Ramkrishna Mission Institute Of Culture, Golpark

Arjya Bhatiyam Jyotishastram

Arjya Bhatta · 2006/06/3

PDF Proofread

Front matter

No text on this page.

No text on this page.

No text on this page.

かみさんいる
TAR
आर्यभटीयम्
ज्योतिःशास्त्रम् ।
परमेश्वराचार्यकृतटीकयासमलङ्कृतम्
क्षत्रियकुमारेण श्रीमदुदयनारायणवर्मणा .
नागरीभाषयानुवादितम्
मधुरापुरस्थ-शास्त्रप्रकाश-कार्यालये
( डा० विद्रूपुर, मुजफ्फरपुर )
नाम्निस्थाने प्रकाशितम्
संवत् १९६३ सन् १९०६ ई०
THE
ARYA BHATIYA
or
है
ANCIENT SANSKRIT ASTRONOMICALWORK
by
Arya Bhata with a sanskrit commendary
of Praneshwaracharya translated into
Nagari and published
by
Udaya Narain singh at shastra Publishing office
Madhuxapur, Bidhupur, Moraffarpur.
--
Printed at Brahma Press Etawah.
LIBRARY
CULT
खवनायत्तीकृतम्
URE
MITA

No text on this page.

ओ३म् समपणम् श्रीयुत मान्यवर क्षत्रियवंशावतंस परमोदार सनातन आर्यधर्मरक्षक श्रीमहाराजाधिराज सर नाहरं सिंह बहादुर शाहपुराधीशेवित-उदयनारय- यणसिंहस्य कोटिशोनतय स्फुरन्तुतराम् 'भो! आप ने सनातनप्रार्य वर्म की उन्नति करके हम भारत वासियों it परम उपकार किया है। ईश्वर श्रीमान् जैसे “धर्मरक्षक, दानशील, आदर्शपुरुष और प्रार्यग्रन्थों के उन्नायक महाराजों की प्रतिदिन ख्यिा बढ़ावे। श्रीमान् की रुचि स० प्रा० ध. की ओर देख कर मैंने वेद के छ: गङ्गों में से नेत्ररूपी वेदाङ्ग ज्योतिष के-उस अपूर्व ग्रन्थ का भाषानुवाद फेयाहै जिम में प्राज १४०० वर्ष पूर्व ही से पृथिवी-भ्रमणा-लिख रक्खा है। यह आर्यभटीय वा प्रार्यभिद्वान्त ग्रन्थ संस्कृत टीका सहित जर्मन श में छपा था-अाज तक भारत वर्ष में इस की अोर किसी का ध्यान ही गया था मैं ने बड़े परिश्रम से इसे जर्मन देशान्तर्गत लिपजिक स्थान 0 । मंगवा कर सटीक सानुवाद एवं विस्तृत भूमिका सेहित छपवाया है। इस सटीक सानुवाद वेदाङ्ग ज्योतिष ग्रन्थ को मुद्रित करा श्रीमानों । कर कमलों में विनयपूर्वक अर्पण कर आशा करता हूं कि श्रीमालू स को स्वीकार कर मुझ. अन्याय पार्षग्रन्थों के सानुवाद प्रकाशित रने में उत्साहित करेंगे। शास्त्रप्रकाश-कार्यालय नि-मधुरापुर, विटूपुर जि० मुज़फ्फरपुर उदयनारायणसिंह श्रीमतामनाकारी- क्षत्रिय कुमार-

RMIC LIBRARY
Mic. No 100247
(1154 In,
12.2.18
ات
ope
Chocked

के छः अङ्ग . ओ३म् प्रस्तावना। वेद भार्यशास्त्रों का शिरोभूषण है । वेद सम्पूर्ण आर्यशास्त्रों की अपेक्षा प्राचीन और सब शास्त्रों का एकमात्र प्राकर कह कर प्रसिद्ध है। विदेशीय-जर्मन देश वासी पं० भट्टमैक्ष मूलर साहब कहते है कि *वेद सब विद्याओं का मूल है। अङ्ग सहित वेद ज्ञान विना-भारतवर्षीय किसी मायग्रन्थ पर कुछ लेख लिखना बहुत कठिन है। भाजे ऐसे अमूल्य रत्न वैद का यथावत् प्रचार न होने के कारण हमारे देश में प्रति दिन मत मतान्तरों तथा फूट की वृद्धि होती जाती है और लोगों को वैदिक धर्म से प्रश्रद्धा होती जाती है। इस वेद के तात्पर्य समझने के लिये हमारे ऋषियों ने इस रचे हैं। इन शिक्षा मादि छः शिक्षा आदि छः अङ्गों में से-वेदाङ्ग ज्योतिष के न जानने से हम भारतवासिगण वेद, शास्त्र, पुराण प्रतिपादित गढ़ार्थ के सम- झने में असमर्थ होकर वेद, ब्राह्मण, पुराण, तन्त्र प्रादि प्रतिपादित ज्योतिष मूलक आध्यात्मिक वर्णन का उलटा वा निन्दित श्राशय समझ कर हम अपने ऋषियों को गुरुतल्पगामी, किन्हीं को चोर, ब्रह्मा को अपनी कन्या के पीछे मैथुनार्थ दौड़ना, रासलीला, यमयमी सम्बाद । भाई वहन का सम्बन्ध ) श्रीकृष्ण जी का व्रजाङ्गनाओं के साथ नाचना आदि अकर्तव्य कर्म करना, गौतम प्रहल्या की कथा, चन्द्रमा की ३३ कन्या, समुद्र-मथन आदि का युक्तेि- युक्त तात्पर्य नहीं समझ समझा सकते। आज हम उन्हीं उपरोक्तं प्रालङ्का- रिक लेखों में से दो तीन लेखों का असली तात्पर्य पाठकों को सुनावेंगे-- जिस से हमारे पाठक यह समझ जावेंगे कि निस्सन्देह असली "सिद्धान्त- ज्योतिषशाख” के जानने ही से वेद, ब्राह्मण, पुराण, आदि प्रोक्त उपाख्यानों को सङ्कति लगा सकेंगे। अब हम यहां पहिले 'समुद्रमथन,' 'रासलीला' और 'वस हरणलीला' का रहस्य कह कर-“भाभटीय” पुस्तक का अनुवाद करेंगे। उदयनारायणसिंह-अनुवादक Every one acquainted with indian literature must have observed how impossible it is to open any book on Indian subjects without being thrown back upon an earlier authority; which is generally acknowledged by the Indians as the basis of all thier knowledge whether sacred or profanc. This carlier authority which we find alluded to in theological and philosophical works as well as in poetry in codes of law in astronomical, grammatical, matrical and lexicographical compositions is called by one comprehensive name the Veda. (P. Max Muller II of Ancient Sanskrit Literaturr, P. 2) २ सरल प्रार्यभटीयस्य- समुद्र-मन्थन। "ऋषीणां भारतीभाति सरला-गहनान्तरा। धीरास्तत्तत्व मृच्छन्ति मुह्यन्ति प्राकृता जनाः ॥ : मी-अर्थात् प्राचीन ग्रन्थों की वाक्य-शैली ऊपर से तो बहुत मालूम होती है परन्तु उन के प्राशय बहुत कठिन हुआ करते जिन को विद्वान् लोग तो समझ लेते पर प्राकृत पुरुष मुग्ध होकर अर्थ का अनर्थ करने लगते हैं। समुद्र-मन्थन उपाख्यान महाभारत के आदि पर्व में १७ से १८ अध्यायों में इस प्रकार वर्णित है कि:- एक समय महात्मा देवगण सुमेरु पर्वत के ऊपर एकत्र होकर अमृत प्राप्ति के लिये परस्पर विचार करने लगे। इसी अवसर में परम देव नारा- यण प्राकर बोले “ हे पितामह ! देवगण और असुरगण मिलकर समुद्र मथन में प्रवृत्त हों। इस के अनुसार देव और असुर गण मन्थन-दण्ड के योग्य मन्दर पर्वत को उखाड़ने लगे, परन्तु कृत कार्य न हो सके। इस के वाद परम देव नारायण की आज्ञानुसार अनन्त देव ने मन्दर पर्वत को जड़ से उखाड़ा और देवगण मन्दर पर्वत को लेकर समुद्र के तीर पर आये । अमृत पाने की में समुद्र, अपने मन्थन में सम्मत हुना-और कूर्मर राज ने मन्दर पर्वत को अपने ऊपर धारण करना स्वीकार किया । देव राज इन्द्र, कूर्म के पीठ पर — मन्दर' रक्ख कर मन्यन रज्जु ( म. हने की डोरी ) बासुकी ( सर्प ) द्वारा मन्दर को बांधकर समुद्र मन्थन में प्रवृत्त हुए। असुरों ने 'वासुकी के गले के उपरले भाग को पकड़ा । और देवगण ने पूच्छ की भोर पकड़ा । विलोड़न करते २ मन्दर पर्वत पर के बड़े २ वृक्षों और ओषधियों से निर्यास और रस समुद्र जल में निपतित होने लगा और अमृा के तुल्य रस स्रोत में देवताओं का शरीर प्राप्त होने लगा, देवगण अमर हुए। अपूर्व रस से मिश्रित हो समुद्र का जल दूध हो गया और दूध से घृत उत्पन्न हुआ। समुद्र मन्थन में पहिले दूध से चन्द्रमा उत्पन्न हुए और घृत से लक्ष्मीदेवी सुरादेवी, उच्चैःश्रवा नामक घोड़ा और अत्यन्त उज्ज्वल कौस्तुभ मणि क्रमश उत्पन्न हुए। कौस्तुभ मणि परम देव नारायण ने अपने हृदय में धारण किया। वे आशा '' ३ . भूमिका ॥ पारिजात श्रीर सुरभि उत्पन्न हुपी।लमी. मोम, सुरा और उच्चैःश्रवा आदित्य मार्ग में देवताओं के निकट गये इस के । अनन्तर धन्वन्तरि अमृत से भरे श्वेतकमण्डलु हाथ में लिपे ऊपर हुए। और दान्त में चारों वेद से विभूषित 'ऐरावस' हाथी निकला। देवराज ने ऐरावत को लिया। अन्त में कालकूट विष उत्पन्न हुप्रा । हलाहल विष के गन्ध से तीनों लोक मोहित हुआ। ब्रह्मा की श्रामा से महादेव ने इस विषपान कर लिया। तब से महादेव जी का नाम नीलकंठ' हुआ। इधर अमृत पान के अभिलाची देवता और असुरों में युद्ध उपस्थित हुआ, परम देव नारायण ने मोहिनी रूप धर कर असुर के निकट उपस्थित हुए। इस मोहिनी मूर्ति को देख कर विमूढचित असुर गण परिवेशनार्थ अमृत के भाण्ड को मोहिनी के हाथ में सर्पण करने में सम्मत हुए । अमृत को हर कर मोहिनी संग्राम से चल निकली। संग्राम सनय देवगण मोहिनी के हाथ के अमृत को पान करने लगे। इसी अवसर में देवता का रूप धारण कर छिपा हुआ 'राहु' अमृतपान करने में प्रवृत्त हुआ। किन्तु चन्द्रमा और सूर्य ने इस की चुगली कर इस की कपटता को प्रकाशित कर दिया और परम देव नारायण ने सुदर्शन ' ( चक्र ) द्वारा राहु के शिर को काट डाला। कटा हुमा राहु का मस्तक प्रकाश मण्डल में उड़ कर पृथिवी पर गिर पड़ा । जो वैर निर्यातनार्थ (बदला लेने के लिये ) अव तक वीच २ में राहु, चन्द्रमा और सूर्य को ग्रस लेता है जिस का नाम ग्रहण है ॥ देवासुर समर में स्वयं नारायण ने प्रवेश कर सुदर्शन द्वारा असुर दन को छिन्न भिन्न कर दिया और प्रमुर मुराउ भूमि पर शोभा देने लगे। मरने मे अवशिष्ट असुरों ने रण में हार कर पृथिवी और समुद्र जल में प्रवेश किया। देवराज प्रमुख देवताओं ने अमृत भाण्ड अर्जुन को प्रदान किया। श्रीमद्भागवत के ८ म स्कन्ध में ५ म अध्याय से ११ वें समुद्र मथन का वर्णन है। भागवत के मत से जहां २ भेद दीख पड़ता है, उम का सारांश नीचे लिखा जाता है। महाभारत में देवताओं को अमृत पीने की इच्छा. क्यों हुई ? इस का कारण नहीं लिखा है ; किन्तु श्रीमद्भागवत् में 'लखा है कि अत्रि के पुत्र शङ्कराश महर्षि दुर्वामा के अभिशाप से देवराज (न्द्र श्रीभ्रष्ट-हुए । असुर युद्ध में देव-सेना हार गयी । इन्द्रादि देवगण ने स्वराज्य से • ताहित हो भतल और पाताल पर पाकर आश्रय लिया। प्रध्याय तक ..

४ मिलने का । गया ने और गरुड़ . प्रार्यभटीयस्य- असुर गण ने स्वर्ग, राज्य पर अपना अधिकार जमाया । या दि एक मात्र वन्द हो गया। भूख से पीड़ित इन्द्र श्रादि कों ने निरूपाय हो सुमेरु पर्वत की चोटी पर जाय ब्रह्मा की शरण लियी। और ब्रह्मा, प्रमुख देवगण की स्तुति से सन्तुष्ट हो परमदेव नारायण ने देवराज इन्द्र को उपदेश दिया कि अमृत.. पान ले बलवान् न हो कर तुम असुरों गण को रण में जीत नहीं सकते। और देवता एवं असुरों के मिले विना समुद्र मन्थन से अमृत अन्य दूसरा उपाय नहीं । इसलिये असुरगण के साथ कपट सम्धि कर दोनों दल मिलार समुद्र मन्थन करो। समुद्र मन्थन से उत्पन्न अमृत परिवेशन के समय मैं असुरों को ठग कर देवताओं को अमृत पान कराऊंगा। नारायण के आदेश से ईन्द्र ने असुर · पति रैवत मनु-पुत्र वलि राजा के साथ सन्धि स्थापन कर समुद्र मन्थनार्थ उद्योग किया। इस के वाद देववा और असुर मन्दर पर्वत को उखाड़ा के पीठ पर मन्दर को रक्त कर समुद्र के किनारे ले आये। रामुद्र मन्थन के पहिले हलाहल विष और क्रम से सुरभि, उच्चैःश्रवा, ऐरावत, ८ दिग्गज, और अभ्रमु प्रभृति ८ हस्तिनी, पारिजात पुष्प, अप्सरा, कमला देवी, वारुणी, कलस हस्त धन्वन्तरि ऊपर हुए। राहुबध उपाख्यान इस पुराण में भी है। विष्णुपुराण के म अंश, ( म० अध्याय में समुद्र मन्थन का वर्णन है 10 विष्णुपुराण के मत से समुद्र मन्थन में पहिले सुरभि, क्रम से वारुखी, पारि. जात, शीतांशु चन्द्रमा, हलाहल विष, कमण्डलु हस्त धन्वन्तरि, और श्रीदेवी उत्पन्न हुई । किन्तु विष्णुपुराण में राहुवध का वर्णन नहीं है । ब्रह्म वैवर्त पुराण के प्रकृति खण्ड के ३८ वें अध्याय में समुद्र मन्थन का वर्णन है। ब्रह्माण्ड पुराण से समुद्र मन्थन में सब से पहिले धन्वन्तरि और क्रम से अमृत, उच्चैःश्रवा, नाना रत्न, ऐरावत, लक्ष्मीदेवी, सुदर्शन चक्र निकले हुए । इन के अतिरिक्त अन्यान्य पुराणों में भी समुद्रमन्थन का वर्णन है। पुराणों में समुद्र मन्थन का वर्णन है कहने से प्रशिक्षित लोगों में इस व्यापार को सपक कह कर ग्रहण करना नहीं चाहते । किन्तु उपाख्यान के सम्भव या असम्भव होने की समालोचना करने पर इस की रचना अर्थवाद से भरा है यह सहज ही में सिद्ध होता है। पहिले तो मन्दर पर्वत का उखाड़ना कैसे सम्भव होगा? दूसरे मथने की रस्सी वासुकी (सर्प) मयते समय जब उत्ती वासुकी शेष ने मन्दर पर्वत को . के मत ५ भमिका ॥ धारण किया तो उस समय पृथिवी किस पर थी ? ( क्योंकि पुराण में लिखे अनुसार लोग समझते हैं कि शेष नाग पर पृथिवी ठहरी है) तीसरे, पृथिवी पृष्ठ २० करोड़ वर्ग माइल है, उस में १५ करोड माइल में समुद्र विस्तृत है। इस सुविस्तीर्ण समुद्र का मन्थन कैसे सम्भव हो सकता ? चौथे, विष्णु पुराणा के मत से महर्षि दुर्वासा प्रदत्त पारिजात माला देवराज इन्द्र ने ऐरावत के शिर पर पहिना दिया, ऐरावत कर्तृक महर्षि प्रसादभूत यह पारिजात माला भूमि के ऊपर फेंकी गई इस से महर्षि दुर्वासा के क्रोध की उत्पत्ति और उसी क्रोध के कारण महर्षि का शाप हुआ। उस के पश्चात् समुद्र मन्धन में ऐरावत की उत्पत्ति हुई यह क्योंकर सम्भव होगा ? पञ्चम, महाभारत में लिखा है कि समुद्र मन्थन से निकले हुये रत्न श्रादित्य मार्ग से (अयन मार्ग से) देवताओं के समीप गये । यदि देवगण ने पृथिवी पर आकर पृथिवी पर के मन्दर पर्वत को उखाड़ कर पृथिवी पर के समुद्र के तीर में रहकर समुद्र मन्थन किया, तो मथने से उत्पन्न रत्न आदि आकाशस्य अयन मार्ग में किस प्रकार देवताओं के निकट जासकते ? सुतरां यह अवश्य ही मानना पड़ेगा कि इस उपाख्यान में अवश्य ही कोई अति गूढ़ अभिप्राय है। वेद पढ़ने से हमे इस बात का ज्ञान हुआ है कि ' शब्दों से अधिकतर स्थानों में जल का वर्णन किया गया है। और वेदाङ्ग + निरुक्त शास्त्र में ( १४।१५) ४ अन्तरिक्ष नामानि सगर समुद्र ” ऐसा उल्लिखित है । “ समुद्रात् अन्तरिक्षात् इति सायनः ” । और पुराण में जल शब्द कारण वारि अर्थ में व्यवद्वत दृष्टं होता है *सुतरां महर्षियों ने पुराणों में समुद्र मन्थन समय में समुद्र और सगर शब्द को प्रा- काश अर्थ में व्यवहार किया है ऐसा बोध होता है। और समुद्र मन्थन अर्थ से प्राकाशस्य पदार्थ का मन्थन समझना उपाख्यान को सङ्गत और संलम होना- वोध होता है। और मन्थन से निकले हुए रत्न आदि देवता के निकट अयन मार्ग से जा सकते । समुद्र मन्थन उपाख्यान का प्रकृत अर्थ यह है कि समुद्र नाम.अन्तरिक्ष और मन्थन नाम-खगोलस्थ दिव्य ग्रह, नक्षत्र प्रादिक के सूप, गति स्थिति आदि का पता लगाना ( Astronomical deep enquiry ) से + सुदासे दंत्रा वसु विभ्रता रथे वृक्षो वहतमश्विनी । रयिं समुद्रा दुत दिवस्पर्षस्मै धंत पुरुस्पृहम् । ऋगवेदे । १ । ४७ । ६ । '*उत्ससर्जच कोपेन ब्रह्माण्डं गोलके जले। ब्रह्म वै० पु० प्रकृतखण्डे २।५० - है कि ' समुद्रः . सागर, .

ह . ३० प्रार्यभटीयस्थ-- (ज्योतिष शास्त्र का अनुशीलन)। बंद विहित याग, यज्ञादि के समयादि नि- र्णय के लिये ज्योतिष शास्त्रामृत की प्राप्ति के लिये देव (प्रकाश) और असुर (अन्धकार) में मेल हुआ। दोनों पक्ष ने मिलकर प्रकाश मन्थन किया मन्दर पर्वत स्वरूप. क्रान्तिपात विन्दु' में सर्प की आकार वाली रेखा संयोजित हुयी, और क्रम से गोलार्द्ध रूपी दिन रात आविर्भूत और तिरोभूतं हो, गोलक विलोडित और मथित हुमा क्रम से ज्योत्स्ना रूपिणी ( चान्दनी) "लक्ष्मी” के साथ चन्द्रमा की स्थिति स्थान, राशि चक्र में निर्णीत हुई । और खगोज़ के बीच “सुरभि” (गी ) रुपिणी पृथिवी की अवस्थिति स्थान निराकृत हुई । “कौस्तुभ' रूप “ध्रुव” तारा विराट मूर्ति के हृदय में स्था- पित हुई । और ग्रह नक्षत्राण राशि चक्र के यथा स्थान में सन्निविष्ट हुये। और “ सावन ” काल यथोचित रूप से निीत होने लगा । याग, यज्ञादि (तिथि आदि विचार पूर्वक) अनुष्ठित होने लगे। “धन्वन्तरि" रूप से कुम्भ राशि धनु राशि के अंश अन्तर पर स्थापित हुआ । महर्षि पराशर ने विष्णु- पुरामा के समुद्र मन्धन के उपरहार में यों लिखा है किः “ततः प्रसन्नभाः सूर्यः प्रययौ स्वेनवर्त्मना। ज्योतीषिच यथामार्ग प्रययुर्मुनिसत्तम !” १।६।११२॥ उपसंहार में वक्तव्य यह है कि, प्राचीन समय में सब जातियों में सूर्य स्वामी और चन्द्रमा पत्नी रूप से परिगणित होते थे और वेद में भी यह स्पष्टतया लिखा हैः- “समिथुनंउत्पादयते रयीञ्चप्राणञ्च । एते मे वहुधा प्रजाः परिप्यतः॥” इतिप्र० उपनिषदि ॥४॥ अर्थः-प्रजा सृष्टि कामना से ब्रह्मा ने चन्द्र, सूर्य को स्त्री पुरुष रूप से सृष्टि किये और सूर्य चन्द्र से मनु और मनु से मानव जाति सृष्टि हुई। फलित ज्योतिष के मत से यद्यपि चन्द्रमा स्त्री-ग्रह कह कर परिगणित है किन्तु चान्द्रमास गणनार्थ चन्द्र, नक्षत्र वा तारापति कह कर परिगणित होता चन्द्रमा का इसप्रकार स्त्री एवं पुरुष दोनों प्रकृति की रक्षा के लिये पौराणिक गण 'चन्द्रविम्ब' और चन्द्रमा की ज्योति को स्वतन्त्र करने में वाध्य हुए । समुद्र मन्थन से चन्द्रविम्ब का लक्ष्मी सहज नाम हुआ, जैसे:--- "दाक्षायिणीपतिर्लक्ष्मी-सहजश्न सुधाकरः” । शब्दरत्नावली।

भूमिका ॥ 9 चन्द्रविम्झ तारापति हुए। और लक्ष्मधारिणी ज्योत्स्वारूपिणी चन्द्रिमा ( घान्दनी ) लक्ष्मी देवी विष्णुप्रिया या सूम्र-पत्नी हुयी । वैदिक प्राचीन प- हुति और पौराणिक नवीन-पद्धति, दोनों ही की समानता हुयी। अब भी “ग्रीनलैण्ड” वासी इस्किमो जाति में यह विश्वास है कि सूर्य अपनी पत्नी धन्द्रिमा के पीछे २ युगयुगान्तर से दौड़ रहे हैं । किन्तु कभी च- न्द्रिमा को स्पर्श नहीं कर सके । और इन दोनों की यह क्रीड़ा उपलक्ष ही में पृथिवी पर दिन रात होते हैं। सूर्यसिद्धान्त आदि ज्योतिष शास्त्र में जो ‘ग्रहण' के कारण दिख ला ये गये हैं उस का स्थल तात्पर्य यह है कि 'अयनवृत्त' परस्पर तिर्यकभाव से श्र- प्रस्थित है । चन्द्रमा के कक्षा वृत्त का एक अर्द्धांश अयन वृत्त के उत्तर में और अपर अड़ींश 'अयन वृत्त' के दक्षिण में अवस्थित और 'अयन मण्डल' और चन्द्रकला के 'छेद विन्दुद्वय' को “ पात " कहते हैं । इस पात के दोनों विन्दु की योग रेखा पर अमावास्या के अन्त में चन्द्र और सूर्य के अवस्थित होने से सूर्यग्रहण होता है । इस पातविन्दु द्वय की योग रेखा के मध्यभाग में सूर्यविम्ब अवस्थित रहते हैं । इस ‘योगरेखा' को “राहु". कल्पना करने से सूर्य विम्बरूप “ सुदर्शन" ( चक्र ) द्वारा “ राहु " दो खण्डित होता है। और पात के दो विन्दुओं में से एक को “राहु" और दूसरे विन्दु को “केतु" कहते हैं । या इन दोनों विन्दुओं को “ राहु" और सांप की देह की नाई पृथिवी छाया मध्ये चन्द्र प्रवेश करने से ‘चन्द्रग्रहण' होता है ऐसा कहने में पृथिवी छाया को केतु' कहना अनुचित नहीं। ऐसा अर्थ करने पर समुद्र मन्थन में बाहु का अमर होना और 'सुदर्शन' द्वारा राहु का शिर कटना, दोनों ही व्यापार सङ्गत और वेदाङ्गीभूत ज्योतिष शास्त्रानुमोदित होते हैं। समुद्रमथन-उपाख्यान में मेरु पर्वत, नारायणदेव, देव, असुर, अनन्तदेव, समुद्र, अमृत, कूर्म, इन्द्र, चासुकी, दूध, घृत, सुरभि, पारिजात-पुष्प, ऐरावत हाथीं, उच्चैःश्रवा घोड़ा, वारुणी, सोम, लक्ष्मी, हलालहल-विष, नीलकण्ठ, अमृतभाण्ड, अर्जुन, दिति अदिति और धन्वन्तरि श्रादि, शब्दों की व्याख्या कियी गयी है, परन्तु वेद, निघण्टु, ब्राह्मण ग्रन्थ, १८ पुराण तथा वाल्मी- कीय आदि उल्लिखित-समुद्रमथन पर-विचार अलग पुस्तकाकार छपेगा- यहां विस्तार भय से-संक्षिप्त लिखा गया ।

स्त्री- A प्रार्यभटीयस्य- श्रीकृष्णलीला की आधिदैविक व्याख्या की अवतरणिका ॥ चन्द्रमा पौराणिक देवता हैं। ३३ नक्षत्र पुराणों है. चन्द्रमा की ३३ शिवनी, भरणी, प्रभृति, (नक्षत्र) चन्द्रमा का घर या गृहिणी हैं। इस स्थल में रूपक अति जाज्वल्यमान है किसी को समझने में कष्ट नही होता किन्तु पुराणों में ऐसे अनेक (हमारे शास्त्रों में प्रायः तीन प्रकार के वर्णन हैं एक आध्यात्मिक सरा प्राधिदैविक और तीसरा प्राधिभौतिक) रूपक हैं, जिनका रूपकत्व भाव सहसा उपलब्धि नहीं किया जाता। श्रीकृष्ण नामक कोई व्यक्ति थे नहीं ऐसा कोई प्रमाण अब तक नहीं मिला है, प्रत्युत ऐसे प्रमाण तो भले ही पाये जाते हैं कि श्रीकृष्ण नामक एक अच्छे प्रादर्श पुरुष वा पुरुषोत्तम सच्चरित्र व्यक्ति हुए हैं जिन का इतिहास महाभारत में है। एवं श्रीकृष्ण सम्बन्धी इस इतिहास के अतिरिक्त भागवत आदि पुराणोक्त ऐसे निन्दनीय उपाख्यान हैं जिन को लेकर विधर्मी लोग हमारे वेदोक्त समा० धर्म तथा हमारे महात्माओं पर कलङ्क दिखलाते हैं जिनका यथोचित समाधान हमारे भाई लोग न जानने के कारण नहीं कर सकते। वेद तथा वेदाङ्ग प्रादि वैदिक ग्रन्थों के देखने से मुराणोक्त उपाख्यानों का तात्पर्य समझ में आता है। जैसा कि पाठकों को वक्ष्यमाण उपाख्यान से ज्ञात होगाः-वैदिक काल से सूर्य, उपास्य देव होते आये हैं, प्राब्राह्मण चाण्डाल पर्यन्त सब ही आर्य इस समय भी शय्या से गात्रोत्थान कर, पूर्व मुंह हो सूर्यदेव को प्रणाम किया करते हैं; सूर्यदेव ही गायत्री के उपास्य देवता हैं। शालग्राम शिला आदि उपलक्ष्य कर जिस प्रकार ईश्वर की उपासना की व्यवस्था मानी जाती है, उसी प्रकार सूर्य को भी उपलक्ष्य कर ईश्वरोपासना की व्यवस्था की गई है। श्रीकृष्ण और अन्याय १० अवतार, सब ही विष्णु के अवतार कहे जाते हैं। श्रीकृष्ण नाम से कोई व्यक्ति अवतीर्ण हुए, जब यह स्वीकार कर लिया गया, और वे अवतार कहकर माने भी गये तब उन के जीवन के साथ विष्णु या सूर्य (कारण वेद में विष्णु और सूर्य एक) की लीला मिश्रित कर देना असम्भव नहीं है। श्रीकृष्ण की वास्य- लीला के साथ जो सूर्य की लीला मिश्रित हुई है। इस के बहुत प्रमाण पाये जाते हैं। वाल्य-लीला यदि इस प्रकार सूपक के ऊपर न्यस्त न किया जाता, तो परम पवित्र गीता शास्त्र के प्रवर्तक के चरित्र में “परदाराभिम- र्शन" दोष अवश्य ही लगता। परीक्षित राजा ने श्रीकृष्ण जी की वाल्य- लीला सुनकर शुकदेव जी से इस प्रकार प्रश्न किया था किः-- . .

भूमिका "सस्थापनाय धर्मस्य प्रशमायेतरस्यंच । अवतीर्णो हि भगवानंशेन जगदीश्वरः ॥ सं कथं धर्मसेतूनां वक्ता कर्ताभिरक्षिता । प्रतीपमाचरद ब्रह्मन् परदाराभिमर्शनम् ॥ आप्तकामो यदुपतिः कृतवान् वैजुगुप्सितम् । किमभिप्राय एतं नः संशयं छिन्धि सुव्रत !॥" जिम संशय ने राजा परीक्षित के मन को छमाडोल वा सन्दिग्ध कर दिया था वही संशय आज अनेक लोगों के मन में उठता है। स्वतः ही लोगों के मन में यह प्रश्न होता है कि धर्मसंस्थापनार्थ और अधर्म के नाश के लिये जिन का जन्म हुआ है वे परस्त्रीगमन रूप कार्य वा कुमित कर्म में क्यों कर प्रवृत्त हांगे ? । या तो यह कोई प्राध्यात्मिक व्यापार है या कि- सी ज्योतिष शास्त्रोक्त विषय का रूपक है। राधा को ह्रादिनी शक्छि (अ- 'ध्यात्म) मानना पड़ेगा या राधा को “राधा नक्षत्र मानना पड़ेगा। नहीं तो अवतार की मर्यादा की रक्षा नहीं होती। शुकदेव जी के मुख परीक्षित के प्रश्न का उत्तर दिया गया है उसे कोई भी सन्तोष जनक (उत्तर) नहीं मान सकता । "ईश्वराणां वचः सत्यं तथैवाचरितं क्वचित् । तेषां यत् स्ववचो युक्तं बुद्धिमांस्तत् समाचरेत्” ॥ यह बात सुनने से किसी के मन की शङ्का नहीं जाती तो परीक्षित का भी सन्देह दूर हुआ हो या नहीं इस में उन्दह ही है। "मैं हजारों दुष्कर्म करु- गा, उस पर कोई ख्याल न करना मैं जो कहूंगा यही करना,,। ऐसी बात किसी धर्म प्रवर्तक व्यक्ति के में शोभा नहीं देती। अवतार का प्रयोजन क्या ? इस पर अवतारवादी लोग कहते हैं कि मनुष्यों को शिक्षा मिलना ही प्रय- तार का प्रयोजन है । जिस कार्य से मनुष्यों को सुशिक्षा न हो कर कुशिक्षा होती ऐसे कार्यों को अवतार में प्रारोपन करना नितान्त प्रसङ्गत है । चाहे जिस भाव से ही देखा जावे श्रीकृष्ण जी की वाल्यलीला को ऐतिहामिक घटना कह कर मानना बहुत कठिन है। वाल्य लीला में नानाप्रकार का प्रा. ध्यात्मिक अर्णन भी है। हम ने जो वेदाङ्ग-ज्योतिष के अनुमार रूपकवर्णन से जो राजा . २ १० प्रार्यभटीयस्य- किया है । इस्से हमारा प्रयोजन यह है कि मनुष्य को सब विषयों में सत्य का अनुसन्धान करना चाहिये। यदि हमारे इस रूपक वर्शन में कोई भ्रान्ति सिद्ध हो तो उसे हम सादर स्वीकार करेंगे। श्रीकृष्णा वा श्रीरामचन्द्र आदि महापुरुषों के किती २ चरित में कोई २ अंश रूपकालङ्कार से वर्णन किये गये हैं ऐसा कहने से उन महात्माओं की सत्ता नष्ट नहीं होती अर्थात् ऐमा कोई न समझे कि इन महात्माओं ने जन्म ही नहीं ग्रहण किया केवल रूपक मात्र है। और उस में उन २ अवतारों के उपासकों के क्षोभ का कोई कारण नहीं । सर्वजन श्राराध्य श्रादिक के चरित में जो कई एक अर्थविहील उपन्यास या कलङ्क आरोप किया जाया करता, बह निदोप, सार्थक, रूपक मात्र, और उस में अवतार श्रादि चरिण में काडू स्पर्श न हो यही हमारे इन रुपकवर्णन का उद्देश्य है । अब हम आगे श्रीकृष्णालीला-का वर्णन करेंग । श्रीकृष्ण-लीला। श्रीकृष्ण जी महाराज श्री विष्णु भगवान् के अवतार कहे जाते हैं। वसुदेव और देवकी श्रीकृष्ण जी के पिता, भाता, श्रीराधिका श्रीकृष्ण जी की प्राधाना शाक्त, बन्दावन, मथुरा, द्वारका और कुरुक्षेत्र, श्री कृष्णा के लीलास्थल कहे जाते हैं ससुरविनाश के लिये श्रीकृष्णजी का प्रयवी पर अयतार का उद्देश्य माना जाता है। श्री मद्भागवत विर पु० में श्रीकृष्ण लीला बात है। वैदिक भाथ्यों का परमदेव (१) सूर्य देव और बेदोक्त प्रमाण से सूर्य का दूसरा नाम विष्णु (२) है और विष्वन सूर्य का अधि डात्री देवता (३) है। प्राचीन आर्यलोग प्रकृत वेदोक्त देव मिनअन्य देवगफ थे ऐसा कदापि सम्भव नहीं। गोलकस्थ राशिचक्र में सर्य देव का एक वर्ष परिभ्रमण, व्यापार उपलक्ष करके आय्यं जाति के मनोजन के लिये पूर्व समय में श्रीकृष्ण लीला का अङ्गुर आरोपित हुभा किन्तु क्रमशः पुराणों में इस लीला रूपी वृक्ष की शा- खा प्रशाखा, पल्लव, होकर अप इन (गोलारूपी) वृक्ष में विषमय फल हो गये। ( कुदरती प्राकृत राशि लीला का मर्ग भल कर श्रीकृष्ण महाराज जैसे श्रा- दर्श पुरुष वा पुरुषोत्तम के चरित्र में कलङ्क लगा ) नहीं तो अधःपतन शील भारत भूमि में कुरुषि की धारा बहती हुई आदर्श पुरुष श्री कृष्ण जी को प्रतल स्पर्श कलङ्करूपी समुद्र में निमज्जिा हो उछलना डूबना क्यों पड़ता ! ! ! और बल वैवर्त पुराणों . 12-गाय-युक्त सविता देव । (२;- ऋ, ६ । ७७ । १. कम् १ । २२ । १६ ।। (३)--गायत्री र . भमिका ११ तनहान.की विचित्र महिमा है ! अनन्तकान, अनादिदेव को ग्रास करने के लिये उद्यान है । अनादि, देव आज भारत में कलुषित भाव से पूजित होते हैं। अङ्गराग न होने से शीघ्र पूजा लोप होगी। भारत के वित्र कुल सदा- शय साधुचित्त यह रूपंक कल्पना कारके भी आज मनातल शासनमाज के निकट दायी हैं । इन जातीय ऋगा बिना वनार्य भाजदम श्रीराला के रहस्य भेद करने में कृत संकप हुए हैं । फागुन की अनास्या को भायात्रा कोना (प्रकाश की मोर ) सन्दर्शन करी । तब देखो का सीना गोगा में अनश्वर अक्षरों में अङ्कित हो रही है । लोग अशा नन्तर को ओर ( प्राकाश में ) तारक मध . धनुमान को है. उस का नाम "पुनर्वसु” है। इस धम् नक्षत्र आवको यह दंगकी विरा. जमान है। इप्त वसु नक्षत्र यात में काले हो विन्ट का नाम 'कर्कट क्रान्ति' है। विर का न पा १ वस्थिन है । उस बिन्दु करने पर राय को भारत मात्र है। और इस पर नो अन्य के “दाना" काय १.7 ) : विन्दु वाल (नय भाल का मध्य) बाल कला को जन् । (3: i). मान रूपना नहीं समझो नव दुबाद गश्याम (१) तुम्हारे सामने माग हो रह। है। श्रीकृष्ण रेखा में शिवम न छाया तन (२) दक्षिा में बात की- सम्मुख में कर्कट सिह कन्या तुमा वृश्चिक और " यमुना (३) अतिक्रमण कर प्रयमतः अबतर हुए। भन्मं करायीला- रात्मक वागा के आकार का पुष्य नक्षत्र पाचममतुवामान है। श्रीकृष्ण पुष्य संक्रमण के पोछ कट राशिस्य र नप कानिय (४) कानीय सर्प का मस्तक षट्तारकाय चकाकृति और धनको ना कहते है। इस की अधिष्ठात्री देवता ‘फणी' हैं। श्रीकृष्ण ने आश्लषा में पर रखकर काली मर्प को दमन किया मम्मुख d पारा - . * पुनवस नक्षत्र का अधिया देवता द माना बदल ह उत्तः ...... ।। क. या वामद ५८ ३,५० श्राकृष्ण जन्मखण्ड । ( आदानर्देवका व मृत , ति हरभ । २ वा दान ग का नाम पयं-१ अयन पाप का नाम अदिति या देवगितह । (2)Clustorst.ti' अर्थात विगग नामय, पुनर्वसु नक्ष. १८. नारय मम मवसे याली नाग्य जन्म - ६५ वरच सोमश्च विष्णुश्चैवानिलोनलः प्रत्याश्च प्रभामश्च ।। 4 व.टी व.म.न.प. नि मानः (२) 1111xCon: - tellation or Canis minor ( 3.1??) tid. (onstillution - या १२ आर्यभटीयस्य- में सिंह राशिस्य पञ्च तारकामय मघा नक्षत्र है और इस की अधिष्ठात्री देवता यम' हैं सुतरां मघा की ज्योतिः नव प्रसूत कात्मक का जीवन संहा. रक “अहि" पूतना नामक बाल रोग का उत्पादक यही मघा (१) पूतना है। मघा की योगतारा (२) देवकी के (अयन रेखाई) उपरिस्य कहने से पूतना को मात्र पद में अभिषिक्त कर श्रीकृष्ण को स्तन्य देने में व्याप्त कियी गयी है। सूर्य देव के मघा में अवस्थिति काल में मघा पाच्छादित होता है । श्रीकृष्ण ने मघा मंहार कर पूतना को विनाश किया । सानने सिंहराशिस्थ पूर्व एवं उपर दोनों फग्गुनी वा अर्जुनी नक्षत्न (३) इन दो नक्षत्रों को अतिक्रम कर श्रीकृष्णा ने “ यमनार्जुन पत भवन लीला दिखलाया है। सम्मुख में कन्या राशिस्य हस्ता' चित्रा, 'तुला राशिस्थ स्वाती, विशाखा, वृश्चिक राशिस्य अनुराधा, ज्येष्ठा, और धनु राशिस्थ मून, पूर्वाषाढ़, और उत्तराषाढ़ ये नव नक्षत्र हैं । ये ही आधुनिक पौराणिक नव नारी हैं (४) पाठ मखी और आद्यशक्ति विशाखा या राधा (५) विशाखा की आकृति पुष्पमाला था तोरण की नाई या तिमन कीसी है। और विशाखा की अधिष्ठात्री देवता ‘शक्राग्नी, 'वि. द्युत' है । इस विद्युताग्नि का नाम यही 'र' (६) नविन का आधार कह कर वि- शाखा 'राधा' नाम से विख्यात (5) है। श्रीकृष्ण चन्द्रावलि. चित्रलेखा । ललिता (८) इन तीन सखियों के साथ सम्भाषण कर श्री राधा को घर में आकर देखा कि श्रयन रेखा को () श्रीराधा ने अधिकार किया है। श्रीकृष्ण और श्रीराधा का मिलन हुन्ना । यह श्री राधा कौन हैं ? वृष राशिस्य सूर्य देव "वृषभानु” राजा । 'कलावती. धन्द्रिमा उन की पत्नी हैं। कलावती अपने पति वृष (राशिस्य सूर्य) भानु ( राजा ) से मिलने की प्राशा में उन्मत्ता होकर पूर्णाकृति लाभ के (१) Regulus (२)मघा को पूतना कहने का और भी कारण हे मया वा आकृति हल की सी है, और देखने म वजा Fly की नाई मालग पडना है कारण मधा को ध्वगिनी, कहना मार्थक है । और ध्वजिनी वाहिनी सेना,, पूननाऽनीकिना चगः ) इन्यमरः । इस अमरकोश प्रमाण से पाया जाता है कि पूतना शब्द व जिना के अर्थ में व्यवहार करने योगय है और मघा पृतना दोनों ही निजिनी, कहने मे मधा पूतना और मातृस्थान में विठलाने के अनेक कारण है । जैसे तृतीय दियमे मासे (वर्षे वा गृह्णाति) पाना नाम मातृका , इति चक्रपाणिदत्त । श्रीकृष्ण जी को पृतना के स्तन्य देने का और भी कारण है जैसे भावप्रकाश ( वैद्यक ) में यह पृनना " या न रांग चिकित्सायाम् तत्र सशोधने पूर्व धात्रा स्तन्या विशोधयेत् ।।।। (३) ऋक १० । ८५ । १३ ।। (४) चन्द्रालि, चित्रलेखा ललिता विशाखा तुज विद्या रङ्ग देवी चम्पकलता सुदेवी और इन्दु लेखा ये ६ हैं (५) "राधा विशाखा पुष्येतु, इत्यमरः (६) स्मृत र:, पावके तीदरले, इति मेदिनी (७, वैशाखे माधवोराधः इत्यमरः () स्वाती नक्षत्र की अधिष्ठात्री देवता पवन, और स्वात। तुला राशि में अवस्थित होने से इसका नाम ललिता, है। और हम्ता की पाच तारा चन्द्र तुन्य शुरु वर्णा है (२) अयन घोष या राय ए घोष पतना " को श्रीकृष्ण जी को भमिका ॥ १३ लिये ज्येष्ठा नक्षत्राभिमुख यात्रा काल में कमलाकृति विशाखा के बीच वि. द्युत रूप राधा को प्रार हुई । इस स्थान में राधा का पौराणिक जन्म और लालन पालन आदि पाठक स्मरणा करें। श्रीकृष्ण का, तुला राशि में राधा नक्षत्र भोगकाल में प्रामाशाग्नि (सूर्य) प्रान्तरिक्ष अग्नि में ( विजुली में) मिलन हुप्रा । (१) मांख्य शास्त्रोक्त प्रकृति पुरुष का मिलन हुआ। क्रमशः कार्तिकी पौर्णमासी पायी विद्यतमयी षद कृत्तिका की शोभा में पौर्णमासी की रोपमय' ज्योत्स्ना, घर्षित हुयी । का- तिकी पौर्णमामी की कौमुदी ज्योत्स्ना में जगत् भासित और हासित होने लगा। पशु, पक्षी आदि मब जीवगा और जगत जन प्रहलाद मे पुलकित हुए । जगत् जन इस विमुग्ध कर रजनी को नल्य,गीत द्वारा सुख से व्यतीत करने लगे। यह विचित्र नहीं। इसी जगत् भय नत्य.गीत. का नाम 'राम- लीला' (२) है। श्रीकृष्णदेव श्रीराधा और भाउ सखी मिल कर रासलीला में स्थान वृन्दावन में प्रमत्त हुए । आज पौर्णमामी कलावती और मातृका- गस्म (३) ( षटकृत्तिका ) अपनी कन्या राधा के शम ग्रह में उन्मत्ता हुयी। विमान पर पुरन्धीगण, प्राज अहहास करती हैं । प्रकृति की इस अनुपम शोभा में संमार मुगध हो रहा है। यह · वृन्दावन' कहां ? यह देखो ‘गोलक' में लाखोनाख गोप( ४ ) गोपी अर्थात् तारक तारका परिवटित हो धाता, ईन्द्र, मविता इत्यादि द्वादश आदित्य (५) रूप में श्रीदामनु, नुदागन, प्रभृति' द्वादश गोप मण्डल के साथ श्री सूर्यदेव, श्रीकृष्ण' नाम से वन्दावन में रामलीला में विराज- मान (६) हैं। यदि इस प्राकृतिक रामलीला सन्दर्शन से आप के हृदय में गम्भीर विमल ईश्वर के प्रेम का उदय हो कर मन, प्राण, पुल्कित न हो और कलुषित भोतिक येमभाव यदि किमी के क्षुद्र कुमंस्कार तिमिराच्छन हृदय में प्रवेश करता हो तब हम और क्या कहेंगे, हां इतना तो अवश्य कहेंगे कि भाइयो !.श्रीकृष्णभगवान् में चाहे ईश्वरभाव से अपनी रुचि.अनुमार पूजा करो परन्तु ऐसे पुरुषोत्तम प्रादर्श पुरुष के सच्चरित्र में पापमय लीला चित्रित प्रापे को कलङ्कित न करो और नारकी न वनो ! ! ! हमने पुनर्वसु नक्षत्र से राधा नक्षत्र तक आदित्यदेव' ( श्रीकृष्ण ) का (१)-ऋक् १ । ६५ । ३० ॥ (२)-- गुरागेद्रवे रमः । इतयमरः । (३)-पर कनिका । (४) किरण ऋक १ । ६२ । ५ प-पालने (५)--वैशाख मे चैत्र पर्यन्त मृय के नाम १ थाना, २ इन्द्र, ३ मविना, ४ विवस्वान्, ५ भग, ६ अयमन् , ७ भाम्कर, ८ मित्र, विगा, १० वगा, ११ पृपा और १२ ग है। महाभारत आदि पर्व प्रायन पुगण के प्राण जन्म ग्वट का ४ थे अन्याय । . (६) १४ आर्यभटीयस्य- अनुसरण कर रास'नीला का बोध कराया परन्तु इस से लीला का सम्यक् बोध न हुआ है। क्योंकि बलदेव, नन्दगोप, यशोदा देवी और रोहिणी देवी इन के न होने से रासलीला का आरम्भ नहीं हो सकता । अन्य ग्रह की तरह आदित्य देव की कृरगति (१) नहीं होती, सुतरा नन्दराज के भवन में श्रीकृष्ण को ले कर जाने के लिये उपाय रहित ( २ ) इस कारण इस समय बलदेव आदि को नन्दालय से रामलीला में निमन्त्रण कर, लाना पड़ा। बहुत पर्यटन से प्रयोजन नहीं । यह देखो एकवार, राशिचक्र में दृष्टि डालकर देखो कलावती चन्द्रमा के पश्चात् भाग में वृषवीथि में। (३) पशि में यशोदादेवी (४) और रोहिणी देवी ( .iklelixran in Ilyader ) राजती हैं । वृषराशिस्थ सूर्य इन्द्र देव (५) देवराज राखा नन्दराज जहाँ कात्यभित्र नहि तथ्य दूरम्” सुतरां हम ने आपतत नन्दराज को वषराशि में यापन किया। विचार पीछे होगा। यथा स्थान में विष्णापराण के ५म नग में वलदेव जी का जन्मवृत्तान्त वर्णित नहीं है। यथा स्थान में श्रीमद्भागवत के दशमस्थान्ध में ऋषिवाक्य में कलदेव जी का जन्मवृत्तान्त का विवरण प्रकाशित नहीं । यथा स्थान में ब्रह्मवैवर्त पु? के जन्मखण्ड में संघर्षण देव (६) का जन्मशतान्त बिना है। किन्तु एकवार इसी के साथ बुध-जन्म वृत्तान्त स्मरण करो ( 9 ) चतुर्थ वसुदेव पुत्र संघर्षण रोहिणी गर्भजात कह कर 'रोहिणेय हैं किन्तु · देव की- नन्दन ' या ' वसुदेवनन्दन' नाम क्यों नहीं पागा ? तृतीय वसुदेव ( ८ ) पुत्र बुध ने सौम्य' नाम पाया किन्तु तारकानन्दन ' या तारासुत' नाम क्यों नहीं पाया ? दोनों ही का जन्म वृत्तान्त रूपक मूलक है। हम लोग ज्योतिष- बुध की आधिष्क्रिया घटना में पाते हैं कि, पाते हैं कि, बुध “रोहिणेय है।"। पुराण में रूपक बिगड़ने के भय से इम का इतिहास नहीं लिखा गया कि किस कारण से वुध का दौहिणेय ' नाम पड़ा। (१)-Rotirgrade motion (२)-राशि चक्र में आदितय देव मेष राशि मे क्रमशः पूर्व दिशा में वृष आदि दुवादश राशि एक वर्ष मे परिभ्रमण करते है । वृष राशि में नन्दालय मिथुन राशिस्थ पु नर्वसु नक्षत्र के पश्चिम मे वृष राशि अवस्थित सुतरा राशि चक्र पर्यटन न करने से श्रीकृष्ण वृष राशि में किस प्रकार जायगे ।। (३) -तृष राशि के पूर्व और पश्चिम सीमान्त में स्थित दो प्रवक रेखा को मध्यवत्ता गोल कान्श को वृषवीथि कहत ह । (४)-वृष राशिरथ पाटलवर्ण देवमातृका पोडश मातृका में देव सेना या षष्ठी नाम से ख्यात एव ताम् वदन्त महा षष्ठी पण्डिताः शिशुपालिकाम् । देवमातृका ने श्रीकृष्णलीला में यशोदा नाम पाया है ज्योतिषमती कहने से यशभि धवलता ।। (५)--जयेष्ठमले भवेदिन्द्रः इतिको १८ अध्यायः ।। (३) देवकयाः सप्तमे गर्भ कामो रक्षा दधौ भिया' । रोहिणी जठर माया तमा कृप्य ररक्ष च ।। तस्माद् बभूव भगवान् नाम्ना संघर्षणः प्रभुः । (७)-तारका गर्भ सम्भूत स एव च बुधः स्वयम् । ब्रह्मवै०पु०प्र०खण्डे६६अ० ॥ (८)--धरो ध्रु वश्च सोमश्च विमा वैवान नाऽन नः । प्रत्यषश्च प्रभातश्च वमत्रोऽष्टी क्रमान् ग्मृताः । गढा वरद खगिण ८ ते ग्रह--योग तत्त्वे । ( शास्त्र में - भमिका ॥ १५ 'इस समय देखा जाता है जो, बलदेव का नाम रौहिणेय है । और वुध का भी नाम रौहिणेय है। गदाधारी (१) यह रोहिणेय श्रीकृष्ण के चिरसङ्गी हैं। गदाधारी अन्य रोहिणेय आदित्यदेव के चिरसङ्गी हैं । गदाधाशी अन्य रोहिणेय आदित्यदेव के धिर सङ्गी हैं (२)। श्रादित्यदेव श्रीकृष्ण हुए, वलदेव को न्यायानुसार बुध ग्रह कहा जावे। घर का घर ही में मिला "गृहचेल्म- धुविन्देत किमर्थं पर्वतं व्रजेत्” इस समय हम रासलीला वर्णन में प्रवृत्त हुए। रास-पूर्णिमा ॥ V करमण्डल विशाखा स्वाति LEE मुल वृश्चिक अनुराधा Plkith 2101 गुना जल विपुव समान धनु चित्रा हाता उत्तर फल्गुनी inte Hit कन्या मिह पर्व फगुनी श्रीषा IRE ILLA कर्कट मघा 21122 चन्द्र पृथिवी पुष्य भिपन मेष कटकसंक्रान्ति वृष EJEE hejiah अश्विनी भरणी ग्राद्रा पुनर्वसु कृत्तिका रोहिणो मृगशिरा (१) मुबली मूषला युधात् । (२)-बुध ग्रह सूर्य के ३० अःश के बीच में रहना है अताव यह प्रायः सूर्य किरण मे छिपा रहता है।

आर्यभटीयस्य- और एक वारराशि-चक्र पर दृष्टि डालो तो देखोगे कि १२ राशिस्थ (१) २७ नक्षत्रों में केवल पूर्वफल्गुनी, उत्तरभल्गुनी, स्वानी, विशाख के उत्तरस्थ एक तारका और श्रवण, धनिष्ठा ये ही छः नक्षत्र अयनमण्डल के ऊपर, . राशि नक्षत्र आकृति अगरेजी तारा.. संख्या अधिष्ठात्री देवता ३ घोटकमुख विकांगा ६ • अग्निशिखा राकट अश्विना मव भरणा कृत्तिका वृष रोहिणी मृगशिरा मिथुन पार्दा पुनर्वसु ककट पुण्य স্মৰা विडाल पद शशि १ पदम धनु . वाग ३ ६ चक স্মথ Aries यम Muscit ददन Pleiades कमनन Ilyades () Betelgeuse प्रादिनि Castor etc जीव Asellus फाग Jlycra पितृगगा या राम Regulus योनि Zosma & Subra अर्थमा Denebola & another दिनात Curves Spicil. Arcturus. शानि Akrol), Dsclubba. and others. Antares ete. मघा लागल सिंह खड्ग पूर्वफाल्गुनी उत्तरफाल्गुना . खरग कन्या हस्ता ५ चित्रा .. वष्ट्र तुला ? पवन मुना कुमकुभवर्ण तारण रवानी विशाग्या वृश्चिक मित्र अनुराधा ज्येष्ठा सर्प सरदन्त या कुण्डल ३ शक । 0 राइब निति तोय विश्वविरिथि मूल पूर्वाषाढ उत्तराषाढ(तयक्ता) धनु शय्या मर्प शर मदर्दल मकर श्रत्रणा my ५ वसु Lesath etc. Kaus 0 Aquila Delphinus 0 . Enif & Homan. Squale of Pegasus Piscis. कुम्भ धनिष्ठा शतभिषा पूर्वभाद्रपद उत्तरभाद्रपद रेवती मण्डन २ वरुण अजएकपाते अहिनध्न . मीन खड़ग पर्यडक मतरय शृङ्गाटक ३२ पृषा विरिधि ३ ( तयक्त) अभिजित Fegir Etc. M तुङ्ग देवी हैं भूमिका ॥ १७ गोलक के कदम्ब के (१) निकटनर । कुरुक्षेत्रपर्व में हम प्रथम दो का ही प- रिचय देंगे। द्वितीय दो कृष्ण लीला की ललिता और श्रीराधा, तृतीय दो का परिचय अङ्क में होगा। यह देखो ! श्रीराधा का किरीट, राशिचक्र के एक धनु के (२) शिरोभाग में उच्चामन पर बैठा है । वाम भाग में ललिता सखी, अ- न्यान्य सखियों में चन्द्रावती (हस्ता) (३) राशिचक्र के दक्षिण में, चित्र लेखा चित्रा नक्षत्र ) राशिचक्र के मध्य में । ललिता ( स्वाती ) और श्रीराधा की (विशाखा का ) (४) अवस्थिति स्थान ऊपर कहा गया है । रङ्गदेवी राशिचक्र के मध्य में अवस्थित है । सुदेवी (1) चम्पक लता (६) राशिचक्र के दक्षिण में अवस्थित तुङ्ग में और इन्द्रलेखा (9)-राशि चक्र में मावस्थित हैं अयन मण्डल के अपर धनु राशि के शिरो भाग में वृष राशि में, यशोदा देवी ( देवमातृका कृत्तिका ) (८) और बलदेव की माता रोहिणी देवी के वामभाग में कलावती जौमुदी चन्द्रिमा के अवस्थित का स्थान है। यह देखो ! कलावती आश्विनी पूर्णिमा, अश्विनी नक्षत्र में अवस्थित कर रास-दर्शन के उल्लास में दूत वेग मे राशि चक्र में दौड़ रही हैं । श्रीकृष्णा और श्रीराभा में परस्पर रासलीला निमित्त विचार हो रहा है। कलावती अश्विनी से भरणी, कृत्तिका, रोहणी, मृगशिरा, प्रादि एक २ नक्षत्र अतिक्रम कर रही हैं और क्रम से जामाता के निकटस्य होती जाती है, मानो नील अवगुण्ठन मुखकमल नाच्छादन करती हैं (९) पुनर्वसु नक्षत्र में (१९) विष्णु तारक के दर्शन से कलावती (१२) ने ८ कमानों को प्राच्छादित कर लिया है (१३) एवं क्रमशः श्रीराधा नक्षत्र में श्राकर जामाता के दर्शन में १६ कला प्रा- (१)-ध्रुव और अभिजित नक्षत्र के प्रायः मध्यवती विन्दु ध व मे । ४ अंश दूर पर कदम्ब अवस्थित है। ६ वात् जिन लवान्तर इति भास्कराचार्यः (२)-Amplhi theatre. (३)-हम्ना नो ५ नक्षम चन्द्रवन शुद्ध वरणा है ।। (४)-विशाखा के तीन पद तुलाराशि में और एक पद वृश्चिक राशि में और उत्तरग्ध नारका अयनमण्डल के उत्तर में एवं अन्य तीन दक्षिण में, इसकारण दुवचन का व्यवहार है। रामायण लकाकागड । विशाग्या के किरीट में १० नक्षत्र हैं।। (५)-अनुराधा का दुतीय तारा नरक लोहित वर्ण कह कर अनुगधा का रहा देवा नाम है अर्थ सं-न-सूर्य ।। रकः स्फटिक सूर्ययोः । इत्यमरः । (६)-ज्येष्ठा वक्राकृति कहकर मृदेवी नाम मृला लता कति ।। (७)--Line of beauty. (८)-तुगस्थ कहने से पूर्वाषाढा नक्षत्र तुग देवी ने नाम पाया है। (6)--भूपाकार शुक्रवर्ण चतुत तारवामय उत्तराषाढ़ इन्दु लेखा है (१०)~चतुर्थ मातृमण्डलम् - काशी खण्डे (११) - कृष्णपक्ष का कलाक्षय (१२) - पुनर्वसु शब्द से वसु का ३ अंश । वमु = = 1. सुतराम् ८० = ६ । अर्थात् पुनर्वसु नक्षत्र में ६ तार है। वर्तमान आर्य ज्योतिषशास्त्र में ५ गृहत होते हैं । किन्तु ४ तारक को साधारण रस्व बाकी २ तारक में से एक २ लेकर दो धनुष दीरयगे वसु अर्थ से धनुष का ग्रहण है ।। (१३) - कार्तिकी कृणाष्टमी या गोपाष्टमी ।। . न--रक ३ ४ २ १८ आर्यभटीयस्य- च्छादन किये (१०) और अनुराधा में उपनीत हो कलावती अवगुण्ठन विमोचनार्थ उद्योग करने पर देखती हैं कि अयणावस्थित त्रिविक्रम सम्मुख में श्वसुर के दर्शन से बड़े पुलकित हैं । कलावती अञवगुण्ठित भाव से अबणा अतिक्रम कर मिष्ठा आदि एक २ नक्षत्र को अतिक्रम करती मुख कमल के नील गुण्ठन क्रम से मोचन करते २ चलमे (२) लगीं। अन्त में वृषराशि में उपनीत हो कृतिका और रोहिणी के वामभाग में आकर नाश्वस्य भाव से भानन्द में नील अवगुण्ठन एक मात्र विमोचन कर सादर ऊंचे आसन पर बैठ गयीं । यो कात्ति की पूर्णिमा की कौमुदी पौर्णमासी का उदग हो कर ज्योत्स्ना में जगत् आलोकमय हुआ। कोमुदी की ज्योत्स्ना-अजता में प्रात्ता हो कर यशोदा देवी ( कृत्तिका ) छिपकर नीलमणि की रासलीला देखने लगी । और बलदेव की माता भी अञव-गु যিশুন मुख से रामलीला देखने लगीं। किन्तु पौर्णमासी कलावती श्वश्रूजन मुलभ अर्कुण्ठित भाव अजगरवन ने सम्पूर्ण जगत् के सामने पृथिवी के पृष्ठदेश से सासर ( दिवस ) घर में रासलीला देखने की कामना से किनारे हो कर लाकमुक्त करती हैं । पुनार जगत् की ओर बाह कर श्रीराधा की सम्पद् में गर्वित हो उद्धा कर सती हैं। उमा दाल में कौमुदी चन्दमा वांके नजर से उभय पार्श्वस्थ वैवाहिक दुक () की जोरदृष्टिपात कर अस्फुट स्वर से कहती हैं कि देखो देखो बहिन हमारी राया स्वामी समागन से सखीकुलमध्ये (चारानिय ) कहां हिर? मी तो कार्मिको चन्द्रिमा के श्राह्लाद से नाचती २ उ-मत्ता प्राडो कर पश्चात् उर्ती वेवाहिक सच्चिदानन्द गोप को कहते हैं कि वाह ! आज का युभ दिन है ! भा-नन्दपुत्र प्रानन्दमय श्रीकृष्रएकी कृपा से हमारी रावा.पविना हुयीं । नन्दराज प्रह्लादसे गदगदभाव में कहते हैं कि श्रीमती अहह ! तुाहारी सुता राधा ही श्राद्या (8) शक्ति हैं। राह देखो ! श्रीकृष्ण का रश्मि चूड़ा ( उर्द्ध मुख मयूख को ) तुम्हारे राधा के पत्तल को मार्जन और धौत करता है। यह देखो ! कौमुदी चन्द्रमा के उद्धर्व भाग में प्रजापति ब्रह्मा ‘ौरिक मण्डल ( ५ ) विराजमान है। आज प्रजापति ब्रह्मा पूर्ण चन्द्ररूपी हंस पर (2) -- अमावाग्या ।। (२) - शुला पक्ष की कलावृद्धि ॥ (३) - यशोदा और रोहिणी । (४)- कार्तिकी वर्ष विशाखासे गणित करने पर और शक्राग्नि या विद्युत - मृत्ति अग्नि का आदि विकाश है ।। (५.)\urist constellution प्रजापति ब्रह्मा के शिरोदेश में प्रजापति नक्षत्र •Delta auriga हत पदम से बात ( Star (tapolln ) तारा दक्षिण कुक्षि में अगितारक (Star nath) ब्रह्म - हुत तारक के पूर्व दक्षिण अंश मे त्रिभुनाकार छोटे २ तीन तार ('T'luc kids) क्या त्रिवेद चिन्ह (Emblem) .

