Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
Siddhanta Siromani
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भूमिका। भारतवर्ष के जिन ग्यानों में और पाठशालाओं में ज्योतिःशास्त्र के पठन पाठन का प्रचार है, वहां श्रीभास्कराचार्य कृत सिद्धान्त- शिरोमणि को मुख्य ग्रन्थ मानकर प्रायः सभी पढ़ते और पढाते हैं। सिद्धान्तशिरोमणि एक ऐमा उपयोगी ग्रन्थ है, जिसमें आर्यभट से लेकर सब प्राचीन श्राचार्यों के सिद्धान्तमन्थों की अपेक्षा विशेष विषय, निर्मल और सरल रीति से, पूर्वाचार्यों के मतों की अलोचना पूर्वक लिखे हैं । इमी कारण सिद्धान्तशिरोमणि का वहुत प्रचार हुआ। दूमरे सिद्धान्त ग्रन्थों का पठन पाठन लुप्तसा होगया। और भारक- राचार्य का यश देश विदेश सर्वत्र फैलगया। सिद्धान्तशिरोमरिण पर प्राचार्य ने स्वयं 'वासनाभाष्य' नामक व्याख्या भी लिग्बी है, जो मूल ग्रन्थ ही माना जाता है । उसमें सरल रीति से सब उपपत्ति श्रादि विषयों का निरूपण है। यद्यपि गणित- नचचिन्तामणि, मरीचि और वासनाबार्तिक प्राचीन टीका तथा उदाहरण ग्रन्थ भी इमपर बने हैं, तौभी श्राजतक न कोई प्रका- शित हुए न किमी प्रयोजन में ही पाये । वासनाभाप्य से ही सब प्रयोजन सिद्ध होता श्राया है। सप्रितमें सिद्धान्तशिरोमणि का उत्तम संस्करण महामहोपाध्याय श्रीवापूदेव शास्त्री, सी, आई, ई का किया प्रसिद्ध है। शास्त्रीजी ने प्राचीन पुस्तकों से मूलग्रन्थ को भलीभाति शुद्ध करके अपनी नवीन टिप्पणियों से भूषित किया है। ज्योतिषविद्याके विचार बहुतही गहन और सूक्ष्म है । उन के वास्तव ज्ञान में कठिन श्रम और मनोनियोग का बहुत श्रावश्यक है। प्राचार्य ने जो विषय सरल भी लिसे हैं, प्रायः उनको भी समझने में लेश हुश्रा करता है । इस कारण भाषानुवाद करने की इच्छा प्रकट हुई, जिससे विशेप करके पढ़नेवालों को विपय ज्ञान में सहा- यता मिले। दूमरे, प्राचार्य के मुख्य ग्रन्थों में लीलावती और वीज. गणित का उत्तम अनुपाद एक, या दो होगया है, पर मिहान्तशिरो. मणि के अनुवाद का आजतक किसी ने साहस नहीं किया। यह भी .
एक भारी अभाव था। इस प्रभाव को मिटाने और छात्रों की सहायता. के अभिप्राय से यह गोलाध्याय का अनुवाद किया गया है। इरा अनुवाद में प्रभा' नामक संस्कृत टिप्पण लिखा है। उस में केवल कठिन श्लोकों की और कहीं कठिन शब्दमात्रकी व्याख्या लिखी है। फिर भाषाभाष्य' में श्लोकों का अर्थ और उपपत्ति' में सब विषयोंका क्षेत्रदेकर उपपत्ति और गणित, सविस्तर सरलरीति से लिखा है। टिप्पण' में बहुत से श्रावश्यक विषयों का समावेश किया गयाहै। सांप्रत में जो पाश्चात्य विद्वानों ने सिद्धान्त विषयक नवीन- पियों का आविष्कार किया है, जो कि बहुतही अपूर्व और प्रत्येक ज्योतिषविद्याप्रमेयों के मनोनियोग और अध्ययन के लायक हैं, उनका इस अनुवाद में प्रसंग से कहीं कुछ विचार किया गया है। क्योंकि सब विपयों के प्रतिपादन में रखतन्त्र ग्रन्थकी अपेक्षा है। अनु- वाद ग्रन्थों में परिचयमात्र ही होमकता है इमलिए यथास्थान श्राक- पण ( Gravitation ) केपलर के सिद्धान्त ( Kepler's three lars). भूभ्रमण ( En-th's rotation ) किरण वक्रीभवन ( Refraction) काल- समीकरण ( Eration of time ) श्रादि विषयों का विचार, आज कल के नवीन सिद्धान्तियों के कौतुकार्थ और उनकी बुद्धि प्राकृष्ट करने के लिये दिखलाया है। इम प्रकार, सिद्धान्तशिरोमणि के अनुवाद को यथाशक्ति उपयोगी करने में कोई कमी नहीं की गई । जहांतक ज्ञात है, ऐमा अनुवाद कोई नहीं प्रकाशित हुा । अशा है, प्राचीन और नवीन सब रीति, नीति के सिद्धान्तप्रेमीगण, इसको प्रीतिपूर्वक स्वीकार करेंगे और उपयोग में लाकर मेरा उदेश्य सफल करेंगे। यह गोलाध्याय का अनुवाद है। गणिताध्याय का भी, यथा स. म्भा शंघ्र होगा। और उनकी भूमिका में प्राचीन सिद्धान्त और प्राचार्यों के विषय में विशेष बातों का विचार किया जायगा चन्त में, विज्ञ महानुभावों से प्रार्थना कि दोपों को क्षमा करेंगे मान-पण्डितपुरी. ज्योतिराचार्य, योध्या-पश्चिममान्त. २०११।१६ १ ॥१॥ गिरिजाप्रसाद द्विवेदी गोलाध्याय १ पृष्ठम् Lo .... ११ .... 95 .... .... .... ११५ १२२ १५०. प्रकरण सूची। नाम पृष्ठात गोलप्रशंसा। गोलस्वरूपप्रश्नाध्यायः।। भुवनकोशः। .... १८ मध्यगतिवासना। स्फुटगतिवासना, तत्रज्योत्पत्तिः। ११५ छेद्यकाधिकारः। ૨૨૨ गोलबन्धाधिकारः। १५० त्रिप्रश्नवासना ।.... ...: १७६ ग्रहणवासना।.... २१२ दृकर्मवासना।.... २५६ भृङ्गोन्नतिवासना। २७२ यन्नाध्यायः।...: २७८ ऋतुवर्णनम्।.... ३३१ प्रश्नाध्यायः। ३४० ज्योत्पत्तिः। .... १७६ २१२ .... .... २५६ ૨૭૨ .... .... २७८ ३३१ .... .... ४२६ १४ श्रीगणेशाय नम सिद्धान्तशिरोमणिः । : वासनाभाष्यसहितः गोलाध्यायः। अथ गोलाध्यायो व्याख्यायते । गोलाध्याये निजे या या अपूर्वा विपमोक्तयः। तास्ता घालावबोधाय संक्षेपादिवृषोम्यहम् ।। गोलग्रन्थो हि सविस्तरतया प्राञ्जलः । किन्तु अत्र या या अपूर्वा नान्यैरुता उक्तयो विपमास्तास्ताः संक्षेपादिवृणोमि । अत्र या या इति प्रथमान्तं पदं तोस्ता इति द्वितीयान्तं पदं बुद्धिमता व्याख्येयम् । तत्रादौ तावदभीष्टदेवतानमस्कारपूर्वकं गोलं ब्रवीमीत्याह- सिद्धिं साध्यमुपैति यत्स्मरणतः क्षिप्रं प्रसादात्तथा यस्याश्चित्रपदा स्वलङ्कतिरलं लालित्यलीलावती । नृत्यन्ती मुखरगगेव कृतिनां स्याद्भारती भारती तंतांच प्रणिपत्य गोलममलं वालावधोधं चुवे ॥ १ ॥ त्रुवे वच्मि । कः । कर्ताहं भास्करः । किम् । गोलं गोला- 'ध्यायम् । किं विशिष्टम् । अमलं निर्दूपणम् । पुनः किंभूतम् ।
२ गोलाध्याये वालाववोधम् । अविपममित्यर्थः । किं कृत्वा । प्रणिपत्य । प्रणि पातपूर्वकं नमस्कृत्य । कम् । तम् । न केवलं तम् । तां च । स कः। साचका । तदाह । यस्य देवस्य स्मरणात् पुंसां साध्यमभीष्टं क्षिप्रं शीघ्र सिध्यति । सोऽर्थाविघ्नराजः। तथा यस्या देव्याः प्रसादात कृतिनां विदुपां भारती वाणी नृत्यन्ती भारतीय स्यात् । भारती नर्तकस्त्री च । कथंभूता वाणी नर्तकी च । चित्रपदा विचित्रपद- विन्यासा ) स्वलंकृतिः शोभनालङ्कारमुद्राङ्किता | लालित्यली- लावती माधुर्यगुणसंपन्ना । कथं वाक् नृत्यन्तीति चेत् । स्रवदमृत- विन्दुसन्दोहसदृशसुरससुकोमलोक्तिगुणा गद्यपद्यमयी चतुरजन: मनश्चमत्कारकारिणी वाणी नृत्यन्तीव भाति । किं विशिष्ट भारती । मुखरगगा । मुखमेव रको मुखरङ्गः । रहो नृत्यस्थानम् । यस्याः प्रसादात् कृतिनां मुखेप्वेवंविधा भारती स्यात् । सार्थात् सरस्वती।तांचप्रणिपत्येति ।मङ्गलादीनि मालान्तानि चशास्त्रा- एयलकारकृतां मतान्यतः सिद्धिवृद्धिशब्दावाद्यन्तयोनिक्षिप्तौ । ॐ नमःशिवाय। प्रभा। या प्रत्यग्रघनाभापि स्वान्तध्वान्तविनाशिनी। तां परेशी परानन्दकन्दली समुपास्महे ॥ १ ॥ सारभूतार्थविन्यासविकाशितकलेवरा । शिरोमणिप्रभा भातु विदुपा हृदये सदा ॥२॥ अथाचार्यः प्रत्यूहन्यूदोपशमनाय स्वाभीष्टदेवतां नमस्कृत्य प्रति- पाचं प्रतिजानीते । सिटिं साध्यमित्यादि । प्रथम भगवतो विनायकस्य गोलप्रशंसा। ततश्च सरस्वत्याः स्तवनम् । लालित्यलीलावती । ललितस्य मञ्ज. लस्य भावो लालित्यम् । गुणवचनब्राह्मणादिभ्यः कर्मणि चेत्यनेन प्यञ् । तस्य लीला बिलासो विद्यते यस्याः सा । 'लीलाविलासक्रि- ययोः।' इत्यमरः । वस्तुतस्तु नर्तकीपक्षे तलितशब्देन हावविशेष विवक्षितः। तल्लनणं यथा धनञ्जयकृते दशरूपके 'सुकुमाराङ्गविन्या- सो मसृणो ललितं भवेत्' इति । मुखरङ्गगा। ज्यतेऽस्मिन्नितिरङ्गः नाट्यशाला । मुखमेवरझो मुख- रङ्गस्तद्गता । भारती वाणी भारतीव नटीव स्यात् । विभर्ति स्वामिति भरत इत्यत्रोणादिकोऽतच् । ततः स्त्रीत्वविवक्षायां डीप् । शार्दूलत्रि- क्रीडितं छन्दः। श्रीगणेशाय नम । भापाभाष्य। आदिशक्ति का करके ध्यान, यह उपपत्ति समेत महान । भाषाभाष्य किया जाता है, जिससे सशय मिट जाताहै ।। जिसके स्मरणसे शीघ्र कर्तव्यकर्म पूर्ण होते हैं । उन गणेश भगवान को प्रणाम है । और जिसकी कृपासे अनेक भूपणों से सुशोभित, बहुविध चरणों की गति (नाच में ) करनेवाली और मनोहर लीलावाली नटी के भाति वाणी विद्वानों के मुखरूपी नृत्यस्थान मे नाचकरता है, उस सरस्वती भगवती को प्रणाम करके सरल, शुद्ध, गोलविषय को कहताहू ॥१॥ अथ गोलप्रथनकारणमाह- मध्याा ासदां यदत्र गणितं तस्योपपत्तिं विना प्रोटिं प्रौढसभासु नैति गणको निःसंशयो न स्वयम् । गोले सा विमला करामलकवत्प्रत्यक्षतो दृश्यते तस्मादस्म्युपपत्तिवोधविधये गोलप्रवन्धोद्यतः ॥ २ ॥ स्पार्थम् । - गोलाध्याये -- प्रभा। दिवि श्राकाशे सीदन्ति यान्ति ते द्युसदो ग्रहास्तेषां यन्मध्यादिरपष्ट- गृहणोदयास्तशृङ्गोन्नत्यादिगणितं, तस्योपपत्तिं विना वासनामन्तरा, गणकः स्वयं न निःसंशयो भवति प्रौढसभासु प्रौढि प्रगल्भतां नैति । सा वासनागोले विमला निर्दूषणा, करे आमलकइव प्रत्यक्षतो निर्वाधं दृश्यते । तस्मात् उपपत्तिबोधविषये मध्यादि समस्तगणितवासनावग- मननिमित्तं गोलप्रबन्ध उद्यतो गोलग्रन्थनिर्माणबद्धपरिकरोऽस्मीत्यर्थः। भाषाभाष्य। ग्रहों के मध्य, स्पष्ट, प्रहण, उदयास्त आदि गणितों की उपपचि विना जाने ज्योविपी निःसन्देह नहीं होता और अच्छे विद्वानों की सभा में योग्य नहीं गिना जाता । वे उपपत्तियां गोलमें, हाथ में रक्खे हुए मामले की भांति साफ दीखती हैं, इसलिये गोलविपय कहने को उद्यत हूं ।। २ ।। इदानीं गोलप्रशंसया गोलानभिज्ञगणकोपहासं श्लोकदयेनाह- भोज्यं यथा सर्वरसं विनाज्यं राज्यं यथा राजविवर्जितं च । सभा न भातीव सुवकृहीना गोलानभिज्ञो गणकस्तथात्र ॥३॥ वादी व्याकरणं विनैव विदुपां धृष्टः प्रविष्टः सभा जल्पन्नल्पमतिः स्मयात्पदुवभूमगावक्रोक्तिभिः । हीणः सन्नुपहासमेति गएको गोलानभिज्ञस्तथा ज्योतिर्वित्सदसि प्रगल्भगणकप्रश्नप्रपञ्चोक्तिभिः॥ ४॥ स्पष्टार्थम् । प्रभा। भोज्यमित्यादि स्फुटम् । उपजातिवृत्तम् । स्मयात् गर्वात् । पटुबद्ध भूभवक्रोक्तिभिः । पटवश्च ते बटयश्च तेषां या भ्रूभगवक्रोक्तयरता .
- गोलप्रशंसा। मिःहीणो लज्जितः। प्रगल्भगणकप्रश्नप्रपञ्चोक्तिमिः । प्रगल्भाः सदसद्विवेककुशला थे गणकारतेषां याः प्रश्नप्रपञ्चोक्तयस्ताभिः । भाषाभाष्य। जिसप्रकार विना घृत के नानारसका भोजन, राजा के विना राज्य, और विना अच्छे वक्ताके सभा नहीं शोभित होती, इसीप्रकार गोल न जाननेवाला ज्योतिषी शोभा को नहीं पाता। जैसे व्याकरण पढे बिना कोई निडर छान वाद करने को सभामें जाय और उसकी अयोग्यतापर अच्छे छात्रगण भूभङ्ग करके वक्र प्रभ करें तो लज्जित होकर हँसी को पहुँचता है, ऐसेही विज्ञज्योतिषियों की सभा मे गोलसे अपरिचित ज्योतिषी की दशा होती है ॥३॥ ४ ॥ अथ गोलस्वरूपमाह- दृष्टान्त एवावनिभग्रहाणां संस्थानमानप्रतिपादनार्थम् । गोलः स्मृतः क्षेत्रविशेष एप प्राज्ञैरतः स्याद्गणितेन गम्यः ॥ ५ ॥ स्पष्टार्थम् । प्रभा। अवनिश्च भं च ग्रहाश्च तेषां यानि सस्थानानि स्वस्वाकाश- गोलेऽवस्थितयोःतथा मानानि च तेषां प्रतिपादनार्थ विशिष्याभिधानाय दृष्टान्त एव । एप गोलः प्राज्ञैर्विज्ञगणकैः क्षेत्रपिशेप. स्मृतोऽभिहितः। वैशिष्टयं च सरल-चापक्षेत्राभ्याम् । अतो गणितेन गम्यो विज्ञेयः स्या- दित्यर्थः । इन्द्रवज्रावृत्तम् । भापामाग्य। पृथिवी, ग्रह और नझनों के परिमाण और स्थिति यतराने के लिये दृष्टान्तरूप यह गोल क्षेपविशेष है। इसलिये विद्वान रोग इसको गणितद्वारा नान सकेंगे ॥५॥ . "-- ६ . गोलाध्याये इदानीं गणितप्रशंसामाह- ज्योतिःशास्त्रफलं पुराणगणकैरादेश इत्युच्यते नूनं लग्नवलाश्रितः पुनरयं तत्स्पष्टखेटाश्रयम् । ते गोलाप्रयिणोऽन्तरण गणितं गोलोऽपि न ज्ञायते तस्माद्यो गणितं न वेत्ति स कथं गोलादिकं ज्ञास्यति ॥ ६ ॥ स्पष्टार्थम् । प्रभा। । " गणयति ग्रहसंस्थानवशेन शुभाशुभफलं निरूपयतीति गणकः । गण संख्याने, कर्तरि ण्वुल । पुराणाश्च ते गणकाश्च तैः । ज्योतिःशा- स्त्रफलमादेशः, आङ्पूर्वकाद्दिशधातो वे घञ्, शुभाशुभकीर्तनमिति कथ्यते । स प्राक्तनशुभाशुभादेशः लग्नबलाश्रितः। लग्नबलादिक फलितभागोक्तमत्रावसेयम् । लग्नवलादि च स्पष्टखेटाश्रयम् । खेटाश्च गोलाश्रयिणः गोलशास्त्रावलम्बिनः । तथा गोलज्ञानं गणितैकगम्यं तरमायोजनः गणितं न जानाति स गोलं विज्ञातुं नालङ्कीणो भव- तीति तत्त्वार्थः) अत्र लग्नबलादि यत्पष्टखेटाश्रयमित्युक्तं तत्रेदमनुस. न्धेयम् । दृष्टादृष्टभेदेन गणितस्य दैविध्य तावच्चतुरस्रम् । तत्र 'अह- टफलसिद्धयर्थ यथार्कायुक्तितः कुरु । गणितं यद्धि दृष्टार्थ तदृष्टयुद्धव तः सदा ॥ तथा 'अदृष्टफलसिद्धयर्थ निर्बीजार्कोक्किमेवहि ।' इति तत्त्वविवेकीयकमलाकरोतया महर्षिदर्शितपथानुसारिण एव स्फुटाः खेटाः फलादेशायोपयुज्यन्ते नतु सांप्रतिकोपलब्धसंस्कारसंस्कृताः । निर्याजाकॊक्तमित्युक्तयातन्निरासात् । फलविषयेऽनापगणिताहीकारे बहुत्र श्रौतस्मातकर्मानुष्ठानसमयादिपु विप्लवः संजायते । तस्माद्धर्मा- भिमानिभिः सुधीभिः सकलं परीक्ष्य निष्कण्टकः पन्था अनुसरणीयः।
गोलप्रशंसा। तत्तत्मस्कारोत्पन्नाः खेटास्तु केवलं ग्रहणोदयास्तादिदृष्टगणित एवो. पयुज्यन्ते । दृष्टगणिताभिमानिनोऽदृष्टगणितोन्मूलनाय बहुधा विव- दन्ते । परमुभयोः स्वीकारेणैव निर्वाहो नत्वन्यतरस्याङ्गीकारेणेत्य- न्यत्र विस्तरः। भाषाभाष्य। प्राचीन ज्योतिपीलोग ज्योति शास्त्र का फल शुभाशुभ का आदेश कहते हैं अर्थात् शुभ अशुभ ववलाना ही उसका मुख्य प्रयोगन है । वह आदेश लग्न और प्रह बलके अधीन है । और ये दोनो स्पष्ट ग्रह के आधार पर हैं, स्पष्ट ग्रह + गोल + दृष्ट और घदृष्ट के भद से गणित दा प्रकार का ह । दृष्ट जो अाग्दों से दसानाय, जैसे प्रहरा, उद यारत, युति थोर भट्टोनति प्रादि । और अष्ट जो देग्दने में न पाते, जसे तिथि, योग श्रादि । महरा थादि के देखने से ही उसका फल होता है पार प्रत उपवाम श्रादिका फ्ल विना देखेही होता है । फलका श्रादश केवल ऋषियों के अनुभव सिद्ध वाक्यों से होता है । जो कुछ ग्रहों की स्थिति के अनुसार फल लिखा उपलब्ध होगा, मनुष्य वही जान सकेगा । इम फ्स की फल्पा ऋपियों के सिवाप पोई नहीं कर और जान सरना। धार्ष प्रों में जो ग्रह स्पष्ट बनाने की रीति हे उसी रीति से स्पष्ट क्येि प्रह फ्लादेश में उपयुक्त हैं। क्योंकि उन्हीं स्पष्ट प्रदों के श्रापारपर भौत और स्मात कों के समय भी है। इसलिये उसी गति में जो तिथि श्रादि सिद्धद्दों उहीं से धर्मव्यवस्था और उसका पाचरण करना उचित है। साप्रत में युरोप के विधनोंने सूक्ष्मर नारा बहुत से नवीन सस्कार निश्चित किये हैं और उनका महीं में उपयोग लाकर सूक्ष्म-स्पष्ट प्रह सिद्ध करते हैं । इम सष्ट निति को लेकर अंग्रेजी गणित विशारद पानकल कई एक पश्चादों में ग्रह स्पष्ट सिद्ध करके उनसे तिथि यादि का साधन करते हैं पार उसी के अनुसार धर्म न्यवरपा करते हैं। परन्तु यह सर्वया अनचित और धर्म में बाधा डालना है । क्योंकि पार्षगणित क यनु सार जब एकादशी श्रादि का उपसास प्रादि सिद्ध होगा उस काल में इस नवीन सूक्ष्म गपित से उसका सिद्ध होना असम्भव होगा। इसप्रकार ऋषियों के वचन में बाधा पड़ने से धर्म का निसव होगा । ऋषियों के वाक्य उन्हीं की रीति पर चलने से घट सकेंगे। इसने सर है रि धर्मव्यवस्था क लिये ऋषिप्रोक्त गनि काही श्राश्रय उचित है। नवीन वेधतिद्र सरकारों को ही प्राचीन प्रपों में बीज' नाम से तिरा ह । यार देथले प्राचीनाने इसका साधन भी किया है । परन्तु इस वीम को प्रहमादि दृष्ट गशिव के टीक समयमान के लिये उपयुक्त किया है । अदृष्ट गपिन में, धानरलकी तरह, नहीं घुमता । इसलिये पानकल के युगेर के नये सस्कार केवल दष्ट गपित में उपयुक्त है। उसमें इसका उपयोग लेने से काई बाधा नहीं है । क्योंकि इमरी च्या स्थाही इसीप्रकार से चाचार्य ने की है। जैसा एफलामिप निनामरदि। गपिन पद्धि दश तहयुद्भयत सदा ।।' अर्थात् घाट गमित के तिरे काल निर्षीन, सूक्त, मूर्यनिशान के गरित्र का पाथर करना चाहिय और रए गणित के लिये निसम टी पाराय और गधित कारवाद हा उमी म सदा शिकाना चाहिये। इसमकार निपएरात और धर्मदिसे यह रिद प्रियेक विनाररान पुरुषों को, ए और प्रष्ट शित उक्त नियमों के अनुसार मा चाहिये । केन एमप या ही धारणों की नाह मास मानना महापाचिन र मय का अपर परदा है। ।
. - गोलाध्याये के आश्रित हैं । और गोलविपय गणित के बिना नहीं जाना जाता । इसलिये जो गणित नहीं जानते वे गोलको कैसे जानेंगे १ ॥६॥ इदानीं ज्योतिः शास्त्रश्रवणाधिकारिलक्षणमाह- दिविधगणितमुक्तं व्यक्तमव्यक्तयुक्त तदवगमननिष्ठः शब्दशास्त्रे पटिठः। यदि भवति तदेदं ज्योतिपं भूरिभेदं प्रपठितुमधिकारी सोऽन्यथा नामधारी ॥ ७॥ स्पष्टार्थम् । प्रभा। अव्यक्तयुक्तं व्यक्तमुक्तं पाटी, चीजं चेत्यर्थः । तयोरुभयोर्यदव- गमनं विज्ञानं तन्निष्ठः समारूढः तथा शब्दशास्त्रे पटिष्ठः, अतिशयेन पटुः पटिष्ठः । 'पतिशायने तमविष्ठनौ' इति इछन् । निष्णात इत्यर्थः। यदि एवंविधो भवति तदा स इदं ज्योतिपं भूरिभेदं, भूरयो भेदाः यस्मिन् । प्रपठितुमध्येतुमधिकारी समर्थों भवति, अन्यथा प्रियं ज्योतिपमधीते' इति नामधारी भवति नतु वस्तुतोऽध्ययनक्षमीभवतीति तात्पर्यम् । मालिनीछन्दः। भाराभाय। जो प्य और अन्य (अर्धा लीलावती, बीजगणित ) न दो प्रकार के गणितों को जानताहो और व्याकरण में दन हो, यह इस अनेक भेदयुक्त पोतिष पो पदने । भपिधारा। नहीं तो फेवट नामधारी ही है ।।७।। अथ व्याकरणवर्णनमाह- यो वेद वेदवदनं सदनं हि सम्यम् ब्राह्मणाः स वेदमपि वेद किमन्यगास्त्रम् । यस्मादतः प्रथममेतदधीत्य धीमान गामान्तरस्य भवति श्रवणेऽधिकारी || स्पष्टाधम् ।
गोलप्रशंसा। ६ । प्रभा। यः ब्रामयाः सरस्वत्याः सदनं स्थानं वेदवदनं वेदानां वदन- मित्र वदनं व्याकरणशास्त्रं 'शब्दशास्त्रं मुखं ज्योतिषं चक्षुपी' इत्या- दिगणिताध्याये प्रतिपादनात् । सम्यगशेषतः वेद वेति स वेदमपि 'विद्यन्ते ज्ञायन्ते लभ्यन्ते वा एभिर्धर्मादिपुरुषार्था इति वेदाः 'प्रत्यक्षा- नुमानागमेपु (प्रमाणेपु) अन्तिमोवेदः' 'समयबलेन सम्यकपरोक्षानु- भवसाधनं वेदः 'अपौरुषेयवाक्यं वेदः' इत्यादिविविधलक्षणनिर्वाच्यं वेद, किमन्यशास्त्रम् । समस्तवाङ्मयाधारभूतस्यापौरुषेयम्य वेदम्य ज्ञानकृते प्रथमं व्याकरणमेवाध्येतव्यम् । एवं व्याकरणज्ञानेनैता- देशस्यमहतोऽगम्यस्य वेदस्यापि ज्ञानं भवति, का कथा पुनस्तत्र तदु- पजीव्यस्य शास्त्रान्तरस्येति । 'इष्टप्राप्त्यनिष्टपरिहारयोरलौकिकमुपायं यो वेदयति सवेदः' इत्येकेनैव वाक्येन कृष्णयजुर्भाष्पभूमिकायां सायणेन घेदस्यव्युत्पादनलक्षणे झुक्के । तत्र प्रमाणत्वेन च- 'प्रत्यक्षणानुमित्या वा यस्तूपायो न बुध्यते । एतं विदन्ति वेदेन तस्मादेवस्य वेदता।' इति वचनं चोपन्यस्तम् । किंच 'मन्त्रबाहाणमित्याहुः' इति बौधायनीय तथा 'मन्नवाह्मणयोर्वेदनामधेयम्' इत्यापस्तम्बोक्तं विमृश्य 'गन्त्र- ब्राह्मणात्मकः शब्दराशिर्वेद' इति विविधनपञ्चोपन्यासान्ते ग्भा- प्यमूमिकायां सायणेन सिद्धान्तितम् । तग्मात्सर्व एव सायणमतानु- गामिनो मन्त्राणां ब्राह्मणानां च वेदत्वं मन्यन्ते इति स्फुटं प्रतिफलति । भापाभाग्य। जो सरम्पती का स्थानभूत ' गणशास्त्र यो भगेभाति जाना है पर वेदको गोलाध्याय हो जानसकता है, और शाखों की तो वातही क्या है। इसलिये बुद्धिमान लोग पहिले व्याकरण पढ़ले तो शास्त्रान्तर को सुनने लायक होते हैं ॥ ८ ॥ अथात्मनो गोलग्रन्थस्य प्रवृत्त्यर्थमन्योक्तिप्रकारणाह- गोलं श्रोतुं यदि तव मतिर्भास्करीयं शृणु त्वं नो संक्षिपो न च व वृथाविस्तरः-शास्त्रतत्त्वम् । लीलागम्यः सुललितपदः प्रश्नरम्यः स यस्माद विद्धन् ! विदरसदसि पठतां पण्डितोक्ति व्यनक्ति ॥९॥ स्पष्टार्थम् । इति गोलमशंसा। प्रभा। अनेनाचार्यः स्वगोलग्रन्थस्यान्योतया प्रशंसातिशयं प्रकटयति । लीलागम्यः लीलया अनायासेन गम्यो चोध्यः । सुललितानि रम- गीयानि पदानि यस्मिन् सः । विद्वत्सदसि पठतामुच्चरतां जनानां विशिष्टवैदुप्यं व्यअयतीत्यर्थः । मन्दाक्रान्ता इन्दः । इति प्रभायां गोलप्रशंसा । भाषामाय। है पति ! यदि तुम्हारी मा गोपिय मुनने पी है तो भाकगनार्य- मृग मुनो। यह गत संमिन है और न व्यर्थ विरही है और शाम्रा पत्यभूग, है। उसमें सर पद और मस हैं। यह महल में आगयना है। और पण्डिता की सभा में पढ़ने से पण्डिलाई प्रपट पाना है ॥९॥ गोलप्रमापा ममार हुआ। में TM में प्रोग-११।
पापस्मरूपमन्नान्याया। अथ भूसंस्थानप्रश्नं श्लोकद्धयेनाह- भ्रमद्भचक्रचक्रान्तर्गगने गगनेचरैः। वृता धृता धरा केन येन नेमियादधः ॥ १ ॥ किमाकारा कियन्माना नानाशास्त्रविचारणात् । कीदृग्दीपकुलादीन्द्रसमुद्रमुदितोच्यताम् ॥ २ ॥ इयं भूगगनेचरैः खेचरैर्वृता केन धृता सती गगने परितो. वर्तमानेऽधोनेयान गच्छेत् । कथमियं गगने स्थितेत्यवगतम् । यतो भ्रमद्भचक्रचक्रान्तर्वर्तते । भानां चक्रं समूहः भचक्रमेव चक्र भचक्रचक्रम् । यदि भूमेद्धारपरम्पराङ्गीक्रियते तदा समन्ता- दर्तमानघनभचक्रस्याधारे स्खलितस्य भ्रमणं नोपपद्यत इत्यर्थः । तथा च सा भूः किमाकारा कियन्माना दीपानां कुलाचलेन्द्राणां च कीदृगवस्थानमिति सर्व नानाशास्त्रविचारणात् । बौद्धादिग तिवादिपक्षमधरीकृत्योच्यतामित्यर्थः । प्रमा। न इयात् । इरणगतावितिधातोःकर्तरि लिङ्। न गच्छेदिति । तथाच फिमाकारा, किम् आकारो यस्याः सा । कीदृशाकारवती । एवं किय. न्माना, किं परिमाणमस्येति कियत् 'किमिदंभ्यां वोघः' इति वतुप, किमः क्यादेशः । इति नानाशास्त्रविचारणात्, तत्तद्वादिमतनिरूपण परीक्षणपुरःसरमुच्यताम् । तथा द्वीपैर्वक्ष्यमाणजम्बूप्रभृतिभिः कुला- द्रीन्द्रैः कुलपर्वतैः समुद्रेश्च कीदृक् क इवेति विग्रहे किन् प्रत्यये 'इदं • किमोरीश्की, इति क्यादेशे सिद्धम् । मुद्रिता पिहितेत्युच्यतामिति प्रश्नः । एते प्रश्ना श्राचार्येणैवोचरिताः तेऽये फुटीभविष्यन्ति । अनुष्टुपदन्यः।
गोलाध्याये
भापामाप्य ।
-
यह पृथ्वी ग्रह नक्षत्रों से वेष्टित, भ्रमण करतेहुए राशिचक्र के भीतर, आकाटा
ग वैगे ठहरी है जिससे नीचे नहीं गिरसक्ती ? इसका स्वरूप और मान ग्या
है ? इसपर द्वीप, पर्वत, समुद्र किस प्रकार स्थित हैं ? यह विविध शासों के
विचारपूर्वक कहो।
इन प्रश्नों के उत्तर 'पागे प्राचार्य ने स्वयं लिखे हैं ॥ १॥२॥
इदानीं ग्रहस्फुटीकरणोपपत्तिप्रश्नान् श्लोकदयेनाह
संसिद्धाद् ागणाझुगादिभगणैःखेटोऽनुपातेन यः
स्यात् तस्यास्फुटता कथं कथमथ स्पष्टीकृतिर्नेकधा ।
किं देशान्तरमुद्गमान्तरमहो बान्तरं किं चरं
किं चोचं मृदु चञ्चलं च तदिदं कस्तात पातः स्मृतः ॥ ३ ॥
कि केन्द्रं किमुकेन्द्रजं किमु चलं किंवाचलं तत्फलं
कस्मात्तत्सहितः कुतश्च रहितः खेटः स्फुटो जायते ।
किं कर्म तथोदयास्तसमये देधा विदयुर्वधाः
सर्व मे विमलं वदामलमलं गोलं विजानासि चेत् ॥ ४॥
अत्र किं देशान्तरमुद्गमान्तरमित्यादि यत्पृष्टं तत्सर्वं मे विमलं
यथां भवति तथा वद । यद्यमलं ब्रह्मादिसुकविरचितं गोलमलम-
त्यर्थ विजानासि । शेपं स्पष्टम् ।
भाषाभाष्य।
'पिया
युगभगणों से अहर्गा पगाकर अनुपातद्वारा जो प्रह सिद्ध किए जाते है वे
घरपुर क्यों होते हैं ? और स्पष्टीकरण एकविध पयों नहीं है ? देशान्तर, उदया-
मगर, गुजान्तर, घर, मन्दाग, शीत्रोश और पात पिसे पहरे हैं । येन्द्र.
११ मन्दोन्द्र और शीतपेन्टफ्त क्या है ? ग्रहमें इसको क्यो जोड़ते, घटान हैं
जिससे स्पष्ट होजाते हैं १ चौर उदय क्मिा प्रस्तराल में श्रया और अक्षभेद मे
धर्म दो प्रकार क्यो परिटतों ने कहा है ? यदि तुम भलीभानि गोल जागते
तो यह सत्र गको यही । इन सा प्रग्ना ये उतर गागे निग॥१५॥
गोलस्वरूपप्रश्नाध्यायः। अथ त्रिप्रश्ने दिनमानभेदप्रश्नं श्लोकदयेनाह- महदहः किमहो रजनीतनु- दिनमणौ गणकोत्तरगोलगे। ननु तनुर्दिवसो महती निशा वद विचक्षण दक्षिणदिगगते ॥ ५ ॥ भवति किं द्युनिशं युनिवासिनां झुमणिवर्पमितं च सुरदिपाम् । पितृपु किं शशिमासमितं तथा युगसहस्रयुगं दुहिणस्य किम् ॥ ६ ॥ स्पष्टम् । प्रभा। अहो गणक ! उत्तरगोलगे मेपादिराशिपट्के वर्तमाने दिनमणी दिनस्य मणिरिव दिनमणिः सूर्यरतस्मिन् । महदहः दीर्घ दिन, तनुः स्वरपा रजनी किम् ? कथं भवतीत्यर्थः । हे विचक्षण! विशेपेण चष्टे इनि । दक्षिणदिग्गते तुलादिराशिषट्के स्थिते दिनमणौ दिवसरतनुः महती च निशा कथं भवतीति वद कथय । धुनिवासिनां दिवि निव. सन्ति ते शुनिवासिनस्तेपाममराणां, सुरद्विषां, सुरान् द्विपन्ति सुरद्विषः किप, तेषां धुनिशमहोरात्रं द्युमणिवर्पमितं सौरसमामितं किं भवति । तथा पितृपु तदेशेषु शशिमाममितं चान्द्रमासप्रमाणकं धुनिशं किं कधं जायते । द्रुहिणस्य ब्रह्मणः युगसहस्रयुगं द्विसहस्रयुगमितं युनिशं किमिति सर्व वद । द्रुतविलम्बितं छन्दः । भापाभाग्य। हे गगक ! जय गौ उत्तरगोल में रहगाह पर दिनाहा और गनिदोटी क्यो गोलाध्याये होतीहै ? और दक्षिणगोल में छोटादिन, वड़ीरात्रि क्यों होती है ? देवता और दैत्यों का अहोरात्र सौरवर्प के तुल्य और पितरों का पान्द्रमासके तुल्य क्यों होताहै ? और ब्रह्माका दिव्य दोहजार युगोंका अहोरात्र क्यों होताहै ? इन प्रश्नों के उत्तर आगे त्रिप्रश्नवासना में लिखे हैं ॥ ५ ॥ ६ ॥ अथ राश्युदयभेदपश्नमाह-; भवलयस्य किलार्कलवाः समाः किमसमैः समयैः खलु राशयः । समुपयान्त्युदयं किमु गोलविन् न विपयेप्वखिलेष्वपि ते समाः ॥७॥ स्पष्टम् । प्रभा। भाना राशीनां वलय मण्डलं भवलयं क्रान्तिवृत्तमित्यर्थः । तस्य समा हादशभागाराशयोऽनासमयैरतुल्यैः समयैः किमु उदयं समुपया- न्ति.प्राप्नुवन्ति । हे गोलवित् ! ते राशयः अखिलेष्वपि विपयेपु.सकल. देशेषु समा न भवन्ति । किमत्र कारणमिति प्रश्नः । भाषाभाष्य। हे गोला ! क्रान्तिवृत्तके सगान बारह हिस्से द्वादशराशिरूप तुल्यकालमें क्यों नहीं उदय होते है और ये उदय सनदेशों में समान क्यों नहीं होते ? उत्तर त्रिप्रश्नवासना में लिसे हैं ॥ ७ ॥ इदानीं युज्याकुज्यादिसंस्थानप्रश्नं वृत्तानाह- झुज्याकुज्यापमसमनरागावलम्बादिकानां विद्धन गोले वियति हि यथा दर्शय क्षेत्रसंस्थाम् ।। स्पष्टार्थम् । भाषाभाप्य। . पुन्या, कुग्या, शान्ति, समशन, अप्रा, अक्षांश और सम्मांश इनसरी थापा में सी-स्थिति है पैमाही गोसमें क्षेत्र स्थिति यहो ।
गोलस्वरूपप्रभाध्यायः। यह सब अक्षक्षेत्र के अवयवभूत हैं इनका प्रतिपादन त्रिप्रश्नवासना में कियाजायगा॥ इदानीं चन्द्रार्कग्रहणयोर्दिकालभेदायुपपत्तिप्रश्नान सार्धश्लोकेनाह. तिथ्यन्ते चेद्ग्रह उडुपतेः किं न भानोस्तदानी- मिन्दोः प्राच्यां भवति तरणेः प्रग्रहः किं प्रतीच्याम् ॥ ८ ॥ लम्बनं बत किंकाच नतिर्मतिमतांवर तत्संस्कृतिस्तिथौ वाणे किं ते सिद्धे कुतः कुत्तः ॥ ६ ॥ अत्र किल प्रप्टुरयमभिंगायः । चन्द्रग्रहणे भूभाग्रहणकीं। पौर्णमास्यन्ते भूभेन्दोस्तुल्यवाद्युतिर्भवितुमर्हति । एवं सूर्यग्रहे चन्द्रश्चादकः । दर्शान्ते तयोस्तुल्यत्वाद्योगेन् भवितव्यम् । अत उक्तम् । तिथ्यन्ते चेद्ग्रह उडुपतेः किं न भानोस्तदानीमिति । बत अहो गणक लम्बनं नाम कि नतिश्च का । तत्संस्कृतिस्तिथी वाणे च किम् । लम्बनेन तिथिः संस्क्रियते नत्या किं वापश्च । तथान्यः प्रश्नः । ते सिद्धे कुतः कुतः इति । ते लम्बनावनती कुतो हेतोः कुतः पृथिव्याःसाधिते। भूव्यासार्धन साधितेत्यर्थः। तथेन्दोः प्राच्यां दिशि स्पर्शः। किं खेः प्रतीच्यामित्यादि सर्व वद । प्रभा। तिथिः सूर्याचन्द्रमसोदिशांशान्तरभवः कालः। वा, तनोति वि. स्तारयति चन्द्रकलामिति तिथिः, बाहुलकादिथिन् कृते सिद्धम् शुल- पक्षादितः पूर्णान्तं यावच्चान्द्रमसी,कलाप्रतिदिनमेककलावृद्धयोपचिता जायते । अत एव श्रमादिपौर्णमारयन्ता या एव शशिनः कलाः। ति. थयस्ताः समाख्याताः' इति तन्त्रोक्तं तिथिलक्षणं संगच्छते । एवं द्वितीया-तृतीयादितिथिनाम कलावृद्धिक्रमेणैव व्यवहृतं कलायास्ति- थेश्च पर्यायवाचकत्वात् । पूर्णान्तं यावत्सलावृद्धया तिथ्यन्तश्च स - गोलाध्याये एवोदीर्यते । तस्मिन् तिथ्यन्ते उडुपतेः उडूनांपतिरचन्द्रस्तस्य ग्रहणं भवति तदा भानो रवः किं कस्मान्न जायते ? चन्द्रग्रहणं पूर्वतः प्रारभ्यते रवेश्च पश्चिमतः किमिति ? किं तावल्लम्बनं का च नतिः ? लम्बन संस्कारस्तिथौ नतेश्च शरे किमिति विधीयते किंच ते लम्बनावनती कुतो भूमेः कुतः करमात सिद्धे इति प्रश्नः । मन्दाक्रान्ता छन्दः । भापाभाष्य। - + पूर्णा को चन्द्रग्रहण तो होताहै पर सूर्यग्रहण क्यों नहीं होता ? चन्द्र- ग्रहणमें पूर्वदिशा में और सूर्यग्रहण में पश्चिमदिशा में स्पर्श क्यों होता है ? लम्बन और नति किसे कहते हैं ? तिथि में लम्बन और शर में नति का सं. स्कार क्यों कियाजाता है ? लम्बन और नति भूव्यासार्थ से क्यों सिद्ध किए गए हैं ? यह सब क्तलायो॥ ८॥९॥ अथ शृगोन्नती चन्द्रशुक्लस्य क्षयवृद्धिप्रश्नमाह- शुक्लस्य दिजराज एप महसो हान्या कुवृत्तः कुतः सवृत्तत्वगतोऽप्यहो भ्रमभवादोपातिसमादिव ।। संप्राप्याथ पुनस्त्रयोतनुमतस्तस्याश्रयेणेव किं . शुक्लस्य क्रमशस्तथैव महसो वृद्धयेति सद्वृत्तताम् ॥१०॥ अहो गणक एप द्विजराजश्चन्द्रः सदवृत्तत्वं गतोऽपि पोर्ण- मास्यां मुवर्तुलतां प्राप्तोऽपि कुतो हेतोः कुवृत्तः कुवतुलो भवति । भ्रमभवादोपातिसङ्गादिव । दोपा रात्रिः। तथा पर्णिमास्यां सक- लया सकलस्यापि चन्दस्य यः सहः सोऽतिसहः तत्सङ्गानन्तरं शुक्लस्य तेजसो हानि याति तथा हान्या कुवृत्तः कुत्सितवृत्तः स्या दितीय प्रतिभाति । यथा दिजराजो ब्राह्मणोपि सदवृत्तत्वं सदा + चन्द्रप्रहरा इमेशा शिपमही नहीं होना । यी दपर उपर भी रोनायापरता है। यह यात धर्म रसायनमा भूग -' इस श्लोर माय में मट है। प्रधान भूमा र पमा गरमा पर गादगे पगमा सिट सम्मान मेहगाई।
गोलस्वरूपप्रश्नाध्यायः। चारवं गतोऽपि भ्रमभवाचित्तचलनसंभवाद्दोपातिसङ्गात् पापाति- सहाच्छुक्लस्य शुद्धस्य तेजसो हानि याति । तमा कुत्सितवृत्तः स्यात् । अथ पुनस्त्रयीतनुमादित्यं प्राप्य ततोऽनन्तरं शुक्लस्य तेजसो वृद्ध्या तथैव सदृत्ततां सुवर्तुलतां प्राप्नोति । तस्य भगवत- स्त्रयीतनोराश्रयेणैव । यथा कुवृत्तो ब्राह्मणस्त्रयीतनुं त्रैविधं पपत्रै- विद्यमेववेति स्मृत्युक्तं पपामन्यं ब्राह्मणं प्राप्य तेन कृतानुग्रहस्ते. जोवृद्धि तथा पुनः सुवृत्ततामेतीत्यर्थान्तरम् । इति सिद्धान्तशिरोमणिवासनाभाप्ये मिताक्षरे गोलाध्याये गोलस्वरूपप्रश्नाध्यायः। प्रभा। अहो गणक एप द्विजराजः द्विजानां राजा द्विजराजः । राजारः सखिभ्यष्टजिति समासान्तष्टच् । चन्द्रः सवृत्तत्वगतोऽपि पूर्णिमायां पूर्णवर्तुलोऽपि महसः शुक्लस्य तेजसः हान्या क्षयेण भ्रमभवादोपा- तिसङ्गादिव, भ्रमोऽप्रमात्मकज्ञानसहकनः कामायनेकविधश्चित्तविक्षे. परतदुयो यो दोषायाः रात्रेरतिसङ्गः समागमस्तस्मादिय कुतः करमा- देतोः कुवृत्तो विषमवृत्तः संजात इत्यर्थः । पूर्णानन्तरं प्रतिदिन चन्द्रमसःशुक्लस्यापचयदर्शनापूर्णिमामगाजनितदोपादिव चन्द्रशुल- क्षय इत्युत्प्रेक्षा । अथ पुनन्वयीतर्नु, त्रयी वेदा एर तनुः शरीरं यग्य सः । त्रयीविद्यया भगवन्तं त्रयीमयं सूर्वमात्मानं यजन्न नि भाग- घतात्तथा त्रयीमयोऽयं भगवान् ' इत्यादिसूर्यसिद्धान्तलाय सूर्य एर यातनुरिति स्फुटम् । तं सूर्य प्राप्य महसः शुक्लप क्रमशः वृद्ध्या,दर्श सूर्याचन्द्रमसोोगोभवति दर्शान्तानन्तरं च शुरूग्य क्रमशो गोलाध्याय वृद्धिर्भवति । तस्य त्रयीतनोराश्रयेणैव सद्वृत्तता पूर्णवर्तुलाकारता. कि कथमेति प्राप्नोति। एवं हिजराजो ब्राह्मणोऽपि सद्वृत्तत्वं रत्वं गतोऽपि प्राप्तोऽपि भ्रमभवः प्रमादजो यो दोपस्य पापस्यातिसङ्गः समागमस्तेन महसः शुक्लस्य ब्रह्मतेजसो हान्या न्यूनीभावेन कुवृचः नीचाचार सन् भगवन्तं त्रयीतर्नु दिवाकरमाराध्य तन्महिम्ना महसः शुक्लम्य तेजसो वृद्धयोपचयेन पुनः सवृत्ततां सुदशामेतीत्यर्थः । एवं पक्षद्वयेऽपि स्फुटोऽर्थः । इति प्रभायां गोलरवरूपप्रश्नाध्यायः। भापाभाष्य।. हे गणक ! यह चन्द्र पूर्णविम्य ( पूर्णा को ) होपर भी निज शुरूता की हानिसे, मानो चित्ती चञ्चलता से रात्रिसङ्गमसे ही, फैसे शीण होगया ? और फिर सूर्य को (अमा को ) पाकर मालूम होता है उसीके श्राभय सेही प्रमसे निज शुलता की वृद्धिमे पूर्णविम्ब होजाता है । यह क्या घातहै ? ऐसे द्विजराज, प्रामण सदाचारी होपरभी नानाविध दोषों के सहसे अपने ब्रह्मतेज की हानिसे पुदशापो पहुँचता है। और फिर सूर्यदेव की प्राराधना से भमसे निज प्रशतेज को पाकर सदापारी यहलाताहै । यह प्रश्नशृनोग्नसिका है।।१०॥ गोलत्वम्पप्रभाध्याय समाप्त हुआ। अथ प्रथमप्रश्नस्य पृथ्वीसंस्थानस्योपपत्तेरुत्तरं विवक्षुरादिस पृथिव्यादीनांतत्त्वानामादितत्वं निखिलजगज्जननेकवीज पर ब्रह्म मनसा प्रणिपत्यादो तावत् तज्जयमाह- यस्मात्क्षुब्धप्रकृतिपुरुपाभ्यां महानस्य गर्भ ऽहंकारोऽभूत् सकशिखिजलोय॑स्ततः संहतेश्च । ब्रह्माण्ड यज्जठरगमहीपृष्ठनिछादिरचे- विश्वं शश्वज्जयति परमं ब्रह्म तत्तत्त्वमाद्यम् ॥ १॥ .
भुवनकोशः। जयति सर्वोत्कण वर्तते । किं तत् । परं ब्रह्म । भादि तत्वं यत् । किं विशिष्टम् । यस्मात् क्षुब्धप्रकृतिपुरुपाभ्यां सकाशान्म- हानभूत् । महतोगर्भेऽहंकारोभूदित्यादि । अत्रैतदुक्कं भवति । सां- ख्यादियोगशास्त्रेपु श्रुतिपुराणेपु चादिसर्गे यथोदितं तदत्रोच्यते। तत्र प्रकृति माव्यक्तमव्याकृतं गुणसाम्यं कारणमित्यादयः प्र- कृतेः पर्यायाः। तस्याः प्रकृतेरन्तर्भगवान सर्वव्यापकः पुरुषोऽस्ति । सत्त्वं रजस्तम इति सर्वे गुणास्तुल्या एव सन्ति । अतएव तद्गु- रणसाम्यम् । तथा प्राकृतिके पूर्व प्रलये लीनस्तत्राव्यको व्यापकः कालोऽप्यस्ति । यदास भगवान वासुदेवः परब्रह्माख्यः सिसृक्षुभ- वति तदा तस्मात् संकर्पणाख्योऽशो निर्गत्य प्रकृतिपुरुपयोः सन्निधिस्थयोः क्षोभं जनयति । ताभ्यां धुब्धाभ्यां महानभूत् । महान वै युद्धिलक्षण इति । तन्महत्तत्त्वं बुद्धितत्वं चोच्यते । यन्महत्तत्वं स प्रद्युम्ननामा भगवतोंऽशः तस्य महत्तत्त्वस्य विकुर्वा- णस्य गर्भेऽहंकारोऽभूत् । सोऽनिरुद्धनामा । त एते वासुदेव- सकर्पणप्रद्युम्नानिरुद्धा इति मूर्तिभेदा वैष्णवागमे विशेपतः प्रसि- द्धाः । सोऽहंकारो गुणवशेनं त्रिधाऽभवत् । यः सात्त्विकः स वैकारिकः । यो राजसः स तेजसः । यस्तामसः स भूतादिः। यथोक्त विष्णुपुराणे- 'वैकारिकस्तैजसश्च भूतादिश्चैव नामसः । त्रिविधोऽयमहंकारो महत्तत्त्वादजायत ।।' तत्र यस्तामसोऽहंकारः स भूतादिः । तस्मात् पञ्चमहाभूतान्य- भवन् । कानि तानि भूतानि खकशिखिजलोयः । खमाकामाम् ।
गोलाध्याये को वायुः। गिखी अग्निः जलसुदकम् । उर्वी पृथ्वी । एतानि भू- तानि स्वस्वगुणपूर्वकाण्यभूवन् । शन्दस्पर्शल्परसगन्धा इत्याका- शादीनां मुख्यगुणाः। तत्राहकाराच्छन्दतन्मात्रम् । गुणस्याति- सूक्ष्मरूपावस्थानं तन्मात्रशब्देनोच्यते । शब्दतन्मात्रादाकाशम् । आकाशात्स्पर्शतन्मात्रम् । तस्मादायुः वायोस्पतन्मात्रम् । तस्मात् तेजः। तेजमो रसतन्मात्रम् । तस्माज्जलम् । जलाद्न्ध- · तन्मात्रम् । ततः पृथ्वी । एवमाकागादीन्यकोत्तरगुणान्यभवन् । अध च नेपां गुणानां शब्दादीनां ग्राहकाणीन्द्रियाणि । श्रोत्रं त्वक् चक्षुपी जिदा नासिका चेति पश्बुद्धीन्द्रियाणि । वामा णिपादगुदमेवाणीति पनि कमन्द्रियाणि । अधोभयात्मकं मनः । नहीन्द्रियः मानन्गेण गुणग्रहण कषु शस्यते । अतस्तद- विटानागे दंयाः। 'दिगातागतोऽश्यियादीन्द्रोपेन्द्रमित्राः। इनि मोनन्दिया दिनः सनो चायः । नक्षुषोः जि. माया नमानामिश्याभिननिया याचोऽग्निः यादग्न्द्रिः । पारगाम्पिमा. मंदार प्रजापतिः। मनमश्चन्दः। शान्तिवाटिनाः | नर चानीन्द्रियाणि नानि तेजनाद- मिारा विधागा- नमामिलामा किन पानमा प्रदेश पाकिस्मृनाः ॥ नमन । परमपनानां त्वानां निनावानपिनने वृद्धवृद्धा भुवनकोशः। कारं ब्रह्माण्डमभवत् तज्जठरे पद्माकारा मही । तत्र कर्णिकाकासे मेरुस्तत्पृष्ठनिष्ठश्चतुर्वदनः कमलोद्भवस्तस्मात् सदनुजमनुजादि- त्यदैत्यं विश्वमभवत् । यस्मादाद्यतत्त्वात् परब्रह्मणः क्षुब्धप्रकृति- पुरुपाभ्यां महदादिपरंपरासमुदायोत्पादितब्रह्माण्डजठरगतजग- तीजलजजनितादिरश्चेरिदं विश्वमभवत् । शश्वदनवरतम् । तस्य ब्रह्मणोऽवसानेऽन्यो ब्रह्मान्यज्जगदित्यर्थः । अतस्तदाद्यं तत्त्वं जयति । प्रभा। तदाद्यं तत्त्वं परमं ब्रह्म जयति । यस्मात् क्षुब्धप्रकृतिपुरुषाभ्यां, सुन्धौ संक्षोभमधिगतौ यो प्रकृतिपुरुपौ ताभ्याम् । प्रकृतिः, प्रकर्पण सृष्टयादिकं करोतीति विग्रहे प्रपूर्वकात्कृधातोः कर्तरि तिच् । 'सत्त्वं रजस्तमश्चैव गुणत्रयमुदाहृतम् । साम्यावस्थितिरेतेपां प्रकृतिः परि- कीर्तिता।' इति लक्षणविशिष्टा सत्त्वरजस्तमसां साम्यावस्थितिरूपा भगवतो मायाख्या शक्तिः। साहि मूलप्रकृतिरविकृतिर्महदाद्या प्रकृति विकृतयः सप्तेति श्रीमदीश्वरकृष्णोक्तसांख्यकारिकावचनेन विकारर- हिता सृष्टिनिदानभूता जड जगद्रूपा च । अनया पुरुषस्य जीवात्मरूपस्य संक्षोभेण महत्तत्त्वं बुद्धितत्वमभूत् । ततोऽहंकारः समुत्पन्नः । तस्मात् खकशिखिजलोwः श्राकाशाहायुयोरग्निरग्नेरापोऽद्भ्यः पृथिवीति कमेण गुणस्यैकोपचयेन, शब्दगुणसहितमाकाशं, शब्दस्पर्शगुणव- यसमेतो वायुः, शब्दस्पर्शरूपात्मकगुणत्रयसमेतोऽग्निरित्थं पञ्चमहा- भृतान्युत्पन्नानि । ततः संहतेच आकाशादितत्त्वानांसमुदायाद् ब्रह्मा- ण्डं ब्रह्मणो जगत्स्रष्टुरण्डमभवत् । यस्य जठरगता मही, तस्याः पृष्ठनिष्ठो विरञ्चिविधाता वर्तते। यतः विश्वं रथावरजङ्गमात्मकमभवत। R + गोलाध्याये एवंविधः परमं ब्रह्म शश्वदनवरतं जयति सर्वातिशयेन वरीवतेत इत्यर्थः । सूर्यसिद्धान्तानुरूपोऽयं सृष्टिकमः । भापाभाष्य । वह श्रादितत्त्व परब्रह्म सदा सर्वोपरि है । जिसके द्वारा प्रकृति और पुरुप मे क्षोभ होनेसे महत्तत्त्व की उत्पत्ति है। और महत्तत्त्व से बहकार और उससे आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी की उत्पत्ति है + और इन सयों से ब्रह्माण्ड की उत्पत्तिहै, जिसके भीतर पृथ्वी के पृष्ठपरं ब्रह्मा विराजते हैं, जो कि विश्व के की हैं ॥१॥ इदानीं भूमेः स्वरूपमाह- भूमेः पिण्डः शशाज्ञकविरविकुजेज्यार्किनक्षत्रकक्षा- वृत्तैर्वृत्तो घृतः सन्मृदनिलसलिलव्योमतेजोमयोऽयम् । नान्याधारः स्वशक्यैव वियति नियतं तिष्ठतीहास्य पृष्ठे निष्ठं विश्वं च शश्वत्सदनुजमनुजादित्यदैत्यं समन्तात् ॥२॥ सर्वतः पर्वतारामग्रामचैत्यचयश्चितः । कदम्बकुसुमग्रन्थिः केसरप्रसरैरिव ॥३॥ योऽयं मृदनिलसलिलव्योमतेजोमय इति पाश्चभौतिको भूमेः पिण्डो वर्तुलाकारस्तदहिस्थैः शशाङ्कादिकक्षावृत्रावृतः सन्नन- न्याधारः स्वशक्तयैव नियतं निश्चितं वियत्याकाशे तिष्ठति । त- स्पृष्ठनिष्ठं च जगत् ।सदनुजमनुनादित्यदैत्यम् । दनुजा दानवाः । मनुजा मानवाः । आदित्या देवाः। दैत्या अमुराः । तेः समेतं समन्तात् तिष्ठति । शेपं स्पष्टार्थम् । + प्रकृति उसे कहते हैं जहा सत्व रज और तम ये तीनों गुण समानरूपमे वर्नमा हो। वह प्रकृति विकाररहित और ना जगरूप है । उमरी पुरुष (जीवामा) का सयोग होने से, प्रमम महन्, अहहार, एकादश रद्रिय, पवन मात्र (जो गुण सूक्ष्मरूपमे वर्तमान रहनाई उसे 'तमार' शादसे व्यवहार करती यह रास्ता र तह ) और पथमहाभूत यो गृष्टि है । यहा प्राचायो मुष्टिक्रम सन्यिदर्शी और संगरियपतो रे अनुसार लिग्गाहे । .
भुवनकोशः। प्रभा। न विद्यते अन्यः आधारो यस्य सः। स्वशक्तयैव वियति नियतं निश्चितं तिष्ठति । सर्वतः परितः। चैत्यं यज्ञायतनभेदः। एतेषां चयैः समुदायश्चितो व्याप्तः । केसरप्रसरैः किंजल्कैः कदम्बकुसुमग्रन्थिरिव वर्तते । एतदुक्तं भवति । यथा कदम्बकुसुमग्रन्थिः केसरैः परितो व्याप्तो भवति तथैव भूरपि समन्तात्पर्वतादिभिश्चितास्तीति । मूगेः पिएड इति स्रग्धरा छन्दः। भापाभाष्य। यह भूपिण्ड, चन्द्र, बुध, शुक्र, रवि, महल, वृहस्पति, शनि और नक्षत्र कक्षाओं से आवृत है + यह मृत्तिका, अग्नि, जल, आकाश और तेजमय है । इसका कोई आधार नहीं है केरल अपनी शक्ति से स्थित है । इसके पृष्ठपर सदा असुर, मनुष्य, देव और दैत्य आदि के सहित विश्व स्थित है। कदम्ब पुष्प की ग्रन्थि जैसे केसरों से व्याप्त रहती है वैसे ही पृथ्वी चारों तरफ से पर्वत, वगीचा, ग्राम, यज्ञशाला आदि से व्याप्त है ॥२-३ ॥ + भूमियो केद्र मानकर नीचे लिग्न क्रमसे ग्रह बार नक्षता की कहा वृत्ताकार मानीगई है। 1 अ. उ.मा. भा. म. भूमिः २४ -- गोलाध्याये इदानीं पुराणेषु भूमेराधारपरंपरा या पठिता तां निराकुर्वन्नाह- मूर्ती धर्ता चेद्धरित्र्यास्ततोऽन्य- स्तस्याप्यन्योऽस्यैवमत्रानवस्था । अन्ते कल्प्या चेत्स्वशक्तिः किमाये किं नो भूमेः साष्टमूर्तेश्च.मूर्तिः ॥ ४ ॥ स्पष्टम्। प्रभा। पुराणेपु शेषकूर्मवाराहादयो ये हि भुवोधारकत्वेन प्रदिष्टास्तन्नान- वस्थादोपं लक्ष्यीकृत्याचार्यरतन्निरूपणपूर्वकं स्वमतमादिशति । चेद्ध- रित्र्याः पृथिव्याः मूर्तः साकारो धर्ती कल्प्येत तदारयधर्तुरप्यन्याधा- रस्तस्याप्यन्य एवं परंपराकल्पनयानवस्थितिः स्यात् । चेदन्ते स्वशक्तिः कल्प्या यदियं नान्याधारा किन्तु स्वशक्तथैवस्थितारित तदा प्रथममेव किमिति न निराधारा कल्प्यते । किं सा अष्टमूर्तेः शिवम्यैका मूर्तिः नो ? अपितारत्येव । एवं निराधारकल्पनायां को दोष इति फलितम् । किच सूर्यसिद्धान्ताधार्पनिबन्धेपु- मध्ये समन्ताइण्डस्य भूगोलो व्योम्नितिष्ठति । विभ्राणः परमां शक्ति ब्रह्मणो धारणामिकाम् ।। परनु गायन में यूरिया मन से काम लिए 171 मत म पृषी सन श्रीरमा दिन है । पीनादिरा गर्यो क (Illo entir) भ्रमय हाता है । ना पकटर भ्रमण यग्नई व प्रह है और ना भूक (Geocentrie) भमर पाल रे व उपप्रट है ना चद्रमा और तप हो की पहा दावृत्तामार है । उग में वे रान मागमा यग्न है । यदानों के सीतारार होने में शाय प्राण है। डाका परणीय महा सम्मान पान में नाम प्रसार हर काम गति प्रममे है . . धनकाशा इति लेसेनापि ब्रह्माण्डमध्ये 'केन्द्ररूपाकाशे बहोणः परमां शक्ति निराधारावस्थानरूपां धारयन भूगोलस्तिष्ठतीति सिध्यति । एवं स्वशक्तिरेव,भुवः स्थितौ निदानमिति निश्चित समितिकसववादिसम- जम् । शालिनी छन्दः। भापामाय। यदि भूमि किसी साकारवस्तु के श्राधारपर स्थित है तो उस आधार का भी कोई श्राधार होना सम्भव है । यो एक वस्तु का दूसरा त्रावार कल्पना करते जायें तो अनास्थिति होजायगी यदि अन्त में निजशक्ति की कल्पना की जाय तो यह पहिले से ही क्यो न मानी जाय ?स्या भूमि अष्टमूर्ति शिवकी एक्मूर्ति में से नहीं है ? इसप्रकार स्वशक्ति से ही पृथ्वी स्थित है। पुराण मे जो शेप, कूर्म आदि आधार कल्पना किया है वह दोपग्रस्त है । सूर्यसिद्धान्त प्रादि प्रार्पग्रन्थों में भी स्वशक्ति से ही भूमि का ठहरना माना जैसा 'मध्येसमन्ताहरडस्य भूगोलो व्योग्नि तिष्ठति । चिप्राण परमा शक्ति ब्रह्मणो गरणात्मिकाम् ॥ ॥ ४ ॥ इदानीं कथमियं भूमेः स्वशक्तिरित्याशब्दां परिहरन्नाह- यथोष्णतानिलयोश्च शीतता विध/ दुतिः के कठिनत्वमश्मनि । मरुचलो भूरचला स्वभावतो यतो विचित्रा वत वस्तुशक्तयः ॥ ५ ॥ आकृष्टशक्तिश्च मही तया यत् सारथं गुरु स्वाभिमुखं स्वशक्तया । आकृप्यते तत्पत्ततीव भाति समे समन्तात् क पतत्वियं खे ॥ ६ ॥ पूर्वश्लोकः सुगमः । आकृष्टशक्तिश्च महीत्यनेन भूमेरधः प- तनं तत्तिर्यगधःस्थितानां चाधःपतनशहा निरस्ता। . * .
गोलाध्याय - प्रमा। यथा अर्कानलयोरुष्णता, विधौ शीतता, के जले द्रुतिवत्वं, अ. श्मनि पापाणे कठिनत्वं, 'मरुद्वायुश्चलः तथा स्वभावतः स्वरूपेण भू'चला यतो वस्तुशक्तयो विचित्राः सन्ति । स्वत एवैतेषां वस्तुनामिय शक्तिरस्ति। मही धरा प्राकृष्टशक्तिराकर्पणशक्तिवती तया खस्थं गुरु वस्तु स्व- शक्तया स्वाभिमुखमाकृप्यते तहस्तु समे पतति इव भाति । इय भूः खे समन्तात्क पततु ? न कापीति भावः। भापाभाप्य। जैसे सूर्य और अग्निमें उम्णता, चन्द्रमा में शीतलता, जर मे द्रवत्व ( बहना पापाण में कठोरता, वायु में चचलता, वैसे ही पृथ्वी मे स्थिरत्व स्वभाव से ही है इन कारणों से ज्ञात होताहै कि वस्तुयी शक्तिया विचित्र हैं । इससे पृथ्वी में जं ठहरनेकी शक्ति है यहभी संभाव सेही है। पृथ्वीमें प्राकर्पणशक्ति है, उम से श्राकाः में फेंकी हुई भारी वस्तुओं को अपनी तरह सींचती है और यह भारी वस्तु गिरर हुई दृष्टिमें यातीहै । परन्तु पृथियी यहीं नहीं गिर सही। क्योंकि आकाश सयतर समान है और भूगोल के उपर सब दिशाओं में गनुष्य प्रादि निवास परते हैं । फि यदि यह पृथिवी नीचे जातीहुई गानें तो यह कहा पडेगी ? + यह मत यौर फा है, प्राचार्य ने प्रागे इममा सएटा पिवाद । + बौद्धलागों का मत है कि पृथिवी निरागर ता र पर बना दी जाती है । पारि काल में कोई गुरूपदा ठहर नहीं समा यो पृपा माना टहरा ! लिए यह निय चि पो च माती है । इमी पान यो दूर पराप लिए चाचा 'सम गमत'-यादि निशा । यो सरा गुजारी करेंगे सिरपुर द तर पाया पर यह की परऔर मिपुरनियाग लगा घर परा पर रिना पडेगार समस्पनन प्रार यमशिनियागभी श्रापमम पर परमपरा तो सर नरक समाा, रिद नाना त हा पदगी ! प्रकार युािर से पानमसन प्रमभूगी। । -- - उपपत्ति। (आकर्पणशक्ति) शक्ति अग्निश्वर पदार्थ है । इस प्रक्ति के प्रभावसे सारा विध बद्ध होरहा है । किसी वस्तुम शक्तिमा प्रयोग करदेने के पार जातक उसमे वाधक शक्तिका सयोग न होगा, यह पदार्थ शक्ति के अधीन रहेगा । शक्तिका परिचय चुम्यासे सहज में होजाताहै । इम चुन्नक का प्रभान पटुत कम है, पर पाकर्षणशक्ति का प्रभाव व्यापक है । इसका विचार अंग्रेजी गोलग्रन्थों में खूब है । यहा पृथिवी के श्राकर्पणशक्ति का प्रभाव दिसलाना है । पृथिवी में जो पाक. पणशक्ति है उससे वह अपने आसपासके पदार्थों को सींचा करती है । पृथिवी के • समीप में प्राकर्षणशक्ति बहुत अधिक होती है और जिसप्रकार दूरी बढ़ती जाती है, वैसे ही वह घटती जाती है । किसी स्थान से भारी ओर हलकी वस्तु पृथ्वापर छोडीजाय तो दोनो समान कालमें पृथ्वीपर गिरेंगी, यह न होगा कि भारी वस्तु पहिले गिरे, परन्तु दुरी समान होनी चाहिए। कभी कभी वायु आदि पाधक शक्तियों से हलकी चीजों के पतनकालम अन्तर पडा करता है । इन बातों की परीक्षा जल, स्थल, पर्वत जहा चाह होम- कती है, फतमे कोई अन्तर नहीं पडता । परन्तु जितनेही उचे पर परीजा की जायगी प्रार्पणशक्ति में उतनीही कमी होगी। परीक्षा के लिए न्यूटनने चन्द्रमा फा उपयोग किया है । चन्द्र पृनी से गरीय अढ़ाई तास मीलकी दृरीपर है वहां के पदायों को भी पृथ्वी अपनी तरफ साचती है । पर दरसे गिरनेवाले पदार्थों का वेग उतना नहीं होता जितना कि पृथ्वी के पास से गिरनेवालों का हुमा करता है, क्योकि पाकर्पणमक्ति का प्रभाव समीप में अधिक रहताहै । जमे दुरी बढती जायगी पेमेही र बीमा आकर्षण कम होगा जायगा । यह चात सहज है जैसे दीपक्से कोई दूर हटता जाय तो उनको मानन पड़ता है कि प्रकाश कम होता जाता है, या ही गुस्त्यापर्पण पा नियम समगना चाहिए । गु. रत्यार्पण के प्रभाव में प्रकाश को भाति दूरी के वर्गमा विपरीत विकार होताहै । पृवीका घरातल केन्द्र से ४००८ मोदी रीपर है । यदि कोई पदार्थ धरातलमे ४००० मालपर रक्या जाय तो उसपरा दरी केन्द्र मे दरी प्रा. ८००० नीत होने के लिए ATT तुला।
- भुवनकोशः २६ मार्गका व्यासार्धरूप है । पर वास्तव में यो नहीं होता, अन्तर पडता है । अन्तर भी प्रत्येक ग्रहमें न्यूनाधिक होता है । जग्तक केन्द्र न बदलैगा, तबतक व्यासार्थ, की दूरी कैसे बढ़ घट सकती है ? इन्हीं कारणों को सोचकर केपलरने घडे परि- श्रमसे 'ग्रहोंके मार्ग अण्डाकार वा दीर्घवृत्ताकार सिद्ध करके नियम कायम किए हैं । ये अण्डाकार + मार्ग प्रार्पणशक्ति के प्रभावसे उत्पन होते है । यह नीचे लिसे क्षेत्र में मालूम होसकता है। च ट - 'सू' सूर्यचिह्न है । इसके चारों तरफ वृत्ताकाररेग्या पृथ्वी के सूर्य प्रदक्षिणाका मार्ग है । पृथिवी जर 'क' चिह्नपर भ्रमणकरतीहुई पहुँची और 'स' सरलरेसा के तरफ चलने लगी उसी समय सूर्यकी केन्द्राकर्पणशक्ति से 'कच' वृत्ताकार मार्ग मे जापड़ी जोकि वास्तव मे दीर्घवृत्ताकार है । इसीप्रकार 'च' चिह्नपर पहुँचकर 'चट' मार्ग में आकृष्ट होती है । यो प्रागेभी समझना चाहिये । यो सूर्य के प्रारूपए + अण्डाकार दार्घवृत्त कहते हैं । इसमें दा नियन पिन्टु दाते है। उनले शाम (rocus) पहते हैं । उनयी दूरी वृत्ती परिधि के दिनी विदुने जियत होती है । इस दीर्घवृत्तरेत्रम फ, +निपतविदु सा पोत्स हैं । इमलिए प+=TT; । इस ऐन र पिप नियमादि गाद (Conic section ) नामक अयमें हैं । 4 (A फ गालाध्याय और निज निज केन्द्रशक्ति के प्रभावसे ग्रहगण सूर्यकी क्रमसे प्रदक्षिणा कियाफरते हैं। और पृथ्वी के चारों तरफ चन्द्रमा भ्रमण किया करता है । जब आकर्षणशक्ति सिद्धहुई तो उसकी दिशाभी अवश्य होगी। रस्सी से किसी चीज को खींचनेसे रस्सी खिंचावकी दिशामें होती है। इसीप्रकार मान लिया जाय कि मह भी किसी अदृश्य रस्सी से सिंचे जाते हैं । केपलर साहबका मतहै कि प्रह तुल्य क्षेत्रफल तुल्य समय में चलते हैं । इसी मतसे न्यूटन ने लिखा है कि इस अदृश्यरस्सी ( आकर्पणशक्ति ) का सिंचाव सूर्यकी तरफ है । अर्थात् श्राकर्षण- शक्ति की दिशा प्रहाँ से सूर्य को तरस है । जब ग्रह अपने मार्ग में भिन्न भिन्न स्थानों में होते हैं तय इस शक्ति में न्यूनाधिक्ता होती है । यह बात केपलर के प्रथम सिद्धांत से सिद्ध होसकती है, जो कि अभी लिसा जायगा । अय, जय कि प्रहाका मार्ग दीर्घवृत्ताकार है, भाकर्पणशक्ति की दिशा सूर्य की तरफ है, और सूर्य- दीर्घवृत्त के किसी एक केन्द्र में वर्तमान है, तो यह मानना पड़ेगा कि आपर्प- रणशक्ति उसी हिसावसे घटै वढ़ेगी जिस नियमसे प्रहकी सूर्य से दूरीके विपरीत वर्ग में कमी वेशी होती है । यह सिद्ध है कि प्रार्पणशक्ति ग्रहोंको सूर्यकी तरफ खीचती है और श्राफर्पाको न्यूनाधिकता में दरीफे विपरीत वर्ग का प्रभाव होता है केपलर ने ग्रहों के विषय में प्रथम तीन नियम निकाले थे, जिनपो पिलरये नियम' या ( Kapler's three Lan3) कहते हैं। जो भाकर्षण राति के नियम हम लिसनुके हैं वे इन नियमा पेठी श्राधारपर स्थित हैं । इन्हीं के यलसे न्यूटनने अपनी रिसीपिया' नामस्मन्य में उतशति के विषय में विचारशक्षित को बढ़ाया है । समइ. सूर्य के चारो तरफ दीर्घवृत्त गे अमण पर दें, यो गर्य दीर्घयचके भीतर सिद्ध हुा । येपलर पहने है कि सूर्य दीर्घत्त के दो पेन्द्र मा मोकामों में में (नोट गे पीछे हम नियतदिन्दु या फोरम दिसता ) पिसी एक पर गहना है इसप्रकार प्रथम नियम सिद्ध हुआ फि- (१) हरएष प्रा. दीर्घवृत्त में सूर्य के ग्रामपाम भ्रमण परत है । और गाये। - मुवनकोशः। गति और दूरी मे कम होती है । सामान्य दूरी पर मध्यममान से गति होती है ऐसेही ग्रहों की भी गति है। व स - इस क्षेत्र में 'स' सूर्यका स्थान है । श्रय, कप दो विन्दु वा तुल्यभाग हैं। अय यदि अवस, अपक क्षेत्रफल तुल्य है तो वन, पक दूरी चलने में तुल्य काल ल- गैगा । यदि कोई क्षेत्रफल बड़ा है तो गति में क्षेत्रफल के अनुसार घदी बढ़ी होगी इसप्रकार संक्षेपरूप से क्षेत्रस्थिति का विचार करने से केपलरका दूसरा सिद्धान्त सिद्ध हुआ कि- (२) प्रत्येक ग्रह सूर्य के पासवाले बिन्दुपर ऐसे वेग से भ्रमण करते हैं कि यदि उस बिन्दु से सूर्यतक सरलरेखा खींची जाय तो तुल्य क्षेत्रफल तुल्यकाल में चलेगी। फेपलर ने लिखा है कि प्रत्येक ग्रहों के वर्ष भिन्न भिन्न होते हैं । निज कक्षा मे भ्रमण करतेहुए ग्रह कभी सूर्य के पास कभी दूर हुआ करते है । अधिक और मि. कट दूरीका आधा मध्यममान से दूरी होती है । ग्रहोंका सूर्य प्रदक्षिणाकाल उनका वार्षिक समय कहाजाता है मध्यममान से दूरी और वार्पिककाल में सम्बन्ध है । जिनकी* सूर्य से मध्यममान की दूरी अधिक होती है उन ग्रहों के वर्ष भी बड़े होते हैं । इन सब विचारो से सिद्ध हुमा कि- ( ३ ) क्सिी ग्रह के वार्षिक समय के वर्ग का, उसकी मध्यममान की दूरी के . • घनके साथ सम्बन्ध होता है । यही केपलरका तीसरा सिद्धान्त है । अव यह विषय समाप्त कियाजाता है इसका विचार वटुत सूक्ष्म और बड़ा है । यहां सब लिम्बना कठिन है ।। ५।६ ॥
३२ गोलाध्याये इदानी बौद्धादियुक्तिमाह- भपअरस्य भ्रमणावलोका- दाधारशून्या कुरिति प्रतीतिः। सस्थं नं दृष्टं च गुरु क्षमातः खेऽधः प्रयातीति वदन्ति पौद्धाः ॥ ७ ॥ दौ द्वौ रवीन्दू भगणी च तद- देकान्तरौ तावुदयं ब्रजेताम्। यदब्रुवन्नेवमनम्बराद्या प्रवीम्यतस्तान प्रति युक्तियुक्तम् ॥ ८ ॥ भूमेः समन्तादर्तमानस्य भपञ्जरस्य भ्रमणान्यथानुपपत्त्या नि- राधाराभूरिति तेषां प्रतीतिरभूत् । तथाकाशस्थं गुरु वस्तु किमपि न हटम् । अतो भूरधो यातीति योद्धा वदन्ति । यथा नौस्थो नावं गच्छन्तीमपि न वेत्ति तथा भूस्थो जनो न वेत्तीति । तथा दो सूर्यो। दो चन्द्रमसो। चतुप्पश्चाशन्नक्षत्राणि । चतुर्भुजस्तम्भनिगो मेरुः । एकान्तरकोणस्थो सूर्यो मेरुकोणवशेनेकान्तरी तावुदयं गच्छत इति जैनाश्चात्रुवन् । . प्रमा। अत्राचार्यणेव बौद्धानां जैनानो च मते स्फुट व्याख्यातम् । कि वृथा लेखगौरवेण । 'अईयो कें द् द्वौ छावे कान्तरोदयौ किल तौ। यद्ययमर्कसूत्राकिंध्रुवचिहभ्रमत्यहा ।। इतिपञ्चसिद्धान्तिकायामाचार्य वाराहमिहिरोऽपि । भापाभाव। नक्षत्रमएष्ट्रल पृथ्वी के ऊपर नीचे भ्रमणकरता हुआ देखा जाता इससे पृथिवी साधारशून्य है ऐमा विश्वास होता है। क्योंकि यदि श्राधार होता तो नक्ष मण्डल -
"
भुवनकाशा
- उसमें अटक जानेसे सदा एकाकार न घूम सकता। आकाश में भारी वस्तु नहीं ठह-
रती इससे पृथिवी आकाशमे नीचे को गिरती है, ऐसा बौद्धलोग कहते हैं । दो सूर्य
और दो चन्द्र हैं, वे एक एक करके अन्तर से उदय होते हैं ऐसा दिगम्बरजैन
कहते हैं, इसलिये हम उनको युक्तिसहत उत्सर कहते हैं ॥ ७१८ ॥
इदानीं तेषां युक्तिभङ्गमाह-
भूःखेऽधः खलु यातीति बुद्धिर्बोद्ध मुधा कथम् ।
जाता यातं तु दृष्ट्वापि खे यक्षिप्तं गुरु क्षितिम् || १ ||
यदि भूरधो याति तदा शरादिकमधं क्षिसं पुनर्भुवं नैष्यति ।
उभयोरधोगमनात् । अथ भूमेभन्दागतिःशरादेःशीघ्रा तदपि न।
यतो गुरुतरं शीघ्र पतति । उर्व्यतिगुर्वी। शरादिरतिलघुः। रेबो-
द्वैवं दृष्ट्वापि भूरधो यातीति बुद्धिः कथमियं तव वृथोत्पन्ना।
प्रभा।
अयमर्थः। यदि बौद्धानां मते धराऽधो याति तदा यत्किमपि वस्तू-
धं तितं चेन्न कदापि तया सह संमिलेदुभयोरेकदिपतनाद्भुवोगुरु-
वाश्चान्यापेक्षया द्रुततरपतननियमात् । अतो बौद्धामामित्थं जल्पनं
नादरणीयमिति।
4
।
भापाभाष्य।
भरे बौद्ध ! कोई भारी वस्तु ऊपर फेंकने से वह तुरत पृथ्वीपर गिरती है, ऐसा
देखकरभी पृथिवी आकाश में नीचे जाती है यह मिथ्याशान तुम्हें कहा से हुया ?
तात्पर्य यह है कि यदि भूमि आकाश में नीचे जातीहै तो ऊपरसे कोई चीज छोड़ीनाय
वो उसका पृथिवी से कभी मेल न होगा। क्योंकि भूमि अधिकभारी होने से बड़े
वेग से नीचे जायगी। परन्तु ये सब वाते प्रत्यक्ष और युक्ति से विरुद्ध हैं ।। ९॥
इदानी जैनयुक्तिभङ्गमाह-
किंगण्यं तव वैगुण्यं द्वैगुण्यं यो वृथा कृथाः।
भान्दूनां विलोक्याला ध्रुवमत्स्यपरिभ्रमम् ॥ १० ॥
गोलाध्याये यदा भरणीस्थो रविर्भवति तदा तस्यास्तमयकाले ध्रुवमत्स्य- स्तिर्यस्थो भवति । तस्य मुखतारा पश्चिमतः । पुच्छतारा पूर्व- तः। तदा मुखतारासूत्रे रविरित्यर्थः । अथ निशावसाने मुखतारा परिवर्त्य पूर्वतो याति । पुच्छतारा पश्चिमतो याति । ततो मु. खतारासूत्रगतस्यैवार्कस्योदयो दृश्यते । अतो दो द्वौ सूर्यावि- त्यनुपपन्नम् । अत उक्तं किंकिमेकं तव वैगुण्यं गण्यम् । येन ध्रुव मत्स्यपरिभ्रमं दृष्ट्वापि भार्केन्दूनां द्वैगुण्यमङ्गीकृतम् । भापाभाष्य। अहोरात्र में ध्रुवमत्स्य का भ्रमण देखकर भी जो तुम दो सूर्य और चन्द्र मानते हो, ये सब तुम्हारे दुर्गुण कहांतक गिर्ने उपपत्ति। ध्रुवतारा से कुछ दूरीपर पुज़रूप ध्रुव पुच्छतारा रहती है । वह ध्रुवके चारों तरफ अहोरात्रमे एकयार भ्रमण करती है । सूर्यास्तके याद ध्रुव बिन्दु से पश्चिम दिशामे दिसलाई देती है । और प्रात काल घूमकर पूर्वदिशा में रहाफरती है। उस स्थान से रविके उदयस्थानतक जो एक रेखा कल्पना कीजाय तो मालुम होता है कि रवि उसी पिन्दुपर उदय को प्राप्त होता है । इसप्रकार ध्रुवकी मुखतारा में उदय चौर पुच्छतारा में अस्त पापाश में प्रत्यक्ष देखने में श्रायाकरता है। इस स्थिति मे यदि दो सूर्य कल्पना किये जायें तो उनके उदय को सङ्गति किस प्रकार सम्भव होसकती है । इसलिये दिगम्बर जैनी ने जो अपने प्रन्थ में दो चन्दा दो मुज्जा' आदि और ५४ नक्षत्र चतुर्भुजस्तम्भ के समान मेर जो लिखा है यह बिल्कुल असङ्गत युक्ति और प्रत्यक्ष से विरुद्ध है + रात्रि में मातों की परीक्षा करके अपना विश्वास दृढ़ करना चाहिये ॥१०॥ - - +भापतिो लिखा कि- र पतनया स्थितिरति नान्या नभस्यगोत्र यति ना। दौरादू हिगुमा भमरया चतुर्भुजस्तम्भनिम व मेहम् ।।"
भुवनकोशः। दानी भूगोलस्य समतां निराकुर्वन्नाह- यदि समा मुकुरोदरसन्निभा भगवती धरणी तरणिः क्षितेः। उपरि दूरगतोऽपि परिभ्रमन किमु नरैरमरैखि नेक्ष्यते ॥ ११ ॥ यदि निशाजनकः कनकाचलः किमु तदन्तरगः स न दृश्यते । उदगयं ननु मेरुस्थांशुमा- कथमुदेतिच दक्षिणभागके ॥ १२॥ पूराणे भूः समादर्शीदरसन्निभा कथ्यते। तन्मध्ये मेरुः । परितो जम्बूद्वीपं लक्षयोजनव्यासम् । तद्वहिर्लक्षप्रमाणः क्षाराम्भोधिः। ततोन्यवीपं लक्षद्वयम् । ततःसमुद्रस्ततोऽन्यद्वीपम् । दीपादरी- पंदिगुणम् । समुद्रात्समुद्रो द्विगुणः। एवं यत्सप्तमं पुष्फरदीपं त. मध्ये मानसोत्तरपर्वतो वलयाकारोऽस्ति । तन्मस्तकोपरि रविर- पचक्र लक्षयोजनान्तरं विपुवदिने भ्रमति । उत्तरगोले तदुत्तरतो दक्षिणगोले दक्षिणत इति । अथ युक्तिरुच्यते । यदि समा भूस्तदा तदुपरि दूरगतो रविभ्रमन किमस्मदादिभिर्न दृश्यते । सततं देव- रिव । यदि मेरुणान्तर्हितो रविस्तहि मेरुः कथं न दृश्यते । यदिमे- तिटानिःसृतस्यास्योदयस्तर्हि प्राच्या उत्तरत एवार्कस्योदयेन भवितव्यम् । यतो मेरुरुत्तरतः। अथ कथं दक्षिणभाग उद्गच्छन्द रयते । अतो भूमेः समतायामिदं नोपपद्यत इत्यर्थः । प्रभा। वासनाभाष्ये यदत्राचार्येणाख्यातं तदेवालम् | जम्बूप्रभृतिद्वीपसं- गोलाध्याये निवेशाधखिलं भागवतविष्णुपुराणादिपुराणेपु खण्डशः समुपलभ्यते । भुयो गोलाकारत्वं नारङ्गफलानुरूपमापदण्डाकारानुविद्धं सांप्रतिकैः सिद्धान्तितम् । गोलाकारानङ्गीकारे विप्रतिपत्तयश्चारुतया प्रदर्शिताः सन्ति । किंच देशभेदेन योऽतांशविभेदः समुपलभ्यते स गोलाकारा- न्यतराकारस्वीकारे न स्यात् देशभेदेन व्युदयकालभिदापि न स्यात्। एवं मेरोदिनरात्रिकर्तृकत्वमपि न घटते प्रत्यक्षतो गोलविरोधाच वस्तुतो वेदतो मुवो गोलाकारत्वमेव लभ्यते । यत्तु पुराणेप्वन्यथान्यथा' प्रतिपाद्यते तत्प्रातिभासिकस्वरूपदृष्टयेति युक्तमुत्पश्यामः। भापाभाष्य। यदि भूमि दर्पण की भांति समान है तो सूर्य पृथिवी के ऊपर यहुत दूरीपर भ्रः भण करता हुआ जैसे देवताओं को छ:मासतक दीखता है वैसेही मनुष्यों को क्यों नहीं दिसलाई देता ? यदि मेरु रात्रिका कारण है तो मनुष्यों को यह क्यों नहीं उनके और सूर्य के बीच में दीसता? यौर मेरु पर्वत उत्तर मे स्थित है, फिर सूर्य दक्षिणगोल में क्यों उदय होता है । तात्पर्य यह है कि यदि मेरुको आडमें रवि छिप जाय तो मेर के उत्तरगोल में रहने से उसके किनारे से उदय होता पूर्व या उत्तर हो सूर्य दिखलाई देगा। पर यह दक्षिणायन में दक्षिण में उदय होता दीसता है क्योंकि मेरु फे दक्षिणभाग में छ:माम सूर्य रहता है । इसलिये मेरुको यस्तकारण मानना गोलविरुद्ध है। उपपत्ति। पृथिवी का भाकार नारंगी के समान फुल भएडाफार में युरोपियन ज्योतिषियों ने माना । जिसे ( Oblate Spheroid ) नामसे विन्यात करते हैं । धियी दोनों मौके पास कुछ चिपटी है । यह एक भागमें १३ मील निश्चय नाह। यदि २३ माइल दोनों ध्रुपोंके पास अधिक स्थान होता तो ठीक गोलाकार पृथिवी हो जानी । भुयोंके पाममें चिपटी होनेफा और भी प्रमाण है । मध्याहपृशके चापडी सम्याई दो स्थानों में निश्चय करने से मध्यममान से ६११. मोल ठहरी है। यह पाप एक अंशको तम्याई सममनी पाहिये । यो यो पाईन्धानों में पर्गका करने ६८.७४. .... . " .... भुवनकोशः। से फलमें कुछ थोड़ा अन्तर पड़ता है । और ध्रुवके पास नाप करने से एक अंश की लम्बाई विषुववृत्तकी अपेक्षा कुछ अधिक होती है । इससे ज्ञात होता है कि विषुवरेखाके पास भूमिकी वक्रता ध्रुवस्थानकी अपेक्षा अधिक है। और भिन्न भिन्न स्थानों के अक्षांशों में एक एक अंशकी लम्बाई आपस में समान नहीं होती। जैसे- विषुव रेलापर मील अक्षांश २० ६८.७८६ ६८.६१३ ६९.२३० ६९.३८६ इसप्रकार भूमिके नारंगी के समान आकारकी दृढ़ता सिद्ध होतीहै । यही आकार युक्ति सिद्ध होने से, सब प्राचीन और नवीन आचार्यों के सम्मत है। पुराण ग्रन्थों में जो समतल श्रादि श्राकार भूमिका लिसाहै वह लोकष्टि से है। प्राचार्य ने भागे श्लोकमें यह यात सिद्ध की है । क्योंकि यदि शानदृष्टि से मानें तो सिद्धान्तों में जो प्रह-गोलस्थिति के नियम हैं वे विरद्ध होजाते हैं। जैसा, यदि गोलाकार न मानकर समतलही मानें तो देशभेद से जो भिन्न भिन्न अक्षांश होते हैं ये एकाकारही सत्र स्थानों में सिद्ध होंगे। परन्तु प्रत्यक्ष वेधसे यह बात वि- सद्धहै । और लहोदय से चरकाल के अन्तर से रेसापुरमें सूर्य उदित होकर फिर स्वदेशमें उदय होनेकी स्थिति जो निश्चित कीगई है, वहभी असंगत होजायगी। क्योंकि समतल आकार होनेपर सब देशोंमें एक कालमें ही सूर्योदय होना चाहिये । इससे पृथ्वीका गोलाकारही युक्ति सिद्धहै +॥ ११॥ १२ ॥ + इसके सिवार वेदमें भी पृपीका गोलाकारही माना है। जैसा "चकापाम परिपह पृथिव्या हिरण्येन मपिना गुम्ममाना । न हिन्वाना सरिततिरत इद्र परिरसशो प्रदशमूर्येण । (ऋ. स. १. ३३ ८) और नीचे तिखा श्रुनि में जो सका क्रमते रियासर माना है वह भी समतल मानने स अरुइत होनायगा । क्यारि वह गोलाकारमें ही घटना है। जैसा- 'श्रामा रजामि दिव्या पार्थिवा श्लोकदेव कृते सारधर्मगे। प्रवाई प्रयाक् सविना सामान निशयन् प्रमुवभिनगन् ।' (ऋस ८ ५३ ३) इमलि पिडानकी रीति से मूभिरा गोरासरहा सर्वथा निहोता है।
३८ गोलाध्याये अथ प्रत्यक्षविरोधशहां परिहरनाह- समो यतास्यात्परिधेः शतांशः पृथ्वी च पृथ्वी नितरां तनीयान् । नरश्च तत्पृष्ठगतस्य कृत्स्ना समेव तस्य प्रतिभात्यतः सा ॥ १३ ॥ स्पष्टम् । प्रभा । यतः कारणात्परिधेः शतांशः समो भवति, पृथ्वी महीच नितरा पृथ्वी 'वोतो गुणवचनात्' इति डीप् । स्थूलत्वगुणविशिष्टा । नरश्च तनीयानतिशयलधुः । अतः तस्य नरस्य तत्पृष्ठगतस्य भूपृष्ठस्थितस्य सा भूः कृरना निरवशेषा समेव दर्पणोदरवत्समाकारेव प्रतिभाति नतु वस्तुतस्तथाभूतास्तीत्यर्थः । श्रयमर्थः कस्यचिहरतुनः शतांशः सूक्ष्म- भाग इति यावत् समाकारो भवति नतु बकाकारः। शाकल्यसंहिताया- मप्यमिहितम् 'वृत्रय पोयत्यशो दण्डवाश्यते तु सः' इति । एवं भूपृष्ठनिष्ठरयद्रष्टुदृष्टिकसूत्रानुरुदायदवधियातितत्पर्यन्तंसम एवाकार: पृथिव्याः परिदृश्यते तदपेक्षया द्रष्टुरतिशयन्द्रत्वात् । अतएव सूर्यशि- दान्ते भूगोलाध्याये- 'अल्पकायतया लोकसः स्वग्थानात्मयतोमुग्वम् । पश्यन्ति वृत्तामप्यतां चकागारां वसुन्धगम् ।।' इति भूमेवरतुतो गोलाकारत्येऽपि मुकुगमारतया दर्शने हेतुरूपन्यरतः । भापामारा. जैसे परिधि पा शतांश मर्यात मगमाग ममान मातुम होना, टका नहीं, अंग हो इस पपीभागे भूमि पी तुलना में मनुष्य प्रायन एरोने में भूमि पे उपर उसकी रवि जहांतक जाती है या मर सपाटही नाम पढ़ती है। .
भुवनकोशः। ३६ उपपत्ति की ? । किसी गोल या वनवस्तु का छोटा से छोटाभाग सीधी रेसा के समान होताहै उस भाग मे गोलत्य फिना वमत्त नहीं रहता, यह परीक्षासे सहजमें मालुम होसकता है । भास्कराचार्य ने इसी यातको भूपरिधि के समें हिस्सेंके दृष्टान्तसे बतलायाहै। यह दृष्टान्त बहुत ही सत्यहै । मनुष्य की दृष्टि हक्यूनानुरोध से गोलाकार पृथ्वीके कोटयश दूरीतक भी नहीं जासकती, इसीलिये उसको जहातक दीसता है सव स- मधरातल ही रहताहै पर वास्तव में गोल ही है। पृथ्वीफे थाकार की अपेक्षा मनुष्य चींटी से भी छोटा है फिर वह कैसे उसकी गोलाकारता का अपलोफन करसकता है ? परन्तु युक्तिसिद्ध होने से नि सन्देह गोलहै सपाट नहीं है, केवल देखनेमे ही माती है। सूर्यसिद्धान्तमें भी ' अल्पकायतयासोका स्वस्थानात्सर्वतोमुसम् ' इ. त्यादि लिखाहै । इस युक्तिसे पुराणों में जो समतल लिखाहै वह दृष्टिके अनुरोध सेही है । यह यातभी सिद्ध होती है ॥ १३ ॥ इदानी स्त्रोक्तस्य भूपरिधिप्रमाणस्योपपत्तिमाह - पुरान्तरं चेदिदमुत्तरं स्यात् तदक्षविश्लेपलवैस्तदा किम् । चक्रांशकैरित्यनुपातयुक्त्या युक्तं निरतं परिधेः प्रमाणम् ॥ १४ ॥ निरक्षदेशः स्वदेशाद्यथायथा दक्षिणतो भवति तथातथा खस्व- स्तिकादिपुववृत्तं नतम् । तयोरन्तरेऽक्षांशाः। ते च निरक्षदेशाद- यसारयोजनैरनुपातेनोत्पद्यन्ते । अतःकस्मिंश्चित्पुरेऽक्षांशाच जा वा तस्मात् पुरादुत्तरतोऽन्यस्मिन् पुरे ज्ञेयाः। ततस्तेपामन्तरांशः पुरान्तरयोजनेश्चानुपातः। यद्यन्तरांशः पुरान्तरयोजनानि लभ्य- ने तदा चक्रांशः ३६० किमिति । फलं भूपरिधियोजनानि । मापाभाग्य। दो उत्तर किया दक्षिण नगरों के असाशान्तर में यदि नगरी के अन्तर योजन
गोलाध्याये
मिलते है सो चमाश में क्या ? इस अनुपात की युक्तिसे परिधि का प्रमाण युक्त
कहागया है।
उपपत्ति ।
देशभेद से भुनकी उंचाई को अक्षांश कहते हैं । जहां ध्रुवकी. उँचाई नहीं
है उसको निरक्षदेश कहते हैं । उस निरक्षसे दक्षिण किंवा उसर हटने से मक्षांश
(ध्रुवोन्नति ) उत्पन्न होतेहैं । भूपृष्ठ पर विपुवरेखा में निरक्ष देश स्थितहै,
सको लङ्का नामसे यहाँपर लिसा है । वहांसे हमलोग उत्तर की तरफ इटहैं।
और जितनाही हटते जायेंगे उतनाही वेध करने से अक्षांश मिन्न भिन्न होते
जायेंगे, अर्थात् ध्रुवको उचाई बढ़ती जायगी । और जय परम उत्तर ध्रुवदेश,
तक चले भायें तो ध्रुव खस्वस्तिक में अर्थात् ठीक शिरके ऊपर होजायगा शौर
वहाँपर अक्षांश पूरे २० होंगे। यह गोलपर ध्यान देनेते स्पष्ट मालुम होता
है। श्रथया इसप्रकार सिद्ध होता है कि यदि कोई मैदान में जाय और क्षितिज
( जहा आकाश और भूमि मिलेहुये मालुम पड़ते हैं ) के पास किसी ऊंचे पर्वत
या वृक्षको देखै तो वह उसको बहुत छोटा और प्राय. भूमि से मिला हुथा पीस
पड़ेगा । फिर यदि उसीके तरफ चलतामाय सो क्रम क्रमसे उसका वास्तधिक स्वरूप
दिखलाई देता जायगा और कुछ कुछ ऊंचा मालुम होगा अन्तमें पास जानेपर
बहुत ऊंचा मालुम होगा। इसीप्रकार निरक्ष देशमे ध्रुव क्षितिज में लगाया माराम
पड़ता है । और जितनाही उसकी दिशामें जायें ऊंचा होता जाता है । अव यदि
कोई निरक्षसे उत्तर है तो उससे निरक्ष दक्षिण होगा । थौर सस्वस्तिकसे घि.
पुवत्त नीचा होगा । अर्थात् जिवना सदेश से निरक्ष दक्षिण होगा उतना ही
सस्वस्तिक से विपुप्रवृत्त नत होगा। यो सस्वस्तिफ और विपुववृत्त के यीच में
अन्तर अक्षांशरूप होंगे । अब फिसी दो स्थानों में अक्षाशों का वेधकर उनके
अन्तरांश करके, नगरों का अन्तर मानकर अनुपात से भूपरिधि सिद्ध होगी।
अनुपात, यदि अक्षांशों के अन्तर में पुरान्तर योजन मिलते हैं तो चक्रांश ३६०
मे क्या भिगे ? फल योजनात्मक भुपरिधि सिद्धहोगी फिर वितोम अनुपात से
अक्षांश भी मालुम होसकेंगे।
यह नो परिधि सिद्ध हुई है सो देशभेदसे भिन्न हुत्रा करती है । इसको स्पष्टप-
रिभि फहते हैं । चौर निरक देशमें जो है उसे मध्यम परिधि कहते हैं । क्योंकि वह
एकाकार और सबसे बड़ी है ॥ १४ ॥
४१ भुवनकोशः। इदानीं तदेवं दृढीकुर्वनाह- निरक्षदेशात्तितिपोडशांशे भवेदवन्ती गणितेन यस्मात् । तदन्तरं षोडशसगुणं स्याद भूमानमस्मादबहु किं तदुक्तम् ॥ १५॥ शृङ्गोन्नतिग्रहयुतिग्रहणोदयास्त- च्छायादिकं परिधिना घटतेऽमुनाहि । नान्येन तेन जगुरुक्तमहीप्रमाण- प्रामाण्यमन्वययुजा व्यतिरेककेण ॥ १६ ॥ स्पष्टम। प्रभा। निर्गतःअक्षो ध्रुवोन्नतिर्यरमादसौ निरतः सचासौ देशश्च तस्मान्नि- क्षदेशात् यस्मात् गणितेन क्षितिषोडशोशे भुवःषोडशमितांशे अवन्ती उजयिनी भवेत् । एतदुक्तं भवति । चक्रांशानां पोडशाशः साईद्वा- विंशतिप्रमितो गणितेन भवति तत्समाश्चावन्त्यां पलांशा इति भूपरि- विषोडशांशे उज्जयिनी मिध्यति । अस्माद्धेतोः तदन्तग्मल्लिकाव- त्यन्तरं षोडशगुणितं भूपरिधिः स्यात् । तदुक्तं बहु किम् ? वृथा विस्त. रेण न किमपि प्रयोजनमित्यर्थः। अमुना परिधिनाशृङ्गोन्नतिः ग्रहयुतिः प्रहणम्, उदयः, अरतं, ग्रछायादिकं च घटते सिध्यतीत्यर्थः। अन्येन घराणोक्तेन परिधिना न घटते । तेन उक्तमहीप्रमाणप्रामाण्यं कथिन भूपरिधिमानयाथार्थ्यमन्वययुजा व्यतिरेकेण अन्वयव्यतिरेकाभ्यां अगुः। प्राचार्या ऊचुरित्यर्थः। भाषाभाग्य। निरत देशमे भूमिके पौडशांश पर गगित से उज्जयिनी की स्थिति मिद हामी गोलाध्याये है । इसलिये लड़ा और उज्जयिनी के अन्तर योजनों को सोलह से । गुणा करने से भूपरिधि का मान ज्ञात होगा । इस विषयमें अधिक क्या कहैं ? इस परिधि से शृ- गोन्नति, ग्रहयुति, ग्रहण, उदयास्त, ग्रहछाया आदि संघटित होते हैं। दूसरी भूप- रिधि की कल्पना से नहीं सिद्ध होते । इसलिये अन्वय और व्यतिरेक की युक्तिसे यही भूपरिधि प्राचार्यों ने प्रमाणित की है। उपपत्ति। . पहिले जो भूपरिधि सिद्ध की है उसी को प्रकारान्तर से दृढ करते हैं । उज्जयिनी में अक्षाश २२३ हैं, ये चक्राश ३६० के सोलहवें हिस्से के समान हैं । इसलिये भूपरिधि के पोडशाश पर उज्जयिनी की स्थिति सिद्ध हुई । यो लड़ा और उज्ज- पिनीके अन्तर योजनों को सोलहसे गुणा करने से भूपरिधि होती है + लङ्का और उज्जयिनी एक मध्यरेखा में स्थित हैं, उनका अन्तर २१३३ योजन है, ऐसा व- राहमिहिर लिसते हैं। उनके मतसे अवन्ती में अक्षांश २४ हैं । इसलिये, २४ २१३३ . ३६०: इस अनुपातसे भूपरिधि योजन ३००० सिद्ध होते हैं । वराहमि- दिर और भास्कराचार्य के मतमें अन्तर है ॥ १५॥१६ ॥ इदानीं भूगोले पुरनिवेशमाह- लडाकुमध्ये यमकोटिरस्याः प्राक् पश्चिमे रोमकपत्तनं च । अधस्ततः सिद्धपुरं सुमेरुः सौम्येऽथ याम्ये वयानलश्च ।। १७॥ कुवृत्तपादान्तरितानि तानि स्थानानि पङ्गोलविदो बदन्ति । वसन्ति मेरो मुसिद्धसद्धा आर्वे व सर्वे नरकाः सदेत्याः ॥ १८ ॥ + पाचार के पतने पर धरना कमतर योना ४१६७ ७ १६ ४३ भुवनकोशः। यो यत्रं तिष्ठत्यवनी तलस्था-- मात्मानमस्या उपरि स्थितं च । स मन्यतेऽतः कुचतुर्थसंस्था मिथश्च ये तिर्यगिवामनन्ति ॥ १६ ॥ अधःशिरस्काः कुदलान्तरस्था- श्चायामनुप्या इव नीरतीरे । अनाकुलास्तिर्यगधःस्थिताश्च निष्ठन्ति ते तत्र वयं यथात्र ॥ २०॥ सुगमम्। प्रभा। और्वे श्रीर्वाद्धृगुवंशीयादृपेर्जातः प्रौर्वः। अणू । वडवानलापरना- मधेयो भूगोलदक्षिणसीम्नि वर्तमानः । तस्मिन् सर्वे नरकाः दैत्याश्च निवसन्ति । यो जनः यत्र तिष्ठति स हि तलस्थामवनी पृथ्वीमात्मानं चास्या उपरि स्थितं मन्यते । श्रतो ये कुचतुर्थसंस्थाः भूपरिधिचतुर्थी- शांशान्तरे वर्तमानास्ते मिथः परस्परमात्मानं तिर्यगिवामनन्ति । कुद- लान्तरस्थाः भूगोलापरार्धान्तरावस्थिताः नीरतीरे जलतटे छायामनु- प्या इव अधःशिरस्काः प्रतीयन्ते । यथा तडागादि तीरस्थितस्य प्रतिबिम्ब पानीयेऽधःशिरस्कं प्रतीयते तथैवेति भावः । एवं तिर्य- गधास्थिताश्च ये ते सर्वे अनाकुलान्तिष्ठन्ति यथा वयमत्र तिष्ठामः। यथाग्माकमवस्थान निर्वाधं तथैवारमदवस्थानाभिप्रायेणैव तिर्थगधोग- तानामप्यवस्थान निर्वाधमिति किं चित्रम् | आधेयापेक्षया आधारस्य महापरिमाणत्वात् । कूष्माण्डादौ सर्वत्र पिपीलिकासंचारदर्शनाच ।
४४ गोलाध्याये . भापाभाप्य 1 1 । भूमिके मध्यभाग में + लङ्का स्थित है, उसके पूर्व में यमकोटि और पश्चिममें रोमापत्तन है । और लङ्काके नीचे सिद्धपुर स्थित है । और उत्तरमें सुमेरु, दक्षिण में घडवानल है । गोलज्ञ पण्डित, इन छःस्थानों को भूमिके चतुर्थाश के तुल्य अ- न्तर अर्थात् भूमध्य से ६० थंशके अन्तर पर प्रत्येक की स्थिति कहते हैं । मेरुपर देवता और सिद्ध निवास करते हैं। और्व अर्थात् वडवानलमें दैत्यों के सहित सब नरकोकी स्थिति है। जो मनुष्य जहां रहताहै वह पृथ्वीको अपने नीचे मानता है और अपनेको उस के ऊपर जानता है । और जो लोग पृथ्वी के चौभाग अर्थात् १० अंशपर रहते हैं वेभी अपने को पृथ्वीके ऊपर और उसको नीचे समझते हैं । परन्तु परस्परमें अपने को तिरछा मानते हैं और अपने से ठीक नीचे अर्थात् १८० अंशपर के रहनेवालों का मानो शिर नीचा और पैर ऊंचा होगया है, ऐसा मालुम होता है । जैसे जलके तीरमें मनुष्यकी छाया उलटी देखने में आती है । परन्तु ऊपर किंवा नीचे रहने वाले सब आनन्द से निवास करते हैं, जैसे हमलोग यहांपर रहते हैं । इसप्रकार पृथ्वीके चारोतरफ मनुष्य निवास करते हैं ॥ १७ ॥ २० ॥ इदानीं दीपानां समुद्राणां च स्थानमाह- भूमेरर्द्ध क्षारसिन्धोरुदफ्स्थं जम्बूदीपं प्राहुराचार्यवर्याः। अर्धेऽन्यस्मिन् दीपपदस्य याम्ये क्षारक्षीराद्यम्बुधीनां निवेशः ॥ २१ ॥ लवणजलधिरादौ दुग्धसिन्धुश्च तस्मा- दमृतममृतरश्मिः श्रीश्च यस्मादवभूव । महितचरणपद्मः पद्मजन्मादिदेवे- वसति सकलवासो वासुदेवश्च यत्र ॥ २२ ॥ + पृथ्वी के जिस स्थान से दोनों ना नितिन में लगे दौख वहा भामरामभ्यस्थान है । विषुवरेसा से भुपारी देखने से वे नितिन म लगे दसो में आते हैं । इमलिय सिद्धानियों ने मिपुरखा के उपर चार पुरी ठहराई है, सार में लड़ा को याचम मा । उमम पूर्ण यमगरि, पश्चिम रोमपत्तन और नाच सिद्धपुर मा।। है । इन चाग स्थानो म ध्रुव मदा दितिन म दिसलाई देना । - - भुवनकोशः। दमो घृतस्येचुरसस्य तस्मा- न्मद्यस्य च स्वादुजलस्य चान्त्यः। स्वादकान्तर्वडवानलोऽमौ पाताललोकाः पृथिवीपुटानि ॥ २३ ॥ चञ्चरुणामणिगणांशुकृतप्रकाशा एतेपु सासुरगणाः फणिनो वसन्ति । दीव्यन्ति दिव्यरमणीरमणीयदेहैः सिद्धाश्च तत्र च लसत्कनकावभासः ॥ २४ ॥ शाकं ततः शाल्मलमत्र कोशं क्रौञ्चं च गोमेदकपुष्करे च । दयोईयोरन्तरमेकमेक समुदयोर्दीपमुदाहन्ति ॥ २५॥ स्पष्टम् । प्रभा। वारसिन्धोरुत्तरदिशि भुयोऽर्धाशे जम्बूहीपस्थितिरित्याचार्याः प्रा- चुः। श्रम्यापरार्धे दक्षिणदिशि द्वीपषट्कस्य तथा शारदुग्धादिसप्त सुद्राणां च स्थितिः । अमृतवत् सन्तोपकारिणो रश्मयो मयूखा यस्य । चन्द्र इत्यर्थः । पद्माजन्म यम्यासौ पद्मजन्मा ब्रह्मा । महित पू. ते चरणपझे यभ्य सः महितचरणपद्मः । सक्लस्य स्थावरजङ्गमात्म- वैश्वस्य वासा यस्मिन् । वसुदेवस्थापत्यं वासुदेवः ऋष्यन्धक्वृष्णि भ्यश्चेत्यनेनाण् । विष्णुपुराणादौ वासुदेवस्य बहुधा निरुक्तिः समु- भ्यते । यथा तत्रैर सर्वत्रासौ समस्तश्च वसत्यत्रेति वै यतः। ततः वासुदेवेति विद्वद्भिः परिगीयते' ॥ इत्यादि। फणति प्रसारसंकोचं छतीति फणा । फण गती, अच् ततस्टापू । फगाया ये मस्यरतेपा ..
