Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner

Vinaye Rag Bilaval

Tilsi Dass · 2011/08

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दयाल दिवाकर देवा । कर मुनि,मनुज, सुरासुर सेवा ॥१॥ पिनर-पत्रिका पाल जो मिदियोंक यान है, जिनका हाका-सा मुण सो गमन विनाक माया है यानी को हटानेवाले का . , गय प्रकार गोयल लह यानुन प्रिय है। जो भानन्द और काणको नयाले विद्या भधार मागर, पुद्धि विधान से श्रीगणेशजीम य तुलसीदाम हाथ जोड़कर यल यही पर मांगता है कि मेरे मनमन्दि में धीमीतारामजी मदा नियाम करें ॥४n मूर्य-स्तुति [२] हिमतम-करिकेहरि करमाली। दहन दोप-दुख-दुरित रुजाली ॥२॥ कोक-कोकनद-लोक-प्रकासी । तेज प्रताप-रूप-रस-रासी सारथि पंगु, दिव्य रथ-गामी । हरि-संकर-विधि-मूरति स्वामी ॥४॥ वेद-पुरान प्रगट जस जागै । तुलसी राम-भगति पर माँगे ॥५॥ भावार्थ-हे दीनदयालु भगवान् सूर्य ! मुनि, मनुष्य, देवता और राक्षस समी आपकी सेवा करते हैं ॥३॥ आप पाले और अन्धकार रूपी हाथियोंको मारनेवाले धनराज सिंह हैं; किरणोंकी माला पहन रहते हैं। दोप, दुःख, दुगवार और रोगोंको भस्म कर डालते हैं ॥२॥ रातके बिछुड़े हुए चकवा-चकधी पक्षियोंको मिलाकर प्रसन्न करने । A -- 471 ३ विनय-पत्रिका वाले, कमलको खिलानेवाले तथा समस्त लोकोंको प्रकाशित करने- गले हैं। तेज, प्रताप, रूप और रसकी भाप खान हैं ॥३॥ आप दिव्य थिपर चलते हैं, आपका सारथी (अरुण) लूला है । हे स्वामी ! आप विष्णु, शिव और ब्रह्माकं ही रूप हैं ॥४॥ वेद-पुराणों में आपकी कीर्ति जगमगा रही है। तुलसीदास आपसे श्रीराम भक्तिका वर माँगता है ॥५॥ शिव-स्तुति [३] को जाँचिये संभु तजि आन । दीनदयालु मगत-आरति-हर, सब प्रकार समरथ भगवान ॥१॥ कालकूट-जुर-जरत सुरासुर, निज पन लागि किये विप-पान । दारुन दनुज,जगत-दुखदायक, मारेउ त्रिपुर एक ही पान ||२|| जोगति अगम महामुनि दुर्लभ, कहत संत, श्रुति, सकल पुरान । सो गति मरन-काल अपने पुर, देत सदासिव सबहिं समान ॥३॥ सेवत सुलभ, उदार कलपतरु, पारवती-पति परम सुजान । देहु काम-रिपु राम-चरन-रति, तुलसिदास कहँ कृपानिधान ॥४॥ भावार्थ-भगवान् शिवजीको छोड़कर और किससे याचना की हाय ? आप दीनोंपर दया करनेवाले, भक्तोंके कष्ट हरनेवाले और

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विनय-पत्रिका ईस उदार उमापति परिहरि, अनत जे जाचन जाहीं। तुलसिदास ते मूढ़ माँगने, कबहुँ न पेट अधाहीं ॥४॥ भावार्थ-शंकरके समान दानी कहीं नहीं है । वे दीनदयालु हैं, देना ही उनके मन भाता है, माँगनेवाले उन्हें सदा सुहाते हैं ॥१॥ वीरों में अग्रणी कामदेवको भस्म करके फिर बिना ही शरीर जगत्में उस रहने दिया, ऐसे प्रभुका प्रसन्न होकर कृपा करना मुझसे क्योंकर कहा जा सकता है ? ॥२॥ करोड़ों प्रकारसे योगकी साधना करके मुनिगण जिस परम गतिको भगवान् हरिसे माँगते हुए सकुचाते हैं यही परम गति त्रिपुरारि शिवजीकी पुरी काशीमें कीट-पतंग भी पा जाते हैं, यह वेदोस प्रकट है ॥३॥ ऐसे परम उदार भगवान पार्वतीपति. को छोड़कर जो लोग दूसरी जगह माँगने जाते हैं, उन मूर्ख माँगनेवालोंका पेट भलीभॉति कभी नहीं भरता ॥४॥ [५] L - - भानी ॥शा नए वापरो रावरो नाह भवानी । दानि बड़ो दिन देत दये बिनु, पेद-बड़ाई निज़ घरकी परवात विलोकहु, हो तुम परम सयानी । सिवकी दई संपदा देखत, श्री-सारदा सिहानी ॥२॥ जिनके भाल लिखी लिपि मेरी, सुखकी नहीं निसानी। तिन रंकनकी । नाक संवारत, ही आयो नकवानी ॥३॥ स्वा जादा

विमाप्रा
'तुम-दीनना दुनी इनके दुग, जागरुना आलानी।
राह
अधिकार मांगिय आह, भीम मली में जानी र
प्रम-प्रगंगा-पिनयमगंगनुन , मुनि रिषिकी पर पानी ।
गुलगी मुदित मग मनाहिं मन, जगन-मातु मुगुकानी ।
भाग-(माजी मोगका भाग यानादीगन
पापाराम जाफर करने मंगे), मगनी ! मा.
(शियनी) पागनमा दोही गाजिन लोगान का
किमीको दान देकर पलमें पानेका कुछमी भधिकार नहीं माल
पंग लोगोंकी मी ये देशाते हैं. जिसमे येकी मांदा द्वती।।
माप पड़ी मयानी ६. अपने घरकी मन्दा सो दमिय (.
देते-देते घर माली होने लगा है, अनधिकारियोंको) शिवजीकी
हुई अपार सम्पत्ति देय-देगार लक्ष्मी और मरम्पती मी (व्यंगम
आपकी यड़ाई कर रही है ॥२॥ जिन लोगोंक मानसपर मन मुमा
नाम-निशान भी नहीं लिया था, मापके पति शिवजीके पागलपन
कारण उन कंगालोंके लिये स्वर्ग सजाते-सजाते मेरे नाका दम आ ग.
है ॥३॥ कहीं भी रहनको जगह न पाकर दीनता और दुनियोके दुन
मी दुखी हो रहे हैं और याचकना तो प्याकुल हो उठी है। लोगों
भाग्यलिपि बनानका यह अधिकार कृपाकर थाप किसी दूसर
सीपिये, मैं तो इस अधिकारको अपेक्षा भीख माँगकर माना अच्छ
समझता हूँ ॥४॥ इस प्रकार प्रह्माजीकी प्रेम, प्रशंसा, चिनय औ
व्यंगसे भरी हुई सुन्दर पाणी सुनकर महादेवजी मन-ही-मन मुदि
हए और जगजननी पार्वती मुसकराने लगी ॥५॥

७ विनय-पत्रिका राग रामकली नाँचिये गिरिजापति कासी । जासु भवन अनिमादिक दासी॥१॥ आदर दानि द्रवत पुनि थोरें । सकत न देखि दीन करजोरें।।२।। सुख-संपति, मति-सुगति सुहाई । सकल सुलम संकर-सेवकाई ॥३॥ गये सरन आरतिक लीन्हे । निरखि निहाल निमिपमहँ कीन्ह ४॥ तुलसिदास जाचक जस गावं । विमल भगति रघुपतिकी पावै ।।५।। भावार्थ-पार्वती-पति शियजीसे ही याचना करनी चाहिये, जिनका घर काशी है और अणिमा, गरिमा, महिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशिस्य और धशित्व नामक आठों मिद्धियाँ जिनकी दासी है ॥१॥ शिवजी महाराज आदरदानी ६, थोड़ी-सी संयासे ही पिघल जाते हैं। पद दीनोंको हाथ जोड़ पड़ा नहीं देख सकते, उनकी कामना पहुन शीन पूरी कर देते है ॥२॥ शंकरको संघास मुग्न, सम्पत्ति, मुयुद्धि और उत्तम गति आदि सभी पदार्थ सुलम हो जाते है ॥३॥ जो भातुर जीय उनकी शरण गये, उन्हें शियाने तुरन्त अपना लिया और देखते ही पलभरमें सयको निहाल कर दिया ॥४॥ भिसारी तुलसीदास भीयश माता है. इसे भी रामकी निर्मल मनिकी भीग मिले ! ॥५॥ [७] कस न दीनपर द्रवहु उमावर । दारन रिपति हरन करनाकर ॥१॥ पेद-पुरान कहत उदार हर । हमरि चेर कम भये कृपिनवर।।२।। - -- विनय-पत्रिका कवनि भगति कीन्ही गुननिधि द्विजा होइ प्रसन्न दीन्हेहु सिव पदा जो गति अगम महामुनि गावहिं । तब पुर कीट पतंगहु पावहिं ।।। देहु काम-रिपु! राम-चरन-रति । तुलसिदास प्रभु! हरहु मेद-मति ।" भावार्थ-हे उमा-रमण ! आप इस दीनपर कैसे कृपा नहीं कर हे फरणाकी खान ! आप घोर विपत्तियोंके हरनेवाले हैं ॥॥ घेद-पुर कहते हैं कि शिवजी यड़े उदार हैं, फिर मेरे लिये आप इतने अधि कृपण कैसे हो गये ? ॥२॥ गुणनिधि नामक ब्राह्मणने यापकी कौन- भक्ति की थी, जिसपर प्रसन्न होकर आपने उसे अपना कल्याणपद दिया ॥३॥ जिस परम गतिको महान् मुनिगण भी दुर्लम बतलाते वह आपकी काशीपुरीमें कीट-पतंगोंको भी मिल जाती है ॥४॥ कामारि शिय! हे खामी !! तुलसीदासकी भेद-युद्धि हरण कर उ श्रीरामके चरणोंकी भनि दीजिये ॥५॥ [८] देव पड़े, दाता पड़े, संकर पड़े भोरे । किये दूर दुख सबनिके, जिन्ह-जिन्ह कर जोरे ॥१॥ सेवा, सुमिरन, पूजिवी, पात आखत थोरे । दिये जगत जहँ लगि सबै, सुख, गज, रथ, घोरे ।।२।। गाँव पसत यामदेव, में फपहूँ न निहोरे । अधिमातिक याघा मई, ते किंकर तोरे ॥३॥ .

९
विनय-पत्रिका
बेगि योलि बलि परजिये, करतूति कठोरे ।
तुलसी दलि, रुध्यो चहें सठ साखि सिहोरे ॥४॥
भावार्थ-हे शंकर ! आप बड़े देव हैं, बड़े दानी है और बड़े भोले
जिन-जिन लोगोंने आपके सामने हाथ जोड़े, 'आपने बिना भेद-
मायके उन सय लोगोंके दुःख दूर कर दिये ॥१॥ आपकी सेवा, स्मरण
और पूजनमें तो थोड़े से येदपत्र और चावलोंसे ही काम चल जाता है:
परन्तु इनके पदलेमें आप हाथी, ग्थ, घोष्ट और जगत्में जितने
सुगक पदार्थ है, सो सभी दे डालते हैं ॥२॥ हे धामदेय में आपके
गाँव (काशी) में रहता है, मैंने कभी आपसे कुछ माँगा नहीं, अय
भाधिानिक करकरूपमें ये भापके किंकरगण मुझे मनाने लगे हैं man
इसलिये भाप न कटोर कर्म करनेवालोंको जल्ली धुलाकर डाँट दीजिये,
में आपकी पलयालेता है, क्योंकि ये दुए तुलसीदामापीनुलसीके पेड़फो
कुचलकर उसकी जगह शाखोट (महोर) के पेड़ लगाना चाहते हैं ॥४॥
[१]
सिव सिव होई प्रसय कर दाया।
फरनामय उदार फीरवि, पलि जाउँ हरहु निज माया ॥१॥
जलज-नयन, गुन-अपन, मयन-रिपु, महिमा जान न कोई ।
पिनु तव कृपा राम-पद-पंकज, सपनहुँ भगति न होई ॥२॥
रिसय, सिद्ध, नि, मनुन, दनुज, मुर, अपर जीव जग माहीं ।
सर पद पिमुख न पार पाव कोउ, फलप कोटि पलि जाहीं ॥३॥

गिनय पत्रिका अहिभूपन, दान-रिपु-मेवक, देवदेव, रिपूगरी। मोह-निहार-दिवाकर मंकर, मग्न गोर-मयहारी ॥ गिरिजा-मन-मानम-मराल, कामीम, ममान-निवामी। तुलसिदास हरिचरन-कमल-घर, देहु मगनि अपिनामी - भावार्थ- कन्यापप गियी ! प्रमन्न होकर दया कीजिये। फरणामय है, आपकी कीनि सय ओर फैली हुई है। मैं बलिदान जाता है, कृपापूर्वक अपनी माया हर लीजिये nn भापक नेत्र कम के समान हैं, आप सर्व गुण सम्पन्न , कामदेयके शत्रु हैं। मापकीर बिना न तो कोई मापकी महिमा जान मकता है और न श्रीराम चरणकमलोंमें, स्वममें भी, उसकी भक्ति होती है nen ऋषि, मित्र मुनि, मनुष्य, दैत्य, देवता और जगत्म जितने जीव है, वे सब आप चरणोंसे विमुख रहने हुए करोड़ों फल्प यौन जानेपर मी संसार-मागर का पार नहीं पा सकत॥३॥सर्प आपके भूपप है, दूषणको मारनेवाले (अं सारे दोषों को हरनेवाले) भगवान् श्रीरामके आपसेवक है, आप देवाधि देव हैं, त्रिपुरासुरका संहार करनेवाले हैं। हे शंकर! आपमोहरूपी कोहरेर नाश करने के लिये साक्षात् मूर्य हैं, शरणागत जीयोंका शोक और मन हरण करनेवाले हैं ॥४॥ हे काशीपते ! हे श्मशाननिवासी हे पार्वती मनरूपी मानसरोवरमें विहार करनेवाले राजहंस !! तुलसीदास श्रीहरिके श्रेष्ठ चरणकमलोंमें अनपायिनी भक्तिका वरदान दीजिये ।

विनय पत्रिका राग धनाश्री [१०] देव , मोह-तम तरणि, हर, रुद्र, शंकर, शरण, हरण मम शोक लोकाभिरामं । वाल-शशि-माल, सुविशाल लोचन-कमल,काम-शतकोटि-लावण्य-धामं कंधु-कुंदेंदु-कर्पूर-विग्रह रुचिर, तरुण-रवि कोटि तनु तेज भ्राजै । भस सांग अधांग शैलात्मजा, व्याल नृकपाल-माला विराजै ॥२॥ मौलिसंकुल जटा-मुकुट विद्युच्छटा, तटिनि-घर-वारि हरि-चरण-पूतं । श्रवण कुंडल, गरल कंठ, करुणाकंद, सच्चिदानंद वंदेऽवधूतं ॥३॥ शूल-शायक-पिनाकासि-कर, शत्रु-चन-दहन इव धूमध्वज, वृषम-यानं। व्याघ-गज-धर्म-परिधान, विज्ञान-धन, सिद्ध-सुर-मुनि-मनुज-सेव्यमान।। तोडवित नृत्यपर, डमरु डिडिम प्रवर, अशुभ इव भाति कल्याणराशी । महा कल्पांत ब्रह्मांड-मंडल दवन, भवन कैलास, आसीन काशी ।५। तज्ञ, सर्वज्ञ, यज्ञेश, अच्युत, विभो, विश्व भवदंशसंभव पुरारी । ब्रोद्र, चंद्रार्क, वरुणानि,वसु,मरुत,यम,आर्चि भवदंघि सर्वाधिकारी ।। । अकल, निरुपाधि, निर्गुण, निरंजन ममकर्म-पथमेकमज निर्विकारं । अखिलविग्रह, उग्ररूप, शिव, भूपसुर, सर्वगत, शर्व, सर्वोपकारं ॥७॥ । ज्ञान-वैराग्य, धन-धर्म, कैवल्य-सुख, सुमग सौभाग्य शिव सानुकूलं । । तदपि नर मृद आरुद्ध संसार-पथ, अमत भव, विमुख तव पादमूलं ॥८ ।

नएमनि, दुष्ट अनि, कटन, मंद-गन, दाम सुनमीस-गग्ग आया। दहिकामागि! भीगम-पद-पंकज मनि अननग्न गम-मंद-मागा ॥९॥ भाग-१ गिग ! महाका मारा कर दिय मार माना Tir!दशा मौकामिगम ! भाष मंगोपण कामंगाने मा मनकारा पाल-मन्द्र सीमा पार मापक पर पामेर कमलगमान हैं। मामी करी कामदेव गमान गुम्परलाके मण्डार मापकी मुन्दर मूर्ति शंग, पुग्द, चन्द्रमा भीर कपूरफ समान गुभा करोड़ों मध्यादफे के समान मापक शरीरका जमलमला राममस्त शरीर मम्म लगी माधे मंगमें दिमाचल-कन्या पार्यतीजी शोमित हो रही मांपों भीर नर-पालोंकी माला आपके गलेमें विराज रही है ॥२॥ मस्तकपर यजलीके ममान चमकते हुए पिलवर्ण जटाजूटका मुकुट है तथा भगवान श्रीहरिके चरणोस पवित्र हुई गंगाजीका श्रेष्ठ जल शोभित है। कानों में कुंडल है, कण्ठमें हलाहल विर सलक रहा है। पेमे करुणा-कन्दा पशिदानन्दस्वरूप, अवधूतपेशभगवान् शिवजीकी मैं वन्दना करता है ॥३॥ आपके कर कमलोंमें शूल, याण, धनुष और तलवार है। शत्रुरूपी धनको परम करने के लिये आप अनिके समान हैं। यैल आपकी सवारी है। याय और हाथीका चमड़ा आपशरीरमें लपेटे हुए हैं। आपयिज्ञानयन है यानी आपके ज्ञानमें कहीं भी अवकाश नहीं है। आप सिद्ध, देव, मुनि, मनुष्य सविता नाण्य-मत्य करते पण आप मन्दर टारा

1३
विनय-पत्रिका
होनेपर भी कल्याणकी खान हैं। महाप्रलयके समय थाप सारे
ब्रह्माण्डको भस्म कर डालते हैं, कैलास आपका भवन है और काशी में
आप आसन लगाये रहते हैं n५॥ आप तत्त्वक जाननेवाले हैं, सर्वश है,
योंके स्वामी है, विभु (व्यापक) है, सदा अपने स्वरूपमें स्थित रहते हैं।
है पुरारि यह सारा विश्व आपके ही अंशसे उत्पन्न है। ब्रह्मा, इन्द्र, चन्द्र,
सूर्य, वरुण, अग्नि, आठ वसु, उनचास मरुत् और यम आपके चरणोंकी
पूजा करनेस ही सर्वाधिकारी बने है ॥६॥ आप कला-रहित हैं,
उपाधि-रहित है, निर्गुण हैं, निर्लेप हैं, परब्रह्म है। कर्म-पथमें एक ही
है, जन्मरहित और निर्विकार हैं। सारा विश्व आपकी ही मूर्ति है,
आपका रूप बड़ा उग्र होनेपर भी आप मङ्गलमय है, आप देवताओंक
स्वामी है, सर्वव्यापी है, संहारकर्ता होते हुए भी सयका उपकार
करनेवाले हैं ॥७॥ हे शिय ! आप जिसपर अनुकूल होते है उसको
शान, वैराग्य, धन-धर्म, कैवल्य-सुख (मोक्ष) और सुन्दर सौभाग्य
आदि सब सहज ही मिल जाते हैं. तो भी खेद है कि मूर्ख
मनुष्य आपकी चरणसेवासे मुँह मोड़कर संसारके विकट पथपर इधर-
उधर भटकते फिरते हैं ॥८॥ हे शम्भो ! हे कामारि !! मैं नए-शुद्धि,
अत्यन्त दुए, करों में पड़ा हुआ दुखी तुलसीदास आपकी शरण आया
हैं। आप मुझे श्रीरामके चरणारविन्दमें ऐसी अनन्य पर्व अटल
भक्ति दीजिये जिससे भेदरूप मायाका नाश हो जाय ॥९॥
भैरवरूप शिव स्तुति
[११}
देव,
भीपणाकार, भैरव, भयंकर, भूत-प्रेत-प्रमथाधिपति, विपति-हर्ता।
मोह-पक-मार्जार, संसार-भय-हरण, दारण-तरण, अभय-कर्चा॥१॥

यनय-पत्रिका अतुल पल,विपुल विस्तार विग्रह गौर,अमल अति धवल घरणीघरामं। शिरसि संकलित-कल-जूट पिंगलजटा, पटल शत-कोटि-विद्युच्छटाम। आज विबुधापगा आप पावन परम, मौलि-मालेव शोभा विचित्रं ललित लल्लाटपर राज रजनीश कल, कलाधर, नौमि हर घनद-मित्रं ।। इंदु-पावक-मानुनयन, मर्दन-मयन, गुण-अयन, ज्ञान-विज्ञान-रूपं । रमण-गिरिजा,भवन भूधराधिप सदा, श्रवण कुंडल,वदन छवि अनूप।। चर्म-असि-शूल-धर,डमरुशर-चाप-कर,यान वृपमेश, करुणा-निधानं जरत सुर-असुर,नरलोक शोकाकुलं,मृदुल चित,अजित,कृत गरलपान। भस तनु-भूपणं व्याघ्र-चर्माम्बरं, उरग-नर-मौलि उर मालधारी । डाकिनी,शाकिनी,खेचरं,भूचरं, यंत्र-मंत्र भंजन,प्रयल कल्मपारी ॥६॥ काल अतिकाल,फलिकाल-च्यालादि-खग,त्रिपुर-मर्दन,भीम-कर्म मारी सफल लोकान्त-कल्पान्त शूलाग्र कृत दिग्गजाव्यक्त गुण नृत्यकारी।७ पाप-संताप-पनघोर संसृति दीन, अमत जग योनि नहिं कोपि त्राता। याहि भैरव-रूप राम-रूपी रुद्र, बंधु, गुरु, जनक, जननी, विधाता 101 यस्सगुण-गणगणति विमलमति शारदा,निगमनारद-प्रमुख ब्रह्मचारी दोप, सर्वेश, आमीन आनंदवन, दाम तुलसीप्रणत-ग्रासहारी ॥९॥ भावार्थ-६ भाषणमूनि भैरव ! आप भयंकर हैं। भूत, प्रेत और ५ विनय-पत्रिका लये आप पिलाव हैं। जन्म-मरणरूप संसारके भयको दूर करनेवाले । सबको तारनेवाले, सयं मुक्तरूप और सयको अभय करनेवाले हैं ॥१॥ आपका पल अतुलनीय है। आपका अति विशाल, गौरवर्ण, नर्मल, उज्ज्वल और शेषनागको कान्तिके समान शरीर है। सिरपर सुन्दर पीले रंगका सौ करोड़ बिजलियोंके समान भावाला जटाजूट शोभित हो रहा है ॥२॥ मस्तकपर मालाकी तरह विचित्र शोभायाली, परम पवित्र जलमयी देवनदी गंगा विराजमान है । सुन्दर ललाटपर चन्द्रमाकी कमनीय कला शोमा दे रही है, ऐसे कुथरके मित्र शिवजीको मैं नमस्कार करता हूँ ॥३॥ चन्द्रमा, अग्नि और सूर्य आपके नेत्र है। आप कामदेवको भस्म कर चुके हैं। गुणोंके भण्डार और ज्ञान- विज्ञानरूप हैं। पार्वतीके साथ आपविहार करते हैं और पर्वतराज कैलास आपका भवन है । आपके कानों में कुण्डल हैं और आपके मुषकी सुन्दरता अनुपम है ॥४॥आप ढाल, तलवार और शूल धारण किये हुए है; आप. के हाथोंमें डमरू, वाण और धनुप हैं । वैल यापकी सवारी है और आप करणाके खजाने हैं। आपकी करुणाका इसीसे पता लगता है कि थाप समुद्र से निकले हुए भयानक अजेय विपकी ज्वालासे देवता, राक्षस और मनुष्यलोकको जलता हुभा और शोकमें व्याकुल देखकर करुणाके वश होकर उसे स्वयं पी गये ॥५॥ भस्म आपके शरीर- का भूपण है, आप वाघंवर धारण किये हुए हैं। आपने साँपों और नरमुण्डॉकी माला हृदयपर धारण कर रखी है। डाकिनी, शाकिनी, खेवर, (आकाशमें विचरनेवाली दुष्ट आत्माओं) भूचर (पृथ्वीपर विचरनेवाले भूत प्रेत आदि) तथा यन्त्र मन्त्र- का आप नाश करनेवाले है। प्रवल पापोंको पलभरमें नष्ट का द्वारा भाकामी महाका कलिकालाई गोकगि आ गहागिरका मान करनेवाले नया यो भयामा कार्य करनेगी हैं। ममान मोकोंके नाश करने यान महासन्दिय समय मानी विलकी नोक दिग्गजाको भार भार गुणातीत तोफर नृत्य का non पा-मन्तापम पूर्व भयानक संगारमें मैदान होकर योगमी लाम योनियों में भटक रहा १.मुझे कोई भी पचानेवाला नहीं है। भैग्यम्प ! गमरूपी रुद्र: आपदी मेरे पन्धु, गुर, पिता, माना और विधाता मंग रहा कीजिये । जिनक गुणोका निर्मल बुद्धियाली मरम्पती, पेद और नारंद आदि ग्रहमानी तथा शेषजी मदा गान करते हैं, यह तुलमीदास उन सर्वेयर, आनन्दयन काशी में विराजमान, मनोंको अमय प्रदान करनेवाले शिव को प्रणाम करता है ॥२॥ [१२] सदा- शंकर, शंप्रदं, सञ्जनानंददं, शैल-कन्या-वरं, परमरम्यं । काम-मद-मोचनं, तामरस-लोचनं, वामदेवं मजे भावगम्यं ॥१॥ कंचु-कुंदेंदु-कर्पूरगौरं शिवं, सुन्दरं, सच्चिदानन्दकंदं । सिद्ध-सनकादि-योगींद्र-श्रृंदारका, विष्णु-विधि-वन्ध चरणारविंद॥२॥ ब्रह्म-कुल-बल्लभं, सुलभमतिदुर्लभं, विकटवेपं, विभुं वेदपारं । नौमि करुणाकरं, गरल-गंगाधरं, निर्मलं, निर्गुणं, निर्विकारं ॥३॥ लोकनाथ, शोक-शूल-निर्मलिनं, शूलिन,मोह-तम-भूरि भानु। -कालकालं, कलातीतमजरं हरं, कठिन-कलिकाल-कानन-कृशानुं + विनय-पत्रिका तज्ञमज्ञान-पाथोधि घटमभवं, सर्वगं, सर्वसौभाग्यमूलं । प्रचुर-भव-भंजनं, प्रणत-जन-रंजन, दास तुलसी शरण सानुकूलं ॥५॥ भावार्थ-कल्याणकारी, कल्याणके दाता, सन्तजनोंको आनन्द देनेवाले, हिमाचलकन्या पार्वतीके पति, परम रमणीय, कामदेवके घमण्डको चूर्ण करनेवाले, कमल नेत्र, भक्तिसे प्राप्त होनेवाले महादेवका मैं भजन करता हूँ ॥१॥ जिनका शरीर शंख, कुन्द, चन्द्र और कपूरके समान चिकना, कोमल, शीतल, श्वेत और सुगन्धित है। जो कल्याणरूप, मुन्दर और सच्चिदानन्द कन्द है । सिद्ध, सनक, सनन्दन, सनातन, सनत्कुमार, योगिराज, देवता, विष्णु और ब्रह्मा जिनके घरणारविन्दकी वन्दना किया करते हैं ॥२॥ जिनको ब्राह्मणोंका कुल प्रिय है; जो सन्तोंको मुलभ और दुर्जनोंको दुर्लभ है; जिनका ये बड़ा विकराल है जो विभु हैं और घेदोंसे अतीत है। जो करुणाकी म्बान द गरलको (कण्ठमें ) और गंगाको (मस्तकपर) धारण करनेवाले है, ऐसे निर्मल, निर्गुण और निर्विकार शिवजीको मैं नमस्कार करता हूँ ॥ जो लोकोंके स्वामी, शोक और शूलको निर्मूल करनेवाले, त्रिशूलधारी है। महान् मोहान्धकारको नाश करनेवाले मूर्य है, जो काल- कभी काल है, फलातीत है. अजर है, आवागमनरूपसंमारको हरनेवाले और कठिन कलिकालरूपीयनको जलाने के लिये अग्नि हैं ॥४॥ यह तुलसी- दास उन तत्ववेत्ता, अमानरूपी समुद्र के सोखनेके लिये अगस्त्यरूप, मर्यान्तर्यामी, सय प्रकार मौभाग्यकी जड़, जन्म-मरणरूप अपार संसारका नाश करनेवाले, शरणागत जनाको मुख देनेवाले सदा सानुशल शियजीकी कारण है ॥ २ चिमय-पत्रिका राण यन्त प्रभयराज । [१३] सेवहु सिप-चरन सरोज-रनु । कल्यान असिल-प्रद कामधेनु ॥१॥ कर-गौर, फरुना-उदार । संमार-मार, मुजगेन्द्र-हार IN सुख-जन्मभूमि, महिमा अपार । निर्गुन, गुननायक, निराकार ॥३॥ प्रय नयन, मयन-मर्दन महेस । अहंकार-निहार-उदित दिनेम ॥ घर पाल निसाकर मालि माज लोक-सोकहर जिन्हकहँ विधि सुगति न लिखी माल । विन्हकी गति कामीपति कृपा उपकारी कोपर हर-समान । सुर-असुर जरत कृत गरल पान ।। बहु कल्प उपायन करि अनेक । चिनु संभु-कृपा नहिं भव-विवेक।।८॥ विग्यान-भवन, गिरिसुवा-रमन कह तुलसिदास मम त्रास-समन ॥९॥ भावार्थ-सम्पूर्ण कल्याणके देनेवाली कामधेनुकी तरह शिवजीके चरणकमलको रजका सेवन करो ॥१॥ये शिवजी कपूरके समान गौर- वर्ग हैं, करणा करनेमें बड़े उदार हैं, इस अनात्मरूप असार संसारमै आत्मरूप सार-तत्त्व हैं, सपाके राजा यामुकिका हार पहने रहते हैं ॥२॥ चे मुखकी जन्मभूमि हैं-समस्त मुख उन मुसरूपसे ही निकलते हैं, उनकी अपार महिमा है, ये तीनों गुणोंसे अतीत हैं। सब प्रकारके दिव्य गुणोंके स्वामी है, वस्तुतः उनका कोई आकार नहीं है ॥३॥ उनके तीन नेत्र है,वे मदनका मर्दन करनेवाले मद्देश्वर, अहंकार रूप कोहरेके लिये उदय हुए सूर्य हैं ॥४॥ उनके मस्तकपर मुन्दर याल .

बिनय पत्रिका चन्द्रमा शौमित है। ये तीनों लोकोंका शोक हरण करनेवाले तथा गणोंके राजा हैं॥५॥ विधाताने जिनके मस्तकपर अच्छी गतिका कोई योगही नहीं लिखा, काशीनाथकृपालु शिवजी उनकी गति ई-शिय- जीकी रुपासे घे भी सुगति पा जाते हैं ॥६॥ श्रीशंकरके समान उपकारी मंसारमें दूसरा कौन है, जिन्होंने विपकी ज्यालासे जलते हुए देव- दानवोंको बचाने के लिये स्वयं विप पी लिया ॥७॥ अनेक कल्पांतक कितने ही उपाय क्यों न किये जाय, शिवजीकी कृपा विना संसारके असली स्वरुपका ज्ञान कभी नहीं हो सकता ॥८॥ तुलसीदास कहते है कि हे विज्ञानके धाम, पार्वती रमण शंकर! आप ही मेरे भयको दूर करनेवाले हैं ॥९॥ [१४] देखो देखो, पन बन्यो आजु उमार्फत। मानों देखन तुमहिं आई रितु वसंत जनु तनुदुति चंपक कुमुम-माल। पर यसन नील नूतन तमाल ।२। कल कदलि जंघ, पद कमल लाल।सूचत कटि केहरि, गति मराल ॥३॥ भूपन प्रसून बहु विविध रंग । नूपुर किंकिनि कलरव विहंग।४। कर नवल बकुल-पल्लय रसाल । श्रीफल कुच,कंचुकि लता-जाल।५। आनन सरोज, कच मधुप गुंज । लोचन विसाल नव नील कंज।६। पिक पचन चरित पर बर्हि कीर। सित सुमन हास, लीला समीर 11 कह तुलसिदास सुनु सिव सुजान । उर बसि प्रपंच रचे पंचवान ८ करि कपा हरिय भ्रम-फंद काम जेहि हृदय यसहिं सुखरासि राम।९।

विनय-पत्रिका भाग-प्रेमिये, शिवजी माज माप वन मन गये हैं। मा भागमें स्थित धीपायंताजी मानी गगन ऋनु बनकर मार देगने भाया है। जिनकगरकी काम्ति मानो मम्मा पला माला है, मुन्दर नील याब नान नमाल- TERN सुन्दर गारं फलेय गृक्ष मार चरण लाल कमल पतली कमर मिहकी और मुन्दा चाल इसकी सूचना दे रही है nan गहन अनेक रंगीक थान म फूल ई. नपुर (पंजनी) और किंकिणी (करधनी) पक्षियों का मुमधुर शब्द । द्वाथमालमिरी मोर आमर पत्ते .म्तन येलकफल औरयालीलतामांक जाल है ॥५॥ मुख कमल और याल गूंजने हुए मारे , विशाल नेत्र नवीन नील कमलकी पंगाड़ियाँ हैं. ६॥ मधुर यचन कोयल तया मुन्दर चरिष मोर और तोते हैं, हमी सफेद फूट और लीला शीतल मन्द मुगन्ध समीर है ॥७॥ तुलसीदाम कहते हैं कि है परम पानी शिवजी ! यह कामदेव मेरे हदयमें घसकर यहा प्रपञ्च रचता nen इस कामकी भ्रम-फाँसीको काट डालिये, जिससे सुखस्वरूप श्रीराम मेरे हृदयने सदा निवास करें। देवी-स्तुति राग मारु दुसह दोप-दुख दलनि, करु देवि दाया। विश्व-मूलाऽसि, जन-सानुकूलासि, कर शूलधारिणि महामूलमाया।। तडित गर्माङ्ग सर्वाङ्ग मुन्दर लसत, दिव्य पट भव्य भूपण विराई। पालमृग-मंजुखंजन-विलोचनि,चन्द्रवदनिलखिकोटि रतिमार लाजा।

पिनय-पत्रिका . इप-मुख-शील-सीमाऽसि,मीमामि,रामाऽसि,वामाऽसि पर युद्धिवानी छमुख हेरम्ब अंपासि,जगदंबिक, शंस-जायासि जप जय मयानी ॥३॥ चंड-भुजदंड-खंडनि, विहंदनि महिप, मुंड-मद-मंग कर अंग वोरे । शुंभ निःशुम कुम्भीश रण केशरिणि, क्रोध वारीश अस्-िवृन्द पोरे।४। निगम-आगम-अगम गुतिय गुन-कयन,उर्विघर करत जेहि सहसजीहा देहि मा,मोहि पन प्रेम यह नेम निजाराम घनश्याम तुलसी पपीहा ।।५।। भावार्थ-हे देवि! तुम दुःसह दोष और दुम्बाको दमन करनेवाली दो मुझपर दया करो। तुम विश्य ब्रह्माण्डकी मूल (उत्पत्ति स्थान) ही, मतोंपर सदा अनुकूल रहनी हो, दुष्टदलनके लिये हाथमें त्रिशूल धारण किये हो और सृष्टिकी उत्पत्ति करनेवाली मूल (अध्यात) प्रकृति हो ॥१॥ तुम्हारे सुन्दर शरीरके समस्त अंगोंमें बिजली-सी चमक रही है, उनपर दिव्य पत्र और सुन्दर माभूपण शोभित हो रहे है। तुम्हारे नेत्र मृगठीने और खञ्जनके नेत्रोंके समान सुन्दर हैं, मुख चन्द्रमाके समान है, तुम्ह देखकर करोड़ों रति और कामदेव लजित होते हैं ॥२॥ तुम रूप, सुख और शीलकी सीमा हो; दुष्पोंके लिये तुम भयानक रूप धारण करनेवाली हो। तुम्ही लक्ष्मी, तुम्ही पार्वती और तुम्ही श्रेष्ठ युद्धिवाली सरस्वती हो । तुम स्वामिकार्तिक और गणेशजी- की ही माता नहीं हो, जगजननी हो, शिवजीकी गृहिणी ही भवानी! तुम्हारी जय हो, जय हो ॥३॥ तुम चण्ड दानयके मुजदण्डोंका खण्डम करनेवाली और महिषासुरको मारनेवाली हो। मुण्ड दानपके घमण्डका नाश कर तुम्दीने उसके अंग-प्रत्यंग तोड़े हैं। शुम-निशुंमरूपी

पिय-पत्रिका
मतयाने हाथियों के लिये तुम गण गहिनी हो। तुमने मान कांच
रुपी गमुझमें शत्रुभोंक दलदल को दिया. शास्त्र और
सहन जीमयाले जी तुम्हारा गुणगान करते हैं। परन्तु उमा
पार पाना उनके लिये यहा कठिन ।। माता ! भुम तुलसीदामही
श्रीरामनाम पेमा ही प्रण, प्रेम और नम दो जैमा गातकका सान
मेयमे होता ॥५॥
राग रामती
जय जय जगजननि देवि, मुर-नर-मुनि-अमुर-सेवि,
भुक्ति-मुक्ति दायिनि, भय-हरणि कालिका ।
मंगल-मुद-सिद्धि सदनि, पर्वशर्वरीश-बदनि,
ताप तिमिर तरुण वरणि-किरणमालिका ॥१॥
वर्म-धर्म कर कृपाण, शूल-शेल-धनुपयाण,
घरणि, दलनि दानव दल, रण-करालिका ।
पूतना-पिशाच-प्रेत-डाकिनि-शाकिनि, समेत,
भूत-ग्रह-चैताल सग-मृगालि जातिका ॥२॥
जय महेश-मामिनी, अनेक रूप-नामिनी,
समस्त लोक-स्वामिनी, हिमशैल पालिका ।
रघुपति-पद परम प्रेम, तुलसी यह अचल नेम,
देहु हे प्रसन्न पाहि प्रणत-पालिका ॥३॥

यिनय-पत्रिका भावार्थ-हे जगत्की माता! हे देवि !! तुम्हारी जय हो, जय हो। वता, मनुष्य, मुनि और असुर सभी तुम्हारी सेवा करते हैं। तुम रोग और मोक्ष दोनोंकी ही देनेवाली हो । भक्तोंका भय दूर करनेके तुम कालिका हो। कल्याण, सुख और सिद्धियोंकी स्थान हो। तुम्हारा सुन्दर मुख पूर्णिमाके चन्द्र के सदृश है। तुम आध्यात्मिक, माधिभौतिक और आधिदैविकतापरूपी अन्धकारका नाश करनेके लिये मध्याह्नके तरुण सूर्य की किरण-माला हो ॥१॥ तुम्हारे शरीरपर कवच है। तुम हाथोंमें ढाल-नलवार, त्रिशूल, सांगी और धनुप-याण लिये हुए हो। दानवोंके दलकासंद्वार करनेवाली हो, रणमें विकरालरूप धारण कर लेती हो। पूतना, पिशाच, प्रेत, डाकिनी, शाकिनी, भूत, ग्रह और बेतालरूपी पक्षी और मृगोंके समूहको पकड़नेके लिये तुम जालरूप हो॥२॥ हे शिव! तुम्हारी जय हो। तुम्हारे अनेक रूप और नाम है । तुम समस्त संसारकी स्वामिनी और हिमाचलकी कन्या हो। हे शरणागत- की रक्षा करनेवाली ! मैं तुलसीदास श्रीरघुनाथजीके चरणों में परम प्रेम और अचल नेम चाहता है, सो प्रसन्न होकर मुझे दो और मेरी रक्षा करो ॥३॥ गंगा-स्तुति राग रामकली [१७] जय जय भगीरथनन्दिनि, मुनि चय-चकोर-चन्दिनि, नर-नाग-विबुष-बन्दिनि. जय जाद-बालिका ।

२ गिमय-पत्रिका विस्नु-पद-सरोजजासि, इम-गीमपर रिमामि, निपथगागि, पुन्यगमि, पाप-छालिका ॥१॥ विमल विपुल पहसि पारि, गीतल प्रयताप-हारि, मरर यर धिमंगतर तरंग-मालिका। पुरजन पूजोपहार, सोमित समि पवलमार, मंजन मय-मार, मक्ति-कल्पयालिका ॥२॥ निज वटयासी विहंग, जल-पल-चर पमु-पतंग, कीट, जटिल तापस सब सरिस पालिका। तुलसी वच तीर तीर मुमिरत रघुवंस-धीर, विचरत मति देहि मोह-महिप-कालिका ॥३॥ भावार्थ-हे भगीरथनन्दिनी ! तुम्हारी जय हो जय हो । तुन मुनियोंके समूहरूपी चकोरोंके लिये चन्द्रिकारूप हो। मनुष्य, भाट और देवता तुम्हारी बन्दना करते हैं। हे जनुकी पुत्री ! तुम्हारी जय हो। तुम भगवान् विष्णुके चरणकमलसे उत्पन्न हुई हो; शिवत्री- के मस्तकपर शोभा पाती हो; स्वर्ग, भूमि और पाताल-इन तीन मार्गोंसे तीन धाराओं में होकर बहती हो। पुण्योंकी राशि और पापोंको धोनेवाली हो ॥१॥ तुम अंगाध निर्मल जलको धारण किये हो। वह जल शीतल और तीनों नापोंका हरनेवाला है। तुम सुन्दर और अति चञ्चल तरंगोंकी माला धारण किये हो। नगर निवासियोंने- पूजाके समय जो सामग्रियाँ मेंट चढ़ायी है उनसे तुम्हारी चन्द्रमा समान धवल धारा शोभित हो रही है। वह धारा संसारके जन्म-मरण- मैवय विनय पत्रिका अपमारको नाश करनेवाली तथा मनिरुपी कल्पवृक्षकी रक्षा के लिये पादाम्प है ॥२॥ तुम अपने तीरपर रहनेयाले पक्षी, जलचर, पलचर, पशु, पतंग, कीट और जटाधारी तपम्वी यादि सयका ममानमायम पाटन करती हो । हे मोहरूपी महिषासुरको मारनेके लिये कालिकाम्प गंगाजी ! मुम तुलसीदासको ऐमी युखि यो कि जिसमे धीरघुनाथजीका स्मरण करता हुमा मैं तुम्हारे नीरपर विचरा कम ॥३॥ [१८] वयवि जय मुरसरी जगदखिल-पावनी । विष्णु-पदकंज-मकरंद इव अभ्युवर यहसि,दुख दहसिअपयन्द-विद्राविनी मिलित जलपात्र-अज युक्त-हरिचरणरज, विरज-यर-चारि त्रिपुरारि शिर-धामिनी ।। । बहु-कन्या धन्य, पुण्यकृत सगर-मुत, भूधरद्रोणि-विदरणि बहुनामिनी यक्ष,गंधर्व,मुनि,किन्नरोरग,दनुज,मनुज मअहिं सुकृत-पुंज युत-कामिनी वर्ग-सोपान, विज्ञान-शानप्रदे, मोह-मद-मदन-पाथोज-हिमयामिनी ३ हरित गंमीर पानीर दुहुँ तीरवर, मध्य धारा विशद, विश्व-अभिरामिनी नील-पर्यक-कृत-शयन सपेश जनु, सहस सीसावली स्रोत सुर-खामिनी अमित-महिमा,अमितरूप,भूपावली-मुकुट-मनिवंद्य त्रलोक पथगामिनी देहि रघुवीर-पद-प्रीति निर्भर मातु, दासतुलसी बासहरणि भवभामिनी भावार्थ-हेगंगाजी! तुम्हारी जय हो जय हो। तुम सम्पूर्ण संसारको पवित्र करनेवाली हो । विष्णुभगवान्के चरण-कमलके मकरन्दरसके .

॥
बिनय-पत्रिका
समान सुन्दर जल धारण करनेवाली हो। दुःखोंको भस्म करनेत्र
और पापोंके समूहका नाश करनेवाली हो ॥१॥ मगवान्की चरणर-
मिश्रित तुम्हारा निर्मल सुन्दर जल ब्रह्माजीके कमण्डलुमें मरा E
तुम शिवजीके मस्तकपर रहनेवाली हो । हे जाही! तुम्हें
है। तुमने सगरके साठ हजार पुत्रोंका उद्धार कर दिया । तुम पर्वत
कन्दराओंको विदीर्ण करनेवाली हो। तुम्हारे अनेक नाम हैं ॥२॥ जो
गन्धर्य, मुनि. किनर, नाग, दैत्य और मनुष्य अपनी स्त्रियास
तुम्हारे जलमें स्नान करते हैं वे अनन्त पुण्योंके भागी हो जाते हैं।
स्वर्गकी निसेनी हो और ज्ञान-विज्ञान प्रदान करनेवाली हो । मोहा
और कामरूपी कमलोंके नाशके लिये शिशिर कनुक्री रात्रि हो
तुम्हारे दोनों सुन्दर तीरोंपर हरे और धने घेतके वृक्ष लगे हैं
उनकं यीचमें संसारको सुस्स पहुँचानेवाली तुम्हारी विशाल नि
धारा यह रही है, यह ऐसा सुन्दर दृश्य है मानो नीले रंगके पलं-
सदन फनयाले शेषनाग मो रहे हैं। हे देवताओंकी स्वामिनी तुम
हजारों सोते शेषजीकी फनायली-जैसे शोमित हो रहे ॥४॥
असीम महिमा है, अगणित रूप है, राजामौकी मुकुटमणियाँसे
पन्दनीय दो।तीनों मागीम जानेवाली!शियमिये !! भर"
हारिणी जननी !! मुझ मुलमीदासको श्रीरघुनाथजीके चरणोंमें मन
प्रेमदो
[१९]
हरनि, पाप विविध वाप मुमिरत मुरसरित ।
रितमति महि पपवेलि मुद, मनोरम फरित ॥१॥

विनय-पत्रिका सोहत ससि धवल धार सुधा-सलिल-मरित । विमलतर तरंग लसत रघुवर केसे चरित ||२|| तो बिनु जगदंब गंग कलिजुग का करित? घोर भव-अपारसिंधु तुलसी किमि तरित ॥३॥ भावार्थ- हे गंगाजी ! सरण करते ही तुम पापों और दैहिक दैविक, भौतिक-इन तीनों तापाको हर लेती हो । आनन्द और मनोकामनाओंके फलोंसे फली हुई कल्पलताके सदृश तुम पृथ्वीपर शोभित हो रही हो ॥१॥ अमृतके समान मधुर एवं मृत्युसे छुड़ानेवाले जलसे भरी हुई तुम्हारी चन्द्रमाके सदृश धयल धारा शोभा पा रही है। उसमें निर्मल रामचरित्रके समान अत्यन्त निर्मल तरङ्ग उठ रही हैं ॥२॥ हे जगजननीगंगाजी ! तुम न होती तो पतामही कलियुग क्या-क्या अनर्थ करता और यह तुलसीदास घोर अपार संसार-सागरसे कैसे तरता?॥३॥ [२०] ईस-सीस यससि, त्रिपथ लससि, नम-पताल-धरनि । सुर-नर-मुनि-नाग-सिद्ध-मुजन मंगल-करनि ॥१॥ देखत दुख-दोप-दुरित-दाहन्दारिद-दरनि । सगर सुवन-साँसति-समनि, जलनिधि जल भरनि ।।२।। महिमाकी अवधि करसि बहु विधि-हरि-हरनि । तुलसी करु पानि बिमल, विमल वारि यानि ॥३॥ भावार्थ-दे गंगाजी! तुम शिवजीके सिरपर विराजती हो: आकाशा - --- स विनय पत्रिका पागाल भार पृथ्वी-दन नीना मागोग पानीशामापमान होती है। देपता मनुष्य, मुनि, नाग, मिस और मजनों का तुम कन्या का हो ॥१॥ तुम देगा होग, दोन, पाप, IIT और दरिदताका नः फर देनी हो। तुमने मगर माठ हजार पुत्रों को यम-यातनाम मुह दिया । अल्लनिधि समुद्रमें तुम मदा जल भरा करती हो। ग्रमाके कमण्डलुमें रखकर, यिष्णुक घाणसे निकलकर और शियरी के मस्तकपर थिराजफर तुम्दीने तीनोंकी महिमा का रक्सी है। हे गंगाजी ! जैसा तुम्हारा निर्मल पापनाशक जल है, तुलसीदाम चाणीको भी मी ही निर्मल यना दो, जिममे यह मर्यपापनाशक रामचरितका गान कर म॥३॥ यमुना-स्तुति राग बिलावल [२१] जमुना ज्यों ज्यों लागी वादन । त्यों त्यों सुकृत-सुभट कलि-भूपहि, निदरि लगे बहु काइन ॥१॥ ज्यों ज्यों जल मलीन त्यों त्यों जमगन मुख मलीन लहै आइन । तुलसिदास जगदघ जवास ज्यों अनघमेघ लागे डादन ।।२।। भावार्थ--यमुनाजी ज्यों-ज्यों बढ़ने लगी, त्या-त्या पुण्यरूपी योद्धा गण कलियुगरूपी राजाका निरादर करते हुए उसे निकालने लगे। यरसातमें यमुनाजीका जल चढ़कर ज्यों-ज्यों मैला होने लगा,

विनय-पत्रिकी
त्यों यमदूतोंका भुख भी काला होता गया। अन्तमें उन्हें कोई भी
भासरा नहीं रहा, अब धे किसको यमलोकमें ले जायँ ? तुलसीदास
हते हैं कि यमुनाजीके बढ़ते ही पुण्यरूपी मेघने संसारके पापरूपी
वासेको जलाकर मस्स कर डाला ॥२॥
काशी स्तुति
राग भैरव
[२२]
सेइय सहित सनेह देह भरि, कामधेनु कलि कासी।
समनि सोक-संताप-पाप-रुज, सकल सुमंगल-रासी ॥१॥
मरजादा चहुँओर चरन पर, सेवत सुरपुर-पासी ।
तीरथ सप सुम अंग रोम सिवलिंग अमित अविनासी ॥२॥
अंतरऐन ऐन भल, थन फल, बच्छ वेद-विस्खासी ।
गलकंबल यरुना विभाति जनु, लूम लसति सरिताऽसी ॥३॥
दंडपानि भैरव विषान, मलरुचि-खलगन भयदा-सी।
लोल दिनेस त्रिलोचन लोचन, करनघंट घंटा-सी ॥४॥
भनिकनिका बदन-ससि सुन्दर, सुरसरि-मुख सुखमा-सी ।
खारथ परमारथ परिपूरन, पंचकोसि महिमा-सी ॥५॥
विस्वनाथ पालक कृपालुचित, लालति नित गिरिजा-सी।
सिद्धि, सची, सारद पूजहिं, मनजोगवति रहति रमा-सी ॥६॥

. कर पिनय-पत्रिका पंचाच्छरी प्रान, मुद माधय, गम्य सुपंचनदासी। ब्रह्म-जीव-सम रामनाम जुग, आखर विख-विकासी ॥७॥ चारितु चरति करम कुकरम करि, मरत जीवगन घासी। लहत परमपद पय पावन, जेहि चहत प्रपंच-उदासी ॥८॥ कहत पुरान रची केसव निज कर-करतूति कला-सी। तुलसी पसि हरपुरी राम जपु, जो भयो चहै सुपासी ॥९॥ भावार्थ-इस कलियुगमें काशीरूपी कामधेनुका प्रेमसहित जीवन भर सेवन करनाचाहिये। यह शोक, सन्ताप, पाप और रोगका नाश वाली तथा सवप्रकारके कल्याणोंकी खान है ॥१॥ काशीके चारों भीरमा मीमा इस कामधेनुके सुन्दर चरण हैं। स्वर्गवासी देवता इसके चरणों संघा करते हैं। यहाँके सब तीर्थस्थान इसके शुभ अंग ई और नागर अगणित शियलिइसके रोम है ॥२॥ अन्तर्ग्रही (काशीका मध्यभाग) इस कामधेनुका ऐन (गही) है। अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष-ये चारों फलामो चार धन है; येद-शास्त्रोंपर विण्यास रखनेवाले आस्तिक लोग इसके पो -वियामी पुरुषाको दी इसमें नियास करनेसे मुक्तिरूपी अमृतमय मिलता है। मुन्दर यरुणा नदी इसकी गल-कयटफे समान शोमायदाही है और भागी नामक नदी मूंछो रूपमें शोभित हो रही है ॥३॥ दण्डधार्ग मैग्य गमांग ६, पापमें मन रखनेवाले दुष्टोंको उन सागासे या गदा गती रहती है। लीला (कुण्ड) और मिलोधन (एकतीय) इमो मंत्रमार कर्णयटा मामला इगो गलका घण्टा ॥ ममि. पकिसका नत्रमा गमान गुन्दरगुम्व है। गंगाजी मिलनेपाया मन र माग जिम में पूप भगा रहता है।

