Adarsh Library, Jaipur

Ve Dono Aur Wah

Mishra Vimal · 2011/03

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वे दोनों और वह

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वे दोनों और वह विमल मित्र

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पर ममी बहानी पहन बेटा
पटना की? दुगानी' मा रिनादेवीपी ? गमती
मनी गोती है, पर मनी गमतीको शनी वरी बीमा मटर की
गाया मांग पुरा गर है ? पटम स म ए नी
पाविदा पी, स्याप्यपा। माम मार्शमयोरेपामगोपीर नही
होती- गभी पी। फिर भी मि मामी वर गे उनमें 2 मारे गम
पतंग भी उनके जीवन की इतनी गाज मिति ? और
हुनेगा देवी ?
पानी महया पीएवी है. गानों को मही। पर मदनदानी पानी
बंगालिनी रो मिनी है ? पोई पनी पतिमी प्रतिभा सम्मान
पानी और पोई परिवी गुगी गादी में मागापार बन जाती
गई तो पतिकोर मोर उसीटियो पो रामा की मार में
पानी और कोई बगना मे परिमोशालिसी ली।
संगार में दर-पनीर मिररमारे टिम उगमणि
गरो.नि ऐगी रानी लिने उपनामी में मिलेगी मोरर
गंगा पीपीगी पानी लिने परियों को जालोर
गीपत्नी भीनी ममहे मना तितिरीमा"
मीलिए तोपरापारिभातिर गिरोहली साला
पाना-मा.न्दुमेगारिन्लीगेसी'
।

किया था, याद आता है---घटना शादी के दिन ही घटी थी। मैंने जिन दिनों डायरी लिखना शुरू था, मेरी उम्र ढल चुकी थी। लेकिन उसके पहले ? उसके पहले के जीवन के बारे में सोचता हूं तो कई बार एक अजीव-सी थकान महसूस होती है। और अब तो अचानक किसीसे मेंट होने पर मुश्किल में पड़ जाता हूं। क्या नाम है ? क्या परिचय है ? कहां पहले देखा था, वड़ा परिचित-सा चेहरा है-बस और कुछ याद नहीं आता। पर इतना जरूर याद है कि वह घटना शादी की रात ही घटी थी। मैंने पूछा था-आप कभी बदामतल्ले मोहल्ले में थीं क्या ? प्रश्न सुनकर महिला थोड़ी संकुचित हो उठी थी। एक के बाद दूसरी भा रही थीं और उनमें से कई मेरे प्रश्नों का उत्तर अच्छी तरह देकर चली भी जा रही थीं। बालिका- विद्यालय में शिक्षिका की नियुक्ति के लिए इण्टरव्यू चल रहा था। सभी बी० ए० पास थीं । वहुत-सारी दरख्वास्तें थीं । दूसरे स्कूलों में पढ़ाने का अनुभव भी उन्हें था । इण्टरव्यू लेकर निर्वाचन का भार मुझी पर था । स्थायी सेक्रेटरी भुवन बाबू छुट्टी पर गए हुए थे। जाते समय मुझे कह गए थे-विवाहित महिला को प्रेफरेंस दीजिएगा, क्योंकि अविवाहित नड़कियां काम-धाम सीखकर अन्त में शादी कर नौकरी छोड़ देती हैं। इसलिए- स्कूल-कमेटी की भी यही राय थी। भुवन बाबू के साथ मेरी दोस्ती बड़ी पुरानी थी। इस मोहल्ले में नया मकान बनने के बाद मैं यहीं चला आया था। कमेटी के सदस्य मुझे दरख्वास्त वगैरह पकड़ाकर वोले थे- पन्द्रह उम्मीदवार हैं । उनमें से आप किसी एक को चुन लीजिएगा। स्कूल भुवन वावू का ही था। इस स्कूल के पीछे उन्होंने काफी पैसा खर्च किया था। खैर! निर्दिष्ट तारीख को मैं इण्टरव्यू ले रहा था। भुवन वावू की स्वर्गीया पत्नी उर्मिला देवी के नाम पर स्कूल का नाम रखा गया था । माहवार पचहत्तर रुपया वेसिक और तीन रुपया सालाना इन्किमेंट । दस साल में बढ़कर तनख्वाह एक सौ पांच रुपये हो जाएगी। ६

पर काटीनेनिरित निररि डे ,
दाहरे के म न पुरादिगो नि
बारिमारिसर इसी दएको मुरिमां। हरन र
सीरी। करार दिने सही मन की
पसर नहीं की। मन के सरं के निर सपालेर एनी
जेर कर देते। दुरन राम ने मुहारमेर मुरा
है. हर ! कोई मिना देस होनही काटा। कार के
निरनो हैन, पोरे-कोरेर नगा।
कुमारी मुना हाउरा, पुकारी मुगल सेन, कुमारी न मन
एटा"
-धीनतो इन्दुसा देगे।
एमार शिहिता हो । यो मारो रन्मोर पेहरा। देरने
पर पस जस्तो, पर भी सडा। रमिता पानिमारको
पानिमारं न होकोर को, और रिपन गरने से पहले
मनन विवाहित महिनामाही निरन करने के निरहा।
मैंने पूल-भारे र?
इन्दुलेसा देश रोजी-रो कोई मन्दान नहीं।
विकाकरते हैं?
दि नहीं है।
मैंने पोसार महिना मेटरर रिपोर से देगा। काने कुन
कोप? रकम हिन्दूरा। मारे पसार र से।
दिर पर पोड़ा बात की पाविरहित वोन गरेमा।
वारको तर समर माता उन महिला को देखता रहा, पर दुरन्न
हो गाने को मंमान निरेगर मिमिता निमा-शिलानर
के निरसितोपनाराही मार रिमोसो सोरि
ससी देखने के निरटोव्हो मारा नहीं राशि जमाना
साहिर करना मनुरित पा, बोर पुष्परमो पर मेरे निर
टोक नहीं।

- स्कूल से सम्बन्धित कुछ और वातें मुझे पूछनी थीं, पर सब गड़वड़ा गया। कुछ देर तक मैं अजीव पशोपेश में पड़ा रहा। ऐसी छोटी-सी बात भी इतनी बड़ी समस्या बन सकती थी, यह किसे मालूम था ! उपन्यास-कहानियां लिखकर कई कठिन समस्याओं का समाधान मैंने किया है । कल्पना में जटिल जीवन की कई ऐंठनों को खोला है, पर ऐसा कुछ होगा, यह मैं नहीं जानता था। किवाड़ वन्द करके कमरे में टेवल- कुर्सी पर बैठकर, कलम चलाकर ख्याति भी मुझे कुछ कम नहीं मिली है। सभीको मालूम है, लोकचरित्र मैं खूब समझता हूं। विशेषकर नारी-चरित्र । तो फिर मांग में सिन्दूर रहने पर भी पति न होने का भेद आखिर क्या था? क्या पति ने अपनी पत्नी को त्याग दिया था? मैंने आंखें नीचे करके कहा----आप बैठिए । कहानी लिखने की कुछ सुविधाएं हैं। लिखते-लिखते कलम रोक- कर सोचा जा सकता है, गलत शब्दों को काट-पीटकर ठीक भी किया जा सकता है, बेठीक बातों को फिर से नये ढंग से लिखा जा सकता है, वक्त की कमी भी नहीं सताती। वह महिला अपने-आप ही बोली मैंने अपने पति को छोड़ दिया है। पति को छोड़ दिया है ! कैसी अजीब बात है ! पत्नी भी कभी पति का त्याग कर सकती है क्या? मैं तो समझता था कि पति ही पत्नी को छोड़ देता है; पर इन्दुलेखा देवी को देखकर मुझे लगा-मैंने इन्हें कहीं देखा जरूर है। क्या तो नाम था ? परिचय ? ---कहां देखा था ? बड़ा परिचित-सा चेहरा-आगे और याद नहीं आया । बहुत पहले का देखा हुआ कोई चेहरा-उन दिनों मुझे डायरी लिखने की आदत नहीं थी। मैंने पूछा-~-आप कभी बदामतल्ले में रहती थीं? मेरी तरफ एक नजर डालकर इन्दुलेखा देवी ने कुछ कहना चाहा, पर संकोचवश बोल नहीं - सकी। मैंने कहा-बचपन में मैं भी बदामतल्ले में ही रहता था। वह मेरा.जन्मस्थान है। इन्दुलेखा देवी बोलीं-तब तो आप उन लोगों को ज़रूर जानते होंगे ? मेरे पति का नाम उन्हें आगे और कुछ कहने की जरूरत नहीं पड़ी। पल भर में मैं स्वर्ग और मयं लोक का परिभ्रमण कर आया। पटल दा, उनके पिताजी, उनकी मां इन लोगों को तो मैं मभी भी नहीं मुसा हूं। मटर दाकी मा उस दिन कितनी रोई थीं। मोहल्ले के सभी लोग उस दिन विवाह-मण्डप में उपस्थित पेस बज रहा था । नौवत यज रही थी। बरातियों की बाहों में बेलमोतिया को फूलमालाएं लिपटी हुई थी। लोग. चाग पारवत पी रहे पे सिगरेट पी रहे थे। पर एकाएक सारा जमपट टण्डा पड़ गया था। मुवन या पट्टी से लौट आए। बोले-यो माहब, निर्वाचन का क्या हुआ मैंने कहा-अभी तक तो कोई निर्णय नहीं ले पाया हूं। भुवन बाबू बोले-इसमें इतना सोमने-विचारने का हैरी क्या ? जिसे भी हो, नियुपित-पत्र पाहा दीजिए । चेहरा देपर ही परित्र का भी अनुमान लगा बैठेगे, इसीलिए तो मैंने यह काम आपको सौंपा था। मैंने कहा-माफ कीजिएगा, भयन राय । मैं हार गया हूं, मेरा अहंकार टूट चुका है। -यो ? मुयन यावू अयाक होकर मंग मोर पूरते रहे। बोले -- क्यों यह हारने यी यात वहाँ से उठ गई ? अहंकार टूटने का कारण हो गाता है, मैं समझा नही? मैंने कहा-है, मुवन या ! कारण है। आप लोग समझते है, साहित्यिक होने से ही आदमी को पहचानना आमान हो जाता है. पर यह यात बिल्कुल गलत है। हम लोग गिफं बना-बनाकर यहानिया गि सकते हैं । कोगिरा करने पर आप भी लिख सकते है। मेरी समझ में तो कुछ भी नहीं आ रहा है। एक थी। पी० ए० पास, बग्या वर्ग रह भी नहीं है-पर पति को छोड़ आई है-ऐमो टीपर श्राप रगगे ? पहिए !

। . । स्कूल से सम्बन्धित कुछ और वातें मुझे पूछनी थीं, पर सव गड़बड़ा गया। कुछ देर तक मैं अजीव पशोपेश में पड़ा रहा। ऐसी छोटी-सी बात भी इतनी बड़ी समस्या बन सकती थी, यह किसे मालूम था ! उपन्यास-कहानियां लिखकर कई कठिन समस्याओं का समाधान मैंने किया है । कल्पना में जटिल जीवन की कई ऐंठनों को खोला है, पर ऐसा कुछ होगा, यह मैं नहीं जानता था। किवाड़ बन्द करके कमरे में टेवल- कुर्सी पर बैठकर, कलम चलाकर ख्याति भी मुझे कुछ कम नहीं मिली है। सभीको मालूम है, लोकचरित्र मैं खूब समझता हूं । विशेषकर नारी-चरित्र । तो फिर मांग में सिन्दूर रहने पर भी पति न होने का भेद आखिर क्या था? क्या पति ने अपनी पत्नी को त्याग दिया था? मैंने आंखें नीचे करके कहा--आप वैठिए । कहानी लिखने की कुछ सुविधाएं हैं। लिखते-लिखते कलम रोक- कर सोचा जा सकता है, गलत शब्दों को काट-पीटकर ठीक भी किया जा सकता है, वेठीक बातों को फिर से नये ढंग से लिखा जा सकता है, वक्त की कमी भी नहीं सताती। वह महिला अपने-आप ही बोली मैंने अपने पति को छोड़ दिया है। पति को छोड़ दिया है ! कैसी अजीब बात है ! पत्नी भी कभी पति का त्याग कर सकती है क्या ? मैं तो समझता था कि पति ही पत्नी को छोड़ देता है; पर इन्दुलेखा देवी को देखकर मुझे लगा-मैंने इन्हें कहीं देखा ज़रूर है। क्या तो नाम था ? परिचय ?..-कहां देखा था ? वड़ा परिचित-सा चेहरा--आगे और याद नहीं आया । बहुत पहले का देखा हुआ कोई चेहरा -उन दिनों मुझे डायरी लिखने की आदत नहीं थी। मैंने पूछा-आप कभी वदामतल्ले में रहती थीं ? मेरी तरफ एक नजर डालकर इन्दुलेखा देवी ने कुछ कहना चाहा, पर संकोचवश बोल नहीं सकी। मैंने कहा-बचपन में मैं भी बदामतल्ले में ही रहता था। वह मेरा जन्मस्थान है। इन्दुलेखा देवी वोलीं- तव तो आप उन लोगों को जरूर जानते होंगे ? मेरे पति का नाम उन्हें आगे और कुछ कहने की जरूरत नहीं पड़ी। पल भर में मैं स्वगं ओर मयं लोक का परिभ्रमण पर आया। पटल दा, उनके पिताजी, उनकी मां इन लोगों को तो मैं अभी भी नहीं भूला हूं। अटल दा की मा उम दिन कितनी रोईपी। मोहल्ले के सभी लोग उस दिन विवाह-मण्डप में उपस्थित थे। गंस बज रहा था। नौवत बन रही थी। बरातियो को याहों में वैलमोतिया को फूलमालाएं लिपटी हुई थीं। लोग- याग भरवत पी रहे पे सिगरेट पी रहे थे । पर एकाएक सारा जमघट टण्डा पड़ गया था। भुवन वायू छुट्टी से लौट आए। बोले-क्यों माहर, निर्वाचन का क्या हुआ? मैंने कहा-अभी तक तो कोई निर्णय नहीं ले पाया हूं। भवन वायू बोले-इममें इतना सोचने-विचारने का है ही क्या ? जिसे भी हो, नियुक्ति-पत्र पाहा दीजिए। चेहरा देखकर ही चरित्र का भी अनुमान लगा बैठेंगे, इसीलिए तो मैंने यह काम आपको मापा था। मैंने कहा-माफ कीजिएगा, नवन वादू। मैं हार गया हूं, मेरा अहंकार टूट चुका है। -क्यों ? मुवन बाबू अवाफ होकर मेरी ओर घूरते रहे। बोले --- वयों यह हारने की बात कहां मे उठ गई ? अहंकार टूटने का मग कारण हो माता है, मैं समझा नही? मैंने कहा-है, मवन बाबू ! कारण है। आप लोग समझते है, माहित्यिक होने से ही आदमी को पहचानना आसान हो जाता है, पर यह बात बिल्कुल गलत है। हम लोग सिर्फ बना-बनाकर कहानिया लिम सकते हैं। कोशिन करने पर आप भी लिख सकते हैं । मेरी समझ मे तो कुछ भी नहीं पा रहा है । एक थी। बी० ए० पास, बच्चा वगैरह भी नहीं है-पर पति को छोड आई है-ऐसी टीचर आप रखेंगे ? कहिए !

। -पति को छोड़ दिया है ? भुवन वाबू के मन में भी दुविधा हुई। इतने वर्षों से वह स्कूल चला रहे थे। बुजुर्ग आदमी थे। जीवन को उन्होंने देखा-पहचाना था। अनेक जगह घूम आए थे। लोगों से ठगे भी गए थे। लेकिन आदमी अनुभवी थे। पर उन्हें भी संकोच में पड़ा देखकर मैंने कहा-~आप स्वयं भी सोचिए और अपनी कमेटी के मेम्बरों से भी सलाह-मशविरा कर लीजिए। मुझे मालूम है कि कमेटी-वमेटी कुछ नहीं । भुवन बाबू ही सर्वे- सर्वा हैं । फिर भी औपचारिकता के लिए मैंने कमेटी का नाम लिया था। भुवन वावू बोले-~~-जो कुछ करना है, मैं ही करूंगा। आप सभीको जानते भी तो नहीं। -~-लेकिन बाद में हमें दोष मत दीजिएगा। मैंने कहा । मुवन बाबू बोले-नहीं, दोष आपके सिर नहीं मढ़गा। पर उसने अपने पति को क्यों छोड़ दिया? मैंने कहा-अवश्य ही पति में कोई दोष रहा होगा। -~-आपने पूछा था ? -यह भी कोई पूछने की बात है ! पर मुवन बाबू को यह मालूम नहीं था कि मुझे कुछ पूछने की जरूरत नहीं थी। मैं सब कुछ जानता था । डायरी नहीं लिखता था। इसलिए ठीक-ठीक समय या तारीख नहीं बता पाऊंगा-पर वाकी वातें तो मुझे याद ही थीं। ३ याद आता है, जाड़े की रात थी। सम्भवत: माघ का महीना था। अटल दा की शादी हो रही थी। अटलबिहारी वासु । हममें से कोन उन्हें नहीं जानता था ! बदामतल्ले के लोग उनकी ओर अंगुली दिखा- कर कहते- देखो, देखो लड़का नहीं, हीरा है हीरा । उसी. अटल. दा. की. शादी की रात वह घटना घटी। १० घटल दा हमारे समय के सरपंच थे। और बतर ही क्यों, यह पूरे मुहल्ले के ही माद थे। हर वक्त हाप में मोटी-मोटी अंग्रेजी रितायें पामे चलते । बचपन में उन पितायो का नाम पड़कर मेरी तो ममम में भी नहीं पाता था। हम लोगों केगेल के मैदान में एक बार भारर मरमे मिलकर फिर यहाँ तो घले जाते । बदामतला उस समय इतना एवाम नही था । कभी कोई बटन दा से पूछता-मार गेलोगे नही बटन दा? तो बटन दापहते-नही रे । आज मुझे भवानीपुर जाना है। हेडमास्टर मुरेश वायू बहे कडे मिजाज के यादमी पे। पदर पहनते थे, पद्दर भी सदर की ही मोढ़ते पे। उन्हें देखकर ही हम लोगो को डर लगता था। पर अटल दा हेडमास्टर साहर के कमरे में बिल्कुल निडर होकर पुस जाते । हम लोगों को बाहर गे अटस दाबी बाया सुनाई पड़ती। पटी गम्भीर और मीठी आवाउ थी अटल दा की। अटल दा किस काम से हेडमास्टर साहब के कमरे में जाते, यह हम सोगो को मालूम नहीं था। अटल दा ने मोहल्ले में एक दरिद्र-भण्डार भी सोता था। उनके पहने पर हम लोग घर-घर जाकर चावल-पाटा यारह मांगरूर साते और दरिद्र भण्डार के दफ्तर में जमा करते । मटस दा कभी परने भी नही थे। हम लोगो के साथ कड़ी धूप में, बरसात में पावन ढोकर माते। पावम, कपरा, पैसा सब इकट्ठा करते, फिर ये पो मामतम्मे के गरीयों में बाटी जाती। कभी-कभी वह किसी-किमी के घर भी गुपचाप उरूरत पी पीछे पहुंचा आते, ताकि दूसरों के सामने उन्हें छोटा न बनना पहें। उस बार पाई. ए. की परीक्षा का रिजल्ट निकला। मदामनम्ने के लोगों ने मुना, मटन दा को मालरशिप मिली है। हम सभी परसदा के पर पहुपे । बटन दा को साप्तापि मिसना एक तरह से हम लोगो की ही उपसम्पि पी। मटस दा मोरम्ने के गौरव पै । बदामतस्ता स्कूल के किमी सरके को पहली बार सातर- ।

शिप मिली थी, पर घर जाकर हम लोगों ने सुना, अटल दा घर पर नहीं हैं। अटल दा के पिताजी आशु वाबू बोले-वह तो कल रात से ही घर नहीं लौटा है। अटल दा घर नहीं लौटे हैं, यह सुनकर हम लोगों को बहुत ताज्जुब हुआ था । अटल दा फिर सारी रात कहां रहे ? क्या वह इसी तरह सारी-सारी रात घर से बाहर ही बिताते थे ? दूसरे दिन अटल दा गलब में आए। चेहरा सूखा और उदास, बाल ' विखरे हुए। पर खेलने के लिए तैयार होने लगे। हम लोगों ने उन्हें घेर लिया । अटल दा को स्कालरशिप मिली थी, यह कोई मामूली बात नहीं थी। वदामतल्ले के इतिहास में ऐसी घटना पहले कभी नहीं घटी थी। उसी अटल दा को हम लोग अपनी आंखों के सामने देख रहे थे, यह क्या हमारा कम सौभाग्य था ! अटल दा ने पूछा- क्यों रे, इस तरह क्या देख रहा है ? अव तक मैं संकोच में पड़ा था, पर अब और अपने को नहीं संभाल सका। पूछा---अटल दा, कल तुम घर पर नहीं थे ? अटल दा बोले-हां, रात काफी हो गई थी, इसलिए घर नहीं लोट सका। -~~ रात को हम लोग तुम्हारे घर गए थे। कहां थे तुम ? अटल दा बोले-भवानीपुर । इस संक्षिप्त उत्तर से मेरा कुतूहल मिटा नहीं। पर यह पूछने की हिम्मत भी नहीं हुई कि भवानीपुर में अटल दा कहां जाते थे। भवानीपुर कलकत्ता में किस तरफ था, वहां अटल दा को इतना क्या काम रहता था कि इतनी रात हो जाती थी ? कि अटल दा घर भी नहीं लौट सकते थे-ये सारे प्रश्न मेरे दिमाग मे गूंज रहे थे, पर अटल दा इतने ऊंचे आदर्श के व्यक्ति थे कि उनपर मन में किसी प्रकार का सन्देह लाना ही दुप्कर-सा लगता था। अटल दा हमारे क्लब के सेक्रेटरी और मोहल्ले के गौरव थे। हम लोगों को विश्वास था, अटल दा कभी कोई गलत काम कर ही नहीं सकते। १२ उम्र में बटन दा मुझमे पहा य? नहीं थे। बसवल एक-दो सम्स; पर उनका पतिरप गगनगुम्वी था। उम्र न भी हो, अपने व्यक्तिमय गे यह गरसो पछार देते थे। कुछ दिनों राद पता चला कि भवानीपुर में यरस दा को क्या पाम रहता था । भवानीपुर में भी अटला का एक लय पा ! यहाँ यह गरीबों के बच्चों को पाते थे। वहां उन्होंने एक साध्यकालीन स्मन की स्थापना की पी। वही निमी को हैजा हो जाने की वजह से, दो दिन तक मटन का उमदी मेवा करते रहे, पर फिर भी उम सरके को नहीं बचा पाए ध उस दिन मैं मुग्ध नपनों में मटन दा को देखता रहा पा। गितने विचित्र पे यह-पारों तरफ उनकी सजग दृष्टि पती, मौन मेया में सगे एते । प्रसंसा के भूगे नहीं, प्रचार का लालच नहीं। मेरी तरह और सोग भी बटल दा को मुग्ध नयनो से देखते रह जाते। अटस पा देसकर, पकित होकर पूछते -इस तरह क्या देयता है रे? पटन दा के पिताजी भाशु माबू बहुत सम्पन्न व्यक्ति नहीं पे । मंगरी- सी गसी में एक पुराना-मा ममान था । याहर टमी दीवार थी। उगपर से वासू मरता रहता; पर यह जी मकान हम लोगों के लिए निमोतीपं. स्थान से कम नहीं था । उसी मकान के एक कमरे में एक सप्तपोश पर पदाई विछी रहती । मेल्फ पर ढेर सारी फिनावें अपी रहतीं। बाद में जिन वर सेराको मोरितायें मैंने पढ़ी थी, न मा नाम पहले-पहल मने अटत दा से ही मुना था। मुझे लगता- हमारे बदामतले के हेर. मास्टर सुरेग मात्र भी जो बात नहीं समझ. सरते, वह अटप्न दा समझ जाते हैं । दीपाल पर तरह-तरह के घाटं टंगे हुए थे। उसगी कसरी गे एक रिंग सटकता था।इम रिंग के सहारे अटम दा रोसरत करते। मुबह-सुबह उठकर मुंह-हाप पोकर अटस दा व्यायाम में जुट जाते, फिर पोती देर साध्यान लगाए बैठे रहते। हम मोगों में भी यह पामर म्पान मगाने के लिए पहा करते। हम लोग पहले -प्यान से सगा ? मन्त्र-मन्त्र तो हम एर मालूम ही नहीं। पटता यह मुनकर हम पाते। बोगटे-प्यान मगाने के लिए मात्र मी जरूरत परती है. यह तुममे सिने पहा ? # - पूछता-तो फिर ध्यान लगाकर क्या सोचूंगा? अटल दा कहते. दीवार पर पेंसिल से एक गोल निशान बनाओ, फिर उस तरफ एकटक देखते रहो। पलकें भी मत झपकाओ। यह देखो-ठीक इस तरह। कहकर वह तस्तपोश पर विछी चटाई पर पद्मासन लगाकर बैठ जाते और दीवार पर टंगे पिचवोर्ड पर लाल निशान की तरफ स्थिर दृष्टि से देखने लगते। थोड़ी देर के बाद बोलते-पहले पांच-दस सेकण्ड तक ताकना, फिर एक-दो मिनट करके समय बढ़ाते जाना । देखना, अभ्यास हो जाने पर बड़ा आसान लगने लगेगा। मैं पूछता-तुम कितनी देर तक बिना पलक झपकाए ताक सकते हो, अटल दा? अटल दा बोलते-बहुत अच्छी तरह तो मैं अब भी नहीं कर सकता हूं। कठिन काम है, अभी भी अभ्यास की जरूरत है। मैं पूछता---यह सब करने से क्या होता है ? अटल दा बोलते-~-मन की शक्ति बढ़ती है, विल-पावर बढ़ता है। चार-पांच दिनों तक बिना खाए-पिए भी रहा जा सकता है तबीयत 'पर कोई असर नहीं होगा। चाहने पर कोई घण्टों समुद्र में भी डूबा रह सकता है। -तुम घण्टों पानी में डूबे रह सकते हो अटल दा? अटल दा हंस देते। बोलते-घत्, इतना आसान है क्या? यह दिन का काम थोड़े ही है। वो साधना करने पर सिद्धि प्राप्त होती है। सिद्धि मिल जाने पर देखना, मोटी से मोटी किताव भी एक बार पढ़ने से कण्ठस्थ हो जाएगी। तेरी आंखों से एक ज्योति निकलेगी। तेरी इच्छा के विरुद्ध कोई कुछ नहीं कर सकेगा। जिससे चाहे अपना काम करवा ले । इसीके बल पर तो मैं इम्तहान में फर्स्ट आता हूं। मैं तो ज्यादा पढ़ता नहीं, पर दूसरे लड़के पचास वार पढ़कर जितना याद करते हैं, मैं एक ही बार पढ़कर याद कर लेता हूं। मैं कहता--मैं भी तुम्हारी तरह करूंगा, अटल दा। अटल दा बोलते-कर तो सकता है, पर इसके लिए ब्रह्मचर्य का पालन करना होगा । ब्रह्मचर्य-पालन किए बिना कुछ नहीं हासिल हो एक । १४ - गरता। उस्टे बाळ या माती है। यह मुनकर मैं तो हैरान रह गया । पूछा-टाटेरा यारत पा मरती है? -ब्रह्मचर्य-मालन रिए बिना मगर गई प्यान मगानेसो पोमिस करता है, तो हार्टफेल हो जाने की सम्भावना रहती है। अटन दासी यात्र मनकर मैं यहत हर गया था। पटल दा बोलने गए-एपदम वेमौत मारा जाएगा। शिनने सोग म तरह से मर गए हैं-क्तिनों को लरथा भार जाता है। फिर मारी जिन्दगी अपंग होकर गुजारनी पाती है। मैंने पूछा-ब्रह्मवयं का रिम तरह से पालन करना पडेगा अटन दाबोने-मिली औरत की तरफ दिन्नुस अगि नहीं उठाना । नारी-जाहिको मां मममला । तुम्हें स्वामी विरानन्द पी लिगी एर किताव पाने के लिए देगा। उन्हीरी रिनार पाकर तो में रखना कुछ सौरा मका हूं। यो अजीब आदमी पे यह विवेकानन्द । एक सर निमी रितार पर मान दौड़ा मते, यस पूरी रिताप ही कष्टस्य हो जाती। पर यह कभी स्टार-पियेटर वानी माक में गउरे भी महीं। मैंने पूछा-पों? --तुझे मालूम नहीं, पियेटर मा मतलब ही है, औरतों का महा। पटन दा के कमरे में घटकर मुझे बहुत बार अपने पर ही गेर होता। सगता, पढने में, निपने में, स्वभाव-परित्र में मैं मे पटमदा की तरह यनू । यह भी एक ममय पावर क्लब रे मारे मरो बटम दा बनने के स्वप्न देशापरते हैं। उन दिनों हम लोग अटस पीही घरह बात एंटवाते। उन्हींशी तह धोठी-नुत्तां पहनते । मैंने तो अपना पड़ने पमरा भी अटन दा की ही तरह पा र रगा था। उन्हीरी देयादेगी न्यूट हैमसन से रिवार, हामले की रितार, दमन, बना मा आदिकी रिता गरीदमी पायाभी विरानन्दा शिमो. मेवर तया ब्रह्मप पर लिपी उनसे पिताव पासर ममम गया पाकि ब्रह्मचर्य रितनी स्टोर पीर है। अटन दा रहते~मन में युरी भावना माने पर मारो पार करना, और देख, शरीर हमेशा तन्दुरुस्त रखना | शरीर यदि ठीक रहेगा तो मन कभी भी नहीं भागेगा। कभी किसी दिन सुबह जल्दी नींद खुल जाने पर मैं अटेल दा को बुलाने के लिए चल देता। सोचता हो सकता है अटलं दा अभी तक सोए पड़े हों। जाड़े का मौसम-नाक-मुंह कम्वल से ढककर घर से निकलता; पर अटल दा के घर पहुंचकर खिड़की से झांकता तो ताज्जुब में पड़ जाता । अटल दा उस समय भी बिलकुल तैयार दिखते। उस भयंकर सर्दी के मौसम में भी दाढ़ी बनाना, स्नान, पूजा-पाठ आदि समाप्त हो चुका होता। लालटेन जलाकर कोई किताब पढ़ते होते। आज याद कर सकता हूं कि सुबह उठने के मामले में हम लोग कभी भी अटल दा को नहीं हरा पाए थे। धीरे-धीरे अटल दा की और भी तरक्की हुई । कालेज की परीक्षा में वह प्रथम आए । पहले की तरह अव उनसे मेंट भी नहीं होती थी। अटल दा का कार्यक्षेत्र वदामतल्ले से बाहर दूर-दूर तक विस्तृत हो गया था। कव वह कालेज जाते, कब लौटकर आते, हमें मालूम ही नहीं चलता । कालेज की छुट्टी के बाद घर लौटकर रोज़ हमारे क्लव में उनका आना अव सम्भव नहीं था । अपने घर पर भी वह समय पर नहीं लोट पाते। कभी-कभी मैं पूछ लेता-कल कहां थे अटल दा? -~-~एक मीटिंग में फंस गया था । अटल दा जवाब देते। रोज़ ही अटल दा किसी न किसी मीटिंग में फंस जाते। बीसियों काम रहते उन्हें । वास्तव में अटल दा एक कर्मरत पुरुप थे। अटल दा जैसे आदमी सिर्फ हमारे क्लव को लेकर माथा-पच्ची करें, यह कैसे हो सकता था ! पर अटल दा यह ज़रूर कहते-मैं क्लव में नहीं आ सकता, पर तुम लोग अपना काम करते रहना, अवहेलना नहीं करना । हम लोग पूरे मन से क्लव की तरक्की तथा अपनी तरक्की पर ध्यान देते, क्योंकि मन में ऐसी धारणा वैठ गई थी कि अपने काम का मतलब - ६ वे-१