गोलाध्याये ये गणाः फणामणिगणाः । चञ्चन्तः शोभमानाः ये फणामणि गणाः मौलिरत्नसमूहास्तेषां येऽशवः किरणास्तैः कृतः प्रकाशो यैरते। ' फणिनः सर्पाः फणारत्यस्येति विग्रहे बाह्यादिभ्यश्चति इनिः। सासुर गणाः सदैत्याः। एतेषु पाताललोकप्विति पूर्वेणान्वयः । निवसन्ति निवासं कुर्वन्ति । तत्र च लसत्कनकावभासैः शोभमानकाञ्चनकान्ति- मद्भिर्दिव्यरमणी रमणीयदेहैर्देवाङ्गनाचारुदेहैः सह सिद्धाश्च दीव्यन्ति संक्रीडन्ते । देवादिकादिवुधातोःकरिलट् । शाक-शाल्मल-कौशा दयो दीपाः समुद्रयान्तराल एकैकशः संस्थिताः सन्ति । . भापाभाप्य। प्राचार्यों ने कहा है कि क्षारसमुद्र के उत्तर भूमिके अधीशपर जम्बूद्वीप स्थित है । उसके दूसरे अर्धाश में दक्षिण घद्वीप एवं क्षार, दुग्ध श्रादि सात समुद्र हैं + प्रथम लवण समुद्र उसके दक्षिण दुग्धसमुद्र है । इस दुग्ध समुद्र से अमृतरश्मि चन्द्रमा 1 - दपिसमुद्र, " " + पृथिरी के मध्यभाग में जम्बूद्वीप है । जम्बद्रीप का पागर यमलपत्र की भांति समतल और गोल है । जैस कमलपत्र अपने मध्यभाग से कुछदूतक क्रमसे उगत होकर पिर ममे कुछ दूरतक अपना होताहै पैसेही नमूदीप कुछ दुरतक क्रम से उन्नत होरर फिर अानन होकर पैला है । सभी कमलप का हाल ऐसा नहीं है पर किसी कमलपनमा योभी श्राकार होताहै । भागवत के ५ वे रफन्ध में इस ही के श्रापार को याही लिखा है यात्रा अय दीरः कुवलयाकोपाम्यन्तर योग नियुत योजनायाम. रामार गया पुररपत्रम् ' । जम्बू, सहप्रभृति द्वीप चारों तरफ से एक एक समुद्र घिरेहुये हैं । इन टीपों छ समशेरापिस्तार पौराणिक मतसे इसप्रकार है.-- (१) जम्बूदार, १ लण्योजन. (५) कीमहीप, १६ लक्षयोजना लरण समुद्र, (२)सतौर २ लक्ष्योजन. (६) गाढीप ३२ ल योजना इक्षुममुद्रा (३)शाल्मलिदीर, ४ वयोजन. (७) युवरवीर, ६४ लक्षयोजन. सुगममुट ( ४ ) खुशी, ८ लवमानन. १.१० लक्षयोजना घृतसमुद्र स्वादक समुद्रसे दक्षिण सांगलोक गिरितक भूप्रदेशको कानमृमि और निग पनि पाजन उग लोकालोक कहते हैं । यो इन गर दी या प्रमाण भागवत और विष्णुपुराण में प्राय सग होता है। दुग्धमगुह " जलममुद्र पावनभूमि, लोशालाक पनि, ५०० " " भुवनकोशः ४७ और लक्ष्मी ने जन्मलिया था । इसी में सर्वव्यापी वासुदेवका निवास है जिनके चरणकमल की ब्रह्मा आदि देवगण पूजा करते हैं। उसके बाद दधि, घृत, इतु, मद्य समुद्र, शेपमें स्वादु जल समुद्र । इस सातवें (स्वादुसल ) समुद्रके भीतरही वडवानल है । पाताल लोक पृथ्वी के पुट (तह) रूपसे स्थितहै । इन सब पतालों में दैत्यों के साथ सर्पवास करते हैं। और उनके फणामणि से वहा प्रकाश होता है । वहींपर मन्छ सुवर्ण वर्णके समान सुन्दर शरीरवालो देवत्रियों के साथ सिद्ध- गण विलास किया करते हैं । शाक, शाल्मल, कौश, क्रौञ्च, गोमेदक और पुष्पर द्वीप दो दो समुद्रों के बीचमें एक एक वर्तमान हैं 1 २-०५ ॥ इदानी जम्बूद्वीपमध्ये गिरिनिवेशवशेन नव खण्डान्याह-- लकादेशाद्धिमगिरिरुदग्धेमकूटोऽथ तस्मा- तस्माचान्ये निपध इति ते सिन्धुपर्यन्ताः । एवं सिद्धादुदगपि पुराच्छृङ्गचच्छुक्लनीला वाण्येपां जगुरिह बधा अन्तरे द्रोणिदेशान् ॥ २६ ॥ भारतवर्पमिदं युदगस्मात् किन्नरवपमतो हरिवर्पम । सिद्धपगच तथा कुरु तस्माद् विद्धि हिरण्मयरम्यकवर्षे ॥ २७ ॥ * अतल, दिनल, सुतल, तलातल, महातल, रमातल पार पाताल र सान भूपर पृथिवा र म मामें पानसमें दशहनार याननका दूरापर स्थित है, २६ भागमा मतहे । पुराण म दूराना यहा पानी है पर तु नाम यों है ---अाल, तिल, नितल, भिस्लिनन्, महातल, सुतल गार पानन । पातालचित्र।
गोलाध्याये माल्यवांश्च यमकोटिपत्तना- द्रोमकाच किल गन्धमादनः। नीलशैलनिपवावधी च ता वन्तरालपनयोरिलावृतम् ॥ २८ ॥ माल्यवज्जलधिमध्यवर्ति यत् तत्तु भद्रतुरगं जगुर्वधाः। गन्धशैलजलराशिमंध्यगं केतुमालकमिलाकलाविदः ॥ २९ ॥ निपधनीलसुगन्धसुमाल्य- रलमिलावृतमावृतमावौ । अमरकेलिकुलायसमाकुलं रुचिरकाञ्चनचित्रमहीतलम् ॥ ३० ॥ अत्र भूगोलस्यार्धमुत्तरं जम्बूदीपम् । तस्य क्षागधेश्च सन्धि- निरक्षदेशः । तत्र लड्का रोमकं सिद्धपुरं यमकोटिरिति पुरचतुष्टयं भारिधिचतुर्थांशान्तरं किल कथितम् । तेभ्यः पुरेभ्यो यस्यां दिशि मेरुः सोत्तरा । अनो लङ्काया उत्तरतो हिमपान नाम गिरिः पूर्वा- परसिन्धुपर्यन्तदेोऽस्ति । तस्योत्तरे हेमकूट । मोऽपि समुद्रपर्यन्न देयः । तथा तदुत्तरे निपधः । तेपामन्तरे द्रोणिदेशा वर्षमज्ञाः । तत्रादौ भारतवपम् । तदुत्तरं किन्नरवर्पम् । ततो इस्विमिति । एवं सिद्धपुरादुत्तरतः शृङ्गवान् नाम गिरिः। ततः खेतगिरः। ततो नीलगिरिति। तेऽपि सिन्धार्यन्तदेव्याः तेपामन्तरे च वीणि। तत्रादो कुरुवर्षम् । तदुत्तरे हिरण्मयम् । ततो रम्यकमिति । अथ याकोटेहत्तरतो माल्यवान् नाम गिरिः। सनु निपधनीलपर्यन्त भुवनकोशः। ४६ दैर्घ्यः। तस्य जलधेश्च मध्ये भदश्विं वर्षम् । एवं रोमकादुत्तरतो गन्धमादनः । तस्य जलधेश्च मध्ये केतुमालम् । एवं निपधनील माल्यवद्गन्धमादनैरावृतमिलावृतं नाम नवमखण्डम् । सा स्वर्गभू- मिः। अतस्तत्र देवक्रीडागृहाणि । शेपं स्पष्टम् । प्रभा। विद्धि जानीहीत्यर्थः । इला भूमिः तस्याः कला तां विदन्ति जा. नन्ति ते इलाकलाविदो मूगोलविद्याविशारदाः । इलावृतमलं प्राचु- येणावृतम् । भाङ्पूर्वकादृधातोःक्तः । कृतावरणमाबभौ । अमराःदेवा स्तेषां ये केतिकुलायाः क्रीडाभवनानि तैः समाकुलं व्याप्तम् । कुलाय शब्दोत्ररथानार्थकः, नतु 'कुलायोनीडमस्त्रियाम्' इत्यमरोक्तया पक्षिवा- सभवनबोधकः । रुचिरं मज़ुलं यत्काञ्चनं सुवर्ण तेन चित्रं नानारूपं महीतलं भूतलं यस्मिन्नितीलावृतविशेषणम् । भापाभाष्य। जम्बूद्वीप नव + खण्डों में विभक्त है । लङ्कादेश ( निरक्ष ) से उत्तर हिमगिरि + जम्बूदीप, आठ कुलाचलों स नव खण्डाम विभक्तहे । भागवत्त के पञ्चमस ध क दूसरे अध्याय में * लिवाहे कि स्वायम्भुवननु क पौत्र अग्नी राना के नौ पुत्र थे, उनका राज्याभिषेक अलग अलग इन नव खरों में हुआ, और वे सब खए उनके नामानुसार प्रसिद्ध हुए। जेमा, नाभिवर्ष, अजनाभवर्ष, किश्वर्ष, हरिवर्ष, इलायतवर्ष, रम्यकर्ग, हिरण्मयवर्ष, कुमवर्ष, भद्राश्ववर्ष और कमालवर्ष । इन नो सरहाका प्रमाण व्यास भगवान् ने जो लिखाहै उसे हम आगे लिखने हैं । यहा पर यह जानना बार- सहे कि सायम्भुस्मनु समय इन दीयों का आकार और प्रमाण 'ना या वह अब नहीं है । इस समय सायम्भुव के समय से घ माबीन से, सातवा वेतन माहै। यो परोना ममप की स्थिति एका कार कैसे होसकती थोडेही काल में विपर्यय दखने में पाया करताहे । भाग्कराचार्य ने पाट कुलाचलों के नाम इसप्रकार लिखे हैं-हिमालय, हेमकूट, निधर, नील, शेत, शृङ्गान, मान्यवान्, पार गधमादन इन में नील और निषध सुमरके उत्तर भार दक्षिण दिशा म नवहजार यानन क अतर साम्पत हाकर पूर्व पार पाश्रम दिशा में लवण ममुद्र तक विस्तृत हैं। नीलगिरिमे नरहनार योजन पर शनगिरि उसम उतनी याजना के अनर पर शृङ्गवान् पर्वत पूर्व और पाश्चम में विस्तृत हाकर लवण समुद्र म मिला है। इसी प्रकार निषध पर्वत से नकहनार याजन दावण में हेमार और उननही अतरपर दक्षिण दिमालयपवन है, वगभी पूर्व और पश्चिम म फेल कर लाण समुद्र में मिलाहै । मा यवान् श्रार गधमादन पर्वत प्रमसे अमरु क पश्चिम और पूर्व दिशा में नवहजार याजना अतर म स्थित हाकर उत्तर और दहियम फल - + ४८ गोलाध्याये माल्यवांश्च यमकोटिपत्तना- द्रोमकाच किल गन्धमादनः। नीलशैलनिपधावधी च ता वन्तरालमनयोरिलावृतम् ॥ २८ ॥ माल्यवज्जलधिमध्यवर्ति यत् तत्तु भद्रतुरगं जगुर्दुवाः। गन्धशैलजलराशिमध्यगं केतुमालकमिलाकनाविदः ॥ २९ ॥ निपधनीलसुगन्धसुमाल्य फै- रलमिलावृतमावृतमावौ । अमरकेलिकुलायममाकुलं रुचिरकाञ्चनचित्रमहीतलम् ॥ ३०॥ अत्र भूगोलस्यार्धमुत्तरं जम्बूद्धीपम् । तस्य क्षागब्धेश्च सन्धि- निरक्षदेशः। तत्र लङ्का रोमकं सिद्धपुरं यमकोटिरिति पुरचतुष्टयं भूपरिधिचतुर्थाशान्तरं किल कथितम् । तेभ्यः पुरेभ्यो यस्यां दिशि मेरुः सोत्तरा । अतो लङ्काया उत्तरतो हिमपान नाम गिरिः पूर्वा- परसिन्धुपर्यन्तदेयोऽस्ति । तस्योत्तरे हेमकूट। मोऽपि समुद्रपर्यन्त देयः । तथा तदुत्तरे निपधः । तेपामन्तरे द्रोणिदेशा वर्षमज्ञाः । तत्रादौ भारतवर्षम् । तदुत्तरं किन्नरवर्पम् । ततो हरिसर्पमिति । एवं सिद्धपुरादुत्तरतः शृगवान नाम गिरिः। ततः शतगिरिः। ततो नीलगिरििित। तेऽपि सिन्धुपर्यन्तदेयाः। तेपामन्तरे च वीणि । तत्रादौ कुरुवर्षम् । तदुत्तरे हिरण्मयम् । ततो म्यामिति । अथ यमकोटेरुत्तरतो माल्यवान नाम गिरिः। सतु निपधनीलपर्यन्त भुवनकोशः। । दैर्ध्यः। तस्य जलधेश्च मध्ये भदाश्वं वर्षम् । एवं रोमकादुत्तरतो गन्धमादनः । तस्य जलधेश्च मध्ये केतुमालम् । एवं निषधनील माल्यवद्गन्धमादनरावृतमिलावृतं नाम नवमखण्डम् । सा स्वर्गभू. मिः। अतस्तत्र देवक्रीडागृहाणि । शेपं स्पष्टम् । प्रभा। विद्धि जानीहीत्यर्थः । इला भूमिः तस्याः कला तां विदन्ति जा- नन्ति ते इलाकलाविदो भूगोलविद्याविशारदाः । इलावृतमलं प्राचु. येणावृतम् । आफूर्यकाद्धातोःक्तः । कृतावरणमाबभौ । अमरा देवा स्तेषां ये केतिकुलायाः क्रीडाभवनानि तैः समाकुलं व्याप्तम् । कुलाय शब्दोत्र स्थानार्थकः, नतु 'कुलायोनीडमस्त्रियाम्' इत्यमरोक्तया पक्षिवा- सभवनबोधकः । रुचिरं मज़ुलं यत्ताञ्चनं सुवर्ण तेन चित्रं नानारूपं महीतलं भूनलं यस्मिन्नितीलावृतविशेपणम् । भाषाभाष्य। जम्बूद्वीप नव + खण्डों में विभक्तहै । लङ्कादेश ( निरक्ष ) से उत्तर हिमगिरि िजम्बूदीप, आठ कुलाचलों स नव खण्डाम विभक्तहे । भागवत के पश्चमस्क ध क दूसर अध्याय में लि वाद वि स्वायम्भुवननु र पौत्र अग्नाभ राजा क नो पुत्र 4, उनका राज्याभिषेक अलग अलग इन नव खण्डों में हुआ, और वे सब खए उनके नामानुसार प्रसिद्ध हुए । जमा नाभिरर्प, अजनाभवर्ष, किरवर्ग, हरिवर्ष, इलाइतवर्ष, रम्पकर्म, हिरण्मयवर्ष, कुमवर्ष, भद्राश्ववर्ष आर यतुमालाप । इन नो सरहाका प्रमाण व्याप्त भगवान ने जो लिखाद उन हम श्राग लिखते हैं । यहा पर यह जानना प्रार शकहे कि सायम्भुपमनु के समय इन दीरों का श्राकार पार प्रमाण ना था वह अब नहीं ह । स समय नायम्भुव के समय से ६ मा चीन के सातवा वैवसत वर्तमााई। यो कराना समय का रियान एका कार क्स हासकती ' थाडहा काल में विपर्यय दखन में आया करताहै । भास्कराचार्य न पाठ इलाचली क नाम इसप्रकार लिख है हिमालय हेमर, निजा नल से हवान् माच्चवान् धार गधमादा इन म नील आराध समरक उत्तर भार दक्षिण दिशा म न्यद्दनार यानन के अतर सायत हाकर पत्र और परिम दिगा में लाय ममुद तर विस्तृत हैं । नालागारमे नरहनार यानन पर स्वतागार उसम उननही यामना क अतर पर भृङ्गवान् परत पूर्व पार पाश्रम में विस्तृत हार लवण समुद्र म मिला है। इसी प्रकार निषध पर्वा स नकहनार यानन दाक्षण में हेमा र उनाडा अतरपर दमिरा मालयवंत इ, बम्भा पूर्व पार पाश्चम म पलार लाण समदम मनाई। मावान् श्रार रायमादा पवत मस अमर क पाश्रम श्रीर पूर्व दिशा म नवहनार याजना के अतर म पित हाकर गर और दहिम इस - गोलाध्याये उसके उत्तर हेमफूट पिर निषध पर्वत है, ये सब समुद्र तक लम्बे हैं । इसीप्रकार सिद्धपुर ( उज्नयिनी से १८० पूर्वमे स्थित ) के उत्तर शृङ्गवान पर्वत उसके उत्तर श्वेतगिरि फिर नीतगिरि है । इन पर्वतों के दो दो के अन्तर पर जो देश हैं ये द्रोणि देश कहलाते हैं जिनको पण्डित लोग वर्प कहते हैं । जिस देश में हमलोग वास करते हैं वह यह भारतवर्ष है । इसके उत्तर किन्नरवर्ष बाद में हरिवर्प है । इसीप्रकार सिद्धपुर से प्रथम कुरुपर्प उसके उत्तर हिरण्मयवर्ष फिर रम्यकवर्प स्थित है । यमकोटि ( उज्जयिनी से १० अंश पूर्वमें स्थित ) से उत्तर माल्यवान और सेमरुपतन ( उज्जयिनी से ६० अंश पश्चिम में स्थित ) से उत्तर गन्धमा दन पर्वत स्थित हैं । ये दोनों नील और निषध पर्वततक विस्तृत हैं । इन चार पांतों के बीच में इशावृत वर्प है । माल्यवान् से समुद्रत रु भद्राश्यवर्प और गन्ध. से समुद्रनर येतमालपर्य है । निषध, नील, गन्ध, माल्य इन पार पर्वतों के मध्या इलायतवर्ष है, जहां सुवर्ण पी विचित्र घटाओं से भूपित देवगणों मा केतिल है । यही सर्गभूगि है । २६-३० ॥ इदानीं मेरुमंस्थानगाह- इह हि गेमगिरिः किल मध्यगः कनकानमयसिदशालयः। दृहिणजन्मकुपद्मजकर्णिके- नि च पुगणविदोऽगुमवर्णयन् ।। ३१॥ ।
- भुवनकोशः। विष्कम्भशैलाः खलु मन्दरोऽस्य सुगन्धशैलो विपुलः सुपार्श्वः। तेपु कमात्सन्ति च केतुवृक्षाः कदम्बजम्बूबटपिप्पलाख्याः॥ ३२ ॥ जम्बूफलामलगलदसतः प्रवृत्ता जम्बूनदी रसयुता मृदभूत्सुवर्णम् । जाम्बूनदं हि तदतः सुरसिद्धसङ्घाः शश्वत्तिवन्त्यमृतपानपराङ्मुखास्तम् ॥ ३३ ॥ श्रानान और शेतगिरि बिल्कुल समुद्र में लीन होगये । इसका कारण मतरों में श्राररिमक प्रलय घटनाही है । भागवत के पाठन स ध के चोत्रीसमें अध्याय में लिखा है कि । श्रासीदतीतकवादे आमो नेमितिकोलय । समुद्रोपप्लुतास्तत्र लोका भूरादयो नृप । अब नर वर्षांशी सामा जानना चाहिये । सुमेर के चारों तरफ चोकोर भूमिका नाम इलावृत्त वर्ष है । इलावृतर्पणी चारा सामापर नीत, निषध, माल्यान् पार ग वसादन ये चारों पर्यत मम से उत्तर, दहिए, पश्रिम और पूर्व में स्थित है । सुमेर पर्वत के दक्षिण निषधाचल से हेमर अर्थात् अल्टाई गिरितक जो भूभाग ह उतरा नाम हरिवहै । हरि- वर्ष के पूर्व और पश्चिम सीमा म लवण समुद्र है। दग समय यह एशियारिय रसिया प्रभृति कई महा देशों में विभक्त है । हेमस्ट से दतिय हिमालयनक भूप्रदेश को फिनर किंरा दिपुरुष देश रहते हैं । इसके पूर्व और पश्चिम सीमापर लपण समुद्र वर्तमान है यह स्थान प्रानान पारस, भारत, ची, ता. तार, प्रभृति कई महादशा में बग है । हिमालय से दक्षिण जम्बूद्वीप पर्यंत भूभाग यो भारतवर्ष कहते हैं । इसके पूर्व पश्चिम पार दक्षिण सं मा लाण समुद्र से वेष्टित है । सुमेर के पत्रिम माल्यवार से जम्बूद्वार के दतियभाग तक भूभाग को केतुमाला कहते हैं । इसके पूर्व और पत्रिम सामापर कमसे पधिम नि पवाचल अर्थात् ईडराल परत यार पधिम नीलगिरि डफाइन पर्वत अपरिधन है । श्रार इसदी दक्षिण सीमापर लपण सद्र स्थित ह । इस समय इमी देश को यूरोर यहते हैं। पूर्व में पानी नगिरि अर्थात् रसी पर्वत, पश्चिम में पाचल यो अलदान दक्षिण में लापरापुद्र रा उत्तर में गधमादाता चार सीमाओं के मध्यरथात को भदास कहते हैं । इस समय यह प्रदेश समुद्र में मग होगया है। -निम भूरदेश के उत्तर नीलगिरि, दक्षिण सेनगिरि, थोर परिम साप समुद्र है उसको रम्यारी कहते हैं । यह देश उत्तर अमेरिका का उत्तर माग है। इन देशका भी प्रा लि भिम होर तुर होगया है । शारिसे दलिय मा तक भूभार को हिरएमरस कहत है । चार भावान से दरिय नम्बर क ददियभाग व भूभाग को कुर्ग कहते है । हिरमा श्री दुर्गा मालूम हार जर उनक स्पेमा के खेत और शान पनि प्रयधारमा को मात दुर थे नी माय । श्रीर सम्मान उतर चामेरिका में वृक्ष प्रा और पृय दक्षिण में परिपत होगया है। गिर मार पुरात म भी नगगनति माया पिा और भूनौत कि है । उससे भारर या भूगल पक्षी तुम निन है । परनु मा पुगी वही प्राधार पर है। - ५२ गोलाध्याये वन तथा चैत्ररथं विचित्रं तेष्वप्सरोनन्दननन्दनं च। धृत्याह्वयं यद्धतिकल्लुराणां भ्राजिष्णु वैभ्राजमिति प्रसिद्धम् ।। ३४ ॥ सरांस्यथेतेष्वरुणं च मानसं महाइदं श्वेतजलं यथाक्रमम् । सरासुरामारमणश्रमालसाः सुरा रमन्ते जलकेलिलालसाः ॥ ३५॥ प्राचीन भविभाग सत्र। उरुदर्द पान पर्वत दिरम्पपवर्ष श्वेतगिारे रम्पकवर्ष मध्यनीतगिरि पूर्वनीलगिरि का रवि परिचमनीलगिरि.का. उशन केतुमालपर्य वा, सुरोप पश्चिमनिषधाई माल्पपान गन्धमारन भद्राव ॥ पूर्वनिपप,या यनरान भजनिपधारन्न हीयपं.वा.शियाटिने देश मकरमा माहागई वित्रस्न नानार भनिदेश मालवस्तार पार प्राचीर मुन्नवा वान और टमका पर हो रहा पादिका प्राय पुरा की प्रमामय परामायो।
भुवनकोशः। ५३ सदनकाञ्चनमयं शिखरत्रयं च मेरो मुरारिकपुरारिपुराणि तेपु! तेप'मधः शतमखचलनान्तकानां रक्षोऽम्वुपानिलशशीशपुराणि चाटो ॥ ३६ ॥ तस्पेलावृतस्य मध्ये कनकरत्नमयो मेरुगिरि कर्णिकाकारस्त- देव देवानामालयम् । तत्र मेराघुपरि शिखस्त्रयम् । तेषु शिखरेषु मुरारेब्रह्मणः पुरारेश्च पुराणि सन्ति । शिखराणामधः समन्तादि- न्दादिलोकपालानां पुराणि सन्ति । अथ मेरोविष्फम्भरौला इत्या. धारपर्वताः।यस्यां दिशियमकोटिस्ताहिकप्रभृति मन्दरमुगन्धवि. पुलसुपा दिक्षु सन्ति । मन्दरे कदम्बः केतुवृक्षश्चैत्ररथं वनमरु- पोदं सरः । मुगन्धशैलमस्तके | केतुक्षोजम्बूः । येनेदं जम्बूदी- पमुच्यते । नन्दनं वनं मानसं सरः 1 विपुलशैलमस्तके केतुवृक्षो वटो धृतिर्वनं महाइदमरः । सुपार्श्वमस्तके केतुतः पिप्पलो वैभ्राजं वनं श्वेतोदं सरः। शेपं सुगमम् । प्रभा। इइलाकृतवर्षे कनकरत्नमयः । कनकं सुवर्ण रनमश्मजातिमणि विशेषः । एभिः प्रचुरमिति नद मयट निस्शानां देवानामालयो वामभवनम् । एवंविधो मेरगिरिमध्यगरतरयेलावृतर्पग्य मध्यभागा- वस्थितो वर्तते । अK मेरं, बहिणस्य ब्रह्मणा जन्म कुर्जन्मभूरेव पर्टी तस्माजाता या कणि केत्यपर्णयन् सादरमकथयन् पौराणिकाः। जम्बू. फलाद् अमलः स्वच्छो गलन् द्रवीभान पतन् यो रसः तस्मात् प्रवृता समुद्गला जम्मूनदी। मृद्रसयुतासुवर्णमभूत् । तत्सुवर्णमतो जाम्बूनद जम्यनयां भवमिति विग्रहे अए । तटभिस्या लेभे इत्यर्थः । सुगन्ध ५४ गोलाध्याये पर्वतस्थ जम्बूफलानामत्युञ्चस्थानात् पातेन विशीर्णानामनस्थिप्राये भकायनिभाना रमेन संजाता जम्बूनाम नदी इलावृते वहतीत्यादि भागवते लेखोप्युपलभ्यते । नन्दनं नन्दयतीति विग्रहे नन्दिग्रहिपचा- दिभ्यो ल्युणिन्यच् इति ल्युः । इन्द्रवनम्। भ्राजिष्णु इत्यत्रंणुच दीप्तियुक्तमित्यर्थः । रमते रमयतीति वा रामा चलादित्वात् णः तत- टाप् । रामाणां रमणं तेन यः श्रमस्तेनालमाः। सुराः देवाः रमन्ते । मुरिासुदेवः को ब्रह्मा पुरारिः शिवः । तेषामधः प्रदेशे इन्द्राग्नि- यमरोवरुणवायुकुबेरेशानामष्टा पुराणि नगराणि सन्ति । आषाभाष्य। इलावृतवर्ष के बीच में फनक और रनमय देवताओंका निवासस्थान मेरुगिरि स्थित है। वह पद्मफर्णिका के समानहै, उसी से ब्रह्माकी उत्पत्ति है । इस मेरो प्राधा- रभूव मन्दर, सुगन्ध, विपुल और सुपार्श्व पर्वत हैं । उनपर कदम्य, जम्बू, बट और पिप्पल वृक्ष नमसे पताकारूप से स्थित हैं । जम्यूफल के विमल-रससे जम्यू नदीकी उत्पत्तिहै । जिसके रससे मिट्टी के संयोग से सुपर्ण उत्पन्न होता है । इस लिए उम सुवर्ण को जाम्बूनद कहते हैं । अमृतपान से विरत होकर देव और सिद्ध पुगप इस नदी के रसका पान करते हैं । वहींपर पिचिन चैप्ररथ नाम फ वन है + पुराणों में मेरु पति का प्राकार पकार्यका समान लिया है । वायु पुराण क ३४ ५ अध्याय में लिया है कि महादास्तु कपितामसार । पत्रसस्थिता । तत रियामा माप महारस । इस प्रकार मेस्ता पासर यों है- मेरगिरि।
५५ भुवनकोशः। और अप्सरो को श्रानन्द देनेवाला नन्दनवन है । देवताओं को धैर्यमद धृतिमन और शोभायुक्त वैभ्राज नामक वन है । वहींपर अमण, मानस, महाइद और श्वेत जा नामक सरोवर है । जिनमें नियों के सहवास श्रमसे आलसी देवगण जलक्रीडा किया करते है । मेरगिरि के तीन शिसर, जहां विष्णु, ब्रह्मा और शिव की तीन पुरी हैं । इन शिसरों के नीचे अष्टदिक्पालों की पुरी हैं पूर्व में इन्द्रकी अमरावती, दक्षिणमें यमकी संयमनी, पश्चिममें वरुणयी श्रद्धावती, उत्तरमें कुरकी महोदया पुरी है । पूर्व दक्षिण में अग्निको तेजोवशा, दक्षिण पश्चिम में रासयी कृष्णाङ्गना, पश्चिम उत्तरमें वायुको गन्धरती, और उत्तर पूर्व में ईशी यशे वती पुरी है. ॥ ३१ ॥ ३६ ॥ तत्रान्यं विशेपमाह- विष्णुपदी विष्णुपदात्पतिता मेरो चतुर्धास्मात् । विष्कम्भाचलमस्तकशस्तसर संगताऽऽगता वियता ॥ ३७॥ सीताख्या भद्राश्च सालकनन्दा च भारतं वर्षम् । चक्षुश्च केतुमालं भद्राख्या चोत्तरान्कुरून्याता ॥ ३ ॥ याकर्षिताभिलपिता दृष्टा स्पृष्टावगाहिता पीना। उक्ता स्मृता स्तुता वा पुनाति बहुधापि पापिनःगुरुपान्॥ ३६ यां चलिते दलिताखिल पन्धो गच्छति वल्गति तत्पिमङ्घः ।। प्राप्ततटे विजितान्तकदूनो याति नरे निस्यात् सुरलोकम् ॥ ४०॥ गहां यामीत्युपक्रम कुर्वत्यपि नरे तस्य पितृणां नरकस्थानां पाशबन्धास्त्रुट्यन्ति । अथ गच्छति गार्ग रम्ने नपित वलान्ति । अस्मत्कुनजो महां गच्छति । अनोस्माकं दुष्कतक- मविच्छेदा गतिविपणनीति हणोत्पतन्ति । अ प्रामतट
गोलाध्याये
गङ्गासन्नस्थिते स्वकुल जे गङ्गावलेन मुष्टिघातादिभिरन्तकदृतान्,
जिला देवलोकं यान्ति एवंविधाया गगाया मन्दाकिन्या:किम-
न्यदर्यत इत्यर्थः । शेष स्पष्टम् ।
प्रभा।
विष्णोः पदं स्थानं यग्याः मा विष्णुपदी गगा । गौरादित्वात
डीप् । निर्गताविष्णुपादाब्जान विष्णुपदी स्मृता' इति मनवैवर्च
पुगण स्थितम् । विष्कम्भाचलानां मन्दरादीनां मस्तके शरतं प्र.
शस्त यत् मरो मानम-महाहदादि तत्र संगता । वियता गगन-
मार्गेग आगना । मेरुपाताच्चतुर्थी विभक्ता सती चतुर्बपि विष्कम्भा-
चलस्थितमासु मंगनत्यर्थः । मीतानामधया घाग भद्राश्ववर्ष
गना । अलकनन्दा चैनद् भारतवर्ष याता। एवमग्रेऽपि ।
भापाभाष्य।
विष्णुपदी गङ्गा विष्णुपद मे मेरुपर गिरी है । वहामे चार प्रगहों में भक्त
होकर चारों मन्दर आदि आधार पर्वतों के शिरोपति मरमें मिली है । सीतानामक
धारा भद्राश्ववर्ष में, अलकनन्दा भारतवर्ष में, पक्षु केतुमाल ( युरोप ) में और ,
भद्रा कुरुवर्ष में फैली है । जिस गङ्गा के नाम मुनने, उसके प्रेम करने, देखने,
मर्श करने, स्नान करने और जनपान करने एक स्मरण और स्तुति करने से
नाना प्रकार के पापी पुरुपे का उद्धार होता है । जिमके पाम जानेका इरादा
करनेही से पितृगण यमपाश से छूट जाते हैं। और जाने से ये मय प्रारम में
आनन्दमे कूदते हैं । और नीरपर पहुँचने पर यमदूता का जीतकर स्वर्गलोय को
मिमारते है ।। ३७ ॥ ४० ॥
इदानी भारतस्यापि मध्ये नपखण्डानि मतकुल चलांश्चाह--
ऐन्दं कशेरु सकलं किल ताम्रपर्ण-
मन्यद्गभस्तिमदतश्च कमारिकाख्यम् ।
नागं च साम्यमिह वारुणमन्त्यावण्डं
गान्धर्वमंज्ञमिति भारतवर्षमध्ये ॥ ४ ॥
भुवनकोशः। ३ वर्णव्यवस्थितिरि हेव कुमारिकाख्ये शेषेषु चान्त्यजजना निवसन्ति सर्वे । माहेन्द्रशुक्किमलयःकपारियात्राः सह्य सविन्भ्य इह सप्त कुलाचलाख्याः॥ ४२ ॥ स्पष्टम। प्रभा। भारतवर्षेऽपि तावदैन्द्रादीनि नवखण्डानि सन्ति तथाच मत्स्य- पुराणे-'इन्द्रद्वीपः कशेरुश्व ताम्रपर्णो गभस्तिमान् । नागहीपस्तथा सौम्यो गन्धर्वस्त्वथ वारुणः ॥अयं तु नवमरतेषां द्वीपःसागरसंवृतः। इन्द्रदीपस्तथा सौम्यो गन्धर्वस्त्वथ वारुण इत्यादि विष्णुपुराणेऽपि स्थितम् । इह कुमारिकाख्यखएड एव ब्राह्मणादिवर्णव्यवस्था नान्यत्र । कुमारिकाखएडमेव भरतखएडमिति बोध्यम् । माहेन्द्रशुप्त यादयधात्र सप्तकुलपर्वताः। तथाच मार्कण्डेयेपुराणे 'माहेन्द्रो मलयःसह्यः शुक्ति- मानृक्षपर्वतः। विन्ध्यश्च पारियात्रश्च सप्तैवान कुत्ताचलाः' इति । भापाभाष्य। इस भारतवर्ष में भी नवखण्ड हैं। उनके नाम ये हैं, ऐन्द्र, कशेरु साम्रपर्ण, गस्तिमान, कुमारिका, नाग, सौम्य, वारुण और गन्धर्व । इनमें केवल कुमारिका खएडमें ही ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि वणीको व्यवस्था है। बाकी खण्डों में अन्त्यज जातियोंका निवास है । माहेन्द्र, शुक्तिमान् , मलय, ऋक्ष, पारियान (वा पारिपात्र), सह्य और विन्ध्य ये भारतवर्ष के सात कुलपर्वत हैं ॥ ४२६४२ ॥ इदानी लोकव्यवस्थामाह- भूर्लोकाख्यो दक्षिणे व्यक्षदेशा- तस्मात्सौम्योऽयं भुवः स्वश्च मेरुः। लभ्यःपुण्यैः खे महः स्याज्जनोऽतो- नल्पानल्पैः स्वैस्तपः सत्यमन्त्यः ॥ ४३ ॥ स्पष्टम् । यदिदमुक्तं तत्सर्व पुराणाश्रितम् । प्रभा। निरक्षदेशाइक्षिणे भूलोकः तस्माचौतरप्रदेशेऽयं जम्बूदीपात्मको भुवर्लोकः मेरु वर्लोकः । खे महले कस्ततो जनस्ततश्च सत्यलोकः .. ..
गोलाध्याये एते सतलोका अग्निपुराणे निर्दिष्टाः । यथा 'भूर्भुवः स्वमहथैव जनव तप एवच । सत्यलोकश्च सप्तैते लोकास्तु परिकीर्तिताः ॥' इति । स्वै रात्मीयैरल्पानल्पैन्यूनाधिकैः पुण्यैलभ्यः । स्वस्वपुण्यानुरूपाउत्तरोत्तर लोकप्राप्तिरितितात्पर्यम् । मापाभाष्य। लङ्करके दक्षिणकी तरफ भूर्लोक है । उससे उत्तरको तरफ भुवर्लोक, और मेरुको स्वर्गलोक कहते हैं । मेरुके ऊपर आकाशमै महर्लोक है, उसके ऊपर जनलोक, तप- लोक और सत्यलोक ये सब एकसे एक ऊपर हैं | जैसा जैसा मनुष्यका पुण्य होताहै वैसा वैसा लोक मिलता है ।। ४३ ॥ सिद्धात क मत से लाकरिपति नीचे लिख क्रम से है। अग्निपुराण में भी यही क्रम है । परत भागपत में भिन्न है। सत्य लोक तपलोक जनलोक महलाक (आकाश में) स्वखोक भुरलोक विपुवदसा भूलोक द भुवनकोशः। ,, इदानीं दिग्व्यवस्थितिमाह- लङ्कापुरेऽकस्य यदोदयः स्या- चदा दिनाधू यमकोटिपुर्याम् । अधस्तदा सिद्धपुरेऽस्तकालः स्याद्रोमके रात्रिदलं तदैव ॥ ४४ ॥ यत्रोदितोः किल तत्र पूर्वा तत्रापरा यत्र गतः प्रतिष्ठाम् । तन्मत्स्यतोऽन्येच ततोऽखिलाना- मुदस्थितो मेरुरिति प्रसिद्धम् ॥ ४५ ॥ . स्पष्टम् । प्रभा। प्रतितिष्ठतीति प्रतिष्ठा प्रतिपूर्वकस्थाधातोः 'आतचोपसर्गे' इत्यङ् ततष्टाप् । एवमुदयास्तवशेन पूर्वापरे विज्ञाय ताभ्यां मत्स्यतोऽन्ये दक्षि- णोत्तरे प्रसाध्ये इति । अखिलानां सकलदेशानामुदगुत्तरदिशि मेरु गिरिरिति प्रसिद्ध विश्रुतम् । भापाभाष्य। जब लङ्का में सूर्योदय होगा उस समय यमकोटि में दिनार्घ और नीचे सिद्धपुर में अस्तकाल एवं रोमकपत्तन में भाधीरात होगी । जिस दिशा में सूर्य उदय हो वहीं पूर्व दिशा और जिधर अस्तहो वही पश्चिम दिशा समझना चाहिये । यो दोनों दिशाओंको जानकर मत्स्य बनाकर दक्षिण और उत्तर दिशाभी सिद्धहोगी सब देशों से उत्तर दिशा में मेरुगिरि की स्थिति है यह वात प्रसिद्ध है। उपपत्ति। भूगोलके मध्यमें लङ्काकी कल्पना है । वहाँसे पूर्वदिशा में 26 अंशपर यम- कोटि स्थित है । यमकोटिका मध्याह्नवृत्त लङ्काका क्षितिज है । लङ्कामें जब उदय होगा वो उससे १० अंश पूर्व यमकोटि में दिनार्ध होगा ! यो जब यमकोटिमें . गोलाध्याये दिनार्ध होगा तो उससे नीचे १० अंशपर सिद्धपुर में अस्त होगा । और उसी समय रोमकपत्तन मे अर्धरानि होगी । इसप्रकार इन नगरों में किसी स्थान में उदय मानकर १० अंश पर पूर्व और पश्चिम स्थित नगरों में क्रमसे उदय, अस्त दिनार्ध और राज्य की व्यवस्था सहज में ज्ञात होती है । भास्कराचार्य ने लिसाहै सब प्रदेशों से मेर उत्तरमें स्थितहै। इस विषय को सप्र- माण सिद्ध करने में सूर्यगति के नियमकी विवेचना आवश्यक है । भागवतके पश्चम स्कन्ध के २१ वें अध्याय में लिसा है कि 'सव्येन चलन दक्षिणेन याति।' इससे यह ज्ञात हुआ कि सूर्य दक्षिणावर्त मे मेरुके चारों तरफ भ्रमण करता है । नीचे लिखे क्षेत्र में स्पष्ट रीति से मालुम होगा 'सु' सुमेरु, 'ज' जम्यूद्वीप, 'प' सक्षद्वीप, 'ई' इतुसमुद्र और 'अ' से अन्यान्य भूभाग समझना चाहिये । 'कस गघ च छ ट ' सुमेस प्रदक्षिणा करनेका रविमार्ग है। क्षेत्र। A प 6 . क भुवनकोशः। क ख प्रादि मार्ग से रवि प्रदक्षिणा करता है । 'क' स्थानपर जब सूर्य उदय होगा तब 'ख' स्थान ठीक सूर्याभिमुख होगा । 'क' चिह्नपर उदय होने से क चिहित दिशा पूर्व 'ग' चिह्नित पश्चिम 'सु' चिह्न उत्तर और 'पइअ' दक्षिणदिशा सिद्ध होती है । जब 'ख' चिह्नपर सूर्य उदय होगा उस समय 'स' पूर्व, 'घ' पश्चि. म, 'सु' उत्तर एवं 'पइअ' दक्षिण दिशा होगी । इसीप्रकार 'ग' चिह्नपर भी उदय कल्पना करके दिशाओंका ज्ञान सह्ज है। यों ज्ञातहोगा कि 'छटठ' इत्यादि क्रमसे परिचम, ठटछच इत्यादि क्रमसे पूर्व और 'सु' उत्तर एवं 'पइअ' दक्षिण दिशामें होंगे । इसप्रकार देखाशाता है कि 'सु' चिह्नित दिशा जम्बूद्वीप से उत्तर 'पइन' चिह्नित दिशा जम्बूद्वीप किंवा लवण समुद्रसे दक्षिण है । अत्र सिद्ध हुआ कि हमारे यहां से मेरा उत्तर सिवाय किसी दूसरी दिशामें नहीं है और सक्ष, इक्षु प्रभृति समुद्र हमारे यहां से दक्षिण दिशा में वर्तमान हैं। इसीलिए विष्णुपुराणमें भी लिखा है कि सर्वेषां द्वीपवर्षाणां मेरुरुत्तरत. स्थितः ॥ ४४१४५ ॥ इदानीं विशेषमाह- यथोज्जयिन्याः कुचतुर्थभागे प्राच्यां दिशि स्याद्यमकोटिखे । ततश्च पश्चान्न भवेदवन्ती लदैव तस्याः ककुभि प्रतीच्याम् ॥ १६ ॥ तथैव सर्वत्र यतोहि यत्स्यात् प्राच्यां ततस्तन्न भवेत्मतीच्याम् । निरक्षदेशादितरत्र तस्मा- प्राचीप्रतीच्यो च विचित्रसंस्थे ॥४७॥ - इष्टपदेशान्मेरोरभिमुखीमुत्तरां दिशं निश्चलां कृतानिरक्षाभि- मुखींदक्षिणां च निश्चलां कृत्वा तन्मत्स्यात्माच्यपरा साध्या। एवं यत्पान्यो चिहं भवति ततः पुनरुत्तर दक्षिणां च साधयित्वा यावत्याच्यपरा साध्यते तावत्पूर्वरेखायां न पतति । उत्तरायाश्च- लिततात्मान्यपरा चलिता भवतीत्यर्थः । शेषं मुगमम् । .
गोलाध्याये
भापाभाष्य।
प्रभा।
यथोजयिन्येति श्लोकद्वयमपि स्फुटम् । अत्रेदंबोध्यम्, ध्रुवता-
रयोः क्षितिजगतत्वाभिप्रायेण पौलस्त्यावासानिमित्तकप्रसिद्ध्याच लङ्का
पुरं भूपृष्ठमध्य प्रकल्प्य ततः पूर्वक्रमेण नवत्यंशान्तरे है यमकोटिम-
शीत्यधिकशतांशान्तरे १८० सिद्धपुर सेप्तत्यधिकद्विशत्यंशान्तरे २७०
रोमकपुरंच भचकभ्रमणसंस्थावगत्यथै कल्पितम् । तेषां विपुवरेखात
इतस्ततो वर्तमानत्वे नष्टत्वेऽपि च कालवशेन प्रकृते न क्षतिर्यावद्भू-
गोलावस्थानं विपुत्रदुपलक्षितविन्दुलक्षणकस्थानचतुष्टयव्यत्यासापा-
यायोगात्।
जैसे उज्जयिनी से पूर्व दिशामें भूमिके चतुर्थाश पर यमकोटि स्थित है तो भी
यमकोटि से पश्चिम दिशामें उज्जयिनी नहीं किन्तु लङ्काही है । इसी प्रकार सर्वत्र
जिस स्थानसे मो स्थान पूर्वमें है उससे दूसरा स्थान पश्चिम में नहीं होसकता ।
यों स्पष्ट है कि निरक्षदेशसे अलग पूर्व और पश्चिम दिशाकी विचित्र स्थिति हो
जातीहै । अर्थात् उत्तर दिशाके चलनसे सय दिशाओंमें अन्तर पड़माताहै ॥४६॥४७॥
इदानी चक्रभ्रमणव्यवस्थामाह-
निरक्षदेशे क्षितिमण्डलोपगो
ध्रुनो नरः पश्यति दक्षिणोत्तरौ ।
तदाश्रितं खे जलयन्त्रात्तथा
भ्रमद्रचक्र निजमस्तकोपरि ॥४८॥
उदग्दिशं याति यथा यथा नर-
स्तथा तथा खान्नतमूत्रमण्डलम् ।
उदग्ध्रुवं पश्यति चोन्नतं क्षिते--
स्तदन्तरे योजनजाः पलाशकाः ॥ ४६॥
योजनसंख्या भाशे-
गुणिता स्वपरिधिहता भवन्त्यंशाः।
भूमो कक्षायां वा
भागेभ्यो योजनानि च व्यस्तम् ॥ ५० ॥
भुवनकोशः। उदग्दिशं याति यथा यथा नर इत्यनेनापसारयोजनैरनुपातः सूचितः । यदि भूपरिधियोजनैश्चक्रांशा लभ्यन्ते तदापसारयो- जनैः किमिति । फलमक्षांशाः। यदि चक्रांशमितपरिधिना भूप- रिधिलभ्यते तदाक्षाशैः किमिति । फनं निरक्षदेशस्वदेशयोरन्त रयोजनानि स्युः। शेपं स्पष्टम् । एवं निरक्षदेशाक्षितिचतुर्थांशे किल मेरुः। तत्र नवतिः ९० पलांशाः। प्रभा । उदग्दिशमित्यादिना भुको गोलाकारत्वमपि ज्ञायते । सपरिधि. भूपरिधिः कक्षापरिधिश्चाभागेभ्यः साधिताक्षांशेभ्यो व्यस्त विपरीतानु- पातेन योजनान्यन्तरयोजनानि ज्ञायन्ते । भाषाभाष्य। निरत देशमें मनुष्य दक्षिण और उत्तर दोनों ध्रुवोंको क्षितिजवृत्तमें लगा देखता है। और भुवासक्त भवनको, अपने शिर के ऊपर जलयन्त्र ( अरहट ) के भाति भ्रमण करता हुआ देखता है । मनुष्य नैसे उत्तरको चलैगा वैसेही भमण्डल को मकाहुआ और उत्तर ध्रुवको क्रमसे ऊचा देसैगा । भूमि और भुपको उँचाई के मध्यमें योननात्मक अज्ञाश होताहै । यो जन सख्याको भाश ( ३६० )से गुणाकर स्पष्टपरिधिका भाग देने से भूमि किंया कक्षामें अरा सिद्ध होते हैं । विपरीत अनुपातसे अशसे योजनात्मक अन्तर होताहै । उपपत्ति । निरत देशमें दोनों ध्रुव हितेन में सलग्न मालूम होते हैं। और वहासे जि. तनाही उत्तरको चलाजाय उतनाही क्रमसे व ऊचा होता जायगा । ये बात प्रथम पुरान्तर चेदिदमुत्तर स्यात् ' इस श्लोकको उत्पत्ति में राष्ट रूपसे लिखा है। जिस प्रकार बहा दो स्थानों का अन्तर जाकर योजनात्मक भूपरिधिका साधन किया है, उसीप्रकार यहा प्रथम प्रताराका साधन होताहै । फिर विल मानुपात से बोनो स्थानों के अन्तर योजनभी मिद्ध होजाई।
गोलाध्याये अक्षांश के साधनार्थ अनुपात, अक्षांश। भूपयो। ३६० :: अंयोः ६३० अंयो भूपयोः अन्तरयोजनार्थ अनुपात, भूप अक्षा अन्तरयोजन । ३६०: भूप :: अक्षां इसप्रकार ' योजनसंख्या भाशेर्गुणिता-' इत्यादि उपपन्न हुआ ॥ १८-५० । अतस्तत्र ध्रुवर्णसंस्थानमाह- सौम्यं ध्रुवं मेरुगताः खमध्ये याम्यं च दैत्या निजमस्तकोः । सव्यापसव्यं भ्रमहक्षचक्र विलोकयन्ति क्षितिजप्रसक्तम् ॥ ५१ ।। स्पष्टम् । कृते गोलबन्धे भगोलं परिभ्राम्येदं शिष्याय दर्शयेत् । प्रभा। मेरुगता अमराः सौम्यं ध्रुवं खमध्ये दैत्या असुराः याम्यं ध्रुवं च निजमस्तको पश्यन्ति । ऋक्षचक्रं भचक्र सव्यामव्यं भ्रमत क्षिति- जप्रसक्तं विलोकयन्ति। तदेतद् भचक्रभ्रमणं देवानां पूर्वादिदिक्कमेण दैत्यानांपूर्वादिदिग्व्युत्क्रमेण भवतीति भावनीयम् । भाषाभाष्य। मेरुवासी देवगण उत्तर ध्रुवको और दैत्यगण दक्षिण ध्रुवको अपने शिरके पर देखते हैं। और वे लोग अनुलोम विलोमरूपसे भपक्रको क्षितिभरेखासक्त भ्रमण करताहुआ देखते हैं। उपपत्ति। खगोल के अन्तर्गत भगोल बनाकर उसको घुमाने से भचा का भ्रमण क्षिति. जासत होताहै । मेरुप्रष्टवासियों को ध्रुव समध्य में दीखता है क्योंकि यहापर १० अक्षांश होते हैं । और विपुपवृत्त उनलोगों का क्षितिमवृत्त होता है । उस भुवनकोशः। क्षितिजवृत्त से क्रान्तिके तुल्य क्रान्तिवृत्त और भचक्र दक्षिण उत्तरको हटा है। ‘ऐसी स्थिति में देव और दैत्य दोनों, यथा समय ~~कान्तिवृत्त और मचक्रको क्षितिजमें लगाहुआ भ्रमण करते हुये देखते हैं । अर्थात् वहांपर क्षितिजवृत्त में सूर्यादि उदित होकर क्षितिज के समानान्तर वृत्तके स्वरूप में चारोंतरफ भ्रमण करते हैं । यो मेरुकी स्थिति गोलपर स्पष्ट प्रतीत होतीहै। सगोलान्तरर्गत भगोल की रचना आगे 'गोलबन्धाधिकार' में कही जायगी ।। ५१ ।। इदानीं भूपरिधिमानं प्राकथितमपि विशेपार्थगनुवदतिस्म ! पोक्लो योजनसंख्यया कुपरिधिः सप्ताङ्गनन्दाब्धय-(४६६७) स्तव्यासःकुभुजङ्गसायकभुवःसिद्धांशकेनाधिकः (१५८१३) पृष्ठक्षेत्रफलं तथा युगगुणस्त्रिशंच्छराष्टाद्रयो (७८५३०३४) भूमेः कन्दुकजालवत्कृपरिधिव्यासाहतेः प्रस्फुटम् ॥ ५२ ॥ भूव्यासः कुभुजङ्गसायकभूमितानि योजनानि चतुर्विशत्यंश १५८१३ मितानि । परिधिः सप्ताङ्गनन्दाधिमितानि ४६६७१ ब्रह्मोक्तव्यासस्य कथं त्वदुक्कादन्यः परिधिरिति चेदत्रोच्यते। मह- दयुतादिव्यासा प्रकल्प्य वृत्तशतांशादपि सूक्ष्मविभागस्य ज्योत्पत्तिविधिनाज्यासाध्या। यत्संख्याकस्यविभागस्य ज्या तत्सं- रूपया सा गुणिता सती परिधिर्भवति । यतःशतांशादपि सूक्ष्मोंशो वृत्तेः समः स्यात् । अतोऽयुतद्वयव्यासे २०००० द्विकाग्न्यष्ट यमर्तुमितः ६२८३२ परिधिारार्यभटाद्यैरङ्गीकृतः । यत्पुनः श्री. धराचार्यब्रह्मगुप्तादिभिर्व्यासवर्गादरागुणात्पदं परिधिः स्थूलोप्य- जीकृतः स सुखार्थम् । नहि ते न जानन्तीति । तथा भूपृष्टक्षेत्रफलं योजनात्मक युगगुणत्रिशच्छराष्टादयः ७८५३०३४ । कथमिदं जातं तदाह । परिधिव्यासाहतेःप्रस्फुटम् । चतुरिक्शतमष्टगुण द्वापटितथा सहसायाम् । अयुतदयविश्यम्भस्यासनोत्तपरिणादः ॥' था. पभोर गणितपाद भा...॥
गोलाध्याये प्रभा। कन्दुकजालवत् यथा कन्दुकस्य पृष्ठभागः परितोजालावृतो भवति तथैवेदं भूगेः पृष्ठक्षेत्रफलमुपरितनं जायत इत्यर्थः । शेष स्फुटमेव । भापाभाष्य। । भूमिकी परिधि ४२६७ योजन कहीगई है । उसका व्यास १५८१ योजन अपने चौबीसवें हिस्से के सहित निश्चित हुआ है । और उसका पृष्ठक्षेत्रफल ७८५३०३४ योजनहै । यह भूमिका क्षेत्रफल गेंदके जालके समान ऊपरका होता है। यह भूपरिधि और व्यासके गुणन से स्फुट सिद्ध होता है । उपपत्ति । ( १ ) ऊपर वासना भाप्य में भास्कराचार्य ने सूक्ष्म अनुपात के क्रमसे व्यास और परिधिका आनयन कियाहै । वह इसप्रकार है, व्यासार्धको अयुत (१००००) श्रादि बड़ी संख्या कल्पना करके ज्योत्पत्ति की विधिसे वृत्तके शतांशकी अपेक्षाभी सूदम अंशकी ज्या साधन करना । परिधि के जितने सूक्ष्म अंशकी ज्या सिद्धभई हो उससे ज्याको गुणा करने से परिधि होगी। क्योंकि शतांशसे भी सूक्ष्म अंश वृत्तमें सम रेखाकार होता है । इसीलिये वृत्तका व्यास २०००० कल्पना करके तदनुसार ६२८३२ परिधि (प्रथम ) आर्यभटादिकों ने स्वीकृत की है । परन्तु श्री. धराचार्य और ब्रह्मगुप्तादिकोंने जो दशगुणित व्यासवर्ग के मूल / १०४ व्या को परिधिके समान मानाहै वह स्थूल प्रकार-होनेपर भी सुभीते के लिये मानली है मूर्यसिद्धान्तादि प्राचीन अन्धों में ' तद्वर्गतोदशगुणात्पदं भूपरिधिर्भवेत् ' अर्थात् दशगुणित व्यासवर्ग का मूल परिधिके समान होता है । अथवा, इसप्रकार व्यास : परि :: १:/१० =३.१६२३ । इसीके लिये भास्कराचार्य कहते हैं कि आर्यभट ब्रह्मगुप्त शुद्ध अनुपात जानक भी इसको क्यों उपयुक्त किया ? रङ्गनाथ ने सूर्यसिद्धान्त की टीकामे लिखाहै । गणित लाघव के लिये इसको स्वीकृत किया है । सूर्यसिद्धान्त में जो सूक्ष्मविर परिधिके साधनकी लिसी है उसीसे '.१:/१०' इस अनुपातकी उत्पत्ति है योजनानि शतान्यष्टौ--' इत्यादि प्रकार से अनुपात यों हुश्रा- ६८७६: २१६००::१: २१६००x१ इसमें हरक - । भुवनकोशः। अपवर्तन देने से और शेष संख्याका वर्ग करने से ११५२।१२ हुआ। इन संख्याओं को एकत्र करने के लिये स्वल्पन्तर से १० मानलिया । इसप्रकार 'व- र्गेण वर्ग गुणयेत्--, इत्यादि विधि से व्यासवर्ग दशगुणितका मृत परिधि हुई। इसी विषय का भास्कराचार्य ने वासनाभाष्यमें प्रसग किया है। परन्तु यह भास्क- राचार्य को सम्मत नहीं है। उनके अनुसार-- १२५० : ३६२७.१ ३.१४१६ यह सूक्ष्म अनुपात है। इसके अनुसार भून्यास १५-१३१ योजन और परिधि ४२६७ सिद्ध होतीहै । 1 ब्रह्मगुप्त और भास्करका भव्यास तो एकही है । परन्तु भूपरिधि में अन्तर पड़ गया । क्योंकि ब्रह्मगुप्तने १:/१० इस स्थूल अनुपातका सुभीते के लिये उप- योग किया है। प्राचीन आचार्यों ने जो योजनात्मक भूव्यास लिसे हैं वे सय परस्पर विरुद्धहैं । जिसप्रकार अर्धज्यासे ज्या का बोध होताहै, प्राय उसीप्रकार योजना से योजन का अर्थ है । योजन का प्रमाण भी प्राचीनी का भिन्नहै । भट्टोत्पल के लेखानुसार पुलिशके मतसे अंगुलादि योजनप्रमाण भास्कर के मत से-- १२ अगुल-१शक. यव-१ अगुल. २ शकु%१ हस्त. २४ अगुल-१ हस्त. ४००० ४ हस्त-१ नोश. हस्त-१ दण्ड. - ग्रोश-१ योजना २००० दण्ड-१ क्रोश. ४ क्रोश-१ योजना इसप्रकार पुलिशानुसार ८ कोश का और भास्करानुसार ४ कोश का एक गोजन होता है। (आर्यभट ने औरही लिखा है ) ऐसेही परम्पर योजन मान वेरुद्ध होने से प्राचीन भूव्यास और परिधि योजनों का ठीक विवेक कठिन है । प्रत में भास्करानुसार ४ कोश का योजन प्रसिद्ध है और एक कोश में २ गेल मानी जाती हैं। परन्तु योजनमान में मील की सरया बहुतों ने भिन्न मानी । किसी ने एक योजन में ५ मील मानकर सूर्य सिद्धान्त का भूव्यास ल निश्चित किया है । ५ मील का योजन ( योजनार्ध ) होतो ब्रह्मगुप्त और * 'मृद्दइनजलमयाना विशम्भोयाननै दिनन्दनाम् । राशिवसतिधिभि १५८१ यमपशाम्मे ५२२ सत्यवम्वदै ४० ॥' नामखुटसिद्धात निम्मनापन, श्लाक १२ । Co०० गोलाध्याये भास्करका भूव्यास ७९०५ मीन्न सिद्ध होता है । सांप्रत में युरोपियन मतसे ७९१२ मील निश्चित हुआ है । परन्तु जिंसप्रकार हमारे यहां योजन प्रमाण में प्राचीन भार्यों का निसंवाद है, पैसेही युरोपियन ज्योतिपियों के भी अनेक प्रकार के मत उपलब्ध होते हैं । वास्तव में एक कोश में दो मील का हिसाव ठीक है और उसी के अनुसार व्यवहार भी है । यदि यह सत्य है तो एक योजनमें पाठ. मील स्फुटही है । परन्तु इस नियम का उपयोग प्राचीनों की मान शैलीपर निर- रही है। उन लोगों की स्वतन्त्र व्यवस्था है। (२) पूर्व 'यदि ममा मरोदरमलिभा' इस श्लोक पी उपपत्ति में भूमि के श्राकार या मयुक्तिक उपपादन हुआ है। वहां लिखा है कि मध्याहवृत्त के पापी लंबाई दो स्थानों में निश्चय करने मे मध्यममानमे ६ मील निशित हुई है यह चाप एक अंश की लंबाई है। अब इसी से अनुमानद्वारा भपरिधि का शान भी सुगम है। १:१२ मील : १६० : ... ३६६८२५,००० मील के भीतर अपरिधि गिद्ध भई । 'पीर २५,००० भल्याम%3 ८००० मीलफे भीतर होता है। ३.१४२१९ . 10 भुवनकोशः। ६६ शम। तर, अL क । ९०-वे क=L चेस । इस कोणकी कोटि-वेखपृ । अनुपात, A वेपस त्रिभुज में । ज्यावेखपृ : वेभुज :. ज्यावेख: पुसभुज । ज्यावेसट: वेटभुज : ज्या८६०धेस। अब, केंपृस जिभुज में 'पृ' कोण समकोण होने से जात्य है। और प्रेस त्रिभुज में समकोण होने से जात्य है । इनकी कोटि भूव्यास के समान है । और दोनों जात्यों में 'केस' कर्ण एकही है । यो जात्य तुल्य हुए । पृ स भुज के भुज के तुल्य हुा । अर 'वेस' में प्रस के तुल्य 'स" जोड देने से 'वे' का मान हुआ। वे है के जात्य में पृ समकोण है। 'थे', कोणकोटि 'के' है । अनुपात- ज्या 2 वे के वेप भुज ज्या 2 के वे :के पृ भुज । यही भूव्यासार्ध का प्रमाण है । इसीप्रकार अन्य रीतियों से भी भूव्यास साधन होसफता है।। ५२ ।। न। क t . ७० गोलाध्याये लल्लोकस्य नगशिलीमुखबाणभुजङ्गमत्यादेर्भूपृष्ठफलस्यक दूपणमाह- दुष्टं कन्दुकपृष्ठ जालवदिलागोले फलं जल्पितं लल्लेनांस्य शतांशकोऽपि न भवेद्यस्मात्फलं वास्तवम् । तत्प्रत्यक्षविरुद्ध मुद्धतमिदं नैवास्तु वा वस्तु वा हे प्रौढा गणका विचारयत तन्मध्यस्थबुद्धयामृशम् ॥ ५३॥ यल्लल्लोक्तं भूपृष्ठंफलं तदुष्टम् । यतस्तदुक्तफलस्य शतांशकोऽपि वास्तवं पारमार्थिकं फलं न भवति । अत्यन्तंदुष्टमित्यर्थः । कुतो यतस्तत्प्रत्यक्षविरुद्धम् । प्रत्यक्षवाधोहि महादूपणम्।अथात्मन औ- द्धत्याशङ्कां परिहरनाह । इदं यदुक्तं नैवोद्धतं किन्तु वस्तुपरमार्थः । अथवा किं शपथपरिहारेण । उद्धतमस्तुवा वस्त्वस्तु वा । हे प्रौढा गएका मध्यस्थबुद्धया विचारयत भृशमत्यर्थम् । प्रभा। इलागोले भूगोले लल्लेन यत्कन्दुकजालबत्फलं भूपृष्ठफलं जल्पि- तमविचारेण कथितं तदुष्टमसमीचीनम् । यस्मादस्यानीतफलरय शतांशकोऽपि वास्तवं यथार्थ फलं न भवेत् । गणितेन न सिध्येदित्य थः । तत्प्रत्यक्षविरुद्धमिदं मनिरूपितमुद्धतमविनीतं नैव किन्तु पर• मार्थः । वा, उद्धतमस्तु विचारशून्यमेव भवतु । वा वस्त्यरतु यथार्थमेव भवतु | 'भावः पदार्थो धर्मः स्यात्सत्त्वं तत्वश वस्तु च' इति त्रिका एडशेषः । हे प्रौदा गणकाः तदखिलं यूयं मध्यग्थबुद्धच्या मध्ये वादि. प्रतिवादिनोरन्तरे तिठतीति मध्यस्था । रयाघातोः कः । तद्बुद्धया पक्षपातराहित्येनेत्यर्थः । भृशमत्यर्थ विचारयत सदसहियफ कुरत । * लक्षावार्य का पूरा र उनके 'गिपतियो- नगशिपमुनाममनारसेगमशिन (२८५६३१८५५७)। समारो परियोजनाय पशु कागपत् ।।
भुवनकोशः। ७ भाषाभाष्य। ३ लल्लाचार्य ने कन्दुकजाल के समान जो भूपृष्ठफल निश्चित किया है उसके श- 'तांश में एक अंश भी यथार्थ नहीं है । वह प्रत्यक्ष विरुद्ध है । हम जो कहते हैं सो वास्तवमें सत्य है या असत्य, इसका विचार, हे प्रौढ ज्योतिषीगण ! आप लोग मध्यस्थ होकर करें ॥५३॥ अथ सयुक्तिः- यत्परिध्यर्धविष्कम्भं वृत्तं कृत्तं किलांशुकम् । तेनार्धश्चाद्यते गोलः किंचिद्धस्त्रेऽवशिष्यते ॥ ५४ ॥ गोलक्षेत्रफलात्तस्मादस्त्रक्षेत्रफलं यतः सार्द्धद्विगुणितासन्नं नावदेवापरे दले ॥ ५५ ॥ एवं पञ्चगुणाक्षेत्रफलात्पृष्ठफलं खलु । नाधिकं जायते तेन परिधिघ्नं कुतः कृतम् ॥ ५६ ॥ वृत्तक्षेत्रफलं यस्मात्परिधिघ्नं न युक्तिमत् । दुष्टत्वाद्गणितस्यास्य दुष्टं भूपृष्ठजं फलम् ॥ ५७ ॥ गोलपरिध्यर्धप्रमाणो यथा व्यामो भवति तथा वस्त्रं वृत्तं कृत्वा तेन वस्त्रेण गोलोपरि न्यस्तेन गोलार्धं प्रच्छाद्यते । वस्त्रपरिधेः संकोचात् किंचिदोनशेपं भवति । एवं सति गोलव्यासवृत्तक्षेत्र- फलाद वृत्तक्षेत्रफलं सार्धद्विगुणितासन्नं भवति । तावदेवापरे किलगोलार्धे । एवं वृत्तक्षेत्रफलात्पश्चगुणादधिकं पृष्ठफन्न कथंचि- दपि न भवति । किन्तु न्यूनमेव स्यात् । तर्हि तेन लल्लेन 'वृत्त फलं परिधिन्नं समन्ततो भवति गोलपृषकलम् ।' इति स्वगणिते कथं परिधिघ्नं कृतम् । किन्तु वृत्तानं चतुर्ममेव पृष्ठफलं भवति । अस्य लल्लोकस्य गणितस्य दुष्टत्वादभूपृष्ठफलमपिदुष्टमित्यर्थः । अथ वालावबोधार्थ गोलस्योपरिदर्शयेत् । भूगोलं मृण्मयं ૭૨ गोलाध्याये दारुमयं वा कृतातं चक्रकलापरिधि प्रकल्प्य २१६०० तस्य मस्त- के बिन्दुं कृत्वा तस्माद्विन्दोगोलपपवतिभागेन शरद्विदलसं. ख्येन २२५ धनूरूपेणैव वृत्तरेखामुत्पादयेत् । पुनस्तस्मादेव वि. न्दोस्तेनैव द्विगुणसूत्रेणान्यां त्रिगुणेनान्यामेवं चतुर्विशतिगुएं यावच्चतुर्विंशतिवृत्तानि भवन्ति । एपां वृत्तानां शरनेत्रवाहक २२५ इत्यादीनि ज्या/नि व्यासार्धानि स्युः। तेभ्योऽनुपातावृत्त प्रमाणानि तत्र तावदन्त्यवृत्तस्यमानं चक्रकलाः २१६०० तस्य व्यासार्धं त्रिज्या ३४३८ । ज्यार्धानि चक्रकलागुणानि त्रिज्या भक्कानि वृत्तमानानि जायन्ते । दयोदयोवृत्तयोर्मध्य एकै वल- याकार क्षेत्रम् । तानि चतुर्विंशतिः। वहुज्यापक्षे बहूनि स्युः। तत्र महदधोवृत्तं भूमिमुपरितनं लघु मुखं शरद्विदलमितं लम्ब प्रकल्प्य लम्बगुणं कुमुवयोगार्थमित्येवं पृथक् पृथक् फलानि । तेषां फला- नां योगो गोलार्धपृष्ठफलम् । तट्विगुणं सकलगोलपृष्ठफलम् । तव्यासपरिधिघाततुल्यमेव स्यात् । प्रभा। यत्तरिध्यप्रविष्कम्भमित्यादि स्फुट विवृतमाचार्यः । भाषाभाष्य । गोल परिधि के अर्धको व्यास कल्पना करके यदि वस्रका वृत्तकाटकर बनायाजाय तो वह वनवृत्त गोलार्धको ढकलेता है और कुछ अश उसका याकी रहजाता है। गोल क्षेत्रफन से वस्त्र क्षेत्रफल अदाई २६ गुणा के अासन्न होता है । और उतनाहीं दूसरे गोल के हिरमें भी होता है । इसप्रकार पञ्चगुण क्षेत्रफल से पृष्ठफल किसीप्रसार अधिक नहीं होता । फिर लल्लाचार्य ने परिधि से वृत्तफल को क्यों गुणा किया! वृत्त क्षेत्रफल को परिधि से गुणना अयुक्तहै । इनलिये ' वृत्तफलं परिधिनं समन्त. तोभाति गोलपृष्ठफलम् ' यह लल्लाचार्यचनपाट गणित का पृष्ठफल साधन विधि अशुद्ध है । और इमसे सिद्ध कियाहुश्रा भूपृष्ठफल भी अशुद्ध है 1 . भुवनकोशः। उपपत्ति । - मिट्टी अथवा काठका एक गोल बनाकर उसको भूगोल कल्पना करे जिसकी परिधिमें २१६०० का होंगी। और एक स्थानपर उसका मध्यबिन्दु मानकर उस से चापाकार गोलके छान भाग २२५ मे पहली वृत्तरेखा बनावे इसीप्रकार उसी हिन्दुसे दूने निगुने आदि चापाकार गोलके छानवे मागसे दूसरी तीसरी आदि वृत्तरेखा बनावे । इसप्रकार इसप्रन्य के अनुसार चौबीस वृत्तरेसा होंगी, यदि अधिक ज्याखण्ड माने जायेंगे तो अधिक होंगी। उनप्लव वृत्तरेसानों के व्यासार्थ २१५' इत्यादिहोंगे । इनपरमे यो अनुपातद्वारावृत्तोंके मान सिद्ध होंगे। ३५१८ : २१६..:: २२५ इ. अन्तिम वृत्तका मान २१६०० चक्राला होगा । और दो दो वृत्तरेवाओं के बीच में एक एक वलयाकार क्षेत्र होंगे। वे यहा चौवीस ज्यासण्ड कल्पना करने से १४ बनेंगे । यदि २४ से अधिक ज्याखण्ड कलना किये जायेंगे तो अधिक वल- यक्षेत्र बनेंगे । उनके फन 'लम्बगुगं कुमुखयोगार्थम् ' इस लल्लोक्तसूत्रानुसार सिद्ध होंगे । अर्थात् छोटी वृत्तरेखा को मुख, बड़ी को भूमि और २१५ को लम्ब कल्पना करके मुख और भूमि के योगाध को लम्ब से गुगना वह वलयक्षेत्रका फल होगा यो चौबीस वलय क्षेत्रों के फलोंका योग गोलपृष्ठा फल होगा उसको दूना करने से गोलपृष्ठ फल होगा ॥ ५४१५७॥ अथान्यथा प्रतिपाद्यते- गोलस्य परिधिः कल्प्यो वेदनज्यामितेर्मितः। मुखबध्नगरेखाभिर्यददामलके स्थिताः ॥ ५८ ॥ दृश्यन्ते वास्तदमागुक्तपरिधर्मितान् । अधिः कृतरेखामिगोले वान्प्रकल्पयेत् ।। ५६ ।। तत्रैकवपकक्षेत्रफलं खण्डैः प्रसाध्यते । सर्वज्यैक्यं त्रिभज्याहीनं त्रिज्याभाजितम् ॥ ६॥ एवं वप्रफलं तस्यानोलव्याससमं यतः। परिधिव्यासघातोऽनो गोलपृष्ठफलं स्मृतम् ॥ ६१ ॥ अनाभीष्टे कस्मिंश्चिदान्थे यावन्ति ज्यानि तत्संरुपा चतु- गुणातन्मितः किल गोले परिधिः करण्यः। यथामलकगोलपृष्ठे । - ar गोलाध्याये मुखवुध्नगरेखाभिः सहजाभिर्विभक्ता वका दृश्यन्ते । तथाभीष्टे गोलपृष्ठे मस्तकातलगरेखाभिः कल्पितपरिधिसंख्यान्वप्रकान्प्रक- ल्यैकस्मिन् वप्रे क्षेत्रफलं साध्यम् । तद्यथा । इह किल धीवृद्धिदे चतुर्विंशतिार्धानि । अतः परावतिहस्तमितो गोले परिधिः कल्पितः । प्रतिहस्तमूर्धाधोरेखाभिस्तावन्तो वप्रकाश्च कृताः । तत्रैकस्य वमकस्याधै हस्तान्तरे हस्तान्तरे तिर्यग्रेखाः कृत्वा ज्या- संख्यानि चतुर्विंशतिः खण्डानि कल्पितानि तत्र जीवाः पृथक् पृथक् त्रिज्याभक्कास्तिर्यग्रेखाप्रमाणानि भवन्ति। तत्राधस्तनी रेखा हस्तमात्रा । उपरितन्यस्तु ज्यावशेन किञ्चिन्यूनाः । सर्वत्र हस्त- मित एव लम्बः । लम्बगुणं कुमुखयोगाधमिति खण्डफलान्यानी- यैकीकृतानि। तदप्रका फलम् । तद्विगुणमेकस्मिन् वाके फलं भवति । तत्साधनार्थमिह सूत्रमिदम् । सर्वज्यैक्यं त्रिभज्याधहीन- मित्यादि। अत्र सर्वज्यानां शरनेत्रवाहव इत्यादीनामेक्यं सुरयम- कृतवाणतुल्यम् ५४२३३ एतस्त्रिज्यानोनं जातं मनुतत्त्वपञ्चमि- तम् ५२५१४ । एतस्त्रिज्याभलं जातमेकवपके क्षेत्रफलं व्याम- समम् ३०॥३३ | यत एनावानेव पणवतिपरिधोलस्य व्यासः स्यात् ३०।३३ परिधितुल्यकाश्च वप्रका इति परिधिव्यासघातो गोलपृथुफलमित्युपपन्नम् । तथाचोक्कमस्मत्पाटीगणिते । वृत्तक्षेत्रे परिधिगुणितव्यासपादः फलं तत् क्षुएं वेदेकारि परितः कन्दुकस्येव जालम् । गोलस्यैवं तदपि च फलं पृष्ठ व्यासनिघ्नं पर्मितं भवति नियतं गोलगर्ने घनास्यम् ॥ गोलपृष्ठफलस्य व्यासगणितस्य पडशो घनफलं स्यात् ।
मुवनकोशः। अत्रोपपत्तिः । पृष्ठफलसंख्यानि रूपवाहूनि व्यासाधतुल्य. वेधानि सूचीखातानि गोलपृष्ठे प्रकल्प्यानि । सूच्यग्राणां गोलगर्ने संपातः । एवं सूचीफलानां योगो घनफलमित्युपपन्नम् । यत्पुनः क्षेत्रफलमूलेन क्षेत्रफलं गुणितं घनफलं स्यादिति तत्त्रायश्चतु. वेदाचार्यः परमैतमुपन्यस्तवान् । प्रभा। वेदना चतुर्गुणिता या ज्या तन्मानमितः परिधिोलस्य क्ल्प. नीयः । बुथ्नो मूलदेशः। 'मूलं वुध्नोऽविनामकः' इत्यमरात् । मुखंच बुध्नश्चतयोगता या रेखाम्ताभिः । यहदामलके धात्रीफले वप्रकाः क्षेत्राणि 'पुन्नपुंसकयोर्वप्रः केदारः क्षेत्रमस्यतु' इत्यमरः । स्थिता दृश्यन्ते तहदेव गोले अर्वाधः मुखत्रुध्नाभ्यां कृतरेखाभिः प्रागुक्तपरिधेर्मितान् चतुर्गुणितज्याप्रमाणान् वप्रान् प्रकल्पयेत् । गणक इति शेषः। यथा ह्यामलकपृष्ठे मुखतलगरेखाभिःरवाभाविकीमि. विभक्ता यप्रका दृश्यन्ते तयैव गोलेऽप्यूचीघोरेखाभिप्रकाः कल्पित. परिधिसंख्यासंमिताः प्रकल्प्या इत्यर्थः । शेष स्फुटमेव । भाषाभाष्य। चौगुनी ज्या संख्या (६६) के समान गोलकी परिधि कल्पना करना । फिर उम गोलमें अपर (मुख) से नीचे तक पल्पित परिवि सग्या के समान ऐसा "करनी, जैसे आमलक में ऊपर से नीचे तक सड़ी रेसाए धनी रहती हैं । यो गोल में क्षेत्रों को उत्पन्न करना । सब ज्याओं के योग निग्या घटाकर और त्रिज्या का भाग देनेसे एक क्षेत्रका फन होगा । यह फन गोलच्यामके तुल्य होगा । इसी लिये परिधि और व्यासका घात गोलके फन के समान कहागया है। १ आर्यभर का मत यह है समपरिणाहत्या पिशमाहत्मेत्र मृतालम् । तुनिजमूनगोमान निरस गरिदे माया ७४ वचनुासान यासवामन रसात् ।
गोलाध्याये, उपपत्ति । - यहां पर गोलमे चौबीस ज्या कल्पना कियेगये हैं। उन संख्या को चार से गुगने पर गोलकी परिधि का मान ९६ हाथ हुआ। और उतनेही वप्र भी कल्पना किये हैं । ज्याध के तुल्य अर्थात् हाथ हाथके अन्तर पर चौबीस वप्रखण्ड फल्पना कियेगये हैं । इनमें नीचेकी रेखा एक हाथकी है और ऊपरवाली सब ज्यारूप होने से कुछ कुछ कम हैं । अब अनुपात से हाथभरके अन्तर पर जो तिरछी रेसा की : हैं उनका आनयन करके वनों का फल मिद्ध करना चाहिये । क्षेत्र। + ज्याओं में अलग अलग त्रिपाका भाग देने से तिरछी रेखाओंका प्रमाण होता है। उसमें श्र. नुपात यों होता है :-यदि त्रिज्या में रूपमित ति. रछी रेसा मिलती है, तब प्रथम ज्या में क्या ? . फल गोल के मस्तक से हाथभर के अन्तर पर प्रपम तिरछी रेसाका प्रमाण होगा। इसी क्रम एक,दो,तीन आदि ज्याओंकी हायभर के अन्तर पर कुल रेखाएं सिद्ध होंगी । अन्तकी चौघीसवीं रेखा हायभरकी होती है और लम्र सर्वत्र हावभर काही है, इसलिये 'लम्वगुणं फुगुसयोगार्ध-, इस से वप्रफल सिद्ध होगा। उस अनुपात के अनुसार:- प्रज्या त्रि:१ :: प्रज्या: त्रि इन तिरछी रेखाओं के मान में द्विश्या पहले की भांति दो दो के योगा- नि:१ :: द्विग्या: त्रि धों को लम्य से गुणने पर वन प्रि: १:: तृग्या: सएडों के फल होते हैं । इस प्र. इत्यादि.. फार फल हुए- प्रयाविशीच्या घि।१::प्रयाविशीग्या:- त्रि प्रश्या त्रित्रि:: त्रि नि १ % 3D D ........ प्रज्या दिग्या ..
त्रयोत्रिज्याई लिइनकायोग आधेवप्रका फल हुआ, त्रि -- भुवनकोशः। द्विज्या तृया इत्यादि नि त्रि (प्रज्या १ द्विज्या १ तृज्या ...नयोविंच्या १त्रि). इसकी द्विगुण किया तो संपूर्ण या त्रि (प्रज्या द्विज्यातल्या? .. प्रयोपिशीज्यात्रि/x. का फल हुभा भाज्य भा- (मज्या१द्विज्या ज्या? प्रयोविज्या नि) जकमें दोका अपवर्तन देनेसहुआ- यहा पर भाज्यराशि, त्रिज्याध से हीन सत्र न्यासरडों के योग के ममान गरियत करने से सिद्ध होता है इसलिये कहा है कि 'सर्वज्यैक्यं निभज्यार्धहीन' यों यह दूसरी युक्ति सगत होती है ।। ५८ । ६१ ॥ इदानीं भूमेः प्रलयभेदौ प्रलयांश्चाह-- वृद्धिर्विधरह्नि भुवः समन्तात् स्यायोजनं भूभवभूतपूर्वैः। ब्राह्मे लये योजनमात्रवृद्धे- नाशो भुवः प्राकृतिकेऽखिलायाः ॥ ६ ॥ दिने दिने यन्मियते हि भूत- दैनंदिनं तं प्रलयं वदन्ति । बाझं लयं ब्रह्मदिनान्तकाले भूतानि यब्रह्मतनुं विशन्ति ॥ ६३ ॥ ब्रह्मात्यये यत्प्रकृति प्रयान्ति सर्वाण्यतःप्राकृतिकं कृतीन्द्राः। लीनान्यतः कर्मपुटान्तरवात पृथक्रियन्ते प्रकृतेर्विकारः॥६४॥ ज्ञानाग्निदग्याखिलपुण्यपापा मनः समाधाय हरौ परेशे। यद्योगिनो यान्त्यनिवृत्तिमस्मा- दात्यन्तिकं चेति लयश्चतुर्धा ।। ६५ ॥
गोलाध्याये अत्र लयो नाम भूतविनाशः। सतु साम्प्रतं प्रत्यहमुत्पद्यते स दैनंदिन उच्यते। यो ब्रह्मदिनान्ते चतुर्युगसहस्रावसाने लोक- त्रयस्य संहारः स ब्राझोलय उच्यते । तत्राक्षीणपुण्यपापा एवं लोकाः कालवशेन ब्रह्मरारीरं प्रविशन्ति । तत्र मुवं ब्राह्मणाः । वाह्वन्तरं क्षत्रियाः । ऊरुद्धयं वैश्याः। पादद्वयं शूद्राः। ततो निशा वसाने पुनर्बह्मणः सृष्टिं चिन्तयतो मुखादिस्थानेभ्यः कर्मपुटान्तर- ताद ब्राह्मणादयस्तत एव निःसन्ति । तस्मिन् प्रलये भुवो योजनमात्रवृद्धेविलयो नाखिलायाः। अथ यदा ब्रह्मण आयुपोऽ. न्तस्तदा याप्रलयास महाप्रलय उच्यते तत्र ब्रह्मा ब्रह्माण्डे । तत्पा. श्वभौतिके । भूर्जले । जलं तेजसि । तेजो वायौ । वायुराकाशे । आकाशमहकारे । अहङ्कारो महत्तत्त्वे । महत्तत्वं प्रकृती । एवं सकलभुवनलोका अक्षीणपुण्यपापा एवाव्यक्तं प्रविशन्ति । यदा भगवान सिसृक्षुः प्रकृतिपुरुपो क्षोभयति । तदा तानि भूतानि कर्मपुटान्तरत्वात् प्रकृतेः स्वत एव निःसरन्ति । यथाह श्रीविष्णु- पुराणे पराशरी जगदुत्पत्तिकारणम् । प्रधानकारणीभूता यतो वे सृज्यशक्तय इति । सृज्यशक्लयस्तकर्माणि तान्येव सृष्टो मुख्यं कारणम् । इतराणि निमित्तकारणानि । अन्यैरप्युक्तम् । नाभुक्तं क्षीयते कर्म कल्पकोटिशतैरपि । नह्यात्मनां भवति कर्मफलोपभोगः कायादिनेत्यादि । अस्मिन् प्रलयेऽखिलाया भुवो नाश इत्यर्थः । तथा ज्ञानाग्नि- दग्धाखिलपुण्यपापा योगिनो विपयेभ्यो मनः समाधाय समाहत्य 'तद्धरौ समाहितं कृत्वा यान्ति । देहं त्यजन्ति । अनिवृत्ति यानि स आत्यन्तिको लय इति ।
भुवनकोशः। ७8 . प्रभा। वृद्धिविधेरहीत्यादि रस्फुटमेव । अत्र भुवो वृद्धिक्षयकल्पना पुरा. रणानुमता बोध्या । प्रलयो हि नित्यनैमित्तिकप्राकृतिकात्यन्तिकभेदेन चतुर्धा। तथा चोक्तं विष्णुपुराणे । 'नैमित्तिकः प्राकृतिकस्तथैवात्यन्तिको द्विज । नित्यश्च सर्वभूनानां प्रलयोऽयं चतुर्विधः ॥' अत्राचार्येण वासनाभाष्य तत्तल्लयविषयिणी विश्वास्थितिवारुतया प्रदर्शिता, किं वृथापल्लवितेन । कूर्मपुराणेऽपि 'योऽयं संदृश्यते नून नित्यं लोके क्षयरित्वह। नित्यः संकीर्त्यते नाना मुनिभिः प्रतिसश्चरः।' इत्यादि समुपलभ्यते । तत्र प्रलयभेदोऽपि साधु प्रतिपादितः। भाषाभाष्य। ब्रह्माके एक दिनमे अर्थात् चारहजार युगोंमें पृथिवी अपनेमे उत्पन्नहुए नानापदार्थों से एक योजन चारों तरफ से बढती है । और ब्रह्मा के दिनान्त में अर्थात् ब्राहलय में एक योजन बढीहुई पृथ्वीका नाश होता है । और प्राकृतिक प्रलय में सारी पृथ्वीका नाश होता है । कालवश जो प्रतिदिन मनुष्यों की मृत्यु होती है उसको दैनन्दिन प्रलय कहते हैं । ब्रह्माके दिनान्त में ब्राह्मलय होता है । उससमय समस्त भूत ब्रह्माके शरीर मे प्रविष्ट होजाते हैं । ब्रह्माके अन्तकाल में समस्त प्राणी निज प्रकृति में लीन होजाते हैं इसलिये विद्वान्लोग उसको प्राक- तिक प्रलग कहते हैं । यों अपनी प्रकृति में लीन होकर भी प्राणी कर्मान्तरवश पुन प्रकृति से अलग होजाते है। ज्ञानरूप अग्निद्वारा सपूर्ण पुण्य पाप भस्मकरके परमेश्वर में मन स्थिर करके, जो योगिजन अनिवृत्ति अवस्था को प्राप्त होते हैं उमको प्रात्यन्तिकतय कहते हैं । इसप्रकार लय चार प्रकारका है । ६२ । ६५ ।। अथ ब्रह्माण्डगोलमाह- ... भूभूधरत्रिदशदानवमानवाद्या ये याश्च धिण्यगगनेचरचक्रकक्षाः। लोकव्यवस्थितिरुपयुपरिप्रदिष्टा ब्रह्माण्डमाण्डजठरे तदिदं समस्तम् ॥ ६६ ॥ स्पष्टम् ।
गोलाध्याये । प्रभा। भवतीति भूःपृथ्वी धरन्तीति धराः । पचाद्यच् । भुवो धरा 4 'पर्वताः। त्रिदशाः देवाः । तदाद्याः तत्प्रभृतयो ये । याश्च धिष्ण्यगगने- चरचक्रकक्षाः । धिष्ण्यानि नक्षत्राणि । गगनेचराः ग्रहाः । चक्रं "', दायः । कक्षा भ्रमणवमनि । उपयुपरि यथोत्तरं लोकव्यवस्थिति लोकानामवस्थानं प्रदिष्टा मुनिभिः प्रतिपादिता। तदिदं समरत जगत्स्रष्टुरएडं चतुर्दशभुपनगोलकः, तदेवभाएड पात्रं, रेवरी र्तत इत्यर्थः । ब्रह्माण्डगोलान्तर्गतमेवाखिलं चराचरं विश्वमिति तत्तम्। भापाभाप्य । भूमि, पर्वत, देवता, दैत्य, मनुष्य आदि और ग्रह, नक्षत्र कक्षा, भूलोक आदि का क्रम सत्र इसी ब्रह्माण्डके भीतर ही है ॥ ६६ ।। इदानीमन्योदितं ब्रह्माण्डमानं पूर्वकथितमपि प्रसादनुवदति स्म कोटिप्रैनखनन्दपटूनखभूभूभृद्धजतेन्दुभि-१८७१२०६१२०००००००० ज्योति शास्त्रविदो वदन्ति नभप्तः कक्षामिमां योजनैः। तद्ब्रह्माण्डकटाहमंपुटतटे केचिज्जगुर्वेष्टनं केचित्लोचुरदृश्यदृश्यकगिरि पौराणिकाः सूरयः ॥ ६७ ।। करतलकलितामलकर दमलंसकलं विदन्ति ये गोलम् । दिनकरकरनिकरनिहत- तममोनभमः स परिधिदितस्तैः॥ ६८।। ह्याहोतन्मितमस्तु नो वा मुवनकाशा प्रमा। *- ब्रह्माण्ड मेव कटाहसंपुटं तत्तटे संधौ केचिदाचार्यो बेष्टनं परिधिं ज- तुस्चुः केचित्पौराणिकाः सूग्यो विहांसोऽदृश्यदृश्यकगिरि लोकालो- »पर्वतप्रमाणं प्रोचुः । करतले कलितं स्थापितं यदामलकं तहदमलं नेषणं ये विद्वांमः सकलं गोल गोलगणितं विदन्ति जानन्ति, तैः देनकरस्य ये करास्तेषां ये निकराः समूहास्तनिहतं दूरीकृतं तमो यस्य तस्य नभम नाकाशग्य स कोटिन इत्यादिप्रतिपादितः परिधि- हदितः । ब्रह्माण्डमेतन्मितं पूर्वप्रमाण कमातु मास्तु वा । वल्पे ग्रहो पावन्ति योजनानि कामति गच्छति । क्रमु पादविक्षपे वर्तमाने लट् । पूर्वैराचार्यैतत्प्रमाणं खकक्षाख्यं प्रोक्तमिद नोस्माकं सैद्धान्तिकानां मतम् । क्लो योजनात्मिका ग्रहगतिरेव खकक्षाख्या। इति प्रभायां भुवनकोशाध्याय । दिशाम जाते. प्राजक्ल विज्ञ प्राचार्यों ने इस पा,आकाशाक्षाका योजनात्मकमान १८७१२०६९२०००००००० की सबसे पहले यह उमाण को कोई विद्वान् ब्रह्माण्डकटाह के ऊपर का वेष्टन कहते से इस भूभ्रमण की। राणिक कहते हैं कि यह लोकालोक पर्वत का प्रमाण है। जो हस्त. 'त स्वन्छ गोलगणित को जानते हैं वे कहते हैं कि सूर्यकिरण अन्धकार के सीमा की परिधिमान है । जो ऊपर कहागया है रहो अथवा न हो । क्लरकाल ( ब्राझदिन ) में जितनी हो की होती है उसीको पूर्वाचार्य मकता कहते हैं, यह हमा प्रासादभूत और लल्लाचार्य वनको समाप्त हुआ। 'यदि च भगा नयुपारपादष्ट ब्रह्माण्डमाण्डजठरे तदि भापाभाच्या या लोकव्यवस्थित पाप इदानीं भूमेरुपरि सप्तवायुस्कन्धास्तानाह--- भूवायुरावह इह प्रवहस्तदूर्ध्वः स्यादुद्रहस्तदन संवहसंज्ञकश्च । अन्यस्ततोऽपि सुबहः परिपूर्वकोऽस्माद् बाह्यः परावह इमे,पवना प्रसिद्धाः॥१॥ भूमेबहिर्दादशयोजनानि भवायुस्त्राम्बदविद्युदाद्यम्। तदूर्ध्वगो यः प्रबहः स नित्यं प्रत्यग्गतिस्तस्य तु मध्यसंस्था |॥ २॥ नक्षत्रकक्षाखचरैः समेतो यस्मादतस्तेन समारतोऽयम्। भपञ्जरः खेचरचक्रयुक्तो भ्रमत्यजसं प्रवहानिलेन ॥३॥ प्रसिद्धमिदम्। प्रभा। भूमेरुपरि तावत्सप्त वायुरकन्धाः सन्ति । तेषां नामा आवहः, प्रवहः, उहहः, संवहः, सुबहः, परिवहः, परायः ॥ ६७ हिादशयोजनान्यष्टचत्वारिंशत्कोशान यावद् भूवा वाम्बुदाः मेघाः तडितो विद्युतः । श्राद्यपदेन करके कारजःसंदतिसन्ध्यारागादि विज्ञेयम् । एषां लक्षा तायां द्रष्टव्यानि । तस्य भूवायोरुर्ववर्ती प्रबवायु प्रत्यग्गतिः पश्चिमगतिः। तस्य मध्यसंरयास सेन प्रबहानिलेनाय नक्षत्रशाखचरः समे कोऽजसं भ्रमति । प्रबहवायुरेव भचक्रनमरे ऽप्यारुम् यस्मा-ज्योतीपि वहति प्रवहस्तेन . तः॥६६॥ वानास्मानियाय मध्यगतिवासना। " भाषाभाष्य। भूवायु, आवह, प्रबह, उद्वह, संबह, सुबह और परावर ये सात वायुस्कन्ध श्राकाश में उत्तरोत्तर प्रसिद्ध हैं । पृष्त्री से बारह योजनतक भूवाय है, वहां मेघ, बिजली आदिको स्थिति है। उसके ऊपर प्रवह्वायु है, जो नित्य पश्चिमाभिमुख एकाकार गति से चलती है। यह भपञ्चर ग्रह, नक्षत्रकक्षा, और ग्रहकक्षा के हित प्रवहवायु द्वारा हमेशा भ्रमण करता है। उपपत्ति । (भूभ्रमण) सांप्रतमें वैज्ञानिक विचारों से निर्विवाद सिद्ध है कि भूमि भ्रमण करती है। और सूर्य आदि ग्रह भचक्र के साथ स्थिर है । यहां संक्षेप से यह सिद्धान्त दिस- लाया जाता है। + प्रार्यमट ने अपने प्रार्यभटीय' में सबमे पहत यह मिदात लिखा है । जैमा - अनुलोमगनिनीय पश्ययचल विलोमग यन् । अचलानि मानि तदत्समपश्चिममानि लझापाम् ।। इमका भाव यो है जैसे नावपर चदेहुरे मनुष्य को निपर यह जाती ह उसस विपरीत दिशा में तीरके अचल वृक्ष यादि चलते हुए प्रतीत होते हैं, इसी प्रकार निरव देशमें अचल नन पूस परिच दिशामें जानेहुये प्रतीत होते है । ' इससे भूमिका पश्चिम से पूर्वदिशा में गति सिद्ध?ई है। यही मिद्धात आनकल विज्ञान से दहोकर समाय हुआ है। परन्तु हमारे देशमै थारंभट के पीछे लल, श्रीपति यादि प्राचार्यों ने इस स्वरूप सिद्धातपर विचार न करके उलटे सरडन हो यिा है। इस लिये इस निशान की सबसे पहले यहा उत्सत्ति होने पर भी वृद्धि नहीं हुई। और यही कारण है कि जिन प्राकृतिक नियमा से दस भूम्रमण की उपपत्ति होती है, ये नियम भी प्राचीनकाल में विशेष रीतिसे शान न थे। भूभ्रम सिधान का खएडन श्रीपनि न इसप्रकार किया है नारयोनुलीमगमनादचल यया न चामन्यते चलाते नैवमिलानमेग। सासमारनेपालदनक्रमामाल गुरशरणपति यदर्शन, रचित यामबरचरा विडगा सनीडमामादयानन सतु नमरी धाग्या । किवायुदा अपि न पियोमुच रयुदेशस्य पूर्वगमनेन चिगय हन।। भूगोलवेगमानेन समाररान पंवादपोपपरदिग्गनर सदा त्यु । प्रामादधरगिरास्याप मनात तरमाधम मुहगमन्वचसादला ।' और राताचार्य के श्लोक है- "यदि न प्रमति पमा तदा सानाय कपमान सा । साम मधुरिमना न ग्युर गंदेश नाभि प्रामुवा वरदासाभिमानी मनदन । श्रमदगमाण र पाका दिरा परिमन " गोलाध्याये पृथिवी में दोप्रकार की गति है । एक दैनंदिन दूसरी वार्षिक गति कहलातीहै।। अहोरात्र में अपने अक्षपर पश्चिम से पूर्व की तरफ जो भ्रमणहै वह दैनंदिन गति है.। और सूर्य के पास पास एक वर्ष में एकबार प्रदक्षिणा करने की वार्षिक गति है। प्रतिदिन सूर्य श्रादि ग्रह और नक्षत्रों का उदयास्त जो देखने मे आता है यह पृथिवी की नित्यगति से होता है । वह इसप्रकार है-कल्पना किया । पृथिवी और 'स' सूर्य और 'तसनप' खगोलीयवृत्त है । अत्र माना कि पृथिवी अपने अक्षपर 'ज' बिन्दु से 'घ' बिन्दुकी और अर्थात् पश्चिम से पूर्व की ओर घूमती है और कोई मनुष्य 'ज' स्थान में है, यों देखना चाहिए सूर्य उदय होते हुए कैसे दिखलाई देता है। जबकग कर ज क जिसमफार 'ज' म्यान 'यबिन्दुका परकायेगा उमाप्रपार उस मनुष्य रार्य उठताहुआ दीस पड़ेगा । और जय 'ज' स्थान 'घ' म्यानपर पाजायगा नय उस मनुष्य को, शिरपर सूर्य थाने में मध्याह होगा । यो 'ज' स्थान के '' स्थानपर आने से मनुष्य को संध्या और 'प' स्थान में लो नत्तम हैं यह उदय होना दिसलाई देगा। इमप्रकार जब '''' विन्दुपर जायगा उमममय आधी रात और 'प' म्यानका नकार शिरपर श्रान मे नत्र पूर्व मे पधिम.पी सरक लाते हुए देखने में पायेंगे । इमीग्राममे 'ज' म्यान को अपने पहले '' धानपर माने से दूसरे दिन का सूर्योदय होगा और 'प' ग्यान के नक्षत्र पश्चिम दिशा में प्रस्त होग। किमी दोर के मामने गोजमन यार उपचाग नफ घमाने से भी बदबान मध्यगतिवासना। सहनमें ज्ञात होसकती है । इसप्रकार पृथिवी की दैनदिनगति और उससे दिन-रात की व्यवस्था स्पष्ट सिद्ध होती है । इस गति को मानने से प्रवहवायु की कल्पना नहीं करनी पड़ती। अब वार्षिक गति जानना आवश्यक है । वह यह है कि क्रान्तिवृत्त में मूर्यका जो स्थान परिवर्त हुआ करता है अर्थात् समय समय पर उदय और अस्त बिन्दुओं में जो अन्तर देसने में पाया करता है, वह इस गति के कारण से ही है । इमको स्वगति समझनी चाहिए । पर यह स्वगति भी पृथिवी के ही भ्रमण से उत्पन्न होती है। आकर्षणशक्ति का यह नियम है कि यदि दो पदार्थ एक दूमरे के पास फिरें तो केन्द्राकर्पणशक्ति से वे दोनों एक साधारण केन्द्र के आस पास घूमेंगे । यह भी है कि किसी दडे के दोनों छोरों में यदि दो समान परिमाणके पदार्थ लगाके बह दढा किसी दूमरे दडेपर प्राडा करके घुमा दियाजाय तो उन दोनों के वृत्ता- कार मार्गका केन्द्र समान अन्तर पर होगा अर्थात् उस दडे के मध्य विन्दुके आसपास वे दोनों पदार्थ वृत्ताकार मार्ग में फिरा करेंगे । परन्तु वे पदार्थ जैसे छोटे या बडे होंगे वैसेही उनके फिरने के मार्गका साधारण केन्द्र बडे पदार्थ के पास और छोटे से दूर होता जायगा । यहा तक कि रडे पदार्थ के केन्द्र में उनका साधारण केन्द्र होगा। जैसा, 'अग' एक आडे दडे के दोनों अन्तो में 'अ' और 'ग' दो तुल्य पदार्थ है, तो 'सन' सडा दडा उम आडे दडे के 'स' मध्यविन्दु मे श्राधार होगा। और उस भाडे दड़े को घुमानें तो 'अ' और 'ग' ये दोनो पदार्थ एकही 'स' प त
।
८६
शालाध्याये
केन्द्र के पास पास ( गपशन ) वृत्तमें घूमेंगे । परन्तु यदि दूसरा पदार्थ 'क' के
समान बड़ा मानाजाय तो 'ग' पदार्थ की अपेक्षा वह आधार 'क' के पास लगेगा।
और यह बड़ा पदार्थ 'तकच' वृत्तमें घमेगा । परन्तु तौभी दोनोंके वृत्ताकार मार्गा
का केन्द्र 'स' यह एकही होगा । और जब दूसरा पदार्थ बहुतही बड़ा हो जैसा कि
'स' तब 'सन' आधार उसके गुरुत्वकेन्द्र में लगेगा । तौभी दंडा घुमाने से 'स'
और 'ग' पदार्थ उसी एकही (स) विन्दुके आस पास घूमेंगे, अर्थात् 'स' पदार्थ
अपने ही केन्द्र के चारों तरफ और 'ग' उस के पास पास घूमेगा । इसप्रकार
पृथ्वी और सूर्य को उक्त दोनों पदार्थों के स्थान में कल्पना करके यह विषय समझना
चाहिए । यो यदि पृथ्वी स्थिर और सूर्य फिरता हुआ मानें तो सूर्यकक्षाका केन्द्र
पृथ्वी के केन्द्र में होने के लिए, सूर्य के परिमाणसे पृथिवी का परिमाण बहुतही
बड़ा होना चाहिए । परन्तु यह बात विरुद्ध है, क्योंकि पृथ्वी की अपेक्षा सूर्यका
मान कई लास गुणा अधिक है । इस लिए पृथ्वी और सब ग्रह सूर्य के ही आस
पास घूमा करते हैं । और सूर्य विम्ब भी अपने अक्ष पर भ्रमण करता हुआ वर्ष
मे एकभार भूमिकी प्रदक्षिणा करता है ।
गति विद्याके नियमों से यह ज्ञात हुआ है कि सूर्य, पृथ्वी आदि अह अपने
परस्पर-आकर्षण से, या तो एक स्थान में होजाने चाहिए, या साधारण गुरुत्व
केन्द्र में भ्रमण करना चाहिए। परन्तु सब ग्रहों की अपेक्षा सूर्य का मान अधिक
होने से उनका साधारण गुरुत्व केन्द्र सूर्य के करीब में रहता है, इसलिए सब प्रह
उसीके चारों तरफ भ्रमण किया करते हैं। जब सूर्य, बृहस्पति आदि महापिण्ड
अपने अक्षमें भ्रमण करते हैं तो उनकी अपेक्षा छोटापिण्ड पृथिवी का भी घूमता
हुआ मानाजाय तो क्या आश्चर्यकी बातहै ? प्रहगणितमें इससे कोई आपत्ति नहींहै ।
यदि कोई मनुष्य जहाज की कोठरी में बैठा हो और जहाज क्रमसे चलाया
जाय तो उस मनुष्य को जहाजकी गतिका अनुभव न होगा । यही हाल भूपृष्ठ-
वासियों की भी है, जिससे हमलोगों को इसकी गति का ज्ञान नहीं होता । यही
आर्यभट ने पहला दृष्टान्त दिया है ।
और श्रीपति, लल्ल आदिकों ने जो शङ्काएं की हैं कि पृथिवी के चलने पर
भूपृष्ठ के पदार्थ गिरपड़ेंगे, पक्षियों को अपना घोंसला न मिलेगा, यह सब सा..'
मान्य शङ्काएं हैं । क्योंकि सब पदार्थ अपने गुरुत्व के अनुसार पृथिवी के तरफ
उसके केन्द्राकर्षणशक्ति से खिंचे हुए हैं। और यह भाकर्पण पृथिवी के चारोतरक
कई मीलतक होता है। इसलिए जो भूपृष्ठ के पदार्थ हैं, वे सब जहां के तहां रहते हैं ।
इसी भांति कितनेही शङ्का, समाधान हैं । यहां भूभ्रमण की मोटी बात संक्षेप
से लिखी गई हैं। वास्तव में इस विषयका विचार बड़ा गहन और उमका सम.
मना भी कठिन है। यहां केवल दिग्दर्शनमात्र किया गयाहै ॥ १ ॥३॥
-
मध्यगतिवासना।
दानीं ग्रहाणां पूर्वगतिमनुपलक्षितामपि दृष्टान्तेनं दृढीकुर्वन्नाह-
यान्तो भचक्रे लघुपूर्वगत्या
खेटास्तु तस्यापरशीघ्रगत्या।
कुलालचक्रभ्रमिवामगत्या
यान्तो न कीटा इव भान्ति यान्तः॥४॥
प्रभा।
भचक्र भमण्डले खेटाः लघी या पूर्वा गतिस्तया यान्तो वजन्तः
तस्यांपरशीघ्रगत्या तस्य भचक्रस्य अपरा पश्चिमा याशीघ्रगतिनक्षत्र-
षष्टिघटीरूपा तया यान्तो गच्छन्तः कुलालचकभ्रमिवामगत्या दण्डेन.
भ्राम्यमाणस्य कुलालचक्रस्य या भ्रमिभ्रमणं तस्या वामगत्या दण्ड-
कृतं यदिवं चक्रभ्रमणं तद्विपर्गतगत्येत्यर्थः । कीटा इव यान्तो न
भान्ति । अयमर्थः । यथा किल कुलालचक्रे पश्चिमदिशि भ्रामिते
सति तत्र पिपीलिकाया पूर्वगतिर्न लक्ष्यते किन्तु पश्चिमैव । एवं ग्र-
हाणामतिलघुः पूर्वागतिरपि न लक्ष्यते । किन्तु प्रवहकृता पश्चिम-
गतिः। सातु सूक्ष्मदृशाऽनुसंधातव्येति तत्त्वम् ।
भापाभाप्य।
-
ग्रह अपनी लघु-पूर्वगति से भवन मे गमन करते हुए प्रवहजन्य शीघ्र पश्चिम
गति से नहीं लक्षित होते । जैसे कुमार के चाकमे चींटी विलोम दिशामें जातीभी
चाकके भ्रमणवश उसकी वह गति नहीं मालूम होती ॥ ४ ॥
इदानीं मध्यगतिवासनां विवक्षुरादौ तावद्भदिनपूर्वकं खेः स्फुट-
सावनदिनमाह-
समं भसूर्यादितो किलाा
पट्या घटीनामुदितं पुनर्भम् ।
रविस्ततः स्वोदयभुतिघातात
खानाष्टभू १८०० लब्धसमामुभिश्च ॥५॥
गोलाध्याये सगागतासुसंयुता खेस्तु पष्टिनाडिकाः। स्फुटं ागत्रमुद्गमा मुक्तिश्च तच्चलम् ॥ ६ ॥ पट्या घटीनां भदिनं सदाा तहुक्तितुल्यासुयुतं खरांशोः। स्यान्मध्यमं सावनमेवमव्दे तत्संख्यका भभ्रमतो निरेका ॥ ७ ॥ यदा किमपि नक्षत्रं सूर्यश्च किल समकालमुदितः नार्को-- दयवेलायां किमपि नक्षत्रमुपलभ्यते किन्तु केवलात्र युक्तिरुच्यत इति किलशब्दः प्रयुक्तः। तस्मात्कालादनन्तरं नाक्षत्राणां घटीनां पठ्या ६० तनक्षत्रं पुनरुदेति । ततोऽनन्तरं रविरुदेति । सच किया ता कालेन । तदर्थमनुगतः । रविः किल क्रान्तिवृत्ते स्फुटगत्या तो गतः । यद्यष्टादशशतानि राशिकलाः स्वोदयामुभिरुद्गच्छ- न्ति तदा स्फुटगतिकलाः कियद्भिरिति । एवं लब्धामुभि दया- नन्तरं रवेरुदयः। अत एव नाक्षत्राःपष्टिघटिकास्तैलब्धामुभिरधिका खेः स्फुटं सावनमहोरात्रं भवति । तच्चाहोरात्रं चलम् । प्रत्यहम- न्यादृक् । प्रत्यहं गत्यन्यत्नान्प्रतिमामं राश्युदयान्यत्वाञ्च ।
मध्यगतिवासना। गाति तत्र मेपराशेः कला अष्टादशशतानि १८०० गगनभू. परपदचन्द्रमितम्सुभि १६७० सद्गच्छन्ति । अन्यस्यान्यैरितिगति कलानामनुपातेनासवः कर्तुं युज्यन्ते । एवं कृते सति स्फुटमहोरात्रं भवति । यत्तैरतं तन्मध्यममेव । एवं वर्षमध्ये यावन्ति स्फुटसाव- नानि तावन्त्येवं मध्यमानि स्युः। तत्संख्यका भभ्रमतो निस्केति यावन्तो भनगा जातास्तत्संख्यकैकोना सती सावनदिवससंख्या भवति । यतो रविः पूर्वतो गच्छन्नेक परिवर्तं गतः अतस्तस्योदय- संख्यैकोनेत्युपपद्यते ॥ प्रभा। 'ऋक्षस्यैषा आदी तया घटीनां पष्टया नाक्षत्रपष्टिपटिकयेत्यर्थः सममेककालावच्छेदेन। भाषाभाय । सूर्य और नक्षत्र एक समय में नितिज में उदित होकर दुमरे दिन फिर न- क्षन ६० घटी में उमी स्थान में नक्षत्र उदित होता है। और रवि, स्वोदयघटिका और गति घटिका के गुणन १८०० का भाग देने से जो असु उपलब्ध हो, उस प्रमाण से पीछे उदित होता है । उक्तरीति से जो असु सिद्ध हुए हैं उनको साट 'घड़ी में जोड़ने से रविका स्फुट साउन अहोरात्र होता है। प्रतिमास उदय और प्रतिदिन की गति के भेद से यह सावन-अहोरात्र चल होता है । नाक्षत्र श्रहोगन मदा साठ पड़ीका होता है। उसमें रविगति के तुल्य अमग्री को जोड़ देने से सी का मध्यम-सारनाहोरान होता है । इमप्रकार सामनाहोरात्र संग्न्या नाचबाहोरात्र संध्या में एक कम होती है उपपत्ति । रवि आदि प्रहों में दो गति है । एक पूर्वगति जिरो स्वगति रहते हैं। दूसरी परिचमगति, जिमको प्रमहजन्यगति महते हैं । इमी गति से प्रनिदिन मर्य आदि महाका उदयास्त होता दिपलाई देता है। पूर्वगति स्पष्ट नहीं दीखती वह वेव से बात होती है । नानों में केवल प्रबहजन्य पश्चिम गतिही है, पूर्वगति नहीं है । उदयकाल में पूर्व तिनिन में यदि एक समय में सूर्य और रिनी नइन का उदय कल्पना किया माय और फिर दूसरे दिन मानन माट पटी मे उनी माय उन दोनों को देखा जाय - । 1 मिलेंगे? अनु। गोलाध्याये। तो वेधद्वारा साफ मालुम होगा कि नाक्षत्र साठपटी में वह नक्षत्र ठीक उसी स्थान में भागया, जहां पूर्वदिन देसागयाथा। परन्तु रवि ठीक उस बिन्दु से कुछ नीचे मो दवा मालुम होगा जिस विन्दु में पूर्वदिन देखा गया था। यही कारण है कि ग्रहो की पूर्वगति भी है जिससे ये चालित होकर नक्षत्रोदय के बाद कुछ काल में उदित होते हैं । उस काल के जानने के लिये अनुपात-एक राशिकता १८०० में उदयासु मिलते हैं तो स्फुट गतिकला मे कितने श्रस १८०० : उदयासु . : गतिक : उसु प्रस्फुटगतिक १८०० इसमकार जो अस पाये उतने काल के बाद नामोदय के अनन्तर रवि उदय होगा उन असुत्रों को नाता पष्टिपटि का अर्धाम् २१६०० असुओं में जोड़ देने से रवि के स्फुट सायन-अहोरात्रास होंगे । यो रविका सावनाहोरात्र स्पष्ट होता है । प्रतिक्षण में स्फुटगति के भेदसे यह प्रतिदिन भिन भिन्न सिद्ध होगा। रविको मध्यमगति के जितने असुहों उनको ६० घटी में जोड़ देने से मध्यमसावन दिन होता है । गति और उदयों की घटती बढ़ती वर्षभर में तुल्यं होजाती है । इसलिये वर्षान्त में स्फुट और मध्यम रबिसाया समान होजाते हैं। रवि अपनी गति में पूर्व में घटते हटते वर्ष में एक भगण अर्धात् द्वादश राशि पे अन्तर पर होगाता है। इसलिये नाशन संरया में एक पटाने से रविमावन होता है। राक्षापायने अपने शिष्यधी सृद्धिद-में तिसाद किरनिगति पला के ममान असु नाक्षम ६० पटी में जोड़ देने से सायन दिन होता है परन्तु यह युतिः ठीक नहीं है। यदि रवि विपुवन्मएटल में भ्रमरपरै सप विपुषन्मण्डत पी एफ पला एक प्रम के समान उदिन होये । उसी स्थिति में परिगति पलाये समान भगु होगा है । परन्तु रवि मान्निया में भमर परना है, उस स्थिति में मेपराशि पीपला १८०० श्रीपा उदय १६७० इमो प्रमुखों में होना है। इत्यादि। इसलिये रासपा मत एक देशी श्रमाय है ।। ५-७ ॥ इदानीं वर्षमध्ये मावनसंख्यामाह- पश्चाहरामास्तिथयः खरामाः सार्थदिदवाः कुदिनाचगन्दे। अस्याकमासोऽलयः प्रदिष्ट शिदिनः सावनमास पर ।। ||
६१
मध्यमतिवासना।
एकस्मिन्सौरवर्षे पञ्चपष्टयधिकत्रिपती ३६५ मिताः सावन-
वसाः पञ्चदश १५ नाडिकाश्च त्रिंशत्पलानि ३० च सार्दानि
विंशति २२ । ३० विपलानि । एपामुपपत्तिमध्यगतिमाप्ये
थितैव । अस्यार्कवर्षस्य द्वादशांशोऽर्कमासो भवतीति युक्तम् ।
सावनमासस्तु सावनानां त्रिंशतैव भवति ।।
भापाभाप्य।
एक सौरवर्ष में ३६५ दिन, १५ घडी, ३० पल और २२ । ३० विपल होते
हैं । इसका बारहवां हिस्मा सूर्यमास कहलाता है । और सावन मास ३० दिन
का होता है।
उपपत्ति ।
युरोपियन मत से सौरवर्ष का मान हमारे यहां से कुछ भिन्न है । यह ३६५
दिन, ५ घंटा, ४८ मिनट और ४६.०५४४४ सेकण्ड है । सूर्यसिद्धान्त और
आधुनिक सिद्धान्त के अनुसार सातों ग्रहों का मध्यमवर्प मान इसप्रकार है--
सूर्यसिद्धान्त ।
आधुनिकसिद्धान्त ।
रनि,
३६५.२५८७५
३६५.२५६३७
२७.३२१६७
२७.३२१६६
भौम,
६८६.६६७५
६८६.६५०५
बुध,
८७.६५८५
८७.६६६३
गुरु, ४३३२.३२०६
४३३२.५८४७
शुक्र, २२४.६६८५
२२४.७००८
शनि, १०७६५.७७३०
१०७५६.२११७
यो संख्या में अन्तर उपलब्ध होता है । युरोपियन मतानुमार नापनदिन-
संख्या वर्ष में ३६६५ होती है। यह मध्यम सावन दिन ३६५१ के है
मध्यमसावन दिन पा अन्तर और 'न' नाक्षत्र दिन का अन्तर
समान
यदि 'म'
बात हो तो-
३६५१:३६६५::म:न
इमप्रकार निप्पत्ति समान होती है । और यदि 'ग' शान हो तो 'न' संग्न्या
- मान ज्ञात होसता है।
भास्कराचार्य्यने रविमास ३० दिन, २६ पढ़ी, १५ पल लिया है यह उस
विवर्ष का द्वादशाश है । सावन मास ३० सावन दिनों का होता है । उदय से
दय पर्यन्त काल को सावन कहते हैं ॥८॥
गोलाध्या। -- इदानी चान्द्रमासमाह- कालेन येनैति पुनः शशीनं क्रामन्भचक्र विवरेण गत्योः। मासः स चान्द्रोऽयमाः कुरामाः पुणेपब २६ | ३१ । ५० स्तत्कुदिनममाणम् ॥ ६ ॥ दर्शान्त किल शशी रविणायुक्तो भवति । ततोदावपि पूर्वतो गच्छतः । तयोः शशी शीघ्रगतित्वात् प्रत्यहं गत्यन्तरेणापतो याति एवं गच्छंश्चक्रकला २१६०० तुल्यमन्तरं यदाग्रतो याति तदा रविणा योगमेति । तयोः कालयोरन्तरालं चन्द्रमासः। तत्पमाणमनुपातेन । चन्द्रार्कयोर्मध्यगती आदौ सम्यक् सावयचे कृत्वा यदि गत्यन्तरेणैकं कुदिनं लभ्यते तदा चक्रकलातुल्येना- न्तरेण कियन्तीत्यनुपातेन चान्द्रमासे कुदिनानि लभ्यन्ते । एको नत्रिंशदिनान्येकत्रिंशद्घटिकाः पञ्चाशत्पलानि २६ । ३१ १५० इत्युपपत्रम् ॥ प्रमा। गत्योः स्वस्वगत्यार्षिवरेणान्तरेण भचक्र क्रान्तिवृत्तं कामन्गच्छन् शशी चन्द्रो येन कालेन यावता समयेन इन रविमेति प्राप्नोति सका. जचान्द्रोमा भापाभाय। गत्यन्तर म कान्तिराम भमण परताना नन्द जितने नगय में रयि में मंयुध होता है उन समग पो चान्द्रमाम बहन है। उसका प्रमाण २६ दिन, १? घड़ी ५० पल।
६२ गोलाध्याथे। इदानीं चान्द्रमासमाह- कालेन येनैति पुनः शशीनं क्रामन्मचक्र विवरण गत्योः मासः स चान्द्रोऽवयमाः कुरामाः पूर्णपत्र २६ । ३११५० स्तरकुदिनप्रमाणम् ||६|| दर्शान्ते किल शशी रविणायुक्तो भवति । ततो दावपि पूर्वतो गच्छतः । तयोः शशी शीघ्रगतित्वात् प्रत्यहं. गत्यन्तरेणाग्रतो याति एवं गच्छंश्चक्रकला २१६०० तुल्यमन्तरं यदाग्रतो याति। तदा रविणा योगमेति । तयोः कालयोरन्तरालं चन्द्रमासः। तत्प्रमाणमनुपातेन । चन्द्रार्कयोर्मध्यगती आदौ सम्यक् सावयवे कृत्वा यदि गत्यन्तरेणैकं कुदिनं लभ्यते तदा चक्रकलातुल्येना- न्तरेण कियन्तीत्यनुपातेन चान्द्रमासे कुदिनानि लभ्यन्ते । एको नत्रिशदिनान्यकत्रिंशद्घटिकाः पञ्चाशत्पलानि २६ । ३१ १५० इत्युपपन्नम् ॥ प्रभा। गत्योः स्वस्वगत्योर्विवरेणान्तरेण भचक्र क्रान्तिवृत्तं क्रामन्गच्छन् शशी चन्द्रो येन कालेन यावता समयेन इनं रविमेति प्राप्नोति सका.. जश्चान्द्रोमासः। भापाभाष्य । द गत्यन्तर से क्रान्तिवृत्त में भ्रमण करता हुप्रा चन्द्र जितने समय में रवि में संयुक्त होता है उस समय को चान्द्रमास कहते हैं । उसका प्रमाण २६ दिन, ३? घड़ी और ५० पल है। उपपत्ति। अमा को सूर्य और चन्द्र का योग होता है । फिर वे अपनी गति के अन्तर से चलते हैं और जब दोनों का चक्राला २१६०० अर्थात् धारहराशि का अन्तर होजाता है तो पुनः प्रापस में मिलते हैं । यो एक श्रमान्त से दूसरे अमान्त तक जो काल है उसको चान्द्रमास कहते हैं । उस चान्द्रमास के साधनार्थ अनुपात- मश्र : कुदिन : : चकर्थ : चकअं x कुदिन दिन । ये कदिन अचीन मा. मश्र : :
६५ मध्यगतिवासना। 1. एवं त्रिगुणचतुर्गुणादिभिः कर्कटादिसंक्रान्तयो भवन्ति एवं संका न्तिरग्रतोऽग्रतो याति । पुनर्दन्तिं प्रायोति तदा गतचान्द्रमासे- भ्यः सौरा एकोना भवन्ति । यदा संक्रान्तिर्दन्तिमतिक्रम्यानतो याति तदानुपातेन यावन्तः सौरा भवन्ति तावद्भिरेकोऽधिमासः । तत्रानुपातः । यद्यनेन सौरचान्द्रान्तरेण कुदिनात्मकेन ०१५४ । २७।३१।५२ । ३० एकः सौरोमासो भवति तदा चान्द्रमासा- न्तः पातिभिः कुदिनैः २६ । ३१ । ५० कियन्त इति । फलं सूर्य मासाः ३२ । १५ । ३११२८१४७॥ अथच युगादिमासैथुगसौर- मासा लभ्यन्ते तदैकेन किमिति । फल मेतावन्त एव सौरमासा लभ्यन्ते । एतावद्भिः सौरामासैरेकश्चान्द्रमासोऽधिको भवति । अत- एवाधिमासस्य चान्द्रत्वम् । कल्पेऽपि कल्प्या अनुपाततोऽत इति सुगमम्। प्रभा। चान्द्रोनोयःसौरस्तेन हताहताच्चान्द्रावाता लब्धा ये सौरामासा- स्तैर्दशनैर्दलाढ्य ३२ । १६ रित्यर्थः । मासैश्चान्द्रमसोऽधिमासः मस्यते . परिमीयत इति मासः मासाद्रविसंक्रान्ति मासादधिक इति मयूरव्यंस कादित्वात्समासः स्यात् । असंक्रान्तिमासोऽधिमासः स्फुटं स्यादिति तल्लक्षणम् । तथाच तैत्तिरीयश्रुतिः। 'द्वादश मासाः संवत्सरः। अस्ति त्रयोदशो मासः, । सौरान्मासादैन्दवश्चान्द्रोमासो यस्मालघी- याँल्लघुतरस्तरमाचे माता संख्ययाधिकारस्युः । सौरमासा पेक्षयेत्यर्थः । शेपं स्फुटम्। भापामाप्य । चान्द्रमास और सौरमास के अन्तर या चान्द्रमास में भागने में जो फल मिले वह अधिमास होता है। वह ३२१ सौरमास के अन्दर पर होता है। इससे ६४ * गोलाध्याये। इदानीमधिमासोपपत्तिमाह-- चान्द्रोनसौरेण हृतातु चान्द्रा- दवाप्ततौरर्दशनैर्दलाढ्यैः ३२१ १६ । मासमवेचाद्रमसोऽधिमासः कल्पेऽपि कल्प्या अनुपाततोऽतः ॥ १० ॥ सौरान्मासादैन्दवः स्पालघीयान यस्मात्तस्मात्संख्यया तेऽधिकाम्स्युः ।। चान्द्राः कल्पे सौरचान्द्रान्तरे ये मासास्तज्ज्ञैश्चधिमासाः प्रदियाः॥ ११ ॥ अत्र द्वितीयश्लोकस्तावत्प्रथमं व्याख्यायते । सोरान्मामादै- न्दवोमासो यतोलघुातः कारणात् कल्पे सौरमाससंख्यायाश्चान्द- माससंख्याधिका भवति । यथा धान्यराशिमानेऽष्टमेतिकाहारमितेः पद सेतिकाहारमितिरधिका भवतीति वालेरपि बुध्यते । यावन्त- श्चान्द्रमासाः कल्पेऽधिका भवन्ति तत्संख्याधिमाससंख्या तीः कल्पिता । तत्रकियद्भिः सौरैरेकोऽधिमासो भवतीति युक्तिरुच्यते। चान्द्रोनसौरेण हतातु चान्दादिति। सौरमासकुदिनेभ्यश्चान्द्रमास- कुदिनेषु शोधितेप, शेपं दिनस्थाने पूर्णमघश्चतुप्पश्चाशदवाटिकाः सप्तविंशतिपलानि सावयचानि १५४१२७।३११५२१३० एकस्मिन्सौरमास इदं सौरचान्दान्तरं कुदिनात्मकम् । युगस्याद- रुपयकस्मिन् दर्शान्ते प्राप्त एकश्चान्द्रमासः पूर्णस्तदनन्तरं चतु- प्पश्चाशद्घटिकाभिः सावयवाभिमध्यमार्कस्य वृपभसंक्रान्तिस्तत्र रविमासः पूर्णस्ततोऽन्यस्मिन् दर्शान्ते पातेऽन्यश्चान्द्रमासान्तः। ततो दीन्तादुपरि दिगुणाभिस्ताभिरेव घटीनिमिथुनसंक्रान्तिः।.