.. तथा राजा. भूमिका ॥ १० सानन्द आसीन हैं । रासलीला देखने के प्रानन्द में ३३ कोटि देवता को साथ विद्याधर, अप्सरागण, पक्ष, रक्ष, गन्धर्व, किन्नर. पिशाय, गुल्लक, भिवाचरण, देव, दानव, असुर, नादि परिवृत्त होकर रासमण्डल के कई नेता (२) ने बागीन हैं। इसी उपलक्ष्य से श्रीप्राधा नलेश्वरी', रामेश्व', जानो पुरा में कही गयीं हैं। और महर्षि वाल्मीकि ने विशाहा को सब का कुन नक्षत्र कह कर वर्णन किया । और बकाल के यात्रियों से रायी किशोरी नाम से श्रीराधा का नाच लिया है और उसी से पाश्चात्य ज्योतिषी लोगों ने श्रीराम पान वाला নিয়া (('orona) (२) है। आज राशिचक्र के बोन्द्र ज) और उन के दक्षिण भाग में वलदेव (मन) अधिक मा गोपी.. गणा (तारकागण) श्रीराधा गोरखका के माध्यामार चक नल में नाच कर कृष्ण बलराम को प्रतिकारती है। वो भी भोत हो चक्र नृत्य में साथ दिया। २४२,४३५ या कामानि परीक्षा करने हैं। कार्तिकी चन्द्रिमा ज्योत्रमा बा-गरनार पूर्व । २. संघ, भाताल शालिन कर स्नेह में डब रही हैं। कातित कोमा म जाना मागर में तीनों जगत् वह चले। प्राचन्द रहय सुशागर में जो मात्र के हाथ निमग्न और अभिषिक्त हुए । अवाचनीय निकल ज्योला जलविश्वन अब- गाहन किया । बाहुली ( कार्तिको ) ज्योल्मा ने मुमता को विस्तार कर ब्रह्मर्षि देवर्षि और राजर्पिगण को लालिङ्गिन कर विभुग्ध किया। इस मोहमें विमुग्ध होकर हमारे ऋषियों ने मच भताप गबंध्यापी परन पुरुष को सूक्ष्मभाव से ज्ञानकृत रूप से सवितमाल मध्यवती नारायण का ही वर्णन किया है। और सवितृमण्डल ही इस प्राकृतिक शोभा को (३) भूग कारण है कहने से सवितृमण्डल को ही विदयुगाध से पूजा किया करते थे। और श्रीकृष्ण लीला की रूपक रचना कियी हैं। अदिनिगन्दन आदित्य देश में और देवकी नन्दन श्रीकृष्ण में भेद कहां ? क्या ऋपियों ने सतर्क नहीं कर दिया है कि "अदितिर्देवकी ह्यभूत् (हरिवंशे ) (आदिति ) और "देवमाता च देवकी" ब्रह्मवैवत जन्मखण्डे ) क्या ऋषियों ने इङ्गित नहीं कर दिया है कि प्रा. दित्यदेव ही देवकीनन्दन हैं ? (१)-- गोलक में ५००० वर्ष पहिले यह दृश्य था इस ममय अब उतना मान्य नही रहा । (२) - श्रीराधा के शिर पर किर।टमण्डल (Corona) (३) सूर्यकिरण चन्द्रमण्डल में प्रतिफलित होने में जानना को नुन होती है . " .

- ॥ वस्त्रहरगा आर्यभटीयस्य- ततोऽखिला जगत्पद्मवोधायाच्युत भानुना ॥ देवकी पूर्व सन्ध्याया माविर्भूतं महात्मना ” विष्णुराणे ५ अ० ३ अ. इतना भ्रान्त क्यों ? क्या वेदाङ्ग भूत ज्योतिषशास्त्र यह नहीं कहता है कि यशोदा (कृत्तिका का) की अधिष्ठात्री देवता दहन (अग्मि) और रोहिणी का कमलज (ब्रह्मा); अग्नि एवं ब्रह्मा एक ही हैं। इन ब्रह्मा के नाभि पन में ( राशि चक्र के केन्द्र में ) विष्णु या आदित्य देव अवस्थित हैं। यह देखो रोहिणी के शिरोभाग में प्रजापति ब्रह्मा हैं । यह ब्रह्मा ही नन्दराज हैं। रासलीला-वस्त्रहरण ॥ राशि चक्र से परिचय रहने पर रासगीला समझ में आसकता है किन्तु " ( लीला ) समझने के लिये “ गोनक" ज्ञान प्रयोजनीय है। पृथिवीस्थ ज्योतिषी गण ने पृथिवी के मेरु दगड (iasis) उत्तर में प्रसारित कर गोलक में जो विन्दुः प्राप्त होते हैं, उस का नाम 'ध्रुवविन्दुरेखा' रक्खा है और पृथियी से दृश्य गोलक, वि-पु-पत् मराशुल द्वारा द्विधा किया है। राशि चक्र के केन्द्रस्य ज्योतिर्विद (?) राशि चक्र के मरु दण्ड को (axis) उत्तर में प्रमारित कर गोलक में जो विन्दु प्राप्त होता उस का नाम कदम्न रक्खा है। और इस केन्द्र से दृश्य गोलक अयममण्डल द्वारा द्विधा 1कया है । मान लो कि : कदम्त्र पर सूर्य को रखने से अयनमण्डल के दक्षिण भगस्य दृश्यगोलकाई अन्धकारमय होगा। इस समय वस्त्रहरण देखो ! असील गाल के बीच श्रादित्य देव अव- स्थित हैं। आदित्य देव का केन्द्र (••ut re) और गोलक का केन्द्र एक ही है ऐसा कहने में दोष नहीं । श्रादित्यमण्डल को वेष्टन कर राशि चक्र प्रयस्थित है। इस ससूर्य राशि चक्र का नाम 'मूदर्शन चक्र' है। इस्से नाम की भी सार्थकता होती है। यह देखो ! सवितृ मण्डल के बीच नारायण श्रीकृष्ण इस कोन्द्र में अवस्थिति कर ससूर्य राशि चक्र को कुन्नाल-चक्र की नाई धूमाते हैं। श्रीकृष्णा इस कुलाल चक्र का शक्तिमय मेधि काष्ठ हैं। सर्यमगण्डल--कुलाल चक्र को हड्डकाष्ठ और राशि चक्र कुलाल चक्र का वेष्टन काष्ठ ( वेलन काठ ) है। यही कुलाल चक्र गसलीला का श्रादर्श (१) है। गोपीगण (२७ नक्षत्र मय) राशिचक्र में अवस्थित रहकर सूर्य किरणसपी वस्त्र में प्राकृत हो जगत् के चक्षु 'पर रह कर लोकों के अदृश्यभाव में (१) कुलाल वक्र प्रतिम मरः । पनाकिनम् । इति उन्कलकालिका ।। । प भमिका ॥ २१ का-किरगा . नृत्य-गीत में प्रमत्त हैं.। कुनाल चक्र की नाई सपूर्य राशिचक्र धूमता है । किन्तु सूर्य केन्द्र को त्याग नहीं करते हड्डकाष्ठ की भांति केवल घूमते हैं। गोपीगम चक्र नत्य में प्रादित्यदेव श्रीकृष्ण की प्रदक्षिणा करती हैं। क्या सुदृश्य मनोहर व्यापार है ! विराट पुरुष का विराट व्यापार ! विराट पुरुष के नाभि स्थल में भूर्य हैं । किन्तु , श्रादित्य देव पर्यन्त काल के वशवर्ती हैं। तृतीय दिन शादित्य देव को श्रीराधा नक्षत्र त्याग कर अनुराधा नक्षत्र में पदार्पण करना पड़ेगा । किम का साध्य है कि इस नियम को तोड़ सके? इधर गोपीगगा रास में उन्मता है । अनुरोध तो सुनेंगी नहीं; राम में बाधा डालेंगी नहीं। उधर श्रीकृष्ण ने अपना माया-आल विस्तार किया। विराट को नाभि देशस्थित सूर्य कदम्ब पर स्पापित हुए और अयन मण्डल के दक्षिणस्थ गोलकाई निशामय गोपी वस्त्र अपहत ( छीनागया ) छुआ ? जगजल, चन्द्रावली, चन्द्रलेखा, तुङ्गदेवी- चम्पकरमता, सुदेवी, शौर इन्दुलेखा प्रभृति तारा-सखियों केर देख पाया। लज्जा में सखी गश नील समुद्र (१) में निमज्लि हुयीं किन्तु पराड-प्रयास । रूप छिपा न इस रूपक में सूर्य श्री कृष्ण कदम्ब कदम्बवृक्ष, तारागणा गोपी, सूर्यकिर गा वस्त्र, नील अन्तरिक्ष, कालिन्दी-अल, महर्षिगगारचित इस मुधामय संपक पक्ष ने जो विषमय फल धारण किया है, इस को देख कर महविगण प्रात्म- ग्लानि से दगध प्रायः हो गये। रासलीला भङ्ग हुयी । श्री कृष्णा वा (अयन- मण्डल) में चले । सम्मुख में अनुराधा नक्षत्र है । भान्त प्रार्यकुल ! जो ज्योतिष- शास्त्र तुम्हारे शयन में, स्वप्न में, उत्सव में, व्यसन में, शोक में, सुख में, समाज में, विजन में, पाप में, पुण्य में, सहाय होता था; भाग तुम लोग उन्नी उयो- तिषशास्त्र को भूल कर श्रीराधाकृष्णा के "पाङ्गीन, रामलीला के अस्तित्व में विश्वास करते हो !!! कहां श्रीकृष्ण ! कहां राधा ! पृथिवी से करोड़ों योजन से अधिक दूरी पर सूर्य, उस से लक्ष २ गुण योजन अन्तर पर राशिचक्र के नक्षत्र श्रीराधा प्रादि अवस्थित, दुर्दशामें पड़ने से इतना मोह पैदा होता है। श्रादि जात प्रादित्यदेव श्रीकृष्ण का राशिचक्र ही "सुदर्शनचक्र" है। चक्री के उस चक्र के किरण जाल में प्राच्छन्न हो प्रार्थजाति, पुरस्थित प्राकृतिक रासलीला को देखने में अक्षम होरही है । रूपक रक्षाके अनुरोध से, श्रीकृष्णा की रासलीला वर्णन में पुराणकार महर्षियों ने कौतुक छल से कुक्षण में कति- . ( १ ) अतरिक्ष का नाम है । ऋग्वंद १० । १८ । ६.. JY १२ 10. BENING २२ मार्यभटीयस्य- पय दो २ अर्थवाले शब्दों का भी प्रयोग किया है। घेद और वेदाङ्ग ज्योतिष- शास्त्र के पाठ और ज्योतिषशास्त्र के अनुशीलन में और ज्योतिपक मण्डल के पर्यवेक्षण ( Olyservation ) से भारतीय प्रार्थजाति विमुख हो, महर्षि- प्रणीत पुरास्थि इन सब दो अर्थ घाले शब्दों के प्रकृत अर्थ ग्रहणा में प्रस- मर्थ. हो गयी, और महषिगण पूजित श्रादित्य देव में अधिष्ठित परम पुरुष प्रकृतदेव श्रीहरि को भल पर आय्य जाति अन्धे की नाई अपने गन्तव्य मार्ग को भल कर इधर उधर भटकती फिरती है। क्या प्रार्थ है ! क्या आश्चर्य है ! क्या भयावह विचार भारत में उपस्थित हुआ हो ! घर को छोड़ कर कौन पगिडत वेद का अर्थ कर सकता ? गोलकात्य सह-माल की गति विधि होड़ कर, कौन सुनिक्षित 'तुधोजन पुराण की व्याख्या कर सकते ? इस भ्रम प्रमाद में फसकर भारत माताले हदय में पति गुहा मणि श्रीकृष्ण में भक्ति स्थापन करने से परामरस होकर, भौतिक कृष्रह के पदाश्रय ले रहे हैं। कोई तो नहीप में मानव-ईश्वर स्थापन से भरिक वातः ललायित हो रहे हैं। भार्यगण ! एकवार मानध्य छोड़ कर नक्षत्र, चन्द्र, सर्व, ग्रहों की गति परीक्षा करो तो वेदोक्त श्रीकृष्णा (श्री विष्ा) के चरित्र की निर्मलता हृदयङ्गम कर सकोगे । सई-हारा हो कर प्रायजाति को निर्याक निरुत्तरभाव से अव- नस मस्तक में, देश २ में, विदेश में, नगर नगर में, गांव २ में, गली २ में, मार्ग में, घाट २ पर, श्रीकृष्ण की कलङ्क रटना और व्यझोक्ति नहीं सुननी पड़ेगी। इसी खेद से हम लोगों ने प्राज पुराण के रूपक जाल को फाड़ने में हाथ डाला है। नहीं तो ऐमी मनोरम अपूर्व मरीचिका के ध्वंस करने में किस की प्रवृत्ति हो सकती ? अज इप्स के प्राग सिद्धान्त ज्योतिष तया आर्यभटीय के विषय सक्षिप्त विचार किया जावंगा और अन्यान्य पुराणोक्त वा ब्राह्म- णोक्त उपाख्यानों का वर्णन-सिद्धान्त शिरोमणि अनुवाद की भूमिका में लिखा आबेगा। . के . . . भूमिका ॥ सिद्धान्त ज्योतिषग्रन्य ॥ भारतवासियो ! श्राप वेद और धर्मशास्त्र अध्ययन करते हैं, कोई वेद और धर्मशाक्त अध्ययनार्थ तैयार हैं: परन्तु आप जानते हैं ! यह क्या लिखा है- “वे विद्ये वेदितव्य इति हस्म यद्ब्रह्म विदोवदन्ति पराचैवा पराच । तापरा ऋग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदोऽथर्ववेदः शिक्षाकरुपी व्याकरणं निरुक्तं छन्दो ज्योतिषमिति” ॥ मुण्डक उ० १।१ । ४, ५ ॥ अर्थात्-विद्या दा प्रहार की है, एक परा दूमरी अपरा । इन में ऋग्वंद यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद, शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त एवं ज्योतिष अपरा विद्या है। और जिस विद्या से अक्षर ब्रह्मा का न हो उसे परा विद्या कहते। इन में से शिक्षा भादि बदरूपी पुरुष के छः अङ्ग व कम हैं जैसा कि कहा है- "शब्द शास्त्रं मुखं ज्योतिपं चक्षुषी, श्रोत्रमुक्तं निरुक्तञ्च कल्पः करो। या तु शिक्षाऽस्य वेदस्य सा नापिका, पादपद्मद्वयं छन्द प्राद्यर्बुधैः ॥१०॥ अर्थात् वेदरूपी पुरुष के व्याकरण तो मुखज्योतिष नेत्र, शिक्षा नासिका, कल्प दोनों हाथ और छन्दः (शास्त्र) पैर हैं। क्या विना नेत्र के वेद पुरा को अन्धे रक्खेंगे एवं आप भी नेत्र होन हो बंद के ज्योतिष सम्बन्धि मर्म का ऊटपटाङ्ग अश्लील अर्थ कर पायर्यों का प्राचीन गौरव नष्ट करेंगे ? ज्योतिष शास्त्र कहने से-यह न सम्पझ लीजिय कि केवल पलिल के ग्रन्थों ही को ज्योतिष कहते किन्तु संहिता, जातक आदि और सिद्धान्त मिल कर ज्योतिष कहाता है। यह बात हम ही नहीं कहते किन्तु जगत् विख्यात पं० वापूदेव शास्त्री जी की कक्तता हमारे सृ०सि० की भूमिकामें पढ़ लीजिये । और महामहोपाध्याय पं० सुधाकर द्विवेदी जी अपने “ गणक तरङ्गिणी " नामक ग्रन्थ में जिस में सिद्धान्त ज्योतिषियों यह इतिहास लिखा है। लिखते हैं कि- आधुनिका ज्योतिर्विदः फलमात्रैकवेदिनः " व्याकरण शास्त्र मज्ञात्वैव लघुपाराशरीबालबोधशीघ्रबोधमुहूर्त्तचिन्ता- मणिनीलकण्ठीवहज्जानकजैमिनिसूत्राणामेकदेशेन मत्ता नात्मानं कृत कृत्यं- ज्योतिषशास्त्रपारङ्गतमन्यन्ते। तत्र साहसिनो मकरान्दादिरचित सारणयनुसारेण तिच्याद्युपपत्तिं विनैवाधारसारणी च वस्तुतः शुद्धा वा नेति सर्वमबुद्ध्वेव तिथिपत्रं विरचण्या आत्मप्रसिद्धिं कुर्वन्ति” । गणकतरङ्गिण्याम्” पृ० १३२ ॥ अर्थात माज कल प्रायः लोग, थोड़े से छोटे २ फलित ज्योतिष के ग्रन्थ शीघ्र बोध, मुहूर्जचिन्तामणि प्रादि पढ़ २ कर आपे को ज्योतिषी मान बैठते और २४ आर्यभटीयस्य- तिथिपत्र बना २ कर अपनी प्रसिद्धि करते हैं और वास्तविक ज्योतिष सिद्धान्त संहिता के ग्रन्थ नहीं पढ़ते इत्यादि । कतिपय ग्रन्थों में ज्योतिष शास्त्र के पांच भेद लिखे हैं जैसा कि- पञ्चकन्धमिदंशास्त्र होरागणितसंहिता! केरलिशकुनञ्चैव प्रवदन्तिमनीषिणः ॥ प्रश्नरत्नटीकाकारः । अर्थात्-ज्योतिषशास्त्र पांच प्रकार का है, १ होरा, २ गणित. ३ संहिता, ४ केरलि एवं ५ शकुन । इसी प्रकार पूर्वोक्त म० म० पं० सुधाकर जी ने उक्त ग्रन्थ के प्रारम्भ में लिखा है कि-"अस्ति सिद्धान्तहोरासंहितारूपं स्कन्धन- यात्मकमष्टादशमहर्षिप्रणीतं ज्योतिःशास्त्रं वेदचक्षुरूपं परम्परातः प्रसिद्धम् । अष्टादशमहर्षयश्च ज्योतिशास्त्र प्रतिपादका ये तेषां नामानि प्रकाशितानि (२) अत्र पुलस्त्य पोलिशयो देन पराशरेण ज्योतिःशास्त्र प्रवर्तका एकोनविं- शति संख्याका आचार्या अभिहिताः । केचनाष्टादशाचार्यानुरोधेन पुलस्त्यो- मनुविशेषणपरइति वदन्ति । नारदेन तु सूर्य हित्वा सप्तदशाधायी एव स्वसं- हितायां प्रकाशिताः । तत्रापि ब्रह्माचार्यो वसिष्ठोऽत्रिरित्यादौ ब्रह्मसूर्यो वसि- ष्ठोगी रित्यनेपाठं वदन्ति । अथाहो एते संहिताकारा महात्मनो लगधस्य न कुर्वन्ति चर्चाम् । येन महात्मना वेदाङ्गमूलरूपं ज्योतिषं पञ्चवर्षयुगवर्णन परं विलक्षणं धके । सूर्येण मयारुणकृते ब्रह्मणा नारदाय व्यासेन स्वशिष्याय वसिष्ठेन माण्डव्य वामदेवाभ्यां पाराशरेण मैत्रेयाय पुलस्त्याचार्या गर्गात्रिभिश्चैवं स्वस्थ- शिष्येभ्यो ज्योतिःशास्त्र विशेषाः प्रतिपादिताः । तथाचाह पराशरः । "नारदाय यथा ब्रह्मा, शौनकाय सुधाकरः । माण्डव्यवामदैवाभ्याम्, वसिष्ठोयत्पुरातनम् ॥ नारायणो कसिष्ठाय, रामेशायापिचोक्तवान् । व्यासःशिष्याय सूर्योऽपि, मयारुणकृतेस्फुटम् ॥ पुलस्त्याचार्यगर्गात्रि, रोमकादिभिरीरितम् । विवस्वता महर्षी गाम्, स्वयमेव युगेयुगे ॥ मैत्रेयाय मयाप्युक्तम्, गुह्यमध्यात्मसंज्ञकम् । शास्त्रमाद्यं तदेवेदम्, लोकेयच्चाति दुर्लभम् ॥ (१)- सूर्य:पितामहो व्यासो वसिष्ठोऽत्रिपराशरः । काश्यपोनारदोगगर्गो मरीचिमनुरङ्गिराः ॥ लोमशःपौलिशश्चैव च्यवनो यवनो भृगुः । शौनकोऽष्टादशाश्चैते जयोतिःशास्त्रप्रवर्तकाः ॥ पराशरश्च---विश्वसृङनारदो व्यासो वसिष्ठोऽत्रि पराशरः । लोमशोयवनः सूर्य श्ध्यवनः कश्यपो भृगुः ॥ पुलस्त्यामनुगाचार्यों पीलिशःशौनकोऽनिराः । गगोमरीचिरित्येते शेयाजयोतिःप्रवत्त काः।।।।

ग्रन्थ नाम । ग्रन्थ नाम। १ ब्रह्मसद्धान्त। मराांचासद्धान्त। २ ८ ४ करयासद्धात। भूमिका ॥ अथैतेषामाचार्याणां समयादिनिरूपणं तत्तद्रथितसिद्धान्तानामलाभेतीव काठिन्यमतो स्माभिस्तीबज्योतिषसिद्धान्त ग्रन्थकारपुरुषका णामुत्तरोत्तरं ख- ण्डनप्रतिखण्डनद्वारेण बहुविशेषरचयितृणां यावच्छक्यं तचदग्रन्थ मर्मस्थलानां सम्यगवलोकनेन समयादिक निरूप्यते ॥ उपरोक्त संस्कृत का प्राशय-नीचे लिखे सिद्धान्तज्योतिष के ग्रन्थों के नाम तो पाये जाते हैं पर ये ग्रन्थ नहीं भिलते अतएव ये ग्रन्थ कब २ बने इस का पता लगाना कठिन है। सिद्धान्त ज्योतिष ग्रन्थों के नाम ॥ ग्रन्थ नाम । ग्रन्य नाम । ६ मसिद्धान्त । ११ पुलम्तसिदधान्त। १६ च्यवनभिधान्त अभिगांसद्धान्त । १२ वारसमिधान्त । १७ गगसिद्धान्त। ३ नारदसिद्धान्त । हस्पतिसिद्धान्त ।. १३ पराशरसिदधान्त । १८ पुलिससिदधान्त । ६ अत्रिसिद्धान्त। १४ व्यामसिदधान्त। १६ लोमसिदधान्त। ५ सृव्य सद्धात । १० सोमसिद्धान्त । १५ भगुमधान्त। २० यवनसिद्धान्त । आधुनिक पौरुष ज्योतिष ग्रन्थ ॥ ग्रन्थ नाम । ग्रन्थनिर्माणकाल स्थान १ श्राय्यभटीय। पं० आर्यभट २ पचासद्धान्तिका। पं० वराहमि पर कालपी ३ ब्रह्मस्फरसिद्धान्त । भीलमाल (दक्षिणपश्चिमोत्तर) ४ दविता यआय सद्धान्त । वित यथार्थमा ५ सिद्धान्त शिरोमाण । प० भारकराचार्य दौलताबाद ६ सिद्धा तसावर्भम। पं० मुनीश्वर एलचपुर ७ तत्त्वविवेक । विदर्भ आर्यभटीन ॥ उपलब्ध पौरुष ज्योतिष ग्रन्थों में सम से पुगना- आर्यभटीय" है। आर्यभट नामक ज्योतिषी ने प्रार्याछन्द के १२० श्लोकों में इस ग्रन्थ को शाके ४२३ में-स्थान कुसुम पुर ( विहार प्रान्त के अन्तर्गत पाटलिपुत्र या पटना ) में बनाया और इस ग्रन्थ का नाम “आर्यभटीय' रक्खा । लोग इसे “आय- सिद्धान्त," "लघु आर्यसिद्धान्त" या "प्रथमार्य-सिद्धान्त” भी कहते हैं। आर्थ- भट स्वयं अपने जन्मस्थान एवं अन्य निर्माणकाल के विषय में या विन है - " ब्रह्म कु शशिबुधभृगुरविकुजगुरुकोणभगणान्नमस्कृत्य । मार्यभटस्त्विह निगदति कुसुम पुरैऽभ्यर्चितं ज्ञानम्॥१॥ना०भा०२१७० भार:-- :--पृथिवी, चन्द्रमा, बुध, . शुक्र, आदि अधिष्ठित परब्रह्म को नम- ग्रन्थ कर्ता . ४२३ शाके पटना . ४२७ प० ब्रमगुप्त ५२० " ८७५ " १०७२" १५२५ " प० कमलाकर भट्ट १५८० रचा ॥ १० श्रार्यभटीयस्य- स्कार कर आर्यभद इस 'कुसुम पुर' (पटना) के लोगों से समाहत पार्यभटीय ग्रन्थ को कहते हैं ॥ १॥ पुनः- “षष्ट्यब्दानां षष्टियंदा व्यतीतास्त्रयश्च युगपादाः । ज्यधिका विंशतिरब्दास्तदेह मम जन्मनोऽतीताः ॥ प्रा०म०गी०३लो०॥१॥ भा०:-इस वर्तमान २८ वीं धौयुगी के चतुर्थ भाग में से तीसरे भाग के ६० वर्ष बीतने पर मेरा (आर्यभट का ) जन्म हुआ । और मेरे जन्म काल से अब तक २३ वर्षं वीत गयीं। वर्तमान महायुग के चतुर्थ पाद के ३६०० सौ वर्ष बीतने पर मेरी उमर २३ वर्ष की हुई । इसी समय मैं ने इस ग्रन्थ को १०॥ पुनः आर्यभट ने यह भी लिखा है कि मैं ने यह ग्रन्थ प्राचीन वैदिक ज्योतिष के अनुसार ही बनाया है-इसे नवीन रचना समझ कर लोग इस की निन्दा न करें:- सदसज्ज्ञान समुद्रात् समुद्धृतं देवताप्रसादेन । सउज्ञानोत्तमरत्नं मया निमग्नं स्वमति नावा ॥" आभागीशोल भा०:-ज्योतिषशास्त्ररूपी समुद्र में अपनी बुद्धिरूपी नौका पर सवार हो समुद्र में निमम होकर ब्रह्मा (ब्रह्माकृत वेदाङ्ग ज्योतिष) की कृपा से सद्ज्ञान रूप रत्न को मैं ने (मार्यभट ने) बाहर किया अर्थात् प्रकाशित किया॥४ापुनः- आर्यभटीयं नाम्ना पूर्व स्वायम्भुवं सदा सद्यत् । सुकृतायुषोः प्रणाशं कुरुते प्रति कञ्चकं योऽस्य ॥ प्रा०भ०गी०४श्लो०५० भा:-श्रादि काल में जिस ज्योतिषशास्त्र को वेद से निकाल कर लोक में-प्रचार किया गया उसी ज्योतिषशास्त्र को अर्थात् वैदिक ज्योतिषशास्त्रको मैं ने ( प्रार्यभट ने ) “आर्यभटीय” नाम से प्रकाशित किया। इस शास्त्र में जो कोई व्यक्ति मिथ्या दोष दिखलाकर इस का तिरस्कार करेगा-उस के सुकृत, पुण्य वा यश एवं आयु का नाश होगा ॥ ५० ॥ इस “आर्यभटीय” में दो मुख्य भाग हैं और १०८ श्रार्या छन्द के शोक हैं अतएव कोई २ इस को “प्रार्याष्टशत” भी कहते हैं। इन दो भागों को कोई २ टीकार-भिन्न २ दो ग्रन्थ मानते हैं-जैसा कि-इस के टीकाकारों में से सूर्ययज्वन-टीकाकार ने इन भागों को दो प्रवन्ध मानकर प्रत्येक की आदि में विघ्न शास्त्यर्थ मङ्गलाचरण किया है। अतएव बहुत से लोगों ने इन दो भागों को भिन्न २ ग्रन्थ माना है। परन्तु ग्रन्थ देखने से मालूम होता है कि एक भाग दूसरे भाग पर अवलम्ब रखता है। अर्थात् यदि एक को छोड़ दिया जावे तो दूसरे का कुछ उपयोग नहीं रहता । इस लिये दोनों को मिलाकर एक सिद्धान्त मानना ठीक है। स्वयं श्रार्यभट ने भी प्रथम भाग का कोई पृथक नाम २७ भूमिका ॥ • नहीं रक्सा है और न उस के अन्त में उपसंहार ही किया है, एकत्र पूरे ( दोनों भागों का ) ग्रन्थ के अन्त में ही उप्रसंहार किया है और "आर्य- भटीय” ऐसा नाम रक्खा है। इसीप्रकार ग्रन्थकार ने ग्रन्थ भर में चार पाद रक्खे हैं पाद का अर्म चौथा भाग है और चतुर्थ भाग क्रिसी पूरे १६ अंशों की वस्तु में होता है-अतएव प्रथम पाद के पूर्व दो श्लोक, प्रथम पाद में १० श्लो०, द्वितीय में ३३ श्लो०, तृतीय पाद में २५ और चतुर्थ में ५०, यो सब मिल कर १२२ श्लोक हैं । परन्तु “प्रार्याष्टशत” इस लेख को देख कर बहुतसे युरोपियन विद्वानों ने भ्रष से इस ग्रन्थ में ८०० श्लोकों का होना माना है। जो श्रीमान् डाक्टर करण साहब के-सन् १८१४ ई० के छपवाये संस्कृत टीका- सहित पार्यभटीय के देखने से पाश्चात्य विद्वानों का ८०० भार्थी श्लो० होने का भ्रम दूर हुआ । आर्यसिद्धान्त नाम से एक दूसरा भी ज्योतिष ग्रन्थ- प्रसिद्ध है-उस पर विचार किया जाता है। द्वितीय आर्यसिद्धान्त ॥ द्वितीय आर्यभट शाके ८७५ में " प्रथम प्रायभट” के अतिरिक्त यह एक द्वितीय “आर्यभट” नवीन हुए; अतएव इन्हें “द्वितीय आर्यभट” और इन के ग्रन्थ को “ द्वितीयआर्यसिद्धान्त कहते हैं। पूना के “ दक्षिण- कालिज" में द्वितीय आर्यसिद्धान्त की एक प्रति है जिस पर " लघुमार्यः सिद्धान्त " लिखा है, परन्तु स्वयं ग्रन्थकार ने अपने ग्रन्थ में ग्रन्थ का नाम “लघु” या “हत्" कुछ भी नहीं लिखा है। इस ग्रन्थ के पहिली आर्या " ( छन्द ) में लिखा है कि- विधि ध खगागम पाटी कुट्टक वीजादि दृष्टशास्त्रेण । आर्यभटेन क्रियते सिद्धान्तो रुचिा भार्याभिः ” ॥ भाः-इन ने अपने अन्य को “सिद्धान्त” ऐसा लिखा है इस के पूर्व के आर्यभट " से यह नवीन हैं, (जो आगे सिद्ध होगा ) इसलिये इन को "द्वितीय आर्यभट” और इन के सिद्धान्त को "द्वितीय आर्यसिद्धान्त” कहते हैं। इन ने अपना ग्रन्थ निर्माण या जन्मकाल के विषय में कुछ नहीं लिखा है। किन्तु “ पराशरसिद्धान्त " ग्रन्थ का मध्यम मान दिया है इससे इन ने दोनों सिद्धान्त ग्रन्थों का उल्लेख किया है। “एतत् सिद्धान्तद्वयमीषद्यात कलौ युगे जातम्” ॥२॥ अध्याय २ ॥ इस के अनुसार कलियुग के थोड़े ही समय बीतने पर ये दोनों सिद्धान्त रचे गये ऐसा.दिखलाने का-इन का उद्देश्य है। . - “ - २८ । आर्यभटीयस्य- परन्तु ब्रह्मगुप्त के अनन्तर यह ग्रन्थ रचा गया ऐसा स्पष्ट प्रतीत होता है। इस का कारण यह है कि यह अपने सिद्धान्त को कलियुग के प्रारम्भ ही में बनना बतलाते हैं, इस से अपने ग्रन्थ को पौरुष ग्रन्थकारों में गणना करते हैं। ब्रह्म गुप्त के पहिले इन के ग्रन्थोल्लिखित वर्षमान या अन्यान्य मानों का वस्तुतः कहीं प्रचार होने का कोई प्रमाण नहीं मिलता । और ब्रह्म गुप्त ने अपने ग्रन्थ में आर्यभट-के दूषणों को सब से पहिले दिखलाया है। इस से ब्रह्मगुप्त के पहिले प्रथम-आयभट हुए यह सिद्ध होता है। द्वितीय आर्यभट के सिद्धान्त के किसी विषय का उल्लेख ब्रह्मगुप्त ने नहीं किया, यदि द्वितीय-आर्यभटग्रन्थ उस समय या उससे पहिले बना होता तो अवश्य इस का भी उल्लेख ब्रह्मगुप्त करते । “ पञ्चसिद्धान्तिका ” ( जो शाके ४२७ का बना है) में अय गति का उल्लेख कुछ भी नहीं दीखता। पहिला आर्यभट, ब्रह्मगुप्त, लल्ल, इन के ग्रन्थों में अयनगांत का वर्णन नहीं है और इस द्वितीय प्रायसिद्धान्त में इसकावर्णन है। अधिक क्या कहा जावे-प्रथम आर्यभट के हो २ दूषण ब्रह्मगुप्त ने दिखलाये हैं, उस २ के उद्धार का यत्न, द्वितीय, आर्यभट ने किया है। इन के ग्रन्थ में युगपद्धति (सत, त्रेता, द्वापर, कलि) है; कल्प का प्रारम्भ रविवार को माना है, और पहिला प्रा० भ० में युग के आरम्भ में मध्यमग्रह एकत्र रहते, स्पष्टग्रह एकत्र नहीं रहते ऐसा लिखा है । इसका खण्डन ब्रह्मगुप्त ने किया है (अ० २ । आर्या ४६) परन्तु द्वितीय आर्यभट के प्रमाण से सृष्टि के प्रारम्भ में स्पष्ट ग्रह एकत्र होते हैं इन सब प्रमाणों से ब्रह्मगुप्त के अनन्तर अर्थात् शाके ५८७ के अनन्तर रे आ० भ० थे। यह उस समय का प्राचीन सिद्धान्त माना जाता और अर्वाचीन सिद्धान्त सब से पहिले प्रार्यकुलभूषण पं० भास्करा चार्य ने रचा। सिद्धान्त शिरोमणि के स्पष्टाधिकार के ६५ वै श्लोक में लिखा है कि प्रार्यभटादिभिः सूक्ष्मत्वार्थ दृक्कोणोदयाः पठिताः ” दृक्कोण अर्थात् राशि का तीसरा अंश ( १० अंश )। प्रयम आर्यभट ने लग्नमान को तीस २ अंशों में किया है। दश २ अंशों का नहीं । परन्तु द्वितीय प्रा० भ० ने अ० ४ आर्या ३८-४० में दूकोणोदय ( लग्न- मान ) कहा है। इस प्रमाण से दूकोणोदय साम्प्रत द्वितीय आर्यभट को छोड़ अन्य किसी ग्रन्थ में नहीं लिखा है। इस के अनुसार भास्कराचार्य के उक्त वाक्यानुसार प्रा० भ० पहिला नहीं, किन्तु द्वितीय प्रा०सि० ही सिद्ध होता है। जिस के अनुसार शाके २०७२ के पूर्व द्वितीय आर्यभट थे, ऐसा निश्चय होता है। द्वितीय श्रा० भ० ने अयनांश निकालने की रीति दियी है, इस के अनुः .

२९ . भूमिका ॥ सार अयनगति एकसी नहीं रहती वरण उस में बहुत न्यूनाधिक्य होता है। परन्तु अयन गति सर्वदा एकसी रहती-ऐसा मानने पर भी इसकी सूक्ष्म गति मानी जाती है जिससे उस में बहुत थोड़ा अन्तर पड़ता है.। माधुनिक सूर्य-सिद्धान्तोक्त अयनगति सब काल में एकसी रहती है परन्तु इस का काल ज्ञात नहीं ऐसा लिखा है। राजभृगांक ” ग्रन्थ में ( शाके ९६४ ) अयनगति सब काल में एकसी रहती है ऐसा लिखा है। इस ग्रन्थ को पूर्व के वने ग्रन्थों में इस विषय के होने का प्रमाण अव तक नहीं मिला है। इस के अनुसार अयनगति का जान ( वरावर ) होने के पहिले वि० प्रा० भ० भटोत्पल के टीका में लिखा है। परन्तु दूसरे प्रा० भ० में ऐसा नहीं लिखा है जिस से द्वितीय आर्यभट भटोत्पल के पहिले थे ऐसा निश्चयं होता है । उपरोक्त प्रमाणों से द्वि० प्रा० भटोक्त मेष संक्रमण काल के उल्लेखानु- सार-द्वितीय आर्यभट का समय ८७५-सिद्ध होता है। इस द्वितीय आर्यसिद्धान्त में १८ अधिकार और ६२५ श्रार्या छन्द के लोक है। प्रथम १३ अध्यायों में करण अन्य के निराले २ अधिकारों का वर्णन है, चौदहवे में गोल सम्बन्ध विचार एवं प्रश्न हैं, १५ वे में १२० भार्या लो० में गणित एवं क्षेत्रफल, धनफल का वर्णन है, १६ वे में भुवन कोश का वर्णन है, १७३ में ग्रह मध्य की उपपत्ति इत्यादि हैं और १८ में में बीजगणित, कृहक गणित हैं। इस में ब्रह्म गुप्त के ब्र०सि० से भी अधिक विषय हैं। इन ने संख्या दिख लाने का क्रम प्रथम प्रार्यभट से भी विलक्षण ही दिया है जैसा कि- वर्ण वर्णवोधितसंख्या वर्ण- संख्या कट, प, य, " १ ६ छ, थ, सः 9 mr घ,ह, भ, व ४ भ, ड, ग, म, श% ५ .. "श्रङ्कानां वामतो गतिः” यह नियम प्रथम प्रार्यभट ने नहीं लिखा है। इन ने यहां "द्वितीयमार्यभट” के समय प्रादि का विचार इस लिये किया है कि जिस से पाठकों को यह भ्रम न हो कि दोनों प्रार्यभटीय ग्रन्यों में पुराना कौनसा है-एवं दोनों ग्रन्य एक ही ग्रन्थकार द्वारा बने या भिन्न २द्वारा vt. प्राय्यभटीयम्य- इत्यादि । अश्व इस का आगे “प्रथम आर्यभटीय” का अनुवाद प्रारम्भ होगा हाय के बहुतभे अमूल्य ग्रन्थ तो प्रदरेजों से पहिले के पाये हुए विधर्मिय । आदि कारणों से नष्ट भ्रष्ट हुए, उस से बचे याये ग्रन्थ, देश : उओं (पुनर्स) के पास सड़ते हैं और उनका प्रचार नहीं होता, इससे व मारे घर माननीय अपरेती गवर्नमेण्ट के सुप्रयम्ध से पुस्त कायों तथा गन्दन, जम्भन आदि देशों में सुरक्षित हैं, परन्तु बड़े शोक की बात है कि जिन भारतवासियों के घर का रत्न ममुद्र पार जाये, भल से लग की साड़ गिट्टा में कुम्भकरण यो माई राट मार कर मोते है और जगान पर भी नहीं जाने की अनुप्रया का तजुमा विला यत आदि से होकार भारत को माना है। हमने अपने देश को पोरका र युगमन सन्य-भार्यभटीर की एक प्रति सन्देश जगवा कर साहको परलोकमार्थ नौक मालुवात प्रकाशित किया है। आशा है कि हमारे पाठक इसकी एक २ प्रति मंगामा कर अपने स्वदेशीय रत्तों का संचय पर हमारे परिश्रम को सफल करेंगे अनुवादक or सूर्यादि के .१७ आर्यभटीयस्य विषयानां सूचीपत्रम् ॥ विषय पृष्ठा मङ्गलाचरणपूर्वक वस्तु कथन संख्या ज्ञापक अक्षरों की परिभाषा ॥ चतुर्युग में सूर्यादि को भगणसंख्या । चन्द्रोच्च बुध, शुक्र के शीघ्रोच्च भगण । कल्पान्तर्गत मनु और गत काल । राशि प्रादि विभाग, आकाशकदया योजन प्रमाण आदि । योजन परिमित भूमि आदि का योजनप्रमाण । १० ग्रहों के अपयान-प्रमाण और पुरुष-प्रमाण । ११ मङ्गलादि पांच ग्रहों का पात भगण और मन्दोचांश । १२ मन्दवृत्त और शनि प्रादि के शीघ्रवृत्त । वक्री ग्रहों का युगमपद में वृत्त एवं भू-वायु की कदया का प्रमाण । १५ चौवीश अर्द्धज्या गीतिका सूत्र परिज्ञान का फल । प्रथमपाद की विषयसूची समाप्त हुई ॥१॥ ग्रन्थकार के जन्मस्थान का वर्णन । १७ संख्या के दश स्थानों की संज्ञा और संज्ञा का लक्षण । ९८ वर्ग और घन स्वरूप वर्णन । वर्गमूल । १९ घनमूल । २०-२३ त्रिभुज क्षेत्रफल और घन त्रिभुज का फल । २३-२४ वृत्तक्षेत्रफल और घन समयत्त क्षेत्रफल । विषम चतुष्कोण आदि का क्षेत्रफल । २४-२५ सब क्षेत्रों का फल लाना और व्यासाई तुल्यज्या का ज्ञान । २५-२६ वृत्त की परिधि का प्रमाण । जीवा की परिकल्पना की विधि। गीतिकोक्त खण्डज्याओं के लाने का उपाय । वृत्तादि के परिकल्पना का प्रकार वृत्त के विष्कम्भाई का लाना । ३१ छायाका लामा । ३२ कोटी और भुजाओं का लाना । ३२-३३ कर्ष एवं भईज्या का लाना। १९ .