पिमप-पत्रिका पाप-ताप-नाशरूपी सुख हमसी सोमा है, भोग भीर मोरारूपी मुलासे परिपूर्ण पक्षकोमीकी परिममा ही इसकी महिमा है . दयालु रदय विश्वनाथजी इम कामधेनुका पालन-पोषण करते हैं भोर पार्यनी-मरीमी दमयी जगजननी रमपर मदाप्यार करती रहती है। माठो मिद्धियाँ, परम्पती और इन्द्राणी शची मका पूजन करती है। जगत्का पालन करनेवाली लक्ष्मी-मरीरमका गम देखती रहती है nu 'नमाशिवाय' यह पञ्चाक्षरी मन्त्र ही इसके पाँच प्राण हैं। भगवान् विन्दुमाधय दी आनन्द है।पञ्चनदी (पञ्चगना) नार्थ दीइम पञ्चगव्य है। यही मंसारको प्रकट करनेयाले रामनामक दो यक्षर'रकार' और 'मकार इसके अधिष्ठाता प्रह और जीय ६॥७॥ यहाँ भग्नेयाले जीयोंका सय मुकर्म और फुकर्मरूपी धाम यह चर जाती है, जिससे उनको वही परमपदरूपी पवित्र दूध मिलता है, जिसको संमारकं विरक्त महात्मागण चादा करते ६८॥ पुराणामलिया है कि भगवान् विष्णुने सम्पूर्ण कला लगाकर अपने हायसिसकी रचना की है। तुलसीदास ! यदि तू सुखी होना चाहता ६नी काशी में रहकर श्रीरामनाम जपा कर ॥९॥ चित्रकूट-स्तुति राग वसन्त [२३] सब सोच-विमोचन चित्रकूट | कलिहरन, करन कल्यान यूट ॥१॥ सुचि अवनि मुहावनि आलबाल | कानन विचित्र, वारी विसाल ॥२॥ मंदाकिनि-मालिनि सदा सींच परवारि, विषम नर नारि नीच॥३॥ दही, घी, गोदर और गोमूत्र । सपक श शिनय-पत्रिका साखा गुरंग, भूरुह-गुपात । निरसर मधुरर,मृदु मलय वान। मुक, पिक, मधुकर,मुनियर विहारु । साधन प्रसून, फल चारि चारु ।' भव-पोरघाम-हर सुखद छोह । थप्यो पिर प्रभाव जानकी नाही' साधक-सुपथिक बड़े भाग पाइ । पावत अनेक अमिमत अधाइ । रस एक, रहित-गुन-करम-काल । सियराम लखन पालक कृपाला. तुलसी जो राम पद चहिय प्रेम । सेइय गिरि करि निरुपाधि नेमा भावार्थ-चित्रकूट सब तरहफे शोकॉसाहानेवाला है। यह कलिन का नाश करनेवाला और कल्याण करनेवाला हरा-भरा वृक्ष है। पवित्र भूमि इस वृक्षके लिये मुन्दर थाल्हा और विचित्र घन ही इस यही भारी वाह है ॥२॥ मन्दाकिनीरूपी मालिन इसे अपने उस उत्त जलसे सदा सींचती है, जिसमें दुष्ट और नीच स्त्री-पुरुषोंके नि स्नान करनेसे भी उसपर कोई बुरा असर नहीं पड़ता ॥३॥ यहाँके सुन शिखर ही इसकी शाखाएँ और वृक्ष सुन्दर पत्ते हैं। झरने मधुर मकर है और चन्दनकी सुगन्धसे मिली हुई पवन ही इसकी कोमलता है ? यहाँ विहार करनेवाले श्रेष्ठ मुनिगण ही इस वृक्षम रमनेवाले तो कोयल और मौर हैं। उनके नानाप्रकारके साधन इसके फूल है और अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष-ये ही चार सुन्दर फल हैं ॥५॥ इस वृक्षकी छाय संसारको जन्म-मृत्युरूप कड़ी धूपका नाश कर सुन्दर सुम देती है जानकीनाथ श्रीरामने इसके प्रभावको सदाके लिये स्थिर कर दिय है ॥६॥ साधकरूपी श्रेष्ठ पथिक यड़े सौभाग्यसे इस वृक्षको पाकर, इस प्रकारके मनोयान्छित मुख प्राप्त करके वृत्त हो जाते हैं य चिनय-पत्रिका या तीनों गुण, काल और कर्मस रहित सदा एकरस है, अर्थात् पके सेवन करनेवाले माया, काल और कर्मक यन्धनसे छूट जाते ६. योकि कृपालु सीता, गम और लक्ष्मण इसक रक्षक . सानुलमी- म ! जोशुश्रीरामजीके चरणों में प्रेम चाहता है तो चित्रपट-पर्यतका नेश्छल नियमपूर्वक मेवन कर ॥२॥ राग पान्हरा [२४] अर धित घेति चित्रकूटहि पलु । फोपित फलि, लोपित मंगल मगु, चिलमत पदत मोह-माया मलु।। भूमि रिलोक राम-पद-अंकित, पन पिलोक रघुपर-पिहारथल । सिल सुंग मरभंग-हेतु लर, दलन कपट-पासंह-दम-दल ॥२॥ जो जनमे जग-जनक जगवपति, विधि-हरि-हर परिहरि प्रपंच एलु। सकत प्रग फरत जेहि आरम, रिगव-रिपाद भये पारय ननु ॥३॥ न करु पिलंग विचार पारमति, परप पारिले मम अगिले पलु । मंघ मो बार जपहि, जो जपि मे. अजर अमर हर अचाहताहत ॥४॥ रामनाम जप जाग फरत नित, मसन पर पावन पीपत जनु ।। सरि गम भारती मनसो, गुग-मापन, अनपान महारत् ।।५।। कामद मनि कामता-कलपतर मो जगजग डागत बगठीत।। बलमी साहिरिमेषि पनिर, एक प्रतीति प्रोनि एक पतु ।।६।। -- है पिनय-पत्रिका भावार्थ-६ चित्त ! अय तो घेतकर चित्रपटको यल । कलियुग फ्रोध कर धर्म और भ्यरमनिरप कल्याणक मागोका लोप कर मोह,मायाभोर पापांकी नित्य वृद्धि हो रही है। वित्रटमेधाराम के चरणोंसे चिदिन भूमिका और उनके विहारके स्थान यनका दर्शन कर पहाँ कपट, पापण्ड और दम्मके दल (समूह) कानाश करनेवाले पर्वत उन शिखरोंको देग, जो जन्म-मरणरूप संमारसे छुटकारा मिलना कारण हैं ॥२॥जहाँपर जगत्पिता जगदीश्वर ब्रह्मा, विष्णु और शिश्नेस अनसूयाके पुत्ररूपसे प्रपञ्च और छल छोड़कर जन्म लिया है। जिस चित्रकूटरूपी आश्रममें एक यार प्रवेश करते ही जुएम हारकर यन- भटकते हुए युधिष्ठिर आदि पाण्डव और राजा नलका सारा दुःरा | हो गया ॥३॥ वहाँ जानेमें अब देर न कर, अपनी अच्छी बुद्धिसे यह टी विवार कर कि जितने वर्ष बीत गये सोतोगये, अव आयुके जितने पर वाकी हैं, वे बीते हुए वर्षों के समान हैं। एक-एक पलको एक-एक वर्ष समान बहुमूल्य समझकर, मृत्युको समीपजानकर, जल्दी चित्रकूट जाकर उस श्रीराम मन्त्रका जप कर, जिसे जपनेसे श्रीशिवजी कालकूट पीनेपर भी अजर-अमर हो गये ॥४॥ जब तू यहाँ निरन्तर श्रीराम नाम अपरूपी सर्वश्रेष्ठ यज्ञ और पयस्विनी नदीके पवित्र जलमें स्नान तण उसके जलका पान करतारहेगा, तय श्रीरामजी तेरीमनोकामना पूरी का देंगे और इस सुखमय माधनसे सहजहीमें तुझे धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष- लागें फल दे देंगे ॥५॥ चित्रकूट में जो कामतानाथ पर्वत है, यही मनोरण श्री चिन्तामणि और कल्पवृक्ष है, जो युग-युग पृथ्वी ..'यो तो चित्रकूट सभी के लिये सुखदायक है, परतु बिनय-पत्रिका तुलसीदास ! तुझे तो विशेषरूपसे उसीके विश्वास, प्रेम और बलपर निर्भर रहना चाहिये ॥६॥ हनुमत्-स्तुति राग धनाश्री [२५] जयत्यजनी-गर्भ-अंभोधि-संभूत-विधु, वियुध-कुल-कैरवानंदकारी । केसरी-चारुलोचन-चकोरक-सुखद, लोकगन शोक-संतापहारी ॥१॥ जयति जय बालकपि केलि-कौतुक उदित चंडकर-मंडल-प्रासकर्ता। राहु-रवि-शक पवि-गर्व-खर्वीकरण शरण भयहरण जय भुवन-भा॥२॥ जयति रणधीर, रघुवीरहित, देवमणि, रुद्र-अवतार, संसार-पावा । विप्र-सुर-सिद्ध-मुनि-आशिपाकारवपुप,विमलगुण,बुद्धि-चारिधि-विधाता जयति सुग्रीव ऋक्षादि रक्षण-निपुण, पालि बलशालि-बघ मुख्यहेतू । जलधि-लंघन सिंह सिंहिका-मद-मथन, रजनिचर-नगर-उत्पात केतू ४ जयति भूनन्दिनी-शोच-मोचन विपिन-दलन पननादरश विगतशंका। लूमलीलाऽनल-ज्यालमालाकुलित, होलिकाकरण लंकेश-लंका ॥५॥ जयति सौमित्रि-रघुनंदनानंदकर, ऋक्ष-कपि-कटक संघट-विधायी । पद्ध-चारिधि-सेतु,अमर-मंगल हेतु, भानुकुल-केतु-रणविजयदायी ॥६॥ जयति जय पजतनु दशन नख मुख विकट,पंड-भुजदंड वोल-पानी। समर-तलिक-यंत्र तिल-तमीचर-निकर, परि डारे सुभट पालि पानी७ - हो ॥२॥ तुम्हारी जय हो, तुम रणमें बड़े धीर, सदा श्रीरामजोर पिनय-पत्रिका जयति दशकंठ-पटक-वारिद-नाद-कदन-कारन, कालिनेमिना अघटघटना-सुघट सुघट-विघटन विकट, भूमि-पानाल-जल-गगन र जयति विश्व-विख्यात धानत-बिरुदावली,विदुप परनत वेद विमलया दास तुलसी त्रास शमन सीतारमण संग शोभित राम राजधानी ॥ भावार्थ-हे हनुमानजी ! तुम्हारी जय हो। तुम अनाक गर्म समुद्रस चन्द्ररूप उत्पन्न होकर देय-कुल-स्पी कुमुदोको प्रफुलिन कर वाले हो, रिता केसरीके सुन्दर नेत्ररूपी चकोराको आनन्द देनेवाले और समस्त लोकोंका शोक सन्ताप हरनेवाले हो तुम्हारी अय जय हो। तुमने वचपनमें ही चाललीलासे उदयकालीन प्रचण्ड सूर्य भण्डलको लाल-लाल खिलौना समझकर निगल लिया था। उस सम- तुमने राहु, सूर्य, इन्द्र और वनका गर्व चूर्ण कर दिया था।हे शरणागत भय हरनेवाले! हे विश्वका भरण-पोषण करनेवाले !! तुम्हारी हिन करनेवाले, देव-शिरोमणि रुद्रके अवतार और संसारके रक्षा हो। तुम्हारा शरीर ब्राह्मण, देवता, सिद्ध और मुनियोंके आशीर्यादा भूर्तिमान रूप है। तुम निर्मल गुण और बुद्धिक समुद्र तथा विधान हो ॥३॥ तुम्हारी जय हो ! तुमने सुग्रीव तथा रीछ (जाम्ययन्त) आदि की कुशलतासे रक्षा की । मद्दा बलवान् वालिके मरवाने में तुम् मुख्य कारण हो। तुम्ही समुद्र लाँघने समय सिंहिका राक्षप्ती मर्दन करनेमें सिंहरूप तथा राक्षसोंकी लङ्कापुरीके लिये धूम .५ तारे) रूप हो ॥४॥ तुम्हारी जय हो। तुम श्रीसीताजीको राम विनय-पत्रिका - सन्देशा मुनाकर उनकी चिन्ता दूर करनेवाले, रावणके अशोक- निकोउजादुनेवाले हो। तुमने अपनेको निशंक होकरमेघनादसे ब्रह्मास्त्र- बिधवा लिया था। अपनी पूँछकी लीलासे अग्निकी धधकती हुई टपटोंसे व्याकुल हुए रावणको लङ्कामे चारों ओर होली जला दी थी १५॥ तुम्हारी जय हो । तुम श्रीराम-लक्ष्मणको आनन्द देनेवाले, रोछ और बन्दरोंकी सेना इकट्ठी कर समुद्रपर पुल बाँधनेवाले, देवताओंका कल्याण करनेवाले और सूर्यकुल-केतु श्रीरामजीको संग्राममें विजय-लाभ करानेवाले हो ॥६॥ तुम्हारीजय हो, जय हो। तुम्हारा शरीर, दाँत, नख और विकराल मुख यज्रके समान है। तुम्हारे भुजदण्ड बड़े ही प्रचण्ड हैं, धृक्षों और पर्वतोंको तुम हाथोंपर उठानेवाले हो। तुमने संग्रामरूपी कोहमें राक्षसोंके समूह और बड़े-बड़े योद्धा रूपी निलोको डाल-डाल- कर यानीकी तरह पेल डाला ॥७॥तुम्हारी जय हो । रावण, कुम्भकर्ण और मेघनादकनाशमें तुम्ही कारण हो; कपटी कालनेमिको तुम्हींने मारा था।तुम असम्भवको सम्भय और सम्भवको असम्भव कर दिखानेवाले हो। तुम बड़े विकट हो । पृथ्वी, पाताल, समुद्र और आकाश सभी स्थानों में तुम्हारी अबाधित गति है ॥८॥ तुम्हारी जय हो। तुम विश्वमें विख्यात हो, पीरताका याना सदा ही कसे रहते हो । विद्वान् और वेद अपनी विशुद्ध पाणीसे तुम्हारी विरदावलीका वर्णन करते हैं। तुमतुलसीदासके भव-मयको नाश करनेवाले हो और अयोध्या सीतारमण श्रीरामजीके साथ सदा शोभायमान रहते हो॥९॥ [२६] जयति मर्कटाधीश,मृगराज-विक्रम,महादेव मुद-मंगलालय,कपाली । मोह-मद-क्रोष कामादि-खल-संकुला,पोर संसार-निशि किरणमालीश AL वाले हो, पिता केसरी सुन्दर नेप-पीचकोगको आनन्द देनेवाले तुमने राहु, सूर्य, इन्द्र और यनकागचे चूर्ण कर दियाथा।हेशरणागत हो ॥२॥ तुम्हारी जय हो, तुम रणमें बड़े धीर, सदा श्रीरामजीका हित करनेवाले, देव-शिरोमणि रुद्रके अवतार और संसारके रक्षा गिनय-पत्रिका जयति दशकंठ-घटकर्ण-वारिद-नाद-कदन-कारन, कालिनेमि ईनाने अपटपटना-गुपट सुघट-विघटन विकट, भूमि-पाताल-जल-गगनगद जयति विश्व-विण्यात यानंत-विरुदावली,विदुपयरनत वेद विमलयन दास तुलमी त्रास शमन मीतारमण संग मोमित राम-राजधानी ॥ भावार्थ-हे हनुमानजी ! तुम्हारी जय हो 1 तुम अनार्क गर्मरने समुद्रसे चन्द्रम्प उत्पन्न होकर देय-कुल-स्पी कुमुदोको प्रफुल्लित कर और समस्त लोकोंका शोक-सन्ताप हरनेवाले हो॥१॥ तुम्हारी जय हो जय हो। तुमने बचपन में ही याललीलासे उदयकालीन प्रचण्ड मूक मण्डलको लाल-लाल खिलौना समझकर निगल लिया था। उस समः भय हरनेवाले ! है विश्वका भरण-पोषण करनेवाले !! तुम्हारी हो। तुम्हारा शरीर ब्राह्मण, देयता, सिद्ध और मुनियोंके आशीर्वाद भूर्तिमान रूप है। तुम निर्मल गुण और बुद्धिके ममुट हो ॥३॥ तुम्हारी जय हो ! तुमने सुग्रीय . 7 की कुशलतासे रक्षा की । महा । मुख्य कारण हो। तुम्ही समुद्र ला मर्दन करनेमें सिंहस्प तथा । . (पुच्छल तारे)सप', विनय-पत्रिका दुष्टॉसव्याप्त घोरसंसाररूपी अन्धकारमयी रात्रिके नाश करनेवाले तुम साक्षात् मूर्य हो॥तुम्हारी जय हो। तुम्हारा जन्म अञ्जनीरूपी अदिति देघ-माता) औरयानरोंमें सिंहकेसमान केसरीरूपी कश्यपसे हुआहै। तुम गत्के कष्टोंके हरनेवाले हो तथा लोक और लोकपालरूपी चकया. किची और कमलोंका शोक नाश करनेवाले साक्षात् कल्याण-मूर्ति मूर्य १२५ तुम्हारी जय हो। तुम्हारा शरीरबड़ा विशाल और भयकर है, त्येक अंग यजके समान है। बड़े भारी भुजदण्ड हैं, बज्रके समान नख पौर सुन्दर दाँत शोभित हो रहे हैं। तुम्हारी पूँछ घड़ी लम्बी है, शत्रुओंके संहारके लिये तुम अनेक प्रकारके अस्त्र, शस्त्र और पर्वतोंको लिये रहते दो ॥३॥तुम्हारी जय हो। तुम श्रीसीताजीके शोक-सन्तापका नाश करने- पाले और श्रीराम लक्ष्मणके आनन्दरूपी कमलोंको प्रफुल्लित करनेवाले हो। पन्दर-स्वभावसे खेलमें हीछसे लंकाजला देनेवाले, अशोक-धनको उजाइनेयाले, तरण तेजके पुज मध्याह्नकालके सूर्यरूप हो तुम्हारी जय हो। तुम समुद्रपर पत्थरका पुल याँधनेवाले, राक्षसोंके महान् भानन्दशे नाश करनेवाले,दुएरायण,फुम्भकर्ण और मेघनादके मर्म-स्थाना- को तोड़कर उनके कोका फल देनेवाले हो ॥५॥ तुम्हारी जय हो। तुम त्रिभुवनके भूषण हो, विभीषणकोराम-भक्तिका घर देनेवाले हो और रण- में धीरामजीके साथ पड़े-बड़े काम करनेयाले दो। लक्ष्मण और सीताजी- सहिन पुष्पक विमानपर विराजमान सूर्यकुलके सूर्य श्रीरामजीको कीर्ति- पताका मुम्ही हो ॥६॥ तुम्हारी जय हो । तुम शत्रुओद्वारा किये जाने- पाले यन्त्र मन्त्र, अमिवार (मोहन-उचाटन आदि मयोगों तथा जादू रोने) को प्रसनेवाले तथा गुप्त मारण-प्रयोग और प्राणनाशिनी हत्या

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बिनय-पत्रिका जयति संग्रामजय, रामसंदेसहर, कौशला कुशल कल्याणमापी । राम-विरहार्क-संतप्त-भरतादि-नरनारि-शीतलकरण कल्पशापी ॥४॥ जयति सिंहासनासीन सीतारमण,निरखि निर्भरहरप नृत्यकारी । राम संभ्राज शोभा-सहित सर्वदा तुलसिमानस-रामपुर-विहारी ॥५॥ मावार्थ हे हनुमानजी ! तुम्हारी जय हो। तुम कल्याणके स्थान, सारके भारको हरनेवाले, धन्दरके आकारमें साक्षात् शिव-स्वरूप हो। (मराक्षसरूपी पतंगोको भस्म करनेवाली श्रीरामचन्द्रजीके मोधरूपी अग्नि- ज्यालमालाफे मूर्तिमान स्वरूप हो ॥१॥ तुम्हारी जय हो.तुम पवन और प्रसनी देवीको आनन्द देनेवाले हो। नीची गर्दन किये हुए, दुम्सी मुग्रीव- * दुःखमें तुम सधे धन्धुके समान सहायक हुए थे। तुम राक्षसांके रालमोधरूपी प्रलय-कालकी अग्निका नाश करनेवाले और सिद्ध देवता या मनमोंके लिये आनन्दके ममुद्र हो ॥२॥ तुम्हारी जय हो, तुम रकादश रुद्राम और जगत्पूज्य शानियोंमें अग्रगण्य हो, संसारभरफे शूरवीरॉफ प्रसिद्ध सम्राट हो। तुम सामवेदका गान करनेवालोंमें और कामदेयको जीवनयालॉम सबसे श्रेष्ठ हो । नुम श्रीरामजीके हितकारी मौर धीराम-भक्तोंके साथ रहनेवाले रक्षक हो ॥३॥ तुम्हारी जय हो। नुम संग्राममें विजय पानेवाले,धीरामजीका सन्देशा (सीताजीके पास) पहुँचानेयाले और अयोध्याका कुशल मंगल (धीरघुनाथजीसे) कहने- पाले हो। तुम भीरामजीके वियोगरूपी मूर्यमे जलते हुए भरत धादि परोयायासी नर-नारियोंका शाप मिटाने के लिये फरपवृक्ष दो प्रया मुम्हारी जयहो। तुम धीरामजीको राज्य सिंहासनपर विराजमान देस, करनेवाले हो। तुम्हारी स्थिति भानम सदा निधल रहती है। सत्य अहिंसा, अस्तेय, ग्रह्मचर्य और अपरिग्रहरुप महावतोंके पालनमें तुम सदा रत हो और सदा धर्मका आचरण करते हो। सिद्ध देवगण और यातुधानोद्धत-ऋद्ध-कालामिहर, सिद्ध-सुर-सजनानंद-सिंधो ॥२॥ कामजेताग्रणी, रामहित, रामभक्तानुवर्ती ॥२॥ पिनय-पत्रिका मादि फर देवियाँका नाग करनयाने हो। शाकिनी, डाधित पूतना, मंग, पताल, मृत भीर प्रमय आदि भयानक जीवों के नियम कांगामक हो । ॥ नुम्हागंजय हो। तुम यंदान्तर जाननेपाने, ना प्रकारकी यिधामा यिनारद, चार यंद और छायदा (शिक्षा व्याकरण, निरुक्त, छन्द और ज्योतिर) के माता तथा गुर ग्रामक सन का निरूपण करनेवाले दी। शान, विज्ञान और वैराग्यके पात्र होगा तुम्हानानको अच्छी तरहम जाना है। तुम समर्थ हो। इमाम गुरु और नारद आदि देवर्षि सदा तुम्हारी निर्मल गुणायली गाया कर net तुम्हारी जय हो । तुम काल (दिन, घड़ी, पल आदि) वि. (सत्य, रजातम) कर्म (मञ्चित,प्रारब्ध, क्रियमाण) और मायाका' योगिराज सदातुम्हारी सेवा किया करते हैं। हे भव-भयरूपीअन्धकारक नाश करनेवाले सूर्य ! यह दास तुलसी तुम्हारी शरण है ॥९॥ [२७] जयति मंगलागार, संसारभारापहर, वानराकारविग्रह पुरारी । राम-रोपानल-ज्वालमाला-मिप ध्वांतचर-सलम-संहारकारी ॥१॥ जयति मरुदंजनामोद-मंदिर, नतग्रीव सुग्रीव-दुःखकषंधो । जपति रुदाग्रणी, विश्व-चंद्यापणी, विश्वविख्यात-मट-चक्रवर्ती ।

विनय-पत्रिका जयति संग्रामजय, रामसंदेसहर, कौशला कुशल कल्याणभापी । राम-विरहार्क-संतप्त-भरवादि-नरनारि-शीतलकरण कल्पशापी ॥४॥ जयति सिंहासनासीन सीतारमण,निरखि निर्भरहरप नृत्यकारी । राम संभ्राज शोभा-सहित सर्वदा तुलसिमानस-रामपुर-विहारी ॥५॥ मावार्थ हे हनुमानजी ! तुम्हारी जय हो। तुम कल्याणके स्थान, सारके भारको हरनेवाले, बन्दरके आकारमें साक्षात् शिव-स्वरूप हो। मराक्षसरूपी पतंगोंकोभस्म करनेवाली श्रीरामचन्द्रजीक क्रोधरूपी अग्नि- ज्वालमालाके मूर्तिमान स्वरूप हो ॥१॥ तुम्हारी जय हो,तुम पवन और प्रजनी देवीको आनन्द देनेवाले हो। नीची गर्दन किये हुए, दुग्वी सुग्रीव- के दुःखमें तुम सच्चे बन्धुके समान सहायक हुए थे । तुम राक्षसांके कराल क्रोधरूपी प्रलय-कालकी अग्निका नाश करनेवाले और सिद्ध, देवता तथा सजनोंके लिये आनन्दके समुद्र हो ॥२॥ तुम्हारी जय हो, तुम एकादश रुद्रोम और जगत्पूज्य ज्ञानियोंमें अग्रगण्य हो, संसारभरके शूरवीरों के प्रसिद्ध सम्राट् हो। तुम सामवेदका गान करनेवालोंमें और कामदेवको जीतनेवालों में सबसे श्रेष्ठ हो। तुम श्रीरामजीके हितकारी और धीराम-भक्कोंके साथ रहनेवाले रक्षक हो ॥३॥ तुम्हारी जय हो। तुम संग्राममें विजय पानेवाले,श्रीरामजीका सन्देशा (सीताजीके पास) पहुँचानेवाले और अयोध्याका कुशल मंगल (धीरघुनाथजीमे) कहने- पाले हो। तुम श्रीराम के वियोगरूपी सूर्यसे जलते हुए भरत आदि अयोध्यावासी नर-नारियोंका ताप मिटानेके लिये कल्पवृक्ष हो ॥४॥ तुम्हारी जय हो। तुम थीरामजीको राज्य-सिंहासनपर विराजमान देख, सिंहासनपर विराजित हो शोभा पा रहे थे, वैसे ही तुम इस तुलसीदन जयति वात-संजात,विख्यातविक्रम,बृहद्वाह,पलबिपुल,बालपिसि जातरूपाचलाकारविग्रह, लसल्लोम विद्युल्लता ज्वालमाला || विनय पत्रिका आनन्दमें विद्वल होकर नाचनेवाले हो। जैसे श्रीरामजी की मानसरूपी अयोध्या सदा विहार करते रहो ॥५॥ [२८] जयति बालार्क वर चदन, पिंगल-नयन, कपिश-कर्कश जटाजूटधारी विकट भृकुटी, यज्र दशन नख, पैरि-मदमत कुंजर-पुंज-कुंजरारी । जयति भीमार्जुन-व्यालसूदन-गर्वहर, भीष्म-द्रोण-कर्णादि पालित, कालहक सुयोधन चम्-निधन हेतु ॥ जयति गतराजदातार, हतार संसार-संकट, दनुज-दर्पहारी इति अति भीति-ग्रह-प्रेत-चौरानल-व्याधिपाया-शमन घोर मारी - जपति निगमागम व्याकरण करणलिपि,काय्यकांतुक-कला-कोटि- मामगापक, मक्त-कामदायक, वामदेव, श्रीराम-प्रिय-प्रेम-यो। जपति पांशु संदग्ध-संपाति नवपक्ष-लोचन-दिव्य-देहदाता कालकलि-पापसंताप-संकुल सदा, प्रणत तुलसीदास सात-माता । भाषा-नुमान जी! मुम्हारी जय हो। नुम पपनसे पाप दुमा पाकम गितुम्हारी गुमाएँ पड़ी विशाल ग पसर तुम्हारी यही हामी हाम्दारा शरीर गुमा-गर्वन धनंजय रथ-त्राण-केत ।

पिनय पत्रिका पमान पिताल पपं जाती है। मुम्हारी मापदी जिसकी रंगा मपपा ज्यालामाकी माला पमान जगमगा दोगुम्दार्ग जय हो। मुम्हाग मुगदप-कालीन पगमान मुन्दरापाले मंत्र, मुम्हार मिराभूगरंगकी कठोर जटामाका जाधवानुम्हारी मदिरेदी । तुम्हारे दोन भाग नापनकममाननुमनापीमदमा दापिदिलको विदीर्ण करनयाल मि ममान होnan तुम्हारी जर हो। तुम भीमगन, मर्जुन भारगड़गपंकोग्नेयाल तथा मर्जुनकराया की पताकापर पटकर उसकी ग्रा करनेवाले दी। तुम भीष्मपितामह, होणाचार्य भार फर्ण मादिम क्षित कालकी सटिक ममान भयानक दुर्योधनको महान् मेनाका नाश करने में मुख्य कारण ॥३॥ नुम्हारी जय हो। तुम गुप्रयोग हुए गल्यको पिरम दिलानेवाले, संचारलं. मंकटांका नाश करनेवाले धीर दानयोंके दपको पूर्ण करनेवाले हो। तुम अतिवृष्टि, अनाधि टीडी, चूंद, पीयार गज्य माक्रमणाप गेनीमें गायक प्रकारको नि, महामप, प्रह, प्रेत, चार, अग्निकाण्ड, गंग, याधा और महामार्ग भादि शौक नाश करनेवाले हो ॥४॥ तुम्हारी जय हो। तुम यद, शान और प्याकरणपर भाष्य लिग्नेयाल भीर काट्य- के कोतुक तथा करोड़ों कलामक समुद्र हो। तुम सामयदका गान करनेवाले, भन्तॉकी कामना पूर्ण करनेवाले मामान शियप हो और श्रीरामके प्यार प्रेमी बन्धु दो ॥५॥ तुम्हारी जय हो । नुम मूर्यसे जले हुप सम्पाती नामक (जटायुकेमा) गृद्धको नये पंख, नेत्र और दिव्य शरीरके देनेवाले हो। और कलिकालके पाप-सन्तापोंसे पूर्ण इस शरणागत तुलसीदासके माता-पिता हो ।

जयति निर्भरानंद-संदोह कपिकेसरी, केसरी-सुक्न भुवनकमा।
यिनय-पत्रिका
[२९]
भक्त-संताप-चिंतापहर्चा ॥
दिव्य भूम्यंजना-मंजुलाकर-मणे,
जयति धर्मार्थकामापवर्गद विभो, ब्रह्मलोकादि-वैभव-विरागी
वचन-मानस-कर्म सत्य-धर्मवती, जानकीनाथ-चरणानुरागी ।
जयति विहगेश-चलघुद्धि-वेगाति-मद-मथन, मनमथ-मथन,ऊर्ध्वरेता
महानाटक-निपुन, कोटि-कविकुल-तिलक, गानगुण-गई-गंधर्व-जेता।
जयति मंदोदरी केश-कर्षण, विद्यमान दशकंठ भट-मुकूट मानी
भूमिजा-दुःख संजात रोपांतकृत जातना जंतु कृत जातुधानी ।।
जयति रामायण-श्रवण-संजात-रोमांच, लोचन सजल, शिथिल वाणी
रामपदपद्म-मकरंद-मधुकर, पाहि, दास तुलसी शरण, शूलपाणी ॥५-
भावार्थ-हे हनुमानजी ! तुम्हारी जय हो। तुम पूर्ण आनन्द के सम्
पानरोंमें साक्षात् केसरी मिद (पयर शेर), कमरीके
एकमात्र भरण-पोषण करनेवाले हो। तुम अञ्जनी रूपी दिव्य भूमि
गुम्दर मानसे निकली हुई मनोहर मणि हो और भक्तोंके सत्ताप
गिताओंको महा नाश करत हो ॥१॥ विभो ! तुम्हारी जप हो।
धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष देनयाले दो ग्रह्मलोकतको समस्त
श्यों में घाययान्मन, यथन और कर्मम माया धर्मके मार
সনীগীমানাবাদাঘলামেমনা।
गुहागर हो। तुम गार वाद पुछि भौर के मोमा
और संसार
'मा

विनय-पत्रिका
गर्वको खर्च करनेवाले तथा कामदेयके नाश करनेवाले वाल-ब्रह्मचारी
हो। तुम बड़े-बड़े नाटकोंके निर्माण और अभिनयम निपुण हो, करोड़ों
महाकवियोंके कुलशिरोमणिऔर गान-विधाका गर्व करनेवाले गन्धों पर
वैजय पानेवाले हो ॥३॥ तुम्हारी जय हो। तुम वीरॉके मुकुटमणि, महा
अभिमानी रावणके सामने उसकी नी मन्दोदरीके बाल खीचनेयाले हो।
तुमने श्रीजानकीजीके दुःखको देखकर उत्पन्न हुए क्रोधके वश हो
राक्षसियोंको ऐसा क्लेश दिया.जैमा यमराज पापी प्राणियोंको दिया
करता है ॥४॥ तुम्हारी जय हो । श्रीरामजीका चरित्र सुनते ही तुम्हारा
शरीर पुलकित हो जाता है, तुम्हारे नेत्रों में प्रेमके आँसू भर आते हैं,
तुम्हारी वाणी गद्गद हो जाती है। हे श्रीरामके चरण-कमल-परागक
रमिफ भोरे ! हे हनुमान-रूपी त्रिशूलधारी शिव! यह दास तुलसी
तुम्हारी शरण है, इसकी रक्षा करो ॥५॥
राग सारंग
[३०]
जाके गति है हनुमानकी ।
ताकी पैज पूजि आई, यह रेखा कुलिस पपानकी ॥२॥
अपटित-घटन, मुघट-विघटन, ऐसी बिरुदावलि नहिं आनकी ।
सुमिरत संकट-सोच-विमोचन, मृति मोद-निधानकी ॥२॥
तापर सानुकूल गिरिजा, हर, लपन, राम अरु जानकी ।
तुलसी कपिकी कृपा-चिलोकनि, खानि सकल कल्यानकी ॥३॥

. - श्रीहनुमान भावार्थ-जिसको (सब प्रकारसे)श्रीहनुमानजीका आश्रय है, उमा प्रतिज्ञा पूरी होहीगयी। यह सिद्धान्त पत्र(हीरे)कीलकीरके समान श्रीहनुमान्जीकी आनन्दमयी भूतिका स्मरण करते ही सारे संकट जाको है सब भाँति भरोसो कपि केसरी-किसोरको जलधि लाँपि दहि लंक प्रबल यल दलन निसाचर घोरको ॥१ शाको बालपिनोद ममुझि जिय बरत दिवाकर मोरको । जारी निपुर-योट पूरन किय रद्-मद लिग फठोरको 11- विनय पत्रिका है ॥१॥ क्योंकि श्रीहनुमानजी असम्भव घटनाको सम्भप और सम्मा असम्भव करनेवाले हैं, ऐसे यशका याना दूसरे किसीका भी नहीं शोक मिट जाते हैं ।।२।। सय प्रकारके कल्याणोंकी खान कृपा-दृष्टि जिसपर है, हे तुलसीदास! उसपर पार्वती, शङ्कर, सर श्रीराम और जानकीजी सदा कृपा किया करती है ॥३॥ [३१] ताकि तमकि ताकी ओर को । जन-रंजन अरिगन-गंजन मुख-भंजन खल घरजोर को। पैद-पुरान-प्रगट पुरुषारथ सकल-सुमट-सिरमोर को ॥२॥ उप अपन, थपे उथपन पन, विपुपद मंदिछोर को । राग गौरी भनाल पिलोकियो बहन पिलायन-कारकी। अप, मद मंगलमय जो गंधक रनरारको विनय-पत्रिका भगत-कामवरु नाम राम परिपूरन चंद चकोरको । तुलसी फल चारों करतल जस गावत गईबहोरको ॥६॥ भावार्य-जिसे सय प्रकारसे केसरी-नन्दन श्रीहनुमानजीकामरोला हैउसकी मोर मलामोधमरीटिस कौन नाक सकता है. हनुमान. जीके समानमकोंको प्रसन्न करनेवाला, शत्रुओका नाश करनेयाला, दुष्टों- कामुँह तोड़नेयालाथड़ा यलयान्मंसारमें और कौन है। इनका पुरुषार्थ वेदो और पुराणों में प्रकट है। इनके समान समस्त शूरवीरोंमें शिरोमणि इसरा कौन है ? ॥२॥ इनके समान (मुप्रीय विमीपण आदि)राज्यथरिकतो. का पुनः स्थापित करनेवाला, सिंहासनपर स्थित (पालि,रायण आदि) राजाधिराजोंको राज्यच्युत करनेवाला, देवताओंको प्रण करकेरायणके यन्धनसे छुड़ानेवाला, समुद्र लौंधकर लाको जलानेवाला और बड़े-बड़े बलवान मयानक राक्षसोंके पलकानाश करनेवाला दुमरा कीन है॥३॥ जिनके याल यिनोदको याद करके अय मी प्रातःकालके सूर्यदेव डरा करते ६, जिनकी ठोड़ीको चोटने कठोर यजके दाँतोंका घमण्ड चूर कर दिया । ॥ बड़े-बड़े लोकपाल मी जिनका कृपाकटाक्ष चाहते हैं, ऐसे रणयाँकुरे हनुमानजीकी जो सेवा करता है, यह सदा निडर रहता है, शत्रुओंपर विजयी होता है और संसारके सभी सुख तथा फल्याणरूप मोक्षको प्राप्त करता है ॥५॥ पूर्णकला-सम्पन्न चन्द्रमा जैसे श्रीरामचन्द्रजीके मुखको अनिमेप-दृष्पिसे देखनेवाले चकोररूप हनुमानजीका नाम । भक्तों के लिये कल्पवृक्षके समान है। हे तुलसीदास गयी हुई वस्तुको फिरमे दिलादेनेवाले श्रीहनुमान्जीकाजो गुणगाता है, अर्थ, धर्म, काम, मोक्षरूप चारों फल सदा उसकी हथेलीपर धरे रहते है ॥६॥ - विनय पत्रिका राग बिलाव , [३२] ऐसी तोहि न यूझिये हनुमान हठीले । साहेच कहूँ न रामसे, तोसे न उसीले ॥१॥ तेरे देखत सिंहके सिसु मेंढक लीले। जानत हौं कलि तेरेऊ मन गुनगन कीले ॥२॥ हाँक सुनत दसकंधके भये बंधन ढीले । सो चल गयो किधी भये अब गरवगहीले ॥३॥ सेवकको परदा फटे तू समरथ सीले । अधिक आपुते आपुनो सुनि मान सही ले ॥४॥ साँसति तुलसीदासको मुनि सुजस तुही ले। तिहूँकाल तिनको भली जे राम रंगीले ॥५॥ मायार्थ इटाल (मनों कष्ट यस्यम दूर करनेवाले हनुमान नुहो ऐसा नहीं चाहिये। धीराम-सरोगे तो कहीं सामी नहीं है मेरे रमान कहीं महायक नहीं ॥१॥ यह होते हुए भी साजरे दंगत मुग मिदा यच्चको (नुम मिहरूप महायक शरणागत पालाको कलियुगमपी मेंढक (जिमकी मेरे सामने कोहली नई मिगले मंगा है। मालम होता है. इस परियुगने तर मनाया सापागनी शाकं दिये इटकारिता, उदारता भादि गुणोंको

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विनय-पत्रिका
दिया है ॥२॥ एक दिन तेरी हुंकार सुनते ही रावणके अङ्ग-नके जोड़
ढीले पड़ गये थे, यह तेरा यल-पराक्रम आज कहाँ गया? अथवा क्या
तू अब दयालुके यदले घमण्डी हो गया है ? ॥३॥ आज तरे सेवकका
पर्दा फट रहा है, उसे तू सी दे जाती हुई इज्जतको बचा दे, नू. यड़ा
समर्थ है, पहले तो तू सेवकको अपनेसे अधिकमानता, उसकी सुनता और
मद्दता था, पर अब क्या हो गया ? ॥॥ इस तुलसीदासके संकटको
सुनकर उसे दूर करके यह सुयश तू ही ले ले । यास्तवमें तो झो. रामके
रंगीले भक्त हैं उनका तीनों कालों में कल्याण ही है |५||
[३३]
समरथ मुअन समीरके, रघुवीर-पियारे ।
मोपर कीवी तोहि जो करि लेहि मिया रे ॥१॥
तेरी महिमा ते चलें चिचिनी-चिया रे।
अँधियारो मेरी चार क्यों, त्रिभुवन उजियारे ॥२॥
केहि करनी जन जानिक सनमान कियारे।
फेहि अघ औगुन आपने कर डारि दियारे ॥शा
खाई खोंची मॉगि में तेरो नाम लिया रे ।
तेरे पल,पलि, आजुलौं जग जागिंजियारे ॥धा
जो तोसों होती फिरी मेरो हेतु दिया रे।
वो क्यों पदन देखापतो फहि पचन इयारे ॥५॥
तोसो ग्यान-निधान को मरग्य पिया रे ।
ही समुन्नत माई-द्रोहकी गति धार छिया रे ॥६॥

पर जो कुछ करनादो मोमैया भमीकराए प्रताप कौन-सी अच्छी करनीजानकरतने मुझे अपना दास समझा था तयार टुकड़ा माँगकरपाया, तेरीयलयालेता, मंतोतरेही पलके मन तो मेरा हृदय ही उसमें कारण होता, फिर में निज-परिवारके मनु के साथ द्रोह करनेवालेका नए-भ्रष्ट हो जाना पड़ता है॥६॥ तेरेसा तेरे सिवा और किस मनुष्यका और किस वस्तुका सहारा है। इस पिता-पत्रिका तेरे सामी राम से, यामिनी सिया रे। वह तुलमीके कौनको काको तकिया रे ॥७॥ मायार्य-हेमपंशनिमान पयनकुमार! रामजीक प्यारे! मुझे मुर चिय मी ( रुपये अशरफीकी जगद) यलमकतामा यदि तोमेरे-जैसे निकम्मोकी मीगानामनॉमिहोपाती।फिर मेरेलिये। त्रिभुवन उजागर ! इतना अँधेरा क्यों कर रक्या? पहले में सम्मान किया था और मय किस पाप तथा अयगुणसे मुझे हायसे दिया, अपनाकर भी त्याग दिया ! ॥३॥ मैंने तो सदासेही तेरे नाम जगत्में उजागर होकर यवतकीतारहा हूँ॥४॥जो मैं तुमसे विमुखा तरह भली-धुरी सुनाकर तुझे अपना मुँह कैसे दिखाता है ॥ मनकी सब कुछ जानता है, पयोंकि तेरे समान शानकी सानि औरस मनकीजाननेवाला दूसरा कौन है? यह तो मैं भी समझता हूँ किसन श्रीरामजी और स्वामिनी श्रीसीताजी सरीखी हैं, यहाँ तुलसीदास तु ही मुझे यहाँतक पहुँचा दे विनय-पत्रिका - [३४] अति आरत, अति स्वारथी, अति दीन-दुखारी । इनको बिलगुन मानिये, बोलहिं न विचारी ॥१॥ लोक-रीति देखी सुनी, व्याकुल नर-नारी । अति परपे अनवरपेहूँ, देहिं देवहिं गारी ।।२।। नाकहि आये नाथसों, सांसति मय भारी । कहि आयो, कीपी छमा, निज ओर निहारी ॥३॥ समै सांकरे सुमिरिये, समरथ हितकारी । सो सप विधि ऊपर कर, अपराध विसारी ॥४॥ पिगरी सेवककी सदा, साहेबहिं सुधारी । तुलसीपर तेरी कपा, निरुपाधि निरारी ॥५॥ भावार्थ-दे हनुमानजी भनि पीड़ित, अति स्वार्थी, अति दीन और भनि दुग्गीके कद्देका पुरा नहीं मानना धादिय, क्योंकि ये घबराये हुए रहने के कारण भले-बुरेका पालने मंसारमें यह प्रत्यक्ष देखा-सुना जाता है कि न होनेपर प्याकुल हुए यी पुरष देवको परमेश्वर को सपाल नहीं सागरफेमारीमयसे . - मय. संपटक समय लोग "- पर भी उमरगा भागधाको मुनाफा उनकी मा प्रकार nun मेगकामगारोगा नामी ही सुधारत माये हैं। गुलमीदामपर तो तुम्हारी एक निगली ही पयं निश्छल कपा [३५] फटु कहिये गादे पर, गुनि समुझि सुसाई। करहिं अनमलेउ को मलो, आपनी मलाई ॥१॥ समरथ सुम जो पाइये, वीर पीर पराई। ताहि वकै सबज्यों नदी पारिधिन बुलाई ॥२॥ अपने अपनेको मलो, चहें लोग लुगाई। भाव जोजेहि तेहि मजै, सुम असुम सगाई ॥३॥ बाँह पोलिदै थापिये, जो निज बरिआई। विन सेवा सो पालिये, सेवककी नाई ॥४॥ चूक-चपलता मेरिये, तू पड़ो बड़ाई। होत आदरे ढीठ है, अति नीच निचाई ॥५॥ बंदिछोर विरुदावली, निगमागम गाई। नीको तुलसीदासको, तेरियै निकाई ॥६॥ भावार्थ-जय संकट पड़ता है, तभी अपने स्वामीको मला-चुरा कह है, और अच्छे स्वामी यह समझ-यूझकर अपनी मलाईसे उस यु समर्थकल्याणकारी और पेस शूरवीरको विनय-पत्रिका कर जो दूसरोंकी विपत्तिमें सहायता देता है, सय लोग उस और (से देखा करते हैं, जैसे समुद्र के पास नदियाँ विना धुलाये ही दौड़-दौड़- कर जाती हैं ॥२॥ संसारमें सभी स्त्री-पुरुष अपनी-अपनी भलाई चाहते शुभ-अशुभके नातेसे जी (देवता) जिसको अच्छा लगता है, वह इसी (देवता) को भजता है । मुझे तो एक तुम्हारा ही भरोसा है ॥३॥ जिसे जबरदस्ती अपने बलकाभरोसा देकर रख लिया वह यदि तुम्हारी सेवा नहीं करता, तो भी उसे संवककी तरह पालना चाहिये ॥४॥ भूल और चञ्चलता तो सब मेरी ही है, पर तुम बड़े हो, मुझ-जैसे अपराधियोंको क्षमा करने में ही तुम्हारी बड़ाई है। यह तो सभी जानते हैं कि आदर फरनेसे नीच भी ढीठ हो जाता और नीचता करने लगता है ॥५॥ वेद- शास्त्र गाते हैं कि तुम यन्धनोंसे छुड़ानेवाले हो। मुझ तुलसीदासका भला अय तुम्हारी भलाईस ही होगा, अन्यथा मैं तो किसी भी योग्य नहीं हूँ ॥६॥ राग गौरी [३६] मंगल-मूरति मारुत-नंदन । सकल-अमंगल-मूल-निकंदन ॥१॥ पवनतनय संतन-हितकारी | हृदय विराजत अवध-विहारी ॥२॥ मातु-पिता,गुरु,गनपति,सारद सिवा समेत संभु,सुक,नारद ॥३॥ चरन बंदि बिनवा सप काहू । देहु रामपद-नेह-निवाहू ॥४॥ चंदों राम-लखन पैदेही । जे तुलसीके परम सनेही ॥५॥ भावार्थ-पवन कुमार हनुमानजी कल्याणकी मूर्ति हैं। सारी धुराइयों- को जड़ से उखाइनेवाले हैं ॥१॥ पवनके पुत्र है,सन्तीका हित करनेवाले

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विनय-पत्रिका मावते भरतके, सुमित्रा-सीताके दुलारे, चातक चतुर राम स्याम बनके॥ बल्लभ उरमिलाके, सुलभ सनेहबस, धनी धन तुलसीसे निरघनके ॥४॥ भावार्थ हे प्यारे लखनलालजी ! तुम भक्तोंका हित करनेवाले हो । स्मरण करते ही तुम संकट हर लेने हो। सब प्रकारके सुन्दर कल्याण करनेवाले अपने प्रणको पालनेवाले और दीनॉपर कृपा करनेवाले हो ॥१॥ पृथ्वीको धारण करनेवाले, संसारका भार दूर करनेवाले, पढ़े साहसी और शेषनागके अवतारही। अपने प्रण और यतको सत्य करने- घाले, धर्मके परम प्रेमी तथा निर्मल मन, धन और कर्मचाले दो ॥२॥ तुम सुन्दरताके भण्डार हो, हाथों में धनुष-बाण धारण किये भीर कमरमें नरकम कसे हुए हो, तुम विश्व विख्यात महान् वीर हो! और यह बड़े संग्राममें विजय प्राप्त करनेवाले हो। तुम सेयकोंको सुख देनेवाले, महा. घली, मय प्रकारमे योग्य और जानकीनाथ धीरामकी गुणायली के गाने पाले हो ॥३॥ तुम भरतजीके प्यारे, मुमित्रा और सीताजीके दुलारे नथा राम-रूपी श्याम मेघके चतुर घातक, उर्मिलाजीके पति, प्रेमसे महजहीमें मिलनेवाले और तुलमी-सरीखे रंकको राम-भक्ति-रूपी धन देने पड़े मारी धनी हो ॥४॥ राग धनाश्री [३८] जयति. लक्ष्मणानंत भगवंत भूधर, भुजग. राज, भूवनेश, भूमारहारी।

प्रलय-पायक-महान्चालमालाचमन, समन-संताप लीलारतारी ||१|| जयति दाशरथि, समर-समरथ, मुमित्रा- सुरन, शत्रुसूदन, राम-मरत बंधी चार-चंपक-परन, वसन-भूपन-धरन, दिव्यतर, भव्य, लावण्य-सिंथो ॥२॥ जयति गाधेय-गौतम-जनक-सुख-जनक, विश्व-कंटक कुटिल-कोटि-हंता। वचन-चय-चातुरी-परशुधर-गरयहर, सर्वदा रामभद्रानुगंता ॥३॥ जयति सीतेश-सेवासरस, विपयरस- निरस, निरुपाधि धुरधर्मधारी। विपुलबलमूल शार्दूलविक्रम जलद- नाद-मर्दन, महावीर मारी ||४|| जयति संग्राम-सागर-भयंकर-तरन, रामहित करण बरबाहु-सेतू । उर्मिला-रवन, कल्याण-मंगल-भवन, दासतुलसी-दोष-दवन हेतू ।।५।। भावार्थ-लक्ष्मणजीको जय हो-जो अनन्त प्रकारके ऐश्वर्यसेयु व्याको धारण करनेवाले सर्पराज शेषनागके अवतार, मारे संसारके मी,पृथ्वीकेभारको दूर करनेवाले, क्रोधके समय प्रलय-कालकी अग्निके मान भयङ्कर ज्वालाएँ उगलनेवाले जगतके सन्तापको नाश करनेवाले र अपनी लीलास ही अवतार धारण करनेवाले हैं ॥१॥ दशरथ-पुत्र श्री. क्ष्मणजीकी जय हो-जो संग्राममें सर्वशक्तिमान्, सुमित्राजीके पुत्र, त्रुओंका नाश करनेवाले और श्रीरामजी तथा भरतजीके प्यारेमाई है। जनके सुन्दर शरीरका रंग चम्पेके फुलके समान है. जो अत्यन्त दिव्य पं भव्य वस्त्र और आभूपण धारण किये हैं और सौन्दर्यके महान् समुद्र है २॥विश्वामित्र, गौतम और जनकके सुख उत्पन्न करनेवाले, संसारके लिये करोड़ों काँटेके समान कुटिल राक्षसोंको मारनेवाले, चतुराईकी बहुत-सी वातास ही परशुरामजीका गर्व हरनेवाले और सदा श्रीरामजीके पीछे- पीछे चलनेवाले लक्ष्मणजीकी जय हो ॥३॥ सीतापति श्रीरामजीकी सयामें परम अनुरागी, विषय-रसके विरागी, कपटरहित होकर श्रीराम सेवा-रूपी धर्मकी धुरीको धारण करनेवाले, अनन्त यलके आदि. स्थान, सिंहके समान पराक्रमवाले, मेघनादका मर्दन करनेवाले अत्यन्त महावीर लक्ष्मणजीकी जय हो ॥४॥ भयानक संग्रामरूपी समुद्रको अनायास ही पार कर जानेवाले, श्रीरामजीके हित के लिये अपनी सुन्दर भुजाओंका पुल बनानेवाले, उर्मिलाजीके पति, कल्याण तथा मंगलके स्थान और तुलसीदासके पापोंके नाश करनेमें मुख्य कारण, ऐस श्रीलक्ष्मणजीकी जय हो ॥५॥ भरत-स्तुति [३९] जयति भूमिजा-रमण-पदकंज-मकरंदरस- रसिक-मधुकर भरत भूरिमागी।

मुवन भूपण-मानुवंश-भूपण, भूमिपाल- मणि रामचंद्रानुरागी ॥१ जपति वियुधेश-धनदादि दुर्लम महा राज-संम्राज-मुख-पद-विरागी । खड्ग धारामती-प्रथमरखा प्रकट शुद्धमति-युवति पति-प्रेमपागी ॥२॥ जयति निरुपाधि-भक्तिमाव-यंत्रित-हृदय, बंधु-हित चित्रकूटाद्रि-चारी। पादुका-नृप-सचिव, पुहुमि-पालक परम धरम-धुर-धीर, वरवीर मारी ||शा जयति संजीवनी-समय-संकट हनूमान धनुवान-महिमा यखानी। बाहुबल विपुल परमिति पराक्रम अतुल, गूढ़ गति जानकी-जानि जानी ||४|| जयति रण-अजिर गन्धर्व-गण-गर्वहर, फिर किये रामगुणगाथ-गाता। माण्डवी-चित्त-चातक-नवांबुद-बरन, सरन तुलसीदास अभय दावा ॥५॥ मावार्य-यहे भाग्यवान् श्रीमरतीकी जय हो-जो जानकीपा

-रामजीके चरण-कमलोंकेमकरन्दका पान करनेके लिये रसिक भ्रमर है।
- संसारके भूषणस्वरूप, सूर्यवंशके विभूपण हैं और नृप-शिरोमणि
रामचन्द्रजीके पूर्ण प्रेमी हैं ॥१॥ भरतजीकी जय हो-जिन्होंने, इन्द्र,
चर आदि लोकपालोको भी जो अत्यन्त दुर्लभ है, ऐसे महान सुखप्रद
हाराज्य और साम्राज्यसे मुख मोड़ लिया। जिनका सेवा-श्रत तलवार.
की धारके समान अति कठिन है, ऐसे सत्-पुरुषोंमें भी जो सर्वश्रेष्ठ
जाने जाते हैं और जिनकी शुद्ध घुद्धिरूपी तरुणी स्त्रीश्रीराम-रूपी स्वामी.
प्रेममें लवलीन है ॥२॥ भरतजीकी जय हो-जो निष्कपट भक्तिभायके
धीन होकर प्रिय मा श्रीरामचन्द्रजीके लिये चित्रकूट पर्वतपर पैदल
ये, जो धीरामजीको पादुका रूपी राजाके मन्त्री बनकर पृथ्वीका पालन
करते रहे और जो राम-सया-रूपी परम धर्मकी धुरीकोधारण करनेवाले
तथा यहे भारी धीर है ॥३॥ श्रीलक्ष्मणजीको शक्ति लगनेपर सीवनी
पूटी लानेके समय, जय भरतजीके घाणसे व्यथित होकर हनुमानजी गिर
पड़े तय उन्होंने जिन भरतजीके धनुष-याणकी बड़ी यड़ाई की थी,
जिनकी भुजाओंका पड़ा मारी थल है, जिनका अनुपम पराक्रम है।
जिनकी गूद गतिको श्रीजानकीनाथ रामजी ही जानते हैं ऐसे मरतजी.
की जय हो ॥४॥ जिन्होंने रणाणमें गन्धयाँका गर्य पर्य कर दिया और
फिरसे उन्हें धारामकी गुण-गाथाओंका गानेवाला पनाया, ऐसे भरत.
जीकी जयहो। माण्डयो चित्तरूपी धानकके लिये जो नर्थान मेघ-यर्ण
ऐसे ममय देनेपाले भरतजीकी यह तुलसीदास शरण है ॥५॥

यिगय-पत्रिका भाम-स्तुति गग धनाश्री [४] जयति जय शत्रु-करि केसरी अत्रुहन, शत्रुतम-तुहिनहर किरणकेतू । देव-महिदेय-महि-धनु-सेवक मुजन- सिद्ध-मुनि सकल-कल्याण हेतू ॥१॥ जयति सवांगमुन्दर मुमित्रा-सुवन, मुवन-विख्यात-मरतानुगामी । वर्मचर्मासि-धनु-बाण-तूणीर-धर शत्रु-संकट-समय यत्प्रणामी ॥२॥ जयति लवणाम्युनिधि कुंमसंमव महा- दनुज-दुर्जनदवन, दुरितहारी । लक्ष्मणानुज, भरत-राम-सीता-चरण- रेणु-भूपित-भाल-तिलकधारी ॥३॥ जयति श्रुतिकीर्ति-वष्ठम सुदुर्लभ सुलम नमत नर्मद मुक्तिमुक्तिदाता । दासतुलसी चरण-शरण सीदत विमो, पाहि दीनान संताप हाता ॥

विनय-पात्रका मावार्थ-शत्ररूपी हाथियोंके नाश करनेको सिंहरूप श्रीरामजीकी जय हो, जय हो-जो शत्रुरूपी अन्धकार और कुहरेके हरनेके लिये साक्षात् सूर्य हैं और देवता ब्राह्मण,पृथ्वी और गौके सेवक सजन सिद्ध और मुनियोंका सवप्रकार कल्याण करनेवाले हैं ॥१॥ जिनके सारे अंग सुन्दर हैं, जो सुमित्राजीके पुत्र और विश्व-विख्यात मरतजीकी आशामें चलनेवाले हैं; जो कवच, दाल, तलवार, धनुप, याण और तरकस धारण किये हैं और शत्रुओद्वारा दिये हुए संकटोंका नाश करनेवाले हैं, उन शत्रुनजीको में प्रणाम करता हूँ ॥२॥ लवणासुररूपी समुद्रको पान करनेके लिये अगस्त्यके समान, यड़े-बड़े दुष्ट दानवोंका संहार करनेवाले और पापों- का नाश करनेवाले शत्रुनजीकी जय हो। ये लक्ष्मणजीके छोटे भाई हैं और भरतजी, श्रीरामजी तथा सीताजीके चरणकमलोंकी रजका, मस्तकपर सुन्दर तिलक धारण करनेवाले हैं ॥३॥ श्रुतिकीर्तिजीके पति है, दुष्टोंको दुर्लभ और सेवकोंको मुलभ हैं, प्रणाम करते ही सुख, भोग और मुक्ति देनेवाले हैं, ऐसे शशुनजीकी जय हो। हे प्रमोयह तुलसीदास तुम्हारे चरणॉकी शरण माकर भी दुःख भोग रहा है, हे दीन और तोंके सन्ताप हरनेवाले उसकी (तुलसीदामकी) रक्षा करो॥४॥ श्रीसीता-स्तुति राग केदारा [४] कपहुंक अंव, अवसर पाइ। मेरिी सुधि द्याइबी, कछु करुन-कथा चलाइ ॥१॥ कई पुरानी प्रदियों में भीसीता-स्तुति-प्रसगमें नीचे लिखा दण्डकमी मिलता

१२
पिमय-पत्रिका
दीन, सर अंगहीन, छीन, मलीन, अपी अपार ।
hdindमाम ले मरे उदर एक प्रभुदासी दाम कहाइ ॥२॥
मूहिह 'सो है कौन', कहिली नाम दसा जनाइ।
मुनत राम कपालक मेरी निगरिय पनि जाइ ॥३॥
इसे ४० फ सख्या देकर हम यहाँ टिप्पणीके रूपमें देते हैं, क्योंकि को
रोक्षेपक भी समझते हैं।
जयति श्रीजानकी मानुकुल-मानुकी प्राणप्रियवालमे तरगि भूपे ।
राम आनंद-चैतन्ययन-विग्रहा शक्ति आहादिनी साररूपे ॥
जयति चितचरणचिन्तनि जेहि घरतिहत काम-भय-कोह-मद-मोह माया।
रुद्र-विधि-विष्णु-मुर-सिद-वंदितपदे जयति सर्वेश्वरी रामजाया ।
कर्म जप योग विज्ञान वैराग्य लहि मोहित योगि जे प्रभु मना ।
जयति वैदेहि सब शक्तिशिरभूषणे ते न तव दृष्टि बिन कबहुँ पाय ।।
जयति जय कोटि ब्रह्माण्डकी ईशि, जेहि निगम-मुनि बुद्धिर्ते अगम गा।
विदित यह गाय अहदानकुलमाय सो नाय तब दान ते हाथ आयें ॥
दिव्य शत वर्ष जप-ध्यान जब शिव घरयोराम गुरुरूप मिलि पथ वतायो।
चितै हित लीन लखि कृपा कीन्ही तबै देवि, दुर्लम देव-दरस पायो ।
जयति श्रीस्वामिनी सीय मुभनामिनी, दामिनी कोटि निज देह दरसे ।
इदिरा आदि दै मत्त गजगामिनी देवभामिनि सबै पाँव परसें ॥
दुखित लखि भक्तबिन दरस निज रूप तप यजन जप तत्रर्ते मुलभ नाहीं।
कृपा परि पूर्ण नवकजदललोचना प्रकट मह जनकप-अजिर माहीं।
रमित तव विपिन प्रिय प्रेम प्रगटन करन लकपति व्याज का खेल ठान्यो।
गोपिका कृष्ण तव दुल्य बहु जतन करि तोहि मिलि ईश आनंदमान्यौ ।।
हीन तय सुमुखि कै संग रहि रंकसो विमुख जो देव नहिं नाय नेरी।
अधमउदरण यह जानि गहि शरण तव दासतुलसी मयौ आय चेरी॥४॥

विनय-पत्रिका जानकी जगजननि जनकी किये पचन सहाइ । तर तुलसीदास भव तय नाथ गुन-गन गाइ ॥४॥ भावार्थ-हे माता! कभी अवसर हो तो कुछ करुणाको पात छेड़कर श्रीरामचन्द्रजीको मेरी भी याद दिला देना, इसीसे मेरा काम यन जायगा ॥१॥ यो कहना कि एक अत्यन्त दीन, सर्व साधनोंसे हीन, मन- मलीन, दुर्यल और पूरा पापी मनुष्य आपकी दासी (तुलसी)का दास कहलाकर और आपका नाम ले-लेकर पेट भरता है ॥२॥ इसपर प्रभु कृपा करके पूछे कि यह कौन है, तो मेरा नाम और मेरी दशा उन्हें पता देना । कृपालु रामचन्द्रजीके इतना सुन लेनेसे ही मेरी सारी बिगड़ी वात यन जायगी ॥३॥ हे जगजननी जानकीजी! यदि इस दासकी आपने इस प्रकार वचनोंसे ही सहायता कर दी तो यह तुलसीदास आपके स्वामीकी गुणावली गाकर भव-सागरसे तर जायगा ॥४॥ [४२] कबहुँ समय सुधि द्यायची, मेरी मातु जानकी। जन कहाइ नाम लेत हौं, किये पन चातक ज्यों, प्यास प्रेम-पानकी॥१॥ सरल प्रकृति. आपु जानिए करुना-निधानकी । निजगुन,अरिकृत अनहिती,दास-दोप,सुरति चिचरहतन,दियेदानकी। बानि विसारनसील है मानद अमानकी । तुलसीदास न बिसारिये, मन करमवचनजाके,सपनेहुँगतिनआनकी। भावार्थ-हे जानकी माता!कमी मौका पाकर श्रीरामचन्द्रजीको मेरी याद दिला देना। मैं उन्हीका दाल कहाता है, उन्हींका नाम लेना हूँ, यिनय-पत्रिका में -- उन्हींके लिये पपीहेकी तरह प्रण किये बैठा हूँ। मुझे उनके स्वाती-जलरूप प्रेम-रसकी यही प्यास लग रही है ॥३॥ यह तो आप जानती ही हैं कि करुणा-निधान राम का स्वभाव यहा सरल है; उन्हें अपना गुण छ द्वारा किया हुआ अनिष्ट, दामका अपराध और दिये हुए दानकी यार कभी याद ही नहीं रहती ॥२॥ उनकी आदत भूल जानेकी है, जिस: कहीं मान नहीं होता, उसको यह मान दिया करते हैं, पर वह भूल जाते हैं ! हे माता ! तुम उनसे कहना कि तुलसीदासको न भूलिये क्योंकि उसे मन, वचन और कर्मसे स्वप्नमें मी किसी दूसरेक आश्रय नहीं है ॥३॥ श्रीराम-स्तुति [४३] जयति सचिदन्यापकानंद परब्रह्म-पद, विकल ब्रह्मादि सुर,सिद्ध संकोचवश,विमल गुण-गेह नरदेह-धारी।। जयति कोशलाधीश कल्याण कोशलसुता, कुशल कंवल्य-फल चारु घारी वेद-योधित करम-धरम-धरनी-धेनु, विप्र-सेवक साधु-मोदकारी ॥२॥ जयति ऋषि-मखपाल, शमन सजन-साल, शापवश मुनिवधू-पापहारी भंजि भवचाप, दलि दाप भूपावली, सहित भृगुनाथ नतमाथ मारी। जयति धारमिक-धुर, धीर रघुवीर गुर-मातु-पितु-बंधु-वचनानुमारी चित्रकूटाद्रि विन्ध्याद्रिदंडकविपिन, धन्यकत पुन्यकानन-विहारी।। जयति पाफारिसुत-काक करतूति-फलदानि खनि गर्न गोपित रािध दिय्य देवी पेपदेखि सखि निशिचरी जनु विडषित करी विश्वाधार विग्रह-व्यक्त लीलावतारी विनय-पत्रिका जयति खर-त्रिशिर-दूषण चतुर्दश-सहस-सुमट-मारीच संहारकर्ता। गृध्र-शपरी-भक्ति-विवश करुणासिंधु,चरित निरुपाधि,त्रिविधार्तिहर्ता।। जयति मद-अंध कुकबंध चधि,वालि बलशालि बधि, करन सुग्रीव राजा। सुमट मर्कट-माल-कटक-संघट सजत, नमन पद रावणानुज निवाजा ७) जयति पायोधि-कृत-सेतु कौतुक हेतु,काल-मन-अगम लई ललकि लंका। सकुल,सानुज,सदल दलित दशकंठरण, लोक-लोकप किये रहित-शंका। जयति सौमित्रि-सीता-सचिव सहित चले पुष्पकारूद निज राजधानी । दासतुलसी मुदित अवघवासी सकल, राम भे भूप वैदेहि रानी ॥९॥ भावार्थ-धीरामचन्द्रजीकी जय हो। भाप सत्, चेतन, ध्यापक, मानन्दरूप परमस आप लीला करनेके लिये ही भव्यकसे प्यकरूपमें प्रकट हुए हैं। जय ब्रह्मा थादि सय देवता और सिद्धगण दानवीके अरयाचारसे ध्याकुल हो गये, तय उनके संकोचसे आपने निर्मल गुण- सम्पन्न नर-शारीर धारण किया । भापकी जय हो, आप कल्याणरूप फोशलनरेश दशरथजी भीर कल्याण-स्वरूपिणी महारानी कौशल्याके यहाँ चार भायोंके रूप (सालोफ्य, सामीप्य, मारूप्य और सायुज्य) मोक्षके मुन्दर पार फल उत्पन्न हुए । मापने घेदोक्त यन्नादि कर्म, धर्म, पृथ्वी, गी, माण, भक्त धीर साधुओंको आनन्द दिया ॥२॥ मापकी जय हो-मापने विश्वामित्रजीके यमकी, राक्षसको मारकर रक्षा की, मजनोंको सतानयाले दुरोंका दलन किया, शापके कारण पापाणरूप हुई गीतम-पती महस्याके पापोंको हरलिपा,शिषधिनुपको तोड़कर राजा के दलका दर्प पूर्ण किया भौर पल-वीर्य-विजयफे मासे अंधा ५

जिरहनि गटा योदकर पिराप देयकी उसमें गाड़ दिया, दिन्नर
त्रिशिरा, दूषण, उनकी थीदह हजार सेना भीरमारांचको मारनेवाले।
मीर नीच जातिकी मी शयरी प्रेमके यां
जिन्होंने दुष्ट, मदान्ध कयन्धका वध किया, महा पलवान् थालिकोमार
त्रिविध तापोका हरण करनेयाले हैं॥६॥ थीरामचन्दजीकी जय हो
जो लंका विजयकर लक्ष्मणजी, जानकीजी और सुग्रीव, हनुमानादि
रिमय-गरिका
गहमेगाना परशुरामजीका मा शागि माती -
माप धमक मारको पार करने में भीर मार रघुवंशन ममा
चीर हैं। मापने गुरु, माता पिता भीरमायनन मानकर निशा
विजयानल भीर क पनी उन पवित्र यनों में रिहार करत
शाय कर दिया था प्रीरामनद्रजीही जग हो-जिन्होंने इन्द्रपुर
কাহমঘ থম ছয় ফণা তসীমানীয়াৰিখ
कन्याका रूप धरकर भापी राक्षसी शूर्पणमाको पहचानकर उस
नाक-कान कटपाकर मानो ममारमरकै मुखमें बाधा पहुंचाने
रायणका तिरस्कार किया ॥ श्रीरामचन्दीको जय हो.-आप मर
उनका उद्धार करनेयाले, करमाके
ममुद
निष्कला
कर सुप्रीवको राजा यनाया, यड़े-बड़े घोर यन्दर तथा रोडोंकी सेना
एकत्र करके उनको व्यूहाकारमजाया और शरणागत विभीषणको मुनि
और भक्ति देकरनिहाल कर दिया Anीरामचन्द्रीकीजय हो-जिन्द
ने खेलके लिये ही समुद्रपर पुल याँध लिया, कालके मनको भी मगर
लंकाको उमंगसे ही लपक लिया और कुलसहित, भाईसहित
सारी सेनासहित रावणको रणमें नाश करके तीनों लोकों और पद
कुयेरादि लोकपालीको निर्मय कर दिया In धीरामचन्द्रजीको जय हो
परित्रवाले और
मी

विनय-पत्रिका मन्त्रियांसहित पुष्पक विमानपर चदकर अपनी राजधानी भयोध्याको चले । तुलसीदास गाता है कि यहाँ पहुँचकर श्रीरामके महाराजा और श्रीसीताजीको महारानी होनेपर समस्त अयधयासी परमप्रसन्न होगये ॥९॥ [४४] जयति राजराजेंद्र राजीवलोचन, राम, नाम कलि-कामतरु, साम-शाली। अनप-अंभोधि-कुंमज, निशाचर-निकर- तिमिर पनपोर खर किरणमाली ॥१॥ जयति मुनि देव नरदेव दसरत्यके, देव-मुनि-बंध किय अवध-यासी । लोकनायक-कोक-शोक-संकट-शमन, भानुकुल-कमल-फानन-चिकासी ||२|| जयति शृंगार-मर तामरम-दामति- दह, गुणगेह, विम्योपकारी। मकल सामाग्य-मांदर्य-मुपमारूप, मनोमय फोटि गवांपहारी॥शा (जपति) मुमग सारंग मुनिसंग सायक शनि, पार पर्मामि पर धर्मधारी । धर्मधुरपीर, रघुवीर, अजयत अतुल, हेलया दतित भूभार मारी ॥४॥ जयति धनधीत मणि-मुरट, टल, दिनक- हलक मलि मात, रिपु-बदन-भीमा ।

(दादस पँधानेयाले) ६, अनीतिरूपी समुद्रको सोखनेके लिये -- सुनत, गावत राम राजलीला ||l भावार्थ-श्रीरामचन्द्रजीकी जय हो-जो राज-राजेश्वरॉमें इन्दके कल्पवृक्षके समान है, जो (शरणागत मक्कोंको) सान्त्वना देनेवाले दिव्य भूपन, यमन पीत, उपवीत, किय ध्यान फल्यान-माजन न को मा। (जयति) मरत-सौमित्रि-शत्रुम-सेवित, सुमुख, सचिव-सेवक-सुसद, सर्वदाता। अधम, आरत, दीन, पतित, पातक-पीन सकत नतमात्र कहि पाहि पाता ॥६॥ जयति जय सुवन दसचारि जस जगमगत, पुन्यमय, धन्य जय रामराजा। चरित-सुरसरित कवि-मुख्य गिरि निःसरित,. पियत, मझव मुदित सँत-समाजा In जयति वर्णाश्रमाचारपर नारि-नर, सत्य-शम-दम-दया-दानशीला । विगत दुख-दोप, संतोप सुख सर्वदा, जयति वैराग्य-विज्ञान-चारांनिधे, नमत नर्मद, पाप-ताप-हर्ता। दास तुलसी चरण शरण संशय-हरण, देहि अवलंब पैदेहि-भर्ता ॥९॥ समान हैं, जिनके नेत्र कमलके समान सुन्दर हैं, जिनका नाम - . कलियुग विनयपानका पो अगस्त्य ऋषिके समान और दानव-दलरूपी गाढ़ और भयानक इन्धकारके नाश करनेके लिये जो प्रचण्ड सूर्यके समान हैं ॥१॥ श्रीराम. इन्द्रजीकी जय हो-मुनि, देवता और मनुप्योंके स्वामी जिन दशरथसूनु श्रीरामचन्द्रजीने अवधवासियोंको ऐमा श्रेष्ठ बना दिया कि मुनि और देवता भी उनकी धन्दना करने लगे। जो लोकपालरूपीचकोंके शोक- सन्तापका नाश करनेवाले और सूर्यकुलरूपी कमलोंके यनको प्रफुल्लित करनेवाले साक्षात् मूर्य हैं ॥२॥ श्रीरामचन्द्रजीकी जय हो-सौन्दर्यरूपी सरोवरमें उत्पन्न हुए नीले कमलाकी मालाके समान जिनके शरीरकी आभा है, जो सम्पूर्ण दिव्य गुणोंके धाम हैं, सारे विश्वका हित करनेवाले हैं और समस्त सौभाग्य, सौन्दर्य तथा परम शोभायुक्त अपने रूपसे करोड़ों कामदेयोंके गर्वको खर्व करनेवाले हैं ॥३॥ श्रीरामचन्द्रजीकी जय हो-जो सुन्दर शाई धनुप, तरकस, वाण, शक्ति, ढाल, तलवार औरथेष्ठ कवच धारण किये हैं,धर्मका भार उठानेमें जो धीर है, जो रघुवंशमे सर्वश्रेष्ठ धीर है, जिनकी प्रचण्ड भुजाओंका अतुलनीय पल है और जिन्होंने खेलसे ही गक्षसोंकानाश करके पृथिवीका मारीभार हरण कर लिया ॥४॥ श्रीराम- चन्द्रजीकी जय हो-जोमणि-जडित सुवर्णकामुकुट मस्तकपर धारण किये और कानोंमें मकराएतकुण्डल पहने है। जिनके मालपर तिलककी सुन्दर मालक और चन्द्रमाके समान जिनका मुखमण्डल शोभित हो रहा है, जो पीताम्बर, दिव्य आभूषण और यज्ञोपयीन धारण किये हुए हैं। ऐसा कौन है ओ धीरामके इस नयनाभिराम रूपका ध्यान करके कल्याणका भागी न हुआ हो ! धीरामचन्द्रजीकी जय हो- जो भरत, लक्ष्मण और शमसे सेषित और सुग्रीय, सुमन्त थादि मन्त्रियों और मक्तोंको सुख नथा सम्पूर्ण इच्छित पदार्थ देनेयाले हैं;

विनय-पत्रिका हैं, जिनकी कथारूपी गंगाजी आदिकवि महर्षि श्रीवाल्मीकिरपी समी स्त्री-पुरुप अपने अपने यर्णाश्रम-विहित आचारपर चलनेवाले दोगमे रहित, मदा सन्तोषी, सब प्रकारसे सुखी और रामक करते थे अर्थात् ये निधिल तुमसे मोर उनके मारे पाप-तापोंको हर लेते है। जानकीनाथ! कंज-यम, कर-मंज, पद कंजारणं ॥१॥ जो अधम, आर्त, दीन, पतित और महापापियोंको केवल एक यार प्रमान करने और 'मेरी रक्षा करो' इतना कहनेपर ही जन्म-मरणरूप संमारसे यचा लेते हैं ॥६॥ महाराज श्रीरामचन्द्रजीको जय हो-जिनका पवित्र यश चौदहों मुवनोंमें जगमगा रहा है, जो सर्वथा पुण्यमय और घन्य हिमालय-पर्वतसे निकली है, जिसमें स्नान कर और जिसके जल पान कर अर्थात् जिसका श्रवण-मनन कर सन्त-समाज सदा प्रस: रहता है ॥७॥ श्रीरामचन्द्रजीकी जय हो-जिनके प्रसिद्ध रामराज्यों मत्य, शम, दम, दया और दानरूपी यताका पालन करनेवाले दुःों और होकर सदा रामकी लीलाको ही गाते-सुनते थे ॥८॥ श्रीरामचन्द्रजी जय हो-जो पैराग्य और शान-पिशान के समुद्र है, जो प्रणाम करनेवालों को ६ गंशयका नाश करनेयाले ! यह तुलसीदाम भापको शरण पnt फरार भपने प्रणतपाल चरणोंका सहारा दीजिये ॥२॥ [४] श्री गमपंद्र कपालु भजु मन हरण भवभय दारगं ! -- राग गौरी 01i.

