Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner

Jhungaar Teja

Sharma,mehta Lajaram · 2011/01

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पढ़ने योग्य उत्तमोत्तम उपन्यास " " नव विधान " " " "200, 3) रंगभूमि (दोनों भाग) १,६) पाश्चर्य घटना बहता हुया फूल २॥) नवीन मन्यासी ३७ मा पडितजी (शरदवायू) १) चित्रशाला १,२७ बड़ी दीदी हृदय की प्यास २७) परिणीता मिस्टर व्यास की कथा २) नंदन निकुंज १), 2) मॅमली दीदी प्रेम प्रसून (प्रेमचंद) १०),05) श्ररक्षणीया प्रेम प्रतिमा २) घद्रनाथ m प्रेम-द्वादशी 29, up विजया प्रेम-गंगा १), २॥ गोरी लगमग १० कामिनी काचन गिरियाला अधखिली कली २७ लवधाँधों 5), श) मगल प्रभात विवाह विज्ञापन विवाहित प्रेम १७ मजरी " १॥ खि फी किरकिरी पिदा २) (रवींद्र मायू.) १) जय सूर्योदय होगा 110 घर और यार १) श्रयला सब प्रकार की पुस्तकें मिलने का पता- संचालक, गंगा-पुस्तकमाला-कार्यालय २९-३०, अमीनाबाद-पार्क, लखनऊ सम्राट अशोक फर्म फल

DOGSOKari
गगा पुस्तकमाला का श्रहासीवाँ पुष्प
जुझार तेजा
लेखक
मेहता लज्जाराम शर्मा
प्रकाशक
रगा-पुस्तकमाला-कार्यालय
२६३०, श्रमोनाबाद-पार्क
लखनऊ
द्वितीयावृत्ति
1
सजिएद)]
स. १६८५ वि०
[सादी ॥

प्रकाशक
श्रीदुलारेलाल भार्गव
अध्यक्ष गंगा पुस्तकमाला-कार्यालय
लखनऊ
मुद्रक
श्रीदुलारेलाल भार्गव
अध्यक्ष गगा-फाइनआर्ट-प्रेस
लखनऊ

भूमिका जय यह पोयी सनिक-सी है, अब इसकी भूमिका भी जरा-सी होनी चाहिए और फिर जय धुरी या भली पुस्तफ प्यारे पाठकों के सामने है, तय लयी चौड़ो भूमिका लिखकर दीपफ को दीपक लेकर दिखाते से लाम भी क्या? र, जैसी कुछ है यह है । धुरी है, तो यह है भोर भली है,तो यह । जिा लोगों की कृपा-रष्टि में इस अकिंचन लेखफ को पुस्तकों ने योदा-पहुत स्थान पा लिया है, अथवा जो समा- लोचक महाशय है, वे इस छोटी सी पुस्तिका का प्रायोपात प्रव. लोकन कर दूध फा-दूध और पानी का पानी अलग कर देनेवाली हस बुद्धि से उसके गुणों की अथवा दोषों की मुझे यदि सूचना देने का अनुग्रह करें, तो मेरा सौभाग्य ! इस पुस्तक में किसनी ही यात असभव सी हैं । मेरी श्रास्तिक युद्धि भी उन्हें पूर्ण रूप से ग्रहण नहीं करती है, किंतु जब पश्चिमीय साइस अनेक प्राचीन असभव बातों को सभव कर रहा है, और जब थोड़ा-सा मनन करने पर अंगरेजी शिक्षा का पदार्थवाद (Materialism) भारतवर्ष के चिरकालीन परमार्थवाद (Spiritualism) के घमरकारों के आगे नष्ट हुआ जा रहा है, सब फौन कह सकता है कि क्सिी दिन ये बातें सत्य घटना के रजिस्टर में दर्ज न हो जायेंगी । श्रारभ हो गया है। कुछ अर्से तक मार्ग प्रतीक्षा करने की यावश्यकता है।

यह पोथी उपन्यास नहीं है , सत्य घटना-सूलक है । इसमें भाषा मेरी है और कथा का श्राधार जन श्रुति । "प्राधार" इसलिये कि पुस्तक को रोचक करने के लिये मैंने कही कहीं इसे रग दे दिया है। किंतु इसमें सदेह नहीं कि मूल घटनाओं का, तेजा के उपासकों के उद्देश्य का, मैंने कहीं परिवर्तन नहीं होने दिया है जोधपुर निवासी सुप्रसिद्ध इतिहास लेखक मेरे माननीय मित्र मुशी देवीप्रसाद का अवश्य ही मैं ऋणी हूँ, जो समय समय पर रचना के लिये मुझे ऐतिहासिक सामग्री देने को मदा तैयार रहते हैं । इम लघु पुस्तिका में भी मैंने थोदा बहुत मसाला उनसे प्राप्त किया । इस पोथी का आधार तेजा के उपासकों के गायन पर है और वह बूंदी के अंतर्गत निजामत देई के ग्राम दौलतपुरा के पटैल श्रीकृष्ण मीने से प्राप्त हुआ है। उक्त परैलजी का भी मैं कृतज्ञ हूँ । उनका अनुरोध है कि पाठक महाशय उनका भक्ति-पूर्वक "राम राम" ग्रहण करें। श्राबू पहाड़, ज्येष्ठ शुक्ला ४, विनीत लजाराम शर्मा सवत् १६७१

से "जुझार
द्वितीय संस्करण
मेरे श्रद्धेय मित्र और "नागरी प्रचारिणी सभा" के जीवन-सर्वस्व
राय साहव बाबू श्यामसुदरदासजी बी० ए० अनुग्रह
तेजा" पहले सवत् १६७1 में सभा की मासिक पत्रिका में और लगे
हाय पुस्तकाकार छपा, और यह उन्हीं की कृपा का प्रतिफल है कि सभा
की प्रबंध समिति ने सख्या ३१, १ वैशाख, सवत् १९८४ के पत्र में
इसका द्वितीय सस्करण अन्यत्र प्रकाशित कराने की माज्ञा मुझे प्रदान
की। गगा पुस्तकमाला के स्वामी श्रीयुत दुलारेलालजी भार्गव के
अनुग्रह से इसकी दूसरी प्रावृत्ति माजहिंदी-जनता के सामने है, और
है बड़ी सजधज के साथ, सचिन । इन दोनो महाशयों को चौर राय
साहय द्वारा सभा को मेरा हार्दिक धन्यवाद है।
मेरा यास्तव में सौभाग्य है कि मेरी पुस्तकों में "जुझार तेजा" का
हिंदा-जनता ने सामान्य की अपेक्षा विशेष प्रादर किया । कोटा, राज.
पूताना के महाशय गौरीलालजी वॉचमेकर और कसकर ने "एक
हादीता-हृदय" के नाम पर खड़ा योला के पद्य में एक सविस सस्क.
रण प्रकाशित किया और नाम इसका "वीर तेजा" रक्खा । यह
सस्करण सवत् १९७७ में प्रकाशित हुआ था। बूंदी निवासी मेरे मित्र
स्वर्गीय मुंशी रघुघरदयालुजी के श्रायुप्मान पुन वायू प्रभुदयालुमी
ने इसका एक उद्-सस्करण "जाँ निसार तेजा" के नाम से प्रका-
शित किया । सूनी हो कि केवल भखिर के सिवा पावू साहब
हो महाशयों का
,
1
ने कही एक
भी मैं कृत
4
।
mai निसार
-

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द्वितीय संस्करण मेरे अदेय मित्र और "नागरी प्रचारिणी समा" के जीवा-सर्वस्व राप साहब बापू श्यामसुदरदासजी दी. ए. के मनुग्रह से "शुमार तेजा" पहले सयत् १३७१ में सभा को मामिक पत्रिका में भार को हाय पुस्तकाकार रूपा, और यह उन्हीं की कृपा का प्रतिफल है किममा फी प्रपध समिति ने सत्या ११ पैशास्त्र, संपत् ११८४ के पत्र में इसफा द्वितीय मस्करण अन्यत्र प्रकाशित कराने की माशा मुझे प्रदान की । गगा पुस्तकमाला के स्यामी श्रीयुत दुलारेलालजी भागय के अनुग्रह से इसकी दूसरी आवृत्ति भाजहिंदा-जनता के सामने है, और है बड़ी सजधज के साय, सचित्र । इन दोनों महाशयों को और राय साहय द्वारा समा को मेरा हार्दिक धन्यवाद है। मेरा वास्तव में सौभाग्य है कि मेरी पुस्तकों में "जुमार सेजा" का हिंदा-जनता ने सामान्य की अपेक्षा विशेष भादर किया । कोटा, राज- पूताना के महाशय गौरीलालजी वॉचमेकर और दुसेजर ने "एक हाड़ीता हृदय" के नाम पर खड़ा पोला के पथ में एक सषित सरक. रण प्रकाशित किया और नाम इसका "धीर तेजा" रक्खा। यह सस्करण सपत् १९७७ में प्रकाशित हुआ था 1 बूंदी निवासी मेरे मित्र स्वर्गीय मुंशी रघुवरदयालुजी के श्रायुप्मान पुत्र बाबू प्रभुदयालुभी ने इसका एक उधू-सस्करण "जाँ निसार तेजा" के नाम से प्रका- शित किया । ब्लूबी यह है कि केवल अपरांतर के सिवा या साहब ने कहीं एक शब्द तक इसमें नहीं बदला है। इन दोनों महाशयों का भी मैं कृतज्ञ हूँ। "जाँ निसार तेजा" के अंत में बाबू साहब मे मेरे प्रदेश ।

5 स्वर्गीय मुशी देवीप्रसादजी का एक निबंध, जो लाहोर के उदं मामिक पत्र "शिव शभु" में प्रकाशित हुआ था, उद्धृत किया है । मुंशीजो. लिखित ऐतिहासिक तथ्य जिसना पुस्तक के कलेवर में पा चुका, उसे यहाँ दुहराने की श्रावश्यकता नहीं, किंतु उससे इसना विशेष विदित होता है कि "तेजाजी की औलाद अब तक सड़ताल (मार- बाद ) में निवास करती है । तेजा के पूर्वपुरुप सींची राजपूस थे उनमें से एक व्यक्ति शहाबुद्दीन बादशाह की सेना के भय से नाटों में मिल गया था।" मुशाजी के मत से तेजा से युद्ध में परास्त होने वाले मेरवाडे के मेर थे। उनसे ही विजय पाफर यह गाएँ बुदा जाने में घायल हुआ । गूजरों की इसने गाएँ छुड़ाई यीं, इसलिये वे लोग इसकी मरहम पट्टी करने लगे। इसने कहा-"तुम कहाँ तक मेहनत फरोगे । मेरे जिस्म में तो जवान के सिवा कोई जगह जगम से खाली नहीं है।" यह कहकर इसने जयान दिखलाई । इतने ही में एक साप श्राया और उसने जयान में काट साया। मुशोजी के लेख में और गाने वालों की रचना में परिणाम एक होने पर भी पृथ्वी भाकाश का-सा भवर है। कौन कह सकता है कि वास्तविक घटना किस प्रकार थी। गानेवालों को रचा तब से अब तक ज्यों की-त्यों चली आ रही है, और सभव है कि मुशीजी का लेख उनकी ग्वोज का परिणाम हो । मुशीजी. जैसे श्रद्धय विद्वान् पर मास्ता न रखना मेरे जैसे मित्र को शोभा नहीं देता, किंतु इतना अवश्य है कि यदि उन्होंने साथ ही कुछ प्रमाण दिया होता, तो अच्छा था । इस सूरस में "सीने बसीने" चली भानेवाली आख्यायिका को मैं असत्य नहीं ठहरा सकता। इतना अवश्य है कि उनके लेख का अाधार मारवाड़ की दतकया है, और मैं कहता हूँ हाडौती की जनता के गायन के आधार पर । भाद्रपद शुE वि लज्जाराम मेहसा जुझार तेजा पहला अध्याय चरित्र में चमत्कार जुझार तेजा का नाम किसी इतिहास में नहीं है । उसके पैदा होने के साल-संवत् का भी अभी तक किसी को पता नहीं है। यहाँ के पढ़े-लिखे विद्वान् जब उसके चमत्कारों को वाहियात ढकोसला समझते हैं, जब कि उनकी उपेक्षा से भारतवर्ष के इतिहास का एक बहुत बड़ा राजाना बडे-बूदों के मन-मदिर में छिपा हुआ है, कि प्राचीन वीरों, महात्माओं और विद्वानों का चरित्र- सग्रह परपरा से बाप-दादों की धरोहर में मिलने पर भी हमारी बेपरवाही की ऑधी के झोकों से दिन-दिन नष्ट होता चला जा रहा है, अथवा हमारी कृतघ्नता की कड़ी धूप से दिन-दिन क्षीण होता जा रहा है, तब यहाँ के इति- हास में तेजा जुझार का वर्णन न हो, तो आश्चर्य नहीं, किंतु राजपूताने की "दत-कथा" में तेजा का पासन ऊँचा है। उसकी असाधारण बहादुरी, उसका अप्रतिम साहस, .

जुझार तेजा-
तेजा ने अपनी जीभ फैलाई, और तर नागराज ने तेजा को जोम
का सुन पीकर अपना करोजा ठडा किया ।
(पए-मरया ६३)
CinzFARPrermirkar

जुझार तेजा पहला अध्याय चरित्र में चमत्कार जुझार तेजा का नाम किसी इतिहास में नहीं है । उसके पैदा होने के साल-सवत् का भी अभी तक किसी को पता नहीं है । यहाँ के पढ़े-लिखे विद्वान् जब उसके चमत्कारों को वाहियात ढकोसला समझते हैं, जब कि उनकी उपेक्षा से भारतवर्ष के इतिहास का एक बहुत बड़ा सजाना बड़े-बूढों के मन-मदिर में छिपा हुआ है, जब कि प्राचीन वीरों, महात्माओं और विद्वानों का चरित्र- सग्रह परपरा से बाप-दादों की धरोहर में मिलने पर भी हमारी बेपरवाही की आँधी के झोकों से दिन-दिन नष्ट होता चला जा रहा है, अथवा हमारी कृतघ्नता की कड़ी धूप से दिन-दिन क्षीण होता जा रहा है, तब यहाँ के इति- हास में तेजा जुझार का वर्णन न हो, तो आश्चर्य नहीं, किंतु राजपूताने की "दत-कथा" में तेजा का आसन ऊँचा है। उसकी असाधारण बहादुरी, उसका अप्रतिम साहस, २ जुझार तेजा उसका अद्वितीय प्रतिज्ञापालन, उसकी असीम सत्य-निष्ठा और उसका अनुकरणीय आत्मविसर्जन राजपूताने के लाखों आदमियों के हृदय की पट्टी पर दृढ़ता की लेखनी से चिर- स्थायी है । जुझार तेजा पढा-लिखा नहीं था, वह उन वीर राजपूतों में से नहीं था, जो अपने असामान्य गुणों को दुनिया के इतिहास में सदा के लिये अमर कर गए हैं, और यह उन जाटों में से भी नहीं था, जिन्होंने भारतवर्ष में एक नहीं, अनेक राज्य स्थापित करके अपना नाम वीरों की फिहरिस्त में लिखवा लिया है। तेजा जाट एक साधारण खेतिहर था। इस बात का कहीं पता नहीं लगता कि उसने कभी किसी उस्ताद से हथियार चलाना सीसा हो, किंतु उसकी असीम प्रतिभा ने उसका नाम अमर कर दिया । लोग देवताओं की तरह उसकी पूजा करते हैं। जब राजपूताना के लासों आदमियों को विश्वास है कि उसका नाम लेकर "डसी" बाँध देने पर साँप का काटा हुआ मरता नहीं है, तब वह अवश्य पूजने योग्य है । उसने यह साबित कर दिया है कि पूजन में जाति-पाति की उच्चता की आवश्यकता नहीं है। चाहे ब्राह्मण हो अथवा चमार ही क्यों न हो-दुनिया में आदर गुणों का है । अथवा एक साधारण से मी साधारण मनुष्य को ऊँचा बनने के लिये चरित्र मे चमत्कार ३ - तेजा के-से गुण ग्रहण करने की आवश्यकता है । पुराणों में जो नीचे से ऊपर को पहुंचे हैं, वे किसी विश्वविद्यालय की डिगरी लेकर नहीं । मनुष्य के ऊपर चढ़ने के लिये तप चाहिए, और जिनमें तप होता है, उनको ऊँचा बनने की आवश्यकता नहीं है । तेजा एक साधारण किसान-एक सामान्य जाट- होने पर भी ब्राह्मण-क्षत्रियों से पुजा जाता है, वह अपढ होने पर भी विद्वानों का वदनीय है, और यह किसी समय मनुष्य-देह धारण करने पर भी अब देवता है । हिंदी के सुप्रसिद्ध इतिहास-लेखक जोधपुर-निवासी हमारे गौरवास्पद मुशी देवीप्रसादजी ने अपनी खोज से पता लगाया है कि- "जाटों में तेजा धौलिया कौम फा खडनाल परगने नागौर राज्य जोधपुर का रहनेवाला था। उसका विवाह गाँव पनेर राज्य किशनगढ़ में हुआ था ।जब वह अपनी खी को लेने पनेर गया, उस समय वहाँ के गूजरों की गाएँ घेर- कर मीने लोग ले जा रहे थे । गूजरों की पुकार जब किसी ने नहीं सुनी, तव तेजा उनकी मदद पर चढ़ दौड़ा । वह लड़- कर उनसे गाएँ अवश्य छुड़ा लाया, परतु वह भी स्वय बहुत घायल होकर गिर पड़ा । वहाँ एक सॉप बैठा था । उसने उसकी जवान पर काट साया और इस तरह -