२ पृष्ठाक ३४ ३४-३५ ३६-३७ ३१-३६ आर्यभटीयस्य विषयानां सूचीपत्रम् ॥ विषय पार्श्वपत दो शहरों का लाना । अंडीकल का लाना। गच्छका लाना । सङ्कलित धन का लाना। वर्ग और धन के सदलित का लाना । दो राशियों के संवर्ग से दो राशियों का लाना। राशि के संवर्ग से दो राशि का लाना । मूलफल लाना। राशिक गणित। भिन्न २ राशियों का सवीकरण । व्यस्तविधि संघ धन का लाना। अव्यक्त मूल्य का मूल्य दिख नाना । ग्रहान्तरों से ग्रहयोग का लाना। 35 ३८-३९ ४१ ४२-४३ ४४ कुहाकार गणित। ४५-४६ ४ः-४० ४-५१ ५१ ५२ द्वितीय पाद की विषय सूची समाप्त हुयी। काल और क्षेत्रविभाग। द्वियोग और व्यतीपात की संख्या । उच्च नीच वृत्त का प्राधार और गुरुवर्ष की संख्या। सौर, चान्द्र, सावन नाक्षत्र मानविभाग। अधिमास, अवम दिन वा क्षय दिन । मनुष्य, पितृ, देवताओं के वर्ष का प्रमाण । ग्रहों के युगकाल, ब्राह्म दिन काल । काल की उत्सर्पिणी प्रादि विभाग । शास्त्र का प्रणयन काल एवं ग्रन्थकार की आयु। युगादि प्रारम्भ काल ग्रहों का समगति होना। समगति वाले ग्रहों का शीघ्र गति होना। राशि, भाग, आदि क्षेत्रों का प्रमाण । नपत्र मण्डल से अधोगत ग्रह कक्ष्या का क्रम । .. या क्रम से काल होराधिपति, दिनपति । ५२-५३ ५३ ५३-५४ ५४-१५ . ५६ ५६-५७ ५७ ३ ६०-६१ आर्यभटीयस्य विषयानां सूचीपत्रम् ॥ विषय पछाड़ दृष्टि के वेषम्य होने का कारण- ५८-५० प्रतिमण्डल का प्रमाण और उस का स्थान- स्फुट ग्रहों का अन्तराल प्रमाण- भ्रमण प्रकार- उच्च, नीच वृत्त के समय का प्रकार-- मन्द और शीघ्र के ऋण और धन का विभाग- शनि, गुरू, मङ्गल (स्फुट) भ, तारा, ग्रहों का विवर लाना- ६६ तृतीय पाद की विषयाधी र माप्त हुई। अपमण्डल का संस्थान-- अपक्रम मण्डल चारी ग्रहगण- ६८ अपमरगुल के चन्द्रमा का पात उत्तर से दक्षिण- ६८-७० चन्द्रमा प्रादि का दूर और निकटता से रार्य प्रभा से उदयास्त ज्ञान-9०-११ स्वतः अप्रकाश भूमि शादि के प्रकाश का हेतु- ७१ कदया और भूसंस्थान- ७१-७२ भूगोल के ऊपर प्राणियों का निवास- कल्प में भमि की वृद्धि और हास- भूमि का पूर्व की ओर चलना- १२-१३ भपञ्जर के भ्रमण का कारण- प्रमाण और मेरु का स्वरूप- मेरु, बड़वामुख आदि का प्रवस्थान भूमि के चारों ओर पृथिवी के चतुर्थ भाग में ४ नगरियां- ७४-१५ लङ्का और उजयिनी के बीच का देश- ७५-७६ भूपृष्टस्थित ज्योतिश्चक्र के दृश्य और अदृश्य भाग- ७६ ज्योतिश्चक्र में देवासुर दृश्य भाग- ७६-99 देवादिकों का दिन प्रमाण- गोल कल्पना- क्षितिज़ में नक्षत्र और सूर्यादि ग्रहों का उदयास्त- 9C-CO. द्रष्टा के कारण अंचे नीचे का विभाग- दूमण्डल, दूक्क्षेप मण्डल- १२ ७३ ७४ 99-१८ 9"-90 ४ 4 i '८२ ८५ ८१ ८५-८ ८८-८ आर्यभटीयस्य विषयानां सचीपत्रम् ॥ विषय पृष्ठाङ्क गोल के भ्रमण का उपाय- ८०-६१ क्षेत्र कल्पना का प्रकार और अमावलम्बक- ८१-८२ स्वाहोरात्राई- ८२ निरक्ष देश में राशि का उदय प्रमाण- ८२-८३ दिन रात्र की हानि वृद्धि। स्वदेशीय राशियों का उदय । ८३-८४ इष्टकाल में शङकु का लाना। शङकु अग्रा को लामा। अर्क अग्रा का लाना। सूर्य का सम मण्डलप्रवेश काल में शङ्कु का लाना मध्यान्ह 'शङ्क और उस की छाया । दृकक्षेप ज्या का लाना। दूगगति, ज्यावलम्बन योजन का माना । चन्द्रादि के उदयास्त लग्न सिद्धि के लिये अपने २ विक्षेप दृक् कर्म । प्रायन दृककर्म । चन्द्र, सूर्य, भूमि छाया के चन्द्र सूर्य ग्रहण के स्वरूप । ग्रहणकाल। ९२-९१ भूछाया का दैर्घः। ९१ भूछाया के चन्द्रकक्षा प्रदेश में व्यास योजन का लाना। स्थित्य का लाना। विमर्धकाल का लाना। ९२-३ ग्रस्त शेष प्रमाण- (३ तात्कालिक ग्रास परिमाण- ३ स्पर्श मोक्षादि ज्ञान- गृहीत विम्ब स्थाण वर्णन- सूर्यग्रहण में अदृश्य भाग- खशाल प्रतिपादित ग्रह गति से दूक संपात द्वारा स्फुटत्व- शास्त्र का मूल- ९६ उपसंहार- आर्यभटीय की विषयसूची समाप्त हुई ॥ . Cベー . ९१-९२ ए - ९५ ॥ प्रोम् ॥ अथार्यभटीयं ज्योतिषशास्त्रम् ॥ * यत्तेजः प्रेरयेत् प्रजां सर्वस्य शशिभूषणम् । मुगटङ्काभयेष्टाङ्कन्त्रिनेत्रन्तमु पास्महे ॥ लीलावती भास्करीयं लघु चान्यच्च मानसम् । व्याख्यातं शिषयबोधार्थ येन प्राक्तनं चाधुना ।। तन्त्रस्यार्यभटीयस्य व्याख्याल्पा क्रियते मया । परमादीश्वराख्येन नामात्र भटदीपिका ।। तत्रायमाचार्य आर्यभटो विघ्नोपशमनार्थ स्वेष्टदेवतानमस्कारं प्रतिपा- घ वस्तुकथमञ्चार्यरुपया करोति ॥ प्रणिपत्यैकमनेक कं सत्यां देवतां परं ब्रह्म । आर्यभटस्त्रीणि गदति गणितं कालक्रियांगीलम्॥ इति ॥ के ब्रह्माणं एक कारणरूपेणेक अनेक कार्यरूपेणानकं सत्यां देवतां व एवदेवता स्वयम्भूरेव पारमार्थिको देव अन्य तेच सृष्टा इत्यपारमार्थिकाः। परब्रह्म जगतो मूलकारणं त्रिमूर्त्यतीतं सर्वव्याप्तं ब्रह्म स्वयम्भूरित्युक्तो भ- पति । आर्यभट एवं ब्रह्माणं प्रणिपत्य गणितं कालक्रियां गोलम्-इत्येतानि पीणि वस्तूनि निगदति । परोक्षत्वेन निर्देशान्निगदतीति वचनम्। तत्र गणि- बाम सङ्कलितमिश्रश्रेडीदशंधीकुटाकारच्छायाक्षेत्राद्यनेकविधम् । इह तु काल- केयागोलयोर्यावन्मात्रं परिकरभूतं तावन्मानं सामान्यगणितमेव प्रायशः प्र. तेजातम् । अन्यच्च किञ्चित्। कालस्य क्रिया कालक्रिया । कालपरिच्छेदोपाय- तं ग्रहगणितं कालक्रियेत्यर्थः । गोलन्नाम ब्रह्माण्डकटाहमध्यवाकाशम- ज्यग्रस्थंहनक्षत्रकक्ष्यात्मकं स्वमध्यस्थधनवृत्तभूमिकमपक्रमाद्यशेषविशेषोपेतं वाहाख्यवायुप्रेरितं कालचक्रज्योतिश्चक्रभपञ्जरादिशब्दवाच्यं गोलः । स च २ गीतिकापादः ॥ वृत्तक्षेत्रस्वाञ्चतुरश्राद्यनकक्षेत्रकल्पनाधारस्वाञ्च गणितविशेषगोचर एव । एतत्त्र यमपि द्विविधम् । उपदेशमात्रावसे यन्तन्मूलन्यायावसे यश्चेति । तत्र युगप्रमाण मन्दोच्चादिवृत्ताद्यपक्रमाद्युपदेशमात्रावसेयम् ।इष्टदिपग्रहगतीष्टापक्रमस्याहोर। त्रचरदलादिच्छायानाडिकाद्युपदेशसिद्धयुगप्रमाणादितो न्यायावसेयम् । एवं दै विध्यम । अत्र स्वयम्भूप्रणामकरणेन करिष्यमाणस्य तन्त्रस्य ब्रह्मसिद्धान्त मूलमिति च प्रदर्शितम् ॥ अथोपदेशावगम्यान्युगभगणादीन् सङ्क्षपेण प्रदर्शयितुं दशगीतिकासूत्रं क रिष्यन् तदुपयोगिनों परिभाषामाह ॥ भा:-अनेक देवताओं में परमश्रेष्ठ ब्रह्मा-जगत् स्रष्टा (जिस ने अनेक देवों को रचा ) को प्रणाम कर आर्यभट ( ग्रन्थकार ) ' गणित , 'कालक्रिया और — गोल विद्या' इन तीन वस्तुओं को वर्णन करते हैं । वर्गाक्षराणिवर्गऽवर्ग ऽवर्गाक्षराणि कात् ङ्मौ यः । खद्विनवके स्वरा नव वर्गऽवगै नवान्त्यवगै वा ॥ इति-वर्गाक्षराणि वर्ग। ककारादीनि मकारान्तानि वर्गाक्षराणि । तानि वर्गस्थाने एकशतायुताद्योजस्थाने स्थाप्यानि । एवं क्रमेण संख्या वेद्या । अ वर्ग अवर्गाक्षराणि । यकारादीनि अवर्गाक्षराणि । तान्यवर्गस्थाने दशसहस लक्षादियुग्मस्थाने स्थाप्यानि । कात् ककारादारभ्य संख्या वेद्या । कका एकसंख्या खकारो द्विसंख्य एवं क्रमेण संख्या वेद्या । अकारो दशसंख्यः । टकार एकादशसंख्यः । नकारो विंशतिसंख्यः । मकारः पञ्चविंशतिसंख्यः । एवं लि पिपाठक्रमेण संख्या वेद्या.॥ ङ्मौ यः । कारमकारयोर्योगेन तुल्यो यकारः पञ्चसख्यायाः पञ्चविंशतिसंख्यायाश्च योगस्त्रिंन्शंसंख्य इत्यर्थः । अत्र प्रथम स्थानमङ्गीकृत्य त्रिंशदित्युक्त नतु द्वितीयस्थानमङ्गीकृत्य । द्वितीयस्थाने त्रिसंख्यो यकारः । इत्युक्तं भवति । रेफादयः क्रमेण द्वितीयस्थाने चतुरादि संख्यास्स्युः। हकारो द्वितीयस्थाने दशसंख्यः शतसंख्यावाचक इत्यर्थः । एवम वर्गस्थानविहितापि हकारसंख्या संख्यान्तरत्वेन वर्गस्थाने स्थाप्यते । एवं कारादिसंख्या वर्गस्थानविहिताप्यवर्गस्थाने संख्यान्तरत्वेन स्थाप्यते । एता न्यायतस्सिद्धम्। अत्रगतुल्यो यकार इति वक्तव्ये ङ्मौ या इति वर्णद्वयेन यदुर तेन संयुक्तरप्यक्षरैस्संख्या प्रतिपादयिष्यत इति प्रदर्शितं भवति । शून्यभूता नामनङ्गीकृतसंख्याविशेषाणां के प्रयुज्यन्ते । इत्यत्राह । खद्विनवके स्वरा न ३ आर्यभटीये प्रेग्यगे । इति । द्विनरकेऽष्टादशके नव स्वराः क्रमेण प्रयुज्यन्ते । अ, इ, , ऋ, ल,ए,ऐ, ओ,ौ । इत्यते नव स्वराः । एतदुक्तं भवति । ककाराद्यक्षर- तास्स्वरास्स्थानपदर्शका • भवन्ति न संख्याविशेषप्रदर्शका इति.। कथं नव- ख्या अष्टादशके प्रयुज्यन्ते । इत्यत्राह । वर्गेऽवर्गे । इति । वर्गस्थानेषु न- स्विकाराद्या नव स्वराः क्रमेण प्रयुज्यन्ते । तथा प्रवर्ग स्थानेषु च त एव । ए- मिन्यैरपि कल्प्यम् । तथा प्रथमस्वरयुतैय कारादिभिर्विहिता संख्या प्रथमे प्रवर्गस्थाने स्थाप्या। द्वितीयस्यरयुतैर्द्वितीये अवर्गस्थाने।एवमन्यैरपीति। ए- मण्टादशस्थानेषु संध्या वेद्या।यदा पुनस्ततोऽधिकापि संख्या केचिद्विवक्षि- ता तदा कथमित्यत्राह। नवान्त्यवर्ग वा । इति । नवानां वर्ग स्थानानामन्त्ये अर्ध्वगते वर्गस्थाननवके तथा नवानामवर्गस्थानानामन्त्ये अर्ध्वगते अवर्ग- स्थाननवके च एते नत्र स्वराः प्रयुज्यन्ते वा। केनचिदनुस्वारादिविशेषेण युक्ताः प्रयोज्या इत्यर्थः । शास्त्रव्यवहारस्त्वष्टादशस्थानानि नातिवर्तते । अथ चतुर्युगे रव्यादीनां भगणतख्यामाह । भा०.-वर्ग के अक्षरों को (क, ख' ग, घ, ङ, च, छ, ज, झ, ञ,ट, ठ, ड, ढ, प. त, थ, द, ध, न, प, फ, ब, भ,म) वर्ग के स्थान में एक स प्रयुत तकको विषम स्थान में रक्ख कर संख्या जाननी चाहिये । इसी प्रकार प्रवर्ग में प्रवर्ग के अक्षर जानना यकारादि (य, र, ल, व, श, ष, स, ह.) प्रवर्ग के स्था- में दशसहस्र, लत, आदि को सम” स्थान में रक्खे। ककारसे लेकरसंख्या गाननी अर्थात् क,से १, ख,से, २ ग,से ३ इत्यादि, मासे २५ इसप्रकार क को १ सं- प्या मानकर म पर्यन्तक्रमशः २५ संख्याहोंगी। ङ, और म इन दोनों कोसंख्या का योग ज्य' की संख्याहै। प्रथम स्थान में य ३० का बोधक, द्वितीय स्थान ३ का, इसी प्रकार 'र' ४० का बोधक और द्वितीय स्थान में ४ का बोधक है।हकारादि भी इसी प्रकार जानना। यहां ककारादि में जो अकारादि स्व- : संयुक्त हैं वे संख्या प्रदर्शक नहीं हैं किन्तु स्थान प्रदर्शक हैं। अ, इ,उ, ए,ऐ, पो, श्री, ऋ, ल, ये नव स्वर हैं-तो १८ संख्या स्थानों में नवस्वर क्यों र रक्खे जावेंगे ? वर्ग स्थान में नव स्वर क्रम से प्रयुक्त होते हैं, उसी प्र- कार अवर्ग स्थान में भी वही नव स्वर हैं। इसी प्रकार औरों का भी जानना प्रथम स्वर युक्त यकारांदि द्वारा संख्या कही जावे-उस को पहिले अवर्ग स्था- म में, और द्वितीय स्वर यक्त को द्वितीय प्रवर्ग स्थान में रखनी । इसी प्र. - में P ४ गीतिकापादः ॥ कार और भी १८ संख्या जाननी चाहिये। अगर १८ से अधिकसंख्या हो,तो इसी नियमसे जानना । परन्तु शास्त्रों में १८ संख्या से अधिक का व्यवहार नहीं है। भा:-निम्न लिखित चक्र से (अक्षर द्वारा जो इस ग घ में संख्याओं का निर्देशहुआ है) गीतिका का अर्थ किया गया है।' संख्याज्ञापक चक्र। . अक्षर । संख्या। अक्षर संख्या। अ%१ ल=१००००9800 इ-१०० ए-१०००००००००० उ-12000 प्रो-१०००००००००००० ऋ-१०००००० औ=१०००००००००००००० क-१ ट-१९ त-१६ प-२१ य-३० ख-१ ठ-१२ थ-१७ फ-२२ ष%E0 ग-३ द-१८ ब-२३ घ-४ भ ढ=१४ ध-१७ व-६० ह-100 ज-१० -१५ न-२० म-२५ और नव स्वरों का योग, यदि वर्ग या प्रवर्ग अक्षरों के साथ होता है, तो वे १८ स्थानों के प्रदर्शक होते हैं। जैसे:- क +५=१ इसी प्रकार और व्यञ्जनों का भी जानना कि क+इ=१०० य और य+अ-३० कु +1=१०००० य+६=३०००० कृ +ऋ-१०००००० यु य+1=100006 क +0-१०००००००० इत्यादि। के क्+ए=10000000000 और कै क+ऐ=१०००००००००००० र +9-४० को क्+प्रो-१०0000000000000 रि+इ-४००० को क्+औ=१०००००००००००००००० रु +3=४००००० इत्यादि इसी प्रकार 'ख' का भी जानना। ख ख+२ खि ख+इ-२०० खु ख्+उ%D२०००० इति संख्यापरिभाषा-समाप्ता। यि यु आर्यभटीये पुगरविभगणाः ख्युध शशि चयगियिडुशुटक डिशिबुण, रुषप्राशनि टुङिध्व गुरु ख्रिच्युभ कुज भलिक्नुख भृगुः बध. सौराः ॥६॥ ष्टिादशस्थानगतानां संख्यानां संज्ञा तः- •एकदशशतसहस्त्रायुतलक्षप्रयुतकोटयः क्रमशः। अर्बुदमजं खर्बनिखर्वमहापद्मशङ्कवस्तस्मात् ॥ जलधिश्चान्त्य मध्यं परार्द्धमिति दशगुणोत्तरं संजाः इत्यनेन वेद्या । युगरविभगणाः । चतुर्युगे रवे गणाः स्युघ इति । उकारयु- सखकारणायुतद्वयमुक्तम्। उकारयुतयकारेण लक्षत्रयम् ।एवं सर्वत्र हल्द्वये एक एव स्वर उभयत्र सम्बध्यते । ऋकारयुतघकारेण प्रयुतचतुष्कम् । एवमलेन न्यायेन सर्वत्र संख्या वेद्या । शशि । शशिन इत्यर्थः । सूत्रे ह्यविभक्तिकोऽपि प्रयोग- स्स्यात् । चयगियिकुशुछ लु इति युगभगणाप्रशशिनः। च षट् । य त्रिंशत् । शि त्रिशतम्। यि त्रिसहस्रम्। डुप्रयुतपञ्चकम् ।शु लक्षसप्तकम् कृ प्रयुतसप्तकम् । कोटिपञ्चकम् । इति ॥ कु भमेरित्यर्थः । डिशिवण्लुरुष इति भगणाः । प्राक् प्राग्गत्या सम्भूता भगणा इत्यर्थः । ग्ल पञ्चदशार्बुदम्। नवमस्या ने पञ्चदशम- स्थाने एकञ्चेत्यर्थः। खु प्रयुतद्वयम् । ष कोट्याटकम्। भूमेर्यत्पाङ मुखंभ्रमणं तस्य चतुर्युगे संभूता संख्यात्रोक्ता । भूमिह्यं चलेति प्रसिद्धा तस्याःकथमत्र - मणकथनम्। उच्यते। प्रवहाक्षेपारपश्चिमाभिमुखं भ्रमतो नपत्रमण्डलस्य मि. ध्यासानवशागमेभ्रमणं प्रतीयते तदङ्गीकृत्येह भूमभ्रमणमुक्तम् । वस्तुतस्तु न भूमेभ्रमणमस्ति । अतो नक्षत्रमण्डलस्य भ्रमणप्रदर्शनपरमत्र भूभ्रमशकए- नमितिवेद्यम् । वक्ष्यति च मियाजानम् अनुलोमगतिस्थिः पश्यत्यचलं विलोमगं यदत् । अचलानि भानि समपश्चिमगानि लङ्कायाम् ॥ इति । अंहोरात्रेण हि भगोलस्य समस्तभागभ्रमणाद_ष रवेर्दिनगतितुल्यभागी पि भ्रमति । अतो रवेर्यु गभगणयुतभूदिवसैस्तुल्या नक्षत्रमण्डलस्य भ्रमणमि- तिभवति । सैवात्रोक्ता स्यात् ॥ शनि दुङ् विष्व इति । शनेर्यु गभगणाः । अयुतामाश्चतुर्दश । कि पञ्चशतम् । वि षट्सहस्रम् । घ चत्वारि । व षष्ठिः ।

६ गीतिकापादः ॥ गुरु खिच्युभ इति । गुरोर्भ गणाः। खि इति द्विशतम् । रि इति चतुस्सहस्रम् । धु इत्ययुतषट्कम् । यु इति लक्षत्रयम्। भ इति चतुर्विंशतिः॥ कुज भदलिकनुख इति । कुजस्य भगणाः । भ चतुर्विंशतिः । दि अष्टशताधिकसहस्रम् । लि पञ्च सहस्रम् ।कु अयुतनवकम्। नु लक्षद्वयम्। खु प्रयुतद्वयम्। अत्र संख्यायोगेभगणसि- द्विः॥ भृगुवुध सौराः। म गुबुधयोर्यु गभगणास्सौरा एव। सूर्यभगणाः स्युधिएव । एवं पथमसूत्रेण रव्यादीनां युगभगणान् प्रदर्घ्य द्वितीयसूत्रेण चन्द्रोच्चभ- गणान् बुधरा ग्वोश्शीघाच्चभगणांश्च शेषाणां कुजगुरुशनैश्चराणां शीघोच्चच्च चन्द्रपातभगणाच भगणारम्भकालञ्चाह । चन्द्रोच्च ज खिंध बुध सगुशिधुन भग जपविखुट्ट शेषार्काः। बुफिनच लातविलोमाधुधान्हयजाऊदयाच्च लङ्कायाम् ॥२॥ चन्द्रोच्चस्य ज खिध इति भगणाः । र्जु खिध इति वा पाठः । जु प्रयु- तॉण्टकम्। रु लक्षचतुष्कम् । षि अष्टसहस्त्रमाखि द्विशतम्। ध एकोनविंशतिः॥ बुधस्य शीघोच्चभगणाः सुगुशियन इति। सु लक्षनवकम् ।गु अयुतत्रयम् शि स- प्तसहस्रम्ाथ प्रयुतसप्तदशकम्।न विंशतिः॥ भ गोश्शीघोच्चभगणा जषधिखुइति जअष्टौष प्रशीतिः। विशतत्रयाधिकद्विसहस्त्रम् । खु प्रयुतद्वयम् । प्रयुतसप्त- कम् ॥ शेषााः। शेषाणां कुजगुरुमन्दानां शीघोच्चभगणा श्राफः । अर्कभंगणा एव । उपरिण्टादेर्षा मन्दोच्चांशान्वक्ष्यति । अत इहोक्ताश्शीघोच्चभगणा इति सिध्यति । बुफिनच इति पातस्य चन्द्रपातस्य विलोमात्मकभगणाः । बु. युतानां त्रयोविंशतिः । फि शतद्वयाधिकसहस्रद्वयम । म विंशतिः । च षट् । कुजादीनां पातभगणान्वक्ष्यति । अर्कस्य विक्षेपो न विधीयते । अत एते चन्द्रपातस्य भगणा इति सिध्यति । उच्चपातानां व्योनि. दर्शनं नास्ति । तथा च ब्रह्मगुप्तः- प्रतिपादनार्थ मुञ्चाः प्रकल्पिता ग्रहगतेस्तथा पाताः ।" इति ॥ बुन्हयजाऊदयाञ्च लङ्कायाम्। कृतयुगादौ बुधवारे लङ्कायां सूर्यो- दयमारभ्य । प्रजात् मेषादिमारभ्य संशिपके गच्छतां रव्यादीमां भगव अंत्रोक्ता इत्यर्थः।सूर्योदयो मध्यसूर्योदयः कास्पारम्भस्तु स्फुटसूर्योदयः। तत्र मध्य मस्फुटयोर्षिशेषाभावात् ॥ कल्पकालान्तर्गतमनून् गतकालच तृतीयसूत्रेसाह । । तु ।

9 . आर्यभटीये ग्रहगण युगीय भगणसंख्या। पृथिवी १५८२२३७५०० सूर्य ४३२०००० चन्द्रमा .५७१५३३३६ बृहस्पति ३६४२२४ २२०६०२४ शुक्र ४३२०००० बुध शीघोच्च १७९३७०२०/ सावन दिन १५५७८१७५०० चन्द्रोच्चभगण ४८८२१० चन्द्रपातभगण २३२२२६ बुधपातभगण ४३२०००० शुक्रशीघोच्चभगण ७०२२२३८८ शनिभगण १४६५६४ ५१८४०००० अधिमास १५९३३३६ चान्द्रमास ५३४३३३३६ तिथि १६०३०३००८० नयाह २५०८२१८० वर्षमान दिन ३६५ घ १५ प ३१ धि काहोमनवो ढ मनुयुग श्ख गतास्ते' त मनुयुग छना च । कल्पादेर्युगपादा ग च गुरुदिवसाच्च भारतात्पूर्वम् ॥३॥ काहोमनवो ढ । क कस्य ब्रह्मणः । श्रहः अहि मनवो ढ चतुर्दश भ- न्ति । मनुयुग श्ख । एकैकस्य मनोः काले युगानि चतुर्युगाणि श्ख । श स- ततिः । ख द्वयम्। द्वासप्ततिरित्यर्थः । गतास्ते चाएतस्माद्वर्तमानात्कलियु- त्पूर्वमतीतास्ते मनवः । च षट् । मनुयुग छ्ना च । वर्तमानस्य सप्तमस्य वोः । अतीतानि चतुर्युगाणि ना । छा सप्त । ना विंशतिः। सप्तविशति- रित्यर्थः । स्वराणां इस्पदीर्घयोर्न विशेषः । अकारर दृश एवाकारः ॥ कल्पा- सौर मास . १५॥

। गीतिकापादः॥ देर्युगपादा ग च गुरुदिवसाच्च भारतात्पूर्वम् । युगपादाग च । वर्तमानस्याष्टी. विंशस्य चतुर्युगस्य ग पादाश्च । त्रयः पादाश्च । गता भवन्ति । अस्मिन्सू. प्रेग्नाद्य चकारत्रयं न सख्याप्रदर्शकम् ।। कदा एवमित्याह । कल्पादेर्भारताहरु- दिवसात्पूर्वमिति । भारता युधिष्ठिरादयः । तैरुपलक्षितो गुरुदिवसो भारतगु- रुदिवसः । राज्य चरतां युधिष्ठिरादीनामन्त्यो गुरुदिवसो द्वापरावसानगत इत्यर्थः । तस्मिन्दिने युधिष्ठरादयो राज्यमुत्सृज्य महाप्रस्थानं गता इति पु- सिद्धिः । तस्माद्गुरुदिवसात्पूर्व कल्पादेरारभ्य गता मन्वादय इहोक्ताः।इत्य- थः। अस्मिन्पले युगानि परस्परसमानि युगपादश्च चतुर्युगचतुर्थांशः । अन्य- पा चेत् बुधवारादिक धतुर्युगे कलियुगारम्भश्शुक्रवारे न संभवति । अतः कृ- तयुगारम्भो बुधवार इति । बुधान्यजाऊदयाच्च लङ्कायामिति । पठिताश्च प्रकाशिका कलियुगादेः प्रागतीताः कल्पदिवसाः शराश्विषट्खाद्रिशराद्रि- वेदकृतेषुयुग्ममखरसमितः स्यात् । इति । अहर्गणो नात्र विशेष्यः । अनेनापि युगानां समयस्सिध्यति ॥ चतुर्थेन सूत्रेण राश्यादिविभागमाकाशकक्ष्यायोजन- प्रमाणं प्राणकलयोः क्षेत्रसाम्यं ग्रहनक्षत्रकक्ष्यायोजनप्रमाणञ्चाह । भाः ब्रह्मा के दिनमें चौदह मनु होते हैं। और एक मन्वन्तर में ७२ महायुग होते हैं । छः मनु पूरे वीत गये, सातवें मनु के २७ युग भी परा और वर्तमान युग के तीन पाद भी बीत गये (सत्. त्रेता, द्वापर) और शुक्रवार से कलियुग का प्रारम्भ हुना-गुरुवार को द्वापर समाप्त हुषा ( महाराजा युधिष्ठिर ने राज्य किया ) इस प्रकार आर्यभट्ट के मत से सृष्टि के प्रारम्भ से वर्तमान कलियुग पर्यन्त १९८६ १९२०००० वर्ष बीते हैं ( शार्क ४२१. तक) श्रा- र्यभट्ट के मत से चारो युग ( सत्, त्रेता द्वापर, कलि ) बराबर हैं-अर्थात् चारो युगों को वर्ष संख्या न्यूनाधिक नहीं है । युग के चारों धरण बराबर हैं एवं इन के मत से मन्वन्तरों की सन्धि भीनहीं होती-इस लिये इनके मत से १ मन्वन्तर में ७२ युग होते हैं ॥३॥ शशिरा शयष्ठ चक्र तेऽशकलायोजनानि यवजगुणाः । प्राणेनेति कलां भूः खयुगांशे ग्रहजत्रो भवांशे ऽर्कः ॥४॥ (*) प्रखेनैति कलाभू यदितर्हि कुतो ब्रजेत् कमध्यानम् । प्रावर्तनमुन यश्चेिन्न पतन्तिः समुच्छयाः कस्मात् । अ० सि. न. ९१ ( देखो भूमिका ) २७ वां वीत गया ए आर्यभटीये 'शशिनश्चक्र भगणा. द्वादशगुणिता राशयः । शशिनो , युगभगणा द्वादश- गुणिता युगराशयो भवन्ति । भगणाद् द्वादशांशो राशिरित्यक्तं भवति । ते शियो यंगुणास्त्रिंशद्गुणिता अंशा भवन्ति। राशेस्त्रिशांशो भाग इत्युक्त भवति । तेशा वगुणाषष्टिगुणाः कला भवन्ति। अंशात् षष्टय शः कलेत्युक्त भवति । ताः कला अगुणा योजनानि भवन्ति । शशिनो युगभवाः कलाद- शगणिता श्राकाशकक्ष्यायोजनानि भवन्तीत्यर्थः। ब्रह्माण्डकटाहावच्छिन्नस्य सूर्यरश्मिव्याप्तस्याकाशमण्डलस्य परिधियोजनान्याकाशकक्ष्यायोजननीत्यु- ध्यन्तो खखषष्टयद्रीषुखाश्विस्वराध्यद्यब्धिभास्करा इत्याकाशक यायोजना. नि ॥ प्राणेनैति कलां भम् । प्राण नोच्छ्वासतुल्येन 'कालेन में ज्योतिश्चक्र कलामेति कलापरिमितं प्रदेशप्रयहवायुवशात्पश्चिमाभिमुखं गच्छति । खख षभूयमतुल्या हि ज्योतिश्चक्रगताः कुलाः। चक्रभ्रमणकालनिष्पनाः प्राणाचा तत्तुल्या इत्युक्तं भवति । अतोघटिकामगडलगताः प्राणा राशिचक्रगताः कलाश्च क्षेत्रतस्तुल्या इति चोक्त भवति ॥ खयुगांशे ग्रहजयः । खमाकाशकदया। युगं ग्रहस्य भगणाः । आकाशकक्ष्यातो ग्रहभगणराप्त ग्रहजवः । एकपरिवृत्ती पहस्य जवो गतिमानं योजनात्मकं भवति । ग्रहस्य कक्ष्यामरालपरिधियोज- नमित्यर्थः ॥ भवांशेकः । भस्य नक्षत्रमण्डलस्य कक्ष्याया वांशे पाट्यशेअर्को भ्रमति । नक्षत्रकच्यातष्षष्ट्यंशेन तुलितार्ककदयेत्युक्तं भवति। अत्र नक्षत्रकक्ष्या विधीयते । अर्ककक्ष्याहि पूर्वविधिनैव सिद्धा । अर्ककश्या षष्टिगुणिता नक्ष- अकश्या भवतीत्युक्तं भवति । पञ्चमेन योजनपरिमितिं भूम्यादोजनप्रमाणञ्च प्रदर्शयति । भा:-न्द्रमा के भगण को १२ से गुणन करने पर "राशि” होगी अर्थात् पन्द्रमा के युग के भगण को १२ से गुणन कर राशि होगी । ( भगण के १२ नाग को राशि कहते हैं ) राशि को ३० से गुणन करने पर "अंश" होंगे, राशिका ३० वां भाग अंश होताहै) अंश को ६० से गुणन करने से कला होगी, अंश के 10वें भाग को कला कहते हैं) कला को २० स गुणन गुणन करने पर यो- न सख्या होगी अर्थात् चन्द्रमा के १ युग के १० र गुणनफल प्राकाश कक्षा का ( योजन में ) परिमाण होगा। इतनी दूर 7 सर्य के किरणों का प्रसार होता है। एक 'प्राण, ( श्वास ) में पृथिवी । की गतिं पूर्व से पश्चिमं को एक कला होती है। प्राकाश कक्षा से ग्रहां के - कला को से गुणन करने १० गीतिकापादः ॥ भगण द्वारा ग्रह का गत्यात्मक योजन होता है। अर्थात् ग्रह की कक्षा में ण्डल परिधि योजन होगा। नक्षत्र कक्षा के ६० वें भाग में सूर्य (अपनी परिधि में) भ्रमण करता है अर्थात् नक्षत्र कक्षा से ६० वां अंश की बराबर सूर्य की कक्षा है। यहां ना प्रकक्षा कहने-से पूर्व सूत्र से सूर्यकक्षा ही सिद्ध है रविकक्षा को ६० से गुण करने से नक्षत्र कक्षा होगी॥ ४ ॥ नृषि योजनं जिला भूव्यासो ऽकैन्टोपिँजा गिण क मेरोः। भगगुरुबुधिशनिभौमाश्शशि ङजणनमांशकास्समार्कसमाः॥ नृषि योजनम् । नृ नरप्रमाणानां षि अष्टसहस्रं योजनं योजनस्य प्रम णं भवति ॥ जिला जि सहस्रं ला पञ्चाशत् । एतानि भूमेयास। माणयोजनहीनि ॥ अन्दीर्घिजा गिण । अर्कमण्डलस्य व्यासप्रमाणयोजना- निघ्रिना इति । घि चत्वारि शतानि । रि चत्वारे सहस्राणि । अ दश । इ- न्दोगिण इति । गि त्रिशतम् । ण पञ्चदश ॥ क मेरोः । मेरोासयोजनप्रमाणं क। एकमित्यर्थः ॥ भृग्वादीनां बिम्बयोजनानि क्रमाच्छशिनो बिम्बस्य योजनव्यासात् डांशशांशणांशनांशमांशतुल्यानि । पञ्चांशदशांशपञ्चदशांश विशांशपञ्चविंशांशतुल्यानीत्यर्थः ॥ शशिकक्ष्यासाधिता एते व्यासाः। अतोधि- कम्भा हताश्चन्द्रस्य योजनकर्णभक्ता लिप्ता भवन्ति । पुनरपि ता विष्क- म्भाहितास्स्वस्वमन्दकर्णशीघ्रकर्णयोर्योगार्धहतास्स्फुटा भवन्ति। इत्युपदेशः। भूव्यासः । । तथाच मयः *। त्रिचतुः कर्णयुत्याप्तास्ते द्विभास्त्रिज्यया हताः । इति । अत्र चन्द्रस्य योजनकर्णश्चन्द्रस्य मध्ययोजनकर्णः । समासमा युगसमा युगार्कभगणसमा इत्यर्थः ॥ ग्रहाणां विषुवत उत्तरेण दक्षिणेन चापयानप्रमाणं पुरुषप्रमाणञ्च षष्ठे न सूत्रेणाह । भाः-८००० पुरुष ( हाथ का पुरुष) १ योजन होता है । इस योजन से १५०० योजन पृथिवी का व्यास है । सूर्य मण्डल का ४४१० योजन, चन्द्रम घडल का व्यास ३१५ योजन, और मेरु (उत्तर या दक्षिण ) का व्यास योजन है। और शुक्र, बृहस्पति, बुध, शनि, मङ्गल, इन का बिम्बव्यास चन्द्रमा ( * ) सर्यसिद्धान्ते ग्रहयुत्याधि कारे ॥ १४ ।।

११ जानना ।.॥ ५ ॥ .. आर्यभटीये है बिम्बव्यास के योजन संख्या से क्रम से ५ वां अंश, १० वां अंश १५, २०, १५, अंश, है। चन्द्रमा की कक्षा से ये व्यास सिद्ध होते हैं। यहां चन्द्रमा का योजन कर्ण से चन्द्रना मध्ययोजन कर्ण जानना । युग में सूर्य के भगण के तुल्य भाऽपक्रमो ग्रहांशाश्शशिविक्षेपोऽपमण्डलात्कार्धम । शनिगुरुकुज खकगार्धं भगुबुध ख स्चाङ्गुलो घहस्तोना ॥६॥ भाऽपक्रमो ग्रहांशाः । ग्रहाणां भ अंशाश्चतुर्विंशतिभागा अपक्रमः । पर- मापक्रम इत्यर्थः । पूर्वापरस्वस्तिकात्रिराश्यन्तरे घटिकामण्डलायक्रम मण्डल योरन्तरालं चतुर्विंशतिभागतुल्यमित्यर्थः ॥ अपमण्डलाच्छशिमः परमविक्षेपो काधं नवानामधं सार्धाश्चत्वारोऽशाः॥ शनिगुरुकुज खकंगार्धम् । शनर्विक्षेपः ख द्वावंशौ। गुरोः क एकांशः। कुजस्म गार्धं त्रयाणामधं सार्थोशः। भृगुबुधख। भृगबुधयोर्विक्षेपः ख द्वावंशौ॥ स्वागुलो घहस्तो ना। पुरुषोनुलो घ- हस्तश्च । स नवतिः । च षट् । षण्णवत्यङ्गुलः पुरुषः । घहस्तश्चतुर्हस्तश्च पुरुषः । ऋषियोजनमित्यादौ नरशब्देन षण्णवत्यङ्गुलप्रमाणमुदितमित्युक्त भवति । तदेव चतुर्हस्तप्रमाणं भवति । चतुर्विंशत्यङ्गुलैरेको हस्तो भवतीति चोक्त भवति । अङ्गुलस्य परिमाणानुपदेशाल्लेोकसिद्धमेवामुलं गृह्यते । उक्तञ्च तत्परिमाणं तन्त्रान्तरे ।( लीलावत्याम् ) "यबोदरैरङ्गुलमष्टसंख्यै हस्तोऽङ्गुलैष्षड्गुणितैश्चतुर्भिः । हस्तैश्चतुभिर्भवतीह दण्डः क्रोशस्सहस्रद्वितयेन तेषाम् ॥ इति ॥ इह विक्षेपकथने शन्यादीनां भृगुबुधयोश्च पृथगग्रहणं कृतम् । सेन तेषां तयोश्च विक्षेपानयने प्रकारभेकोस्तीति सूचितम् ॥ कुजादीनां प- श्वानां पातभागान् सूर्ययुतानां तेषां मन्दोच्चांशांश्च सप्तमेन सूत्रेणाह । भाः-ग्रहों का परमाक्रम २४ अंश है। अर्थात् पूर्वस्वस्तिक'और'अपरस्वस्तिक' ३ राशि के अन्तर पर हैं " घटिकामगडल" और " अपक्रममण्डल " के बीच का भाग २४ अंश है। " अपक्रममण्डलय से चन्द्रमा का "परमविक्षेप. ४१ अंश है, शनि का विक्षेप २ अंश, गुरु का अंश, मङ्गल का १ - अंश शुक्र और बुध का विक्षेप २ अंश है । हाथ का पुरुष होता है। और २४, भङ्गुल का हाथ एवं ६ अङ्गुल का पुरुष होता है । ८ पेटे से पटे मिले - २ २ १२ गीतिकापादः॥ हुए यव का १ अङ्गुल २४ अकुल का १ हाथ ४ हाथ का १ दंड और २००८ दंड का १ क्रोश होता है ॥६॥ बुधभगुकुजगुरुशनि नवरषहा गत्वांशकान्प्रथमपाताः । सवितुरमीपाञ्ज तथा वा अखि सा ह्दा हूल्यखिच्य मन्दो. च्चम् ॥ ७॥ । बुधस्य पातांशाः न विंशतिः । भृगोः व षष्टिः। कुजस्य र चत्वारिंशत् ।गुरोःष अशीतिः। शनैःह शतम् । गत्वांशकान्प्रथमपाताः। उक्तानेतानेवांशका पादितो गत्वा व्यवस्थिता युधादीनां प्रथम पातास्स्युःप्रथमशब्देन द्वितीयोगी पातोऽस्तीति सूचितम् । स च प्रथमपाताच्चक्रान्तिरे स्थितस्यात् । विक्षेप- मगडलापमगडलयोस्संपातस्थानं पातशब्देनोच्यते । तदा भयत्र भवति । गत्वेति वचनात्तेषां प्रातानां गतिरभिप्रेता । गतिश्च विलोमा। पातविलोमा इत्यने पातानां विलोमगत्वमुक्तम् । अस्मिन्काले पातामा 'स्थितिरेवमित्युक्तं भव ति ॥ सवितुर्मन्दोच्चं तथा द्वा । दा अष्टादश । वा षष्टिः । अष्टसप्ततिभा- गान् तथा मेषादितो गत्वा स्थितं सवितुर्मन्दोच्चमित्यर्थः। अमीषामुक्ताना बुधादीनां मन्दोच्चानि अखिरित्येवमादिभिरुक्तानि। बुधस्य मन्दोच्चं अखि दशाधिकशतवंयभागाः । म गोः सा नवतिभागाः । कुजस्य ह्दा । हा शतं दा अष्टादश । अष्टादशाधिकशतभागाः । गुरोः हल्य । ह शतं ल पञ्चाशत् य त्रिंशत् । अशीत्यधिकशतभागाः । शनेः खिच्य। खि शतद्वयं च षट् य त्रिंशत्। षत्रिशदुत्तरशतद्वयंभागाः। गत्वेतिवचनादेषामपि गतिरभिहिता । गति रचा नुलोमा चन्द्रोच्चवत् । अस्मिन्काल एव मन्दोच्चस्थितिरित्युक्त भवति । पातोच्चानां बहुना कालेनैवाल्पोऽपि गतिविशेषस्संभवतीति मत्वा तेषां गतिरिहानभिहिता। उक्ताशास्त्रान्तरे ( सूर्यसिद्धान्ते मध्याधिकारे ४१ तेषां कल्पभगणा:- "प्राग्गतेस्सूर्यमन्दस्य कल्पे सप्ताष्टबहूयः । कोजस्य वेदखयमा बौधस्याष्टर्तुबहूयः ॥ खखरन्ध्राणि जैवस्य शौक्रस्यार्थगुणासवः । गोऽग्नयश्शनिमन्दस्य पातानामथ वामतः ॥ मनुदस्रास्तु कोजस्य बौधस्याष्टाषटसागराः ।

१३ . . आर्यभटीये कृताद्रिचन्द्रा जैवस्य त्रिखाङ्काश्च गुरोस्तथा ॥ शनिपातस्थ भगणाः कल्पे यमरसतवः ।। इति । गुरोरिति दैत्यगुरोरुक्तम् + । अस्मिन्पा कलेः प्रागतीता ग्रहग- तिविषयाः कल्पान्दा लिख्यन्ते- "खखखाभाहिनागषुवाणाङ्क काः कलेस्समाः । मानिर्दिष्टा ग्रहाणान्तु चारारम्भात्ततोग्ध्वगाः ॥ इति । अस्मिन्पक्षे कुदिवसा अष्टाक्ष्यहिखरेन्द्रगोग्गतिथयः। भदन- काशिकायामुच्चपातानां गतिरन्यथा प्रदर्शिता- 'खाकाशाष्टकृतद्विद्विव्योमेष्वद्रीषुवहूयः।। युगं बुधादिपातानां विद्वद्भिः परिपठ्यते ॥ एकद्वित्रिचतुष्पञ्च भगणाः परिकीर्तिताः । सौम्यारशुक्रजीवार्कपातानां क्रमशो युगे” एतैस्त्रैराशिकाद्यथोक्तपातसिद्धिः । इति । युगमत्र वर्षात्मकम् । एभि- सिद्धानां पातानामुक्ता अंशा एव भवन्ति नतु कतिचिद्भगणाः । तेशाः क्र- गता एव भवन्ति नतु विलोमगाः । तथा सूर्यबुधादीनाञ्च मन्दोच्चयुगं तक णाश्च प्रदर्शिताः।- "रव्युच्चस्य रसैकाङ्कगिर्यष्टिनवशङ्करा । सहस्रघ्ना युगं प्रोक्तं भगणाच त्रयोदश ॥ दन्तवस्वश्विरामाग्निवसुरामयमा युगम् । बुधोच्चस्य शतघ्नास्ते सप्तात्र भगणास्मृताः ।। खखाब्धिवेदपञ्चाष्टिवेदनन्दाद्रयो युगम,। कवेस्सूरेस्तदर्ध स्यादेकस्तस्मिन् गणस्तयोः । इति । सौरकुजयोस्तु तत्प्रकरणे ग्रन्थे पाठो दृश्यते । तयोरेवं पाठः कार्यः "व्योमाम्बरशून्यकृताब्धिरुद्गशरवसुमतीषुशशितुल्यम् । +मैव-भ गोरिति पाठस्य पुस्तकान्तरे दृष्टत्वाद्गुरोरिति पाठः मामा- देक इत्यनुमेयम् । प्रकाशिकापुस्तके शतघ्न स्यात् इति पाठो दृश्यते ॥ + प्रकाशिकापुस्तके एकस्तद्भगणस्तयोः । इति दृश्यते ।।

- अपमगडल " गीतिकापादः ॥ असितोच्चयुगं कौ द्विणं भगणा इहेषवस्तु तयोः ॥ + इति । अत्रापि पठितभागा एव लभ्यन्ते नतु भगणाः । अतएवं प्रतीयते केनचिबुद्धिमता स्वबुद्ध्या परिकल्प्येवं लिखितमिति । अस्मिन्पक्षे कलेः प्राग- तीतास्समा लिख्य ते । • खखखाभ पगनागगोचन्द्राः प्राकलेस्समाः । इति ॥ अष्टमेन सूत्रण शशिनच पूर्वसूत्रोदितसूर्य बुधभुगुकुजगुरुशनीनाञ्च मन्दवृत्तानि शनिगुरुकुजभृगुबुधानां शीघ्रवृत्तानि चाह । भा:-बुध का पात अंश २०,शुक्र का ६२,मङ्गल का ४०, वृहस्पति का ८०, शन का १२ ये प्रथम पात हैं । ये उक्त पात अंश मेषादि राशि से चल कर बुध श्रादि के व्यवस्थितनात होते हैं। यहां प्रथम शब्द से द्वितीयपात का भी होना सू. चित होता है । और वह प्रथमपात से चक्रान्तिर में स्थित है । विक्षेप म- गडल ” और के सम्पात स्थान को पात . कहते हैं। वेही दोनों यहां होते हैं। संर्य का मन्दोच्च ७६ अंश, मेष आदि से चल कर स्थित होता है। बुध का मन्दोच्च २१० अंश. शुक्र का ५० भाग, मङ्गल का ११८.गुरु का १८० और शनि का २३६ भाग हैं ॥ ७ ॥ कार्थानि मन्दवृत्तं शशिनश्छ ग छ घ ढ छ क यथोक्तभ्यः। क ग्ड ग्ल कु द्ड तथा शनिगुरुकुजभृगबुधोच्चशीघ्रभ्यः । कस्य नवानामधू कार्धानि । अर्धपञ्चमैरपवर्तितानि वृत्तानीहोच्यन्त । त्यर्थः। शशिनो मन्दवत्त छ सप्त । यथोक्तभ्यः सूर्यबुधादिभ्यस्सिद्धानि वृत्ता नि गादीनीत्यर्थः । ग्रहाणाञ्चांशाद्वि वत्तपरिमितिः कल्प्यते । अतो ग्रहेभ्यं कृत्तानि भवन्ति । तत्र सूर्यस्य मन्दवत्तं ग त्रीणि । मन्दवृत्तमेव शशिसूर्ययं भवतीति । बुधस्य छ सप्त । म गोः घ चत्वारि • कुजस्य ढ चतुर्दश। गुरो छ सप्त । शनेः क नव ॥ शनिगुरुकुजभृगुबुधोच्चशीघ्रभ्यः । शीघ्रोच्चेभ्यः शीघ्रोच्चनिमित्तशीघ्रगतिवशाज्जातानि वृत्तानि कादीनिः। शनेः क नव । गु रोः ग्ह । गत्रीणि । ड त्रयोदश । षोडशेत्यर्थः । कुर्जस्य ग्ल । ग त्रीणि । ल पञ्चाशत् । त्रिपञ्चाशदित्यर्थः । भृगोः क्ल । क नव । ल पञ्चाशत् । एकोनष- ष्टिरित्यर्थः । बुधस्य द्ड । द अष्टादश । उ त्रयोदश । एकत्रिंशदित्यर्थः । + प्रकाशिकापुस्तके रुद्रशरशैलवसुमुनीन्दु समाः। इति पाठः। रश्च । भगणा नवेषवस्तु तयोः । इति लिखितम्-- ५ २ . का ३९, आर्यभटीये अत्र मन्दशीघ्रवृत्तियोः क्रमभेदस्स्यात् तेन मन्दस्फुटशीघ्रस्फुटयोायभेदस्सूचि- तः । यथा शीघ्रभुजाफलस्थकर्ण साध्यत्वं मन्दभुजाफलस्य तदभावश्च । अथवा मन्दकर्णतत्साधनानामविशेषकरणं शीप्रकर्णतत्साधनानां तदभावश्चति ॥ ए- धमोजपदे वृत्तानि प्रदर्य यु मे पद वृत्तानि भूयायोः कक्ष्याप्रमाणञ्च नबन सत्रेणाह। भाः-चन्द्रमाकामन्दवृत्त है (यहां४ - है परन्तु से अपवर्तित वृत्त कहा जाता है)पूक्ति सूत्र पठित सूर्य बुधादि से सिद्धवृत्त ग अदि है ग्रहों के अंश ही से वृत्तपरिमित कल्पना की जाती है-इस लिये ग्रहों से वृत्त होते हैं। सूर्य का मन्दवृत्त ३, सूर्य और चन्द्रमा का मन्द ही वृत्त होता है। बुध का 9, शुक्र का ४, मङ्गल का -१४, गुरु का ७, शनि का 1 शीघ्रोच्चग- ते वशतः उत्पन्न वृत्तं शनि का , गुरु का १६, मङ्गल का ५३, शुक्र का ५६, पौर बुध होता है " . मन्दात् ङ ख द ज डा वक्रिणां द्वितीये पदे चतुर्थ च । जाणलछल क्नोच्चाच्छीघ्रात गियिडश कुवायुकक्ष्यान्त्या। वक्रिणां पूर्वसूत्रोदितानां बुधभृगुकुजगुरुशनीनां द्वितीये पदे चतुर्थे पदेच न्दिात् मन्दगतिवशाज्जातानि मन्दवृत्तानि ङादीनि । बुधस्य ङ पञ्च । भृ- तः ख द्वे । कुजस्य द अष्टादश । गुरोः ज अष्टौ । शनः डा अयोदश ॥ क्तिानां शनिगुरुकुजभृगुबुधानां शीघ्रादुच्चालीघ्रोच्चगतिवशाज्जातानि शी- वृत्तानि जादीनि । तानि च द्वितीयचतुर्थपदयोध्यन्ते । शनेः जा अष्टौ । :: ण पञ्चदश। कुजस्य क्ल। क एकम् । ल पञ्चाशत् । एकपञ्चाशत् । शुक्रस्य ल । छ सप्त । ल पञ्चाशत् । सप्तपञ्चाशत् । बुधस्य क्न । क नव । न विं- तिः। एकोनत्रिंशत्। अत्र द्वितीयचतुर्थपदोपदेशात्पूर्वोक्तानि प्रथमततीय- रिति चोक्तं भवति ॥ कुवायोk संबन्धिनो वायोरनियतगतरत्या कदया पन्तभवा कक्ष्या गियिङश इति। गि शतत्रयम्। थि सहस्त्रत्रयम् । ङ पञ्च । सप्ततिः। अत ऊवं प्रवहोनाम वायुर्नियतगतिस्सदा भवति येन ज्योतिष- वक्रमिदमपराभिमुखं भ्रमति ॥ दशमसूत्रेण कालक्रयागोलोपयोगीनि अर्धाग्याह - - ।

गीतिकापादः ॥ भाः-वक्री बुध, शुक्र, मङ्कल,गुरु और शनि का युग्म(सम)पद अर्थात् द्वितीय और चतुर्थ पद में मन्दगति वशतः मन्दवृत्त इस प्रकार होते हैं:-बुध के ५, शुक्र के २, मङ्गल के १८ बृहस्पति के ८, शनि का १३, पूर्वोक्त शनि, गुरु, कुज, शक्र, बुध, के शीघ्रोच्च गति वशतः शीघ्रवृत्त होते हैं। द्वितीय और धतुर्थ पद में श न के ८, गुरु के १५, मङ्गल के ५१, शुक के ५७, बुध के २९, भूवायु ३:७५ पर्यन्त चलता है। इस के ऊपर प्रवह वायु रहता है ॥९॥ मखि भखि फखि धखि खि अखि ङखि हस्क स्वकि किष्ण शकि किध्वालकि किग्र हक्य धाहा स्त सगश्क व ल्क प्र फ-छ कलार्धज्याः ॥ १० ॥ ॥ कलार्धन्याः कलात्मिका अर्धज्या इहोक्ता इत्यर्थः । समस्तज्या अर्धज्ये- ति द्विविधा हि जीवा । चापाकारस्य वृत्तपरिधिभागस्यैकाग्रादपराग्रान्तगता रेखासमस्तयेत्युच्यते । तदर्धमर्धज्येत्युच्यते । गोलकालक्रिययोर धज्यैव हि प्रायेण व्यवहारः । तस्मादिहार्धज्याप्रदर्शन क्रियते । चतुर्विंशतिजीवा इह पठिताः अतो गोलपादस्य चतुर्विंशतिभागं चापं प्रकलप्यह जीवाः कल्पिता इति प्रदर्शितं भवति । श्राद्यजीवा मखि इति । पञ्चविंशत्यधिकशतद्वयम् ।भ खि चतुर्विंशत्यधिकशतद्वयम् । एवमन्याश्च वेद्या ।अष्टमीहस्क इति । नवा कैकाः । स्वकि चन्द्रात काः । किग त्रिवसुचन्द्राः । श्घकि वेदाभेकाः कि ध्य वेदषडकाः । ल क वेदेविन्दवः । किय त्रिमनवा हक्य एकाग्निचन्द्राः धाहा नवरुद्राः । स्त षड्दश । स्ग ज्यङ्काः । एक नवादयः । व पञ्चरसाः ल्क एकेषव । प्त सप्ताग्नयः । फ द्वयश्विनः । छ सप्त ॥ अत्रैकचापोत्थ जीवया रहिता द्वितीयज्या । चाएत्रयोत्थजीवा चापदयोत्थनीवमा रहित तृतीयज्या । एवं परा अपि ज्ञेयाः । यद्यप्यर्धज्या एता युक्तितस्साध्यास्तथा पि तासां बहुषु साधनत्वादिहोपदेशः कृत इति बोद्धव्यम् ॥ दशगीतिकासून परिज्ञानस्य फलमाह। पृथिवी से ऊपर सात प्रकार के वायु हैं:-प्रावह, प्रवह, उद्वह, सं- वह सुवह. परिवह' और परावह, । इसी प्रकार ऊपर २ के सात लोकों में सात २ प्रकार के वायु मिलकर ४९ प्रकार के वायु होते हैं । इसी को पुराणों में < कोटि ( प्रकार ) वायु हैं ऐसा लिखा है। +अस्मिन्सूत्रवत्रभङ्ग उपलभ्यते अतः प्रकाशिकापाठो धहहचइत्यादिशीभनपाठ .