। कंदर्प अगणित अमित छवि, नवनील नीरद सुंदरं । ११ पाट पीत मानहु तड़ित रुचि शुचि नौमि जनक सुतावरं ॥२॥ मजु दीनबंधु दिनेश दानव-दैत्य-वंश-निकंदनं । रघुनंद आनंदकंद कोशलचंद दशरथ-नंदनं ॥३॥ सिर मुकुट कुंडल तिलक चारु उदार अंग विभूषणं । आजानुभुज शर-चाप-धर, संग्राम-जित-खरदूपणं ॥४॥ इति वदति तुलसीदास शंकर-शेष-मुनि-मन-रंजनं । मम हृदय-कंज-निवास कुरु, कामादि खल-दल-गंजनं ॥५॥ मावार्थ-हे मन रुपालु श्रीरामचन्द्रजीका भजन कर। संसारके म-मरणरूप दारुण भयको दूर करनेवाले हैं, उनके नेत्र नय-विकसित मलके समान है। मुख, हाथ और चरण भी लाल कमलके मदृश १ नके सौन्दर्यकी छटा अगणित कामदेयोंसे बढ़कर है, उनके शरीरका पीन-नील-सजल मेधके जैमा सुन्दर घर्ण है, पीताम्यर मेघरूप शरीरमें पनी बिजलीके समान चमक रहा है, ऐसे पावन-रूप जानकीपति गैरामजीको मैं नमस्कार करता हूँ | हे मन! दीनोंके बन्धु, सूर्यके मान सेजस्यो, दानय मौरदत्योंके घंशकासमूल नाश करनेवाले, मानन्द- द, कोशल-देशरूपी आकाश निर्मल चन्द्रमाके समान, दशरयनन्दन धीरामका मजन कर ॥३॥ जिनके मस्तकपर रमजटित मुकुट, कानों में हुण्डल, भालपर सुन्दर तिलक और प्रत्येक अंगमें मुन्दर आभूषण सुशोभित हो रहे है। जिनकी भुजाएँ घुटनॉतक लम्बी है, जो धनुष-याण लिये हुए जिन्होंने संप्राममें मरदूषणको जीत लिया है nan जो शिध, शेप भीर मुनियों के मनको प्रसन्न करनेवाले, और काम-क्रोध-लोमादि

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पिमय निका
सभाका मारा करमेयाने हैं। तुलसीदास प्रागंना करता है कि
श्रीरघुनाथजी मरंदय कमलमै मदा नियाम करें।
गग रामरटी
[४]
मदा
राम जपु, राम जपु, राम जपु, गम जप, राम जपु, मूह मन, बार वा
सकल सामाग्य सुख-खानि जिय जानि शठ,मानिविश्वासवदवेदसा
कोशलन्द्र नव-नीलकंजामतनु, मदन-रिपु-कंजहदि-चंचरी
जानकीरवन सुखमवन भुवनकप्रभु, समर-मंजन, परम कारुनीकं ।
दनुज-चन-धूमधुज पीन आजानुभुज, दंड-कोदंडवर चंड वान
अरुण करचरण मुख नयनराजीव,गुन-अयन,पहु मयन-शोमा-निधार
यासनाईद-फरव-दिवाकर,
काम-क्रोघ-मद-कंज-कानन-तुषारं
लोम अति मत्त नागेंद्र पंचाननं भक्तहित हरण संसार-मारं ।
केशवं, क्लेशहं, केश-बंदित पद-वंद मंदाकिनी मूलभूत
सर्वदानंद-संदोह, मोहापहं,
घोर-संसार-पाथोषि-पोत ५
शोक-संदेह-पाथोदपटलानिलं,
पाप-पर्वत-कठिन कुलिश
संतजन-कामधुक-धेनु, विश्रामप्रद,नाम कलि कलुप-भंजन अनूपं ।।६
धर्म-कल्पद्रुमाराम, हरिघाम-पथि
संबलं, मूलमिदमेव एकं
भक्ति-वैराग्य-विज्ञान-शम दान-दम, नाम आधीन साधन अनेकं ।।
तेन तप्तं, हुतं, दत्तमेवाखिलं, तेन सर्व कृतं कर्मजालं
येन श्रीरामनामामृतं पानकृतमनिशमनवधमवलोक्य कालं

विनय-पत्रिका उपच,खल,मिल्ल यवनादिहरिलोकगत,नामबलविपुलमतिमल नपरसी त्यागि सब आस,संत्रास,मवपास,असिनिसितहरिनामजपु दासतुलसी।। मावार्थ-रे मूर्ख मन! सदा-मर्वदा वारयार श्रीरामनामका ही जप फर; यह सम्पूर्ण सौभाग्य-सुखकी खान है और यही वेदका निचोड़ है, ऐसा जीमें समझकर और पूर्ण विश्वास करके सदा धीरामनाम कद्दा कर ॥१॥ फोशलराजश्रीरामचन्द्रजीके शरीरकी कान्ति नवीन नील कमलके समान है। ये कामदेवको भस्म करनेवाले शिवजीके हृदयरूपी कमलमें रमनेवाले भ्रमर है।जानकीरमण, सुखधाम, अखिल विश्वके एकमात्र प्रभु, समर- में दुष्टोंका नाश करनेवाले और परम दयालु है ॥२॥ वे दानयोंके वनके लिये अग्निके ममान हैं। पुष्ट और घुटनांतक लम्ये भुजदण्डॉमें सुन्दर घनुप और प्रचण्ड पाण धारण किये हैं। उनके हाथ, चरण, मुख और नेत्र लाल कमलके समान कमनीय हैं । ये सद्गुणों के स्थान और अनेक कामदेयों की सुन्दरताके भण्डार हैं ॥३॥ विविध घासनारूपी कुमुदिनीका नाश करनेके लिये साक्षात् मूर्य और काम, क्रोध, मद आदि कमलोंके पनको नए करने के लिये तुपार (पाला) हैं। सोमरूपी अत्यन्त मतवाले गजगजके लिये पनराज सिंह और भकोंकी भलाई के लिये राक्षसोंको मारकर संसारका भार उतारनेवाले ॥४॥ जिनका नाम केशव है, जोशॉके नाश करनेवाले हैं, ग्रहा और शियसे जिनके चरणयुगल पन्दित होते ६-जो गंगाजीक उत्पत्तिस्थान है। सदा आनन्दके समूहा मोदके पिनाशक और भयानक मप-सागरक पार जानेके लिये जहाज E५॥ धीरामजी शोफ और मंशयरूपी मेघोंके ममूहको छिन्न-भिन्न करने के लिये यायु-रूप और पाप-रूपी कोटेन पर्यतको तोड़ने के लिये विशद प्रवर नवेध शुम श्रीरमण परम संताप यिनय-पत्रिका पत्ररूप हैं जिनका अनुपम नाम सन्ताको कामनुके समान फल देनेयाला तथा शान्तिदायक और कलियुगके भारी पापोंको करने में सानी नहीं रमताना यह ग्रीरामनाम धर्मरूपी कल्पः यीचा, भगवान के धामजानेवाले पथिकोंके लिये पायेय तथा साधन और सिद्धियाँका मूलयाधार है।मति, पैराग्य, विज्ञान, राम दान आदि मोक्षक अनेक साधन सभी इस राम-नामके अधीन जिसने इस कराल कलिकालको देखकर नित्य निरन्तर श्रीरामना निदोष अमृतका पान किया, उसने सारे तप कर लिये, सब र अनुष्ठान करलिया, सर्वस्व दान देदिया और विधिके अनुसार समी कर्म कर लिये nen अनेक चाण्डाल, दुष्कर्मा, मील और यवनादि रामनामके प्रचण्डप्रतापसे श्रीहरिके परमधाममें पहुँच गये और घुद्धिको विकारोंने स्पर्श भी नहीं किया। हे तुलसीदास! सारी और भयको छोड़कर संसाररूपीयन्धनको काटने के लिये पैनीतल समान थीराम-नामका सदा जप कर ॥९॥ [४] ऐसी आरती राम रघुवीरकी करहि मन । हरन दुखदुंद गोविंद अपरपर रूप हरि, सरपगत, सरबदा बसत, इति वासना धूप पोह-मद-मोह-तम,प्रौदअमिमान चितवृत्ति + आनन्दपन ॥१॥ “शूल संशय सकल, विपुल भव-यासना-पीना ७५ यिनय-पत्रिका अशुभ-शुभकर्म-घृतपूर्ण दश वर्तिका, त्याग पावक, सतोगुण प्रकासं । भक्ति-वैराग्य-विज्ञान दीपावली, अपि नीराजनं जगनिवासं ॥४॥ -विमल हृदि भवन कृत शांति पर्यक शुभ, शयन विश्राम श्रीरामराया । क्षमा-करणा प्रमुख तत्र परिचारिका, यत्र हरि तत्र नहिं भेद, माया।५। एहि imir.Ara-A------ भावार्थ-डे मन! रघुकुल-वीर श्रीरामचन्द्रजीकी इस प्रकार आरती र रागद्वेष आदिद्वन्द्वौतथा दुःखौफ नाशक, इन्द्रियोका नियन्त्रण रनेवाले और आनन्दकी वर्षा करनेवाले हैं ॥१॥ जड़-चेतन जगत् सय घोहारका रूप है,ये सर्वव्यापी और नित्य है-इस यासना (सुगन्ध) की इनकी धूप कर । इससे तरी भेदरूप दुर्गन्ध मिट जायगी। धूपके याद शेप दिखाना चाहिये, सो आत्मज्ञानका स्वयं प्रकाशमय दीपक जलाकर उसमे कोध, मद, मोहक अन्धकारका नादा कर दे। इस हान-प्रकाश अभिमानभरी चित्त धृत्तियाँ आप ही क्षीण हो जायेंगी ॥२॥ इसके याद अत्यन्त निर्मल श्रेष्ठ भायका नैवेद्य भगयान अर्पण कर, विमुख मायका मुन्दर मैयद्य लक्ष्मीपति भगवानको परम सन्तोपकारी होगा। फिर सुग, समस्त सन्देश मार भपार-संसारकी यामनामोके योजक नाश करनेयाले 'प्रेम' का ताम्बूल भगवानके नियंदन कर ॥३॥ तदनन्तर गुमाशुभ कर्मरूपी तमें ही हुई दस इन्द्रियरूपी वृत्तियोंको स्यागकी भनिने जलाकर सत्यगुणरूपी प्रकार फर; इस तरह भक्ति, घेराग्य और विज्ञानरूपी दीपापलीकी मारती जगमिपास भगवान भर्पण कर

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विनय पत्रिका आरती के समय हाथोंसे बजायी जानेवाली तालीका शब्द सुनकर पाए. रूपी पक्षी तुरन्त उड़ जाते हैं ॥२॥ यह भारतीमकोंके हृदयरूपी भवन- के अज्ञानरूपी अधिकारका नाश करनेवाली और निर्मल विज्ञानमय प्रकाशको फैलानेवाली है ॥३॥ यह मोह, मद, क्रोध और फलियुगरूपी फमलोंके नाश करनेके लिये जाडेकी रात है और मुक्तिरूपी नायिकासे पला देनेके लिये दूती है तथा इसके शरीरफी चमक बिजलीके समान ॥४॥ यह शरणागत भक्तरूपी कुमुदिनीके यनको प्रफुल्लित करनेके लेये चन्द्रमाकी किरणोंकी माला है और तुलसीदासके अभिमानरूपी महिषासुरका मर्दन करनेके लिये अनेक कालिकाओंके समान है ॥५॥ हरिशंकरी पद .[४९ ] देव- दनुज-धन-दहन, गुन-गहन, गोविंद नंदादि-आनंद-दाताऽविनाशी । शंभु, शिव, रुद्र, शंकर, मयंकर,मीम,पोर, तेजायतन, क्रोध-राशी॥१॥ अनंत, भगवंत, जगदंन-अंतफ-त्रास-शमन, श्रीरमन, भुवनाभिरामं । भूपराधीश जगदीश ईशान, विज्ञानधन, ज्ञान-कल्यान-धाम ॥२॥ वामनाव्यक्त, पावन, परावर, विभो, प्रकट परमातमा, प्रकृति-स्वामी । चंद्रशेखर,शूलपाणि,हर,अनप,अज,अमित,अविछिन्न,पमेश-गामी ।। नील जलदामतनु श्याम, बहु काम छवि राम राजीवलोचन कृपाला। फंधु-कर-चपु,पपल,निर्मल मौलि जटा,सुर-तटिनि,सित सुमन माला ।। वसन किंजल्कघर, चक्र सारंग-दर-कंज-कौमोदकी अति विशाला। मार-करि मत्त मृगराज, पैनन, हर, नौमि अपहरण संसार-जाला ।।५।। -

पिन पत्रिका
कण, करुणामयन, दवन कालीय स्वत, विपुल कमादि निमः
त्रिपुर-मद-मंगकर, मतगज-नर्मघर, अन्धकारग-असन पनगारी
मन,व्यापक,अकल, सकल,पर,परमहित,ग्यान,गोतीत गुन-पति
सिंधुसुख-गर्व-गिरि-वन, गौरीश, भय, दक्ष-मरा अखिल विश्वंम
भक्तिप्रिय,भक्तजन-कामधुरु धेनु, हरि, हरण दुर्घट विकट विपति
सुखद नर्मद, परद,विरज,अनवासिल,विपिन-आनंद-वीथिन
रुचिर हरिशंकरी नाम-मंत्रायली इन्द्रदुख हरनि, आनंद
विष्णु-शिव-लोक-सोपान-सम सर्वदा वदति तुलसीदास विशद
[इस भजनके प्रत्येक पदमै आधे भगवान् श्रीविणुकी और
में भगवान् शिवकी स्तुति की गयी है, इसीसे हमकामाम हरि-नांक
गोसाजी महाराजने विष्णु और शियको एक साथ स्तुति कर
हरमें अभेद सिद्ध किया है।]
भगवान् विष्णु-दामवरूपी वनके जलानेवाले गुणोंके धन
सात्त्विक सद्गुणोंसे सम्पन्न, इन्द्रियोंके नियन्ला, नन्द-उपनन्द
आनन्द देनेवाले और अविनाशी है।
भगवान शिव-शम्भु, शिव, रुद्र-शंकर आदि कल्याणकारी
प्रसिद्ध है; यड़े भारी मयदर, महान् तेजस्वी और प्रोधकी राशि
भगवान् विष्णु अनन्त हैं, छः प्रकारके ऐश्चयोंमे युक्त हैं।
का अन्त करनेवाले यमकी प्रासको मिटानेवाले, लक्ष्मीजीके
और समल ध्रहाण्डको प्रानन्द देनेवाले हैं।
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R विनय पत्रिका भगवान् शिय-कैलासके राजा जगत्के स्वामी, ईशान, विज्ञानधन मौर क्षान तथा मोक्षके धाम है ॥२॥ भगयान् विष्णु थामनरूप धरनेवाले, मन-इन्द्रियोंसे अध्यक्त, पवित्र (विकाररहित), जड़-चेतन और लोक-परलोकके स्वामी, साक्षात् परमात्मा और प्रतिके खामी है। भगयान् शिय-चन्द्रमाको मस्तकपर और दायमें त्रिशूल धारण रनेयाले एटिके मंहारकर्ता, पापशून्य, अजन्मा, अमेय, अखण्ड और दीपर मयार होकर चलनेवाले हैं ॥३॥ भगयान् विष्णु-नीले मेयके समान श्याम शरीरपाले, अनेक मईयोंकी-सी शोमाघाले. कमलके सदृश सुन्दर नेत्रपाले और समस्त यियम रमनेपाल, रुपालु हैं। भगवान् शिय-दस मीर कपूरके समान चिकने, श्येत और मुगन्धित शरीरपाले, मलरहित, मस्तकपर जटाजूट मोर गंगाजीको पारण करनेवाले नया मफेद पुष्पोंकी माला पहने हुए है ॥ भगवान् विष्णु-कमटक केसरके समान पीताम्बर धारण किये नया दाॉमें दर, चम, प, शाई धनुष भार भत्यन्त विशाल कौमोदकी गदा लिये हुए हैं। भगवान शिव-गामदेयमपी मनयाले हापीको मारनेके लिये पिम्प, नीन मेघवाले भार मापागमनरूपी जगत झालका नाश परमपाले एमेशिका में प्रणाम करता है।

. गिग-पत्रिका भगवान पिणु-मानसानेगानागाधाम, माग दमन करनेवाले और स भादि भनेक दुष्टोको करनयाले हैं। भगवान शिय-त्रिपुरासुरका मचूर्ण करनेवाले, मतयार धर्म धारण करनयाले भीर मन्धकासुररूपी सर्पको लिय गरुद ॥६॥ मगयान् विष्णु-पूर्णमल, घगयरमें व्यापक, कलारदिव श्रेष्ठ, परम हितैषी, भानम्वरुप, मातःकरणारूपी भीतरी मार याहरी इन्द्रियोस मतीत भार तीनों गुणोंकी वृत्तियोंका हरण करने भगवान शिय- जलन्धरके गर्यरुपी पर्वतको तोड़ने के लि रूप, पार्यतीके पति, मसारकै उत्पत्तिस्थान ई और दक्षके यज्ञके विध्वंस करनेवाले हैं ॥७॥ भगवान् विष्णु-जिनकोमक्तिहीप्यारीमा करनेके लिय कामधेनुके समान हैं और उनकी घड़ी-घड़ी कठिन भयानक विपत्तियोंको हरनेवाले, अतएव हरि कहलानेवाले हैं। भगवान् शिव-सुख,मानन्द और मनचाहाधर देनेवाले सय प्रकारके विकारों एवं दोषसि रहित और आनन्द-चन के गलियोंमें विहार करनेवाले हैं ॥८ यह हरि और शंकरके नाम-मन्त्रों की सुन्दर पंक्तियाँ राग- द्वन्द्वोस अनिन दुःखको हरनेवाली, आनन्दकी सानि और विष्ट शिषलोकमें जाने के लिये सदा सीढोके समान हैं, यह यात तुल शुद्ध पाणीसे कहता है Hen . F

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यिनय-पत्रिका [५०] देव- मानुकुल-कमल रवि, कोटिकंदर्प-छविकाल-कलि-व्यालमिव वैनतेयं । प्रपल भुजदंड परचंड कोदंड-धर तूणवर विशिख पलमप्रमेयं ॥१॥ अरुण राजीवदल-नयन, सुपमा अयन, श्याम तन-कांति घर वारिदाम। तप्त कांचन-चस्व, शस्त्र-विद्या-निपुण, सिद्ध-सुर सेन्य, पाथोजनाम। अखिल लावण्य-गृह, विश्व-विग्रह, परम प्रौढ़, गुणगूढ, महिमा उदारं । दुर्धर्ष, दुस्तर, दुर्ग, वर्ग-अपवर्ग-पति, मम संसार-पादप-कुठारं ॥३॥ शापवश मुनिवधू-मुक्तकृत, विप्रहित, यज्ञ-रक्षण-दक्ष, पक्षका । जनक-नृप-सदसि शिवचाप-भंजन, उग्र भार्गवागर्व गरिमापहर्ता ।। गुरु-गिरा-गौरवामर-सुदुस्त्यज राज्य त्यक्त, श्रीसहित सौमित्रि भ्राता। संग जनकात्मजा, मनुजमनुसृत्य अज, दुष्ट-चघ-निरत, त्रैलोक्यनाता। दंडकारण्य कृतपुण्य पावन चरण, हरण मारीच-मायाकुरंगे। पालि बलमत्त गजराज इव केसरी, सुहृद सुग्रीव-दुख-राशि-भंग ॥६॥ ऋक्ष, मर्कट विकट सुभट उद्भट समर, शैल-संकाश रिपु त्रासकारी । बद्धपाथोधि, सुर-निकर-मोचन, सकुल दलन दससीस-भुजचीस भारी।। दुष्ट पियुधारि-संघात, अपहरण महि-मार, अवतार कारण अनूपं । अमल, अनवद्य, अद्वैत, निर्गुण, सगुण, ब्रह्म सुमिरामि नरभूप-रूपं ॥८॥ शेप-श्रुति-शारदा-शंभु-नारद सनक गनत गुन अंत नहिं तर चरित्रं । सोइ राम कामारि-प्रिय अवधपति सर्वदा दासतुलसी-त्रास निधि-वहिनं ६ बिनय-पत्रिका भावार्थ-सूर्यवंश-रूपी कमलकोसिलाने के लियजोसूर्य है, कामदेयोंके समान जिनकी सुन्दरता है, कलिकालरूपी सर्पको म लिये जो गरुड़ है, अपने प्रवल भुजदण्डोंमें जिन्होंने प्रचण्ड धनुष याण धारण कर रक्खे हैं, जो तरकस याँधे हैं और जिनका धल है ॥१॥ लाल कमलकी पंखुड़ियों जैसे जिनके नेत्र हैं, जो शोमा हैं, जिनके साँवरे शरीरको सुन्दर कान्ति मेधके समान है। जो सोनेके समान पीताम्बर धारण किये हैं, जो शस्त्र-विद्याम निपुण सिद्धों तथा देवताओंके उपास्य है, और जिनकी नाभिसे कमल = हुभा है ॥२॥ जो सम्पूर्ण सुन्दरताके स्थान है। सारा विश्व ही दि मूर्ति है, जो पड़े ही युद्धिमान् और रहस्यमय गुणवाले हैं, जिनकी महिमा है, जिनको कोई भी नहीं जीत सकता और जिनकी ली पार को भी नहीं पा सकता, जिनको पहचानना यड़ा कठिन है वर्ग और मोक्षके स्वामी नथा आवागमनरूपी संसारके वृक्षकी जड़ के लिये कुटार हैं ॥३॥ जो गौतम मुनिकी स्त्री अहल्याको शापसे करनेवाले, विभ्यामित्रके यशकी रक्षा करनेमें मनोंका पक्ष करनेवाले हैं.तथा राजा जनककीसभामेंशियजीधन तोड़कर महान् तेजस्वी एवं माघी परशुरामजीके गर्य और महश्यको करनेवाले जिन्होंने पिता चयनोंका गौरय देयना मी जिपको बड़ी कठिनताम छोड़ सकते हैं. ऐसे पर मदज ही ग्याग दिया और माई लक्ष्मण तथा श्रीजानकासीको लेकर, मजम्मा परमा दोकर मी, नादीलासहीनों लोकोंकी । लिये रापणादि दुर रानमांका संहार किया जिने और रलने विनय-पत्रिका सावन चरणकमलोसे दण्डक धनको पवित्र कर दिया, कपट मृगरूपी मारीचका नाश कर दिया,जो यालिरूपी महान् वलसे मतवाले हाथीके संहारके लिये सिंहरूप है और सुग्रीवके समस्त दुःखोंका नाश करनेवाले परम सुहृद् हैं ॥६॥ जिन्होंने भयंकर और थड़े भारी शूरवीर रीछ-चन्दरोंको साथ लेकर संग्राममें कुम्भकर्ण-सरीखे पर्वतके समान आकारवाले योद्धा. ओंको डरा दिया, समुद्रको याँध लिया, देवताओंके समूहको रावणके यन्धनसे छुड़ा दिया और दस सिर तथा विशाल बीस भुजाओंयाले रावणका फुलसहित नाश कर दिया ॥७॥ देवताओंके शत्रु दुष्ट राक्षसोंके समूहका, जो पृथ्वीपर भाररूप था, संहार करने के लिये अवतार लेनेमें उपमारहित कारणवाले, निर्मल निर्दोष, अद्वैतरूप, वास्तवमें निर्गुण, मायाको साथ सगुण, परमाल नर-रूप राजराजेश्वर श्रीरामका मैं स्मरण करता हैं ॥८॥ शेषजी, येद, सरस्वती, शिवजी, भारद और सनकादि सदा जिनके गुण गाते हैं, परन्तु जिनकी लीलाका पार नहीं पा सकते यही शियजीके प्यारे अयोध्यानाथ थीराम इस तुलसीदासको दुःखरूपी समुद्रसे पार उतारनेके लिये सदा-सर्वदा जहाजरूप है ॥९॥ [५१] देव- जानकीनाथ, रघुनाय, रागादि-चम-तरणि, तारुण्यतनु, तेजधामं । सच्चिदानंद, आनंदकंदाकरं, विश्व-विथाम, रामाभिरामं ॥१॥ नीलनव-चारिघर-सुमग-सुभकांति, कटि पीत कौशेय वर वसनधारी । रत्न-हाटक-जटिव मुकुट-मंडित-मौलि, मानु-शत-सदृश उद्योतकारी ।।

जिनकी नवीन नील सजल मेघके समान सुन्दर और शुम कान्ति धनय-पत्रिका श्रवण कुंडल,माल तिलक, रुचिर अति,अरुण अंमोजसोचन यफ अवलोक, प्रैलोक शोकापह, मार-रिपु-हदय-मानस-मगर्ने नामिका चारु, मुकपोल, द्विजयजदुति, अधर वियोपमा, मयुग कंठ दर, चियुक पर, वचन गंभीरतर, सत्य संकल्प, सुरवागन सुमन मुविचित्र नव तुलसिकादल-युतं मृदुल वनमाल उर मान भ्रमत आमोदवश मन मधुकर-निकर, मधुरतर मुखर कुर्वन्ति गान मुमग श्रीवत्स, केयूर, कंकण, हार, किंकिणी-रटनि कटि-तट रसाल वाम दिशि जनकजामीन-सिंहासनं कनक-मृदुवछियत तरुतमाल- आजानु भुजदंड, कोदंड-मंडित वाम वाहु, दक्षिण पाणि वाणमेका अखिल मुनि-निकर,सुर,सिद्ध,गंधर्व वर नमत नर नाग अवनिप अ- अनघ, अविछिन्न, सर्वन, सर्वेश, खलु सर्वतोमद्र-दाताऽसमाकं । प्रणतजन-खेद-विच्छेद-विद्या-निपुण नौमि श्रीराम सौमित्रिसा! युगल पदपद्म सुखसम पद्मालय, चिन्ह कुलिशादि शोमाति मारी। हनुमंत हृदि विमल कृत परममंदिर, सदादासतुलसी-शरण शोकहा- भाषार्थ-जानकी नाथ श्रीरघुनायजी राग-द्वेषरूपी अन्धकार नाश करने के लिये सूर्यरूप, तरुण शरीरवाले, तेजके धाम, सचिदान- मानन्द-कन्दकी खानि, संसारको शान्ति देनेवाले, परम सुन्दर है। जो कटि-नट में सुन्दर रेशमी पीताम्बर धारण किये है, और दिन 14 विनय-पत्रिका लकपर सैकड़ों सूर्योके समान प्रकाश करनेवाला रन-जड़ित सुन्दर वर्ण-मुकुट शोभित हो रहा है ॥२॥ जो कानों में कुण्डल पहिने,भालपर लिक लगाये, अत्यन्त सुन्दर भ्रकुटि तथा लाल कमलके समान बड़े- हे नेत्रोंवाले, तिरछी चितवनसे देखते हुए, तीनों लोकोंका शोक रनेवाले और कामारि श्रीशिवजीके हृदय-रूपी मान-सरोवरमें विहार करनेवाले इंस-रूप हैं ॥३॥ जिनकी नासिका बड़ी सुन्दर है, मनोहर कपोल है, दाँत हीरे-जैसे चमकदार हैं, होठ लाल-लाल यिम्याफलफे. समान हैं, मधुर मुसकान है, शंखके समान कण्ठ और परम सुन्दर ठोड़ी है। जिनके वचन यही गम्भीर होते हैं, जो सत्य-संकल्प और देवताओंके दुःखोंका नाश करनेवाले हैं ॥४॥ रंग-बिरंगे फूलों और नये तुलसी पत्रोंकी कोमल धनमाला जिनके हृदयपर सुशोभित हो रही है, उस मालापर मुगन्धके घश मतवाले भारॉका समूह मधुर गुखार करता हुआ उड़ रहा है ॥५॥ जिनके हृदयपर सुन्दर थ्रीयत्सका चिद है, बाहुऑपर थाजूयन्द, हाथों में कंकण और गलेमें मनोहर हार शोभित हो रहा है, टि-देशमै सुन्दर तागढीका मधुर शब्द हो रहा है। सिंहासनपर घाम गमें भीजानकीजी विराजमान है, जो तमाल-वृक्षके समीप कोमल वर्ण-लता-सी शोभित हो रही है n६॥ जिनके भुजदण्ड घुटनोतफ लम्बे । यायें हाथ धनुए और दाहिने हाथमें एक याण है। जिनको सम्पूर्ण निमण्डल, देवता, सिद्ध, श्रेष्ठ गन्धर्य, मनुष्य, नाग और अनेक राजा. हाराजागण प्रणाम करते हैं ॥७॥ जो पापरहित, भरवण्ड, सर्यश, सरके गमी और निश्चयपूर्वक इमलोगोंको कल्याण प्रदान करनेवाले हैं। जो रिमागत भक्तोंके कष्ट मिटानेकी फटामें सर्वथा निपुण हैं, ऐसे लक्ष्मण

सकल यज्ञांशमय उग्र विग्रह क्रोड़, मर्दि दनुजेश उद्धरण उर्वीर
छलन पाल कपट-बटुरूप वामन प्रक्ष, भुवन पयंत पद तीन करणं
चरण-नख-नीर त्रैलोक-पावन परम,विबुध-जननी-दुसह-शोक हरग।।५
क्षत्रियाधीश-करि निकर-नव-केसरी, परशुधर विन-ससि-जलदरूप]
पिनय गतिका
जी महिम श्रीगमनानीको में प्रणाम करना है जिनके
चरण कमल मानव धाम और कमला (ममीजी) के निवास स्थान
मान् लक्ष्मीजी गदा उन परणोंकी मेयाम लगी रहती हैं। यन
४८ चिटोंग जो मत्पन्न शोमा पाई और जिन्होंने मकर
धीहनुमानजीक निर्मम हदयको अपनायेष्ठ मन्दिर यना रपमा है या
श्रीहनुमानजी हृदयमे यह परणकमल मदा यम , ऐसे शोक हर
याले श्रीरामके चरणोंको शरणमें यह नुलसीदास है ॥९॥
[५२]
देव-
कोशलाधीश,जगदीश,जगर्दकहित, अमितगुण, विपुलं विस्तार लीला
गायंतितव चरितमुपवित्र श्रुति-शेष-शुक-शंभु-सनकादिमुनि मननशी
वारिचर-वपुप धरि भक्त-निस्तारपर, धरणिकत नाव महिमातिगुर्वी
कमठ अति विकट तनु कठिन पृष्ठोपरी, भ्रमत मंदर कंडु-सुख मुरारी
प्रकटकृत अमृत, गो, इंदिरा, इंदु, दारकाईद-आनंदकारी ॥३
मनुज-मुनि-सिद्ध-सुर नाग-त्रासक,दुष्ट दनुज द्विज-धर्म-मरजाद-
अतुल मृगराज-चपुधरित, विद्दरित अरि, भक्त प्रहलाद-अहलाद
द-हा
द-का
चीस भुजदंड दससीस खंडन चंड वेग सायक नौमि राम भूपं ॥६॥

८७ धिनय-पत्रिका भूमिभर-मार-हर, प्रकट परमातमा, ब्रह्म नररूपधर भक्तहेतू । धृष्णि-कुल-कुमुद-राकेश राधारमण, कंस-चंसाटवी-धूमकेतू ॥७॥ प्रवल पाखंड महि-मंडलाकुल देखि निंद्यकृत अखिल मख कर्म-जालं। शुद्ध बोधैकघन, ज्ञान-गुणधाम, अज, बौद्ध-अवतार वंदे कपालं ॥८॥ कालकलिजनित मलमलिन मन सर्वनर मोह-निशि-निविड़यवनांधकारं। विष्णुयश पुत्र कलकी दिवाकर उदित दासतुलसी हरण विपतिभारं॥९॥ भावार्थ-हे कोसलपति !! हे जगदीश्यर ! आप जगत्के एकमात्र (तकारी हैं, आपने अपने अपार गुणोंकी पट्टी लीला फैलायी है। आपके रम पवित्र चरित्रको चारों घेद, शेषजी, शुकदेय, शिव, सनकादिऔर मिन-शील मुनि गाते हैं ॥१॥ आपने मत्स्य-रूप धारणकर अपने पोको पार करनेके लिये (महाप्रलयके समय) पृथ्योकी नौका यनायी; मापकी अपार महिमा है। आप समस्त यज्ञोंके अंशोसे पूर्ण है, माप घड़े भयङ्कर शरीरयाले हिरण्याक्ष दानवफा मर्दन करके शूकर- रूपसे पृथ्वीका उद्धार किया ॥२॥ हे मुरारे!आपने अति भयानक कछुएका रूप धारण करके, समुद्र-मन्थनके समय रसातलमें जाते हुए मन्दराचल पहाडको अपनी कठिन पीठपर रस्य लिया, उस समय उसपर पर्वतके घूमनेसे भापको खुजलाहटका-सा मुष प्रतीत हुआ था। समुद्र मथने- पर मापने उससे अमृत,कामधेनु, लक्ष्मी और चन्द्रमाको उत्पन्न किया, इससमापने देयतामोकोषहुतआनन्द दिया॥३॥आपने मतुलित बलशाली सिंहरूप धारण करके मनुष्य, मुनि, सिद्धादेयता और नागॉको दुःख - हो रहे हैं। आप मोहरूपी रात्रि म्लेच्छरूपी घने अन्धकारके पिनय-पत्रिका देमपाले, ग्रामण भीर धर्मको मर्यादा नाश करनेवाले दुष्टयानय हिग कशिपुस्पाको विदीर्ण कर मनयर प्रहारको माहादिन कर दिया। मापने यामन ग्रह्मगार्गका रुप धारणकर राजा थनिको छन । पहिले तीन पर पृथ्वी मांगी, पर नापते ममय तीन परम साराग्रज तक नाप लिया । (नापनके ममय) आपके चरण-नयमेन लोकोंको पवित्र करनेवाला (गंगा) जल निकला । आपने यदि पातालमें भेज, और यह राज्य इन्द्रका देकर देयमाता अदितिका शोक हर लिया ॥१॥ आपने सदनयाटु आदि अभिमानी क्षत्रिय रा रूपी हाथियोंकेसमूहको विदीर्ण करनेके लिय सिंह-रूप और ब्राह्मण धान्यको हराभरा करने के लिय मेयरूप, ऐसा परशुराम अवतार किया। और रामरूपसे दस सिर तथा यीसभुजदण्डयाले रायणकोप याणोंसे खण्ड-खण्ड कर दिया, ऐसे राजराजेभ्यर श्रीरामचन्द्रजीत प्रणाम करता हूँ ॥६॥ भूमिके मारी मारको हरनेके लिये आप परन शुद्ध ब्रह्म होकर भी भक्तोंके लिये मनुप्यरूप धारण करके प्रकट हुप वृष्णिवंश-रूपी कुमुदिनीको प्रफुल्लित करनेवाले चन्द्रमा, राधाजीके और कंसादिके धंशरूपी वनको जलाने के लिये अग्निस्वरूप थेn७N ! पाखण्ड-दम्भसे पृथ्वीमण्डलको व्याकुल देखकर आपने यज्ञादि स कर्मकाण्डरूपी जालका खण्डन किया, ऐसे शुद्ध बोधस्वरूप, विज्ञान सर्य दिव्य-गुण-सम्पन्न, अजन्मा, कृपालु बुद्ध भगवान्की मैं घ करता हूँ ॥८॥ कलिकालजनित पापोंसे सभी मनुष्योंके मन : लि. सूर्योदयकी तरह विष्णुयश नामक ग्राहमणके यहाँ

विनय-पत्रिका
पसे कल्कि अवतार धारण करेंगे। हे नाथ! आप तुलसीदासकी
विपत्तिके भारको दूर करें ॥२॥
[५३]
देव-
सकल सौभाग्यप्रद सर्वतोभद्र निधि, सर्व, सर्वेश, सर्वाभिरामं ।
शर्व-हदि-कंज-मकरंद-मधुकर रुचिर रूप, भूपालमणि नौमि रामं ॥१॥
सर्वमुख-धाम गुणग्राम, विश्रामपद, नाम सर्वसपदमति पुनीतं ।
निर्मल, शांत, सुविशुद्ध, योधायतन, क्रोध-मद-हरण, करुणा-निकेतं ।।
अजित, निरुपाधि, गोतीतमव्यक्त, विभुमेकमनवद्यमजमद्वितीयं ।
प्राकृतं, प्रकट परमातमा, परमहित, प्रेरकानंत चंदे तुरीयं ॥३॥
भूधर, सुन्दरं, श्रीवरं, मदन-मद-मथन सौन्दर्य-सीमातिरम्यं ।
दुष्प्राप्य, दुष्प्रेक्ष्य, दुस्तप, दुष्पार, संसारहर, सुलम, मृदुभाव-गम्यं ।।
सत्यकृत, सत्यरत, सत्यव्रत सर्वदा, पुष्ट, संतुष्ट, संकष्टहारी ।
धर्मवर्मनि अझकर्मयोधैक, विप्रपूज्य, प्रमण्यजनप्रिय, मुरारी ।।५।।
नित्य, निर्मम, नित्यमुक्त, निर्मान, हरि, ज्ञानपन, सच्चिदानंद मूलं ।
सर्वरक्षक सर्वमक्षकाध्यक्ष, कूटस, गूदार्चि, भक्तानुकूलं ॥६॥
सिद्ध-साधक-साध्य, वाच्य चाचकरूप,मंत्र जापक-जाप्य, सृष्टि-स्रष्टा ।
परम कारण,कंजनाभ,जलदाभवनु,सगुण,निर्गुण,सकल दृश्य-द्रष्टा१७॥
व्योमच्यापक, विरज, ब्रम, परदेश,कुंठ, वामन, विमल ब्रह्मचारी ।
सिद्ध-दारकादवंदित सदा, खंदि पाखंड-निर्मूलकारी ॥८॥

संमोह-अज्ञान, गुण-सति है। परमात्मा होनेपर भी प्रकृतिको साथ लेकर प्रकट होनेवाले चालाकापार. पाना पड़ा कठिन है। आप अपनी पास भाषागम में रहनेवाले, सल्य-मंकरप, मदा ६ पुर-दिव्य शक्तिसामर्य- विनय-पत्रिका पूरनानंदसंदोह, अपहरन वचन-मन-कर्म-गत शरण तुलसीदास त्रास-पााधि इव कुंभजा भावार्थ-समस्त सौभाग्यके देनेवाले सब प्रकारसे कल्याणके विश्वरूप, विश्वके ईश्वर, सयको सुख देनेवाले, शिवजीके हदय मकरन्दको पान करने के लिये भ्रमर-रूप, मनोहर रूपवान् पचंरा शिरोमणि श्रीरामचन्द्रजीको मैं प्रणाम करता हैं ॥१॥ हे श्रीर आप सय सुखोंके धाम, गुणोंकी राशि और परमशान्ति देनेवाले हैं का नाम समस्त पदार्थों को देनेवाला तथा बड़ा ही पवित्र है। आप शान्त, अत्यन्त निर्मल, शान-स्वरूप, क्रोध और मदका नाश कर तथा करुणाके स्थान है ॥२॥ आप सबसे अजेय, उपाधिरहित इन्द्रियोंसे परे, अव्यक्तः, व्यापक, एक, निर्विकार, अजन्मा और में द्वितकारी, सयके प्रेरक, अनन्त और निर्गुणरूप हैं । ऐसे श्रीरामव को मैं प्रणाम करता हैं ॥३॥ आप पृथ्योको धारण करनेवाले लक्ष्मीपति, मुन्दरतामें कामदेवका गर्व वर्ष करनेवाले, सौन्दर्य की भौर अत्यन्त ही मनोहर है। आपको प्राप्त करना यहा कठिन है।' दर्शन घड़े कठिन है, तसे कोई आपको नहीं जान सकता. म मंगारके हग्नेयाले, मनॉकी महादीम दर्शन देनेयाले भार प्रेम दीनतामे ग्रास होनेवाले आप सत्यको उत्पन्न करनेवाले,

विनय-पत्रिका
न्तुष्ट और महान कठोंके हरनेवाले हैं। धर्म आपका कवच है, आप ग्रह्म
और कर्मके शानमें अद्वितीय है,प्राह्मणीक पूज्य हैं, ब्राह्मणों और भक्तोंके
गरे हैं, तथा मुरदानवके मारनेवाले हैं ॥५॥ हे हरे! आप नित्य, ममता-
हित,नित्यमुक्तमान-रहित,पापोंके हरनेवालेझानस्वरूप,सचिदानन्दधन
र मयके मूल कारण हैं। आपसयके रक्षक, सयको मृत्युरूपसे भक्षण
रनेवाले यमराजके खामी,कृटस्थ गूढ़ तेजवाले और भक्तोंपर कृपा करने
ले हैं ॥६आप ही सिद्ध,साधक और साध्य हैं, आप ही पाच्य और
गचक हैं, आप ही मन्त्र, जापक और जाप्य तथा आप ही सृष्टि और आप
हो सटा है। आप परम कारण हैं। आपको नाभिसे कमल निकला है।
पापका शरीर मेघके समान श्यामसुन्दर है। सगुण-निर्गुण दोनों ही
माप हैं । यह समस्त दृश्यरूप संसार भी आप है और उसके द्रष्टा भी
माप ही हैं ॥७॥ आप आकाशके समान सर्वव्यापी, रागरहित, ब्रह्म
गौर. वर देनेवाले देवताओंके स्वामी हैं। आपका नाम वैकुण्ठ और
विमल वामन ब्रह्मचारी है। सिद्ध और देव-समूह सदा आपको वन्दना
किया करते हैं, आप पाखण्डका खण्डन कर उसे निर्मूल करनेवाले
है ८॥ आप पूर्ण आनन्दकी राशि, अविवेक, अज्ञान और सत्व, रज,
तम गुणों के त्रिदीपको हरनेवाले हैं। यह तुलसीदास वचन, मन और
कर्मसे आपकी धारण पड़ा है। इसके भव-भयरूपीसमुद्रके सोखने के लिये
भाप ही साक्षात् अगस्त्य ऋपिके समान है ॥९॥
[५४]
-
विश्व-विख्यात,विश्वेश,विश्वायतन, विश्वमरजाद, व्यालारिगामी ।
नम,वरदेश,वागीश,व्यापक,विमल,विपुल बलवान,निर्वानस्वामी॥१॥

सत्यसंकल्प, अतिकल्प, कल्पांतकतकल्पनातीत, अहि-तल्पवामी धनज-लोचन, वनज-नाभ वनदाम-चपु,वनचरघज-कोटि-लावण्पर भक्त-अनुकूल, भवशूल-निमूलकर, तूलअघ-नाम पावक-समान! तरल तृष्णातमी-तरणि,धरणीधरण, शरण-मयहरण, करुणानिधानं पाहि मामीश संताप-संकुल सदा दास तुलसी प्रणत रावणारी । पिनय-पत्रिका प्रति,महतत्य, शन्दादि गुग, देवनाध्याम,मदग्नि,अमान को पुद्धि, मन, इंद्रिय,प्राण,निशातमा,काल,परमाणु,irroine सर्वमेवाय त्वप भूपालमणि ! व्यक्तमव्यक्त, गतमेद, विष्णो। भुवन भादंग, कामारि-नंदिन, पदद मंदाकिनी-जनक, निभ्यो आदिमध्यांत, भगवंत । वं मर्यगतमीश, पश्यन्ति ये ब्रह्मादी । यथा पट-तंतु,घट-मृत्तिका, सर्प-नग, दारु करि, कनक-कटकांगदाई गृह, गंभीर, गर्वघ्न, गूढार्यवित, गुप्त, गोतीत, गुरु, ग्यान-ग्याता। ग्येय, ग्यानप्रिय, प्रचुर गरिमागार, घोर-संसार-पर, पार दाना । सुकर, दुम्कर, दुराराध्य, दुर्व्यसनहर, दुर्ग, दुर्द्धर्प, दुर्गातिहर्चा | चेदगर्मिकादर्म-गुनगर्व, बहुल धुंदारकाबूंद-चंदारु-पद-द्वंद्व अगिपर-गर्व-निर्वाप-कर्चा ॥ मंदार-मालोर-धारी। भावार्थ-है धीरामजी! आप विश्वमें प्रसिद्ध, अखिल ब्रह्माण स्वामी, विश्व-रूप, विश्वकी मर्यादा और गरुडपर जानेवाले हैं। ग्रह हैं । वर देनेवाले ब्रह्मादि देवताओंके और याणीके सामी आप सर्वव्यापक, निर्मल, यड़े यलयान और मोक्ष पदके अधी A. ॥ मूल प्रकृति, महत्तत्व, शब्द, स्पर्श,रूप, रस, गन्ध, सस्य विनय पत्रिका नमोगुणा समस्त देयता, आकाश, यायु, मति निर्मल जल, पृथ्वी, बुद्धि,मनदसोंइन्द्रियाँमाण, अपान,समान, ध्यान, उदान नामक पच. प्राण, चित्त, मारमा, काला परमाणु और महान् चैतन्य-शक्तिवादिसभी छ आपका ही रूप है। राज-शिरोमणि!प्रकट और मप्रकट सब कुछ गप ही है, थाप अभेदरूपसे अपिल विश्वमें रम रहे हैं। यह समस्त वगत् मापके एक संशमें स्थित है। शिवजी यापके दोनोंचरण-कमलोंकी चन्दना करत,श्रीगंगाजी इन्हीं चरणोंसे निकली हैं। भाप सर्व-विजयी ॥२-३॥ है मगवन् ! आप ही आदि, मध्य और अन्त है। आप सबमें ग्याप्त है। हे ईश! ग्रह्मयादी मानीजन आपको सयमें ऐसे ओतप्रोत देखते है, जैस यरनमें मत, घडैमें मिट्टी, सर्पम माला, लकड़ीके यने हुए हाथीमें लकड़ी और कड़े, पाजू आदि गहनों में सोना मोतमोत है | इस प्रकार आप अत्यन्त गूढ, गम्भीर दर्प-दारी, गुप्त रहस्य के ज्ञाता, गुप्त, मन-इन्द्रियों- से अतीत, सयके गुरु, मान, माता और प्रेयस्वरूप, ज्ञान-प्रिय, महान् गौरयके भण्डार और इस घोर भवसागरसे पार उतार देनेवाले है॥५॥ आपका संकल्प सत्य है, आप प्रलय और महाप्रलय करनेवाले हैं। मन-बुद्धिसे आपको कोई कल्पना नहीं कर सकता । आप शेषनागकी शय्यापर निवास करनेवाले हैं। आपके कमलके समान नेत्र है, आपकी नाभिसे कमल उत्पन्न हुआ है, आपके शरीरकी कान्ति मंधके समान श्याम है और करोड़ों कामदेयोंके समान आप सुन्दरताको राशि है ॥६॥ आप भक्तोंके लिये मुलभ, दुष्पोंके रिये दुर्लभ है, आपकी आराधना (परीक्षाके लिये) बड़े-बड़े कष्ट आते हैं, भाप भक्तोंके सारे दुर्गुणोंका नाश कर देते हैं, घड़े दुर्गम (यही *- -. 4 संत-संतापहर, विश्व-विश्रामकर, राम कामारि, अमिरामकारी। पिनप-पत्रिका कठिमागे गिन) और कठिन .. मामाजीक पुत्र गणकारिको भानी का जो गई प. हरण करयान मापन प्रम नंगले. गंगागौरको जगे उगानगनमारका गमनान पार माकोशलानरनिय मामिलाकपी रात्रिकामा के लिये भाप ग्य, भ्याको भाग्ण करनाले शरणागतम दग्गंगाल और करणा गानnen माप घरणयुगलोंकी या देयतामोसमूह यन्दना करता माप मन्दारकी मालाहदयपरम किये रहते हैं। हे रायणके शत्रु श्रीरामजी ! सदा मन्तापसे प्यार तुलसीदास मापकी शरण है। नाय! मेरी रक्षा कीजिये ॥२॥ शुद्ध बोधायतन, सचिदानंदघन, सजनानंद-वर्धन, खरारी ।। शील-समता-भवन,विषमता-मति-शमन, राम रामारमन, रावनारी । खड्गकर, चर्मवर-वर्मघर, रुचिर कटि तूण शर-शक्ति सारंगधारी ।। सत्यसंधान, निर्वानप्रद, सर्वहित, सर्वगुण ज्ञान-विज्ञानशाली। सपन-चम-घोर-संसार-भर-शर्वरी नाम दिवसेश खर-किरणमाली। तपन तीच्छन तरुन तीन तापन, तपरूप, तनभूप, तमपर, तपसी मान-मद-मदन-मत्सर-मनोरथ-मथन,मोह-अंमोधि मंदर,मनस्वी।।

विनय-पत्रिका वेद-विख्यात, परदेश वामन, विरज, विमल, वागीश, वैकुंठस्वामी । काम-क्रोधादिमर्दन,विवर्धन,छमा-शांति-विग्रह, विहगराज-गामी॥५॥ "रम पावन, पाप-पुंज-मुंजाटवी अनलइन निमिप निर्मूलक । वन-भूपण,दूषणारि, भुवनेश,भूनाथ,श्रुतिमाथ जय भुवनभर्चा ॥६॥ अमल,अविचल, अकल,सकल,संतप्त-कलि-विकलता-भंजनानंदरासी। उरगनायक शयन, तरुणपंकज-नयन,छीरसागर-अयन,सर्ववासी ॥७॥ सिद्ध-कवि-कोविदानंद-दायक पदद्वंद्व मंदात्ममनुजैर्दुरापं । पत्र संभूत अतिपूत जल सुरसरी दर्शनादेव अपहरति पापं ॥८॥ नित्य निर्मुक्त, संयुक्तगुण, निर्गुणानंद, मगवंत, न्यामक, नियंता । विश्व-पोपण-भरण,विश्व-कारण-करण,शरण तुलसीदास त्रास-हंता॥९॥ भावार्थ-हे श्रीरामजी!आपसन्तोंके संताप हरनेवाले, महाप्रलयके समय सारे विश्वकोअपनेमें विश्राम देनेवाले तथा शिवजीको आनन्द देनेवाले हैं। आप शुद्ध-योध-धाम, सच्चिदानन्दघन, सजनोंके आनन्दको यढ़ानेवाले और खर दैत्यके शत्रु हैं ॥१॥ हे श्रीरामजी! आप शील और समताके स्थान, भेद-युद्धिरूप विपमताके नाशक, लक्ष्मी-रमण और रायणके शत्रु है । आप हाथमें तलवार, सुन्दर ढाल, थाण, धनुष और शक्ति लिये रहते हैं, शरीरपर कवच धारण किये और सुन्दर कमरमें तरकस कसे है ॥२॥ आपसत्य-संकल्प, कल्याणके दाता, सयके द्वितकारी, सर्व दिव्यगुण और शान, विमानसे पूर्ण है। आपका राम-नाम (अनान- रूपी) मत्यन्त घन अन्धकारसे पूर्ण धोरसंसाररूपी रात्रिका नाश करनेके करते ६और भव्यत्तामपस मयमें रहते हैं ॥७॥ सिद्धा, कापियाँ विनय-पत्रिका लिये प्रचण्ड किरणयुक्त सूर्य के समान है ॥३॥ आपका तेजय तीक्ष्ण है, संसारके नये-नये तोय तापोंको आप नाश करनेव राजाका शरीर होनेपर भी मापका स्वरूप तपोमय है। आप अ परे और तपस्वी है। मान, मद, काम, मत्सर, कामना और मी समुद्र के मथनेके लिये आप मन्दराचल हैं; आप बड़े विचा हैं ॥४॥ वेदोंमें प्रसिद्ध, वर देनेवाले देवताओंके स्वामी, यामन, बिमल, वाणोके अधीश्वर और चैकुण्ठके स्वामी है। आप काम, लोभ आदिके नाश करनेवाले, क्षमा बढ़ानेवाले, शान्ति-रूप और राज गरुडपर चढ़कर जानेवाले हैं ॥५॥ आप परम पवित्र और पुखरूपी भूजके यनको पलभरमें जड़सहिन जला देनेवाले अमित आप ब्रह्माण्डके भूषण, दूषण दैत्यके शत्रु, जगत्के स्वामी; यी वैदके मस्तक और सारे विश्वका भरण-पोषण करनेवाले हैं। जय हो ॥६॥ आप निर्मल, एकरस, कला-रहित, कला-सहित फलियुगके तापसे तपे हुए जीयोंकी व्याकुलताका नाश करने आनन्दकी राशि हैं। आप शेपनागपर शयन करते हैं, आपके नेत्रा प्रफुलित कमलके समान हैं। आप व्यक्तरूपसे क्षीर-सागरमें नि विद्वानोको मुख देनयाले भाप ये चरण युगल दुष्टारमा मनुष्यात दुर्लम जिन पवित्र धरणोंसे परम पवित्र जलपालीगंगानी निकर मिनके दर्शनमात्रमे ही पाप दूर हो जाते हैं ॥८॥ माप नित्य ई. में मर्यथा मुना हैं, दिव्य-गुण-सम्पन्न, तीनों गुणों से रहित है. या म्याप , या प्रकार के ऐश्वर्यसे युक्त भगया है, नियमों को बिनय-पत्रिका यिपर शासन करनेयाले हैं। माप समस्त विश्यक पालन-पोषण जानेवाले, जगत्के आदिकारण और शरणागत तुलसीदासका भय एनघाले ॥९॥ [५६ ] . रनुजयदन, दयासिंधु, दंमापहन, दहन दुर्दोष, दोपहर्ता । दुष्टवादमन, दममवन, दुःखोपहर, दुर्ग दुर्वासना नाशक ॥१॥ भूरिभूषण, मानुमंव, मगवंत, मय-भंजनामयद, भुवनेश मारी। भावनातीत, भवयंघ, भवभक्तहित, भूमिउद्धरण, भूधरण धारी ॥२॥ परद,पनदाम, पागीश,विश्वातमा, विरज, वैकुण्ठ-मन्दिर-विहारी। प्यारकंप्योम, पंदारु, वामन, रिमो, मनविद, मन, चिंतापहारी ॥३॥ 'महज संदर, मुमुख, गुमन, तुम सदा, शुद्ध सर्वज्ञ,स्वच्छन्दवारी। मर्पकत, सर्वभूत, सर्वजित, सर्वहित, सत्य-संकल्प, कल्पांतकारी ॥४॥ नित्य, निमोह, निर्गुण, निरंजन, निजानंद, निर्वाण, निर्माणदाता। "निर्मरानंद, निकंप, निम्मीम, निर्मुक्त, निरुपाधि, निर्मम,विधाना ।।५।। "महामंगलमूल मोद-महिमायतन,मुग्ध-मधु-भयन,मानद अमानी । मदनमर्दन, मदातीत, मापारहित, मंजु मानाप, पापोजपानी ॥६॥ फमत-सीपन, फलाकोर, फोदंडपा, फोशताधीश,फल्यापरासी । पापान प्रपुर मत्तकार-फेमरी, मनमन-पुण्य-भारम्पवासी ॥७॥ 'अनप, मांस, मनवय, अस्पत्ता,मन, अमित, अरिहार, आनंदसिंपा। अमत, मनिकेत, अविरत, अनामय,मनारंभ, अमोदनादान-पंचा। ७ घरद ! आपका शरीर मेघके समान श्याम है। आप वाणीमा वाले है। आप सदा शुभस्वरूप, निर्मल, सर्वज्ञ और स्वतन्त्र मावर करनेवाले हैं। आप सब कुछ करनेवाले, सबका भरण-पोषण करने सवको जीतनेवाले, सयके हितकारी, सत्य-संकल्प और कल्पका अर्थात् मलय करनेवाले हैं ॥४॥ आप नित्य हैं, मोह-रहित है, निगुणा .याप पूर्ण आनन्दस्वरूप, अचल, सीमारहित, मोक्षरूप, उपाधिरहिक दासतुलगी गैदग्विन, आपत्र इद, गोकसंपन्न, अतिशय सभीत। प्रणतपालक राम, परम करणाघाम, पाहि मामुर्विपति, दुर्विनीत । मावार्थ- श्रीगमजी ! माप दानयाँ नाशका, दया स्ट दम्म दूर करनेयाल. तुफनाको मम्म करनेवाले और वर्षको हर याले हैं। आप दुष्टताका नाश करनेवाले दमक म्यान अर्थात् जितेन्दि- श्रेष्ठ, दुगाँफे ममूहको परनयाले और कठिन तया युग यामनाम विनाशम॥१॥ भाप यनेक अलंकार धारण किये, सूर्यक प्रकाशमान, ऐश्वर्यादि छः दिव्य गुणोंसे युक, संसारसे मुनव- अभय दान देनेवाले यार सयस यई जगदीश्वर हैं। आप मन-नुदिन भावनाओंसे परे, शियजीस यन्दनीय, शिवभकॉक हितकारी भूमिक उद्धार करनेवाले और (गोवईन) पर्वतको धारण करनेवाले हैं ॥३॥ विश्वके आत्मा, राग-रहित और चैकुण्ठ-मन्दिरमें नित्य विहार कर वाले हैं । आप आकाशके समान सर्वत्र व्याप्त है, सबसे चन्दनीय, बान- रूप-धारी, सर्वसमर्थ, ब्रह्मवेत्ता, ब्रह्मरूप और चिन्ताओंको दूर' वाले हैं ॥ ३ ॥ आप स्वभावसे ही सुन्दर, सुन्दर मुखवाले और सुद्धा निजानन्दरूप हैं। मुक्तिस्वरूप और मुक्ति प्रदान । जना करने