अटल दावाहीमाम करना था।
किमी-तिमी दिन अपातर ही स्टम दामात्र में मा माते, हिर
पई-कई दिनों तक बिलास गायब रहते। दिन सब में मुबह र
पर नहीं जा सका था। बटन दायोल गए दिन पाम बितरण
समय नहीं है। बमल में यटन दा बक्षमतलं को मायरो पानी
घन ही परिज के दोनों के माय मिसरर नव-नामों में न
रहते। उस माल हम मांगों को भी हाई मन की परीक्षा दी। मैं भी
मन लगाकर पाने में जुट गया । धामी-कमार मपानर मेंट हो जाने पर
घटन दा पाकर पूछने-कों, कमो पढाई पल रही है ?
मैं बहला-बहुत हर लगता है, पटना।
-~-हर परे, हर किम वाता?
मैं बहला-तुम्हारी वरह का न मेरा पोडे ही है।
बटल दा बोलते-जैन क्या भगवान कभी किमी देता है !
न तो स्वय बनाना पड़ता है। तभी तो कोई कुछ हामिल र सरता
है। कठोर ब्रह्मचर्य की बावश्यकता है। फिर कोई भी यापारा
नही रोक मरती । एक बार जो चीज पदेगा, मन पर उतर जाएगी।
उम नियम का पालन करता है न?
-~-कौन-मा नियम?
-प्यान लगाने के लिए कहा था न !
मैंने कहा-कौगिरा तो करता हूं. पर रोज नियम में बंट नहीं
पाठा : मुबह भाप्त ही नही पलती।
अटल दर ने पूछा-रोज कितने पटे मोता है ?
में मनकार भी अनमती कर गया । बाद में बटन दा के मामने जाने
में भी और मंकोच में गट जाता। अपनी गति और मामी
सीमा पर ग्लानि होती । पटल दा एक जोनियम थे । उनके मागे हम
सोगों को क्या गिनती दमदग वार एक ही पेज को बचाया परने पर
मी बार नहीं होता। गणित का हल निरानी में मिर का मीना समीन
को गोला पर देवा । हम लोगो की बदा सामना? महक धनते नौ
मन्दर मुबहा दोगा और मन सुग्न्त मनाहम मांगो पर ममम मौर

ब्रह्मचर्य की शिक्षा व्यर्थ हो जाती। अक्सर अपने को धिक्कारता कि अटल दा की तरह पिसी सुन्दरी को देखने पर उसे मां के रूप में क्यों नहीं सोच सकता? जानता हूं कि हम लोग कमज़ोर हैं, हमारा मन भी उतना ही कमज़ोर है । एक दिन रात को मोटी वितायें हाथ में लिए अटल दा को तेज कदमों से घर लौटते देखा । मुझे देखकर वह चौंकाकर रुक गए। बोले-इतनी रात को वहां गया था रे? मैंने कहा-दवा लाने डाक्टर के यहां गया था, पिताजी की तबीयत ठीक नहीं--पर, इतनी रात गए तुम कहां से लौट रहे हो, अटल दा? अटल दा बोले-घर लौटने में तो मुझे रोज़ ही इतनी देर हो जाती . है -पर, इतनी रात अटल दा? रात के नौ बज चुके हैं। अटल दा बोले-किसी-किसी दिन तो इससे भी देर से. लौटता हूं। ----लेकिन क्यों ? इतनी देर तक रात को कहां क्या काम करते हो, अटल दा? अटल दा अत्यंत सहज भाव से बोले-इधर मुझे भवानीपुर से एलगिन रोड भी जाना पड़ता है । लड़के छोड़ते ही नहीं, उसके बाद लाइब्रेरी जाता हूं । एशियाटिक सोसाइटी की लाइनरी में काफी समय लग जाता है। फिर थोटा रककर बोले-देख न, ये तीन किताबें ले जा रहा हूं। आज रात को खत्म करके कल सुबह लौटाने का वादा भी कर चुका हूं। सुनकर मैं हैरान रह गया। इतनी मोटी-मोटी तीन कितावें एक रात में ही अटल दा कसे पढ़ पाएंगे ! कव तो पढ़ेंगे और कव सोएंगे? मैं जानता था कि अटल दा की स्मरणशक्ति और पढ़ने की क्षमता असाधारण है, तथापि वदामतल्ले के लोगों की धारणा थी कि आशु नाबू का लड़का अटल वदामतल्ले का गौरव बढ़ाएगा । मैट्रिक में स्कालरशिप मिली है, इण्टरमीडिएट में भी मिली है। जब तक कालेज में पढ़ेगा, शायद मिलती ही रहेगी । यह लड़का कभी बदामतल्ले को बदनाम नहीं कर सकता । और सच में बी०ए० में अच्छा रिजल्ट करको अटल दा ने साबित कर दिया कि वाकई वह बदामतल्ले के होनहार लड़के हैं। यद्यपि यह - आज इतने दिनों ये बाद उन दिनों की यात मोचरर मुझे हमी पाती है। बाग फे उन दिनों में ईम्वरचन्द्र विद्यासागर से पर महामनीपियो नै जो पुछ पहा पा, उमे पडरर मे ब-यारय मानता पा। उस समय नहीं जानता था कि पड़ने-लिगने में फार्म माना और तबला बनाने में फस्र्ट माना एक ही चीज है। उस समय तो यग, जानना था कि जीवन में मगर उन्नति करना है, प्रतिरत होना है, तो पढाई में पटं माना ही है। विद्यार्थी जीवन में कभी मुझे मालगिर नहीं मिली। गापारण तौर से परीक्षा पास करने में ही जान निकल जाती थी। इसलिए यह भी जान गया था कि जिन्दगी में हम सो का बुध नहीं होने का । सारे जरमात अटल दा के ही प्राप्य है । वन में हो पयो, मारा बदामतन्ना यही सोचता था । लोग प्रांगा-भरी नजरों में परम दा यो देगते । मापम में परने-रितना अच्छा सका है। किमी प्रमारवाय नहीं, पमन्ड नही। विद्या में पितनी प्रतिष्ठा पाई है, फिर भी कमा मोटा स्वभाव है । युए माली के याद तो यह लासी में लेगा। भागु बाबू का मान बढ़ाएगा । बदामती सागौग्य यनेगा। पाना-निपना ही जय इस दुनिया में ज्ञान एप प्रतिष्ठा को मात्र सगोटी है. फिर तोमटन दा का बहना ही क्या । मोरगर के कई हितंपी याग वायू को मार रहत-बाप अपने सहरसोवियत भर दोरिए । बैरिस्टरी पड़ माएगा। दूसरा पहता-रसी भैज दीजिए, इन्जीनियरिंग की पढ़ाई मधी सीमग मढ़ता-पंमा तो साक्टरी में ही अधिक मा मना है, और मम पूपा जाए तो देश में अच्छे टारटर है ही पिनने ? आग बाद बोसो-मैं क्या यह सरता हू, माई ! महमेसोपाई में मुमतो अभी तक एक पंगा भी नहीं गचंना पराअपनी स्यालर- गिपरे पंगो से ही अटल ने पाई-तिसाई की है । इसलिए उमरात्रिम तरफ भी रुझान है, वह वही पढ़े-मैं अपनी तरफ से कुछ नहीं कहना चाहता। -~-लड़के का रुझान है किस तरफ ? फिसीने पूछा। नारा वाचू बोले-उसकी इच्छा तो कालेज में पढ़ाने की है। -लेकिन प्रोफेसरी से आखिर कितना कमा सकेगा? यह उस समय की बात है जब हम लोग आई० ए० पास करने के बाद वी० ए० में पढ़ रहे थे। अचानक ही एक दिन सुना, अटल दा की पादी होनेवाली है। अटल दा तव तक एम० ए० की परीक्षा में फस्ट पलारा फस्र्ट आकर विलायत जाने की तैयारी कर रहे थे। अटल दा की शादी की खबर पारों तरफ पलते ही लोग खुशी मे मारे झूम उठे । सुनने में आया, लड़की अलीपुर के रईस घराने की है। उस आलीशान मकान को दूर से कई बार हम लोगों ने देखा भी था। यह भी सुनने में आया फि बड़ा बाजार में लड़की के चाप का लोहे का कारोवार है । परिवार छोटा है। पति-पत्नी और गालोती बेटी । चूंकि अटल दा गुणी और अच्छे लड़के थे इसलिए गरीब होने पर भी लड़की के मां-बाप अपनी लड़की का यह रिप्ता पारने में नहीं हिचकिचाए। अटल दा के विलायत जाने का खर्चा भी लएपीवाले ही दे रहे थे। बाद में उनके बाद उनकी सारी सम्पत्ति के उत्तराधिकारी भी अटल दा ही बनते। सच ! मनुष्य के जीवन में नव निरागा भाग्योदय होता है, कोई नहीं पाह सकता। न अटल दा ही कुछ जानते थे और न उनकी पत्नी को ही कुछ मालूम था । वदागतल्ले के लोगों को भी गुछ मालूम नहीं था, न हम लोग ही कुछ जानते थे। २० घटना पटल दाधीशादी के दिन घटी। इन्दुलेगा देवी यी दरग्यास्त, उसमा पेहरा, मांग में सिन्दूर और सिर पर आंचल ने मुझे हतप्रभ कर दिया था। दुनिया में इतने लोगों के रहते हुए भी उसकी दरस्वास्त पर निर्णय का भार मुझ पर ही पल- सच में यह भी एक आश्चर्य की यात थी। अटल दा का निर्णायक मैं कैसे बन सकता था! में अटल दा का भाग्यनियन्ता बनूगा, मह भी एक अजीव परिहारा पा।माज मगर अटल दा सामने होते तो मैं उन्हें समभा-युमा मेता। इम प्रचार के परिहास का आमिर मयं क्या है ? क्यों ऐगा होता है ? अटल दा में किस चीज की कमी थी ? प्रतिमा? प्रतिष्ठा ? शुद्धि याज्ञान- किस पोज़ का अभाव पा उनमे? मागिरी पार जय मैं मटस दा से मिला था, मेरी अरों गीली हो उठी पी 1 अटप्स वा का अटूट स्वारप्प टूट चुका था । हातीको एक-एक हदी गिनी जा सपती थी। पाटशिला के टीन के एप्पर वाले मकान के बरामदे में बंटकर मटल दा एक बटोरी में मुशीसा रहे थे। मुझे देगकर अटा दा शुभ होफर योले-सूसो अब बड़ा आदमी चन गया है रे ! या नाम हमा है सेरा। इससे मुझे महीमा मैंने पूछा-पर तुम्हें पपा हो गया है. अटल दा? अटल दाने पहा-पो ? छ भी तो नहीं। मैंने कहा-गुम्हारी सेहत इस कदर करी रिग गई? पटन दायोले-मह मुछ नही । मेरा मन नहीं टूटा है रे । मन हो तो सब कट है। -तुममे हम लोगों को भी माता पी, पटना। तुम हमारे गौरव थे। तुम महान यन सरते थे...

अटल दा मुड़ी फांकते-फांकते रुक गए। फिर पुकारा-अरी ओ सुनती हो ? कहां गई? मैं आस-पास ताक रहा था। अचानक कमरे के अन्दर से अटल दा की पत्नी निकल आई। अटल दा बोले--तेरी भाभी है । पर छुओ मेरा मन तिक्त हो गया। इसे प्रणाम करना पड़गा। मैंने उसकी ओर आंखें उठाई। काली, दुबली-सी लड़की । हाथ में सोने की दो चूड़ियां । मुझे लगा, खाना बनाते-बनाते रसोई से उठकर भाई थी। मिल की एक मोटी साड़ी बंधी हुई थी। मैंने हाथ उठाकर प्रणाम किया। बटल दा ने अपनी पत्नी से कहा- इसका नाम सुनने पर तुम पहचान जाओगी। हमारे बदामतल्ले का लड़का है। यहां किसी साहित्य- सभा में सभापति बनकर आया है। फिर मुझसे पूछा-मुड़ी खाओगे ? गरीबी के कारण नहीं, मैली साड़ी या टोन के छप्पर के लिए भी नहीं, सही कारण क्या था इतने दिनों बाद भी नहीं कह सकता, पर मुझे लगा था कि इनकी ऐसी हालत में मेरा न आना ही शायद ठीक होता। मेरा मन अटल दा को ऐसी स्थिति में देखकर रो उठा था। बदाम- तल्ले के सभी लड़कों को आदर्श अटल दा घाटशिला में एक मास्टर वनकर गुजारा कर रहे हैं—यह देखकर भी यकीन नहीं पाता था। अटल दा क्या नहीं बन सकते थे? कितनी सम्भावनाएं थीं उनमें ! उनका ससुर धनी था। काफी पंसों के मालिक बन सकते थे, अटल दा । आखिर बड़ा- बाजार के लोहे के कारोबार के उत्तराधिकारी अटल दाही तो थे। फिर क्यों बटल दा को सब कुछ खोना पड़ा। यह क्या सिर्फ उनका दुर्भाग्य ही था ? और कुछ नहीं ? पर, अटल दा की शादी के पहले दिन तक किसीको कुछ मालूम नहीं था।

हम लोग भी वैसयर थे। हापरीन लिगने के कारण तारीग नहीं पता माता, पर पारो, गादीको गत वदामसम्ले के करीब सभी सोग भोज में शामिल होने के लिए दोरे थे। पनी पर मे गादी-नौबत, वाजा, पंड पार्टी, ननाई गभी एकगाय यज रहे थे। गहन पूनों को माला मे गगाई गई पी। पतार में मोटरगाष्टियां गढी पी। हम मुठ महफे यराती थे। बदामाले में अलीपुर ज्यादा दूर नहीं । हम मोग बम में मोर मचाते, गली गे उपलने हए पहुऐ थे। अटल दा भी गाड़ी में यर वनकर, फूलमाला पहने, मेहरा वाघे, सजे-धरे बैठे थे । साप ही आशु यायू, पुरोहित और मई अन्य सरजन भी थे। पर मुझे ऐमा सगा, जंगे अटल दा थोडे पबराए हुए याग यायू धोन-अटल नाराज हो रहा था । मह रहा पा इसना दिसावा करने की क्या जरूरत थी! अटल दा अपनी शादी के पहले दिन तक अपनी शादी के बारे में पुष्ट नहीं जानते थे। यह रांची गए हुए थे। रापी से उन्होंने हमें एक चिट्टी भी लिपी यो। चिट्टी में उन्होंने लिया पा~-अपनी जाति की ऊपर उठाना पड़ेगा, अपनी कमजोरियो पर वायू पाना होगा। हमारी रोटेदी हो गई है. इगे मोषी करना होगा। देश के नययुयर यदि मोष्ट न हो तो हम बिलकुल पीछे रह जाएगे । दूसरे देश इतनी तरी कर रहे हैं। तुम भी यादमी बनो। वचन और फर्म में एक रहो । महो तुम मोगों मे दूर रहार मैंने अनुभव दिया कि यहा के लोग तिने परिश्रमी हैं, कितनी एपता है इनमे । हमम इगी पीज की कमी है। में मोटकर आऊगा तो नये सिरे में पलय को व्यवस्थित करगा। हमे नगरी सोचना पड़ेगा, यदि प्राप्त शिक्षा पो हम गायन पर समें तो जीवन प्पर्य है। और भी यहत-गी याने अटल दा ने लिगी पों। मैंने पूछा पावल तो तुम्हारी शादी है, अटन दा? -सादी? अटल दा मानो पोक उठे। फिर अनमनी और मकान के पन्दर चले गए। उसके बाद मकान के अन्दर या भा, पर, मुझे मालूम नहीं। हम लोग तो सिर्फ गादी वाले दिन मर-पार ! बाती बनकर भोज के लिए चल दिए थे। जाते ही वर्दी पहने हुए वेयरों ने हमें एक-एक गिलास गरवत पाड़ा दिया। एक-एक वेयरे के हाथ में एका श्री। किसी में पान, किसी में सिगरेट-दियासलाई, किसी ट्रे में आइसक्रीम थी। बदामतले के प्राय: सभी लोग मौजूद थे। आशु वावू के इकलौत लड़के की शादी थी, इस खुशी में वह सबको शामिल करना चाहते थे। लड़की वाले धनी थे, दस-बीस लोग ज्यादा भी खा जाएं, तो उन्हें फर्क ही क्या पढ़ता ! अटल दा को कीमती गलीचे वाले सिंहासन पर बैठाया गया। वह और भी सुन्दर दीन रहे थे। सभीकी मांखें बार-बार अटल दा पर ही पद रही थीं। पुगप हो तो ऐसा ! सिल्क का कुर्ता पहनकर अटल दा मानो सभा की रौनक बढ़ा रहे थे। थोड़ी देर में अटल दा को मण्डप में बुलाया गया। पहले जयमाल की रस्म पूरी होनी थी-फिर कन्यादान । शंख बजने लगे। शादी शुरू हो गई । इसी बीच हम लोगों को खाने के लिए बुलाया गया । मकान से लगे बगीचे में टेबल-कुर्सियां लगाई गई थीं । चाप, कटलेट, तरह- तरह की मिठाइयां, पूरी, भाजी, खाने की विविध सामग्री वहां भरी पड़ी थी। अटल दा के ससुर पैसेवाले आदमी थे। जिस तरह अटल दा पर हम लोगों का अधिकार था, उसी तरह उनकी ससुराल पर भी था। बड़े- बड़े गरम पाटलेट हम लोग एक ही बार में निगलते जा रहे थे। अटल दा इतने बड़े मकान और इतनी विशाल सम्पत्ति के मालिक बनेंगे, मोहल्ले वाले इसे हक्का-बक्का होकर देख रहे थे । देखना वाजिव भी था। ऐसा पुर-भाग्य कितने पिताओं को प्राप्त होता है ? अटल दा का सौभाग्य हमारा ही सौभाग्य था। अब अटल दा के साथ-साथ हमारे क्लव के भी दिन फिर जाएंगे। क्लब का अपना मकान होगा, क्लब के मेम्बर भी बढ़ जाएंगे । बदामतल्ले के अलावा भवानीपुर, कालीघाट, एल गिन रोड के लड़के तक आकर हमारी खुशामद करेंगे कि हम उन्हें इस क्लब का मेम्बर बना लें। खाते-खाते हम राव गे ही बातें सोच रहे थे कि - अचानक २४ अचानक बन्दर में बड़ा औरगन मनाई पहा । ग्मिी ने रिमोसो चिलाकर पुजारा। विवाह-माप में मंगल-दांग बज रहा या, पन्यादान से राम पूरी होने ही यानी पी कि गोरमारा के कारण एकाएर सब कुछ टम पर जो लोग माना परोग रहे थे, ये ही देते-दने पर गायब हो गए, फिर लौटकर पाए ही नहीं। कमल दा ने सात-सात पहा--बरे, मिठाई सब कहा गई? नी मिटाश्या बनी पी? विशु दा ने पहा-अन्दर से न जाने पिम याउमा पोरगुन मनाई पढ़या है। हमने अमीता उम तरफ ध्यान ही नहीं दिया था। पानी में तोहल्ला- गुल्मा होता ही है, नहीं तो लगता ही नहीं मिलादी हो रही है। रितने लोग-बाग, अतिपि, रिस्ते-परिवार वाले, बरातो-गोर नहीं होगा तो क्या होगा! पर हमलोग साने की पंगत में मंठे ही रहे। न वोगोई कुछ देने ही माया और न ही पूछने। अटन दा के पितात्री भाग यार को मैंने दूर में मावे देगा । माग पायू यो उत्तेजित लग रहे थे। उनके पीछे-पीई पृष्ठ मोग मोर भी जमी सरफ जा रहे थे। हम लोगो के गाय साने वालों में मेन बने उठकर उनसरी तरफ पल दिए। हम लोगों को भी लगा, यम मय उटना पाहिए। विग दा योले-अवे पल उठ । देखें तो आगिर मामला क्या है। लगता है कोई मामूली बात नहीं। हत्याराम मोग टट पहुए। मास परपर का बना पासीमान मरान रोपनी से जगमगा हा था। मकान केटीर गामने बगीचा पा! बगीच मे निरखते ही पोटिको, और पोटिको मे सगे ही ऊपर राने की मोटी थी। सारा मान पलों । से सजा था। वातावरण खूशबू से भरा था। औरों को देखादेखी हम लोग भी सीढ़ी के ऊपर चढ़ गए। सभी उत्तेजित, घबराए हुए-से थे। विशु दा वोले-मामला जरूर कुछ सीरियस है । सामने जाऊं भी कैसे ! भागे तो खचाखच भीड़ है। किसी तरह भीड़ में से हम लोग आगे निकल ही गए। हाल के दरवाजे के सामने भीड़ थी। कमरे के अन्दर से हवन की सुगन्ध आ रही थी। मुझे लगा मटल दा की भी आवाज़ आ रही थी। उसके साय ही किसी औरत की आवाज़ भी सुनाई दी। मुझे बड़ा कुतूहल हुा । मैंने भीड़ में धक्कम-धुक्की कर कमरे के अन्दर जाने की कोशिश की। विशु दा बोले-तुम लोग मेरे पीछे-पीछे चले आओ। कमल दा भी मेरे पीछे-पीछे आए। अन्दर झांकते ही मैं हतप्रभ रह गया। कन्यादान की रस्म तव तक शायद पूरी नहीं हुई थी। हवन के सामने लाल बनारसी साड़ी पहने नई दुल्हन अटल दा के हाथ पर हाथ रखकर बैठी थी। पुरोहित मन्त्र पढ़ रहा था। लड़की के पिता टसर सिल्क के कपड़े पहनकर कन्यादान कर रहे थे। आशु बाबू सामने खड़े थे । और हम लोगों ने देखा, सबके सामने एक और भी लड़की खड़ी थी। उसके भी सिर पर आंचल था । एक सूती साड़ी पहन रखी थी। हम लोग सिर्फ उसके पीछे का ही हिस्सा देख पा रहे थे । चेहरा नहीं दिखाई पड़ रहा था। । . । हम थोड़ा किनारे पर सरक आए । अब पूरा चेहरा दिखाई पड़ रहा था । सिर्फ चेहरा ही नहीं, मैंने झटके में उसे आपादमस्तक देख लिया। उस लड़की के दोनों हाथों में एक-एक चूड़ी थी। कानों में मामूली- से सोने के झुमके । पतली काली-सी वह लड़की विवाह-मण्डप के सामने खड़ी थी, पर उसकी आंखों से मानों आग धधक रही थी। मैंने पूछा-यह लड़की कौन है , विशु दा? विशु दा बोले-~-चुप रह ! सुनने भी दे । लड़की बोल रही थी-यह मेरे पति हैं। २६ माग मा बौन-कौन तुम्हारा पति है ? अटर ? -गो! उनके गाय मेरी मादी हुई है। -मादी? आग यार भनक रहे। पारे भोमाग माम मा जिन्हें गामा करने याज सर मामले में रिली बादमी ने नही देगा पा । तुरन सपने को गंमानकर उन्होंने पहा-या. तुम पर को हो येटी गुम कौन हो? सपी योनी-मेगे यातायीन महीनो रन्हीं गे पूष्टि? थागू या योरेगमे पगें पूना पदेगा? अपने सर को नहीं जानना ? मैंने पर उमरी शादी की पो मि तुमसे उमी गाती हो १ सरसी योलो-गादी बापने नहीं की थी। हम लोगों ने भी पी। तुम लोगों ने शादी की है? -हो मी है । विस्याम न हो तो आप अपने येदे गे पूटिए ! अब नई पुरन के पिता भी मप मे दर गए । योल-गुम रिगती सामोहो? यहाँ पारने या हो। मी योली-आप लोगों ने मुझे पर नहीं पहुंचाई है।गयर पार में स्वयं यादोटी वाई। र, म ममय मोबाई? अब तो मेरी बेटी मायगी पानी हो भी गई है । पहो यार भयो नही पहा ? -पररे पंग आती ? आप मोगों ने मुझे गवर टीभी का? पन्या-पस वाले हंगपरे । बोने--अजीर यात परती। तुम रग गोनती होरिपरले मालूम रहता तो तुम्हें मृधित नहीं करते? भान याय भी नग्म परकर योगे-बेटी, धय गुम हो ग गामी ! सुम्हें जो पुछ गला बटल को पनपारर आना। पम पहाग गरी विदा होगी। अदा नई दुल्न के माप घर ही वाएगा। महीं था गुम उगने पद गमन-बुझ लेना। महती योगी मैं मरता प्रतीसरा नहीर मरतीx" उनमे निन्दगी। दुमन के तिा पर अपना ये गो मंठे। बोले-हमारा पता . । .