जुमार तेजा
.
,
जब वह मर गया, तो उसकी खी उस पर सती
हो गई।"
राजपूताने में ऐसा कोई गाँव नहीं, जहाँ भाद्र-शुक्ला १० को
तेजा का पूजन न होता हो । पूजन होता है "डसी" काटने
के लिये । ढोलक पर अलगोजे बजा-बजाकर लोग उसे पहले
खूब रिमा लेते हैं, फिर उसका पूजन करके तव "डसी" काटते
हैं । साल-भर के किसी दिन, किसी समय, किसी अवस्था
में मनुष्य को, चौपाए को, किसी को चाहे जैसे महा भयकर
जहरीले सांप ने डस लिया हो, उसके घरवाले, संगी-साथी
अथवा अड़ोसी-पड़ोसी दवा के लिये किसी अस्पताल में दौड़े
नहीं जायेंगे, किसी वैद्य से अथवा किसी हकीम से जाकर
यह नहीं कहेंगे कि "हमें दवा दो। और जब दुनिया में
अभी तक ऐसी "रामवाण" दवा का आविष्कार ही नहीं
हुश्रा, अथवा हुआ भी तो उसके आगे अज्ञानाधकार का परदा
पड़ा हुआ है, अथवा उन लोगों के लिये हर जगह सुलभ
नहीं, तब दौड़कर जाने से, किसी स दवा माँगने से लाभ ही
क्या? बस वे लोग उसी समय चाहे जिसके सिर का साफा,
पगढ़ी अथवा और कपड़ा लेकर उसे लवाई की और फाडते
हैं। फाड़कर उसे थोड़ा-सा बटते हैं, और तब "जय तेजा
राजकुमार ! तेजाजी की जाय
कहकर उस बीमार के
,

चरित्र में चमत्कार
।
गले में बाँध देते हैं । लासों का विश्वास है कि रोगी मरने
नहीं पाता । उसका जहर उस समय अवश्य "चूमतर" हो
जाता है । उस समय इतना जरूर करते हैं कि रोगी को एक
दिन रात सोने नहीं देते । जहर यदि जोरदार हुआ,
तो"बाया
तेजाजी" की मन्नत भी मानते हैं। वह कपडा, जो "डसी"
के नाम से प्रसिद्ध है, यदि भाद्रपद शुक्ला १० से पहले काट
डाला जाय अथवा टूट पड़े, तो सर्पदश से महीने, दो महीने
अथवा आठ-दश महीने तक भी रोगी के मर जाने का भय
है । इसलिये उस "डसी" की सूब रक्षा करनी चाहिए।
बस भाद्रपद शुक्ला १० के दिन उस रोगी को लेकर
"डसी" काटने के लिये तेजाजी के "देवल" पर जाते हैं।
वह रोगी वास्तव में किसी दिन रोगी अवश्य था, किंतु आज
हट्टा कट्टा तदुरुस्त है । उसके नस में भी रोग का नाम नहीं।
वह जेठ की दुपहरी में सूब हल जोतता है, सावन की
माडियों में घटों तक अपने शरीर पर मेह मेलकर निरानी
करता रहता है, और जाड़ों की रात में जंगल में पडे रहने
पर भी उसे भी जुकाम नहीं होता है । जिम व्यक्ति को
विषधर सर्प ने काट साया था, उसकी यह वर्ष-भर के तीन
सौ उनसठ दिनों की दिनचर्या है, किंतु भाद्रशुक्ला १० के
दिन एक बार फिर उसे रोगी बनना पडता है। यह दशा यदि
.

६
जुझार तेजा
.
केवल मनुप्य की हो, तो कहा जा सफता है कि यों ही ढोंग
करता है अथवा साँप के भय ने उमे विफल कर दिया है,
किंतु गाय-थैलों को, घोडे-गहों को, भैसों को "डसी"
काटते ही साँप फा जहर चढते देखा गया है । दिनों
पूर्व-महीनों पहले आदमी अथवा जानवर की जो दशा
सॉप के काटने पर हुई थी, वही तेजाजी की मूर्ति के
सामने भाद्रपद शुक्ला १० के दिन विद्यमान है। वैसा ही
जहर का चढाव,और वैसी ही लहरें आना । खैर "डसी"
काटते समय चार आदमी उसे इस तरह पकड़े रहते हैं कि
वह गिरने न पावे । "गिरा सो गया" ही लोगों का सिद्धात
है । नीम के मौर से तेजाजी की मूर्ति के स्नान के जल को
छिड़के यही उस समय इलाज है। वस, यों तेजाजी के
"देवल" की सात प्रदक्षिणा करते-करते वह भला-चगा हो
जाता है। ऐसा लाग्यों श्रादमियो का विश्वास है। इसी
विश्वास से, इसी श्रद्धा से, वे "जुमार तेजा" का पूजन
करते हैं, और "जहाँ विश्वास है, वहीं विकाश है।" इस
सिद्धात से उनकी कामना पूर्ण होती है । वे यहाँ तक मानते
हैं कि तेजाजी के मदिर के निकट कहीं-न-कहीं एक श्वेत
सर्प अवश्य रहता है। कितने ही लोग कहते हैं कि हमने
उसके दर्शन किए हैं। लोगों के सिद्धात के अनुसार यही
.
-

चरित्र में चमत्कार
तेजाजी हैं । और, जब लाखों आदमी उनसे कार्य की सिद्धि
पाकर काल के चंगुल से अपने प्राणों को बचानेवाले, अपने
स्वजना की रक्षा करनेवाले हैं, हजारों गाँवों में उनकी मूर्तियाँ
स्थापित होकर उनका पूजन होता है,तब इस बात को असत्य
मानने से भी लाभ क्या? जिन महानुभावों को इस पर
श्रद्धा न हो, जो इसे वाहियात बतलाकर अपने द्वारा लोगों का
"अधविश्वास" छुडाना चाहते हों, वे गाँव-गाँव, घर-घर
सर्पदश की दवा पहुँचाकर वब शताब्दियों के अनुभव को
मिथ्या सिद्ध करने का यत्न करें।
कुछ भी हो, उसके चरित्र के लिये आगे के कुछ पृष्ठों का
अवलोकन करने पर पाठकों को विदित हो जायगा कि एक
सामान्य किसान किन उत्कृष्ट गुणों के कारण इस तरह
लाखों आदमियों से पूजा जाता है । जो चमत्कार के उपासक
हैं, वे उसके चमत्कार का, और जो गुणों के भक्त हैं, वे उसके
गुणों का पूजन करें।

दूसरा अध्याय माना का ताना हाड़ौती, मेवाड़, मारवाड़ और अजमेर जहाँ-जहाँ तेजा का आदर है, वहॉ वहाँ की भाषा में उसका गुण कीर्तन किया जाता है। उसके जन्म से लेकर शरीरात तक की कथा का ही इस गायन में वर्णन है । कविता किसी साहित्य- शिरोमणि विद्वान् की नहीं, यमक, अनुप्रास, श्लेष और काव्य की ऐसी-ऐसी बारीकियों का उसमें लेश तक नहीं, और न उसमें रसिक जनों के मनों को आद्र कर देने के लिये शृगार-रस है, और न उनके लिये "लपटाने दोऊ पट ताने परे हैं"---की छटा है, किंतु उस तुकवदी का भाव बड़ा महत् है, और उसके अक्षर-अक्षर में जोश भरा हुआ है। चौमासे के दिनों में जिस समय काली घटाएँ छा-छाकर दिन को रात बना देती हैं, मेह वरस-बरसकर नालों को नदियाँ बना देने की वाहवाही लूटता है, और धरती हरी धोती ओढकर अपना मनमोहन सौंदर्य छिपा रखती है, उस समय यहाँ के किसान गले में ढोलक लटकाकर अलगोजों

माना का ताना
के साथ नाचते जाते हैं, और लड़ा-लडाकर "तेजाजी" गाते
जाते हैं । गाते समय वे सचमुच अपना आपा भूल जाते हैं,
उनके सिरों पर से साफे गिर गए, तो कुछ परवाह नहीं और
तंबाकू पीने की यदि उन्हें चाट भी लग रही है, तो कुछ चिंता
नहीं । यह गायन, यह नृत्य तजा-दशमी से पहले होता है।
मुशी देवीप्रसादजी की खोज का जो वर्णन प्रथम अध्याय
में है, वह केवल मारवाड़ के गायन के आधार पर है, और
उसके अतिरिक्त इस लेसक को, जो लिखना है, वह हाड़ौती के
गायन का माराश है । मुशीजी की तलाश में और हाड़ौती
के गायन में थोड़ा-बहुत अतर है । मुशीजी उसे खड़नाल
परगने नागौर राज्य जोधपुर का रहनेवाला बतलाते हैं, और
हाडौतीवालों की राय में वह रूपनगर राज्य किशनगढ का
निवासी था । ससुराल दोनों ही ने पनेर में वतलाई है, किंतु
मुशीजी के मत से पनेर किशनगद के राज्य में है, और
हाड़ौतीवाले अपने गायन में इस बात का पता नहीं देते कि
यह गाँव किस राज्य में और कहाँ पर है । खैर ' हाड़ौती-
वालों के मत से इस बात का यदि पता न चले, तो मत चलने
दीजिए, किंतु कुछ पृष्ठों के अवलोकन से विदित हो जायगा
कि पनेर किशनगढ़ के राज्य में नहीं, किंतु ऐमीजगह पर है,
जहाँ जाने के लिये तेजा को बनाम नदी पार करनी पड़ी थी।
.

- - दूसरा अध्याय माना का ताना हाड़ौती, मेवाड़, मारवाड़ और अजमेर जहाँ-जहाँ तेजा का आदर है, वहाँ-वहाँ की भाषा में उसका गुण कीर्तन किया जाता है। उसके जन्म से लेकर शरीरात तक की कथा का ही इस गायन में वर्णन है । कविता किसी साहित्य- शिरोमणि विद्वान् की नहीं, यमक, अनुप्रास, श्लेष और काव्य की ऐसी-ऐसी बारीकियों का उसमें लेश तक नहीं, और न उसमें रसिक जनों के मनों को आई कर देने के लिये शृगार-रस है, और न उनके लिये "लपटाने दोऊ पट ताने परे हैं"-की छटा है, किंतु उस तुकबदी का भाव बड़ा महत् है, और उसके अक्षर-अक्षर में जोश भरा हुआ है। चौमासे के दिनों में जिस समय काली घटाएँ छा-छाफर दिन को रात बना देती हैं, मेह बरस-बरसकर नालों को नदियाँ बना देने की वाहवाही लूटता है, और धरती हरी धोती ओढकर अपना मनमोहन सौंदर्य छिपा रखती है, उम समय यहाँ के किसान गले में ढोलक लटकाकर अलगोजों .

माना का ताना
.
के साथ नाचते जाते हैं, और लड़ा-लडाकर "तेजाजी" गाते
जाते हैं । गाते समय वे सचमुच अपना आपा भूल जाते हैं,
उनके सिरों पर मे साफे गिर गए, तो कुछ परवाह नहीं और
तपाकू पीने की यदि उन्हें चाट भी लग रही है, तो कुछ चिंता
नहीं । यह गायन, यह नृत्य तजा-दशमी से पहले होता है ।
मुशी देवीप्रसादजी की खोज का जो वर्णन प्रथम अध्याय
में है, वह केवल मारवाड के गायन के आधार पर है, और
उसके अतिरिक्त इस लेसक को, जो लिसना है, वह हाडौती के
गायन का साराश है । मुशीजी की तलाश में और हाड़ौती
के गायन में थोड़ा-बहुत अतर है । मुशीजी उसे सड़नाल
परगने नागौर राज्य जोधपुर का रहनेवाला बतलाते हैं, और
हाड़ौतीवालों की राय में वह रूपनगर राज्य किशनगढ का
निवासी था । ससुराल दोनों ही ने पनेर में चतलाई है, किंतु
मुशीजी के मत से पनेर किशनगढ के राज्य में है, और
हाड़ौतीवाले अपने गायन में इस बात का पता नहीं देते कि
यह गाँव किस राज्य में और कहाँ पर है। सर ' हाड़ोती.
वालों के मत से इस बात का यदि पता न चले, तो मत चलने
दीजिए, किंतु कुछ पृष्ठों के अवलोकन से विदित हो जायगा
कि पनेर किशनगढ के राज्य में नहीं, किंतु एमी जगह पर है,
जहाँ जाने के लिये तेजा को यनाम नदी पार करनी पड़ी थी।

जुझार तेजा अस्तु, इतना पता अवश्य लग गया है कि तेजा के घाँप का नाम बख्शराम था, और तेजा का वदना जाट की बेटी ब्याही थी। जिस समय वह केवल छ महीने का था, तभी उसका विवाह कर दिया गया था। इतनी जल्दी विवाह क्यों किया गया, सो मालूम नहीं, किंतु गाँववालों की कविता में कहा जाता है कि- "थाली में परणायो रे कुंचर तेजा कडो-ऊँडो भादूडो मो गाजै रे।" बस यह कविता इस बात की गवाही दे रही है । गाँव- वाले अपने गीत में तेजा के केवल इम जन्म का ही हाल सुनाते हो मो नहीं, उन्हें किमी तरह मालूम हो गया होगा कि यह पूर्व जन्म में कौन था, और किस तप के प्रभाव से इस जन्म में अथवा मृत्यु के बाद इतना पूजनीय समझा जाने लगा। वे कहते हैं कि पूर्व जन्म में मी तेजा गायों का ग्वाल था। गाँव की गाएँ चराना ही शायद उमका पेशा था। अपनी गाएँ चराने के लिये वह नित्य जगल मे जाया करता था । एक दिन अकस्मात् उसे किसी महात्मा के दर्शन हो गए। तेजा ने उनकी बहुत सेवा की । फल यह हुआ कि एक दिन महात्मा ने प्रसन्न होकर उससे कहा-"बेटा, मॉग ! जो मागेगा सोही पावेगा।" उसने हाथ जोड़कर उनके पैरों माना का ताना पर पड़कर प्रार्थना की-"महाराज, जो आप मुझसे सचमुच प्रसन्न हुए हैं, तो मुझे ऐसा बरदान दीजिए, जिससे मेरा नाम होवे, और लोग मुझे पुजने लगें।" इस पर महात्मा बोले- "बेटा, तू जगली गँवार है । न तो तू भक्ति जानता है, और न ज्ञान, फिर किस बल से मैं बताऊँ कि तू महात्मा वन जायगा। अच्छा, भगवती यमुना के तट पर जाकर तपस्या कर, तेरा कल्याण होगा।" वह बोला-"महाराज, जर आपका बर- दान है, तब कल्याण अवश्य होगा। परतु मैं गाएँ चराने के सिवा और जगल के बबूल-पेजडों के सिवा यह भी तो नहीं जानता हूँ कि तपस्या किस चिड़िया का नाम है ।" इस पर साधु ने योग की साधना का कुछ प्रकार बतलाकर उसे यमुना तट के किसी वृक्षविशेष पर उलटे लटकने का उपदेश दिया । हटयोग का माधन करते हुए वर्षों तक वह कदर के वृक्ष तले उलटा लटका रहा । बस, यों लटके-लटके ही उसके प्राण-पखेरू उड़ गए । उसकी इस तरह मृत्यु हो जाने के बाद यमुना जल में उसके शरीर से रफ की वूदें गिरकर पुष्प बनकर बहने लगीं । उस पुष्प को लछमा (लक्ष्मी) जाटनी उठा लाई, और उसी के प्रभाव से उसके तेजा का जन्म हुधा। इसके तारा और फलचाए दो नाम और भी थे, किंतु वह प्रसिद्ध हुआ तेजा के नाम से ।'

" १० जुझार तेजा अस्तु, इतना पता अवश्य लग गया है कि तेजा के घोंप का नाम बख्शराम था, और तेजा को वदना जाट की बेटी ब्याही थी। जिस ममय वह केवल छ महीने का था, तभी उसका विवाह कर दिया गया था। इतनी जल्दी विवाह क्यों किया गया, सो मालूम नहीं, किंतु गाँववालों की कविता में कहा जाता है कि- "याली में परणायो रे कुंवर तेजा ऊडो-ऊंडो भादुडो सो गाजे रे।" बस यह कविता इस बात की गवाही दे रही है । गाँव- वाले अपने गीत में तेजा के केवल इम जन्म का ही हाल सुनाते हो मो नहीं, उन्हें किमी तरह मालूम हो गया होगा कि यह पूर्व जन्म में कौन था, और किस तप के प्रभाव से इस जन्म में अथवा मृत्यु के बाद इतना पूजनीय समझा जाने लगा। वे कहते हैं कि पूर्व जन्म में मी तेजा गायों का ग्वाल. था। गाँव की गाएँ चराना ही शायद उमका पेशा था। अपनी गाएँ चराने के लिये वह नित्य जगल में जाया करता था । एक दिन अकस्मात् उसे किसी महात्मा के दर्शन हो गए। तेजा ने उनकी बहुत मेवा की । फल यह हुआ कि एक दिन महात्मा ने प्रसन्न होकर उससे कहा-"बेटा, माँग। जो माँगेगा सो ही पावेगा।" उसने हाथ जोड़कर उनके पैरों 7

