Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
Sukrit Kirtikllolinyadi Vastupal Prashasti Sangrah
Front matter
कल कचा निथा सी साधुचरित-प्रेष्ठिवर्य श्रीमद् डालचन्दजी सिंघी पुण्यस्मृतिनिनित प्रतिष्ठापित एवं प्रकाशित सिंधी जैन ग्रन्थ मा ला {चन आगमिक, दार्शनिक, साहित्यिक, ऐतिहासिक, वैज्ञानिक, क्यारमक-इत्यादि विविधविएयगुम्फित प्राकृत, संस्कृत, अपमंस, प्राचीनगर, राजस्थानी भादि माना मापानिबद सार्वजनीन पुरातन वाद्यय तमा नूतन संशोधनात्मक साहित्य प्रमाशिनी सर्वश्रेष्ठ जैन ग्रन्यावलि] प्रतिष्ठाता श्रीमद्-डालचन्दजी-सिंधीसत्पुय ख० दानशील -साहित्यरसिक-संस्कृतिप्रिय श्रीमद् वहादुर सिंहजी सिंघी |SHALUnaus L-AVEroup BILA 413110 PATI प्रधान सम्पादक तथा संचालक आचार्य जिन विजय मुनि अधिष्ठाता, सिंघी जैन शास्त्र शिक्षापीठ निवृत्त ऑनररि डायरेक्टर भारतीय विद्या भवन, बम्बई * ऑनररी फाउंडर-डायरेक्टर राजस्थान ओरिएण्टल रिसर्च इन्स्टीट्यूट, जोधपुर (राजस्थान) ऑनररी मेवर जर्मन ओरिएण्टल सोसाईटी, जर्मनी, भाण्डारकर ओरिएण्टल रिसर्च इन्स्टीट्यूट, पूना (दक्षिण), गुजरात साहित्यसभा, अहमदाबाद (गुजरात), विश्वेश्वरानन्द वैदिक शोध प्रतिष्ठान, होसियारपुर (पाच) इसादि । संरक्षक श्री राजेन्द्र सिंह सिंघी तथा श्री नरेन्द्र सिंह सिंघी व्यवस्थापक अधिष्ठाता, सिं घी जैन शास्त्र शिक्षा पीठ भारतीय विद्या भवन, पम्बई प्रवाशक-ज. ह. दवे, ऑनररी गरेक्टर, भारतीय विवश भवन, बम्बई, न.. मुद्रक-गुगरवन्द देवबन्द, महोदय प्रिंटींग प्रेस, भावनगर,
महामात्य - वस्तुपाल-कीर्तिकीर्तनस्वरूप
उदयप्रभाचार्यादि-अनेक कविविरचित
सुकृत की ति क ल्लो लि न्या दि
वस्तुपालप्रशस्तिसंग्रह
संपादनकर्ता
अनेकग्रन्यमाण्डागारोद्धारक-विविधदुर्लभ्यनन्यसंशोधक
जिनागमप्रकाशकारि-प्रतिष्ठानप्रवर्तक
आगमप्रभाकर-मुनिप्रवर-श्रीपुण्यविजय सूरि ।
SM
प्रकाशनकर्ता
अधिष्ठाता, सिं घी जैन शास्त्र शिक्षा पीठ
भारतीय विद्याभवन, चम्बई
रिझमाद २०११]
प्रपमाति
[सिष्टयम्द १९५६
मन्यांफ५]
सापिनर मुरक्षित
[मूल्य रु० ६/६०
७ SINGHI JAIN SERIES अद्यावधि मुद्रितग्रन्थ नामावलि , मेस्तुझाचार्यरचित प्रबन्धचिन्तामणि २३ श्रीमदमाहुआचार्यका भद्रबाहुसंहिता. मूल संस्कृत प्रन्थ. २४ जिनेवररिकृत कयाकोपप्रकरण. (प्रा.) २ पुरावनप्रवन्ध मह बहुविध ऐलियतध्यपरिपूर्ण २५ उदयाममूरिक्त धर्माभ्युदयमवाय. भने प्राचीन निबन्ध सवय. २६ जयसिंहमूरिक्त घर्मोपदेशमाला (प्रा.) ३ राजशेसरसरिरचित प्रमोश. २० कोहलविरचिन लीराबई महा. (प्रा.) जिनप्रमरिहत विविधतीयकरप. २८ जिनदयाल्यानद्यः (प्रा.) ५ मेघविजयोपाध्यायकृत देवानन्दमहाकाय, २९.३० ३१ सयंमूविरचित पउमरिठ, (यशोविजयोपाध्यायक्त जैनतर्कभाषा. भाग १.२.३ (प.) हेमचन्द्रापार्यकृत प्रमाणमीमांसा, ३२ सिद्धिचन्द्रकृत काव्यप्रकाशलण्डन, ८ मट्टाकलहुदेवत मलप्रन्यायी. ३३ दामोदरपण्डित कृत रतिव्यतिप्रकरण. ९प्रबन्धचिन्तामणि-हिन्दी भाषांतर. ३४ मिमिन द्विरकृत कुमारपालचरित्रमंप्रद. १. प्रमानन्दसूरिचित प्रभावकचरित. ३५ जिनपालोपाध्यायरचित खरतरगर इद्गविलि " सिद्धिचन्द्रोपाध्यायरचित भानुचन्द्रगणिचरित. ३६ टक्ष्योतनमरिकृत कुवलयमाला कदा. (प्रा.) १२ यशोदिजयोपाध्यायविरचित धानपिन्दुप्रकरण, ३७ गुणपालमुनिरचित अंबुपरिपं. (प्रा.) १३ हरिषेणाचार्यहत इन्कयाकोश. ३० पूर्वाचार्यविरचित जपपायर-निमितशाख. (प्रा.) १४जैनपुस्तकप्रदातिसंग्रह, प्रथम माग. ३९ भोजनृपतिरचित शुशारमतरी. (संसत कया) १५ हरिमत्रिविरचित धूर्ताख्यान. (प्राक्त) १० धनसारगणीकृत-भर्तृहरिशतकनपटीका. ४. कौटल्यकृत मर्यशास्त्र सटीक. (कतिपयअंश) १६ दुर्गदेवकृत टिप्समुइया (प्राकृत) 10 मेघविजयोपाध्यायकृत दिग्विजयमहाकाव्य. ४२ विद्यप्तिलेखसंग्रह विशतिमहालेख- विज्ञतित्रिवेणी यादि अनेक विज्ञप्तिलेख समुच्चय. 1८ कवि अब्दुल रहमानकृत सन्देशरासक. (अपभ्रंश) १३ महेनपरिकृत नर्मदासुन्दरीकभा. (प्रा.) १५ भर्तृहरित शतकयपादि सुभाषितसंग्रह. ४३ हेमचन्द्रापास्त छन्दोऽनुशासन. २० शान्त्यावार्मात न्यायावतारबार्दिक-वृत्ति. १५ वस्तुपालगुणवर्णनात्मक काम्यद्वय २. कवि धादिलरचित परमतिरीचरिट. (अप.) कीर्तिकौमुदी तथा सुकृतसंकीर्तन २२ महेश्वरधरिक्त नागपंचमीकहा. (प्रा.) ४६ सुकृतकीर्तिकोलिनी आदि वस्तुपालप्रशस्तिसंप्रह. Shri Bahadur Singh Singhi Memoirs Dr. G. H. Bühler's Life of Hemachandrācharya. Translated firom German by Dr. Manilal Patel, Ph. D. 1 स्व. बाबू श्रीवहादुरसिंहजी सिंधी स्मृतिग्रन्य [भारतीयविद्या भाग ३] सन १९४५. 2 Late Babu Shri Bahadar Singbji Singhi Memorial Volume BHARATIYA VIDYA [Volume V] A. D. 1945. 3 Literary Circle of Bahāmātya Vastupala and its Contribution to Sanskrit Literature. By Dr. Bhogilal J. Sandesara, WLA., Ph. D. (SJ.S.33.) 4-5 Stadies in Indian Literary History. Two Voludies. By Prof P.K. Gode, AI. A. (S.I.S. No. 37-38.) म संप्रति मुद्यमाणग्रन्थनामावलि ,विविधराष्टीय पशवटिसंग्रह. ५रामवन्दकविरचित-मलिकामकान्दादिनारकला २ बैनपुस्तकप्रशस्तिमप्रह, भाग १. ६ तणाभावार्यत घटावश्यकबाडावरोधवृत्ति दित मैत्रीचन्द्रवंशमवन्ध. ७ प्रद्युम्नगरिकन मूलशुदिपमण-सटीक. ८श्वलयनाला फ्या, भाग १ ४ गुणप्रभाचार्यटन विनयन (चौदान) ९ सिंहविलमूरिचित मद्रराजरहस्य. ३ जयसोमा विपया नुक्रम " " २१-२३ किंचित् प्रास्ताविक १ वस्तुपालधर्मगुरु नागेन्द्रगल्छीय श्रीउदयप्रभसूरि विरचित मुकृतकीर्ति कल्लोलिनी, पद्य सं. १७९ पृ. १-१६ २ उदपप्रमशरिकृत वस्तुपालस्तुति, पद्य संख्या ३३ १७-२० ३ मलघारगच्छीय श्रीनरचन्द्रमरिकृत वस्तुपालप्रशस्ति, पद्य सं. २६ ४ मलघारगच्छीय श्रीनरेन्द्रप्रमहरिकृत वस्तुपालप्रशस्ति, पद्य सं. १०४ २४-२९ ५ नरेन्द्रप्रभमरिरचित द्वितीय प्रशस्ति, पद्य सं. ३७ ३०-३३ ६ श्रीजयसिंहरिविरचित वस्तुपाल-तेजःपाल प्रशस्ति, पद्य सं. ७७ ३४-३९ ७ वस्तुपालस्तुतिकाव्य, पद्य सं. १३ ८ नरनारायणानन्दकाव्यप्रान्तलिखित वस्तुपालस्तुतिकाव्य, पय सं. १८, ४१-४३ ९ उपदेशतरङ्गिणीग्रन्यगत वस्तुपालस्तुतिकाव्य, पद्य १ १० गिरनारतीर्थस्य वस्तुपालप्रतिष्ठित नेमिनाथप्रासादप्रशस्ति क्रमांक १ ११ क्रमांक २ ४६-४८ १२ " १० " "४४-४६ " " "४८-५० " ५०-५३ " ५३-५५ . myrur १३ ५५-५८ " " ५९-७५ " " ७५-७६ ७६ " ७६-१ " ७६-२ १५ गिरनारतीर्थ स्थित अन्य प्रकीर्ण लेख ४ १६ अर्बुदाचलतीर्थस्य लूणवसहिकागत लेखसंग्रह १७ तारणदुर्गस्थ लेस १८ शगुंजयपाजस्थित लेख १९ अपहिलपुरस्थित शिलालेख २० अर्बुदाचलस्थित अन्यलेख २१ स्तंमतीर्थीय शिलालेख २२ गणेशरग्रामगत शिलालेख २३ नगरपामगत शिलालेस २४ यस्तुपालतीर्थयात्रा लेख २५ उदयप्रभाचार्पकत उपदेशमालाकर्णिका पृत्तिगत वस्तुपालवर्णन २६ सोमेघरकविकत सुरथोत्सवकाव्यगत वस्तुपालवंशवर्णन २७ यस्तुपालविरचित नरनारायणानन्द काव्यगत प्रशस्त्यात्मकवर्णन २८ वस्तुपालविरचित आदिनाथ स्तोत्र २९ नेमिजिनस्तर ३० अम्बिकादेवीस्तोत्र " ७६-४ " ७७ ७८-८० ८१-८७ ८८-९० " " ९१-९२ " " ९४
"
३१ महामात्य वस्तुपालकृत आराधना
३२ वस्तुपाल संपन्धित ग्रन्थान्तपुष्पिकालेख
३३ विजयसेनसरि रचित रेवंतगिरि रास
३४ पाहणपुत्रकृत आयूरास
परिशिष्ट
१ सुकृतकीर्तिकछोलिनी आदि प्रशस्ति पद्यानुक्रमणिका
२ सुकृतकीर्तिकल्लोलिनी आदि रचनागत विशेपनामानुक्रमणिका
~~
किंचित् प्रास्ताविक । । प्राचीन महागुजरातके महामात्य वस्तुपाल तेजपाल (दोनों बन्धु ) के नाम बहुविश्रुत है । इनके जीवन वृत्तान्तके विषयमें इंग्रजी, जर्मन, गुजराती एवं हिन्दीमें बहुत कुछ लिखा गया है। इन सबमें विशेष रूपसे उल्लेखयोग्य इंग्रेजी अन्य डॉ. भोगीलाल सांडेसरा, एम्. ए., पीएच्. डी. (डायरेक्टर ओरि- 1 एण्टल रीसर्च इन्स्टीटयूट, बडौदा युनिवर्सिटी) का लिखा हुआ 'लिटरेरि सर्कल ऑब महामात्य वस्तुपाल एण्ड इटस् कोन्ट्रीब्युशन टु संस्कृत लिटरेचर' (Literary circle of Mahamatya Vastupala and Its contribution to Sanskrit Literature) है, जिसमें इस विषय पर बहुत ही प्रमाणभूत एवं गंभीर अध्ययनपूर्ण विवेचन किया गया है । सिंघी जैन ग्रन्थमालाके ३३ ३ अन्धके रूपमें, कोई ९-१० वर्ष पहले हमने इसे प्रकाशित किया । इसके पूर्व ही, सन् १९४९ में, हमने इसी ग्रन्थमालाके चतुर्थ प्रत्यके रूपमें, वस्तुपालके मुख्य धर्मगुरु आचार्य उदयप्रभ सूरिका बनाया हुआ संस्कृत काव्यात्मक बडा प्रन्ध 'धर्माभ्युदय महाकाव्य' प्रकाशित किया, जिसका संपादन विद्ववर्य मुनिराज श्री पुण्यविजयजी महाराज और इनके दिवंगत गुरुवर्य श्री चतुरविजयजी मुनिमहाराजने किया है। इस 'धर्माभ्युदय महाकाव्य 'के प्रास्ताविक वक्तव्यमें, हमने वस्तुपाल मंत्रीके जीवनवृत्त और तत्कालीन इतिहास पर विशिष्ट प्रकाश डालनेवाली, तथा उस मंत्रीके समयमें विद्यमान एवम् उससे संबन्धित जिन विद्वानोंने काव्य, प्रबन्ध, प्रशस्ति, रास आदि जो रचनाए की हैं, उनका संक्षिप्त परिचयात्मक निर्देश किया था और साथमें यह भी सूचित किया था कि-हम भविष्पमें वस्तुपाल विषयक यह सब फुटकल ऐतिहासिक साहित्य, संकलित कर, एक या दो भागोंमें, प्रकट करना चाहते हैं। हमारे इस विचारको मुनिमहोदय श्री पुण्यविजयजी महाराजने भी बहुत पसन्द किया और इन्होंने स्वयं इसका संपादन कार्यभी सहर्ष स्वीकार किया। प्रस्तुत संग्रह उसी रिचारके फल स्वरूप तैयार हुआ है। इस संग्रहमें वस्तुपाल विषयक जितने भी प्रशस्त्यात्मक प्रबन्ध, शिलालेख, ग्रन्थपुष्पिकाएं एवम् रास आदि कृतियां मिल सकी, उन सबका एकत्र समावेश कर दिया गया है । आशा है कि ऐतिहासिक तथ्योंकी खोज करने वाले अम्यासिपोंके लिये यह बहुत उपयुक्त संकलन सिद्ध होगा। इस संग्रहका संपादन कार्य तो प्रायः सन् १९५० में पूरा हो गया था। इसका मुद्रण कार्य भावनगरके एक प्रेसमें कराया गया था; पर बादमें इसके सब छपे फर्मे बबईमें भारतीय विद्या भवनम · भगवा लिये गये थे। स्थान वगैरहकी ठीक सुविधा न होनेसे अनेक वर्षों तक ये फर्मे इधर उधर घूमते-फिरते रहे और फिर हमारा भी स्थानान्तरण होता रहा ।इससे, उक्त धर्माभ्युदय महाकान्यके प्रास्ताविकमें उल्लिखित कथनानुसार हम इसे शीघ्र प्रकाशित करनेमें असमर्थ रहे। पर हर्षका विषय है कि इतने वर्षोके बाद भी, अब यह संग्रह समुचित रूपसे प्रकाशमें आ रहा है। पूर्व पुरुषोंके गुणकीर्तनात्मक पुष्प कभी धासी नहीं होते । जब भी वे गुणग्राहकोंके हायोमें उपस्थित होते हैं तव शिरोधार्य ही होते हैं। इसके संपादन कार्यके विषयमें मुनिमहोदय श्री पुण्यविजयजी महाराजकै प्रति, उक्त धर्माभ्युदय काव्यके प्रास्ताविक वक्तव्यके अन्तमें, जो अपना हार्दिक कृतज्ञ भाव हमने प्रकट किया है-वही यहां पुनरुल्लिखित करना चाहते हैं कि-"इस संग्रहका संपादन करके इस अन्यमाला के प्रति अपना जो विशिष्ट ममत्व भात्र प्रदर्शित किया है और उसके द्वारा सौहार्दपूर्ण सहकार प्रदान कर मुझको जो उपकृत किया है, उस सौजन्यमूर्ति परमस्नेहास्पद मुनिवर श्री पुष्पविजपजी महाराजका मैं अत्यन्त कृतज्ञ हूं।"
२ इस संग्रह के साथ ही इसका समानविषयक एक अन्य संग्रह प्रकट हो रहा है जिसमें सोमेश्वर विरचित की ति कौमुदी तथा अरिसिंह कविकृत सुकृत संकीर्तन काव्य संकलित है। ६. संपादन कार्य भी इन्हीं मुनिवरने किया है। पहले ये दोनों संग्रह एक ही ग्रन्थके रूपमें प्रकाशित : जानेकी कल्पना रही थी, पर पीछेसे इसके साथ डॉ. म्यूहलर आदिके लिखित उन ग्रन्योंके संबन्धके । निबन्ध भी उसमें सम्मिलित करनेकी कल्पनासे उसको अब पृथक् अन्यके रूपमें प्रकट किया जा रहा है + अनेकान्तविहार, अहमदाबाद. फाल्गुनी पूर्णिमा, सं. २०१७ धा. २, मार्च, १९६१. - मुनि जिन विजय १ •आभार प्रदर्शन- प्रस्तुत यस्तुपाल प्रशस्त्यात्मक संग्रह अन्यके प्रकाशन व्ययमें भारत सरकारकी ओरसे आधा हिस्सा सहायताके रूपमें मिला है, तदर्थ हम भारत सरकारके प्रति अपना साभार कृतज्ञभाव प्रदर्शित करना चाहते हैं।
सिंघी जैन ग्रन्थमाला] [वस्तुपाल प्रशस्तिसंग्रह PERATAPHRRAORTANTRSTARRIOनम्पिकमावि माwिapहिरवासाच्याष्टीयमानहासत्पनिकमध्यम mahanmप्रियानमाविसमाhिaiमयपतनियाwfamannavaraurs दय निकायमाछानामNAMATIOमावरक- मामfar ROTEST REoftweatherapapayasusefumeanMARनिधिमmadrastra RAMAयसमावादनतिरकारसिमकादिवशनिवनविनायकादवमवग्यामि लायरीpanman RO HERक्षाhिagemhraupeqatINEERS230 RAHAMROMमोशन ਸ਼ਿੜੀ ਬੁਜs੧੩ ਣਗੇ ਜੋ ਖਸਮ roasaram varanasa antwanlodविधानवनिराकनाथ यशवधाम म्याच्या मित्रनिर्षिी मनुक्षewafमलिन निययावयक शादानमा CERamayan शामिप्रकामारकमकमसREnायकवनिनितिमविरमा COMMARREEमराममविश्मरणासनमनमानक कमायनिकम maratmaramanarteamanineupermayser कारिकामा Turalननिदायक मानि मानिraafAHIYEDRISशाबाटORIमायदेशER नाशिम-MATHA MARमशिन ARRITAMARHIनवशालकान TRESERIERAR TREAaमितिकाकि विधामायाजासामPिARमा मासिकwati ARमापन NARENTStefinकनिमोडनानाONARTtamanतिदिामामिलामा 96 AANTERVATIHARITRA ATTRARMERAruaared madamsayesentaraafanteraReadममी STRESIRTNERAakorammamTOTRAMINATANDROPRIETORSEEnमाण rirmourvaOGARMINOPHPandanाभिAMBRID ROSEROMANTIPURPERATOR awalparaPRINODERNORMAANWAR नाsaamteaमध्यान Mammomreamasometerorapenformwonaqaaburfarinewsves PrastainamastaraparmatmananewsnetwasnasTBARDASR] Daregamayantargarepreyantumkareereapmaarnama mehupamortanROSPARSHemanueसासरावामाPिRAune womrntalsofmarsampawal dowomemadeatuna Palamaaपयम Mardrea-TaareMeisertraa andalnfomaraeaderjRZANTONनिमा matatharo Toolseीयन RammanapariplazaRurarilean materiawaalathuramesemanMASHINETRaawमशि- memadefeaturtheoreparamerasacpak Palanविन medalevarkaryoantrkatanaantarvammelanetmasmomaara Taramawal DeshmutanelenoelevenatirawaentendeeartRIOmanthalipela मरन WHERE SANTMLabhannurte-minuternanamamrapan mamerandAMImamARनियम returowroaturoraptimanwraayaawarismRRESH -onmurarammameranianuarysmarANazawi306 MInferekhnaDEOnerdamouflipuran कासी myman- अहमहामाहास्थित -डेहलफलमसरतोलन्य वस्तुपालाशास्तिसंग्रह की प्रति के आयन्त पत्र
प्रथमं परिशिष्टम् ।
नागेन्द्रगच्छभूपामणिमिः श्रीमदुदयप्रभाचार्यविरचिता
-वस्तुपालान्वयप्रशस्तिरूपा-
सुकृतकीर्तिकल्लोलिनी।
पश्चजिनस्तुतिरूपं मङ्गलम्
चिन्तातीतफलपदः स दिशतु श्रेयो युगादिप्रभुभैजुर्जन्मनि यस्य कल्पतरवः सर्वेऽप्युपादानताम् ।
नेत्यं चेत् कथमन्यथा वमुमतीमस्मिन्नलकुर्वति, त्रैलोक्यैकगुरौ न गोचरममी जग्मुर्जगचक्षुपाम् ? ॥१॥
पापं पङ्कजयन् मुदं कुमुदयन् मोहं तमःस्तोमयन् , बुद्धि तोयधयन् नतिप्रणयिनां चन्द्राश्मयन् लोचनम् ।
पीयूषप्रतिमल्लनिर्मलगवीप्रक्षालितमातलस्तापत्र्यापदपास्तयेऽस्तु जगतः श्रीमान् मृगाको जिनः॥२॥
श्रीनेमिर्नवनीलनीरजरुचिः श्रेयांसि निःश्रेयसश्रीविश्रान्ततनुस्तनोतु कृतिनां सौभाग्यमङ्गीगुरुः ।
सजः कन्जलकालिमा त्रिजगतीलीलावतीनेत्रयोर्यदेद्युतिपानचिह्नवदसावद्यापि विद्योतते ॥३॥
परमपदपुरापद्वारभूतो विमूत्यै, स भवतु मवभाजा पार्श्वनाथो जिनेन्दुः ।
यदुपरि परिणाम तोरणसग्दलानां, कलयति महहेतुोगिनेतुः फणाली
छद्मोत्सेकितनोरभीरभिनमोगर्म सगर्भीकृतच्छायस्य च्छविभिः सुरस्य शिरसि स्वर्णद्युतिः शैशवे ।
वीश्यैव क्षणतः प्रदक्षिणविधिग्रहेषु वैमानिकपाग्मारेषु सुपर्वपर्वततुलां वीरः श्रयन् वः श्रिये ॥ ५॥
सरस्वत्याः स्तवनम्
पुण्यैकहेतू रसिनीरजन्मप्रमापट् रूपचितप्रभावैः ।
श्रीवर्द्धमानस्य जिनेश्वरस्य, वाचः क्रमौ वक्त्रमपि स्मरामि
लीलासचरणं च नूपुररणत्कारश्रियं च स्वयं, बोढुं साधु निपेव्यते खगकुलोत्सेन हंसेन या ।
किझल्कासनप्रसक्तमनसस्तस्यैव हेतोः करे, कुर्वाणा कमलं सतां भवतु सा ब्राझी परब्रह्मणे ॥७॥
कविस्तुतिः
जीयामुः कवयो नवोत्तमगुणग्रामामिरामश्रियः, सर्वे शास्रतरङ्गिणीपरिवृद्धोल्लासैकचन्द्रोदयाः ।
येषां कीर्तिरुदारवैमवमवत्प्रौदमयन्धावलीकल्लोला मुवनेषु पञ्चमपयोराशिश्रियं गाहते
१ मदं मुद्रित ॥२'यदयन् मुद्रिते ॥ ३ हेतुंर मुद्रिते ॥ ४ सदा म मुदिते ।
॥८॥
[ प्रथम २ श्रीउदयप्रभाचार्यविरचिता चापोत्कटवंशीयराजवर्णनम् राजा श्रीवनराज इत्यभिधया चापोत्कटः कोऽप्यभूद् ,गोत्रेण क्रियया च कश्चन बनाद्वीरः समभ्युत्थितः । सूर्येणापि जितेन यस्य महसा बाल्येऽपि दोलातरुच्छाया नाम न नामिता दिशि दिशि क्रोधारुणं धावता ॥९॥ सूर्या-चन्द्रमसौ कदाऽप्युदयतश्चेत् पश्चिमायां ततो, राज्यं स्यादिह सन्धयेति सुतया देशं समुद्राहयन् । येनास्यां दिशि वर्धमानमहसा राज्ञा च सूरेण च, प्राप्तेनाभ्युदयं महोदयपतिः पूर्णप्रतिज्ञः कृतः॥१०॥ भूषा भुवोऽणहिलपाटकनामधेया, येन न्यधायि किल गूर्जरराजधानी । यत्रोदयन्नवनवाद्भुतभोगभाग्यश्रीणां नृणां बहुतृणं त्रिदशौकसोऽपि एकाऽपि प्रमदा मदालसवपुर्यत्र प्रपापालिका, चिनाणा करकैरवेण करकं पूर्ण जलैरुज्ज्वलैः । रत्नस्तम्ममवलिजप्रतिकृतिपान्ते कृतपाजलीन् , यूनो वीक्ष्य मूदुस्मितेन तनुते लज्जाविलक्षस्थितीन् ॥१२॥ अस्मिन्नुन्नतवेश्ममौलिपु भवान् भावी सखेदः सखे !, चक्रप्रस्खलनाकुलीकृतरथस्तस्मादितो गम्यताम् । भिन्नान्तस्तमसः सुवर्णकलशाश्चैत्यालिचूलाजुपः, संज्ञां चक्रुरधीरकेतनकरैर्यत्रेति मित्रं प्रति ॥ १३ ॥ स्फूर्जद्गुर्जरमण्डलावनिवधूवक्त्रोपमेऽस्मिन् पुरे, चैत्यं किच विशेषकं व्यरचयत् पश्चासराहं नृपः । यस्योधैः कलशश्वकास्ति रुचिभिः किश्चिद्विमिन्नाम्बरश्यामत्वव्यपदेशकेशपदवीसीमन्तसीमामणिः॥१४॥ धात्रीधुरीणभुजनिर्जितभोगिराजः, श्रीयोगराज इति भूरमणस्ततोऽभूत् । यस्य प्रतापतरणिस्तरवारिमेषमूर्त्यन्तरेण नवकीर्तिजलं वर्ष ॥ १५॥ आसीदीशो दोष्मदादित्यरत्नादित्यो रत्नादित्य इत्यस्य पट्टे । तीवं तेजोवहिमहाय यस्यावर्षत् खगः शत्रुसंवर्तकाब्दः ॥ १६॥ जातः करीन्द्रो रवैरिसिंहः, श्रीवैरिसिंहस्तदिलाविलासी । यत्कीर्तिकुल्या स्तुतिकैतवेन, चिक्रीड लोकाननकाननेषु श्रीक्षेमराज इति तद् विरराज राजा, येनोद्धृतेऽपि भुवने कृश एव शेषः । विस्मृत्य नृत्यदुरगीभरगीयमानतत्कीर्तिपानरसिको रसनं सुधायाः ॥१८॥ राजा चामुण्डराजस्तद्, भूमण्डलममण्डयत् । ससर्प विश्वे यस्याऽऽज्ञा, नरेन्द्ररप्यलहिता ॥ १९ ॥ चौलुक्यवंशीयनरपतिवर्णनम् आहडस्तदजनि क्षितिनेता, यस्य याहुरिह नूतनराहुः । एककालगिलितो रिपुतेजा-कीर्तिसूर्य-शशिनौ न मुमोच ॥२०॥ नम्रारीन्दुमुखीमुखेन्दुविजयस्मेरक्रमाम्भोरुहः, श्रीभूमि वनैकभूषणमम तर्विभु भटः । यत्कीर्तिर्गगनेऽपि पुप्यनिकरः स्वर्गेऽपि दुग्धोदधिः, माखण्डेऽपि हरस्मितं विलसतिश्वप्रेऽपि चन्द्रप्रभार। पीनश्री जपन्नगोऽजनि यशोवार्धिर्जम्भे मुहुः, कम्पं खगलता ततान परितो जज्वाल तेजोऽनलः । यत्य क्षुण्णविपक्षयनितानिःश्वासबातोर्मिभिर्जेतु केतुचलाऽभ्यमदविचला चित्र जयनीरसौ ॥२२॥ स्वसीयः अयति स्म तस्य पदवीं चौलुक्यलक्ष्मीशिरोमाणिक्यं हिमयद्विजिष्णुमहिमा श्रीमूलराजो नृपः। रेले यस्य तमोरिपत्रिपुरुषप्रासादकेतुच्छलादाकाशेऽपि विकाशिकाशविशदा कीर्तिस्त्रिमार्गा नदी ॥२३॥ १ सुनया का• ॥ २ च शूरे मुद्रित ॥ ३ घेत्ये मुद्रिते ॥ ४ "त् पहाविभु० ॥
। परिशिष्टम् ] सुकृतकीर्तिकल्लोलिनी। स्वक्रान्तसिन्धुपतिलक्षसमुद्धृतश्रीकोटिर्यदीयतरवारिरवारितौजाः ।। कीर्त्याऽहसद् दिवि हरिं सुर-दैत्य-शेषक्षुब्धैकसिन्धुकलितकमसिश्रियं तम् ॥ २४ ॥ तेजःस्पार्जितदीपदीपिनि सुधाशोभैर्यशोभिः शुभे, विश्वच्छमनिवाससद्मनि वशी भूमि मुनक्ति स्म यः । शत्रुत्रीनयनोदविन्दुजतृणस्तोमेन रोमाञ्चितां, सेनाभिः परिकम्पिनी परिवृढो चोदा नवोढामिव ॥ २५ ॥ पाण्ड्यः पाखण्डिवेषं वहति नवहतिवातसम्पातभीरुः, कीरः कर्णाटवीरस्त्यजति रणभुवं व्याकुलो मालवेन्द्रः। च्य चन्न कान्तीवरचरितमसाचातुरः कस्तुरप्का, क्ष्माचक्राकान्तिभीमे प्रसरति सततं यत्प्रतापप्रभावे ॥२६॥ भेजे तेजोगगनगहने यस्य पिनस्फुलिङ्गमान्ति बालारुणमणिरुचं पाप कीर्त्यङ्गनायाम् । ईशो मासामपि दिवि दिवा किञ्च खद्योतपोतच्छायामायात् प्रतिनृपघटादुर्यशोदुर्दिनेषु युद्धोड्डामरमण्डलामदलितोद्दण्डारिमुण्डोनैतिक्रीडाखण्डितकाण्डमण्डपसुरप्रत्यक्षदोर्डम्बरः। चण्डांशुद्युतिचण्डिमा तदभवच्चामुण्डराजः क्षमाजानिर्यस्य विभात्यखण्डविभुतापाखण्डमाखण्डलः।।२८॥ रोदःझीरोदनारखिलदिगबलानव्यनिर्भूतचीरे- दिमागस्फारहारैरमरपतिपुरकोडपुप्पोपहारैः । क्षोणीचन्द्राश्मशालैरपि भुजगजगच्चन्द्रिकाचक्रवाले:, फुल्लत्काशप्रकाशस्त्रिभुवनमभितो भाति यत्कीर्तिहासः ॥२९॥ मेरुश्चेत् परिकम्पते जलपतेर्मुञ्चन्ति चेद् पीचयो, मर्यादां द्युतिमर्थमा त्यजति चेदुर्वी दिवं याति चेत् । तद्भज्येत परैरसाविति सतां सन्या मुधा यो व्यधात् , सङ्घयक्षोभविघूर्णितावनिरज.कुतेऽपि ततादृशे ३० खेलखड्गपडंहिवेल्लितभुजावलि वो वल्लभः, श्रीमान् वल्लमराज इत्यजनि तद् यचेजसा ताडितम् । शीतं स्फीतमभूत् तमश्च जगतः प्रत्यर्थिसाथै गतं,नेदं चेदिह कम्प-कालिमगुणौ कस्मादकस्मादिमौ ॥३१॥ श्वनं सिन्धुरभुमया वसुधया भूमि भटौर्दिवं, सप्तिक्षिप्तरजोभरेण पिदधे सोऽयं जगज्झम्पनः । यः श्रीमालपभूपमालफलकमस्वेदबिन्दुच्छलपत्यग्रप्रथितप्रशस्तिविकसदोर्विक्रमोपक्रम' ॥ ३२॥ तस्मान्नेत्रसुधाजनं समजनि श्रीदुर्लमो मल्लिकाफुल्लोस्कुल्लयशा विशामधिपतिर्जीमूतपूतोन्नतिः । येनोधेस्तरवारिवारितपरक्ष्मामृत्प्रतापाग्निना, विश्वाश्वासकरेण सूरमहसामन्तर्दघे मण्डलम् ॥ ३३ ॥ कैराग्भोज भेजे सततविततं यस्य कमला, प्रियारागादागादनु दनुजमेचा स्वयमसिः । यशसूननं तदनि तयोरमजकथासदर्पः कन्दर्पद्विपमपि रुपाऽधो न्यधित यः तस्माद् मस्मीकृतरिपुनृपः क्षमापतिः शौर्यसीमा, भीमः श्रीमानजनि यजनैर्यस्य नश्यत्तमोभिः । प्राप्तास्तृप्ति दिवि दिविषदो नेन्दुमास्वादयन्ते, लोकः शामिति समतनोत् कीर्तिभिर्विपलब्धः ॥ ३५॥ १स्वक्रीतसि का० ॥ २ °मुद्धत मुदिते ॥ ३ काञ्चीय मुद्रिते ॥ ४ "इतिः अस्ति । ५ पयमिदं उदयप्रभीयवस्तुपालस्तुतौ दशमपयतयाऽपि दृश्यते ।।
[ प्रथम
१
श्रीउदयप्रमाचार्यविरचिता
यत्रारिक्षत्रगोत्रक्षयकरणरणाद्वैतवैतण्डिकेऽपि,
क्षमापालाः कुद्धकालादिव निरगुरसेर्यत्प्रसादेन वेगात् ।
ताचंही नम्रदेहाः करपरिमलनैर्मानयन्तो नयन्तो,
मूर्नोऽप्यूई लघीयत्रिदशगृहगुहागर्भगुप्ताः प्रसुप्ताः ॥३६॥
सेवालन्ति पयःसमुद्रति दिशामन्तेषु मध्येनभः, सारङ्गन्ति शशाङ्कति घुमुवने दागन्ति दन्तीन्द्रति ।
पुप्पस्तोमति षट्पदन्त्यनुलताखण्डं सुधाकुण्डति, श्वभ्रान्तर्भुजगन्ति यस्य यशसि प्रत्यर्थिदुष्कीर्तयः॥३७॥
तत्कामधीरजनि जगतीकामुकः कर्णदेवः, किं वर्ण्यन्ते मुकृतसुकृता यस्य शुद्धान्तवध्वः ।।
अस्वप्नीभिर्मनुजमुदृशो बहमन्यन्त धन्यम्मन्या ध्यानव्यसनजनितस्वप्नयद्भोगभाजः ॥३८॥
कान्तं यं वीक्ष्य यान्तं प्रणयमयरूषा स्वप्नलब्धं प्रबुद्धा.
स्तबुद्धया न्यस्तहस्ता लिखितरतिपतेरञ्चले चञ्चलाक्ष्यः ।
मूलाश्चित्रशालाभुवि भवति विभु यमित्यत्रहस्त-
स्तचा हन्ति स्म मूर्तः स्वपरिभवमवन्मानभूमिमनोभूः ॥ ३९॥
कान्ते कृष्णेऽभिमते जगदवनपुषा बाहुना विग्रहेण, क्षिष्ठे सूनावनने पितरि जलपती निर्जिते सैन्यपूरैः ।
बन्धी दीपाकरे तु प्रथममपि मुखालोकममप्रभावे, लक्ष्म्यास्तेनेह तेने हरणमुरुयशोदौत्यदत्तस्पहायाः ॥४०॥
भौतिकतिजलोज्वलमन्तनि कुम्भयुगलं कलयद्भिः ।
योऽवरोधविधुरैर्मलिना रिमिः करिकुलश्च सिपेवे
अर्थव्यर्थितदुस्थदुर्विधिलिपिट्कुिम्भिकुम्मच्छिदासिंहः श्रीजयसिंहदेवनृपतिः श्रीवेश्म तस्मादभूत् ।
सायासपहतावनीधवनवस्वासिसन्तुष्टये, चक्रे यः क्रतुचक्रवालमवनीशको न शक्रश्रिये ॥ ४२ ॥
पद्मा पममपास्य पाजनितं यस्यारिकेशावलीरोलम्बप्रविरोलदालिदलं भेजे कराम्भोरुहम् ।
शेष वायुवशं विसृज्य सरलं दो गमागादसिः, कृष्णोऽपि प्रियमेलकाभिधमभूत् तचीथमेतगुजः॥४३॥
न्यस्यावश्यं शिरसि विरस कन्दतां पादमेषां, राज्यं प्राय हुतमिति रणे यः प्रतिज्ञा प्रतेने ।
एतत्पादोपरि तु परितः स्वं परिन्यस्य मौलिं, प्रीतरन्तः प्रतिनृपतिभिः प्रत्युत प्रापि लक्ष्मीः ।। ४४ ॥
बानमाजितवाजिराजिवरणशुपक्षमामण्डलमोमलोदकदम्बडम्बरपरिच्छन्नाम्बरे सारे ।
यत्कौक्षयकदण्डमण्डितरिपुश्मापालमालायतिव्यासका न परं पुरन्दरपुरीनार्यः स्वकार्यक्षमाः ॥१५॥
शोषः सैप जवान यशोजलनिघो शान्तिः प्रतापानले, शत्रणां शिरसि च्युतेऽपि हसितं नृतं करन्धेष्यपि ।
सत्यं सहरसमरस्य महिमा सोत्साहमन्त्रस्थितेयस्योधः करवाल एव स कयं सिद्धो न सिद्धाधिपः ॥४६॥
विटोजमि गते भयादनिविडोजसि स्वनिरि, तदीयदिशि यः स्फुरनिह महो-यशःक्ष्मारहौ ।
अरोपयदहो! पयःपतिनटेऽधुनाऽप्यन्वहं, ततोऽभ्युदयतो नवौ रवि-निशाधयो पलवी
रक्ष्यां रक्षितुमझमे दिरामपि श्यामे सदुःये यमे, यमृत्यैरमिमतदक्षिणककुमारीद्विषो माविभीः ।
मास्म द्वाश्महि दुःसहेरिति नताः पाराय यारोनिर्भजः सेतुमुवं ततः कपिमयाचुक्षोम रक्षोमरः ॥४८॥
१ पमिदं रदपभोरापारातुनी अरमपचलनापि वर्तते ॥ २ पथिपिने उदयप्रभीयवरगुपालनुनी।
३ नितं स्य ॥ ४ 'स्वस्तहला मुशिने ॥ ५ मिलिताडे, मुपिते ।। ६ मधिम्य दिने ।
७"पिमिः ॥
॥४७॥
1
परिशिष्टम् ]
सुकतकीर्चिकल्लोलिनी।
विधाशः पाशं निजतनुविनाशाय वरुणा, शुचा गेजे विनत्यपरहरितो यत्र विभुताम् ।
किमन्यच्चन्द्रार्काविह दिशि गतौ यस्य च यशः-प्रतापाभ्यामम्भःपतिपयसि डीनो निपततः ॥ १९॥
यस्मिन्नुचरदिग्गते बलवलचूर्णावलीमिः स्थलीभूर्व मेति नदीपतिर्दृतमय मेरोः परेणागमत् ।
तेने किञ्च निकेतनं धनपतिः कैलाशशैले सुखग्राह्यम्मन्यमना मनागपिन चामुञ्चत् तटंशूलिनः ॥५०॥
तेजोवहिहुताष्टदिग्नृपसमियज्ज्ञानयूपोपमैनेंदृक् कोऽपि पतिः क्षितेरिति दिशामू गुलीसन्निभैः ।
भालानप्रतिमैर्दिगीशकरिणां दिग्मण्डपोत्तम्मनस्तम्मस्तोमनिभैश्च यस्य विजयस्तम्भैदिगन्ता बमुः ॥५१॥
। शवं शार्ङ्गधरस्य शेग्वरमणि शूलायुधस्य द्विपं,
वज्रास्त्रस्य रदं परश्वधमृतः स्वर्लोकलीलाजये ।
कार्थितया विलुम्पतु मॅटो विश्धैकधामा यशो,
नामा[ss]यस्य हहा ! जहार तु कुतो युग्यं जरब्रह्मणः ? ॥ ५२।।
अस्य विक्रमविक्रमस्य न मुदे श्लाघा जगजाविकी,
लध्यानामपि कष्टमष्टककुभां जेताऽयमेतावती ।
'क्षोणीकम्पिनि धूतपूलिनि बले यस्याहि विश्वेश्वरः,
शेषो नाम ननाम धाम मुमुचे गानुर्नभोम्पणम्
क्रान्तशमवलो भमभोगिलोकः क्षिति जयन् । येन पर्यरदैत्येन्द्रः, पुरीपरिसरे हतः
हृष्टोऽभून्मुशलघ्वजः स्वकुशलध्यानेन जिष्णुः स्मयम्राजिष्णुर्मुदितः समुद्रशयनो रुद्रोऽपि मुद्रामुदा।
उक्षिप्ते किल पर्षरस्य शिरसि क्रूरस्य विश्वत्रयीजेतुर्येन तदा विधुन्तुदधिया भीतस्तु शीतद्युतिः॥ ५५ ॥
संजज्ञे नृपतिशतैः कृताहिसेवा, क्षमापालस्तदनु कुमारपालदेवः ।
निर्वीराविभवमुचाऽपि येन मुष्टा, निर्वीरा रिपुवसुधा नितान्तपुष्टा
सैन्यप्रकम्पितधराविधुरात्मकेपु, पोतैरलचसलिलेषु धुनीधवेषु ।
श्रीजैनचैत्यरचनेन शिलोचयेषु, यस्याजनिष्ट चरणः शरणं रिपूणाम्
यस्य सद्मनि सदा हयहेतोः, खाद्यमुद्गवलयं दलयद्भिः ।
सिच्यते मुचिरसश्चितशोकरिभिर्नयनवारिभिरेव
॥ ५८॥
दास्यवर्तिन इवाऽऽस्यसमुत्थश्वासनाशिततृणासु विपक्षाः ।
प्रातरथुसलिलेन यदीयद्वारभूमिपु रजः स्थगयन्ति
अमे हम्मीरवीरश्चिरमजिरमहीपादपः पादपद्म-
क्रीडामुन्नः कलिङ्गः सदनवदनगो मेदपाटः कपाटः।
अन्ध्रः कर्णाट-लाटौ कुरु-मरूमुरला वङ्ग-गौडा-उन-चौडाः,
क्रोडस्तम्भाः समायामिति नृपतिकुलराकुलैरावृतो यः
॥ ६० ॥
कय्यन्ते न महीमृतः कति महीयांसो महीशेखराः, माहाम्यं स्तुमहे तु हेतुनिगमादेतस्य चेतोहरम् ।
मर्यादामतिलइयन् रसलसधवाहिनीवाहितोऽणोराजः स जगाम जाङ्गलमहीमागेषु भग्नोन्नतिः।।६
१. पयमिदं उदयप्रभीयवस्तुपालस्तुती सप्तमपरत्वेनापि वर्तते ॥ २'टो निस्सीमधामा उदयप्रभीय.
वस्तुपालस्तुतौ ॥ ३ क्रीतश' का० ॥
॥
॥ ५९॥
(प्रथम
६
थीउदयप्रभाचार्यविरचिता
दर्श दर्शमसयदर्शनकचं कल्पान्तशिल्पान्तकप्रक्रीटद्रसनासनाभिमभितो यस्बगरखेला युधि ।
वित्रस्तस्य चमूचरैः सह तथा प्राविश्वरक्ष्मा मुजः,प्रस्वेदाम्बु जगाल जाङ्गलमुवोऽभवक्षनमा यथा॥२॥
क्षीणत्वं दाक्षिणात्या व्यरचय चन्मालवी वालवीक्षा-
दुःखादOणि हणी शुचमधित दधौ जाली नाबलीलाम् ।
कुजाऽऽसीत् कन्यकुब्जा शिरसि मुतभरात् कौक्षणी कङ्कणानां,
वृन्दं खेदाद् विमेदावनिमृति चलिते यात्रया यत्र जैत्रे
कोदण्डं स्वकरे कुन कुरुते सज्ज गलसगलबस्तो देति नितम्यतो न वसनं कीरोन वीरोचितः ।
युद्धक्षोणिषु दक्षिणः क्षितिपतिर्न क्षोददक्षोदयद्वाहुर्मृत्युसहस्रचक्षुषि मुहुर्यस्मिन् धनुर्धन्वति ।। ६४ ॥
जगद्धन्यम्मन्यः प्रबलजलदुर्गाऽर्जुनमडी, यदीयैरुयद्भिर्बलपरिवृद्वैः पौरुपदैः ।
हयोत्सातक्षोणीविततरजसा सिन्धुपरिखां, स्थलीकृत्य क्रीडासमिति शमितः कोकणपतिः ॥६५॥
पदं विजयसम्पदामजयपालदेवोऽखिलद्विपन्नृपतिमृत्युभूरथ वम्व भूवल्लमः ।
राज मुरराजवजगति यस्तनूडिम्बितप्रियाधयविलोचनाम्बुजसहस्रनेत्राश्चितः ॥६६
यस्मिन् पश्यति वेदमनोऽनणमुवि प्रान्तेऽपि मचद्विपे, नेशुर्नाऽऽशु नृपा व्यपापरुनयः सेनामयवीडया ।
शोकश्यामतमानिमानपि पुनः प्रेक्ष्य द्विषो नापिषद्, दग्धक्ष्मारुहखण्डखण्डनविधौ कुर्वनवज्ञामिव ६७
आजन्मत्रासहेतुथमसमदहृदः कण्टकाः कण्टकट्ठ-
द्रोणीचीकृत्त्वचोऽपि स्वल्टुपलशिलामोगमुग्नांडूयोऽपि ।
अङ्गुष्ठं नर्तयित्वा मृतपदममवन् यस्य सेनामटानां,
निःस्वानध्वानजैत्रत्वरतुरगमृतां पश्यतामप्यदृश्याः
तमहतमहं बदा बघ्या समं न समानये, यदि तदवनीनेता नेति प्रणीतरणो थिः ।
किमपि न पुनः कर्तुं मर्तुः स यस्य शशाक तन्नियतममुचत् प्राज्यं राज्यं सतामचलं वचः
॥६९॥
वीरधवलवंशवर्णनम्
मूल कीतलेताततैः समान श्रीमूलराजर्जा नृपस्तपट्टे करकेलिकन्दुककलक्ष्मांगोलको पालकः ।
यस्मै दण्डमखण्डहर्पकृतये हम्मीरम्भील्हप्रवेदप्रमवं समर्पितवती मातेव कौतुहलात् ॥ ७० ॥
सन्तापं यत्प्रतापस्य, तुरुप्कैरसहिष्णुमिः । आपादमस्तकं चक्रे, ध्रुवं वासोऽवगुण्ठनम्
रिपुमीनेवाग्भोपयरयनदीमातृकयधा, विद्यामीनो मीमः समभवदुदाउस्तदनुजः ।
अलब्यार्थिस्तोमः पुरन्पु विभकार्थिषु फलप्रदेषु प्रद्वेपं विरचयति दानकरसिकः
सलीनानामनुवटयनं तीरविश्रान्तनीरसीतुल्यानां यदरिदृशां दिक्षु रेजुर्मुखानि ।
उत्कलोलः सह बहुविधरेव रलाकरोऽयं, रात्रौ रत्लान्यतनुत बहिः सोमनामानि मन्ये
घानां धाम कुमारसालपरणीपालपसादास्पद, चौलग्यो धालानभूसुरुमतिः श्रीमीमपल्लीपतिः ।
अर्णोराजपो व्ययत्त नृपति मामेतदीयः पिता, मलैवं लवणप्रसादपवौक्ष्मामारमेप व्यवाद ।।७॥
१'गांजनमयेदी' मुदित । २ म्ययाय पुद्रिने ॥ ३ मापाल' मुद्रित । ४ पो
म्य मुपिते.
॥७३॥
-- .. -- परिशिष्टम् ] । सुकृतकीर्तिकल्लोलिनी। । ॥ यत्खंदण्डयमुनाम्मसि मेदपाट-चन्द्रावतीपुरपती त्रिदिवाय मग्नौ । चक्राम चक्रमवनेरथ पूर्णमर्णोराजस्य तस्य तनयो लवणप्रसादः ।। ७५॥ घोरारण्यविलङ्घनैरतिघनै रीणाऽप्यरीणामहो !, राजिजिविजित्वरत्वरगतिर्वित्रस्य यस्याऽऽहवे। 'स्वामात्यक्रमफर्ममर्मररवानाकर्णयन्ती गता, प्राणत्राणवनावनावपि मिया मिश्रा न विश्राम्यति ॥ ७६ ॥ कोपारिननलितास्तटस्थबलवत्फुत्कारविस्फारिता, निर्भग्नाश्चरणेन काचकुतपपाया निकाया द्विषाम् । सहुप्कीर्तिमिपद्रवन्नवमपीचक्रेण चक्रेऽम्बरं, श्यामं यस्य यशःपयोमिरमितः प्रक्षालितं निर्मलैः ॥ ७७ ॥ किं वो लवणप्रसादनृपतिः ! पाणी कृपाणच्छलं, कालं बालमहो महोमरजितादादाय सूरादपि । यो मुष्टिग्रहलालितं प्रतिपदं कोपारुणः कम्पयन् , दिग्नता रिपुमुण्डमोदकचयैरुच्चै रुचं नीतवान् ॥७८॥ नताशेषद्वेषिक्षितिपकृतपूजः प्रतिपदं, तनूजस्तस्याऽऽस्ते भुजगजगदीशघुतियशाः । अधीशो धीराणां धवलकुलधौरेयधवलः, श्रियां सौधं धीमान् धवलचरितो वीरधवलः ॥ ७९ ।। देशोऽरण्यप्रदेशो नगरमगरसा कन्दरा मन्दिराली, तूली धूलीनिवेशस्तृणमृतकबरीधानमेवोपधानम् । कापच्छायाऽनुगस्त्री प्रतिदिनमशनं कन्दमूलं दुकूलं, वल्कं दारिद्यकल्कं सचिव इति शुचिर्यविपां राज्यलक्ष्मीः ॥ ८०॥ न किं स हरितुल्यतास्तुतिपु लज्जते ? यजितैररातिनिवहेमहागिरिगुहागृहेकस्पृहः । विजित्य मृगवैरिणो निजपुरे नियुक्ताः स्वयं, गृहोपवनमूहां विरचयन्ति रक्षां किल ॥ ८१ ॥ दूरं दुर्ललितेन यस्य महसा शकेऽम्बरं त्याजिता, कीर्तिरिमहीमृतां तव मवद्वलक्ष्यकृष्णच्छविः । गूढक्ष्माधरकुअपुअसदनोत्सने तमश्छद्मना, चके नागविनाशमेव रुदतीबाप्पोपमैर्निरैः ॥ ८२ ॥ अन्तव्योग श्रयन्ती मधुरमधु विधुच्छाशुअच्छदं दि- पत्रं नक्षत्रलक्षच्छलजलकणिकं भानुमद्भापरागम् । प्रान्तध्वान्तद्विरेफवजमजरगिरिज्याजकिझल्कमेत- लीला नीलाम्बुजस्य श्रयति वियदहो ! यद्यशस्तोयराशौ ॥८३ ॥ अप्राप्ततादृशगुणां युवति नितम्यस्तम्ब-स्तनस्तवकमारमृतोऽहसन् याः। माधासु यस्य पृतनामु पुरे रिपूणां, सास्त्रासकाललसिता हसितास्तयाऽपि प्रतिदिनमपि रौद्रर्यस्य तप्तः प्रतापरिति समिति समेतः संपविष्टोऽसिदण्डे । जिगमिपुररिवर्गः स्वर्गमग्रे तडाग, हिममयमिव मेने भानुमानन्दमग्नः यस्य न्यधितचापचापलचलनाराचवीचीचयव्यस्तत्रस्तसमस्तसैनिकजनन्यालोफशोकाकुलाः । खेदस्वेदमयं पयःकणगणं भाले दधुर्मीरुषु, व्यक्तं मौक्तिकपट्टबन्धनमिव प्रत्यर्थिपृथ्वीमुजः ॥ ८६ ।। कुदे युद्धेषु यस्मिन् रिपुनृपनिकरः केशवव्योमकेश- अमादीनां पदाजैरपि मनसि पृते रक्षितो न क्षतेभ्यः । रक्षमात्मानमात्मकमकमलयुगमाप्तगप्रसादा. देताम्यो देवताभ्यः कथमिव मुक्ने नाधिकोऽभून् प्रभावैः ॥ ८७ ।। १धारा दुरित।
प्रधर्म ८ । . ॥ ९॥ धीउद्यप्रभाचार्यविरचिता यत्खनक्षतकुम्भिकुम्भविगलत्कीलालकल्लोलिनीपझिर्व्यक्तयशोमहीरहमहो ! निर्मूलयन्ती द्विषाम् । तेषामेव महोदवानलभरं शान्ति नयन्ती ययौ, मुक्तामण्डलमण्डिताऽम्बुधिमगात् तेनैव रत्नाकरः ॥८८॥ यद्दोमण्डलकुण्डलीकृतधनुःप्रोड्डीनकाण्डायलिन्यासत्रासपराः परं प्रियतमा नेशुद्विषां वक्षसः । तासामप्युरसो रसोत्तरलरादुःखातुराणामय, कन्दर्पः करकोटिकुट्टनदराद् दूरेण तूर्णं ययौ ॥ ८९ ॥ प्रत्याकारच्छलगुरुदरीनिःसृतः श्यामकान्तिः, सर्पन सर्पनियमकलयद् यस्य पाणी कृपाणः । यं व्यालोक्य प्रस्टमरयशोराशिनिर्मोकभानं, द्वेषिक्षोणीपरिवृढमहोदीपकः माप शान्तिम् । ॥९०॥ युद्धपर्वणि कदापि न दृष्ट, यस्य पृष्ठमसुहृन्निकुरुम्पैः । सप्रतिज्ञमिव वीक्षितुमुत्कैस्तैश्विरादनुचरत्वमभाजि कुण्डलप्रतिमितस्वभुजाभ्यां, यश्चतुर्भुज इव प्रतिभाति । चारुचक्रमनुबन्धि दधानो, बाणयुद्धजितकामविपक्षः ॥९२॥ यत्पदाम्बुजयुगं रणधूलीधूसरं चिकुरमार्गनिकाभिः । मार्जयन्ति विनता रिपुनार्यः, श्रीनिकेतमिव हस्तधृताभिः ॥ ९३॥ यदानप्रभवप्रमतकनकप्राग्भारसारस्फुरन्नेपथ्यप्रचयप्रकम्पितरुचः प्रेक्ष्य द्विजानां प्रियाः । विन्ध्योल्लासभयाद् घटोद्भवमुनर्योग्योऽप्युपतो न यल्लोपामुद्रिकया तिरस्कृतिगिरा तस्मादुपालभ्यते।।९४॥ यस्मिन् दाननिदानकाचनचयस्मरत्करे कर्णिकोचालस्तालदलं न वान्छति जनः माणमियापीतये। तस्मान्मूलपथेऽखिले फलगलन्मैरेयसितोल्लसत्तॄण्याभिस्तृणराज एप समभूत तथ्याभिधानस्ततः ॥९५॥ भ्रूभनिप्रतिबिम्बतोरणदलं प्रौढप्रतापैच्छलप्रौद्यद्दीपमदभ्रशुम्रयशसा लिप्तं सुधास्पार्द्धनां । पद्मासद्म विभाति वीरधवलक्षोणीशखरं पुरो, युद्धकुद्धविरोधिरोधिपरिखाविस्फारधाराजलम् ॥१६॥ उपार्जि विभुताऽद्भुता वसुमती च नीता वशं, क सम्प्रति महामतौं धृतभरे भवेयं सुखी । अनेन गदितैरिति स्फुटसभाजनैर्भाजनैः, श्रियामिति सभाजनैः शुचिविचारमूचे वचः ॥९७॥ वस्तुपालवंशवर्णनम् वंशोऽयं प्रथितोन्नतिः प्रभवति प्राग्वाट इत्याहया, पुण्यः पुण्यसुधारसेन शुचिना सोद्रेकसेकक्रियः। दिल्यामम्परलम्बिनी सुचरितप्रासादमासादयन् , कीर्ति केतनकौतुकेन तनुते यः स्वधुनीस्पर्धिनीम् ॥९८॥ अच्छिद्रो यदि तस्कृतो गुरुगुणश्चेन्निर्जलस्तत् कुतस्तेजस्वी यदि धीमतां हृदि गतश्चूडामणिश्चेत् कुतः । वंशेऽस्मिनजनिष्ट विष्टपचमत्कारीति कीर्तिप्रभाशुम्रो मौक्तिकरलवन्नवनवश्रीमण्डितश्चण्डपः ॥ ९९ ॥ चण्डप्रसाद इति तस्य सुतस्ततोऽमृद्, यकीर्तिगिर्धवलितेऽम्बरभिचिभागे। लीला ललो लिपिरयस स्थानमन्धोः, क्रीडारथः प्रकटमेकरथातशोभी ॥१००॥ समजनि जिनसेवानित्यद्देवाकवृत्तिः, प्रगुणगुणगणश्रीत्तस्य कान्ता जयश्रीः । जगति घनतमोमिः करमले मानसान्तः, किल विलसति यस्याः शुद्धहंसो विवेकः ॥ १०१ ॥ १ पदमिदं उदमप्रमीयवस्तरालस्नुतौ पटपद्यनयामि विश्ने ॥ २ जातिप्रियाः मुर्तिते ॥ ३° मुनियों को तापच्छलरमोदिते ॥ ५'तीयन नोपर्श का ॥
परिशिष्टम् ] । सुकृतकीर्तिकल्लोलिनी। - माधुर्यधुर्यमधुलोभगुणैकशोमनिष्कम्पसम्पदलिनीनलिनीवनश्रीः । सूरस्ततस्तनुभवोऽनुभवोपभुक्तमाग्यप्रमावविभवो नयर्वमूव ॥ १०२॥ स श्रीमानुदयाचलोज्वलरुचिर्भत्र्यं दधानो जने, शूरः क्रूरतमःसमुच्चयभिदाशूरः कथं वर्ण्यते ।। अन्योन्यव्यतिपङ्गसङ्गतरुचि व्योमच्छले पत्वले, तेजःकीर्तिमिपेण चक्रमिथुनं सयोजयामास यः॥१०॥ आता वातायन इव धियां तस्स निःसीमकीर्तिस्तोमः सोमः समजनि जनालोकनीयः कनीयान् । देवो देवेष्विव जिनपतिर्मानसे,मानसेफाद्, यस्यावश्यं नृपतिः पतिः सिद्धराजो रराज ॥१०॥ विश्वानन्दकरः सदा गुरुरुचिर्जीमूतपूतोन्नतिः, सोमः कोऽपि पवित्रचित्रविकसद्देवेशधर्मोन्नतिः । । चक्रे मार्गणपाणिशुक्तिकुहरे यः स्वातिवृष्टिबोर्मुक्तैमौक्तिकनिर्मलं शुचि यशो दिकामिनीभूषणम्॥१०५॥ एतस्य विकसद्धर्मारामस्याजनि वल्लभा । सीताऽऽभूतनयाऽप्येपा, न कुशीलवसन्मतिः ॥१०६॥ आशाराज इति व्यराजयदथ माखण्डमाखण्डल- क्रीडासिन्धुरपश्यतोहरयशःस्तोमेन पुत्रस्तयोः । श्रीमान् सोमसमुद्भवो निजमवेऽम्मोघौ गिरीशान् गुरून् , सेतूकृत्य तिरोदघे स्वकुलजाहकारमुप्णद्युतः ॥ १०७॥ यस्तीर्थानां प्रकरमकरोल्लोकनिर्माणकर्मालकीणो विधिरधिगतः सोऽम्बुजन्मानजन्मा । आभ्यामुच्चैस्तदपि विजितं यो विचिन्त्येति चिने, भकि धीमानकृत जननीपादयोरादरेण ॥ १०८॥ दवालोकेऽर्थिलोके सुरसुरभिरिव प्राजते यस्य वाणी, चेतोवृत्तिश्च चिन्तामणिरिव फलदः कल्पशाखीव पाणिः । स्तुत्योऽसौ कस्य न स्यादमरगिरिसमः सूर-सोमप्रसर्प- जापुजामितश्री सिनसितयशोदम्मजम्मारिकुम्भी ! ॥ १०९॥ तस्य प्रिया मुदमधत्त पिनाकपाणेर्देवी कुमारजननीव कुमारदेवी । इन्दुः सदा रिपुरजीयत पङ्कजश्रीसर्वस्वदानमुदितेन मुखेन यस्याः ॥ ११०॥ कम्तस्पाम्तसरोवरफवरला जल्यानुफारसागजश्रेणनिन्दामामिरगुतभातिक्षशिक्षचन्द्रद्युतिः। शश्वद्विश्वविनाशतत्परिमयाधःकारभागीरथी, या मुक्ताफलनिर्मलद्युतिगुणामिव्यक्तिशुक्तिर्वभौ ॥ १११ ॥ चत्तारस्तनया नयाहृतिरसाः कंसारिदोर्विक्रमा, गोदावर्य इवोज्ज्वला दुहितरः सप्त प्रसूतास्तयोः । आत्मद्वादशतां यदीयवदनैलेमे सुधादीधितिर्बद्धस्पर्द्ध इयाखिलार्कवरतोच्छेदाजगन्मोदयन् ॥ ११२ ॥ लॉवण्याङ्ग इति युतिव्यतिकरैः सत्याभिधानोऽभवत् , शके शकरकोपविनमभरादासीदनगः स्मरः । १ उत्तरार्धमिदं उदयप्रभीयवस्तुपालस्तुती साविंशतितमपोऽपि दृश्यते ॥ २'वृष्टिं मुहुः, कृत्वा मौक्तिकनि- मलं निजयशो दिक्कामिनीमण्डनम् उदयप्रभीयवस्तुपालस्तुतौ ॥ ३ चलन्म मादेते ॥ ४ यः श्रीसोम का० ।। ५पद्यमिदमुदयप्रभनाम्ना निर्दिष्टं पाठभेदेन प्राचीनलेखसंग्रह भाग २ गत४३ संख्यगिरिनारसत्कशिलालेने दश्यत । तथाहि- लावण्याङ्ग इति चुतिव्यतिकरेः सत्याभिधानोऽभवद्, भ्राता यस्य निशानिशान्तविकसचन्द्रप्रकाशाननः । शो शङ्करकोपसम्भ्रमभरादासीदनङ्गः सरः, साक्षादकमयोऽयमित्यपहतः स्वर्गागनाभिलघु ॥४॥ म -
[प्रथम
श्रीउद्यप्रभाचार्यविरचिता
।
सानं सुभगोऽयमित्यनिमिपस्त्रैण्येन बाल्ये हतः,त्यक्त्वा मूवलय सुरेन्द्रसदसि क्रीडातति निर्ममे॥११॥
मल्लदेव इति देवताधिपश्रीरमूत् तदनुभूर्विभूतिमः ।
धर्मकर्मधिषणावशो यशोराशिदासितसितद्युतिद्युतिः
॥ ११ ॥
रक्तः सद्गतिभावभाजि चरणे स्मेरास्यपरुहप्रक्रीडत्परमेष्ठिवाहनतया प्राप्तः प्रतिष्ठां पराम् ।
खेलनिर्मलभानसेन समयं कापि श्रयन् पङ्किलं, विश्वे राजति राजहंस इव यः संशुद्धपक्षद्वयः ॥११५॥
आस्ते तस्य सुधारहस्यकवितानिष्ठः कनिष्ठः कृती, बन्धुर्वन्धुरबुद्धिबोधमधुरः श्रीवस्तुपालाभिधः ।
ज्ञानाम्भोरुहकोटरे प्रमरतां सारङ्गसाम्यं यशःसोमे शौरितुलां च यस्य महिमक्षीरोदधौ खं दधौ ॥११६॥
हस्तानन्यस्तसारस्वतरसरसनप्राप्तमाहात्म्यलक्ष्मी-
स्तेजःपालस्ततोऽसौ जयति वसुभरैः पूरयन् दक्षिणाशाम् ।
यहुद्धिः कल्पितोरुद्विपगहनपरक्षोणिभृद्वृद्धिसम्प-
लोपामुद्राधिप॑श्च स्फुरति लसदिनस्फारसञ्चारहेतुः
॥ ११७॥
तदिम मौलिघु मौलिं, कुरुपे पुरुपेश ! सकलसचिवानाम् ।
क्षितिधव ! तत्तव दोप्णोविष्णोरिव भवति विश्रामः
॥ ११८॥
श्रुखेति मुदितहृदयः, पुण्यप्रागल्भ्यलभ्यसभ्यगिरम् ।
अनयोरनयोज्झितयोधरणिधर्व व्यधित धरणिधवः
॥ ११९॥
सोऽयं प्रख्यातकीर्तिः सुजनजनमनःपद्मबोधोप्णधामा,
श्रीतेजःपालनामा स्फुरति भतिलतास्थानकल्पवृक्षः ।
पाटारम्भाय लक्ष्म्या दुहितुरिव दधत् पट्टिका वर्ण्यवर्णा,
मुक्तादम्भेन गम्भीरिमगरिमगुणैर्यः पयोराशिरासीत्
॥ १२०॥
दियात्रोत्सववीरवीरधवलक्षोणीधवाध्यासितं,
प्राज्यं राज्यरथस्य भारमभितः स्कन्धे दधल्लीलया ।
भाति प्रातरि दक्षिणे समगुणे श्रीवस्तुपालः कथं
न श्लाघ्यः स्वयमश्वराजतनुजः कामं स वामस्थितिः !