मध्यगतिवासना। ४७ इदानीगवमेगापिाह- शशाङ्कमासोनितसावनेन ०! २८।१० त्रिंशदधृता लब्धदिनैस्तु चान्दैः। रुदांशकोनाधिरसैः ६३ । ५४ । ३३ क्षयाहः स्यात्सावनोऽतश्च युगेऽनुपातात् ॥ १२ ॥ युगे चान्द्राणां सावनानां च दिनाना यदन्तरं तान्यामानि । अत एकस्मिन् मासे चान्द्रसावनान्तरं कुदिनाम गृहीतम् । तत्र दिवसाः पूर्णमष्टाविंशतिर्घटिका दरा पानीयपलानि च । २८ | १० इदमेकस्मिन्मासे त्रिंशत्तिथ्यात्मके कुदिनात्मकमवम- खण्डम् । यवनेन त्रिंशबान्दाणिदिनानिलभ्यन्ते तदा संपूर्णेनैके. नावमेन कियन्तीति त्रैराशिकेन लब्बैरुद्रांशकांनाव्यिसै ६३ । ५४ । ३३ रेकः क्षयाहो भवति । सच सावनः। अखण्डस्य रूपत्य सावनेच्छाकल्पनात् । अतोऽनुपातात्कल्येऽपि । प्रभा। शशाङ्कमासश्चान्द्रमासरतेनोनितो यः सावनमाप्तस्तेन हृता भक्ता- त्रिंशत् । लब्धदिनैश्चान्दैरुद्रांशकोनाब्धिरसैः ६३ । ५४ । ३३ क्षयाहः सावनः स्यात् । अतोऽनुपाताद् युगेऽपि साध्य इत्यर्थः । भापाभाप्य । चान्द्रमास में सावनमाम को घटाकर शेषका तीस में भागदेने से लब्ध ६४, चान्द्रदिनों में एक मावन अवम होता है । उसमे अनुपात से युगावग भी सिद्ध होते हैं। उपपत्ति । कल युग की आदि मे सान और चान्द्रदिनी की प्रवृत्ति एकवारगी हुई है। परन्तु चान्द्रदिन मावनदिन को अपेक्षा छोटा होने से, सावनदिन के अर्थात् सूर्यो. दय से पूर्वकाल मे ही चान्द्रदिन पूरा होजाना है। इस स्थिति में चान्द्रदिनान्त और सूर्योदय के मध्य में जो काल रहता है उससे अवमशंप कहते हैं । वह सावन है, -
गोलाध्याय।
अनुपातद्वारा कल कालमें भी ज्ञात करना चाहिये । सौरमास से चान्द्रमास छोटा
होता है इसलिये सौरमास से चान्द्रमास की संख्या अधिक होती है । कल्प्य में
सौर, चान्द्रमासों के अन्तर में जो चान्द्रमास होते हैं, उनको विद्वान लोग अधि-
मास कहते हैं।
उपपत्ति।
कल्प में जितने चान्द्रमास सौरमास से अधिक होते हैं वे अधिमान कहताते
हैं। अब यहां यह जानना श्रावश्यक है कि फितने सौरमासो में एक अधिमास
पड़ता है। एक
जानने के याद अनुपात से कल्प काल में सुगमता
से सिद्ध होमता है । सौरमास के कुदिनों में चान्द्रमास सम्बन्धि कुदिनों को
घटाने से शेप दिन, घटिकादि । ४५ ॥२७॥ ३१ ॥ ५२ । ३० । यह एक सौर.
मास में सौरचान्द्र का अन्तर है । श्रमा से दूसरे अमान्त तक चान्द्रमास और एक
रविसंक्रान्ति से दूसरी सक्रान्ति तक सौरमास होता है । यो समझना चाहिये कि
युगारम्भ के याद थमा को एक चान्द्रमास पूरा होगया । और अमान्त के बाद उत"
घटिका में रविकी वृष संझान्ति हुई और उसी समय सौरमास पूरा भया। इसीप्रकार
दूसरे श्रमान्त पर पुनः चान्द्रमास पूराभया और उसके बाद द्विगुणित उ घटिया में
मिथुन संक्रान्ति भई और सौरमास पराभया । यो क्रमसे अमान्त के पाद रधिमं.
कान्ति दूनी, तिगुनी, चौगुनी के हिसाब से अमान्त के पाद पढ़ती मायगी और
दर्शान्त का अतिक्रमण करके भागे होगी। इस स्थिति में अनुपात से जितने सौर.
मास मिलें उस हिमात्र से एक अधिमाम पड़ेगा । अर्थात् सौरमास से एक चान्द्र.
मास अधिक होजायगा, जिसमें फि संगान्ति नहीं हुई है। अब अनुपान ही
प्रवृत्ति हुई-
।
॥५४॥२७ इत्यादि मौरमाम :: २६।३११५० .
इमप्रकार चान्द्रमास गे ३२ । १५ । ३१ इत्यादि सौरमामादि प्रामदये।
सौरमासों में एक घान्द्रमास वा अधिमाम पता है यह मिड टुला यो युग
सौरमाम और पल्प सौरमामों से युगाधिगाम और फातिमाम भी मष्ट है।
जावे ॥१०॥११॥
मध्यगतिवासना। ६६ श्वमवमशेषस्यापि तुल्यत्वमेव । एकत्र चान्ददिनान्यन्यत्र कुदि- नानि छेदः । अधिमासावमशेपयोरिटजातिवं प्रकल्य मतिमद्धि- श्चन्द्राकानयनानि कृतानि । तत्र ये जडास्ते वासनां पर्यालोच- यन्तो भ्रमन्ति । प्रभा। सौरेभ्यः साधितारते चेदित्यादि पद्यद्वयमपि रफुटमेव । भाषाभाष्य सौरमास से अधिमास साधन करने से यह चान्द्र होता है। और चान्द्रसे साधन करने से सौर होता है । और शेष भी उसी के अनुसार घान्द्र और सौर होता है। यदि बान्द्र दिनों से अवम का साधन हो तो वह सावन होता है । और सावन दिनों से साधन करने से चान्द्र होता है । और उसी के अनुसार शेष भी होते हैं। उपपत्ति। सौरमास और चान्द्रमास से अधिमास साधन करने से वह क्रममे चान्द्र सौर होता है और शेष भी उसी के अनुसार होता है । अनुपात इसप्रकार होते हैं- कधिमा x इसौदि (१) कसौदिः कधिमा : : इसौदि. सादि 'गताधिमास, शेष अ- विशेष चान्द्रात्मक होता है। कांमा x इसौदि : कसौदि: फचामा : : इसोदि कसौदि कां कसौ+कधि । दोनो खण्डी को अलग अलग इष्टसौरदिन से गुणा और कल्प सौर दिनका भाग देने से हुआ-- कसौx इसौदि कधि x इसौदि हर और अंश कल्प सौर का अपवर्तन कमो देने से फल और शेष चान्दात्मक होता है । क्योकि मभ्यराशि चान्द्रसएड है। इसप्रकार ' सौरेभ्यः साधिवा.-तच्छेपं सदशात्तथा, यह उपपन्न हुआ। फघि xचां (२)का कधि : . दचां.. 'गनिमाग,पौर रोग अपिल शेष सौरात्मक रहेगा।
87 . गोलाध्याये। क्योंकि सारगदिन का अवयवभूत है। यह अवमशेष प्रतिदिन बढ़ता है और जब ६० घटिका (२४ घण्टे ) तक बढ़ जाता है तय एफ अवमदिन पूरा होता है। उसके पूरे होने मे जितने चान्द्रदिन लगते हैं उसके साधन के लिये एक मास स. म्बन्धि सावनचान्द्रान्तर ० दिन, २८ घटी, १० पल सिद्ध करके, अनुपात यों १२।१० ३० चन्द्रदिन :: सारदिन: ६४१ तिथि। इस प्रकार ६४ इतने चान्द्रदिनों में एक पूरा क्षयाह होता है । वह सावन है, क्योंकि इन्छा जातीय फल होता है ॥ १२ ।। इदानीमधिमासस्य चान्द्रत्वमवमस्य सावनत्वमभिधायाह- गणान् कल्पगतमानेतुं विलोमविधिना यान्यवमान्यानीतानि ये चाधिमासास्तेषां विशेपमाह- सौरेभ्यः साधितारते चेदधिमासारतदैन्दवाः। चेचान्देश्यस्तदा सौरास्तच्छेपं तदशात्तथा ॥ १३ ॥ सावनान्यवमानिस्युश्चान्द्रेभ्यः साधितानि चेत् । सावनेभ्यस्तु चान्द्राणि तच्छेपं तदशात्तथा ॥ १४ ॥ यथाहर्गणानयने सोरेभ्यश्चान्द्रान साधयितुं ये ऽधिमासा आनी यन्ते ते चान्द्रास्तच्छेपं च चान्द्रम् । यदि चान्द्रेभ्यः सौरान साधयितुं तदा सौगस्तच्छेपमपि सौरम् । एवं चान्देभ्यः सावनानि साधयितुमवमान्यानीयन्ते तदा तानि सावनानि । यदि सापने- भ्यश्चान्द्राणि कर्तुं तदा चान्द्राणि स्युः। साध्यत्वं भजन्तीत्यर्थः । तच्छेपमपि तदशात् । अभिमतगणादवमर्हतादित्यादिनाहर्ग- पात् कल्पगतमानीतं तदा सावनेभ्योऽवमान्यानीतानि । तानि चान्द्राणि । चन्द्रदिवसेभ्योऽधिमासाः साहितारते सौरास्तच्छे तदशादित्यर्थः । अधिमासस्य चान्द्रले सोरत्वे चाधिमासशेपं तुः ल्यमेव रयात् । विवेकत्र रिदिनानि छेदः अन्यत्र चान्द्राणि ! H
मध्यगतिवासना।
इदानीं विशेषः प्रश्नाध्याये-
अहर्गणस्यानयनेक्रमासा-
श्चैत्रादिचान्दैर्गणकान्विताः किम् ।
कुतोऽश्मिासावमशेषके च
त्यक्ते यतः सावययोऽनुगतः ॥ १५ ॥
प्रभा।
हे गण! अहर्गणण्यानयने साधनेऽकमामाः सौरमासाश्चैत्रादिग.
तचान्द्रैःकिमन्विताः ? विजातीययोः कथं योगः कृत इत्यर्थः । अधि-
भातावमशेषके च कुतः करमाटेतोरत्यक्ते, यतोऽनुपातः सावययो भव-
तीति प्रश्नः।
भापाभाष्य।
अहर्गण के साधन में सौरमास चैत्रादि चान्द्रमासों में क्यों जोडे गए ? अषि-
माम और अवमशेप को क्यों छोड दिया ? क्योंकि अनुपाव साययय होता है,
यह प्रश्न है ॥ १५ ॥
अस्य प्रश्नस्योत्तरमाह-
दर्शावधिश्चान्द्रमसो हि मासः
सौरतु संक्रान्त्यवधिर्यतोऽतः।
दर्शाग्रतः संक्रमकालतः प्राक्
सदेव तिष्ठत्यधिमासशेषम् ॥ १६ ॥
दर्शान्ततो याततिथिप्रमाणेः
सेतु सौरा दिवसाः समेता।
यतोऽधिशेपोत्यदिनाधिकारते
त्यक्तं तदस्मादधिमासशेपम् ॥ १७
तिथ्यन्तसूर्योदययोग्तु मध्ये
सदैव तिष्ठत्यवमावशेषम् ।
त्यनेन तेनोदयकालिकः स्या-
ति यन्तकाले हागणोऽन्यथातः ॥ १८ ॥
कची १०० गोलाध्याये। कसौxइचां- कचा : कसौ:: इयां: कसौ-का-कधि । दोनों खण्डों को अलग अलग इष्टचान्द्र से गुणाकर कल्पवान्द्र का भाग देने से हुआ--- कचों x इचां कधि x इचा । यहां कल्पचान्द्रमित गुणक और भाजक में कचा अपवर्तन देने से फल और शेष सौरात्मक रहेगा। मध्यम राशि के सौरसम्बन्धि होने से । इसलिये । चञ्चान्द्रेभ्यस्तदा सौरास्तच्छे तद्वशात्तथा---' यह उपपन्न कचा हुआ। : कचा कचा कर x इचां (३) कचा: कब :: इना: '= गतायम और शेष भवमशेष का साधनात्मक होगा। कसा x इन क्योंकि, कचां: फसा : : इचां: कच कसा कचां-कव । इन दोनों खण्डों को अलग अलग इष्टचान्द्रसे गुणकर कल्पचान्द्र का भाग देने से हुआ- कानांx इचों का x इचां । हर अंश मे कल्पचान्द्र का अपवर्तन देने मे फल और शेष सावनात्मक होगा । इसप्रकार ' साइनान्यवमानिस्युश्चान्द्रेभ्यःसा• चितानि घेत्' यह उपपन्न हुआ- •कX इमा (४) कसा : कय: : इसा: आतावम और शेप अयमशेष चान्द्रामक रहेगा। फनर इमा क्योंकि, फसा : कचा : : इसा: कनां कमा+फर। दोनों सएडों को अलग अलग इमारन मे गुणकर स्पसारन का भाग देने मे हुआ. फसाइमा फX इमा । हर अंश में स्पसायन का अपवर्तन देने में फा और रोग चान्द्रसम्बनित होगा । इमप्रकार सानभ्यस्नु चान्द्राग्नि तछेप TAITANI' यद् उपपन्न हुआ। -mer : TERINIT' का भाव पर होता है । १३-१४ । कसा । कमा . कमा । मध्यगतिवासना। ।तिथ्यन्त और सूर्योदय कालके मध्यमें अवमशेष पटिकात्मक रहता है । उसको छोड़ देने से अहर्गण सूर्योदय समय में होता है। अन्यथा तिध्यन्त काल का ही होता है। उपरत्ति। अमान्त में चान्द्र और संक्रान्ति मे सौरगाम पूरा होताहै। उन दोनों के मध्य में जितनी तिथि रहती हैं वे अधिमाम शेष तिथि कहलाती हैं। क्योंकि सौर और चान्द्रका अन्तर अधिमाम कहलाता है । अहर्गण के साधन में गतमास में चैत्रादिगत चान्द्रमासों को सौर मानकर जोड़ देने से सक्रान्ति तक मास गत होते हैं। फिर उन में गत तिथियों को सौर दिन मानकर जोडने से इष्टदिन तक अहर्गण होता है । परन्तु यह अइण सौरचान्द्रान्तर अर्थात् अधिमास शेष दिनों से अधिक होता है इसलिये घटाना चाहिये । और अधिमास के साधन में মধার से लम अघिमास और उस के शेप को सौर दिनों में युक्त करने से चान्द्राह होते हैं । इस स्थितिमें अधिमास शेषदिनों को जोडना प्राप्त होता है और पूर्व घटाना इमलिये 'धनर्णयोरन्तरमेवयोग इस नियम से अधिमास शेष को छोड़ दिया। तिथिकी समाप्तिके वाद जितनी घड़ी मे सूर्योदयहो उस घड़ी को अवमशेष घटिका कहते हैं। क्योंकि चान्द्र और सावन का अन्दर अवम होता है। श्रनु- सात से लब्ध असम को विधियों में घटादेने से विध्यन्त मे मावनाहर्गण होता । यदि सूर्योदय में अहर्गण सिद्ध करना हो तो तिथ्यन्त में अवमशेप घटिका जोड़ देने से उदयकाल में होगा । इस प्रकार जोड़ना प्राप्त होता है । परन्तु यहां र भी 'धनर्णयो ---' इस नियम से श्रवमशेष घटिकाओं को छोड़ दिया तो वत्त सूर्योदय का अहण होगया । ये सत्र उपपत्ति बहुत स्फुट हैं । १६-१८ ॥ प्रयोदयान्तरकोपपत्तिमाह- अहर्गणो मध्यमसावनेन कृतश्चलसाम्फुटसावनस्य। तदुत्थखेग उदयान्तराख्य- कमें दोनोनयुताः पलेन ।। १६ ।। लड्बोदये ग्युन कृतास्तथाथै- यतोऽन्तरं तचलमल्पकं च । योऽयमहर्गण आनीतः स मध्यमसारनेनैव । कुतः । ग्फुसा- - १०२ गोलाध्य.ये। मध्यममानेन यावत्यगावास्या तदन्ते चान्द्रमासान्तः । मध्य मात्य यस्मिन् दिने संक्रान्तिस्तत्र संक्रान्तिकाले रविमासान्तः तयो रविचन्दमासान्तयोरन्तरे यावत्यस्तिथयः सावयवास्ता अधिमासशेपतिथयः । यतः सौरचान्दान्तामश्मिासः। अहर्गणा- नयने गताब्दा विगुणास्ते सौरामासा जाताः । अतग्तेपु चैत्रादिचान्द्रतुल्याः सौरा एव मासा योजितास्ते संक्रान्त्यवधयो जातास्तेपुत्रिंशद्गुणेषुगततिथितुल्या सौराएर दिवसायोनिता अतः सौरचान्द्रान्तरेणाधिका जातास्तदन्तरमधिमासशेपदिनानि भवन्ति । सौरचान्नान्तरत्वात् । अतोऽधिमासशपदिनान्येभ्यः शोध्यानि । अथ चाघिमासानयनेऽनुपातलधेर'मासैदिनीकृते- स्तच्छेपदिनैश्चयुक्ताः सौराहाश्चान्दाहा भवितुमर्हन्ति । एपमत्रा- धिमासशेपदिनानि क्षेप्याणि । तत्रशोध्यानि।अतः कारणादधि- मासशेपं त्यक्तम् । अथावमशेपत्यागकारणमुच्यते । तिथ्यन्ता नन्तरं यावतीभिटीभिः सूर्योदयस्ता अवमशेपघटिकाः । यत- श्चान्द्रसावनान्तरमवमानि । यद्यवमशेपं न त्यज्यते लब्धारमेर- वमरोपवाटिकाभिश्च तिथय ऊनी क्रियन्ते तदा तिथ्यन्ते सावनोहर्गणो भवति । अथच सर्योदयावधिः साध्यः । तिथ्य- न्ताहर्गणोऽवमशेपटीभिर्युक्तः सन्नदयावधिर्भवति । अतोऽवमशेपे त्यक्ते स्वतः सूर्योदयावधिर्भवति । . भापामाध्य। अमान्त तक घान्द्र और संक्रान्ति तक सौर मास होता है । इसलिये प्रमान के आगे रबि संक्रान्ति कालतक अधिमासशेप रहना है । दन्तिके याद जितनी निधि पाती है उनको मोर मानकर सौरदिन उनमें जोद देने मे मगह अधिशेष दिनामे अधिक झोलाता है मतिो अधिमास शो को दिया यह चान्द्रदिन
।
मध्यगतिवासना।
नाक्षत्र ६० घड़ीमें जोड़ने से स्पष्ट सावनकाल होता है। अब क्रान्तिवृत्त के
तिरश्चीन होने से उसके टुकड़े समानकाल में उदित नहीं होते, इसलिये विषपद्
धृत्तका मध्यमगति कलोत्पन्नासु चिह्न जब नितिज़ में लगेगा उस समय
मध्यम गति कलातुल्यासु चिह्न नहीं लगता । किंतु उन चिह्नों का जो अन्तर
है उसके तुत्य क्षितिज से नीचे रहता है और कभी ऊपर । इसी कारण मध्यम
सावनाहर्गण से जो ग्रह सिद्ध होते हैं वे ठीक क्षितिज के नहीं होते, किन्तु
उक्त अन्तर से अन्तरित रहते हैं यहीं अन्तर उद्यान्तर है अर्थात् मध्यम
और स्पष्ट सायनों का अन्तर काल है । इसलिये मध्यम सावन से सिद्ध प्रहों में
उनको ठीक क्षितिजस्थ करने के लिये उदयान्तर-संस्कार आवश्यक हुआ। केरल
रविवीत में मध्यम और स्पष्ट सायन तुल्य होते हैं, इसलिये वहां उक्त संस्कार
का अभाव होता है । परन्तु फिर अन्तर पड़ता है । यो पदादि में 'भारम्भ,
के मध्य में परम और अन्त में शून्य होता है । इस प्रकार चारो चरणों में
प्रभाव होने से वर्ष मे चारदफा शून्य होता है । इम संस्कार के बिनाही ब्रह्म
गुप्त ने जो लिङ्काममयान्योत्तररंग्यायां भास्करोदये मध्धा.' मध्यमाधिकार ३४
यह लिखा है वह शसङ्गत है ।।
अयोदयान्तरमाह
मध्याभुक्ता असयो निरते
ये च मध्यार्ककलासमानाः ॥ २० ॥
तदन्तरं यत्स्फुटमध्ययोस्त-
युपिण्डयोः स्यादिवरं गतित्रम् ।
हतं झुरावासभिराप्तलिप्ता-
होना ग्रहाश्चेदसवोऽस्यकाः स्युः॥ २१ ॥
तदन्यथाब्यारतु निजोदयश्चे-
हुक्कासुपूर्व विहितं तदानीम्।
कृतं तथा स्याचरकर्ममित्रं
कर्म ग्रहाणामुदयान्तराख्यम् ॥ २२ ॥
१०४ गोलाध्याये। वनस्य चलत्वात् । तथाविधेनानुपातेन स्फुको नायातीत्यर्थः युगादेरारभ्य वर्तमानरविवदेःप्राण्यावान् मध्यमसावनस्तावानव स्फुरसावनः स्यात् । किंतु रविपदेल यावा मध्यममावन- रतावान रफुरः । अतस्तदुत्थखेगा उदयान्तराख्यकर्मोद्भवेन फले- नोनयुताः सन्तो लवोदये स्युर्नान्यथा । लड्वायां भास्करोदये । मध्या इति यदन्यैरुक्तं तदसत् । प्रभा। स्फुटसावनस्य चलत्वात्प्रतिक्षणमन्यादृशत्वादहर्गणो मध्यम- सावनेन कृतः । तदुत्थखेटा मध्यमाहर्गणोत्पादितग्रहा उदयान्त- राख्यकर्मोद्भवेन फलेनोनयुताः सन्तो लङ्कोदये रयुर्नान्यथा । उदया न्तरसंस्कारमन्तरालङ्कायां भ स्करोदये मध्या न भवन्तीत्याचार्याभिम- तम् । तथाद्यैः पूर्वाचार्यनं कृतम् । यतस्तदुदयान्तराख्यकर्मान्तर चलमरिथरमल्पक चैत्युपेक्षितमिति भावः। भाषाभाप्य। स्पष्टमाग्न के प्रतिक्षण भिन्न होने से अहर्गण मध्यम सावन में किया गया है । इसलिये अहर्गण से साधित ग्रहों में उदयान्तर संस्कार करने से ये ठीक लवोदय में गध्यम होते हैं, अन्यथा नहीं । पूर्वाचार्यों ने इम उदयान्तर सरकार को श्र. स्थिर और स्वल्प होने से ग्रहों में नहीं किया है। - उपपत्ति। स्पष्ट सावन के प्रतिक्षण भिन्न होने से प्रांगण का साधन मध्यम सावन हुआ है । इसलिये मध्यम अहर्गण से सिद्ध किये प्रह ठीक सूर्ये दर पाल नहीं होते । कभी सूर्योदय के पूर्व और कभी पीछे होते हैं। संपात मे । गृत्त में मध्यम सूर्य के प्रशत्फ जितनी कला होती है उम को व्यामार्ध मान एक वृत्त करने पर वा नाड़ी वृत्त के जिस निट्स पर संपातकर यहां से संपत गाड़ी पृच में मध्यमगतिम्लातल्या होते हैं । इन को नाक्षत्र ६० पी जोड़ने में रविका मध्यम सावनमाल होता है। ऐम ही सायन मध्यन गर्म गो मान्तिवृत्त में प्रवेश है उस पर ध्रा प्रोतवृत्त परने से यह जहां नाजी संपान पर उस विन्दु से मंगात तक मध्यम गति यलोत्पन्नान होते हैं । इन ८ L मध्यगातवासना। भाषाभाष्य । निरतदेश में मध्याभुक्तासु और मध्यार्ककलातल्यासुओं का अन्तर स्पष्ट और मध्यम अहर्गण का अन्तर है। उस अन्तर को गति से गुणकर अहोरात्रासु का भाग देने से लब्धफल को असुवों के न्यून होनेपर ग्रहमें घटादेना अन्यथा जोड़देना अर्थात् विषमपद में फल ऋण और समपद में धन करना । इमप्रकार मध्यार्क भुक्तासु सिद्ध होते हैं । यदि स्वदेशोदय से मध्यार्कभुक्तासु सिद्ध करके यह उदयान्तर कर्म कियाजाय तो ग्रहों में चर संस्कार स्वतः होजाता है। उपपत्ति । पूर्व श्लोकमें उद्यान्तर-संस्कार का कारण धतलाकर अब उसका साधन प्रकार बतलाते हैं। मेपादि से लेकर सायन सूर्यको जो भुक्तराशि हों उनके निरक्षदेशीय उदोंका योग करना । और जिस वर्तमान राशिके भुक्त अंशहों उनको भी उस राशिस- म्बन्धि उदयासुओं से गुणकर और उसमें तीस का भाग देकर जो असु मिलें । उनको भी निरक्षदेशीय उदयों के योगमें जोड़देना । इसप्रकार मध्याभुक्तासु सिद्ध होंगे । इतने असुओं के समान, कालमें नाक्षत्रदिन के अन्तर लङ्कामे मध्यम सूर्य होता है । परन्तु अहर्गण से जो ग्रह मिद्धहुए हैं वे मध्यार्ककता के समान असु कालमें नाक्षत्रदिन के अनन्तर के हैं । इसलिये मध्याभुक्तासु और मध्यार्ककला. तुल्यासुत्रों का जो अन्तर है वही सष्ट मध्यम अहर्गणो का अन्तर है । वही सूर्यो- दयों का अन्तर है। वही उद्यान्तर है । वही उसके साधन के लिये अनुपात किया:- गतिक x अन्तरासु. अहोरासुः गतिक : : अन्तरासः = = उदयान्तर । यह अहोरा फल, यदि कलासे असु अधिक हों अर्थात् समपद में, ग्रह में धन करना चाहिये । और यदि असुओं से कला अधिकहो अर्थान् विपमपद में ऋण करना चाहिये । यहाँपर यदि स्वदेशोदय से मध्या के मुतासु सिद्ध कियेजाय तब प्रहों में चर संस्कार स्वयं होजाता है। और यदि स्पष्टसूर्य के मुक्तास प्रहफिये जायें, वत्र उदयान्तर-भुगान्तर-चर ये तीनों संस्कार स्वतः होजाते हैं । यह उ- दयान्तर-संस्कार सलान्तर होने से ग्रहों में पूर्वाचार्यों ने नहीं किया, यह प्राचार्यका कथन है । २०-२२ । -- + इस उदयान्तर-सरकार को अमेनी गोलमयों में इवेशन प्राप टाइमस् ( Equation of time ) के नाम से लिखा है। इसका अर्थ कालममीकरण है। युरापिया रंति के अनुसार इमत उपपादन सहप से इमप्रकार है १०६ गोलाध्याये। सायनांशेन रविणा मेपादेशरभ्य ये भुक्ता राशयस्तत्सम्बन्धिनो निरखोदयासवो गगनभूधरपकचन्दा १६७० इत्यादयस्ते- मैक्यं कृत्वा भुज्यमानराशेर्ये भुका भागास्तारतदुदयासुभिः संगुण्य त्रिंशता ३० विभज्य लब्धासवोऽपि तत्र क्षेप्याः। एवं मध्यार्क भुक्तासवः स्युः । भदिनान्तादूचं तावत्यस्वात्मके काले लङ्कायां मध्यमार्कस्योदयः । तत्कालेहि ग्रहाः साध्याः । अथ चाहर्गणेन ये सिद्धास्ते मध्यमार्ककलामितेऽस्वात्मके काले भदि- नान्तादूर्व जाताः । अतोऽसूनां कलानां च यदन्तरं तेनार्कोद- योऽन्तरितः । अतस्तदुदयान्तराख्यं कर्मोच्यते । तैरन्तरासुभिर्ग- हगति संगुण्यार्कसावनाहोरात्रासुभि २१६५६ विभज्य लब्धकला हे ऋणं कार्याः। यदि कलाभ्योऽसवोऽल्पकाः स्युः । अन्यथा धनम् । यदि तु स्वदेशोदयैर्मध्यमार्कभुक्तासूनानीयेदं कर्म कृतं तदोदयिकानां ग्रहाणां चरकर्मापि कृतं स्यात् । यदि तु स्फुरर्क- भुक्रानसून स्वोदयासुभिरानीयेदं कर्म ऋतं तदोदयान्तरभुजान्तर- चरकर्माणि त्रीण्यपि कृतानि म्युः । तर्हि कथमिदमुदयान्तराख्य कर्माद्यैर्न कृतं तदाह । यतोऽन्तरतनलमल्पकं च । वर्पचरणान्तेषु चतुलप्यन्तराभावः। तन्मध्ये वन्तरय पक्षियो। प्रभा। निरक्षे ये मध्याभुक्ता श्रमवः येच मध्यार्ककलातुल्यासवरतेषां यदन्तरं तरफुटमध्ययोद्युपिएडयोरहर्गणयोर्विवरमन्तरं स्यात् । तद्द तिमं धुरात्रासुभिहनं विभक्तं विधेयम् । प्राप्तलिप्ताभ्यो ग्रहाहीनाः कार्याः । यदि असवोल्पकाः । यशधिकारतदा पाढया कार्याः। शेष 'फुटमेव ।
१०६ क्षेत्र, 'भोर सितं.३ नारी. मार्च २१ क्रान्ति - अब इसक्षेत्र में कयना किया राष्ट मूर्य 'स' है । तब उतका चरपान Tक होगा, क्योकि भा. प्रोतहत्त नायीवृत्तपर सम्बस है, इसलिये प चिर से सपा T तक नाशत में सूर्यका चरकाल ही होगा। से मन्यम सूर्य है, अर्थात् T सं नाही वृतगत मध्यम सूर्य है । 'क' नाही वृत्त म स्पष्ट सूर्य स्थान है । T स र गालीय विभुन में, T स कर्ण होन से T क से अधिक है । इसलिये स्पट सूर्य T क, मध्यम T से से पश्चिम होने से प्रतिदिन पहिलेही उदय को प्राप्त होगा। क्योंकि पलभाकाल पकी *"ल स तेज है। इससे यह काल समीकरण का माग ऋण हागा । इसरा परममान-१०क्ला होगा। इसीप्रकार यह निश्चित होता है कि अयनान्त स सपात बिंदुतक पलमाशल पदीकाल से मद होने से, कालसमीकरण का भाग धन हागा । उसका भाग परम +१. क्ला होगा। अब (१) कारपद' पार (२) कारणय' क्त्सना करने से उपर जो लिखागया है उसका साराश या हुया (१) 'क' मानमा वर्ष में सूर्य के नीचस्थान और उच्चस्थान में प्रभाव होता है । श्रयान् ३१ दिसम्बर और १ जुलाई को। और परम धनमान + कला मार्च मास के अतसे कला सितम्बर क प्रतना बदलता है। (२)'य' मामा वर्ष में चार दका अभाव होता है । दोनों सपातों में और दोनों अपना ना में। सपान से अयनात तक 'य' मग और अपनात से सपात तक धन होता है । और धन +१. कला अपन परमपान मे-१. तक बदलता है। (३) क और य का योग वा अनर, उनके एक वा विपरीत राशियों के अनुमार, ररने से, पान- समीकरण का मामिड होता है । इमार य और य का बनगरिनानुमार जी योग हागा वही वास. सावरण होगा या परममा यह है 1 नोट। ए समीरप सष्ट और मध्यमशान या चतररुप होता है । जब राएकाल से मध्यमकान पिर, होता है उस समय पता धन हो है। ओर गव मायमरात से राष्ट अपित होता है तब दोनों पन्तरमण होता है। पलभाषन्य से नो पासमान होता है यह रस और जेवर ( uateh) गेनी चालतान हाना है पद मप्या होता है। इसलिये यदि इनदोनों के पालों का अन्तर पियानाय तर यहभी पालसमीरण रूप है। इसमपार, (मपमपाल) + (पष्टवाल)मालसमीकरण । श्रश्वा (घडीपारा) + (पलभाकात )यालसमारण। मरहमातिवृत्त में भमण करता है और मध्यम सूर्य ५६ । सगति से नाडीत में भमण करता है। परन्तु मानिवृत्त में राष्टसूर्य को गति यदला करती है और नाहीवृत्त में एकाकार रहती है। इसलिए यह प्रतीत होता है कि क लममीकरण दो पारश से उत्पन्न होता है । (१) भारत के उत्तरोन्द्र, प्रातिवृत्त में ही अनुल्यगति । (२) परमशान्ति। अब प्रथम इनदानों कारों का चलग थलग विचार करके पिर इनी रयोगशक्ति से, वर्ग में काल समीकरण व परम और कब उसमा प्रभाव होता है, इसका पिचार किया जायगा । (१) वेपलर के दूसरे नियम से यह सिर हुआ है सिजन पृथ्वी अपने अक्षमें भ्रमण करतीहुई रहरु पास अर्थात् उसके नीचस्थान में पहुचती है, तब उसका वेग बहुत होजाता है । यह प्राय: ३१ दिसम्बर को पहुंचा फरनी है । इसलिये पृधी नितगति के नियम से वाविहन में भ्रमण किया करती है यह गति उगसमय में बहुत बड़जाती है । पृथ्वी अपो अदमें पश्चिम से पूर्वको घूमती है, इस भ्रमण से स्पष्ट सावर दिनमभ्यम सापनदिन से बड़ा होगा। और रनिगदिस्थान में पृषी ६ पहुंचन पर अर्थत् ३१ दिगम्बर को यदि पलभा और घड़ीको एक साथ ही चला दियाजाय तत्र स्पष्टसाल मध्यमसल के अतर्गत होता है । यह सटकाल की घटती प्रायः तीनमासनक होती है, जबतक कि पृथ्वीको स्पष्ट और मध्यमगति समाा न होनार अर्थात् वह पदान्त को न पहुषै । इसप्रकार पृथ्वी की अतुल्यगति से जो कालसमीरण का भाग उत्पन्न होता है, वह मार्च मासतक परम होकर प्राय धन ७' क्ला, व मिनट होता है । उसके बाद फिर पलभाकाल घड़ीराल से बढ़ता है घोर गत तीनमास में जितना कम था, वह पृथ्वी के उच्चमें पहुंचने पर पूरा पहार फिर मध्यम और स्पष्टकाल समान होनाते हैं । यह माय १ जुलाई को होनाता है । उस समय, पृषी थी अतुल्यगति से जो कालममीकरण उत्पन्न होता है उसका प्रभाव होनाता है । इसी प्रकार देखने में आता है कि उक्त रवि उच्च से उसके नीचत्यानतक कालसमीकरण ग्राने पर. ममान ऋण 'क्ला सितम्बर के अन्तत होता है। (२) क्रान्ति के पशसे चर में सदा अतर पड़ा करताहै । क्ल्पना किया, नीचे लिखे क्षेत्रमे, ' स्पसूर्य और 'स' मध्यम है। वे दोनों सायन मेषादि से स्पष्टमान्तिवृत्त और मध्यम नाहीवृत्तम चले और सायनतुल में जाकर दोनों एर होगये। उस समय चरका प्रभार हुआ। और दोनों अपनों में चर परमहुआ। अर्थात् सायन मेपादि और साइननुलादि में योर कर्कादि मरादि मे धम से बात भय और परम उत्तर वा दक्षिण होने से चरभी शन्य और परम हुा । इन चार स्थानों में मानके पशम जो कालसमीरण या भाग उसन्न होता है, वह शून्य होता है । इमप्रकार वर्षमें चारबार उनका अमार मिश्रा।
मध्यगतिवासना। भापाभाप्य। जो ग्रह उदयान्तर के संस्कार से लङ्कोदयकाल के सिद्ध होते हैं वे देशान्तर संस्कार से निज देश के उदयकालिक सिद्ध होजाते हैं। देशान्तर दो प्रकार का है । एक पूर्वापर । दूसरा दक्षिणोत्तर जिसे चर कहते हैं । तत्र तावत्पूर्वापरमाह- यल्लकोजयिनीपुरोपरि कुरुक्षेत्रादिदेशान् स्पृशत् सूत्रं मेरुगतं बुधैर्निगदिता सा मध्यरेखा भुवः। आदौ प्रागुदयोऽपरत्रविपये पश्चाद्धि रेखोदयात् स्यात्तस्लास्क्रियते तदन्तरभवं खेटेपवृणं स्वं फलम् ॥२४॥ लङ्काया मेरुपर्यन्तं नीयमाना रेखोजयिनी कुरुक्षेत्रादिदेशान स्पृशन्ती याति सा मध्योखेत्युच्यते । रेखायां यदाऊदयस्तका- लात् पूर्वमेव पूर्वदेशे भवति । रेखोदयकालादनन्तरं पश्चिमदे- शेऽर्कोदयः। तदन्तरकालस्तदन्तरयोजनः स्पष्टभूवेष्टनादनुपातेन ज्ञायते । यदि स्फुटपरिधियोजनैः पष्टिवटिका लभ्यन्ते तदा रेखा स्वरयोरन्तायोजनैः किमितीति त्रैराशिकेन देशान्तरवटिका लभ्यन्ते । मध्यगत्याथचानीता नाड्याताभिरनुपातः । यदि घ. टीपट्या ग्रहस्य गतिकला लभ्यन्ते तदा देशान्तरघटीभिः सिमिति। अथवा योजनरेवानुपातः । स्फुटपरिधियोजनेंर्गतिः प्राप्यते तदा देशान्तरयोजनः किमिति | फलं कलाः प्रागृणं यतातत्रा- दावुदयः । पश्चाद्धनम् । यतस्तत्र रेखोदयादनन्तरमोदय इन्युपपन्नम्। ।
गोलाध्याये। इदानी देशान्तरस्वरूपमाह- येऽनेन लहोदयकालिकास्ते देशान्तरेण स्वपुरोदये स्यः। देशान्तरं मागपरं तथान्यद् याम्योत्तरं तबरसंज्ञमुक्तम् ॥ २३ ॥ य उदयान्तरकर्मणालदायामोदयिका ग्रहाजाताग्ते देशान्तर कर्मणा स्वयुरोदयिकाः स्युः। तच देशान्तरं द्विविधम् । एक पूर्वा- परमन्यद्याम्योत्तरम् । तच्चरसंज्ञमुक्तम् । ये ग्रहा अनेनोंदयान्तरसंस्कारेण लोदयकालिका जातास्ते हि देशान्तरसंस्कारेण संस्कृताः रखपुरोदये स्यु । प्रभा। . +१०',- १०+१०',-१', यह कम से , परवरी , में, अगरत पोर नवम्बर में होता है। श्रोर 'क' का मान ७' से कभी अधिक नहीं हो सका । इसलिये यह सिद्ध होता है कि ऊपर लिखे महीनों में कालसमीकरण (फ+य) उसी राशिसम्बधि होगा निस राशिसम्बधि 'य' है। चाहे ' ' का मान ऋण हो अथवा घर । वर्ष में कालसमीकरण के प्रभाव के दिन यह हैं-प्राग १६ एप्रिल १५ जून, १ सितम्बर और २५ दिसम्बर । और परम धन फल १४ । २८* इतना ११ फरवरी को प्रोर परम भरणफल १६' २१, ३ नवम्बर को हुया करता है। यह उक्त दानों फलों के याग से सयुक्त फल ह । यह वात क्षत्र में इसपर स्पष्ट प्रतीत होती है क्षेत्र, इस क्षेत्र में मध्य में सो पारेखा है उस में कालसमीकरण का प्रभाव दिखलाया गया है और उस रेखा से जा चपाहार क्षेत्र का दो स्थान में लम्ब रेखा से अतर दिखलाया हे यह लियत दिनों में भा द्वण लिया है। यह विषय प्रति मम है। उपयोगी होोसे, सरप में यहा लिखा गया है।
मध्यगातवासना। वागतयन मप स्वर स्माएपद यागना रत्त नगर का वापर रिसापर देशान्तर का साधन कई प्रकार में होता है। मेघ में भी होता है। मान- त्यविधक में फमलाकरभट्टने मूलांश साधन परफे देशान्तर गिराना है। मिरर'- नाम रोगापरान मेरा पर मालारा नगर श्री मन्मना पाहै। और रेम्पापुर का मध्यपरिधिगत अन्नर ११६ सिमरिया है।मीको मगंग करने । इमरपार रेणापुर और परेशर तूनाशीको सिसकार अनुगरिया- मला: : गर ०१.xn. माया । मकार नियो गुदराम ' उसन(मोनार कि ममापिया । १४ ।।
गोलाध्याये। प्रभा। रेखोदयादादौ पूर्वदेशे प्रागुदयः । अपरत्र पश्चिमदेशे तु पश्चा- दिति देशान्तरं प्रागृणं पश्चाद्धनं क्रियत इत्यर्थः । भाषाभाष्य । लका से मेस्तक कुरुक्षेत्र, उज्जयिनी--आदि देशों में होती हुई जो रेखा है उस को भूमि की मध्यरेखा कहते हैं । रेखापुर से पूर्व देशों में प्रथम सूर्योदय और पश्चिम में पीछे से होता है। इसलिये देशान्तर संस्कार पूर्व में गण पश्चिम में धन किया जाता है। उपपत्ति । रेखापुर में जब सूर्योदय होगा उस समय से पहिले ही उस के पूर्ववर्ति देशों में सूर्योदय होगा । और रेग्योदय के बाद में पश्चिमवति देशों में होगा। मध्य रेसा और सदेशान्तर स्पष्ट भूपरिधि में योजनात्मक होता है उसी को देशान्तर योजन कहते हैं । रेसोदय काल के किनने काल पूर्व या पश्चात् म्वदेश सूर्योदय होगा, उसके साधनार्थ अनुपात- स्यपयो :: देयो के फल रेयापुर और स्वपुर सूर्योदय घटिकामो का अन्तर होगा । इमी को देशान्तर घटिका कहते हैं । यह लामे पूर्व किंव्य पश्चिम मे., नात्कालिक भांशले सम्मान है। था प्रकारान्तर से अनुपाल- इस प्रकार कलात्मय पल को भहों में संस्कार करने मे संदेशोदय के होते हैं । अथवा एकही अनुपात .. गक .. से साधन किया- : गक देयो : মুম্বী इस प्रकार फल मगान पाता है। स्थिति यो है।
:
मप
ल व्या
उपपत्ति।
निरक्षदेश और स्वदेश का अन्तर योजन अक्षांश के समान है । उस को
में घटा देने से लम्नांश रहते हैं । वह स्वदेश और मेरु का योजनात्मक अन्तर
है । मेरु को केन्द्र मानकर ६ से जो वृत्त होगा वह निरक्षदेश में होकर
जायगा, उसी को मध्यमपरिधि कहते हैं । और जो वृत्त लम्यज्या तुल्म व्यासार्ध
से बनेगा वह स्पष्टपरिधि स्वदेश की होगी । यह परिधि मध्यमपरिधिके समा-
नान्तर होती है और उस से छोटी होती है । यहा पर मध्यमपरिधि से स्वदेशीय
स्पष्टपरिधि का साधन करते हैं-
मपरलज्या
त्रि
स्पष्टपरिधि ॥ २५॥
नि
मध्यगतिवासना समाप्तहुई।
इदानी गोलंविवक्षुरादौ ज्योत्पत्तिकथने कारणमाह-
पटो यथा तन्तुभिरूतिर्य-
ग्रूपैर्निबद्धोऽत्र तथैव गोलः।
दोकोटिजीवाभिरमुं प्रवक्तुं
ज्योत्पत्तिमेव प्रथम प्रवक्ष्ये ॥ १ ॥
स्पष्टम् ।
प्रभा।
'यथा अर्धतिर्यग्रुपैस्तन्तुभिः सूत्रःपटो वस्त्रं निबद्धो भवति तथैवात्र
गोलोऽप्यूर्वाधो दोकोटिजीवाभिर्निबद्धः । अमुं गोलं प्रवक्तुमाख्यातुं
प्रथमं गोलारम्भइत्यर्थः । ज्योत्पत्तिमेव प्रवक्ष्ये व्याकरोमि ।
भाषाभाष्य ।
असे खड़े बेडे सूत्रों के सयोग से वस्त्र बुना हुआ होताहै उसी प्रकार यह गोल
भी भुजज्या कोटिज्याओ से वेष्टित है इसलिये पहिले इस गोल को स्वरूपज्ञानार्थ
ज्योत्पत्ति का निरूपण करताहू ॥ १ ॥
गोलाध्याये। इदानीं भूगोले स्फुटपरिधिप्रदेशं स्फुटतानुपातं चाह- स्वदेशमेर्वन्तरयोजनैर्य- लम्बाशगिरेः समन्तात् । वृत्तं स्फुटो भूपरिधिर्यतः स्यात् त्रिज्याहतो लम्वगुणः कृतोऽस्मात् ॥ २५ ॥ स्वपुरस्य मेरुगर्भस्य चान्तरे यावन्ति योजनानि तावन्ति लम्बांशजानि । यतो निरक्षदेशस्वपुरान्तरयोजनान्यक्षांशजानि। भागेभ्यो योजनानि च व्यस्तमित्युपपद्यत इत्यर्थः । तैर्लम्बांश- जैयोजनैर्भगिरेः समन्ताद्यवृत्तमुत्पद्यते स स्फुटो भूपरिधिः । यो मध्यपरिधिः पठितःस निरक्षदेशोपरि। अयं तु स्वपुरोपरि। अतः किंचिन्न्यूनो भवति । अथ तदानयनम् । मध्यमपरिधेरभीष्ट त्रिज्यातुल्यं व्यासार्धं प्रकल्प्य तस्मिन् व्यासार्धे स्वपुरे यावती लम्बज्या तावत् स्फुटपरिधासाध भवितुमर्हति । अतस्तेन त्रैरा- शिकम् । यदि त्रिज्याव्यासार्धे मध्यमः परिधिलभ्यते तदा ल- बज्या मिते क इति । फलं स्फुटपरिधिरित्युपपन्नम् । इति गोलभाष्ये मध्यगतिवासना । अत्र ग्रन्यसंख्या १७५ । प्रभा। स्वदेशस्य मेरोथ यान्यन्तस्पोजनानि तैलन्यांश लम्बांशोएल- मेंझगिरेः समन्ताद् यवृत्तं स रफुटो भूपरिधिः । इति प्रभायां मध्यगतिवासना । भापामाप्य। स्वदेश और मेरु का जो लम्बांश तुल्य अन्तर योजन है उम व्यासार्ध में मेक- गिरि के चारों तरफ जो वृत्त होगा उस को स्पष्टपरिधि कहते हैं । इसलिये उस को लम्बग्या से गुणकर त्रिन्या का भाग दिया है।
'ज्योत्पत्तिः। मंतागुलेन सूत्रेण वृत्तं विलिख्य दिगङ्कितं चक्रांशकैश्चादित कृत्वा तत्रैकस्मिन्नेकस्मिन् वृत्तचतुर्थांशे नवतिर्नवतिर्भागा भव- न्ति । ततो यावन्ति ज्यानि कार्याणि तावद्भिविभागैरेकैकं वृत्त- चतुर्थाशं विभज्य तत्र चिह्नानि कार्याणि । तद्यथा । यत्र चतुर्विश- तिर्जीवाः साध्यास्तत्र चतुर्विंशतिर्भवन्ति । एवं द्वितीयचतुर्थांशेऽ पि।ततो दिचिह्नादुभयतश्चिह्नद्धयोपरिगतं स्त्रं ज्यारूपं भवति । एवं चतुर्विशतिया भवन्ति । तासामर्धानि ज्यार्धानि । तत्प्रमा णान्यनुलैर्मिला ग्राह्याणि। प्रथादितो व्याख्यायते । येष्टा त्रिज्या स कर्णः कल्प्यः । या भुनज्या सभुजस्तयोः कर्णभुजयोर्वर्गान्तरपदं कोटि कोटिज्ये- त्यर्थः। तत्र ये भुजकोटिज्ये ते भुजकोट्यंशानां क्रमज्ये ज्ञातव्ये। भुजज्या त्रिज्यातो यावदिशोध्यते तावत् कोट्यशानामुत्क्रमज्या- वशिष्यते । एवं कोटिज्योना त्रिज्या भुजांशानामुत्क्रम ज्यास्यात् । अथोत्क्रमज्यास्थानं दर्शयति । तत्र पूर्वलिखिते वृत्ते चिडयो- रुपरिंगतं सूत्रं किल ज्या । तदुपरि तयोश्चिह्नयोर्मध्ये यदृत्तखण्डं तचापं धनुः। चापमध्यस्य ज्यामध्यस्य च यदन्तरं वाणाकार सो- कमज्येत्युच्यते । त्रिभमौर्विकाया इत्यग्रे सम्बन्धः । एवं साधारण्येन ज्याक्षेत्रं दर्शयित्वाथ निर्दिष्टांशानां गणितेन ज्यानयनम् । त्रिभमौर्विकाया यदर्धिस्य मूलं सा पञ्चचत्वारिंश दशानां ज्या स्यात् । तस्या यावत्कोटिज्या साध्यते तावत् तावत्येव भवति । यतस्तत्रकोव्यंशा अपि पञ्चचत्वारिंशत् । अत्रोपपत्तिः । त्रिज्याभुजत्रिज्या च कोदिस्तयोर्वर्गयोगपदं वृत्तान्तः समचतुरखस्य भजास्यात् । सैव नवतिभागानां ज्या।
गोलाध्याये। इदानीं जीवाक्षेत्रसंस्थानं तावदाह- इष्टा त्रिज्या सा श्रुतिर्दो जज्या कोटिज्या तदर्गविश्लेपमूलम् । दोः कोट्यंशानां क्रमज्ये पृथक् ते त्रिज्याशद्धे कोटिदोरुत्क्रमज्ये ।। २ । ज्याचापमध्ये खलु वाणरूपा स्यादुत्क्रमज्या त्रिभमौर्विकाया। वसूलं शरवेदमाग- जीवा ततः कोटिगुणोऽपितवान् ॥ ३॥ त्रिभज्यकाघखगुणांशजीवा तत्कोटिजीवा खरसांशकानाम् । क्रमोत्क्रमज्या कृतियोगमूला दलं तदर्धाशकशिश्निी स्यात् ॥ ४ ॥ त्रिज्योकमज्या निहतेईलस्य मूलं तदधीशकशिञ्जिनी वा। तस्याः पुनस्तद्दलभागकानां कोटेश्च कोयंशदलस्य चेवम् ॥ ५ ॥ एवं त्रिपटसूर्यजिनादिसंख्या अभीष्टजीवाः सुधिया विधेयाः। त्रिज्योत्थत्ते भगणाविते वा ग्राह्या अभीष्टा विगणय्य जीवाः ॥ ६॥ अत्र त्रिज्योत्थत्ते भगणाहिते वेत्येतदन्त्यवृत्तस्योत्तरार्धमादो व्याख्यायते। ज्योत्पत्तावभीष्टा त्रिज्या कल्प्य ते समायाभूमौ त्रिज्या ज्योत्पत्तिः। ११६ तत्राष्टमात् तदाशकशिजिनी चतुर्थम् ४ । तत्कोटिज्याविंशम् २० । एवं चतुर्थाद्वितीयम् २ । दाविंशं च २२ । दितीयात् प्रथमं १ त्रयोविंशं च २३ । एवं दशमचतुर्दशपञ्चमैकोनविंश- सप्तमसप्तदशैकादशत्रयोदशानीत्यष्टमात् १० ११४१५ | १६ | ७ ११७ | ११ | १३ | अथ दादशात् पष्ठाष्टादशतृतीयैकविंश- नयमपञ्चदशानि ६ ॥ १८॥३॥ २१18 | १५ | त्रिज्या चतु- विशमिति २४ । अतोऽवशिष्टां ज्योत्पत्तिमग्रे वक्ष्यामः। प्रभा। इष्टत्रिज्येत्यादयः श्लोका श्राचार्येण समासतो व्याख्याताः। वि. शेषः क्षत्रस्थिती व्यक्तीकरिप्यते । भापाभाष्य। इष्ट त्रिज्याकर्ण भुजज्या भुज और दोनों का वर्गान्तर मूल कोटिया होती है। भुजांश और कोटयशकी क्रमज्याओं को त्रिज्या में घटाने से कोटिज्या और भुज- ज्याकी उत्क्रमज्या होती है । ज्या और चाप के वीचमें वाणरूप खड़ी रेखा को उत्कमज्या कहते हैं । त्रिज्यावर्ग के अर्धका मूल ४५ की ज्या होती है, उसकी कोटिज्या भी-उतनीही होती है । त्रिज्या का अर्थ की ज्या और उसकी कोटिज्या ६० की होती है । क्रमज्या और उत्क्रमस्याओं के वर्गयोगमूल का अर्ध अधीशकी ज्या होती है । अथवा निव्या और उत्क्रमज्या के गुणन के अर्ध का मूल अधीशज्याके समान होता है । इसीप्रकार अधोराज्या के भी दे की ज्या और कोटिज्या सिद्ध करना चाहिये । यो ३, ६, १२, २४ आदि इष्टज्याओं को कल्पना करना अथवा त्रिज्यादृच बनाकर उसे भगणों से अङ्कित करके इज्याओं को गिनकर जानना चाहिये। उपपत्ति । किसी निर्दिष्ट्र चापकी ज्याको भुजज्या कहते हैं वह ६० से न्यून चाप की झेती है। उसको घटाने से शेष पर कहते हैं । क्योंकि प्रथमपद में भुजम्या बढ़ती है और पदान्त्र . और तब ११८ गोलाध्याये। तदर्धं ग्राह्यम् । अतो वर्गयोगस्य चतुर्थाशः कृतः । तदेव त्रिज्या वर्धिमतस्तन्मूलं शरवेदभागज्येत्युपपन्नम् । अथ त्रिंशद्भागानां ज्या त्रिज्यामिता स्यात् । तस्याः कोटि ज्या पष्टिभागानां ज्या स्यात् । अत्रोपपत्तिः। वृत्तान्तः पातिसमपडलस्य भुजो व्यासामितः स्यादिति प्रसिद्धं गणितेऽपि कथितम् । अतस्त्रिज्या त्रिंशद्भाग- ज्येत्युपपन्नम्। अतः प्राग्वदुत्क्रमज्या। पष्टिभागज्ययोना त्रिज्या राशरुत्क्रम- ज्या।सा कोटिरूपिणी ।क्रमज्या भुजरूपिणी। तदप्रयोर्निवद्धसूत्रं तत्कर्णः। तत्रिंशदागानां ज्यारूपम् । अतस्तदधं पश्चदशभागानां ज्यामित्युपपन्नम्। एवं सर्वत्र तदर्धाशकशिञ्जिनीनामुपपत्तियिा। अथ प्रकारान्तरेण तदधाशकशिञ्जिनीमाह | त्रिज्योकमज्या निहतेरित्यादि। अस्योपपत्तिः । तत्राद्याक्षरचिलीजप्रकारेण कथ्यते । तत्रो क्रमज्योना त्रिज्या किल कोटिज्या तस्यावर्गोऽयम् । उव १६ त्रिभा त्रिव १ अनेनोना त्रिज्याकृतिर्दोज्याकृतिः स्यात् ।उव उत्रिभा २ | अयं कमज्यावर्ग उत्क्रमज्यावर्गयुतोजातः । उत्रिम २। अस्य चतुर्थभागः उत्रिभा३ । अस्य मूलं ग्राह्यम् । अत उलं त्रिज्योत्क्रमज्यानिहतेरित्यादि । एवं तस्या अप्यन्या तदधीशक शिञ्जिनीति । एवं कोटिज्यायापि यावदभिमतखण्डानि स्युः। तद्यथा । यत्र चतुर्विशतिः खण्डानि तत्र राशेाष्टमं खण्डम् = ! तत्कोटिज्या पोडशम् १६ शस्वेदभागज्या दादशम् १२१ स्मात् खण्डत्रयात् कथितप्रकारेण चतुर्विशतिः खण्डान्युत्पद्यन्ते ।
क
।
न
,
(१) अब चाप और अ क चाप-४५
अद-ज्या+ अव और मश्र या मवत्रिज्या । इसलिये,
मबम+म-२ म २ त्रि।
V२वि और अद: ज्या अध
*/त्रि' अथवा, ज्या ४५%3D/त्रि इसलिये
'त्रिभमौषिकायाः वर्गार्धमूलं शरवेदभागनीबा-
इत्यादि उपपन्न हुआ।
(२) वृत्तान्तर्गत सम पटकोण क्षेत्र का भुज व्यासार्थ के
तुल्य
व्यक्त गणित के क्षेत्र व्यवहार अथवा क्षेत्रमिति के तीसरे अध्याय से सिद्ध है।
इसलिये वृत्त ६० त्रिज्या के तुस्य है ६० या वि.: ज्या ३त्रि। इससे
'त्रिभज्यका खगुणांशजीवा-, इत्यादि उपपन्न होता है।
(३) अप एक निर्दिष्ट चापहै । श्रय चापाई है।
भप पाप की ज्या पम और उत्तमय मश्र
तब,
A
होताहै यह
भप-
.
Vपम+अमर, और ज्या अप-अन=ज्या भव ।
.:.ज्या अब=Vपम'म इस प्रकार 'प्रमोत्क्रमज्याकृतियोगमूला-
दल तदधीशकशिलिनी स्यात् ' यह उपपन्न हुआ।
(४) कोज्या-त्रि-उज्या ।
वर्ग फरने से-
१-२ त्रिxउज्या+ उ
त्रिज्यावर्ग में घटाने से मुजन्यावर्ग शेषरहा-
२ त्रिज्या-उज्या
.:. ज्या २ निउज्या-उग्या
'ग्या" जोड़ने से-
ज्या अन्या'२ निxउज्या ।
૨
१ । श्रीपतिने शिम्साह-"क्षेत्रे पड़ते हृदयाल्यर हो समा गोलविदो पदति।
वृत्ते परीलाइरानीवा विष्कम्भाबरडेन समोपल"॥१॥
१२०
गोलाध्याये।
कोटिग्या शून्य होती है। इसप्रकार प्रथमपद मे भुजन्याभज, कोटिज्या कोदि,
त्रिज्यार्ण यह क्षेत्र बनता है । इमीतरह दूसरे पद मे कोटिज्या बढती है और
पदान में त्रिज्या तुल्य होजाती है । भुजव्या शन्य होती है। ऐसेही फिर तीसरे
पद में भुजज्या यहती है चौथे में कोटिया । ये सब यात निम्न लिवित क्षेत्र में
स्पष्ट मालूम पडती हैं।
क्षेत्र
म
म
चप
स
न.प.
ल
स
प्रथम पद में अप भुजाश की प ल भुमन्या और उसके ५ व फोटपेश की
पर कोटिज्या अलं उत्तमज्या और वट कोटपुत्कमया है ऐमेही द्वितीयपद में
अल उत्मनग्या, प ल भुजज्या प ट कोटिज्या घट कोटपुत्ममग्या है इसीप्ररा
तीसरे और चौधे पदमें भी जानना।
छेद्यकाधिकारः।
१२३
देखता किन्तु अलग देखता है इस कारण विद्वानों ने मध्यप्रह में भुजफल का
संस्कार किया है।
उपपत्ति ।
भास्कराचार्य के मत से भूमि ब्रह्माण्ड के केन्द्र में है और सूर्य, चन्द्र श्रादि
मह उसके चारों तरफ वृत्ताकार निज कक्षाओं में भ्रमण करते हैं । इन कक्षाओं
का केन्द्र भूमि में नहीं है । जिस वृत्त में प्रह भ्रमण करता है उसे प्रतिवृत्त कहते
है और उसी व्यासार्ध से जो भू केन्द्रक वृत्त होताहै उसे कक्षावृत्त कहते हैं प्रतिवृत्त
में भ्रमण करता हुआ ग्रह जहां कक्षावृत्तमें दिखलाई दे वही ग्रह का स्पष्ट स्थान
है उसी के ज्ञानार्थ ग्रहों के मध्यस्थान में मन्दफल का संस्कार किया जाता है ।
मध्यम प्रह मन्दफल संस्कृत मन्दस्पष्ट कहलाता है । और जिस वृत्तमें यह मन्द-
स्पष्ट ग्रह भ्रमण करता है उसे मन्दप्रतिवृत्त कहते हैं। सूर्य, चन्द्र मन्दफल संस्कृत
ठीक भूकेन्द्रक सिद्ध होजाते हैं । परन्तु पञ्चताराग्रह मन्दफल संस्कृत भूकेन्द्रक
न होकर अन्यस्थान के सिद्ध होते हैं । इस कारण कक्षावृत्तको ही पञ्चग्रह सम्बन्धि
द्वितीय प्रतिवृत्त कल्पना करके उसी केन्द्र और व्यासार्ध से दूसरा कक्षावृत्त बनाया।
इस प्रकार द्वितीय प्रतिवृत्त में भ्रमण करता हुआ ग्रह इस कक्षावृत्त में जहां दिल-
लाई देता है उस के ज्ञानार्थ मन्दस्फुट ग्रहों में द्वितीय संस्कार शमिफल का
किया जाता है ॥ ७॥
एवमेकेनैव श्लोकेन संक्षेपाच्छेद्यकसर्वस्वमुक्त्वेदानी कि-
श्चित्सविस्तरं छात्रान प्रत्याह-
. पूर्वापरायतायां तद्भित्तावुत्तरपार्श्वके ।
दर्शयेच्छिष्यवोधार्थ लिखित्वा छेद्यकं सुधीः ॥८॥
नाद्यापीदं सम्यगस्माभिर्जायत इति शिष्यैरुक्त आचार्य आह ।
पूर्वापरायंतायामित्यादि । स्पष्टार्थम् ।
-
भाषाभाष्य।
पूर्व पश्चिम विस्तृत भित्ति के उत्तर तरफ छैद्यक को लिसकर शिष्यनोध के
लिये विद्वान् लोग दिखलारे । इमकी निर्माण विधि प्रागे दिखलाई गई है ॥८॥
१२२ गोलाध्याये। प्राधा करने से (ज्या+उज्या') त्रिxउज्या । वर्गमूल लेने से अधीश ज्या हुई V ज्या+उज्या=Vत्र उच्या इसप्रकार ' निज्योत्क्रमज्यानिहतेदेलस्य मूलं तद्धीशकशिजिनी वा विधि उपपन्न हुई। और शेष बातें साफ हैं। यह 1 ज्योत्पत्ति संक्षिप्त समाप्तहुई। O छेद्यकाधिकार इदानीं स्पष्टीकरणे फलस्योत्पत्तिमाह- भूमेमध्ये खलु भवलयस्यापि मध्यं यतःस्याद यस्मिन् वृत्ते भ्रमति खचरो नास्य मध्यं कुमध्ये | भूस्थो द्रष्टा नहि भवलये मध्यतुल्यं प्रपश्येत् तस्मात्तज्ज्ञैः क्रियत इह तद्दो फलं मध्यखेटे ॥ ७॥ यदेतत् भपरेऽश्विन्यादीनां भानां वलयं तद्भूमेः समन्ता- सर्वत्र तुल्येऽन्तरे वर्तते । यतस्तस्य मध्यं कुमध्ये । अथ यस्मिन् वृत्ते ग्रहोभ्रमति तस्यमध्यंकमध्ये न। तभूमेः समन्तात्समानान्तरं नेत्यर्थः । अतो भूस्थो द्रष्टा भवलये मध्यमस्थाने ग्रहं न पश्यति कि- न्त्वन्यत्र पश्यति तयोर्भवलये यदन्तरं तद्ग्रहस्य फलमित्यर्थादुक्तं भवति अत उक्तं तस्मात्तःक्रियत इह तद्दोः फलं मध्यसेट इति। मापाभाय। है। भचक्रका केन्द्र पृथिवी है, परन्तु जिस वृत्त में प्रह नित्य भ्रमण करता उसका मध्य भूमि नहीं है । अर्थान् उस वृक्की उच्चता भूमि से विषम है । समाना. कार नहीं है । इसलिये भूनिवासी द्रा कचात्तगत मध्यमस्थान में प्रा को नहीं ।
छेद्यकाधिकारः। देखता किन्तु अलग देखता है इस कारण विद्वानों ने मध्यमह में भुजफल का संस्कार किया है उपपत्ति । भास्कराचार्य के मत से भूमि ब्रह्माण्ड के केन्द्र में है और सूर्य, चन्द्र आदि मह उसके चारों तरफ वृत्ताकार निज कक्षाओं में भ्रमण करते हैं । इन कक्षाओं का केन्द्र भूमि में नहीं है । जिस वृत्त में ग्रह भ्रमण करता है उसे प्रतिवृत्त कहते हैं और उसी ब्यासार्ध से जो भू केन्द्रक वृत्त होताहै उसे कक्षावृत्त कहते हैं प्रतिवृत्त में भ्रमण करता हुआ ग्रह जहां कक्षावृत्तमें दिखलाई दे वही ग्रह का स्पष्ट स्थान है उसी के ज्ञानार्थ ग्रहों के मध्यस्थान में मन्दफल का संस्कार किया जाता है । मध्यम प्रह मन्दफल संस्कृत मन्दस्पष्ट कहलाता है। और जिस वृत्तमें यह मन्द- स्पष्ट प्रह भ्रमण करता है उसे मन्दप्रतिवृत्त कहते हैं। सूर्य, चन्द्र मन्दफल संस्कृत ठीक भूकेन्द्रक सिद्ध होजाते हैं । परन्तु पञ्चतारामह मन्दफल संस्कृत भूकेन्द्रक न होकर अन्यस्थान के सिद्ध होते हैं । इस कारण कक्षावृत्तको ही पञ्चग्रह सम्बन्धि द्वितीय प्रतिवृत्त कल्पना करके उसी केन्द्र और व्यासार्ध से दूसरा कक्षावृत्त बनाया। इस प्रकार द्वितीय प्रतिवृत्त में भ्रमण करता हुआ ग्रह इस कतावृत्त में जहां दिन लाई देता है लास के पनावालहस्मदशहों में द्वितीय त्रिभज्ययैव प्रतिमण्डलायं सैवोचरेखा स्वपरात्र तिर्यक् ॥ १२ ॥ तुङ्गोर्चरेखा खलु यत्र लग्ना तत्रोच्चमस्मिन् प्रतिमण्डलेऽपि । ततो विलोमं खलु तुङ्गमार्ग- भैषादिरस्मात्खचरोऽनुलोमम् ॥ १३ ॥ देयम्तदुच्चान्तरमत्र केन्द्र दोोबरेखा खगयोश्च मध्ये। तिर्यकत्थरेखासगयोस्तु कोरिः सोधिरा वाहुगुणस्तु तिर्यक् ॥ १४ ॥ .
१२२ गोलाध्याये। आधा करने से- (ज्या+उज्या ) त्रि- उज्या । वर्गमूल लेने से अधीश ज्या हुई TV ज्या+उज्या=V त्रि: उज्या इसप्रकार ' त्रिज्योरक्रमज्यानिहतेदलस्य मूलं तदद्धीशकशिजिनी वा विधि उपपन्न हुई। और शेप बाते साफ हैं। १६ । ज्योत्पत्ति संक्षिप्त समातहुई। -- छेद्यकाधिकारः। इदानीं स्पष्टीकरणे फलस्योत्पत्तिमाह- भूममध्ये खलु भवलयस्यापि मध्यं यतःस्याद् यस्मिन् वृत्ते भ्रमति खचरो नास्य मध्यं कुमध्ये । मतिक्रान्तमोताद नहि भवलये मध्यतुल्यं प्रपश्येत् प्रत्यक्षाविषयमित्यर्थः। दिव्यं ज्ञानं पारम्पर्यवशापिपरंपरया • प्रमा- इच नारदाय हिमगुर्यच्छौनकाय' इत्यादिकया रहस्यमप्रकाश्यमय- नी प्रकाश्यं नीनं पिपरम्परया मुधि प्रकटीकृतम् । ततस्तस्मात्का. रणादग्यभूतत्वेनेत्यर्थः । टेपिकृतघ्नदुर्जनदुगचाराचिरावामिनाम् । द्वेपिणम कृतघ्नाथदुर्जनावत्यादि विशेषणसमासःतेषां तत्प्रकाश्य- मध्यापनीयमिति इमां मुनिकृतां सीमां नियमपद्धतिमुज्झतरत्यजतः पुंस इति शेपः। यायुः मुक्तक्षयः ग्यादा सूर्यमिद्धान्तेऽप्युक्तम् रहस्य- मेतदेवानां न देयं यस्य कस्यचित् । 'मुपरीक्षिन शिष्याय देयंवत्सर वामिने ॥' इति । भाषाभाष्य। प्रमोदिन्य, प्रतीन्द्रिय, न मिटा सपियो परगम में पृथियो पर राति कि मोदी, हरन, दुर्जन, दुगनी और कर छेद्यकाधिकारः। १२७ विलोम और ग्रहोको अनुलोम कल्पना करना । ग्रह और उनका अन्तर केन्द्र क- हलाता है । ग्रह और उच्चगत रेखाके बीच मे भुजज्या रहती है । ग्रह एप याम्यो. तर रेवाके बीचमें ऊपर नीचे कोटि होती । और त्रिज्या भूमध्यसे तिरछी होती है। इसप्रकार छेद्यक निर्माण होता है। उपपत्ति । नीचे लिखेहुये देनमे उच्च,मह, अन्त्यफलज्या श्रादिका स्थान स्पष्ट प्रतीत होगा प्रतिवृत्तभनि। स्वम दाभारतम् X निन्यफलज्य 46 कोज्या दोग RE नीच - इतिकर्तव्यतोपपत्तिमाह- किलगायें नस्यजीचा।
गोलाध्याये। भित्तेरुत्तरपा विन्दुं कृत्वा तस्मादिन्दोस्त्रिज्यामितेन कर्कटेन वृत्तं विलिखेत् । तत्कंसाइत्तम् । यस्य ग्रहस्य छेद्यकं विलिख्यते तस्य मध्यमभुक्तिपञ्चदशांशेन तस्मिन्नेव विन्दौ यवृत्तं क्रियते सा भूः । लम्बनावनतिदर्शनार्थमियं भूः। अन्यथा विन्दुरेव भूः कल्प्यते । तत्कशावृत्तं चक्रांशैरक-यम् । तत्रेष्ट स्थाने मेपादि प्रकल्प्य तस्मान्मध्यमग्रहमचं च दत्त्वा तदग्रयोश्चिले कार्ये । भूम्युच्चयोरु- परिगता रेखा कार्या । सोचरेखा । अथ भूमध्यउच्चरेखाजनितम- त्स्येन तिर्यग्रेखान्या कार्या । अथ ग्रहस्यान्त्यफलज्यामितं सूत्रं भूमध्यादुच्चरेखायां दत्त्वा तदग्रचिह्नात् त्रिज्यामितेनैव कर्कटकेन य. वृत्तं विलिख्यते तत्पतिमण्डलम् । तत्रापि सैवोचरेखा । किन्तु त- न्मध्येऽन्या तिर्यग्रेखा कार्या । प्रतिमण्डलमपि चक्रांशेरक-यम् । अयोचरेखोपरिनीयमाना यत्र लगति तत्र प्रतिमण्डलेऽप्युचं क- ल्प्यम् । तस्मादुचराशिभागान विलोमतो गणयित्वा तदने मेपादिः कल्प्यः। ततो ग्रहोऽनुलोमं देयः । तत्र ग्रहोचयोरन्तर केन्द्रम् । उच्चरेखायास्तिर्यग्ग्रहगामिनी रेखा सा दोया । प्रतिमण्डलमध्ये या तिर्यग्रेखा तद्ग्रहयोरन्तरं कोटिज्या । साकिलोर्ध्वरूपा भवति। भापामाप्य । विग्या तुल्य फर्फटक (पृत्त बनाने के कंपासका प्राचीन नाम कर्कटक है) मे पहिले फक्षावृत्त पनाना । इस वृत्तफे मध्यसे मध्यममहभोगके पन्द्रहवें हिस्से में ओ वृत्त पनगा यह पृथिवी होगी । कक्षावृत्त को राशियों से अधिन फरफे उपौरमा फा दान करके एक रेसा भूमि और उसके घीचमें करना, यह वृत्त में पूर्वापर रखा होगी । याद में याम्योत्तर जैसा भी म विन्दु में होतीहुई करनी । भूमध्य में पूर्वापर रेसा अन्त्यफलग्या की कल्पना करके उसके चापिन्दु पो पेन्द्र मानकर उनी फक्षावृत्तके त्रिज्याव्यासाधं से प्रतिमण्डल पृप यनाना । दम पृत्तमें उमगतरमाही पूापर रेवा होगी और याम्योत्तर रेग्ग मर्ग करनी। इस प्रतिमपटलमें मीन और पूर्वापर रेगके संपात में उछ यो पत्पना फरसे यहाँसे मेषादि रागियों को ' छैद्यकाधिकारः। १२६ । दोनों के वर्गयोगमूल से कर्ण होता है। वह भूमध्य और विलोम और ग्रहों अन्तर में होता है । कक्षावृत्त और कर्ण का जिस बिन्दु में हलाता है । ग्रहस्पष्ट ग्रह दीखताहै कक्षावृत्त और कोटि रेसा का सम्पात बिन्दु तर रेखाके बंधान है । सष्ठ ग्रह और मध्यप्रह का अन्तर फल स्थान है । स्पष्ट है। इसमयममह अधिक होनेपर ग्रहों में फलका ऋण संस्कार और न्यून होनेपर धन संस्कार कियाजाता है। उपपत्ति । नीचे लिखे क्षेत्र में जगघ' मकरादि केन्द्र और लज' कर्मादि केन्द्र है। मकरादि केन्द्र में कोटिज्या ऊपर होती है इसलिये कोटिज्या और श्रन्त्य. फलज्याके योगसे स्पष्ट कोटि होती है । कादि केन्द्र में कोटिज्या नीचे होती ( पूर्व क्षेत्र देयो) है इसलिये वहां पर कोटिज्या और अन्त्यफलज्या का अन्तर करने से स्पष्टकोटि का स्वरूप होताहै। इसप्रकार,प क स्फुट कोटि है और पुप कर्ण है जो कक्षावृत्त को बिन्दु पर काटता है। और ' क पृ' भुज है। - ल गोलाध्याये। तदूर्द्धतः कोदिगुणो मृगादौ मतेन कर्कटेन कादि केन्द्रे तदधो यतः स्यात् ॥ १५ ॥ विलिख्यते अतस्तदैक्यान्तरमनकोटि- क्रियते दोयाभुजस्तस्कृतियोगमूलम् । कर्णः कुमध्यप्रतिमण्डलस्थ- खेटान्तरे स्पष्टखगो हि दृश्यः॥ १६ ॥ कक्षाख्यवृत्ते श्रुतिसूत्र सक्ने फलं च मध्यस्फुटखेटमध्ये । मध्येऽग्रगे स्पष्टखगाणं तत् पृष्ठस्थिते स्वं क्रियते ततश्च ॥ १७ ॥ तयोः कक्षावृत्तप्रतिवृत्तयोर्मध्ये ये तिर्यग्रेखे तयोरन्तरं सर्वत्रा न्त्यफलज्यातुल्यमेव स्यात् । ततोन्त्यफलज्याग्रादुपरि प्रतिवृत्तस्य कोटिज्या मृगादी केन्द्रे भवति । कादौ तु तदधः । अतःकोटि- ज्यान्त्यफलज्ययोर्योगवियोगों कृतो। तथा कृते सति कक्षामध्य- गतिर्यग्रेखावधेः स्फुगकोर्भिवति । कोटितलकुमध्ययोरन्तरं दो ा स भुजः। तत्कोटिवगंक्यपदं कर्ण इत्युपपन्नम् । कर्णो नाम ग्रह कुमध्ययोरन्तरसूत्रम्। तत्सूत्रं कक्षामण्डले यत्र लग्नं तत्र स्फुटो ग्रहः स्फुटमध्यारन्तर फलम्। तच मध्यग्रहात्स्फुटे ग्रहेधित धन- मूने ऋणं क्रियत इत्युपपन्नम् । एवं मन्दफलेन मन्दस्फुटः शीघः फलेन स्फुटः स्यात् । भाषाभाप्य 1 कक्षा और प्रतिहत गा याम्योत्तर रंगाओके म प पत्यफलज्या ती है। मकरादि केन्द्रमें कोटिग्या ऊपर एवं कादि केन्द्र में ना होती है । इसलिये कोटिग्या और अन्यालण्या का क्रममे योग यियोग करने सेम्पुटकोटि होती है।
छेद्यकाधिकारः। मन्दस्फुटो द्राक्रतिमण्डले च। भ्रमत्यतश्चञ्चलकर्मणीह मन्दस्फुटो मध्यखगः प्रकल्प्यः॥ १८ ॥ मन्दकर्मपूर्वकं शीघ्रकर्मेत्येतत्स्पष्टार्थम् । प्रभा खे निज मन्दप्रतिवृत्ते मध्यग्रहो भ्रमति । शीघ्रप्रतिवृत्ते च मन्द- स्पष्ट इति शीघ्रफलानयनार्थ मन्दस्पष्ट एवं मध्यः प्रकल्प्य इति । भापाभाप्य। - मध्यम ग्रह अपने मन्दप्रतिवृत्त में और मन्दस्पष्ट निज शीघ्र प्रतिवृत्तमें भ्रमण करताहै। इसलिए शीघ्रफलके साधनार्थ मन्दस्पष्टको मध्यम प्रह कल्पना किया है १८॥ इदानीमुचोपपत्तिमाह भ्रमन् ग्रहः स्वे प्रतिमण्डले नृभिः स यन कक्षावलये विलोक्यते । स्फुटो हि तत्रास्यफलोपपत्तये प्रकल्पितं तुङ्गमिहाद्यसूरिभिः ॥ १६ ॥ यः स्यात्पदेशःप्रतिमण्डलग्य दूरे भुवस्तस्य कृतोचसज्ञा। सोऽपि प्रदेशश्चलंतीति तस्मात् प्रकल्पिता तुङ्गगतिर्गतिज्ञः ॥ २० ॥ उच्चाद्रपदान्तरितं च नीचं मध्यः स्वनीचोचसमो यदा स्यात् । कक्षास्थमध्योपरि कर्णसूत्र- पातात् स्फुटो मध्यसमस्तदानीम् ॥ २१ ॥ क - पमxपृक फ- . गोलाध्याये। इसलिये '' ग्रहका स्पष्ट स्थान है और ट म ग्रह का फल है । एवं मध्यम प्रह है । यो सष्ट ग्रह से मध्यग्रह आगे पीछे रहने पर धन, ऋण को उपपचि स्फुट होती है। प्रहफल की उपपत्ति और प्रकारसे भी होसकती है । जैसे, 'मन' लम्ब 'एट' फे ऊपर करने से यह फलज्या होगी और 'मन' त्रिभुज प पू क के सजातीय होगा। पटक = प म : मन; इसलिये, मन:- फलज्या, पृAXक, क्योंकि, पम-खक-पुत्रा अब, के केन्द्रज्या, अ- अन्त्यफलज्या, फ-फलज्या और क-कर्णके कल्पन किया। तब स्पष्ट कोटि-कोज्या श्र! मृगादि और कर्कादि केन्द्र के अनुसार । और कर्ण-/ पेज्या (योज्या । अ) इसलिये नियमानुसार xज्या अxफॅज्या V केज्यार+ (कोज्या पर । यह बात जानना आश्यक है कि जब केन्द्रोटिग्या श्रन्त्यफलज्या के समान फर्कादि केन्द्र में होगी, तत्र कर्ण केन्द्र दोा के तुल्य होगा । अन्यथा फर्ण सदा दोसे बडा रहेगा। और इसी हेतु से फल अन्त्यफलज्यासे कम होगा । ऐसेही जत्र कर्ण केन्द्र दोर्या के समान होगा तय फल परमाधिक होकर अन्त्यफलज्या के समान होगा ! अर्थात् जिम समय ग्रह कक्षावृत्त गत यान्योत्तर रेसा और प्र. तिवृत्त के संपात विन्दु पर पहुंचता है तभी परमफल होताहै । इसलिये प्रतिवृत्त और कक्षावृत्त की याम्योत्तर रेखाओंका अन्तर सदा समान और अन्त्यफलग्या के तुल्य रहता है । वासनाभाष्य में आचार्य ने भी लिग्ना है ......तयोरन्तर स पत्रान्त्यफलज्यातुल्यमेव स्यात् ।' इसप्रकार मध्यम ग्रह फल संस्कृत गन्दस्पष्ट होताहै । पुनः मन्दस्पटगे शीफल पी मसार करने से स्पष्ट प्रहहोता है । मन्दस्पष्ट औरस्पष्ट विमण्डलगत प्राचार्य मे मानाहै, फिर उन्हींको सल्यान्तर से क्रान्तिवृत्तगत मान लिया है, कोई संसार नहीं किया ।। १५ । १६॥ १७ ॥ इदानी मन्दस्फुटं मध्यम प्रकल्प्य शीघ्रफलं यत्साध्यते तदप पत्तिमाह- मध्यो हि मन्दमतिमण्डले स्वे क - - छेद्यकाधिकारः। भापामाप्य । अपने उमस्थान में स्थित ग्रह पृथिवी से बहुत दूर और नीच स्थित समीप होताहै, इसलिये ग्रह पिम्प क्रमसे छोटा और बडा दिसलाई देताहै । इसीप्रकार सूर्य के समीप मे उसके तेजसे प्रहबिच छोटा और दूरी में बडा दीखता है ।। इदानीमन्यदक्तुं प्रकारान्तरमाह- उक्तामयैषा प्रतिवृत्तभङ्गया युक्तिः पृथक् श्रोतुरसंभ्रमार्थम् । . स्पष्टीकृतेस्तां पुनरन्यथाहं नीचोचत्तस्य च वच्मि भङ्गन्या ॥ २३ ॥ इह किल स्पष्टीकरणयुक्तिः प्रतिहत्तभङ्गन्या मयोक्ता । अथ तामेव नीचोचवृत्तभङ्गया वच्मि। प्रभा । स्फुटार्थोऽयं श्लोकः । क्षेत्ररचना विशेषोऽत्र भङ्गिः। भापाभाष्य। - इसप्रकार हमने प्रतिवृत्तभङ्गि (भगि, क्षेत्र रचना को कहते हैं) से सुननेवा. लोकी सदेह निवृत्ति के लिये स्पष्ट ग्रहसाधन को युक्ति कही है। अब उसी युक्ति को 'नीचोचवृत्त' क्षेत्रद्वारा पुन कहते हैं । इदानी तां भगिमाह- कक्षास्थमध्यग्रहचिह्नतोऽथ वृत्तं लिखेदन्त्यफलज्यया तत् । नीचोचसंज्ञं रचयेच रेखां कुमध्यतो मध्यखगोपरिस्थाम् ।। २४ ॥ कुमध्यतो दूरतरे प्रदेशे रेखायुते तुमिह प्रकल्प्यम् । नीचं तथासनतरेऽथ तिर्यड् ૬૨૨ गोलाध्याये। उच्चप्रदेशात् क्रमेण चलितस्य फलप्रवत्तिदृश्यते । अतस्तु कल्पितम् । शेपं स्पष्टम् । मध्यगतिवासनायां च सविस्तरमुक्तम् । प्रभा यदा मध्योग्रहः स्वनींचोच्चममो भवति तदा तंत्र फलाभावान्म ध्य एवं रफुटः न कापि भिदा । तत्र कक्षावृत्तगतोवरेखाकर्णयोरैक रूप्याद् उच्चाचलितस्य ग्रहस्य फलोपलब्धिदर्शनाच्च । अन्यत्रफुटम् भाषाभाष्य । प्रह निज प्रतिवृत्त में भ्रमण करताहुश्रा जहां कक्षायच में दिखलाईदे वही स्पष्ट प्रहका स्थान है । स्फुटग्रहोंकी फलोपपत्ति के लिये उचकी कल्पना विद्वानोंने क. है। भूमिसे प्रतिमण्डला भो ऊंचा भाग है उसको उच्चसंज्ञा है वह उच्चप्रदेश भी चलता है इसलिये उच्चगति की कल्पना हुई है । उच्चदेशसे छः राशिके अन्तर पर नीच प्रदेश है। जिससमय मध्यम ग्रह अपने नोच और उच्चस्थान में होगा सब कक्षावृत्तगत पूर्वापररेखा और फर्सरेसाके मेल होनेसे मध्यम प्रह ही स्फुद होगा। क्योंकि उस स्थानमें फलका अभाव होताहै ॥ १६-~-२१॥ इदानीमन्यदाह- उच्चस्थितो व्योमचरः सुदूरे नीचस्थितः स्यान्निकटेरियाः। अतोऽणुविम्बः पृथुलश्च भाति भानोस्तथासन्नसुदूरवर्ती ॥ २२ ॥ - प्रभा व्योम्नि नभसि चरतीति व्योमचरो ग्रहः, उच्चस्थितः उच्चप्रदेशे घर्तमानो धरिच्या भुरः सकाशात्सुदूरे भवति । तथैव नीचे स्थिती निकट भवति यतःकारणाद् ग्रह बिम्बोऽणुः सूचमरतथा पृथुलः रशृन्तो विस्तीर्ण इत्यर्थः । भाति प्रतीयते । तथा भानोरासन्नसुदरस्थितोषि प्रहारतचेजःपुम्जपरामृतत्वात्नमेणाणुमहांश्च प्रतीयत इत्यर्थः ।
छद्यकाधिकार
१३५
उच्च स्थान से मन्दकर्म में निजकेन्द्रगति से विलोम और शोधकर्म में अनुलोम
भ्रमण करते हैं । इसलिये मन्दकेन्द्र का दान विलोम और शीघ्रकेन्द्रका अनुलोम
करना चाहिये । प्रह और उच्चरेसा के अन्तर मे दोा रहती है। एवं ग्रह और
याम्योत्तररेखा के अन्तरमें कोटिज्या रहती है।
उपपत्ति ।
अन्त्यफलज्या व्यासाध से जो वृत्त बनता है उसे नीचौमवृच कहते हैं । कक्षा-
वृत्त
में जो
भुजग्या
और कोटिज्या होती है उसका नीचोचवृत्त में परिणाम न
करने से भुजफल और कोटिफल नाम पडता है । इस परिणाम के लिये गणि-
ताध्याय में इसप्रकार अनुपात किया है-
निज्या : भुज्या : अंज्या मुलफल । ऐसही कोटि फल भी
सिद्ध होताहै।
नीचोधवृत्त भड्गि की रचना उक्त विधि के अनुमार करने से यों होती है ।
नीचोशवृत्तभङ्गि।
समग्र
k
गोलाध्याये। नीचोचमध्ये रचयेचरेखाम् ॥ २५ ॥ नीचोचवृत्ते भगणावितेऽस्मिन् मान्दे विलोम निजकेन्द्रगत्या। शैलेऽनुलोमं भ्रमति स्वतुङ्गा- दारभ्य मध्ययुचरो हि यस्मात् ॥ २६ ॥ अतो यथोक्तं मृदुशीघ्रकेन्द्र देयं निजोचायचरस्तदने। दोयोचरेखावधि खेटतःस्या- तिर्यस्थरेखावपि कोटिजीवा ॥ २७ ॥ प्रावत् कक्षावृत्तं चक्रांशाङ्कितं कृत्वा तत्र मध्यग्रहं च दत्ता ग्रहचिह्वेऽन्त्यफलज्या प्रमाणेनान्यवृत्तं लिखेत् । तन्नीचोचवत्त- संज्ञम् । अथ भूमध्यादग्रहोपरिगता रेखा किश्चिद्दीर्घा कार्या | सात्रोचरेखा । नीबोचवृत्ते भूमेर्द्वरतरे प्रदेशे रेखायुत रच्चं प्रकल्प्य- म् । आसन्ने रेखायुते नीचम् । नीचोचचिताभ्यां मत्स्यमुत्पाद्य ति- यंप्रेखा मध्ये कार्या । तस्मिन् वृत्ते केन्द्रगत्योचग्थानादारभ्य मध्य- ग्रहो भ्रमति। मान्दे विलोमं शैध्येऽनुलोमम् । अतः कारणान्मन्द केन्द्रमुच्चादिलोमं देयम् । शीघ्रकेन्द्रमनुलोमम् । तदने ग्रहः । अत्रापि ग्रहोचरेखान्तरे दोया ग्रहतिर्यग्रेखयोरन्तरे कोरिज्या। भापाभाष्य। कक्षावृत्तगव मध्यमह चिह को केन्द्र म नकर अन्त्यफलज्या व्यासार्थ से नी. चोगवृत्त करना । फिर भूमध्य से मध्यमह वक रेखा करना।भूमध्य से दूर इस रेग्याका जहां नीचोगवृत्त के साथ संयोग हो यहीं नीनोमवृत्त में उग्रस्थान मानना । और भासन्न प्रदेश में नीच स्थान की कल्पना करना । फिर याम्योसर-सा परके- राशियों से अद्वित करना । इस नीचोचन में "पेन्द्रगति से मध्यम प्रह छेद्यकाधिकारः। उपपत्ति । नीचोचवृत्त में फलसाधन की उपपत्ति इसप्रकार है । पृक स्फुटकोटि पृप कर्ण, 'ट' कक्षावृत्तगत स्फुट गह और टम फल है । पृम रेखा पर टन लम्ब करने से 'टन फलज्या होगी। फलज्या-फ, प्रतिवृत्चीय केन्द्र क,कर्ण=क, अन्त्यफलज्या स व स अंफ मुज्या क:पक % 3D त्रि: भुज्या अंफ: भुफ। इसलिये भुजफल- ",अप, पृटन और पृपक त्रिभुज सजातीय हैं। नि ... पूप : पक-पृट ; टन अथवा, नि: फ पकरत्रि ..फ3 क इस स्थिति में भुजफल को त्रिज्या से गुण कर. कर्ण का भागदेने से फलज्या के समान होता है। अंफxभुया परन्तु नि त्रि अफ भुज्या पक- - अंफ४ भुज्यार -फलज्या क क गोलाध्याये। इसकी विशेष विधि गणिताध्याय मे लिसी है । यहां सुगमता के लिये क्षेत्र दिसलाया गया है ॥ २४-२७ ।। इदानी कर्णानयनं फलं चाह- ये केन्द्रदो कोटिफले कृते ते नीचोचवृत्ते भुजकोटिजीवे। त्रिज्योदर्धतः कोरिगुणो मृगादौ कादिकेन्द्रे तदधो यतः स्यात् ॥ २८ ॥ अतस्तदैक्यान्तरमत्रकोटि- दोदोः फलं भूग्रहमध्यसूत्रम्। कर्णोऽथ मध्यग्रहकर्णमध्ये फलं धनणं तदिहोकवच ॥ २९ पूर्वार्द्ध सुगमम् । कक्षावृत्ते व्यासार्थ किल त्रिज्या । त्रिज्या ग्राहपरि कोटिफलं यतो मृगादी केन्द्रे भवति कादौ तु तदधः। अतस्तदेक्यान्तरं स्पष्टा कोटिः । तस्मिर व्यस्त्रे भुजफलमेव वाहुः । भूग्रहान्तरं कर्णः । दोः कोटिवगैक्यपदमिति प्रसिद्धम् । अत्रापि प्राग्वत् कक्षायत्ते कर्णसूत्रसक्ने स्फुटो ग्रहः । स्फुटमध्य- योरन्तरं फलमित्यादि। इति नीचोचवृत्तभङ्गिः।
छेद्यकाधिकारः। १२६ तस्य यथागोभ्रमादिपरीतो भ्रमःतत्र गौर किलापसव्यं भ्रमति । तदूर्धकाठं तथा भ्राम्यमाणमपि स्वाङ्गेन सव्यभ्रममुत्पादयति । एवं नीचोचवृत्ते भ्रमणं विपरीतमिव प्रतिभाति । शेपं स्पष्टम् । इति मिश्रभङ्गिः। प्रभा । मन्दोच्चतोऽग्रे इति । प्रतिमण्डले प्राक् पूर्वाभिमुखं वस्तुतः स्वगत्या गच्छन् ग्रहामन्दोच्चतो मन्दप्रतिवृत्तीयोचस्थानाद् अनुलोमें कक्षास्थराशिक्रममार्गेण निजकेन्द्रंगत्या अग्रे भ्रमति गच्छतीव भाति । शीघावशीघ्रप्रतिवृत्तीयोच्चस्थानात् विलोम कक्षारथराशिकमवैपरीत्येन निजकेन्द्रगत्या शीघ्रकेन्द्रगत्या गच्छतीव भाति । मन्दोच्चग्रहयोःप्राग्ग- मनादुच्चगतेरल्पत्वान्मन्दोच्चादन एव ग्रहोभवतीत्यनुलोमगमनभानम् । शीघ्रोच्चगतेरधिकत्वाच्छीघ्रोच्चात्पश्चादेव ग्रहो भवतीति विलोमगमन- मानम् तस्य प्रतिवृत्तस्थग्रहम्यानुलोमप्रतिलोमयाने नीचोचवृत्चे पुनर- न्यथा वैपरीत्येन भवतः।मन्दप्रतिवृत्तीयानुलोमगतं विलोमं तथा शीघ्र प्रतिवृत्तीयविलोमगमनमत्रानुलोमं भवतीति भावः शेष स्फुटम् ॥ भाषाभाष्य । । प्रतिमण्डल में मन्दोच्च से पूर्व दिशा में निज केन्द्र गति द्वारा प्रह अनुलोम मण करता है । और शीघ्रोच्च से विलोम भ्रमण करता हुआ मालूम पड़ता है पोंकि पीछे को हटा रहता है । नीचोच वृच में प्रतिमण्डलीय ग्रह की वह नुलोम और विलोम गति विपरीत होती है । उसमे एफ प्रह गति है दूसरा तेभान (गति का आभास ) विद्वानों ने फलोपपत्ति के लिये यह क्ल्पना की 1 नीचोच्च वृत्त और प्रतिवृत्त भनि को एकर लिगने से दोनों वृत्चों के संपात न्दु मे प्रह अवश्य हुआ करताहै। जमे रेलयन्न में वृपम जिस दिशा में भ्रमण ।
गोलाध्याये के होता है । यह निधि प्रतिवृत्तीय फलानयन के अनुसार है । प्राचार्य गणिताध्याय में फलानयन की रीति लिसी है । २८ । २६ ।। अथ मिश्रभङ्गिमाह- मन्दोचतोऽग्रे प्रतिमण्डले पार ग्रहोऽनुलोम निनकेन्द्रगत्या। शीघ्रादिलोम भ्रमतीव भाति विलम्बितः पृष्ठत एव यस्मात् ॥ ३० ॥ नीचोच्चवृत्ते पुनरन्यथा ते तस्यानुलोमप्रतिलोमयाने। एकागतिः सा प्रतिभानमन्यत् प्राज्ञैः फलार्थ प्रविकल्पितं तत् ॥ ३१॥ भङ्गिदयं चेल्लिखितं विमिश्रं वृत्तदयेऽप्यत्र यथोक्तदत्तः। नीचोचवृत्तप्रतिवृत्तयोगे भ्रमत्यवश्य शुचरस्तदानीम् ॥ ३२ ॥ यथा भवेलिकयन्त्रमध्ये काष्ठभ्रमो गोभ्रमतो विलोमः। नीचोचवृत्तभ्रमणं तथान्यत् स्याद्गच्छतोऽपि प्रतिमण्डलेन ॥३३॥ ग्रहः पूर्वगत्या प्रतिमण्डलेनैव भ्रमति । यदेतन्नीचोचवृत्त त- सा गणकैः फलार्थ कल्पितम् । तत्र प्रतिमण्डलगतेविलोम ग्रहो गच्चन्निव प्रतिभाति । कयं तत्र विलोमगतिः प्रतिभाति । तत्र दृष्टान्तः। यथा तेलिकयन्त्रमध्ये तिलपीडनार्थमूर्धकाटं प्रतिप्यते।
छेद्यकाधिकारः। तवृतौ शीघ्रनीचोचमध्यं तथा शीघ्रनीचोचवृत्ते स्फुटः खेचरः॥ ३४॥ शीघ्रनीचोचवृत्तस्य मध्यस्थिति ज्ञातुमादौ कृतं कर्म मान्दं ततः। खेटवोधायशैघय मिथः संश्रिते मान्दशैघ्रये हि तेनासकृत् साधिते ॥ ३५ ॥ नीचोचवृत्तभङ्गिपर्यालोचनयैवं परिणमतीति स्पष्टार्थम् । प्रभा । मध्यगत्येत्यादि । मध्यगत्या मध्यमकक्षावृत्ते ग्रहो गच्छेदिति क. ल्पना । यस्मात्मन्दनीचोच्चवृत्तस्य कक्षावृत्तीयमध्यग्रहचिह्नमध्यं केन्द्र स्यात् । तथा तवृत्तौ मन्दश्रुतिसक्तकक्षावृत्तपरिधिप्रदेशे मन्दस्फुटन- हस्थाने शीधनीचोचवृत्तमध्यं भवेत् । शीघ्रनीचोच्चवृत्चे मन्दस्पष्टग्रहदा- नेन यतस्थानं तत्ररफुटो विम्बात्मकोग्रहः। कक्षामण्डले शीघ्रनीचोच्च- त्तस्य मध्यस्थिति केन्द्रावस्थानं ज्ञातुंप्रथमं मान्दकर्म मध्यग्रहे कृतम् । ततः खेटबोधाय मन्दस्पष्टे शैवयं कर्मेति । हि यस्मात् मान्दशैघ्रयेफले मिथः संश्रिते अन्योन्याश्रिते तेन ते फले असकृदनेकवारंसाधिते ॥ भापामाप्य। मन्दनीचोच वृत्त का केन्द्र कक्षावृत्त में होने से ग्रह अपनी गति से उसी वृत्तमें भ्रमण करता है । शीघ्रनीचोच वृत्त का फेन्द्र कक्षावृच (जिस निन्दु में मन्दकर्ण कक्षावृत्त को काटता है ) में रहता है और उसीवृत्त में स्पष्टमह भ्रमण करताहै। शीधनीचोच्चवृत्त के केन्द्र स्थिति ज्ञानार्थ प्रथम मन्दफल का संस्कार किया गया है। इसप्रकार मन्द और शीघ्रफल के परस्पर संबद्ध होने से स्पष्टीकरण में असत्कर्म कियागया है। तात्पर्य यह है कि शात्रफल मन्दस्पष्ट ग्रह के अधीन है और मन्दस्पष्ट मन्द 4 what . गोलाध्याये करता है उससे विपरीत दिशा में पाठ का स्वाङ्ग भ्रमण होता है उसी प्रकार नीचोचवृत्त और प्रतिवृत्त का भ्रमण आपस में मालूम पड़ता उपपत्ति। नीचोच वृत्त और प्रतिवृत्तभङ्गि को एकत्र करने से जो क्षेत्र बनता है उसको मिश्रमणि कहते हैं । उक्त विधि से निर्माण करने से उसका आकार इसप्रकार होता है ।। ३० । ३३ ॥ मिनभङ्गि। प्रतिशत कक्षाहत फोल्पा इदानी मन्दशीघ्रकर्मदयेन स्फुटत्वे कारणमाह- मध्यगत्वा स्वकक्षास्यवृत्ते ब्रजेन्- मन्दनीचोचवृत्तस्य मध्यं यतः।
छेद्यकाधिकारः। मागच्छतीति ब्रह्मगुप्तमतम् । अथ यद्येवं परिधः कर्णेन स्फुटत्वं तर्हि किं शीघ्रकर्मणि न कृतमित्याशय चतुर्वेद आह । ब्रह्मगुप्तेनान्येषां प्रतारणपरमिदमुक्तमित्यादि । तदसत् । चले कर्म- णीत्थं किं न कृतमिति नाशङ्कनीयम् । यतः फलवासना वि- चित्रा शुक्रस्यान्यथा परिधः स्फुटत्वं भौमस्यान्यथा तथा किं न वुधादीनामिति नाशक यम् । अतो ब्रह्मोक्तिस्त्र सुन्दरी। भापाभाप्य। किसी प्राचार्य का मत है कि स्वल्पान्तर होने से मन्दफलानयन में कर्णानुपात नहीं कियागया। किसी का मत है कि मन्दनीचोच्चपरिधि, कर्ण से गुणकर त्रिज्या का भाग देने से स्पष्ट होती है । इसलिये पुन. यदि कर्णानुपात कियाजाय तो भी फल पूर्व तुल्यही सिद्ध होताहै । इसकारण कर्णानुपात नहीं किया । शीघ्रफल साधन में यह विधि क्यों न कीगई । यह शङ्का न करनी चाहिये, क्योंकि प्रत्येक ग्रहों की फलोपपत्ति भिन्न है ।। उपपत्ति । मन्दनीचोचवृत्त परिधि कर्णानुसार बदला करती है । उस स्थिति में दोनों का सम्वन्ध समानही रहता है । मन्दनीचोचपरिधि गणिताध्याय में जो लिखी है वह मध्यम अर्थात् त्रिज्यातुल्य कर्ण में है । इसकारण पहिले परिधि का स्पष्टी- करण कर्णानुसार होना आवश्यक है । क्योकि पुनः कर्ण घटा यदा करता मन्द फल का साधन करना उचित है परन्तु फर्णानुपात करने पर भी फल में भेद नहीं होता यह प्राचार्य ब्रह्मगुप्त का मत है + { । है , + आचार्य ब्रह्मगध का श्लोक यह है-~- 'त्रिच्याभक्त परिधि पंगुको बाहुकोटिगुणकारा । अप्समादे तत्कलमाद्यसम नात्र कर्णोऽरमात् ॥ भापतिका भी क्थन है- 'त्रिज्यागुष श्रुतिहत परिधिर्यतादो काट्योगुणामृदुफलानयनेप्सहयात् । स्थामन्दमाद्यसममेव पल दश कर कृतान मृकर्मपि तन्यारे ।
N गोलाध्याये फल बिना नहीं होता इसलिये दोनों फलों का परस्परमें सम्बन्ध है । इसलिये प्रथम मन्दस्पष्ट को ही स्पष्ट मानकर उससे मन्द फलका साधन करके गणितागत मध्यप्रद में संस्कार करके मन्दस्पष्ट सिद्ध किया पुनः शीघ्र फल सिद्ध करके स्पष्ट कियागया है यो बार बार करने पर अन्तर निवृत्त होजाता है ॥ ३४ ॥ ३५ ॥ इदानीं मन्दकर्मणि कर्णः किं न कृत इत्याशङ्कयोत्तरमाह- स्वल्पान्तरत्वान्मृदुकर्मणीह कर्णः कृतो नेति वदन्ति केचित् । त्रिज्योद्धतः कर्णगुणः कृतेऽपि कर्णे स्फुट स्यात्परिधिर्यतोत्र ॥३६॥ सेनाद्यतुल्यं फलमेति यस्मात् कर्णःकृतो नेति च केचिदूचुः। नाशकनीयं न चले किमित्य यतो विचित्रा फलवासनात्र ।। ३७॥ इह कर्णेन यत्फलमानीयते तदेव समीचीनम् । यन्मन्दकर्मणि कर्णोन कृतस्तत्स्वल्पान्तरत्वात् । मन्दफलानि हि स्वल्पानि भ. वन्ति । तदन्तरं चाति स्वल्पमिति केपांचित् पक्षः । ब्रह्मगुप्तोऽत्र कारणमाह । त्रिज्याभक्तः परिधिः कर्णगुण इत्यादि । मन्दकर्मणि मन्दकर्णतुल्येन व्यासार्धन यदृत्तमुत्पद्यते तत्कक्षामण्डलम् । तेन ग्रहो गच्छति । यो मन्दपरिधिः पाठपठितः स त्रिज्यापरिणतः । अतोऽसौ कर्णव्यासार्धे परिणाम्यते। ततोऽनुपातः। यदि त्रिज्या- वृत्तेऽयं परिधिस्तदा कर्णवृत्ते के इति । अत्र परिधेः काँगुणस्त्रि ज्या हरः। एवं स्फुटपरिधिस्तेनदो गुण्या भांशे ३६० भाज्या। ततस्त्रिज्यया गुण्या कर्णन भाज्या । एवं सति त्रिज्यातुल्ययोः कर्णतुल्ययोश्च गुणहरयोस्तुल्यत्वान्नाशे कृते पूर्वफ्लतुल्यमेव फल छेद्यकाधिकार मत देखता है उस स्थान में भूपृष्टगत द्रष्टा नहीं देखता । और मध्याह्न में दोनों द्रष्टा समान ही देखते हैं। इस लिये नतकर्म कहा गया है। लम्बन साधन में उसकी जो युक्ति कही है वही यहां पर भी जाननी चाहिये ॥ ३८ ॥ इदानीं गतिफलाभावस्थानमाह: कक्षामध्यगतिर्यग्रेखाप्रतिवृत्तसंपाते मध्यैव गतिः स्पष्टा परं फलं तत्र खेटस्य ।। ३६ ॥ कशोवृत्तमध्ये या तिर्यग्रेखा तस्याः प्रतिवृत्तस्य च यः संपात- स्तत्र मव्येव गतिः स्पष्टा । गतिफलाभावात् ।.किं च तत्र ग्रह- स्य परमं फलं स्यात् । यत्र ग्रहस्य परमं फलं तत्रैव गतिफलाभावेन भवितव्यम् । यतोऽद्यतनश्वस्तनग्रहयोरन्तरं गतिः। फलयोरन्तरं गतिफलम् । ग्रहस्य गते; फलाभावस्थानमेव धनर्णसंधिः । य पुनर्लल्लोक्तम्- मध्यैव गतिः स्पष्टा वृत्तद्वययोगगे ह्युचरे । इति । तदसत् । नहि वृत्तदययोगे ग्रहस्य परमं फलम् । भाषाभाष्य। कक्षावृत्तगत याम्योत्तर रेखा और प्रतिवृत्त का जिस निन्दु में संपात होता है वहां मध्यगति ही स्पष्टगति होती है। और वहीं पर प्रहका परमफल भी होताहै ।। उपपत्ति । 'लल्ल श्रीपति आदि प्राचीन श्राचार्यों का मत है कि कक्षावृत्त और प्रतिवृत्त के संपात बिन्दुपर ग्रहों को स्पष्ट और मध्यमगति समान होती है और वही परम- फल भी होता है । परन्तु भारसराचार्य इसका प्रतिवाद करके निश्चित करते हैं कि पक्षावृत्तगत-याम्योसर रेग्या और प्रतिवृत्त का जहां संपास होता है वहीं परम फल और मभ्यगति ही स्पष्टगति होती है। वर्तमान और गत दिन सम्बन्धि प्रह का अन्वरं उसकी गति के समान होता है। और फलों का अन्तर गविफल के तुल्य होता है । इमप्रकार यदि सूर्योदय काल में एक दो दिन सम्बन्धि प्रहों का मध्यम स्थान कम से पर, पर, प३ इत्यादि कल्पना फिया जार और प्रहकी गोलाध्याये १४४ मध्यपर्क नि स्पष्टनीचोयवृत्तगत भुजफल-त्रि . जैसा, नि : मध्यप-कर्ण : स्पप,.. पप" मपxकदोर्ध्या ३६० त्रिज्यावृत्तगत फल मपxकदोा त्रि मपxदोया .X "यह कर्णानु- त्रि पातन करके साधित भुज फल के समान है, इस लिये मन्दफल साधन में कर्णा. नुपात नहीं किया । ब्रह्मसिद्धान्त के भाष्यकार चतुर्वेदाचार्य ने लिसा है कि ब्रह्मगुप्त का यह मत प्रतारणार्थ है। क्योंकि शीघ्र फलके साधन में कर्णानुपात नहीं किया। परन्तु भास्कराचार्य के मत से ब्रह्मगुप्त की कल्पना बहुत उत्तम है ।। ३६ । ३७ ॥ इदानी नतकर्मवासनामाह। * प्राक् पश्चात् प्रतिमण्डलस्थखचरं द्रष्टा कुमध्यस्थितः कक्षायां खलु यत्र पश्यति नतं नो तत्र भूपृष्टगः। मध्याह्ने तु कुमध्यपृष्ठगनरौ तुल्यं यतः पश्यत- स्तेनोक्तं नतकर्मलम्बनविधौ या युक्तिस्त्रापि सा ॥ ३८॥ स्पष्टम्। प्रभा। कुमध्यस्थितो द्रष्टाप्रतिमण्डलस्थखचरं प्राक् पश्चात् नतंयत्र खलुः पश्यति तत्र भूपृष्ठगो द्रष्टा तंग्रहं नतं न पश्यति । मध्याह्नेतूभावपि द्रष्टारौ दृक्सूत्रयोरैक्यात्सम पश्यतस्तेन कारणालम्बनविधौ नतको कम् । तत्र या युक्तिरभिहिता सैवात्रापि चोध्येत्यर्थः । भापाभाय। भूमध्यगत द्रष्टा प्रतिचगत प्रहको कक्षा में जिस स्थान में पूर्व किंवा पश्चि * बहुतों का मत है कि भारतराचार्य ने गणितान्याय म जानतकर्म लिखा है उमा माय : श्लोर का सम्मध न होने से यह से है ॥
छेद्यकाधिकारः। भाषाभाष्य। वंश शलाकाओं से प्रतिमण्डलादि वृत्त बनाकर उच्च और प्रहको अति करके .महकी क्रियादि गतियोंको ज्योतिपी दिखलाये। उपपत्ति। उक्त नियमके अनुसार यदि उच्च और ग्रहों में विपर्यास मालूम पड़े तो ग्रहों की गति वक्रमानुसार होगी जय ग्रह अथ रेया में अाले, द अह अपये उच्च स्थान में होगा। और जब क, के के में हो उस समय नीचगत होगा और जब ब ब इत्यादि में हो तव स्थिर होगा और जिस समय व क के ऊपर के चाप में ग्रह होगा तब उसकी गति सीधी होने से शीघ मालूम होगी । और 4 क नीचे के पाप में जब हो सब उसकी वक्रगदि दिसलाई देवी है ॥ ४० ॥ वक्रभागि।
१४६ "गोलाध्याये अपने उस स्थान अथवा नीच से गति फल्पना फरफे फ., फर, फर इत्यादि फल कल्पना किया जाय। तय, म.tफर, प.1फ., प.1फर, ये प्रहों के स्पष्ट स्थान होंगे। .प.-प, 1(फ.-फ. २ प.-प. (फ..-फा); इसप्रकार क्रमसे तीनों दिनोंकी स्पष्टगति सिद्ध होगी। श्रय स्पष्ट और मध्यम गतिके अन्तरको गतिफल कहते हैं। इस लिये गतिफलके अभाव में- प.-प, पर-प, इत्यादि स्पष्टगति के भाग होंगे जोकि मध्यमगति के समान है । और शेष भाग फ,-फर, फ३-फ, इत्यादि गतिफल होंगे । जोकि क्रम से दो दिनके फलों का अन्तररूप है । इसप्रकार यह स्पष्ट है कि गतिफल फलके आश्रय पर है । परन्तु जब फल का मान बढ़ता है उस समय गतिफल घटता है इसलिये जब फल परम होताहै तय गतिफल का अभाव होजाता है । उस स्थिति में कक्षावृत्त गत याम्योत्तर रेखा जिस बिन्दुमें प्रतिवृत्तके साथ संपात करती है (देखो प्रतिवृत्तभनि ) वहां गतिफल शून्य होता है और उसी स्थान में मध्यम और स्पष्टगति आपस में समान होती हैं । यही भास्कराचार्य का मत है । दूसरो फा मत भ्रमपूर्ण है ॥ ३६॥ इदानीं ग्रहस्य वक्रत्वं छेद्यके यथा शीघ्रं दृश्यते तदर्थमाह- वंशोदवाभिः प्रतिमण्डलायं. कृत्वा शलाकाभिरिदं यथोक्तम् । प्रचाल्य तुझंखचरं च गत्या चक्रादि सर्व खलु दर्शयेद् द्राक् ॥ ४०॥ वंशशलाकाभिश्छेद्यकं कृत्वा तत्राद्यतनस्फुटग्रहस्थानं चि. यित्वा द्वितीयदिन उच्चं ग्रहं चोनवशान्मेपादि च प्रकल्प्यान्यन् स्फुटग्रहस्थानं चिढ्यम् । तत्पूर्वचिह्नायदि पृटगतं तदा वका गतिया। - A १४६ छेद्यकाधिकारः। प्रभा। तत्फले भुजांशफल इत्यर्थः । ऋणे सति मध्यमार्कोदयात्रफुटा- कॊदयः प्राक् पूर्वमेव भवति । एवं स्खे धने तस्मात्कालादनन्तरमस्माद् भुजांशफलसम्बन्धि फलं क्षयःवं वा ग्रहे युक्तियुक्त सयुक्तिक निरुक्तं प्रतिपादितमस्तीत्यर्थः-1 भापाभाप्य। भुजांशफल ऋण होनेपर मध्यम सूर्योदय के पहिले और धन होनेपर याद स्पष्ट सूर्योदय होताहै । इस लिये भुजांशफलसम्बन्धि असुओं का प्रह में ऋण, धन संस्कार ठीक कहागया है। उपपत्ति इस विधिकी उपपत्ति श्राचार्य ने गणिताध्याय में लिखी है । ये भुजांशफल सम्बन्धि असुकाल समीकरण के उस भागके तुल्य हैं जो सूर्यको क्रान्तिवृत्त में अतुल्यगति से उत्पन्न होताहै ॥ ४३ ॥ इदानीं छेद्यकोपसंहारेण गणकप्रज्ञा-वर्णयन्नाह- ये दर्भगर्भाग्रधियोऽत्र तेपां स्याच्छेद्यकार्थः परमाणुरूपः। येऽन्ये जडाः कुण्ठधियश्च तेपां स्यादिन्द्रवज्राहतपक्षतुल्यः ॥ १४ ॥ इन्द्रवजाहतपक्षः पर्वतस्तत्तुल्यच्छेद्यकार्यों जडानाम् । इन्द्रवज्रा छन्दश्च सूचितम् । शेपं स्पष्टम् । इति श्रीभास्करीयेगोलभाष्येमिताक्षरेस्फुटगतिवासनायां छेद्यकाधिकारः। प्रत्र ग्रन्यसंख्या २४० प्रभा। दर्भगर्भागवडीमतिर्यपांत कुशाग्रबुद्धयः । तेषां कृने देद्यरुपए- चोऽत्यन्तंन्द्रभूतः । भन्येपा तुं इन्द्रवजाहतपक्षनुल्यः इन्द्रवजया- .. गोलाध्याये इदानीं केन्द्रसंज्ञा स्फुटकक्षां चाह- वृत्तस्य मध्यं किल केन्द्रमुक्तं केन्द्र ग्रहोचान्तरमुच्यतेऽतः। यतोऽन्तरे तावति तङ्गदेशा- नीचोचवृत्तस्य सदैव केन्द्रम् ॥ ४१ ॥ ग्रहस्य कक्षा चलकर्णनिती स्फुटा भवेदव्यासदलेन भक्ता। तदयासखण्डान्तरित कुमध्यात् स भ्राम्यते हि प्रवहानिलेन ॥ १२॥ .श्लोकदयमपि स्पष्टम्। प्रभा। वृत्तरय मध्यमित्यादि स्फुटम् । चलकर्णः स्वशीप्रवर्णरतेन तरयाः स्फुटयक्षाया यव्यासखण्ड नियातनान्तरितः। মাথাব। गृत गभ्यफो केन्द्र पहते हैं। इसीलिये मह और उमफे अन्तरपो भी पेट पहने हैं ।पयोंकि उधम पेन्द्र मूल्य अन्तर पर नीचोगा पेन्द्र राहणार पादक मा को शीशा में गुफर ग्रिण्याचा भाग ने पद होती है। ममि से मध्यम शुटपाल के ज्यागा गमान दूरीपर प्रपदानितळाग प्र६ भ्रमण करने ६॥४॥४॥ इदानीं भुजान्तरकपिपत्तिमाह-- मध्यमार्कांदयात्माकम्फुटाकदियः स्थाहणे तरुले स्ये यनोऽनन्तरम् । तेन भाम्बतलोत्यासुजातं वयः खं फलं गुम्ति निरहं ग्रहे ॥१३॥ स्पष्टं म्फुटगतो व्यात्यात च।
गोलबन्धाधिकारः। १५१ आदौ सारदास्मयीं यष्टिं कृत्वा तदर्धस्थाने तत्र प्रोतां पृथ्वी सूक्ष्मां शिथिलां च विधायं तस्या बहिश्चन्द्रादीनां गोलान् यष्टश्या सह दृढान् बघ्नीयात् । तेषां वहिर्नलिकासंस्थौ खहग्गोलाविति साधारण्येनोक्तम् ॥ प्रभा। कधीमत्रकाम् । पृथ्वी सूक्ष्माम् । आरो भौमः । नलिकाश्रितो खगोलमोलौ बनीयात् । गएक इति शेषः शेपं व्यक्तमेव । भाषाभाष्य। सरल, सुदृढ़ काष्ठ की ध्रुवयष्टि बनाकर उसके मध्यभाग में पृथ्वी की कल्पना करना ( यह भूगोल इसप्रकार ध्रुनयष्टि मे होना चाहिये जिसमे उस काल में गोल घूम सकै ) उसके बाहर क्रम से.चन्द्र, युध, शुक्र, रवि, मङ्गल, बृहस्पति और शनि गोल दृढ़ता से वांधना । उसके ऊपर नलिका अर्यात् भुवयष्टि से सम्बन्ध खगोल और दृग्गोल अलग २ बांधना चाहिये * ॥२॥ इदानीं सविशेपमाह- पूर्वापरं विरचयेत् सममण्डलायं याम्योत्तरं च विदिशोर्वलयदयं च । ऊर्वाध एवमिहत्तचतुष्कमेत-. दावेष्ट्य तिर्यगपरं क्षितिजं तदर्धे ।। ३ ।। एकं पूर्वीपरमन्यद्याम्योतरं तथा कोणवृत्तदयमेव वृत्तचतुष्टयमू- *स्थिर नवनोंके गोलको यहापर भगोल कहते है। यह भगोल प्रत्येक अहोका अलग न मानर सब ग्रहोंके लिये एकही मान लियागया है। इस भगोल में क्रान्तिवृत्त, विषुववृत्त, अहोरात्रवृत्तं श्रादि की कल्पना है जोकि अस्थिरवृत्त है । इसकारण यह भगोल ध्रुवनलिका में दृदना से याशगया है । जिसमें भूमतीहुई कीलये सहारे यह भी भूमै । इस गोलके बाद सगोल है। इसमें समाएडल, मन्यावृत्त, रिति- जात यादि जोरि स्थानीय अतांश के अनुसार स्थिर रहते हैं, उनकी कल्पना कीगई है। इसप्रकार रंगोल और खगोलको अलग अलग स्थिर करके एक तीसरा दृग्गोलकी भीकन्यना दीगई है। इसमें भगोल और खगोल ये वृत्त बारस में मिलहुये रहते है इस दृग्गोश में उक्त दोनों गोलों के संयोगसे जो गोलीय HT उत्पन्न होते है, रेसष्ट प्रतीत होते है। -- - गोलाघ्याये हतौ पनी यस्य सः पर्वत इत्यर्थः । पुरा सपक्षाः पर्वता श्रासन् शचौर्शन पक्षहीना:कृताः इति पौराणिकी गाथा। ' इति प्रभायां देद्यकाधिकारः। भापाभाप्य। जो पुशामधुद्धि पुगप है उनके लिये देयकविषय परमाणु के समान शुद्र है। और जो जद फुएटमति है उनको पर्वत के समान है। ॥ १४ ॥ देपकाधिकार समाप्त दुथा। इदानीं गोलबन्धाधिकारमाह- सुसरलवंशशलाकावलयः श्लपणेः सचक्रभागा । रचयबोल गोले शिल्पे चानल्पनेपुणो गणकः॥ १ ॥ स्पष्टम् ॥
गोलवन्धारिकारः।
१५३
प्रभा।
-
स्फुटार्थोऽयं श्लोकः पूर्वापरोधिोभागेषु वृत्तसंपातबिन्दवःपूर्वा-
दिस्वस्तिकपदेन परिभाष्यन्ते।
भाषाभाष्य।
पूर्व और पश्चिम संपात में गयाहुआ, खस्वस्तिकसे स्वदेशाक्षाशके तुल्य दक्षिण
दिशा में मुका और उसी प्रमाण से गोलके नीचले भागमें उत्तरकी तरफ झुका हुआ
साठ पड़ी से अङ्कित करके नाडीवलय को ज्योतिपी यनाने ।। ५ ।।
इदानीं दृड्मण्डलमाह-
ऊर्ध्वाधरस्वस्तिककीलयुग्मे
प्रोतं श्लथं दृग्वलयं तदन्तः।
कृत्वा परिभ्राम्य च तत्र तत्र
नेयं ग्रहो गच्छति यत्र यत्र ॥ ६ ॥
खस्वस्तिके चाधास्वस्तिके चान्तःकीलको कृत्वा तयोः प्रोतं
श्लथं दृग्वलयं कार्यम् । तत्तु पूर्ववृत्तेभ्यः किश्चिन्न्यूनं कार्यम् ।
यथा खगोलान्तर्धमति । यद्येक एव ग्रहगोलस्तदैकमेव दृड्म-
ण्डलम् । यो यो ग्रहो यत्र यत्रं वर्तते तस्य तस्योपरीदमेव परि-
भ्राम्य विन्यस्य हरज्याशवादिकं दर्शनीयम् । अथवा पृथक् पृथ-
गष्टो दृड्मण्डलानि रचयेत् । तत्राष्टमं वित्रिभलग्नस्य । तच
हक्क्षेपमण्डलम् ।
प्रभा।
स्पष्टम् ।
भापाभाय ।
अर्थ और अध स्वस्तिक के कीलों में ढीला पोयाहुआ मण्डल होता है ।
यह वृत्त उक्त सब वृत्तों के भीतर होता है और घुमाकर जहा जहा प्रविम्ब होता
है वहा वहां लाया जाता है ॥ ६ ॥
भापामाप्य। ઉપર गोलाध्याये धिोरुपमावेष्टय तदर्धे वृत्तं क्षितिजाख्यं निवेशयेत् । अत्र याम्यो- तरवृत्त उत्ताक्षितिजादुपरि पलांशान्तर एकं ध्रुवचिह्न कार्यम् । दक्षिणक्षितिजादधोऽन्यत। पूर्व-पश्चिम दिशामें सममण्डल और दक्षिण-उत्तर दिशा में याम्योत्तर वृत्त और विदिशाओं में दो वृत्त उपर नीचे के क्रमसे करना । इसप्रकार चार वृत्त करके सरके आधे पर क्षितिजवृत्तको कल्पना करनी ॥३॥ इदानीमुन्मण्डलमाह- पूर्वीपरक्षितिजसङ्गमयोर्विलरनं याम्ये ध्रुवे पललवैःक्षितिजादधःस्थे । सौम्ये कुजादुपरि चाक्षलवैधुवेत- दुन्मण्डलं दिननिशोझयवृद्धिकारि ॥ ४॥ समवृत्तक्षितिजयोर्यो पूर्वापरो संपातौं तयोर्भुवयोश्च स.. वध्यते तदुन्मण्डलसंज्ञम् । दिनराभ्योद्धिक्षयो तदशेन.भवतः । भापामाप्य । पूर्वापर और क्षितिज रेखामें सक्त, दक्षिण ध्रुव की तरफ स्यदेशाशांशके से मान हितिज से नीचे, और उत्तर भर में उसी प्रकार ऊंचे गया हुधा उन्मएडर पृत्त बनाना । यह उन्मण्डल दिन-रातिके घटती, बढ़तीश पारण है ॥४॥ इदानीं विपुवन्मण्डलमाह- पर्वापरम्वस्तिकयोर्विलतं. खस्वस्तिकादशिणतोनभागे। अपश्च तेरुत्तरतोहितंच पटव्यात्र नाडीवलयं विदध्यात् ॥५॥ तयोरेव पूर्वापरसंपातयोविलग्नं तथा याम्योत्तरवृत्ते खस्वस्ति कादक्षिणतोऽयः स्वस्तिकादुत्तरतोऽशान्तरे यवृत्तं निवघ्यने तदिपुवदत्तम् । "" - गालवन्धाधिकारः। १५५ खगोलवृत्तैर्वक्ष्यमाणैर्भगोलवृत्तैः क्रान्तिविमण्डलायुर्यो निबध्यते स दृग्गोलः । कथमस्य दृग्गोलसंजेति तदर्थमाह । दिगोलजा- तमित्यादि । यतोऽयाकुज्यासमशङ्काद्यक्षेत्राणि दिगोलजा- तानि । भगोलवृत्तैः खगोलवृत्तमिलितेस्तान्युत्पद्यन्ते । मिन्नगो- लवन्धे सम्यइनोपलभ्यन्त इति दृग्गोलः कृतः। इति खगोलदृग्गोलबन्धौ । प्रभा । बड्डा खगोल इत्यादि स्फुटम् । दृग्गोलोऽयमक्षक्षेत्रादिज्ञानार्थम- त्यन्तोपयुक्तः । अत्रान्तर्विविधसूत्रसत्वाद् दृड्मएडलं बहिनिवेश्यम् । भाषाभाष्य । - गोल के दोनों ध्रुवों में दो नलिफाएं यांधकर उस के आधार पर, खगोल के बाहर, सुग्गोल की रचना करना चाहिए। खगोल में क्रान्तिवृत्त, विमण्डल आदि भगोलीयपत्तों से जो गोल यांधा जाता है वह दृग्गोम कहलाता है । दोनों गोल की क्षेत्रस्यिति दिसलाई देने से इसको दृग्गोल कहते हैं+ || - 18 इदानीं भगोलबन्धमाह- याम्योत्तरक्षितिनवत्सुदृढं विदध्या- दाधारवृत्तयुगलं. ध्रुवयष्टिवद्धम् । पष्ट पद्दमत्र सममण्डलवसृतीयं नाड्याह्वयं च विपुवदलयं तदेव ॥ १० ॥ यथा खगोले तितिमं याम्योत्तर च तदाकारमपरमाधारवृत्त-. दयं ध्रुवयष्टिस्थं कृत्वा तदुपर्यन्यत्तृतीयं सममण्डलाकारं घटी. पष्ट्या चाङ्कितं कार्यम् । तन्नाडीवृत्तं विषुववृत्तसंजं च । + परपर इम रिकार के दूसरे साल की टिपरी देखनी सीर।
गोलाध्याये अथ विशेपमाह- ज्ञेयं तदेवाखिलखेचराणां पृथक् पृथग्वा रचयेत्तथाष्टौ। दृमण्डलं वित्रिभलग्नकस्य दृक्क्षेपवृत्तास्यमिदं वदन्ति ॥ ७॥ व्याख्यातमेवेदम्। प्रभा। लम्बनादिसाधनार्थ दृमण्डलस्य दृक्क्षेपमण्डलमिति विशेष- संक्षाकरणम्। भाषाभाष्य । , इस एकही इमण्डल को सब प्रहों के लिए समझना चाहिए । अथवा अलग अलग आठ मण्डल बनाए जायँ, सात ग्रहों के लिए और आठवां चित्रिभलग्न के लिए । वित्रिभलग्न के दृमण्डल को दृक्क्षेपमण्डल कहते हैं ॥ ७ ॥ इदानीमेवं खगोलमुक्त्वा दृग्गोलमाह- बद्धा खगोले नलिकादयं च ध्रुवदये तन्नलिकास्थमेव । बहिः खगोलादिदधीत धीमान दृग्गोलमेवं किल वक्ष्यमाणम् ॥८॥ भर्गालवृत्तः सहितः खगोलो दृग्गोलसंज्ञोऽपममण्डलाद्यैः । दिगोलजातं खलु दृश्यतेऽत्र क्षेत्रं हि दृग्गोलमतो बदन्ति ।।. तस्मिन खगोले ध्रुवचिह्नयोर्नलिकादयं बद्धा तन्नलिकाधार- मेव खगोलाबहिरङ्गुलत्रयान्तरे दृग्गोलं रचयेत् । कथितः
गोलबन्याधिकारः।
कान्तिपात और ग्रहों के पष्ट विक्षेपपात विलोम भ्रमण करते हैं। इनके स्थान
भी इसी में अङ्कित करना चाहिए ॥ १ ॥
इदानी क्रान्तिात्तस्य निवेशनमाह
कान्तिपाते च पातादण्ट्वान्तरे
नाडिकावृत्तलग्नं विदध्यादिदम् ।
पाततः प्राक् त्रिभे सिद्धभागेरुदग-
दक्षिणे तैश्च भागैविभागेऽपरे ॥ १२ ॥
क्रान्तिपातचिह्नात् पट्भेऽन्तरेऽन्यच्चि कार्यम् । ते चिते ना-
सोवृत्तेन संसक्ते कृत्वा पातचिहादग्रतस्त्रिभेऽन्तरे नाडीवृत्ताद्भागच-
तुर्विशत्योत्तरतो यथा भवत्यपरविभागे त्रिभेऽन्तरे दक्षिणतश्च
तैर्भागैर्यथाभवति तथा वस्नीयात् ।
प्रभा।
स्फुटार्योऽयं श्लोकः । सिद्धभागपदं परमकान्त्यंशोपलक्षकं तेन
पदा यावती परमकान्तिरुपलभ्यते तदा तावत्येव ग्राह्येति तत्त्वम् ।
भापामाप्य।
क्रान्तिपात-निह से छ राशि के अन्तर पर दूमरा चिह्न करना, वे नाहीवृत्त के
मलान, ऐते.हिए..पातचित मे.तीन.गशि.की.दीश पारे नागरपिास,
अंश उत्तर हटाकर, इसी प्रकार पश्चिम तरफ दक्षिण दिशा में उतने ही यश की
दुर्ग पर कान्तिपृत्व को पावन । (गोल देसो ) ॥ १० ॥
इदानीं विमण्डलमाह-
नाडिकामएटले कान्तिवृत्तं यथा
कान्तिात्ते तथा क्षेपवृत्तं न्यसेत् ।
क्षेपवृत्तं तु राश्यसितं तत्र च
क्षेपपातेपु चिहानि कृत्वोतमत् ॥ १३ ॥
है १५.६ गोलाध्याये प्रभा। स्फुटार्थोऽयं श्लोकः । विपुबहलयं निरक्षपूर्वापरशब्देनापि परि- भाष्यते । भापाभाप्प। चाम्योत्तरवृत्त और हित जपूत के समान ध्रुवयष्टि-सभ्यद्ध दो आधारयुप्त रचना करना । सममएहरा की भाति साठपटिका से अक्षित करके, तीसरा नाही- वृत्त उक्त दोनों वृत्तों के ऊपर कल्पना करना । यह नाडीवृत्त ही विषुववृत्त कहलाता है ॥ १० ॥ इदानी क्रान्तिवृत्तमाह- क्रान्तिवृत्तं विधेयं गृहात भ्रम- त्यत्र भानुश्च भाः कुभा भानुतः । कान्तिपातः प्रतीपं तथा प्रस्फुटाः क्षेपपाताश्च तत्स्थानकान्यतयेत् ॥ ११ ॥ अथान्यत् तत्प्रमाणमेव वृत्तं कृत्वा तत्र मेषादि प्रकल्प्य डाद- शराशयोऽहयाः । तत्क्रान्तिवृत्तसज्ञम् । तस्मिन वृत्ते रविभ्रमति । तथा वर्भाान्तरे भूभा च। तथा तत्र क्रान्तिपातो मेपादेविलोम भ्रमति । तथा ग्रहाणां विक्षेपपाताः प्रस्फुटा विलोमं भ्रमन्ति । अतः क्रान्तिपातादीनां स्थानानि तनाक्यानि । प्रभा। क्रान्तिपातः प्रतीपमर्थाद्विलोम भ्रमति । एवमेव ग्रहाणा विले. पपाता अपि । शेपं स्फुटम् । भापामाप्य । द्वादश राशियों से अहित फरके शान्तिवृत्त की कल्पना करनी इस में -सर्दी भ्रमण करता है । और सूर्य से छः राशि के अन्तर पर भूमा भ्रमण करती है गोलबन्धाधिकारः। १५६ पत्त मे विमण्डल का स्थापन करना । इस रिमण्डल को द्वादश राशियों से अङ्कित करके उस में विक्षेपपात को अङ्कित करना । मान्तिवृत्त और विमण्डल का छ छ राशियों पर संपात स्थिर करके, क्रान्तिकृत्त से उत्तर क्षेपपात से तीन राशि के अ. न्तर पर और स्फुटशरांश के समान दूर्गपर, इसीप्रकार दक्षिण में तीन राशि के दूगे पर और क्रान्तिवृत्त से स्फुटशरांश के तुल्य अन्तर पर विमण्डल को स्थिर करना । प्रहों के स्पष्टशराश, त्रिज्यागुणित और शीघ्रकर्णभक्त स्पष्ट होते हैं । छ प्रहों के -विमण्डल अलग अलग कल्पना करना चाहिए । अपने अपने वृत्ती में चन्द्रादि प्रह भ्रमण करते हैं। उपात्ति। चन्द्रपात और उसका स्पष्टस्थान चन्द्र के कक्षावृत्त में रहता है। इसलिए वि. क्षेपकेन्द्र कक्षावृत्त में गिनना चाहिए । यों चन्द्र का शर, विक्षेपकेन्द्र के. अनुसार सिद्ध करने से, कक्षावृत्त केन्द्र और भूकेन्द्रानुसार समानही सिद्ध होगा । परन्तु भौर प्रहों के पात भौर मन्दस्पष्टस्थान उनके शीघ्रप्रतिवृत्त में रहते हैं। इसलिए उनके शर विक्षेपकेन्द्र से सिद्ध करने पर शीघ्रप्रतिवृत्तीय मन्दस्परस्थान और पात. सम्बन्धी सिद्ध होंगे । और वे शीघ्रप्रतिवृत्तीय केन्द्राभित्राय से मध्यमशर होंगे । 'जोकि ग्रहों के सूर्य केन्द्रकशर के समान होते हैं । जैसा कि, इस क्षेत्र में 'नप' क्रान्तिकृत्त का चतुर्थाश है । 'अ' शीमप्र- तिवृत्त, 'न' पातस्थान और 'प' प्रहस्थान 'न'फ्रान्तिवृत्त के धरा. इन पर 'अ' और '५१ सम्बरूप खाधना । तब, 'अब परमार और पंप'प्रहार। श्री प्रतिवृत्तकेन्द्रगतद्रशा, ग्रह को 'प' तुल्य दूरीपर देखेगा । इसलिए यह भार । मध्यम कहलाता यह शर यो सिद्ध होता है,-- : ज्या न पं; ज्या पंप, - . . sho ज्यान. ज्याचब अथवा त्रिxज्या पंप- ज्या अवर ज्यान 4, इसलिये साधन में श्रव' का ज्ञान पहिले होना चाहिए ! अ.