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१४
जुमार तेजा
"दूसरे घाट से (आँखें खोलकर ) भर ले। हम इस समय
ठाकुर-सेवा कर रहे हैं।"
"और दूसरे घाट पर मेरा पैर फिसल जाय तब? मेरी
गागर टूट जाय, मेरी चूड़ियाँ फूट जायें, और न-मालूम मेरे
कहाँ-कहाँ चोट लग जाय । तू कब का ऐसा पडित बन गया
है, जो घाट पर किसी को पानी तक नहीं भरने देता । तेरी
लुगाई अपने बाप के यहाँ पड़ी-पड़ी तेरी जान को रो रही है,
यों ही अपनी जवानी खो रही है, और तू यहाँ पडित
बना बैठा है।"
"हैं मेरी औरत ! क्या मेरी विवाहिता ? जब मेरी शादी
ही नहीं हुई, वव औरत आई कहाँ से ?
तू झूठ बोलती है।
अच्छा, जो सच्ची है, तो खा कसम' सा अपने घड़े को सौगद
या अपने छोटे भैया की?"
"मुझे गरज ही क्या पड़ी है, जो मैं झूठ बोलू । क्या मुझ
झूठ बोलकर तुझसे जागीर लेनी है? जिस गाँव में तेरी
ससुराल है, उसी में मेरी पीहर (मैका) है, इसलिये मैं जानती
हूँ, और इसीलिये मैं सौगद साती हूँ।"
यों माना गूजरी के सौगद खाने पर उसने जाना और
साथ ही माना कि "मेरी शादी हो चुकी है ।" यस पति और
पत्नी के बीच में जो एक अलौकिक प्रेम होता है, वह पत्नी का

माना का ताना
१५
नाम सुनते ही उसके हृदय में लहरें मारने लगा। आजकल
पञ्चीस वर्ष के लड़के चार-पाँच लड़कों के बाप बन जाया करते
हैं, किंतु तब तक तेजा को स्त्री का शायद लसर्ग तक नहीं हुआ
था। काम-शास्त्र के विद्वानो की तरह नहीं, ग्रामीणों के ग्राम्य
धर्म का भी उसे थोड़ा-बहुत ज्ञान होता, तो अवश्य वह किसी-
न-किसी तरह अपनी गृहिणी का पता पा सकता था। किंतु
आज ही अभी उसे खयर हुई, और तुरत ही वह पूजा-पाठ
समेटकर अपनी माता के पास पहुँचा । केवल पहुँचा ही क्यों,
उसने उदास होकर अपनी जन्मदात्री माता से पूछा-
"मा । क्या मैं अभी तक कुँआरा ही हूँ? मेरे सगी साथी
इस सावनी तीज पर अपनी-अपनी बहुओं को लाने के लिये
अपनी अपनी ससुराल में जाने की तैयारी कर रहे हैं।"
"हैं 'किस निपूते ने तुमे बहका दिया ? किस मुई ने एसा
बोल मार दिया। हाय तीर की मार अच्छी और "बोल"
की मार खोटी। जिसने तुझे बहकाया है, उस पर-रामजी
करें-बिजली गिरे।"
"नहीं मानहीं जिन्होंने मुझसे कहा है, उन्हें ऐसी गाली
न दे । भगवान् करे उनका मंगल हो । वे फले-फूलें और सुख
पावें । उन विचारों ने तेरा बिगाड़ा ही क्या है, जो तू उन्हें
कोसती है। जिनक हाथ से हमारा कुछ नुकसान हो जाय, उन्हें

जुमार तेजा . १८ आई । उसने पूरे डेढ़ सौ रुपए खर्च करके एक यदिया जोन खरीदी। इससे पाठक शायद यह समझ लें कि उस सम भी चैलों की जोड़ी का यही भाव या, जो अब है, और भाड कल गायों और बैलों के मारे जाने का नाम लेकर चौप- मॅहगे हो जाने की जो दुहाई दे रहे हैं, वे भूलते हैं, सो नहीं जैसा माल वैसा मोल । घोड़ा पञ्चीस को भी मिल सक है, और पाँच हजार में भी सस्ता । साधारण कामों के लि- उस समय चालीस-पचास रुपए में जोड़ियाँ मिलती थी अस्तु, तेजा ने जोड़ी खरीदकर राज्य की कोतवाली अथ सायर में महसूल चुकवाया । कोतवाली अथवा साय लिसने से प्रयोजन वही है, जिसे गानेवाले चबूतरा कहते और देशी रजवाड़ों में दोनों ही चबूतरा कहलाते हैं । सि होता है कि आजकल की तरह हिंदू-राज्य में रहकर में बैल की बिक्री पर महसूल लेने का उस समय रवाज था तेजा की बहन का नाम राजा था। वह किस गाँव च्याही गई थी, सो मालूम नहीं , किंतु तेजा व दो रात बीच में रहकर पहुँचा। इससे अनुमान हो है कि पञ्चीस-तीस फोस से कम न होगा तेजा के समधी नाम जौरा था। गाँव के किसी पनघट की बावली पर वेज शरीर-कृत्य से निवृत्त होकर बहन से मिलने के इरादे

शत्रुओं की चुनौती
१९
ठहर गया। गाँव की पनिहारिनें जब वहाँ पानी भरने के लिये
आई, तब उन्होंने बातचीत से उसे पहचाना, और तब राजा
को जाकर खबर दी कि-"तुमे लिवा ले जाने के लिये तेरा
भाई आया है।" इन स्त्रियों में राजा की ननद भी थी।
उसका नाम मालूम नहीं । ननद का पैगाम सुनकर राजा ने
यह बात मिथ्या समझी । वह बोली-
"मुझे पीहर से आए बारह वर्ष हो गए। अभी तक जब
किसी ने मेरी सुध नहीं ली, तो अब कौन आने लगा । घर
से निपूता ढोर खो जाने पर भी उसकी तलाश की जाती है।
इसलिये नाहक मेरी दिल्लगी करके मुझे क्यों कुढ़ाती हो।
उनके लेसे तो मैं मर गई।"
"नहीं-नहीं भाभी, कुढ़ो मत ! उदास मत हो ! मैं तुमसे
दिल्लगी नहीं करती, सच कहती हूँ। तुम्हें विश्वास न हो, तो
(अपनी चूड़ियाँ दिखाकर ) सौगद खाकर कहती हूँ कि
तुम्हारा भाई आया है, और पनघट की यावली पर ठहरा
इया है।"
इससे पाठक समझ सकते हैं कि जब हिंदू-रमणियाँ पति
के लिये स्वन में भी कभी अशुभ चिंतन न करने का दावा
करती है, जब चूड़ी की सौगद उनके लिये सिर फट जाने से
भी यदकर है, और जब उन्हें मर जाना मजूर, परतु चूड़ी की
-

२० जुझार तेजा कसम खाना मजूर नहीं, तब राजा की ननद ने एक हलकी-सी बात के लिय इतनी भारी फसम क्यों साई? उनकी ऐसी समझ में भूल नहीं, किंतु इस बात से यदि वे परिणाम निकाल ले कि हिंदू-समाज उस समय इतना गिर गया था कि पति की शपथ खाने में उसने किंचित् भी आनाकानी न की, तो उनका यह भ्रम है । फसम खानेवाली जाटनी थी, जिनमें धरेजे का रवाज सदियों से चला आता है । हाँ, इमसे यह नतीजा अवश्य निकल सकता है कि जिन जातियों में एक पति के मर जाने पर, अथवा उमसे खटपट हो जाने पर दूमरा पति कर लेने की चाल है, उनके यहाँ पत्ति की दर इतनी , ननद के सौगद खाने पर जब राजा को भरोसा हुआ कि सचमुच उसका भाई आया है, तब वह फूले अग न समा सकी। लोग कहते हैं कि पनघट की बावली से तेजा चल- कर जब वहन के यहाँ गया, तय नगर के लोग-लुगाइयाँ उसे देसने को इकट्ठी हो गई थीं। सब आपस में कहते थे कि- "जिसे देसने की मुद्दत मे अभिलाषा थी, उसे आज आँसों मे देस लिया।" बोध होता है कि या तो गाँव के जमीदार फा नातेदार मममकर लोग तेजा को देखने आए हों, अथवा तेजा की वीरता का डका इससे पहले धज चुफा हो ।

शत्रुओ की चुनौती किंतु अब से पहले उसने कब, कहाँ वीरता की, सो पता नहीं। प्राचीन समय में द्विजों के यहाँ द्विज जव अतिथि होता, था तब मधुपर्कादि से उसका सत्कार करने की जैसी चाल थी, वैसे ही अपने किसी आत्मीय स्वजन प्यारे पाहुने के आने पर उसके लिये आरती उतारने का काम सुहागिनी माता, बहन इत्यादि किया करती थीं । बस, इसी तरह राजा ने तेजा का भी स्वागत किया। भारतवर्ष के भाषा-काव्य में जैसे अत्युक्ति का बहुत श्रादर है, वैसे ही इन गॅवारों के गीतों में भी कमी नहीं है। कहा जाता है कि मोतियों से थाल भर- कर राजा ने भाई की आरती उतारी। मोती सच्चे थे अथवा झूठे, सो राम जाने । शायद मोती नहीं ज्वार हो । ज्वार के दाने मोती से होते हैं। लोग सेर ज्वार के लिये सिर कटा दिया करते हैं । "ज्वार विना कोई द्वार न भावे जग में नाता ज्वारी का ।" बस ऐसे भाई को बधा (१) लिया और तब दोनों ओर के कुशल-प्रश्नों का समय आया । तेजा ने अपनी माता का संदेशा घहन और उसकी सास को सुनाया । उसने अपने गाँव की खबर सुनाते हुए कहा कि- "छोटा भाई अब इतना बड़ा हो गया है कि बछड़े चराने लगा है।" गाँववालों को अब तक भी अपनी उमर के साल याद नहीं रहते हैं। ये ऐसे ही इशारे से उमर पतलाया -- जुझार तेजा करते हैं । इसका मतलब यही है कि लड़के की उमर दश- बारह वर्ष की है ! खैर, बहुत वर्षों में भाई के मानेपर बहन उसे उलाहना देने से भी न चूकी । उसने कह दिया--- "ओ हो । हो । इतने वर्षों में आया। मैं तेरी सूरत भी अच्छी तरह न पहचान सकी । मैं तो भैया, पीहर का रास्ता तक भूल गई।" इसके अनंतर बहनोई मे मिलने की बारी आई। दोनों ओर से "जुहार साहव । जुहार " हुई। साले का आतिथ्य- सत्कार हुआ । नई हँडिया में चावल तैयार किए गए। वहाँ पर भी तेजा ने भगवान् के भजन-पूजन में सकोच नहीं किया। तेजा का शृगार इस तरह का था। पैरों में चमकीला जूता, हाथ में माला, धोबी से धुलाई हुई मिरजई और कंधे पर रंगीन धोती । माथे पर क्या था, सो याद नहीं । भोजन करते समय तेजा की ममधिन से यों पाते हुई- "ममधिन, राजा को भेज दे। दस दिन वहाँ भी रह आएगी । मेरी मा का इसके लिये बहुत जी लगा हुआ है।" "नहीं, इस समय मैं नहीं भेज सकती । बहू को भेज देने में मेरी खेती चौपट हो जायगी, और-तो-और परतु दही कौन यिलोवेगा" इमफे उत्तर में जय सेजा ने समधिन को एक भूरी भैंस -

,
की ससुराल
शत्रुओं की चुनौती
२३
देने का वादा किया, तब वह राजा को भेज देने पर राजी
हुई। यों सघ लोगों से मिल-भेंटकर राजा की सास के
पैरों पडने के अनंतर वह बहन को लेकर वहाँ से चल
दिया । वास्तव में मार्ग की रक्षा का उस समय भाज का-सा
प्रबंध नहीं था । शायद तब इतनी आबादी भी नहीं थी।
घन
और भाई के घर के बीच का रास्ता बिलकुल
जगल-ही-जगल में होकर था। पीलेखाल के पास उनको
मीनों ने घेर लिया। तेजा सिर से पहले नाक कटानेवाला,
मरे मारे विना एक ही घुडकी में कपडे-लत्ते दे देनेवाला
नहीं था । मीने भी विना घायल किए अथवा विना घायल
हुए किसी को लूट लेना कायरता समझते थे। यदि कोई
मुसाफिर चोरों के डर से चुपचाप कपड़े उतार देने को तैयार
हो जाय, तो वे कहा करते थे कि-"यों देना हो, तो
किसी ब्राह्मण को देना । हम सून निकाले विना ऐमा दान
नहीं लेंगे।" बस, परिणाम यह हुआ कि दोनों ओर से लडाई
ठन गई। तेजा बोला-
"लडो येशक 'मैं भी रणभूमि को पीठ दिखानेवाला कुपूत
फायर नहीं हूँ।मारूंगा, और तुम सबको मारकर मरूँगा, परतु
लड़ने-मगडने से पहले (धरती में अपना बरछा रोपकर) इसे
उसाड़ लो, तब मुझसे समाम करने की हिम्मत करना ।"
-

२४
जुझार तेजा
.
लोग कहते हैं, तेजा ने अपना भाला पत्थर में गाड़ दिया
था । खैर, गाढ़ा किसी जगह पर हो, परतु जब भीनों से बरछा
उसड़ न सका, तब वे यह कहकर कि-
"अच्छा, आज हम तुझे जिंदा छोड देते हैं, परंतु जब तू
ससुराल जावेगा, तब रास्ते के पहाड़ों में तुझसे जरूर बदला
लेंगे।" चलने लगे।
"खैर, मैं तब भी तुम्हें पानी का लोटा पिलाने को तैयार
हूँ। येशक, मेरी ससुराल ऐसी ही विकट जगह में है, जहाँ
लूट-खसोट, मार-काट और डकैती का बाजार हमेशा गर्म
रहता है।"
तेजा से ऐसा जवाव पाकर मन-ही-मन वैर लेने की प्रतिज्ञा
करते हुए वे लोग वहाँ से चले गए, और यह भी अपनी बहन
को लिए हुए घर आ पहुँचा। घर पहुँचकर तेजा ने फिर
वही ससुराल जाने की बात छेड़ी।माता ने बहुत समझाया, परतु
उसने माना नहीं। बडे भाई और भौजाई के नाम का पता
नहीं, परतु भाभी ने उसे समझाया । उसने यहाँ तक कह
डाला कि-
"जहाँ तेरी मसुराल है, वहाँ "दौडों का दौर-दौरा है।
मैं तुझे एक की जगह दो --एक मेरी सगी बहन और दूसरी
घरी बहन विवाह दूंगी। तू वहाँ मरने के लिये मत जा ।
1

शत्रुओं की चुनौती
२५
यहाँ जायगा, तो अवश्य मारा जायगा। मैंने स्वप्न में देखा है
कि तुमे नाग डस गया, और तेरा देवल वन गया । इसलिये
प्यारे देवर, मैं तुझे हरगिज न जाने दूंगी।"
जब उसकी ससुराल ऐसे भयकर प्रदेश में थी, तब उसके
चचा और भाई ने उसे रोका क्यों नहीं, अथवा उसकी मदद
के लिये दस-पाँच हथियारबंद साथ क्यों न हुए, सो कोई
नहीं कहता, परतु यह निश्चय है कि यह अकेला ही जाने को
तैयार हुआ । तेजा की घोड़ी का नाम लीला अथवा लीलाधरी
था, और उसका रग समद था। घोड़ी बड़ी मनचली थी।
जाने की तैयारी देखते ही वह रणोन्मत्त की तरह नाचने और
उमग दिखलाने लगी। तेजा ने तीर, कमान, भाला, सिरोही,
तलवार, तोड़ेदार धदूक और कमर में कटार-इतन हथियार
साथ लिए। उसके सिर पर सुरग पगड़ी, उम पर कलगी टॅकी
हुई थी । सब साज-सामान से लैस होकर वह घोड़ी के पास
गया,
और उसे चलने के लिये उतावली देखकर ज्यों ही वह घोड़ी
पर चढ़ने लगा, त्यों ही उसकी मा, भौजाई और बहन ने उसे
पकड़ लिया । उन्होंने फिर भी उसे समझाया, परतु उसने
किसी की एक भी न सुनी ! बहन के पूछने पर उसने इकरार
किया कि-"पीपल के जितने पत्ते हैं, उतने ही दिनों में वापस
आऊँगा।" यस इससे सबने समझ लिया कि "तेजा वापस

२६ जुमार तेजा आने के लिये नहीं जाता, मरने को जाता है। यह समझ- फर सप-की-सय' रो-पीटकर रह गई और सचमुच ही तेजा भरने के लिये, मरफर अपना नाम अमर फर जाने लिये घोड़ी पर सवार होकर वहाँ से चल दिया। रा.