॥ १२१॥
यत्कीर्तिप्रसर. परस्परपरिस्पर्दो वर्दिष्णुभिर्दूर दारितमेतदम्बरमिह अष्टं भुवो मण्डले ।
राशीमाववरिष्णुमीन-मकराधाकीर्णमर्ण-पतिव्याजादञ्जनमञ्जुलच्छवि न कैः प्रत्यक्षमुत्प्रेक्ष्यते ॥१२२॥
नीता वशं विषमवारिगुणेन बाहुस्तम्भे धृता कनकहलिकाभियोगात् ।
श्रीन सिन्धुरवधूरिव मूरिवादानप्रमोदितघनोदितमार्गणालिः
१. क्रीडां ततो नि' का ॥२ पयमिदमुक्ष्यप्रभनाम्ना प्राचीनलेससंग्रह भाग २ मध्ये ४३ तमगिरिना'
रमशिलालेशे दृश्यते । पूर्वाय च तत्र पाठभेदेन वर्तते-पतः सद्गतिमापभाजि चरणे श्रीमतवेयोऽपये,
याता परमेष्ठि०॥ ३ परमिदमुदयत्रभनाम्ना प्राचीनलेखसंग्रह भाग २ मध्ये १३ तमगिरिनारसत्कशिलालेखे
भटमपद्यतया यत्तते ॥ ४ धिपस्य स्फुर' गिरिनारशिलालेखे ॥ ५ "योध्युष्णा मुद्विते ॥ ६ कक्षपक्षा
4.॥ ७ पमिदं उदयभीयवस्तुपालस्तुती एकादरापद्यतया, प्राचीनलतराह भाग २ लेख ४३ मध्ये उदए
प्रमनाम्ना तृतीयपयतया बरतते ॥ ८धुर्य भ्रा उदयभोयवस्तुपालस्तुतौ ॥ ९ हलन्याजयोगात् प० ।
॥ १२३॥
परिशिष्टम् ] सुकृतकीर्तिकल्लोलिनी। धाग्नि स्वर्धामशैलं प्रियवचसि सुधामानने यामिनीशं, कण्ठे वैकुण्ठशङ्ख भुजशिखरयुगे जम्भभित्कुम्भिकुम्भौ । पुण्योत्पन्नस्य यस्य स्वयमसमचमत्कारिरूपस्य पाणी, प्रत्यक्षं कल्पवृक्षं जगति जनयतश्चातुरी भातु धातुः ॥ १२४ ।। लावण्यद्रवकूपरूपसुभगे निःशेपचेतस्विना- मन्तर्वासिनि वाग्वशंवदमधौ राजप्रसादोज्वले । एतस्मिन् सुमनोमनोरमगुणैर्विश्वं च विश्वत्रयं, वश्यकुर्वति सोऽपि सम्पति पदप्रष्टो मनोभूरभूत् ॥ १२५॥ अम्भोदप्रमभाजि दुर्जनजने श्यामायमानद्युतौ, तन्वाने भुवनेषु दुस्तमतमःस्तोमं कुकीर्तिच्छलात् । लब्धोच्चश्रमराममार्गणमुखख्यातश्रुतिद्वारत- स्तूर्ण मानसमानशे सुमनसा हंसोज्ज्वलैर्यद्गुणैः ।। १२६ ॥ मूलस्थूलहरित्करिस्थिरपदं शुभप्रभं भूमिभृदम्भस्तम्भमरं नमःसुरसरिद्वयाजध्वजनाजिनम् । उत्तुर जगतीतलेऽतुलयशःप्रासादमासाद्य यश्चिन्तातीतफलप्रदोऽवनिजने देवोऽस्तु सेवोन्मुखे ॥१२७|| इन्दुर्विन्दुरपां सुरेश्वरसरिड्डिण्डीरपिण्डः पति- र्भासां विद्रुमकन्दैलो विमु नभः श्रीवत्सलक्ष्मा किल । कैलास-त्रिदशेम-शम्भु-हिमवत्प्रायास्तु मुक्ताफल- स्तोमः कोमलवालुकाऽस्य च यश क्षीरोदधौ कौमुदी ॥ १२८॥ गर्नन्निर्जरकुञ्जरे मुरजति प्रौढोर्मिभिर्नृत्यति, क्षीराब्धौ कलहंसिकाकलकलैर्गमाजले गायति । श्यामाकामुकपारिपार्श्वकयुतो विश्वत्रयीसम्मदक्रीडानाटकसूत्रधारपदवीं यत्कीर्तिपूरो ययौ १२९॥ उद्भूतप्रतिभाद्भुतस्य मतिमचन्द्रस्य चिद्रूपता- माहात्म्यं स्तुमहे किमस्य निखिलमन्थाव्यिमन्थारमनः ।। दुःस्थानां प्रतिभूभृतां च विदघे भालस्थलस्थापिता, दृक्पातैर्वितथैवं येन कविता काऽपि त्रीलोकीकवेः ।।१३०॥ यत्कीर्तेः स्वैरमैरावणमदसमदान्तभृतालिगीत- स्फूर्जद्द निनादस्फुरदुरुमुरजोल्लासितायाः सितायाः । नित्यं नृतं सृजन्त्याः शिरसि मुरगिरेश्वारुचारीप्रचार- स्पष्टप्रनष्टहारावलिगलितमणिम्रान्तिमायान्ति ताराः १ मजित्कु मुदिते ॥ २ पद्यमिदमुदयप्रमनाम्ना निर्दिष्टं प्राचीनलेखसंग्रह माग २ मध्ये ४३ मंख्य- गिरिनारसस्तशिलालेखे सप्तमपयतयाऽपि वर्तते ॥ ३न्दलः किल विभुः श्रीवत्सलक्ष्मा नमा गिरिनार- शिरालेरो ॥ ४ इत आरभ्य त्रीणि पद्यानि उदयप्रभीयवस्तुपालखती रमशः १२-१३-१४ पयतया वर्तन्ते ।। ५ षष्ठस्य उदयप्रमीयवस्नुपालस्तुतौ ॥ ६°भृतीच घिदयौ मा मुद्रिते ॥ ७ व काचन लिपियन त्रिवेदीकवेः उदयप्रमीयवस्तुपालस्तुतौ ॥ ८°गीतैः स्फू मुद्रित ॥ ९ मृिदयनिभिरिव समुलासि उदयप्रमीयवस्तुपालस्वती ॥ १० नृत्य र उदयप्रभीयवस्तुपालस्तुती ।। . - - - ५ श्रीउदयप्रभाचार्यविरचिता अस्मदोत्रैक मित्र खमसि निशि शशी क्रीडया पीडयेन्नः, शके पकेरुहैः श्रीरिति गदितुमिच प्रीतियुक्ता नियुका । तत्तत्या यस्य ताम्रः कुपित इव करो दानशोभी यशोभि- मृत्यैश्चके तथेन्दं त्रिजगति स यथा लक्ष्यते नेक्षितोऽपि ॥ १३२ ।। जाता कृष्णपदात् प्रिया जलनिघेदुष्कर्मभिर्निमगा, बहेवं परिभाव्य यत् किल दधौ झम्पा पुरा वै भवे । तन्मन्येऽस्य कराग्रसम्मृतजनिर्मूत्वा गुंणश्रेयसी, कीर्तिः ख्यातिमवाप्य काऽप्यभिनवा ग यमुज्जृम्भते ॥ १३३॥ भर्तुषमयं विधाय कितवः कोऽन्येति मामुन्मना- स्तेनामुं विजये ! निवारय यतो मे नीलकण्ठः प्रियः । जल्पन्तीति सती यदीययशसा शुभ्रीते सर्वत- त्रैलोक्येऽपि पिनाकिना सशपथं प्रत्यायिता पार्वती ॥ १३४॥ क्षीराब्धिलुठति क्षितौ फणिपतिः स्फारस्फुरत्स्फूत्कृतिर्गङ्गा निम्नमुखी करोत्यलिवधूलौकै रवं कैरयम् । अन्तः सन्ततमङ्कपकमिपतश्चन्द्रोऽपि तद्रोपितम्लानिर्दानिवरस्य यस्य यशसा तूर्ण हृते वैभवे ॥१३५॥ प्रतीता नीतीनामुपरि परिपाकेन रमते, मतिर्देवे सेवा सकलकरणैकान्तकरणम् । अहो ! यस्यायश्यं शठरिपुहठमाणहरणं, रणं दीने दानं सपदि विपदेकक्षयलयः कोपाटोपपरैः परेश्चलचमूरनत्तुरङ्गक्षतक्षोणिक्षोदवशादशोपि जलधिय स्तम्भतीर्थे पुरे । स्वेदाम्भस्तटिनीघटाघटनया श्रीवस्तुपालम्फुरतेजस्तिग्मगर्भस्तितप्ततनुमिस्तैरेव सम्पूरितः ॥ १३७॥ यः प्रत्यर्थिक्षितिपतिकरिच्छेदमेदस्विशक्तिर्मुक्तागौरैरयनिवल्यं कीर्तिपूरपूरि । तं वरगन्तं युधि विधुरयामात संग्रामसिंह, निस्त्रिंशो यत्करपरिचितः कृष्णसारोऽपि चित्रम् ।। १३८ ॥ ख्यातः सङ्ग्रामसिंहो या, शहो वा सिन्धुराजमूः । संयुध्य मज्यमानोऽस्य, युद्धे सत्याभिधोऽभवत् भमः शङ्ख इति स्वदिविषदामाक्षिप्य लक्ष्मीमुख, लक्ष्मीशः किल शड्सलक्ष्मणि करे चिक्षेप चक्षुश्चलम् । कीया लप्तमवीक्ष्य शहममलं यस्य स्वयं विस्मयं, गच्छन् करमलसिन्धुराजतनुभकीया कृतार्थीकृतः असौ फीतीः स्थका मन्त्री, कामं त्रीणि जगन्त्यनु । वस्तुपालोऽरिसामन्तयणसामन्तकोऽक्षिपत् ॥११॥ पैदाभिरामहस्तेन, महस्तेन प्रतन्वता । रविणेव तमःस्तोमः, समस्तो महता हत्तः १ तापापया यस्य नाम्नः मुदते ॥ २ गुणिप्रेयसी को० ॥ ३ पद्यमिद उदयप्रमीयवस्तुपालस्तुती 'मपमपतयापि वसते ॥ ४ रने निर्मा, प्रैलो उदयप्रभीयवानुपालस्तुतौ ॥ ५ पद्यमिदमुदयप्रभनाम्ना निर्दिष्ट प्राचीन मगग्रह भाग २ मधे ४३ गायगिरिनाररात शिरसे द्वितीयपनयाऽपि दृश्यते ६ भस्तिमा मतर्नु मुदिते ॥ ७ पमिदं उदयनभीयास्तुपालस्नुनी अष्टादशपयतया वर्तते ॥ ॥ १३६ ॥ , -- -- - -- परिशिष्टम् ] सुकृतकीर्तिकल्लोलिनी। संयोजितेन मणिमण्डितशातकुम्भकुम्भत्विषा शुचिनखेन करद्वयेन । मौलिस्थितेनःजिननाथसनाथमध्यप्रासादवदिनमुखे क्षणमीक्ष्यते यः ॥ १४३ ॥ मालिन्यं मुमुचे जगत्रयशुचेरर्केन्दुमन्दाकिनीसम्पादपि यत्र दुर्दमतमःसम्बन्धबधूकृतम् । आकाशेन तदप्यमुच्यत चिरं यचीर्थयात्रारजः, स्नात्रादृश्यतदात्यनिर्मलमिलत्कीर्तिद्युतियोतिना ॥१४॥ मा भूम्मगुवनेऽपि दुस्तरतम स्तोमस्तथा मास्म मुन्नेत्रेऽपि द्युमदा सदाविकसिते सम्मीलनं मर्त्यवत् । इत्युगामिरज.समुच्छ्यमयाद् दम्भोलिपाणिर्महीमम्मोभृद्धिरसीपिचत् प्रतिदिनं यत्तीर्थयात्रोद्यमे ॥१४५|| यद्दिकुम्मि-कुलादि-कोल-कमठ-व्यालेश्वरोः खेचराः, कष्टादेव दधुस्तलं तदवनेर्विष्णुश्चतुर्भिर्भुजैः । तत् खन्नाकभुजेन वीरघपलो मुद्रागुलीलीलया, तेजापालकरस्तदेव सवलः ख्यातो बलिभ्योऽप्यसौ ॥ १४६ ॥ सोऽधिरोहनिह रैवताद्रौ, वस्त्रापथस्थानतपोधनानाम् । ददौ यदौचित्यधियाऽपि किञ्चित् , कालेन नीतं करतां तदेतैः ॥ १४७ ॥ यात्रापर्वणि रैवतक्षितिघरे प्राप्तोऽत्र मन्त्रीश्वर- स्तेजःपाल इदं निशम्य जनतोऽथाऽऽहूयतांस्तापसान् । साई द्रम्मसहस्रयुग्ममुचितं दत्त्वोत्तमर्णवजात्, तद्रामं परिमोचयन् करममु सन्त्याजयामासिवान् ॥१४८ ॥युग्मम् ॥ किश्चैतेन गुणैः शशाङ्कशुचिमिकृष्टः सुराष्ट्रापतिः, पित्रोः पुण्यकृते जिनेश्वरकरं श्रीमीमसिंहोऽमुचत् । तीरिक्षकहेतवे तु कृतिना देवादितो दापिता, सेयं पञ्चशती सुराष्ट्रपतये तस्मै पुराऽभ्यर्थनम् ।। २४९॥ वम्व गोत्रैकगुरुगरीयानेपामशेपागमपारदृश्वा । नागेन्द्रगच्छे स महेन्द्रनरिमहेन्द्र-नागेन्द्रयशा मुनीन्द्रः ॥ १५०॥ कर्मसाक्षिभवतापपीडन, क्रीडित शमरसौषपल्लवे । क्षारिताखिलमद स्म दन्तिवद्, यं त्यजन्ति खलु कश्मलालयः ॥ १५१॥ पन्या अन्यारवीना मुनिरजनि ततः कोऽपि कल्याणवल्याः, कन्दः कन्दर्पदर्पद्रुमवनदहनम्रान्तिसूः शान्तिरिः । प्रत्यप्रक्षुब्धदुग्धार्णवनवरहरीकल्पजल्पेन यस्मिन् , जल्पाके कोविदेशे मतिमकृत कृती को विदेशे न गन्तुम् ? ॥ १५२ ।। आनन्दचन्द्रा-ऽमरचन्द्रसूरी, तत्पट्टलक्ष्मीशुचिम्पणामौ । अन्तःस्फुरदलसपलभूतगुरुकमान्मोजनम्वावमूताम् १ पमिदं उदयप्रभीयबस्नुपालखनौ एकोनविदापयनयाऽपि वर्तते ॥ २ 'पु युसदा सदायिकसिते. प्यामील° उदयप्रभौयवानुपालतुनी ॥ ३ मुशर्य कामुदित च ॥ ४ प्रतिपदं य° उदयप्रभीयपस्दपाल- म्नुनौ ॥ ५ रापेश्वरा.. हाकेन भुजेन मुद्रिते ।। ७ प्राशोऽत्र मुद्रित ।
७ [ प्रथम - श्रीउदयप्रभाचार्यविरचिता दन्तौ धर्ममतगजस्य दुरितक्षोणीरहच्छेदने, गच्छव्योमतलस्य सोम-तरणी मोहान्धकारव्यये। सम्यक्त्वक्षितिपस्य दुर्दमरिपुनशे मुजौ शासना- रण्यस्थौ प्रतिवादिकुम्भिदलने यौ व्याघ्र-सिंही श्रुतौ ॥ १५४ ॥ श्रीमांस्ततोऽजनि मुनिः स तदीयपट्टश्रीपट्टबन्धमुकुटो हरिभद्रसरिः । एकत्र सोम-शतपत्रगुणौ मुखाग्रे, शश्वद्विवोधमधुरौ समवासयद् यः ॥ १५५॥ नृणां यत्पदपद्मयोर्मुवि भवत्योन्नत्यहेतुर्नतिर्भालन्यस्तरजोबजो वितनुते सर्वप्रकर्षोदयम् । आधणे च नखेन्दुदीधितिमरः पद्माकरोलासनं, स्तौमि श्रीहरिभद्रसरिसुगुरोस्तस्याद्भुतं वैभवम् ॥१५६|| जयति विजयसेनसूरिरूरीकृतसुकृतस्तदयं तदीयपट्टे । जितजगदपि मन्मथो न यस्य, व्यथित तनुप्रतिपन्थिनोऽपि तापम् ।। १५७ ॥ इन्दुः पत्रावलम्ब व्यषित कुवलये दुर्मदारमा प्रपेदे. गर्जिः पर्जन्यदन्ती व्यतनुत जगति स्तम्भमा फणीन्द्रः । चिक्षेप क्षीरसिन्धुर्दिशि विदिशि तृणैः संयुतं वारिजातं, यस्योद्दामप्रमाणे यशसि विस्मरे ते तु सन्तोऽप्यसन्तः ॥ १५८॥ यस्मादभ्युदयं भजेननु जनो धर्मस्य तस्याप्यसौ, दूराद् दूरतरं चरत्यनुदिनं संवर्धमानः श्रिया। दुर्दैवव्ययमानवैभवभरताक्षलक्ष्मीकते, तस्यैवाभिमुख हि धावति सुधाभानुर्यथा भास्वतः ॥ १५९ ॥ दोपोन्मुद्रणमुद्रितेऽपि दिवसारम्भास्मतेऽपि स्थिते, माग्याम्मोरुहि निर्विशेषितमनःसन्तोपपोपस्थितिः । अन्तः सन्ततधर्मनिर्मलमधुस्वादैकतानाशयः, साधुर्माधुकरी बिभर्ति विरलो वृति जनः कश्चन ॥ १६०॥ आयुर्वायुहतोर्मिवत् तरुणिमा घर्मिग्रमत्कम्बुवत् , कम्बुप्रस्रवदम्बुबुहुदकवल्लक्ष्मीलबोऽप्यन्वहम् । सद्यो बुहृदबिन्दुमेदकणवत् तोपोऽपि दोपादिक- माहनिधौ कुकर्मजलधौ साक्षादिव प्रेक्ष्यते ईडगूरूपगुरूपदेशविशदस्वाभाविकस्वच्छधी- स्तेजःपालनिनानुजानुचरितः श्रीवस्तुपालः कृती । शुभादप्रयशःप्रसूनसुभगधीवल्लिकन्दोपमा, धर्मस्थानपरम्परा रचयितुं धचेतमामुद्यमम् ॥ १६२॥ १ पमिदं उदयभीयवस्तुपालस्नुतौ सप्तदशपद्यतयाऽपि निरीक्ष्यते ॥ २ गर्जन् प का मुद्रिते ॥ ३ प्रहः भरे उदयप्रमीयबस्नुपारस्तुतौ n . - :- परिशिष्टम् 1 । सुकृतकीर्तिकल्लोलिनी। मजन्तीमवनीमवेक्ष्य दुरिताम्भोघौ नवं भूधर- माग्भारं रचयाञ्चकार यमसौ तीर्थेशचैत्यच्छलात् । तत्रैनःप्रतिदन्तिनाशसुभगः मेक्षामृदङ्गस्थन- गर्जन विश्वयी जयत्यनुदिनं धर्मद्विपो मतले ॥ १६३॥ स्तम्मनपुरवतगिरिदेवतचैत्ये प्रपश्चिते येन । शत्रुञ्जयजिनपुरतस्तीर्थत्रयगतिफलं कुरुतः ॥ १६४ ॥ शत्रुनये भवपयोधितरार्थतीर्थ, येनेन्द्रमण्डपमखण्डपदं व्यधायि । तस्मादुरःकरधृताद्भुतकुम्मशक्त्या, तीतमोजलमयन्ति जना जिनामे . ॥१६५ ।। अस्मिन्नाभिभुवः प्रभोस्तनुभवश्चक्री स चक्रे पुरा, चैत्यं श्रीमरतः परे तु सगरमापालमुख्या व्यधुः । देवो दाशरथिः पृथासुतपतिः प्राग्वाटभूर्जावडिः, शैलादित्यनृपः स वाग्भटमहामन्त्री च तस्योद्धृतिम् ॥ १६६ ॥ व्यातन्वन्नमरेन्द्रमण्डपमयं श्रीरैवत-स्तम्मना- लक्षारप्रभुनेमि-पार्श्वसहितं तीर्थेऽत्र शत्रुञ्जये । प्राग्वाटान्वयवार्धिवर्धनविधुर्धात्रीशमन्त्रीशिता- श्लाघ्यः सहपतिः सतां विजयते श्रीवस्तुपालोऽधुना ॥ १६७ ॥ किं चित्रं यदि यत्सवत्सलतया स्वच्छाश्ममूर्तिच्छला. दत्राऽऽखण्डलमण्डपे सुरपुरादभ्याययुः पूर्वजाः। एतस्य प्रतिपन्नसू नुपदवीभाजोऽपि येनाद्भुत- पीत्या यासमिह व्यपाद् विपिपुरं त्यक्त्वाऽपि वाग्देवता ॥ १६८॥ पृष्ठे काश्चनपट्टिकं जिनपतेरायस्य भामण्डल- श्रीतुल्यं पुरतोऽपि सत्यपुरभ्वीरावतारं मुदा । कुम्भान् पञ्च च पश्चपातकतमश्चण्डधुतीन् मण्डप, श्रीशघुञ्जयदन्तिदाननदवच्चक्रे तडागं च यः ॥ १६९ ।। . चके च यो धवलके विमलाद्रिचैत्य, पञ्चासरं च पुरि गूर्जरकर्णिकायाम् । तत्केतुकेतवकरद्वयनर्तनेन, शुनपमा नमसि नर्तयति स्म कीर्तिम् ॥ १७०॥ प्रतिष्ठाप्य च मन्त्रीशस्तीश मुनिसुव्रतम् । योऽश्वावतारतीर्थस्य, मन्दिरं विदधे कृती ॥ १७१ ॥ मामे शासनदधे च, विदधे योऽपालिते । वडाग सागराकारसमात्यः प्रपया सह ॥ १७२॥ स्यानात् पोपयशालाना, नासत्यरुचिचेष्टितः । यः पापौषधशालानां, येनि श्रीमानकारयन् ॥ १७३ ॥ १ पप उदयभीपाली शिदिनमपतयारले ॥२ यदप्ती उपप्रमीयवधानावनो। ३पी पिमाति भुयने धीपनंगधादिपः उदयप्रभोयरटरमा ।। -- [ प्रथम श्रीउदयप्रभाचार्यविरचिता येन स्तम्भनकाधिदैवतजिनप्रासादमुद्धृत्य तं, ततेने किमपि प्रपाद्वयमपि श्वेतांशुशुभप्रभम् । यत् पश्यन्ति पुरो जिनेश्वरपदानुध्यानयात्राधना, धीमन्तो निजमूर्तिकीर्तिसुकृतं चञ्चद्वया(द्धजा)डम्बरम् ॥ १७४॥ श्रीमालवेन्द्रसुमटेन सुवर्णकुम्भानुचारितान् पुनरपि क्षितिपालमन्त्री। श्रीवैद्यनाथसुरसमनि दर्भवत्यामेकोनविंशतिमपि प्रसभं व्यधत्त ॥ १७५॥ तत्रैव वीरधवलक्षितिवल्लभस्य, मूर्ति तदीयसुदृशोऽपि च जैत्रदेव्याः । स्वीयानुजस्य च निजस्य च मल्लदेवमन्त्रीश्वरस्य च चकार सम्पमन्त्री ॥ १७६ ॥ नृत्यन्त्या व्योमरने क्रमकटकझणत्कारतारं द्युगना- रङ्गच्चकालनादं सचिवकुलपतेर्वस्तुपालस्य कीर्तेः खेदप्रस्वेदबिन्दुश्रियमियमयते पद्धतिस्तारकाणां, यावत् तावत् पताकाञ्चलचलनविधि चैत्यमाला विधत्ताम् ॥ १७७॥ इमामकृत सद्गुरोविजयसेनसूरिप्रभोः, क्रमाम्बुजरजोमजा विमलमानसोल्लासभृत् । प्रशस्तिमुदयप्रभः प्रभवदद्भुतप्रातिभप्रभावभरभासुरः सुकृतकीर्तिकल्लोलिनीम् ॥ १७८॥ . ., यक्षस्य च कपर्दिनः । वस्तुपालान्वयस्यास्तु, प्रशस्तिः स्वस्तिशालिनी ॥१७९॥ ॥ समाप्ता सुकृतकीर्तिकल्लोलिनीसंज्ञकेयं प्रशस्तिः । ॥ कृतिरिय पण्डितपुण्डरीकश्रीमदुदयप्रभस्य ।। ॥ सङ्ख्या ग्रन्थाग्रं ४०० ।। शुभं भवतु ॥ ॥ लेखकपाठकयोश्च कल्याणमस्तु ।' भर १ श्रीवैद्यनाययस्येश्मनि दर्मपन्यां, यान् दुमंदी सुभटवर्मनृपो जहार । तान् पिंशति गतिमतस्तपनीयकुम्मानारोपयत् प्रमुदितो इदि पस्तुपालः ॥ ४८." नरेन्द्र प्रमीयवस्नुपानप्रशस्तौ ।
: 'द्वितीयं परिशिष्टम् नागेन्द्रगच्छमण्डनश्रीउदयप्रभसूरिविनिर्मिता वस्तुपालस्तुतिः। । , - ॥५॥ ॥ 'पीयूषादपि पेशलाः शशधरज्योत्स्नाकलापादपि, स्वच्छा नूतनचूतमञ्जरिभरादप्युल्लसत्सौरभाः। वाग्देवीमुखसामसूक्तविशदोबारादपि प्राञ्जलाः, केपां न प्रथयन्ति चेतसि मुदं श्रीवस्तुपालोक्तयः ॥१॥ चेतः केतकगर्भपत्रविशदं वाचः सुधाबन्धवः, कीर्तिः कार्तिकमासमासलशशिज्योत्स्नावदातद्युतिः । आश्चर्य क्षितिरक्षणक्षणविधौ श्रीवस्तुपालस्य यत् , कृष्णत्व चरितैरपास्तदुरितैलॊकेषु भैजे भुजः ॥२॥ श्रीवस्तुपालमन्त्रीन्दोमः किं गुणगौरवम् ? । यस्य निप्पतिमानस्य, तुलनायाः कथा वृथा ॥ ३ ॥ सूरो रणेषु चरणप्रणतेषु सोमो, वक्रोऽतिवक्रचरितेषु बुधोऽर्थबोधे।। } नीतो गुरुः कृतिजने कविरक्रियासु, मन्दोऽपि च ग्रहमयो नहि वस्तुपाल: महणधुमणपकैर्मालपट्टेषु लब्धा, विधिविहितकुवर्णश्रेणिकी याचकानाम् । विरचयति सुवर्णश्रेणिम्पाममीपां, ध्रुवमिति नववेधा वस्तुपालः सुमेधाः युद्धपर्वणि कदाऽपि न दृष्टं, यस्य पृष्ठमसुहृन्निकुरम्बै. । सप्रतिज्ञमिव यीशितुमुत्कैस्तैश्विरादनुचरत्वमभाजि शङ्ख शार्ङ्गधरस्य शेखरमणि शूलायुधस्य द्विप, वज्रास्त्रस्य रद परश्वधभृतः स्वर्लोकलीलाजये । उत्कर्षार्थितया विलुम्पतु भटो नि सीमधामा यशो, नामाऽऽयस्य हहा ! जहार तु कुतो युग्य जरब्रह्मणः ! सेलिन्ति पय समुद्रति दिशामन्तेषु मध्येनम , सारङ्गन्ति शशाकति थुविपिने दानन्ति दन्तीन्द्रति । पुष्पस्तोमति पट्पदन्त्यनुलताखण्डं सुधाकुण्डति, श्वभ्रान्तर्भुजगन्ति यस्य यशसि प्रत्यार्थिदुष्कीर्तयः ॥८॥ भर्तुर्वेपमय विधाय कितवः कोऽप्येति मामुन्मना- स्तेनासु विजये ! निवारय यतो मे नीलकण्ठ प्रियः । २ पचमिद धर्माभ्युदयदशमसर्गप्रान्ते, प्रवन्धकोशगतवस्नुपालप्रवन्धे षट्षष्टितम च एव स्तुत केनापि कविना" इत्लुलेसेन निर्दिष्ट वर्नते ॥ २ पद्यमिद प्रबन्धकोशे वस्तुपालप्रबन्धे अष्टापभाशत्तमं “कश्चित्" इत्युलेखेनो- विखित वर्तते ॥ ३ पमिद मुकृतकीर्तिकलोलिन्या ९१ तमम् ॥ ४ पयमिदं मुक्तकीर्तिकलोलिन्यां ५२ तमम् ।। ५ 'टो विश्वैकघामा मुकतवोतिकोलिन्याम् ॥ ६ पयभिद मुकृतकीर्तिकलोलिन्या ३७ तमम् ॥ ७ भुवने सुस्तकीर्तिकलोलिन्याम् ॥ ८ परामिद मुकतकोतिकहोलिन्या १३४ तमम् ।। - - .
१८
[द्वितीय
॥ १२ ॥
श्रीउदयप्रभाचार्यविरचिता
जल्पन्तीति सती यदीययशसा शुग्रीकृते निर्भरं,
त्रैलोक्येऽपि पिनाकिना सशपथं प्रत्यायिता पार्वती
कराम्भोज भेजे सततविततं यस्य कमला,
प्रियारागादागादनु दनुजमेचा स्वयमसिः।
यशःसू नुनूनं तदजनि तयोरमजकथा-
सदर्पः कन्दर्पद्विपमपि रुपाऽधो व्यधित यः
दिग्यात्रोत्सववीरवीरधवलक्षोणीधवाध्यासितं,
प्राज्यं राज्यरथस्य भारमभितः स्कन्धे दधल्लीलया ।
धुर्य प्रातरि दक्षिणे समगुणे श्रीवस्तुपालः कथं,
न श्लाघ्यः स्वयमश्वराजतनुजः कामं स वामस्थितिः ? ॥ ११ ॥
गॅजेन्निर्जरकुञ्जरे मुरजति प्रौढोर्मिभिर्नृत्यति,
क्षीराब्धौ कलहंसिकाकलकलैगङ्गाजले गायति ।
श्यामाकामुकपारिपार्श्वकयुतो विश्वत्रयीसम्मद-
क्रीडानाटकसूत्रधारपदवीं यत्कीर्तिपूरो ययौ
उद्भूतप्रतिभाद्भुतस्य मतिमर्चण्डस्य चिद्रूपता-
माहात्म्यं स्तुमहे किमस्य निखिलग्रन्थाब्धिमन्यात्मनः ।।
दुःस्थाना प्रतिमूभृतां च विदधे भालस्थलस्थापिता,
हक्पातैर्वितथैवं काचन लिपिर्येन त्रिवेदीकवेः
यत्कीर्तेः स्वैरभैरावणमदसमदम्रान्तमृनालिगीत-
स्फूर्जद मृदङ्गध्वनिभिरिव समुल्लासितायाः सितायाः ।
नित्यं नृत्यं सृजन्त्याः शिरसि सुरगिरेश्वारुचारीप्रचार-
स्पष्टप्रप्रष्टहारावलिगलितमणिप्रान्तिमायान्ति ताराः
यैर्नद्धाऽतिचलाऽवलाऽपि कमला गम्भीरिमाधैर्गुणै-
स्तैरेपाऽपि न नहते किमु हदैः कीर्जिगजानिकी ।
सञ्चिन्त्येति यथा यथा गमयति प्रौहिं परा यो गुणा-
नुद्दामैव तथा तथाऽभि[स]रति स्वैरं दिगन्तानसौ
'श्रीवामाम्बुजमाननं परिणतं पञ्चाङ्गलिच्छद्मतो,
जग्मुर्दक्षिणपञ्चशाखमयता पचापि देवद्रुमाः।
१ ते मर्वतनलों मुकृतकोतिरिन्या ॥ २ पमिदं मुकृतकोतिलोलिन्या ३४ तमम् ॥३पद्यमिदं मुक्तकी
सिंकलोलिन्या १०तमम् , तपा उदयमनाम्नैव निर्दिष्टं प्राचीनलेरामंग्रह भाग २ लेस ४३ मध्ये तृतीयम् ॥४मातिभ्रा
मुहतकीसिंघमाशिन्या प्राचीनलेससाद भाग २ च १५६त भारम्य त्रीणि पदानि मुकृतकोतियोलिन्या क्रमश १२५
१३०-11तमानि ॥ ६ पन्द्रस्य मुक्नोतियोलिन्यां ॥ ७ व येन कविता कापित्रिलोकीकः मुक्तकी
सिहोलिन्यो । जानिनादरपुरदुरमुरजोल्लासि मुलकीर्तिटोलिन्या॥९नृत्यं समुस्तकीसिकाोलिन्यो ।
१० परमिदं धर्मायुश्यगतमसान्त प्ररन्धकोगवस्तुगलबन्धे यष्टितम न"इनानु" इत्युदेवेनोलिसितं यत्तते ।
॥ १३ ॥
॥ १४ ॥
॥१५॥
। -- - परिशिष्टम् ]. वस्तुपालस्तुतिः । वान्छापूरणकारणं प्रणयिनां जिहैव चिन्तामणि-।। । र्जाता यस्य किमस्य शस्यमपरं श्रीवस्तुपालस्य यत् ! इन्दुः पत्रावलम्ब व्यधित कुवलये दुर्मदात्मा प्रपेदे, गर्जि पर्जन्यदन्ती व्यतनुत जगति स्तम्भभावं फणीन्द्रः । चिक्षेप क्षीरसिन्धुर्दिशि विदिशि तृणैः संयुतं वारिजातं, यस्योद्दामप्रमाणे यशसि प्रैसमरे ते तु सन्तोऽप्यसन्तः ॥१७॥ पद्माभिरामहस्तेन, महस्तेन वितन्वता । रविणेब तमःस्तोमः, समस्तो महता हतः ॥१८॥ मा भन्मद्भुवनेऽपि दुस्तमतमःस्तोमस्तथा मास्म मुन्नेत्रेयुं घुसदा सदाविकसितेप्चामीलनं मर्त्यवत् । इत्युद्गामिरजःसमुच्छ्यमाद्दम्भोलिपाणिर्महीमम्भोमृद्भिरसीपिचत् प्रतिपदं यत्तीर्थयात्रोत्सवे ॥ १९ ॥ अन्तः कजलमजुलथि यदिदं शीतयुतेर्योतते, तन्मूढाः कवयन्ति लक्ष्म न वयं सूक्ष्मेक्षिकाकाहिणः । ययात्रोत्सवमद्भुतं रचयता श्रीवस्तुपाल ! त्वया, शीतांशौ लिसितं स्वनाम तदिदं प्रत्यक्षमुवीक्ष्यते ॥२०॥ मैजन्तीमवनीमवेक्ष्य दुरिताम्मोधौ नवं भूधरप्राग्भारं रचयाञ्चकार यंदसौ तीर्थेशचैत्यच्छलात् । तत्रैनःप्रतिदन्तिनाशसुभगः प्रेक्षामृदनस्वनैनर्जन् विश्वजयी विमाति भुवने श्रीधर्मगन्धद्विपः ॥२१॥ श्रीवस्तुपाल ! कलिकालविलक्षणस्त्वं, संलक्ष्यसे जगति चित्रचरित्रपात्रम् । यद्दानसौरमवता भवता वितेने, नानेकपेन मदमेदुरिता सुखश्रीः ॥ २२ ॥ देश्यः कस्यापि नायं प्रथयति न परप्रार्थनादैन्यमन्य- स्तुच्छामिच्छां विधते तनुहृदयतया कोऽपि निप्पुण्यपण्यः । इत्थं कल्पद्रुमेऽस्मिन् व्यसनपरवशं लोकमालोक्य सृष्टः, स्पष्टं श्रीवस्तुपालः कथमपि विधिना नूतनः कल्पवृक्षः ॥ २३ ॥ "श्रीवस्तुपालसचिवस्य परे कवीन्द्राः, कामं यशांसि कवयन्तु वयं तु नैव येनेन्द्रमण्डपकृतोऽस्य यश.प्रशस्तिरस्त्येव शक्रहृदि शैलशिलाविशाले ॥२४॥ शके शारदपर्वगर्वितशशिज्योत्स्नासपलं तव, त्रैलोक्ये गुणजालकं विलसति श्रीवस्तुपालाद्भुतम् । यचादादपाशवैशसकृतातकाभिशङ्काः स्फुटं, नैवान्यस्य भवन्ति कीर्तिवरलाः खेलासु हेलास्पदम् ॥ २५॥ आशाम्यो नवपुष्पपेशलयशःसौरभ्यसम्भावनासंहूतैः सततं पतद्भिरमितो सभार्थिभिः सेवितः । रगत्पत्रपवित्रया घनलसत्पुण्यामृतैः सिक्तया, लिष्टः श्रीलतया महीरुह इव श्रीवस्तुपालः यमौ ॥२६॥ १ तत् धर्माभ्युदयमहाकाव्ये ॥ २ पद्यमिदं मुक्तकीर्तिकहोलिन्या १५८ तमम् ॥ ३ विर सुकृतकीर्ति- कहोलिन्याम् ॥ ४ पद्यमिदं मुकृतीसिकहोलिन्या १४२ तमम् ॥ ५ पयमिदं मुकृतबीतिकडोलिन्यो १४५ तमम् ।। ६ऽपि घुसदा सदाविकसिते सम्मील' मुक्तकीर्तिकलोलिन्याम् ॥ ७ प्रतिदिन य मुस्तकीर्ति- होलिन्याम् ॥ ८ पयमिदं धर्माभ्युदयाष्टमसर्गान्ते वर्तते ॥ ९ पद्यमिदं मुल्लकीर्तिकलोलिन्यां ११३ वमम् ॥ १० यमसो मुस्वकीर्तिकहोलिन्याम् ॥ ११ योजयत्यनुदिनं धर्मतिपो भूतले मुक्तकीर्तिममोलिन्याम् ॥ १२ पपमिदं धर्माभ्युदयमहाकाव्यवादशसर्गान्त पिरते ॥ १३ पयमिदं धर्माभ्युदयमहाकाव्यपशमसर्गान्ते वर्तते ॥
श्रीउदयप्रभाचार्यविरचिता [द्वितीयं परिशिष्टम् नेत्राणाममृताञ्जनं कथमिव श्रीवस्तुपालाकृती, सोऽयं नास्तु घनोदयः परिलसट्टवारिधर्मस्थितिः ।। चक्रे मार्गणपाणिशुक्तिकुहरे यः स्वातिवृष्टिं मुहुः, कृत्वा मौक्तिकनिर्मलं निजयशो दिकामिनीमण्डनम् श्रीवस्तुपाल | क्षितिपालमुद्रां, भूमण्डलान्तः कति नैव दोषस्य दुष्टप्रभवस्य मन्त्रिन् ।, प्रभुभवानेव तु निग्रहाय ॥२८॥ या प्रार्थना याचकवक्त्रवासादासादयद् दुर्भगतामतीव । दानाय सैवार्थिषु वस्तुपाल , स्थिता तवाऽऽस्ये सुभगीबभूव ॥२९॥ अत्यद्भुता सचिवपुगव वस्तुपाल 1, कौतस्कुती स्फुरति धर्मकला तवेयम् ।। यत् कर्हि चिद् विमुखतामुपनीय पृष्टा, पीठामि (नि?) पश्यसि न मार्गणमण्डलस्य ॥३०॥ त्रिजगति यशसस्ते तस्य विस्तारभाजः, कथमिव महिमानं ब्रूमहे वस्तुपाल!। सपदि यदनुभावस्फारितस्फीवमूर्तिर्विधुरगिलदराति राहुमाहुस्तमकम् ॥३१॥ बाणे गीर्वाणगोष्ठी भजति भगवति ब्रह्मभूयं प्रपन्ने, व्यासे विद्यानिवासे कलयति च कला कैशकी कालिदासे । माघे मोघां मघोनः सफलयति देशं योऽद्य वाग्देवतायाः, सोऽयं धात्रा धरित्या निवसनसदर्न प्रस्तुतो वस्तुपाल: ॥ ३२ ॥ वर्षीयान् परिलप्तदर्शनपथः प्राप्त. परं तानवं, रोहन्मोहतया तया हतपरिस्पन्दोऽतिमन्दोद्यमः । श्रीमन्त्रीश्वर वस्तुपाल ! भवतो हस्तावलम्ब चिराद्, धर्मः प्राप्य मही विहर्तुमधुना धत्ते पुनः पाटवम् ॥ ३३॥ ॥ इति नागेन्द्रगच्छीयश्रीउदयप्रभसूरिकृता वस्तुपालस्तुतिः ।। १ पयस्यास्योत्तरार्धमिदं मुस्तकीर्ति कोटिन्या १०५ तमलोके ॥ २ 'वृष्टिनर्मुक्कमौक्तिकनिर्मल शुचि यशो दिशामिनीमपणम् मुस्तकीतिकालिन्याम् ॥ ३ पद्यमिद धर्माभ्युदयचतुर्यसर्गप्रान्ते वर्तते । ४ पयमिदं पुण्तनप्रबन्धप्रहगतवस्नुपलपरन्ये २४८ तमं सोमेश्वरदेवोलितयोल्लिखितं वसते ॥ ५ मयपति पुरातनप्रबन्धसंग्रहे ॥ ६ शव का पुरातनप्रबन्धमहे ॥ ७ दृशं चाय पुरातनप्रबन्भमहे ॥ ८ पथ- मि धर्माभ्युदयमहाकाव्यप्रथमसर्मप्रान्ते ।
तृतीयं परिशिष्टम् मलधारिश्रीनरचन्द्रसूरिसूत्रिता वस्तुपालप्रशस्तिः। । । ॥ - - ॥ U -- ॥ स वः श्रेयः शत्रुञ्जयशिखरशीकमुकुटः, प्रदोषान्तध्यान्तव्यतिकरनिकाराम्बरमणिः ।। भवान्तिश्रान्तिव्यपनयनदीप्णामृतसर सनाभिः श्रीनाभिनमवजिननाथः 'प्रथयतु . श्रीप्राग्वाटकुलेऽत्र चण्डपसुताचण्डप्रसादादभूत, पुत्रः मोम इति प्रसिद्धमहिमा तस्याश्वराजोजजः।। तस्माल्लूणिग-मल्लदेवसचिवौ श्रीवस्तुपालस्तथा, तेजःपाल इति श्रुतास्तनुभुवश्चत्वार एतेऽभवन् ॥२॥ चेतः किं कलिकाल ! सालसमहो । किं मोह ! नो हस्यते , तृप्णे । कृष्णमुखाऽसि किं ? कथय किं विघ्नौष । मोघो भवान् । ब्रूमः किं नु सखे । न खेलति किमप्यस्माकमुज्जृम्भितं, सैन्यं यत् किल वस्तुपालकृतिना धर्मस्य संवर्मितम् ॥३॥ दैर्गः स्वर्गगिरिः स कल्पतरुभिर्भेजे न चक्षुप्पथे, तस्थौ कामगयी जगाम जलघेरन्तः स चिन्तामणिः । कालेऽस्मिन्नवलोक्य याचकचमू तिष्ठेत कोऽन्यस्ततः, स्तुत्यः सोऽस्तु न वस्तुपालसुकृती दानकवीरः कथम् ? स श्रीजिनाधिपतिधर्मधराधुरीणः, लाय्यास्पदं कथमिवास्तु न वस्तुपालः ।। श्री-शारदा-सुकृतकीर्तिमयत्रिवेण्याः, पुण्यः परिस्फुरति जङ्गमसनमो यः स्वच्छन्दं हरिशङ्करः स भगवान् यत्कीर्तिविस्कृतिमि- निद् मस्मकृतानरागमिव तद् भूतेशमूतं वपुः । सर्वानं घटितां गिरीश्वरसुता दुग्धाब्धिपुत्री जवाद्, व्यावृचां च सहस्ततालहसितैवेलक्ष्यमध्यापयत् दायादा कुमुदावलिर्विचकिलश्रेणी सहाध्यायिनी, सधीची सुरसिन्धुवीचिवितति.. की चन्द्रिका । १ पद्यमिदं नरचन्द्रसरिनाम्ना निर्दि प्राचीनलेरासंग्रह भाग २ मध्ये ३९ संख्यगिरिनारशिलालेखे प्रथम- पद्यतया वर्तते ॥ २ पद्यमिदं नरबन्द्रनाम्ना निर्दियं प्राचीनलेखसंग्रह माग २ मध्ये ४२ संख्यगिरिनारसत्तथिमालेसे परमपद्यतयाऽपि दृश्यते॥३'क्य यस्य करणं तिष्ठेत कोऽन्यः स्वतः पुण्यः सोऽस्तु गिरिनारशिलालेखे । ॥ 1 परिशिष्टम् ] वस्तुपालप्रशस्तिः। शीतज्योति:प्रकाशं तदनु समुदितं तद्यशो येन तेने, शश्वद्विस्तारिराकारजनिमहमहो । विश्वतो विश्वमेतत् चण्डांशोरपि चण्डतामगमयद् यस्य प्रतापोदयः, शीतांशोरपि शीतमानमभजद् यस्य प्रसादोत्सवः । ब्रह्मास्वादनतोऽपि तोपमपुषद् यस्यावदातं यश- स्तल्लोकोचरमस्य कस्य वचसा पात्रं चरित्राद्भुतम् ? ॥ २२॥ यस्मिन् धर्म पुरस्कृत्य, विपद्वयो रक्षति क्षितिम् । जने जन्यमजन्यं च, द्वयमप्राप्यतां गतम् ॥ २३ ॥ तस्मिन् काञ्चनकोटिभिः प्रणयिनां दारिद्यमुद्रादुहि, व्यक्तं काञ्चनशैलखण्डनविधावाखण्डलः शक्तिः। प्राम्यत्येव निदेशतोऽस्य तदयं राज्ञा ससूरः सदा, नक्षत्रैः परिवारितश्च परितोऽप्यद्याप्यम् रक्षति ॥ २४ ॥ नमस्ये निर्दृष्टाः शरदि नहि वर्षन्ति जलदाः, फलपातरात्तैर्न खलु फलवृक्षाश्च फलिनः । प्रदुग्धा वा गावः पुनरपि न दुग्धानि ददते, कदाऽप्येतस्योच्चैर्न तु वितरणे श्राम्यति मतिः ॥२५॥ दीपः स्फूर्जति सज्जकज्जलमलः संहं मुहुः सहरन्निन्दुमण्डलवृत्तखण्डनपरः प्रद्वेष्टि मित्रोदयम् । सूरः क्रूरकरः परस्य सहते तेजो न तेजस्विनस्तत् केन प्रतिमं चैवीनहि महः श्रीवस्तुपालामिघम् ॥२६॥ - 4. ॥ इति मलधारिश्रीनरचन्द्रसूरिकृता श्रीवस्तुपालप्रशस्तिः॥ " - १ पधमिदं नरयन्द्रनाम्ना निर्दिष्ट प्राचीनलेखमाह भाग २ मध्ये ३९ सख्यगिरिनारसत्वशिलालेसे चतुर्ष पयतया, पुरातनप्रदन्धरांप्रहगतवस्नुपालप्रवन्धे २१६ तमं सोमेश्वरदेवोक्तितयोग्लिखित च वर्तते ॥ २ "पूरतर गिरिनारशिलालेखे पुरातनप्रबन्धसंग्रह च ॥ ३ यवीमि सचिवं श्री गिरिनारपिलालेसे ।
चतुर्थ परिशिष्टम् "मलधारिश्रीनरेन्द्रमभरिनिर्मिता वस्तुपालप्रशस्तिः । ॥४॥ स मनलं वो वृपमध्वजः क्रियाजटावलीसंवलितांसमण्डलः । यदीयमनं किल सर्वमङ्गलाभितं प्रमोदाय न कस्य जायते ! समूलमुन्मूलयितुं सुरद्रुहः, सन्ध्यासमापौ चुलकीकृतेऽम्मसि । स्वयम्मुवा यः समजे मटाग्रणीः, समग्रशक्तिः स चुलक्य हत्यभूत् तदन्वयाम्भोधिविधुर्विधूतविरोधिमूलोऽजनि मूलराजः। न कापि दोषोक्तिरमूतु यस्य, यशःप्रकाशैविंशदेऽपि विश्वे य(तस्यात्मभूः समभवद् मुबदण्डचण्डयामुण्डराज इति राजकमौलिरलम् । भूवल्लमस्तदनु वल्लमराजदेवत्तन्नन्दनो मुदमुदञ्चितवान् प्रजानाम् तत्यानुजन्मा सममूत् परस्त्रीसुदुर्लभो दुर्लभराजदेवः । सम्व मीमो रणभूमिभीमस्ततोऽपि सीमा जगतीपतीनाम् तदात्मजः संयति लब्धवर्गः, कर्णोऽभवत् कर्णसमप्रतापः । श्रीसनमाद् वीररसोऽपि यस्य, वभार शृङ्गारमयत्वमेव स्नुस्तदीयोऽअनि वैरिवीरद्विपेन्द्रसिंहो जयसिंहदेवः । नवेन्दुकुन्दश्रुतिभिर्धरित्री, यः कीर्तिमुक्ताभिरलपकार अयं हि राकामुविलासकौतुकी, रिपुस्तदस्यास्तु विपर्ययोऽधुना । इतीव यो मालवमेदिनीश्वर, चकार काराविनिवेशदुःस्थितम् ततोऽभवत् कीर्विलतालवालः, कुमारपालः क्षितिपालभास्वान् । यस्य प्रतापः शिशिरेऽप्यरीणां, स्वेदोदविन्दूनधिकांश्चकार उदमतेज सुकृतैकमन्दिरं, घराघरेन्द्रः स गिरामगोचरः। व्यवत्त यः शत्रुकलत्रमण्डली, महीमशेषां च विहारभूपणाम् तस्मादमदलपपाल इति क्षितीशः, प्रत्यार्थपार्थिवकुलपल्याश्रयाशः । श्रीमूलराज इति वैरिसमासराजनिजिविक्रमनयस्तनयस्तदीयः माधुः कनीयान् विजयी तदीयः, श्रीमीमदेवोऽस्ति महीमहेन्द्रः। प्रवासदायिन्यपि वैरिवों, बभूव यस्मिन्न वनाभिलाषी १दूरग्मया य....सजे प्रतौ ॥ २ पायविप्रो ।
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॥ १४ ॥
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॥१५॥
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॥ १८॥
परिशिष्टम् ]
घस्तुपालप्रशस्तिः ।
श्रियं चौलुक्यानां प्रकृतिमतिभेदेन विवशां, वशीकृत्याऽमुप्मिन्नसमविनिवेशा[म]कृत यः ।
स नेताऽणोराजः समभवदिहेवान्वयवरे, वरेण्यश्रीशाखां...........णिरद्वैतसुभटः
भूयांस एव प्रथितप्रतापा, यशस्विनस्तस्य सुता बभूवुः ।
प्रदीप्यते तेषु जयी विनिद्ररुद्रप्रसादो लवणप्रसादः
पात्य शौण्डीर्यमदं परेषां, यद्विक्रमो मानसमध्युवास ।
तदङ्गनानां च दृशो विकृप्य, बलान् विलासान् विदघेऽश्रुवारि
तन्नन्दनः कुमुदकुन्दनिभैर्यशोभिर्विश्वानि वीरधवलो घवलीकरोति ।
यद्विक्रमः क्रमनिरस्तसमस्तशत्रुर्मन्येऽद्य ताम्यतितमामहितानपश्यन् ।
चित्रं विवल्गन्नपि यत्प्रतापः, प्रचण्डमार्तण्डमहोमहीयान् ।
विरोधिवर्गस्य निसर्गसिद्धं, भुजामहोप्माणमपाकरोति
इतश्च-
प्राग्वाटवंशध्वजकल्पकीर्तिः, श्रीचण्डपः खण्डितचण्डिमाऽभूत् ।
उवास यस्मिन् गुणवारिराशी, चिराय लक्ष्मीप्रमुरेव धर्मः
गुणौघहंसालिसरोजपण्डचण्डप्रसादोऽस्य सुतो बभूव ।
यत्कीर्तिसौरभ्यतरङ्गितानि, जगन्मुदेऽद्यापि दिगन्तराणि
पत्युनंदीनामिव विश्वनन्दनो, बभूव सोमोऽस्य सुतः कलानिधिः ।
एकाऽपि................
