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संस्कृत पाठ माला प्रथम भाग

Saatavalekar Daamodar · 2006/03/23

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anwarREE H अंक १. ** 96V६५ १क स्थाकपमा भरकरण ७४/-१९८० २१-५-14 संस्कृत-पाठ-माला। [सस्कृत भाषाका अध्ययन करनेका सुगम उपाय। ] प्रथम CHECKED. 197 Initial मा लेखक और श्रीपाद दामोदर सातवळेकर, स्वाध्याय-मंडल, औंध, (जि. सातारा.) Sear पंचम वार HERI । - - -- संवत् १९९१, शक १८५६, सन १९३४ मूल्यं छः आने। thi THAN HTRA AINEETERANE htU HARIHATI SENTENT उद्देश्य । संस्कृत भाषा अत्यंत प्राचीन भाषा है, यह भाषा संपूर्ण आयौँकी प्रधान भाषा है। इसी भाषाके अन्य नाम देवभाषा, देववाणी, गीर्वाणभाषा आदि हैं । आर्योंके संपूर्ण धर्मग्रंथ संस्कृत भाषामें हैं, इसलिये सब आयौँको संस्कृत भाषाका अध्ययन अवश्यमेव करना चाहिये । हरएक मनुष्यको संस्कृत भाषाका अभ्यास सुगम हो, इसी लिये यह "संस्कृत-पाठ- लिखी है। इसमें पाठविधि ऐसी सुगम रखी है कि जो मनुष्य प्रतिदिन, Sarar आधा घंटा इस पुस्तकका "अभ्यास करेगा, उसको वर्षके अंदर रामायण महाभारत समझनेके लिये जितना ज्ञान अहिये उतना प्राप्त हो सकता है । आशा है कि, संस्कृतको प्रेमी इन पुस्तकोंसे अवश्यही लाभ उठावेंगे। माला" स्वाध्याय--मण्डल, लेखक औंध, ( जि. सातारा) श्रीपाद दामोदर सातवळेकर १ श्रावण, सं.१९९१ . मुद्रक तथा प्रकाशक--- श्रीपाद दामोदर सातवळेकर भारतमुद्रणालय, औंध (जि. ० सातारा)

ॐ
संस्कृत-पाठ--माला
14
प्रथम भाग।
पाठ १
.
--
ना
-
निम्नलिखित शब्दोका स्मरण कीजिये-
अहं = मैं
वदामि = (मैं) बोलता हूं।
तू
वदसि = (तू) बोलता है।
सः = वह
वदति
(वह ) बोलता है।
वाक्य।
अहं वदामि
मैं बोलता हूं।
त्वं वदसि
सः वदति वह वोलता है।
ये वाक्य संस्कृतमे उलटे शब्द 'खकर भी बोले जाते हैं, जैसे-
बदामि अहं । वदसि न । वदति सः।
अहं वदामि । त्वं वदसि । सः वदति ।
ये दोनों वाक्य शद्ध है । अर्थात् इस
वाक्यके शब्द उलट पुलट रखनेसे भी संस्कृतमें कोई
तू बोलता है
.
प्रकार

(४)
%3D
व्याकरणकी अशुद्धि प्रायः नहीं होती है। यह एक प्रकारकी
संस्कृतमें सुविधा है । अब निम्नलिखित शब्द पढिये-
पठामि (मैं) पढता हूं। खादामि (मैं) खाता हूं।
पठसि = (तू) पढता है । खादसि (तू) खाता है।
पठति = वह पढता है । खादति = (वह) खाता है ।
पश्यामि = (मैं) देखता हूं। गच्छामि (मैं) जाता हूं।
पश्यसि = (तू) देखता है। गच्छसि (तू) जाता है।
पश्यति=(वह) देखता है । गच्छति = (वह) जाता है।
%3D
अब आप निम्नलिखित वाक्य स्वयं जान सकते हैं:-
अहं पठामि।
त्वं पठसि ।
सः पठति।
अहं पश्यामि। त्वं पश्यसि। सः पश्यति।
अहं खादामि। त्वं खादासे। सः खादति।
अहं गच्छामि। त्वं गच्छसि। सः गच्छति।
अहं वदामि । त्वं वदसि । सः वदति।
इस पाठमें आप निम्नलिखित शब्द स्मरण कीजिये....
तत्र - वहां
यत्र -
जहां
कुत्र कहां
यहां
इन शब्दोंका उपयोग करके आप अब बहुतसे वाक
स्वयं बना सकते हैं।
अत्र =

(५) १ - पाठ २ अहं तत्र पठामि। मैं वहां पढता हूं। त्वं कुत्र पठसि। तू कहां पढता है ? सः अत्र पठति। वह यहां पढता है। सः यत्र पठति। वह जहां पढता है, तत्र अहं पठामि । वहां मैं पढता हूं। इसी प्रकार निम्नलिखित वाक्य बनते हैं अहं अत्र पश्यामि । त्वं कुत्र पश्यसि ? सः तत्र पश्यति । यत्र सः पश्यति तत्र अहं गच्छामि । सः तत्र खादति । त्वं कुत्र खादसि । यत्र सः गच्छति तत्र अहं गच्छामि। अब निम्नलिखित शब्दोंका स्मरण कीजिये- नहीं किं = क्या ? नहि = नहीं इन शब्दोंका उपयोग करके आप ये वाक्य बना सकते हैं- कः वदति ? कौन बोलता है ? सः किं वदति वह क्या बोलता है ? सः तत्र किं वदति ? वह वहां क्या बोलता है ? सः तत्र न वदति। वह वहां नहीं बोलता। त्वं तत्र किं खादसि? तू वहां क्या खाता है ? का = कौन ? - %3D %3D - -

%3D
अहं न वदामि । मैं नहीं बोलता हूं।
सः न गच्छति वह नहीं जाता।
त्वं न पश्यसि तू नहीं देखता ।
अब विना प्रयत्न आप निम्नलिखित वाक्य समझ सकते हैं
अहं तत्र न पश्यामिासः अत्र पश्यति। त्वंतत्र
पश्यसि ? सः तत्र न गच्छति। त्वं कुत्र गच्छसि
अहं तत्र गच्छामि। यत्र सः गच्छति तत्र त्वं नि:
न गच्छसि। यत्र सः गच्छति तत्र अहं गच्छामि ।
यत्र यत्र सः पश्यति तत्र तत्र सः गच्छति। यत्र
यत्र त्वं गच्छसि तत्र तत्र अहं गच्छामि । यत्र अहं
पश्यामि तत्र त्वं किं न पश्यसि ? यत्र सः पश्यति
तत्र अहं पश्यामि।
देखिये, थोडेसे प्रयत्नसे आप कितने वाक्य बोल सकते
हैं। अब निम्नलिखित शब्द ध्यानमें रखिये-
यदा
नैव = नहीं, बिलकुल नहीं
हमेशा तदा
कदा
| इदानीं জন
इन शब्दोका अब उपयोग कीजिये । देखिये कितने वाक्य
अब आप बना सकते।
किं त्वं तत्र गच्छसि । = क्या तू वहां जाता है ?
नहि, अहं न गच्छामि नहीं, मैं नहीं जाता।
-
- जब
सदा -
-
,

(७)
--
पाठ ३
। किं न गच्छसि ? - (तू) क्यों नहीं जाता ?
यदा सः तत्र गच्छति - जब वह वहां जाता है।
तदा अहं तत्र गच्छामि तब मैं वहां जाता हूं।
कदा सः तत्र गच्छति? कब वह वहां जाता है ?
यदा त्वं तत्र गच्छसि -- जब तू वहां जाता है।
इस ढंगसे आप भी स्वयं कई वाक्य बना सकते हैं । आप
नये वाक्य बनाकर कागजपर लिखेंगे, तो बहुत लाभ हो
सकता है। अब निम्नलिखित वाक्य पढते ही आपके समझमें
--
आ सकते हैं-
-
सः सा पठति । त्वं सदा किं न पठसि ? यदा
सः पठति तदा त्वं किं वदसि ? कः तत्र गच्छति ?
सः तत्र न गच्छति । यदा त्वं तत्र पश्यसि तदा
सः अत्र वदति । यदा त्वं तत्र खादसि तदा अहं
अत्र वादामि।
".मः (वह)" के स्थानपर आवश्यक नाम रख कर भी
उसी प्रकार वाक्य हो सकते हैं, देखिये
राम राम
सूर्य := सूर्य
कृष्णः = कृष्ण
वायु
हरिश्चंद्रः हरिश्चंद्र सोमः सोम
वायुः =
-

(८) रामः गच्छति। राम जाता है। कृष्णः वदति। कृष्ण बोलता है। हरिश्चन्द्रः पठति। हरिश्चंद्र पढता है। सोमः न गच्छति । सोम नहीं जाता। रामः किं न पढति? राम क्यों नहीं पढता? कृष्णःतत्र न पश्यति। कृष्ण वहां नहीं देखता । इसी प्रकार निम्नलिखित वाक्य सुगमतासे बन सकते हैं- कृष्णः न गच्छति । रामः न वदति। सोमः गच्छ- ति । वायुः सदा गच्छति । कृष्णः किं न वदति ? जयचंद्रः किं न पश्यति ? सर्वमित्रः न खादति। सः तत्र किं न खादति । यदा रामः अत्र पठति तदा सः तत्र खादति। यदा कृष्णः तत्र गच्छति। तदास नैव पठति। अब निम्नलिखित शब्दोंको स्मरण कीजिये- आगच्छामि - (मैं) आता हूं। आगच्छसि -(तू) आता है। आगच्छति-- (वह) आता है। इनका उपयोग करनेसे निम्नलिखित वाक्य बन सकते हैं- अहं आगच्छामि । त्वं आगच्छसि । सः आग- च्छति। अहं न आगच्छामि । त्वं न आगच्छसि । सः न आगच्छति । त्वं तत्र किं न आगच्छसि ?

(९)
पाठ ४
अब आप निम्नलिखित शब्दोंको कंठ कीजिये
किमपि-कुछभी
ह्यः-कल (गत दिन)
इदानीं- अब
श्व:-कल (आगामी दिन)
अधुना"
परश्वः-परसूं
अद्य-आज
निरंतरं- निरंतर
इन शब्दोंका उपयोग करके अब आप वाक्य बोल सकते हैं।
सः किमपि न वदति ।
वह कुछ भी नहीं बोलता।
रामः किमपि न पठति । राम कुछ भी नहीं पढता।
अद्य कृष्णः तत्र पठति । आज कृष्ण वहां पढता है।
अधुना अहं पठामि ।
अब पढता हूं।
इदानीं त्वं पठसि । अब तू पढता है।
कथं स किमपि न पठति ? कैसे वह कुछ भी नहीं पढता है?
अब आपकी योग्यता इतनी हुई है कि आप निम्नलिखित
वाक्य विना कष्ट समझ सकते हैं।
रामः इदानीं अत्र गच्छति । श्रीकृष्णः अधुना
अत्र पठति । रामः इदानीं नैव गच्छति । त्वं किमपि
किं न पठसि ? सः कदा पठति? त्वं किमपि किं न
खादसि ? विश्वामित्रः अद्य तत्र पठति । यदा पठति
तदा त्वं कुत्र गच्छसि ? यदा सः तत्र पठति तदा
मैं

(१०) अहं तत्र नैव गच्छामि। किं त्वं तत्र न गच्छास ? अद्य अहं तत्र नैव गच्छामि। सःसदा किमपि खा. दति। कथं सः सदा खादति? यदा सः तत्र किमपि खादति तदा त्वं किमपि किंन वदसि ? अहं तदा तत्र नैव गच्छामि । त्वं अधुना वदसि । सः इदानीं पश्यति । सः किं पश्यति? सः सदा तत्र नैव गच्छ- ति । कदा त्वं तत्र पश्यसि यदासःरामः तत्र गच्छ ति। त्वं तत्र आगच्छसि किम् ? किं सः तत्र न आगच्छति? संधि। संस्कृत में दो शब्द परस्पर समीप आनेसे पहिले शब्दका अंतिम वर्ण और दूसरे शब्दका प्रथम वर्ण एक दुसरेके साथ विशेष नियमोसे मिलते हैं। इसका नाम "संधि' है । इस समय तक संधि किये विना ही पूर्व पाठोंमें वाक्य दिये हैं । अब इस पाठमें उन वाक्योंके ही संधि बनाकर बताने हैं। सन्धि इस प्रकार बनते हैं- संधिविना वाक्य संधि करके वाक्य वदामि+अहम् वदाम्यहम् । सः+वदति। स वदति। तत्र+ अहं पठामि तत्राहं पठामि।

(११) इन संधियोंके नियम आगे आ जायगे परंतु यहां संधियों- के साथ परिचय होनेके लिये पूर्व पाठोंके संस्कृत वाक्य संधि वना कर दिये जाते हैं। जहां संधि नहीं होते वहां संधि बनाये नहीं हैं- संस्कृत-वाचन-पाठः। स पठति । स पश्यति । स खादति । स गच्छति। स वदति । अहं तत्र पठामि । त्वं कुत्र पठसि ? सोऽत्र पठति । स यत्र पठति तत्राहं पठामि । अह- मत्र पश्यामि । स तत्र खादति। यत्र स पश्यति तत्राहं गच्छामि। स तत्र खादति।त्वं कुत्र खादसि? यत्र स गच्छति तत्राहं गच्छामि । को वदति ? स किं वदति स तत्र किं वदति? स तत्र न वदति । त्वं तत्र किं खादसि? अहं न वदामि। स न गच्छति। त्वं न पश्यास। इन संधिवाक्योंकी तुलना प्रथम और द्वितीय पाठके वाक्योंके साथ कीजिये । इससे आपको पता लगेगा कि संधि कहां और किस प्रकार बने हैं।

(१२)
पाठ ५
संस्कृतमें नामोंकी विविध विभक्तियोंके जो विभिन्न रूप
होते हैं, वे अब देखिये--
देवः-देव
४ देवाय-देवके लिये
हे देव-हे देव ५देवात्-देवसे, देवके पाससे
२देव-देवको, देवके प्रति ६देवस्य- देवका
३ देवेन-देवने ७ देवे--देवके अंदर
इसी प्रकार अकार अंतवाले पुलिंग शब्दोंके रूप होते है ।
देव, कृष्ण, राम, धनंजय, आदि शब्द अकारांत है, अर्थात्
इनके अंतमें 'अ' है; "राम" शब्द " + आ+ म्+ अ= राम'
ऐसा है । इससे पाठक जान सकते हैं कि किस प्रकार
राम शब्द अकारान्त है । इसी रीतिसे देव, कृष्ण, धनंजय
आदि शब्दोंमें अकार अंतमें है। पाठकोंको कुछ शब्दोंके
अंतोंका परिचय यहां देना चाहिये इसलिये निम्न शब्द दिये हैं-
अकारान्त शब्द-- देव, सूर्य, सोम
(अ)
आकारान्त शब्द- विश्वपा, शंखध्मा (आ)
इकारान्त शब्द- हरि, रवि, कवि (इ)
इकारान्त शब्द- नदी, दासी, श्री
उकारान्त शब्द-विष्णु, भानु, सूनु
(उ.)
कारान्त शब्द- पितृ, मात, भ्रात
(क)
--

(१३) - इसी प्रकार शब्दोंके अंतका स्वर पहचानना चाहिये । इस- का उपयोग बहुत है इसलिये पाठक इसको ठीक प्रकार सम झे । अस्तु । यहां अकारान्त पुलिंग शब्दके रूप बताये हैं और फिर दूसरे एक शब्दके रूप बताये जाते हैं- १ सोमः- सोम ४ सोमाय- सोमके लिय हे सोम !-- हे सोम! ५ सोमात्- सोमसे २सोम-सोमको,सोमके प्राति ६ सोमस्य-- सोमका ३सोमेन-सोमने ७ सोम-- सोममें पाठकोंके मनमें ये रूप अब ठीक प्रकार आ गये ही होंगे। इसी प्रकार अकारांत पुल्लिंग शब्दोके रूप पाठक करें। अक : रान्त पुल्लिंग शब्द ये है- देव:- देवता। भूप:- राजा। नरः- मनुष्य। पुरुष:-पुरुष । जन:-मनुष्यः। शब्द:- शब्द। वर्ण:--रंग। कृष्णः-काला। मनुष्यः-मनुष्य। हस्तः- हाथ। कर:- हाथ। पादः-पांव गल्ल:- गाल। स्कंधः--कंधा। दंतः-दांत ओष्ठः- होंट। केशः केश;बाल। कर्णः-कान आप अब इन शब्दोंका उपयोग कर सकते हैं, देखिये- भूपः वदति-राजा बोलता है। जनः पठति-मनुष्य पढता है। नरः गच्छति-- मनुष्य चलता है। - .