२ | ३ ४ 9 - आर्यभटीये १७ घी गीतिका का अर्थ नीचे लिखे चक्र द्वारा किया गया है। ज्या-ज्ञापक चक्र। जयासंख्या ५/६ || २० | ११ | १२ | १३ ज्याईसं० २२५/२२४ २२२ | २१९ २१५ / २१० २०५ | १९८ ! १९९ / १८३ १७४ १६२ १५४ ज्यासंख्या | १४ | १५ | १६ | १७ | १८ | १८ | २० | २१ | २२ / २३ 7याईसं० (१४३/१३९ | ११९ | १०६/ ९३ /96 | ६५ | ५१ | ३७ | २२ दशगीतिकासूत्रमिदं भूग्रहचरितं. भपजरे ज्ञात्वा ग्रहभगणपरिभ्रमणं स याति भित्त्वा परं ब्रह्म ॥११॥ भूमे हाणाञ्च चरितं यस्मिन्दशगीतिका सूत्रे तद्दशगीतिकासत्रम् । भपञ्जरे ज्ञात्वा । गोले ज्ञास्या। भपञ्जरमध्ये भूस्तिष्ठति । चन्द्रादिमन्दान्ता ग्रहास्स्व- गत्या प्राङ्मुखं चरन्तो ज्योतिश्चक्रगत्यापराभिमुखं भ्रमन्ति । तत उपरि स्वतोगतिहीनं नक्षत्रमण्डलमपराभिमुखं भ्रमति । इत्यादि ज्ञात्वेत्यर्थः । स पुरो गणितविदेवंविधं ग्रहादिचरितं ज्ञात्वा ग्रहनक्षत्राणां मार्ग भिरवा परं ब्रह्म गछति॥ इति पारमेश्वरिकायां भटदीपिकायां गीतिकापादःप्रथमः। भा:-पृथिवी और ग्रहों का चरित जिस में वर्णित है। उस को राशि चक्र में पथावत् जान कर, नक्षत्र चक्र में पृथिवी अवस्थित है और चन्द्रमा मन्दग्रह श्रादि अपनी २ गति से पूर्व की ओर चलते हुए ज्योतिश्चक्र की गति से प- राभिमुख भ्रमण करते हैं । इस के ऊपर अपनी गति से हीन नक्षत्रमण्डल भ्रमण करता सा दीख पड़ता है। गणितज गण इस प्रकार ग्रह आदिकों के चरित को जान कर पर ब्रह्म को प्राप्त होते हैं ॥ ११ ॥ इति आर्यभटीये गीतिका पादः समाप्तः ॥१॥ एवं दशगीतिकात्मकेन प्रबन्धेनातीन्द्रियमर्थजातमुपदिश्येदानों तन्मूलन्याया- धसेयमर्थजातंप्रवन्धान्तरेण प्रदर्शयन्निष्टदेवतानमस्करपूर्वतदभिधानप्रतिजानाति ब्रह्मकुशशिबुधभगरविकजगुरुकोणभगणान्नमस्कृत्य । आर्यभटस्त्विह निगदति कुसमपुरेऽभ्यर्चितं ज्ञानम् ॥१॥ ब्रह्मभूमिग्रहनक्षत्रगणान्नमस्कृत्य कुसुमंपुरे कुसुमपुराख्यास्मिन्दशे। अभ्यर्चित जानं कुसुमपुरवासिभिः पूजितं ग्रहगतिज्ञानसाधनभूतं तन्त्रमार्यभटो निगदति । ३ १८ गीतिकापादः॥ कुसुमपुरेभ्यर्चितमित्यनेन ॥ कालक्रियागोलयोर्गणितगम्यत्वात्मयमं गणि- तपादं प्रतिपादयिष्यन्नादितो दशानां स्थानानां संज्ञास्संख्यालक्षणचाह । भा०:- पृथिवी, चन्द्रमा, बुध, शुक्र, सूर्य, मङ्गल, और सहस्पति, आदि धिष्ठित परब्रह्म को नमस्कार कर आर्यभट इस कुसुमपुर (पटना, विहार) के लोगों द्वारा समात आर्यभटीय नामक ग्रन्थ को कहते हैं ॥ १॥ एक दश च शतञ्च सहस्रमयुतनियुते तथा प्रयुतम् । कोट्यर्बुदञ्च वृन्दं स्थानात्स्थानं दशगुणं स्यात् ॥२॥ * इति । स्पष्टयः । अनुक्ता संख्या शास्त्रान्तरादवगन्तव्येति भावः ॥ समचतु- रअफलयोर्वर्गसे ज्ञा वर्गस्वरूपञ्चार्याधुनाह । दूसरी गीतिटता का अर्थ नीचे लिखे प्रकार जानना । एक १ शत १ सहस्त्र १००० अयुत १०००० लत. १ . . मयुत १०००.०० कोटि १०० अर्बुद १०.०९०.०० अबज १००००००० ०००००००००० निखर्व १०००००००००० महापद्म. खर्व १०० ........ . जलधि१००० अन्त्य १००००००००० मध्य १००००००००० परार्द्ध १० (• ) इहार्यापूर्वार्धे वृत्तभङ्ग उपलभ्यते । एकं दशावतु शतं सहस्रर्माि पाठः शुद्धमायो भवेत्।

१९ प्रायभटीये बस्समचतुरशः * फलञ्च सदृशद्वयस्य संवर्गः ॥ यस्य चतुरस्य क्षेत्रस्य चत्वारो बाहवः परस्परं समास्स्युः कर्णद्वयञ्च परस्परं समं भवेत् तत्क्षेत्रं समचतुरश्रमित्युच्यते । स क्षेत्रविशेषो वर्गसंज्ञितो भवति । फलञ्च । तस्मिन् क्षेत्रे यत्क्षेत्रफलं भवति तदपि वर्गसंज्ञितं भवति । क्षेत्रफलसमुदायस्य वर्गसंज्ञा भवति । अभीष्टक्षेत्रस्यान्तर्भागे हस्तमितैश्चतुभि- बोहुभिनिष्पन्नानि यानि समचतुरश्राणि तानि क्षेत्रफलानीत्युच्यन्ते । एवं त्रिकोणवृत्तादिक्षेत्रेष्वपि हस्तोन्मितचतुरअपरिकल्पनया जातानां चतुरश्रख- गडानां फलसंज्ञा भवतीति वेद्यम् । सदृशद्वयस्य संवर्गः । सागयोः परस्परतु- ल्ययोस्संख्ययोर्यस्संवर्गः परस्परहतिस्स वर्गसंज्ञो भवति । स्वस्य स्वसंख्यया हननं वर्गकर्मे त्युक्तं भवति ॥ उत्तरार्धन घनमाह । भा:-जिस “चतुर्भुज क्षेत्र के चारोभुजा एवं दोनों कर्ण परस्पर समान हों, उसे "समचतुरस्त्र क्षेत्र कहते हैं। ऐसे " समचतुरस्र” क्षेत्र का नाम "वर्गक्षेत्र" भी है। और इस के फल का नाम " वर्गक्षेत्रफल " होता है। समान दो संख्याओं के परस्पर गुणन को "संवर्ग कहते हैं । और आधी गीति- का का अर्थ हुश्रा॥ सदृशत्रय संघौ घनस्तथा द्वादशाग्रस्स्यात् ॥ ३ ॥ सुल्यसंख्यात्रयस्य संवर्गः परस्परहतिर्घनसंज्ञो भवति । स्वस्य स्वसंख्य- या गुणितस्य पुनरपि स्वसंख्यया हननं घनकर्मेत्युक्तं भवेति । तथा द्वादशा- प्रक्षेत्रञ्च घनसंज्ञ भवति । एतदुक्तं भवति। हस्तन्मितिदैर्घ्य विस्तृतेस्समचतु: रश्रस्य स्तम्भादेर्यथा मूले तिर्यगायतानि चत्वार्याणि' भवन्ति । तथाग्र चत्वारि । अधऊर्ध्वगतानि चत्वारि । एवं द्वादशभिरत्रैर्युतं क्षेत्रञ्च घनसंक्षं भवतीति । अत्र सदृशद्वयसंवर्गस्सदृशत्रयसंवर्ग इत्याभ्यामेव वर्गकर्म घनकर्म च ,प्रदर्शितम् । अस्माद्विधेयायतस्सिद्ध परैरुक्त प्रक्रियान्तरं विलिख्यते । “समद्विधातः कृतिरुच्यतेग्य स्थाप्योऽन्त्यवर्गो द्विगुणान्त्यनिध्नः । * व्रतरअरितिपाठो वैदिकः शतपथब्राह्मादिषु दृश्यते ज्यौतिषग्रन्थेषु नोपलभ्यते किन्तु चतुरस्ररित्येव पाठो दृश्यते । यत्र यत्रास्मिन् ग्रन्थे-अस्त्र स्थाने "अनं पश्येत तत्र सर्वत्रायमेवं हेतुर्ने यः । • तथा लीलावत्याम् २, गीतिकापादः ॥ स्वस्वोपरिण्टाच्च तथापरेङ्कास्त्यत्क्तान्त्यमुत्सार्य पुनश्च राशिम् ॥" इति वर्गकर्म । "समात्रिघातश्च घनः प्रदिष्टः स्थाप्यो घनोऽन्त्यस्य ततोऽन्त्यवर्गः । प्रादित्रिनिघ्नस्त अादिवर्गस्यन्त्याहतोऽथादिघनश्च सर्वे ॥ स्थानान्तरत्वेन युता घनः स्यात् प्रकल्प्य तत्खण्डयुगं ततोऽन्यत् । एवं मुहुर्वर्गघनपसिया प्राद्यङ्कतो वा विधिरेष कार्यः ॥ इति घनकर्म । अन्त्यानि तत्कालस्थापितघनस्य मूलादीन्यन्त्यस्थानानि । आदिस्तस्यारिभूतमेकमेव 'स्थानम् । खण्डयुगमादिखण्डमविन्यस्तं तथा वि- न्यस्तमन्त्यखण्डेञ्च । अन्यत् अन्यत्र प्रकल्प्येत्यर्थः ॥ भिनवर्गभिन्नघनयोस्तु । "अंशक्ती भक्तायां छेदजवर्गेण भिन्नवर्गफलम् । अंगस्य घनं विभजच्छेदस्य घनेन घनफलं भिन्नम् ॥, इत्याभ्यां वर्गफलघनफले कल्प्ये ॥ वर्गमूलमाह । समान तीन संख्याओं के परस्पर गुणन को “धन” कहते हैं एवं द्वाद- शास्त्र क्षेत्र (१२ कोण का ) का नाम भी "घनक्षेत्र" ॥३॥ भाग हरेदवर्गान्नित्यं द्विगुणेन वर्गमूलेन । वर्गाद्वगै शुद्धे लब्धं स्थानान्तरे मूलम् ॥४॥ ओजस्थानानिवर्गसंज्ञितानिायुग्मस्थानान्यवर्गसंज्ञितानिाअन्त्यावर्गस्थानाद्यथा ब्धं वर्ग विशोधयेत्। शुद्धस्य तस्य वर्गस्य मूलमेकत्र संस्थापयेत् पुनस्तन्मलं पृ- थक् संस्थाप्यपृथक्स्थेन तेन द्विगुणतेन मूलाख्येन फलेन शुद्धवर्गस्थानस्यादिभू- तमवर्गस्था विभज्य लब्धफलत्य वगञ्च विहृतस्थानस्यादिभूताद्वर्गस्थानाद्वि- शोध्यपुनस्तत्फलं मूलाख्यं पूर्वस्थापितमूलफलस्यादित्वेन पङ्क्तयांन्यसेत् । पुनस्तया मूलपङ्क्त्या पृथक्स्थया द्विगुणितया शुद्धवर्गस्थानस्यादिभूतमवर्ग स्था विभज्य तत्र लब्धस्य फलस्य वर्गच्च विहतस्थानफलमवर्गस्थानस्यादिभूत द्विर्गस्थानाद्विशोध्यतत्फलमपि मूलपङ्क्तौ स्थापयेतापुनरप्येवंकुर्याद्यावत्स्या- नावसानम्। तत्र दृष्टा मूलपङ्क्तिमूलमेव । सदा विभज्यम् । यदि तत्र फलं न भवेत् तदा शून्यं मूलपती संस्थाप्य पुनरम्यदवर्गस्थानं विभजेदित्यर्थः । य- दा यत्स्थानं हियते तदा तस्यान्त्यस्थानानि तस्यावयधभूतानीतिकल्प्यम्। ।

२१ . आर्यभटोये लब्धं स्थानान्तरे तत्तल्लब्धं स्थानान्तरत्वेन पङक्तयां स्थाप्यमित्यर्थः ॥ घनमूलमाह। भा० - इकाई के स्थान से प्रारम्भ करके प्रत्येक दूसरे अङ्कके ऊपर एक विन्दु रक्खो, इस प्रकार पूरी राशि कई अंशों में बंट जावेगी, इन अंशों की संख्या से वर्ग मूल के अटों की संख्या जानी जायगी! वांई ओर के पहिले अंश में से कौन सी सब से बड़ी संख्या का वर्ग घट सकता है, उसे निर्णय करो वही व- र्गमूल का पहिला अङ्क होगा, उस को भाग की तरह दी हुई संख्या की दा. हिनी ओर लिखो और उस के वर्ग को उसी वाई श्रोर के अंश में से घटा- ओ। फिर वाकी पर दूसरे अंश अर्थात् आगेके दो अङ्कोको उतारो। इस प्र- कार जो दो राशि वनगों उन को " भाज्य , मानो और इस भाज्य के हिने के एक अङ्क को छोड़ कर उस में पहिली वर्गमूल संख्या को दूने का भा- ग दो और भागफल को उसी मूल की दाहिनी ओर “ भाजक " की हिनी ओर लिखो। फिर उस भाजक को मूल के शेष अङ्क से गुणा करके गु. णन फल को भाज्य में से घटाओ। फिर और और सब अंशों को उतार कर पहिले की तरह कार्य करो। उदाहरण:- २२०६ का वर्गमूल बतानो। २२०९ (४७ यहां पहिला अंश २२ है। सब से बड़ी संख्या के वर्ग २६ को २२ में से घटा सकते हैं। इस लिये ४ ही वर्गमूल का पहिला अङ्क होगा । पहिले अंश २ में से १६ घटाने से ६ शेष रहे। दूसरा अंश C. को ६ को दाहिनी ओर उतारने से ६०९ हुए । ६.९ के को छोड़ देने से ६० रहे। ६० में मूल ६४ के दूने अर्थात् ८ का भाग देने से.भागफल हुना । ७ को १ के दाहि- नी ओर ८ के दाहिने लिखो। फिर ८७ को ७ सेगुणा करके गुणन फल ६०८ में से घटाने से व्यकी कुछ नहीं रहा; इस लिये ४७ इष्ट वर्गमूल हुभा ॥ ४ ॥ .

२२ गीतिकापादः ॥ अघनाट्नजेदद्वितीयात् त्रिगुणेन घनस्य मूलवर्गण । वर्गस्त्रिपूर्वगुणितशोध्यः प्रथमाघनश्च घनाद ॥५॥ प्रथमस्थानं घनसंज्ञम् । द्वितीयतृतीये अघनसंज्ञे। चतुर्थं घनसंज्ञम् । पञ्चमषष्ठे अघनसंज्ञे । एवर्मन्थान्यपि स्थानान्युक्तक्रमाद्विद्यानि । वर्गावर्गवि- भागो घनविभागश्च युक्तिसिद्धत्वादिहाचार्यणानुपदिष्टः। अन्त्यायनस्थाना- द्यथालब्धं घनं विशोधयेत् । पुनस्तस्य मूलमेका संस्थाप्य पुनस्तद्घनमूलं वर्गीकृत्य त्रिभिश्च निहत्य तेन शुद्धघनस्थानस्यादिभूतयोरघनस्थानयोढ़ि- तीयाद्वामगादघनस्थानात्फलं विभजेत् । द्वितीयमघनस्थानं विभजेदित्यर्थः । तत्र लब्धं फलं वर्गीकृत्यं त्रिभिश्च निहत्य पूर्वस्थापितेन मूलफलेन च निहत्य विहृतस्थानमादिभूतात्प्रथमाख्यादघनस्यागाद्विशोध्य तस्य फलस्य घनश्च शुद्धराशेरादिभूताग्रस्थानाद्विशोध्यपुनस्तत्फलं घनमूलाख्यं पूर्वस्थापिते घने मूलाख्यफलस्यादिस्थाने पतिरूपेणस्थापयेत् । पुनर्मूलपङ क्या पृथ- क्स्थया वर्गीकृतया त्रिभिश्च निहतया शुद्धधनस्यादिभूतमघनस्थानं विभ- ज्य लब्धं फलं वर्गीकृत्य त्रिभिश्च निहत्य पूर्वस्थापितमूलपङ क्त्या च नि- हत्य विहतस्थानस्यादिभूतात्प्रथमाख्यादघनस्थानाद्विशोध्य फलस्य घनश्च शु दुस्थानस्यादिभू ताद्घस्थानाद्वि शोध्य तत्फलं घनमूलाख्यं पूर्वस्था- पितघनपतौ स्थापयेत् । पुनरप्येवं कुर्याद्यावत्स्थानावसानं । तत्रजाता घन पतिर्घनमूलफलं भवति । भिन्नेषु तु । अंशघनमूलराशौ खनमूलं छेदमूलहते। इत्यनेन वेद्यम् । तथा भिनवर्गमूले च त्रिगुणेन घनस्य मूलवर्गण भजेदित्य नेन । एवं प्रथमं घनशोधनासभिहित भवति । वर्गमूले च द्विगुणेन ‘वर्गमूलेन हरेदित्यनेन प्रथमं वर्गशोधनं भवति । घनकर्म लौकिके गणित उपयुज्यते नतु क्रियागोलयोः ॥ त्रिभुजक्षेत्रस्य फलं पूर्वार्धनाह । भा०-इकाई के स्थान से प्रारम्भ करके प्रत्येक तीसरे अंक के ऊपर एक एक विन्द रक्ख कर राशि को कई एक अंशों में वांट लो, यह अंशसंख्या घनमू- ल की अङ्कसंख्या होगी। बांई ओर के पहिले अंश में जिस बड़ी से बड़ी संख्या का घन घट स- 'कता हो उस को भाग की रीति के अनुसार दी हुई राशि की दाहिनी श्री- र लिखो यही संख्या इष्ट घनमूल का पहिला अङ्क होगी पहिले अंश में से - काला हु" आर्यभटीये मूलांश के धन को घटनश्रो और अन्तरफल पर पास वाले दूसरे अंश को रो और इसे "भाग्य समझो। पुनः लब्ध मूलांश के वग के तिगुने को "जांच भाजा” समझो। भाज्य पिछले दो अङ्का को छोड़कर उस में जांच भाजक” का भाग देने से मूल दूसरा अङ्क मिल जावेगा। मूल में जो दो अङ्क ( या कई अङ्क ) अभी मिले हैं, उन को ३ से गुणा तो और गुणन फल को नये मूलाङ्क के ( जो जांव भाजक द्वारा निश्चय । है ) वांई ओर रक्खो, फिर इस राशि को नये मूलाङ्क से गुणा करो और णन फल को "जांच भाजक” के नीचे दो अंक दाहिनी ओर रक्खो और न को जोड़ो, अब यही योगफल असल भाजक होगा। "असल भाजक को उस के शेष अंक से गुणा करो और गुएन फल को ज्य में से घटाओ। फिर अन्तरफल पर पास वाले दूसरे अंश को उतारो इस कार अब तक सब अंश उतार लिये न जांय, तब तक ऊपर लिखी हुई रीति । अनुसार कार्य करोः-- उदाहरण-४२८७५ का घनमूल निकालो। ३ जांचभाजक ३४३-२७ ४२८७५ (३५ ३ (५४५-४७५ 3X२७ सिलभाजक ३१७५ १५८७५ ३९७५४५-१५८०५ ३५ इष्ट घनमूल हुआ।॥३॥ त्रिभुजस्य फलं शरीरं समदलकोटीभजार्धसंवर्गः ॥ त्रिभुजस्य क्षेत्रस्य या समदलकोटी । लम्ब इत्यर्थः। त्रिभुजस्याधोगतो जो भूमिरित्युच्यते अर्वकोणागम्यन्तं ल्यलम्बसूत्रं स लम्ब इत्युच्यते । ल- घस्योभयपार्श्वगते ये त्रिभुजदले त्रिकोणरूपे तयोरयं लम्ब एक एव कोटि- वति । तस्मात्समदलकोटीत्युच्यते । तस्याः कोट्या भुजा तत्पार्श्वगतो भ- गहस्स्यात् । अतो भुजयोरध्य भूम्यधं भवति । भूम्यर्धेलम्बयोस्संवर्गस्त्रिभु . क्षेत्रफलं भवति ॥ घनस्य त्रिभुजस्य फलमुत्तरार्धनाह ।

गीतिक पा - का भा०: त्रिभुजक्षेत्र के जो दो तुल्य दल (अद्भुभाग) कोटी । अर्थात् लम्ब । त्रि शुज के अधोगत भुजा की भूमि (आधार ) कहते हैं । ऊपर के कोण रे भाधार तक जो लम्ब सूत्र उसे « लम्ब , कहते हैं। आधार के अर्द्धभार को लम्ब से गुणन करने पर-गुणनफल " त्रिभुज क्षेत्र ,, का फल होगर ।' एवं आधीगीतिका अर्थ हुभा ॥ ऊर्ध्व भुजातत्संवर्गाधं स घनषडपिरिति ॥ ६ ॥ ऊर्श्वभुजा क्षेत्रमध्योच्छायः । तदिति क्षेत्रफलम् । ऊर्ध्वभु जायाः क्षेत्र फलस्य च संवर्गार्ध यत् स घनः।घनफलं भवति। स क्षेत्रविशषषडनिश्च भ वांत षड्बाहुभवति । सर्वतस्त्रिकोणं क्षेत्रमित्यर्थः । लम्बावगतिस्तु त्रिभु भुजयोर्योगस्ततिरंगुणो भुवाहतो लब्ध्या द्विस्था भूरूनयुता दलिताबा तयोस्स्याप्ताम् । स्वाबाधाभु जकृत्योरन्तरमूलं प्रजायते लम्ब इत्यनेन वेद्या युक्त्या च तत्सिध्यति । युक्तिस्तु लीलावतीव्याख्यायां प्रदर्शिता । लम्बतद र्धयोर्वर्गान्तरपदमत्रोव॑बाहुभवति ५ वृत्तक्षेत्रफलं पूर्वार्धनाह ऊर्ध्वभु जा ( खेत के बीच का उच्छाय ) और क्षेत्रफल का संवर जो अर्द्ध भाग-वह 'घन' होता है । अर्थात् वह क्षेत्र "षडस्त्रि" या "षड्वा हु" होता है। अथवा यो समझो कि वह सब ओर से "त्रिकोण" होताहै ॥६॥ समपरिणाहस्याध विष्कम्भाधहतमेव वृत्तफलम् ॥ समपरिणाहस्य'समवृत्तक्षेत्रपरिधेर विष्कम्भाहितं वृत्तक्षेत्रफलं भवति । वत्तक्षेत्रफलानयनेज्यमेव प्रकारस्सूक्ष्म इत्येवशब्देन प्रदर्शयति ॥ घनसमवृत्त क्षेत्रस्य फलमपरार्धेनाह। समवृत्त क्षेत्र, के परिधि के प्राधे को व्यास के प्राधे भाग से गुणन क रने पर गुणनफल वृत्तक्षेत्र का फल होगा।६ एवं आधी गीति का का अर्थ है। तन्निजमूलन हतं घनगोलफल निरवशेषम् ॥ ७ तत्समवृत्तक्षेत्रफलं निजमूलेन स्वकीयमूलेन हतं घनगोलफलं भवति । नि रवशेष स्फटमित्यर्थः॥ विषमचतुरश्रादीनामन्तःकर्णयोस्संपातादधलम्बको; धरखगडपमाणं क्षेत्रफलञ्चाह। और उक्त समवृत्त क्षेत्रफल को स्वकीय मूल गुणन करने पर स्फुट घन गोल मल होगा ॥७. आयामगुणे पार्वे तद्योगहृते स्वपातरेखे ते । विस्तरयोगाधंगण ज्ञेयं क्षेत्रफलमायामे ८॥

२५ आर्यभटीये- मायामो लम्बः। तेन गुणिते पाय भूवदने । भूमिर्मुखञ्चेत्यर्थः । भूबदनाभ्यां पनिहते लम्बे भूवदंन योर्योगेनं हते ये लब्धे ते पातरेखे भवतः। कर्णयोस्स- पाताद्भूम्यन्तो लम्बभागस्त या कर्णयोस्संपातान्मुखान्तो लम्बभागश्चेत्यर्थः । तत्र भूमितो लब्धं, भूमिकर्मयोगयोरन्तरालं मुखतो लब्धं मुखकर्मयोगयोरन्तरा- लम्। श्रायामे लम्बे विस्तरयोगार्धेन भूमिमुखयोर्योगार्धन गुणिते क्षेत्रफलं भवति। इति शेयम्। समसम्बक्षेत्रेयं विधिः। नतु विषमलम् । तत्र चेलम्बयोः कत- मोऽत्र परिगृहीत इति सन्देहस्स्यात् उद्देशकेन यदि समलम्बो नोद्दिश्यते तदा तु समानलम्घस्य चतुर्भुजस्य मुखोनभूमिं परिकल्प्य भूमिं भुजौ भुजी व्यप- देण्यसाध्ये तस्यावधेर्लम्श्रमितिस्ततश्चाबाधयोना चतुरप्रभूमिः । दसम्बवगैक्य पदं श्रुतिस्स्यात् ।समानलम्बे लघुदो कुयोगान्मुखान्यदोस्संयुतिररिपका स्यात्। इत्य- नेन समलम्बतत्कर्णतत्सम्भवा वेद्याः ॥ उक्तानुक्तक्षेत्राणां र्वषां फलानयन पूर्वार्धनाह। भा०-लन से दोनों भुजाओं को गुणन करो, गुणन फल को आधाधा (खण्ड) के योग से भाग दो, तो भागफल स्वपातरेखा होगी । अर्थात् करणाश्रित उभय सम्पात रेखा होगी ॥ उस पातरेखा को लम्ब रेखा से गुहान कर गुणन फल “ आयाम क्षेत्र " का फल होगा ॥८॥ सर्वेषां क्षेत्राणां प्रसाध्य पार्थ फलं तदभ्यासः ।। उक्तानामनुक्तानाच क्षेत्राणां पार्य प्रसाध्य । आयामविस्तारात्मको बाहू प्रसाध्य । उपपत्त्या निश्चित्य । तयोरभ्यासः कर्तव्यः । तत् क्षेत्रफलं भवति । सम- चतुरश्रस्य तद्घनस्य च पायोस्स्पष्टत्वान्न प्रसाधनम् । व्यनस्य लम्ब आयामः । कल्पितभूम्यधं विस्तारः । घनगोलेपि वृत्तफलस्य मूलमुच्छायः । विषमचतुरश्र समलम्बे लम्ब आयामः। भूवदनयोगार्थ विस्तारः । जिषमचतुरश्रे. विषम लम्ब एक कर्णभूमि प्रकल्प्य तत्पार्श्वगतयोस्त्रिकोणयोर्लम्बद्यमानयेत् । तत्र लम्बद्वयैक्यमायामः काख्यभम्पर्ध विस्तारः । एवं सर्वत्र स्वधिया विस्ता- रायामौ परिकल्प्यौ ॥ कालक्रियागोलोपयोगरहितानां गणितानां प्रतिपादनं प्रासङ्गिकमिति वेद्यम् ॥.समवृत्तपरिधी व्यासार्धतुल्यज्याप्रदेशज्ञानमपरार्धेनाह । भा०-जिन क्षेत्रों का वर्णन यहां किया गया है जिन का वर्णन यहां नहीं हुआ है ऐसे सब क्षेत्रों के दोनों भुजाओं को उपपत्ति से निश्चय करे, दोनों का अभ्यास करना चाहिये, तब क्षेत्रों का फल ज्ञात हुमाकरेगा। परिधेषड्भागज्या विष्कम्भाधन सा तुल्या ॥ ६ ॥ परिषषड्भागस्य राशिदयस्य या जीया सा विष्कम्भार्धन व्यासाधून तुल्या - .

- - २६ गीतिकापादः ॥ भवति । राशिदयस्य समस्तजीवात्र जीवेत्युच्यते । न पठितार्थज्या। एकराशे पठितार्धज्या विष्कम्भार्थेन दलेन तुल्येत्यर्थः ॥ त्रैराशिकेनेष्टवृत्तस्य परिधित व्यासकल्पनार्थ व्यासतः परिधिकल्पनार्थञ्च प्रमाणफले दर्शयति ॥ भाल-परिधि के छठे भाग के दो राशियों की जो जीवा (ज्या) वह व्यार के आधे की बराबर होती है। यहां जीवा से पूर्ण जीवा (पूर्णज्या) समझर्न क्योंकि प्राचार्य ने यहां अर्दुज्या को पढ़ा नहीं ॥९॥ चतुरधिकं शतमष्टगुणं द्वाषष्टिस्तथा सहस्राणाम् । अयुदद्वयविष्कम्भस्यासन्नो वृत्तपरिणाहः ॥ १० ॥ चतुरधिकं शतं यत्तदृष्टगुणम्। सहसाणां द्वाषष्टिश्च । एतदयतदयविक भस्य वृत्तस्यासन्नः परिणा: । नतु निश्शेष इत्यर्थः । परिणाहः। परिधिः। वृत्तस्य परि गाहः । परिधिव्यासयोरेकस्यैव हि निशशेषता सम्भवति । इतरस्य सावययता सम्भवत्येव । दसागन्यहिदिषसंख्यः परिणाहोऽत्र कीर्तितः । गीतिकायां या अर्धज्या उक्तास्तास्सर्वा अपि युक्तित एकराश्यर्धज्याविष्कम्भार्धयोतियोस्स- तोस्साध्यास्स्युः । तासां सिद्धार्थमिह परिधिषड्भागस्य समस्तज्याप्रदर्शनं परि- धित्यासज्ञानसाधनभूतफलप्रमाणयोः प्रदर्शनञ्च कृतम् । तत्रैकराश्यर्धज्यायां वक्त- व्यायां द्विराशिसमस्तज्याप्रदर्शनन्तु । क्वचित्समस्तज्यामानीयार्थीकृत्यार्धज्या सा- ध्यत इति प्रदर्शनार्थ परिधितो विष्कम्भानयन एवं त्रैराशिकम् । यदि चतुर- धिकं शतमष्टगुणं द्वाषष्टिस्तथा सहसाणामित्युदितपरिधेरयुतद्वयं विष्कम्भः । तदा चक्रकलापरिमितपरिधः कियान्विष्कम्भ इति भचक्रस्य विष्कम्भलब्धिः । तदर्धमिह त्रिंज्यालब्धिर्भवति। एवं विष्कम्भोऽपि युक्तितस्पिध्येत् । सा युक्ति- महाभास्करीयव्याख्यायां सिद्धान्तदीपिकायां विस्तरेण प्रदर्शिता। एकराश्यानयने युक्तिस्त्विह प्रदर्श्यते व्यालार्धाध नयेत्केन्द्रात सौम्यप्राक्सूत्रयोर्द्विधा । तदग्राभ्यां परिध्यन्तं सूत्रे प्राक्सौम्ययोर्नयेत् ॥ प्रागायतं तयोः कोटि जान्यदिति कल्प्यते । गोलपादं भवेत्ताभ्यां त्रिधा खण्डितमैशगम् ॥ कोट्याग्रात्पूर्वसूत्रान्तं सोम्यान्तञ्च भुजाग्रतः । रेख बाहुकोटी ते कोटिबाहोस्तु पूर्वयोः । व्यासार्धाधसमे ते स्तस्तयोः कृत्योर्द्वयोः पुनः । निजोत्क्रमज्यावर्गेण युतयोर्यत्पदवयम् ॥ समस्तज्याद्वयं तद्विनिजचापदयस्य तु ।

२० आर्यभटीये- समस्तव्ये च ते गोलपादस्याद्यन्तभागयोः । दीर्घाल्पयोस्तु यो भेदो बाहोः कोटयोस्तथाच यः । तवर्गक्यपदं मध्यभागस्य ज्या समस्तज्या ॥ समस्तज्वात्रयस्यांत्र साम्यात् खण्डत्रयं समम् । व्यासाार्धमिता तस्मादेकर्षज्येति निश्चितम् ।। इति ॥ जीवापरिकल्पनायां युक्तिप्रकारं दर्शयति । भा:-दो अयुत (२०००) परिमित व्यास की आसन्न परिधि का परिमाण ६२८३२ है । अर्थात् १: ३. १४१६ ये गुणोत्तर हुए। इसी प्रकार त्रैराशिक द्वारा इससे न्यूनाधिक परिमित्ति व्यास के आसन्न परिधि का परिमाण समझना चाहिय॥१०॥ समवृत्तपरिधिपादं छिन्द्यात्रिभुजाश्चतुर्भुजाच्चैव । समाचापज्यार्धानि तु विष्कम्भाध यथेष्टानि ॥ १९ ॥ समवतस्य परिधिपाद छिन्द्यात् । युक्तिपरिकल्पिताभी रेखाभिछिन्द्या- दित्यर्थः। तत्र जातात्रिभुजाक्षेत्रांत्कानिचिजज्यार्धानि सिध्यन्ति। त्रिभुजस्या- वशासिध्यन्तीत्यर्थः । अन्यानि तत्र जाताच्चतुर्भुजात्क्षेत्रासिध्यन्ति । चतुर्भुजा- अवशासिध्यन्तीत्यर्थः ॥ समचापज्यानि । परस्परं समानामधवापानां ज्या- धानीत्यर्थः । विष्कम्भार्धे सिद्धे सत्यन्यानि सिध्यन्तीत्यर्थः । यथेष्टानि गीति- काभूक्तानां चतुर्विंशत्यर्धजीवानाम्मध्ये यानीष्टानि तानि सिध्यन्ति । सर्वाणि सिध्यन्तीत्यर्थः । एवं पिण्डज्याधानि सिध्यन्ति । तानि पूर्वपूर्वहीनानि मख्या- दीनि भवन्ति । अत्रोच्यते ॥ वृत्तेशी धनुराकारस्समस्तधनुरुच्यते । तस्याग्रद्वयगा जीवा समस्तज्या च तस्य तु ॥ तस्या अर्धमिहाज्या तच्यापार्धञ्च तद्धनुः । दोकोटिजीवे त्वर्धज्ये सदा तद्नुषी तथा ॥ गतगन्तव्यभागौ हि दोकोटी वृत्तपादके। तज्ज्ये दिक्सूत्रयुगंमान्ते चेष्टकृत्तांशकादतः ॥ अर्धज्याग्रात्परिध्यन्तं तदुत्क्रमगुणो भवेत् । दोकोटयोस्कहीना त्रिजीवा स्यादितरोतक्रमः ॥ अर्धज्योत्क्रमवगैक्यपदं तद्धनुषो भवेत् । .समस्तज्या तदर्थ तु तच्चापाधैर्धजीवका । अर्थोत्क्रमसमस्ताभिाभित्रचनं भवेदिह । ।

२८ तु गीतिकापादः॥ दोकोटिभ्यां व्यासदलखण्डाभ्याञ्च चतुर्भुजम् ॥ श्य समस्तजीवाधं साध्यजीवेति कल्प्यते । चतुर्भुजे तु कोटिर्वा भुजा धा साध्यजीवका॥ त्रिज्यादोःकृतिभेदस्य मूलं कोटिर्भुजा तथा । एतत्सर्व विदित्वात्र जीवायुक्तिर्विचिन्त्यताम् ॥ राशित्रयमिते दोणि दोा त्रिज्यासमा भवेत् । त्रिज्यैषोत्क्रमजीवापि तस्याः कोटया प्रभावतः ।। शतस्त्रिगुणयोर्वर्गयोगमूलं समस्तज्या । जीवा त्रिराशिकापस्य ज्यश्र तत्र प्रायते ॥ समस्तार्थीलमज्याभिस्समस्तज्यार्धमत्र सार्थबाहोरर्धज्या पिण्डज्या द्वादशीप सा ॥ तया तदुत्क्रमेणापि समस्तज्या पुनर्भवेत् । ताभिस्त्यनं समस्तज्यादलं षष्टार्धजीवका॥ तया कोटिश्चसाध्या स्याही कोटयोन्य॑स्तयोः पुनः । ताभ्यां दिक्सूत्रखण्डाभ्यामपि स्याच्चतुरश्रकम् ॥ अष्टादशी तत्र कोदिरित्थं सर्वत्र चिन्त्यताम् । चतुरश्र त्रिकोणं वा जीवा चापि तदाश्रिता ॥ अष्टादशीषष्टिकाभ्यां समस्तज्यावशात्पुनः । नवमी च तृतीया च बाहुकोटिवशात्पुनः ॥ ताभ्यां पञ्चदशी चैकविंशी सप्तेति साधिताः॥ व्यासार्धा ह्यष्टमी ज्या. तत्कोटिषोडशी भवेत्॥ अष्टम्यास्तु समस्तज्याविधिना च चतुर्थिका। ततः कोटिवशादिशी समस्तज्यावशात्ततः ॥ दशमी च ततो बाहुवशात्स्यात्तु चतुर्दशी। चतुर्दश्यास्समस्तज्यावशाद्भवति सप्तमी ॥ ततः कोटिवशात्सप्तदशी भूयोग्य पञ्चमी । दशम्यास्तु समस्तज्यावशासिध्येत्पुनस्तथा । एकोनविंशी पञ्चम्या बाहुरूपेख सिध्यति । द्वितीया च चतुर्यास्स्यात्समस्तल्यावशात्ततः ॥

ल आर्यभटीये- द्वाविंश कोटिरूपेण समत्तज्यावशात्ततः । एकादशी ततो बाहुरूपेण स्यात्त्रयोदशी । द्वितीयायाः समस्तज्यावशात्प्रथमजीवका। त्रयोविंशी ततः कोटिरूपेणैवञ्च षोडश ॥ त्रिन्यैव हि चतुर्विशी पूर्वपूर्वोनिता इमाः । खण्डज्या गीतिकोक्तास्स्युरित्युक्तं ह्यनयार्यया ॥ इति ॥ प्रथमखण्डज्यातो गीतिकोक्तखण्डज्यानामानयनोपायमाह । भा:-युक्ति से मानी हुई रेखा द्वारा भाग देवे तो त्रिभुज और चतुर्भुज वशतः कुछ प्रर्दुज्या सिद्ध होंगी । परस्पर समान अर्द्धचापों की अर्द्धज्या । और व्या- सार्द्ध के सिद्ध होने पर शेष इष्टज्या सिद्ध होती जावेंगी ॥ ११ ॥ प्रथमाच्चापज्यार्धाोरूनं खण्डितं द्वितीयार्धम् । तत्पथमज्याधीशैस्तैस्तैरूनानि शेषाणि ॥ १२ ॥ चापज्यार्धम् । चापस्य विहितांर्धज्या हि मरूयादयः । खण्डितं द्वितीया- धम् । द्वितीयमर्धज्याखण्डम् । प्रथमखण्डज्यास्थापनानन्तरं यदभीष्टजीवाखण्ड त्याप्यते तद्वितीयमित्युच्यते । साध्यस्य पूर्वमित्यर्थः। प्रथमाचापज्यार्धाये- स्संख्याविशेषरूनं तत्तदभीष्टजीवाखण्डं द्वितीयाख्यम् । तैस्तैरूनानि।बहुसा- च्यापेक्षया बहुषु स्थापितानि प्रथमखण्डज्यार्धानि कृत्वा पुनस्तत्प्रथमज्याधी । तदिति । तच्छब्देनप्रथमादिरभीष्टज्यापूर्वान्तः खण्डज्यासमूह उच्यते । त- मादतीतखण्डज्यासमूहात्प्रथमज्यान लव्धेरंशः फलाख्यैश्चोनानि कुर्यात् । एवंभूतानि शेषाणि भवन्ति । तत्तदुत्तरजीवाखण्डानीत्यर्थः । एतदुक्तम् । प्रथम थिमज्याखण्डं संस्थाप्य तस्मात्साध्यस्य पूर्वजीवाखण्डं द्वितीयाख्यं विशोध्य षिमेकत्र संस्थाप्य पुनस्साध्यखण्डज्यातः पूर्वखण्डज्यासमूहं प्रथमस्यया विभज्य ब्धं फलं पूर्वस्थापितशेषयुतं प्रथमज्यातशशोधयेत् । तत्र शिष्टमुत्तरजीवाखरई विति । उदाहरणम् । द्वितीयखण्डज्यातः पूर्वखण्डज्या मखि इति । अस्य न्यू- ताभावात्प्रथमफलं शून्यम्। पुनस्साध्यात्पूर्वखण्डज्यासमूहो मखि एव। त- मात्प्रथमज्यान लब्धमेकम् । तत् प्रथमज्याखण्डाद्विशोध्य शिष्टं द्वितीयन्या गई भखि इति । पुनस्तृतीयात्साध्यज्याखण्डात्पूर्वज्याखण्ड भखि प्रथमादेके- निमेतत्पुनस्साध्यात्पूर्वखण्डन्यासमूहो मखिभखिभ्यां तुल्यस्तस्मात्प्रथमज्याधैन धं द्वयं पूर्वशिष्टमेकञ्च मलेविंशोध्य शिष्टं तृतीयज्यालण्ड फखि इति । एवम ॥श्च साध्याः ॥ तैस्तैरितिवचनं बहुसाध्यजीवापेक्षया फलानां बहुत्वात् । - ३० गीतिकापादः॥ ऊनानीतिवचनं बहुसाध्यापेक्षया प्रथमजीवाखण्डस्य बहुधा स्थापितत्वात् । शेषाणीतिवचनं साध्यानामुत्तरजीवाखण्डानां बहुत्वात् ॥ वृत्तादिपरिकल्प- नाप्रकारमाह। भा०ः-प्रथम चापज्या? (संख्या) जो ऊन है। यह द्वितीयज्याई होगा इसी प्र- कार द्वितीय आदि जानना। जैसे :-२२५ प्रथमज्याई, २२४ द्वितीय, तृतीय २२२ इत्यादि ( प्रथम पा० गी० स० १०) इसीप्रकार और भी जानो ॥१२॥ वृत्तं भ्रमेण साध्यं त्रिभुजञ्च चतुर्भुजच्च कर्णाभ्याम् ॥ साध्या जलेन समभूरधऊर्ध्वं लम्बकेनैव ॥ १३ ॥ भ्रमेण कर्कदा व्ययन्त्रेण वृत्तं साध्यम् । एतदुक्तं मवति। ऋजवीं काञ्चि- द्यष्टिं संपाद्य तस्या ऊर्ध्वभागे कण्ठप्रदेशे पाशेन दृढं बध्वा अधोगतानादपि कण्ठान्तं भित्त्वा शलाकाद्वयं कृत्वा तयोर ग्रंतीदणाग्रं कुर्यात् । एवमधोमुखं क- र्कटयन्त्रं भवति । पुनश्शलाफयोरन्तराले शलाकां निधाय कर्कटकं विवृतास्यं कुर्यात् । अन्तरालस्थशलाकाया ऊर्ध्वाधश्चलनात्कर्कटास्यमिष्टवृत्तव्यासार्धसमं कृत्वा एकशलाकाग्रं साध्यवृत्तमध्यप्रदेशे संस्थाप्यापरमग्रं वृत्तनेमिप्रदेशे सं- स्थाप्य कर्कटं भ्रमयेत् । तदभीष्टवृत्तं भवति । इति ॥ त्रिभुजक्षेत्रञ्च चतुर्भुजक्षे कर्णाभ्यां साध्यम् । एतद्वयमपि स्वेनस्वेन कर्णेन साध्यमित्यर्थः । त्रिभु मप्येको कर्ण इति कल्प्यते त्रिभुजद्वयोत्थचतुर्भुजे तस्य कर्णालकत्वात् तत्र प्रथमं कर्णतुल्यां शलाकां समभूमी निधायान्यभुजदयतुल्ययोशशलाकयोरेक शलाकां कर्णस्यैकाग्रे निधायापरी शलाकां कर्णस्येतराने निधाय भुजा- ख्यशलाकाग्रयोस्सृन्धिं कुर्यात् । तदभीष्टत्रिभुजं भवति । चतुर्भुजे ऽपि कर्ण- योरेकं प्रथई निधाय तस्यैकार्वे भुजद्वयं त्रिभुजवन्निधायापरपावें थे- तरभुजद्वयं त्रिभुजवन्निध्यात्। इतरकर्णञ्च तस्मिन् कर्णस्याने निदध्यात् । तदा कर्णद्वयाङ्कितं चतुर्भुजं भवति । अत्रैककर्णपरिग्रहेणेतरकर्णश्च निय मितो भवति ॥ साध्या जलेन समभूः । भूमेस्समत्वं जलेन साध्यम् । भने- समविषमतापरिज्ञानं जलेन भवतीत्यर्थः । एतदुक्तं भवति । चक्षुस्सूत्रेण भूमि समतलां कृत्वा तत्रैक वृत्तमालिख्य तदहियङ्गुलान्तरितं व्यङ् गुल न्तरितं वा वृत्तान्तरञ्च विलिख्य, परिध्योरन्तरालमदेश समन्तात् खात्य कुल्यां संपाद्य तां कुल्यामद्भिः पूरयेत् ॥ तत्र परितो जलं भूसम.चेत् भूमिस्सर भवति । यत्र जलस्य नीचत्वंतत्र भूमेस्त्रतिस्स्यात् । यत्र जलस्योन्नतिस्तत्र भूमे नींचत्वं स्यादिति ॥ अधऊर्ध्व लम्बकेन । गुरुद्रव्याबदाग्रमवलम्बितं सूत्रमब आर्यभटीये- लम्बक इत्युच्यते। ततशाच्छक्कादेरधऊर्ध्वस्थितियेत्यर्थः। शङ्कोहि मूलाग्रयो- (धावस्थान ऋजुस्थितिर्भवति॥ इष्टवत्तप्रदर्शनाय तद्विष्कम्भार्धानयनमाह । भा-भ्रम अर्थात् परकार (कम्पास-एक किस्मि के लोहे, पीतल, या काष्ठ का श्ना हुमा यन्त्र ) से इष्ट वृत्त वनावे । परकार के एक नोक को इष्ट वृत्तके बीच में दृढ़कर रक्खे एवं दूसरे नोक को जितना बड़ा वृत्त क्षेत्र वनाना चाहे उतना फैलाकर चारो ओर घुमावे तो अभीष्ट वृत्त क्षेत्रवन जावेगा। इसी प्रकार त्रिभुज और चतुर्भुज क्षेत्र को भी अपने २ कर्ण द्वारा यनावे । अर्थात् त्रिभुज की एक भुजा को कर्ण मान कर, इस कर्ण की बराबर एक शलाका जमीन पर रक्ख कर, अन्य दो भुजा की बराबर शलाका पर एक प्रलाके को कर्ण के आगे एवं दूसरी शलाके को कर्ण के दूसरी ओर रक्ख दोनों भुजा वारी शलाका के साथ मेलावे तो अभीष्ट त्रिभुज होगा । इसी प्रकार चतुर्भुज को भी जानना ॥ यदि भूमि की समता जाननी हो कि यह भूमि बराबर हैं या ऊची नीची है तो-इस को जल द्वारा टीक करे। दृष्टि द्वारा भूमि को बराबर कर उस पर एक वृत्त लिखे उस के बाहर दो या तीन अंगुल अलग-दूसरा वृत्त बनावे और परिधि की वीच की जगह को बराबर रक्व कर गड़हा करे और इस गड़हे को जल से भरे । यदि इस के ऊपर जल सब तरफ हो तो जानना कि पृथ्वी सम है। और यदि जल कम दीखे तो वहां जगह ऊंची होगी एवं जहां जलं - धिक हो वहां जगह गहिरी होगी। लम्बक द्वारा पृथ्वी की ऊंचाई नीचाई का ज्ञान होता है ॥ १३ ॥ शकोः प्रमाणवर्ग छायावर्गण संयुतं कृत्वा । यत्तस्य वर्गमूलं विष्कम्भाधं स्ववृसस्य ॥ १४ ॥ वर्गमूल मूलमेव । इष्ट शङ्कोः प्रमाणवर्ग तच्छायावर्गण युक्ता मूलीकुर्यात् । उन्मूलमिष्टकाले स्ववृत्ताख्यस्य मण्डलस्य विष्कम्भाधं भवति। छायाप्रमध्यं श- कुशिर-प्रापि यन्मण्डलमूर्ध्वाधस्स्थितं तत्स्ववृत्तमित्युच्यते । यथा महाशङ्कु शिरःप्रापि व्यासार्धमण्डलं तद्वदिदमपि वेद्यम् ॥ शङ्कोः प्रदीपोन्नतिवशाज्जात- छायानयनमाह। भ.:-इष्ट शङ कु के प्रमाणवर्ग को उसकी छाया वर्ग के साथ योग करे और इस का वर्गमूल निकाले तो यह मूल, इष्ट काल में “ स्ववृत्त मण्डल " का व्या- सार्द्ध होगा। छांया के अग्रभाग से शकुं के शिर पर्यन्त जो वृत्त ऊपर नीचे को है उसे “ स्वपत्त " कहते हैं ॥ १४ ॥ - ३२ - । गीतिकापादः॥ शङ्कुगुणं शकुभुजाविवरं शङभुजयोर्विशेषहृतम् यल्लब्धं सा छाया ज्ञेया शङ्कोस्वमूलाद्धि ॥ १५ ॥ शकुरिष्टशङ्खः। भुजा दीपयष्टिः। तयोर्विवरं अन्तरालभूमिः । तां शङकुन शकूनतिमानेन निहत्य । शभुजयोर्विशेषेण शंङ्कन्नतिहीनदीपोन्नत्य नि भजेत्। तत्र लब्धं तस्य शङ्कोशछाया भवति । स्वमूलादुत्पत्रच्छायामानं भवति उदाहरणम्। द्वात्रिंशदङ्गुला दीपोनतिश्शङकरिनाङगुलः। दशाङ्गुला तद्विवरे भूमिश्छायात्र कीर्त्यताम् ॥ दीपोन्नतिः ३२ । शङ्कन्नतिः १२ । तयोरन्तरालभूः १०। शभुजयोर्विशे' शङ्कन्नतिहीनदी पोन्नतिः । २० । लब्धं छायामानम् ६ ॥ अत्र राशिकसिद्ध दीपानाच्छा मस्तकप्रापि कर्णसूत्रं भूम्यन्तं प्रसारयेत् । अत्र क्षेत्रदयं भवति तयोः प्रथमे दीपमूले शकुमानं हित्वा य ऊर्श्वभागशिशष्यते स भागो भुजा भुजायाशशङ्खदीपान्तरालभू तुल्या कोदिः । तदा शङ कुभुजायाः का कोतिर्राि शंकुमूलकर्णभूयोगयोरन्तरालकोटिसिद्धिः।सा हि तस्य शङ्कोशछायाभवति। इति स्थानद्वयस्थापितसमशकुदयच्छायाभ्यां छायाग्रयोरन्तरेण च दीपभुजानयः दीपमूलच्छायाग्रयोरन्तरालानयनचाह । भा०:-इष्ट शंकु और भुज (दीपयष्टि) के अन्तरको अन्तराल (वीच की जगह भूमि कहते हैं। उस अन्तराल भूमि को शंकु की उन्नति मान से गुणा करे प्रौ शंकु मान को भुजा में से घटाकर, फल जो विशेष वची हुई-दीपोन्नति-उस भाग देवे, भागफल छाया मान होगा । उदाहरण जैसे-दीप की उन्नति ३२, शं की उनाति १२ अन्तराल भूमि १० है, तो छाया मान क्या होगा अब ३२ में से १२ को घटांथा तो शेष २० रहा और १२४१०-१२० में २० क भाग दिया तो ६ मिला, यही छाया मान हुआ ॥ १५ ॥ छायागुणितं छायाग्रविवरमूनेन भाजिता कोटी। शङ्कुगुणा कोटी सा छायाभक्ता भुजा भवति ॥ १६ ॥ दीपादेकसूत्रगतयोश्शक्कोलाययोरग्रे यत्र भवतस्तत्स्थानयोरन्तराल तयोलाययोरेकया निहत्य । अनेन शायाहासेन छाययोरन्तरतुल्येन विभत् 'तत्र लब्धं कोटी भवति । या छाया गुणकारत्वेन परिगृहीता । सदग्रदीपमूल योरन्तरालभूमिरित्यर्थः । सा कोटी शंकुगुणिता गुणकारत्वेन परिगृहीतय और उस .

३३ .. प्रायभटीये- बायया भक्ता सती भुजा भवति । दीपोन्नतिरित्यर्थः । उदाहरणम् । दिगिभषोडशभिस्तुल्ये छाये धाग्रान्तरं तयोः । अर्कतुल्यं दीपभुजा तत्कोटी च निगद्यताम् ॥ प्रथमच्छाया १० ।.द्वितीयच्छाया १६ । छायाग्रयोरन्तरालभूमिः १२ । अत्र प्रथमछायया लब्धा दीपकोटिः २० । दीपभुजा २४ । अथवा द्वितीयछायया लब्धा दीपकोटिः ३२ । दीपभुजा २४ । छायाग्रे हि छायाकमण्डलस्य मध्यं भवति । अतश्छायाग्रात्कोटिकल्पना । दीपमूलस्थस्य शङ्कोहि छाया न भवति। ततो बाह्ये क्रमेण छायाविद्विस्स्यात् । तत्रैवं त्रैराशिकम् । यदि छायान्तरतुल्येन छायाद्रासेन छायान्तरतुल्या भूमिर्लभ्यते तदेष्टछायातुल्येन शायाह्रासेन का भू- मिरिति छायाग्रदीपमूलान्तरालभूमिलब्धिः। यदीष्टछायास्यकोट्या स्वशङ्कुभुजा तदा दीपकोट्या का भुजेति दीपभुजालब्धिः । भुजाकोटिभ्यां कर्णानयनमा- धिनाह। भा०-दीप से एक रेखा गत शङ्कु और छाया के अग्र का जहां मेल होता- उत्त के बीच की जगह को इन दोनों में से एक छाया को घटा कर और दोनों छाया के अन्तर तुल्य से भाग देवे, तो भागफल कोटी होगा । जो छाया गुण- कार करके मानी गयी है उसके अग्र एवं दीप के मूल के बीच की भूमि यह कोटी है उसको शङकु-गणित से “ गुणकार , करके मानी हुई छाया से भाग देने पर भागफल भुज होता है। अर्थात् दीपोन्नति होती है ॥ १६॥ यश्चैव भुजावर्गः कोटीवर्गश्च कर्णवर्गस्सः । भुजावर्गकोटिवर्गयोर्योगः कर्णवर्गस्यादित्यर्थः । शरे जाते जीवानयनम- पराचनाह। भा:-भुजा का वर्ग और कोटी का वर्ग का योग कर्णवर्ग होता वृत्तं शरसंवर्गो ऽर्धज्यावर्गस्स खलु धनुषोः ॥ १० ॥ वृत्तक्षेत्र इष्टचापस्या या समस्तज्या तन्मध्यादुभयपार्श्वगतौ यो शरौतयो- संवर्गो यस्स खलु धनुषोः पूर्वोदितेष्टचापखण्डयौरर्धज्यावर्गो भवति । इष्टोत्क्र- मज्या प्रथमश्शरः । लटून समस्तविष्कम्भो द्वितीयशशरः । कोटिकर्णयोगोऽ- त्राधिकश्शरः । तदन्तरमूनशशरः । तदाहतिर्हि तयोर्वर्गान्तरम् । इतीह युक्तिः । वृत्तयोस्संवर्ग सति परिधिद्वययोगादेकस्मादितरपरिधिद्धययोगान्ता या जीवात- न्मध्यादुभयपार्श्वगतशरद्वयानयनमाह। भा:-वृत्तक्षेत्र में इष्टचाप की जो पूर्णज्या , उस के बीच से जो उभय, पार्श्वगत शर का संवर्ग है, वह धनुष का पूर्वोक्त इष्ट पाप ख ! का प्रया- वर्ग होगा ॥ १७॥ ५ - गीतिकापादः ॥ ग्रासोने द्वे वृत्तं ग्रासगुणे भाजयेत्पृथकत्वेन । ग्रासोनयोगभक्ते संपातशरौ परस्परतः ॥ १८ ॥ * अन्योऽन्यान्तर्गतयोत्तपरिधिभागयोर्मध्यगतमन्तरालं ग्रास इत्युच्यते । तेन ग्रासेन हीनं वृत्तद्वयम् । पृथक्त्तन पृथगित्यर्थः । पृथगग्रासंमानेन गुपितं कृत्वा पृथग्भाजयेत् । तत्रानुक्त हारमनुवादरूपेण प्रदर्शयन्फलं वदति ग्रासो- नयोगभक्ते संपातशराविति । तत्र ग्रासोनयोवृत्तयोर्योगेन भक्ते राशिदये सति स्तब्धी संपातशरी भक्तः । परिधियोगद्वयगतसमस्तजीवाया मध्य उभयपाल- गतौ शरावित्यर्थः। परस्परतः । अल्पवृत्ताम्लब्धोऽधिकवृत्तशरः । अधिकवृत्ता- लब्धोऽल्पवृत्तशर इत्यर्थः । उदाहरणाम् । चत्वारिंशन्मितं वृत्तभन्यत्षोडशसम्मितम् । ग्रसभागश्चतुस्संख्यस्तयोर्वाच्यो गरी पृथक् ” ॥ वृत्तमेकम् ४० । अन्यत् १६ । ग्रासः ४ लब्धो लघुवृत्तशरः ३ । सहदत्तशरः१॥ श्रेडीफलानयनमाह। भा:-वृत्त और परिधि भाग के अन्तर्गत स्थान को “ ग्रास " कहते हैं। उस ग्रास से हीन, दोनों वृत्तों को अलग ग्रास-मान से गुणा कर पृथक भाग देवे.। ग्रासोन एवं वृत्त योग द्वारा भाग देने पर दो सम्पात शर होंगे। छोटा वृत्त हो तो अधिक वृत्तशर होगा एवं बड़ा वृत्त हो, तो अल्प वृत्तशर होगा। उदाहरण जैसे-दो वृत्तों का मान ४० और ग्रास १६, और दोनों वृत्त का ग्रास १४४ गुण ३६४४-१४४, १२४४-४८ ३.--१ ॥१८॥ इष्ट व्येकं दलितं सपूर्वमुत्तरगुणं समुखमध्यम् । इष्टगुणितमिष्टधने त्वथवाद्यन्तं पदार्धहतम् ॥१६॥ बहुसूत्रार्थप्रदर्शकमेतत्सूत्रम् । अतो बहुधा योजना कार्या । तत्र म- ध्यकलसर्वफलानयने सपूर्वमित्येतदुपनीय योज्यम् । इष्टपदमेकहीनं दलि- समुत्तरेश ध याख्येन गुणितं मुखेनादिधनेन युतं मध्यधनं भवति । तन्म- ध्यधनमिष्टपदगुणितं सर्वधनं भवति । अनवं सूत्रम् । इष्ट व्येकं दलितं अयगुणितं मुखयुतञ्च मध्यधनम् । इष्टपदेन विनिम्नं मध्यधनं भवति सर्वधनम् । * प्रकाशिकायां ग्रासोनयोगलब्धौ । इति पाठः। प्राचार्येण तु भक्त- स्सन्यात इति लिखितं स्यात् । ग्रासोन ३६ । १२ ४८ ४८

आर्यभटीये-
३५
इति ॥ अन्योपान्त्यायभीष्टपदधनानयने तु पूर्वमुत्तरगुणं ससुरुमित योजना।
इष्टपदात्पूर्वमतीतानि पदानि पूर्वशब्देनोच्यन्ते। पूर्वपदसंख्या चयगुणिता मुख-
युता इष्टधनं भवति। शत्रैवं
सूत्रम् । पूर्वपदं चयगुशितं मुखसहिलमिष्टयनं स्या-
स्। इति । अवान्तरगतैष्टंपदधनानपने तु मध्यमित्येतदुपनीय क्रमेण सूप्रमि-
ष्टगुणितमिष्टधनभित्येवमन्तं योज्यम् । अवान्तरगष्टपदसंख्या ध्येका दलिता
इष्टपदेभ्यः पूर्वमतीतपदयुता चयगुणिता मुखसहिता भवान्तरगतेष्टपदसंख्यागु-
णिता अवान्तरेष्टपदेषु सर्वधनं भवति। अत्रैवं सूत्रम् । इष्टं व्ये कं दलितं सपूर्वमुत्तर-
गुणं समुखमिष्टगुणमवान्तरेष्टपदसंभूतं फलं भवति । इति प्रवेष्टशब्देनावान्तरे-
ष्टपद संख्योच्यते । उदाहरणम् ।
आदि पञ्च चयस्सप्त गच्छत्सप्तदशोव्यताम् ।
मध्योपान्ताष्टमादित्रि बद सर्वधनं पृथक् ॥
आदिधनम् ५। चयः ७। गच्छः १७ । नत्र मध्यपना नयने एम् ११। अस्मा-
दिष्टव्य कमित्यादिना सिद्धंमध्यधनम् ६॥ एतरिष्टपदेन सप्तदशभिर्निहतम्१०३१
एतत्सर्वधनम्। उपान्त्यपदधनानयने इष्टम् १६ । अरमात्पर्धपदम् १५ । पयगुणितं
मुखसहितञ्च १९० । एतदुपान्त्ये षोडशपदे धनम्। अथाष्टभादिपदत्रयधनानयने
इष्टम् ३ । एतद्य के दलितम् १ । अस्मात्पूर्वपदैरसप्तभिर्युतम् । उत्तरगुणं समुखञ्च
६१ । इष्टनावान्तरपदस्त्रिभिनिहतम् १८३। एतदष्टमादिपदत्रये धभं भवति ॥स-
बंधनानयन उपागन्तरमाशिमाह । अथवाद्यन्तं पदार्थहतम् । इति । आ-
दिधनान्त्यधनयारक्यं पदार्थहतं सर्वधनं भवति ॥ शमुखमध्यमिरपत्र समुखं
मध्यमिति द्रष्टव्यम्॥ यत्र मध्यपदाभावस्त्रत्र मध्यात्पूर्वापरयोमत्पन्नधनयोर्यो-
गार्थ मध्यधनं भवति ॥ गच्छानयनमाह ।
भा:-अब श्रेडीगणित कहते हैं। अन्त्यधन लाने की रीति यह है कि-
पद (गच्छ) में से एक घटावे शोर शेष अंङ्क को " चय ” (बढ़ती) धन से गु-
खा करे और गुणन फल में “ मादिधन ” को जोड़े तो “अन्त्यधन ” होगा
एवं इसी “ अन्त्य धन में प्रादि ( मुख ) धन को जोड़ कर योगफल को
दलित (आधा) करने से “ मध्यधन होगा। और “ सध्यधन को
पद से गुणा करने पर “ सर्वधन " होगा।
उदाहरण-जैसे आदिधन ५। चय 9।गच्छ १७ । है, तो उक्त नियमानुभार १
में से १ घटाया=२६X9=११२४५=१९१ पह " अन्त्यधन , हुना । पुनः ११+५
=१२२ को दलित किया तो ६९ हुशा यह अध्ययन गुम्मा, मीर। ६१४११=२०३१
यह सर्वधन ” हुआ ॥ १९ ॥

- गीतिकापादः॥ गच्छोऽष्टोत्तरगुणितादद्विगुणाद्युत्तरविशेषवर्गयुतात् । मूलं द्विगुणाबूनं स्वोत्तरभजितं सरूपार्ध ॥ २० ॥ लब्धधनमत्र विशेष्यम् । सर्वधनादष्टभिर्गुणितात् । पुनरुत्तरेण चयाख्येन च गुणितात् । पुनर्द्विगुणस्यादिधनस्य । उत्तरस्य घयाख्यस्य च यो विशेषस्तस्य वर्गेण युताद्यन्मूलं तस्माद्विगुणमादिधनं विशोध्या उत्तरेण चयाख्येन विभजे- त् । तत्र लब्धाद्रपेणकेन च युतादर्घ गच्छो भवति । पूर्वोदाहरणे लब्धधनम् २०३१ । एतदष्टभिरुत्तरेण सप्तसंख्येन च गुणितम् ५८०७२। द्विगुणमादिधनम् १०॥ उत्तरम् । अनयोर्विशेषस्य वर्गण र युतम् ५८०८१। अस्माज्जातंमूलम् २४९ । द्विगु- रोनादिधनेन १० ऊनम् २३१॥ एतत्स्वोत्तरेण धयेन ७ भक्तम् सरूपम् ३४ । दलितम् १७ । एष गच्छः ॥ (कायकोत्तराकानां संकलितधनानयनगाह ॥ भाः-सधन को ८ से गुणा करे और गुणनफल को पुनः घय (७) से गुणा करे और श्रादिधन (५) को द्विगुणित कर उस में चय (७) के साथ परस्पर अन्तर करने पर जो शेष रहे उस का वर्ग करे; उसे उक्त सर्वधन, में जोड़ कर उप्त का वर्गमूल निकाले, एवं इस वर्गमूल में द्विगुणित आदि धन (१०) को घटावे, शेष को चय से (७) भाग देवे और भागफल में रूप (१) जीड़े और योगफल को दलित ( आधा ) करे, यह आधी संख्या गच्छ का परिमाण होगा। उदाहरण जैसेः सर्वधन १०३७Xc=८२९६ इस को ७ से गुणा किया तो ५८०७२ हुआ। और श्रादि धन ५४२=१० में से ७ घटाया तो शेष ३रहा पुनः ३४३८८।५८०७२+6=५०८९ इत का वर्ग मूल २४१में से १०घटाया तो २३१ रहे, इस में ७ काभागदिया तो३३+१=३४, इस को दलित किया तो १९ यह “गच्छ,सिद्ध हुश्रा ॥२०॥ एकोत्तराद्युपचितेर्गच्छाद्यकोत्तरत्रिसंवर्गः । षड्भक्तरस चितिघनस्सैकपदघनो विमूलो वा ॥२१॥ एकमुत्त मादिश्च यस्या उपचितेस्तस्था एकोत्तराद्य पचितेश्चितिघनः संक- लितधनमत्र साध्यते। संकलितस्य संकलितधनमित्यर्थः। गच्छाद्येकोत्तरत्रिसंवर्गः। गच्छप्रथमराशिरेकोत्तर एकयुतो गच्छे द्वितीयो राशिः। द्वितीयोऽप्येकयुतस्तृती- यो राशिः । एषां गच्छाद्यकोत्तराणां प्रयाखरं संवर्गषड्भक्तो यस्स चितिघनः संकलितधनं भवति । एकाद्य कोत्तराङ्कानां संकलितधनं भवति ॥ सैकपदधनों धिमूलो वा । अथवा सैकामापदानां धनराशिस्सैकपदहीनषड्भक्तश्चिसिघनो.