आशाराजा शस्वीत्तस्य सूनुर्जज्ञे विज्ञश्रेणिसीमन्तरत्नम् ।
येनाऽऽतेने [न] क्वचिद् बालसङ्गश्चित्रं चक्रे नाप्यलीकप्रसक्ति
तस्याऽभवन्निर्मलकर्मकारिणी, कुमारदेवीति सधर्मचारिणी।
असूत सा नीतिरिवातिनान्छितप्रदानुपायांश्चतुरस्तनूरुहान्
लूणिगः प्रथमस्तेपु, मलदेवस्ततोऽपरः । वस्तुपालः सुधीरस्मात् , तेजःपालोऽथ धीनिधिः ॥ २३ ॥
वंशश्रीमौलिधम्मिलं, मल्लदेवं कथं स्तुवे ! । यस्य धर्मधुरीणस्य, विवेकः सारथीयते
सरस्वतीकेलिकलामरालः, स वस्तुपालः किमु नाभिनन्यः ।।
जिताः पदन्यासमनन्यतुल्यं, वितन्वता के कवयो न येन ।
दानं दुर्गतयर्गसर्गललितव्यत्यासवैहासिकं, शौण्डीय भुजदण्डचण्डिमकथासर्वपं विद्विपाम् ॥
बुदिर्यस्य दिगन्तभूतलभुवामारष्टिविद्या श्रियां, कस्यासौ न जगत्यमात्यतिलकः श्रीवस्तुपालो मुदेगा२६॥
तैजापाल: सचिवतिलको नन्दताद् भाग्यमियस्मिन्नासीद् गुणविटपिनामव्यपोहः [ प्ररोहः ] ।
पच्छायाम त्रिभुवनवनप्रेशणीपु प्रगम, प्रक्रीदन्ति प्रस्मरमुदः कीर्तयः श्रीसहायाः
धन्यः स वीरधवला शितिकैटमारिय॑स्येदमद्भुतमहो महिमप्ररोहम् ।
दीपोष्णदीधिति-सुधाकिरणमवीणं, मन्त्रिद्वयं किल विलोचनतामुपैति
पेक्ष्यास्थैय प्रमुप्रीति-विम्ति-यपुरा-ऽऽयुपाम् । यस्तुपालः स्थिरे धर्मकर्मण्येव धियं दधौ ॥२९॥
॥२०॥
॥२१॥
॥२२॥
॥ २४ ॥
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॥ २७ ॥
॥२८॥
[ चतुर्थ ॥३२॥ ॥ ३५॥ मलधारिश्रीनरेन्द्रप्रभत्रिविरचिता अगण्यपुण्योदयसस्यकाश्यपीमघौघनिर्धातनकर्मकर्मठाम् । सहेव सङ्घन नमस्यकर्मणा, यस्तीर्थयात्रामकरोन्महामतिः अभ्यर्च्य देवान् पथि साधुमण्डलीमाराध्य शुद्धागन-पानकादिभिः । उद्धृत्य दीनानुपकृत्य धार्मिकान् , यो यात्रया प्राप पवित्रतां पराम् उद्धृत्य पञ्चासरजैनवेश्म, यस्तत्र संस्थाप्य च पार्श्वनाथम् । चकार चौलुक्यपुरे स्वकीर्तिसखीत्वमुखां वनराजकीर्तिम् श्रीयुगादिप्रभोदमन्यवृंदाचलमूर्ध्नि यः । श्रेयसे मल्लदेवस्य, मल्लिदेवमतिष्ठिपत् ॥ ३३ ॥ विनाणं परितो जिनेन्द्रमवनान्युच्चैश्चतुर्विशति, तापोत्तीर्णमुवर्णदण्डकलशालकारतारश्रियम् । यः शत्रुञ्जयदेवसेवनमनाः शत्रुञ्जयाख्यं जिनप्रासादं धवलकनामनि पुरे निर्मापयामासिवान् ॥३४॥ गोप्रहप्रोज्झितासूनां, देवभूयमुपेयुपाम् । राणभट्टारकाणां यस्तत्रागारमकारयत् वार्ष तस्य परः स्मेरपद्मां पीयूपवान्धवीम् । प्रपां चापतिमा विश्वप्रीतिदा यो व्यधापयत् ॥३६ ॥ पौषधशालाद्वितयं, यस्याऽऽस्ते तत्र मुनिभटाकीर्णम् । कलिशत्रुभीतिमगुरधर्मधराधीशदुर्गनिभम् पुरोचमे स्तम्भनकामियाने, निवेशने पार्श्वजिनेश्वरस्य । योऽकारयत् काञ्चनकुम्भदण्डमखण्टधर्मा शिखरं गरीयः नामेय नेमिनाथं च, तदीये गूढमण्डपे । सरस्वती जगत्यां च, स्थापयामास यः कृती ।। ३९ ॥ मकारयन्नगाकारं, प्राकारं परितोऽत्र यः । निदाघदमनक्रीडाप्रवृतं च प्रपाद्वयम् यश्चकार नवोद्धारधारि...द्भुतवैभवाम् । सुघासहचरी तत्र, वापी व्याकोशपङ्कजाम् ॥ ११ ॥ भृगुनगरमौलिमण्टनमुनिसुव्रततीर्थनाथमवने यः । देवकुलिकामु विंशतिमितासु हेमानकारयद् दण्डान् तस्य गर्भगृहोत्सने, यस्त्रैलोक्यदिवाकरौ। पार्श्वनाथ-महावीरो, क्षान्तिघीरो न्यवीविशत् ॥ ४३ ॥ नगराख्ये महास्थाने, चैत्यमाद्यजिनेगितुः । येनोद्धृत्य समुद्दधे, कीर्तिमरतचक्रिणः व्याघ्ररोल्य(पल्ल्य)भिये प्रामे, पूर्वजैः कारितं पुरा । येन तत्पुण्यवृद्ध्यर्थमुद्धृतं जिनमन्दिरम् ।।४५।। निरीन्द्रग्रामे वोडास्त्र्यबालीनाथस्य मन्दिरम् । विनसङ्घातपाताय, प्रजानामुद्दधार यः स्थापयन् सींहुलग्राममण्डने जिनवेशनि । य. श्रीवीरजिनं विश्वप्रमोदमदजीवयत् श्रीवैद्यनाथवरयेश्मनि दर्मवत्यां, यान् दुर्मदी मुमटवर्मनृपो जहार । तान् विंशति द्युतिमतम्तपनीयकुम्मानारोपयत् प्रमुदितो हृदि वस्तुपालः ॥ १८ ॥ श्रीधीरघवलमूर्तिर्जयतलदेव्याश्च मूर्तिरसमश्रीः। श्रीमल्लदेवमूर्तिः, स्वमूर्तिरनुजस्य मूर्तिश्च ॥ ४९ ॥ श्रीवैद्यनाथगर्भद्वारयहिभितिसम्म निलये । अन्तर्भक्तिनिमीलितकरकमलाः कारिता येन १ भीमालयेन्द्रसुमटेन सुपर्णकुम्मानुत्तारिता पुनरपि क्षितिपालमन्त्री । श्रीयपनाययरयेश्मनि दर्मयायामेकोनविंशतिमपि प्रसमं व्ययत्त ॥ १७ ॥ उदयभीयायां मुडतकीर्तिमोलिन्याम् ॥ ॥ ३८॥ ॥४०॥ ॥ ४२ ॥ ॥४४॥ ॥ ४६॥ ॥४७॥ - ॥ ५० ॥ युग्मम् ॥
।' ॥ ५५॥ , ॥ " -- ॥ ५७॥ परिशिष्टम् ] यस्तुपालप्रशस्तिः। २७ स्वविरोधिनी शुचिर्भुवमुमारशय्ये च बदरकूपे च । यस्य प्रपा प्रपश्यन् , कलयत्यधिकाधिकं तापम् उद्दधारानुजो यस्य, तीथें कासहदामिधे । नामेयभवनं तुझं, स्वयमम्बालयं पुनः ॥ ५२ ॥ स्तम्मतीर्थे नगोलुङ्गे, घानि भीमेश्वरस्य यः । शातकुम्भमयं कुम्म, केतने चाध्यरोपयत् ॥ ५३ ॥ तत्र लोलाकृति दोलाकालां धोती च मेखलाम् । यो वृषं च तुषारांशुकान्तिकल्पमकल्पयत् ।। ५४ ॥ यः स्फुरन्मेदुरामोदे, तस्य गर्मगृहोदरे । मूर्ती न्यवेशयद् धीमानात्मनश्चानुजस्य च तस्य जगत्यां प्रीत्यै, ललितादेव्याः स्ववल्लभाया यः । सूत्रयति स्म पवित्रां, वटसावित्रीसदनसहिताम् किं च कारयता तत्र, तक्रविक्रयवेदिकान् । स्वस्य प्रकटिता येन, कृत्या-ऽकृत्यविवेकिता उद्धृत्य वैद्यनाथस्य, वेश्म योऽत्रैव मण्डपे। मूर्ति श्रीमल्लदेवस्य, शत्यकीर्तिरतिष्ठिपत् ॥५८ ।। पुण्यं प्रतापसिंहस्य, यः स्वपौत्रस्य वर्धयन् । तत्रैव रचयामास, ध्वस्तग्रीष्मातपा प्रपाम् ॥ ५९ ॥ प्रभूतमूतराजस्य, यशोराजस्य मन्दिरम् । रम्यं निर्मापयामास, कीतीनां वासवेश्म यः ॥६०॥ असौ भुवनपालस्य, शिवाय शिवमन्दिरम् । अस्थापयत् समं रम्यैर्दशभिर्देवताल्यैः ॥६१॥ तजगत्यां च यः काम्यं, चण्डिकायतनं नवम् । वेश्म रलाकरस्यापि, निस्सपलमसूत्रयत् ।। ६२ ।। पश्च पौपधशालाच, तत्र येन वितन्वता । पञ्चोचरविमानश्रीपात्रमात्मा व्यतन्यत ॥ ६३ ॥ पुण्यायाऽजयसिंहस्य, रोहडीजिनधाम्नि यः । नामेयप्रतिमां तस्य, मति च निरमापयत् ॥ ६४ ॥ इहैवाष्टापदोदारं, श्रीशालिगजिनालये । लक्ष्मीधर स्य] पुण्यार्थमुपकारी चकार यः ॥६५॥ तत्रैकं राणकश्रीमदम्बडस्य तथाऽपरम् । पुण्याथै वैरिसिंहस्य, यस्तीर्थेशं न्यवीविशत् ॥६६॥ श्रीकुमारविहारेऽत्र, त्रारातिनतक्रमौ । पार्श्वनाथ-महावीरो, प्रीत्या यः प्रत्यतिष्ठिपत् ॥ ६७ ॥ प्रामेऽर्कपालितकनानि जिनेश्वरस्य, वीरस्य मन्दिरमुदारमकारि येन । । भूतेशवेश्म च मनोहरमध्वनीना, सजीविनी तपनतापरिपुः प्रपा च ॥ ६८॥ येनात्रैव वियच्चुम्यिवीचिवाचालकूलभूः । कासारः कारयाचक्रे, क्षीरनीरधिवान्धवः ॥ ६९॥ मन्येऽस्मिन्नमृताम्बुदेन वपे पीयूपवर्मुहुः, केनाप्येतदयश्यमम्बरसरित्सकेरुहैः पूरितम् । व्यक्तं ब्रशमुतामरालकुलजैः कीर्ण मरालैरिदं, तेनैतस्य न वस्तुपालसरसः स्तोतुं गुणानीमहे ॥७॥ पलभ्यां पुण्यलभ्यश्रीः, प्रासादो वृपमप्रभोः । येनोद्दधे मुदा महदेवस्य सुकृतश्रिये ॥ ७१ ।। ललितादेव्याः पल्याः, सुकृताय जिनेन्द्रभवनमासि तटम् । तत्र नवकमलललितं, ललितसरः कारितं येन ॥७२॥ शत्रुञ्जयनगोत्सझे, श्रीयुगादिजिनेशितुः । कार्तस्वरमयं रम्य, पृष्ठपट्टमतिष्ठिपत् तत्यैवाऽऽद्यविमोश्चैत्यप्रवेशे येन वामतः । सुव्रतस्वामिनं न्यस्य, भृगुकच्छविभूषणम् ॥ ७४ ।। वीरं दक्षिणतः सत्यपुराधीशं निवेश्य च । तदन्ते मारती देवी, विचाराध्या न्यघीयत ॥ ७५॥ युग्मम् ।। तत्रैवाकारयद् घाग्नि, काञ्चनान् मण्डपत्रये । पौत्रप्रतापसिंहस्य, श्रेयसे कलशानसौ प
२८
। [चतुर्थ
मलधारिश्रीनरेन्द्रप्रभसूरिविरचिता
स्तोतुं नामिनरेन्द्रनन्दनगुणान् गोत्रं च कीर्ति समं, व्याहारं सचिवारविन्दतरणेरेतस्य दानाम्बुधेः ।
यत्रोवास विकस्वरोमयमुखी प्रीत्येव देवीन्दिरा, तद् येनास्य विभोरकार्यत पुरोडक्पारणं तोरणम् ॥७७॥
अत्रैव शैले रचयाञ्चकार, मनोज्ञमाखण्डलमण्डपं यः ।
प्रयान्ति वैलक्ष्यमवेक्ष्य यस्य, लक्ष्मी सहस्राक्षदृशोऽप्यवश्यम्
७८॥
तत्र रैवतकाधीशः, प्रमुश्च स्तम्मनेश्वरः । वस्तुपाले विधृत्येव, प्रीतिमागत्य तस्थतुः
॥७९॥
श्रीवस्तुपालस्य कयाऽतिभक्त्या, नेमिः समाकृप्यत ? कौतुकं नः ।
इतीव तस्मिन्नवलोकना-ऽम्बा-प्रद्युम्न-शाम्बाः सममभ्युपेयुः
तत्राऽऽत्मस्वामिनो वीरधवलस्य धरापतेः । स्वर्द्विपामद्विपारूढां, मूर्ति स्थापयति स यः ॥ ८१ ।।
अत्रैव शत्रुञ्जयशैलमौली, नन्दीश्वरद्वीपगतान् जिनेन्द्रान् ।
तस्यानुजः स्थापयति स्म तेजःपालाभिधानो यशसां निघानम् ॥८२॥
धर्मस्थानमिदं विलोक्य जगतामानन्दकन्दोदयप्रावृट्कल्पमनल्पसम्भ्रमभरान्नन्दीश्वराल्यं जनः ।
तेजःपालयशांसि मांसलरसंगायन् मुहुर्गायते, मन्ये नूतनवस्तुसंस्तववशोद्भूतां प्रभूतां मुदम् ॥ ८३ ॥
अनुपमदेव्यास्तेन, स्वप्रेयस्याः प्रमूतसुकृताय ।
आदिजिनेश्वरपुरतो, विदधेऽनुपमासरश्च नवम् ।
॥ ८४॥
विशेषके रैवतकस्य मूभृतः, श्रीनेमिचैत्ये जिनवेश्मसु त्रिषु ।
श्रीवस्तुपालः प्रथमं जिनेश्वरं, पाच च वीरं च मुदा न्यवीविशत्
तदन्तिके च निःशेषसुरा-ऽसुरनिविताम् । कारयामास यः काव्यकामधेनुं स्वरस्वतीम् ॥ ८६ ॥
येनाऽऽत्मनः स्वपल्याश्च, स्वस्य भ्रातुः कनीयसः। तद्भार्यायाश्च शैवेयचैत्येऽकार्यन्त मूर्तयः ॥ ८७ ॥
अम्बिकाभवने येन, मूर्ति. स्वस्यानुजस्य च । जगन्नेत्रसुधावृष्टिः, कारिता चारिमास्पदम् ॥ ८८ ॥
तदीये शिखरे नेमि, चण्डपश्रेयसे च यः । मूर्ति रम्यां तदीयां च, मल्लदेवस्य च व्यधात् ।। ८९ ।।
चण्डप्रसादपुण्यं वद्धयितुं योऽवलोकनाशिखरे ।
स्थापितवान् नेमिजिनं, तन्मूर्ति स्वस्य मूर्ति च
॥९०॥
प्रद्युम्नशिखरे सोमश्रेयसे नेमिनं जिनम् । सोममूर्ति तथा तेजःपालमूर्ति च योऽतनोत् ॥ ९१ ॥
यः शाम्बशिखरे नेमिजिनेन्द्रं श्रेयसे पितुः
तन्मूर्ति च, कारयामास भक्तितः
चसापथे जगत्यां, मवनाम्नः शूलिनो भवनमतुलम् ।
उद्धरति स्म विवेकी, तेजःपालस्तदनुजन्मा
पुरतः कालमेघस्य, क्षेत्रपालस्य कारितः । अश्विनोर्मण्डपस्तत्र, तेनैव मतिशालिना
प्रीतो वखापथमुवि पुरा यद् ददौ तापसानां, सद्यः किश्चित् तदिदमधुना प्रापितं तः करत्वम् ।
प्रामोद्धारादविलमपि तन्मोचयामास तेभ्यस्तेजपालः मुस्तकृतधीर्वस्तुपालानुजन्मा
स्ववंश्यतिमिः श्रीमग्नेमिनायेन चान्वितः । मुखोद्धाटनकस्तम्भे, वस्तुपालेन निर्ममे ॥ ९६ ॥
अशाराजस्य पितुः, पितामहम्यापि सोमराजस्यामूर्तियुगमत्र मन्त्री, व्यापयत् तुरगपृष्ठस्थम् ॥९७ ॥
१पीठो ६ प्रदी॥
॥ ९२॥
॥ ९३॥
॥ ९ ॥
॥ ९५॥
२९ , परिशिष्टम् ] वस्तुपालमशस्तिः । द्वारे यत् किल दक्षिणामनुगतं यच्च प्रतीच्यां स्थितं, यत् कौवेरदिगाश्रितं च सदनं श्रीनेमिनाथप्रमोः । काम मण्डयति स्म तानि सचिवोसः स यस्तोरणै- दृष्टिस्तद्विभवं विमान्य जगतो नान्यत्र विश्राम्यति ॥ ९८॥ गुरुः फुलेऽस्य नागेन्द्रगच्छब्योमार्यमाऽभवत् । श्रीमहेन्द्रप्रभा श्रीमान् , शान्तिसुरिस्ततः श्रुतः॥९९॥ आनन्दा-ऽमरसूरी, तदीयगच्छाब्धिकौस्तुभप्रतिमौ । तदनु हरिभद्रमरि, शमरलमहोदधिः सममूत् ॥ १० ॥ तत्पदे विजयसेनसूरयः, पूरयन्ति कृतिनां मनोरथान् । तुपालजिनबिम्बपद्धतिजृम्भते जगति यत्प्रतिष्ठिता ॥ १०१॥ अत्यद्भुतैः कृत्यशतैरजसं, योऽसाधयद्धर्ममतुल्यकर्म । श्रीवस्तुपालः सचिवावतंसः, प्रकल्पतां कल्पशतायुरेपः ॥ १०२॥ यो विद्वद्भिरप्येवं स्तूयते-- त्यागारापिनि राधेयेऽप्येककर्णैव भूरभूत् । उदिते वस्तुपाले तु, द्विकर्णा वर्ण्यतेऽधुना ॥ १०३॥ जज्ञे हर्षपुरीयगच्छतिलकः श्रीमन्मुनीन्दुप्रभु- देवानन्दगुरुस्ततस्तदपरः सूरिश्च देवप्रमः । तच्छिप्यैर्नरचन्द्रसूरिगुरुभिर्दवप्रतिष्ठोदय- स्तामेतामतनोत् प्रशस्तिमतुलां सूरिनरेन्द्रप्रभः ॥ १०४ ॥ ॥ इति मन्त्रीश्वरवस्तुपालप्रशस्तिः श्रीनरेन्द्रप्रभसूरिविरचिता ॥ "
पञ्चमं परिशिष्टम् ।
मलधारिश्रीनरेन्द्रप्रभसूरिविनिर्मिता
वस्तुपालप्रशस्तिः।
॥२
॥१॥
स्वस्ति श्रीवल्लिसालाय, वस्तुपालाय मन्त्रिणे । यद्यशःशशिनः शत्रुदुप्कील् शर्वरीयितम् ॥ १॥
शौण्डीरोऽपि विवेकवानपि जगत्राताऽपि दाताऽपि वा,
सर्वः कोऽपि पथीह मन्थरगतिः श्रीवस्तुपालाश्रिते।
स्वज्योतिर्दहनाहुतीकृततमःस्तोमस्य तिग्मधुतेः,
कः शीतांशुपुरःसरोऽपि पदवीमन्वेतुमुस्कन्धरः ?
श्रीवस्तुपालसचिवस्य यशःप्रकाशे, विश्वं तिरोदधति धूर्जटिहासभासि ।
मन्ये समीपगतमप्यविभाव्य हंस, देवः स [प]अवसतिश्चलितः समाधेः
वास्तवं वस्तुपालस्य, वेत्ति कश्चरिताद्भुतम् ।। यस्य दानमविश्रान्तमर्थिप्वपि रिपुष्वपि
शून्येषु द्विपता पुरेषु विपुलज्वालाकरालोदयाः,
खेलन्ति स्म दवानलच्छलभूतो यस्य प्रतापामयः ।
जुम्मन्ते स्म च पर्वगवितसितज्योति समुत्सेकिते,
ज्योत्स्नाकन्दलकोमलाः शरवणव्याजेन यत्कीर्तयः
कुन्दं मन्दप्रताप गिरिशगिरिरपाहकृतिः साश्रुपिन्दुः,
पूर्णेन्दुः सिद्ध............विधुरिमा पाञ्चजन्यः समन्युः ।
शेपाहिनिर्विशेषः कुमुदमपमदं कौमुदी निष्प्रमोदा,
क्षीरोदः सापनोदः क्षतमहिम हिमं यस्य कीर्तेः पुरस्ताव
यस्यो:तिलकस्य किन्नरगणोद्दीतैर्यशोमिर्मुहुः,
स्मेरद्विस्मयलोलमौलिविगलचन्द्रामृतोजीविनाम् ।
सष्टि भवदीशी मम न मेऽप्य.........वाप्येति गां,
मुण्डसमरिणद्वधातृशिरसां शम्मुः परं पिप्रिये (७
राकाताण्डवितेन्दुमण्डलमहःसन्दोहसंपादिमि-
यकीर्तिप्रकर्जिगत्रयतिरस्कारैकहेवाकिमिः ।
अन्योन्यानवलोकनास्तियो. शैलात्मजा-दासिनोः,
क त्वं क त्वमिति प्रगरभरमसं वाचो विचरुर्मियः
१ पमिदं नरेन्द्रसरिनाम्ना मिटि चीनलेसह भागर मध्ये संयगिरिनारसतशिलालेसे
नुपपतयापियो।
॥८॥
- -- । परिशिष्टम् ] ।।। यस्तुपालप्रशस्तिः। बादं प्रौढयति प्रतापशिखिनं कामं यशःकौमुदी, सामोदांतनुते सतां विकचयत्यास्यारविन्दाकरान् । शत्रुस्त्रीकुचपत्रवलिविपिनं निःशेषतः शोपयत्यन्यः कोऽप्युदितो रणाम्बरतले यस्यासिधाराधरः ॥९॥ तत्सत्यं कृतिमिर्यदेष भुवनोद्धारैकधौरेयतां, मित्राणो मृशमच्युतस्थितिरिति प्रेमोत्तरं गीयते । यत्र प्रेम निरर्गलं कमलया सर्वाङ्गमालिङ्गिते, केषां नाम न जज्ञिरे सुमनसामौर्जित्यवत्यो मुदः ॥१॥ न यस्य लक्ष्मीपतिरप्युपैति, जनार्दनत्वात् समतां मुकुन्दः । वृपरियोऽप्युग्र इति प्रसिद्धिं, दघत्रिनेत्रोऽपि न चास्य तुल्यः स्वस्ति श्रीवलये नमोऽस्तु नितरां काय दाने ययो- रस्पष्टेऽपि दिशां यशः कियदिदं वन्द्यास्तदेताः प्रजाः। दृष्टे सम्प्रति वस्तुपालसचिवत्यागे करिष्यन्ति ताः, कीर्ति काञ्चन या पुनः स्फुटमियं विश्वेऽपि नो मास्यति ॥१२॥ यस्मिन् विश्वजनीनवैभवभरे विश्वम्भरां निर्भरश्रीसम्भारविभाव्यमानपरमप्रेमोचरां तन्वति । प्राणिप्रत्ययकारि केवलमभूदेहीति संकीर्तन, लोकानां न कदापि दानविषयं नाप्रार्थनागोचरम् ॥ १३ ॥ दृश्यन्ते मणि-मौक्तिकस्तवकिता यद्विद्वदेणीदृशो, यजीवन्त्यनुजीविनोऽपि जगतश्चिन्ताश्मविस्मारिणः । यच ध्यानमुचः स्मरन्ति गुरवोऽप्यनान्तमाशीगिरः, प्रादुप्पन्त्यमला यशःपरिमला श्रीवस्तुपालस्य ते ॥ १४ ॥ कोटीरैः कटका-ऽहुलीय-तिलकैः केयूर-हारादिभिः, कौशेयैश्च विभूष्यमाणवपुपो यत्पाणिविश्राणितैः । विद्वांसो गृहमागताः प्रणयिनीरप्रत्यभिज्ञाभृतस्तैस्तैः स्वं शपथैः कथं कथमपि प्रत्याययाश्चक्रिरे ॥१५॥ तैस्तैउँन जनाय काञ्चनचयैरश्रान्तविश्राणितैरानिन्ये भुवनं तदेतदमितोऽप्यैश्चर्यकाष्टां तथा । दानकन्यसनी स एव समभूदत्यन्तमन्तर्यथा, कामं दुर्धतिधामयाचकच भूयोऽप्यसम्भावयन् ॥१६॥ आगो यद्वसुवारिवारितजगद्दारिद्यदावानलश्वेतः कण्टककुट्टनैकरसिकं वर्णाश्रमेष्वन्वहम् । सट्टामश्च समप्रवैरिविपदामद्वैतवैतण्डिफस्तन्मध्ये वसति त्रिधाऽपि सचिवोसेऽत्र वीरो रसः ॥१७॥ आश्चर्य वसुवृष्टिभिः कृतमनःकौतूहलाकृष्टिभिर्यस्मिन् दानधनाधने तत इतो वर्षत्यपि प्रत्यहम् । दूरे दुर्दिनसकयाऽपि सुदिनं वकिञ्चिदासीत् पुनर्येनोवींवलयेऽत्र कोऽपि कमलोल्लासः परं निर्मितः॥१८॥ साक्षाद् ब्रह्म परं धरागतमिव श्रेयोविवतैः सतां, तेजःपाल इति प्रतीतमहिमा तस्यानुजन्मा जयी । यो धते न दशां कदापि कलितावद्यामविद्यामर्या, यं चोपास्य परिस्पृशन्ति कृतिनः सद्यः परां निवृतिम् १ पमिदं नरेन्द्रस्निाना प्राचीनलेखसंग्रह भाग २ मध्ये १ संख्यगिरिनारसत्यशिलालेये प्रथमपद्यतया वर्तते ।। २ पद्ममिदं नरेन्द्रमारनाम्ना प्राचीनलयम भाग मत ४१ सल्यगिरिनारसलशिलालेखे द्वितीयपयवयाय वियत ॥ ३ पद्यमिदं नरेन्दररिताना प्राचीनलेसह माग २ मध्ये १ संख्यगिरिनारसत्कशिलालेखे द्वादश पद्यतयाऽपि वस्ते ॥ ४ प्रसिद्धम गिरिनारशिलालेखे । -- .
॥२१॥
॥२२॥
॥ २३॥
मलधारिश्रीनरेन्द्रमभसूरिविरचिता
[पशम
सहामः क्रतुभूमिरत्र सत्ततोद्दीपः प्रतापोऽनलः,
श्रूयन्ते स्म समन्ततः श्रुतिमुखोद्वारा वि[धी]नां गिरः।
मन्त्रीशोऽयमशेषकर्मनिपुणः कर्मोपदेष्टा द्विषो,
होतव्याः फलवांस्तु वीरधवलो यज्वा यशोराशिमिः
॥२०॥
श्लाघ्यः स वीरधवलः क्षितिपावतंसः, कैर्नाम ! विक्रमनयाविव मूर्तिमन्तौ ।
श्रीवस्तुपाल इति धीरललामतेजःपालश्च बुद्धिनिलयः सचिवौ यदीयो
अनन्तप्रागरभ्यः स जयति बली वीरधवला, सशैलां साम्भोधि भुवमनिशमुद्ध मनसः ।
इमो मन्त्रिप्रष्ठौ कमठपति-कोलाधिपकलामदनां बिभ्राणौ मुदमुदयिनी यस्य तनुतः
युद्धं वारिधिरेष वीरधवला माशकदोविक्रमः,
पोतस्तत्र महान् यशःशतपटाटोपो न पीनद्युतिः ।
सोऽयं सारमरुद्भिरश्चतु परं पारं कथं न क्षणाद्,
यत्राश्रान्तमरित्रतां कलयतः स्वावेव मन्त्रीधरौ
स्वैरै प्राम्यतु नाम वीरधवलक्षोणीन्दुकीर्तिर्दिवं,
पाताले च महीतलं च जलधेरन्तश्च नक्तन्दिवम् ।
धीसिद्धाञ्जननिर्मलं विजयते श्रीवस्तुपालाख्यया,
तेजःपालसमाया च तदिदं यस्या द्वयं नेत्रयोः
॥२४॥
श्रीमन्त्रीश्वरवस्तुपालयशसामुच्चावचैचिभिः,
सर्वस्मिन्नपि लम्भिते धवलता कल्लोलिनीमण्डले ।
गोत्रेयमिति प्रतीतिविकलास्ताम्यन्ति कामं भुवि,
भ्राम्यन्तस्तनुसादमन्दितमुदो मन्दाकिनीधार्मिकाः
हहो रोहण ! रोहति त्वयि मुहुः किं पीनतेये ! शृणु,
प्रातः । सम्प्रति वस्तुपालसचिवत्यागैर्जगत् प्रीयते ।
तनास्त्येव ममार्थिकुट्टनकथा प्रीतिदरी किन्नरी-
गीतैस्तस्य यशोऽमृतेश्च तदियं मेदस्विता मेऽधिकम्
देव स्वर्गम ! कष्टं, ननु के इव भवान् ? नन्दनोद्यानपालः,
खेदस्तत् कोऽध ! केनाप्यहह ! हृत इतः काननात् कल्पवृक्षः।
हुँ मा वादीप्तदेतत् किमपि करुणया मानवाना मयेव,
प्रीत्याऽऽदिष्टोऽयमुयास्तिलकयति तलं वस्तुपालच्छलेन
१ पमिदं नरेन्दरिलाना निधि प्राचीनलेमयह भर २ मध्ये ५७ संगलिरिनरमत्कशिलालेसे दशम
पपतयानी रियते ॥ २ नीयाधिका गिरिनारशिलालेखें ।। ३ पमिदं नरेन्द्रसारितामा निर्दिष्ट प्राचीनलेखसंग्रा
भाग १ मध्ये मध्यगिरिनारमलशिलालेमे नवमपरतया, पुरातनबन्धसंहगताधे माणिक्य
उक्तिया २५६ तमं च वर्तते ।।
॥२५॥
॥२६॥
॥२७॥
" परिशिष्टम् ] परतुपालप्रशस्तिः। कर्णायास्तु नमो नमोऽस्तु चलये त्यागैकहेवाकिनौ, यो द्वावप्युपमानसम्पदमियत्कालं गतो त्यागिनाम् । माम्याम्भोपिरतः परं पुनरयं श्रीवस्तुपालश्चिरं, मन्ये धास्यति दानकर्मणि, परामौपम्यधौरेयताम् ॥२८॥ व्योमोत्सबरुषः सुधाधवलिताः कक्षागवाक्षाकिताः, स्तम्नश्रेणिविजृम्भमाणमणयो मुक्तावचूलोज्ज्वलाः दिव्याः कल्पमृगीदशश्च विदुषां यत्त्यागलीलायितं, व्याकुर्वन्ति गृहाः स कस्य न मुदे श्रीवस्तुपाला कृती! ॥२९॥ यद् दूरीक्रियते स्म नीतिरविना श्रीवस्तुपालेन तत्, काञ्चित् संवननौपधीमिव वशीकाराय तस्येक्षितुम् । कीतिः कौझनिकुञ्जमञ्जनगिरि पाक्छेलमस्ताचलं, विन्ध्योधिर-शर्वपर्वत-महामेरूनपि प्राम्यति ॥ ३०॥ देवः पहजमूर्विभाव्य भुवनं श्रीवस्तुपालोद्भवः, शुमांशुद्युतिभिर्यशोभिरमितोऽलक्ष्यैर्यलक्षीकृतम् । कल्पान्तोद्भुतदुग्धनीरधिपयःसन्तापशकाकुलः, शङ्के वत्सर-मास-वासरगणैः सख्याति सर्गस्थितेः चित्रं चित्रं समुद्रात् किमपि [निरगमद् वस्तुपालस्य पाणे- र्यो दानाम्बुप्रवाहः स खलु समभवत् कीर्तिसिद्धसवन्ती । साऽपि स्वच्छन्दमारोहति गगनतलं खेलति क्ष्माधराणां, शृशोत्सनेषु रङ्गत्यमरमुवि मुहुर्गाहते सेचरोन् ॥ ३२ ।। पुण्यारामः सकलसुमनःसंस्तुतो वस्तुपालः, तत्र स्मेरा गुणगणमयी केतकीगुल्मपशिः। तस्यामासीत् किमपि तदिदं सौरमं कीर्तिदम्भाद् , येन प्रौढप्रसरमुहृदा वासि[ता] दिग्विभागाः ॥३३॥ सेचं सेचं स खलु विपुलैसिनावारिपूरैः, स्फीतां स्फाति [वितरणतरुवस्तुपालेन नीतः । तच्छायायां भुवनमखिलं हन्ता विश्रान्तमेतद्, दोलाकेलिं श्रयति परितः कीर्तिकन्या च तस्मिन् ॥३॥ श्रीवस्तुपालयशसा विशदेन दूरादन्योन्यदर्शनदरिद्रदृशि त्रिलोक्याम् । नामौ स्वयम्भुवि विशत्यपि निर्विशङ्क, शके स चुम्बति हरिः कमलामुखेन्दुम् स एप निःशेषविपक्षकालः, श्रीवस्तुपालः पदमद्भुतानाम् । यः शङ्करोऽपि प्रणयिनजस्य, विभाति लक्ष्मीपरिरम्मयोग्यः चीत्कारैः शकटवजस्य विकटैरधीयहेपारवैरारावै खणोत्तरम्य वहलैबन्दीन्द्रकोलाहलैः । नारीणामथ चचरीमिरशुभमेतस्य वित्रस्तये, मन्त्रोचारमिवाचचार चतुरो यस्तीर्थयात्रि]महम् ॥ ३७॥ ॥ इति मलधारिश्रीनरेन्द्रप्रमसरिकता यस्तुपालप्रशस्तिः॥
पष्ठं परिशिष्टम् श्रीजयसिंहसूरिविरचिता वस्तुपालतेजःपालप्रशस्तिः। ॥२॥ श्रेयः श्रीमुनिसुव्रतः स तनुतां यो मन्दरागस्तले, तन्वानः कमठाधिनाथममृतोद्धारकैधौरेयकः । निर्मथ्यैनमधर्मकर्मलहरीपूरैरपारं भवाकूमारं पुरुषोत्तमाय न तमां दत्ते स्म कस्मै श्रियम् ॥ १॥ यस्मै रश्मिभरो गभीरिमगुणकान्तेन कल्लोलिनी- कान्तेनाञ्जनपुञ्जमञ्जिमजयी शङ्के स्वकीयोऽर्पितः। यस्येव कमसेवनाय च मुदा मुक्तोऽभू: कच्छपो, लेमे लान्छनतां स यच्छतु सतां श्रीसुव्रतो निर्वृतिम् आनन्दाय सुदर्शनाऽस्तु जगतां यस्या मुखेनामतो, नम्राया मुनिसुव्रतक्रमनखादर्शप्रतिच्छन्दिना। आत्मद्वादशतां वहन्नहरहर्देवो हिमांशुर्महाकल्पानल्पपतङ्गपाटवतिरस्कारे चकारोद्यमम् रक्षादक्षो दिवि दिविपदां कोऽपि सन्ध्यासमाधि, ध्यातुर्धातुश्चलकजलतः शौर्यराशिः पुराऽऽसीत् । प्रेहत्खगप्रतिमितितया सम्मुखीनो यभूय, भूसंरम्मत्रसदसुहृदो यस्य युद्धे य एव 'वंशो विश्वत्रितयविदितः पर्वणां वेदम तम्माचौलक्याख्यः समजनि समुन्मीलदौन्नत्यलीलः । सच्चूला स्मितसितयशश्चलतानातिरेकादेकच्छत्रामतनुत महीं मूलराजो महीन्दुः कृत्वाऽधः कच्छपं सिन्धुराजप्रक्षोमशोमितः । अमन्दरोचितमुजोऽप्यमवद् यः श्रियः प्रियः ॥६॥ कीर्तिस्तोमसुधामृतानि यमुधाम्बण्डानि रेजुः सुघा- कुण्डानीव नवनिविष्टपसदा स्वाचानि यस्मिन् विमौ । रक्षानागचतुष्किका इव सदा सेवासमायातपट्- किंगद्राजकुलीयदक्षिणमुजव्याजेन येषां यमुः तस्मादकरमलमिलग्निजीलिंगनिगुग्रीहनां निजमहोदहनाशिदीताम् । मूर्ति हरस्य परणी रिपुराजमुण्डे यामुण्टराज इति राजपति स्म राजा १ गा.॥२ यरमे गा.॥
- " " परिशिष्ठम् ] यस्तुपालतेजःपालप्रशस्तिः। यत्खनवल्ली हरसिद्धिसिद्धप्रपेव रेजे समराटवीषु । मृत्युन्मुखैः साहसिभिर्यशोम्भः, क्रीतं निजानक्षतजेन, यस्याम् मवल्लभात्तद्नु वल्लभराजदेवः, ख्यातः क्षितौ समिति यः सितविप्रमाभिः । हग्यामदामभिरपूजि सुराङ्गनामिः, शृङ्गारदैवतमिवेप्सितकान्तदाता । स्वयं विनप्रेषु परेषु युद्धसिद्धकचिन्ताचयचान्तनिद्रः । यः स्वप्नसङ्खपरमि बाहुदण्डकण्डतिनि.दमुदं न भेजे ॥११॥ तस्मादमृद् मूवलयस्य मूषा, भीदुर्लमो दुर्लभराजदेवः । यस्यासिसिन्धौ वितताभिरेत्य, मग्न महीभृत्कुलवाहिनीमिः ॥ १२॥ सुरस्त्रीणां नेत्रं सृजति निजरूपादनिमिपं, ध्रुवं तस्मिन् भस्मीकृतरिपुरभूद् मीमनृपतिः । यदुत्पाते जाते द्रुतवृतभियो भोजपतेरुरः श्रीरास्यं गीः करमसिलता युक्तममुचत् ॥ १३॥ यद्दानोदकजातसिन्धुपटलैः कीर्तिप्रभापाण्डुभिः, शत्रुखीजनसाजनाथुसलिलस्रोतस्विनीभिः समम् । सम्भिधैव पदे पदे तनुमतामन्तः समन्तान्मुदं, तन्वद्भिर्जितगान यामुनजलैर्धात्री पवित्रीकृता ॥ १४ ॥ क्रोमन्ति स्म यथा यथाऽम्बरपथान यात्रासु यात्रायनीजैत्रे सर्पति दर्पतारतुरगक्षुण्णा रजोराजयः । पश्यन्तीवातथा तथा त्रिपथगातोयेऽपि विच्छायतां, शङ्के कीर्तिरगादधौतधवला दूरेऽतिदूरादपि॥१५॥ तस्माद् विस्मारितरतिपतिः कामिनामाधामा, नामा कर्णः समजनि भुजाशालिनां मौलिरत्नम् । निन्छ बन्दिग्रहमपि निजं बहमन्यन्त मन्ये, धन्यम्मन्या रिपुयुवतयो यस्य रूपं निरूप्य ॥ १६ ।। यदङ्गघटनोत्सृष्टः, परमाणुगणैरिव । विधिविधाय कन्दर्प, सदर्पा द्यामपि व्यघात् सततन्तुप्रपञ्चेन, यस्तां कीर्तिपटी न्यधात् । चतुर्दशापि विश्वानि, च्छादयाश्चक्रिरे यया ॥१८॥ व्यजयत जयसिंहदेवमूपस्तदनु 'दिशस्त्रिदशप्रभुप्रभावः । यशसि यदेसिनुदुग्धमुग्धैः, प्रितमुड्डुमिर्दिवि दोहफेनसाम्यम् ॥ १९॥ तत् त्रैलोक्यनिभत्रिमिकगृहकोडस्फुरन्मालवक्ष्माभृत्कीर्तिनितम्बिनीमुखपरिक्षेपाय पांसूत्करम् । लीलालधजगद्वयं खरखुरोत्सातक्षमामण्डलच्छिद्रौघैरुरगालयेऽपि तुरगा यस्य क्षणाञ्चिक्षिपुः ॥ २० ॥ विश्वस्योपकृतियतव्यतिकरैस्तैर्यद्यशस्तेजसोः, सामान्यमतिपत्तिमप्यसुलमा लब्ध्वेन्दु-तीनद्युती। कान्तौ चिरनन्दितामिव तयोरायुःप्रवृद्ध्यौपीं, द्रष्टुं काञ्चन काञ्चनक्षितिधरोपान्तेऽपि तौ ग्राम्यतः ॥२१॥ तत्कालं कलहे निहत्य किमपि प्रत्यायिताः शत्रवः, स्वर्गस्त्रीपरिरम्मणेऽपि न मनःस्वास्थ्यं समासेदिरे । य कल्पान्तकृतान्तवक्त्रकुहराकारस्फुरत्कार्मुकं, पश्यन्तः प्रसरन्तमद्भुतभयावेशेन मीलदृशः ॥२२॥ अवश्चयन्नाशु कृपागपातं, विरोधिवीरा नमन क्रियामिः । यस्यापिढेरुहबद्धवासां, लक्ष्मी च दक्षा रभसादगृहन् ॥ २३ ॥ १दिशनि गा० ॥२'सिपे नु दु गा०॥
श्रीजयसिंहसूरिविरचिता
स्वैरेव महतैपिद्धिरमरीमतैः सुरीभिः समं,
गीतं प्रीतिरसैः स्वमेव हृषिते तस्मिन् यशः शृण्वति ।
क्ष्मां पाति स्म कुमारपालनृपतिर्यत् कीर्तिकालप्यदं,
तद् बाप्पाजनकश्मलं न रुदतीवितं सवित्तोऽग्रहीत् ॥२४॥
जैन धर्ममुरीचकार सहसाऽर्णोराजमत्रासयद्, वाणैः कुङ्कणमग्रहीदपि गुरुचके स्मरध्वंसिनम् ।
इत्यं यस्य परिक्षतक्षितिमृतो हंसावलीनिर्मल, रामस्येव निरन्तरं नवयशः तापूरैर्दिशः पूरिताः ॥ २५॥
तादृग्दानपरम्परामिरभितो निष्काश्य कालं कलिं,
त्रेता-द्वापरयोरहप्रथमिकापद्धस्पृहं पश्यतोः ।
श्रेयधन्दनतो विशेषकविधि कृत्वा यशोजाहवी-
पाथोभिः कृतिना स्वयं कृतयुगो येनामिषिक्तः क्षिती ॥२६॥
अजयदजयपालभूमिपालः, क्षितिमथ मन्मथमन्जुलेन येन ।
त्रिपुररिपुरपि प्रसूनबाणैरिव पिहितः सहसा यशःसमूहः
॥ २७॥
अन्तर्यत्कीर्तिकासारं, कृतस्नानस्य सर्वतः । लग्नफेनलवायन्ते, तारा गगनदन्तिनः ॥२८॥
बालः श्रीमूलराजोऽथ, विक्रीडन् समराङ्गणे। द्विपल्लतापतानानि, समूलमुदमूलयत् ॥ २९ ॥
आपपे प्रसूतिसम्भमेण यत्तेजसा रिपुयशम्सुधारसः ।
तेन निर्गलितबिन्दुवृन्दवद्, योतते वियति तारकाततिः
भूमीमारमथो बमार भुजयोः श्रीमीमदेवो विमुर्दानारम्भविजृम्भमाणविमवप्रागल्भ्यगर्जयशाः ।।
गीतो यत्तुलया विरोचनमुतः पातालवैतालिकैरोंचालमनोभिरन्वहमहङ्कारं चकार स्मितः ॥ ३१ ॥
मदाननसरोजेन, नित्यस्मरेण निर्जितः । सज्जलज इनामजद्, यद्यशोजलधौ विधुः
॥३२॥
अर्णोराजाजातं कलकलहमहासाइसिक्यं चुलुक्यं,
श्रीलावण्यप्रसादं व्यतनुत स निजश्रीसमुद्धारधुर्यम् ।
मस्य प्रत्येकधाराद्वयफलितभुजायुग्मशाली रिपूणां,
कीलालैः पीतवासा इव समिति चतुर्बाहुतामेति सङ्गः
ताहकम्पव्यतिकरमृतां सर्वतः पर्वतानां, व्यातन्वद्भिः क्षयसममरुत्यूरशङ्कातिरेकम् ।
यमत्पभिक्षिविधववधूवर्गनिःश्वासवातजातोत्पातेरिव दिवि सदा प्रेमुरकेंन्दु-ताराः
भूभारोदृतिधुर्यदुर्द्धरमुजस्तस्याग्नजन्मा स्फुर-
कीर्तिः श्रीधवलोऽस्ति वीरधवलोऽहवारलकेश्वरः ।
यस्मिन् निमति मार्गणे रिपुगण हृप्यन्ति तस्यानाः,
कामोऽयं कुरुते भदेकवशगं चिचेशमित्याशया
विक्रीडतो यस्य नवप्रताप-यशाकुमारी जगदङ्गणान्तः ।
प्रमावमाजी लसतस्तदनरक्षामु दक्षाविव सूर-राजौ
॥ ३०॥
॥ ३३ ॥
॥३५॥
परिशिष्टम् ] वस्तुपालतेजापालप्रशस्तिः । पाताले बलिराजराज्यविशदे विश्वम्भरामण्डले, यल्लीलायितमन्जुले सुरपुरे कल्पद्रुमुद्राजुधि । दारियेन मयद्रुतेन सहसा यद्वैरिवीराश्रयादश्रान्तप्रसरेण शैलशिखरकोडेषु विक्रीडितम् यस्यासिरम्भोदसहोदरश्री, शौर्य द्विपस्येव मदप्रवाहः । सर्पन् सदारिनरेन्द्रकीर्तिकासारपूरं कलुपीचकार ॥३८॥ सचिवप्रवरं कश्चित्, प्रार्थितस्तेन पार्थिवः । श्रीमान् मीमो मुदा वाचमुवाच श्रवणामृतम् ॥ ३९ ॥ वाग्देवताचरणकाश्चननू पुरश्रीः, श्रीचण्डपः सचिवचक्रशिरोऽवतंसः । प्राग्वाटवंशतिलकः किल कर्णपूरलीलायितान्यधित गूर्जरराजधान्याः ॥४०॥ मतिकल्पलता यस्य, मन स्थानकरोपिता । फलं गूर्जरम्पानां, सङ्कल्पितमकल्पयत् ॥४१॥ वाग्देवीप्रसादः (), सूनुश्चण्डप्रसाद इति तस्य। निजकीर्तिवैजयन्त्या, अनयत गगनानणे गनाम् ॥१२॥ पातालमूले पिहिताशुभासः, पृथ्वीविमागेऽपि हराट्टहासः । स्वर्गेऽपि दुग्धाब्धिपयोविलासः, कीर्तिर्यदीया त्रिजगत्युयास कीर्तिकश्मलितपार्वणसोमः, सोम इत्यजनि तस्य तनूजः । सिद्धराजगुणभूषणभाजः, ससदो विशददर्पणकल्पः ॥ ४४॥ उत्कर्षप्रगुणां गुणा-गुणपरिज्ञानौचिती मन्महे, तस्य प्रीतिरसादनन्यमनसा येनान्वहं सेविताः । देवस्तीर्थकदेव केवलनिषिविद्यानिधान गुरु , सूरि श्रीहरिभद्र एव गुणधीः सिद्धेश एवाधिपः ॥४५॥ सीताकुक्षिसरोवरैकवरलाकान्तोऽश्वराजाख्यया, तस्याभूत् तनुभूः सदाऽपि जननीभक्तौ च यः पावनः । स्फुर्जर्जटिजूटकोटरपदन्यासोत्यपापच्छिदे, स्वनद्याऽपि समाश्रित. सितलसत्कीर्तिच्छविच्छद्मना ॥१६ सप्तलोकचरी सप्ततीर्थयात्रासमुद्भवा । गन्ना जिगाय यत्कीर्तिविश्वत्रितयविस्तृताम् ॥४७॥ भैमीव नैषधमहीरमणस्य तस्य, कान्ता सती समजनिष्ट कुमारदेवी। यन्मानसे जिनपदाम्बुजभाजि शुद्धपक्षद्वयः पतिरराजत राजहंसः ॥४८॥ श्रीमल्लदेव इति तत्तनुमूर्बभूव, यत्कीर्तिपूरशशिनोर्गगनाकपीठे। स्पोंडुरं प्रसृतयोरिव साम्यदण्डं, स्वर्दण्डमेव विपिरन्तरधत्त हृष्टः ॥१९॥ विद्यते ह्यविद्यौ तदनु तदनुजौ धीनिधी वस्तुपाल- स्तेजःपालश्च तेजस्तरणितरुणिमस्फूर्तिरोचिष्णुमूर्ती । श्रीमन्नेतौ निजश्रीकरणपदकृतव्याप्ती प्रीतियोगात् , तुभ्यं दास्यामि विश्वं जयतु नवनवं धाम तन्मन्त्रमित्रम् इत्युक्त्वा प्रीतिपूर्णाय, श्रीवीरधवलाय तौ । श्रीभीमभूमुजा दत्तौ, वित्तमाप्तमिवाऽऽमनः ॥५१॥ अन्ये केचन रोचमानमतयो मन्त्रीधरा भास्करा, लप्स्यन्ते यत ! वस्तुपालसचिवाधीशेन साम्यं कुतः । सार्थ यलघुबन्धुनाऽपि दिविपद्वृन्दैकमान्यः स्वय, सामान्यप्रतिपचिगौरवपदं वाचस्पतिन्छति 1॥५०॥ ॥ ५२ ॥ ...
१.°चत्थाय मा०॥ २. पद्यमिद पुरातनप्रबन्धसंग्रहान्तर्गतयस्तुपालतेजःपालप्रयन्धे-"एकदा मन्त्री मेकं गणु | [मन्प्रिणोकम्-आदिश्यताम् । भय पाचात्ययामिन्यां दा युवत्येका समेत्य प्राह" युटेखानन्तरं निष्टतिं वर्तते । पत्रम् ६२ सथा उपदेशतरविण्या समपत्रेऽप्यस्पेगैव वर्तते । केवल तत्र , सुपतचेत्याकराचार्यरुक्तम्" इति वर्तते, न तत्र रासिाहयरेन्यस्य वा कस्याप्याचार्यस्य नामोल्लेखो वर्तते इति । | श्रीमुनिसुयतचैत्याचार्य श्रीरासिलत्रिमिरुकम्-मन्धिन् ! सन्देशक [पष्ट जयसिंहसूरिविरचिता वीरश्रीवरधानि वीरधवले सिंहारवान् मारवान्, जेतुं यातयति प्ररूढपुलकर यूरयन् पौरुषम् ।' यस्तीर्णा यदुसिंहसिंहणवलाम्भोधि मुजक्रीडया, गर्जन्नर्जितवान् यशस्त्रिजगतीमुक्तालतामण्डनम् ।।५३।। सम्पूर्णे भुवने धनेन रजसा श्रीतीर्थयात्रापरिस्यन्दिस्यन्दनवृन्दतारतुरगनातक्रमोरपातिना । यत्कीर्ते. सह पांशुकेलिमुहृदो नन्दन्ति मन्दाकिनी-दुग्धाम्भोधि-विभावरीविभु-ककुप्कुम्मीन्द्र-रुद्रादयः५१ येनाऽकारि तमोनिकारिकलशालकारि शत्रुञ्जयक्ष्मामृन्मण्डनमिन्द्रमण्डपमहो । नामेयमर्तुः पुरः । तेनैकां युधुनी दधद्धिमगिरिः पार्श्वस्थपार्श्वप्रभु-श्रीमन्नेमिनिकेतकेतनयुगामोगेन निर्मर्सितः ॥१५॥ या शत्रुञ्जयशेखर जिनगृहश्रीतारहारं स्खलत्ताराधोरणि तोरणं यदसृजत् तन्मूर्ध्नि लक्ष्मीः स्थिता । शऽमृदुदितद्विपक्षवदना नन्तुं समागच्छतो, नामेयं प्रणिपत्य च प्रचलतो यस्याऽऽस्यवीक्षाशया॥५६॥ श्रीशनुञ्जयशृङ्गसीनि सरसि पाप्याम्बु यत्कारिते, नीचत्वाय सुधाकराय विबुधाः कुर्वन्ति नोपक्रमम् । इत्यूहं कृतिनोऽन्वहं विदधते कुन्दावदातद्युता, भास्वच्छाश्वतराकया जगति यत्की, परीतेऽभितः ५७ येन व्यधाप्यत विधुयुतिहारिवारी, श्रीपादलिप्सनगरीमुकुरस्तडागः । यद्यस्त्यगस्तिरिह कोऽपि तदेतु तन्याद्, दोःस्फालनं मुहुरितीव महोर्मिभिर्यः अर्फपालितकमामे, तेन तेनेऽद्भुतं सरः । यस्य निस्यन्दलेखेव, पावे वहति वाहिनी येनोजयन्तगिरिमण्डननेमिचैत्ये, नामेय-पार्श्वजिनसद्मयुगं व्यधायि । अन्तः स्वयंघटितनामिज-नेमिनाथ-श्रीस्तम्मनेशगृहमप्युदधारि हारि स्वमं यद्गुरुचैत्यतोरणशिर पद्यापदैः प्राप यद्वापी-कूप-तडागमार्गचलनैः पातालमूलं ययौ ।' सा यत्पौषध-मन्दिरोदर-वराऽऽरामप्रपामध्यमूविश्रामश्रयणेन मिमपि यत्कीर्तिर्मुहुर्गाहते ॥६१ ।' यन्निापितदेवमन्दिरशिरःकल्याणकुम्भप्रमाप्राग्भारैर्विदघे सदा मुदिवस सर्वत्र धात्रीतले ।। दृश्यः शाश्वतिकस्तथा प्रसमरश्यामच्छविच्छद्मना, यत्खगक्षतवैरिवामनयनावक्त्रेषु रात्रिक्षणः ॥१२॥ अस्थापयत् स्थिरमतिः शकुनीविहारे, संसारतारिलसदम्बडधर्मपुजे। श्रीपार्श्व-वीरजिनपुङ्गवयुग्मदम्भाद्, यो यामिकद्वयमिवामिमधर्मयन्धुः तमेकदा करारोपमत्सितस्वर्णशेखरः । श्रीतेजःपालमन्त्रीशो, मुदा ज्येष्ठं व्यजीज्ञपत् सुव्रतक्रमनमस्कृतिहेतोर्यातवान् भृगुपुरं प्रति सोऽहम् । काव्यमुज्वलनयो जयसिंहर रिरित्यपठदन मदने तेजपाल ! कृपालधुर्य ! विमलप्राग्वाटवंशध्वज !, श्रीमन्नम्पडकीर्तिरद्य वदति त्वत्सम्मुख मन्मुखात् । ॥५८॥ ॥ ५९॥ ॥६०॥ ॥६३॥ ॥६४ ॥ ॥६५॥ तेज.पालो भृगपुरमायात । तत्र 'धीमुनि . + -- परिशिष्टम् ] यस्तुपालतेजापालप्रशस्तिः। आजन्मावधि वंशयष्टिकलिता प्रान्ताङ्गमेकाकिनी, वृद्धा सम्प्रति पुण्यपूर्ण ! भवतः सौवर्णयष्टिस्पृहा ॥६६॥ इत्युक्त्वा मम पञ्चविंशतिमितास्तेन स्वयं दर्शिता- स्तस्मिन् सुव्रतधाग्नि देवकुलिकाः कल्याणकुम्भस्पृशः । ता:-सौन्दर्यमृतोऽपि कान्तिनिधिभिः कल्याणदण्डैर्विना, सीमन्तैरिव सुभ्रुवो विदधते नान्तः सतां सम्मदम् आदेशं देव! यद्येवं, दत्से 'स्वच्छेन चेतसा । हेमदण्डानिमानत्र, तदहं कारये स्यात् इत्यन्तःस्मितवस्तुपालसचिवादेशाल्लसचेजसस्तेजःपालमहामतिर्व्यरचयत् कल्याणदण्डानिमान् । प्रत्येकं हरहासहारिमहसो येषां शिखासु स्थिता, नृत्यन्ति प्रतिवासरं परिचलत्केतुच्छलात् कीर्तयः ६९ जुहन् पातकपादपैकदहने तीर्थेशधर्मे निजां, कर्माली न कति ऋतूनकृत स श्रीवस्तुपालानुजः।। दण्डा यूपवदुच्चसुत्रतगृहक्ष्माभृद्भवायाममी, तत्तेनाऽम्बडमण्डलेश्वरयशःसिन्धौ समारोपिताः ॥७॥ दत्ते चेतसि सम्मदं सुकृतिनां तेनेयमुत्तम्भिता, चच्चच्चारुमरीचिवीचिकलिता कल्याणदण्डावलिः । पूर्वोर्वीधरकुश्नतः प्रसरता प्रातर्वियत्कानने, यत्राऽऽगत्य भियेव गोपतिगवीवृन्देन मन्दायते ॥ १ ॥ यावचण्डपगोत्रमण्डनमणेः कीर्तिर्षियद्वाहिनीहस्ता दिग्गजगर्जिवाद्यविभवोमारणे नृत्यति । दण्डास्तापदमी सुवर्णघटनाविनाजिनः केतनक्रीडत्किक्षिणिकारवव्यतिकरैः कुर्वन्तु गीतकमम् ॥७२॥ तेजपालयशोविलासविशदश्रीणां दिशां कौतुकक्रीडामण्डपडम्बरं महदहो ! यावद् दधात्यम्बरम् । तावन्नूतनजातरूपजनितः सोऽयं समुत्तम्मनस्तम्भस्तोमसमानतां वितनुतामुद्दण्डदण्डमजः ॥ ७३ ॥ स्वस्तिश्रीव्योमदेशादुदयनतनुभूकीर्तिरुर्वीतले श्री- तेजपालं प्रसन्ना वदति मतिमता वन्द्य ! नन्धा मदायुः । येन त्वत्कृप्तहेमध्वजयिततभुजा दुःषमादाहदूना, लिम्पन्तां ता मुहुर्मामिह जिनगृहिकास्त्वद्यशश्चन्दनेन ॥ ७४॥ मोहो द्रोह धियाऽधिरोहति रस श्रीपुञ्जहृत्पञ्जरे, क्षिप्तो यः कलिकालकेलिविधुरो दक्ष ! त्वया रक्षितः। यीसोमान्वयवार्षिवर्धनकलासोम! स्वयं निर्मलो, धर्मः प्रत्युपकारकर्मठतया स त्वां क्षितौ रक्षतु ॥७५|| श्रीवस्तुपाल! तव चितवनप्ररूढः, सत्त्वोपकारमतिसारणिसिच्यमानः । सत्पत्र-पुण्यकुमुमः फलदोऽस्तु तुभ्यमव्याजविश्वसुहृदे जिनधर्मवृक्षः ॥ ७६॥ श्रीमुक्तपदाम्भोजमधुप्रातमधुव्रतः । एतां प्रशस्तिमस्तापां, जयसिंहः कविय॑धात् ॥ ७७॥ ॥ श्रीजयसिंहत्रिविरविता यस्तुपालतेजःपालप्रशस्तिः ।
सप्तमं परिशिष्टम्
वस्तुपालस्तुतिकाव्यानि ।
स्वस्ति श्रीवस्तुपालाय, बभौ यहुद्धिसुभ्रवः । क्रोडीकृताम्बरं रौप्याञ्जनभाजनवद् यशः ॥ १॥
अन्तःक्षारं रिपूणां धनमपि कवलीकृत्य तृष्णातुरेव,
त्वत्कीर्तिर्नाऽऽप तृप्ति भुवि सचिव ! जवात् क्षीरनीराकरेऽपि ।
तस्मादाकाश-नाकोरगनगरचरस्वर्धनीपानहेतोः,
सर्वत्रापि त्रिलोकीहितचरित ! चिरं सम्भ्रमाद् बम्भ्रमीति
भवद्भुजभुजमोऽसौ, वस्तुपाल ! द्विषां भये । असि दधाति फूत्कारविपोद्गारसहोदराम्
औषधीशसखः सत्यं, वस्तुपालयशोभरः । येन प्रसर्पता पश्य, विश्वं मुक्तामयं कृतम्
शेपद्वेषविधायिनीमपि भवत्कीर्ति सुधासोदरां, श्रीमन्त्रीश ! मुखस्फुरद्विषभिदे गायन्ति नागाशनाः ।
शम्भुः स्वाङ्गविरोधिनीमपि पुनर्नित्योपरोधादिमां, देवीर्गापयते विषाकुलगलश्यामत्वसंलप्तये ॥५॥
कल्पद्रुमसवावतंसमधुपीझङ्कारलब्धोपमाः, काम कामगवीनवीनपयसां पानेन तारस्वराः ।
ताश्चिन्तामणिरश्मिभस्मिततमःस्तोमे सुमेरोर्गुहागमें चण्डपगोत्रमण्डन ! भवद्दानानि देव्यो जगुः ॥६॥
देव! त्वत्प्रतिपन्थिपार्थिवपुरीसौधाग्रभागादिव, प्राप्य व्योमविहारदुर्लभमपि प्रौढप्ररूढप्रभः ।
श्रीमञ्चण्डपगोत्रमण्डना भवत्की, जितो यामिनीजीवेशस्तनुते तृणं निजमुखे लक्ष्मच्छविच्छद्मना ||७||
गुणग्रामे रामे जितसितकरे सत्यपि निजे, स्वयं गृहासि त्वं परगुणमतादृक्षमपि यत् ।
अयं लोमक्षोभश्चतुर! चतुराम्भोधिरसनावनीशिक्षादक्ष ! स्फुरति किमु ते मन्त्रिमुकुट !!
भोगीन्द्रस्त्वगुजेन त्रिपुररिपुरपि त्वत्प्रभुत्वप्रभावैः,
शीताशुस्त्वन्मुखेन त्रिदशसरिदपि त्वच्चरित्रप्रपञ्चैः ।
शक्रेभस्त्वद्गतेन प्रसभमशुभतां लम्भिताः सज्जलज्ज,
निर्मजन्ति स्म तस्मिन् सचिव ! तव यशस्तोयधौ वस्तुपाल !
भर्ता भोगभृतां विभर्ति वसुधामेव प्रभावागुता,
दिग्दन्तीन्द्रकरस्तु हन्ति च रिपून धत्ते च धात्रीमिमाम् ।
श्रीमन्त्रीश ! मवगुजस्तु कृतिना दत्ते च वित्तव्रज,
भिन्ते च द्विषतो दधाति च धरामेषां क साम्यं मिथः !