(१४) - पाठ६ हे पुरुष! त्वं तत्र गच्छसि किं ? हे राम ! स पुरुषः तत्र पठति । हे नर! त्वं फलस्य वर्ण पश्यसि किं? भूपस्य हस्तः । स शब्द वदति । मनुष्यस्य स्कंधे केशः। कृष्णस्य वर्णः कृष्णः । रामस्य वर्णः न कृष्णः । पुरुषः भूपं पश्यति । निम्नलिखित भाषावाक्यके संस्कृत वाक्य बनाइये- राजाका हाथ । मनुष्यका शब्द । सोमका वर्ण। वह वहां जाता है । वह मनुष्य वहां नहीं जाता । तू वहां क्यों जाता है ? वह वहां क्यों नहीं जाता ? सोम वहां क्यों नहीं जाता। कृष्ण वहां हमेशा जाता है। रामचंद्रका हाथ । राजाका दांत। राजा वहां खाता है । मैं यहां खाता हूं। वह वहां जाता है ? मैं वहां पढता हूं। तू वहां बोलता है। राजा मनुष्यको देख- ता है । मैं राजाको देखता हूं। निम्न शब्द स्मरणमें रखिये- अस्ति = (वह) है आगच्छति (वह) आता है असि = (तू) है आगच्छसि-(तू) आता है अस्मि = (मैं) हूं आगच्छामि (मैं) आता हूं भवति = (वह) होता है पतति: (वह) गिरता है भवसि = (तू ) होता है पतसि = (तू) गिरता है भवामि = (मैं) होता हूं पतामि = (मैं) गिरता हूं - -- मैं यहां हूं। १५ इन क्रियापदोंका उपयोग करके अब आप वाक्य बनाइये- सः आस्ति। वह है। सः तत्र न अस्ति। वह वहां नहीं हैं। अहं अत्र अस्मि। अत्र अहं अस्मि । यहां मैं हूं। अस्मि अहं अत्र। हूं मैं यहां। मनुष्यः राजा भवति । मनुष्य राजा होता है। राजा मनुष्यः भवति। राजा मनुष्य होता है। नरः अत्र आगच्छति। मनुष्य यहां आता है। भूप:सदा तन्त्र न राजा हमेशा वहां नहीं भवति । होता है। अहं अधुना तत्र न मैं अब वहां नहीं आगच्छामि। आता हूं। स पुरुषः सदा किं वह मनुष्य हमेशा क्यों पतति? गिरता हैं। किं त्वं पुरुषस्य स्कंधं क्या तू पुरुषका कंधा पश्यसि ? देखता है ? किं स कृष्णस्य दंतं न क्या वह कृष्ण का दांत. पश्यति? नहीं देखता? इदानीं भूपस्य हस्तात् अब राजाके हाथसे केश केशः पतति। गिरता है।

(१६) - स पुरुषः कुत्र अस्ति ? वह पुरुष कहां है? इदानीं स पुरुषः तत्र अब वह पुरुष वहां नहीं नास्ति। है। भूपः इदानीं कुत्रं गतः ? राजा अब कहां गया? अहं अस्मि भूपः। मैं हूं राजा। स भूपः नास्ति । वह राजा नहीं है। अब आप निम्न वाक्य पढकर समझ सकते हैं- अहं इदानीं न पठामि । स सदा तत्र पश्यति । त्वं इदानीं किं खादसि ? अहं न किमपि वदामि । रामः यत्र गच्छति तत्र सोमः सदा आगच्छति । कः पुरुषः भूपं पश्यति ? इदानीं स पुरुषः भूपं पश्य- ति । कदा त्वं तत्र गच्छसि ? यदा स नरः तत्र न गच्छति तदा त्वं अन आगच्छ । रामः राजा अस्ति । कृष्णः तदानीं रामं वदति । सोमः इदानीं कुत्र अ- स्ति । यत्र हस्तः पतति तत्र केशःन अस्ति । यत्र रामः पश्यति तत्र स पुरुषः न अस्ति । यदा त्वं आगच्छसि तदा गृहं गच्छामि । त्वं किं किमपि न वदसि ? स इदानीं किमपि न पठति । यथा कृष्णः पठति तथा रामः पठति । यथा अहं गच्छामि तथा त्वं किं न गच्छसि ?

(१७) ? , - पाठ ७ निम्नलिखित भाषावाक्योंके संस्कृत वाक्य बनाइये मैं जाता हूं। मैं अभी जाता हूं। मैं आज नहीं जाता। मैं आज वहां नहीं जाता । तू वहां आज जाता है । क्या तू आज वहां जाता है ? तू आज वहां क्यों नहीं जाता ? अब तू यहां आता है ? नहीं, मैं आज वहां नहीं जाता हूं। निम्नलिखित वाक्योंके भाषावाक्य बनाइये अहं गच्छामि । अहं अद्य गच्छामि । अहं अद्य न गच्छामि। अहं अद्य तत्र न गच्छामि । त्वं अद्य तत्र गच्छसि । किं त्वं अद्य तत्र गच्छसि ? त्वं अद्य तत्र किं न गच्छास ? अधुना त्वं अत्र आगच्छसि ? नहि, अहं अद्य तत्र न आगच्छामि । देवः कुत्र आस्ति ? भूपः तत्र न अस्ति । केशस्य कः वर्णः ? केशस्य कृष्णः वर्णः। दंतस्य वर्णः कः ? ओष्ठस्य वर्णः कः ? हस्तस्य कः वर्णः ? अत्र पुरुषः आस्ति किं? सः अत्र अस्ति। निम्नलिखित वाक्य पढिये - १ अहं नैव गच्छामि। २ त्वमद्य कुत्र गच्छसि ? सोऽद्यात्राऽऽगच्छति। ४ त्वं तत्राऽय गच्छसि। AAA- (१८) संधि करके वाक्य । कृष्णो न गच्छति । रामो न वदति। सोमो ग- च्छति । वायुः सदा गच्छति । कृष्णः किं न वदति ? जयचंद्र : किं न पश्यति ? सर्वमित्रो न खादति । स तत्र किं न खादति ? यदारामोऽत्र पठति तदास तत्र खादति । यदा कृष्णस्तत्र गच्छति तदास नैव पठति । यदि कोई कठिनता हुई तो पाठ ३ में ये वाक्य देखिये । अकारान्त पुलिंग नामोंके रूप करना पाठक अब जानते । अकारांत नपुंसकलिंग नामोके रूप भी, प्रथमा और द्वि- तीया को छोडकर शेष विभक्तियोंके पूर्ववत् ही होते हैं- १ पुस्तकं = पुस्तक ४पुस्तकाय = पुस्तकके लिये हे पुस्तक = हे पुस्तक! ५ पुस्तकात् = पुस्तकसे २ पुस्तकं पुस्तकको ६पुस्तकस्य = पुस्तकका पुस्तकके प्रति ७ पुस्तके पुस्तकमें ३ पुस्तकेन = पुस्तकने ine पाठक इसमें देख लें कि प्रथमा और द्वितीया किंवा केवल प्रथमाको छोडकर शेष रूप पुल्लिंगके समान ही हुए हैं। यदि पाठक एक एक नियम ध्यान रखेंगे, तो पुलिंग और नपुंसक- लिंग अकारान्त नामोके रूप वनाना उनके लिये अत्यन्त सुगम बात होगी। .

(१९) पाठ ८ अब यहां कई नपुंसकलिंग अकारान्त शब्द देते हैं- - बर्तन - नयनं = आंख पानं नेत्रं जलं - पानी उदरं - पेट सलिलं = नखं नाखून अंबरं - आकाश ललाटं = मस्तक कमलं = कमल वस्त्रं = वस्त्र, कपडा पुष्पं भूषणं = गहना फलं नगरं = शहर पुस्तकं -- किताव पत्रं = पान, पत्ता द्वारं दरवाजा वनं %3D वन गृहं - घर ये अकारान्त नपुंसकलिंगी शब्द हैं । इनके रूप पूर्ववत् वनते हैं । इनके रूप आप सुगमतासे बना सकते हैं, देखिये इनसे कैसे वाक्य वनते हैं- १ सः रामस्य नयनं पश्यति । २ रामः कृष्णस्य वस्त्रं न पश्यति । ३ देवदत्तः भूपस्य नगरं न गच्छति ४ सोमः फलं खादति । ५ स इदानों फलं किं न खादति ? ६ सः अधुना पुस्तकं पठति ।

(२०)
?
१ वह रामका आंख देखता है। २ राम कृष्णका वस्त्र
नहीं देखता । ३ देवदत्त राजाके नगरको नहीं जाता। ४
सोम फल खाता है । ५ वह अब फल क्यों नहीं खाता ?
६ वह अब किताब पढता है।
अब आप निम्नलिखित वाक्य पढते ही समझ सकते हैं-
हरिश्चन्द्रस्य भूषणं कुत्र अस्ति ? त्वं फलं किमपि
किं न ग्वादास ? यत्र स पठति तत्र रामचंद्रस्य पुस्तकं
अस्ति किम् ? यत्र भरद्वाजः पठति तत्र रामचंद्रस्य
पुस्तकं न अस्ति । भूपस्य नगरं कुत्र अस्ति ? कृष्णस्य
पात्रे जलं न आस्ति । पात्रं कुत्र अस्ति ? पात्रं अत्र
अस्ति । सः नगरात् नगरं गच्छति । जले कमलं
अस्ति । सलिले कमलं न अस्ति । द्वारं कुत्र अस्ति ?
गृहस्य द्वारं अत्र अस्ति । वने सलिलं न अस्ति । यत्र
जलं न अस्ति, तत्र स किं न गच्छति ? त्वं अत्र किं
न आगच्छसि . अहं न पतामि ।
निम्नलिखित भाषा वाक्यके संस्कृत वाक्य बनाइये-
घरका द्वार यहां है। रामचंद्रका वस्त्र कहां है ? जलमें
कमल क्यों नहीं है ? कृष्णका भूषण कहां है ? देवदत्तका
पुस्तक यहां नहीं है । राजाका नगर कहां है ? वह नगरसे
आता है। वह फल खाता है। तू फल क्यों नहीं खाता ।
?

-८५/७१(*
(२१)
पुस्तकालय
गुरुकुल कांगडी
पाठ ९
-
संस्कृतके वाक्योंमें निम्न प्रकार मेल होते हैं। इनका
स्मरण रखना उचित है-
न + अस्ति= नास्ति (नहीं है)
न + एव = नैव ( बिलकुल नहीं)
किं + अस्ति = किमस्ति (क्या है ?
अहं + अस्मि = अहमास्मि ( मैं हूं)
किं + अपि = किमपि (कुछ भी)
इनका उपयोग निम्न प्रकार होता है
१ स तत्र नास्ति।२ तत्र पुस्तकं नैव अस्ति ।३ तत्र
किमपि नास्ति । ४ अत्र अहमस्मि । ५ त्वं किं किमपि
न पठसि ? भूपस्य नगरे भपः अस्ति । ७ किं त्वं
नगरात् आगच्छसि ? ८ नहि, अहं वनात् आगच्छा-
मि । ९ वने किमस्ति ? १० वने सलिलं अस्ति।
११ जले कमलं नास्ति । १२ पुस्तके पत्रं अस्ति किं ?
१३ देवदत्तस्य पुस्तके पत्रं नास्ति ।
१ वह वहां नहीं है । १ वहां पुस्तक बिलकुल नहीं है।
३ वहां कुछ भी नहीं है । ४ यहां मैं हूं । ५ तू क्यों कुछ
भी नहीं पढता ? ६ राजाके नगरमें राजा है । ७ क्या तू

(२२) , नगरसे आता है ? ८ नहीं, मैं वनसे आता हूं। ९ वनमें क्या है? १० वनमें जल है । ११ जलमें कमल नहीं है। १२ पुस्तक- में पत्र है क्या ? १३ देवदत्तके पुस्तकमें पत्र नहीं है। संधि। पाठकोंका संधियोके साथ थोडा परिचय हुआ है। विशेष परिचय होनेके लिये पाठ ६ के कुछ वाक्य यहां संधि करके दिये जाते हैं। अहमिदानी न पठामि । स सदा तत्र पश्यति । त्वमिदानीं किं खादसि ? अहं न किमपि वदामि । रामो यत्र गच्छति, तत्र सोमः सदाऽऽगच्छति । कः पुरुषो भूपं पश्यति ? इदानीं स पुरुषो भूपं पश्यति । कदा त्वं गच्छसि ? यदा स नरस्तत्र न गच्छति तदा त्वं अत्राऽऽगच्छ । रामो राजाऽस्ति । कृष्णस्त- दानी रामं वदति । सोम इदानीं कुत्रास्ति । यत्र यत्र हस्तः पतति तत्र तत्र केशो नास्ति । यत्र रामः पश्यति तत्र स पुरुषो नास्ति । यदा त्वमागच्छसि तदाऽहं गच्छामि । त्वं किं किमपि न वदसि ? स इदानीं किमपि न पठति । यथा कृष्णः पठति तथा रामः पठति। यथाऽहं गच्छामि तथा त्वं किं न गच्छसि? पाठक यहां देखें कि संधि कहां हुए हैं और कहां नहीं हुए।

(२३) पाठ १० "वि- - हरएक भाषामें गुण बतानेवाले शब्द होते हैं । उनको शेषण" कहते हैं। जैसा 'काला कपडा' इसमें 'काला' यह विशेषण है। इसी प्रकार संस्कृतमें भी बहुत विशेषण हैं और उनका उपयोग वाक्योंमें करना आवश्यक होता है। विशेषणोंका उपयोग इस पाठमें बतानेका विचार है, इसलिये यहां थोडेसे विशेषण दिये जाते हैं। विशेषण। श्वेत-सुफेद । कृष्ण-काला । लाल पीत-पीला । हरित-हरा । नील- नीला शुभ्र-श्वेत । अंध -अंधा । बधिर- बहरा वाचाल-बहुत --बहुत धीर-धैर्यवान धीर-धैर्यवान् । वीर- वीर- शूरवीर बोलनेवाला। शोभन- उत्तम । दीर्घ- लंबा विशाल-बडा। कृपण-कंजूस । उदार-उदार, बलिष्ठ-बलवान्। ह्रस्वः छोटा । दाता नवीन-- नया । पुराण-पुराना। धनाढ्य- धनी विज्ञ- ज्ञानी। कोमल-कोमल, नरम । मूढ- मूख विशेषणके रूप विशेष्यके समान ही होते हैं। विशेषणद्वारा जिसका गुणवर्णन किया जाता है उसको विशेष्य कहते हैं। यहां विशेषणोंका उपयोग करनेकी रीति देखिये-