- -- शुभ काम में ! सीधे ढंग से नहीं मानोगी, तो हमें दूसरे तरीके अपनाने पड़ेंगे। लड़की भी आपे में नहीं थी। बोली-जो चाहे कीजिए । मैं भी देखना चाहती हूं कि आप क्या करते हैं । कन्या-पक्ष वालों ने अव आशु वाबू से पूछा-क्यों समधी, क्या किया जाए, आपकी क्या राय है ? आशु वावू ने उस लड़की को समझाकर कहा-क्यों हंगामा कर रही हो, बेटी। अभी-अभी तो कन्यादान समाप्त हुआ है- अभी भी कुछ रस्में बाकी हैं । समधी दिन-भर का भूखा-प्यासा है, तुम चाद में आना। तुम्हारी बात मैं ज़रूर सुनूंगा। हाथ जोड़कर मिन्नत करना ही आशु वाबू के लिए वाकी रह गया था। पर लड़की अचल-अटल पत्थर की तरह खड़ी रही। दुलहन के पिता ने गरजकर सिपाही को पुकाराबहादुर ! सारा मकान मानो कांप गया । इतनी गम्भीर आवाज़ थी उनकी। सारे बरातियों में एक क्षण के लिए हलचल मच गई । लगा, बस अब कुछ न कुछ होकर ही रहेगा। कन्यादान खत्म हो चुका था। पुरोहितजी ने शेष दो-चार बूंदें घी को हवन पर छिड़ककर अपने हाथ पोंछ डाले। हाल में बरातियों, रिश्तेदारों, मुहल्ले वालों, वहां रहनेवालों और न भी रहनेवालों की भीड़ में एक अजीव घुटनभरी स्थिति पैदा हो गई। न जाने क्या सर्वनाश हो-सभी यही देखने के लिए उत्सुक थे। दुलहन का कोई भाई नहीं था, तो क्या हुआ, उसके बाप के पास पैसे का बल था, आदमियों का बल था । उफ ! क्या भयावह दृश्य था ! अटल दा ! हमारे अटल दा की यह करतूत ! सिर्फ अटल दा ही नहीं उनके साथ-साथ हम लोग भी पत्यर बन गए थे । अटल दा की तरह हम लोगों के मुंह से भी कोई शब्द नहीं निकल रहा था। मैं उदास, विस्मित आंखों से देख रहा था, सोच रहा था । हमारे अटल दा, बदामतल्ले के गौरव, सभी छात्रों के आदर्श, उनके नाम पर इतना बड़ा कलंक ! क्या यह सम्भव हो सकता था ! गंगा में गर्दन तक डूवकर भी उनके नाम पर कोई कुछ कहे तो हम विश्वास नहीं कर सकते थे। कमल दा बोले-~~-यह लड़की जरूर किसी बुरे मतलव से आई है। !

विशुदा ने कहा- यहां से भगा देने में ही खेत सत्म । मुझे भी बड़ा
गुस्सा आ रहा था। यह सड़की अटल दाका पूरा जीवन बर्बाद करने पर
तुली है। ऐसी कुरूप, काती सड़की अटल दा की पत्नी नहीं हो माती।
सोचते ही धूणा से मितती आने लगी । और ठीक उसीके मामने बनारसी
साड़ी पहने, मन को आग से नई दुलहन बा लाल-लाल दिव्य चेहरा
मांसों के सामने सष्ट हो उठा । रितनी सुन्दर दिख रही थी वह !
भीड़ से भिनभिनाहट की आवाज आने लगी । मिनभिनाहट धीरे-
घोरे शोर में बदल गई । तरह-तरह की बातें सुनने में आ रही थीं।
कोई रह रहा पा-यह सड़की नम्बरी बदमाश है। बदमासी की
और कोई जगह नहीं मिली ?
--मारकर भगा दोन...
रिश्तेदारों में ने मिनीने महा-हम पुलिस में टेलीफोन कर रहे हैं।
दुलह्न के पिता के लिए ऐना अपमान बर्दास्त के बाहर या, उन्होंने
भानुभाव से कहा-समपी, आप ही बताइए, क्या करना चाहिए?
--आप मोड़ी देर और व्हर राइए, में एक बार फिर
सड़की को समझाकर कहता हूं।
वह लड़की अनमनी-मी चुपचाप पड़ी थी।
बाग, बाय बोले-बेटी, मैं अटल का याप हूँ। मैं रह रहा हूं.
सुम्हारी सारी बातें मैं क्त मूनूगा । अब तुम यहां से जा सकदो हो। यहा
पोर करने में कोई लाभ नहीं होगा।
लड़की बोली में यह शादी नहीं होने दूंगी।
आशु याच बोने-लेनिन सन्मान तो हो चुका है। कन्यादान का
मतलब ही है गादी हो जाना।
सहरी चोली-नहीं। यह मादी नहीं हुई है।
किसीने आप में कहा-तुम्हारे क्ले मे नहीं हुई? निकर यहां से !
आगु यादू शारे ने उसे चुप रहने के लिए बार बोरे-गादी
नहीं हुई है , बहने का मनत्र ?
सड़की बोनी-पोंक इसी वर के साथ पहो एक यार मेरो गादी हो
आमुवाबू बोले-
.

-कब हुई ? अव लड़की भी धैर्य खो चुकी थी। वोली-आपको सबूत चाहिए? आशु बाबू के घेर्य की भी दाद देनी चाहिए। बोले-~मान लिया कि तुम्हारी शादी हुई है। पर, तुम कोई सबूत दिखाओगी और मैं मान जाऊंगा, यह भी तो नहीं हो सकता। उसके लिए भी तो गवाह चाहिए, तुम किसकी लड़की हो ? यह सव भी तो हमें जानना चाहिए । लड़की बोली-मैं सब कुछ कहने के लिए तैयार हूं। -तुम्हारे तैयार होने पर क्या होता है। अभी हमारे पास इतना वक्त नहीं है। अभी तो वरातियों का खाना भी नहीं हुआ लड़की बोली---जो होना है वह आज ही तय होगा। कल की वात मैं नहीं जानती। -खैर । वताओ । क्या नाम है तुम्हारे पिताजी का? तुम्हारा गोत्र .. ? क्या है ? - । + लड़की भयंकर रूप से उत्तेजित हो उठी। बोली-देखिए, मैं गोत्र- वोत्र कुछ नहीं जानती। जानना भी नहीं चाहती । मैं सिर्फ इतना जानती हूं कि हम दोनों की शादी हुई है । मैं बहुत दूर से आ रही हूं । आखिरी क्षण में मुझे खबर मिली, इसलिए हांफती-दौड़ती-भागती आई हूं। मैंने अभी तक कुछ खाया नहीं है। खाना खाने का अवसर तो हमें भी नहीं मिला है । दिन-भर का उपवास है, यह तो मालूम ही होगा तुम्हें ? लड़की बोली-आप लोगों ने उपवास किया है या नहीं, यह तो आप ही बता सकते हैं । मुझे जानने की कोई ज़रूरत भी नहीं है । ---तो फिर बताओ, अव तुम क्या चाहती हो ? लड़की बोली-मैं उन्हें यहां से उठाकर ले जाऊंगी। अव आशु वाबू अपने को नहीं रोक सके। बोले--तुम्हारी यह हिम्मत !दुलहन के वाप के क्रोध का भी पार नहीं रहा । किसी रिश्तेदार ने कहा-पुलिस में फोन कर दूं, ताऊजी? इस मामूली-सी लड़की की हिम्मत देखकर हैरान हो रहा हूं। पर तब तक वह लड़की एक और तमाशा कर बैठी । अचानक वह अटल दा का हाथ परदकर बोली--सुम उठो, यहा में चनो । बदल या मर माए जिम तरह बैठे थे, उसी तरह बैठे ही रहे । उटने की नामित नहीं रह गई थी उनमें । मड़वी हाय पाहार बटन दा को मोचन न। योलो-इटी ! चलो ! चनो मेरे मार मुझे तुमने गवर तर नही दी? क्या सोचा था तुमने, कि मुझं कुछ माही नदी नगगा? असा हमा कि समय पर मुझे पता चल गया | तुम लाज मंग सर्वनाग मरने पर तुल गए हम विमूढ अवाक सब कुछ देख रहे थे। हम लोगों का तापला ही मूग गया था। मैं मोच रहा था, क्या मचमुच ही मटर दा ने इस बुरुष, कानी-क्लूटी लड़की से शादी की है ? अगर की है तो मदों ? किन माह म? अन्त में अटल दा दे लिए इस तरह में हम लोगों के चेहरे पर शलिन पोतना ही वाकी था? तभी दुलहन के पिता फिर चिलाए-यहादुर ! ६ उस ममप मेरे पाम डायरी नहीं थी। दिन, नारीस और हम क्षण काहिमाब नहीं दे सकता । केवल इतना याद है कि उस दिन बटन दा को मादी को रात हम बराती लोग मं मे गड गए थे। अटल दा ने पह काय? इस तरह रही अपने को छोटा किया जाता है ! माय में हम सांगों को भी नीचा दिखाया! याद है-१९४२ में । इस घटना केवल माल बाद बिग दिन अटल दा के माय मेरी मेंट हुई थी, लज्जा और इसे काफी देर तक में मर बात नल नहीं सका था। पार्शमला में मैं पिनी ममा का ममापति बनार गया । देश में उमममय बबाल चल रहा था। बलात्ता पर दम गिगए जा रहे थे। करता के लोग देमहार थे। नागरिक इधर-उधर भागकर जान बचा रहे थे। पर उम समय नी समाए हो रही पी. नडको कोविद के आगे - - में घाटशिला जाना ही पड़ा था। पाटशिला को बंगाल का ही एक छोटा-सा टुकड़ा कहना गलत नहीं होगा । घाटशिला के ही किसी स्कूल की मीटिंग में में बुलाया गया था। सभा का संचालन मैंने विधिवत् किया था। मैंने अपना पारम्परिक टिपिकल भापण भी दे डाला। मेरे गले में फूलमालाएं थीं, लोगों ने मेरी फोटो भी ली। सभा का सारा काम अच्छी तरह सम्पन्न हुआ था। पर लौटते समय एक घटना घटी। स्कूल के सीनियर टीचर अक्षय बावू वोले-हमारे हेडमास्टर साहब के साथ आपका परिचय नहीं हो सका । वह बुरी तरह बीमार हैं। उनसे मिलकर आपको खुशी होती। मैंने पूछा-वह कौन हैं ? अक्षय वावू बोले- वह इस स्कूल के प्राण हैं। पर इस समय वह बहुत ही बीमार हैं । उन्हींकी कोशिश से स्कूल की इतनी तरक्की हुई है। उसके बाद थोड़ा रुककर बोले-यह देखिए, यह उनकी तस्वीर है। मैंने आंखें ऊपर की। दीवार पर फ्रेम में मढ़ी हुई एक तस्वीर टंगी थी। देखते ही मैं चौंक उठा। यह तो हमारे अटल दा थे। मैंने पूछा-आपके हेडमास्टर साहब का नाम क्या है ? अक्षय बाबू बोले-अटलबिहारी वासु । आज याद कर सकता हूं। उस दिन टीन के छप्पर के नीचे बैठकर मैं अटल दा की गृहस्थी अांखें फाड़कर देख रहा था। एक टूटी मैली- लालटेन, लकड़ी के एक छोटे तख्त पर देवी-देवताओं के चित्र । कमरे दूसरे किनारे पर एक तस्तपोश पड़ा था। उसपर एक फटी चटाई बि हुई थी, सिरहाने पर एक मैला तकिया-और सारे तत्तपोश पर कित विखरी पड़ी थीं । तरह-तरह की किताबें-विचित्र विषयों पर-मैं का क्या गिनाऊं? मौका देखकर मैं पूछ बैठा-अच्छा अटल दा" ३२ ? अटल दा बोले-बोल न ! क्या बोलना पाहता है ? मैंने कहा-तुम्हें दुख नहीं होता ! -दुख मेरी तरफ ताककर पहले अटल दा मानो थोड़ी देर के लिए अवाक रह गए। पहले तो मैं खुद ही नहीं समझ सका था, पर शायद मैं अपने आंसू सफलतापूर्वक नहीं छिप पाया था। इस घोर दारिद्रय और धूमिल वातावरण में मेरा मन घयरा उठा था । कहां तो अलीपुर के बगीचे वाली कोठी के मालिक होने की बात थी। विलायत जाकर बैरिस्टर बनने की हवा पी। बचपन से अटल दा की मैंने मन में यही तस्वीर बनाकर रखी थी। और क्या यह सिर्फ मैं अपनी यात बता रहा हूँ ! बदामतल्ले के सभी लोगो के मन में तो यही बात थी। सभी जानते थे कि आशु बाबू जैसा पुष-भाग्य सबको नसीव नहीं होता । आशु वाबू विलक्षण सन्तान के पिता हैं । अटल दा के महान होते ही आशु बाबू के दुख के बादल छंट जाएगे। थला लेकर उन्हें तब बाजार नही दौडना पडेगा। आशु बाबू की भी बड़ी-सी कोठी बनेगी। लड़के के कारण लोगों में आश् वाबू का मान बढ़ेगा, लेकिन... उस घटना के कितने दिनों बाद देखा, अटल दा का पुराना टूटा मकान और भी टूटने लगा था। पलस्तर झर रहा था। कई बार अटल दा के घर फे पास से गुजरते समय में एकाएक रुक जाता। अटल दा के उस कमरे की तरफ देखता । अब कमरे की खिडकिया मन्दर से बन्द ही रहती थीं। अटल दा के जाने के बाद एक दिन के लिए भी उन खिडकियों को नहीं खोला गया था। । माशु बाबू ठीक पहले की ही तरह थैला लिए बाजार जाते थे। कभी- कभी मैं कहता-मुझे दीजिए चाचाजी, मैं पर पहुचा आता हूं। पर वह नहीं देते । कहते-नही! नहीं ! मैं पहुंच जाऊंगा। कैसे हैं तेरे बाबूजी?

- तो - मौका देखकर मैं पूछता--आप कैसे हैं चाचाजी ? आशु वाबू कहते-मैं ! मैं अच्छा ही हूं। मैं फिर पूछता-आजकल अटल दा कहां हैं ? आशु बाबू कहते-क्या पता वेटा, कहां है ? मुझे तो खबर तक नहीं भजता। कभी-कभी मैं अटल दा के घर भी चला जाता था। चाची खाना बना रही होतीं। आहट पाकर पूछतीं-कौन है ? -मैं हूं चाची। चाची कहती-आयो वेटा, हमारी याद कैसे आ गई ? जवाब में मैं कुछ भी नहीं बोल पाता। चाची फिर स्वयं ही कहती-~-अटल से मिलने आए हो, पर वह है नहीं । -वह तो है नहीं। वह तो है नहीं। सारे मकान में एक ही स्वर गूंजता-वह नहीं है ! अटल दा नहीं है, यह बात हम लोग भूल नहीं पाते थे। पर धीरे-धीरे जिस तरह सब कुछ सह जाता है, उसी तरह एक दिन यह भी सह गया । आशु बाबू, चाची, सभी अटल दा को भूल गए । हम भी भूल गए । न भूलने पर काम भी कैसे चलता ! जीने के लिए आदमी को बहुत कुछ भूलना जो पड़ता है। कभी-कभी देखता, पार्क के अन्दर से आशु वावू लाठी टेकते-टेकते कहीं जा रहे हैं । वाद में तो उनकी यह हालत हुई कि उनके सामने से गुजरने पर भी वह नहीं पहचान पाते । आंख से साफ दिखाई नहीं पड़ता। में उनके सामने जाकर पैर छूकर प्रणाम करता। वह पूछते-कौन हो बेटा तुम ? मैं पूछता--अटल दा की कोई खवर मिली, चाचाजी ? --ओ, तुम हो ! नहीं बेटे, कोई खवर नहीं मिली। मैं कहता--आप किसी अखबार में विज्ञापन क्यों नहीं देते चाचाजी! पाशु बाबू हंसते। कुछ बोलते नहीं।

हनी तरह एक दिन मुवर-गुदह रूबर मिली कि चाची मर गई हैं।
हमी लोग नन्हें मनान ले गए। तहरा या नहीं, इसलिए मुसाग्नि भी
मुझे ही देनी पड़ी। अटम दा के रहने भी मुन्न पराये के हाथ पाची की
अन्त्येष्टि हुई । उसके बाद फिर जिस गति से दुनिया चल रही थी, पलने
समी।
यागु बापू अब भी कभी-कभार लाटी लेकर घूमने निकलते थे।
वोलते-मुझे किस बात का दुम है, वेटा! मैं वनों दुख मनाऊ!
मैं कहता पर बटन दा का यह कैसा माचरण? इतनी वही वात
हो गई और उन्होंने सबर तक नहीं ली।
याग याबू हंसते। बोलते-नहीं लेता है वोन ले, बेटा ! उसमें
पमा है ? मैं तो अपने मन को यही समझाता हूं कि मेरे कभी लड़का
हुआ ही नहीं । सोनूगा लड़ा था भी तो मर गया।
.
७
पाटगिला में अटल दा के पास बैठकर मुझे वही पुरानी या याद
मा रही पी। जो इस कदर निर्दयी है उमपर अभियोग भी क्या लगाऊँ?
अटस दा की पत्नी एक कटोरे में चाय दे गई।
अटल दा ने पत्नी से कहा-ऐ! सुनो...
मटम दा की पली रुक गई। मुझे तो उसकी तरफ आस उठाकर
देसने की हिम्मत भी नहीं पड़ रही थी। असल मे आस उठाने में भी
मुझे पूणा-सी हो रही थी।
मैं मोच रहा था-सारे झंझट के पीछे यही तो औरत है।
गुस्से मे भरी जवान तक रुक गई थी।
अटल दा ने अपनी तरफ से ही कहा पा—यह तेरी मामी हैं। इनके
"
.
पर छू।
। , इच्छा तो नहीं हो रही थी। फिर भी किया। पर केवल हाप ही
जोडे।

भाभी ने कहा-आपको लिखी किताबें मैं पढ़ती रहती हूं। माप अच्छा लिखते हैं। मैं सिर झुकाए जिस तरह वैठा था, बैठा ही रहा । पर जब वह बहुत बोलने लगी तब मैंने अचानक पूछा-चाचा कैसे हैं यह तो तुमने पूछा तक नहीं, अटल दा? , चाचा? चाचा का नाम सुनते ही अटल दा चौंककर चुप हो गए। . मैंने कहा- तुम्हारे मन में दया, ममता कुछ भी नहीं, अटल दा ? तुम इतने पत्थर कब से बन गए ? तुम तो ऐसे नहा थे ! अटल दा मानो कुछ सोचने लगे। जैसे अचानक उन्हें घर की याद मा गई हो । एकाएक सारी स्मृतियां उमड़ आई हों। किताब के पन्नों को सहलाते हुए मन ही मन अटल दा कुछ वुदबुदाने लगे । मुझ लगा मैंने अनजाने में उनके मन के किसी घाव को कुरेद दिया है और उस टीस की यन्त्रणा से उनकी सारी अन्तरात्मा कराह उठी हो। मैंने फिर कहा-बचपन से तुम हम लोगों के आदर्श थे, अटल दा। तुम्हें छोड़कर दूसरे आदर्श की बात हम जानते भी नहीं थे। यह सब तो तुम्हें मालूम था, अटल दा! अटल दा अनमने होकर किताब के पन्ने उलटने लगे। कुछ कहा नहीं। मैं कहता ही गया-मेरे साथ-साथ बदामतल्ले के सभी लड़कों ने शपथ खाई थी कि बड़े होकर हम तुम्हारी तरह बनेंगे। यह भी तुम्हें . । मालूम था ! अटल दा ने फिर भी कुछ नहीं कहा । मुंह लटकाए बैठे रहे । मैंने कहा- तुम्हारे पिताजी और मां ने आखिरी समय में कितना कष्ट भोगा है, इसका तुम अन्दाज़ लगा सकोगे ? वोलो, जवाब दो..! अटल दा ने अपना सिर चा नहीं किया । चुप ही रहे । -~~ -पहले तो तुस ऐसे नहीं थे । अन्याय के विरुद्ध सबसे पहले। तो तुम ही आवाज़ उठाते थे, सर ऊंचा कर उसका प्रतिवाद करते थे। कोई बुरा काम तुम्हारे बस का नहीं था। अटल दा फिर भी चुप रहे ।

? ? मन कहा-मैं तुम्हें मान इस तरह चुप नहीं रहने दूगा, अटक तुम्हारे पर पड़ता हूं। मेरी बात या कम से कम ए तो याव एक बार तो मुह गोलो। तुम कुछ भी बोतो-पर बोलो जकर। तुम्हें सर बताना पड़ेगा कि यह सब ययों हुआ? इसके लिए जिम्मे कौन है ? तुम विगके प्रति कौन-सा कर्तव्य निभा रहे हो? वह व है ? क्या वह तुम्हारे मा-बाप से भी बड़ा है ? यटल दा मन ही मन मानो थोड़े पंचल हो उठे। मैंने कहा-हरो नहीं, अटल दा। मैं तुममे उसका नाम नहीं पूछना पाहता"उसे कुछ कहूंगा भी नहीं... अटल दा ने मेरे दोनो हाथ पकड लिए। बोले-सुन, आज तू मेरे पाम रह जा। मैंने पूछा-यो ? अटल दा बोले-तेरी सारी बातो का में जवाब दूगा, पर आज सुझे मेरे पास रहना पडेगा। ----तुम्हारे यहां रहूंगा, अटल दा? -यो, बहुत काम है क्या ? -नही, काम की बात मैं नहीं कर रहा हूं। मन ही मन मैं चारों रफ की दशा ऐसपर मयुचित हो रहा पा।कहाँ रहूगा मैं ' इस कमरे ? इग फटे विस्तर और गन्दगी के राज्य मे पुल दो ही तो कमरे । उपर से पाना बनाने की आवाज और सुगन्ध आ रही पो। अटल दा फिर बोले-आज रह जा। यह देस, एक नई किताब दी है। तुझे भी पढ़वाऊंगा। नई पिता के लिए मेरे मन में कोई लालन नहीं था। पिताव का अटल दा को हो मरता है. पर मैं तो अटस दाका सोमी था। सब हने हुए भी बटल दा ने क्यों इस भयंकर दारिदय को अपनाया ? लए स्मिके लिए ? जिम काली-कलूटी महकी को मैंने अलीपुर गह-मण्डप में देखा था उसका इतना बड़ा आरपंज! इतना मोह ' - मे मिल की मली साडी पहने हुए उसे आज भी तो मैंने फिर । उसमें अटल दा ने बाकपंग लायक क्या पाया?

भाभी ने कहा-आपको लिखी किताबें में पढ़ती रहती हूं। आप अच्छा लिखते हैं। मैं सिर झुकाए जिस तरह वैठा था, वैठा ही रहा । पर जब वह बहुत वोलने लगी तब मैंने अचानक पूछा-चाचा कैसे हैं यह तो तुमने पूछा तक नहीं, अटल दा? चाचा? चाचा का नाम सुनते ही अटल दा चौंककर चुप हो गए। मैंने कहा-~-तुम्हारे मन में दया, ममता कुछ भी नहीं, अटल दा ? तुम इतने पत्थर कव से बन गए ? तुम तो ऐसे नहा थे ! अटल दा मानो कुछ सोचने लगे। जैसे अचानक उन्हें घर की याद मा गई हो । एकाएक सारी स्मृतियां उमड़ आई हों। किताव के पन्नों को सहलाते हुए मन ही मन अटल दा कुछ वुदवुदाने लगे । मुझ लगा मैंने अनजाने में उनके मन के किसी घाव को कुरेद दिया है और उस टीस की यन्त्रणा से उनकी सारी अन्तरात्मा कराह उठी हो। मैंने फिर कहा-बचपन से तुम हम लोगों के श्रादर्श थे, अटल दा। तुम्हें छोड़कर दूसरे आदर्श की वात हम जानते भी नहीं थे। यह सब तो तुम्हें मालूम था, अटल दा! अटल दा अनमने होकर किताव के पन्ने उलटने लगे। कुछ कहा नहीं। मैं कहता ही गया-मेरे साथ-साथ बदामतल्ले के सभी लड़कों ने शपथ खाई थी कि बड़े होकर हम तुम्हारी तरह बनेंगे। यह भी तुम्हें - मालूम था ! अटल दा ने फिर भी कुछ नहीं कहा । मुंह लटकाए बैठे रहे । मैंने कहा-तुम्हारे पिताजी और मां ने आखिरी समय में कितना कष्ट भोगा है, इसका तुम अन्दाज़ लगा सकोगे? वोलो, जवाव दो! अटल दा ने अपना सिर ऊंचा नहीं किया । चुप ही रहे। -~-पहले तो तुस ऐसे नहीं थे । अन्याय के विरुद्ध सबसे पहले, तो तुम ही आवाज़ उठाते थे, सर ऊंचा कर उसका प्रतिवाद करते थे। कोई बुरा काम तुम्हारे वस का नहीं था। अटल दा फिर भी चुप रहे ।

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. - जो अटल दा ब्राह्ममुहूर्त में उठकर मन की शक्ति बढ़ाने के लिए दीवार पर अंकित बिन्दु को अपलक देखते थे, विवेकानन्द को लिखी ब्रह्म- पर्य गी पिताय पटगार जिन्होंने अपना मन इतना दृढ़ किया था, उनकी यह अपोगति ! स्वाल के हेवमास्टर बने थे, यह तो अच्छी बात थी। बच्चों फो आदमी बना रहे थे, यह भी अच्छी बात थी; पर अपने को उन्होंने यया बना लिया ? क्या अटल दा दुनिया के सामने सर ऊंचा कर खड़े हो सकते थे ? बोल सकते थे कि मैंने जो कुछ किया है-उचित किया है, जो कुछ समझा है, ठीक समझा है ! में कहीं सो गया था। अटल दाबोले-तेरी भाभी को कहे देता हूं कि आज तू यहीं साएगा। फिर चिल्लाकर पुकारा-सुनती हो ! अटल दा पो मावाल सुनकर वह महिला फिर आई । अटल दा बोले-सुनो, आज यह मेरे साथ ही रहेगा, समझी। मेरे कमरे में ही इसका विस्तार लगा देना। फिर मेरी तरफ देखकर भटल दा ने कहा-तुझे थोड़ा पाप्ट तो होगा। तभी भाभी ने पूछा- आप रात को रोटी खाते हैं या चावल ? मेरे लिए परेशान होने की कोई बात नहीं ! जो आप लोग साइएगा, यही में भी सा लूंगा। भाभी हंस पड़ी। बोली-आप हमारे पाण्ट के बारे में सोच रहे हैं न ; पर औरतों को खाना बनाने में तकलीफ नहीं होती। अटल दा बोले-इसके लिए बैंगन की भाजी बना देना। भाभी बोली-तुम्हें बैगन पसन्द है, इसलिए क्या सभीको भाएगा? भंने रोककर याहा--नहीं भाभी ; आपकी जो मर्जी हो, बनाइए । रााने-पीने के मामले में मेरा कोई झमेला नहीं। भाभी के जाने के बाद अटल दा ने फिर कहा-यहां तुझे तकलीफ तो होगी.. मैंने माहा-

। तकलीफ क्यों होगी ! तुम यह सोचो
अटल दा।
अटल द बोले-आजकल यहां मच्छरों का बड़ा उपद्रव है।
मैंने कहा-कुछ भी हो अटल दा, पर आज मैं तुम्हारी
जरूर सुनूगा। यह सब क्यों हमा किमलिए तुम इस तरह
भागते फिर रहे हो
अटल दा बोले-मैं भागता फिर रहा हू ! यह तुझमे गिने
दिया?
मैंने कहा-क्या कह रहे हो अटल दा! तुम भागे नहीं?
तुम्हा
पास जो शक्ति थी, जो क्षमता थी, प्रतिभा थी, उमके वन पर तुम
सबके प्रणम्प बन सकते थे। सबके लिए एक उदाहरण रप सरते
अटल दा मेरी बात सुनकर मुस्कराने लगे। बोले-~-ययों, अब क्या
में सबकी नजरों से गिर चुका हूं?
मैने कहा-और नहीं तो पा | जरा सोचो तो सही, तुम क्या बन
सकते थे ? तुम्हे किस चीज की कमी थी?
सिर झुकाकर अटल दा कुछ सोचने लगे । योले-आज रात तुझे
भारी बात बताऊगा । तू तो आज यहीं रह रहा है न?
मनुष्य सोचता कुछ है और होता है कुछ और। नहीं तो क्या मैं यह
कता था कि इतने दिनों के बाद मेंट होने पर भी मटम दापी
सुनने से मैं वचित रह जाऊगा । उस दिन अलीपुर की उम गादी
से ही सारी घटना रहस्य में ढको पड़ी पी। और भाज व
Tटन का मौका मिला तब भी स्कूल-माटरी के जीवन की आर
की कहानी फिर हमेशा-हमेशा के लिए मेरे लिए मसात हा
ई बार अवकाग के क्षणो मे मन ने पूछा है-बरा बटन दा

को जीवन में शान्ति मिली? क्या अटल दा ने जीवन के किसी क्षण में मन ही मन पश्चात्ताप नहीं किया ? पर इन बातों को जानने का कोई उपाय नहीं था। उसके बाद कितनी ही वार में बाहर निकला हूं ! घाट- शिला के स्टेशन से भी कई बार गुजरा हूं। कई बार मन में आया कि घाटशिला में उतर जाऊं, अटल दा से मेंट कर आऊं, पर उस बार जो कड़ वा अनुभव लेकर लौटा था उससे फिर घाटशिला जाने की कभी हिम्मत ही नहीं पड़ी। चिट्ठी लिखकर अटल दा की कोई खबर लूं, इतना साहस भी मैं नहीं बटोर पाया। लेकिन क्यों ? वही कहानी आज वताऊंगा। अटल दा के कहने पर उस रात मैंने घाटशिला में रहने के लिए हां भर ली थी। एक ही कमरे में, एक ही तस्तपोश पर अटल दा के साथ रात विताऊंगा.। उन्हींकी जवानी उनकी कहानी सुनूंगा-इस सबंकी मन में बड़ी उत्सुकता थी। घोड़ी देर तक बातचीत कर लेने के बाद हाथ-पैर धोने के लिए मैं बाहर के आंगन में जाकर वाल्टी किस तरफ है, यही देख रहा था कि इतने में भाभी आई। मैंने पूछा-~~-इस वाल्टी के पानी से हाथ-पैर धो सकता हूं, भाभी ? भाभी बोली-हां, पर आप यहां आए क्यों ? उसके गले की आवाज़ सुनकर मैं चौंक उठा । इतनी ही रूखी आवाज़ थी उसकी। भाभी बोलीं-आप लोग क्यों मेरे घर आते हैं ? क्यों ? जवाव दे सकते हैं ? मैं हैरान होकर भाभी की तरफ देख रहा था । अंधेरे में भी उसका नाराज और उत्तेजित चेहरा में अनुभव कर रहा था । वह बोली-सव लोग मिलकर मेरा सर्वनाश करने आ जुटते हैं ? हमने आप लोगों का क्या बिगाड़ा है ? मैंने कौन-सा अपराध किया है ? मैंने कहा-मैं कुछ समझा नहीं कि आप मुझे क्या कह रही हैं ?