विनय-पत्रिका
ममतारहित और सबके विधाता है ॥५॥ आप घड़े-बड़े मंगलोंके
ल, आनन्द और महिमाके स्थान, मूर्ख मधु दैत्यको मारनेवाले, दूसरों-
मान देनेवाले और स्वयं भानरहित हैं। आप कामदेवके नाशक
दसे रहित, मायासे रहित, सुन्दरी लक्ष्मी देवीके स्वामी और हाथमें
मल लेनेवाले हैं ॥६॥ आपके नेत्र कमलके समान हैं, आप चौंसठ
लाओंके भण्डार, धनुप धारण करनेवाले, कोसलदेशके स्वामी और
कल्याणकी राशि हैं । राक्षसरूपी यहुत-से मतवाले हाथियोंको मारनेक
लये सिंह है, मतोंक मनरूपी पवित्र वनमें निवास करनेवाले हैं ॥७॥
राप पापरहित, अद्वितीय, दोषरहित, अप्रकट, अजन्मा, सीमारहित,
नेचिंकार और आनन्दके समुद्र है। आप अचल हैं, (पर) एक ही
स्थानमें आपका निवास नहीं है, आप सर्वत्र हैं, परिपूर्ण हैं, नारोग
अर्थात् मायाके विकारोंसे रहित है और अनादि हैं । मेघनादके मारने-
'गले लक्ष्मणजीके आप ही बड़े भाई हैं ॥८॥ यह तुलसीदास संसारके
(खोंसे दुखी, विपद्-ग्रस्त, शोकयुक्त और अत्यन्त भयभीत हो रहा
४३ हे शरणागत-पालक ! हे परम करुणाके धाम! हे पृथ्वीपति रामजी!
इस दुनिीतकी रक्षा कीजिये ॥९॥
[५७]
सहि सवसंग निजअंग श्रीरंग! भवभंग-कारण शरण-शोकहारी ।
तु मपदंनिपल्लव-समाश्रित सदा, भक्तिरत,विगतसंशय, मुरारी ॥१॥
सुरभुर,नागनर यक्षगंधर्ष-खग,रजनिचर,सिद्धये वापि अन्न।
त-संसर्ग वर्गपर परमपद,प्राप्य निःप्राप्यगति त्वयि प्रसमे ॥२॥

तत्रत्वद्भक्ति-सअन, समागम, सदा भवतु म राम वियाममेक रोग महाभारयाण-पलयके आधित और भापकी भक्ति में सगे- शिननंजीर, ममी (भाएकी मनिमें लगे हुए) सम्मान विनय-पत्रिका वृत्र,बलि बाण,प्रहलाद,मय,व्याध,गज,गृध,द्विजवन्धु निजधर्म- साधुपद-सलिल निर्धत कल्मप सकल,श्वपच-यवनादि कैवल्य भ शांत, निरपेक्ष, निर्मम, निरामय, अगुण, शब्दकपर, ब्राइ दक्ष,समक,स्वदक,विगत अति स्वपरमति,परमरतिविरति तव च विश्व उपकारहित व्यग्रचित सर्वदा, त्यक्तमदमन्यु, कृत पुण्यरास यत्र विष्ठन्ति तत्रैव अज शर्व हरि सहित गच्छन्ति क्षीरान्धिवासी वेद-पयसिंधु, सुविचार मंदरमहा, अखिल-मुनिश्रृंद निर्मथनकता सार सतसंगमुद्धृत्य इति निश्चितं वदति श्रीकृष्ण वैदर्भिमा शोक संदेह, भय-हर्प, तम-तर्पगण साधु-सयुक्ति विच्छेदकारी यथा रघुनाथ-सायकनिशाचर-चमू-निचय-निर्दलन-पटु वेग भारी यत्र कुत्रापि मम जन्म निजकर्मवश भ्रमत जगजोनि संकट अनेक प्रयल भव-जनित व्याधि-भैपज भगति, मक्त भैपज्यमद्वैतदरसी संत-भगवंत अंतर निरंतर नहीं, किमपि मति मलिन कह दासतुल भावार्थ-दे रमापते ! मुझे सत्संग दौजिये, क्योंकि यह प्राप्तिका एक प्रधान साधन है, संसारकेभायागमनका माश करने भीर शरणमें भाय हुए जीयोंके शोकका दरनेवाला है। हे मुरा #. उनका भविधाजनित मन्दे नष्ट हो जाता है ॥१॥ देश्या भाग, मनुष्य, पन, गाय, पक्षी, राम, सिख तथा भौरभो, im बिनय-पत्रिका थ, धर्म, कामसे परे आपके उस नित्य परमपदको प्राप्त कर लेते हैं, दो अन्य साधनोंस नहीं मिल सकता, परन्तु केवल आपके प्रसन्न होनेसे मिलता है ॥२॥ वृत्रासुर, पलि, थाणासुर, महाद, मय, व्याघ मीकि), गजेन्द्र गिद्ध जटायु और ग्राह्मणोचितकर्मसे पतित अजामिल ण तथा चाण्डाल, ययनादिमी सन्तोंके चरणोदकसे अपने सारे को धोकर कल्याण-पदके भागी हो गये ॥३॥ (ये साधु कैसे हैं) उसे सारी कामनाएँ निकल जाने के कारण शान्त, किसीभीवस्तुया तेकी आकांक्षा न रहनेसे निरपेक्ष, ममतासे रहित, उपाधिरहित, गुणोंसे अतीत, शम्दब्रह्म अर्थात् घेदके जाननेवालोंमें मुख्य और वेत्ता है । जिस कार्यके लिये मनुष्य देह मिला है उसे पूरा करनेमें लि, सम-अष्टा, अपने आत्मस्वरूपको जाननेवाले, अपनी परायी बुद्धि त् भेदबुद्धिसे रहित,सय कुछ अपने श्रीरामका समझनेवाले, और चक्रपाणेघे संसारके भोगोंसे विरत और आप परमारमाके अनन्य संसारके उपकारके लिये उनका चित्त सदा व्याकुल रहता मद और क्रोधको उन्होंने त्याग दिया है और पुण्योंकी यही पूँजी मायी है। ऐसे सन्त जहाँ रहते हैं, यद्दों ग्रह्मा और शिवजीको साथ कर क्षीर-समुद्र निवासी श्रीहरि भगवान आप-से-आप दो जाते हैं ५॥ (सत्संग कैसा है) घेद क्षीर-समुद्र है, उसका भलीभाँति विचार । मन्दराचल है, समस्त मुनियों के समूह उसे मथनेवाले हैं। मथनेपर रसंगरूपी सार-अमृत निकला । यह सिद्धान्त रुक्मिणी पति भगवान् कृष्ण यतलाते हैं॥६॥ सन्त-महारमामाकी सत्-युक्ति शोक, सन्देश यावर्ष, मन्नान औरयासनाओं के समूहकोइसप्रकार नष्ट कर डालती है, से धीरघुनाथजीके पाण राक्षसोंकी सेनाके समुदायको कौशल और अमिनपल परम दुर्जय निशापर-निकर सहित पड्वर्गगो पातुधानी आपकी भक्ति ही एकमात्र औषधि है और अद्वैतदर्शी (चरायरमें देहि अवलंय करकमल, कमलारमन, दमन-दुख, शमन-संताप मा विविध कोशीप, अति रुचिर मंदिर-निकर, सत्वगुण प्रमुख कटका पुणप-अमिमान सागर भयंकर घोर, विपुल अवगाह, दुस्तर अपार नक्र-रागादि-संकुल मनोरथ सकल, संग-संकल्प धीची-विकारं। मोह दशमौलि, उद्माव अहंकार, पाकारिजित काम विश्रामहारी। देप दुर्मुस, दमगर, अकंपन कपट, दर्प मनुजाद मद-शूलपानी! विनय पत्रिका बड़े घेगसे नष्ट कर देते हैं ॥७॥ हे रामजी ! अपने कर्मवश जहाँ । मेरा जन्म हो, जिस-जिस भी योनिमें अनेक संकट भोगता हुआ मह वहाँ ही मुझे आपकी भक्ति और सन्तोंका संग सदा मिलता हे राम ! यस, मेरा एकमात्रयही आश्रय हो ॥८॥ संसार-जनित (मति दैहिक और दैयिक ) तीन प्रकारको प्रयल पीडाका नाश करने आपको ही देखनेवाले) भक्त ही वैद्य है। वास्तवमें सन्त । भगवान्में कभी किञ्चित् भी अन्तर नहीं है। मलिन-युद्धि तुल दास तो यही कहता है ॥९॥ [५८] देव- अज्ञान राकैश-ग्रासन विधुतुद, गर्व-काम-करिमत्त-हरि, दूपणारी । चपुप ममाण्ड सुप्रवृत्ति लंका-दुर्ग, रचित मन दनुज मय रूपधारी। लोम अतिकाय, मत्सर महोदर दुष्ट, क्रोध पापिष्ट यिपुधावकारी - ! विनय-पत्रिका वि भवदंघ्रि-सेवक विभीषण बसत मध्य दुष्टाटवी ग्रसितचिंता । नेयम-यम सकल सुरलोक-लोकेश लंकेश-वश नाथ ! अत्यंत भीता ॥६॥ बान-अवधेश-गृह गेहिनी भक्ति शुम, तत्र अवतार भूमार-हर्ता । मक्त संकष्ट अवलोकि पितु-चाक्य कृत गमन किय गहन वैदेहि-भः ।। कैवल्य साधन अखिल भालु मर्कट विपुल ज्ञान-सुग्रीवकृत जलधिसेतू । प्रपल वैराग्य दारुण प्रभंजन-तनय, विषम वन मवनमिव धूमकेतू ।।८।। दुष्ट दनुजेश निर्वशकत दासहित, विश्वदुख-हरण बोधेकरासी । अनुज निज जानकी सहित हरि सर्वदा दासतुलसी हृदय कमलबासी।९। भावार्थ-दे लक्ष्मी-रमण ! इस संसार-सागरमे डूबते हुए मुझको अपने कर-कमलका सहारा दीजिये। क्योंकि आप दुःखोंके दूर करनेवाले और पहे-य: सन्तापोंके नाश करनेवाले हैं। हे दूषणनाशक ! आप अशानरूपी चन्द्रमाको प्रसनेके लिये राहु और गर्व तथा कामरूपी "मतयाले हाथियोंके मर्दन करनेके लिये मिह हैं ॥१॥शरीररूपी ब्रह्माण्ड- में प्रवृत्ति ही लंकाका किला है। मनरूपी मयदानयने इसे बनाया है। ४ इसमें जो अनेक कोर (शरीरम पाँच कोरा है-अन्नमय, प्राणमय,मनोमय, विज्ञानमय और आनन्दमय ) हैं, ये इसके अत्यन्त सुन्दर महल हैं, सस्यगुण आदि तीनों गुण इसके सेनापति है ॥२॥ देहाभिमान मत्यन्त भयङ्कर, अथाह, भार, दुस्तर समुद्र है, जिसमें राग-द्वेप और कामना मादि अनेक घड़ियाल मरे और आसक्ति तथा संकल्पोंकी खहरें उठ रही हैं । इस लंकामे मोहरूपी राषण, अहंकाररूपी उसका मा कुम्भकर्ण और शान्ति नष्ट करनेवाला कामरूपी मंधनाद है। यहाँ ना

दिनय-पत्रिका
लोमरूपी मतिकाय, मत्सररूपी दुष्ट महोदर, कोपरूपी
देशान्तक द्वेषरूपी दुर्मुस, दम्मरूपी खर. कपटरूपी मकान
मनुजाद और मदरूपी शुलगाणि राक्षस हैं. यद (दुष्ट राज-परि
उसके सेनापतिरूपी) राक्षसोंकासमूह अत्यन्त
पार कठिन है। न मोह आदि : राक्षसोंके साथ ।
रामियों भी हैं ५.५ हे नाथ! आपके चरणकमलोहा से
निमारग है, जो इन दुष्ोसे भरे हुए पनमें सर्वथा चिन्ताम
निपागकर गायम-नियमरूपी दो दिकपाल भीरमात
मीन होकर मयत भीत रहते इसलिये
महारा नगर भीर कागल्या यहाँ गयो मार उगा
भतार लिया, बेग होमागकीयामशानरूपी बाप
मनिती कीजों द्वारा (न मान का नारा
टिहापं ।) भीर जगमतीका कर देवकराती
भाममा वन मा. (ही मी में 4
गत गान उस भनेर मार
rintin (गार) गागर तुम भी बागि ।
"পং বা গণসামা নুন সিগম (গ
AAHRATE NATAK
1* rimtis natt! firm for
TATA माशाxrget
meri ARE मा मन औr start
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मनr-EAS, विनय-पत्रिका [५९] व- न-उद्धरण रघुवर्य करुणाभवन, शमन-संताप, पापौघहारी। मल विज्ञान-विग्रह, अनुग्नहरूप, भूपवर विबुध, नर्मद, खरारी ॥१॥ सार-कांतार अति घोर, गंभीर, धन, गहन तरुकर्म संकुल,मुरारी । सना पल्लि खर-कंटकाकुल विपुल,निविड़ बिटपाटवी कठिन मारी॥२॥ विविध चितयत्ति-सग निकर श्येनोलूक,काकवक गृध्र आमिप-अहारी। अखिल खल,निपुण छल,छिद्र निरखासदा,जीवजनपथिकमन-खेदकारी क्रोध करिमत्त, मृगराज कंदर्प, मद-दर्प वृक-माल अति उग्रकर्मा । महिष मत्सर यूर, लोम शूकररूप, फरु छल, दंम मार्जारधर्मा ॥४॥ कपट मर्कट विकट,व्याघ्र पाखण्डमुख,दुखद मृगवाव,उत्पातकर्ता। हृदय अवलोकि यह शोक शरणागतं,पाहि मां पाहि,मो विश्वमा ॥५॥ प्रवल अहंकार दरपट महीधर, महामोह गिरि-गुहा निविहांपकारं । चित्त घेवाल, मनुजाद मन, प्रेतगन रोग, मोगोषवृश्चिक-विकारं ॥६॥ विषय-सुख-लालसादेश-पशकादि,सल झिल्लि रूपादि सर सर्प,स्वामी। तत्र आशिप्त तप विषम माया नाय, अंघ में मंद, मालादगामी [१७॥ पोर, अवगाह भव आपगा पापजलपूर, दुष्प्रेक्ष्य, दुस्तर, अपारा । मकर पयर्ग, गो नक पकाइला,कूल शुम-अशुम,दुख तीय धारा ।।८।। सकल संघट पोच शोचवश सर्वदा दासतुलसी विषम गहन प्रस्तं । प्राहि रघुवंशभूपण कृपाकर,कठिन काल विकराल-कलियास-यस्तं ॥९॥ भावार्य-दे धीरामजी! मार दीनांगरसार करनेवाले, पुपलमें भेरणा म्यान, सन्ताप नाश करनेवाले मोर पाके ममूहक --- . ! हरनेवाले हैं। आप निर्यिकार, विज्ञान-म्यरूप, कृपा-मूति, राजा ॥९॥ हे मुरारे! यह संसाररूपी पन बड़ा ही भयानक और गहरा है। इसमें कर्मरूपी वृक्ष यही ही सधनतासे लगे हैं, वासनारूपी लतार्थ और छल करने में निपुण हैं। कोई छिद्र देखते ही यह जीवरूपी यात्रियों मनको सदा दुःख दिया करते हैं॥३॥ इस संसार-चनमें कांधली मतवाला हाथी, कामरूपी सिंह, मद्रूपी मेड़िया और गर्वरूपी छ। निर्दय हैं। इनके सिवा यहाँ मत्सररूपी कर भैंसा, लोग रूपी शुकर, छलरूपी गीदड़ और दम्भरूपी विलाय भी हैं। यहाँ कपटरूपी विकट यन्दर और पाखण्डरूपी बाघ है, जो सन्तरूपी मृगोंको सदा दुःख दिया करते और उपद्रव मचाया करते हैं। हे विश्वम्भर! रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये ॥५॥ इस संसार-यनमें (इन जीव-जन्तुमासे यच जानेपर भी आगे और विपद् है) अहंकाररूपी यहा विशाल पर्वत है,जो सहजमें लाँघा नहीं जा सकता। इस पर्वतमें महामोहरूपी गुफा जिसके अन्दर घना अन्धकार है। यहाँ चित्तरूपी घेताल, मनरूपी राक्षस, रोगरूपी भूत-प्रेतगण और भोग-विलासरूप सहर फैला हुमा १॥६॥ यहाँ विषय-मुखकी लालसासरी विनय-पत्रिका शिरोमणि, देवताओंको सुख देनेयाले तथा सर नामक दैत्यकं गड लिपट रही हैं और व्याकुलतारूपी अनेक पैने काँटे विछ रहे हैं। इन प्रकार यह सधन घृक्ष-समूहोंका महाघोर वन है ॥२॥ इस चित्तकी जो अनेक प्रकारको वृत्तियाँ हैं, सो मांसाहारी याज, उल्लू काक, यगुले और गिद्ध यादि पक्षियोंका समूह है। ये सभी बड़े हुए वन हृदयमें यह शोक देखकर मैं आपकी शरण आया है, हे नाथ ! आप मेरी 1 विनय-पत्रिका मक्खियाँ और मच्छर हैं, दुष्ट मनुष्यरूपी झिल्लो है, और हे स्वामी ! रूप, रस, गन्ध,शब्द, स्पर्श विषयरूपी सर्प है। हे नाथ! आपकी कठिन मायाने मुझ मूर्सको यहाँ लाकर पटक दिया है। हे गरुड़गामी ! मैं तो अन्धा है, अर्थात् माननेत्र-विहीन हूँ ॥७॥ इस संसारस्वतमें वहनेवाली वासनारूपी मव-नदी,यहीही भयङ्कर और अथाह है, जिसमें पापरूपीजल मरा हुआ है, जिसकी ओर देखना सहज नहीं, इसका पार करना बहुत ही कठिन है, क्योंकि यह अपार है। इसमें काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सररूपी छः मगर हैं, इन्द्रियरूपी घड़ियाल और भँवर भरे पड़े हैं। शुभ-अशुभ कर्मरूपी इसके दो तीर है, इसमें दुःखोकी तीव्र धारा यह रही है ॥८॥ हे रघुवंशभूपण ! इन सब नीचोंके दलने मुझे पकड रफवा है, यह आपका दास तुलसी सदा चिन्ताके यश रहता है। इस कराल कलिकालके भयसे डरे हुए मुहाको आप कृपा करके वचाइये ॥९॥ [६०] देव- नामि नारायणं, नरं करुणायनं, ध्यान-पारायणं, ज्ञान-मूलं । अखिल संसार-उपकार-कारण,सदयहृदय, तपनिरत,प्रणतानुकूलं॥१॥ श्याम नव तामरस-दामधुति वपुप,छवि कोटि मदनार्क अगणित प्रकाश तरुण रमणीय राजीव-लोचन ललित वदन राकेश,कर-निकर हास ।।२।। सकल सौंदर्य निधि,विपुल गुणधाम,विधि-वेद-बुध-शंभु-सेवित,अमान। अरुण पदकंज-मकरंद मंदाकिनी मधुप-मुनि,द कुर्वन्ति पानं ॥३॥ शुक्र प्रेरित घोर मदन मद्-भगत, क्रोधगत,योधरत,ब्रह्मचारी । मारकंडेय मुनिवर्यहित कौतुकी बिनहि कल्पांत प्रभु प्रलयकारी ॥४॥ - Fepal विकटतर वक्र क्षुरधार प्रमदा, तीन दर्प कंदर्प खर खड्गवारा। पान करते हैं॥३॥ जो इन्द्रसे भेजे गये भीषणकामदेवक- विनय-पत्रिका पुण्य वन शैलसरि पद्रिकाश्रम सदासीन पमासनं, एक रूप । सिद्ध-योगींद्र-शृंदारकानंदप्रद, मद्रदायक दरस अति अनूपं ॥५ मान मनभंग, चितमंग मद, क्रोध लोमादि पर्वतदुर्ग, मुवन-मर्चा द्वेष-मत्सर-राग प्रबल प्रत्यूह प्रति, भूरि निर्दय, क्रूर कर्म कर्चा | धीर-गंभीर-मन-पीर-कारक, तत्र के वराका वयं विगतसारा I परम दुर्घट पथं,खल असंगत साथ, नाथ! नहिं हाथ वर विरति-यष्टी। दर्शनारत दास,त्रसित माया-पाश,बाहि हरि,बाहि हरि,दास कष्टी। दासतुलसी दीन धर्म-संबलहीन,अमित अति संद, मति मोह नाशी । देहि अवलंब न विलंब अंभोज-कर, चक्रधर तेजवल शर्मराशी । भावार्थ-मैं उन श्रीनर-नारायणको नमस्कार करता है, जो करुणा स्थान, ध्यानके परायण और ज्ञानके कारण हैं। जो समस्त संसार उपकार करनेवाले, दयापूर्ण हृदययाले, तपस्या में लगे हुए और शरणार भक्तोंपर कृपा करनेवाले हैं ॥३॥ जिनके शरीरकी कान्ति नवीन-न- फमलोंकी मालाके समान है। जिनका सौन्दर्य करोड़ों कामदेवों के सा और प्रकाश अगणित सूर्योके समान है। नव-विकसित मुन्दर कमल समान जिनके मनोहर नेत्र है, चन्द्रमाके समान सुन्दर मुख है में चन्द्रमाकी किरणों के ममान जिनकी मन्द मुसकान है ॥२॥ जो सन मुन्दरताके भण्डार, अनेक दिव्य गुणों के स्थान और प्रमा, येद, वि- लेवित होनेपर भी मानरक्षित हैं। जिनके लाल-ह हुएमन्दाकिनी (गंगाजी)रूपी मकरन्दका मुनि विनय-पत्रिका कामर्दन करनेघाले, मोधरहित, शुद्ध योधस्वरूप और ब्रह्मचारी है। जेन्होंने अपने सामर्थ से विनाही कल्पान्तके मार्कण्डेय मुनिको दिखाने- के लिये प्रलयकालकी लीला की थी ॥४॥ जो पवित्र यत, पर्वत और नदियोंसे पूर्ण यदरिकाश्रममें सदा पद्मासन लगाये एकरूपसे (अटल) विराजमान रहते हैं। जिनका अत्यन्त अनुपम दर्शन सिद्ध, योगीन्द्र और देषताओको भी आनन्द और कल्याणका देनषाला है ॥५॥ हे विश्वम्भर ! यहाँ मापके बदरिकाश्रमके मार्ग मनभंग' नामक पर्वत है, (जिसे देव- कर लोग भागे यदनेसे हिचकते हैं) और यहाँ मेरे हृदयमें अभिमानरूपी मनमंग है। (जिससे साधनका उत्साह भंग हो जाता है) यहाँ 'चित्त- मंग' पर्वत है, तो यहाँ मद ही चित्तभंगका काम करता है। यहाँ जैसे कठिन-कठिन पर्वत है तो यहाँ काम-लाभादिकठिन पर्वत है। यहाँ (जैसे हिंसक पशु आदि यड़े विसई) तो यहाँ राग-द्वेष-मत्सर मादि भनेक बड़े मारी विन्न है, जो सय यई ही निर्दय और दुष्ट है ॥६॥ यहाँ कामिनी. ही पलीटेदी नजर ही दुरेको भयङ्कर धार और कामका पिप ही तलवार की तेज भार है, जो बड़े-बड़े धीर और गम्भीर पुरुषोंके मनको भी पीड़ा पहुँचा रहा है, फिर इम-सरीखे निर्वलोकी तो गिनती ही क्या है। ॥७॥ माय ! प्रथम तो यह भापके पर्शनका मार्ग होपड़ा कठिन है, फिरदुए भौर नीचौका (मेरा)माय हो गया है,सहारेके लिये हायमें घेराग्यरूपी टकड़ी नहीं है। यह दास मारके दर्शनके लिये पथरा रहा है, परन्तु मायाके फन्दे में कसकर दुमी हो रहा है। हे नाय! दासके फटको दूरकर इसकी रया कोजिये, रक्षा कीजिये ८॥ मुहदीन मुलमीदासके पास धर्मपी मार्गस्यप (कलेपा) मोमही है, पर यहादुयो हो रहा और दीविद मूर्ति पदोमके कामणके यहा। उसके पूर्वजनेजादल रुचिरसुकपोल, दरग्रीव सुखसीव, हरि,इंदुकर-कुंदमिव मधुरदासा । वर्तमान विन्दुमापानीकी यार्थी और सामीजी विराजती। परतुन बादकी समापिन की दुलमीशानी के समय हामी चिनय-पत्रिका हूँ, मोहने मेरी बुद्धिका भी नाश कर दिया है। अतएव हे चक्रय आप तेज, वल और सुग्यकी राशि है, मुझे यिना विलम्ब । करकमलका सहारा दीजिय ॥२॥ [३१] देव- सकल सुखकंद, आनंदवन पुण्यकृत, बिंदुमाधव द्वंद्व-विपतिहार यस्यांधिपायोजअज-शंभु-सनकादि,शुक शेप,मुनिदअलि निलया अमल मरकत श्याम, काम शतकोटि छवि,पीतपट तड़ित इब जलदनी अरुण शतपत्र लोचन,विलोकनि चार, प्रणतजन-सुखद,करुणाईशीट काल-गजराज-मृगराज, दनुजेश-वन-दहन पावक, मोह-निशि-दिन चारिभुन चक्र कौमोदकी जलज-दर, सरसिजोपरि यथा राजहंस ॥३॥ मुकुट,कुंदल,तिलक,अलकअलिबावइव,भृकुटि, द्विज,अधरवर,चाहना उरसि वनमाल सुविशाल नवमञ्जरी, भ्राज श्रीवत्स-लांछन उदारं। परम ग्रभन्य,अविधन्य,गतमन्यु, अज, अमितपल, विपुलमहिमा.अ. हार-केयूर, फर कनक कंकन रतन-जटित मणि-मेखला कटि प्रदेश पुगल पद नूपुरामुखर कलहंसयत, सुभग सांग सौंदर्य वैशं ॥ सकल सौभाग्प-संयुक्त लोक्य श्री दक्षि दिशिरुचिर पारीश-कन्या पसत विषुधापगा निकट तट सदनयर, नयन निरसंति नर तेऽति धन विनय-पत्रिका अखिल मंगल-भवन,निविड़ संशय-शमन,दमन-वृजिनाटवी, कष्टही। विश्वधूत, विश्वहित, अजित, गोतीत,शिव,विश्वपालन-हरण,विश्वकर्ता ज्ञान-विज्ञान-वैराग्य-ऐश्वर्य-निधि, सिद्धि अणिमादि दे भूरिदानं । ग्रसित-भव-व्याल अतित्रास तुलसीदास, प्राहि श्रीराम उरगारि-यानं॥ भावार्थ-हे विन्दुमाधव! आप सब सुखोंकी वर्षा करनेवाले मेघ हैं, आनन्दवन काशीको पवित्र करनेवाले हैं, रागद्वेदि द्वन्द्वजनित विपत्ति. कोहरनेवाले आपके चरणकमलों में ब्रह्मा, शिव और सनक सनन्दनादि तथा शेष और मुनिरूपी भ्रमर सदा निवास किया करते हैं ॥१॥ आप निर्मल नीलमणिके समान श्यामरूप हैं, सौ करोड़ कामदेयोंके समान भापकी सुन्दरता है, पीताम्यर धारण किये हैं। यह पीताम्यर नीले यादलमे बिजलीक समान शोभित हो रहा है। आपके नेत्र लाल कमलके समान है, मुन्दर चितयन है, भक्तोंको मुख देनेवाले हैं और करणा-रससे खाभाविकही भीगे रहते ६२॥ आप कालरूपी द्वायीको मारने के लिये सिंह राक्षसरूपी धनके जलाने के लिये अग्नि और मोहरूपी रात्रिके नाश करनेके लिये सूर्यरूप ६ चारों भुजाओंमें शंख, चक्र, गदा भीर पन धारण किये आपके हाथमें श्वेत शंस, कमलके ऊपर कि मुसलमान मन्दिर तोदनेवाले हैं तो मूर्तियाँ अपने घरमें उठा ले गया 1 उप समर शैयारी के विचनापत्रीका और वैष्णवराशीके विन्दुमापरजीय मन्दिर तोड़ा गया और उसीकी जगह मजिर बनायी गयी। एक पवयरा मन्दिरका की है। दूरुप उसी मेलमें पनाया गया । गुलसीदासजी जहाँगीरके समपमें थैकुण्टवासी हुए भोर मन्दिर भौरंगजेब रासान में टोदे गये। -

'तुलसीदासको संसाररूपी सर्प निगले जा रहा है, इससे।
-
चिर शोभायमान हो रहा है। आप ग्रामका यदुत मादर करनेवाले
मोधरहित, अजन्मा, अपरिमित पगफमी, महा महिमाचले
स्थान, कठिन-कठिन सन्देहोंके नाश करनेवाले, पापरूपी यनरी
करनेवाले और कठोके हरनवाले हैं। आप विश्वको धारण करनेवार
विश्वके हितकारी, अजेय, मन-इन्द्रियोसे परे, कल्याणरूप और विधा
६) अणिमादि महान् सिद्धियोंके देनेवाले बहार
पिमर-पत्रिका
मंडे हुए रामर ममान शामिल हो मनकार मा
कानों में कुण्डल, मालपर मिलक, भ्रमरममूहममान काली मन
भ्रपुटी, सुन्दर दोन दीठ मीर नामिका यही ही मुन्दर हैं। मुन्दर
भार शंषक समान प्रीया मानां मा मुमकी मीमा ।। हे हरे!
मधुर मुसकान चन्द्रकिरण भीर कुन्दामुमो ममान है !
हश्यपर नयी मंजरियामहित विशाल पनमाला और मुन्दर :
अनन्त है। आपको धन्य धन्य है मापदयपर हार..
मोनेके याजूयन्द, हायोंमें रत्नजडित कंकण और कटिदेवाने
तागड़ी धारण किये हैं। दोनों चरणाम हंसके समान मु.
फरनेवाले नूपुर पहिने हैं। आपके समस्त अंग सुन्दर
और मा
सारा ही येश सुन्दरतामय है । समस्त सामाग्यमयी तीनों लोई
गंगाजीफे समीप सुन्दर मन्दिरमें निवास करते हैं; जो मनुष्य :
आपका दर्शन करते हैं, वे अत्यन्त धन्य हैं ॥७n आप सब
सृजन, पालन तथा संहार करनेवाले हैं या आप ज्ञान, विज्ञान,
शोमासमुद्र
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विनय-पत्रिका
-भस्यन्त भयभीत है। मनपप सपोंके मायक गरदको सपा करनेवाले
रामजी! पपा करके मुझ पचा लीजिये ॥२॥
राग आसायरी
-
.
[२]
दि परम पन्छ, परम पड़ा।
नरसमिस हपिर पिन्दुमाधय छरि निरखहि नयन अपाई ॥१॥
निगद किगार पीन मुंदर पY, साम मुरचि अधिमाई।
नीलकंज, पारिद, समाल, मनि, इन्द्र तनुते इति पाई ॥२॥
'महल परन गुभ चिन, पदल नख, अति अभूत उपमाई ।
अरन नील पापोज प्रसर अनु, मनिनुन दल गसुदाई॥३॥
जाप मनि-अस्ति मनोहर, नूपुर जन-सुगदाई।
अनुर उर हरि पिपिए रूप परि, रहे पर मरन मनाई ॥४॥
पटियर रति पार किकिनि-र, अनुपम, परनि न जाई ।
होम अलज पाल फदित माय उनु, मधुरर सगर गराई॥५॥
र रिमाल भृगुपन पाल अनि, एपर फोमदनाई।
न पार रिधि भूपन विधि, रपि निज मन ना ॥६॥
पनिमाल प प्रा दिन पनि ।
र जगन-बटन दारिद, ना पी पाई ॥७॥

सागरकी शोमा भसीम। ऐसा जान पड़ता है मानो मोला
(श्याम) मैप, नमाल और नीलम मणिने हाँके शरीरी शाम
की. जिनककोमल धरणाम सुन्दर (पन्न अंपुगादि) शुभ
भारमयाँदी पसी मति भभूत उपमामानोहार
रजयुत पनाका समूह निकला हो सागर
यिनय-पत्रिका
भुजगभोग-भुजदंड कंज दर चक्र गदा बनि आई।
सोभासीय ग्रीव, चिमुकाघर, बदन अमित छपि छाई॥
कुलिस, कुंद-कुडमल, दामिनि-दुति, दसनन देखि लजाई।
नासा नयन-कपोल, ललित श्रुति कुंडल धू मोहि भाई।
कुंचित कच सिर मुकुट, माल पर, तिलक कहीं समुझाई ।
अलप तड़ित जुग रेख इंदु महँ, रहि तजि चंचलताई।
निरमल पीत दुकूल अनूपम, उपमा हिय न समाई।
बहु मनिजुत गिरि नील सिखरपर, कनक चसन रुचिराई ।
दच्छ माग अनुराग-सहित इंदिरा अधिक ललिताई।
हेमलता जनु तरु तमाल दिग, नील निचोल ओढ़ाई।
सत सारदा सेप श्रुति मिलिक, सोभा कहि न सिराई ।
तुलसिदाम मतिमंद द्वंदरत कह
भावार्थ-इस शरीरका यदी यहाभारीफल और इतनी ही मा.
कि मेत्र वृत होकर धीविन्दुमाधयकी नवसे शिशतक शोमा दे
जो निर्मल, मोसह यर्षके किशोर, पुष्ट हैं और जिनके सुरमा
कौन पिधि गाई।

यिनय-पत्रिका जड़ित नूपुर मनको मोहनयाले मौर भक्तोंको मुग देनेयाले हैं, मानों रावजीके हृदय में अनेक रूप धारण करके भगवान विष्णु सुन्दर मन्दिर नाकर पास कर रहे हों ॥४॥ कमरमें जो तागडीका सुन्दर शब्द हो हा, यह अनुपम है, उसका वर्णन नहीं हो सकता, (फिर भी ऐसा कहा सकता है)मानों सोनेके कमलकी सुन्दर फलियामें भ्रमरोंका मुझपना रम्द (मुखार) हो रहा हो ॥५॥ विशाल पक्षास्थलमें भृगुमुनिके घरण- कवि मंकित होकर आपके यक्षास्थलकी कोमलता पतला रहा है। कंकण आदि नाना प्रकारके गहने ऐसे सुन्दर हैं,मानों प्रह्माजीने मन ठगाकर स्वयं अपने हाथोंसे मनाये ॥६॥ गजमुक्ताओंकी मालाके 'नीच में रनोंकी चौकी ऐसी शोभा पा रही है कि उसका वर्णन नहीं हो सकता (पर समझानेके लिये कहा जाता है कि) मानों (नीले) मेघपर हारागणोंके मण्डलके योचमें नयग्रहोंने येठनेका स्थान बनाया हो। (माय पद है कि नीले मेधके समान भगवान्का शरीर है, तारागणोंका मण्डल जमुक्ताओंकी माला है और उसके धीचमें स्थान-स्थानपर पिरोये हुए (रंग-बिरंगे रन नयग्रहोंके यैठनेका स्थान है) ॥७॥ सर्पके शरीर-सदृश भुजदण्डोंमें कमल, शंख, चक्र और गदा शोभित हो रहे हैं। ग्रीया सुन्दरता- ही सीमा है और ठोड़ी तथा होठोसहित भुखकी असीम छवि छा रही है gen दाँतोंकी ओर देखकर हीरे, कुन्दकलियाँ और बिजलीकी चमक जाती है। नासिका, नेत्र, कपोल, सुन्दर कानोंमें कुण्डल और मी मुझे बहुत प्यारी लगती है ॥९॥ सिरपर धुंधुरवाले याल है, उनपर सोनुकुट पहने हैं, मालपर तिलककी घड़ी शोभा हो रही है, उसे समझाकर कहता हैं, मानों प्रिजलीकी दो छोटी-छोटी रेखाएँ अपनी पश्चलता

मावार्थ-सारीरकायहीथड़ामारीफल और इतनीहीमीय
कि मंत्रता होकर धीविन्दुमाधयकी नम्पसे शिसतक शोमा देता
जो मिमं सोलर यक किशोर, पुष्ट हैं और जिनके गुदा
शागिरीशोमा भीम। पंसा जान पड़सामानोमील
(श्याम) मंध, नमाल और नीलम मणिने इन्हींकेशगरसे शो
कीजिनककोमल घरणाम गुन्दर (पन्न भकुशादि) म
मनॉकी पेमी भति भभूत रुपमा मानों पर
गेलयु पनीका समूह निकला होगांनी
अलप तड़ित जुग रेख इंदु महँ, रहि तजि चंचलताई।
यह मनिजुत गिरि नील सिखरपर, कनक-बसन रुविराई ।
दच्छ माग अनुराग-सहित इंदिरा अधिक ललिताई।
हेमलवा जनु तरु तमाल ढिग, नील निचोल ओदाई ।
यिनय-पत्रिका
भुजगमोग-भुजदंड कंज दर चक्र गदा पनि आई।
सोभासीय ग्रीव, चिचुकाघर, पदन अमित छवि छाई।
कुलिस, कुंद-कुडमल, दामिनि-दुति, दसनन देखि लजाई ।
नासा नयन-कपोल, ललित श्रुति कुंडल धू मोहि भाई।
कुंचित कच सिर मुकुट, माल पर, तिलक कहीं समुझाई ।
निरमल पीत दुकूल अनूपम, उपमा हिय 'न समाई।
सत सारदा सेप श्रुति मिलिक, सोभा कहि न सिराई।
तुलमिदास मतिमंद बंदरत कह कौन चिघि गाई ॥१
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विनय-पत्रिका हित नूपुर मनको मोहनेवाले और भक्तोंको सुख देनेवाले हैं, मानों घजीके हृदयमें अनेक रूप धारण करके भगवान् विष्णु सुन्दर मन्दिर कर वास कर रहे हो ॥४॥ कमरमें जो तागड़ीका सुन्दर शब्द हो है, यह अनुपम है, उसका वर्णन नहीं हो सकता, (फिर भी पेसा कहा सकता है) मानों सोनेके कमलकी सुन्दर कलियोंमें भ्रमरोंकासुहावना ग्द (गुखार) हो रहा हो ॥५॥ विशाल यक्षःस्थल में भृगुमुनिके चरण- चिह्न अंकित होकर आपके वक्षःस्थलकी कोमलता यतला रहा है। कण आदि नाना प्रकारके गहने ऐसे सुन्दर हैं, मानों ब्रह्माजीने मन गाकर स्वयं अपने हाथोंसे यनाये है ॥६॥ गजमुक्ताओंकी मालाके चमें रत्नोंकी चौकी ऐसी शोमा पा रही है कि उसका वर्णन नही हो कना (पर समझानेके लिये कहा जाता है कि) मानों (नीले) मेघपर रागणोंके मण्डलके घोचमें नयग्रहोंने बैठनेका स्थान बनाया हो। (भाष गह है कि नीले मेधके समान भगवान्का शरीर है, तारागणोंका मण्डल जमुक्ताओंकी माला है और उसके वीचमें स्थान-स्थानपर पिरोये हुए रंग-बिरंगे रन नवग्रहोंके यैठनेका स्थान है) ॥७॥ सर्पके शरीर-सदृश . ८॥ दाताका बार देखकर वार, कुन्दकालया और यजलीकी चमक लजाती है। नासिका, नेत्र, कपोल, सुन्दर कानों में कुण्डल और भी मुझे यहुत प्यारो लगती हैं ॥९॥ सिरपर झुंघुरयाले पाल हैं, उनपर हाइकुट पहने हैं,मालपर तिलककी घड़ी शोभा हो रही है, उसे समझाकर "कहता है, मानों विजलीकी दो छोटी-छोटी रेखाएँ अपनी पश्चलता पिपली उदर, गंमीर नामि सर, जहं उपजे विरंचि ग्यानी विनय-पत्रिका छोड़कर चन्द्रमाके मण्डल में निवास कर रही है...' अनुपम पीताम्बर धारण किये हैं, जिसकी उपमा हृदय, समता (फिर मी कल्पना की जाती है) माना : ... शिवरपर सोने के समान यत्र शामित हो रहा हो ॥११॥ दक्षिक प्रेमसहित लक्ष्मीजी विराजमान है। यह ऐसी शोमा पायो । तमालवृक्षके समीप नीला वस्त्र योदे सोनेकी लता पैठी हो । सरस्वती, शेषनाग और वेद सब मिलकर इस शोमाका वर्णन भी पार नहीं पा सकते । फिर मला यह रागद्वेपादिद्वन्द्वॉमें फंसा! मन्दबुद्धि तुलसीदास किस प्रकार गाकर इस शोमाका दन सकता है ॥१३॥ राग जैतधी [३] मन इतनाई या तनुको परम फल । सब अँग मुभग पिन्दुमाधर-छवि,तजि सुमाव, अवलोकु एकात वरुन अरुन अंमोज चरन मृदु, नख-दुति हृदय-तिमिर-हारी । कुलिम-केतु-जब-जलज रेख पर, अंकुम मन-गज-यसकारी। फनम्-जटिन मनि नूपुर, मेखल, कटि-तट स्टति मधुर बानी। डर बनमाउ, पदिक यति मोमित, विध-परन चित कह करी । म्याम लामाम-दाम-चरन पप, पीत रमन मोमा स • "मा अंग" और "नमिन दोनों पाट मिरते।

बिनय पत्रिका ( कंकन केयूर मनोहर, देति मोद मुद्रिक न्यारी । श कंज दर चार चक्रधर, नाग-सुंड-सम मुज चारी ॥५॥ सुग्रीव, छरिसीव चिबुक द्विज, अधर अरुन, उन्नत नासा । व राजीव नयन, ससि आनन, सेवक-सुखद बिसद हासा ॥६॥ चिर कपोल, श्रवन कुंडल, सिर मुकुट, सुतिलक भाल प्राजै । लित भृकुटि, सुंदर चितवनि, कच निरखि मधुप-अवली लाजै ॥७॥ प-सील-गुन-खानि दच्छ दिसि, सिंधु-सुता रत-पद-सेवा । बाकी कृपा-कटाच्छ चहत सिव, विधि, मुनि, मनुज, दनुज, देवा ।।८।। तुलसिदास भव-प्रास मिट तब, जब मवि येहि सरूप अटकै । नाहित दीन मलीन हीनसुख, कोटि जनम भ्रमि प्रमि मटकं ॥९॥ मावार्थ-हेमन! इस शरीरका परम फल केवल इतना ही है किनस. से शियतकसुन्दर भंगोपाले श्रीविन्दुमाधवजीको छविका पलमरके लिये अपने घशल स्वभावको छोड़कर स्थिरताके साथ प्रेममे दर्शन कर ॥१॥ जिनके कोमल धरण नये सिले हुए लाल कमलके समान है, नमोंकी योनि हृदयके मनानरूप भन्धकारको हरनेवाली है। जिन चरणों में पिज, जाजी और कमल भादिको सुन्दर रेनाएँ । मीर अंकुशका विध मनरूपी दाधीको यराम करनेवाला है ॥२ पैराम सोनेक रसहित भूपुर भार कमरमै तागड़ी मधुरस्वरसे बज रही है। पेटपर पनि रेनाएँ पड़ी , माभि सरोपरके समान गहरी है। जहाँमे प्रवासी सरी मामी उत्पन्न हुए पपर धनमाला और उसके बीच में । मणिपाकी मामी भागम्य शोभायमान है, मृगुजीक मामा ॥४॥हायोंमें मनोहर कंकण भौर बाजूयन्द, अंगठी निगर मानन्दवरहीदवाशीकीडगरशयिशालचारी मुजामा संच गदा भीर पा धारण किये संमकममान प्रांश मुदाय कमलय सहसरा नेत्र, चन्द्रमाकसमान मुममण्डल मारमृदुमुमशनर कोमुग्प देनेवालीanामुन्दर कपाल,कानाम कुण्डल,मस्तकपर और मालपर मुन्दर तिलक शोमित हो रहा है। सुन्दर कटानी और मनोहर चितवन है और जिनके काले केशाको देखकर मारॉकी कृपादृष्टि शिव, ब्रह्मा, मुनि, मनुष्य, दैत्य और देवता मी चाहते हैं. बंदीरघुपति करुना-निधान । जाते छूटै भव-मेदभयान।।। विनय-पत्रिका गो विणको मीन लेगा। भील कमला नोकी माला ह जिनका ग है, उमराणा मानो शोमाकी यादी कर सीमा है। मुन्दर टोड़ी, दौत, साल होठ भार नुकीली नासिरा है, भी लर्जित हो रही है ॥७॥ रूप, शील और गुणोंकी सानि सिन्धु श्रीलक्ष्मीजी दक्षिणमागमें विराजित होकर चरणसेवा कर रही हैं, नि तुलसीदासका संसारजनित भय तभी मिट सकता है, जब उसकी इस मुन्दर छविमें अटक जाय, नहीं तो वह दीन, मलीन और सुन्द होकर करोड़ों जन्मांतक व्यर्थ ही भटकता फिरेगा ॥९॥ राग बसन्त [६४] रघुवंस-कुमुद-सुखप्रद निसेस ! सेवत पद-पंकज अज-महेस ।। निजभक्त हृदय-पायोज-भृग । लायन्य वपुप अगनित अनंग ।। - विनय-पत्रिका ते प्रबल मोह-तम-मारतंड । अग्यानभाहन-पावक प्रचंड ॥४॥ भेमान-सिंधु-कुंमज उदार । सुररंजन, मंजन भूमिभार ॥५॥ गादि-सर्पगन-पनगारि । कंदर्प नाग-मृगपति, मुरारि ॥६॥ र-जलधि-पोत चरनारविंद । जानकीपवन आनंद-कंद ॥७॥ दुमंत-प्रेम-बापी-मराल । निष्काम कामधुक गो दयाल ॥८॥ लोक-विलक, गुनगहन राम | कह तुलसिदास पित्राम-धाम ॥९॥ भावार्थ-मैं करुणानिधान धीरघुनाथजीकी धन्दना करता है, जिससे मेरा सांसारिक भेद-शान छूट जाय ॥१॥ धीरामजी रघुवंशरूपी कुमुदको चन्द्रमाके समान प्रफुल्लित करनेवाले हैं। ग्रमा और शिय जिनके चरण. कमलाकी सेवा किया करते हैं ॥२॥ जो अपने भक्तोंके हृदय कमलमें भ्रमरकी भौति निवास करते हैं। जिनके शरीरका लावण्य असंख्य कामदेयोंकि समान ॥३॥ जो पड़े प्रपल मोहरूपी अन्धकारके नाश करने के लिये मूर्य और समानरूपी गहन पनके मल करने के लिये अग्निरूप kn॥ जो भभिमानरूपी समुद्रफे मोबनेके लिये उदार अगस्त्य हैं और देयतामोको सुप देनेवाले तथा (दैत्योंका दलनकर) पृभ्यीका मार उतारनेयाले ५॥ जो राग-द्वेषादिक्षपोंके भक्षण करनेके लिये गरुड़ भौर कामरूपी दायीको मारनेके लिय सिंह हैं तथा मुर नामक दैत्यके भारनेवाले जिनधरणकमत संसार-सागरसे पार उतारनेके लिये जदाज ऐसे धीजानकीरमण रामजी आनन्दकी वर्षा करनेवाले ६ जो हनुमानजीक मेमरूपी पापडीमें इसके ममान सदा विहार परनेयाले मौर निकास मनांके लिये कामधेनुके ममान परम दयालु - -- ग्रिनय-पत्रिका हैं ॥८॥ तुलसीदास यही कहता है कि तीनों लोकोंक शिरोमनि, के वन श्रीरामचन्द्रजी ही केवल शान्तिके स्थान है ॥२॥ राग भैरव रामनाम-अनुरोंगी। राम राम रमु, राम राम रटु, राम राम जपु जीहा । रामनाम-नवनेह-मेहको, मन ! हठि होहि पपीहा ।। सब साधन-फल कूप-सरित-सर, सागर-सलिल-निरासा । रामनाम-रति-स्वाति-सुधा-सुम सीकर प्रेमपियासा । गरजि, वरजि, पापान बरपि पवि, प्रीति परखि जिय जाने । अधिक अधिक अनुरांग उमंग उर, पर परमिति पहिचान । रामनाम-गति, रामनाम-मति, है गये हैं, जे होहिंगे, तेइ त्रिभुवन गनियत पदमागी। एक अंग मग अगमु गबन कर, बिलमु न छिन छिन छाहैं। तुलमी हित अपनो अपनी दिसि, निरुपधि नेम नियात् ।। मागार्म-देजीमतूसदारामराममें रमा फर, रामराम रटाफ राम रामकाजाप किया कर।हेमन! तुमी रामनाममें प्रेमरूपी निरय मंप लिये हट करके परीक्षा पन जाजम पपीहा फो. नदी और मानकर जमकी जरासी मीमाशाम कर फे.यल स्वाती के जयकी एक प्रेम के लिये प्यासारदा ने ही तू भी मी सायना नया फलोंकीमाशाम करयल धीरामनाम विनय-पत्रिका अमृतको यूँदमें ही प्रीति कर ॥२॥ पपीहेपर उसका प्रेमी मेघ गरजता है,डाँट बतलाता है, ओले बरसाता है,यज्रपात करता है, इस प्रकार कठिन- से कठिन परीक्षा करके पपीहेके अनन्य प्रेमको पूर्णरूपसे परखकर जब वह इस बातको जान लेता है कि ज्योज्यों परीक्षा लेता हूँ त्यों-त्यों इस पपीहेका प्रेम अधिकाधिक बढ़ता है, तब उसे म्वानीकी बूंद मिलती है। इसी प्रकार (भगवानकी दयासे परीक्षाके लिये कैसे ही संकट आकर तुझे विचलित करनेकी चेयश क्यों न करें )तू तो (अनन्य मनसे) श्रीरामनामकी ही शरण ग्रहण कर, राम-नाममें ही बुद्धिलगा,राम नामका ही प्रेमी बन । ऐसे रामनामके आधित जितने भक्त हो गये हैं, अभी है और जो आगे होंगे, त्रिलोकीमें उन्हीं को यहाभाग्यवान समझना चाहिये ॥४॥ यह (रामनाममें अनन्य प्रेम करनेका) एकांगी मार्ग बड़ा ही कठिन है, यदि नू इस मार्गपर चला जाय तो क्षण-क्षणम (सांसारिक सुग्चोंकी) छाया लेनेके लिये ठहरकर देर न करना । हे तुलसीदास! तेराभला तो अपनी ओरसे श्रीरामनाममें निरुपधि अर्थात् निष्कपट प्रेमके निवाहनेसे ही होगा ॥५॥ [६६ ] राम जपु, राम जपु, राम जपु, बावरे । घोर मव-नीर-निधि नाम निज नाव रे ॥१॥ एक ही साधन सब रिद्धि-सिद्धि साधि रे। ग्रसे कलि रोग जोग-संजम-समाधि रे ॥२॥ मलोजो है, पोचजो है, दाहिनोजो, वाम रे । राम-नाम ही सों अंत सब ही को काम रे ॥३॥ है यह जगत् भ्रमसे आकाशमें फले-फूले दीखनेवाले बाँचेके E सर्वथा मिथ्या है, धूप के महलोंकीभाँति क्षण-क्षणमेंदीखने और मिट इन सांसारिक पदार्थों को देखकर तू भूल मत जोरामनामको पिनय-पत्रिका जग नम-माटिका रही है फलिपति रे । धुर्षों केगे धारहर देखि त् न भूलि रे ॥४॥ राम-नाम छादि जो भरोसा कर और रे। तुलमी परोसो त्यागि मांग कर कार रे ॥५॥ मावार्य-भरे पागल ! राम जप, राम जप, राम जप। संसाररूपी ममुद्रम पार उतरने के लिये श्रीरामनाम ही अपनी ना अर्थात् इस रामनामरूपी नायमें सकता है, क्योंकि यह मनुष्यके अधिकार है ॥१॥ इसी एक सी पलसे सय ऋद्धि-सिद्धियोंको साध ले, क्योंकि योग, संयम और स आदि साधनोंको कलिकालरूपी रोगने प्रसलिया हमला हो, उलटा हो, सीधा हो, अन्तमें सयको एकरामनामसे ही काम पड़ेग , M : कर दूसरेका भरोसा करता है, हे तुलसीदास ! वह उस भूसंकेस जो सामने परोसे हुए भोजनको छोड़कर एक-एक कोरके लिये कु तरह घर-घर माँगता फिरता है ॥५॥ [६] राम राम जपु जिय सदा सानुरागरे । कलि न विराग, जोग, जाग, तप, त्याग रे ।

१२३
विनय-पत्रिका
राम सुमिरत सर विधि हीको राज रे।
रामको पिसारियो निषेध-सिरताज रे ॥२॥
राम-नाम महामनि, फनि जगजाल रे।
मनि लिये फनि जिये, न्याकुल विहाल रे ॥३॥
राम-नाम कामतरु देत फल चारि रे।
कहत पुरान, वेद, पंडित, पुरारि रे ॥४॥
राम-नाम प्रेम-परमारथको सार रे।
राम-नाम तुलसीको जीवन-अधार रे ॥५॥
भावार्थ-जीय! सदा अनन्य प्रेमसे श्रीरामनाम जपा कर, इस
कलिकालमें रामनामके सिवा पैराग्य, योग, या, तपऔर दानसे कुछ भी
नहीं हो सकता ॥१॥ शास्त्रोंमें विधिनिषेधरूपसे कर्म पतलाये , मेरी
सम्मतिम धीराम-नामका स्मरण करना ही सारी विधियों में राज-विधि
मौर श्रीरामनामको भूल जाना ही सबसे यदकर निषिद्ध कर्म ६ ॥२॥
राम-नाम मदामणि है और यह जगत्का जालसाँप है। जैसे मणि ले लेनेसे
सोप प्याकुल होकर भर-सा जाता है, इसी प्रकार रामनामरूपी
मणि ले लेनेसे दुःखरूप जगत्-जाल आप ही भएप्राय हो जायगा ॥३॥
मरे! यह राम नामकस्पषस हैजो अर्थ, धर्म, काम, मोक्षधारों फलोंका
देनेवाला है। इस पातको पेद, पुराण, पपिरत और शियजी महाराजभी
पता श्रीराम-नाम प्रेम भौर परमार्थ अर्थात् मक्ति-मुनि दोनोंका
सार भीर यह रामनामाम तुलसीदासक तोडापनकामाधारही है॥५॥

यिनय-पत्रिक दुख पाइहै। [६८] राम राम राम जीह जोली तू न जपिहै। तौलौं, तू कहूँ जाय, तिहूँ ताप तपिह ॥ १ ॥ सुरसरि-तीर बिनु नीर सुरतरु तरे तोहि दारिद सताइहै ॥२॥ जागत, बागत, सपने न सुख सोइहै । जनम जनम, जुग जुग जग राइहै ॥३॥ छुटियेके जतन मिसेप चाँघो जायगो । हैहै विप मोजन जो सुघा-सानि खायगो ॥४॥ तुलसी तिलोक, तिहूँ काल तोसे दीनको।' रामनाम ही की गति जैसे जल मीनको ॥५॥ मायार्थ-हे जीय!जयतकतूजीमसेराम नाम नहीं जपेगा,त कहीं मी जा, तीनों सापोंसे जलता ही रहेगा ॥१॥ गंगाजीके जानेपर मी तू पानी यिना तरमकर दुखी होगा, कल्पवृक्ष ने तुझे दरिदता मताती देगी २ जागते, मोते और मपने में सुरे गुण महीं मिलेगा, इस समागमें जन्म जन्म भोर युग-युगमे । ही पड़ेगा ३ मितने ही छटनेके (दूसरे) उपाय करेगा (रा' निमुन होने के कारण) उतना ही भोर कमकरधनाजाया मीन मी ना. टिप विप समान हो जाया nan हे तुलसी दामको नीनों लोकों भोर तीनों कालोमें एक ग्रीरामनामका भरोगाम मछलीको जलका

।
गुमिस गानों, नाम ।
र निलो ग १॥
भाmiriri:
गार. frrii. साहरि दीना॥
आमा गुमाint
पोत पाए और inku
पाप , REE FREE
गर in गया|
SAMIR नाय ।
gratी को 11
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Pre here ten remem
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Mommerivernment

गनपत्रिका नौगजा) Minanा या गाभा... का मा-बाप भी निगारका मामगार-मागरमे लिये यह पुन मी ग मुसार मगर पालिका प्रधान' Anan गम-नामक समान पनि गायन मग कान है। निम करनेसे तुलमो के समान ऊमामी मुन्दर (मनिमपी प्रचुरधा उपजाऊ भूमि बन गया [30] मलो भली मांति है जो मेरे कह लागिहें । मन राम-नामसों मुमाय अनुरागिहै ॥१॥ राम-नामको प्रभाउ जानि जुड़ी आगिहै । सहित सहाय कलिकाल मीरु मागिह ॥२॥ राम-नामसों विराग, जोग, जप जागिहै । वाम विधि माल ह न करम दाग दागिहै ॥३॥ राम-नाम मोदक सनेह सुधा पाहि । पाइ परितोप तू न द्वार द्वार बागिहै ॥ ४॥ राम-नाम काम-तरु जोइ जोइ माँगिहै । तुलसिदास स्वारथ परमारथ न खाँगिहै ॥५॥ भावार्थ-हे मन ! यदि मेरे कहेपर चलकर, स्वमायसे ही' नामसे प्रेम करेगा तो तेरा सब प्रकारसे भला होगा ॥१॥ राम कँपा देनेवाली सर्दीका नाश करने के लिये अग्निके सा

विनय पत्रिका
मनुष्यको बुद्धिको विचलित कर देनेवाला कलिकाल अपने (काम-क्रोधादि)
सहायकों समेत रामनामके डरसे तुरन्त माग जायगा ॥२॥ राम-नामके
प्रभावसे वैराग्य, योग, जप, तप आदि आप ही जागृत हो उठेगे;फिर धाम
विधाता भी तेरे मस्तकपर पुरे कर्म-फल अंकित नहीं कर सकेगा, अर्थात्
तेरे सारे कर्म क्षीण हो जायेंगे ॥३॥ यदितूराम-नामरूपीलड्डूको प्रेमरूपी
अमृतमें पागकर सायगा तो तुझे सदाकं लिये परम सन्तोष प्राप्त हो
जायगा, फिर मुखके लिये घर-घर भटकना नहीं पड़ेगा ॥४॥ राम नाम
कल्पवृक्ष है, इससे हे तुलसीदास ! तू उससे खार्थ-परमार्थ जो कुछ भी
गेगा, सोसभी मिल जायगा, किसी यातकी कमी नहीं रहेगी ॥५॥
[७१]
ऐसेहू साहयकी सेवा सों होत चोरु रे ।
आपनी न यूझ, न कह को राँडरोरु रे॥१॥
मुनि-मन-अगम, सुगम माइचापु सों ।
कृपासिंधु, सहज सखा, सनेही आपु सों ॥२॥
लोक-बेद-विदित पड़ी न रघुनाथ सों।
सब दिन सब देस, सबहिके साथ सों ॥३॥
खामी सरवग्यसों चले न चोरी चारकी ।
प्रीति पहिचानि यह रीति दरबारकी ॥४॥
काय न कलेस-लेस, लेत मान मनकी ।
सुमिरे सकुचि रुचि जोगवत, जनकी॥५॥

है,जिसमें सब प्रकारके फल फलते ६६ जिर श्रीराम मुनियोंके मनको भी अगम है, यही मक्तॉक लिये माता-पि समान मुगम है, कृपाकेममुद्र है, म्यमावसे ही मित्र और अपने रहते हैं ॥३॥ (सच्चे मनसे श्रीरामसे प्रेमकर, क्योंकि वे स्वामी सर्व उनसे सेवककी चोरी छिपीनहीं रह सकती। वहाँ प्रेमकी ही पहचान है, यही उनके दरवारकी नीति है ॥४॥ उनकी सेवामें शरीरको जरा है। प्रेमसे स्मरण करते ही घे संकोचमें पड़ जाते हैं और सेवर रुचि देखने लगते हैं, अर्थात् भक्तोंको मनमानी पस्तु देकर मी। संकोचमें रहते हैं कि हमने कुछ भी नहीं दिया ॥५॥ वह जिसपर प्रम उसके वशम हो जाते हैं और जिसपर नाराज होते है। छुड़ाकर) अपने परम धाममे भेज देते है। उनका पिनय पत्रिका रीम पम होत, सीस देव निज धाम रे । फलत मकल फल कामतानाम ॥६॥ ये खोटो दाम न मिले, न रासे काम रे । सोऊ तुलसी निवाज्यों ऐसो राजाराम रे॥७॥ भावार्थ-मर ! से म्यामीकी मयास भी अपना जी चुगात तुममें न तो अपनीमम है और न तुझे दूसरेके कहेका ही कुछ बया तू तो किसी भी कामका नहीं, पत्थरका रोड़ा है ॥१॥ जो म ही मेम करनेवाले हैं ॥२॥ यह यात लोक और पेदमें प्रसिद्ध है कि मी नाथजीसे यहा कोई भी नहीं है, चे सर्वदा, सर्वत्र और समीके, भी कट नहीं पहुँचता, ये स्वामी मनके प्रेम और सेवाको ही मान L- १२९ यिनय-पत्रिका बेचनेपर एक खोटा पैसा नहीं मिलना और रखनेसे कुछ काम नहीं निकलता, ऐसे तुलसीदासको भी जिन्होंने निहाल कर दिया, ऐसे राजाधिराज थोरामजीका क्या कहना है ? ॥७॥ [७२] मेरो भलो कियो राम आपनी मलाई । ह्रीं तो साई-द्रोही पै सेवक-हित साई ॥१॥ रामसों बड़ो है कौन, मोसों कौन छोटो। राम सो खरो है कौन, मोसो कौन खोटो ॥२॥ लोक कई रामको गुलाम ही कहायौं । एतो पड़ो अपराध मौ न मन बाचौं ॥३॥ पाथ माथे चढ़े तुन तुलसी ज्यों नीचो । चोरत न बारि ताहि जानि आपु सींचो ॥४॥ मावार्थ-श्रीरामजीने अपने भलेपनसे ही मेराभला कर दिया। (मेरे कर्तव्यसे मला होनकी क्या आशा थी ?) क्योंकि मैं तो स्वामीके साथ धुराई करनेवाला है। परन्तु मेरे स्वामी श्रीराम सेवकके हितकारी है ॥१॥ श्रीरामजीसे तो बड़ा कौन है और मुझसे छोटा कौन है ? उनके समान बरा कौन है और मेरे समान खोटा कौन है ? ॥२॥ संसार कहना है कि मैं (तुलसीदाम) गमजीका गुलाम हूँ, और मैं भी यह कहलवाता है। (वास्तवमै रामका सेवक न होकर भी मैं इस पदवीको स्वीकार कर लेता हूँ) यह मेरा पड़ा भारी अपराध है, तो भी श्रीरामका मन मेरी तरफसे तनिक भी नहीं फिरा ॥३॥ हे तुलसी ! जैसे तिनका ९ सर्प डस रहा है ॥२॥ वेद और विद्वान् पुकार-पुकारकर कह रहे है यिनय-पत्रिका यहुत नीच होनेपर भी जलके मस्तकपर चढ़ जाता है, (ऊपर उतराने लगता है) परन्तु जल उसे अपने द्वारा ही साँचकर पालापोसा हुआ समझकर डांता नहीं । (इसी प्रकार भगवान श्रीरामजी समझते हैं) ॥४॥ [७३] जागु, जागु, जीव जड़ ! जोह जग-जामिनी । देह-गेह-नेह जानि जैसे घन-दामिनी ॥ १ ॥ सोवत सपनेहूँ सहै संसृति-संताप रे। TO बूडयो मृग चारिखायो जेवरीको साँप रे ॥२॥ कहैं वेद-बुध, तू तो यूझि मनमाहिं रे। दोष-दुख सपनेके जागे ही पै जाहि रे ॥३॥ तुलसी जागेते जाय ताप तिहूँ ताय रे । राम-नाम सुचि रुचि सहज सुमाय रे ॥ ४ ॥ भावार्थ-अरे मूर्ख जीर!जाग जाग! इस संसाररुपी रात्रिकोदेव! शरीर और धर-कुटुम्बके शेमको ऐसा क्षणभंगुर समझ जैसे बादलोंके यीचको चिजली, जो क्षणभर चमककर ही छिप जाती है ॥ (जागर्नके समय ही नहीं) तू सोते समय सपनमें भी संसारके कष्ट ही सब रहा है, अरे! तू भ्रमसे मृगतृष्णाके जाल में इया जा रहा है और तुझे रस्मीश

२१
यिनय-पत्रिका
मानरूपी निद्वासे जागनेपर ही नष्ट होते हैं और तभी श्रीराम-नाममें
हैतुकी स्वाभाविक विशुद्ध प्रीति उत्पन्न होती है ॥४॥
राग विभास
[७४]
जानकीसकी कृपा जगावती सुजान जीव,
जागि त्यागि मूदताऽनुरागु श्रीहरे ।
करि विचार, तजि विकार, मजु उदार रामचंद्र,
भद्रसिंधु, दीनबंधु, वेद पदत रे॥१॥
मोहमय कुहू-निसा विसाल काल विपुल सोयो,
खोयो सो अनूप रूप सुपन जू परे ।
अप प्रमात प्रगट ग्यान-मानुके प्रकास,यास-
ना, सराग मोह-द्वैप निविड़ तम टरे ॥२॥
मागे मद-मान चोर मोर जानि जातुपान
फाम-फोह-लोम-छोम-निकर अपरे ।
देखत रघुवर प्रताप, चीते संताप-पाप,
ताप प्रिविध प्रेम आप दूर ही करे ॥३॥
नवन मुनि गिरा गॅमीर, जागे अति धीर वीर,
पर विराग-चोप सकल संत आदरे ।
तुलसिदास प्रस कपाल, निरसिजीवजन विहाल,
भन्यो भव-जाल परम मंगलाचरे ॥४॥

नय-पत्रिका १३३ भावार्थ-(श्रीरामनामके आश्रित) चतुर जीवोंको श्रीरामजीकी पाही (अमानरूपी निद्रासे)जगाती है, (अतएव रामनामके प्रभावसे) र्खताको त्यागकर जाग और श्रीहरिके साथ प्रेम कर। नित्यानित्य तुका विचार करके, काम-क्रोधादि समस्त विकारोंको छोड़कर ल्याणकं समुद्र, दीनयन्धु, उदार श्रीरामचन्द्रजीका भजन कर, यो दकी आशा है ॥१॥ मोहमयी थमायस्याकी लम्बी रात्रिमें सोते हुए हो यष्टुन समय यीत गया और माया-स्यममें पड़कर तू अपने भनुपम जन्मस्वरूपको भूल गया। देख ! अय सयेरा हो गया है और शानरूपी र्यका प्रकाश होते ही यासना, राग, मोह और द्वेषरूपी घोर अन्धकार र हो गया है ॥२॥ प्रातःकाल हुमा समझकर गर्य मोर मानरूपी घोर गने लगे नया काम, क्रोध, लोभ और क्षोमरूपी राक्षसोंक समा बने भाप डर गये । श्रीरघुनाथजीके प्रचण्ड प्रतापको देखते ही पाप नाप नष्ट दो गये भीर नीन प्रकारके ताप श्रीरामजीके प्रेमम्पी टने शान्त कर दिये ॥ स गम्भीर पाणीको कानोंगे सुनकर र-मन मोह निद्रामे जाग उठे भीर उन्होंने सुन्दर ये नोर मादिको यादग्मे अपना दिया। हे तुलसीदाग पामय रामचन्द्रजीने मन-जायोकोप्याचल मकर गंगार-पी जातो का भार उन्हें परमानन्द प्रदान करने स्टंग मग गवगे हो, सर्ग मां, गामों घट यों कहाँगो, ३ विनय-पत्रिका म चचन-हिये, कहीं न कपट किये, ऐसी हठ जैसी गाँठि पानी परे सनकी ॥१॥ रो, भरोसो नाहि, पासना उपासनाकी, यासव, चिरचि सुर-नर-मुनिगनकी। रथके साथी मेरे, हाथी खान लेवा देई, काहू तो न पीर रघुबीर ! दीन जनकी ।। २।। -प-सभा सावर लपार भये, देव दिव्य, दुसह साँसति की आगे ही या तनकी। चे परी, पाऊँ पान, पंचमें पन प्रमान, तुलसी चातक आस राम स्थामयनकी ॥३॥ भावार्थ-पुरा-भला जो कुछ भी हैं सो थापका है। आपकी माह में आपसे झूठ क्यों कहूँगा?भापतोसभी मनकी बात जानत हमि कपटसे हो परन्तु कर्म,पयन और हदयसे कहता है कि मैं आपका है। यह माप- की गुलामीका इठ नना पका है जैसे पानीसे भीगे हुए मनको गोठ ॥१॥ रामजी ! न तो मुझे दूसरेका भरोसाई और न मुझे इन्द्र, प्रला अधया न्य देवता, मनुष्य भीर मुनियोंकी उपासना करनेकी हीरच्छायापक सेवा समी स्वार्थक सापी, जन्मभर दायीको तरह मेया करनेपर कहीं से जैसा मुच्छ फल देते है।इनमेंसे किसी को भी दोनों दुग मी हानुभूति नहीं है, जैसी भापकोई ॥२॥ हे विष्यदय, मैं मापका गुलाम " यह पात पनि में सूट कहना है तो मेरे इस शरीरको अपने ही मागे नय-पत्रिका ॥ असहा कष्ट दीजिये जैसा मोपोंकी समाने (साँपको यश करनेका प नहीं जागनेवाले) झटे मरेको मिलता है अर्थात् उस पाखण्डीको पफाट माते हैं। और यदि मंसशा(रामका गुलाम)सिद्ध हो जाऊँ तो साथ ! मुझे पंचोंके बीच में सचाईका एक यीड़ा मिल जाय । क्योंकि - तुलसीरूपी चातकको एक रामरूपी श्याम मेघाही आशा है ॥३॥ रामको गुलाम, नाम रामबोला राख्यौ राम, काम यहै, नाम ? हाँ कपहूँ कहत हो। रोटी-लूगा नीकै राखे, आगेहूकी घेद भाखै, मलो हहै तेरो, ताते आनंद लहत हौं ॥१॥ गाँध्या हो करम जड़ गरय गूढ़ निगड़, सुनत दुसह हों तो साँसति सहत हौं। आरत-अनाथ-नाथ, कौसलपाल, कृपाल, लीन्हों छीन दीन देख्यो दुरित दहत हो ॥ बुझ्यौ ज्योंही, कहो, मैं हूँ रो हारावरोजू कुमाएर मेरो कोऊ कहूँ नाहिं, चरन गहत हों। माँजो गुरु पीठ, अपनाइ गहि चाँह, बोलि सेवक सुखद, सदा रिद यहत हौं ॥३॥ लोग कहें पोच, सो न सोच न सँकोच मेरे .