(२४)
" शब्द
-
श्वेतः अश्वः-सुफेद घोडा । श्वेतं कमलं-सुफेद कमल ।
अश्वशब्द अकारान्त पुलिंग होनेसे “अश्व" शब्दके समान
श्वेत" शब्दका रूप हुआ। उसी प्रकार
नपुंसकलिंग होनेके कारण दूसरे वाक्यमें श्वेत शब्दका रूप
कमल शब्दके रूपके समान बना। इसीसे ज्ञात हो सकता
कि किस ढंगसे विशेषण विशेप्यके साथ चलता है। अब आप
निम्नलिखित वाक्य देखिये तो विशेष्य और विशेषणका नियम
आपके ध्यानमें आ सकता है-
शोभनं वनं। विशालं उतरं । नवीनं कमलं ।
पुराणं वस्त्रं । शुभ्रं पुष्पं । नीलं कमलं।
रक्तं वस्त्रं। हरितं वनं। शोभनं पुस्तकं।
पीतं पुष्पं ।
शोभनं जलं। पतिं वस्त्रं ।
ये नपुंसकलिंग विशेष्य और उनके साथ विशेषण हैं । अब
पुल्लिंग विशेष्य और उनके साथ विशेषणके रूप देखिये-
शोभनः पुरुषः। विशालः कर्णः। नवीनः बालकः ।
पुराणः पुरुषः। शुभ्रः वर्णः । नीलः वर्णः।
हरितः वृक्षः।
शोभन: गल्लः।
बलिष्ठः पुरुषः। धीरः पुरुषः । वाचालः मनुष्यः।
ये विशेष्य पुलिंग होनेसे विशेषण भी उसी प्रकार हो गये
हैं । यही बात पाठक निम्न लिखित वाक्यों में देख सकते हैं-
रक्तः वर्णः।

(२५)
१ शोभनस्य नगरस्य विशालं द्वारम् ।२ धनाढ्यस्य
पुरुषस्य रक्तं वस्त्रम् । ३ शोभने जले नवीनं कमलम् ।
१ उत्तम नगरका बड़ा फाटक । २ धनी मनुष्यका लाल
कपडा । ३ उत्तम जलमें नवीन कमल ।
इन वाक्यों में पाठक देख सकते हैं कि विशेष्यके रूपोक
समान ही विशेषणके रूप बने हैं । संस्कृतभाषाकी यह विशेषता
पाठक अवश्य ध्यानमें धारण करें।
संधि।
पाठक संधियोंके साथ अब अच्छी प्रकार परिचित हुए हैं
वे ही संधि बनाकर निम्नलिखित वाक्य लिखे हैं। ये वाक्य
पढनेसे पाठकोंको पता लग सकता है कि कहां किस प्रकार
संधि हुए हैं-
संस्कृत-वाचन--पाठः।
अहं वदामि । त्वं वदसि । स वदति ।वदाम्यहम् ।
वदसि त्वम् । वदति सः । अहं पठामि । पठाम्यहम् ।
अहं पश्यामि । पश्याम्यहम् । अहं खादामि। खादा-
म्यहम् । अहं गच्छामि गच्छाम्यहम् । स गच्छति।
स वदति । स खादति । स पश्यति । स पठति ।
तत्राहं पठामि । त्वं कुत्र पठसि ? सोऽत्र पठति ।
स यत्र पठति, तत्राहं पठामि । अहमत्र पश्यामि ।
त्वं कुत्र पश्यसि ? स तत्र पश्यति ।

(२६) - पाठ ११ अब कुछ संस्कृत वाक्य पढिये- १ रामचंद्रस्य नवीनं गृहं शोभनं आस्ति । २ श्री- कृष्णस्य पुराणं नगरं कुत्र अस्ति? ३विज्ञस्य पुरुषस्य शोभनं पुस्तकं अन नास्ति । ४ त्वं विशालं वनं इदानी गच्छसि किम् ? ५ नहि; इदानीं अहं भूपस्य शोभनं नगरं गच्छामि । ६ स पुरुषः भूपस्य शोभ- नात् नगरात् इदानी एव आगच्छति । ७ स बलिष्ठः पुरुष इदानी कुत्र अस्ति ? १ रामचंद्रका नवीन घर सुंदर है। २ श्रीकृष्णका पुराणा शहर कहां है ? ३ ज्ञानी मनुष्यका उत्तम पुस्तक यहां नहीं है। ४ तू विशाल वनके प्रति अवजाता है क्या? ५ नहीं, अब मैं राजाके सुंदर नगरको जाता हूं।६ वह मनुष्य राजाके सुंदर नगरसे अव ही आता है । ७ वह बलवान् पुरुष अब कहां है ? अब निम्नलिखित शब्द स्मरण कीजिये- १ अहं-- मैं ५ मत्- मुझसे २ मां-- मुझे, मुझको ६ मम-- मेरा ३ मया- मैंने ८ मयि-- मुझमें ४ मां-- मेरे लिये अब इनका उपयोग देखिये--

(२७)
१ अहं मम गृहं इदानीं एव गच्छामि। २ त्वं
मम गृहं इदानी एव आगच्छसि किं ? ३ स पुरुषः
मां वदति । अहं नगरात् नगरं गच्छामि । ५ मम
गृहं शोभनं नास्ति किम् ?
१ मैं अपने घर अभी जाता हूं। २ क्या तू मेरे घर अभी
आता है ? ३ वह मनुष्य मुझे कहता है। मैं शहरसे ( दूसरे )
शहर जाता हूं। ५ क्या मेरा घर सुंदर नहीं है ?
अब इस अवसर पर एक दो शब्द ध्यानमें रखिये ।
सह-साथ
सकाशात्-पाससे
साकं-
सत्वरं-शीघ्र
प्रति--प्रति
दत्तः-दिया हुआ
कृतः-किया हुआ उक्त:- कहा हुआ
गतः-गया
आगतः-आया हुआ
१ मया सह स पुरुषः आगच्छति।२ स मम सका-
शात् सत्वरं गतः।३मया रामाय फलं दत्तम्। ४ भूपेन
मह्यं धनं दत्तम् । ५ मया उक्तं मया कृतं।७ मया
इदानीं एवं कृतम् । ८ मया साकं स न गच्छति ।
१ मेरे साथ वह पुरुष जाता है। २ वह मेरे पाससे शीघ्र
गया। ३ मैंने रामके लिय फल दिया। ४ राजाने मेरे लिये
धन दिया । ५ मैंने कहा । ६ मैंने किया। ७ मैंने अभी
किया। ८ मेरे साथ वह नहीं जाता है।
"

(२८) १ पाठ निम्नलिखित शब्द ध्यानमें रखिये- • १ त्वम्-तू ५ त्वत्-तेरे पाससे २ त्वां-तुझे ६ तव-तेरा ३ त्वया-तेरेसे, तुझसे ४ तुभ्यं-तेरे लिये ७ त्वयि-तुझमें इनका उपयोग करके कई संस्कृत वाक्य बन सकते हैं, देखिये- १ अहं त्वया सह नगरं गच्छामि। २ त्वं मया सह नगरं गच्छसि । ३ स मया सह तत्र न गच्छति, परन्तु त्वया सह अत्र पठति। १ मैं तेरे साथ शहरको जाता हूं। २ तू मेरे साथ शहर को जाता है । ३ वह मेरे साथ वहां नहीं जाता है, परन्तु तेरे साथ यहां पढता है। १ तव गृहं शोभनं अस्ति । २ मया तुभ्यं धनं दत्तम् । ३ त्वया मह्यं धनं न दत्तम्। ४ स पुरुषः मम पुस्तकं त्वया सह पठति । ५ त्वंः वीर पुरुषः असि । ६ स शोभन: भूपः अस्ति।७तव वीरः पुत्रः कुत्र अस्ति? ८ तव गृहे त्वं किं न पठसि ? अत्र त्वं कदा आगच्छसि ११० तव फलं कुत्र आस्ति? ११ यत्र बल- भद्रस्य वस्त्रं अस्ति। १२त्वया अद्य किमपि न कृतम्।

(२९)
१३ तव नगरात् अहं अद्य इदानीं एव आगतः।
१ तेरा घर सुंदर है । २ मैंने तेरे लिये धन दिया।
३ तूने मेरे लिये धन नहीं दिया। ४ वह मनुष्य मेरा पुस्तक
तेरे साथ पढता है । ५ तू वीर पुरुष है । ६ वह उत्तम राजा
। ७ तेरा वीर पुत्र कहां है ? ८ अपने घर तू क्यों नहीं
पढता है ? ९ यहां तू कब आता है ? १० तेरा फल कहां है ?
११ जहां बलभद्रका वस्त्र है । १२ तूने आज कुछ भी नहीं
किया । १३ तेरे नगरसे मैं आज अभी आगया ।
संधि करके वाक्य ।
पूर्व पाठोंमें दिया वाक्योंके संधि नीचे दिये हुए वाक्यों.
में देखिये । इन वाक्योंको पाठक पूर्व पाठोंमें देख सकते हैं।
तदाऽहं तत्र गच्छमि । तदा तत्राऽहं गच्छामि ।
तदा तत्र गच्छाम्यहम् । कस्तत्र गच्छति ? तत्र को
गच्छति ? गच्छति कस्तत्र ? यदाऽहं तत्र न पश्यमि
तदा स तत्र गच्छति । यदा तत्राऽहं न पश्यामि स
तदा तत्र गच्छति । यदा तत्र नाऽहं पश्यामि स तदा
तत्र गच्छति । यदा तत्र न पश्याम्यहं स तदा तत्र
गच्छति। यदा त्वं तत्र न पश्यसि तदा सोऽत्र वदति।
यदा त्वं तत्र पश्यस्यत्र तदा स वदति । यदा त्वं
तत्र पश्यसि तदास बदत्यत्र । कदा त्वमत्र खादास?

(३०)
पाठ १३
निम्नलिखित वाक्य आप अब विना कष्ट समझ सकते हैं-
अहं सत्वरं आगच्छामि । किं त्वं मम गृहं प्रति
इदानी एव सत्वरं न आगच्छसि १ स कुत्र गतः?
मया धनं न दत्तम् । मया किं इदानीं उक्तम् ? त्वं
इदानीं किं किमपि न वदसि ? स इदानी कुत्र गतः?
त्वं इदानीं यत्र गच्छसि तत्र स आगच्छति किम् ?
पुरुषस्य नगरं कुत्र अस्ति ? स इदानीं फलं खादति।
मम पुस्तकं यत्र अस्ति तत्र त्वं इदानीं किं न गच्छसि ?
निम्नलिखित भाषावाक्योंका संस्कृत कीजिये-
मैं अब नहीं जाता हूं। तू मेरे साथ आता है । वह मेरे
साथ क्यों नहीं आता ? मेरा पुस्तक कहां है ? जहां मेरा घर
है वहां तू अव आता है ? मैं अपने घर जाता हूं। क्यो तू नहीं
आता? वह आता है । मैं शीघ्र जाता हूं।
संधि करके संस्कृत वाक्य ।
यत्र स पश्यति तत्राऽहं गच्छामि । स तत्र खादति।
त्वं कुत्र खादास? यत्र स गच्छति तत्राहं गच्छामि।
को वदति ? स किं वदति ? स तत्र न वदति।त्वं तत्र
किं ग्वादसि ? अहं न वदामि । नाऽहं वदामि।न वदा-
म्यहम् । स गच्छति । त्वं न पश्यसि ?
?
?

(३१) तदाऽहमत्र खादामि। यदा त्वं तत्र खादस्यहं त- दात्र खादामि । यदा त्वं तत्र खादसि तदाऽत्राहं खा- दामि । यदा त्वं तत्र वादसि तदाऽत्र खादाम्यहम् । अहं तत्र न पश्यामि । तत्राऽहं न पश्यामि । न तत्र पश्याम्यहम् । स तत्र न गच्छति । त्वमत्र किं पश्यसि ? त्वं किं पश्यस्यत्र ? किमत्र त्वं पश्यसि ? अहं तत्र गच्छामि । तत्राऽहं गच्छामि । गच्छाम्यहं तत्र । यत्र स गच्छति तत्राऽहं गच्छामि । यत्र स गच्छत्यहं तत्र गच्छामि। यत्र स गच्छति गच्छाम्यहं तत्र। यत्र स गच्छति गच्छामि तत्राहम् । यत्राहं पश्यामि तत्र त्वं किं न पश्यसि ? यत्र पश्याम्यहं तत्र त्वं किं न पश्यसि ? यत्र स पश्यति तत्राहं पश्यामि । यत्र स पश्यति तत्र पश्याम्यहम् । यत्र स पश्यत्यहं तत्र पश्यामि । नहि, नाहं तत्र गच्छामि । नहि, न तत्रा गच्छामि । नहि, न तत्र गच्छाम्यहम् । नाहं तत्र गच्छामि। सूचना। इसमें वाक्योंके शब्द इधर उधर करनेसे संधियों में कौनसा और कैसा भेद होता है यह बताया है। पाठक थोडे ही परि- श्रमसे कौनसा शब्द आगे पीछे किया है यह जान सकते है (३२) पाठ १४ - - अब निम्नलिखित शब्द स्मरण कीजिये- यदि-यदि नोचेत्-नहीं तो तर्हि-तो युक्तं-ठीक कथं-कैसे सत्यं-सच देखिये इनका उपयोग कैसा होता है- यदि त्वं तत्र न गच्छसि तर्हि अहं अत्र एव आगच्छामि | २ यदि त्वं फलं इदानीं न खादसि त- हि अहं फलं खादामि । ३ यदि त्वं वदसि तर्हि अहं वदामि।४ यदा त्वं पठसि तदा अहं न पठामि । ५ अहं सत्यं वदामि। ६ त्वं युक्तं वदसि । स न सत्यं वदति । ८ कथं त्वं एवं वदसि । १ यदि तू वहां नहीं जाता तो मैं यहां ही आता हूं। २ यदि तू फल अब नहीं खाता तो मैं भी फल नहीं खाता हूं। ३ यदि तू बोलता है तो मैं बोलता हूं। ४ जब तू पढता है तब मैं नहीं पढता । ५ मैं सच कहता हूं। ६ तू ठीक कहता है । ७ वह सच नहीं बोलता। ८ कैसे तू ऐसे बोलता है ? अब आप निम्न लिखित वाक्य पढते ही समझ सकते हैं- यदि त्वं गच्छसि तर्हि अहं न गच्छामि । यदि स भूपः अत्र आगच्छति तर्हि अहं किमपि न वदामि। -