इन्दुर्निन्दति कौमुदीसमुदयं मुक्तामणीनां ततिर्मुक्तालतिरस्तचण्डिमहिम दी न साधिपः ।
गर्व शर्वधराधरो न कुरुते न स्वधुनी स्पद्धिनी, श्रीमन्त्रीश्वरवस्तुपालयशसि त्रैलोक्यमाक्रामति ॥११॥
पलि-कर्ण-दधीचिकीर्तयः, कलिपार्पितमत्यजन् मलम् ।
तव दानपयोनदीकृतस्नपनवण्डपगोत्रमण्डन ।
शो परजिनीपतिः फतुभुजा साथै. स्वयं प्रार्थितः, कर्ष कमिलातलादनुदिनं त्वदानतोयच्छटाः ।
श्रीमचण्डपवंश्य। सियति शचीचिवेशलीलावन, नैवं चेत् कथमन्यथा विटपिनामप्यत्र दानक्रिया ॥१३
॥ यस्तुपालस्तुतिकाव्यानि ॥
॥८॥
॥१०॥
॥ १२॥
अष्टमं परिशिष्टम् वस्तुपालस्तुतिकाव्यानि । [महामात्यश्रीवस्तुपालविनिर्मितनरनारायणानन्दमहाकाव्यप्रतिसर्गप्रान्त- गवानि अन्यान्यकविविरचितानि वस्तुपालस्तुतिकाव्यानि।] सवामसिंहपृतनारुधिरारुणानि, श्रीवस्तुपालकरवालविजृम्भितानि । कीनाशकासरकटाक्षसहोदराणि, को नाम चीक्षितुमपि क्षमते विपक्षः ॥१॥ प्रथमसर्गप्रान्ते ॥ दृश्यः कस्यापि नायं प्रथयति न परमार्थनादैन्यमन्य- स्तुच्छामिच्छां विधत्ते तनुहृदयतया कोऽपि निप्पुण्यपण्यः । इत्थं कल्पद्रुमेऽस्मिन् व्यसनपरवशं लोकमालोक्य सृष्टः, स्पष्टं श्रीवस्तुपालः कथमपि विधिना नूतनः कल्पवृक्षः ! ॥२॥ द्वितीयसर्गप्रान्ते ॥ श्रीवस्तुपाल ! कलिकालविलक्षणस्त्वं, संलक्ष्यसे जगति चित्रचरित्रपात्रम् । यद् दानसौरमवता भवता वितेने, नानेकपेन मदमेदुरिता मुखश्रीः ॥ ३ ॥ तृतीयसर्गप्रान्ते ॥ गृहासि नाम परतोऽपि नवान् गुणांस्त्वं, त्यागो गुणस्तव नवस्तु न वस्तुपाल ! । लोकोत्तरस्तदपरस्य नरस्य स स्याद्, यत् तादृशो नहि दृशोः पथि माहशानाम् ॥ ४ ॥ चतुर्थसर्गप्रान्ते ॥ कैरसरसिरुई ते वासवेश्म श्रियोऽभूदजनि वदनपञ सम वाग्देवतायाः । इह जगति समस्ते वस्तुपाल! स्तुमः कं ! , सचिवतिलक ! धन्यं तद् वदाऽन्यं वदान्यम् ॥ ५॥ पञ्चमसर्गमान्ते ।। १ पमिदं धर्माम्युदयमहाकाव्यैकादशसर्गप्रान्ने वत, उदयप्रमीयवस्तुपालस्तुतौ २३तमं वर्तते, जिनहीयवस्नुपालचरिते "कृपालवालं श्रीवस्तुपालं स्तौति स्म कश्चन ।" इत्युल्लेखेन निर्दिष्ट ऋषि दर्तते ॥ २ पथमिदमुदयशमीयवस्तुपालस्तुती २२तम वर्तते ॥ ३ पद्यमिदं नरनारायणानन्द- महाकान्यनवमसर्गप्रान्तेऽपि पर्तते । - કર मिटम मन्यान्यकयिविरचितानि इतरगुणकथायाः काथिकत्वस्पृहायामिह वहति सहास्यं कस्य नो लास्यमास्यम् ।। तव तु विततकीर्तेः कीर्तनं कर्तुकामः, सुरगुरुरपि शढे वस्तुपाल ! त्रपालुः ॥६॥ षष्ठसर्गान्ते ॥ जनव्यामोहवल्लीयमिन्दिरा मन्दिरे स्थिता । मन्त्रिणा वस्तुपालेन, कल्पवल्ली विनिर्मिता ॥७॥ सप्तमसर्गप्रान्ते ॥ . श्रीवस्तुपालसचिवस्य परे कवीन्द्राः, कामं यशांसि कवयन्तु वयं तु नैव । येनेन्द्रमण्डपकृतोऽस्य यशःप्रशस्ति-रस्त्येव शक्रहृदि शैलशिलाविशाले ॥८॥ अष्टमसर्गप्रान्ते ।। कैरसरसिरुहं ते वासवेश्म श्रियोऽभूदजनि वदनपमं सद्म वाग्देवतायाः । इह जगति समस्ते वस्तुपाल ! स्तुमः के?, सचिवतिलक ! धन्यं तद् वदाऽन्यं वदान्यम् ॥९॥ नवमसर्गप्रान्ते ॥ या श्रीः स्वयं जिनपतेः पदपद्मसद्मा, भालस्थले सपदि सङ्गमिते समेता । श्रीवस्तुपाल! तव भालनिभालनेन, सा सेवकेषु सुखमुन्मुखतामुपैति दशमसर्गप्रान्ते ॥ त्वत्कीर्तिज्योत्स्नया जाते, तीरे नीरेशितुः सिते । नेक्ष्यन्ते पक्षिभिर्वस्तुं, वस्तुपाल! वनालयः ॥११॥ मुकुलितकमलोदयः कवीन्दुः, क इव न काव्यसुधानिधिर्वभूव ! । स्फुरदुरुविभवस्तु वस्तुपालः, कविसविता कविताप्रभाभिरामः एकादशसर्गप्रान्ते शूरो रणेषु चरणप्रणतेषु सोमो, वक्रोऽतिवक्रचरितेषु बुधोऽर्थबोधे । नीतौ गुरुः कृतिजने कविरक्रियासु, मन्दोऽपि च ग्रहमयो नहि वस्तुपालः ॥ १३ ॥ ॥ १०॥ ॥ १२॥ द्वादशसर्गप्रान्ते ॥ श्रीवस्तुपाल ! जितबालमृणालगर्भ, शुभ्र वितन्वति जगत् तव कीर्तिपूरे । मन्यामहे कुवल-कज्जल-कोकिला-ऽलिकाकोल-कोलसदृशामभिधा मुधाऽभूत् ॥ १४ ॥ त्रयोदशसर्गप्रान्ते ॥ लक्ष्म्यामाकृष्टिमुच्चाटनमनयवति स्तम्भमुज्जृम्भिदम्मे, दोपे विद्वेषमभ्यन्तररिपुषु मृति वश्यतां चित्तवृत्तौ । १ पमिदं धर्माभ्युदयमहाकाव्यपसममर्गप्रान्ते, उदयप्रभीयवस्नुपालस्तुती व २४तमं वर्तते । २ पमिदं नरनारायणानन्दमहाकाव्यपश्चमसर्गप्रान्तेऽपि वर्तते ॥ ३ पद्यमिद धर्माभ्युदयमहाकाव्यः तृतीयगर्गप्रान्ते:पि वर्तते ॥ ४ पद्यमिदं उदयप्रभीयवस्तुपालस्तुतौ चतुर्थ वर्तते, प्रपन्धकोशे "अपर इन्युरोनोविखितं वर्तते, उपदेशतरङ्गिण्या कविन्दमध्यान् कस्यचिकितयोलिखितं च वर्तते, जिनहर्षीय पस्तुपालयरिने पुनः हरिहरोक्तितया निहिनं दृश्यते ॥
४३ - परिशिष्टम् ] वस्तुपालस्तुतिकाव्यानि । कर्तुं यद् वस्तुपाल ! प्रभवसि सकले मण्डले तत् तवैव, श्रीमन्मत्रीश ! मन्ने स्फुरति निरवधिः काऽपि पट्कर्मसिद्धिः ॥ १५॥ चतुर्दशसर्गप्रान्ते ॥ मवति हि विभवो भवः परेपा, तय विभवोऽभिनवस्तु वस्तुपाल । इह महिममहो यशः प्रसूते, यदयममुन्न परत्र पुण्यलक्ष्मीम् । पञ्चदशसर्गप्रान्ते ॥ अचिन्त्यदातारमजातशत्रं, श्रीवस्तुपालं कति नाश्रयन्ति ! । चिन्तामणिः सोऽपि युधिष्ठिरश्च, नान्वर्थसामर्थ्यपदं यदने ॥ १७॥ शहे शारदपर्वगर्वितशशिज्योत्स्नासपलं तव, त्रैलोक्ये गुणजालकं विलसति श्रीवस्तुपालाद्रुतम् । यत् ताहादृढपाशवैशसकृतातकामिशङ्काः स्फुट, नैवान्यस्य भवन्ति कीर्तिवरलाः खेलासु हेलास्पदम् षोडशसर्गप्रान्ते ।। - वस्तुपालस्तुतिकाव्यम् । श्रीवस्तुपालमन्त्रिणा सौवर्णमपीमयाक्षरा एका सिद्धान्तप्रतिलेखिता । अपरास्तु श्रीताड- कागदपत्रेषु मपीवर्णाञ्चिताः ६ प्रतयः । एवं सप्तकोटिद्रव्यव्ययेन सप्त सरस्वतीकोशा लेखिताः । वदनु श्रीउदयप्रमसूरिमिराशीर्वादः प्रदत्तः । तद्यथा- जम्बूद्वीपो जलघिपरिखाभूपितो यावदास्ते, ज्योतिश्चक्र सुरगिरितटीं पर्यटत्येव यावत् । यावत् कूर्मो वहति वसुधा त्वद्यशःपुजसाधु, जीयाज्जैन मुखमिव परं पुस्तक वस्तुपाल 1 ।। उपदेशतरङ्गिणी पत्रम् १४२ ॥ १.पमिदं मिनदीययस्तुपालचरिते "पालवालं थ्रीवस्तुपालं स्तौति स्म स्श्वन ।" इत्यु खेनो- द्विमिन वार्तते ।। २ पद्यमिदमुदयप्रमीयवस्तुपालस्तुतौ २५तमं यती ।।
नवमं परिशिष्टम् श्रीगिरिनारपर्वतस्थाः प्रशस्तिशिलालेखाः । गूर्जरेश्वरमहामात्यश्रीवस्तुपाल-तेजःपालकारितश्रीनेमिनाथप्रासाद गताः पट् बृहत्प्रशस्तयः । - ॥१ ठ० श्रीआश (३८-१) नमः सर्वज्ञाय । पायानेमिजिनः स यस्य कथितः स्वामीकृतागस्थिता- वग्रे रूपदिदृक्षया स्थितवते प्रीते सुराणां प्रभौ । काये भागवते वनेवक...द्विपोलावने शंसता- मिदशा(१)....मपि.......वनाजवे. स्वस्ति श्रीविक्रमसंवत् १२८८ वर्षे फागुण शुदि १० बुधे श्रीमदणहिलपुर(*)वास्त प्राग्वाटान्वयप्रसूत ठ० श्रीचंडपात्मज ठ० श्रीचंडप्रसादांगज ठ० श्रीसोमतनुज राजनंदनस्य ठ० श्रीकुमारदेवीकुक्षिसभूतस्य ठ० श्रीलुणिग महं० श्रीमालदेवयोरनुजस्य महं श्रीतेजःपालामजन्मनो महामात्यश्रीवस्तुपालस्यात्मजे महं० श्रीललितादेवीकुक्षिसरो(*)वरराज हसायमाने महं० श्रीजयतसिंहे सं० ७९ वर्षपूर्व स्तंभतीर्थमुद्राव्यापारान् व्यापृण्वति सा सं० ७७ वर्षे श्रीशत्रुजयोजयंतप्रभृतिमहातीर्थयात्रोत्सयप्रभावाविर्भूतश्रीमद्देवाधिदेवप्रसादासादित संघाधिपत्येन चौलुक्यकुलनभस्तलप्रकाशकमार्तडमहाराजाधिराजश्रीलवणप्रसाददेवसु(*)तमहाः राजश्रीवीरधवलदेवप्रीतिप्रतिपन्नराज्यसर्वैश्वर्येण श्री-शारदाप्रतिपन्नापत्येन महामात्यश्रीवस्तुपालेन तथा अनुजेन सं० ७६ वर्षपूर्व गूर्जरमंडले घपलककप्रमुखनगरेषु मुद्राव्यापारान् व्याटण्वता महं० श्रीतेजःपालेन च श्रीशनुजया-र्बुदाचलप्रभृतिमहातीर्थेषु श्रीमदणहिलपुर-मृगुपुर-(*)स्तम- नकपुरस्तंमतीर्थ-दर्भवती-धवलककपमुखनगरेषु तथा अन्यसमस्तस्थानेष्वपि कोटिशोऽभिनवधर्म- स्थानानि प्रभूतजीर्णोद्धाराश्च कारिताः ॥ तथा सचिवेश्वरवस्तुपालेन इह स्वयंनिर्मापितश्रीशजय- महातीर्थावतारश्रीमदादितीर्थकरश्रीमपमदेव-स्तंमनकपुरावतारश्रीपार्श्वनाथदेव-सत्यपु(*)रावता. रश्रीमहावीरदेवप्रगस्तिसहित-कश्मीरायतारश्रीसरस्वतीर्तिदेवकुलिकाचतुष्टय-जिनयुगल अम्मा ऽवलोकना-शाम्ब-प्रद्युम्नशिखरेषु श्रीनेमिनाथदेवालंकृतदेवकुलिकाचतुष्टय-तुरगाधिरूढस्वपितामह महं० ठ० श्रीसोम-निजपितृ ठ० श्रीआशाराजमूर्तिद्वितय-चारुतोरणत्रय-श्रीनेमिनाथ (1) देव-आत्मीयपूर्वजा-अजा-भुज-पुत्रादिमूर्तिसमन्वितमुखोद्धाटनकस्तंभश्रीअष्टापदमहातीर्थप्रमृतिअने- १ परिशिष्टेऽम्मिन् (6) गकोटमं पुलिनिहं सर्वत्र हिरालेखपफिसमाप्तिद्योतकमरसातम्यम् ॥ 4m 1. । 11 4 परिशिष्टम् ] 1 गिरिनारपर्वतस्थाः प्रशस्तिशिलालेखाः । ककीर्तनपरम्पराविराजिते श्रीनेमिनाथदेवाधिदेवविभूषितश्रीमदुजयंतमहातीर्थे आत्मनस्तथा स्व- धर्मचारिण्याः प्राग्वाटज्ञातीय ठ० श्रीकान्हडपुत्र्याः ठ० राणुकुक्षिसंभूताया महं० श्रीललिता- देव्याः (4) पुण्याभिवृद्धये श्रीनागेंद्रगच्छे मट्टारकश्रीमहेंद्रसूरिसंताने शिष्यश्रीशांतिसूरिशिष्य- श्रीआणंदचरि-श्रीअमरसूरिसट्टे भट्टारकश्रीहरिभद्रसरिपट्टालंकरणप्रभुश्रीविजयसेनसरिमतिष्ठित- श्रीअजितनाथदेवादिविंशतितीर्थकरालंकृतोऽयमभिनवः समंडपः श्रीसम्मेवमहातीर्थावतारपा- सादः कारितः ॥ (*) पीयूपपूरस्य च वस्तुपालमन्त्रीशितुश्चायमियान् विभेदः । एकः पुनर्जीवयति प्रमीतं, प्रमीयमाणं तु भुवि द्वितीयः श्रीद-श्रीदयितेश्वरप्रभृतयः संतु क्वचित् तेऽपि प्रीणति प्रमविप्णवोऽपि विमवै किंचनं कंचन । सोऽयं सिंचति कांचनैः प्रतिदिनं दारिद्रयदावानल- प्रम्लानां पृथिवीं नवीनजलदः श्रीवस्तुपालः (*) पुनः ॥२॥ प्रातः ! पातकिनां किमत्र कथया दुर्मत्रिणामेतया !, येषां चेतसि नास्ति किंचिदपरं लोकोपकारं विना । नन्वस्यैव गुणान् गृणीहि गणशः श्रीवस्तुपालस्य य- स्तद्विश्वोपकृतित्रतं चरति यत् कर्णेन चीर्णं पुरा मित्त्वा भानुं भोजराजे प्रयाते, श्रीमुंजेऽपि स्वर्गसाम्राज्यमाजि । एकः संप्रत्यर्थिनां वस्तुपालस्तिष्ठत्यश्रु (*) म्यदनिकंदनाय चौलुक्यक्षितिपालमौलिसचिव ! त्वत्कीर्तिकोलाहल- त्रैलोक्येऽपि विलोक्यमानपुलकानंदाश्रुभिः श्रूयते । किं चैषा कलिदूपिताऽपि भवता प्रासाद-वापी-प्रपा- कृपा-ऽऽराम-सरोवरप्रभृतिभिर्घात्री पवित्रीझता से श्रीतेजःपालः, सचिवश्चिरकालमस्तु तेजस्वी । येन वयं निश्चिताश्चिंतामणिने(४)व नंदामः लवणप्रसादपुत्र श्रीकरणे लवणसिंहजनकोऽसौ । मंत्रित्वमत्र कुरुतां, कल्पशतं कल्पतरुकल्पः पुरापादेन दैत्यारेर्मुचनोपरिवर्तिना । अधुना वस्तुपालस्य, हस्तेनाधःकृतो बलिः ॥८॥ दैयिता ललितादेवी, तनयमवीतनयमाप सचिवेंद्रात् । नाना जयंतसिंह, जयंतमिन्द्रात् पुलोमपुत्रीव ॥ ९॥ (8) [एते ] श्रीगूर्जरेश्वरपुरोहित ठ० श्रीसोमेश्वरदेवस्य । १ परमिदं चीनजेनलेखसंग्रह १ भागे ६४ संख्य १.१ संस्थादाचलमत्वाशिलालेसयो क्रमशः तमं अपमं च सोमेश्वरदेवकृतिरूपेणैव वर्तते ।। २ पद्यमिदं प्राचीन नलेखसंग्रह १ मागे ६४ संख्यार्बुदाचनमक- शिलले म सोमेभरदेवकृतिरूणव वत्तते ॥ - निमपितृ ठ० श्रीआशाराज (6) मर्तिद्वितय-चारुनोरणत्रय-श्रीनेमिनाथदेव-आत्मीयपूर्वजा-अजा- जुन-पुत्रादिगतिसमन्वितमुमोसाटनकम्तम्भ-श्रीअष्टापदमहातीर्थममृतिअनेककीर्तनपरम्पराविराजिते श्रीनेमिनायदेयापिदेवविपिन श्रीमदुमपन्तमहातीर्थ आत्मनस्तथा स्वमार्यायाः प्राग्वाटभातीय 30 भीकानदडपुप्याः ट० () राशिगमनाया मह० श्रीमोगुकायाः पुण्याभिवृदये श्रीनागेन्द्र २ पमर पापा १ मा १-४१ मध्यगिरिनारमारण्यो. प्रान्नमागेऽपि ।' १ प प्राचीनजनाप्रमग 1-01-1 गंम्यगिरिनारमारशस्नियति प्रान्तमाये पती पनि प्राया 1-1.-.-पनिरिनारमरामि शन्तमागे रत ४६ [ नवौ 1 गिरिनारपर्वतस्थाः प्रशस्तिशिलालेखाः । स्तंमतीर्थेऽत्र कायस्थवंशे वाजडनंदनः । प्रशस्तिमेतामलिखत् , जैत्रसिंह वः सुधीः ॥ १॥ वाहडस्य तनूजेन, सूत्रधारेण धीमता । एपा कुमारसिंहेन, समुत्कीर्णा प्रयत्नतः श्रीनेमेनिजगद्भर्तुरम्बायाश्व प्रसादतः । वस्तुपालान्वयस्यास्तु, प्रशस्तिः स्वस्तिशालिनी ॥३॥ (गिरनार इन्स्क्रिप्शन्स् नं. २ । २१-२३) (३९-२) ............यः पु....तयदुकुलक्षीरार्णवेन्दुर्जिनो, यत्पादाब्जपवित्रमौलिरसमश्रीरुजयन्तोऽप्ययम् । धचे मूर्ध्नि निजप्रभुप्रसमरोद्दामप्रभामण्डलो, विश्वक्षोणिभृदाधिपत्यपदवीं नीलातपत्रोज्वलाम् स्वस्ति श्रीविक्रमसंवत् १२८८ वर्षे फागुण शुदि १० बुधे श्रीमदणहिल(4)पुरवास्तव्य- प्राग्वाटान्वयमसूत ठ० श्रीचण्डपालात्मज ठ० श्रीचण्डप्रसादागज ठ० श्रीसोमतनुज ठ० श्री- आशाराजनन्दनस्य ४० श्रीकृमारदेवीकुक्षिसंमृतस्य ४० श्रीलुणिग महं० ठ० श्रीमालदेवयोरनु जस्य महं० ४० श्रीतेजःपालामजन्मनों महामात्यश्रीवस्तुपालस्यात्मजे महं० ०० श्रीललितादेवी (*) कुक्षिसरोवरराजहंसायमाने महं० श्रीजयन्तसिंहे स० ७९ वर्षपूर्व मुद्राव्यापार व्यापृण्वति सति सं० ७७ वर्षे श्रीशQजयोजयन्तप्रभृतिमहातीर्थयात्रोत्सवप्रभावाविर्भूतश्रीमद्देवाधिदेवप्रसादासादि- तसंघाधिपत्येन चौलक्यकुलनमस्तलप्रकाशनैकमार्तण्डमहाराजाधिराजश्रीलयण()प्रसाददेवमुतम- हाराजश्रीवीरधवलदेवप्रीतिप्रतिपन्नराज्यसर्वेश्वर्येण श्री-शारदाप्रतिपन्नापत्येन महामात्यश्रीवस्तुपालेन तथाऽनुजेन सं० ७६ वर्षपूर्व गुर्जरमण्डले धवलककपमुखनगरेषु मुद्राव्यापारान् व्यापृण्वता महं० श्रीतेजापालेन च श्रीशत्रुजया-युंदाचलप्रभृतिमहातीर्थेषु (४) श्रीमदणहिलपुर-भृगुपुर-स्तम्भनक पुरस्तम्मतीर्थ-दर्मवती धवलककामुम्वनगरेषु तथाऽन्यसमस्तस्थानेष्वपि कोटिशोऽभिनवधर्मस्थानानि प्रगतजीर्णोद्धाराश्च कारिता । तथा सचियेश्वरश्रीवस्तुपालेनेह स्वयंनिर्मापितश्रीशश्रृंजयमहातीर्ण वतारयामदादितीर्थकरभीपमदेव () स्तम्भनकपुरावतारधीपार्श्वदेव-सत्यपुरावतारश्रीमहावीरदे वप्रमस्तिसहित-कश्मीरावतारश्रीसरस्वतीर्तिदेवकुलिकाचतुष्टय-जिनद्वयाऽम्याऽवलोकना-या म-प्रद्युम्नशिखरेषु थीनेमिनाथदेवालंकृतदेवकुलिकाचतुष्टय-तुरगापिम्दनिजपितामह ठ० श्रीसोम गयो महारकीमहेन्द्रगरिमन्नाने निभ्यश्रीशान्तिगरिमिष्यश्रीपानन्दयरि-श्रीअमरधरिपट्टे म
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परिशिष्टम् ] । गिरिनारपर्वतस्याः प्रशस्तिशिलालेखाः ।
रकश्रीहरिभद्रहरिपट्टालंकरणश्रीविजयसेनरिमतिष्ठितथीऋषभदेवप्रमुखचतुर्विशतितीर्थकरालंकृतो-
ऽयमभिनवः समण्ड(*) पः श्रीसंमेतमहातीर्थावतारप्रधानप्रासादः कारितः ॥
चेतः किं कलिकाल | सालसमहो । किं मोह ! नो हस्यते ।
तृप्णे ! कृष्णमुखाऽसि कि ? कथय किं विनौष ! मोघो भवान् ।
ब्रूमः किं नु सखे !! न खेलति किमप्यस्माकमुज्जृम्भितं,
सैन्यं यत् किल वस्तुपालकृतिना धर्मस्य सवर्मितम्
यं विधुं बन्धवः सिद्धार्थनः शत्र ().
.पश्यन्ति, वर्ण्यतां किमयं मया ?
॥२॥
वैरं विभूति-भारत्योः, प्रभुत्व-प्रणिपातयोः । तेजस्विता-प्रशमयो., शमितं येन मन्त्रिणा ॥३॥
दीपः स्फूर्जति सज्जकजलमलः म्नेह मुहुः सहर-
निन्दुमण्डलवृत्तखण्डनपरः प्रद्वेष्टि मित्रोदयम् ।
सूरः क्रूरतरः परस्य सहते तेजो न तेजस्विन-
स्तत् केन प्रतिम प्र (4) वीमि सचिवं श्रीवस्तुपालाभिधम् ?
॥ ४॥
औयाताः कति नैव यान्ति कति नो यास्यन्ति नो वा कति,
स्थानस्थाननिवासिनो भवपये पान्थीभवन्तो जना, १ ।
अस्मिन् विस्मयनीयबुद्धिजलधिर्विध्वस्य दस्यून् करे,
कुर्वन् पुण्यनिधि घिनोति वसुधां श्रीवस्तुपालः परम्
दधेऽस्य वीरधवलक्षितिपस्य राज्यभारे धुरंधरधुरा (*)
श्रीतेजपालसचिपे दधति स्वबन्धुभारोत्तावविधुरैकधुरीणभावम्
इह तेजपालसचिवो, विमलितविमलाचलेन्द्रममृतभृतम् ।
कृत्वाऽनुपमसरोवरममरगण प्रीणयाचक्रे
॥
एते श्रीमलधारिश्रीनरचन्द्रसूरीणाम् ॥
ईह वालिगसुतसहजिगपुत्राऽऽनकतनुजवाजडतनूजः ।
अलि () ग्वदिमा कायस्थः, स्तम्भपुरीयध्रुवो जयतसिंहः
हेरिमण्डप-नन्दीश्वरशिल्पीधरसोमदेवपौत्रेण । बकुलस्वामिसुतेनोत्कीर्णा पुरुषोत्तमेनेयम् ॥ २ ॥
श्रीनेमेस्त्रिजगन्र्तरम्बायाश्च प्रसादतः । वस्तुपालान्वयस्यास्तु, प्रशस्तिः स्वस्तिशालिनी
१ पद्यमिदं नरचन्द्रसूरिकृतवस्तुपालप्रशस्तौ तृतीयपद्यतयाऽपि वर्तते ।
२ पद्यमिद नाचन्द्रसारेकृत.
वस्नुपालप्रशस्तौ २६ पद्यतयाऽपि दृश्यते ॥ ३ पद्यमिद धर्माभ्युदयमहाकाव्यनवमसर्गप्रान्तेऽपि दृश्यते ।।
४ पद्यमिदं प्राचीनजेनलेखसमह २ भागे ४० संख्यगिरिनारसत्कप्रशस्तावपि प्रान्तमागे वर्तते ॥ ५ परमिद
प्राचीननलेखसमह २ भागे ४०-४१ सख्यगिरिनारप्रशस्त्योरपि प्रान्तभागे दृश्यते ॥ ६ पद्यमिदं प्राचीनजन-
लेखसंग्रह २ भागे ३८-४०-४२-४३ सख्यगिरिनारप्रशस्तिप्वाप प्रान्तमागे वर्तते ॥ ।।।।
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१ ॥१॥
गिरिनारपर्वतस्याः प्रशस्तिशिलालेखाः । महामात्यश्रीवस्तुपालस्य प्रशस्तिरिय ६०३ महामात्यश्रीवस्तुपालभार्या महं० श्रीसोलुकावा धर्मस्थानमिदम् ॥ (गिरनार इन्स्क्रिप्शन्स् नं० २ । २३-२४) (४०-३) ॥ ॐ नमः सर्वजाय ।। प्रणमदमरप्रेट्सन्मौलिस्फुरन्मणिधोरणी- तरुणकिरणश्रेणीशोणीकृताखिलविग्रहः । सुरपतिरकरोन्मुक्तैः सात्रोदकर्पसणारुण- प्लुततनुरिवापायात् पायाज्जगन्ति शिवाङ्गजः स्वस्ति श्रीविक्रमसवत् १२८८ वर्षे फागुण शुदि १० बुधे श्रीमदणहिलपुरवास्तव्यप्रा() ग्वाटान्वयप्रसूत ठ० श्रीचण्डपालात्मज ठ० श्रीचण्डप्रसादाज ठ० श्रीसोमतनुज ठ० श्रीआशा- राजनन्दनस्य 8० श्रीकुमारदेवीकुक्षिसमूतस्य ठ० श्रीलुणिग महं० श्रीमालदेवयोरनुजस्य महं० श्रीतेजःपालामजन्मनों महामात्यश्रीवस्तुपालस्यात्मजे मह० श्रीललितादेवीकुक्षिसरोवरराजहंसा- यमाने (4) महं० श्रीजयन्तसिंहे सं० ७९ वर्षपूर्व स्तम्भनकतीर्थमुद्राव्यापार व्यापृण्वति सति सं० ७७ वर्षे श्रीशजयोजयन्तप्रमृतिमहातीर्थयात्रोत्सवप्रमावाविर्भूतश्रीमद्देवाधिदेवप्रसादासादित- संघाधिपत्येन चौलुक्यकुलनमस्तलप्रकाशनकमार्तण्डमहाराजाधिराजश्रीलयणप्रसाददेवसुतमहाराज- श्रीवीरधव(*)लदेवप्रीतिप्रतिपन्नराज्यसर्वधर्येण श्री-शारदाप्रतिपन्नापत्येन महामात्यश्रीवस्तुपालेन तथाऽनुजेन सं० ७६ वर्षपूर्व गूर्जरमण्डले घालककामुम्बनगरेषु मुद्राव्यापारान् व्यापृण्वता महं० भीतेजःपालेन च शमुजया-ऽवृंदाचलप्रभृतिमहातीर्थेषु श्रीमदणहिलपुर-भृगुपुर-स्तम्भनकपुरस्तम्म. तीर्थ-दर्मवती-धव()लककामुम्बनगरेषु तथाऽन्यसमम्तस्थानेष्वपि कोटिशोऽभिनवधर्मस्थानानि प्रम् तजीणोंद्वाराध कारिताः । तथा सचिरेश्वरीवस्तुपालेनेह स्वयंनिर्मापितश्रीशगुंजयमहातीर्यावतार- श्रीमदादितीर्थकरीझपमदेव-स्तम्मनापुरापतारश्रीपार्श्वनाथदेव-श्रीमत्यपुरावतार श्रीमहावीरदे- य(०) प्रशस्तिसहित-कश्मीरावतारश्रीसरस्वतीर्तिदेवकुलिकाचतुष्टय-जिनयुगला-म्या-ऽवलोकना शाम्प-प्रधुम्नशिमरेषु श्रीनमिनाथदेवारनदेवकुलिकाचतुष्टय-तुरगाधिरूढनिजपितामह ठ० भी- सोम-म्वपितृ ठ० श्रीआशाराजमर्तिद्वितय-कुन राघिस्दमहामात्यधीपस्तुपालानुज महं० श्रीतजा पालमूर्तिद्भप-चारतोरणत्रय-श्रीनेमिनाथदेव-आत्मीयपूर्वजा-अजा-ऽनुज-पुरादिमतिसमन्वितमुमो- बाटनम्तिग्मीरांमैतमहातीयममृतिअनेकनीयपरम्पराविराजिते श्रीनेमिनाथदेवाधिदेवविपितश्रीम- दुमपन्तमहातीर्थे श्रारमनम्नया ममायांयाध प्राग्पाटमातीय ठ० श्रीकान्हडपुष्याः ४००) राण: इशिताया महं० थीमोगुकाया. पुन्याभिवद्धये श्रीनागेन्द्रगयो महारकधीमहेन्द्रपरिसताने शिष्यश्रीशान्तिपरिमियी मागन्दरि-भीनमरगरिस? महारमधीहरिमारिपधरंकरणममुभी- -- परिशिष्टम् ] गिरिनारपर्वतस्याः प्रशस्तिशिलालेखाः। ४९ विजयसेनमरिप्रतिष्ठितापमदेवालंकृतोऽयमभिनवः समण्डपः श्रीअष्टापदमहातीर्थावतारनिरुपम- प्रधानप्रासादः कारितः ॥ प्रासादैर्गगनाङ्गणप्रणयिमिः पातालमूलंकपैः, कासारैश्च सितैः सिताम्बरगृहैलैश्य लीलावनैः । येनेयं नयनिर्जितेन्द्रसचिवेनालंकृताऽलं क्षितिः, क्षेमकायतनां चिरायुदयी श्रीवस्तुपालोऽतु सः संदिष्टं तव वस्तुपाल! बलिना विश्वत्रयीयात्रिका- न्मत्वा ना(*दतश्चरित्रमिति ते हृष्टोऽसि नन्याश्विरम् । नार्थिभ्यः अ॒यमर्थितः प्रथयसि स्वल्पं न दत्से न च, स्वश्लाघां यहु मन्यसे किमपरं ! न श्रीमदान्मुद्यसि अरिवलदलनश्रीवीरनामाऽयमुत्र्या, सुरपतिरवतीर्णस्तर्कयामस्तदस्य । निवसति सुरशाली वस्तुपालाभिधानः, मुरगुरुरपि तेजःपालसंज्ञः समीपे उदारः शूरो वा(रुचिरवचनो वाऽस्ति नहि या, भवत्तुल्यः कोऽपि कचिदिति चुलुक्येन्द्रसचिव ।। समुतम्रान्तिर्नियतमवगन्तुं तव यग- स्ततिगह गेहे पुरि पुरि च याता दिशि दिगि सा कुत्रापि युगत्रयी वत! गता मृष्टा च सृष्टिः सतां, सीदत्साधुरसंचरसुचरितः खेलवलोऽभून् कलिः । तद्विवार्तिनिवर्तनकमनमा प्रचोऽधुना गं(*)मुना, प्रस्तावम्तव वस्तुपाल! मवते यद् रोचते तन् कुरु के निधाय बसघातले धनं, वस्तुपाल! न यमालयं गताः । त्वं तु नन्दसि निवेशयन्निदं, दिक्षु घाबति जने बुधावति पौत्रेण धारय वराहपते! धरित्री, सूर्य प्रकाशय सदा नन्दामिपिञ्च । विश्राणितेन परिपालय वस्तुपाल!, मारं भवत्सु यदिमं निदधे विधा(मा आत्मा वं जगतः सदागतिरिय कीर्तिमुवं पुष्करं, मैत्री मन्त्रिवरः स्थिरा घनरसः श्लोकनमोहः शमः । नोकः केन करम्तवामृतकरः कायश्च मास्वानिति, स्पष्टं घटिमूर्तयः कृतपठाः श्रीवस्तुपाल! लयि ॥८॥ विद्या यद्यपि वैदिकी न लमते सौभाग्यमेपा कचि- व मान कुम्ने च कथन बचः कांद्वये य(यापि । राजानः कृपगाश्च यद्यपि गृहे यमप्ययं च व्यय- चिन्ता काऽपि नयापि तिष्ठति न में श्रीवस्तुपाले मति पमिदमुपदेशनागिण्यांप्रमाणे सांमध्यादयनानव वन । .
नवमं ॥ १०॥ ॥ १२ ॥ ॥ १३ ॥ ॥१४॥ ॥१५॥ गिरिनारपर्वतस्याः प्रशस्तिशिलालेखाः। कर्णे खलप्रलपितं न करोपि रोपं, नाविष्करोपि न करोप्यपदे च लोभम् । तेनोपरि त्वमवनेरपि वर्तमानः, श्रीवस्तुपाल! कलिकालमधः करोपि सर्वत्र आन्तिमती, सर्वविदस्त्वदभवत् कथं कीर्तिः । (*) श्रीवस्तुपाल! पैतृकमनुहरते सन्ततिः प्रायः सोऽपि बलेरवलेपः, स्वल्पतरोऽभूत् तथैव कल्पतरोः । श्रीवस्तुपालसचिवे, सिञ्चति दानामृतैर्जगतीम् नियोगिनागेपु नरेश्वराणां, भद्रस्वभावः खलु वस्तुपालः! । उद्दामदानप्रसरस्य यस्य, विभाज्यते कापि न मतभावः विबुधैः पयोधिमध्यादेको बहु(*)मिः करीन्दुरुपलब्धः । बहवस्तु वस्तुपाल!, प्राप्ता विबुध ! त्वयैकेन प्रथमं धनप्रवाहै हैरथ नाथमात्मनः सचिवः । अधुना तु सुकृतसिन्धुः, सिन्धुरवृन्दैः प्रमोदयति श्रीवस्तुपाल! भवता, जलधेर्गम्भीरता किलाऽऽकलिता । आनीय ततो गजता, स्वपतिद्वारे यदाकलिता एते श्रीमद्गुर्जरेश्वरपुरोहि(*)त ठ० श्रीसोमेश्वरदेवस्य । इंह वालिगसुतसहजिगपुत्राऽऽनकतनुजवाजडतनूजः । अलिखदिमां कायस्थः, स्तम्भपुरीयध्रुवो जयतसिंहः हैरिमण्डप-नन्दीश्वरशिल्पीश्वरसोमदेवपौत्रेण । बकुलस्वामिसुतेनोत्कीर्णा पुरुषोत्तमेनेयम् महामात्यश्रीवस्तुपालस्य प्रशस्तिरियं निष्पन्ना ॥ ६०३ ॥ श्रीनेमेस्त्रिजगद्भर्तुरम्बायाश्च प्रसादतः । वस्तुपालान्वयस्यास्तु, प्रशस्तिः स्वस्तिशालिनी माहामात्यश्रीवस्तुपालभार्या महं० श्रीसोखुकाया धर्मस्थानमिदम् ।। (गिरनार इन्स्क्रिप्शन्स् नं० २ । २४-२५) (४१-४) ॐ नमः श्रीनेमिनाथदेवाय ॥ तीर्थेशाः प्रणतेन्द्रसंहतिशिर कोटीरकोटिम्पुर- तेजोजालजलप्रवाहलहरीप्रक्षालितांघिद्वयः । १ पमिदं प्राचीन जैनलेमर्सग्रह १ भागे ३९ संत्यागिरिनारसवप्रशस्तावपि प्रान्तमागे धर्तते ॥ २ पदमिर प्राचीन अनटेसमग्रह २ भागे ३९.४१ सरयागिरिनारप्रशरत्योरपि प्रान्तभागे वर्तते ॥ देशमग्रह १ भागे ३८-३९.४२.४३ सग्यागिरिनारसत्काशस्तिष्वपि प्रान्तभागे वर्तते ।। ॥ १६ ॥ ॥२॥ ॥३॥ ३ पद्यमिदं प्राचीन जैन- . परिशिष्टम्] गिरिनारपर्यंतस्थाः प्रशस्तिशिलालेखा ते वः केवलमूर्तयः कवलितारिष्टां विशिष्टाममी, तामष्टापदशैलमौलिमणयो विश्राणयन्तु श्रियम् । स्वस्ति श्रीविक्रमार्कसंवत् १२८८ वर्षे फागुण (4) शुदि १० बुधे श्रीमदाणहिलपुरवास्तव्य- प्राग्वाटान्वयप्रसूत ठ० श्रीचण्डपालात्मज ठ० श्रीचण्डप्रसादागज ठ० श्रीसोमतनुज ठ० श्रीआशा- राजनन्दनस्य ठ० श्रीकुमारदेवीकुनिसंभूनस्य ठ० श्रीलुणिग महं० श्रीमालदेवयोरनुजस्य ठ० मह० श्रीतेजःपालामजन्मनो महामात्यश्रीवस्तुपालस्पात्मजे (५) महं० श्रीललितादेवीकृक्षिसरो- परराजहंसायमाने महं० श्रीजयन्तसिंहे सं० ७९ वर्षपूर्व श्रीस्तम्भतीर्थवेलाकुलमुद्राच्यापार व्यापृ- पति सति सं० ७७ वर्षे श्रीशजयोजयंतप्रमृतिमहातीर्थयात्रोत्सवप्रभावाविर्भूतश्रीमद्देवाधिदेवप्रसा- दासादितसंपाधिपत्येन चौलुक्यकुलनमस्तठप्रकाशनैक (4) मार्तण्डमहाराजाधिराजश्रीलवणप्रसाद- देवसुतमहाराजश्रीवीरधवलदेवप्रीतिप्रतिपन्नराज्यसर्वश्वर्येण श्री-शारदाप्रतिपन्नापत्येन महामात्यश्रीव- स्तुपालेन तथाऽनुजेन सं० ७६ वर्षपूर्व गूर्जरमण्डले धवलक्ककप्रमुखनगरेप मुद्रात्र्यापारं व्यापृण्वता महं० श्रीतेजःपालेन च श्री (*) शधुंजया-बुंदाचलमहातीर्थेषु श्रीमदणहिलपुर-भृगुपुर-स्तम्भनक- पुर-स्तम्मतीर्थ-दर्मवती-धवलकरामुखनगरेषु तथाऽन्यसमस्तस्थानेष्वपि कोटिशो धर्मस्थानानि प्रभूतजीर्णोद्धाराश्च कारिताः । तथा सचिवेश्वरश्रीवस्तुपालेनेह स्वयंनिर्मापितशत्रुजयमहातीर्थाव- तारश्रीमदादितीर्थकर श्रीऋषभदेव-स्तम्भनकपुरावतारश्रीपार्श्वनाथदेव-सत्यपुरावतारश्रीमहा- वीरदेवप्रशस्तिसहित-कश्मीरावतारश्रीसरस्वतीदेवकुलिकाचतुष्टय-जिनयुगला-ऽम्या-बलोकना- शाम्ब-प्रद्युम्नशिखरेपु श्रीनेमिनाथदेवालंकृतदेवकुलिकाचतुष्टय-तुरगाधिरूढनि (*) जपितामह ठ० श्रीआशाराजमूर्तिद्वितय-तोरणत्रय-श्रीनेमिनाथदेव-आत्मीयपूर्वजा-अजा-ऽनुज- पुत्रादिमूर्तिसमन्वितमुखोद्घाटनकस्तम्भश्रीसमेतावतारमहातीर्थप्रमृतिअनेककीर्तनपरम्पराविराजिते नेमिनाथदेवाधिदेवविमूपितश्रीमदुजयन्तमहातीर्थे आ (*) त्मनस्तथा स्वमार्यायाः प्राग्वाटज्ञातीय 3० कान्हडपुन्याः ठ० राणुकुनिसंभूतायाः महं० श्रीसोखुकायाः पुण्याभिवृद्धये श्रीनागेन्द्रगच्छे मट्टारकश्रीमहेन्द्रररिसंताने शिप्यग्रीशान्तिमरिशिप्यआणन्दररि-श्रीअमरबरिपट्टे भट्टारकश्रीहरि- मद्रवरिपट्टालंकरणश्रीविजयसेनरिप्रतिष्ठि (*) तश्रीमदादिजिनराजश्रीऋषभदेवप्रमुखचतुर्विशतितीर्थ- करालंकृतोऽयमभिनवः समण्डपः श्रीअष्टापदमहातीर्थावतारप्रधानप्रासादः कारितः । स्वस्ति श्रीबलये नमोऽस्तु नितरां कर्णाय दाने ययो- रस्सप्टेऽपि दृशां यशः कियदिदं वन्द्यास्तदेताः प्रजाः। दृष्टे संप्रति वस्तुपालसचिवत्यागे करिप्यन्ति ताः, कीति कांचन या पुनः स्फुटमियं विधेऽपि नो गास्यति कोटीरैः कटका-ऽङ्गुलीय-तिलकैः केयूर-हारादिभिः, कौशेयैश्च विमप्यमाणवपुषो यत्पाणिविप्राणितैः । १ पद्यमिदं मलयारिनरेन्दप्रमीयलघुवस्तुपालप्रशन्ना द्वादमपद्यतयाऽपि दृश्यते ॥ २ पद्यमिदं मलधारि- नरेन्दप्रमीयलघुवस्तुपालप्रशस्वी पञ्चदशपदम्पेणाऽपि दृश्यते ॥ श्रीसोम-पितृ ठ० ..
नवमं गिरिनारपर्वतस्याः प्रशस्तिशिलालेखाः। विद्वांसो गृहमागताः प्रणयिनीरप्रत्यभिज्ञाभृत- स्तैस्तैः स्वं शपथैः कथं कथमिव प्रत्याययांचक्रिरे न्यासं व्यातनुतां विरोचनसुत (*) स्त्यागं कवित्वश्रियं, मास-व्यासपुरःसराः पृथु रघुपायाश्च वीरप्रतम् । प्रज्ञा नाकिपताकिनीगुरुरपि श्रीवस्तुपाल ! ध्रुवं, जानीमो न विवेकमेकमकृतोत्सेकं तु कौतस्कुतम् ! वास्तवं वस्तुपालस्य, वेत्ति कश्चरितामृतम् ! । यस्य दानमविश्रान्तमार्थप्वपि रिपुष्वपि स्तोतव्यः खलु वस्तुपालसचिवः कैर्नाम वाग्वैभवै- येस्य (*) त्यागविधिविध्य विविधां दारिद्रयमुद्रा हठात् विश्वेऽस्मिन्नखिलेऽप्यसूत्रयदसावर्थीति दातेति च, द्वौ शब्दावभिधेयवस्तुविरहव्याहन्यमानस्थिती आधेनाप्यपवर्जनेन जनितार्यित्वप्रमाथान् पुनः, स्तोकं दत्तमिति अमान्तरगतानाहाययार्थिनः । पूर्वस्माद् गणसंख्ययाऽपि गुणितं यस्तेष्वनावर्तिपु, द्रव्यं (*) दातुमुदस्तहस्तकमलस्तस्यौ चिरं दुःस्थितः विश्वेऽसिन् किल पङ्कपविलतले प्रस्थानवीयर्थी विना, सीदन्नेष पदे पदे न पुरतो गन्तेति संचिन्तयन् । धर्मस्थानशतष्ठलेन विदधे धर्मस्य वर्षीयसः, संचाराय शिलाकलापपदवीं श्रीवस्तुपालः स्फुटम् अम्मोजेषु मरालमण्डलरुचो डिण्डीरपिण्डविपः, कासारेषु (*) पयोधिरोधसि लुठनिर्णिकमुक्ताश्रियः । ज्योत्साभाः कुमुदाकरेषु सदनोयानेषु पुप्पोल्वणाः, स्फूर्ति कामिव वस्तुपालतिनः कुर्वन्ति नो कीर्तयः ? देव स्वाथ ! कष्टं ननु क इव भवान् ! नन्दनोयानपालः, खेदस्तत् कोऽध ! फेनाप्यहह ! हृत इतः काननात् कल्पवृक्षः, । हुँ मा यादीतदेतत् किमपि (*) करुणया मानवाना भयव, प्रीत्याऽऽदियोऽयमास्तिरकयति सलं वस्तुपालच्छलेन श्रीमन्त्रीचरवस्तुपालयशमामुच्चावचैचिमिः, सलिन्नपि लम्मिते घबलतां कालोलिनीमण्टले । १ पदमिदं नरेन्द्रप्रमीयाटवस्तुपाठपयस्तो चतुर्थश्यतयाऽपि वर्तते ॥ २ पमिदं नरेन्द्रप्रमीयरुशुवस्वपाल- प्रभो २० वरूपेगापि यावे ॥ ३ पमिद मौन्दप्रमीलाबादपालप्रशना १९ तमाशापेणापि वर्तते ।।
परिशिष्टम्] गिरिनारपर्वतस्याः प्रशास्तिशिलालेसाः । गयेयमिति प्रतीतिविफलानाम्यन्ति कामं मुवि, माम्यन्तम्तनुमादमन्दितमुदो मन्दाकिनीयात्रिकाः ॥१०॥ वस्त्रं () निर्वासनानानयनायगतं यस्स दारिद्रयदस्यो- दृष्टिः पीयूषष्टिः प्रगयिषु परितः पेनुपी सप्रसादम् । प्रेमालापरतु फोऽपि स्फुरदममपरबतसंपादवेदी, नेदीयान् वस्तुपालः स खलु यदि तदा को न मान्यकमिः ! ॥ ११ ॥ सामाद् अम परं धरागतमिर श्रेयोविवर्तः सतां, तेजपाल इति प्रसिद्धमहिमा तस्यानु(*)जन्मा जयी । यो घने न दगां यहाऽपि फलितावद्यामविद्यामयीं, यं चोपास्स परिम्पृशन्ति कृतिनः सघः परां निर्वृतिम् ॥ १२ ॥ आकृष्टे कमलाकुलस्य कुदगारम्मस्य संम्तम्मनं, वस्यत्वं जगदागयस्य यमसामागान्तनिर्वाप्सनम् । मोहः गनुपराक्रमस्य मृतिरप्यन्यायदस्योरिति, वैरं पडिधर्मनिर्मितिमया मन्त्रोऽस्य मन्त्रीशितुः ॥ १३ ॥(.) पते मलधारिश्रीनरेन्द्रसूरीणाम् । सम्मतीर्येऽत्र कायस्यवंशे वाजडनन्दनः । प्रगस्त्रिमेतामलिम्बत्रसिंहधुवः सुधीः हरिमण्डप-नन्दीश्वरशिल्पीश्वरसोमदेवपीत्रेण । वकुलसामिसुतेनोत्कीर्णा पुरुषोत्तमेनेयम् ॥२॥ श्रीवस्तुपालप्रमोः प्रशस्तिरियं निष्पन्ना ॥ मगलं महाश्रीः ।। (गिरनार इन्स्क्रिप्शन्स् नं० २ । २६-२७) (४२-५) ॐ नमः सर्वज्ञाय ॥ ये उज्जयन्तं... जयाभूप्रजाकल्याणा। स्वस्ति श्रीविक्रमसंवत् १२८८ वर्षे फागुण शुदि १० बुधे श्रीमदणहिलपुरवा(*)तव्य- प्राग्वाटान्वयप्रमूत ठ० श्रीचण्डपालात्मज ४० श्रीचण्डप्रसादागज ठ० श्रीसोमतनुज ठ. श्रीआशाराजनन्दनस्य ४० श्रीकुमारदेवीकुक्षिसंभूतस्य ठ० श्रीलुणिग महं० श्रीमालदेवयोरनु- जस्य महं० श्रीतेजःपालामजन्मनो महामात्यश्रीवस्तुपालस्यात्मजे महं० श्रीललितादेवीकुक्षिसरो- वरराजहंसाय(*)माने महं० श्रीजयन्तसिंहे सं० ७९ वर्षपूर्व स्तम्भतीर्थे मुद्राव्यापारान् व्याप- प्वति सति सं० ७७ वर्षे श{जयोञ्जयन्तप्रभृतिमहातीर्थयात्रोत्सवप्रसादाविर्भूतश्रीमद्देवाधिदेवप्रसा- दासादितसंघाधिपत्येन चौलुक्यकुलनभस्तलप्रकाशनकमार्तण्डमहाराजाधिराजश्रीलवणप्रसाददेवसु- १ पद्यमिदं नरेन्द्रप्रमीयलघुवस्तुपालप्रशलो १९पद्यरूपेणापि वर्त्तते ॥ २ पमिदं प्राचीन नलेखसंग्रह ३ पयमिदं प्राचीनजैनलेखसाह २. भागे ३८-४२-४३ मयगिरिनारसत्कप्रशस्तिष्वपि प्रान्तभागे दृश्यते ॥ २ भागे ३९-४० संख्यगिरिनारसत्कप्रशस्योरपि प्रान्तमागे वर्तते ॥
[नवमं आत्मनस्तथा स्वधर्मचारिण्या गिरिनारपर्यतस्याः प्रशस्तिशिलालेखाः । तमहाराजश्रीवीरघ(*)वलदेवप्रीतिप्रतिपन्नराज्यसर्वेश्वर्येण श्री-शारदाप्रतिपन्नापत्येन महामात्यश्रीवस्तु- पालेन तथाऽनुजेन सं० ७६ वर्षपूर्व गूर्जरमण्डले धवलक्ककप्रमुखनगरेषु मुद्राव्यापार व्याश्वता महं० श्रीतेजपालेन च श्रीशत्रुजया-ऽयुंदाचलप्रभृतिमहातीर्थेषु श्रीमदणहिलपुर-भृगुपुर-स्त(क) म्भनकपुर-स्तम्भतीर्थ-दर्भवती-धवलकासमुखनगरेषु तथाऽन्यसमस्तस्थानेष्वपि कोटिशोऽभिनवधर्म- सानानि प्रमूतजीर्णोद्धाराश्च कारिताः । तथा सचिवेश्वरश्रीवस्तुपालेनेह स्वयंनिर्मापितश्रीशत्रुजय- महातीर्थावतारश्रीमदादितीर्थकरश्री ऋषभदेव-स्तम्भनकपुरावतारश्रीपार्श्वनाथ-देव-सत्यपुरावतार- श्री(*)महावीरदेवप्रशस्तिसहित-कश्मीरावतारश्रीसरस्वतीमूर्तिदेवकुलिकाचतुष्टय-जिनयुगला-ऽम्बा- बलोकना-शाम्ब-प्रद्युम्नशिखरेणु श्रीनेमिनाथदेवालंकृतदेवकुलिकाचतुष्टय-तुरगाधिरूढस्वपितामह महं० श्रीसोम-निजपित ४० श्रीआशाराजमूर्तिद्वितय-चास्तोरणत्रय-श्रीनेमिनाथदेव-आत्मीय(क) पूजा-अजा-ऽनुज-पुत्रादिमूर्तिसमन्वितमुखोद्घाटनकस्तम्भश्रीअष्टापदमहातीर्घप्रभृतिअनेककीर्तनपरम्प- राविराजिते श्रीनेमिनाथदेवाधिदेवविभूषितश्रीमदुञ्जयन्तमहातीर्थे प्रारबाटज्ञातीय ठ० श्रीकान्हडपुत्र्याः ठ० राणुकुक्षिसंभूताया महं० श्रीललितादेव्याः पुण्याभि() वृद्धये श्रीनागेन्द्रगच्छे भट्टारकश्रीमहेन्द्रसरिसंताने शिष्यश्रीशान्तिमरिशिप्यश्रीआणन्दरि-श्री- अमरमरिपट्टे मट्टारकश्रीहरिभद्रसरिपट्टालंकरणप्रमुश्रीविजयसेन रिप्रतिष्ठितश्रीअजितनाथदेवादि- विंशतितीर्थकरालंकृतोऽयमभिनवः समण्डपः श्रीसंमेतमहातीर्थावतारप्रासादः कारितः । से श्रीजिनाधिपतिधर्मघराधुरीणः, श्लाघास्पदं कथमिवास्तु न वस्तुपालः । श्री-शारदा-मुक्त-कीर्ति नयादिवेण्याः, पुण्यः परिस्फुरति जङ्गमसङ्गमो यः विभुता-विक्रम-विद्या-विदग्धता-वित्तवितरण-विवेकैः । यः सप्तमिर्विकारैः, कलितोऽपि यभार न विकारम् यस्य मूः किमसावस्तु, वस्तुपालमुतः सदा । नावासावयाप्येतो, धर्मकर्मकृतौ कृतौ कस्यापि कविता नास्ति, विनाऽस्य हृदयामुखम् । वास्तवं वस्तुपालस्य, पश्यामस्तद् वयं च यम् दुंर्गः स्वर्गगिरिः स कल्पतरुभिर्भेजे न चक्षुप्पथे, तस्थौ कामगवी जगाम जलधेरन्तः स चिन्तामणिः । कालेऽस्मिन्नवलोक्य यस्य करुण(गा) तिठेत कोऽन्यस्ततः, पुण्यः सोऽस्तु न वस्तुपालपुटती टानकवीरः कथम् ! सोऽयं मन्त्री गुरुतितरामुद्धरन् धर्ममारं, श्लायाममि नयति न कथं वस्तुपालः सहेलम् । तेजःपालः बबलधरलः सर्वकर्मीणबुद्धि- द्वैतीयीकः कल्यतितरां यस्य धौरेयकत्वम् १ पमिदं नरचन्द्रीयवमपालवतो परमादयेनापि दृश्यते ॥ गर्ने २३तमा नाऽपि दाने ॥ ३ पानेदं नरबन्दीपपलप्रशम्नी घर्पपद्यतयाऽपि दृश्यते । ॥२॥ ॥४॥ २ पमिदं धीभ्युदयमहासम्पप्रथम . परिशिष्टम् ] गिरिनारपर्यतस्याः प्रशस्तिशिलालेखाः। ऐतलिन् वयुषामुपाजलयरे श्रीवस्तुपाले जग- . जीवाती सिचयोचर्येर्नवनवैर्नक्तं दिवं वर्षति (*)। आसामन्यानो घनोझिशशिज्योत्स्नाच्छवल्गद्गुणो- द्भूतैरय दिगम्बराद्यपि यशोवासोमिराच्छादितम् लक्ष्मीमन्याचलेन्द्रनमणपरिचयादेव पारिप्लवेयं, ममनस्यैव मद्गाचकितमृगदशां प्रेमनस्वेतरस्य । आयुर्निश्वासवायुप्रणयपरतयैवेवमयंदुसं, स्वास्नुर्धर्मोऽयमेकः परमिति हृदये (*) वस्तुपालेन मेने ॥८॥ तेपालस्य विष्णोश्च, कः स्वरूपं निरूपयेत् ? । स्थितं जगत्रयों पातुं, यदीयोदरकन्धरे ॥ ९ ॥ ललितादेवी नाना, सधर्मिणी वस्तुपालस । अस्सामनिरसनयन्तनयोऽयं (*) जयतसिंहाख्यः ॥१०॥ दृष्ट्वा वपुश्च वी........च, परस्परविरोधिनी । विवादा......नेत्रसिंहवारुम्यवादि (1) कः ॥ ११ ॥ (4) कृतिरियं मलयारिश्रीनरचन्द्रसूरीणाम् ॥ सम्मतीर्थेऽत्र कायस्थवंशे वाजडनन्दनः । प्रशस्तिमेतामलिखञ्जनसिंहधुवः सुधीः चाहतस्य तन्जेन, सूत्रधारेण धीमता । एपा कुमारसिंहेन, समुत्कीर्णा प्रयत्नतः ॥२॥ श्रीनेमेखिजगदर्तरम्बायाश्च प्रसादतः । वस्तुपालान्वयस्यास्तु, प्रशस्तिः स्वस्तिशालिनी ॥३॥ (गिरनार इन्स्क्रिप्शन्स् नं० २१२७-२९) (४३-६) ॐ नमः श्रीसर्वज्ञाय ॥ संमेवादिशिरःकिरीटमणयः मेरल राहंकृति- ध्वंसोल्लासितकीर्तयः शिवपुरप्राकारतारनियः । आनत्यश्रितसंविदादिविलसदलौघरलाकराः, कल्याणावलिहेतवः प्रतिकलं ते सन्तु वस्तीर्थपाः ॥१॥ स्वस्ति श्रीविक्रमसंवत् १२८८ वर्षे फागुण शुदि १० बुधे श्रीमदणहिलपुरवास्तत्र्यप्राबाट- कुलालकरण (*) श्रीचण्डपालात्मज ठ० श्रीचण्डप्रसादागज ठ० श्रीसोमतनुज ४० श्रीआशाराज- नन्दनस्य ठ० श्रीकुमारदेवीकुक्षिसम्भूतस्य ठ० श्रीलुणिग महं० श्रीमालदेवयोरनुजस्य महं० श्री- महामात्यश्रीवस्तुपालस्यात्मजे महं० श्रीललितादेवीकुक्षिसरोवरराजहंसायमाने १. पद्यमिदं नरनदीयवस्नुपालपासो पोशपयनयाऽपि वर्तते ॥ २ पयामेदं प्राचीनजनटेखसंग्रह २ मागे ४ संख्यर्बुदायलमालाले पोडश सोमेश्वरदेवकृतितया पर्तते ॥ ३ पमिदं प्राचीन नलेखरामह २ मागे ३४-४१-४२ संख्यागिरिनारप्रालिष्वपि प्रान्तमागे वर्तते ॥ ४ पद्यमिदं प्राचीनजनलेखसंग्रह २ भागे १८-४३ संख्यगिरिनारसकप्रशस्योरपि प्रान्तमागे वर्तते ॥ ५ पद्यमिदं प्राचीनजनलेखसंग्रह २ भागे ३८-३९- Y.-४३ सख्यगिरिनारप्रशस्तिष्वपि प्रान्तभागे दर्तते ॥ तेजपालामजन्मनो ५६ त्येन गिरिनारपर्वतस्था प्रशस्तिशिलालेसा । नियम महं० श्रीजयन्तसिंह स० ७९ वर्षपूर्व स्तम्भ (*) तीर्थमुद्राव्यापारान् व्यापृण्यति सति स० ७७ वर्षे श्रीशत्रुजयोजयन्तप्रभूतिमहातीर्थयात्रोत्सवप्रभावाविर्भूतश्रीमद्देवाधिदेवप्रसादासादितसदाधिप- चौलुस्पकुलनभस्बरप्रकाशनकमार्तण्डमहाराजाधिराजश्रीलवणप्रसाददेवसुतमहाराजश्रीबीरध- बलदेवप्रीतिप्रतिपन्नराज्यसर्वेश्वर्येण श्री-शारदाप्रतिपन्नापत्येन महामा (*) त्यश्रीवस्तुपालेन तथा अनुजेन स० ७६ वर्षपूर्व गूर्जरमण्डले धवलक्ककप्रमुखनगरेषु मुद्राव्यापारान् व्यापृण्वता मह० श्रीतेजपालेन च श्रीशनुञ्जया-झुंदाचलप्रभृतिमहातीर्थेषु श्रीमदणहिलपुर-भृगुपुर-स्तम्भनकपुर-स्तम्भतीर्थ-दर्भ- वती-धवलकाप्रमुखनगरेषु तथा अन्यसमस्तस्थानेष्वपि कोटिशोऽभिनवधर्मस्थानानि प्रभूतजी (*) णों- द्धाराश्च कारिता ॥ तथा श्री-शारदाप्रतिपन्नपुत्रसचिवेश्वरश्रीवस्तुपालेन स्वधर्मचारिण्या प्रामाट- ज्ञातीय ठ० श्रीकान्हडपुत्र्या ठ० राणुकुक्षिसम्मूताया मह० श्रीललितादेव्यास्तथा आत्मन पुण्या- भिवृद्धये इह स्वयनिर्मापितश्रीशगुञ्जयमहातीर्थावतारश्रीमदादितीर्थकरश्रीपभदेव-स्तम्भनकपुरा- वतारश्रीपार्श्वनाथदेव-सत्यपुरा (*) घतारश्रीमहावीरदेवप्रशस्तिसहित-कश्मीरावतारश्रीसरस्वतीमू- र्तिदेवकुलिकाचतुष्टय-जिनयुगल-अम्बा-अलोकना-शाम्ब प्रद्युम्नशिखरेषु श्रीनेमिनाथदेवालकृतदेव- कुलिकाचतुष्टय-तुरगाधिरूढनिजपितामह मह० श्रीसोम-स्वपितृ ४० श्रीआशाराजमूर्तिद्वितय चारुतो- रणत्रय-श्रीनेमिनाथदेव-आत्मीयपूर्वजा-अजा-ऽनुज-पुत्रादिमूर्तिस (*) मन्वितमुखोद्घाटनकस्तम्भ-श्रीअ- पापदमहातीर्थप्रभृतिअनेककीर्तनपरपराविराजिते श्रीनेमिनाथदेवाधिदेवविमूपित्तश्रीमदुजयंतमहातीर्थे श्रीनागेन्द्रगच्छ मट्टारकश्रीमहेंद्रमरिसंताने शिष्यश्रीशांतिम्ररिशिष्यश्रीआणंदसरि-श्रीअमरसारिपट्टे भट्टारकश्रीहरिभद्रसूरिपट्टालकरणप्रभुश्रीविजयसेनहरिप्रतिष्ठित (*) श्रीमदजितनाथदेवप्रमुखविंशतिती- थंकरालकृतोऽयममिनव समण्डप श्रीसंमेतावतारमहातीर्थप्रासादः कारित ॥ छ । मुष्णाति प्रसभ वसु द्विजपतेर्गौरीगुरु लक्ष्यन् , नो धत्ते परलोकतो भयमहो। हसापरापे कृती। उच्चैरास्तिकचक्रपालमुकुट ! श्रीवस्तुपाल ! स्फुट, भेजे नास्तिकतामय तव यश पूर कुतम्त्या (*) मिति : कोपोटोपपरै परैश्चलचमूरङ्गत्तुरङ्गक्षत- क्षोणीक्षोदवशादशोपि जलधि श्रीस्तम्भतीर्थ पुरे। स्वेदाम्भस्तटिनीघटाघटनया श्रीरस्तुपालस्फुर- चेजस्तिम्भगमस्तितप्ततनुभिस्त्रैरेव सम्पूरित दियात्रोत्सवपीरचीरघालोणीधवाध्यासित, प्राज्य राज्यरथस्य मारममित स्वघे दपल्लीलया। ॥२॥ १ पमिद धर्माभ्युदयमहासयनवममाप्रा तेऽपि दसवे ॥ २ पद्यमिदं मुस्तरीतिगरिन्यो १३७ तम. पचतगाऽपि वर्तते ॥ ३ पमिदै मुस्तकीतिकोकिन्यो १२१ पशुरूपेग उदयनीयवस्तुपालस्तुती च ११ पद्यरूपेगाऽपि स्यते॥
५७ - , - - . परिशिष्टम् ] गिरिनारपर्वतस्थाः प्रशस्तिशिलालेखाः । भाति प्रातरि दक्षिणे समगुणे श्रीवस्तुपालः कथं, ।। न लाभ्यः स्वयमश्वराजतनुजः कामं स वामस्थितिः? ॥३॥ लावण्यांग इति द्युतिव्यतिकरैः 'सत्याभिधानोऽभवद्, माता यस्य निशानिशांतविकसच्चन्द्रप्रकाशाननः । शंके शंकरकोपसम्रमभरादासीदनंगः। स्मरः, साक्षादंगमयोऽयमित्यपहृतः स्वांगनामिलघु । रक्तः सद्गतिमावमाजि चरणे श्रीमल्लदेवोऽपरो, याता परमेष्ठिवाहनतया प्राप्तः प्रतिष्ठां पराम् । खेलनिर्मलमानसेन समयं क्वापि श्रयन् पंकिलं, विधे राजति राजहंस इव यः संशुद्धपक्षद्वयः सोऽयं तस्य सुधाहरस्य कवितानिष्ठः कनिष्ठः कृती, - बंधुर्वधुरखुद्धियोधमधुरः श्रीवस्तुपालाभिधः । ज्ञानांभोरुहकोटरे अमरतां सारंगसाम्यं यशः- सोमे सौरितुलां च यस्य महिमक्षीरोदधौ खं दधौ इंबिंदुरपां सुरेश्वरसरिडिंडीरपिंडः पति- सां विद्रुमकंदलः किल विभुः श्रीवत्सलक्ष्मा नभः । कैलास-त्रिदशेम-शंभु-हिमवत्प्रायास्तु मुक्ताफल- । स्तोमः कोमलवालुकाऽस्य च यशःक्षीरोदधौ कौमुदी हस्तामन्यस्तसारस्वतरसरसनप्राप्तमाहात्म्यलक्ष्मी- स्तेजःपालस्ततोऽसौ जयति वसुभरैः पूरयन् दक्षिणाशाम् । यहुद्धिः कल्पितोरु(*)द्विपगहनपरक्षोणिभृद्भुद्धिसंप- लोपामुद्राधिपस्य स्फुरति लसदिनस्फारसंचारहेतुः पुण्यश्रीर्मुवि मल्लदेवतनयोऽभूत् पुण्यसिंहो यशो- वर्यः स्फूर्जति जैत्रसिंह इति तु श्रीवस्तुपालात्मजः । तेजःपालसुतस्त्वसौ विजयते लावण्यसिंहः स्वयं, यैर्विधेऽभवदेकपादपि कलौ धर्मश्चतुष्पादयम् एते श्रीनागेंद्रगच्छे भट्टारकश्रीउदय()प्रभसूरीणाम् । स्तम्मतीर्थेऽत्र कायस्थवंशे बाजडनंदनः । प्रशस्तिमेतामलिख त्रसिंहधुवः सुधीः १ पद्यमिदं मुकतकीर्तिकलोलिन्या ११३ पद्यतयाऽपि वर्तते ॥ २ पद्यमिदं सुकृतकीर्तिकल्लोलिन्या ११५ पद्य- रूपेणापि वर्तते ।। ३ पद्यमिदं सुस्तकीर्तिकलोलिन्या १२८तमपद्यरूपेण्यपि दृश्यते ॥ ४ पद्यमिदं मुक्तकीर्ति- कलोलिन्यो ११७ पद्यतयाऽपि वर्तते ॥ ५ पद्यमिदं प्राचीन जैनलेखसंग्रह २ भागे ३८-४१-४२ संख्यगिरिनार. प्रशस्तिप्यपि प्रान्तमागे वसवे ॥ गि०८ [ नवम गिरिनारपर्वतस्थाः प्रशस्तिशिलालेखाः। चाहडस्य तनूजेन, सूत्रधारेण धीमता । एषा कुमारसिंहेन, समुत्कीर्णा प्रयत्लतः ॥२॥ श्रीनेमेस्त्रिजग रम्बायाश्च प्रसादतः । वस्तुपालान्वयस्यास्तु, प्रशस्तिः स्वस्तिशालिनी ॥ ३ ॥ श्रीवस्तुपालप्रभोः प्रशस्तिरियं निष्पन्ना । शुभं भवतु ॥ (४४-७) वस्तुपालविहारेण, हारेणेवोज्ज्वलभिया । उपकण्ठस्थितेनायं, शैलराजो विराजते श्रीविक्रमसंवत् १२८९ वर्षे आश्विनवदि १५ सोमे महामात्यश्रीवस्तुपालेन आत्मश्रेयोऽयं पश्चादागे श्रीकपर्दियक्षप्रासादसमलंकृतः श्रीशत्रुजया तार]श्रीआदिनाथप्रासादस्तदमतो वाम- पक्षे स्वीयसद्धर्मचारिणी महं० श्रीललितादेवियोऽर्थ विंशतिजिनालंकृतः श्रीसम्मेतशिवरप्रासाद- स्तथा दक्षिणपक्षे द्वि० मार्या महं० श्रीसोसुश्रेयोऽयं चतुर्विशतिजिनोपशोभितः श्रीअष्टापदप्रासादः अपूर्वपाटरचनारुचिरतरमभिनवप्रासादचतुष्टयं निजद्रव्येण कारयांचके । (लिट ऑफ आर्कियोलॉजिकल रिमॅन्स इन कॉम्बे प्रेसिडन्सी पृ० ३६१) (४५-८) महामात्यश्रीवस्तुपाल महं० श्रीललितादेवीमूर्ति । (४६-९) महामात्यश्रीवस्तुपाल महं० श्रीसोखुकामूर्ति.... । (लि. ऑ० आ० रि०३० बॉ०० पृ० ३५७-८) (४७-१०) पस्तुपालविहारेण, हारेणेवोज्वलश्रिया । उपकण्ठस्थितेनायं, शैलराजो विराजते (४८-११) वस्तुपालविहारेण, हारेणेवोज्वलश्रिया । उपकण्ठस्थितेनायं, शैलराजो विराजते (लि. ऑ० आ० रि० १० बो००० ३५९) १ एम पीनजनतम भागे १८-१ संगपगिरिनार-मरोषि प्रस्तुमागे पसे । २ पमिदं पानसमंधर । मागे 16-11-1.-१ गवगिरिनारयाशियी प्रान्तमाये पवे. ३ पनि प्रानौरसमा १ भागे -r८ मंसगिरिनरसाप्रागिरि स
श्रीअर्बुदाचलोपरिस्थिताः प्रशस्तयः ।
गुर्जरेश्वरमहामात्यश्रीतेजःपालकारितश्रीलूण-
| }}{" वसहिकागतप्रशस्तिलेखाः ।
.