० आर्यभटीये- ३७ पति। । उदाहरसम्। पञ्च संकलिता ये स्युस्तेषां संकलितः प्रदगच्छः ५। एष पमराशिः भयमेकोत्तरः ६ । एष द्वितीयः । अयमप्येकोत्तरः ७ । एष तृतीयः । षां त्रयाणां संवर्गः २१० । षडभक्तः ३५ । अयं चितिघनस्संकलितधनं भवति । थवर । सैकं पदम् ६ । अस्य घनः २१६।एष स्वमूलेन सैकपदेन ६ हीनः २२० । इभक्तञ्च ३५ । एष चितिघनः ॥ वर्गधनयोस्संकलितमाह। प्रथम राशि को “ गच्छ ” कहते हैं। इस में १ जोड़ने से द्वितीय राशि ती है, द्वितीय राशि में १ जोड़ने से तीसरी राशि होती है और इन तीनों संवर्ग को छः से भाग देने पर “ चितिघन संकलितधन होता है। प्रथम राशि में १ जोड़ कर इस को घन कर, घनफल में पद को घटा र ६ से भाग देने पर चितिघन होता है। उदाहरण जैसेः-पद (५) प्रथम राशि ५+१=६ यह द्वितीय राशि हुई पुनः +१=9 यह तृतीय राशि हुई, इन तीनों का संवर्ग ५४६x9=२९० हुश्रा इस में ६ का गि देने पर ३५ रहा यह चितिघन संकलितघन हुआ । पुनः ५+१=६ पुनः x६x६२१६में ६ घटाया तो२९० वचा २१०, ६-३५ यह चितिधन हुप्रा॥२१॥ सैकसगच्छपदानां क्रमात्त्रिसंवर्गितस्य षष्टोऽशः । वर्गचितिघनस्स भवेच्चितिवर्गो घनचितिघनश्च ॥२२॥ पदमेव सर्वत्र गच्छशब्देनोच्यते । सैकपदं प्रथमराशिः । सैकं सगच्छञ्च पदं तीयः । एषां त्रयाणां क्रमेण हननं कुर्यात् । एवंभूतस्य विसंवर्गितस्य बयाणां वर्गस्य यषष्ठोशः स वर्गचितिघनो भवेत् । वर्गाणां संकलितधनमित्यर्थः ॥ पतिवर्गो घनचितिघनश्च । चितेरेकादिसंकलितस्य यो वर्गः स घनचितिघनः। कादिपनानां संकलितघनमित्यर्थः । उदाहरणम् ॥ पञ्चानां वर्गधनयोः पृथक . कलितं वद । अत्र सैकपदम् ६ । इदमेव सगच्छम् ११। केवलपदम्। एषां त्रयाणां संवर्गः ३० । षड्भक्तः ५५ । मदं वर्गसंकलितम्॥ अथ घनसंकलिते गच्छः५। एकाद्य को रकल्पनया इष्टं व्येकं दलितमित्यादिसूत्रेणानीतं संकलितधनम् १५॥ अस्य वर्गः २५ । एतत् पञ्चपर्यन्तानामेकादीनां घनक्यम् ॥ द्वयो राश्योसंवर्गामयन उपा- न्तिरमाह॥ भा:-केवल पद में एक जोड़ने से पहिली राशि, एक युक्त पद में जोड़ने द्वितीय राशि, इन तीनों को क्रम से गुणा करे । इस प्रकार तीन बार गु- ति का छठा भाग “ वर्ग " चितिघन होता है। और एक प्रादि संकलित .

६ गीतिकापादः ॥ का वर्ग “घन चिति घन" होता है-उदाहरण जैसे-एक सहित पद ५+९६ गच्छ जोड़ा तो (५) ११ हुना, केवल पद ५, इनका संवर्ग ६४९९४५ ३३० इसमें का भाग दिया तो ५५ वर्ग संकलित हुआ। गच्छ ५ संकलित धन १५४१५-२२ यह एक आदि पांच संख्याओं का धनैक्य हुभा ॥ २२ ॥ संपर्कस्य हि वर्गाद्विशोधयेदेव वर्गसंपर्कम् । यत्तस्य भवत्यधं विद्यादगुणकारसंवर्गम् ॥ २३ ॥ संपर्कस्य गुणगुण्यात्मलयोयो राश्योस्संयोगस्य वर्गात् तयोरेवराश्यो संपर्क वर्गयोगं विशोधयेत् । तत्र यच्छिष्टं तस्य यदर्घ स गुणकारयोर्गुणगुण्या ख्ययो राश्योस्संवो भवतीति विद्यात् । परस्परहनने हि द्वयोर्गुणकारत्वं गुर त्वञ्च कल्पयितुं शक्यम् । तस्मादुभी गुणकारशब्दवाच्यौ। उदाहरणम् । “धदा हतिद्वयो राश्योः पञ्चसप्त समानयोः". राश्योस्संपर्कः १२ । अस्य वर्गः १४४ । अस्माद्राश्योर्वर्गयोः २५ । ४ । ए योर्योग विशोध्य शिष्टम् ७० । अस्यार्धम् ३५ पञ्चसप्तमितराश्योस्संवर्गः ॥ राश्य संवर्ग तदन्तरे च जाते राशिदयानयनमाह । भा०;-गुण और गुण्यात्मक राशियों के योग के वर्ग से उन्हीं दो राशि के वर्ग के योग में से वर्गयोग घटावे। उस में जो शेष रहे उसका प्राधा गु होगा एवं गुण्यात्मक राशि का संवर्गहोगा। उदाहरण जैसेः-दो राशियों के योग १२, इस का वर्ग १४४, इस से दोनों राशियों का वर्ग क्रम से २५+ge इस का योग १४ को १४४ में घटाया तो शेष 90 रहे, इस का आधा ३५ हुश्र यह ५ और ७ राशि का संवर्ग हुआ ॥ २३ ॥ द्विकृतिगुणात्संवर्गाद द्वयन्तरवर्गण संयुतान्मूलम् । अन्तरयुक्तं हीनं तद्गुणकारद्वयं दलितम् ॥ २४ ॥ राश्योस्संवर्गात् द्विकृत्या द्वयोः कृत्या चतुस्संख्यया गुणितात द्वघन्तरवगैरे द्वयो राश्योरन्तरस्य वर्गण युताद्यन्मूलं तद्विधा विन्यस्य । एकस्माद्राश्यन्त विशोधयेत् । अन्यस्मिन्नाश्योरन्तरं प्रक्षिपेत् । एवंकृतद्वयं दलितं. गुणकारद्वार भवति । उदाहरणम् । दशाहतिस्त्रयं भेदो राश्योस्तौ ब्रूहि बुद्धिमन् । भत्र राश्योसंवर्गः १०। द्वयोः कृत्या गुणितः ४० । राश्यन्तरम् ३। भर वर्गल र युतम् ४ । अस्मान्मूलम् । अन्तरयुक्तं दलितम् । अयमेको राशिः॥

मार्यभटीये- प्र मूलराशिः । राश्योरन्तरेण हीनं दलितम् २ । भयं द्वितीयराशिः ॥ एव दिविधौ यदुपायान्तरादि तत्सर्व लीलावतीव्याख्याने प्रदर्शितम् । अतस्त- दिवगन्तव्यम् । शतादेरेकस्मिन्मासादिकाले या वृद्धिस्तत्समाने धने तया घादत्ते सति तस्माद्धनादभीष्टकाले वृद्धिसहितमूलफलानयनमाह ! भा:-दो राशियों के संवर्ग को ४ से गुणा करे और दोनों के अन्तर वर्ग कर उक्त गुणनफल में जोड़े और उस का वर्गमूल निकाल कर दो श्र- । २ स्थानों में रक्खे एक में दोनों राशि के अन्तर को घटावे एवं दूसरे में शि के अन्तर को जोड़े, तो दो गुणकारराशि होंगी ॥ उदाहरण जैसेः xx=४०, १०-9-३, ३४३= 1 9X9=४ इसका वर्गमूल 9+३=१० पुनः १० को लेत किया तो ५ हुआ, यह एक राशि हुई । मूलराशि'७-३-४ इसको दलित या तो २ रहा, यह द्वितीय राशि हुई । इसी प्रकार और भी जानो ॥२४॥ मूलफलं सफलं कालमूलगुणमर्धमूलकृतियुक्तम् । मूलं मूला|नं कालहतं. स्यात्स्वमूलफलम् ॥ २५ ॥ मूलस्य शतादेरेककाले वृद्धिरूपं यदुनं दत्तं तद्नं मूलफलाख्यम् । सफलम- टिकाले स्ववृद्धिसहितम् । कालेनाभीष्टकालेन गुणितम् । पुनर्मूलेन प्रमाणस्था- स्थितेन शतादिना च गुणितम् । मूलस्य शतादेरर्धस्य कृत्या च युतं मूलीकुर्यात् । न्मूलं मूलार्थेन शतादेर्मु लस्यार्धेनोनं कृत्वाभीष्टकालेन हरेत् । तत्र लब्धं स्व- लत्य शतादेः फलं भवति । एतस्मिन् काले वृद्धिरित्ययः । तदेवदत्तमूलधनञ्च वति । उदाहरणम् । फलं शतस्य मासे यद्दतं तत्स्वफलान्तरम् । मासषटके षोडशकं जातं मूलफलं वद ॥ अत्र मूलफलाख्यं दत्तधनं सफलम् १६ । एतत् कालेन पसंख्येनाभीष्टकालेन शितम् मूलधनेन प्रमाणाख्येन शतेन च गुणितम् ०६००। अर्धमूलकृत्या मू- धनस्य शंतस्या यत् तत्कृत्या २५०० । अनया युतम् १२१०॥ अस्य मूलम् १९०। उन्मूलधनार्धन ५० अनेन हीनम् ६। अभीटकालेन षटकेन भक्तम् १० । एत- शसंख्यं शतस्य मासे फलं भवति। दत्तधनञ्च तदेव ॥ त्रैराशिकगणितमाह । भा:-जो रुपया उधार लिया जाता उसे । मूलधन " या असल रु- पा कहते हैं । और महाजन को दिये हुए “ मूलधन , से काम लेने के ब- ते में जो कुछ अधिक दिया जाता उसे. सूद “व्याज, “बुद्धि” या “मूलफल" हते हैं। और व्याश सहित धन को “सपल, या "मिअधन, वा "सर्वधन" .

४७ मूलधन से से ॥ गीतिकापादः॥ कहते हैं। सर्वधन को इष्टकाल से गुणा करे, पुनः इसको गुणा करे मूल (१०० ) के आधे को ( ५० ) वर्ग कर उस में जोड़े और इस का वर्गमूस निकाले और उस मूल को मूलधन के आधे से घटावे और शेष को इष्टकाल से भाग देवे । भागफल इष्टधन का व्याज होगा। उदाहरण जैसे:-मूलफल सूदसहित १६ रु० ६ मास ( इष्टकाल ) से गुणा करने पर ६ को मूलधन १०५ गुणा किया तो ६६०० हुमा । १०० का आधा ५०x१०-२५०० इसके ६००+२५००=१२१०० इसका वर्गमूल १९० हुआ, इसमें मूलधन के प्राधे ५० को घ टाया तो ६० रहे, इसमें इष्टकाल ६ का भाग दिया तो १० मिला, यही एक मास में १०० का ब्याज हुमा ॥ २५ ॥ त्रैराशिकालराशिं तमथेच्छाराशिना हतं कृत्वा । लब्धप्रमाणभजितं तस्मादिच्छाफलमिदं स्यात् ॥ २६ ॥ प्रमाणं फलमिच्छा चेति त्रयो राशयस्स्युः । तैर्निष्पन्न कर्म त्रैराशिकम् श्रराशिके यः फलाख्यो राशिस्तत्त्रैराशिकफलराशिमिच्छाख्यराशिना हतं कृत्व प्रमाणाख्यराशिना भाजितं कार्यम् । एवं भाजितात्तस्माद्राशयब्धं तदिदमि च्छाफलं भवति । उदाहरणम् । ताम्बूलानां शतेनानदशकं लभ्यते यदि। ताम्बूलषष्ट्या लभ्यन्ते कियन्त्याम्राणि तद्वद ॥ अत्र ताम्बूलशतं प्रमाणराशिः। श्रान दशकं फलराशिः। ताम्भूलषष्टिरि च्छाराशिः । तेन गुणितात्फलात्प्रमाण लब्धं षट्संख्यं भवति । तदिच्छाफलम् । भिन्न षु राशिषु यो विशेषस्तमार्याधुनाह । पहिली राणि को “ प्रमाण राशि » दूसरी को “ फलराशि , और ती सरी को . इच्छाराशि कहते हैं। फलराशि को इच्छाराशि से गुणा का और प्रमाणराशि से भाग देवे तो भागफल इच्छाराशि ( उत्तर) होगी उदाहरण जैसेः-१०० पान में तो, १० श्राम आते हैं तो ६० पान में कितने श्राम पावेंगे? ६०x१० ६००, ६००-१०० ६ प्रांम पावेंगे। यही इच्छा राशि हुई ॥२६॥ छेदाः परस्परहता भवन्ति गुणकारभागहारणाम् । गुखकारभागहाराणां छेदाः परस्परहतास्स्फुटा भवन्ति । एतदुक्तं भवति गुबगुल्ययोराहतिरत्र गुणकारशब्देन विवक्षिता। हार्य इत्यर्थः । हार्यस्यछेद ।

आर्यभटीये- ४१ हास्केण गुखितो हारको भवति। हारकस्य छेदो हार्यण गुखितो हार्यो भवति । इति गुणगुण्ययोस्सच्छेदत्ये तच्छेदयोराहतिहार्यस्य छेदस्यात् । सवर्णीकरण- मुत्तरार्धनाह। भा:-“ गुण " एवं"गुण्य” को परस्पर गुमा करना, यहां गुणकार शब्द से विवक्षित है। अर्थात् हार्य ” । “ हार्य ” के छेद ” को हारक गुणा करने पर हारक होता है। हारक के छेद को "हार्य" से गुका करने पर हार्य होता है। छेदगुणं सच्छेदं परस्परं तत्सवर्णत्वम् ॥२७॥ सच्छेदं । अंशोऽत्र विशेष्यः । छेदसहितसंशं परस्परच्छेदगुणं कुर्यात् । त- तदंशं तत्तच्छेदञ्च स्वव्यतिरिक्तानां परेषां सर्वेषां छेदैः ऋमेण गुणितं कुर्यादि- त्यर्थः । तत्सवर्णत्वम्। सवर्णीकरणंतदित्यर्थः। एवं कृते सर्व राशयसमच्छेदा भव- न्ति । उदाहरणम् । अष्टांशकास्त्रयः यादहतास्त्वं शोधृताः कति । गुणगुण्यहरांस्तांश्च समच्छेदान् कावे वद ॥ अत्र गुण्यः ३ । गुणः १ । अनयोर्हतिः ३ । एष हार्यः । हारः १ । हारकस्य ३२ ३ छेदेन गुणितो हार्यः । एष हार्यः। हार्यस्य छेदेन गुसितो हारः ३२ । एष हारः । एवं नवसंख्योऽत्र हार्यो भवति द्वारिंशत्राख्यो हारकश्च । सवर्णीकरण- न्यासः३।१।१। अत्र गुण्यराशिस्तब्छेदश्च गुणकारहायोश्छेदाभ्यां हतो कार्यों गुणकारराशिस्तच्छेदश्च गुणहारकयोश्चेदाभ्यां हती कार्यों हारकराशि- स्तच्छेदश्च गुणगुण्ययोशछेदाभ्यां हतौ का। तथा कृते गुण्यराशिः ३६ । गुणः २४ । हरः ३२ । एवं सर्वत्र वेद्यम् ॥ व्यस्तविधिमाह । ९६ ९६ भा:-छेद सहित अंश को परस्पर च्छेद गुण करे अर्थात् उस अंश और उस छेद को स्वकीय को छोड़ अन्यों के छेद के साथ क्रम से गुणा करे। इसी को सवर्गीकरण या “ समच्छेद कहते हैं। उदाहरण जैसे- इन दोनों का गुणनफल हार्य हुआ। हार ३२ १. ३ । यह orim गुण ४२ गीतिकांपादः ॥ हारक के छेद के साथ गुणा करने पर हार्य हुमा । “ के छेद के साथ गुणा किया तो हार ३२ यह हार हुआ । सवर्णीकरण न्यास- ३ १ १ । यहां गुण्यराशि गुण २४ हर ३२ इसी प्रकार और भी जानी ॥२७॥ ८,४,३ ६ गुणकारा भागहरा भागहरा ये भवन्ति गुणकाराः । यः क्षेपस्सो ऽपचयो ऽपचयः क्षेपश्च विपरीते ॥२८॥ दृश्यराशिनोद्दिष्टराश्यानयने व्यस्तविधिः क्रियते । उद्दिष्टराशौ यो गुज्ञ कारस्स भागहारः। हारो गुणः। क्षेपो उपचयः। अपचयः क्षेपस्स्यात् । एर विपरीते व्यस्तविधौ भवति । अनुक्तमध्यनेनैव सिध्यति वर्ग मूलं मूलीकरणे वर्गीकरणमित्यादि । उदाहरणम् । कस्त्रिघ्नः पञ्चभिर्भक्तष्षभिर्युक्तः पदीकृतः। एकोनो वर्गितो वेदसंख्यस्स गणकोच्यताम् ॥ दृश्यम् ४ । वर्गीकृतत्वात्पदीकृतः २ । एकोनस्वादेकयुतः ३ । पदीकृतत्वाद- र्गितः । षड्भिर्युतस्वात्तै_नः ३ । पञ्चभिर्ह तत्वात्पञ्चभिर्गुणितः १५ । त्रिभि- र्गुिणितत्वात्त्रिभिभक्तः ५। एष उद्दिष्टराशिः ॥ यत्र बहवस्संधारस्युः । तत्रैकैक संघमनास्य शेषसंघानां संख्याश्च गणितास्स्युः । तत्र सर्वसंख्यानां योगसंख्यान- यनमाह। भा:-"दृश्यराशि” द्वारा “ उद्दिष्ट राशि " के लाने को " व्यस्त विधि कहते हैं । उद्दिष्ट राशि में जो गुणकार, वह भाग हार होता है। हार गुख होता, क्षेप अपचय होता और अपचय क्षेप होता है इस प्रकार विपरीत व्यस्त विधि में होता है। उदाहरण जैसे-दृश्य ४ इस का मूल २, १ कम करने से ३, ३ का वर्ग इसमें से छः, घटाने से ३ । ३ को ५ से गुणा किया तो १५ हुभा इसमें ३ का भाग दिया तो यही उद्दिष्ट राशि हुई ॥ २८ ॥ राश्यूनं राश्यूनं गच्छधनं पिण्डितं पृथक्त्वेन । व्येकेन पदेन हतं सर्वधनं तद्भवत्य ब ॥ २९ ॥ राश्यूनं राश्यूनम् । एकैकसंघहीनं संधैक्यं कृत्वा तत्तत्संघयोगं गच्छाख्यं धनं पृषकत्वेन स्थापितं संघतुल्यस्थानेषु स्थानेषु स्थापितं यत् तत्पिण्डितं कृत्वा । तेषामैक्यं कृत्वा । व्येकेन पदेन । एकसंघहीनेतरसंख्यया । हरेत्। तत्र लब्धं यत तदेव सर्वधनं भवति । सर्वेषां संघधनानामैक्यमित्यर्थः। तस्मात्सर्वधनात्पूर्व- स्थापितरास्यूनसंघधने कैकलिन्विशोधिते सति शिष्टमेकैकसंघानं भवति। .

४३ आर्यभटीये- येन संघेन हीनमितरसंघधनं विशोध्यते । तत्र शिष्टं तत्संघधनं भवति। उदा० । व्यूहात्रयश्येनकङ्काख्यहंसजा दृष्टा वनेऽत्रैकहीनेतरदयात् । जाता तु संख्यार्कशक्राष्टिसम्मिता ट्यूहत्रये प्राज्ञ संख्यात्र कथ्यताम् ॥ अत्र प्रथमराशिं हित्वान्याभ्यां जाता संख्या १२ । द्वितीयं हित्यान्याभ्यां जाता १४॥ तृतीयं हित्वान्याभ्यां जाता १६। पृथक्रियतमेतत्त्रयं पिण्डीकृतम् ४२। एकहीनेन पदेन द्विसंख्येन हृतम् २१ । एतद्व्यूहत्रयाता सफलसंख्या । एपा प्रथमगदितार्कसंख्यया हीना । एतच्छेधनमानम् । अथ समस्तसंख्या शक्रही- ना । एतत्कङ्कभानम् । अथाष्टिहीना ५। एतद्वंसमानम्। अध्यक्तमूल्यानां मूल्य- प्रदर्शनायाह । भा:-अनेक राशियों में से एक को छोड़ भवशिष्ट राशियों का योग करे पोगफल - गच्छधन होता है। इस प्रकार एक २ इतर राशियों का पोग कर भिन्न रखता जावे और पुनः पृथक रक्खी हुई राशियों का एकत्र पोग करे। और सब राशियों में से एक घटाकर शेष राशि (जितनी हो) उसे उक्त संघयोग में भाग देवे, तो भागफल सब संघों का एक संघधन होगा। पुनः इस में क्रम से ( पहिली, दूसरी, तीसरी ) राशि को घटा देने से-एक २ संघधन होता जावेगा । उदाहरण जैसे--पहिली राशि को छोड़ कर, अन्य राशियों से १२, दूसरी रा० को छोड़, अन्य राशियों से १४, तीसरी छोड़, अन्य राशियों से १६, इन तीन का योग ४२ हुओर इस में दो का भाग दिया तो २१, यही तीनों व्यूहों की संख्या हुई। २१-१२८९ यह ध्येन मान हुअा, पुनः २१-१४-७, यह कङ्कमान हुआ और २१-१६-५, यह हंसमान हुमा २९ ॥ गुलिकान्तरेण विभजेवयोः पुरुषयोस्तु रूपकविशेषम् । लब्धं गुलिका मूल्यं यद्यर्थकृतं भवति तुल्यम् ॥३०॥ गवादिगव्यं गुलिकाशब्देनोच्यते । रूपकशब्देन पणादिसंशितं स्वर्णादि- द्रव्यम् । तत्र रूपकाख्य द्रव्ययोर्विशेषं विश्लेषं गुलिकाख्यद्रव्ययोरन्तरेण विभजेत् । तत्र लब्धमेकैकस्य गुलिकाख्यद्रव्यस्य मूल्यं भवति। यद्यर्थकृतंभवति तुल्यम् । यत्र द्वयोः पुरुषयोस्स्वस्वगुलिकामूल्यरूपकयुतिमानं तुल्यं भवति तत्रैवं विधिरि- त्यर्थः । उदाहरणम् । समस्वयो रुपकाणां शतं षष्टिः क्रमागुनम् । गावष्षणिजोश्चाष्टौ तत्र गोमूल्यकं कियत् ॥

४४ का मूल्य गीतिकापादः॥ प्रथमस्य रूपकमानम् १०० । गुलिकाख्यगोमानम् । द्वितीयस्य सपकभा. नम् ६० । गुलिकास्यगोमानम् । अत्र रूपकान्तरम् ४२ । एतद्गुलिकान्तरेण २। अनेन भक्तम् २० । ऐतविंशतिसंख्यमेकैकगोमूल्यम् । नत्रैकैकस्य विंशत्यधिकं श- तद्वयं रूपकं भवति ॥ ग्रहान्तराद्ग्रहयोगकालानयनमाह । भा:-गौ भादि द्रव्य का नाम “गुलिका” और स्वर्ण प्रादि द्रव्य के पण प्रादि का नाम “ रूपक” है दो रूपक संज्ञक द्रव्यों में जो विशेष हो उस में न्यून को घटाकर शेष से भाग देवे, भागफल एक २ गौ होगा। जहां दोनों पुरुषों को अपने २ गौ के मूल्य का योग तुल्य हो वहां यह नियम होगा। उदाहरण जैसे—एक पुरुये के पास १०७) रुपये एवं ६ गौ और दूसरे पुरुष के पास ६०) रूपये एवं ८ गौ, तो प्रत्येक गौ का मूल्य क्या होगा ? रुपये १००-६० रु०-४० रु०। और ८ गौ में से ६ नौ० घटाया तो शेष २ रहे । ४०२ =२० ० प्रति गौ का मूख्य वीर वीत राहुना । और प्रत्येक पुरुष को १००+ १२०=२२० रुपये, १६०+६०-२२० रुपये हुये ॥ ३२ ॥ भक्त विलोमविधरे गतियोगेनामुलोमविवरे द्वे । गत्यन्तरेण लब्धौ द्वियोगकालावतीतप्यो ॥ ३१ ॥ विलोमयोर्वक्रयोर्गहयोर्विवरे स्फुदानारे द्वे लिप्तीकृते तयोर्गतियोगेन वक्रस्पष्टगत्योोगेन लिप्तीकृतेन भक्के कार्य । अनुलोमयोर्वक्रिणोईयोरवक्रि- नोईयोर्वा विवरे द्वे गत्यन्तरेण वक्रगत्योवा स्पष्टगत्योर्वान्तरेण भक्त कार्ये । द्वे इतिवचनमन्तरस्य श्वैविध्यात् । शीधगतिहीनो मन्दगतिरन्तरं भवति । मन्द- गतिहीनशशीधगतिश्चान्तरं भवति । इति द्वैविध्यम् । तत्र हरणे लब्धौ द्वौ द्वि- योगकालौ । द्वयोर्यहयोयोगकालौ दिनालको । अतीतैयौ भवतः । शीघगति- रग्रतो गच्छति चेदतीतस्स कालः। मन्दगतिरनतो गच्छति चेदेष्यस्स कालः। विलोमे तु ऊर्ध्वगतो वक्री चेदेष्यः । अन्यथातीतः ॥ अथ कुट्टाकारगणितप्रदर्श- नार्थमार्याद्वयमाह । भा:-जिन दो ग्रहों का “ योग " जानना हो, उन में से यदि शीघगा- मी ग्रह की अपेक्षा अधिक हो तो “ योग " गत हुआ (इष्ट काल से पहिले) और मन्दगामी ग्रह शीघगामीग्रह की अपेक्षा अधिक हो तो योग भाषी ( इष्ट काल से पीछे ) जानना । यह नियम दो पूर्वगामी ग्रहों के लिये है और चक्र गामी ग्रहों का तो उसके उलटा होता है। अर्थात् वक्री ( टेढ़ा चलने वाला ) मन्दगामी ग्रह की अपेक्षा वक्रीशीघगामीग्रह अधिक हो तो । " ४५ आर्यभटीये- “ योग " भावी एवं वक्री शीघ गामीग्रह की अपेक्षा वक्री मन्दगामी ग्रह अधिक हो तो “ योग” वीत गया आनना । और दोनों ग्रहों में से एक वक्री एवं दूसरा• पूर्वगामी ग्रह हो तो वक्रीग्रह से पूर्वगामी ग्रह अधिक हो तो योग, गत और पूर्वगामी ग्रह से मन्द गामी ग्रह अधिक हो तो "योग” भावी जानना । दो इष्ट कालिकग्रहों की अन्तर कला को अपनी २ गति कला द्वारा गुण करे गुणन फल में दो सरलगामी या वक्रगामी ग्रह हों, उनकी स्फुटगति के अन्तर कला का भाग देवे, भागफल से “योग” का (उपरोक्तप्रकार)जानहोगा॥३१॥ अधिकाग्रभागहारं छिन्द्यादूनाग्रभागहारेण । शेषपरस्परभक्त मतिगुणमग्रान्तरें क्षिप्तम् ॥ ३२ ॥ अधउपरिगुणितमन्त्ययुगूनाग्रच्च्छेदभाजिते शेषम् । अधिकाग्रच्छेदगुणं द्विच्छेदाग्रमधिकाग्रयुतम् ॥ ३३ ॥ इति । द्विविधः कुहाकारः । निरग्रस्साग्रश्चेति । केनचिद्गुणकारेण गुणिते भाज्ये भाजकेन भरते यश्शेषस्तेन शेषेण भाज्यभाजकाभ्याञ्च तच्छेषप्रदगुणकार- राशेरानयनाय यत्कर्म क्रियते स निरग्रकुटाकार इत्युच्यते । तत्रानीतस्स गुण- कारः पूर्वगुणकाराद्भिन्नश्चेत् तस्मिन्स्वहारप्रक्षेपात्पूर्वगुणकारस्सिध्यति । यौके- नैव राशिना भाज्यद्वये गुणिते भाजकदयेन हृते शेषद्वयं भवति तत्र ताभ्यां तत्तद्भाज्यभाजकाभ्याञ्च तत्तच्छेदद्वयगुणकारद्वये निरग्रविधिनानीते सति यदि त सकारद्वयं भिन्न भवति । तदा ताभ्यां तद्वारकाभ्योच्च पूर्वगुणकारानयने यः कर्मशेषो भवति । स साग्रकुटाकार इत्युच्यते । शेषद्वयेनानीती यौ गुणकारी तयोरधिकोऽधिकाग्र इत्युच्यते । ऊन ऊनोऽयः । •साग्रकुटाकारप्रदर्शनपरमेत- दार्याद्वयम् । निरनोऽप्यस्मादेव सिध्यति । अधिकाग्रभागहारं छिन्द्यान्दूना- ग्रभागहारेण । अधिकाग्रसाधनभूतं भागहारमूनाग्रसाधनभूतेन भागहारेण छि- न्यात् । हरेत् । शेषपरस्परभक्तम् । अनन्तरं शेषपरस्परहरणं कार्यम् । शेषशब्दो त्रि हतशेषस्य तत्समीपस्थितस्योनाग्रहारकस्य च प्रदर्शकः । हृतशेषस्योनाग्रभा- गस्य च परस्परहरणं कार्यमित्यर्थः।.यदा पुनरधिकाग्रभागहारस्यल्पत्वादूनाग्र- हारेख प्रथमहरमं न सम्भवति तदाधिकाग्रहारोनाग्रहारोनाग्रहारयोः परस्पर- हरणं कार्यम् । कुहरकारे हि भाज्यभाजकयोः परस्परहरणं विहितम् । तत्र भा- व्येन भाजकस्यं प्रथमहरणञ्चाभिप्रेतम् । अत्राप्यधिकाग्रभागहारो भाज्यत्वेन . कल्पितः । ऊनाग्रहारो भाजकत्वेन कल्पितः । तत्र भाज्यस्याल्पत्वापादनाय ४६ गीतिकापादः॥ तस्य प्रथमहरवं विहितम् । यदा प्रथममेवाल्पो भाज्यस्तदा तस्य प्रथमहरवं न कार्यम् । परस्परहरणे तत्तत्कलञ्चाधोग्धः क्रमेण स्थाप्यं यथा फलवल्ली भवति। परस्परभक्तमितिवचनात्फलग्रहणमप्यभिहितं भवति । अन्यस्मादन्यस्माच्च भक्तं फलं हि परस्परभक्तं तत्स्थाप्यमिति शेषः । यावद्भक्त शेषयोरल्पत्वान्मतिः करप्या भवति । तावदेवं परस्परहरणं तत्फलास्थापनञ्च कार्यम् । परस्परहरणस्य द्विष्टत्वात्फलपदानां समत्वे परस्परहरणं समाप्यते । अतस्समपद एव मतिः करप्यते । मतिगुणमग्रान्तरे क्षिप्तम् । भाज्यशेषे यया संख्यया निहते तस्मिन् क्षेप्यराशिं प्रक्षिप्य वा तस्माच्छोध्यराशिं विशोध्य वा भाजकशेषेण हृत निश्शेषो भवति भाज्यशेषः सा संख्या मतिर्भवति । अत्राग्रयोरन्तरं क्षेप्यरा- शिस्स्यात् । तां मतिं बुद्धया प्रकल्प्य तया भाज्यशेषमल्पसंख्यं निहत्याग्रयोरन्तरे क्षेप्यसंज्ञिते प्रक्षिप्याधिकसंख्येन भाजकशेषेण निश्शेषं हत्वा फलं गृह्णीयात् । पु- नस्तां मतिं फलपदानामधो विन्यस्य तस्या अधस्ताम्लब्धञ्च विन्यसेत् । मति- कल्पनायास्सुखत्वापादनाय हि परस्परहरणं विधीयते । तन्निवृत्तये पुनरवत- परिगुणितमन्त्ययुगित्यादिना वल्लयु पसंहारश्च विहितः। अतो निश्शेषहरणान्तं फलं ग्राह्यमिति सिद्धम् । अथ मतिश्च । अधउपरिगुणितमन्त्ययुगितिवचनादध शंदेनोपान्त्यपदं गृह्यते । उपान्त्यपदेन स्वोर्धपदं निहत्य तस्मिनन्त्यपदंप्र- क्षिपेत् । पुनरप्येवं कुर्याद्याववावेव राशी भवतः । तत्र राश्योरुपरिस्थ एव ग्राह्यः । ऊनाग्रच्छेदभाजिते. शेषं अधिकाग्रच्छेदगुणं द्विच्छेदाग्रमधिकाग्रयुतम् । द्वयो राश्योरुपरिस्थितं राशिमूनाग्रच्छेदेने हरेत्। तत्र शिष्टमधिकाग्रच्छेदेन नि- हत्य तस्मिनधिकाग्रं प्रक्षिपेत् । स विच्छेदाग्रराशिर्भवति । पूर्वोक्तमान्यदयस्थ शेषदयप्रदो गुणकार इत्यर्थः । निरग्रेऽप्येवमेव विधिः । किन्तु तत्र मतिकल्प- नायां हृतशेषो दृश्यराशियोध्याख्यः । एष दृश्यश्चेत् क्षेप्याख्यः। राशिदये जात जपरिस्थराशिं भाजकेन हरेत् । तत्र शेषो गुणकारोहिंगणादिस्स्यात् । अधस्स्य राशिं भाज्येन हरेत् । तत्र शेषो लब्धं भगणादिसंशितं फलं स्यात् । अधिकाग्र- च्छेदगुणमित्यादिको विधिस्तत्र न भवति । अत्रैवं वा. योजना । अधिकाग्रभा- गहारं छिन्द्यादूनाग्रभागहारेण । इति । अधिकाग्रभागहारशब्देनाधिकसंख्येन भाज्यभाजकावुक्तौ । भाज्यस्यापि हि परस्परहरणे भाजकत्वं सम्भवति तावू नाग्रभागहारेणास्पसंख्येन केनचिद्राशिना छिन्द्यात् । निश्शेष हरेत् । अपवर्त- नस्य संभवेऽपवर्तयेदित्यर्यः । पुनश्शेषपरस्परहरणादिकम्। अपवर्तितयो परस्प- रहरणादिकं कार्यम् । इति । उदाहरणम् । ।

४५ प्रार्यभटीये- "राशी वसुघ्ने नवदसभक्ते, शेषश्चतुर्भिस्तुलितस्तथास्मिन् । अत्यष्टिनिघ्ने शरवेदभक्ते, शेषोऽद्रितुल्यो बुध कस राशिः "॥ प्रथमे भाज्यो ८ । हरः २९ । शेषः ४ । भाज्यभाजकयोः परस्परहरणे कृते ३ तत्फलानि वलयां संस्थाप्य जाता फलबल्ली १॥ भाज्यशेषः १। भाजकशेषः २ । चतुस्संख्यशेषराशिश्शोध्यः । तत्र कल्पिता मतिः ६ । मतिगुणिताद्भाज्यशेषा- छोध्यराशी विशोधिते शेषः २। तस्माद्भाजकशेषेण लब्धं फलम् १ । मतिफला mr भ्यां युता वल्ली १। अधमपरिगुणितमन्त्य युगित्यादिना लब्धौ राशी १३ । अ- २० नयोत परिस्थितं भाजकेन २९ अनेनं हरेत् । तत्र शेषः १५। एष गुणकारः। सा- प्रविधावयमग्रः । अधस्स्थं भाज्येन ८ अनेन हरेत् । तत्र शेषः ४ । एष फलरा- शिः। अत्रानीतेन गुणकारेण हताद्भाज्याद्भाजकेन लब्धं फलमित्यर्थः। एवं निर- प्रकुटाकारः ॥ अथ द्वितीये भाज्यः १७ । भाजकः ४५। शेषः । एतैरपि पूर्वव- दानीतो गुणकारराशिः ११ । साग्रविधावयमग्रः अयमूनाग्राख्यः । पूर्वानोतो धिकाग्राख्यः १५ । अग्रौ १५ । अग्रान्तरम् ४। अयं क्षेप्यराशिः । अधिकाग्रहारः ११ २८ । अयं भाज्यः । अनाग्रभागहारः ४५ । अयं भाजकः । अत्र प्रथमहरणमधि- काग्रहारसीनस्वान्न सम्भवति। अतो भागहारयोः परस्परहरणं कृत्वा वाली स: पाद्यानान्तरं क्षेप्यराशिं प्रेकल्प्य निरग्रविधिना गुणकारमानयेत् । तथानीतो पुखराशिः ३४ । अयमधिकाग्रच्छेदेन २९ । अनेन गुणितः । ८६ । अधिकाग्रेश ५। अनेन युतम् । १००१। अयं द्विच्छेदाग्राख्यो गुणराशिः । उद्दिष्टो गुणराशि शायमेव । यदा पुनरेवमानीतो द्विच्छेदान उद्दिष्टगुणाद्भिबस्तदा तस्मिन्स्वहार मिष्टगुणं प्रक्षिप्योद्दिष्टगुणस्साध्यः। स्वहारस्त्वधिकाग्रीनाग्रभागहारोस्संवर्ग स्यात् । अथवा तमोरेव भागहारयोः परस्परभक्तशेषेण भक्तस्ततयोरेव संवर्गो परस्सात् । अयं सागकुटाकारो गणितविद्भिबहुधा क्रियते । निरपश्च धारकु-. कारवेलाकुटाकारादिभेदादहुधा भवति । तत्सर्वं महाभास्करीयभाष्यस्य गीतिकापादः ॥ व्याख्याया सिद्धान्तदीपिकाख्यायां विस्तरेण प्रदर्शितम् । तस्मादिहारमा- भिरनादूतम् । भा:-कुहाकार गणित (इनडिटरमिनेट इक्केशन) दो प्रकार का होता है एक को “निरग्र कुहाकार” एवं दूसरे को “साग्र कुटाकार” कहते हैं। किसी गुणकार से गुणा कर, भाजक द्वारा भाग देने पर जो शेष रहता, उस शेष एवं भाज्य, भाजक द्वारा उक्त शेषप्रदगुण कारराशि " के लाने के लिये जो कर्म किया जाता उसे “ निरन कुहाकार " कहते हैं । इस प्रकार लाया हुआ वह गुण कार, यदि “ पूर्व गुणकार " से भिन्न हो तो उसमें स्वहार ” देने से “ पूर्व गुणकार ” सिद्ध होता है। जहां एक ही राशि से दो भाज्य गुणित हो एवं दो भाजक से भाग देने पर जो शेष रहता, वहां उन से एवं भाज्य, भाजक से उन २ के दोनों “ छेद " एवं दोनों “ गुणकार निरग्रविधि ” से लाने पर यदि दोनों गुण कार भिन हों तो उन से एवं उन के दोनों हारकों से “ पूर्वगुणकार” लाने के लिये जो कर्म शेष रहता उस का नाम “ साग्र कुहाकार” है। और दोनों शेषों से जो दो गुणकार लाये गये, उन में से जो अधिक होता उसे “अधिकाग्र” एवं जो न्य न होता उसे “ऊनाग्र” कहते हैं ॥ ३२ ॥ ३३ ॥ इति पारमेश्वरिकायां भटदीपिकायां गणितपादो द्वितीयः " 7-0*:- अथ कालक्रियापादः प्रदर्श्यते । तत्र कालविभागमाह । वर्ष द्वादश मासास्त्रिंशदिवसो भवेत्स मासस्तु । षष्ठिर्नाड्यो दिवसष्षष्टिस्तु विनाडिका नाडी ॥१॥ एक वर्ष द्वादश मासा• भवन्ति । त्रिंशद्दिवसा यस्मिन् स त्रिशदिवसः मासस्त्रिंशदिवसस्स्यात् । एको मासस्त्रिंशदिवसा भवतीत्यर्थः । एको दिवस ष्टिर्नाड्यो भवति। एका नाडी षष्टिविनाडिका भवति । सौरसावनचान्द्रादि संज्ञितेषु वर्षेषु तत्तद्वर्षकालावादशांशस्तत्तन्मासकाखः । एवं स्वमानवशात्तत्त द्दिननाड्यादिकाला वेद्याः । कालभेदा नवविधा उक्ताः । "ब्राह्म पिश्यं तथा दिव्यं प्राजापत्यञ्च गौरवम् ॥ सौरञ्च सावनं चान्द्रमाई मानानि वै नव ॥" इति-नक्षत्रमण्डलभ्रमखकालतुल्यस्य नाक्षत्रास्यदिनस्यावयवभूताया वि माडिकायाः कालमानि प्रदर्शयति ।

8 . प्रार्यभटीये- भाः-एक वर्ष में १२ महीने होते हैं, एक मास में ३० दिन, एक दिन में ० नाड़ी, एक नाड़ी में ६० विनाडी होती हैं। सौर, सावन, चान्द्र, आदि सं क वर्षों में उस २ वर्ष के बारह २ महीना आदि उक्त प्रकार जानना । का- मान र प्रकार का होता है-जैसा ( कि सूर्य सिद्धान्त में लिखा है )-१ ब्रा- नय,रपित्र्य,३ दिव्य, ४ प्राजापत्य, ५ वार्हस्पत्य, ६ सौर, ७ सावन, ८ चान्द्र, और नाक्षत्र, ये नव प्रकार के कालमान हैं ॥१॥ गुर्वक्षराणि षष्टिविनाडिकाी पडेव वा प्राणाः । यावता कालेन षष्टिगुर्वक्षराण्युच्चरति मध्यमया वृत्त्या पुरुषः । तावा- काल भार्ती विनाडिका । ऋक्षसंबन्धिनी विनाडिका । ऋक्षाणामाधारभूत- मण्डलं यावता कालेन परिभ्रमति । स काल श्राी दिवसः। तस्य षष्ट्यंश प्रा- ी नाडिका । तस्याषष्ट्यंश प्राी विनाडिका सेयमित्यर्थः । षडेव वा प्राणाः यावता कालेन पुरुषष्षडुच्छासान् करोति। तावान्कालश्चाी विनाडिका स्यात्। द्वावपि कालौ तुल्यावित्यर्थः ॥ कालविभाग एवं प्रदर्शितः । क्षेत्रविभागश्च तथा शेयइत्युत्तरार्धेनाहः । भा:--जितने समय में ६० गुरु ( दीर्घ ) अक्षर का उच्चारण पुरुष मध्यम वृत्त से करता उतने काल को नाक्षत्रिक विनाडिका कहते हैं। एक रात्रि में म ध्यान्हिक रेखा पर कोई स्थिर तारा दीख पड़े-उस समय से उसके दूसरे रात्रि को उसी रेखा पर उक्त तारा दीख पड़े, उतने मय को नाक्षत्रिक अहोरात्र कहते हैं। इस के ६० वें अंश को नाक्षत्रनाडिका कहते हैं। नालिका के ६० वें भाग को विनाडिका कहते हैं। जितने काले में पुरुष छः श्वास करता उतने काल को नाक्षत्रिक विनाडिका कहते हैं। प्रर्थात् ६० गुरु अक्षर के प- रिमाण एवं ६ श्वास के परिमाण से-जो काल होता वह परस्पर तुल्य होता है। एवं कालविभागः क्षेत्रविभागस्तथा भगणात् ॥ २ वर्षात्कालविभाग एवमुक्तः । भंगणारक्षेत्रविभागोपि तथा ज्ञेयः। एत- दुक्तं भवति । द्वादशांश एको राशिर्भवति । राशस्त्रिंशांश एको भागः । भागस्य षष्ट्यंश एका लिप्ता । लिप्तायाष्षष्ट्यंश एका विलिप्ता। विलिप्तायाप्प- पट्यंश एका तत्परा । इति भगणादयः क्षेत्रात्मकाः। वर्षादयः कालात्मकः ॥ पशिचक्रे चरतो योर्ग्रहयोश्चतुर्युगे योगसंख्याज्ञानमार्याधुनाह । मा- ॥ १ ५० गीतिकापादः॥ भाः-इसी प्रकार भगण से क्षेत्रविभाग जानना । १२ अंश की राशि राशि के ३० वें भाग को १ भाग, १ भाग के ६० वें भाग को १ लिप्ता,१लिप्स के ६० वें भाग को १ विलिप्ता, १ विलिप्तिका के ६० वें भाग को १ तत्पर कहते हैं ॥२॥ भगणा द्वयोर्द्वयोर्ये विशेषशेषा युगे द्वियोगास्ते । द्वयोर्ग्रहयो? युगभगणसमूहौ तयो योर्विशेषशेषाः। द्वयोर्भगणसगृहयो रधिकादल्पे विशोधिते शिष्टा ये भगणास्ते युगे द्वियोगाः। द्वयोर्ग्रहयोश्चतुर्यु योगसंख्या भवति । तुल्यकालं मण्डलमारुह्य मन्दशीघगतिभ्यां चरतोहयोर्यद योगो भवति । तदा हि शीघगतेरेकपरिवर्तनाधिक्यं स्यात् । अतः परिवर्तना न्तरतुल्या मण्डले चरतोहयोर्योगास्स्युः ॥ युगे व्यतीपातसंख्यामपरार्धनाह । भाः-दो ग्रहों का जो युगभगणसंख्या हो, उन दोनों के विशेष शेर अर्थात् दोनों भगण समूह से अधिक से अत्यन्त को घटाने पर जो शेष रहे वही युग में 'द्वियोग , होंगा। दोनों ग्रहों की चतुर्युग में योगसंख्य होगी । तुल्य काल में मण्डल से चलकर मन्द और शीघ गति से चलते दो ग्रहों का जब योग होता है, तब शीघ गति से एक का परिवर्तन अधिव परिवर्तनान्तर तुल्य से मण्डल में चलते हुए ग्रहों के योग होते हैं। रविशशिनक्षत्रणास्संमिश्राश्च व्यतीपाताः ॥३॥ रविशशिनोनत्रिंगणा युगे यावन्तः प्रथमं रविभगणं गणयित्वा पुनशश शिभगणे च गणिते यावन्त इत्यर्थः । सम्मिश्राश्च । पुन योर्भगोक्ये च गणिते यावन्तस्तावन्तो युगे व्यतीपाता भवन्ति । रविशशिनो गणैक्यद्विगुणतुल्या इ- त्यर्थः । अत एतदुक्तं भवति। रविशशिनोोंगे चक्रार्ध एका व्यतीपातस्स्यात्। पुनस्तयोोंगे चक्रे द्वितीयो व्यतीपातस्स्यात् । इति । इह स्थूलतया व्यतीपात समस्तु मयेनोक्तः। “एकायनगतौ स्यातां सूर्याचन्द्रमसौ यदा । तद्युतौ मण्डले क्रान्त्योस्तुल्यत्वे वैधृताभिधः ॥ विपरीतायनयती चन्द्राी क्रान्तिलिप्तिकाः । समास्तदा व्यतीपातो भगणार्धे तयोर्युतिः ॥ " सू० सि० इति । अत्रापि भण्डलभगणार्धशब्दाभ्यां सूर्याचन्द्रमसोर्भिनगोलता तुल्य- गोलता च क्रमादभिहिता । इति वेद्यम् ॥उच्चनीचवृत्तस्य परिर्तमायानाह होता, अतएव

.
आर्यभटीये-
५१
भा:-जब सूर्य और चन्द्रमा भिन्न २ अयन में होते एवं दोनों के स्पष्ट
राशि प्रादि जोड़ने से ६ राशि की बराबर हो, तो व्यतीपात मामक पात
होता है। युग में जितने सूर्य के भगण हों, उनको प्रथम गिने पुनः चन्द्रमा के
भगम' को गिनने पर जितने भगण हों, दोनों को जोड़े और योगफल जितना
हो युग में उतने व्यतीपात नामक पात जानना ॥ ३ ॥
स्वोच्चभगणास्स्वभगणविशेषितास्स्वोच्चनीचपरिवताः ।
उच्चभगणस्वभगणयोरन्तरं स्वोच्चनीचपरिवर्तः । इत्यर्थः । चन्द्रस्य तुङ्गभग-
स्वभगणयोरन्तरं मन्दोच्चनीचपरिवर्तः। इतरेषान्तु षण्णां मन्दोच्चस्य स्थिरत्वा-
स्वभगणा एव मन्दनीचोच्चपरिवाः । कुजादीनां पञ्चानां शीघोच्चभगणस्वभ-
गणान्तरं शीघोच्चनीचपरिवर्तस्यात् । सर्वे ग्रहास्स्वोच्चस्य परितो भ्रमन्ति ।
तत्रोच्चासने ग्रहे स्वोच्चत्वमुच्चस्य सप्तमस्थाने नीचत्वञ्च । तभ्रमणमत्रोच्चनीच-
परिवर्त इत्युच्यते । तत्र मन्दोच्चादनुलोमेन भ्रमणं शीघोच्चात्प्रतिलोमेन च युगे
स्वोच्चनीचपरिवता अत्रोक्ताः। द्वियोगन्यायसिदस्यास्य पृथगभिधानं ग्रहाणा-
मुच्चनीचपरिवर्तप्रदर्शनाय ॥ गुरुवर्षाण्यपरार्धेनाह ।
भा:-अपने उच्चभगण को स्वभगण से घटाकर शेष स्वीच नीच परिवर्ज
होगा। चन्द्रमा का उच्चभगण और स्वभगण का अन्तर मन्दोच्च , नीच परि-
वर्त है । इतर छः ग्रहों का शीघोच्चभगण स्वराणान्तर-शीघोच्च नीच परि-
वर्त होगा। सब ग्रह अपने २ उच्च के चारों ओर दमण करते हैं।
गुरुभगणा राशिगुणास्त्वाश्वयुजाद्या गुरोरव्दाः ॥४॥
गुरोभंगणा राशिगुणा द्वादशभिर्गणिता यगे आश्वयजाद्या अब्दा इत्यर्थः।
अत्र वराहमिहिरः ।
"नक्षत्रेण सहोदयमस्तं वा याति येन सुरमन्त्री।
तत्सं वक्तव्यं वर्ष मासक्रमेणैव ॥
वर्षाणि कार्तिकदीन्यामेयाद्वयानुयोगीनि ।
क्रमशखिभन्तु पञ्चममुपान्त्यमन्त्यश्च यद्वर्षम् ॥” १० संहितायाम् ।
इति । मासक्रमेण कार्तिकादिमासक्रमेण वर्षक्रम इत्यर्थः ॥ सौरचान्द्रसा-
बननाक्षत्रमानविभागमाह।
भा-सहस्पति के भगण को १२ से गुणन कर-गुणनफल युग में कार्तिक ।
मादि वाहपत्यवर्ष होगा ॥ ४ ॥