१५८ गोलाध्याये क्रान्तिहत्तस्य विक्षेपवृत्तस्यांच क्षेपपाते सपड्भे च कृत्वा युतिम् । क्षेपपाताग्रतः पृष्ठतश्च त्रिभे क्षेपभागैः स्फुरैः सौम्ययाम्ये न्यसेत् ॥ १४ ॥ शीघ्रकर्णेन भक्तास्त्रिभज्यागुणाः स्युः परक्षेपभागा प्रहाणां स्फुटाः क्षेपवृत्तानि पहां विदध्यात् पृथक स्वस्ववृत्ते भ्रमन्तीन्दुपूर्वा ग्रहाः ॥ १५ ॥ अस्य श्लोकस्य समग्रस्य व्याख्यानम् । यथा क्रान्तिवृत्तं पृथक पृथक् कृतमेवं विमण्डलमपि राश्यकं पृथक् कृत्वा तत्र मेपादे- यस्तं स्फुटं क्षेपपातं दत्त्वाग्रे चिहं कार्यम् । अथ क्रान्तिवृत्तस्य विमण्डलस्य च क्षेपपातचिह्नयोः संपातं कृत्वा तस्मात् पड्भान्त- रेऽन्यं च संपातं कृत्वां क्षेपपांताग्रतस्त्रिभेऽन्तरे क्रान्तिवृत्तादुत्तरतः स्फुरैः क्षेपभागेः पृष्ठतश्च त्रिभेऽन्तरे तैरेव भागैर्दक्षिणतः स्थिा कृत्वा विमण्डलं निवेशनीयम् । अथ पठिता ये विक्षेपभागार त्रिज्यागुणाः शीघ्रकर्णेन भक्ताः स्फुग ज्ञेयाः । अत्रानुपातः यदि कर्णाग्र एतावन्तरतर्हि त्रिज्या कियन्त इति । यतो भ गोले त्रिज्यैव व्यासार्थम् । एवं चन्द्रादीनां पविमण्डलानि के र्याणि । स्वस्वविमण्डले ग्रहा भ्रमन्ति । प्रभा। आचार्येणैव व्याख्याता इमे श्लोकाः । स्रग्विणीवृत्तानि । भापामाध्य। जिस प्रकार नाडीत्त में क्रान्तिवृत्त का संनिवेश किया गया है, वैसेही का गोलबन्धाधिकारः। सब पहिले क्षेत्र में ज्यान : ज्या अवज्यान : ज्या पप ज्या 4 . ज्या न अ . ...ज्या अव ज्यान पं पंप.नि. अच- नप उत्थापन से पश• नप.त्रि प शनि अब- शो कानप शीक इस प्रकार : शीघ्रकर्णेन भक्ता-इत्यादि उपपन्न हुआ ॥ १३ ॥ १५ ॥ अथवा ॥ क्षेत्र। 15 इदानी क्रान्ति विक्षेपं चाह- नाटिकामण्डलात्तिर्यगत्रापमा क्रान्तिवृत्तावधिः कान्तिवृत्ताच्छरः ।
- - गोला याये। र्थात् शरमाधन में परमशर की प्रारश्यकता है। और नए' पातस्थान से नई की दूरी,जोकि विक्षेपरेन्द्र कहलाता है। यह प्रह का मन्दस्पष्ट स्थान और पाद के मध्यस्थान स्वरूप है । ग्रहशर, भकेन्द्रमप्राय से सष्ट कहलाता है। इस पE- शाका सावन इस प्रकार है,- 'भू' भूकेन्द्र, 'श्र' शीप्रतिहत्तरेन्द्र, 'प' प्रह का मन्दस्पष्टस्थान | और 'भूप' शीघ्र कर्ण जोकि आपत्त को 'क' पिन्दु पर काटा है । यो 'क' विदु कक्षावृत्तगत प्रह का स्पष्टन्धान होगा । 'अ' येन्द्र से पय वृत्त और 'भू' पेन्द्र मे कम वृत्त करना । इन दोनों वृत्तों के धरातल झान्तिवृत्त पर लम्त्ररूप होंगे। इस प्रकार, प व मध्यमशर और कम सप्तशा होगा । ५ य और कम रेखाएं प्रान्ति- गृत्त के धरातल पर लम्बा सांची गई हैं। और पे दोनों रेखा भू च रेखा पर भी ममकोण उत्पन्न योगी । इस प्रकार, पर मध्यमशरफी ज्या और फट पट पारज्या । श्रय , भ प च और भू क ट त्रिभुजों में, भूपएप भूक : कट; भूक-पच 1 .. तीय नि मनग्या अपना सएशरग्या शीय ज्याअX परन्तु, मध्यमाच्या नि ज्याअर • ज्यान ज्याअयज्यान ...राटगरज्या x वि जीक प्रहार फामा घाटा होता, मलिए मिटान्तों में उRN TEA IN अपरन परम पाय पापण रियागया। इस प्रकार पश:- गो रिमोर्गो पामार मे गुणा जागरण पा भाग देने में राशर निहा। भर पाना गिरि- नपरा, मरसिश्चन्द्र पासा, यमगर, था,
गोलबन्धाधिकारः।
इस परमक्रान्ति के कोण का ज्ञान उत्तरायण और दक्षिणायन के आरम्भ में
मध्याहू नतांश के वेधसे ज्ञात होता है । कल्पना किया न, न दोनों नतांश और ''
स्थानीय भक्षांश है । अब, यदि 'स' किसी अयन में सूर्य का स्थान माने तो
उसकी क्रान्ति 'सम' होगी। यह कान्तिवृत्त और नाडीवृत्त सम्पात से बना ''
कोण के मान के तुल्य है । क्योंकि दो महावृत्तों के सम्पातोत्पन्न कोण का मान
जो उन वृत्तों पर लम्वरूप होता है, उस के चार में गिना जाता है। यों यह
क्रान्ति ध्रुवप्रोतवृत्त में, समझनी चाहिए ।
नतांश और क्रान्ति के योग, वियोग से अक्षांश होता है यह उपपत्ति से
२
.
इसलिए, अन+प,
उत्तरायण मे..
दक्षिणायन में,
अन्तर करने से 'प' का मान हुआ, प: । वसन्तसम्पात मे सूर्य
की क्रान्ति शून्य होती है । उस के बाद हर दिन, सूर्य की वार्षिकगति के कारण
उस की क्रान्ति कुछ काल तक बढ़ती है । वह प्राय: २१ जून तक बढ़ती चली
जाती है, क्योंकि उस समय तक परमक्रान्ति होजाती है । फिर क्रम से घटने
लगती है और शारदसंपात में करीब २३ सितम्बर तक शून्य होजाती है ।
इस प्रकार, सूर्य की क्रान्ति, वसन्तसंपात =O
परम उत्तर=२३, २८, उत्तर:
शारदसंपात
परम दक्षिण=२३,२८. दक्षिण.
इसप्रकार वर्ष में क्रान्ति की घटती बढ़ती हुआ करती है । इस स्थिति में सूर्य का
शर शून्य मानागया है । इस लिए मध्यमक्रान्ति ही स्पष्ट है । आजकल युरोपि.
यन विद्वानों ने सूर्य का शर भी करीव १ निश्चित किया है । १६ ।।
इदानी क्रान्तिपातमाह-
विपुवत्क्रान्तिवलययोः सम्पातः कान्तिपातः स्यात् ।
तद्भगणाः सौरोक्ता व्यस्ता अयुतत्रयं कल्पे ॥ १७ ॥
अयनचलनं यदुक्तम्मुजालाद्यैः स एवायम् ।
तत्पक्षे तद्गणाः कल्पे गोर्तुनन्दगोचन्द्राः
( १६६६६)॥ १८ ॥
गोलाध्याये क्षेपवृत्तावधिस्तिर्यगेवं स्फुटो नाडिकावृत्तखेटान्तरालेऽपमः ॥ १६ ॥ क्रान्तिवृत्ते यत्स्फुटग्रहस्थानं तस्य नाडीवृत्तात्तिर्यगन्तरं सा क्रान्तिः। अथ विमण्डले च यत् ग्रहस्थानं तस्य क्रान्तिवृत्ताद्यत् तिर्यगन्तरं स विक्षेपः । अथ विमण्डलस्थग्रहस्य नाडीवृत्ताध: तिर्यगन्तरं सा स्फुटा क्रान्तिः। प्रभा। नाडिकामण्डलादित्यादि स्फुटम् । तिर्यक्पदेन लम्बरूपताबोध्या। भापाभाप्य । नाडीत्त से क्रान्तिवृत्त तक तिरछा अन्तर क्रान्ति कहलाती है। और कान्ति- वृत्त से विक्षेपवृत्त तक शर होता है । इसप्रकार नाडीवृत्त और प्रह के बीच में २ स्पष्टमान्ति होती है। उपपत्ति । कान्तिवृत्त और नाडीवृत्त के धरातलों के संपात से जो कोणं उत्पन्न होता है उसका मान परमशान्ति के तुल्य है । साम्प्रत में युरोपियनवेधानुसार उसका मान.२३,२८ है। उक्त दोनों वृत्तों का सम्मात दो स्थान अर्थात् मेष और सुल में, गोल में स्पष्ट है। इन दोनों सम्पातबिन्दुओं में जय सूर्य आता है तब उसका उदय और अस्त ठीक पूर्व और पश्चिम में होकर दिन, रात समान होते हैं, जैसा फि निरक्ष में हुआ करता है.। क्योंकि उस दिन अहोरात्रवृत्त का आधाभाग क्षितिज के ऊपर और भाषा नीचे होने से सारी पृथ्यो में दिन, राव की स्थिति समान होती है। Hni क भापाभाष्य। गोलबन्धाधिकारः। यति तदा महामतिमन्तो ब्रह्मगुप्तादीनां समानधर्माण एवोत्पत्स्य- न्ते । ते तदुपलभ्यनुसारिणीं गतिमुररीकृत्य शास्त्राणि करिष्यन्ति । अत एवायं गणितस्कन्धो महामतिमद्भिर्धतः सन्ननाद्यन्तेऽपिकाले खिलत्वं न याति । अतोऽस्य क्रान्तिपातस्य भगणाः कल्पेऽयुत- त्रय तावत् सूर्यसिद्धान्तोक्ताः। तथा मुआलाद्यैर्यदयनचलनमुक्त स. एवायं क्रान्तिपातः । ते गोऽङ्ग नन्दगोचन्द्रा १६६६६६ उत्पद्यन्ते । अथ च ये वा ते वा भगणा भवन्तु | यदा येऽशा निपुणैरुपलभ्यन्ते तदा स एव कान्तिपात इत्यर्थः । तं विलोमगं क्रान्तिपातं ग्रहे प्रक्षिप्य क्रान्तिः साध्या । नाडीवृत्त और क्रान्तिवृत्त के संपात को क्रान्ति गात कहते हैं । सूर्यसिद्धान्त मे, कान्तिपातभगणविलोम तीन अयुत कल्प में कहे हैं । मुसाल आदि आचायों ने जो अयनचलन का निरूपण किया है वह यही है । उनके मत से कल्प में १९९६६९ भाण होते हैं। इन भगणों से जो सांप्रत में अयनांश सिद्ध हो उनका ग्रह में संस्कार करके क्रान्तिसाधन करना चाहिए । क्रान्ति से चर, उदय, आदि सिद्ध होते हैं । यो •लग्न के साधन में चरखण्ड का संस्कार करना चाहिए। उपपत्ति । क्षेत्रमिति के अनुसार दो घृत्तों का संपात दो बिन्दुओं पर होता है, इस नियम से विपुववृत्त और क्रान्तिवृत्त का संपात दो स्थान पर सिद्ध है । स्वभावशक्ति से संपातबिन्दु चल है, इस कारण यह बिन्दु सर्वदा चला करता है अर्थात् उक्त दोनों वृत्तों के संपातविन्दु सरकते रहते हैं। इस संपात को कोई आचार्य कान्तिपात - हते हैं। उन का यह अभिप्राय है-किसी काल में अश्विनी की पोगतारा और उक्त संपात एक स्थान पर था, तर ठीक चित्रा के पूर्वार्द्ध में अर्थात् ३१x१३-१८० अंशापर दूसरा संपात होता था और पुनर्वसु के तीसरे पाद १३१x६४%386 में दक्षिणायनविन्दु, उत्तरापाढ के पहले पाद १३३४ २०१२७० में उत्तरायणविन्दु होता था । उस काल को अयनांशाभाव काल कहते हैं। जब स्वभावशक्ति से प्रेरित संपातविन्दु अश्विनीयोगतारा को छोड़कर आगे चला और वैपसाधन से उसमाचलन ज्ञात हुआ तरसे यह काल अयनांशसत्ताकाल कहलानेलगा। और पहला संपातमिन्दु, स्थिम्मेपादि-निरयणचिह्न से तथा तत्तत्कालिक संपातविन्दु, चलमेपादि-सायनचिह्न से व्यवहृत होनेलगा। और स्पिरमंपादि से चलमेपादितक जोक्रान्तिमुत्तम चापागार । । - गोलाध्याये तत्सजातं पातं क्षिप्त्वा खेटेऽपमः साध्यः। क्रान्तिवशावरमदयाश्वरदललग्नापमे ततः क्षेप्यः ॥१६॥ क्रान्त्यर्थं पातः क्रान्तिपातः । पातो नाम सम्पातः । कयोः। विपुत्रत्क्रान्तिवलययोः । न हि तयोर्मेपादावेव संपातः । किन्तु तस्यापि चलनमस्ति । येऽयनचलनभागाः प्रसिद्धास्त एव वि- लोमगस्य क्रान्तिपातस्य भागाः । मेपादेः पृष्ठतस्तावद्भागान्तरे क्रान्तियत्ते विषुववृत्तं लग्नमित्यर्थः। नहि क्रान्तिपातो नास्तीति वक्तुं शक्यते । प्रत्यक्षेण तस्योपलव्यत्वात् । उपलब्धिप्रकारमये वध्यति । तत्कथं ब्रह्मगुप्तादिभिर्निपुणैरपि नोक्त इति चेत् । तदा स्वल्पत्वातै!पलब्धः। इदानीं बहुत्वात् साम्प्रतिकैरुपलब्धः। अत एर तस्य गतिरस्तीत्यागन्तव्यम् । यद्येवमनुपलब्धोऽपि सोरसि- द्धान्तोहत्वादागमप्रामाण्येन भगणपरिष्यादिवत् कथं तेनोक्तः । सत्यम् । अत्र गणितस्कन्ध उपपत्तिमानेवागमः प्रमाणम् । तर्हि मन्दोचपातभगणा आगमप्रामाण्येनेव कयं तेरमाइति न च वक्त- व्यम् । यतो ग्रहाणां मन्दपलाभावस्थानानि प्रत्यक्षेणेचोपलभ्यन्ते। तान्ये मन्दोवस्थानानि । यान्ये विशामावस्थानानि तान्येय पातस्थानानि किन्तु तेपां गतिरस्ति नास्ति वेति सन्दिग्यातत्र मन्दोचपातानां गतिरस्ति । चन्द्रमन्दोमपातादित्यनुमानेन सिद्धा साच कियती तदुच्यते । येनगगेम्पनचिस्यानानि नानिगणित नागच्छन्ति । तद्गणसंभवा वार्षिकी देनन्दिनी वा गतिईया । नन्वेवं यद्यन्येरपि भगणेस्तान्या स्थानान्यागच्छन्ति तदा कत- स्या गतेः प्रामाण्यम् । मत्यम् तिहि मांप्रतिकोपलभ्यनुमारिणी कापि गनिजीकर्तन्या । यदा एनर्महता कालेन महदन्तरं भवि है गोलवन्धाधिकारः। विषुवदपक्रममण्डलसपाते प्राचि मेषादि । पश्चात्तुलादिरनयोरपक्रमासम्भव प्रोक्त ॥ राशिनयान्तरेऽस्मात्कर्कादिरनुक्रमान्मृगादिश्च । तत्र च परमा कान्तिर्जिनभागमिताय तव ।। निर्दिष्टोऽयनसन्धिश्चलनं तव सम्भवति । सद्गणा कल्पे स्युर्गोरसरसगोकचन्द्रमि ॥ १९९६६९४३६०४६०४६० इस के अनुसार भयनाशगति यो सिद्ध होती है- ४३२००००००० १६६६६६४३ और 'निंशकृत्य 'इमशुद्ध सूर्यसिद्धान्त के पाठ के १०००० १ १४१०६x६०४६० अनुसार =५४ यह अपनाशगति ४३२०००० ७२०० ७२०० होती है । और आधुनिक युरोपियनमतसे ५०.२४ विकला गतिहै इसके अनुसार ७२ वर्ष में १ पूरा होता है और द्वादश राशिपर भ्रमण ३६०४६+६० ५० २४ २६,०००वर्षों में होताहै ।। १७ । १६ ॥ इदानीं विक्षेपपातानाह- एवं क्रान्तिविमण्डलसंपाताः क्षेपपाताः स्युः । चन्द्रादीनां व्यस्ताःक्षेपानयने तु ते योज्याः॥ २०॥ मन्दस्फुटो द्राक प्रतिमण्डले हि ग्रहो भ्रमत्यस्य च तस्य पातः । पातेन युक्ताद्गणितागतेन मन्दस्फुटारखेचरतः शरोऽस्मात् ॥ २१ ॥ पातेऽथवा शीघ्रफलं विलोम कृत्वा स्फुटात्तेन युताच्छरोतः। चन्द्रस्य कक्षावलये हि पातः स्फुटादिधोर्मध्यमपातयुक्तात् ॥ २२ ॥ तयाक्रान्तिवृत्तविमण्डलयोःसंपातःक्षेपपातः। तं ग्रहे अभिप्य क्षेपः साध्यः । एतदुक्तं भवति । क्रान्तिपातः प्रसिद्धः। यथा तं ग्रहे * - १६६ गोलाध्याये प्रदेश पनता रहता है उसको फ्रान्तिपात-अपनाह शब्द से पाइन । Im स्थिति के अनुरोध से स्थिरमेपादि से आगत प्रह में उस चापाकार प्रदेश के अंशोको संस्कार करके उसको सायनप्रहण कहने लगे, इत्यादि । कालकम से अपनांशवश जय अश्विनी आदि ताराओं का चलन हुआ तब अश्विनीयोगतारा भी चलित हुई, ऐसी दशा में उक्त सम्पातबिन्दु का परिचायक कोई न रहा अर्थात् वह बिन्दु क्षेत्र. मितिपरिभाषित बिन्दुस्वरूप में आकर अदृश्य होगया । और अयनांश के विषय में मतभेद फैलने और निग्यणगणनारम्भस्थान स्थिरमेषादि केवल अनुमानगम्य हो गया । संपातविन्दु के दैनंदिनादिगतिमान में अनेक मतभेद हैं और राशिभोग में यों मतभेद है कि सूर्यसिद्धान्त के अनुसार संपातविन्दुःस्थिरमेपादि से २७ अंश पश्चिम जाकर फिर उसी क्रम से लौटकर स्थिरमेपादि में आजाता है और फिर २७ अंश पूर्व जाता है वहा से फिर लौटकर स्थिरमेपादिमें श्राता है । यो चार भ्रमण २७५ २५+२७+२७=१०८का एक भगण माना जाताहै । युग में ६०० भगण माने हैं और कल्प में ६००४१०००-६००००० भगण होते हैं। परन्तु प्रकृत में भाचार्य के 'व्यस्ता अयुतत्रयं कल्पे' इस वाक्य के अनुप्तार कल्प में ३०००० पे भगण सिद्ध होते हैं। एकवाक्यता करने के लिये कई एक मतिमान् । व्यस्ता विना विशत्या अस्ता गुणिताः' ऐसी व्याख्या करके उक्त ३०००० इन भगणों को २० से गुणकर सूर्य सिद्धान्त के साथ एकवाक्यता करते हैं ३००००x२०६०००००। मेरे विचार से उक्त एकाम्यता असंगत प्रतीत होती है क्योंकि व्यस्तशब्द पी उक्त व्याख्या आचार्य की लेखशैली से विरुद्ध है । यह अवश्य सम्भव है कि आ- चार्य के समय में 'विंशकृत्यः' इस शुद्धपाठ के स्थान में त्रिंशत्कृस्वः' यह प्रामादिक पाठ प्रचलित रहाहो, जिसकी चर्चा रङ्गनाथ ने सूर्यसिद्धान्त के टिप्पण में की है। यों आचार्यलिखित स्यसिद्धान्त के मत.से युग मे ३०.भगण फल्प में ३०x१००० =३०००० भगंण होते हैं। अत एव मरीचिलिखित- 'खाभ्रस्वाभ्राग्नयः कलो क्रान्तिपातविपर्ययाः । व्यस्ता अङ्कविलिताया गतेः प्रत्यब्ददर्शनात् ।' यह श्लोक प्रचलित हुआ है। १४३६०४६०४६० ॥ ४३२००००००० १४४००० और मुखाल आदि कितने एक आचार्यों का यह मत है कि संपातविन्दु का पूरा ध्रमण होता है, जैसा कि विक्षपपातों का । और यही मत भास्कराचार्य को अभि. मत है । मुसाल के वाक्य यों हैं - 'उत्तरतो याम्यदिश याम्यान्तात्तदनु सौम्यदिग्मागम । परिसरता गगनसदा घरनं विश्चिनवेदपमे ।। । - गोलवन्धारिकारः। १६६ क्षेपरेन्द्र है । अन्य ग्रहों का पात और उनका मन्दस्पष्टस्थान उनके भीतप्रतिवृत्त मे रहता है । इस लिये विक्षेपकेन्द्र के साधन मे पात पो मन्दस्पष्ट में जोडना चाहिए। ग्रह का स्पष्टपात बही है जिसको स्पटमहत्यान में युक्त करने से विक्षेपकेन्द्र होता है । और वह मध्यमपात में शीघ्रफल का व्यस्तमस्कार करने से सिद्ध होता है। इस प्रकार यदि स्फुटपात-या तब ऊपर कही रीति मे रिक्षेपमेन्द्र या+पप्र । और मन्दस्पप्र+मध्यपा निक्षेपमेन्द्र है । दोनों के तुल्य होने से सनीकरण करके पक्षान्तरानयन करनेपर य या मान य =मन्दस्पन+मध्यपा-स्पप्र-मन्दस्पम+ मध्यपा-मन्दस्पप्र-शीफ-मध्यपा-शीफ यो । पातेऽथना शीघ्रपल दिलोमम- इत्यादि प्रकार उपपन्न हुआ ॥ २० । २२ ।। इदानीं ज्ञशुक्रयोविंशेपमाह- ये चात्र पातभगणाः पठिता ज्ञभृग्यो- स्ते शीघ्रकेन्द्रभगणेरधिका यतः स्युः ! स्वल्पाः सुखार्थमुदिताश्चलकेन्द्रयुक्ती पातो तयोः पठितयक्रभवो विधेयो ॥ २३ ॥ चलादिशोध्यः किल केन्द्रसिद्ध्ये केन्द्र सपाते युचरस्तु योज्यः । अतश्वलात् पातयुताज्ज्ञभृग्वोः सुधीभिरायेः शरसिद्धिरुता ॥ २४ ॥ रफुटोनशीघ्रोच्चयुती स्फुटो तयोः पातो भगोले स्फुट एव पातः। ननु ज्ञशुक्रयोः शीघोचपातयुति केन्द्रं कृत्वा यो विशेप था- नीतः स शीघ्रोच्चस्थान एव भवितुमर्हति । न ग्रहस्थाने । यतो ग्रहोऽन्यत्र वर्तते । अत इदमनुपपन्नामा प्रतिभाति । तथा च ब्रह्मसिद्धान्तभाष्ये । ज्ञशुक्रयोःशीघ्रोचस्थाने यारान् विपस्ता- वानेव यत्रतत्रस्थस्यापि ग्रहस्य भवति । अत्रोपलब्धिरेव वामना मान्यत्कारणं वक्तुंशक्यत इति चतुर्वेदनाप्यनच्यवसायोऽत्र कृतः।
भापाभाप्य । गोलाध्याये प्रक्षिप्य क्रान्तिः साध्यते, एवं विक्षेपपातं ग्रहे प्रक्षिप्य क्षेपः साध्य इत्यर्थः । अथ विक्षेपपातो मन्दस्फुटे यत्संक्षिप्यते तत्कारणमाह । मन्दस्फुट इति । यतः शीघ्रप्रतिमण्डले मन्दस्फुटगत्या ग्रहो भ्र- मति । तत्र च वृत्ते पातोऽतो गणितागत पातं मन्दस्फुटे प्रक्षिप्य क्षेपः साध्यते। शेष स्पष्टम् । इस प्रकार क्रान्तिवृत्त और विमण्डल के संपात को क्षेपपात कहते हैं। इस विलोमगतिपात का चन्द्रादि ग्रहों में संस्कार करके विक्षेपसाधन करना । पात और मन्दस्पष्ट मह निज शीघ्रप्रतिवृत्त में भ्रमण करता है । इस लिए मन्दस्पष्ट और पात का योग करके शरसाधन करना चाहिए । भथवा शीघ्रफल का पात में विलोम संस्कार करके, उसको स्पष्ट करके शर सिद्ध करना । चन्द्र के कक्षावृत्त में पाव की स्थिति है, इस लिए स्पष्टचन्द्र में पात का संस्कार करके शरसाधन करना । उपपत्ति। सूर्य क्रान्तिवृत्त पर भ्रमण करता है । परन्तु चन्द्र, भौम आदि ग्रह मान्तियत्त में न भ्रमण करके अपने अपने विमण्डल में भ्रमण करते है जिन का धरातल फ्रान्तिवृत्त के धरातल की तरफ झुका हुआ है। वे विमण्डल जिन बिन्दुओं में प्रान्ति- घृत्त धरातल फो काटते हैं, यह भ्रमण करता हुआ जहां उन बिन्दुओं में, फ्रान्तियत्त से उत्तर दिशा में, उदित होता है. वह उस का पात कहलाता है । और उस विन्दु से छ राशि पर जो संपात होता है यह सपड्भपात कहलाता है । चन्द्रपात उस के फक्षावृत्त में भ्रमण करता है, क्योंकि चन्द्रकावृत्तधरातल का फेन्द्र प्रान्तियत्तधरा- सलफेन्द्र में होकर गया है, अर्थात् भूकेन्द्र में होकर । परन्तु अन्य ग्रहों के पास उन के शीघ्रप्रतिवृत्त में रहते हैं, क्योंकि उन के विमण्डलधगतलकन्द्र शीघ्रपतितकेन्द्र में होकर गये हुए हैं । जो फेन्द्र प्रान्तिवृत्त के धरातल में होते हैं। जय प्रह अपने पात से अलग किसी स्थान में है उस स्थिति में उम प्रह और मान्तिवृत्त धरातल का यथासंभव दक्षिणोचर अन्तर पर पहलाता है । जब पर अपने पात से आगे या पीछे तीन राशि के अन्तर पर होता है दक्षिण किंवा उत्तर. उम का परम अन्तर होता है । यही अगर परमगर कहलाता । इस प्रकार महों फाशर उस पात में पारम्भ होता है और चीन राशि . स्तर पर परम होता है इसलिए घर के साधन में प्रद और पास पा अन्तर जानना आवश्यक है। यह अन्तर प्रद और पात के योग के तुन्य है । क्योंकि पान मेपादि मे विलोम भ्रमण करता है । इमी अन्तर को विक्षेपरेन्द्र यह चन्ना पाव और उमा स्पष्टरयान उम पक्षाहत में रहता है, इन दोनों का योग दि. राप मान्तिपत्त में इसलिए - गोलबन्धाधिकारः। और शुक्र के पातों को उन के शीघ्रकेन्द्र में जोड़ देना चाहिए । इस प्रकार पातस्थान ठीक ज्ञात होगा। उपपत्ति । यहा पर आचार्य ने वासनाभाष्य में सा अभिप्राय स्पस लिख दिया है । तोमी अधिक सुगमता के लिए फिर उम का उपपादन किया जाता है सीमोच - मध्यग्रह- शीघ्रवेन्द्र । ( शीउ-मम )+ पठितमोत्यपात - मध्यमपात । यह पात प्रतिमण्डल का मिद हुआ । भन, मध्यग्रह+मन्दफल = मन्दस्पष्टग्रह । इन का योग करने से, शी उ+म+पठितचक्रोत्यपात-निक्षेपकेन्द्र । इसीलिए वासनाभाष्य में लिखा है कि पात में मन्दफल का व्यस्त संस्कार करना । इमलिए यह जो विक्षेपकेन्द्र मिद्ध हुआ है वह शीघ्रप्रतिवृत्त का वास्तव-विक्षेपोन्द्र हुआ । परन्तु गणिताध्याय के ग्रहन्छायाधिकार में जो ‘सितज्ञपातौ स्फुटौ स्तश्चलकेन्द्रयुक्तो-' इस के स्थान में मन्दस्पष्ट में शीत्रोच्च घटाकर जो शीनरेन्द्र मानकर उसका और पातया योग किया है, वह स्वल्पान्तर से किया है । क्योंकि उम में मन्दफल का अन्तर रहजाता है। इसप्रकार -शीनोच-मध्यग्रह-मन्दफल-शीत्रवेन्द्र । और, पठितपात+शीनोच- मध्यमह-मन्दफलमध्यमात । और, मध्यप्रह+मन्दफल-मन्दस्पष्ट के होता है । इसलिए दोनों का योग करने में पठितचक्रोत्यपात+शीनोच-विक्षेपमेन्द्र । यह स्वल्पान्तर है क्योंकि यहापर मन्दफल का एक पक्ष में जोडने और दूसरे पक्ष में घटाने से तुल्य होनेपर नाश होजाता है । इसप्रकार 'ये चार पातभगणा पठिता -' इत्यादि उपपन्न होता है। शीघ्रकेन्द्र सिद्ध करने के लिये मध्यमग्रह को शीघ्रोच में घटाना चाहिये और विक्षेप (शर) केन्द्र बनाने के लिये शीतकेन्द्रभगणयुक्त पात में मन्दस्पष्ट ग्रह को जोदना चाहिये । यो तुल्य शोध्य क्षेप्य राशियों के नाश होने के कारण पातयुक्त शीघोक्ष से पूर्वाचार्योने बुध शुक्र का शरसायन किया। भगोल म शीत्रप्रतिवृत्त और विमण्डल का सम्पात स्फुटपात है, इस कारण शीघोच में मन्दस्पष्ट घटाने से जो मन्दफरा- 'न्तरित शीघ्रकेन्द्रभगण बनते हैं उनका और बुध शुक्र के मध्यम ( गणितागत ) पातों का योग स्फुटपात होता है । इस प्रकार चलाद-' इम श्लोक का आशय है ॥ २३ ॥ २४ ॥ इदानीं ग्रहगोले विशेपमाह- ग्रहस्यगोले कवितापमण्डलं प्रकरप्य कक्षावलयं यथोदितम् ॥ २५ ॥ , गोलाध्याये सत्यम् । अत्रोच्यते । येऽत्र ज्ञशुक्रयोः पातभगणाः पठितास्ते शीघ्रकेन्द्रभगणैर्युताः सन्तस्तद्भगणा भवन्ति । तथा च माधवीये सिद्धान्तचूडामणौ पठिता अतोऽल्पभगणभवः पातः स्वशीघ्रके न्द्रेणं युतः कार्यः शीघ्रोचाद्ग्रहे शोधिते शीघ्रकेन्द्रम् । तस्मिन् सपाते क्षेपकेन्द्रकरणाथ ग्रहः क्षेप्यः । अतस्तुल्यशोध्यक्षेपयो शे कृते शीघ्रोचपातयोग एवावशिष्यत इत्युपपन्नम् । किंच मन्दस्फुटोनं शीघ्रोचं प्रतिमण्डले चलकेन्द्रम् । तत्पाते क्षेप्तुं युज्यते । एवं कृते सति विक्षेपकेन्द्रं मन्दफलेनान्तरित स्यात् । ग्रहच्छायाधिकारे सितज्ञपातौ स्फुटौ स्तश्चलकेन्द्रयुक्तावित्यत्र मन्दस्फुटोनं शीघ्रोचं शीघ्रकेन्दं पाते क्षिप्तम् । अतस्तत्र मन्दफ- लान्तरमङ्गीकृतमित्यर्थः । इतरकेन्द्रस्यानुपपत्तेः । अतो मन्दफलं पाते न्यस्तं देयम् । यतोऽनुपातसिद्धं चलकेन्द्रं मध्यग्रहोनशीघ्रो- चतुल्यं भवति । यत्तु भगोले क्रान्तिवृत्तं तत् कक्षावृत्तम् । तत्र यदिमण्डलं तत्र स्फुटग्रहः । तत्स्फुटपातयोगोहि विक्षेपकेन्द्रम् । अतः स्फुटपातस्थाने संपातं कृत्वा ततस्त्रिभेऽन्तरे स्फुटीकृतेः पर- मविक्षेपांशेः प्राग्वदुत्तरे दक्षिणे च विन्यस्यम् । तथा न्यस्ते विम ण्डले स्फुटग्रहस्थाने विक्षेपः स्फुटविक्षेपेण गणितागतेन तुल्यो दृश्यते । नान्यथेत्यर्थः। प्रभा। इमे इलोकाः स्फुटार्थाः । वंशस्थेन्द्रवंशयोरुपजातिसंपादनार्थ कैश्चित 'पातकः' इति पाठः कल्प्यते । भाषाभाप्य । बुध और शुफ के पावभगण जो लिये हैं वे अपने गीतकेन्द्रमगणों से गुरु करने में पपा होते हैं। पद संसार गणित की सुगमता के लिए दिया गया है। .
गोलवन्धाधिकारः। १७३ द्वितीयं त्रैराशिकम् । आये त्रिज्याहरो द्वितीये गुणस्तयो शे कृते केन्दज्यायाः परमशरगुणायाः कर्णो हरः । फलं कक्षावृत्तसू- त्रयोस्तिर्यगन्तरम् । स स्फुरः शरः ।.. प्रभा। + वासनाभाप्यत एवात्र सर्वमवधेयम् । ज्ञमृग्वोः स्वशीघ्रकेन्द्रेण युतस्तु देय इत्युक्तिस्तु पूर्वोक्तविशेषस्मरणार्था । भापाभाप्य। प्रदगोलीयक्रान्तिवृत्त को कक्षावृत्त कल्पना करके उस में शीघ्रप्रतिवृत्त को बांधकर, उक्त शरतुल्यं दूरी पर विमण्डल को स्थिर करना । इस में ग्रहों का पान निश्चित करना चाहिए । बुध और शुक्र का पात निजशीघ्र केन्द्र के सहित समझना चाहिए। उपपत्ति । पहले भगोल ही को ग्रहगोल मानकर पात की उपपत्ति दिसलाई । यदि भगोल के भीतर प्रगोल बांधने की इच्छा हो तो यथास्थान नाडीवृत्त और क्रान्तिवृत्तको बांध कर क्रान्तिवृत्तको प्रहका कक्षावृत्त मानना और छेद्यकरीति से शीघ्रप्रतिमण्डल,निम- ण्डल यांधकर इन में मेषादिसे विलोम गणितागतपात का दान करना । और पातस्थान में उक्त शांघप्रतिमण्डल तथा विमण्डलका संपात करके उसके आगे छ राशिपर दूसरा संपात करना । और पातस्थान के आगे पीछे तीन तीन राशि के अन्तर पर प्रतिमण्डल से विमण्डल को पाठपठित परमशरांश के तुल्य उत्तर और दक्षिण की तरफ स्थिर करना । और विमण्डल में मेषादि से अनुलोम मन्दस्फुट प्रह का दान करना । यह मन्दरकुट प्रह पतिमण्डल से उत्तर दक्षिण की तरफ जितने अन्तर पर दीखै उतनाही उम स्थान पर शर होगा । इम इष्टशर का ज्ञान पात और मन्दस्फुटमह के योग करने म होगा क्योंकिपात का विलोम और मन्दस्पष्ट का अनुलोम अङ्कन कियागया है । उक्त योग की शरमाधन के लिए केन्द्रमंज्ञा की है । इष्टशरसाधन के लिए अनुपात-त्रि- ज्यातुल्य विक्षेपकेन्द्रदोर्णा में पाठपठित परमशर मिलता है तो इष्टविक्षेपकेन्द्रदोया में क्या? फल इटस्थान में प्रतिमण्डल और विमण्डल का अन्तर । त्रि: पश:: इदो: इश । त्रि यह अन्तर शोधकर्ण के अम में आया है। विम्ब से भूपेन्द्र की दूरी को कर कहते हैं। भूगर्भवासी प्रतिमण्डलस्य प्रहको कक्षामण्डल में कर्णमार्ग से देवता है, इस कारण इष्ट शर को भूगर्भाभिप्राय से सट करने के लिए दूसरा अनुगग-कीम में साधित पशाइदो -श .
. . ७२ गोलाध्याये निवध्य शीघ्रातियत्तमस्मिन् विमण्डलं तरपठितः शरांशेः । मध्योऽत्र पासो द्युसदा ज्ञमृग्योः स्वशीघ्रकेन्देण युतस्तु देयः ॥ २६ ॥ भगोल एव तावद्ग्रहगोल कल्प्यः। तत्र स्फुट एव पातः । अथ यदि तदन्तर्ग्रहगोलोऽन्यो निवध्यते तदा तत्र यथोक्तं विषुववृत्तं क्रान्तिवृत्तं च बद्धा तत्कान्तिवृत्तं कक्षामण्डलं प्रकल्य तत्र छेद्य- कोतविधिना शीघ्रप्रतिमण्डलं बद्धा तत्र प्रतिमण्डले गणितागतं पात मेपादेविलोमं गणयित्वा तत्र चिह्नं कार्यम् । अथ त्रिज्याव्या- सार्धमेवान्यवृत्तं राश्यकं विमण्डलाख्यं कृत्वा तत्रापि मेपादेयं. स्तं पाताने चिहं कृत्वा प्रतिमण्डलविमण्डलयोः पातचिह्न प्रथम संपातं ततो मार्यन्तरे द्वितीयं च संपातं कृत्वा पातादग्रतः पृष्टतच . त्रिमेऽन्तरे परमविक्षेपांशः पठितः प्रतित्तापुत्तो दक्षिणे च विम- गडलं विन्यस्यम् । तत्र मन्दस्फुगत्या पारमार्थिको अहो भ्रमति । अतो मेपादेरनुलोमं मन्दस्टो विमण्डले देयः । स तत्रस्थान तिमण्डलाद्यावतान्तरेण विक्षिसस्तावांस्तत्तदेशे विक्षेपः । यतो वृत्तसंपातस्थे ग्रहे विक्षेपाभावः। त्रिमेऽन्तरे परमो विशेषः । मध्येऽ नुपातेन । अतो वृत्तसंपातम्योरन्तरं ज्ञेयम् । तदन्तरं पाताहयोगे कृते भवति । पातस्य विलोमगत्वात् । स योगः शरार्थ केन्द्रम् । यदि त्रिज्यातुल्ययां केन्द्रज्यया परमः शरस्तदाभीष्टयानया क इति । फलं प्रतिमण्डलविमण्डलयोस्तिर्यगन्तरं स्यात् । विमण्ड लस्थाहाद्यदभूमध्यगं सूत्रं तनहान्तरम् । स च शीमाः । यदि मध्यात्कन एतापान विशेषस्तदा त्रिज्या क्रियानिति गोलबन्धाधिकारः। १७५ प्रभा। कान्तिपातचिह्नादनुलोमकमेण मेपादिराशीन प्रकल्प्य तत्तद्ग्रेप्व- होरात्रवृचानि कल्प्यानि । तान्येवानुलोमविलोमक्रमेण मेपादिद्वादश- राशीनां भवन्ति । एतदुक्तं भवति । नाडीवृत्तादुत्चरतो दक्षिणतश्च त्रीणि वृदानि कृतानि चेद्वादशराशीनां भवन्ति । भाषाभाष्य । कान्तिपात से अनुलोम तीस तीस अंश पर मेषादि राशियों की कल्पना करके उनके आगे अहोरात्रवृत्त को रखना चाहिए । नाडीवृत्त से उत्तर तीन और दक्षिण तीन अहोरात्र बांधना । वे ही क्रम, उत्क्रम से मेपादि बारह राशियों के अहोग- प्रवृत्त होंगे ॥२८॥ दानीमस्योपसंहारमाह- एप भगोलः कथितः खेचरगोलोऽयमेव विज्ञेयः ॥ २६ ॥ अत्रापमण्डले वा सूत्राधारैरधश्च तस्यैत्र । शन्यादीनां कक्षा वतीयादूर्णनाभजालाभाः ॥३०॥ बद्धा भगोलमेवं यष्ट्यां यष्टिं खगोलनलिकान्तः । प्रक्षिप्य भ्रमयेत्तं यष्ट्याधारं स्थिरौ खहरगोलौ ॥ ३१ ॥ यथायं भगोलो वद्धस्तथैव ग्रहगोला अपि वघ्नीयाः। किन्तु पां छेद्यकमन्तश्चालयितुं नायातीति बहिःस्थमेव दर्शनीयम् । पथवार भगोले यदपमण्डलं तस्यायोऽधस्तनिवद्धैः सूत्राओरर्वद्धा निश्चरादीनां कक्षा दर्शनीयाः। एवंविधं भगोलं यष्ट्यां दृढं वद्धा [ष्ट्यप्रयोः प्रोते नलिकांद्वये निवद्धौ खगोलदृग्गोलौ कृत्वा भ- गोलभ्रमणं दर्शयेत् । इति श्रीभास्कराचार्यविरचिते गोलवासनाभाष्ये मिताक्षरे गोलबन्धाधिकारः समाप्तः । अथ ग्रन्थसंख्या १० ॥
- क.त्रि - १७४ गोलाध्याये विक्षेप मिलता है तो विज्यान में क्या? फल कक्षामण्डलीय इष्टस्थान में स्पष्टशर। पश.इदो पश.इदो.त्रि पश.इदो :त्रि -1॥२५।२६॥ त्रि इदानीमहोरात्रवृत्तमाह- ईप्सितकान्तितुल्येऽन्तरे सर्वतो. • नाडिकाख्यादहोरात्रवृत्ताह्वयम् । . तत्र बद्धा घटीनां च पष्टयाङ्कये- दस्य विस्कम्भखण्डं घुजीवा मता ॥ २७ ॥ नाडीवृत्तादुत्तरतो दक्षिणंतो वा सर्वत इष्टक्रान्तितुल्येऽन्तरे यवृत्तं निवध्यते तदहोरात्रवृत्तम् । तेन वृत्तेन तस्मिन् दिने रवि- भ्रंमतीत्यर्थः । तस्यवृत्तस्य व्यासायुज्या । प्रभा। स्फुटार्थोऽयं श्लोकः। भाषाभाष्य । नाडीवृत्त से दक्षिण किंवा उत्तर इष्टक्रान्ति के समान दूरीपर, साठयपी से अङ्कित करके अहोगनवृत्त का निरेशन करना । इस वृत्त के व्यासार्ध को धुज्या. फहते हैं। इसी अहोरात्रवृत्त में सूर्य नित्य भ्रमण किया करता है ॥ २७ ॥ इदानीमन्यदाह- अथ कल्प्या मेपाचा अनुलोमं कान्तिपातासात् । एप मेादीनां ारात्रवत्तानि वन्नीयात् ॥ २८ ॥ : नाडीवृत्तोभयतस्त्रीणि त्रीणि क्रमोत्क्रमात तानि । कान्तिपाताङ्कादारभ्य त्रिंशता त्रिंशता भागैरन्यान मेपादीन प्र. कल्प्य तदग्रेपूक्तवदहोरात्रत्तानि वशीयात् । तानि च नाडीवृत्त स्योभयतस्त्रीणि त्रीणि भवन्ति । तान्येव क्रमोकमतः सायनां शार्कस्यदादशगशीनाम् । - न त्रिप्रभवासना। इदानी लवास्वदेशाकोंदययोरन्तरं चरकालमाह- निरक्षदेशे क्षितिजाख्यवृत्त- मुन्मण्डलं तज्जगुरन्यदेशे। स्खे स्वे कुर्कस्य समुद्गमोऽस्मा- चराईमर्कोदययोस्तु मध्ये ॥ २ ॥ स्पष्टार्थम् । प्रभा। क्षितिजाख्यवृत्तमेव निरक्षदेशेपून्मएडलाभिस्यम् । स्वस्वदेशीय क्षितिजे रव्युदयात्तद्देशीयार्कोदयान्तरं चरखण्डसमानमिति सुव्यक्तम् । भापाभाप्य। . निरक्षदेश के क्षितिजत को उन्मण्डल कहते हैं। अपने अपने देश के क्षितिज मे सूर्य का उदय होताहै । इसलिये स्वदेश और निरस के सूर्योदयकाल का अन्तर घरसण्ड के समान होता है ॥२॥ इदानी चरफलस्य धनर्णवासनामाह-- आदो स्वदेशेऽथ निरक्षदेशे सूर्योदयो हरतमयोऽन्यथातः ! ऋणं ग्रहेऽरमादुदये स्वमरमे फलं चरोत्यं विसौम्यगोले ॥ ३ ॥ याम्ये विलोमं सलु, तत्र यस्मा- दुमण्डलं स्वशितिजादधस्तात् । नाव्याहयादुत्तरयाम्यभागो गोलस्य तावृत्तस्याम्यगोलो ॥ ४ ॥ सुगम पूर्व व्याख्यातं ! इगौलोगो फुटायौं । उपजानीन्द्राबाउन्दगी ।।
१७६
गोलाध्याये
.
.
प्रभा।
रफुटाः श्लोकाः । वासनाभाप्ये व्याख्याताश्च ।
इति प्रभायां गोलबन्धाधिकारः।
भाषाभाष्य
इस प्रकार भगोल को स्थिति वर्णित हुई, याही प्रहगोलस्थिति भी जाननां पा.
हिये । भगोलीय फ्रान्तिवृत्त के नीचे क्रम से शनि आदि ग्रहों की कक्षा बड़े सूक्ष्मसूत्र से
फ्रान्तिकृत्त में बांधना । फिर भगोल को भुवनलिका में दृढ़ करके, दोनों ध्रुवनलिका
ओमें खगोल और दृग्गोलको पोकर, भगोलका भ्रमण दिखलाना चाहिए ॥२९॥३१॥
गोलबन्धाधिकार समाप्त हुआ।
अथ त्रिप्रश्नवासना।
तत्रादौ चरस्थानमाह-
उन्मण्डलक्ष्मावलयान्तराले
शुरात्रवृत्ते चरखएडकालः।
तज्ज्यात्र कुज्याचरशिञ्जिनी स्या-
दयासार्धवृत्ते परिणामिता सा ॥ १ ॥
क्षितिजोन्मण्डलयोर्मध्येऽहोरात्रवृत्ते यावान् कालःस चरखण्ड
कालः। तत्रोन्मएलादुभयतश्चरतुल्येऽन्तरे चिह्न कृता तयोनि-
बद्धसूत्रस्याच कुज्या । सैव त्रिज्यावृत्तपरिणता सतीचरज्या स्या-
दिति निमरने व्याख्यातम् ।
प्रभा ।
रफुटार्थोऽयं श्लोकः । उपप्रातिश्छन्दः ।
भापामाध्य
उन्मएएलच और क्षितिजगृत्त के बीच में अहोरात्र के सएडको पासण्ड
करते हैं । उमफी ज्या को कुम्या कहते हैं । और कुल्या प्रियायत में परिणत
रने मे चरज्या कहलाती है ॥१॥
त्रिप्रश्नवासना। १७६ र अर्थात् वहां उदय और अस्त सदा एकाकार होता है इसलिये दिन-रात में कभी भेद नहीं पड़ता ॥ ५ ॥ इदानी विशेपमाह- पद्पष्टिभागाभ्यधिकाः पलांशा यत्रांथ तत्रास्त्यपरो विशेपः ॥ ६ ॥ लम्बाधिका क्रान्तिरुदक् च यावत् तावद्दिनं सन्ततमेव तत्र। यावच याम्या सततं तमिता ततश्च मेरौ सततं समाईम् ॥ ७ ॥ यत्र देशे पट्पष्टे ६६ रधिकाः पलांशास्तत्रायं विशेषः । अर्क- स्योत्तरा क्रान्तिावत्काल लम्बाधिका भवति तामत्कालं सन्ततं दिनमेव । याम्याक्रान्तिर्यावत् तावत् सन्ततं रात्रिरे । तद्यथा । यत्र किल सप्ततिः ७० पलाशास्तत्र लम्बो विंशतिः २० । तत्र देशे विषुववृत्तं दक्षिणक्षितिजादुपरिभागविंशत्योत्तरक्षितिजाद- धश्च तावता । यदा वेरुत्तरा क्रान्तिर्भागविंशतिर्भवति । तदोत्तर क्षितिजे रविविम्बमोदितं भूत्वा मध्याह्ने दक्षिणक्षितिजादुपरि याम्योत्तरमण्डले भागचत्वारिंशतोन्नतं भवति । तदा त्रिंशद्घ- रिका दिनदलम् । अतो दिनं पष्टिः । रात्रिः शून्यम् । ततो द्वितीय दिन उत्ताकान्तरधिकत्वादविरुत्तरक्षितिजं न स्पृशति । एवं प्रतिपर्ययं परमक्रान्ति यावदुपर्युपरि परिभ्रमति । एवं मिथुनान्त उत्तरक्षितिजादुपरिभागचतुष्टयं याति । पुनस्तेनेय क्रमेणार- रोहति । विंशतिभागाधिका क्रान्तिर्यावत्तावत्कालं रविः सततं दृश्यः । तावदिनमे । अनयैवयुक्त्या दक्षिणगोले मितिजादधः- स्थेऽ सन्ततं रात्रिरिति । अत एव मेरो पण्मासं दिनम् ।
गोलाध्याये मापाभाप्य। भूर्योदय पहिले स्वदेश में उस के बाद निरक्षदेश में होता है । और प्रस्त पहिले निरक्ष में फिर स्वदेश में होता है। इस कारण चरफल उदय मे ऋण और अस्त मे धन उत्तर गोलमें किया जाता है । और दक्षिणगोलमे उलटा संस्कार करना चाहिये । अर्थात् उदय में धन और अस्तमें ऋण क्योंकि वहां स्वदेशीय क्षितिजवृत्तसे उन्मण्डल नीचे है । नाडीवृत्त से उत्तर और दक्षिण गोलके हिस्सेको उत्तर और दक्षिण गोल कहते हैं ॥३॥४॥ इदानी दिननिशोलधुत्वमहत्वेहेतुमाह- अतश्च सौम्ये दिवसो महान्स्या- द्रात्रिर्लधुर्व्यस्तमतश्च याम्ये । शुरात्रवृत्ते क्षितिजादधःस्थे रात्रिर्यतः स्यादिनमानमूः ॥ ५ ॥ सदा समत्वं शुनिशोनिरक्षे नोन्मण्डलं तत्र कुजाद्यतोऽन्यत् । क्षितिजादुपरिस्थेऽहोरात्रवृत्तखण्डे यावान् कालरतावान् दिवसः यावांस्तदधःस्थे तावती रात्रिरिति सुगमम् । प्रभा। भादौम्बदेश--, इत्यादिपर्यालोचनेन सूर्योदयवशादुचरदक्षिण- गोत्नयोर्दिनरायोवृद्धिक्षयो गोले रफुटं विलोक्येते। भाषाभाप्य। मप्रकार उदाश उत्तरात दिन बड़ा और नाम छोटी होती है। इससे उनटा दक्षिणगोल में समझना चाहिये । प्रदोगनवृत्त का पण्ड चितिज ये पर पौर नीने जैसा है, उसी प्रकार दिन और रात का मान होता है। और निरह में दिन और रात घरायर होते हैं । क्योंकि यहां चितिग के सिवाय दुगरा मनगण्डल नहीं है। +ोदय में सदमदराम पराराप्रबनना का प्राशा हा Prart १ सालम उमरइन आर हो मेरल में नादा होने म पा, मसर तर नग । चार दक्षिण में सामान सामाग्री बार में माहनिमे पाप महे ग म सहर पाना है।
त्रिप्रश्नवासना। १८१ कल्पना किया- ख-सस्वस्तिक। खख-पूर्वापरा । नाना-नाडीवलय। उद-उत्तर दक्षिण चितिजयिन्दु । उनाना=याम्योत्तरवृत्त । खना-अक्षांश-७० नाद लम्बांश-२० र उत्तरक्षितिज बिन्दुगत-रविनिम्न । र दक्षिण क्षितिजबिन्दु से याम्योत्तरवृत्तमें४ :अंश उन्नत रविनिम्न । नाउ लम्नांश तुल्य उत्तरक्रान्ति में रात्रि । उर लम्बांशाधिक उत्तरकान्ति में.दिन । नांद लम्याश तुल्य दक्षिणक्रान्ति में दिन । देवलम्यांशाधिक दक्षिणक्रान्ति में रात्रि । ३६०ः भूपरिधियोजन: अक्षांशान्तरः इष्टयोजन । इसप्रकार इष्टस्थानकी दूरी जानी जाती है ॥ ६-७ ॥ इदानीं मेरुसंस्थानमाह- विषुववृत्तं ासदां क्षितिजत्वमितं तथाच दैत्यानाम् । उत्तरयाम्यो क्रमशो मूोर्धगतौ ध्रुवीयतस्तेपाम् ॥ ८ ॥ उत्तरगोले क्षितिजादू परितो भ्रमन्तमादित्यम् । सत्यंत्रिदशाः सततं पश्यन्त्यसुरा असव्यगोव्याम्ये॥६॥ स्पष्टम्। प्रभा। त्रिदशास्तिस्रो जन्मसत्त्वाविनाशाख्याः, नतु मानामिव वृद्धिप रिणामक्षयाख्यादशा येषां ते । देवा इत्यर्थः शेपं रफुटम्। आर्यागीतिः। भाषाभाष्य । देव और दैत्यों को रिपुत्त क्षितिजरूप होताहै । क्योकि उनके शिरपर ध्रुवों गोलाध्याये १८० भापाभाष्य 1 उपपत्ति । जिस देश मे ६६ अंश से अधिक अक्षांश है, वहां दिन-रात की व्यवस्था भिन्न है । यहां पर सूर्य की उत्तर क्रान्ति जब तक लम्बाश से अधिक रहेगी तब तक सदा दिन ही रहेगा । और उसी प्रकार दक्षिण क्रान्ति जब तक श्रधिक रहैगी, उस समय तक सदा रात्रि ही रहेगी। इस प्रकार मेरुप्रदेश में छं मास का दिन होता है। जिसदेश में ७० अक्षांश है वहां लम्बांश २० होगे । क्योंकि७० + २०%3D १० । खस्वस्तिक से अक्षांश के तुल्य दक्षिण की तरफ विषुववृत्त नत होगा और दक्षिण क्षितिजसे लम्बांशके तुल्य उन्नत होगा। इस स्थितिमे विपुववृत्त उत्तर क्षि- तिजके नीचे २० अंश और दक्षिणक्षितिज के ऊपर २० अंश रहेगा । जब रवि की उत्तर क्रान्ति २० अंश होगी उस समय उत्तर क्षितिजमें रविधिम्य अदित होकर मध्याह्नमें दक्षिण क्षितिज के ऊपर याम्योत्तरवृत्तमें ४० अंश ऊंचा होगा। तय ३० घड़ीका दिनार्ध अर्थात् ६० घड़ी का दिनमान होगा और रात न होगी फिर दूसरे दिनसे उत्तर क्रान्ति ज्यों ज्यो बढ़ती जायगी त्यों त्यों सूर्य उत्तरक्षि. तिजके ऊपरही भ्रमण करेगा । इसप्रकार उत्तर परमकान्ति तक भ्रमणकरताहुआ रपि जन मिथुनान्त में पहुचैगा तर उत्तरक्षितिजसे ४ अंश ऊंचा होगा अर्थात् शून्य अंशसे लेकर पीस अंशपर्यन्त लम्यांशके तुल्य जनतफ उत्तर क्रान्ति रही तबतक सूर्य क्षितिजके नीचे याद लम्वांशसे अधिक उत्तर क्रान्तिमें क्षितिजके ऊ. परही रहेगा । इमोप्रकार लम्यांश से अधिक दक्षिणमान्ति में सूर्य क्षितिजके नीचे ही भ्रमण करेगा। इसी गुझिसे मेर में घ मासा दिन होता है ।
४ त्रिप्रश्नवासना। १८३ श्यावत्तैिरेवारोहणं कुर्वन्नपि देवदृष्टस्तैरेव पुनरवरोहणं कुन किं न दृश्यत इति अतस्तदसत् । भापाभाप्य। सहितारिशारदो ने उत्तरायएको देवताओ का दिन और दक्षिणायन को रात्रि माना है । जहा स सूर्य दिन करने को प्रवृत्त होताहै वही स दिन और जहा से रात्रि करने को चलता है वहीं से रात्रि यह फल कहने के अभिप्राय से है । तात्पर्य यह कि सायन मेप दि में रवि उदित होकर जब मिथुनान्त में पहुचता है उस समय देव- ताओं का दिनार्ध वा दोपहर होताहै उसके बाद फिर सायन क या में अस्त होकर दैत्यभाग में उदित होता है, तर देवताओं के यहा राति होती है । और दैत्यों के यहा सायनतुल मे उदित होकर जव मकरान्त में पहुचता है उस समय दैत्यों के यहा दोपहर होताहै । उसके बाद फिर सायन मीन में अस्त होजाताहै, तन दैत्यों के यहा रानि रहती है । इस स्थिति में सहिताविशारदों ने फल के अभिप्राय से देवभाग में मध्याह्न के बाद अर्थात् कर्कराशि के प्रारम्भ से ही रानि मान ली है, क्योंकि वहा से श्रस्त के समुख सूर्य चलकर अस्त होता है । और दैत्यभाग म मकरराशि के प्रारम्भ से ही दिनमान लियाहै, क्योंकि वहा से उदय के समुख सूर्य चलकर देवभाग में उन्य को प्राप्त होता है । इस प्रकार वास्तव में कर्क के श्रारम्भ से रानि और मकर के आरम्भ से दिन गोलयुक्ति से न होने पर भी यह कल्पना केवल कथन के प्रयोजन से है क्योंकि यदि फल का प्रयोजन न हो तो प्राचार्य प्रश्न करते हैं कि, देवतालोग जिस क्रमसे सर्य को चढते हुए देखते हैं, क्या उसी कम से उतरतेहुए न.देसेंगे, अवश्यही देखेंग ॥११-१२ ।। इदानी पितृदिवसस्योदयास्तादिकालानाह- विधूप्रभागे पितरो वसन्तः स्वाधः सुधादीधितिमामनन्ति । पश्यन्ति तेऽनिजमस्तको दर्श यतोऽस्माद्द्यदलं तदेषाम् ॥ १३ ॥ भान्तरत्वान्न विधोरवास्थ तस्मानिशीथः खलु पौर्णमास्याम् । 17 व ने भी इस कपना का फन मलर लिवी ह । नम'--- 'रंगने मुगपराम पन पुना रानगरस्य । गन गने वापग्गामेषामनपर पागमम्मति । " - १८२ गोलाध्याये फी स्थिति रहती है । अर्थात् देवताओं के उत्तर और दैत्यो के दक्षिण ध्रुव शिर- पर दिसलाई देता है। उत्तरगोल में क्षितिजके अपर भ्रमण करताहुना सूर्य देव. ताओं को अनुलोम और दैत्यों को विलोम दिसलाई देता है । नाड़ीवृत्तको क्षितिजाकार रखकर मेरुकी स्थिति समझनी चाहिये ।। E-६ ॥ इदानी दिनरात्रिस्वरूपे पितृदिनं चाह- दिनं दिनेशस्य यतोऽत्र दर्शने तमी तमोहन्तुरदर्शने सति । कुपृष्टगानां शुनिशं यतो नृणां तथा पितॄणां शशिपृष्ठवासिनाम् ॥ १० ॥ स्पष्टम्। प्रभा। तमी रात्रिः । 'रजनी यामिनी तमी' इत्यमरः । शेष स्फुटम् वंश- स्थवृत्तम्। इदानी संहितोक्तस्याभिप्रायमाह- दिनं सुराणामयनं यदुत्तरं निशतरत्साहितिकैः प्रकीर्तितम् । दिनोन्मुखेऽके दिनमेव तन्मतं निस तथा तत्तलकरतनाव तत् ॥ ११ ॥ द्वन्द्वान्तमारोहति येः क्रमेण तैरेव वृत्तखरोहतीनः। यात्रेच दृष्टः प्रथमं स देवे- स्तत्रैव तिश्न विलोक्यते किम् ॥ १२ ॥ साहितिकानां न चेदयमभिप्रायानहि मेपादेय मिथुनान्तं H त्रिप्रश्नवासना। दूरस्थितत्वादाप्रलयं रविं पश्यति । दिनान्ते रव्यादीनुपसंहृत्य शेत इत्यर्थः। कल्पद्येन ब्रह्मणोऽहोरात्रं भवति सूर्यसिद्धान्ते यथा 'इत्थं युग सहस्रेण भूतसंहारकारकः । कल्पो ब्राह्ममहः-इत्यादि। प्रभा। भापा भाष्य। भूमि से ऊँचे बहुत दूरीपर ब्रह्मा निवास करते है । इसलिए प्रलयकाल तक सूर्य को सदा देखा करते हैं उनका उदय अस्त नहीं होता। और दिनान्त में शयन करते हैं । इसप्रकार दो हजार युग ब्रह्मा का अहोरात्र होता है । अर्थात् एक हजार युग दिन और उतनी ही राति होती है । ब्रह्मा के दिन में सृष्टि रहती है और रानिमे उसका नाश अर्थात् प्रलय हो जाता है ॥ १५ ॥ इदानीमुदयवासनामाह- योहि प्रदेशोऽपममण्डलस्य तिर्यस्थितो यात्युदयं तथास्तम् । सोऽल्पेन कालेन य ऊर्धसंस्थो- ऽनल्पेन सोऽस्माद्दया न तुल्याः॥ १६ ॥ य उद्दमे याम्यनता मृगाद्याः स्वस्यापमेनापि निरसदशे।। याम्याक्षतस्तेऽतिनतत्त्वमाशा उद्यन्ति कालेन ततोऽल्पकेन ।। १७॥ कादयः सोम्यनता हि येऽत्र ते यान्ति याम्यानवशादृजत्वम् । कालेन तस्मादबहुनोदयन्ते तदन्तरे स्वं चरखण्डमे ॥ १॥ विषुवदहोरात्रत्तानि लबायां संमपश्विमगानि गशिवलयं गोलाध्याये कृष्णे रविः पक्षदलेऽभ्युदेति शुक्नेऽस्तमेत्यर्थत एव सिद्धम् ।। १४ ॥ स्पष्टम्। . भापाभाष्य। - पितरलोग चन्द्रके ऊपरी भागपर निवास करतेहुए चन्द्रको अपने नीचे मानते हैं । वे श्रमा को अपने शिर के ऊपर सूर्य को देखते हैं । इमलिये उसदिन उनका मध्याह होताहै । छ राशि के अन्तर पर चन्द्र के नीचे सूर्यके अवस्थान से पूर्णारा उन । की अर्धरात्रि होती है। वहां पर कृष्णपक्षार्ध में सूर्य का उदय और शुक्लपक्षा में अस्त होताहै । यह अर्थात् सिद्ध हुआ। उपपत्ति । मांप्रत में यह निश्चय हुआहै कि चन्द्रमा एक कील में पृथ्वी के चारों तरफ घूमा करता है। यह एक मास अर्थात् २७ दिन, ७ घंटामें पृथ्वी की एकयार परिममा पूरी करता है । इस स्थिति से यह ज्ञात हुआ कि चन्द्र का एकभाग सूर्य के संमुग्य रहने में पंद्रह दिन तक प्रकाशित रहताहै, और दूमरा भाग सूर्य के विपरीत दिशामें होने रे कृष्ण रहताद । उसी नियमसे हमारे यहां और शुक्लपक्ष का व्यवहार होतादे । जर हमारे सामने फा पन्द्रगोलार्ध फटण होने लगता है तब उसका दूसरा गोलार्ध तिम पर पितरों का निवास है, वह शुक्ल होने लगता । यो जिमदिन हमाग दृश्या पा प्ण होगाता है उस दिन पिना सब गोलार्ध शुरल होनाता । अथी अमावास्या पो उनके यहां समध्य में सूर्य होने में मध्या होता है। इसी नियम जिस दिन हमारे यहां पूर्ण होती है उम दिन पितरों के अर्धगति होनी है। इसमपार हमारी अमावास्या और पूर्ण समसे पितरों या मध्याय और अध रानि होने से यह मिद्ध हुआ कि हमारी ष्णाष्टमीयो पितों के यहां पर्योदय श्री. शुगलाष्टमी पो उनके मर्याग्द होताद ।। १३-१४ ।। अथ ब्रह्मदिनोपपत्तिमाह-- यदतिरगतो द्रुहिणःक्षितः सततमामलय विमीक्षते । भाति तापदयं शयितश्च त- झुगसहलयुगं शुनिशं विधेः ॥ १५ ॥ -- त्रिप्रश्नवासना। १८७ तद्रहितत्रिंशद्भिः कन्यान्तो वा झपान्तो वा । चरखण्डैरुनाब्बास्तेन निरमोदयाःस्वदेरो स्युः ॥ २२ ॥ क्षितिजेऽजादिं कृत्वा गोलं भ्रमय प्रदर्शयेत् सर्वम् । उक्तमनुक्तं चान्यच्छिष्याणां वोधजननार्थम् ॥ २३ ॥ उदयवासना स्फुटगत्यध्याये कथितैत्र । इह तु मेपादिं क्षितिजे कृत्वा गोलं भ्रमयन् क्रमेण यदुक्तं वक्ष्ययमाणं च सर्वदर्शयेत् । तत्र . सर्व दृश्यत इत्यर्थः। प्रभा। भचक्रपादास्तिथिनाडिकाभिरिन्यादि गोलस्थितिनिरीक्षणेन स्फुट मवगम्यते । ताभिश्चरोनागिः पञ्चदशघटीभिः चरयुताभिः पञ्चदशघ टीभिरिहितस्त्रिंशद्भिः । निरक्षदेश में क्रान्तिवृत्त के चारों पाद अलग अलग पञ्चदश घटिका में उदय और अस्त होते हैं । क्रान्तिवृत्त का प्रथम और द्वितीय अर्ध सर्वत्र तीसटिका में उदित और अस्त हुआ करता है । मेपादि से मिथुनान अर्थात क्रान्तिवृत्त का प्रथम पाढ, पञ्चदश घटिका में उन्मएडल का उल्लङ्घन करता है । परन्तु क्षितिजके नीचे होने के कारण चरसण्ड से न्यून पञ्चदश घटिका तुल्य काल प्रथमही वह क्षितिज का उल्लङ्घन करता है । कन्यात से धनु तक अर्थात् कान्तिवृत्त का तृतीय पाद पञ्चदश घटिका में उन्मण्डल में लगता है । और चरसण्ड युक्त पञ्चदश घटिका तुल्यकाल में पीछे वह क्षितिज में लगता है। मिथुनान्त से कन्यांत तक क्रान्तिवृत्त का द्वितीयपाद और धनु से मीनान्त तक चतुर्थपाद होताहै * तीस घड़ी में चार सण्ड प्रथम और तृतीयपाद सम्बन्धि घटादेने से शेप काल समान काल में उक्तदोनों पाद क्षितिज में लगते हैं । इसप्रकार निरक्षदेशीय उदयमान में चरखण्डयुत और रहित करने से स्वदेशोदय का मान होता है । क्षितिज में मेपा- दिका स्थापन करके,गोल घुमाकर यह सर व्यवस्था, उक्त अनुक्त सविस्तर शिष्यों के ज्ञान के लिये बतलाना चाहिये ॥ १६।२३ ॥ * यो गामें अताश २६ । ४८ पलमा ६ । ४ चराम मेड ३५३ । वृष ६३० मि ७४२ । पण्डित पुरी में पलात्मर उदयमान भापाभाष्य। मे. २२० ..१६४ क..४४६ R.R" क. ३३८ तु..३३८ मी. २२० पगमकमान म. मि से. 4.१ २८ .मी. मि १ ११ १२ म. क. २५८२४५.
गोलाध्याये तु मन्दरादो परमकान्त्या विषुवन्मण्डलादक्षिणतो मिथुनान्त उ- तरतोलग्नमतस्तिरश्चीनम् । तत्रापि मेपः सक्रान्त्या महत्त्या तिरश्चीन उदेति । अतोऽल्पकालोदयः । वृपभस्तदल्पयातस्तस्मात् किंचिदधिककालः । मिथुनस्तदल्पयातस्तदधिककालः। एवं नि- रक्षेऽपि न समा उदयाः। अथ ये मकारादयोयाम्ये नतास्ते याम्या- क्षवशादतिनता उद्गच्छन्ति स्वदेशेऽतोऽल्पकालोदयाः । ये तु कादयःस्वस्वक्रान्त्या सौम्ये नतास्ते याम्याक्षवशाहजुत्वं गता उद्यन्ति । अतश्चिरकालोदयाः । लहास्वदेशोदययोरन्तराले स्वं चरखण्डमेव भवति । यतस्तक्षितिजयोरन्तराले चरम् । भाषाभाप्य। क्रान्तिवृत्तका जो भाग तिरछा है वह थोड़े कालमें और जो सीधा है वह अधिक समयमें उदयको प्राप्त होताहै। नाड़ीवृत्तसे दक्षिणदिशामें, निज क्रान्तिवश मकरादि राशिवलय झुके हैं ( गोल देसो ) परन्तु दक्षिण अक्षांश के वश चे यहुतही नत होकर थोड़े समय में उदय को प्राप्त होते हैं । और कर्क आदि राशिवलय जो उत्तर दिशा में झुके हैं वे दक्षिण अक्षांशवश सीधे होगए हैं। इसलिए अधिक काल में उदय को प्राप्त होतेहैं । निरक्ष और स्वदेश के उदय में चरसंडका अन्तर है । इसप्रकार निरक्षदेश क्या साक्ष कहीं उदय समान नहीं हैं ।। १६ । १८ ॥ अथ चरखण्डैरूनाधिकत्वं गोलभ्रमणोपरि यथा प्रतीयते तथाह । भचक्रपादास्तिथिनाडिकामिः पृथक् समुद्यन्ति निरक्षदेशे। चक्रार्धमाद्यं च तथा दितीयं सर्वत्रपूर्णाग्निमिताभिरेव ॥ १६॥ मेपादेमिथुनान्तो नाडीभिस्तिथिमिताभिन्दवृत्ते । लगति कुजे तदधस्थे प्रथमं ताभिश्चरोनाभिः ॥ २० ॥ कन्यान्ताद्धनुपोऽन्तस्तिथिमितनाडीभिमदलये। लगति कुजे चोर्धस्थे, पश्चात्ताशिवरायागिः ॥ २१ ॥ . ।
१८४ त्रिप्रश्नवासना। "तस्तत्र यथा कथितास्तथोदया न भवन्ति । यावत् सदोदिती रविस्तावदहोरात्रवृत्तं क्षितिजं न स्पृशति । अहोरात्रंत्रते क्षिति- जोन्मण्डलयोरन्तरं हि चरम् । अतस्तत्र कुज्याचरज्यादिकमसत् । शेपं स्पष्टम् । भापाभाष्य। जिस देश में लम्बाश चौवीस अश से कम हैं वहा उदय भार घर के धन ऋग की व्यवस्था उक्त रीति से नहीं हे ती ! उन सर देशों की स्थिति इस देश से भिन्न होने से नहीं कही गई । क्योंकि वहा मनुष्यों की गति ही नहीं है ।। गोलस्थिति पर दृष्टि देने से सर यात सष्ट होजाती हैं ॥ २५ ॥ इदानी लग्नशब्दव्युत्पत्योदयास्तमध्यलग्नस्थानान्याह- यत्र लग्नमपमण्डलं कुजे तद्गृहाद्यमिह लग्नमुच्यते । प्राचि पश्चिमकुजेऽस्तलग्नक मध्यलग्नमिति दक्षिणोत्तरे ॥ २६ ॥ स्पष्टम्। प्रमा। कौ पृथिव्यां जातमुत्पन्नं कुजं गर्भक्षितिजं तस्मिन् । यत्रापमण्डनं गृहाचं राश्यादिप्रदेशेन लग्नं तदिह लग्नमित्युदीर्यते । शेपंग्फुटमेव । भापानाध्य । पूर्वक्षितिज में क्रान्तिकृत का जो राश्यादि प्रदेश लगा रहता है उस को लग्न कहते हैं। और पश्चिम-शितिन में जो लगा रहता है इस से अस्त लग्न और याम्योत्तरवृत्त में मध्य लग्न कहते हैं ।। २६ ॥ अथ लानार्थमर्कस्य तात्कालिकीकरणवासनामाह- लग्नार्थमिष्टवाटिका यदि सावनास्ता- स्तात्कालिकार्ककरणेन भवेयुरायः। - गोलाध्याय -- अथास्तमयानाह- योऽभ्युदेति समयेन येन त- सप्तमोऽस्तमुपयाति तेन च । राशिमपमण्डलं कुजा- दर्धमेव सततं यतः स्थितम् ॥ २४ ॥ यो राशियन कालेनादेति तेन तत्ससमोऽस्तं याति। ये मेषादी- नामुदयास्ते तुलादीनामस्तमयाः। येतुलादीनामुदयास्ते मेपादी- नामस्तमया इत्यर्थः । यतोऽपमवृत्तं क्षितिजादुपर्यर्धमेव भवति । अर्धमघश्च । अतो राश्योरुदयमस्तमयं च गच्छतोस्तुल्यकाल- . तोपपद्यते। प्रभा। स्फुटार्थोऽयं श्लोकः । कुजं गर्भक्षितिजम् । भापाभाच्या - जो राशि जितने समय में उदित होता है, उससे सातवी राशि उतने समय में अस्त होता है। क्योंकि क्षितिज के ऊपर भाधा भाग फ्रान्तिवृत्त फा सदा रहता है। अर्थात् मेप आदि राशियों का जो उदय है वही सुला आदि राशियों का प्रस्त काल है । और जो तुल आदि का उदयकाल है वही मेप आदि का अस्तकाम है। क्योंकि प्रान्तियत्त का आधा हिस्सा उपर और आधा नीचे हमेशा रहता है। इसलिये उदय और अस्तम समानसालता होती है ॥ २४ ॥ इदानी विशेपमाह- यत्र लम्बजलवाजिनोनका- स्तत्र नोदयचराधमुक्तात् । नान्यसंस्थिततयान्यथोदितं येन नैप विपयो नृगोचरः ॥ २५ ॥ यस्मिन्देशे पट्पष्टि ६६ भागाधिकः पलस्तत्र केचन राशयः सदोदयाः केचन सदास्तमिताः केचन प्रान्तादच्छन्ति । अ- त्रिप्रश्नवासना। काः कृताः स्युः । एवं तासां सावनानां नाक्षत्रीकरणार्थमर्कस्य तात्कालिकीकरणमुपपन्नम्। ननु यद्येवं तर्हि किं सावना अङ्गीकृत्य नाश्त्रीकरणप्रयासे- न । किमु नाक्षत्रा एव नाङ्गीकृताः । सत्यम् । तदप्युच्यते । तत्र त्रिप्रश्ने छायार्थ ग्रहाणां स्वस्वसावनमेवोदितं ग्राह्यम् । तद्यथा । इटकाले स्वाहोरात्रत्ते यत्र ग्रहःस्थितः। यत्र च क्षितिजसङ्गस्त- योरन्तरे यापत्यो घटीविभागास्तावत्यः सावना नाट्यस्ता हि क्षेत्रस्ताहि क्षेत्रविभागात्मिकाः। अथ चोदयकाले यत्र स्थितो ग्रह आसीत् । तत्कुजमध्ये यावत्यस्तावत्यो नाक्षत्रास्तास्तु कालविभा- गात्मिकाः । यथा पौर्णमास्यां छायाकरणे चन्द्रस्यासकृतिधिनो. दिता नाडिकास्ताश्छायार्थ न गुज्यन्ते । यत्तु कैश्चिच्छायार्थमप्य- सकृतिधिनानीतास्तदसत् । अत एव वश्यति । चन्द्रप्रभार्थमसकृतिधिनोदितं यत् कैश्चित्कृतं खलु न सत् तदसावनत्वात् । जानन्ति ये न निपुणं गणितं सगोलं तेषां तु तन्त्रकरणव्यसनं स्थैर ॥ इति । छायायाः क्षेत्रात्मकत्वात् सावनाभिरेव साध्या । अयम- थेस्त्रिप्रश्ने व्याख्यात एव । एतत्सावनवटिकाप्रसङ्गाल्लग्नार्थमपि सावना अङ्गीकृता इत्यर्थः। भापाभाष्य। यदि इष्टघटिका सावन हैं तो तात्कालिक सूर्य से नाक्षत्र होंगी । राशियों के नाक्षत्रोदयकाल इएपटिनाओं में जो कि नाक्षरमम्बन्धि हैं टन में घटाना चाहिए। और यदि इष्टटिका नाक्षनही है, उस दशा में तात्कालिक सूर्य करने का कोई प्रयोजन नहीं है।
गोलाध्याय आर्योदया हि सदृशीभ्य इहापनेया- स्तात्कालिकत्वमथ न क्रियते यदायः॥२७॥ ननु ल नकरणार्थ या इष्टवटिकास्ताः सावना उत नाक्षत्राः । यदि सावनास्तहि नाक्षत्रा उदयाः कथं विसदृशास्ताभ्यो विशो- ध्याः । अतस्ताभिन क्षत्राभिर्भवितव्यम् । तथा भोन्यकालसा नार्थमर्कस्तात्कालिकः किं कृतः। यत उदयावधेरिष्टघटिकास्तथा- कौंदयानन्तरमेव राशेर्नोग्यांशाः क्रमेणोद्गच्छन्ति । अत औदयि- कार्कस्य भोग्यं गृहीतुं युज्यते न तात्कालिकस्य । तथा प्रतीत्यर्थनुदाहरणम् । यत्र किल पञ्चाङ्गुला ५ विपुवती तत्र मेपादिग: स्फुटमहोरात्रं चतुश्चत्वारिंशदशुभिरधिकाः पष्टि- घटिकाः ६०१७१२ अथ उदयानन्तरमहारानवृत्तसमेकाले ६० ७१२ यावत्तात्कालिकाल्लिानं साध्यते तावदर्कालिक स्थान समम् । यावदोदयिकात् िक्रियते तावत् सममेव । अतोन्वयव्य- तिरेकाभ्यां प्रतीतेयुक्तितश्चार्कस्तात्कालिकीकरणमयुकमिव प्रति- भाति । सत्यम् । अत एवोक्नं लानार्थमिटघटिका इत्यादि। अत्रेष्टघाटिकाः सायनास्तावदाचायगीकृतास्तासां नाक्षत्रत्वं कर्तव्यम् । तचैवम् । यथा प्रागुकस्वाहोरात्रसम्बन्धिन्यो या गति. कलास्ताः स्त्रोदयासुभि-संगुण्यगशिकलाभिर्विभज्य फलासुभि- रथिकाः सावनतुल्या नासत्राः पष्ट्रियटिका अहोरात्ररत्ते नात्राः स्युः। तत मोदयिकार्कस्य भो यासवः शोध्याः। एवं सत्याचार्यण लावामिष्टघटीसम्बन्धियो गतिकला प्रमै प्रक्षिशास्ततो ये भोग्यासबस्त योदयिका भोग्यानुभ्यो न्यूनाजातास्ते यापदिष्ट घटिकाभ्यः शोध्यन्ते तावत्ता इष्टवटीसम्बन्गितिकलामुभिगधि- त्रिप्रश्नवासना। तब वह साधितकाल नाक्षत्र ही होगा सावन न होगा । यदि लग्न और औदायिक सूर्य से सावनकाल और तात्कालिक-सूर्य का साधन करना हो तो नीचे लिखे हुए अनुसार लाना पाहिए- ६० • रग :: सावदि. इसप्रकार सावनपटिका सम्बन्धि सूर्यगति को उदयपाल के सूर्य में जोडने से तात्कालिक सूर्य के आसन्न होगा। इस से पुन तात्कालिक-सूर्य का साधन करना । यों ठीक सावनघटिका निश्चित होगी। अर्थात् असकरकम से तात्कालिक- सूर्य से सावनघटिकाओं का यथार्थ निश्चय होजायगा ॥ २७ ॥ इदानीं देशविशेषेण राशीन सदोदिताननुदितांश्वाह- भ्यंशयुङ्गवरसाः '६६।२० पलांशका यत्र तत्र विपये कदाचन । दृश्यते न मकरो न कार्मुकं किं च कर्किमिथुनो सदोदितौ ॥ २८ ॥ यत्र साधिगजवाजिसंमिता-७८ | १५ स्तत्र वृश्चिकचतुष्टयं न च । दृश्यतेऽथ वृपभाचतुष्टयं सर्वदा समुदितं च लक्ष्यते ॥ २६ ॥ यत्र तेऽथ नवतिः पलांशका- स्तत्र काञ्चनगिरी कदाचन । दृश्यते न भदलं तुलादिकं सर्वदा समुदितं कियादिकम् ॥ ३० ॥ अयमर्थसिप्रश्ने लम्बाधिका कान्तिरुदक् च यावत् तावदिनं सन्ततमेव तत्रेत्यादिना सम्यक् कथित एव । यत्र पश्चिकान्त कान्तितुल्यो लम्बस्तत्रेते पलांशाः ६६ |२०। तत्र धनुर्म करो क्षितिजादधः स्थितावेव ममतः। कर्किमिथुनौ तूपर्येव । यत्र तुला- - गोलाध्याये, उपपत्ति। - आचार्य ने वासनांभाप्य में सावनघटिकाओं के नाक्षत्रीकरण का कारण सवि- स्ता दिखलाया है। उस का सारांश इस प्रकार है यदि इष्टकाल सावन है तथ तात्कालिक-सूर्य से लग्न का साधन करना चा- हिए। और यदि नाक्षत्र है तब उदयकालिक-सूर्य से ही लग्नसाधन करना उचित है। उदय काल में रवि लग्न के समान होता है | उस के अनन्तर राशियों के नाक्ष- त्रोदय होते हैं । इस लिए औदयिक सूर्य के बाद जो नाक्षत्रोदय( उदय को प्राप्त) होते हैं, उन को नाक्षत्र इष्टपटिका में घटा देना चाहिए । और जिस समय लग्न के लिए इष्टयटिका सावन हैं उस समय विजातीय,सावन घटिकाओं से नाक्षत्रोदय नहीं घट सक्ते । इसी लिए उन सावन घटिकाओं का नाक्षत्रीकरण युक्तिसमत हुआ । इसीलिए ही अर्क का तात्कालिकीकरण किया गया है । अर्थात् सूर्य को तात्कालिक करने से सावन घटिकाएं स्वत: नाक्षत्रपटिका होजाती हैं । वह इस प्रकार होती है-अपने अपने अहोरात्रवृत्त में, इएकाल में, जहां प्रह स्थित है, और जो इटकाल में अहोरात्रवृत्त और क्षितिजवृत्त का योग है इन दोनों के अन्तर में अपने अहोराप्रवृत्त में जितनी घटिकाएं होंगी चे सावन घटिका है । उदयकाल में निश अहोरात्रत्त में जहां ग्रह स्थित हो वहां चिह करना, फिर उदय के अनन्तर इष्टकाल में जहाँ हो उस स्थान में चिह्न करना, इस चिह्न का और पूर्व क्षितिज में जहां विन किया है उस का स्वाहोरात्रवृत्त में जो घटीरूप अन्तर है उस को नासन घटिका कहते हैं । इस प्रकार यह यात स्पष्ट ज्ञात हुई कि सावन घटिकाओं की अ. पेक्षा नाक्षत्र घटिका इटघटी सम्बन्धि-गतिकलोत्पन्नानु के समान अधिक हैं। इस लिए सावन घटिकाओं में इष्टयटी सम्बन्धि गतिकलासुमों को मोड़ देने से सावन पटिकाएं नाक्षत्र होजायगी। गतिकलेपन्नासुओं के साधन के लिए अनुपात किया- १००० : स्वोदय ::गकः फल गतिकता सम्बन्धि असु होंगे। इन को सावनघटिकाओं में जोड़ने से नाक्षत्र होती हैं । इस प्रकार सावन घटिकाओं का नाक्षत्र काना उपपन्न हुआ । परन्तु, यहां पर औदायिक सूर्य में ही सापय से गतिकलाओं का जोड़ दिया गया है। गतिकलाओं के जोड़ने से ही औदयिक सूर्य तारकालिक होजाता है। फिर उमसे भोग्यकाल का साधन फरना उचित है । तात्कालिक भोग्यासुओं से औदयिक भोग्या मितने अधिक हैं, उतने ही इष्टपटी सम्पन्धि गतिमलोपनासु है । इसी फे समान ही इष्ट सावन और नाक्षत्र पटियाओं या अन्तर है। इस प्रकार माष. न घटिकाओं के नाक्षत्रीकरण के लिए मूर्य तात्कालिक किया गया इस प्रकार यह यात भी स्पष्ट है कि ताकालिक सूर्य और लग्न में जो पाल गाधन होगा यह सावन होगा । परन्तु परि मू और लग्न साल के होंगे - - त्रिभवासना। १६५ राशीनां पृथक् पृथक् स्वचरानि चोच्यन्ते । निरक्षोदयासवो गगनभूधरपदकचन्द्रा १६७० इत्यादयो यत्र देशे यस्य राशेः स्वचरार्धसमाःस गशिस्तदेशे सदा दृश्य इत्यत्र का युक्तिः। अन्यथा दृश्यादृश्यं सर्वं युक्तिशून्यमुक्तम् । यद्येवं तर्हि यत्र पट्प- ष्टिः ६६ पलांशास्तत्र सर्वेषां सचरोदयसाम्यं स्यात् । युगपत् सर्वेषां सदा दृश्यत्वं मेरावपि न घटते । सापाभाप्य । लल्लाचार्य का मत है कि निरक्षदेश के उदयासु जिस देश मे, जिस राशि के चराई के समान होंगे, वह राशि उस देश में सदा उदित दीरोगा। यदि यह नियम है तो ६६ अक्षांशमाले देश में उदयासु और सचराधीन राशियों के समान होने से वहां सब राशिया एक समय में उदित होंगे। परन्तु इस प्रकार नहीं होता- इस लिए यह लल्लाचार्यकथन असगत है। उपपत्ति । लल्लाचार्य का मत है कि निरनोदयासु जिस देश मे जिस राशि के चराध के तुल्य होंगे वहां वह राशि सदा उदित रहेगा । लल्लाचार्य का इलोक ऊपर प्रमा में लिसा है परन्तु यह अज्ञानमूलक है । क्योंकि ६६ अक्षाश देश में चरासु उदयासु के तुल्य होते हैं, परन्तु वहा सर राशि एक समय में उदित होते नहीं देखने में आते । जैसा- मेषादिजीवाः-, इत्यादि विधि से एकाटि राशियों की ज्याओं को परमात्पद्विज्या से गुणकर निज युज्याओं का भागदेकर, फल का चाप करन से राशियों के निरसोदयासु होते हैं । भय ६६ अक्षाशवाले दंगा में साधन के लिए अनुपात क्यिा- लन्या : अज्या :: प्राज्या : कुज्या अज्याXमरज्या अज्याxमाया त्रि गुज्या : ::ति:चरज्या:- द्युयाल ज्या इस का चाप उक्त अक्षाशनुल्य देश में चर हुआ, और यह निरक्षोदय के समान है। क्योंकि, वहांपर अक्षज्या परमाल्पाज्या के और लम्मन्या जिनया के तुल्य होने से, पर ज्या इस रूपमे क्रान्तिज्या और प्रिया के गुणन में । मेज्याxप द्यु अज्याXक्रा ज्या लज्या , पानि शुxजिउमा १६४ गोलाध्याये न्तकान्तितुल्यो लम्बस्तत्राटसप्ततिः सप्तदशकलाधिका ७८ | १: पलांशास्तत्र यश्चिकादि चतुष्टयं क्षितिजादधो वृपभादिकमुंपरि एवं मेरौ नवतिः ६० पलांशास्तत्र तुलादिपदकमधो मेपादिका मुपरीति सर्व भगोले भ्रामिते सति दृश्यते । प्रभा ज्यंशयुङ्नवरसा इत्यादयः स्फुटार्थाः । रथोडताछन्दः । भाषाभाष्य 1 जिसदेश में अक्षाश ६६ । २० हैं वहां धनु और मकर उदित हुए नहीं दीसते। और कर्क, मिपुन सदा क्षितिज के ऊपर रहते हैं और जहाँ ७६ । १५ अ. क्षांश है वहां पृश्चिक, धनु, मकर, कुम्भ क्षितिज के नीचे ही उदित होते हैं। और धूप से चार राशिया सदा क्षितिज के ऊपर उदित होते हैं। और जहाँ २० अक्षांश है अर्थात मेरु में, मेपादि छ राशि सदा उदित और तुलादि छ राशि अस्त रहती हैं। उपपत्ति। जिस देश में जिस राशि की दक्षिणकान्ति लम्यांश मे अधिक है वह राशि उस देश में नहीं दिखलाई देता । इस लिए जिस देश में ६६ । २" अक्षांश हैं यहाँ धनु और मकर को दक्षिणमान्ति लम्नांश से अधिक होने से ये दोनों राशि नही उदित होवे । इसीप्रकार मय की गोलस्थिति है ॥ २८॥ ३० ॥ इदानी लल्लोक्तस्य दृश्यादृश्यत्वलक्षणस्य दूपणमाह- सशेर्यस्य निराजोदयसमाः स्वीयाश्चरासिवो दृश्यस्तत्र सदा स राशिमिति नियुक्ति लल्लोदितम् + यद्येवं रसपद ६६ पलांशविपये सर्वेऽप्यमी सर्वदा दृश्याः स्युर्युगपञ्चरोदयवटीसाम्यादसत्तचतः ॥ ३१ ॥ एकदित्रिराशीनां चराण्ययोऽधःशोधितानि तानिचरखण्डानि + लग्नादापायों ?- पराससमा निगम वापरायोगे , राममदा तरिका रासोन्यता नीर . २ - त्रिमनवासना। १६७ उपपति। आचार्यका अभिप्राय यह है कि लल्लने जो ६६ । ३. और ७५ । । वृश्चिक मकर और कुम्भका न उदय होना दिखलायाहै सो हमारे मतसे ६६ । । और ७।५ इन अक्षांशों में भी नहीं उदयको प्राप्त होते फिर इन को ३ अंश न्यून लिखने में क्या हेतु है ! यह युक्ति विरुद्ध है और जहां ६६ । ३. अक्षांश है वहां धनुरन्त और मकरादि के कुछ अंशों की क्रान्ति लम्बाधिक होने से वह भागमात्र नहीं उदित होता और भाग दक्षिण क्रान्तिके लम्बाधिक न होने से देखने में आता है । परन्तु लल्लने इन दोनोंका उदयही नहीं माना । जैसा कि प्रभा में उनका श्लोक लिखा है। इसीप्रकार ७y अक्षांश में भी समझना पाहिये ।। ३२॥ अथाक्षलम्बज्ञानार्थमाह- यन्त्रवेधविधिनावोन्नति- नितिश्च भवतोऽक्षलम्बको। तोक्रमादिषुवदन्ह्यहर्दले येऽथवानतसमुन्नतालवाः ॥ ३३ ॥ चक्रयन्त्रेण ग्रहवेधवद्धवं विध्येत् । तत्र यन्त्रनेम्यां य उन्नता शास्तेऽशांशाः। ये नतास्ते लम्बांशाः । अथवा विषुवदिनार्धे येऽर्कस्यनतोन्नतांशास्तेऽशलम्बांशाः अथवा विषुवदिनार्धे येऽर्क स्य नतोन्नतांशास्तेऽशलम्बांशा इति युक्तियुक्तम् । भाषाभाष्य। वेधद्वारा जो ध्रुवका उन्नतांश और नतांश सिद्ध हो वही अक्षांश और लम्त्रांश लाता है । अथवा विषुवहिनके मध्याह में जो सूर्यका नतांश और उप्रवाश हो मह क्रमसे अक्षांश और लम्बांश होताहै। उपपत्ति। देशभेद से जहां वेध से धुवकी जितनी उंचाई प्रातहो वही उस देश का भ- शांश है। और स्वमध्य से अक्षांश के समान ही नाडीवृत्त दक्षिण मुका रहता । इस अक्षांश को २० में घटा देने से लम्बांश, अक्ष कोटिके समान होते हैं। स्थानीय ध्रुवको उचाई उस स्थान के अक्षांश के समान किस प्रकार होती है, इसकी युक्ति इस प्रकार है- .
१६६ गोलाघ्याये जिनज्या का भाग देने से मेपादि-राशिज्या सिद्ध होती हैं । इस लिए घरज्या- मेज्याxप छु 43; इस का चाप निरक्षोदयासु के तुल्य सिद्ध होगया ! पर यह लल्ला- धु चार्य की युक्ति उपपत्तिशून्य है । एक समय में सब राशियों का उदय मेरु में भी नहीं होता ॥ ३१ ॥ इदानीमन्यपणमाह- पट्पष्टिः सदला लवाः पलभवा यस्मिन्न तस्मिन् धनु- नक्रश्चापि न वृश्चिको न च घटः पञ्चायो७५१० यत्र च दृश्यः स्यादिति यत् सदा प्रलपितं लल्लेन गोले निजे गोलज्ञ त्रिलवोनितास्त उदिताः केनोच्यतां हेतुना॥३२॥ अत्र त्र्यंशयुङ्नवरसा इत्यादिभिर्भवितव्यम् । ६६ । २० । ७८ | १५ | एपां स्थाने एते ६६ ।३०।७५ | त्रिभिस्त्रिभि- शैरूनाः केन हेतुना लल्लेन निजे गोले पठिताः। हे गोलज्ञ तत्पोच्यताम्। प्रभा। श्राचार्येण व्यंशयुङ्नवरसेत्यादिना देशभेदेनाक्षांशान स्थिरीकृत्य या राश्युदयव्यवस्था निरूपिता, तत्रैव देशे लल्लमतेनाक्षांशास्त्रयं । शोनाभवन्ति । तथाच तदुक्ति:- 'पञ्चभिरधिका सप्ततिरंशा यस्मिन् पलस्य विषये स्युः। तत्र न वृश्चिककार्मुकमकरघटा दृश्यतां यान्ति ॥, ध्यंशोनाक्षांशकल्पनायां न किमपिधीजमित्याचार्याभिप्रायः। भाषाभाष्य। जिस देश में ६६ । ३० अक्षांश है यहां वृश्चिक और मकर नहीं उदित होते। और जहां ७७ । ० अक्षांश है यहां कुम्म उदय योनहीं प्राप्त होता । इस प्रकार जो लहाचार्य ने अपने अन्य (शिघ्यधीवृद्धिद) में पका है मो हे गोलविशारद ! नहोंने पिम कारण मे अक्षांशों को तीन अंग न्यून लिया है।
१६६
त्रिप्रश्नवासना।
च्छेदको नतु नर सलम्बवत् ।। ३४ ॥
अस्य वासना त्रिभने कयितैव ।
प्रभात
.