?
कुत्र त्वं इदानीं गच्छसि ? यत्र त्वं न गच्छसि । स
किं न किमपि वदति ? न युक्तं उक्तं त्वया। स
इदानीं न सत्यं वदति । स सर्वदा एव सत्यं वदति।
अब निम्नलिखित भाषावाक्यक संस्कृत वाक्य बनाइये-
तू कहां जाता है ? वह अब कहां है ? राजा नगरमें है।
तू अपने घरमें है । मैं तेरे घरमें हूं। तू मेरे घरमें नहीं है।
अब तू मेरे घरमें पुस्तक पढता है। तू उत्तम शब्द बोलता
है । वह अब सत्य नहीं बोलता । तू अब ठीक क्यों नहीं
बोलता ? तू जहां जाता है वहां वह नहीं जाता । मैं अभी
शीघ्र जाता हूं। वह घरमें नहीं है । वह अब घरमें ही है।
संधि करके वाक्य ।
रामो गच्छति । कृष्णो वदति । सोमो न गच्छति।
कृष्णस्तत्र न पश्यति। तत्र कृष्णो न पश्यति ।
तत्र न कृष्णः पश्यति । न कृष्णस्तत्र पश्यति ।
कृष्णो न गच्छति । न कृष्णो गच्छति । रामो न
वदति । न रामो वदति । सोमो गच्छति। वायुः
सदा गच्छति । सदा वायुर्गच्छति । कृष्णः किं न
वदति ? किं कृष्णो न वदति ? किं न कृष्णो वदति?
जयचन्द्रः किं न पश्यति ? किं जयचन्द्रो न पश्यति ?
किं न जयचन्द्रः पश्यति ? सर्वमित्रो न खादति । न
सर्वमित्रः खादति । स तत्र किं न खादति ?
३

(३४) पाठ १५ - किसके द्वारा अब निम्नलिखित शब्द स्मरणमें रखिये- १क: कौन ४ कस्मै= किसके लिये २ कं = किसको ५ कस्मात् =किसके पाससे ३ केन = किससे, किसने, ६ कस्य = किसका ७ कस्मिन् = किसमें इन शब्दोंका उपयोग निम्न लिखित प्रकारसे कीजिये और वाक्य बनाइये- १ कः स पुरुषः अस्ति ? २ त्वं कं पुरुषं पश्यसि ? ३ तुभ्यं केन नरेण धनं दत्तम् ? ४ कस्मै जनाय त्वया वस्त्रं दत्तम् ? ५ कस्मात् नगरात् त्वं इदानीं आगतः ? ६ कस्य गृहे स इदानीं अस्ति ? ७ कस्मिन्नगरे कमलं नास्ति? Rom १ कौन वह मनुष्य है ? २ तू किस पुरुषको देखता है ? ३ तुझे किस मनुष्यने धन दिया ? ४ किस मनुष्यके लिये तूने वस्त्र दिया? ५ किस नगरसे तू अब आगया है ? ६किस- के घर अब वह है ? ७ किस शहरमें कमल नहीं है ? अब आप निम्नलिखित वाक्य पढते ही शीघ्र समझ सकते हैं।

(३५)
कः मनुष्यः अत्र आस्ति ? अत्र न कः पुरुषः
अस्ति । अहं एव अत्र इदानीं अस्मि । इदानीं त्वं
पुस्तकं पठसि किं ? स कृपणः पुरुषः तत्र नास्ति ।
अन त्वं कदा आगच्छसि ? त्वं सदा सत्यं वदसि
तथा अहं सदा युक्तं वदामि ।
अव निम्नलिखित शब्द स्मरण कीजिये।
लिखति =(वह) लिखता है तिष्ठति (वह) खडा रहता है।
लिखसि = (तू) लिखता है तिष्ठसि-(तू) खडा रहता है।
लिखामि=(मैं )लिखता हूं तिष्ठामि-(मैं) खडा रहता हूं।
पचति-(वह) पकाता है धावति-(वह) दौडता है।
पचसि = ( तू.) पकाता है धावसि =(तू) दौडता है।
पचामि = (मैं) पकाता हूं धावामि = (मैं) दौडता हूं
संधि बनाये वाक्य ।
रामोऽत्र पठति तदा तत्र स खादति । यदात्र रामः
पठति तदा तत्र स खादति । रामो यदात्र पठति
तदा तत्र स खादति। यदा कृष्णस्तत्र गच्छति तदा
स नैव पठति । कृष्णो यदा तत्र गच्छति तदा स नैव
पठति । यदा तत्र गच्छति कृष्णस्तदा स नैव पठति ।
अहमागच्छामि। आगच्छाम्यहम् । त्वमागच्छसि ।
अहं नागच्छामि । नागच्छाम्यहम् ।

(३६) पाठ १६ om आज आपके पन्दरह पाठ हुए हैं। इतने पाठोंसे आपकी योग्यता कितनी हुई है यह आप इस पाठमें देखिये । इस परीक्षाके लिये श्रीमद्भगवद्गीताके दो श्लोक यहां देते हैं- ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति । भ्रामयन्सर्वभूतानि यंत्रारूढानि मायया । तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत । तत्प्रसादात्परांशांतिस्थान प्राप्स्यसि शाश्वतम् ।। श्री० भगवद्गीता । अ०१८। ६१, ६२ पद-ईश्वरः। सर्व+भूतानां हृद्+देशे । अर्जुन । तिष्ठति । भ्रामयन् । सर्व+भूतानि । यंत्र+आरूढानि। मायया ॥६१॥ तं । एव । शरणं गच्छ । सर्व + भावेन । भारत । तत्+ प्रसादात् । परां । शांति । स्थानं । प्राप्स्यास । शाश्वतम्॥६२॥ अन्वय- हे अर्जुन ! सर्व-भूतानां हृद्देशे ईश्वरः तिष्ठति। मायया यंत्र-आरूढानि सर्व-भूतानि भ्रामयन् ॥ ६१॥ हे भारत ! तं एव सर्व-भावेन शरणं गच्छ। तत्-प्रसादात् परां शातिं शाश्वतं स्थान प्राप्स्यसि ॥ ६२ ॥ पाठको ! आपको प्रायः इन श्लोकोंका आशय समझमें आया (३७) ही होगा। यदि नहीं आया है, तो यह अन्वय दो चार वार पढिये, तो अवश्य भाव ध्यानमै आ जायगा । आपकी सुविधाके लिये शब्दार्थ यहां दिया जाता है- हे अर्जुन ! ( सर्व-भूतानां) सब प्राणियोंके ( हृद्-देशे) हृदयप्रदेशमें ईश्वर (तिष्ठति) ठहरा रहता है और (मायया) कुशलतासे (यंत्र-आरूढानि) यंत्र पर लगाये हुए चित्रोंके समान (सर्व-भूतानि) सब भूतोंको (भ्रामयन्) घुमाता है ॥६॥ हे (भारत) अर्जुन! (तं एव) उसीको ( सर्व-भावेन) पूर्ण भक्तिसे शरण ( गच्छ ) जा। ( तत्-प्रसादात् ) उसके प्रसादसे (परां) श्रेष्ठ शांति तथा शाश्वत स्थान (प्राप्स्यसि) तू प्राप्त करेगा ॥ ६२ ॥ इन दो श्लोकोंका आधा भाग तो आपके समझमें आगया था। कई शब्द आपको परिचित नहीं थे, इसलिये शेष आधा भाग आपके ध्यानमें नहीं आया था। यदि थोडे अधिक शब्द आपको परिचित हो जायगे, तो इस प्रकारके श्लोक भी आप अवश्य समझ जायगे । इतना विश्वास अपके मनमें इस समय अवश्य उत्पन्न हुआ होगा। यदि थोडेसे प्रयत्नसे आप ये श्लोक समझ सकते है तो आप यदि एक वर्ष इसी प्रकार प्रयत्न करेंगे तो रामायण महाभारत समझनेमे आपको कोई कठिनाइ नहीं होगी।

(३८)
पाठ १७
पूर्वोक्त श्लोकोंसे बननेवाले कई वाक्य देखिये-
हृद्देशे ईश्वरः तिष्ठति।
हृदये ईशः अस्ति।
तं शरणं गच्छ।
ईशं शरणं गच्छ।
ईश्वरं शरणं गच्छ।
परां शांति प्राप्स्यसि ।
शाश्वतं स्थान प्राप्स्यसि ।
इसी प्रकार अन्य वाक्य भी बहुतसे हो सकते हैं, उनको
यहां देखिये-
युद्धदेशे अर्जुनः तिष्ठति ।
रथे कृष्णः तिष्ठति।
नगरे भूपः तिष्ठति ।
द्वारदेशे नरः तिष्ठति
भूपं शरणं गच्छ।
नरं शरणं न गच्छ।
शोभनं पुस्तकं प्राप्स्यसि ।
इस प्रकार आप अनेकानेक वाक्य बनाते जायगे, तो संस्कृत
भाषामें आपकी प्रगति होने में बडीही सहायता होगी।
-

(३९) m- ? संस्कृत वाक्य । यदा त्वं लिखसि तदा स तत्र धावति । यदा स गृहे तिष्ठति तदा अहं पुस्तकं न पठामि । यदा स धावति तदा फलं खादति । यदा त्वं पचसि तदा अहं लिखामि । स पुरुषः इदानीं धावति । स वीरः पुरुषः कदा अत्र आगतः ? त्वं किमपि किं न लिखसि ? स किं अत्र तिष्ठति ? स किं धावति ? अव निम्नलिखित भाषावाश्यक संस्कृत वाक्य बनाईये- जब तू बोलता है तब वह दौडता है । वह क्यों पकाता है ? वह क्यों नहीं आया ? वह कहां है ? मैं यहां हूं। वह मनुष्य अब क्यों दौडता है ? जब तू फल खाता है तब वह पत्र लिखता है ? यदि तू नहीं देखता है, तो वह नहीं जाता है ? क्यों तू यहां खडा है ? वह यहां क्यों नहीं है ? तू अब क्यों नहीं दौडता? तू उसको पत्र क्यों नहीं लिखता ? तू कहां देखता है ? तू वहां क्यों नहीं देखता ? अब इन वाक्योंको आप विना यत्न समझ सकते हैं- त्वं इदानी किं पश्यसि ? सः अधुना कुत्र गतः ? रामः इदानीं तत्र नास्ति किम् ? अहं नगरात् इदा- नीमेव आगतः । अहं शीघ्रं पुस्तकं पठामि । ईश्वरः कुत्र अस्ति ? ईश्वरः हृद्देशे तिष्ठति। मनुष्यस्य हृदय- प्रदेशे ईशः अस्ति।मम हृदयदशे ईश्वरः अस्ति किम् ? , (४०) पाठ १८ - ५ तस्मात् = उससे %3D निम्नलिखित शब्द कण्ठ कीजिये १ सः - वह २ तं उसको ६ तस्य% उसका ३ तेन = उसने, उससे, ४ तस्मै उसके लिये ७ तस्मिन् = उसमें इनका अब वाक्यों में उपयोग कीजिये- तव पुस्तकं अहं नैव पठामि । मम पुस्तकं एव पठामि । त्वं इदानीं मम पुस्तकं पश्यसि । यदा त्वं तत्र गच्छसि तदा स कुत्र भवति ? यदि त्वं फलं न खादसि तर्हि अहं न खादामि । अधुना स पत्रं लि- खति । स पुस्तकेन सह अत्र आगच्छति । त्वं रामेण सह अत्र आगच्छसि किम् ? कथं स तत्र नागच्छति? पुस्तकस्य पत्रं कुत्र अस्ति ? तव गृहं कुत्र अस्ति ? मम गृहं तव गृहस्य समीपं एव अस्ति । तव हृदये ईश्वरः अस्ति एव । अहं तं ईश्वरं सर्व- भावेन शरणं गच्छामि । त्वं तं ईश्वरं सर्वभावेन शरणं गच्छ। विपुलं धनं प्राप्स्यसि। गृहे धनं भवति । मम गृहे श्रीरामचन्द्रः अस्ति । तेन सह अहं ब्रम- णाय गच्छामि । त्वं केन सह भ्रमणाय गच्छसि ? ?

(४१) - १ तस्य गृहं अत्र नास्ति । २ स इदानी कुत्र अस्ति? ३ तस्य नगरं अधुना गच्छ । ४ तेन तुभ्यं किं दत्तम्? ५ केन तस्मै फलं दत्तम् ? ६ तस्मात् नगरात् अत्र आगच्छ । ७ तस्य ईश्वरस्य वाचकः प्रणवः अस्ति । १ उसका घर यहां नहीं है। १ वह अब कहां है ? ३ उसके शहरको अब जा । ४ उसने तुमको क्या दिया ?५किसने उसे फल दिया? ६ उस नगरसे यहां आ।७ उस ईश्वरका वाचक प्रणव (ओंकार ) है। अब आप निम्नलिखित घाक्य पढते ही समझ सकते संस्कृतपाठः। तस्मिन् नगरे तव गृहं कस्मिन् स्थाने अस्ति? राम- चंद्रस्य गृहस्य समीपे मम गृहं अस्ति । सूर्यस्य प्रकाशे सः तिष्ठति । त्वं सूर्यस्य किरणे पुस्तकं किं पठसि? तेन मह्यं पुस्तकं दत्तं, तत् अहं इदानीं चंद्रस्य प्रका- शेन पठामि। त्वं दीपस्य प्रकाशे पुस्तकं पठसि किम्? नहि नहि, अहं दीपस्य प्रकाशे पुस्तकं न पठामि। अहं ह्यः रामचन्द्रस्य गृहं गतः। तत्र इंद्रदत्तः किं पश्यति ? स फलं किं न खादति ? सोमेन दत्तं फलं स न खादति । रामस्य शोभनं पुस्तकं कुत्र अस्ति? तत् नगरं गच्छ । स त्वां तत्र पश्यति । अहं अत्र त्वां पश्यामि । कथं स तत्र गच्छति ?स तत्र नास्ति ।

हो
%3D
(४२)
ये शब्द अब स्मरण कीजिये
वद = बोल ।
पठ पढ । भव -
पश्य = देख । खाद खा । गच्छ : जा
आगच्छ = अ ।। पच% पका । धाव = दौड
प्रापय% पहुंचा। चल = चल। पत = गिर जा
कुरु-कर ।
। देहि = दो । ब्रूहि = बोल, कह
लिख = लिख। तिष्ठ
तिष्ठ = ठहर । मामय 3 घुमा
नय - लेजा।
उपविश-बैठ। आनय = ला
अब इनका उपयोग करके वाक्य बनाइये-
१ हे रामचंद्र ! त्वं फलं खाद।२ हे मनुष्य ! पुस्तकं
पठ। ३ त्वं तत्र गच्छ। ४ इदानीं सत्वरं धाव ।
५ सत्यं वद । ६ पत्रं लिख । ७ फलं तत्र नय ।
१ हे रामचन्द्र ! तू फल खा । २ हे मनुष्य ! तू पुस्तक पढ।
३ तू वहां जा। ४ अब शीघ्र दौड । ५ सच बोल । ६ पत्र
लिख । ७ फल वहां लेजा।
वाचनपाठः।
बेहि, स इदानीं कुत्र गतः ? वद, त्वं किं
अधुना पठसि ? चक्रं भ्रामय इदाना । अधुना धाव ।
फलं शीघ्रं खाद । रामस्य शोभनं पुस्तकं कृष्णस्य
गृहं नय । तव रक्तं वस्त्रं कः पश्यति ? मम पीतं
वस्त्रं शीघ्रं तत्र नय। अत्र एव उपविश । इदानीं
अहं अत्र एव तिष्ठामि, त्वं शीघ्रं अत्र आगच्छ ।
?