५ विनय-पत्रिका तुलसी अकाज-काज राम ही के रीझे-खीझे, प्रीतिकी प्रतीति मन मुदित रहत हौं ॥४॥ भावार्थ-मैं श्रीरामजीका गुलाम हूँ। लोग मुझे 'रामयोला' कहने को हैं। काम यही करता हूँ कि कभी-कभी दो चार वार राम नाम कह ता है। इसीसे राम मुझे रोटी-कपड़ोंस अच्छी तरह रखते हैं। यह तो स लोककी बात हुई, आगे परलोकके लिये तो वेद पुकार ही रहे हैं कि उम-नामके प्रतापसे तेरा कल्याण हो जायगा । वस, इसीसे मैं सदा सन्न रहता हूँ ॥१॥ पहले मुझे जड़ कोने अहंकाररूपी कटिन बेड़ियोंसे सँध लिया था। यह ऐसा भयानक कष्ट था, जो सुननेमें भी बड़ा असह्य -1 मैंने दुखी हो पुकारकर कहा, 'हे आर्त और है अनाथोंके नाथ ! = कोसलेश! हे रूपासिन्धु! मैं बड़ा कष्ट मह रहा हूँ।" (यह सुनते ही) रामने मुझ दीनको पापोंमे जलता हुआ देखकर तुरन्त कर्म-बन्धनसे पुड़ा लिया ॥२॥ ज्यों ही उन्होंने मुझसे पूछा 'तू कौन है' त्यों ही मैंने कहा, हे नाथ ! मैं आपका दास बनना चाहता ।मेरे कहीं भी और कोई नहीं , आपके चरणों में पड़ा है। इसपर भनसुम्बकारी परम गुरुश्रीरामजीने मेरी पीठ ठोंकी, याँह पकड़फर मुझे अपनाया और आश्वासन दिया। जबसे मैं यह (फण्ठी, तिलक, माला, रामनाम-जप, अहिंसा, अभेद, नम्रता आदि) भगवान्का चैष्णवी याना सदाधारण कियेरहता ॥३॥ रामका गुलाम बना देमकर लोग मुझे नीच कहते हैं। परन्तु मुझे इसके लिये कुछ मी चिन्ता या सोच नहीं है, क्योंकि न तो मुझे किसीके साथ विवाह-सगाई करनी है और न मुझे जाति-पाँतिसे ही कुछ मतलब यिनय-पत्रिका है। तुलसीका यनना-बिगदना नो श्रीरामजी रीमने-मीझनमें ही है। परन्तु मुझे आपके प्रेमपर विश्वास है, इमामे में मनमें सदा सानन्द रहता॥४॥ [७] जानकी-जीवन, जग-जीवन, जगत-हित, जगदीस, रघुनाथ, राजीवलोचन राम । सरद-विधु-बदन, मुखसील, श्रीसदन, सहज सुंदर तनु, सोमा अगनित काम ॥१॥ जग-सुपिता, सुमातु, सुगुरु, सुहित, सुमीत, सरको दाहिनो, दीनबन्धु, काहूको न बाम । आरविहरन, सरनद, अतुलित दानि, अनवपाल, कृपालु, पतित-पावन नाम ॥२॥ सकल विख-चंदित, सकल सुर-सेवित, आगम-निगम कहैं रावरेई गुनग्राम इहै जानि तुलसी तिहारो जन भयो, म्यारो कै गनियो जहाँ गने गरीव गुलाम ॥३॥ भावार्थ-हे श्रीरामजी, आप श्रीजानकीजीके जीवन, विश्व प्राण. जगत्के हितकारी, जगत्के खामी, रघुकुलके नाथ और कमलके समान नेत्रवाले हैं । आपका मुखमण्डल शरद्-पूर्णिमाके चन्द्रमाके समान हैं। सुत्र प्रदान करना आपका स्वभाव है। लक्ष्मीजी सदा आपमें रमती हैं। .

विनय-पत्रिका
आपका शरीर स्वाभाविक ही परम सुन्दर है, जिसकी शोभा असंख्य
कामदेवोंके समान है ॥१॥ आप जगत्के सुखकारी पिता, माता, गुरु,
हितकारी, मित्र और सबके अनुकूल है । आप दीनोंके बन्धु है,
परन्तु बुरा किसीका भी नहीं करते ।आप विपत्ति के हरनेवाले, शरण
देनेवाले, अतुलनीय दानी, शरणागत-रक्षक और कृपालु है। आपका
राम-नाम पतितोको पावन कर देता है ॥२॥ सारा विश्य आपकी यन्दना
करता है, समस्त देवता आपकी सेवा करते हैं और सभी घेद-शास्त्र
आपके ही गुण-समूहोंका गान करते हैं । यह सब जानकर तुलसीदास
आपका गुलाम बना है, अय बतलाइये आप इसे अलग समझेंगे या
'गरीव गुलामोंकी नामावलीमें गिनेंगे ॥३॥
राग टोड़ी
[७८]
देव-
दीनको दयालु दानि दूसरो न
जाहि दीनता कहीं ही देखो दीन सोजी
सुर, नर, मुनि, असुर, नाग साहिब तो घनेरे
(पै) तो लो जो लौ रावरे न नेकु नयन फेरे ॥
त्रिभुवन, तिहुँ काल विदित, वेद बदति चारी ।
आदि-अंत-मध्य राम ! साहयी तिहारी ॥३॥
तोहि माँगि माँगनो न माँगनो कहायो ।
सुनि सुभाष-सील-सुजसु जाचन जन आयो॥४॥

३
आपकी नजर फिरते ही चे सय भी छोड़ देते हैं। तीनों लोगों
॥३॥ जिस मिखमंगेने आपसे माँग लिया, यह फिर कमी मिसारी नहीं
अकाम हो गया) आपके इसी स्वभाव-शीलका सुन्दर यश सुनकर यह
दास आपसे भीख माँगने आया है ॥en आपने पापाण (अहल्या
तकको अपना लिया है। हे महाराज दशरथके पुत्र! आपने नीच रंकाको
आपका गरीय गुलाम हूँ ।हे कृपालु (इसीनाते)एक धार यही का
विनय-पत्रिका
पाहन-पसु, रिटप-बिग अपने करि लीन्हें ।
महाराज दसरथक ! रंक गय कीन्हे ॥५॥
तू गरीवको निवाज, ही गरीब तेरो।
पारक कहिये कृपालु ! तुलसिदाम मेरो ॥६॥
भावार्थ-हे श्रीरामजी ! दीनॉपर दया करनेवाला और उन्हें (परम
सुख) देनेवाला दूसरा कोई नहीं है। मैं जिसको अपनी दीनता मुनाना
हूँ, उसीको दीन पाता है। (जो स्वयं दीन है वह दूसरेको क्या देमकता
है ?) ॥१॥ देवता, मनुष्य, मुनि, राक्षस, नाग आदि मालिक तो बहुतेरे
हैं, पर वहींतक है जबतक आपकी नजर तनिक भी टेढ़ी नहीं होती।
तीनों काल सर्वत्र यही प्रसिद्ध है और यही चारों वेद कह रहे हैं कि
आदि, मध्य और अन्तमें, हे रामजी, सदा आपकी ही एक-सी प्रमुता
कहलाया। (यह तो परम नित्य सुखको प्राप्तकर सदाके लिये दृप्त और
पशु(यन्दरभालू), वृक्ष (यमलार्जुन) और पक्षी (जटायु, काकभुशुण्डि)
राजा यना दिया है ॥५॥ आप गरीयोंको निहाल करनेवाले हैं और मैं
दीजिये कि 'तुलसीदास मेरा है ॥६॥

यिनय-पत्रिका
[७९]
देव-
तू दयालु, दीन हो, तू दानि, ही भिखारी ।
ही प्रसिद्ध
पातकी, तू पाप-पुंज-हारी ॥१॥
नाथ तू अनाथको, अनाथ कौन मोसो ?
मो समान आरत नहिं आरतिहर वोसो ॥२॥
ब्रह्म तू, ही जीय, तू है ठाकुर, हौ चेरो।
वात-माव, गुरु सखा तू सब विधि हितु मेरो॥३॥
वोहिं मोहिं नाते अनेक, मानिय जो भावे ।
ज्यों त्यों तुलसी कृपालु ! चरन-सरन पावै ॥४॥
भावार्थ-हे नाथ ! तू दोनोंपर दया करनेवाला है, तोमैं दीन हैं। तू
अतुल दानी है, तो मैं भिखमंगा हूँ। मैं प्रसिद्ध पापी हूँ तो तू पाप-पुओं-
का नाश करनेवाला है ॥१॥ तू अनाथोंका नाथ है, तो मुद्दा-जैसा
अनाथ भी और कौन है ? मेरे समान कोई दुग्बी नहीं है और तेरे समान
कोई दुःखोंको हरनेवाला नहीं है ॥२॥ तू ब्रह्म है, मैं जीय हूँ। तू स्वामी
है, मैं सेवक हूँ। अधिक फ्या, मेरा तो माता, पिता, गुरु, मित्र और
सय प्रकारसे हितकारी तू ही है ॥३॥ मेरे तेरे अनेक नाते हैं, नाता तुझे
जो अच्छा लगे, वही मान ले। परन्तु वात यह है कि हे कृपालु ! किसी
मी तरह यह तुलसीदास तेरे चरणोंकी शरण पा जावे ॥४॥
[८०]
और काहि माँगिये, को माँगियो निवारै ।
अभिमतदातार कौन, दुख-दरिद्र दारै ॥१॥

अच्छे समयमें तो दो दिन समीके दरवाजेपर नगारे धजते हैं, परन्तु दशरथ नन्दन! ऐसा दानी है कि बुरे समयमें भी तु गरीयोंको निहाल कर देता है ॥३॥ कुछ भी सेवा न करनेवाले, अच्छे गुणांसेसचा हीन जिन मनुष्योंने तेरे सामने अपना दुखड़ा सुनाया, उन सरको घरमधाम राम काम-कोटि-रूप रूरी। साहस सर पिघि सुजान, दान-खडग-मूरो ॥२॥ सुसमय दिन निसान सपके द्वार वाज कुसमय दसरथक दानि गरीब निवाज ॥३॥ सेवा दिनु गुनविहीन दीनता सुनाये। जे जे ते निहाल किये फूले फिरत पाये ॥४॥ तुलसिदास जाचक-रुचि जानिदान दीड । रामचंद्र चंद्र तू, चकोर मोहिं कीजै ॥५॥ भावार्थ-हे प्रभो! अव और किसके आगे हाथ फैलाऊँ। दुसरा कौन है जो सदाके लिये मेरा माँगना मिटा दे? दूसरा ऐ- कौन मनोवान्छित फलॉका देनेवाला है जो मेरे दुःख-दारिदयकामा कर दे ? ॥१॥ हे श्रीराम ! तू धर्मका स्थान और करोड़ों कामदेव सौन्दर्य से भी सुन्दर है। सब प्रकारसे मेरा स्वामी है, मनकी म तरह जानता है और दानरूपी तलवारके चलाने में बड़ा शूर है ।२. निहाल कर दिया, इसीसेपे यानन्दसे फूले फिरत ॥४अव तुलमा दास भिखारीके मनकी जानकर आतिश कमी नहीं चाहता बिनय-पत्रिका केवल तेरा प्रेम चाहता है ऐसा जानकर) दान दे और वह यही कि हे श्रीरामचन्द्र ! तू चन्द्रमा है ही, मुझे यस, चकोर बना ले ॥५॥ मनका 4m [ ८१] दीनबंधु, सुखसिंधु, कपाकर, कारुनीक रघुराई । राजार सुनहु नाथ! मन जरत त्रिविध जुर, करत फिरत चौराई ॥१॥ कबहुँ जोगरत, भोग-निरत सठ हठ वियोग-चस होई । कबहुँ मोहबस द्रोह करत बहु, कबहुँ दया अति सोई ॥२॥ कबहुँ दीन, मतिहीन, रंकतर, काहुँ भूप अभिमानी । कबहुँ मूढ, पंडित पिडंपरत, कयहुँ धर्मरत ग्यानी ॥ ३ ॥ कबहुँ देव ! जग धनमय रिपुमय, कपहुँ नारिमय भास । लारा संसृति-संनिपात दारुन दुख दिनु हरि कृपा न नासै ॥ ४ ॥ संजम, जप, तप, नेम, घरम, प्रत, बहु भेषज-समुदाई । तुलसिदास भव-रोग रामपद-प्रेम-हीन नहिं जाई ।।५।। भावार्थ-दे परम दयालु धीरघुनाथजी ! माप दीनोंके यन्धु, सुनके समुद्र और एपाकीखानि ।देनाथ !मुनिये, मेरा मन संसारके त्रिविध तापसे जल रहा है अथवा उसे (काम-क्रोध-लोमरूपी) त्रिदोष व्यर हो गया है और इसीसे पद पागलकी तरह पकता फिरता है ॥१॥ मी पाद योगाभ्यास करता तो कभी बददुए मांगों में फंस जाता है। एमी घटपूर्षक थियोगके यश हो जाता है तो कभी मोहफे यश दौकर नाना मकारके द्रोह करता है भीर कभी धड़ा दयालु धन जाता २॥

नियम, धर्म, प्रत मादिअनेक ओषधियों हैं परन्तु तुलसीदासकासंसार सब प्रकार मलमार लाग निज नाथन्चरन बिसराये ॥३॥ राम-चरन-अनुराग-नीर चिनु मल अति नास न पात्र ॥१॥ हुमा है, यह करोड़ों उपार्योसे मी नहीं छूटता। अनेक जन्मोसे यह पिनय-पत्रिका कमी बीन, युमिहीन, यहा ही कंगाल यन जाता है, तो कमी धन राजा यन जाता है। कमी मूर्म यनताई, तो कभी पण्डित यन जाता है। कभी पापण्टी यनता है और कमी धर्मपरायण धानी बन जाता है । है देय ! कमी उसे मारा जगत् धनमय दीयता है, कभी शत्रुमय और कई ग्त्रीमय दीपता है अर्थात् यह कमी लोममें, कमी मोघम और कमी कार फंसा रहता है। यह मंमाररूपी सनियत-ज्यरका दारुण दुःख रिम- भगवत्-रूपाके फी नष्ट नहीं हो सकता था यद्यपि संयम. ज.ता- रूपी रोग श्रीरामजीके चरणोंके प्रेम बिना दूर नहीं हो सकता। [८२] मोहजनित मल लाग विविध विधि कोटिहु जवन न जाई । जनम जनम अभ्यास-निरत चित, अधिक अधिक लपटाई ॥१॥ नयन मलिन परनारि निरखि, मन मलिन विपय सँग लागे। हृदय मलिन वासना-मान-मद, जीव सहज सुख त्यागे ॥ २॥ परनिंदा सुनि श्वन मलिन मे, वचन दोष पर गाये। तुलसिदास व्रत-दान, ग्यान-तप, सुद्धिहेतु श्रुति गावे । मावार्थ-मोहसे उत्पन्न जो अनेक प्रकारका (पापरूपी) मल लय

विनय-पत्रिका
पापमें लगे रहनेका अभ्यासी हो रहा है, इसलिये यह मल अधिकाधिक
लिपटता ही चला जाता है ॥१॥ पर-स्त्रियोंकी ओर देखनेसे नेत्र मलिन
हो गये है, विपयाँका संग करनेसे मन मलिन हो गया है और वासना,
अहंकार तथा गर्यसे हृदय मलिन हो गया है तथा सुखरूप स्वस्वरूपके
त्यागमे जीय मलिन हो गया है ॥२॥ परनिन्दा सुनते-सुनते कान और
दूसरोंका दोष कहते-कहते यचन मलिन हो गये है। अपने नाथ श्रीराम-
जीके चरणोंको भूल जानेसे ही यह मलका भार सव प्रकारसे मेरे पीछे
लगा फिरता है ॥३॥ इस पापके धुलने के लिये वेदतो व्रत, दान,मान, तप
आदि अनेक उपाय बतलाता है परन्तु हे तुलसीदाम!श्रीरामके चरणोंक
प्रेमरूपी जल बिना इस पापरूपी मलका समूल नाश नहीं हो सकता ॥४॥
राग जैतश्री
[८३]
कछु है न आई गयो जनम जाय ।
अति दुरलभ तनु पाइ कपट तजि मजे नराम मन-वचन-काय ॥१॥
लरिकाई बीती अचेत चित, चंचलता चौगुने चाय ।
जोपन-जुर जुरती कुपथ्य करि, भयो त्रिदोप भरि मदन पाय ॥२॥
मध्य पयस धन हेतु गवाई, कृपी पनिज नाना उपाय ।
राम-चिमुख सुख लयो न सपनेहुँ, निसिरासर तयौ तिहूँ ताय ॥३॥
सेपे नहिं सीतापति-सेवक, साधु सुमति मलि भगति माय ।
सुनेन पुलकितनु, कहे न मुदित मन, किये जे परिवरघुवंसराय॥४॥

जिमसे सारे शरीरमें कामरूपी यायु मरकर सनिपात हो गया। न तो कमी श्रीरामचन्द्रजीके मतोंकी और तुम युखियाले सन- कोहीमतिमायसेमलीमीनियाकी,नधीरघुनायीकी मुलाम कपाको रोमांच कर की मुना श्रीर न कमी प्रमन्ना मनमा विनय-पत्रिका अब सोचत मनि बिनु भुअंगज्यों, विकल अंग दले जरा धाप ! सिर धुनि-धुनि पछितात मीजिकर,कोउ नमीत हित दुसह दाय॥५॥ जिन्ह लगिनिज परलोक विगारथी, ते लजात होत ठाड़े ठाँय। तुलसी अजहुँ सुमिरि रघुनाथहिं, तरयौ गयेद जाके एक नाय ॥६॥ भावार्थ-हाय ! मुझसे कुछ भी नहीं यन पड़ा और जन्म यों ही बीर जा रहा है । यड़े दुर्लम मनुष्य शरीरको पाकर निष्कपट-मायसे तर मन-वचनसे कमीश्रीरामका मजन नहीं किया ॥१॥ लड़कपन पीता, उस समय चित्तमें चौगुनी चश्चलना और (सेलने-शानी प्रसन्नता थी। जयानीरूषी ज्यर चढ़नेपर स्त्रीरूपी कुपथ्य कर लिया (जयानी ढलनेपर ) यीची अवस्था सेती, व्यापार और भनेक उपास में धन कमानेमें भोयी, परतु धीरामसे विमुख होने के कारण भी में भी मुम नहीं मिला, दिन-रात संमारके तीनों सापसे जलता तोपान ॥४॥ भय जवकि युदाने माकर मारे अंगों को प्याकुल कर नत्र मनिट्टीन मांगमान चिन्ता करना ,मिर शुन-धुनकर भी मट मला पटताता रममय दाहायामको वृशाव- रमियको मालिका मिटि नहीं पड़ता जित निप (ने AMERIT )ोच-गायीक गिाड़ दिया था, भाग पाम मां दिनय-पत्रिका में मीसमर्मानानुलमी ! समय भी उन श्रीरघुनाथजीका स्मरण कर, जिनका एक चार नाम लेनेमे ही गजराज (मंमारमागर) तर गया था॥६॥ [४] ती तू परितह मन मीजि हाथ । भयो है गुगम तोको अमर-अगम तन,ममुझिधी फतवोवत अफाय ॥१॥ मुग्य-मापन हरि-विमुख पृथा जैसे सम फल घृतहित मये पाय । यह विचारि, तजि कुपथ-पुमंगति, पलि गुपंय मिलि मले साय ॥२॥ देशु राम-सेरक, मुनि कीरति, स्टहि नाम करि गान गाय । दय आनु धनुपान-पानि प्रभु, लसे मुनिपट, फाटे फने माय ॥शा तुलमिदाम परिहरि अपंप सर, नाउ गमपद-कमन माय । अनि रिपहि तोमे अनेक गल, अपनाये जानकीनाथ ॥४ भाषा-मन! नुदायम-मार पनानागा. पकिसी भनुपारिपनाको दुर्गम यही नुको सहज मिट गया पर पाहाममिक विधा र पिमुगाम- पायानगीनगदी निरिपानार मपना परिमा(गुगारम भाग नपिपास गुपमा गnि ) fruire Imam UrflmiR नया मामा पालामा पागंEutineer

ঘিনা
সমনামী গোমোগলমাঝামানকর্মীরা
पाण लिय, मुनियाँक या पहने और कमरमें तरफस कम
श्रीरामजीका दृदयमें ध्यान करा हे तुलसीदास ! मंमा
प्रपञ्चोंको छोड़कर धीरामजीक चरण कमलॉम मस्तक नया ।
तेरे-जैसे अनेक नावोंको धीज्ञानानाय रामजीने अपना लिय
राग धनाश्री
.
मन ! माधवको नेकु निहारहि ।
सुनु सठ, सदा रंकके धन ज्यों, छिन छिन प्रभुहि संभार
सोमा-सील यान-गुन मंदिर, सुंदर परम उदार
रंजन संत, अखिल अप-गंजन, भंजन विषय-विकार
जो विनु जोग-जग्य-अत-संजम गयो चहै भव-पार
तो जनि तुलसिदास निसि-पासर हरि-पद-कमल विसार
भावार्थ-हे मन!माधवकीओरतनिक तो देख ! अरे दुप
जैसे कंगाल क्षपा-क्षणमें अपना धनसँभालता है, पैसेही तू अप
श्रीरामजीका स्मरण किया कर ॥१॥ श्रीराम शोमा, शीला
सद्गुणों के स्थान हैं। ये सुन्दर और बड़े दानी है। सन्तोको
करनेवाले, समस्त पापोंके नाश करनेवाले और विपयोंके वि
मिटानेवाले हैं ॥२॥ यदि तू यिना ही योग, यज्ञ, यत और
संसार-सागरसे पार जाना चाहता है तो हे तुलसीदास ! रा
श्रीहरिके चरणकमलाको कभी मत मूल ॥३॥

विनय-पत्रिका [८६] इह कयो सुत ! चंद चहूँ। श्रीरघुपीर-चरन-चिंतन तजि नाहिंन ठार कहूँ॥१॥ जाक घरन विरंचि सेह सिधि पाई संकरहूँ । मुक-सनकादि मुकुन विचरत नेउ भजन करत अजहूँ॥२॥ जयपि परम घपल श्री संतत, थिर न रहति फतहूँ । हरि-पद-पंकज पाइ अचल भइ, करम-पचन-मनहूँ ॥३॥ फरुनासिंधु, भगत-चिंतामनि, सोमा सेवठहूँ। और सकल सुर, असुर-ईस मर खाये उरग ॥४॥ मुरुचि फसोसोइ सत्य सात अति परप पपन जपहूँ। तुलसिदास रघुनाथ-रिमुख नहि मिटर रिपति कपहूँ ।।५।। भावार्थ-मन भुषसीको माना गुमानिने पुषसे गदा था-पुत्र ! भारों पेदाने पदो कहा कि धीरपुनाराजी पर पिनको. पर आपको भीर कहीं भी टिकामा महाशिनपरणात पिणाम करणेप्रमा भीर शिषसोने मी मिरिण मान (जिनी संराग) मा शुरनगमकारिजापागुन एप दिया और मपनी EिRTERPRE२यविमलीशानमी निर पिरमही रही. पातु की रानके परमपमा A. स्परसमस पर रोग निम्नामबावामी, पोदाraium Nपुर भीर मो.

-- ! तजे चरन अजहूँ न मिटत नित, पहियो ताहू केरो॥३॥ छुटै न विपति भजे पिनु रघुपति, अति संदेहु निवरो। तुलसिदास सब आस छाँड़ि करि, होहु रामको चेरो ॥३॥ भावार्थ-हे मूर्ख मन! मेरी सीख सुन, हरिकेचरोसे विमुख होकर किसीने भी सुख नहीं पाया।ह दुष्ट: इस यातको खूब समझ ले, अमी तो सवेरा ही है (अभी कुछ नहीं पिंगड़ा है, शरण जानेसे कामबन सकता है)॥१॥ देख! यह सूर्य और चन्द्रमा जयसे भगवान्के नेत्र और मनसे अलग टुप तभीसे यहा दुख भोग रहे हैं। रात-दिन आकाशमैं घर पिनय पत्रिका १४ पं. लिय निनामणिमाप, उनकी मंशा करनेम ही सारी शोमा । भारसिननं यायोकमामी, मोमी काम, क्रोध, लोमामाको भीर मारमय-न मास मेहुए पुत्र ! (तरी विमान मुगचिने जो कुछ कहा है मां मुनने में भन्यन्त कठोर होनेपर मी सन है। गुलमादाम ! धीरघुनाथजीम विमुग रहनेस विपत्तियों नाश कभी नहीं होता। [23] सुनु मन मूह मिखापन मेरो। हरि-पद-विमुख लह्यो न काहु मुख, सठ ! यह समुझ सवेरो ॥१॥ बिछुरे ससि-रमि मन-नननितें, भ्रमत अमित निसि-दिवस गगन मह, तहँ रिपु राहु बड़ेरो ।।। जद्यपि अति पुनीत सुरसरिता, तिहुँ पुर मुजस घनेरो। पायत दुख बहुतेरी।

। विनय-पत्रिका लगाते विताने पड़ते हैं, वहाँ भी बलवान शत्रु राहु पीछा किये रहता है ॥२॥ यद्यपि गंगाजी देवनदी कहाती है और यही पवित्र हैं, तीनों लोकोंमें उनका यहा यश भी फैल रहा है, परन्तु भगवञ्चरणोंसे अलग होनेपर तबसे आजतक उनका भी नित्य यहना कमी वन्द नहीं होता ॥३॥ श्रीरघुनाथजीके मजन बिना विपत्तियोंका नाश नहीं होता। इस सिद्धान्तका सन्देह वेदोंने नाश कर दिया है। इसलिये हे तुलसीदास ! सब प्रकारकी आशा छोड़कर श्रीरामका दास बन जा ॥५॥ [८८] कबहूँ मन रिनाम न मान्यो। निसिदिन भ्रमत पिसारि सहज मुख, जहँ तहँ इंद्रिन तान्यो ॥१॥ जदपि विपय-सँग सलो दुसह दुख, विपम जाल अरुझान्यो । तदपि न तजत मूढ़ ममतावस, जानतहूँ नहिं जान्यो ॥२॥ जनम अनेक किये नाना विधि करम-कीच चित सान्यो। होइ न विमल विवेक-नीर-बिनु, वेद पुरान वरखान्यो ॥३॥ निज हित नाथ पिता गुरु हरिसों हरपि हृदै नहिं आन्यो । तुलसिदास कव कृपा जाय सर सनतहिं जनम सिरान्यो ॥४॥ भावार्थ-अरे मन! तूने कभी विश्राम नहीं लिया।अपना सहज सुख- खरूप भूलकर दिन-रात इन्द्रियोंका बँचा हुआ जहाँ-तहाँ विषयों में भटक रहा है ॥१॥ यद्यपि विपयोंके संगसे तूने असहा संकट सहे हैं और तू कठिन जालमें फंस गया है तो भी हे मूर्ख! तू उन्हें छोड़ता नहीं। !

. है अनुकूल बिसारि मूल सठ पुनि खल पतिहिं भज ॥२॥ नुलमिदाम यस होइ तहिं जब प्रेरक प्रभु परज ॥४॥ पतग भनक प्रकारमममसाला, पर पदमपनदीमनीता। विनय-पत्रिका ममतावश सब कुछ समझकर भी समझ हो रहा है ॥२॥ अनेक जन्माने नाना प्रकार के कर्म करके नू उन्हींके कीचड़में सन गया है, हे वित्त यिकरुपी जल माप्त किये बिना यह कीचड़ कमी 'साफ नहीं हो सकता । ऐसा वेद-पुराण कहते हैं ॥३॥ अपना कल्याण तो परम प्रनु, परम पिता और परम गुरुरूप हरिसे है, पर तूने उनको हुलसकर इदएन कभी धारण नहीं किया, (दिन-रात विपयोंके वटोरनेमें ही लगा रहा। तुलसीदास ! ऐसे तालाबसे कय प्यास मिट सकती है, जिसके बोइनेनें ही सारा जीवन धीत गया ॥en [८६] मेरो मन हरिजू । हठ न तर्ज। निसिदिन नाथ देउँ सिख यहु विधि, करत सुभाउ निज ।।१।। ज्यों जुवती अनुमति प्रसव अति दारुन दुख उपज । लोलुप भ्रम गृहपमु ज्या जहँ तहँ सिर वदपि अघम विचरत देहि मारग कबहुँ न मूई लजे ॥३॥ ही हारयों करि जतन विविध विधि अतिस प्ररल भावार्थ-धीहरि ! मेरा मन हट नहीं होता। नाप पदनान यज। अज। जमे युपती श्री सम्मान जन ममप मायात भर - विनय-पत्रिका अनुभव करती है (उस समय सोचती है कि अय पतिके पास नहीं जाऊँगी) परन्तु यह मूर्खा सारी घेदनाको भूलकर पुनः उसी दुःख देने पाले पनिका सेवन करती है ॥२॥ जैसे लालची फुत्ता जहाँ जाता है पहीं उसके सिर जूने पड़ते हैं तो भी वह नीच फिर उसी रास्ते मटकता है, मूर्यको जरा भी सजा नहीं आती ॥३॥ (ऐसी ही दशा मेरे इस मनकी है, विषयों में कष्ट पानेपर भी यह उन्हींकी ओर दौड़ा जाता है) मैं नाना मकार उपाय करते-करते थक गया। परन्तु यह मन अत्यन्त घलयान् और अजेय है। हे तुलसीदास ! यह तो तभी घश हो सकता है, जय कि प्रेरणा करनेवाले भगवान् स्वयं ही इसे रोके ॥४॥ N ऐसी मूढ़ता या मनकी। परिहरि राम-भगति-सुरसरिता, आस करत ओसकनकी ॥१॥ धूम-समूह निरखि चातक ज्यों, तृपित जानि मति धनकी । नहिं तहँ सीतलता न चारि, पुनि हानि होति लोचनकी ॥२॥ ज्यों गच काँच बिलोकि सेन जड़ छाँह आपने तनकी । दाज टूटत अति आतुर अहार बस, छति, बिसारि आननकी ॥३॥ कह लो कहीं कुचाल कृपानिधि ! जानत हौ गति जनकी । तुलमिदास प्रभु हरहु दुसह दुख, करहु लाज निज पनकी ॥ ४ ॥ मावार्थ-इस मनकी ऐसी मूर्यना है कि यह श्रीराम-भक्तिरूपी गंगा- जीको छोड़कर भोसकी चूदास तृप्त होनेकी आशा करता है ॥९॥ जैसे .

दासका दारुण दुम्व हर लीजिये और अपने (शरणागत-चत्सलतापी मेरो दुसह दरिद्र, दोप, दुख काहू तो न ' हरयो॥३॥ अब रघुनाथ सरन आयो जन, मय-भय विकल हरयो ॥४॥ यिनय-पत्रिका प्यामा पपीहा धुएं का गोट दंगकर उम मेघ समझ लेता है, परन्तु का (जानेपर) न तो उसे शीतलता मिलती है, और न जल मिलता है धुएँसे ऑग्में और फट जाती है। (यही दशा इम मनको है) जैसे मूर्य याज फाँवकी फर्शमें अपने ही शरीरकी परमाई देखकर उसपर चॉच मारनेसे यह टूट जायगी इस यातको भूसके मारे मूल जल्दीसे उसपर टूट पड़ता है (वैसे ही यह मेरा मन मी विण्यात टूटा पड़ता है) ॥३॥ हे रुपाक भण्डार ! इस कुचालका में कहाँतत्र वर्णन करें ? आप तो दासॉकी दशा जानते ही हैं। हे स्वामिन् ! नुदास प्रणकी रक्षा कीजिये ॥४॥ [९१] नाचत ही निसि-दिवस मरयो। तब ही ते न भयो हरि थिर जयतें जिव नाम धरयो ॥१॥ बहु वासना विविध कंचुकि भूपन लोमादि मरयो । चर अरु अचर गगन जल थलमें, कौन न खाँग करयो ॥२॥ देव-दनुज, मुनि, नाग, मनुज नहिं जाँचत कोउ उपरयो । थके नयन, पद, पानि, सुमति, बल, संग सकल बिछुरयो ।

विनय-पत्रिका
जेहि गुनतें बस होहु रीझि करि, सो मोहि सब बिसरथो ।
तुलसिदास निज भवन-द्वार प्रभु, दीजै रहन परयो ॥५॥
भावार्थ-रात-दिन नाचते-नाचते ही मरा! हे हरे ! जयसे आपने
"जीय' नाम रफ्रखा, तयसे यह कभी स्थिर नहीं हुआ ॥१॥ (इस माया-
सपी नाचौ) नानाप्रकारकी वासनारूपीचोलियाँ तथा लोम(मोह)आदि
अनेक गद्दने पहनकर, जड़-चेतन और जल-स्थल-आकाशमें ऐसा कौन-
सा म्याँग है जो मैंने धारण नहीं किया ! ॥२॥ देवता, दैत्य, मुनि, नाग,
मनुष्य आदि पेसा कोई भी नहीं यचा जिसके आगे मैंने हाथ न
फैलाया हो ? परन्तु इनमें किसीने मेरे दारुण दारिदय, दोष और
दुम्मोंको दूर नहीं किया ॥३॥ मेरे नेत्र, पैर, हाथ, सुन्दर युद्धि और
पल सभी थक गये हैं। सारा संग मुझसे यिहुट गया है। अब नो है
रघुनाथजी ! यह संमारके भयसे व्याकुल और भीत दास आपकी
सरण आया है ॥४॥ हे नाथ ! जिन गुणॉपर रीझकर मार प्रसन्न होते
हैं, यह सय तो मैं भूल चुका है। अय हे प्रभो ! इस तुलसीदासको
अपने दरवाजेपर पढ़ा रहने दीजिये ॥५॥
[९३]
माधवजू, मोसम मंद न फोऊ ।
जपपि भीन-पतंग हीनमति, मोहि नहिं पूजे आंऊ ॥१॥
रुचिर रूप-आहार-चस्प उन्ह, पावक लोह न जान्यो ।
देखत रिपति रिपप न उजत हो, नाते अधिक अपान्यो ॥२॥

भावार्थ- माधय! मेरेममान मूर्य कोई मीनहीं है। यद्यपि माही उनमें अधिक मूम, २॥ महामोहरूपी अपार नदी में निरतामा किता। (इसे पार होने के लिये) धीरिक गाण-मटणी भागाफी नाका बार-बार फेनॉकी (भयांत आगमंगुर मग.) पराग पहल भूमा कुना पुरानी गली गोत्र गनंगीत नियमन विनय-पत्रिका महामोह-सरिता अपार मह, संतत फिरत बहो। श्रीहरि-चरन-कमल-नौका तजि, फिरि फिरि फेन गयो ॥३ अस्थि पुरातन छुधित स्वान अति ज्यौं भरि मुख पकरें । निज तालगत रुधिर पान करि, मन संतोष धरै ॥४' परम कठिन भवच्याल ग्रसित ही प्रसित भयो अति मारी। चाहत अमय मेक सरनागत, खगपति नाथ विसारी ॥५॥ जलचर-चंद जाल-अंतरगत होत सिमिटि इक पासा । एकहि एक खात लालच-बस, नहिं देखत निज नासा ॥६॥ मेरे अप सारद अनेक जुग, गनत पार नहिं पाये । तुलसीदास पतित-पावन प्रभु, यह भरोस जिय आवै । भीर पतंग हीनयुधि है, परन्तु ये भी मेरी घरापरी नहीं कर गहने १० पतंगने गुन्दर रूपयशोदीपकको मति नहीं समझा भार महीन भादार. यश लोहको कोटा नहीं जाना पनु वियों को प्रत्यक्ष विपतिरूप देखकर भी नहीं छोड़ता, भतर m

पिनय-पत्रिका
है, उमघाटकर यहा मन्तुष्ट होता है (यह नहीं समझना कि यह रन
तो मेरे ही शरीरका है। यही हाल मेरा है) ॥ मैं मंसाररूपी परम
कटिन मर्पक उसनेमे अत्यन्त ही भयभीत हो रहा है, परन्तु (मूर्यता
यह है कि उमसे यचने के लिये) गरुड़गामी मगवानकीशरणागत न होकर
(विश्यम्पी) मेंढकीशरणमे धमय चाहता है। जैसे जलमें रहनेवाले
जोकि समूह मिमट-सिमटकर जालमेरफट्ट हो जाते हैं और लोभवश
एक दूसरेको पाते हैं, अपना मायी नाश नहीं देखते (येमी ही दशा
मेरी है)॥६यदि मरम्पतीजी भनेक युग तक मेरे पापोंको गिनती
रहै, तय भी उनका अन्त नहीं पा सकती। मेरे मनमें तो यही भरोसा
है कि मेरे नाय पतित-पायन है (मुझ पतितको भी अवश्य
अपनागे)॥
[१३]
कृपा सो घौं कहाँ विसारी राम ।
बेहि करना मुनि नयन दीन-दुख, धावत हो तजि घाम ॥१॥
नागराज निज पल विचारि हिय, हारि चरन चित दीन्हों।
आरत गिरा मुनत खगपति तजि, चलत विलंब न कीन्हों ॥२॥
दितिसुत-बास-त्रसित निसिदिन प्रहलाद-प्रतिग्या राखी।
अतुलित बल मृगराज-मनुज-तनु दनुज हत्यो श्रुति साखी ॥३॥
भूप मदसि सम नृप विलोकि प्रभु, रासु कह्यो नर-नारी ।
बसन पूरि, अरि-दरप रि करि, भूरि कृपा दनुजारी ॥४॥

. तुम राखे रघुर। मार। भावार्थ- श्रीरामजी! आपने उस पाको कहाँ भुला दिया,जिस सी भी देर नहीं की ॥२॥ हिरण्यकशिपुसे रात-दिन मयमांत रहनेवाले प्रहादकीमतिज्ञा आपने रक्खी, महान् बलवान सिंह और मनुष्यका-सा लजा जाते देखकर) सब राजाओंके सामन पुकारकर कहा कि 'हे नाथ! ये सभी मुश तुलसी पिनय पत्रिका एक एक रिपुते ग्रामित जन, अब मोहि देव दुसह दुस बहु रिपु कम न हरहु मव-पीर ११ लोभ-ग्राह, दनुजेस-क्रोध कुरुराज-चंधु खल तुलसिदास प्रभु यह दारुन दुस मंजहु राम उदार ॥६॥ कारण दीनोंके दुग्यकी करण-भ्यनि कानों में पढ़ते हो आप अपना धान छोड़कर दौड़ा करते हैं ? ॥१॥ जय गजेन्द्रने अपने यलकी ओर देखकर और हृदयमें हार मानकर आपके चरणों में चित्त लगाया, तब मार उसकी आर्तपुकार सुनते हीगरुड़को छोड़कर तुरन्त वहाँ पहुँचे, तनिक (नृसिंह) शरीर धारणकर उस दैत्यको मार डाला, वेद इस यातका साई ॥३॥ 'नर' के अवतार अर्जुनकी पत्नी द्रौपदीने जब राजसभामें (अपनी मेरी रक्षा कीजिये' तय हे दैत्यशत्रु ! आपने वहाँ (द्रौपदीको लान यचानेको ) घस्त्रोंके देर लगाकर तथा शत्रुओंका सारा घमण्ड चूर्णका बड़ी कृपा की neहे रघुनाधजी! आपने इन सब भक्तोंको एक एक शत्रुके द्वारा सताय जानेपर ही पचा लिया था। पर यहाँ मुझे तो बहुत-से श असध कट दे रहे हैं। मेरी यह भय-पोडा आप क्यों नहीं करते ? ॥५॥ लोमरूपी मगर, मोधरूपी दैत्यराज हिरण्यकशिपु.

सापकी रण म ग रामपानी पोनि - हारि माहिरिमारो। बानत निज महिमा मेरे अप, सदापि न नाथ मंमागे ॥१॥ पवित-पुनीत, दीनाल, अमान-मानस प्रति पारो। न मथम, ममील दोन दिया पेदन मा मग! ॥२॥ गग-गनिका गागार हामिटारो आहार निशान! पागल पनरागं ॥ बोसिस त अमिता, पदिय मागे। * . रोग रोग पुन मी भने म गा in पर,पिग गया। समामा कोपि.मारग Mu दिमाश गि। पण मी मागे attrientattim Kumkumtamanahartaman tattott.nittumbinine है

परन्तु मुझ तुलसीदासको यही सबसे बड़ा दुम है कि प्रभुमार
अधिकार प्रभूमों (मेरी) भूरि मलाई मनि ॥२॥
विनय-पत्रिका
है ? ॥२॥ (पहले तो) मुझे आपने पक्षी (जटायुगृद्ध), गणिका (जीवन्टी
हाथी और व्याध (वाल्मीकि) की पंक्तिमें बैठा लिया। यानी पारी
स्वीकार कर लिया। अब हे कृपानिधान ! आप किसको शर्म करके मेरे
परसी हुई पत्तल फाड़ रहे हैं ॥३॥ यदि कलिकाल आपसे अधिक
बलवान होता और आपकी आशा न मानता होता, तो है हरे!
आपका मरोसा और गुणगान छोड़कर तथा उसपर क्रोध करने मोर
दोप लगानेका झंझट त्यागकर उसीका भजन करते ॥५॥ (परम्)
आप तो मामूली मच्छरको ब्रह्मा और ब्रह्माको मच्छरके समान का
सकते हैं, ऐसा आपका प्रताप है। यह सामर्थ होते हुए भी मार मुझे
त्याग रहे हैं, तय हे नाथ ! मेरा फिर यश ही क्या है ? ५॥ यद्यपि
सथ प्रकारसे हार धुका है और मुझे नरकमें गिरनेका भी भय नहीं है।
भी मेरे पापाको भस्म नहीं किया ॥६॥
तऊन मेरे अप-अवगुन गनिहें ।
जो जमराज काज सय परिहरि, इह ग्याल उर अनि ॥१॥
पलिई घटि पुंज पापिनक, असमंजग जिप जनि ।
पानीनि मगनी, भगत-गिरामनि मनि ।
मिदाम कोमलपति अपनायेदि पर नि: ॥३॥

विनय-पत्रिका भावार्थ-हे श्रीरामजी!यदि यमराज सब कामकाज छोड़कर केवल मेरे ही पापों औरदोषों के हिसाब-कितायका खयाल करने लगेंगे, तय भी उनकोगिन नहीं सकेंगे (क्योंकि मेरे पापोंकी कोई सीमा नहीं है)।१॥(भीर जब वह मेरे हिसायमें ही लग जायँगे, तब उन्दे इधर उलझे हुए समझकर) पापियों के दल-केन्दल छूटकर माग जायँगे इससे उनके मनमें बड़ी चिन्ता होगी। (मरे कारणसे) अपने अधिकार में बाधा पहुँचते देखकर (भगवान्के दरवारमें अपनेको निदोप सावित करनेके लिये) यह आपके सामने मेरी पहुन यड़ाई कर देंगे (कहेंगे कि तुलसीदास आपका भक्त है, इसने को पाप नहीं किया, आपके भजनके प्रतापसे इसने दूसरे पापियों को भी पापके पन्धनसे छुड़ा दिया) ॥२॥ तय आप हँसकर मुझ मक्तपर विश्वास कर लेंगे और मुझे भक्तोंमें शिरोमणि मान लेंगे। थात यह है कि हे कोसलेश ! जैसे-तैसे आपको मुझे अपनाना ही पड़ेगा ॥३॥ [९६] जो पै जिय धरिही अवगुन जनके । तो क्यों कटत सुकृत-नखते मो प, पिपुल बूंद अप-चनके ॥१॥ कहिहै कौन कलप मेरे कृत, करम वचन अरु मनके । है हारहिं अमित सेप सारद श्रुति, गिनत एक-एक छनके ॥२॥ जो वित पद नाम-महिमा निज, गुनगन पावन पनके । । तो तुलसिहिं तारिही विप्र ज्यों दसन तोरि जमगनके ॥३॥ भावार्थ-हे नापयदिभार इस दासके दोरॉपर ध्यान देंगे, तब तो । पुयापी मखसे पापरूपी परे-पड़े पनोंके समूह मुहम कैसे फटेंगे! ।

विनय-पत्रिका (मेरे जरासे पुण्यम मारी-मारी पाप कम दूर होंग!) पचन और शरीरम किये हुए मेरे पापांका वर्णन मी कौन कर १ एक-एक क्षणके पापोंका हिसाय जोहनमें अनेक शेष, स- और वेद हार जायेंगे ॥२॥ (मेरे पुण्याँक मरांस तो पापोंमे - उद्धार होना असम्मय है) यदि आपके मनमें अपने नामकी महिम पतिनाको पायन करनेवाले अपने गुणों का स्मरण आ जाय तो आ- तुलसीदासफो यमदतोंके दाँत तोड़कर संसार-मागरमे अवश्य वै तार देंगे, जैसे अजामिल प्राह्मणको तार दिया था ॥३॥ [९७] जो पै हरि जनके आगुन गहते । तौ सुरपति कुरुराज चालिसों, कत हठि पैर विसहने । जो जप जाग जोग व्रत परजित, केवल प्रेम न चहते । तौ कत सुर मुनिवर विहाय ब्रज, गोप-गेह बसि रहते ॥ जो जहँ-तहँ प्रन राखि भगतको, भजन-प्रभाउ न कहते । तौ कलि कठिन करम-मारग जड़ हम केहि भाँति निबहते ॥ जी सुवहित लिये नाम अजामिलके अघ अमित न दहते । तौ जमभट साँसवि-हर हमसे वृषभ खोजि खोजि नहते ।। जो जगविदित पतितपावन, अति गांकुर विरद न बहते। तो यहुकलप कुटिल तुलसीसे, सपनेहुँ सुगति न तहते ।। भावार्थ-(भाप दासोक दोपोंपर ध्यान नहीं देते) हे रामजी माप दासोका दोष मनमें लाते तो इन्द्र दुर्योधन और चालिसेट कर .