॥
--
।
(६४)
।। र्द०॥
वंदे सरस्वती देवी, याति या का[व]मानसम् ।
नी[यमा]ना [निजेने] व, [यानमा ] नस[व] सिन [1]
॥१॥
य. [क्षतिमा [नप्य] रु णः प्रकोपे, शांतोऽपि दीस]: स्मरनिग्रहाय ।
} निमीलिताक्षोऽपि सम]मदर्शी, स व शिवायास्तु शि* [पातनूजा ॥२॥
अणहिलपुरमस्ति स्वस्तिपात्रं प्रजा [नाम]जरजिर [धुतुल्यैः] पा [ल्य]माने चुलुिक्यैः]।
। [विरम]ति रमणीनां य[त्र वक्त्रे]न्दु [मंदी ]कृत इव [सि ]तपक्षपक्षयेऽप्यधकारः ॥३॥
तत्र प्राग्वाटान्वयमुकुटं कुटजप्रसून (*) विशदयशाः ।
। दानविनिर्जितकरुपद्रुमपंडथंडपा समभूत्
॥४॥
चंडप[सादसं[ज्ञ.], स्वकुल[प्रासादहेमदंडोऽस्य ।
प्रसर[त्कीर्तिपताकः, पुण्यविपाकेन सूनुरमूत्
आत्मगुणैः किरणेरिव, सोमो रोमोगमं सता (*) कुर्वन् ।
। उदगादगाधमध्याद्दुग्धोदषिबाधवात्तस्मात्
एतस्मादजनि जिनाघि[नाथभक्ति, विप्राणः स्वमनसि शश्वदश्वराजा ।
तस्याऽऽसीदयिततमा कुमारदेवी, देवीव त्रिपुररिपोः कुमारमाता
तयो. प्रथमपु (*)त्रोऽमन्मंत्री लूणिगसज्ञया ।
दैवादवाप बालोऽपि, सालोक्यं [व] सवेन सः
पूर्वमेव सचिव. स कोविंदैर्गण्यते स्म गुणवत्सु लूणिगः ।
यस्य निस्तुपमतेर्मनीषया, धिकृतेव विषणस्य धीरपि
श्रीमछदेवः श्रि(*)तमछिदेवः, तस्यानुजो मंत्रिमतल्लिकाऽभूत् ।
बभूव यस्यान्यधनागनासु, लुब्धा न बुद्धिः शमलव्धबुद्धेः
॥१०॥
धर्मविधाने भुवनच्छिदपिधाने विभिन्नसघाने ।
सृष्टिकृता न हि सृष्टः, प्रतिमल्लो मल्लदेव(स्य
॥८॥
६० [नयम श्रीवृंदावलोपरिस्थिताः प्रशस्तयः । नीलनीरदकदम्बकमुक्तश्वेतकेतुकिरणोद्धरणेन । मल्लदेवयशसा गलहस्तो, हस्तिमल्लदशनांशुषु दत्तः ॥ १२॥ तस्यानुजो विजयते विजितेंद्रियस्य, सारस्वतामृतकृताद्भुतहर्पवर्षः । श्रीवस्तु(*)[पाल इति भालतलस्थितानि,दौःस्थ्याक्षराणि सुकृती कृतिनां विलंपन् ॥१३॥ विरचयति वस्तुपालथुलुक्यसचिवेषु कविपु च प्रवरः । न कदाचिदर्थहरणं, श्रीकरणे काव्यकरणे वा ॥१४॥ तेजःपालः पालितस्वा(*)मितेजःपुंजः सोऽयं राजते मंत्रिराजः । दुर्वृत्तानां शंकनीयः कनीयानस्य माता विश्वविधांतकीर्तिः तेजपालस्य विष्णोश्य, कः स्वरूपं निरूपयेत् ! । स्थितं जगत्रयीसूत्रं, यदीयोदरकंदरे ॥ १६ ॥ जाल्हू-माऊ-साऊ-धनदेवी-सोहगा-चयजुकाख्याः । परमलदेवी चैषां, क्रमादिमाः सप्त सोदर्यः ॥ १७॥ एतेऽश्वराजपुत्रा, दशरथपुत्रास्त एव चत्वारः । प्राप्ताः किल पुनरवनावेकोदरवासलोमेन ॥१८॥ अनुजन्मना समेतस्तेजःपा()लेन वस्तुपालोऽयम् । मदयति कस्य न हृदयं !, मधुमासो माधवेनेव पंथानमेको न कदापि गच्छेदिति स्मृतिप्रोक्तमिव स्मरंतौ । सहोदरौ दुर्द्धरमोहचौरे, संभूय धर्माध्वनि तो प्रवृत्ती ॥२०॥ इदं सदा सो(*)रयोरुदेतु, युगं युगव्यायमदोर्युगधि । युगे चतुर्थेऽप्यनपेन येन, कृतं कृतस्यागमनं युगस्य ॥२१॥ मुकामयं शरीरं, सोदरयोः सुचिरमेतयोरस्तु । मुक्तामयं किल महीवलयमिदं भाति यत्कीर्त्या ॥ २२॥ ए(*)कोत्पत्तिनिमिचो, यद्यपि पाणी तयोस्तथाऽप्येकः । वामोऽम्दनयोन तु, सोदरयोः कोऽपि दक्षिणयोः ॥ २३ ॥ धर्मस्थानांकितामुवा, सर्वतः कुर्वताऽमुना । दचः पादो बलाढवयुगलेन कलेगले ॥२४॥ इतश्चौरक्पवीरा(*)गा, वंशे शासाविशेषकः । अर्णोराज्ञ इति स्यातो, जातस्तेजोमयः पुमान् ॥२५॥ तस्मादनंतरमनंतरितप्रतापः, पाप क्षिनि क्षतरिपुर्लपणप्रसादः । स्वर्गापगाजवलक्षितगंसशुभा, ग्राम यस्य लवणाब्धिमतीत्य कीर्तिः(*) ॥२६॥ सुनम्तस्मादासीदशरथकालयप्रतिहतेः, प्रतिश्मापाररानां फवरितपो धीरघपला । १ पमिदं प्राचीन नगद १ भाग ४२ मध्यगिरिनारगतिशी नवमं मलभारिधीनरपत्रपरि- A RE २ पमिदं जिनद्वपीयपस्नुपालयरिते सोमेधादेखनाम्नय यते ॥
६१ ॥ २७॥ परिशिष्टम् ] । श्रीमयुंदाचलोपरिस्थिताः प्रशस्तयः । यशःपूरे यस्य प्रसरति रतिक्लांतमनसा- मसाध्वीनां भग्नाऽभिसरणकलायां कुगलता चौलुक्यः सुकृती स वीरधवलः क(*)जपानां जपं, यः कर्णेऽपि चकार न प्रलपतामुद्दिश्य यौ मंत्रिणौ । नाभ्यामभ्युदयातिरेकरचिरं राज्यं स्वमर्तुः कृतं, वाहानां निवहाः घटाः 'करटिनां बद्धाश्च सौघांगणे तेन मंत्रिद्वयेनायं, जाने जानूपवर्तिना । वि(*)मुर्मुजद्वयेनेव, सुखमाश्लिप्यति श्रियं ॥२८॥ ॥ २९ ॥ - इतध- । गौरीवरश्वशुरभूघरसमवोऽयमस्त्पर्युदः ककुदमद्रिकदंबकस्य । मंदाकिनी धनजटे दधदुत्तमांगे], यः श्यालकः शशिभृतोऽमिनयं करोति ॥ ३० ।। कचिदिह विहरंतीवर्वी (*समाणस्य रामाः, प्रसरति रतिरंतर्मोक्षमाकांक्षतोऽपि । कचन मुनिमिरयां पश्यतस्तीर्थवीथीं, मवति भवविरक्ता धीरपीरात्मनोऽपि ॥ ३१ ॥ श्रेयःश्रेष्ठवशिष्ठहोमहुतमुक्कुंडान्मृतंडात्मज- प्रद्योताधिकदेहदीधितिम(*)रः कोऽप्याविरासीन्नरः । तं मत्वा परमारणैकरसिकं स व्याजहार झुते- राधारः परमार इत्यजनि तन्नामाऽथ तस्यान्वयः श्रीधूमराजः प्रथमं बभूव, भूवासवस्तत्र नरेंद्रवंशे । भूमिमृतो यः कृतवानभिज्ञान् , पक्षद्वयोच्छे(*)दनवेदनासु ॥ ३३ ॥ घंघुक-ध्रुव-मटादयस्ततस्ते रिपुद्विपघटाजितोऽभवन् । यत्कुले जनि पुमान् मनोरमो, रामदेव इति कामदेवजित् रोदकंदरवर्तिकीर्तिलहरीलिप्तामृतांशुद्युते- रप्रद्युम्नवशो यशोधवल इ(*)त्यासीचनूजस्ततः । यचौलुक्यकुमारपालनृपतिप्रत्यर्थितामागतं, मला सत्वरमेव मालवपति व(वोल्लालमालब्धवान् ॥ ३५ ॥ शत्रुश्रेणीगलविदलनोन्निद्रनिस्त्रिंशधारो, धारावर्पः समजनि सुतस्तस्य विश्वप्रकाश्यः । कोपाक्रांतप्र(*)धनवसुघानिश्चले यत्र जाता- च्योतन्त्रोत्पलजलकणाः कोकणाधीशपत्न्यः सोऽयं पुनर्दाशरथिः पृथिव्यामव्याहतौजाः स्फुटमुजगाम । मारीचवैरादिव योऽधुनाऽपि, [मगव्यमव्यग्रमतिः करोति नयम । ॥४०॥ , ६२ श्रीअर्बुदाचलोपरिस्थिताः प्रशस्तयः । साम(तसिंहसमिति क्षितिविक्षतीजाः, श्रीगूर्जरक्षितिपरक्षणदक्षिणासिः । ।। महादनस्तदनुजो दनुजोत्तमारिचारित्रमत्र पुनरूज्वलयांचकार ॥३८॥ देवी सरोजासनसंभवा किं , कामप्रदा किं सुरसौरभेयी । प्रदादनाकारघरा(*)घरायामायातवत्येप न निश्चयो मे धारावर्पसुतोऽयं, जयति श्रीसोमसिंहदेवो यः । पितृतः शौर्य विद्या, पितृव्यकाहानमुभयतो जगृहे मुक्त्या विपकरानरातिनिकरान्निर्जित्य तत्किंचन, प्रापत् संपति सोम(*)सिंहनृपतिः सोमप्रकाशं यशः । येनो:तलमुज्ज्वलं रचयताऽप्युत्ताम्यतामीjया, सर्वेषामिह विद्विषां नहि मुखान्मालिन्यमुन्मूलितं ॥४१॥ वसुदेवस्यैव सुतः, श्रीकृष्णः कृष्णराजदेवोऽस्य । मात्राधिकप्रतापो, यशोद(*)यासंश्रितो जयति ॥ १२ ॥ इंतश्च- अन्वयेन विनयेन विद्यया, विक्रमेण सुकृतक्रमेण च । कापि कोऽपि न पुमानुपैति मे, वस्तुपालसदृशो दृशोः पथि ॥४३॥ देयिता ललितादेवी, तनयमवीतनयमाप सचिवेंद्रात् । नामा जयंत(*)सिंह, जयंतमिंद्रात् पुलोमपुत्रीव ॥४४॥ यः शैशवे विनयवैरिणि बोधवंध्ये, घचे नयं च विनयं च गुणोदयं च । सोऽयं मनोमवपरामवजागरूक- रूपो न के मनसि चुंबति जैत्रसिंहः ! ॥४५॥ श्रीवस्तुपालपुत्रः, कल्पायुरयं जयं(तसिंहोऽस्तु । कामादधिकं रूपं, निरूप्यते यस्य दानं च से श्रीतेजःपालः, सचिवचिरकालमस्तु तेजस्वी । येन जना निश्चिताश्चितामणिनेव नंदति ॥४७॥ यचाणक्या-ऽमरगुरु-मरुद्व्याधि-शुक्रादिकानां, प्रागुत्पादं व्यधित भुवने (*) मंत्रियां बुद्धिघानां । चक्रेऽभ्यासः स खल विधिना नूनमेनं विधातुं, तेजःपालः कथमितरथाऽधिक्यमापैप तेषु ! ॥१८॥ १ पयमिदं प्राचीन रेनलेससंग्रह १ भागगत ३८ संख्यगिरिनारसत्कशिलालेखे नवम् सोमेश्वरदेवकृतिस्पे. मेव निदिष्ट वर्तते ॥ २ पद्यमिदं प्राचीननटेसमाह २ भागगत ३८ संख्यगिरिनारसक १.१ संख्यादावलं. प्रशयोः क्रमशः पठं प्रथमं च सोमेश्वरदेवनितया निर्दि वर्तते ।।
" , 11 . । ॥ 11 परिशिष्टम् ] श्रीमदाचलोपरिस्थिताः प्रशस्तयः । ६३ अस्ति स्वस्तिनिकेतनं तनुभृतां श्रीवस्तुपालानुजन ।। ii. स्तेजःपाल इति स्थिति बलिकृतामुतिले पालयन् । आत्मीयं ब( )दुमन्यते न हि गुणग्रामं च कामंदकि- चाणक्योऽपि चमत्करोति न हदि प्रेक्षास्पदं प्रेक्ष्य यम् ॥ १९॥ इतश्च महं० श्रीतेजपालस्य पत्न्याः श्रीअनुपमदेव्याः पितृवंशवर्णनम् ॥ प्राग्वाटान्वयमंडनैकमुकुटः श्रीसांदचंद्रावती वास्तव्यः स्त(*)वनीयकीर्तिलहरिपक्षालितक्ष्मातलः श्रीगागाभिधया सुधीरजनि यद्वृत्तानुरागादभूत्, को नाप्तप्रमदो न दोलितशिरा नोद्भूतरोमा पुमान् ? ॥५०॥ अनुसृतसज्जनसरणिधरणिगनामा बभूव तत्तनयः । स्वप्रभुहृदये (4) गुणिना, हारेणेव स्थितं येन ॥ ५१॥ त्रिभुवनदेवी तस्य, त्रिभुवनविख्यातशीलसंपन्ना । दयिताऽभूदनयोः पुनरंग द्वेषा मनस्त्वेकम् ॥५२॥ अनुपमदेवी देवी,,साक्षादाक्षायणीव शीलेन । तदुहिता सहिता श्रीतेजःपालेन () पत्याऽभूत् ॥ ५३॥ इयमनुपमदेवी दिव्यवृचप्रसूनत्रततिरजनि तेजपालमंत्रीशपत्नी । नय-विनय-विवेकौचित्य-दाक्षिण्य-दानप्रमुखगुणगणेंदुद्योतिताशेपगोत्रा लावण्यसिंहस्तनयस्तयोरयं, रयं जयन्ति (४) [ दि] यदुष्टवाजिनाम् । लव्ध्वापि मीनध्वजमंगलं वयः, प्रयाति धर्मेकविधायिनाऽध्वना श्रीतेजपालतनयस्य गुणानमुप्य, श्रीलूणसिंहकृतिनः कति न स्तुवंति।। श्रीबंधनोद्धुरतरैरपि यैः समंतादुद्दामता त्रिजगति क्रि(*)यते स्म कीतेः गुण-धननिधानकलशः, प्रकटोऽयमवेष्टितश्च खलसर्पः । उपचयमयते सततं, सुजनैरुपजीव्यमानोऽपि मल्लदेवसचिवस्य नंदनः, पूर्णसिंह इति लीलुकासुतः । तस्य नंदति सुतोऽयमहणा(-)देविभूः सुकृतवेश्म पेथडः अभूदनुपमा पत्नी, तेजःपालस्य मंत्रिणः । लावण्यसिंहनामाऽयमायुष्मानेतयोः सुतः ॥ ५१ ।। तेजपालेन पुण्यार्थ, तयोः पुत्र-कलत्रयोः । हर्म्य श्रीनेमिनाथस्य, तेने तेनेदमदे ॥ ६ ॥ तेजपाल इति क्षितीदुसचिवः शंखोज्ज्वलाभिः शिला- श्रेणीमिः स्फुरदिटुकुंदरुचिरं नैमिप्रमोमंदिरम् । उचैर्मडपमप्रतो जिन वरा] वासद्विपंचाशतं, तत्पार्थेषु बलानकं च पुरतो निष्पादयामासिवान ॥ ५४ ॥ - । ॥ ५५ ॥ । ॥ ५८॥ . --
हममें
॥ २॥
॥ ६४॥
श्रीअर्बुदाचलोपरिस्थिताः प्रशस्तयः ।
श्रीमचंड[प] संभवः [सम ]भवचंडप्रसादस्ततः,
सोमस्तत्वभवोऽश्वराज इति तत्पुत्राः पवित्राशयाः ।
श्रीमल्लूणिग-मल्लदेवसचिवश्रीवस्तुपालाहया-
स्तेजःपालसमन्विता जिनमतारामोन्नमन्नीरदाः
श्रीमंत्रीश्वरवस्तुपालतनयः श्रीजै(*)वसिंहाय-
स्तेजपालसुतश्च विश्रुतमतिविण्यसिंहामिधः ।
एतेषां दश मूर्तयः करिवधूस्कंघाधिरूढाश्चिरं,
राजते जिनदर्शनार्थमयतां दिमायकानामिव
मूर्तीनामिह पृष्ठतः करिवधूपृष्ठप्रतिष्ठाजुपां,
तन्मतिर्विम(*)लाश्मखचकगताः कांतासमेता दश ।
चौलुक्पक्षितिपालवीरधवलस्याद्वैतबंधुः सुधी-
स्तेज पाल इति व्यधापयदयं श्रीवस्तुपालानुजः
तेजपालः सकलपजोपजीव्यस्य वस्तुपालस्य ।
सविधे विभाति सफलः, (*) सरोवरस्येव सहकारः
तेन प्रात्युगेन या प्रतिपुर-मामा-ऽध्य-शैलस्थलं,
वापी-कूप-निपान-कानन-सरः-प्रासाद-सत्रादिका।
धर्मस्थानपरंपरा नवतरा चक्रेऽथ जीर्णोद्धृता,
तत्संख्याऽपि न बुध्यते यदि परं तद्वेदि (४)नी मेदिनी
शंभोः श्वासगतागतानि गणयेद् यः सन्मतिर्योऽथवा,
नेत्रोन्मीलनमीलनानि कलयेन्मार्कडनाम्नो मुनेः ।
संख्यातुं सचिवद्वयीविरचितामेतामपेतापर-
व्यापारः सुकृतानुकीर्तनतति सोऽप्युजिहीते यदि (*)
सर्वत्र वर्सतां कीर्तिरश्चराजस्य शाश्वती । सुकर्तुमुपक च, जानीते यस्य संतति.
आसीचंडपमंडितान्वयगुरु गद्रगच्छश्रिय-
थूडारलमयत्नसिद्धमहिमा सरिमहेंद्राभिधः ।
तस्माद्विस्मयनीयचारुचरित श्रीशांति(*) [सूरिस्त ] तो.
प्यानंदा-ऽमरमरियुग्ममुदयचन्द्रार्कदीप्रद्युति
श्रीजैनशासनवनीनवनीरवाहः, श्रीमास्ततोऽप्यपहरो हरिभद्रसरिः ।
विद्यामदोन्मदगदेवनवद्यवैद्या, त्यातस्ततो विजयसेनमुनीधरोऽयम्
गुरो स्त] (*)स्या शिपां पात्रं, सूरिरस्त्युदयममः।
मौक्तिकानीव सूकानि, माति यत्प्रतिमांबुघेः
॥६६॥
॥६७॥
॥६८॥
॥६९॥
" परिशिष्टम् ] श्रीभवृंदावलोपरिस्थिताः प्रशस्तयः । । एतद्धर्मस्थानं, धर्मस्थानस्य चास्य यः कर्ता । तावद् द्वयमिदमुदियादुदयत्ययमवुदो यावत् । ॥ ७२ ॥ श्रीसोमेश्वरदेवथुलुक्यनरदेवसेवितांहि(*)युगः । रचयांचकार रुचिरां, धर्मस्थानप्रशस्तिमिमाम् ॥७३॥ श्रीनेमेरम्बिकायाश्च, प्रसादादबुदाचले । वस्तुपालान्वयस्यास्तु, प्रशस्तिः खम्तिशालिनी ॥७॥ स्त्र० केल्हणसुतघांधलपुत्रेण चंडेश्वरेण प्रशस्तिरियमुत्कीर्णा । (*) श्रीविक्रम संवत् १२८७ वर्षे] फाल्गुण वदि ३ रखौ श्रीनागेंद्रगच्छे श्रीविजयसेनसूरिभिः प्रतिष्ठा कृता ।। (६५) ॥ ॥ ॐ नमः [सर्वज्ञाय ॥ सव]त् १२८७ वर्षे लौकिकफाल्गुनवदि ३ रयौ अोह श्री- मदणहिलपाटके चौलुक्यकुलकमलराजहंससमस्तराजावलीसमलंकृतमहाराजाधिराजश्रीम[मदेव ]. (*) विजयराज्ये त......... .............. श्रीवसिष्ट(छ) कुंडयजनानलोद्भूतश्रीमद्भुमराजदेव- कुलोत्पन्नमहामंडलेश्वरराजकुलश्रीसोमसिंहदेवविजयिराज्ये 'तस्यैव महाराजाधिराजश्रीभीमदेवस्य प्रसा [दात् गूर्ज] (6) रत्रामंडले श्रीचौलुक्यकुलोत्पन्नमहामंडलेश्वरराणकश्रीलवणप्रसाददेयसुत्त- महामंडलेश्वरराणकश्रीवीरधवलदेवसत्कसमस्तमुद्राव्यापारिणा श्रीमदणहिलपुरवास्तव्यश्रीप्राग्वाट- ज्ञातीय ठ० श्रीचंड[पसुत ठ० श्री] (*)वंडप्रसादात्मज महं० श्रीसोमतनुज ठ० श्रीआसराज- मार्या ठ० श्रीकुमारदेव्योः पुत्र महं० श्रीमल्लदेव सधपति महं० श्रीवस्तुपालयोरनुजसहोदरभातृ महं० श्रीतेजःपालेन स्वकीयमार्या महं० श्रीअनुपमदेव्यास्तस्कुक्षि [सभूतप] (1) वित्रपुत्र महं० श्रीलूणसिंहस्य च पुण्ययशोऽभिवृद्धये श्रीमदर्युदाचलोपरि देउलवाडाग्रामे समस्तदेवकुलिकालकृतं विशालहस्तिशालोपशोभितं श्रीलूणसिंहवसहिकाभिधानश्रीनेमिनाथदेवचैत्यमिदं कारित ॥छ । (*) प्रतिष्ठितं श्रीनागेंद्रगच्छे श्रीमहेंद्ररिसताने श्रीशांतिसरिशिष्यश्रीआणंदसरि-श्रीअमरचंद्र- परिपालंकरणप्रभुश्रीहरिमद्रसरिशिष्यैः श्रीविजयसेनसूरिभिः ॥ छ । अत्र च धर्मस्थाने कृत मायकगोष्टि(ठि)कानां नामा(*)नि यथा ॥ महं• श्रीमल्लदेव महं० श्रीपस्तुपाल महं० श्री- तेजःपालप्रभृतिमातृत्रयसतानपरंपरया तथा महं० श्रीलूणसिंहसत्कमातृकुलपक्षे श्रीचंद्रावतीवास्त- न्यप्राग्वाटज्ञातीय उ० श्रीमावदेवसुत ठ० श्रीशालिगतनुज ठ० (*) श्रीमागरतनय ठ० श्री- गागापुत्र ठ० श्रीधरणिगमा महं० श्रीराणिग मह० श्रीलीला तथा ठ० श्रीधरणिगभार्या 30 श्रीतिहुणदेविकुक्षिसंभूत महं० श्रीअनुपमदेवीसहोदरातृ ठ० श्रीसीम्यसीह ठ० श्रीआम्बसींह ठ० श्रीजदल (*) तथा महं० श्रीलीलासुत महं० श्रीलूणसीह तथा भातृ ० जगसीह 30 रत्नसिंहानां समस्तकुटुंबेन एतदीयसनानपरंपरया च एतस्मिन् धर्मस्थाने सकलमपि स्नपनपूजा- सारादिकं सदैव करणीय निर्वाहणीयं च ॥ तया ॥ (*) श्रीचंद्रावत्याः सत्कममस्तमहाजनसकल- । [मयमै श्रीअर्बुदावलोपरिस्थिताः प्रशस्तयः । जिनचैत्यगोष्टि(ठि)कप्रभृतिश्रावकसमुदायः ॥ तथा उवरणी-कीसरेउलीग्रामीयनारबाट ज्ञा० ० राप्तल उ• आसघर तथा ज्ञा० माणिभद्र उ० श्रे० आल्हण तथा ज्ञा० श्रे० देल्हण उ० खीम्बसी(*)ह धर्कटज्ञातीय श्रे० नेहा उ० साल्हा तथा ज्ञा० धउलिग उ० आसचंद्र तथा ज्ञा० श्रे० वहुदेव उ० सोम प्रापाटज्ञा० श्रे० सावड उ० श्रीपाल तथा ज्ञा० ० जींदा उ० पाल्हण धर्कटना० श्रे० पामु उ० सादा प्राग्वाटज्ञातीय पूना उ० सा(*)ल्हा तथा श्रीमालज्ञा० पूना उ० साल्हाप्रभृतिगोष्टि(ष्ठि)काः । अमीभिः श्रीनेमिनाथदेवप्रतिष्टा( Bा)वर्ष- थियात्राटाहिकायां देवकीय चैत्रवदि ३ तृतीयादिने स्नपनपूजाद्युत्सवः कार्यः ॥ तथा कासहदमा- मीय ऊएसवालज्ञा(*)तीय श्रे० सोहि उ० पाल्हण तथा ज्ञा० श्रे० सलखण उ० वालण प्राग्वाटज्ञा० श्रे० सांतुय उ० देल्हुय तथा ज्ञा० श्रे० गोसल उ० आल्हा तथा ज्ञा० श्रे० कोला उ० आम्बा तथा ज्ञा० ० पासचंद्र उ० पूनचंद्र तथा ज्ञा० श्रे० जसवीर उ० ज( )गा तथा श० ब्रह्मदेव उ० राल्हा श्रीमालज्ञा० कपडरा उ० कुलधरप्रभृतिगोष्टि- (ठि)काः । अमीभिस्तथा ४ चतुर्थीदिने श्रीनेमिनाथदेवस्य द्वितीयाटाहिकामहोत्सवः कार्यः ॥ तथा ब्रमाणवास्तव्यप्राग्वादशातीय महाजनिक (4) आंमिग उ. पूनड ऊएसवालशा० महा० धांधा उ० सागर तथा ज्ञा० महा० साटा उ० वरदेव प्राम्बाटज्ञा० महा० पाल्हण उ० उदयपाल ओइसवालज्ञा० महा० आवोधन उ० जगसीह श्रीमालज्ञा० महा० वीसल उ० पासदेव प्रा(* वाटज्ञा० महा० वीरदेव उ० अरसीह तथा ज्ञा० श्रे० धणचंद्र उ० रामचंद्र- प्रभृतिगोष्टि(प्ठि)काः । अमीभिस्तथा ५ पंचमीदिने श्रीनेमिनाथदेवस्य तृतीयाष्टाहिकामहोत्सवः कार्यः ॥ तथा धउलीग्रामीय प्राग्वाटज्ञातीय श्रे० सा(* जण उ० पासवीर तथा ज्ञा० श्रे पोहाडि उ० पूना तथा शा० ऋ० जसडुय उ० जेगण तथा ज्ञातीय श्रे० साजन उ० भोला तथा ज्ञा० पासिल उ० पूनुय तथा ज्ञा० श्रे० राजुय उ० सावदेव तथा ज्ञा० दूगसरण उ. साहणीप ओइसवाल(*)ज्ञा० श्रे० सलखण उ० महं० जोगा तथा ज्ञा० श्रे[.] देवकुंयार उ० आसदेवप्रभूतिगोष्टि(ठि)का' । अमीभिस्तथा ६ षष्ठीदिने श्रीनेमिनाथदेवस्य चतुर्थाष्टाहि- कामहोत्सवः कार्यः ।। तथा मुंडस्थलमहातीर्थवास्तव्य प्राग्वाटज्ञातीय (*) श्रे० सं० धीरण उ० गुणचंद्र पाल्हा तया श्रे० सोहिय उ० आश्चेसर तथा श्रे० जेजा उ० खाखण तथा फीलिणी- ग्रामवास्तव्य श्रीमालज्ञा० बापल-गाजणप्रमुखगोष्टि(ठि)काः । अमीभिस्तथा ७ सप्तमीदिने श्री- नमिनाथदेवम्य पंचमाष्टाहिकाम( * )होत्सव कार्यः ॥ तथा इंडाउद्रग्राम-डवाणीग्रामवास्तव्य श्रीमालज्ञातीय श्रे० आम्युय उ० जमरा तथा ना० [.) लखमण उ० आम् तथा ज्ञा० श्रे० आसल उ० जगदेव तथा ज्ञा. श्रे. मिग २० घणदेव तथा ज्ञा० ० जिणदेव उ० 'जाला(*) प्राग्वाटज्ञा० ० आसल उ० सादा श्रीमाल ज्ञा० श्रे० देदा उ० बीसल तथा शा० ० आमधर उ० आमल तथा ज्ञा० श्रे० थिरदेव उ० वीरुय तथा ज्ञा० ० गुणचंद्र उ० देवधा तथा ज्ञा० ऋ० हरिया उ० हेमा माग्वाटज्ञा० ऋ० लखमण(*) उ० कडपान- तिगोष्टि(ष्ठि)काः । अमीमिम्तया ८ अष्टमीदिने श्रीनेमिनाथदेवपाष्टाहिकामहोत्सवः कार्यः ।।
। . ० पहुदा परिशिष्टम् ] धीअर्बुदावलोपरिस्थिताः प्रशस्तयः तथा [म.डाहडवास्तव्यमाग्वाटनातीय श्रे? देसल उ० ब्रह्मसरणु तथा ज्ञा० जसकर उ० श्रे० धणिया तथा ज्ञा[०] श्रे० (*) देल्हण उ० आल्हा तथा जा० श्रे० वाला उ० पद्मसिह तथा ज्ञा० श्रे० आंबुय उ० चोहडि तथा जा० श्रे० बोसरि उ० पूनदेव तथा ज्ञा[0] श्रे० वीरुप उ० साजण तथा ज्ञा० श्रे० पाहुय उ० जिणदेवप्रभृतिगोष्टि(ठि)काः । अमीभिस्तथा ९ नवमोदिने (*) श्रीनेमिनाथदेवस्य ‘सप्तमाष्टाहिकामहोत्सवः कार्यः ॥ तथा साहिलबाडावास्तव्य ओइसवालज्ञातीय श्रे० देल्दा उ० आल्हण श्रे० नागदेव उ० आम्बदेव श्रे० काल्हण उ० आसल श्रे० वोहिथ उ० लाखण श्रे० जमदेव उ० वाहड श्रे० (*) सीलण उ० देल्हण १० महधरा उ० घणपाल श्रे० पूनिग उ० वाया श्रे० गोसल उ० वडापमृति- गोष्टि(ठि)काः । अमीभिस्तथा १० दशमीदिने श्रीनेमिनाथदेवस्य अष्टमाष्टाहिकामहोत्सवः कार्यः ।। तथा श्रीअर्बुदोपरि देउल(*)वाडावास्तव्यसमस्तश्रावकः श्रीनेमिनाथदेवस्य पंचापि कल्याणि- कानि यथादिनं प्रतिवर्ष कर्तव्यानि । एवमियं व्यवस्था श्रीचंद्रावतीपतिराजकुलश्रीसोमसिंहदेवेन तथा सत्पुत्र राज० श्रीकान्हडदेवप्रमुखकुमरैः समस्तराजलोकस्त(*)या श्रीचंद्रावतीयस्थानपति- मट्टारकप्रभृतिकविलास तथा गूगलीत्राह्मणसमस्तमहाजनगोप्टि(ठि )कैश्च तथा अर्बुदाचलोपरि थी- अचलेश्वर श्रीवसिष्ठ तथा संनिहितग्रामदेउलवाडाग्राम-श्रीश्रीमातामहबुग्राम-आयुयग्राम- ओरामाग्राम-उत्तरछग्राम-सिहरग्राम-सालग्राम-हेठउंजीग्राम-आखीग्राम-श्रीघांधलेश्वरदे- वीयकोटडीप्रभृतिद्वादशग्रामेषु संतिष्ट(8)मानस्थानपतितपोधन-गूगुलीब्राह्मण-राठियप्रभृतिसमस्तलोकै- स्तथा भालि-भाडाप्रमृतिग्रामेपु सतिष्ट(४)मानश्रीप्रतीहा( )रवंशीयसर्वराजपुत्रैश्च आत्मीयात्मीय- स्वेच्छया श्रीनेमिनाथदेवस्य मंडपे समुपविश्योपविश्य महं० श्रीतेजःपालपार्थात् स्वीयस्वीयभमो- दपूर्वकं श्रीलूणसीहवप्तहिकाभिधानस्यास्य धर्मस्थानस्य सर्वोऽपि रक्षामारः स्वीकृतः । तदेतदा(*) स्मीयवचनं प्रमाणीकुईमि(द्विारेतैः सर्वैरपि तथा एतदीयसंतानपरंपरया च धर्मस्थानमिदमाचंद्रार्क यावत् परिरक्षणीयम् ॥ यतः- किमिह कपाल-कमंडलु-वल्कल-सितरक्तपट-जटापटलैः । व्रतमिदमुज्ज्वलमुन्नतमनसां प्रतिपन्ननिर्धणं ॥ १ ॥ छ । (-) तथा महाराजकुलश्रीसोममिहदेवेन अम्यां श्रीलूणसिंहवसहिकायां श्रीनेमिनाथदेवाय पूजां. गभोगाथै वाहिरहयां डवाणीग्रामः शासनेन प्रदत्तः ॥ स च श्रीमोमसिंहदेवाभ्यर्थनया प्रमारा- न्वयिभिराचंद्राकं यावत् प्रतिपाल्यः ॥४॥ (*) सिद्धक्षेत्रमिति प्रसिद्धमहिमा श्रीपुंडरीको गिरिः, श्रीमान् रेवतकोऽपि विश्वविदितः क्षेत्रं विमुक्तरिति । नूनं क्षेत्रमिदं द्वयोरपि तयोः श्रीअर्बुदस्तत्पम्, मेजाते कथमन्यथा सममिमं श्रीआदि-नेमी स्वयम् ? संसारसर्वस्वमिहेव मुक्तिसर्वस्वमप्यत्र जिनेशदृष्टं । विलोक्यमाने भवने तयास्मिन् , पूर्व परं च त्वयि दृष्टिपाथे श्रीकृष्णपीयश्रीनयचंद्रसरेरिमे ।। ने नयम ६८ श्रीअर्बुदावलोपरिस्थिवाः प्रशस्तयः । सं० सरवणपुन सं० सिंहराज साधू साजण सं० सहसा-साइदेपुत्री 'सुनथव' प्रणमति "शुभम्॥ (६६) (१) ॐ । स्वस्ति ।। सं० १२९६ वर्षे वैशाख शुदि ३ श्रीशQजयम- (२) हातीर्थे महामात्यश्रीतेजपालेन कारितनंदीसरवर- (३) पश्चिममण्डपे श्रीआदिनाथवि देवकुलिका दंड-क- (४) लसादिसहिता । तथा इहैव तीर्थे महं [0] श्रीवस्तुपालका- (५) रितश्रीसत्यपुरीयश्रीमहावीरर्षियं खत्तकं च । इहि( है )व (६) तीर्थे शैलमयबिंब द्वितीयदेवकुलिकामध्ये खतक- (७) द्वय श्रीऋषभादिचतुर्विशतिका च । तथा गूढमण्डपपूर्वद्वा- (८) रमध्ये खत्तकं मूर्तियुग्मं तदुपरे श्रीआदिनाथनियं श्री- (९) उज(ज)यंते श्रीनेमिनाथपादुकामंडपे श्रीनेमिनाथर्षि- (१०) बं खत्तकं च । इहैव तीर्थे महं [0] श्रीवस्तुपालकारितश्री- (११) आदिनाथस्याग्रत(तो) मंडपे श्रीनेमिनाथबिंब खत्तकं च । (१२) श्रीअर्बुदाचले श्रीनेमिनाथचेत्यजगत्यां देवकुलि- (१३) काद्वयं पविसहितानि । श्रीजावालिपुरे श्रीपा- (१४) र्श्वनाथचैत्य जगत्यां श्रीआदिनाथपियं देवकुलिका (१५) च । श्रीतारणगहे श्रीअजितनाथगूढमंडपे श्रीमा- (१६) दिनाथर्षिय खत्तकं च ॥ श्रीअणहिल्लपुरे हथीयावापी- (१७) प्रत्यासन्न श्रीसुविधिनाथवियं तचैत्यजीर्णोद्धारं च । (१८) वीजापुरे देवकुलिकाद्वयं श्रीनेमिनाथवि श्रीपा- (१९) वनाविवं च । श्रीमूर प्रासादे कपलीखतकद्वये (२०) श्रीआदिनाय श्रीमुनिसुव्रतस्वामिपिं च ॥ लाटाप. (२१) ल्यां श्रीकुमरविहारजीर्णोद्धारे श्रीपार्श्वनाथस्याम- (२२) त(तो) मंडपे श्रीपार्थनाथर्विवं खत्तकं च । श्रीमहादनपु. (२३) रे पाल्हविहारे श्रीचंद्रप्रमस्वामिमंडपे खत्तक- (२४) द्वयं च । इहैव जगत्यां श्रीनेमिनाथस्यामत(तो) मंडपे (२५) श्रीमहावीरवियं च । एतत् सर्व कारितमस्ति । श्रीनाग- (२६) पुरीपवरङ्गुडीपा साहु नेमडमुत सा० राहड । (२७) सा० जयदेव ग्रा० सा० सहदेव सत्पुत्र संघ० सा० (२८) रोटा प्रा० गोसल सा० जपदेव सुत सा. वीरदे- 17 । - परिशिष्टम् ] श्रीमदाचलोपरिस्थिताः प्रशस्तयः । (२९) व देवकुमार हालूय सा० राहड सुत सा० जिणचंद्र (३०) धणेश्वर अभयकुमार लघुमातृ सा० लाहडेन (३१) निजकुटुंबसमुदायेन इदं कारितं । प्रतिष्ठितं (३२) श्रीनागेंद्रगच्छे श्रीमदाचार्यविजयसेनसूरिभिः ॥ (३३) श्रीजाबालिपुरे श्रीसौवर्णगिरी श्रीपार्श्वनाथजगत्यां (३४) अष्टापदमध्ये खत्तकद्वयं च ॥ लाटापल्यां श्रीकुमारविन (३५) हारजगत्यां श्रीअजितस्वामिवि देवकुलि- (३६) का दंड-कलससहिता । इहैव चैत्ये जि- (३७) नयुगलं श्रीशांतिनाथ श्रीअजितस्वामि । (३८) एतत् सर्व कारावि(पि)तं । (३९) श्रीअणहिल्लपुरमल्यासन्न चारोपे (४०) श्रीआदिनाथविवं प्रासादं गूढमंड- (४१) पंछ चउकिया सहितं सा० राहड- (४२) सुत सा० जिणचंद्र भार्या सा० चाहि- (४३) णिकुक्षिसमूतेन संघ सा० दे- (४४) वचंद्रेण पिता माता आत्मश्रेयो- (४५) थे कारापितं ॥छ । (६७) र्द० ॥ श्रीनृपविक्रमसवत् १२८८ वर्षे श्रीमत्पत्तनवास्तव्य प्राग्वाटज्ञातीय श्रीचंडप श्रीचंड- प्रसाद श्रीसोम महं० श्रीआसरासुतश्रीमालदेव महं० (*) श्रीवस्तुपालयोरनुज महं० श्री- तेजपालेन महं० श्रीवस्तुपालभार्यायाः मह० श्रीसोखुकायाः पुण्यार्थं श्रीसुपार्श्वजिनालंकृता देव- कुलिकेयं कारिता ॥ छ । छ ।। (६८) द० ॥ श्रीनृपविक्रमसंवत् १२८८ वर्षे श्रीपत्तनवास्तव्य प्राग्वाटजातीय श्रीचंडप श्रीचंड- प्रसाद श्रीसोम महं० श्रीआमरासुतश्री(*)मालदेव महं० श्रीवस्तपालयोरनुज महं० श्री- तेजपालेन महं० श्रीवस्तपालभार्याललतादेविश्रेयोऽयं देवकुलिका कारिता ।। छ । छ ।। (६९) द० ॥ संवत् १२८८ वर्षे श्रीचंडप श्रीचंडप्रसाद श्रीसोम महं० श्रीआसरांगज महं० श्रीवस्तपालमुत महं० श्रीजयतसीहश्रेयोऽर्थ (*) महं० श्रीतेजपालेन देवकुलिका कारिता ॥ द. [1] श्रीसुवधिनाथस्य कल्या० फाल्गुन वदि ९ च्यवन -- .
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श्रीमदाचलोपरिस्थिताः प्रशस्तयः ।
[नपर
।
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॥ श्रीपविक्रमसंवत् १२८८ वर्षे श्रीचंडप श्रीचंडप्रसाद श्रीसोम महं० श्रीआसरांगज
महा०] श्रीतेजपालेन श्रीजयतसीहमार्याजयतलदेवि [*] श्रेयोऽर्थ देवकुलिका कारिता ।।।
(७१)
० ॥ श्रीनृपविक्रमसवत् १२८८ वर्षे प्राग्वाटज्ञातीय श्रीचंडप श्रीचंडप्रसाद श्रीसोम
मह[0] श्रीआसरांगज महं० श्रीतेजपालेन श्रीजयतसीहमार्यामहवदेवि(*)श्रेयोऽयं देवकुलिका
कारिता ॥
(७२)
द० ॥ श्रीनृपविक्रमसंवत् १२८८ वर्षे प्राग्वाटजातीय श्रीचंडप श्रीचंडप्रसाद श्रीप्तोम महं०
श्रीआसरान्वयसमुद्भव महं० श्रीतेजपालेन महं० श्रीजपतप्ती(*)हमार्या महं० श्रीरूपादेवि-
श्रेयोऽयं देवकुलिका कारिता ॥ छ ।
(७३)
द० ॥ श्रीनृपविक्रमसंवत् १२८८ वर्षे श्रीचंडप श्रीचंडप्रसाद महं० श्रीसोम महं०
श्रीआसरान्वये मह. श्रीमालदेवमुताश्रीमहजलश्रेयोऽर्थ महं० श्रीतेजपालेन दे(*)बकुलिका
कारिता ॥छ।
(७१)
द० ॥ श्रीपविक्रमसंवत् १२८८ वर्षे प्रापटशातीय श्रीचंडप श्रीचंडप्रसाद महं० श्रीसोम
महं० श्रीआमरान्वये महं० श्रीमालदेवसुताबाईश्रीसदमलश्रेयो(*)ऽयं मह० श्रोतेजपालेन
देवकुलिका कारिता ॥ छ॥
(७५)
दं० ॥ श्रीनृपविक्रमसेवत् १२८८ वर्षे प्राग्वाटजातीय श्रीचंडप श्रीचंडप्रसाद महं० श्रीसोम
मई० श्रीआसरान्वये महं० श्रीमालदेवमत महं श्रीपुंनमीहीपमा(*)ो महं० श्रीआल्हग-
देवियोऽथ मह० श्रीवेजपालेन देवकुरिका कारिता ॥ छ ।
(७६)
दं० ॥ श्रीनृपविक्रमसंवत् १२८८ वर्षे प्राग्वाटनातीय श्रीचंडप श्रीचंडप्रसाद मई० श्रीसोमा
न्वये महं० श्रीआमरामुत महं० श्रीमारदेवीपमार्या महं० श्रीपात्येयोऽयं मह० श्रीतेजपालेन
देवरिया कारिता !!
(७७)
दं० ॥ श्रीनपवियमसेवन १२८८ वर्षे प्राग्वाटमातीय श्रीचंप श्रीचंडमाद महं० श्रीमोमा-
न्वये मह० मीयामरामुत महं० श्रीमालदेवीयभायां महं० श्रीलीलूरेयोऽयं महं० थी.)
तेजपालेन देवरिका कारिता ॥८॥
1 . 1 - - ! . । परिशिष्टम् ] श्रीअर्बुदाचलोपरिस्थिताः प्रशस्तयः ।। (७८) ०॥ श्रीनृपविक्रमसंवत् १२८८ वर्षे प्राग्वाटवंशीय श्रीचंडप,श्रीचंडप्रसाद महं०,श्रीसोम महं० श्रीआसरा महं० श्रीमालदेवान्वये महं० श्रीपूनसीहसुत महं० , श्रीपेथडश्रेयोऽर्थ, महं० श्रीतेजपालेन देवकुलिका कारिता ।। (७९) द० ॥ श्रीनृपविक्रमसवत् १२८८ वर्षे प्राग्वाटवंशीय श्रीचंडप श्रीचंडप्रसाद महं० श्रीसोमा- न्वये महं० श्रीमालदेवसुत महं० श्रीपुंनसीहश्रेयोऽयं महं० श्रीतेजपालेन देवकुलिका कारिता ॥ छ । छ । (८०) ०॥ श्रीनृपविक्रमसवत् १२८८ वर्षे प्राग्वाटवंशीय श्रीचंडप श्रीचंडप्रसाद महं० श्रीसोमा- न्वये महं० श्रीआसरासुत महं० श्रीमालदेवश्रेयोऽयं तत्सोदरलघुमातृ महं० श्रीतेजपालेन देवकुलिका कारिता ॥ छ । (८१) र्द०॥ श्रीनृपविक्रमसंवत् १२८८ वर्षे प्राग्वाटवंशीय श्रीचंडप श्रीचंडप्रसाद महं० श्रीसोम महं० श्रीआसरा 'महं० श्रीमालदेवान्वये महं० श्रीपुंनसीहसुताबाईश्रीवलालदेवियोऽर्थ महं० श्रीतेजपालेन देवकुलिका कारिता ॥ छ ।। (८७) संवत् १२९० वर्षे प्राग्याटवंशीय महं० श्रीसोमान्वये महं० श्रीतेजपालसुत मई० लूण- सीहमारियणादेवियोऽ(*)महं० श्रीतेजपालेन देवकुलिका कारिता ॥ छ ॥ शुभं भवतु (८८) द १० ॥ संवत् १२९० वर्षे महं० श्रीसोमान्वये महं० श्रीतेजपालमुत महं० श्रीलूणसीहभा महं० श्रीलपमादेवियोऽथ महं० तेजपालेन देवकुलिका कारिता ।। (८९) द० ॥ श्रीनृपविक्रमसंवत् १२९० वर्षे श्रीपत्तनवास्तव्य प्राग्याटवंशीय महं० श्रीचंडप श्री- चंदप्रसाद महं० श्रीसोमान्वये महं० श्रीआसरासुत महं० श्रीमालदेवमातृ महं० श्री(*) वस्तपालयोनुज महं० श्रीतेजपालेन स्वकीयमा महं० श्रीअनुपमदेवियोऽयं देवधीमुनि- सुबतदेवस्य देवकुलिका कारिता ॥ छ । (९०) श्रीनुपविक्रमसंवत् १२९० वर्षे माग्वाटज्ञातीय महं० धीचंडप यीचंडप्रसाद श्रीसोम महं० श्रीवासरान्वयसमुद्भब महं० धीतेजपालेन स्वमुतापलदेवियोऽर्थ देवकुलिका कारिता ॥ 3 - ७२ श्रीमदावलोपर्यिस्थता प्रशस्तयः । [ नवर्म संवत् १२९० वर्षे प्राग्वाटज्ञातीय महं० श्रीचंडप श्रीचंडप्रसाद श्रीसोम श्रीआसरा- न्वयसमुद्भूत महं० श्रीवेजपालेन स्वमुतश्रीलूणसीहमुतागउरदेवियोऽर्थ देवकुलिका कारिता ॥७॥ (९४) ॥ ० । स्वस्ति श्रीविक्रमनृपात् सं० १२९३ वर्षे चैत्र वदि ८ शुक्र अद्येह श्रीअर्बुदावल- तीर्थे स्वयंकारितश्रीलूणसीहवसहिकाख्यश्रीनेमिनाथदेवचैत्ये जगत्यां श्रीप्राग्याटज्ञातीय 3. चंडप ठ० श्रीचंडप्रसाद महं० श्रीसोमान्वये श्रीआसराज-भार्याश्रीकुमारदेव्योः सुत महं० श्रीमालदेवसंघपतिश्रीवस्तुपालयोरनुज महं० श्रीतेजपालेन स्वमगिन्या वाईझालहणदेव्याः श्रेयोऽयं विहरमानतीर्थकरसीमंधरस्वामिप्रतिमालंकृता देवकुलिकेयं कारिता प्रतिष्ठिता श्रीनागेंद्र- गच्छे श्रीविजयसेन रिमिः ॥ छ । (९५) स्वस्ति श्रीविक्रमनृपात् सं० १२९३ वर्षे चैत्र वदि ८ शुक्र अद्येह थीअर्बुदाचलतीर्थे स्वयं- कारितश्रीलूणसीहवसहिकास्यश्रीनेमिनाथदेवचैत्ये जगत्यां श्रीप्राग्याटज्ञातीय ४० चंडप ४० श्रीचंडप्रसाद महं० श्रीसोमान्वये ठ० श्रीआसराज-माश्रिीकुमारदेव्योः सुत महं० श्रीमालदेव- संघपतिश्रीवस्तुपालयोरनुज महं० श्रीवेजापालेन स्वभगिनीवाईमाउश्रेयोऽर्थ विहरमानतीर्थकरथी- युगंधरस्वामिजिनप्रतिमालंकृता देवकुलिकेयं कारिता ॥ छ । (९६) स्वस्ति श्रीविक्रमनृपात् सं० १२९३ वर्षे चैत्र वदि ८ शुक्रे अघेह श्रीअर्बुदाचलतीर्थे स्वयंकारितश्रीलूणसीहवसहिकाख्यश्रीनेमिनाथदेवचैत्य जगत्यां श्रीप्राग्वाटज्ञातीय ४० चंडप ४० धीचंडप्रसाद महं० श्रीसोमान्वये ४० श्रीआसराज-भार्याश्रीकुमारदेव्योः मुत महं० श्री. मालदेवसंघपतिश्रीवस्तुपालयोरनुज महं० श्रीतेजपालेन स्वमगिन्या :} साउदेव्याची श्रेयोऽ विहरमानतीर्थकरश्रीवाजिनालंकृता देवकुलिकेयं कारिता ॥ छ । (९७) स्वस्ति श्रीविक्रमनृपात् सं० १२९३ वर्षे चैत्र वदि ८ शुक्र अद्येह श्रीअर्बुदाचलती स्वयं- कारितत्रीणसीहबमहिकाव्यश्रीनेमिनाथदेवचैत्वे जगत्यां श्रीप्राग्वाटशातीय ठ० चंडप 30 श्रीचंहप्रसाद महं० श्रीसोमान्वये ठ० श्रीआसराज-भायश्रिीकुमारदव्योः सुत महं० श्रीमाल- देवसंघपतिश्रीवस्तुपालयोरनुन महं० श्रीवेजपालेन स्वमगिन्या माईघणदेवीश्रेयसे विहरमानतीर्थ- करी[सराहुबिवालंकृता देवकुलिकेयं कारिता ।। (९८) ॥ ० ॥ स्वस्ति श्रीनृपविक्रमसंवत् १९९३ वर्षे चैत्र वदि ८ शुक्रे अधेह श्रीअर्बुदाचल- महातीर्थे स्वयंकारितश्रीदणमीहवमहिकाव्यश्रीनेमिनापदेव()चत्यजगत्यां श्रीप्राग्बाटशातीय - - परिशिष्टम् ] श्रीअर्बुदाचलोपरिस्थिताः प्रशस्तयः । ठ० श्रीचंडप ठ० श्रीचंडप्रसाद महं० श्रीसोमान्वये ठ० श्रीवासराज ठ० श्रीकुमारदेव्याः सुत महं० श्रीमालदेव सिधप(*)ति महं० श्रीयस्तुपालयोरनुज ,महं० श्रीतेजःपालेन स्वमगिन्या वाईसोहगायाः श्रेयोऽथ शाश्वतजिनकपभदेवालंकृता देवकुलिका कारिता] || (८९९) १० ॥ स्वस्ति श्रीनृपविक्रमस(स)वत् १२९३ वर्षे चैत्र वदि ८ शुके अयेह श्रीअर्बुदाचल- महातीर्थे स्वयंकारितश्रीलूणसीहवसहिकायां श्रीनेमिनाथदेवचैत्ये, जगत्या(*) || श्रीप्राग्वाट- ज्ञावी(ती)य ठ० श्रीचंडप ठ० श्रीचंडप्रसाद महं० श्रीमोमान्वये ठ० श्रीआसराज ठ० श्रीकुमार- देव्योः सुन महं० श्रीमालदेर महं० श्रीवस्तुपालयोरनुज मह० (*) श्रीतेजपालेन स्वभगिन्या बाईवयजुकायाः श्रेयोऽथ श्रीवर्धमानाभिधशाश्वतजिनप्रतिमालंकृता देवकुलिकेयं कारिता ॥ शुभं . भवतु ॥ मंगलं महात्रीः ॥ (१०२) द० ॥ श्रीनृपविक्रमसवत् १२९३ वर्षे चैत्र वदि ७ अोह श्रीअर्घदाचलमहातीर्थे स्वय- कारितश्रीलूणसीहवसहिकास्यश्रीनेमिनाथदेवचैत्ये जगत्यां महं० श्रीतेजःपालेन(*)मातुलमुत मामा राजपालभणितेन स्वमातुलस्य महं० श्रीपूनपालस्य तथा भार्या महं० श्रीपूनदेव्याश्च श्रेयोऽथं अस्या देवकुलिकायां श्रीचंद्राननदेवप्रतिमा कारिता ।। (१०३) दं० ॥ श्रीनृपविक्रमसंवत् १२९३ चैत्र वदि ७ श्रीअर्बुदाचलमहातीर्थे प्राग्वाटज्ञातीय ठ० श्रीचंडप ठ० श्रीचंडप्रसाद महं० श्रीसोमान्वये ठ० श्रीआसराजसुत(*) महं० श्रीमालदेव महं० श्रीवस्तुपालयोरनुज महं० श्रीवेजापालेन स्वभगिन्याः पद्मलायाः श्रेयोऽयं श्रीवारिसेणदेवा- लंकृता देवकुलिकेयं कारिता ॥ (११०) संवन् १२९७ वर्षे वैशाख वदि १४ गुरौ प्राग्वाटज्ञातीय चंडप चंडप्रसाद महं० श्री.... ..........सा सुतायाः ठकुराज्ञीसंतोपाकुक्षिसंभूताया महं० श्रौतेजःपालद्वितीयमार्या महं० श्रीसुहडादेव्याः श्रेयोऽयं एतत् त्रिगदेवकुलिकाखत्तक श्रीमंतिनाथसिंच कारितं ॥ छ । - । संवत् १२९७ वैशाख सुदि १४ गुरो प्राग्वाटजातीय चंडप चंडप्रसाद महं० श्रीसोमान्वये नियम श्रीअर्बुदावलोपरिस्थिताः प्रशस्तयः । महं० श्रीआसराजसुत महं० श्रीवेजःपालेन श्रीमत्पत्तनवास्तव्यमोदज्ञातीय ठ० झाल्हण सुत 3. आसामुताया ठकुराज्ञीसंतोपाकुक्षिसंभूताया महं० श्रीतेजःपालद्वितीयभार्या महं० श्रीसुहहा- देव्याः श्रेयो.... (प्रथमहस्ती) [महं० श्रीचंडप।] (द्वितीयहस्ती) [महं० श्रीचंडप्रसाद ।] (तृतीयइस्ती) महं० श्रीसोम । (चतुर्थहस्ती) महं० श्रीआसराज । (पंचमहस्ती) [महं० श्रीलूणिग।] (षष्ठहस्ती) [महं० श्रीमल्लदेव । (सप्तमहस्ती) [ महं० श्रीवस्तुपाल ।) (अष्टमहस्ती) [महं० श्रीतेजःपाल 11 (नवमहस्ती) [महं० श्रीक्षेत्रसिंह । ] (दशमहस्ती) [महं० श्रीलावण्यसिंह ।] - (१ हस्तिषठमागे) (२ " ~ " " १ आचार्यश्रीउदयसेन । २ आचार्यश्रीविजयसेन । ३ महं० श्रीचंडप । ४ महं० श्रीचापलदेवी । १ महं० श्रीचंडग्रसाद । २ महं० श्रीवामलदेवी । १ महं० श्रीसोम । २ महं० श्रीसीतादेवी । १ महं० श्रीआसराज । २ महं० श्रीकुमारदेवी । १ महं० श्रीणिगदेव । २ महं० श्रीलूणादेवी । २ महं० श्रीलीलादेवी। ३ महं० श्रीप्रतापदेवी। २ महं० श्रीललितादेवी । ३ महं० श्रीवेजलदेची । १ महं० श्रीवेजःपाल । महं० श्रीअनुपमदेवी । १ महं० श्रीजयसिंह । महं० श्रीजयतलदेवी । (६ . " १ महं० श्रीमालदेव १ १ महं० श्रीवस्तुपाल । (७ " ) परिशिष्टम् ] । तारणदुर्गादिगताः प्रशस्तयः । १ महं० श्रीलावण्यसिंह । २ महं० श्रीरूपादेवी १ महं० श्रीसुहडसीह । २ महं० श्रीसुहडादेवी । ३ महं० श्री सलखणदेवी । .- (१०,,) تی (२४२) सं० १२७८ वर्षे फाल्गुण बदि ११ गुरौ श्रीमत्पचनवास्तव्य प्राग्वाटज्ञातीय ठ० श्री- चंडेशानुज ठ० मुमाकीयानुन(?) ठ० श्रीआसराजतनुज महं० श्रीमालदेवश्रेयसे सहोदर महं० श्रीवस्तुपालेन श्रीमल्लिनाथदेवखचकं कारितमिदमिति । मंगलं महाश्रीः ॥ शुभं भवतु ।। ० ॥ (३) श्रीतारणदुर्गस्थः शिलालेखः । (५४३) द० ॥ स्वस्ति श्रीविक्रमसंवत् १२८५ वर्षे फाल्गुण शुदि २ रवौ । श्रीमदणहिलपुरवास्तव्य प्राग्याटान्वयप्रसूत ठ० श्रीचंडपात्मज ठ० श्रीचंडप्रसादांगज ठ० श्रीसोमतनुज ठ० थीआशा- राजनन्दनेन ठ० (*)मारदेवीकुक्षिरम्तेन ठ० श्रीलूणिग महं० श्रीमालदेवयोरनुजेन महं० श्रीतेजपालामजन्मना महामात्यश्रीवस्तुपालेन आत्मनः पुण्याभिवृद्धये इह श्रीवारंगकपर्वते श्रीअजितस्वामिदेवचैत्ये श्रीआदिनाथदेवजिनपिंगालंकृतं मतकमिदं कारितं । प्रतिष्ठितं श्री. नागेन्द्रगच्छे मारकश्रीविजयसेनसूरिभिः ॥ (१) श्रीशनुजयपद्या(पाज)शिलालेखः। (१) [श्रीमदगदिलपचन] वास्तव्य प्रामाटान्वय- (२) [प्रसून ठ० श्रीचंडतनुन] 8. श्रीचंदप्रमादां- (३) [गज ठ० श्रीमोमपुत्र ० सीआशाराजनं.
[नव ५६ तारणदुर्गादिगताः प्रशस्वयः । (४) [दनेन ठ० श्रीणिग ] श्रीमालदेव संपप- (५) [ति महं० श्रीवस्तुपालानु न महं० श्रीतेजःपाले. (६) [न श्रीशर्बुजयतीर्थे ] संचारपाजा कारिता ॥ अणहिलपत्तनान्तर्गताः शिलालेखाः। (१) ॥सं० १२८४ वर्षे ।। विश्वानंदकरः सदा गुरुरुचिर्जीमूतलीलां दधौ, सोमश्वारुपवित्रचित्रविकसदेवेशधर्मोन्नतिः । चक्रे मार्गणपाणिशुक्तिकुहरे यः स्वातिवृष्टिवजे- मुक्तमौक्तिकनिर्मलं शुचि यशो दिकामिनिमंडनम् युक्त...................सोमसचिवः कुंदेंदुगुर्गुणै. रिद्धः सिद्धनृपं चिमुच्य मुकृती चक्रे न कंचिद्विभुम् । रंग गमदपदच्छदमदः श्रीसद्म पनं किमु, सोलासाय विहाय मास्करमहस्तेजोन्तरं यांति पर्यशैषीदसौ सीवामविश्वामित्रसंगतः । अत्रितमहाधर्मलाघवो रायवोऽपरः ॥२॥ सं० १२८४ वर्षे श्रीमत्पत्तनवास्तत्र्य प्रारबाट ४० श्रीवंडप्रसाद सुत ठ० श्रीसोमः । सं० १२८४ वर्षे श्रीमत्पचानवास्तव्य प्राग्वाट ४० धापूनसीह सुन ४० आल्हाणदेवी कुभिमः ४० पेयहा॥ सं० १३५२ वर्षे कार्तिक मु. ११ गुरु सं० पेपर मुन सं महान परपरसमेत मुरति गरित ॥
परिशिष्टम् ] अर्बुदाचलगती अपशिष्ठी शिलालेग्यो । (६) अर्बुदाचलगतौ अवशिष्टौ शिलालेखौ (१-२५६) दं० ॥ सं० १२८७ वर्षे चैत्र वदि ३ शुक्रे महं० श्रीवस्तुपाल महं० श्रीतेजःपालाः ॥ य[:] पूर्वजपुण्याय अस्मिन्नर्बुदगिरी श्री (२-२६०) नृपविक्रमसंवत् १२८७ वर्षे फाल्गुण सु(व)दि ३ सोमे(रवौ) अघेह श्रीअर्बुदाचले श्री- मदणहिलपुरवास्त० प्राग्वाटज्ञातीय श्रीचंडप श्रीचंडप्रसाद महं० श्रीसोमान्वये महं० श्री- आसरायुत महं० मालदेव महं० श्रीवस्तुपालयोरनुज आतृ महं० श्रीतेजःपालेन स्वकीयमार्या महं० श्रीअनुपमदेवीकुक्षिसभूत सुत महं० श्रीलूणसोहपुण्यार्थं अस्यां श्रीलूणवमहिकायां श्रीनेमि- नाथमहातीर्थ कारिवं ॥ छ । छ । (श्रीजयंतविजयजीसंगृहीत श्रीअर्बुद-प्राचीन-जैन-लेखसंदोह) ............... स्तम्भतीर्थीय-श्रीआदीश्वरमन्दिरगतः शिलालेखः (१) ॐ नमः श्रीसर्वज्ञाय ॥ धीराः सत्त्वमुगन्ति यत्रिभुवने........... ..नेति श्रुतं, साहित्योपनिप[न्नि ](२)पण्णमनसो यत्प्रातिभं मन्यते । सार्यजं च यदामनंति मुनयस्तत्किचिदत्यद्भुतं, ज्योतिर्योतितवि(३)ष्टपं वितनुतां मुक्ति च मुक्तिं च यः श्रीमद्गुर्जरचक्रवर्तिनगरमाप्तपतिष्ठोऽननि, प्राग्याटायर(४)म्यवंशविलसन्मुक्तामणिश्चंडपः । यः संपाप्य समुद्रतां किल दधौ राजप्रसादोल्लम- दिलकप(५)कीर्तिशुनलहरिः श्रीमंतमतजिन ॥ २॥ अजनि रजनिजानिज्योतिरुयोतिकीर्तिबिजगति तनुज(६)न्मा तस्य चंडप्रसादः। नम्बमणिसम्बशा[*सुंदरः पाणिपयः, फमत न कृतार्थ यस्य कल्पद्रुकल्पा(७) ॥ ३॥ पत्नी तस्याजायतात्यायताक्षी, मार पीः [पुण्य पात्रं जयश्रीः [1] बजे ताभ्यामनिमः घरसनः, पुत्रः श्री(८)मान् सोमनामा द्वितीयः नवम स्तम्भतीर्थीय-श्रीबादीश्वरमदिरागत निर्माप्याऽऽदिजिनेंद्रबिमसम शेषत्रयोविंशति श्रीजैनप्रतिमानिराजि(९)तमसावभ्यञ्चितु वेश्मनि [1] पूज्यश्रीहरिभद्रसूरिसुगुरो [पाश्चात् मतिष्ठाप्य च, स्वस्याऽऽत्मीयकुलस्य चा {क्ष](१०) यमय श्रेयोनिधान व्यधात् असामाशारा तनुनमपर सोमसचिव , प्रियाया सीताया शुचिच(११)रितवत्यामजनयत् [यशोमि भिर्डगति विशदे क्षीरजरपी, निवासैकपीतिमुदममजदि(१२)दु प्रतिपद श्रीरवते निर्मितसप्तयात्र , केनोपमानस्त्विह ] सोऽश्वराजः । क्लकशकामुपमान(१३)मेन, पुष्णात्यहो यस्य यश शशाके अनुजोऽम्यापि सुमनुजत्रिभुवनपालम्तथा स्वसा केली । (१४)आशारानम्याजनि, जाया च कुमारदेवीति तस्याभूतनयासया(य) प्रथमक श्रीमल्लदेवोऽपर श्च(१५)चञ्चडमरीचिमडरमहा श्रीवस्तुपालस्तत्त । तेजपाल इति प्रसिद्धमहिमा विश्वेऽत्र तुर्य स्फुर- चा(१६)तुर्य समजायतायत्तमति पुत्रोऽश्वराजादसौ श्रीमल्लदेवपौत्रो, लीलमुतपुण्यसिंहतनुज(१७)मा । आल्हणदव्या जात , पृथ्वीसिंहाख्ययाऽस्ति विख्यात श्रीवस्तुपार सचिरस्य गेहिनी देहिनीव गृ(१८)हरक्ष्मी । विशदतरचित्तवृत्ति, श्रीललितादेविसज्ञाऽस्ति शीताशुपतिवीरपीवरयशा विश्वेऽत्र (१९)पुत्रस्तयो विख्यात प्रसरद्गुणो विन[यते श्रीजैनसिंहः कृती । लक्ष्मीर्यत्करपकनप्रणयिनी हीनाश्रयोत्येन सा, (२०)प्रायश्चित्तमिवाचरत्यारह स्नानेन दानाभसा अनुपमदेण्या पल्या, श्रीतंज.पालसचिवतिरकस्य [1] (२१)लावण्यसिंहनामा, धाम्नो धामाऽयमात्मजो जज्ञे नामवन् कति नाम सति कति ते नो वा मविप्यन्ति के [1] वे(२२)तु छापि न कोऽपि सघपुरुष श्रीवस्तुपालोपम । पुण्याच प्रहरमहनिशमहो सर्वाभिसारोदरो, येनाय वि(२३)जित कलिविंदपत्ता तीर्थेशयानोत्सव ।॥११॥ .