(४३)
पाठ १९
?
-
अब आपकी योग्यता इतनी हुई है कि आप निम्नलिखित
वाक्य पढते ही समझ जायगे।
तं तस्य गृहं प्रापय ।मम पत्रं तत्र नय । तस्मै एकं
पत्रं देहि । तं देशं गच्छ । अधुना बहि, त्वया किं
उक्तम् ? स कदापि युक्तं न वदति । अहं सदा युक्तं
सत्यं एव वदामि । गृहस्य समीपं स लिखति । स
इदानीं वने वृक्षस्य समीपं तिष्ठति। फलं देहि, पुस्तकं
नय, पत्रं लिख ।
अब इस पाठमें निम्नलिखित शब्द कण्ठ कीजिये-
१ यः-- जो
५ यस्मात् -- जिससे
२यं-जिसको
६ यस्य जिसका
३ येन-जिसने
४ यस्मै- जिसके लिये ७ यस्मिन् - जिसमें
इनका उपयोग आप करेंगे तो आप बहुतसे उपयोगी
वाक्य बना सकते हैं । देखिये --
१ यः शूरः पुरुषः इदानीं मम नगरे अस्ति,स एव
तत्र अद्य गच्छति । २ यं त्वं इदानीं तत्र पश्यासि,स
एव स भूपः। ३ येन तुभ्यं धनं दत्तं, स एव वीरः

(४४) अस्ति।४ तस्मात् नगरात् इदानीं यः मनुष्यः आगतः स एव यज्ञदत्तशर्मा अस्ति । ५ यस्य पुरुषस्य पुस्तकं त्वं पठसि, स एव मम गृहे इदानीं अस्ति । ६ यस्मिन् गृहे सः नरः अस्ति तत् गृहं कुत्र अस्ति? ७ तस्य भूपस्य किं नगरम् ? १ जो शूर मनुष्य अब मेरे नगरमें है वह ही वहां आज जाता है । २ जिसको तू अब वहां देखता है वह राजा (है)। जिसने तुझे धन दिया वह ही शूर है । ४ उस नगरसे अब जो मनुष्य आया वह ही यज्ञदत्तशर्मा है । ५ जिस मनुष्यका पुस्तक तू पढता है वह मेरे घरमें इस समय है। ६ जिस घरमें वह मनुष्य है वह घर कहां है ? ७ उस राजा- का शहर कौनसा? अव निम्न लिखित शब्द स्मरण कीजिये- वदिष्यति-बोलेगा (वह) ग्वादिष्यामि -- खाऊंगा। वदिष्यसि (तू) गमिष्यति - जायगा (वह) वदिष्यामि -- बोलूंगा। गमिष्यसि-- जायगा (तू) द्रक्ष्यति -- देखेगा (वह) गमिष्यामि - जाऊंगा। द्रक्ष्यसि- (तू) पक्ष्यति -- पकायेगा ( वह द्रक्ष्यामि --देखूगा। पक्ष्यसि- (तू) खादिष्यति खायेगा (वह) पक्ष्यामि -- पकाऊंगा। खादिष्यासि (तू) करोमि -- करता हूं wp- - (४५) an- इनका उपयोग करके अब आप वाक्य बना सकते हैं- १ यदा त्वं तत्र गमिष्यसि, तदा अहं त्वां द्रक्ष्यामि। ३ कदा त्वं भूपस्य नगरं गमिष्यसि ?३ यदा त्वं श्वः तत्र गमिष्यसि, तदा अहं अपि तत्र एव आगमि- ष्यामि । ४ यदा त्वं फलं ग्वादिष्यसि तदा अहं अपि फलं खादिष्यामि । ५ यदा रामः अन्नं पक्ष्यति तदा त्वं अपि अन्नं खादिष्यास । ६ यदा स पुस्तकं पठि- प्यति तदा अहं अपि पठिष्यामि । ७ यदि त्वं तत्र न गमिष्यसि तर्हि अहं अन्नं अपि न ग्वादिष्यामि । ८ अहं मम गृहं अद्य इदानीं गच्छामि, त्वं श्वः आगमिष्यसि। कः इदानीं तत्र गमिष्यति? १० अहं अद्य अन्नं नैव पक्ष्यामि । १ जब तू वहां जायगा, तब मैं तुझे देखूगा।२ कब तू राजाके नगरको जायगा? ३ जब तू कल वहां जायगा, तब मैं भी वहां ही आऊंगा। ४ जब तू फल खायेगा तब मैं भी फल खाऊंगा। ५ जब राम अन्न पकायेगा तब तू भी अन्न खायेगा। ६ जब वह पुस्तक पढेगा तब भी पढूंगा। ७ यदि तू वहां नहीं जायगा, तो मैं अन्न भी नहीं खाऊंगा । ८ मैं अपने घर आज अभी आता हूं, तू कल आवेगा। ९ कौन अब वहां जायगा ? १० मैं आज अन्न नहीं पकाऊंगा।

(४६) - - - पाठ २० इस पाठमें आप निम्नलिखित शब्द ध्यानमें रखिये- धाविष्यति धावेगा (वह) चलिष्यामि चलूंगा धाविष्यसि = ( तू) भविष्यति = होवेगा (वह) धाविष्यामि = धाऊंगा भविष्यसि (तू) प्रापयिष्यति पहुंचायेगा भविष्यामि होऊंगा। प्रापयिष्यसि (तू) प्रापयिष्यामि = पहुंचाऊंगा पतिष्यति गिरेगा (वह) चलिष्यति = चलेगा (वह ) पतिष्यसि (तू) चलिष्यसि गिरूंगा। अब इनका उपयोग करके आप कई वाक्य बना सकते हैं। संस्कृत वाक्य। १ अहं इदानीं धाविष्यामि । २ किं त्वं न धावि- ष्यसि ? ३ किं स मम पत्रं तं नरं प्रापयिष्यति ? ४ यदि स नगरं गमिष्यति तर्हि तव पत्रं प्रापयिष्यति। ५ तत् कथं भविष्यति ? ६ तत् एवं भविष्यति ७ स इदानीं कूपे पतिष्यति । ८ नहि नहि, स इदानीं तस्मिन् कूपे नैव पतिष्यति।९ पश्य तं, कथं स धावति । १० अहं पश्यामि परंतु स इदानीं न ,, (तू) पतिष्यामि - -

(४७)
?
धावति । ११ त्वं कुत्र पश्यति ?
भाषा वाक्य।
१ मैं अब धावूगा । २ क्या तू नहीं धावेगा ? ३ क्या
वह मेरा पत्र उस मनुष्यको पहुंचायेगा ? ४ यदि वह शहरको
जायेगा तो तेरा पत्र पहुंचायेगा । ५ वह कैसे होगा ? ६ वह
ऐसा होगा । ७ वह अब कूवेमें गिरेगा। ८ नहीं, नहीं वह
अब उस कूवेमें नहीं गिरेगा।९ देख उसे, कैसा वह दौडता
है । १० मैं देखता हूं परंतु वह अब दौडता नहीं । ११ तू
कहां देखता है ?
अब निम्नलिखित शब्द स्मरण कीजिये
मध्याह्ने = मध्यदिनमें सायं = शामको
दिवा = दिनमें
जैसा
रात्रौ = रात्री
तैसा
प्रातः = सबेरे, प्रातःकालमें द्रुतं = शीघ्र
इन शब्दोंका उपयोग करके अब वाक्य बनाइये-
संस्कृत वाक्य ।
१ स मध्याहे कुत्र गच्छति ? २ यत्र रामः गच्छति
तत्र एव स गच्छति । ३ त्वं रात्रौ कुत्र गमिष्यसि ?
४ अहं तव गृहं गमिष्यामि । ५ स सायं नैव गमि-
प्यति । ६यदास गमिष्यति, तदः त्वं किं करिष्यसि ?
यथा
तथा =

(४८)
भाषा वाक्य।
१ वह मध्यदिनमें कहां जाता है ? २ जहां राम जाता
वहां ही वह जाता है । ३ तू रात्री में कहां जावेगा ? ४ मैं
तेरे घर जाऊंगा। ५ वह सायंकाल नहीं जावेगा। ६ जब
वह जायगा, तब तू क्या करेगा ?
अव निम्नलिखित वाक्य आप सुगमतासे बोल सकते हैं-
संस्कृत-वाचन-पाठः।
अहं तव गृहं सायं आगमिष्यामि । त्वं मम गृहं
सायं सत्वरं आगच्छ । सः अद्य तस्य नगरं गमि-
ष्यति, फलं भक्षयिष्यति । यथा स पुस्तकं पश्यति
तथा पठति । नहि नहि, सः पुस्तकं पश्यति परंतु
नैव पठति । स इदानी पुस्तकं पश्यति परंतु किं न
पठति ? त्वं तत्र दिवा किं न गमिष्यसि ? रामचंद्रः
रात्री दीपस्य प्रकाशेन पुस्तकं पठिष्यति । त्वं यदि
अन्नं पक्ष्यसि तर्हि अहं खादिष्यामि । तस्मिन् वने
इदानी सलिलं शोभनं भविष्यति । तस्मिन् गृहे
श्वेतं वस्त्रं नास्ति । कस्मिन् गृहे रक्तं पत्रं अस्ति,
वद । शीघ्रं ब्रूहि । तव पुस्तकं नवीनं अस्ति परंतु मम
पुराणं अस्ति । यदा धनाढ्यः पुरुषः गमिष्यति तदा
अहं अपि गमिष्यामि ॥

(४९)
--
-
पाठ २१
इस पाठमें निम्नलिखित शब्द स्मरण कीजिये-
करिष्यति = (वह) करेगा दास्यामि- (मैं) दूंगा
करिष्यसि%3(तू) नेष्यति-(वह) ले जायगा
करिष्यामि = (मैं) करूंगा
नेष्यसि-- (तू)
दास्यति= (वह) देगा
दास्यासि= (तू)
नेष्यामि-(मैं) ले जाऊंगा
इन शब्दोंका अब उपयोग कीजिये-
१ त्वं कर्म करिष्यसि किम् ? २ नहि, अहं अद्य
नैव करिष्यामि। ३ स कर्म कदा करिष्यति? ४ यदा
त्वं करिष्यसि, तदा स करिष्यति । ५ स मह्यं फलं
दास्यति। ६त्वं मह्यं पुस्तकं नैव दास्यसि किम् ?
७ त्वं इदानी पुस्तकं तत्र नय। ८ अहं तत्र इदानीं नैव
गमिष्यामि । ९ त्वं कदा तत्र गमिष्यसि ?
१ क्या तू कार्य करेगा ? २ नहीं, आज कभी नहीं
करूंगा। ३ वह कार्य कब करेगा? ४ जब तू करेगा, तब वह
करेगा । ५ वह मुझे फल देगा।६ क्या तु मुझे पुस्तक नहीं
देगा १७ तू अभी पुस्तक वहां ले जा । ८ मैं वहां अब नहीं
जाऊंगा । ९ तू कब वहां जावेगा ?
१० अहं श्वः गमिष्यामि।११ तर्हि अद्य कः गमि-
४

(५०) ? , ष्यति? १२प्रायः भूमित्रः अद्य सायं तत्र गमिष्यति। १३ त्वं पत्रं कदा लेखिष्यसि ? १४ अहं पत्रं अधुना एव लिखामि । १५ यदा त्वं पक्ष्यसि, तदा स कुत्र भविष्यति? १६ यदा अहं अन्नं पक्ष्यामि तदा स स्व- गृहे एव भविष्यति।१७ अहं कदापि नैव पतिष्यामि। १० मैं कल जाऊंगा। ११ तब आज कौन जायगा? १२ प्रायः भूमित्र आज शामको वहां जावेगा। १३ तू पत्र कब लिखेगा ? १४ मैं पत्र अभी लिखता हूं। १५ जब तू पका- येगा, तब वह कहां होगा ? १६ जब मैं पकाउंगा तब वह अपने घरमेंही होगा। १७ मैं कवीभी नहीं गिरूंगा। अब निम्नलिखित शब्द स्मरण कीजिये- वदितुं= बोलनेके लिये पठितुं = पढनेके लिये द्रष्टुं देखनेके लिये खादितुं= खानेके लिये गन्तुं = जानेके लिये आगन्तुं = आनेके लिये पक्तुं = पकानेके लिये धावितुं = दौडनेके लिये प्रापयितुं = पहूंचानेके लिये चलितुं = चलनेके लिये भवितुं होनेके लिये पतितुं = गिरनेके लिये कर्तु = करनेके लिये दातुं = देनेके लिये वक्तुं = बोलनेके लिये लेखितुं लिखनेके लिये स्थातुंठहरनेके लिये भ्रामयितुं घुमानेके लिये नेतुं% ले जानेके लिये उपवेष्टुं = बैठनेके लिये (५१) इन शब्दोंका उपयोग करके अब आप वाक्य बना सकते हैं- १ अहं इदानीं तेन सह वदितुं इच्छामि । २ रामः तत्र गन्तुं इच्छति । ३ त्वं धनं दातुं न इच्छसि किं ? ४ स इदानीं पत्रं लेखितुंतत्र गतः। ५ त्वं तत्र फलं प्रापयितुं किं न गच्छसि? ६अहं कन्दुकंभ्रामयितुंगतः। ७ अहं इदानीं अत्र उपवेष्टुं इच्छामि । ८ सः अद्य पक्तुं तत्र गमिष्यति । ९. अहं अद्य सायं धावितुं इच्छामि । १० स पुरुषः शोभनं अपि फलं खादितुं किं न इच्छति ? ११ स साधुः अस्ति । १२ अतः न इच्छति । १३ अहं ईशं शरणं गन्तुं इच्छामि । १४ त्वं सर्वेश्वरं शरणं गच्छ । १ मैं अब उसके साथ बोलना चाहता हूं। २ राम वहां जाने की इच्छा करता है। ३ क्या तू धन देने की इच्छा कर- ता नहीं ? ४ वह पत्र लिखनेके लिये वहां गया । ५ तू वहां फल पहुंचानेके लिये क्यों नहीं जाता? ६मैं गेंद घुमाने के लिये गया था । ७ मैं अब यहां बैठना चाहता हूं। ८ वह आज पकानेके लिये वहां जावेगा । ९ मैं आज शामको दौडना चाहता हूं १० वह मनुष्य उत्तम भी फल खानेकी इच्छा क्यों नहीं करता ? ११ वह साधु है। १२ इसलिये इच्छा नहीं करता । १३ में ईश्वरको शरण जानेकी इच्छा करता हूं। १४ तू सबके ईश्वरको शरण जा। ?