युनिशमण्डले अहोरात्रवृत्ते कुजादुन्नत सावनं सावनकालो भव
ति। तस्य सावनोन्नतकालस्य ज्याद्युतिविधौ ग्रहाणांछायासाधने उप
युज्यते। अस्य ज्या अक्षवशतोऽतकणवत्तियतिरश्चीना भवति । अत
श्छेदक इत्युच्यते नतु नरः शङ्खः यतः सलम्बवतीति स्फुटार्थः ।
भाषाभाप्य ।
क्षितिज से अहोरात्रवृत्त में जो प्रहोंफा उन्नतांश है वह सावन है । इस दन्नत-
चाप की ज्या ग्रहोंके छाया साधन के लिये उपयुक्त है । यह ज्या, अक्षांशवश, अ-
क्षकर्ण के समान तिरछी होती है । इसको छेद कहते हैं शंकु नहीं । क्योंकि शंकु
लम्बके समान सीधा होता है।
उपपत्ति।
जय सूर्य क्षितिज के ऊपर होताहे उस समय द्वादशागुन शंकुकी छाया और
सूर्य के सन्नताश की ज्या और उसकी कोटिज्या सिद्ध करना । फिर नीचे लिरहे
अनुपात से सब प्रहोंकी छाया अलग अलग सिद्ध होजाती है।
रउग्याः दृग्ज्या. :१२: द्वादशांगुल शंकुकी छाया ।
इसप्रकार सय ग्रह-नक्षत्रों की छाया सिद्ध होती है। यद्यपि भौमादि पञ्च
ता और नदमें की कश्या प्रकारामान नहीं होती जैसा कि सूर्य और चन्द्रकी
स्पष्ट प्रतीत होती है, तो भी अन्य ग्रहों की छाया सिद्ध करने से उस ग्रह की
दिशा मालुम होजाती है । छाया की लम्बाई और दिशा ज्ञात होनेपर छायाप्रसे
शकु मूल तक सूघ ले जाने से प्रह दिशा ज्ञात होसकेगी।
छायासाधन के लिये निर्दिष्ट काल सावन रहताहै। क्योंकि ग्रहोंके उन्नाश
निश्चय करने विना छाया नहीं जात होसकती। और उन्नवारा अहोरात्र वृक्ष के
। पाप का अंश है, जो तिदिन और प्रद के धीच में रहता है। परन्तु पाप में जो
समय रहता है यह मारनपा से मित्र नहीं होता ॥ ३४ ॥
- १६८ गोलाध्याये 'वेधक -स्थान, न अ क स्थानीय-मध्याह्न वृत्त है, जो न और क बिन्दु पर विपुत्रद्वृत्त को काटता है । यदि अप वेधानुसार ध्रुव दिशा है तव भूपेन्द्र से के प रेखा ध्रुव दिशा मे खींचना । यह रेसा पूर्व अप के समान होगी, क्योंकि ध्रुव इतनी ही दूरीपर स्थित है । वेधक का क्षितिज स्पर्शरेखा रूप अ व होगा। अब यह बात सिद्ध करना चाहिये कि कोण जो ध्रुवकी उँचाई का मान है, न अ चाप वा । इस कोण के समान है । यह । कोण अक्षाश केसमान है । इस स्थित में, अपके प और = परन्तु , कोण की कोटि और 4 कोए कोटि है इस लिये == या, ध्रुवकी उँचाई = अक्षाश । इससे यह स्पष्ट है कि ध्रुवको उँचाई में जिस क्रमसे भेद होगा उसी प्रकार अक्षांश में भी भेद होगा, जिस क्रमसे वेधकर्ता उत्तर या दक्षिण हटैगा ।। ३३ ॥ क्षेत्र य व सितिन मध्याहत्त श्री इदानीं शइकानयनवासनां संक्षिप्तामाह-- उन्नतंानिशमण्डलेकुजात सावनंातिविधौ हि त ज्यका। तिर्यगशवशतोऽलकर्णव- त्रिप्रभवासना। '२०१ शरुनतलवज्यका भवे- दृग्गएश्व नतभागशिञ्जिनी ॥ ३६॥ भास्करेऽत्र सममण्डलोपगे यो नरः स समशगुरुच्यते। कोणशरथ कोणवृत्तगे मध्यशकुरिति दक्षिणोत्तरे ॥ ३७॥ कुणगानां कुदलेन हीनं दृमण्डलार्धे खचरस्य दृश्यम् । कुच्छन्नलिप्ता नातो विशोध्याः स्वभुक्तितिथ्यंशमिताः प्रभार्थम् ।। ३८ ॥ दृमण्डले क्षितिजादुपरि ग्रहपर्यन्तं थेऽशास्त उन्नताः । खम- दधस्ते नताः । उन्नतांशानां ज्याशः नतांशज्यादृज्या। : कुच्छन्नविप्ताभिरूनः कार्यः । द्रष्टुः कुइलोच्छितत्वात् । मर्थो ग्रहच्छायाधिकारे व्याख्यात एव । भाषाभाष्य। क्षतिज से टमंडल में ग्रह का जितना उनतांश हो उसकी ज्या को श, खमध्य से जितना नताश हो उसमी ज्या को हम्ज्या कहते हैं । जप सूर्य वृत्त में हो उस समय उसका शक समश बहलाता है । इमी प्रकार वृत्त में होने से कोणशङ्कु और वक्षिणोत्तरवृत्त में रहने से मध्यश जाता है । भूटष्ठनिवासियों को ग्रहों का दृइमण्डल प्राधा दीसता है, परन्तु अमला इसमें कम रहती हैं। इसलिए छायासाधन के लिए शस्थ में, भक्ला (महमुक्ति के पञ्चदशाश के तुल्य ) घटाना चाहिए। गिर्भ से भूशीवासी, मूल्यासार्थ दे तुत्य उचे रहते हैं । भूगाना की रानी दा कहते हैं । प्रहों का जो शह सिम होता है यह भाभ से होता है परतु प्रगान में भूपृष्ट स पता लिए भागासापन में जो राह सिद्ध हो उममें दुग्धसरमा धगदने से यह राष्ट्र भूपृष्ट से रोना तया विशेष विवरण गपिताभ्यार में प्राचार्य ने किया है। कुष्माना निद करो करिनु 7xभून्याया सप्रकार है--नियो गच भूयायाम । इसमें नया माना गनिया - माता । इनादिर जिला सपिश प्रम।' गम न देनेसे गालाध्याय - इदानीं केपांचिडूपणमाह- 'चन्द्रप्रभार्थमसद्धिधिनोदितं यत् कैश्चिकृतं खलु न सत्तदसावनत्वात्। जानन्ति ये न निपुणं गणितं सगोलं तेपातु तन्त्रकरणव्यसनं वृथैव ॥ ३५ ॥ व्याख्यातमेव । प्रभा। कैचिल्लल्लादिभिः 'समयोऽमकृदेवमाध्यः' इत्यादि नास्वग्रन्थे चन्द्र स्य छायामाधनार्थममकृत्प्रकारेण य उदितकाल श्रानीतः स न समीची नः तस्यामावनत्वात । एवं स कालो घसावनोनाक्षत्रीजातः, इप्यतेतु सावन इति वैषम्यमितिमावः। भापामाध्य। फिसी पाचार्य ने पन्द्र-छाया साधन के प्रसङ्ग में चन्द्र के उदयकाल असकृत्यम से स्पष्ट किया है । परन्तु यह उदयकाल सावन नहीं सिद्ध हुआ किन्तु नाशन होगया है इसलिए असफरकर्म ठीक नहीं है । जो पूरी तौर से गणित और गोलविषय को नहीं जानते उन लोगों का अन्य बनाने का व्यसन व्यर्थ ही है+॥३५॥ इदानीं शगुस्थानमाह- दृष्टिमण्डलभवा लवा कुजा- दुन्नता गगनमध्यतो नताः। +इसका तात्पर्य यह है कि पूर्णी का सिर काने में किमाने पर अदितकाल (पार उदर से टीकासन भाकरम में किया है, द वारसा चन्द्र एन मे प्रगतमा सिमित है। परन्तु यह उनमन है। कम भिरि से सारनामा प्रशान न होगा । इस दिर साल में सक्षम नहीं है। रे सा कर और होमानी है जब द्रौदाकदीन का बाल भोकर मिर होगा पर नमाड एक बार ही निरग हा आत यस मारपर बाद HMitra'मन मार (Anth किरणवक्रीभवन। इस क्षेत्र में, प्रथम यह जान रखना चाहिये कि किसी ग्रह का किरण पृथ्वी पर पड़ा और बोच में वायुमण्डल में पड़कर सीधे मार्ग के बदले 'संप मार्ग से भूमि को पहुना । यहा पर भाघात मे पव' भाग तिरा होगया। 'प' वेधकर्ता का स्थान है, पख' समय से लम्ब रेखा है । इस संपव' किरणमार्ग भौर लम्ब रेखा से 'क' कोण उत्पन्न होता है। और फिरणवक्रीभवन कोण उत्पन्न होता है। वास्तव में किरणमार्ग 'सपट' होना चाहिए, इसलिए रिणवक्रीभवनकोण क-' के समान है । यहा पर अनुसन्धान से यह भी मानागया है कि उक्त सम्म रेखा और किरणरेखाओं के सयोगसे जो कोण उसन्न होता है उसकी ज्या में भौर रिणवत्रीभवन कोणज्या में नियत सम्बन्ध होता है। लम्बरेला भोर किरणरेखा से उत्पन कोण की ज्या को यहा पर 'नतकोणज्या' नाम से समझना पाहिए। इसलिए उक्त परीक्षित नियम के अनुसार - ज्या नतको -=नियतसम्बन्धन । ज्या क्विको अब देखना चाहिए कि सूर्य का यथार्थ स्थान 'स' है । स मे सूर्य का किरण सप सीधी रेखा से न जाकर घनवायु के कारण स प प मार्ग से तिग्या होकर जातामा 'अप' धनुष के आकार में होजाता है। इस स्थिति में 'प'वेधकता को सूर्य अपने पथार्थ स्पानसे ऊबा प स दिशा में दीन पड़ेगा । यहा पर प स रेखा पभ धनुष की पर्शरेखारूप होती है। इस प्रकार ' स पस' कोण, सूर्य के यथार्थ दिशा और किरणवीभयन से मत्सम दिशाओं के बीच में, किरणवक्रीभवन कहलाता है । इसका प्रभाय महन पत्रों पर पपने से, उनके उपनाम बदते और समभ्य से नताश घटते हैं । इम लिये धागत उन्नताशों में किरणवक्रीभवन घटाने से वास्तव उप्रतारा सिद्ध होने ₹। जब मह शिविर में होगा तर किरण वशीभवन का मान परम होगा। क्योंबिवाहर पतनरोण परम होगा । इसलिए क्षितिम में परम-फिरणवी भवन होना है और समय में वह अन्य होता है। क्योंकि हमध्यगत पद के किरण सम्बन परकर वायुमण्डत का भेदन करते हैं, इसलिए ये तिर नहीं होते हैं। सिनिन में परम-किरणवक्रीभवन का मान ३५ पला होता है। जब पातु की भक्ति और उसमें गरमी पदनी है म ममा सिलवीभवन बनगा है। . * गोलाध्याये उपपत्तिा किरणवक्रीभवन, वा ( Refraction )। येध से प्रहां के जो उन्नतांश और नतांश सिद्ध होते हैं वे वास्तविक नहीं होते। उनमें एक प्रकार का संस्कार किया जाता है तब वे यथार्थ होते हैं। इस संस्कार का नाम फिरणवक्री-भवन है। इस संस्कार का नाम और नियम प्राधीन सिद्धान्तों में नहीं लिखा है । इसका ज्ञान युरोपियन ज्योतिषियों ने वेध से प्राप्त किया है। प्रसङ्गवश उपयोगी होने से यहां पर सक्षेप से इसका निरूपण किया जाताहै । पृथ्वी जिस वायुचक्र से वेष्टित है उस वायुचम में होकर सय आकाशीय पदार्थों के किरण आकर नेत्र में लगते हैं, तब वे सय पदार्थ दिखला देते हैं । यह परीक्षा से सिद्ध हुआ है कि जय किसी घनपदार्थ के द्वारा किरण पृथ्वी पर श्राते हैं तय अपने मार्ग में सीधे नहीं अति, वफ होकर पाते हैं। क्योंकि पृथ्वी के आस पास की घन वायु से टकर खाजाने से भूमि पर तिरछे होकर गिरते हैं। अर्थात् वेधकर्ता की तरफ वक्र होकर धनुष के रूप में वे किरण भूमि से संपोग करते हैं। इस प्रकार घायु की आपातशक्ति से, जो वैध से प्रह की दिशा ज्ञात होती है उस में अन्तर पड़ता है। और इसी कारण से उसके येध सिद्ध उमताशों में भी भन्तर पड़ता है। क्षेत्र नाममराह २०४ गोलाध्याये . क्षितिज मेकिरणवक्रीभवन ३५ कला होकर फिर कम से घटताजाता है और ४ भंश उभवांश में केवल ५८ रहजाता है । भव किरणवीभवन या घटना और बढ़ना किस नियम से होता है, इस का निश्चय करना चाहिए । इसलिए यह सिद्ध करना चाहिए कि किरणयक्रीभवन इस मसे बदलता है, जिस फ्रमसे नमध्यनतांशकी स्पर्शरेखा यदलती है । फल्पना किया, स भ प किसी प्रहका 'प' वेधकर्ता तक किरणमार्ग है, सम उस पद की विशाप से होगी । 'ज' कोण और 'क' कोण का योग खमध्यनतांश के तुल्य होगा। और 'स असं' कोण किरणवफ्रीभवन-4, के हैं। क्षेन भय पूर्वरीति के अनुसार, श्या नतको ज्याक्विको ज्या (ज+) क्याफ यक्ष ज्या (ज+फ)-ज्यान, फ ख -न. 24 चा, TIMIT गामा भूमि ज्याज x यो ज्याय, + पोरयाज + जगाय, न ज्या ज. परन्तु यहापर 'पोण का मान यहुत छोटा है और त्रिकोणमिति के भनुसार किमी प्रति अस्पोण को कोटिग्या = १ होती है और रग्य, चाप. और उसी ज्या उसके वृत्तात्मक मान के तुल्य होते हैं। ज्याकफ भोर पोज्या फ% इमलिए ऊपर पा समीकरण योभा- पाज+फ ४ पोज्या जन ज्या ज; ... फx फो ज्यान ज्यानज -याज = (1-2)या जा अथवा, क% (-१)सज. योज्यान पहि, म-१८ . किरणवक्रीभवन । तदन्तरेक्यं समवृत्तखेट- मध्यांशजीवां भुवि बाहुमाहुः ॥ ४१ ॥ हरज्यां श्रुतिं चाथ तयोस्तु कोटिं पूर्वापरां वर्गवियोगमूलम् । क्षितिजस्याहोरात्रवृत्तसंपातयोर्वद्धं सूत्रमुदयास्तसूत्रम् । ग्रह स्थानाल्लम्बः शङ्कः । तस्य तलमुदयास्तसूत्रादक्षिणतो भवति । यतः क्षितिजादुपरि दक्षिणतोऽहोरात्रवृत्तं गतम् । अधस्तूत्तरतो गतम् । अतो निश्युत्तरं नृतलम् । अथ भुज उच्यते । उत्तरंगोले ऽयोत्तरं नृतलं याम्यमतस्तेनोनागा बाहुर्भवति।वाहुर्नाम शामूल- पाच्यपरसूत्रयोरन्तरम् । यदाग्रा शतलादूना तदा तयोरन्तरं द- क्षिणं शडतलं बाहुः स्यात् । एवं समवृत्तप्रवेशादुपरि । दक्षिण गोले त्वग्रा याम्या शतलं च याम्यं तयोर्योगे कृते वाहुः स्यात् । रविसममण्डलयोरन्तरांशानां ज्या वाहुः । तत्र या दृग्ज्या स कर्णः। तयोवर्गान्तरपदं पूर्वापरा कोटिः। । मापाभाप्पा - क्षितिज में भहोरात्रवृत्त और सममण्डल के मध्यभाग की पायो भप्रा पाहत हैं। यह अप्रा पूर्व पश्चिम दिशा में हुआ करती है। पूर्व और पश्चिम दिशाकी भाभी के अपमें जो सूत्र बाधा आता है उसको उद्यास्त-मूत्र कहते हैं । दिन में राहुतल उदयाम्त-सूत्र से दक्षिणदिशा में होता है । क्योंकि तितित र दक्षिणमे भहोरात्रहत्त में स्थित रहता है। इसी प्रकार रात्रि में उत्तर दिशामें भहो: गत राता है इसलिए शहरात उदयास्तसूत्र से उभर होता है । इस प्रकार गतलपी स्थिति युक्तियुक्त कहोगई है। उत्तर दिशा में मारे अप होने से राहततकी दक्षिण दिशा और दक्षिण में होने गगन दक्षिण दिशा का होता है । इन रोना शाहगना का योग-वियोग भुज २०६ गोलाध्याये किरणवक्रीभवन-सारणी । मापम मध्यम वेधोन्नतांश पक्रीमपन. वेधीनतांश. वक्रीभवन . o ४५ ३५ ३० २० . ५२ २३ ६ ४ ५ १४ . २० ३२ . Gaxcww-०.०० २५ ३ . २२ 4 २३ २० ४५ 20 ६० . . ५० १० १० . . इदानीमग्रामुदयास्तसूत्रं चाह- माजे झुरात्रसममण्डलमध्यभाग- नीवारका भवति पूर्वपराशयोसा। भग्राग्रयोः प्रगुणमत्र निवद्धसूत्रं यत्तददन्ति गणका उदयास्तसूत्रम् ।। ३६ ॥ सूत्रादिवाशातलं यमाशं याभ्यां गतं हि युनिशं कुजोर्चे । भधश्च सौम्यां निशि सोम्यमस्मात् सयुक्तियुक्त नृतलं निरुक्तम् ॥ ४०॥ सौम्याग्रकाप्रान्नृतलं हि याम्य याम्याग्रकारात्पुनरेव याम्यम् ।
त्रिप्रश्नवासना। २०६ मिद्ध होगे उनमें प्रम मे का, दूसरा दो गाशियों का, तीसरा तीन गशियों का होगा। इन में तीसरे में दूसरा उदयकाल और दूसरे में पहिल घटा देने से अलग अला निरसोदयास सिद्ध होंगे। ये मान्तिक्षेत्र गोलमें स्पष्ट दीखते हैं ॥ ४२-४४॥ अयासक्षेत्राण्याह- भुजोशमा कोटिरिनाङ्गुलोना कर्णोऽशकर्णसिभुजं यथेदम् । तथाशलम्बौ भुजकोटिल्पी त्रिज्या श्रुतिर्दक्षिणसौम्यवृत्ते ॥ ४५ ॥ उन्मण्डले प्रागपरोत्थसूत्रात् क्रान्तिज्यका कोटिस्थ छुराने। कुज्या भुजोऽग्रा जितिजे च कर्णः क्षेत्रं तथेदं त्रिभुज प्रसिद्धम् ॥ ४६ ॥ अग्रा अजः स्वे समना च कोटि- द्यरात्रके ततिरत्र कर्णः। भुजोपमज्या समना च कर्णः कुज्योनिता तद्दतिख कोटिः॥४७॥ उद्धृत्तना दोरपमः श्रुतिः स्या- दग्रादिखण्डं खलु तत्र कोटिः। उदृत्तना कौटिस्थाग्रकार- खण्ड भुजस्तच्छ्रवणः क्षितिज्या ॥४॥ कोटिर्नरः शडतलं च बाहु- श्छेदः श्रुतिस्त्यामसहस्रमेवम् । इत्पाद्य सद्यः स्फुटगोलविद्ये- - गोलाभ्याये कहलाता है यह भुज क्षितिज के ऊपर सममण्डल और प्रहस्थान के भन्तर की ज्पा-रूप है । महकी हग्ज्या कर्ण और भुज-कर्ण का घर्गान्तर-मूल पूर्वापर कोटि होती है । ३६-११॥ इदानीं क्रान्तिक्षेत्राण्याह- क्षेत्राणि वक्ष्येऽपमसंभवानि संक्षेपतोऽक्षमभवाणि चातः॥ ४२ ॥ भुजोऽपमः कोटिगुणो शुजीवा कर्णत्रिभज्या त्रिभुजोपमोत्थे। मेपादिजीवाः श्रुतयोऽपवृत्ते तदभूमिजे क्रान्तिगुणा भुजाः स्युः॥ ४३ ॥ तत्कोग्यः म्वानिशाख्यहत्ते व्यासार्धपत्ते परिणामितानाम् । चापेयु तासाममबस्ततो ये तेश्रो विशुद्धा स्दया निरक्षे ॥ ४४ ॥ स्पष्टम् । एपां क्षेत्राणामुपपत्तिः स्पष्टाधिकारे दर्शितैव । भापामाप्य। मम सोप से फ्रान्तिक्षेत्र यहते हैं। पनन्तर भक्षक्षेत्र पहेंगे। मान्तिज्या भुज, पुज्यायोटि, त्रिज्यापर्ण यह प्रथम शान्तिक्षेत्र है। मेष, वृष, मिथुन इत्यादि राशियों पी-ज्या प्रान्तिवृत्त में पूर्ण होते है । भौर इनकी मास्ति पपा उन्मएरत में भुज और गिज अहोरात्रत्तों में कोटि होगी। इन उपाभोंका निग्यारा में परिणामन पागे मे उनके पापोंका भमु को सिद्ध होगा उतना काल निरत में राशियों के उदय में लोगाम अपार जो दफान + सत्र में, 'स' सूर्य, ' लिदिन में उदारपारा, • उर' उदयास सूत्र, अ' प्रमा, मुड' गातुन । पहार सग भुन, नम कर और जगहमी मित्राय सरस भी पाए-'पटिग्दा | . त्रिप्रश्नवासना। ये आठ अक्षक्षेत्र हैं । इसीप्रकार विद्वान लोग भौर हजारों क्षेत्र कल्पना करके, निज शिष्यों को भलीमाति बतलाएँ। उपपत्ति। G । . J . 1 ये सन क्षेत्र नीचे लिसे क्षेत्र में स्पष्ट प्रवीत होते हैं । सत्र क्षेत्र परस्पर में अनुपातीय हैं । इसलिए एकके झानसे अनुपातद्वारा सब ज्ञात होजाते हैं । 'अ क ग घ' स्थानीय मध्याह्नवृत्त है । क क प क्षितिज, अ खमध्य, 'पव' क्रम से उत्तर, दक्षिण ध्रुव, च के फ नाड़ीवृत्त, 'घर जन्मण्डल, म फ द अहोरातत्त, च य और फ ह क्षितिजरेखा पर लम्ब है। अक्षज्या. समशङ्क. तद्वृति, निघ्या. कुश्योनदृति. अग्रा, उन्मण्डलशक. अप्रादिखण्ड, कुज्या. भप्रामखण्ड, इसप्रकार. सब अवयव स्पष्ट हैं। कय * . लम्रज्या, 1 चय । कच . फग %3D . - . कफ कातिया. - म निमेव यो भूपृष्ठ यो लम्बितो चन्द्रग्रहेतु लम्ब- 7 गोलाध्याय- श्छात्राय शास्त्रे प्रतिपादनीयम् ॥ ४६॥ मथक्षेत्राणां साधनानामाद्युपपत्तिस्त्रिप्रश्ने दर्शिता। इति श्रीभास्करीये गोलमाष्ये मिताक्षरे त्रिपश्नवासना भत्र ग्रन्थसंख्या १६०॥ प्रभा। एवममुना प्रकारेण त्यसाणा त्रिकोणक्षेत्राणा सहस्र नानाविध- मित्यर्थः । स्फुटा स्फीता गोलविद्या येषां तैः । सद्यः सत्वरमुत्पाद्यावि- कृत्य, छात्राय, छत्रं गुरोःपाणामावरणं तच्छीलमस्येति, 'छत्रादि- भ्योणः' इति णः । तस्मै निजविद्यार्थिने इत्यर्थः । प्रतिपादनीय विविच्यकथनीयमिलि। इति प्रभायां निप्रश्नवासना । भापामाध्य। भय अक्षत्र कहते है (१) द्वादश योटि, परमान, पररणरण, (२) रम्नग्या कोटि, अक्षयाभुग, निग्यारणं । यह क्षेत्र ममाहवृत्त धरातल में होता है। (३) फ्रान्तिक्या वोटि, युज्या भुज, अमारण (४) ममशङ्ख कोटि, अमाभज, ननिवर्ण । (५) कुज्योतिदृतियोटि, मानियाभुन, मम शडकर्ण । (६) अमारिसण्ड कोटि, उ-मण्ड (७) उन्मण्डनगरकोटि, अप्रामखण्टभुज, पुग्यापर्ण । (८) शोटि, शर्तलभुन, छेद वा तिर्ण । इस क्षेत्रमें आर (४) इममें यह भद किर मूस ममर 17 ht मागी परतु जब मर ममसर-7 में नहीं अगर उस समय नुन वरी RA होगा TRP म उनको गास रीति से गरार, "हा है | । लण्डरशाभुज, मान्तिग्यापर्ण । - । ५व' । । . . क्रम त्रिभवासना । आठ अक्षक्षेत्र हैं.। इसीप्रकार विद्वान लोग भौर हजारों क्षेत्र कल्पना करके, निज शिष्योंको भलीभांति बतला. • उपपत्ति। ये सब क्षेत्र नीचे लिखे क्षेत्र में स्पष्ट प्रतीत होते हैं । सत्र क्षेत्र परस्पर में अनुपातीय हैं । इसलिए एकके झानसे अनुपातद्वारा सब ज्ञात होजाते हैं। 'अ क ग घ' स्थानीय मध्याह्नवृत्त है । क क घ क्षितिज, अ खमध्य, से उत्तर, दक्षिण ध्रुव, च कफ नाडीवृत्त, 'पकर उन्मण्डल, म फ द अहोरात्रत्त, च 4 और फ ह क्षितिजरेखा पर लम्ब है अक्षज्या, = .समशङ्क लम्बध्या, तवृति. निज्या. कुध्योनदृति. उन्मण्डलश. क्रांतिज्या, कह अप्रादिपण्ड, कुज्या. भप्राप्रखण्ड, इसप्रकार. सत्र अवयत्र स्पष्ट हैं। . + 'कइ कब 1 । . कच - . अग्रा, फग . फफ । = । . फग 8 (it प नमेव यो भूपृष्ठ यो लम्बितो लम्ब - २१५ गोलाध्याये एक क्षेत्र के तीन अवयवो से अनुपातद्वारा दूसरे के अवयव ज्ञात होजाते हैं +इस विधि की विशेष व्याख्या आचार्य ने गणिताध्याय में की है ।।४५-४९॥ त्रिप्रवासना समाप्त हुई। अथ ग्रहणवासना । चन्द्रार्कग्रहणयोः स्पर्शी मोक्षे च दिव्यत्य यस्योपपत्तिमाह- पश्चाभागाज्जलदवदधः संस्थितोऽभ्येत्य चन्द्रो भानोविम्वं स्फुरदसितया छादयत्यात्ममूर्त्या । पश्चात्स्पर्शो हरिदिशि ततो मुक्तिरस्यात एव कापिच्छन्नः कचिदपिहितो नैप कक्षान्तरत्वात् ॥ १॥ अकादधश्चन्द्रकला । यथा मेघोऽधःस्थः पश्चाद्भागादागत्य रविं छादयति । एवं चन्द्रोऽपि शीघ्रत्वात् पश्चाभागादागत्य रविं छादयति । ततःपश्चात् स्पर्शःनिःसरति चन्द्रे पूर्वतो मोक्षो वः। अत एव कक्षाभेदात् कचिदर्कश्छन्नो दृश्यते कचिदेष न छन्नः। यथाधस्थे मेधे कैश्चिद रविन दृश्यते कैश्चिद् दृश्यते प्रदेशा- न्तरस्थैः। प्रमाण स्फुरत प्रत्यक्षायितमसित श्यागं यस्यारतया। छादयति आ. गोति । मुक्तिः, मुच् भावे तिन् । मोक्षः। +इन अनुपातीयोगहन से गोडीयधिगमति गायिका रे तन में मिम नाते हैं। उदाहरपीसी गप का सममता बार मध्याहदाय है। उस पार या पाश या रोगा! रमन रमा, यो मन अाय विभून मा अब 14. नत्र, या, यन या पाया रमTERNET'। तर मV+R-5), औ, परमज :..च() 4. अ.३१॥ अनि स+(4-1 भगमी. पर.. दो र गगता में for - .
ग्रहणवासना। २१३ भाषाभाष्य। हक जिस प्रकार मेघ सूर्यको ढंकलेता है वैसेही-चन्द्र पीछे की तरफ से आकार सूर्यविम्ब को अपनी श्याममूर्ति से ढंकलेता है । इसलिए सूर्यग्रहण में पश्चिम दिशा में स्पर्श और पूर्व दिशामें मोक्ष होता है । चन्द्र सूर्य के पक्षाओं के भेद्र से सूर्य किसी देश में आच्छादित दीसताहै और कहीं नहीं जैसे जिनके सूत्र में मेघ आमाता है उनको सूर्य नहीं दीसता औरोंको दीखता रहताहै। अर्थात् देशभेद से सूर्य ग्रहण होता है , एकवारमें सर देगोंमें नहीं हुमा करता ॥ १ ॥ इदानी नतिलम्बनयोः कारणमाह- पर्वान्तेऽर्क नतमुडुपतिच्छन्नमेव प्रपश्ये- भूमध्यस्थो नतु वसुमतीपृष्टनिष्ठस्तदानीम् । तहक्सूत्राद्धिमरुचिरधो लम्बितोऽर्करहेऽतः कक्षाभेदादिह खलु नतिर्लम्बनं चोपपन्नम् ॥ २॥ समकलकाले भूभा लगति मृगाङ्के यतस्तयाम्लानम् । सर्वे पश्यन्ति समं समकक्षत्वान्न लम्बनावनती ॥३॥ पूर्वाभिमुखो गच्छन् कुच्छायान्तर्यतः शशी विशति । तेन प्राक् प्रग्रहण पश्चान्मोक्षोऽस्य निःसरतः ॥ ४ ॥ भानोविम्वपृथुत्वादपृथपृथिव्याः प्रभा हि सूच्यग्रा । दीर्घतया शशिकक्षामतीत्य दूर वहिर्याता ॥ ५ ॥ अनुपातात् तदेयं शशिकक्षायां च तविम्वम् । भूमेन्दोरन्यदिशि व्यस्तः क्षेपः शशिग्रहे तस्मात् ॥ ६ ॥ दर्शान्तकाले रविं पूर्वतः पश्चिमतो वा नतं चन्द्रेण छन्नमेव प्रपश्यति भूमध्यस्थो द्रष्टा । यतो दर्शान्ते समौ भवतः। यो भूपृष्ठ स्थोस तदार्क छन्नं न पश्यति । यतस्तदृष्टिसूत्राचन्द्रोऽधो लम्बितो भवति । अतःकक्षाभेदालम्बनं नतिश्चोपपद्यते । चन्द्रग्रहेतु लम्ब- A गोलाध्याये ननत्योरभावः । यतःसमकलकाले भूभाचन्द्रे लगति । तया चनं सर्वे विदेशान्तरस्था अपि नतमपि तं चन्द्रं समं पश्यन्ति । यत स्तत्र छाद्यवाद्यकयोरेकैव कक्षा जाता। तथा भूभा तावत् पूर्वाभि मुखमर्कगत्या गच्छति । चन्दश्च स्वगत्या । स शीघ्रत्वात्पूर्वाभि मुखो गच्छन् भूभां प्रविशति । तेन तस्य प्राक् स्पर्शः। भूभाया निः सरतः पश्चान्मुक्तिः । भानोविम्यं विपुलं पृथ्वी लघुः । अतो भूभा सूच्यया भवति । दीरत्वे चन्द्रकक्षामतीत्य दूरंगता। तदेय- मनुपातात्साध्यते । चन्द्रकशाप्रदेशे भूमा चन्द्रविम्वं चेति सर्व ग्रहणे प्रतिपादितमेव । प्रभात दर्शप्रतिपदो पूर्णिमाप्रतिपदोः सन्धिः पर्वेत्युच्यते । वसुमती- पृष्ठनिष्ठः भूपृष्ठस्थ इति । मृग अङ्को यस्यासौ मृगाङ्कः शशी । वि- शति, विश, प्रवेशने वर्तमाने लट् । प्रभा, प्रपूर्वकाद्भाधातो वे अङ् छाया । इन्दोः सकाशाद्भूभान्यदिशि भवति ततः क्षेपः शरो व्यस्तो देय इत्यर्थः। भाषाभाष्य । भूगर्भनिगासी नत सूर्य को पूर्वान्तकाल में आच्छन्न देखते हैं, परन्नु प समय भूपृष्ठवासी नहीं देखते, क्योंकि उनके यूसूत्र से चन्द्र लम्बित रहता है इसप्रकार कक्षाओं के भेदसे लम्बन और नति उपपन्न होो है। मिस समय सूर्य और चन्द्र की स्फुट कला समान होती है, उस समय भूभा चन्द्रविम्म में प्रवेश करती है। उससे चन्द्रनिम्न मलिन, निस्तेज सको समान दिखाई देती है । क्योंकि लम्पन और नतिमा अभाव होने से चन्द्रग्रहण राण देशों में दिखाई देता है । चन्द्र पूर्वाभिमुग्न गमन करता हुआ भूछाया में प्रवेश फरता है इसी लिए चन्द्रग्रहण में प्रथम पूर्व दिशा में प्रहणका आरंभ और पश्चिम दिशा में मोश होना है। -
ग्रहणवासना।
सूर्यनिन्न के बड़े और भूबिम्बके छोटे होने से भूमिको छाया सूची के समान
सूक्ष्माप्र होती है । और लम्बी होने के कारण चन्द्रकक्षा के बाहर दूर पली
जाती है।
इस भूभा की लम्बाई और चन्द्रकक्षा में भूभा का प्रमाण अनुपात से सिद्ध
होता है । चन्द्रसे विपरीत दिशा में भूभा होती है इसलिए शरफा दान विपरीत
होता है।
उपपत्ति ।
चन्द्रकक्षा में भूभाबिम्य का सावन आचार्य ने गणिताध्याय मे लिया है।
उसका निरूपण यथास्यान होगा । यहापर सुगमता के लिए यही घात प्रकारा.
न्तर से क्षेनद्वारा लिखी जाती है।
(१) चन्द्रकक्षा में भूछाया के पास का साधन इसप्रकार हैं । भूछाया फा
फोणात्मक व्यास म न चाप है । उसमा कोणार्थ म भ प जो भूकेन्द्र में म न पाप
के मम्मुख है।
अब, अ-भूकेन्द्र । प-सूर्य का परमलम्बन भ अ क । चन्द्रका परम सम्पन
भ म च, या, भ क व । स-सूर्य व्यासार्थ से उत्पन्न भूमेन्द्रग कोणमान स ग अ ।
03 व य, भगया कोणार्धमान ।
क्षत्र,
7
इस क्षेत्र में क्षेत्रमिति ( अ १ प्र. ३२) से सिद्ध हुभा-
म+4. अ-4-.
इसीकारण से, स-4;
24-(स-4)-प-म
परन्तु 'ए' और स का मान शा, इमरिण २ भ, म न पाप का ममुख
भकेन्द्रग कोण निम्पिा दुभा ।
गोलाध्याये इसी प्रकार चन्द्रप्रवेशकाल सम्बंधि भूछाया का व्यासार्ध अर्थात् 'कय' भी सिद्ध होसकता है । यह व्यसार्ध 'प-प+स' के समान है । क्योंकि क्षेत्रमिति .. (अ १ प्र. ३२) सें-- कभ स-4+0=d-प+स. २) ऊपर के क्षेत्रमें भ व अर्थात् भूपेन्द्र से भूछायान तक भूभा फी लम्बाई है। इसका मान भी भूठ्यासार्ध और भूछायाकोणार्ध मान ज्ञात होनेसे सुगमहै । जय, 8 कोण छोटा ( अर्थात् स-4 ) है उस स्थिति में कल्पना होसकती है कि भूव्यासार्ध किसी वृत्तके चाप के समान है जिसका केन्द्र और व्यासार्ध व3; और व है। इसप्रकार सिद्ध होता है- त्रि *२०६२६५५ भव २०६२६५"त्रि २०६९६५ त्रि। ... भव: यहां पर भूध्यासार्ध ४००० मील 'स' रविव्यासार्ध-कला १६ वा ९६० भौर पर रविका लम्पन 'मानने से- २०६२६५+४८०० मील = ८६०,००० मील प्राय: १६०-८ भूभा पी उँचाई गिद्ध होती है ॥२-६॥ इदानी छादकनिर्णयमाह- छादकः पृथुतरस्ततो वियो- बखण्डिततनोविपाणयोः। कुण्ठता च महती स्थितियतो लक्ष्यते हरिणलक्षणग्रहे ॥७॥ अखण्डिततनोविपाणयो- * एक पसिी में १,२६६,...यश्चित गरिएका के समाा परिषिरात में ही। और "बिग विम्यानुराग लिटती है। 1286... শিবল १.१६...
ग्रहणवासना। स्तीक्ष्णता भवति तीणदीधितेः। स्यात् स्थितिलघुरतो लयुः पृथक् छादको दिनकृतोऽवगम्यते ॥ ८ ॥ दिग्देशकालावरणादिभेदा- नच्छादको राहुरिति ब्रुवन्ति । यन्मानिनः केवलगोलविद्या- स्तत्संहितावेदपुराणवाह्यम् ॥ ६॥ राहुः कुभामण्डलगःशशाङ्क शशाङ्कगश्चादयतीनविम्वम् । तमोमयः शम्भुवरप्रदानात् सर्वागमानामविरुद्धमेतत् ।। १०॥ अर्कच्छादकाचन्द्रच्छादकः पृथुतरोऽवगम्यते । कुतः । यतो खण्डितस्येन्दोर्विपाणयोः कुण्ठता दृश्यते स्थितिश्च महती । अक्रस्य पुनरर्धखण्डितस्य तीक्ष्णता विपाणयोःस्थितिश्च लबी। एतत्कारणदयान्यथानुपपत्यार्कस्यछादकोऽन्यः। स च लघुः। एवं रवीन्दोन छादको राहुरिति वदन्ति । कुतः। दिग्देशकालावरणा दिभेदात् । एकस्य प्राक् स्पर्शः । इतरस्य पश्चात् । खेः कापि ग्रहणमस्ति कापि नास्ति । कापि दर्शनादग्रतः कापि पृष्टतः। । अतो राहुकृतं न ग्रहणम् । नहि वयो राहवः । एवं के वदन्ति । केवलगोलविद्यास्तदभिमानिनश्च । इदं संहितावेदपुगणवाह्यम् । यतः संहितासु राहुरष्टमो ग्रहः । स्वर्भानह वा ग्रासुरः सूर्य तममा विव्यारेति माध्यन्दिनी श्रुतिः। सर्व गङ्गाममं तोयं सर्व ब्रह्मसमा दिनाः।
गोलाध्याये सर्व भूमिसमं दानं राहुग्रस्ते दिवाकरे ॥ इत्यादिपुराणवाक्यानि। अतोऽविरुद्धमुच्यते। राहुरनियतगति स्तमोमयो ब्रह्मवरमदानाद्भुभां प्रविश्य चन्द्रं छादयति चन्द्रं प्र- विश्य रविं छादयतीति सर्वांगमानामविरुद्धम् । प्रभा। । भतिशयेन पृथुरिति पृथुतरः । अर्ध खण्डितं तनुः शरीर बिम्ब यस्य सः तस्य । विपाणयोः शृङ्गयोः कुण्ठता मान्य तथा स्थितिश्च महती भवति । एवं चन्द्रोपरागे स्थितिः । तीक्ष्णाः खसः दीधि- तयोरश्मयो। यस्य खेरित्यर्थः । विषाणयोरतीक्ष्णतास्थितिश्च लध्वी। एवं सूर्याचन्द्रमसोरूपरागे स्थितिभेदाच्छादकस्य पार्थक्यं रफुटमवयु द्यते । केवला गोलविद्या येपान्ते गोलकपक्षपातिन इत्यर्थः । संहि- ताश्च वेदाश्च पुराणानि च तेभ्यो याह्य वहिभूतं विरुद्धमिति यावत् । अयमर्थः संहितावेदपुराणेपु राहुकृतं ग्रहणं दृश्यते यथा हि ऋग्वेदस्य चतुर्थाष्टके द्वितीयाध्यायस्य द्वादशवर्गे- 'यं वै सूर्य स्वर्भानु- स्तमसा विध्यदासुराः। मनयन्तमन्वविन्द-- नांऽत्ये अशक्नुवन् । एपमन्यत्रापि । यद्यपि वराहमिहिराचार्यण वृहत्संहितायां राहुचा. राध्याये सविशेषराहुनिराकृतस्तथाप्याचार्योंक्तिः प्रौढिवादमूलि केति न हि सर्वशरीरुता । इत्थं च प्रकृते वासनाभाप्ये यदाचार्यः समाहिसं त- देव सर्ववादिसम्मतमिति। - ग्रहणवासना। २१६ भाषाभाष्य। - चन्द्रग्रहण में छादक बड़ा होता है इसलिए चन्द्र के दोनों शृन भन्द और भदणका स्थितिकाल बड़ा होता है। इसीप्रकार सूर्यग्रहण में छादक के छोटा होने से सूर्य के शृगाम तीसे होते हैं और प्रणस्थितिकाल छोटा होता है । इस से चन्द्रसे सूर्य का छादक भिन्न ज्ञात होता है। दिशा, प्रदेश, काल और आवरण के परस्पर भेद होने से बहुत से मानी और गोल के पक्षपाती विद्वान् राहु को छादक नहीं कहते । परन्तु यह मत वेद, पुराण और सहिता के मतसे विरुद्ध है इसविषय में सर्वसम्मत पक्ष यह है कि ब्रह्मा के वरदान से राहु चन्द्रमण्डल में प्रविष्ट होकर सूर्य का और भूभा में प्रवेश करके चन्द्र का आच्छादन करता है ॥ ७-१०॥ इदानी ते लम्बनावनती कुतो हेतोः कुत इति कुदलेन साध्ये ते इत्यस्य प्रश्नस्योत्तरमाह- यतः क्योंच्छितो द्रष्टा चन्द्रं पश्यति लम्बितम्। साध्यते कुदलेनातो लम्बनं च नतिस्तथा ॥ ११ ॥ स्पष्टम्। प्रभा। भूपृष्ठनिष्ठो द्रष्टा भृव्यासाधनोच्छुितःवक्सूनाहिधुमधो लम्यितं पश्यतीति लम्बननती भूव्यासार्धन साधिते इति । .. भापभाप्य । भूप्रष्ठनिवासी द्रष्टा अपने एक्सूत्र से चन्द्रको लटका हुआ देखता है इसलिए भूव्याधि से लम्बन और नवि का साधन किया जाता है ॥ ११ ॥ इदानी बोलावबोधार्थ छेद्यकमकारेण लम्बनमाह- इष्टापवर्तितां पृथ्वीं कक्षे च शशिसूर्ययोः । भित्तौ विलिख्य तन्मध्ये तिर्यग्रेखां तयोर्ध्वगाम ॥ १२ ॥ तिर्यग्रेसायुती कल्प्यं कक्षायां क्षितिजं तथा।
२२० गोलाध्याये ऊर्ध्वरेखायुतो खार्ध दृग्ज्याचापांशकै तौ ॥ १३ ॥ कृत्वार्केन्दू समुत्पत्तिं लम्बनस्य प्रदर्शयेत् । एकं भूमध्यतः सूत्रं नयेचण्डांशुमण्डलम् ॥ १४॥ द्रष्टुर्भपृष्ठगादन्यदृष्टिसूत्रं तदुच्यते । कक्षायां सूत्रयोर्मध्ये यास्ता लम्बनलिक्षिकाः॥ १५ ॥ गर्भसूत्रेसदा स्यातां चन्द्रार्को समलिप्तिको । दृक्सूत्रालम्वितश्चन्द्रस्तेन तल्लम्बनं स्मृतम् ॥ १६ ॥ हरगर्भसूत्रयो रेक्यात्खमध्ये नास्ति लम्बनम् । स्पष्टार्थमपि स्वरूपमा व्याख्यायते । कुदलेनोच्छ्रितो द्रष्टा दृङ्मण्डले स्वस्थानोन्नतं ग्रहं पश्यति । अतस्तज्ज्ञानार्थं पृथिवी व्यासार्धस्य योजनानि कक्षाव्यासार्धस्य च योजनान्येकेन केन चिद्धरण छित्त्वा तेन प्रमाणेन भित्तौ विलिखेत् । एतदुक्तं भवति । भूव्यासः कुभुजङ्गसायकभू १५८१ मितानि योजनानि। एतानि केनचिन्महता हरेण छिन्नानि । तद्दलं भूव्यासार्धम् । तेनैव छेदेन चन्द्रार्ककक्षाव्यासार्धे चिन्ने । ते तव्यासाधं भवतः । एवं कृत्वा. भित्तावुत्तरपार्श्वे विन्दं कृत्वा तस्मादिन्दो व्यासार्धन भूवृत्तं कृत्वा कक्षाव्यासार्धाभ्यां कक्षावृत्तेच.कार्थे । तस्माद्विन्दोरुपरेखा तिर्यग्रेखा च कार्या । तिर्यग्रेखा यत्र कक्षायां लग्ना तत्र क्षितिज करप्यम् । ऊर्ध्वरेखा यत्र लग्ना तत्र खमध्यं कल्प्यम् । एवं चन्द्र कक्षायां रविकतायां च । ते च कक्षे भगणांशे ३६० रहनीये ते चन्द्रार्कयोईइमण्डले । यथ दर्शान्तस्य या दृग्ख्या तथा पांशः खमध्यानतो विन्दुः कार्यः । एवं चन्द्रमायामपि ताबदिरे व नताशेः। तो विन्दू रविचन्द्रो करप्यो । अप भूमभ्याटविविन्द्र अहणवासना। --- गामिनी रेखा कार्या सा रेखा चन्द्रं भित्त्वा रविं याति । अथ भूपृष्ठ- गाद्रष्टुरन्या रेखा रविविन्दु नेया सा रेखा चन्द्रे न लगति। तयोः सूत्रयोरन्तरे चन्द्रकलायां याः कला दृश्यन्ते ता लम्बनलिसाः। अथवा द्रष्टुश्चन्द्रविन्दूपरिगता रेखा रविकक्षायां नेया तत्र सूत्रयो- रन्तरे याः कला दृश्यन्ते ता वा लम्बनलिप्तास्तुल्या एव भवन्ति । भूगर्भाद्या नीता रेखा तद्गर्भसूत्रम् । समकलो चन्द्रार्को तत्र सदैव भवतः । अथ या, रेखा द्रष्ट्रविविन्दं नीता तहक्सूत्रमुच्यते । दृक्सूत्राचन्द्रो लम्वितो भवति । अतस्तल्लम्बनम् । अथ यदा चन्द्रा- कर्को खमध्ये भवतस्तदा गर्भदृष्टिसूत्रयोक्यमतस्तत्र लम्बनाभा- वः । इयं दृमण्डले लम्बनस्योपपत्तिर्दर्शिता। भाषाभाष्य। भन्यासा और कक्षायोजन के व्यासाधों को किसी एक इष्ट असे अपवर्तित करके भीत में लिसना । उस में पूर्वापर और याम्योत्तर रेखा करनी । याम्योसर रेखा और कक्षावृत्त का जहां सम्मात हो वह क्षितिज और पूर्वापर रेखाके साप कत्तावृत्त का जहां सम्पात हो वह समध्य कल्पना करना । सूर्य और चन्द्र को निम कक्षावृत्तों में दृग्ग्याचापांश के तुल्य लम्यित कल्पना करके लम्बनकी उपपत्ति दिस्खलाना। भूगर्भ से एक सूत्र सूर्यबिम्ब को लेजाना, दूसरा भूपृष्ठ से वहीं लेगाना, इन सूत्रों को दक्सूत्र कहते हैं । इन फा कक्षात्त में जो अन्तर है वह लम्बनकला है। गर्भसून में सूर्य, चन्द्रकलात्मक समान होते हैं । परन्तु मूत्र से लम्बित रहता है इसलिए उसको लम्बन कहते हैं । और समभ्य में गर्भसूत्र और एक्सूत्र के एक होनेसे लम्पन का अभाव होता है। उपपत्ति। (१) यहांपर वासनाभाष्य के लेखानुसार लम्बन की स्थिति दिखलाई जाती है। पृथिवी, 'द्र पृष्ठवासी द्रष्टा, फ द और पग पन्द्र, सूर्य के हरमण्डल, 'च' और 'र' बिन्दुओ में गये हुये । 'क' पन्द्रगोलीय ग्नम्परितक भौर 'प' सूर्य- एक्सूत्र • २२२ गोलाध्याये गोलीय । अव भूगर्भ से रविविम्ब तक भूचर सूत्र करने से चन्द्र और सूर्य एकही में सिद्ध हुये । परन्तु 'द्र भूपृष्ठ से रविविम्ब तक पृष्ठटक्सूत्र करने पर चन्द्रमा इस एक्सूत्र से निजकक्षा में लम्बित ज्ञात हुआ । यही सूर्य से चन्द्र का लम्बन है । जय सूर्य प विन्दु पर आवेगा उससमय पन्द्र क बिन्दु पर होगा, सय भूगर्भसूत्र और, टक्सूत्र एकाकार होने से खमध्य में लम्बन का अभाव सिद्ध होता है । इसप्रकार रवि से चन्द्र का लम्बन दृमण्डलगत आचार्य ने दिखलाया है। रवि और चन्द्र का अलग लम्बन सिद्ध करके उनका अन्तर फरने पर भी यही सम्धन सिद्ध होता है, जैसा कि आचार्य ने अपने भाष्य में कहा है। यह रमण्डलीय लम्पन समध्य से उत्पन्न होता है। इसे उन्नतांश सम्बन्धि साधारण उम्मन समझनाचाहिए। क्षेत्र।
ग्रहणवासना। २२३ (२) इस लम्बन का पूरा विवरण इसप्रकार है -कल्पना किया 'द्र 'भ- वस्थ द्रष्टा, ज, खमध्य, ज स रविगत दृङ्मण्डल । 'द्र 'केन्द्र से भूस' व्या. सार्थ से एक ख म र वृत्त किया, जो द्रज और द्र स रेखाओं को खरबिन्दुओं में फाटता है । अव भूद्र के तुल्य एक 'म स' रेखा की यो ख म और ज स चाप समान होगें। स' के गर्भाय नताश ज स हैं और पृष्ठीय नताश ख र, ज स , से अधिक, धा, म र चाप के तुल्य अधिक है। इसलिए प्रहका 'र' स्पष्टस्थान, म र चाप के तुल्य दृङ्मण्डल में अवनत सिद्ध हुआ । इसप्रकार 'मर' प्रहका साधारण लम्बन हुआ । यो यह बात स्पष्ट प्रतीत हुई कि दृङ्मण्डलीय नताश सम्बन सस्कृत ग्रहके स्पष्ट नताश होते हैं। क्षेत्र। र IF इस लम्बन का साधन इसप्रकार होता है -दर रेखा पर एक म न लम्ब और Kज पर र अलम्ब सींचना। अय करपना किया- प-भूस, वा, द्रर। ६-भद्र, वा, म स । ल-मर,वा, रम्मन ।
२२४ गोलाध्याये , न-ज स, या, ख म-घड्मण्डलीय नतांश । और न+ल-खर- स्पष्ट नतांश । मन=ज्याल, और रअ ज्या (न+ल) अय, द्र र अ और स म न त्रिभुजों में, दर: र असम : मन, भधवा, त्रि: ज्या (न+ल) : ज्याल, ६५ च्या(न+ल) .. ज्याला इसप्रकार यह स्पष्ट है कि जन ज्या (न+ल)-त्रि या, न+ल-६, उस समय लम्मन परग होगा । यदि परम लम्पन ज्याप, ज्याप-६ और ..ज्या ५% ज्या पxज्या (न+ल) लम्पन फा मान साधारण सात से इतना छोटा है कि क्या और पाप में कुछ अन्तर विशेष नहीं पड़ता । इस रीति से यदि ज्याल-ल और ज्यादा प्रिपा 4- ग्या ( न+ल),और भी, प्रट् यी नांगण्या-ज्या ( न+ल) .. 4xग्या न सिप्रकार परम सम्बन को नतांश ज्या से गुमर पल में प्रिया का भाग देने से लम्पन मिद्ध हुआ। आपायने म्यनमान मिal- "पायमें रिपा है। (३ ) लिमसमर मह नितिन में रहनाई नए टम्बन परम होगा जोकि -
A
ग्रहणवासना।
२२५
खमध्यमें
शून्य होकर क्रमसे बढ़ता है। सूक्ष्म रीति से सूर्यका परमलम्बन और
चन्द्रका ५७ होताहै।
॥
।
*
क्षितिन
प
:
इस क्षेत्रमें 'ई' द्रष्टा वा वेधकर्ता का स्थान है 'ग' प्रह है और प कोण
क्षितिज लम्बन का मान है।
त्रिकोणमिति का सिद्धान्त है कि प्रतित्रिभुज में हरएक भुजसे उसके सम्मुख
कोण की ज्या समान गुणित होती है । जैसे द्र भू स निमुन में -
उपद्रस मू: ज्या द्रभू स: द्रभ भूस:
द्र स भू किसी नक्षत्र का लम्बन है और भू द स फोग १०-समभ्यन.
प्रशिके समान है। ये दोनों ग्रामसे-
है स मूल.
भूद्र स-१८-स,
भन्यामा=प्रि.
नभनी भूम,
इमप्रकार,
ग्याल ग्या (१८-.)::त्रि, भूम,
।
.
२२६ गोलाध्याये अथवा ज्या १८०-स-समव्यनताश ज्या, त्रि. ... ज्या ल3 -ज्यान भूस जय प्रह क्षितिजमें होगा, उससमय, नताश-६०-१ और लम्बन परम होगा। ज्यापल- भूस ... -ज्या६०-- इसप्रकार ज्याल-ज्या पलX ज्यान भूस अथवा, सम्मनपरम लम्बन स्पष्टनच्या, यहा यह बात स्पष्ट प्रतीत हुई कि स्पष्ट ख मध्यनताश ज्या में जिसमकार अन्तरहोगा उसी क्रमसे ग्रह नक्षत्रों के लम्बन ५ मे भी होता जायगा। १२-१६॥ * चन्द्रमा का परम लम्बन प्रकारान्तर से सुगम हे। किसी एक समय में उत्तर योर दक्षिण गोल में दो स्थान निश्चय करपे चन्द्र का मध्याह नताश वेध से सिद्ध करना । उत्तर गोल में 'निश्चित सिद्ध स समय, दक्षियगोल में- '' निश्चितमिद. स राम य. एस यो प स मम य सम्मुम रेसा । 'न' और उत्तर, दक्षिण गोल म पत्र नताश और' -परम लम्बा. पहले उपपत्ति से सिम दुया है। r घ ज्या स- न्यायालया द और, सं- नि या नया पलर याने, भूस : ल+लया प स (या 7 याने, सरल च्यानर यासकार परग लम्बन करना। यापल:- ग्रहणवासना। .२२७ इदानी नत्युपपत्तिमाह- अथ याम्योचरायांतु भित्तौ पूर्वोक्तमालिखेत् ॥ १७ ॥ ये कक्षामण्डले तत्र ज्ञेये दृक्क्षेपमण्डले । त्रिभोनलग्नहग्ज्या या सक्क्षेपोदयोरपि ॥ १८ ॥ तञ्चापांशै तौ विन्दू कृत्वा वित्रिमसंज्ञको । तल्लम्बनकलाः प्राग्वज्ञेयास्ता नतिलिप्तिकाः॥१६॥ कक्षयोरन्तरं यत्स्यादित्रिमे सर्वतोऽपि तत् । याम्योत्तरं नतिः सात्र हक्षेपात् साध्यते ततः॥ २०॥ इदमेव छेद्यकं याम्योत्तरायां मित्तौ पूर्वपार्वे लिखित्वा नत्यु- पपत्तिदर्शनीया।ये तत्र कशामण्डले ते हक्क्षेपमण्डले । दर्शान्ते त्रिभोनलग्नस्य यादृग्ज्यास हक्क्षेपःदयोरपि तावान। ब्रह्मगुप्त- मते तु तचापांशा वित्रिभलग्नशरसंस्कृताश्चन्द्रदृक्क्षेपचापांशाः स्युः। तयोर्वृत्तयोः सार्धात्स्वस्वहोपचापांशेनतौ विन्दू कार्यों। तौ च वित्रिभसंज्ञो । ततःप्राग्वद् भूमध्याद भूपृष्ठाच सूत्रे प्रसार्य लम्बनलिप्तिकाशे यास्ता नतिलिप्तिकाः नतिर्नाम चन्द्रार्ककक्षयो याम्योत्तम्मन्तरम् । तदित्रिमलग्नस्थाने यावत् सर्वतोऽपि तावदेव भवति । अत्तो दृक्षेपात्साधिता नतिः । भाषाभाष्य। । दक्षिणोत्तर भीतमें पूर्वलिखित भूमि और सूर्य, चन्द्र को कमा लिसना । सूर्य और चन्द्र के कक्षावृत्तों को हरक्षेपवृत्त कल्पना करना । निमोन नगी तो दृग्ज्या (नतांराज्या) होगी वह सूर्य, चन्द्र का एकही दृक्क्षेप होगा। रोपवृत्तामें सगध्ध से निज दृक्शेपाश के तुल्य नत विनिम बिन्दु की कल्पना करनी । फिर पूर्वरीति के अनुसार लम्बनकला फा साधन करना, वही नतिकला हॉगी । सूर्य और चन्द्र की कक्षाओं का अन्तर जितना वितिम विन्दु में होता है वही अन्नर सर प्रदेशों
.
.
२२८.
गोलाध्याये
में रहताहै । सूर्य चन्द्र की कक्षाओं का दक्षिणोत्तर अन्तर नति कहलाती है । इस
लिए नति सनके रक्क्षेपों से सिद्ध की जाती है।
उपपत्ति।
भय प्रह दृमण्डल में लम्बित रहता है उससमय उसका निजकक्षापत्त से
जो दक्षिण या उत्तर अन्तर रहताहै उसको नति कहते हैं।
फल्पना किया, 'ख' समध्य, 'न' त्रिभोन लग्न और ख न प उसका मण्डल
है। 'न सर' क्रांतिवृत्त और 'प' उसका केन्द्र है । स स त रविगत दृमण्डल
और प त र कदम्पप्रोतवृत्त 'त' स्पष्ट रविस्थान में गया हुआ । इस स्थिति में
'सर' स्पष्ट लम्बन और 'तर नति होगी।
भेन
न
हम हर मदिरा साधन इमरबार :-
जन-प्रिमोनलग्ननवांश, पस-रविनतांग ।
र गोलीय प्रिमों में-
भय पन मारमा
ग्रहणवासना।
૨૨
ज्या ख स: ज्या ख न ज्या सत: ज्या रत,
ज्या स त+ज्या सन
.:. ज्यारत-
ज्या खस
अन ज्या स त और ज्या र त के स्थान में, यदि स्वल्पमान होने से, पाप
फा ही प्रहण करलिया तो यों हुआ--
स तxज्यासन
रत:-
ज्यासस
परन्ता
पxज्या ख स
त्रि
यह पहिले लम्बन के विवरण में सिद्ध होचका है
परज्या
खन
परलम्बन
- नति, यह सिद्ध हुआ। इस से
लिप्तानी त्रिज्याप्ता-, इत्यादि आगे का प्रकार उपपन्न होता है।
* यहां स्पष्ट प्रतीत होता है कि चन्द्र की नति में सूर्य की नति पटा देने से
उक्त विधि के अनुसार सूर्य से चन्द्र का लम्यन सिद्ध होजायगा । और यह
लम्बन, त्रिभोन लग्न की स्थिति में, सूर्य और चन्द्र के लम्बनान्तर के समान
होगा।
प्रहण के समय में चन्द्रमा का शर बहुत छोटा होता है, इसलिए चन्द्रकांति-
वृत्त से बहुत दूर नहीं रहता । इसकारण यहांपर चन्द्र का लम्पन और नति का
साधन, विमण्डलानुरुद्ध चन्द्र के क्रान्तिवृत्त सम्बन्धि स्थान से दिया गया है।
आचार्य ने नतिसाधन के विशेष प्रकार गणिताध्याय में लिखे हैं। इसलिए
उनकी व्याख्या यधास्थान होगी॥ १७--२० ॥
इदानीं स्फुटलम्पनार्थमाह-
यत्र तत्र नतादर्कादधश्चन्द्रावलम्बनम् ।
तहग्वृत्तेऽन्तरं चन्द्रभान्वोः पूर्वापरं तु तत् ॥ २१ ॥
पूर्वापरं च याम्योदग्जातं तेनान्तरदयम् ।
अत्रापमण्डलं प्राची तत्तिर्यग्दक्षिणोत्तरा ॥ २२ ॥
यत्पूर्वापरभावेन लम्बनाख्यं तदन्तरम् ।
यद्याम्योत्तरभावेन नतिसंजं तदुच्यते ॥ २३ ॥
२३० गोलाध्याये नतिलिशाभुजः कर्णो दरलम्बनकलास्तयोः । कृत्यन्तरपदं कोटिः स्फुटलम्बनलिप्तिकाः ॥ २४ ॥ परलम्बनलितानी त्रिज्यासा रविदृग्ज्यका । दृग्लम्बनकलास्ताः स्युरेवं हक्क्षेपतो नतिः ॥ २५ ॥ गत्यन्तरस्य तिथ्यंशः परलम्वनलिप्तिकाः। गतियोजन ११ तिथ्यंशः कुदलस्य ७६ : यतो मितिः॥२६॥ स्युलम्बनकलानाड्गे गत्यन्तरलवोद्धृता । प्रागग्रतो वेश्चन्दः पश्चात्पृष्ठेऽवलम्बितः ॥ २७॥ शीघेऽग्रगे युतिर्याता गम्या पृष्टगते यतः। प्रागृणं तद्धनं पश्चात क्रियते लम्बनं तिथो ॥ २८ ॥ याम्योत्तरं शरस्तावदन्तरं, शशिसूर्ययोः । नतिस्तथा तया तस्मात्संस्कृतःस्यात्स्फुरः शरः ॥ २६ ॥ स्पष्टार्थमिदं ग्रहणवासनायां व्याख्यातं च । भापामाप्य। समध्य से किसी प्रदेश में लम्भित सूर्य से जो पन्द्रमा. का लम्यन है पर सूर्य और पन्द्रका इमण्डलगत पूर्वापर अन्तर होता है । इसप्रकार पूर्यापर और योम्योत्तर ये दो अन्तर हुए । क्रान्तिवृत्त यहां पर पूर्वापरहे और उसका दक्षिणो- तरवृत्त ( कदम्यवृत्त ) दक्षिणोत्तर है । ( यहां यह स्पष्ट होताहै कि पूर्वापर अन्तर फ्रान्तिवृत्त में और दक्षिणोत्तर उसके दक्षिणोत्तरवृत्त में रहता है। पूर्वापर अन्तर को लम्बन और दक्षिणोत्तर अन्तरफो नवि कहते हैं । नतिकलाभुज, रन्ड मनकलाकर्ण और दोनों का वन्तर मूल स्पष्ट लम्बन फला कोटि होती है । पि की ज्या को परम लम्बन की कलामे गुणकर त्रिज्या या भागदेने से इग्लम्बन पला सिद्ध होती है, इसीप्रकार एकापसे नति भी सिद्ध होती है। सूर्य चन्द्र की गति के अन्तर के पन्द्रहों भाग फे ममान परमलम्यन की कला होती है। क्योंकि उन्ही योजन्मत्मक गति के पन्द्रहवें भागो समान भूज्यासार्थ का मान होता है। पन्द्रकी लम्पनफला में गत्यन्तर फे अंशों का भाग देने से, पटियात्मक सम्यन होगा ! यदि चन्द्रमा निमोननग्न से पूर्व हो तय यद मर्य मे आगे होगा और जम २३१ अहणवासना। पश्चिम दिशा में है, उससमय सूर्य से पीछे लटका रहेगा। यदि सूर्य से चन्द्र आगे है, उससमय चन्द्र की शीघ्रगति के कारण दोनों का योग पहिले होचुका समझना चाहिए । और जब सूर्य से पीछे हो तव योग आगे होनेवाला समझना चाहिए । इसप्रकार निभोनलग्न से पूर्व चन्द्र हों तो तिथि में लम्बन का संस्कार करण और पश्चिम हो तो धन करना चाहिए । सूर्य चन्द्र का याम्योत्तर अन्तर शर होता है और नति भी चाम्योत्तरही होती है। इसलिए शरका नति में संस्कार करने से चन्द्र का स्पष्टशर ( सूर्य से) होता है। उपपत्ति। पहिले लिखे क्षेत्र में, र स त समकोणत्रिभुज मान लेने से, र त आधार, स त-कर्ण, स र लम्य वा कोटि । इसप्रकार, स र=Vस तर त, वा स्पष्ट सम्बन । इसलिए 'नतिलिप्ताभुज:--, इत्यादि प्रकार उपपन्न हुआ। अथवा, ख न स, स त र सजातीय त्रिभुजों से अनुपात किया- दृक्क्षेxवं दृग्ग्या : रक्क्षेपज्या :: इग्लंज्याः नति। हच्या . : अथवा, पलंग्ग्या त्रि: पलंज्या :: दृग्ज्या:-- -दृग्टन्बन । इसप्रकार परट- प्रि म्यनलिप्तानी 1-, यह विधि उपपन्न हुई। फिर अनुपात किया- हग्या : रक्षेन्या :: इग्लं : नति पलं म्या पलंग्ज्या टक्क्षे पलं टक्क्षे परन्तु इंग्लम्बन-- हज्या निXटग्ज्या त्रि इसप्रकार एवं टक्क्षेपतो नतिः। उपपन्न हुआ । गर्भक्षितिजसे पृष्ठक्षितिज भूच्यासार्ध योजन के तुल्य ऊंचा रहता है। इस लिए क्षितिज में कुछन्नलिप्ता के समान परम लम्पन होताहै । फुरन्नलितासापन फे लिए अनुपात-- गरियो ग अ क :: भूव्यायो:=- ग अफXभू व्यायो यहाँ मुम्यासार्थ गतियों ग और गवियोजन में भूव्यासायोजन या अपर्चन देने से, यसमनिप्ता। इसलिए 'गत्यन्तरस्य निध्यंग.--, यह प्रकार उपपन्न हुआ । " पुनः अनुपात किया--
२३२
गोलाध्याये
६० हग्लक
ग:६०:: ग्लक:
इस में ६० का अपवर्तन देने से
ग अं
गत्यन्तर कला के स्थानमें गत्यन्तर के अंश हुए।
-घटिकात्मक लम्बन । इसप्रकार 'स्युलम्बनकला---' इत्यादि प्रकार
(ग)
उपरन्न हुआ ॥ २१-२९ ।।
यथ वलनवासनामाह-
तुलाजाद्योर्हि संपाते विपुवत्क्रान्तिवृत्तयोः ।
स्यातां याम्योत्तरे गिन्ने परक्रान्त्यन्तरे च ते ॥ ३०॥
आयनं वलनं तत्र जिनांशज्यासमं ततः।
एकवायनसन्धौ तु तयोः स्यादक्षिणोत्तरा ॥३१॥
एकेर तदशात्माची तन नो वलनं ततः।
तदन्तरेऽनुपातेन खेटकोटिकमज्यका ॥ ३२ ॥
जिनज्यानी धुजीवातायनदिग्वलनं भवेत् ।
एवमेव हि संपाते विपुवत्समवृत्तयोः॥ ३३ ॥
उन्मण्डलं भवेत्तत्र विपुवदक्षिणोत्तरा।
क्षितिजं समवृत्तस्य पलज्या च तदन्तरम् ॥ ३४॥
क्षितिजेशज्यया तुल्यमक्षनं वलनं ततः।
तयोरेकेव याम्योदङ्न मध्ये वलनं ततः ॥ ३५॥
नतक्रमज्यया साध्यमन्तरे वनुपाततः।
नतं खाहाहतं भकं ादलेनाप्तभागकः॥ ३६॥
क्रमज्याक्षज्यया क्षुस्माद्यज्याभक्ताक्षजं भवेत् । .
प्राक् सौम्यं पश्चिमे याम्यं तचापेक्यान्तरात्स्फुटम्॥३७॥
ग्रहणवासना। २३३ 4 । प्रभा। एते श्लोका आयनाक्षवलनसाधनविधिनिरूपका वासनामाप्ये व्याख्याताः एषामाशयो वासनाप्रपञ्चे व्यक्ततरो भविष्यति । अत्रा- स्माभिः प्रसङ्गत्यशेनैते मूलश्लोका विभज्य व्याकृताः। मापामा । मेष और तुलके आदि में जो विषुववृत्त और क्रान्तिवृत्तसंपात है (दृग्गोल पर दृष्टि देनी चाहिए ) उसमे उनके दक्षिणोत्तरवृत्त मिन्न है । और वे परम क्रान्तिके तुल्य अन्तर * पर हैं। इसलिए वहांपर आयनवलन चौनीस अंश के समान होता है । अयनसन्धि में नाडीवृत्त और क्रान्तिवृत्तके दक्षिणोत्तरतृस एपदी होते हैं । इसलिए उनका पूर्वापर भी एकही होगा इसकारण . वहा आयनपलन का अभाव होगा । जब प्रह अयनविन्दु और विपुवद्विन्दु के बीच में, क्रान्तिवृत्त के किसी स्थान में होगा, उस समय अनुपात से, ग्रहकोटिज्या को परमकान्तिज्या से गुणकर धुज्या का भाग देने से आयनवलन सिद्ध होगा। इसीप्रकार समवृत्त और विषुववृत्त के सपात - स्थानीय क्षितिज और उन्म- ण्डल, नमसे दोनों वृत्तों के दक्षिणोत्तर होंगे; और उनका अन्तर अक्षज्या के तुल्य होगा। इसलिए क्षितिज के पूर्व और पश्चिम विन्दु में, अक्षया के तुल्य आक्ष. चलन होगा। मध्याह्न में समवृत्त और विषुववृत्त का दक्षिणोत्तर एकही होता है इसलिए वहां आक्षवलन का अभाव होता है । बीच में अनुपातद्वारा नतज्या से सिद्ध करना चाहिए ! + नतांशों को ९० से गुणकर दिनार्ध का भाग देने से जो फल मिले उसकी ज्या को असल्या गुणकर महायारा भागदेने से प्राप्त फल आझवलन होता है । यदि नव पूर्व है, वव आचवलन उत्तर दिशामा होगा । और जव पश्चिम है, उस समय दक्षिण होगा । इसप्रकार आयन और आक्षवलन जब एकही दिशा के हों वय उनका योग और भित दिनाओं का अन्तर स्पष्टवलन होता है। - । -- * अन्तर शब्द से यहोर दो महारत्तों का, निग्यावृत्त में चापामा अवर समझा चाहिए। + यहार ना से मममण्डल के चार का प्रदर है जो समय और प्रदान समान के मध्य में उ पण होता है।
२३४ गोलाध्याये उपपत्ति। वेधकर्ता, ग्रह का वेध अपने सम्मुस सममण्डल के अनुरोध से करता है। इसलिए वेधकर्ता का पूर्वापर सममण्डल होता है। सममण्डल से इष्ट नत काल में प्रह का वेध करने से, वेधकर्ता के, क्रान्तिवृत्तगत ग्रहकी दृश्यपरिधि के पूर्वबिन्दु से जो क्रान्तिवृत्त का चलन होता है उस को वलन कहते हैं। यह बलन, आवायने. दो भागों में विभक्त करके साधन किया है। एक आक्षवलन, दूसरा भायनवलन कहलाता है । सममण्डल से बिपुवन्मण्डल, जिस दिशा में जितना चलित हो, उस दिशा का वह पलन-मान आक्षचलन है । और विपुवन्मण्डलसे प्रान्तिमण्डल का जिस दिशामें जितना चलन हो, उस दिशा का वह चलन-मान आयन पलन है। इन दोनों चलनों के संस्कार से स्पष्टवलन होता है । अर्थात् सममण्डल से क्रान्ति मण्डल या चलन सिद्ध होताहै। प्रदेोत्पन्न निग्यावृत्त में प्रगत सममोतवृत्त और धुवप्रोतवृत्त के संपाव से उत्पन्न कोण के सम्मुख चाप का मान आभवलन होताहै । और इसीप्रकार प्रहगत कदम प्रोतवृत्त और ध्रुवप्रोतवृत्त के संपात से उत्पन्न कोणका, महोत्पन्न विज्यावृत्त में सम्मुख घाप का मान आयनवलन होता है । इन दोनों चापों का यथासम्भव योग वा अन्तर से, महोत्पन्न निग्यावृत्त में, प्रहगत कदम्नप्रोतवृत्त और समप्रोतवृत्त के सपात से उत्पन्न कोण पा, पापरूप मान होता है । इसको सम्वलन कहने हैं। सिद्धान्त की परिभाषा के अनुसार, किसी वृत्त के किसी स्थान से आगे अंश पर जो स्थान होगा यह पहिले स्थान मे पूर्व दिशा में होगा। और उमी स्थान से पीहे है अंश पर जो स्थान होगा, वह उस से पश्चिम समझा जापगा। और क वृत्त पा जो दक्षिणोत्तरवृत्त होगा, उम में दक्षिण तरफ जो ९० अंश पर स्थान होगा वह दक्षिण स्थान होगा। और पाई वरफ उसनेही अन्वर पर उगर स्थान होगा। इस परिभालके अनुमार, प्रान्तियत्तगत महन्धान के पूर्वमिन्दु का, प्रद. गत दक्षिणोत्तरवृत्त के पूपिन्दु मे शोचना है, वह पटना। परन्तु प्रहगत दक्षिणो. शरवृत्त प्रह से ९० भागे ममन यो पाटेगा, इसलिए प्रान्तियन में पूर्वशिन्दुमा को घटन है वह समवृत्तगत पूपिन्दु से पटन है। गा, वरन पण दिसामों में समान फर करना । जय प्रान्निनगत पूर्यविन्दु, ममतगत पूर्वबिन्दु में महादे, नथ उसर बन्न और यदि दक्षिण, नर दक्षिण घलन होला । - -
ग्रहणवासना।
२३५
नीचे लिसे क्षेत्र में वलन की स्थिति स्पष्ट प्रतीत होती है ।
अंत्र
h
च
ब
ल ग क क्रान्तिवृत्त और 'ग' उसमें ग्रहस्थान ।
न ६ घनाडीवृत्त और 'अ' सायन मेपादि ।
स ह फ-समवृत्त, 'ह' समवृत्त और नाडीवृत्त का संपातविन्दु ।
सह-सममण्डलीय नतकाल । पक-पदम्पपोतवृत्त, पगबुनप्रोतवृत्त
और म ग फ-समप्रोतवृत्त ।
अब,
1
।
.
फ य चाप-य ग फ-आश्वलन ।
-
1
.
1
बकचाप-कग य-आयनवलन ।
फकचाप-कग फ-स्सष्टवरन।
अथवा,
कान्तिपुरमा पूर्वमिन्दु,
२३६ गोलाध्याये '' नाडीवृत्तगत प्रहका पूर्वमिन्दु 'स' समवृत्तगत - इसलिए, स न, न ख और स स ाक्ष, आयन और स्पष्टवलन के । इनका साधन इस प्रकार है- प्रभु-अह भुजांश. प-परमकान्ति का क्रान्ति. अ-अक्षांश. अय आयनयलन, अक्ष-आक्षवलन, स्प-स्पष्टवलन. नम्नतकाल. . अब, न अन गोलीय त्रिभुज में, ज्या स न अ : ज्या न अ ख-ज्या ख अ : ज्या न ख, अथवा, को ज्या का : ज्या प-कोज्या प्रभु : ज्या अ य, ज्या पx कोच्या प्रभु .'. ज्या अय इसलिए खेट कोदिक . ... कोज्या का जिनज्यानी शुजीवातायन दिग्वलनं भवेत् ॥ यह प्रकार उपपन्न हुआ । यह वलन उत्तर दक्षिण होता है; जिधर 'ख' बिन्दु न विन्दु से हो। भव, न ह स गोलीय त्रिभुज में; ज्या स न ह : ज्या न ह स:ज्या सह: ज्या सन: यहां पर, ज्या स न ह-ज्या स न अ-को ज्या झा, ज्या न ह स ज्या अ, और, ज्या सह% ज्यान ., को ज्या मा : या अ-ज्या न ज्या अक्ष ज्या अXज्यान .. ज्या अक्ष- इसलिए 'नतं सासाहत- को ज्या का कमज्याक्षज्ययाक्षुषा घुज्यामकाक्ष भवेत् ॥ यह प्रकार उपपन्न हुआ। यह . -३७. ॥ ग्रहणवासना। २३७ चलन भी 'म' विन्दु के 'स' विन्दु से उत्तर-दक्षिण स्थिति में, उत्तर-दक्षिण होता है। यहां पर, सटवलन स स स न+न खोजर'न' विन्दु स और स के बीच में स्थित हो। और जब 'न' स और ख के आगे हो, तब भायन और आक्ष के अन्तर के समान स्पष्टवलन होता है। यह स्पष्टवलन भी दक्षिण-उत्तर होता है। जिस क्रम से 'स' बिन्दु 'स' विन्दु के उत्तर-दक्षिण होवे । वलन का प्रयोजन ग्रहण के परिलेस में पड़ता है । गणिताध्याय में इसका वर्णन होगा ।। ३०-~ एवमेवं च संपातो यःक्रान्तिसमवृत्तयोः। परमं तत्र तत्कालवलनैक्यान्तरं स्फुटम् ॥ ३८ ॥ अग्रतः पृटतस्तस्मात् क्रान्तिवृत्ते त्रिभेऽन्तरे। तयोर्याम्योत्तरकत्वात् तत्र नो वलनं स्फुटम् ।। ३६ ॥ न स्पष्टवलनामावस्तत्र स्यादुलमज्यया। क्रमज्यया ततः कार्य दाार्थ कथ्यते पुनः॥ ४० ॥ सर्वतः क्रान्तिसूत्राणां ध्रुवे योगो भवेद्यतः। विपुवन्मण्डलपाच्या ध्रुवे याम्या तथोत्तरा ॥ ४१ ॥ सर्वतः क्षेपसूत्राणां ध्रुवाजिनलवान्तरे । योगः कदम्बसंज्ञोऽयं ज्ञेयो वलनवोधंकृत् ।। ४२॥ तत्रापमण्डलमाच्या याम्या सोम्याच दिक् सदा । कदम्बभ्रमवृत्तं च वन्नीयात् परितो ध्रुवात् ॥ १३ ॥ गोले तु जिनतुल्यांशेस्तत्र ज्या क्रान्तिशिञ्जिनी। सर्वतः समवृत्ताच याम्योदकुजसङ्गमे ॥ १४ ॥ तत्तिर्यगतसूत्राणां योगः स समसंज्ञकः। समध्रुवकदम्बानामुपरिशुचरान्नयेत् ॥ १५॥ सूत्राणि वृत्तरूपाणि वलनानि तदन्तरे ।
तर स्पष्टवलना मिलेंगी । और सव क्षेपसूत्र, क्रान्तिवृत्त के केन्द्रकदम्ब में सयुक्त होते हैं। सम्मभून होकर सदा मिली रहती हैं। ध्रुवविन्दु को केन्द्र मानकर, २४ व्यास फा दक्षिणोत्तरवृत्त, मध्याह्नवृत्त और क्षितिजवृत्त के सपातमिन्दु में मिलता। २३८ गोलाध्याये अाज वलनं मध्ये स्यात्समध्रुवसूत्रयोः ॥ ४६॥ कदम्बध्रुवसूत्रान्तरायनं च त्रिभे ग्रहात् । कदम्बसमसूत्रान्तः स्फुदं सर्वदिशां च तंत् ॥ १७॥ प्रभा। लल्ल-श्रीपत्यादिभिः प्राचीनगणरुकमज्यया चलनानयन सस निबन्धेपूपनिबहम् । परं क्रमन्यमन्तरा साधनमज्ञानमूलकमित्याचा यः प्रकृते बहुधा प्रतिपादितम् । एवमेव च संपात इत्यादयः श्लोका स्फुटार्थाः। गोलस्थितिविचारण्या सुबोधाः। भाषाभाष्य। जय प्रह क्रान्तिवृत्त और समवृत्त के सपातविन्दु मे हो, थायन और आक्षवलन के सयोग वा वियोग से उत्पन्न, परम होता है। परन्तु संपातबिन्दु से, तीन राशि आगे वा पीछे, मान्तिवृत्त में प्रबिन्दु रहनेपर स्पष्ट वलन का अभाव होता है । क्योंकि वहा पर समवृत्त और क्रान्तियत्त का दक्षिणो. तरत्त एक होजाता है ( गोल पर दृष्टि देनी चाहिए ) । परन्तु यदि प्रम या छोडकर उत्क्रमज्या से वलन सिद्ध कियाजाय, तब उक्त स्थान में स्पष्टवलन का अभाव नहीं होगा। इसलिए वलन क्रमज्यासे ही साधन करना चाहिए । इमी वात की दृढता के लिए फिर कहते हैं। सब कान्तिसूत्रों का ध्रुवबिन्दु योग होता है । इसलिए, स्पष्ट है कि विषुववृत्त के धरातल में, लम्वरूप इना और दक्षिणरेखा में पूर्व और पश्चिम रेखाओं पर लम्ब होकर, सुवबिन्दु में, धुवयिन्दु से २४ अश दूर है। यही कदम्न, वलन को उत्पन्न करता है । कदम्य में, दक्षिगत्तर रेखायें, क्रान्तिकृत्तीय धरातल मे पूर्वापर रेखाओं' से ध्रुवकी चारों तरफ दृत्त बनाना । इसका नाम कदम्यभ्रमवृत्त है, इसमें कर भ्रमण किया करता है। इसकृत्त में ज्या क्रान्तिज्या के समान होती है । सम यह सातबिन्दु सममान कहलाना है। यह पिरिज तर और दक्षिण विद्ध - . प्रहणवासना। २३६ अब प्रह के धुव और कटम्म में वृत्ताकार सूत्र करना, जो ममस्थान में मिलें । इन वृत्ती के बीच में तीनों वलन स्पष्ट दिखलाई देंगे । अर्थात् सम और ध्रुववृत्तों के बीच में भाक्षवलने, कदम्ब और ध्रुवके बीच में, भायनवलन और कदम्ब समसूत्रों के बीच में स्पष्टवलम । ये वरन ग्रह से तीन राशि के अन्तर में, सब दिशाओं में समान होते हैं। अपत्ति। + लह, श्रीपति आदि प्राचीन आचार्यों ने वरन के साधन में, ग्रह की काटि ज्या को दोहकर उस की उत्क्रम-या का महा दिया है। और कान्ति योटिया को छोड़कर सनिमाहोलमज्या से साधित क्रान्तिज्या और आक्षवरन के साधन में, नतागण्या के स्थान में उसकी उत्क्रमच्या और प्रान्तिकोटिज्या के स्थान में पूर्वोक्त क्रान्तिज्या का ग्रहण किया है । यह सब गोर स्थिति के विरुद्ध होने से आचार्य ने इस की परम्परा दूर करने को कई प्रकार की गोलस्थिति दिसलाई है, जैसी आर भाष्य में लिखी है । इमीतरह की आगे और भी दिग्वलाई जाती है। घे सब गोलमें प्रत्यक्ष प्रतीत होती हैं ॥ ३८-४७ ॥ अथवा परितः खेटा खाइभागान्तरे न्यसेत् । त्रिज्यादृत्तं ततस्तत्र विषुवत्समबत्तयोः॥१८॥ • मध्ये सवलनं विद्यादिपुवत्क्रान्तिवृत्तयोः । अन्तरं चायनंक्रान्तिसम त्तान्तरे स्फुटम् ॥ ४६ ॥ +सगंदिकातननिता कमशिानामि भुषातभा पलाएन महा। घाानि पूर्वनतपश्चिमया फ्लानि सौम्यनारा समयहि पृषकमरा সাময়িশিয়া গত্য কর দেব । त या धनु मविग्रह ददिरस्यात् पारिशवस्य दिशादिशि स्यात् ।। पक्रम पालोद्भवाना युति कमादकदिशा पलानाम् । काया रियोगाभ्यदिशा तती चा मामा भोमा बलनम्य नीग ॥ २३-६॥ लन्लाचाय। 'वाका पारगुणाभिगवान पिस पासास कार्मुक यत । उदकच याम्य पालयोस्तु तदायमाशाता वन्ति ।। बिना सहिताय प्राप्तो न्यलनी गररितमपचार माग सेरण यर । पालनमा मामा म्यामगारतिय मिकिन यस पनि।
२४० गोलाध्याये तापमण्डलं प्राची तस्या याम्योत्तरः शरः । वलनानयने क्षेपः क्षिप्तो येस्ते कुबुद्धयः ॥५०॥ नक्रादिश्च कदम्बश्च स्यातां याम्योत्तरे समम् । आयनं वलनं तस्मान्नायनादौ प्रजायते ।। ५.१ ॥ ततो भ्रमति गोले स मकरादिर्यथा यथा । तथा तथा भ्रमत्येप कदम्बोनिजमण्डले ॥५२॥ कुम्भादावथ मीनादो याम्योदग्वलयस्थिते । जायते वलनं.तद्यत् सौम्यसूत्रकदम्बयोः ॥ ५३ ॥ अन्तरं शिञ्जिनीस्पं कदम्बभ्रममण्डले । अयनाद्गतकालांशक्रमकान्तिज्यका हि सा ॥ ५४॥ उत्क्रमज्या यतो वाणः शिजिनी तु कमज्यका। सत्रिमार्कात् क्रमकान्तिज्यातो वलनमायनम् ।। ५५ ।। येम्समुत्कमकान्त्या भ्रान्त्या ते शितं हि तत् । युनत्यानयेव विज्ञेयमक्ष चक्रमज्यया ॥ ५६ ।। परोकरन्यवानूयाद्यः पगन् न प्रदूपर्यत । तस्येव दूपर्ण तद्धि न दोषोऽतोन्यदूपणे ॥ ५.७ ॥ प्रमा। 'अपना परितः--, इत्यादयः श्लोकाः स्फुटाः परोसेरिति पर. मर्थ:-यः कोऽपि समनं परमताहिर मिटान्तयन्परमतं न दृपयक्ति, तत्तन्यैर दूषणम् । यस्तु परमतं दूपयित्वा चमतं प्रासयनि मन दोपभाक् । अनाचायेंग्ग प्राचीनगणव दृषणानि प्रदय तरिक ममतमुपन्यग्नमिति न दोपमागिनेनि नाम।
ग्रहणवासना।
२४१
भापाभाध्य।
अथवा भ्रवस्थान ग्रहको कल्पना कर, उसको केन्द्र मानमा ६० अश पर एक
धृत्त करना । तब इस वृत्त मे, विपुवद्वृत्त और समवृत्त के सपातनिन्दुओं के
थीचमें आक्षालन जानना चाहिए । और इसीत्त में नाडीवृत्त और प्रान्तियत्त
के सपातविन्दुओं के मध्यमें भायनवलन और क्रान्तिवृत्त समवृत्त के बीच में
स्पष्टवलन जानना चाहिए । इस स्थिति मे क्रान्तिवृत्त का धरातल पूर्वापर और
शर उसका याम्योत्तर होता है। जिन लोगोने (लल्ल श्रीपति सहश) वरन के
साधन मे शर को जोडा है। उनकी दुर्बुद्धि के लिए क्या कहैं । मकरादि और
पदम्न, एक समय मे याम्योत्तरवृत्त में पहुचते हैं। इमलिए अयनादि मे आयन-
चलन नहीं होता । जिसप्रकार गोलमें मकरादि भ्रमण करता है उसीप्रकार कदम,
अपने छोटे वृत्त में भ्रमण किया करता है।
जब कुम्भादि अथवा मीनादि याम्योत्तरवृत्त में आते हैं। उस समय कान्ति-
वृत्त और याम्योत्तरवृत्त के मध्य में, कदम्य भ्रमवृत्त मे ज्यारूप अन्तर आयन
वलन होताहै । यह वलन क्रान्तिज्या के समान होताहै, जो याम्योत्तरवृत्त से
मकरादि के गतकाल ज्या से उत्पन्न होती है । उक्रमज्या वाणाकार. और ममज्या
अर्धचाप की ज्या होती है (इसलिए कदम्ब से याम्योत्तरवृत्त की अन्तर की
उकमज्या से वलनका यथार्थ मान सिद्ध नहीं होसकता जैमा कि लल्ल आदि ने
कहा है ) सूर्य में तीन राशि जोडकर उसकी शान्तिज्या से पर नसाधा फरगा
चाहिए।
इस वलनसाधन को जिन्होने उत्क्रमज्या से कहा है ने सर भन में पड़कर
इसका नाश किया है । इसी युक्तिसे आक्षवलन का भी समस्या से ही साधन
करना चाहिए।
जो मनुष्य दूसरे की उक्ति से विरुद्ध अपनी उक्ति प्रकट करता है और उस
के दोषों को नहीं दिखलाता, वह दोपभागी होता है । परन्तु जो दूसरे के दोषा
को प्रकट करके अपना मत उसके विरुद्ध प्रकट करता है यह दोपी नहीं होता।
प्रयोजन यह है कि आचार्य ने इस स्थान में प्राचीनों के दोपों को खुलासा कह-
पर अपना मत उसके विरुद्ध प्रकट दिया है, इसलिए भाचार्य सय दोषी नहीं
हैं ।। ४८-५७ ॥
उत्तमज्या निरासोऽयमन्यथा वाय कथ्यते ।
जिनांशेर्जिनवृत्ताख्यं कदम्बात्परितो न्यसेन ।। ५८ ॥
कान्तियाम्योचरं वृत्तं कदम्बदयकीलयोः।
प्रोतं कृत्वा चलं न्यस्तं दन्दान्ते स्याद ध्रुवोपरि॥ ५ ॥
२४२ गोलाध्याये द्वन्द्वान्ताचाल्यतेऽशेयस्तरेव चलति ध्रुवात् । जिनवृत्ते तदंशानां तत्र ज्या क्रान्तिशिजिनी ॥ ६०॥ श्रायनं सैव वलनं झुज्याने जायते ग्रहात् । ग्रहधुवान्तरे यस्माद ाज्याचापांशकाः सदा ॥ ६१ ॥ त्रिज्यावृत्ते यतो देयं तत्रातः परिणाम्यते । एवमक्षांशकैर्वृत्तं समाख्यात् परितो न्यसेत् ।। ६२॥ समकीलकयोःप्रोतं तथा याम्योत्तरं चलम् । तत्तत्खेटोपरि न्यरतं यैरंशः खार्धतो नतम् ॥ ६३॥ समवृत्तेक्षवत्ते च तैरेव स्यानतं ध्रुवात् । समवृत्तनतांशज्याशज्यापरिणताक्षजम् ॥ ६४ ॥ गुज्याग्रे वलनं प्राग्वत् त्रिज्यागे परिणाम्यते । उपपत्त्यानया सम्यक् समवृत्तनतांशजय ॥ ६५ ॥ लनं स्यात्तथा वक्ष्ये स्वाहोरात्रनतादपि । भापामाप्य । भप फिर प्रकारान्नर से उनमज्या या निगमरण दिपाया जाता है: फदम्य फो पेन्द्र मानकर २४ की त्रिया में कदम्ब के चारों तरफ वृत्त पाना । पोर शान्तिवृत्त फा याम्योत्तरशत्त दोनो पदम्यों में घूमता हुघा पाना । यह या जप मिथुनान्त की ज्या में लाया जायगा, सप ध्रुवभिन्नुपा होगा। यह पलटन मिथुनान्त से जितने अंश आगे जायगा, ठीक उसने ही अंश, भृगयिन्दुमे जिन ? वृत्त में भी जायगा । मिनवृत्त में उन ( पदेहुए ) अंगों पी श्या, मानिता फे समान होती है। यही प्रहमे गुज्यान में आयन यसग होता है। क्योंकि मह. और ध्रुव के घीच में सदा घुग्गचापाश रहने । ये मातियोटिज्या फे मगान होये हैं। ( गोल देखना चाहिर ) परन्तु या फर गुज्यान में होता है, इगरिए त्रिग्यावृत में परिणामन दिया जाना है। जिमनार कदम्पसे परमतान्तितुब च्यामाध में नियम दिया गया है, येसाही समरपान पोरेन्द्र मानकर स्थानीय अंगादानुत्य च्यामार्ध में समासान थे पारोंतरण वृत्त पन्ना। (इस पो अक्षन पहने। ) ममहन या दक्षिणीयर
२४३
ग्रहणवासना।
वृत्त, दोनों समम्मानो मे घूमता हुआ वरना । इस चलवृत्त को प्रह के ऊपर
लेजाने पर समध्य से ग्रह का जितना नताश होगा उतना ही ध्रुवपिन्दुसे समवृत्त और
अक्षवृत्त ने नताश होंगे । ग्रह की समवृत्तनतज्या को अनवृत्तमें परिणामन करने से
भाक्षवलन होताहै । जैमा त्रायनवरन मे परिमामन किया गया है, वैसा ही धुज्याप्र-
सम्बन्धि आक्षवल्न को त्रिज्यावृत्तमें परिणामन करना चाहिए । इसी उपपत्ति से
समवृत्तीयनताराज्या से भी सूक्ष्म रीतिसे वरन सिद्ध होसकता है ।
अर भागे अहोरात्त के नताश मे भी वलनसाधन कहते है ॥५८-६९ ।।
अग्रानृतलयोर्योगः समदिक्खेऽन्यथान्तरम् ॥ ६६ ॥
तत्त्रिज्यावर्गविश्लेपपदभक्तामशिञ्जिनी।
नतासुदेोज्ययाक्षुणा वलनं पलनं स्फुटम् ॥ ६७ ।।
नतं खासाहतं गतं शुदलेनाप्तनागकैः ।
क्रमज्याक्षज्यया क्षुण्ण स्थूलं वा ज्यया हृता ॥ ६८ ॥
शुज्यारत्तापत्तस्ये न्यसेवा रविमण्डलम् ।
शुज्याने वलनं तवदन्तरं वृत्तयोस्तयोः ॥ ६६ ॥
चिम्पान्तबिम्बमध्योत्यकान्तिमौर्योस्तदन्तरम् ।
अर्कदो ज्यखण्डनं विम्वार्धं तत्त्वदलहत् ॥ ७० ॥
जिनज्यानं त्रिभज्याझमे स्यादन्तरं हि तत् ।
विम्वार्धहत त्रिभज्यामेवं त्रिज्यागतं भवेत् ।। ७१ ॥
गुणहारकविम्वार्धत्रिज्यानाशे कृते सति ।
भोग्यखण्डं निनांशज्यागुणं तत्त्वाश्विभाजितम् ॥ ७२ ॥
सत्रिभाात् क्रमकान्तेस्तन्तुल्यं जायतेऽथवा ।
क्रमकान्तेरिदं वीक्ष्य भ्रान्ति त्यजत वालिशाः॥ ७३ ॥
नामित छत्रवद्वितिर्यककान्तिस्तु सा समा।
तत्र शुज्यानपातो यस्तनिर्यकरणाय सः ॥ ७ ॥
२४४ गोलाध्याय नवकाल भापाभाप्य । अप्रा और शंकुतल का, एक दिशा में योग और भिन्नदिशा में अन्तर करना । इसप्रकार भुग सिद्ध होता है। इस भुज और त्रिज्यावर्ग के अन्तरमूल को, नतासुन्या से गुणकर अक्षज्या का भाग देने से आक्षवलन होता है । अथवा, को ६० से गुणकर दिनार्ध का भाग देने से जो फल मिले उस की ज्या को अक्षज्या से गुणकर धुज्या का भाग देने से, प्रकारान्तर से स्थूल आक्षवलन होता है। अथवा, अहोरात्रवृत्त और क्रान्तिवृत्त के संपात्तविन्दु में रविविम्य की कल्पना फरनी । उक्त दोनों वृत्तों के मध्य में जो रविविम्बका चाप है, वह दोनों वृत्तों का अन्तर है । यह अन्तर आयनवलन है। यह विम्मकेन्द्र और चिम्पान्त की कान्तिज्याओं के अन्तर के समान है। इसका साधन यों है.-रबिध, व्यासार्ध को, रविभुजज्या के भोग्यखण्ड से गुणकर २२५ का भाग देना । फिर इस फलको २४ से गुणकर त्रिज्या का भाग देने से जो फल मिलेगा वह बिम्बमध्य और अन्तकी प्रान्तिज्याओं का अन्तर होगा । इस अन्तर को फिर त्रिज्या से गुणकर बिन्यव्यासार्ध का भाग देने से, त्रिज्यावृत्तसम्बन्धि फल होगा । पहिले अनुपात में विम्बव्यासार्ध गुणक था, अब भाजक हुआ । इसलिए आपस में अपवर्तित होकर शेप अनुपात का स्वरूप, भोग्यपण्ड गुणित जिनज्या और २२५ भाजक रहता है। यह फल-परिमाण सत्रिभ-सूर्य की झान्ति के समान होता है, अर्थात् सूर्य से ९० अंश पर क्रान्तिवृत्त में जो ग्रह होगा उस की क्रान्ति के समान होगा। इस लिए हे अज्ञानियो ! यह सब क्रमज्या की स्थिति सविस्तर देखकर अपनी भ्रान्तियों को छोड़ो । जव रविविम्य, खमध्य से छतरी की तरह दक्षिण वा उत्तरी तरफ झुका हुआ दिखलाई देता है। तब वह सत्रिम मह की शान्ति तिरछी होती है । इसकारण यहां जो घुज्या से अनुपात किया गया है, वह सनिभमह क्रांति- रूप आयनरलन के तिर्यक् बनाने के लिए है। उपपत्ति । आचार्य ने आगे वासनाभाष्य में इन प्रकारों की उपपत्ति स्वयं लिखी है। परन्तु वे उपपत्तियां यही लिसी जाती हैं। जिससे आगे वासनामाप्य के व्याख्यान फा आवश्यक न रहै। (१) ग्रहण के समय में सूर्य मा शंकु, शंकुतल और अमा सिद्ध करके भुज फा साधन करना । प्रह और समस्त या दक्षिणोत्तर अन्तर भुजके समान होता है ( गोल देसना चाहिए)। जिसरकार पिपुवद्वक्षिण विम्बाध उत्तरतान्तिदन्या के समान अन्तर पर शुज्यावृत्त होता है, वैसे ही यहा पर समवृत्त मे भुजतल्य
ग्रहणवासना।
२४५
अन्तर पर एक वृत्त करना इसका नाम उपवृत्त है। इसका व्यासार्थ त्रिभुज
के समान हेता है । युज्यावृत्त और उपवृत्त के संपातविन्दुओं में ज्यारूप रेखा
करनी । इसका अर्ध उपवृत्त में नतांशज्या होगी। यही अहोरात्रवृत्त की भी
होगी। परन्तु उक्त दोनों वृत्तों का मान परस्पर मे भिन्न है । इसलिए दोनो
वृत्तों में ज्या के अंश भिन्न होंगे।
क्षेन।
।
स.
यहो
भु
भा.
उपया
स
स
मक्ष.
उपन
अब साधन के लिए अनुपात--
न उपाधु
नि: नतज्या :: द्यु:-
- अहोरात्रवृत्त वा, उपवृत्त
नि
नतांशज्या।
न ज्या द्यु
न ज्याXद्युXअक्ष
* अक्ष:--
उपXत्रि
समवृत्त, वा
अक्षवृत्तनतांगज्या ।
गोलाध्याये D न उपा अन उपच्या न ज्याXIX भक्ष न ज्याXXअक्षरनि उपxत्रि धु उपx आक्षक्लन ज्या यह आचार्य के मत से मूक्ष्म आक्षवलन ज्या है। इनकार 'अमानृतल योयोग:-- ६६-६७ उपरन्न हुआ। (२)जो पहले समस्थान को केन्द्र मानकर अक्षवृत्त बनाया है, उसी में क्षचन की उपपत्ति फिर प्रकार न्तर-मे करते हैं। फा मध्याह्न में सूर्य से समस्थान को सूत्र ले जाने से वह ध्रुविन्दु में होकर माता है । इसलिए विपनद्वृत्त और समरत को एकड़ो याम्योत्तर रेसा होने से उत्त समय चरन का अभाव होता है। फिर मध्य ह से नत सूर्य को ममस्थान से सूत्र लेजाने पर यह सत्र सममण्डल में जहा लाता है उस चिन्दुसे खमध्य तक जितने अंश होते हैं, उतने ही अक्षवृत्त में, सन और ध्रुपसूत्रों के बीच में होते हैं। इन अंशों को ज्या के समान सम और ध्रुपसूत्रों का अन्तर होता है। जर मह याम्योत्तरवृत्त में रहना है उस समय नतकाल और समवृत्त नतांश शन्य होता है । और जब ग्रह नितिन मे रहता है । तब समवृत्त नतांश ९० ते है और नतकाल दिना के समान होता है । समवृत्त नतांश की ज्या अक्षवृत्त मे, अअज्या के तुल्य होती है । इसप्रकार सममण्डलोय नतांश से क्लन का साधन' पचित हुआ। उसके साधन के लिए स्थूल अनुगत कियां-- हसन इन दिनार्धन : ९० समन: : इन.. दिनार्धन नांश नि समन सनXउन अक्ष दिनाधन त्रि -- -इष्ट समयसीय ज्यान में आक्षग्लन। दिनानि शु यह फल. ९. मगर इन xaxनि २०४मन त्रिः- xरि दिनार्धन इनग्या, (क) इनXअक्ष आपलनग्या । (ख) इमप्रकार, (क) और (ख) मिलकर मनं खासाहत भरूं बदलनाप्रभागकै ।' इत्यादि ( इनो०६८), प्रकार उपपन्न हुआ। यहां पर क्षेत्र पूर्वलिपित समझना चाहिए । (३) अब फिर प्रकारान्तर में कन का माधन और समस्या का खण्डन दिसलाते हैं ।
ग्रहणवासना।
मान्तिहत अगोरात्रवृत के सपान विन्दु में रचिपिम्ब की कल्पना करनी।
बिनपरिधि में जहा मान्तिवृत्त और अहोरात्रवृत्त का स्पर्श हो, उन दानों स्पर्शधि
न्दुओं का दक्षिणोत्तर अन्तर वरन होता है । यह वरन, रविधिम्य को मध्य प्रान्ति
और विम्यान्तक्रान्ति अर्थात् जहा रविविम्यपरिधि और नान्तिन का सपात हो,
इन दोनों प्रान्तियों के अन्तर पे ममान होता है।
2.
विभ
दिनमा
[स
पविच
धुर
विह
इस क्षेत्र में रवि की विम्बमध्यक्रान्ति और बिन्चान्तमान्तिक्रमसें र म और
रंथ है । इनका अन्तरल है। यही वलन है। इसी अन्तर के साधन के लिए
रवि के विम्बल्यासार्थ से अनुपात किया-
भोखरबिन्या दो यान्तरज्या | यहा पर
दिव्या
२२५ भोस
%3D
गोलाध्याये ws भोग्यखण्डको स्पष्ट करने के लिए अनुपात किया- ति: २.५ इ को: २२५४ इको -स्पष्ट भोग्यसण्ड । पहिले भो- नि ग्यखण्ड के स्थान में इस स्पष्ट भोग्यखण्ड का स्वरूप ग्रहण करने से अन्तरज्या २२५४३कोxविव्या इ कोविंच्या का स्वरूप हुआ। अन्तरज्या निx२२५ नि अन्तर प्रान्तिज्यारों के अन्तर के समान होता है । इसलिए वान्निसाधन के लिए अनुपात किया-- ज्या २४X अज्या अज्या- - भि ज्या २४ भोसxविव्या परन्तु अस्पष्ट अन्तरज्या: " ४ भोसxविव्याxज्या२४ -विम्बल्यासार्य में बलन । २२५xत्रि यहा पर ' अदर्भािग्यसपन-, 'जिनज्याघ्न निमन्याप्तम---, यह उपपन हुआ। परन्तु यह वलन विम्वीय त्रिज्या या है, इसलिए निज्यावृत्त में परिणामन के लिए अनुपात किया--- भोसxरिया ज्या २४ xत्रि भोप- ज्या शिव्या यह पल नि २२५४निxविच्या २२५ त्रिज्यावृत्तीय घरन । इसप्रकार यहा 'निम्बार्धविभज्यानम्-, 'गुणहारकावि म्मानिग्यानाशे-, यह पूरा प्रकार ( ७०-७२) उपपन हुआ। (४) जय प्रहविषुववृत्त में स्थित होगा तब भूकेन्द्र से प्रविम्ब तक मृग्र लेजाने से वह प्रिज्यासूनकोटि रुप सीधा होगा और प्रविम्ब उसके अपर टीफ घनके आकार में होगा । और जब प्रह अपनी मान्विश मेपात में झुपैगा उम समय त्रिज्यासूत्र कर्णरूप होगा और पिम्यसे भूमि में लम्पसूत्र शुज्यायोटि और शान्तिज्या मज होगा | जर विज्यासून कर्णरूप होगा तय उमके ऊपर का बिम्ब . . * भोग्यतए के सर परने की विधि और उसकी उपरति मितान्याय म, यथारपान गर्न नायगी E क्राअंको. ग्रहणवासना। २५६ तिरछा होगा इसलिए वलनज्या भी कर्णरूप होगी । पहिले जो कान्त्यन्तररूप घलन सिद्ध किया है वह लभ्यरूप त्रिज्यासूत्र की स्थिति में कोटिरूप हुआ है। और अय विम्यके सुराव में वह अन्तर कर्णरूप होजायगा । इसलिए उसके साधन के लिए अनुपात किया शुको नि पाxको व्या पूर्वसाधित अन्तरस्वरूप । इसलिए उसके स्थान में इस नि पारको ज्याxत्रिक पारको ज्या फा प्रहण करने पर हुआ धु को त्रिक धु को ५सप्रकार 'नामितं छत्रहिन्धम् -, 'अत्र शुज्यानुपातोय ---(७४) इत्यादि विशेप उपपन हुआ। अथ वलनेपु वर्मणि चोत्क्रमज्यानिराकरणाय मूलसूत्रेऽपि बहूतं तथापि किंचिदिहोच्यते । विषुववृत्तं समवत्तं प्रकल्प्य दक्षि- णोत्तरवृत्तस्थे ग्रह आयनवलनस्योपपत्तिप्रतीत्यर्थं पृथग्दर्शयेत् । अपमण्डलप्राच्यपराया एकः कदम्बो याम्यान्यः सौम्यादिक् । एवं विषुववृत्तप्राच्यपराया ध्रुवौ । यदा मकरादिर्याम्योत्तरवृत्ते तदैव कदम्बोऽपि । अतो विपुवत्क्रान्तिवृत्तयोरेकैव याम्योदिक्। तथा द- क्षिणोत्तरवृत्तस्य कुम्भादेश्व मध्ये स्वाहोरात्रवृत्ते पञ्चगुणाईचन्द्रा १६३५ असवो वर्तन्ते । ते पष्ट्युद्धृताःकालांशाः स्युः ३२|१५| अथ कुम्भादिर्यावदक्षिणोत्तरवृत्तं नीयते तावत् कदम्यो निजमण्ड- ले चक्रांशाङ्किते तावद्भिरेव कालांशै ३२ । १५ दक्षिणोत्तरवृत्त- सम्पातात प्रत्यगवलम्वते । कदम्बयाम्योत्तर सूत्रयोरन्तर वलनम् । सा च तेपामंशानां कदम्बवृत्ते ज्या अतःक्रमज्या । उत्क्रमज्या तु वाणरूपा भवति । कदम्बत्ते या ज्या सा क्रान्तिज्या । अतस्तेषा मंशानां क्रमक्रान्तिज्या वलनम् । अथवैकराशेः क्रमकान्तिज्या त्रिज्यागुणा झुज्याहृता तथापि सैव भवति ।
गोलाध्याये २५० भाषाभाष्य । इम पासनाभाष्य फा अभिप्राय पहले श्लोकों में संक्षेप से आचुका है। इस लिए व्याख्या की आवश्यकता नहीं है। गोल पर विचारने से ही ये बाते सट प्रतीत होती हैं। अथवान्यप्रकारेणोत्क्रमज्यानिराकरणं ज्यानुपातश्च प्रति पाद्यते । क्रान्तिवृत्तेऽर्कस्थानेऽर्कविम्वं मुद्रिकाकारं विन्यस्य बिम्ब परिधौ यत्र स्वाहोरात्रवृत्त लग्नं यत्र च क्रान्तिवृत्तं तयोरन्तर यदक्षिणोत्तरं तत्तत्र विम्बे प्राच्यपरयोर्वलनम् । तचार्कक्रान्ते विम्वार्धकलायुतस्यार्कस्य क्रान्तेश्चान्तरम् । अतस्तस्यानयनम् । रविदोायां क्रियमाणायां योग्यखण्डं तेन मानार्धकला गुण्याः शरदिदौ २२५ र्भाज्याः। फलं दोय॑योरन्तरं स्यात् । तत्र ताव- रस्फुटभोग्यखण्डज्ञानायानुपातः । यदि त्रिज्यातुल्यायां कोटौ प्रथ- मं ज्याध शरद्विदसा भोग्यखण्डं तदाभिमतायामस्यां किमिति । फलं स्फुट भोग्यखण्डम् । तेन गणितं विम्वाध शरदिदर्भाज्यम् । एवं स्थिते शरदिदसमितयोर्गुणहरयोनशे कृते विम्बार्धस्य कोटि ज्या गुणस्त्रिज्या हरः। फलं दोय॑योरन्तरम् । ततः कान्त्यर्थमनुपा- तः। यदि त्रिज्यया जिनज्या लभ्यते तदानेन दोव्न्तरेण कि- मिति । फलं क्रान्त्यन्तरम्। तबिम्बव्यासार्धे वलनम् । अथान्योऽनु पातः । यदि विम्वव्यासार्धवृत्त एतावदलनं तदा त्रिज्याव्यासार्ध- वृत्ते किमिति । अत्र त्रिज्यातुल्ययोर्गुणहरयोस्तथा विम्वार्थमि- तयोश्च तुल्यत्वान्नाशेकते कोटिज्याया जिनांशज्या गुणस्त्रिज्या हरः । फलं कोटिक्रमकान्तिव्या । तत्रिन्यावृत्ते वलनम् । एवं विषुववृत्तस्थित एव ग्रहे । यतो भूमध्यात् खस्वस्तिकस्थविम्बमध्यं प्रति यत्सत्र नीयते तत्रिज्यासूत्रं दण्डवत् । तदुपरिस्थं विम्वं छत्र ग्रहणवासना। २५१ वत्समन्तात्सममेव । यत्तत्परितस्त्रिज्यावृत्तं यत्र च वलनज्या देया तदपि भूसममेव स्थितम्।अतस्तत्र तथागतमेववलनम्। यदा किल मेषान्ते ग्रहस्तदा तत्कान्त्या खस्वस्तिकादुत्तरेनतं विम्यं स्यात् । त्रिज्यासूत्रं तदा कर्णरूपम् । विम्बमध्याच लम्बसूत्रं ध्रुवयष्ट यन्तं शुज्या । सा तत्र कोटिः। क्रान्तिज्या भुजः । यथा किंचित् कर्ण- स्थित्या धृते दण्डे छत्रमपि तस्पर्धिन्यां दिशि कर्णरूपं भवति । तत्र बलनज्यापि कर्णरूपिण्या भवितव्यम् । यत्पूर्वमानीतं क्रान्त्य- न्तरं लम्बसूत्रप्रतिस्पर्धि तत्कोटिरूपं जातम् । तस्य कर्णकरणाया- नुपातः । यदि शुज्या कोट्या त्रिज्याकर्णस्तदानया किमिति। पूर्व कोदिज्याया जिनज्या गुणस्त्रिज्या हरः । इदानी त्रिज्या गुणो |ज्या हरः । अत्रापि त्रिज्यातुल्ययोर्गुणहरयो शे कृते कोटिज्या जिनज्यागुणा ाज्यया भक्ता वलनं स्यादित्युपपन्नम् । भाषाभाष्य। यह वासनाभाष्य 'युज्यावृत्तापवृत्तैक्ये-' यहां से लेकर 'अत्र घुग्यानुपातो य-' इस श्लोक तक उपपत्तिविषयक है । उपपत्ति पहले लिग्वी जाचुकी है। गुक्त्यानयेव विज्ञेयमाजं च क्रमज्ययेति । यथायनवलनजा- नार्थ ध्रुवापरितो जिनभागेः कदम्बभ्रमवृत्तं विवद्धं तथा याम्योत्त- रक्षितिजयोर्यः संपातः स समसंज्ञकः। तस्मादप्यमांशैः परितोऽक्ष- वलनज्ञानार्थ वृत्तं वस्नीयात् । तत्किलाक्षवलयसंज्ञम् । तदपि अंश- रक्यम् । तगभवलनोपपत्तिदर्शनीया । तद्यथा । मध्याहेऽर्का- समचिह्न प्रतिटीयमानं वृत्ताकारं सूत्रं ध्रुवचिहलग्नं याति । अ- तस्तत्र वियुत्समवृत्तयोरेकैव याम्योत्तरा । चलनाभाव इत्यर्थः । अथ यदि दिनान्नितं सूर्य कृत्वा समचिहात्सूर्य प्रतिनीयमानं २५२ . गोलाध्याये सूत्रं यत्र सममण्डले लगति तत्वस्वस्तिकयोमध्ये यावन्तोऽशा स्तावन्त एभत्ते सगसूबधुवयोर्मध्ये भवति । यतस्तलमत्तानु- कारं वदना तेषां भागानामशालये यावती कमज्या तावदेव सम. सूत्रधुवयोरन्तरम् । अथ क्षितिजस्थे क्षितिजमेव समसूत्रम् । त- त्राक्षवृत्ते समवृत्ते.च नातिनतांशाः । तेपो ज्याक्षालयेशज्या- तुल्या स्यात् । अतः सममण्डलगतैनतांशैलनं साधयितुं युज्य ते। तेतु महायासेन ज्ञायन्ते। न तु सुखेन । अतस्तम्ज्ञानार्थ स्थू- लोऽनुपातः सुखार्थ कृतः । यदि दिनातुल्येन स्वाहोरात्रनतेन नवतिः सममण्डलनतांशा लभ्यन्ते तदेष्टेन किमिति। लब्धनतां- शानां या क्रमज्या साक्षज्यावृत्ते परिणाम्यते । यदि त्रिज्यावृत्त ए. तावती ज्या तदाक्षज्यावृत्ते कियतीति । लब्धं किल वलनज्या स्यात् । परं सा गुज्याये न त्रिज्याये । यतः समसूत्रध्रुवयोरन्तरं तत् । ग्रहधुवयोर्मध्ये शुज्या चापांशा एव वर्तन्ते । यदि ाज्या वृत्त एतावती तदा त्रिज्यावृत्ते कियतीति । एवं सति पूर्व।राशिके त्रिज्या हरः इदानीं गुणः । तुल्यत्वात्तयो शेकृते नतांशज्यया अक्षज्या गुणो गुज्या हरः। फलं स्थूला वलनज्या स्यात् । भापामाप्य । इस बासनामाप्य में पावाहन स्वादलेन भक्तम्-इत्यादि इलोक्से गणि- ताध्याय में जो आमलन मिद्ध किया है और उसी के अनुरूप यहा पर पहले 'म खाशाहत भप इस लोक में जो साधन पिया दे, उनी पी सविस्तर गोलस्थिति दिगलाई है। यह मय पहले गिरी गानुपी है। अवसूक्ष्माप्युच्यते।ग्रहणकालेऽस्य शकःशदरतलमयाच साध्या । अपारा कुतलयोःममदिशोरक्यमन्यथान्तरं स फिल वा- हुः पूर्व प्रतिपादित एव । ग्रहसमवृत्तयोरन्तरं ज्याम्पं दक्षिणोन ग्रहणवासना। २५३ बहुतुल्यं स्यात् । तथा विषवत्तादुत्तरतो दक्षिणतो वा क्रान्ति न्यान्तरे युज्यावृत्तं तथा समवृत्तादपि बाहुक्शादुसरतो दक्षिणतो वाहतुल्येऽन्तर उपवृत्तं कल्प्यम् । तदपि भांशैरङ्मयम् । वाहु- गर्गोनत्रिज्यावर्गस्य पदं तस्मिन् वृत्ते गुज्यावन्यासार्धम् । अथ गुज्यावृत्तोपवृत्तयोया प्रापश्चात्संपातो तयो पाक्यरसूत्रंनि ध्यते तस्यार्धमुपवृत्ते नतांशानां ज्या । सेवाहोरात्रवृत्तनतांशा मां भुजज्या । अथ तदानयनम् । नतासूनां या भुजजीवा सा शु ज्यावृत्ते परिणाम्यते । यदि त्रिज्यावृत्त एतावती तदा ाज्यावृत्ते केयतीति । एवमुपवृत्तनतांशज्या भवति । ततो यापवृत्तव्या- सार्थ एतावती तदाशज्याव्यासार्धे कियतीति । ततो हुज्यान एता ती वलनज्या तदा त्रिज्याग्रे कियतीति । अत्र प्रथमेऽनुपाते त्रि- मा हरो |ज्या गुणः। तृतीयेऽनुपाते त्रिज्यागुणो द्युज्या हरोऽत- तुल्यत्वात्तयो शे कृते नतासूनां भुजज्याक्षजीवया गणितोप त्तिव्यासार्धन भक्का सा सूक्ष्मा वलनज्या स्यात्।अत उक्तमान्त- तयोर्योग इत्यादि। भाषाभाष्य । इस बासना भाष्य में-अप्रावृत्तलयोर्योग-, से वलनं पलज स्फुटम् ।, तफ सूक्ष्म माक्षवलनसम्बन्धि उपपत्ति है । यह पहले लिखी जाचुकी है। अथ दृष्टान्तः । यत्र किल स्पभान्तकान्तितुल्योऽक्षः २० । १८। तत्र पक्षान्तम्थोऽर्को दिनार्षे खस्वस्तिके भवति । तदा पन्तिवृत्तं दृमण्डलाकार म्यात् । सत्रिगृहोऽकों-राशिपञ्चक संहान्तः। स च तदा क्षितिजे वर्तते तत्माच्यपरयोरन्तरं क्षितिजे त्यक्ष वलनं दृश्यते । सा च सिंहान्तस्याग्रा । तत्कथं स त्रिगृहा- २५४ गोलाध्याये कोक्रमकान्तिर्वलनम् । अतोऽसत् । अस्मदानयनं विना नेद- मग्रारूपं वलनमुत्पद्यत इत्यर्थः । भापाभाप्य। अब दृष्टान्तों से उत्क्रमज्या का निराकरण दिखलाते है -जिस देश में वृपकी फ्रान्ति के समान भांश हो वहां पर वृषभान्त की प्रान्तिके दिन मध्याह में सूर्य नस्वस्तिक में होगा, और बान्तिवृत्त दृमण्डलागार होगा | उससमय सनि सूर्य क्षितिज में होगा । उसफा और प्रास्वस्तिक का 'अन्तर क्षितिज में अपा के समान प्रत्यक्ष वलन होता है (ग्गोल देखना चाहिए ) परन्तु यह चलन सत्रिभ प्रह की क्रममानि के समान होता है उस्लम के नहीं। इसप्रकार क्रमग्या से ही पलनसाधन करना उपपत्ति से सिद्ध है। वृषभान्त की शान्ति के दिन सूर्य को समग में करपना करके उमपर हम ण्डल करना यही क्रान्तिवृत्त होगा। इसका क्षितिज में जहां संपात होगा उस दिन से प्रास्वस्तिफयिंदु तक महोत्पन्न विज्यादत्त (क्षितिज ) में अन्तर आक्षत्रल स्पष्ट दिखलाई देता है। यही इस घासनामाप्य के प्रधान का सार है । अथान्यो महान् दृष्टान्तः । यत्र देशे पट्पष्टिभागा ६६ अमर तत्र मेपादौ क्षितिजस्थे सर्वेऽपि राशयः समकालमेव शितिजर भवन्ति । तदा क्रान्तिवृत्तमे वितिजमातीत्यर्थः । तत्र मे चूपभादौ मिथुनादो वा स्थिते खो पमं त्रिज्यातुल्यमेव र वलनं स्यात् । यतः क्रान्तिवृत्ताच्युनग जाता तथा विषा सति तदा रखेर्दक्षिणस्यां दिशि स्पर्शः । चन्दस्वोचर यामिर' एतदुक्तं भवति । तत्र देशे तस्मिन् काले तस्य त्रिज्यातुर वलनस्यान्यथानुपपत्यास्मदीयमेव वलनानयनं समीचीन तत्र देशेमज्या ३१४० 1 मेपादिगे वो ज्या ३४३८ १२ सवः ।मितिजम्धे नतघटिकाः १५ बायनकलना २४ । आमालनचापांशाः ६६ । पटवन्ननम्य चापांशा रहणपासना। कृपादिगे वो ज्या ३३६६ । चरज्यासवः १६७० । नत घटिकाः १९ | ३८ | आयनचलनचापांशाः २१ | ४ शक्षजस्य ६८ । ५६ स्फुट लनस्य चापांशाः ६० । मिथुनादिगे युज्या ३२१८ चरासवः ३४६५ । नताटिकाः २४ । ३७ आयनव- लनांशाः १२ । ३२ अाजस्य ७७ । २८ स्फुरस्य ६० एवं 'सर्वत्र। अत एवं प्रतिदिनं प्रत्याह- यत्सम्वस्तिकगे सो भवलये हरवृत्तवत्संस्थिते प्रत्यक्ष वलनं कुजे, त्रिभयुताकांपासमं दृश्यते । वं चेत्क्रमजीवयानयसि तत्तादृक् सखे गोलविन्- मन्ये तीमलं तदेव वलनं धीवृद्धिदाद्योदितम् ॥ यत्राक्षोऽङ्गरसा लवा दिनमणेस्तत्रोदयंगच्छतो मेषे वा पभेऽपि वाप्यनिमिपे कुम्ने स्थितस्यापि वा । स्पर्शो दक्षिणतस्तदा नितिजवत् स्यात्क्रान्तिवृत्तं यत- स्तब्रूधुक्रमजीवयान पलनं व्यासातुल्यं कथम् ॥ अनेनैवोत्क्रमज्या निराकरणेन दृकर्मापि क्रमज्यया साध्यम् । नमूलत्वाददृकर्मणोऽतस्तयोरेकैव वासना। . इति श्रीभास्करीये सिद्धान्तशिरोमणिगोलवासनाभाष्ये मिता ग्रहणासना। भापाभाप्या फिर भी दृष्टान्त से उत्क्रमज्या का खण्डन और अमज्या का विधान सिद्ध - जिस देश में अक्षांश ६६ है उन देश में जब मेपादि क्षितिम में होगा तब । राशियां एक बार एक समय में क्षितिन में होंगी । वहां पर मेष वृष या +याचार्य ने जिन क्षेत्र स्थितियों से पलनों के साधन किये ६ इन साधनों के सिवाय सिन २५६ गोलाध्याये मिथुन में जब सूर्य रहेगा वत्र स्पष्टयलन निग्या के तुल्य होगा। अर्थात् उसत में समवृत्त से कान्तिवृत्त का पहोवन त्रिभ्यावृत्त में त्रिज्या के तुल्य अन्तर होता है। दृग्गोल पर ध्यान देना चाहिए । फल्पना किया क्षितिमवृत्तही ६६ अभाश में कान्तिवृत्त है और प्रारमस्तिक में, मेपादि में रवि है । रवि से त्रिज्यावृत्त यान्या त्तरवृत्त ही है। उसमें समवृत्त और क्षिात मरूप क्रान्तिवृत्त का दक्षिणोत्तर अन्वर, गोल में स्पष्टवलन स्पष्ट दिसलाई देता है । यह अन्तर ९० के तुल्य है। यह निध्यातुल्य वलनक्रमज्या से ही सिद्ध होता है। उत्क्रमज्या से नहीं । यही सब आचार्य ने गणित से भी दिखलाया है। इसमकार ऊपर के दोनों दृष्टान्तों फा अभिप्राय आचार्य ने श्लोपत्रीकर दिया है। इन दोनों श्लोकों का अर्थ सरल है गणिताध्याय के चन्द्रप्रणाधिकार फे अन्त के दोनों श्लोक हैं, इसलिए यहांपर मूल में नहीं लिखे । जिसप्रकार पलन + का साधन नामज्या से होता है वैसेही आगे एकर्म का भी साधन नमज्या से ही करना चाहिए । क्योंकि वलनही हकर्म-सस्कार का प्रहणवासना समाप्त हुई। अथोदयास्तवासना । तत्रादावदयेऽन्ते च दृकर्मकारणमाह- कान्तिवृत्तग्रहस्थानचिह यदा स्यात्कुजे नो तदा खेचरोऽयं यतः। स्वेपुणोसिप्यते नाम्यते वा कुजा- तेन दृकर्म खेोदयास्ते कृतम् ॥ १॥ नैव वाणः कुजेऽसौ कदम्वोन्मुख- स्तत्समुत्क्षेपणं नामनं च विधा। प्रायनं चाक्षजं तेन कर्मदयं परमविवेक में कई विशेष प्रकार और क्षेत्रस्थितिया बहुत उपयोगी है। प्राचार्य के सारना की रसूलता भी लिती हैं। उनका लिखना यहोर उपयोगी था, पर विस्तारमय से नहा लिहाजा मिलाततस्त्र विपके अनुराद में सदशियों का निमपर क्यिा जाए। -
द्वधर्मवासना।
२५७
तत्प्रपञ्चः पुनः संविविच्योच्यते ॥ २॥
स्पष्टम् ।
प्रभा।
अथेदानी दृकर्मवासमां प्रारभमाणो दृकर्मकारणं निर्दिशति । यदा
यस्य ग्रहस्य क्रान्तिवृत्तगतं स्थानं कुजे भवति तदा स ग्रहो न भवति ।
यतः स स्वशराने वर्तमानस्तदशेन कुजात्कदाचिदुन्नमितः कदाचित्र
नमितो भवति । अतः क्रान्तिवृत्तगतं स्थानं यदा क्षितिजे भवति तदा
कियता कालेन प्राक्पश्चाहा तत्र ग्रहोभविष्यतीति तदर्थ दृकर्म सस्कारः
खटोदयास्ते कृतः । यदा हि क्रान्तिवृत्तगतं ग्रहस्थानं क्षितिजे भवति
तदा तस्य शरः क्षितिजे न मिलति यतोऽसौ कदम्बाभिमुखो भवति ।
त्तरमादायनाक्षभेदेन द्विधा दृकर्मावश्यकम् ।
भापाभाप्य।
।
.