भाभी बोली-हा, मैं आप सबों को कह रही हूं। आप लोग मिलकर मेरे विरुद्ध षड्यन्त्र रच रहे हैं । हमने किसका क्या बिगाड़ा मैं अपने पति के साथ यहा गृहस्थी निभा रही हूं, यह भी आप लोगो नजर में गड़ना है। मैंने फिर कहा- यह सब आप क्या कर रही हैं ? वह बोली क्यों ? आप कुछ समझते नही या मेरी गृहस्थी का हाल देखकर समझना नहीं चाहते ? शरीर पर यह फटी मैली साड़ी, पह टूटा तस्तपोश, यह गन्दी मच्छरदानी, आपकी किसी पर नज़र नहीं पड़ी? आपके पास आंखें नहीं हैं ? यह सब देखने के बाद भी यहा रहने और खाने के लिए आपने 'हा' भर ली ! मैंने बड़े संकोच के साथ कहा-थोडी देर पहले आपने ही तो मुझ यहा साने और रहने के लिए कहा था? अटन दा की पत्नी अचानक भल्ला उठी-पाप कहना चाहते हैं कि आप कुछ समझते ही नही ? लेकिन मैं भी आप लोगो को यह बता देना चाहती हूं कि इनसे याप लोगों को कुछ नहीं मिलने का। बहुत दिनो से मैं इन्हें आप लोगो से बचाती फिर रही हूं। इनमे जो कुछ गुण था- उसे मैं बर्बाद करके ही छोड़गी। -इसका मतलब? -~-मतलब क्या है, यह आप अच्छी तरह जानते होंगे। आप लोग सोचते होगे-~-गृहस्थी की चक्की में पिसकर जब मैं मर जाऊगी तब जिसको चीज है, आप इन्हें उसीके हाथ में सौंप दीजिएगा। जीते-जी यह हगिज नहीं होने दूगी। मैंने कहा-यह सब आप क्या कह रही हैं ? वह बोली-~मैं ठीक ही कह रही हूं। मैं किसीसे डरती नहीं। मुझे किम बात का है ? गरीव की लड़की हूं, क्या इसीलिए मैं कुछ कम मती हूँ ? कम जानती हू? फिर थोड़ी देर नप रहकर बोली-आप यहा से चले जाइए । मैं पर पकड़ती हूं। हम लोगों को और मत सताइए। जाइए ! में चला जाऊं? अचकचाकर मैं पूछ वैता।

। -हां। आपको इसी क्षण जाना पड़ेगा। एक रात खाना नहीं खाने पर आप मर नहीं जाएंगे। स्टेशन जाकर आज ही रात की गाड़ी पकड़- कर चले जाइए। इनके पिताजी आए थे, उन्हें भी मैंने घर से बाहर निकाल दिया । और क्यों नहीं निकालूंगी ? शादी की है, क्या इसीलिए भगवान के आगे कोई महापाप किया है ? मैंने कहा-पाप है या नहीं, मैंने तो ऐसा कुछ कहा नहीं । आप क्यों यह सब बातें उठा रही हैं ? मुझे लगा, वह रोने लगी थी। वह फिर वोली-अपराध मैंने किया है ? पाप की बात उठाकर अपराध मैंने किया है ? अगर अपराध किया है तो उसके लिए भी मैं किसीके आगे जवावदेह नहीं हूं। मुझे किसी बात के लिए मजबूर मत कीजिए। आप यहां से चले जाइए। उनके परिचित किसी आदमी का चेहरा तक मैं नहीं देखना चाहती। मैं नहीं चाहती कि मेरी ससुराल की तरफ का कोई भी आदमी यहां आए, सास-ससुर तो मर गए, फिर आप लोग क्यों जलन पैदा करने के लिए आ जाते हैं ? मैंने कहा अटल दा के मां-बाप तो वेटे के शोक में ही मर गए । वह बोलीं-अच्छा हो हुप्रा! बला टली! -कहां गई ! हाथ-पर धोने का पानी-वानी दिया क्या ? अटल दा की आवाज सुनाई पड़ी। मैंने कहा - अटल दा ने शायद हमारी बातचीत सुन ली है ? -उन्हें मैं समझा दूंगी। आप तो जाइए ! जाइए यहां से ! इतना कहकर उसने मुझे मानो धक्का देकर ही निकाल दिया। मैंने जाते-जाते कहा-अटल दा गुस्सा होंगे, भाभी। -उनके लिए आपको सोचने की जरूरत नहीं। उनके लिए मैं जो हूं। आप जाइए ! अब उसने मुंह पर धम्म से दरवाजा ही वन्द कर दिया । और घाट- शिला की उस अंधेरी रात में मैं हतप्रभ-सा थोड़ी देर अटल दा के घर के वाहर ही खड़ा रहा। उसके बाद उस रात कर गाड़ी आई, कव स्टेशन छोड़ गई और में किस तरह कलकत्ता पहुंचा-मुझे कुछ भी याद नहीं । vie Ham- ४२ चार-बार मन में एक ही बात उठतो कि जिस तरह बटल दा को में इस प्यार और इतनी यदा करता था, वह सब कहा खो गई ? क्यों हमें यः दाको इस तरह पोना पड़ा आज याद आता है कि कलकत्ता लौटकर बहुत बार सोचा कि य बात दूसरों को बता; पर बताऊं भी तो किसे ? जिसे जानता था प्यार करता था, वह तो था नहीं। एक तरह से मर गया था। बाद में मैंने सुना था कि शादी की उस रात के बाद से ही अटल । की नई पत्नी ने बटल दा से कोई रिश्ता नहीं रसापा। अटल दा के धनी ममुर ने भी यटल दा को त्याग दिया था। और उसके बाद जीवन की पहाई-उतराई मे कौन कहा छिटक गया--में किमी पीपवर नहीं में पाया । फर्मत भी नहीं थी। ऐमा तो होता ही है। कितने घनिष्ठ यार, दोस्त, रिश्ते के लोग जीवन मे छिटक जाते हैं, जिनसे फिर कभी मेंट ही नहीं होती। दूमरी तरफ. मितने अनजाने गराये अपने बन जाते हैं । इसलिए अटल दा की बात, उनके मा-बाबूजी, यहाँ तक कि उनकी विवाहिता पत्नी की बात भी मुझे याद नहीं रही। बदामले को छोड़कर कितने मोहल्ले और परिवेश बदलता हुआ मे इस नये मोहल्ले में भा पहुंचा, यह भी तो मैंने पहले मे सोच- जमकर, जान-बूझकर नहीं किया था। ६ नाज इतने दिनों के बाद दरस्वास्त में पता देखकर मैं चौंक गया वन बाबू बोले-अगर प्रापको पसन्द है और अगर आप ठीक है, तो मुझे कोई बापति नहीं। । जव मार मुमी पर था तब सोचा, एक बार इन्दुलेखा देवी को वा सू। स्कूल के चपरामी के हाप मैंने एक चिट्ठी भेज दी। नाया मगर विमो दिन स्कूल में या मक्ती ।

पैसा था, गुर जानना है-- जरूरी है। सब में मुझे जागने गो बड़ी इच्छा हुई कि जिन लोगों के पास इतना से पनीचाप की गलौती बेटी को नौकरी की क्या जरूरत पड़ गई ? मैंने तो उसी समय राना था कि बाप का लोहे का कारोवार है। बाप गरने के बाद गया वे सारे पैसे वर्वाद हो गए थे ? यह भी सुना शागि पति को छोड़ने के बाद अटल दा की पत्नी पढ़ाई-लिखाई में व्यस्त हो गई थी। मैट्रिक पारा तो थी ही, कालेज में दाखिला ले लिया था । पर बी० ए० पारा कर गई थी, यह मैं नहीं जानता था। उसी दिन शाम गोमें श्याम बाजार गया। यहाँ मेरा पुराना दोस्त अधीर वोरा रहता था। जाते ही मैंने पूछा- सुगने कुछ सुना है, अधीर ! अपने अटल पा का क्या हाल है ? अधीर गर्मठ आदमी था। चारों तरफ की सवर रखता था। स्वास्थ्य भी अच्छा था। पुरांत भी थी। बोला- अटल पाकी कौन-सीखवर? मैने नहा-~-अटल दा को पुरारी पली आई थी। हमारे मोहल्ले यो स्गाल में नौकरी लिए । गगों, गुगुछ बता रागाते हो ? यह सुनगार अधीर चौंका तक नहीं । चोला-गों, सुगने कुछ नहीं सुगा ? भने गाहावे लोग सम्पन्न हैं। मैं तो यही जानता था। बहुत वा लोहे का कारोबार था, भालीशान हवेली। बाप के मरने के बाद राब वर्वाद हो गया गया? अपीर बोला-सब कुछ तो अटल दा ने ही वर्वाद किया। -- नगा बक रहे हो ? मैं मानो आकाश से गिरा । अटल दा के लिए मेरे मन में एक भजीय-सा आपण था। उनके रोहरे के कारण या उनकी पांतों के लिए, यह मैं नहीं पह समाता। अधीर की बात सुनकर में राम में हैरान रह गया । मैंने पाहा---गुझे तो पुछ भी नहीं मालूग? ?

- नमानम अधीर को इतनी सबर कहां से मिल गई। अधीर बोला- पादगिला के स्कूल में एक बार अपनी एक टेक्स्ट-बुक लगवाने के लिए गया था। वहीं मुझे यह खबर मिली थी। अधीर की किताबों की दुकान यो । विभिन्न तरह की पाठ्य-पुस्तकें धाकर स्कूलों में चलाने की कोशिश करता था। इस धन्धे में उसे गांवों और गहरों में काफी धूमना पड़ता था। पहली बार जब वह घाटमिला गया, तब उसे मालूम नहीं था कि अटल द पाटशिला के स्कूल में हैं। पर बाद में वातो ही बातों में पता लग गया। उसके बाद से जितनी बार अधीर पाटशिला गया, कुछ न कुछ सवर जरूर लाया । अटन दा कभी हमारे स्कूल के आदर्श तड़के थे। म अटल दा की खबर पाने के लिए किसके मन में उत्सुकता नहीं होती ! अधीर ने जो खबर सुनाई थी, वह गोपनीय थो, इसलिए इतने दिनों के बाद उस बात को लेकर कहानी लिख रहा हूं। उस समय पता चलने पर बहुत से लोग दुखी होते, पर आज दुत मनाने के लिए कोई नहीं है। अब वो तम नाटक के अन्तिम अंक के अन्तिम दृश्य पर भी पदी पड़ गया है.इसीलिए तो मैं लिख पा रहा हूँ। सर। हो, तो मैं कह रहा था -हम लोगों की तरह शायद इन्दुलेखा देवी भी अटल दा को ढूंढ रही पी दंढ-दूढ़कर वह पक गई थी। निराश हो चुको यो । अन्त में एक दिन यह घाटशिला पहुंच ही गई। बन्दर से किमोने कहा था-कौन ? दुलेसा बोली थी-में। -~-4 कोन ? नाम नहीं है ? कहते-कहते जो बाहर निकल भाई, उने इन्दुलेसा तुरन्त पहचान गई। वह कुन्तीदेवी थी। पर कुन्ती की बात का जवाब देने के पहले हो इन्दुलेखा अन्दर घुस गई । सोघे अटन दा के सोने के कमरे में पहुंच गई। बटन दा उस समय बद्दर प्रोढ़कर कोई । व पढ़ रहे थे। सिर उठाकर पूछा-तुम ? ? -हां, मैं ! दोनों में से किसीको कुछ और कहने की ज़रूरत नहीं थी। फिर भी टल दा ने पूछा-अचानक कैसे आना हुआ -छह महीने हो गए। मेरे पिताजी का देहान्त हो गया है। -उम्र पूरी हो गई थी। चले गए। मैं क्या कर सकता हूं, बोलो ? -हां, तुम क्या कर सकते हो! तुम्हारे साथ मेरा क्या रिश्ता! यही बताने के लिए इतनी दूर आई हो? -इतनी-सी वात के लिए कोई सिरफिरा ही यहां आएगा। -तो फिर क्यों आई हो ? वही बताओ ! -ज़रूर कहूंगी, नहीं तो तुम जीत जाओगे। क्या सोचा है तुमने ? मुझे हराकर तमाम दुनिया से वाहवाही लूटोगे? -मेरी वाहवाही की वात रहने दो । -उस समय मैं छोटी थी, इसलिए कुछ समझी नहीं थी। पर अब तो बड़ी हो गई हूँ। तुम्हारा मतलव मैं खूब समझती हूं। कमरे की हवा तक गम्भीर हो उठी थी। और वेजान सारी चीजें -अलगनी, विस्तर, व वसे मानो संजीव हो उठी हों। बाहर की खिड़की से एक गौरेया आ टपकी, पर इस भयंकर स्तब्धता को बर्दाश्त न कर फिर उड़ गई। इस मौन को तोड़कर इन्दुलेखा वोली-तुम्हारे साथ मेरा रिश्ता सिर्फ सम्पत्ति का लेन-देन है। इसके अलावा और रिश्ता हो ही क्या सकता है, कहो ? -इतने दिनों के बाद यह वात तुम्हारी समझ में पाई ? -निर्लज्ज की तरह बात स्वीकार कर रहे हो न ? -तुमसे शादी करने गया था, यही तो चरम निर्लज्जता यह किसे नहीं मालूम, कहो ! आज स्वीकार करने पर मेरा वेहयापन कम तो नहीं होगा। -~-लेकिन इस हालत में गुजारा कर. तुम उसी निर्लज्ज छुपाना चाह रहे हो । क्या मैं कुछ नहीं समझती? ४६ पूछा। -मैं चाहे कितनी भी तंगी में क्यों न रहूं, फिर भी तुम्हारे आगे तोहाय फैलाने नहीं गया। -भीम मागने वो स्थिति में हो, यह तो देस ही रही हूं। पर भीस को नहीं मांगी, वह भी मुझे मालूम है। -क्या मालूम है, कहो ? -यही बताने आई हूं। और इतने दिनों तक क्यों नहीं आई थी, यह भी बताऊगी। जिस सम्पत्ति के लोभ मे तुमने मुझसे शादी का टोंग रपाया था, उसे टकराकर तुम समझते हो, तुम जोत जाओगे ! -इमामतलव ? अटस दाने -यो अहंकारी हो न? -क्या कहना चाहती हो, साफ-साफ कहो । ~~~माफ-माफ ही कह रही हूँ। तुम्हे मैंने बहुत-सी विडियों लिखी, पर तुमने एक का भी जवाब नहीं दिया। क्या सोचा है तुमने ? बिना पाए-पीए रोग मे, दोश मे, मूसे-नगे मर जाओगे और मैं तुम्हारे शोक मैं रोऊँ, यही न? -तुम्हारी एक भी चिट्ठी मुझे आज तक मिली हो, मुझे याद नहीं आता । र, छोडो उस बात को । का लिसा था तुमने उन चिट्ठियों मे? -मुनिए ! अचानक पीछे से औरत की आवाज सुनकर इन्दुलेखा ने पीछे मुड़कर देखा। पोयट पर कुन्ती पड़ी थी। इन्दुलेसा बोली-क्या है? कुन्ती बोली-देस रही हैं, मान-मर से वह विस्तर पर पड़े हैं और आप उन्हें बती-बटो सना रही हैं ? -मो? यदि सात-भर से बीमार हैं, तो डाक्टर क्यों नहीं बनाया गया ? अच्छा हास्टर बुलाने के लिए यदि तुम लोगों के पास पने नहीं ये तो तुमने मुभमे मागे कसलों नहीं? उसके बाद वह बटन दारो तरफ देगार दोती-मों के लिए । .

- तो तुम्हारे बाप ने मेरे साथ तुम्हारी शादी की थी। उन पैसों को गने में तुम्हें फिर गर्ग पयों आई ? चोप्प ! लगा मानो गागरे में विजली गिरी हो। अटल दा के गले में इतनी ताकत है, गोई पल्पना भी नहीं मार रापता था । पर, इन्दुलेखा अगर इतनी भासानी से हार मान जाती तो फिर वह इन्दुलेगा काहे की थी। उसने भी ऊंची आवाज में कहा-तुम फिरो पुप रहने के लिए कह रहे हो ? -तुम्हें गाह रहा । -~- चुप रहने के लिए यहां नहीं आई हूं। चुप रहने की आज मेरी वारी नहीं है। आग में अपना अधिकार जताने आई हूं । उरा अधिकार गी वात मैं चिल्ला-चिल्लाकर बताने के लिए आई हूं। -अचला, तो बताओ कि तुम्हारा अधिकार गया है। और बता- गार पली जाओ। -गिर्फ अधिकार बताऊंगी, ऐसा नहीं, उसकी व्यवस्था भी करूंगी। ---बोलो, सुनता हूं तुम्हारे अधिकार की बात ! -तुम दोनों मिलकर गया इसी तरह मेरा जीवन बर्वाद कर डालोगे ? मैं गया गोई नहीं हूं ? मैं तुम लोगों की कोई नहीं लगती ? अग्नि को साक्षी मानकर गया तुमने मुझरो विवाह नहीं किया था ? - तुम्हें बता चुका हूं, वह मेरी लज्जा थी। -यह तुम्हारी लज्जा हो सकती है, पर इरामें मेरा क्या कसूर तुम्हारी सज्जा का परिणाम मैं पयों भोगूं । मुझे आज तुमसे इराका जवाब पाहिए। थोड़ी देर समा अटल दा गुछ नहीं बोल रागे । फिर कहा-तुग किस गीमत पर गुझे गुपित दे सकती हो ? मैं यह कीमत जरूर चुगाऊंगा। इन्दुलेखा गरज उठी । बोली-निर्लज्ज, कायर कहीं के ! निस से आज तुग गुपित गी बात कर रहे हो ? तुम्हें अगर मुगित मिल गई, त दुनिया की हर चीज झूठी है। भगवान भूठा है। चन्द्र और सूर्य भूठे है सारी दुनिया भूठी है। -तुग गया पाहती हो, बोलो ? भेरी तवियत बहुत सराव है। ? ४८ -~में तुम्हारी चिक्मिा करवाना चाहती हूँ। तुम्हें स्वस्य देखना पाहती है। -चिकित्ला? पुलीदेवी हैरान रह गई। कमरे में यदि बिजली गिरती, फिर भी वह शायद इतनी हैरान नहीं होती। तेज-तर्रार लहरी कुन्ती, आज मुरमा-सी गई। उसके मोठो से आवार नहीं निकली। इन्दुलेगा बोली- तुम पूछ सकते हो कि में क्यों तुम्हारी चिरिला करवाना चाहती हैं ? जिसने मेरा इतना यहा मर्वनाम किया है, वगका स्वास्प्य लौटा देने में मुझे क्या फायदा ? पर लाम मुझे है, इसीलिए मैं तुम्हें टीक देखना चाहती हू । तुम्हें ठीक न कर सकने पर मुझे मुक्ति नहीं मिलने की। ---इमका मतलब ~~इमरा मतलब अगर तुम समझते ही तो मेरा इतना दुभाग्य किम पाठ का? का अर्थ तुम्हें समझने की जरूरत नहीं। अचानक अटन दा पर नजर पड़ते ही इन्दुलेगा ने देगा, इतनी उते. जना के बाद अटल दा बड़े कमजोर दिस रहे थे। अब तक वह बैठे में, पर अब सेंट गए और उनके मुह से सून वह घना । इन्दुलेगा ने बुन्ती से लहा-खडी-सही देस क्या रही है ? रिमी- साटर को बुलाशाए। पुन्ती बोली--पह उनकी कोई नई बीमारी नहीं है। -नई नहीं है तो भी सडेरा देखने से राम घलेगा ? ई पोरदान तो कम से कम लाकर दीजिए। इस तरह में तो यह आदमी मर जाएगा। पर, कुन्ती उमी तरह चुपचाप सही रही। गेली-बार यहां रहने पर मैं उन्हें बचा नहीं पाऊगी । आप चली जाइए । --मैं चली जाने के लिए यहां नहीं माई हूँ। -अगर आप उनका भला चाहती तोबारा यहा रहनाटी नहीं। -~में इन्हें इस हालत में छोड़कर नहीं जा सरती। तुम्हारे हवार गरगहने पर भी नहीं।

- ---तो फिर अपनी आंखों के सामने आप उनकी मृत्यु देखना पसन्द करेंगी? में क्या चाहती हूं, क्या नहीं, यह सोचने की तुम्हें जरूरत नहीं । उनया अच्छा-युरा मेरा भी अच्छा-बुरा हो सकता है । तुम नहीं मदद करोगी, तो मुझे ही देखना पड़ेगा। इतना कहकर इन्दुलेखा अटल दा का सिर गोद में लेकर बैठ गई और अपने आंचल से उनका मुंह पोंछकर पखा झलने लगी। उस दिन की इन्दुलेखा एक आश्चर्य की मूर्ति थी। उसके चेहरे की तरफ देखकर कुन्ती निर्वाक रह गई। उस दिन से रोगी, सौत और उस गृहस्थी का सारा भार इन्दुलेखा देवी पर ही मा पड़ा। मैंने पूछा----उसके बाद? अधीर बोस ने कहानी पूरी की। वाहा-~-अन्त में हमारे हीरो अटल दा अपनी दूसरी पत्नी के पैसों से ही गुजारा करने लगे। डाक्टर, दवाई, मकान का किराया सब उनकी दूसरी पत्नी ही जुटाती थी। मैंने पूछा-उसके बाद? अधीर बोला-उसके बाद से अटल दा कभी वाल्टेयर, तो कभी पुरी रहने लगे। इन्दुलेखा देवी के बाप के मर जाने पर लोहे का कारोबार बन्द हो चुका था। बैंक में जो रुपये थे, उसीसे काम चल रहा था। अपने अटल दा का यह परिणाम होगा, ऐसा सोचा भी नहीं था, भाई। अब तो पत्नी के पैसों से ही अटल दा की गृहस्थी चलती है। मैंने मन ही मन सोचा हो सकता है, अधीर जो कुछ कह रहा है, ठीका ही हो । अटल दा के पीछे सारा पैसा खत्म हो गया हो, इसीलिए शायद नौकरी की जरूरत पड़ी हो।

अधीर ने मुमग पूछा-तमने उसे नौकरी दी? मैंने यहा कल आने के लिए पहा तो है । देगे, पपा जयाच देती है। गोपा है. पूनकि नौकरी की उगे चारत क्या है ? मोपा पा, मेरी पिट्टी पाकर दूसरे ही दिन इन्दुलेगा देयी आएगी। नुषन वायू गे मैंने यह रसा पा-यह महिना मेरी परिचित है। रहे ही रनिएगा। भुवन यापू मान भी गए थे। पर जिस समय भाने की बात थी, वह नहीं आई। दम पर गए, ग्यारह बज गए, यारह भी बज गए, फिर पी की सरफ देखा तो या पुगे । सयर पपरासी के मारपस टीप गमप पर ही भेजी गई थी। पर दो बजे तक भी पदुमेरा देयी भी पोई गयर नहीं मिली। शाम के करीब तीन बजे इन्दुलेगा देवी आई। पड़ी दाम, परी-पकी मी लग रही थी। सग, सारी रात सो नहीं सरी थी। उनकी तरफ देराकर मैं परित रह गया। पूधा-आपसी समीयत पराव है ? इन्दुनमा योली-नहीं। मैंने कहा-हम पोस्ट के लिए हम लोगों ने पापही को पना है। समय पर आपको नियुक्ति-पत्र मिल जाएगा। इन्दुलेखा देवी के चेहरे पर कृतज्ञता का भाव स्पष्ट हो उठा । मुझे नमस्ते कर यह पली गई। पलते ममप योल गई-आपने मेरा जो उप. पार दिया, उगे मैं प्यार नहीं कर सकसी। मुझ पर सो गिर्फ शिक्षिा के नियांपन का भार पा.यह हो गया। अब में प्री पा । न गे मेरा कोई परिगत माप हो पा नहीं । इग- लिए अपने और पामो में उमझ गया । एकदिन सम सेक्रेटरी भुवन बाबू मुमी मिलने पाए। मैंने पूछा ---मेरा मनाय कमा रहा ? दुमेगा देवी मंसी निकतो ? -घत ही अच्छी है। इतनी अच्छी टीघर हमारे स्कूल में दूसरी कोई मही। -यह से? मैंने मुखलपण पूछा।

भद्र महिला समय की बड़ी पावन्द है । एक दिन की भी उसने छुट्टी नहीं ली। -पर, मैंने एक रिस्क लिया था ! -कैसा रिस्क? -इन्दुलेखा देवी अपने पति को छोड़ आई हैं, इसलिए मुझे थोड़ा डर था। -किस बात का डर ? -~हो सकता है, आपके स्कूल की लड़कियों के चरित्र पर इसका कुछ प्रभाव पड़े। भुवन वावू वोले- नहीं जी। मामला ठीक इसके विपरीत है। ऐसे आदर्श चरित्र की महिला-टीचर मैने तो पहले देखी ही नहीं। मैं थोड़ा हैरान हुआ। स्कूल में इतनी सारी शिक्षिकाओं के रहते हुए, इन्दुलेखा देवी भुवन बाबू को इतनी आदर्श कैसे लगने लगीं। मेरी समझ में कुछ नहीं आया। पूछ ही लिया-आपको वह क्यों इतनी आदर्श लगती हैं, बता सकते हैं ? -~-उसका पहनावा बड़ा सादा है । चाय वगैरह का विलकुल नशा नहीं। छात्राओं को बड़े यत्न से पढ़ाती है । हमारी हेडमिस्ट्रेस भी इन्दु- लेखा देवी पर खुश हैं । छात्राएं भी उसे खूव मानती हैं । चलिए, मेरा निर्वाचन अच्छा रहा । मुझे तो इसलिए खुशी है। थोड़े ही दिनों में इन्दुलेखा देवी का सुनाम चारों तरफ फैल गया । सभी लड़कियां इन्दुलेखा देवी के पास ही पढ़ना चाहती थीं। वह अपने घर पर भी कई लड़कियों को पढ़ाने लगीं। सुबह-शाम लड़कियों को पढ़ातीं, दिन में स्कूल जातीं। भुवन बाबू ने उनका वेतन भी बढ़ा दिया । एक दिन सड़क पर इन्दुलेखा देवी के साथ मेरी मेंट हो गई। स्कूल जा रही थीं। सिर पर आंचल था। किसी तरफ विना देखे, सिर झुकाए चली जा रही थीं। मैंने एक बार सोचा, बुलाकर बात करूं। फिर सोचा, ।

नहीं, यह टीक नहीं रहेगा, उचित भी नहीं । रिगी अनात्मीय महिला के साप गरम पर गई होकर यान करना मभद्रता होगी। यह एक माधारण. को मारी और मामूली-सी पापल पर्ने पीनहाय में एक छोटा-मा छाता भी था। मेरी यही इच्छा थी हिपूप-अटल दा पापा ममाचार है ? मटन दाग है ? पर हो गया है, मेरा दम तरह में पूछना पायद इन्दुलेगा देवो महज भाप गे न लें। यही सोचकर में भी उसे अनदेगी फर गया। बाद ? भवन याय मे ही मैंने मारी यात गुनीं। उन्होंने ही एक दिन पहा---गमा है । मुना है मापने कुछ मैंने पूछा-यौन-मा पार? ---यही आपकी इन्दुलेगा देयो का कार? --नही तो । मैंने तो नहीं मुना --देयो है गाहय, देयो । इन्दुलेगा देयी मानपी नहीं, देवी है। फिर भवन या इतिहाग यताने बंट गए । पिन पटिन परिस्थितियों मेन्दुलेगा देवी अपना जीवन बिता रही है, पिग तरह वे पति मी अय. हेलना और उममा मायापार और तिरपार गह रही हैं । यह मिना रके सारीपानी बह गए। फिर बोले - उम रोगी पति केपी उमने सारी पतु मम्पत्ति फूफ दी है। जिग पति ने गादी यो रात ही उगे त्याग दिया था. उमी पनि के लिए उगने अपने जीयन मामारा गुग, दिमाम, अर्य, माम, स्वास्थ्य सर कुछ नष्ट कर दिया है। उमी पति को उसने मिनी ही भार वायु-परिवर्तन के लिए महगी जगहों पर भेजा है। बी. यो पटरी पो युसाया है । महगी दवाइयां मार दी। मयन याय मुझे.दुलेगा देवी का पूरा इतिहाग बना गए । फिर मोरे -वारतर में पान के समाज में एंगी पति-भवितरही देगने से भी नहीं मिनती सारय । यह तो मर में देवी है । मने रहापे मारी बात जानता हूं। --भासी भय छ मालूम है? .