(५२)
पाठ २२
इस पाठमें आपको कुछ श्लोक बताये जाते हैं-
सत्यस्य वचनं श्रेयः सत्यादपि हितं वदेत् ।
यद्भूतहितमत्यन्तमेतत्सत्यं मतं मम ॥
म० भारत शांति० ३२९ । १३
पद-सत्यस्य । वचनं । श्रेयः। सत्यात्। अपि।हितं । वदेत्।
यत् । भूत+हितं । अत्यन्तं । एतत् । सत्यं । मतं । मम ॥
अन्वय- सत्यस्य वचनं श्रेयः।सत्यात् अपि हितं वदेत् ।
यत् अत्यन्तं भूतहितं एतत् सत्यं, ( इति ) मम मतम् ॥
अर्थ- सत्यका भाषण (श्रेयः) कल्याण करनेवाला है।
सत्यसे भी (हित) हितकारक भाषण (वदेत् । बोलना चाहिये।
जो अत्यंत (भूतहितं) प्राणिमात्रका हितकारी वचन, (एतत्)
वह सत्य (है, ऐसा) मेरा मत है।
यह श्लोक आपको विना प्रयत्न समझमें आगया होगा।
कुछ शब्दोकी कमी आपके पास इस समय है। वह यदि दूर
होगी, तो ऐसे श्लोक सुगमतासे समझ सकते हैं, यह बात
आपको बतानेके लिये ही इस पाठमें दो तीन श्लोक देनेका
विचार किया है-
an

(५३)
न भीतो मरणादस्मि केवलं दूषितं यशः ।
विशुद्धस्य हि मे मृत्युः पुत्रजन्मसमः किल ।
मृच्छकटिक नाटक १०।२७
पद-न । भीतः । मरणात् । अस्मि । केवलं । दूषितं ।
यशः। विशुद्धस्य । हि । मे।मृत्युः। पुत्र जन्म+समः।किल।
अन्वय- (अहं ) मरणात् भीतः न अस्मि । केवलं यशः
दूषितं । हि वि+शुद्धस्य मे मृत्युः किल पुत्रजन्म-समः॥
अर्थ-- (मैं) मरणसे (भीतः) डरा हुआ नहीं हूं। केवल
यश (दूषितं ) कलंकित हुआ (इसलिये बुरा लगता है)
(हि) क्यों कि (वि+शुद्धस्य ) अत्यंत शुद्ध रहते हुए (मे) मेरा
मृत्यु हुआ तो (किल)निःसंदेह पुत्रका जन्म होनेके समान है।
पिताऽऽचार्यः
सुहृन्माता
भार्या
पुत्रः पुरोहितः।
नाऽदण्डयो नाम राज्ञोऽस्ति यः स्वधर्म न तिष्ठति ॥
मनुस्मृति ८।३३५
पद-पिता । आचार्यः । सुहृत् । माता। भार्या । पुत्रः।
पुरोहितः। न । अ+दण्डयः । नाम । राज्ञः। अस्ति । यः
ख+धर्मे । न । तिष्ठति ।
अन्वय- पिता आचार्यः सुहृत् माता भार्या पुत्रः
पुरोहितः यःस्व+धर्मेन तिष्ठति, (सः) राज्ञः अ+दण्डयः
नाम न अस्ति ।

(५४) अर्थ-पिता, आचार्य, ( सुहृत् ) मित्र, माता, (भार्या) स्त्री, पुत्र, पुरोहित [कोई भी तो] जो स्वधर्ममें नहीं रहता वह (राज्ञः) राजाके लिये (अ+दण्ड्यः) अदण्डनीय नहीं है अर्थात् राजा उनको दंड दे सकता है । न तेन वृद्धो भवति येनाऽस्य पलितं शिरः। यो वै युवाऽप्यधीयानस्तं देवाः स्थविरं विदुः॥ मनुस्मृति २११५६ पद-न । तेन । वृद्धः। भवति । येन । अस्य । पलितं । शिरः। यः। वै । युवा । अपि । अधीयानः । तं । देवाः । स्थविरं । विदुः॥ अन्वय-येन अस्य पलितं शिरः तेन वृद्धः न भवति। यः वै युवा अपि अधीयानः तं देवाः स्थविरं विदुः॥ अर्थ-(अस्स) इसका (पलितं) सफेद सिर हुआ इस- से ही वृद्ध नहीं होता। जो (वै) निश्चयसे (युवा) जवान है परंतु ( अधीयानः ) ज्ञानवान् है उसको (देवाः) ज्ञानी लोग (स्थविरं) वृद्ध (विदुः) जानते हैं।

(५५) त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः। कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत् ॥ भगवद्गीता १६।२१ पद-त्रि+विधं । नरकस्य । इदं । द्वारं । नाशनं । आत्म- नः। कामः । क्रोधः । तथा । लोभः । तस्मात् । एतत् । त्रयं । त्यजेत् । अन्वय- आत्मनः नाशनं नरकस्य एतत् त्रिविधं द्वारं । कामः क्रोधः लोभः । तस्मात् एतत् त्रयं त्यजेत् ॥ अर्थ- अपना नाश करनेवाला नरकका यह (त्रिविधं) तीन प्रकारका द्वार है । काम, क्रोध और लोभ [ यही वह द्वार है ] इसलिये ( एतत् ) ये (वयं) तीन (त्यजेत्) छोड दें। दूर करें। पाठक इन श्लोकोंको बार बार पढ़ें और पढते ही अर्थ ध्यानमें आता है वा नहीं देख लें। पांच छः बार पढते ही अर्थ समझ जायगा। इतने थोडेसे पाठ होते ही पाठकोंकी योग्यता कितनी हुई है, यह इस पाठमें पाठक अनुभव करें। इस पुस्तककी पद्धति नवीन है । परन्तु यह पद्धति इतनी सुगम है कि पाठक इससे एक वर्षके अन्दर ही संस्कृत भाषामें स्वयं प्रवेश कर सकेंगे।

(५६)
च-और
प्रभूतं-बहुत
पाठ २३
अब इस पाठमें निम्नलिखित शब्द स्मरण कीजिये-
अपि-भी
वा-किंवा
नोचेत्-नहीं तो
अथवा-किंवा
हि-क्यों कि
किंवा-
चेत्-यदि
न्यून-थोडा
अब इनका वाक्योंमें उपयोग कीजिये-
१ यदि सः अद्य अत्र आगमिष्यति तर्हि त्वं
तत्र न गच्छ, नोचेत् श्वः प्रातः एव गच्छ । २ किं
त्वं पुस्तकं पठिष्यसि अथवा स पठिष्यति ? ३ स
सदा प्रभूतं वदति। ४ त्वं वद नोचेत् अहं वदिष्यामि।
५ सत्यं अपि अयुक्तं न वद ।
१ यदि वह आज यहां आवेगा तो तू वहां न जा, नहीं
तो कल प्रातः ही वहां जा। २ क्या तू पुस्तक पढेगा अथवा
वह पढेगा? ३ हमेशा वह बहुत बोलता है। ४ तू बोल, नहीं
तो मैं बोलूंगा । ५ सच भी (परन्तु) अयोग्य न बोल।
अब आप निम्न लिखित वाक्य पढते ही समझ जायगे।
यदि सः अद्य इदानीं फलं न खादति तर्हि त्वं
इदानीं एव खाद । त्वं श्वः कुत्र गमिष्यसि ? यदि सः
अद्य न आगमिष्यति तर्हि अहं तस्य गृहं श्वः सायं
३

(५७) गमिष्यामि। कःतत्र इदानीं एवं वदति ? तत्र रामभद्रः अस्ति स एवं वदति।नहि नहि, तत्र रामचंद्रः नास्ति। तर्हि कः सः? स हरिश्चंद्रः अस्ति ।स कः हरिश्चंद्रः?स नागपुरदेशीयः विष्णुमित्रस्य पुत्रः हरिश्चंद्रः इदानीं एव नागपुरात् अत्र आगतः। स शोभनः पुरुषः अस्ति । स नागपुरं कदा पुनः गमिष्यति? सः परश्वः सायं नागपुरं प्रति गमिष्यति अथवा श्वः एव गमि- ष्यति । स केन सह आगतः ? स देवदत्तेन सह आगतः। देवदत्तः अपि तेन सह गमिष्यति किम्? नहि देवदत्तः अत्र एव स्थास्यति, स एव गमिष्यति । त्वं इदानीं किं करिष्यसि ? अहं इदानीं न किमपि करोमि। अब निम्नलिखित शब्द स्मरण कीजिये- नगरं - शहर पुष्पं -- फूल उद्यानं- बाग चंदनं - चंदन तोयं जल वस्त्रं कपडा नीरं तिमिरं-- अंधेरा उदकं बरतन नवं नाखून अन्नं दुग्धं -- दूथ पीतं .- पिया इनके उपयोगसे अब आप कई वाक्य बना सकते हैं- श्रीरामचंद्रस्य नगरं अयोध्या नाम आस्ति । श्री- " पात्रं -- - -

-
(५८)
कृष्णस्य नगरं द्वारका नाम अस्ति। त्वया दुग्धं किंन
पीतम् ? मया दुग्धं न पीतम् । तत्र दुग्धं नास्ति, तत्र
नीरं अस्ति । मम वस्त्रं तेन इदानीं नीतम् । तस्मिन्
गृहे त्वं उपविश । अहं इदानीं मध्याह्नसमये
सूर्यस्य किरणे, सूर्यस्य प्रकाशे वा उपविशामि। तव
नखं कथं न रक्तं अस्ति ? कथं पीतं एव दृश्यते ?
तस्मिन् कूपे उदकं नास्ति । तस्मिन् जले कमलस्य
पुष्पं न भवति ।
निम्नलिखित भाषा वाक्यक संस्कृत वाक्य बनाइये-
मैं अब घर जाता हूं। दूध कहां है? वह कहां गया है? मैं
अभी घरसे आया । वह सूर्यके किरणमें क्यों नहीं जाता ?
उसका घर कहां है ? उसका बाग कहां है ? बलराम कहां
गया ? तू वहां क्यों नहीं जाता है ?
निम्नलिखित संस्कृत वाक्योंके भाषावाक्य बनाइये-
अहं इदानी गृहात् अत्र आगतः। फलं कुत्र
अस्ति ? त्वया जलं किं न आनीतम्? स इदानीं जलं
न आनेष्यति किम् ? स किं पश्यति ? स तत्र तव
पत्रं न नेष्यति । अहं एव मम पुस्तकं तव गृहं प्रति
प्रापयिष्यामि । तव गृहं कुत्र अस्ति ? स कथं न
आगच्छति ? यदि स इदानीं न आगतः तर्हि श्वः
प्रातःकाले आगमिष्यति । तस्मिन् कूपे प्रभूतं जलं
अस्ति । त्वं पश्यास किम् ? तत्र इदानी सान भवति।

(५९)
?
पाठ २४
यदि पाठकोंके पूर्व पाठ ठीक हो चुके हैं तो इस पाठके
चाक्य उनको विना परिश्रम समझ सकते हैं । इसमें पूर्व पाठोंके
ही वाक्य संधि बनाकर दिये हैं-
तस्य गृहमत्र नास्ति । स इदानीं कुत्राऽस्ति ? तस्य
नगरमधुना गच्छ । तेन तुभ्यं किं दत्तम् ? केन तस्मै
फलं दत्तम् ? तस्मान्नगरादत्राऽऽगच्छ । तस्येश्वरस्य
वाचकः प्रणवोऽस्ति।
तस्मिन्नगरे तव गृहं कस्मिंस्थानेऽस्ति। रामचन्द्रस्य
गृहस्य समीपे मम गृहमस्ति । सूर्यस्य प्रकाशे स
तिष्ठति । सूर्यस्य किरणे पुस्तकं किं पठसि ? तेन मा
पुस्तकं दत्तम् । तदहमिदानी चंद्रस्य प्रकाशे न पठा-
मि । त्वं दीपस्य प्रकाशे पुस्तकं पठसि किम् ? नहि
नहि, अहं दीपस्य प्रकाशे पुस्तकं न पठामि । अहं ह्यो
रामचंद्रस्य गृहं गतः । तत्रेन्द्रदत्तः किं पश्यति ? स
फलं किं न खादति? सोमेन दत्तं फलं स न खादति।
रामस्य शोभनं पुस्तकं कुत्रास्ति ? तन्नगरं गच्छ ।
स त्वां पश्यति । अहमत्र त्वां पश्यामि । कथं स
तत्र गच्छति ? स तत्र नास्ति ।
हे रामचंद्र ! त्वं फलं खाद । हे मनुष्य ! पुस्तकं

(६०)
पठ । त्वं तत्र गच्छ । इदानीं सत्वरं धाव । सत्यं
वद । पत्रं लिख । फलं तत्र नय।
ब्रूहि, स इदानीं कुत्र गतः ? वद, त्वमधुना किं
पठसि ? चक्रं भ्रामयेदानीम् । अधुना धाव । फलं
शीघ्रं खाद । रामस्य शोभनं पुस्तकं कृष्णस्य गृहं
नय । तव रक्तं वस्त्रं कः पश्यति ? मम पीतं वस्त्रं
शीघ्रं तत्र नय। अत्रैवोपविश । इदानीमहमत्रैव
तिष्ठामि, त्वं शीघ्रमत्रागच्छ । तं तस्य गृहं प्रापय ।
मम पत्रं तत्र नय। तस्मायेकं पत्रं देहि । तं देशं
गच्छ । अधुना बेहि, त्वया किमुक्तम् १ स कदापि
युक्तं न वदति । अहं सदा युक्तं सत्यमेव वदामि ।
गृहस्य समीपं स लिखति । स इदानीं वने वृक्षस्य
समीपं तिष्ठति । फलं देहि। पुस्तकं नय । पत्रं लिख ।
यः शूरः पुरुष इदानीं मम नगरेऽस्ति स एव तत्राद्य
गच्छति। यं त्वमिदानीं तत्र पश्यसि स एव स भूपः।
येन तुभ्यं धनं दत्तं स एव वीरोस्ति । तस्मान्नगरा-
दिदानी यो मनुष्य आगतःस एव यज्ञदत्तशर्माऽस्ति।
यस्य पुरुषस्य पुस्तकं त्वं पठसि स एव मम गृहे
इदानीमस्ति । यस्मिन्गृहे स नरोऽस्ति, तद् गृहं
कुत्रास्ति ? तस्य भूपस्य किं नगरम ?