जिस समय शान्तिवृत्तगत ग्रहस्थान क्षितिज में लगता है उस समय वह प्रह
नहा लगता। क्योंकि ग्रह अपने शरवश कभी क्षितिज के उपर और कभी नीचे
| रहता है । इसलिए प्रह किवने समय के बाद क्षितिज में आवेगा, इसके लिए
उदय और अस्ल में कर्म -सस्कार किया गया है । जब मान्तिवृत्तगत प्रहका
स्थान क्षितिज में लगता है तब उस प्रहका शर क्षितिज के साथ नहीं मिलता।
क्योकि वह कदम्बाभिमुस होता है । शर का, क्षितिन से, कभी ऊपर और कमी
नीचे होना दो प्रकारका है । अर्थात् एक क्रान्तिवृत्तकी तिरछाई से और दूसरा
स्थानीय अक्षाशयश । इसलिए दृर्म दो प्रकार का है, एक आयन और
दुसरा आक्ष | अब इन दोनों की माधनविधि और विशेष पिर विचारपूर
कहते हैं ॥ १-२॥
अथ तत्कर्माह-
क्षितिजे वलने येस्तस्तदशादिपुणा ग्रहः ।
याम्येन नाम्यते माजात सौम्येनोन्नाम्यते तथा ॥३॥
तद्यस्तं चलने याम्ये व्यस्तं प्रत्यकुजेऽप्यतः।
शायनं त्रिज्यया चेत्स्यादस्पष्टेन शरण किम् ॥ ४ ॥
N पुणा उन्नाम्यते । एवं याम्यायनक्लने सनि मौम्येपुणा उन्नाम्यने गोलाध्याये लम्बज्ययानं चेत्स्याइलनं किं स्फुटेषणा। इति त्रैराशिकालव्धे त्रिज्याने एज्ययोद्धते ॥ ५ ॥ तचापेक्यान्तरमाणैः कुजारखेटो नतोन्नतः। तैः प्राणैर्यत्नमालग्नं नतारखेदात्मजायते ॥६॥ उत्क्रमणोन्नताद्यञ्च तद् ग्रहोदयलग्नकम् । उक्तव्यत्ययतः प्रत्यगस्तलग्नं सपग्रहात् ॥ ७॥ शरे महति मानान्तु चरार्ध मध्यमापमात् । शरस्फुटतथा कृत्वा तचापैक्यान्तरासुभिः ॥ ८ ॥ विभिन्नैकदिशोविद्यादतजेन नतोन्नतम् । आयनामजयोर्योगवियोगाल्लग्नमुक्तवत् ॥ ६ ॥ - अत्र गोले यथोक्तं क्रान्तिमण्डले विगण्डले च ग्रहं दत्त्वा वि- मण्डलस्थग्रहोपरि ज्यावृत्ते च बद्धे यथेयं दृकर्मोपपत्तिः सुखेन वालैरपि वुध्यते तयायं सूत्रपाउः कृतोऽतः सुगमा । तथा ग्रहच्छा याधिकार इयमुपपत्तिः सम्यकथितेत्र । ये क्षितिजे वलने श्रायनाक्षवलने तद्वशाद् ग्रहो याम्येन इपुरण रखशरेण धमाजात्कुजान्नाम्यते सौम्येनोन्नाम्यते । अर्थात् प्राक्कुजे मौम्यायनल ने सौम्येपुरणा र उम्पले याम्येपुर मायने । तथा याम्ये वलने तारतं भवत्यर्थात् प्राक्कुजे याम्यायनवलने,सौम्येपुणा ग्रहो नाम्यते याम्येपुणा उन्नाम्यते । अतः प्रत्यक्कुजेऽपि व्यस्तम थर्थात् प्रत्यक्कुजे सौम्यायनवलने सौम्येपुणा ग्रहो नाम्यते, याम्य याम्येपुगा नाम्यत इत्यर्थः। प्रायनं नित्यया चेत्स्यादित्यादीनाम : रफुटा एच। - प्रभा।
दृकर्मवासना। २५६ " भापाभाप्य। क्षितिज में जो आयन और आक्षवलन होते हैं उनके वश क्षितिज से ग्रह अपने शर से, सौम्यायननलन में, उत्तरशरद्वारा उन्नामित और दक्षिणशरद्वारा ना- मित होता है। और याम्यायनरलन में उलटा होता है । अर्थात् उत्तर शर से नामित और दक्षिणशर से उन्नामित होता है । यह स्थिति पूर्व क्षितिज की हुई। इससे उलटी पश्चिम क्षितिज में होती है । अर्थात्, सौन्यायनवलन में, अपने उत्तर शर से ग्रह नामित और दक्षिण से उनामित होताहै । इसीप्रकार याम्यायन बलन में उत्तर शर से उनामित और दक्षिण से नामित होता है । यह स्थिति निरक्षदेश मे समझनी चाहिए । साक्षदेश में इसप्रकार है। पूर्व क्षितिज मे, सौम्य आक्षवलन में उत्तर शर से ग्रह उन्नामित और दक्षिण शर से नामित होता है। और पश्चिम क्षितिज में, याम्यावलन में, उत्तर शर से मह उन्नामित दक्षिण शर से नामित होताहै । इसप्रकार उन्नामत और नामनका नियम है। यदि निज्या मे आयनमलन मिलता है तर मध्यम शर मे क्या मिलेगा और लम्बया में यदि आक्षवलन मिलता है तब स्पष्टशर में क्या ? इन राशिको से जो फल मिले उनको विज्या से गुणाकर गुज्याका भागदेना । जो फल मिलें उनके चापज्याओं के, यथासम्भव, योग वा अन्तर से जो असु उत्पन्न हो, उस असु के समान काल में क्षितिज से ग्रह नत और उनत होता है । इन असुओं से नत ग्रह से ममलग्न और उन्नत से उरक्रमलग्न जो होगा, वह प्रहका उदयलग्न होगा। इस विधि से विपरीत छराशि-सहित सूर्य से अस्तबग्न साधन करना चाहिए। जिन नक्षनों के शर बहुत बड़े है। उनके कर्म काल भिन्नति से सिद्ध होते है। उनकी गध्यम क्रान्ति से और स्पष्टशर से चर सिद्ध करना। इनके पापों के यथासम्भव योग वा अन्तर से जो असु उत्पन्न हों, उस अमु के समान काल करके, आमदारा, मह उन्नागित वा नामित होता है । गायन और आअह- कों के योग वा अन्तर से, उक्त विधि के अनुसार प्रहया उदय या अस्तलग्न सिद्ध करना चाहिए। - उपपति। आचार्य ने गणिताध्याय के प्रदच्छायाधिगर में आयन और आभरपर्म का उपपत्ति सविस्तर लिखी है। यहा पर केवल मूत्ररूप में सक्षेपसे दिसलाई ६ । मुगमता के लिए यहा भी विचार किया जाता है। करपना दिया, भद्घ क मस्यामपृत्त है कस दजिविज, परवस्तिर, 'स' क्षितिज का पूर्वविन्दु और पसगै विषुववृत्त है। 'उ' उत्तरभुर, 'प' दक्षिण 'n' प्रहस्थान और 'मान्सियचीय प्रहस्यान है । ह ग ग म प्रगत कदम्य प्रोतवृत्त, इसलिए गर्म भर होगा। ग ग म प्रदक्षा अहोरानमत्त । नरिए पार गैर भा। ध्रुव, , २६० गोलाध्याये जब क्रान्तिवृत्त-गत प्रहस्थान क्षितिज में है कर नीचे लिखे क्षेत्र से सष्ट प्रतीत होता है कि ग्रह अपने शर गर्ग' से या तो क्षितिज से उन्नामित है वा नामित । परन्तु ग्रह का उन्नामन किंवा नामन एकबारगी सिद्ध करना काठेन है, इसलिए इसके दो भाग करके सिद्धकिये हैं। प्रथम भाग क्षितिज मे ब्रुवप्रोतवृत्त तक चर है। यह उन्नामन किंवा नामन ग्रह के स्पष्टसर से होता है, जो कि गर । है । और उनामन और नामन का दूसरा भाग, ध्रुवप्रोतवृत्त और कदम्बप्रोतवृत्त का अन्तर रग है। यह ग्रह के मध्यमशर 'मग' से सिद्ध किया जाता है। इन दोनों भागों के योग किंवा नियोग से, क्षिविज से ग्रहका यथार्थ उन्नामन किंवा नामन सिद्ध होता है । जब स्थानीय अक्षाश उत्तर है और ग्रहका क्रान्तिवृत्तगत स्थान पूर्व क्षितिज में है तब आक्षवलन उत्तर होगा। और ध्रुवप्रोतवृत्त क्षितिज से उत्तर में उन्नामित होगा। इसकारण जब आक्षवलन है, तब प्रह, पूर्वक्षितिज से उन्नामित होगा; यदि उसका शर उत्तर है । और जब शर दक्षिण होगा, उस समय क्षितिन से नामित होगा । स्थानीय अक्षाश जव दक्षिण है तब उक्त नियम के विपरीत आक्षग्लन दक्षिण होगा । अर्थात्, जब आक्षवलन दक्षिण होगा तत्र भुवोतवृत्त क्षितिज से नामित होगा और उत्तर शर वश ग्रह क्षितिज्ञ के नीचे नामित होगा । यदि दक्षिग शा है, तब क्षितिज के ऊपर उन्नामित होगा। क य , - । परन्तु हर्मवासना। जन ग्रह का भुजाश मेपादि छ राशियों के अन्तर्गत है तर यह स्पष्ट है कि आयनवलन उत्तर होगा। और ग्रहगत ध्रुवप्रोतवृत्त के ऊपर उत्तर कदम्ब होगा। इसलिए जब आयननलन उत्तर होगा, तय ग्रह अपने मध्यमशर उत्तर या दक्षिण से, ध्रुवप्रोतवृत्त से उनामित किंवा नामित होगा। इसके विपरीत, जब आयनन- लन दक्षिण है, तन प्र नुवप्रोतमृत्त से, नामित वा उन्नामिन होगा; जैसा मह फा शर होगा। क्योंकि जब आयनबलन दक्षिण है, सब उत्तर कदम्य ध्रुवप्रोतवृत्त के नीचे रहता है और दक्षिण परम्प ऊपर रहता है। इसीप्रकार जर मह पश्चिम क्षितिज में हो सन ध्रुवप्रोतवृत्त, जो क्रान्तिवृत्तगत प्रहस्थान मे गया हुआ है भितिज के ऊपर उत्तर मिया में रहता आक्षवल्न दक्षिण होता है । इसलिए पूर्वक्षितिज की स्थिति से पश्चिम क्षितिज में विपरीत होती है । जय ग्रह का भुजाग मेषादि छ राशियों के बीच में होता है, तब आयनवलन उत्तर और उत्तर कदर ध्रुवप्रोतवृत्त के नीचे होताहै । इस लेख प्रह के उत्तर भर में नागन और दक्षिण में उन्नामन होता है । और जम प्रह भुमाश तुल आदि छ राशियों के अन्तर्गत होता है, उस समय आयनरलन दक्षिण और उचर कदम्न ध्रुवप्रोतवृत्त के ऊपर होता है । इसकारण प्रह का उना- मन तभी होता है जब उस का शर उत्तर होता है । और नामन तर होता है जय उसका शर नक्षिण होता है । इसप्रकार पश्चिम भितिज मे, इस स्थिति के विप- रीत होता है। अच, प्रह के उन्नामन मे उसके उदयकाल और नामन में, प्रह किसने ममय में भितिज में उदय होगा, इसम साधन करते हैं। उपर जिग्ने क्षेत्र म चउर कोण वा बैंप वियुपत्तचाप घ पिदु मे र तर मह पा उन्नामन फाल है। और र से ग तर ग्नामन काल का मान, ग उर पोण वा पप पिपुरवृत्त पाप है । इन य प और पप कालों में प्रथम पर्प का साधन दिया जाता है। गर्गर तिगुज में, गर्ग = महार, गगर - आयनग्लन ग र गं समकोण । र : ज्या गार = ज्या गग गारग; अपना आपयाXज्यातर नि: आरश्या - यार पारग, प्रायनवयन- - .. २६२ गोलाध्याये ज्यारग । इसलिए भायन त्रिज्यया चेत्-, सिद्ध हुआ। फिर, उगर और उपंप निभुजो में, ज्याउग : ज्यारग = ज्या उप : याप, यहा पर, ज्याउरा = क्रान्तिकोटिज्या, और उप-निग्या, त्रिी उधारग .:. ज्यापर माफोज्या = आयनपत्नज्या, मिज्यान में । इसतिए । त्रिज्याघ्ने युज्ययोड़ते।' यह उपपन्न हुआ। अन इसी प्रकार कंप के स वन के लिए यह प्रकार है:- गैरच निभुज में, गर = साष्टशर, रगच = आक्षवलन, और र च अक्षाश कोदि। .:. ज्या गचर ज्या रगच: ज्यागेर : ज्य रच ... %3D -- अथवा आताण्याXस्पस अक्षांको आचरलगज्या, स्पश. रच- आसग्लनज्या। अज्ञाको इसप्रकार 'लम्पज्ययाक्षज चेत्स्याद्वलनं किं पुणा ।' यह उपपन हुआ । यद आक्षालन दुज्याप्रमें होता है। फिर, उचर और उप जिभुजी में- यो उच ज्याचर - ज्या ज्याप; यहा पर, ज्याउच शान्तिकोज्या, और ज्याउर = त्रिज्या, निxज्याचर .:. ज्याकप % ज्या = आक्षवलन, विमाप्र में । इसप्रकार त्रिज्याघ्ने शुन्ययोवृते---, । यह प्रार, आशवरनगरमा में, उपपन हुआ। इसप्रकार साधितान यदि दोनों उनागन ना नामन सम्बन्धि दी तो, समपार में, शितिज्ञ रो ग्रह उन्नामित अथवा नामिव होगा । यदि एर उनामनपाल दूसरा नामनकाल हो, तर इन के अन्तर से शेष कार तुल्य पाल में, भितिज मे प्रह उनामिन या नामित होता है । इमार शर्मकार का माधन होता है। जर प्रह शिशीम में होता है तन नान्तियत्त का जो निन्दु दरक्षितिज में रगा .
:- - दृक् मेवासना। २६३ रहता है, वह उस नहका उन्य लग्न होता है । ग्रह के उदयकाल साध के लिए उदयलग्न का साधन आवश्यक है । उदयलग्नसाधन की विधि इसप्रकार है: यदि प्रह दृझिार से नामित है, ना यह स्पष्ट है कि जर ग्रह उदय क्षितिज में आवेगा, उस समय उसका नान्तिवृत्तीय प्रदेश क्षितिज से कर्मात के तुल्य उन्ना मित होता है । इसकारण, इम स्थान को सूर्य कल्पना करके इर्मकाल से उदय लग्न साधित करना । परन्तु गदि ग्रह दृकर्मकार से, पितिन से उन्नामित हो, नर उसका क्रान्तिहत्तीय स्थान उत्ती काठमे नामित होगा। इसलिए कम से जोलान होगा, वह ग्रहमा उयलग्न होगा। कान्तिन का जो प्रदेश पूर्वक्षिविज में लगा है, वह जब पश्चिम झिविज में हगेगा तब वह अस्तलग्न कहलानैगा । नर का अस्तकाल जानने के लिए उसका अन्त लग्न पहिले जानना जावश्यक है । यदि मह अस्त क्षितिज से इधर्मकाल से नामित हो, तव ग्रह क्षितिज म जिससमय पहुचेगा,तब उसका गान्तिवृत्तीयस्थान दृधर्मकाल के तुल्य क्षितिज से उचा रहेगा । और इसीगल से, छ राशियुक्त सूर्य पूर्वक्षितिज से न मित रहैगा । इमलिगे छराशि सहित ग्रह का कान्तिवृत्त-प्रदेश को सूर्यमानकर, दृर्भकाल से जा लन सिद्ध होगा वह ग्रहका अस्तलग्न होगा। पर यदि ग्रह पश्चिम क्षितिज से नामित होगा तर उसका छराशिमहित फ्रान्ति- वृत्तीय प्रदेश पूर्वक्षिति से सकर्मकाल करके उन्नत होगा। इसलिए इसविधि से जो लग्न सिद्ध हुआ है वह अस्तर होगा । यहा पर जो पफ कर्म काल का साधन, गरच निभुन से सिद्ध किया है, वह ठीक नहीं है। क्योंकि उस निभुजम ग चर कोण अक्षाग कोटि के समान स्वीकृत किया गया है परन्तु यह वास्तव में उसके तुल्य नहीं हो सकता । यदि उसका शर छोटा हो तो इस दृकर्मकाल में विशेष वाधा नहीं है । परन्त, यति ग्रहका शर बडा है, उस समय पर्क कर्मकाल ठीक नहीं है । उस स्थान में इस का साधन यों है:-पूर्वलिसित क्षेत्र में 'र' कोई नक्षत्र मान लिया और ग प्रान्तिवृत्त का सपातमिन्दुः । और नक्षत्रात ध्रुवप्रोतवृत्त गप उस ममय नपत्र का मध्यमशर होगा। रच, स्पष्टशर और र प स्पष्टक्रान्ति होगी। अन, सपं चरार्ध का साधन गंप मध्यममान्ति और शक चराध का साधन एर अथवा चा से सिद्ध ग्ना फिर उनका अन्तर करना 17 पं वा सक- २६४ गोलाध्याये सप-पक के होगा । परन्तु यह अन्तर ग और र के विषुववृत्त के एक ही प्रदेश में रहने से होता है । यदि भित्र स्थानों में होंगे, तर प दोनों चराधों के योग तुल्य होगा। इसप्रकार 'शरे महति भाना तु---, इत्यादि विशेष मिद्ध होता है- अथ शरस्य स्पष्टीकरणमाह- सत्रिराशिग्रहयुज्यानिम्नस्त्रियोदृतः शरः। स्फुटोऽसौ कान्तिसंस्कारे कर्मण्यक्षजे तथा ।। १०५ ॥ अथ संक्षिप्तो गौणप्रकारः । मुख्यस्तु पूर्व व्याख्यात एव । तथा पीह युक्तिमात्रमुच्यते । विषुववृत्तात्क्रान्ति(वाभिमुखी । क्रान्त्य- ग्राच्छरः कदम्बाभिमुखः । कथं तेन तिर्यस्थेन संस्कार्या । अतः क्रान्त्यग्रे यदाज्यावृत्तं तस्य शराग्रस्य च यदन्तरमृजु तेन संस्कृता सती स्फुटा भवति। तच्चान्तरं कोटिरूपम् । शरः कर्णरूपः । तब गान्तरपदं युज्यावृत्ते भुजः। एतत्त्यत्रं दिग्वलनजक्षेत्रसम्भवम् । तत्र सत्रिराशिग्रहक्रान्तिः कदम्बधुवसूत्रयोरन्तरम् । तज्ज्याभु जः । नवज्याकोटिम्रिज्या कर्णः । यदि त्रिज्ययेयं कोटिस्तदा शरेण केत्युपपन्नम् । कोटिरूपस्यैव शरस्य ध्रुवोन्मुखस्य ज्ययाक्षण दृधर्म कर्तुं युज्यते । शेपोक्तिः स्पष्टार्था । भाषाभाष्य। शर तोग राशियुफ प्रह की धुज्या से गुणकर त्रिज्याका भाग देने से स्पष्ट होता है । यह कान्तिसस्कार और आयन आक्षम में उपयुक्त होता है। उपपत्ति। स्पष्टशर का साधन दो प्रकार से गणिताध्याय के प्रछायाधिकार में किया गया है। उनमें प्रथम प्रकार सदन और टूमरा स्थूल माना है । वही दूमरामकार यहा पर खिलाते हैं।
। हकर्मवासना। २६५ स्पष्टशर करने का प्रयोजन यह है कि ग्रह अपने शरवश क्रान्तिवृत्त से इधर उधर रहता है । और प्रहकी क्रान्तिध्रुवप्रोतवृत्त में नाडीवृत्त और क्रान्तिवृत्त का इष्टस्थान में अन्तररुप होती है। परन्तु जब ग्रह अपने शराम में है उस समय यह अन्तर उसकी वास्तविक क्रान्ति न होगी। इसलिए इस शररूप अन्दर का उक्त दोनों वृत्तों के अन्तररूपक्रान्ति में संस्कार करना उचित हुआ। परन्तु शर फ़दम्बाभिमुख है उसको ध्रुवाभिमुख क्रान्ति में, विजातीय होने से जोड़ घटाय, नहीं सकते । इसलिए कदम्बवृत्तगत शरका ध्रुववृत्त में परिणामन करते हैं इस परिणामन से ध्रुवप्रोतवृत्त में जो शर होताहै उसी को स्पष्टशर कहते हैं । और कदम्बवृत्तगत शर को मध्यशर कहते हैं । अब इस स्पष्टशर और क्रान्ति का यथासम्भव संस्कार करने से नाडीवृत्त से शराम तक ग्रहकी, दक्षिणोत्तर स्पष्ट क्रान्ति होती है। इसी स्पष्टक्रान्तिसाधन के लिए शरको स्पष्ट किया है। कल्पना किया, न द = नाडीवृत्त, ध= ध्रुवस्थान, दग = क्रान्तिवृत्त और ग = प्रहस्थान है। गस = मध्यमशर, गक = सप्टशर है । स = शराप्रगत ग्रह गर्कल और कसग क्रमसे स्थानीय और पिम्बीय अहोरानवृत्त । सक = विम्वीयभुज सक = फैग = ग्रह भुज । इस प्रकार, सकग और सर्कग दिग्वलन-सम्बन्धि त्रिभुज हैं । क्योंकि सगक कोण आयनवलन के समान है । अर्थात् स्पष्टशर कोटि, मध्यमशर कर्ण और दोनों का वर्गमूल युज्यावृत्त में भुज । इसी त्रिभुज को वासनाभाष्य में दिग्वलनज व्यस्र लिसा है । सग बोग का मान आयन- वलन के साथ यदलता जायगा । औरह के शरमान में सष्ट और मध्यम दोनों शर एकही होंगे, अथवा २७ भुजाश में दोनों एकाकार होंगे। सगक समकोण त्रिभुज मानने से और सगक कोण का वीन राशियुक प्रह क्रान्तिमान, स्वीकार करने से, क्योंकि सनिम प्रहक्रान्ति आयनवलन के आसन्न होती है। और सग% त्रिज्या। ..:. ज्या सकग : कोन्या सगफ :: गस : गफ । अथवा, गस : गक क्योकि, सानभइक्रान्ति त्रि. याप्ट कोटि वा गुज्याकी यरिसंज्ञा है ।
गोलाध्याये . यष्टिXगस =गक = स्पष्टशर । इसलिए 'सनिराशिमह ाज्यानिघ्न नि, यह प्रसार उपपन्न हुआ ॥ १०॥ क्षेत्र। र अथ ब्रह्मगुप्तादिभिः किं स्पष्टोनोक्त इत्याशङ्कयाह- ब्रह्मगुप्तादिभिः स्वल्पान्तरत्वान्न कृतः स्फुटः। स्थित्यर्धपरिलेखादौ गणितागत एव हि ॥ ११॥ नक्षत्राणां स्फुटा एव स्थिरत्वात्पठिताः शराः । . । यह स्पटशर या साधन रथूल हे । श्रीरादव शायीनीने अपने शारित सिद्धातशिरोमणि पे, इस श्लोक की टिप्पणी में लिखा है- 'परमाल्पधुनीवानो महायोद्धृत शर इति पाठ साघु । अर्थात् शर परमाल्पयुज्या से गुणकर प्रद्युम्या का भाग दनेस सष्ट हाता है । इसप्रकार में रख घट के साधन में विशप है । इस यष्टि से शर स्पष्ट करने से उक्त निधि की राता निकल जानी है। सभि ग्रहवी काति या वा थायनाला या के वर्गका निन्यार्ग म पर मने लनेसे यष्टि होती है पर तु आयनक्लन या सदा सरिभग्रहवातिच्या के समान ही हाती । यहा स्वाता है । नि पशुx वि. -यषि, नि यटि यटि ४ मश-पाकिxमरा - परमश FIXT तु राप्रबार उक्त विधि उपपन्न हुई प मश: - २६७ दृकर्मवासना। दृधर्मणायनेनेपां संस्कृताश्व तथा ध्रुवाः ॥ १२॥ स्पष्टार्थम् । भाषाभाष्य। ब्रह्मगुप्त आदि आचार्यों ने स्वरूपान्तर होनेसे गर को स्पष्ट नहीं किया । और प्रहण प्रसंग में, स्थित्यर्धसाधन और परिलेस में गणित से सिद्ध गरसे ही उप- योग किया है । नक्षत्रों के स्थिर होने से उनके शर स्पष्टही लिखेहुए हैं । और इन के ध्रुवक आयनदृधर्म-संस्कृत लिखेहुये हैं । आयन फर्म संस्कार से सन प्रह-नक्षन निरक्षदेश के सिद्ध होजाते हैं। फिर उनको स्वदेशीय करन में केवल , भाक्षकर्म का संस्कार करना पड़ता है ।। ११ । १२ ।। अथ सदूपणानुपहसन्नाह- क्रान्तिसूत्रे शरं केचिन्मन्यन्ते ते कुबुद्धयः। यद्येवमायनं तैश्च दृकर्मान्यैश्च किं कृतम् ॥ १३ ॥ किं स्पष्टे वालने सूत्रे दत्तो मध्यशरश्च तैः। कोटिवदालनात्सूत्रात्स्पर्शमुक्तिशरी च किम् ॥ १४ ॥ किं च कृत्वा शरं कोटिं स्थित्यनियनं कृतम् । तादृक् चेत्स शरस्तेन नातुपातेन सिद्धयति ॥ १५ ॥ यदि क्रान्तिसूत्रे शरस्तदा ध्रुवाभिमुखः स्यात् । निरनदेशे नित जस्थो ध्रुवाभिमुखशराग्ररथो ग्रहः क्षितिजं न त्यजति । नामनी नामनाभावात् । किं तत्रायनहकर्मणा [ अथवाचार्यः कृतं येन मन्यन्ते तैरपि कृतं भ्रान्तत्वात् । तथा परिलेसे विम्बमच्यात् स्पष्ट वलनानोपरिंगतं सूत्रं क्रान्तिवृत्तप्राची। तस्याः कोटिवच्छर. किं दत्तः। तत्पक्षे ध्रुवसूत्रे नेयः। शेपं स्पष्टम् । भाषाभाष्य। कोई ध्रुवप्रोतवृत्त में शरको मानते हैं । परन्तु यह उनी दुर्बुद्धि है । यदि ध्रुवप्रोतवृत्त में ही मानें तत्र ध्रुवाभिमुखार होने से निरझदेश में मह क्षितिज -- गोलाध्याये फो नहीं छोड़ेगा । क्योकि वहां ध्रुव के तितिज मे रहने से नामन वा उन्नामन फा अमाव होगा। यदि इसप्रकार की स्थिति है तब उनके मतसे आयन डकर्म संस्कार क्यों कियाजाता है. यह संस्कार व्यर्थ होगा। और कदम्बप्रोतवृत्तरूप सष्टवलनसूत्र में मध्यशर का दान कोटिरूप क्यों किया । उनके मतसे ध्रुवसूत्र में देना चाहिए । और वलनसूत्र से स्पर्श और मोक्षकालिकशर कोटिरूप क्यों दिये इनको भी ध्रुवसूत्र में देना था और शरको कोटिमानकर स्थित्यर्ध का साधन कैसे किया ? यदि शर ध्रुवमोतवृत्त में मानागया तब अनुपात से सिद्ध न होगा ॥ १३ । १५ ॥ अथोत्क्रमज्यानिवृत्तिमाह- दृष्टिकर्मवलनं च केनचि- दभ्रान्तितः कथितमुत्क्रमज्यया। तत्कृतं तदनगैस्ततोऽपरै- रन्धपूरूपपरं परोपमैः।। १६ ॥ ब्रह्मगुप्ततिरत्र सुन्दरी सान्यथा तदनुगैर्विचार्यते। नोद्धता कृतिरथोद्धतास्तु वा मामिका सुगणका विचार्यताम् ॥ १७ ॥ अत्र ब्रह्मगुसकृतिः सुन्दर्यपि चतुर्वेदाचार्यन्यथा व्याख्यात तथात्मन औद्धत्यशङ्कां मत्वोक्तम् । हे सुगणका इयं मामिका कृति नौद्धता । अथ वास्तुद्धता । सम्यग्विचार्यताम् । अत्र स्थोद्धा छन्दोनामापि सचितम् । प्रभा केनचिभ्रान्तितः दृधर्म तथा वलग चोकमज्यया साधनाया दिष्टम् । तदनन्तरं तदनुगतैरन्धपूरुषपर परोपमैरन्धपुरुषवदनालोर व तन्मार्गगम्तदानयनमुत्तमम्यया कृतमित्यर्थः । ब्राझरफुटसिद्धा - हकर्मवासना। २६६ ब्रह्मगुप्ताचार्यकृतमानयनं साधु तथापि तदनुगैश्चतुर्वेदाचायः खटी- काया तदानयनमन्यथा व्याख्यातमिति । शेष भाष्ये स्फुटमेव । भाषाभाष्य। किसीने भ्रम से दृकर्म और वलन का साधन उत्क्रमज्या से करना कहा उसके बाद दूसरोंने अन्धपरम्परा से उसी मतको मानकर उत्क्रमज्या से साधन किया । परन्तु भला बुरा का विचार न किया । यद्यपि ब्रह्मगुप्त की विधि ठीक है, चौभी चतुर्वेदाचार्य ने उसका अर्थ उलटा किया है। इस विषय मे मेरी साधन विधि कैसी है, हे मुज्ञगणक ! उसका विचार आपलोग ही करें ॥ १६-१७ ।। अथ व्यभिचारमाह- उत्क्रमज्याविधानेन दृकर्मवलनं तथा । यत्तैरुक्तं न तत्तथ्यं व्यभिचारोऽत्र कथ्यते ॥ १८ ॥ जिनाल्पकाक्षांशगुणत्रिभज्या- घातो जिनज्याविहतोऽस्य चापम् । तेन त्रिभोनेन समाप्रतीच्यां प्राक् सत्रिभेण द्युचरः कुजे चेत् ॥ १६ ॥ दृङ्मण्डलाकारतयापवृत्तं तयाम्यसौम्यं क्षितिजं तदा स्यात् । क्षिप्तोऽपि खेदः परमेपुणात्र याम्योत्तरत्वात् क्षितिजं न जह्यात् ॥ २० ॥ दृकर्मसंभूतफलद्वयस्य नाशो भवेदन धनर्णसाम्यात् । नैवोकमज्याविधिनात्र साम्यं दृक्कर्म कार्य क्रमजीवयातः॥ २१ ॥ तयैवनाशो वलनदयस्य साम्यादिगन्यत्ववियोजनेन।
ॐ २७० गोलाध्याये न साम्यमत्रोत्क्रमजीवया स्यात् कमज्ययातो वलनं विधेयम् ।। २२ ॥ यत्र चतुर्विशतिभागेभ्योल्पोऽक्षरतत्राक्षज्यात्रिज्ययोर्घातो जि नांशज्याभक्तः । पलस्य यावच्चापं तावतो भुजस्य कान्तिज्योत्त- राक्षज्यासमा भवतीत्यर्थः। तद्यथा । अक्षांशाः । २०१३८ । ए. पां ज्या १२१० । अस्यास्त्रिज्यागुणाया जिनज्याहृतायाश्चापं राशिदयम् २ । अनेन सत्रिभेण समो ग्रहो ५ यदा पूर्वक्षितिजे । अथवा वित्रिभेण ११ समः प्रत्यक्षितिजे ग्रहो भवति । तदाप- भान्तः स्वस्वरितके । अतो दृङ्मण्डलाकार क्रान्तिवृत्तं स्यात् । अस्य क्रान्तिनस्य शितिजप्रदेशे क्षितिजमेव दक्षिणोत्तरं स्यात् । यतस्तदा कदम्बः क्षितिजे वर्तते । अतः क्षितिजस्थो ग्रहः परमे णापि शरेण कदम्वोन्मुखेन विक्षिप्तः क्षितिजं न त्यजति । क्रान्ति वृत्तग्रहस्थानमेवोदयलग्नं स्यात् । एवं दृकर्मफलयोर्धनर्णयोः साम्यं भवति । उत्क्रमज्याविधानेन तयोर्न साम्यं स्यात् । अतः क्रमज्ययैव कर्तव्यम् । एवं तत्रैव वर्तमानस्यार्कस्य वलनामावः वलनयोभिन्नदिशोः साम्यात् । उत्कमज्यया नैव साम्यमित्यर्थः । अथ यत्खस्वस्तिकगे स्वाविति श्लोकद्धयं पूर्व व्याख्यातमेव । भापाभाप्य। जिन पूर्वाचार्यों ने उत्तामज्या से दृदम और बलन सिद्ध किया है । यह ठीक नहीं है। यहां पर उदाहरणद्वारा उस विधि की असंगति दिखलाई जाती है। जिस स्थान में अक्षाश २४ से कम है, उस देश में अक्षांशाज्या यो निग्या से गुणफर परममान्तिग्या या भागदेने से जो पापारमफफल मिले, उस में तीनरामि पटाने से या जोडने से मामसे यह पश्चिम और पूनिनित में होगा। इस समय फ्रान्सिगृत्त हुमण्डल होगा और उसका दक्षिणोत्तरवृत्त क्षिविज्ञ ही होगा। इस लिए ग्रह अपने परमार भी क्षितिज से इधर उधर नहीं दोमकता । थयोंकि हकर्मवासना। २७१ शर याम्योत्तर होने से, क्रान्तिवृत्तपर लम्बभूत है । इस स्थितिमे, आयन और भान क्षम आपस में धन ऋण होने से नष्ट होजाते हैं । अर्थात् उक्त सरकार का अभार होता है । परन्तु यह अभाव उत्तमज्या से सिद्ध नहीं होसकता, इसलिए दृकर्मसाधन में सदा क्रमज्या से ही करना चाहिए । इसी प्रकार इस स्थान में आयन और आक्षवलन, भिन्नदिशाओ के तुल्य होते हैं, इसलिए उनका अन्तर करने से नाश होजाताहै पर यदि उत्तमज्या से साधन पियाजाय तब उक्त दोनों चलन तुस्य न होंगे। इसलिए वलनका साधन रमज्या से करना चाहिए। उपपत्ति। जिस देश में अक्षाश चौबीस अशसे कम है वहा पर ग्रह का भुजाश सिद्ध करते हैं। जिसकी उत्तर प्रान्ति अक्षज्या के समान होवे । अनुपात किया-- अक्षज्या % निxअक्षज्या ज्या २४ नि ; इस फलका चाप जो ज्या २४ हो उतने ही भुजाश की क्रान्तिज्या अक्षज्या के समान होती है । अर्थात् उत्तर कान्तिज्या जिस दिन अक्षज्या के समान होगी, तर प्रान्तिवृत्त दृङ्मण्डलाकार होगा । उक्तफल में, तीन राशि जोडने से पूर्वक्षितिज में और घटाने से पश्चिम क्षतिज में ग्रह होता है इसप्रकार दृड्मण्डलाकार क्रान्तिवृत्त का क्षितिजही दक्षिणोत्तर होताहै, कदम्ब क्षितिज में कहता है । क्षितिजग्रह अपने शर से इधर उधर पालित भी क्षितिजको नहीं छोड़ता । उस समय क्रान्तिकृत्तगत प्रहस्थान ही उदयलग्न होताहै। और दोनों दृकर्मों का धन, ऋण होने से नाश होजाता है। इसीतरह वलनों का भी नाश होताहै ॥ १८ ॥ २२ ॥ अथ तन्मतिभ्रमे कारणमाह- गदिसराभस्यात् परविश्वासात् प्रमादतश्चापि । मुह्यन्त्यपि मतिमन्तः किं मन्दोऽन्यैस्तथाचोक्तम् ॥ २३ ॥ गणयन्ति नापशब्दं न वृत्तभङ्गं वयं न चार्थस्य । रसिकलेनाकुलिता वेश्यापतयः कुकवयश्च ।। २४ ॥ स्पष्टम्। इति श्रीभास्करीये गोलभाष्ये मिताभर उदयास्तधर्मवासना।
गोलाध्याये
२७२
प्रभा।
प्रथमश्लोकस्तु स्फुट एव । द्वितीयो व्यर्थवाची। यथा वेश्यापति
पक्षे, अपशब्दो दुर्वाच्य, वृत्तभङ्गो, दुष्कीर्तिः अर्थक्षयो धनक्षयः।
रसिकत्वेनाकुलिता व्यग्राः सन्तोन गणयन्तीति सर्वत्रान्वेति । एवं
कुकवयोऽपि कवितायामपशब्द, छन्दोभामर्थक्षयमर्थापुष्टिं रसिकत्वे-
नाकुलिता न गणयन्ति । एताः सर्वा अशुद्धीः प्रमादवशेन न वि.
चारयन्तीत्यर्थः।
इति प्रभायां दृक्कमवासना।
भापाभाप्य।
गर्व उत्कट इच्छा, दूसरे का विश्वास और प्रमाद ( भ्रम ) से बुद्धिमान लोग
भी भटक जाते हैं, मन्दमतियों का तो कहनाही क्या है । कहा भी है कि वेश्या-
गामि, और कुकवि रसको आकुलता से भले बुरे का विचार नहीं परते । असा
येश्यागामि, वैश्या के कहेहुये दुर्वचन , दुर्यश और द्रव्य के सर्च का विचार नहीं
फरते । कुवि अपनी कविता में युराशब्द , छन्द का भंग और अर्थकी पुष्टि
का विचार नहीं करते । इसप्रकार दूसरे श्लोक का अर्थ है ॥ २३-२४ ॥
भापाभाप्य में शुक्र्मयासना समाप्त हुई।
अथ शृङ्गोन्नतिवासना । तत्र शुक्लत्वे कृष्णवे च कारणमाह-
तरणिकिरणसङ्गादेप पीयूपपिण्डो
दिनकरदिशि चन्द्रश्चन्द्रिकाभिश्चकास्ति ।
तदितरदिशि वाला कुन्तल श्यामलश्री.
घट इव निजमूर्तिच्चाययेवातपस्यः ॥ १ ॥
सूर्यादधस्थस्य विधोरयस्थ-
म नृश्यं सफलासितं स्यात् ।
दर्शऽय भार्थान्तरितस्य शुक्लं
तत्वोणमास्यां परिवर्तनेन ॥ २॥
शृङ्गोन्नतिवासना। २७३ कक्षाचतुर्थे तरणेहि चन्द्र- कर्णान्तरे तिर्यगिनो यतोऽन्जात् पादोनपवाष्ट ८५ । ४५ लवान्तरेऽतो दलं नृदृश्यस्य दलस्य शुक्लम् ॥ ३॥ उपचितिमुपयाति शौक्ल्यमिन्दो- स्त्यजत इनं व्रजतश्च मेचकत्वम् । जलमयजलजस्य गोलकत्वात् प्रभवति तीक्ष्णविपाणरूपतास्य ॥ ४ ॥ यद्याम्योदकपनशशिनोरन्तरं सोऽत्र बाहुः कोटिस्तूर्ध्वाधरमपि तयोर्यश्च तिर्यक्स कर्णः । दोर्मूलेऽकः शशिदिशि भुजोऽग्राच कोटिस्तदने चन्द्रः कर्णो रविदिगनया दीयते तेन शौक्ल्यम् ॥ ५ ॥ स्पष्टम् । अस्य वासना पूर्व कथितैव । तथापि किंचिदिहोच्य- ते। प्राग्वद्भित्तेरुत्तरपार्वे चन्द्रका रविकक्षां च विलिख्य तत्रोर्च- रेखां तिर्यग्रेखां च कृत्वा चन्द्रकोर्ध्वरेखासंपाते चन्द्रविम्व विलि- ख्येदं दर्शयेत्। तिर्यग्रेखाया उपरि चन्द्रकलाव्यासार्धमितेऽन्तरेऽन्यां तिर्यग्रेखां कुर्यात् । सा रेखा प्रत्याविकक्षायां यत्र लग्ना तत्र स्थित एवार्क ऊर्ध्वरेखावच्छिन्नचन्द्रविम्बा पश्चिमतः शुक्लं भवति । तस्यार्धमधस्तनं मनुष्यदृश्यम् । तत्रस्थेऽर्के व्यर्केन्दुः सपादचतु- भौगोनं राशित्रयं भवति २ १२५ । ४५ एतावत्येव व्यर्केन्दुभुजे बिम्बाधं पश्चिमं पूर्व वा शुक्लं भवितुमर्हति । न त्रिभे । प्रभा। एप पीयूपपिण्डोऽमृतपिण्डश्चन्द्रः तरणेः सूर्यस्य यः किरणसङ्गः २७४ गोलाध्याये संमेलनं तस्मादिनकरदिशि यस्यां दिशि चन्द्रादविरस्ति तदिशी....। चन्द्रिकाभिः स्वद्युतिभिश्चकारित शोभते । तदितरदिशि बालाकुन्तल. श्यामलश्रीः, कुन्तल केशः चिकुरः कुन्तलो वालः' इत्यमरः। बाला- कुन्तलस्येव श्यामला कृष्णा श्रीः शोभा यस्य सः । निजमूर्तिच्छायया चन्द्रः। प्रातपस्थों घट इव चकास्ति । एतदुक्तं भवति । यथा आतप- स्थस्य घटस्य दिनकरदिशि यो भागःस उज्ज्वलोऽन्यश्च कृष्णो दृश्यते तथैव चन्द्रस्यापीत्यर्थः । दर्श सूर्यादधरथस्य विधोश्चन्द्रमस ऊर्ध्वमर्थ शुक्लं तथाधस्थमर्ध मनुष्यदृश्यं सकलमसितं कृष्णं भवति । अथ भा- र्धान्तरितस्य षड्राश्यन्तरितस्य पौर्णमास्यां परिवर्तनेनोमर्धमसितं तथा धस्तनं शुक्लं भवति । एवं चन्द्रात्पादोनपटाप्टलवान्तरितस्य वेरितर्यक स्थत्वान्नृदृश्यस्य दलस्य भागस्य दलमध शुक्लं भवति । इनं रवि त्यजत इन्दोः शौक्ल्यमुपचितिं वृद्धिमुपयाति प्राप्नोति । तथैवेनं व्रजत इन्दोर्मेचकत्वं श्यामलत्वं 'कालश्यामलमेचकाः।' इत्यमरः। उप- चितिमुपयाति । अस्य जलमयजलजस्य, जलमयश्चासौजलजश्च तस्य गोलरूपत्वात्तीक्षणविषाणरूपता प्रभवति । शृङ्गयोस्तैदण्यं रविकरस्पर्शवशेन भवतीत्यर्थः। शेष स्फुटम् । भापाभाप्या । माग पम यह अमृतपिण्ड चन्द्र सूर्यकिरणों के संयोग से अपनी पांदनी से, सूर्यकी तर प्रकाशित होताहै । और दूसरी तरफ नवीन स्त्री के केशों के तुल्य अपनी फार छाया से , धूप में रक्से हुए घड़े की भांति शोभित होता है। अर्थात् असे धू में घरे हुए घड़े का सूर्य के संमुसवाला भाग प्रकाशित और दूसरे तरफवार अपनी परछाही से काला रहता है, वैसेही चन्द्र का सूर्य संमुखबाला फोला और दूसरा काला रहता है । अमावास्या को मूर्य के नीचे चन्द्र का मनुष्य को दिसलाई देनेवाला नोचला हिस्मा सघ काला होजाता है। और अमारे या छ राशि के अन्तर मे, पूर्णिमा को पन्द्रका वही नीचे का भाग चमरीला होजार है । मूर्य को चौथी कक्षा में , भूमि से चन्द्रकर्ण के तुल्य दूरी पर, पन्द्र ८५ । ४५ अंश के अन्तर में, सूर्य तिरछा होता है। इसलिए यहां पर मनुष्य पन्द्रपिम्प जितना दिखलाई देता है उमका चोपाई हसा पीना होता है मर्य में जितनाही पन्द्र हटता है उतनाटी चन्द्र में शुम बदना है । और ' प दा शृङ्गोन्नतिवासना। २७५ -सूर्य के पास होताजाता है तब उसका शुक्ल क्रम से घटता जाता है । जलमय चन्द्र के गोल होने से उसके शृंग (शुक्लवश ) नोकदार होते हैं । सूर्य चन्द्र का दक्षिणोत्तर अन्तरभुज, पूर्वापर अन्तर कोटि और तिरछा अन्तर कर्ण होता है। भुज के मूल में सूर्य होता है, भुज चन्द्र की तरफ होता है । भुजके अप्रसे कोटि होती है, जिसके अनमें चन्द्र होता है । और चन्द्र से रवि की दिशा में फर्ण होता है। इसी कर्ण से चन्द्र में शुक्ल पहुंचता है । उपपत्ति । (१) अमावास्या को सूर्य और चन्द्र एक सूत्र मे नीचे ऊपर होते हैं। इसलिए चन्द्रमा का नीचला भाग जो मनुष्यों को दिसलाई देना चाहिए, वह सब काला हो- जाता है। फिर अमाके बाद जब सूर्य चन्द्र का छ राशिका अन्तर होता है अर्थात् पूर्णिमा को बही चन्द्रका नीचे का भाग प्रकाशित होता है । इसप्रकार प्राचीनों के मत से सूर्य चन्द्र के अंश के अन्तर पर, मनुष्यों को जो चन्द्रका भाग दिखलाई देता है उसके चतुर्थाश में शुरू होता है । परन्तु यहापर आचार्य के मतसे ८५। ४५ अंश परही चतुर्थाश शुक्ल होजाता है ९० अश पर नहीं । इसका पूरा साधन गणिताध्याय के शृङ्गोन्नति अधिकार में है। यहापर केवल सक्षेप से स्थिति दिखलाई है। कल्पना किया, म भूमि, वरद सूर्यकक्षा, चय चन्द्रकला । अप, भाचार्य के मतसे जब रवि '' विन्दु में होगा क्षेत्र । तभी चन्द्रविम्ब का दृश्य अर्ध शुक्ल होजायगा । और जय रवि'द' स्थान में होगा अर्थात् ९० पर, उससमय दृश्याध से अधिक शुरूच होगा। पर प्राचीनों के मवसे यहीं अर्ध विम्ब शुक्ल होताहै । परन्तु वर वृत्त चतुर्थाश से रद चाप के तुल्य कम है। बर चाप का साधन इसप्रकार है। अचर समकोण त्रिभुज में, अच चन्द्र- कक्षा व्यासार्ध और अर रविवक्षा व्यासार्ध का मान है । इसका योजनात्मक मान सिद्धान्त के अनुसार- अच%D५१५६६ अर-६८९३७५ अच ५१५६६ अब, कोज्याचअर- -=*०७४८-कोज्या ८५,४३ अर ६८९६७७ प --
चार पांच दिनके बाद जब चन्द्र 'य' स्थान में होगा उससमय पश्चिम दिशा में
क्षेन।
D
म
क
भू
सय विम्बों का अधे आपस में समान है। और घट रेसा से चन्द्र के उस भाग
२७६
गोलाध्याय
::. घरचाप-८५।- ४५ स्थूलता से हुआ।इसीलिए 'पादोन पट्काप्टलवान्तरे'
माना है।
(२) चन्द्र के शुक्ल का वृद्धिक्षय आकाश में स्पष्ट देसने में आता है । अमा-
वास्या के बाद पूर्णातक जिसप्रकार शुक्ल बढ़ता है उसका क्षेत्र नीचे लिखा है।
कल्पना किया, अकदम चन्द्रकक्षा है । 'भू' भूमि और 'स' सूर्य है । और
अपनी कक्षामें चन्द्रविम्ब भ्रमण करता,
इस क्षेत्र में चन्द्र की आठ स्थिति दिसलाई है । गन रेसा सूर्य दिशा
रेखा पर लम्वरूप है । इस से चन्द्र का जाल और कृष्ण भाग का अर्थ होता !
का अर्थ होता है जो वेधक की तरफ है ।
जव चन्द्र अमा को अनिन्दु में सूर्य के साथ योग करता है तब उसका
कृष्णभाग भूमि की तरफ रहता है, इसलिए वेधकर्ता पो नहीं दीसता । फिर
सूर्यास्त के बाद, लिसाहुआ स्वरूप दिसलाई देगा। जय स्थान में, सूर्य मे
९० पर होगा तय अर्ध गुल होगा । और दो स्थान लिखा रूप होगा और जब
'म' स्थान में, पूर्णा यो होगा उस दिन चन्द्रका प्रकाशित भाग भूमिकी तक
होजायगा और पूरा विम्ब शुभ होगा।
म
द
शृङ्गोन्नतिमासना।
२७७
पूर्णा के बाद यह शुक्लका वृद्धिक्षय फिर 'फ' 'अ' 'ह' के क्रमसे क्षीण होकर
अन्तमें अमा को 'अ' निन्दु में पहुचकर पूरा बिम्ब क्षीण होजाता है । यही अभि-
प्राय ' उपचितिमुपयाति-' इस श्लोक का है।
म क्षेत्र ।
(३) इसक्षेत्र में, र-रवि, च-
चन्द्रमा, और, अर=भुज, अच-
कोटि, चर कर्ण । अव कर्ण के 4
अग्रपर एक गचप समकोणोत्पादक
रेखा की।
न्य
इस रेखा से चन्द्र के शुलशृङ्ग को दिशा ज्ञात होगी । और जचद भुज
समुस कोण गचल कोण के समान होगा । यो संपूर्ण कोण के मान से, उत्तर
शृङ्गाम उन्नत और दक्षिण नत होताहै । जब चन्द्र 'क' स्थान में होगा तव शृङ्गों
की उचाई निचाई न होगी । क्योंकि इस स्थान में कर्णरेखा से शुल्ल सण्डित
होजाता है । जब सूर्य चन्द्र से उत्तर है तव उत्तर और दक्षिण होने पर दक्षिण
शृङ्ग ऊचा होता है । चन्द्रमा में कर्णमार्ग से शुक्ल पहुचता है । इसप्रकार 'यद्या
म्योदकतपनशशिनो -' इत्यादि श्लोक का साराश है गणिताध्याय में यह विषय
सविस्तर लिखा है ।। १-५॥
अथाध्यायोपसंहारश्लोकमाह-
ईपदीपदिह मध्यगमादौ
ग्रन्थगौरवमयेन मयोक्ता।
वासना मतिमता सकलोह्या
गोलवोध इदमेव फलं हि ॥ ६ ॥
२७८ गोलाध्याये हि यस्मात् कारणात् गोले ज्ञात इदमेव फलं यदश्रुतापि वासनोह्यते। इति श्रीभास्करीये सिद्धान्तशिरोमणिगोलभाष्ये मिताक्षरे शृङ्गोन्नतिवासनाध्यायः । ग्रन्थसंख्या १८ ॥ प्रभा। इह तन्ने मध्यानां गमो ज्ञानं यत्र तदादौ तदादिप्रकरणे मया ग्रन्थगौरवभयेन ईपदीपत् किञ्चित् किश्चित् संक्षेपणेत्यर्थः या वास- नोक्ता सा मतिमता बुद्धिमता सकला संपूर्ण ज्ञेयेत्यर्थः । संक्षिप्ताओं विशिष्यावधेय इति तत्त्वम् । हि यस्मादोलवोधस्येदमेव फलमिति । इति प्रभायां शृङ्गोन्नतिवासना। भाषाभाष्य। इस मन्थ में मध्यमाधिकार आदि अधिकारों में जो अन्य गौरव के भय से थोड़ी थोड़ी उपपत्तियां लिखी हैं, उनको बुद्धिमान लोग स्वयं पूरी तौर से समझ लेवें। क्योंकि गोलके ज्ञानरा यही फल है ॥ ६ ॥ भाषाभाष्य में श्रद्गोन्नतिवासना समाप्त हुई। अथ यन्त्राध्यायो व्याख्यायते । तत्रादौ तदारम्भप्रयोजनमाह। दिनगतकालावयवा ज्ञातुमशक्या यतो विना यन्त्रैः । वक्ष्ये यन्त्राणि ततः स्फानि संवेपतः कतिचित्॥१॥ गोलो नाडीवलयं यष्टिः शर्वटीचक्रम् । चापं तुर्य फलकं धीरेकं पारमार्थिकं यन्त्रम् ॥ २॥ स्पष्टम्। प्रभा। यतो यस्माद् दिनस्य गताः ये कालावयवास्ते यन्त्रदिना ( सक्षम त्यात) ज्ञातुमशक्या भवन्ति । ततस्तरमात्मंक्षेपतः कतिचितफुटानव्य.
यन्त्राध्यायः। २७६ भिचारितानि यन्त्राणि वक्ष्ये । शेषं स्फुटम् । ब्रह्मगुप्तस्तु यन्त्रारम्भे गोलस्य परिच्छेदः कर्तु यन्त्रैविना यतोऽशक्यः' इति कारणमाह । भापाभाष्य। काल के N ४ सूक्ष्म अवयवों का ज्ञान विना यन्त्र के अशम्य है। इसलिए संक्षेप स, कुछ यन्त्रों का वर्णन कहते हैं । उन ( यन्त्रो ) के नाम ये हैं -गोल, नाडी. वल्य, यष्टि, शङ्कु, घटी, चक्र, चाप, तुर्य, फलक और धी। परन्तु इन सय यन्त्रों में एक धी यन्त्र सर से उत्तम है ॥ १-२ ॥ अथ प्रथमं गोलयन्त्रमाह- अपवृत्तगरविचिहं क्षितिजे कृत्वा कुजेन संसक्ते। नाडीवृत्ते विन्दु कृत्वा धृत्वाथ जलसमं क्षितिजम् ॥ ३॥ रविचिह्नस्यच्छाया पतति कुमध्ये यथा तथा विद्यते । उड्डगोले कुजविन्द्वोर्मध्ये नाट्यो युयाताः स्युः॥ ४॥ यथोक्तविधिना खगोलान्तर्भगोलं वद्धा तत्र क्रान्तिवृत्ते मेपादे रारभ्य रविभुक्तराशिभागाद्यं दत्वा तदने यच्चिद्रं तदपवृत्तगरवि- चिमुच्यते । भगोलं चालयित्वा रविचि क्षितिजे धार्यम् । तथा इते सति क्षितिज प्राच्यां विपुवन्मण्डले यत्र लग्नं तत्र खटिकया विन्दुः कार्यः। ततःक्षितिजवृत्तंजलसमं यथा भवति तथा गोलयन्त्रं स्थिरं कृत्वा भगोलस्तथा चाल्यो यथा रविचिह्नस्य छाया भूगर्भे पतति । तथा कृते सति विपुववृत्ते क्षितिजविन्दोमध्ये यावत्यो घटिकास्तावत्यस्तस्मिन् काले दिनगता ज्ञेयाः । अपवृत्ते मेपादेरा रभ्य प्राक् क्षितिजपर्यन्तं यदाशिभागाद्यं तल्लग्नं ज्ञेयम् । इति गोलयन्त्रम् । प्रभा। एवं लल्लोऽपि 'अथ लग्नकालासिद्धयै पूर्वापरपरिकरोतरैवभिः २८० गोलाध्याये निर्मापयेगोले प्राविधिना क्रान्तिवृचमिह ॥ तस्य बहिश्चखगोल समवृचक्षितिजदक्षिणोत्तरगैः उन्मण्डलेन च तथा ध्रुवयष्टया पूर्व वत्मभुवा ॥ वटयाङ्कयेहगोलं प्रागपराणीतराणि चक्राशैः कुर्याद् दृढं खगोल श्लथं भगोल च नलिकाभ्याम् ॥ यस्मिन्नंशे सचिता तत्र शलाका क्षिपेदपवृत्ते नाडीवृत्तस्थां तामुदये क्षितिजादविवशेन ॥ मयेच्छश्वत्तद्यथा न केन्द्रं त्यजेच्छलाकामा । रविचिह्नक्षितिजान्तर मुदितांशस्तृणकुजान्तरा घटिकाः ॥ इति ॥ भापाभाष्य। क्रान्तिवृत्त में जो रविस्थान, अर्थात् मेपादि से मुक्त राश्यादि प्रदेश है उसको क्षितिज में लाकर नाडीवृत्त और क्षितिज के संपात में चिह्न करना। फिर क्षितिज को जलके समान समतल करके गोलयन्त्र को स्थिर करना। फिर भगोल को ऐसा चलाना जिसमें रविचित की छाया भूगर्भ में पड़े । इस स्थिति में विपुववृत्त और क्षितिजविन्दुके बीच में जितनी घड़ी हों वे दिनकी गतपीटका होती है । और मेपादि से लेकर पूर्वक्षितिजपर्यन्त क्रान्तियत्त में जो राश्यादि अवयव हों वह लग्न है । N उपपत्ति । सगोल के भीतर भगोल बनाकर अर्थात् जो गोल बन्धाधिकार में, क्षितिज मध्याहवृत्त, समहत्त, उन्मण्डल आदि सगोलीय स्थिरवृत्त हैं और प्रान्तियत्त, अहोगप्रवृत्त, रधिमण्डल, ध्रुवप्रोतहत्त आदि भगोलीयवृत्त हैं इनको राश्यादि से अङ्कित करके यथास्थान चल स्थिर बाधकर दिसाधन करके गोलको स्थापित करना इमप्रकार आकाशीय, गोलस्थिति हटान्त गोलमें परिणत होती है तत्र घटिका और लग्न जानने में गोल युक्तिही यासना है ॥ ३-४ ॥ अथ नाडीवलयमाह--- अपवृत्ते कुजलग्ने लग्नं चाथो खगोलनलिकान्तः । भृस्थं धुवयष्टिस्थं चक्रं पष्टया निजोदयश्चाइयम् ॥ ५ ॥ व्यस्तैर्यष्टीभायामुदयेऽर्क न्यस्य नाडिका ज्ञेयाः । इष्टच्छायासूर्यान्तरेऽथ लग्नं प्रभायां च ॥ ६ ॥ केनचिदाधारण वाभिमुखकोलकेत्र धृते । अथवा कीलच्छायातलमध्ये स्युनता नायः॥ ७॥ * यन्त्राध्यायः। अत्र चारुदारुमयमिष्टप्रमाणं चक्राकारं समं नेम्यां पष्टिघटिकाई यन्त्रं खगोलमध्यस्थायां ध्रुवयष्टौ पृथ्वीमध्यस्थाने प्रोतं कार्यम् । तथा स्वोदयप्रमाणे#पादिराशिभिरसमैरुभयपार्श्वयोः पवर्गेण च बुद्धिमताङ्कनीयम् । तैश्चोदयैर्विलोमैरक यम् । मेपात् पश्चिमतो वृपो वृपात् पश्चिमतो मिथुन इत्यादि । स चाइनप्रकारः सर्वतोभद्र- यन्त्रे यथा मया पठितः। वृतौ चक्रभागैस्तदन्तर्घटीभिः स्वदेशोदयैश्चाङ्कयेदस्य पार्श्वम् । प्रतिस्त्रोदयं खाग्निभिः क्षेत्रभागै स्त्रिभागाभिधैर्दादशांशेर्नवांशः॥ त्रिभागैर्दिभागैस्तथा स्वस्त्रनाथैः प्रयत्नेन पड्वर्गमेवं विभज्य ॥ एवं यन्त्रं कृत्वा यस्मिन् दिने तेन कालज्ञानं तस्मिन दिने वानौदयिको रविस्तभुक्तान् राशीन मेपादेर्दत्त्वा भुज्यमान- शेर्भागान क्षेत्रभागेषु दत्त्वाग्रे रविचिह्न कार्यम् । तस्मिन् दिने इयकाले यष्टिच्छाया या पश्चिमतो गता तस्यां छायायां रवि- गई यथा भवति तथा यन्त्रं स्थिर कार्यम् । ततोऽनन्तरं रविर्यथा थोपरि याति तथा तथा छायाधो गच्छति । छायाचिङ्गयोर्मध्ये [ घटिकास्तथा दिनगता जेयाःतथा यष्टिच्छायायां यो राशियें क्षेत्रांशास्तल्लग्नं ज्ञेयम् । स च पवर्गः। अथवा किं खगोलान्तः न यष्टिपोतेन । चक्रान्तरिष्टं प्रमाणं कीलकं प्रोतं कृत्वा स लको ध्रुवाभिमुखो यथा भवति तथा केनचिदाधारण चक्र स्थिर र्यम् । तथा कृत इष्टकाले कीलच्छाया यत्र लगति तस्य * महारान सराई जयसिंह की याबाई जयपुर की वेधशाला में इसप्रकार का एक मार सयपत्य है। इस में उत्तर और दलिए दोनों गोल की स्थिति दिसलाई है। वर्तमानकाल में रानमे भाषाभाष्य। घड़ी अङ्कित करके खगोलीय ध्रुवयष्टि में पो देना। और स्वदेशके राश्युदयों से विलोम यिक सूर्य के भुक्तराशियों को क्रान्तिवृत्त में मेपादि से अङ्कित करके वर्तमान को घुमाकर स्थिर करना । सूर्योदय के समय यष्टिच्छाया यन्त्रपाली में पश्चिम पाली में नीचे की तरफ जाती हे मध्याह्न में अनोधर रूप होती है। इस छाया २८२ गोलाध्याये यन्त्राधश्चिह्नस्य च मध्ये नतनाडिका ज्ञेयाः । इतिनाडीवलयम्। प्रभा। अपवृत्त इत्यादयः श्लोका भाप्ये स्फुटार्थाः। पड्वर्गाङ्कनरलोक त्रिभागशब्दस्त्रिंशांशयाची। अब नाडीवलय यन्त्र कहते हैं. :-काष्ठका चक्राकार यन्त्र बनाकर उसमें साठ- अर्थात् मेप से पश्चिम वृष, वृप से मिथुन आदि और होरा, द्रेष्काण, नवांश द्वाद- शांश, त्रिंशांश से अङ्कित करना । फिर जिस दिन वेध करना हो उस दिन औद. राशि के भुक्त अंशों को अङ्कित करना और उनके आगे सूर्यचिह्न कल्पना करना। वाद उदयकाल में यह सूर्यचिह्न जिसप्रकार ध्रुवयष्टि की छाया में हो वैसा यन्त्र फी तरफ पड़ती है बाद जैसा जैसा सूर्य ऊंचा होताहै वैसी यष्टिकी छाया यन्त्र- और रविचिह्न के बीच में जितनी घटी हों वे दिनको गतघटिका होंगी । और पुत्र- यष्टिकी छाया में जो राशि हो वही लग्न है। ** अथवा सगोल के भीतर ध्रुवयष्टि की कल्पना न करके केवल चक्र को ही किसी आधार से स्थिर करके उसके -मध्य में धुवाभिमुग्व फील गाड़ देना। इसप्रकार इष्टपाल में कोलगाया जहां घधि में पढ़े उस छाया के और चक्रके टीक अधोगत चि के बीच में नतघटिका होंगी ।। ५-७ ॥ धाज्ञा से पतिपय ज्योतिषियों ने इस गाय पाशोधनाया है। इसलिए उन यत्र पर दशा में है। इसका काल घोसा और मोटा है हमार उसपी धागा पप्या न होने से ये परिधि में स्पष्ट प्रीन न होने से पैर के अनुपा है। और पाटयानों या घडू न भी स्थल होने ग्य विभाग नहीं जात होने । इस में गात आठ पुगो बारीक भालिसे हैं । निना इस कोई सम्बध नहीं है।
यन्त्राध्यायः . २८३ नोट। यही नाहीवलययन्त्र भूमि में रखने से पलभायन के स्वरूप को प्राप्त होताहै । पलमायन्त्र काल - न के लिये बहुत उपयोगी है इसलिए उसका सोपपत्तिक साधन यहा लिसाजाता है कल्पना किया, 'इउक' याम्योत्तरमण्डल । गच-विपुत्रदत्त । ड, ढ, नुवचिह्न । 'ढ' ध्रुवचिह अक्षांश के तुल्य त्रिज्यासे 'इमन' वृत्त किया ! '' समस्यान । 'पूर्य। पूर्यगतध्रुवप्रोतवृत्त जनम सइय-दितिजधरातल। क्षेत्र । Ic प - 4 . पर इस क्षेत्र में, सूर्यगत रय' रितु में तिति नरेखात सपात करता है। इसलिए पोतवृत्त' य'रिद से समस्यान तक ५ य' मुनहुया ।'४'प्रज्ञाशोटि और भुवोतवृत्त में ध्रुवसे तिन तक 'य' कर्य यह चापनात्य हो । यहाँ पर 'ढ' भुवरितुगत 'द ग' याम्योत्तरवृत्त र 'हज'भुववृत्तों का नाडीवृत्तम परमातर 'गज ननकाल है । , कोष का मान है र इधवग्यान में परिणत नवकाल है । इसप्रकार कोटिकी के सपात से उत्पन्न ४ हनतकाल का और द ग्रहांश का ज्ञान होने से' इय भुज की सरिता का शान लप्रमशातर्गत गोलीय त्रिकोणमिति के । चारनाये फोयदानननन्या कोषमाहति त्रिन्यामा व पाया कोपसमुसाहुना ॥' इस तिमाल से- सिनत ज्याइ त्रि मिर किया पसाई में गधिनागन ननकाल की सशरेता मिलती है नौ महमा च्यासार्थ क्या, या, असहन में विग्यान--प्रवन के पर्श चिश्मे पर्गग्गा सरइम्प नतकाल कॉम्पर्श गोलाध्याये नोर। होती है वही वियावृत्त में उक्त दोनों वृत्तों के स्पर्शीवदु से धीविभागरूप प्रथमा । (घण्टा ) विभागरूप अतराश की स्पर्शरेखा होती है । उसफा चार शितिनवृत्त में सूर्यगत भुवोन और उत्तर समस्थान का अन्तराशरूप 'इय' भुज होगा। अथवा उक्त प्रथ के ' कोणज्यका योणलग्नसाहुकोटि ययाहता । त्रिज्याभक्ता पल धायक कोरिया भवेत् ॥ अनुसार- ख्या नतर योज्या अक्ष को या 'य' कोण। नि :./हिरवाज्यार य ज्या य कोण । यार, ज्याय ज्याइ याद ३४ज्याद ज्याय उक्त वासना से निकली रीति। समतल पाषाण में इष्ट व्यासार्थ से वृत्त बनाकर उसको पूर्वापर और याम्योत्तररेखासे श्रीद पता । याम्योत्तर--रेखा को उत्तर की तरफ पदाकर उसमें केन्द्र पल्पना करके स्थानीय प्रहार ज्या के तुल्य च्यासार्धं से एक ऐसा वृत्त बनाना जो पहिले वृत्तकै उत्तर विदु को स्पर्श करे । यी इस वृत को भी पूर्वापर, तथा याम्योत्तर-रेता से प्रति करना । इसप्रकार दोनों वृत्तों की याम्यो बरा एक होजायगी और पूर्वापर रेखा समानातरा होंगी । इनके समाना तर दोनों वृत्तों के सरा विदु में जानेवाली एक स्पर्शरेखा कानी । और छारे वृत्त में स्पर्शनिद्ध के दोनों तरफ स्थानी परम दिनमान के प्राधे थे तुग्य घड़ी, अथवा पण्यास भाग करना । वे नतकाल के विभाग होंगे छोटे वृत्तकै केन्द्र से उसके हर एक विभागों में होकर नानेवाली स्पर्श-रेखा तक रेखा कानी ।। घेदन ना होंगी । उनके और स्पर्शरेताके हर एक सपातपितु से बड़े वृक्ष के पेद्र तक र पानी । और ये रेता रहे वृत्तको निस जिस स्थान में बारें बहा घड़ी अपवा घण्टारूप विभागका नना। पूक्ष्मकाल जानने के लिए हरएक घड़ी अएका परा में पल, पथवा मिनट की कल्पना करनी और बड़े वृत्त के परिधि से शहर की रेखाओं तथा छोटे नृतको मानर पर देना और उम रहे वृत्त की रेखाओं को रद करना । हिर स्थानीय-प्रधाश स्पर्शरेसा छोटि, त्रिग्या सुन, घेदन रेता कर्ण-ऐसा धातुमय रद क्षेत्र बापाकर उसे बई वृत्त पेन्द्र में इस ग से मना कर देना कि जिसमें अक्षारा स्परारेसा उत्तररिद के ऊपर टीक सम्ररूप है । सम्न के अम से न केतक नो घेदनरेता है उसी को ' भुवाभिमुम्ब-गोल 'फरते हैं । इस बील की कायावृत्त परिधि में जहां पर वहा से पश्चिम की तरफ गा) और पूर्व की तरफ गग्य काल (पटी, अपा घरटा) जानना। यह यात्र: प्रशस बोदवर सारे महल में उपयोग देमकता ? सी विशतिर जगारयवशाला में समा प्रादि पविषय पत्र शैल गृहार सा है यह पत्र पल में रन सकता है। और के
यन्त्राध्यायः।
२८५
नोट में
त्र
-
क्षितिज
ससएन
पलमायन्बकेश का प्राकार।
अक्षाशसशरगर
भूत
त्रिज्या
२८६ गोलाध्याये अथ घटिकामाह- घटदलरूपा घटिता घटिका ताम्रीतले पृथुच्छिद्रा । युनिशनिमजनमित्या भक्त युनिशं घटीमानम् ॥ ८॥ अत्र दशभिः शुल्बस्य पलैरित्यादि यद् घटीलक्षणं कैश्वित्कृतं तद्युक्तिशून्यं दुर्घटं चेत्येतदुपेक्षितम् । इष्टप्रमाणाकारसुपिरं पात्रं घटीसंज्ञमङ्गीकृतम् । युनिशनिमजनसंख्यया यदि पत्रिंशच्छता- नि पानीयपलानि लभ्यन्ते तदैकेन निमजनेन किमिति त्रैरा- शिकम् । इति घटीयन्त्रम् । प्रभा। घटिता रचिता। ा च निशा च युनिशम् अहोरात्रः तस्मिन् यन्निमज्जनं घटिकाया जलेनिमग्नतं तस्य या मितिः संख्यया मान तया । 'दशभिः' इति लल्लस्य प्रथमः प्रकारः । द्वितीयस्तु अथवा खेच्छाघटितं घटीप्रमाभिः प्रमाधितं भूयः। प्रैराशिक सिद्धबाहुलंवद्गुरु विपुलरन्धं यत् ॥ इष्टदिनार्धघटीभिः सममथवा निमज्जति घटी स. पष्टया शतैत्रिभिर्वा विंशतिलध्यक्षरासूनाम् ॥ इति ॥ भापाभाप्य। आधे घड़े के आकार का एE ताम फा घटिकायन्य यनाफर, उसके पीप में छेद करना और उसको अलमें छोड़ देना । दिन रात के बीच में जितनी पार पद जल में इझे उस संख्याका अहोरात्र में भाग देने से एक पार ह्यने पा पाद सिद्ध होगा। उपपत्ति । यह पटीयन्त्र अहोरात्र में जितनी पार जरमें डुबै उम संख्या को गिना अनुगत करना पाहिए । पदि साठ यार टूो सो पड़ी फेटूयने या प्रमाण एकए पड़ी का होगा । और यदि दिन रात में चौबीस चार टूये वो अदाई पड़ी। एक घटा हर दफे दयने का काल होगा । दमकार अनुपान किया-गदि मई यन्त्राध्यायः। २८७ राम की संख्या में, ३६०० पानीय पल मिलते हैं तो एक बार में क्या ? फल घटी के डूबने का समय हुआ + घटिका में छोटे बड़े छेदके अनुसार जलमें डूबने की संख्या कम ज्यादा होगी। इस घटिकायन्त्र का कालज्ञान के लिए यहुत प्रचार है ॥ ८॥ अथ शकुमाह- समतलमस्तकपरिधिर्धमसिद्धो दन्तिदन्तजः शङ्खः । तच्छायातः प्रोक्तं ज्ञानं दिग्देशकालानाम् ।। स्पष्टम् । इति शड्डयन्त्रम् । प्रभा। तलं च मस्तकं च तलमस्तके । समे तलमस्तके यस्य स चासो परिधिश्च । दन्ती हस्ती तस्य दन्तजः, भ्रमसिद्धः भ्रमों लोहकाष्ठ घटितो यन्त्रविशेषः 'खराद' इति हिन्दीभापायां प्रसिद्धम् । एवं विधः शड्कुः स च प्रायो द्वादशाङ्गुलः कियते । शेपं स्फुटम् । 'भ्रमसिद्धः सममूलाग्रपरिधिरतिसुगुरुसारदारुमयः। रज्जुव्रणराजीलाञ्छनस्तथा समतलं शङ्कुः इति लल्लः। भापाभाष्य। जिसका ऊपर और नीचे समधरातल हो ऐसा खराद पर चढाहुआ हाथी के + यहा वासनाभायमें जो प्राचार्य न 'दशभि शुल्वस्य पलै -' इत्यादि । लिखकर माची घटीय पका सएडन किया है यह लल का कल्पित है। दशभि शुल्बस्य पले पान कलशासनिम घटितम् । हस्ताधैं मुखव्यास समवृत्त दलोच्छायम् ।। सभ्यशमारफत्रयम्तनलयासमसवृत्तयाहेन । चतुरङ्गलया विद्ध मधति विमले जले नाम्या ।।, श्रीपति क ये श्लोक हैं। “शुल्बस्य दिभिर्विहित पलयंत् पडलाच दिगुणायतास्यम् । तदग्भसा पष्टिपले प्रर्य पात्र घाईप्रमित घटी स्यात् ॥ सायशमापनयनिर्मिता या हेम्न शलाम चतुरड्डुला स्यात् । तिद तया प्राकनमत्र पात्र प्रर्यते डिक्यामुना तत् ॥ , -- २८८ गोलाध्याये दांत का शकु होता है । यह शहकुद्वाशाङ्गुल वा इष्टाङ्गुल का समझना चाहिए । इसको दिक्साधन फरके स्थापित करने से, इसकी छादा से दिशा, देश और काल फा ज्ञान होता है ॥९॥ अथ चक्रमाह- चक्र चक्रांशाहू परिधौ श्लयशृङ्खलादिकाधारम् । धात्री त्रिम आधारात् कल्प्या भाषेत्र खाधं च ॥ १० ॥ तन्मध्ये सूक्ष्माक्षं क्षिप्त्वार्काभिमुखनेमिकं धार्यम् भूमेरुन्नतभागास्तत्रातच्छायया भुक्ताः ॥ ११ ॥ तत्वार्धान्तश्च नता उन्नतलवसंगुणीकृतं शुदलम् । युदलोन्नतांशभक्तं नाड्यः स्थूलाः परैः प्रोक्ताः ॥ १२ ॥ धातुमयं दारुमयं वा समं चक्रं कृत्वा तन्नेम्यां शृङ्खलादिरा- धारः शिथिलः कार्यः । चक्रमध्ये सूक्ष्मं सुपिरमाधारात् सुपिरोपरि गामिनी लम्बबदूर्ध्वरेखा कार्या । तन्मत्स्यतोऽन्या तिर्यग्रेखा चात्र + प्राचार्य के मत से शाम नीचे घोर ऊपर का भाग गोल है । अपात् यो परन्तु ऐसे शडु की छाया वृत्तपालि में मोटी पड़ती है इसलिए सूक्ष्म अवयवों का ज्ञान ठीक नहीं होता । यदि सूच्यम शङ्ख बनाकर उपयोग में लायाजाय तो अधिक सुभीता पहै ! ब्रह्मसिद्धात में भी लिखा है । मूलदथगुलविपुल सूच्यप्रो द्वादशालोमाय । जयपुर की वेधशाला में, पुराने शड्डयन्त्र का एक पत्थरका बड़ा भारी चौतरा बना हुआहै । इसके मध्य में शङ्क के लिए गढ़ा बना है । इसपर जो वृत पाषाण का है उसका ध्यास प्राय ३३ गन और । इस हैं । वृत्त के चतुषोश में २४ भाग है। प्रतिभाग में १५.. १५ हिरसे हैं । फिर इनमें हर एक में दश दश हिस्से है और इन में भी हर एक में तीन तीन विभाग है। प्रतिम विभाग में क्ला और यमु समान होते हैं । यह या बहुत पुरानाहै । इस के उपयोग में प्राचीन प्राचार्याने हजारों श्लोक लिखे हैं । पाश्चर्य है कि इस यन्त्र का सुधार और शङ्कस्थापन नहीं हुआ । शायद इसका उपयोग न स मझा होगा । यदि यह साफ चिकना दिया होता तो व्याखण्ड यल्लना करने से इट या बोटिग्याउलमच्या प्रादि सहनही शातहोती । और इनसे परेसा चादि गाणसे सिद्ध होता । गणित करने में मूलग्रहण से घरात में कहीं भूलता पानाती है सो भी इसमे दूर होगाती। गणितागत समग्दाया, कोणछाया, मध्यपशाया, इष्टदाया और इनके दायापर्ययी तुलना और - M भाभ्रमणवी रीति की पालोचना भी हम यन्य से अनायास ज्ञान होनानी।
२८६ यन्त्राध्यायः॥ 'कार्या । तच्चक्र परिधौ भगणांशैरकयित्वाधारात्रिम इति नंवति भागान्तरे तिर्यग्रेखा तत्परिधिसंपाते धात्री क्षितिः कल्प्या भार्धेऽ न्तर ऊ रेखा नेमिसंपाते खाधु कल्प्यम् | सुपिरे सूक्ष्मा शलाका प्रवातव्या।सा चाक्षसंज्ञा । तचक्रमर्काभिमुखनेमिकं च यथा भवति तथाधारे.धार्यम् तथा धृतेऽशस्य छायापरिधौ यत्र लगति तकुज- चिह्नयोरन्तरे येऽशास्ते खेरुन्नतांशाः । ये छायाखार्धयोरन्तरे ते नतांशा ज्ञेयाः। एवमत्र नतोन्नतांशज्ञानमेव भवति । अतोऽन्यै- घटिका अप्यानीताः। तद्यथा। तस्मिन् दिने गणितेन मध्यंदिनो- नताशान् दिनार्धमानं च ज्ञावानुपातः कृतः । यदि मध्यंदि. नोन्नतांशेर्दिनार्धनाड्यो लभ्यन्ते तदैभिः किमित्येवं स्थला घटिकाः स्युः। प्रमा एते श्लोकाः स्फुटार्थाः। मध्यदिवसोन्नतांशैदिनार्धनाडीवदन्ति तु- या ये । ते मूर्खास्तच्छाया इष्टच्छायासमा न यतः' इत्यनेन घटीसाधनं षितं ब्राह्मस्फुटसिद्धान्ते। भापाभाष्य । किसी काष्ठ वा धातु का वृत्ताकार चक्रयन्त्र बनाकर उसकी परिधि तीन सौ साठ शोंसे अङ्कित करना । और ढीली जंजीर या किसी और आधार से रसना । र्थात् इस चक्रयन्त्र को किसी जंजीर में लटका देना चाहिए या दो सम्भों के च में किसी नलिका में पोकर लटका देना चाहिए, जिससे इष्टदिशामें घूम कै। आधार से अर्थात् जंजीर में जो यन्त्र का प्रदेश लगा है उससे वीन राशि अन्तर' अर्थात् यन्त्रगत दक्षिणोत्तर-रेखासंपात में भूमि कल्पना करनी । और ह राशिके अन्तर पर अर्थात् ऊर्द्धरेखा और परिधि के संपातमें पमध्य फल्पना रना । फिर केन्द्र में एक सूक्ष्म शलाका पोदेनी । बाद में यन्त्रको सूर्य की तरफ सरकार करना जिसमें इस शलाका की छाया यन्त्र की परिधि में पड़े। जिस छाया पडै, उसके और क्षितिज के बीचमें सूर्य के पन्नताश और समध्य ' २६० गोलाध्याये से नतांश होते हैं। दिनार्थ को उन्नतांश से.गुणफर मध्याह के नतांशों का साग देनेसे स्थूल दिनकी गतघड़ी सिद्ध होती है। ऐसा और लोगोंने कहा है। उपपत्ति । * चन यन्त्र से सूर्यका नतांश और उन्नतांश वेधसे ज्ञात होता है। इस यन्त्र से किसप्रकार वेध होता है । यह ऊपर लिखा है कई आचार्यों ने उन्नतांश सिद्ध करके अनुपात से दिनकी गतघड़ी भी सिद्ध की है । जैसा, यदि मध्याह्नसम्बन्धि उन्नतांश में दिनार्थघटी मिलती हैं, तब इष्ट उन्नतांश में क्या ? इसप्रकार इष्ट इन्भ- तांश में दिनकी गवघड़ी सिद्ध होगी। परन्तु यह स्थूल घड़ी हैं क्योंकि, दिनार्थ दिना?नतांश : : इघ : इउन इसप्रकार जो इटोग्नताश होंगे उनकी छाया वेधानीत इघकालिक छाया के तुल्य न होगी ॥ १०-१२॥ ग्रंथ वेधेन ग्रहज्ञानमाह- पैत्रपुष्यान्तिमवारुणाना- मृतदयं नेमिगतं यथा स्यात् । दूरेऽन्तरेऽल्पेषु भखेचरौ वा तथात्र यन्त्रं सुधिया प्रधार्यम् ॥ १३ ॥ नेमिस्थदृष्ट्वाक्षगतं प्रपश्येत् खेच धिण्यस्य च योगताराम । नेम्यड्कयोरक्षयुजोस्तु मध्ये येडशाः स्थिता भध्रुवको युतस्तैः॥१४॥ प्रत्यकस्थिते भेश्य पुरः स्थिते ते- हीनो ध्रुवः स्यात्खचरस्य भुक्तम् ॥ तत्र यन्त्रस्यायो नेम्यां दृष्टिं कृत्वार्द्धनेम्या मुक्काणां म भदितयं युगपन्नेमिगतं यथा स्यात्तथा यन्त्रं स्थिरं कृत्वा ने धिष्ण्ययोरेकतरं स्थानमकयेत् । ततोऽये पृष्ठतो वादृष्टिं चालयि * प य र बहुत पुराना है । इसका नाम मिशत में भी पाया है यही पक्रया + योग में यन्त्रराम के स्वरूप को प्राव होता है। .
यन्त्राध्यायः। २६१ अहं विध्येत् । ग्रहः प्रायोक्षगतो दृश्यते । अक्षमूलस्य ग्रहस्य चान्तरं शरो ग्रहावधिः । अक्षमूलं नेम्यां यत्र लग्नं दृश्यते तत्स्थानमप्य- इयम् । अथ भग्रहालयोर्मध्ये येऽशास्तैर्मधुवो युतः स्फुटग्रहों भवति । यदा ग्रहात्पश्चिमस्थं नक्षत्रम् । यदा पूर्वस्थं नक्षत्रं तदा भध्रुवो हीनः स्फुटग्रहो भवति । अथवाल्पशरं नक्षत्रं रोहिण्याचं ततो दूरेऽन्तरे यदा ग्रहस्तदा तावेवविवा प्रोक्तवद ग्रहज्ञानम्। इति चक्रयन्त्रम्। पैत्र:ति। मघापुष्यरेवतीशततारकाणामर्थादासां योगताराणां शरा- भावाकान्तिवृत्तधरातलेऽवस्थानात्तथा वेधेन चक्रयन्त्रस्य कान्तिवृत्त धरातलगतत्वमिति ज्ञेयम् । अल्प इपुर्यस्य तादृशं यद्भ खेचरश्च तो। अत्र यथा यथा शराल्पता तथा तथा सूक्ष्मता, इतोन्यथाभावे स्थूलता। शेष भाष्ये स्फुटम् । प्रभा। मापाभाष्य। चिह मघा, पुष्य, रेवती और शतभिप इन नक्षत्रों मे दो नक्षत्र एक कालमें, जिस प्रकार वेध करने से यन्त्र की नेमि में आवें वैसा यन्त्र स्थिर करना । अथवा जो अल्पशरवाले ग्रह और नक्षत्र हों । वे यन्त्र की नेमि में जिसप्रकार आवे वैसा यन्त्र स्थिर करना। फिर यन्त्र की नेमिगतदृष्टि से नक्षत्र का जो स्थान नेमि आवे पहा करना । ग्रह का वेधसे जो स्थान सिद्ध हो वहा भी चिह्न करना। इसप्रकार प्रह और नक्षत्र के चिहित स्थानों में जो अश हों उनको नक्षत्र धुवक में जब प्रहसे नक्षत्र पश्चिम हो तब जोडने और पूर्व हो तर घटाने से ग्रह स्पष्ट होता है । यन्त्रकील जहा नेमि में लगाहो उस स्थान से महचिह तक शर होता | इसप्रकार चक्रयन्त्र से वेधद्वारा ग्रह का ज्ञान होता है। सबको वेव करके प्रत्येक विषय की प्रतीति करनी चाहिए ॥ १३ । १४ ॥ अथ चापं तुर्यगोलं चाह- दलीकृतं चक्रमुशन्ति चापं कोदण्डखण्ड खलु तुर्यगोलम् ॥ १५ ॥ है ।
कोदण्डं धनुः। शेषं स्फुटम् । धनुस्तुरीययन्त्रयोः प्रयोजनमि २६.२ गोलाध्याये स्पष्टम् । अत्र यन्त्रेषु गोलो गोल एव । नाडीवलयं विषुव- वृत्तम् । तयोटिकाज्ञाने गोलयुक्तिरेव वासना । सम्यग्वाभिमु- खयष्टिके गोले धृते यथोक्ताः स्वत एव घटिका ज्ञायन्त इत्यर्थ । यत्तु नाडीवलयं चक्रं कृत्वा यष्टयां प्रोतं तत् पवर्गावनार्थमेव । यत्तु चक्रं तदृमण्डलम् । तत्र नतोन्नतांशज्ञानमेव गोलयुक्त्या भवति । दृमण्डले क्षितिजादुपरि ये गैरविर्भवति तैरेव पश्चिम शितिनादधःकीलकच्छायालगतीत्यर्थः । ग्रहवेधेयहक्लेपधिष्ण्यं नेमिस्थं कृत्वा यन्त्रं धृतं तत् क्रान्तिवृत्ताकारावस्थानार्थम् । अतः स्तत्रापि गोलयुक्तिव वासना । इति चापतुर्थे । प्रभा। न प्रतिपादितम् । किंतु तदुद्देशमात्रम् । अतश्चक्रप्रकृतिकत्वात्तदति देशेन प्रयोजनं बोध्यम् । भापाभाष्य। वृत्तका आधा चाप और चापका आधा तुर्य यन्त्र कहाभाता है। यहां तक जो यन्त्र कहे हैं उनका सक्षेप से वासनाभाष्य में फिर स्थिति और उपयोग लिखा है इसकी व्यारया का कोई विशेष प्रयोजन नहीं है ॥ १५॥ अथ फलकयन्त्रार्थमाह- दृमण्डलेऽत्र स्फुटकाल उक्तः सुखेन नान्यैर्यतितं मयातः। सगोलयुक्तर्गणितस्य सारं स्पष्टं प्रवक्ष्ये फलकाख्ययन्त्रम् ॥ १६ ॥ स्पष्टम् ।
यन्त्राध्यायः। २६३ प्रभा । अन्यैराचार्यः सुखेनान हङमएडलीयोन्नतांशान् विवा ग्रहाणां स्फु- टकालो नोक्तः। श्रतः सती समीचीना गोलयुक्तियत्र तादृशस्य गरिण- तरय सारं फलकाख्ययन्त्रं प्रवक्ष्ये । भापामाच्या पूर्वाचार्यों ने सुख से दृङ्मण्डलगत उन्नतांश का वेध करके ग्रहों का सष्टकाल नहीं सिद्ध किया । इसलिए हम उत्तम गोल युक्ति का और गणित का सारभूत फलकयन्त्र कहते हैं । अर्थात् इस यन्त्रमें हम सब नई युक्ति दिसलावेंगे ॥१६॥ इदानीमभीष्टदेवतानमस्कारपूर्वकमाह- नित्यं नाड्यतमोहरं सुमनसामुल्लासनं सप्रमं निष्क्लेशं समयाववोधनविधौ प्रोवोधितज्योतिपम् । सेव्यं मण्डलमध्यगं सुकृतिभिर्यन्त्रं स्फुट वच्म्यहं नत्वैतद्गुणमेव देवममलं श्रीभास्करं भास्करः ॥ १७ ।। वच्मि कथयामि । किम् । यन्त्रम् । किं विशिष्टम् । स्फुटमव्य- भिचारि । काकर्ताहं भास्करः । किं कृत्वा । नत्वा प्रणिपत्य। कम् । भास्कर सूर्यम् । किं विशिष्टम् । मण्डलमध्यगं सूक्ष्मरूपाव- स्थानम् । पुनः किं विशिष्टमिति प्रतिविशेषणं संवध्यते । नित्यम- विनाशिनम् । तथा जाज्यतमोहरं शैत्यतमोहरम् । तथासुमनसां कमलादीनामुल्लासनम् । तथा सप्रभं सदीप्तिकम् । तथा निष्क्लेशं निरायासम् । क । समयाववोधनविशे कालज्ञानविधाने । पोहो- • धितज्योतिपमुल्लासिततारकम् । यदेतत्तारकाणां तेजस्तदवितेजः संजनितमेवेत्यर्थः । तथा सेव्यमुपास्यम् । कैः । सुरुतिभिः पुण्यकृद्भिः। अर्थतान्येव विशेपणानि यन्त्रे व्याख्यायन्ते । किं विशिष्ट यन्त्रम्।जाड्यतमोहरम्।जाज्यं मौढ्यं तदेव तमोहरतीति जाड्यत-
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२६४
गोलाध्याये
मोहरम् । कदानित्यं प्रत्यहम् । तथा सुमनसांविदुपामुल्लासनम्
तथा सप्रमं छायासहितम् । तथा निष्क्लेशं समयाववोधनविधी
अत्र सुखेन कालज्ञानं भवतीत्यर्थः । तथा प्रोवोधितज्योतिष
मुज्ज्वलीकृतज्योतिः शास्त्रम् । तथा सुकृतिभिः सुगणकै सेव्यम्
तथा मण्डलमध्यगम् मण्डलं मध्यगं यस्येति मण्डलमध्यगमन्त
लिखितवृत्तमित्यर्थः। तथामलमिति ।
प्रभा
आचार्येण स्फुटं पक्षद्वयेऽपि व्याख्यातोऽयं श्लोकः ।
भापामाप्य।
इस श्लोफ का अर्थ दो प्रकार का है। एक सूर्यपक्ष में दूमरा यन्त्र के । क्रम
से
दोनों पक्षों जैसा:-नित्य अविनाशी और प्रतिदिन, शीत और अशाननाशक कमली
को और विद्वानज्योतिपियों यो आनन्ददायक, शोभा और छायासहित, फाल.
मान में सेशनाशक, प्रह नक्षत्र और ज्योविपशाग्न फे प्रफाशक, पुण्यवान् और
ज्योपियों से सेवित्त, मण्डल में सूक्ष्मरूप से वर्तमान और रामहित, निपग
श्रीसूर्यभगवान् को प्रणाम परफे, इन्ही उफ लक्षणों से सदित फलफयन्त्र हो ।
(भास्कराचार्य) पहताहूं ॥ १७ ॥
इदानीं यन्त्रलक्षणमाह-
कर्तव्यं चतुरस्रकं सुफलकं खाट्वाङ्गुलर्विस्तृतं
विस्ताराद्विगुणायतं सुगणकेनायाममध्ये तथा ।
आधारः श्लयद्धलादिवटितः कार्या च रेखा तत-
स्त्वाधारादवलम्बसूत्रसहशी सा लम्बरेखोच्यते ॥ १८ ॥
लम्ब नवत्य ६० लकविभज्य
प्रत्यङ्गुल तिर्यगतः प्रसार्य।
मूत्राणि तत्रायतमामरेखा
जीमाभिधानाः मुधिया विधेयाः ॥ १६ ॥
२६५ यन्त्राध्यायः। आधारतोऽधः खगुणा ३० मुलेषु ज्यालम्बयोगे सुपिरं च सूक्ष्मम् ।। इष्टप्रमाणा सुपिरे शलाका क्षेप्याक्षसंज्ञा खलु सा प्रकल्प्या ॥ २० ॥ पष्टयगुलव्यासमतश्च रन्ध्रात् कृत्वा सुवृत्तं परिधौ तदड्वयम् । पष्टया घटीनां भगणांश ३६० कैश्च प्रत्यंशकं चाम्बुपलेश्च दिग्भिः॥ २१ ॥ अग्रे सरन्धा तनुपट्टिकैका पष्टयगुला दीर्घतया तथाङ्कया। अत्रादौ धातुमयं श्रीपादिदारुमयं वा फलकं चतुरखं श्लक्ष्णं समं कर्तव्यम् । तच्च नवत्यङ्गुलविस्तारं द्विगुणविस्तारदैर्व्यम् । तत्समीपे दैर्घ्यमध्ये, तस्याधारः शिथिलः शृङ्खलादिः कार्यः। आधारे धृतं यन्त्रं यथा लम्बमानं स्यात्तथा धृते फलक आधारा- दधः सूत्रमवलम्बरेखा कार्या । सा च लम्बसंज्ञा । तं लम्ब नवति- भागं कृत्वा भागे भागे तिर्यग्रेखा दीर्घा कार्या । तिर्यक्त्वं तु लम्बभवान्मत्स्यात् । सा रेखा ज्यासंज्ञा ज्ञेया । आधारादस्त्रिंश- दुगुलान्तरे या ज्या तस्या लम्बस्य च संपाते सुपिरम् । तत्रेष्टप्र- माणा शलाका क्षेप्या । साक्षसंज्ञा । तस्मादन्ध्रात् त्रिंशदङ्गुलेन कर्कटकेन वृत्तरेखा कार्या । सा पष्टि ६० घटिकाभिर्भगणांशकः पडग्निसंख्यैः ३६० प्रत्यंशं दशभिर्दशभिः पानीयफ्लैश्वाझ्या । अथ. ताम्रादिमयी वंशशलाकामयी वा पट्टिका पष्टरमुला ६० २६६ गोलाध्याये दीर्घतया तेरेव फलकाङ्गुलैस्तथैवाङ्किता कार्या।सापट्टिकार्धाङ्गुल: विस्तृता । एकस्मिन्नग्रेङ्गुलविस्तृता कुठाराकारा कार्या। तत्रविस्तार- मध्ये छिद्रं कार्यम् । अप्रोतायाः पट्टिकाया लम्बोपरि धृताया एकं पार्वं यथा लम्बरेखां न जहाति तथा सरन्ध्रा कार्येत्यर्थः । भापाभाप्य। फलकयन्त्र अतुल अब फलकयन्त्र का लक्षण कहते हैं:-बुद्धिमान ज्योतिपी को, चौकोर १० अगुल चौड़ा और चौड़ाई से दूना लम्या १८० 'अमुल बनाना चा- हिए । और लम्याई के बीच में ढीली जंजीर आदि कोई आधार कल्पना करना जिस में यन्त्र लटका रहै और इष्टदिशा में घूम सकै । और आधार से एक लम्ब-सूत्र की भांति रेखा करनी, इसको लम्बरेखा कहते हैं। इस लम्बको के तुल्य ६० विभाग करके प्रतिभालों में सूक्ष्म रेनाएं करनी, इन रेखाओं को ज्यारूप समझना चाहिए । आधार से ३० अमुल पर जहां लम्परेसा और ज्या का योग हो, वहां पर एक सूक्ष्म छिद्र करके उसमें एक इष्टप्रमाण से फील छोड़देना । इसका नाम अन्न फल्पना करना चाहिए । फिर इस छिद्र को फेन्द्र मान फर, तीस अाल के व्यासार्ध से एक वृत्त करना। इसकी परिधि को साठ पड़ी तीन सौ साठ अंश और प्रति अंशों को दश पानीप पलों से अक्षित करना । फिर एक छोटी पट्टी, साठ अट लम्पी, उक्त विधि के अनुमार अक्षिय फरके, एप घरफ ऐर फरके उक्त काल में पो देना चाहिए । जैसा कि यासनामाप्य में लिया है, यह पट्टी आधा अइल पौड़ी एक घर' और दूमरी घरफ आलभर पौड़ी करना जिसमें पुल्दड़ी के समान हो । । सरफ छेद फरफे अक्ष में ऐसा पोना पाहिए जिसमें एक सम्यरेगा पर प लेजाने पर, इसका एक भाग टीक सम्परेगा पर होरे ॥ १८-२१ ।। इदानीं यन्त्रोपकरणमाह- यत्खण्डकः स्थूलचरं पलाचं तगोकुहत्स्यावरशिजिनीह ॥ २२ ॥ पत्खण्डकोत्यं वराध पानीयपलात्मकं तम्यकोनविंशति ? - २६७ २० यन्त्राध्यायः। भागोऽत्र चरज्या ज्ञेया । तानि चरखण्डानि दिइनागसव्यंश गुणै १०१८ | ३ । विनिनी पलप्रभाः स्युश्चरखण्डकानीति । तानि यथा सार्धचतुरङ्गुले ४ । ३० पलभादेशे ४५१३६ । १५ । अत्रोपपत्तिः। खण्डकैश्चरसाधनेकथितैव । तचरं रूपतश्चर. ज्यारूपमेवागच्छति।तञ्च पानीयपलात्मकम् । अतस्तत्पङ्गुणितभ- स्वात्मकं स्यात् । ततोऽनुपातः । यदि त्रिज्याव्यासार्ध एतावती चरज्या तदा त्रिंशयासार्च कियतीति । अत्र त्रिंशचरज्याया गुणकस्त्रिज्या हरः । अतः पभिस्त्रिंशता च त्रिज्यापवर्तने कृते जात एकोनविंशतिहरः १६ । रूपं १ गुणः। फलमत्र यन्त्रे चर- ज्योपपन्नम्। भापाभाप्य । 'जो चरखण्डों से पलादि स्थूल चर सिद्ध हो उसमें १६ का भाग देने से फल घरज्या के तुल्य होता है। उपपत्ति । अव यन्त्रका स्वरूप वर्णन करके, उससे वेध करने के सहायक चर आदि का साधन दिखलाते हैं। -चर के साधन मे प्रथम अनुपात यह है, लज्या', अज्या : मेपादिनाज्या अथवा, १२ पमा: मेपादिकाज्या फल कुज्या हुई। फिर.अनुपात किया, धु कुज्या नि; फल घरज्या हुई। इसका चाप चर कलात्मक हुभा। यह विधि है। परन्तु आचार्य ने गणिताध्याय में एक, दो, तीन राशियों के क्ष्म चर साधन के लिये जो प्रकार लिखा है, वहीं यहा मी चर साधन में . लिखा है। जिस स्थान में एक अङ्गुल की पर भा है, वहा १०, ८, ३१ पलात्मक पर खण्ड होते हैं। इन तीनो खण्डों को पलमा से गुणने से सूक्ष्म चर खण्ड होंगे, में --फलक्रयन्त्र . २६८ गोलाध्याये जिस स्थान की पलमा ८ अंगुल से बड़ी नहीं है । अब ये पलात्मक चर छ मे। गुणने से असुरूप होंगे। यह ३४३८ त्रिज्या में सिद्ध होते हैं। परन्तु फलकयन्त्र के लिये ३० अङ्गुल त्रिग्या में परिणागन करना चाहिये। ६०४३० ३४३८ : १०४६-६० :: ३० अंगुः-- ३४३८ राशि सम्बन्धि पर होगा। परन्तु, उक्तरूप में, १० को ६४३०-१८० से गुण कर ३४३८ के भाग में, त्रिज्या का अपवर्तन देने से हर स्थान में १६ हुये और गुणक स्थान में रूप १ हुआ। इसलिये 'यत्खण्डकै. स्थूल परं पलायम्-' यह प्रकार उपपन्न हुआ।। २२ ।। इदानीं यष्टिसाधनमाह- वेदा ४ भवाः ११ शैलभुवो १७ धृतिश्च १८ विश्वे १३ च वाणाः पलकर्णनिघ्नाः। अर्कोवृताः स्युः क्रमशः स्वदेशे राश्यलभ्यानि हि खण्डकानि ।। २३॥ तैः क्रान्तिपाताट्यस्वे नज्या पष्टयुद्धृताक्षश्रवणेन युक्ता। दिग्मी कृताप्ता भवतीह यष्टिः सा पट्टिकायां सुपिरात्पदेया ॥ २४ ॥ ४१११।१७११८1१1 ५ एतानि खण्डकानि निक देशे पलकर्णगुणानि दादशभक्कानि स्वदेशे भवन्ति । पञ्चद- शभिः पत्रदशभिर्भागैरेक लभ्यते । एवं तेः खण्डः सायनां- शादिभुजज्या साध्या । सा पष्टिभला पलकर्णयुताततो दशगुणा चतुर्भक्ताङ्गुलात्मिका यष्टिर्भवति । सा यष्टिपट्टिकायां सुपिराहेया। यष्टिमितान्यङ्गुलानि पट्टिकायां रन्ध्रादारभ्य गणयित्वाग्रे चिदं कार्यमित्यर्थः ।
यन्त्राध्यायः। २६६ अत्रोपपत्तिः। अत्र सुपिरोपरि या ज्या रेखा सा मध्यरेखेति ज्ञातव्या । इह किल दृमण्डलाकारे धृते यन्त्रे कीलच्छाया पत्र परिधो लगति तन्मध्यरेखयोरन्तरे य उन्नतभागास्तेषां ज्योन्न- तज्या । मध्यरेखाछाययोर्मध्ये यावन्त्यङ्गुलानि तावन्त्यमुलानि नतज्येत्यर्थः सैवेष्टकाले शङ्खः। स एव पलकर्णगुणो बादशहृत इष्टहतिः स्यात् । सा त्रिज्यागुणा झुज्यया भक्केष्टान्त्यका स्यात् । अथ त्रिज्योत्तर गोले चरज्यया युता दक्षिणे हीना सत्यन्त्या स्यात् । अन्त्याया इष्टान्त्यकोनाया यच्छेपं सा नतकालस्योत्क्रम- ज्या स्यात् । अतरतस्या उत्क्रमचापे कृते नतकालो ज्ञायत इति किल गोले कालज्ञानवासना । इदं धूलीकर्म यन्त्रादेवोपसंहर्तु यष्टिः कृता । तत्र तावद्राश्यर्धे भुजे युज्या ३४१८ राशौ ३३६६ । सार्धे राशौ ३२६२ राशिद्धये ३२१८ । साधराशिदये ३१६१ राशित्रये ३१४१ । यदा किल द्वादशाङ्गुलशङ्कुत्रिज्यया गुण्यत आभिर्घज्याभिः पृथक् पृथग्विभज्यन्ते तावत् सर्वत्र द्वादशाङ्गु लानि लभ्यन्ते । अधो वेदा इत्यादीनि व्यङ्गुलानि । उपरितनान दादशपरित्यज्यैपामेवान्योऽनुपातः । एतान्येव स्वदेशे पलकर्ण- गुणानि दादशहतानि पञ्चदशभागलभ्यानि खण्डकानि कल्पि- तानि । तैः खण्डकैः सायनांशार्कस्य भुजज्या व्यङ्गुलात्मि- का भवति । अतः पष्टयुद्धृता । इयमक्षकर्णेऽतो योज्या । यतो य उपरित्यक्ता द्वादश ते यावदक्षकर्णेन गुण्यन्ते दादशभिर्विभ- ज्यन्ते तावदक्षकर्ण एव लभ्यते । एवं द्वादशाङ्गुलस्यशदोरिष्टा- त्या जाता । इयं धूली कर्मोपसंहारार्थ त्रिंशदङ्गुलस्य शड्डोः गोलाध्याये परिणामिता । तत्रानुपातः। यदि द्वादशाङ्गुलस्येयं तदा त्रिंश दुङ्गुलस्यकेति । अत्र गुणकभाजको त्रिभिरपवर्त्य गुणकस्थाने दश १० भागहारे चत्वारः ४ कृताः। एवमंनुपातेन त्रिंशदङ्गुल- शङ्कोरिष्टान्त्या यष्टिसंज्ञा भवतीत्यर्थः । यदि त्रिंशच्छकोर्यष्टि- मितेष्टान्त्या तदेष्टशङ्कोः कियतीति । एवमिष्टशड्वर्यष्ट्या गुण्य- स्त्रिंशता भाज्यः। फलमिष्टान्त्येति स्थितम् । तदर्थ सायष्टिः प. ट्टिकायां दत्ता तदने चिह्नं च कृतम् । भापाभाप्य। ४ । ११ । १७ । १८ । १३ । ५ इन खण्डों को पलकर्ण से गुग कर घारह का भाग देने से, स्त्रदेश में खण्ड होते हैं । ये सण्ड पन्द्रह पन्द्रह अंश सम्बन्धि होते हैं । अर्थात् सूर्य के भुजांश होते हैं । इन खण्डों से सायन सूर्य की भुजग्या सिद्ध करके, साठ का भाग देना । फिर फलको पलकर्ण में जोड़कर और दशसे गुणकर चार या भाग देना । फल अगुलात्मक यष्टि होगी। इस यष्टि फो फलफ यन्त्र के चीप के छेद से दान करना । अर्थात् पीच के छेद से गष्टि के तुल्य अगुल पट्टीमें गिनकर उसके आगे चिह करना चाहिये । । उपपत्ति। यष्टि साधन की उपपत्ति इस प्रकार है :-फलकयन्त्र को रहमण्डलापार रगकर वेध करने पर यन्त्रगत कीलकी छाया परिधि के जिस स्थान में ही पक्षा मध्यरसा वक ग्रह के उन्नतांग होते हैं । असा, नीचे लिये धेत्र में अपेन्द्र मे घभद मध्यरेसा है, अग यष्टि है। अय यन्पना किया कि पील पी छाया शृति परिधि में 'चिद पर लगी, राय 'कप' मूर्य या उन्ननाश होगा। उसी राह 'के घ' होता है । यह इष्टशशु है, इस से उन्नतकाल साधन के लिये भनुपात किया:- पफमको नियामे गुण १२:५क:: इश:इष्टद्धति.. पुग्या का भाग देने से इष्टान्या दु:- " अत्र- पकxdिx३० इसमें '५ का १२के हैं। यन्त्राध्यायः॥ ३०१ पकxइशं :: त्रिः स्टान्त्या पकXइशं त्रि १२ १२४द्यु यह त्रिज्या व्यासार्ध में इष्टान्त्या सिद्ध हुई । परन्तु यहां तीस ३० अनलकी त्रिज्या मानकर वृत्त कियागया है, इसलिये इस इष्टान्त्या का इसमें परिणामन के लिये अनुपात किया:- इशं: पक इनि पकइशंxax३० १२Xद्यु १२XX शं अव यहां पर यह जानना चाहिये कि निरक्षदेश में पलभा शून्य होने से प. लकर्ण द्वादशाकुल ही होता है । इसलिये विज्या और द्वादशके गुणन में निज राशि सम्बन्धि युज्याओं का भाग देने से फल सर्वत्र द्वादश अगुलही आता है पकxइ शंxत्रिx३० १२४ घुxइशं १२४ा १२xनि =१२ अमुल सर्वत्र उपलब्ध होते हैं । इनको छोड़कर व्याला स्मक फलका ग्रहण किया. ४ । १५ । ३२ 1 ५०। ६३ । ६८ इनका अन्तर, ४ । ११ । १७ । १८ । १३ । ६ हुआ । यह फल व्यकुलात्मक है इसलिये साठ का भाग देकर अकुलात्मक कर लिया। ये निरक्ष में राश्यर्घ १५ अंश सम्बन्धि युज्या खण्ड होते हैं। पहले अनुपात के स्वरूप में शेप रहा है । उससे फिर अनुपात किया:-- ३०Xइपक स्वदेशीय पुज्यावएट अान् द्वादशपलकर्णदेश में यदि ४... इत्यादि सण्ड मिलते हैं तय इष्टपलकर्ण इपक X४... देश में क्या ? यो अनुपात करने से, 'पटरर्णनिमा अफोरताः स्सु, क्रमशः स्वदेशे।' यह उपपन्न हुआ। भय इन गण्डों पर से सायन सूर्य की मुजज्या सिद्ध करने में । अंगमितर्दशाप्तम्-' के रयान में १५ अंग का भागदेना चाहिये, क्योंकि सुग्यासण्ड १५ सम्बन्धि सिद्ध रिये गये है। अब पहले नो द्वादश लान्य को सौप दिया था उसका भी वशीय फल में सरसा करना पाहिये । उसके लिये अनुपान: इपक D द्वारद्वा गोलाध्याये द्वा द्वाXइपक इ पक:- द्वा इस "इप क, को ३०४३ प के इस पूर्व साधित फल में जोडने से हुआ %3D - हर अशामें ३का द्वाxद्वा ३०४३ पक+द्वारक ३० X ३५ क+इपक द्वाXद्वा अपवर्तन देने से हुआ १०xइपक+६५ क यहा पर 'x इपक' या ४ स्वदेशीय फल समझना चाहिये । इसलिये १० (फ + इ प क )- यष्टि- ३० शगुलशङ्क की इप्टान्त्या । यों 'दिग्नी कृताप्ता भरतीह यष्टि ।। यह उपपन्न हुआ त्रिज्या में चरज्या को उत्तर गोलमें जोडने और दक्षिण गोल में घटाने से अन्रया होती है । अन्त्या में इस साधित इप्टान्त्या को घटादेने से नतकाल की उत्तमज्या होती है । उसका उत्समचाप नतकाल होता है । इस प्रकार फला यन्य से कालज्ञान होताहै ॥ २३ ॥ २४ ॥ . बिरादहुए नियारेन P यन्त्राध्यायः। इदानीं यष्टिप्रयोजनमाह- धार्य तथा फलकयन्त्रमिदं यथैव तत्पार्श्वयोर्लगति तुल्यमिनस्य तेजः। छायाक्षजा स्पृशति तत्परिधी यमंशं तत्रांशके मतिमता तरणिः प्रकल्प्यः ॥ २५ ॥ अक्षप्रोतां रविलवगतां पट्टिकां न्यस्य तस्मा- घटेरग्रादुपरि फलकेपश्व गोलक्रमेण । यत्रादेयश्चरदलगुणस्तत्र या ज्या तयात्र छिन्ने वृत्ते तलगघटिकाः स्युनता लम्बकान्ताः ॥ २६ ॥ तयन्त्रमाधारेऽवलम्बमानं तथा धार्य यथा यन्त्रोभयपार्श्वयो- स्तुल्यकालमेवार्कतेजो लगति । अर्काभिमुखनेमिकं दृड्मण्डला- कारमित्यर्थः। तथा धृते सुपिरे प्रोतस्याक्षस्य छाया वृत्तपरिधी यस्मिन्नंशे लगति तत्रांशेऽर्कः कल्प्यः । अथाक्षपोतेव पट्टिका रविचिह्ने स्थाप्या । तथा धृतायां पट्टिकायां यत्पूर्वं कृतं यष्टि- चिह्न तस्मादुपर्युत्तरगोले । दक्षिणगोलेतु तदपश्वरज्या मिता- न्यङ्गुलानि फलके गयित्वा तत्र चिह्न कार्यम् । विह्नस्थाने या ज्या रेखा सा वृत्ते यत्र लग्ना तस्मादधोवृत्ते लम्बरेखावधेर्याव- त्यो घटिकास्तावत्यस्तकाले नता ज्ञेयाः । तविचिद्रं यदि • रेखयोर्मध्ये स्थितं तदा तदनुसारिणीं तत्रान्यां रेखां प्रकल्प्य नाड्यो नेया। अत्रोपपत्तिः। अत्रोत्तरगोले मुपिरादुपरि दनिणे तदधश्वर- ज्यामितान्यङ्गुलानि दत्वा तदने चिह्नकार्यम् । तदन्त्याग्रं यम् । एवं वृत्तस्यायो व्यासार्ध चरज्यया युतोनं कृतं भवति । अतः पे उसके आगे चित्र फरना वह अन्गा या अप्र होगा। इसप्रकार पृत्तयनि- को सूर्यचिह्न में स्थिरफरने पर पष्टिका चिह जो पूर्व किया गया है उससे गोलाध्याये सान्त्या अथवृत्तपरिषौ यत्रछाया लाना तन्मध्यरेखयोरन्तरं किल शङ्खः । छायोपरि पट्टिकायां न्यस्तायां यत्र यष्टिचिह्न तन्मध्यरेख- योरन्तरमिष्टान्त्या । यदि त्रिज्याने शङ्खतुल्यो विप्रकर्पस्तदा यष्ट्यग्रे कियानित्ये त्रैराशिकं कृतं भवति । सा युदलेऽन्त्यायाः शोध्या । अन्त्याग्रं तु चरज्यया मध्यज्याया उत्तरगोल उपरि दक्षिणेऽधो वर्तते । अतो यष्ट्यग्रादुपर्यधश्चरज्या दत्ता । तदने या ज्यारेखा तयावच्छिन्ने मोवृत्तखण्डे वाणरूपमन्त्याया अवशे भवति । अतस्तदुत्क्रमज्यायाश्चापं नतत्रटिका भवन्ति । तस्या ज्यारेखायाः सकाशाल्लम्बरेखावधि नतत्रटिका वृत्ते विगणय्य ग्राह्या इत्यर्थः। इस फलक यन्त्र को इसप्रकार रसना चाहिये जिस में इस यन्त्र के रोनी तरफ समानकाल में सूर्य का तेज लगे। इस स्थिति में यन्त्रमध्य-कीलकी छाया जा वृत्तपरिधि में लगे वहीं सूर्य कल्पना करना चाहिये। फिर काल में पोई हुई पट्टी गिनार चिह करना । चितपर की ज्यारेगा जहां वृत्त में लगी हो वहा से नीचे लम्परेनातक जितनी पड़ी हो, ये उस समय की नयटिका होती है। उत्तर गोलमें यन्त्र छिद्र से उपर दक्षिण गोल में नीचे परज्यामुलका दान गर पला व्यासार्ध गोलश परज्या से युक्त और रियुग होता है हमी यारण यह अन्या होगी । और पृतपरिधि में जहां छाया लगा है उसका और पृतमापरेखा का अन्तर एश होगा। छाया के उपर पट्टी लेजाने में जिस स्थान पर या चिद होगा. उसका धौर मम्मोगा या अन्तर इशान्त्या होगी। इस स्थिति में यह पा यदि भिग्या में शहन-य अन्नर प्राप्त होता है सो यष्टि में अप्र में वया ! यह अनुपात रयम होता है। भापामाप्य। उपपत्ति। .
यन्त्राध्यायः। भक-त्रिज्या। भग-यष्टि । कघ इष्टशङ्क । गत्र-इटान्त्या। य श इअ - इष्टान्त्या को अन्या में घटा देने से उत्क्रमज्यारूप अन्त्या शेप यचैगा उसका चाप करने से नव घटिका होंगी ।। २६ ।। एवं छायादर्शनात्कालज्ञानमुक्त्वेदानीमेतावत्यभीष्टे काले नते क छाया लगिष्यतीत्येतदर्थमाह- लम्बादेया विनतघटिकास्तज्ज्यकातश्चरज्या व्यस्ता देया भवति च तथा यापरा तत्र मौवा । धार्या पट्टी स्पृशति हि यथा तज्ज्यकां यष्टिचिह्न पट्टीस्थाने निपतति तदाक्षस्य नूनं प्रभास्य ।। २७ ।। अधस्तनाल्लम्ववृत्तसंपातादूर्व वृत्ते नतघटिका गण्याः । तदने या ज्यारेखा तस्या अध उत्तरगोले दक्षिणे तु तदुपरिफलके चरज्यामितान्यङ्गुलानि गणयित्वाग्रे चिह्न कार्यम् । तत्र या ज्या रेखा तस्यां रेखायां पट्टीस्थितयष्टिचिह्न यथा लगति तथाक्ष- प्रोतैव सा पट्टी धाऱ्या पट्टीस्थाने तस्मिन कालेऽक्षस्य छाया पति- व्यतीति ज्ञेयम् । अनोपपत्तिः कथितप्रकारवपरीत्येन । यदस्य यन्त्रस्य नवत्य- अलविस्तारस्तट्विगुणं दैZमुक्तं तत्सर्वदेशाभिप्रायेण । अथवा याव- देव स्वदेश उपयोगि तावदेव बुद्धिमता कार्यम् । तद्यथा । वृत्त- मध्यरन्ध्रादुपरि परमचरज्यामितारेखाटापश्चाष्टत्रिशत् । एवं पदच- वारिंश ४६ दङ्गलानि विस्तारे । परमयष्टिमितान्यगुलानि द्विगु- णानि पट्सप्ततिव्ये । एतावता कुरुक्षेत्रपर्यन्तं यावत् कालज्ञानं स्यात् । इति फलकयन्त्रम् ।
गोलाध्याये ३ ० भापाभाष्य। " नीचले सम्परेखा और वृत्तसम्पात के ऊपर वृत्त में नतघटिकाओं की गणना करनी और नतघटिकाओं के अप्रगत ज्यारेखा से नीचे उत्तरगोल में, ऊपर दक्षिण गोल में, फलक में चरज्याङ्गलों की गणना करके उनके आगे चिढ़ करना । और वहां जो ज्या रेखा होवे उस पर पट्टीगत यष्टिचिन्ह जिस प्रकार भाव उसी प्रकार यन्त्र कील में पोई हुई पट्टी को स्थिर करना । तर उस काल में कील की छाया प्रपश्य पट्टी में पड़ेगी ॥२७॥ अथ यष्टियन्त्रमाह- त्रिज्याविष्कम्भार्थवृत्तं कृत्वा दिगड़ितं तत्र । दवायां प्राक् पश्चाद्यज्यावृत्तं च तन्मध्ये ॥ २८ ॥ तत्परिशै पट्यझं यष्टिर्नष्टद्युतिस्ततः केन्द्रे । त्रिज्याङ्गुला निधेया यष्ट्यग्राग्रान्तरं यांवत् ॥ २६ ॥ तावत्या मौा यद्धितीयवृत्ते धनुर्भवेत्तत्र । दिनगतशेपा नाट्यः प्राक् पश्चात्स्युःक्रमेणेवम् ॥ ३०॥ सभायां भूमो त्रिज्यामिताङ्गुलेन कर्कटेन वृत्तं दिगवितं च कृत्वा तत्र प्राक् पश्चादना गोलवशादुत्तरा दक्षिणा वाज्यावद्देया अनाग्रयोद्धं सूत्रमुदयास्तसूत्रमुच्यते । अब तस्ये वृत्तस्य मध्ये गुज्यामितेन कर्कटेनान्यदत्तं कृत्वा नाडीपष्ट्याकनीयम् । ततनि. ज्यामिताङ्गुलाया जयप्टेमूलं केन्द्रलग्नं कृत्वाग्रमर्काभिमुखं तथा धार्य यथा यष्टिर्नष्टच्छायास्यात् । ततःप्राच्यां दिशित्रिज्यावृत्तेयद. प्राग्रचिहं तस्य यष्टयग्रस्य च मध्यमृजुशलाकयामित्वा सा शलाका गुज्यावृत्ते जीवावद्धा। न ज्यावत् । ततः शलाकारयोर्मध्ये धनुपि यावत्यो घटिकास्तावत्यातदा दिनगता नेयाः। एवं पश्चि- यन्त्राध्यायः। ३०७ मायाप्रयष्ट्यप्रयोर्मध्ये शलाकया दिनशेषा ज्ञेयाः । दिनशेपोनं. दिनमानं दिनगतनाज्यो भवन्ति । यतस्तदैक्यं दिनमानम् । अत्रोपपत्तिर्गोलयुक्तन्यैव । यष्टित्रिज्या । यद्धवि वृत्तं लिखितं, तक्षितिजम् । तत्र पूर्वतः पश्चिमतश्चाग्रा । अग्राग्रयोरुपरिगता 'खोदयारतसूत्रय । अग्राग उदितो रविर्यथायथाहोगत्रवृत्तगत्यो- परि गच्छति तथा तथा केन्द्रे निवेशितसूलाया यष्टेर भ्राम्यमाणो यष्टिर्नष्टद्युतिःस्यात्।यतो यष्ट्यग्रे रविः अग्रानादर्क यावदहोरात्रवृत्ते यावत्यो घटिकास्तावत्यो दिनगता भवन्ति । तत्राकाशे गुज्या- वृत्तं लेखितुं नायाति । अतोऽग्रामयष्ट्यग्रयोरन्तरं शलाकया मित्या गृहीतम् । ततो भुवि लिखिते हुज्यावृत्ते तया शलाकया ज्यारू- पया धनुपि घटिकाज्ञानं युक्तियुक्तम् । भापाभाष्य । निज्या व्यासार्ध से एक वृत्त बनाकर उसको पूर्वापर और याम्योत्तर रेखा से अङ्कित करना। और पूर्व, पश्चिम में अग्रा का दान करके उनके श्रम में सूत्र यांधना वह उदयास्त सूत्र होता है । और वृत्तमध्य में एक धुज्या व्यासार्ध से वृत्त पनाकर उसको साठ घडी से अङ्कित करना । फिर विज्या तुल्य यष्टि को वृत्त केन्द्र में स्थापित करके, यष्टि के अप्र को सूर्य के सम्मुस इस प्रकार करना जिसमे यष्टि की छाया का प्रभार । इस स्थिति में प्रभा के धन से यष्टि के अन तक किसी वस्तु से माप कर उसको गुज्यायत्त में पूर्णग्या के सदृश । रखना । पूर्णज्या के चाप में जितनी घड़ी हों वे दिन की गत घडी पूर्व कपाल में और दिन शेष घड़ी पश्चिम कपाल में होती है। उपपत्ति । यहां पर जो विज्यावृत्त किया गया है वह क्षितिजत है। यष्टि निग्या के तुल्य है । अग्राम में सूर्य उदित होकर यहोरात्र में भ्रमण करता है । उस समय केन्द्र में यष्टि रखकर उसको सूर्य के सम्मुस परने पर यष्टि की छाया का .