भुवन बाबू हैरान हो गए। फिर पूछा-आप ये बात -जानता हूं, तभी तो मैंने उसका निर्वाचन किया था। -पिछले पन्द्रह साल से इस तरह पति को बीमारी से बचाकर रखन। ई मामूली बात नहीं है, जनाव! आजकल की कौन पत्नी इतना कर नाएगी ! कहिए ? ~सो तो आपका कहना ठीक है -मैंने सोचा है कि ऐसी पत्ति-परायणा देवी के लिए एक सम्मान- सभा का आयोजन करना चाहिए। आप क्या कहते हैं ? -~-अवश्य कीजिए, मेरी ओर से क्या आपत्ति हो सकती है ! ----आपत्ति तो इन्दुलेखा देवी कर रही हैं। कहती हैं, मैंने अपने रूग्ण पति के लिए ही तो त्याग किया है। उसके लिए सम्मान क्यों ? फिर भुवन वाबू ने मुझसे कहा-अगर आप उन्हें किसी तरह मना कर 'हां' करवा सकें, तो बड़ा अच्छा हो। हमारी तरफ से जरा कोशिश कीजिए न ! मैंने कहा- उनके पति के साथ मेरा परिचय है, यह मैं उन्हें नहीं बताना चाहता। -फिर आप एक काम कीजिए। यह कहकर उन्होंने एक प्रस्ताव रखा । बोले-अगर हम लोग उनके गी पति की सहायता के लिए कुछ चन्दा इकट्ठा करें, तो कैसा रहेगा? यह सुनकर मैं बड़ा खुश हुआ। मैंने कहा-यह तो बड़ा अच्छा रहेगा । मैं इससे बिलकुल सहमत हूं। -फिर मैं यही प्रस्ताव उनके सामने रख रहा हूं। आपकी क्या राय अन्त में यही तय हुआ। कुछ ही दिनों में भुवन चावू की कोशिग एक हजार रुपए चन्दे के इकट्ठे हो गए । सवने कुछ न कुछ दिया ही । मैं भी पांच रुपये दिए । भुवन वावू ने भी सौ रुपये दिए थे। इस बात से मुझे बड़ी खुगी हुई। अटल दा-हमारे वचपन के अटल दा के लिए मैं इससे भी अधिक कुछ कर पाता तो खुश होता यह समारोह बड़े सादे ढंग से मनाया गया। इन्दुलेखा देवी धूम ५४ पसन्द नहीं परनी पी। पंगा सेपर उन्होंने भूवन बार पो पन्यपान दिया। योती-पापना कीजिए. मेरे पति जल्दी से जल्दी स्वाय रोजाएं। उमके याद अचानक एक दिन गवर मिली कि बटम दा पसरना आए हुए हैं। पयर अपीर योम ने ही दी थी। यह पेट्रा रोट के गनि- टोरियम में थे। इन्दुलेगा देवी ने ही उन्हें कमाता युनवाया था। गयर मुनार मैंने पहा-तब तो भदल दा पिनकुम अच्छे हो गए होंगे। अधीर धोसा नहीं । अगर अन्रे ही होते तो मलपता माने की जरूरत ही पापी? -उना पता तुम्हें मातम है, अधोर? अपीर ने मुझे अटल दाफा पता यताया । उसो पता कर मैं यह याजार में उनके पर पहुंचा। कलकत्ता में इतने मयान रहते हुए भी अटस दाग मुहल्ले में ? इग अंधेरी कोठरी को ही किराए पर क्यों लिया, वह नहीं मरता । पोई अच्छा-सा गुनी हया और पूप वाला मरान उन्हें नहीं मिला ? अंधेरे और सीलन भरे कमरे में बहुत दिनों के बाद मटन दा को देगकार में पहली पार की ही तरह अपार रह गया । जिगने आकर दरयाग सोना, उसे देगकर मैं समझ गया कि यह उग दिन यानी पही भाभी पी-कुन्तीदेयो ।हालागि उनका पेहरा और भी यक्षना • आ मगा। मैंने कहा-मापद आप मुझे पहपान रही हों ? यह चुछ बोली नहीं। मैंने कहा-ई वर्ष पहले आप पाटशिला के मान में में अटल दा मे मिलने गपापा । अटस दा और में एक ही पल में पहने थे। --माप ययों आए हैं ? भाभी ने पूछा। मैंने कहा-गुना है. अटन दा यहा है । इमनिए एक बार उन्हें देगने के लिए भाया पा।

-क्या देखेंगे उनका?
-क्यों, उनसे भेंट करना मना है क्या ?
-नहीं । मना तो नहीं है, पर उनसे भेंट करने पर शायद वह पीर
अधिक दिन तक जी जाएं।
यह सुनकर पहले तो मैं चौंक उठा । कहने का तात्पर्य समझने में ही
तुझ कई क्षण लग गए। उसके बाद मैंने कहा-आपके ऐसा कहने का
मतलब?
-मतलब यही कि उनके लिए जल्दी मर जाना ही बेहतर है।
-क्यों?
-मरने पर उन्हें शान्ति मिलेगी। और मैं भी यही चाहती हूं।
-मैं चकित रह गया। बोला-आप क्या कह रही हैं, मैं समझ नहीं
पा रहा हूं।
-दिन-रात में भगवान से प्रार्थना करती हूं, कि वह जल्दी मर
जाएं। उनका कष्ट अब और मुझसे नहीं देखा जाता।
-क्या कह रही हैं, भाभी?
मैं टीक ही कह रही हूं। मरना ही उनके लिए शुभ होगा। बहुत
ही शुभ !
-पर मैं तो आपकी बात समझ ही नहीं सकता। मैंने तो सुना था,
बहुत दिनों से उनके रोग को चिकित्सा चल रही है । उनपर बहुत पैस
खर्च किया जा रहा है। यह भी सुना था कि उनकी चिकित्सा के पी
किसीने अपनी सारी जायदाद स्वाहा कर दी है। अटल दा को जीकि
रखने के लिए दिन-रात परिश्रम करती रहती हैं ?
--आपने गलत सुना है।
-नहीं भाभी। गलत नहीं सुना है । वह हमारे ही मुहल्ले में
स्कूल में नौकरी करती है । हम मुहल्ले वालों ने उनके पति की चि
के लिए चन्दा इकट्ठा करके एक हजार रुपये भी दिए हैं।
-आप लोगों ने मूल की है। इतनी भयानक धोखेवा
निर्दयी, इतनी नीच औरत मैंने इस जीवन में नहीं देखी। साम
तो मैं उसका गला घोंट देती।
५६

यह योनी . गुनार मेरी हैरानी और या पई। मैंने पहा बास मागे गिरे हिए, क्या कह रही है ? [~-मार वियफम वेगावर गाना गरी गापागेपर रहे हैं। अगर आपको पता रहता तो सादर जताररहगर पारों पन्दा बट्ठा नहीं करते । पाप जानते नहीं, मितनी भयंकर दरमा और नीच औरत है वह गम्मे री भाभी काप रही थी। मैंने पहा-हम सोग तो उन्हें प्राठी औरत ये रूप में ही जानते हैं। अपने पति के लिए उन्होंने क्या-मुष्ट नहीं गंवाया है ? -आपको ए नहीं मालूम । मालूम होगा तो आप उरी गन में भाइ मारकर भगा देते। -यो? -तो फिर मुनिए । इतनी नीच औरत है कि पति पर उगे वग भी दया-ममता नहीं । विसवुल निर्मम आत्मा है वा । याहर याने गमको है कि वह पति के लिए सब कुछ न्योछावर कर रही है. पर ऐगी निर्मम औरत सारी दुनिया में कभी भी नहीं जन्मी होगी। में उगरी सरफ देगती हूं और हैरान रह जाती है । हो मरता है यह यम जाने, पर जिम दिन से उस मुहजली के हाथ पडे, उग दिन में मैंने इनके सपने की उम्मीद भी छोह दी। कसी अजीब बात है। --हां, भाई ! जिम सरह लोग दवाई पिलाकर अपमरे पूहोमो तड़पता देखकर मजा लुटते हैं, यह भी कुछ ऐगा ही है। इन्दुमेगा देवी रुपया-पैसा गचं कर रही है, चिरिरमा परया रही है, सरख पाने पर हया बदलने के लिए अच्छी जगहों पर भेज भी रही है । पर महीने में लिए वाल्टेयर भेजा था, पुगे में दो मात रणा पात हार में पैदा रोग सैनिटोरियम में भी तीन साल रमा था। सारा सचं अकेले यही दो रही है ? हा, वह तो है ही रही है। मासूम भाव हर रिज लाख रुपये उगने राचं कर दिए हैं। उमा हिमाय मेरे पाम नों - जितना भी खर्च हो, पैसों के मामलों में वह कभी नहीं कतराई। हर स्वास्थ्यप्रद जगह हम दोनों को भेज देती है। अच्छे से अच्छे डाक्टर को बुलवाकर इनकी चिकित्मा करवाती है । चिकित्सा में भी कोई कमी नहीं है। -तो फिर ? खामला उनके नाम आप इतना दोप मढ़ रही हैं ? -दोष तो दूंगी ही। इतना करने पर भी यह ठीक क्यों नहीं होते ? इतनी दवाइयां खाने और चिकित्सा होने पर भी इनकी बीमारी क्यों ठीक नहीं होती? -~-बीमारी का ठीक होना-न होना तो आदमी के बस में नहीं है २ भाभी झल्ला उठीं । बोलीं-यही बात वह सवको समझाती फिर रही है । पर असल बात क्या है, आप जानते हैं ? --आप ही कहिए। मेरी समझ से असल बात तो यही है कि वह पति को स्वस्थ और जीवित रखना चाहती हैं। और क्या हो सकती है ? -नहीं, असल बात यह नहीं है। --तो क्या पति की मृत्यु हो जाए, यही उनकी मनोकामना है ? -नहीं। यह भी नहीं। -तो फिर? ----उसका असली उद्देश्य है आदमी को जीने और मरने के बीच की स्थिति में रखना । यह सारी जिन्दगी इसी तरह अपाहिज और नाकाम होकर रहें, यही उसकी अभिलाषा है। -क्या कह रही हैं ? -हां! इसीलिए चिकित्सा के कारण जैसे ही वह ठीक होने लगते हैं, वह चिकित्सा वन्द करवा देती है । खर्च से हाथ समेट लेती है। उस वार वाल्टेयर में इनकी सेहत काफी अच्छी हो गई थी, जैसे ही उसे यह सवर मिली, उसने कहला भेजा-बस, वाल्टेयर रहने की अब कोई जरूरत नहीं। चले आयो । यह कुछ दिन और वहां रहते तो बिलकुल अच्छे हो जाते । पर यही तो वह सह नहीं सकती। एक बार की बात है । एक दवा ।

से इन्हें काफी फायदा पहुंगा था । दयाई बीमती पी। जगही उग लगा, ग दवाई मे यह यादमी मरमुन ही जी गाएगा, उगने रपये भेजना बन्द पोडी देर सफर फिर योलों-इमी यार पेण्डा रोहफे मेनिटोरियम में पिछले तीन मास से इन्हें रणा पा। इनका वजन भी यन गया था। मग भी लगती थी । जैसे ही यह गबर मिली, उमने मुरन्त चिट्ठी लिग दी -नकमा पले आओ । और पैसा भेजना मेरे लिए सम्भय नहीं। पहमब सुनकर मैं आइपयंचरित हो गया था। योगं सो मुंह में पायाव नहीं । काफी देर बाद मैंने पूछा---ऐसा करने का उद्देश्य क्या है ? -रामामा देगने के अलावा और क्या उद्देश्य हो सकता है ? दवा सागर नहा एटपटाता है और लोग तमाशा देखते हैं । यह भी पहन हर समयमा ही है। टोईगी भी नही, मरने भी नहीं देगी। यह एक अजीव निष्टर आनन्द है । इम औरत का तो मैं पून करूं, तभी मेरे मन की जलन मिटेगी। इसके बाद मेरे कहने लायक कुछ भी नहीं रहा । कुछ कहा भी नही ।। सौटते समय केवल पूछा-अव कमे है पटल दा? भाभी पोड़ी देर पुछ नहीं बोली। फिर बोली-इतनी बातें सुनने के बाद भी आप यह पूछ रहे हैं ? गर! अटस दा उस समय सो रहे थे। उस दिन उन्हें दूर मे ही देगार पला आया था। अटल दा से यात करने का मौका मुझे नहीं मिला पा। १२ मेरे जीवन का यह एक अजीय अनुभव पा । इस तरह की कोई घटना रिगी पहानी या उपन्यास में भी मैंने नहीं पढी । जीवन में इस तरह की पटना पट मरती है, इसका मुझे अन्दाज ही नहीं पा । कई दिन तक मन ही मन बहा येकन रहा। ऐमा क्यों होता है ? कैसे कोई दूसरे को गृहस्यो १६ उजाड़ सकता है ? गमा इन्दुसेगा देवी को इसरो शान्ति मिल रही है। गोभी गाई गोटी-गोटी हिताय लिगी , | सोता था, मनुष्य-गरिन में रामना। सादगीगी गरा-गरा पहनानता । इरागे अलावा दूसरों को भी लगेगा: उपन्यास मैंने पर। शेगस पिगर से लेगार टालस्टाय, वामगागा, गोपासा, गोगी राब मैने पर हैं। चालगाम के बारे में सुना है : दि गरेरट लिटर हा मन मारेगटर्स नेगरट टु गाँध। (भगवान मनार गरम पानों का सबसे बक्षा सप्टा नही था।) पर, उसकी गिताय में भी ऐसा परिस देखने को नहीं मिला । तो गया गुन्तीदेवी ने गार गाहा मा? सौत पर अपना गुस्सा उतार रही थी। चाहत माशापानी गारने गे बाद भी में गिसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंग रागा । - उस दिन अचानक अमीर बोरा मेरे यहाँ आगा। से किसी पर जाने गी पुरांरा अपीर नोरा गो गिलती नहीं है। मेरे नगे पर गा पता भी उगे नहीं मालग था, पर रविवार टी का दिन था-शायद यही सोच- पर निकल गया था। आतेहीमोला- आ गया रे । मैने पूछा.....उस मागले का गुरछ पता लगाया ? -~-गिरा मामलेगा? -----अरे भाई, बही! अटस दागे मामलेगो लेकर में बड़े सोच में गही बताने तोरे यहाँ आगा। उसने नाद गीर ने जो पाहा, सुगार में दंग रह गया । सच में गणी इस मुनिया में गिनी चिनिन पटनाएं गरती है ! गनुष्य पागल मितनी निमित राहों में भटकता रहता है, उसका हिसाव विधाता भी गानमा सहरी । स गती पर जितने तार, लोग मिलते हैं, उतने ही सरत परि । निसी उपामारा-नेगाना गीगा क्षमता किमहरायो गागो जान स.रावरे मन का पता लगा सके। अगर ऐसा ही होता, तो सिराने गा मसाला भी गय का राग हो जाता। हमेशा-हमेशा लिए उपन्यास-रेसन बन्द हो जाता । फार्मूने पर अगर मनुष्य मन का विचार किया जा सकता हो शायद आदमी, मादमी नहीं रह जाता-मशीन बन जाता। १३ बहन दिन पहले की यात है। इस उपन्यास के शुरू-शुरू की घटना थी पद । उन दिनों अटल दा हमारे मुहल्ले के सरताज थे। पढने मे फस्ट आते । विमल आदशं थे। हर मुहल्ले में बच्चे चरित्र-गठन के लिए सभा मायोजित रिया करते थे। बच्चों के मन मे स्वामी विवेकानन्द का प्रभाव गला जाता था। जिस तरह आज सबकी जवान पर राजकपूर, दिलीप मुमार, नगिग के नाम सुनाई पडते हैं-~उसी तरह उस समय चरित्र-गठन के लिए विवेकानन्द की लिसो ब्रह्मचर्य की किताब पढने को दी जाती थी। पंक्षिपचन्द्र को किताब 'आनन्द मठ' एक क्लब से लेकर दूमरे क्लब के महके पाते। यह मैं उग अग्नि-युग की बात बता रहा हूं, जब हर मुहल्ले में टंगाट गाहब घूमते थे। टेगा साहब उस समय कलकत्ता में पुलिस- पामिश्नर थे। मारे पहर मे जामूसो का जाल बिछा था। वह खुद हर मुहल्ले मे पूम-घूमकर लडके, बच्चों से दोस्ती करते। टेगाट साहब मलमन मा एक कुर्ता और तात की धोती पहनते थे। परों मे पम्प-गू जातते थे। वहाँ कौन प्रिटिश सरकार के खिलाफ कुछ बोल रहा है, अग्रेरी के विरुद्ध कौन लोगो को भड़का रहा है, कहा लड़के लाठी और तनदार पलाना सीप रहे हैं, पूम घूमकर यही सब देखना-जानना टेगार्ट साहब का काम पा। और सचमुच ही अचानक किसी दिन पुलिस की पड़ी आती और मुहल्ले के गिने-चुने घरों पर हमला बोल देती। आर के लड़को को यह जानना जरूरी है कि हमें स्वतन्त्रता बिना कारण नहीं मिली । करोड़ों लोगो की कोशिश और आत्म-रयाग के जरिये पद स्वतन्त्रया से प्राप्त हुई है । आज निश्चिन्त होकर हम जो जी में माता है, करते हैं, जहां सुशो हो, जाते हैं। पर उन दिनो लाट साहब के इर्द-गिर्द । घूमने पर भी पुलिस आकर पकड़कर ले जाती थी। चौरंगी पर खुलेआम कोई घूम नहीं सकता था । मार पड़ती थी, पर इसका कोई उपचार भी नहीं था। आम आदमियों के लिए वह एक दुर्दान्त दमन-युग था। ट्रेन के जिस डिव्ये में अंग्रेज़ मुसाफिर चढ़ते, वहां भारतीयों को जगह नहीं मिलती । थर्ड क्लास के डिब्बे में भी अगर दो-चार एंग्लो इण्डियन आ बैठते तो भारतीयों के अधिकार छिन जाते। एक भयावह वातावरण में उन दिनों हम लोग रहते थे। उन्नीस सौ पच्चीस-छब्बीस की वात है। कांग्रेस वालों का स्वर भी नरम था। वे आवेदन, निवेदन के सहारे अधिकार प्राप्त करने की कोशिश कर रहे थे। साल में एक बार किसी एक बड़े शहर में मीटिंग होती थी। कुछ प्रस्ताव पास होते थे। भापण होते थे। पर असली काम मुहल्ले की गुप्त समितियां ही करती थीं। अंग्रेज़ इन्हीं से डरते थे। वाकी लोग अंग्रेजों के अधीन अच्छी नौकरी करते थे। पुलिस के ब्लक रजिस्टर से अपना नाम वचा रखा या । अपने नाम पर दाग नहीं लगने दिया था। उन दिनों जो लोग लाठी और तलवार चलना सीखते थे, जिन्होंने क्लव बनाकर, नाइट स्कूल खोलकर लड़के-लड़कियां को बुद्धि-सम्पन्न बनाने के लिए अपना सब कुछ त्याग दिया था, उनमें से बहुतों को हम आज नहीं जानते । हो सकता है, उनमें से आन भी कुछ जीवित हों, पर आज खुशी के दिनों में उन्हें कोई याद नहीं करता । थोड़ी-बहुत पेन्शन उन्हें मिल जाती होगी। खैर ! उन दिनों हमारे मुहल्ले के आदर्शवादी लड़कों में एक थे हमारे अटल दा। जब वाकी लोग अपने स्वार्थ के पीछे दीवाने बने हुए थे, अटल दा हम लोगों को प्रादमी बनाने के पीछे जुटे हुए थे। वाकई वह अतिमानुपिक परिश्रम करते थे। आशु बाबू को यह सव पसन्द नहीं था। उनकी इच्छा थी कि उनका लड़का उन्हींकी तरह किसी अच्छे आफिस में काम करे । उनसे भी अच्छी नौकरी करे। बड़ी मोटरगाड़ी में दफ्तर आए-जाए, जिससे दस जने आंखें फाड़कर देखें । आमतौर से हर गृहस्थ वाप जो चाहता है, आशु वाबू भी उससे अधिक की आशा नहीं रखते थे। हो सकता है, उनके मन में एक छोटी-सी आशा रही हो, अपने मकान को दुतल्ला बनाने की। ६२

सम्पम वर्ग की मनोवृत्ति को परम भरा हो
माध्यम से प्राप्त ररमा पाहते । बाद इनोनिर मोती है
घंटे में महते-
-समय यहागराव है। पोडो भारपानी से परना
घटल वा युभिमान पुत्र थे। पाराने सानिमारा
प्रतिवाद उन्होंने कभी नहीं किया। यह पहली पाजी, तनमक
पर ही पलता है।
भाग पाय ने वहा पा-मना है,टेगा बाहर निकारहतारमोहले
में घूमते हैं।
अटन दा रहते-हां, मना तो हमने की है।
मागु बाबू बहते-तो फिर इन समर बाहर पनि ना करे।
पारो तरफ जासूम हैं।
गिफं आग यार ही सो, दूसरे लोग भी बटन दारोमद रखें
रहने, अटल दा की भलाई के लिए उस देखें। रत-ने साके
लिए भी बुरा सोचो अटन ! बुडारे की बागा ठो दुन ही होन।
1
ये मारी बाते हम लोगो के गानों में भा पदचाया। पर हम दड़े-
लोगो याती पर ध्यान नहीं देते। हम लोगो ने तो नि यही मीन्दा
पाकि देश के लिए प्राण देने में ही गौरव है। हम जानते थे कि अप्रेज
गरबार का उन्मूलन किए बिना देश का हित नहीं हो मकान देवन
पकि हजारों लड़के पालिसकर बेकार बैठे हैं। उन्हें नहीं नौकरी नहीं
मिलती। उरा समय हम सोग मी० आर० दाम के भाषण मनते गिन
पा में भी जोशीला भाषण होवा, हम यही दौड़ने। मीटिंग के समय
पुलिस साठी पर तैनात रहती। किमी-रिसी दिन माटी के बर पर
मीटिंग को तितर-बितर कर देती। बहुतों को चोट नी माती। पुसिम
तिना पटोर वांय करती, हम लोगों को जिद भी उतनी ही बानी
जाती। मन ही मन हम अंग्रेजो के कट्टर दुश्मन बन गए थे। हन यंग्रेजों
वो भगाना पाहते थे। यह धरणे युग नहीं था। हम तो मि यही

जानते थे कि चाहे गोलो दाग कर हो या बम फेंककर, हमें अंग्रेजों को भगाना ही है। साथ ही साथ अंग्रेज़ी चीजों का बहिष्कार तो था ही। हम लुक-छिपकर स्वामी विवेकानन्द के उपदेश पढ़ते । विवेकानन्द ने लिखा - 'शरीर तन्दुरुस्त रहेगा, तो मन भी तन्दुरुस्त रहेगा। अटल दा भी हमें यही बातें समझाते। उनकी लिखी कितावें हमें पढ़ने के लिए देते। मन ही मन हम विवेकानन्द बनना चाहते थे। भाज की तरह उस समय सिनेमा नहीं था । थियेटर था, पर वह भी श्यामवाज़ार की तरफ। हमारे मुहल्ले से दूर पड़ता था। वहां जाने का ही मौका नहीं लगता, और फिर उतना पैसा खर्च कर थियेटर देखने का सामर्थ्य मुझमें नहीं था । और सच पूछा जाए तो उसमें कोई दिलचस्पी भी नहीं थी। ठीक इसी समय अटल दा पर मुहल्ले के बाहर के काम का बोझ आ पड़ा। अपने मुहल्ले के एक छोटे-से क्लव से उन्होंने जिस आदर्श- मय जीवन की शुरुग्रात की, उसका प्रचार करने के लिए अटल दा ने दूर-दूर के मोहल्लों में क्लब खोले । क्योंकि विवेकानन्द की वाणी को सब तक पहुंचाना जरूरी जो था। तभी तो देश में स्वराज्य आता, मुक्ति मिलती। हमें यह नहीं मालूम था कि अटल दा कहाँ, क्या काम कर रहे है, किस मोहल्ले में किस नये क्लव का उद्घाटन कर रहे हैं..-पर, हम यह जानते थे कि हमारे अपने क्लब की बहुत-सी शाखाएं-प्रशाखाएं खुल गई थीं। अब सभी जगह अटल दा का जाना जरूरी था। अटल दा स्वयं देखभाल न करते, तो क्लवों का चलना मुश्किल था। १४ इसी तरह के एक क्लव में उनके जीवन की वह प्रांधी भाई थी। आंधी माने ऐसा-वैसा कुछ नहीं। पहले तो सचमुच लगा था कि कोई आंधी है। स्वामी विवेकानन्द ने कहा था-"जो स्वयं नरक में जाकर । वे.