. यदा त्वं तत्र गमिष्यसि, तदाऽहं त्वां द्रक्ष्यामि । कदा त्वं भूपस्य नगरं गमिष्यसि ? यदा त्वं श्वस्तत्र गमिष्यसि, तदाऽहमपि तत्रैवागमिष्यमि। यदा त्वं फलं खादिष्यसि, तदाऽहमपि फलं खादिष्यामि। यदा रामोऽन्नं पक्ष्यति तदा त्वमप्यन्नं खादिष्यसि । यदा स पुस्तकं पठिष्यति तदाऽहमपि पठिष्यामि । यदि त्वं तत्र न गमिष्यास तयहमन्नमपि न खादि- ष्यामि । अहं मम गृहमद्येदानीं गच्छामि, त्वं श्व आगमिष्यसि । क इदानीं तत्र गमिष्यति ? अहम- द्याऽन्नं नैव पक्ष्यामि । अहमिदानीं धाविष्यामि । त्वं न धाविष्यसि ? किं स मम पत्रं तं नरं प्रापयिष्यति ? यदि स नगरं गमिष्यति तर्हि तव पत्रं प्रापयिष्यति। तत्कथं भविष्यति तदेवं भविष्यति । स इदानीं कूपे पति- ष्यति । नहि नहि, स इदानीं तस्मिन्कूपे नैव पति- ष्यति । पश्य तं, कथं स धावति । त्वं कुत्र पश्यति? सूचना-पाठकोंको यदि कुछ वाक्य समझमें नहीं आये तो वे पूर्व पाठोंमें इन वाक्योंको देख सकते हैं ।

(६२)
पाठ २५
संस्कृत-वाचन-पाठः।
स मध्याहे कुत्र गच्छति ? यत्र रामो गच्छति
तत्रैव स गच्छति । त्वं रात्रौ कुत्र गमिष्यसि ? अहं
तव गृहं गमिष्यामि । स सायं नैव गमिष्यति, तदा
त्वं किं करिष्यासि?
?
अहं तव गृहं सायमागमिष्यामि । त्वं मम गृहं
सायं सत्वरमागच्छ । सोऽद्य तस्य नगरंगमिष्यति।
फलं भक्षयिष्यति । यथा स पुस्तकं पश्यति, तथा
पठति । नहि नहि, स पुस्तकं पश्यति परंतु नैव पठति।
स इदानीं पुस्तकं पश्यति परंतु किं न पठति ? त्वं
तत्र दिवा किं न गमिष्यसि ? रामचंद्रो रात्री दीपस्य
प्रकाशेन पुस्तकं पठिष्यति । त्वं यद्यन्नं पक्ष्यसि
तहिं खादिष्यामि। तस्मिन्वन इदानीं सलिलं शोभनं
भविष्यति । तस्मिन्गृहे श्वेतं वस्त्रं नास्ति। कस्मि-
न्गृहे रक्तं वस्त्रमस्ति ? वद। शीघ्रं रूहि । तव पुस्तकं
नचीनमस्ति परंतु मम पुराणमस्ति । यदा धनाढ्यः
पुरुषो गामिष्यति, तदाऽहमपि गमिष्यमि।

(६३) त्वं कर्म करिष्यसि किम् ? नहि, अहमद्य नैव करिष्यामि । स कर्म कदा करिष्यति ? यदा त्वं करिष्यसि,तदा स करिष्यति। स मह्यं फलं दास्यति। त्वं मह्यं पुस्तकं नैव दास्यसि किम् । त्वमिदानी पुस्तकं तत्र नय । अहं तत्रेदानीं नैव गमिष्यामि । त्वं कदा तत्र गमिष्यसि ? अहं श्वो गमिष्यामि। तद्यद्य को गमिष्यति ? प्रायो भूमित्रोऽद्य सायं तत्र गमिष्यति । त्वं पत्रं कदा लेखिष्यसि ? अहं पत्र- मधुनैव लिखामि । यदा त्वं पक्ष्यसि, तदा स कुत्र भविष्यति ? यदाऽहमन्नं पक्ष्यामि तदा स स्वगृह एव भविष्यति । अहं कदापि नैव पतिष्यामि । अहमिदानीं तेन सह वदितुमिच्छामि । रामस्तत्र गन्तुमिच्छति । त्वं धनं दातुं नेच्छसि किम् ? स इदानी पत्रं लेखितुं तत्र गतः। त्वं तत्र फलं प्रापयि- तुं किं न गच्छसि ? अहं कंदुकं भ्रामयितुं गतः। अहमिदानीमत्रोपवेष्टुमिच्छामि । सोऽद्य पक्तुं तत्र गमिष्यति । अहमद्य सायं धावितुमिच्छामि । स पुरुषः शोभनमपि फलं खादितुं किं नेच्छति ? स साधुरस्ति । अतो नेच्छति । अहमीशं शरणं गन्तु- मिच्छामि । त्वं सर्वेश्वरं शरणं गच्छ ।

(६४) यदि सोऽद्यात्रागमिष्यति तर्हि त्वं तत्र न गच्छ । नोचेच्छ्वः प्रातरेव गच्छ। किं त्वं पुस्तकं पठिष्यसि? अथवा स पठिष्यति?स सदाप्रभूतं वदति । त्वं वद । नोचेदहं वदिष्यामि । सत्यमप्ययुक्तं न वद । यदि सोऽयेदानी फलंन खादात तर्हि त्वमिदानीमेव खाद। त्वं श्वः कुत्र गमिष्यसि ? यदि सोऽद्य नागमिष्यति तर्यहं तस्य गृहं श्वः सायं गमिष्यामि । कस्तत्रेदा- नीमेव वदति ? तत्र रामभद्रोऽस्ति स एवं वदति। नहि नहि, तत्र रामचंद्रो नास्ति । तर्हि कः सः ? स हरिश्चन्द्रोऽस्ति । स को हरिश्चन्द्रः ? स नागपुर- देशीयो विष्णुमित्रस्य पुत्रो हरिश्चन्द्र इदानीमेव नागपुरादत्रागतः। स शोभन: पुरुषोऽस्ति । स नागपुरं कदा पुनर्गमिष्यति ? स परश्वःसायं नागपुरं प्रति गमिष्यति । अथवा श्व एव गमिष्यति। स केन सह आगतः १ स देवदत्तेन सहागतः। देव- दत्तोऽपि तेन सह गमिष्यति किम् ? नहि, देवदत्तो- ऽत्रैव स्थास्यति । स एव गमिष्यति ? त्वमिदानी किं करिष्यसि ? अहमिदानी न किमपि करोमि ।

(६५)
?
पाठ २६
अहं वदामि । विष्णुमित्रेण सहाहं वदामि । अहं
विष्णुशर्मणा साकं वदामि । त्वं हरिश्चन्द्रेण साकं
किं वदसि ? स त्वया सह किं वदति ? त्वं तं किं
वदसि ? रामेण सह गोविंदः कदा वदिष्यति ? स
वदति ? स कुत्र वदति ? देवदत्तो वदति । वदति
विश्वामित्रः। रघुनाथः पठति । गदाधरः खादति ।
खादति रघुनाथः । हे देवदत्त त्वं किं खादसि ? हरि-
श्वन्द्र त्वं फलं खादसि किम् ? अहं फलं खादामि ।
अहं किमपि न खादामि । स किमपि खादति किम् ?
माधवो न ग्वादति किमिदानी फलम् ? त्वमिदानी
न खादास किम् ? अत्राहं पठामि । यत्राहं पठामि,
नत्र स पठति। यत्र स पठति तत्राहं पठामि ।
यत्राहं पठामि तत्र त्वं पठ। अधुना त्वं पठ। अहं
सूर्य पश्यामि। त्वामहं पश्यामि । रामचन्द्रः त्वां
पश्यति । कः त्वां पश्यति? त्वं कं पश्यसि ? त्वां का
पश्यति ? पश्यति कः त्वाम् ? त्वं गदाधरं पश्यसि
किम् ?
त्वं तत्र पश्यसि । अधुना स पश्यति ।
इदानीं त्वं पश्यसि । त्वं कुत्र गच्छसि ? त्वं काशी
गच्छसि किम् ? कः काशी गच्छति ? अहं वेणुग्राम
?

?
(६६)
गच्छामि । अहं नगरं गच्छामि । रामचन्द्रो नगरं
गच्छति । रघुनाथः पात्रं पश्यति । त्वं पात्रं पश्यसि।
पश्यति रघुनाथो जलम् । जलं अहं पश्यमि। त्वं
जलं पश्यसि किम् ? रघुनाथो जलं पश्यति किम् ?
हरिश्चन्द्रो गच्छति । देवदत्त त्वं गच्छसि। मित्र अहं
गच्छामि, त्वमपि गच्छ । मैत्रः तत्र पठति । मित्र
त्वं तत्र पठसि किम् ? अहं तत्र पठामि । तत्राहं
खादामि।
तत्र त्वं खादसि । रामचंद्रः तत्र ग्वादति ।
हरिश्चन्द्रः तत्र पश्यति । त्वं तत्र पश्यसि । अहं
तत्र पश्यामि । रघुनाथः तत्र गच्छति । त्वं तत्र
गच्छसि । तत्र त्वं गच्छसि। गच्छसि त्वं तत्र ।
तत्र रघुनाथो गच्छति । गच्छति रघुनाथस्तत्र । अहं
तत्र गच्छामि । तत्र गच्छाम्यहम् । तत्राह गच्छा-
मि। खादाम्यहं तत्र। तत्राहं खादामि । वादामि
तत्राहम् । ग्वादामि त्वं तत्र । तत्र त्वं ग्वादसि ।
खादति रघुनाथस्तत्र । रघुनाथस्तत्र खादति । गदा-
धरः पठति । पठति गदाधरी ग्रन्थम् । पठति ग्रन्थं
गदाधरः। हे कृष्ण, तत्रत्वं पठसि । पठसि किं त्वं
तत्र ? रघुनाथस्तत्र पठति । अहं तत्र पटामि । पठा-
म्यहं तत्र तत्राहं पठामि । रघुनाथः कुत्र पठति ?

(६७)
?
त्वं कुत्र?
?
?
कुत्र पठति रघुनाथः ? पठति रघुनाथः कुत्र ? त्वं
कुत्र पठसि ? कुत्र त्वं पठसि ? पठसि त्वं कुत्र ?
अहं कुत्र पठामि ? कुत्राहं पठामि ? पठाम्यहं कुत्र ?
अहं कुत्र वादामि ? कुत्राहं खादामि ? खादाम्यहं
कुत्र ? त्वं कुत्र खादसि ? कुन त्वं ग्वादसि ? खादसि
रघुनाथः कुत्र वादति ? खादति
रघुनाथः कुत्र ? कुत्र रघुनाथः खादति ?
रामचन्द्रः कुत्र पश्यति ? पश्यति कुत्र रामचन्द्रः!
कुत्र रामचन्द्रः पश्यति ? त्वं कुत्र पश्यसि ? कुत्र
त्वं पश्यसि ? पश्यसि त्वं कुत्र ? अहं कुत्र पश्यामि?
कुत्राहं पश्यामि ? पश्याम्यहं कुत्र ? हरिश्चन्द्रः कुत्र
गच्छति ? कुत्र हरिश्चन्द्रो गच्छति ? गच्छति कुत्र
हरिश्चद्रः ? त्वं कुत्र गच्छसि ? कुत्र गच्छसि त्वम् ?
गच्छासि त्वं कुत्र ? गदाधरो गच्छति कुत्र ? अहं
कुत्र गच्छामि ? गच्छाम्यहं कुत्र ? कुत्राहं गच्छामि
अत्र रामचन्द्रः पठति । पठल्यत्र रामचंद्र रामचन्द्रो-
ऽत्र पठति । त्वमन्त्र पठसि । पठस्यत्र त्वम् । अत्र
त्वं पठसि। अहमन्त्र पठाभि पटाम्यहमन्त्र । अत्राह
पठामि । यत्र हरिश्चन्द्रः पठति । पठति यत्र हरि-
धन्द्रः हरिश्चन्द्रो यत्र पठति। यत्र त्वं पठसि ।
?
-

(६८) पाठ २७ यदा स न पश्यति, तदा त्वं पश्यसि । यदा त्वं पश्यसि, तदाहं न पश्यामि । यदाहं पश्यामि तदा स न पश्यति । तदा रामचन्द्रः गच्छति । रघुनाथ- स्तदा नैव गच्छति। तदा त्वं नैव गच्छसि । अहं यदा नैव गच्छामि, तदा त्वं गच्छसि । स यदा नैव गच्छति, तदा त्वं गच्छसि । त्वं यदा नैव गच्छसि, तदा स गच्छति । रघुनाथः कदा गच्छति ? सः इदानीं न गच्छति । रामचन्द्रः कदा खादति ? इदानीं स नैव खादति । किं इदानीं स न खादति? न स इदानी खादति किं स तत्र गच्छति ? नहि, स तत्र नैव गच्छति । त्वं तदा पठसि किम् ? नाहं तदा पठामि । तदा त्वं किं न पठास ? रघुनाथः कदा पठति ? अहं कदा पठामि ? त्वं कदा पठसि ? यदा रामः पठति, तदा कृष्णो न पठति । कृष्णो यदा पठति, तदा रामो न पठति । यदा हरिश्चन्द्रः खादति, तदा रामो गच्छति । यः खादति तं हरिश्चन्द्रः पश्यति । सूर्य हरिश्चन्द्रः पश्य- ति । त्वं सूर्यं पश्यसि किम् ? रामः सूर्यं न पश्यति। अहं सूर्य पश्यामि । त्वं सूर्यं न पश्यसि । अहं सूर्य न पश्यामि । रामस्य जनकः सूर्यं पश्यति। वायुः (६९) गच्छति । सोमः गच्छति। वायुनं गच्छति। सोमो न गच्छति । हरिश्चन्द्रस्य जनकः कदा सोमं पश्यति ? कृष्णस्य जनकः सोमं न पश्यति किम् ? सर्वमित्रस्य जनकः सोमं न पश्यति किम् ? सर्वमित्र आ- गच्छति किम् ? किं त्वमागच्छसि ? अहमागच्छामि, सोमं पश्यामि च। हरिश्चन्द्रः किमपि न खादति। रामः किमपि न पश्यति । कृष्णः किमपि न पठति । खादति न किमपि रामः । कृष्णः किमपि खादति । न त्वं किमपि ग्वादसि । न खादाम्यहं किमपि । अद्याहं गच्छामि । त्वमद्य गच्छसि किम् ? सोऽद्य गच्छति। अद्य रामचंद्रो गच्छति । हरिश्चंद्रोऽद्य नगर गच्छति । रघुनाथः कृष्णस्य वस्त्रं पश्यति। गोपालो नगरमागच्छति । यज्ञमित्रो वनं गच्छति । विष्णुमित्रः पुस्तकं पठति । सूर्यो गच्छति । वायु- रागच्छति । सोमो यदा आगच्छति, तदा त्वं मा खाद । स पुरुष इदानीं पश्यति ।त्वं मा पश्य । तृण- स्य वर्णो हरितः भवति । रामस्य हस्तः ह्रस्वोऽस्ति । कृष्णस्य हस्तो दीर्घः अस्ति । चन्द्रमित्रस्य गल्लः शोभनः अस्ति । तव ओष्ठो रक्तोऽस्ति। रामस्य ओ- ष्ठो यथा रक्तोऽस्ति न तथा कृष्णस्य । भूपो वदति।

. (७०) भूपः नगरं गच्छति । भूपः सायं पात्रेणं जलं पिबति । भूपः फलं खादति। भूपः पत्रं लिखति। भूपः तं पुरुषं पश्यति । भूपः पादाभ्यां गच्छति । भूपः पुष्पं दास्यति । भूपः केशान्पश्यति । उद्याने भूपस्तिष्ठति । अधुना गृहे नैव तिष्ठति भूपः। ह्य एव नगरं गतो भूपः । भूपस्य वस्त्रं रक्तं अस्ति । कदा भूपो द्वारेण गच्छति ? भूपस्य नयनं शोभन- मास्ति । भूपो विज्ञोऽस्ति । वाचालो नास्ति भूपः । भूपोऽम्बरे सोमं पश्यति। भृपः सूर्य अधुना पश्यति। देवदत्तस्य जनकः कृपणः इति जनो वदति । जन उद्यानं गच्छति । गच्छति ग्रामं जनः । जनः अन्धः अस्ति । जनः किमपि न करोति । जनः किं न वदति वदिष्यति च ? जनः किं न द्रक्ष्यति खादि- ष्यति वा ? जनो ग्रामं गच्छति । जनो ग्रामादाग- च्छति । जनो वदति । जनः पठति ग्रंथम् । जनः पश्यति देवम् । खादति फलं जनः । जनः अस्ति । जनो भवति । जनः पतति । जनो लिखति । जनः पचति । जनस्तिष्ठति। जनो धावति । जनो वदिष्य- ति। जनो द्रक्ष्यति त्वाम् । जनः खादिष्यति फलम् । गमिष्यति ग्रामं जनः। जनोऽन्नं भक्ष्यति । जनो धाविष्यति । जनः उद्यानं प्रति तोयं प्रापयिष्यति ।

(७१) . पाठ २८ जनो ग्रामाञ्चलिष्यति।जनः शोभनो भविष्यति। तिमिरे जनः पतिष्यति । जनः किमपि करिष्यति । दास्यति जनः। जलं नेष्यतिः जनः । जनो द्रष्टुं धावति । कृष्णो वदिष्यति । कृष्णस्त्वां द्रक्ष्यति। कृष्णः फलं खादिष्यति। कृष्णो गमिष्यति नगरम्। कृष्णो वनं गमिष्यति । कृष्णो नरं द्रक्ष्यति। कृष्णो द्रष्टुं धाविष्यति । कृष्णो मां प्रापयिष्यति । कृष्ण- श्वलिष्यत्युद्यानात् । कृष्णो मूढो भविष्यति। कृष्णः पतिष्यति । कृष्णः पुस्तकं करिष्यति । कृष्णो वस्त्रं दास्यति । कृष्णो वस्त्रं नेष्यति । कथं कृष्णो वस्त्रं नेष्यति ? कृष्णो वाचालो भवति । कृष्णो बलिष्ठो भवति । विज्ञोऽस्ति कृष्णः। कृष्णो बधिरोऽस्ति । कृष्णो धनाढ्योऽस्ति । कृष्णो ग्रामं गतः । कृष्णो ग्रामादागतः। कृष्णेन त्वां प्रति किमुक्तम् ? मां प्रति किं दत्तम् ? किं पीतं कृष्णेन ?। शोभनोऽस्ति कृष्णः । कृष्णो धीरोऽस्ति किम् ? अस्त्युदारः कृष्णः। रामस्य करः नीलः अस्ति । कृष्णस्य न तथा यथा रामस्यास्ति । परंतु कृष्णस्य श्वेतः अस्ति । तव करः दीर्घः अस्ति किम् ? रामस्य करः शोभनो- ऽस्ति । न तथा तव करः शोभनः । तस्य करः ? ? ?