चौथा अध्याय
जब उसने
प्रतिज्ञा की परिसीमा
जब तेजा अपने घर से सचमुच मरने-मारने अथवा मर
मिटने के लिये चला था,
माता
और
बहन तथा
भौजाई के हजार समझाने पर भी अपनी गृहिणी से मिलने
की दृढ़ प्रतिज्ञा कर ली थी, और जब उसे मीनों की चुनौती
के बदले के लिये, समर-भूमि में अपने हाथों की परीक्षा
देकर अपना नाम अमर कर जाना था, तब मार्ग में यदि बुरे
से भी बुरे शकुन हुए, तो क्या । यद्यपि देहाती लोग शकुनों
के बहुत कायल हैं, वे इस काम को समझते भी अच्छा हैं,
और अनुभव से अनेक बार सिद्ध हो चुका है कि शकुन मूठे
नहीं होते हैं, परतु तेजा ने बुरे शकुनों की किंचित् भी परवा न
की । निश्चय है कि तेजा गॅवार देहाती होने पर भी कर्तव्य.
दक्ष था । वह जानता था कि आदमी अपने कर्तव्य-पालन के
लिये पैदा हुआ है । वह नितात निरक्षर होने पर भी जानता
था कि चाहे कोई प्रशसा करे अथवा निंदा, चाहे धन आवे
अथवा चला ही क्यों न जाय, चाहे श्राज ही शरीर छूट जाय
अथवा सौ वर्ष बाद , परतु धीर पुरुष न्याय का मार्ग नहीं
छोड़ते हैं। वह सचमुच ही-
.

२८
जुझार तेजा
,
"निन्दन्तु नीतिनिपुणा यदि वा स्तुवन्तु ,
लक्ष्मी समाविशतु गच्छतु वा यथेष्टम् ,
श्राव वा मरणमस्तु युगान्तरे वा ,
न्याय्यात्पय प्रविचलन्ति पद न धारा ।"
इस लोकोक्ति का ज्वलत उदाहरण था। घस, इसलिये
उसने अपनी जन्मदात माता की भाशा को तुच्छ समझा।
देहातियों के लिये जिन शकुनों पर ही उनकी दुनियादारी का
आधार है, जो ज्योतिष के मेघ-गों से, गवर्नमेंट की मेटिरि-
श्रोलाजिकल रिपोर्ट से वृष्टि, खेती और फसल के काम में हजार
दर्जे, ठीक मिलते हैं, उन्हें पैरों से रौंदकर चला और यों उसने
दिसला दिया कि जिसे कुछ कर दिखाना है, उसके लिये ये
तिनके के समान रही हैं।
उसे मार्ग में काले और साली कलश लिए कुंभारी मिली,
उसके सामने काले बैलों की जोडी जुती हुई गाड़ी मिली, उसके
जाते समय बाई और गीदड़ बोला, और इसी तरह खोटे-से-
खोटे अपशकुन उसे होते गए । जब तेजा ऐसे-एसे भयकर
अपशकुन देसने पर भी न डरा, न लौटा और उसने अपना
सकल्प न बदला, तब यदि शकुन देखते ही मन में
एक बार दगदगा भी हुआ, तो क्या, और न हुआ तो
-
क्या
H

प्रतिज्ञा की परिसीमा २९ . अस्तु । जिस समय वह यों घोड़ी दौड़ाता चला जा रहा था, उस समय एकाएक उसकी नजर जलते हुए जगल पर पड़ी। वहाँ का जगल जल-जलकर भयंकर ज्वालाएँ उगल रहा था, चारों ओर धुऑ-ही-धुआँ होकर आकाश धुआँधार हो रहा था । जो पशु और पक्षी भागकर, उडकर अपना प्राण बचा सकते थे, वे अवश्य भागे, उन्होंने अपनी प्राण- रक्षा का भरसक प्रयत्न किया, किंतु जब यमराज का छोटा भाई भीपण दावानल प्रलयकाल की अग्नि की तरह अपने हजार- हजार हाथों से पकडकर जीव-जतुओं को अपने विश्वनाशक मुस में डाल रहा था, तब जान बचाने का उपाय ही क्या । यों भाग जाने पर भी, उड जाने पर भी जल-भुनकर भुरता हो गए । वहाँ की यह दशा देखकर उसका कोमल हृदय एक- दम पसीज गया। गृहिणी से प्रथम समागम की उसकी लालसा और प्रतिज्ञा हवा हो गई। उसने गाएँ चरानेवाले ग्वालों से इसका कारण पूछा । उसने पूछा कि-"ऐसा घोर कर्म करनेवाला कौन है ?" शायद उसे यदि आग लगा देनेवाले का नाम-धाम मालूम हो जाता, तो वह अवश्य उसे मजा चसाए विना नहीं मानता । परतु जब बाँसों के सघर्पण से भाग लगी थी, तब वह दड भी देता, तो किसे देता ? जो जगल जल रहा था, वह घास से हरा-भरा था। गोचारण के लिये परती ३० जुझार तेजा छोटी हुई भूमि थी। यह सञ्चा गोरक्षक, गो-सेवा के सिवा अभी तक उमर-भर में इसने कुछ काम ही नहीं किया, और जष गोरक्षा के लिये ही मरने को जा रहा है, तब गोग्रास-- गाय का चारा--जलते देखकर उसका हृदय उछल पड़ा। तेजा ने घोड़ी से उतरकर उसे एक अधजले लूंठ से बाँध दिया । वह धोती ऊपर चढ़ाकर, हाथ की बाँहें ऊँची समेट- कर आग बुझाने के लिये तैयार भी हुआ, परतु वहाँ बंबई- कलकत्त की तरह आग बुझाने की कल नहीं, पास कोई कुआँ नहीं, बावली नहीं, तालाब नहीं। पुराण-प्रसिद्ध कथा है कि एक बार किसी पक्षी के अडे समुद्र बहा ले गया। पक्षी को उस पर क्रोध भाया। "कमजोर और गुस्सा ज्यादह" इसके अनुसार यह पसेरू समुद्र- द-जैसे महा बलवान् शत्रु की अनत जलराशि को उलीच-उलीचकर फेंक देने को तैयार हुआ । जल भर- भरकर फेंकने के लिये उसके पास कोई पप नहीं, पखाल नहीं, और मशक नहीं-तब उसने अपनी जरा-सी चोंच से भर-भरकर पानी फेंकना प्रारभ किया। बस, तेजा का उद्योग उसी पक्षी के समान था। वह पक्षी चोंच से समुद्र उलीचकर बदला लेना चाहता था, और तेजा ने विनाजल, विना मदद। आग बुझाने का साहस किया। भाग किस तरह बुझाई गई, सो कोई नहीं बतलाता, किंतु "जो आकाश पर तीर मारता A

प्रतिज्ञा की परिसीमा
कमी सीसा नहीं । हजार जमाना बिगड़ जान पर भी ऐमी
नीचता हिंदू से कभी स्वप्न में भी नहीं हो सकती । हाँ,
तेजा के लिये इस समय एक रास्ता और भी था। वह यदि
चाहता, तो उसकी सुशामद कर सकता था, उसके आगे
रोकर-गिड़गिड़ाकर प्राणों की भिक्षा माँग सकता था।
किंतु "हा-हा साए न ऊबरै धैरी बस पड़ियाँ" यह
लोकोक्ति उसके दिमाग में घफर काट रही थी । जो हथेली
पर जान लेकर केवल मरने ही के इरादे से घर से निकल
पड़ा है, यदि वह शत्रु की. और सो भी एक ऐसे दुश्मन की
जिसको वह अभी भरते-मरते बचा चुका है, खुशामद करे,
तो सचमुच उसकी बहादुरी में बट्टा लग जाय-उमकी
जननी लजा जाय । बस, इसीलिये तेजा ने उस सर्पको उचन
-
दिया। वह बोला-
"अच्छा, तुझे उपकार के बदले में मेरा अपकार
फरके कृतघ्न बनना है, तो भले ही बन । मैं तैयार हूँ।
में मरने को तैयार हूँ। मुझे किंचित् भी तुझसे भय नहीं है।
किंतु आज से सर्प जाति पर कोई उपकार नहीं करेगा।"
"कुछ भी हो, परतु जब मेरी नागिन इसी आग में जलकर
मर चुकी है, तब-तैने हमसे मेरा विछोह क्यों किया? मैं तुझे
।

३२ जुझार तेजा उससे नाराज हुआ । नाराज होकर उसने दिखला दिया कि दुर्जनों का उपकार फरके मौत मोल लेना है। उसने मावित कर दिया कि जो बुरे हैं, वे अपनी बुराई से कभी नहीं चूकते । इसी लिये बड़े लोगों ने ठीक कहा है कि-"पय पानं भुजगाना केवल विप वर्द्धनम्। खैर । वह सॉप बोला-"ओहो बड़ा गजब हो गया । तैने मुझे बचाया क्यों ? मैं यदि जल जाता, तो कष्टों से छूटता । मैं हिंदू-सम्राट् पृथ्वीराज और शहाबुद्दीन मुहम्मद- गोरी के दारुण सग्राम में मारा गया चॉपावत सरदार हूँ। मेरा नाम बलूसिंह ( बलदेवसिंह अथवा बलवतसिंह का सक्षेप) है। अपनी घोड़ी का मूल्य चुकाए विना मर जाने से और मरती बार मन में इस तरह की ग्लानि रह जाने से मुझे सर्प-योनि में आना पड़ा है । मैं मर जाता, तो दुस से छूटता । अब मैं तुझे डरूँगा । मारे विना हरगिज न छोडूंगा।" एक विषधर भुजग का, नरजाति के चिरशत्रु का, ऐसा इरादा देसकर, उससे ऐसा बर्ताव पाकर यदि तेजा चाहता, तो उसी समय उसका सफाया कर सकता था, किंतु जिसको बनाया, उसे विगाड़ना, जिसे बचाया, उसको मारना और जिसका उपकार किया है, उसका घात करना हिंदू-जाति ने

मर चुकी है, तब तैनेरुमसे मेरा विछोह क्या font
किंतु "हा-हा साए न ऊपर मेरी पम पहिला,
लोकोक्ति उसके दिमाग में आधार काट रही श्री
पर जान लेकर केवल मरने ही के इरादे में
पड़ा है, यदि वह शत्रु की, और सो भी एक समान
तो सचमुच उसकी बहादुरी में थट्टा रहा xsunny
"अच्छा, तुझे उपकार के बदले में pen
मैं मरने को तैयार हूँ। मुझे किंचित् भी तुमय मय
"कुछ भी हो, परतु जब मेरी नागिन इमीग्राम
प्रतिक्षा की परिसीमा
कभी सीखा नहीं । हजार जमाना पिगढ़ नान १r hunt
नीचता हिंदू से कभी स्वप्न में भी नही (HIM
तेजा के लिये इस समय एक रास्ता और भी { अy.in
चाहता,
तो उसकी सुशामद कर सपना था, Nis in
रोकर-गिड़गिड़ाफर प्राणों की मिशा माँग घरमा I
जिसको वह अभी मरते-मरते बचा पुका है, शाम भी
जननी लजा जाय । बस, इसीलिये तेजा ने PARTY
करके कृतघ्न बनना है, तो भले ही बन | Sagar
किंतु आज से सर्प जाति पर कोई
-
दिया। वह बोला-
पाnauth
जारसगा"

जुझार तेजा
.
"हा-हाँ, डस लनो डस लेना। मैं फय कहता हूँ कि भुके
प्राण-दान दे, परतु एक ही बात मैं तुमसे कहता हूँ। मरो
शादी हुए बारह और बारह चौबीस वर्ष हो गए हैं। तब से
मेरी स्त्री अपने मैके में पडी-पडी कौवे उडा रही है। एक बार
जीते जी उससे मिल आने दे । तब मैं जरूर तेरे पास श्रा
जाऊँगा। उम समय जो कुछ तेरे जी में आवे, सो करना ।"
इस पर सूर्य-चद्रमा की गवाही से, धरती माता की शहादत
से सर्प ने तेजा की बात स्वीकार की । वास्तव में हिंदू-जाति
की सत्यनिष्ठा का यह नमूना है। तेजा की सच्चाई की सीमा है कि
शत्रु भी उसके वचन का विश्वास करे । एक कृतन्न सर्प तक
को उसकी प्रतिज्ञा-पालन का भरोसा हो । इससे सिद्ध होता
है कि उस समय तक हिंदू जाति के हृदय से विश्वास का
विनाश नहीं हुआ था।
यो तेजा काल के गाल में से बचकर वहाँ से चल अवश्य
दिया और चला भी एक और प्रतिज्ञा के भार से अपने हृदय
को लादकर अपनी प्राणप्यारी के प्रिय दर्शन के लिये। किंतु
वहाँ से दो मंजिल निकलकर जब तीसरी मंजिल पर पहुँचा,
तो यनास नदी ने उसका रास्ता रोक लिया। घोडी समेत तेजा
को नदी पार कर देने के लिये मल्लाह अवश्य तैयार थे, किंतु
वह जेरवद सोलकर ऊपर बाँध लेने के बाद घोड़ी-समेत
,
1

प्रतिज्ञा की परिसीमा ३५ चौमासे की चढी हुई बनास के पार हो गया। पार जाकर उसने दूसरे किनारे पर श्रीबदरीनाथ महादेव के दशन किए। गानेवाले कहते हैं कि यह वही महादेव हैं, जो आजकल गोकर्णेश्वर के नाम से प्रसिद्ध हैं। गोकर्णेश्वर महादेव का मंदिर बनास के किनारे जयपुर राज्य के राजमहल-नामक स्वे में है। यह स्थान छावनी देवली मे पाँच कोस पर अब तक विद्य- मान है। यहाँ तेजा ने महादेव के दर्शन कर ब्राह्मण-भोजन कराया, आप भोजन किया, और घोडी को सूब चूरमा खिलाया । तब दो दिन बीच में ठहरकर अपनी ससुराल के गाँव पनेर पहुँचा । अव पाठकों ने अवश्य समझ लिया होगा कि मुशी देवी- प्रसादजी की बतलाई हुई पनेर और इस पनेर में कोसों का अतर होना चाहिए । मुशी देवीप्रसादजी की तलाश के अनु. सार तेजा की जन्मभूमि चाहे मारवाड के सड़नाल गाँव में हो, अथवा गानेवालों के विचार के अनुसार रूपनगर राज्य किशन गढ में हो, किंतु उसके गाँव और ससुराल का फासला कम-स- कम पाँच सात मजिल होगा, और इन दोनों के बीच नदी बनास भी होनी चाहिए । यद्यपि, पनेर गाँव वृंदी अथवा जयपुर के इलाके में कहाँ पर है अथवा उस जमाने में था, सो अभी तक मालूम नहीं, किंतु जो आदमी रूपनगर से चलकर राजमहल के निकट बनास नदी के पार उतरे और राजमहल जुझार तेजा . से उसकी ससुराल दो-तीन मजिल पर हो, तो उसको ससुराल अवश्य बूंदी के इलाके में दुगारी के आस-पास होनी चाहिए। दुगारी में अब भी तेजा दशमी पर बहुत बड़ा मेला होता है । दूर-दूर के यात्री अपनी-अपनी डमियों कटवाने के लिये वहाँ जाते हैं । जब अटकल से ही काम लेना है, तब यह भी कहा जा सकता है कि इसकी ससुराल केकड़ी में थी, क्योंकि वहाँ भी भारी मेला होता है । परतु इस अटकल से सच्चाई नहीं मालूम होती, क्योंकि रूपनगर से केकड़ी जानेवाले को शायद प्रथम तो घनास उतरने की आवश्यकता ही नहीं और सो भी राज- महल के पास।

पाँचवाँ अध्याय , - ससुराल में तिरस्कार गत अध्याय के अत में तेजा पनेर पहुँच तो गया, परतु जिसने पञ्चीस वर्ष की उमर में कभी ससुराल नहीं देसी, मास-ससुर नहीं देये, अपनी सात फेरे फी औरत नहीं देसी, अथवा यों कहो कि जिसको किसी ने न देसा, वह यों ही- विना किसी तरह के इशारे के-ससुराल में जाकर कहे कि “मैं तुम्हारा दामाद हूँ" और यदि वहाँ पर पहचाना न जाय-और ऐसा सभव भी है, क्योंकि जब उसका ब्याह हुआ था, तब उसकी उमर छ महीने की थी, तो जरूर ही वहाँ से जूते मारकर निकाल दिया जाय । क्योंकि हिंदुओं में दूसरे किसी का दामाद बन जाना गाली है, और यह उम जमाने की बातें हैं, जब राजपूत-जाति फिसी को अपना दामाद बनाने में अपनी हेठी-अपने लिये लज्जा समझकर कोमल कन्याओं का जन्म लेते ही कलेजा मसोस डालती थीं । "न रहेगा बाँस और न बजेगी बाँसुरी" की लोकोक्ति के अनुसार जनमते ही बालिका के रक्त में अपने हाथ रँगने की नीयता दिखाने में नहीं हिच- .