1 गरे जीवों के उदारी पेप्टा करता है-वही समहान वा वंशधर जो महासन्धि पूजा का ना हर गांव में, हर घर में जाकर बांटता यही मेरा माई है, मेरा पुत्र है। यही एक परीक्षा है। जो रामप्य का पुत्र है, वह भारता मरा नहीं चाहता । मले समय भी वह दूसरों का त्याच पाहता है। जो आराम पाता है, जो आसनो है, जो अपने लिए गरपालिान पास्ता है. वह हमारा कोई नहीं। वह हमने अलग अटन दा भी ऐसे ही परोपकारी थे। अटन दा को भी मही पारणा थी कि खुद फटे नाकर पेश होगा, परिमारी मोग पीछे पड़े रहें। अपनी मुक्ति मे क्या फायदा, यदि दूसरे मोर अपार मे, मम्कारों में जकड़े रहें। हमे सभी की जरूरत है। मा के माहान पर सबको पाना पड़ेगा । मा सबको आत्माहुति मोगती है। माना सर्वस्व त्यागने पर ही मां जागेंगी। मिट्टी की मा में सभी प्राण प्रतिष्या होगी और वह जापत होगी। परब में आगर अटल दा यही बातें बताते थे। सभी लड़के या हार पटना की बातें मुनते और देवता की तरह उन्हें श्रद्धा को दृष्टि में देयते। सर-सहमियां दोनों ही पलव में आते थे, पर फ्राक पहनने वाली छोटी सरियां ही आती। पोड़ी-सी बड़ी हो जाती तो उनका क्लव: भाना बन्द हो जाता। परसाले माने पर रोक लगा देते। तब नरोजादी की बारी आती, बच्चे होने को पारी माती, गृहस्थी निभाने जौबारी आती। अदमदा पर विश्वास करना पाप था। अटल दा के चरित्र में पोसी बात कोई मोच भी नहीं सकता था। एक दिन कुन्ती बाकर उनमे रोती थी--मटन दा, आपको वाबूजी ने बुलाया है । बगे? -4 बारको देखना चाहते हैं। -वारे, मुझमें देगने लाया ऐमा क्या है ? नहीं, यह बात नहीं । आपकी बात मैंने वापूजी को बताई थी। -

कुन्ती ने अपने बाप को क्या कहा था, क्या पता। पर एक दिन
न्ती जिद करके अटल दा को अपने घर ले ही गई । भवानीपुर में ऐसा
जो कोई मुहल्ला हो सकता है, यह अटल दा कल्पना भी नहीं कर
सकते थे।
अटल दा को देखकर कुन्ती के वाबूजी बिस्तर से उठ बैठे।
कुन्ती बोली--बाबूजी को बुखार है।
-बुखार है तो आप उठ क्यों रहे हैं ? आप लेटकर ही बातें
कीजिए। अटल दा ने कहा।
कुन्ती के वाबूजी हंसकर बोले-बुखार तो आज नहीं आया ।
पिछले सात साल से बुखार की शिकायत रही है।
-क्यों? डाक्टर क्या बताते हैं ?
उन भद्र सज्जन ने कहा-डाक्टर की क्षमता के परे है मेरा यह
रोग । रोग तो मन का है। फिर बड़े सहज ढंग से वह अपनी कहानी
कह गए । सज्जन का नाम था मंगल सरकार।
मंगल बाबू ने कहा--कुन्ती से मैं आपकी बातें सुनता हूं और सोचता
रहता हू । आज काम करने की शक्ति खो बैठा हूं। सोकर केवल स्वप्न
देखता रहता हूं। पर वेटे, किसी दिन हम में भी तुम्हारी तरह काम कर
की बड़ी लगन थी, शक्ति थी। इसीलिए कुन्ती से कहा था-अप
अटल दा को किसी दिन घर पर लाना।
थोड़ी देर कर बोले-तुम्हें देखकर मन में उम्मीदें बंध रही
तुम ज़रूर कुछ कर सकोगे।
हमारे अटल दा को कभी इतने वयोवृद्ध आदमी से प्रेरणा
प्रोत्साहन नहीं मिला था।
अटल दा ने कहा भी-आपकी तरह मेरे कार्यों को किसीने
नीय नहीं समझा है । सभीने निन्दा की है। लोग कहते हैं कि
चाकरी कर घर-गृहस्थी के लिए कुछ कमा सकता तो वह इस
होता। इससे मां-बाप का उपकार होता । आपने पहली बार
किया है।
मंगल बाबू बोले-समर्थन ही क्यों, बेटा, हिम्मत रहत

पाम महाप भी घटाता । हो तो एक जीवन है । मुम्हारी उस में मुझे
भी रिमोंने मार नोरिया पा, गमिए मुझे यह उठानी पड़ी।
में हार मा । मुमपे नही हो मरा ? तुम पानी दा
घटा, नम श्रीगो बनोगे ।
मोगरत गनी पे पर प्रदरमा बानागना परमा।
पागनर द्वारी पामों के योर मार भी मानवायागु,
रमा नियगिटी में पर माने यात्रा महामनमाने में fri
rini fruना पना गया। मगर वार ने पानी
गमर EिR आना बंटा। गंरांग मन परना।
परत का प्रान, मंगन यार पाम पंटो । पपनी मा-भाnen
यामुना गंगन या या पती पाने का भी नहीं
गते । गा पाने के लिए पर उपरा आरमी पाार मगर पार
भी बदामगा। मंगल वापरा निजी जीवन भी यह विपित्र पाएर
दिनमाने परमारिगान में मार मार पोदेन पर यम पा,
पर तो जाना होगे। उगी राष्ट्र मेरो मोग पार भी गए
प। पर अगली आदमी पो पुगिनतीगी। शिगने यम बनाया
धा-और रिलाट मारय पर भी पा, परिग मा पता भार
भी नाममा पाई है। उमरे नाम प्रय भी यार।
नाबी-पान पादह ? अगमी आदमी और पा?
ने पहा-एर पासपोर। मेरा अमनी नाम मंगर
गसार नही मेरा पारपिर नाम पतीपो भी नहीं मालूम।
पदादा अपार होरर मन-यो।तो शिर मा
अगामी नाम है?
-मंग नाम योग।
प्रोमानो बार गिरा और भी
यानानी मारी।
प्रमा-पारही प्रोन ?

-हां! - -आप ही के नाम पुलिस ने दस हजार रुपयों के पुरस्कार की घोषणा की थी? --हो । प्रोजेन की आज तक कोई नहीं पकड़वा सका है। किसीको यह मालूम ही नहीं कि ब्रोजेन जिन्दा भी है या नहीं, जिन्दा है भी तो कहां-किस दशा में है ? सवको तो यही मालूम है कि ब्रोजेन इण्डिया छोड़कर भाग गया है । जर्मनी, रशिया, अमेरिका, तोकियो, वह कहीं भी हो सकता है, रासविहारी वासु की तरह । नाज पहली बार तुम्हें ही सच्ची बात बता रहा हूं। अटल दा विस्मय भरी नजरों से मंगल वाबू को देखते रहे । मंगल चाबू बोले-तुमसे यही माशा रखता हूं वेटा, कि तुम पहले की तरह ही मुझे मंगल वाबू ही समझोगे। मध्यमवर्ग का एक बीमार बूढ़ा किरानी ही समझना, बेटा। यही याद रखना कि तबीयत खराव रहने की वजह से मैं नौकरी छोड़कर किसी तरह दिन काट रहा हूं। शायद यहां से भाग सकता तो अच्छा होता। ज्यादा काम भी कर सकता। स्वास्थ्य भी इस कदर नहीं टूटता। अटल दा ने कहा-आप ठीक कह रहे हैं। आपको बाहर चले जाना चाहिए था। पर आप गए क्यों नहीं ? मंगल वायू बोले- बोले-बाहर जाना अच्छा तो रहता, यह मैं भी जानता था, पर मुझपर उस समय उससे भी किसी बड़े काम का बोझ था। -कौन-सा काम ? --उस कमरे में जो है, वह कुन्ती ! उस कुन्ती के कारण ही मुझे यहां रह जाना पड़ा। -अपनी पुत्री की वजह से ? मंगल बाबू अपने गले को और भी गम्भीर बनाकर वोले-लोग उसे मेरी बेटी ही समझते हैं। कुन्ती भी समझती है कि मैं उसका वाप हूं। -प्राप उसके बाप नहीं? -नहीं। .

भीमवी गदोपहरा रंगार ! प्राशिसहर धीरे-धीरे गिर
उठा रही थी।कमी पापा ने भी गीता माता पिर माला
पास दुनिया में नह भी माम मामिपी पर मायापार मा.काशि
ने यही बम मिया है। और शान्ति मानि मोगों ने पहराया
है, वे हमेशा ही मध्यम वर्ग के मोगा रहे हैं। मानब समीर वर्ष
मध्यम वर्ग ही है । मंगन मान भी इसी मध्यम वर्ग के प्रतिनिपि ।
उन्होंने जिग तरह उग पुगवी पत्रणारा अनुभव पिया पा.मा अटल
दामनुभव महीं कर गरते थे। यही बात यह भटम सारो गममाया
१६०२ में योगर वार समाज ही हमापा गया और जापान
शेष एप और सहाई की समारी हो रही थी। मो समय भारत में
गुण समितियां गठित करने का सरल्प लिया गया । इसके पो गि
महिलाको पिप प्रेरणा थी, यह पी मिस्टर निवेदिता।
पहली बार मिमी पानिमारी पी उबाल गे अदमदा ने उन दिनों
का इतिहास गुना । अब तक तो उन्होंने पढ़ा हो पा. र प्रांगों देगा
प्रामाणिक वर्णन गुनने को मिला।
अटप्स दा ने महा-आप लोगों को भी र मी मा
पा?
--र किस बात का? गिसे M ? लि.
पारियो के लिए रनाही मरना है। मेरा एक दोन पा रन ।
मारपेन का नाम तुमने गुना होगा?
---गुना है।
सप पूछो तो सरपेन पुदीराम गुर साम दोनों स्तर
केमिया पाडार के प्रसार में पुरती माना गीयते । एकही शाप
दोनो ने अग्निपरोपाई पीहिमोनोपा राता मोर
एकही मा। पर यह परम गया, म भाग 1 पान रेश

हो! -आप ही के नाम पुलिस ने दस हजार रुपयों के पुरस्कार की घोपणा की थी? हो । प्रोजेन की माज तक कोई नहीं पकड़वा सका है। किसीको यह मालूम ही नहीं कि ब्रोजेन जिन्दा भी है या नहीं, जिन्दा है भी तो कहां-किस दशा में है ? सबको तो यही मालूम है कि ब्रोजेन इण्डिया छोड़कर भाग गया है । जर्मनी, रशिया, अमेरिका, तोकियो, वह कहीं भी हो सकता है, रासबिहारी वासु की तरह । आज पहली बार तुम्हें ही सच्ची बात बता रहा हूं। अटल दा विस्मय भरी नज़रों से मंगल बाबू को देखते रहे । मंगल बावू बोले-तुमसे यही आशा रखता हूं वेटा, कि तुम पहले की तरह ही मुझे मंगल वाबू ही समझोगे। मध्यमवर्ग का एक बीमार बूढ़ा किरानी ही समझना, बेटा। यही याद रखना कि तबीयत खराव रहने की वजह से मैं नौकरी छोड़कर किसी तरह दिन काट रहा हूं। शायद यहां से भाग सकता तो अच्छा होता। ज्यादा काम भी कर सकता। स्वास्थ्य भी इस कदर नहीं टूटता। ! अटल दा ने कहा-आप ठीक कह रहे हैं। आपको बाहर चले जाना चाहिए था। पर आप गए क्यों नहीं ? मंगल बाबू बोले-बाहर जाना अच्छा तो रहता, यह मैं भी जानता था, पर मुझपर उस समय उससे भी किसी बड़े काम का वोझ था। -कौन-सा काम ? -उस कमरे में जो है, वह कुन्ती ! उस कुन्ती के कारण ही मुझे यहां रह जाना पड़ा। -अपनी पुत्री की वजह से ? मंगल वाबू अपने गले को और भी गम्भीर बनाकर बोले-लोग उसे मेरी बेटी ही समझते हैं। कुन्ती भी समझती है कि मैं उसका वाप हूं। -प्राप उसके वाप नहीं ? -नहीं। । ६८ पर याम बाबू ने मन ही मन सोचा पा कि यगर लड़रे की शादी पर दी जाए तो या रात योगायद जल्दी ही पर थापग आएमा । माग याय ये दोरतो ने भी यही मलाह दी। कहा-आपकी पत्नी पी भी मो उपही पुषी है। उन्हे भी बात करने के लिए कोई मिल जाएगा। आपनी को पड़ी भी तो नहीं है। उसी समय मे बारा वायू बरगदा के लिए सड़की दूसने लगे। रहन गोत्रने मे याद यह रिम्ना उन्हें पगन्द आया था। यही अलीपुर वासा रिश्ता । एक दिन चुपचाप वह इन्दुलेगा देवी को देय भी आए। बाप यार में दोस्तों ने कहा-आपको अच्छा मम्बन्ध मिल गया है।यम, यही शादी कर दीजिा । ममपी धनी है । आपरे लड़के को भी पर और भरोगे की जरूरत है । धनी यार की इकलौती बेटी-पया बम यही यात है। जिम गमप आग वार अटल दा वो शादी की तैयारी कर रहे थे, उग नमय अटल दारिगो और ही दुनिया में बस रहे थे । साने-पीने की भी मुध नही रहती थी । मटन दा पो एक नई प्रेरणा मिली थी। गृहस्थी पी पी तो गभी पीमते हैं। नौकरी भी गभी करते है। जंगल का जानपर भी पेट भरने के उपाय जानता है। इतना पढ-लिरावर अटल दा भी परा वीरेंगे फिर अटल दा और दूगरों के बीच अन्तर ही क्या गोगा? मंगम याय ने पहा पा-मेदिनीपुर के मिया बाजार के पाग एक टूटे मारान मे म मोगोंगा एक गुफिया अहहा था। वहीं एक काली की मूर्ति को भी ग्याना पी पी हमने । नौकर-चाकर तो नहीं। साना बनाना, पतंन मानना पर पाम हम लोग अपने ही हायो करते । मामने याने पमरे में परपाटा रहा था, जिग पर हर समय एक--आधा सुना कपाटगा रस्ता पाहम लोग उनी पर वाले कमरे में मिलते । हम पानी गोराम, गगिन, निगपद राय और गत्वेन । उग गमय मानो एम प्रारमी नही, अग्निमलिग पे। माम पार ने अपनो यान जारी रगी-माज के बच्चे उन दिनों की पास नही जानने । मांग-बाग तो अब निप्रिय होकर जी रहे है। टेगा

नहीं। यही सोचकर भागा कि जो काम सत्येन नहीं कर पाया, उसे मैं
पूरा करूंगा। पर मुझे हराकर वह जीत गया। इस इतिहास को तो
सभी जानते हैं । तुम भी जानते हो ?
-जानता हूं।
अटल दा इस इतिहास से परिचित थे। हर रोज काम-काज से
निपटकर अटल दा एक बार मंगल बाबू के यहां जरूर जाते थे। उस
युग की क्रान्तिकारियों की बातें सुनते-सुनते किसी-किसी दिन तो अधिक
रात हो जाती। तब तक कुन्ती क्लव छोड़ चुकी थी। फाक छोड़कर
साड़ी पहनने लगी थी। लाठी चलाना अव उसे नहीं शोभता था। मंगल
वाबू को तो इसमें कोई आपत्ति नहीं थी, पर समाज नहीं मानता था।
उन दिनों इतनी बड़ी लडकी क्लव तो क्या सड़क पर भी नहीं निकलती
थी।
कहानी सुनते-सुनते अटल दा पूछते-उसके बाद?
?
मंगल बाबू कहते--आज रात काफी हो गई है। बाकी कल
सुनना।
मंगल बाबू के घर जाना अटल दा का एक नशा हो गया था।
किसी भी क्लब के लड़के अब अटल दा को पहले जितना पास नहीं पाते।
सब यही सोचते-अटल दा किसी बड़े काम में उल में हुए हैं। घर के
लोगों के लिए भी उनका दर्शन अब मुश्किल हो गया था।
कभी-कभार प्रागु बाबू पूछते~कल इतनी रात कहां थे ?
अटल दा छोटा-सा उत्तर देते-काम था ।
-कौन-सा काम ? कहां का काम, कसा काम? अपना काम या
पराये का काम ?
अटल दा कुछ नहीं कहते । अटल दा जो ठीक समझते, वहीं करते।
अटल दा बातें कम करते। पढ़ने-लिखने की बात उन्हें कभी कहनी नहीं
पड़ी। उनके लिए कभी ट्यूटर की भी जरूरत नहीं पड़ी। वह हमेशा
अपनी कोशिश में ही फट आए। अपनी भलाई-बुराई भी वह अच्छी
तरह समझ सकते थे, इसलिए माशु यावू भी बेटे को कुछ नहीं
कहते।

सान से कभी नही पूछा, क्योंकि मैं जानता था कि सत्येन इस तरह के सना-दुर्गा मांगों को सहायता करता रहता है । जिस दिन मेदिनीपुर में पुलिस आकर मरन को पकड़कर ले गई, सारे मेदिनीपुर के लोग हैरान ह गए। पुलिस हमें भी पकड़ सकती थी, पर घटनास्थल से मैं पुलिस को और चारर निकल गया मोर दूसरे ही दिन मैंने मेदिनीपुर छोड़ दिया। पर पाने के दिन सुबह ही एक घटना घटी। पो फटते ही मैं घर से निश्मा था। अन्धकार पूरा साफ भी नहीं हुआ था। बाजार बन्द था । उमी बाजार के मोड़ पर एक आदमी मेरे सामने आकर रुका। उसके साथ एक छोटी-सी सड़की थी । विनुल छोटी-सी। दो या तीन साल की रही मैंने पूछा--कोन? मन ही मन घोडा डर भी गया था। पर हिम्मत दिवाकर साती सानारसदा रहा। पद मादपी योला-आपके साथ कुछ काम था। --सेरिन आप हैं कौन? उम आदमी ने पहा-नाम बताने पर आप मुझे पहचानेंगे नहीं। युमें सस्पैन ने भेजा है। --स्पेन? गुनार में विचलित हो गया । अपनी प्रतिज्ञा की बात भूल गया । नगा, यह मामी पुलिस का भी हो सकता है। मुझे फंसाना चाहता है। असम में सापेन को पुलिस ने इतना अचानक पकडा था कि उसका कारण मैं भी टोप-ठीक नहीं समझ सका पा। उन दिनों पुलिस इतनी चुपचाप परमारती पो कि एक पष्टे पहले तक भी उसका आभास नहीं होता पासासी सोग हो अंग्रेजी पुलिस के जासूस होते थे, पर स्वतन्त्रता- गाम में बंगाली मानों ने बड़ी हिम्मत भी दिखाई है । सत्पेन का नाम गुनगरपोक गया था। यह आदमी शायद मेरो मनोदशा भाप गया था। गोला-बोई ऐमी-मो बात नहीं । असल में मरन यावू ने ही आपके निए पहा याउन्होंने पापको किमी छोटी लड़की का भार उठाने के मिए पाया?

? साहब को देखकर लोग डर से कांपते हैं। पुलिस देखकर कमरे में छुप जाते हैं । कैसे कारपोरेशन के काउन्सलर वनें, इसकी चिन्ता लगी रहती है । पर उस समय हमारी भावनाएं कुछ और ही थीं। सत्येन के बड़े भैया के पास दो नालों वाली एक बन्दूक थी। उसका सत्येन ने विना लाइसेंस के इस्तेमाल किया था। एक दिन सत्येन को शक हो गया कि पुलिस उसके पीछे पड़ गई है। मुझसे सत्येन ने कहा भी देख प्रोजेन, अगर पुलिस मुझे पकड़ भी ले तो तुझे एक काम करना पड़ेगा। -क्या काम है, वोल ! सत्येन बोला-~~-इस दुनिया में किसीका भार या उत्तरदायित्व मुझ- पर नहीं है । मेरे मर जाने पर किसीको कोई घाटा नहीं होगा, कोई क्षति नहीं पहुंचेगी, सिर्फ एक को छोड़कर । मैंने पूछा-कौन ? तेरे भैया ज्ञाननाथ बाबू सत्येन बोला- नहीं । भैया को मैं श्रद्धा की दृष्टि से देखता हूं। वह भी मुझे मानते हैं, पर भैया की बात नहीं तो फिर किसके लिए कह रहा है ? सत्वेन वोला-वह मेरी अपनी कोई नहीं। उसके सम्बन्ध में मुझसे कभी कुछ नहीं पूछना, पर एक बात जान ले कि मेरी तरह उसका भी अपना कोई नहीं। उसका सारा भार एक तरह से मैं ही ढोता हूं। यदि मैं पकड़ा जाऊं तो उसका क्या होगा, मैं यही सोच रहा हूं। मैंने कहा--उसके लिए तू चिन्ता मत कर। तेरा भार मैंने अपने ऊपर लिया। सत्येन बोला--तो फिर कसम खा कि उनकी बात तू कभी किसीको नहीं बताएगा। वे लोग कौन हैं, मेरे कौन लगते हैं, यह भी नहीं। मैंने कहा था-प्रतिज्ञा करता हूं, ये वातें दूसरों को कभी नहीं बताऊंगा। सत्येन बोला-जब मैं जेल से लौटूंगा तव फिर उनका दायित्व उठा लूंगा और तुम्हें मुक्त कर दूंगा। उसी समय यह भी बताऊंगा कि ये कोन हैं। यह भी बताऊंगा कि मैंने क्यों तुझे ही इस बोझ को उठाने के लिए कहा था। सच में वे कौन थे, सत्येन के साथ उनका क्या रिश्ता था, यह मैंने - ७२ मंचन वायू बों-नही । उमे मव कुछ कहूंगा, यह बात तो सत्येन माप नी पी। मैंने तो मिपं. वचन दिया था कि मैं कुन्ती का मार माजमा बटन दा ने पूछा-मापरा अमन नाम ग्रोजेन है, इस बात को कुन्ती जानती ? नही, व मुष्ट भी नहीं मालूम। मेरे अलावा एक तुम्हीको ये पान मानम है । और भी दो-एक अने जानते हैं। पर उनमे से विसीको पानीसाग है,और बोई मर गया है। में नारे भी इतनी बातें मापद नहीं कहता । पर बहुत दिनो से तुम्हें देग हार न । मैंने तुम्हें टीय पहचाना है । तुम्हारे बीच मैं अपने को पा गाई। मुम्ही पुरा कर मांगे, अटल ! जरूर कर सकोगे। जब दूसरे मामो को दंगता हूं. तर मन निरामा मे भर जाता है । वचपन में हम मोगों ने अप्रेजों को पहा मे भगाने के लिए गाधना की थी। उस समय तुम्हारी नरह के पुष्ट माये थे, पर आज उनकी सस्या घट रही है। दो बीच में मात्र अपने पुराने 'म' को देग पा रहा हूं, इसीलिए आज तुम्हें तनी मारी बात यह दी। अब मेरे दिन तो पूरे हो चुके हैं । --जानना , में अय और अधिक दिनो तक नहीं जो गकूगा । और frr पिरान इस मगार में जीता ही कौन है ! मुभमे तो कुछ नहीं हो मारा, पह, मुम देश हो रहे हो। बचपन में मैं जिस नाम से जाना जाता पा, उग नाम पोम आज जीम पर भी नहीं ला सकता। जो मुझे इस 'उनकी पोई भी सामना मुझसे पूरी नहीं हुई। मैं हार मपा, भा.! पि मत्पन को मैंने जो वचन दिया था, घेवल उमे ही औजार निभा पापा हूं। यही मेरी गगी है और यही मेरा मन्तोष । अनदाने पूछा-म दिन में आपका अमल परिचय कोई नहीं पापा माए. बार यौननहीं. यो: भी नहीं। मोतिर अब नर आरिम परिचय में जी रहे हैं ? मगर सार बोरेपनम्ना वारपोरेशन में एक परक है, यही मेरा मात्र परिपर है।

। मैंने कहा-हां, हां। सत्येन ने मुझसे कहा तो था । ---यह रही वह लड़की। मैंने लड़की को देखा। अमली फ्राक पहने एक छोटी-सी लड़ की। इमारी वातचीत वह कुछ भी नहीं समझ पा रही थी। चुपचाप उस आदमी का हाथ पकड़े खड़ी थी। मैं सोच में पड़ गया । अभी कहीं वाज़ार के लोग जग जाएं तो हमें देख लेंगे, पहचान भी लेगे। उसके बाद सर्वनाश में देर नहीं रहेगी। -अच्छा तो मैं चलता हूं। मैं चौंककर मानो जाग उठा । मुंह उठाकर देखा तो वह आदमी लड़की को छोड़ चला जा रहा था । और वह लड़की भी अजीव थी। न तो रो रही थी और न ही उस आदमी को बुला रही थी। मैं पुकारने ही जा रहा था---'ओ साहब, पर न मालूम क्यों गले से आवाज़ ही नहीं निकली । चुपचाप देखता रहा। वह आदमी धीरे-धीरे आंखों से ओझल हो गया। अब मैंने लड़की की तरफ देखा। वह भी मुझे देख रही थी। शायद मुझे समभना चाह रही थी। पर ज़्यादा सोचने का वक्त नहीं था। ट्रेन का समय हो रहा था । टिकट खरीदना वाकी था। उसके लिए भी समय चाहिए। मैं लड़की का हाथ पकड़कर स्टेशन की तरफ तेज कदमों से चलने लगा। लड़की भी निविकार भाव ने मेरे साथ चलने लगी। उसके बाद कब तो मैंने टिकट खरीदा, कब कलकत्ता पहुंचा, कुछ खयाल नहीं है । सत्येन के सामने शपथ खाई थी, उसे वचन दिया था कि उसका सौंपा दायित्व निभाऊंगा, इसलिए उसे निभाना ही पड़ेगा। आजीवन । -हां, तो मैं कह रहा था कि उसी दिन से मैं मंगलमय सरकार बना गया। मूल ही गया कि कभी मेरा नाम प्रोजेन भी था। मैं अपनी ही नज़र में अपरिचित बन गया । अब मैं कुन्ती का बाप बन चुका था। प्रोजेन वाबू की कहानी सुनते-सुनते उस दिन काफी रात हो गई थी। बाहर जोरों की बारिश हो रही थी। अटल दा ने खिड़की से बाहर फिर [-लेकिन कुन्ती ? क्या ये बातें उसे मालूम हैं ? . झांका ७४ मान गनू बो-नहीं । उसे सब कुछ रहूगा, यह यात तो सत्येन गाय नही हुई थी। मैंने तो सिर्फ वचन दिया था कि मैं कुन्ती का भार 1 उटालगा। घटन दा ने पूछा-प्रापरा अगल नाम योजेन है, इस बात को कुन्ती जानती है? -नही, उने यस भी नहीं मालूम। मेरे अलावा एक तुम्हीको ये यात मासूम है । और भी दो-एक जने जानते हैं, पर उनमे से क्सिीको पांगी गई है,और कोई मर गया है। मनु भी इतनी वान पायद नहीं कहता। पर बहुत दिनो से तुम्हें देश हाईन । मैंने तुम्हे टीक पहचाना है । तुम्हारे बीच में अपने को पा परा। मुम्ती पुट कर मकोगे, अटल | जरूर कर सकोगे। जब दूसरे मनोयो देता हूं. तब मन निरागा से भर जाता है । यचपन मे हम लोगों ने ग्रेजोरी यहा में भगाने के लिए साधना की थी। उस समय तुम्हारी सण के पुछ लडके थे, पर माज उनकी संख्या घट रही है । तुम्हारे बीच में बाज अपने पुराने 'मैं' को देय पा रहा हूं, इसीलिए आज तुम्हें इतनी मारी बातें पह दी। अब मेरे दिन तो पूरे हो चुके है । -जानताह अय और अधिक दिनो तक नहीं जी सकूगा । और गिर पिरान इस मगार में जीता हो कौन है | मुभमे तो कुछ नहीं हो गा, पर तुम देगही रहे हो । बचपन में मैं जिस नाम से जाना जाता पा, दम नाम को मैं आज जीम पर भी नहीं ला सकता । जो मुझे इम परती पर पाए. उनकी कोई भी सामना मुझमे पूरी नहीं हुई। हार पपा, भाई! मिसत्येन पो मैंने जो वचन दिया था, फेवल उसे ही जो-जान मे निमा पाया हूं। यही मेरो युगी है और यही मेरा सन्तोप । अटर दा ने पूछा- उम दिन मे आपका अमल परिचय कोई नहीं गनता? मंगर पार दो-नही, वो भी नहीं। -गोपिरप्रय तर आर रिग परिचय मे जी रहे हैं ? मार यार गोरे-में फतरता कारपोरेगन मे एक वलक हूं, यही रापमान परिषय है। . । ।