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शिवजीने नाचते-नाचते उसका पार नहीं पाया, उसीको गोप-रमणियों के जन्म-मरणरूपी दुखोंके भारसे जीय छूट जाते हैं, उसी कगानिधि पिनय-पत्रिका जाको नाम लिये छ्टत मव-जनम-मरन दुख-मार। अंबरीप-हित लागि कृपानिधि, सोइ जनमे दस बार ॥ जोग-विराग, ध्यान-जप-तप करि, जेहि सोजत मुनिग्यानी । वानर-माल चपल पमु पामर, नाथ तहाँ रति मानी ॥६॥ लोकपाल, जम, काल, पवन, रवि, ससि सब आग्याकारी । तुलसिदास प्रभु उग्रसेनके द्वार बत कर धारी ||७|| मावार्थ-श्रीहरि अपने दासपर इतना प्रेम करते हैं कि अपनी स प्रभुता भूलकर उस भक्तके ही अधीन हो जाते हैं। उनकी यह सनातन है ॥१॥ जिस परमात्माने देवता, दैत्य, नाग और मनुष्यों कर्माकी यड़ी मजबूत डोरीमें याँध रफ्सा है, उसी अखण्ड पर यशोदाजीने प्रेमवश जबरदस्ती (ऊखलसे) ऐसा याँध दिया कि कि आप खोल भी नहीं सके ॥२॥ जिसकी मायाके वश होकर प्रक्षा ताल बजा-बजाकर (आँगनमें) नचाया ॥३॥ वेदका यह सिद्धार प्रसिद्ध है कि भगवान् सारे विश्वका भरण-पोषण करनेवाले लक्ष्मीजी स्वामी और तीनों लोकोंके अधीश्वर है, ऐसे प्रभुकी मी भक्त से पलिके आगे कुछ मीप्रभुता नहीं चल सकी, घरन् प्रेमयश प्राह्मण कर उससे भीग्व माँगनी पड़ी ॥४॥ जिसके नाम-स्मरणमात्रसे संसाः । मक्त अभ्यरोपके लिये स्वयं दस यार अवतार धारण किया ५॥ नि १६३ विनय-पत्रिका को संयमी मुनिगण योग, वैराग्य, ध्यान, जपऔर तप करके खोजते रहते है, उसी नाथने बन्दर, रीछ आदि नीच चञ्चल पशुओंस प्रीति की ॥६॥ लोकपाल, यमराज, काल, वायु, सूर्य और चन्द्रमा आदि सब जिसके आज्ञाकारी है, वही प्रभु प्रेमवश उग्रसेनके द्वारपर हाथमें लकड़ी लिये दरवान की तरह खड़ा रहता है ॥७॥ विरद गरीवनिवाज रामको । गावत घेद-पुरान, संभु-मुक, प्रगट प्रमाउ नामको ॥१॥ ध्रुव, प्रहलाद, विभीपन, कपिपति, जड़, पतंग, पांडव, सुदामको । लोक सुजस, परलोक सुगति, इन्हमें को है राम कामको ॥२॥ गनिका, कोल, किरात, आदिकपि, इन्हते अधिक वाम को । चाजिमेघ, कब कियो अजामिल, गज गायो कर सामको ॥३॥ छली, मलीन, हीन सब ही अंग, तुलसी सो छीन छामको । नाम नरेस प्रताप प्रयल जग, जुग-जुग चालत चामको ! मावार्थ-धीरामजीका पानाहीगरीयोंको निहाल कर देना है द पुराण, शिवजी, गुकदेवजी आदि यही गात हैं। उनके श्रीरामनामक प्रभाय नो प्रत्यक्ष ही है ॥१॥ ध्रुय, प्रसाद, विभीषण, सुग्रीव, जड़ (भद्दल्या), पक्षी (जटायु, काकभुशुण्डि), पाँचों पाण्डव और मुदामा. इन सबको भगवान्ने इस लोकमै सुन्दर यश और परलोकमे मद्गति दी।इनमेंसे रामके कामका मला कौन था? ॥२॥ गणिका (जीपन्ती ) 44 A साधनॉस दीन, दुयला-पतला और कौन है? पर श्रीरामक नामाची हारि चुचुकारि दुलारत, देत दिवावत दाउ॥३॥ व मय-धनु मंजि निदरि भूपति भृगुनाथ खाइ गये वाउ। छमि अपराध, छमाइ पाय परि, इती न अनत समाउ ।। पिनय-पत्रिका कोल किगत (गुद, निपाद मादि) तथा मादिकवि याल्मीकिइन युरा कौन था? अजामिलने कय अश्वमेध-यज्ञ किया था, गनराजन का सामवेदका गान किया था ? ॥३॥ तुलसीक समान कपटी, मलिन, स. राजाके राज्यमें उसके प्रयल प्रतापसे युग-युगसे चमड़ेका सि मी चलता आ रहा है अर्थात् नामके प्रतापसे अत्यन्त नीच भी परमात्माको प्राप्त करते रहे हैं, ऐसे ही मैं मी प्राप्त करूंगा.' [१००] सुनि सीतापति-सील-सुमाउ । मोद न मन, तन पुलक, नयन जल, सो नर खेहर खाउ ॥१॥ सिसुपनतें पितु, मातु, वन्धु, गुरु, सेवक, सचिव, सखाउ । कहत राम-विधु-घदन रिसोहैं सपनेहुँ लख्यो न काउ ।।२।। खेलत संग अनुज पालक नित, जोगवत अनट- अपार जीति सिला साप-संताप-बिगत भइ, परसव पावन पाउ । दई सुगति सो न हेरि हरप हिय, चरन छुएको पछिवाउ ॥it कह्यो राज, पन दियो नारिवस, गरि गलानि गयो राउ। ता कुमातुको मन जोगवत ज्या निज तनु मरम कुपाउ ॥६॥ अगर ja राव

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पाम कुछ भी नहीं है। मैं तेरा ऋणी हैं,तू मेरा महाजन याडे तो विनय-पत्रिका का पश्चात्ताप अवश्य हुआ कि ऋषिपत्नीक मेरे चरण क्यों लम गये? ॥४॥ शिवजीका धनुष तोड़कर राजाओंका मान हर इससे जय परशुरामजीने आकर झोध किया, तब उनका अपराध मन करके उलटे श्रीलक्ष्मणजीसे माफी मैंगवायी और स्वयं उनके चरणोपर गिर पड़े, इतनी सहिष्णुता और कहीं नहीं है ! ॥५॥ राजा दशरथने राज्य देनेको कहकर, कैकेयीके पशमें होने के कारण धनयास दे दिया और इसी ग्लानिके मारे ये मर भी गये, ऐमी युरी माता कैकेयीका मन भी आप ऐसे समाल रहे, जैसे कोई अपने शरीरक मर्मस्थानके घायको दंगता रहता है, अर्थात् आप सदा उसके मन अनुसार ही यलो रहे ॥६॥ जय आप हनुमानजीको सेया यश होकर उनके उपरत हो गये, तय उनसे कहा कि दे पयनसुन ! यहाँ आ, तुझे देने को तो मेरे मुझसे लिपा-पढ़ी करया ले' ॥७॥ सुप्रीय और विभीषणने माता कण्ट-माय नहीं छोड़ा, परन्तु आपने तो उन्हें भरना ही लिया। भरताका नामदा भरी ममा भाप मम्मान करते रहा है. उनकी मांमा कति करते नी आपके हदय में तृप्ति की नहीं होती : मनोपर मापने जो-जो दया और कार किये है, उनकी तो गर्मा पटनं ही मार समाग मानो गड़ जात (भानी प्रशंमा भाग मुहाता ही नहीं), पोकामा आपको प्रणाम का भार गाण मा माता, माग रात उसका यश वर्णन कानेगुना । भीर कार दुगाग गान कापागेकोमलाप भीराम गुणमोको मम गमकर मोदय प्रेमी या भागपी. ।

यिनय-पत्रिका तुलसीदाम ! इस प्रेमानन्दके कारण त अनायास ही धीरामके चरण- कमलॉको प्राप्त करेगा ॥१०॥ [१०] जाउँ कहाँ तजि घरन तुम्हारे । काको नाम पतित-पावन जग, केहि अति दीन पियारे ॥१॥ फीने देय पराइ पिरद-हित, हटि हटि अघम उपारे । खग, मृग, म्याथै, पपान, पिटप जद, जवन कयन मुर तारे ।।२।।. देव, दनुज, मुनि, नाग, मनुज सप, माया-पिवस विचारे । विनके हाप दामतुलमी प्रभु, फहा अपनपी हारे ॥३॥ मापार्य-२ माश! भाप परणोंको कर भीर कदौ जाऊँ? गरम परित-पापन' नाम भीर Eि(भापको भौति) दीन- दुलिपारे किरे यान प्यारे ! १६ भाजतक किस देवनाने अपने पाशे पाने के लिये एक गुन-गुनार नागोंका उसार fruit: किस देवताने पक्षी (जटायु), पा(क्स-वानर मादि).त्याध (पान्मादि), पापा (भात्या), जाप (पमला म) भार पपनोंका उसाला देपा, प, मुनि, माग, मनुष्य भादि सो देधारे मापा पा (मरा हुमा पुगेर पन्धमा गोद Art वि) मा पर तुलीदास मप उन मोगरा गांप. TRIN

विनय-पत्रिका
[१०२]
हरि ! तुम बहुत अनुग्रह कीन्हों।
साधन-धाम वियुध-दुरलम तनु, मोहि कृपा करि दीन्ह
कोटिहुँ मुख कहि जात न प्रभुके, एक एक उपकार
तदपि नाथ कछु और माँगिही, दीजै परम उदा-
विषय-यारि मन-मीन भिन्न नहिं होत कबहुँ पल एक
ताते सही विपति अति दारुन, जनमत जोनि अनेक
कृपा डोरि पनसी पद अंकुस, परम प्रेम-मृदु-बारो
एहि विधि वेधि हरहु मेरो दुख, कौतुक राम तिहारो
हैं श्रुति-रिदित उपाय सकल सुर, केहि केहि दीन निहार
तुलसिदाम येहि जीव मोहरजु, जैहि याम्यो सोइ टॉम
भावार्य- हरे ! आपने यही दया की, जो मुझे देखना
मी दुर्लभ, माधनों के स्थान मनुष्य शरीरको कृपापूर्वक दे दि
यपि माएका एक-एक उपकार करोड़ों मुभास नहीं कहा जा
नयापि है नाय ! मैं कुछ मोर माँगना, आयड़े उतार ..
पर दीजिये। मेरा मनरूपी मराठ विपयापी जग '
दिये मी अलग नहीं होता, राम में मन्यग्नदारण गुलम
पार-बार अनेक योनियों में मुझे जन्म लेना पड़ता है ३n (
मएको पाइनर लिये गमतीमार मानी कृपाशी
और अपने परम शिशशशीकर कोटा दला,

-- - विनय-पत्रिका मरूपी कोमल चारा चिपका दीजिये। इस प्रकार मेरे मनरूपी मच्छको पकर अर्थात् विषयरूपी जलसे याहर निकालकर मेरा दुःख दूर कर जिये । आपके लिये तो यह एक खेल ही होगा ॥ यों तो घेदमें नेक उपाय भरे पड़े हैं, देवता भी यहुत-से हैं, पर यह दीन किस-किस- निहोरा करता फिरे ? हे तुलसीदास ! जिसने इस जीयको मोदकी रीम याँधा है, यही इसे छुड़ायेगा ॥५॥ [१०३ ] यह बिनती रघुवीर गुसाई। और आस-पिखास-भरोसो, हरी जीव-जड़वाई ॥१॥ चही न सुगति,सुमति,संपति कछु,रिधि-सिपि,विपुल पढ़ाई। हेतु-रहित अनुराग राम-पद पद अनुदिन अधिकाई ॥२॥ कृटिल करम ले जाहि मोहि जहँ जहं अपनी परिआई। तहँ तहँ जनि छिन छोह छोड़ियो, कमठ-अंडकी नाई ॥ ३ ॥ या जगमें जहँ लगि या तनुकी प्रीति प्रतीति सगाई । ते सप तुलसिदास प्रस ही सों होहिं सिमिटि इक ठाई ॥ ४ ॥ भाषा-दे धीरघुनाथजी ! नाप ! मेरी यही विनती है कि इस जायको दूसरे माधन,देघनाया कोपरजोमाया पिश्यास भार भरोमा समूनाको मापहर टीजिये ॥१॥ हे गम ! मैं मुक्ति, सद्यदि धन-सम्पति, काति-सिद्धि और पड़ी भारी या भादि कुछ भी नहीं बादताधम, मेरातोभापके चरणकमलामे दिनों दिन मधिक-से-अधिक विमुनीम में मीही एल महापामगाराम ७ भरके लिये भी अपनी कृपा न छोड़ना ॥३॥ हे नाथ! इस संसारमेंस मन समेत या तनके बासिन्ह, इह सिखापन देहाँ ॥२॥ काहूँगा।मंग मन यही कहना भित्र में श्रीगीता-रामा पोकर इमर्ग जगद कहीं भी नहीं जाऊँगा मेरे पंपा शिश्याम उपना गया है कि भगने म्यामो धीमी विनय-पत्रिका अनन्य और विशुद्ध प्रेम यढ़ता रहे, यही चाहता है ॥२॥ मुझे भारत बुरे कर्म जबरदस्ती जिस-जिस योनिमें ले जाय, स-उस योनिने। हे नाथ ! जैसे कछुआ अपने अण्डोंको नहीं छोड़ता, वैसे ही मार तक इस शरीरका (स्त्री-पुत्र-परिवारादिसे) प्रेम, विश्वास और सस है, सो सब एक ही स्थानपर सिमटकर केवल आपसे ही हो जाय ! [ १०४] जानकी-जीवनकी पलि जहाँ । चित कहै रामसीय-पद परिहरि अब न कहूँ चलि जहीं ॥१॥ उपजी उर प्रतीति सपनेहुँ मुख, प्रभु-पद-पिमुस न पैहीं। घयननि और कथा नहिं सुनिहीं, रसना और न गहाँ । रोकिहीं नयन पिलोकत औरहि, सीस ईस ही नहीं ॥३॥ नाना-नेह नाथमों करि मय नाता नेह अहहीं । पह घर मार ताहि सुलमी जग जाको दाम कहेही ॥४॥ मार्थ-4 नो धीमानकीजीयन रघुनाथजीपर माननीयो १ यिनय-पत्रिका 1 इस शरीरमें रहनेवाले ( इन्द्रियादि) सभीको यही उपदेश T॥२॥ कानोंसे दूसरी बात नहीं सुनूँगा, जीमसे दूसरेकी चर्चा नहीं गा, नेत्रोंको दूसरी ओर ताकनेसे रोक लूँगा और यह मस्तक ल आपके (चरणों में ही) झुकाऊँगा ॥३॥ आपके साथ नाता और करके दूसरे सबसे नाता और प्रेम तोड़ दूंगा। इस संसारमें मैं -सीदास जिसका दास कहाऊँगा फिर अपने सारे कर्मों का बोझा उसी स्वामीपर रहेगा ॥४॥ [१०५ ] बबली नसानी, अब न नसैहीं। राम-कृपा भव-निसा सिरानी, जागे फिरि न डसही ॥१॥ मायउँ नाम चारु चिंतामनि, उर कर तें न खसहौं । त्यामरूप सुचि रुचिर कसौटी, चित कंचनहिं कसैहीं ॥२॥ सरपस जानि हँस्यो इन इंद्रिन, निज यस है न हँसहीं । नन मधुकर पनकै तुलसी रघुपति-पद-कमल यसैहौं ॥ ३ ॥ भावार्थ-अबतक (की आयु तो व्यर्थ ही) नष्ट हो गयी, परन्तु अय -) नष्ट नहीं होने दूंगा।श्रीरामको कपासे संसाररूपी रात्रि धीत गयी (मैं संसारकी माया रात्रिसे जग गया है। अब जागनेपर फिर (माया- बिछौना नहीं बिठाऊँगा (अब फिर मायाके फन्देमें नहीं फैसंगा) ॥१॥ मेरामनामरूपी सुन्दर चिन्तामणि मिल गयी है। उसे हृदयरूपी हाथ- कभी नहीं गिरने दूंगा। अथवा हृदयसे रामनामका सरण करता प्रेम लखि कृत किये आपने तिनको, सुजस संसार हरिहरकोमो अपनी हँसी नहीं कराऊँगा। अय तो अपने मनरूपी भ्रमर नाम लिये रामकिये परम पावन सकल, नर तरत तिनके गुनगान च्याध अपराधकी साध राखी कहा, पिंगल कौन मवि भगति में कौन धींसोमजाजी अजामिल अघम, कान गजराज घी वाजपेयी ।। पांडुसुत,गोपिका, पिदुर, कुधरी, सबरि,सुद्ध किये सुद्धतालेस के यिनय-पत्रिका रहंगा और हायमे रामनामकी माला जपा करंगा । श्रीरघुनाथ जो पवित्र श्यामसुन्दर रुप है उसकी कसोटी बनाकर माने बिर मोनेको कमूंगा। अर्यात् यह देगा कि श्रीरामके ज्यानमें मेर सदा सर्वदा लगता है कि नहीं ॥२॥ जबतक में इन्द्रियोंके यश नयतक उन्होंने (मुझे मनमाना नाच नचाकर ) मेरी बड़ी हंसी परन्तु अय स्वतन्त्र होनेपर यानी मन-इन्द्रियोंको जीत लेनेपर करके श्रीरामजीके चरणकमलों में लगा दूँगा। अर्थात् श्रीराम चरणोंको छोड़कर दूसरी जगह मनको जाने ही नहीं दूंगा ॥३॥ राग रामकली [ १०६] महाराज रामादरयो धन्य सोई। गरुभ,गुनरासि,सरवग्य,सुकृती,सर,सील-निधि,साधु तेहि समन उपल-केवट-कीस-भालु-निसिचर सपरिगीप सम-दम-दया-दान

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राग दीजिय) तीनों लोकों और तीनों कालोंमें तुलसीसरीमा मन्दा कुटिल और दुष्ट-शिरोमणि कोई नहीं हुमा परन्तु अपने नाममर रमनके लिये अपने (पतितपायन) प्रणकोस्मरण करकमकलिकालन मुज बिसाल सर घनु घरे, कटि चारु निपंग ॥२॥ सुमिरत ही मानै भलो, पावन सब रीति ॥३॥ सबको प्रभु, सबमें बस, सबकी गति जान ॥ ५॥ पिनय पत्रिका फरनपर नीच होकर भी सेगा पद न पाया हो? टीनों के दुरु नाश करनेवाले, लक्ष्मीजीके पति, करुणा मन्दिर, पतिताको फरनयाले श्रीरामजीका यश येदाने गाया : ५ (औरॉकी बात सर्पसे इसे हुएको भी धीरामने अपनीचरणमें ले लिया । बिहाग बिलावल [१०] है नीको मेरो देवता कोसलपति राम | सुभग सरोरुह लोचन, सुठि सुंदर साम॥१॥ सिय-समेत सोहत सदा छवि अमित अनंग । बलि-पूजा चाहत नहीं, चाहत एक प्रीति । देहि सकल सुख, दुख दहै, आरत-जन-धु । गुन गहि, अप-औगुन हरे, अस करुनासिंधु ॥४॥ म-काल-पूरन सदा पद वेद पुरान .

यिनय-पत्रिका
को करि कोटिक कामना, पूर्ज बहु देव ।
तुलसिदास तेहि सेहये, संकर जेहि सेव ॥६॥
भावार्थ--कोसलपति श्रीरामचन्द्रजी मेरे सर्वश्रेष्ठ देयता है, उनके
मलके समान मुग्दर नेत्र है और उनका शरीर परम मुन्दर श्यामवर्ण
१॥ श्रीसीताजीकसाथ सदा शोभायमान रहते हैं, असंख्य कामदेवोंके
मान उनका मौन्दर्य है। विशाल भुजाओम धनुप-याण और कमरमें मुन्दर
रिफस धारण किये हुए हैं ॥२॥ ये थलि या पूजा कुछ भी नहीं चाहते,
पल एक 'प्रेम' चाहते ६। स्मरण करते ही प्रसन्न हो जाते है, और
उप सरसे पवित्र कर देते हैं ॥३॥ सय मुप दे देते है और दुबोको
रस्स कर डालते हैं। घे दुखीजनोंके पन्धु , गुणोंको प्रहण करते और
मपगुणोंको दर लेते हैं, ऐसे करुणा-सागर ॥४॥ सय देश भीर सय
समय सदा पूर्ण रहते हैं, ऐमा घेद-पुराण कहते हैं। ये सय म्यामी
सपमें रमते श्रीर सयक मनकी पात जानते हैं. (पमे स्वामीको
एकर) करोड़ों प्रकार की कामना करके दूसरे भनेक देयतामाको कोन
परेनुलसीदास, (भपने ती) उसीकी मंया कानी पाहिये, जिसकी
पा देवदेव महादेयजी करते ६.
[१०८]
पीर महा अपराधिये, माधे सिधि होय ।
मकल काम पूरन कर, जान मर काय ॥१॥
गि, विलंब न कीजिये लीड उपदेन ।
पीज
मंत्र जपिये माई, जो अपत महेम ॥२॥

सुख-संपदा-संतोप-विचार ॥१॥ ६म यातको मय जानते॥१॥इस कामको जल्दीदी करना या पादिय. मदन म्यामायिक स्नेहका घी बनाना चाहिये और मार समिघका क्षमासपीमियन करना चाहिये तथा ममताशा करना यापापांका उपादम, मनका वशीकरण,int पाणिजिगनंगप्रकाराममनपिया, संधी मिले।मुष्टानादारमाहीमार्ग पर पड़ा,भिमप्रमुनिशzirl बिनय-पत्रिका प्रेम-चारि-तरपन भलो, घृत सहज सनेहु । संसय-समिध, अगिनि छमा, ममता-चलि देहु ॥३॥ अघ-उचाटि, मन यस कर, मार मद-मार । आकर जिन्ह यहि माँति मजन कियो, मिले रघुपति ताहि । तुलसिदास प्रभुपथ चढ्यो, जो लहु निचाहि ॥५॥ मावार्थ-महान् धीर श्रीरघुनाथजीकी आराधना करनी सात जिन्हें साधनेसे मय कुछ सिद्ध हो जाता है। ये सय इच्छाएं पूर्णता देर करना उचित नहीं है । (सद्गुरसे) उपदेश लेकर उत्तीर (गम) का जप करनाचाहिये, जिसे धीशिवजी जपा करते हैं। अपक. पाद पनादिकी विधि इस प्रकार ) प्रेमापी जालम तारा कामका माण तथा मान भी गुणगानिका भात विनय-पत्रिका [१०१] कस न करहु करुना हरे ! दुखहरन मुरारि ! त्रिविधताप-संदेह-सोक-संसय-भय-हारि ॥१॥ इक कलिकाल-जनित मल, मतिमंद, मलिन-मन । तेहिपर प्रभु नहिं कर सँभार, केहि भाँति जिये जन ॥२॥ सब प्रकार समरथ प्रभो, मैं सब विधि दीन । यह जिय जानि द्रवौ नहीं, मैं करम-विहीन ॥३॥ भ्रमत अनेक जोनि, रघुपति, पति आन न मोरे । दुख-सुख सहौं, रही सदा सरनागत तोरे ॥४॥ तो सम देव न कोउ कृपालु, समुझौं मनमाहीं। तुलसिदास हरि तोपिये, सो साधन नाहीं ॥५॥ भावार्थ-हे हरे। हे मुरारे । आप दुःखोंके हरण करनेवाले हैं. कर मुझपर दया क्यों नहीं करते? आप दैहिक, दैविक, भौतिक तीनों कारके तापोंके और सन्देह, शोक, अज्ञान तथा भयके नाश करने- ले हैं। ( मेरे भी दुःख, ताप और अमान आदिका नाश कीजिये )॥१॥ कतो कलिकालसे उत्पन्न होनेवाले पापोंसे मेरी धुद्धि मन्द पड़ गया है और मन मलिन होगया है, तिसपर फिर हेम्वामी!आप भी मेरी सँभाल हीं करते ? तय इस दासका जीवन कैसे निभेगा ? ॥२॥ ममी ! आप सय प्रकारसे समर्थ है और मैं सब प्रकारसे दीन हूँ। यह जानकर की आप मुझपर कृपा नहीं करते, इससे मालूम होता है कि मैं भाग्यहीन ही k है रघुनाथजी ! मैं अनेक योनियोंमें मटक माया परन्तु आपके दिमय-पत्रिका सिया मेरे दुमग कोई भ्यामी नहीं है। दुम-मुस सहत- सदा आपकी ही तारण knu अपने मनमें तो समझता है कि आप ममान दुमरा कोई भी दयालु परन्तु देहरे! भाएको प्रसन्न करनेवाले साधन इस तुलस नहीं हैं। (यिना ही माधन फेयल शरणागतिसे ही होना पड़ेगा) २ [१०] का कहि कहिय कृपानिधे ! भव-जनित विपतिः इंद्रिय सकल विकल सदा, निज निज सुमाउ जे सुख-संपति, सरग-नरक संवत सँग ला हरि ! परिहरि सोइ जतन करत मन मोर अमा में अति दीन, दयालु देव सुनि मन अनुर जो न द्रवहु रघुबीर धीर, दुख काहे न ला जद्यपि मैं अपराध-भवन, दुख-समन तुलसिदास कहँ आस यह बहु पचित उधा भावार्थ-हे कृपानिधान ! इस संसार जनित मारी दुखड़ा भापकोछोइकर और किसके सामने रोइन्दियाँती अपने विषयाम आसक्त होकर उनके लिये व्याकुल ये नो सदा सुम्ब-सापनि और साजरककी उलझनमें ही है पर हेहरे मेरा यह अभी आपको छ पा विनय पत्रिका भापका दयालु नाम सुनकर मैंने माप मन लगाया है। इतनपर भी हे रघुरि | धार ! यदि माप मुझपर दया नहीं करते तो मुझे कैसे दुख नहीं होगा? ॥३॥ ययय ही में अपराधाका घर हैं। परन्नु हे मुरारे। याप तो (अपराधका विचार न करके) दुबाका नाश ही करनेवाले है। मुम तुसादामको आपस सदा यही आशा है, क्योंकि आप अय- नक अनेक पतितो ( अपराधियों ) का उद्धार कर चुके हैं (इसलिये भय मेरा मी अवश्य करेंगे)]] [१११] फेसर ! कहि न जाइ का कहिये । देरात तब रचना विचित्र हरि ! समुझि मनहि भन रहिये ॥१॥ मुन्य मीति पर चित्र, रंग नहि, तनु यिनु लिखा चितेरे । चाये मिटह न मरइ भीति, दुख पाइय एहि तनु हेरे ॥२॥ रविकर-नीर, घसे अति दारुन मकर रूप तेहि माहीं। बदन-हीन सो ग्रस चराचर, पान करन जे नाहीं ॥३॥ कोउ कह सत्य, झूठ कह कोऊ, जुगल प्रबल कोउ मान । सत्य तुलसिदास परिहरे तीन भ्रम, सो आपन पहिचान ॥४॥ भावार्थ-हे फेशय ! क्या कहूँ ? कुछ कहा नहीं जाता! हे हरे ! आपको यह विचित्र रचनादेखकरमन ही मन (आपकी लीला) समझकर रह जाता हैं ॥१॥ कैसी अद्भुत लीला है कि, इस (संसाररूपी) चित्रको निराकार (अव्यक्त) चित्रकार (पष्टिकर्ता परमात्मा) ने शून्य (मायाको ++ - स्थूल चित्र तो धोनेसे मिट जाते है, परन्तु यह (महा-मायावी है। उस मगरके मुँह नहीं है, तो मी वहाँ जो भी जल पीने जाता है कर उसके पीछे दौड़नेवालोंको भी यिना मुखका मगर यानी निराश मनसतो (ये तीनों ही भ्रम है) जो इन तीनों भ्रमासे निवृत्त होक विनय-पत्रिका दीवारपर बिना ही रंगके (संकल्पसे ही) बना दिया। (माधा- माया-चित्र) किसी प्रकार धोनेसे नहीं मिटता । (साधारण विष है, उसे मृत्युका डर नहीं लगता परन्तु ) इसको मरणका मय धना है। (साधारण चित्र देखनेसे सुख मिलता है परन्तु ) इस संसारम- मयानक चित्रकी ओर देखनेसे दुःख होता है ॥२॥ सूर्यको किरण (भ्रमसे) जो जल दिखायी देता है उस जलमें एक भयानक मगर यह जड़ हो या चेतन, यह मगर उसे ग्रस लेता है। भाय यह कि संसार सूर्य की किरणोंमें जलके समान भ्रमजनित है। जैसे मू किरणोंमें जल समझकर उनके पीछे दौड़नेवाला मृग जल न पाह प्यासा ही मर जाता है, उसी प्रकार इसभ्रमात्मक संसारमें सुमसर काल मा जाता है ॥३॥ इस संसारको को सत्य कहता हैको नि पतलाता है और कोई सत्य मिभ्यास मिलाहुमा मानता है। तुलसीराम है (भयांत् मय कुछ परमात्माकी लीला ही समझता है) यही मी असली म्यापको पहचान सकता है॥ [१२] कैमत्र ! काग्न कान गुमाई। जेदि अपगप अमाय जानि माहिं तर आपकी ना ॥१

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वर लगि जो दुस सहउँ कहेउँ नहि, जद्यपि अंतरजामी ॥२॥ द्वैतरूप तम-कृप परौं नहिं, अस कछु जतन विचारी ॥४॥ तुलसिदास प्रभु तच प्रकास बिनु, संसय टरै न टारी ॥५॥ भावार्थ-हे माधव! अव तुम किस कारणकृपानहीं करते तुम्हाग बिना जीवन धारण ही नहीं कर सकता तय तुम प्रणतपाल होकरी मैंने तुमसे नहीं कहे, यद्यपि तुम अन्तर्यामीरूपसे पय जानते थे। विनय-पत्रिका फर, परन्तु रात-दिन मापकी निष्ठुरता देखकर यह तुलसीदान दुवी हो रहा है (इसीस याम्य होफर) ऐसा करना पड़ा ॥५॥ [१३] माधव ! अब न द्रवहु केहि लेखे । प्रनतपाल पन तोर, मोर पन जिगहुँ कमलपद देखे ॥ १॥ जर लगि मैं न दीन, दयालु त, मैं न दास, ते खामी । वे उदार, मैं कृपन, पतित में, ते पुनीत, अति गावै । बहुत नात रघुनाथ! तोहि मोहि, अब न वजे पनि आवे ॥३॥ जनक जननि, गुरु-चंधु, सुहृद-पति, सब प्रकार हितकारी । सुनु अदभ्र करुना वारिजलोचन मोचन मय मारी। प्रणतोशरणागतका पालन करना है और मेराण तुम्हारे धरणारविन को देख-देखकर ही जीना है। भाव यह कि जब मैं तुम्हारे चरण मुझपर कृपा क्यों नहीं करते जबतक मैं दीन और तुम दयाल सेयक और तुम स्वामी नहीं घने थे, तबतक तो मैंने जो दुःख किन्तु अब तो मेरा तुम्हारा गया । मदानी हो और । देरे सहे विनय-पत्रिका कंगाल हूँ, तुम पतितपावन हो और मैं पतित हूँ, चेद इस बातको गा रहे हैं । हे रघुनाथजी ! इस प्रकार मेरे-तुम्हारे अनेक सम्बन्ध है; फिर मला, तुम मुझे कैसे त्याग सकते हो ? ॥३॥ मेरे पिता, माता, गुरु, भाई, मित्र, खामी और हर तरहसे हितू तुम्ही हो । अतएव कुछ ऐसा उपाय सोची, जिससे मैं द्वैतरूपी अंधेरे कुएँ में न गिलं, अर्थात् सर्वत्र केवल पक तुम्हें ही देखकर परमानन्दमें मग्न रहूँ ॥४॥ हे कमलनयन ! सुनो, तुम्हारी अपार करुणा भवसागरके भारी भयसे ( आवागमनसे) छुड़ा देनेवाली है । हे नाथ ! तुलसीदासका अज्ञान (रूपी अन्धकार) विना तुम्हारे ज्ञानरूप प्रकाशके, विना तुम्हारे दर्शनके, किसी प्रकार भी नहीं टल सकता (अतएव इसको तुम ही दूर दूर करो) ॥५॥ [११४] माधव ! मो समान जग माहीं। सब विधि हीन, मलीन, दीन अति, लीन-विषय कोउ नाहीं ॥१॥ तुम सम हेतुरहित कृपालु आरत-हित ईस न त्यागी । मैं दुख-सोक-विकल कृपालु ! केहि कारन दया न लागी ॥२॥ नाहिंन कछु औगुन तुम्हार, अपराध मोर मैं माना। ग्यान-भवन तनु दियेहु नाथ, सोउ पाय न मैं प्रभु जाना ॥३॥ पेनु करील, श्रीखंड पसंतहि दूपन मृपा सार-रहित हत-भाग्य मुरभि, पल्लव सो कहु किमि पार्य ॥४॥ सब प्रकार में कठिन, मृदुल हरि, दृढ़ विचार जिय मोरे । तुलसिदास प्रभु मोह-संसला, छुटिहि तुम्हारे छोरे ॥५॥ लगा।

भार ग और क्या होगा? इतनेपर भी मैं दुःख और शोकसे व्याकुल हो हूँ। हे कृपालो ! किस कारण तुमको मुझपर दया नहीं मानीral नयन्दनको और करील घसन्तको पृथा ही दोष देते हैं। मग नातमाग्य है।याँसमें सार ही नहीं है। तर येचारा चन्दन उम धि कदास भर दे। इसी प्रकार करीलमें पत्ते नहीं होते फिर धमाल -टिया फिममीरमानुसीदासकी मोहरूपी पड़ी मारे। कादिर कोटि पाय फरिप, अम्यंतर प्रन्धि नट नय-पत्रिका भावार्थ-हे माधव ! संसारमें मेरे समान, मव प्रकारसं साधनाम पी, अति दीन और विषय भोगौम ड्रया हुआ दूसरा कोई नहीं है ।। र तुम्हारे समान, यिना ही कारण कृपा करनेवाला, दीन-दुखिशात नार्थ सब कुछ त्याग करनेवाला स्वामी कोई दूसरा नहीं है। माया के दीनोंके दुःख दूर करने के लिये ही तुम वैकुण्ठ या सचिदानन्धनका दकर धराधाममें मानवरूपमें अवतीर्ण होते हो, इससे मषित = मानता हूँ कि इसमें तुम्हारा कुछ भी दोष नहीं है, सय मेग राध है। क्योंकि तुमने मुझे जो ज्ञानका भण्डार यह मनुष्य पा, उसे पाकर भी मैंने तुम-सरीखे प्रभुको आजतक नहीं पहचाना - कैसे हरा-भरा कर देगा ? (सही में विकहीन और भतिशून्य से बार दोप लगा मकता है!)! सय प्रकार कटारा सो कोमल म्यमाययाले हो, मैंने अपने मन में यह निधयापसे रिका बागेमे पट मांगी, अन्यथा नहीं घर ! मोह-काम क्यों हँट।

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- उशयकरकपच मरो, पर जयतकनुमदयानही कातका वामृत पहादीमधुर और शाग्निकर,यदि मनको यह अमुक करि उपाय पचि मरिय, तरिय नहि, जब लगि करहुन दाया। मधुर सीतल जो प मन सो रस पाये। सपने परवस पर, जागि देखत केहि जाइ निहोरे । तुलसिदास हरि-कृपा मिटै भ्रम, यह मरोस मनमाही १५ भावार्थ- माधय! तुम्हारी यह माया ऐसी (दुम्तरकिfr ही माता भारजवाइमकैयाम्नयिकम्यका अनुमय माग नरमोहमनित गंसारकी महान् विपत्तियों दुल देनीरगी नय-पत्रिका रुकी दयाके बिना संशयशून्य विवक नहीं होता और विवेक हुए वि 7 घोर संसारसागरसे कोई पार नहीं जा सकता ॥५॥ [११६] माधव ! असि तुम्हारि यह माया । सुनिय, गुनिय, समुझिय, समुझाइय, दसा हृदय नहिं आवै । जेहि अनुभव पिनु मोहजनित भव दारुन विपति सताई ।।२ ती कत मृगजल-रूप विषय कारन निसियासर धारे॥ जेहिके भवन पिमल चिंतामनि, सो कत कांच घटोरे। ग्यान मगति साधन अनेक, सत्र सत्य, धूठ कछु नाही। राजाना अपामय ही है गुनता है, विचारतारे,रामाता रणको मममाता , पर तुम्हारी ग मायाका यथार्थ हा सर

विनय-पत्रिका
कहींचखनेकोमिल जाय, तोफिर यह विषयरूपी झूठे मृगजलके लिये क्यों
ति-दिन भटकता फिरेजिसकेघरमें ही निर्मल चिन्तामणि विद्यमान
यह काँचक्यों बटोरेगा?भाव यह कि जिसे ब्रह्मानन्द प्राप्त हो गया, वह
यिक विषयानन्दकी ओर क्यों ताकने लगा जैसे कोई सपने में किसीके
(राधीन होजाय और (टनेके लिये उससे) विनय करे, परजवजागजाय
यि यह किससे क्यों निहोराकरेगा?॥४॥ ज्ञान,भक्ति आदि भनेक साधन
और सभी सधे हैं। इनमें झूठ एक भी नहीं। परन्तु तुलसीदासके मन-
तो इसी पातका भरोसा है कि प्रशानका नाश फेवल श्रीहरि-कृपास ही
हो सकता है। अर्थात् भगवत्कृपा ही परम साधन है और वह सब जीवों-
र है ही, फेयल उसपर भरोसा या परम विश्वास करना चाहिये ॥५॥
[११७]
हे हरि! कवन दोष तोहिं दीजै ।
जैहि उपाय सपनेहुँ दुरलभ गति, सोइ निमि-घासर कीजै ॥१॥
जानत अर्थ अनर्थ-रूप, तमकूप परष यहि लागे।
सदपि न तजत खान अज खर ज्यों, फिरत विषय अनुरागे ॥२॥
भूत-द्रोह कृत मोह-यस्य हित आपन में न विचारो ।
मद-मत्सर-अभिमान ग्यान-रिपु, इन मह रहनि अपारो ॥३॥
चैद-पुरान मुनत समुझत रघुनाथ सकल जगन्यापी ।
पेषत नहिं श्रीखंड बेनु इत्र, सारहीन मन पापी ॥४॥
अपराध-सिंधु करुनाकर ! जानत अंतरजामी।
तुलसिदास भयभ्याल-प्रसित तब सरन उरग-रिपु-गामी ॥५॥

मोचता। मदाप्याअहंकार आदि जो शानके शत्रु है, उन्हीं में नहीं समाती, जैसे चन्दनकी सुगन्ध विना गूदेके साररहित वाँसमें न डसा हुआ यह तुलसीदास तुम्हारीशरणमें पड़ा है। (इसे बचामोर ज्यों गज-दसन तथा मम करनी, सब प्रकार तुम जानहु ।। रहनि आन विधि, कहिय आन, हरिपद-सुख पाइय कैसे ॥२ निमयपत्रिका मापार्य- हरे ! तुम्हें क्या दोष है ? (फ्योंकि दोष नो सानै ही) जिन उपायोंमें म्यानमें मी मोक्ष मिलना दुर्लम है, मैं दिन-रात किया करता है ॥१में जानना है कि इन्द्रियोंक मोग सर्वथा अनर्थ इनमें फंसकर मानरूपीधर कुर में गिरना होगा, फिर मीमै दिएर आसक्त होकर कुत्ते, यकर भौर गधेकी भाँति इन्हीं के पीछे मटर हैं ॥२॥ अान-परा जीयोंके माप मोह करता है और अपना दिन में रचा पचा रहता है। (यनाइये मुन्न सरीखा नीच और कौन होगा)। वेदों और पुराणों में सुनता हैं तया ममझता है कि श्रीरामजी ही सन संसारमें रम रहे हैं, परन्तु मेरे यियेकहीन पापी मनमें यह बात वैमे जाती ॥४॥ हे करणाकोसानि! मैं तोमपार अपराधीका समुद्रा अन्तर्यामी सब कुछ जानते हो। अतएव हे गरुडगामी ! संसाररूपीस संसाररूपी साँप तुम्हारे वाहन गरुड़को देखते ही मयसे भाग जाय' तुम एक बार इधर आओ तो सही) ॥५॥ [१९८] हे हरि ! कवन जतन सुख मानहु । जो कछु कहिय करिय भवसागर तरिय यच्छपद जैसे।

जद्यपि मम १८९ विनय-पत्रिका देखत चारु मयूर ययन सुभ बोलि सुधा इव सानी । सविप उरग-आहार, निठुर अस, यह करनी वह पानी ॥३॥ अखिल-जीव-वत्सल, निरमत्सर, चरन-कमल-अनुरागी। ते तब प्रिय रघुवीर धीरमति, अतिसय निज-पर-त्यागी ॥४॥ औगुन अपार संसार-जोग्य रघुराया। तुलसिदास निज गुन विचारि करुनानिधान करु दाया ॥५॥ भावार्थ-हे हरे ! मैं किस उपायसे अपनेको सुखी समस्? मेरी करनी हाथीके दिखावटी दाँतोंके समान है, यह सब तो तुम भलीमाँनि जानते हो।भाव यह कि जैसे हाथी के दाँत दिखानेके और तथा खानेके और होते हैं, उसी प्रकार में भी दिखाता कुछ और हूँ, और करता कुछ और ही हूँ ॥१॥ मैं दूसरोंसे जो कुछ कहता हूँ धैसा ही स्वयं करने भी लगें, तो भव-सागरसे बछड़ेके पैरभर जलको लाँघ जानेकी भाँति अनायास ही तर जाऊँ।परन्तु करूँ क्या ? मेरा आचरण तो कुछ और है और कहता - कुछ और ही। फिर भलातुम्हारे चरणोंका या परमपदका आनन्द कैसे मिले?॥२॥ मार देखनेमें तो सुन्दर लगता है और मीठी वाणीसे अमृतस सने हुए-से बचन बोलता है; किन्तु उसका आहार जहरीला साँप है ! फैसा निष्ठुर है ! करनी यह और कथनी यह ! (यही मेरा हाल है) ॥३॥ हे रघुवीर! तुमको तो वे ही सन्त प्यारे है, जो समस्त जीवोंसे प्रेम करत है। किसीको भी देखकर तनिकभी नहीं जलते, जो तुम्हारे चरणारविन्दॉक मेमी है, जो धीर-बुद्धि हैं, जो अपने परायकाभेद यिल्कुल ही छोड़ चुके हैं। अर्थात् मयमें एक तुमकोही देखते हैं (फिर मैं इन गुणोंसे हीन तुम्हें कैसे !

मनि, मान, पैराग्यमादि सभीसाधनममनको शान करना अच्छा कर अयश 'मुझे पूछ। (मान, मनि वैराग्यसाभार तुलसिदाम इंद्रिय-समय दुख, हरे यनिहिं प्रभु सारे ॥५॥ भावार्थ-देहरे ! मेरा यह (संसारको सन् निरय, पवित्र और मुखरूप माननेका) भ्रम किस उपायसे दूर होगा ?मता, गुमना यिनय-पत्रिका प्रिय लD ?) ॥४॥ हे रघुनाथजी! यद्यपि मुझमें अनन्त भवगुण हैं और संसारमें ही रहने योग्य हैं, परन्तु तुम करुणानिधान हो, तनिक मन गुणोंपर विचार करके ही तुलसीदासपर दया करो! ॥५॥ [११९] हे हरि ! कवन जतन भ्रम भागे। देखत, सुनत, विचारत यह मन, निज सुमाउ नहिं त्याग ॥१॥ भगति-ग्यान चैराग्य सकल साधन यहि लागि उपाई। कोउ भल कहउ, देउ कछु, असि वासना न उरते जाई ॥२॥ जेहि निसि सकल जीव सूतहिं तव कृपापात्र जन जाग। निज करनी विपरीत देखि मोहिं समुझि महा मय लागे ॥३॥ जद्यपि भग्न-मनोरथ मिधियस, सुख इच्छव दुख पावै । चिनकार करहीन जथा सारथ पिनु चित्र बनावै ॥४॥ हपीकेम मुनि नाउँ जाउँ पलि, अति मरोस जिय मोरे । सोचता है, फिर भी मेरा यमनमायका मोहता । (और मंसारको मस्त्य मुसाप मानकर यार-यार किया गया है) मेरे हृदयमे तो यही यामना कमी नहीं जाती कि rity यिनय-पत्रिका नमें भी प्रायः वड़ाई और धन-मान पानेकी वासना वी ही रहती ॥२॥ जिस (संसार-रूपी) रातमें सब जीव सोते हैं, उसमें केवल पिका कृपापात्र जन जागता है। किन्तु मुझे तो अपनी करनीको बिल्कुल विपरीत देखकर वहाभारीभय लग रहा है ॥३॥ यद्यपि दैव-यश- रम्यवरा मनुप्यके सारे मनोरथ नष्ट हो जाते हैं, सांसारिक सुख उसके ग्यम (पूर्व सुस्तके अभावस) लिखे होनहीं गये।तथापि वह सुखोंकी च्छामात्र कर वैसे ही दुःख पाता है जैसे कोई विना हाथका चित्रकार केवल मनोकल्पित) चित्रोंसे अपना स्वार्थ सिद्ध करना चाहता है और मग्नमनोरथ होकर दुःख पाता है ( उसी प्रकार में भी भजनसाधनरूप उरुत किये बिना ही यों ही सुख चाहता हूँ) ॥४॥ आपका हृषीकेश इन्द्रियाँफे स्वामी) नाम सुनकर मैं आपकी घलया लेता हूँ। मेरे मनमें मापका अत्यन्त मरोसा है। तुलसीदासका इन्द्रिय-जन्य दुःख आपको अवश्य नाश करना ही पडेगा ॥५॥ [१२०] हे हरि ! कस न हरहु भ्रम भारी । बद्यपि मृपा सत्य मासे जबलगि नहिं कृपा तुम्हारी ॥१॥ अर्थ अविद्यमान जानिय संसृति नहिं जाइ गोसाई । म पिन पौध निज हठ सह परवस परयो कीरकी नाई ॥२॥ सपने पाघि विविध पाधा जनु मृत्यु उपस्थित पद अनेक उपाय कर जागे दिनु पिनु पीर पीर न जाई ॥३॥ भुति गुरुसाधु-समृति संमत यह दृश्य असत दुखकारी । चौदि पिन तजे, मजे चिनु रघुपति, विपति मकं को टारी || आई।

स्मृतियाँ समी एक स्वरस कहते हैं कि यह दृश्यमान जगत् सन्
है, असत् है, तथापि यतक आपकी रुपा नहीं होती, दवा
यथार्थमें नहीं है, किन्तु हेस्वामी!इतनेपर भी इस संसारसे छुटकारा
पाता।मैं किसी दूसरेद्वारा याँध बिना ही अपने ही हउ (मोह) से दो
तरह परवशधा पड़ा हूँ (स्वयं अपने ही अमानसे बघ-सा गया ।
जैसे किसीको स्वममें अनेक प्रकारकेरोगहोजाय जिनसे माना उसऔर
द्दी आ जाय और वाहरसे वैद्य अनेक उपाय करते रहें, परन्तु उस
उन्हें दूर करने के लिये मिथ्या उपाय कर रहे हैं, पर तत्त्वज्ञानके बिना
। पड़कर लोग बिना ही हुए संसारकी अनेक पीडामोगा रहे है।
श्रीरघुनाथजीका भजन नहीं किया जाता तबतक ऐसी किसकी
है जो इस विपत्तिका नाश कर सके? घेद निर्मल पाणीसे संसर
सागरसे पार होनेके अनेक उपाय यतला रहे है, किन्तु हे तुलसीदास
जबतक 'मैं और मेरा' दूर नहीं हो जाता-अहंता-ममता नहीन
पिनय पत्रिका
पा, उपाय संमार-तरन कई,
विमल गिरा अतिः गाई।
तुलसिदाम में-मोर गये बिनु जिउ सुख कबहुं न पाये !"
भावार्थ-देहरे ! मेरे इस (संमारको सत्य और सुमन
माननेके ) मारी भ्रमको क्यों दूर नहीं करते १ यद्यपि यह संसार
सत्य सा ही मासता है॥१॥मैं यह जानता है कि (शरीर-धन-पुत्रादि
वह जागता नहीं तबतक उसकी पीड़ा नहीं मिटती (इसी प्रकारमाः
भ्रममें
इन पीड़ाओंसे छुटकारा नहीं मिल सकता) घेद, गुरु, सन्त
(और काल्पनिकसत्तामान लेनेपर) दुःख-रूप है। जबतकासेत्याग,
-
जाती, तबतक जीव कमी सुख नहीं पा सकता ॥५॥

विनय-पत्रिका [१२१] है हरि ! यह भ्रमकी अधिकाई । देखत, सुनत, कहत, समुझत संसप-संदेह न जाई ॥१॥ जो जग मृपा ताप-त्रय अनुभव होइ कहहु केहि लेखे । कहि न जाय मृगयारि सत्य, भ्रम ते दुस होइ पिसेखे ॥२॥ सुमग सेज सोबत सपने, वारिधि यूड़त भय लागे । कोटिहुँ नाव न पार पाव सो, जब लगि आपु न जाग ॥ ३ ॥ अनविचार रमनीय सदा, संसार भयंकर भारी। सम-संवोप-दया-विवेक तें, व्यवहारी सुखकारी ॥४॥ तुलसिदास सब विधि प्रपंच जग, जदपि झूठ श्रुति गायै । रघुपति-भगति, संत-संगति पिनु, को भव-त्रास नसावै ॥५॥ भावार्थ-देहरे! यह भ्रमकी ही अधिकता है कि देखने, सुनने, कहने और समझनेपर भी न तो संशय (असत्य जगत्को सत्य मानना) हो जाता है और न सन्देश (पक परमात्माकी ही अखण्डसत्ता हैया कुछ और) ही दूर होता है ॥१॥ (कोई कहे कि) यदि संसार असत्य है, तो फिर तीनों तापोंका अनुभव किस कारणसे होता है ? (संसार असत्य है तो मंसारके ताप भी असत्य हैं, परन्तु तापोंका अनुभव तीसत्यप्रतीत होता (इसका उत्तर यह है कि)मृगतृष्णाकाजल सत्य नहीं कहा जासकता, परन्तु जयतका भ्रम है,तयतक यह सत्यहीदीखता है और इसीभ्रमके कारण विशेष दुःस होता है। इसी प्रकार जगत्में भी भ्रम-वश दुःखोंका अनुभव होना है ॥२॥ जैसे कोई सुन्दर सेजपर सोया हुआ मनुष्य सपनेमें समुद्र 'इवनेसे मयभीत हो रहा हो पर जयतक वह स्वयं जाग नहीं जाता, विनय-पत्रिका नयतक करोडोनाकामडारामीयह पारनहीं जा सकता। यह जीय माननिद्रामें मचेतमामसार-सागरमें इयरहा है फे तरयशानमें जागे यिना सहना साधनाद्वारा भी यह दुमा हो सकता ॥३॥ यह यत्यन्त मयानक संसार मानके कारण दिखायी देता है। अयश्य ही उनके लिये यह संसारमुखकारी जो मम, सन्तोप, दया और विवेकसे युक्त व्यवहार करते। तुलसीदास ! वेद कह रहे हैं कि यद्यपि सांसारिक प्रपञ्च सर असत्य है, किन्तु रघुनाथजीकी भक्ति और सन्तोंकी संग किसमें सामर्थ्य है जो इस संसारके भीपण मयका नाश कर श्रमसे छुड़ा सके ? ॥५॥ [१२२] मैं हरि, साधन करइ न जानी । जस आमय मेपज न कीन्ह तस, दोष कहा दिरमानी सपने नृप कह घटै .पिप्र-चघ, विकल फिर अघ लागे वाजिमेध सत कोटि कर नहिं सुद्ध होइ विनु जागे स्रग मह सर्प विपुल भयदायक, प्रगट होइ अविचारे बहु आयुध धरि, बल अनेक करि हारहिं, मरइ न मारे निज भ्रम ते रविकर-संभव सागर अवि भय उपजार अबगाहत घोहित नौका चदि कबहूँ पार न पाये तुलसिदास जग आप सहित जब लगि निरमूल न बाई. तब लगि कोटि फलप उपाय करि मारिय, वरिय नहि माई ।

विनय-पत्रिका
भावार्थ-हे हरे ! मैंने (अज्ञानके नाशके लिये) साधन करना नहीं
साना । जैसा रोग था, वैसी दवा नहीं की। इसमें इलाजका क्या दोष
? ॥१॥ जैसे सपने में किसी राजाको ब्रह्महत्याका दोष लग जाय और
ह उस महापापके कारण व्याकुल हुआ जहाँ-तहाँ भटकता फिरे, परन्तु
चितक यह जागेगानहीं तबतक सौ करोड़ अश्वमेध-यज्ञ करनेपर भी वह
युद्ध नहीं होगा, वैसे ही तत्त्वज्ञानके विना अशानजनित पापोंसे छुटकारा
नहीं मिलता ॥२॥ जैसे अज्ञानके कारण मालामें महान् भयावने सर्पका
प्रम हो जाता है और वह (मिथ्या सर्पका भ्रम न मिटमेतक) अनेक
थियारॉके द्वारा पलसे मारते-मारते थक जानेपर भी नहीं मरता, साँप
होता तो हथियारोंसे मरता; इसी प्रकार यह अज्ञानसेभासनेयाला संसार
भी शान हुए यिना याहरी साधनोंसे नष्ट नहीं होता ॥३॥ जैसे अपने ही
नमसे सूर्य की किरणोंसे उत्पन्न हुआ (मृगतृष्णाका) समुद्र बड़ा ही
भयावना लगता है, और उस (मिथ्यासागर) में डूबा हुआ मनुष्य याहरी
जहाज या नावपर चढ़नसे पार नहीं पा सकता (यही हाल इस
अमानसे उत्पन्न संसार सागरका है।)॥४॥ तुलसीदास कहते हैं, जब-
तक 'मैं पनसहित संसारका निर्मूल नाश नहीं होगा, तयतक, हे
माइयो, करोड़ोंयत्न कर-करके मरभले ही जाओ, पर इस संसार-सागरसे
पार नहीं पा सकोगे ॥५॥
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[१२३]
अस फछु समुझि परत रघुराया।
रिनु तव कृपा दयालु ! दास-हित ! मोह न छुटै माया ॥१॥

पाई।
दिन अरु रैनि बसान।
निसि गृहमध्य दीपकी यातन्ह, तम निवृत्त नहिं होई
चित्र कलपतरु कामधेनु गृह लिखे न विपति नसावे ।।
भावार्थ-दे रघुनाथजी! मुझे कुछ ऐसा समझ पाता।
दयालु है सेयक-हितकारी! तुम्हारी पाके बिना म तोमर
धानिकहानमें कितना ही निपुण क्यों नदी पर यह संमार-सहा
भूमके मारे तुम्य पा रहा हो और को उसके घरमें '
कामधेनुकं चित्र टिप-टिमकर उसकी विपत्ति दूर करना या हो।
दरमहींहोमकली मे ही कंबलशास्रॉकी यातॉसेहीमा मानिस
गन-दिन पट मोजनॉपर व्याख्यान दे रहनमे पर।
होता। मांडन करनार भूषकी निवृति होनेगजामानुदिनी
गुमशीनी पड़ी जानता जिसने पिनाही कुछ पोवामनपर
सिपा मोगरकोरीयान्यान-याजोगया.
चिनय-पत्रिका
वाक्य-न्यान अत्यन्त निपुन भव-पार न पावै को ।
जैसे कोइ इक दीन दुखित
अति असन-हीन दुस
पटरस बहुप्रकार भोजन कोउ,
बिनु बोले संतोप-जनित सुख खाइ सोइ पै जाने ।
जयलगि नहिं निज हदि प्रकास, अरु विपय-आस मनमाहीं।
तुलसिदास तबलगि जग-जोनि भ्रमत सपनेहुँ मुख नाहीं ।
हो सकता है भार न माया ही छूटती है ॥१॥ जैसे रातके समा।
केपल दीपकी यात करनेसे अधरा दूर नहीं होता, ऐसे ।
पार मही कर माता ॥२॥ जैसे कोई एक दीन, दुखिया, मोजन मन
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विनय-पत्रिका कार्य-सिद्धि होती है ॥४ा जबतक अपने हृदयमें तत्त्व-शान का प्रकाश नह हुभा और मनमें विषयोंकी आशा बनी हुई है, तबतक, हे तुलसीदास इन जगत्की योनियोंमें भटकना ही पड़ेगा,सुख सपनेमें भी नहीं मिलेगा। जो निज मन परिहरै पिकारा । तौ कत द्वैत-जनित संसृति-दुख, संसय, सोक अपारा ।।१।। सत्रु, मित्र, मध्यस्थ, तीनि ये, मन कीन्हें परिआई ।य. त्यागन, गहन, उपेच्छनीय, अहि, हाटक, तनकी नाई ॥२॥ असन,पसन,पसु,बस्तु विविधविधि,सय मनि मह रह जैसे!..... 'सरंग, नरक, चर-अचर लोक बहु, बसत मध्य मन तसें ॥३॥ चिटप-मध्य-पुतरिका, सूत मह कंचुकि विनहिं बनाये। 15 मन महँ तथा लीन नाना तनु, प्रगटत अवसर पाये ॥४॥ रघुपति भगति-चारि-छालित चित, विनु प्रयास ही सूझै । तुलसिदास कह चिदं-विलास जग यूझत यूझत यूझै ॥५॥ साउ-जागा भावार्थ-यदि हमारा मन विकारोंको छोड़ दे, तो फिर द्वैतमावर स्पन संसारी दुःख, भ्रम और अपार शोक क्यों हो! यह सय मन. वेकारोंके कारण ही तो होते हैं ॥१॥ शत्र, मित्र और उदासीन इन तीनोंकी मनने ही हठसे फटाना कर रखी है। शत्रुको साँपके समान याग देना चाहिये, मित्रको मुवर्णकी तरह ग्रहण करना चाहिये और उदासीनकी वणकी तरह उपेक्षा कर देनी चाहिये। ये सब मनकी ही फरपनाएं हैं॥२॥ जैसे (बहुमूल्य) मणिमें भोजन, वस्त्र, पशु और भनेक समगम इस मनमें भी अनेक प्रकारके शरीरलीन रहते हैं, जो समय पाकर भक्तिरूपी जलसे धुलकर चित्त निर्मल हो जायगा, तब अनाया चैतन्यके विलासरूप जगत्का सत्य तत्त्य परमात्मा समझते-समझ मैं कहि कहीं विपति अति मारी। श्री रघुवीर धीर हितकारी। मम हृदय भवन प्रभु वोरा। वह बसे आइ बहु चोरा अति कठिन करहिं बरजोरा) मानहिं नहिं विनय निहोरा।। अति करहिं उपद्रव नाथा| मरदहिं मोहि जानि अनाया। एक, अमित बटपारा कोउ सुनै न मार पुकारा।। कह तुलसिदास सुनु रामा लूटहिं तसकर तब धामा। विनय-पत्रिका प्रकारकी चीजें रहती यही मर्ग, नरम, घर, अचर और क लोक इस मनमें रहते हैं। माव यह किसोटी-मी मणिक मोलम जो सो गाने, पीने, पहननेकी चीजें मरीदी जा सकती है, वैसे ही इस प्रतापसे जीय स्वर्ग-नरकादिमें जा सकता है 2n जैसे पेड़के । कठपुतली और मूतम यल, यिना यनाये ही सदा रहते हैं. उसी हो जाते हैं men इस मनके विकार कय छुटेंगे, जब श्रीरघुनाथ सत्यरूप परमात्मा दिखलायो दो। किन्नु तुलसीदास कहते हैं। समझमें आवेगा ॥५॥ [१२५] तम, मोह, लोभ, अहँकारा । मद, क्रोध, बोध-रिषु मारा। मैं भागेहु नहिं नाथ ! उबारा। रघुनायक, करहु संमारा ।। चिंता यह मोहिं अपारा। अपजस नहिं होइ तुम्हारा!!'

विनय-पत्रिका
भावार्थ-हे रघुनाथजी! हे धैर्यवान् ! (बिना ही उकताये) हित
करनेवाले मैं तुम्हें छोड़कर, अपनी दारुण विपत्ति और किसे मुनाऊँ ?
॥१॥ हे नाथ ! मेरा हृदय है तो तुम्हारा निवास स्थान, परन्तु आजकल
उसमें घस गये हैं आकर यहुत-से चोर ! तुम्हारे मन्दिर में चोरोंने घर कर
लिया है ॥२॥ (मैं उन्हें निकालना चाहता हूँ, परन्तु वे लोग बड़े ही
कठोर हृदय हैं) सदा जयरदस्ती ही करते रहते हैं। मेरी विनती-निहोरा
कुछ भी नहीं मानते ॥३॥ इन चोरों में प्रधान सात है अशान, मोह, लोभ,
अहंकार, मद, क्रोध और शानका शत्रु काम ॥४॥ हे नाथ ! ये सब यहाही
उपद्रव कर रहे हैं, मुझे अनाथ जानकर कुचले डालते है ॥५॥ मैं अकेला हूँ
और ये उपद्रयी घोर अपार है। कोई मेरी पुकारतक नहीं सुनता ॥६॥
हे नाय ! माग जाऊँ तो मी इनसे पिंड छूटना कठिन है, क्योंकि ये पीछे
लगे हो रहते हैं। अब हे रघुनाथजी ! आप ही मेरी रक्षा कीजिये ॥७॥
तुलसीदास कहता है कि हे राम! इसमें मेरा क्या जाता है, चोर तुम्हारे
ही घरको लूट रहे हैं ॥८॥ मुझे तो इसी यातकी यही चिन्ता लग रही है
कि कहीं तुम्हारी बदनामी न हो जाय (आपका भक्त कहलानेपर भी मेरे
हदयके सात्विक रनोंको यदि काम, क्रोध आदि डाकू लूट ले जायेंगे
.तो इसमें आपकी ही यदनामी होगी। अतपय इस अपने घरकी आप ही
सम्हाल कीजिये) ॥९॥
[१२६]
मन मेरे, मानहि सिख मेरी ओ निजु मगति चहै हरि केरी ॥१॥
उर आनहि प्रमु-कत हित जेते । सेवहिं ते जे अपनपो चेते ॥२॥

पिनय-पत्रिका २०० दुस-सुख अरु अपमान-घड़ाई। सब सम लेसहि विपति विहाई ॥३॥ मुनु सठ काल-ग्रसित यह देही । जनि तेहि लागि विहि केही ॥४॥ तुलसिदाम विनु असि मति आये । मिलहि नराम कपट-ला लाये ॥५॥ मायार्थ हे मेरे मन! यदि तू अपने हृदय में भगवानकी मक्ति चाहता है, तो मेरी सीख मान ॥१॥ भगवान्ने (गर्भवाससे लेकर अबतक) तेरे ऊपर जो (अपार) उपकार किये हैं उनकोयाद कर, और अहंकार छोड़कर बड़ी सावधानीसे तत्पर होकर उनकी सेवा कर ॥२॥ सुख-दुःख, मान- अपमान, सयको समान समझ; तभी तेरी विपत्ति दूर होगी ॥३॥ मरे दुष्ट इस शरीरको तो कालने असहीरपसा है इसके लिये किसीको दोषमत दे॥५॥ तुलसीदास कहता है कि ऐसी वुद्धि हुए विना, केवल कपट-समाधि लगानेसे श्रीरामजी कमी नहीं मिलते, वे तोस प्रेमसेही मिलते हैं ॥५॥ [१२७ ] मैं जानी, हरिपद-रति नाहीं । सपनेहुँ नहिं विराग मन माहीं॥१॥ जे रघुबीर-चरन अनुरागे । तिन्ह सव भोग रोगसम त्यागे॥२॥ काम-भुजंग डसत जब जाही। विषय-नीच कटु लगत न वाही ॥३॥ असमंजस अस हृदय विचारी । बढ़त सोच नित नूतन मारी ॥४॥ जर का राम-कृपा दुख जाई । तुलसिदास नहिं आन उपाई ॥५॥ भावार्थ-मैंने जान लिया है कि श्रीहरिके चरणों में मेरा प्रेम नहीं है। फ्याँकि सपने भी मेरे मनमें वैराग्य नहीं होता (संसारके भोगॉम वैराग्य होना ही तो मगयधरणाम प्रेम होने की कसौटी है जिनका रामके विनय-पत्रिका चरणाम प्रेम है, उन्होंने सारे विपय-भोगोंकोरोगकी तरह छोड़ दिया है॥२॥ जय जिसे कामरूपी साँप डस लेता है, तभी उसे विषयरूपी नीम कड़वी नहीं लगती ॥३॥ ऐसा विचारकर हृदयमें पड़ाअसमंजस हो रहा है कि क्या करें? इसी विचारसे मेरे मन में नित नयासोच बढ़ता जा रहा है ॥४॥ हे तुलसीदास ! और कोई उपाय नहीं है; जब कभी यह दुःख दूर होगा, तो यस धीराम-कृपासे ही होगा ! ॥५॥ [१२८] सुमिरु सनेह-सहित सीतापति। रामचरन तजि नहिंन आनि गति ॥१॥ जप,तप,वीरथ,जोग,समाधी। कलिमति-विकल,न कछु निरुपाघी|२|| रतहुँ सुकृत न पाप सिराहीं । रकतवीज जिमि पादत जाहीं ॥३॥ इरति एक अप-असुर-जालिका । तुलसिदास प्रभु-कृपा-कालिका||४|| मावार्थ-रे मन !प्रेमके साथ श्रीजानकीचल्लम रामजीका सरण कर क्योंकि श्रीरामचन्द्रजीके चरणोंको छोड़कर तुझे और कहींगति नहीं है।५॥जप,तपातीर्थ,योगाभ्यास,समाधि आदिसाधन है परन्तु कलियुगमें जीयोकी धुद्धि स्थिर नहीं है इससे इन सभी साधनों चिन्न है ॥२॥ माज पुण्य करते भी (धुद्धि ठिकाने न होनेसे) पापका नाश नहीं होता। रतयाज राक्षसकी भाँति ये पाप तो पढ़ते ही जा रहे हैं,माव यह है कि बुद्धिकी विफलतासे पारमें पुण्य-धुद्धि और पुण्यमें पाप-युदि हो रही है। इससे पुण्य करत मी पाप हो पद रहे हैं ॥३॥हे तुलसीदास!सपाप-रूपी राक्षसों के समूहकोनाशकरनेवालीतो केवल प्रभुकी कृपारुपी कालिकाजी विनय-पत्रिका दी है । भगवत्रपाको शरण लेने के सिवा अव अन्य किसी सायन काम नहीं निकलेगा या [१९] रुचिर रसना तू राम राम राम क्यों न रटत । सुमिरत मुख मुकृत पढ़त, अघ-अमंगल घटत ॥१॥ बिनु श्रम कलि-कलुप-जाल कटु कराल कटत । दिनकरके उदय जैसे तिमिर तोम फटत ॥२॥ जोग, जाग, जप, विराग, तप, सुतीरय-अटत । बाँधिवेको भव-गयंद रेनुकी रजु घटत ॥३॥ परिहरि सुर-मनि सुनाम, गुंजा लखि लटत । लालच लघु तेरो लखि, तुलसि तोहिं हटत ॥ ४॥ भावार्थ-हे सुन्दर जीम ! तू राम-राम क्यों नहोरटती! जिसरा नामके स्मरणसे सुन्न यौर पुण्य बढ़ते हैं तथा पाप और अशुम घट हैं ॥१॥ रामनाम-स्मरणसे बिना ही परिश्रमके, कलियुगके कटु भयानक पापोंका जाल वैसे ही कट जाता है, जैसे सूर्य के उदय होने अन्धकारका समूह फट जाता है | रामनामको छोड़कर योग, यर जप, तप, वैराग्य और तीर्थाटन करना वैसा ही है जैसे संसार कई गजराजफे बाँधने के लिये धूल के कणोंकी रस्सी घटना; अर्थात् . घूलकी रस्सीस हा का घाँधना असम्भव है, वैसे ही रामनाम-ही. साधनोंसे मनका परमात्मा लगनायसम्भव है या मुन्दर रामनामरूप चिन्तामणि छोड़तू विषयरूपी घुघचियों को देखकर उनपर ललचाई है, तेरा यह तुच्छ लोम देखकर ही तुलसी तुझे फटकार रहा है । मो विनय-पत्रिका [१३०] राम राम, राम राम राम राम, वपत । मंगल-मुद उदित होठ, फलि-मल-छल छपत ॥१॥ फार के लहं फल रमाल, पपुर पीज यपत । दारहि जनि जनम जाय गाल गूल गपत ॥२॥ फाल, फरम, गुन, गुमाउ सरफे मीम तपन । राम-नाम-महिमा की पापा पले पपत ॥३॥ साधन रिनु सिद्धि मफल रिफल लोग लपत । फलिमुग पर पनिज पिपुल नाम-नगर गपत ॥ ४॥ नाम सों प्रतीति-धीवि उदय गुपिर पपत। पावन रिपे रापन रिषु शुलगिने अपन ॥५॥ भाग-राम नाम सामन्यात भार मानापपरोला भार गरि पाए न or-for irriturn जोपर मा.पि भाम पर गएप पर HITE ने (दुर्गम मनुष्य ) जम्मा गरम (पार मोirthगा.TR-मामी ) em, S.yR (और) ar RamtmaitriM. VR. Amritmमार पाता है.mptin INमापन mamir inारा समाnिth miriti

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३ विनय-पत्रिण [१३०] राम राम राम राम राम राम, जपः । मंगल-मुद उदित होत, कलि-मल-छल छपत ॥१॥ फर के लहे फल रसाल, पपुर पीज पपत । हारहि जनि जनम जाप गाल गूल गपत ॥ २॥ फाल, फरम, गुन, मुभाउ मपके मीम नपन । राम-नाम-महिमा की परपा पले पपत ॥३॥ साधन पिनु मिदिमकल रिफल लोग लपत । फलिजुग पर पनिज रिपुल नाम-नगर ग्रपन ॥४॥ नाम सों प्रतीति-श्रीनि उदय मुधिर पपन । पारन किये रावन-रिपु तुलगिने अपन॥५॥ माता-राम-माम जायभीर भानापना Trयुग पाप II TR-Eि सिरा जोपर भाजपने मामलामा सपने (मनुप) Triमरा ( Miniरोगामिनाम ॥ mri गुण (more) INT KAR VIRE. अपनभागीmin मा:mjunममाitiesi mium NR Rartment way पानेके लिये व्याकुल हैं; पर यह कय सम्भव है? हाँ, कलियु- ढेर-का-ढेर वनिज-व्यापार,माल-मत्ता नाम-नगरमें सप जाता है। कलियुगका पाप-समूह राम-नामके प्रतापसे नए हो जाता है नाममें विश्वास और प्रेम करनेसे हृदय भलीभाँति स्थिर-शान्त जाता है। रामजीके नामने रावण-सरीखे शत्रु और तुलसी-स पतितको भी पावन कर दिया है ॥५॥ [१३१] पायन प्रेम राम-चरन-कमल जनम लाहु परम । रामनाम लेत होत, सुलम सकल धरम ॥१॥ जोग, मख, विवेक, रिति, वेद-विदित करम । करिवे फहँ कटु कठोर, सुनत मधुर, नरम ॥२॥ तुलसी मुनि, जानि-यूनि, भूलहि जनि भरम । तेहि प्रभुको होहि, जाहि सब ही फी सरम ॥३॥ भावार्थ-धीरामचग्दीचरणकमलों में विमुख (निकाम) में होनाहीजीयनका परमफलराम-नाम लेनेहीसारधर्म सुलभीर हैं। येमेनो योग, यस, थियेक पैराग्य मादि भनेक कर्म पेत्रों में पता गंप हैं, जो मुनने में तो बड़े ही मधुर भौर कोमल आन परत पर भग्नमें परेही कटु मोर कटोर ॥२॥ हालिया है तुलसीदाम ! मान-मरमभ्रममें प्रमभूट, न तो उगा प्रभुका ही (राम) मानिसमरी सा!३॥