।
+
३०८
गोलाध्याये
अभाव होता है । क्योंकि यष्टि के अम में सूर्य रहता है । अग्राम से अहोरात्र
दृत्तगत सूर्य तक जो घड़ी होती है वह दिन की गत घड़ी होती है । आकाश
में घुज्यावृत्त नहीं लिख सकते इस कारण भूमि मे लिख कर घटिकाओं का
ज्ञान किया गया है। यदि एक दिन में गुज्या स्थिर कल्पना कोजाय तो इस
विधि से काल ज्ञान होगा ॥ २८।३०.।।
।
क्षेत्र।
II
प्रदाराना
पुत्परत
द
.
नहोरात्रतन
उदयाना
यग्राचा.
यन्त्राध्यायः। भापाभाष्य। अथान्यदाह- यष्ट्यग्रालम्बो ना ज्ञेया दृग्ज्या नृकेन्द्रयोर्मध्ये । नष्टद्युतेर्यष्टेरग्रादधो यावान् लम्बस्तावांस्तस्मिन् काले शङ्खः। शङ्खकेन्द्रयोर्मध्ये दृग्ज्या ज्ञेया । शङ्खप्राच्यपरयोरन्तरं बाहुः प्रागपराशानरान्तरं बाहुरिति वक्ष्यति । यष्टि के अप्र से जो लम्ब होगा वह उस काल मे शंकु होगा । शंकुमल और केन्द्र के बीच मे दृग्ज्या और शंकु पूर्वापर सूत्र का अन्तर भुज होता है । इस प्रकार क्षेत्र स्थिति.होती है। केवलदिरज्ञाने सत्यक्षभामाह- उदयेऽस्ते यष्ट्यग्रप्राच्यपरामध्यमग्रा स्यात् ॥ ३१ ॥ शवदयास्तसूत्रान्तरमर्कगुणं नरोद्धृतं पलभा । उदयकालेऽस्तकाले वा यष्टिर्नष्टद्युतिर्धियमाणा सकलैव भूल- ग्ना स्यात् । एवं यष्ट्यग्रमाच्यपरयोरन्तरं त्रिज्यावृत्ते ज्यावत् स्थितम् । साग्रा ज्ञेया । ततः प्राग्वदुदयास्तसूत्रमिष्टकाले शङ्कुश्च शङ्कदयास्तसूत्रयोरन्तरं दादशगुणं शकुना भक्तं पलभा स्यात् । अत्रोपपत्तिस्त्रैराशिकेन । तद्यथा । यद्यस्य शङ्कोः शङ्कदयास्त- सूत्रयोरन्तरं शङ्कुतलं भुजस्तदा बादशाङ्गुलस्य शङ्कोः के इति । • फलं विपुवती भवति। भापामाप्य। उदयकाल या अस्तकाल में यष्टि के अन केशन्गर और प्राच्यपरसून में अमा होती है । इष्ट शकु और उदयास्त सून के अन्तर को यारह से गुणकर शंकु का भाग देने से पलभा होती है। उपपत्ति। शंकु और उदगास्त सूत्र का अन्तर शंकुतल होता है । शंफुकोटि, शंकुतल- ३१० गोलाध्याये भुम, ज्याकर्ण यह क्षेत्र उत्सन्न होता है। अब यहां पर केवल दिशा को जान कर पलभा के लिये अनुपात किया- शंको : शंकुतल : : द्वाको:- शंकुतल ४ द्वा को पलभा शंको इस लिए उत्तर प्रकार उपपन्न हुचा ।। ३१॥ अयोधन्तमर्कमदृष्ट्वापि- भुजयोरेकान्यदिशोरन्तरमैक्यं रविणम् ॥ ३२ ॥ शान्तरहृत् पलमा प्रागपराशानरान्तरंबाहुः। स्पष्टार्थम् । अत्रोपपत्तिः । यत्र देशे विपुवती ४ । तत्रोत्तरगोले प्रथम- शॉनिंशदङ्गुलो दृष्टः । तम्य याम्यो भुजः पनाङ्गुलः । भन्या पशिदङ्गुलः । तस्य याम्यो भुजः समाङ्गुलः । अत्राप्रया दिना किल शटुतलं न नायने । फिन्नु भुजाग्रयोर्यावदन्तरं शगुनलः योरपि तापदेवान्ता भवनि ! तन्दुतलं कल्पितम् २ । काय राहन्छयान्नग्नुल्पस्य शहोः ६ । यद्यग्य शवोदि शाम तदा दादशाहनम्य फिमिनि । फनं पनमा ।
गोलाध्याये यही यात यहा आचार्य ने पलमा ४ अङ्गाल कल्पना करके 'उदाहरण से दिखलाया है। और प्रकारान्तर से समीकरण से भी लिखा है ॥ ३२ ॥ इदानी दिग्देशकालानामज्ञाने केवलार्कदर्शनादेव सर्वमाह- यष्टया शकुत्रितयं ज्ञात्वा वा कथ्यते सर्वम् ॥ ३३ ॥ आद्यन्तशङ्कुशिरसोस्तिर्यसूत्रं निवध्य तत्सक्ने । मध्यमशङ्कग्रादढे सूत्रे भूमिं पृथङ्नेये ॥ ३४ ॥ भूचिह्नदितयोपरि सूत्रं तत्रोदयास्तसूत्रं स्यात् । तत्केन्द्रान्तरमग्रा सूत्रादग्रान्तरे ततः प्राची ॥ ३५ ॥ प्राग्वदतोऽक्षच्छाया तच्छुतिविहतारकार्कसंगुणिता । कान्तिज्या त्रिज्यानी जिनभागज्योवृता दोा ।। ३६ ॥ त्रिज्यावृत्तं विलिख्य प्राग्वद्यष्टपा शङ्कुत्रितयमगीष्टे काले ज्ञात्वा प्रथमतृतीयशंद्यायोरे सूत्रं तिर्यविद्या मध्यस्थाकोर ग्रेन्यसूत्रस्येकमग्रं वदा तत्सूत्रं तिर्यक्सूत्रलग्नं यया भवति तथा प्रथमशकभिमुखमधः कर्णगत्या त्रिज्यावृत्तपरिधि नीत्वा तत्र पूर्वभागे चिह्न कार्यम् । ततोऽन्यत्सृत्रं तदेव वा तृतीयशनि- मुखमनेनैव प्रकारेण नीत्वा वृत्तपश्चिमभागे चिई कार्यम् । तयो. श्चियोरपरि गतं सूत्रमुदयास्तसूत्रं स्थान । सूत्रकेन्द्रयोरन्तर मना । उदयास्तसूत्रादग्रातुल्येऽन्तरे केन्द्रोपरि पाव्यपरा रेखा कार्या । ततः शहदयास्तसूत्रान्तरमित्यादिना पलभातानम् । शेपं स्पटम। भत्र गोलेहोरात्रवृत्ते ययोग नितिनगंगातयोग्दयाम्नम बद्धा तस्मिन्नेवाहोरात्रहत्ते विनयं सत्या तानि सहगाम प्रकल्पावन्तविजयोतिर्यकसूत्रं च निवन्य मध्यमूत्रात् निर्याम:
यन्त्राध्यायः। सक्तमधःसूत्रं नीयमानमुदयास्तसूत्र एव लगतीत्युपपत्तिदर्श- नीया । ततोऽयादिपलभाज्ञानं युक्तियुस्य । पलभाज्ञाने तद्देश- ज्ञानम्। प्रभा। आद्यन्तौ यौ शङ्क तयोः शिरमी अग्रे तयोः । तत्सते आद्यन्तशङ्कु शिरोबद्धतिर्यक्सूत्रसंलग्ने । भूमि भूनिखितत्रिज्यावृत्तपरिधिम् । तत्केन्द्रान्तरम् । उदयास्तसूत्रवृत्त केन्द्रयोरन्तरम् । शेष स्फुटम् । भापाभाष्य। अथवा यष्टि से सूर्य के तीन शकु सिद्ध करके उनसे कालज्ञान करना । मादि और अन्त के शकुओं के प्रम में सूत्र बाधना और इस सूत्र से सलग्न बीच के शकु के अप्र से कर्णाकार दो सून पूर्व और पश्चिम दिशा में भू. लेखित त्रिज्यावृत्त परिधि में लेजाकर वहा पर चिह्न वरना । इन दोनों चिहों । बीच में जो सूर होगा वह उदयास्तसून होगा । वृत्तवेन्द्र और उदयास्तसूत्र का दक्षिणोत्तररूप अन्तर अग्रा होती है उदयास्तसूत्र से अप्रा के तुल्य अन्तर र पूर्वीपर रेसा होती है । अव पूर्वरीति से पलभा सिद्ध करके अप्रा यो दश से गुणकर पलकर्ण का भाग देने से क्रान्निध्या होती है। फिर क्रान्तिज्या को त्रिज्या से गुणकर परम क्रान्तिज्या का भाग देनेसे सूर्य की भुजज्या होती है । उपपत्ति । सूर गया है। वह 4 गोल मे अहोरात्रवृत्त और क्षितिज़ के सपात गे बैंभा हुश्रा मूत्र उदय स्त व होगा-अहोरात्रवृत्त में ही तीन प्रकार के शकु कल्पना करके उनमें सूत्र गया है । और मध्यशक से जो पूर्व और पश्चिम मे मे उदयास्तसून में ही लगता है । इस सपात से पूर्वापर मूत्र सक होती है । अग्रा के ज्ञान से, दिशा, पलभा, प्रन्ति श्रादि का शाा है ॥ ३३ ॥ ३६॥ कालज्ञानमाह तद्धनराधे चरणे वर्पस्याः प्रजायतेऽन्येषु । ..
गोलाध्याये भान्च्युितःसभाो भगणापतितोऽन्दचरणानाम॥३. ऋतुचिर्ज्ञानं स्याहतुचिहान्यमतरततो वक्ष्ये । भात्रितयादाभ्रमणं नसदस्मादिक्पलाद्यं च ॥ ३८॥ छायातोऽप्रातो वा भानुः संक्रान्तिपात एव स्यात् । पातोनः स्फुटमानुः रफुटमानूनो भवेत् पातः ॥ ३६ ॥ अत्राप्रातस्तच्छुतिविहतानकार्कसंगुणितेत्यादि विलोमवि-- धिनाया स्फुर्कदोया नीतातस्या यद्धनःसरविर्भवति।एवंवर्षस्य प्रथमचरणे । द्वितीये भाच्च्युतस्तृतीये सभाधश्चतुर्थे भगवान् पतित इति व्यस्तविधिः । वर्षचरणज्ञानमृतचिह्नः । अत्रान्यैराचार्येभत्रितयादिग्ज्ञानं दिग्ज्ञाने भाभ्रमरेखां चो. त्पाद्य केन्द्रमाभ्रमरेखयोर्यद्याम्योत्तरमन्तरं सा मध्यच्छाया। ततः मान्तिज्या विलोमविधिना तस्या रविरक्षश्चैवं भङ्गार्थ यत्कृतं तदसत् । कुतः। यात्रितयानाभ्रमणं तदपि तावद सत् ।अन्यान्यभाग्रहणादन्यथान्यथा भाभ्रमरेखा स्यादिति निपुः गैरवलोक्यम् । भाभ्रमनाशे दिक्पलादिकमपि न घटते । अतो यष्ट्या शंकुत्रितयं ज्ञात्वेत्यादिना महाप्रश्नभङ्गो युक्रः । अत्र किलाग्रातो रवितिः । योऽत्रामातश्यायातो वा रविह यते स संकान्तिपात एव स्यात् । अतः पातोनोरविर्भवति यून पातो भवतीति युक्तियुन्म। ५मध्यमो मयनादहन गणात् कल्पगतमिति कालज्ञानम् । इति यष्टियन्त्रम् । "र भापाभार सूर्यफी भुजाया जो पूर्व मिस की है उसका धनु परने से वर्ष के प्रथम में स्पष्ट सूर्य होता है । द्वितीय चरण में ए राशिमें घटाने, तीनो में पार जोड़ने और चौपे घर में बारह राशि में घटाने से सटपर्य होता है।
- यन्त्राध्यायः। भारणों का ज्ञान ऋतुओं से होता है । ऋतुओं का वर्णन आगे कहाजायगा । * पूर्वाचार्यों ने लिखा है कि द्वादशांगुलशंकु की छाया उस वृत्त में भ्रमण करती है, जो वृत्त उक्त शंकु की वीनप्रकार की छायाओं के अनमें उत्पन्न होता है । परन्तु यह अशुद्ध रीति है । इसलिये उक्तवृत्त में जो पूर्व पश्चिम आदिरेसा और मक्षांश आदि सिद्ध होंगे, वे सबभी अशुद्ध होंगे। बाया अथवा अप्रामीज्या से जो सूर्य सिद्ध होगा वह सारन होगा। इसलिये सूर्य में अयनांश घटादेने से स्पष्ट (निरयण ) सूर्य होगा । और सूर्य को घटाने से अयनांश शेष बचेंगे ॥ ३७।३६ ॥ इदानीं धीयन्त्रं विवक्षुरादौ तत्प्रशंसामाह- अथ किमु पृथुतन्त्रैर्धीमतो भूरियन्त्रैः स्वकरकलितयटेर्दत्तमूलाग्रदृष्टेः। न तदविदितमानं वस्तु यदृश्यमानं दिवि भुवि च जलस्थं प्रोच्यतेऽथ स्थलस्थम् ॥ ४०॥ स्पष्टार्थम् । प्रभा। अथ पूर्वोक्तानन्तरम्। धीमतिर्विद्यते यस्यामौ धीमान् तस्य । पृथूनि * यहा पर प्राचार्य ने लल्ल, श्रीपति यादि प्राचार्यों न जो माभ्रम की रौनि लिखी हे उसकी अमानि दिसलाकर अपनी विधि लिखी है। लल्लाचार्य का प्रकार यों है-. 'छायात्रयामभवयोर्मुसपुच्छरोयोगो यमस्य दिगुदगुदलप्रभागे । यत्र भुवो धनपतेर्दिगसो भवेद्वा तमत्स्यपुच्चमुखरचरसिद्धसिद्धी । यो मत्स्यपुच्चमुखनिर्गतरन्जुयोगस्तस्मात् प्रभाविनयचिहशिरोऽवगाहि । वृत्तलिखेन विनहाति हि तस्य रेखा छायाकुसापतिमिनामलवशना स्त्री।' भापति का प्रकार यों है- 'छायात्रयामोद्भवमत्स्यमध्यस्थक्सत्रयोर्यत्र युति प्रदेशे। याम्योक्ता शङ्कतलात्ककुप्सा मेरा सोन्येतरगोलयो स्यात् ।। मत्स्यादरद्वयगसूतपुतेध तस्या भारायस्पृगिति यद्भवतोह वृत्तम् । घाया न नसििपनुज्झति मयशव्यस्य भागमिव सायुगति पथचिन् ।' परनु यह नात परीक्षा से सिद्ध हुई है हि महों की दाया दौत्ति में भमग्न करती है।
गोलाध्याये विस्तृतानि यानि तन्त्राणि शास्त्राणि तैः। भूरीणि प्रचुराणि पूर्वोक्त विविधयन्त्राणि तैः । किमु इति विकल्पे | धीमन्तस्तु स्वल्पोप- करणैरेव सर्व विदन्ति न हितेषां कृते विविधयन्त्रकल्पनमुपयोगावह- मित्याचार्यः स्वल्पोपकरणं धीयन्नं विवक्षुस्तमेव प्रशंसति । अथ स्थलग्थं वस्तु प्रथम धीयन्त्रेण विद्ध्वोच्यते शेष स्फुटमेव । भापाभाष्य। युद्धिमानों को पडे ग्रन्थ और यहुतसे यन्त्रो से क्या प्रयोजन है ? अर्थात् उनको फेवल धीयन्त्र से ही सन काम करने चाहिएं । हाथमें लकड़ी लेकर, उसके मूलमें दृष्टि देकर वेध करने से जो वस्तु भूमि अाकाश और जल में दिखलाई देवे उसका मान ज्ञात होजाता है । अा प्रथम भूमि मे स्थित वस्तुओं की वेधविधि कहते हैं ॥ ४०॥ अत्र प्रश्नः- वंशस्य मूलं प्रविलोक्य चाचं तत्स्वान्तरं तस्य समुच्छ्रयं च । यो वेत्ति यष्ट्यैव करस्थयासो धीयन्त्रवेदी वद किं न वेत्ति ॥ ११ ॥ . स्पष्टार्थम। प्रभा। तत्स्वान्तरं, वंशस्य निजस्य चान्तरम् । किं न वेत्ति ? सक्लमेर तस्य विदितं भवति। भापाभाग्य। जो हाथ में यष्टि लेकर बास का मूल और अप्रवेधकर अपना और वास का अन्तर और उँचाई जान लेता है, यहो वह धीयन्त्रविशारद क्या नहीं जानता ? अर्थात वह सय कुछ जानता है ।। ४९ ॥
यन्त्राध्यायः अथ यट्या ध्रुववेधेन पलभामाह- यव्यग्रमूलसंस्थं विद्धा ध्रुवमग्रमूलयोर्लम्यो । बाहुर्लम्बान्तरभूर्लम्बोच्छायान्तरं कोटिः॥ ४२ ॥ कोटिर्दादशगुणिता वाहुविभक्ता पलप्रभा ज्ञेया । अत्र समायां भूमौ स्थित्वा गणकेन वेधः कर्तव्यः । यट्यामू- लसंस्थमिति । योरग्रे मूले चैकहेलया यथा ध्रुवः संलग्नो दृश्यते तथा यष्टिर्धार्या । ततस्तदग्रान्मूलाच लम्वनिपातौ कार्यो । भुवि लम्बनिपातयोरन्तरे यावत्यगुलानि तावान अजः। एवं लम्बो- चयोरन्तरे यावन्ति तावती कोटिः । यष्टिप्रमाणं कर्षः। सर्ववेधे- वप्ययमेव विधिज्ञेयः । ततोऽनुपातः । यद्यनेन वाहुनैतावत्ती कोटिस्तदा द्वादशाङ्गलेन किमिति फलं पलमा स्यात् । भाषाभाष्य। यष्टि को ध्रुवाभिमुख इस प्रकार रखना जिसमें यष्टि के अग्र और मूल में ध्रुव एक समय में लगा हुआ दीख पडै । इसप्रकार वेघ करके यष्टि के अग्र और मूल में लम्न छोड़ना । दोनों लम्बों के मध्यकी भूमि भुज, लम्बों का अन्तर कोटि होती है। कोटि को बारह से गुणकर भुज का भाग देने से पलभा होती है। उपपचि । यष्टि से वेध करने पर उस के अग्र और मूल में जो लम्न छोडे हैं उनका भूमि में जितने अंगुल अन्तर हो वह मुजरूप है । लबों का अन्तर कोटि और यष्टि । परि विधा गोलाध्याय अश्य अनुपात किया इस भुज में यह कोटि मिलती है तर द्वादशागुल कोटि में क्या फल पलमा होगी।॥ ४२ ॥ इदानीं वंशादिवेधमाह- विधैवं वंशतलं दृष्ट्युच्छायाहतादाहोः॥४३॥ कोट्यालब्धं ज्ञेयं स्ववंशमध्ये महीभानम् । विद्धाथो वंशाग्रं भूमानं कोटिसंगुणं भक्तम् ॥ ४४ ॥ दोषणा वंशोच्छायो दृष्ट्युच्छायेण संयुतो ज्ञेयः । उदाहरणम्। पञ्चशकाङ्गुला ४५ य यष्टिरष्टपटिगुच्छ्रयः । पटकरास्तलवेधो दोः कोटिः सप्तदशाङ्गुला ॥ अग्रवये रसेशा ११६ दोः कोटिस्तुरगकुञ्जराः ८७। वंशस्य यस्य तन्मानं चात्मवंशान्तरं वद ।। यष्टिः १४५ । गुच्छायः ६८ } तलवेधे वाहुः १४४ । कोटिः १७ । अग्रवेधे चाहुः ११६ । कोटिः ८७। अत्र तलवेधेऽग्रवेधेवा ध्रुववद्यष्ट्यग्रमूललम्बयोरन्तरभूर्भुजः। लम्बोच्छायान्तरं कोटिः। एवं यथोक्तकरणेन लब्धमात्मवंशान्तरम् ५७६ । वंशौञ्चयम् ५००/ अत्रोपपत्तिः । आत्मवंशान्तरभूमिर्भुजः। दृगुच्छायः कोटिः । दृष्टिवंशमूलयोर्वद्धं सूत्रं कर्णः । एतत्यानुप्तारमेव यष्ट्यावधेन त्र्यसमुत्पद्यते । तत्र लम्बान्तरभूर्भुजः । लम्बोच्चयान्तरं कोटिः। यष्टिः कर्णः । अतोऽनेनानुपातः । यद्यनया कोट्यायं भुजोलभ्यते तदा गुच्छायकोट्या क इति । फलमात्मवंशान्तरभूमिः। एवमनः वेशेऽपि । एवं वंशमूलादुपरि दृष्ट्यच्छायमितेऽन्तरेचिहं कल्प्यम् । तइदृष्ट्योरन्तरे रेखा भूमानमिता स भुजः । चिन्होपरिस्थं वंश- भापाभाष्य। यन्त्राध्यायः। खण्डं कोटिः। दृष्टिवंशाग्रयोर्वद्धं सूत्रं कर्णः । एतत्त्र्यस्रानुसारमेव वेषयत्रं भवत्यतोऽनुपातः । यदि वेधभुजेन वेधकोटिर्लभ्यते तदा भूमितेन भुजेन केति । फलंचिह्नोपरितनवंशखण्डम् । तदृष्ट्युच्छा- येणयुतं सकलवेणुप्रमाणम् । इसी उक्त वेधविधि के अनुसार वास का मूल वेधकर भुजकोटि का ज्ञानकरके, भुजको वेधकर्ता की दृष्टिको उँचाई से गुणकर कोटिका भागदेने से वेधकर्ता और वंशके मूलका, भूमिमें अन्तर होता है । अव, इसीप्रकार यास के अग्रभाग का (यष्टिसे ) वेधकर भुज, कोटिका निश्चय करके, भूगत अन्तर को कोटिसे गुण. कर भुजका भाग देने से फल, बांसकी उँचाई होगी। इसमें वेधकर्ता की दृष्टिको उचाई जोडदेने से, पूरे वासको उँचाई सिद्ध होगी। उपपत्ति । यहां पर प्राचार्य ने उदाहरण दिखलाया है । उससे उक्त विधि के अनुसार गणित करने पर वासकी उँचाई सहज में ही सिद्ध होजाती है । और उपपत्ति में जो क्षेत्रस्थिति लिखी है उसके अनुसार क्षेत्र का स्वरूप इस प्रकार है:- क्षेत्र, । ज ल यहां पर,अक-यासको उँचाई, मव-दृष्टिको उचाई, वक-दृष्टि और यांसके मूल में बँधा सूत्र । प्रथम तलवेध में, मझ=भुज मव-कोटि और वर-कर्ण यह स्वाभाविक “क्षेत्र होता है। अब यष्टि से ' यष्टयममूलसंस्थ-' इत्यादि उक्त विपिसे वेध करने पर व मा और लप लम्मों का अन्तर वज कोटि लन भुज और लव कर्ण होता है।
वज जल टव टग - गोलाध्याय भय इस क्षेत्र के साथ व म क बड़े क्षेत्रका साजात्य है इसलिये अनुपात किया यम • मा । मक भुज हुआ, अर्थात् वेधार्ता और यास की अन्तर भूमि, हुई। इसी प्रकार अप्रवेध में पास के मूल से दृष्टि की उचाई के तुल्य अन्तर पर चिह्न 'च' करके भूमि के समानान्तर 'च' चिह से 'व' तक रेसा करनी, यह भुज होगा। च श्र कोटि और व श्र कर्ण होगा। पर यष्टि से अप्रवेध करने पर गप और वम लम्नोंकी अन्तर भूमि दव भुज, टग कोटि और वग कर्ण हुआ यह निभुज पहिले त्रिभुज के सजातीय होता है, इसलिये अनुपात किया 'वच चम चम चिह्नके ऊपर वास का टुकडा है, इसमें दृष्टिकी उचाई चक जोडदेने से अक पूरा वास का मान सिद्ध हुआ ॥ ४३ । ४४ ॥ अथ केवलाग्रोधेनाह- अयं वियोर्धस्थः पुनरुपविष्टश्च तदिद्धयेत् ॥ १५ ॥ निजभुजभक्ते कोटी तदन्तरहतो हगाच्यविश्लेपः। भूमिर्वशोच्यमतः पृथक् पृथक् पूर्ववज्ज्ञेयम् ॥ ४६॥ স্বপ্ন সঃ। ऊर्धस्थस्य गृहादिभिर्व्यवहितस्याप्यग्रमात्रं सखे वंशस्य प्रगुणस्य यस्य सुसमे देशे समालोक्यते ॥ अत्रैव त्वमवस्थितो यदि वदस्यस्यान्तरं चोच्छ्रयं मन्ये यन्त्रविदां वरिष्ठपदवी यातोऽसि धीयन्त्रवित्॥१७॥ उदाहरणम् । दृष्टयट्योर्चसंस्थेन वंशाग्रं विध्यता अजः। दृष्टश्चतुस्करोऽथान्ययष्ट्या साहागुलः सखे । निविष्टेन तथा कोटिरगुलं वेधयोरपि । अात्मवंशान्तरं ब्रूहि वंशोच्छ्रायं च वेधवित् ॥ ऊर्धवेधे भुजः ६६ । कोटिः १ | उपविष्टवेये भुजः कोटिः १ । अष्टो दृगुच्छाया करिपतौ ७२ | २४ । यथोक्तकरणेन . ।
यन्त्राध्यायः। ૮૧૨ २१६० ६० - लब्धं भूमानं हस्ताः २८८० 1 वंशौच्च्ये च हस्ता. ३३ । अत्रोपपत्तिरव्यक्तकल्पनया 1 तत्रात्मवंशान्तरभूः । या १ । यष्टयूवेधभुजेन ६६ अनेनेयं कोटिर्लभ्यते तदा यावत्तावता किमिति । फलं पूर्ववगुच्छायेण युतं जातं वंशमानम् ! या १ । एवमुपविष्टवेधेन च वंशमानम् । या १ रु एतो समाविति समच्छेदीकृत्य छेदगमे शोधनार्थ न्यासः । या ६०रु६२२०८० । समीकरणेन लब्धं भूमानाङ्गुलानि या ६६ रु २०७३६० ६६१२० १ वंशयोस्त्रोत्थापितयोरुभयत्रापि वंशमानं सममेवागु लानि ७६२ । ततश्चैवं क्रियोपपद्यत इत्यर्थः। प्रभा । प्रश्नपद्ये, व्यवहितस्यार्थीदन्तरितरय, प्रगुणग्य प्रकण गुणोयत्र तस्य ऋजुवंशस्येत्यर्थः । वरिष्ठपदवीम्, अतिशयेन वर इति विग्रहे 'अतिशायन-' इत्यादिना इष्ठन् । प्रियस्थिरेति वगदेश. तन्य पदवी यदि यातोऽसि तदा वद । शेषं रफुटम् । भापाभाप्य । अब केवल अन धसे यासकी उंचाई सिद्ध करने की विपि कहो। पहले गड़े होकर 'प्रप्र का वेध यष्टिसे करे फिर उमीका ठार धा जो दोनो मी से योटि उत्पन हो उसमें अपने अपने भुजोंगा भाग देकर जो फन मिले, उसका अन्तर करके दृष्टिक उँचाइयों से अन्तर में भाग देन; पन वेघर्ता और मामा भूमिमें अन्तर होगा । फिर पहली विधिसे यासग नाई शाा करनी चाहिये । प्रश्न :-हे मित्र ! एक समभूमि में ऊचे सीधे यामरा मृत किमी पर भागि छिपा हुआ है, केवल उसका अन दिन्नताई देता है। यदि तुम यही बार मी उचाई और यहां मे अन्तर रतला. नो, गय, धन धानन्त्रागार में गुम यो -- अगा।
य : तय, ६ इसप्रकार दिनानम्हतो गोज्य विश्लेपः भागः-, त्यादि उपपत्र गोलाध्याये उपपत्ति । प्राचार्य के उदाहरणानुसार प्रथम वेवगे भुज ६६ । कोटि १1 द्वितीय वेधमें भुज ६० कोटि १ । दोनों वेधमें दृष्टिकी उँचाई ७२ । २४ कल्पनाकी गई है। यहां पर, वेधकर्ता और बांसको अन्तर भूगिका मान-य, कल्पना किया । प्रथम 'प' स्थान से उक्त विधिके अनुसार वेधकरके चनुपात किया:- य ६६.१:: य: +७२=वांसकी उँचाई । फिर 'फ' स्थान ६६ ०१:: य:-: वय, +२४-यांसकी उँचाई। अब, + ६० ६० ६६ ४८ । इसतिये, य-६६,९२० ६०६६ अंगुलात्मक भूमि का मान, वा २८८० हरतारगक मान हुआ। यह, ७२-२४ ७२-२४, प्रथना, य = ', यह, दृष्टिको उँचाई अन्तर में फोटियों का १ ६०६६ यन्तर पटायर निजभुन या भाग देवर फल के समान से पेध करने पर; य य च य ६ य +२४ । - --४८,अथवा ८६४० ६० य च ६०६६ है हुथा ॥१५-१७ ॥ चांग yि यन्त्राच्यायः॥ ३२३ अथ जलान्तर्वधमाह- एवं तोयेऽप्योच्च्यं तत्र गौच्योनितं भवति । किंवा यट्या कोटी दृष्ट्युच्छायो जलान्तरे वाहू ॥ ४८ || त्रि प्रश्नः। दूरस्थस्य न दूरगस्य यदि वादृष्टस्य दृष्टम्य वा वंशस्य प्रतिबिम्बितस्य सलिले दृष्ट्वाग्रमानं सखे । अत्रैव लमवस्थितो यदि वदस्यस्यान्तरं चोच्छ्यं त्वां सर्वज्ञमतीन्द्रियज्ञमनुजव्याजेन मन्ये भुवि ॥ ४६ !! उदाहरणम् । दृष्टा चेत्त्र्यगुला कोटि हुश्च चतुरङ्गुलः। ऊर्धस्थेनोपविष्टेन बाहुरेकादशाङ्गुलः ॥ कोटिरष्टाइगुला तोये वंशाग्रं विध्यता सखे । व्येकहस्तो गुच्छायौ वंशौच्च्यं चान्तरं वद ॥ ऊर्धवेधे कोटिः ३ । भुजः ४ । उपविष्टवेधे कोटिः | भुजः ११ दृष्ट्युच्छायो क्रमेण ७२ ॥ २४ । लब्धमात्मशान्तरं हस्ताः ५८ वंशौच्च्यं हस्ताः ६३ । अत्रो वेधेऽन्योपविष्टवेधे चान्या यष्टिरिति । अत्रोपपत्तिः । अत्र भित्तेः सुसमे पार्वे तिर्यग्रेखा दीर्घाकार्या। विल जलसमा भूः तत्रैकस्मिन्नेकान्तप्रदेश ऊर्धरेखा कार्या । केल वंशः । वंशमूलादधोगामिनी वंशप्रमाणेपान्या रेखा नौ । तस्किल वंशप्रतिनिम्मम् । अब भरेसाया उपर्यन्यप्रान्त च्छितान्या रेसा कार्या। गुच्छायालतिविम्यांशाग्रगामिनी रेगा कार्या । मा कर्णरेखा भरेसायां यत्र लग्ना तत्रम्ये नहीं है । यहां पर दृष्टि की उँचाई कोटी, जल में प्रतिबिम्नित यांस और वेधार प्रभ-हे मित्र! दूर या पास, दस वा न देसे जिम यांसका प्रतिबिम्प जल के अन्तर में दोनों भुज होते हैं । ३२१ गोलाध्याये जले वंशानं द्रष्टा पश्यति । जलादुभयतो हे त्र्यो भवतः । तत्र जलवंशमूलयोरन्तरं बाहुः । प्रतिविम्ववंशः कोटिः । अधः कर्ण खण्डं कर्णः । अन्यदात्मजलान्तरं बाहुः । दृष्ट्युच्छ्रायः कोटिः। ऊर्धकर्णखण्डं कर्णः । एते व्यस्र परस्परानुमते । यष्टिवेधेन ये भुजकोटी ते अप्येतदनुसारे । अत उक्तं एवं तोयेऽपीति । किंवत्र यदोच्च्यमागच्छति तद् दृगोच्च्येन हीनं कार्यम्। प्रतिविम्वितस्या धोमुखत्वाददगोच्च्येन सहागच्छति । अतस्तदूनंकृतमिति सर्व- मुपपन्नम्। प्रभा। हे सखे ! यदि तस्यान्तरमुच्छ्रयं च वदसि, तदा त्वां भुवि अती. न्द्रियज्ञमनुजव्याजेन, इन्द्रियमतिक्रान्तमिति विग्रहे अत्यादय इति समासः । अतीन्द्रियं जानातीति, अतीन्द्रियज्ञः सचासौ मनुजश्च तयाजेन तदीयच्छलेन भुवि सर्वशं मन्ये । भाप,भाप्य। - अथ जलके बीच मे सड़े हुए बांस या किसी वृक्षको वेव विधि यतलाते हैं। इसीप्रकार जल में भी यांस की उंचाई सिद्ध होजाती है । यहां पर दृष्टि में उँचाई घटाने से यथार्थ उँचाई होती है । अथवा यष्टि से येध करने का प्रयोज उपपत्ति। पड़ा है उसका फेवल अप्रभाग देखकर, यदि तुम यहाँ बैठे हुए. उसकी उन और अपने से अन्दर बतला दो, तब तुमको पृथ्वी पर मनुष्यरूपम सर्वश माने गदा पर प्राचार्य के उदाहरणानुमार खड़े येधमें कोटि ३, भुन ४ 1 4 में वोटि ८, भुग ११ फ्रग से दोनों में दृष्टि की उचाई ७२ ॥ २४ । नीचे लिने क्षेत्र में, प्रफ पांस पो उचाई, क ग जलम पास पा श्री यन्त्राध्यायः। ३२५ बांस के नुन्य गहराई-हय, बग-जल विस्तृति । प-प्रथम वेध स्थान और पं-द्वितीय वेधस्थान | वर और यपं दृष्टिकी उचाई । ग=प्रतिविम्वित यांस का अप्रभाग है। प्रथम वेध में अनुपात से दृष्टिको उँचाई, ४ : ३ :: बग : वप : आदि अन्त राशियों का गुणन मध्यराशियो के गुणन के समान होताहै । इसलिए समीकरण से यों हुप्रा- ४वप ३ वग=४५ प वा, वग- द्वितीय वेध में अनुपात, ११:८:: बग : वप-१८ मङ्गल; ११ वप-५२८ अथवा, ८ वग% ११ वप ५२८, अथवा, ग% - और बग- %3D ३ ८ ४वप ११ वप-५२८ इस प्रकार, बग- ३ ४ पप ११वप-५२८ ३३ वप-१५८४ अथवा, ४ वप- अथवा, ३२ वप= ३३ वप-१५८४, वा, वप% १५८४ .:. १५८४-७२= १५१२ अङ्गल = ६३ हाथ - बांस की उँचाई । अब जलकी विस्तृति भी सिद्ध होजाती है जैसा- ४वप १५८४४४ ३ ३ = २२१ अङ्गल =८८ हाथ हुए ' इसप्रकार समीकरणों के स्वरूपान्तरों से प्रश्नका उत्तर सिद्ध हुआ। बंग- 4 देना ४ ११ क गोलाध्याये किंवा यष्ट्येत्यस्योदाहरणम्। पडबैरमरेस्तुल्यान्यङ्गुलान्यथवा क्रमात् । आत्मतोयान्तरं दृष्ट्वा वंशौच्च्यं चान्तरं वद ।। ऊर्धस्थस्य नलान्तरम् ६६ । उपविष्टस्य जलान्तरम् ३३ । दृष्ट्युच्छायौ ७२१२४ । लब्धं तदेव भूमानं हस्ताः ८८ शौच्च्यू हस्ताः ६३ । इति धीयन्त्रम् । भापाभाष्य। इस उदाहरण मे यष्टिसे वेधन करके केवल जलके अन्तरों को जानकर यांसकी उँचाई और अपने से उसरा अन्तर सिद्ध किया है। उपपत्ति। नीचे तिखे हुए क्षेत्र में उदाहरण के अनुसार क्षेत्र का अवयव कल्पना किया- कग=६६ अगुल, कद-३३, अक-७२, यक-२४ य-वेधकर्ता और चांस अन्तर, य-दृष्टिकी उँचाई है । अत्र, कग : अकजह : जश्न, अथवा, ६६ :७२८३ ३ व च: य: ३% बांस की उँचाई। ७२ व ; इसलिए ४ पिर, फद:बर : जह: जम, वा, ३३ : २४::व: य-४८% २१ ८व ८व १ = यांसकी ऊँचाई। है ११ ८य घ च १ ३ पा, २= . ११ ११ ४४ ...य = ४४४२%ES, तर य% बास की ऊँचाई मिद हुई। ३ व ४ ३४८८ --३४२२-६, ४ यन्त्राध्यायः। ३२७ क्षेत्र, । इसबार स्वरूपान्वर से प्रश्न उपपन्न हुमा । उक्त दोनों प्रश्न आपस में मिले हुए हैं। धीयन्त्र का विषय समाप्त हुआ । ४८।४६ ॥ अथ स्वयं वहमाह- लघुदारुजसमचक्रे समसुपिराराः समान्तरा नेम्याम् । किञ्चिद्धका योज्याः सुपिरस्या? पृथक् तासाम् ॥ ५० ॥ रसपूर्णे तचक्रं द्याधाराक्षस्थितं स्वयं भ्रमति । ग्रन्धिकीलरहिते लघुदारुमये भ्रमसिद्धे चक्र अरः । किं विशिष्टाः । समप्रमाणाः समसुपिराः समतौल्य, समान्तरा नेम्यां योज्याः। ताश्च नद्यावर्तवदेकत एव सर्वाः किञ्चिद्धका योज्याः। ततस्तासामाराणां सुपिरेषु पारदस्तथा क्षेप्यो यथा सुपिरार्धमेन पूर्ण भवति । ततो मुद्रितारानं तञ्चक्रमयस्कारशाणवद् याथ- रस्थं स्वयं भ्रमति । अत्रयुक्तिः । यन्त्रैकमागे रसो ह्यारामूलं प्रवि- शति । अन्यभागे त्वारा धावति । तेनाकृष्टं तत्स्वयं भ्रमतीति । प्रभा। 'पारा चर्मप्रभेदिका। इत्यमरः । गेप स्फुटम् ।
३२८ गोलाध्याये भापामाध्य। अच्छे काठ का खरादा हुआ एक चक्र बनाना उसकी परिधि में समान अन्तर से एकाकार तुल्य छिद्रवाले श्रारा लगाने । ये आरा एक तरफ कुछ मुके होवें । और इन धाराओं के छिद्रों में इस प्रकार पारा छोड़ना जिसमें सब छिद्र श्राधे भोजावें अर्थात् प्राधे खाली हैं। बाद छिद्रों के मुखको अच्छी तरह बन्द करदेना। और इस चक्र को ग्वराद की भांति दो आधार में पोयेहुए एक लोहदण्ड के बीच मे स्थिर करदेना तब यह स्वयं चक्कर खाता रहेगा। युक्ति यह है कि यन्त्र के एक तरफ पारा आरा के मूलमें जाता है और दूसरी तरफ आरा के आगे सरकता है । इस प्रकार प्राघात से चक्र का स्वयं भ्रमण होता है ॥ ५० ॥ अथान्यदाह उत्कीर्य नेमिमथवा परितो मदनेन संलग्नम् ॥ ५१ ॥ तदुपरि तालदलाद्यं कृत्वा सुपिरे रसं क्षिपेत्तावत् । यावद्रसैकपाश्र्वे क्षिप्तजलं नान्यतो याति ।। ५२ ॥ पिहितच्छिदं तदतश्चक्र भ्रमति स्वयं जलाष्टम् । यन्त्रनेमिं भ्रमयन्त्रेण समन्तादुत्कीर्य घड्गुलमात्रं सुपिरश्य वेधो विस्तारश्च यथा भवति ततस्तस्य सुपिरस्योपरि तालपत्राः दिकं मदनादिना संलग्नं कार्यम् । तदपि चक्र द्याधाराक्षस्थित कृत्योपरि नेम्यां तालदलं विवा सुपिरे रसस्तावत् क्षेप्यो यावत सुपिरस्याधो भागो रसेन मुद्रितः । पुनरेकपायें जलं प्रक्षिपेत् । तेन जलेन द्रवोऽपि रसो गुरुत्वात्परतः सारयितुं न शक्यते । अतो मुद्रितच्छिद्रं तचक्र जलेनाकृष्टं स्वयं भ्रमतीति । प्रभा। उत्कीर्य इत्यादि स्फुटमेव । गदनो मधूच्छिष्टम् । रसः पारदः । ৭। গ গ । না রু ল খ গ ঘা। নয় । भाषाभाष्य।
यन्त्राध्यायः ३२६ परिधि को सराद से दो अंगुल गहरी दो अगुल चौडी करनी । और इस चौतरने छेद को तालपत्र आदि किसी वस्तु से मोम आदि के सहारे चन्द करना । यन से तालपत्रको उखाड़कर उसके भीतर छेद के श्राधे हिस्से में पारा भरकर आधे में जल भरदेना । वाद छेदको तालपत्र से मजबूत बन्द फरदेना । और इसको भी पहले 'स्वयवह यन्त्र' की भाति आधार पर रसना तक यह स्वयं भ्रमण करता रहेगा। वस्तुशक्ति यह है कि छेद के एक भाग में पारा दूसरे में जल रहता है परन्तु जल पारे को दबाकर उसमी तरफ नहीं जासकता ॥ ५१ । ५२ ।। अथान्यदाह ताम्रादिमयस्याङ्कुशरूपनलस्याम्बुपूर्णस्य ॥ ५३ ॥ एकं कुण्डजलान्तर्दितीयमग्रं त्वधोमुखं च वहिः । युगपन्मुक्तं चेत् कं नलेन कुण्डावहिः पतति ॥ ५४॥ नेम्यां वद्ध्या घटिकाश्चक्रं नलयन्त्रवत्तथा धार्यम् । नलकाच्युतसलिलं पतति यथा तवटीमध्ये ॥ ५५ ॥ भ्रंमति ततस्तत्सततं पूर्णवटीभिः समाकृष्टम् । चक्रच्युतं तदुदकं कुण्डे याति प्रणालिकया ॥ ५.६ ।। ताम्रादि धातुमयस्याङ्कुशरूपस्य वक्रीकृतस्य नलस्य जल- पूर्णस्यैकमग्रंजलभाण्डोऽन्यदग्रं वहिरधोमुख चैकहेलया यदि वि- मुच्यते तदा भाण्डजलं सकलमपि नलेन वहिः क्षति। तद्यथा। छिन्नकमलस्य कमलिनीनलस्य जलभृद्भाण्डे क्षिप्तस्य जलपूर्णसु- पिग्स्यैकमग्रं भाण्डावहिरधोमुखंदृतं यदि धियते तदा भाण्डजलं सकलमपिनलेनवहिर्याति । इदं कुक्कुटनाडीयन्त्रमिति शिल्पिनां हरमेखलिनांच प्रसिद्धम् । अनेन बहबश्चमत्काराः सिध्यन्ति अथ चक्रनेम्या घटीद्धा 'जलयन्त्रवड्याधारक्षसंस्थितं तथा निवे. शयेद्यया नलकमच्युतजलं तस्य घटीमुखे पतति । एवं पूर्णपटी. ne ३३२ . गोलाध्याये भ्रमणं शीलां, भ्रमराणां समूहो भ्रामरं, यस्मिन् । भवतां चेतांसि कथमव्यथानि पीडारहितानि सन्ति । कामोद्दीपकत्वादिति भावः। इति एवं विधं मन्दमान्दोलिताः चालिताः ये चूतानामाम्राणां नूतना- धनाःसान्द्राः स्फाराः प्रचुराः स्फुरन्त्यःप्रकाशमानाःपल्लवाःकिसलयानि तैः। उहेल्लन्त्यः परितोवेष्टिता या नववल्लयोनूतनशाखामजयस्तासु उच्चैः कलमव्यक्तं मधुरं यथास्यात्तथा कोकिलाः जपन्ति । शब्दायन्त इत्यर्थः । शार्दूलविक्रीडितं छन्दः । वसन्तजा वसन्तोद्भवा मल्लिकाः स्वकुसुमैः तदानीमुत्कर्षमाप्तैः मालती जाति तदानी मलिनामपकर्षमाप्नामवहसन्तीवेत्युत्प्रेक्षा। उप- वनमुद्यानकर्तृमलयानिलकम्पितैः किसलयैः पाणिकल्पैः ताः कर्म भूता वसन्तजमल्लिका हास्यरूपादनयाद्विनिवारयतीवेत्युत्प्रेक्षा। समयशेन सर्वः खलून्नतिमवनतिं च गच्छति न तत्रोपहासायुज्यत इति मध्य- स्थस्य निषेधोन्याय्यः। द्रुतविलम्बितं छन्दः । भापामाच्या हे पथिक, इस बसन्त ऋतु में, जन कि सिलीहुई नवीन मल्लिका के मत्त भ्रमणगण चारों तरफ घूमरहे हैं, इस समय आप लोगोंका चित्त कैसे दुःखी नहीं है ? इस प्रकार वायुसे हिलाईहुई बामकी नई-धन पल्लव युक लवाथों पर ऊंचेस्सर से मानो कोकिला अलाप रही है। इस वसन्तऋतु में उत्पन्न मल्लिका, अपने सिलेहुये फूलोसे, मलिन मालती (चमेली) का मानो उपहास कररही है । मलयाचलको वायु से कपायहुये पल्लयो से वनमल्लिकाथों को मानो मना कररहा है कि तुम चमेली को गत हँसो ॥ १॥२॥ . विहाय सौधं तृणकुख्यमण्डपे प्रसिच्यमाने सलिलेः समन्ततः। शुचौ रमन्ते विरतं विलासिनः मियाजनैः सीकरसेचनोन्मुखाः ॥ ३॥ सुगन्ध ऋतुवर्णनम् । निदाघदाहार्तिविघातहेतवे वनाय कामोच्छितचूतकेतवे। बजन्ति वापीजलकेलिलालसाः शुचौ रतिस्त्रेदगलज्जलालसाः॥ ४ ॥ प्रभा। विलासिनः सौध राजसदनं प्रासादं वा विहाय तृणस्य उशीरादेः कुड्यं भिचियस्मिन् तादृशं यन्मण्डपं तस्मिन् ।तृणरचितगृह इत्यर्थः शुचौ ग्रीष्मसमये। सीकरोजलकणःनिदाघोग्रीष्मस्तस्य या दाहार्ति- स्तस्या योविघातोनाशः तस्य हेतुस्तस्मै । चूता एवं केतवः पताकाः चूतकेतवः । काममत्यर्थमुच्छ्रिताः चूतकेतवो यस्मिन् तस्मै । वनाय वनं गन्तुम् । रत्या यः स्वेदो धर्मस्तस्य यद् गलस्रवज्जलं तेनालसा आलस्याभिभूताः । अतएव वापीजलक्रीडायामुत्सुका विलासिनो बजन्ति गच्छन्तीत्यर्थः। भाषाभाष्य। प्रीष्मकाल में विलासीगण, अपने उत्तम प्रासादों को छोडकर चारों तरफ जलसे सिंचीहुई तृणकुटी में, जलक्रीडा करते हुए अपनी प्रियाओं के साथ विहार किया करते हैं। इस प्रीष्मकाल में बहुतसे विलासीगण, रतिश्चम से बहतेहुए पसीनों से बाल- स्थयुक्त होकर , ग्रीष्मशान्ति के लिए, श्राम के वृक्षरूप पताकाओं से भूपित वन को, जलविहार के लिए जातेहैं ॥ ३।४ ॥ मदनदहनखिन्नामागतेऽप्येत्यकाले परिमलबहलानां मालतीनां नदीनाम् । अदय दयित सिञ्चस्यात्मदृग्वारिणा किं परिमलबहलानां मालतीनां न दीनाम् ॥ ५ ॥ उच्चेविरोति हि मयूरकुलं यदम्ब मन्दं कदम्बमकरन्दविमिश्रितश्च ।
३३४ गोलाध्याये वातःप्रवाति पतिरेति न तेन मन्ये निर्घाणनिघणविकर्णविहृत्वमस्य ॥ ६॥ एवंविधं विरहिणी विरहेण खिन्ना. भिन्नाञ्जनच्छविघने गगने घनौं। मत्वा प्रियं तमदयं हृदयं प्रविष्टं ब्रूते सपेशलमलं परिहासमिश्रम् ॥७॥ प्रभा । अथ वर्षतु वर्णयति । मदनदहनखिन्नामित्यादि स्वयमाचार्येणैवाने व्याख्यातम् । हे अम्ब इति क्रीडामहकारिणीमुद्दिश्य सम्बोधनोक्तिः । साम्प्रनं मयूरकुलमुच्चैर्विरोति। कदम्बानां ये मकरन्दाः पुष्परसास्तैर्विमि- श्रितो वातो मन्दं वाति । एवमुद्दीपककालेऽपि पतिनै एति । तेनास्य निघीणनिघृणविकर्णविहत्वं मन्ये । निर्घाणवेनास्य कदम्बसौरभान- वगमः।निणत्वं निर्दयत्वम्। विकर्णत्वेन मयूराणामालपश्रवणाभावः विहृत्वं स्मृतिशून्यत्वम् । यदीमानि कारणानि नरयुग्तदा कथमरिम- वर्षौ पतिर्मदन्तिकं नागच्छेदित्याशयः । एवंविधं विरहेण खिन्ना पीडिता विहिणी घनी वर्षाकाले यग्मिन् भिन्नाञ्जनच्छविधने भिन्न भेदं प्राप्तं यदञ्जनं तद्वच्छविः शोभा येषां तथाभूता घना मेघा गगने व्योम्नि तमदयं प्रियं हृदयप्रविष्टं गत्वा परिहासमिधं सपेशलमलं ते । पेशलं चारु । शेपं व्यक्तमेव । भाषाभाष्य। हे निर्दय प्रिय ! इस वर्षाकाल के आगमन में, जब कि नदियों में चारों तर मल यहरहाहै, मालतिया फूल रही है और मानववियों का फामोद्दीपन से मार भङ्ग होरहा है, ऐसे समय में फामाग्नि से सतायो दीन मुम यो अपने प्रेमाभुभ से क्यों नहीं आकर सींचते ? इस फाल मयूरगण उपे सरसे पालाप पर है, कदम्य पुष्प की सुगन्धियुक्त घायु मद मंद पलरही है। वो भी पति विदेर
w
ऋतुवर्णनम् ।
३३५
से नहीं पाया । इस से मालुम होताहै उसके नाक, कान और दया नहीं है। यदि
ग्रह सब होता तो अवश्य उसको अनुराग उत्पन्न होता।
इसप्रकार वर्षामें अजन के समान मेघों से छाए हुए आकाश में विरह दुःस
से पीड़ित विरहिणी, अपने निर्दयी पति को नानाविध हँसी मज़ाक की बातें
कह रही है ।। ५।७।।
स्वतनुजवनराज्या पुष्पवत्या श्लिपन्त्या
ह्यनुचितकृतसङ्गोऽस्मीति शैलोऽनुतप्तः ।
निशि शशिकरचञ्चन्निरैरश्रुकल्पैः
शरदि हृदिजखेदस्वेदवान् रोदितीव ॥ ८ ॥
प्रभा।
स्वतनुजवनराज्या स्त्रोत्पन्नवनपया । पुष्पवत्या कुसुमविशिष्टया
पुष्पं कुसुमं, स्त्रीरजश्व । सतः संपर्कः भोगश्च । अश्रुकल्पैर्नयनाम्बुस-
दृशैः । शशिनः चन्द्रस्य ये कराः किरणाः तैः चञ्चन्तो मिश्रीभवन्तो
ये निझराः शैलशतप्रवाहाः तैः। हृदि अन्तःकरणे जातो यः खेदः
सहनायोग्य दुःखं स एव खेदो घर्मोदकं तहान् । हृदिजेत्यत्र सप्तम्या
अलुक् । रोदितीवेत्युत्प्रेक्षा।
भोपाभाष्य ।
निज शरीर से उत्पन्न और पुष्प से सयुक्त, वनपतियों के संयोग को अनु.
चित मानकर लेशित पर्वत, शरत्काल की रात्रिमें चन्द्रमा के किरणों से प्रकाशित
झरते हुए निम जल से, हदय दुख-सूचक मानो आंसुओं को ही पहा
रहा है।॥८॥
। सहस्यकाले बहुशस्यशालिनी
चितामवश्यायकमौक्तिकोत्करैः ।
प्रहृष्टपुष्टाखिलगोकुलामिला
विलोक्य हृष्यन्त्यधिकं कृपीवलाः॥६॥
३३६ गोलाध्याये प्रभा। सहस्यः पौपमासस्तस्य काले हेमन्त वित्यर्थः । इला पृथिवीं विलोक्य कृषीवला अधिकं हृष्यन्ति । किं विशिष्टामिलाम् । बहुशस्य: शालिनी बहूनि यानि शस्यानि तैः शालते शोभत इति ताम् । अव. श्याया नीहाराःत एवं मौक्तिकानि तेषामुत्करैः समुदायैश्वितां व्याप्ताम् प्रहृष्टानि पुष्टानि अखिलानि गोकुलानि यस्याम् । इति हेमन्तवर्णनम्। भापाभाष्य। हेमन्तरतु में हिमके मोतियों के समान बिन्दुओं से व्याप्त नानाविध शस्यों से भूपित, और हष्ट पुष्ट गोवृन्दों से पूर्ण भूमि देखफर, किसान अतिहर्पित हो रहे हैं । ॥ अरुणनीलिममीलितपल्लव- प्रचुरफुल्लसमुल्लसनैः श्रियम् । वहति कांचन काञ्चनकाननं नवतरां नितरां शिशिरागमे ॥ १०॥ अपटुतिग्ममरीचिमरीचिगि- नहि तथा शिशिरे शिशिरक्षतिः । निशि यथोष्मलपीनघनस्तनी- भुजनिपीडनतः स्वपतां नृणाम् ॥ ११ ॥ सभा। अथाचार्यः श्लोकहयेन शिशिर वर्णयति । शिशिरागमे पाचन-- काननं कचनार इति हिन्दीभाषायां प्रसिद्धो वृक्षप्तत्याननं वन अरुणनीलिमा अरुण-नीलयोर्भावः । अरुणिमा, नीलिमत्यर्थः । आभ्यां मीलिता मिश्रिता ये पल्लवाः तेषां प्रचुराणि भूयामि फुल्लानि विकस्वराणि समुल्लासनानि संपदः तैः। श्रथया अमानीलनिमी- लितपल्लवम् , इतिच्यरतं पनविशेषणम्।वाचन अनिर्याच्या नवतररा- तुवर्णनम् । २३५ मतिनवीनां श्रियं शोभां नितरामत्यर्थ वहति धचे ॥ उष्मलौ उष्णता- विशिष्टौ पाचौ पुष्टौ घनौ मांसलौ स्तनौ यस्याः तस्या भुजनिपीडनतः बाहुबल्लिवेष्टनतः । शेपं स्पष्टम् ।। भापाभाष्य। शिशिर ऋतु में, नानाविध लाल और नीलवर्ण के पल्लवो से युक्त खूब फूलेहुए कचनार के वन, अपूर्व शोभाको धारण किएहुए हैं । इस ऋतुमें, सूर्य के प्रातप से वैसा जाडा नहीं जाता जैसा उष्ण और पीन कुचवाली रमणी को भङ्क में लेकर, रानिमें सोने से निवृत्त होताहै ।। १० । ११ ।। ऋतुव्यावर्णनव्यानादीपदेपा प्रदर्शिता । कविता तद्विदां प्रीत्यै रसिकानां मनोहरा ॥ १२ ॥ सरसमभिलपन्ती सत्कवीनां विदग्धा नवरतरमपीया भारती कामितार्थम् । न हरति हृदयं वा कस्य सा सानुरागा नवरतरमणी या भारती कामितार्थम् ॥ १३ ॥ न भवति हृतचित्तो वाचमाकर्ण्य रम्यां परभृतसरसा ना कोमलां सत्कवीनाम् । सततमुपगतानां साम्बुजैर्वा पयोभिः परभृतसरसांना कोमलां सत्कवीनाम् ॥ १४ ॥ त्रिदिवमधरयन्तस्तीरपङ्केन नाना । रुचिरसिकतया वा श्लेपित्ताङ्गै सुवृत्तः । कृतिन इह स्मन्ते रम्यसारस्वतोवे रुचिरसिकतया वा श्लेपिताः सुवृत्तः॥ १५ ॥ वर्षाकाले हृदयस्थमदयं दयितं प्रति विरहिणी किलेवं नूते। हे दयित निर्दयास्मिन्नयागते काल एत्यागत्य किं न सिबसि । काम् ।
किं विशिष्टाम् । अमलां निर्दूपणाम् । पुनः कथंभूताम् । सततं रम्याम् । पुनः कि विशिष्टाम् । परभृतसरसाम् । परभृतस्य कोकि- तेषा वाचं सततं रम्यामाकर्य का ना हृतचिचो न भवति । ३३६ 'गोलाध्याये माइति माम् । कथंभूताम् । दीनां । केन । आत्महग्वारिणा स्वदृक्- सलिलेन । कासां सम्बन्धिनिकाले । नदीनां । कथंभूतानाम् । परिमलबहलानाम् । परि समन्तात् । मलबहलानाम् । न केवलं तासाम् । मालतीनामपि । परिमलवहलानामामोदवहलानाम् । न केवलं तासामपि । लतीनामिति । रतीनाम् । तासां च परिम- लबहलानाम् । तत्र परस्य भावः परिमा। परिम्णोलवः परिमलवः। तं हर तीति परिमलवहराः। तासां परिमलवहराणम् । रलयोर्वव- योश्चेक्यस्य श्लेपेतु गृहीतत्वात् । मानिनीनां मानिनां वा- कामातुराणां मानभङ्गेन तुच्छत्वमापादयन्तीनां रतीनामित्यर्थः ।। अाथ कविवर्णनम् । का सत्कवीनां विदग्धा भारती वाणी कस्य हृदयं न हरति । अपि तु सर्वापि सर्वस्य । अनवरतरमणी- या । सततं रम्या । किं कुर्वती । अभिलपन्ती । कम् । अमिता- र्थम् । अप्तख्यमर्थम् । किं विशिष्टम् । सरसम् । साच कस्य न हरति । किम् । अर्थ हृदयं वा । या । का । नवरतरमणी । अपूर्व- सुरता युवती । किं विशिष्टा ।भारती भरतसम्बन्धिनी नर्तकली। कथंभूता सती। कामिता । पुनः। किं विशिष्टा । सानुरागा। किं कुर्वती । सरसमभिलपन्ती । विदग्धा । काना नरः सत्कवीनां वाचमाकर्य हतचिचो न भाति । लस्येव सरसां रसवतीम् । अथ द्वितीयोऽर्थः । के उदके वयः प. क्षिणः सन्तश्च ते कवयश्च सत्कवयो हंसाद्या जलपक्षिणः ।
ऋतुवर्णनम् । विशिष्टाम् । न अकोमलां । कोमलाम् । कथंभूतानां तेपाम् । उपगतानां तीरविलासिनामित्यर्थः । केपाम् । परभृतसरसाम् । कैः। पयोभिः । कथं भूतैः । साम्बुजैः । अथवा । उपगतानां नगर- निकटवर्तिनां सरसां सत्कसम्बन्धिनो वयः सत्कवयस्तेपाम् । अथ किमेवंविधयात्र ग्रन्थे प्रातिकानां गणकानामित्याश- त्योच्यते । नहि मन्दार्थमेव अन्य प्रारभ्यत इत्याह । इह कवीनां दे गती। इयमियं वा । एतत्परोऽयं श्लोकः । रमन्ते । के । कृ- तिनो विदांसः। क । रम्यसारस्वतोवे। सरस्वती नदी प्रवाहे । सर- स्वत्याः सर्वगतलाइङ्गाचा अपि सरस्वत्य उच्यन्ते । अत्र किं वि- शिष्टा उपलक्षिताः। कैः सुवृत्तः रम्याचारैः पुनः कै। आश्लेपि. ताङ्गैः । अवलिप्ताङ्गैः । केन । नदीतीरपङ्केन । न केलं तेन। नानारुचिरसिकतया वा! किं कुर्वन्तः । तथा रमन्ते । अधयन्तः अथरीकुर्वन्तः । किम् । त्रिदिवम् । अस्मादप्युपरितनं स्थानं वाञ्छन्तः। अथ द्वितीयोऽर्थः । नानारुच्या रसिकत्तं सिकता तयेह रम्यसारस्वतौघे वाक्समूहे चतुरवचननिचये कृतिनो रमन्ते कैः कृत्वा । सुवृत्तैः श्लदणैः श्लोकैः मालिनीप्रभृतिभिः। किंवि- शिष्टैः । श्लेपिताङ्गैः । श्लेपोक्तियुक्तवरणैः । पादावृत्तिप्रभृतिभिः । किं कुर्वन्त:त्रिदिवमधरयन्तःत्रिदिवसुखादपि काव्यरतिसुखमधिकं मत्वेत्यर्थः । शेपं स्फुटम्। इति श्रीभास्करीये सिद्धान्तशिरोमणिवासनाभाप्ये गोलाध्याये मिताक्षरे ऋतुवर्णनं समाप्तम् । अत्र ग्रन्थसंख्या ६०॥
३४०
गोलाध्याये.
प्रभा।
एते श्लोका आचार्येण स्वयं विशिप्य व्याख्याता एव ।
इति प्रभायां ऋतुवर्णनम् ।
भापामाच्या
यहां तुवर्णन के बहाने कवियो की प्रीति के लिये यह रसिका मन हरने
याली छोटी कविता दिसलाई गई है
सत्कवियों की सरस और चतुरे वाली अनेक विष उत्तम भावों को प्रकार
परती हुई, किसके हृदय को नहीं हरती ? अथवा नवीन रति में निपुण
अनुरागरती, चतुर नटी, सरस गान करती हुई क्सिया मन नहीं हरती ? सभी
का हर लेती है।
सत्कषियों की सरस, निर्दूषण और कोकिल के समान मधुर घाणी,
पिसा
चित्त नहीं हरती ! अथवा कमलों से पूर्ण सरोपर में बिहार परनेवाले इस आदि
पक्षियों के फोगल र मधुर शन मुनकर, रिसफा चिरा नहीं मुग्ध होता !
जैसे गङ्गाजरा और उसकी रेणुका यो पावर स्वर्ग सुख को लोग
है । उसी प्रकार नानाप्रकार की रसिकता से, सरस्वती के मुन्दर छन्द और
रलेपपूर्ण उतियों में, विद्वान् लोग, स्वर्ग को तुच्छ गानयर रग जाते हैं।
उपर के तीनों श्लोक पादात्ति यमफ है। इनका संस्कृत में अर्थ पमत्कार
भाप में स्पष्टही ॥१२॥१५॥
भाषाभाष्य में प्रानुवर्णन समाप्त हुआ।
समझने
,
अय प्रश्नाध्यायां च्यारयायते ।
तत्रादौ तदारम्भप्रयोजनं तत्प्रशंसां चाह-
मोदि प्रोटसभानु नति गणतः प्रश्नविना प्रायशो-
ऽनस्तान वच्मि विचित्रगङ्गिचतुरमीतिपदानाय थान् ।
माफयापि पर्णवर्णपदनं वयमेति जाणा-
तस्यासर्यकपर्वतशिरमाव्याधिन्दोऽत्र यः॥ १ ॥
.
प्रश्नाध्यायः
पाट्याच वीजेन च कुट्टकेन
वर्गप्रकृत्या च तथोत्तराणि।
मोलेन यन्त्रैः कथितानि तेप
चालायवोधे कतिविच्च वच्मि ॥ २ ॥
प्रष्टार्थम् ।
। प्रभा।
गणकः प्रौढसभासु गोलगणितज्ञसमाजेपु प्रश्नैः कल्पनाविशेष-
जनितेरभिनवैर्विना प्रश्नज्ञानमन्तरा प्रायशः प्रौटि तज्ज्ञानोत्कृष्टतान
एति नाधिगच्छति । अतरतान् प्रश्नान् विचित्रा नानाविधा या भङ्गयः
प्रश्नोचररूपारतासु ये चतुरास्तेभ्यःप्रीतिप्रदानाय वच्मि कथयामि। अहं
प्रन्थनिर्मातेत्यध्याहार्यम् । यान् प्रश्नानाक्यापि श्रुत्वापि सुवर्ण वर्ण-
वदनं सुवर्णकान्तिसदृशं मुखं क्षणात् प्रश्नश्रवणोचरकाल एवं वैवर्य
तिदुचरदानासामयेन मालिन्यमप्रमत्वमितियारद एति प्राप्नोति।करय
प्राप्नोतीत्याकादायां तस्य,यःश्रोतागणकोऽत्र खोमहान्याकुगर्वःस्व-
गुणगौरवजनिताभिमानः स एव पर्वतस्तस्य शिरसि मरतके प्रौढ्याप्रक
गाधिरूढ श्रारोहणं कृतवानित्यर्थः । प्रथम पाट्यादिविधिना यानि
भनानामुत्तराणि कथितानि पूर्वाचार्यैर्ब्रह्मगुप्तादिभिः प्रदर्शितानि तेपा
मध्येऽत्र चालावबोधनिमित्त कतिचित्प्रश्नान सोत्तरान् वच्मीत्यर्थः ।
भाषाभाष्य ।
ज्योतिषी, प्रश्नज्ञान के विना अच्छे ज्योतिपियों की सभामें प्रगम नहीं
होता । इसलिए विविध प्रश्नोत्तर कल्पनाविशारदों के सतोप के लिए उन प्रश्नों
कहता हूँ | जिनको सुनतेही वडे दुरभिमान रूपी पर्वतके शिरपर पेलकर
दे हुए ज्योविपियों की, सोना के समान उजली मुसकान्ति, मलिन होजाती
। पाटी बीज कुट्टक वर्गप्रकृति गोल और यन्त्रों से जिन प्रश्नों के उत्तर
वाचार्यों ने कहे हैं । उन प्रश्नों से कुछ प्ररन बालबोध के लिए पहा पर
हताहू ॥१२॥
ht सदसद्विवेककुशलः। विद्वयकरकोरचारमतिभिः । विदुषां पण्डिताना चक्रं समूहः तस्मिन् चकोरा इव चोरा अतिमुज्ञाः, तेभ्यः चार यति सरगमयतीति पाटीपाटीति तन्निमित पाटीरूपं रचिनमित्यर्थः। ३४२ गोलाध्याये अथ बुद्धिमतः प्रशंसामाह- अस्ति त्रैराशिकं पाटी वीजं च विमला मतिः। किमज्ञातं सुबुद्धीनामतो मन्दार्थमुच्यते ॥ ३ ॥ वर्ग वर्गपदं धनं घनपदं संत्यज्य यद्गण्यते तत्त्रैराशिकमेव भेदबहुलं नान्यत्ततो विद्यते । एतद्यबहुधास्मदादिजडधीधीवृद्धिबुद्या बुधै- विदच्चकचकोरचारुमतिभिः पाटीति तनिर्मितम् ॥ ४ ॥ नव वर्णात्मकं वीज न बीजानि पृथक् पृथक् । एकमेव मति/जमनल्पा कल्पना यतः॥ ५ ॥ स्पष्टार्थम् । वर्ग तन्मूतं धनं तन्मूलं च त्यक्त्वा यद्गएयते संख्यायते तदेव- बहुलं भेदः स्वग्वरूपैबहुलमनेकविधं त्रैराशिकमेव ततोऽन्यन्न यिने तदन्तर्भूतं सर्वमित्यर्थः । एतद्यबहुधोक्तं तत्र हेतुमाइ । अम्मदादिजडधीधीवृद्धिबुद्ध्या । वयमादिर्यपांतेऽस्मदादयस्तेच ते ज. धियो मन्दबुद्धयश्च तेषां धीमतिन्तस्या वृद्धिर्धनं तहिपये घुड़ि: तया । अग्मदादिनधियां धीवृद्धिः स्यादिति युद्येत्यर्थः । धु रमणीया मतियपाते । पक्षिषु चकोराणामतिसुशतप्रमितिः । पट सकलान गनभेदानां निरूपणमशल्यमिति सल्पा एव भेद प्रदर्शिताः । इत्यं राशियर पाटी प्रतिपिहिमतार्थमाघपु प्रधान तत्वेनाम्युपगम इति वेदिनभ्यम् । वर्णत्मक यावचारतानकनन्निवादिगम्बरपवीजमन्यास प्रभा।
प्रश्नाध्यायः। ३४३ । न चैकवर्णतन्मध्यमाहरणादिभेदैः परस्परं भिन्नानि बीजानि । तहि किमित्याह यतोऽनल्पामतिरेव एकं बीजं बहुविधा कल्पना समुदेति । मतिकल्पनावशादेव वीजस्यानेकविधत्वमित्यर्थः । भापाभाष्य 1 म राशिक गणित का भेद पाटी गणित और शुद्ध युद्धि वीजगणित है । सुद्धियों को क्या नहीं मालुम है ? वे सब जानते हैं । इसलिए मन्दगुद्धियों के लिए विशेष कहता हूं । वर्ग, वर्गमूल, घन, घनमूल छोड़कर जो कुछ गणित किया जाताहै वह नाना- विध त्रैराशिक-भेद के सिवाय कुछ नहीं है। यह हमारे सदृश मन्दबुद्धियों की बुद्धि बढ़ाने की इच्छासे, सुज्ञ विद्वानों ने पाटीगणित की रचना की है । यीज का स्वरूप यावत् , कालक श्रादि वर्ण नहीं है और न एकवर्ण, मध्यमाहरण, भावित आदि भेद से वीज का अलग अलग स्वरूप है । केवल एक बुद्धि ही बीजगणित का स्वरूप है । जिससे अनेकविध कल्पनाएं हुआ करती हैं ।।३।५।। अथ प्रश्नानाह- अहर्गणस्यानयनेर्कमासा- श्चैत्रादिचान्दैगणकान्विताः किम् । कुतोधिमासावगशेपके च त्यक्त यतः सावयवोऽनुपातः ॥ ६ ॥ अयमस्य भङ्गश्च पूर्वं व्याख्यातमेव । हे गणक ! अहर्गण के साधन में सौर मासों में चैत्रादि से गत चान्द्रमासों को विजातीय होने से कैसे जोडदिया है ? और अनुपात के सावयव होनेपर भी भधिमास और अवमशेप को क्यों छोड दिया है ? इस प्रश्नका उत्तर मध्यगति वासना में दर्शावधिश्चान्द्रमसाह मास -,इत्यादि विधि से किया गयाहै ॥ ६ ॥ अथान्यमाह- चन्द्रश्चन्द्रगुणो रवी रविगणश्वाङ्गारकोऽङ्गाहत-- भाषाभाष्य। .
से गुणकर, फलका . 4 ३४४ गोलाध्याये स्तद्योगो गुणसंगुणान्सुरगुरोराश्यादिकात् पातितः। शेपं चापरपंर्ययोत्थखचरेणोनं युतं वा शनिः रयात् केऽन्ये भगणा वदेति तव चेदस्तिश्रमो मिश्रके ||७|| प्रभा। स्फुटार्थोऽयं श्लोकः । चन्द्रगुणो रूपगुणित इत्यर्थः । भापाभाप्य । चन्द्रमा को एफ से, सूर्य को यारह से और भौम को योग करके तीन से गुणा किए हुए राश्यादि गुरु में घटाकर शेप को किन ग्रहों के भगणोंमें जोड़ने वा घटाने से शनि सिद्ध होताहै ? उन भगणों को बतलाओ यदि मिश्रगणित में तुमने परिश्रम किया है, यह प्रश्न हुआ ॥ ७ ॥ अथास्य भङ्ग:- उद्देशकालापवदेवकार्य योगान्तरायं ग्रहपर्ययाणाम्। दृष्टस्य चक्राणि तदूनितानि तैरुनितं तत्क्रमशो विधेयम् ॥ ८॥ अज्ञातखेटः स्वमृणं कृतश्चे- दज्ञातचकाणि भवन्ति तानि । कहाः प्रदेया अविशुद्धशुद्धी कहैश्च तक्ष्यं कुदिनाधिकं चेत् ॥ ६॥ उदाहरणे ग्रहाणां यथा यथा योगोऽन्तरं वाभिहितं तथा तथा ग्रहयुगभगणानामपि कार्यम् । यदि शोध्यं न शुध्येत्तदा कुदि- नानि दत्त्वा शोषयेत् । तथा गुणकैर्गुणने योगे च कृते यदि राशि कुदिनाधिको भवति तदा कुदिनैरतक्ष्यः । एवं योगान्तरादि यद्भवति तेन दृष्टमहस्य युगभगणा एकभोनाः कार्याः। अन्यत्र .
प्रश्नाध्यायः ३४५ तेर्भगणैस्तदूनं कार्यम् । एवं कृते प्रथमस्थाने यदवशेष तेऽन्ये भगणा भवन्ति । यद्यन्यभगणा उदाहरणे धनं कृताः। यदि ऋणं कृतास्तदा दितीयस्थाने यदवशेपं तेऽन्यमगणा इति। अत्रोपपत्तिः। यद्ग्रहाणां योगवियोगादिकं तत्तद्युगभगणा- नां कृतम् । तथाविधैर्भगणैरहगणाद ग्रहवफल आनीते तद्योग- वियोगादिकमुत्पद्यते । यत्र शोध्यं न शुध्यति तत्र यत्कुदिनानि दत्तानि तत्रेयं युक्तिः । यैर्भगणैर्यादृशो ग्रहो राश्यादिको भवति तेरेव कुदिनाधिकैस्तादृश एव राश्य दिकः स्यात् । भगणशेषयो. स्तुल्यत्वात् । किन्तु तद्गपा अधिका आगच्छन्ति ते परि- स्यकाः । प्रयोजनाभावात् । उदाहरणं हि राश्यादि ग्रहाणामेव । मनयेव युतन्या यत्र गुणनादिके कृते कुदिनाधिकत्वं दृश्यते त्र राशिः कुदिनैस्तस्य इत्युक्तम् । अ योगवियोगादिके ये गणा नातास्तेऽन्यभगणैरूनाः सन्तो दृश्यहमगणा भवन्ति । दृष्टभगणैरूना अन्यभगणा भवन्तीति विलोमविधिः । यदान्य- नगणेर्युक्ताः सन्तो दृष्टभगणा भान्ति तदा तैरेवोना दृष्टभगणा मन्यमगणा भवन्तीत्यर्थात् सिद्धम् । अथ वालावबोधार्थ कल्पितभगणेरुदाहरणम् । तत्र खेभंगणा- प्रयः ३ चन्द्रस्य चत्वारः । भोमस्य पञ्च ५ गगेः सप्त। पनेर्नव । कुदिनानि पष्टिः ६० त्रयोविंशति- २३ महर्गणं कल्प्य साधिता ग्रहाः ।र. १ १२१ | चं. ६ । १२ । म. ११101गु. ८|६|शु. ५। १२ । अत्र दादशगुणोऽर्कः । किगुणश्चन्द्रः षड्गुणो भीमः। र.६ | १८ |.६।१२। .६ 11 एणं योगः। १० 10 अयं त्रिगुणादगुरोविशोय ..
गोलाध्याये २४ । १८ शेपम् २ | १८ | अथाज्ञातभगणज्ञानार्थं ग्रहगुगम- गणानां यथोक्ते योगे वियोगे च कृते जातम् १११ ०। एतच्छनि- भगक्वभिरूनीकृतं जातावन्यभगणौ २। यधन्यभगणा ऋणं तद्भगणद्वयसंभूतो ग्रहः । । ६ अस्मिन् पूर्वस्मात् २ । १८ शो- धिते जातः शनिः ५ । १२ । यद्यज्ञातः खेटः स्वं तदा शनिभग- णेपु ६ कुदिनानि ६० प्रक्षिप्यैकादश ११ विशोध्य जाता अन्यभगणाः १८ । एभ्यो जातो ग्रहः २।२४ अनेन पूर्वशेपेयुते जातःशनिः ५॥१२ भापामाप्य । अब उत्तरकी रीति कहते हैं। प्रश्नकर्ता के कथनानुसार प्रहभगणों का योग अथवा अन्तर करके फलको ज्ञात ग्रह के युग भगणों में एक स्थान में घटादेना और एक स्थान में उन भगणों कोही फल में घटाना । शेप अन्य ग्रह के भगण होंगे। यदि अन्य प्रहका भगण उदाहरण में जोड़ा गया हो, तब प्रथम स्थान में जो शेष रहेगा वह अन्य ग्रह का भगण होगा । और यदि घटाया गया हो तव दूसरे स्थान में जो शेप यचैगा यह अन्य ग्रह का भगण होगा । यदि युगभगणों में फल घटाने परन घट सकै तब उस शोधक राशि में कुदिनों को जोड़कर, फल को घटाना चाहिये । और जोड़ने किंधा घटाने याद यदि राशि कुदिन से अधिक वर्ष तब उसको कुदिनों से तष्टित करदेना चाहिये । उपपत्ति। (१) यहां पर प्रहों का योग अथवा अन्तर न करके यदि उन प्रहों के युग भगणों काही योग वा अन्तर किया जाय और उससे इष्ट महर्गण द्वारा प्रह समान फल सिद्ध किया जाय तो भी ग्रहों का योग या अन्तर गुणक और भाजक के तुल्य होने से,सिद्ध होजाता है। जैसा,र+-- + A के परभ यह फचभरह . अह (फरभ+कपभ)x । परन्तु यहां पर प्रश्न में भगणों ही था.' फकु काकु ( इष्ट होने से केवल ग्रहों के कल्प भगणों का ही योग आदि करने से प्रयोजन - सिद्ध होजाता है । तात्पर्य यह है कि ज्ञात भगणसे जो ग्रह सिद्ध हुये हैं उनको इष्ट अङ्कों से गुण करके अज्ञात भगण-सम्पन्धि ग्रह का योग और अन्तर करने पर अन्य ग्रह होता है । तर अज्ञात भगण का ज्ञान अभीष्ट रहता है । उसके ज्ञान के लिये 'उद्देशकालापवत्-' इत्यादि विधि से इष्ट ग्रह भगणों का योग आदि करके फलमो अन्य ग्रह भागण में विलोमविधि से जोडने घटाने से इष्ट ग्रह का भगण ज्ञात होता है । यह विषय भाष में स्पष्टही है। श्रम प्रश्न के अनुसार गुणन श्रादि करने से दो पक्ष सिद्ध हुये.- {गुxघ-(चx अ+rxक+मxग) + प्र-शनि । यहा पर 'अ' 'क' श्रादि इष्ट गुणक सख्या के द्योतक कल्पना किये हैं और अज्ञातभगए सम्बन्धि ग्रह का मान है। अब दोनों पक्षों को ) इस से गुणा तो हुआ- गुभxघ-(चमX+रभxक+मभxग) + अज्ञावभगण, -शनि भगण । अत्र कोष्ठक का मान 'फ' कल्पना किया तो दोनों पक्ष यों हुये- फ + अज्ञातभगण शनिभगण यहा पर इष्टभगण शनिभगए है इस लिये उमको फा मे जोडा घाया तय हुश्रा- फ-अशतभागणशशिभगण. फ+ज्ञानभगए-शनिमगण. पक्षान्तर नयन से, फ-शनिभगण-अजात मगण शनिमगरण-फ = अज्ञातभगण । इसप्रकार 'इस्य चमाणि तद्- नितानि, तैरूनितम्-' इत्यादि बिपि उपपन हुई। (२) इस विधि को प्राचार्य ने सुगमता से समझने के लिए उदाहरण में दिसलाया है। उसका गणित भाव के अनुसार इस प्रकार है - कल्पना दिया। रगिभगरा ३ पन्द्रभगए ४ भौमभगए 1.. ..... Powww
३४५
गीलाध्याये
....
गुरुभगण ७............
शनिभगए ६.............
कल्पकुदिन ६०
श्रय प्रश्नानुसार ७४३-(४४१+३४१२+५४६)=२१-(४+
३६+३०)=२१-७०,२१ में ७० घट नहीं सकते इसलिए उस में ६० कला
फुदिन जोड़ा-८१-७०=११ शेष घचा । अज्ञातभगण=भ कल्पना करने से
सक्त विधि के अनुसार ११-म या ११+भ-६ पक्षान्तरानयन से भ% ११
FE वा, भ६-११ दूमरे समीकरणं में कुदिन जोड़कर पटाने से=६० +
६-११५८ । इसप्रकार ज्ञात हुआ कि कल्प में अज्ञात प्रहभगण २ वा ५८
है । अय, २३ अहर्गण मानकर राश्यादि प्रह अनुपात से सिद्ध हुये-
.
चन्द्र, यदि ६२ : ४ : २३ : ६।१३, यह१ =६ .. ११
रवि, ६० : ३ : २३ : १। २४, यह १२६ .. १८,
भौम, ६२ : ५ .. २३ : ११ । ०, यह ६ =६
यो.
गुरु, ६१ : ७ . २३ .८। ६, पह४३%30, १८
.
०
१८
शे० २
अशातग्रह ६० : २ ॥ २६ ६ श.२०१८-६ । ६श.५।११
६० : ५८ :: २३ । २ । २४ शे.c+R|२४-श.५११२
शनि, ६० ::: २३ : ५। १२
इसप्रकार २ और ५८ भगणों से ज्ञात प्रह राश्यादि सिद्ध हुआ IFE |
अथान्य प्रश्नमाह-
ये याताधिकमासहीनदिवसा ये चापि तच्छेपके
तेषामेक्यमवेक्ष्य यो दिनगणान् ब्रूतेऽत्र कल्पे गतान् ।
संश्लिष्टस्फुटकुट्टकोद्भवटुक्षुदेणविद्रावणे
तस्याव्यक्तविदो विदो विजयते शार्दूलविक्रीडितम् ॥ १० ॥
प्रश्नाध्यायः। प्रभा। ये यत्संख्याका याताधिकमासहीनदिवसाः श्रदर्गणसाधने किय- माणे गताधिमासास्तथा हीनदिवसा श्रवमदिनानि ये चापि तच्छपके तयोरघिमासावमयोः शेषके, तेपांचतुर्णामैक्यं योगमवेक्ष्य विज्ञाय यो गणकः कल्पे गतान् कल्पादितो व्यतीतान् दिनगणान् सौर- चान्द्रसावनभेदात्मकामहर्गणानत्र ते गणितहारा कथयति । त- स्यान्यक्तविदः, भव्यक्तं बीजगणितं वेत्तीति विग्रहः । विदो विदुपः संश्लिष्टरफुटकुट्टकोहटबटुक्षुदैणविद्रावणे, संश्लिष्टसंज्ञो यः स्फुटकु- दृकस्तत्रीङ्कटः प्रगल्भोयो बटुःसएव क्षुदैणोऽल्पकायो मृगस्तरय विद्रा- वणे पलायनकर्मणिशार्दूलविक्रीडितं सिंहबच्चेष्टितं विजयते सर्वोत्कर्पण वर्तत इत्यर्थः । शार्दूलविक्रीडितमिति छन्दो नामापिसूचितम् । भापाभाष्य। अहर्गण के साधन में जितने गत अधिमास और अवम हो उनका और एनके शेपों का योग जानकर जो गणक कवादिसे खौर, पान्द्र, सायन अहर्गयों को गणित से यवलावे यह बीजगणितज्ञ परिडत, संश्लिष्टस्फुटकुट्टक में उद्भट को भगाने में सिंहके समान विजयी होता है ॥ १० ॥ अथास्य भङ्गः। नाष्टाष्टिगोभ्यधिरीलामतु- दिप ८६३३७४४६१६८४ने सशेपाधिमासावमैक्ये । भवेदयेकचान्नाह १६०२६EEEEEEEE भक्तेऽवशेष गतेन्दुधराशिस्ततः सावनाद्यः॥ ११ ॥ स्पष्टार्थम् ।। प्रभा। सशेषे खस्वशेषाभ्यां सहिते येऽधिमासावमे तयोरक्यं तस्मिन् । इन्दुयुराशिश्चान्द्राहर्गण इत्यर्थः । शेष स्फुटम् । बालकरूपी तुद्रमृग प्रश्नाध्यायः। 'दिना । कथमस्य विषय इति चेत् । उच्यते । गतसौरदिनेभ्यो यावन्तोऽधिमासा यच्च शेपं गतचन्द्रदिनेभ्योऽपि तावन्त एव भवन्ति तावदेव चावशेषम् । अवमान्यवमशेपंच चन्द्रदिनेभ्य एव सिध्यति । अतस्तयोः शेपयोश्च योग उदाहते युगाधिमासा- वमयोगो गुणो युगेन्ददिनानि हरः । गतेन्दुदिनप्रमाणं याव- सावत् १ । तद्गुणेन गुणितं हरेण भक्तम् । तत्र लब्धिप्रमाणं कालकः १ । तद्गुणितं हर गुणकगणितायावत्तावतो विशोध्य जातं शेपम् । या २६६७५८५८००० का १६०२६६६०००००० एतदधिमासावमशेपैक्यम् । यो लब्धःकालकः १ सगताधिमामा- वमानामैक्यम् । तच्छेपे यदि क्षिप्यते तदा चतुर्णा योगः कृतो भवति । या २६६७५८५०००० का १६०२६ECREEEEE I अस्य चतुर्णा योगस्योदिष्टयोगेन समीकरणे क्रियमाणेऽधिमासा- वमयोगो भाज्यः । व्येकेन्ददिनानि हरः । उहिष्टयोग ऋण- क्षेपः । एवं सति लाघवार्थ रूपशुद्धावाचार्येण स्थिरः कुट्टकः कृतः। सच कृताहाटीत्यादि। प्रभा। जिष्णुजो ब्रह्मगुप्ताचार्यस्तेन कृताच्छास्त्राद् बामग्फुटसिद्धान्ता- दित्यर्थः । ब्रह्मसिद्धानुसारमधिमामावमनच्छेपाणां युति विज्ञायेति तापर्यम् । मापामाप्य। अब उदाहरण रिसलाते है । प्रमसिद्धान्त के भागार अधिमास, पवम, भधिशेप और अवमशेप का योग, ६४८४२६००० १४६ जानकर जो अगए सिद्ध फरदेगा यह मानसिद्धान्त को मानोगासा है।
३५२ गोलाध्याये उपपत्ति। (१) यहां पर उपपत्ति योमगरियत से की है। अधिमास आदि का ज्ञान होने से उनको इस प्रकार मान लिया:-- फ घ-फल्पचान्द्रदिन । क श्र-कल्पाविमास । क व-कल्पावमदिन। ग अ-गताधिमास । अधिशेष। ग वगतावम दिन । व अवम शेप । च-गताधिमास+गतावग+धिरोप+यमशेष । यगतचान्द्रदिन । भय अनुपात किया- कच:यथ। : य:ग + . व श्र+व कच:क: : य : गव+ कम •एको इरशोद्गुणको विभिन्नो-,इस रीति के अनुसार, फ च ( क प फ ब ) : : य : ग श्र-मग व+ पहां पर यदि 'ग भ+ग व 'इस लब्धि का घ+च जाय तो यों स्वरूप होगा, + . मान य फल्पना कर लिया शेष रहा । इसलिये, ( क अफ व ) य= Exफ+S+, अब 'कचxक' घटा देने से ( कब+यव ) य-कचxक= +4; और फग+गय; शेष को लागि में जोदने से यों पर हुये। (फ+कच ) य-( कच-१)गन+ग++य,च ।
इस सूत्र से स्थिर कुट्टक प्रश्नाध्यायः २५३ पज्ञान्तरानयन से (क+कब ) य-च:(कच--१)क पूर्वोक्त मक स्थापन से ( १५६३३०००००+२५००२५५०००० ) य-६४८४२६००० १७१ ( १६०२६१६००००००-१) क । अन यहा पर तुट्टा का विषय हुआ । जैसा, कौन राशि कल्पाधिमास और कल्पावम के योग से गुरिणत, इष्ट युति से हीन एकोनचान्द्रदिन से भाजित शुद्ध पहा कुट्टक से जो गुणक सिद्ध होगा वह का मान होगा । उसीके साधन लिए रूपशुद्धि में 'पं विशुद्ध परिकल्प्य-' किया इस प्रकार रूप शुद्धि में 'कृताष्ट धि-' इत्यादि गुणक उत्पन्न होता है। वहां पर 'अभीमित क्षेपनिशुद्धिनिने-' इत्यादि क्रिया करने में 'कृताष्ठाष्टि-'यादि का गुणक सशेप अधिमास अरमयोगादि और भाजक एकोनचान्द्राह होता है। (२) उदाहरण में भड़के अनुसार गणित करके सय वार्ते सिद्ध पी है। उस सी सङ्गति इस प्रकार है - • गाय -- ग++4-६४८४२६०००१७१ और फ च= १६०२६६६०००००० : ६४८४२६०००१७१४८६.३७४४६१६८४, 3:४६२४१६३२३३६ १६०२६६६०००००० लतिर १०३०० शेष। .:. १०३०० ये गतवान्द्रदिन हुए। अन पान साधन के लिये अनुपान, १६१ ग य और 4-२६७४२६०००००० य%९०३०० एच. फत य १०१३६, शेप सारन अर्गण। पर इम से 'अ', के लिये अनुपात किया, क च . कप १० ग और श्र-३८१००००००००० अ-३०० च, ३५४ गोलाध्याये .१८३००-३००-१००,०० गत सौराहर्गण |इस लिये २६ वर्ष, मास और १० दिन कल्पगत हुए ॥१२॥ इदानी महाप्रश्नमाह- चकात्राणि गृहाग्रकाणि च लवाग्राणि ग्रहाणां पृथग्-- यानि स्युः कलिकाप्रकाणि विकलागाणीह धीवृद्धिदे। चन्द्राकरिगुरुज्ञभार्गवचलच्चायासुतानां तथा पूर्व सिद्धमहर्गणागमविधो न्यूनाहशेपं च यत् ॥ १३॥ पत्रिंशत्सहितानि तानि कुदिनैस्तष्टानि दृष्ट्वामका--" एयाचष्टे स्फुटकुट्टके पटुमतिः खेटान् दिनोघं च यः । तं मन्ये गणिताट्वीविश्टनमोदिप्रमत्ताखिल- ज्योतिर्वित्करिकुम्भपीठलुठनप्रोत्कण्ठकराठीरवम् ॥ १४ ॥ प्रभा।
, प्रश्नाध्यायः। ३५५ यल्लुठनमितस्ततः सुखेन स्वाइविक्षेपरतत्र प्रकर्पणोत्कण्ठा यस्य तथा-- भूतं कण्ठौरव सिंह तमहं मन्ये शङ्के इत्यर्थः । भाषाभाष्य। चन्द्रमा, सूर्य, मङ्गल, बृहस्पति, बुध और शुक्र का शांघोच्च और शनि इन प्रत्येक के क्रम से भगणशेष, राशिशेष, अंशरोप, कलाशेष, विकलाशेप और अहर्गण के साधन में जो अवमशेष रहता है इन सर छत्तीस शेपों को कुदिन से तष्टिव करके जो शेष रहै उसको जानकर; जो स्कुटकुट्टक में चतुर गणक, अहर्गण और प्रह बतलाने, उसको मैं गणितरूपी वन के उजाड़ करने से मदांध गणक- रूपी गजोंके कुम्भरूप आसनपर लोटने को उत्तष्टित सिंह समझताहूं॥१३॥१४॥ अथास्य भङ्गः। उद्दिष्टं कह (१५७७६ १७५.००) तष्टमम्बुधिहतं शुध्येनचेत्तत्खिल लब्धरामनखादिलोचनरसन्यङ्कदि(२६३६२७२०३)निनंततः। पञ्चादित्रिनवादिसागरयुगच्छिद्राग्निभिः(३६४४७६३७५) संभ- जेच्छेपं स्याद्गुणको हरेण स युतो यावद्भवेदीप्सितः ॥१५॥ अस्योदाहरणम्। पञ्चत्रिंशदहो सखे दिविपदां चनादिशेपाणि या- न्येषां सावमशेपमैक्यमपि यद्वीवृद्धिदे जायते । तत्तष्टंकुदिनैःखखेपुभरविच्छिद्रेन्द्र(१४६१२२७५००)तुल्यंगुरो- रिन्दो हि कुजस्य वा वद यदाकीदृग्युपिण्डस्तदा ॥ १६ ॥ धीवृद्धिदे तन्ने ग्रहाणां चक्रादिशेपाणि मिलितान्यवमशेफ्यु तानिच १४६१२२७५००। एतानि किलोद्दिष्टानि चतुर्भिविभज्य लब्धं रामनखादिलोचनरसयङ्कदिभिः २६३६२७२०३ संगुण्य पञ्चावित्रिनवाद्रिसागरयुगच्छिदाग्नि ३६४४७६३७५ भिविभ- ज्यशेपमहर्गणोजातः खखाभ्रदिमितः १०००। अयं जातः कुज- दिने । दिगुणे हरे क्षिप्ते जातः सोमवासरे ७८८६६८७५० । त्रिगुणे क्षिसे जातो गुरुदिने ११८३४४८१२५ ।
गोलाध्याय, अत्रोपपत्तिरेको हरश्चेद्गुणको विभिन्नावित्यनेनैव । अत्र - गुणकाविति द्विवचनमुपलक्षणार्थम् । तेन बहुगुणानामैक्यं गुणो भवति । अग्राणामैक्यमग्रम् । तद्यथा । रूपमहर्गणं प्रकल्प्य ग्रहाणां चक्रादिशेपाण्यानोय तेपामेश्यं युगावमयुतं भाज्यः कल्प्यः । कुदिनानि हरः। उदिष्टपट्त्रिंशच्छेपाणां योग ऋणक्षेपः । एप भाज्यहारक्षेपाणां चतुर्भिरपर्वतः कृतः । ततोलाक्वार्थ रूपशुद्धी लब्धं रामनखाद्रीत्यादिस्थिाकुट्टकः कृतः। प्रभा। उद्दिष्टमित्यादि पश्चत्रिंशदहो इत्यादि श्लोकद्वयं स्फुटार्थम् । भापाभाष्य। इए भगण आदि शेपों के योग को कुदिन से तष्टित करने के बाद, यदि चार से भाग देने पर शेप वचै तो वह प्रश्न अशुद्ध होता है, और चार के भाग देने पर शेप न रहै तो फल को २६३६२७२०३ से गुणकर ३६४४७६३७५ का भाग देना, शेप ग्रहण पचगा । यदि अहर्गण से प्रश्नानुसार इष्टवार न मिल तो अहर्गणं को भाजक ( ३६४४७६३७५ ) में जब तक इष्टयार न मिले तय तक जोड़ना चाहिए। प्रश्नः-दे मिन ! धीवृद्धिद के अनुसार गुरुवार, सोमवार और भौगवार को सूर्यादि उक्त प्रहों के भगणादि शेप और अमशेप का योग कुदिन से तष्टित करने पर १४६१२२७५०० शेप रहता है, तर उक्त दिनो में अहर्गण क्या होगा ? | उपपत्ति। (१) 'पाप्राणि गृहाप्रकाणि-' इत्यादि प्रश्न के अनुसार ग्रहों के शेर इस प्रकार होते हैं:- चं, भशे. राशे, अंश. फलाशे, विकलाशे, र, भशे. मं, भशे. गु, भशे. यु, शीभशे. शु, शोभशे. " " " " " . श, भशे.
प्रश्नाध्यायः ३५७ यहा इट अहर्ग से चन्द्र श्रादि उक्त प्रत्येक ग्रहों के अलग अलग भगण प्रादि पाच शेपो को सिद्ध करके उनका योग करने से पैंतीस शेपों का योग होता है । और उसी अहर्गण से उत्पन्न अवम शेप का योग करने से छत्तीस शेषों का योग होता है । इस योग को धीवृद्धिद में पठित्त कुदिना से तष्टिन करके शेषको भानकर अर्गण और प्रहका ज्ञान करना चाहिए। यहा पर रूप अहर्गण कल्पना करके उक्त छत्तीस शेपको अलग थलग सिद्ध करके डाका योग करने पर ११८४०७१८८६००६६८ होता है । इसको धी- पृद्धिद के कुदिन १५७७६१७५०० से तष्टित करने पर शेप २५६४००६६८ रहता है । यह शेष-अ । कुदिन=क । इष्ट अहर्गण य । २५६४००६६८ इस प्रकार, रूप अहर्गण में छत्तीस शेषों के १५७७८१७५०० कु योग को कुदिन से तष्टित करने पर शेष रहता है । फिर अनुपाव किया, १ श्र यह कुदिन से तष्टित करने पर इष्ट शेप कु फे समान होता है । यहा पर 'कु' का भाग देने पर लधिक कल्पना य किया तत्र M xt-x-इष्टशेप-१४६१२२७५००=म । घारका अपवर्तन दने से हुन्मा, X-मन ६४८५०२४२ च-३६४४७६३७५ फ१४६१२२७५००%x य-कु अXय-म -क । अय यहा पर रूप शुद्धि में स्थिर कुट्टक से गुणक कु प्रसिद्ध करने से हुआ २६३६२७२०३ फिर 'अभीप्सितक्षेपविशुद्धिनिने इस विधि २६३६२७२०३४म २६३६२७२०३४म ज्य। यह अव्यक- ३६४४७६३७५ का मान सिद्ध हुआ। पहिले जयपुक-म इस समीकरणं में 'अ' और 'कु' में चार का भपवर्तन लिया गया है इस लिए 'ग' मात्र भी चार से अपवर्त्य है । नहीं तो इस के करने पर प्र वर्गण के अनुसार होता। ६ शेप-गुरुवार को अहगण सिद्ध हुआ । इसप्रकार वासनाभाप्य में लिखित ३५८ गोलाध्याये उदाहरण सिल होजायगा। 'म' का मान 'उद्दिष्ट कहतष्टम् - है। इसप्रकार प्रश्नका भङ्ग उपपन्न हुआ। 'पञ्च त्रिंशदहो ससे इस उदाहरण का 'उद्दिष्टं- इस मन गणित इसप्रकार होता है धीवृद्धिदके अनुसार एक युगमें छत्तीस शेपोंका योग १४६१२२७५.०० ... १४६१२२७५००:४७२८०६८७५ और- ३७२८०६८७५४२६३६२७२०३ २७७४६५४७१ और शेष ३६४४७६२७५ १००००-अहर्गण के है। --१४२८, ४ शेप, अर्थात् १०००० महर्गण, भौगवार के दिन सिद्ध हुआ क्योंकि युग शुक्रवार को प्रारम्भ हुआ है । इसी प्रकार सोमवार को अहर्गण सिद्ध करने में इस १०००० अहर्मण में भाजक को जोड़ना चाहिए, जबतक शेप में ७ का भाग देने पर शेप ३ १००००+३६४४७६३७५४२७८८६६८७५० -११२६.०६८२१,३ शेप-अहर्गण सोमवार के दिन सिद्ध हुश्रा। १००००+३६४४७६३७५४३ ११८३४४८१२५ गणित की सङ्गति होती है ।। १५ । १६ ॥ इदानीं निरग्रचकादपि ग्रहादहर्गणमाह । लिप्साधु दशयुग्भवन्ति विकलास्तासां वियोगस्त्रियुग- भागा भागदलं गृहाणि शशिनः खत्रीन्दवस्तद्युतिः । दृष्टा चन्द्रदिने कदा वद पुनस्तादृक् च काव्याहनि व्यक्तभव्यक्त्रविविक्तयुक्तिगणितंचिद्धन विजानासिचेत्॥१७॥ । - ७ इसी प्रकार, =१६६०६४०१७ ७ प्रश्नाध्यायः। ३५६ प्रमा। शशिनःलिप्ताधमित्यादि सम्बन्धः। काव्याहनि शुक्रवासरे 'शुको दैत्यगुरुःकामः' इत्यमरः व्यक्तं चाव्यक्तं च तयोर्या विविक्ता पवित्रा युक्तिः सैव गणितं चेत् विजानासि । शेष रफुटम् । भापाभाष्य। । चन्द्रमा की कला के अर्ध में दश जोडने से विकला के तुल्य होता है। और T, विकला के अन्तर मे तीन जोड देने से अश होता है । और अश का आधा ग के समान होना है। इन राशि, अश, कला और विकलाओं का योग १३० । है । यह राश्यादि चन्द्र का योग सोमवार को यदि हुआ तो यही योग 'वार के दिन का उत्पन्न होगा ? यदि तुम पाटीगणित और बीनगणित में रहो तो तलाओ ।। १७ ॥ अस्य भगः। राश्यादेर्विकला दृढकुदिनगुणाश्चक्रविकलिकाभक्ताः । शेपत्यागे लब्धं रूपयुतं भगणशेपं स्यात् ॥ १८ ॥ शेपोनहरो विकलाशेपं तस्मिन् कहाधिके ज्ञेयः। स खिलः खेटस्त्वखिले विकलाशेपापिण्डो वा ॥ १६ ॥ दृढभगणा येन गुणाश्चक्रायोना दृढकहैः शुद्धाः। सहगणो दृढकुदिनयुतस्तावद्यावदीप्सितो वारः॥ २०॥ उदाहरणम् । ग्रं शशिनः खखाभ्रगगनप्राणर्तुभूमि१६००००हृतं शुध्धेचेन सिलं फलं कृतगुणाष्टाङ्गाहिनागा८६८३४ हतम्। [[ग्न्याशराहकैः५६३१३ श्वविभजेत्स्याच्छेपमहांगण- तापवत्र हरं क्षिपेदभिमते याववेदासरे ॥ २१ ॥ नेप्साधं दशयगित्यत्र लिप्ताप्रमाणं यावत्तापत् १ प्रकरप्योक्त- कृत्वाचदीजक्रियया ज्ञातः शशी १: । २२ । ५.८ ॥ ३६ ..