गेकऽस्मिनुपमानतामुपगताः मर्वेषु नः संमति, प्राप्ता नेत्युपमेयतां तदधिकग्रीवस्तुराण, (एनाल्स ऑफ घी भाण्डारकर ओरिएन्टल रिसर्च इन्स्टीट्युटपूटा (१) ॥९० ॥ स्वस्ति ॥ संवत् १२९१ वर्षे वैमाख शुदि १४ गुरौ श्रीमदणहिलावादका तनुजन्मा ठ० श्रीकुमारदेवीकुक्षिसमुद्भूत ठ० श्रीणि[ग](३) महं० श्रीमालंदेव मादुर महं० श्रीतेजःपालामज महामात्यश्रीवस्तुपालात्मज महं० श्रीजयतमिहे [न्तम] नया सं० ७९ वर्षपूर्व ब्याटण्यति महामात्यश्रीवस्तुपाल महं० श्रीदेजःपालाम्यां ममनमा (4)तथा अन्य]समस्तसानेवपि कोटिशोऽभिनवधर्मस्थानानि जीर्णोदाराध काग्निःr. सचिनेश्वरधीवस्तु(६)पालेन आत्मनः पुण्यामिह गाणउलिमामे प्रपा श्रीगायादेवनमा गुट गांभीर्य जलधिर्यलिवितरणे पूषा प्रतापे स्मरः, सौंदर्य पुरुषग्रते रघुपतिनाति, परिशिष्टम् ] गणेशरग्रामगतः शिलालेखः । लक्ष्मी धर्मागयोगेन, स्थेयसीं तेन तन्वता [I] पौषधालयमा................(२४)निर्ममेन विनिर्ममे श्रीनागेंद्रमुनींद्रगच्छतरणिर्जने महेंद्रप्रमोः, पट्टे पूर्वमपूर्ववाव्ययनि(२५)धिः श्रीशांतिरिः [1] आनंदामरचंद्रसूरियुगलं तस्मादमत्तत्पदे, पूज्यश्रीहरिभद्रसरिगुरवोऽस्यन् मु(२६)वी भूषणं ॥१६॥ तत्पदे विजयसेनसूरयस्ते जयंति भुवनैकमपणं [1] ये तपोज्वलनविभूतिभिस्तेजयं(२७) ति निजकीर्तिदर्पणं ॥ १७॥ स्त्रकुलगुरु...., पौषधशालामिमाममात्येंद्रः । पित्रोः पवित्रहृदयः, पुण्यार्थ(२८) कल्पयामास ॥१८॥ वाग्देवतावदनवारिजमित्रसामद्वराज्यदानकलितोरुयशःपताकां [1] चके गुरोविज(२९)यसेनमुनीश्वरस्य, शिष्यः प्रशस्तिमुदयप्रमरिरलां ॥ १९ ॥ सं० १२८१ वर्षे महं० श्रीवस्तुपालेन कारितपौपघ(३०)शालाख्यधर्मस्थानेऽस्मिन् मेष्टि राजदेवसुत श्रे० मयधर ! भां० सोमा उ भा० धारा । व्यव० वेला उ वीकल । थे० पूना (३१)युत वीजा वेडी० उदेयपाल उ आसपाल मां० आल्हण र गुणपाल पतंगोष्टिकत्वमंगीकृतं । एमिर्गोष्ठिकैरस्य धर्मस्थानस्य(३२)............ ..स्तंमतीर्थेऽत्र कायस्थवंशे वाज.............रिलि. मिह च ४० सू०........[जैत्र] सिंह ध्रुव........कुमरसिंहनोत्कीर्णा ॥ (८) गणेशरग्रामगतः शिलालेखः प्राग्वाट २० (30) श्रीचंडपात्मज [चं](२)डप्रमादांगज ट. मनोरणं तः प्रतोली द्वारा........ ...(७)त प्राकारथ कारितः ॥ ॥ वॉ०९ पृष्ठ १७७ लेख १) श्रीसोमतनुन ८० पासामाग गगरमामगत: शिलालेयः । नियम .... ............(९)विदग्धमतयातुल्यौ कौटिल्य-वस्तुपालौ । ............कुर्वते न, कस्मात् पारयोः समतां वदनं घस्तुपालस्य,(१०) कमलं को न मन्यते । यत्स्यालोकने स्म[२], भवति प्रतियासरं ॥३॥ श्रीवस्तुपाल संप्रति, परमं हतिकर्मक (2) [1] ..वा(११) भवता नितिरधिजनेन संघटिता तस्मै स्वस्ति चिरं चुलुक्यतिलकामात्याय............ .........(१२)........कर्मनिर्मलमतिः सौवस्तिकः शंसति । राधेयेन विना विना च शिबिना य........ .(१३)........स्मयं ........स्व.... ........गच्छति संतः सदा महामात्यश्रीवस्तुपालस्य प्रशस्तिरिय]. (एनाल्स ऑफ घी भांडारकर ओरिएन्टल रिसर्च इन्स्टीट्युट पूना बॉ०९ पृष्ठ १८० लेख २) ........ नगरपामगतः शिलालेखः (१) ॥९० ॥ संवत् १२९२ वर्षे आपाद शुदि ७ रयो श्रीनारदमुनिविनिवेशिते श्रीनगरवरमहा- स्थाने सं० ९०३ वर्षे अ(२)तिवर्षाकालवशादतिपुराणतया च आकस्मिकधीजयादित्यदेवीयमहा. प्रासादपतनविनष्टायां श्रीरत्नादेवीमूर्ती(३) पश्चात् श्रीमत्पत्तनवास्तव्यप्राग्याट 30 श्रीचंडपात्मज ठ० श्रीचंडप्रसादांगज ठ० श्रीसोमतनुज 8० श्रीआशाराजनंद(४)नेन ठ० श्रीकुमारदेवीकुक्षिसंभूतेन महामात्यश्रीवस्तुपालेन स्वमार्यायाः ठ० कान्हडपुज्याः ० राणुकुक्षिभया(५)या महं० श्रीललिता- देव्याः पुण्यार्थमिहैव श्रीजयादित्यदेवपल्याः श्रीरत्नादेवीमूर्तिरिय कारिता ! शुभमस्तु ॥ छ । (एनाल्स ऑफ धी भाण्डारकर ओरिएन्टल रिसर्च इन्स्टीटयुट पूना बॉ०९ पृष्ठ १८२ लेख ३) परिशिपम् ] तारणदुर्गादिगताः प्रशस्तयः । ७७ वस्तुपालतीर्थयात्रालेखः सं० १२१९ वर्षे संघपति स्वपितृ ठ० श्रीआशाराजेन समं महं० श्रीवस्तुपालेन श्रीविम- लाद्रो रैवते च यात्रा कृता । सं० ५० वर्षे तेनैव समं स्थानद्वये यात्रा कृता । सं० ७७ वर्षे स्वयं संघपतिना मूत्वा स(स्व)परिवारयुतं ९० वर्षे स० ९१ वर्षे सं० ९२ वर्षे सं० ९३ वर्षे महाविस्तरेण स्थानद्वये यात्रा कृता । श्रीशgजये अद्न्येव पंच वर्षाणि तेन सहितेन स० ८३ वर्षे स० ८४ सं० ८५ ० ८६ २०८७ सं० ८८ सप्त यात्राः सपरिवारेण तेन स्तसे ... ..श्रीनेमिनाथाम्बिका- प्रसादाचा............ भूता भविष्यति ॥ (वॉट्सन म्युझियम-राजकोट) " । . । मा ।
दशमं परिशिष्टम् आचार्य श्रीउदयप्रभविरचिताया उपदेशमालाकर्णिकाख्य: विशेपवृत्तेः आद्यन्तगते । । --- . महल-प्रशस्ती। - ५ ॥२॥ आदि:-- अहंस्तनोतु भुवनाद्भुतकल्पवृक्षः, श्रेयःफलं निविडयोधमुभप्रसूतम् । यस्याशिमूलममितः पतितप्रसूनप्रायाः सुरा-ऽसुर-नराधिपसम्पदोऽपि देवः स वः शतमखप्रमुखामरौषकृप्तप्रथः प्रथमतीर्थपतिः पुनातु । मुक्तिक्रमो न.... चिन्तातीतफलप्रदः स दिशतु श्रेयो युगादिप्रभुजुर्जन्मनि यस्य कल्पतरवः सर्वेऽप्युपादानताम् । नेत्थं चेत् कथमन्यथा वसुमतीमस्मिन्नलङ्कुर्वति, त्रैलोक्यैकगुरौ न गोचरममी जग्मुर्जगञ्चक्षुपाम् ! ॥३॥ तुनेमभीममसितीव्रतरेण कर्मवातं व्रतेन विनिपाख्य भवाटवीषु । मुक्तावलिश्रियमशिनियदात्म...... लीलासञ्चरणं च न पुररणकारश्रियं च स्वयं, बोर्बु साधु निपेव्यते खगकुलोसेन हंसेन या । किझल्कासनप्रसक्तमनसस्तस्यैव हेतोः करे, कुर्वाणा कमलं सतां भवतु सा ब्राह्मी परब्रह्मणे ॥५॥ जीयाद् विजयसेनस्य, प्रमोः प्रातिमदर्पणः । प्रतिविम्बितमात्मानं, यत्र पश्यति भारती ॥ ६ ॥ संपत्याद्भुतपुण्यपण्यविपणौ सा मा ..पदेशपद्धतिरसौ सा प्रातराशायते ॥७॥ गाथास्ताः खलु धर्मदासगणिनः सज्जातरूपश्रियः, किंचैप स्फुरदर्थरलनिकरः सिद्धर्षिणैवार्पितः । तेनैतामतिवृत्तसंस्कृतमयीमातन्वतः कर्णिका, वृत्ति मेऽत्र सुवर्णकारपदवीसीमाश्रमश्चिन्त्यताम् ॥ ८ ॥ - ............ यत:---- ..................... ........ - ..यथाविधिखवकघटनादुम्भते यशांसि तु शिस्मिनः ॥९॥ अन्वगता प्रशस्ति:- कमठधनभूताम्भोराशिसंयासिसाधिपतिकलितमूर्तिनीलनालीककान्तिः । सितरुचिरविराजल्लोचनः केवलधीपरिचयचतुरात्मा श्रीजिनो वः श्रियेऽस्तु ॥ १ ॥ १ पद्यमिदं मुक्तकोसिकहोलिन्यां प्रथमायरूपेणापि परीने ।। २ पयमिद मुकृतकोनिकलोलिन्या सप्तमपर- तयाऽपि वर्तते ॥ ३ पयमिदं धर्माभ्युदयमहाकाव्ये प्रथमसर्गे चतुर्दशपद्यत्वेनापि वर्तते ।।
. . " - परिशिष्टम् ] उपदेशमालाकर्णिकावृत्तमङ्गलप्रशस्ती। श्रीवर्धमानः शमिनां मनांसि, जिनो चिनोतु त्रिपदी यदीया । व्यामोति विश्वं बलिघात(ति)कर्मजयोदिता विश्वगनश्वरश्रीः ॥२॥ श्रीवीरशासनमहामहिमागरिष्ठः, श्रीमद्रयाहुविहिताचरणप्रतिष्ठः । काले कलायपि विलुप्तघनाघसद्ध, श्रीमानयं विजयते यतिमूलसङ्घ श्रीनागेन्द्रकुले मुनीन्द्रसवितुः श्रीमन्महेन्द्रप्रमोः, पट्टे पारगतागमोपनिषदां पारगमग्रामणीः । देवः संयमदैवतं निरवधिविधवागीश्वरः, सञ्जज्ञे कलिकल्मषैरकलुपः श्रीशान्तिपरिर्गुरुः ॥ ४ ॥ शक्तिः काऽपि न कापिलस्यं न नये नैयायिको नायकश्चार्वाकः परिपाकमुज्झितमतिर्थीद्धश्च नौद्धत्यमाक् । स्याद्वैशेषिकशेमुपीच विमुखी वादाय वेदान्तिके, दान्तिः केवलमस्य वक्तुरयते सीमां न मीमांसकः ॥५॥ तत्पट्टे प्रथमः शमिप्रभुरमूदानन्दरिः परः, सजज्ञेऽमरचन्द्रसरिरखिलानूचानचूडामणिः । शश्वद् यस्य सरस्वतीपसरणे सिद्धेशितः संसदि, पाश्चेतसि वेतसीतरुरसावाचार्यकं कार्यते ॥ ६ ॥ सिद्धान्तोपनिषन्निपण्णहृदयो धीजन्मभूस्तत्पदे, | पूज्यः श्रीहरिभद्रसूरिरभवच्चारित्रिणामग्रणीः । { : प्रान्त्वा शून्यमनाश्रयैरतिचिराद् यस्मिन्नवस्थानतः, सन्तुष्टैः कलिकालगौतम इति ख्यातिर्वितेने गुणैः गुरुः श्रीहरिभद्रोऽयं, लेमेऽधिकवयःस्थितिम् । मोहद्रोहाय चारित्रनृपनासीरवीरताम् तत्पदे विजयसेनसूरयः, पूरयन्ति कृतिनां मनोरथान् । तद्वी वृपमसूत नूतना, कामधेनुरिव सर्वकामदम् गर्यात् पूर्वमनादरैरवहितैः पश्चात् ततो विस्मितैः, प्रस्विन्नैरनुविस्मृतात्मभिरथो बादेऽनुवादे क्षणात् । , भाग्यैर्मानिमनीषिणां परिणता पुंस्त्वेन वागेप इत्याक्षिप्तैरथ सेन्यतेऽथ सहसा यः सादरं वादिभिः ॥१०॥ यस्योपदेशममृतोपमितं निपीय, श्रीवस्तुपालसचिवेश्वर-तेजपालो । सद्धाधिपत्यमसमं जिनतीर्थतेजःसंवर्धनाजितशतक्रतु चक्रतुस्तौ श्रीमद्विजयसेनस्य, सौमनस्यं नमस्यत । यद्वासिता धृताः कैर्न, गुणाः शिप्याश्च मूर्धसु ! ॥ १२ ॥ शिप्यस्तस्य च लक्षणक्षणचणः साहित्यसौहित्यवा- नुद्यतर्कवितर्ककर्कशमनाः सिद्धान्तशुद्धातुरः । श्रीधर्माभ्युदये कविः प्रविलसहुर्यादिगोत्रे पत्रि- स्तामेतामृदयप्रमाल्यगणभृद् वृति व्यघात् कर्णिकाम् तस्याऽऽज्ञया विजयसेनमुनीश्वरस्य, शिष्येण सेयमुदयप्रभदेवनाम्ना । योग्या विशेषविदुपामुपदेशमालावृत्तिः कयाग्रथनतोऽभिनवा वितेने ॥ १४ ॥ प्रथमादर्श प्रथमानमानसो देवयोधविबुध इमाम् । स्थपतिरिव सापयिता, गुरुपु नतोऽतनुत साहाय्यम् ॥१५॥ १ पथमिदं धर्माभ्युदयमहाकाव्यप्रयमसँगै नवमपातयाऽपि वर्तते ॥ २ पयस्यास्य पूर्वार्ध नरेन्द्रप्रभीय. रखपासप्रशस्तिगत १.१ पधपूर्वार्धसमम् ॥ ॥ ८॥ ।
उपदेशमालाकर्णिकावृत्तम अलमस्ती । [ दशम चान्दे कुले कलशतः किल सरिदेवानन्दापशिष्यकनकप्रमहरिनाम: | प्रद्युम्नमरिरुदितः कवितासमुद्रमुष्टिन्धयोऽम्मुपदशोधयदेप वृचिम् उत्सेकितोत्सूत्रनिरूपणार्याऽऽशातना स्यात् तनुकाऽपि काचित् । मिथ्याऽस्तु मे दुष्कृतमत्र साक्षी, श्रीसद्धमट्टारक एव तीर्थम् एकैकेन विमोहशक्यचरांछित्त्वा कपायानिमान् , दीप्ते भानु-कृशानुधामनि मनथैकेन हुत्वाऽऽमनः । मन्त्रस्याप्टशतैरितीह जपितैस्तैः पञ्चभिः सिद्धये, गाथामिर्गुरुगुम्फिता विजयते जप्योपदेशावलिः ॥ १८॥ कल्पाविष्करणादितो विवरणाद् विज्ञाय विज्ञात्मनामानायादुपदेशपद्धतिमिमामासेवमानो मुदा । लोकामोपरिवर्तिनीमभिमुखीं कुर्वीत वीतान्यधीवृत्तिनिवृतिदेवतां शिवपुरीसाम्राज्यकामः कृती ॥ १९॥ तत्त्वोदिलरसप्तमिकमहाप्रासादराजाङ्गणं, यावद् भाति जगद्गुरोभगवतः तीर्थशितुः शासनम् । तावच्छावक-साधुधर्मविजयस्तम्भवयालम्बिनी, दृतिर्वन्दनमालिका विजयतां तत्रोपदेशसजः ॥२०॥ सेयं पुरे धरलके नृपवीरवीरमन्त्रीशपुण्यवसतौ वसतौ वसद्भिः । वर्षे ग्रह-अह-स्वो क्रूतमार्कसमयः, भोकैर्विशेषविवृतिविहिताअनुतनीः इत्याचार्यश्रीउदयप्रमदेवसङ्घटितायामुपदेशमालायाः कर्णिकायां विशेषवृत्तौ तृतीयः परिवेशः सम्पूर्णः ॥ ० ३७१४ । एतावता च सम्पूर्णा उपदेशमालायाः कणिकाख्या विशेषवृचिरिति । ग्रंथ १२२७४ । छ। छ।
. सूर्याय व॥ ६ उपक, विश्वामित्रष्ट।। ७ यज्ञविद्याविदाम् ॥ ८ ईश्वरः॥ ९ 'प्नुव' ख ॥ १० 'गुलेवा १ आनन्दपुरम् ॥ २ देवा, मदिरा च ॥ ३ सर्पा, वेदभ्रष्टाच ॥ ४ भूदेवा ॥ ५ स्वामिन, इति स्पानाचारेण गोत्रस्यावठइनाम प्रतीयते, पर च डॉक्टर-रामकृष्ण-गोपाल-माण्डारकरमदानी 'एकादशं परिशिष्टम् गूर्जरेश्वरपुरोहितश्रीसामेश्वरदेवविरचितस्य सुरथोत्सवमहाकाव्यम्य . महामात्यश्रीवस्तुपालवंशवर्णनादिप्रतियदा प्रशस्तिरूपः पञ्चदशः सर्गः । अस्ति प्रशस्ताचरणप्रधान, स्थानं द्विजानां नेगरामियानम् । कर्तुं न शक्नोति कदाऽपि यस्य, त्रेतापवित्रस्य कलिः कलाम् सत्तीर्थस्य सुराभितेन जगता यस्योपमा स्यात् कयं, स्वाध्यायैकनिघेर्गतश्रुतिवृतेनोर्वीतलेनापि वा ?। यत्सौधेपु विशुद्धिवर्जितवपुर्वालोऽपि नाऽऽलोक्यते, वन्दे श्रीनगरं तदेतदखिलस्थानातिरिक्तोदयम् इतनयनसुखैर्मखामिधुमैः, श्रुतिकटुमिर्षवृन्दवेदपाठः । कलिरकलितसम्मदः प्रदत्ते, न सल्ल पदं विदुषां गृहेषु यत्र चश्चत्पश्चमखामिभनतमसि स्थाने त्रिनेत्रानल- ज्वालाप्रज्वलितप्रसूनधनुषा देवेन दत्तोदये । श्रीमतां च पवित्रतां च परमामालोकयन्तः सुराः, स्वर्वासेऽप्यरसा रसामरजगव्याजेन मेजुः स्थितिम् तस्मै संयमिनामिनाय मुनये नित्यं नमस्कुर्महे, यन्माहात्म्यमसघमाह स मुहुर्मुसन्मनाः कौशिकः । आविर्भूतममूतपूर्वचरितश्रेष्ठाद् वशिष्ठात् ततः, सत्कर्मोद्धरमध्वरस्थितिविदा स्थानेऽत्र गोत्रं महत् येषामशेषाधिपतिः प्रसन्नः, सन्नद्धपाणिः प्र(फ)णिकरणेन । तएव सम्मतिमिहाभुवन्ति, [कुले ] गुलेचा(वा)गिधया प्रसिद्ध श्रीसोलशर्मा विमले कुलेऽत्र, जन्म द्विजन्मप्रवरः प्रपेदे । यः स्वर्गिणः सोमरसेन यागे, पितृश्च पिण्डैरपृणत् प्रयागे १es-पाय 'रिपोर्ट' पुस्तके 'गुलेचा' इत्येव पाठ भाधिन । - ॥२॥ - - 11 ॥८॥ ॥ १३ ॥ ॥ १४॥ सुरथोत्सवमहाकाव्यस्य सोलः सलीलमवनीमवतामसौ वः, सौवस्तिकोऽस्त्रिति वरं स्मरता स्मरारेः । श्रीगुर्जरक्षितिमुजा किल मूलराज-देवेन दूरमुपरुध्य पुरो दघे यः यथा प्रतिष्ठा महती वसिष्ठस्तिग्मांशुवंशे भगवानवाप । निजेन सौवस्तिकतागुणेन, चौलुक्यभूपालकुले तथाऽसौ विधिवद् वाजपेयं यः, कलिकालेऽप्यकल्पयत् । कियती वा जपेयं तच्चरितामृतसंहिताम् । ॥ १० ॥ ऋग्वेदवेदी च श(क)तक्रतुश्च, दचान्नदानश्च जितेन्द्रियश्च । तिरोहिते तत्र पुरोहितेन्द्र, तदङ्गजन्माऽजनि लल्लशर्मा यः करोति स्म चामुण्डराजाख्यं नृपमाशिर्पा । हेतिप्रतापसम्पन्नं, हविषा च हविर्भुजम् ॥ १२ ॥ श्रीमुञ्जनामा तनुजस्तदीयः, स्वयं स्वयम्मूरिव भूतलेऽभूत् । यासण्यलाभाय तथाहि सद्विरभाजि मौजी रशनेव वृत्तिः सद्वंशजातेन गुणान्वितेन, शरासनेनेव पुरोहितेन । एतेन मेने भुवने न किञ्चिन्न दुर्लभं दुर्लभराजदेवः सन्तापशान्ति जगतोऽपि सोमस्तन्नन्दनश्चन्दनवञ्चकार । पीयूपहारी हरिणाङ्कितश्च, सत्यां यमाजे द्विजराजतां यः यस्याशीःप्रतिपादितोदययुजा श्रीभीमभूमीमुजा, क्षीरक्षालितशालितन्दु(ण्ड)लसितं साक्षात्कृतं तद्यशः । येनाशाक्रमणक्षमेण त इमे मूर्तिप्रभेदाः प्रमो- भस्मोद्धलनमन्तरेण धवलाः सर्वेऽपि निर्वर्तिताः मित्वा भानुं तत्र ताते प्रयाते, पुत्रः श्रीमानामशर्मा बभूव । कृत्वा सम्यक् संप्त संस्थाः ऋतूना, क्रीता कम्रा येन संम्राडभिख्या सदा यदाशीःपरिपूर्णकर्ण , श्रीकर्णनामा नृपतिः प्रकाण्डम् । वसुन्धरामण्डलमर्णवान्तं, वान्तारिनारीनयनाम्चु चके १ अस्य मूलराजपुरोहितस्य सोलस्य सत्ताममयो मूलराजराग्यसमय एवं ॥ २ पुरोहितः ॥ ३ अयं मूलराजमहाराज वि० सं० १९३-१०५३ वर्षेषु राज्यमकार्यात्, इति Indian Antiquary Vol. XI P. 219 ॥ ४ अस्य चामुण्डराजपुरोहितस्य लल्लशर्मणः सत्तासमयश्चामुण्डराजराज्यसमय एव । ५ चामुण्टराजराग्यम्--वि० सं० १०५३-१०६६ ॥ ६ भायुधम्, दीप्तिश्च ॥ ७ पौरुषम्, सन्तापश्च ।। ८ अस्य दुर्लमराजपुरोहिनस्य श्रीमुअनाम्न सत्ताममयो दुर्लभराजराग्यसमय एव ॥ ९ मौधो वृत्तिरिति मुनवर्तमानाना ग्रामण्यं भवतीत्यर्थः । एतन मुअस्य सदाचारस्वमुक्त भवतीत्यर्थः । अय च मौजी मेसला पारमयो रशना ब्राह्मण्यलाभाय सद्भिवंप्यते ॥ १० दुर्लमराजराज्यम्-वि० सं० १.६६-१०७८ ॥ ११ भस्य भीमराजपुरोहितस्य सोमस्य जीवनममयो भीमराजराग्यसमय एव ॥ १२ विष्णुना, मृगेण च ॥ १३ यमले स॥ १४ श्रामण्य, चन्दख च ॥ १५ भीमराजराग्यम्-वि. स. १०७८-११२.." १६ पृथिव्यादयोऽौ । १७ शिस्य ॥ १८ अन्य प्रोकर्णराजपुरोहितस्याऽऽमशर्मणः स्थितिसमय श्रीकर्ण राजयायममा एन ॥ १९ अप्रिोमाद्या. ॥ २० वाजपेययाजीति ॥ २१ पोकर्णराजराम्यम्-वि•सं० १११.-११५.॥ ४ آر. । परिशिष्टम् ] पञ्चदशः सर्गः। ८३ दानानि तानि सदनानि च तानि शम्भोरम्भोजराजिरुचिराणि सरांसि तानि । येनामुना मुनिजनानुकृता कृतानि, विचैथुलुक्यकुलसम्भवम्पदत्तैः ।। ॥ १९ ॥ धाराधीशपुरोधसा निजनृपक्षोणी विलोक्याम्बिलां, चौलुक्याकुलितां तदत्ययकृते कृत्या किलोत्पादिता । मन्यस्य तपस्यतः प्रतिहता तत्रैव तं मान्त्रिकं, सा संहत्य तडिल्लता तरुमिव क्षिप्रं प्रयाता कचित् ॥ २०॥ तस्मात् कुमारः सुकुमारमूर्तिमूर्तस्तपोरागिमिवोजगाम .! स्वराजराज्योदयदायिनी वागुवास शक्तेरिव यस्य वक्त्रे ॥ २१ ॥ पद्धः सिन्पुवसुन्धरापतिरतिपौढप्रतापोऽपि य- नीतः स्फीतबलोऽपि मालवपतिः कारां च दारान्वितः । दृप्तः सोऽपि संपादलक्षनृपतिः पादानति शिक्षितः, श्रीसिद्धक्षितिपेन सैप विभवः सर्वोऽपि यस्याऽऽशिपाम् ॥ २२॥ कुंगोपशोभितैर्यागस्तडागैश्च परःशतैः । दृष्टं पूतं च यश्चके, चक्रवर्तिपुरोहितः ॥ २३ ॥ ऋजुरोहितमृत्पुरोहितत्वम्पृहयेव त्रिदिवं गतस्य तस्य । तनुर्मनुभूपतिपणीतस्मृतिसर्वस्वमवाप सर्वदेव: ॥ २४ ॥ मध्वरेयंधित साधु सपर्यामध्वरेपु जयति स्म सुरेशम् । मानवानविदितापरयाच्यो, मानवानकृत चैप कृतार्थान् ॥ २५॥ अर्चिपामयनमीयुपि तत्र, क्षत्रसतमनमस्करणीये । अध्यगामि विधिरामिगनाम्ना, वैदिकस्तदनु तचनुजेन ॥ २६॥ सत्कर्मनिर्माणरतेरमुष्य, भीडानिदानं द्वयमेतदासीत् । स्ववर्णनाकर्णनमुतमेभ्यः, संसारकारान्तरवस्थितिश्च ॥ २७॥ ज्येष्ठः श्रेष्ठतमः समस्तविदुषां श्रीसर्वदेवाइयः, श्रेयःसम्पदपास्तदुस्नरतमाः श्रीमान् कुमारोऽनुजः । मुजोऽय द्विजकुञ्जरस्तदनुजो न्यायाजडेनाहड- श्चत्वारस्तनयास्ततः समभवन् वेदा इव ब्रह्मणः ॥ २८॥ १ मालपाभिपतियशोवर्मणः पुरोहितेन सदेसमूनि गजराजश्रीसिदराजारनामधेयजयसिंहदेवेन माता वोल्प सपार्यमभिचारेग त्योपादिता । गा च भामशर्मणः पुरोपमः शान्तिमन्त्रैः प्रतिपिता सनी तमेय मालयाधीशपुरोहित संहत्य निरोहितनि थ्यते ॥ २ शामिपुत्रः ॥ ३ योदत्तनामा॥ ४ यशो. घमंगामा ॥ ५ आनलदेयः ॥ ६ श्रीसिदराजगदम् कि. गं. ११५०-11९९ ॥ ७ अन, दर्मय ।। ८ सहस्पतिः ॥ ९ दियोः ॥ १. भरिमांग गवति । ११ अमिहोत्रादिः । १२ अस्य सिद्धरामरोहितस्य सर्यरेयस्प औरनममयः सिदराजराग्यसमय व ॥
सुरथोत्सवमहाकाव्यस्य
[एकादशं
कुमारपालस्याचुलुक्यमर्तुरङ्गानि गङ्गासलिले निधाय ।।
श्रीसर्वदेवेन गयाप्रयागविप्राः प्रदानेन कृताः कृतार्थाः
॥ २९॥
स्थाने स्थाने तडागानि, शिवपूजा दिने दिने । विप्रे विप्रे च सत्कारः, श्लाघा यस्य गृहे गृहे ॥३०॥
राही गृहीतोष्णकरे कुमारः, कुमारपालस्य सुतेन राज्ञा ।
कृतोपरोधोऽपि परं पुरोधाः, प्रत्यग्रहीत्। तस्य न रत्नराशिम्
यः शौचसंयमपटुः कटुकेश्वराख्यमाराध्य भूधरसुताघटितार्धदेहम् ।
तां दारुणामपि रणानणजातपातवातव्यथामजयपालनृपादपास्थत्
विलोक्य दुष्कालवशेन लोकं, कालशेपं सविशेपशूकः ।
श्रीमूलराजं दलितारिराजमचीकवृ(र)त् तत्करमोचनं यः
दुष्टारिकोटिकदनोत्कटराष्ट्रकूटकुल्येन शल्यैितरणाङ्गणकौकूणेन ।
सर्वप्रधानपुरुषाधिपतिः प्रतापमल्लेन भूपतिममलिकया कृतो यः
सेनानीविदघे' कुमार इति यः शङ्के चुलुक्येन्दुना,
जित्वा सोऽथ जवादवार्यतरसः प्रत्यर्थिपृथ्वीपतीन् ।
इष्टां तद्विपयर्द्विमाशिपमिव प्रादात् पुरोधाः स्वयं,
तस्मै याज्यमहीमुजे निजचमूवीरवजैरक्षतैः
धाराधीशे विन्ध्यवर्मण्यवन्ध्यक्रोधाध्मातेऽप्याजिमुत्सृज्य याते' ।
गोगस्थानं पत्तनं तस्य भक्त्वा, सौधस्थाने खानितो येन कूपः
गृहीतं कुप्यता कुप्यं, मालवेश्वरदेशतः । दसं पुनर्गयाश्राद्ध, येनाकुप्यमकुप्यता
जित्वा म्लेच्छपतेर्बलं तदतुलं राज्ञी सरःसन्निधौ,
स्वःसिन्धोः सलिलैविधाय विधिवत् प्रीतिं पितॄणामपि ।
दानी मोक्षमनुक्षतक्षितितले कृत्वाऽब्दमब्दबजे,
राजार्थ रचयाचकार चतुरः स्वार्थ प्रजार्थं च यः !
यः कर्माणि च पद्गुणांश्च तनुते तद्भूर्भुवः स्वस्त्रय,
कीर्तिर्यस्य च यश्च निर्मलरुचिों जातुचिन्मुञ्चति ।
र कुमारपालराज्यम् वि० सं० ११९९-१२३० ॥ २ अस्य कुमारपालपुरोहितस्य कुमारस्य सत्ता-
समयः कुमारपालराये ॥ ३ अजयपालेन ॥ ४ सामन्तसिंहयुदे हि श्रीअजयपालदेवः प्रहारपीच्या
मृत्युरोटिमायातः कुमारनाम्ना पुरोहितेन श्रीकटुकेश्वरमाराध्य पुनः स जीवितः ॥ ५ अजयपालराग्यम्
वि. सं. ११३०-१९॥ ६ शूरः पणतीक्ष्णापः परः ।।
७ मूलराजराग्यम् वि. सं. १९९५-
१२३५ ॥ ८ कुमारः श्रीअजयपालपुत्रश्रीमूलराजयकाशाद् दुप्पालपीडिताना प्रधानां तदानी करमोरनं
पारितवान् ॥ ९ निहतकोणाधिपतिमल्लिकार्जुनेन । १० बरिदेशसमृद्धिम् ॥ ११ भमणा, तडलर.
पण्डितय ॥ १२ अयं किम्यया यशोयर्मणा पौत्रः ।।
॥ ३८॥
पञ्चदशः सर्गः। । । 7 " परिविरम् ] शस्त्राविष्कृतिरध्वरे च युधि च श्लाघ्योलिहीते यतः, सूत्रं यस्य हृदि स्फुरत्यविरतं ब्राझं च राज्यस्य च मरुन्धतीद कान्ताऽस्य, पत्युरानामरुन्धती । अभूदमिघया लक्ष्मीः, साक्षालक्ष्मीरिव क्षितौ ॥१०॥ आदिमः प्रशममन्दिरं महादेव इत्यभिघया तदनमः । येन पाणिनिहितेन पङ्कजेनेव तुप्यति परं सरस्वती ॥४१॥ सोमेश्वरदेव इति, क्षितिदेवस्यास्य वन्धुरनुजन्मा । अजनि कनिष्ठस्तस्य, माता ख्यातान्वयो विजयः ॥ ४२ ॥ तैत्रिमिः प्रथममध्यमोत्तमैः, स्वे पदे च पुरुषैर्व्यवस्थितैः । शब्दशास्त्रमिव गोत्रमुच्चकैः, सक्रिय समजनिष्ट विष्टपे सोमेघरदेवकवेरवेत्य लोकम्पूर्ण गुणग्रामम् । हरिहर-सुभटममृतिमिरमिहितमेवं कविमवरैः ॥११॥ श्रीसोमेश्वरदेवस्य, कवितुः सवितुश्च को । सतृणाम्यवहारस्य, निरासेऽपि रसमदा वादेवतावसन्तस्य, कवेः श्रीसोमशर्मणः । धुनोति विबुधान् सूक्तिः, साहित्याम्मोनिषेः सदा ॥४६॥ तव वक्त्रं शतपत्रं, सद्वर्ण सर्वशास्त्रसम्पूर्णम् । अवतु निजं पुस्तकमिव, सोमेश्वरदेववाग्देवी ॥१४॥ वसिष्ठानिष्ठायाः पदमिति जगत्यस्ति पटहः, प्रकृष्टास्त्वेषामप्यजनिपत मुञ्जप्रभृतयः । कुले जातोऽप्येषां शतधृतिदुहित्रा पुनरयं, स्वयं पुत्रीचक्रे नवकविगुणप्रीणितहृदा कान्येन नव्यपदपाकरसास्पदेन, यामार्धमात्रयटितेन च नाटकेन । श्रीमीमभूमिपतिसंसदि सम्पलोकमस्तोकसम्मदवशंवदमादधे यः कवीन्द्रपदवीस्पृहामहह । तेऽपि तन्वन्ति य- द्वचः क्रकचकर्कशं प्रथयति व्यथां कर्णयोः । कविः स विरलः पुनर्मुवि भवादृशो दृश्यते, मुघाभिरभिषेचनं रचयतीव यः सूक्तिभि. मन्दभ्यन्दसि कोऽपि कोऽपि विकलः सालकृतिव्यामृता- वर्थे कोऽपि वृथाश्रमो रसनिघावन्धः स कोऽप्यध्वनि । यस्त्रान्तर्विहरतिरश्चितनयामजीरम स्वर- स्पर्धापन्युभिरेक एव कवते काव्यैः कुमारात्मजः १ अयं श्रीदर्पपंत्यो हरिहरो पीरघपलराजगमीपे नैषधपुस्तक प्रपमं पस्तुपालेमाये सलनपद- पनि दरिदसमधे प्रयन्धकोशे फुनमुपलभ्यते ॥ २ भीमदेयराम्यम् वि० सं० १२१५-१२९५ ए. विमुषनपालयग्यम् वि० सं० १२१८-११०० ॥। भयं पुमारस्य पुत्रः सोमेभ्यरदेयके ॥ १८ ॥ ॥४९॥ ॥५०॥ ॥५१॥ रेशममारमगीर ॥
८१
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सुरथोत्सयमहाकाव्यस्य
[काशे
वैदुप्यं विगताश्रयं श्रितवति श्रीहेमचन्द्रे दिवं,
श्रीप्रहादनमन्तरेण विरतं विश्वोपकारप्रतम् ।
दृष्ट्वा तद् द्वयमत्र मन्त्रिमुकुटे श्रीवस्तुपाले कवि-
स्तत्कीर्तिस्तुतिकैतवादिति मुदामुद्गारभारब्धवान्
प्राग्वाटान्वयवारिधौ विधुरिव श्रीचण्डपा प्रागमूत्,
सम्मूतोऽमृतसत्य-शौचसदनं चण्डप्रसादस्ततः ।
सोमस्ततनयो नयोज्वलमतिस्तस्याऽश्वराजः सुतः,
पूतात्माऽथ तदनमूः सुकृतमः श्रीवस्तुपालोऽभवत्
उकुल्लमल्लीप्रतिमल्लकीर्तिः, श्रीमल्लदेवोऽभवदप्रजन्मा ।
बभूव तस्यावरजश्च तेज:पालाभिधानः सचिवप्रधानम्
श्रीवस्तुपालस्य चिरायुरस्तु, दिशां प्रकाशं दिशते सदा यः ।
कर्पूरकिर्मीरितकेरलस्त्रीरदायदातद्युतिभिर्यशोभिः
क्षीणे चक्षुपि भेपनं भगवती कालीश्वरी देहिनां,
देहे चित्रविचित्रभाजि शरणं श्रीवैद्यनाथः प्रभुः ।
संसारज्वरजर्जरे हृदि सदा विष्णु विष्णुर्मुदे,
दौर्गत्ये च जिघांसिते गतिरसौ श्रीवस्तुपालः पुनः
न वदति परुषा रुषाऽपि वाचः, स्पृशति परस्य न मर्म नर्मणाऽपि ।
विरमति मतिमानमात्यचन्द्रः, कचन च नार्थिकदर्थितोऽपि दानात्
धनमनवरतक्षितीन्द्रसेवाश्रमसमवाप्तमयनतोऽपि दत्ते ।
अपरमपि परोपकारकं यद्, विमृशति वस्तु तदेव वस्तुपाल:
सत्यं ब्रुवे भवतु मा क्षतिरत्र काचिद् , मूत्वा खलपकृतिनाऽपि मयाऽतिमात्रम् ।
मन्त्री समे च विषमे च पीक्षितोऽसौ. इष्टं न दुनमिह किशन सीने ॥ ५९ ॥
अयमनुदिनदानोत्कर्पितप्राणवर्पपरिचरितचरित्रः स्वस्तिमानस्तु मन्त्री ।
तुहिनकरसमानर्यस्य कीर्तिपतानैरजनिपत रजन्यः प्राप्सराकाविपाकाः
हमन्ते लोकतः पापा , शपानन्ये नियोगिन. । अधिकारमधिकारममात्यः शास्त्यसौ पुनः ॥ ६१ ॥
त एव स्तूयन्ते नृपतिपशुमिर्धीवरतया,
प्रजानामानायः सपदि मनु येभ्यः प्रपतति ।
तदित्यं मुस्थानां पकिनचकितं कापि बसतां,
मनां सम्प्रत्येकः सचिवशिवतातिर्मुवि भवान्
१देमपन्द्रा पुमारणालये . १९९९ मगमत् ॥ २ अयं महानाति. सोमे.
प्रारिमारसपर. ॥
॥५६॥
॥५८॥
॥१२॥
॥ ६॥ परिशिष्टम् ] पञ्चदशः सर्गः। अर्थदानदलितार्थिदुःस्थिति, वां विना विनयनम् ! सम्प्रति । मृज्यते जगति केनचित् सतां, वस्तुपाल! न कपालदुर्लिपिः गोमयरसानुलिप्ते, कीर्तिसुधाधवलिते च मुवनगृहे । श्रीवस्तुपाल ! भवतश्चकास्ति चित्रं चरित्रमिह पीयूपैः प्रणता हिमैः प्रणिहिता तारामिराराधिता, गडावीचिभिरर्चिता परिचिता दिग्दन्तिदन्तांशुभिः । कर्पूरैः परिशीलिता मलयजैरावर्जिता मण्डिता, डिण्डीरस्तवकैकैरनुसृता मन्त्रीश ! कीर्तिस्तव प्रवर्तमानेऽत्र कवित्वसत्रे, सत्कृत्य सत्पात्रममात्यमेयम् । कृतार्थमात्मानमसावमंस्त, सौवन्तिको गुर्जरनिर्जराणाम् कुमारपुत्रेण कुमारमातुः, कान्य तदेतज्जगदेकदेव्याः । श्रुति-स्मृति-व्याकृति-यज्ञ विद्याविशारदेन क्रियते स तेन ॥ इति श्रीगुर्जरेश्वरपुरोहितश्रीसोमेश्वरदेवविरचिते सुरथोत्सवनाम्नि महाकाव्ये कविप्रशस्तिवर्णनो नाम पञ्चदशः सर्गः ॥ ॥ ६५॥ ॥ ६७॥ - ३ कुमारनामकवितुप पुत्रेण सोमेश्वरदेवन ॥ २ कुमारः स्कन्दस्तस्य मार्गाया ।
द्वादशं परिशिष्टम् 'गूर्जरेश्वरमहामात्यश्रीवस्तुपालकविविरचितस्य नरनारायणानन्द- महाकाव्यस्य प्रशस्त्यात्मकः पोडशः सर्गः। शोभाभिमूतपुरुहूतपुरं पुरन्ध्रीलावण्यलोमितजगन्नगरं गरीयः । धाम श्रियोऽणहिलपाटकनाम कामलीलामयं जयति गुर्जरमूविभूषा वाग्देवतां यदि जना जननीमिवैनामानन्दिनः प्रतिदिनं हृदि नन्दयन्ति । यस्मिन्निमान् मदनतुल्यरुचस्तथापि, निर्मत्सरा त्यजति नो सुतवत्सला श्रीः ॥२॥ प्राग्वाटगोत्रतिलकः किल कश्चिदत्र, श्रीचण्डपः स्फुटमखण्डपदप्रतिष्ठः । विस्फूर्जितान्यधित गूर्जरराजराज्यराजीवजीवनरविः सचिवावतंसः ‘कृष्णीकृतारिवदना सुमनोमनांसि, रागास्पदं विदधती यदलक्ष्यरूपा । आनन्दमर्दितविचारमदैयंदीयकीर्तिर्मुघा जितसुधा बुबुधे बुधेन्द्रैः चण्डप्रसाद इति सादितविश्वदौस्थ्यस्तनन्दनः स्वकुलनन्दनकल्पशासी । मुक्तामयप्रसवसञ्चयचारुचञ्चत्कीर्तिप्रभासुरमिताम्बरमूर्वभूव शासार्थवारिमरहारिहदालवालसरोपिता मतिलता वितता नितान्तम् । यस्य प्रकाशितरविमहतापपद्विछायार्थिमिपकुलैः फलदा सिपेये पुण्यस्य पापपटलीजयिनो जयश्रीरासीत् तदीयदयिता नयमूर्जयश्रीः । यस्या मनो दयितमतिमुरसवन्तीस्नानोज्वला जनयति स्म जिनेन्द्रसेवाम् नैयो सम्पुटविपाटनया कदाचिदेपा स्मितं जितसुधाविभयं व्यधच । श्वेतयुतिः करपतां तदयं हृदन्तः, केनापरेण परिमूततनुस्तनोति ! श्रीराम शममूदनयोर्नयामधीरशमूर्जगति शूर इति प्रतीतः । अस्वमतां मुरगुरुः सह शिष्यवर्धित्ते स्म यन्मतिजितश्विरचिन्तयेव पूडामणीकृतजिनाट्रिनमप्रपयः, कर्णस्फुरदुरसुवर्णविभूएणधीः । सर्मनि प्रबलदुर्मदमोहचौरः, दुःसपरेऽपि विस्वास य एव शूरः दत्वाऽपि कान्तिस्वमेव यदीयकीदिव्यं राजनिस जगत्यपवादभीतः । इन्दुः सुधावपुरपि प्रमुरोपीनामप्येष सर्पनिमलक्ष्मभृतौ न शुद्धः सोमाभिषसदनुमः मुजनाननान्नोऽभवद् विबुधसिन्धविशुदबुदिः । यन्मानसेऽमृतरसे विलास बाधिक्षिधौर्यनापयिभुरैव सरस्वतीयम् ॥ १२॥ क्रीगरुमा सदमि मुरादा मदेव, मोति विकम्प्य फिल मोऽपि गुरुः सुराणाम् । पहदिनभरमास विपारितस्य, नीराजनान्यात पपरपूरलेः
-
.
"
परिशिदम् ]
1 मरनारायणानन्दस्य पोडशः सर्गः ।
देवः परं जिनवरो हरिभद्रसरिः, सत्यं गुरुः परिवृढः खल सिद्धराजः ।
धीमाननेन नियतं नियमत्रयेण, कीर्ति व्यधात् त्रिपथगामिव यः पवित्राम् ॥ १४ ॥
पुस्फूर्ज गूर्जरधराधवसिद्धरानराजत्समाजनसमाजनमाजनस्य ।
दुर्मन्त्रिमन्त्रितदवानलविहलायां, श्रीखण्डमण्डननिमा भुवि यस्य कीर्तिः ॥ १५ ॥
कुर्वन् परायगणिते सति यद्गुणानामेकैकविन्दुरचनामुडकैतवेन ।
चन्द्रच्छलेन कति नो खटिनीषुभिचौ, धाता व्यपादथ विधास्यति कीर्तिशेपाः ! ॥१६॥
नो चेद् यशासि बलि-कर्ण-दधीचिमुख्या, दानोत्सरविरलानि मुवि व्यधास्यन् ।
भक्तरदास्यत विलासमरालवाललक्ष्मीर्यदीयघनदानयशोनदीपु
॥ १७ ॥
श्रीवाससद्मकरपद्मगदीपकल्पां, व्यापारिणः कति न विग्रति हेममुद्रा
प्रज्वालयन्ति जगदप्यनयैव केऽपि, येन व्यमोचि तु समस्तमिदं तमस्तः ॥ १८ ॥
कान्ता जगत्रितयविस्मयनीयनीतेः, सीतेति रामचरितस्य बभूव तस्य ।
यल्लोचनं स्थिरतरं दयिताननेन्दौ, दूरेण काञ्चनमृगश्रियमन्वगच्छत् ॥ १९॥
हादसो हसतु शीतकरोऽपि भासा, भृङ्गीरुतैरपि च हुकुरुतां सरोजम् ।
दूरावलम्बितशिरोम्परडम्परेण, यस्या मुखं जगति न प्रकटं यदासीत् ॥२०॥
तत्सम्भवस्त्रिमुवनाभरणं बभार, शुभं यशोमरमनश्वरमश्वराजः ।
मुच्या कलङ्ककलितं ललितं हिमांशू, हर्षादलाभि सकलाभिरय कलामिः ॥२१॥
यं मातृभक्तिशुचिमेव यशश्छलेन, ससेव्य जातसुकृतो रजनीमुजङ्गः ।
आसीजगत्रितयविस्तृतवैभवश्व, साक्षात् कलकरहितश्च सदोदितश्च ॥ २२ ॥
हुत्या सदध्वरचितेपु तमासि तीर्थयात्रोत्सवेषु खलु सप्तमु पावकेषु ।
यः सप्तपूर्वपुरुषैकमुदे यशोऽम्भ पूर्वानि सप्त भुवनानि कृती प्रतेने
संस्तूयमानचरितः परितः प्रबुद्धैः, सत्यवते सुकृतसूनुरिवान्वहं यः ।
लज्जामसज्जयत चापगुरुद्विजेन्द्रद्रोणक्षयक्षणतदुक्तिविचारणेन
॥ २४ ॥
तस्य प्रिया प्रणयपात्रममात्रशीललीलायितं यत ! वमार कुमारदेवी ।
आलीयत प्रतिपदं जिनपादप , चितेशवक्त्रकमले च यदीयदृष्टिः
यस्या मुखे जिनगुणमहणप्ररोहनीत्या शिरः प्रतिकलं परिकम्पयन्त्याः ।
हित्वाऽम्बुजं च रजनीरमणं च लोला, दोलाकुतूहलरसं समसेवत श्रीः
॥ २६ ॥
सूनुस्खयोरजनि नीरजनिर्मलास्यः, श्रीलास्यम्ः स्मरकलः किल लूणिगास्त्यः ।
वात्येऽपि यस्य चरितं विरराज वृद्धसवादऊं क्रमनिराकृतपलवस्य
॥२७॥
यस्याऽऽननं द्विजवियुकमपि द्विजेन्द्रसान्द्रप्रभाभरममानवशैशवस्य ।
॥ २८॥
अकं च केशलवमुक्तमपि व्यराजद्, यस्य प्रवालरुचिराघरपाणिपादम्
सत्याभिपस्तदनुजो मनुजावतंसरलं पम्व विदितो मुवि मछदेवः ।
पस्याइतः प्रतिफलं गतिविप्रमेण, विमाजने स्म न महानपि हस्तिमल्ल
1॥२५॥
॥२९॥
गरनारायणानन्दस्य पोडशः सर्गः ।
द्विादशे
॥३६॥
और्वामिनाऽपतत यः सततं पयोधौ, पातालसीनि फणिफुत्कृतिदावदाहः ।
चण्डेव चण्डकरधर्मघटेति मत्वा, यस्योज्ज्वलानि वचनानि सुधा सिषेवे
तस्यानुजः पितृपदाम्बुजचश्चरीकः, श्रीमातृभक्तिसरसीरसकेलिहंसः ।
साक्षाजिनाधिपतिधर्मनृपाझरक्षो, जागर्ति नर्तितमना हृदि वस्तुपाल:
नागेन्द्रगच्छमुकुटाऽमरचन्द्रमरिपादान्जभृतहरिभद्रमुनीन्द्रशिष्यात् ।
व्याख्यावचो विजयसेनगुरोः सुधाममास्याच धर्मपथि सरपधिकोऽभवद् यः ॥ ३२ ॥
कुर्वन् मुहुर्षिमल-रैवतकादितीर्थयात्रां स्वकीयपितृपुण्यकृते मुदा यः ।
सघष्टिसइपदरेणुमरेण चित्रं, सद्दर्शनं जगति निर्मलयाम्बभूव
धर्मोचिती रुचितकामगवी निपेन्य, दुग्धप्रपास्त्रिजगतोऽपि वितत्य कीर्तीः ।
यो मातृदुग्धरसपानमहोत्सवानामानण्यमात्मनि कथञ्चन नैव मेने
भास्वत्प्रभावमधुराय निरन्तरायधर्मोत्सवव्यतिकराय निरन्तराय ।
यो गूर्जराधनिशिरोमणिभीमभूपमन्त्रीन्द्रतापरवशत्वमपि प्रपेदे
यः कामवृत्रिनुजेन निजेन तेजःपालेन पूर्णनृपकार्यपरम्परेण ।
सद्धर्मकर्मरस एव मनो मनोज्ञविद्वद्विनोदपयसि स्नपयाम्बभूव
यः स्वीयमातृ-पितृ-बन्धु-कलत्र-पुत्र-मित्रादिपुण्यजनये जनयाञ्चकार ।
सद्दर्शनवजविकासकृते च धर्मस्थानावलीवलयिनीमवनीमशेपाम्
की, सौरभसारसान्द्रसुमनःसन्दोहसन्दोहक-
स्कान्त्या पाति वसन्तमन्वहमसावित्यर्पितार्थक्रमम् ।
ख्याति प्राप वसन्तपाल इति यो नामाद्वितीयं मुदा,
विद्वद्धिः परिकल्पितं हरिहर-श्रीसोमशर्मादिभिः
श्रीशत्रुञ्जयशैलशेखरमणेः श्रीनामिनुप्रभोः,
पीत्वा वक्त्रसुधांशुदीधितिसुधामाकण्ठमुत्कण्ठया ।
व्यातन्वन् कवितां नितान्तमुदितः सद्यस्तदुद्गारवत्,
तस्यैवाऽऽदिजिनेश्वरस्य जनयामास स्तवं यो नवम्
नरनारायणानन्दो, नाम कन्दो मुदामिदम् । तेने तेन महाकाव्य, वाग्देवीधर्मर नुना
उदास्वद्विश्वविद्यालयमयमनसः ! कोविदेन्द्राः! वितन्द्राः,
मन्त्री बद्धाअलिो विनयनतशिरा याचते वस्तुपालः ।
अस्पप्रज्ञाप्रमोधादपि सपदि मया कल्पितेऽस्मिन् प्रबन्धे,
भूयो भूयोऽपि यूयं जनयत नपनक्षेपतो दोपमोपम्
॥ इति श्रीगुर्जरेश्वरमहामात्यश्रीवसन्तपालविरचित्ते नरनारायणानन्द
नाम्नि महाकाव्ये प्रशस्तिप्रपञ्चो नाम पोडशः सर्गः ॥
॥ ३८॥
त्रयोदशं परिशिष्टम्
गूर्जरेश्वरमहामात्यश्रीवस्तुपालविरचितस्तोत्रादि ।
मनोरथमयं विमलाचलतीर्थमण्डनश्रीआदिनाथस्तोत्रम् ।
॥ २ ॥
लब्ध्वा मानुपजन्म जातिसुकुलमष्ठां प्रतिष्ठामिमां,
धृत्वा धर्मधुरीणतामधिगतः सदायिपत्यश्रियम् ।
तीर्थेशानिम ! वस्तुपालसचित्रो विवाग्रजाप्रपदा-
ssरोहाय प्रगुणां मनोरथमयीं निःश्रेणिमाशिश्रियत्
श्रीनामेय ! मनोरथाः शतपथा मिथ्याभिमानाम्बुधैः,
कल्लोला इव विस्फरन्ति विषयमाहाहन्यग्रिताः ।
हित्वा तानिति वस्तुपालसचिवः सद्बोधदुग्धोदधे-
मेंजे वीचिसमानिमान् शमदमप्रव्यक्तमुक्ताफलान्
प्रत्याशं प्रसरकपायविषयज्वालाकरालादितो,
दूरीमूय मयककराद् भवदवाद् व्यामोहधूमान्धितः ।
श्रीशत्रुक्षयगैलपावन ! जिन ! त्वद्वक्त्रचन्द्रातपो-
पास्तिध्वस्ततमाः शमामृतहदे दाहं कदाऽहं क्षिपे ?
एतस्मिन् भववारिधी निरवधिक्रोधौर्वबहेश्व्युत-
खस्तो लोभतिमिङ्गिलस्य गिलनात् क्लेशाम्मसो निर्गतः ।
सस्तस्तात ! कदा कदाग्रहमहामाहाच शत्रुञ्जय-
द्वीपं प्राप्य मजेय जेयविजयप्रीतः परां निवृतिम् !
संसारव्यवहारतो रतिमऽतिव्यावर्त्य कर्तव्यता-
वार्तामप्यपहाय चिन्मयतया त्रैलोक्यमालोकयन् ।
श्रीशबुञ्जयीलगहरगृहामध्ये निबद्धस्थितिः,
श्रीनामेय ! कदा लमेय गलितज्ञेयामिमानं मनः !
स्वामिन् ! मृत्युहरेरहं हरिणवन्नष्टोऽतिकटायुध-
व्याधिव्याघशतैर्वृतः श्रितमवारण्योऽशरण्यो प्रमन् ।
नामेय ! लमनाकुलः कुलपतिर्यत्रासि तस्मिल्लमे,
श्रीरायुञ्जयशैलनामनि कदा पुण्याश्रमे विश्रमम् !
॥ १॥
॥६॥
॥८॥ मनोरथमयं धीमादिनाथस्तोत्रम् । [भयोदर्श श्रीगर्वोप्ममिरौप्मलेषु धनिनामीप्यानलज्वालया, जिहालेषु मृगीदृशामनुशयाळूमायितेषु द्विपाम् । वक्त्रेषु ग्लपितामिमां त्रिजगतीनिस्तन्द्रचन्द्रोदये, देव श्रीविमलाद्रिकेतन ! कदा दास्ये खदास्ये दृशम् ! कोधेन ज्वलितो हतोऽहमिपुमिः पञ्चेपुणा पञ्चभिः, बद्धो मोहमहाद्विपा च विषयग्राम प्रकामं श्रितः । तद् ध्वस्तान्तरवैरिवार । भुवनस्वामिन् ! सनाथै त्वया, दुर्गे श्रीविमलाद्रिनामनि सुखं स्थातास्मि सुस्थः कदा ! आस्य कस्य न वीक्षितं ? क न कृता सेवा ? न के वा स्तुताः ।, तृष्णापूरपराहतेन विहिता केषां च नाभ्यर्थना है । तत् बात ! विमलादिनन्दनवनीकरपैककल्पद्रुम !, त्वामासाद्य कदा कदर्धनमिदं भूयोऽपि नाहं सहे ? संसारे सुखहेतुवस्तुविषयैरुत्सग्नितः समते- देचा देव । त्वदन्यदेव तदियं वाञ्छा ममोत्सेकिनी । श्रेयोवैभव ! नाभिसम्म ! भवाकूपारपारनम ।, श्रीशत्रुञ्जयमण्डनेन भवता भावी कदा सङ्गमः ! एताः शमामृतरसेन हृदालवाले, संवर्धिताः पृथुमनोरथक्लयो मे । विश्वकमित्र ! भगवन् ! भवतः प्रसादाल्लोकोत्तरैः फलभरैः सफलीभवन्तु धर्मध्यानमना मनोरथमयं स्तोत्रं युगादिप्रभो- श्वके गूर्जरचक्रवर्तिसचिवः श्रीवस्तुपालः कविः । प्रातः प्रातरधीयमानमनपा यश्चित्तवृति सता- माधत्ते विभुता च ताण्डवयति श्रेय.श्रियं पुष्यति ॥ १२॥ १५ इति मूलरेश्वरमहामारपश्रीवस्तुपालविरचितं मनोरथम विमलाचल- तीर्घमण्डनश्रीआदिनापजिनस्तोत्रम् ॥ 1 १ भ क अन्योशे 117 तमपृष्ट २९तम , पुनप्रदे . तमले १५ तम. पर्तते ।
(२) रेवतकाद्रिमण्डनश्रीनेमिजिनस्तवः । -- . जयत्यसमसंयमः शमितमन्मथप्रामवो, भयोदधिमहातरि१रितदावपाथोघरः । तपस्तपनपूर्वदिकळपकर्मवालीगजः, समुद्रविजयाङ्गजत्रिभुवनैकचूडामाणिः अहङ्कतिलतायुधं प्रमदमान्द्यसिद्धौषधं, मदेन्धनधनञ्जयः स्मरकरीन्द्रकण्ठीरवः । स्पृहारजनिवासरः प्रथितपकतीव्रातपः, समुद्रविजयात्मजः स्फुरतु मानसे मेऽनिशम् ॥ २॥ मेरुमें रुचिमातनोति न मुधा मानी हिमानीगिरिः, कैलासस्तु न वस्तुतः स्तुतिपदं वन्ध्यः स विन्ध्याचलः। लाप्यो रैवत एव केवलमय शृङ्गाणि शृङ्गारय-न्युश्चैर्यस्य जगत्रयस्तुतिपदः श्रीनेमिकल्पद्रुमः ॥ ३ ॥ संसारार्तितपोपतापशमनश्रद्धालयः! किं मुथा, राग-द्वेपदयोन्मुकैत बुधाः! सेव्यान्तरैः सेवितैः । आजन्मोपशमामृतैकसरसः श्रीरिष्टनेमिप्रमो-निवृत्यौपयिक पदाम्बुजयुगं धत् प्रसक्तं हृदि ॥ ४ ॥ यस्यानीकवमिरेव विनिताःस्व-मू-मुंव स्वामिनो, मौलौ शासनमुद्रन्ति मुवने देवोऽयमेकः स्मरः। सोऽप्याजन्मजितः करोति न करे जैत्रं धनुर्य प्रति, प्रीति रैवतदैवतं वितनुतां देवाधिदेवः स कः येषां मूर्तिरसौ तवेश ! परमानन्दैकनिस्यन्दिनी, ध्यानावेशवशंवदा स्मृतिपथे शश्वत् पुनीतेतमाम् । तेषां सम्मदवारिपूरितदृशां शैवेय! नैवेयम-प्याधत्ते मनसश्चमत्कृतिसम्बं सा सिद्धिसीमन्तिनी ॥ ६ ॥ सामाज्यं चतुरणवीनिवसनक्षोणीशमौलिस्खल-पादाजं न सुरा-ऽसुरेन्द्रमुकुटस्पृष्टांहिपीटं च न । सिद्धि शाश्वतसौख्यसनमुभगां नाभ्यर्थये किन्तु मे,श्रीशैवेय!तवेयमस्तु चरणाम्भोजेषु मक्तिभृशम् ।।७।। नेपथ्येरतिथीभवत्पृथुतरापथ्यैरतथ्यप्रथै-रुघद्वैद्युतडम्बरैः किमपरेकैव भूयान्मम । आश्लेपस्पृहयालमुक्तियुवतिप्रीतिप्रियम्भावुका, श्रीमन्नेमिजिनेशितुः स्तुतिरियौवेयकं शाश्वतम् ।। ८॥ इत्यं श्रीवस्तुपालः सुकृतसुरतरोरालवालस्त्रिलोकी- स्वामिन् नेमे ! त्वदीयक्रमकमलरज पुजपुण्यैकमालः । संघाधीशश्चलक्यक्षितिपतिमचिवः शारदाधर्मसनु- विज्ञहिं ते विघते प्रथय मम सदा दर्शनेन प्रसादम् श्रीसद्दमर्तृसचिवेश्वरयस्तुपालक्लप्सेन नेमिनमनेन किलाष्टकेन । यः स्तौति तस्य कमलामविलम्बमम्पादेवी तनोत्यतनु सन्तनुते च तेजः ॥१०॥ ॥ इति गूर्जरेश्वरमहामात्यश्रीवस्तुपालकृतो रैवतकाद्रि- मण्डनश्रीनेमिजिनस्तवः ॥
मनोरथमयं धीमादिनाथस्तो
श्रीगर्योपामिरोमलेपु धनिनामीप्यानलल्याला
जिहालेषु मृगीदृशामनुशयामायितेऽ
वक्त्रेषु ग्लपितामिमां निजगतीनिस्तन्द्रचन्द्रोदरे
देव श्रीविमलाद्रिकेवन ! कदा दास्ये
क्रोधेन ज्वलितों हतोऽहमिपुभिः पञ्चेषुणा प.
बद्धो मोहमहाद्विपा च विषयमाम प्रका
तद् ध्वस्तान्तरवैरिवार ! भुवनस्वामिन् ! सना
दुर्गे श्रीविमलाद्रिनामनि सुखं स्थातारि
आत्यं कस्य न वीक्षितं ! कन कृता सेवा ? न
तृष्णापूरपराहतेन विहिता केषां च ना.