३८
जुझार तेजा
कती थी । सब नहीं, अनेक परंतु अनेकों की नीचता से
कलक सब पर था, और उस काले टीके को मिटाने का यश
ब्रिटिश गवर्नमेंट को है।
अस्तु, तेजा ने गाँव के बाहर जाकर किसी बगीचे में
विश्राम लिया । यह बाग उसके ससुरालवालों का था, किंतु
तेजा नहीं जानता था कि किसका है। जब वह जाकर वहाँ
पहुँचा, तय बगीचे का ताला बद था। इसके कहने से मालिन
ने ताला नहीं खोला । गीतों में कहा जाता है कि उसके
प्रताप से ताला अपने आप खुल पड़ा, और शायद ससुराल में
आकर अपनी मस्ती दिसाने के लिये ही उसने बगीचे में
घोड़ी यों ही छोड़ दी । घोड़ी ने बगीचे के पेड तहस-नहस कर
डाले, तब मालिन को गुस्सा आया और उसने टूब कोड़े
मार-मारकर घोडी की साल उडा डाली । घोडी की ऐमी
दुर्दशा देखकर तेजा का भी झांध भडक उठा। उसने मालिन
को ठोंका। मालिन रोती-पीटती अपनी मालिकिन के पास
गई । इस तरह तेजा के वहाँ आने का पैगाम उसकी ससुराल
में पहुंचा। यह बगीचा उसकी स्त्री की निगरानी में था।
उसका नाम बोदल था। उमर उसकी वही बारह और बारह
चौबीस वर्ष की होगी। इस तरह याग को नष्ट-भ्रष्ट कर
सालना, और तिस पर मालिन को मारना- ये दो अपराध
it

ससुराल में तिरस्कार
३९
तेजा के थे। मालिकिन को सुनकर पहले बहुत ही क्रोध
भाया । एक चौबीस वर्ष की अघला में बल ही क्या, जो
प्रचड तेजस्वी तेजा का मान-मर्दन कर सके। यदि दोनों के
भाग्य में दापत्य सुस बदा होता, तो शायद किसी दिन
मानिनी धनकर तेजा का मान भी मर्दन कर सकती थी,
किंतु इस समय युवती बोदल ने लूट-मार के केंद्र पनेर के
निवासी लुटेरों के सरदार बदना जाट के बल पर यहाँ तक
कह डाला कि-"मैं और तो और, परतु पानी तक में भाग
लगा मकती हूँ। आकाश के तारे उतार सकती हूँ । तू
घबराय नहीं । जिसने मेरा बाग बिगाडकर तुझे मारा है,
उसे अवश्य दड दिया जायगा ।" घर में बेटी लाड़ली
थी, और ससुरालवालों के न सँभालने से घेटी का
लाड़ और भी बढ़ गया था। बस, इसने अपनी भाभी को
हुक्म दिया कि-"पानी भर लाने के मिस से जाकर देखो
तो वह कौन आदमी है ?" ननद के कहने से भौजाई गगरी
सिर पर रखकर बगीचे की बावली में पानी भरने को गई।
यह बावली बदना की बनवाई हुई थी।
जिस समय भौजाई ने वहाँ पहुँचकर सिर की गगरी
सीढ़ियों पर धरी, तेजा जपस्थली में हाथ डाले हुए "राम-राम"
जप रहा था। तेजा के लिये इस तरह भजन करने का यदि

४० जुझार तेजा । यह पहला ही अवमर हो, तो पाठक कह सकते हैं कि उसने ससुरालवालों को दिखलाने के लिये ढोंग फैलाया था। किंतु नहीं-यह उसका नित्य का नियम था, और सचमुच ही वह बड़ा भास्तिक था । वह खाते-पीते, उठते-बैठते, सोते-जागते, चलते- फिरते कोई काम भगवान् का नाम लिए विना नहीं करता था । इस गायन में पद-पद पर इसका संकेत है । फिर वह जमाना भी ऐसा नहीं था, जिसमें भगवान का भजन भी झूठा ढकोसला खयाल किया जाय । बादल की भौजाई और तेजा के साले की बहू ने घूघट की ओट से उसे सिर से पैर तक अच्छी तरह निरसकर कुछ-कुछ पहचाना, कुछ अटकल लगाई, और तब कुछ मुस- किराकर होठों से अपनी मद-मद हँसी को दबाते हुए पर- देशी अनजान से बात करने में अथवा यदि कुछ पहचान भी लिया, तो अपने ननदोई से बातचीत करने में लजाते हुए पूछा और पूछने में ही थोड़ा-मा विनोद मलकाकर अपना परिचय दे डाला। वह बोली- 'ए परदेशी-पसेरू। किस नगरी का निवासी है, और किसके यहाँ का प्यारा पाहुना है ?" "मैं रूपनगर का रहनेवाला हूँ, और इसी नगरी में घदना का प्यारा पाहुना । बदना मेरा मसुर और मैं उसका

,
ससुराल
में तिरस्कार
४१
दामाद
" तेजा से ऐसा उत्तर पाकर उसकी कली-कली
सिल उठी । वह वैसे ही मृदु हास्य से कहने लगी--"कुवर
साहब । हैं आप पधारे हैं । मले पधारे । आज किधर भूल
पड़े। मेरी ननद तो आपकी राह देखती-देखती थक गई।"
उसने इस तरह तेजा को अपना परिचय देकर उसका परि-
चय ले लिया, किंतु हिंदुओं में यों ही स्त्री-जाति को स्वतत्रता
नहीं, फिर धर की बहू-बेटी और जवान क्योंकर एक जवाना
मेहमान से कह सके कि-"तुम घर चलो।" बस यों भी वह
जाते-जाते ननदोई को उसी घट की ओट मे निरसती
हुई, सिंहावलोकन की तरह फिर-फिरकर उसकी ओर
निहारती हुई चल दी, और घर पहुँचकर तब ननद से
बोली-
"लाभो हमारी मिठाई बोलो, आज क्या इनाम दिल.
चायोगी ? मैं अभी ऐसी खबर सुनाना चाहती हूँ, जिससे
तुम्हारी कली-कली सिल उठे।"
"हे हैं ! क्या खबर ? कहो तो सही, कौन-सी खबर ?
ऐसी कौन-मी सदर है, जिसके लिये तुम मिठाई माँगती हो।
मिठाई दो, तो तुम दो। भगवान् ने तुम्हें सुग्य दिया है। तुमने
इस चार गनगौर पर ही मिठाई नहीं दी मुम अभागी से मिठाई
क्या और इनाम क्या ? जिसे जिंदगी-भर तुम्हारे टुकड़ों पर
.
-
।

जुमार तेजा गुजारा करना है, उससे मिठाई ? भाभी, यों ही कॉटों में न घसीटो। "नहीं, सच कहती हूँ, हँसी नहीं करती । आज जरूर मिठाई लूँगी, ( हँसकर ) प्यारे पाहुने का-तुम्हारे ही प्यारे का पैगाम लेकर आई हूँ। जिसके लिये तुम बरसों से आस लगाए बैठी थीं, वह आ पहुँचा और तुम्हें ही लेने के लिये आए हैं। मौज " इतना कहते-कहते ननद ने भौजाई का मुंह पकड़ लिया। इसके बाद क्या बातचीत हुई, सो कहने का अधिकार इस लेखक को नहीं । कहने की आवश्यकता भी नहीं। मेरी कल्पना ने जहाँ तक इसे पहुँचा दिया, उतना ही चस है। खैर, पनिहारियों के कहने से तेजा को मालूम हुआ कि बदना जाट की हवेली के दरवाजे एर पारस पीपल का पेड़ है, उसका बेटा कानों में मोती पहने हुए है, और वह खूब धन- वान् है, परतु उसने वहाँ जाने पर शायद इसका बिलकुल उलटा पाया । जिस समय तेजा ने अपनी सास के पास जा. कर जुहार किया, तो वह पीढ़े पर बैठी चरसा कात रही थी। जब ससुर से मिला, तब वह भैंस चरा रहा था। उसके घर की औरतें ऑगन बुहार रही थी, और लड़का चौसर सेल रहा था। दामाद की खातिर करने के लिये पलँग बिछाया . H

ससुराल में तिरस्कार
४३
गया, और फस्तूरी डाला हुआ तवाकू उसे पीने को दिया
गया । तेजा ने मसुरालवालो का ऐसा प्रातिथ्य स्वीकार
तो किया , परतु यहाँ जाते ही फिर भगवान की सेवा
करने के लिये जल की गगरी माँगी । इधर उसका इस
प्रकार से नित्य का नियम आरम हुआ, और उधर खाना
बनने लगा । घर से घी देकर बदले में तेल, गेहूँ
फा पाटा देकर उसकी जगह कुलत्थ और दामाद को
परोसने के लिये वाकले तैयार किए गए। इस पर बेटी
बहुत फुढी, यहुत रोई, और मुँहफट बनकर उसने माता से
यहाँ तक कह दिया कि-
"घर में सब कुल मौजूद होने पर भी मेहमान का इतना
तिरस्कार क्यों करती है ? क्या तुझे आना अच्छा नहीं
लगा ?"
"हाँ-हाँ जमाई और जम, दोनों की एक ही राशि है।"
अस्तु, वह यों ही रो-मीककर रह गई, और तेजा के लिये
परसा वही गया, जो तैयार किया गया था। तेजा ने उस
थाल में से दो-तीन ग्रास अवश्य लिए, परतु ससुराल में
जाने पर ऐसा अपमान | जहाँ देवता के समान पूजा होने
की आशा, वहाँ ऐसा निरादर । विवाह के बाद चौवीस वर्ष
में पहली बार जाने पर ऐसी बेइज्जती । तेजा इस अपमान

जुझार तेजा - - . जा को सहन न कर सका । वह तुरत ही उठ खड़ा हुआ। सड़े होकर उसने थाली को एक लात मारी। तब वहाँ से यह गया, वह गया, चल दिया । जाती बार उसने सास से जुहार की या न की, सो मालूम नहीं, किंतु उसने सास की गाली अवश्य साई । उसे जाता देखकर वह बोली- "अच्छा, जाता है, तो जा निपूते तुझ पर गाज पड़े । जा तुमे काला सा जावे। " तेजा गाली सामर नहीं गया । गाली के बदले ऐसी ही उलटी गाली देकर वहाँ से वह चल दिया । तब उसने उसी बगीचे में अपना डेरा डाल दिया । वहाँ ठहरकर तेजा ने घस्ती-भर के ब्राह्मणों को भोजन कराया । केवल ब्राह्मण- भोजन ही क्यों, बस्ती के सब लोग-लुगाई, चालक-बूढों को न्योता दे दिया, एक न दिया अपनी ससुरालवालों को । ब्राह्मण रसोई बनानेवालों के हाथ से चूरमा बनवाकर सब का जिमाया । जन सब लोग राजी-खुशी भोजन कर चुके, तर तेजा की बारी आई । भगवान के ध्यान पूजन से निवृत्त होकर यह भी भोजन करने बैठा मही, परंतु ससुराल की तरह वहाँ भी परसी थाली उसके सामने मे खींच ली गई। अन्न अच्छा-बुरा चाहे जैसा हो, किंतु तेजा ने वहाँ उसके लात मारी थी। हिंदू अन्न को देवता मानते हैं, . " ~ 1

ससुराल मे तिरस्कार
,
-
अब
तब भी उसने उसका अपमान किया था। यहाँ तेजा के
भोजन-प्रारम करके दो-तीन ग्रास लेते-लेते ही माना
गूजरी ने इसके आगे हाय तोया मचाई । शायद यह वही
माना गूजरी थी, जो एक बार जगल में जलाशय के किनारे
उससे मिलकर उसके विवाह होने की याद दिला चुकी थी।
माना ने कहा-
"हाय-हाय
क्या करूँगी ? घर में
इस समय
कोई आदमी नहीं । निपूते इस गाँव के कोई मेरी पुकार
सुनते नहीं, और लुटेरे जगल में से चरती हुई मेरी सब गाएँ
लिए जा रहे हैं।"
"ले गए तो ढोली (ढोल बजानेवाले) को बुलाकर
गाँव की "बार" चढ़ा। सबके साथ मैं भी चलने को
तैयार हूँ।"
"यार क्या चढ़ाऊँ ? गाँव के सारे मर गए । जय तू ही
डरके मारे मरने के डर से आनाकानी करता है, तब हर हो
गई । हाय अब मैं क्या करूँगी । हाय मेरी सब गाएँ गई।
गवाडा-खिड़क साली हो गया। अरे । ये वे ही चाँदा के
मीने हैं, जिनसे तैने चुनौती का बदला लेने की सौगद
खाई थी। ऐसा नामी था, तो घर से आया ही क्यों था ?
मेरी तरह घाँघरा पहन लेता।"
"

जुमार तेजा
"हैं वे ही मोने ? अच्छा तब जरूर जाऊँगा । अवश्य
मारूंगा और मरूँगा, परतु तेरी गा छुड़ाकर लाऊँगा ।
जो न छुद्धा लाऊँ, तो मैं तेजा नहीं । तेजा और तेजा की
सात पीढ़ी को धिधार " यों कहते हुए तेजा ने भूसे पेट
थाली हटा दी । हाथ धोकर कुल्ला करने के अनंतर तेजा ने
कपड़े पहने, हथियार सजाए और तब घोडी कसकर उस
पर सवार हो गया । सवार क्या हुआ, चढ़कर अकेला ही
गाँववालों की मदद लिए विना चल दिया। घर से जब
चलने लगा था, तब माता ने उसे रोका था, किंतु "बेटी देकर
बेटा लेनेवाले" सास-ससुर ने इससे कुछ न कहा । मालूम
होता है कि मसुरालवालों में इसकी दुश्मनी थी।
-

छठा अध्याय डेढ़ सौ से अकेला तेजा अथवा उसकी माता से बदना और उसकी जोरू की यदि शत्रुता न होती, तो माता इसे ससुराल जाने से क्यों रोकती, और बदना की औरत ही ऐसे प्यारे पाहुने का इतना अपमान क्यों करती १ तेजा की माता के लिये तो यह भी खयाल किया जा सकता है कि बेटे का अमंगल विचार- कर उसने भेजने में नाही की, क्योंकि इधर तेजा मुठमई और उधर का प्रदेश भयफर, किंतु बदना की जोरू के वर्ताव का कोई कारण ध्यान में नहीं आता। समव है कि आजकल हिंदू- समधियों की आपस में जैसे जरा-जरा-सी बात के लिये खिंचा- सिंची हो जाया करती है, और इस समय समधियों अथवा समधिनों के परस्पर अड़ाव से जैसे आजीवन स्त्री-पुरुष में जूती पैजार हुआ करती है, वैसे ही कुछ हो पड़ा हो। खैर, माना गूजरी के उमारने से तेजा सज-धज के साय डेढ़ सौ मानों से लड़ मरने के लिये अफेला ही चद दौड़ा। उसकी शरणागतवत्सलवाने, उसके प्रतिक्षा-पालन ने भयवा उसकी भावी ने उसे पीठ तक फेरफर न देखने दिया कि कोई

४८
जुझार तेजा
उसकी मदद के लिये आता तो नहीं है। अस्तु, वह घोड़ी
दौड़ाता वहाँ से चला, और जब तक उसे गायों को लिए हुए
मीने जात दिग्वाई न दिए, उसने कहीं विश्राम तक न लिया।
अत में उसे दूर से गोरज उड़ती दिखलाई दी। फिर गाएँ देख
पड़ी और साथ ही डेढ सौ हथियार बद मानों का मुड ।
एक ओर डेढ़ सौ और दूसरी और अकेला वह । यदि तेजा कच्चे
दिल का होता, यदि उमे प्राणों का लोभ होता और यदि वह
माना से की हुई प्रतिज्ञा को तिनके की तरह तोड़ डालना
चाहता, तो उसी समय वापस जा सकता था । परतु नहीं !
रणभूमि से विमुख होकर भाग जाना और मर जाना उसके
लिये समान था । वह ऐसे नाक कटाकर जीने से सिर कटा-
कर मर जाने को सीधे स्वर्ग चला जाना समझता था । बस,
इसलिये उसने अपने प्यारे प्राणों को समर-यज्ञ में होम देने
के दृढ़ सकल्प के साथ ही लुटेरों को ललकारा-
"ठहरो ठहरो कहाँ लिए जाते हो इन गायों को ? जो
मईमी है, तो लड़ो। अपने प्रण को पालन करो, और जो
हिम्मत नहीं हो, तो गायों को छोड़कर भाग जाओ। देखना,
तुम डेढ़ सौ और मैं अकेला हूँ, परतु इस अकेले के हाथों का
मजा चख जाओ।
"जा-जा अपना मुंह लेकर लौट जा। नाहक औरों के
-
..