५२ गीतिकापादः॥ रविभगणा. रव्यब्दा रविशशियोगा भवन्ति शशिमासाः। रविभूयोगा दिवसा भावाश्चापि नाक्षत्राः ॥५॥ यावता कालेन रवे गणपरिवृत्तिस्तावत्कालो .रष्यब्दाः। यावता कालेन रविशशिनोोगस्यात् तावत्कालश्चान्द्रमासः। एककालमारुह्य गच्छतोः पुनर्यो गकाल इत्यर्थः । रविभगणतुल्या युगे रव्यब्दाः। युगे रविशशियोगतुल्या युगे चान्द्रमासाः । रविभूयोगशब्देन रवैर्भू परिभ्रमणमभिहितम् । युगे रवे परिभ्रम- णतुल्या युगे भूदिवसाः । सावनदिवसा इत्यर्थः । युगे यावन्तो भावा नक्षत्र- मण्डलस्य परिभ्रमणानि तावन्तो-युगे नाक्षत्रदिवसाः। अत्र भचक्रश्चमणसिद्धा नाक्षत्रदिवसा उक्ताः । सतु चन्द्रमतिसिद्धाः ॥ अधिमासावमदिनान्याह । भा०-जितने काल में सूर्य का भगण पूरा होता है उतने काल को १ 'सौर वर्ष कहते हैं। जितने काल में सूर्य और चन्द्रमा का योग होता है- उतने काल को “ चान्द्रमास” कहते हैं । तुल्य समय में चलने से पुनः योग काल होता है। सूर्य्यभगण के तुल्य युग में सौरवर्ष होते हैं । युग में सूर्य और चन्द्रमा के योग की बराबर युग में चान्द्रमास होते हैं । युग में सूर्य का पृथिवी भ्रमण के तुल्य सावन धा भूदिवस होते हैं। युग में जितने नक्षत्र मण्डल का आवर्त अर्थात् भ्रमण होता, उतने ही युग में नाक्षत्र दि- वस होते हैं॥५॥ अधिमासका युगे ते रविमासेभ्यो ऽधिकास्तु ये चान्द्राः। शशिदिवसा विज्ञेया भूदिवसोनास्तिधिप्रलयाः ॥६॥ युगरविमासहीना युगृचान्द्रमासा युगेऽधिमासास्स्युः। युगभूदिवसोना युगचान्द्रदिवसा युगे तिथिप्रलयाः। अवमदिवसा इत्यर्थः मनुष्यपितृदेवानां संवत्सरप्रमाणमाह । भा०:-युग के सौरमास से युग के चान्द्रमास को घटाने पर युग में प्र- धिमास की संख्या निकल पावेगी । युग के सौरमास से युग के चान्द्र दिन घटाने पर युग में तिथि क्षय अर्थात् अवम वा क्षय दिन होंगे ॥ ६ ॥ रविवर्ष मानुष्यं तदपि त्रिंशद्गुणं भवति पित्र्यम् । पित्र्यं द्वादशगुणितं दिव्यं वर्ष समुद्दिष्टम् ॥ ७॥ रविवर्ष मानुष्यं वर्ष भवति। (मानुष्यं वर्ष त्रिंशद्गुणितं पित्र्यं वर्ष भवति)। पित्र्यं वर्ष द्वादशगुणितं दिव्यं वर्ष भवति । अत्र सौरमानेन पि- यमुदितं शालान्तरे तु चान्द्रेणोदितम् । तथाच मयः ६ ५३ वर्षको ३० से गुणन । युग आर्यभटीये- 'त्रिंशता तिथिभिर्मासश्चान्द्रः पिश्यमहः स्मृतम् । सू० सि० इति ॥ ग्रहासां युगकालं ब्राह्मदिनकालञ्चाह । भा:-सौर वर्ष को मानुष्य वर्ष भी कहते हैं। मानुष्य करने पर पिज्यवर्ष होता है। और पियवर्ष को १२ से गुणन करने पर दिव्यवर्ष होता है। यहां सौरमान से पिश्यदिन कहा है परन्तु सूर्यसि- द्वान्त श्रादि ग्रन्थों में चान्द्रमान से कहा गया है ॥७॥ दिव्यं वर्षसहस्र ग्रहसामान्यं युगं द्विषट्कगुणम् । अष्टोत्तरं सहस्रं ब्राह्मो दिवसो ग्रहयुगानाम् ॥८ दिव्यं वर्षसहसं द्विषट्कगुणं द्वादशगुणितं ग्रहसामान्यं युगं भवति । सर्वे- षां ग्रहाणां युगमित्यर्थः । युगादौ सर्वषां ग्रहाणा मण्डलादिगतत्वात्तेषां म- ध्यमानयने युगविशेषो नास्तीति सामान्यशब्देन द्योतितम् ॥ कालस्योत्सर्पि- श्यादिविभागमाह। भा:-१००० दिव्यवर्ष को १२ से गुणन कर गुणनफल ग्रह सामान्य युग होगा। अर्थात् सब ग्रहों का युग होगा। की आदि में सब ग्रहों को म यडल के आदि में होने से इन के मध्यानयन में कोई युग विशेष नहीं है ॥८॥ उत्सर्पिणी युगाधं पश्चादवसर्पिणी युगार्धचं। मध्ये युगस्य सुषमादावन्ते दुष्पेमेन्दच्चात् ॥ ६ ॥ * अस्थार्थो व्याख्याकारेण न प्रदर्शितः। अतो भटेप्रकाशिकायां यदुक्तं सदत्र लिख्यते । यस्मिन् काले प्राणिनामायुर्यशोवीर्यादीन्युपचीयन्ते स काल उत्सर्पिणीसंशः । यस्मिन्नपचीयन्ते सोग्वसर्पिणीसंशः । युगस्य पूर्वार्धमुत्सर्पि- शोकालः । अपरार्धमवसर्पिणीकालः। युगस्य मध्यमस्त्रयंशः समकालः । श्राद्य- म्ती (सुषमा ) दुष्षमासंज्ञौ त्र्यंशौ। एतत्सर्वमिन्दूश्चात्प्रभृति प्रतिपत्तव्यम् । अस्यार्थोऽभियुक्तैर्निरुप्य वक्तव्यः । इति प्रकाशिकायां व्याख्यानम् । अत्र इन्दू चात्प्रभृति प्रतिपत्तव्यमित्यनेन किमुक्तमिति न जानीमः । उक्तार्थस्य ग्रहगणि- तोपयोगित्वमपि न पश्यामः । एवं वार्थः । इन्दूच्चात्प्रभृति गतिमतां गतिर्यु- गाद्य उत्सर्पिसी.। अपराधैवसर्पिनी मध्ये समा च। मध्यकालावस्थिति- प्रदेशादूर्ध्वमधो वा ग्रहाणामवस्थितियुगान्तयोर्भवति । अतो मध्यमगतेर्भेद- स्स्यात् । तस्मात्काले-काले निरुप्य मध्यमसंस्कारः कार्य इत्यर्थः । अथवा । * भटंदीपिकापुस्तकद्वये सुषमा, चादावन्ते च दु० इत्यपपाठः । ।

५४ । . गीतिकापादः॥ इन्दूच्चात्प्रभृति यान्युच्चानि मन्दोच्चानि शीघोच्चानि च भवन्ति तेषां यावस्थि- तिः । सा उत्सर्पिणी समा च स्यात् । मध्ये काले यत्रावस्थितिसञ्चानां भवति। तस्मात्प्रदेशादूर्ध्वमधो वा युगाद्यन्तयोरेव स्थितिर्भवतीत्यर्थः । तेन वृत्तभेदा- स्स्यात् वृत्तभेदात् स्फुटभेदस्स्यात् । अतः-काले काले निरुप्य वृत्तसंस्कारः कार्य इत्यर्थः । इति । शाखप्रणयनकालं तत्काले स्ववयःप्रमाणञ्च प्रदर्शयति । भा:-इस का अर्थ व्याख्याकार ने नहीं किया; इस लिये भटप्रकाशिका में जैसे लिखा है उसी प्रकार-भावार्थ यहां लिखा जाता है, जिस समय प्राणियों की आयु, यश, वीर्य आदि की वृद्धि होती है उस काल को “ उत्सर्पिणी" काल कहते हैं और जिर्स ससय प्राणियों के प्रायु वीर्य्य आदि का ह्रास होता है, उसे 'अपसर्पिणी' काल कहते हैं । युग के पूर्वार्द्ध को उत्सर्पिणी और अ- पराई को अपसर्पिणी कहते हैं । युग के मध्यम व्यंश को सम काल कहते हैं। आदि और अन्त को ( सुषमा ) दुष्षमा त्र्यंश . कहते हैं, इन सब को “ इन्दू पात् प्रभृति प्रतिपत्तव्यम्” इस वाक्य से क्या अभिप्रेत है सो नहीं ज्ञात होता और न इस पूरे सूत्र से गणित में प्रयोजन जान पड़ता है ॥९॥ षष्ट्यब्दानां षष्टिर्यदा व्यतीतात्रयश्च युगपादाः। त्र्यधिका विंशतिरब्दास्तदेह मम जन्मनो ऽतीताः॥१०॥ इह वर्तमानेष्टाविंशे चतुर्युगे चतुर्भागत्रय षष्टयब्दानां षष्टिश्च यदा गता भवन्ति । तदा मम जन्मनः प्रभृति व्यधिका विंशतिरब्दा गता भवन्ति । वर्त- मानयुगचतुर्थपादस्य षट्छताधिकसहसत्रयसम्मितेषु सूर्याब्देषु गतेषु सत्सु - योविंशतिवर्षण मया शास्त्रमिदं प्रणीतमित्युक्तं भवति । अत्राह प्रकाशिका- कारः । अस्यायमभिप्रायः । अस्मिन् काले गीतिकोक्तभगणैराशिकेनानीता ग्रहमध्यमोच्चपातास्स्फुटारस्युः । इत उत्तरं तथानीतेषु तेषु सम्प्रदायसिद्धस्सं- स्कारः कार्यः । इति । तथाच तच्छिष्यो लल्लाचार्यः । "शाके नखाब्धिरहिते शशिनोक्षदर्स स्तत्तुङ्गतः कृतशिवस्तमसष्षडङ्कः। शैलाब्धिभिस्सुरगुरोर्गुणिते सितोच्चा- छोध्यं त्रिपञ्चकुहतेधशाक्षिभक्ते ॥ स्तम्बरमाम्बुधिहते क्षितिनन्दनस्य- सूर्यात्मजस्यगुखितेग्म्बरलोचनैश्च । । . .

आर्यभटीये- व्योमामिवेदनिहते विदधीत लब्धम् । शीतांशुसूनुकुजमन्दकलासु वृद्धिम् ॥” धीवृद्धिदतन्त्रे । इति । अभ्रशराक्षितुल्यस्सर्वेषां हारकः कुजशनिशशीकलासु वृद्धिर्योज्यं शेषकलाभ्यश्शोध्यम् । एष संस्कारश्शकाब्दाख्यानातीव भिन्नः । अत्र शकाब्दा- चन्द्र यमाब्धिशोधनं युक्तं तदनुक्तम् । नखाब्धिशोधनं यदुक्तं तदुक्तिस्सौकर्या- येति वेद्यमिति प्रकाशिकाकारेणोक्तम् । अयन संस्कारश्च प्रदर्शितः । "कल्यब्दात् खखषट्कृतिहीनाद्वसुशून्य नागशरभक्तात् । शेष द्विवाणशक्रेः पदं भुजाब्दा द्विसंगुणिताः॥ शशिसूर्यहृता लब्धं भागादिफलं भुजाफलवत् । ऋणधनमयनध्रु वयोः कुर्यात्ते दृक्समे भवतः ॥" इति । पदप्रदेशेषु द्विषाणशक्राब्देषु गतभाग ओज पदे भुजाब्दः। युग्मपदे त्वेष्यो भुजाब्दः । भुजाफलवत् । मेषादावणं तुलादौ धनमित्यर्थः । अयनवय- गध्रुवयो राशित्रये राशिनवके चर्णधनञ्चेत्यर्थः । तथाभूतेऽग्यनावसानमित्युक्तं भवति । युगाद्यारम्भकालसाम्यं कालस्यान्त्यच्च प्रदर्शयति । भा:-इस वर्तमान अट्ठाईसवीं चौयुगी के चतुर्थ भाग में से तीसरे भाग के ६० वर्ष वीतने पर मेरा ( आर्यभटका ) जन्म हुआ। और मेरे वर्ष वीते हैं। वर्तमान युग के चतुर्य पाद के ३६०० सौर वर्ष धी- मेरी २३ वर्ष की उमर हुई-इसी समय मैं ने इस ग्रन्थ को रचा। इस पर प्रकाशिकाकार ने लिखा है कि इस गीतिकोक्त भगण द्वारा राशिक से लाये हुए-ग्रहमध्य उच्च, पात, और स्फुट होते हैं। इस के उसप्रकार लाने पर सम्प्रदाय सिद्धसंस्कार करना चाहिये ॥१०॥ युगवर्षमासदिवसास्समं प्रवृत्तास्तु चैत्रशुक्लादेः । कालो ऽयमनाद्यन्तो ग्रहभैरनुमीयते क्षेत्रे ॥ ११ ॥ सर्वेषां मण्डलान्तर्गतत्वाद्युगादौ सौरचान्द्रादीनां युगपत्प्रवृत्तिः ॥ अना- द्यन्तः कालः क्षेत्रे गोले स्थितैर्ग्रहभैरप्यनुमीयते । एतदुक्तं भवति । यद्यप्यनाद्य- न्तः कालस्तथापि ज्योतिश्चक्रस्थैरुपाधिभूतैः कल्पमन्यन्तरयुगवर्षमासदिवसादि- रूपेण परिच्छित इति । ग्रहाणां समगतित्वमाह । भव-आकाशमण्डल में सब ही सौर, चान्द्र, आदि की एक साथ युग की प्रादि में प्रवृत्ति हुई। अमाद्यन्त,काल, गोल में स्थितग्रहों और नक्षत्रों काल से तने पर ।

गीतिकापादः॥ द्वारा भी अनुमान होता है। यह कहा जाता है कि यद्यपि अनाद्यन्त काल है तथापि ज्योतिश्चक्रस्य उपाधिभूत द्वारा कल्प, मन्वन्तर, युग, वर्ष, मास, दि वस, आदि रूप से परिच्छिन है ॥११॥ षष्द्या सूर्याब्दानां प्रपूरयन्ति ग्रहा भपरिणाहम् । दिव्येन नभःपरिधिं समं भ्रमन्तस्वकक्ष्यासु ॥ १२ ॥ सूर्याव्दानां षष्ट्या सर्व ग्रहा भपरिणाहं नक्षत्रमण्डलं पूरयन्ति । तावता कालेन तत्तुल्ययोजनानि गच्छन्तीत्यर्थः । दिव्येन नभःपरिधिम् । दिव्येन युगेन ग्रहसामान्ययुक्तेन चतुर्युगेन भभःपरिधिमाकाशकक्ष्यां परिपूरयन्ति। तत्तुल्यानि योजनानि गच्छन्तीत्यर्थः । समं भ्रमन्तरस्वकदयासु । सर्वे ग्रहा दिने-दिने सुल्य योजनानि स्वकदयायां भ्रमन्तस्सन्त एवं भपरिणाहं नमःपरिधिञ्च पूरयन्ति । समगतीनां मन्दशीघगतित्वं कक्ष्याभेदागवतीत्याह । भा०:-६० सौर वर्ष में सब ग्रह नक्षत्रमण्डल, को पूरा भ्रमण करते हैं अर्थात् इतने समय में उसके तुल्य योजन चलते हैं। दिव्ययुग द्वारा अर्थात् चतुर्युग करके आकाश कइया को पूरा करते हैं । अर्थात् उसके तुल्य योजन जाते हैं। सब ग्रह दिन २ तुल्य योजन अपनी २ कक्षा में परिभ्रमण करते २ इस प्रकार आकाश कक्षा को पूरा करते हैं ॥ १२ ॥ मण्डलमल्पमधस्तात् कालेनाल्पेन पूरयति चन्द्रः । उपरिष्ठात्सर्वेषां महच्च महता शनैश्चारी ॥ १३॥ सर्वेषां ग्रहाणामधस्ताद्गच्छंश्चन्द्रस्स्वमण्डलमल्पयोजनमल्पेन कालेन पूर- यति । अन्यग्रहमण्डलापेक्षया मण्डलारपत्वम् । अन्यग्रहमण्डलपूरणापेक्षया का- लस्यारूपत्वच्च । सर्वेषां ग्रहाणामुपरिष्टाद्गच्छञ्छनैश्चरस्स्वमण्डल महदधिकयो- जनं महता कालेन पूरयति ॥ राशिभागादिक्षेत्राणां प्रमाणं तत्तन्मण्डलानुसा- रेणेत्यत श्राह। भा:-सब ग्रहों के नीचे चलता हुमा चन्द्रमा थोड़े समय में अल्प योजन पूरा करता है, अन्य ग्रहों की अपेक्षा इसका मण्डल छोटा होने से मण्डल को पूरा करने में थोड़ा समय लगता है। सब ग्रहों के ऊपर चलता हुआ शनैश्चर अपने बड़े मण्डल के अधिक योजन के अधिक काल में पूरा करता है ॥१३॥ अल्पे हि मण्लेऽल्पा महति महान्तश्च राशयो ज्ञेयाः । अंशाः कलास्तथैव विभागतुल्यास्स्वकक्ष्यासु ॥ १४ ॥ .

५५ आर्यभटीये- अल्पतेने मण्डले राश्यादयोऽल्पक्षेत्राः । महति भण्डले राश्यादयो महा- न्तः । स्वकक्ष्यासु विभागंतुल्याः । स्वकक्ष्यायाः द्वादशांगतुल्यो राशिः । राशि- क्षेत्रत्रिंशांशतुल्यक्षेत्रो भागः । तथा कलादयः । एवं स्वकल्या प्रकल्पितविभा- गतुल्या रांश्यादयः । नमत्रमण्डलादधोगतानां ग्रहकक्ष्याणा क्रममाह । भा:-अल्प क्षेत्र में मण्डल में राशि आदि अल्पक्षेत्र होते हैं। बड़े म. बडल में राशि आदि बड़ी होती है। अपनी कक्षा में विभाग तुल्य २ होते हैं। अपनी २ कक्षा के १२ वां अंश एक राशि के तुल्य होलाहै। राशि क्षेत्र ३० अंश के तुल्य है । एवं अपमी २ कक्षा में प्रकल्पित विभाग तुल्य राशि प्रादि हैं ॥१४॥ भानामधश्शनैश्चरसुरगुरुभौमार्कशुक्रबुधचन्द्राः। तेषामधश्च भूमिर्मधीभूता खमध्यस्था ॥ १५ ॥ नक्षत्रकक्ष्यावस्थितानां भानामधः क्रमेण शनैश्चरादयस्त्वकक्ष्यायां घरन्ति । तेषां ग्रहाणामधस्स्थिता भूमिः खमध्यस्था मध्यस्था । आकाशमध्ये तिष्ठति। तेषां ग्र- हाणां मेधीभूता भूमिः । मेधी 'नास खलमध्ये स्थितो धान्यमर्दकानां बलीव- दकादीनां बन्धनार्थ स्थापितस्स्थूलशंकुः । यथा बलीबर्दमहिषादयस्तं शंकुम् मध्यं कृत्वा तस्य परितो भ्रमन्ति । तथा भानि ग्रहाश्च खमध्ये स्थितां भूमि मध्यं कृत्वा तस्याः परितो भ्रमन्ति । इत्यर्थः । अत्र निरक्षदेशमङ्गीकृत्योर्ध्वा- धोविभागः कृतः । ग्रहाणां मेधीभूताया भूमेः परितो भ्रमणतस्तु मेरुमध्यम- ङ्गीकृत्य । उक्तेन कक्ष्याक्रमेणैव कालहोराधिपत्यं दिनादिपत्यञ्च प्रदर्शयति । भा:-नक्षत्रकता अवस्थित नक्षत्रों के नीचे क्रम से शनिचर, वहस्पति, मङ्गल, शुक्र, बुध, चन्द्रमा, अपनी कक्षा में चलते हैं, इन ग्रहों के नीचे भूमि आकाश में है। इन ग्रहों के मेधीभूत भूमि है। जिस प्रकार कृषक ( किशान लोग ) लोग धान्य आदि को देमन भरने के लिये एक काण्ड वा वांश का बड़ा लग्गा पृथिवी में गाड़ कर उस में दश बीस वा जितनी इच्छा हो बैलों को बांध देते हैं-और बैंल सब उसी मेधी वा मेहा को मध्यस्थ करके घूमते हैं, उसी प्रकार इस पृथिवी को मेधी मान कर उस के धारी ओर नक्षत्रादि और सब ग्रह भ्रमण करते हैं ॥ १५ ॥ सप्तते होरेशाश्शनैश्चराद्या यथाक्रमं शीघ्राः । शीघ्रक्रमाच्चतुर्था भवन्ति सूर्योदयादिनपाः ॥ १६ ॥ उक्ताश्शनैश्चरादयो यथाक्रमं शीघ्राः शीघ्रगतयो भवन्ति । कक्ष्याक्रमेणे- ५८ . गीतिकापादः ॥ तसिध्यति । एवं यथाक्रमं शीघ्रारसन्त एते शनैश्चरादयो यथाक्रमं होरेशा कालहीरेशा भवन्ति । वाराधिपस्य प्रथमहोरा । पुनस्तस्मादुक्तक्रमेण रात्री वाराधिपपश्चमस्य प्रथमहोरा । पुनस्तस्मादुक्तक्रमेण । इत्यर्थः । उक्ताच्छीघ्रक- माच्चतुर्थास्सूर्योदयमारभ्य दिनपा भवन्ति । शनैश्चरवारादुत्तरवार उक्तक्रमेण शनैश्चराच्चतुर्थोऽर्को वाराधिपः । तत उपरिगतबारेऽर्काच्चतुर्थश्चन्द्रो धाराधियः । एवं परेऽप्युक्तक्रमेण चगुर्थश्चतुर्थास्सूर्योदयमारभ्य वाराधिपा भवन्ति।मध्यपहस्य दृग्वैषम्यात्तत्स्फुटीकरणमारभ्यते। तत्र दृग्वैषम्यकारणं प्रदर्शयति । भा:-उक्त शनैश्चर आदि यथा क्रम से शीघ्र गति वाले होते हैं। कक्षा क्रम से यह सिद्ध होता है एवं यथा क्रम से शीघ्र होने से ये शनैश्वर श्रादि यया क्रम से ' होरेश , एवं काल होरेश होते हैं। वाराधिप की प्रथम होरा, पुनः उससे उक्त क्रम से रात्रि में पाराधिप पञ्चम की प्रथम होरा होती है। पुनः उससे क्रम से उक्त शीघ्र क्रम से सूर्योदय प्रारम्भ करके चतुर्थ दिनपति होता है । शनैश्वरयार से उत्तर वार उक्त क्रम से शनैश्चर से चतुर्थ सूर्य्य वारा- धिप होता है। उससे उपरिगति वार में सूर्य से चौथा चन्द्रमा वाराधिप हुआ । इस प्रकार पर में भी उक्त क्रम से धतुर्थ २ सूर्योदय से लेकर वारा- धिप होते हैं ॥ १६॥ कक्ष्याप्रतिमण्डलगा भ्रमन्ति सर्व ग्रहास्स्वचारेण । मन्दोच्चादनुलोमं प्रतिलोमञ्चैव शीघ्रोच्चात् ॥ १७ ॥ स्फुट एक एव ग्रहो भवति । तस्य विषमगतित्वात् तद्गतिसिद्धये समग तिमध्यमाख्यो ग्रहः पृथक् कल्प्यते । तत्र भूमध्यकेन्द्रे कक्ष्याख्यमगडले मध्यर ग्रहस्सदा स्वचारेण मध्यमगत्या भ्रमति गच्छति । स्फुटग्रहस्तु भूमध्यातिका स्तकेन्द्र प्रतिमण्डलाख्ये मरडले स्वचारेण मध्यमगत्यैव भ्रमति गच्छति । अथव स्वचारेण कक्ष्यामण्डलगतो मध्यमग्रहो मध्यमगत्या दूग्विषये चरति । प्रति मगडलगतस्स्फुटग्रहस्स्वचारेण स्फुटगत्या दूग्विषये चरति । इति योजना । म न्दोचादनुलोमम् । यत्र-यत्र मन्दोच्चमवतिष्ठते तत्तत्स्थानादंनुलोमं दिने-दिने केन्द्रभुक्तया गच्छति । यत्र-यत्र शीघ्रोच्चमवतिष्ठते तत्तत्स्थानात्प्रतिदिन स्वशीघ्रगत्यन्तरेण तुल्यकेन्द्रगल्या प्रतिलोमं गच्छति । प्रतिमखलप्रमाणं तत्याननवाह। भा:- स्फुट एक ही ग्रह होता है। उसकी विषम गतित्व से उस गति की सिद्धि वा निश्चय के लिये " समगति , मध्यम नाम से ग्रह की ५९ आर्यभटीये- पपक कल्पनां कियी जाती है। उसमें भूमध्य केन्द्र पर कक्षाख्य मण्डल में म- ध्यमग्रह सदा अपनी मध्यमगति से चलता है। स्फुट ग्रह तो भूमध्य केन्द्र को अतिक्रम ( नांघ कर ) कर प्रति मण्डल वा वृत्ताभास में अपनी गति से भ्रमख करता है। अथवा अंपनी गति से कक्षामण्डलगत मध्यग्रह मध्यगति से दूगविषय में ( देखने में ) चलता है। ऐसी योजना है। जहां २ मन्दोच्च रहता है उस २ स्थान से अनुलोम ( सीधी या सम ) गति से दिन २ केन्द्र भुक्ति से चलता है । और जहां २ शीघ्रोच्च ठहरता है। उस २ स्थान से प्रति दिन स्व शीघ्र गत्यन्तर से तुल्य केन्द्र गति से प्रति लोम (विषम ) गति से चलता है ॥१७॥ कक्ष्यामण्डलतुल्यंस्व-स्वं प्रतिमण्डलं भवत्येषाम् । प्रतिमण्डलस्य मध्यं घनभूमध्यादतिक्रान्तम् ॥१८॥ कक्ष्यामण्डलं हि सर्वेषामाकाशकदयातस्वभगणैर्लब्धं स्यात् । प्रदर्शितञ्च तत् खयुगांशे ग्रहजव इति । ( दशगीतिकायाम् ४ ) । स्व-स्वं प्रतिमण्डलमपि खस्वकदयामण्डलतुल्यं भवति । कदयामण्डलस्य मध्यं धनभूमध्ये भवति । भू- मेरन्तर्गतो यो मध्यभागस्तत्रेत्यर्थः । प्रतिमण्डलस्य मध्यन्तु तस्मावनभूमध्या- दतिक्रान्तं भवति । धनभूमध्यादुचनीयवृत्तव्यासार्धतुल्यान्तरे । इत्यर्थः । सद- पति च। प्रतिमण्डल भूमध्ययोरन्तरालप्रमाणं मध्यस्फुटयोरन्तरालप्रमाणञ्चाह। भा:-कक्षामण्डल सब ग्रहों का आकाशकका से अपने २ भगणों द्वारा जात होता है। अपना २ प्रति मण्डल भी अपने २ कक्षामण्डल के तुल्य होता है। कक्षामण्डल के मध्य में घनभूत. मध्य में होता है अर्थात जहां भूमि के अन्तर्गत जो मध्य भाग हो वहां प्रतिमण्डल'का मध्यभाग तो धनभूमध्य से प्रति क्रान्त होता है। अर्थात् घनभूमध्य से उच्च नीच वृत्त व्यासाई तुल्य अन्तर पर होता है ॥ १८ ॥ प्रतिमण्डलभूविवरं व्यासाधं स्वोच्चनीचवृत्तस्य । वृत्तपरिधौ ग्रहास्ते मध्यमचारं भ्रमन्त्येव ॥ १६ ॥ गीतिकासु यन्मन्दवृत्तमुक्तं तन्मन्दकर्मण्युचनीचवृत्तं स्यात् । तत्रोक्तं शीघ्र- पत्तं शीघ्रकर्मण्युञ्चनीयवृत्तं स्यात् । तस्य स्योचनीयवृत्तस्य व्यासाधं प्रतिमा- लभूनध्ययोरन्तरालमपि भवति । गीतिकोक्तवृत्तानि ज्याकर्णक्षेत्रसाधितानि । श्रतो भूमध्य केन्द्रं कृत्वा त्रिज्याव्यासार्धन कक्ष्यामण्डलमालिख्य तन्मध्यात्स्यो- .

गीतिकापादः॥ चनीचत्तव्यासार्धन्तरे केन्द्रं कृत्वा त्रिज्यातुल्यव्यासार्धन वृत्तमालिखेत् । तत्प्र- तिमण्डलं भवति । प्रतिमण्डले योन्नि दृश्यमानस्साक्षाद्ग्रहश्चरति । कल्पितो मध्यमग्रहकक्ष्यामण्डले चरति । कक्ष्यामण्डले यत्र मध्यमग्रहोग्वतिष्ठते तत्र केन्द्रं कृत्वा स्वक्त्तव्यामार्धन स्वोच्चनीचत्तमालिखेत् । तस्य परिधौ ग्रहा मध्य- मचारं भ्रमन्ति । मध्यमास्तस्मिन्वृत्ते मध्यमगत्या भ्रमन्ति चरन्ति । उच्चानि तस्मिन्स्वगत्या चरन्ति । इत्यर्थः । तस्मिन्वृत्त उच्चमध्यमयोरन्तरालभवा भुज- ज्यायत्प्रमाणा तत्प्रमाणा व्यासार्धमण्डले मध्यमस्फुटयोरन्तरालभुजज्या भवति। क्षेत्रमानेनात्र तुल्यता नतु लिप्तादिसंख्यया । उच्चनीचवृत्ते मध्यमोच्चानां चार प्रकल्प्य मध्यमोच्चयोरन्तराजभवभुजाज्यातुल्यं मध्यमस्फुटयोरन्तरालमिति प्र. कल्प्यम् । इत्यर्थः । गीतिकोक्तवृत्तानां ( दशगीतिकायाम् ।) कार्धापवर्ति- तत्वात्परिलेखनकर्मणि त्रिज्या कार्धापवर्तिता ग्राह्या स्यात्। तत्र भ्रमणप्रकारमाह। भा---गीतिकाओं में जो मन्दवृत्त कहा है वह मन्दकर्म में उच्च, नीच, वृत्त है। वहां का कहां शीघ्रवृत्त शीघ्रकर्म में उच्च, नीच, वृत्त में हो। उसके स्वोच्च नीच वृत्त का व्यासार्द्ध प्रतिमण्डल और भूमण्डल के बीच का भी होता है। गीतिकोक्त वृत्त सब ज्याकर्ण क्षेत्र साधित है। अतएव भूमध्य के केन्द्र करके त्रिज्याव्यालाई द्वारा कक्षामण्डल लिखकर उसके बीच से खोच्च नीच वृत्त व्यासान्तिर पर केन्द्र करके त्रिज्या तुल्य व्यासाई द्वारा वृत्त लिखे। वह प्रति मण्डल होगा। प्रतिनरडल में आकाश में दृश्यमान साक्षात् ग्रह च- लता है। कल्पित मध्य ग्रह कक्षा मण्डल में चलता है। कक्षामण्डल में जहां मध्यमग्रह रहता है, वहां केन्द्र मानकर स्ववृत्त व्यासाई द्वारा स्वोच्च नीच वृत्त लिखे । उस के परिधि में मध्यमगति से ग्रह सब चलते दीखेंगे। और उच्च सर उसमें अपनी गति से चलते दीखपड़ेगे ॥ १९ ॥ यश्शीघ्रगतिस्त्वोच्चात् प्रतिलोमगतिस्स्ववृत्तकक्ष्यायाम् अनुलोमगतिवृत्त मन्दगतिर्यो ग्रहो. भ्रमति ॥२२॥ यो ग्रहस्स्वोच्चाच्छीघ्रगतिर्भवति स्वस्वनीचोचवत्ताख्यकक्ष्यायां प्रतिलोमग तिर्भमति । तत्र जाता गतिः प्रतिलोमेति कल्प्या । मध्यमादधोगतस्य स्फुट स्य मध्यमस्य चान्तरं तत्र जाता गतिभुजेत्यर्थः । यो ग्रहस्त्रोच्चान्मन्दगतिर्भ वति स स्ववृत्तेऽनुलोमं गच्छति । तस्मिम्वृत्ते जाता गतिभुजानुलोमेति कल्प्या। सत्र नध्यादुपरि स्फुटो भवतीत्यर्थः । अत्रोच्चादूर्ध्वगतराशिषट्करयो ग्रहरशी- . आर्यभटीये- ६१ प्रगतिरित्युध्यते। अधोगतराशिषट्कस्थो मन्दगतिरिति च । इति द्रष्टव्यम् । मध्यमात्स्फुटस्य प्रतिलोमानुलोमगतित्वमुक्तम् । उच्चनीचत्तस्य भ्रमणप्रकार तन्सच्यावस्थानञ्जाह । भा:-जो ग्रह अपने उच्च से शीघ्रगतिवाला होता है, वह अपने २ नीचोच्च वृत्त नामक कक्षा में प्रतिलोमगति से भ्रमण करता है। उससे उत्पन्न गति प्रातिलोम करके कल्पना करनी चाहिये । मध्यम से नीचे का स्फुट और म- ध्यम के अन्तर से उत्पन्न गति · भुजा , कहलाती है। जो ग्रह अपने उच्च से मन्दगति होता है-वह अपने वृत्त में अनुलोम चलता है। उस वृत्त में उत्पन्न गति का नाम 'भुजानुलोम , है । वहां मध्य से ' उपरिस्फुट होता है। यहां उच्च से उद्यंगति छः राशिस्थग्रह 'शीघ्रगति' कहा जाता है। अधोगत : राशिस्थ ग्रह 'मन्दगति , कहा जाता है। मध्यम से स्फुट का प्रतिलोम, अनु- लोम गति होना कहा गया ॥ २० अनुलोमगानि मन्दाच्छीघ्रात्प्रतिलोमगानि वृत्तानि। कक्ष्यामण्डललग्नस्स्ववृत्तमध्ये ग्रहो मध्यः ॥ २१ ॥ कक्ष्यामण्डले यत्र मध्यमग्रहस्तत्र केन्द्रं कृत्वा स्ववृत्तपरिलेखनं कार्यनि- त्यर्थः ॥ एवमुच्चयशात् स्फुटगतिः प्रतिदिनं भिन्ना । ततस्स्फुटगतिमिदुधर्थ स्फुटकर्म क्रियते । तत्रैकोच्चयोस्सूर्यन्द्वोरेकमेव स्फुटकर्म । ट्युचानां कुजादीना स्फुटकर्मणी द्वे भवतः। तत्र तेषां स्फुटकर्मद्ये कृतेपि कदापि दृग्भेदस्सम्भवति । मन्द शीघ्रयोः कल्यामण्ड लभेदात् प्रतिमण्डलभेदाच्च संभवति। तद्ग्भेदव्युदासायं मेवं क्रियते। कुजगुरुशनीनां प्रथमं मध्यान्मन्दफलमानीय तन्मध्यमे कृत्वा तस्माच्छीघ्रफलञ्चानीय तदर्थं तस्मिन्नेव कृत्वा तस्मान्मन्दफलं, सकलं केवलमध्ये कृत्वा तस्माच्छीघ्रफलञ्च सकलं तस्मिन्नेव क्रियते । सं स्फुटो ग्रहः । बुधश्रुक्रयो- स्तु प्रथमं मध्यमाच्छीघ्रफलमानीय तदर्घ मन्दोच्चे व्यस्तं कृत्वा तन्मन्दोच्चं म- ध्यमाद्विशोध्य मन्दफलमानीय तत्सकलं मध्यमे कृत्वा तस्माच्छीघ्रफलञ्च स- कलं तस्मिन्नेव क्रियते । स स्फुटस्स्यात्। इति । एतत्सर्वमार्यात्रयेण प्रदर्शयति। तत्र प्रथमं मन्दशीघ्रयोऋणधनविभागमार्यानोक्ता सार्धनार्यादयेन स्फुट- क्रमवाह। भा:--कक्षामण्डल में जहां मध्यग्रह रहता है वहां केन्द्र मानकर स्व- वृत्त लिखे। एवं उच्च वशतः स्फुटगति प्रतिदिन भिन्न २ होती है। उससे. स्फुटगति के निश्वयार्थ स्फुट कर्म होता है। उसमें एक उच्च वाले सूर्य और

तस्मादुत्पन्ना जीवा
गीतिकापादः॥
चन्द्रमा का एक ही स्फुटकर्म होता है। और दो उच्च ( शीघ्र मन्द ) वाले
मङ्गल प्रादि के दो स्फुटकर्म होते हैं। उसमें उन के दो स्फुटकर्म करने पर
भी कभी दूगभेद सम्भव होता है। मन्द और शीघ्र के कक्षामण्डल भेद से
एवं प्रतिमण्डल के भेद से सम्भव होता है । सो दंगभेद के परित्याग (व्यु-
दास ) के लिये किया जाता है । मङ्गल, बहस्पति, शनि, पहिले मध्य से मन्द
फल लाकर उसको मध्यम करके और उस से शीघ्र लाकर उसका आधा उसी
में करके उससे मन्दफल सब केवल मध्य में करके उससे शीघ्रफल सब उसी
में श्राजाता है। वह स्फुटग्रह होता है । बुध और शुक्र का तो पहिले मध्यम
से शीघ्र फल लाकर उसके 'आधे को मन्दोच्च में व्यस्त कर और उससे शीघ्र
फल सब उसमें किया जाता है। वही स्फुट होता है ॥ २१ ॥
ऋणधनधनक्षयास्स्युर्मन्दोच्चाव्यत्ययेन शीघ्रोच्चात्।
मन्दोच्चात् । मन्दोच्चहीनान्मध्यमादित्यर्थः ।
पद-
क्रमेख
ऋणधनधनक्षयारस्युः
। व्यत्ययेन शीघ्रोच्चात् । मध्यमहीनाच्छीप्रोच्चा-
दुत्पन्ना
जीवा व्यत्ययेन धनर्णर्णधनास्स्युरित्यर्थः । एतदुक्तं भवति । प्रथमपदे
मन्दभुजायाः क्रमज्याफलमृणं भवति । द्वितीयपदे कोट्या उत्क्रमन्याफलम्
तृतीयपदगतसम्पूर्णभुजाफलसंस्कृते ऋणं भवति । शीघ्र तु धनर्णव्यत्ययेन
भवति । इति । मान्ये मेषादौ भुजाफलमणं तुलादौ धनम्। शैघ्र सूचान्मध्य-
मस्य शोधन विधानान्मेषादौ धनं तुलादावणमित्येवार्थः ।
भा:--मध्यमहीन उत्पन्न जीवा पद क्रम से ऋण और धन मन्दोच्च से
धन और ऋण होता है। मध्यम हीन शीघ्रोच्च से उत्पन्न जीवा विपरीत भाव
से धन और ऋण, ऋण और धन होता है। इस का प्राशय यह है कि प्रथम
पद में मन्दभुजा की क्रमज्याफल ऋण होता है। द्वितीय पद में कोटी द्वारा
उत्क्रमज्या फल होता है। तृतीय पदगत सम्पूर्स भुजफलसंस्कृत में ऋण होता
है। शीघ्र में तो धन ऋण विपरीत भाव से होता है। मान्यकर्म में मेषादि
में भुभाफल ऋण, तुलादि में धन होता है। शैघ्रय में तो उच्च से मध्यम का
शोधन विधान मेषादि में धन होता है, तुलादि में ऋण होता है।
शनिगुरुकुजेषु मन्दादर्धमृणधनं भवति पूर्व ॥ २२ ॥
मन्दोच्चाच्छीघ्रोच्चादर्धमृणधनं ग्रहेषु मन्देषु ।
मन्दोच्चात्स्फुटमध्याश्शीघ्रोच्चाच्च स्फुटा ज्ञेयाः ॥२३॥

६३ आर्यभटीये- शनिगुरुमुजेषु नन्दीश्चात् सिद्धान्मन्दान्मन्दभुजाभलादधैं मेषादावणं तुलादी धनच भवति । पूर्व स्फुटकर्मण्येवमित्यर्थः । मन्दोच्चहीनान्मध्यमात्सिद्धान्मन्द फलादर्थं मध्यम ऋणं धनं वा यथाविधि कार्यमित्युक्तं भवति ॥ शीघ्रोच्चादर्ध- मुखधनं ग्रहेषु मन्देषु। शीघ्रोच्चान्मन्दफलार्धसंस्कृतमध्यहीनादुत्पन्नशीघ्रभुजा- फलादर्धमृणं धनं वा यथाविधि मन्देषु ग्रहेषु मन्दफलार्धसंस्कृतेषु शनिगुरुकुजा- मां मध्यमेषु कुर्यात् । मन्दोच्चात्स्फुटमध्याः। मन्दोच्चात् मन्दोच्चसिद्धमन्दफ- लसंस्कारादित्यर्थः । मन्दफलार्धशीघ्रफलार्धाभ्यां संस्कृतान्मध्यमान्मन्दोच्चं वि- शोध्य तस्मादुत्पन्नेन मन्दफलेन कृत्स्नेन संस्कृतः केवलमध्यः स्फुटमध्यमाख्यो भवति । एवं शनिगुरुकुजानां स्फुटमध्या भवन्ति। शीघ्रोच्चाच्च स्फुटा शेयाः । शीघ्रोच्चात्स्फुटमध्यमहीनादुत्पन्नेन शीघ्रफलेन कृत्स्येनं संस्कृतस्स्फुटमध्यस्स्फु- टग्रहो भवति । एवं शनिगुरुकुजानां स्फुटा शेयाः ॥ भाः-शनि, गुरु, मङ्गल में मन्दोच्च से सिद्ध मन्द से मन्द जाफलाई मेषादि में ऋण और तुलादि में धन होता है । पूर्व ही स्फुटकर्म में मध्यम से मन्दफल से प्राधा मध्यम ऋण या धन यथाविधि करना चाहिये । प्राशय यह है कि शीघ्रोच्च से अर्द्ध ऋण, धन ग्रहों में मन्द में शीघ्रोच्च से मन्द फलाई संस्कृत मध्य हीन से उत्पन्न शीघ्र भुजाफल अर्द्ध ऋण या धन यथाविधि मन्द ग्रहों में मन्दफलाई संस्कृत में शनि, गुरु, मङ्गल के मध्य करना चाहिये । म- न्दोच्च सिद्ध भन्दफल संस्कारादि । मन्दफलार्द्ध शीघ्रफलाई द्वारा संस्कृत मध्य से मन्दोच्च को घटा कर उस से उत्पन्न कृत्स्त्र मन्दफल द्वारा संस्कृत केवल मध्य स्फुट मध्य नामक होता है । एवं शनि, गुरु, मङ्गल, का स्फुट मध्य होता है। शीघ्रोच्च से स्फुट मध्य घटाकर, जो उत्पन्न सम्पूर्ण शीघ्रफल, उसके द्वारा संस्कृत स्फुट ग्रह होता है ॥ २२ ॥ २३ ॥ शीघ्रोच्चाद|नं कर्तव्यमृणंधनंस्वमन्दोच्चे। स्फुटमध्यौ तु भृगुबुधौ सिद्धान्मन्दात्स्फुटौ भवतः ॥२४॥ भृगुबुधयोस्तु शीघ्रोच्चान्मध्यमहीनादुत्पन्नं शीघ्रफलम!नं स्वमन्दोच्चे मेषादापूर्ण तुलादौ धनञ्च कार्यम् । शीघ्रविधिव्यत्ययेनेत्यर्थः । स्फुटमध्यौ तु भृगुबुधौ ‘सिद्धान्मन्दात् । एवंसिद्धान्मन्दान्मन्दोच्चाद्यन्मन्दफलं तेन सकलेन संस्कृतौ भृगुबुधमध्यमौ स्फुटमध्याख्यो भवतः । शीघ्रफलार्धसंस्कृतं मन्दोच्चं म- ध्यमाद्विशोध्य तस्मादुत्पत्रमन्दफलेन सकलेन संस्कृतो मध्यस्फुटो भवति । फ- .

६४ गीतिकापादः॥ लानयनप्रकारस्तु । मन्दकेन्द्रभुजाज्यां मन्दस्फुटवृत्तेन निहत्याशीत्या विभज लब्धस्य चापं मन्दफलं भवति । तथा शीघ्रकेन्द्रभुजज्यां शीघ्रस्फुटवृत्तेन निह त्याशीत्या विभज्य लब्धं व्यासार्धन निहत्य. शीघ्रकर्णन विभज्य लब्धस्य चार शीघ्रफलं भवति । कर्णस्तु तत्तत्केन्द्रादुत्पन्नभुजज्या, कोटिज्याच ववत्तेन निह त्याशीत्या विभजेत् । तत्र लब्धे भुजाकोटिफले मवतः । कोटिफलं मृगादी व्या साधै निक्षिप्य कादौ कोटिफलं व्यासार्धाद्विशोध्य वर्गीकृत्य तस्मिन् भुजाफ लवर्ग प्रक्षिप्य मूलीकुर्यात्।सको भवति। एवं सकृत्कृत एव शीघ्रकर्णस्स्फुटस्थ त् । मन्दकर्णस्तु विशेषितस्स्फुटो भवति । तत्प्रकारस्तु । प्रमथसिद्धं कर्णं भुजा कोटि फलाभ्यां निहत्य व्यासार्धन विभजेत् तत्र लब्धे भुजाकोटिफले कर्णसिद्ध भवतः । पुनस्ताभ्यां व्यासार्धन पूर्ववत् कर्णमानयेत् । तमपि कर्णं प्रथममशीत्या लब्धाभ्यां भुजाकोटिंफलाभ्यामेव निहत्य व्यासार्धन विभज्य भुजाफलं कोटि फलञ्चानीय ताभ्यां कर्णं साधयेत् । एवं तावत्कुर्यात् यावदविशेषकर्णलब्धिः । अविशिष्टो मन्दकर्णरस्फुटो भवति । वृत्तकर्म तु । भुजाज्यामोजयुग्मपदवत्तयो- रन्तरेण निहत्य व्यासार्धन विभज्य लब्धमोजपदवृत्ते धनमृणं कुर्यात् । श्रीजव तेग्न्यस्मान्नयू ने धनम्। अधिके ऋणम् । तत् स्फुटवृत्तं भवति । एतत्सर्वं कक्ष्या- प्रतिमण्डलगा इत्यादिभिः प्रदर्शितभेवेति भावः ॥ '"स्फुटविधियुक्तिस्सिध्येन्नैव विना छेद्यकेन विहगानाम् । तस्मादिह संक्षेपाच्छेद्यककर्म प्रदर्श्यते तेषाम् ॥ त्रिज्याकृतं कुमध्यं कदयावृत्तं भवेत्तु तच्छैघ्रम् । शीघ्रदिशि तस्य केन्द्रं शीघ्रान्त्यफलान्तरे पुनः केन्द्रम् ॥ कृत्वा विलिखेद्वृत्तं शीघ्रप्रतिमण्डलायमुदितमिदम् । इदमेव भवेन्मान्दे कृष्यावर पुनस्तु तत्केन्द्रात् ॥ केन्द्रं कृत्वा मन्दान्त्यफलान्तरे वृत्तमपिच मन्ददिशि । कुर्यात्प्रतिमण्डलमिदमुदितं मान्दं शनीड्यभू पुत्राः । मान्दप्रतिमण्डलगास्तत्कदयायां तु यत्र लक्ष्यन्ते । तत्र हि तेषां मन्दस्फुटाः प्रदिष्टास्तथैव शैघे ते। प्रतिमण्डले स्थितास्स्युस्ते लक्ष्यन्ते पुनस्तु शैघाख्ये । कल्यावृत्ते यस्मिन् भागे तत्र स्फुटग्रहास्ते स्युः एवं सिध्यति तत्र स्फुट युग्मं तत्र भवति दूग्भेदः । यत्र खगा लक्ष्यन्ते तत्रस्या लक्षिता यतीन्यस्मिन् ॥" .

१५ आर्यभटीये- क्रियतेन तन्निमित्तं मध्ये मान्दार्धमपिच शैघ्रार्धम् । शैघ्र मान्दं मान्दं शैघ्रश्चेति क्रमस्स्मृतोऽन्यत्र ॥ मान्दं कदयावृत्तं प्रथमं बुधशुक्रयोः कुमध्यं स्यात् । तत्केन्द्रान्मन्ददिशि मन्दान्त्यफलान्तरे तु मध्यं स्यात् । मान्दप्रतिमण्डलस्य तस्मिन्यत्र स्थितो रविस्तत्र । प्रतिमण्डलस्य मध्यं शैघ्रस्य तस्य मानमपिच गदितम् ॥ शीघ्रस्ववृत्ततुल्यं तस्मिंश्चरतस्सदा ज्ञशुक्रौ च । स्फुटयुक्तिः प्राग्वत्स्याद्रुग्भेदः पूर्ववद्भवेदिह च ॥ क्रियतेऽत्र तन्निमित्तं शैघ्राधं व्यत्ययेन मन्दोच्चे। तसिद्ध मान्दं प्राक् पश्चाच्छैघ्रञ्च सूरिभिः पूर्वैः ॥ इति ॥ भूताराग्रहविवरानयनायाह । भा:--शुक्र और बुध का तो मध्यम हीन शुक्रोच्च से उत्पन्न शीघ्रफल अझैन को स्वमन्दोच्च मेषांदि में ऋण और तुलादि में धन करना चाहिये अर्थात् शीघ्रोच्च के नियम के उलटा इस प्रकार सिद्ध भन्दोच्च से जो मन्दफल उन सब के साथ संस्कृतशुक्र और बुध ( मध्यम ) स्फुट मध्य होते हैं। शीघ्र फलाई संस्कृत मन्दोच्च को मध्यम घटाकर उससे उत्पन्न मन्दफल सब के साथ संस्कृतमध्य स्फुट होता है । फलान्यन प्रकार तो मन्दकेन्द्र भुजा की. ज्या को मन्दस्फुट वृत्त के साथ गुणनकर ८० से भाग देवे, भागफल धापीय मन्दफल होगा । उप्ती प्रकार शीघ्र केन्द्र भुजज्या को शीघ्रस्फुट वृत्त के साथ गुणनकर, गुणानफल में ८० का भाग देवे, भागफल शीघ्रफल होगा। कर्ण तो उस २ केन्द्र से उत्पन्न भुजज्या को एवं कोटीज्या को स्ववृत्त से गुणनकर ८२ का भाग देवे. भागलब्ध भुजाकल और कोटीफल होंगे। कोटीफल को सिंह (राशि) श्रादि में व्यासार्द्ध में मिलाकर, कर्कट ( राशि ) आदि में कोटीफल को व्यासार्द्ध से घटाकर, वर्गकर उसमें भुजावर्गफल को मिलाकर मूल करे तो कर्श होगा । एवं एक धार करने ही से शीघ्रकर्ण स्फुट होता है । मन्दकर्ण तो विशेषित स्फुट होता है । उन्न प्रकार प्रथम सिद्धकर्ण को भुमा कोटी. द्वारा गुणन कर व्यासार्द्ध में भाग देवे, भागफल भुजाफल, कोटीफल कर्ण सिद्ध होते हैं। मुनः उन दोनों से व्यासार्द्ध से पूर्ववत् कर्ण लाये । उस कर्ण को भी ८० द्वारा भाग देने पर लब्धि भुजाफल और कोटीफल से गुणन कर व्यासार्द्ध मे भाग देकर भुजाफल और कोटीफल को लाकर उनसे 4 मा RAHU LIBRARY .

के वृत्त ६६ गीतिकापादः॥ धन करे । यह क्रिया उस समय तक करे जब तक विशेष कर्ण लब्ध न हो अवशिष्ट मन्दकर्ण स्फुट होगा। वृत्तकर्म तो भुजज्या को प्रोजपद औ युग्मपद के अन्तर से गुणन कर व्यासार्द्ध से भाग देवे, भागफल प्रोज पद वृत्त में धन को ऋण करे । भोजपद वृत्त में धन को ऋण करे । श्री ओजवृत्त में अन्य से न्यून द्वारा धन और अधिक में ऋण । वह स्फुट या होता है ॥ २४॥ भूताराग्रहविवरं व्यासार्धहृतस्स्वकर्णसंवर्गः । कक्ष्यायां ग्रहवेगो यो भवति स मन्दनीचोच्चे ॥२५॥ अन्त्योपान्त्यस्फुटकर्मसिद्धयोश्शीघ्रकर्णमन्दकर्णयोस्संवर्गो व्यासाहिते भूताराग्रहविवरं भवति । भूमेस्ताराग्रहणाञ्चान्तरालं कलात्मकमित्युक्तं भवति । ताराग्रहाणां विक्षेपानयने भूताराग्रहविवरं भागहारो भवति । तत्र स्वपातो- नभुजज्यां स्वपरमविक्षिप्त्या निहत्य स्वेन भूताराग्रहविवरेण विभजेत् । तत्र लब्धं स्वविक्षेपो भवति । तत्रास्य विनियोगः कक्ष्यायामिति । अत्र प्रकाशि- काकारः । भूताराग्रह विवरव्यासार्धविरचितायां कदयायां यो ग्रहस्य जवस्सम- न्दनीचोच्चे भवति । तावत्प्रमाणायां कक्ष्यायां ग्रहो मन्दस्फुटगत्या गच्छती- त्यर्थः । इत्याह । अस्मान् किन्हवेतन्नोपपन्नमिति प्रतिभाति । अथवा योजना। कदयावृत्ते स्फुटग्रहस्य मध्यादधि भवति । एवं शीघ्र पीति । अथवा कक्ष्यायां गच्छतो ग्रहस्य प्रतिमण्डलतो बहिरन्तर्वा यावती परमा गतिस्तावस्प्रमाणव्या- सार्धं मन्दनीचोच्चवृत्तं भवति । एवं शीघ्रऽपीति ॥ भा:-तारा और ग्रहों के विक्षेप लाने में भूतारा ग्रह विवर भाग हार होता है। उसमें अपने पात से ऊन भुजज्या को स्वपरम विक्षिप्ति से अन्तर गुणन कर अपने भूतारा ग्रहं से भाग देवे भागफल स्वविक्षेप होता है। कक्षा वृत्त में स्फुट ग्रह का मध्य से होता है। एवं शीघ्र में भी अथवा कक्षा में चले ग्रह का प्रति मण्डल से वाहर या भीतर जितनी परमागति होती है उतने परिमाण व्यासाई मन्दनीचोच वृत्त होता है। इसी प्रकार शीघ्र में भी जानना ॥ २५ ॥ इति पारमेश्वरिकायां भददीपिकायां कालक्रियापादस्तृतीयः । :*::*:0 भवन्ति तदा - आर्यभटीय- अथ गोलपाद आरभ्यते । तत्रापमण्डलसंस्थानमाह । मेषादेः कन्यान्तं सममुदगपमण्डलार्धमपयातम् । तौल्यादेर्मीनान्तं शेषार्धं दक्षिणेनैव ॥१॥ मेषादिकन्यान्तै राशिभिरुपलक्षितमपमण्डलस्यार्धमुदगपयातम् । तौल्या- दिमीनान्तै राशिभिरुपलक्षितं शेषाधु दक्षिणेनापयातम् । सममपयातम् । ए- तदुक्तं भवति । मेषादेः क्रमेण कन्यादेरुत्क्रमेण च सममपयाति । मेषसमं कन्या या अपयानम् । वृषसमं सिंहस्य । इत्यादि । अपयानं हि मण्डलस्य क्रमेण भ- वंति । तथा तुलासमं मीनस्यापयानम्। वृश्चिकसमं कुम्भस्य। इत्यादि । मेषादेः कन्यान्ताच त्रिराश्यन्तरे परमापयानं भवति । चतुर्विंशतिभागाः परमापयानम्। भापक्रमो ग्रहांशा इति गीतिकासूक्तं तत् (श्लो०३i).अत्र मेषादिकन्यान्त- शब्दौ पूर्वस्वस्तिकापरस्वस्तिकयोर्गतराशिभागयोर्वाचको। अतो यदा धनात्मका अयनसंस्कारभागाः पञ्चदश मीनमध्यं पूर्वस्वस्तिकगतं कन्यामध्य- मपरस्वस्तिकगतम् । तदा मीनमध्यात् कन्यामध्यान्तमर्धमुदगपयातं शेषमधं दक्षिणतोऽपयातम् । यदा ऋणात्मकाः पञ्चदशभागा अयनाख्यास्युस्तदा मेष- मध्य पूर्वस्वस्तिकगतं तुलामध्यमपरस्वस्तिकगतम् । तदा मेषमध्यात्तुलामध्या- न्तमर्धमुदगपयातं शेषमधं दक्षिणतोऽपयातम् । इति वेद्यम् । अतएव मेषादितः प्रवृत्तेष्वपक्रमानयनायनसंस्कारः क्रियते ॥ प्रथापक्रममण्डलचारिण आह । भा०;-मेष राशि से कन्या तक अर्थात् मेष, वृष, मिथुन, कर्कट, सिंह, कन्या, अपमण्डल का आधा भाग उत्तर की ओर चलता है। और तुला मीन राशि तक अर्थात् सुला, वृश्चिक, धनु, मकर, कुम्भ, मीन तक अपमण्डल दक्षिण की ओर चलता है। सम अपयान का अर्थ यह है कि मेष राशि के तुल्य कन्या का प्रपयान, ( चलना) वृष के तुल्य सिंह का, मिथुन के तुल्य । मेष राशि से कन्या राशि पर्यन्त तीन २ राशि अन्तर पर परमापयान होता है। चौवीस २४ भाग परमापयान होता है। यहां मेष, वृष, मिथुन, कर्कट, सिंह, कन्या,इन छः राशियों को अर्थात् राशि चक्र के प्राधे भाग को “पूर्वस्व- स्तिक " कहते हैं। और तुला, वृश्चिक, धनु, मकर, कुम्भ, मीन, इन छः रा. शियों को अर्थात् ' राशिचक्र के अपराई को “अपरस्वस्तिक" कहते हैं। इस लिये जब धनात्मक अयन संस्कार १५ भाग होता है तो मीन मध्य पूर्वस्व- स्तिक, गत और कन्या मध्य अपरस्वस्तिगत होता है। तब मीन मध्य से कन्या मध्यान्तर्गत आधा मण्डल उत्तर को चलता है और शेषाई दक्षिण को चलता है। जब ऋणात्मक १५ भाग अयन नाम होता है । तब मेष मध्य पूर्व .