तत् त्रातर ! विमलादिनन्दनवनीकस्पैककल्प
त्वामासाद्य कदा कदर्थनमिदं भूयोऽपि
संसारे सुखहेतुवस्तुविषयैरुत्सन्नितः सरते-
देता देव ! वदन्यदेव तदियं वाच्छा
योवैभव नाभिसम्भर ! भवापारपारगाम ,
श्रीशत्रुञ्जयमण्डनेन भवता भावी कदा
एताः शमामृतरसेन हृदालवाले, संवर्धिताः पृ
विश्वकमित्र ! भगवन् ! भवतः प्रसादालोकोत्तरैः ।
धर्मध्यानमना मनोरथमयं स्तोत्रं युगादिप्रभो
धके गूर्जरचक्रवर्तिसचिवः श्रीवस्तुप
प्रात. प्रातरधीयमानमनयां यश्चित्तवृति सता-
माधते विभुता च ताण्डवयति श्रेय दि
॥ इति गुर्जरेश्वरमहामात्यधीवस्तुपालविरचित
तीर्घमण्डनश्रीआदिनाथजिनर
परिशिष्टम् ] श्रीवस्तुपालयता आराधना । ५ (४) महामात्यश्रीवस्तुपालकृता आराधना । न कृतं सुकृतं किञ्चित् , सतां संस्मरणोचितम् । मनोरथैकसाराणामेकमेव गतं वयः अर्हन्तस्त्रिजगद्वन्द्यान् , सिद्धान् विध्वस्तबन्धनान् । साधूश्च जैनधर्म च, प्रपद्ये शरणं त्रिधा ॥२॥ कृतं पद्विधजीवानां, पीडनं क्रीडयाऽपि यत् । हास्यादिना विमूढेन, यन्मृपा भापितं मया ॥३॥ परद्रव्येप्वदत्तेपु, यन्मनोऽपि नियोजितम् । कथश्चिदमिलापोऽपि, यदब्रह्मणि निर्मितः मूर्छया विहितः कश्चिदामहो यत् परिग्रहे । स्वमेऽप्याऽऽविष्कृता या च, रजनीभोजने स्पृहा ॥५॥ चके कोपच यत्किञ्चिद्, या च काचिदहतिः ।। माया लोमश्च यस्तत्र, मिथ्या दुष्कृतमस्तु मे यद् वात्सत्यं कृतं नैव, यद् गुणा नानुमोदिताः । गुरवो यदवज्ञाताः, संस्तुता यत् कुतीथिकाः ॥७॥ कुदेशना च या चक्रे, यत् सिद्धान्तेऽप्यवासना । यत् सत्कर्मप्रमादश्च, निन्दामि तदशेषतः ॥ ८॥ ज्ञान-दर्शन-चारित्रं, गोचरे विहितं च यत् । मार्गानुसारतः सांस्ताम्येयोरनुमादये (१) ॥९॥ त्यनामि पापमाहारं, माथे मध्यमखण्डतः । श्रयेऽहं सुकृतं पारमविकं दुष्कृतं त्यजन् ॥ १० ॥ ॥ इति मन्त्रीश्वरश्रीवस्तुपालकृता आराधना ॥ S चतुर्दशं परिशिष्टम् श्रीमदरिसिंहविरचितं सुकृतसंकीर्तनमहाकाव्यम् । ॥१॥ ॥२॥ ॥३॥ वनराज: श्रीवेश्मविस्मयमयप्रबलप्रतापश्चापोत्कटान्वयवनैकहरिनरेन्द्रः । आसीदसीमचरितः परितप्तशत्रु-भालाप्तिाभिनलिनो वनराजदेवः यत्खनखण्डितविरोधिशिरोऽधिरक्त-स्रोतस्विनीभिरुदधिर्विदधे सरागः । येनाऽधुनाऽप्यरुणतां भजतस्तदङ्ग-सम्पर्कतोऽर्क-शशिनावुदयक्षणेषु निर्गत्य कोशकुहरादसिदन्दशूकः, श्यामो यथागतमगात् त्वरितं यदीयः । एतेषु मास्म विशदेप परेरितीव, रुद्धेपु वक्त्रविवरेषु कराङ्गुलीभिः खट्वाङ्गसनतकरस्तरवारिलम-कृत्तारिमुण्डमिपतः समराङ्गणे यः। भालाधिरोपितहुताशनचण्डचक्षु-राभादिभासुरविरोधिविभासुरश्रीः तेने कृतान्तसमतां रसनासनाभि-धारोद्धरो यदसिरञ्जनमञ्जुलश्रीः । अहाय यस्य युघि दर्शनसंज्ञयैव, भिन्दन्नरीनधित किकरतां कृतान्तः स्तब्धप्रकम्पितविलीनविर्वर्णगात्रैः, खिनैर्विभङ्गुरवस्फुरदश्रुलेशम् । उन्मुच्य पौरुपमवाप्य च भीरुभावं, यः सेव्यते रिपुभिरुत्पुलकैः प्रसन्नः आकर्ण्य तूर्णमुपकर्णयितुं च यस्य, कीर्ति मुहुर्भुजगभीरुगणेन गीताम् । चक्षुःश्रवा रसवशेन दृशां निमेपोन्मेपक्रियामनिमिपोऽपि चकार शेषः वक्रीकृते धनुपि मौक्तिकताडपत्रज्योत्स्नाम्बुमारभृति पत्वलतां दधाने । यस्याऽऽननं विकचवारिजकल्पमन्त-भैजे विहाय परराजकरान् जयश्रीः श्रीमत् पुरं मुवि पुरन्दरपत्चनाम, तेनाऽऽदधेऽणहिलपाटकनामधेयम् । स्त्रीणां मुखे स्मरतपस्विवनेऽजनीन्दु-पद्मश्रियोरसुहृदोरपि यत्र योगः । अन्तर्वसद्धनजनाद्रुतमारतो भू-र्मा अश्यतादिति भृशं वनराजदेवः । पश्चासराहनवपार्श्वजिनेशवेश्म-व्याजादिह क्षितिधरं नवमाततान १-'विधीर्ण परिशिष्म् ] धीवस्तुपालकता माराधना । (४) महामात्यश्रीवस्तुपालकृता आराधना । 4 1 न कृतं सुकृतं किञ्चित् , सतां संस्मरणोचितम् । मनोरथैकसाराणामेकमेव गतं वयः अर्हतस्त्रिजगद्वन्यान् , सिद्धान् विध्वस्तवन्धनान् । साधूश्च जैनधर्म च, प्रपये शरणं त्रिधा ॥२॥ कृतं पविधजीवानां, पीडनं क्रीडयाऽपि यत् । हास्यादिना विमूढेन, यन्मृपा भापितं मया परद्रव्येप्वदत्तेपु, यन्मनोऽपि नियोजितम् । कथञ्चिदभिलापोऽपि, यदब्रमणि निर्मितः मूर्छया विहितः कश्चिदाग्रहो यतू परिग्रहे । खमेऽप्याऽऽविकृता या च, रजनीभोजने स्पृहा ॥ ५॥ चक्रे कोपश्च यत्किञ्चिद् , या च काचिदहकृतिः । माया लोमश्च यस्तत्र, मिथ्या दुष्कृतमस्तु मे यद् वात्सल्यं कृतं नैव, यद् गुणा नानुमोदिताः । गुरवो यदवज्ञाताः, संस्तुता यत् कुतीर्थिकाः ॥ ७ ॥ कुदेशना च या चक्रे, यत् सिद्धान्तेऽप्यवासना । यत् सत्कर्मप्रमादश्च, निन्दामि तदशेषतः ॥ ८॥ ज्ञान-दर्शन-चारित्रं, गोचरे विहितं च यत् । मार्गानुसारत. सर्वास्ताम्येयोरनुमादये (१) त्यनामि पापमाहारं, पाय मध्यमखण्डतः । श्रयेऽहं सुकृतं पारमविकं दुष्कृत त्यजन् ॥ १० ॥ - ॥ इति मन्त्रीश्वरश्रीवस्तुपालकृता आराधना || oto चतुर्दशं परिशिष्टम् माचीनहस्तलिग्वितप्रतिमान्तगता वस्तुपालादि- प्रतियद्वाः पुष्पिकाः। धर्माभ्युदयमहाकाव्य अपरनाम संघपतिचरित सं० १२९० वर्षे चैत्र शुदि ११ रवौ स्तम्मतीर्थवेलाकृलमनुपालयता महं० श्रीवस्तुपालेन श्रीधर्माभ्युदयमहाकाव्यपुस्तकमिदमलेखि ॥ छ ॥ छ । शुभमस्तु श्रोतृव्याख्यातृणाम् ॥ (संभात श्रीशांतिनाथ-ताडपत्रीय-भंडार) आचारांगवृत्ति-सूत्र-नियुक्ति सर्वगाथासल्या ३६७ । आचारनियुकिः समाता || आचारागवृत्तिः १२३०० । आचारसूत्र २५०० । नियुक्ति' ४४७ । सवत् १३०३ वर्षे मार्गवदि १२ गुरौ अघेह श्रीमदणहिलपाटके महाराजाधिराजश्रीवीसलदेवराज्ये महामात्यतेजःपालपतिपत्नौ श्रीश्रीआचारांगपुस्तकं लिखित- मिति ।। कल्याणमस्तु श्रीजिनशासनप्रवचनाय || मंगलं महाश्री. ।। (खभात श्रीशान्तिनाथ-ताडपत्रीय भडार) (३) देशीनाममाला संवत् १२९८ वर्षे नाश्विन शुदि १० रवौ अघेह श्रीभृगुकच्छे महाराणकश्रीवीसलदेव... मह० श्रीवेजपालसुत मह श्रेलूगसीहममृतिपचकुलपतिपयौ आचार्यश्रीजिणदेवसरिकते देसी- नाममाला लिसापिता । लिखिता च कायस्थज्ञातीय महं० जयंतसिंह ................. (पाटण संघवीपाटक-ताडपनीय-भंडार) (४) जीतकल्पचूर्णिः तदृत्तिश्च शुभाशुभुवि वस्तुपालसचिवल्यागोऽस्य चन्द्रातप- स्तेनोन्मीलितमधिकैरवकुत्ते यत् तु श्रियस्ताण्डपम् ।
।
।
1
परिशिएम् ] लिखितप्रतिप्रान्तगता वस्तुपालादिप्रतिवद्धा प्रयतयाः
तस्याः पादतलपपावरमसोडीनरिवोड्डामरै-
स्तेनातस्तरिरे ठरमितयशाकिजल्कजालैर्दिशः
विश्वेऽस्मिन् कस्य चेतो हरति नहि समुल्लास्य विश्वासमुच्चैः,
प्रौढश्वेतांशुरोचिःप्रचयसहचरी वस्तुपालस्य कीर्तिः ।
मन्ये तेनेयमारोहति गिरिपु मिया लीयते गहरेषु,
स्वर्गोत्समानुपास्ते भजति जलनिधि याति पातालमूलम् ॥ ३८॥
एतेभ्यः प्रभुणा सगौरवमहं तावत् प्रदत्ता परं,
देश देशममी भ्रमन्ति तदहं गच्छाम्यमीमिः समम् ।
नो चेत् काऽप्यपरा मिलिप्यति वधूतत्रेति मीत्या ध्रुवं,
कीर्तिर्यस्य गुणाननु भ्रमति स श्रीरस्तुपालः कृती
सोऽयं धात्री धवलयति को यस्तुपालोऽचलेन्द्र-
म्तस्मादाविर्भवति समरे काऽपि दोःस्फूर्तिगङ्गा ।
यस्यां ममाः प्रतिवसुमतीयाटमानां समन्तात्,
सम्पद्यन्ते खछ पुनरनावृचये कीयस्ताः
(पाटण संघवीपाटक-ताडपत्रीय-भंटार)
महामात्य श्रीवस्तुपालसुतजेनसिंहलेखित पुस्तिका प्रशस्तिः ।
प्राग्वाटान्वयमण्डनं समजनि श्रीचण्डपो मण्डपः,
श्रीविश्रामकृते तदीयतनयश्चण्डप्रसादामिधः ।
सोमम्तामवोऽभवत् कुवलयानन्दाय तस्याऽऽत्मम्-
राशाराज इति श्रुतः श्रुतरहस्तत्त्वावनोने बुधः
॥१॥
तजन्मा वस्तुपालः सचिवपतिरसौ सन्ततं धर्मकर्मा-
लंफर्माणैकबुद्धिर्वियुधजन चमत्कारिचारित्रपात्रम् ।
माप्तः सहाधिपत्वं दुरितविजयिनी सूत्रयन् सहयात्रां
धर्मस्यौज्ज्वस्यमाचात् कलिसमयमयं कालिमानं विलुप्य
यस्यामजो मल्लदेव उतथ्य इव वाक्पतेः ।
उपेन्द्र इव चेन्द्रस्य तेजःपालोऽनुजः पुनः
चौलुक्यचन्द्रलूणप्रमादतनुजस्य वीरपालम्य ।
यो दधे राज्यपुरमेकधुरीणं विधाय निजमनुजम्
॥२॥
॥१॥
लिसितप्रतिप्रान्तगता वस्तुपालादिप्रतियार प्रशस्तयः । । [चतुर्दशं विमुता-विक्रम विद्या विदग्धता-वित-वितरण-विवेकः । यः सप्तमिर्विकारः कलितोऽपि बभार न विकारम् अपि चाप्यायिता वापी-प्रपा-कूप-सरोवरैः । पोषिता पोपधागारैर्जीर्णोद्धारैः समुद्धृताः श्रिया प्रीतया निर्व्याज पूजिता ससपूजनैः । प्रशस्तिविस्तरस्तोमैः सरस्वत्यापि संस्तुता शौर्येणोर्जस्वितां नीता स्फीता नव्योक्तिसूक्तिमिः । प्रीताऽर्थिसार्थसत्कारैरुपकारैः पुरस्कृता ॥८॥ वासिता साधुवादेन तोरणैस्तुगतां गता । हैमसग्दामकुम्भेन्द्रमण्डपाधैश्च मण्डिता नित्यं शत्रुञ्जयाद्रौ नवजिनभवनोत्तु शृङ्गामजान- द्वातव्याधूतधौतध्वजपटकपटाद् यस्य नर्चि कीर्तिः । तस्येयं गेहरुक्ष्मीविभवति ललितादेधिनामी तदीयः पुत्रोऽयं जैत्रसिंहः स्फुरति जनमनःकन्दरामन्दिरे ॥१०॥ दृश्या वपुश्च वृसं च परस्परविरोधिनी ! । विवदाते समं यस्मिन् मिवस्तारुण्य-वार्द्धके सोऽयं सहयदेवी कुक्षिभवस्य प्रतापसिंहस्य। तनयस्य श्रेयोऽर्थ व्यधापयत् पुस्तिकामेताम् ।। १२ ॥ पुष्पदन्ताविमौ यावद् दीपौ ब्रह्माण्डमण्डपे । एपा सुपुस्तिका तावद् धर्मजागरकारणम् ॥ १३ ॥ [ एतत्पशस्तियुक्ता पुस्तिका पत्ननगरे वाडीपार्श्वनाथमाण्डागारे विद्यते।।
पञ्चदशं परिशिष्टम् श्रीविजयसेनसूरिविरचित रेवंतगिरिरासु । -- " -- परमेसर तित्थेसरह, पयपंकय पणमेवि । मणिसु रामु रेवंतगिरे, अंचिकदेवि सुमरेवि ॥१॥ गामागर पुर वण वहेण, सरि सरवरि सुपएमु । देवभूमि दिसि पच्छिमह, मणहरु सोरठदेसु ॥ २ ॥ जिणु तहिं मंडल मंडणउ, मरगयमउडमहंतु । निम्मल सामल सिहरमरे, रेहद गिरि रेवंतु ॥ ३ ॥ तसु 'सिरि सामिउ सामलउ, सोहगसुंदर सारु जाइवनिम्मलकुलतिलउ, निवसइ नेमिकुमार ॥ ४ ॥ तम मुह दंसणु दसदिसि वि, देसदेसंतरु संघ । आवइ भावरसालमणउ, हलि हिलि] रंगतरंग ॥ ५ ॥ पोरुयाडकुलमंडणउ, नंदणु आसाराय । वस्तुपाल वर मंति तहिं, तेजपाल दुइ माय ॥ ६ ॥ गुरजरधरधुरि धवलकि, वीरधवलदेवराजि। विहु वंधवि अवयारियउ, [स]म दूसग गाझि ॥ ७ ॥ नायलगच्छह मंडणउ, विजयसेणसूरिराउ । उवएसिहि विहु नरपवरे, धम्मि धरिउ दिदु भाउ ॥८॥ तेजपालि गिरनारतले, तेजलपुरु नियनामि । कारिउ गढ-मढ-पवेपवरु, मणहरु घरि आरामि ॥ ९॥ तहिं पुरि सोहिउ पासजिणु, आसारायविहारु । निम्मिउ नामिहि निजजणणि, कुमरसरोवर फारु ॥ १० ॥ तहि नयरह पुरवदिसिंहि, उग्गसेण गढदुग्गु । आदिजिणेसरपमुहजिणमंदिरि मरिउ समग्गु ॥ ११ ॥ पाहिरि गढ दाहिणदिसिहि, चउरियवेहिविसाल । लाहुकलहहियओरडीय, तडि पसु ठाइ कराल ॥ १२॥ तहि नयरह उत्तरदिसिहि, साल-मसंमार । मंडण महिमंडल......., मंडप दसह उयार ।। १३ ॥ जोइउ जोइउ मवियण, पैमि गिरिहि दुयारि । दामोदरु हरि पंचमउ, सुवन्नरेहनइ पारि ॥ १४ ॥ अगुण अंजण अंबिलीय, अंबाढय अंकुल्लु । उंबरु अंबरु आमलीय, अगरु असोय महानु ।। १५ ।। परवर करपट करणतर, करवंदी करवीरा । कुडा कडाह कयंय कड, करच कदलि कंपीर ।। १६ ॥ पेयल वंजनु पउल वहो, वेडस वरण विडंग । वासंती वीरिणि विरह, वेसियालि वण चंग ॥ १७ ॥ सीममि सिंलि सिरसमि, सिंधुवारि सिरखंडा । सरल सार साहार सय, सागु सिगु सिणदंड ॥ १८ ॥ १रहार ॥ २ मंडल देश ॥ ३ राजनेन्चो से ॥ ४ सिरिमस्तक-शिगर ॥ ५ प्राणीनी परर ६सार-प्रधान ।
१०० श्रीविजयसेनसूरिविरचित [पञ्चदर्श पहाव-मुल्ल-फलुल्लसिय, रेहइ तहि वणराइ तिहि उजिलतलि पम्मियह, उलटु अंगि न माइ ।। १९ ॥ बोलावी संघह तणीय, कालमेयंतर पंथि । मेहविय तहिं दिढ धणीय, वस्तुपाल वरमंति ॥ २० ॥ |प्रथमं कडवं ॥ . दुविहि गुजरदेसे रिउरायविहंडणु, कुमरपालु भूपाल जिणसासणमंडणु । तेग संठाविओ सुरठदंडाहिवो, अंपओ सिरिसिरिमालकुलसमवो । पाज सुविसाल तिणि नैठिय, अंतरे धवल पुणु पैरव मराविय धनु म धवलह माउ जिणि पाग पयासिय, बारविसोत्तरवरसे जसु जस दिसि वासिय । जिम जिम चडई तडि कडणि गिरनारह, तिम तिम ऊडई जण भवण संसारह । जिम जिम सेट जल अगि पलोहए, तिम तिम कलिमल सयल ओहट्टए जिम जिम वायइ वाउ तहि निझरसीयल, तिम तिम भवदुहदाहो तक्खणि तुट्टह निधल । कोइलकलयलो मोरकेकारवो, मुभए महुयर महुरु गुंजारवो । पाज चढंतह सावयालोयणी, लापारामु दिसि दीसए दाहिणी जलदजालबबाले नीझरणि रमाउलु, रेहइ उजिलसिहरु अलि-कजलसामळु । बहलवुहु धातुरसमेउणी, जत्य उलदलइ सोवन्नमइ भेउणी । जत्य दिप्पंति दिवोसही सुंदरा, गुहिर वर गरुय गंभीर गिरिकंदरा जाइ कुंदु विहसतो जं कुमुमिहि संकल, दीसइ दस दिसि दिवसो किरि तारामंडल । मिलियनवलबलिदलकुमुमझलहालिया, ललियसुरमहिवलयचटणतलतालिया । गलिययलकमलमयरंदजलकोमला, विउल सिलवह सोहंति तहिं संमैला मणहरपणवणगहणे रसिर हसिय किंनरा, गेउ मुहुरु गायतो सिरिनेमिजिणेसरा । जत्य सिरिनेमिजिणु अच्छए अच्छरा, अमुरमुरउरगकिंनरयविजाहा । मटडमणिकिरणपिंजरिय गिरियसेहरा, हरसि आवंति बहुमतिभानिमरा सामियनेमिकमारपयपंकयलंधिउ, घेर पूल वि जिण घन मन पूरब पंछिउ । जो मक्कोडाकोडि.... अनु सोवन्नु घणु दाणु जउ दिए । सेवड जडकम्मघणगंठि जउ तिब्बए, तउ उअिंतसिहरु पाविजए । जम्मणु जीवाणु] जीविय तमु तहिं कयत्यू, जे नर उर्मितसिहरु पेसा वरतित्थ् । आसि गुरजरपरय नेण अमरेसर, सिरिजयसिंघदेउ पवर पुहवीसरु । हणवि मोतु निणि राउ यंगारउ, रविउ साजणु दंडाहिर सारउ १बर-शुभ माना २ पार पर परदा म पगोसो दधिनी सनी ॥ निधिकार गरी प्रामगीनी वय ५ स्वरमारसेदो ॥ ६ गुम्मएच्ययनमाय ७ मामला राबी ॥८परणे यी भने पूड पग. .
+ परिक्षयम् ]] रिवंतगिरिरा। अहिणवु नेमिजिणिंद तिणि भवणु कराविउ, निम्म चंदरु, विवे नियंनाउं लिहाविठ, योरविक्वंभवायंभरमाउलं, ललियपुरलियकलसकुलसंकुलं । मंडपु दंड पशुतुंगतरतोरणं, धबलिय बन्झि रुणझणिरिकिंक्रिणिधणं । इचारसयसहीउ पंचासीय वच्छरि, नेमिभुयणु उद्धरिउ साजणि नरसेहरि मालवमंडलगुहमुहमंडणु, भावडसाहु दालिघुखंडणु । ऑमलसार सोवन्नु तिणि कारिउ, किरि गयणंगण सूरु अवयारिउ । अवरसिहर वरकलस झलहलइ मणोहर, नेमिभुयणि तिणि दिट्ठइ दुह गलइ निरंतर ॥ १० ॥ ॥ द्वितीयं कडवं ॥ " दिसि उत्तर कसमीरदेसु नेमिहि उम्माहिय । अजिउ रतन दुइ बंधू गरुय संघाहिव आविय ॥१॥ हरसवसिण घणकलस भरिवि ति न्हवणु करंतह । गलिड लेव सु नेमिविच जलधार पडतह ॥ २ ॥ संघाहिद् संघेण सहिउ नियमणि संतविउ । हा हा! धिगु घिगु! मह विमलकुलगंजणु आविउ ॥३॥ सामियसामलधीरचरण मह सरणि भवंतरि । इम परिहरि आहार नियमु लइउ संघधुरंधरि ॥ ४ ॥ एकवीसि उपवासि तामु अंचिकदेवि आविय । पभणइ संपसन्न देवि जय जय सद्दाविय ॥ ५ ॥ उद्देविणु सिरिनेमिबिंबु तुलिउ तुरंतउ । पच्छलु मम जो एसि वच्छ 1 तुं भवणि वलंतउ ॥ ६॥ गइवि,अंबि.. ...कंचणं.........यलाणइ। बिंदु मणिमउ तहिं आणइ ॥ पढममवणि देहलिहि छुडि पुडि आरोविड । संघाहिवि हरिसेण ताम दिसि पच्छल जोइउ ॥ ८ ॥ ठिउ निचलु देहलिहि देवु सिरिनेमिकुमारो । कुसुमवुट्टि मिल्हेवि देवि किउ जइजइकारो ॥ ९ ॥ बइसाहीपुन्निमह पुनवंतिण जिणु थप्पिउ । पच्छिमदिसि निम्मविउ भवणु मवदुहतरुकप्पिउ ॥१०॥ न्हवण-विलेवणतणीय वंछ भवियणजण पूरिय । संघाहिब सिरिअजित-रतनु नियदेसि पेराइय ॥११॥ सयल वित्ति कलिकालि कालकलसे जाणवि छाहिर । झलहलंति मणिविकति अंचिकुरु आइय ॥ १२ ॥ समुद्दविजय-सिवदेविपुत्तु जायवकुलमंडणु । जरासिंघदलमलणु मयणभहमाणविहंडणु ॥ १३ ॥ राइमईमणहरणु रमणु सिवरमणि मणोहरु । पुन्नवंत पणमंति नेमिजिणु सोहगुसुंदरु ॥ १४ ॥ वस्तपालि वर मंति मुयणु कारिउ रिमहेसरु । अट्ठावय-सम्मेयसिहरवरमंडपु मणहरु ॥ १५ ॥ कविजक्खु मरुदेवि दुह वि तुंगु पासाइउ । पम्मिय सिरु धुणंति देव वलिवि पलोइउ ॥ १६ ॥ तेजपालि निम्मविउ तत्थ तिहुयणजणरंजणु । कल्याणउतउतुंगु अपणु लंघिउ गयणंगणु ।। १७ ।। मिज नाम ॥२ दारिद्रखण्डन दारिदने सू करनार ।। ३ नेमिनाथना मंदिरनो भागलमारो॥४ य=भाई ।। ५ सामियमामन नेमिनाथ भगरान ॥ ६ मुप्रसमा ॥ ७ निषेधार्थक अव्यय ॥ ८ बलानक मंदिरनो एक भाग ॥ ९ परागता पाछा पाच्या ॥ १० फस्यागापयतुंग भरनं नैमिनाय भगवानना दीक्षा केवलज्ञान भने निर्वाग ए प्रण कल्याणकर्ने लगतुं विशाळ मंदिर । क
पिजनसूरिपिरविस
[पत्राव
दीसइ दिसि दिसि कुंडि कुंडि नीझरणउ मालो। इंद्रमंडप देपालि मंत्रि उद्धरिउ विसालो ॥१८॥
अइरावणगयरायपायमुद्दासम दंकिउ । दिट्ठ गयंदमुकुंड विमलु निज्झरसमलंकित ।॥ १९॥
गयणगंग जं सयलतित्यअवयारु भणिजह । पक्सालिवि तहि अंगु दुक्ख जलअंजलि दिजइ ॥२०॥
सिंदुवार-मंदार कुरषक-कुंदिहि सुंदरु । जाइ-ज्ड्-सयवचि-वितिफलेहि निरंतर
दिद्वय छत्रसिलकडणि अंबवणु सहसारामु । नेमिजिणेसरदिक्ख-नाण-निवाणह ठाम ॥ २२ ॥
॥ तृतीयं कडवं ॥
गिरिगरुया सिहरि चडेवि, संव-जंबाहि बंबालिउंए ।
समिणी ए अंपिकदेविदेउलु दीठु रमाउल ए
बज्जइ ए ताल कंसाल, वजइ मद्दल गुहिरसर ।
रंगिर्हि ए नच्चइ बाल, पेसिवि अंबिकमहकमल
॥२॥
सुभकरु ए ठविउ उच्छंगि, विभकरो नंदणु पासिक ए ।
सोहइ ए ऊर्जिलसिंगि, सामिणी सीहँसिंघासणी ए
दावइ ए दुक्खहं मंगु, पूरह वैछिउ भवियजण ।
रक्खइ ए चउविहु सधु, सामिणी सीहसिंघासणी ए
दस दिसि ए नेमिकुमारि, आरोही अवलोइड ए ।
दीजइ ए तहि गिरनारि, गयणंगणु अवलोणसिहरो
पहिलइ ए सांयकुमारू, बीजइ सिहरि पजून पुण ।
पणमई ए पामई पारु, भवियण भीसण भवभमण
ठामि ठामि ए रयणसोवन, विच जिणेसर तहिं ठविय ।
एणमइ एते नर पन्न, जे न कलिकालि मलमयलिया ए
नं फल ए सिहरसंमेय, अट्ठापय नंदीसरिहिं ।
तं फल ए मवि पामेइ, पेसेविणु रेवंतसिहरो
गहगण ए माहि जिम माणु, पचयमाहि जिम मेरुगिरि ए ।
त्रिहु मुयणे ए तेम पहाणु, तित्यमाहि रेवंतगिरि
धवल घय ए चमर भिंगार, आरचि मंगलपईव ।
तिथ्य मह ए कुंडल हार, मेघाईवर जावियं ए
॥ १०॥
१ दरो दिशामा ॥ २ शरणानी माला || ३ मा भने डाइना भारोपी, ४ सामिनी ॥ ५
रमणीय ॥ जयंतगे।। ७-८ अम्बिकादेवी।। ९ मलममिनितामामेला ॥
॥८॥
१०६ ॥ ११ ॥ ॥ १२ ॥ ॥ १४ ॥ - ॥ १५॥ परिशिष्टम् । पंतगिरिरा। दियहिं ए नर जो पवर, चंद्रोर्य नेमिजिणेसरवरभुयणि । इहमवि ए मुंजवि भोय, सो तित्थेसरसिरि लहइ ए चउविहु ए संधु करेइ, जो आवइ उजितगिरि । दिविसंवह ए रागु करेइ, सो मुंचइ चउगइगमणि अट्टविह ए जय(झय) करंति, आठई जो तहिं करइ ए । अट्ठविह ए करम हणंति, सो अट्टमवि सिज्झइ ए अंविल ए जो उपवास, एगासण नीवी करई ए । तसु मणि ए अटइं आस, इहभव परमव विविह परे पेमिहि ए मुणिजण अन्नह, दाणु धम्मियवच्छल करई ए । तमु कही ए नहीं उपमाणु, परभाति सरण तिणउ आवह ए जे न उजिति, घरधरइ धोलिया ए । आविही ए हियइ न संति, निष्फलु जीविउ तासु तणउं जीविउ ए सो जि परि धन्न, तासु समच्छर निच्छणु ए । सो परि ए मासु परि धन्नु, वलि हीजड नहि वासर ए जहिं जिणु ए उजिलठामि, सोहगसुंदरु सामल ए । दीसइ ए विह्णसामि, नयणसळूणउं नेमिजिणु नीजर ए चमर ढलंति, मेघाडंबर सिरि धरीइं । तित्थह ए सड रेवंदि, सिंहासणि जयइ नेमिजिणु रंगिहि ए रमद नो रासु, सिरिविजयसेणि सूरि निम्मविउ ए । नेमिजिणु ए तूसइ तासु, अंबिक पूरइ मणि रलीए ॥ चतुर्थ कडवं ॥ ॥ समतु रेवंतगिरिरासु ॥ ॥ १७॥ ॥ १८॥ ॥ १९ ॥ -- ॥ २०॥ १ आपे ॥२ चद्रवो ॥ ३ देवागना ॥ ४ परागणे ॥ ५ धंधोलीया-पधार्मा रच्यापच्या रहेनारा, भयवा धांधलीया गात दिवस धमाल करनारा ॥६ निर्जर देव ॥ ७ रेवतगिरि ॥
पोडशं परिशिष्टम् पाल्हण पुत्र कृत आयूरास ६० ॥ पणमेविणु सामिणि वाएसरि, अभिनवु कवितु रेयं परमेसरि । नंदीवरधनु जासु निवासो, पभषउ नेमिजिणंदह रासो गूजरदेसह मज्झि पहाणं, चंद्रवती नयरि वक्खाणं । पावि सरोवर सुरहि सुणीअइ, बहुयारामिहि ऊपम दीनइ लिग चाचरि चउहट विधारा, प(मह मंदिर धवलहर पगारा । छनिस राजकुली निवसेइ, धनु धनु धम्भिउ लोकु बसेइ राजु करइ नह( हिं) सोमनरिंदो, निम्मल सोलका जिम चंदो । हिन बनाउ गिरि पुहवि प्रसिद्ध, बहुयह लोयह तणउजु तीथो घण वणरायहं सजल सुठार, तहिं गिरिवर पुणु आयु नाउं । तर सिरि बारह गाम निवासो (सी), राठी गूगलिया नहिं तपसी ॥५॥ तमु सिरि पहिलउ देउ सुणीजद, अचलेसरु तमु ऊपमु दीजह । तहि छह देवत बालकुमारी, सिरि मा सामिणि कहर विचारी विमलिहिं रवियर पावनिकंदो, तहि छह सामिड रिसहजिणिदो। सानिधु सघह करइ संखेवी, तहि छह सामिणि अंपाएगी पुरुष पच्छिग पग्मिय तर्हि आपहि, उत्तर दक्षिण संघु जिपवर न्हावहिं । पसहि मंदिरु रिसह मत्ता (स्वन्ना !), नाचहि धम्मिय बहु गुणवता(ला) धनु धनु विमलडि जेणि कराविउ, ससिमंडलि निणि नाउ रिहाविउ । विहुं सह परिसह अंतर मुणीजइ, चीन नेमिहि भुषशु सुणीजइ उपणि- नमिवि विराण (1)णि नमिति, वीजा मंदिरनियम् । त पुहविहि माहिं जो सलहिलय, ऊतिम गूजर देस ।। न सोलंकियारसमभिडं, सूरउ जगि जसबाउ । त गजरातपुरसमुधरण, राण लूणपसाउ परिषठ दार जो आध्यप, निणि पेलिउ गरिताणु । राजु कार असय गओ, जामु मर्गनिउ माशु ।। .माय ॥ २ सय ॥३॥ ५ मामा ममि!ि iy८गरानी बीमार।
आयूरास। १०५ परिशिष्टम् ] लणसापुत्तु जु विरघवले, राणउ अरडकमल्ल । त चोर-चराडिहि आगलओ, रिपुरायह उरि साठे ॥ १२ ॥ . - भास- वस्तपाल तसु तणइ महंतर, सहुयर तेजपाल उदयंतउ । अमिणवु मंदिर जेण कराविय, ठावि ठावि जिणविंब भराविय महिमंडलि किय जेणि उद्धारा, नीरनिवाणिहि सत्तुकारा । सेत्तुजसिहरि तलावु खणाविउ, अणपमसरु तमु नाम दियाविउ नितु नितु सुरसंघ पूजा कीजइ, छहि दरिसणि घरि दाणु वि दीजइ । संघ पुरिस पुहविहि सलहीजइ, रीतु बघेला बहु मानिजइ अन्न दिवसि निय मणि चिंतीजइ, महतइ तेजपालि पमणीजद । आबू भणिजह तीथहं ठाउँ, जइ जिणमंदिर तह नीपावडं ठाकुरु ऊदल ताव हकारिउ, कहिय यात कान्हद बदसारिउ । आबू रिखमह मंदिर आछद्द, महतउ तेजपाल इम पूछई चीजउ नेमिहिं भुवणु करेसहं, जइ जिणमंदिर यौहर लहिसहं । पहिलउ सोमनरिंदु पूछीजइ, कटक माहि जाइवि विनवीजइ ठवणि- महतिहिं जायवि भेटियओ धावलदेविमल्लारु । त कड(२) जोडेविणु वीनतओ, सोमनरिंद प्रमारु ।। विनति अम्हहं तणीय, सामिय तुहु अवधारि । त मागउ थाहर मंदिरह, आयूयगिरिहि मझारि त तूठउ धांवलदिवितणउ, आगइ कहियउ एहु । त विमलह मंदिर आसस, विजउं करायहु देव ।। अम्हि धुरि गोटिय आयुयह, आगे अछह निवाणु । त करिज मंदिरु विजपाला तुहुं, हियइ म धरिजहु काणि भासा- दिस(य!)इ आय(एस तह सोमनरिंदो, वस्तुपालु तेजपाल आणंदो। जिण समिय मंदिरु वेगि निप्पजए, अइमु निरोप दिव उदुलु दीजए ॥ २०॥ अइसि ऊदल्लु चंद्रावती आवए, सयल महाजनु परि तेडावए । चालहु हिव आयुइ जाएसहं, जिणमंदिर थाहर भूमि जोएसहं ॥२१॥ २मार-माल्यवल्यः ।। २ यमै यमे स्थाने स्थाने ॥ ३ कने बेसारीपासे वेमारीने ॥४मंदिरने लायक भूमी ॥
[पोडश ॥२४॥ . पाल्दण पुत्र कृत। चलिर ऊदल्ल महाजनि सहितर, आधुय देवलबाडइ पहुतो। ठामि ठामि मंदिरभूमि जोयंतओ, मिलिउ मेलावओ आंबुय लोयहं ॥२२॥ मंदिर थाहर नवि आपेसहं, प्राणिहिं भुवणु करण नवि देसहं । आगए विमलमंदिर निप्पनओ, सिर मा भूमिहि दीनर दानु ॥२३॥ वाणि- उदल तित्यु ति]पसीय बहु परि मनावइ । राठी पर गूगुलिया वस्तई पहिरावइ मास- अम्हि धुरि गोटिय दिव निमिनाथ, जिणभूमि आपहु ते इस माहा । विमल मंदिरु ऊनर दिसि जाम, लक्ष्य भूमि तिल(जपाल वधाविउ ॥२५॥ महतइ तेजपाल पभणीजइ, सोमनदिड मुतहारु तेहीबइ । जाइन आयुद्द तुहं (मुहुतु) कमठाए, वेगिहि जिणमंदिर निप्पाए ॥२६॥ चालिउ पइट करिट मुतहारो, भूमि सुवण इकवार अहारो। सोभनदिउ विगि आबुह भावइ, कमठा मुहुतु आरंम् करावद ॥२७॥ मात- मूलग्ग पायारघर, पूबिउ कुरुम प्रवेस । मरिउ गहारट तहि ज पुरे, खरसिल हुमउ निये ।। आसंनी तहिं ऊपडिय, पाथरकेरिय खाणि । निपनु गडारउ मूलिगमओ, देउल चडिट प्रमाणि ॥२८॥ रूपा सरिसट समतुल ए, दसहि दिसावरि जाइ । पाहणु तर्हि आरासणउं, आणि तहिं कमठाई। सरवर घाटु जो नीपजए, मंदिरु बहु विस्तारि । त आतिसह दीसइ सडर, नेमिजिणिंद पयार उपणि- सोमनदेउ सुनदारो कमठाउ करावद । सइ तर मंत्रि विजपालो निणविंचु मरावह ॥ ३०॥ माम- खंमायति वर नार विनु निपजए, स्यणमउ नैमिजिणु ऊपम दीजए । दिमनि कंनि स्यणकनि सामल धीरा, यह पंकति बहु मति माह सरीरा --- -- परिशिष्टम् ] आबूरास । tap निवसए विंदु जो सालह संठिओ, विजयसिणरि गुरि पढम पतीठिओ। निपनु परिपूरनु सामलदेउ, धणु तिजपाल जिणि आयुय नेओ ॥ ३२ ॥ घवलसुत सुरहि पुत ठविय तहिं रहवरे, खडइ सुहडा सुमुहुआ आयुय गिरवरे । नयरवर गामह माहिहि आवए, सइत भवियहो जिण पहेरावए ॥ ३३॥ आधुय तलवटे रत्यु पहूतओ, तेणीय ऊवरणीय पाज चढंतओ। धडऊथडइ रहु पाज विसमी खरी, वेगि संपत्त अंपिक वर अच्छरी ॥ ३४॥ सानिधि अंबाइय रत्थु चदंतओ देवलवाडए दिणि छठइ पडतो ॥ ३५ ॥ ठवणि- आबुय सिहरि संपत्तु देउ पहु नेमिजिणेसरु । वणसइ सवि विहसणहं लग्ग आइर तित्थेसरु ।। ३६॥ उच्छंगिहि जुगादिजिणु जिणु पहिलउ ठविजइ । तुहुँ गरुयउ निमिनाथ विवु तिजपालिहिं कीजइ ॥ ३७॥ हकारहु वर जोइसिय पइठह दिणु जोयहु । तेडावहु चउविहहं संघु पुर-पाटण-गामहं ॥ ३८॥ चार संवच्छरि छियासियए( १२८६) परमेसरु संठिउ । चेत्रह तीजह किसिण पखि निमि मुवणिहि संठिउ ॥ ३९ ॥ पहुं आयरिहिं पयह किय बहु भाउ धरंता । रागु न(त) वइ भवियजणाहं निमितित्थु नमंतह ॥४०॥ श्रावे हंडावडा तणे जिणु पहिलउ न्हवियउ । पाछइ न्हवियड सपल सघि तुम्हि पणमहु भवियहु ॥४१ ॥ ..... ] तासु कल्याणिकु कीजह । दसमि तित्यु नेमि जात रेसि संघ पासि मंगीजह ॥ ४२ ॥ संघु रहिउ जिणि जात करिवि नेमिभुवण विसाल । पूरि मणोरह वस्तुपाल मंति तेजपाल ॥४३॥ मूरति बेपु असराज तणी कुमरादि विभाया । काराविय नेमिभुवणुमाहि बिहु निम्मलकाया काराविउ निमिभुवण फलु लयउ संसारे । निमुणहु चरितु नदन्ते (ते ! ) तिणि धंधूय प्रमारे ॥ १५॥ रिपममंदिरु सासणि जाणुं घुघुय दिनउ डकडवाणिउं गाउं । तिणि समसीहि उजालिउ नाउं नेमिहि दिन्नु डवाणिउ गाउं ॥ १६ ॥ [ ॥ १४ ॥ १पु पिता ॥
आपूरासन
[पोस
[मास]
[..
..]
अनेक सपपति आबुइ आवहि, कनक कपड निमिजिणु पहिरावहिं
पूजहि माणिक मोतिय ईले, किवि पूनहि सोगधिहि फूले ।
केवि हु हियडय भावण भावहि, केवि हु मंनीणइ आराहहिं
केवि चडावलि नेमि नमीजद, रासु क्यणु पाल्हण पुत्र कीजइ ।
चार सवच्छरि नवमासीए( १२८९), वसंत मासु रंमाउल दोहे
एह राहु( स ! ) विस्तारिहिं जाए, रापइ सयल संघ अंचाई ।
राखइ जाखु जु आछद खेडद, राखद ब्रासंति मूढेरह
!! आरासः समाप्तः ।
परिशिष्टानि ।
सुकतकीर्तिकल्लोलिनी-आदि वस्तुपालप्रशस्तिसंग्रह । पद्यानुक्रमणिका। श्लो टो० पृ० १०२ ४३ २१ मइरावणगयराय मसि ऊदल्छ अकारयन्नगाकारं यगण्यपुण्योदय पृ. ६२ १०५ २५ ९८ ४० १५ ३० २६ २६ ९९ मगुण अंजण ८४ ६० ५९ ४३ ८ ९९ ८८ ३ १४ २६ २८ १०३ ५२ ११ १२६ २५ १०६ १३ ३ ३० १०२ ८२ ८ १०३ ५९ २० २९ २८ २८ ३२ अन्वयेन विनयेन अन्न दिवसि अपास्य शौण्डीर्यमदं मपि चाप्यायिता अप्राप्ततादृशगुणां अमूदनुपमा पत्नी अभ्यर्घ्य देवान् अम्बिकाभवने येन अविल ए जो अम्भोजेपु मराल अम्भोदभ्रममाजि अम्हि धुरि भयं हि राकासु अयमनुदिनदानो अरिवलदलनश्री अरुन्धतीव कान्ता अर्कपालितकामे भर्चिपामयन अर्णोराजाङ्गजातं अर्थदानदलिता अर्थव्यर्थितदुस्थ भहस्तनोतु मुवना अर्हतनिजगद् अवश्चयन्नाशु असावाशाराज मसौ कीतीः स्वका असौ भुवनपालस्य अस्ति प्रदास्ता ६० ३ २१ ८६ ७८ अग्रे हम्मीरवीर अचिन्त्यदातार मष्टिदो यदि तत्कृतः मजनि रजनिजानि अजयदजयपाल अविह एजय मणहिलपुरमस्ति मन्यद्भुता सचिवपुङ्गव ! अन्यतैः कृत्यशतैः मोव शत्रुञ्जय मत्रच शैले रचयाञ्चकार अनन्तप्रागनभ्यः अनुजन्मना समेतस् अनुमोऽस्यापि मनुपमदेवी देवी अनुपमदेश्यां पल्या मनुपमदेव्यास्तेन मनुसृतसजन मन्तःकजलमञ्जलथि अन्तःक्षारं रिपूणां अन्तर्य कीर्तिकासारं अन्तयोम अवन्ती अन्ये केचन ४० ८५ ३८ २२ १९ २६ ३३ ८३ ८ ७६-२ ५३ ४२ ४ ७६-२ २८ ८४ १ ७८ २ २३ ६ २० २ ७६-२ ४० ३६ २७ २८ ८३ ५२ GG ९२ ५७ ४२ ६० ९३ ३९ १९ ३९ ६० अस्ति स्वस्तिनिकेतन अस्थापयत् स्थिरमति अस्मद्गोत्रकमित्र अस्मिनाभिभुव अस्मिन्नुन्नतवेश्म अस्य विक्रमविक्रमस्य अहकृतिलतायुध अहिणवु नेमि आकृष्टे कमलाकुलस्य आगो यहसुवारि आजन्मत्रासहेतु मात्मगुणै किरणैरिव आत्मा त्व जगत मादिम प्रशम आदेश देव । यद्येव मायेनाऽप्यपवर्जनेन आनन्दचन्द्राऽमरचन्द्र आनदाऽमरसूरी आनदाय मुदर्शना आपपे प्रसूति भावुय तलवटे आवुय सिहरि आयाता कति आयुर्वायुहतोर्मिवत् भावइ एजे ४९ ११ सुरुतकीर्तिकल्लोलिनी-आदि वस्तुपालप्रशस्तिसग्रह लो पृ. ग्लो. ४९ आस्य कस्य न ९ ३८ आहडस्तदजनि १३२ १२ इदुबिंदुरपा १६६ इतरगुणकथाया ६ १३ २ इतश्चौलुक्यवीराणा २५ ५३ ५ इत्थं श्रीवस्तुपाल ९ २ ९३ इत्यन्त स्मित ९ १०१ इत्युक्वा प्रीति इत्युक्त्वा मम ३१ इद सदा सोदरयो २१ ६ इन्दु पत्रावलम्ब १५८ ६ ५९ इन्दु पत्रावलम्ब ८ इन्दुर्निन्दति इन्दुर्बिन्दुरपा १२८ ६८ ३९ इमा समयवैषम्याद् १५ ६ ५२ इमामकृत सद्गुरोर् १७८ १३ इयमनुपमदेवी १०० २९ इह तेजपाल ३ इह वालिगमुत ३० इह वालिगसुत १०७ इहैवाष्टापदोद्धार ६५ १०७ ईदृग्रूपगुरूपदेश १६२ उच्छगिहि १४ उद्वेविशु सिरिनेमि ६ १०३ उत्कर्षप्रगुणा ४५ २६ १९ उत्फुल्लमल्ली १०७ ९ उत्सेरितोत्सूत्र २१ २५ उदग्रतेज मुकृतैक १० २८ उदार सूरो वा ३१ उद्दधारानुजो यस्य ५२ २ उदृत्य पञ्चासर ३२ ६४ उदृत्य वैद्यनाथस्य उदास्यविश्वविधा ११ २२ १६ ६३ ४७ १ २७ १६१ १०७ १०१ आशाम्यो नवपुष्प ८० आशाराज इति आशाराज शस्यधी आशाराजस्य पितु आधर्य यमुष्टिमि आसीदीशो दोमदा आसीधडपमंडिता आरते तस्य मुधारहत्य २४ ४९ ४ २६ २७ ९० पद्यानुफ्मणिका। ११३ पृ० श्लो. ६ ४० उमृतप्रतिमा उद्भूतप्रतिमा लो० १३० १३ ८० उपार्जि विभुता २४ ५४ ४ ३९ १११ ९ २४ ४० ४५ १०७ १२ १८ २३ २२ उदल्ल तित्यु ग्वेदी च हजुरोहित एकवीसि उपवासि एकाऽपि प्रमदां एकैकेन विमोह एकोपत्तिनिमित्तो एतद्धर्मस्थानं एतस्मादजनि एतस्मिन् भव एतस्मिन् वसुधा एतस्मिन् वसुधा एतस्य विकसद्धर्मा एताः शमामृतरसेन २१ ४९ २७ १५ ७ १६८ ४ ७ १४९ १ पृ. ११ कल्पद्रुप्रसवावतंस १८ कल्पाविष्करणादितो ८ कवीन्द्रपदवीस्पृहा १०६ कस्याऽपि कविता ८२ कान्तं यं वीक्ष्य ८३ कान्तस्वान्तसरो १०१ कान्ता जगन्त्रितय कान्ते कृष्णेऽभिभूते काराविउ निमु ६० काले यखड्गदण्डे काव्येन नव्यपद ५९ किं च कारयता किं चित्रं यदि २२ कि वो लवण किञ्चैतेन गुणैः ९ किमिह कपाल ९२ कीर्तिकश्मलित ९७ कीर्तिस्तोमसुधा ६० का सौरभसार १०८ कुण्डलप्रतिमित कुदेशना च या कुन्दं मन्दप्रताप १०१ कुमारपालस्य कुमारपुरेण ७८ कुर्वन् परार्म्यगणिते ९९ कुर्वन् मुहुर्विमल ४१ कुशोपशोभितैर् ४२ कुष्माण्डि ! मण्डन ३ कृत पड्वियजीवानां कृत्वाऽघः कच्छप ३३ कृष्णीकृतारिवदना के निधाय वसुधातले केवि चडावलि ४४ ३४ १०६ ११ ३९ १८ एतेभ्यः प्रमुणा ९० ९२ ८ ८ ३० ९० ९५ ३० ४ ८४ १६ २९ ६७ ५ ८९ एतेऽधराजपुत्रा एह राहु और्याग्निनाऽपतत औपीशसखः सत्यं कउडिजक्खु कय्यन्ते न महीमृतः कमठधनमृताम्मो करवर करपट करसरसिरह ते करसरसिरुहं ते कराम्भोज भेजे कराम्भोज भेजे कर्णायास्तु नमो कर्णे खलप्रलपित फर्मसाक्षिमवताप १६ ३३ २३ ९० ८३ ९४ ५ ३ ९ ३४ ६ ३४ ४ ८८ ६ २८ १० १५१ ४९ सुतकीर्तिकल्लोलिनी-आदि वस्तुपालप्रशस्तिसंग्रह कोटीरैः कटका श्लो. लो पृ. २ ६४ २ ३७ ७ ४ १३७ २ १०४ ८४ ४१ २६ ८७ ३५ ५६ ५ ३० १३ ८८ ७ ६८ १७२ ५ ७६ १५ १०४ ८ ३१ ७ ६ ५९ ९५ कोटीरैः :: कटका कोदण्डं स्वकरे कोपाग्निन्वलिता कोपाटोपपरैः परैश कोपाटोपपरैः परेश् क्रान्तशकवलो कामन्ति स्म यथा क्रीडाकथासु सदसि क्रुद्धे युद्धेषु यस्मिन क्रोधेन ज्वलितो क्वचिदिह विहरंतीर् क्षीणत्वं दाक्षिणात्या क्षीणे चक्षुपि क्षीराब्धिर्टठति खभायति वर खेलखड्गपट्टि ख्यात सड्मामसिंहो गयणगंग जे गर्ननिर्जरभरे गर्ननिर्जरकुर गर्वात् पूर्व गहगण ए माहि गाभार्य जलधिर गाथास्ता' खलु गामागर पुर गिरिंगरया सिहरि गुणप्रामे रामे गुणधननिधान गुणोघहंसालि ५६ १३५ ६ १७० पृ० ३१ गुरोस्ति]स्या शिपां ५१ गूजरदेसह मन्झि ६ गृहीतं कुप्यता गृह्णासि नाम परतोऽपि १२ गोग्रहप्रोज्झिता गोमयरसानुलिसे गौरीवरश्वशुर ३५ ग्रामेऽपालितक मामे शासनदत्ते च घण वणरायह ९२ घोरारण्यविलीनै चंडसिा]दर्स[ज्ञः] चक्रे कोपश्च ८६ चक्रे च यो धवलके १२ चश्चत्पञ्चम १०६ चण्डप्रसाद इति ३ चण्डप्रसाद इति १२ चण्डप्रसादपुण्य १०२ चण्डांशोरपि चण्डता चत्वारस्तनया १८ चहुविहु ए संघु १०२ चान्द्रे कुले ७६-३ चालिउ पइठि चित्रं चित्रं समुद्रात् ९९ चित्र विवानपि १०२ चिन्तातीतफलप्रदः चिन्तातीतफलप्रदः चौकार शकटनजस्य २५ चूडामणीरत ९९ चेन किं कलिकाल! २९ चेतः किं कठिकाल1 चेतः केनकगर्भ ८१ १०० ८ ५ ८८ ९० १३९ २० १२९ १२ १० ९ चलियउ ऊदल्ल २२ ११२ २२ १२ २८ २३ ९ १०६ १०३ १ ८ १०६ २ ३३ ३२ १७ २५ १ १ ३ ७८८ ३३ ८८ गुरजरपरपुरि गुरुः मुलेश्य गुरुः श्रीहरिमदोध्य ९९ و ه س م له ८ ७९ ४७ पद्यानुक्रमणिका । लोक पृ० २८ श्लोक ६२ ६२ ४५ २७ ४ ९७ त एव स्तूयन्ते तजगत्यां च तजन्मा वस्तुपाल: त तूठउ ततोऽभवत् कीर्ति तत्कामश्रीरजनि तत्कालं कलहे २ १९ १०५ ९ २४ ६५ चौलक्यः सुकृती चौलुक्य क्षितिपाल चौलुक्यचन्द्र छद्मोत्सेकितनो ज फलुए जगन्यमन्यः अने हर्षपुरीय जनन्यामोह जम्बूद्वीपो जलधि जम्मगु जोव[] जयति विजयसेन जय यसमसंयमः जलदजालवयाले ४ १०४ तत् त्रैलोक्यनिभ ३५ १ १०२ ६ २९ ४२ ४३ १०० १४ ९३ १०० २२ २० २० ६ १०१ तत्त्वोदिल्वर तत्पढे प्रथमः ८० ८ १५७ १ ४ ९ ७९ जहिं जिणु ए तत्पदे विजयसेन तत्पदे विजयसेन तत्पदे विजयसेन तंत्र प्राग्वाटान्वय तत्र रैवतकाधीशः तत्र लोलाकृति तत्राऽऽमस्वामिनो जाइ कुंदु विहसंतो ५ १७ १३३ २ १२ जातः करीन्द्रोदुर जाना कृष्णपदात् जान्हू माऊ-साऊ जिगु तहिं मंडल जिचा म्लेच्छपतेर् ७९ ५४ ८१ ६६ १७६ २८ २७ २८ २७ तकं राणक ९९ ८४ २७ जिम जिम धायह ३८ ३ १०० १० ६ १ ૨ २४ जीयाद विजयसेनस्य जीयामुः कवयो जीविउ ए सो जुवन् पातक बैन धर्मनुरीचकार दउ जोइउ मान दर्शन-चारित्रं परस्तमः १०३ ३९ तत्रैव वीरधवल तत्रैवाकारयदा तसंभवत्रिभुवा तसत्यं कृतिमिर तदन्तिके च नि.शेष तदन्दयाम्भोधि तदामज संयनि तदिम मौलिपु मौलिं तदीये शिखर नेमि तन्नन्दनः कुमुद तम.सर्वान्नीने तमहतमहं वदा तमेरुदा फरारोप तयोः प्रथमपुत्रो तव या शनपत्रं २५ १४ ११८ ८९ ९९ २५ ९५ २८ २२ ६ ८३ १०५ १०२ यमिठानिए दि निच ८ ९ ये भनि ४७ १०१ सुकृतकोतिकालोलिनी-आदि वस्तुपालप्रशस्तिसंग्रह ग्लो पृ० ९९ १०४ लो १५ ६ ४ ९९ २७ २१ २५ ३९ ३९ ८ ३४ ७३ ९ ५५ २६ ११ १२ २४ तेज पाल पालित तेज पाल सफल तेज पाल सचिपतिलको तेज पाल ! कृपालधुर्य ! तेज पालयशो तेज पारस्य विष्णोश्च तेज पालस्य विष्णोश्च तेज पालेन पुण्यार्थ तेज स्फूर्जितदीप तेजपालि निम्मविउ तेजपालि गिरनार तेजोवहिहुताष्टदिग् तेन भ्रातृयुगेन तेन मंत्रिद्वयेनाय तेषा मृगेश्वर ३ ३ ३५ २३ ८१ ७६-४ ३५ ६० ६३ ३ १०१ ९९ ६० २५ १७ ९ ५१ ६६ २९ ७ तमु मुह दंसणु तमु सिरि पहिला तमु सिरि सामिउ तस्मात् कुमार. तस्मादरमल तस्मादनतर तस्मादभूदजयपाल तस्मादभूद् तस्मान्नेत्रसुधाञ्जन तस्माद्' भस्मीकृत तस्माद् विस्मारित तस्मिन् काश्चनकोटिमि तस्मै संयमिनामिनाय तस्मै स्वस्ति चिर तस्य गर्मगृहोत्सङ्गे तस्य जगत्यां तस्य प्रिया प्रणय तस्य प्रिया मुद तस्याऽऽजया तस्यानुज तस्यानुजन्मा तस्यानुजो विजयते तस्याऽभवनिर्मन तस्याऽभूत्तनया तस्यैवाऽऽधरिमो तहि नयरह उत्तर तहिं पुरि सोहिउ तहिं नयरह प्रव वाहसम्पत्यतिकर तारग्दानपरम्परामि तीर्थमा प्रणतेन्द्र तु ममीम ५ ६४ ९४ ४३ ५६ २५ ११० २७ ८९ तैस्तैन जनाय तैत्रिभि प्रथम त्यजामि पापमाहार ४३ ८५ १४ ९ ७९ १३ २२ ९ १०३ ३ ३१ ५२ ११ १०९ १०४ २० ६३ ४२ ७४ त्यागाराधिनि राधेये निंग चाचरि निजगति यशसस्ते त्रिभुवनदेवी तस्य २५ त्वत्कीर्तिज्योत्स्नया ७६-२ दत्तालोकेऽथिलोके २७ देते चेतसि सम्मद दधेऽस्य वीरपाल दन्ती धर्ममतङ्गजस्य दयिता ललितादेवी दयिता ललितादेवी दर्श दर्शमसह्य दस दिसि प दानं दुर्गनवर्गसर्ग दानानि तानि ९ ३९ १३ १० ९९ ६ १५४ १४ ९९ ९ ४५ ५० ४ तत्र पाल इनि ७८ १३ १९ पद्यानुक्रमणिका। ११७ ग्लो टो. पृ. ८० ७ ७ ४ ४ ९८ २९ ३४ ९ घनु धनु विमलडि १०१ १२१ ११ ३ २२ १०० २५ ९२ २० धर्मविधाने मुवन २ २८ १२ ११ ८३ २४ ३४ १ २८ ६० २६ ४ १८ ४ १०२ १०७ ३३ ५ दायादा कुमुदावलिर् दारिश्चदुर्दन टावद ए दुक्खहं दास्यवर्तिन इवाऽऽस्य दिग्यात्रोत्सववीर दिग्यात्रोत्सववीर हिण्यागोत्सवीर दिट्ठय छत्रसिल दियहिं ए नर दिस(य) आय(ए)सु दिसि उत्तर कसमीर दीपः स्फूर्जति दीपः स्फूति दीसइ दिसि दिसि दुर्गः स्वर्गगिरिः दुर्गः स्वर्गगिरिः दुविहि गुन्नरदेसे दुशरिकोटि दूर दुर्ललितेन स्यः कस्यापि इन्यः कस्यापि स्यन्ते मगिमौक्तिक इस्चा पपुथ दृष्ट्य वपुथ देवः पहजर देयः परं जिनयरो देवः स वः देव! वप्रतिपन्थि देव स्वनाथ ! फट देय स्वनाथ ! फट देवि ! त्वर्जित देवि! प्रकाशयति देयी सरोजासन २१ देशोऽरण्यप्रदेशो ९४ दोपोन्मुद्रणमुदितेऽपि १०२ द्वारे यत् किल घंयुक-ध्रुव-भटा घनमनवरत १८ घनु सु धवलह १०२ धन्यः स वीरधवल १०३ धर्मध्यानमना १०५ १०१ धर्मस्थानमिदं २३ धर्मस्थानांकितामुखी धचिती रुचित १०२ धवल धय ए धवलमुत मुरहि घात्रीधुरीण मुन १०० धाम्नां धाम ८४ धाम्नि स्वर्धामगलं धाराधीशपुरोधसा १९ घाराधीशे विन्ध्यवर्म ४१ धारावर्षमुतोऽयं धीराः सत्त्वमुगन्ति ९८ न किं स हरितुन्यता न कृतं मुक्तं ३३ नगराख्ये महास्थाने नताशेपवेषि नमस्ये निराः नमिचि चिराग ३२ नत्रारीन्दुमुखी ५२ न यस्य लक्ष्मीपति ९४ नरनारायणानन्दो ९४ न वदति परुषा नागेन्द्रगच्छ ৩৪ १ ३४ १२४ २० ८३ ७ २३ २ ४० ७६-२ १४ १ ८१ ११ ११ ४४ २६ १४ २ २३ २५ १० ४० २ ३१ ९ ९० ८ ५ ९० ३९ मुरुतफीतिकल्लोलिनी-आदि वस्तुपालप्रशस्तिसंग्रह लो० पृ० नाभूवन् कति ४ ३९ our ८ १०४ १९ १४ १० १३ ४६ ६ १०० १०२ ३ नामेय नेमिनाथ च नायलगच्छह नितु नितु मुरसंघ नियं शत्रुनयादौ नियोगिनागेषु निरीन्द्रनामे घोडाख्य निर्माप्यादिजिनेंद्र निवसए विधु नोजर ए चमर नीना वर्श विषम नीलनीरदफदायक नृत्यन्या न्योमरहे नृणां यपदपमयोर् नेत्राणाममृताननं ३२ ३७ १२३ २ पृ० ७६.२ परमपदपुरान परमेसर तित्येसरह ९९ परिवल दल्ल १०५ पर्यगैपीदसौ ९८ ५० पहिलइ सांब ૨૬ पाण्डयः पारखण्डिवे ७६-२ पातालमूले पिहितां १०७ पाताले बलिलाज १०३ पापं पङ्कजयन् १० पीनश्रीर्मुजयनगो ६० पीयूषपूरस्य च १६ पीयूपादपि पेशला १४ पीयूषैः प्रणता २० पुण्यं प्रतापसिंहस्य ९३ पुण्यश्री वि पुण्यस्य पापपटली ८९ पुण्यायाऽजयसिंहत्य पुण्यारामः सरुल ५२ पुण्ये गिरीशशिरसि १०१ पुग्यैरहेतु पुरत कालमेघम्य पुरा पादेन दैत्यार ४६ १ १७७ १५६ ८७ २७ नेपप्यरतिथीभवत् ५९ ९ ८ ८ ८८८ ७ ८८ नैवोउसम्पुट नोचे यशासि न्यस्यावस्य गिरसि ग्यास व्यातनुतां ६४ ४४ ४ ३३ २७ ३३ ९४ or न्दयग-रिवण ३ ११ २० १ २८ ८ ८ पुरुन्य पष्टिम ८ १०५ १ १ ९८ पथानमेको न पाच पोरयशालाम पदम मवगि पगमेवि समिति पनी तापाजायना पयुदीनामिव पद रिमयसम्पदा पा पमपाय पामाभिगमदानेन पामाभिगमन पमा पाटरीना গবেষপ २० ४८ १३ १०४ पुरोत्तमे स्तम्मनका ७६.