डेढ सौ से अकेला काम के लिये दीए में पतग क्यों बनता है । उस राड़ गूजरी ने यो ही जीजा-जीजा और जमाई-जमाई कहकर तेरी जान लेने के लिये जोश दिला दिया है । याद रसना, डेढ सौ आदमी हैं । यदि तेरी ओर थूक दे, तो भी तू बह जायगा । तेरी क्या मजाल, जो हम पर हाथ उठा सके।" "हैं । मैं लौट जाऊँ? चला जाऊँ, तो मेरी जननी लजा जाय । तुम यदि डेढ सौ बकरियाँ हो, तो मैं शेर और डेढ़ सौ चिड़ियों में अकेला बाज़ हूँ | घबराओ नहीं अभी एक-एक की गिन-गिनकर खबर लिए लेता हूँ। अगर तुम्हें गिन-गिन- फर मजा न चखाऊँ, तो मैंने माता लछमा का दूध पाकर भख मारी" "हैं । तू लछमा का बेटा है ? तब तो तू हमारा भानजा हुआ' वह हमारे राखी बाँधती थी।" "राखी बाँधती थी, तो अच्छी बात है । मामाजी गायों को छोड़ जामो, और मेरी मामियों को क्षयी काचलियाँ पहनाकर विधवा मत बनाओ।" "अरे छोकरे । फिजूल बातें बनाता है । भाग जा अपनी जान लेकर । हम डेढ़ सौ यहादुर और तू अफेला छोकरा।" "अच्छा लीजिए डेद सौ बहादुर मामा साहब संभा- लिए।" कहकर तेजा ने तीर बरसाना आरभ कर दिया। सच- - जुझार तेजा मुच ही उधर डेढ सौ और इधर वह अकेला था । एकदम से एक ही बार में उस पर यदि डेढ सौ तीर पड़े, तो उसका शरीर ही टुकड़े-टुकड़े होकर लाश तक का पता लगना मुश- किल हो जाय । परतु क्या अकेले तेजा पर डेढ सौ के डेढ सौ ही तीर मार सकते थे । गायों की सख्या विदित नहीं, परतु जब उन्हें घेरकर ले जानेवाले डेढ सौ थे, तब यदि दो हजार गाएँ मान ली जाय, तो आश्चर्य नहीं। बस, इतनी गायों को रोकनेवाले भी तो चाहिए। यदि न रोकी जाये, तो यों ही जगल में तितर-बितर हो जाय । गाएँ भी तो ऐसी नहीं थीं, जो उन्हें पहचानकर बोली पर रुक सकें । फिर डेढ सौ होने मे उन लोगों को घमड भी था कि अकेला छोकरा हम डेढ सौ का क्या कर सकता है ? बस, तेजा के तारों की भरमार ने मचमुच ही उनको व्याकुल कर दिया। उसने जैसा कहा था, वैसा ही कर दिखाया । उसके एक-एक तीर से एक-एक आदमी मर-मरकर, घायल हो-होकर, जब दो, तीन, चार गिरने लगे, तब मानों के पैर उग्पड़ गए । पैर उखड़ जाने मे पाठक शायद यह समझ बैठे कि क्या मीनों ने तेजा पर वार किए विना ही उमे गाएँ सौंप दी होंगी। नहीं, ऐसा कदापि नहीं हो सकता । हो सकता है कि तेजा को अकेला समझकर उन्होंने इसकी परवाह न करने एफ,

डेढ सौ से अकेला
।
से धोसा साया, परतु वे भी खाली हाथों नहीं भागे । जिस
ममय गाएँ छोड़कर माने भागे, उनके तारों की मार से तेजा
और उसकी घोड़ी भी कम घायल नहीं हुई थी । दोनों का
शरीर सचमुच छिन्न-भिन्न हो गया था। उनका सारा बदन
लहूलुहान होकर कपड़े खून से रंग गए थे। दोनों के शरीर
में से रक्त टपक-टपककर धरती भिगोता जाता था। गाएँ
भागे-भागे घर की ओर मुँह किए हुए अपने-अपने बछड़े-
बछियों से मिलने के लिये उतावली होकर चली जा रही थीं,
और तेजा भी घायल वीरों की तरह मतवाले मातग की नाई
विजय के जोश में झूमता हुश्रा पनेर की ओर चला जा
रहा था।
उम समय उसे अवश्य खयाल हुआ होगा कि "माना
को उसकी पूरी-की-पूरी गाएँ पहुँचाने से उसको धन्यवाद
मिलेगा।" किंतु धन्यवाद के बदले तेजा को उलाहना मिला।
कृतघ्न माना ने तेजा की तारीफ करने के बदले, उसका
उपकार मानने की जगह और मीठे वचनों से उसका स्वागत
करने के स्थान में सचमुच ही अपनी नीचता दिसाई । उसन
यह साबित कर दिया कि ऐसी ही नीचातिनीच नारियों की
बदौलत रमणी-समाज कलकित हुआ है । वह बोली-
"अरे सय ले आया तो क्या हुआ ? हाय मेरा एफला
-

५२ जुझार तेजा साँड़ अरे वही सबकी जान था । हमारे गाँव में दस- बीस कोस तक ऐसा कोई साँड़ नहीं था। उसी की बदौलत मेरी गायों में अच्छे-अच्छे बैल पैदा होते थे, और यों मैं हजारों रुपया कमाती थी। हाय अव मैं क्या करूँगी ? ले जा, तेरी गाएँ मुझे नहीं चाहिए। इतनी गाएँ। भले ही उनको वापस दे दे । बस, मेरा साँड ला दे और नहीं, पहन ले लहँगा । तैंने कुछ भी न किया । जब मेरा साँड़ ही नहीं पाया, तो औरों का आना किस काम का?" "अर माना गूजरी। मुझे मत मरवा । मैं यों ही मारा जाऊँगा। उधर वे डेढ़ सौ और इधर मैं अकेला । मेरी चिंदिया विखर जायगी और मुझे भय है कि मैं उस नाग-देवता से अपना वादा पूरा करने न पाऊँगा।" "अच्छा, तो तू डेढ सौ देखकर घबरा गया १ गूलर के फल के डेढ सौ मच्छरों से १ बड़ा बहादुर बनता था ना ? लहँगा पहन ले "है । मैं लहगा पहनें ? लहगा पहनें पनेर के मर्द । मैं मारूँगा और मरूँगा।" कहकर तेजा ने फिर समर- भूमि की ओर घोड़ी की बाग मोड़ दी । पहली बार जब तेजा गया था, तब उसे प्रतिज्ञापालन के लिये जीता लौटकर नाग देवता के दर्शन पाने की आशा १ डेढ सौ से अकेला - थी। मरना तय भी था और अब भी है, परतु तब वचन का निर्वाह करके मरनाथा, अब प्रतिज्ञा की धरोहर छाती पर लादकर मरने चला। तब शत्रु के बाणों की मार से उसका शरीर छिन्न भिन्न हो गया था, अब जीवित लौटने की आशा त्यागकर चला और ठानकर चला कि अब समराग्नि में अपने शरीर को, प्राण को, प्रतिज्ञा को और मर्वस्व को होम कर देना है । बस, यही ठानकर वह रणोन्मत्त होकर चला, और मारा-मारा घोड़ी को दौड़ाकर तेजा ने फिर उन मीनों को जा पकडा । दूर से ही वह ललकारकर बोला- "मामाजी, बैल लेकर कहाँ जाते हो? इसे तो दे जाओ। इतनी जाने खोकर भी यदि लड़ने से पेट न भरा हो, तो एक बार फिर देख लो भानजे के हाथ वस, इसके अनतर खूब ही मारा-मारी हुई । इधर मीनों के तीरों की मार से तेजा के घाव-पर-घाव लगने लगे, और उधर तेजा के तीर फिर पहले की तरह एक-एक वार से एक- एक श्रादमी को गिरा-गिराकर धगशायी करने लगे। वास्तव में घमासान युद्ध मच गया। मरनेवालों की लाशों से, घायलों के आर्तनाद से और तेजा के रक्तप्रवाह से गहरा झगडा मच गया। मासभोजी रक्तलोलुप पशु-पक्षियों की "

५४
जुमार तेजा
खूब दावतें हुई । श्रत में मीने हारकर भाग गए। एकला
साँड़ अथवा गानेवालों के शब्दों में "काने बछड़े"
को लेकर तेजा विजय की हँसी हसता वापस
गया।

. सातवाँ अध्याय प्रतिज्ञापालन मे प्रात्मबलि जिस समय माना गूजरी का "काना बछडा" ले कर, तेजा घायल शरीर से, रणोन्मत्त होकर झूमता-मामता, गिरता. पडता और फिर सँभलता शत्रुओं का दमन करता हुआ सचमुच ही गूलरफल के जीवों की तरह रणचडी के वीर मीनों की बलि चढाता पनेर के पास पहुँचा, तो पहली मुठ- भेड उसकी गूजरी माना से ही हुई । माना ने तेजा का अपने ही स्वार्थ के लिये विनाश करवाने पर भी अपना "एकल साँड" पाकर उसे धन्यवाद दिया या नहीं सो गानेवाले नहीं कहते । वे ये भी नहीं बतलाते कि "वचने का दरिद्रता" के सिद्धात से उसने तेजा से दो-चार मीठे शब्दों से उसके मन का थोड़ा-बहुत समाधान भी किया या नहीं । जब वह तेजा को मरवाने के लिये ही पैदा हुई थी, जब रणदेवी को तेजा-जैसे वीर की बलि चढ़ाना ही उसका इष्ट था, और जय गानेवाले उसे सेजा का विनाश करनेवाली देवी बतलाते हैं, तब वह तेजा को आशीर्वाद ही क्यों देने लगी। वह इस तरह के एक

जुझार तेजा
शब्द का उधारण किए बिना ही अपना "काना बछड़ा"
लेफर वापस चल दी। वह इस तरह चल दी, और तेजा ने
भी अब उसे वहाँ ठहरने न दिया। आजकल के लोगों की
तरह तेजा का उस समय भी खयाल था कि मैली-कुचैली
औरत की परछाही पड़ने से उसके घाव बिगड़ जायेंगे।
जब वह तेजा का सचमुच ही काम तमाम कर चुकी थी,
तब उसे गरज ही क्या पड़ी थी, जो अब वहाँ ठहरकर वह
तेजा की मरहम-पट्टी करने की झूठ-मूठ मनुहार करती ।
अस्तु । उमने वहाँ से चलकर तेजा के "अब तब हो
जाने की खबर उसकी ससुरालवालों को दी । जिनको तेजा
पर, न-मालूम क्यों, घृणा थी, जो उसके साथ साफ दुश्मनी
दिखला चुके थे,और जिन्होंने तेजा की जान की तिनके की तरह
बिलकुल परवा न की, वे आते तो आते ही क्यों ? वहाँ
से आई केवल तेजा की गृहिणी और उसे अपने पति के
पाम जाने से रोकने के लिये उमकी कृत्या माता । तेजा
की स्त्री पति की ऐसी दशा देखकर रोने लगी। उसने रो-
रोकर आकाश गुंजा डालने में बिलकुल कोताही नहीं
की। उमने पति के चरणों में लोटकर उसे बहतेरा
समझाया--बहुत कुछ प्राथना का, और यहाँ तक कहा कि
"गाँव में चलो, मैं तुम्हारी सेवा करूँगी, और तुम्हें अवश्य
,
.
.

प्रतिज्ञापालन में आत्मवलि
५७
आराम होगा ।"परतु तेजा ने उसकी बात पर कान नहीं
दिया । उसने साफ कह दिया-
"मैं अपना फर्तव्य पालन कर चुका । अब मुझे जीकर
ही क्या करना है ? मैं मर चुका और जय तक मैं नाग
देवता के पास पहुँचकर अपनी प्रतिज्ञा पालन न कर लूँ,
तय तक एक-एक मिनट मेरे लिये भारी है। मैं यदि उसके
निकट पहुँचने से पहले ही मर जाऊँ, तो मेरी बात में बट्टा
लग जाय । इसलिये मैं उधर जाता हूँ, और तू अपने बाप
के यहाँ जाकर मौज कर ।"
"सो मुझसे नहीं हो सकेगा । जहाँ तुम वहाँ मैं । तुम
जियोगे, तो मैं जिऊँगी और तुम
घोदल का फठ भर आया। वह न कह मकी कि "तुम मरोगे
तो मैं भी मर जाऊँगी।" हिंदुओं में भले घर की बहू-बेटियाँ
सौभाग्यवती रमणियाँ अपनी जबान से ऐसा कभी नहीं कह
सकती हैं। यदि भूल से भी उनके मुँह मे ऐसी बात निकल
जाय, तो उन्हें मरणात कष्ट होता है । अच्छा, उसका गला
भर जाने से उमने आगे नहीं कहा और नहीं कहने दिया
उसकी राक्षसी माता ने। उसने फौरन ही बेटी का गला पकड
लिया । वह बोली-
"इम निपूते के साथ तुझे मैं कभी मरने न दूंगी। यह कल
"
इतना कहते-कहते
-

जुझार तेजा
-
मरता आज ही क्यों न मर जाय । अच्छी बात है, मर जाय,
तो मै तुझे दूसरा अच्छा खसम करा दूंगी । मेरी गोरी-गोरी
बेटी के लिये एक नहीं-अनेक तैयार हैं। इस मुए से हजार
दजें अच्छे । जिनके यहाँ जाकर मेरी बेटी मौज
उडावे"
"अपनी दूसरी बेटी को खसम कराइयो अथवा तू ही
बुढापा भड़काने के लिये दूसरा खसम कर लीजियो । खसम
का नाम लेते तेरी जीभ नहीं जल जाती ? जो बेटी के लिये
ऐसी धुराई सोचती है, उस पर, भगवान् करे, बिजली पड़े ।
यह माता नहीं पूतना माता है । अपने बेटे-बेटी को दूध के बदले
जहर पिला देनेवाली माता है "
"अरे मान जा बेटी। मरे के साथ मत मर । जब
जाटों में एक मरने पर दूसरा और दूसरा मर जाने पर
तीसरा कर लेने की चाल है, और जब जाटिनी पति से कष्ट
पाकर अपने सात फेरे के खाविंद को छोड़ सकती है,
तू नाहक ही इम मुए के माथ क्यों मरती है। इसका
हाथ पकड़कर तूने सुख ही कौन-सा पाया है, जो तू मरने
चली है ?"
"अम्मा, दुस-सुख अपने नसीब का है। जो जैसा
करता है वैमा ही पाता है। मैंने जैसा किया, वैसा पा लिया।
तब
।

।
प्रतिज्ञापालन में आत्मबलि
५९
जब एक से ही सुख नहीं मिला, तो दूसरे से मिलने की क्या
आशा है ? फिर सुख भी मिले, तो किस काम का ? फूंक दे
ऐसे सुप को आग लगा दे ऐसे नए खाविंद को । मुझे
ऐसा नहीं चाहिए।"
"अरे मान जा बेटी। अपनी जननी का कहा मान
जा । मरे के माथ कोई भी नहीं मरता है । जिनमे
दूसरा खाविंद करने की चाल नहीं है, वे भी नहीं
मरती हैं।"
"यह अपना-अपना मन है । अपनी-अपनी ताकत है।
मैं मरूँगी और अपने बहादुर स्वामी के चरणों में लोटकर
जल मरूंगी।"
"अरे बावली । जो रोटियाँ सेकने में उँगली जल जाने
से रो-रोकर घर भर डालती है, उससे दहकती हुई चिता
में-ज्वाला छोड़-छोड़कर जमीन श्रासमान एक
डालनेवाली आग में कैसे जला जायगा । मान जी।
कहा मान । बेटी जिद्द मत कर । नाहक हठ करके अपनी
फजीहत न करा ।"
अपना मुँह लेकर चल दे। ऐसी भूठी
बातें करके मेरा सत मत डिगा ।मैं मरूँगी और जरूर हो
जल मरूंगी।"
कर
"बस जा
जा

६०
जुझार तेजा
यों कोरा उत्तर पाकर बोदल की माता वहाँ से चल दी,
किंतु गई तेजा को कोसती, और पेटी को गालियाँ सुनाती
हुई। मास के चले जाने के बाद तेजा ने भी अपनी स्त्री को
बहुत कुछ समझाया-बुझाया-बहुतेरा उसको बाप के
यहाँ लौटा देने का हठ किया, किंतु प्राणनाथ के चरण
पकडकर उनमें अपना मिर रख देने के सिवा, आँसुओं की
धारा प्रवाह से पति-चरणो को सिंचन कर प्राणनाथ के
अताह को शमन करने और अपने कलेजे की दहकती हुई
ज्वाला को शात करने के अतिरिक्त उसने एक शब्द भी
मुँह से नहीं निकाला। बस, इसमे तेजा ने समझ लिया कि
विवाह के बाद चौबीस वर्ष के अवसर में एक दिन के लिये
भी दापत्य सुख प्राप्त न होने पर भी बांदल का व्रत अटल है।
अब हजार मिर पटकने पर यह माननवाली नहीं । जब पति
के साथ जाने की इसने दृढ प्रतिज्ञा कर ली है, तब सचमुच
आग्रह करके इसका सत बिगाडना अच्छा नहीं। बस मेरी दृढ़
प्रतिज्ञा में इसकी दृढ प्रतिज्ञा मिल गई, इस तरह पका मनसूबा
घाँघकर दोनों वहाँ से चल दिए । पहले तेजा अकेला था, किंतु
अब यदि दोनों के अलग प्राण और अलग तन माने जायें, तो
एक और एक ग्यारह हो गए। किंतु नहीं, हिंदुओं के
सिद्धात के अनुसार "एक प्राण दो तन",
और
.
इस बात