६८ से गीतिकापादः ॥ स्वस्तिकगत एवं तुल्य मध्य अपरस्वस्तिकगत होता है। तब मेष के मध्य तुला मध्यान्त-आधा उत्तर अपयान होता है और शेषाई दक्षिण से अप- यान होता है । इसलिये मेष की आदि से अपक्रम लाने का संस्कार होता है ॥१॥ ताराग्रहेन्दुपाता भ्रमन्त्यजखमपमण्डलेऽर्कश्च । अर्काच्च मण्डलार्धे भ्रमति हि तस्मिन् क्षितिच्छाया ॥२॥ ताराग्रहाणां पाताश्चेन्दुपातश्चार्फश्च सदापमण्डले भ्रमन्ति । अर्कान्मण्डलार्ध उपमण्डले मच्छाया सदा भ्रमति। शशिकुजादयश्च स्वे-स्वे विक्षेपमण्डले धरन्ति । विक्षेपमण्डलस्य संस्थानमाह । भा:-तारा, ग्रह, चन्द्रमा, इनके पात और सूर्य सदा अपमण्डल भ्रमण करते हैं । सूर्य से मण्डल के आधे अपमण्डल में भूच्छाया सदा भ्रमण करती है। चन्द्रमा, मङ्गल श्रादि अपने २ विक्षेपमण्डल में चलते हैं ॥२॥ अपमण्डलस्य चन्द्रः पाताद्यात्युत्तरेण दक्षिणतः । गुरुकुजकोणाश्चैवं शीघ्रोचेनापि बुधशुक्रौ॥३॥ . स्फुटचन्द्रो यदापमण्डलस्यपातसमो भवति तदा चन्द्रोऽपमण्डले चरति । ततः क्रमेणोत्तरेण याति । पातात्त्रिराश्यन्तरे परमविक्षेपसममुदग्गमनम् । पा- तात् षडाश्यन्तरे स्थितश्चन्द्रोऽपण्डले घरति। तत्र हि द्वितीयपातस्य स्थिति- रुक्ता । लस्माद्वितीयपातात् क्रमेण दक्षिणतो याति । तत्रापि पातात्त्रिराश्य- न्तरे परमविक्षेपसमं दक्षिणायनम् । एवं चन्द्राधारस्य विक्षेपमण्डलस्य संस्थान मुदितम् । परमविक्षेपस्तु कार्धमित्युक्तं (दशगीतिकायाम्। ) सार्धाश्चत्वारोंग्शा इत्यर्थः ॥ गुरुकुजकोणाश्चैवम् । यथा मन्दस्फुटसिद्धश्चन्द्रवपातसमोऽपमण्डले च- रति तथा गुरुकुजकोणाश्च स्वमन्टस्फुर्टे पातसमेऽपमण्डले चरन्ति । ततः क्रमे- णोत्तरेण यान्ति । पातात्त्रिराश्यन्तरे मन्दस्फुटे परमविक्षेपसममुदग्गमनम् । पा तात् षडाश्यन्तरे मन्दस्फुटेग्पमण्डले चरन्ति । ततः क्रमेण दक्षिणतो यान्ति । तत्रापि त्रिराश्यन्तरे परमविक्षेपसमं दक्षिणगमनम् । एवं गुरुकुजमन्दानामा- धारभूतस्य विक्षेपमण्डलस्य संस्थानम् । शीघ्रोचेनापि बुधशुक्रौ । स्वशीघ्रोच्चे- नाप्यपमण्डलादुदग्दक्षिणतश्च चरतो बुधशुक्रौ । अपिशब्दान्मन्दस्फुटवशाच्च । एतदुक्तं भवति । बुधशुक्रयोस्स्वमन्दफलं स्वशीनोचे व्यस्तं कृत्वा तस्मात्स्वपात विशोध्य विक्षेपस्साध्य इति । अतो मन्दफलसंस्कृते शीघ्रोच्चे स्वपातसमेग्पम- रहले परतः । ततः क्रमेणोदग्यातः । पातात्त्रिराश्यन्तरे शीघ्रोच्चे परमविक्षेपस- ६ - आर्यभटीये- समुदग्गमनं षडाश्यन्तरेऽपमण्डले चरतः । तस्मात् क्रमेण दक्षिणतश्चरतः । तत्रा- पे त्रिराश्यन्तरे परमविक्षेपसमं दक्षिण गमनम् । इति । एवं सर्वेषां विक्षेपम- [लमपमण्डले स्वपातद्वयभागयोबद्धताभ्यां त्रिराश्यन्तरे उदग्दक्षिणतश्चापमण्ड- नात्परमविक्षेपान्तमितं भवति । परमविक्षेपस्तु शनिगुरुकुज खकगाधं भृगुबुध व इत्युक्तम्। (दशगीतिकायाम् ६ ।) केचिदाचार्या गुरुकुजशनीनां शीघ्रोच्चफलं वपातेऽपि ग्रहवत् कृत्वा तथाकृतं स्वपातं स्फुटग्रहाद्विशोध्य विक्षेपानयनं कुर्वन्ति बुधशुक्रयोस्तु स्वभन्दफलं स्वपाते कृत्वा तं पातं शीघ्रोच्चाद्विशोध्य वक्षेपं कुर्वन्ति । तथाच लम्लाचार्यः । "क्षितिसुतगुरुसूर्यसनुपाताः स्वचलफलेन युता प्रथा तथैव । शशिसुतसितयोः स्वपातभागाः स्वमृदुफलेन च संस्कृताः स्फुटाः स्युः ॥” इति । अस्मिन् पक्षे कुजगुरुशनीनां स्फुटग्रहात्पातोनम् । इन्द्वादीनामर्क- घेप्रकर्षसन्निकर्षकृतोदयास्तमवस्य परिज्ञानमाह । भा:--स्फुट चन्द्रमा जब अपमण्डलस्य पात सम होता है । तब क्रम से तर ओर होकर जाता है। पांत से तीन राशि के अन्तर पर परमविक्षेप म-उत्तर गमन करता है। पात से ६ राशि के अन्तर पर स्थित चन्द्रमा श्र- मण्डल में चलता है। उसी स्थान में दूसरे पात का सम्भव होता है। इस लये उसकी स्थिति कही गयी। उस दूसरे पात से क्रमशः दक्षिण करके जाता । वहां भी पात से तीन राशि के अन्तर पर परमविक्षेप सम दक्षिणायन ता है। एवं चन्द्राधार विक्षेपमण्डल का संस्थान कहा है । और परम वक्षेप ४ अंश ३० कला है ( पा०३ । गी० ८) जिन राशियों का सम अप- नि होता उनको निम्न लिखित चक्र द्वारा दिखलाया जाता है। समअपयानचक्र ॥ . न दोराशियो में सम अपयान होता। जिन दो राशिमों में सम अपयान होता। राशि के राशि के तुल्य मेष तुला मीन सिंह वृश्चिक मिथुन कर्कट धनु कर्कट मिथुन धनु कुम्भ वृश्चिक मीन तुला यह चक्र इसी पाद के दूसरी गी० के प्राशय से बना है . -- तुल्य कन्या वृष मकर मकर सिंह वृष % 3D% 3D .

90 गीतिकापादः ॥ भा०:-जिस प्रकार मन्दस्फुट चन्द्रमा स्वपात सम अपमण्डल में चलत है उसी प्रकार गुरु, कुज, और कोण स्वमन्दस्फुट [पात सम अपमण्डल में चलते हैं। तब क्रमशः उत्तर होकर जाता है। पात से तीन राशि के अन्तर पर मन्दस्फुट में परमविक्षेपसम उत्तर गमन करता है । 'पात से ६ राशि के अन्तर पर मन्दस्फुट अपमण्डल में चलते हैं। तब क्रम से दक्षिण से जाते । वहां भी तीन राशि के अन्तर पर परम विक्षेप सम दक्षिण को जाता है। एवं गुरु, कुज, मन्द के आविर्भूत विक्षेपमण्डल का संस्थान है बुध और शुक्र के स्वमन्दफल को अपने शीघ्रोच्च में व्यस्त ( उल्टा ) करके उससे अपने पात को घटाकर विक्षय साधे । इसलिये मन्दफल संस्कृत शीघ्रोच्च स्वपार सम अपमण्डल में चलते हैं ; तब क्रम से उत्तर जाते हुए पात से तीन राशि के अन्तर पर शीघ्रोच्च में परम विक्षेपसम उच्च गमन छः राशि अन्तर पर अपमण्डल में चलने से । तब क्रम से दक्षिण जाते हुए वहां भी राशि के अ. न्तर पर परमविक्षेप सम दक्षिण गमन करता है । इसीप्रकार सब का वि क्षेपमण्डल अपमण्डल में स्वपात के दोनों भाग में बन्धा उन दोनों से तीन राशि के अन्तर पर उत्तर दक्षिण करके अपमण्डल से परम विक्षेपान्तमित होता है ॥३॥ चन्द्रोंऽशैदिशभिरविक्षिप्तोऽर्कान्तरस्थितैर्दृश्यः । नवभिभृगु गोस्तैवर्ष धिकद्वयधिकर्यथालक्ष्णाः ॥४॥ अविक्षिप्तो मृगाङ्करस्वार्कान्तरस्थितैादशभिरंशैर्दृश्यः । ( नवभिर्भ गुः । न वभिः कालांशै गर्दृश्यः ) । नवनिर्विनाडिकाभिरित्यर्थः। भृगोरुक्तस्तै यधि कैर्गुरुर्दृश्यः । एकादशभिः कालभागैरित्यर्थः । तैवर्षधिकैर्बुधो दृश्यः । त्रयोद शभिः कालभागैरित्यर्थः । तैवधिकैश्शनिदृश्यः । पञ्चदशभिः कालभागैरि र्थः । तैदयधिकैः कुजोदृश्यः सप्तदशभिः कालभागैरित्यर्थः । यथाश्मणाः । थासूक्ष्मा इत्यर्थः । शुक्राद्गुस्सूक्ष्मः । ततो बुधः । ततो मन्दः। ततः कुजः ।। गुरुबुधशनिभौमाश्शशिङअणनमांशका इति (दशगीतिकायाम् ५। ) सपणन श्वोक्तः । विक्षिप्ते ग्रहे तु दर्शनसंस्कारयुतग्रहसूर्ययोरन्तरालगतैरंशैर्यथोक्तसंर दृश्यो भवति । स्वतोऽप्रकाशस्य भूम्यादेः प्रकाशहेतुमाह । भा:-सूर्य से १२ अंश दूर पर चन्द्रमा दृश्य होता है, नौ काल अर्थात् विनाडिका से शुक्र दृश्य होता है, गुरु १९ कालांश, बुध १३ काल । आर्यभटीये- ७१ शनि १५ कालांश, मङ्गल. १७ कालांश पर दृश्य होते हैं । जो २ ग्रह जैसे २ सूम होते हैं। वह २ ग्रह वैसे २ अधिक कालांश पर दीख पड़ते हैं। शुक्र से गुरु सूक्ष्म, पुनः बुध, तब शनैश्चर, फिर मङ्गल है ॥४॥ भूग्रहभानां गोलार्धानि स्वच्छायया विवर्णानि । अर्धानि यथासारं सूर्याभिमुखानि दीप्यन्ते ॥५॥ भूमेश्चन्द्रादीनां ग्रहाणां भानामश्विन्यादितारकाणामितरतारकाणाञ्च गो- लार्धानि सर्वतोवृत्तानां स्वशरीराणामधानि स्वच्छायया विवर्णानि स्वभावसि- द्वेन रूपेण विवर्णानि । अप्रकाशात्मकानि । अथवा स्वच्छायया स्वशरीरेणार्क- करव्यवधानादुत्पन्ना या छाया तमोरूपा तया विधर्णानीति। सूर्याभिमुखा- न्यन्यान्यर्धानि यथासारं दीप्यन्ते । अल्पशरीरा अल्परूपा दीप्यन्ते महाश रीरा महारूपा दीप्यन्ते । इत्यर्थः । चन्द्रस्य चाधं सदा प्रकाशवद्भवति । अमावास्यायां चन्द्रस्योर्ध्वाधं प्रकांशवद्भवति । तस्मादस्माभिस्तदर्धमदृश्यं भवंति। प्रतिपदादिषु क्रमेण ·सितभाऽगोग्धो ‘लम्बते । पूर्णायामधोग्धं सर्व सितं भवति । तस्मादस्माभिर्दृश्यमधं सितं भवति । बुधशुक्रावळदधरस्था- वपि तयोस्सूर्यासत्त्या सूर्यबिम्बस्य महत्त्वाच्च सदा सितमेव तयोबिम्बं भवति । कल्यासंस्थान भूसंस्थानचाह । भा०:-पृथिवी, चन्द्रमा, एवं अन्यान्य ग्रह, अश्विनी आदि तारागण के गो लाई अर्थात् प्राधा भाग-अपने शरीर का आधा भाग अपनी छाया से (सूर्य के प्रकाश के कारण) अप्रकाशात्मक होता है । और शेषा? इनके सूर्य के सम्मुख होने से प्रकाशित होते हैं । अल्प शरीर वाले अल्प रूप से, बड़े शरीर वाले बड़े रूप से प्रकाशित होते हैं। चन्द्रमा का आधा भाग सदा प्रकाशवान्. होता है ॥ ५॥ वृत्तभपज्जरमध्ये कक्ष्यापरिवेष्टितः खमध्यगतः । मुज्जलशिखिवायुमयो भूगोलस्सर्वतोवृत्तः ॥६॥ पञ्जरो नक्षत्रकक्ष्या । वृत्ताकारनक्षत्रकदयाया मध्ये भूर्भवति । कक्ष्यापरिवे- ष्टतः । चन्द्रार्कादिग्रहाणां कक्ष्यामध्यगत इत्यर्थः । खमध्यगतः । ब्रह्माण्डक- हाहावच्छिन्नस्याकाशस्य मध्यगतः । मृज्जलशिखिवाय्वात्मकः सर्वतोवृत्तश्च भू- गोलो भूमिर्भवति । भानामध इत्यादिसिद्धस्य भूसंस्थानस्य पुनर्वचनं प्राणि- चारप्रदर्शशेषतया एवंभूतायां भुवि सर्वत्र प्राणिनस्संचरन्तातिप्रदर्शनार्थं तत्मा- . ण संचारं प्रदर्शयति ॥

७२ गीतिकापादः ॥ भा:-वृत्ताकार नक्षत्र कक्षा में पृथिवी है, चन्द्रमा, सूर्य प्रादि ग्रह कक्षा से परिवेष्टित आकाश के वीच जिस प्रकार दो कटाह के सम्पुट की ना अवस्थित है । मृतिका, जल, वायु, अनिमय सब अोर से घिरा हुआ भूगोल अवस्थित है ॥६॥ यद्वत् कदम्बपुष्पग्रन्थिः प्रचितस्समन्ततः कुसुमैः । तद्वद्धि सर्वसत्त्वैलजैस्स्थजैश्च भूगोलः ॥७॥ यथा कदम्बाख्यवक्षस्य कुसुमग्रन्थिस्समन्ततः सर्वत ऊर्ध्वभागे पायेंषु कुसुमैः प्रचितः । तथा वृत्ताकारो भूगोलश्च जलजैस्सर्वसत्त्वैः स्थलजैस्सर्वसत्त्व सर्वतः प्रचितः। भूमी, सर्वत्र स्थावरजङ्गमा नदीतटाकादयश्च भवन्तीत्यर्थः कल्पेन संभूतं भूमेद्वय पचयमाह। भा:-यह भूगोल कदम्ब के फूल के.केशर के फैलावसा सब ओर पर्वत बाराम, ग्राम, नदी श्रादि से घिरा हुआ है ॥ ७ ॥ ब्रम्हदिवसेन भूमेरुपरिष्टाद्योजनं भवति वृद्धिः। दिनतुल्ययैव रात्र्या मृदुपचितायास्तदिह हानिः ॥८॥ ब्रह्मदिवसेन भूमेरुपरिष्टायोजनं वृद्धिर्भवति। समन्ताद्योजनं वृद्धिर्भवती त्यर्थः । दिन तुल्यया राज्या ब्रह्मणो राज्या मृदोपचिताया भूमेस्तद्धानिर्भवति योजनं हानिर्भवतीत्यर्थः । अतः कल्पादौ पञ्चाशदधिकं योजनसहसं भूमेर्विरक म्भः । अन्तरालेऽनुपातेन कल्प्यः । इत्युक्तं भवति । भूमेः प्राग्गमनं नक्षत्राणां गत्यभावञ्चेच्छन्ति केचित् तन्मिण्याज्ञानवशादित्याह । भाः-एक ब्राह्म दिम में सब ओर से पृथिवी की एक योजन वृद्धि होती है, एवं ब्राह्मरात्रि में पृथिवी को एक योजन हानि होती है । इसलिये काप की आदि में पृथिवी का १०५० योजन व्यास होता है ॥८॥ अनुलोमगतिस्थः पश्यत्यचलं विलोमगं यद्वत् । अचलानि भानि तद्वत् समपश्चिमगानि लङ्कायाम् ॥६॥ यथा नौस्थो नौयानं कुर्वन् पुरुषोऽनुलोमगतिस्स्वाभिमतां पश्चिमां दि गच्छबचलं नद्या उभयपार्श्वगतमचलं वृक्षपर्वतादिवस्तु विलोमगं प्राची दिश गच्छदिव पश्यति तथा भानि नक्षत्राणि लङ्कायां समपश्चिमगानि कर्तृभूतानि अचलानि भूमिगतान्यचलवस्तूनि कर्मभूतानि विलोमगानीव प्राची दिश गच्छन्तीव पश्यन्तिा लङ्कादि विषुवद्देशे येव नक्षत्रपञ्जरस्य समपश्चिमगत्वम् ।

आर्यभटीये- एवं ताराणां विण्याज्ञानवशादुत्पन्नां प्रत्यग्गमनप्रतीतिमङ्गीकृत्य भूमेः प्राग्ग- तेरभिधीयते । परमार्थतस्तु स्थिरैव भूमिरित्यर्थः । भपञ्चरस्य' धमणहेतुमाह । भा:-जैसे नौका में बैठा हुश्शा मनुष्य निकारे की स्थिर वस्तुओं को दू- परी ओर को चलते हुए देखता है, ऐसे ही मनुष्यों को सादि नक्षत्र जो स्थर हैं, पश्चिम की ओर चलते हुए दीखते हैं और पुधियी स्थिर मालूम होती है, परन्तु वास्तव में भूमि ही चलती है ॥ ६ ॥ उदयास्तमयनिमित्तं नित्यं प्रवहेण वायुनाक्षिप्तः । लंकासमपश्चिमगो भपज्जरस्सग्रहो भ्रमति ॥१०॥ रव्यादीनामुदयास्तमयहेतुभूतो भपञ्जरो नक्षत्रयोलो राशिचक्रात्मकः प्रव. हास्येन वायुना सदा प्राक्षिप्तो लङ्कायां समपश्चिगो ग्रहैस्सह भ्रमति । मेरु- माणं तत्स्वरूपञ्चाह। भा:-सूर्यादि के उदय और अंस्त के हेतु भूत भपञ्जर अर्थात् नक्षत्रगोल ग्वह नामक वायु द्वारा सदा आक्षिप्त लङ्का में सम पश्चिम ग्रहों के साथ पलता है॥१०॥ मेरुयोजनमात्रः प्रभाकरो हिमवता परिक्षिप्तः । नन्दनवनस्य मध्ये रत्नमयस्सर्वतोवृत्तः ॥१९॥ मेरुयोजनमात्रोच्छितस्तावद्विस्तृतश्च । सर्वतोवृत्तो रत्नमयत्वात्प्रभाकरच प्रभाणामाकरः । हिमवता पर्वतेन परिक्षिप्तो नन्दनवनस्य मध्ये भवति । भू- मेरुयमधश्च निर्गतो मेरुरित्याह । तथाच मयः। ( सूर्यसिद्धान्ते भूगोला- ध्याये झो० ३२-३४।) "मध्ये समन्तादण्डस्य भूगोलो व्योनि तिष्ठति । विभ्राणः परमां शक्ति ब्रह्मणो धारणालिकाम् ॥ तदन्तरपुटारसप्त नागासुरसमाश्रयाः। दिव्यौषधिरसोपेता रम्याः पातालभूमयः ॥ अनेकरत्ननिचयो जाम्बुनदमयो गिरिः । भूगोलमध्यगो मेरुरुभयत्र विनिर्गतः ॥" इति ॥ मेसबडवामुखाद्यवस्थानप्रदेशमाह । भा-मेरु योजनमात्र ऊंचा है और योजनमात्र विस्तृत है, सब ओर से घिरा हुआ रत्नमय होने से प्रकाशवान् है। हिमवान् पर्वत से परिक्षिप्त नन्दन . धन के बीच में अवस्थित है। जैसा कि सूर्यसिद्धान्त में लिखा है:-ब्रह्मा की १० १४ ~ । गीतिकापादः॥ धारणात्मिका परमाशक्ति के ऊपर यह भूगोल भण्ड (ब्रह्माण्ड) के बीच श्रा काश में भ्रमण करता हुश्रा अवस्थित है ॥ उस भूगोल के भीतर नाग श्री असुर आदि मनुष्य विशेष के निवास को 9 पाताल कहते हैं ( प्रतल, वितल सुतल, तल सलातल, रसातल, पाताल, जिन में अनेक प्रकार स्वप्रकाश युक्त रमणीक प्रोषधि हैं ॥ ( सू० सि अ० १२ श्लोक ३२।३४) ॥१९॥ स्वमरू स्थलमध्ये नरको बडवामुखश्च जलमध्ये । अमरमरा मन्यन्ते परस्परमधस्स्थितानियतम् ॥१२॥ मेरुभागगतं भूमेरधं भूप्राचुर्यात्स्थलसंज्ञम् । बडवामुखमधं जलप्राचुर्याज्ज लसंज्ञम् । तत्र स्थलमध्ये 'मेरुस्स्वर्गश्च भवति । जलमध्ये नरको बडवामुखश भवति । अमरास्स्वर्गवासिनः । मरा नरकवासिनः । स्वर्गवासिनोऽस्माकमध स्स्थिता नरकवासिन इति मन्यन्ते। नरकवासिनश्च तपास्माकमधस्थिता स्वर्गवासिन इति मन्यन्ते । "उपरिष्टात् स्थितास्तस्य मेन्द्रां देवा महर्षयः। अधस्तादसुरास्तद्वद्विषन्तोऽन्योन्यमाश्रिताः ॥" इति । (सूर्यसिद्धान्ते भूगोलाध्याये श्लो० ३५ । ) तस्य मेरोरिति शेषः । "ततः समन्तात्परिधिः क्रमेणायं महार्णवः । मेखलावत् स्थितो धाग्या देवासुरविभागकृत् ॥" इति च ( तत्रैव श्लो० ३६ । ) ॥ स्थलजलाशयोस्सन्धौ भूमेः परितो भूप- रिधिचतुर्थभागान्तरालव्यवस्थिताश्चतसो नगरीराह । भा०:-मेरू भागगत भूमि का आधा भाग मृतिका की अधिकता से स्थल संज्ञक है। और बड़वामुख शेष प्राधा भाग जल की अधिकतर से नरक संज्ञक है। उस स्थल में मेरु ( स्वर्ग) रहता है। जल में बडवामुख ( नर- क) है। अमर, ( स्वर्गवासी ) मरा ( नरकवासी ) स्वर्गवासी गल समझते हैं कि नरकवासी लोग हमारे नीचे रहते हैं एवं नरकवासी गण जानते कि स्वर्गवासी गण हमारे नीचे रहते हैं ॥ १२ ॥ उदयो योलङ्कायां सेो ऽस्तमयस्सवितुरेव सिद्धपुरे। मध्यान्हो यवकोटपां रोमकविषयेऽर्धरात्रस्स्यात् ॥१३॥ लङ्का दक्षिणदिग्गता । तस्यां य उदयः। यदा सूर्योदय इत्यर्थः । सिद्धपुरे स एवास्तमयः। तदारवेरस्तमयस्स्यादित्यर्थः । सिद्धपुरी नाम नगर्युत्तरदिगि १५ आर्यभटीये, चितेत्यनेनोक्तं भवति । स एव लोदयो यवकोट्यां मध्याहस्स्यात् । तदा ध्याहूकाल इत्यर्थः । पूर्वदिशि यवकोटिसंज्ञा नगरीत्यनेनोक्तं भवति । रोम- विषये स एवोदयोऽर्धरात्रस्स्यात् । पश्चिमदिशि स्थिता सा नगरीत्यनेनोक्त पति । तथाच मयः (तत्रैव लो० ३०-४० ।) “समन्तान्मेरुमध्यात्तु तुल्यभागेषु तोयधेः । द्वीपेषु दिक्षु पूर्वादिनगर्यो देवनिर्मिताः ॥ भूवृत्तपादे पूर्वस्यां यवकोटीति विश्रुता । भद्राश्ववर्षे नगरी स्वर्णप्राकारतोरणा ॥ याम्यायां भारतवर्षे लङ्का तद्वन्महापुरी। पश्चिमे केतुमालाख्ये रोमकाख्या प्रकीर्तिता । उदक सिद्धपुरी नाम कुरुवर्षे प्रतिष्ठिता। तस्यां सिद्धा महात्मानो निवसन्ति गतव्यथाः ॥” इति ॥ रवेस्समन्ताद्धमणात्प्रतिदेशं कालभेदस्य पूर्वादिदिग्विभागोत्र मधिकृत्य मेरुस्थानात् कृतः ॥ मेसलइयोर्बडवामुखलङ्कयोश्चान्तरालप्रदेश योज्जयिन्योरन्तरालप्रदेशचाह । भा:--जिस समय लङ्का ( दक्षिण दिशा में ) में सूर्योदय होता, उस मय सिद्धपुरी (उत्तर दिशा में है) में सूर्यास्त, यव कोटी में मध्यान्ह (पूर्व गामें है) और रोमक नगर (पश्चिम दिशा में है) में आधीरात होती है॥१३॥ स्थलजलमध्यालङ्का भूकक्ष्याया भवेच्चतुर्भागे। उज्जयिनी लङ्कायास्तच्चतुरंशे समोलरतः ॥१४॥ स्थलमध्यान्मेतस्थानात् भूकक्ष्यायाश्चतुभोगान्तरे लङ्का भवति । तथा जल ज्याबावामुखस्थानाच भूकक्ष्यायाश्चतुर्भागान्तरे लङ्का भवति । लङ्कावरिस- रयवकोटिरोमकविषयाश्च स्थलजलमध्याकदयांचतुर्भागे भवन्ति । लङ्का- स्सनोत्तरदिशि चतुरंशे भूकक्ष्याचतुर्भागस्य चतुरंशे । भूकक्ष्यायाषोडशांशे । जयिनी नाम नगरी भवति । उज्जयिनी लङ्कायासमोचरदिशि भूकक्ष्यायाः दिशांशे । इति केचिद्वदन्ति । तैरग्रान्तरञ्च प्रदर्शितम् । "लकोत्तरतोग्वन्ती भूपरिधः पञ्चदशभागे ॥" ब्रह्मगुप्तः ॥ भूपृष्ठस्थितेज्योतिश्चक्रस्य दृश्यमदृश्यञ्च भागमाह। भा:-स्थल मध्य से अर्थात् मेरुस्थान से भू कक्षा के चतुर्थ भाग अन्तर . ते गीतिकापादः॥ पर लङ्का है । मल स्थान से अर्थात् बड़वा मुख स्थान से चतुर्थ भाग अन्तराल में लङ्का है। लङ्का की नाई सिद्धपुर, यवकोटी और रोमक भी भक्षक्षा के चतु भाग अन्तराल में है। लङ्का के समान उत्तरदिशा में भूकता के आतुर्थ अंश चौथे भाग में अर्थात् १६ अंश पर उज्जयिनी नगरी है ॥ १४ ॥ भूव्यासार्धनोनं दृश्यं देशात्समाद्गोलार्धम् । अधं भूमिच्छन्नं भूव्यासार्धाधिकञ्चैव ॥१५॥ समाद्देशात् पर्वतादिव्यवधानरहिताद्भूपृष्ठाद्भगोलार्थं ज्योतिश्चक्रस्योपर्य भूव्यासार्धेनोनं भूव्यासार्धतुल्यांशहीने दृश्यं भवति। अपरमधं भूव्यासार्धेना धिकं भूमिच्छन्नमदृष्यं भवति । एतदुक्तं भवति । ज्योतिश्चक्रस्य यदूर्वाधं तस्य पूर्वभागे भूयासार्धतुल्यों शोऽस्माभिरदृश्यो भवति भूपृष्ठव्यवधानात् । तथा प श्चिमभागेऽपि भूव्यासार्धतुल्यांशोऽस्माभिरैदृश्यो भवति । अतस्ताभ्यामंशाभ्यां हीनमुपर्यधं समदेशे भूपृष्ठेऽवस्थितैर्दृश्यं भवति । अपरमधं ताभ्यामंशाभ्यां युत भूमिच्छवत्वात् समदेशे भूपृष्ठेग्वस्थितरदृश्यं भवति ॥ ज्योतिश्चक्रे देवासुर दृश्य भागमाह। । से भा-सम देश से अर्थात् पर्वत आदि से व्यवधान रहित भूपृष्ठ से भगोलाई ज्योतिश्चक्र के ऊपर का प्राधा-भूव्यासार्द्ध से जन-अर्थात् भूव्यासार्द्ध तुल्यांश हीन दृश्य होता है। दूसरा प्राधा भूव्यासाई से अधिक भूमिछन-अदृश्य होता है। प्राशय यह है कि भूपृष्ठ के व्यवधान से ज्योतिश्चक्र का जो उर्व अर्द्ध भाग है उस के पूर्व भाग में भूव्यासार्द्ध तुल्यांश हम लोगों से अदृश्य होता है। तथा पश्चिमभाग में भूव्यासाई तुल्यअंश हम लोगों से अदृश्य होता है। इस कारण उन अंशों से हीनं रूपर नीचे देश में में अवस्थित पुरुष दृश्य होता है। दूसरा अर्द्ध उन अंशों से युक्त भूमि से छिपे होने से समदेश में भूपृष्ठ पर अवस्थित पुरुष से अदृश्य होता है ॥ १५॥ देवाः पश्यन्ति भगोलार्धमुदङ्मसंस्थितास्सव्यम् । अपसव्यगं तथा दक्षिणायडवामुखे प्रेताः॥१६॥ उदग्गतमेरुसंस्थिता देवारसम्यं भगोलार्थ ज्योतिधकाभिमुखस्य लङ्कास्य स्य पुरुषस्य मध्यभागगतं पश्यन्ति । उदग्गतमनिमः । दक्षिणमागगतबह- घामुखे स्थिताः प्रेता नरकमासिनोग्यस उपगं दक्षिणभागगतम पश्यन्ति ।

आर्यभटीये- मेषादिगमुदगंधं देवाः पयन्ति । तुलादिगं दक्षिणमधं नरकवासिनः पश्यन्ति । इत्यर्थः । केचिदेवं वदन्ति । ज्योति स्योदगधं सव्यं सव्यगं मेरुस्था देवाः पश्यन्ति । दक्षिणमर्धमयस्सय्यगमसुराः पश्यन्ति । तथाच ब्रह्मगुप्तः । सौम्यमपमण्डला) मेषाद्यं सव्यगं सदा देवाः । पश्यन्ति तुलाद्यधं दक्षिणमपसव्यगं दैत्याः ॥ , इति । अत्रैवं योज्यम् । मेरुबडवामुखयोयोतिश्चक्रवर्द्रमतां देवासुराणां सव्यगमपसव्यगञ्चेति । अपसव्यगशब्दो हि दक्षिणवाचकः । देवादीनां दिनप्र- माणमाह। भा:-मेरुनिवासी ( देवगण ) ज्योतिश्चक्र के उत्तर गोलार्द्ध को देखते हैं और दक्षिण मेरुनिवासी (प्रेत ) असुरगण दक्षिण गोलार्द्ध को देखते हैं। अर्थात् मेष, वृष, मिथुन, कर्क, सिंह, कन्या, इन छः राशि पर्यन्त भगोलाई को देवगण देखते, उस समय दक्षिण मेरुनिवासी ( असुर ) तुला, वृश्चिक, धनु, मकर, कुम्भ, मीन, राशि पर्यन्त दक्षिण गोलार्द्ध को देखते हैं ॥ १६ ॥ रविवर्षार्ध देवाः पश्यन्त्युदितं रवि तथा प्रेताः । शशिमासाध पितरश्शशिगाः कुदिनार्धमिह मनुजाः ॥१७ रविवर्षाधं मेषमासादिकन्यामासान्तं देवास्सदोदितं रविं पश्यन्ति मेषा- दिकन्यान्तराशीनां मेरुक्षितिजादूर्ध्वगतत्वात् क्षितिजवच्चभ्रमणाञ्च । अतो मेषादिमासषट्कं देवानां दिनं भवति । तुलामासादि भीनमासान्तं देवा रविं कदाचिदपि न पश्यन्ति तुलादिराशिषटकस्य मेरुक्षितिजादधोगतत्वात् क्षिति- जानुसारेण चक्रभ्रमणाच्च । अतस्तुलादिमासषट्क देवानां रात्रिर्भवति । तथा प्रेताः । नरकवासिनश्च तथा रविवर्षार्धं रविं पश्यन्ति । किन्तु तुलामासादि मीनमासान्तं रविं पश्यन्ति । अतस्तदा तेषां दिनं भवति । मेषमासादि मीन- मासान्तं रविं कदाचिन पश्यन्ति ॥ अतस्तदा तेषां रात्रिर्भवति । मेरुबडया मुखयोर्ध्वाधोदिशौ व्यत्ययाद्भवतः । अतस्तयोदिनरात्री च व्यत्ययेन भवतः ॥ मृगादिवासषट्कं देवानां दिनमिति यो व्यवहारस्स तु तत्र वैदिककर्मणां विहितत्वार कृतः कादिमासषट्के अविहितत्वातेषां रानिरिति च व्यवहारः कृतः । अत्र वराहमिहिरः मेषवषमिघुनसंस्थे दिनमर्के कर्कदादिगे रात्रिः । मेलस्थितदेवानामिति यैरुक्तं नमस्तेभ्यः ॥

७८ । गीतिका पादः॥ इति ॥ शशिगात्रशशिमबहलो_भागगता पितरश्शशिमासस्य चान्द्रमास- स्या) रविं पश्यन्ति । शशिमासस्यापरार्धं न पश्यन्ति। अतः पितॄणां चान्द्रमा- साधं दिनं भवति । तदर्धं रात्रिश्च । अमावास्यायां हि चन्द्रमण्डलादूर्ध्वगतो अर्को भवति । अतस्तदानीं पितॄणां दिनाधं भवति । पौर्णमास्यां चन्द्रमगड- लादधोगतोकः । अतस्तदा पितृणां राज्यधं भवति । अष्टम्यर्धयोरुदयास्त- मयौ च । कुदिनार्धमिह मनुजाः । मानुजास्सावनदिनस्यार्धं रविं पश्यन्ति । अपरमधं न पश्यन्ति । गोलकल्पनामार्याद्वयेनाह । भा०:~-मेष, वृष, मिथुन, कर्कट, सिंह, कन्या, इन छुः मास पर्यन्त देव गण सदा सूर्य को उदित देखते हैं, इस कारण देवताओं का छ: मास का एक दिन होता है। और तुला, वृश्चिक, धनु, मकर, कुम्भ, मीन, इन छः मास पर्य्यन्त देवगण सूर्य को नहीं देखते अतएव इन छः मास की उनकी एक रात्रि होती है। और प्रेत या असुरगण तुला, वृश्चिक, धनु, मकर, कुम्भ, मीन, इन छ: मास पर्यन्त सूर्य को सदैव उदित देखते इस लिये असुरों को छः मास का एक दिन होता है। एवं मेष, वृष, मिथुन, कर्कट, सिंह, कन्या, इन का मास पर्य्यन्त असुरगण सूर्य को नहीं देखते इस कारण इतने समय इनकी छः मास की एक रात्रि होती है । और पितृगण (चन्द्रलोकनिवासी) चान्द्र मास के आधे भाग पर्यन्त सूर्य को देखते हैं अतएव इनका हमारे १५ दिन का एक दिन होता एवं इतने ही (१५) की उनकी एक रात्रि होती है। यों कि अमावास्या को चन्द्रमण्डल के उपरले भाग में सूर्य दीख पड़ता इस का- रण पितृगण को उस समय मध्यान्ह होता है और पौर्णमासी को चन्द्रमण्डल से नीचे सूर्य रहता श्रतएव उस समय पितृगण की आधीरात होती है। और कृष्णपक्ष के अष्टमी को पितृ लोगों का सूर्योदय और शुक्लपक्ष अष्टमी को सूर्यास्त होता है । मनुष्यों को सावन दिन के प्राधा भाग पर्यन्त सूर्य दीखता एवं अपराई नहीं दीखता ॥ १७ ॥ पूर्वापरमधऊधु मण्डलमध दक्षिणोत्तरज्जव । क्षितिजं समपार्श्वस्थं भानां यत्रोदयास्तमयो॥१८॥ वंशशलाकादिना निर्मितमेकं मण्डलं कृतं पूर्वापरमधमध्ये निदध्यात् । तत् सममण्डलं नाम भवति। तत्प्रमाणमेवापरं मण्डल दक्षिणोत्तरमपसावं निदध्यात् । तद्दक्षिणोत्तराख्यं भवति । पुनरन्यन्मण्डलं तत्प्रमाल समपावर्ष 90 - प्रार्यभटीये- तिर्यग्गतं दिक्चतुष्टयजनितस्वस्तिकं निदध्यात्। तत् क्षितिज नाम । तस्मिन् क्षितिजे भानां नक्षत्राणामर्कादिग्रहाणाञ्चोदयास्तमयो भवंतः ॥ भा:-वांस की शलाका आदि से मण्डल ( वृत्त ) बनावे, उस में पूर्व और पश्चिम भाग को क्रम से नीचे ऊपर रक्खे, वहे । यह ' सममण्डल होगा। उसी के तुल्य दूसरा मण्डल दक्षिण, उत्तर क्रम से नीचेऊपर को रक्खे वह 'दक्षिणोत्तर मण्डल' होगा । पुनः एक तीसरा मण्डल उसी के बराबर तिरछे क्रम से दिक् चतुष्टय जनित स्वस्तिक रक्खे , उसका नाम क्षितिज , होगा । उस 'क्षितिज' में नक्षत्र ग्रहादिकों का उदय, अस्त का ज्ञान होगा ॥१८॥ पूर्वापरदिग्लग्नं क्षितिजादक्षाग्रयोश्च लग्नं यत्। उन्मण्डलं भवेत्तत् क्षयवृद्धी यत्र दिवसनिशोः ॥१९॥ पूर्वप्रमासमेवापरं मण्डल पूर्वापरस्वस्तिकयोस्तियनिधायोत्तरस्वस्तिकगत- शितिजमण्डलादूर्ध्वमक्षाग्रेग्क्षज्यान्तरे दक्षिणोत्तरमण्डले लग्नं यथा भवति । तथा दक्षिणस्वस्तिकगतक्षितिजमण्डलादधश्चाक्षज्यान्तरे दक्षिणोत्तरमण्डले लग्नं यथा भवति तथा निदध्यात् । एतदुन्मण्डलं नाम भवति । दिवसनिशोः क्षय- बढी अस्मिन्वेद्ये । एतत् खगोलबाम भवति । अस्यान्तर्गतं नक्षत्रगोलमप्यस्ति । तसंस्थानन्तु। पूर्वापरमधऊर्ध्व तथा दक्षिणोत्तरमधऊर्ध्वञ्च समपार्श्वस्थं दिक्च- तुष्टयजनितस्वस्तिकञ्च बनीयात्। एतानि त्रीणि विषुवन्मण्डलानि। तेषु पूर्वापरं घटिकामण्डलाख्यं स्यात्।पुनरपरं मण्डलं पूर्वापरस्वस्तिकयोस्तिर्यभिधायाधस्स्व- स्तिकादुत्तरत उपरिवस्तिकाद्दक्षिणतश्च परमापक्रमतुल्यान्तरे दक्षिणोत्तरशला कयोर्बनीयात् पूर्वापरस्वस्तिकयोश्च बधीयात् । एसदपमण्डलं राश्याद्यङ्कितच भवति । पुनर्पटिकामगमलस्य दक्षिणत उत्तरतश्च स्वेच्छापक्रमान्तरेषु पूर्वापरा- यतानि तत्तत्स्थानसमानि मण्डलानि बनीयात् । तानीष्टस्वाहोरात्रमण्डानि । पुनश्शक्षणासृज्वीमयश्शक्षाका गोलस्य दक्षिणोत्तरस्वस्तिकद्वयाभिवेधिनी निधा- य तदग्रयो शरदण्डिके निश्चले निदध्यात् । पुनस्तदहिश्शरदण्डिकयोरत्तरा- लतुल्यव्यासं खगोलं कुर्यात् । पुनः खगोल उन्मण्डलदक्षिणोत्तरमण्डलसंपातद्वये थं कृत्वा तयोरयाशलाकाग्रे प्रवेशयेत् । एवं स्वविषयगोलावस्थितिः । द्रष्ट्व- शादधकादिविभागः कार्यः । इत्याह । भार-पूर्व 'अपर , और 'शितिज , रेखा के सङ्गन होकर दूसरा एक 9 से गीतिकापादः ॥ वृत्त रचना करे । वह स्वदेशीय अक्षांश परिमित उत्तर और दणिण ध्रुव दूर अवस्थित होगा और इस पत्त का नाम ' उन्मण्डल , होगा। इसी म- ण्डल , में सूर्य्य जब दीख पड़ता है उस समय दिन और रात्रि का हास और वृद्धि होती है ॥ १० ॥ पूर्वापरदिओखाधश्वोर्खा दक्षिणोत्तरस्था च। एतासां संपातो द्रष्टा यस्मिन् भवेद्देशै ॥२०॥ पूर्वापरदिग्गता या रेखा या चाधऊर्ध्वदिग्गता दक्षिणोत्तरदिग्गता च या तासां संयोगो द्रष्दृस्थाने भवति ॥ दृमण्डलं दृक्क्षेपमण्डलञ्चाह । भा०:-पूर्वापर दिग्गत रेखा जो नीचे ऊपर को गई है, दक्षिणोत्तर दि- ग्गत है, उस का संयोग स्थान द्रष्टा का स्थान होता है ॥ २० ॥ ऊर्ध्वमधस्ताद्रष्टुयं दृङ्मण्डलं ग्रहाभिमुखम् । ट्रकक्षेपमण्डलमपि प्राग्लग्नं स्यात्तिराश्यूनम् ॥२१ ॥ अर्ध्वाधोगतं द्रष्टुमध्यमिष्टग्रहारिनुखं दृङ्मण्डलं भवति।पूर्वोक्तमण्डलानि भूगध्यमध्यानि । इदन्तु भूपृष्ठस्थितद्रष्टुमध्यं भवति। त्रिराश्यूनं प्राग्लग्नं ह- कक्षेपमण्डलं भवति । इत्यर्थः। दृङ्मण्डलहक्क्षेपमण्डलयोलम्बनविधाधुपयोगः गोल यन्त्रण भ्रामयन्ति केचित् । तत्रोपायं प्रदर्शयति । भा:-ऊपर नीचे को गया हुआ द्रष्टा का मध्य इष्टग्रहाभिमुख दृमण्डल होगा। पूर्वोक्त मण्डल सब भूमध्य मध्य है। यह तो भू पृष्ठस्थित द्रष्टा मध्य हुमा । अर्थात् तीन राशि कुन प्राग लम दृक्क्षेप मण्डल होता है ॥२१॥ काष्ठमयं समवृत्तं समन्ततस्समगुरुं लघु गोलम्। पारततैलजलस्तं भ्रमयेत्स्वधिया च कालसमम् ॥२२॥ काष्ठमयं वंशादिकाष्ठे निर्मितं न समवृत्तं सर्वतोवृत्तं समन्ततस्समगुरु स- वयवेषु समं गुरुत्वं यथा भवति तथा कृतम् । लघुमगुरम्। एवंभूतं गोलं कृत्वा पारतादिभिस्त स्वधिया च कालसमं भ्रमयेत् । अयमर्थः । भूमिष्ठदक्षिणोत्तरस्त म्भयोरुपरि गोलप्रोतायाशलाकाया भने स्थापयेत् । गोलदक्षियोत्तरच्छिद्रे तैलेन सिञ्चत् यथा निस्सङ्गो गोलो भ्रमति । गोलस्यापरतो. गोलपरिधिसमि- 'तदैर्घ्य साधश्छिद्रं जलपूर्ण नलकं निदध्यात् ततो गोलस्यापरवतिके कीलकं निघाय तस्मिन्सूत्रस्यैकमग्रं बधाधो विषुवन्मण्डलपृष्ठेन प्राङ्मुख भीत्वा ।

शार्यभटीये- ८१ तत उपर्याकृष्य प्रत्यङ्मुखं तेनैव नीत्वा तदअबढ़ पारतपूर्णमलाबु जलपूर्ण न- लके निदध्यात् ततो नलकस्याधश्छिद्रं विवृतं कुर्यात् तेन जलं निस्सवति। न- लकस्थजलमधो गच्छति । तद्वशाच्च तत्रस्थमलाबु पारतपूर्त्या गुरुत्वाज्जलेन स- हाधो गच्छद् गोलं प्रत्यङ्मुखमाकर्षति । एवं त्रिंशद्घटिकाभिरईसम्मितं यथा जलं भवति गोलस्य चार्धं भ्रमति तथा स्वबुद्धया जलनिस्सावो योज्यः । इति । गोलोज्यं घटिकायन्त्रात् कालपरिच्छेदसाधनमेव नतु (ज्योतिश्चक्रभ्रमणसाधनम्) ज्योतिश्चक्रे हि समोदितौ गुरुचन्द्रौ प्रतिमूहूर्त स्थानान्तरितौ दृश्यते । अस्मिन्न तथा दृश्यते । अतो घटिकायन्त्रसमोऽयं गोलः। नतु ज्यतिश्चक्रसमः । क्रान्ति भूज्याकांग्राशङ्कुशङ्कग्रसमशक्कादीनामुपपत्तिज्ञानं हि गोलप्रयोजनम् ॥ अथ ज्योतिश्चक्रस्थैार्धेः क्षेत्रविशेषान् प्रदर्शयिष्यन् क्षेत्रकल्पनाप्रकारमक्षावल- म्बको चाह। भा:-वंश आदि काष्ठ का बना हुआ सब ओर से बराबर एवं सम गुरु { भारी) वृत्त (हलका और बहुत भारी नहीं) इस प्रकार काष्ठगोल बनाकर पारे से या अपनी बुद्धि से विचार कर किसी अन्य उपयुक्त वस्तु से काल के बराबर भ्रमण करावे। इस का अभिप्राय यह है कि भूपृष्ठ के दक्षिण उत्तर स्तम्भ के ऊपर गोल प्रोत लोहे के शलाके के आगे में स्थिर करे । गोल के दः क्षिणोत्तर छिद्र में तैल से इस प्रकार सींचे जिस से निस्सङ्ग होकर भ्रमण करे। गोल के दूसरी ओर से परिधि सम्मित दीर्घ छिद्र के साथ जल से भरा नलक ( नल ) रक्खे, तदनन्तर गोल के अपर स्वस्तिक पर कीलक गाड़े,-एवं उस सूत्र के एक अग्रभाग को बांध कर, विषुवन्मण्डल पृष्ठ द्वारा प्राङ्मुख लाकर ऊपर को खींच कर उसी से प्रत्यङ्मुख लाकर उस को अग्रभाग को बांधकर, पारे से भरी तुम्बी जल भरे हुए नलक में रक्खे, तब नलक के नीचे के छिद्र को फैलावे-उस से जल गिाता है। और नलक मैं जल नीचे जाता है, इस कारण वहां की तुम्बी पारे से भरे होने से भारीपन से जल के साथ नीचे जाती हुई गोल को पूर्व की ओर खींचती है। एवं ३० घटिका में प्राधे भाग गोल जितने जल में से गिरे उतना जल गिरने योग्य अपनी बुद्धि से रक्खे ॥२२॥ दृग्गोलार्धकपाले ज्याधुन विकल्पयेनगोलार्धम् । विषुवज्जीवाक्षभुजा तस्यास्त्ववलम्बकः कोटिः॥२३॥ दृग्गोलार्धकपाले दृश्ये गोलार्धभागे ज्यार्थेन तत्र गोलपादनिष्पन्नेन ज्या- पेनाशादिभुजात्मनावलम्बकादिकोट्यात्मना च स्थितेन भगोलार्धं विकल्पये- २ गीतिकापादः ॥ उज्योतिश्चक्रा, विविध कल्पयेत् । अक्षज्याश राङ्कुभूज्याद्याश्रितैर्विविधैः क्षेत्रैर्युक्त दृश्यं भगोलार्धं कल्पयेदित्यर्थः । सा वक्ष्यमाणाक्षादिषु क्षेत्रकरुपनयोपपत्ति - येत्युक्तं भवति । विषुवज्जीवाक्षभुजा । विषुवद्दिनलध्यान्हेखमध्ययोरन्तरां, लज्या विषुवजीवा भवति । विषुवच्छायेत्यर्थः । साक्षभुजा भवति । अक्षज्येत्यर्थः अवलम्बकस्तस्याः कोटिः। अक्षज्यावर्गहीनत्रिज्यावर्गस्य पदमवलम्बक इत्यर्थः। विषुवन्मध्यान्हेशकुरवलम्बकस्स्यात् । स्वाहोत्रार्धमाह । भा०:--दृश्य गोलाई भाग में, वहां गोल पाद से उत्पन्न ज्याई द्वारा प्रक्षादि भुजात्मा व लम्बकादि और कोट्यात्मा द्वारा विकल्प से ज्योति- श्चक्राई को विविध प्रकार से कल्पना करे। अर्थात् अक्षज्या शङ्क भूज्यादि प्रा. श्रित अनेक क्षेत्र द्वारा दृश्य भगोलाई की रचना करे। प्राशय यह है कि विषुवद् दिन के मध्याहू में सूर्य और आकाश के वीच की ज्या को विषु- वज जीवा ( विषुवच्छाया ) कहते हैं। बही अक्षभुजा होती है अर्थात् अ- क्षज्या होती है। उसकी अवलम्वक कोटि होती है। अर्थात् अक्षज्या वर्ग हीन त्रिज्यावर्ग का पद अवलम्बक होती है ॥ २३ ॥ इष्टापक्रमवर्ग व्यासाधकृतेर्विशोध्य यन्मूलम् । विषुवदुदग्दक्षिणतस्तदहोरात्रार्धविष्कम्भः ॥२४॥ इष्टापक्रम ज्यावर्ग व्यासार्धवाद्विशोध्य शिष्टस्य मूलं विषुवन्मण्डलस्य घ- टिकाख्यास्योदग्दक्षिणगतयोवाहोरात्रमण्डलयोरविष्कम्भो भवति। विष्क- म्भार्थमित्यर्थः । क्रान्तिभुजायावाहोरात्रा कोटिः। व्यासाधं कर्णः। गोलान्तर्ग- तमक्षभुजादिकं क्षेत्रं महाभास्करीयव्याख्यायां विस्तरेण प्रदर्शितम् । श्रतोत्र न व्याख्यास्यामः । निरक्षदेशे राश्युदयप्रमाणमाह । भा:--इष्ट अपक्रमज्या वर्ग को व्यासाई वर्ग से घटाकर अपशिष्ट के मूल को घटिकानामक विषुवंन्मण्डल के उत्तर दक्षिण गत स्वाहोरात्रार्द्ध म- एडल का अर्द्ध विष्कम्भ होता है । क्रान्ति भुजा के स्वाहोरात्रार्द्ध कोटि होती है, व्यासाई कर्ण होता है ॥ २४ ॥ इष्टज्यागुणितमहोरात्रव्यासार्धमेव काष्ठान्त्यम्। स्वाहोरात्रार्धहृतफलमजाल्लकोदयप्राग्ज्या ॥२५॥ स्वाहोरात्रव्यासाघु स्वाहोरात्रा काष्ठान्त्यमपक्रमकाष्ठान्तगतम् । परमाप- क्रम साधितस्वाहोरात्रार्धम् । सर्वरात्रिविषयेऽपि परमापक्रमसिद्धस्वाहीरार्धमेव निहन्यते । इत्येवशब्देनोक्तं परमापमसिद्धाहोरात्रार्ध शशिकृतशशिरामतुल्यमि- .