? -~-यहां नौकरी करते समय किसीको शक नहीं हुआ कि असल में श्राप कौन है ? अटल दा ने पूछा। मंगल वाबू बोले-नहीं। एक बार में देशबन्धु चित्तरंजन दास से मिला था। उन्होंने मुझसे दो-एक बातें पूछी थीं। मेरा खद्दर का पहनावा देखकर वह समझ गए कि मैं कोई देशभक्त हूं। अधिक कुछ उन्होंने पूछा नहीं और नौकरी मुझे मिल गई। -उसके बाद ? अटल दा ने पूछा। उसके बाद जब से मैंने नौकरी में पैर रखा, क्लर्क ही रह गया । और कुछ बनना भी तो मैंने नहीं चाहा । वन भी नहीं सका । और कुछ वनता तो शायद वह मेरी भूल होती। सत्येन मुझपर जो भार सौंप गया था, उसे मैं इसके विना ढो नहीं सकता था। उसे कौन देखता? क्यों मंगल बाबू बोले-कुन्ती मेरी लड़की नहीं है, यह जानने पर कुन्ती को बहुत बड़ा आघात पहुंचेगा। मैं भी अपने वचन से डिग जाऊंगा। लोगों में तो यही बात रहनी चाहिए कि कुन्ती मेरी लड़की है। मैं कुन्ती की भलाई चाहता हूं। यही चाहा भी था। मेरी अपनी भलाई से सत्येन को दिया गया वचन मेरे लिए ज्यादा कीमती है। तुम्हें नहीं मालूम, मैंने कैसे दुर्योग के दिन काटे हैं। अगर नहीं सुना है तो मुझसे सुनते जाओ। उन दिनों 'वन्दे मातरम' का उच्चारण भी अपराध माना जाता था। उस अपराध के विरुद्ध लड़ने के लिए हमें उतना ही कठोर बनना पड़ता था। हम लोग ब्रह्मचर्य का जीवन बिताते थे। सोचते थे, यदि हम यह कष्ट भोगेंगे तो हमारी वाद वाली पीढ़ी चैन से रहेगी। वह स्वतन्त्र भारत की गोद में सोकर आराम की सांस ले सकेगी। यही तो हमारा साध्य था। अपने सुख से अधिक हम लोग चरित्र-गठन पर ध्यान देते थे। --पर किसी-किसी दिन कुन्ती के लिए दुश्चिन्ता सताती थी । कुन्ती कौन है ? कौन उसका वाप है ? कौन उसकी मां है ? जो आदमी उसे मेरे पास छोड़ने आया था, वह कौन था ? बहुत-सी बातें दिमाग में आती थीं। सोच-सोचकर थक जाता था, पर कोई हल नहीं निकाल सकता था। लेकिन मन में पक्का विश्वास था कि सत्येन कोई गलत काम नहीं कर - ।

गकता। ईश्वर के मन में मैल हो सकता है, पर सत्येन के मन में नहीं हो सकता है मौन स्वयं किसीसे प्रतिज्ञाबद्ध था। किसीसे उसने कहा होगा कि उमको अनाथ लड़की का भार वह लेगा। और मुझपर सत्येन का बहुत भरोमा था, शायद इसी कारण उस लड़की का भार मुझपर सौंपकर वह हंसता हुआ फांसी पर लटक गया। मेरे साथ उसकी अन्तिम भेंट नही हो सकी, पर वह जहां भी रहे, में यही सोचकर खुश रहता हूं कि मैं उसकी पात रम सका । यह भार मैं आजीवन ढो सकता था, पर आयु की भी तो एक मीमा होती है। आजकल उसीकी अन्तिम पुकार सुनाई देती है । लगता है, अव तो थोडे ही दिन रह गए हैं । अपने वाद कुन्ती को मैं किसे देगा? अचानक अटल दा बोल पडे --कुन्ती का भार अगर मैं ले लू तो आपको कोई आपत्ति होगी? --आपत्ति होगी मुझको ? एक विषाद की हसी हंसकर मगल बाबू ने महा-इममे बडी खुशी मेरे लिए और क्या हो सकती है, अटल ? मुझे तो मुक्ति मिलो, बेटा ! मैं निश्चिन्त हो सका। मेरी मुट्ठी में मानो स्वर्ग आ गया। बड़ी दुश्चिन्ता से माज तुमने मुझे छुटकारा दिलाया । मैं तुम्हाग हमेशा के लिए कृतज्ञ रहूंगा। उसके बाद शायद अटल दा जान भी नहीं सके, सोच भी नहीं सके कि उन्होंने कितने चिन्तनीय भार को अपनाया था। कैसा दारण वोझ जीवन-भर के लिए अपने कन्धो पर उठाया या। एक दिन अस्वस्थ मंगल बाबू और भी अस्वस्थ हो गए। यह उनकी बीमारी का माखिरी दौर था। उस दीमारी की हालत में ही अटल दा का विवाह, कन्यादान, परिणय सब कुछ हो गया। मदानीपुर के एक छोटे- से किराये के पलट के प्रांगन में दीमार मंगल दाद की आंखों के सामने अटल या और कुन्तीदेवी के जीवन में चरन दुर्योग के दिन घिर आए। पर अटल दा को त्याग में विश्वास था, अपनी शक्ति में विश्वास था, ब्रह्मचर्य में विश्वास था। बटल दा के लिए मा-बाप मे बड़ा उनका देग, उनी मातृभूमि थी। और उस समय कुन्ती भी तो यटल दा की मन्य- विप्या थी और अटल दा उसके आदर्श पुरुष । उनके साथ अपने को - सौंपकर कुन्ती भी अपने को धन्य समझने लगी। मंगल बाबू ने आखिरी आशीर्वाद दिया। वोले-तुम दोनों सुखी रहो । दोनों मिलकर देश को प्यार करो, उसका कल्याण करो। मैं और कुछ नहीं चाहता। छोटा-सा उत्सव । इस संसार के मात्र तीन प्राणियों को मालूम थी उम दिन की घटना । काय की, कहां की, अवहेलित अशात एक लड़की, मांग की तरह अटल दा के जीवन के हर मोड़ के साथ जुड़ गई। मिर पर आंचल डालकर कुन्ती ने अटल दा को प्रणाम किया। दो जीवन जग दिन एकाकार हो गए। मरते समय मंगल वाबू बोल गए.-मैंने तुम्हें जो कुछ भी कहा, वह तुम्हारे-हमारे बीच गोपन रहना चाहिए। और किसीको नहीं मालूम होना चाहिए। अटल दा ने कहा-ऐसा ही होगा। यह बात अगर यहीं खत्म हो जाती तो अटल दा को लेकर उपन्यास लिखने की जरूरत ही नहीं पड़ती। अधीर बोस ने भी यही कहा था । बोला-आदमी शादी करता है, तो घोषणा य.रके करता है। इसीलिए शायद लोगों को निमन्त्रण दिया जाता है । दस को साक्षी मानकर खिलाने का भी रिवाज है। आज लगता है, यह नियम एक प्रकार से अच्छा हो है । पहले शोचता था, यह अपव्यय है, पर यह बात नहीं । सच में, जब हम अटल दा के नाम पर मुग्ध थे, उनकी बातों को वेद- वाक्य मानते थे, उसी समय उन्होंने अन्दर ही अन्दर हमारी आस्था को हिला दिया था। हम समझते रहे कि अटल दा को बहुत काम है, वह देर को महान बनाने के बड़े कामों में जुटे हैं। दूर से हम उन्हें प्रणाम करते थे, उन्हें श्रद्धा करते थे। सोचते थे, विना कारण बातें करने से उनका समः नष्ट होगा।

मापद उमो तरह चलता रहता। हो मकता है, उसी तरह में किसी दिन अटल दा के साथ-माय बुन्तीदेवी का जीवन भो ऐश्वर से महिमान्वित हो उठता, पर ऐमा हुआ नहीं । क्यों नही हुआ, इसकी व्याख्या करने का दायित्व मुझपर नहीं है। मनुष्य का जीवन क्या गणित का मेल है । क्या वह रूल आफ थी है ? गणित में दो और दो मिलकर चार बनते हैं, पर गणित-शास्त्र में क्या जीयन के मूल्यबोध को आका जा सकता है ? अगर है तो फिर क्यों वारिसाल मेल के डकैती के कारण जिस प्रोजेन को दूटा जा रहा था, वह ब्रोमेन मंगल वायू बनकर कलकत्ता शहर में छुपता रहा ? बटल दा के अलावा इस सच्चाई को और कौन जानता था? क्या अटल दा को मालूम था कि मनुष्य के सबसे बड़े गुणो और आदशों के अधिकारी बनकर भी वह इस तरह वह जाएगे? हम, तुम या और पाच जने जिस तरह से जी रहे हैं, सोच रहे हैं, बड़े हो रहे हैं, अटल दा भी तो उमी ढग से बड़े बन सकते थे। बड़े बनकर किसी सरकारी माफिम में वही नौकरी कर सहज ढंग से सुखी जीवन बिता सकते थे । वाकी लोग जिम तरह दुनिया के साथ समझौता कर जीते हैं, उसी तरह ममझौते की राह अपनाते तो हम लोग अटल दा को वाह्वाही देते, उनकी प्रगमा करते, उनको मृत्यु के बाद चन्दा इकट्ठा कर एक स्मृति-स्तम्भ भी बना देने । पर कौन जाने ! हो माता है, ममझौते की राह अपनाकर ही अटल दा यो ऐसी परिणति हुई। अगर कुन्तीदेवी से अटल दा ने विवाह किया था तो यह बात उन्होने किमोको बताई क्यो नहीं ? हर रोज रात गए पर लौटने के कारण आमु बावु ने एक दिन फिर पूछा-इतनी रात गए वहा अटल दा वरावर सच बोलने के प्रादी थे। बोले-मुझे काम रहता आशु वान बोले- 1-पर पर मे भी तो पाम रह सकता है । इस युद्धा में क्या मुझने सारे काम हो सकते हैं? मेरी उम्र टल चुकी है, यह भी मोचो।

. कर कुन्ती भी अपने को धन्य समझने लगी मंगल वाबू ने आखिरी आशीर्वाद दिया। वोले-तुम दोनों सुखी हो । दोनों मिलकर देश को प्यार करो, उसका कल्याण करो। मैं और कुछ नहीं चाहता। छोटा-सा उत्सव । इस संसार के मात्र तीन प्राणियों को मालूम थी उस दिन की घटना। कब की, कहां की, अवहेलित अनात एक लड़की, सांप की तरह अटल दा के जीवन के हर मोड़ के साथ जुड़ गई। सिर पर आंचल डालकर कुन्ती ने अटल दा को प्रणाम किया। दो जीवन उस दिन एकाकार हो गए। मरते समय मंगल वावू वोल गए-मैंने तुम्हें जो कुछ भी कहा, वह तुम्हारे-हमारे बीच गोपन रहना चाहिए। और किसीको नहीं मालूम होना चाहिए। अटल दा ने कहा-ऐसा ही होगा। १६ व यह बात अगर यहीं खत्म हो जाती तो अटल दा को लेकर उपन्यास लिखने की ज़रूरत ही नहीं पड़ती। अधीर बोस ने भी यही कहा था बोला-आदमी शादी करता है, तो घोषणा व.रके करता है। इसीलि शायद लोगों को निमन्त्रण दिया जाता है। दस को साक्षी मानव खिलाने का भी रिवाज है। आज लगता है, यह नियम एक प्रकार अच्छा ही है। पहले सोचता था, यह अपव्यय है, पर यह बात नहीं सच में, जब हम अटल दा के नाम पर मुग्ध थे, उनकी बातों को वाक्य मानते थे, उसी समय उन्होंने अन्दर ही अन्दर हमारी आस हिला दिया था। हम समझते रहे कि अटल दा को बहुत काम है, को महान बनाने के बड़े कामों में जुटे हैं। दूर से हम उन्हें प्रणाम थे, उन्हें श्रद्धा करते थे। सोचते थे, विना कारण बातें करने से उनक नष्ट होगा। ।

7 शायद उमौ तरह चलता रहता । हो सकता है, उसी तरह से किसी दिन अदन दा के साथ माय कुन्तीदेवी का जीवन भो ऐश्वर्य से महिमान्वित हो उठता, पर ऐमा हुआ नहीं। क्यों नहीं हुआ, इसको व्याख्या करने का दायित्व मुझपर नही है । मनुष्य का जीवन क्या गणित का मेल है ? क्या वह रूल आफ थी है ? गणित में दो और दो मिलवर चार बनते है, पर गणित-शास्त्र से क्या जीवन के मून्यबोध को आका जा सकता है ? अगर है तो फिर वयो बारिसाल मेल के डकैती के कारण जिस बोजन को दूदा जा रहा था, वह प्रोजेन मगल वाबू बनकर कलकत्ता शहर मे पता रहा अटल दा के अलावा इस मच्चाई को और कोन जानता था? वा अटल दा को मालूम था कि मनुष्य के सबसे बडे गुणो और मादलों के अधिकारी बनकर भी वह इस तरह बह जाएगे? हम, तुम या और पाच जने जिम तरह से जी रहे हैं, सोच रहे हैं, बड़े हो रहे हैं, अटल दा भी तो उमी ढग से बडे बन सकते थे। बडे वनकर किसी सरकारी मानि मे बडो नौकरी कर सहज ढग से सुखी जीवन बिता सकते थे । चाकी लोग जिम तरह दुनिया के साथ समझौता कर जीते हैं, उसी तरह ममझौते की राह अपनाते तो हम लोग अटल दा को वाहवाही देते, उनकी प्रशंसा करते, उनको मृत्यु के बाद चन्दा इकट्ठा कर एक स्मृति-स्तम्भ भी बना देने। पर कौन जाने । हो सकता है, ममझौते की राह अपनाकर ही अटल दा यो ऐसी परिणति हुई। अगर कुत्तीदेवी से अटल दा ने विवाह किया पा को यह बात उन्होंने किसीको वताई क्यों नही ? हर रोज रात गए घर लौटने के कारण आगु बावु ने एक दिन फिर पूछा-इतनी रात गए कहा ये? अटल या बरावर सच बोलने के आदी थे। बोले-मुझे काम रहता बागवायू बोले-पर घर में भी तो काम रह सकता है । इस बुढापे मे या मुमने सारे काम हो सकते हैं ? मेरी उम्र ढल चुकी है, यह भी तो मोची।

। - अटल दा इसका क्या उत्तर दे सकते थे! चुप रहे । . पर आशु बाबू चुप नहीं बैठे। अटल दा की शादी की तैयारी करने लगे। जीते-जी लड़के की गृहस्थी वसा देना उनका कर्तव्य था। उस दिन भी यथावत अटल दा घर से निकलने ही वाले थे आशु वावू बोले-अभी कहीं मत जाओ। तुम्हें थोड़ी देर तक घर में रहना पड़ेगा। ......क्यों? अटल दा ने पूछा। आशु बाबू ने सोचा, लड़के को सारी बातें खुलकर बताना शायद ठीक नहीं रहेगा। वेटा आपत्ति कर सकता है । इसीलिए उसको कुछ बताए विना वह अपने काम में लग गए। पर अटल दा को शक हो गया। मन ही मन वह छटपटाने लगे। उन्हें लगा, उनके विरुद्ध कोई पड्यन्त्र चल' रहा है । उस दिन सुबह से ही उनका मन भारी था। मां से जाकर अटल दा ने पूछा-~-मां, आज घर में किस चीज़ का मायोजन हो रहा है ? क्या है घर में ? मां ने कहा- वे लोग आज तुम्हें देखने के लिए आएंगे! ----मुझे देखने के लिए? अटल दा मानो आकाश से गिरे। बोले- में कोई शेर या भालू हूं, जो लोग मुझे देखने के लिए आएंगे। -हां वेटे! आज बात पक्की हो जाएगी। अटल दा के सिर पर सच में विजली गिर पड़ी। इधर में कई दिनों तक अटल दा घर भी नहीं आए थे। आते भी तो बहुत रात को । सिर्फ सोने के लिए। इसी बीच उनके विरुद्ध इतना बड़ा पड्यन्त्र रचा गया था, वह भांप भी नहीं पाए थे। इस पड्यन्त्र के विरुद्ध अटल दा की अन्तरात्मा विद्रोह कर बैठी। अटल दा ने कहा-मैं इस घर में नहीं रह सकता, मां! हरगिज़ नहीं रहूंग । मैं अभी जा रहा हूं। इतना कहकर वह दरवाजे की तरफ भागे ही ये कि लड़की वालों की गाड़ी आकर दरवाजे पर रुकी। गाड़ी से लड़की के पिता, पुरोहित और दो-चार सजे-धजे व्यक्ति उतरे। अटल दा बिलकुल उनके सामने पड़ dia । गये।

भाग वायू भी बाहर आए । नमस्कार वगैरह की औपचारिकता हुई। मभीको लाकर बैठक में बैठाया गया। परिवार मध्यम वर्ग का था। बठक भी मध्यम वर्ग के परिवार पाँ तरह की हो यो । उमके लिए किमीको संकोच या गर्म करने को कोई यात नहीं थी, क्योंकि मारी बातें जानकर ही वह लड़की दे रहे थे। लड़का मेघावी, स्वस्य और मच्चरित था। लटके के बारे में उन्होंने बडी हान- चीन की थी। मवने कहा था-पहफा नही, रत्न है । किसी दिन यह जीवन की सफलता की सबसे ऊंची सीटी पर पहुंचेगा। मुहल्ले के, गैर- महल्ले के, मभीने यही कहा था कि वह सासों में एक है । इमीलिए नरकी के बाप ने लडके के वाप की आर्थिक स्थिति पर गौर नहीं किया। उनकी तरफ से कोई शिकायत नहीं थी। आश बाबू के लिए भी गाने लायक पुछ नहीं था। पर ताज्जुब है ! अटल दा तो ताज्जुब वाले आदमी निकले ! एकदम साग्जव वाला व्यवहार था उनका। बात पक्की हो जाने पर मगाई और आशीवाद की रस्म भी लड़की वालों ने पूरी कर दी मार आयोजन के अन्त तक अटल दा यह सारा अत्याचार चुपचाप सहते गए। उन्होंने शायद इम- निए महा कि उसके बाद मुक्ति का उपाय उन्हें मालूम या। बाप के लिए पर मामूनी अत्याचार वह अनायास सह सकते थे। उसके बाद तो अटल दा हमेशा के लिए कलकत्ता छोड़कर लापता हो जाने वाले थे। अगर कोई भून उनमे हुई भी तो उस मूल के लिए उनसे जवाय मागने वाला कोन पा? जवाब देने के लिए वह अपनी परिचित दुनिया और दायरे मे लौटकर मानवाले ये ही नहीं । लोग उन्हें टूढ़ेगे, तो दूढे । और फिर वह ग्रोजेन वावू का जीवन भी तो जानते थे। देश की स्वतन्त्रता के लिए जो झूठ अपनाया जाता है, उमे मिथ्या नहीं कहा जाता। जीवन की प्रसंशा देश बडा है। पारिवारिक कर्तव्यों से देश के प्रति संघ महान है । यहा तक कि वाप मे भी वडा विवेक है । गर ! मड़ी वालों ने उस दिन सुशो-नुनी विदा मांगी। उनके जाते हो अनि दा भी घर से निकल पड़े।

१७ । उस समय कुन्ती की नई-नई शादी हुई थी। शादी का मतलब आमूल परिवर्तन । जब तक यह आदमी कुन्ती का गुरु बना रहा, आदर्श पुरुप था। अटल दा को कुन्ती कुछ और ही दृष्टि से देखती; पर वाप के मरने के बाद कुन्ती ने अटल दा का कुछ और ही रूप देखा। अब तक उसके पिता ही उसके जीवन में एकमान पुरुप थे; पर हर पुरुप एक जैसा नहीं, इसका प्रमाण कुन्ती को पति के रूप में अटल दा को पाकर मिला । न जाने अटल दा दिन-रात यया सोचते रहते । कुन्ती पूछतीइतना भी क्या सोचते हो हर समय ? -कहां! कुछ भी तो नहीं । कहकर अटल दा कुन्ती की बात टाल जाते । अटल दा को हर समय लगता, वह कुन्ती के सामने पकड़े जाएंगे। प्रश्न केवल कुन्ती का ही नहीं था, आस-पड़ोग, हर जगह पकड़े जाने का प्रश्न उन्हें सता रहा था। अटल दा को बचपन से ही सभीका प्यार मिला था, श्रद्धा मिली थी। एक सिरे से लोगों ने उनकी तारीफ के पुल बांधे थे । निन्दा, शिकायत, बदनामी का दुर्भोग उन्हें कभी नहीं सहना पड़ा। अटल दा के लिए यश सस्ता था, प्रशंसा उनका प्राप्य था । इस यश के लिए अटल दा को कभी कोई कीमत नहीं चुकानी पड़ी थी। यह उन्हें अनायास मिलता था। उस सहज प्राप्ति के पथ पर मानो पहली बार किसीने बाधा पहुंचाई। उसके बाद ही से अटल दा को लगने लगा कि लोग उनपर शक करने लगे हैं। कहीं सबको उनकी बात का पता चल गया तो लोग उन्हें श्रद्धा के आसन से उतारकर मिट्टी में पछाड़ देंगे। इसी डर से अटल दा छुपते फिर रहे थे। सदका चलते कहीं किसी पुराने दोस्त से भेंट हो जाती तो अटल दा अनदेखी कर जाते। कोई अगर पूछ लेता-क्यों भई, क्या हाल है तुम्हारा क्या कर रहे हो आजकल ? तो अटल दा कहते-चलता हूं यार, कुछ काम है। ---इतना भी क्या काम है, जरा बताओ भी तो! ?

अटार दा रहनेपाम की भी कोई सीमा है या? मोरार
तरफ भागकर जान पाते।
धात गप भी दी । भटम दायादोई एक रामपा! मटमा
मारी सरह कोई साधारण मारमी तो नहीं रिस पाहे पर पर मिस
ति या फिर दिन भर गोंको गमामों में बेगर गई मिम । बटर
तो जीनियम थे। घटना स्वयं में एक प्रतिमा । पर समापारण
मोगों से जितनी अधिक प्रदा मिसती गई, मटन दा रागही मषित
होते गए । अगर लोगो का पता चल जाए? अगर यह जाएं? मी.
सए अटल दा ने गयको नजर पार र दार पा पाने को गोराहन
शनि है, उसे ही अपना लिया। भक्तों के सामने होर सम्मान प्राप्त
करने की क्षमता कोअटस दा ने सो दिया।
कुन्ती पूस्तो-आज दिन भर यहा ये ?
अटना महते-पामगार में कमा पा।
----कौन-सा काम?
पटल दा महते-काम क्या एक है ? भार वरानगर जाता था।
कुन्ती यहती--पर तुमने तो पहा पा कि आज रप माओगे । र
का कोई वन्दोवस्त हमा? दो महीनो से किरपा यायो परा है।
पर अटम दा कुन्ती के सामने सरागर भूठ योस गले । अगम में
दिन-भर यह एकान्त में रिसी मंदान में पाम पर बंटरममयमारने।
कमी पार्क में किसी सामोव पर टरर आराम पाठास नरयानी
पुनाव पकाते रहते।
कभी-कभी उन्हें ऐगा लगता था--यह उन्हें होया पसा है ? क्या
सब कुछ मिथ्या है ? जब उनके पास पैसे नहीं थे, नौग्री नही पो, तर
यह यो प्रोजेन बाबू को वचन देने गए करा यह भी मरोको नर में
महान बनने के लिए? अपने को महामान मिस करने के लिए?
कभी-कभी वह मोचते-रिमी नोररी बीमोगियो शाहिए।
नौगे करना चाहें तो लोग शो से उन्हें रग लेंगे। पर यहा भी तोको
कमाया रह जाएगी। तर तो सबकी तरह वह मामूली बजार ग
?

जाएंगे। पर, यदि सामान्य स्तर पर उतरकर जीवन विताने पर पहले- जैसी श्रद्धा और भक्ति न मिली, तो ? लोग अगर पूछे-अटल दा ने इतना पढ़-लिखकर क्या किया ? हम इतने कम पढ़े-लिखे उनसे क्या बुरे हैं ? अटल दा और हम में कोई फर्क नहीं ? दिन-भर मैदान के चक्कर लगा-लगाकर अटल दा वेचैन हो जाते । यह कलकत्ता, यह बंगाल, यह भारत, सारी दुनिया के सामने मानो अटल दा तुच्छ हो गए थे। पहले जैसे लोग उनसे ईयां भी नहीं करते थे। यह भी उनके लिए एक अजीव यन्त्रणा थी। यह एक दण्ड था, अभिशाप . - था। रात में अटल दा थोड़ी देर के लिए कुन्ती के घर पहुंचते । उनको देखते ही कुन्ती वही प्रश्न दुहराती-नौकरी मिली ? -नौकरी ? मैं नोकरी करूंगा? नौकरी ही करनी होती तो पहले ही कर सकता था। तुम क्या समझती हो. मैंने किसी मामूली आदमी की तरह नौकरी करने के लिए जन्म लिया है ? पहले-पहले तो कुन्ती अटल दा के साथ बातें करती थी। उस समय उसका मोह भंग नहीं हुआ था। कहती-तुम नौकरी नहीं करोगे तो कैसे क्या होगा, कहो ? किस तरह गुजारा होगा? अटल दा कहते-मेरे साथ जव तुम्हारा जीवन जुड़ ही गया है, तव जिस तरह मेरा चलता है, तुम्हारा भी चलना चाहिए। ''मेरी बात छोड़ो। तुम्हारा भी तो नहीं चल रहा है। अटल दा कहते--मेरी बात सोचने की तुम्हें ज़रूरत नहीं। कुन्ती कहती-मेरा भी कैसे गुजारा होगा, यह तो तुम्हें सोचना ही पड़ेगा । और अगर सोचना नहीं चाहते तो मुझसे शादी क्यों की ? इस बात का जवाब देते समय अटल दा जैसे धीर पुरुप भी अपना धैर्य खो बैठने-पर फिर स्वयं को संभाल लेते। कभी-कभी उनके मन में इच्छा होती कि वह कुन्ती को सब बातें खुलकर बता दें। कुन्ती कौन थी? उसका परिचय क्या था, क्यों उन्होंने उससे शादी की। सब बातें बताकर फिर हमेशा के लिए यह रिश्ता तोड़कर वह कहीं और चले जाएं। - ५४ पर यह तो सारगरि पिन्तना पी। मन में उठ गयान सोमटम दामन में ही गंगो मेते । जती भी बात पर पुप ही गले । और फिर सारा विरोध मर पर मादे बदाम के बारने मरान में मोर माने, घोड़ी देर के लिए यह मान मन रोपन्ती को मामर देते। शिर उन्हें यार आ जाता कि यह गाधारण मनुष्योगीसह गिजीने के लिए संमार में नहीं आए थे। दुनिया के पाप आम आदमियों की तरह गिर पिराटने के लिए पैदा न हए । दुनिया रे गभी आम मामियों की सरह आटे, दाल, नमक, मिर्षकी पिन्ना गे मापा-पच्ची करना उतरा काम नहीं पा। यह महत् क्षण में जन्मे गामार थे। स्मो विगाना की तरह अटल दा भी गृह-रयागी पे। स्वामी विवरानन्द की तरह ही दुनिया रे आयेदन-निवेदन की परवाह करने पर उनका काम नही पाने पर। अपने पाद और मध्य की प्राप्ति मे बाधाए माना तो स्वाभाविक ही था, इन बाधाओ से कार उटने में ही उनका महत्व पाइन बापामों के मनिरमप में ही बटन दा पपना गौरय मानते थे। मैंने पूछा- उसके बाद? अपोर योग ने यहा-मन ही मन वहम प्रतीपूरहे पे, मोच रहे थे किमटस दा बच्चों को आदमी बनाने की सापना में जुटे हुए है, प्यम्त हैं, जब हम जी-जान गे वियाग कर रहे पनि अटार दा अपनी तपस्या में लीन हैं, उस समय वह पागलों की तरह पर-उपर घूम रहे थे। उस समय उन्होंने रिमोतो बिना बताए एपार गावीर सी यो । गोपन परिणय यी पोग मन में पार या मिन-भिल से मानो धारमहत्या कर रहे थे। पन्नी पती-मेरा भार अगर नहीं उटामोगे तो में बाउंगी पहा ? घटस या महते-पायहाँ तुम हो, यही हो। -और सुम? E बटल दा कहते--तुमसे शादी की है, इसलिए क्या मैं तुम्हारा खरीदा हुना गुलाम बन गया ? मेरा क्या अपना कोई स्वतन्त्र अस्तित्व नहीं ? -कौन कहता है कि नहीं है ? मैंने तो यह नहीं कहा। अटल दा भल्ला उठते-तुम्हारे लिए, सिर्फ तुम्हारे लिए मेरा पटना- लिसना, मेरी साधना, तपस्या सव व्यर्थ गई। इस तरह से तो मैं कुछ ही दिनों में पागल हो जाऊंगा। -उससे पहले मैं पागल हो जाऊंगी। इन दिनों मेरा अपना भी दिमाग ठीक नहीं है। -अगर पागल हो ही गई हो तो सामखा किसी और को पागल करने पर क्यों तुली हो? -मेरे लिए क्या तुम जरा भी नहीं सोचते ? क्या मैं तुम्हारी कोई नहीं ? अग्नि को साक्षी मानकर तुमने क्या मुझसे शादी नहीं की? वोलो ? मुझे छूकर बोलो ? अटल दा थोड़ी देर तक स्थिर मूर्तिवत खड़े रहते। आंखें फाड़कर देसते रहते, मानो क्रोध के आवेश में कुछ भी कर बैठने वाले हों, पर तुरन्त ही अपने को संभाल भी लेते । बोलते-कुन्ती, तुम मुझे जरा भी शान्ति नहीं दे सकती नया ? -शान्ति ? कुन्ती मानो मन ही मन हंस पड़ती । बड़ी उदास-सी हंसी। बोलती --शान्ति तुमने क्या मुझे एक क्षण के लिए भी दी है ? -जानती हो, तुम्हारे लिए मैंने कितना बड़ा त्याग किया है ? -बोलो, क्या त्याग किया है तुमने ? सुनाओ अपने त्याग की लिस्ट? -इसके माने ? तुम जानती हो, तुमसे शादी करने के पहले मुझमें कितनी शक्ति थी? मेरा कितना सम्मान था ? कितना काम रहता था मुझे ? लोग मुझमें कितनी श्रद्धा रखते थे, इसका तुम अन्दाज़ भी नहीं लगा सकती। -सूब जानती हूं। कभी मैं भी तुम्हें बड़े सम्मान की दृष्टि से देखती थी। ? - waan