प्रतिज्ञापालन में आत्मबलि
.
को दोनों ने थोड़ी देर के बाद सिद्ध भी कर दिसाया ।
वे दोनों मार्ग में किस तरह गए, सो कोई बतलानेवाला
नहीं है। किंतु वन-वन भटककर दोनों ने उस
सॉप की बॉबी का पता लगाया। दोनों की सयुक्त
प्रार्थना से जब नागदेव बाहर
आए, तब हाथ जोड़-
कर, धरती पर माथा टेककर और आँचल पसारकर
रोती हुई बोदल बोली-
"राजाओं के राजा, हे वासक ( वासुकि) राजा, मुझ
गरीय पर दया करके मेरे खाविंद को छोड़ दो । चौबीस
वर्ष में एक दिन के लिये, एक पल के लिये भी मैंने सुस
नहीं भोगा । एक के बदले दो-दो हत्या क्यों लेते हो ?"
"नहीं । इसमें मेरा दोष नहीं है । तेरा खाविंद सुद
मुझसे प्रण कर गया है। यदि वह अब भी कह दे कि मैंने
अपनी प्रतिज्ञा तोड़ी, तो मैं छोड़ सकता हूँ। वह यहाँ अपना
प्रण पूरा करने के लिये स्वय आया है । मैं उसे बुलाने नहीं
गया हूँ।" नाग देवता से ऐसा उत्तर पाते ही तेजा इस
वरह उछल पड़ा, जिस तरह पका फोड़ा छूने से बीमार उछल
पड़ता है । वह अवश्य "अय तव" हो रहा था, किंतु अपने
जोश को न संभाल सका । उसने पावों की पीड़ा से अत्यत
व्याकुल होने पर भी जोश में आकर पोर के साथ कहा-

जुमार तेजा
-
"नहीं, हरगिज नहीं । मैं अवश्य अपने वचनो का
बाँधा हाजिर हूँ। मैं अपने प्रण को लातों से कुचलनेवाला
नहीं हूँ। मुझसे यह कभी नहीं हो सकता कि मैं वचन चूक
जाऊँ । दुनिया में वचन चूक जाने के बराबर पाप नहीं ।
महाराज मुझे वचन-चूक बॉदी का जाया नहीं कहलाना है ।
आप सुशी से जहाँ जी में आवे डसें । मैं तैयार हूँ।"
"हॉ-हाँ । तू तैयार है, तो मैं भी तैयार हूँ । तू अपना
प्रण निर्वाह करना चाहता है, तो मुझे भी उन नहीं है, परतु
(तेजा को नरा से शिख तक निहारकर ) तुझे डरौँ भी, तो कहाँ पर
डसू । सिर से पैर तक कोई जगह भी तो खाली मिले सारा
वदन तीरों की मार से छिन्न-भिन्न हो रहा सून
है। माम निकल पड़ा है। कहीं तिल धरने की भी तो जगह
नहीं है।
"अच्छा इनके बदन में जगह नहीं है, तो बाबा बासक
(वासुकि ) मुझे डस लो। मेरा सारा शरीर खाली है, और
(पति की ओर इशारा करके) जैमे यह वैसी मैं। जिस दिन हमारा
हयलेवा हुआ, जिस दिन से हमने भाँवरी फिरी, उस दिन से
एक प्राण दो तन हुए । और, एक हो चाहे अलग-अलग
हों, तुम्हें एक की हत्या करने से गरज । बस, इनको
छोड़कर मुझे काटो । इनके मामने मर जाने ही में मेरा
में तर

प्रतिज्ञापालन में आत्मबलि
H
भला है । यह जीते रहकर सुग्व पावें, तो मैं सुस से
मरूँ।"
.
घाड़ी बोली-"अजी आप इन दोनों ही को क्यों डसते
हो ? मैं तैयार हूँ। मुझे डमो और मेरे मालिक-मालिकिन को
सुख पाने के लिये छोड़ दो । मुम-जैसी इन्हें बहुत मिल
जायेगी।"
"बम-बस | समझ लिया। तू इन दोनों को वकील बना-
कर अपने प्राण बचाने आया है। जो मरने से नहीं डरता
है, नो इन्हें क्यों लाया । बोल, अब भी जान प्यारी है, तो
मिक्षा मॉग।"
बम, नाग देवता के मुँह मे ऐसी बात निकलते ही फिर
तेजा को जोश आया। फिर वह ललकारकर कहने लगा-
"नहीं-नहीं, ऐसा हरगिज न होने दूंगा। मैं जरूर अपने
वचनों को पालूँगा । अगर मारा शरीर ही आपके डमने लायक
नहीं रहा है, तो (जीभ निकालकर ) इमे डमिए महाराज।
यह अछूत
"अच्छा, आपको एक के साथ तीन जान लेनी है, तो भले
होडसे।" इस तरह घोदल के मुख से और "मालिक मर जाय,
तो मुझे भी जीफर क्या करना है" यो घोड़ी के कहने पर
तेजा ने अपनी जीभ फैलाई, और तप नागराजने तेजा की जीभ
.

जुझार तेजा
है
.
n
"नहीं, हरगिज नहीं । मैं अवश्य अपने वचनो का
बाँधा हाज़िर हूँ। मैं अपने प्रण को लातों से कुचलनेवाला
नहीं हूँ। मुझसे यह कभी नहीं हो सकता कि मैं वचन चूक
जाऊँ । दुनिया में वचन चूक जाने के बराबर पाप नहीं।
महाराज मुझे वचन-चूक बाँदी का जाया नहीं कहलाना
आप सुशी से जहाँ जी में आवे डसें । मैं तैयार हूँ।"
"हॉ-हाँ तू तैयार है, तो मैं भी तैयार हूँ। तू अपना
प्रण निर्वाह करना चाहता है, तो मुझे भी उस नहीं है, परतु
(तेजा को नख से शिव तक निहारकर ) तुमे डसू भी, तो कहाँ पर
डसू । सिर से पैर तक कोई जगह भी तो खाली मिले सारा
घदन तीरों की मार से छिन्न-भिन्न हो रहा है । में तर
है । माम निकल पडा है । कहीं तिल धरने की भी तो जगह
नहीं है।"
"अच्छा इनके बदन में जगह नहीं है, तो बाबा बासक
(वासुकि ) मुझे डस लो। मेरा सारा शरीर खाली है, और
(पति की ओर इशारा करके) मे यह वैसी में। जिस दिन हमारा
हथलेवा हुआ, जिस दिन से हमने भाँवरी फिरी, उस दिन से
एक प्राण दो तन हुए। और, एक हो चाहे अलग-अलग
हो, तुम्हें एक की हत्या करने से गरज । बस,
इनको
छोड़कर मुझे काटो। इनके सामने मर जाने ही में मेरा
।
,
,

प्रतिज्ञापालन में आत्मबलि
भला है । यह जीते रहकर सुग्व पावें, तो मैं सुस से
मरूं।"
घाडी बोली-"श्रजी आप इन दोनों ही को क्यों डसते
हो ? मैं तैयार हूँ। मुझे डमो और मेरे मालिक-मालिकिन को
सुस पाने के लिये छोड़ दो। मुम-जैसी इन्हें बहुत मिल
जायगी।"
"बम-बम | समझ लिया। तू इन दोनों को वकील बना-
कर अपने प्राण बचाने आया है। जो मरने से नहीं डरता
है, तो इन्हें क्यों लाया । बोल, अब भी जान प्यारी है, तो
भिक्षा माग ।"
चम, नाग देवता के मुँह मे ऐसी बात निकलते ही फिर
तेजा को जोश पाया। फिर वह ललकारकर कहने लगा-
"नहीं-नहीं, ऐसा हरगिज़ न होने दूंगा। मैं जरूर अपने
वचनों को पालूंगा। अगर मारा शरीर ही आपके डमने लायक
नहीं रहा है, तो (जीभ निकालकर ) इसे डमिए महाराज
यह अछूत है।"
"अच्छा, आपको एक के साथ तीन जान लेनी हैं, तो भले
हो डसें।" इस तरह बोदल के मुख से और "मालिक मर जाय,
तो मुझे भी जीफर क्या करना है" यों घाड़ी के कहने पर
तेजाने अपनी जीभ फैलाई,औरतवनागराजलेला
-
.
.

६४
जुझार तेजा
--
,
का सून पीकर अपना कलेजा ठढा किया । इस तरह जब वह
अच्छी तरह तृप्त हो चुका, तप बोदल मे बोला-
"तुम हम तीनों के लिये-अपने, मेरे और तेजा के
लिये-एक ही चिता तैयार करो। इस बहादुर सच्चे तेजा के
माथ तू तो जलेगी ही, सात फेरे की औरत है, परंतु मैं भी
जागा। मैंने सारी लीला इमलिये की है । एक ही चिता में
तीनों के भस्म हो जाने के बाद तेजा की पूजा तेजा के नाम
से और मेरी देलवालजी के नाम से होगी । हमारे मदिर में
जो मूर्ति पधगई जायगी, उसमें । तेजा, उसके गले में मैं
और पास तू सड़ी हुई होगी । घोडी तेजा की अवश्य होनी
चाहिए, क्योंकि (घोड़ी की ओर सकेत करके) यह उसे बहुत
प्यारी थी। परतु यह भी अगर यहाँ मर मिटेगी, तो तेजा
के घर पर खबर देने कौन जायगा, और वहाँ पहुचे विना
मेरा काम सिद्ध क्योंकर होगा ?"
जय बोदल ने पूछा-"आपका काम कौन-सा ?" तो
नागराज ने उत्तर में कहा-"वही हमारी पूजा होने का ।
इसी मतलब से मैंने इसे डसा है। मतलब मेरा यही है कि
तेजा के नाम पर जो कोई आदमी या जानवर को "डसी"
बाँध देगा, उस पर सॉप के काटे का असर बिलकुल न
होगा । बस, इस तरह नाम अमर करके लोगों का सैकड़ों
1

प्रतिज्ञापालन में आत्मबलि . पीढियों तक उपकार करने के लिये-हजारों-लाखों जीवों के प्राण बचाने के लिय यह ौतुक है।" "अच्छा महाराज ' आपकी इच्छा" कह कर बोदल चुप हो गई। तब उसने पति का मस्तक अपनी गोदी में से उतार- कर एक साफ-सुथरी-सी जगह पर धरती में लिटाया । पति को लिटाने के बाद उसने हँसते-हँसते प्रसन्न होकर जगल की लकडियाँ इकट्ठी की । यों चिता तैयार की। कहीं से तलाश करके चिता में आग दी, और जव नीचे से वह अच्छी तरह जल उठी, तब पति को उस पर लिटाकर लपककर उस पर चढ नैठी। पति का मस्तक अपनी गोदी में रसकर बडी दृढता के माथ बैठ गई। उसकी ऑग्नों में आँसू की एक बूंद नहीं। मुस पर उदासी की बिलकुल मलक नहीं । बस, मुस-कमल पर मुसकिराइट,'आँसों में मीठी मीठी हँसी और जवान पर भगवान् के नाम के साथ पति के चरणों में टकटकी । जलते- जलते उसने माता-पिता को शाप अवश्य दिया "तू सुअरी हो जा और तू सोमड़ा ।" क्रोध के मारे उसकी जवान से इतना निकला, सो निकला। उसने भाई को फलने-फूलने का, अन्न-धन बढ़ने का आशीर्वाद भी दिया । किंतु थानद के माय अपने कर्तव्य-पालन से प्रमन्न होते हुए मानो भाज असड ऐश्वर्य पा लिया---इस प्रकार के हर्ष मे उसने सभी जुझार तेजा चिता के साथ पातिव्रत की अनत ज्वाला में अपना सुख, अपना सौभाग्य, अपना शरीर और अपना प्राण तक होम कर दिया । जरा-सी चिनगारी छू जाने पर जो सत्ताईस बार सी- सी करती थी, जो मरने की गाली सुनकर मारने को दौड़ती थी, उसने आज पैर जलने पर, हाथ जलने पर, शरीर जलने पर और मस्तक जल जाने पर एक बार सी तक नहीं की। लोग कहते हैं कि स्वामी की मुहब्बत स्त्री को विह्वल कर चिता में भस्म कर डालती है, परतु उसे स्वप्न में भी पति से प्यार करने का सौभाग्य प्राप्त नहीं हुआ । विवाह के दिन यदि सयोग से दपति की चार नजरें हो गई हों, तो याद नहीं । वे चार नजरें दुधमुंहे बालक-बालिका की थीं, किंतु आज के सिवा दोनों ने एक दूमरे को कभी नजर-भर देखा तक नहीं। तब प्रेम का वास्ता कैसा? किंतु जैसे तेजा ने अपने कर्तव्य की रक्षा के लिये, अपना नाम अमर कर जाने की इच्छा से, अपने प्यारे प्राणों की प्रतिज्ञादेवी को बलि चढा दी, उसी तरह बादल ने आत्म- विसर्जन कर दिया। यों दोनों शरीर छोड़ देने पर भी मरे नहीं, जीते हैं। उनका यश उसी समय चिता की ज्वाला के साथ गगन-मढल को भेदता हुश्रा स्वर्ग की अप्सराओं से गाया जाने लगा। यम, इसी का यह परिणाम है कि अनेक वर्ष बीत जाने पर भी देवताओं की तरह उनकी पूजा होती है। .

का आठवाँ अध्याय अंतिम दृश्य यो दंपति की चिता में नागराज को भस्म कर देनेवाली मालाएँ सू-सू शब्द के साथ धुआँ के हरकारों को आगे भेजकर जब आकाश से सूर्य-मंडल को भेदती हुई स्वर्ग के देवताओं द्वारा विष्णु भगवान् के चरण-कमलों में तेजा के और बोदल के कर्तव्य-पालन का तथा नागराज की कामना पैशाम पहुँचा, तब घायल घोडी ने अपने मालिक के चिर- वियोग का मरणात दुख आजीवन अपने हृदय में धारण कर माता लकमा (लक्ष्मी ) के पास यह हृदय-विदारक शोक- सवाद पहुंचाने के लिये रास्ता लिया। घोडी बेशक घायल हो चुकी थी। उसके प्राण भी अपना सदा का अड़ा छोड़कर में आ चुके थे। कदम-कदम पर "यह गिरी, वह पड़ी" की हालत में आ पहुंची थी । जब ऐसा बहादुर मालिक मर चुका था, तब उसे जीकर ही क्या करना था ? अब मरी तो मरी और घटे-भर बाद मरी तो मरी परतु यदि पैगाम पहुँचाने का कर्तव्य-पालन करने से पहले ही मर जाय, तो घोड़ी की जाति पर बट्टा लग जाय । उसका खेत ही कलक का टीका । कठ जुमार तेजा . गोली की मार से शरीर कई जगह छिद रहा है। तीर जो बदन में घुस रहे हैं, उन्हें कोई निकालनेवाला नहीं। "बस, हाय रे गजब हो गया। हाय रे बेटा मैं तो तुझे पहले ही मना करती थी।" यों कहती हुई मालिकिन मूञ्छित होकर एक तरफ, और अपने कर्तव्य से निवृत्त होकर धड़ाम से घोड़ी दूसरी तरफ गिर गई। धड़ाम-धड़ाम की दो बार आवाजे सुनकर घर के, बाहर के, मुहल्ले के, सब दौड़े हुए आए । वास्तव में पैगाम देनेवाला कोई नहीं था, परतु अटकल से उन्होंने जान लिया कि तेजा मारा गया। जब लछमा सचेत हुई, तय सूव ही रोई-झांकी, और घरवाले भी रोए, गाँववालों ने, अड़ोसी-पड़ोसियों ने उनके साथ सहानुभूति दिखलाई । विशेष लिसकर पाठकों का हृदय दुखाने से कुछ लाभ नहीं है। ऐसे समय में जो कुछ होता आया है, सब ही हुआ। गानवाले कहते हैं--"माता से घोड़ी ने सारा किस्सा कह सुनाया था ।" इस पर कोई भरोसा करे या न करे, अधिकार है। यदि उसका आदमी की तरह बोलना असभव है, यदि इसी तरह सॉप का बातचीत करना असभव है, तो तेजा को मरते-मरते जिला देनेवाले साँप के काटे को प्राण- दान करनेवाले औरयों असंभव को सभव कर दिसानेवाले चमत्कार के पासग में हैं। राजपूताने के, जो लाखों श्रादमी

।
अतिम दृश्य
.
इन चमत्कारों को सत्य मानते आए हैं, उनके लिये तो
भूमि में हजार बीज पर
पर भी विश्वास का अकुर नहीं जम सकता, मान से कि
जिन्होंने प्राणि-विद्या का अनुशीलन किया है, वे अवश्य
मानेंगे कि पशु-पक्षियों की, कीट-पतगादिकों की मी का
अच्छा, जो जैसे माने, उसे वैसे ही मानने दीजिए। पानी
के बताए हुए ठिकाने पर तेजा की तलाश करने के लिये
सहारे-सहारे तेजा की माता, उसका पिता और सगे-सायी
है ही, किंतु जिनके हृदय की असर
घोडी ने दोनों जगह इशारों से समझा दिया था।
घोड़े-घोड़ी के स्वभाव का अध्ययन करनेवाले हैं।
भापा है, और जो अभ्यास करता है, उसके लिये, असा
नहीं है, कष्टसाध्य भले ही हो ।
घायल घोडी के खुरों तथा उसके रक्त-बिंदुओं के चिह।
२
-
.
-
H
बैलगाड़ी पर सवार होकर चल दिए । घोड़ी के प्राण-पखेरू.
वहीं उड गए।
अपने मालिक-मालकिन के आत्मविसर्जन की सूचना
देने के अनतर जय घोड़ी ने अपने प्यारे प्राणों का
त्याग कर दिया, तर उसकी सो कथा ही समाप्त
गई। एमी स्वामिभक्त घोडी का यदि किसी ने
बनाया, तो क्या और न बनाया, तो उसे
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७२ जुमार तेजा जब घर में एकदम मे दो दो स्वजनों का चिर-वियोग हो गया, तब उस बेचारी की सुध लेनेवाला भी कौन ? अस्तु, तेजा के माता-पिता, वधु-बाधव, नौकर-चाकर जगल-जगल ढूंढते हुए उसी जगह जा पहुंचे, जहाँ तेजा की, उसकी अर्धा- गिनी बोदत की और साथ ही उस सर्प की राख का ढेर- चिता-भस्म में मिलकर उनका नाम शेप रह गया था । थोड़ी-सी हड़ियाँ और थोड़ी-सी आग के सिवा वहाँ कोई नाम निशान नहीं। यदि तेजा और उसकी बी का भस्मावशेप हो गया, वो हो गया, किंतु उसके शस्त्रों के सिवा ऐसी कोई चीज नहीं बची, जिसे छाती से लगाकर उसके माता-पिता अपना कलेजा ठढा कर सकें । प्रियजनों की प्यारी वस्तु का उनके चिर वियोग के अनतर दर्शन प्रियदर्शन नहीं है। उसे देसने से सुस के बदेल दुस होता है । बस, यही दशा उसके माता-पिता की हुई। "हाय तेजा। अंर प्यारे पूत । ओ चुढ़ापे की लकडी । हाय हमें मझधार में डालकर कहाँ चल दिया। हाय रे । हे भगवान् । हमें भी मौत दे दो।" कहते-कहते दोनों यहोशाचे दोनों इस तरह अचेत भी हुए, और समय पाकर उन्हें होश भी आया। उन्होंने उस जगह दंपति की अत्येष्टि-क्रिया की अथवा नहीं, दोनों की अस्थियाँ गंगाजी भेजी गई अथवा नहीं, सो कोई नहीं कह सकता .