[१२] गम-से प्रीतमकी प्रीति-रहित जीप जाय जियत । जेहि गुण गुग मानि लेनु, मुख मा ममुप्त कियत ॥१॥ जां-जह जेदि जानि जनम महि, पतान, पियत । नई नई न पिपप गुगति, पहत सात निपत ।। २ ।। बन रिमोह सी, फटयो गगन मगन पिपत। तुनगी प्रम-गजम गार, पयों न मुषा पियत ॥ ३ ॥ भाषा-धीगमग प्रानमा मम पर जीप पी माम! जिसियनगग)रापमान निरिपार मापा गुप हितमा- Partime.frmin योनि- १को पाताभारनाम- जम्मगिपा, मनगिvिe miNTAIN मा भनुपरjnferAngrtist पाम तीनोमा) नो मोमें Randimartine Ik. nerकपिगमें भामार EिPAL IAt gmi !eft मे भाग Trt.ity TRIENT पापणाम भी then (frmit rar or मा) मोहिरि किरिलि, हि नीर मार | कर, नि, म न एगर गुग पर ! छोटो पड़ों, खोटो सरी, जग जो जई रहत। अपनो अपने को मला कहा, को न चहन ॥२॥ विधि लगि लघु कीट अरधि मुख मुखी, दुख दहत । पमु लौं पमुपाल ईस बांधत छोरत नहत ॥३|| विषय मुद निहार मार मिर काँधे ज्यों बहन । योही जिय जानि, मानि सठ तू साँसति सहत ॥४॥ पायो केहि घृत विचार, हरिन-चारि महत । तुलसी वक ताहि सरन, जातं सर लहत ५il मावार्थ-अरे जीव ! मैं तुझसे यार-यार हितकारी,प्रिय, पवित्र और मत्य वचन कहता हूँ, इन्हें सुनकर, मनमें विचारकर और समझकर मी न सुगम और मुन्दर रास्ता क्यों नहीं पकड़ता ? अर्थात् श्रीरामकी शरण क्यों नहीं हो जाता ? ॥ छोटा-यड़ा, खोटा-सरा, जो जहाँ संसारमें रहता है, उनमें यता, ऐसा कौन है, जो अपना भला न पाहता हो ? ॥२॥ ब्रह्मासे लेकर छोटे-छोटे कीड़ेतक मुससे सुखी होते हैं और दुःखसे जलते हैं, पशुपालकग्यालेकी तरह परमात्माजीवरूपी पशुभाको (महानसे) बाँधता (मानसे) खोलता और उन्हें (काम) जोतता है ॥३॥ विषयोंके सुखोंको देखावेतो सिरके योझेको कन्धेपर रसनेके समान है। अर्थात् विषय-सुसमें सुख है ही नहीं, इस तरहमनमें समझकर मान ज्ञा। अरे मूर्ख! क्यों कष्ट सह रहा है? ४ तनिक विचार तो कर मृग- तृष्णाके जलको मथकर किसने धी पाया है ? अर्थात् असत् काल्पनिक पदार्थों में सच्चा सुख कैसे मिल सकता है ? हे तुलसी ! त्तो उसी प्रभुको शरणमें जा, जिससे सब कुछ प्राप्त होता है ॥५॥ संसारके विनय-पत्रिका [३४] वाते ही पार पार देव द्वार परि पुकार करत । आरति, नति, दीनता कहें प्रभु संकट हरत ॥१॥ लोकपाल सोक-विकल रावनडर रत। फा मुनि सकुचे कृपालु नर-गरीर परत ॥२॥ फौसिया, मुनि-तीय, जनक सोच-अनल जरत । साधन कहि सीतल भये, सो न समुझि परत ॥३॥ केवट, खग, सपरि महज परनकमल न रत । सनमुख तोहिं होत नाय ! कुतर गुफर फरत ॥४॥ पंधु-पर फपि-विमीपन गुरु गलानि गरत । संवा फेहि रीझि राम, किये मरिम भरत ।।५।। सेवक भयो पपनपूत माहिए अनुहरत । वाको लिये नाम राम सर को मुबर दरन ॥६॥ जाने पिनु गम-रीति पचि पचि जग भरत । परिहरि एल मरन गये तुलमि-से तरत ।७॥ मार-माप तुम्हारसी म्पमापी जामार वापर पा rभा बार-बार पुपार हाकिमत, माना और निता गुरु मार रातो रामारपद. THEभारिपारकर पारगासन अम्पा मारामारपालिपपमा सीमाता.लिओपियामि, भाभार मदिरे - जा रहे थे, ये किस साधनसे शीतल हो गये ? ॥३॥ गुह निषाद,प (जटायु), शबरी आदि स्वभावस ही तुम्हारे चरण-कमलोंमें रत नहीं किन्तु हे नाथ ! तुम्हारे सामने थाते ही (इन) बुरे-धुरे वृक्षों में मी भर अच्छे फल फल गये ! भाव यह कि निपाद, शबरी आदि पापी तुम्हारी शरणागतिसे तर गये ॥४॥ अपने-अपने भाईके साय शुन करनेसे सुग्रीय और विभीषण बड़े भारी दुःखसे गले जाते थे। हे राम तुमने किस सेवासे रीझकर उन्हें भरतजीके समान मान लिया हनुमानजी तुम्हारी सेवा करते-करते तुम्हारे ही समान हो गये। रामजी ! उनका (हनुमान्जीका ) नाम लेते ही तुम सयपर मलार्मो प्रसन्न हो जाते हो ॥६॥ (यह सय क्या हुआ ? दुःख, नम्रता श्री दीनताके कारण ही तुमने ऐसा किया) इसलिये हे नाथ ! तुम्हा (रीमानेकी) रीति म जाननेके कारण ही जगत् अन्यान्य साधनामें पद पचकर मर रहा है। तुम दुपियों, नम्रों और दीनॉपर प्रसन्न होते होय जानकर जो तुम्हारी शरण हो जाय यह तो तर ही जाता है, क्योति कपट छोड़कर तुम्हारीशरणमें जानेसे तुलसी जैसे जीय भी सो संमा सागरसे तर गये ॥७॥ राग मूहो बिन्यायल [१३५] राम सनेही सों ते न सनह किया। अगम जो अमरनिहुँसोतनु तोहि दियो। दियो मुकुल जनम, मरीर मुंदर, हेतु जो फल पारिको । जो पाइ पंडित परमपद, पायत पुरारि गरिको ।

मार, मनी, गरिमी।
Mirant दीप
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खग,सबरि,निमिचर,मालु,कपिकिये आपुते बंदित बड़े । तापर विन्द कि संवा मुमिरि जिय जात जनु सकुचनि गड़े।।४। स्वामीको मुमार को सो जब उर आनिह । सोच सकल मिटिंह, राम मलो मन मानि ।। मलो मानिह रघुनाथ जारि जो हाथ माथो नाइहै । वतकाल तुलसीदास जीवन-जनमको फल पाइहै ।। अपि नाम करहि प्रनाम,कहि गुन-ग्राम, रामहिं धरि हिये । विचरहि अवनि अवनीस-चरनसरोज मन-मधुकर किये ॥५॥ भावार्थ-अरे ! जिन्होंने तुझे देय-दुर्लभ मनुष्य-दारीर दिया, उ परम प्रेमी श्रीरामजीके साथ तुने प्रेम नहीं किया। उन्होंने ऐसे अच्छे कुल जन्म और सुन्दर शरीर दिया है, जो अर्थ, धर्म, काम और मोसा कारणहै। जिस पाकर बानी लोगभगवान् शिव अथवा कृष्ण परमपदक प्राप्त करते हैं। फिर यह भारतवर्ष देश, पास ही देव-नदी गंगाजी, कैस सुन्दर स्थान है! साथ ही सत्संगभी उत्तम है। इतनेपर भी भरे कायर तरी कुबुद्धिके कारण इन सब साधनॉकी कल्पलता भी (जन्ममरणरूपी, विषैले फल फला चाहती है ! अर्थात् इतने सुन्दर साधनोंको पाकर भी तु अपने बुद्धिदोपस इनका दुरुपयोग ही कर रहा है ॥१॥ अब भी समझ ले। मन लगाकर परमार्थकी बात मुन । यह बात कल्याण करनेवाली है और इस संसारमें भी उससे अपना सार्य सिद्ध होता है । यदि तुझे स्वार्थ ही अच्छा लगता है, विचार कर, घर जिससे स्वार्थ प्राप्त होगा, और जिसे वेद गाते हैं (अर्थात् श्रीरामजी ही इससे यह सिद्ध है कि गोसाईजी मगयान् शिव, कृष्ण और राममै कोई भैर नहीं मानते थे। कौन है २११ विनय-पत्रिका हैं)।मरे दुष्ट ! देव, (विषयरूपी) साँपके साथ खेलना छोड़ दे, उस स्वामीको पहचान, जिस (सवमें रमनेवाले आत्मारूपी राम) के प्रेमक कारण ही पिता, गुरू, स्वामी, शरीर, पुत्र,सेवक, मित्र आदि सब प्रिय जान पड़ते हैं, उस अहैतुक हित करनेवाले परम सुहृद् प्रभुको तूने नहीं पहचाना ॥२॥ वह तेरा हितकारी प्रभु हरि दूर नहीं है, तेरे हृदयमें ही है। छल छोड़कर उसका स्मरण करनेपर वह सदा कृपा किये ही रहता है। भाव यह है, कि परमात्मा हृदयमें तो अवश्य है किन्तु वीचमें कपटका परदा पड़ा है, इसीसे उसका साक्षात्कार नहीं होता । परदा हृदा, कि प्यारेका मुखकमल दीवा! यह कृपा करके अपने भक्तोंपर कर-कमलोंकी छाया किये रहता है, स्वयं सदा उनकी रक्षा करता है। जो उसे मजता है, यह भी उसे भजता है। यह जगत्का ईश्वर है, जीवका जीवन है। जो सबके लिये सब तरहकेसाजसजाता है, जिसने विष्णुको विष्णुत्वा ब्रह्माको ब्रह्मत्य और शिवको शिवत्व दिया,वह यहो श्रीजानकी-नाथ रघुनाथजी- की मधुर आनन्दस्वरूपिणी मंगलमयी मूर्ति है ॥३॥ यद्यपि यह यहुत ही बड़ा स्वामी है,सभीका अधीश्वर है, तथापि यह महान् सुशील, सुन्दर और सरल है। अरे ! जिसका ध्यान शिवको भी दुर्लभ है उसने उठकर के घटको हृदयसे लगा लिया! हृदयसे लगाकर मिलते ही उसकी आँपों में ओम्भर आये और मेमयशशरीर शिथिल सा हो गया।देवता,सिद्ध, मुनि और कयि कहते हैं, कि श्रीरघुनाथजीके समान कोई भी प्रेमप्रिय नहीं है, उन्हें जितना प्रेम प्यारा लगता है उतना और किसीको नहीं लगता। उन्होंने पक्षी (जटायु), शवरी, राक्षस (विमीपण), रीछ (ज्ञाम्ययान् आदि) और पन्दरों (हनुमानजी आदि) को अपनेसे भी अधिक पूजनीय - २१ विनय-पत्रिका पना दिया। (अयशीलकी मार देमिय)इतनेपर भी ये जब उन लोग मारा की हु सेया याद करते हैं, तय मंकाक मारे मन-ही-मन गड़े जाते हैं | प्रभु धागमजीका जोशील-म्यमाय मैंने कहा है उसे तू हृदयमें लायेगा, नय नर्गमारी चिन्ताएँ मिट जायेगी और मनु रामचन्द्रजी मी मनमें प्रसन्न होंगे। श्रीरघुनायजी तो तमी प्रसन्न हो जायेंगे, जय नहाय जोड़कर मम्नक नया देगा। तुलसीदास ! तू उसी क्षण जन्म और जीवनका फल पा जायगा, अर्थात् तुझे श्रीरामजी दर्शन देंगे। राम-नामका जप कर, रामको प्रणाम कर, उनके गुण-समूहों- फा कीर्तन कर, और हृदयमें श्रीरामजीको विराजित कर और अपने मनको जगदीश श्रीरामचन्द्रजीके चरण-कमलामे नित्य निवास करने वाला भ्रमर यनाकर पृथ्वीपर निर्भय विचरण कर ॥५॥ [१३६] [१] जिव जयतें हरितें बिलगान्यो । तबतें देह गेह निज जान्यो ।। मायास स्वरूप विसरायो । तेहि भ्रमते दारुन दुख पायो । पायो जो दारुन दुसह दुख, सुख-लेस सपनेहुँ नहिं मिल्यो । भव-सूल, सोक अनेक जेहि, तेहि पंथ तू हठि हठि चल्यो । बहु जोनि जनम, जरा, विपति, मतिमंद ! हरि जान्यो नहीं । श्रीराम विनु विश्राम मूढ़ ! विचारु, लखि पायो कहीं। [२] आनंद-सिंधु-मध्य तर यासा । बिनु जाने कस मरसि पियासा । मृग-भ्रम-नारि सत्य जिय जानी । वह तू मगन भयो सुख मानी।

विनय-पत्रिका
तई मगन मञ्जसि, पान करि, त्रयकाल जल नाही जहाँ ।
निज सहज अनुभव रूप वव खल! भूलि अब आयो तहाँ ।
निरमल, निरंजन, निरविकार, उदार सुख त परिहरयो ।
निकाज राज विहाय नृप इव सपन कारागृह परयो ।
[३]
निज करम-होरि हड़ कीन्हीं। अपने करनि गाँठि गहि दीन्हीं।
जाने परपस परयो अभागे । ता फल गरम-घास-दुख आगे॥
आगे अनेक समूह संसृति उदरगत जान्यो सोऊ ।
सिर हेठ, ऊपर चरन, संकट पात नहिं पूछ कोऊ ॥
सोनित-पुरीप जो मूत्र-मल कृमि कर्दमावृत सोबई ।
कोमल सरीर, गंभीर वेदन, सीस घुनि-धुनि रोपई ॥
तू निज करम-जाल जई घेरो। श्रीहरि संग तज्यो नहिं तेरो।।
बहुविधिप्रतिपालन प्रभु कीन्हों। परम कृपालु ग्यान तोहि दीन्हों।
तोहि दियो ग्यान-विवेक, जनम अनेककी तब सुधि मई।
तेहि ईसकी ही सरन, जाकी विपम माया गुनमई ।।
जेहि किये जीव-निकाय पस, रसहीन, दिन-दिन अति नई ।
सो करी बेगि संमार श्रीपति, विपति महँ जेहि मति दई ।।
[५]
पुनि बहुरिधि गलानि जिय मानी। अब जग जाइ भजी पळपानी।
ऐसेहि करि विचार धुप साधी । प्रसव-पवन प्रेरेउ अपराधी ।

विनय-पत्रिका
प्रेरथो जो परम प्रचंड मारुत, कष्ट नाना ते सह्यो ।
सो ग्यान, ध्यान, चिराग, अनुमव जावना-पावक दह्यो ।
अति खेद ब्याकुल, अलप बल, छिन एक बोलि न आई ।
तब तीत्र कष्ट न जान कोउ, सब लोग हरपित गावई ।।
[६]
पाल दसा जेते दुख पाये । अति असीम, नहिं जाहिं गनाये
छुधा-च्याधि-बाधा मइ मारी । वेदन नहिं जाने ‘महतारी
जननी न जानै पीर सो, केहि हेतु सिसु रोदन करे ।
सोइ करै विविध उपाय, जाते अधिक तुव छाती जरै ।।
कौमार, सैसब अरु किसोर अपार अप को कहि सके।
न्यतिरेक तोहि निरदय! महाखल! आन कहु को सहि सके ।
[७]
जोन जुवती सँग रंग रात्यो । तर तू महा मोह-मद मारयो।
ताते तजी घरम-मरजादा । विसरे तर सब प्रथम पिपादा।
पिमरे पिपाद, निकाय-संकट समुनि नहिं फाटत हियो ।
फिरि गर्मगत-आवर्त संसतिचक्र जैहि होइ सोइ कियो ।।
कृमि-मस-रिट-परिनाम तनु, तेहि लागि जग पैरी भयो ।
परदार, परधन, द्रोहपर, मंमार
पाई नित नयो॥
[4]
देखन ही आई विरुधाई । जो त मपन' नाई बुलाई।।
पार्क गुन कटु कई न जाहीं । सो अब प्रगट दा ननु माहीं।

विनय-पत्रिका
सो प्रगट तनु जरजर जराबस, व्याधि, मूल सतावई ।
सिर कंप, इंद्रिय-सक्ति प्रतिहत, पचन काहु न भावई ।।
गृहपालहते अति निरादर, खान-पान न पावई ।
ऐसिहु दसा न विराग तहँ, तृशा-तरंग पढ़ायई ।।
कहि को सके महामव तेरे । जनम एकके कछुक गनेरे ।
चारि खानि संतत अवगाहीं । अजहुँ न करु विचार मन माहीं॥
अजहूँ विचारु, विकार तजि, भजु राम जन-सुखदायकं ।
मवसिंधु दुस्तर जलरथं, भजु चक्रधर सुरनायकं ॥
विनु हेतु करुनाकर, उदार, अपार-माया-तारनं ।
कैवल्य-पति, जगपति, रमापति, प्रानपति, गतिकारनं ॥
[१०]
रघुपति-भगति सुलभ, सुखकारी । सो अयताप-सोक-भय-हारी ॥
पिनु सतसंग भगति नहिं होई । ते तय मिलें द्रयै जब सोई॥
जब द्रव दीनदयालु राघव, साधु-संगति पाइये ।
जैहि दरस-परस-समागमादिक पापरासि नसाइये ।।
जिनके मिले दुख-मुख समान, अमानतादिक गुन भये ।
मद-मोह लोम-विषाद-क्रोध सुबोधतें सहजहिं
[११]
सेक्त साधु द्वैत-भय भागै। श्रीरघुबीर-चरन लय लागे ।
देह-जनित विकार सब त्याग। तब फिरि निज स्वरूप अनुरागै॥
गये ।।

लोक-पावन
ऐसी मी
विनय-पत्रिका
अनुराग सो निज रूप जो जगते विलच्छन देखि
संतीप, सम, सीवल सदा दम, देहवंत न लेखि
निरमल, निरामय, एकरस, तेहि हरप-सोक न व्याप
सो सदा जाकी दसा
[१२]
जो वेहि पंथ चलै मन लाई । तौ हरि काहे न होहिं र
जो मारग श्रुति-साघु दिखावै । तेहि पथ चलत सबै सुख
पावै सदा सुख हरि कृपा, संसार आसा तजि से
सपनेहुँ नहीं सुख द्वैत-दरसन, यात कोटिक को कई
द्विज, देव, गुरु, हरि, संत रिनु संसार-पार न पाइये
यह जानि तुलसीदास प्रासहरन रमापति गाइये
[१]
भायार्थ हे जीय! जयसे तू भगवानसे अलग हुभा.
शरीरको अपनाघरमान लिया।मायाके यश होकर तूने मरने सचिन
म्वरूपको मुला दिया,और इसीभ्रमके कारण तुझे दारण दुःख
तुझे यही कठिन (जन्म-मरणरूपी) मसहनीय दुम्म मिले। गुला
मममें भी देश नहीं रहा। जिस मार्गमें अनेक संसारी कर और
भरे पड़े हैं, न उनीपर इटपूर्वक यार-बार चलना रहा भनेक योनि
मटका, साहुभाविपत्तियां मही,(मर गया)।पर,मरे मूल ना
माधीरिकी महीं पहचामा ! भरे भूद! विचारकर देखा भीम
घोडकर (किमीने) क्या कहानि प्राप्त की है।
समारं
मोगरे

विनय-पत्रिका । [२] दे जीय! तेरा नियास तो आनन्दमागरम है, अर्थात् न आनन्द- वरूप ही है, तो मी न उसे भुलाकर क्या प्यासा मर रहा है न (विषय- मंगरूपी) मृगजलको सथा जानकर उमीमें मुख समझाकर मन हो हा है। उसमें इयार नहा रहा है और उसीको पी रहा है। परन्तु उस (विषय-भोगरूपी) मृगतृष्णाके जलमें तो (सुपरूपी) सथा जल तीन बालमें भी नहीं है। अरे दुष्प ! न अपने सहज अनुभव-रूपको भूलकर आज यहाँ आ पड़ा है। तूने माने उस विशुद्ध अविनाशी और विकाररहित परम सुग्नस्वरूपको छोड़ दिया है और व्यर्थ ही (उसी प्रकार दुखी हो रहा है) जैसे कोई राजा सपने राज छोड़कर कैदखानेमें पड़ जाता है और प्यर्थ ही दुखी होता है। अर्थान् सपनेमें भी गजा राजा ही है, परन्तु मोह- पश अपने संकल्पसे राज्यस पश्चित होकर कारागारमें पड़ जाता है और जबतक जागता नहीं, तबतक व्यर्थ ही दुःख भोगता है। इसी प्रकार जीव मी मचिदानन्दस्वरूपको भ्रमयश भूलकर जगन्में अपनेको मायासे बंधा मान लेना है और दुषी होता है। [३] तूने स्वयं ही (अमानसे) अपनी कर्मरूपी रस्सी मजबूत कर ली, और अपने ही हाथोंसे उसमें (अविद्याकी) पक्की गॉठ भी लगा दी। इसीसे हे अमागेनू परतन्त्र पड़ा हुआ है। और इसीका फल आगे गर्भ में रहनेका दुःख होगा। संसारमें जो अनेक लोशॉक समूह हैं उन्हें पद्दी जानता है जो माताके पेट में पड़ा है। गर्भ में सिर तो नीचे और पैर ऊपर रहते हैं। इस भयानक संकटके समय कोई बात भी नहीं पूछता। रक्त, मल, मूत्र, विनय-पत्रिका सी पिष्ठा, कोई और कीचमे धिगहुमा (ग)सोता है। कोमल शरीर जर यही भारी वेदना होती है, तय सिर धुन धुनकर रोता है। [४] तू यहाँ अपने कर्म जालमें फंसा हुआ (दुम पाता है, परन्तु)श्री हरिने यहाँ भी तेरा साथ नहीं छोड़ा। (गर्भम) प्रभुने नाना प्रकारसे तेरा पालन-पोषण किया, और फिर परम कृपालु मामीने तुझे वहीं भाव भी दिया |जय तुझेहरिने मान-वियेक दिया, तब तुझे अपने अनेक जन्मोकी यातें यादआयों और तू कहने लगा-जिसकी यह त्रिगुणमयी माया अति दुस्तर है, मैं उसी परमेश्वरकी शरण हैं। जिसमायाने जीव-समूहको अपने वश करके उनके जीवनको नीरस मर्यात् आनन्दरहित कर दिया है और जो प्रतिदिन अत्यन्त नयी बनी रहती है, (ऐसी मायारूपी) जिस लक्ष्मीके पतिने गर्भकालकी इस विपत्तिमें मुझे ऐसी विवेक-बुद्धि दी है यही मेरी इससे तुरन्त रक्षा करें।' फिर तू (पूर्व-जन्मॉमें मजन न करने के लिये) अपने मनमें यहुद भाँतिसेग्लानि मानकर कहने लगा कि अबकी बार (संसारमें) जन्म लेकर तो चक्रधारी भगवान्का भजन ही करूँगा। ऐसा विचार कर ज्यों ही चुर हुआ कि प्रसवकालकी पवनने तुझ अपराधीको प्रेरित किया, उस मति प्रचण्डयायुकेद्वाराप्रेरित होकर तूने (जन्मकेसमय)नाना प्रकार के कॉको सहा । उस समय उस भयानक एकी आग तेरा ज्ञान, ध्यान, वैराग्य और अनुभव सभी कुछ जल गया, अर्थात् मारे कष्टके तू सब भूल गया। अत्यन्त कटके कारण तू व्याकुल होगयाऔर थोडायल होनेसे एकक्षण भी तुझसे बोला नहीं गया। उस समयके तेरे दारुण दुःसको किसीने र जाना, उलटे सय लोग (पुत्र होनेके मानन्दमें) हर्षितहोकर गाने लगे।

विनय-पत्रिका [६] फिर पचपनमें सून जिनन महान् कष्ट पाय, घे इतने अधिक है कि उनको गणना करना असम्भय है। भूम, रोग और अनेक यड़ी-घड़ी याधानाने तुझे घेर लिया, पर तरी माँको तेरे इन सय कोंका यथार्थ पता नहीं लगा।माँ यह नहीं जानतीकियथा किसलियरोरहा है। इससे वह थार-यार ऐसही उपाय करती है, जिसस तेरी छाती औरभी अधिक जले । जैसे अजीर्ण, कारण पेट दुग्ननेस पश्चा रोता है, पर माता उसे भूग्गा समझकर और खिलाती है, जिससे उसकी बीमारी यद जाती है। शिशु, फुमार और किशोरावस्थामें तु जी अपार पाप करता है, उसका वर्णन कौन करें ? अरे निर्दय ! महादुष्ट ! तुझे छोड़कर और कौन ऐसा है जो इन्हें सह सकेगा? [७] जवानीमें तु युवती स्त्रीकी आसक्किमें फँसा, नय तो महान् अज्ञान और मदमें मतवाला हो गया। उस जवानीके नशेम तुने धर्मकी मर्यादा छोड़ दी और पहले (गर्भ में और लड़कपनमें) जो कष्ट हुए थे, उन सवको भुला दिया (और पाप करने लगा)। पिछले करसमूहोंको भूल गया। (अय पाप करनेस) आगे तुझे जो संकट प्राप्त होंगे, अरे, उनपर विचार करके तेरी छाती,नहीं फट जाती ? जिससे फिर गर्भके गड्ढेमें गिरना पहे, संसार-चक्रमें आना पड़े, तने यारम्बार वैसे ही कर्म किये। जिस शरीरका परिणाम ( मरनेपर) कीड़ा, राख या विष्ठा होगा, ( कमें गाइनेसे सड़कर कीड़ोंके रूपमें यदल जायगा, जलानेपर राख हो जायगी या जीव-जन्तु खा डालेंगे तो उनकी विष्ठा यन जायगा) उसीके लिये तू सारे संसारका शत्रु यन बैठा । परायी स्त्री और विनय-पत्रिका २. विष्टा, कीड़े और कीचसे घिरा हुआ (गर्भ में) सोता है। कोमल शरी जव बड़ी भारी वेदना होती है, तब सिर धुन-धुनकर रोता है। [४] तू यहाँ अपने कर्म-जालमें फंसा हुआ (दुःख पाता है, परन्तु) हरिने यहाँ भी तेरा साथ नहीं छोड़ा। (गर्ममें) प्रभुने नाना प्रकार तेरा पालन-पोषण किया, और फिर परम कृपालु स्वामीने तुझे वहीं म. भी दिया । जब तुझे हरिनेमान-विवेक दिया, तब तुझे अपने अनेकजन्मान यातें याद आयीं औरत कहने लगा-'जिसकी यह त्रिगुणमयी माया दुस्तर है, में उसी परमेश्वरकी शरण हूँ। जिस मायाने जीव-समूहको भर वशमें करके उनके जीवनको नीरस अर्थात् आनन्दरहित कर दिया है की जो प्रतिदिन अत्यन्त नयी धनी रहती है, (ऐसी मायारूपी) नि लक्ष्मीके पतिने गर्भकालकी इस विपत्तिमें मुझे ऐसी विवेक-युधि दी वही मेरी इससे तुरन्त रक्षा करें।' [५] फिर तू (पूर्व-जन्मोंमें भजन न करने के लिये) अपने मनमें व भाँतिसे ग्लानि मानकर कहने लगा कि अयको यार (संसारमें) जन्म तो चक्रधारी भगवान्का मजन ही करूँगा। ऐसा विचार कर ज्यों ही हुआ किप्रसवकालकी पवनने तुझ अाराधीको प्रेरित किया, उस भी प्रचण्ड यायुके द्वारा प्रेरित होकर तूने(जन्मके समय) सदा । उस समय उस भयानक कष्टको आगमें तेरा ज्ञान, ध्यान, पैराग्न अनुमय समी कुछ जल गया, अर्थात् मारे कष्टक तू सर भूल गया! कएके कारण तू प्याकुल होगया और थोड़ा पल होनेसे पकान थोला नहीं गया। उस समयके तेरे दारुण दुःखको किसीने । उलटे सय लोग (पुत्र होनेमानन्दमें)दर्पित होकर गाने लगे। 1 " .

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२२.
पिनय-पत्रिका
पराये धन (पर मोति) और इससे द्रोह, यही संसारम।
नया पड़ता गया।
देखो-ही-देखो पुराना जिसे तूने सनमें मीनही युत
भाइस
पुल सानो जाता। उसे अप मरने शरीर
ऐस से सोरोस बार कारपरोग और मूल सन
लिर मिल लिन्ग साटि चली गयी है। तेरा को
वितो मारोगशाली करनेवालाकुचामी
लेकसकरतेशेवर सेरा निरादर होने
कुपो रहेको र सरसो देते, तर
सारेगामही पाताया
रूपी उपमहानग! इस दशा मी
एगा।
परेसे सोनम सासर पार
HTTET) नालामा भीम
पर arrमारिकार र मनोरम
रेगा भार मारामार र गुमर मा-माग
miग्न गारांनापारपाकमान
नाहीतुरा सागर
मराम और
मुकाम

२२१ विनय-पत्रिका [१०] धीरघुनाथजीकी भक्ति सुलभ और सुपदायिनी है। यह संसारके तीनों ताप, शोक और भयको हरनेवाली है। किन्तु यह भक्ति मत्संगके विना प्राप्त नहीं होती और सन्त तमी मिलते हैं जय रघुनाथजी रुपा करते हैं। जय दीनदयालु रघुनाथजी कृपा करते हैं तय सन्त-समागम होता है। जिन मन्तकि दर्शन, स्पर्श और सत्संगसे पाप-समूह समूल नष्ट हो जाते ६. जिनके मिलनेमे मुग्न-दुःसमें समवुद्धि हो जाती है, अमानिता आदि अनेक सद्गुण प्रकट हो जाते हैं तथा भलीभाँति परमात्माका पाँध हो जाने के कारण मद, मोह, लोभ, शोक, क्रोध आदि सहज ही दूर हो जात। [११] ऐसे साधुमाका संयन करनेस इतका भय भाग जाता है। (मर्यत्र परमात्म-युधि हो जानेसे घर निर्भय हो जाता है) धीरघुनाथजी परणोंमें प्यान लग जाता है। शरीरसे रापन्न हुए सय विकार र जात भीर तय भपने म्यरूपमें-आरमम्यरूप में प्रेम होता है। जिसका अपने मरुप भनुराग हो जाता है, अर्थात् जो भात्मम्परुपको प्राप्त हो जाता है साली दहा संसार में कुछ पिलक्षण ही हो जाती है । सन्तोर, समता, पारित भोर मन इन्द्रियों का निमद उसके सामाविक हो जाते फिर पदमपनको देहधारी नहीं माननाभान महादेवाग्म-चोधपना जाता पपिपुल, गंमार-रांग-रहित भार एशरम(परमारम-म्यरूपमें निय बिर) जाता।फिर उसे दरमहीध्यापता।जिमकी ऐसी निव निरोगी वातानोसोको पवित्र करनपाला होता। ।

विनय-पत्रिका पराये धन (पर प्रीति) और दूसरोंसे द्रोह, यही संसारम नित्य नया बढ़ता गया। [८] देखते-ही-देखते बुढ़ापा आ पहुँचा, जिसे तूने स्वप्नमें भी नहीं युलारा था; उस वुढ़ापेका हाल कहा नहीं जाता। उसे अब अपने शरीर प्रन्यास देख ले, शरीर जर्जर हो गया है, बुढ़ापेके कारण रोग और शूल सतारो हैं, सिर हिल रहा है, इन्द्रियोंकी शक्ति चली गयी है। तेरा घोलना किसीको अच्छा नहीं लगता, घरकी रखवाली करनेवाला कुत्तामा तेरा निरादर करता है अथवा फुत्तेसे भी यदकर तेरा निरादर होने लगा। कुत्ते को दूरसे रोटी फेंकते हैं, पर उसे समयपर तो दे देते हैं, तेरी उतनी भी सँमाल नहीं; अधिक फ्या, तू माने-पीनेतकको नहीं पाता। पेसी दुर्दशा होनेपर भी तुझे पैराग्य नहीं होता? इस दशामें मीर तृष्णाकी तरंगोंको यदाता दी जाता है। [९] ये तो तेरे एक जम्मके कुछ योडेसे कट गिनाये. ऐसे भने पड़े यहेजन्मोकी सयकी कथा तो कौन कह सकता सदा घार मानो (पिण्ड, अण्डज, म्यदन, उनिस) में घूमना पड़ता है। मीन मनमें विचार नहीं करता! मप मी विचार कर मज्ञानको छोड़द भीर मनोनी मुग देनेवाले मगवान् श्रीरामनीका मगन कर । ये नुस्तर मय-सागर लिये जवासाप. उन गुपनिषधारण करनेयायपनिमगवानका मान कर । ये विनाही हेनु वा कानयाले हैं, परेही मार और म अपार मायागंतारनेवाले हैं। मोक्षके,गंमार,समी भौरान मामा माय एवं मुनिक कारण है। युद्धाने २२१ विनय-पत्रिका [१०] श्रीरघुनाथजीकी भक्ति सुलम और मुखदायिनी है। वह संसारके तीनों ताप, शोक और भयको हरनेवाली है। किन्तु वह भक्ति सत्संगके बिना प्राप्त नहीं होती और सन्त तमी मिलते हैं जय रघुनाथजी कृपा करते हैं। जय दीनदयालु रघुनाथजी कृपा करते हैं तब सन्त-समागम होता है। जिन सन्तोंके दर्शन, स्पर्श और सत्संगसे पाप-समूह समूल नष्ट हो जाते हैं, जिनके मिलनेसे सुख-दुःखमें समबुद्धि हो जाती है, अमानिता आदि अनेक सद्गुण प्रकट हो जाते हैं तथा मलीभाँति परमात्माका बोध हो जानेके कारण मद, मोह, लोभ, शोक, क्रोध आदि सहज ही दूर हो जाते हैं। [११] पेसे साधुओंका सेवन करनेसे द्वैतका भय भाग जाता है, (सर्वत्र परमात्म-बुद्धि हो जानेसे वह निर्भय हो जाता है) श्रीरघुनाथजीके चरणोंमें ध्यान लग जाता है। शरीरसे उत्पन्न हुए सब विकार छट जाते हैं, और तव अपने स्वरूपमें-आत्मस्वरूपमें प्रेम होता है। जिसका अपने स्वरूपमें अनुराग हो जाता है, अर्थात् जो मात्मस्वरूपको प्राप्त हो जाता है । उसकी दशा संसारमें कुछ विलक्षण ही हो जाती है। सन्तोष, समता, शान्ति और मन-इन्द्रियाँका निग्रह उसके स्वाभाविक हो जाते हैं, फिर घह अपनको देहधारी नहीं मानताअर्थात् उसका देहारम-योध चला जाता है। यह विशुद्ध,संसार-रोग-रहित, और एकरम (परमात्म-स्वरूपमें नित्य स्थिन) हो जाता है। फिर उसे हर्ष-शोक नहीं ध्यापता । जिसकी ऐसी नित्य स्थिति हो गयी यह तीनों लोकोंको पवित्र करनेघाला होता है।

विनय-पत्रिका [१२] जो मनुष्य इस मार्ग पर मन लगाकर चलना है, भगवान उस सहायना क्यों न करेंगे ? यह जो मार्ग घेद और सलौने दिया दिया है, उसपर चलनेसे समीप्रकारकं मुराकी प्रामिहोगी।इसमार्गपर चलनेवाला साधक सामारिक (विषय से सुगकी) माशाको त्यागकर मगयकृपाम नित्य (अद्वैत प्रलके) मुग्पको मात करता है। यों तो करोड़ों याते हैं, उन्हें कौन कहता फिरे ? परन्तु जहाँतक द्वैत दिखलायी मी देता है यहाँतक सपनमें भी सया सुख नहीं मिल सकता, सच्चा मुख अद्वैन ब्रह्म स्वरूपमें स्थित होनमें ही है, इसीफोसंसार-सागरसे पारहानाकहतेहै; परन्तु ब्राह्मण, देवता, गुरु, हरि और सन्तोंकी (कृपा) बिना कोईसंसार-सागरका पार नहीं पा सकता, यह समझकर तुलसीदास मी (संसारके) भयको दूर करनेवाले लक्ष्मीपति भगवानके गुण गाता है। . राग बिलावल रा [१३७ ] जोपै कृपा रघुपति कृपालुकी, पैर औरके कहा सरै । होइ न वाँको बार भगतको, जो कोउ कोटि उपाय कर ॥१॥ तकै नीचु जो मीच साधुकी, सो पामर, तेहि मीच मरे । वेद-विदित प्रहलाद-कथा सुनि, कोन भैगति-पथ पाउँ घरै ? ॥२॥ गज उधारि हरि थप्यो विभीपन, ध्रुव अविचल कयहूँ न टर। अंबरीप की साप सुरति करि, अजहुँ महामुनि ग्लानि गरै ।।३।। - २२३ विनय-पत्रिका सों धौं कहा जु न कियो सुजोधन, अबुध आपने मान जरै। प्रभु-प्रसाद सौभाग्य विजय-जस, पांडवन परिआइ वरै ॥४॥ जोइ जोइ कूप खनैगो परकहँ, सो सठ फिरि तेहि कूप पर । सपनेहुँ सुख न संतद्रोहीकहँ, सुरतरु सोउ विप-फरनि फर ॥५॥ है काके टू सीस ईसके जो हठि जनको सीव चर।। तुलसिदास रघुवीर याहुबल सदा अभय, काहू न डरै ॥६॥ भावार्थ-यदि कृपालु रघुनाथजीकी कृपा है, तो दुसरोंके पैर फरने- से उनका क्या काम निकल सकता है ? भक्तका बाल भी याँका नहीं होता, चाहे कोई करोड़ों उपाय क्यों न करे ॥१॥जो नीच सन्तकी मान विचारता है, यह पाभर स्वयं उसी मौतम मरता है। प्रबादकी कथा घेदों में प्रसिद्ध है, उसे सुनकर ऐसा कौन (अमागा) होगा, जो भक्ति-मार्गपर पैर न रफ्षेगा,यानी भक्तिन करेगा?॥२॥श्रीहरिने गजराजका उद्धार किया. विभीषणको राज्य-सिंहासनपर बैठाया, ध्रुयको ऐसा अटल पद दे दिया जो कभी हटना ही नहीं और अम्बरीषको तो यात ही निराली है, महा- मुनि (दुर्वासा)ने जो उनको शाप दिया था, उसका परिणाम याद करके भय भी पे ग्लानिसे गले जाते है, लाजसे मरे जाते ६ ॥३॥ दुर्योधनने भपनी जान, ऐसी कौन-सी यु है,जोपाण्डयोंके साथ नहीं की। मूर्ग अपने ही घमण्ड में जलता रहा। पर भगवान्की कृपासे सौभाग्य, विजय और यशने पाण्डयोंको ही हटपूर्वक अपनाया ॥४॥ जो दूसरेके • 'पास्यने पाठही है। पांडुतने पाट कर देनेवालोंने भूल की है। भवधीमें पाण्डका बहुपचन कर्ममारकका पर रूपरे पोडधनहि' वा 'पासपने'। परिषद' भी कापरसे बनता है, परन्तु यहाँ एक मात्रा उससे अधिक माहिये थी।

विनय-पत्रिका लिये फुया गोदेगा, यह दुरध्वयं उमीमें गिरेगा।सन्ठोंके साथ पैर कर पालेको म्यानमें मी मुग नहीं हो सकता । उसके लिये तो कल्पवृक्ष में जहरीले फल ही फलेगा Men किसके दो सिर है जो भगवान् के मदर्भ सीमा लाँधेगा? है तुलसीदास! जिसके धीरघुनाथजीका बाहुन सहायक है, यह सदा निर्मय है, किसीस भी नहीं डर सकता ॥६॥ [१३८] कबहुँ सो कर-सरोज रघुनायक! धरिही नाथ सीस मेरे । जेहि कर अभय किये जन आरत, वारक बियस नाम टेरे ॥१॥ जेहि कर-कमल कठोर संभुधनु मंजि जनक संसय मेट्यो । जैहि कर-कमल उठाइ बंधु ज्यों, परम प्रीति केवट मेथ्यो ॥२॥ जेहि कर-कमल कृपालु गीधकहैं, पिंड देइ निजधाम दियो । जेहि कर यालि विदारिदास-हित, कपिकुल-पति सुग्रीव कियो ॥३॥ आयो सरन समीत विमीपन, जेहि कर कमल तिलक कीन्हों। जेहि कर गहि सर चाप असुर हति, अभयदान देवन्ह दीन्हों ॥४॥ सीतल सुखद छाहँ जेहि करकी, मेटति पाप, ताप, माया। निसि-चासर तेहि कर-सरोजकी, चाहत तुलसिदास छाया ॥५॥ भावार्थ-हे रघुनाथजी! हे स्वामी! क्या आप कभी अपने उस कर कमलको मेरे माथेपर रखेंगे, जिससे आपने, परतन्त्रतावश पर वार भापका नाम लेकर पुकार करनेगले यात्तं भक्तोंको अभय करदिश था ॥१५ जिस कर-कमलसे महादेवजीका कठोर धनुष तोड़कर आपने महाराज जनकका सन्देह दूर किया था मौर जिस कर-कमलमे गुहनिया को उठाकर माईक समान यड़े ही प्रेमसे हृदयसे लगा लिया था Int

विनय-पत्रिका
लु ! जिस कर-कमलसे आपने (जटायु) गीधको (पिताके समान)
ग्डदान देकर अपना परम धाम दिया था, और जिस हाथसे, अपने
सके लिये धालिको मारकर, सुग्रीवको बन्दरोंके कुलका राजा बना
था॥३॥जिस कर-कमलसे आपने भयभीत शरणागत विभीषणका
ज्याभिषेक किया था और जिस हाथसे धनुष-वाण बढ़ा राक्षसीका
नाश कर देवताओंको अभय-दान दियाथा ॥४॥ तथा जिस कर-कमल-
। शीतल और मुखदायक छाया पाप,सन्ताप और मायाका नाश कर
लती है, हे प्रभु! आपके उसी कर-कमलकी छाया यह तुलसीदास
त-दिन चाहा करता है॥५॥
[१३९]
दीनदयालु, दुरित दारिद-दुख दुनी दुसह तिहुँ ताप तई है ।
देव दुबार पुकारत आरत, सपकी सय सुख हानि मई है ॥१॥
प्रभुके पचन, वेद-बुध-सम्मत, मम मूरति महिदेवमई है।
विनकी मति रिस-राग-मोह-मद, लोभ लालची लीलि लई है ।।२।।
राज-समाज कुसाज कोटि कटु कलपित कलुप कुचाल नई है।
नीति, प्रतीति, प्रीति परमिति पति हेतुबाद हठि हेर हई है ॥३॥
आम्रम-चरन-घरम-विरहित जग, लोक वेद-मरजाद गई है।
प्रजा पवित, पाखंड-पापरत, अपने अपने रंग रई है ॥४॥
सांति, सत्य, मुभरीति गई घटि, यही कुरीति, कपट-कलई है।
सीदत साधु, माधुता सोचति, खल विलसत, हुलसति खलई है॥५॥

पिनय पत्रिका
परमारथ स्वारय, साधन भये अफल, सफल नहिं सिद्धि स
कामधेनु-धरनी कलि-गोमर विषस विकल जामति न र
कलि-करनी परनिये कहाँला, करत फिरत बिनु टहल र
वापर दाँत पीसि फर मीजत, को जान चित कहा
त्यो त्यों नीच चदत सिर ऊपर, ज्यों ज्यों सीलबस दीलद
सरुष परजि तरजिये तरजनी, कुम्हिलह कुम्हड़की जई
दीजे दादि देखि ना तो चलि, मही मोद-मंगल रितई
भरे भाग अनुराग लोग कह, राम कृपा-चितवनि चितई
यिनती सुनि सानंद हेरि हँसि, करना-चारि भूमि मिबई।
राम-राज भयो काज, सगुन सुम, राजा राम जगत-विजई
समरथ पड़ो, सुजान सुसाहब, मुकृत-सैन हारव जितई है
सुजन सुमाव सराहत सादर, अनायास साँसति वितई है ।
उथपे थपन, उजारि वसावन, गई यहोरि बिरद सदई है।
तुलसीप्रभु आरत-आरतिहर, अभयवाह कहि केहि नदई है।
भावार्थ-हे दीनदयालु ! पाप, दारिद्रय, दुःख और तीन मा
दुःसह वैविक, दैहिक,भौतिकतापोंसेदुनियां जलीजारही है। हे भग
यह आर्त आपके द्वारपर पुकार रहा है, क्योंकि समीके सय प्रा
सुख जाते रहे है । वेद और विद्वानोकोसम्मति है तथाप्रभुके धी-
वचन है कि ग्रामण साक्षात् मेराही स्वरूप हैं। पर भाम उन माह्मण
धुद्धिको मोध, आमक्ति, मोहमद, लोम और लालचने निगल लिया

बिनय-पत्रिका o त् ये अपने स्वाभाविक शम-दमादि गुणोंको छोड़कर अज्ञानी, कामी, पी, घमण्डी और लोभी हो गये हैं॥२॥ इसी तरह राजसमाज प्रिय-जाति) करोड़ों कुचालॉसे भर गया है, वे (मनमाने रूपमें लूट- अन्याय, अत्याचार व्यभिचार,अनाचाररूप)नित्य नयी कुचाले चल है और हेतुयाद(नास्तिकता)ने राजनीति,(ईश्वर और शास्त्रपर यथार्थ) वास,भेम,धर्मकी और कुलकी मर्यादाकाहूँद-हूँ कर नाश कर दिया ॥३॥ संसार वर्ण और आश्रम-धर्मसे भलीभाँति विहीन हो गया है। क और वेद दोनोंकी मर्यादा चली गयी। न कोई लोकाचार मानता है, रन शास्त्रकी आशा हीसुनता है। प्रजा अवनत होकर पाखण्डऔर पाप- रत हो रही है। सभी अपने-अपने रंगरंग रहे हैं, यथेच्छाचारी हो गये ॥४॥ शान्ति,सत्य और सुप्रथाएँ घट गयी और कुप्रधाएँ यद गयी है तथा भीमाचरणोंपर) कपट (दम्भ)की कलई हो गयी एवं दुराचार तथा ल-कपटकी बढ़ती हो रही है। साधुपुरुष कर पाते हैं, साधुता शोकप्रस्त , दुए मौज कर रहे हैं और दुष्प्रता आनन्द मना रही है अर्थात् यगुला- चढ़ गयी है ॥५॥ परमार्थ स्वार्थमें परिणत हो गया अर्थात् मान, क्ति,परोपकार और धर्मके नामपर लोग धन बटोरने लगे हैं। (विधि. वंकन करनेस) साधन निष्फल होने लगे हैं। और सिद्धियां प्राप्त होनी न्द हो गयी हैं, कामधेनुरूपी पृथ्वी कलियुगरूपीगोमर (कमाई)के हाथमें रहकर ऐसी व्याकुल हो गयी है कि उसमेंजी बोया जाता है, यह जमता ही नदी (जहां-तहाँ दुर्भिक्ष पड़ रहे हैं) ॥६॥ कलियुगकी करनी कहाँ- तक भवानी जाय ? यह विना कामका काम करता फिरता है। इतने- पर मी दोन पीस-पीसकर हाथ मल रहा है। न जाने इसके मनमें अभी

८
है
।
विठा देना, जैसे रावणके भयस डरे हुए देवताओंको फिरसे स्वर्ग
पिनय-पत्रिका
क्या-क्या है nा है प्रमु! ज्यों-ज्यों आपशीलवश इस दील दे रहे है
धामा करत जान है, त्यों-हास्या यह नीच सिरपर चढ़ता जाता
जरा क्रोध करकासे डांट दीजिय। यापकी तरजनी देखते ही या
कुम्हड़की बनियाकी तरह मुरझा जायगा nen आपकी यया लेला-
देयकर न्याय कीजिये, नहीं तो अब पृथ्वी आनन्द मंगलसे शून्य
जायगी। ऐसा कीजिय, जिसमें लोग यहभागी होकर प्रेमपूर्वक यह
कि श्रीराम ने हमें कृपादृष्टिसे देखा है (यड़मागी यही है जिमका राम
के चरणों में अनुराग है । यह अनुराग श्रीरामकृपास ही प्राप्त होता है)
॥२॥ मेरी यह यिनती सुनकर श्रीरामजीने आनन्दसे मेरी ओर देखा
और
मुसकराकर करुणाकी ऐसी वृष्टि की जिससे सारी भूमि तर
गयी । (हृदयका सारा स्थान शान्तिसे पूर्ण हो गया) रामराज्य हो
सय काम सफल हो गये । शुभ शकुन होने लगे, क्योंकि महार
रामचन्द्रजी जगद्विजयी हैं (हृदयमें उनके विराजित होते ही कलियुः
की सारी सेना भाग गयी) ॥१०॥ सर्वसमर्थ ज्ञानस्वरूप दयालु
पुण्य-रूपी सेनाको हारनेसे जिता लिया, सद्भक्त स्वमायसे ही आदर
पूर्वक उनकी सराहना करते हैं, कि नाथने सहज ही सारी यातना
दूर कर दी ॥११॥ (परन्तु) आप ऐसा क्यों न करते? यापका तो सदा
से यह याना चला आता है, कि उजड़े हुएको यसाना और गयी ।
वस्तुको फिरसे दिला देना (जैसे विभीषण और सुग्रीवको राज्यएर
'स्वामी
,
यसा देना)। हे तुलसी ! दुखियोंके दुःख दूर कर भगवान्ने जिम
किसको अमय याँह नहीं दी? ॥१२॥

विनय-पत्रिका [१४० नर नरकरूप जीयत जग भव-भजन-पद-विमुख अभागी। सिबासर रुचिपाप असुचिमन,खलमति-मलिन,निगमपथ-त्यागी।। हे सवसंग, मजन नहिं हरिको, सवन न राम-कथा-अनुरागी। -- । करखान-सृगाल-सारस जन, जनमत जगत जनान-दुख लागा॥शा भावार्थ-वे अमागे मनुष्य संसारमें नरकरूप होकर जी रहे हैं, जो ग्म-मरण-रूप भवकाभञ्जन करनेवाले श्रीभगवान्के चरणोंसे विमुख हैं। नकी रुचि रान-दिन पापोंमें ही लगीरहती है। उनका मन अशुद्ध रहता उन दुष्टोंकी बुद्धि मलिन रहती है, और घे घेदोक्त मार्गको छोड़े हुए ॥१॥ न तो ये सन्तोंका संग ही करते हैं,न भगवद्गजन करते हैं और न नके कानोंको श्रीरामकी कथा प्यारी लगती है। तो यस,सदा-सदा श्री-पुत्र-धन और मकान आदिकी ममतारूपी रात्रिमें ही अचेत सोते हते हैं। उनकी धुद्धि (इस 'मेरे मेरे' की निद्रासे) कमी जागती ही ही ॥२॥ हे तुलसीदास! जो दुष्ट श्रीहरि नाम रूपी अमृतको छोड़कर टपूर्वक विषयम्पी जद्दर माँग-माँगकर (धन-पुत्र आदिकी कामना कर- ) पीते हैं, ये मनुष्य सूअर, फुत्ते और गीदड़के समान जगत्म कंपल अपनी माँको दुःख देनेके लिये ही जन्म लेते हैं ॥३॥ [१४१] रामचंद्र रघुनायक ! तुमसों ही विनती केहि भाँति करौं। अघ अनेक अवलोकि आपने, अनघ नाम अनुमानि डरौं ॥१॥ !

विनय-पत्रिका . पर-दुख दुखी मुखी पर-सुख ते, संत-सील नहिं हृदय घरौं । देखि आनकी विपति परम मुख, सुनि संपति विनुआगि जरौं ॥२॥ : भगति-पिराग-ग्यान साधन कहिबहु निषि डहकत लोग फिरौं । सिव-सरयस सुखधाम नाम दव, चि नरकप्रद उंदर भरी ॥३॥ जानत ही निज पाप जलधि जिय, जल-सीकर सम सुनत लरौं । रज-सम पर-अवगुन सुमेरु कार, गुन गिरि-सम रज निदरी 180 नाना चेप बनाय दिवस-निसि,पर-बित जेहि तेहि जुगुति हरौं । पत्तएको पल न कबहुँ अलोल चित हित दै पद-सरोज सुमिरौं ॥५॥ जो आचरन विचारडु मेरो, कलप कोटि लगि औटि मरौं । तुलसिदास प्रभु कृपा-बिलोकनि, गोपद-ज्यों भवसिंधु तरौं ॥६॥ भावार्थ-हे रघुकुलश्रेष्ठ रामचन्द्रजी ! मैं किस प्रकार तुमसे विनय करूँ ? अपने अनेक अघों (पापों) की ओर देखकर और तुम्हारा मन (पापरहित) नाम विचारकर डर रहा हूँ ॥१॥ दूसरेके दुःखसे दुखी तथा दूसरेके सुखसे सुखी होना सन्तोका शील-स्वभाव है, उसे तो मैं कभी हृदयमें धारण ही नहीं करता। प्रत्युत दूसरोंको विपत्ति देखकर परम सुखी होता है। और दूसरोंकी सम्पत्ति सुनकर तो बिना ही आग जला करता हूँ ॥२॥ भक्ति, वैराग्य, झान आदिके साधनोंका उपदेश देता हुआ लोगोंको भाँति-भाँतिसे ठगता फिरता हूँ और शियके सर्वस्व तथा मानन्द के धाम तुम्हारे राम-नामको येच-वेचकर नरकमें ले जानेवाले (पागे) पेटको भरताहूँ ॥३॥ मनमें जानता हूँ कि मेरे पाप समुद्र के समान अपार २३१ विनय-पत्रिका परन्तु अब दूसरे किसी मुरा सपने पापोंकलिय जय यह सुनता सिमे पानीकी दयारमी पाप तय उसमलने लगता है। राय यह कि महापापी होनेपर भी लोगोंके मुगम परम पुण्यारमा कहलाना चाहता हूँ परन्तु दुसरोक धूल कणके समान मामूली दोगेको भी मुमेरपर्यंतक समान यदाकर यतलाता है। और उनक तके समान (महान्) गुणोंको पुलक समान तुम्छ पतलाफर उनका तिरस्कार करता है (मरी ऐमी करनी है) nan भौति भौतिके भेष यना- बनाकर दिन-रात जिस किसी भी उपाय इसरॉकाधन हरण करता है। कमीएकपल भी स्थिरचित्त होकर प्रमसे तुम्हारे घरणकमलोंका सरण नहीं करता । यदि तुम मेरे याचरणोंपर विचार करने लगोगे तप तो मुमे करोड़ों कपनक संसाररूपी कायम आँट-खटफर जल मरना पंगा, जन्म-मरणसे कमी नहीं छदंगा। पर यदि तुम एक यार रूपादृष्टि कर दोगे, तो प्रमो में तुलसीदास उसीके प्रमायस रस संमार सागर- को गायके पुरके समान सहज ही पार कर जाऊँगा ॥६॥ [१४२] सङ्घचत ही अति राम कृपानिधि क्यों करि पिनय सुनावी । मकल परम विपरीत करत, केहि माँति नाथ ! मन मायौं ॥१॥ जानत ही हरि रूप चराचर, मैं हठि नयन न लावी । अंजन-कम-सिखा जुवती, वह लोचन-सलम पठायौं ॥२॥ अवननि को फल कथा तुम्हारी, यह समुझौ, समुझावों । तिन्हयननि परदीप निरंतर मुनि सुनि भरि भरि तावौं ||३|| ग्रिनय-पत्रिका जेहि रसना गुन गाद तिहारे, मिनु प्रयास सुख पावौं । तेहि मुख पर अपवाद मेक ज्यों रटि-रटि जनम नसायौं । 'करहु हृदय अति रिमल यसहि हरि,कहि कहि सबहिं सिखावी । ही निज उर अभिमान-मोह-मद खल-मंडली वसावी । जो तनु घरि हरिपद सापहि जन, सो दिनु काज गवावौं । हाटक-घट भरि धरयो सुघा गृह, तजि नम कूप खनावीं ॥६॥ मन-क्रम-वचन लाइ कीन्हे अध, ते करि जतन दुरारीं । पर प्रेरित इरपा यस कबहुँक किय कछु सुम, सो जनावौं ॥७॥ विप्र-द्रोह जनु चाँट परचो, हठि सदसों पैर बढ़ानौं । वाहूपर निज मति-विलास सब संवन माँझ गनावों ||८॥ निगम सेस सारद निहोरि जो अपने दोष कहावौं । तौ न सिराहिं कलप सत लगि प्रभु, कहा एक मुख गावों ॥९॥ जो करनी आपनी विचारी, सौ कि सरन ही आवौं । मृदुल सुभाउ सील रघुपतिको, सो पल मनहिं दिखायौं ॥१०॥ तुलसिदास प्रभु सो गुन नहि, जेहि सपनेहुँ तुमहिं रिझावौं । नाथ-कृपा भवसिंधु धेनुपद सम जो जानि सिरावौं ॥११॥ भावार्थ-हे कृपानिधि रामजी! मुझे बड़ा संकोच हो रहा प्रकार मापको अपनी विनती सुनाऊँ ? जो कुछ भी मैं करता फिरनाथ!आपको क्यों अच्छा लगने ५ 1 १३३ विनय-पत्रिका लगा॥१॥ यद्यपि में यह जानता हूँ किसम्पूर्ण जड़-चेतन भगवान् श्रीहरि- का ही रूप है, पर मैं उस हरिम्वरूपको भूलकर भी नहीं देखता । मैं तो अपने नेत्र-रूपी पतंगोंको कामिनीरूपी अग्निको शिवा (जलनेके लिये) मेजता हूँ ॥२॥ में यह समझता हूँ और दूसरोंको भी समझाता हूँ कि कानोंकी सार्थकता तो आपकी कथा सुननेमें ही है; परन्तु मैं तो उन कानोंसे सदा दूसरों के दोष सुन-सुनकर, उन्हें हृदयमें भरता और सन्तान होना हूँ ॥३॥ जिस जीभसे आपके गुणानुवाद गाकर विमा ही परिश्रमके परमसुख प्राप्त कर सकता है, उस मुखसे (जीमसे) मेढककी नाई दूसरोंकी निन्दाएँ रट रटकर अपना जन्म म्बो रहा हूँ ॥४॥ मैं यह यात सयको सिखाता फिरता है, कि 'हृदयको अत्यन्त शुद्ध कर लो, तभी उसमें भगवान् श्रीहरि विराजेंगे' किन्तु मैं स्वयं अपने हृदयमें अभिमान, मोह और मद आदि दुष्पोंकी मण्डलीको चसाना हूँ ॥५॥ जिस दुर्लभ मनुष्य-शरीरकोधारणकरभक्त जनभगवान्- के परमपदको प्राप्त करनेकी साधना करते हैं, मैं उसे व्यर्थ ही खो रहा हैं। घरमें सोनेके घमें अमृत भरा रक्खा है, पर उसे छोड़कर आकाशमें कुयाँ खुदवाता हूँ ॥६॥ मनसे, फर्मस और धचनसे मैंने जो पाप किये है, उन्हें तो में यक्ष कर-कर बड़े जतनसे छिपाता है। और यदि दूसरों की प्रेरणासे अथवा ईवश कहीं कोई शुभ कर्म बन गया है, तो उसे जनाता फिरता हूँ ॥७॥ ब्राह्मणों के साथ द्रोह करना तो मानो मेरे हिस्सेमें ही आ गया है। जबरदस्ती ही सबसे वैर बढ़ाता फिरता हूँ। इतना (बुद्धिभ्रष्ट) होनेपर भी, मैं सय सन्तोंके बीच बैठकर अपनी बुद्धिक विलासको गिनाता हूँ (उनमें उत्तम ज्ञानी सन्त बनता है) un विनय-पत्रिका चारों वेद, शेषनाग और शारदा आदिका निहोरा करके उनसे यदि अपने दोपोंका बखान कराऊँ, तय भी, हे प्रभो! मेरे घे दोष मोर तक समाप्त न होंगे ! फिर, भला में एक मुखसे उनका कहाँतक व कम् ॥९॥ यदि मैं अपनी करनीपर विचार करू, तो क्या मैं आ- शरणमें आनेकासाहस भी कर सकूँ? परन्तु श्रीरामजीका यहाहीको स्वभाव और असीम शील है, इसी यातका यल मनको दिसातारा हूँ ॥१०॥ हे प्रभो! इस तुलसीदासके पास ऐसा एक भी गुण नई जिससे स्वप्नमें भी आपको रिझा सके। किन्तु हे नाथ! आपकी कृप आगे यह संसार-सागर गायक खुरके समान है। यह जानकर सन्तोष कर लेता (कि आपकी रुपासे, मैं विपरीत आचरण होनेपर भी संसार-समुदसे सहज ही तर जाऊँगा) ॥११॥ [१४३] मुन राम रघुवीर गुसाई, मन अनीति-त मेरो। चरन-सरोज पिसारि तिहारे, निसिदिन फिरत अनेरो ॥ मानत नाहिं निगम-अनुसासन, प्रास न काहू करो। भूपो सूल करम कोउन्ह तिल ज्यों बहु पारनि परी ॥ जह सतसंग कथा माघयकी, सपनेहुँ करत न फेरो । लोम-मोह-मद-काम-कोहरत, विन्दमों प्रेम पनेरो ॥ पर-गुन मुनन दाह, पर-पन सुनन हरस महतो । आप पापको नगर यमायत, सहि न मकत पर रोरी 12 माधन-फल, गुति-मार नाम तर, मय-सरिना कह गरे। । पर-का काँकिनी लागि मट, चि होत हठि थेगे ।।५ 7 . . २३५ विनय-पत्रिका 1 कबहुँक हो संगति-प्रमावतें, जाउँ सुमारग नेरो। तब करि क्रोध संग कुमनोरथ देत कठिन भटभेरो ॥६॥ इक हौं दीन, मलीन, हीनमति, विपविजाल अति धेरो। वापर सहि न जाय करुनानिधि, मनको दुसह दरेरो ॥७॥ हारि परयो करि जतन बहुत विधि, तातें कहत सबेरो। तुलसिदास यह त्रास मिट जव हृदय करहु तुम डेरो ॥८॥ भावार्थ-हे रामजी ! हे रघुनाथजी! हे स्वामी ! सुनिये--मेरा मन अन्यायमें लगा हुआ है, आपके चरण-कमलोंको भूलकर दिन-रात इधर- उधर (विपयों में) भटकता फिरता है॥१॥ नतोयह घेदकी हीाक्षामानता है भीर न उसे किसीका उर ही है । यह बहुत यार फर्मरूपी कोल्हमें तिलकी तरह पेरा जा चुका है, पर अब उस कपको भूल गया है ॥२॥ जहाँ सत्संग होता है। भगवानकी कथा होती है, यहाँ घद्द मन स्वप्नमें भी भूलकर भी नहीं जाता। परन्तु जो लोभ, मोह, मद, काम और क्रोध- में मग्न रहते हैं, उन्हीं (दुष्टोस) घह अधिक प्रेम करता है ॥३॥ दूमरॉके गुण सुनकर घट (डाहफे मारे) जला जाता है और दूसरों के दोष सुनकर पड़ा भारी हरमाता स्वयं तो पापोंका नगर यसा रहा है, पर दूसरेके (पापोंके) पेड़को भी नहीं देख सकता।भाष यह कि अपने बड़े-बड़े पापों- पर तो कुछ भी ध्यान नहीं देता, परन्तु दूसरोंके जरा-से पापको देपकर दी उनकी निन्दा करता है ॥n आपका राम-नाम सारेसाधनोंका फल, पद का सार और संसाररूपी नदीसे पार जाने के लिये येहा है। ऐसे राम-नामको यह दुष्ट दूसरके हाथ कौड़ी कार्ड लिये पेयता दुभा विनय-पत्रिका जबरदस्ती उनका गुलाम धनता फिरता है।यदि कमी सत्संगके प्रभार भगवत्केमार्गकेसमीप जातामी हूँ तोपिपयोंकीमासक्तिउमड़करमना तुरन्त सांसारिकथुरीकामनारूपी गइहेमेंधमादेदेतीहै।एकतोमै हीदीन, पापी और वुद्धिहीन हैं तथा विपत्तियोंके जाल में ग्व्य फंसापा निसपर, हे करुणानिधि ! मनके इस असा धकेको मैं कैसे सह मकान हूँ ? ॥७॥ मैं अनेक यत्न करके हार गया, इससे मैं पहलेस ही कहे देना हूँ कि तुलसीदासका यह मय (जन्म-मरणका प्रास) तमी दूर होगा, जा आप उसके हृदयमें निवास करेंगे ॥८॥ [१४४] सो घी को जो नाम-लाज ते, नहिं राख्यो रघुबीर । कारुनीक पिनु कारन ही हरि हरी सकल भव-भीर ॥१॥ वेद-पिदित, जग-विदित अजामिल विप्रबंधु अप-धाम । पोर जमालय जात निवारयो सुत-हित सुमिरत नाम ॥२॥ पमु पामर अभिमान-सिंधु गज असो आइ जर प्राह । सुमिरत महत सपदि आये प्रभु, हरयो दुसह उर-दाह ।।३।। म्याध, निषाद, गीप, गनिकादिक, अगनित औगुन-मूल । नाम-ओट राम मानिकी दूरि करी सर पूल ॥४॥ फैहि आचरन पाटि ही तिनतें, रघुकुल-भूपन भूप । मदिन तुलमिदास निमिवासर परयो भीम समका ।।५।। माया- रघुयोग ! पंगा कौन है, जिग मापने अपने नाम पानी नामें नहीं रमादीमापनी मिाही कारण -