३६० गोलाध्याये अस्य भगणानां कुदिनानां चापवर्तः १६५०००० । दृढभगणाः : ३५००२ । दृढकहाः ६५६३१३ जातोऽहर्गणः २५७१५१ । अयं जातः शनिवासरे। दिगुणे क्षेपे क्षिसे जातः सोमवासरे २१६६७७७ । पडणे क्षिप्ते जातः शुक्रवासरे ५६६५०२६ । सप्तगुणे क्षिप्तेऽनेकधा सोमवासरे २१६६७७७१वा ८८६३६६८. वा १५५५८८१५६ इत्यादि । अथवा शुक्रवासरे ५६६५०२६! वा १२६८६२२० वो १६३८३४११ इत्यादि । एवमन्येषां ग्रहाणां स्थिाकुट्टकः कार्यः। अत्र वासना । भगणशेपं चक्रविकलाभिदि गुण्यते कहै. विभज्यते तदा विकलात्मको ग्रहो लभ्यते । शेपं विकलाशेपं स्यात् । अतो विलोमविधिना भगणशेपानयनम् । राश्यादे- विकलाः १२७०७१६ | दृढकदिनै ६५६३१३ गुणिताश्चक विकलाभि १२६६००० भक्ताः । लब्धम् ६३७६५८ शेपम् ३३१०४७ । शेप्त्यागे लब्धं रूपयुतमतः कृतम् । यतोविक- लाशेपं क्षिप्त्वा चक्रविकलाभिर्भाज्याः ।-तदिकलावशेषमज्ञा- तम् । अथ विकलाशेपज्ञानमुच्यते । यदवावशेपं त्यक्तं तेनोना- श्चक्रविकला न पूर्यन्ते तास्तत्र क्षिप्त्वा यदि भागो हियते तदा लब्धिः सरूपा लभ्यते । अतस्तदेव विकलाशेपम् । विकला शेपेण कुदिनेभ्यो न्यूनेन भवितव्यम् । एवं यज्ज्ञातं तत्किञ्चिद- धिकमपि भवति । तदसत् । उहिष्टग्रहस्य खिलवात् । भापामाप्य। राश्यादि चन्द्र का विकलापिण्ड करके दृढ अर्थात् अपरर्तित युदिनों से गुए फर चमकला का भाग देकर जो शेप पचै उसको छोड़कर, लब्धि में एक जोड़ने से भगण शेप होताहै । बोहेहुए शेष को हर अर्थात् भाजक में पटादेने में विकता . . प्रश्नाध्यायः शेष होताहै । यदि यह विकलाशेप दृढकुदिनों से अधिक हो तो प्रश्न अशुद्ध होगा और उसके अनुसार सिद्ध ग्रह सिल होगा। यदि अधिक न होगा तो विकलाशेष से अहर्गण सिद्ध ( कुट्टक से) होगा। अथवा वह अहर्गण होगा जिस से दृढभगणों को गुणकर और चक्रशेप को उसमें घटा कर दृढकुदिनों का भाग देनेपर शेप न बचेगा । दृढकुदिनों को अहर्गण में तबतक जोड़ना चाहिए जबतक इष्टवार न सिद्ध हो। सदाहरण:-चन्द्रमा के भगणशेष में १६५०००० का भाग देने से यदि शेष न रहै तो उदाहरण खिल नहीं होता । उस स्थिति में, चन्द्र के दृढ भगण शेप को ८८६८३४ से गुण कर और ६५६३१३ का भाग देने से शेप अहर्गण सिद्ध होता है । इस में भाजक को इष्टवार सिद्ध होने तक जोड़ना चाहिए । उत्पत्ति । (१) 'लिप्ता दशयुग्भवन्ति विकला:-' इस उदाहरणके अनुसार चन्द्रका राश्यादि अवयव समीकरण से इसप्रकार सिद्ध होता है.- “कलाय, कल्पना किया । तब +१०%विकला । इसका और कला का अन्तर तीन से युक्त य- य+२० +३-अंश । इसका अर्थ -- य+२० +३ -=राशि । इन चारों का योग एकसौ तीसके समान है य- य+२० +३ २ २ + -१३० य+२० य+२० य+ +य- +३+ २ २ य+२० य-१४ य-१४ -य+ + २ ४ ६ य--२-५२०% य%५२२ ५२२ ..य:५८ । ६ गोलाध्याये .इस से उक्त उदाहरण के अनुसार, ५५ला। 34 ५८+२० -३६-विकला। २ ५८-३६+३%२२-अंश । २२ २०११ राशि। रा इस प्रकार राश्यादि चन्द्र ११ । ।३।५८ । ३६ सिद्ध हुआ। (२) 'राश्यादेविकला. 1.-' इसकी सद्गति इस प्रकार है.-उक्त विधि से राश्यादि चन्द्र ११ । २२। ५ । ३६' यह ज्ञान हुआ है इसकी विकला १२७०७१६ । और चन विकला १२६६०००। कलकुदिन=१५७७६१६४५०००० चन्द्रभगण=५७७५३३ इस १६५०००० संख्या से सप्टित करने पर दृढकल्पकुदिन%E५६३१३ दृढ़चन्द्रभगण=३५००२० भर अनुपात किया-- कः कल्पसअह : इप्टभगण, कभ-अह -इष्टभगण+ भशे . अथवा, रुकुकल्पभ अह इप्टभगए. हकभ यह भरी -इष्टमगण+ रककु दक यदि भगण शेप रहै और उस से ग्रह सिद्ध करना हो तो, यहा पर भगण शेष को चक्र पिकला से गुण कर फल्पकुदिन का भाग देनेसे लब्धि विकलात्मक चन्द्रमा सिद्ध होगा । और शेप विकला शेप रहेगा। यदि विकलात्मक चन्द्रमा से भगएशेप जानना हो तो विलोम विषि फरनी चाहिये।
चन्द्रविफ४कल्पा -=भगए शेष । चक्रविक यहां पर कल्पकुदिन दृढ अर्थात् अपवर्तित लेना चाहिए वह ६५६३१३ है। और चन्द्रमा का दृढ कल्पभगण ३५००२ है । इस लिए पूर्व विधि का रूप यों हुआ। 17 fw . १२७०७१६४६५६३१३ १२१५२०५०६६०४७ १२६६०० -६३७६५८ सब्धि १२६६००० और शेप ३३१०४७ हुआ । ... १३७६५८ फल १ जोड़ देने से ६३५६५६ भगण शेप हुआ। यहां पर विशेप यह है कि पिकलाशेप, दृढ कुदिन से सर्वदा अल्पही रहता है। इस लिए यदि केवल विकलात्मक ग्रह को दृढ कुदिन से गुणकर चक्रविकला का भाग दिया जाय तो लब्धि रूपोन भगण शेप होगी । और शेप चक्रविकला से कम रहेगा। और चक्रविकला में विकला शेप को घटा देने पर शेप पूर्व शेप के तुल्य होगा । इस लिए इन दोनों के योग करने पर चक्रविकला के तुल्य होने से नाश हो मानेपर लब्धि रूपोन होगी। इसकारण केवल विकलात्मकग्रह को दृढ फुदिनों से गुणकर पक्रविक्ला का भाग देने पर लन्धि में एक जोड़ने से भगण शेष होगा । इमौलिए कहा है 'शेपत्यागे लब्धं रूपयुतं भगणशेष स्यात् ।' अब विकलात्मकप्रह को दृढकुदिनों से गुणकर चक्रविकला का भाग देने पर शेप और विकलाशेप का योग चक्रविकला के समान होता है इसलिए उस शेप को चक्रपिकला में घटा देने से शेष निकलाशेप ही रहेगा। परन्तु विकताशेप सदा दृढदिन से अल्प रहता है इसलिए यह भी अल्प ही रहेगा । नहीं तो उदाहरण सिल होगा। इसकारण 'शेपोनहरो विकलाशेष-' इत्यादि नियम से; हर--१२६६००० शेष:-३३१०४५ विकलाशेष। ६६४६५३ . -1 ईटभगण -य क ३६४ 'गोलाध्याये परन्तु यह विकलाशेप दृढकुदिन १५६३१३ से अधिक होने से जो राश्यादि ११ । २२ । ५। ३६ चन्द्र सिद्ध हुआ है वह सिल है। (३) चन्द्रमा के भगण शेप से अहर्गण सिद्ध करनेके लिए 'चक्रामं शशिन' इत्यादि उदाहरण कल्पना किया गया है। कल्पना किया, भ-भगणशेप। क-१५७७६१६४५०००, कल्पकुदिन । च-५७७५३३०००००, चन्द्रमगण । अ-अहगण । तब अनुपात किया, क : च :: : इष्टभगण+में ---! अथवा य+ कल्पना कर लेने से। .:. चxअ-क यम : इस समीकरण में 'च' और 'क' को उदाहरणानुसार १६५०००० से भाजित करना है इसलिए 'भ' को भी भाजित करना चाहिए नहीं तो उदाहरण सिल हो जायगा। इसलिए दोनों वरफ १६५०००० का भाग देने से हुआ; ३५००२४-६५६३१३४य-भ, वा चx-फेxय में अय, पंxxx १ अथवा, ३५००२ अ-५६३१३४५=१ :. ८८६८३४; ' कृतगुणाष्टाङ्गाहिनागाः ।' + श्रीरादेयशानी नी ने थाने शोधित शिरामधि के रिणणी में ऊपर लिसे नियमों के अनुसार राश्यादरिकला-'इयादि भयो परिवतित परफे मार लिखा है . 'रारयादेखरमा रदकुदिनगुणाश्चस्सिलियामता । शेशमावे रिक्लारामारोऽत्र रिशय । पलब्ध तद्भगोरित राधेपमा तु । शेागो सन्ध रूपयुत मगधरोप स्यात् ।। शेगाहरो सिताराम तरिम राहाम्याची। ज्ञेय सलिल रस्त्यतिस विकलामहोगा योनि सुरगश्चमतिरशिया शिनितिशप्रयुता । रत्युदिता पारतस्यतचाप सा राहात्यति । कारा पयरोग रिलाच या मतान। वरमारयाणा पेटाइन दिवयुगनेकपा रा ग्या। - प्रश्नाध्यायः॥ - इस लिए ६३७६५६४८८६८३४८३१५४७८८१६०६ हुआ, इसमें १५६३१३ का भाग देने से फल ८६६५५५ मिला और शेप २५७१६१ अह- गंण हुआ ! यही वासनाभाष्य में अहर्गण लिसा है। परन्तु भगणशेप ६३७६५६ में नियमानुसार १६५०००० इसका भाग नहीं लगता इसलिये उदाहरण सिल सिद्ध होता है । लेकिन आचार्य ने उक्त अहर्गण को शुद्ध माना है ॥ १८ । २१ ।। १-यदि उक्त प्रश्न- 'लिप्ताध शिवयुग्भवन्ति विकलास्तासां वियोगोऽब्धियुम्। भागा भागदलं गृहाणि शशिन. कुनीन्दवस्तद्युति ॥' यों कल्पना किया जाय तो उदाहरण शुद्ध होगा। जैसा- य+२२ य+२ य-१४ यक, २+११ 'वि, य- +४%3 २ य-१४ रा, इनका योग एकसौ एकतीस के समान है। य+२२ य-१४ ६ य+२ य+ ४ ६ य+२=५२४, ६ य-५२४-२, ६-५२२, य- - य २ ४ + ४ ५२२ ६ =५८ कला। उत्थापन देने से राश्यादि चन्द्र सिद्ध हुआ ११।२।५८१४०१ इनका योग १३१ है। राश्यादेविकला इस नियम के अनुसार चन्द्रकी विकला दृढकुदिनों से गुणित चनविकलाओं से भक हुई १२७०७०.४६५६३१३ १२१५२०६०५५३६० १२६६००० १२६६००० लब्धि-६३७६५८ शे १०८७३६० इस शेप को हर में घटाने से शेप १२६६००० १२८७.६० ८६४० यहाँ विकला शेप ८६४० ढकुदिन ६५६३१३ से उदाहरण शुद्ध है।
भापाभाष्य। रा इस्वमित्यादिना जाने बज्येष्मूले ६।१६या २२१७२१ गोलाध्याये अथ खिलोदाहरणम्। राशयः ख • लवाः पञ्च ५ कलाः पङ्घर्ग ३६ संमिताः। विकला गोभुवो १६ नेहमव्येन्दुरुदये कचित् ॥ २२ ॥ चं० | ५ | ३६ । १६ । अतो राश्यादर्विकला इत्यादिके कृते शेपं सप्तविंशतिः२७ शेपोनहरो विकलाशेपमिदम् १२६५६७३॥ अस्मिन् दृढकहाधिके ज्ञातः खिलः खेटः । ईदृशश्चन्द्रो मध्यम औदयिको न कदाचिद्भवतीत्यर्थः। सूर्योदय के समय में मध्यम राश्यादि पन्द्र ।। ३६१ कभी नहीं होसकता। 'राश्यादेर्षिकता.-' इत्यादि विधि से गणित फरनेपर शेप २७ होता है इसपो हर में घटादेने से विकला शेप १२६५६७३ सिद्ध होता है। परन्तु यह शेष हठ फुदिन ६५६१३ से अधिक है इसलिए यह उदाहरण खिल है ॥ २२ ॥ एवमनेकधा खिलत्वं कुट्टकविषयमभिधायेदानीं वर्गप्रकृति- विषयमाह। स्याद्यस्मिन्नधिमासशेपककृतिदिग्नी सम्पा कृति- व्यंका शेपातिता च दशभिः स्यान्मूलदा या यदा। काले कल्पगतं तदा वदति यस्तत्पादपद्मं बुधाः सेवन्ते बहुधा प्रमेयवियति भ्रान्ता भ्रमन्तोऽलियत् ॥२३॥ उद्दिष्टं कट्टके तय निरपवननम् । व्यभिचारः पचित्वापि सिलवापत्तिरन्यथा ॥ २४ ॥ स्पष्टार्थम् । अस्य वर्गप्रकृत्यामगः तत्राधिमामशेषप्रमाणं यात्र तावन् । अस्य कृतिदिनी सम्पा जाता । यावर १ ।
प्रश्नाध्यायः। अत्र इस्वं यावत्तावन्मानं तदेवाधिमासशेपम् ६ । वा २२८ । अथ दितीयोदाहरणेऽधिमासशेपप्रमाणं यावत्तावत् १ । अस्य कृतिव्र्येका दंशहता च जाता याव रु । अस्य मूलप्रमाणं कालकः १ । अतः कालकवर्गसमीकरणे शोधने च वृते जातं प्रथमपक्षमूलम् । या ११ परपक्षस्यास्य काय १० रू १ । वर्ग- प्रकृत्यामूले जाते ते एव ६ । १६ वा २२८ १७२१ अत्र कनिष्ठ कालकमानं ज्येष्ठं यावत्तावन्मानं तदेवाधिमासशेपम् । १६ वा ७२१ । अतः कल्पगतानयनं कुट्टकेन । तत्राधिमासा भाज्यः । रविदिनानि हारः। अधिमासशेपं पट्कमितमृणक्षेपः। ननु कथा मयं क्षेपः। अत्र भाज्यभाजकयोर्लक्षत्रयेणापवर्तनं तत्तु नास्य क्षेपस्येति खिलत्वापत्तिः। सत्यम् । अत उक्तंमुद्दिष्टं कुट्टके तज्ज्ञैरि- त्यादि । अतो लक्षत्रयेणापवर्तने कृतेऽधिमासशेपं पदृष्टम् । अत- कुट्टकेन ज्ञातं कल्पगतं चतुभिरूनानि त्रयोविंशतिशतवाणि २२६६ । तथा परमासाः ६ । पतिथयश्च ६ । प्रभा। प्रमेयो वस्तुभूतार्थः स एव वियदाकाशः तस्मिन् भ्रान्ताःसंदिहानाः, अलिबभ्रमन्त इतस्ततोऽटन्तो बहुधा सेवन्ते भजन्ति । तज्ज्ञैःकुट्टकंग- णतकोविदः कचित्तत्प्रसङ्के निरपवर्तनं ज्ञेयमर्थात् भाज्यहारक्षेपाणां मध्ये क्षेपको नापवर्त्यः । परन्तु येन चिन्नी भाज्यहारौ न तेन क्षेपश्चै- दुष्टमुद्दिष्टमेव, इति नियमेन कुत्रचिद् क्षेऽपवर्तनराहित्याद् व्य- भेचारःखिलवापत्तिश्च जायते । अत्राचार्यःक्षेपकोनापवर्तितः किन्तु ढिएकाङ्कीकृतः। परं नैप नियमः सर्वत्र प्रभवतीति ज्ञेयम् । भाषाभाष्य। अधिमासशेष के वर्गको दश से गुणकर फलमें एक जोड़ने से कम वर्ग हो. यगा ? अथवा कव अधिमासशेष के वर्ग में एफ घटाकर दशका भाग देने पर ३६८ । उपपत्ति । गोलाध्याये फल मूलप्रद होगा? यह स्थिति कितने कल्पगत वर्षों में होगी ? इसका उत्तरजो कहता है उसके चरणकमल की, प्रमेयरूपी आकाश में भ्रम में पड़कर नमर की भाति भ्रमण करतेहुए विद्वान्लोग अनेकप्रकार से सेवा करते हैं। कुट्टकविशारदों को कुट्टक गणित के प्रसङ्ग में ( यहापर ) क्षेपक में अपवर्तन नहीं देना चाहिए । परन्तु अपवर्तन न देने से गणित में कहीं व्यभिचार कहीं खिलता की आपत्ति होती है । यहांपर अभिप्राय यह है कि भाज्य हार और क्षेप में केवल भाज्य हार ही में अपवर्तन देना क्षेप में न देना, उसको दृढ भाज्यहार-सम्बन्धि मानलेना चाहिए परन्तु भाज्यहार और क्षेप इन तीनोंको किसी एकही अङ्क से तष्टित करना चाहिए, नहीं तो 'येन दिन्नौ भाज्यहारी न तेन क्षेपश्चैतदुष्टमुद्दिष्टमेव ।' इस नियम से क्षेपक ग्विल होजायगा । पर प्राचार्य ने क्षेपको दृढ मानकर उसमें अपवर्तन नहीं दिया। पर यह नियम सर्वत्र नहीं होता इमीलिए प्राचार्य ने खिलत्वापत्ति लिखीहै । १-इम के पहले कुट्टक विषयक प्रश्न थे, अय वर्गप्रकृति के प्रश्न दिखलाते हैं । अधिमास शेप = अ, फल्पना किया, तो प्रश्नानुसार, १० + १ = ', मान लिया । यह वर्गप्रकृति का विषय है, इस में प्रश्न होता है-किस संख्या के वर्ग को से गुणकर फल में १ जोड़ने से मूल मिलता है ? रुपक्षेप में वर्गप्रकृत्यायद्विरं वेन या भजेत् ।' इत्यादि विधि से कनिछ ज्येष्ठ का साधन फिया । प्रकृति-१० क्षेप-१ इष्ट = य = ३ मानने से, २४१ फनिष्ठ १०-या १०-६ म्येष्ठ = V१०+१=V६ = १६ - ज. अधिमास शेप इम प्रकार मिद कनिष्ठ = Eष्ट = १ = मे भावना द्वारा दुमर कनिष्ठ और ज्येष्ठ २८८ ! ७२.६ए। २-दूमरे मरन में, प्रान के अनुसार- 7 प्रश्नाध्यायः॥ ३६६ . कसौx ज+६; %Dज', अथवा अ-१० ज+१, यह भी पूर्व के स. मान ही है । भेद इतना है कि कनिष्ठ ज्येष्ट का मान और ज्येष्ठ कनिष्ठ का होगा। १६ वा ७२१ पूर्वविधि से अधिमास शेप ६, इस के साधनार्थ अनुपात यह है- कसौ : क अधि · : इसो, वा अ : ज+ सो ६ .:. क अधि - 3 क अधिर-६ कसौ । यहां कुट्टफ का रिपय हुमा । अर्थात् कल्पा- धिंगास को किस गुण से गुणकर, उस में अधिमास शेप को घटाकर, कल्प सौर दिन का भाग देने से नि शेप होता है । यहां जो गुण थायेगा वही इष्टसौर दिन और लब्धि गताधिमास होगे । .:. भाज्य = क अधि, = १५६३३००००० ] यहां भाज्य और सौ = १५५५२००००००००हार में ३००००० क्षेप अधिशे, तीन लासका अप. धर्तन देकर दृढ़ किया है, पर उसका क्षेप में न लगने से उसको अपवर्तित नहीं किया, यही सिलता का निपय है । वीनों एकही से अपवर्तित होने चाहिए । इसप्रकार- दभाज्य = ५३११. दृढ़हार-५१८४०००. इनका पूर्व स्वरूप में उत्थापन देने से हुअा- ५३११ अ-६ अब कुट्टक गणिव से इष्टसौर दिन हात ५१८४००० हुए । वर्ष = २२६६, मास = ६, तिधि ६ । यही सब प्राचार्य के उदाहरण का ' आचार्य फमलाफर ने तत्वविवेक की शेप वासना में इस विपय का विचार मौर मास्कराचार्य के थभिमत कनिष्ठ-उगेष्ट साधन की वासना भी उदाहरण पर दिनलाई है ॥ २३-२४ ॥ हार - . गरिणत है।
३७०' गोलाध्याये इदानी देशविशेपमुद्दिश्य पलांशप्रश्नानाह- पाच्यामुज्जयिनीपुरात्कुपरिधेस्तुर्थेऽशके यत्पुरं तस्मात्पश्चिमतोऽपि तावति ततोऽप्यन्यत्पुरारेर्दिशि । नैर्ऋत्यां यदतोऽपि तेषु नगरेप्पाचक्ष्व मेऽक्षांशकान गोलक्षेत्रविचक्षणक्षणमिदं संचिन्त्यचित्ते मुहुः ॥ २' प्रभा कुपरिधे परिधेस्तुर्याशके चतुर्थाशके नवत्यंशान्तर इत्यर्थः।पुर शिवस्तद्दिश्यैशान्याम् । इदं क्षणं मुहुरसकृञ्चित्ते सञ्चिन्त्य विन तेपूक्तदिग्वर्तिपु नगरेप्वक्षांशकान् पलांशानाचक्ष्व कथयेत्यर्थः । भापाभाष्य। अब देशस्थिति बतलाकर अक्षाशप्रश्न करते हैं:-उजयिनी से पूर्व में : अंशपर कोई नगर है और यहीं से पश्चिम में नव्वे अंशपर कोई नगर है, पूर्व में जो नगर है उससे ईशानकोण में नव्वे अंशपर और पश्चिम में ओन है उससे वायुकोण में नये अंशपर कोई नगर है । हे गोलक्षेत्रचतुर ! कुछ देर म वित्त में इन प्रश्नों को खूब विचारकर, उक्त नगरों में अक्षांश वतलायो । २५ अस्य भङ्गः। दिग्ज्यापलभाक्षुण्णे त्रिज्यार्कहते च वाहुकोटिज्ये । अपमृतियोजनलबजे तदन्तर दक्षिणे भागे ॥ २६ ॥ ऐक्यं सौम्ये भूमेय॑स्तं पादाधिकेऽपसरे । रविगुणमक्षश्रवसाभक्तं तचापमक्षांशाः ॥ २७ ॥ अत्र तहेशवशेन दिशो ज्ञेयान स्वदेशवशेन । अत्र पर प्रोऽपसारयोजनलवा नवतिः ६० । तदोर्ध्या त्रिज्या ३४३६ कोटिज्या पूर्णम् । दिग्ज्यादोर्ययोर्वातः पूर्णम् ० । कोटिज्या लभयोतिश्च पूर्णम् । एते त्रिज्ययाश्च यथाक्रम हते तथा प्रश्नाध्यायः। शून्ये एव० 101 तयोोगे वियोगे वा शून्यमेव । एतदविगुण- मक्षश्रवणहृतं शून्यमेव । अतो यमकोटिपत्तने शून्यं पलांशाः । अथ द्वितीयप्रश्नेऽप्येवं शून्यं पलांशाः । अतो यमकोटेः प्रतीच्या लड्दैव । अथ तृतीयप्रने दिल्या २४३१ । इयमपसारदोयया त्रिज्यामितया गुण्या त्रिज्यया च भाज्या । अत इयमेव २४३१ । लङ्कायां पलभापूर्णम् ० । तद्गुणार्कहृता च कोटिज्यापूर्णम् । तयो- योगस्तादृश एव २४३१ । इयमर्कगुणा लसाक्षकर्ण १२ हृता विकृतैव २४३१ दोया । अस्याश्वापं पलांशाः ४५ । यत्रैते पला. शास्तत्र पलभा १२ । पलकर्णश्च १६ । ५८ | १४ | अथ चतुर्थप्रश्ने सैव दिग्ज्या २४३१ । तथैवोक्तविधौ कृतेवि- कृतैव । किंतु इयमर्कगुणाक्षकर्ण १६ ॥५८ ! १४ हृता! अस्या- श्वापं पलांशाः३०॥ प्रभा। अपमृतिरपसरणमेकस्थानादपरस्थानगमनं तस्या ये योजन लवा- स्तदुत्पन्ने बाहुकोटिज्ये क्रमेण दिगंशानां ज्यया पलभया क्षुण्ण त्रिज्यया द्वादशभिहरो भक्त भूमेर्दक्षिणे भागे नगरस्थितौ लब्धफल- योरन्तरं सौम्ये भागे ऐक्यं च विधेयम् । पादाधिके नवत्यंशाधिकेऽप- सरेतु व्यरतं पूर्वोक्तया विपरीतं विधेयम् । एवमानीतफलं रविगुणमक्ष- श्रवसा पलकर्णेन भक्तं तच्चापमत्ताशाः स्युः। भापाभाष्य। उजयिनी से जिस नगर का अक्षाश निश्चय करना हो वह उस से मिस दिशा मे जितना हटाहो उमअन्तर को अपसार योजन करते हैं। अपमार योजनों का अंश परके उस की भुजया और झोटिग्या सिद्ध करना । फिर दोनों को प्रमसे दिगंशज्या और पलभा से गुण र प्रिया और द्वादश का भाग देना । यदि इष्ट । ३७२ गोलाध्याये नगर दक्षिणदिशा में स्थित हो तो फलों का अन्तर करना और उत्तर में हो तो योग करना चाहिये । यदि अपसारयोजन : नव्ये अंश से अधिक हो तो उक्त फलों का दक्षिणदिशा में योग और उत्तरदिशा में अन्तर करना चाहिये । इस प्रकार अन्तर को सिद्ध करके उसे द्वादश से गुणकर पलकर्णका भाग देने से फल इष्ट नगरमें अक्षांश सिद्ध होते हैं । यहां प्राचार्य ने वासनाभाप में पारों प्रश्नों का उदाहरण दिखलाया है उसके अनुसार गणित इस प्रकार है:- कल्पना किया, द-दिगंश । दो नगरों का अंशात्मक अन्तर । प=इष्ट नगर की पलभा। क-अक्षकर्ण । -किसी दूसरे नगर का अक्षांश । भय 'दिग्यापलभातुएणे-' इत्यादि विधि से- कोज्याxप ज्या यं-( ) ४-१२ । त्रि +- १२ थन प्रथम प्रश्न में द=6, अ=E5, प=५ अंगुल, उज्जयिनी में । और फ-VR+५=१३ । ०४५ १२ ३४३८ -(0+०)x १२.. १३ .:. 30-अक्षांश यमकोटि में सिद्ध हुश्रा। (२) दूसरे प्रश्न में, द-i, Ge,-प-० अंगुल यमकोटि में । इम- लिये फ%१२ ::.ज्या-( ३४३८४० ३४३८ =(o+.) ४१३०, अक्षांश लहर में सिद्ध हुना। ज्यायxज्याद क ..ज्या श्र=(३४३८४० + )x 0x0 - x°)x M . १२ १ Va प्रश्नाध्यायः (३) तीसरे प्रश्न में,द%४५, अ%D8,4० लङ्का में इसलिये क-१२: ..ज्या ३४३८४२४३१ +- ३४४८ १२ =(२४३१+.)४१-२४३१: यही दिग्ज्या है। इसका चाप करना। .:. : अक्षांश हुये। (४) चौथे प्रश्न में, द-४५, अE6, प=१२ अंगुल, इसलिये =१२/२: ... ज्या = ( ३४३८४ ३४३८/२०४१२)x- ३४३८ १२/२ = (३४३८/२ ० )x -३४३८, .: = ३० अक्षांश सिद्धहुभा ॥ २६-२७ ।। अथान्यदुदाहरणम् । नितिपरिधिपडशे प्राचि धारानगर्या- स्त्रिनयनदिशि यदा पत्तने चाग्निभागे। कथय गणक तत्र क्षिप्रमक्षांशकान् मे क्षितिपरिधितृतीयेऽथांशके तत्र तत्र ॥ २८ ॥ धारायामक्षप्रगा' ५ | पलकर्णः १३ । अनापसारयोजनलवाः पष्टिः ६० तहोळ २६७७ । कोटिज्या १७१६ । दिज्यायाः पाच्यायामभावः। तस्माद्यजज्या पूर्णमेव । अत कोटिज्या पल- भागुणा अक्षकर्णा १३ ता! फलस्य चापमक्षांशाः। एवं प्राच्या गतस्याक्षांशा.१११५१० ईशानदिशंगतस्य दिग्ज्या २४३१ । दोा दिग्ज्यागुणा त्रिज्याभक्ता कार्या । कोटिज्यातु पलमा ५ गुणा दादशभक्ता कार्या । तयोयोगो द्वादशगुणः पलकर्ण १३ हृतः फलस्य चापमक्षांशाः ४६ | १८ |२४| ईशान्यांगतस्य । - ३७४ गोलाध्याये: एवमाग्नेय्यांच २११५४१३४ अथ व्यंशेऽपंसारे लंवाः १२०/- एप दोा कोटिज्ये एते एव २६७७ | १७१६ । यथोक्तकरणेन जाताः प्राच्यां पलांशाः १११५ / ०। ऐशान्याम् २११५४ । ३४ | आग्नेय्याम् ४६ | १८ |२४| अनोपपत्तिः । गोले खस्वस्तिंकादिच्छादिचिह्नोपरि दृष्ट- मण्डलं निवेश्यम् । तत्र खस्वस्तिकं स्वस्थानं कल्प्यम् । ततो- ऽपसारलवाने दृङ्मण्डले पुरचिह्न कार्यम् । धुवात्पुरचिह्नोपरि नीयमानं वृत्ताकार सूत्रं यत्र विपुवन्मण्डले लगति तत्पुरचिह्नयो- रन्तरं तस्मिन् पुरे पलांशाः । अथ तज्ज्ञानार्थमुपायः। अपसारयो- जनलवानां दो कोटिज्ये कृते दिग्लवानां च दिग्ज्या। तंतोऽनु पातः । यदि त्रिज्यामितया दोय॑या दिग्ज्याभुजो लभ्यते तदापसारलवज्यया किमिति। फलं पुरसममण्डलयोरन्तरं याम्योत्तरं ज्यारूपम् । स भुजः । पुरविपुववृत्तयोर्यावदन्तरं तावतैवान्तरेण सर्वत्र विपुववृत्तादुत्तरतोऽन्यत् स्वाहोरात्रवृत्तं निवेशनीयम् । तस्य क्षितिजेन सह यत्र संपातस्तत्माच्यपरयोरन्तरमना ! यत्रोन्म- एडले लग्नं तत्याच्यपरयोरन्तरं पलांशाः क्रान्तिरूपाः । अथ तज्ज्ञानार्थमपसारलवानां कोटिज्या । स पुरचिङ्गाल्लम्बःशङ्कः स पलभया गुण्यो दादशभक्तो जातं शङ्क्तलम् । उत्तरगोल उत्तरभुजस्य शङ्कुतलस्य च योगेऽग्राभवति । तदन्यथान्तरे कृते सत्यग्रा । अतो वेपरीत्येन क्रान्तिः। तदर्थमनुपातः । यदि पलकणे द्वादशकोटिर्लभ्यते तदारयाकिमिति । फलंकान्तिज्यारूपाक्षज्या अतस्तचापमक्षांशाइत्युपपन्नम् । भूमेः पादाधिकेऽपसरेऽतो व्यस्त यतो विपुववृत्तमधः सममण्डलादुत्तरतः।
प्रश्नाध्यायः। . १२ + भापाभाष्य। धारा नगरी से पूर्वदिशामें भूपरिधि के छठे भागपर कोई नगर है, ईशान कोण और अग्नि कोण में भी छठे भाग पर नगर है । अथवा ये तीनों नगर उक्त दिशाओं में भूपरिधि के तीसरे भाग में स्थित हैं । हे गणक ! इन नगरों में अनाश बतलाओ। (१) पहले लिरोहुए प्रश्नों के समान इन प्रश्नों के भी उत्तर दिग्ज्या पलभा शुरणे-, इत्यादि विधि से होते हैं । यहाभी कल्पना किया, द=6, 4-६०, प=५ धारा की इसलिये क= १३ श्रय दिग्ज्या पलीक्षणे-, से यह स्वरूपहुआ, ज्या श्र+ज्याद , को ज्या अxप. १२ ज्या ( +. -)x त्रि फिर उदाहरणनुमार गणित करने से हुया- २६७७x. १७१६४५. ज्या ( -X. ३४३८ १७१६४५ १२ ८५६५ =६६२ १३ श्र ११ ।१५।१' अक्षाश धारानगरी से पूर्व नगर में हुआ (२) दूसरे प्रश्न में द= ४५, अ६०, प= ५, क = १३. .:. ज्या २६७७४२४३१ १७१६४५ x ३४३८ १२ १६३६६१०६ १६१३ = २६०४ .:. S = ४६ । १८२४ अक्षाश, धारा नगरी से ईशान कोण में ४५ अपमार योजन पर सिद्ध हुआ। (३) प्रश्न में, द = ४५, अ६०, ५ = ५ क = १३. .:.ज्या - २६७७४२४३१ -)x ३४३८ ६५४६२३६ ६ % 3D ७४४६ ७४४६ S १७१६X५ १२ - =१२८१ ७४४६ ७४४६ :: =२१ ॥ ५४' । ३४ । अक्षाश, धारानगरी मे ईशान दिशा में बतान नगर में सिद्ध हुआ।
- तक मान्तिरूप अक्षांश होता है ।इम अक्षांश के ज्ञान के लिए अपसार योजनों की कोटि करने से पुरचिह से लम्बरूप शंकु हुना। हममे शरतल गोलाध्याये (४) चौथे प्रभ में, उक्त तीनों स्थानों को अपनी अपनी दिशा में भूपरिधि, के तीसरे भागपर १२० अपसार योजनों पर माना है। यहां, ज्या-ज्या१२० ज्या६० २६७७ । को ज्यानको ज्या १२०-ज्या ३०-१७१६ । को ज्याद=0, प=५ और क-१३. २६७७+० १७१६+५. १२ .:.ज्या- ')+ ३४३८ १२ .:.१२ । १५'10" यह अक्षांश सिद्ध हुआ । १२० इतने अपसार योजन पर ईशान और अग्निकोणस्थित नगरों में पूर्व सुल्यही अक्षांश सिद्ध होंगे । इसलिये पूर्व दिशा में ११ । ५।। ऐशानी में २३ । ५४' । ३४' आग्नयो में ४६।१८।२४" ये अक्षांश सिद्ध होते हैं। (२) 'दिग्ग्यापलभातुएणे-' इस विधि की उपपत्ति इसप्रकार है। नीचे लिसे क्षेत्र में 'स' समध्य, गग्रह क्षितिज रेखा, '' ध्रुव., 'प' पुरचिह, 'सपन' पुरगत दृगएडल, 'सप' अपसार योजन 'अच' दिग्ज्या, 'पक' पुरक अक्षांश 'प' विन्दु की क्रान्ति । इस पुर के अक्षांश को सिद्ध करने के लिए अनुपात किया त्रिज्या : अच :: सप: भुज; पुर और सममण्डल के बीच ..भुम पुर और विपुववृत्त का जितना अन्तर है उतने ही अन्तर पर विषुववृत्त उत्तर दूमरा अहोरात्रवृत्त की कल्पना परना, यह वृत्त जहां दितिज में सपात कर वहां से प्राच्य पर पिन्दुतक अना और उमण्डल सम्पात से उष्ट बिन्दु फे निये अनुरात किया। १० पल :: शं, या, फोनपापप : शंयुगल । में हुआ। अचरसप त्रि में प्रश्नाध्यायः ३७७ पलxकोचाखप .' शंकुतल- उत्तरगोल में, उत्तर भुज और शत्रुतल के चोग से अग्रा होती है अन्यथा अन्तर से होती है। ज्याप्रचxज्याग्यप पलxकोमाग्न ..श्रमाया + नि इससे क्रान्ति के लिये अनुपात किया | पक:१२ • अमाज्या मांज्या-पक । १२(माअच ज्याग्वप+ पलxको ज्यासप १२४यग्राया त्रि १२ पक इसप्रकार 'दिज्यापलभाचरणे निम्याहते च बाहुमोटिज्ये ।' इत्यादि विधि ज्यापन पक उपपन्न हुई। यदि अपसारयोजना से अधिक होगे तो पुर चिह क्षितिजके नीचे हेगा; वर भुजको दिशा में विपर्यय होगा। इसलिए धन कण के चिह बदल, जायगे ॥१८॥ क्षेन.
३७८ गोलाध्याये अथोक्तानपि प्रश्नानेकीकर्तुमाह । मित्र मित्रस्त्रिनेत्रस्य दिश्युगमं याति यत्र त्रिनेत्रमध्यस्थितः। तत्र मे तान्त्रिकाक्षुब्धमक्षप्रभा क्षिप्रमाचक्ष्व दक्षोऽसि गोले यदि ॥ २६ ॥ प्रमा। हे मित्र तान्त्रिक, मित्रः सूर्यत्रिनेत्रस्य शिवरय दिश्यैशान्यां त्रिने. वर्तमाद्री तन्मव्यस्थितो यत्र देशे उदयं याति तत्र मे अक्षुब्धमक्केश यथास्यात्तथा अक्षमा पलमा क्षिप्रं सत्वरमांचन क्थय। शेप स्फुटम् । भाषाभाप्य। हे मित्र, गोलविशारद ! जिस देश में सूर्य आर्द्रा नक्षत्र के मध्य में ईशान दिशा में उदय हो, उस देश मे पलभा क्या होगी ? यदि तुम गोलगणित में चतुर हो तो विना खेदो शीघ्र उत्तर पहो । उपपत्ति। इस प्रश्न में प्रा नक्षत्र के मध्य में सूर्य को माना है इससे प्रान्ति का शान हुआ। और ऐशानी दिशा से दिग्ज्या ज्ञात हुई । यहा दिग्ज्याही सूर्यकी अप्रा है । इसलिए सूर्य की अमा-ज्या ४५-२४३१ । आनिक्षत्र के मध्य भुजारा ७३ । २०' कीया=३२८ २१६ । ४०" और सूर्यको परमग्रान्तिज्या=१३८५ अप अनुपात किया, त्रि: ज्या २४ : ज्या ७३ | २० इष्टतान्तिग्या । - और, नि ल ज्या, अम्राज्या:प्राज्या .:. अप्राज्या : ज्या २४ लज्या ज्या ७३1२.' ज्या २४x ज्या ७३।२० ११६७४३२६२/६४." .. लज्या%D. श्रमाया २४३१ =१८६१ । ५०1४८ -ज्या ३।२३ । ३७ प्रश्नाध्यायः ३७६ अबकि अक्षांश ५६ । ३६ । २३” हों तब अक्षाशज्या=२८५०' । १३" इस लिए अनुपात किया, लंज्या अक्षज्या पलभा । द्वा अथना * १८८११५१° २८७० । १३० १२ ... पलमा १२४(२८७०१ १३) अगुल सिद्धहुई ॥२६॥ १८६१ । ५१ एकदित्रिचतुःपञ्चपइभिर्यत्रोदितोरविः । मासैरस्तमयं याति तत्राक्षांशान पृयम्वद ॥ ३० ॥ प्रभा। यत्र देशे रविरेकहित्यादि मासैरुदितः सन् पश्चादरतमयं याति तत्र पृथगक्षांशान् वदेत्यर्थः। भाषाभाप्य। - -वहा दो जिन देशो में सूर्य एक, दो, तीन, चार, पाच और छ मास तक उदित रह कर अस्त होता है, यहा कितने अक्षाश होंगे ? उपपत्ति । जहा पर मिथुनार्ध के आगे वर्तमान सूर्यकी उत्तर क्रान्ति लन्याश से अधिक होगी वहा एक मास सूर्य उदित रहैगा अर्थात् एक मास का दिन होगा। और मिथुनादि के श्रागे स्थित सूर्यगी प्रान्ति जहा लम्बाश से अधिक होगी- मास का दिन होगा । और वृपा के आगे सूर्यको क्रान्ति जहा लम्माश से अधिक हो वहा तीन मास का दिन होगा । यो वृपादि की क्रान्ति लम्बाधिक मे चार मास का दिम । इसीप्रकार जहा मेपार्ध के आगे वर्तमान सूर्यकी क्रान्ति लम्बाश से अधिक होगी यहा पाच मास का दिन और मेपादि को क्रान्ति लम्बाश से अधिक मे छ मास का दिन होगा। इसप्रकार मिथुनार्ध क्रान्ति के समान लम्माशों को नव्वे में घटा देने से जो शेष यचै उतने अक्षाश जिस देश मे होग वहा एक महीने का दिन होगा। इस नियम के अनुसार, ३८० गोलाध्याये अक्षाश ६७%१ मास का दिन " ७३-३ ४८%8 " ८४%D५ 80%६ पह विषय पहले त्रिप्रश्नवासना में भी नाचुका है ॥ ३० ॥ शुज्यकापमगुणार्कदोर्यका- संयुति खरखरखवापसंमिताम्। वीक्ष्य भास्करमवेहि मध्यम मध्यमाहरणमस्ति चेच्छुतम् ॥ ३१ ॥ युज्यापक्रमभानुदोर्गुणयुतिस्ति युद्धृताप्त्याहता स्यादाद्यो युतिवर्गतो यमगुणात्सप्तामरा ३३७ प्रोनिता। नागादयङ्गदिगदका ६१०६७८ पदमतस्तेनाद्य ऊनोभवे- ध्यासाऽष्टगुणाधिपावकमितेकान्तिज्यकातो रविः॥३२॥ भापाभाप्य। प्रश्न:- यदि तुम मध्यसाहरण गणित विधि को जानते हो तो धुज्या मातिज्या और सूर्य की भुजज्या का योग ५००० इतना जानपर, मध्यम सूर्य पतलायो। पुज्या, मान्विज्या और सूर्यको भुजश्या ये योग को चार से गुणपर फनमें पदरह का भाग देने से लब्धि की प्राध सज्ञा है । फिर योग के वर्ग को दो से गुणाकर फल में ३३७ चा भाग देकर लघि यो ६७८ में घटा फर शेष का मूल पूर्व सिद्ध प्राध में घटा देना, शेप ३४३८ व्यामा म मात होगी। इससे सूर्य का ज्ञात करना चाहिए । क्रान्तिज्याममगडतदृतिमहीजीवाग्रकाणां युति- दृष्ट्वा खापरपञ्चसेचरमिता पञ्चाजुलाचप्रभे।
प्रश्नाध्यायः॥ देशे तत्र पृथक् पृथगणक ता गोलेसि दक्षोऽक्षज- क्षेत्रक्षोदविधौविचक्षण समाचवाविलक्षोऽसि चेत्॥३३॥ क्रान्तिंज्या विपुवत्लभारविहतेस्तुल्या प्रकल्प्यापराः कृत्वापासमशङ्खतमृतिमहीजीवा अभीष्टास्ततः । द्याद्यास्तद्युतिभाजिताः पृथगथ प्रोद्दिष्टयुत्या हता उद्दिष्टा खलु तद्युतिः पृथगिमा व्यक्ता भवन्ति कमात्॥३४॥ प्रभा। महीजीवा कुज्या । अक्षजक्षेत्राणां यः क्षोदः प्रत्यवयवविचार यो विधिस्तस्मिन् । अविलदो विस्मयावेशरहित इतियावत् । भापाभाष्य। प्रश्न - हे विचक्षण ! यदि तुम अक्ष क्षेत्रों के विचार में निपुण हो तो जिस देश पांच अगुल पलभा है वहां क्रान्तिज्या, समशङ्क, वद्धृति, कुज्या और अमा का ग ६५०० जानकर इन अवयवों को अलग अलग बतलाओ । उत्तर.- पलभा और द्वादश के गुणनफल को क्रान्तिज्या मानकर अनुपात से अमा, समराकु, तद्धृति और कुज्या सिद्ध करके इनका योग करना । फिर अलग इनको ज्ञात योगसंख्या से गुणकर इस योगका भाग देने से सब अलग अलग स्फुट होजाते हैं। उपपत्ति। पलमा-५ कान्तिच्या ५४१२%६० अनुपात किया, पलभा अक्षक : : माज्या : समशङ्कु . अगल । . अथवा, १३४६० १५६ ६० : समशः- ५ १३ , फिर अनुपात किया, ..
३८२ गोलाध्याये- - १५६४१३१६६ द्वा : अक्षक : : समश : तद्धृति=- १२ ६.४५ पलभा : काज्या: कुज्या-- .. , और, ६०४१३१ द्वा अक्षक :: क्रांज्या : अप्राज्या इसलिए अनुपात किया- इन सर फलों के योग में यदि क्रान्तिया श्रादि मिलती है तो उदिष्ट योग में क्या ? अथवा, :: ६५०० : १२०० कान्तिज्या, इसी प्रकार, ४७५ : १५६ : ६५०० : ३१२०-समश. : १६६ :: ६५०० : ३३८०तवृति : २५ ::६५०० : ५००=कुज्या. : ६५ :: ६५०० : १३००=अप्रग्या. इस प्रकार सय अवयव अलग अलग सिद्ध होते हैं 11 ३३-१४ ॥ अनापमज्याक्षितिशिञ्जिनीनां योगं सहस्रदितयं विदित्वा। पृथक् पृथक्ता गणक प्रचा रूढा सगोले गणिते मतिश्चेत् ॥ ३५ ॥ प्रमा। तितिशिजिनी कुज्या।' मौर्वी ज्या शिजिनी गुणः।' इत्यमरः रूढा प्रसिहा। शेष स्फुटम् । ४७५ भापामाच्या है गणक ! यदि तुम्हारी बुद्धि गोल और गणित में सूर्य प्रसिद्ध हुई होगी कमान मालिया, कन्या का योग ने हजार मानकर प्रत्यायो अलग अलग हो ।
सिद्ध हुआ। २००० . . हे सुगणक ! गरिणतस्कन्ध के देहरूप से प्रसिद्ध सिद्धान्त गोलसहित रहो, प्रश्नाध्यायः ३८३ उपपत्ति। यहां भी पलभा५ इसलिए पूर्व विधि के अनुसार, क्रान्तिज्या ६० अप्राज्या-६५ कुज्या=२५ योग-१५० अब यहा पर उद्दिष्ट योग २००० है, इसलिए पूर्वविधि के अनुसार ८०० =कान्तिज्या, : २००० : ८६६१-अप्राज्या, २००० ३३३१-कुज्या. इस प्रकार सब अवयव अलग अलग सिद्ध हुए ॥ ३५ ॥ पास्तां तावत् सगोलः सुगणक गणितस्कन्धवन्धप्रसिद्धः सिद्धान्तो लग्नसिध्यै किमिति बत कृतस्तत्र तात्कालिकोऽर्कः। नाडीपष्टया धुरात्रं दशपलयुतया भानवीयं किलायो लग्नं तात्कालिकार्कात् प्रवद किमधिकं ताराने पलोने॥३६॥ प्रभा। हे सुगणक! गणितरकन्धस्य यो बन्धः शरीरं तेन प्रसिद्धः सिद्धान्तः सगोलस्तावदास्ताम् । अयमाशयः लग्नं तात्कालिकात्सिाध्यते नन्नाक्षत्रघटीभिरेव कर्तव्यमुदयानां नाक्षत्रत्वात् । सूर्यसावनमध्ये नाक्षत्रघटीषष्टिदशपलयुक्ता भवति । पेवल साधितं लग्नं त लालि. कादिधिकम् । भाषाभाष्य। . . . । ८ यह कहो कि लग्नसाधन में सूर्य को सात्कालिक क्यों किया गया है। नाक्षत्र साठ घड़ी मे दश पल जोड़कर सौर दिन के वश मे राग्न सिद्ध करने 1 th भापाभाष्य। ३८४ गोलाध्याये से तात्कालिक सूर्य से अधिक और दश पल होन करके लग्न सिद्ध तात्कालिक सूर्य के समान क्यों होता है । उपपत्ति । इस प्रश्न के उत्तर के लिए विपश्न वासना के 'लग्नार्थ मिष्टघटिका य सावना स्यु:-, इमका विषय समझना चाहिये ।। ३६ ।। नाक्षत्रा उत सावनास्तनुकृतौ नाच्योऽय चेत् सावना नाक्षत्रा उदया कथं विसदृशास्ताभ्यो विशोध्या वद । नाक्षत्रा यदि तारात्रसदृशे काले गतेकाधिक किं लग्नं न समंततोदिनकरस्तात्कालिक किंकृतः॥३७॥ लग्नके साधन में जो घडी है वे सायन है अथवा नाक्षत्र हैं ? यदि सावन हैं तो उनमें राशियों के नाक्षत्र-उदय विजातीय कैसे घटाए गये हैं ? और यदि नाक्षन है तो सावन अहोरात्र तुल्यकाल में लग्न तात्कालिक सूर्य से समान न होकर अधिक क्यों होता है ? तर लग्नसावन मे तात्कालिक सूर्य करने का क्या प्रयोजन है ? उपपत्ति। यह प्रश्न भी ' लग्नार्थमिप्टघटिका -, इत्यादि विषय के मालोचन से स्पष्ट होजाता है ।। ३७ ॥ पश्चाङ्गुला गणक यत्र पलप्रभास्यात् तत्रेष्टमा नवमिता दशनाडिकामु । दृष्टा यदा यद तदा तरणिं तवास्ति यद्यस्ति कौशलमलं गणिते सगोले ॥२८॥ ? भाषाभाष्य। है गणक ! जिस देश में पलभा पाच अमल है यहाँ शपदी दिर यात होने पर इष्टच्छाया नव श्रद्गुल को उपलब्ध हुई नो मर्य या भुज्ञाश क्या होगा । यदि तुमारा गोत और गणित में पूरा कौशल है. ता यहो।
मरनाथाया।
३८५
उपपत्ति !
इस प्रश्न का उत्तर गणिताध्याय के त्रिप्रश्नाधिकार में
दृष्टान्त्यकामुनवकाल
भौर्वीम् , इत्यादि विधिसे लिसा है । यहा पर उसीके अनुसार उत्तर निसाजाता है -
नीचे लिसे क्षेत्र में 'याद' स्थानीयमध्याह्नवृत्त है, 'कमर' क्षितिज है,
'अ', खमध्य है, प और 4 उत्तर-दक्षिण ध्रुव है । 'श्रमद' समवृत्त, फमग'
विषुववृत्त, पम उन्मण्डल, 'हचल' अहोरात्रवृत्त, 'स' सूर्य और चर, सम, हन
चिविन रेखापर लम्ब है।
प
३८६ गोलाध्याये और 'ह' विन्दु पर होने से हृति होगी और जब 'स' विन्छु 'च' विन्दु मे होगा उस समय कुन्या होगी । इष्टति को त्रिज्यादृत्त में परिणत करने से इष्टान्त्या होती है । परन्तु जर 'स' विन्दु ह' विन्दु के समान होता है उस समय केवल अन्त्या ही होती है। इस प्रकार अपर तिये हुए अवयवों से नीचे लिखा स्वरूप सिद्ध होता है- (१) इष्टति = कला + फुल्या, (२) इष्टान्त्या = सून + चरज्या, (३) हति = शुज्या कुज्या, (४) अन्त्या = त्रिज्या + चरज्या, यहा पर धन और ऋण की व्यवस्था गोतक्रम से जानना चाहिए । अब ५५ समय में इ-हति आदि साधन करने का प्रकार यों है-- दिनार्ध में नतराल को घटा देने से शेप उनकाल वचता के क्रमसे चर या जोडने ओर घटा दो से सूत्र होता है। इसको गुज्या से गुण कर त्रिज्या का भाग दने से फल क्ता होती है । फिर ऊपर लिखे नियम स इन्हति आदि स्पष्ट हैं। श्रन प्रश्न का उत्तर सिद्ध करते हैं- द्वादशाङ्गुलशङ्ख की छाया के वर्ग यो द्वादशवर्ग १४४ में जोडयर मूल लेगा फल घायापर्ण होगा । इम से महाराङ्क के लिए अनुपात किया-- त्रि महाशकुः अथवा सूर्य की उनाया । फिर 'प्रनुपात पिया, महाश इष्टइति, 3- इष्टान्या. नि इटहरनि है । इस में गोल । - छाक १२ यतक और, दु इट इप्टाच्या S अक्षक x मशxनि १९Xणत्या इस रूप म 'इष्ट ह' फा पूर्वस्वरूप लेने स हुथा, धुज्या । इस लिए इशान्यरामनतपाल मोम्-'इयादि उपपन हुआ। अय इस गुज्या से प्रान्तिज्या, बरज्या सिद्ध करपे पिर इाल्या का साधन प्रश्नाध्यायः। करना क्योंकि उन्नतकाल को कल्पित-इष्टान्त्या मान लियागया है । इस लिए असकर्म से इष्टान्त्या साधन करने से ठीक होगी। इसकी युक्ति गणिताध्याय में इस प्रश्न के उत्तर में स्पष्ट लिसी है। यों जब वास्तव इष्टान्त्या का ज्ञान हो जायगा तर ऊपर तिसी विधि से फिर धुज्या और उस से क्रान्तिया चर आदि सिद्ध करके सूर्यका ज्ञान सुगमता से होजायगा ॥ ३८ ॥ दिनकरे करिवैरिदलस्थिते नरसमा नरभापरदिङ्मुखी। भवति यत्र पटो पुटभेदने कथय तान्त्रिक तत्र पलप्रभाम् ॥ ३६॥ प्रभा। वैरमस्यारतीति वैरी । करिणो वैरी सिंहः, तस्य यद्दलमर्धं तत्र स्थिते । सिंहराश्यर्धस्थिते दिनकर इत्यर्थः । नरभा द्वादशाङ्गलशङ्ख- च्छाया नरसमा शङ्कसमानदी । पुटभेदन नगरं 'पत्तनं पुटभेद- नम् ।' इत्यमरः । शेष व्यक्तमेव । भापाभाष्य। हे गोलविशारद ! जिस देश में सिंहराशि के अर्ध में वर्तमान सूर्य को द्वाद- शाङ्गुल शङ्ख की पश्चिमाभिमुस छाया शङ्कु के समान लम्बी होती है वहा परभा क्या होगी। उपपत्ति। इस प्रश्न का उत्तर गणिताध्याय के निप्रश्नाधिकार में त्रिज्याघात पुति- हन्नर स्यात् ।, इत्यादि विधि से लिया है। यहा पहले छाया शात होने से छायाण का भी शान हुना। अब शकुके लिये - थनुपात किया छाक १२ नि: गहाश, समा मर्य योसिंहराश के प्रर्ध में ४११५ इस प्रश्न का उत्तर गणिताध्याय फ्रे त्रिमरनाधिकार में 'याम्यादभितकाल - किमी उज्जयिनीनिवासी ने सूर्योदय से पांच घड़ी दिन पीठे अथवा मध्याह के ३८ गोलाध्याये मानाहै, इसलिये उससमय की क्रान्तिज्या ६८७१४८. और ४५-२४३१' समशङ्कया है। ::.( २४३१ ):-(E८७१४८ )=( तद्धृति-कुज्या ) अथवा, ५६०९७६१-६७५७४६-४६३४०१२, ..तद्धृति-कुज्या=V४६३४०१२-२२२११५० क्योंकि तबृति-कुज्या-कोटि, क्रान्तिज्या भुज और समशङ्क=कर्ण है। इससे पलभा के लिये अनुपात किया । कुज्योनतद्धृति : क्रांज्या : : १२ : पलमा अथवा, २२२१॥२५ : १८७१४८ : : १२ : पलभा=५ इतनी सिद्धहुई ।। ३६॥ मार्तण्डः सममण्डलं किल यदा दृष्टः प्रविष्टः सखे काले पञ्चवटीमिते दिनगते यदा नते तावति । केनाप्युजयिनीगतेन तरणेः क्रान्ति तदा वेत्सि चे- न्मन्ये त्वां निशितं सगर्वगणकोन्मत्तेभकुम्भाङ्कुशम्॥४०॥ प्रभा। मार्तण्डः सूर्यः। निशितं शाणोद्धृतं सगर्वा ये गणकारत एव मत्तेभा- रतेषां ये कुम्भाः गण्डस्थलानि तेषु अङ्कुशं त्वां मन्य इत्यर्थः । भापाभाप्य। .. " सस बाद पांच पदी दिन गये सूर्य को सममण्डल में प्रवेश करता हुआ देपा; समय यदि तुम सूर्य की क्रान्ति जान सको तो हम तुमको अभिमानी गणरूपी हाधियों के कुम्भों पर नुकीला अङ्कुश मानें। उपपत्ति।
प्रश्नाध्यायः। जीवा इत्यादि विधि से लिसा है। उसी के अनुसार यहां पर उत्तर दिखलाया जाता है:- (१) पहले उन्नतकालज्या को तद्धृति कल्पना करके उससे शङ्क साधन के लिए अनुपात किया- व पकद्वा तद्भः समशङ्क- १२४ तदृति -अन; इससे 'अय' अर्यात् कान्तिज्या के लिए अनुपात- पलभाXअन पक: पलभा :: अन : अब कान्तिग्या । पक इस कान्तिज्या से चर आदि सिद्ध करके इप्टहति सिद्ध करना चाहिये। क्योंकि पहले उन्नतकाल-या को तद्धृति कल्पना करके क्रान्तिज्या सिद्ध की गई है इसलिये वह स्थूल है। ऊपर के क्षेत्र में चर-अद और उन्नवग्या-अफ के है । अय 'भयोमतादून- पुताचरेण- इस विधि से, क्द-अद-कम-सूत्र, यह प्रिग्यावृत्तीय है इससे शुज्यावृत्तीय कला लिए अनुपात किया- ३६० गोलाध्याये नि : कन्न : धु · नव-कला इसी प्रकार 'न ह' का भी अनुपात से साधन करना । तब,नय+बह-नह= तद्धृति का दूसरा मान हुा । यो असकृत्कर्म सेतद्धृति का साधन करके क्रान्निज्या सिद्ध करना । फिर अन्त में अनुपात करना कि कल्पित हति में यह प्रान्तिज्या मिलती है तो साधित हृति मे क्या ? अथवा . ૨ ૨ २ हन • अन हन अर्व : यो यथार्थ क्रान्तिज्या सिद्ध होगी। (२) दूसरे प्रश्नमें पाच घडी नतकालमें सूर्य का सममण्डल प्रवेश कल्पना कियागया है। इसका उत्तर 'तदा नतज्या-' इत्यादि विधि से होता है । वह इस प्रकार है- कल्पना किया, न-नतकाल, .:. नि-न-सूत्र, फ-फ्रान्तिज्या .. नि-क-युग्या. त्रि सूनः : झ कला. फला=कुज्योनतद्धृति के है । यहाँ घर्गेण वगै गुणयेद्भजेछ ।' इसके अनुसार, २ (नि-न) (नि-न) धुज्या : कला नि फला-फोटि, फ्रान्ति-या भुज, समशझुकर्ण, इस अक्षक्षेत्रसे अनुपात २२ ૨ : - दिया , २ द्वा २ ૨ पलभा : कला २२ २ २ २ फ २ पतभा २ Xफला- २ -फ. १४१X २ (त्रि-न)(नि-फ) त्रि अय, नि-न-८६४८८३ २५ (नि-२)२५४८८६४८८३-२२१६२२०७५ और १४४ नि=१४४ (३४३८ )२-६७०२०५७५३६ २२१६२२०७५ (त्रि- 2) कर १७०२८५७५३६ प्रश्नाध्यायः ३६१ । २ तिर - त्रि-कर १७०२०५७५३६. क-७३ कर, आसन्न में। २२१६२२०७५ .:.२६ क-३ नि: कर %D१३६३८२८ “और क-/ १३६३८२८-१९६८=ज्या । ५१ इसप्रकार क्रान्तिज्या के ज्ञान से सूर्य का भी ज्ञान सुगम है ॥ ४० ॥ मार्तण्डे सममण्डलं प्रविशतिच्छाया किलाष्ट्यङ्गुला दृष्टाटासु घटीपु कुत्रचिदपि स्थाने कदाचिदिने । अर्कक्रान्तिगुणं तदा वदसि चेदक्षप्रमा तत्र च त्रिप्रश्नप्रचुाप्रपञ्चचतुरं मन्ये त्वदन्यं न हि ॥ ४ ॥ भापाभाप्य । किसी स्थान में किसी दिन सममण्डल प्रवेश में आठ घड़ी दिन बीते मूर्यको अगल की छाया ज्ञात हुई है तो उस स्थान में क्रान्तिज्या और पलभा क्या होगी ! यदि यह तुम बतलानो तो, विप्रश्न-विषयक नानाविध-प्रपञ्च में चतुर तुम्हारे समान दूसरा हम न मानें । उपपत्ति । इस प्रश्नका उत्तर गणिवाध्याय के निप्रश्नाधिकार में 'अत्रापि साध्योनतका. लजीवा-' इत्यादि विधि के अनुसार लिसागया है । वह इस प्रकार है:- यहां महाशङ्क साधन करना चाहिए । (१६)२+ (१२)=(२०); इमलिए सोलह श्रङ्गल छाया सम्बन्धी समन्छायापर्ण २० हुआ । इससे अनुपात पिया, २० : १२ : ३४३८ : २०६३ । ४८ यह महाशङ्ख हुश्रा । श्रय उनतकाल श्राट घड़ी की ज्या को तवृति-२६५५ पलना करके अनुपात किया; ६६५५४१२ যাক- २०६२।४६:२६५५: २०६२५ कर्ण जानकर पलमा मी ज्ञात हुई। श्रमाविग्यारे लिए अनुपात, सोलह . . + -इसप्रकारपल.
पलक: पलमा::समश ३६२ गोलाध्याये - कान्तिज्या। परन्तु यह क्रान्तिज्या स्थूल सिद्ध हुई है । इससे गुज्या, कुज्या चर आदि सिद्ध करके ' अथोनतात्-' इत्यादि विधि से कला सून सिद्ध करके इष्टइति लाना, फिर पलकर्ण और क्रान्तिज्या का साधन करना। इसप्रकार असकृतम से वास्तव क्रान्तिज्या का ज्ञान होता है ।। ४१ ।। यत्र क्षितिज्या शरसिद्ध २४५ तुल्या स्यात्तवृतिस्तत्त्वकुरामसंख्या ३१२५ । तत्राक्षमार्को गणक प्रचव चेदतजक्षेत्रविचक्षणोऽसि ॥ ४२ ॥ भाषाभाष्य । हे गणक ! यदि तुम अक्षक्षेत्रों में चतुर हो तो २४ ५ कुज्या धौर ३१२५ सति को जानकर पलभा और सूर्य को यहो । इस प्रश्न का उत्तर गणिताध्याय में 'कुज्योनतऋतिट्टता--' इत्यादि प्रकार से उपपत्ति । वह यों है-- पलभाम्य य: १२ २४५ : मान्तिया २६१० अव फुग्योनवमृति सिर य ३५२८और य ४ फरये अनुपात फिया, २६४० ३५०८० तद्धृति-कुज्या यर परन्तु, समृति-पुण्या-३१२५-२४५-०८८.. ३५२८० ...२८८०% " २८८० य%%3३-पलमा। मध प्रान्तियाके निये अपात रिया । २४५ ८४०-प्रान्तिया । इसमे पूर्व मिति के अनुमार मर्य का मान मुगम है ॥ ४० ॥ ४ प्रश्नाध्यायः॥ '३३ क्रान्तिज्यासमशङ्कुतद्धतियुति कुज्योनितां वीक्ष्य यो विंशत्यश्वरसै ६७२० मितामथपरांपष्टयङ्कचन्द्र१६६०मिताम् । कुज्यायापभशिञ्जिनीयुतिमिनं वेत्यक्षमां चापि तं ज्योतिर्विकमलाववोधनविधी वन्दे परं भास्करम् ॥ १३ ॥ प्रभा। ज्योतिर्विद एप कमलानि तेषां योऽवबोधनविधिः प्रकाशकरणं तस्मिन् । परं श्रेष्ठं भारकर सूर्य मन्ये इत्यर्थः । भाषामाच्या फ्रान्तिज्या समशङ्कु और तद्धृति के योग में कुज्या को घटाकर शेष ६७२० मानकर और कुज्या, अप्रा और फ्रान्तिज्या का योग १६६० जानकर सूर्य और क्रान्तिज्या को जो बतलावे, गणकरूपी कमलोंके प्रकाश करने में उस सूर्य को प्रणाम करता हूं। उपपत्ति। इम प्रश्न का उत्तर गणिताध्याय में 'क्रान्तिज्यासमशडतद्धृतियुति कुज्योनिता या तया ।' इत्यादि प्रकार से कियागया है, वह इस तरह है:- प्रान्तिया समशङ्क ८६७२०, यह सीन कोटियोग है। तद्धृति-कुज़्या १६६०, यह तीन भुजयोग है। घद्धृति-कुज्या अब अनुपात किया, पोटियोग : भुजयोग . १२ : पलभा । अथवा, १६६०x१० ६७२०:१६६०.१२ ६७२० इस प्रकार, युज्या, थमा और मान्तिश्या एक क्षेत्र से अययय और पलमा, पलग और मादश जानार किसी एक अवयव का मान गुगम है। चौर, कुज्या थप्रान्या २ . अब, यह प्रश्न पहले प्रश्न के समानही है । इस का उत्तर गणिताध्याय में यहां परता योग कोटियों का है, दूमरा फणा का है। इससे पहले के समान ३६४ गोलाध्याय पलक V(१२)()-V ६५५ २५. ४ द्वादश%D१२ पलभा-२३ -=-२८ इन तीनों भुजों का योग हुआ। पतफर्ण-१२५ इसमे अनुपात किया- २८ : १२ : १६६० : ८४०० मान्तिग्या । इस प्रकार सव अवयव अलग अलग ज्ञात होनाते हैं । क्रान्तिज्या से विलोम विवि से सूर्यका ज्ञान भी सुगम है ॥ ४३ ॥ क्रान्तिज्यासमशङ्कुतद्धतिपुतिं कुज्योनितां वीक्ष्य यः पूर्णाव्यब्धिमहीमिता १४४०मथपरांखाभ्राष्टभूसंमिताम१८०० अशाज्यासमशङ्कतद्धतियुतिं वेत्यक्षमा च तं ज्योतिर्विकमलावबोधनविधौ वन्दे परं भास्करम् ॥४४॥ फ्रान्तिज्या, समशङ्कु और तद्धृति के योग में कुज्या को घटाकर शेप १४४० जानकर और अमाज्या, समशङ्कु और नद्धृति का योग १८०० जानकर पलभा और सूर्य को जो वतलावे, गणकरूपी फमलों के प्रकाश करने में उस सूर्य को मैं प्रणाम करता हूं। उपपत्ति। 'प्रान्तियातमशतद्धृतियुतिः कुज्योनिताद्यो हता।' इत्यादि प्रकार से होता है । भापाभाष्य। - । अनुपात किया- कोटियोग : कर्णयोगः : द्वा: पलकर्ण, श्रथना, १४४० : १८०० : : १२ : १५; अय अक्ष पार्ण से पलमा ज्ञात हुई। पलभा-V१५)-(१२) =VE१६ प्रश्नाध्यायः। ३९५ इससे अमाज्या, समशङ्कुच्या और तद्धृति या ज्ञान सुगम है । ये तीनों अब पव एकही अक्षतेत्र के हैं ॥ १४ ॥ यत्र त्रिवर्गेपमिता पलामा तत्र त्रिनाडीप्रमितं चरं स्यात् । यदा तदा: यदि वेत्सि विदन् सांवत्सराणां प्रवरोसि नूनम् ॥ ४५ ॥ प्रभा। सर्वत्सरं तज्ज्ञानोपयोगि शास्त्रं वेचीति सांवत्सरः । अण गणक इत्यर्थः । तेषां प्रवरः श्रेष्ठः नून निश्चयेनासीत्यर्थः । भापाभाप्य। ६ त्रि गुज्या जिस देश में पलभा नव है, वहा जन तीन घडी के तुल्य चर हो उस समय सूर्य क्या होगा ? यदि यह कहो तो तुम निश्चय से ज्योतिपियों में प्रवीण हो । उपपत्ति। इस प्रश्नका उत्तर गणिताध्याय में 'चरन्यकाभिहति -' इत्यादि विधिसे है कल्पना किया, कझान्तिज्या । तव, १२ क कुज्या फ फिर, Vनि-कर दुज्या; इसलिए अनुपाव किया, चरज्या कुज्या. घरज्या = ज्या ३ घडी = ज्या १८ - १०६२। धुज्या चरज्या /नि , अथवा, नि इससे क्रान्तिग्या और उससे विलोम विधि से सूर्य का ज्ञान सुगम है ॥ ४५ ॥ याम्योदक्समकोणभाः किल कृताः पूर्वः पृथक्साधने स्तिद्दिग्विवरान्तरान्तरगता या प्रच्छकेच्छावशात् । ता एकानयनेन चानयति यो मन्ये तमन्यं भुवि ज्योतिर्विददनारविन्दमुकुलमोलासने भास्करम् ॥ ४६॥ -५'४१०६२ .:. कुञ्या રૂદ गोलाध्याये प्रभा। ज्योतिर्विदां वदनान्येवारविन्दमुकुलानि तेषां यत्प्रोल्लासनं तरिमन् ।, तमन्यं भुवि भास्करं रविं मन्ये इत्यर्थः। भापाभाप्य। पूर्वाचार्यों ने सूर्य, की मध्याह्न छाया, सममण्डल छाया और फोणवृत्त छायाओं का साधन भिन्न भिन्न प्रकारों से किया है; परन्तु इनका साधन एकही प्रकार से जो करै उसको, ज्योतिपियों के मुखरूपी कमल कलिकाओं के विकास करने में भूमि में दूसरा सूर्य मानें। उपपत्ति। आचार्य ने छाया साधन गणिताध्याय के त्रिप्रश्नाधिकार में 'पलप्रभाव्यास, दलेन निघ्नी ।' और 'व्यासार्धवर्गः पलभा कृतिन्नः ।' इन दो प्रकारों से किया है। यहीं उपपत्ति लिखी जायगी ॥ ४६ ॥ दृष्ट्वेष्टभां योऽत्र दिगवेदी छायादयं वा प्रविलोक्य दिग्ज्ञः । वेत्यक्षभामुद्धतदैववेदि- दुर्दर्पसर्पप्रशमे स तायः॥ ४७ ॥ . भादयस्य भुजयोः समाशयो- य॑स्तकर्णहतयोर्यदन्तरम् । ऐक्यमन्यककुभोः पलप्रभा नायते श्रुतिवियोगभाजितम् ॥ ४८॥ . उद्धता ये दैववेदिनो गणकारतेषां यो दुर्दपः स एव सर्प; तरय यत्प्रशमनं तस्मिन् ताक्ष्यों गरुडः सोऽन्तीत्यर्थः । समाशयोग्तुल्य दिशोः। अन्यककुमौरन्यदिशोः । शेपं रफुटम् । प्रभा। भाषाभाष्य। भरन:- इष्टाछाया दिशा और सूर्य को अथवा दिशा और दो छायाँ पो जान प्रश्नाध्यायः ३६७. कर जो पलभा वतलावे, उद्धत ज्योतिपियों के गर्वरूपी सर्प के नाश में वह गरुड के समान है। उत्तर -दोनों छायासन्धि-भुजों को छायाकों से उलटा गुणना अर्थात् प्रथम भुज को द्वितीयकर्ण और द्वितीयभुज को प्रथम फर्ण से गुणा करना । फिर दोनों भुजों का तुल्य दिशामें अन्तर और भिन्न दिशामें योग करके फलमें दोनों छायासबन्धि-कणों के अन्तर का भाग देना, फल पलमा होगी। उपपत्ति। इस प्रश्न का उत्तर गणिताध्याय में उदाहरण देकर लिया है। यह सब यया स्थान दिखलाया जायगा । यहा सक्षेप से लिखा जाताहै । प्रक - प्रथम छायाकर्ण. प्रथमभुज. द्विक = द्वितीयछायाकर्ण. द्विभ = द्वितीयभुज, अब अनुपात क्रिया- १२xनि प्रक: १२ .नि प्रथम महाश? प्रम: द्विक . १२ .नि-१२xनि द्वितीयमहाशङ्क। द्विक इमी प्रकार प्रक प्रभ प्रक प्रम-नि त्रि --प्रयम निग्यावृत्तीय भुज । दिक द्विम द्विभxनि त्रि द्वितीय निग्या वृत्तीय भुज । द्विक इसलिए, प्रम-त्रि-द्विभxत्रि द्विक अब 'शन्सरहत् पलभा-' इस विधि से, १२xनि १२xत्रि प्रxद्विक द्विभरमा दिक विक सभाइस प्रकार 'भाग्यस्य भुगयो -यादिप्रकार उपपन्न हुमा॥४७॥४८॥ भर गोलाध्याये अक्षाभां तरणिं दिशो युगगतं मासं तिथिं वासरं यः कूपोद्धृतवन्न वेत्ति सहसा पृष्टो दिगर्कादिकम् । बृहीत्याशु परेः कथं स कथयत्यस्योत्तरं वक्ति यो वन्दे तच्चरणावमुष्य गणकाः के वा न सेवापराः॥१६॥ भापाभाप्य। . जैसे कूप से किसी को बाहर निकालने पर जल्दी में उस से पूछने पर वह पूर्व-पश्चिम नहीं जानता, वैसेही जो पलभा, सूर्य, दिशा, युगमान, मास, तिथि, दिन आदि नहीं जानता वह लोगों के जल्दी पूछने पर फैसे कह सकता है । परन्तु जो इसका उत्तर कहता है उसके चरणों को प्रणाम है। उसकी सेवा में सभी गणक-गण तत्पर रहते हैं। उपपत्ति। यह प्रश्न यन्त्राध्याय के 'आद्यन्तशङ्कुशिरसो:-' इत्यादि विशेप संयन्धी है। वह इस प्रकार है:- ध्रुवकी उंचाई अक्षांश होता है । यन्त्र से मध्याह्न में सूर्यका नतांश सिर फरके उसमें अक्षांश का संस्कार करके क्रान्ति का ज्ञान करना । उससे विलोम विधि से सूर्य का भुजांश सिद्ध करना फिर 'भाधीच्युतः सभाधो भगणात्पतितो- ब्दचरणानाम् ।' इत्यादि क्रमसे सूर्य ज्ञात होताहै । वर्ष चरण का शान सूर्याफ्रान्त नक्षत्र से होताहै । दिशा फा ज्ञान ध्रुव से स्पष्ट है । इस प्रकार प्रतिदिन मध्याह में सट सूर्य का ज्ञान करना । अधवन और श्वस्वन स्पों के अन्तर में स्पष्ट सूर्यफी गति होती है । इस तरह स्पष्टगति का ज्ञान करके जिस दिन गति अति- अल्प हो उस दिन जितना स्पष्ट सूर्य हो वही उच्च समझना चाहिए । परमा धिक और परमाल्प गतियों का योगार्ध मध्यम गति होती है । स्पष्ट सूर्य से विलोमविधि से मध्यम-सूर्य का ज्ञान करना । फिर राश्यादेषिकला:-' इत्यादि विधि से विकलाशेप से अहर्गण का ज्ञान होता है । अहण से चार और विलोम- विधि से फल्पगत वर्षों का ज्ञान होताहै । इस प्रकार पहले कदीमुई विधियों से सप विषयों का ज्ञान करना चाहिए ॥ ४६॥ , प्रश्नाध्यायः ३ वंशस्य मूलं प्रविलोक्य चागं तत्स्वान्तरं तस्य समुच्छ्रयं च । यो वेत्ति यष्टवैव करस्थयासो धीयन्त्रवेदी वद किं न वेत्ति ॥ ५० ॥ ऊर्धस्थस्य गृहादिभिर्व्यवहितस्याप्यामात्रं सखे वंशस्य प्रगुणस्य यस्य सुसमे देशे समालोक्यते । अत्रैव लमवस्थितो यदि वदस्यस्यान्तरं चोच्छ्रयं मन्ये यन्त्रविदांवरिष्ठपदवीं यातोऽसि धीयन्त्रवित्॥५१॥ दूरस्थस्य न दूरगस्य यदि वादृष्टस्य दृष्टस्य वा वंशस्य प्रतिविम्वितस्य सलिले दृष्ट्वाग्रमानं सखे । अत्रेव त्वमवस्थितो यदि वदस्यस्यान्तरं चोच्छ्रयं त्वां सर्वज्ञमतीन्द्रियज्ञमनुजव्याजेन मन्ये भुवि ॥ ५२ ॥ प्रभा। एते श्लोकाः प्रथमं यन्त्राध्याये व्याकृता एव । भाषाभाष्य। इन प्रश्नों का अर्थ और उत्तर पहले यन्त्राध्याय में मायुफा है ॥५०॥५२॥ तिग्मांशुचन्द्रो किल सायनांशी चतुर्दिराशी च विपातचन्दः। गृहाटकं तत्र वदाशु पातं धीवृद्धिदं त्वं यदि बोधीपि ॥ ५३ ॥ युनायनांशोऽशशतं शशी - दशीतिरकी दिशती प्रिपातः।
गोलाध्याये चन्द्रस्तदानीं वद पातमाशु धीवृद्धिदं त्वं यदि बोवुधीपि ॥ ५४ ॥ असंभवः संभवलक्षणेऽपि स्यात्संभवोऽसंभवलक्षणे किम् । पातस्य सिद्धान्तमिह प्रचा चेक्रान्तिसाम्ये प्रसृता मतिस्ते ॥ ५५ ॥ भागोनयुक्तं त्रिभ ३।३ मर्कचन्द्रौ चेत्सायनांशी च विपातचन्द्रः। भागदयोनो भगण ३६ स्तदानीं पातं वदतं यदि वो बीपि ॥ ५६ ॥ यातेऽपि पाते कचिदेप्यलक्ष्म गम्येन गम्यं वद चित्रमत्र । यत्संभपासंभवपरीत्यं सांवत्सराचार्य विचार्य नूनम् ।। ५७ ॥ एते प्रश्ना व्याख्याता एव । भापाभाप्या सायन सूर्य और चन्द्र प्रम से ४ और ३ राशिद और निरयण पन्द्रमा राशि है । इस स्थिति में यदि तुम धीवृद्धिद तन्त्र पो भलीभाति जानते हो। पात अर्थात् मर्य-चन्द्र पा फ्रान्तिमाम्य बतलायो । जय सायनचन्द्र का घश १०० और सूर्य ८० अंश हो एव निरयणका २०० अश हो तो पाव की स्थिति हो। जप पात का मंभव होता है तप अममय क्यों माना है (लग्नाचार्य के मन से ) और अब अमभव हा सण होता है तब उसया मा यों हाजाना है. ( यह भी इऊ आचार्य के मत मे ) इम लिये यदि तुम्हारी पुद्धि पानविषय में ना हो तो उसरा टोक नियम कही।
४०१ - - प्रश्नाध्यायः जब सायन सूर्य और चन्द्र २ । १६ और ३ । १ हो और निरयणचन्द्र ११ । २८ हो उस समय पात स्थिति, यदि जानते हो तो को। धीवृद्धिद तन्त्र में, किसी स्थान में गतपात की स्थिति में भावी पात लिखा है और जहां वास्तव में हुआ है वहां आगे होना माना है । यह बड़ा आश्चर्य है। इस लिए हे गणक ! इम संभव और असंभव की विपरीतता को खूब विचारकर कही। उपपत्ति। इन प्रश्नों का विषय गणिताध्याय के पाताविकार में लिसा जायगा क्योकि पातविपय का विचार वहीं विस्तार से हो सकेगा ।। ५३ ॥ ५७ ॥ इदानीं सिद्धान्तग्रथनकालमाह- रसगुणपूर्णमही १०३६ समशकसमयेऽभान्ममोत्पत्तिः । रसगुण ३६ वर्षेण मया सिद्धान्तशिरोमणी रचितः ॥ ५ ॥ भाषाभाष्य । मेरा जन्म १०३६ शक में हुआहै और छत्तीसवर्ष की अवस्था में मैंने सिद्धान्तशिरोमणि को बनाया है ।। ५८ ।। इदानीं विद्वजनानुनयादनोद्धत्यप्रतिपादनदारेणात्मनःप्राग- ल्भ्यं प्रार्थयन्नाह- गणितस्कन्धसंदर्भोऽदभ्रदर्भागधीमतः। उचितोऽनुचितो यन्मे धाटयं तत्क्षम्यतां विदः ॥ ५६ ॥ गणितस्कन्धस्य संदर्भो नाम रचनाविशेषः । असावदभ्र- दर्भाप्रवीमत एवोचितः । मूलप्रदेशादुपरि यानि पुष्टानि दीर्वाणि दर्भपत्राणि असावदभ्रस्तस्याग्रं यथा तीक्ष्णं तथा यत्त्य गतिस्ती- दणा अभेद्यमपि प्रमेयं भित्वान्तः प्रविशति । तथाविधस्य गणि- तस्कन्धप्रबन्ध उचितः । अनुचितो मे तथापि कृतः। तद्धार्य हे विद्वज्जना गणकाः । क्षम्यताम् ।
गोलाध्याये
४०२
भापाभाप्य।
फुशामबुद्धियों को गणितविषयक नियन्ध लिसना उचित है। इससे जो मेरे
से अनुचित यनपड़ा हो उसे हे विद्वानो ! आपलोग क्षमा कीजिये ॥ ५ ॥
इदानीमाद्यदूपणापराध परिहरन्नाह-
ये वृद्धा लघवोऽपि येऽत्रगणका बद्धाञ्जलिं वच्मि तान्
क्षन्तव्यं मम तेर्मया यदधुना पूर्वोक्लयो दूपिताः
कर्तव्ये स्फुट्वासनाप्रकथने पूर्वोक्तिविश्वासिनां
तत्तहूपणमन्तरेण नितरां नास्ति प्रतीतिर्यतः ॥ ६०॥
स्पष्टम् ।
भापाभाष्य।
बड़े भौर छोटे सव ज्योतिपियों से प्रचलि बांधकर मेरी प्रार्थना है कि मैंने
जो प्राचीनों के मतों का अपने प्रन्थ में खण्डन किया है उसके लिए वे मेरे फो
धमा करेंगे । क्योंकि पूर्वमतानुयायियों को विना प्राचीनों के दोष दिखलाये
नवीन उपपत्ति-विपय में विश्वास नहीं होता ।। ६० ॥
प्रासीत् सह्यकुलाचलाश्रितपुरे विद्याविदजने
नानासजनधानि विजडविडे शाण्डिल्यगोत्रो दिजः ।
श्रौतस्मातविचारसारचतुरो निःशेपविद्यानिधिः
साधूनामवधिमहेश्वरकृती दैवज्ञचूडामणिः ॥ ६१ ॥
तजस्तचरणारविन्दयुगलप्राप्तप्रसादः सुधी-
मुग्धोदोधकरं विदग्धगणकप्रीतिप्रदं प्रस्फुटम् ।
एतद्व्यक्तसदनियुक्तिबहुलं हेलावगम्यं विदां
सिद्धान्तग्रथनं कुबुद्धिमथनं चके कविर्भास्करः ॥ ६२ ॥
केचित्पिपछिपन्त्येनं प्रश्नाध्यायं हि केवलम् ।
तदर्थ लिखिता अत्र प्रश्नाः प्रागगदिता अपि ॥ ६३ ॥
मरनाप्यायः। - ४०३ प्रश्नानमन् अपठतो गणकस्य गोल- कन्दोल्लसत्सरलयुक्तिशतप्रवालैः। प्रश्नोत्तरार्थपरिचिन्तनवारिसित- मूलामला मतिलता समुपैति वृद्धिम् ॥ ६४ ॥ स्पष्टार्थम् । इति श्रीमहेश्वरोपाध्यायसुतभास्कराचार्यविरचिते सिद्धान्त- शिरोमणिवासनाभाष्येमिताक्षरेगोलाध्यायःसमाप्तः। अत्र गोलाध्याये ग्रन्थसंख्या २१००। प्रभा। ऋग्यजुःसामाख्यारितस्रो विद्या यस्येति निविद्यः । ततः स्वार्थ श्रण । अथवा तिस्रो विद्या अधीते वेद वा । तदधीतेत्यादिनाण। सुधीना मुग्धानां चोदोधकरम् । विदग्धाश्चतुरा ये गणकास्तेषां प्रीति- प्रदम् । व्यक्ता प्रस्फुटा या सदुक्तिः शोभनालङ्कारविशिष्टा वाणी यु- क्तिश्च ताभ्या बहुलम् । हेला विलासादिक्रिया तयावगम्यम् । गोल एवं कन्दः, उल्लसन्ति सरलयुक्तिशतान्येव प्रमालानि, तैः । प्रश्नोत्तरा- र्थाना य परिचिन्तनं विचारस्तदेव वारिजल तेन सिक्तमूला अमला निर्दूषणा मतिलता बुद्धिलता वृद्धि समुपैति प्राप्नोति । वृद्धिशब्दो- ऽत्रमङ्गलार्थक इति । ज्योतिाकृतिसाहितीचतुरता पड्दर्शनोद्भासिता तत्चद्भावरसस्फुरत्सुकविता यस्यास्ति ख्यातिं गता। अम्बापादपरायणो जयपुरीपागलयाध्यापको भूयो भाति दिवेापाख्यजनको दुर्गाप्रसादः सुपीः ॥ १ ॥ तत्सूनुरल्पधिषिणो गिरिजाप्रसादः संचिन्त्य नैकमतसंमथितार्थतत्त्वम् ।
गोलाध्याये वेदाङ्गगोधरणिसंमितविक्रमाव्दे- भापासुभाष्यसहितामकरोत्प्रभा ताम् ॥ २ ॥ साकेतपश्चिमदिशाभरणायमाना भ्राजिष्णुसाम्बशिवमन्दिरमञ्जुगर्भा। नानादुमव्रततिवंशमनोभिरामा सा भाति पण्डितपुरी मम जन्मभूमिः ॥ ३ ॥ भापाभाप्य। सघात के निकट, वेदाध्यायी और नानाविध सम्झन पुरुषों से मुक्ति विगविड नामक स्थान में शाण्डिल्यगोत्रीय ब्राह्मण, श्रुति और स्मृति शाम्रो विचार में चतुर, नाना विद्यानिधान, साधुश्रेष्ठ, देवशमुकुटमणि नामक विद्वान थे। उनका पुत्र, उन्हीं के परण प्रसाद से, विद्वान् और मुद्रों को मोधदाय, चतुर ज्योतिषियों को सन्तोपनद, स्पष्ट अन्धो किया और युक्तियों से पूर्ण विद्वानों पो अल्पश्रम सा-य, और युपद्धियों का मनप यह सिद्धान्त निर्माण भास्कर फति ने दिया है। कोई लोग इस प्रश्नाध्याय को ही पदेंगे, इस विचार से पहले कहे प्रश्नों को भी यहां लिखा है। इन प्रश्नों को पानेवाले गोचिपियों पी, गोलापी पदों के नानावि, सुन्दर, सरल युतिरप प्रवालों (पागल पालयों) मे, प्रानोपर-विचाररूप जर से सीबीई शुद्ध पुदिनता ग्य पृद्धि को प्राप्त होती है ।। ६१ ॥ ६४ ।। भापामाप्य में गोरायाय ममातमा । संवा ६४ पेत्रादि गुपयार पा० २० मा, गन REE, एक महेयर ज्योत्पतिः। ४०५ अथ ज्योत्पत्तिः। प्राचार्याणां पदवीं ज्योत्पत्त्या ज्ञातया यतो याति । विविधां विदग्धगणकप्रीत्यै तां भास्करो वक्ति ॥१॥ प्रभा। विदग्धाश्चतुरा ये गणकारतेषां प्रीत्यै। भापामाप्य। विना ज्योत्पत्ति का विषय जाने प्राचार्यपदवी नहीं प्रात होती, इसलिए अनेक भांतिकी त्योत्पत्ति को, चतुर गएकों के सन्दीप के लिए भास्कर बहता है॥१॥ इष्टाङ्गुलव्यासदलेन वृत्तं कार्य दिगद भलवाङ्कितं च । ज्यासंख्ययाप्ता नवतेलवा ये तदाद्यजीवाधनुरेतदेव ॥ २॥ द्वियादिनिघ्नं तदनन्तराणां चापे तु दत्तोभयतो दिगङ्गात्। ज्ञेयं तदनदयवद्धरज्ज्यो- र ल्यकाध निखिलानि चैवम् ॥ ३॥ प्रमा। यावतीज्या विधातुमिष्टारतमख्यया चतुर्विशत्यादिरूपयेत्यर्थः । तव श्राधजीवाधनुःस्यात् । एतदेव द्विच्यादिभिर्निमं तदनन्तराणां जी- वानां धनुःस्यात्। चापे तु दत्तोभयत इत्यादिना अर्धन्यारूपं दर्शितम्। एवं निखिलानि ज्याझुनि स्युः। मापाभाध्य। महुल के गुरुप व्यासाय से पृरा बनाकर उस में दिशाभी हित अप दूसरी निधि से इन्हीं ज्याओं को गणित द्वारा कहता हूँ । निग्यावर्ग में, (चाप के बीच में जो बाण क तुल्य अन्तर रहता है उसी को उत्कमग्या मानना गोलाध्याये करके, ३६० अंशों को अङ्कित करना । ज्यासंख्या का नव्ये अंश में भाग देने से लब्धि प्रथम-ज्या का धनु होता है । इसको दो, तीन आदि इष्ट संख्याओं से गुणने से पाये के धनुप होंगे । दिक् चिह्न के दोनों ओर वृत्त में धनु तुल्य खण्ड कल्पना करके उनके अन में रस्सी बांधकर उसका अर्ध इन ज्याओं को समझना चाहिए । इसीप्रकार सत्र ज्याएं सिद्ध होती हैं ॥ २ ॥ ३ ॥ अथान्यथा वा गणितेन वच्मि ज्यार्धानि तान्येव परिस्फुपनि । त्रिज्याकृतिर्दोर्गुणवर्गहीना मूलं तदीयं खलु कोदिजीवा ॥ ४ ॥ दो कोटिजीवारहिते त्रिभज्ये तच्छेपके कोटिभुजोत्क्रमज्ये। ज्याचापमध्ये खलु योऽत्र वाणः सैवोत्कमज्या सुधियात्र वेद्या ॥ ५ ॥ प्रभा। जलवत्समीकृते महीतले विलिखिते महीयसि वृत्चे पूर्वगणना प्रकारेण अवगतानि धपि ज्यार्धानि सूक्ष्माण्येव । पुनरेतानि गणिते- नापि साध्यन्ते तत्रानेके प्रकाराः। शेष स्पष्टम् । भापामाप्य । भुजपा पाकर मूलफोटिया होती है। निया में ज्या और कोटिग्या घंटा देने से शेष कोटिया और भुभन्या को कमज्या रहती है । ज्या और चाहिए ॥४॥५॥ त्रिज्या राशिज्या, तत्कोटिज्या च पष्टिभागानाम् । त्रिज्यावर्गार्धपदं, शरवेदांशज्यका भवति ॥ ६॥ - - ज्योत्पत्तिः, ४०७ प्रभा। राशिज्या त्रिंशदंशानां जीवा स्यात् । तत्कोटिज्या पष्टिभागानां जीवा स्यात् । शेषं स्पष्टम् । भापाभाष्य। त्रिज्या का भर्ध एक राशि ३० की ज्या होती है और उसकी कोटिज्या साठ अश की होती है । त्रिज्यावर्ग के आधे का मूल पैंतालीस अंश की ज्या होती है। उपपत्ति । (१) ३०° ज्या=य, त्रि-य=६०° उत्तमज्या, 'निज्योत्तमज्यानिहतेर्दलस्य- इत्यादि विवि से, - य x नि = २ य, - य x त्रि २ - %D १ समशोधन करने से त्रि = २ य२ + य x नि; पक्षों को प्राट से गुणकर त्रिज्यावर्ग जोड़ने से हुआ- पनि = १६ य + य x' त्रि+नि', ::. VEत्रि' =३ त्रि,और/ १६ य+याxHि+४य+त्रि. .. ३ त्रि = ४ ग+त्रि =४ या-२ त्रि नि1 इस लिए 'निग्या नाशिज्या।' उपपन्न हुआ। (२) अथवा 'प्रमोत्क्रमज्याकृतियोगमूलात्-' इत्यादि विधि से त्रि-य = ज्या२६० त्रि -य- उत्क्रमज्या ६० इन दोनों के वर्ग, ~२य xनि+य,और नि-य, इन का योगार्थ करके राशिज्यावर्ग के साथ समीकरण के लिए न्यास; २त्रि२-२ यxनि - य - २१२-२ य ४नि- ४ य? समशोधन करके पक्षों को पार से गुणाकर विज्यावर्ग जोड़ दिया; पनि १६ य+८य x त्रि+दिर :: VEत्रि = ३णि और V १६ य+यxत्रि+४ि+त्रि + ४०८ गोलाध्याये ३ त्रि = ४ य + नि; फिर इनका समीकरण करने से नि! = ज्यो ३०. के सिद्ध हुआ। (३) 'त्रिज्यावर्गाधपदं शरवेदांशज्यका भवति । इस की उपपत्ति यों है- क्रमज्या और उत्क्रगज्या ४५ की त्रिज्या के समान होती है, इमलिए 'क्रमोत्कर मज्या- इत्यादि रीति से- त्रि+'त्रि = २ त्रि', 'वर्गेण वर्ग गुणयेत्' से V२त्रि-२ त्रि उक्त प्रकार उपपन्न हुआ।। ६ ।। त्रिज्याकृतीपुत्रातात्त्रिज्याकृतिवर्गपञ्चघातस्य । मूलोनादष्टहतान्मूलं पत्रिंशदंशज्या ॥७॥ 3D ४ २ भापाभाप्य। प्रिज्यावर्ग को पांच से गुणकर फल में, त्रिज्यावर्ग वर्ग और पांच के गुणन फल के मूलको घटाकर, पाठ का भाग देकर फिर मूल लेना, फल छत्तीस अश की ज्या होगी। उपपत्ति । , . ४ 'त्रिज्याकृतीपुघातान्मूलम्-' इत्यादि वक्ष्यमाण रीति से अठारह अंश १८* की ज्या यह होती है, ५नि-त्रि इसको त्रिज्या में घटा देने से ७२ अंश की उत्क्रमज्या होती है, .:. त्रि-/५निर = उग्या ७२', इससे 'निग्योत्रमण्यानिहते-'इसके अनुसार, ५ त्रि-/५नि = ज्या ३६० "अथवा, V पत्रिपत्रि ज्या १६ अम निग्या मुजज्यहविहीनयुक्त, इस विधि से, V५त्रि २ त्रिभु ४ ज्योत्पत्तिः। १०६ ५त्रि त्रि-त्रिx भु- ४ नि-बिरभु ५त्रि-/ त्रि त्रि-Viaxभु_V५नि-V५त्रि' -ज्या ३६. ५ गजहयगजेषु ५८७८ निघ्नी त्रिभजीवा वायुतेन १००००संभक्ता। पत्रिंशदंशजीवा तत्कोटिज्या कृतेपूणाम् ॥ ८ ॥ प्रभा। तत्कोटिज्या कृतेपूणां चतुःपञ्चाशहागानां जांधा स्यादिति संबन्धः॥ भापाभाष्य। प्रकारा- -- त्रिज्या को ५८७८ से गुणकर फल में १०००० का भाग देने से तर से छत्तीस अंश की ज्या होती है । ३६ अंशों की कोटिज्या ५४ अंशकी ज्या होती है। उपपत्ति :(१) यहां प्राचार्य ने त्रिज्या १०००० कल्पना की है । अब अनुपाव होता है कि- त्रि:५६७. १०००० : ५८७८ :: इष्टनि: ३६ ज्या । यह प्रकार पहले जो ३६ ज्या सिद्ध हुई है उसी से सिद्ध होता है। पहले प्रा.स्वरूप यह है- ५त्रि-पत्रि V५; यहां फरणी गठ मूल लेने से ८ ५२.७६२५८६, इस में ८.फा भाग देने से लब्धि,३४५३२३ .:. ज्या Vि.३१५३२३बिx.५.७८% 11 X 1945 सपना।
• गोलाण्याये (२) यहां गणित का विस्तार इस प्रकार है-पहले सिद्ध हुई छत्तीम अंश ३६ ज्या यह है, V५ त्रि'- त्रि" यहां त्रिज्या के स्थान में १०००० २ कराना करने से- १००००४५% १००००००००४५-५००००००००। और, १००००४५=१००००००००००००००००४५ इसका मूल लेने से और शेष ५३५४०८७६० त्याग करने से। हा /५००००००००००००००००-२२३६०६७६७=1/पत्रि'; और ५००००००००-२७६३६३२०३-V पत्रि-/ नि .. २७६३६३२०३:८-३४५४६१५०-V पनि रात्रि फिर मूल लेने से और मूल शेष २६६ का त्याग करने से; /३४५४६१५०० ५८७८ । अब इससे ऊपर लिखा अनुपात करने से, निx५८७८ यह सिद्ध हुआ। इस प्रकार गजयगजेपनिघ्नी-' इत्यादि विधि उपपन हुई ॥८॥ त्रिज्याकृतीपघातान्मूलं त्रिज्योनितं चतुर्भक्तम् । अष्टादशभागानां जीवा स्पष्टा भवत्येवम् ॥ ६ ॥ भापामाग्य। . निज्यावर्ग को पाच से गुणकर मूल लेना, फिर उसको विज्या में घटाकर चार फा भाग देना फल अठारह अश की ज्या होती है। उपपत्ति। ( ) यहा पर यदि उस १८=य तत्र २ य = ज्या ३६ के होता है । इस से अनुपात क्यिा- नि: २ ::२य : त्रि-२ य, म प्रपार दो पक्ष सिद्ध हुए, ४ य=नि२-२ xि य समशोधन मे ४ यनि-, गों यो घार ४ से गुण कर निन्यावर्ग जोडने से, ज्योत्पत्तिः। १६ य+८निय+नि =५ तिर ::./१६ य+नि ४ य+नि ४ य + नि, और V५नि फिर इनका समंशोधन करने से हुश्रा- इस प्रकार 'निन्यानीपुरग्तान्मूलं-' इत्यादि ज्या १८V ५ निक-नि ४ प्रकार उपपन्न हुआ। क्षेत्र। - त्रि- त्रिय (२) अथवा प्रकारान्तर से ज्या १६- य, नि-य = उज्या ७२, इससे 'निज्योत्क्रमज्या निहतेईलस्य-' इस विधि से छत्तीस अंश की ज्या का वर्ग हुआ- प्रकारान्तर से ६ अंश के ज्यावर्ग के लिये भाग लिसे क्षेत्र के अनुसार अनुपात, मिज्याकर्ण में कोटिग्या कोटि तो द्विगुण भुनन्या कर्ण को ४२ य ज्या२३६; और को ज्या= नियर, नि लिये ' वर्गेण वर्ग गुणयेद् भनेच' इस नियम से कोटिज्या वर्ग को ४ से गुणकर दि का भाग देकर पहले पक्ष के साथ समीकरण के लिये न्याय- त्रि-त्रिय में क्या? (फो ४२ य) ४ यदि समन्छेद और ऐदगम करने से नि-नि४य = ८ यx नि- य ११२ गोलाध्याये पक्षान्तरानयन से '-८ यxनि = त्रि३४यति' मूल के लिये आठ से गुणकर, १६ य ४ वि + हनि', इसको जोड़ने से ६४ य '-४८ यx नि+६ त्रि'- १६ यx त्रि+८य ४ 'नि+त्रि 'स्वमूले धन,' इस नियम से मूलहुए ६४ य. -४८ यx निहनि -: य-३ तिर V१६य नियxविरे + नि = -४ य : त्रि-तिर इनका फिर पक्षान्तरानयन से ८य+यनि-२त्रि' इनको दो से गुणकर त्रिज्यावर्ग जोड़कर मूल लिया- V१६य+यxत्रि+निय+नि,और पति इनका समशोधन करने पर सिद्ध हुशा- * ज्या १t=/ ५ त्रि-त्रि, ४ कर्ण विश कोटि इम प्रसर उ० प्रगर उपपन्न (श्रा ॥६॥ क्रमोत्कमच्यातियोगमूला- हलं तद शकशिजिनी स्यात् । सह-TET STET forमरापिरक में है। यही में तुम भA HAIT में विमान में समापन मामि पर नगरी है।
10
ज्योत्पत्तिः।
। त्रिज्योत्नमज्यानिहतेदलस्य
मूलं तदर्शशकशिञ्जिनी वा ॥ १०॥
भापामाध्य।
क्रमज्या और उत्क्रमज्या के वर्गयोग के मूल का आधा अर्धाशज्या होती है।
अथवा त्रिज्या और उत्क्रमज्या के गुणन के आधे का मूल, अधीशज्या होती है।
उपपत्ति ।
(१) इस क्षेत्र में उपपत्ति
स्पष्ट प्रतीत होती है।
उज्या
ok
त्रिक अज्यामु
(२) दूसरे प्रकार में अनुपात किया-
अज्याक . उत्क्रमज्या हर लब्धि का गुणन
राज्य राशि के समान होता है ।
.:. त्रि x उज्या अभ्या
V त्रि: उज्या /अज्या अन्या ।
क्षेत्र
ज्याक
.
इस प्रकार निभ्योकमग्यानिहतेदलस्य ।' इत्यादि मकार उपपन्न हुआ॥१०॥
धरौ तद्दलयोः तदर्घयोः पदे मूले क्रमेण मुजेन जनयुक्तत्रिभखएड: निग्यावर्ग में त्रिज्या और भुजज्या के घात को एक स्थान में जोड़कर दूसरे स्थान में पटाकर मूल लेने से, कम से भुज सहित और रहित त्रिज्याकी अर्धग्या होती है। इसी प्रकार भुजग्या के स्थान में कोटिज्या मानकर कोटि की अर्धग्या (१) नीचे लिसे क्षेत्र के साथ अनुपात किया-यदि निग्या में अर्धया ४१४ गोलाध्याये तस्याः पुनस्तद्दलभागकानां कोटेश्च कोट्यशदलस्य चैवम् । अन्यज्यकासाधनमुक्तमेवं पूर्वेः प्रवक्ष्येऽथ विशिष्टमस्मात् ॥ ११ ॥ भाषाभाष्य। इसी प्रकार अर्धज्या, का भी अर्ध करके ज्यासाधन करना । और कोटिग्या का भी अर्धग्या आदि साधन करना चाहिए । इस प्रकार पूर्वाचार्यों ने इष्टच्या से अन्यज्याओं की साधन विधि कही है । परन्तु अब इस से विशिष्ट विधि कहताहू ॥ ११ ॥ त्रिज्याभुजज्याहतिहीनयुक्त त्रिज्याकृती तद्दलयोः पदे स्तः। भुजोनयुक्तत्रिभखण्डयोयें कोटिं भुजज्यां परिकल्प्य चैवम् ।। १२ ।। प्रभा। त्रिज्या-भुजज्ययोर्या श्राहतिः तया हीनयुक्त त्रिज्याकृती निग्या- योज्ये स्तः । कोटिज्यां भुजज्या परिकरप्य पुनरेवं क्रिया कार्या । भापामाध्य। सिद्ध करना चाहिए। उपपत्ति। मिलती है तो द्विगुणान्या में क्या ? पल उसमन्या २ अर्धज्या प्रकारान्तर से उत्न मज्या प्रि-भुज्या उज्या । इस लिए दोनों का समीकरण से । उपा त्रि पक्ष हुए- ज्योत्पत्तिः। ४१५ २ अर्धज्या त्रि -त्रिभु ; इन में दो का अपवर्तन देकर मूल लिया- अर्धज्या = अर्धज्या = V प्रि-विxभु । यहा 'निग्याभुजज्याट्र- : - 7 तिहीना त्रिज्याकृति । इत्यादि अंश उपपन्न हुआ। म . क्षेत्र। मुज्या कोटि कर्ण कोटि त्रिज्याकर्ण (२) नीचे लिसे क्षेत्र के अनुसार अनुपात किया-त्रिज्या कर्ण मे अर्धज्या अर्धग्या भुज तो द्विगुण अर्धज्याकर्ण में क्या१२ -=उज्या प्रकारान्तरसे उत्क्रमज्या नि त्रि-भु । इसप्रकार दो पक्ष सिद्ध हुए २ अर्धज्या २ = त्रि+त्रिभुः इन में दो का अपवर्तन देकर मूल लेने से हुआ- Vअर्धज्या अर्धज्या Vi+त्रि X भ, इसलिए' त्रिज्याभुजज्याइति- २ क्ता प्रिग्याछति । इत्यादि अश उपपन्न हुआ। देना . EXI उत्तमन्पा . गोलाध्याये इस प्रकार दोनों क्षेत्रों से मिलकर पूरा श्लोक उपपन्न हुआ !! १२ ।। यहोर्ययोरन्तरमिष्टयोर्य- कोटिज्ययोस्तत्कृतियोगमूलम् । दलीकृतं स्याहुजयोर्वियोग- खण्डस्य जीवैवमनेकधा वा ॥ १३ ॥ भापाभाप्य। इष्टभुजज्या और फोटिज्याओं के अन्तर का मूल लेकर उसका आधार रना, इसप्रकार भुनों के अंतरार्ध की ज्या होगी। ऐसही अनेक प्रकारों से जीवार सिद्ध होती है। उपपत्ति। नीचे तिने क्षेत्र के अनुमार- (यूटो-लदो)+(लको-पृयो)-४ স্মথ। .:. (दोसारको अं)-२ अर्धग्या, नो पक्षों में दो का अपवर्तन दिया पो मिद हुआ V(दो अ)+(पो प्र) प्रशंग्या २ हयो:-' इत्यादि विधि अपपन्न हुई ॥१३॥ क्षेत्र, २ . इसलिए योग्ययोरन्धरमि- भापाभाप्य । ज्योत्पत्तिः। दोः कोटिजीवाविवरस्य वर्गों दलीकृतातस्य पदेन तुल्या। स्थाकोटिवाहोर्निचरार्धजीवा वक्ष्येऽभ मूलग्रहणं विनापि ॥ १४ ॥ भुजज्या और कोटिज्या के अन्तर वर्ग के मूल के समान कोटिग्या और भुजज्या के अन्तरार्ध की ज्या होती है। आगे पिना मूल के ही यह विधि कहताहू । उपपत्ति । नीचे लिसे क्षेत्र में, प्रथम दोा-दो, प्रथम कोटिज्याको द्वितीय दोादों, द्वितीय कोटिज्यायो के अनुमार, (को-दो )२+ (को-दो)-४ अर्धज्या, यहापर, (को-दो) ( फो-दो 3 (को-दो)- ४ अर्धज्या २ 'वर्गण वर्गम्-' इत्यादि विधि से अर्ध । अब सूत्र २ . करने से हुआ- ૨ . (को-दो.) अर्धन्याः Vअर्धज्या V( को-दो) ज्या( कोटयश-भुजांश ) V(को-दोर %3- तेन । कोश कोल्या रिकोळ गिए
गोलाध्याये
इस प्रकार 'दो कोटिजीवाविवरस्य-' इत्यादि विधि उपपन्न हुई ॥१४॥
दोाकृतिव्यासदलार्धभक्ता
लब्धत्रिमयोर्विवरेण तुल्या।
दोकोटिभागान्तरशिञ्जिनीस्या-
ज्ज्यानि वा कानिचिदेवमत्र ॥ १५ ॥
भापाभाष्य।
के
भुजज्या के वर्ग मे त्रिज्यामा भाग देकर लब्धि और त्रिज्या के अन्तर
समान भुज कोटिको अन्तराशज्या होती है । इस प्रकार कितनी एक ज्या
सिद्ध होती हैं।
उपपत्ति।
नीचे लिग्ने क्षेत्र में, अनुपात रिया-
: मुज्या २%
नि
दिया, भुज्या,
नि: भुज्या
भज्या, इस में दो का अपपर्तन
... Vभुज्या--त्रिभुज कोटिकी अन्तराश ज्या के समान हुआ।
भुनाश
कोरेश
शिर
इस लिये उस विधि उपपन्न हुई।॥ १५ ॥
ज्योत्पत्तिः। ४१६ स्वगोङ्गेषुपडशेन६५६६वर्जिता भुजशिञ्जिनी । कोटिज्या दशभिःक्षुणा त्रिसप्तेयुर७३विभाजिता ॥ १६ ॥ तदैक्यमग्रजीवा स्यादन्तरं पूर्वशिञ्जिनी । प्रथमच्या भवेदेवं पष्टिरन्यारततस्ततः ॥ १७ ॥ व्यासाऽष्टगुणाध्यग्नितुल्ये स्यनवतिर्यकाः। कोटिजीवाशताभ्याता गोदसतिथि१५२६भाजिता ॥ १८ ॥ दोा स्वाव्यङ्गवेदांश ४६७ हीना तबोगसमिता। तदग्रज्या तयोश्चापि विवरं पूर्वशिञ्जिनी ॥ १६ ॥ तत्त्वदसा नगांशोना २२४ । ५.१ एवमत्राद्यशिञ्जिनी । ज्यापरंपरयेवं वा चतुर्विंशतिमौर्विकाः ॥ २० ॥ चापयोरिष्टयोदोर्ये मिथः कोटिज्यकाहते। त्रिज्याभक्ते तयोरक्यं तच्चापैक्यस्य दोज्यका ।। २१ ॥ चापान्तरस्य जीवा स्यात्तयोरन्तरसंमिता। अन्यज्यासाधने सम्यगियं ज्याभावनोदिता ॥ २२॥ समासभावना चैका तथान्यान्तरभावना । आद्यज्याचापभागानां प्रतिभागज्यकाविधिः॥ २३ ॥ या ज्यानुपाततः सेप्टव्यासार्धे परिणाम्यते । आद्यदो कोटिजीवाभ्यामे कार्या ततो मुहुः ।। २४ ॥ भावनाः स्युरतदग्रज्या इष्टे व्यासदले स्फुटाः। स्थूलं ज्यानयनं पाट्यामिह तन्नोदितं मया ॥ २५ ॥ इति ज्योत्पत्तिः। भाषाभाष्य। इस प्रकार ज्या कोटिज्या या साधन करके अर भावना से प्रत्यश ज्या पा ४२० गोलाध्याये - १ है - प्रकार लिखते हैं:-भु ज्या में उसका भाग घटाना और दशगुनी कोटि- ६५६९ मा ५७३ का भाग देना, इन दोनों फलों का योग अगिली ज्या होती है अर्थात् यह एक अंश की भुजज्या होगी । और पहती ज्या एक अंश की ज्या होती है वह साठ कला के तुल्य होती है । इसी प्रकार आगे की ज्या सर सिद्ध होती हैं। इस प्रकार में ३४३८ त्रिज्या कल्पना करके नये अंश तक प्रत्येक अंश की ज्या सिद्ध होती है । कोटिज्या को सौ से गुणकर फल में १५२२ का भाग देना और भुजज्या का अंश घटा देना, इस प्रकार फल श्रागेकी ज्या होगी ( यह ज्या ३०० इतने चाप की होती है प्रथम चापज्या से अधिक होती है) दोनों के अन्तर से गतज्या ज्ञात होती है। यहां प्रथमज्या (अर्थात् ३० अंश ज्या ) २२४६ के समान होती है । ( २२५ के नहीं होती जैसा कि साधारण रीति से कही गई है ) इसी नियम से चौवीस अंशों को ज्याएं सिद्ध होती हैं दो इष्ट चापों की भुजज्याओं को उसकी कोटिज्याओ से गुणकर त्रिज्या का भाग देना, फलो का योग करने से चापों की योगज्या और अन्तर से अन्तर- ज्या होती है । इस विधि को ज्याभारना कहते हैं, अन्य ज्याओं के साधन में यह ज्याभावना उपयुक्त होती है। यह विधि दो प्रकार की है, पहली समासभावना कहलाती है ( यह चापों • फी योग ज्यासाधनार्थ है ) और दूसरी अन्तरभावना कहताती है (यह चापों की अन्तरज्या के लिये है) । पहले जो ज्या सिद्ध हुई हैं उन से प्रत्यंशज्या सिद्ध करनी चाहिये । ज्या को व्यासार्ध में परिणामन करने से इष्टज्या होतीहै । प्रथमज्या और कोटिज्या से भावना द्वारा अन्यज्या इष्ट व्यासार्ध में सिद्ध होती हैं । पाटीगणित अर्थात् लीलावती में ज्यासाधन स्थूल रीति से लिया है इसलिये यहां उसका फिर निरूपण नहीं किया गया है। उपपत्ति । 'चापयोरिष्टयो ज्ये-' इत्यादि विधि से, घृ ज्यालयो लज्याx को + त्रि पृ ज्याxल दो ल ज्या को "अन्तरज्या, नि %D योग च्या ज्योत्पत्तिः। ना मातरचाप इनाप सभाप हहन्या त्रि योगज्या y दि २ यहा पर लघुचापाश-१ ज्यासाधन के लिए इसकी फला की तो हुई ६० अव तत्वाशिवभक्ता असव कला वा ।' इत्यादि प्रकार से ६० यह ज्या सिद्ध हुई यह लघुज्या है। थब, ३४३८-नि, इम लिए- १९८१६-४४=नि ३६००-लज्या ११८१६२४४-नि-लज्यार .:. ३४३७३-खोV (नि:- २-लज्या) स्थूल रूप से भर 'चापयोरिष्टयो ज्ये- इत्यादि विधि से, वृज्या४३४३७३ ६०४वृको योगग्या । , वृज्याX६८७५ ज्याx३४३५३ २ पृश्याX६८७५. ३४३८ ३४३८ ६८७६ यहा अनुपात किया- ६८७६ निग्या में, ६८७५ लको, वो ६५६९ त्रिज्या में क्या ?
गोलाध्याये १ + ६८७५४६५६६ -- ६५६८ सिद्ध हुई । इसलिए पहले जो योगज्या का ६८७६ स्वरूप था वह यों हुश्रा- ज्या X ६५६८ , ६० X वृको = योगया। यहां दूसरे स्वरूप में छ का + --६५६६ ३४३८ अपवर्तन देने से योगज्या का रूप इसप्रकार हुआ- १०xवृको वृज्या- योगज्या, ६५६६ ५७३ और, ज्या- १ १०४ को - अन्तरज्या. ६५६६ ५७३ इसलिए स्वगोऽङ्गेपुपडंशेन-'कोटिज्या दशभिः क्षुण्णा त्रिसप्तेषु विभाजिता तदैक्यमप्रजीवा स्यादन्तर पूर्वशिशिनी।' यह प्रकार उपपन्न हुआ | 'कोटिजीवा शताभ्यस्ता-' इत्यादि दूसरे प्रकार की संगति इसप्रकार लज्या X युको योगज्या, नि त्रि ज्याxलको लज्या वृको - अन्तरज्या. नि यहां लगुचापांश= ३।४५ इसकी ज्या - २२४ । ५६ और कोटिग्या -२४३१ । दृश्या४३४३१ वृको४२२४५६ + - योगण्या। ३४३८ ३४३८ वृज्या-लको + अनुपात किया- ३४३८:३४३१ ::४६७ ३४३१४४६७ ४६६. ३४३८ पृश्या४६६ . ना५य- २२४ । ५६:३४३८:: १०० ३४३८x१०० -- १५२६. २२४ । ५६ वृको ४ १०० १.२६ वृको x १०० १५९६ वृकोर १०० १५२६ वृन्या' १ त्रि ज्याय 1 ज्योत्पत्तिः। ४२३२ इसलिए 'कोटिजीवा शताभ्यस्ता गोदसतिथिभाजिता । दोा स्वाद पग- वेदाशहीना-' इत्यादि प्रकार उपपन्न हुआ। 'चापयोरिष्टयोदोर्ये-' इत्यादि विधि की उपपत्ति श्रीवापूदेव शास्त्री कृत इसप्रकार है:- ₹ क्षेत्र। फ यहा पर, प अ बडे पाप की ज्या-अक, कोटिज्या श्रव । द्वि- गुण लघुचाप-बज,इसका श्राधा छ अ =अज= लघुचाप लघुज्या% छस- सजा लप ग अय, 'घज' रेखा द्विगुण लघुचाप की पूर्णाज्या है । इसके 'स' मध्य बिन्दु से सफ, सम रेसा कमसे अक और पर रेखाओं के समानान्तर करना । यदि 'ध अ' वृहचाप में अज तुल्य लघुचाप जोड दिया जाय तो चज चापैक्य होत. है, इसकी ज्या 'जर' रेखा और कोटि या 'जप' रेसा होती है। अब यदि 'च' तुल्य बृहचाप से 'छ' लघुचाप को घटा दिया तो अन्तरचाप 'छच' के तुल्य वचा। इसकी ज्या छद रेखा और उसकी कोटिग्या छभरेसा करना । अब गक और गसफ जात्यनिभुज 'ग' कोण के तुल्य होने से सजातीय हैं। इससे अनुपात किया-ग अ त्रिज्या तुल्य कर्ण में यदि अक वृहशापया भुज है तो ग स लघुचाप पोटिज्या कर्ण में क्या ? यो 'सफ' रेसा सिद्ध हुई। यहा अस रेसा लघुचाप की उत्तमज्या रूप है, इसलिये इसको प्रिज्या में घटाने से सग रेसा लघुचार कोटिज्या के तुल्य सिद्ध हुई । और गसफ मात्य सबझ में सजातीय है । क्योंकि छसग कोण ६० है इसमें यदि गसप कोण घटा दिया जाय तो शेष झसङ्ग कोण सफ कोण के समान रहा, क्योंकि यह कोण 80- गसफ' कोणके तुल्य है । इसप्रकार यहा योटि और पर्ण के सपत से उत्पन्न कोण समान सिद्ध हुए । गसफ निभुज में फग योटि गस यर्ण है । इम वर्ण के सपात में उत्पन्न सगफ कोण के तुल्य मसल कोण है, वहा सम तुल्य कोटि और सक कर्ण है, अर्थात् धझ के तुल्य मुज हुआ । इसलिये गसफ नात्य के सजातीय छम जास्य हुआ । यह गभर के भी सजातीय है । श्रम अनुपात किया।
हैं 1 ४२४ गोलाध्याये ग विज्या नुल्य वर्ण में यदि का वृतचाप कोटिज्या कोटि है तो छस लघुचा' ज्या कर्ण में क्या ? यो सझ रेखा लन्ध हुई । इनको पहले सिद्ध की हुई सफ रेर में घटाने स झ फ रेसा बाकी रहती है जो छद चापान्तर या के तुल्य है ! औ यहा छसझ, सजट, त्रिभुज समान बनते हैं। इस कारण इनके भुज समान छस-सज, छम-सट सम-जट । अव सफ रेसा के तल्य टर रेखा में स रेखा के तुल्य जट रेसा जोड देने से जर रेसा चापैक्य की ज्या सिद्ध हुई । अत्र चाप के अन्तर और ऐक्य के कोटिज्या के लिये अनुपात किया-ग' त्रिज्याकर्ण में यदि अब शाप कोटिज्या पोटि है तो सग लघुचाप-कोटिज्याक मे क्या ? यो सम रेपा लब्धहुई। गअ त्रिज्याकर्ण में यदि अक बृहवारज्या भुज तो छस लघुज्या कर्ण में क्या ? यो छझ रेसा प्राप्त हुई। इसको सम रेसा तुल्य झम रेखा में जोड देने से छझ रेसा चापान्तर की बोटिज्या सिद्ध हुई और सम रेखा में छझ रेखा के तुल्य सट रेसा को घटा देने से टम रेसा तुल्य जप रेखा चौपक्य की कोटिज्या सिद्ध हुई । इससे 'चापयोरिष्टयोदोर्थे-- इसप्रकार की उपपत्ति लघुक्रिया से उपपन्न हुई । उक्का प्रकार की उपपत्तियों क समारोह सिद्धान्ततत्त्वविवेक के स्पष्टाधिकार में देसो ॥ १६-२५ ॥ उक्ता संक्षेपतः पूर्व ज्योत्पत्तिः सुगमा च सा । सविशेपाधुना तत्र विशेपादिवृणोम्यतः ॥ १ ॥ तत्र तावदाचार्याणां पदवीमि यादिश्लोकपथकं सुगमम् अत्र गणितेन ज्याज्ञानार्थं मूलभूतज्याचतुष्कसिद्धमवारमेवाह तत्पकारो हि वीजगणितक्रियया । त्रिज्या राशिज्येत्यादि विज्गार्धन १७९६ तुल्या त्रिंश३०देशानां ज्या भवति । तस्या कोटिज्या पष्टिदगागानाम् । त्रिज्यावर्धिपदं पचचत्वारिंश दंशानां४५ज्या भवति। अथ त्रिज्यावर्गात् पञ्चगुणात् त्रिज्याफतिवर्गपश्चातस्य मूलेन हीनादष्ट = तात्पदं पत्रिंशदंशानां च्या । अथवा गजयगजेपु ५८७८ निघ्नी त्रिज्यागुतेन १०००८ ४२५ दाविशं च २२ । दितीयादाचं १ त्रयोविंशं च २३ | विंशति ज्योत्पत्तिः। का पत्रिंशदेशानांज्या स्यात् । इति गणितलावाम् । तत्को- ज्याञ्चितुष्पञ्चाशदंशानां ज्या। तथा त्रिज्यावर्गस्य पञ्चंगुणस्य मूलं त्रिज्याहीनं चतुर्मतं सद धादशभागानांज्या भवति । तत्कोटिज्यात दिसप्ततिभागानाम् । अन्यथा साधनमाह । क्रमोत्क्रमज्येत्यादि । कोटिज्योना त्रिज्या भुजस्योलमज्या स्यात् । भुजज्योना त्रिज्या कोट्युत्क्रम- ज्या स्यात् । भुजक्रमज्योलमज्ययोश्च वर्गयोगपददलं भुजा- शानामर्धस्य ज्या स्यात् । अथवा त्रिज्योत्तमज्याघांतदलस्य मूलं तांशकशिलिनी स्यादिति क्रियालाघवम् । एवमुत्पन्नव्याया अपि कोटिज्या सा तत्कोटिभागानाम् । ततः पुनरेवमन्यास्तद(शकज्या साध्याः । कोटेश्चैवमन्याः। तद्यथा । यत्र चतुर्विंशतिास्तत्र त्रिज्यामिष्टम-ज्यार्धम् । तत्कोटिज्या तु पोडशम् १६ । शवेदांशज्या द्वादशम् १२ । अथाष्टमात्तदर्धाश प्रकारेणचतुर्थम् । तत्कोटिच्या विंशम् २० । एवं चतुर्थादद्वितीय तमाहशमं १० चतुर्दशं च १४ । दशमात्पञ्चमं ५ एकोनविंशं च १६ | दाविंशादेकादशं ११ त्रयोदशंच१३ । चतुर्दशात् १४ सप्तमं ७ सादशं च १७॥ अथ दादशात् प३६ मष्टादशं च १८ ॥ पात् ६ तृतीय ३ मेकविंशं च २१ । अष्टादशाननमंह पञ्चदशं च १५ । त्रिज्याचतुर्विशमिति । एवं फिल पूर्वरन्यज्यासाबर- इदानीं विनाप्युलमययाभिनयप्रकारेणाहात्रिज्याभुजव्याह- तीत्यादिशत्रिज्याभजव्यायानेन त्रिज्याकृतिरेकबोनान्यत्र युता। . मुकम्।
गोलाध्याये दे चार्धिते । तयोर्मूले । आधं भुजोनसाङ्कांशानां दलस्य ज्या द्वितीय भुजाब्यखात्रांशानां दलस्य । एवमतोप्यन्याः। तद्यथा अष्टमात्पोडशं १६ ज्याईम् । पोडशाचतुर्थ ४ विशं च २०॥ चतु शिमं १० चतुर्दशं च १४ । एवं सर्वाण्यपि। प्रकारान्तरमाह । यद्दोय॑योरन्तरमित्यादि । इष्टदोळयोर्य दन्तरं कोटिज्ययोश्च यत्तयोर्वर्गस्यमूलस्य दलं भुजयोरन्तरार्धस्य ज्या भवति । एवमन्ययोरन्यान्याः । यथैका किल चतुर्थी ४ । अन्याष्टमी ८ दोा । ताभ्यां द्वितीया २ सिध्यति । द्वितीया चतुर्थीभ्यां प्रथमे १ त्यादि। तथा दो कोटिज्ययोरन्तरवर्गदलस्य मूलं दो कोटिभागान्तरा. धस्य ज्या स्यात् । यथाष्टमी ८ दोा। पोडशी १६ कोटिज्या। • ताभ्यां चतुर्थी ४ स्यादित्यादि। अथ मूलग्रहणक्रियया विनापि दो कोटिभागान्तरज्यानयन माह । दोाकृतिरित्यादि । दोव्वर्गस्त्रिज्यान भक्तः । तस्य त्रिज्यायाश्च विवरं दोः कोट्यन्तरस्य ज्या स्यात् । कानिचिदेवमत्र ज्यार्धानि साध्यानि । तद्यथा । यत्र किल त्रिंशज्यार्धानि तत्र त्रिज्याधं दशमम् १० तत्कोटिज्या विंशतितमम् २० शरवेदां- शज्या पञ्चदशम् १५ । पदत्रिंशदंशज्या दादशम् १२ । तत्को- टिज्या अष्टादशं १८ ज्यार्थम् । अष्टादशभागानां ज्या पथ्म ६ । तत्कोटिज्या चतुर्विंश २४ मिति । क्रमोत्क्रमच्या दित्यादिना पूर्वोक्तप्रकारेण दशमान् पनमम् ५ पञ्चविंशम २५ । एवं दादशात् प;६ तृतीयं ३ सप्तविंशं २७ च । अष्टादशान मेन ४२७ . ज्योत्पत्तिः। एतान्येवानेन प्रकारेण सिध्यन्ति नान्यानि । अने उक्त कानि- चिदेवंमत्रेति । योययोरन्तरमित्यादिप्रकारेण । अतोऽत्र पञ्चम- -५ मेका दोा नवम “मन्या । श्राभ्यां यहोर्ययोरन्तरमित्या- दिना प्रकारेण भुजयोरन्तरार्धस्य ज्योत्पद्यते । तच द्वितीयं २ ज्यार्धम् । तत्कोटिज्याष्टाविंशम् २८ । आभ्यां क्रमोत्क्रमज्या कृति- योगमूलादलमित्यादि प्रकारेणाद्यं १ चतुर्दशं १४ च । एवमन्या- श्चतुर्दश सिध्यन्ति। 'अथ ज्याभावना । सा च देवा । एका-समासभावना । अन्या- न्तरभावना । तदर्थमाह । स्वगोऽ पुण्डशेनेत्यादि । यत्र किल व- सुत्रिवेदाग्नि ३४३८ तुल्या त्रिज्या नवतिश्चज्यार्धानि तत्र ता- वदुच्यते । तत्र मूलभूतज्याना मध्ये काचनेष्टा भुजज्या तत्कोटि- ज्या च पृथक् स्थाप्या । भुजज्या स्वनवपडियुरस ६५६६ विभा गेन रहिता कार्या । कोटिज्या तु दशगुणा त्रिसप्तपञ्चभि ५७३ भी. ज्या । तयोरेक्यं तदग्रज्या | अन्तरं पूर्वज्या स्यात् । यथा त्रिज्या त्रिंशसंख्याकं ज्यार्धम् ३० । ततः समासभावनयकत्रिंशसंख्यम् ३१॥ तस्माददात्रिंशत्संख्यमित्यादि।अन्तरभावनयात्वेकोनत्रिंश २६ मशविरा २८ मित्यादि। पूर्ण दोया कोटिज्यां त्रिज्या व प्रकल्प्य प्रथमं १ खण्डमेवं पष्टिः ६० स्यात् । अंय यदि सैव त्रिज्या चतुर्दिशतियानि तदर्थमाह । कोहि जीवाशताभ्यरतेत्यादि । अत्रापि त्रिज्यार्धमटम = ज्याध सा भुजज्या। पे.डशं १६ कोटिया सा कोटिव्या शतगुणा गोदन- तेघि १५२६ भाजिता ! या तु दोज्यां सा तु निजेन समावेदां १४६७ शेन हीना कार्या । यदि तयोरक्यं क्रियते तदा नवमा गोलाध्याये दे चार्धिते । तयोर्मूले । आद्यं भुजोनखादांशानां दलस्य ज्या द्वितीयं भुजाव्यखादांशानां दलस्य । एवमतोप्यन्याः। तद्यथा अष्टमात्पोडशं १६ ज्याईम् । पोडशाचतुर्थं ४ विशं च २० । चतु दशमं १० चतुर्दशं च १४ । एवं सर्वाण्यपि । प्रकारान्तरमाह । यद्दोपयोरन्तरमित्यादि । इष्टदोय॑योर्य- दन्तरं कोटिज्ययोश्च यत्तयोर्वर्गक्यमूलस्य दलं भुजयोरन्तरार्धस्य ज्या भवति । एवमन्ययोरन्यान्याः । यथैका किल चतुर्थी ४ | अन्याष्टमी ८ दोा । ताभ्यां द्वितीया २ सिध्यति । द्वितीया चतुर्थीभ्यां प्रथमे १ त्यादि। तथा दोःकोटिज्ययोरन्तरवर्गदलस्य मूतं दो कोटिभागान्तरा- र्धस्य ज्या स्यात् । यथाष्टमी ८ दोा। पोडशी १६ कोटिज्या। • ताभ्यां चतुर्थी ४ स्यादित्यादि । . अथ मूलग्रहणक्रियया विनापि दो कोटिभागान्तरज्यानयन माह । दोाकृतिरित्यादि । दोव्वर्गस्त्रिज्याधैन भक्तः । तस्य त्रिज्यायाश्च विवरं दो कोट्यन्तरस्य ज्या स्यात् । कानिचिदेवमत्र ज्यार्धानि साध्यानि । तद्यथा । यत्र किल त्रिंशज्यार्धानि तत्र त्रिज्याधं दशमम् १०। तत्कोटिज्या विंशतितमम् २० शरवेदां- शज्या पञ्चदशम १५ 1 पदत्रिंशदशज्या दादशम् १२ । तत्को- टिज्या अष्टादशं १८ ज्याईम् । अष्टादशभागानां ज्या पम् ६ । तत्कोटिज्या चतुर्विंश २४ मिति । कमोत्कमब्याकृतियोगमूला- दित्यादिना पूकिप्रकारेण दशमान् पञ्चगम् ५ । तत्कोटिज्या पञ्चविंशम् २५ । एवं दादशात् प६ चतविशं २१ च । पात् तृतीयं ३ सप्तविंशं २७ च । अष्टादशानवन : मेविंशं २१ च ।
गोलाध्याये ज्या भाति । यद्यन्तरं तदा समं ७ स्यात् । एवं समासभावना नवमादशमं १० दशमादेकादश.११ मित्यादि। तथान्तरमापन या सप्तमात् पठं ६ पठात् पञ्चम ५ मित्यादि । एवं प्रथमं १ सप्तांशो नतत्त्वदरमितं भवति । अथवा पूर्ण दोज्यां त्रिज्यां च कोटिज्य प्रकल्प्य साध्यते तथापि तदेव । ततः समासभावनया द्वितीयादी न्यखिलानि भवन्ति । अथा त्रिज्यां दोया प्रकल्प्य पूर्ण कोटि ज्यां च प्रकल्प्य साध्यते तदा त्रयोविंश २३ मुताद्यते तस्मादन्तर भावनया द्वाविंशम् २२ । ततोप्येकविंशम् २१ । एवमखिलान्या निष्पद्यन्ते । अय भावनामाह । चापमोरिष्टयोरित्यादि । इष्टयोश्चापौर्य दो ज्ये ते वर्मभूमौ स्थाप्ये । तयोरवस्तारकोटिज्ये च । ततः प्रथमको टिज्या द्वितीयदोर्यया गुण्या। ततो द्वितीयकोटिज्या प्रथमदोर्य- या गुण्या। दे अपि त्रिज्यया माज्ये । फलयो समासरचापैक्यभुज स्य ज्या भाति । अन्तरं चापान्तरस्य ज्याभवति । इयं सिद्वज्या तोऽन्यच्या साधने वासना । तद्यथा । तुल्यभावनया प्रथमज्या धस्य प्रथमज्यान सह समासभावनया द्वितीयम २ द्वितीय द्वितीयेनैवं चतुर्थ ४ मित्यादि । अथ तुल्यभावनया। द्वितीय तृतीययोंः समासभावनया पञ्चमम् ५। ग्रन्ताभावनया प्रथम स्यादित्यादि। अटव्यामार्ध ज्याज्ञानार्थमाह | नाद्यज्या चापभागाना त्यादि । यावदिशैरेका ज्या लभ्यते त प्रायच्या चापांशा मातभागज्यकाविधिरिति । त्रिममपञ्चमि ५७३ भनेत्यादिनाप्र प्रकारेणेफमागस्य ज्यामानीय तदापनातो भागदयस्य ते