(७२)
चलति । रघुनाथः खादति करेण । रामः करण फलं
खादति । चैत्रस्य करः कोमलः अस्ति । मैत्रः करेण
वस्त्रं दास्यति । मम करः त्वां भूषणं दास्यति ।
रामभद्रस्य स्कंध शोभनः अस्ति । भूमित्रस्य केशाः
कृष्णाः सन्ति । जनाः फलानि खादन्ति । पुरुषौ
फलानि खादतः। पुरुषो लिखतः पत्रम् ।
शोभनस्य
गृहस्य द्वारं विशालमस्ति। विशालस्य
नगरस्य गृहाणि शोभनानि सन्ति । धनाढ्यस्य
जनस्य केशाः कथं सन्ति ? रामशर्मा अधुना स्कंधं
पश्यति । कृष्णस्तव स्कंधं पश्यति । रामो निरंतरं
वदिष्यति । त्वं सदा किं वदिष्यसि ? अधुना देव.
दत्तस्तत्र गच्छति । मनुष्यः शब्दं पठति। नरः
नरेण साकं गच्छति । तव केशः शुभ्रः अस्ति ।
उदारस्य तस्य नरस्य ओष्ठो रक्तोऽस्ति । करे फलं
पतति । करात् पतति फलम् । करात् भूषणं पतति ।
भूषणं करे पतति । तव हस्ते कदा फलमागच्छति।
सर्वमित्रस्य पादः शुभ्रः अस्ति । नगरात् शब्द
आगच्छति।वनात् शब्द आगच्छति । मध्याह्ने शब्द
आगमिष्यति । ग्रामादुदारो मनुष्यस्तोयं दातुमा-
गच्छति।

(७३) पाठ २९ देवदत्तः पादाभ्यां गच्छति । मैत्रः पादाभ्यां मध्याहे गच्छति । चैत्रः पादाभ्यां सत्वरं गच्छति ग्रामम् । भूमित्रो दंतैः खादति फलम् । कृपणो मनुष्यो द्रव्यं नैव दास्यति । मनुष्यः पत्रं जले पश्य- ति । सः मनुष्यः पात्रे जलं पश्यति । त्वं पश्यसि किम् ? अहं पश्यामि । सः वने जलं पश्यति । देव- दत्तो वनं द्रष्टुं गतः।त्वमप्यागच्छ । वनं द्रष्टुं गच्छ । चैत्र त्वं पत्रं लिख । देवदत्तः ह्यः श्रीनगरादागतः। विष्णुमित्रः श्वो गमिष्यति राजपुरम् । हे नर ! त्वं गमिष्यसि किम्? हे देव ! त्वं उपवेष्टुं इच्छसि किम् ? किं देवो गमि- ष्यति ? पुरुषः किं खादिष्यति ? फलं ग्वादिष्यति । दुग्धस्य वर्णः श्वेतोऽस्ति । उद्यानस्य वर्णः हरितः अस्ति । तोयस्य वर्णः शुभ्रः अस्ति । तस्य पुष्पस्य वर्णः : कृष्णः अस्ति । नीरं शुभ्रं अस्ति । किं त्वमि- दानी न पठसि ? अहं सदा तत्र पश्यामि । भू- मित्रो यत्र पश्यति, तंत्र चैत्रो गच्छति । भूपः कं पुरुषं पश्यति ? अधुनाऽहं भूपं पश्यामि । त्वं कदा तत्र वदसि ? यदा रघुनाथस्तत्र गच्छति तदा त्वम- ?

--
(७४)
त्रागच्छ । कृष्णो भूपोऽस्ति । तदानीं रघुनाथो
रामचंद्रं वदति । तदानीं रघुनाथो रामचंद्रं पश्यति।
कृष्णोऽधुना कुत्रास्ति ? रामोऽद्य कुत्रास्ति ? यत्र
पादः पतति, तत्र कोऽपि नास्ति। यत्र गोविंदः
पश्यति, तत्र त्वं नासि । यत्र त्वं पश्यसि, ता मुकुंदो
नास्ति।
यत्राहं पश्यामि तत्र त्वं नासि । यदा राम
आगच्छति, तदा विष्णुहं गच्छति । स किं
किमपि न वदति ? विष्णुरिदानी किमपि न पठति ।
यथा गोविंदः पठति तथा मुकुंदा गच्छति, तथा हरिः
किं न गच्छति ? अहं पठामि । अहमद्य पठामि ।
अहमद्य न पठामि । अहमद्यात्र वदामि । त्वमधात्र
किं न बदसि ? सोऽद्यात्र किं न वदति ? सोऽद्य
तत्र ग्वादति । किं त्वमिदानी ता पश्यासि? नहि,
अहं अद्य अत्र पश्यामि । अधुना त्वं खादसि किम् ?
मुकुंदः कुत्रास्ति ? रामस्तत्र नास्ति। त्वमच तत्र
किं न पठसि ? कमलस्य कः वर्णः ? कमलस्य शुभ्रो
वर्णः । दुग्धस्य का वर्णः ? श्वेतो वर्णः दुग्धस्य ।
तिमिरस्य कः वर्णः ? तिमिरस्य कृष्णो वर्णः। अहं
नैव वदामि । सोऽद्य कुत्र गच्छति ? त्वं मम गृहे
अब आगच्छसि किम् ?
?
:
?

(७५) पाठ ३० मैत्रस्य भूपणं कुत्रास्ति ? त्वं पत्रं किं न लिखसि ? यत्र बुधो गच्छति तत्र त्वं किं न गच्छसि ? गृहस्य द्वारं अना- स्ति । रामचंद्रस्य वस्त्रं कुत्रास्ति ? सलिले कमलं किं नास्ति ? कृष्णस्य भूषणं कुत्रास्ति ? देवदत्तस्य पुस्तकं तत्र नास्ति । भूपस्य नगरं अबास्ति । स नगरादागतः। खादति फलं सः । त्वं फलं किं न खादति ? अहं इदानीं वनं न गच्छामि । सदा तत्र गच्छति विश्व- नाथः । स इदानीं जलस्य समीपे गच्छति । तस्य पुस्तकं पुराणं अस्ति । तस्य नगरं विशालं अस्ति । कृष्णस्य हस्तो बलिष्ठोऽस्ति । मुकुंदस्य वस्त्रं नवीनं अस्ति । रामो विज्ञो भवति । वाचालो हरिरिदानी वदति । श्वेतं दुग्धं अर्जुनेन पीतम्। रघुनाथः कृष्णोऽस्ति । वनं हरितं अस्ति। सः मनुष्यः अंधोऽस्ति । त्वं धीरोऽसि । तस्य गृहस्य द्वारं हृस्वं अस्ति। त्वां सः जलं प्रापयितुमिच्छति । त्वं वनं गन्तुं इच्छसि ? किं मुकुंदो भूषणं द्रष्टुं इच्छति ? रघुनाथो वीरोऽस्ति । किं कर्तुं इच्छसि त्वम् ? सोऽत्रागन्तुं नेच्छति । स तत्र खादितुं इच्छति । किं त्वं अत्र खादितुं नेच्छसि ? स पुस्तकं नेतुं इच्छति । गोविंदः पुस्तकं पठितुं नेच्छति । त्वं किं इच्छसि ? तव वस्त्रं रक्तं अस्ति किम् ? तव वर्णः कृष्णोऽस्ति किम् ?

(७६) रामचंद्रस्य नवीनं पुस्तकं शोभनं अस्ति । मुकुंदस्य पुराणं पुस्तकं शोभनं नास्ति । रामस्य नवीनं गृहं कुत्रास्ति ? वि- ज्ञस्य नरस्य शोभनं पुस्तकं अत्रास्ति । त्वं शोभनं वनमि- दानीं गच्छसि किम् ? नहि इदानीं अहं तव विशालं गृहं आगच्छामि। स नरः भूपस्य शोभनात् गृहात् इदानीं आग- च्छति । स कृपणः पुरुषः इदानी कुत्रास्ति ? कृष्णः रामं प्रति वदति । रामेण सह विष्णुमित्रः वदति । रघुनाथेन साकं हरिः नगरं गच्छति । भासेन पुस्तकं कृतम् । तेन अहं मूढः कृतः। भूमित्रो तस्य भूपस्य नगरं गतः । मम सकाशात् स यदि पुस्तकं नेष्यति, तहिं दास्यामि । तव सकाशात् यद्यहं वस्त्रं नेष्यामि तर्हि त्वं दास्यसि किम् ? मुकुंदो गमिष्यति किं सत्वरं ? त्वं सत्वरं मह्यं पुस्तकं देहि । सत्वरं स पत्रं लखिष्यति किम् ? स तुभ्यं पुस्तकं दास्यति किम् ? रामः पात्रं पश्यति किम् ? मया तस्मै सलिलं दत्तम् । त्वया तस्मै पात्रं दत्तं किम् ? तेन मह्यं फलं दत्तम् । भूपस्य नगरं को गतः ? मुकुंदः अथवा रामः ? त्वया तसै किमपि उक्तं किम् ? देवदत्तो गृहादागतः । अहं नगरं गतः। उद्यानादागतः। वाचालो मुकुंदो वनादागतः । अद्याहं दुग्धायागतः। अद्य त्वं चंदनाय गतः किम् ? त्वं इदानीं अनोपविश । त्वं अद्य अत्रैव तिष्ठ । त्वं अद्य पत्रं लिख । त्वं श्वः प्रातः फलं खादिष्यासि किम् ?

(७७) पाठ ३१ रामो रक्ताय वस्त्रायागतः। विश्वनाथो नीरायोद्यानं गतः। रघुनाथः पुष्पायोद्यानं गतः । स नगरादागन्तुं इच्छति । अहं त्वया सहागन्तुं इच्छामि । स मया साकं पठितुं इच्छति । अहं तेन सह धावितुं इच्छामि । रामः कृष्णेन साकं वक्तुं इच्छति । कृष्णः पात्रं कर्तुं इच्छति । अहं भूपणं दातुं इच्छामि । मया सह पुरुषो वदति । त्वया सह स नरः वनं पश्यति । यत्र स खादति तत्राहं न इच्छामि । अहं अत्र खादामि । त्वं कुत्र खादसि ? यत्र स पठति तत्राहं पठामि । कः पठति? किं पठति ? स किं पश्यति ? रघुनाथ इदानीं न पठति । त्वं अधुना किं खादसि ? अधुना किं न खादसि ? अहं दिवा खादामि । स रात्रौ खादति। त्वं द्रुतं खादसि । त्वं फलं खाद, अथवा मा खाद । जलात् कमलं नय । तोयात् फलं तत्र नय। सलिलात्कमलं तत्राहं नेष्यामि । त्वंतत्र सलिलात्कमलं नेष्यसि किम् ? स तस्मात्तोयादागच्छति। स तस्मिन्सलिले कमलं पश्यति। स तस्मिन्पात्रे पुष्पं पश्यति । स वने पुष्पं द्रक्ष्यति । त्वं गृहे पुष्पं द्रक्ष्यसि किम् ? त्वं पुस्तकं द्रुतं पठ । यदि त्वं पुस्तकं पठसि तहमाग- च्छामि । स सत्यं वदति । भूपो ह्य आगतः। त्वं मया सह वद, नोचेदहं गमिष्यामि। त्वं लिख, नोचेदहं लेखिष्यामि।

'(७८) त्वमचैवोपविश नोचेदहं गमिष्यामि । त्वं आगच्छसि चेत् तर्हि अहं अत्र तिष्ठामि । त्वं तत्र तिष्ठसि चेत् अहं आगमिष्यामि। त्वमागच्छ नोचेदहं गमिष्यामि । त्वं अन्नं कुरु, अहं खादितुं इच्छामि । खादितुं आगच्छामि । त्वं कर भ्रामय । रघुनाथः कृष्णाय पात्रं दास्यति । शोभनं पात्रं दुग्धाय दास्यति । स दुग्धाय शोभनं पात्रं नेष्यति । त्वं अत्रवोपविश, तुभ्यमहं वस्त्रं दास्यामि । त्वमत्रैव तिष्ठ । तुभ्यमहं दुग्धं दास्यामि । त्वमत्र स्थ तुं किं नेच्छसि ? अहं त्वया साकं वदितुमिच्छामि । त्वं मया सह वदितुं नेच्छसि किम् ? स त्वया सह वक्तुमिच्छति । त्वं तेन साकं वक्तुं किं न इच्छसि ? अहं तुभ्यं चंदनं दास्यामि । त्वं मह्यं वस्त्रं दास्यसि किम् ? रघुनाथो मुकुन्दस्य गृहे उपवेष्टुं कि नेच्छति ? त्वमेव तस्य गृहे उपविश । त्वं पुष्पं द्रष्टुं इच्छसि किम् ? यत्र त्वं गन्तुं इच्छसि तत्र गच्छ । त्वं कुत्र गन्तुं इच्छसि ? अहं तत्रा- गच्छामि यत्र त्वं गन्तुं इच्छसि । यत्र त्वं खादितुं इच्छसि तत्राहं नागच्छामि । यत्र त्वं पठसि तत्राहमागच्छामि । अहं यत्र पठामि तत्र त्वं.किं न पठसि ? अहं यदा सादामि तदा त्वं किं नागच्छांसे ? सायमहमत्र खादामि । प्रातरह फलं खादामि । यदाहं पश्यामि तदा त्वं किं न पश्यसि ? ?

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संस्कृत पाठ माला प्रथम भाग

Author
Saatavalekar Daamodar
Title
Sanskrxt Paatha Maalaa Pratham Bhaag
File name
संस्कृत पाठ माला प्रथम भाग
Text
OCR done
Citation
1934
Published
2006/03/23
Publisher
Daamodar Saatavalekar, Svaadhyaay Mandal, Aundh, Saataaraa
Language
Sanskrit
Pages
79
Library
University Library,gurukul Kangri Vishwavidyalaya
Classification
LANGUAGE LINGUISTICS LITERATURE
DLI number
477384
Barcode
99999990173238.00
Scanning centre
C-DAC, Noida
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संस्कृत पाठ माला प्रथम भाग