-मेरा यह सम्मान प्रदा पमा पदाती? मैं गर पा
पर लोगों में नहीं मिल गरा, यानी गाना ? योगी, मनमा
फर गकता?
-योन ? गप बान ता?
--
• सुमने ग्यपं मोएर यात बभमाये में गया है। मममें
पोई गा नही । परीक्षा में पार्ट थाने के नाम
नही। गेगों ने ना या बहार या यना दिस है। मप में नमामी
भी यह नही रहे । नम थान हो, मोग विशिर ममाहारा
गम्मान करें, तुम्हें गा मान । पर मर में गा पनना या इतना भागात
है ? मते फार शिरा धिनारी गयो उठना पाहा पा।
कली की यात अटन दागो यच्छी नही मगनी। बोमो मेरे
प्रति तुम्हारी यही धारणा है'
---तुम मेरी गप जानना पाहा , मौलिए मुझे पापमा परा
मैंने नारी अनुमति नकर ही कहा है।
--टीम है, अगर मुममें पता नहीं बनाती तो मुर्भधार दी।
रिहा । मुग तरह पात्रमा यो हो।
गरे में पाना जाने सगो।
पोर में कली पटना। पोरी-साग
--जहा मैगी मजी।
मी के अनुसार जाने पर सोनाम नहीं बनेगा। मन मा
freमने मुभगे शादी की है।
शादी की, गलिए मेरा सपा कोई यान निरनी'
पती और भी जोर गे श्रम साप पर मी, बोली-
नहीं।
मा मनय?
-~मापद गुम अाही तरह पानामागे गरपिनी ।
मुक बनग तम्हारा कोई अस्तिरप नी । मगर तुम मममगिरी

गानून तुम्हें रोगेगा? ----तुम मुझे गानून सिसा नही हो ! -पुलिस-कानून को जलाना भी दुनिया में कानून है। अगर भगवान को मानते हो तो उनका भी एगा मानून है। गा दुनिया जिसगी बनाए नियमों से बंधी है, पन्द्र, राग, ग्रह-TET जिरागो बनाए नियमों मेगल पर पल रहे हैं, उरामा भी तो एका गाना है। यही गानून गुग्म रोगा। --में वह कानुन नहीं गानता। -तुम्हारे न मानने पर भी गागून तो निसीगी नहीं गुगेगा । भोर में भी गयों सुनंगी? अटल पा से और नहीं राहा जाता। बोलते----तुग सुनोगी या नहीं, उसे लेकर मैं गयों सिरदर्दी मोल लूं? मैं तो पला । उस दिन इतना गाहगार गह भाटगे से गुन्ती गाहाम सागर बाहर जाने के लिए उठ गढ़े हुए। पर उरागे पहले गुन्ती ने अटन दागे गुरों का रडोर पर निगा। इरा गिनाय से अटल दागा गुता पाट गया । अटल या पौनगर र गए । फटे पुर्तगी तरफ एक गणार सालगर बिना किसी रफ से यहां गे पल दिए। गुतेंगे. फट जाने गे गारण गुन्ती भी रांगोर में पड़ गई थी ? " जब तक उसे होश आया, अटल दा पहरो जा पुगे। १८ गुन्ती के विवाहित जीवन में इस तरह की पटना पहली या थी। अटल दागे जीवन में भी यह अपने रंग गी पहली पटना भी। मे ही लोगोंगी श्रमा, उनका प्यार, सद्भावना और सम्मान : अटल दा गा अहम् सीमा पर पहुँच पुगा पाउनमेशा लगा या गगों नगरों गे मागे छोटे बनें ? गणों यह भूगोंगी भागोग बनें ? या तो गोई गलती ही नहीं पार गगते । अगर उनसे हो भी जाती है तो लोगों को उगे ठीक समझना चाहिए भटर ८८ जीनियम पे, मटन दा को मूल किसी जीनियस को मूल चीजो भूल नहीं मानी आनी पाहिए। उसके बाद एक दिन वह निर्धारित लग्न भी याया। अटन दा की गादी का निमन्त्रण-पत्र मान बाबू बाट भी चुके थे । उन दिनों रात को अटल दा कमरे की पत्ती युमाकर सारी रात अंधेरे में जाग कर पाट देते । दिमाग में आता, सारे आयोजन-उत्सव को छोड़-छाड़कर अन्तिम मुहर्त में वही भाग जाएं, जहां उन्हें कोई नहीं जाने, कोई नहीं पहचाने । जहाँ जाने पर उनका मतीत विलकुल मिट जाए-जहां जीवन नये सिरे मे, नये ढंग गे भारम्भ किया जा सके । सोच-सोचकर अटल दा पूरब के चांद को पश्चिम में स्पेस देते। बारा वायू पूरते-तुम्हारा चेहरा मूसता क्यों जा रहा है, अटल ? अटल दागे कोई जवाब न पाकर आशु बाबू हर जाते । यस बीच में गि एक ही दिन रह गया था। किसी तरह वह दिन अगर टल जाए तो यह विपत्ति से उपर सकते हैं। पत्नी से जाकर आरा याय ने पहा-बटल इतना उदास क्यों है ? अटलदा फी मां बोली- यहां ? मुझे तो ऐसा कुछ नहीं लगा। - तुमसे कुछ रहा है अटल ने ? आश बाबू ने पूछा। -नही तो! आपको कुछ यहा है क्या ? नहीं । कहेगा पया? फिर बोले-कई दिनों से रट रहा था, पादी नहीं मरूंगा। आ यायू की पत्नी बोसी-वह तो हर लड़या कहता है। -मैं जरा पयरा गया था, सोच रहा था, कही उन सजन पुरुष फे मामने बहरत न होना पडे । अटस घरावर का जिद्दी ही रह गया। कई दिनों तक मटन दा पर से निकले ही नहीं। जो लडका रात-दिन बाहर पूमता-फिरता रहता पा-वह एकाएक पर बंटने लगेगा, इतना रिपर होकर बंटेगा, इमकी भी यल्पना कौन कर सकता था? पाटीवी शरीदारी समाप्त हो चुकी थी। अटल दा की शादी में काम करने के लिए मादमियों की कमी तो यो नही । मास याबू जो कहते हम तुरस्त करने के लिए संघार रहते । आटा, मंदा, धो, घोनी, जरूरत को हर - म लोग मिलकर खरीद लाए थे। शादी के दो-चार दिन पहले से तेदारों का जमघट शुरू हो गया था। शहनाई का आर्डर भी दे गया था। पर अटल दा दिन-भर अपने कमरे में चुपचाप पड़े रहते । पहले हम गों से मेंट होने पर बातें करते थे, पर अब देखकर भी चुप रहते । मैंने स, अटल दा का चेहरा बड़ा उदास लग रहा था। पूछा भी-तुम्हारी जीयत तो टीक है न अटल दा? गम्भीर आवाज में अटल दा ने कहा-नहीं। क्या पता? मुझे तो लगा, शायद गादी के दिन सभी लड़कों का चेहरा अटल दा की तरह सूख जाता होगा-उपवास जो करना पड़ता है। सूखना स्वामाविक भी था। मैंने फिर पूछा-तुम्हारा काम-काज कसा चल रहा है अटल दा ? अटल दा बोले-ठीक ही चल रहा है। मुझे लगा, हम लोगों से बात करना अटल दा को अच्छा नहीं लग रहा था। फिर भी मैंने पूछा-इतने गम्भीर क्यों हो अटल दा ? अटल दा ने मानो एक जबर्दस्ती की हंसी हंसी। ओठों के मूख जाने पर जिस तरह की हंसी निकलती है, अटल दा की हंसी ठीक वैसी ही थी। यह हंसी अटल दा की नहीं थी। आदमी रोने के बाद ऐसी हंसी हमता है । देखकर हम लोग हैरान रह गए। थोड़ी देर के बाद अटल दा वोले-मैं बड़े सोच में पड़ा हूं। मैंने पूछा-क्यों ? तुम्हें किस बात की चिन्ता है अटल दा? अटल दा बोले-चिन्ता कोई एक है ? चारों तरफ कितना काम है, पर मैं कुछ भी नहीं कर पा रहा । उस समय अन्दरूनी बातों का हमें कहां पता था ? अटल के अन्दर जो आंधी चल रही थी उससे तो हम बेखवर थे। हमें इस व का क्या पता कि कुन्तीदेवी को भी कुछ मालूम नहीं होगा। चुपचाप फुन्तीदेवी को बिना बताए यहां भागकर जान बचा रहे हैं। अटल सोचा होगा कि कुन्ती देवी को कुछ मालूम ही नहीं होगा। चुपना ६० शादी कर यह यही दूर चले जाएगे। धनजान अपरिचित शहर में नई नौकरी और नई दुलन में साप ग्रहम्पी वमा लेंगे। मूल यादमी ही करता है। आदमी के लिए ही भूल सम्भव है, देयताओं के लिए नहीं। पर आज ममझ मरता है कि वह अदत दा को भून नहीं थी, उनकी सामगवाली थी। मयकी नजर में बड़ा बनूगा, मधमे पदा-वित पाता हंगा, मयके पर रहूंगा, यह पारण भी तो एक विस्म की नासमभी और गम में, यो हम लोगो ने पटल दा को इतना ऊंचा उठाया ! असली दोपतो हमी लोगो का था। इसीलिए अब जब यटल दा की विवेचना करता है, सब सगता है, घोट जीवन के लिए लाभदायक है। अवहेलना, अनादर म्वास्थ्यप्रद है। यचपन मे मुहल्ले के लड़कों मे, मा. याप यई-युजर्गों में आदर और मम्मान पाकर ही सम्भवतः अटल दा ऐगे हो गए थे । गयकी दृष्टि में गिर जाने के डर मे ही पटल दा ने ऐमी यरूपी की यो-नही तो और क्या कारण हो सकता था? पर ! शादी के दिन हम लोग मज-धजकर बराती वनकर चल पर थे। अधीर योम ने पहा- -उसके आगे पपा हुआ, वह तो तुझं मालूम हो है । आर याय जिग वान के पिए डर रहे थे, उमका कुछ नहीं हुआ। पनी बागानी में यटन दा गव बुध मान लेंगे, इसको पल्पना भी विमो को नही पी। जो बटन दा बराबर गूती सदर आदतन पहनते थे, उमी अटन दा ने उस दिन हमर गित्वार्ता पहना, जरी के किनारी वाली पोती याधी। दूल्हा बनार गारी में बंटकर शादी करने के लिए निगल उम ममय तक हममें से घिमीरे मन में कोई मदद नहीं उठा पा। मैंने तो यही मौवा या किशादी पर ममय हर मटका हो इतना विनयी योर नम हो उठता है।

गो सोपा पा ग fan जीवन गारमरणीग fia है- शामा सीमारण पोसी.सी लण्णा, पोससा संमोग मिलकर गरको राहिरण नगा। उस सि लोग उसे जो भी गुपए है, पाह सुनता, गानसा । जो माला राबर हम लोगों को उपदेश देते सो, गामी fairnी प्रागी गाणी सुना सो जाना ऐसा यार देख राप में दम गुमाया गए थे। पर गोगही सोपहर संतोष पार लिया मिलमा जागिर रामाण से बाहर कोई जीप तो है नही या भी रागाज गे, गांच में से एक, फिर पिना गगों नही गारेगे। महात्मा गांधी, सी० भार० दारा, वितासागर से लेगार जब रागण परमास में शादी गीभीमरलायो पापी गाने पर हम एशों निराहो ! या पार पागद रालिए भी दिमाग में आई भी किरपा में मा urfagatी निरीगार शेयरमा-रो लग रहे थे । पहारेगी यह मता, परितगी गाः पार ग गई ? गगा रागी पुरी शादी मे गत ऐसे ही यि ? मेरे मन दुनिया में मिली शादियां देखी भी, जगलो मेरों को गादगारी गोशिगी। भावगी बात तो गाः पी हिम ऐसी पारणा भी नहीं बना रामकिपरला रामराम और पिरो पागलों-शी पी। हमारे लिए या गरमा गरमागी गरिमा गिजर एका और भी पलीगी। शोर भी नहीं सोगि म पनी गाते हुए भी मुरारी शादीगर अपने ही परों पर गुलामी गार र थे। किन गागी गगा जल पानी नासमझी ही भी? कमी-गाभी सोसा, मगर नासमझी जी को EC दाराने विलित गगों थे? भयो, कनान भादगी तो साराari, भिगार और निगान्ग भी।तोपिर? पो फिर मा भरलदानी ोि गई थी ? गुहिने गरी असल दागी ससा मे लोग अपने मंगल- अमंगल गोमती राग सामने गा पा से अपराध गो गाना विवार-मरर में हम लोग अटन दा के पाम-पाग ही थे। मैंने देखा, मटन दा पनीने गे तर है। मोचा, नमर सिल्क का कुर्ता पहन रसा है, गरमीलिए इतना पमीना बा रहा है । अटल दा का पमीना कम नहीं हुआ। बटन दा को इतना पसीना बहाते देखकर हम लोग हैरान रह गए, पौषि अटन दातो माधारण आदमी नहीं थे। अटल दा क्यों हमारी तरह अमहाय लग रहे थे ? अटल दा ने मुझे बुलाकर कहा था-सुन पर गिलास पानी देने के लिए कह दें। मैंने कहा था-पानी पीओगे अटल दा? शादी होने तक तो तुम्हें हुए राना-पीना नही चाहिए । -~न मही। वही प्यास लगी है रे ! अटल दा ने कहा था। मैं पानी लाने के लिए आगिर रिस पहता ? भासपारा लड़की वालों के गई लोग थे। उन्ही में से किसीको बुलाकर एक गिलास पानी के लिए पहा । उसने पानी दिया या नहीं, मुझे देखने का मौका नहीं मिला, पयोकि उसी समय खाने की युसाहट आई और हम खाने के लिए चल पोपे। उग बाद याय शादी की रस्में शुरू हुई, मालूम नहीं। क्योंकि उस समय सो हम गरम पूरी, भाजी, सह पेडे और पुलाव साने में मग्न थे अपानय ही उपर से पोर मुनाई दिया था। हत्यहाकर दूसरों के साथ में भी भागा या भोर वहा जाकर देखा तो अजीव ही तमाशा था। ! मैंने पूछा-उसके बाद? अधीर बोग ने बताया-उसके बाद की घटना तो तुम लोगों को मालूम ही होगी। इतने दिनों के बाद बाज मामला साफ हो गया, भई। अगम में सब में ही अर्थात् उम पटना के बाद ही अटल दा अब यह मटन दा नहीं गमए थे। उनका जीवन-मूर्य प्रस्तापत पर चला गया।

। आज इतने दिनों के बाद मैं समझ सका कि अटल दा का यह अधःपतन क्यों हुआ। उस दिन, शादी की उस रात अटल दा को जिस बात का डर था, जिस कारण उनका पसीना अबाध गति से बह रहा था, वही हुआ। अपने कृत्य की आशंका से उनका कण्ठ सूखा जा रहा था। अटल दा की शादी तो सम्पन्न ही हो गई थी। बाद की खबर से में वैखबर हो रहा । जिस अटल दा को बदामतल्ले में नहीं देखकर मैंने सोचा था कि वह रांची चले गए हैं, वही अटल दा उस समय भवानीपुर में कुन्ती के घर रह रहे थे-भला, इसकी कल्पना भी हम कैसे कर सकते थे? उस समय डायरी रखने की मुझे आदत नहीं थी। घटनाओं की तारीख याद नहीं कर सकता । पर अधीर बोस की सारी बात सुनकर फिर से मुझे कुछ-कुछ याद आने लगा। पर जो चिट्ठी अटल दा ने लिखी थी, उसपर 'रांची' ही तो लिखा था। रांची से ही तो अटल दा ने लिखा था : हमारी जाति की रीढ़ टेदी हो चुकी है। इसे ठीक करना पड़ेगा । तुम आदमी बनो। ववन और कर्म में एक बनो। लोगों में एकता पैदा करनी पड़ेगी, क्योंकि एकता ही शक्ति है। मैं लौटकर आऊंगा, तब क्लव के बच्चों को यही बताऊंगा कि हमें नए सिरे से मोचना पड़ेगा। शिक्षा अगर सार्थक नहीं हुई तो जीवन व्यर्थ है। इस तरह की बहुत-सी बातें लिखी थीं अटल दा ने। आज इतने दिनों के बाद सब कुछ फिर याद आ रहा है। यह चिट्टी फिर किसने लिखी थी ? किरा अटल दा ने ? जो अटल दा उस समय कुन्तीदेवी से विवाह रचाकर अन्तद्वन्द्व से क्षत-विक्षत होकर स्वर्ग, मत्यलोक और पाताल की परिक्रमा कर रहे थे ? या फिर वह अटल दा, जो बदामतल्ले के आदर्श लड़के थे-- स्वामी विवेकानन्द के आदर्श मन्त्र- शिप्य ? एक ही आदमी में ये परस्पर दो विरोधी चरित्रों का कंसा समावेश? पर अतीत में अटल दा ने जो कुछ किया था, जो भी मूल उनसे हुई थी, क्या इतने दिनों के बाद भी उसका प्रायश्चित्त नहीं हुआ था? १४

और इमे मतही को पता : हर
बोडेन गारो बाम गरिमार:-
जिगे कहने से निरपग्नि -
घोषणा की थी, मदत दानेर
उटा निया? और कमर सहर
गांव में दान मरे? दोन मन
मी यसामति पाने के
सेवा में मरने मम् को नहीं नाम:

। अचानक ही मैंने कहा-मै चहूबाजार गया था, अटल दा से मिलने । सोचा था, मेरी बात सुनकर इन्दुलेखा देवी चौंक उठेगी। पर नहीं। बड़े ही शान्त-संयत स्वर से बोली-कैसे हैं ? मैंने कहा-अच्छे नहीं हैं। ----पर मैने तो सुना है इन दिनों वह अच्छे ही हैं । इन्दुलेखा देवी के प्रश्न का जवाव दिए विना मैंने कहा- आप उन्हें बचाना क्यों नहीं चाहती ? अब इन्दुलेखा देवी चौंक उठीं। बोली-आपके ऐसा कहने का आशय? मैने फिर कहा-आप उन्हें जीवित रखना चाहती हैं, या मार डालना चाहती हैं ? थोड़ी देर चुप रहने के बाद वह बोलीं- आप क्या कहना चाहते हैं, में ठीक से समझ नहीं सकी। भने और स्पष्ट शब्दों में कहा-~-पेण्ड्रा रोड में अटल दा के अच्छे होने की खबर पाकर भी आपने अचानक ही वहां रुपये भेजने वन्द क्यों कर दिए ? उन्हें फिर कलकत्ता क्यों बुलाया ? कलकत्ता में इतनी जगहें रहते हुए भी बहूबाजार के सीलन भरे उस मकान में क्यों रखा ? मेरे मुंह से इतना कुछ सुनना पड़ेगा, इसकी कल्पना शायद इन्दु- लेखा देवी ने नहीं की थी। मैंने कहा-कुछ कहिए ! मेरी बातों का जवाब दीजिए ! इन्दुलेखा देवी मानो पत्थर की मूत्ति वनी बैठी रहीं। बहुत देर के बाद बोलीं-ये बातें आपको किसने वताई ? मैंने कहा--जिसने भी कहा हो, वात सच है या नहीं, यह आपको बताना पड़ेगा । मैं आपसे जवाब मांगने आया हूं। आपने लोगों को यही बताया है कि हजारों रुपये अपने रुग्ण पति के पीछे खर्च करती रही हैं और अभी भी कर रही हैं। यही विश्वास दिलाया है कि पति के लिए आप सुबह से शाम तक सटती रहती हैं। पर आपने किसके लिए इतने बड़े छल का सहारा लिया? इससे किसका भला होगा? आपका या फिर अटल दा का? पे-६ इन्दुलेसा पप रहीं। मेरी बात का जवाब उन्होंने नहीं दिया। मैंने कहा-चुप मत रहिए। जवाब दीजिए। आज आपसे जवाब मेकर ही यहां मे हिनूंगा। तमाम लोगों की आंखों में आप देवी बनी बैठी है। इमरा अमली उद्देश्य क्या है, में यह जानना चाहता हूँ! इन्दुलेगा देवी ने पाखें भगा ली। बोली आपने सब कुछ सुना -हो, सुना है । सुना भी है और विश्वास भी किया है। अब मिर्फ भापकी बात सुनने के लिए मुझे यहां आना पड़ा है, क्योकि अटल दा मेरे ? -आपके गुरु -हाँ ! मैंने इतने दिनों तक आपको कुछ नहीं कहा था। किन्तु उमगे कोई फर्क नहीं पड़ता। आप यही बताइए कि आप इतनी निष्ठुर मे मन की ? लोग अधमरे चूहे के तड़पने का तमाशा देखते हैं, क्या घटन दापो आपने वैसा ही तमाशा बना रखा है ? मैंने देगा इन्दुसखा देयो की अषिों से आसू टपक रहे थे। साड़ी के पल्लू से आगे पोंछकर बोली-यही पहले बाप मेरे यहां आए हैं ? -हा! नहीं तो आपसे मेरी और क्या बात हो सकती पी? तो फिर आज आप यह समझकर जाइए कि अपने पति को भलाई या युराई के लिए में पाहे वो भी करूं, किसीको कुछ कहने का अधिकार महो । मेरे पति की मलाई भी मेरे हाथों में है, और नुकसान भी। इससे बापको क्या? इन्दुनसा देवी जैसी धीर स्थिर, शान्त मूति की जुबान से ऐसी बातें गुनार में तो हतप्रभ रह गया। इन्दुनैसा देवी बोली-~-जिम दिन जान-बूझकर मेरे पति ने मेरा मनाम पिया पा, मेरे बाप को ठगकर मुझसे शादी की थी, आपने उस दिन मेरे पति मे बार मांगा था? मेरे कपर अत्याचार के विरुद्ध उनके पर जाकर उन्हें पिरमारने के लिए भी आप नहीं गए होंगे। तो फिर मार मुझगे वो मेरे कामों की जवाबदेही चाहते हैं ! आइए ! थाप यहाँ में पते जाइए" यह सुनकर मेरे गले से आवाज़ नहीं निकली। । वह वोलों में अपने पिता की सारी जायदाद की उत्तराधिकारिणी बनी थी और मुनीम-गुमाश्तों तथा रिश्तेदारों की लूटपाट से बचा-खुचा जो भी धन था, उसे मैंने पति की बीमारी के पीछे खर्च कर दिया है क्या इसलिए कि उनका भला हो ? जिसने मेरा सर्वनाश किया, मैं उसीका हित चाहूंगी, यह बात आपने सोची भी तो कैसे ? मैंने छूटते ही कहा-इससे तो बेहतर होता कि उनका खून कर दिया जाता। उन्होंने भी तुर्की-चतुर्की जवाब दिया ~ पर इससे बदला तो नहीं लिया जा सकता । खून करने पर उन्हें अपने अपराध का दण्ड कैसे मिलेगा? उल्टै यह उनका भला करना होगा। मैंने कहा-तो फिर उन्हें बना लीजिए। बात तो एक ही हुई न ! दण्ड तो नहीं मिला! इस प्रकार जीना भी नहीं, मरना भी नहीं, मैं इसी तरह उन्हें रखना चाहती हूं। इस आदमी को जानना चाहिए कि किसी औरत का सर्वनाश करने पर इतनी आसानी से छुटकारा नहीं पाया जा सकता। - इन्हें जानना चाहिए कि दुनिया की हर औरत निरीह और वेवकूफ नहीं होती। औरत में भी आत्मसम्मान का बोध रहता है । उसे भी मात्म- मर्यादा का ज्ञान रहता है । औरत में भी प्राण होते हैं। थोड़ा रुककर फिर बोलीं-रात बहुत हो गई है, आप घर जाइए। इस पाप की कोई सफाई नहीं, कोई प्रायश्चित्त भी नहीं। उसो बाद में वहां ठहरा नहीं था। विमूद-सा उनके घर से चला आया था। सोचा था, यह बात चारों ओर फैला दूंगा । इन्दुलेखा देवी के झूठ गौरव को मटियामेट कर दूंगा; पर उसी समय तीन साल के लिए मुझे कलकत्ता के बाहर जाना पड़ा। इतना अचानक जाना पड़ा कि मुवन बाबू को भी सवर नहीं कर सका । पूरे राजस्थान का दौरा करने वाली नोकरी थी मेरी। पर वह कहानी कुछ और ही है, उसकी पृष्ठभूमि भी दूसरी है-वह दूसरी दुनिया की कहानी है। वह प्रसंग यहां अवांछनीय ६८

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पोहोएर निषन पारगोपिट्टी निकर मैंने उनएर पौर
देने याना मशेष सार पाया। मदन पार ने निगा पा-
भासो गुनगर ग होगा कि हमारे एमोनोगादेवी में
पानरमाया रहा ये निवामियों को दुगरे गागर में मोति
हैमा उन्होंने पिता कौन लगने ? गोरीपर पाना हमारे निर
मौसमीक्षा दी। पुमिम भारमला बागान मुसमा नहीं मरी
है। हमारी भी समझ में पर नहीं बारहोंने मार
निराकानी पनि ! हमारे गा में उनकी मृत्यु पर सिर
पोरममा पो। गनीने पोप उनसेगी मो, पतिराना
महिनाबारी दुनिया में दुलंग है। हम उनको मरतो प्रारमा की मुशि
को बामना करो है।सम में गराएर सन वि टांगने प्रताप
भी ले पाग परयाग। माता है, पर गबर मुनगर मारोगगो
होगी।
मपन पापी पिटी पाने में सामने उन्हें और पीर गैग में
मिसामिगरीवर मेसर मुझे मिर्ग। पर नगर
नहीं है मगर
हो गया है. मटार दा भी भर म दुनिया में न हो। पुनी को भी
गीं। पर मंमार करितो पौने में मार मार भी जरा अस्थिर वो
साना परता कि भले होरपमरे लिए होमोनहरो, मदरसा
केबीपन शान्ति हो।
का गभीरा नहीं मिलता,पं भी नहीं। पाने पर भी ओपन
में गरगोग जमेराम में नहीं सासरते; परन मरने कीमती पोर है,
पानि । म मानगरि मदाने पर गानि नही पाही दी।
गिरे मनग्न में ही पापी-पापा, जने जीवन-मर पानिमिन
भीगे मरती है!
मामा पोर तुनेगा देवीपी पर रहानी वारी पहानी है

या प्रतिशोध को; या फिर सिर्फ नियति के निष्ठुर परिहास की, मैं नहीं सगझ सका, अब भी नहीं समझ पा रहा हूं। कहानी जैसी-जैसी घटी थी, में लिस गया। यह माहानी पढ़कर इसमें अन्तनिहित तथ्य को खोजकर आपको आनन्द या वेदना जो भी हो-मैं उसीके लिए अपने को कृतार्थ मानूंगा। 000

Ve Dono Aur Wah

Author
Mishra Vimal
Title
Ve Dono Aur Wah
File name
Ve Dono Aur Wah
Text
OCR done
Published
2011/03
Publisher
Xxxxxxxxxxxxxx
Language
Sanskrit
Pages
109
Library
Adarsh Library, Jaipur
Classification
Poetry
DLI number
552068
Barcode
4990010032798.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
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Copyright permitted
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