अंतिम दृश्य किंतु जब तेजा इतना पराक्रम दिग्पलाकर, केवल सत्य के लिये अपनी बलि चढ़ाकर स्वर्ग को सिधारा था, जय उसकी अभिलापा और नागराज की आज्ञा थी, तब उस जगह चबू. तरा बनवाकर उस पर उनकी मूर्ति स्थापित की गई और इस तरह इस दुखात कथा की यहीं समाप्ति हो गई। सस्कृत-साहित्य में 'दु सात-नाटक दूपित समझा जाता है, और मैं भी उसे पसद नहीं करता हूँ। दुखात से दर्शकों अथवा पाठकों के श्रत करण पर प्रभाव पडता है सही, परंतु जिसके असर से हृदय कॉपता रहे, वह प्रभाव नहीं । भय की छाया है । और, भय, शोक और वेदना मनुष्य को कीटभृग की नाईं उसी में गिरा देती है, इसलिये दुख के अनतर सुस होना चाहिए । मैंने अभी तक जो कुछ लिसा-लिसाया है, सब केवल इसी उद्देश्य से । परतु यह नियम कल्पना के मनोराज्य में आसन पा सकता है, सत्य घटना में नहीं । और, तेजा की जो कहानी है वह सत्य घटनामूलक है । बस, इसलिये मुझे 'दु सात' लिखने की लाचारी ग्रहण करनी पड़ी । अन्तु जो कुछ होना था, सो हो गया । जव मुझे दुसात लिखना ही इष्ट नहीं हैं, तब इस पुस्तक के अतिम दृश्य को अधिक मर्म- भेदी, विशेप हृदयन्द्रावक शब्दों में दिसलाकर पाठकों जुमार तेजा चर्म-चक्षुओं से वा हृदय की आँखों से रुलाना भी अच्छा नहीं। तेजा का परलोकवास भाद्र शुक्ला १० को हुआ । इसमें किसी तरह का सदेह नहीं । राजपूताने-भर में इसी दिन तेजा- दशमी के नाम से उत्सव होता है, किंतु उसके जन्म का दिन कौन और संवत् कौन था, इस बात का पता जव राजपूताने के प्रसिद्ध इतिहासवेत्ता मुशी देवाप्रदासजी को ही नहीं लगा, तब मुझ अकिंचन को लगने की आशा क्या, हाँ। गाने- वालों के कथन से विदित हुआ है कि सवत् १ की यह घटना है। परतु यह एक किस शताब्दी का एक है, मो किसी को मालूम नहीं । इसलिये इस "एक" का मालूम होना और न होना बराबर है ।गत पृष्ठोंके पढनेसे इतना अनुमान होता है कि जिस ममय की यह घटना बतलाई जाती है,उस समय राजपू- ताने, बल्कि भारतवर्ष में भनायक अराजकता थी। किसी की जान और माल की खैर नहीं थी । यदि कोई कारण हो सकता है, तो यही जिससे तेजा को उसकी माता ने पीहर में बहू जवान हो जाने पर भी उसका मुकलावा कराने के लिये नहीं जाने दिया। मुशी देवीप्रदासजी की खोज से जब पर्वतसर (मारवाड़) में तेजाजी की मूर्ति के निकट सवत् १७६१ मिती भाद्रपद कृष्ण ६ शुक्रवार को महाराज अभय- अतिम दृश्य । । सिंहजी के राज्य में प्रधान भडारी विजयराज का मूर्ति पधराकर प्रतिष्ठा करने का उल्लेख है, तब यह तो निश्चय हो ही गया कि यह घटना सवत् १७६१ अर्थात् १८० वर्ष से पूर्व की है । कितने वर्ष पूर्व की, इस प्रश्न का उत्तर देने के लिये कुछ अटकल मे काम लेना पडेगा ।जो महाशय अपनी अट- कल पर जोर लगाकर परिणाम निकाला चाहें, वे निकाल सकते हैं । मेरे अनुमान से यह घटना उस समय की होनी चाहिए, जव राजपूत-नरेशों की शक्ति नाम शेप रह गई थी । वह समय औरगजेय के शासन के लगभग है । अरस्तु । पुस्तक को समाप्त करने से पूर्व तेजा के जन्म-स्थान का, उसकी ससुराल का और उस स्थल का जहाँ उसने आत्म- विसर्जन किया, पता लगाने की आवश्यकता है । मुशी देवी- प्रसादजी न-मालूम किस आधार पर यतलाते हैं कि तेजा सडनाल परगने नागौर राज्य जोधपुर का रहनेवाला था। किंतु गानेवाले उसकी जन्मभूमि रूपनगर राज्य किशनगढ में बतलाते हैं। मैं गानेवालों के कथन से मुशीजी की खोज को विशेष प्रामाणिक मानता हूँ, पितु एक ही बात से मुझे "सोज" पर संदेह होता है । यात यह है कि तेजा के लिये जय पनना मुशीजी पर्वतसर में स्वीकार करते हैं तय है कि राडनाल छोड़कर उमफे माता-पिता ने .

जुझार तेजा . चर्म-चक्षुओं से वा हृदय की आँखों से रुलाना भी अच्छा नहीं। तेजा का परलोकवास भाद्र शुक्ला १० को हुथा । इसमें किसी तरह का सदेह नहीं । राजपूताने-भर में इसी दिन तेजा. दशमी के नाम से उत्सव होता है, किंतु उसके जन्म का दिन कौन और सवत् कौन था, इस बात का पता जब राजपूताने के प्रसिद्ध इतिहासवेत्ता मुशी देवीप्रदासजी को ही नहीं लगा, तब मुझ अकिंचन को लगने की आशा क्या, हाँ गाने- वालों के कथन से विदित हुआ है कि सवत् १ की यह घटना है। परतु यह एक किस शताब्दी का एक है, सो किसी को मालूम नहीं । इसलिये इस "एक" का मालूम होना और न होना बराबर है ।गत पृष्ठोंके पढनेसे इतना अनुमान होता है कि जिस समय की यह घटना बतलाई जाती है,उस समय राजपू- ताने, बल्कि भारतवर्ष में भनायक अराजकता थी। किसी की जान और माल की सैर नहीं थी । यदि कोई कारण हो सकता है, तो यही जिससे तेजा को उसकी माता ने पीहर में यह जवान हो जाने पर भी उसका मुकलावा कराने के लिये नहीं जाने दिया । मुशी देवीप्रदासजी की सोज से जब पर्वतमर (मारवाड़) में तेजाजी की मूर्ति के निकट सवत् १७६१ मिती याद्रपद कृष्ण ६ शुक्रवार को महाराज अभय- - .

अतिम दृश्य सिंहजी के राज्य में प्रधान भहारी विजयराज का मूर्ति पधराकर प्रतिष्ठा करने का उल्लेख है, तब यह तो निश्चय हो हो गया कि यह घटना मवत् १७६१ अर्थात् १८० वर्ष से पूर्व की है। कितने वर्ष पूर्व की, इस प्रश्न का उत्तर देने के लिये कुछ अटकल से काम लेना पड़ेगा।जो महाशय अपनी अट- कल पर जोर लगाकर परिणाम निकाला चाहें, वे निकाल सकते हैं। मेरे अनुमान से यह घटना उस समय की होनी चाहिए, जर राजपूत-नरेशों की शक्ति-नाम शेप रह गई थी । वह समय औरगजेब के शासन के लगभग है । अस्तु । पुस्तक को समाप्त करने से पूर्व तेजा के जन्म-स्थान का, उसकी ससुराल का और उस स्थल का जहाँ उसने आत्म- विसर्जन किया, पता लगाने की आवश्यकता है । मुशी देवी- प्रसादजी न-मालूम किस आधार पर बतलाते हैं कि तेजा सडनाल परगने नागौर राज्य जोधपुर का रहनेवाला था। किंतु गानेवाले उसकी जन्मभूमि रूपनगर राज्य किशनगढ में बतलाते हैं। मैं गानेवालों के कथन मे मुशीजी की सोज को विशेष प्रामाणिक मानता हूँ, किंतु एक ही बात से मुझे “सोज" पर सदेह होता है । बात यह है कि तेजा के लिये जब स्मारक बनना मुशीनी पर्वतसर में स्वीकार करते हैं, है कि सदनाल छोड़कर समके माता-पिता ने उसका चयू- तब सभव नहीं जुझार तेजा तरा इतनी दूर पर पर्वतसर में बनाया हो । गानेवाले तेजा का घर रूपनगर में बतलाते हैं, और यहाँ से पर्वतसर दो- तीन कोस से अधिक नहीं । बस, इसलिये अधिक सभव यही है कि उसकी जन्मभूमि रूपनगर में थी। खैर, कुछ भी हो, पनेर के विपय में भी इसी तरह का मत- भेद है । मुशीजी की खोज के अनुसार गाँव पनेर किशनगढ़ राज्य में बतलाया जाता है । किंतु न तो नशे के देसने से किशनगढ राज्य में किसी पनेर नामधारी गाँव का पता लगा और न गानेवालों की बातपर ध्यान देने से । यह बात अटकल के तराजू पर तुल सकती है। यह मैं पहले ही कह चुका हूँ कि गानेवालों के मत से तेजा को रूपनगर मे गोकर्णेश्वर के निकट बनास पार करके पनेर जाना पड़ा था । राजमहल राज्य जयपुर में छावनी देवली के निकट गोकर्णेश्वर महादेव का सुप्रसिद्ध मदिर है। इस बात पर विश्वास करने से पनेर. का होना डुगारी के निकट कहीं आस-पास पाया जाता है , क्योंकि तेजाजी के मुख्य धामों में से एक डुगारी भी है। यह डुगारी वृंदी राज्य में है । मदिर में शिलालेखनहीं, इसलिये इस विपय में अधिक नहीं कहा जा सकता। हाँ, एक पनेर मेवाड़ राज्य में भी है । उसका नाम पदेर है । यह बनास नदी के किनारे जहाजपुर से पश्चिम की ओर दो-तीन कोम पर ।

अतिम दृश्य ७७ होगा । परतु इम जगह पहुँचने के लिये राजमहल के निकट बनास उतरने की आवश्यकता नहीं। मुशीजी के अनुमान मे तेजा को सॉप डसने की घटना कहीं पनेर के आस-पास की ही पाई जाती है, और -हाड़ौती के गानेवालों ने तेजा की पूजा के पर्वतसर, उक- लाना और डुगारी-ये तीन मुख्य पीठ बतलाने के सिवा किसी खास जगह का पता नहीं दिया है। मभव है कि यह जगह उकलाना हो । परतु उकलाना किस राज्य में है, सो अभी तक मालूम नहीं हो सका । रूपनगर से पनेर जाते समय गानेवालों ने तेजा के लिये जो मार्ग बतलाया है, उस पर गौर करने से निश्चय होता है कि जाती बार जिस जगह 'उसे सॉप के दर्शन हुए थे, वह बनास नदी और रूपननगर के बीच में है । साँप ने तेजा को अपने रहने का जो स्थान बत- लाया, उस जगह ऊँचे और नीचे चौरे यतलाए गए हैं। चौरे रणभूमि में काम आनेवाले वीर पुरुषों के लिये अथवा राजा तथा राजपुरुषों के लिये बनवाए जाते हैं। पता लगानेवाले उकलाने की सोज करते समय यदि जाँचना चाहें, तो इसे भी देख सकते है मुशी देवीप्रसादजी की सोज के अनुसार तेजा के आत्म- यिमन का स्थान पनेर है, और इसीलिये वहाँ तेजा फा , - जुझार तेजा , पूजन भाद्र शुक्ल १० को होता था। किंतु किशनगढ़ राज्य के हासिल (?) से कष्ट पाकर मारवाड़ के जाट और गूजर पनेर से तेजा की मूर्ति उसाड़कर पर्वतसर ले गए । वहाँ अब बड़ा भारी मेला होता है, और गाय-बैलों की बिक्री होती है। सभव है कि यह बात सत्य हो। परतु जव पर्वतसर और रूप- नगर का फासला केवल २ या ३ कोस है, तव रूपनगर से उसाड़ ले जाने और ससुराल पनेर की होने से उसके नाम को अटकल लगाई गई हो, तो कुछ आश्चर्य नहीं । अव यों तो तेजा-दशमी का मेला बड़े-बड़े गाँवों में सब जगह होता है, किंतु पर्वतसर, केकड़ी और डुगारी ये तीन स्थान मुख्य हैं । यहाँ मेले के व्याज से सूब व्यापार भी होता है । तेजा का चरित्र समाप्त करने से पूर्व अब एक ही बात शेप रह गई है। उसके चरित्र में चमत्कार भी है और उत्कृष्ट गुणों का समुदाय भी । जो चमत्कार के उपासक हैं, वे राज- पूताने के लाखों श्रादमी अपने अटल विश्वास से उसकी भाक्तिपूर्वक पूजा करके सर्प-दश के भय से मुक्त होते हैं। सर्प- दश के प्राणातकारी विप के लिये यदि राजपूताने में कोई औपध है, तो तेजाजी की डसी, और मत्र है, तो उसका नाम । खैर, जो इस प्रकार के अलौकिक चमत्कार के उपासक हैं, वे प्रसन्नता मे उसकी पूजा करके अपने-अपने स्वजनों के और ।

यातम दृश्य - ..सर्वसाधारण के प्राणों की रक्षा करें। आजकल के अविश्वाम और अश्रद्धा के जमाने में जब हैदराबाद के निजाम स्वर्गवासा महबूबअलीखाँ साहब के नाम लेने से सर्प-विष दूर हो सकता था, तब तेजस्वी तेजा के नाम से क्यों न हो । किंतु मैं चमत्कार का उपासक नहीं, गुणों का पूजक हूँ। तेजा ने अपने उत्कृष्ट चरित्र से साबित कर दिया है कि कैसे एक क्षुद्रातिशुद्र मनुष्य भी अपनी आत्मशक्ति से, अपना आत्म- विसर्जन करके अपने सर्वस्व और प्राणों की वलि चढ़ाकर मनुष्य से देवता बन सकेता है । "नर से नारायण" बनने के विशाल उद्योग का यह एक छोटा-मा नमूना है। तेजा सचमुच ही प्रतिज्ञापालन, सत्यनिष्ठा और परोरकार का आदर्श था। एक सेतिहर अपढ जाट होने पर भी क्षत्रियत्व उसके श्रत करण में ठसाठस भरा हुआ था। यदि उसके मन में पराक्रम की परिसीमा न होती, यदि उसका अत करण परोपकार-व्रत का प्रती न होता, तो वह कभी डेढ सौ आदमियों से अकेला न भिड़ पड़वा । यदि,उसे अपनी जान प्यारी होती, तो "कान यछड़े" को छुड़ा लाने के लिये दुवारा क्यों जाता ? यदि उसका शरीर और उसका श्रत करण सत्यनिष्ट न होता, तो अपनी प्रतिज्ञा पालने के लिये सॉप के पास जाकर अपने प्राणों की पूर्णाहुति ही क्यों -

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Jhungaar Teja

Author
Sharma,mehta Lajaram
Title
Jhungaar Teja
File name
Jhungaar Teja
Text
OCR done
Citation
1915
Published
2011/01
Publisher
Ganga Pushtak Mala Karyalaya Lucknow
Language
Sanskrit
Pages
94
Library
Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
Classification
Literature
DLI number
546603
Barcode
4990010025062.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
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