१ पुपदन्ताविमो २५ पुरन गुर्जर ६ पूजदि मागिक ५ परमेय सचिवः स १२ र फागना १९ मिहिए मुगिन १३ पान धाग्य ९५ पोरपान ९ १६९ १५ १०३ ६ ९९ पद्यानुक्रमणिका । सो. ९९ १७ M १० ३४ ८ ७ १०५ १०० १२ २० १४० १० १३४ ९ १० ९० १७ ३ ૨૨ ३५ ९० ६६ ४ लो. पौषयशालाद्वितयं प्रगमदमरप्रसन् प्रतापतपनो यस्य प्रतापस्यात प्रतिदिनमपि रौद्रेर् प्रति राप्य च मन्त्रीशस् १७१ प्रतीता नीतीना १३६ प्रत्याकारच्छलगुरुदरी प्रयाश प्रसरत् प्रथमं धनप्रवाहैर् प्रथमादर्श प्रद्युम्नशिखरे सोम ९२ प्रमूतमूतराजस्य प्रवर्तमानेऽत्र प्रसादादादिनाथस्य प्राग्वाटगोतिलकः प्राग्वाटवंशवज १८ प्राग्वाटान्चयमंटनं प्राग्याटान्वयमंडने प्राग्वाटान्वयवारिधी प्रासागना प्रीतो वखापथमुवि ९५ प्रेश्यास्थैर्य प्रभुप्रीति २९ प्रेयस्यपि न्यायविदा ९ पदः सिन्धुबसुन्धरा २२ बन्धुः कनीयान् १२ यभूय गोत्रकगुरुर् १५० पलि-कर्ग-दर्धाचि १२ यहुं मायरिहिं बाई प्रौटयति पागे गीगगोरी ३२ पार सवधरि ३९ पालः श्रीगलराज्य २९ २६ वाहिरी गह ४८ विडोजसि गते २२ विभ्राणं परितो २२ वीजउ नमिहि वोलावी संघह मग्नः शङ्ख इति १२ भर्ता मोगमृतां भर्तुर्वपमयं विधाय ९१ मर्तुर्वेषमयं विधाय ५० भवति हि विभवो भवभुजमुजङ्गोऽसौ २८ माग्यम्किमसावस्तु २७ मास्वप्रमावमथुराय भित्वा भानु मित्या भानु ८८ भूवन्टमस्तदनु भूमारोमृतिधुर्य भूमीमारमथो वमार भूयांस एव ८६ भूपा भूवोऽगहिल ४९ मृगुनगरमौलि भेजे तेजोगगन भैमीव नैषध २२ भोगीन्द्रस्वमुजेन भ्रमन्ती भृशमन्याय ८३ २४ भ्रातः ! पातफिनां फिमन भ्राता वातायन इव ४० भ्रमद्गिप्रतिविम्य १०७ मंदिर थाहर मजन्तीमवनी २० मजन्तीमवनी १०७ मगहरपगरग मतिमन्परता यस्य १७ १० ३५ २५ ३६ or २५ १४ ११ ૪૨ ૨ २५ ४८ ९ १२ ४० २२ ४५ ९ १०४ ९६ २३ ८ १०६ ९ २१ ६ १०० १७ सुकृतकोतिकल्लोलिनो-आदि वस्तुपालप्रशस्तिसंग्रह पृ० ८३ पृ० मप्वधित मन्दरदसि मन्येऽस्मिन्नमृता मन्लदेव इति मलदेवसचिवस्य मसृग्युसम्पबैर् ७० यः क्षतिमा यः प्रत्यर्थिक्षितिपति यः शत्रुनयशेखरं यः शाम्यशिखरे १३८ २७ १० यः शैशवे ९२ ४५ ५ महतइ तेजपाल २६ ३२ १२ ३८ २८ ६२ ८४ २७ ९० ६२ १० ११ १३ १०२ ९ १४५ १९ १० १४४ १२ २२ ४८ १२२ १३१ १४ ८८ ८ ९ ६० ३५ ९३ ८ १ ३६ ४ ४४ ९ ८२ महतिहिं जायवि महिमटलि किय माधुर्यवुर्यमधुलोम मा भून्मदमुवनेऽपि मा मून्मदमुवनेऽपि मालवमंडल मालिन्यं मुमुचे मुकुलितरुमलोदय मुक्तामयं शरी मुक्या विप्रकरा मुणानि प्रसभं मूरति यपु गळया विहितः मूतीनामिह पृरतः मूल कार्तिलताततेः मूलग्ग पायारपर मूमयूरदरित्यरि मेगमें रचिमातनोति मेरो परिकम्पले मोहोडोरिया मोनिकपनि यं मानमनि 4fri पपयः यागेतिन या पनि मनावि १७ यः शौचसयमपटुः १०६ यः स्फुरन्मेदुरामोदे १०५ यः स्वीयमात १०५ यचाणक्याऽमरगुरु यत्कीर्तिप्रसरैः १३ यतिः स्वैर यत्कीर्तेस्वैर यखट्गक्षत १३ यत्खड्गदण्ड ४२ यखड्गवन्ती यत्पदाम्बुजयुगं ६२ यगारिक्षरगोत्र यथा प्रतिष्ठा १०७ यदगपटनोत्सूरैः ९५ यदाननसरोजन ६४ यदानग्रभर ६ यदानोदकजात यदिस्युम्भि-युल्लादि यद दुरीक्रियते रम ९३ यदोर्मण्टलकुण्डली ३ यपानासु तुरा यस्पन्न यत् वासन्य यनिमापिनदेय यभरार नयोबार ८२ यरनीयांना प्रार मम्मादम्य परिमन् दाननिदान ५ ३५ ६४ ३२ ९४ ७० ८ २८ १२७ ३ १४६ ३० ८९ ८ २२ ९४ ४ २ ૨૨ २ १२ ४७ ६२ ३८ २६ ९ ८४ ८ पद्यानुक्रमणिका । ग्लो. २३ ६ यम्मिन् धर्म पृ. ९३ ८१ १८ १०३ १५ २० १३ ४ २ ४८ ७ ४ १४ ११५ २२ १० ३ १४ ४ १०१ ८ २८ १९ २ २ १०४ ४ ૨૬ १६ ३८ ११ पृ० २३ येषां मूर्तिरसौ येपामशेषाधिपतिः ६ द्वाऽतिचल्ला रंगिहि ए रमइ ३४ रक्षादक्षो दिवि रक्यां रक्षितुमक्षमे रणे वितरणे चात्र रक्तः सदतिमावभाजि रक्तः सद्गतिमायमाजि २४ राइमई मणहरण ८९ राका ताण्डवितेन्दु ९३ राजा चामुण्डराज ८९ राजा श्रीवनराज ८२ राजु करइ तह ३७ राहो गृहीतोगकरे रिपुत्रीनेताम्मो ३० रिपममंदिर ३९ १३ रोद कन्दरर्ति २० रोदःक्षीगेदनाः ४२ लक्ष्मी धर्माद्वयोगेन लरमामन्याचरेन्द्र लल्यामारष्टि सय्या मानुषजन्म लमन्ते लोकनः ३ ललितादेवानान्ना ३८ उलितादेव्याः पन्याः लवप्रसाद ३८ लानन्यायकून २८ पायसिंहलनय मायाम इति सल्यान इति टीडामच यस्मिन्नुतर यस्मिन् पश्यति यस्मिन् विश्वजनीन यस्मै रस्मिमरो यम्य न्यतितचाप यस्य भूः किमसा यस्य समनि सदा यस्यानो य(तोरयाममः समभवद यस्याऽऽननं यस्यानीझवधूमि यस्या मुसे यस्याशी प्रतिपादितो यस्यासिरम्मोद यस्योपदेश यस्योपातिलकस्य यापचण्डपगोन यात्रापर्वगिरेवत या प्रार्थना याचक या ग्री: स्वयं युक्त........ युदं वारिधिरप युद्पगि कदापि मुदपर्वगि कदापि युदोशमरमण्टाप येन भ्यधान्यन पेन ग्नम्मनकाधि पेनाफारि तमोनिकारि पनमनः रूपन्यार पेनार पियाम्पि पेनाग्निागिन्म: पोजपतगिरि ७ ६ १०७ १०६ ४६ २९ रूपा सरिसर ७२ १४८ २९ १० २९ ३ ७६.३ २३ ८ १ ९२ ८६ ६ १० ७२ ७ १७४ ११३ ९ ५ सुशतकौतिकटोलिनी आदि वस्तुपालप्रशस्तिसंग्रह ९ ४९ ५० १ ८२ १४ २ ९८ ५४ ५ ९८ ७ ११ २ ४९ ५ ३ ९ २८ १७ ७२ १०५ ३५ ९ ७६ ४२ १ १ विधा यद्याप वैदिकी २६ विघेते हधविद्या ५९ विधिवद् वाजपेयं २५ विबुधैः पयोधि ८ विभुता-विक्रम ३१ विमुता विक्रम १०१ विमलिहिं ठरियड ५३ विरचयति यस्तुपाल १०२ विस्तारा पार्श ७६-४ विलोक्य दुष्कालवशेन ९४ विशेषके खतरस्य विधस्मिन्नपि वस्तुपाल! २७ विश्वस्योपकृतित्रत ८५ सिवानन्दकर सदा ६२ विद्यानन्दकर. सदा १०१ विधेऽस्मिन् कस्य १०५ विधेऽस्मिन् रिट बार दक्षिणतः २८ वीरश्रीवीरभाग्नि ८८ वेय वनल ३७ वैदुर्य विगनाप्रये ७६.३ वैर विनि-भार यो ८५ व्यजयन जयसिंह ३० व्यानरोन्य(पन्य) व्याजात पोपरालाला व्यातन्वानमंन्द्र ९८ पोमोफर मो भगवागतानि पति काशिन पहिलीत भारसी ५८ रासबरणच निगः प्रशमतेषु चंदे सरस्वती वंदाश्रीमौलि भिन्लं वोऽयं प्रथितोन्नति बंगो विश्वनितयविदितः वइसाही पुनिमह वन निर्वासनाना वनइए तार वदनं वस्तुपालस्य दरदे कन्पवन्ति। वर्षीयान् परिशत चलभ्यां पुण्यटन्यत्री बसिरानिटाया वसुदेवस्येव मुन यसपालि वर चलपाल तमु वस्नुपानिकारण चयापचे जगयां माग्देवतां यदि पारदरताचरण আমাৰ वाग्देवतावमानस्य वाग्देवीप्रसाद वाजधानिनवाधि या नाय पारिता समापन पानांनुसनश्य पग्न परालय भदाय ननून पहनन मानन रिसोय ७ १२ ९७ १ २ ९९ ८६ ३ १६ ए ४ १ Ya ર पद्यानुक्रमणिका । १२३ लो. पृ. ४७ ३ ૨ ६४ १७ श्रीनेमेत्रिजगर्नु २७ श्रीनेमेनिजगद्भर्तु १५ श्रीनेमेनिजगद्भर्तु ६१ श्रीप्राग्वाटकुलेऽत्र ८८ श्रीमन्त्रीश्वरवस्तुपाल ७९ श्रीमदगुर्जरचक्रवर्ति ७६-२ श्रीमन्त्रीश्वरवस्तुपाल ९६ श्रीमन्त्रीश्वरवस्तुपाल ३० श्रीमल्लदेव इति ४२ श्रीमल्लदेवः श्रित श्रीमल्लदेवपौत्रो श्रीमद्विजयसेनस्य श्रीमांस्ततोऽजनि श्रीमालवेन्द्रमुमटेन श्रीमुञ्जनामा ९८ ३२ ५२ २ २५ १० ४९ १० १० १२ ५ ४० ५९ ७६-२ ७९ ८८ १७५ १३ ग्लो शङ्ख शाहपरस्य बघुन्नयनगोसहे शत्रुनये मवपयोधि १६५ शत्रुश्रेणीगल शास्त्रार्थवारिमर ६ शिन्यस्तस्य च १३ गतांशुप्रतिवीर १२ शुभांगुर्भुवि शून्येषु द्विपतां पुरेपु रो रणेषु १३ शेपद्वेषविधायिनीमपि शोमामिमूत १ शोषः सैप जवाद ४६ शौण्डीरोऽपि २ शौर्यगोरिचतां यावे हंडावडा श्रियं चौलस्यानां १३ श्रिया प्रीतया श्रीकुमारविहारेइन श्रीक्षेमराज इति १८ श्रीगप्मिमि श्रीमापासमयः ६२ श्रीजनशासनयनी प्रतिजपालननयस्य ५६ श्रीद-श्रीदयिनैघर २ श्रीमराजः प्रथम ३३ श्रीनागेन्द्रमुनीन्द्र श्रीनागेन्द्रयुले धनाय! मनोरथाः २ मिनरनी प्रतमम्पिकायाप দিলাম ३ ८२ २६ १०७ श्रीयुगादिप्रमोर् २५ श्रीरामश ९ ७६-२ ७ ९८ ०९ २२ श्रीरवते निर्मित श्रीवर्धमानः शमिनां श्रीवस्तुपाल ! कलिकाल श्रीवस्नुपाल ! कलिकाल श्रीवस्तुपाल 1 क्षितिपालमुद्रा श्रीवलुपाल! जितवाल श्रीवस्तुपाल ! तव श्रीवस्तुपालपुत्रः श्रीवस्तुपाल ! भवता २८ ४१ २० ४२ ३९ ६४ ६४ ६३ ७० ७६ १६ ३ ७६-३ ग्रीवस्नुपान्टन्त्रीदोर् ३५ ३३ ७६-१ २० १ वस्नुपालयसा श्रीवस्तुपाल संप्रति श्रीवस्नुपालसचिवस्य श्रीपस्नुहाउसचिवस्य रस्तुमाउसचिवम्य श्रीवानुशासचिवस्य ३ ८ ૨૨ ७६-२ १२४ सुकृतकीर्तिकल्लोलिनी-आदि वस्तुपालप्रशस्तिसंग्रह श्लो श्लो० १८ २० ३२ ४१ १ ३ १३ १४७ ३९ २७ २ ४८ ८३ ५९ १० २९ ८६ ८९ ८२ ८२ ८२ श्रीवस्तुपालस्य श्रीवस्तुपालस्य श्रीवाससमकर श्रीवासाम्बुजमानन श्रीवीरधवलमूर्तिर् श्रीवीरशासन श्रीवैद्यनाथगर्भ श्रावैद्यनाथवरवेश्मनि श्रीगुञ्जयशृङ्ग श्रीशनुञ्जयशैल श्रीसभर्तृसचिवे श्रीमुक्तपदाम्भोज श्रीसोमेश्वरदेवश् श्रीसोमेश्वरदेवस्य श्रीसोलशर्मा विमले श्रुचेति मुदितहृदय श्रेय श्रीमुनिसुव्रत श्रेय श्रेष्वशिष्ठ लाध्य स वीरधवल श्वभ्र सिन्धुरमुग्नया संघाहिवु संघेण संघु रहिउ संजज्ञे नृपतिशतै सताप यप्रतापस्य संदिष्ट तव वस्तुपाल! समेतादिशिर संयोजितन मणिमण्डित सर्स नानामनुतटवन संसारन्यवहारतो संसारसर्वस्वमिहर संसारानितपो १५ १८ ११९ २८ स एप नि शेप समाम क्रतुभूमि ८९ सड्यामसिंहपृतना १८ सदस्याद्भुत २६ सहोऽधिरोहनिह ७९ सचिवप्रवर कञ्चित् २६ सत्कर्मनिर्मागरते २६ सत्तीर्थस्य सुराश्रितेन सय ब्रुवे ९० सयाभिधस्तदनुजो सदा यदाशी ३९ सदशजातेन सन्तापशान्ति सप्ततन्तुप्रपञ्चेन ८१ सप्तलोकचरी १० स मगल वो ३४ समजनि जिनसेवा समुद्दविजय सिवदेवि ३२ समूलमु मूलयितु ३ सम्पूर्णे भुवने १०१ सयल वित्ति १०७ सरस्वतीकेलिकला ५ सर्वत्र भ्रान्तिमती ६ सर्वत्र वर्तता कीर्ति ४९ सव श्रेय शगुञ्जय स येण्ट कुण्ठ १३ स श्रीजिनाधिपति स श्रीजिनाधिपति ९१ स श्रीमानुदयाचलो ६७ स श्रीतेजपाल ९३ स श्रीतेज पाल सा नापि युगयी साक्षात् अदा परं ३७ २४ १ ३२ ८ १ १०१ १३ २ ३२ १०१ २४ ३८ ३ ४३ १२ २५ २५ ५० २ ६८ १४३ २२ ७३ ५ १ ३ १०३ संसार मुम्बस्नु ६२ संतूयमाचरित २४ ५ 'पद्यानुक्रमणिका । १२५ पृ० ग्लो १२० पृ. १० १२ ८ -९८ ८२ ४६ १ ४ १ ७ १ २१ २ om ५७ स्तम्मनपुर-रैवतगिरि १६४ ৩৩ ४६ २७ ३ १३ ५२ २८ ९४ १० लो० साक्षात् ब्रह्म पर १२ सानिधि अंबाझ्य ३५ सामंतसिंहसमिति ३८ सामियनेमिकुमार सामियसामल साम्रान्यं चतुरर्णवी सिंदुवार-मंदार सिद्रक्षेत्रमिति सिद्धान्तोपनिष सीसमि सिंबलि सीताकुक्षिसरो मुतस्तस्मादासीन मुमकर ए ठविउ मुरलीगां ने मुद्रतक्रमनमस्कृति सूनुस्तदीयोऽजनि सूनुस्तयोरजनि सूरो रणेषु सूर्याचन्दमसी सेच सेच स खल सेनानार्विदधे सेयं पुरे धवलके २१ सेगलन्ति पयः समुद्रति सेवालन्ति पयः समुद्रति सैन्यप्राम्पितधरा सोऽपि चले सोमनदेउ सुतहारो सोमाभिवस्तदनुजः सोमेश्वरदेव इति सोमेश्वरदेवावे ४७ १ सोऽयं प्रख्यातकीर्तिः १०७ सोऽयं मन्त्री ૬૨ सोऽयं सूहवदेवी १०० सोलः सलील १०१ स्तम्मतीर्थेऽत्र स्तम्मतीर्थेऽत्र १०२ स्तम्भतीर्थऽत्र स्तम्भतीर्थेब स्तम्भतीर्थे नगोत्तुङ्गे ९९ स्तोतव्यः खल ६० स्तोतुं नामिनरेन्द्र १०२ स्तोत्रं श्रोत्ररसायन स्थाने स्थाने ३८ स्थापयन् सिंहुलग्राम २४ स्फूर्जद्गुर्जरवेस्म ८९ १७ स्वमुलगुरु...... स्वफ्रान्तसिन्धुपति २ स्वच्छन्द हरिशङ्करः स्वस्ति श्रीवलये ८४ स्वस्ति श्रीनलये स्वस्ति श्रीवल्लिसालाय स्वस्ति श्रीवस्तुपालाय स्वस्ति श्रीव्योमदेशा स्वयं विननेषु परेषु स्वर्ग यद्गुरुय स्ववंश्यमूर्तिभिः ८५ स्वविरोधिनी शुचिर् स्वतीयः श्रयति स्म ५७ स्वामिन् ! मृत्युहरे स्वैर भ्राम्यतु नाम स्वैरव प्रहतैर् २७ २६ २ ७६-३ ३ २१ १ १४ १८ २४ ६ १२ १ १० ३४ ८० ३० ४ १ ४० ८ ७४ ३९ ३ १२ ३० १२ ४२ ८८ ५१ २३ २८ २७ २ ९१ ३२ ८५ ४४ सोऽयं तस्य ६ ४० सोऽय धात्री सोऽयं पुनर्दाशरथिः १२६ सुकतकीतिकलोलिनी-आदि वस्तुपालमशस्तिसंग्रह लो पृ० श्लोक पृ० २६ ११ २० ११७ ८८ हो रोहण ! रोहति हकारहु घर हत्वाऽपि कान्तिलय हन्तुं जनस्य दुरित हरसवसिण हरिमण्डप-नन्दीश्वर हरिमण्डप-गन्दीश्वर ३२ हरिमण्डप-नन्दीश्वर १०७ हयांदसौ हसतु हस्ताप्रत्यरत हस्तानन्यस्त हुल्वा सदध्वरचितेषु ५ इतनयनसुखैर् ४७ हटोऽभून्मुशलप्वज ९४ ८ २ ८९ ८१ ३ ५ मुकृतकीर्तिकल्लोलिनी-श्रादि वस्तुपालप्रशस्तिसंग्रह । विशेपनामानुक्रमणिका । १०१ अर्बुद " " पृट यंचय (मंत्री) १०० अम्बिका भवन (देवनामन्दिर) मह (नृपविशेष) ५ अरसीह (प्रामाट ना० महा० वीरदेवसुन) अचलेश्वर (शिवमदिर) ६७ अर्कपालित (ग्राम) अचलेसर (अचथर, शिवमन्दिर) १०४ वर्कपालितक २७,३८ अजयपाल (चौद्धक्यनृपति) ६,२५,३६,८८ अर्जुनमही ( स्थलविगेष) ६ अजयसिंह योराज (सपादलमपनि) अजित (सपाधिपति) २०१ योराज (चौलुक्यवीय) ६७२५,३६,६० यजिय (अजित, संघाधिपति) (पर्वत) ६१,६२,६७ सहायय (अद्यापटपान) १०१,२०२ अर्युदगिरि ७६-२ यणपमसर (अनुपमा सरोवर) १०५ अर्बुदाचल २६,४४,४६,४८,५१,५४,५६, अणहिलपत्तन (अणहिलपुर, गूर्जर राजधानी) ७५ ६५, ६७,६८,७२,७३,७६-२ सणदिलपाटक (अहिलपुर, अवलोकनाशिखर (रवतगिरि शिन्वरविक्षेप) २८, गूर्जर राजधानी) ८८,९६ ४४,४६,४८,५१,५४,५६ १०२ अणहिलपुर (गूर्जर राजधानी) ४१,४६,४८,५१,५३, अवलोयणसिहर (अवलोकनाशिवर) सभ्यराज (आशाराज, मत्री) १०१८,२१,३७, ५७,५९,६०६४, ७५, ७६-१, ७६-३ ७६-२,८६,८२ अहिल्लपुर ( अहिलपुर) ६८,६९ अध्यायतारतीय अनुपमदेवी (तेजपालपत्नी) २८,६३,६५,७१, यष्टापदनासाट (स्थापन्यविशेष) ७१,७६-२,७६-२ अनुपम सरोवर यष्टापद महातीर्थ (स्यलविशेष) अनुपमा (अनुपमदेवी, तेजपालपानी) ६३ अष्टापदशैल (पर्वत) यनुपमासर (सरोवर) २८ मापदोद्धार (जिनमन्दिर) २७ सन्ध्र (नृपविशेष) ५ अमगज (यश्वराज) समयकुमार (माहु राहामुन) ६९ अहणादेवि (पूर्णसिंहपरनी) अमरहि (नागेन्द्रगच्छीय) २९,४५,४६,४८, आंमिग (प्राग्वाटज्ञा० महाजन ) ५१,५४,५०,६४ मांयुय (प्रा० मा० .) ६७ १३,६५,७६-३, आखण्डलमण्डप (इन्द्रमण्डप) ૨૮ ७२,९० यास्त्रीग्राम अमरेन्द्र मण्डप (इन्द्रमण्डप, स्थापत्यविशेष) १५ थामिग (विद्वान्) ८३ २७ आणंदHि (नागेन्द्रगन्टीय आनन्दमूरि) ४५४८, (महामन्त्री) (मण्डलेवर) ३९ यानंदसूरि (आगदरि) २०,४६,६५, ययाशियर (तनगिरि शिमरविशेष) ४४,४६,४८, ७६-३,७२ ५१,५४,५६ आनन्दयन्द्रसरि , अमरचन्द्ररि सम्पढ (राणक) सुस्तकीतिकल्लोलिनो-आदि वस्तुपालप्रशस्तिसंग्रह " " ७४ पृष्ठ थानक (कायस्थ) ४७.५० इन्द्रमण्डप (स्थापत्यविशेष) १५,१९,३८,१०२ आयु ( अर्बुद पर्यंत) १०५,१०६,१०८ उग्गसेणगढ (दुविशेष) आयुय १८५,१०६,१०७ उजयन्त (स्थत पर्वत) ३८,४४,४५,४६,४८, आबू १०४,१०५ ५१,५३,०४,५६,६८ आबूय उजित (उजयन्त पर्वत) आबुयप्राम ६७ उजिल (उज्जयन्त पर्वत आमशर्मा (विद्वान्) ८२ उत्तरछनाम ६७ शाम्चदेव (ओइसवाल ज्ञा० ०, नागदेवपुत्र) ६७ उदयन ( ममी) आम्बसिंह (प्रारबाट पुर) ६५ उदयपाल (प्रा० ० महा., पारहणपुत्र) आम्या (प्राग्लाट ० ०, कोलापुन) ६६ उदयप्रभसूरि (नागेन्द्रगच्छीय) १६,४३ ५७, आम्वुय (श्रीमाल शा..) ६४,६६-३,७९ थारासण (ग्राम। १०६ उदयसेनसूरि ( आचार्य) आल्हण (प्राबाट श्रेष्ठी माणिमदपुत्र) ६६ उदुल (टकुर) २०५ आल्हण (ओइसवालज्ञा. थे., देल्हापुत्र) ६७ उदेयपाल (श्रेष्टी) आल्हण (भाण्डागारिक) ७६-३ उपदेशमाला (ग्रन्थ भालणदेवि ( पूर्णसिंहपत्नी) ७०,७६,७६-२ उमारशय्य (प्राम) २७ आल्हा (भाबाट ज्ञा० अंक, गोसलपुत्र) ६६ उयरणी (प्राम) याल्दा (प्रा० शा० ०, देल्हणपुन) ६७ ऊपसवाल (जाति) आवोधन (ओइमवाल शा० महा.) ६६ अजिल (उज्जयन्त पर्वत) १०२ গাবাল ९,२५,२८ ऊदल (मायार, ठकुर) मन्त्री पुर) ५४,४६,४८,५१,५३, ऊदल (ठकुर) १०५,१०६ ७६३७५-४,७७,९७ आश्वेश्चर (प्रा. ज्ञा० ५०. सोहियपुत्र ) ऊदरणी(प्राम) भासचंद्र (धर्फट ज्ञा०, पउलिगात्र) ६६,६७ भासदेव (ओइसगाल शा० श्र०, देवकुयारपुत्र) ६६ करडिजक्ख (कपर्दा यक्ष ) आसधर (श्रीमाल शा००) १०१ कटुकेश्वर (शिरमन्दिर) ८४ आसधर (प्रा.हा- ०, रासलपुत्र) आसपाल (श्रेष्ठी) कडया (प्रा० ज्ञा० श्रे०, लखमणपुत्र) यासरा (आसराज) कनकप्रभत्रि (आचार्य) आसराज (यपुर, आगाराज) ६५७२,७३,७४,७५ आसल (श्रीमाल शा० थ.) कयदुरा (श्रीमाल हा०) (प्रा. शा. धे) कर्णदेव (चौतुक्यनृपति) ४,२४,३५,८२ " (श्रीमार हा ग्रंक) कर्णाट (नाविशेष) (ओइस ज्ञा०, कात्हणपुत्र) कलिङ्ग (नृपविशेष) ६७ भासा (कुर मोटज्ञातीय झाल्दणमुत) कश्मीरावतार (स्थापत्यविशेष) ७४ ४४,४६,४८ ५९,५४,५६ याप्ताराय (आशाराज) कसमीर (देश) थासारायविहार (जिनमन्दिर) ५९ कान्तीश्वर (उपविशेष) ३ आस् । श्रीमाल ज्ञा. श्रे०. लयमणपुत्र) ६६ कान्यकुब्जा (नौविशेष) भाइड (चापोत्कट नृप) कान्हड (टवुर, ललितादेवी पिता ) ४५,४६४८,५१, माइंड (विदान) ५४,५५,५६,७५७६२, ऊरल्ल (उपुर) ६६ ओइसवाल ( ज्ञाति) ६६ ओरासा (ग्राम) ६७ ८० ६९,७०,७१ ७६-१ कपर्दी (यक्ष) ५ २ विशेषनामानुफमणिका। " पृष्ट पृट कान्हडदेव (राजकुमार) ६७ सोम्यसीह (प्रा० मा, देहपात्र) ६६ कानंदकि(नीतिशानकार) ६३ सेटा (साहु, यरहुटिया) कायस्थ (वा) ४६,४७,५०,५३५५५७,७६-३,९६ गउरदेवि (दणसीहगता) ७२ फालमेघ (क्षेत्रपाल) गड्डा (नरी) ८४ फालमेघतर (स्थानविशेष) १०० गयंद (युद्ध) १०२ कालिदास (कवि) २० गया (तीर्थ ) फाल्हण (ओइमवालमा अं.) ६७ गागा (प्रामाटाशीय) ६३ कासहद (प्राम) २७.६६ (प्रा. शा• ठपुर) कीर (पविशेष) ३६ गाजण (श्रीमाल शा.) ६६ फीसरउली (प्राम) ६६ गाणउलि (ग्राम) ७६-३ फुरण (देश) ३६ गाणेश्वरदेव (शिवमदिर) ७६.३ कुमरादिधि (कुमारदेवी आशाराजपनी) १०७ गिरनार पर्वत) ९९,१००,२०२ कुमरपाल (बुमारपाल, राजा) गुजर (देश) पुमरविहार (जिनमदिर) ६८ गुणचंद्र (प्रा. शा. ., धीरणपुत्र । कुमरसरोवर (श्रीमाल शा. अं.) फुमरसिद (सूत्रधार) ७६-३ गुणपाल (भाण्टागारिक) ७६-३ कुमार (कुमारशमा, विद्वान् ) ८३.८४,८५.८७ गुरजर (देश) कुमार देवी ( अदाणी, आशाराज परनी) ४४, गुर्जरेभ्यर पुरोहित (सोमेश्वरदेव ) २५,३७ गुर्जर ( देश) ७६-१८२८७ ४६,४८५१,५३,५५.५९ गुलेचा गोत्रविशेष) ६५.७२,७३,७४,७५, ७६-२,७६-३,७६४,८९ १०४,१०६ फुमारपालदेव (चौउययनृपति) ५,६,२५,३६, गूजर (देश) १०४ फुमारविहार (जिनमन्दिर) २७६९ गुजरात (देश) १०४ कुमारसिंह ( सूत्रधार) ४६,५५,५८ गूर्जर (देश) गूर्जरकणिका (गूर्जर राजधानी) फुरु (पविशेष) फुलधर (श्रीमाल ज्ञा., क्यडुरापुन) ६६ [गूर्ज स्ना (महल) कृष्णराज (परमार नृपति) केली (आशाराज भगिनी) ७६-२ गूर्जरराजधानी (अणहिल पाटक) कल्हण (सूनधार) गोगस्थान (ग्राम) कोङ्गण (देदा) ६१ गोसल (प्रा० ज्ञा० ०) कोला (ग्राबाट ज्ञा० ० ) ६६ (ओइस० ज्ञा० ) कौडण (उदणपति नृप) (साहु वरहुडिया) कोकणपति (नृपविशेष) गौड (नृपरिगेप) कोणी (स्त्रीविशेष) चंडप (मत्री) ८,२१,२५,२८,३७,३९,४० कौटिल्य (चाणक्य) चंडप (मत्री, ठकुर) ४४,५९, ६४, ६५,६९,७०, क्षेमराज (चापोत्कट नृप) २ ७२,७२,७३,७४,६५,७६-१, संभायति (नगरी) ७६-३,७६-४, ८६,८८,९७ १०६ खांसण (प्रा. शा. ३०, जेजापुन) ६६ चंडपाल (चडप) ४६,४८,५१,५३५५ सीम्यसिंह (प्रा. शा. टकुर) चडप्रसाद (मनी, चापपुन) ८,२१,२५,२८,३७ गूगुलिया} (ज्ञातिविशेष) २२,३७,६२,८८,८२,९०,९२,९४ ६२ गूर्जरमडल ४४,४६५१,५४५६ ८४ " ६ ६ १३० सुरुतकीतिकल्लोलिनी-आदि वस्तुपालप्रशस्तिसंग्रह ८० " पृष्ठ चंद्रप्रसाद (मत्री, ठकुर) ५४,४६,४८,५१,५३, जयसिंहदेव (चौलुक्यपति) ४,२४,३५ ५६,५९,६४,६५,६९७०,७१, जयसिंहहि (वधि, जैनाचार्य) ३८,३९ ७२,७३,७४,७५,७६, ७६-१, जयादित्य (पविशेष) ७६-३, ७६४,८६,८८,९७ जसकर (प्रा. शा. श्रे.) ६७ चंडेश (चप) जसहुय (प्रा० शा. श्रे.) चडेश्वर (सूत्रधार) ६५ जसदेव (ओइसवाल ज्ञा० अं०) ६७ चंद्रावती (पुर, पुरी, नगरी) ७,६३,६५६७, जसरा (श्रीमाल ज्ञा. श्र०, आम्बुयपुर) १०४, १०५ जसवीर (प्राम्बाट ज्ञा. श्रे.) चडालि (चन्द्रावती नगरी) १०८ जागल (देश) चाणक्य (कौटिल्य) ६२,६३ जाहली (स्त्रीविशेष ) ६ चान्द्र कुल (गच्छ) जाला (श्रीमाल शा. घे०, जिणदेतपुर) ६६ चापलदेवी ( मह, चइपपत्नी) ७४ जाहू ( वस्तुपाल तेजपालभगिनी) चापोत्कट (राजवश ) २ जायडि (प्रामाटवशीय । चामुण्डराज (चापोत्स्ट नृप) २ लावालिपुर ६८६९ चामुण्डराज (चौलुस्मन्पति) ३,२४,३४,८२ जिणचंद्र ( साहु राहडपुत्र) चारोप (ग्राम) ६९ जिणदेव (श्रीमाल ज्ञा. श्रे.) चाहिणि (साहु जिणचद्रभार्या) ६९ (प्रा० शा. श्रे०, पाहुयपुर) ६७ चुलुक्य (चौलुक्य, राजवंश ) २४.३६,५९,६०,६५, जिणदेवसूरि (आचार्य) ७६-४,८३,८४,९३, जींदा (पारवाट श्रेष्ठो । चौड (नृपनिशेष) ५ जेगण (प्रा० शा• J०, जसड्डयपुर ) चौलुस्य । राजवश) २६२५३४,४४,४५,४६,४८ नेजा (प्रा. ज्ञाश्रे०) ५१,५३,५६,६० ६१,६४,६५, जैत्रदेवी (वीरधवलपत्नी) ८२,८३९७ जैत्रसिंह (जयत्तसिंह, वस्तुपालपुत्र ) ५५,५७,६२,६४, चौलुक्यपुर (अणहिरपुर) २६ ७६-२,९८ जगदेव (श्रीमाल ज्ञा• श्र०, आसलपुर) (ध्रुव, कायस्थ) ४६,५३,५५,५७,७६-३. जगसीह (प्राग्वाट, ठकुर) ६५ जोगा (मह, ओइसवाल ज्ञाश्रे०, सलयणपुन) ६६ (ओइस • शा० महा०, आवोधनपुत्र) ६६ झालहणदेवी (वस्तुपाल-तेजपाल्भगिनी) ७२ उगवार ० ५० , जनावरपुर), ६६ सदण (कुर, भेटशारीत्य, जगल (नृपविशेष) ६ उफउवाणि (प्राम) १०७ जयंतसिंह ( वस्नुपाल्पुन) डवाणि (ग्राम) १०७ ५६,६२ उधाणी (ग्राम) ६६,६७ (कायस्थ) तारंगक (पर्वत) जयतलदेवी (वीरधवलपानी) तारणगढ़ ६८ (जयतसिंहमारी) ७२,७४ तिजपाल (तेजपाल) १०५,१०६,१०७ जयतसिंह (मह, वस्तुपारपुत्र) ४४५५,७४,७६-३ तिष्टुणदेवि (राणी, धरणिगभार्या) (हभपुरीय, ध्रुव) ४७५० नुरष्क (नृपविशेष) ३ जयतसीह (मह, वस्नुराल्गुन) ६९,७० तुरुक (नृपविशेष) ६ जयदेव (साहु, बरहुडिया) ६८ तेजःपाल (मत्री, आशाराजपुत्र) १०,१३ १४२१, जयथी (चडग्रमादपानी) ८१७६-१,८८ २५,२८,३१,३२, जयसिंघ (चौरक्यनपति) ३७,३८,३९ " "" " ७५ विशेषनामानुकमणिका । घणपाल (ओइस० मा० ०, महधरापुत्र) ६७ ९९ धरणिग (प्रामाट, गागामुत) २ " ६६ धर्माभ्युदय ( ६ " १५८०,९९ ४४,४६,४८,५१,५४,५६ पृष्ठ तेजपाल (मह) ४४,४५,४६,४७,४८,४९५१,५३, धणदेव (श्रीमाल शा• श्रे०, सूमिपुत्र) ५४, ५५ ५६.५७ ६०,६२,६३,६४, घणदेयी (वस्नुपाल-तेजपालभगिनी) ६५६७,७२,७३,७४,७५५७६,७६-१, धनदेवी ७६२,७६३, ८६,९०, ९६, ९७ तेजपाल (महामात्य, मह) ६८,६९,७०,७१७९.९६, धणिया (प्रा० ज्ञाश्रे०, जमकरपुत्र) ९९, १०१, १०५ १०७ घणेश्वर (साहु राहडमुत) तेजलपुर (ग्राम) त्रिपुरुषप्रासाद (शिवमदिर) (प्रा० ज्ञा०, ठकुर) त्रिभुवनदेवी (प्राग्वाट, धरणिगपत्नी) ६३ धर्कट (ज्ञाति) त्रिभुवनपाल ( अश्वराजभ्राता) ७६२ धर्मदासगणी ( आचार्य) थिरदेव (श्रीमाल ज्ञा० श्र०) (महाकाव्य) दक्षिण (नृपविशेष) धवल (चौलुक्यवशीय ) दर्भवती (नगरी। १६,२६४४,४६,४८,५४,५१,५६ (मनी) दाक्षिणात्या (सीविशेष) ६ धवलक (नगर) दामोदरहद (स्थानविशेष) घवलक दुर्लभ (चौलुस्यनृपति) ३,२४,३५,८२ घयलकक " दुगसरण (प्रा० शा०) घांधल (सूत्रधार) उलवाडा (ग्राम) ६५,६७ धांधा (लएस. ज्ञा• महा.) देदा (श्रीमाल ना. श्रे.) ६६ धांवलदिघि (घावलदेवी, सोमनरेन्द्रमाता) १०५ देपाल (मनी) १०२ धावलदेवि देल्हण (प्रा० शा० अं०) ६६,६७ धारा (भाण्डागारिक) (ओइस० झा. श्रे०, सीललपुन) (नगरी) देल्हा (ओइस० ज्ञा० अं०) धारावर्ष (परमार नृपति) देल्हुय (प्रा. ज्ञा० अं०, सातुयपुर) धीरण (प्रा. ज्ञा. श्रे.) देवांयार (ओइस ज्ञा० |.) धृवभट (परमारवशीय गृपति) देवकुमार (साहु जयदेवपुत्र) धूमराज (परमारवशीय नृपति) देवचद्ग ( साहु जिणचद्पुन) देवधर (श्रीमाल ज्ञा० श्र०, गुणचद्रपुत्र) ६६ नदीश्वर (स्थापत्यविशेष) नंदीसर। देवप्रमसूरि (हपंपुरगन्छीय आचार्य) देवयोघ (विद्वान् ) नगर (मृद्धनगर, स्थानविशेष) देवलबाट (ग्राम) १०६,१०७ नगरवर (महास्थान) देवानन्दसरि (आचार्य, हर्षपुरगन्छीय) २९,८० देसल (प्रा. ज्ञा००) ६७ नयचन्द्रसूरि (कृष्णपिंगच्छीय) देसीनाममाला (प्रथ) ९६ नरचन्द्रसूरि (हर्षपुरगच्छीय) (मरधारी) धंधुक (परमारवशीय नृपति) धंधूय नरनारायणानन्द (काव्य) धुंधुय १०७ नरेन्द्रसरि धलिग (धट ज्ञा०) घउली (ग्राम) ६६ नागदेव (भोइस• ज्ञा० थे.) घणचंद्र (प्राबाट शा. श्रे.) नागपुर ६७ " २८,१७ ६८ " २९ ७२ नगरारय " ६७ २९ " ६६ नरेन्द्रप्रभरि । मलधारी) ६७ १३२ सुकृतकोतिकलोलिनी-आदि वस्तुपालप्रशस्तिसंग्रह पृष्ट ६७ . १०२ नसीह ७० ६३ ७७ नागेन्द्रगच्छ १३,२९,४५,४६,४८,५१,५४५६५७, पाहुय (प्रा. ज्ञा० अं० ) ६४,६५ ६९,७२,७५,७६३, ७९ ९० प्राग्वाट कुल, वश ) ८,१५२१,२५,३७,३८,४४,४५, नायलगच्छ (नागेन्द्रगच्छ) निरिन्द्रग्राम २६ ५९,६३, ६५,६६६७,६९७०, नृपविक्रम संवत् ६९,७०७१,७३,७६-२ ७१,७२,७३,७५ ७६ ७६-१, नेमड (साहु, वरहुडिया) ७६-३,७६-४, ८६ ८८.९७ नेहा (धर्कट श्रष्ठी) ६६ पुंडरीक ( पर्वत, शगुंजय) ६७ पजून्न ( प्रद्युम्नशिसर) पञ्चासर (जिनमदिर) २,१५,२६ पुण्यसिंह ५७,७६-२ पत्तन (अणहिलपुर) ६९,७४,७५,७६,७६-४ पूर्णसिंह पूनसीह | (महदेवसुत) पद्मला ( वस्तुपाल-तेजपालभगिनी) ७३ पुस्पोत्तम (सूत्रधार) ४७५०,५३ पद्मसिंह (प्रा. ज्ञा० अ०, वालापुत्र) ६७ पूनचंद्र (प्राग्बाट ज्ञा० श्रे०, पासचद्रपुर) परमलदेवी (वस्तुपाल तेरपालभगिनी) पूनड (प्राग्वाट ज्ञा० महाजनी, आमिगपुन) परमार (राजवंश) ६१ पूनदेव (प्रा० ज्ञा० धे०, वोसरिपुत्र) ६७ प्रतापदेवी (मालदेवपत्नी) ७४ पूनदेवी (मह, वस्तुपाल तेजपालमातुलभार्या) ७३ प्रतापमल्ल (राजपुरुप) ८४ प्रतापसिंह (जयतसिंहपुन, वस्तुपालपौत्र) २७,२८,९८ पूना (प्राग्माट ज्ञा० ) पूनपाल (मह, वस्तुपाल तेजपालमातुल) ७३ ६६ प्रतीहार (राजवश) प्रद्युम्नशिखर (रैवतगिरि शिसरविशेप)२८,४४,४६, " (श्रीमाल ज्ञा.) ६६ (प्रा० ज्ञा० ० वोहडिपुत्र) ६६ ४८,५१,५४,५६ (अष्ठी) ७६-३ प्रद्युम्नसूरी (आचार्य) ८० पूनिग (ओइस० ज्ञा० अं०) प्रमार (राजाश) ६७,१०५ पूनुय (प्रा० ज्ञा०, पासिलपुत्र) प्रयाग (तीर्थस्थान) ८१,८४ पृथ्वीसिंह (पूर्णसिंहपुत्र) प्रदादन (परमार नृपति) ६२ पेथड (पण्डित, कुमारशर्मगुरु) ६३,७१,७६ ८६ पोस्याड (वश) प्रहादनपुर (पारणपुर) पाण्ड्य (नृपविशेष) ३ धकुलस्वामी (सूत्रधार) ४७,५०,५३ पात् (मालदेवभार्या) यदरकूप (ग्राम) पादलितनगरी ५ पाल्हण (प्रा ज्ञा० ०, जीदापुर) ६६ पलदेवि ( तेजपालपुत्री) (सएस. झाअंक, सोहिपुत्र) व धोलाल (मालवनृपति) (प्रा. शा• महा.) ब्रह्मदेव (प्राग्वाट झा.) १०८ ब्रह्मसंति (ब्रह्मशान्ति यक्ष) पाल्दविहार (जिनमदिर) ब्रह्मसरणु (प्रा. ज्ञा० ., देसलपुत्र) पाल्दा (प्रा. शा. |., धीरणपुत्र) ब्रह्माण (प्राम) पासचंद्र (प्रामाट शा. प्र.) याण (कर) पासदेय (धमाल झा• महा., बीसरपुत्र) ६६ योटि (प्रा० शा० अंक, आयुयपुत्र) पासयार (प्रा. डा. श्र., साजगपुत्र) ६६ भदयाहु (आराय) ७९ पासिल (प्रा.शा.) ६६ माडा (ग्राम) पासु (पाट धेशी) मामा (तपारमातुर गुन) " ७३-२ ६८ फीलिणी (ग्राम) ३८ वर (दैत्य) २७ . " " ७१ " " १०८ ६७ ६६ २० ६७ ७३ ३ " " "" ८२,८३,८९ २७ २७ (चौलुक्यनृपति. द्वितीय) ६.२४,३०र 3 राणु (ठकुराणी, ललितादेवी मादा) ४५४०३८ रामचंद्र (प्रारबाट ज्ञा० ५०, पणचार) ६६ रामदेव (परमारवशीय नृपति) विशेषनामानुक्रमणिका । ४ मालि (ग्राम) मालयपति (नृपविशेष) भापड ( साधु) १०१ मालवभूप (नृपविशेष) ३ मास (कवि) ५२ मालवी (स्त्रीविशेष) ६ भीम (चौलुस्यनृपति, प्रथम) ३,२४,३५,८२ मालवेन्द्र (नृपविशेप) द्वितीय) ६२४३६,३७,६५, (गुभट नृप) ८५,९० मुंज (नृपति, धाराधीश) भीम (पल्लीपति) ( विद्वान्) भीमसिंह ( मुराष्ट्रापतिनृपति) १३ मुंडस्थल (प्राम, महातीर्थ) भीमेश्वर (शिवमन्दिर) मुनीन्दुप्रभु (मुनिचन्द्रमूरि, हर्षपुरगच्छीय) भुवनपाल (नृपविशेष) मुमाकीय (पुरी) भूतेशवेदम (शिवमन्दिर) २७ मुरल (नृपविशेष) भूभट (चापोत्कटनृप) २ मूढेर (ग्राम) भृगुकच्छ (भृगुनगर, भृगुपुर) २७,९६ मूलराज (चौलुक्यपति, प्रथम) २,२४,३४८० भृगुनगर (भृगुकच्छ, भृगुपुर) २६ भृगुपुर (भृगुकच्छ, मृगुनगर ३८,४४,४६,४८, मेदपाट (नृपविशेष) (देश) भोज (नृपति, धाराधीश) ३५,४५ मोढ (ज्ञाति) भोला (प्रा. शा० श्रे०, साजनपुत्र ) यशोधयल (परमारवंशीय नृपति) (म]डाद्दड (ग्राम) यशोराज (नृपविशेष) . मयघर (श्रेष्ठी) योगराज (चापोत्कट नृप) मरु (नपविशेष) रतन (संघाधिपति) मलघारि (गच्छ) मालदेव (आशाराजपुत्र) १०, १६, २१, २५, २६,२७, रत्नादित्य (चापोत्कट नप). २८,३७,५७५९,६०,६३,६४ रत्नादेवी (जयादित्यदेवपरनी) ३ (मह. आशाराजपुत्र) ६५,७६-२ ८६, ८९, ९७ रयणादेवि (लूणसीहभार्या) महधरा (ओइस ज्ञा० अं०) राजदेव (भ्रष्टो) महाक (सं० पेथडमुत) ७६ राजपाल (तेजपालमातुलमुत) महादेव (विद्वान् , सोमेश्वरपुरोहित भ्राता) राजुय (प्रा० ज्ञा० श्रे०) महेन्द्रप्रभसूरि (नागेन्द्रगच्छीय) राठी (ज्ञातिविशेष) महेन्द्रप्रभु ७६-३,७९ राणभट्टारक महेन्द्ररि १३६४,६५ राणिग (प्रा० शा०, मह) (भट्टारक) ४५,४६,४८,५१,५४,५६ माउ } (वस्तुपाल-तेजपालभगिनी) २० माघ (कवि) माणिभद्र (प्रामाट श्रेष्ठी) ३८ मारव (नृपविशेष) राष्ट्रकूट (राजा) मालदेव (मह) ४४,४६,४८५१५३,५५,६९,७०, रासल (प्राबाट श्रेष्ठी) (ठपुर) ७१७२,७३,७४,७५,७६-१,७६.३ ६१,८३८४,१०१ मालय (देश) राहट (साहु, नेमपुत्र) (साहु) मालवनृप (नृपतिनिगेगा। ५ ४७५३,५५ रत्नसिंह (प्राग्वाट, ठकुर) १०४१ R " " ७२,६० माऊ राहा (प्रामाट सा, ब्रह्मदेवपुत्र) " १३४ सुशतकीर्तिकलोलिनी-आदि वस्तुपालप्रशस्तिसंग्रह " " " " २७ " " पृष्ठ रूपादेघि (जयसिहभा) ७० लूणवसहिका (जिनमदिर) (लावण्यसिंहभार्या) ७५ लूणसिंह (लावण्यसिंह, तेजपाल्गुन) रेवंत (रवत पर्वत) ९९१०२ लूणसीह ) ७१,७२.७६१,९६ रेवंद ( १०३ लूणसिंहयलहिका (जिनमदिर) ६५ रैवत (पर्वत) १५.७६-२,७७ लूणसीयसहिका ( ) ६७,७२,७३ रेवतक (.) २८.६७.९० लूणसीद ( मह, लोलासत) ६५. रेवतादि) १३ लूणादेवी (दणिगपत्नी) रोहडी (ग्राम) २७ लूणिग (लावण्याग, आशाराजपुत्र) २१,२५,५९ लक्ष्मी (कुमारनाम-पत्नी) ६४,७५,७६,७६-३,८९ Bংঘ २७ जिगदेव ( ) ७४ लखमण (श्रीमाल शा. श्रे.) ६६ क्षेला राजश) (प्रा. ज्ञा.) ६६ वह (नुपविशेष) ५ ललितसर (सरोवर) २७ घटसावित्रीसदन ( देवतामन्दिर ) ललितादेधी (स्तुपालानी) धनराज ( चापोत्क्ट) (मह, वस्तुपालपनी) २४,४५,४६४८ ययजुका ( वस्तुपाल-तेजपालभगिनी) ६०७३ वरदेव (कएभवाल शा. महा०, साटापुत्र) ६९,७४,७६२,७६४,९८ ६८ लल्लशमा (विद्वान् ) वरदुडिया (गोत्रविशेष) ८२ बलभी (नगरी) २७ लवणप्रसाद (चौलुक्यवशीय) ६.७,२५,६० (महाराजाधिराज) ४४,४५४६,४८, चलालदेवि (पूनसीहमुता) ७१ ५१,५३,५६ वलभराज (चौलुक्यपति) ३,२४,३५ (महामण्डले घर, राणक) ६५ पशिष्ट (ऋषि) लयसिंह (लारण्यसिंह, लूणसिंह, तेजपार पुत्र) ४५ घशिष्टकुंड ( भर्युदस्थित कुड) लपमादेषि ( लूपसीहभार्या) ७७ घसिष्ट (स्थानविशेष) ६७ लासप (ओइसवाल ज्ञा० ०, कोहिथपुत्र) (ऋषि) ८२ लाट (पविशेष) ५ वसिष्यटकुड (भदस्मिन बुड) लाटापली (प्राम) ६८,६९ घसन्तपाल ( वस्तुपाल) ९० लावण्यप्रसाद (समाद, चौकशीय) २६ यस्तपाल (दरनुमाल.) लापण्यसिह (शसिंह, तेजपारपुर) ५७ ६३,६४, यस्तुपाल (मत्री, आशाराजपुन) १०,१२,१४१५, ७५,७६२ १६,१७१८,१९,२०,२१, लावण्यांग (अणिग, आशाराजपुत्र) २२.२३,२५,२६,२८,२९, लापाराम (स्थानविशेष) १०० ३०, ३१, ३२ ३३,३७, लाहट (साहु राइडमुत) ३९,४०, ४१,४२,४३ लीला (प्राग्वाटशातीय महे) (महामात्य) ४४,४५,४६,४७,४८,४९,५०, लीलादेवी (मालदेवभार्या) ७४ टीलुका ६३ ५८,६०.६२.६३,६४ स्टीलू ७०,७६.२ ६५,६८,६९, ७२,७३,७४,७५७६, लुणिग (टमुर, लावण्याग) ५४,४६,४८.५१,५३,५५ ७६.१,७६२.७६ ३.७६-४,७७,७२, लुणसा (वप्रसाद चौटुक्य) ८६८७ ९०, ९१ ९२,९३,९५, राजपसाय (लवणप्रयाद, चौलुक्य) १०४ ९६,९७,९९, १००, १०५, १०७ लूणमसाद (लवणपाद, चौडस्य) ९७ वस्तुपालसर (सरोवर) 17 " " विशेषनामानुक्रमणिका। " " विक्रम संवत् पृष्ठ वस्त्रापथ (स्थानविशेष) १३,२८ घीजापुर ब्रांडा (ओइसवाल ज्ञा० ० गोसलपुत्र) ६७ धीर (वीरधवलराजा) ८० वहुदा (ओइसवाल ज्ञा, श्रे०, सीलणपुत्र) ६७ धीरदेव (प्राग्वाट ज्ञा• महा०) ६६ बहुदेव (धर्कट श्रेष्ठी) ६६ धीरदेव (साहु, जयदेवपुत्र) बाग्भट (महामंत्री) १५ थीरुय (श्रीमाल ज्ञा० श्रे० थिरदेवपुत्र) माया (ओइसवाल ज्ञा० धे०, पूनिगपुत्र) ६७ घीस्य (प्रा. ज्ञा००) वाजड (कायस्थ) ४६,४७,५१,५३,५५,५७ वीसल (श्रीमाल ज्ञा० महा.) वापल (श्रीमाल ज्ञा०) (श्रीमाल ज्ञा० ० देरापुन) घामलदेवी (मह, चंडप्रसादपत्नी) ७४ वीसलदेव (नपति) घालण (कएरावाल ज्ञा० ३०, सलसणपुत्र) ६६ घेजलदेवी (वस्तुपालपत्नी) ७४ पाला (प्रा० शा० ०) ६७ वेला (व्यवहारी) ७६-३ पालिग (कायस्थ) ४७,५० वैद्यनाथ (शिवमदिर) १६,२६,२७ वालीनाथ ( यक्षविशेष) २६ वैरिसिंह ( चापोत्कटनृप) पाहड (सूत्रधार) ४६५५.५८ परिसिंह २७ (ओइसवाल ज्ञा० ३०, जसदेवपुत्र) ६७ घोडाय्य (वालीनाथयक्ष) २६ ४३,४६,४८,५३, घोसरि (प्रा० शा .) ६७ ५५,५८,६५,७५ घोहडि (प्रा. ज्ञा. श्रे.) ६६ विकमनृप संवत् ७२ घोहिय (ओइसवाल शा• श्रे०) विक्रमार्क संवत् व्यास (कवि) २०५२ विजय (सोमेश्वरपुरोहित भ्राता) ८५ व्यानरोलि (ग्राम) २६ विजयसिणसूरि (विजयसेनसूरि) १०७ शकुनीविहार (जिनमन्दिर) विजयसेण (विजयसेनहरि) ९९,१०३ शत (संप्रामसिंह नृपति) १२ विजयसेनसूरि (नागेन्द्रगच्छीय) १४,१६,२९,४५, शत्रुजय (पर्वत) १५२२,२७३८,७७,९२ ४७,४९,५१,५४,५६,६४,६५६९, (पर्यंत, महातीर्थ ) ४४,४७,४८,५१,५३, ७२,७४,७५,७६-३,७८,७९,९० चिन्ध्यवर्मा (धाराधीश नृप) (पर्वत, तीथे) विमल (मन्त्री) १०४,१०५ (धवलकस्थित जिनमदिर) २६ विमल (शत्रुजय पर्वत) ९० शत्रुजयशैल ९०९१ विमल (मन्त्री) १०४ शवजयमहातीर्थावतार (स्थापत्यविशेष) ४४,४६, विमलमंदिर (जिनमंदिर) ४८५१,५४,५६ पिमाहानल (शत्रुजयपर्वत) १६ शत्रुजयाद्रि ५८ बिमलाद्रि (शत्रुञ्जयपर्वत) १५,७७,९२ शत्रुजयावतार (स्थापत्यविशेष) विरघपल (वीरधवल) १९५ अंतिसूरि (नागेन्द्रगच्छीय) १३,२९,४५,४६, बीरधवल (चौलुक्यवंशीय, चपति)७,८,१०, १३, ४८,५१,५४,५६, १६,१८२५२६,२८,३२,३६ ६४,६५,७६-३,७२ ३७,३८,६०,६१,६४,९२९९ शाम्यशिखर (रैवतगिरिशिखरविशेष) २८,४९,४६, (महाराज) ४४,४६,४५,४८,५१,५४,५६ ४८,५१,५५,५६ (राणक, महामण्डलेश्वर) ६५ शालिग (प्राम्बाटज्ञातीय, बुर) भीकल (व्यवहारी) ७६-३ शालिगजिनालय २७ बीना (श्रेष्ठी) ७६-२ र (सूर, चंडप्रसाद ज्येष्ठात्र) " " सुरुतकीतिकलोलिनी-आदि वस्तुपालप्रशस्तिसंग्रह " . " सत्यपुर (मगर) पृष्ठ पृष्ठ शैलादित्य (नृप) साजण (साधु) ६८. श्रीधांधलेश्वरदेवीयकोटडी (स्थानविशेष) ६७ (दडाधिप) १००,१०१ श्रीपाल (प्राग्वाटश्रेष्ठी, सावडपुत्र) ६६ साजन (प्रा. ज्ञा० ०) श्रीमाल (ज्ञाति) साटा (उएसवाल ज्ञा० महा.) श्रीमातामहयुग्राम ६७ सादा (धर्कटश्रेष्ठी, पासुपुत्र) ६६ प()गार ( सोरठपति) १०० (प्रा. ज्ञा० ० आसलपुत्र) ६६ संग्रामसिंह (शख, सिन्धुराज ) १२,४१ सामंतसिंह (सुप) संतोपा (ठकुरानी, मोढ ज्ञा• और आसा-पत्नी) सालग्राम ७३७४ साल्हा (धर्कटश्रेष्ठी, नेहापुर) संमेतमहातीर्थ (महातीर्थ) (प्रा. ज्ञा०, पूनापुन) संमेत्तमहातीर्थाचतारप्रासाद (स्थापत्यविशेष) (श्रीमाल ज्ञा०, पूनापुत्र) ४५,५४ सावड (प्राबाटश्रेष्ठी) ६६ संमेतमहातीर्थावतारप्रधानप्रासाद सायदेव (प्राग्वादशातीय, ठकुर) (स्थापत्यविशेष) ४७ साघदेव (प्रा. ज्ञा श्रे, राजुयपुर) संमेतशिखरप्रासाद (स्थापत्यविशेष) ५८ साहणीय (प्रा. ज्ञा०, दूगसरणपुत्र) संमेतावतार (स्थापत्यविशेष) ५१ साहिलवाडा ( प्राम) ६७ संमेतावतारमहातीर्थप्रासाद (स्थापत्यविशेष ) ५६ सिंहण (यदुवशीयसप) संमेय (सभेतशिवा पर्वत) १०१,१०२ सिंहराज ( सघपति, सरवणपुर) ६८ १५,२७,६८ सिंहुलग्राम २६ सत्यपुरावतार (स्थापत्यविशेष) ४४४६,४८, सिद्ध (सिद्धराज) ५१,५४,५६ सिद्धनृप । सदमल (मालदेवसुता) ७० सिद्धराज (चौलक्यनृपति) ९,३७८९ सपादलक्ष (देश) ८३ सिपि (आचार्य) सरवण (सघपति) ६८ सिसाधिप (सिद्धराज) सर्वदेव (विद्वान् ] ८३,८४ सिद्धेश (सिद्धराज) ३७ सलराण (एस. ज्ञा. श्रे.) ६६ सिझेशिता (सिद्धराज) ७९ (ओइस ज्ञा. श्रे.) ६६ सिन्धु (देश) ८३ सलखणदेवी (मुद्दडसीहपत्नी) ७५ सिन्धुराज ( शस, सग्रामसिंह) सहजल (मालदेवभुता) (कच्छपति) ३४ सद्दजिग (कायस्थ) सिरिमाल (श्रीमालकुल) सददेव (साहु, बरहुडिया) सिहरग्राम सहसा (सपाति) ६८ सीता (सोमपत्नी) ९,७६,७६-२,८९ सहसाराम (स्थानविशेष) १०२ सीतादेवी (मह, सोमपत्नी नी) ७४ सांतुय (प्रारबाट शा००) ६६ सीलण (ओदसवाल ज्ञा० ) ६७ सांयकुमार (शाम्यशिपर) १०२ सुतकीतिकल्लोलिनी (कृतिविशेष) साइदे (३. सहसापत्नी) ६८ सुनथर (सं० सहसापुत्री) साउदेवी (वस्तुपाल तेजपाल भगिनी) ર सुभट (कवि) साऊ ६० सुमटयर्मा (मुष) २६ सागर (प्रामादशावीय, टपर) ६५ सुमसीह (सोमसिंह) १०७ सागर (सएमदाल भा. महा• पांघापुत्र) ६६ सुरठ (देश) १०० सामण (प्रामार शा. श्रे.) ६६ सुराष्ट्रापति (भीमसिंहनृपति) १ " ७० १०० } विशेषनामानुक्रमणिका। " . ४८ " सुरिताण (सुल्तान) १०४ सोलंकि (राजा) १०४ सुवन्नरेह (नदी) ९९ सोल (सोलशर्मा) सुहडसीह ७५ सोलशर्मा (विद्वान्) सहडादेवी (मह वेजपाल द्वितीयभार्या) ७३,७४ सोहगा (वस्तुपाल-तेजपाल-भगिनी) ६०,७३ (सुहडसीह पत्नी) ७५ सोहि (ऊएसवाल ज्ञा० ) सुमिग (श्रीमाल ज्ञा० .) ६६ सोहिय (प्रा. ज्ञा००) सूर (मत्री. चण्डप्रमाद ज्येष्ठान) ९७६१ सौवर्णगिरि (पर्वत) ६९ सूहवदेवि (जयतमिहभार्या) ७०,९८ स्तम्भतीर्थ (पुर नगर, स्थान) १२,२७२८४४, सेचुज (शनुजय) ४६५१.५३५४,५५, ५६,५७,७६३,९६ सोखु (यह वस्तुपाल द्वितीयभार्या) स्तम्भनक (प्राम) सोखुका ( ४६,४८,५०, स्तम्भनकतीर्थ (स्तम्भतीर्थ) ५१,५८६९ सोमनदिउ : शोभनदेव, सुनधार) १०६ स्तम्भनकपुर (ग्राम) ४४.४६,४८,५१,५४५६ सोभनदेउ ( १०६ स्तम्भनपुर ( स्थानविशेष) सोमा (भाण्डागारिक) ७६-३ स्तम्भपुरीय ध्रुव (जयतसिंह) ४७,५० सोम (मनी लण्डनसाद-द्वितीयपुन) ९,२१,२५२८,३७ नाजण (प्रा. ज्ञा० ३०, वीरुयान) ६७ (मनी, ठकुर) ४४,४६,४८,५१,५३, हंडाउद् (प्राम) हंडावडा (ग्राम) १०७ मह ) ६५,६९७०,७१,७२, हथीयावापी ६८ ७३, ७४, ७५, ७६, हम्मीर (नृपविशेष) ७६ १,७६२,७६-३, हरिभद्रसूरि नागेन्द्रगच्छीय ) १४,२९,३७,६४, ६५,७६-२,७६-३, ७६४,८६,८८ ७९,८९,९० सोम (धर्कटश्रेष्ठी बहुदेवपुन) (महारक) ४५,४७,४८,५१,५४,५६ सोम ( नरेंद्र) १०४ १०५ हरिमण्डप (स्थापत्यविशेष ) ४७ सोमदेव । सूत्रधार) ४७,५०,५३ हरिया (श्रीमाल ज्ञा. श्रे.) सोमशर्मा (विद्वान् । ८२ हरिहर (कवि) सोमशर्मा ( सोमेश्वरदेव, पुरोहित) ८५९० हर्पपुरीयगच्छ २९ सोमसिंह (नृपति, धरावर्षमुत) ६२ हालूय ( साहु जयदेवपुर) सोसिंहदेव (महामण्डलेश्वर) ६५.६७ हूणी (स्त्रीविशेष) सोमेश्वरदेव (ठकुर, गूर्जरेश्वर पुरोहित) ४५,५०, हेठउंजीग्राम ६७ ६५.८५ हेमचन्द्र (आचार्य) सोरठ (देश) ९९,१०० हेमा (श्रीमाल झा० ०, हरियापुत्र) ( "