-
आर्यभटीये-
८३
ष्टज्ययेष्ट भुजज्यया निहत्य तद्भुजज्यासाधितेनेष्टस्वाहोरात्रात हरेत्।तत्र लब्ध-
मजानोदयप्राग्उया भवति। लङ्कायां तद्भुजाभागगतराव्युदयकालजाता प्राग्ज्या
प्रागपरमण्डलज्या । घटिकामण्डलग्येत्यर्थः । सा चापितोदयास्तमितिर्भवति ।
एवं भुजाभागस्योदयप्रमाणानयमम् । प्रतिराशिमानन्तु। इष्टराशेराद्यान्त्यभुजा-
ज्याभ्यां पृथग्राशिमानद्वयमानीय तयोरन्तरं कुर्यात् । तदिष्टराशेलकोदयमानं
भवति । मेषादितस्तुलादितश्च क्रमेण भुजायाः
प्रवृत्तिः । अतस्तत्र राश्युदयाश्च
क्रमेण भवन्ति।कन्यान्तान्मीनान्तच्चोत्क्रमेण भुजायाः प्रवृत्तिः । अतस्तत्रराश्युदया-
श्चोत्क्रमेण भवन्ति। अत्रैवं त्रैराशिकम् । यदि त्रिज्यया परमापसिद्धस्थाहोरात्रार्ध-
तुल्या
कोटिर्लभ्यते तदेष्टज्यया कियतीतीष्टस्वाहोरात्रागतेष्टकोटिलब्धिः। य-
दीष्टस्वाहोरात्रार्ध इयती कोटिस्तदा व्यासार्धं कियतीति व्यटिकामण्डलगतरा-
श्युदयज्यालब्धिः । अत्र प्रथमत्रैराशिके व्यासार्धं भागहारः। द्वितीये सगुणकारः
तयोर्गुणकारहारयोस्तुल्यत्वात्तदुदयं विना कर्म क्रियते । दिननिशोः क्षयवृदया-
नयनमाह।
भा०:--परमापक्रम साधित स्वाहोरात्रार्द्ध को इष्ट भुजज्या से गुणन कर,
उस भुजज्या से साधित इष्ट स्वाहोरात्राई द्वारा भाग देवे भाग फल मेष
राशि से लडोदय प्रागज्या होता है ॥ २५ ॥
इष्टापक्रमगुणितामक्षज्यां लम्बकेन हृत्वाया।
स्वाहोरात्रे क्षितिजा क्षयवृद्विज्या दिननिशोस्सा ॥२६॥
इष्टापक्रमज्ययाक्षज्या निहत्य लम्बके हृत्वा यल्लभ्यते सा स्वाहोरात्रे स्वा-
होरात्रमण्डलनिष्पन्ना दिननिशोः क्षयवृद्धिण्या क्षितिजा क्षितिजमण्डलादुत्प-
मा । तितिज्येत्यर्थः । अत्रैवं त्रैराशिकम् । यद्यवलम्बककोटमाक्षज्या भुजा तदा-
पक्रमकोट्या का भुजेति ज्यालब्धिः । सा वाहोरात्रनिषण्णा । अतस्तां त्रिज्यया
निहत्य स्वाहोरात्रेण विभजेत् । तत्र लब्धा घरदलज्या भवति । अत्रैवं त्रैराशि-
कम् । यदा स्वाहोरात्र इयती ज्या तदा व्यासानण्डले कियतीतिध्यासार्धमण्ड-
लज्यालब्धिः । घरदलाश्चापिताश्चरदलासवो भवन्ति । स्वदेशराश्युदयमाह ।
भा:--इष्टापक्रमज्या से अक्षम्या को गुणनकर लम्बक से भाग दे, भाग
फल को, स्वाहोरात्राई में स्वाहोरात्रमण्डल निष्पन्न दिन रात्र के क्षय वृद्धि
ज्याक्षितिजा, क्षितिज मण्डल से उत्पन्न क्षितिज होता है ॥ २६ ॥
उदयंति हि. चक्रपादश्चरदलहीनेन दिवसपादेन।
प्रथमो ऽन्त्यनाथान्यौ ततसहितेन क्रमोत्क्रमतः॥२७॥

८४ गीसिकापादः॥ प्रथमश्चक्रपादो मेषवृषमिथुनाख्यश्चरदलहीनेन दिवसपादेन। चरदलहीना- भिः पञ्चदशघटीभिः । उदयति । अन्त्यश्च मीनघटमृगाख्यस्तथा चरदलहीनाभिः पञ्चदशघटिकाभिरुदयति। अतो मृगादिमिथुनान्तानां षण्णां लङ्कोदयास्तद्राशि- भवचरदलासुभि नास्स्वदेशोदया भवन्ति । अथान्त्यौ तत्सहितेन । कर्कसिंहक- न्याख्यस्तुलालिघापाख्यश्च चक्रपादौ चरदलसहितेन दिवसपादेनोदयतः । अतः कादिचापान्तानां षण्णां राशीनां लङ्कोदयास्तत्तच्चरदलयुतास्स्वदेशोदया भव- न्ति । क्रमोरक्रमतः । प्रथमपादे प्रथमराशेर्मेषस्य लड्रोदये प्रथमराशिभवं घरद- लं शोध्यम् । वृषस्य द्वितीयस्य लोदये द्वितीयराशिभवं चरदलं शोध्यम् । तृ- तीयस्य मिथुनस्य लङ्कोदये तृतीयराशिभवं चरदलं शोध्यम्। द्वितीयपादे तूरक- मेण देयम् । कर्कटस्थ तृतीयराशिधरदलं देयम्। सिंहस्य द्वितीयराशिचरदलं दे- यम् । कन्यायाः प्रथमराशिचरदलं देयम् । तृतीयपादे क्रमेण देयम् । चतुर्थपाद उत्क्रमेण शोध्यम् । इत्युक्तं भवति । गोलस्योत्तरोन्नतत्वान्मीनादयश्शीघ्रमुद्य- न्ति । अतस्तेषु घरदल शोध्यम् । तस्मादेक कर्कटादयश्शनरुद्यन्ति । अतस्तेषु चरदलं देयम् ॥ इष्टकाले शक्कानयनुनाह । भा:-प्रथम चक्र पाद अर्थात् मेष, वृष, मिथुन नामक है। चरदल हीन द्वारा दिवसपाद से अर्थात् १५ घटिका करके उदय होता है। और अन्त्य अर्थात् मीन, कुम्भ, मकर, नामक पाद है, सो १५ घटिका करके उदय होता है , इसलिये मकर, कुम्भ, मीन, मेष, वृष, मिथुन, इन छः राशियों का उदयास्त १५ प्राण हीघटा करके स्वदेशोदय होता है ॥और कर्क, सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक, धनु, से प्रथम तीन राशि द्वितीय पाद और दूसरा तीन शि तृतीय पाद है । १५ घटिका जोड़ने से उदय होता है । अतएव कर्कादि धनु पर्यन्त छः राशियों को लङ्कोदय उस उस १५ प्राण के जोड़ने से स्वदेशोदय होता है। प्रथम पाद में प्रथम राशि मेष राशि के लतोदय में प्रथम राशि से उत्पन्न घरदल घटावे । वृष राशि अर्थात् द्वितीय राशि के लङ्कोदय में द्वितीय राशि भव घरदल घटावे । तृतीय मिथुन राशि के लङ्कोदय में तृतीय राशि भव घरदल घटावे। और द्वितीय पाद में कर्कट राशि का तृतीय चरदल जोड़े। सिंह राशि के तृतीय राशि के घरदल जोड़े। चतुर्थ पाद में उत्क्रम करके घटावे। गोल के उत्तर उन्नत होने से मीन आदि राशि शीघ्र उदय होती है, अतएव उन में चरदल घटाया जाता है। और कर्कट आदि राशि धीरे २ उदय होती है इस लिये उन में चरदल जोड़ा जाता है ॥२७॥ क्रम ८५ आर्यभटीये- स्वाहोरात्रष्टज्यां क्षितिजादवलम्वकाहतांकृत्वा। विष्कम्भाविभक्त दिनस्य गतशेषयोश्शसङ्कुः ॥२८॥ क्षितिजात् क्षितिजमण्डलादुत्पन्नां स्वाहोरात्रेष्टज्यां पूर्वाह्न दिनस्य गत- घटिकाभिरानीतामपराह्ने दिनस्य शेषघटिकाभिरानीतामवलम्बकेनाहतां कृत्वा पुनस्तस्मिन् राशौ विष्कम्भार्धन विभक्ते सति शङ कुर्भवति । इष्टकाले म- हाशङ्कुर्भवति । दिनस्य गतशेषयोश्श कुः । अभीष्टदिनगतकालेऽभीष्टदिनैष्य- काले च शकुर्भवति । दिनस्य गतशेषयोस्स्वाहोरात्रेष्टज्यामिति वा सम्बन्धः । अत्रैवं त्रैराशिकम् । यदि त्रिज्यातुल्यस्वाहोरात्रेष्टज्यया लम्बकतुल्यश्शङ्कुर्लभ्यते तदेष्टस्खाहोरात्रेष्टज्यया कश्शङ्कुरितीष्टशङ्कुलब्धिः । विषुवद्दिनमध्याहे हि त्रिज्या स्वाहोरात्रेष्टज्या । अवलम्बकश्श कुः । स्वाहोरात्रेष्टज्यानयनन्तु । उत्तर गोले गतगन्तव्यासुभ्यश्रदलासून्विशोध्य जीवामादाय स्वाहोरात्रार्धेन निहत्य त्रिज्यया विभज्य लब्धे भूज्या प्रक्षिपेत् । सा क्षितिजादुत्पन्ना स्वाहोरात्रेष्टज्या भवति । दतिसगोले तु चरदलप्रक्षेपभूज्यायाश्शोधनम् । इत्येवं विशेषः । शङ्- कुवर्ग त्रिज्यावर्गाद्विशोध्य शिष्टस्य मूलं तस्य शङ्कोश्छाया भवति । शकुच्छा- ययोर्भुजाकोटित्वादाभ्यां त्रैराशिकादिष्टच्छाया साध्या । छायाया नाडिकाकर- गन्तु । द्वादशाङगुलशकुना त्रिज्यां निहत्येष्टच्छायाकर्णन विभज्य लब्धं महा- शङ कुर्भवति । तस्माच्छङ्कुविधिव्यत्ययकर्मणा गतगन्तव्यनाडिका भवन्ति ॥ भा:--क्षितिज मण्डल उत्पन्न स्वाहोरात्रेष्टज्या को पूर्वान्ह में दिन के गत घटिका द्वारा लाये अवलम्बक से गुणन कर, पुनः उस राशि में व्या- सार्दु से भाग देने पर दिन के गत और गम्य का शङ्ख होगा। अभीष्ट दिन के गत काल में और अभीष्ट दिन के गम्य काल में शङ्ख होता है ॥२८॥ विषुवज्जीवागुणितस्स्वेष्टश्शङ्कुस्स्वलम्बकेन हृतः। अस्तमयोदयसूत्राद्द क्षिणतस्सूर्यशङ्कग्रम् ॥ २६ ॥ स्वेष्टं महाशकुं स्वदेशविषुवउज्यया निहत्य स्वदेशलम्बकेन विभजेत् । तत्र लब्धमस्तोदयसूत्राद्दक्षिणतस्सूर्यस्य शङ्कगं भवति । नित्यदक्षिणं शक्कग्रं भवति गोलस्योत्तरोन्नतत्वात् । सूर्यग्रहणं चन्द्रस्याप्युपलक्षणम् । अत्रैवं त्रैरा- शिकम् । यद्यवलम्बककोट्याक्षज्या भुजा तंदा शकुकोट्या का भुजेति । उभयत्र क्षेत्रस्यानिमित्तत्वात्त्रैराशिकं घटते । अथवा। लम्बकशङ्कोरक्षज्या भुजा तदेष्ट- शङ्कोः का मुजेति त्रैराशिकम् ॥ अथार्कीग्रानयनमाह । शक्कग्रानयामाह।

महाशङ्ख मैं । ८६ गीतिकापादः॥ भा०:-स्वेष्ट को स्वदेश विषुवजज्या से गुणनकर गुणनफल स्वदेश लम्बक का भाग देवे, भागफल प्रस्तोदय सूत्र से दक्षिण से सूर्य को शङ्कग्र होता है । नित्य ही दक्षिण शङ्कन होना है, गोल के उत्तर उन्नत होने से । सूर्य ग्रहण कहने से चन्द्रग्रहण का भी उपलक्षण जानना ॥ ९ ॥ परमापक्रमजीवामिष्टज्यार्धाहतो ततीविभजेत् । ज्यालम्बकेन लब्धार्काग्रा पूर्वापरेक्षितिजे॥३०॥ परमापक्रमजीवामिष्टज्यया सायनार्कस्य भुजज्यया निहतां कृत्वा ततो ज्यालम्बकेन लम्बकाख्यजीवयाविभजेत्।अवलम्बकेनेत्येवार्थः । तत्र लब्धाकग्रा भवति । पूर्वापरे क्षितिजे।पूर्वक्षितिजे यत्र रविरुदेति। अपरक्षितिजे यत्र चास्तं गच्छति। तत्स्थानद्वयस्य पूर्वापरस्वस्तिकस्य चान्तरालजाता क्षितिजमण्डलगता जीवार्काग्रेत्यर्थः । अत्रैवं त्रैराशिकम् । यदि त्रिज्यया परमापक्रमो लभ्यते तदे- ष्टज्यया कियानपक्रम इतीष्टक्रान्तिलब्धिः । यद्यवलम्बनोटिकस्य क्षेत्रस्य त्रिज्या कर्णस्तदेष्टक्रान्तिकस्य क्षेत्रस्य कः कर्ण इत्यकोग्रालब्धिः । प्रथमत्रराशिक त्रिज्या हारः। द्वितीये त्रिज्या गुणकारः। अतस्तदुभयं विना कर्म क्रियते ॥ अस्य सममण्डलप्रवेशकाले शडक्वानयनमाह । भा०:--परमापक्रम जीवा को सायन सूर्य की भुजज्या से गुणनकर गु- णनफल में लम्बक नामक जीवा का भागदेवे, भागफल अर्काया होता है। पूर्वापर क्षितिज में जहां पर सूर्योदय होता एवं अपर क्षितिज में जहां सू- र्यास्त होता है। अर्थात् उन दोनों स्थान से पूर्वापर स्वस्तिक के बीच से उ- त्पन्न क्षितिज भण्डलगत जीवा अकांग्रा होती है ॥ ३० ॥ सा विषुवज्योना चैद्विषुवदुदग्लम्बकेन सङ्गुणिता। विषुवज्यया विभक्ता लब्धः पूर्वापरे शकुः ॥३१॥ विषुवदुदक् विषुमण्डलादुदग्गता। उत्तरगोलभवा सा.। अर्काग्रा । विषु- वज्योनाचेत् । विषुवज्ज्योनया क्रान्त्या साधिता घेदित्यर्थः । विषुवज्योन- क्रान्तिसिद्धासोदग्गताकग्रा लम्बकेन गुणिता विषुवज्ज्यया विभक्ता कार्या। तत्र लब्धं पूर्वापरसूत्रगतेकै शङ् कुर्भवति।सममण्डलश कुरित्यर्थः । 'सममण्डल गते योग्रातुलितं शङकग्रम् । तत्रैव त्रैराशिकम् । यद्यक्षतुल्येन शक्ग्रेण लम्बकतुल्यश्श कुर्लभ्यते तदाकाग्रातुल्येन शङ्कग्रेण कश्शकुरिति सलमण्डल शङकुलब्धिः ॥ मध्याहूशङकुं तच्छायाञ्चव्ह ।

29 प्रार्यभटीये- --विषुवन्मण्डल से उत्तरगत अर्थात् उत्तर गोल से उत्पन्न अर्काग्रा, विषुवजज्या से उन क्रान्ति से साधित हो तो विषुवजज्या से जन क्रान्ति सिद्ध वह उदगगगतार्काना लम्बक से गुणित विषुवजज्या से भाग देवे भाग फल, पूर्वापर सूत्रगत सूर्य में शक होता है। अर्थात् सममण्डल शेङ्क होगा ॥३१॥ क्षितिजादुन्नतभागानांया ज्यासा परोभवेच्छ कुः। मध्यान्नतभागज्या छायाशङ्कोस्तु तस्यैव ॥३२॥ मध्याहूकाले दक्षिणक्षितिजादुत्तरक्षितिजादा यावद्भिरंशैरुन्नतोऽर्को भवति तावतां भागानां या ज्या भवति सा परशकुर्भवति । मध्याह्नशङ्कुरित्यर्थः ॥ खमध्याद्यावद्भिरंशैरवनतोऽर्को भवति तावतां भगानां या ज्या सा तस्य शङ्को- श्छाया भवति । मध्याहरुछायेत्यर्थः । दक्षिणगोले क्रान्तिचापाक्षचापयोोगो- पावनतिः । उत्तरगोले तयोर्विवरमर्कावनतिः। अवनतिहीनं राशित्रयमुन्नतिः॥ दूक्क्षेपज्यानयनमाह। भा:--मध्यान्ह काल में दक्षिण क्षितिज से या उत्तर क्षितिज से जि- तने अंशों करके सूर्य उन्नत हो उतने ही अंशों की ज्या होती है, वह शङ्ख होता है। आकाश मध्य से जितने अंशों करके सूर्य अवनत होता है, वह उस की छाया होती है। ( मध्यान्ह छाया )। दक्षिण गोल में क्रान्ति चाप और अक्षचाप का योग सूर्य की अवनति होती है। उत्तर गोल में क्रान्ति चाप और अक्षचाप के अन्तर सूर्य की अवनति होती है। अवनत हीन तीनों राशि उन्नति कहाती है ॥ ३२ ॥ मध्यज्योदयजीवासंवर्ग व्यासदलहृते यत् स्यात् । तन्मध्यज्याकृत्योर्विशेषमूलं स्त्रकक्षेपः॥ ३३॥ मध्यलमस्य दक्षिणामधनुरक्षधनुषोर्योगस्य जीवा मध्यज्या। मध्यलम- स्योत्तरापमधनुरक्षधनुषोरन्तस्य जीवा मध्यज्या । क्षितिजे यत्र तत्काललनमु- दयति तत्स्थानपूर्वस्वस्तिकयोरन्तरालजीवा सोदयज्येत्युच्यते । सायनलमस्य भुजज्यापक्रान्तिहता लम्बकभाजितोदयज्या भवति । संवर्गः परस्परनिहति। मध्यज्योदयज्ययोसंवर्ग व्यासाहिते यल्लभ्यते तस्य वर्ग मध्यज्यावर्गाद्विशोध्य शिष्टस्य मूलं स खक्क्षेपः । यस्य ग्रहस्य. रवेश्शशिनो वा मध्यलग्नं परिगृहीतं तस्य दुक्क्षेपज्या भवतीत्यर्थः । दृक्क्षेपलमखमध्ययोरन्तरालजीवा द्रुक्क्षेपज्ये-, युध्यते । सूर्यग्रहणे रवेश्चन्द्रस्य च मध्यज्यादृक्क्षेपज्ये पृथक् साध्ये । युक्तिस्त्व- - गीतिकापादः ॥ अ च्छेद्यके शेया। तदन्यत्र प्रदर्शितम् । मध्यलमन्तु पूर्वाह्न नताशुभ्यो रविस्थि तराशिभागादुत्क्रमेण लङ्कोदयासन्विशोध्य तावतो राशीन् रवौ विशोध्य सा- ध्यम् । अपराह्न तु नतप्राणेभ्यो रविस्थितभागात् क्रमेण लङ्कोदयासून्विशोध्य तावतो राशीन रवी प्रक्षिप्य साध्यम् । दृग्गतिज्वालम्बनयोज़नानयनमाह । भा:-मध्य लग्न का दक्षिण अपमधनु और अक्षधनु के योग की जीवा मध्यज्या है। मध्यलम के उत्तर अपमधनु और अक्षधनु के अन्तर जीवा मध्यज्या होती है। क्षितिज में जहां तत्काल लम उदय होता है। उस स्थान से और पूर्वापरस्वस्तिक के बीच की जीवा उदयज्या है। सायन लम की भुजज्या को अपक्रम क्रान्ति से गुणनकर, लम्बक से भागदेवे, भागफल उदयज्या होता है। मध्यज्या और उदयज्या के वर्ग में व्यासाई से भाग देवे भागफल के वर्ग को मध्यज्या वर्ग से घटावे, अवशिष्ट का मूल निकाले वह स्वदृक् क्षेप होगा। जिस ग्रह का या सूर्य या चन्द्रमा का मध्यलम ग्रहण किया जावे उसकी दूक्क्षेपज्या होगी । दृक्ोप लग्न और आकाश मध्य के बीच की जीवा दूक्क्षेपज्या होती है। सूर्य ग्रहण और चन्द्रग्रहण में मध्यज्या और दृक् क्षेपज्या भिन्न २ साधे ॥ ३३ ॥ दृग्दृक्क्षेपकृतिविशेषितस्य मूलं स्वदृग्गतिः कुवशात् । क्षितिजे स्वा दृक्छाया भूव्यासाधू नभोमध्यात्॥ ३४ ॥ दृग्भेदहेतुभूता स्वच्छायां दूग्ज्या वा स्वदृग्गतिज्या वा दृक्क्षेपज्यावेयं यः। सा यदि क्षितिजे भवति नभीमध्यात् क्षितिजान्ता भवति। व्यासार्दुतुल्या भव- तीत्यर्थः। तदा कुवशाभूमिवंशान्निष्पन्नो दृग्भेदो व्यासाधं भवति । भूव्यासार्ध- तुल्यं दृग्भेदयोजनमित्यर्थः । नन्तराले ऽनुपातात् कल्प्यम् । अतो दुग्गतिज्यां भूव्यासाधन निहत्य त्रिज्यया विभज्य गतं दृग्भेदयोजनं भवति । ग्रहणे तल्लम्ब नभवति । दृक्क्षेपज्यां भूव्यासार्धन निहत्य त्रिज्यया विभज्य लब्धं ग्रहणे नति योजनं भवति । दूग्ल्यात एवं लब्धं दृमण्डलगतं. कर्णरूपं लम्बनयोजन भवति । अनेन ग्रहणे न व्यवहारः।युक्तिविषयोत्वेतदपि वेद्यम् । लम्बनयोजन नतियोजनञ्च त्रिज्यया निहत्य स्वेन-स्वेन योजनव्यासेन विभजेत् । तत्र लब्धं तस्य तस्य लम्बनलिप्ता नतिलिप्ताश्च भवन्ति । अर्कन्दोर्नतिलिप्तान्तरं सूर्यग्र- हसे नतिर्भवति पर्धान्तकालाच्छोध्या। अपराह्न देया। एवं संस्कृतं पर्वान्तं स्फुट- शशिमासान्तमित्युच्यते॥ चन्द्रादीनामुदयास्तलमसिद्धये स्वस्वविक्षेपेण दूकाह।

आर्यभटीये- ---दूग हेतुभूत अपनी छाया या दृगज्या या दृक् क्षेपज्या है। वह यदि क्षितिज में आकाश मध्य से क्षितिज के अन्त तक होती है। अर्थात् व्यासाई तुल्य होती है, तब भूमि वशतः निष्पन्न ( उत्पन्न ) ग्भेद व्यासाई होता है। अर्थात् भूव्यासाई तुल्य दृगभेद योजन होता है। बीज में त्रैराशिक से कल्पना करे । अतएव दृग्गतिज्या को भव्यासाई द्वारा गुणन कर त्रिज्या से भाग, देवे भागफल दूग्भेद योजन होता है। ग्रहण में वह लम्बन होता है। दृक्क्षेपज्या को भूव्यासाई से गुणन कर त्रिज्या से भाग देवे भागफल ग्रहण में नतियोजन होता है । दृग्ज्या से इस प्रकार लब्ध दृङ्मण्डल गत कर्णरूप ल- म्बन योजन होता है। इस के द्वारा ग्रहण में व्यवहार नहीं किया जाता ॥३४॥ विक्षेपगुणाक्षज्या लम्बकभक्ता भवेदृणमुदस्थे। उदये धनमस्तमये दक्षिणगे धनमृणं चन्द्रे ॥३५॥ विक्षेपगुणिताक्षज्या लम्बकभाजिता लिप्ताम्मकं दृकफलं भवति। उदकस्थे । अपमण्डलादुदस्थे चन्द्रे । उदये ऋणम् । उत्तरविक्षेप उदयविषये तफलं चन्द्र ऋणं कार्यमित्यर्थः । प्रस्तमयविषये तत्फलं चन्द्रे धनं कुर्यात् । दक्षिणगे धनमृणं चन्द्र । दक्षिणविक्षेप उदयविषये तत्फलं चन्द्रे धनं कार्यम् । तत्काल- चन्द्र एतत् क्रियते । एतदादं दृक्कर्म ॥ आयनं दृक्कर्माह। भा:-विक्षेप गुणित अक्षज्या लम्बक से भाग देने पर भागफल लिप्तात्मक दृक्फल होता है । अपमण्डल से उदकस्य चन्द्रमा में, उदय में ऋण करना अ- र्थात् उत्तर विक्षेप में उदय विषय में उस दृकफल चन्द्रमा में ऋण करना चाहिये । अस्तमय विषय में उस फल को चन्द्रमा में धन करे । दक्षिण वि. क्षेप उदय विषय में उस फल को चन्द्रमा में धन करे। इस को प्रातदूक कर्म कहते हैं ॥ ३५॥ विक्षेपापक्रमगुणमुत्क्रमणं विस्तरार्धकृतिभक्तम्। उदगृणधनमुदगयने दक्षिणगे धनमृणं याम्ये॥३६॥ उत्क्रमणं विक्षेपापक्रमगुणम् । सायनचन्द्रस्योत्क्रमणं कोट्या उत्क्रमज्ये- त्यर्थः । वद्विक्षेपेण . परमापक्रमेण च निहत्य विस्तरार्धस्य व्यासार्धस्य कृत्या विभजेत् । तत्र लब्धं लिप्तात्मकद्रकालं भवति॥ उदगृणधनमुदगयने दक्षिणगे । उदगयन उदग्विक्षेपे तत्फलं चन्द्र ऋणं भवति । तत्र दक्षिणगे विक्षो तत्फलं' चन्द्रे, धनं भवति । उदग्दक्षिणगे च क्रमादृणम्। इति योज्यम् ॥ धनमृणं याम्ये । . १२ ९० - - । गीतिकापादः॥ दक्षिणायनगते चन्द्रे पूर्वक्रमादनमृणच भवति । उदग्निक्षेपे धनम् । दक्षिणवि- क्षेप ऋणमित्यर्थः । प्राचार्या स्थूलरूपं दृफलद्वयमिह प्रदर्शितम् । नतु सूक्ष्म- रूपमिति वेद्यम् । अस्मात् स्थूलरूपात् सूक्ष्मरूपं युक्तया सिद्धयतीति भावः । यस्य चन्द्रस्योदयास्तलममपेक्षितं तत्र दृक्कर्मद्वयं कार्य नतु ततोऽन्यत्र ॥ चन्द्रार्क- भूमिभूच्छायानाम:न्दुग्रहणयोश्च स्वरूपमाह । भा:-विक्षेप क्रमगुण अर्थात् सायन चन्द्रमा के उत्क्रमण को कोदी द्वारा उत्क्रमज्या लावे । उसके विक्षेप और परमापक्रम द्वारा गुणनकर व्या- सार्द्ध के कृति ( वर्ग) से भाग देवे भागफल लिप्तात्मक दृक्फल होगा । उद- गयन उदग विक्षेप में उसका फल चन्द्रमा में ऋण होता है; उस दक्षिणग विक्षेप में वह फल : चन्द्रमा में धन होता है। उत्तर दक्षिणग विक्षेप में क्रम से ऋण होता है। दक्षिणायन गत चन्द्रमा में पूर्व क्रम से धन और ऋण होगा। उत्तर विक्षेप में धन होता है और दक्षिण विक्षेप में ऋण होता है॥३६॥ चन्द्रो जलमो ऽग्निर्मदभूश्छायापि या तमस्तद्धि। छादयति शशी सूर्य शशिनं महती च भूच्छाया॥३७॥ चन्द्रो जलात्मकः । अर्कोऽनिमयः । भूमिर्मुदात्मिका । तस्या भूमेर्या छाया भच्छायाख्या सा हि तमः । सूर्य ग्रहणकाले शशी छादयति नतु राहुः । शशिनं ग्रहणकाले महती भूच्छाया छादयति नतु राहुः ॥ ग्रहणकालमाह । भा:-जल स्वरूप चन्द्रमा, अमिस्वरूप सूर्य, मृत्तिकामय भूमि हैं भूमि की छाया का नाम अन्धकार है। सूर्य ग्रहण में चन्द्रमा सूर्य को पाच्छा- दित ( ढक ) कर लेता है; राहु नहीं। और चन्द्रग्रहण में पृथिवी की छाया चन्द्रमा को ढक लेती है, राहु नहीं ॥ ३७॥ स्फुटशशिमासान्ते ऽकं पातासन्नो यंदा प्रविशतीन्दुः । भूच्छायां पक्षान्ते तदाधिकोनं ग्रहणमध्यम् ॥३८॥ स्फुटशशिमासान्ते लम्बनसंस्कृतेऽमावास्यान्तकाले पातासबोल्पविक्षेप- श्चन्द्रो यदाकं प्रविशति तदाधिकोनं ग्रहणमध्यम् । अधिककालस्याल्पकालस्य चन्द्रग्रहणस्य मध्यं तदा भवतीत्यर्थः । पक्षान्ते पौर्णमास्यन्ते यदा चन्द्रो भ- छायां प्रविशति तदा चन्द्रग्रहणस्य मयं भवति । कैश्चितु स्फुदशशिमासान्त केवलममावास्यान्तं तत्र ग्रहणमूर्ध्वगतं भवति कदाचिदूनमधोगतं भवति । इतिव्या ख्यातम् । भूछायादैर्घ्यमाह ।

। आर्यभटीये- ९१ भा: लम्बन संस्कृत अमावास्या काल में अल्पविक्षेप चन्द्रमा जब सूर्य मण्डल में प्रवेश करता है, तब न्यनतर ग्रहणमध्य होता है। अर्थात् अधिक काल एवं अल्पकाल का चन्द्रग्रहण मध्य होताहै। पौर्णमासी को जन्म चन्द्र- मा भच्छाया में प्रवेश करता है, तब चन्द्रग्रहण का मध्य होता है ॥ ३८ ॥ भूरविविवरं विभजेदभूगुणितन्तु रविभूविशेषेण । भूच्छायादीर्घत्वं लब्धं भूगोलविष्कम्भात् ॥३६॥ भूरविविवरमर्कस्य स्फुटयोजनतुल्यं तद्भगुणितं भव्यासयोजनगुणितं कृत्वा रविभूविशेषेण रविव्यासयोरन्तरेण योजनात्मकेन, विभजेत् । तत्र रनब्धं भूच्छा- याया देध्यं योजनात्मकं भवति । भूगोलविष्कम्भात् भव्यातार्धात् । भूगोलस्य मध्यात्प्रभुतीदं छायादेयं भवतीत्यर्थः ॥ भच्छायायाश्चन्द्रकक्ष्याप्रदेशे व्यासयो- जनानयनमाह । भा:--पृथिवी और सूर्य का स्फुट योजन तुल्य भूव्यास योजन गुणित सूर्यव्यास और भूव्यास के योजनात्मक अन्तर से भाग देव, भागफल भू त्या की चौड़ाई योजनात्मक होती है। पृथिवी के व्यासाई से अर्थात् भगाल के मध्य प्रभृति से यह छाया दैर्घ्य होती है ॥ ३९ ॥ छायाग्रचन्द्रविवरं भूविष्कम्भेण तत् समभ्यस्तम् । भूच्छायया विभक्तं विद्यात्तमसरस्वविष्कम्भम् ॥४॥ छायाग्रचन्द्रविवरं चन्द्रस्य स्फुटयोजनकर्णन हीनं छायादैयमित्यर्थः । तद्रव्यासेन निहत्य भूच्छायादेपेण विभजेत् । बन्न लब्धं चन्द्रमार्गे तमसो भू- च्छायायास्वविष्कम्भो योजनात्मकव्यासो भवति । तं व्यासं त्रिज्याकर्णन दि- भजेत् । तत्र लब्धं लिप्तात्मकस्तमोत्यासो भवति । अर्केन्द्रोश्च स्वयोजनव्याम त्रिज्याकन निहत्य स्वस्फुटयोजनकर्णन विभज्य लब्धं लिप्तात्मकस्वव्यासो भवति ॥ स्थित्यानयनमाह। भा०-चन्द्रमा के स्फुट योजन से कर्ण घटाकर अर्थात् छाया के लम्बाई को भूव्यास से गुखन कर गुणनफल में भूछाया के लम्बाई से भाग देवे; भागफल चन्द्रमा के मार्ग में तन (ग्रन्थकार) अर्थात् भूछाया का स्वकीय विष्कम्भ अर्थात् यो जनात्मक व्यास होगा। उस ध्यास को त्रिज्या कर्ण द्वारा भाग देबे, भागफल लिप्तात्मक तनोव्यास होगा । सूर्य और चन्द्रमा के अपने २ योजन व्यास को १२ गीतिकापादः ॥ त्रिज्याकर्ण से गुणन कर गुणनफल में अपने २ स्फुट योजन कर्ण द्वारा भाग देने से भागफल लिप्तात्मक अपना २ व्यास होगा ॥ ४० ॥ सम्पर्धिस्य कृतेश्शशिविक्षेपस्य वर्गितं शोध्यम् । स्थित्यर्धमस्य मूलं ज्ञेयं चन्द्रार्कदिनभोगात् ॥४१॥ संपर्कार्धस्य कृतेः । सूर्यग्रहणे सूर्यन्दोबिम्बयोगार्धस्य वर्गाच्छशिनी विक्षे- पस्य वर्गितं शोध्यम् । विशोधयेदित्यर्थः । चन्द्रग्रहणे चन्द्रतमसोबिम्बयोगा- र्धस्य वर्गात् केवलस्य चन्द्रविक्षेपस्य वर्ग विशोधयेत् । तत्र यच्छिष्टं तस्य मूलं स्थित्यर्थं भवति । स्थित्यर्धसाधनमित्यर्थः । तत् कथमित्यत्राह । चन्द्रार्कदिन- भोगादिति । तस्मान्मूलात् षष्टिनादर्केन्द्वोर्गत्यन्तरेण स्थित्यर्धनाडिका भव- न्तीत्यर्थः । चन्द्रग्रहणे तास्स्फुटा भवन्ति । सूर्यग्रहणे तु स्थित्यर्धकालसम्भूतेन लम्बनकालेन युतास्स्फुटा भवन्ति । मध्यकाललम्बनस्पर्शकाललम्बनयोरन्तरेण युतास्पर्शस्थित्यर्धनाडिकास्स्फुटा भवन्ति तथा. मोक्षकाललम्बनमध्यकाल- लम्बनयोरन्तरेण युता मोक्षस्थित्यर्धनाडिकांच स्फुटा भवन्तीत्यर्थः ॥ विमर्दा- र्धकालानयनमाह। भा०:-सूर्यग्रहण में सूर्य और चन्द्रमा के विम्ब के योगार्द्ध के वर्ग से चन्द्रमा के विक्षेपवर्ग को घटावे। चन्द्रग्रहण में चन्द्रमा के तम विम्ब के योगाई के वर्ग से केवल चन्द्र विक्षेपवर्ग को घटावे। उस से जो शेष बचे उ. सका मूल निकालने से स्थित्यर्द्ध होगा। उक्त एल को ६० से गुणनकर-गुण- नफल को सूर्य और चन्द्रमा की गति से अन्तर करने पर स्थित्यर्द्ध नाडिका होगी । चन्द्रग्रहण में वे ही स्फुट होंगी । सूर्यग्रहण में तो स्थित्यर्द्ध काल स- म्भूत से लम्बन काल को जोड़ने पर स्फुट होंगी। मध्यकाल लम्बन और स्पर्श काल लम्बन से घटाकर जोड़े तो स्पर्श स्थित्यई नाडिका स्फुट होंगी। और मोक्ष काल लम्बन और मध्यकाल लम्बन से घटाकर जोड़ने से मोक्ष- स्थित्यई नाडिका स्फुट होंगी ॥ ४१ ॥ चन्द्रव्यासा/नस्य वर्गितं यत्तमोमयार्धस्य। विक्षेपकृतिविहीनं तस्मा मान्मूलं विमर्दार्धम्॥४२॥ चन्द्रबिम्बार्धहीनं तमोबिम्बाधं यत्तस्य वर्गाद्विक्षेपवर्ग विशोध्य यच्छिष्ट त. स्वान्मूल विमर्दा विमर्दसाधनं भवति । तस्मात् षष्टिनादन्द्वोर्गत्यन्तरेण विमर्थकालो नाडिकात्मको भवतीत्यर्थः ॥ ग्रस्त शेषप्रमाणमाह । ॥

३ भा०:- आर्यभटीये। :-चन्द्रबिम्बार्द्धहीन तमोविम्बाई को जो उसके वर्ग से विक्षेप वर्ग को घटाकर बचे, उस का मूल विमर्दार्द्ध होता है , उसी को विमर्द साधन कहते हैं । उस को ६० से गुणनकर सूर्य और चन्द्रमा की गति से घटानेपर शेष- फल विमर्दाई नाडिका होंगी ॥ ४२ ॥ तमसो विष्कम्भाशशिविष्कम्भावर्जितमपोह्य। विक्षेपाद्यच्छेषं न गृह्यते तच्छशाङ्कस्य॥१३॥ चन्द्रबिम्बाधं तमोबिम्बाद्विशोध्य शिष्टं विक्षेपाट्तिशोधयेत् । तत्र य- छछेषं तत्तुल्यश्चन्द्रस्य भागस्तमसा न गृह्यते। शेषलिप्तासमानलिप्ता न गृह्यन्ते। इत्यर्थः ॥ तात्कालिकग्रासपरिज्ञानमाह । भा०:--चन्द्रविम्बाई को तमोविम्बाई से घटाकर • शेषफल को विक्षेप से घटावे जो बचे उसके तुल्य चन्द्रमा का भाग अन्धकार से ग्रसित नहीं होता॥४३ विक्षेपवर्गसहितात् स्थित्यर्धादिष्टवर्जितान्मूलम्। सम्पर्कार्धाच्छोध्यं शेषस्तात्कालिको ग्रासः॥४४॥ (विक्षेपकृतियुतादिष्टकालकोट्यूनस्थित्यर्धकोटेर्वर्गाद्यन्मूल तत् सम्पर्धक- तेर्विशोध्यम् । तत्र यच्छेषं तत् तात्कालिकग्रासप्रमाणं भवति ॥ स्पर्शमोक्षादि ज्ञानमाह ।* भा:-विक्षेप वर्ग जोड़ा हुआ, इष्टकाल कोठी से घटाकर स्थित्यर्द्ध कोटी के वर्ग से मूल कर उसे सम्पर्द्धवर्ग से घटावे-शेषफल तात्कालिक ग्रास होगा॥४४॥ मध्याहात् क्रमगुणितो ऽक्षो दक्षिणतोऽर्धविस्तरहृतो दिक स्थित्यर्धाच्चान्दोस्त्रिराशिसहितायनात् स्पर्श ॥४५॥ ( मध्याहात् क्रमगुणितोऽक्षोर्धविस्तरहतः । नतज्यया गुणिताक्षज्या त्रि- ज्यया भक्ता । तचापप्रमाण दिग्भवति । ) प्राक्षवलनं भवति । दक्षिणतो दि ग्मध्याहूात् ( पूर्वभागे ) दक्षिणं वलनं भवति । [ दक्षिणतो दिक] प्राकृपाले रवेस्पर्श दक्षिणवलनं भवतीत्यर्थः । पश्चात्कपाले उत्तरवलनम् । (मध्याह) न दिग्भवति । चन्द्रस्य सूर्यविपरीतं सर्वत्र भवति । एतदक्षवलनं स्थित्यर्धाच्च । स्थित्यर्धशब्देन तन्मूलभूतो विक्षेप बच्यते सूर्यस्य स्फुटनतिश्च वलनं भवति । तस्य नतिवदिग्भवति स्पर्श मोक्षे च । चन्द्रग्रहणे चन्द्रविक्षेपो वलनं भवति । पुस्तकद्वयेपि व्याख्यानं खण्डितम् । तस्मात्प्रकाशिकाव्याख्यानमिह लिखितम् ।स्थत्यर्धक्षेत्रमध्यप्रागतीतकालः । मध्यकालादूर्ध्वरेष्ट काल इट- कालः स्थित्यर्थक्षेत्रादिष्टकाल” इति पुस्तकद्वयेऽप्यवशिष्टं खरडवाक्यम् ।

- । - गीतिकापादः॥ तस्य विक्षेपव्यत्ययात् स्पर्श मोक्षे च दिग्भवति। अन्दोस्त्रिराशिसहितायनात् अयनशब्देनापक्रम उच्यते। त्रिराशिसहितादकांच्चन्द्राच्च निष्पन्नोऽपक्रमोशी तयोरन्द्वोर्तलनं भवति । स्पर्शे। इति ग्रहणे । इत्येवार्थतः। एतदायनंवलनम् अस्य दिक्तु बिम्बस्य मुखेज्यनवद्भवति । चन्द्रस्य स्पर्शयनवत् मोक्षेश्यलव्यत्य यात् । चन्द्राद्वयत्ययेन सूर्यायनवलनं दिग्भवति । अक्षवलनायनचापयोस्तुल दिशोर्योगं कृत्वा भिन्नदिशोरन्तरं कृत्वा जीवामादाय सम्पर्कान निहत्य त्रि ज्यया विभज्य लब्धे विक्षेपं संस्कुर्यात् । तत् स्फुटवलनं भवति । गृहीतबिम्ब स्थान्वर्णानाह । भा०:-( मध्यान्ह से क्रम गुणित अक्षाई विस्तरहत । नतज्या द्वार गुणित अक्षज्या से त्रिज्या द्वारा भागदेकर भागफल चाप परिमाणा दिव होगी ) दक्षिण से मध्यान्ह में ( पूर्वकाल में) दक्षिण वलन होता है । अर्थात पूर्व कपाल में सूर्य के स्पर्श में दक्षिण वलन होता है। पश्चिम कपाल में उत्तर बलन होता है। चन्द्रग्रहण और सूर्यग्रहण में सर्वत्र उल्टा होता है। स्थित्यर्दु शब्द से उस का मूलभूत विक्षेप कहा जाता और सूर्य की स्फुट नति वलन होता है। और स्पर्श और मोक्ष में उसके नति तुल्य होता है । चन्द्रग्रहण में चन्द्रविक्षेप बलन होता है। उस के विक्षेप के व्यतिक्रम ( उलटा ) से स्पर्श और मोक्ष में दिशा होती है। अयन शब्द से अपक्रम कहा जाता है। तीन राशि सहित सूर्य और चन्द्रमा से निष्पन्न अपक्रम भी सूर्य और चन्द्रमा का वलन होता है। ग्रहण में यह प्रायनवलन होता है। इस की दिशा तो बिम्ब के मुख में - यन के तुल्य होगी। चन्द्र, ग्रहण के स्पर्श में अयन तुल्य होगा। मोक्ष में अ यन के विपर्याय से चन्द्रमा से व्यतिक्रम द्वारा सूर्य प्रायन वलन होता है। प्राक्ष वलन के दोनों चाप के तुल्य दिशा का योग, कर और यदि भिव होतो अन्तर कर धाप लेकर सम्पार्द्ध से गुणन कर त्रिज्या से भाग देवे, भागफल में विक्षेप संस्कार करे तो वह म्फुट वलन होगा ॥ ४५ ॥ . प्रग्रहणान्ते धूमः खण्डग्रहणे शशी भवति कृष्णः। सर्वग्रासे कपिलस्स कृष्णताम्रस्तमोमध्ये॥४६॥ प्रग्रहणे प्रारम्भ । अन्ते मोक्षे समाप्तौ च । चन्द्रो धूम्रो भवति । खण्डन हणेपर्धबिम्बे गृहीतप्राये कृष्णवर्णः सर्वग्रासे विमर्द जाते सति कपिलः । सर्व ग्रहखेपि तमोमध्यं प्रविशति सति कृष्णतान ( धर्मराशी भवति )। चन्द्र वदर्कस्यापि वर्ण इति प्रकाशिकायामुक्तम् ॥ सूर्यग्रहलेदृश्यभागमाह । - - ॥

आर्यभटीये, भा:-चन्द्रग्रहण के प्रारम्भ (स्पर्श) और मोक्ष में चन्द्रमा धूम्र वर्ण होता है। खण्ड ग्रहण में अर्थात् बिम्ब के आधा भाग ग्रसित होने पर कृष्ण वर्ण होता, सर्वग्रास में कपिलवर्ण होता, सर्वग्रहण में भी तमोमध्य प्रवेश करने पर कृष्ण एवं ताम्बे का सारंग होता है ॥ ४६ ॥ सूर्येन्दुपरिधियोगे ऽर्काष्टमभागो भवत्यनादेश्यः । •भानोर्भासुरभावात् स्वच्छतनुत्वाच्च शशिपरिधः ॥४॥ सूर्येन्द्वोः परिधियोगे स्पर्शादावर्कबिम्बस्याष्टमभागो ग्रस्तोग्प्यनादेश्यः । द्रष्टुमशक्य इत्यर्थः । तत्र हेतुमाह भानोरिति । सूर्यस्यातिभासुरत्वात् जलम- यस्य शशिनः परिधेरत्यच्छत्वाच्च । आसन्नार्करश्मिभिशशिपरिधेरच्छत्वं सम्भ- वति । अष्टमभागाधि के ग्रस्ते तेनाष्टमांशेन सह ग्रस्तभाग उपलभ्यते ॥ एवं स्वशास्त्रप्रतिपादितग्रहगत्यादर्दूकसंवादात् स्फुटत्वमाह । भा:-सूर्यग्रहण में सूर्य और चन्द्रमा की परिधि योग में सूर्य के अष्टमभाग ग्रस्त सूर्य का नहीं दीख पड़ता। इस का कारण यह है कि सूर्य के अत्यन्त प्रकाश और जलमय चन्द्रमा की परिधि की स्वच्छता होने से । क्योंकि सूर्य के किरण निकट होने से चन्द्रमा की परिधि की स्वच्छता का सम्भव होता है इस कारण अष्टम भाग से अधिक ग्रस्त भाग की उपलब्धि होती है ॥४॥ क्षितिरवियोगादिनकृद्रवीन्दुयोगात्प्रसाधितश्वेन्दुः । शशिताराग्रहयोगात्तथैव ताराग्रहास्सर्वे ॥४८॥ इह तन्त्र उदितोऽर्को भूरवियोगात् प्रसाधितः । स्फुट इति कल्पितः । यथा पूर्वापरसूत्राग्रे रवेरुदयास्तमयाच्च गोलान्तगतोपर्क इति कल्प्यते । दक्षिणो तरगतिनिवृत्त्यायनगतिश्चेति च पूर्वापरसूत्रगतशङ्कुच्छायया दक्षिणोत्तरगतश- च्छायया च तात्कालार्कस्साध्यते। एवं बहुभिः प्रकारैः परीक्ष्यानोदितोऽर्क- स्फुट इति कल्पितः । इत्यर्थः एवं प्रकाशिकायामुदितम् । एतैः प्रकारभेदैस्सा- पनार्क एव सिध्येत् नतु दूगानीतः । अयनचलनञ्च प्रतिकालं भिन्न युक्तचा सत्परिज्ञानञ्च गणिताळदेव भवति* ॥ शास्त्रस्य मूलमाह । भा:-पूर्वापर रेखा के आगे सूर्य का उदय होने से गोलान्तर्गत सूर्य की ऐसी कल्पना कियी जाती है। और दक्षिण उत्तर के गति निवृत्ति * अंतः परं कतिचित्खण्डितवाक्याक्यानि पुस्तकद्वये दृश्यन्ते । तद्यथा । अतः केचिदेवमाहुः । कृत्तिकादितारकाणां शास्त्रोदितैः - इयलग्नं मध्यलग्नमस्तलमञ्च सस्यग्ज्ञात्वा पुनरकस्यार्धास्तमये घटिकायन्त्रं ' स्थाप्य तेन कृत्तिकादीनां येन कालेन विशे- वांशश्च तासामु. - -- होकर समुद्र गीतिकापादः॥ द्वारा “ प्रयन ” होता है। पूर्वापर शङ्खछाया में एवं दक्षिणोत्तर शङ्खलाया द्वारा तात्कालिक सूर्य सिद्ध होता है। एवं बहुत प्रकार से परीक्षा किया, हुप्रा स्फुट सूर्य होता है ॥ ४ ॥ सदसज्ज्ञानसमुद्रात् समुद्भुतं देवताप्रसादेन । सज्ज्ञानोत्तमरत्नं मया निमग्नंस्वमतिनावा ॥४॥ सदसउज्ञानरत्नवतो ज्योतिश्शास्त्राख्यसमुद्रात् स्वमतिनावा स्वमत्याख्या नावमारूढेन मया तन्मध्यं प्रविश्य तत्र निमग्नं सज्ज्ञानाख्यमुत्तमरत्नं देवता- यास्स्वयंभुवः प्रसादेन सम्यगुद्धृतम् । स्वयंभुवोद्दिष्टार्थप्रकाशनमेव मया कृत- मित्यर्थः । संक्षिप्तत्वञ्चन सिध्यति ॥ अथोपसंहरति । भा:-ज्योतिष शास्त्र रूपी समुद्र में अपनी बुद्धिरूपी नौका पर सवार में निमग्न हो ब्रह्मा की कृपा से सद्ज्ञानरूप रत्न को मैं ने (प्रा- र्यभट) बाहर किया अर्थात् प्रकाशित किया ॥४॥ आर्यभटीयं नान्मा पूर्व स्वायम्भुवं सदा सद्यत् । सुकृतायुषोः प्रणाशं कुरुते प्रतिकचुकं योऽस्य ॥ ५० ॥ पूर्वमादिकाले यज्ज्योतिश्शास्त्रं वेदात्समुद्धृत्य ग्रन्थेन लोके प्रकाशित- मासीत् सदा सर्वदा सद्भूतं तदेव मया नानार्यभटीयमिति तन्त्रं प्रकाशितम् । अस्य शास्त्रस्य यः प्रतिकञ्चकं कुरुते । दोषोत्पादनेन तिरस्करणमित्यर्थः । सस्य सुकृतायुषोः प्रणाशस्स्यात् ॥ परमादीश्वराख्येन कृतेयं भटदीपिका । प्रदीप्यतां सदा ज्योतिश्शास्त्रज्ञानां हृदालये ॥ इति भटदीपिकायां गोलपादः । इत्यार्यभटीयं समाप्तम् । भा:-आदि काल में जिस ज्योतिषशास्त्र को वेद से निकाल कर लोक में प्रचार किया गया-उसी ज्योतिः शास्त्र को अर्थात् वैदिक ज्योतिष शास्त्र को, मैं मे (आर्यभट) आर्यभटीय तन्त्र ” नाम से प्रकाशित किया है। इस शास्त्र में जो कोई व्यक्ति मिण्यादोष दिखला कर इस का तिरस्कार करेगा-उरु के सुकृत, पुण्य वा यश और प्रायु का नाश होगा ॥५०॥ प्रार्य भटीय ज्योतिषशास्त्र पूरा हुआ। *प्रतिकञ्चुको योग्स्य। इति पठनीयम् । दीपिकाव्याख्याया व्याकरणविरुद्धस्यात् ।

गौतमीय न्यायशास्त्र सभाष्यसानुवाद-मूल्य ३॥) वेद, उपवेद और वेद के छः प्रङ्गों के रक्षार्थ-हमारे ऋषियों ने-छः उपाङ्ग स्वरूप-छः दर्शन शास्त्र रचे हैं । इन दर्शनों में (अपमे २ तरीके पर) दोक्त सत्य सनातन धर्म को युक्ति तथा प्रमाणों से बड़े २ नास्तिकों के श्राक्षेपों का उत्तर देकर-हमारे वेदोक्त धर्म की रक्षा कियी गयी है। इन इः दर्शनों में से सब से अधिक हमारे गौतम ऋषि ने चार्वाक, बौध, आहेत, जैन आदि मतों का अकाट्य उत्तर दिया है । इस दर्शन में एक बड़ी विल- तणता.है कि इस का ठीक २ समझ लने पर, शास्त्रार्थ वा वहम की रीति खूब मालूम हो जाती है और चाहे कैसा भी प्रबल नास्तिक क्यों न हो इस शास्त्र के जानने वाले के सामने नहीं ठहर सकता । इस न्यायविद्या को "तर्क," मन्तिक या Logic कहते हैं। गौतम मुनि कृत् ५३० सूत्रों पर वात्स्या- यन मुनिकृत् संस्कृत भाष्य का अत्युस सरलभाषानुवाद, स्थान २ पर उपयुक्त टिप्पणी दियी गयी है। और यह प्रति १३ शुद्ध प्रतियों से मिला कर अत्यन्त शुद्ध छापी गयी है । इस में एक और विशेषता है कि इस की भूमिका में प्रास्तिक और नास्तिक दर्शनों पर युक्ति और प्रमाणों द्वारा विचार लिखा गया है और-छः दर्शनों का परस्पर विरोधाभास-के भ्रम को दूर किया गयाहै । अर्थात् छः दर्शन का मुख्य 'एक वेदोक्त सत्यधर्म की रक्षा करना-उद्देश्य है यह वात युक्ति, प्रमाण से सिद्ध कियी गयी है। सामवेदीय-गोभिलगृह्यसूत्र सदीक सानुवाद २॥) वेद के शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द, और ज्योतिष इन' छः प्रङ्गों में से-“कल्प” नामक अङ्ग वेद के हस्त स्वरूप हैं । अर्थात् वेद का जो धान उद्देश्य-श्रेयस्कर कर्मकाण्ड की प्रवृत्ति कराने में-है उसी का प्रतिपादक ह्यसूत्र है । चारों वेदों की भिन्न २ शाखा होने से,प्रत्येक शाखाओं के भिन्न २ ह्यसूत्र हैं। यह गोभिल गृह्यसूत्र-सामवेद की कौशुमी शाखा का-गोभिल- मुनिप्रणीत-स्मार्सकर्म की पद्धति स्वरूप है। इस ग्रन्य में प्रथम सूत्र है। प्रत्येक सूत्र पर संस्कृबटीका, पावश्यकीय स्थानों में टिप्पणी और गर्भाधानादि संस्कारों में जिन वेद मन्त्रों के पढ़ने की आवश्यकता पड़ती है, वे पूरे २ मन्त्र संस्कृत टीका में रक्खे गये हैं । और भमिका में वेद, शाखा, सूत्र, गोत्र, प्रवर, श्रादि पर अत्यन्त उपयोगी विचार किया गया है। सुन्दर चिकने कागज पर नये टायप में अत्यन्त शुद्ध छपा है। सूर्यसिद्धान्त भाषाटीका और बृहदभूमिका सहित मू० २) यह ग्रन्थ-सिद्धान्त ज्योतिष के , उपलब्ध ग्रन्थों में सब प्राचीन सर्व मान्य है। भारतवर्ष में ज्योतिष के अनुसार पञ्चाङ्ग आदि वनने तथा प्रणित श्रादि सिद्धान्त ज्योतिष के विषय सम्बन्धी विवाद होने पर-इसी . .

त गन्थ का प्रामाण्य माना जाता है। आज तक इस अमूल्य ज्योतिष के ऊपरी ऐसा अपूर्व विचार नहीं किया गया था इस की भूमिका के १५० पृष्ठों में प्रायः संस्कृत ज्योतिष, अगरेजी आदि ज्योतिष, वेद, ब्राह्मणादि पुस्तकों से भारतवर्षीय ज्योतिषशास्त्र का गौरव सिद्ध किया गया है । केवल इस एक पुस्तक के पढ़ने से बिना गुरु प्रायः ज्योतिष के। विषयों का ज्ञाता हो सकता है। पिङ्गलसूत्र सटीक सानुवाद । मूल्य १॥) वेदार्थ समझने के लिये-छन्दोग्रन्थ की भी आवश्यकता है। स्थान १ में छन्दो विशेष का विधान है, इसी कारण गायत्री उष्णिक, अनुष्टुप, सहती, पंक्ति, त्रिष्टुप. जगती, इन सात छन्दों का वर्णन तथा मगण, यगण नादि छन्द सम्बन्धी वैदिक तथा लौकिक छन्दों का वर्णन है। बिना छन्द ज्ञान के वेद पढ़ना दोष लिखा है तथा विना छन्द ज्ञान के मन्त्रों का अर्थ भी ठीक समझ में नहीं आ सकता क्योंकि विना षडङ्ग के बंद का तात्पर्य समझना आहोपुरुषिकामात्र है । यद्यपि श्रुतयोध, वृत्त रत्नाकर प्रादि भी छन्दोग्रन्थ हैं परन्तु-उन में वैदिक छन्दों का कुछ भी वर्णन नहीं है अतएव हम ने बड़े परिश्रम से-बेद के छः अङ्गों में से पिङ्गलकृत् छन्दसूत्र पर हलायुधकृत वृत्ति सहित का अति उपयोगी सरल भाषानवाद किया है। उत्तम चिकने काम पर अत्यन्त शुद्ध छपा है। नीचे लिखे पुस्तक शीघ्र छपेंगे। १-सिद्धान्तशिरोमणि-पं भास्कराचार्य कृत् ज्योतिष का प्र. (गोलाध्याय) संस्कृत टीका और भाषानुवाद एवं उपयुक्त-चित्र सहित मू०२ २-सचित्र भारतवर्षीय प्राचीन भूगोल । माम ही से समझ जाइये-वाल्मीकीय तथा महाभारत श्रादि के समर के देशों की स्थिति का-चित्र, रावण, वालि, तथा भगवान् रामचन्द्र जी ? राज्य के भिन्न २ रंग दे कर नकशा छापा जावेगा २॥) ३-सर्वदर्शनसंग्रह-माध्वाचार्यकृत्-जिस में १६ दर्शन और जिस में आस्तिक नास्तिक, दर्शनों का सिद्धान्त लिखा है। संस्कृत श्री भाषानुवाद सहित और भूमिका में सब दर्शनों पर गढ़ विचार तथा-अगरेज में भी प्रत्येक दर्शन का खुलासा लिखा गया है मूल्ये-२॥) इस में नीचे लिखे दर्शन हैं ; इन का अलग २ दाम इस प्रकार होगा चार्वाक ), बौद्ध ), माईत ।), रामानुज ), पूर्णप्रज्ञ), पाशुपत =), शेव दर्शन इ), प्रत्यभिज्ञान =), रसेश्वर =), न्याय ), वैशेषिक ), मीमांसा पाणिनीय =), सांख्य =), पातञ्जल ।) और शाङ्करदर्शन ) है। पता-उदयनारायणसिंह-शास्त्रप्रकाश कार्यालय मधुराया, पवितुटूपुर Rood. on28.4.75 N.. 603 . १ LIBRARY GULTU,

No text on this page.

No text on this page.

No text on this page.

ch
520.UARY/RIS
NATI
100247

No text on this page.

Arjya Bhatiyam Jyotishastram

Author
Arjya Bhatta
Title
Ancient Sanskrit Astronomical Work
File name
Arjya Bhatiyam Jyotishastram
Text
OCR done
Citation
1906
Published
2006/06/3
Publisher
Udaya Narain Singh, Madhunapur
Language
Sanskrit
Pages
144
Library
Ramkrishna Mission Institute Of Culture, Golpark
Classification
Astrology
Keywords
Ancient Indian Astrology
DLI number
345085
Barcode
4990010220583.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
Rights
In Public Domain
VMLT id
RoXlaIJ4ki6
Download PDF

Arjya Bhatiyam Jyotishastram