विनय-पत्रिका
रुणा करनेवाले और (जन्म-मरण-रूपी) संसारके भयको दूर करनेवाले
॥२॥ घेदमें प्रफट है और संसारमें भी प्रसिद्ध है कि अजामिल जाति-
का ब्राह्मण महान् पापाका स्थान था। यमलोक जाते समय जब उसने
के बहानेआपका'नारायण'नामलिया तव आपने उसे यमलोक जानेसे
रोक दिया ॥२॥ जय मगरने महान् अभिमानी पामर पशु हाथीको पकड़
लेया, तब उसके एक ही वार स्मरण करनेपर, हे प्रभो! आप वहाँ दौड़े
माये और उसकी दुःसह हार्दिक पीडाको मिटा दिया (मगरसे छुड़ाकर
उसे परमधाम प्रदान कर दिया ) ॥३॥ घ्याध (पाकि), निपाद
गुह), गीध (जटायु), गणिका (पिंगला) इत्यादि अगणित जीप जो
गोको जड़ थे, परन्तु हे रामजी! आपने अपने नामकी मोटसे इन सयकी
सारी पीड़ाओंका नाश कर दिया ॥२॥ हे रघुवंशभूषण महाराज! मैं
इन सयोंसे किस आचरणमें कम हैं? फिर भी मैं तुलसीदास रात-दिन
भयानक अज्ञानरूपी कुएँ में पड़ा दुःख भोग रहा हूँ (सबको निकाला
है तो अय मुझे भी निकालिये) ॥५॥
[१४५]
कृपासिंधु ! जन दीन दुवारे दादि न पारत काहे ।
जब जहँ तुमहिं पुकारत आरत, वह तिन्हके दुरा दाहे ॥१॥
गड, प्रहलाद, पांडमुत, कपि, सबको रिपु-संकट मेट्यो ।
मनत, पंधु-भय-विकल, पिभीपन, उठि सो भरत ज्यों भेटयो ॥२॥

विनय-पत्रिका मैं तुम्हरी लेड नाम ग्राम इक उर आपने अमात्रौं । भजन, विवेक, निराग, लोग भले, में क्रम-क्रम करिल्यावों ॥३॥ सुनि रिस भरे कृटिल कामादिक, कहिं जोर मरिआई। तिन्हहिं उजारि नारि-अरि-धन पुर राबहिं राम गुसाई ॥ सम-सेवा-छल दान-दंड ही, रचि उपाय पचि हारयो । मिनु कारनको कलह पड़ो दुख, प्रभुसों प्रगटि पुकारयो ॥५॥ मुर स्वारथी, अनीस, अलायक, निटर, दया चित नाहीं। जाउँ कहाँ, को विपति-निवारक, मवतारक जग माहीं ॥६॥ तुलसी जदपि पोच, तउ तुम्हरो, और न काहू कैरो। दीजे मगति चाँह धारक, ज्यों सुबस चसै अब खेरो ॥७ भावार्थ-हे रुपासागर ! यह तुम्हारा दीन जन तुम्हारे द्वार न्याय क्यों नहीं पाता?जय, जहाँपर, दुखियोंने तुम्हें पुकारा, तय वई पर तुमने उनके दुःख दूर कर दिये ॥१॥ गजराज, महाद, पाण्डव, सुप्री= आदि सबके शत्रुओंसे दिये गये कष्ट तुमने दूर कर दिये । माई रावण डरसे व्याकुल शरणागत विभीषणको उठाकर तुमने भरतकी नाई हृदय से लगा लिया (फिर मेरे लिये ही ऐसा क्यों नहीं होता) ARA तुम्हारा नाम लेकर अपने हृदयमें एक गाँव घसानाचाहता हूँ और उसमें वसानेके लिये मैं धीरे-धीरे भजन, विवेक, वैराग्य आदि सजनोंको इधर- उधरसे लाता हूँ ॥३॥ पर यह सुनकर क्रोधित हो दुष्ट काम, क्रोध, लोमा

.
विनय-पत्रिका
मोहमद,मात्सर्य आदि जबरदस्ती करते हैं और उन येचारे भजन आदि
मले आदमियों को निकाल-निकालकर, हेममो ! उस गाँवमें दुष्टखी, शत्र
और धन यादि नीचोंको ला-लाकर पसाते हैं ॥४॥ साम, दाम, दण्ड, भेद
भार सेवारहल करके तथा और भनेक उपाय करके मैं थक गया हूँ, तय
हे प्रभो! इस विना ही कारणकी लड़ाई के इस महान् दुःसको बाज मैंने
तुम्हारे सामने खुलकर निवेदन कर दिया है ॥५॥ (तुम्हारे सिया यह
दुग्य और मुनाना भी किसे, क्योंकि) देवता तो स्वार्थी, असमर्थ,अयोग्य
और निष्ठुर हैं। उनके चित्त तो दया नहीं है। मैं कहाँ जाऊँ ? (तुम्हार
सिया) कौन विपत्ति दूर करनेवाला है ? कौन इस संसार-सागरसे पार
उतारनेपाला है ? ॥६॥ नुलमी यद्यपि नीच है, पर है तो तुम्हारा ही, और
किसीका गुलाम तो नहीं है। अपना जानकर एक यार भक्तिरूपी याँह
दे दो, जिमसे यह (तुम्हारे नामका) गाँव अच्छी तरह आबाद हो जाय।
अर्थात् दृदयमें तुम्हारी भक्तिके प्रतापसे भजन,ज्ञान, वैराग्यका विकास
होकर काम-क्रोधादिका नाश हो जाय ॥७॥
[१४६]
हो सब विधि राम, रावरों चाहत भयो चेरो।
ठौर ठीर साहबी होत है, ख्याल काल कलि केरो॥१॥
काल-करम-इंद्रिय-विपय गाहकगन घेरो।
ही न कयूलत, बाँधि के मोल करत करेरो ॥२॥

बड़ेंगे। गुलामका पालन कीजिय, नहीं तो फिर खोजनेस भी इसका पता बिनय पत्रिका पंदि-छोर तेरी नाम है, बिम्दत में को, तर छल-प्रीति के मांग उर डेरी ॥३॥ नाम-ओट अब लगि मच्यो मलनुग जग जंगे। अब गरीर न जमो गिर्यपाइयों न हरी ॥४॥ जेहि कौतुक पक खानको प्रभु न्याव निरो । तेहि कौतुक कहिये कृपाल ! 'तुलसी है मेरो ॥२॥ भावार्थ-रामजी! मैं सब प्रकार आपका दास बनना चाहता पर यहाँ तो जगह-जगह सादयी हो रही है। भाव यह कि मनर इन्द्रियाँसमी मेरे मालिक यन ये हैं। यह सय कलिकालके खेल है। काल, कर्म और इन्द्रियरूपी ग्राहकोंने मुझे घेर रक्सा है। अब मैं उ दाय विकना कबूल नहीं करता, तब ये मुझे बाँधकर मुझपर कहा चढ़ाते हैं, जैसे-तैसे लालच दिसाकर अपने वशमें करना चाहते हैं। आपका नाम बन्धनसे छुड़ानेवाला है और आपका याना भी बड़ा है। मैंने उन (ग्राहको) से यह कहा, कि भाई ! मैं तो रघुनाथजी । यिक चुका हूँ, तय ये कपट प्रेम दिग्याकर मुझसे मेरे हृदयम यम लिये स्थान माँगने लगे (यदि उन्हें स्थान दिये देता है, तो अभी तो दीनता दिखा रहे हैं, पर जगह मिल जानेपर धीरे-धीरे उसपर मत अधिकार जमा लेंगे।) शा अबतक मैं आपके नाम के सहारसे बचाए पर अय तो यह कलियुग मुझेजेर किये है। अतएप, अय इस गरी ।

उघारे ॥१॥ विनय-पत्रिका लगेगा नाय!आपने जिस लीलासे पक्षी (उल्लोका औरकुत्तेका सैसला कर दिया था, उसी लीलासे (इस कलियुगसे) यह भी कह दीजिये कि, 'तुलसी मेरा है। (इतना कह देनेसे फिर फलियुगका इसपर कुछ भी घशन चलेगा) ॥५॥ [१४७] कपासिंधु ताते रहो निसिदिन मन मारे। महाराज ! लाज आपुही निज जॉप १पनमें उल और गीच एक ही घरमें रहते थे। एक दिन गीधने बुरी नीयतसे परपर अपना अधिकार करना चाहा और उल्टूसे कहा-'हमारा घर खाली कर दो, इसपर तुम्हारा कोई अधिकार नहीं, नहीं मानते तोचलो राजाजीसे न्याय करा लें।' अन्तमें दोनों श्रीरामजीके दरबारमें आये । रामचन्द्रजीने उनसे कहा-'घर किसका है। तू उसमें कबसे रहता है। उल्लने उत्तर दिया-'महाराज ! जबसे वृक्षोंकी सृष्टि हुई, तबसे मैं उस घरमें रहता हूँ।' गोधने कहा कि 'जबसे मनुष्योंकी सृष्टि हुई, तबसे में रहता हूँ।' भगवान्ने कहा कि 'वृक्षोंकी सृष्टि मनुष्योसे पहले हुई है, इसलिये घर उलूका ही है, तुम्हारा नहीं । तुम घर खाली कर दो।' २ एक दिन श्रीरामजीके राजदरबार में एक कुत्ता आया और रोता हुआ कहने लगा-महाराज, तीर्थसिद्धि नामक ब्राह्मणने बिना ही अपराध लाठीसे मेरा सिर फोड़ दिया, 'आप मेरा न्याय कर दीजिये। भगवान्ने ब्राह्मणको बुलाया और उससे कि 'तुमने निरपराध कुत्तेके सिरपर क्यों लाठी मारी!' आक्षणने कहा, कि 'मैं भीख माँगता फिरता था, इसे मैंने रास्तेसे हटाया, जर यह न हटा, तब मैंने लकड़ी मार दी। ब्राह्मणको अदण्डनीय समझकर भगवान् विचार करने लगे। इतनमै बुत्तेने कहा कि 'भगवन् ! आप इसे कालिंजरका महन्त बना दीजिये 1 मैं मी पूर्व-जन्ममें एक महन्त था। मश्यामश्य खानेसे मुझे कुत्ता होना पहा, महन्ती बहुत बुरी है। कुत्तेके कहनेपर भगवान्ने उसे कालि जरका महन्त बना दिया। " 1 रिमय-पत्रिका मिले रई, मारया घई कामादि संपाती। मो पिनु रहै न, मेरिय जारं छल छाती ॥ पसत हिये हित जानि में सनकी रुचि पाली। कियो कथाको दंद हो जड़ करम कुचाली ॥३॥ देखी मुनी न आजु ली अपनापति ऐसी । फरहिं सब सिर मेरे ही फिरि पर अनसी ॥४॥ बड़े अलेखी लसि पर, परिहरे न जाही। असमंजसमें मगन हो, लीजे गहि याहीं ॥५॥ पारक पलि अवलोकिये, कौतुक जन जी को । अनायास मिटि जाइगो संकट तुलसीको ॥६॥ मावार्थ-हे कृपासिन्धु ! इसीलिये मैं रात-दिन मन मारे रहन कि हे महाराज! यपनी जांघ उघाइनेसे अपनेको ही लाजर है ॥१॥ यह काम, फोध, लोम आदि सार्या मिले भी रहते हैं और मा भी चाहते हैं, ऐसे दुष्ट हैं ! ये मेरे यिना रहते भी नहीं और फरके मेरी ही छाती जलाते हैं। भाव यह कि अपने ही बन मारते हैं ॥२॥ ये मेरे हृदय में यसते हैं, मैंने ऐसा समझकर प्रेमपू- इन सबकी रुचि भी पूरी कर दी है, अर्थात् सव विषय भोग चुका फिर भी इन दुष्टों और कुवालियोंने मुझे कत्थककी लकड़ी बनारस है (लकड़ीके इशारेसे जैसे नाच नचाते हैं, वैसे ही ये मुझे नचाते हैं)। ऐसी अपनायत (आत्मीयता) तो आजतक मैंने कहीं भी नहीं देखें नुनी । कर्म तो करें सव आप, और जो कुछ घुराई हो, यह मेरे ति है विनय-पत्रिका माये ॥४॥ मुझे ये सय बड़े ही अन्यायी दीखते हैं पर छोड़े नहीं जाते । यड़े हो यसमअसमें पड़ रहा हूँ। अब हाथ पकड़कर आप ही निकालिये (नदी तो, अपने से बने हुए ये मुझे मार कर ही छोड़ेंगे) ॥५॥ आपकी यलैया लेता है, कृपाकर एक यार गपने इस दासका यह कौतुक तो देखिये। मापके देखते ही तुलसीका दुःख सहज ही दूर हो जायगा ॥६॥ [१४८] कहाँ कौन मुहँ लाइ के रघुपीर गुसाई । सकुचत समझत आपनी सब साइँ दुहाई ॥१॥ सेवत बस, सुमिरत सखा, सरनागत सो हो। गुनगन सीतानाथके चित करत न हौं हौं ॥२॥ छपासिंधु बंधु दीनके आरत-हितकारी। प्रनत-पाल विरुदावली सुनि जानि पिसारी ||३|| सेइ न घेइ न सुमिरि के पद-प्रीति सुधारी । पाइ सुसाहिब राम सों, भरि पेट विगारी ॥४॥ नाथ गरीपनिवाज है, में गही न गरीबी । तुलसी प्रभु निज और ते पनि पर सो कीबी ॥५॥ भावार्थ-हे रघुवीर ! हे स्वामी ! कौन-सा मुँह लेकर मापसे कुछ कहूँ ? स्वामीकी दुहाई है, अब मैं अपनी करनीपर विचार करता हूँ, तय संकोचके मारे चुप हो रहता हूँ ॥१॥ सेवा करनेसे घशमें हो जाते हैं, स्मरण करनेसे मित्र धन जाते हैं और शरण में आनेसे सामने प्रकट हो बिनय-पत्रिका जाते हैं। ऐसे अप श्रीसीतानाथजीके गुण-समूहपर भी मैं ध्यान देता || माप कृपाके समुद्र है, दीनोंके बन्धु हैं, दुखियोंके हित । शरणागतोंके पालनेवाले हैं, आपको ऐसी विरदावली सुनकर जानकर मी मैं भूल गया हैं॥३॥ मैंने न तो सेवाही की और न ही किया । स्मरण करके आपके चरणोंमें सचा प्रेम भी नहीं कि आप-सरीखे श्रेष्ठसामीको पाकर भी मैंने भरपेट आपसे बुराई हीको आप गरीयोंपर कृपा करनेवाले हैं, पर मैंने गरीयो धारण नहीं (अतएव मेरी ओर देखनेसे तो कुछ भी नहीं होगा), अयद्दे नाथ! ओर देखकर ही जो आपसे यन पड़े सो कीजिये ॥५॥ [१४९ ] कहाँ जाउँ, कासों कहीं, और ठौर न मेरे । जनम गंवायो तेरे ही द्वार किंकर तेरे ॥१॥ मैं तो बिगारी नाथ सों आरतिके लीन्हें । तोहि कृपानिधि क्यों बनै मेरी-सी कीन्हें ॥२॥ दिन-दुरदिन दिन-दुरदसा, दिन-दुख दिन दूपन जप लौ तू न पिलोकिह रघुवंस-विभूपन ॥३॥ दई पीठ पिनु डीठ में तुम बिस्व-रिलोचन । तो सों तुही न मरो नत-सोच-विमोचन ॥४॥ पराधीन देव दीन हाँ, स्वाधीन गुसाई। पोलनिहारे सौ फर चलि विनय किमाई॥५॥ । -- बिनय पत्रिका आपु देखि मोहि देखिये जन मानिय साँचो। बड़ी ओट रामनामकी जेहि लई सो चाँचो ॥६॥ रहनि रीति राम रावरी नित हिय हुलसी है। ज्यों मावै त्यों करु कृपा तेरो तुलसी है ॥७॥ भावार्थ-कहाँ जाऊँ ? किससे कहूँ ? मुझे कोई और ठौर ही नहीं। स तेरे गुलामने तो तेरे ही दरवाजेपर (पड़े-पड़े) जिन्दगी काटी है ॥१॥ ने तो जो अपनी करनी विगाड़ी सो हे नाथ ! दुःपोंसे धयराया हुआ होने के कारण विगाड़ी। परन्तु हे कृपानिधे ! यदि तू भी मेरी करनीकी ओर देखकर फल देगा तो कैसे काम चलेगा ? ॥२॥ हेरघुकुलमें श्रेष्ठ! जयतक तू (हरा जीवकी ओर कृपादृष्टिसे) नहीं देखेगा, तबतक नित्य ही बोटे दिन, नित्य ही युरी दशा, नित्य ही दुःख और नित्य ही दोष लगे रहेंगे ॥३॥ मैं जो तुझे पीठ दिये फिरता है तुझसे विमुख हो रहा हूँ, सोमें नो दृष्टिहीन हैं,अन्धा हूँ (अशानी हैं) पर तू तो सारे विश्वका द्रष्टा है। मुझसे विमुप कैसे होगा!) नुह-सातो तू ही है, तेरे सिवा दीन दुमियोंये. शोक हरनेयाला दूसरा कोई नहीं है ॥४॥ हे देय ! मैं परतन्त्र हैं, दीन हैं, तो स्वतन्त्र, स्वामी है। तेरी पलिदारी ! (बैतन्यरूप) पोलनेयालेसे उसकी परछाई क्या विनय कर सकती है ? ॥५॥ मतपय नू पहले अपनी भोर देस, फिर मेरी ओर देख, तभी इस दालको सपा मानना राम-नामकी ओर बड़ी मारी है। जिस किसीने मी राम-नाम- की मोट ले लीया (जन्म-मरणकेचप्रसे) दर गया राम!तरी एन-सहन सवा मेरे हृदय में हुलस रही है, तेराशील समाप विचारकर परतू 6 और नहीं भी है, क्योंकि इस संसारमें जितने जीव है ये समी सन्तारके पिनय-पत्रिका में मन-ही-मन पड़ा प्रमन्त्र हो रहा है कि भव मेरी सारी करनी जायगी। यम, यह तुलसी तेरा है, जिस तरह हो, उसी तरह मा एषा कर [...] रामभद्र ! मोहिं आपनो सोच है अरु नाहीं। जीव सकल संतापके माजन जग माहीं ॥१॥ नातो पड़े समर्थसों इक ओर कियों हूँ। तोको मोसे अति घने मोको एक तूं ॥२॥ पड़ी गलानि हिय हानि है सरबग्य गुसाई । कूर कुसेवक कहत हौं सेवककी नाई॥३॥ मलो पोच रामको कहैं मोहि सर नरनारी । विगरे सेक्क खान ज्यों साहिव-सिर गारी ॥४॥ असमंजस मनको मिटै सो उपाय न सूझे । दीनबन्यु ! कीजे सोई पनि परै जो बूझे ॥५॥ बिरुदावली बिलोकिये तिन्हमें कोउ हो हौं । तुलसी प्रभुको परिहरयो सरनागत सो हाँ॥६॥ भावार्थ-हे कल्याण-खरूप रामचन्द्रजी ! मुझे अपना सोच है भी 4 पात्र हैं, (समी दुखी हैं) ॥१॥ पर क्या आप जैसे यहे समर्यसे सिर्फ एक 4 ओरसे सम्यन्ध है ? (शायद यही हो क्योंकि आपको तो यदुतरे हैं, किन्तु मेरे तो एक आप ही २॥ नाय! भार

बिनय-पत्रिका
तो घट-घटकी जानते हैं, मेरे हृदय में यही यही ग्लानि हो रही है और
इसीको मैं हानि समझता हूँ कि, मैं हैं तो दुए और बुरा सेवक,
नमकहराम नौकर, पर पातें कर रहा हूँ सच्चे सेवक-जैसी ।भाय यह है,
कि मेरा यह दम्म माप सर्यक्षके सामने कैसे छिप सकता है? ॥३॥
परन्तु मला हूँ या धुरा, सब स्त्री-पुरुष मुझे कहत तो रामका ही है न?
सेवक और कुत्ते के बिगड़नेसे स्वामीके सिर ही गालियाँ पड़ती है। भाव
यह कि यदि मैं बुराई करूँगा, तो लोग आपको ही बुरा कहेंगे ॥४॥
मुझे यह उपाय भी नहीं सूझ रहा है, कि जिससे चित्तका यह असमञ्जस
मिटे अर्थात् मेरी नीचता दूर हो जाय और आपको भी कोई भला-बुरा
न कहे । अव हे दीनबन्धु ! जो आपको उचित जान पड़े और जो धन
सके, बद्दी (मेरे लिये) कीजिये ॥५॥ ननिक अपनी विरदावलीकी ओर
तो देखिय! मैं उन्हीं में कोई हूँगा! (भाव यह कि आप दीनबन्धु हैं, नो
क्या मैं दीन नहीं हूँ, आप पतित-पावन है, तो क्या मैं पतित नहीं हूँ,
आप प्रणतपाल है, तो क्या मैं प्रणत नहीं हैं ? इनमेंसे कुछ भी तो हँगा)।
(इतनेपर मी) यदि स्वामी इस तुलसीको छोड़ देंगे, तो भी यह उन्हींके
सामने शरणमें जाकर पड़ा रहेगा। (आपको छोड़कर कहीं जा नहीं
सकता) ॥६॥
[१५१]
जोप चेराई रामकी करतो न लजातो।
वो तू दाम कुदाम ज्यों कर-कर न विकातो॥१॥

मिनय-पत्रिका जपत जीह रघुनाथको नाम नहिं अलसातो। बाजीगरके सूम ज्यों खल खेह न खातो ॥२ जो तू मन ! मेरे कहे राम-नाम कमातो। सीतापति सनमुख सुखी सब ठाँव समातो॥३ राम सोहाते तोहिं जो तू सबहिं सोहावो । काल करम कुल कारनी कोऊ न कोहातो।।४ राम नाम अनुरागही जिय जो रतिआतो। स्वारथ-परमारथ-पथी वोहिं सब पतिआवो ॥५॥ सैइ साधु सुनि समुझि के पर-पीर पिरावो । जनम कोटिको काँदलो हद-हृदय थिरातो॥६॥ भव-मग अगम अनंत है, पिनु श्रमहि सिरातो । महिमा उलटे नामकी मुनि कियो किरातो ॥७॥ अमर-अगम ननु पाइ सो जड़ जाय न जातो । होतो मंगल-मूल तू, अनुकूल पिघातो ॥८॥ जो मन, प्रीति-प्रतीतिसों रामनामहि रातो। तुलमी रामप्रसादसों तिहुँताप न तातो ॥९॥ नमावा भाषा-अरे! जो धीरामसीको गुदामी करमेमें तो मग दाम होका मी, शोटेदामकी भौति इस हार्ग साप विकता शिरमा । मात्र यति रमारमाहासय मंशोनेपर मोउन भूल जाने के कारण जोरपगं एक योनिमें मरी योनिमें भरकता

बिनय पत्रिका
रहा है ॥१॥ यदि तू जीभसे श्रीरघुनाथजीका नाम जपनेमें आलस्य न
करता, तो आज तुझे याजीगरके सूमके सदृश धूलन फाकनी पड़ती॥२॥
परे मन ! यदि तू मेप कहा मानकर राम-नामरूपी धन कमाता,
तोश्रीजानकी नाय रघुनाथजीके सम्मुख उनकी शरण में जाकर सुखी हो
जाना और सर्वत्र तेरा आदर होता। लोक-परलोक दोनों यन जाते ॥३॥
जो मुझे श्रीरामजी अच्छे लगे होते, तो तू भी सयको अच्छा लगता;
काल, फर्म और कुल आदि जितने (इस जीवके) प्रेरक है, ये सब फिर
कोई भी तुझपर फोध न करते। सभी तेरे अनुकूल हो जाते ॥४॥ यदि तू
श्रीराम-नामसे प्रेम करता और उसीमें अपनी लगन लगाता, तो स्वार्थ
और परमार्य इन दोनोंके ही बटोही तुझपर विश्वास करते । अर्थात्
तू संसार और परलोक दोनोंमें ही सुखी होता ॥५॥ जो तू सन्तोंकी सेवा
करता एवं दूसरोंका दुःख सुन और समझकर दुखी होता, तो नेरे
हृदयरूपी तालाघमें जो करोड़ों जन्मोंका मैल जमा है, वह नीचे बैठ
जाता, तेरा अन्तःकरण निर्मल हो जाता ॥६॥ श्रीरामका नाम न लेने-
यालोंके लिये संसारका मार्ग अगम्य है और अनन्त है, किन्तु उसीको
तू विना ही श्रमके पार कर जाता। जय श्रीरामके उल्टे नामकी भी इतनी
महिमा है कि उससे व्याध (वाल्मीकि) मुनि यन गये थे, तय
सीधा नाम जपनेसे क्या नहीं हो जायगा ? ॥७॥ अरे मूर्ख! तेरा यह
देवताओंको भी दुर्लभ (मानव) शरीर यों ही न चला जाता!तू कल्याण-
का मूल हो जाता और विधाता तेरे अनुकूल हो जाते ॥८॥ अरे मन !
यदि तू प्रेम और विश्वाससे राम-नाममें लौ लगा देता, तो हे तुलसी,
श्रीराम-चपासे, तू तीनों तापामें कभी न जलता ॥९॥

विनय-पत्रिका [१५२] राम मलाई आपनी भल कियो न काको। जुग जुग जानकिनाथको जग जागत साको ॥१॥ ब्रह्मादिक विनती करी कहि दुख वसुधाको । रविकुल-कैरव-चंद भो आनंद-सुधाको ॥२॥ कौसिक गरव तुषार ज्यों कि तेज वियाको। प्रभु अनहित हित को दियो फल कोप कृपाको ॥३॥ हरयो पाप आप जाइकै संताप सिलाको । सोच-मगन काट्यो सही साहिर मिथिलाको ॥४॥ रोपरासि भृगुपति धनी अहमिति ममताको चितवत माजन करि लियो उपसम समताको ॥५॥ मुदित मानि आयमु चले पन मात-पिताको । घरम-पुरंधर धीरधुर गुन-सील-जिता को॥६॥ गुह गरीय गवग्याति हजेहि निउन मसा को। पायो पावन प्रेम ते सनमान ससाको ॥७॥ मदगति मारी गीधी सादर करता को।। सोच-मीच सुग्रीयके संकट-दरता को रामि रिमीपनको सक अम फाल-गहा तहि काल कहाँ आज पिराजत राज है दम जहाँको॥९॥ पानिम पामी अपनी यक्षिय न माको! मां पाग पाची तहाँ जो मुनि-मन पा पिनय-पत्रिका काम-भूरुह आको । गति न लहै राम-नामसो चिघि सो सिरजा को। सुमिरत कहत प्रचार के बल्लभ गिरिजाको ॥१॥ अनि अजामिल को कथा सानंद न मा को। नाम लेत कलिकालह हरिपुरहिं न गा को १ ॥१२॥ राम-नाम-महिमा करे साखी वेद पुरान है तुलसी-तन ताको ।।१३।। भावार्थ-श्रीरामजीने अपने भले स्वभायसे किसकाभला नहीं किया? ग-युगसे श्रीजानकीनाथजीका यह कार्य जगन्में प्रसिद्ध है ॥१॥ प्रहा दि देयतामाने पृथ्वीका दुःख सुनाकर (जय ) विनय की थी, (तय प्योका पार हरनेके लिये और राक्षमोंको मारनेके लिय) सूर्यवंशरूपी मुदिनीको प्रफुल्लित करनेवाले चन्द्ररूपएपं अमृत के समान मानन्ददेने दि धीरामचन्द्रजी प्रकट हुए ॥२॥ विश्वामित्र ताइफाका तेज देखकर लेकीनाई गल जाते थे। प्रभुने ताड़काकांमारकर, शत्रुको मित्रका-सा ल दिया पर्ष क्रोधरूपी परम कृपा की। माय यह है किदुए तारकाको दनि देकर उसपर कृपा की स्वयं जाकरशिला (पनीमहल्या) का परसाप दूर कर दिया, फिर, (धनुष-परके समय) शोक-सागरमेंस स्वर दुए मिथिलाके महाराज जनकको निकाल लिया, अर्थात् धनुष पोरकर उनकी प्रतिमा पूरी कर दी परशुराम फोघटेर पर्य मरंकार और ममत्यके धनी थे, उन्हें भी मापने देखते ही शान्ति भीर समताका पात्र बना लिया। भर्थात् यह कोपीसे शान्त भीर महकारीसे समनराजे गये ५॥ माता (कके.दी) और पिताकी पासा मानकर

मा
नाम-नामकी महिमा ऐसी है कि वह आकके पेड़को भी कल्पवृक्ष बना
सकती है। घेद और पुराण इस घातके साक्षी है (इसपर भी विषाम
बिनय पत्रिका
प्रसन्नचित्तसे पन चले गये । पंमा, धर्मधुरन्धर भार घारजबारी तर
सद्गुण भीर शीलको जीतनेयाला दूसरा कौन है ? कोई भी नहीं ।
नीच जातिका गरीय गुह निगद, जिमने ऐसा कौन जीव है जिस नई
पाया दो मर्यात् जो सय प्रकारके जीयाँका मक्षण कर धुका था,
मी पयित्र प्रेमके कारण श्रीरघुनायजीसे सम्रा जैसा आदर
किया non शयरी धीर गांघ (जटायु) को सत्कारके साय
देनेयाला कौन है ? और शोककी सीमा अर्थात् महान् दुमी मुग्रीवका
संकट दूर करनेवाला कौन है ? (श्रीरामजी हो है) ॥८॥ ऐसा कर
फालका ग्रासथा, जो (रावणसे निकाले हुए) विमीपणको अपनी शरमन
रखता ? जिस रावणके राज्यमें आज भी विमीपण राजा यना 2।
(यह सय रघुनाथजीकी ही कृपा है) ॥९॥ अयोध्याका रहनेवाला
मूर्ख धोयी, जिसमें वुद्धिका नाम भी नहीं था, यह पामर भी यहाँ पहुँच
गया, जहाँ पहुँचनेमें मुनियों का मन मी थक जाता है। (महामुनिगन
जिस परमधामके सम्बन्ध तत्त्यका विचारमी नहीं कर सकते, वहयोग
वहीं चला गया) ॥१०॥ ब्रह्माने ऐसा किसे रचा है, जो राम नाम लेका
मुक्तिका भागी न हो ? पार्वतीवल्लभ शिवजी (जिस) राम-नामका पर्व
सरण करते हैं और दूसरोंको उपदेश देकर उसका प्रचार करते हैं ॥१६॥
अजामिलकी कथा सुनकर कौन प्रसन्न नहीं हुआ ? और राम-नाम लेकर
इस कलिकालमें भी कौन भगवान् हरिके परम घाममें नहीं गया! ॥१२॥
न हो, तो) मुलसीकी ओर देखो।माव यह है कि मैं क्या था और मार
राम-नामके प्रभाषसे कैसा राम-भक्त हो गया हूँ ॥१३॥

२५३ . विनय पत्रिका -- [१५३] मेरे राबरियै गति है रघुपति बलि जाउँ । निलज नीच निरधन निरगुन कह, जग दूसरो न ठाकुर ठाउँ ॥ १॥ हैं घर पर बहु भरे सुसाहिब, सूझत सपनि आफ्नो दाउँ। वानर-चंधु विभीषन-हितु विनु, कोसलपाल कहूँ न समाउँ ॥२॥ प्रनतारति-भंजन जन-रंजन, सरनागत पवि-पंजर नाउँ । कीजै दास दासतुलसी अब, कपासिंधु पिनु मोल विकाउँ॥३॥ भावार्थ-हे रघुनाथजी ! आपपर यलिहारी जाता हैं। मुझे तो यस आपकी ही शरण है। क्योंकि इस निर्लज, नीच, कंगाल और गुणहीनके लिये संसारमें (आपको छोड़कर) न तो कोई मालिक है, और न कोई ठौर- ठिकानाही ॥१॥ सेतोघर-घर बहुतेरे अच्छे-अच्छे मालिक हैं, किन्तु उन सबको अपना ही स्वार्थ सूझता है । मैं तो यन्दर (सुग्रीय) के मित्र और विीपणके हितैपी कोशलेश श्रीरामचन्द्रजीको छोड़कर और कही भी शरण नहीं पा सकता, और किसी मालिकके यहाँ मेरा टिकाव नहीं हो सकता ॥२॥ आप आश्रितोंके दुःखोंका नाश करनेवाले और भक्तोंको सुख देनेवाले हैं। शरणागतोंके लिये तो आपका नाम ही वनके पिंजरके समान है। भाव यह कि आपका नाम लेते ही घे तो सुरक्षित हो जाने हैं। अतः हे रुपासागर! अय तुलसीदासको तो अपना दास पना ही लीजिये। मैं अब चिना ही मोलके (यापके हाथमें) विकना चाहता ॥३॥ -

पिनप-पत्रिका
है-
।
[१५४]
देव ! दसरो फोन दीनको दयालु ।
सीलनिधान मुजान-सिरोमनि, सरनागत-प्रिय प्रनव-पाठ ॥१॥
को समरथ सरपग्य सफल प्रमु, सिव-सनेह-मानस मराठ।
को साहिय किये मीत प्रीवियस सग निसिचर कपि मील माल ॥२॥
नाथ हाय माया-प्रपंच सब, जीव-दोप-गुन-करम-कालु ।
तुलसिदास मलो पोच राबरो, नेक निरखि कीजिये निहाल ॥३॥
भावार्थ--हे देय ! (आपके सिपा) दीनॉपर दया करनेवाला इस
कौन है? आप शीलके मण्डार, शानियों के शिरोमणि, शरणागतोंके प्यान
और माश्रितोंके रक्षक हैं ॥१॥ आपके समान समर्थ कौन है ? आर
जाननेवाले हैं, सारे चराचरके स्वामी है, और शिवजीके प्रेम
मानसरोघरमें (विहार करनेवाले) हंस है। (दूसरा) कौन ऐसा खान
है जिसने प्रेमके वश होकर पक्षी (जटायु), राक्षस (विमीपण ), यन्द
भील (निपाद) और मालुओंको अपना मित्र बनाया है ? ॥२॥ हे नाय
मायाका सारा प्रपञ्च एवं जीयोंके दोष, गुण, कर्म और काल सयभार
हो हाथ हैं । यह तुलसीदास, भला हो या युरा, आपका ही है । तनिक
इसकी ओर कृपादृष्टि कर इसे निहाल कर दीजिये ॥३॥
राग सारंग
[१५५]
विस्वास एक राम-नामको।
मानव नहिं परतीति अनत ऐसोइ सुभाव मन चामको ॥१॥

विनय-पत्रिका यो न छठी छ मत रिगु जजुर अथर्वन सामको । उप सुनि सहमत पचि मर कर तन छाम को ? ॥२॥ कलिकाल कठिन आधीन सुसाधित दामको। राग जोग जप तप, भय लोभ मोह कोह कामको ॥३॥ सब लायक भव गायक रघुनायक गुन-ग्रामको । (म-कामतरु-तर डर कौन घोर धन घामको ।। ४॥ नै को जैहै जमपुर को सुरपुर पर-धामको । बहुत भलो लागत जग जीवन रामगुलामको ॥ ५॥ यार्थ-मुझे तो एक राम-नामका ही विश्वास है। मेरे कुटिल छ ऐसा ही खभाय है, कि घद और कहीं विश्वास ही रता ॥१॥ छः (न्याय, पैशेषिक, सांख्य, योग, मीमांसा, । शास्त्रोका तथा साक्, यजु, अथर्पण और साम येदोका तो मेरी छटोमें ही नहीं पड़ा (भाग्यमें ही नहीं लिखा है, और मत, तीर्थ, तप मादिका तो नाम सुनकर मन डर रहा (इनसाधना)पच-पचरमरे या शरीरकोक्षीण करे। २n र (यज्ञादि) कलियुगमें कठिन है, और उनका होना मी धनके है। (भव रहे) ज्ञान, वैराग्य, योग, जप और करनमें काम कोध, कर "पन, सार) विनय पत्रिका का क्या डर माय यह है कि ये मशान यश होकर दिया फंस सकते । इससे पाप-ताप उनसे सदा दर रहते हैं 5 कौन सा है, कि कौन नरक जायगा, कौन म्यर्ग जायगा और कौन परम जायगा ? तुलसीदासको तो इस संसारमे रामजीका गुलाम होकर 'यहुत अच्छा लगता ॥५॥ [१५६] कलि नाम कामठरु रामको । दलनिहार दारिद दुकाल दुख, दोप घोर घन घामको नाम लेत दाहिनो होत मन, पाम विघावा बामको । कहत मुनीस महेस महातम, उलटे उलटे सूधे नामको । मलो लोक-परलोक तासु जाके पल ललित-ललामको । तुलसी जग जानियत नामते सोच न कूच मुकामको ३ भावार्थ-कलियुगमें श्रीराम-नाम ही कल्पवृक्ष है। क्योंकि, । दारिदय, दुर्भिक्ष, दुःख, दोष और घनघटा (अज्ञान ) तथा कड़ी (विषय-विलास) का नाश करनेवाला है। रामनाम लेते ही प्रति विधाताका प्रतिकूल मन भी अनुकूल हो जाता है। मुनीश्वर घाल्मीति उलटे अर्थात् 'मरा मरा' नामकी महिमा गायी है और शिवजीने सी राम-नामका माहात्म्य यताया है । तात्पर्य यह है, कि उलटानामजप जपते वाल्मीकि ध्याधासे ग्रह्मर्षि हो गये और शिवजी सीघानाम अपने हलाहल विषका पान कर गये तथा स्वयं भगवत्स्वरूप माने गये। जिसे इस परम सुन्दर राम-नामका यल है, उसके लोक और परलो'

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पतितपाव
विनय-पत्रिका
सहल है (क्योंकि ये संयकको भूलचुकी भोर देसते ही नहीं,
अपने भक्तोंके घट-घट में, चारों युगोंमें धारों पदर, जागते रहते
(हृदयमें येटकर सदा रमयाली करते हैं।) अपराध ५.
सेयकपर शोध नहीं करते । परन्तु जब अपने सेवककी गुगावटी मु
हैं, तय उसपर रोझ जाते हैं nen जिन्दं भजनेस, तिर्यक् योनिके (फ
पक्षी)पयं तामसी शरीरवाले (रासस)मी तीनों लोकोंके तिटकवन
देतुलसी ऐसे (मुखद सुशील,मुन्दर भक्तवत्सला चतुर,'
प्रभुको जो नहीं भजते उनपर विधाता प्रतिकूल ही है |
राग नट
[१५८]
कैसे दे नाथहि खोरि।
काम-लोलुप भ्रमत मन हरि भगति परिहरि तोरि ॥१॥
बहुत प्रीति पुजाइवे पर, पूजिवे पर थोरि ।
देत सिख सिखयो न मानत, मूढ़ता असि मोरि ॥२॥
किये सहित सनेह जे अघ हृदय राखे चोरि ।
मंग-बस किये सुम सुनाये सकल लोक निहोरि ॥३॥
करौं जो कछु घरौं सचि-पचि सुकृत-सिला बटोरि ।
पैठि उर परपस दयानिधि दंम लेत अंजोरि ॥४॥
लोभ मनहिं नचाव कपि ज्यों, गरे आसा-डोरि ।
बात कहीं बनाइ बुध ज्यों, पर विराग निचोरि ॥५॥
एतेहुँ पर तुम्हरो कहावत, लाज अँचई घोरि ।
निलजवा पर रीझि रघुपर, देहु तुलसिहिं छोरि ॥६॥

बिनय-पत्रिका भावार्थ-स्वामीको कैसे दोष दूं?हे हरे मेरा मन तुम्हारीभक्तिको डकर कामनाओंमें फंसा हुआ इधर-उधर भटका करता है ॥१॥ ने पुजानेमें तो मेरा यहा प्रेम है, सदा यहीचाहता हूँ, कि लोग मुझे नी-भक्त मानकर पूजा करें, किन्तु तुम्हें पूजनमें मेरी बहुत ही कम ति है। दूसरोंको तो खूब सीख दिया करता है, पर स्वयं किसीकी क्षा नहीं मानता। मेरी ऐसी मूर्खता है ॥२॥ जिन-जिन पापोंको मैंने अनुरागसे किया था, उन्हें तो हृदयमें छिपाकर रखता हूँ। पर भी किसी अच्छे संगके प्रभावसे (विना ही प्रेम) मुझसे जो कोई अच्छे म बन गये हैं, उन्हें दुनियाको निहोरा कर-कर मुनाता फिरता हूँ। ग्य यह, कि मुझे कोई पापी न समझकर यहा धर्मात्मा समझे ॥३॥ भी जो कुछ सत्कर्म यन जाता है उसे खेतमें पड़े हुए अन्नके दानोंको रद्द यटोर पटोरकर रख लेता हूँ, किन्तु हे दयानिधान ! दम्भ परदस्ती हृदयमें घुसकर उसे याहर निकाल फेंकता है । भाव यह -, कि दम्म पढ़कर थोड़े बहुत सुकृतको भी नष्ट कर देता है ॥४॥ सके सिवा लोम मेरे मनको आशारूपी रस्सीसे इस तरह नचा रहा - जैसे धाजीगर पन्दरके गलेमें डोरी घाँधकर उसे मनमाना नचाता है रतनेपर भी मैं दम्मसे) एक बड़े पण्डितकी नाई परम घेराग्यके रिपको याने यना-पनाकर सुनाता फिरता हूँ ॥५॥ इतना (दम्भी) मोनेपर भी मैं तुम्हारा (दास) कहाता है। लाजको तो मानों में घोलकर की पो गया है। हे रघुनाथजी ! तुम उदार हो, इस निर्लजतापर ही नीमकर नुलसीका पन्धन काट दो। (मुझेभव पन्धनसे मुक्त कर दो) ॥६॥ !

बिनय-पत्रिका [ १५२] है प्रभु ! मेरोई सब दोसु। सीलसिंधु कृपालु नाथ अनाथ आरत-पास ॥१॥ चेप वचन विराग मन अप अवगुननिको कोसु । राम प्रीति-प्रतीति पोली, कपट-करतर ठोस १२॥ राग-रंग कुसंग ही सों, साधु-संगति रोसु । चहत केहरि-जसहिं - सेइ सुगाल ज्यों खरंगोतु ॥३१ संभु-सिखवन रसन हूँ नित राम-नामहि घोसु । दंभहू कलि नाम कुमन सोच-सागर-सोमु १४॥ मोद-मंगल-मूल अति अनुकूल निज निरजोस् । रामनाम प्रभाव अनि तुलसिहुँ परम परितोसु ॥५॥ भावार्थ-हे प्रमो ! सय मेरा ही दोष है । आप तो शासके कृपालु, मनायॉक नाथ और दीन-दुखियोंके पालन-पोसनेयाले । मेष और पचन में तो पैराग्य दीखता है, किन्तु मेरा मन पायो अपगुणोंका माना है। रामजी! आपके प्रेम और विश्वास मेरा मन पोला है अर्थात् उममें तनिक भी प्रेम भार विधारना दौ, कपटको करनीक लिये तोय टोम है. काट-ही-काट मत अमे खरगोश सियारको संया करके सिंदकी कीर्ति चाहता है. * * पुमंगनिस तो प्रेम करना और साधुमाक संग माया (जैसे मरगोश गोदार पटपर मिहकी-सी वीति याला सिपार तो सा हो सका। कीतिक पाले प्राणी विनय-पत्रिका ने हैं। इसी प्रकार जो कुसंगम पड़कर कीर्ति चाहता है, उसे कोर्तिका लिना तो दूर रहा, उसके मद्गुणों का भी नाश हो जायगा, जिससे रिम्बार मृत्युके चक्रमें जाना पड़ेगा।) ३॥ शिवजीका उपदेश यही , कि 'नित्य जीभसे राम-नामका कीर्तन करो। फलियुगमें दम्भसे भी दया हुआ राम-नाम अगस्त्यको तरह दुःख-सागरको सोख लेता है दम्भसे लिया हुआ नाम भी लोक-परलोक दोनोंकी चिन्ताओंको दुर कर इता है) ॥४॥ यह राम-नाम आनन्द और फल्याणकी जड़ है। श्रीराम- म अपने लिये ऐसा अत्यन्त अनुकूल है कि जिसकी किसी अनुकूलतासे तुलना नहीं हो सकती। राम-नामका ऐसा प्रभाव सुनकर तुलसीको नो परम सन्तोष है (क्योंकि यही उसका अवलम्बन है) ॥५॥ [१६० मैं हरि पतित-पावन सुने। मैं पतित तुम पतित-पावन दोउ मानक बने ॥१॥ व्याध गनिका गज अजामिल साखि निगमनि भने । और अघम अनेक तारे जात कापै गने ॥२॥ जानि नाम अजानि लीन्हें नरक सुरपुर* मने । दासतुलसी सरन आयो, राखिये आपने ॥३॥ . आजकलकी प्रचलित प्रतियोमें प्रायः 'नरक जमपुर मने पाठ । परन्तु मैंने एक प्राचीन प्रतिमें 'नरक सुरपुर मने' पाठ देखा था और यही टीक माम होता है, क्योंकि नरक और यमपुर एकार्थवाचक होनेसे पुनरुक्ति दोष आता है। इसके सिवा बिना जाने भी अन्तकालमें भगवान्- नाम लेनेवालेकी मुक्ति बतायी गयी है, न कि स्वर्गगमन; इसलिये है यही पार टीक है।

11 da पिनय-पत्रिका भावार्थ-हे हरे ! मैंने तुम्हें पतितोंको पवित्र सो मैं तो पतित है और तुम पतितपायन हो; यस दोनों गये, दोनोंका मेल मिल गया। (थप मेरे पाचन होनेने है ?) ॥१॥ वेद साक्षी दे रदे हैं, कि तुमने व्याव (वामीति (पिंगला येश्या), गजेन्द्र और अजामिलको तया और मो. को संसार-सागरसे पार कर दिया है, जिनकी गिनती ही सकती है? || जिन्होंने जानकर या यिना जाने तुम्हा लिया, उन्हें नरक और स्वर्गमें जानकी मनाई कर दी अर्थात् वे भवसागरसे पार होकर मुक्त हो जाते हैं (यह बूझकर ही अप) तुलसी मी तुम्हारी शरणम माया अपना लो॥३॥ राग मटार [११] तो सौ प्रभु जो पै कहूँ कोड होतो। वौ सहि निपट निरादर निसिदिन, रटि लटि ऐसो घटि को कपा-सुधा-जलदान माँगियो कहीं सो साँच निस खाति-सनेह-सलिल-सुख चाहत चित-चावक सोपो काल-करम-बस मन कुमनोरय कबहुँ कबहुँ कुछ मो ज्यों मुदमय पसि मीन वारि तजि उछरि भमरि लेत गो दुराव दासतुलसी उर क्यों कहि आवत ओ २ राज राय दसरथ के, लयो यो दिनु जोर

बिनय-पत्रिका
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भावार्थ-यदि तुमसरीखा कहाँ कोई दूसरा (समर्थ स्वामी) होता,
मला ऐसा कौन क्षुद्र था, जो निपट ही निरादर सहकर एवं दिन-
आत तेरा नाम रट-रटकर दुयला होता ? ११॥ मैं जो तुझसे कृपारूपी
पभूतजल माँग रहा है, यह सचमुच ही निराला है। मेरा चित्तरूपी
पातकका यथा प्रेमरूपी स्वातिनक्षत्रका आनन्दरूपी जल चाहता ॥२॥
काल तथा कर्मके प्रभावसे यदि कभी-कमी मनमें कोई युरी कामना आ
जाती है, (जिससे तेरी ओरसे वित्त हटने लगता है) तो यह पेमा ही
है, जैसे मानन्दसे जलमें रहनी हुई मछली कमी-कमी उछलकर फिर
घबराकर उसी में गोता लगा जाती है (जैसे मछलीको क्षणभरका भी
मलका वियोग सहन नहीं होता, वैसे ही मेरा वित्त-चानक तेरे प्रेम-
जलसे अलग होनपर धयरा जाता है, और फिर तेरे ही लिये चेष्टा
करता है) ॥३॥ (परन्तु ऐसा कहना भी नहीं यनता क्योंकि) तुलसी-
शासके हृदय में जितना कपट है, उतना किस प्रकार कहा जा सकता है।
पर हे दशरथ दुलारे! तेरे राज्यमें लोगोंने बिना ही जोते-याय पाया
। अर्थात् यिना ही सत्कर्म किये केपल तेरे नामसे ही अनेक पापी तर
गये है. पैसे को भी तर जाऊँगा, यही विश्वास है nun
राग सोरठ
[१२]
ऐमो को उदार जग माहीं।
रिनु सेवा जो वै दीनपर राम सरिम कोउ नाहीं ॥१॥

पिनय-पत्रिका
जो गति जोग निराग जवन करि नहिं पावत मुनि ग्यानी
सो गति देत गीध सबरी कई प्रम न बहुत जिय जानी
जो संपति दस सीस अरप करि रायन .सिव पहँ लीन्हीं
सो संपदा निमीपन कहं अति सकुच-सहित हरि दीन्हीं
तुलसिदास सब मांति सकल मुख जो चाहसि मन मेरो
ती भजु राम, काम सम पूरन करें कृपानिधि तेरो
भावार्थ-संसारमें ऐसा और कौन उदार है, जो विना
किये दीन-दुखियोंपर (उन्हें देखते ही) द्रवित हो जाता हो?
श्रीरामचन्द्र ही हैं, उनके समान दूसरा कोई नहीं ॥१॥ धड़े-
मुनि योग, वैराग्य आदि भनेक साधन करके भी जिस परम
नहीं पाते, वह गति प्रभु रघुनाथजीने गीध और शबरीतकको दे
उसको उन्होंने अपने मन में कुछ बहुत नहीं समझा ॥२॥ जिस सा
रायणने शिवजीको अपने दसोंसिर चढ़ाकर प्राप्त किया था, यही
श्रीरामजीने बड़े ही संकोचके साथ विभीपणको दे डाली ॥३॥ तुरु
कहते हैं, कि अरे मेरे मन, जोत्सब तरहसे सब सुखचाहता है, तो
जीका भजन कर।कृपा-निधान प्रमु तेरी सारी कामनाएँ पूरी कर
[१६३]
एकै दानि-सिरोमनि साँचो।
जोइ जाच्यो सोइ जाचकताबस, फिरि बहु नाच न नाचो
सय खारथी असुर सुर नर मुनि कोउ न देत विनु पाये
कोसलपाल कृपाल कलपतरु, द्रवत सकत सिर नाय
।

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६ दशरथने प्रेमके निभानेमें शरीर छोड़कर, अपनी अचल कीर्ति स्थापित अपनी प्राणाधिका प्यारी सीताजीकोभीभुला दिया (जानकीजीका पता । उनका दुःख भूलकर) आप हदयमें विभीषणहीकी चिन्ता करने में विनय-पत्रिका विय-विरही मुग्रीव सखा लखि प्रानप्रिया बिसराई। रन परयो बंधु मिमीपन ही को, सोच हृदय अधिकाई ॥३॥ घर गुरुगृह प्रिय सदन सासुरे, मह जब जहं पहुनाई । तब तहँ कहि सपरीके फलनिकी रुचि माधुरी न पाई 1121 सहज सरूप कथा मुनि यरनत रहत सकुधि सिर नाई। केवट मीत कह सुख मानत पानर बंधु बढ़ाई ॥५॥ प्रेम-कनौडो रामसो प्रभु त्रिभुवन तिहुँकाल न माई। तेरो रिनी हौं करो कपि सों ऐसी मानिहि को सेवकाई ॥६॥ तुलसी राम-सनंह-सील लखि, जो न मगति उर आई। तौ तोहिं जननि जाय जननी जड़ तनु-तरुनवा गाई ॥ भावार्थ-प्रीतिकी रीति एक श्रीरघुनाथजी ही जानते हैं। श्रीराम सय नातोंको छोड़कर केवल प्रेमका ही नातारखते हैं ॥२॥ जिन मंहार कर दी, उन प्रेमी पितास भी आपने जटायु गीधपर अधिक ममता और गुणगौरयता दिखायी, (दशरथका मरण रामके सामने नहीं हुआ. परन्तु प्यारे गीधके प्राण तो रामकी गोद में निकले और हार्यो पिण्डदान देश उसका उद्धार किया) ॥२मित्र सुग्रीयको स्त्री के विरहमें देखकर आपने लगानेकी यातमुला पहले पालिको मारकर सुग्रीवका दुःस दूर रणभूमिमें शक्तिके लगनेसे प्यारे माई लक्ष्मण मूच्छित होकर पड़े हैं, पर किया)

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. यिनय-पत्रिका मिलि मुनिश्रृंद फिरत दंदक यन, सो परचा न चलाई। चारहि पार गीध सपरीकी परनत प्रीति सुहाई स्वान कहे ते कियो पुर बाहिर, जती · गयंद चदाई। तिय-निंदक मतिमंद प्रजा रज निज नय नगर चमाई । यहि दरवार दीनको आदर, रीति सदा चलि आई। दीनदयालु दीन तुलसीकी काहु न सुरति कराई। मायार्थ-हे र भेष्ट ! आपकी यही यड़ा है, कि आप घनि धनान्धीका, गण्यमान्योका (धन या विद्या या पदके अभिमानिय अनादर कर गरीयोंका आदर करते हैं, उनपर वही कृपा करते हैं ॥१॥ अनेक साधन करके थक गये, पर उन्हें बापने स्वप्नमें भी दर्शन न किन्तु निषाद एवं कपटी रीछ, यन्दर और राक्षस (विभीषण) के भाई-चाराकर लिया,(इसीलिये कि ये सब दीन-निरभिमानी थे)॥२॥ कारण्यमें घूमते तो फिरे मुनियों के साथ हिलमिलकर, परन्तु उना बर्षातक नहीं चलायी, लेकिन गीध (जटायु) और शबरीके बारम्बार सुन्दर बखान करना आपको सदा अच्छा लगा। (यह घही दीनता और निरभिमानकी बात है) ॥३॥ कुत्ते के कहनेपर संन्यार तो हाथीपर बढ़ाकर नगरके थाहर निकाल दिया और श्रीप्तीना भूठी निन्दा करनेवाले मूर्ख धोबीको अपनी प्रजा समझकर अपने नगर अयोध्या यसा लिया(क्योंकि यह दोन-गरीपंथा) nette सिद्ध है कि इस दरवारमें, रामराज्यमें, दीनोंके भादर करनेकी चली आ रही है। किन्तु हे दीनदयालु (क्या) इस । ध्यान मापको (मालतक)किसीने नहीं दिलाया ॥५R

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मावार्थ-हे रघुश्रेष्ट ! आपकी यही बड़ाई है ... भापको(भामतक)किसान नहीं दिलाया: मिलि मुनिश्रृंद फिरत दंरक बन, सासरचान विय-निंदक मतिमंद प्रजा रज निज नय नगर यहि दरबार दीनको आदर, सात सदा पनि दीनदयाल दीन तुलसीकी काहुन सुरवि अनादर कर गरीयोंका आदर करते हैं, उनपर पट्टी रुपाकर- अनेक साधन करके थक गये, पर उन्हें आपने स्वप्नमें भी किन्तु निषाद पचं कपटी रोछ, यन्दर और राक्षस (विमी भाई-चाराकर लिया,(इसीलिये कियेसवदीन-निरभिमान कारण्यमें घूमते तो फिरे मुनियों के साथ हिलमिलकर पर चर्चातक नहीं चलायी, लेकिन गीध (जटायु) और श यारम्बार सुन्दर यखान करना यापकी सदा अच्छा लग यहीदीनताऔर निरभिमानकी बात है)॥३॥ कुत्ते के कहनपर तो हाथीपर चढ़ाकर नगरके थाहर निकाल दिया और गुटी निन्दा करनेवाले मुर्ख घाबीको अपनी प्रजा समझ सदरपारमें, रामराज्यमें दीनोंके भादरक- आ रही है। किन्तु दीनदयालु (क्या) विनय-पत्रिका पारहि पार गीध समरीकी परनत प्रीति खान कहे तें कियो पुर बाहिर, जठी गयंद धनान्धोंका, गण्यमान्यांका (धन

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यिनय-पत्रिका भावार्थ-दीनोंका ऐमा हिन करनेशले श्रीरामचन्द्रजी ही है। भति फोमल, करुणा भण्डार और पिनाही कारण दुसराका सा करनेवाले हैं साधनोंस रहित, दीन, गौतम ऋषिकी ती मान्य अपने पापोंके कारण, शिला हो गयी थी। उसे मापने घरसे बड़ा अपने पवित्र चरण कर, घोर शापसे छुड़ा दिया ॥२॥ हिंसामे रख गु= निपाद जिसका तामसी शरीर था, और जो पयुकी तरह वन किंग रहताथा, उसे आपने, पंश और जातिका विचार किया विनाही, प्रमय होकर हृदयसे लगा लिया ॥३॥ यद्यपि इन्द्र के पुत्र जयन्तन (काका श्रीसीताजीके चरणमें चाँच मारकर) इतना भारी अपराध किया 4 कि कुछ कहा नहीं जा सकतातथापिजयपद(याणके मारे घराकररमा लिय) सब लोकोंको देख फिरा और फिर शोकसे व्याकुल होकर शरण आया, तब उसको साराभय दूर कर दिया NR जटायु गीध पौर- योनिका था, सदा मांस खाया करता था। उसने ऐसा कौन-सा = धारण कियाथा, किजिसकी मापनअपने हायसे, पिताके समान अन्त्यों क्रिया कर सर याते सुधार दी, अर्थात् मुक्ति प्रदान कर दी ॥५॥ शव नीच जातिकी मूर्खास्त्री थी।जो लोक और वेद दोनोंसेहीयाहर थी।परण उसका सथा मेम समझकर कृपालु रघुनायजीने उसे भी कृपापूर्वक दर्शन देकर उद्धार कर दिया ॥६॥ सुग्रीव यन्दर अपने माई (पालि) के भयसे व्याकुल होकर जयपुकारता हुआ आपको शरणमे आया, तभार अपने उस दासका दारुण दुःख नहीं सह सके और गालियों सहकर भी यालिका वध कर डाला ॥७॥ विभीषण, शत्रु (रायण) का भाई था और जातिका राक्षस था! यह किस भजनका अधिकारी था

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मौर सदा सुप देनग्राली है। जैस (छोटी-सी) के सामने चली जाती है, पर यहामारी हायी यह जाता है (क्याने मछलीकी तरह उसमें तैरना नहीं जानता) जैसे यदि धूलने मिल जाय तोउसे को मीज़ार लगाकर अलग नहीं कर सकतान्ति रमको जाननेवाली एक छोटी-मीनाटी उसे अनायास ही (अलग पा जाती है ॥३॥जो योगी दृश्यमानको अपने पेट में रख (हमें मा समटकर, परमेश्वररूप कारण कार्यम्प जगत्का लय करके) (अर निद्राको त्यागकर सोता है, यही द्वैतम आत्यन्तिक रूपसे मुक्त पुरुप भगवान के परम पदक परमानन्दकी प्रत्यक्ष अनुभूति कर सकता इस अवस्थामें शोक,मोहमय,हर्ष,दिन-गत और देश-काल नही रह (एक सच्चिदानन्दधन प्रभु ही रह जाता है) हे तुलसीदास ! अबतक दशाकी प्राप्ति नहीं होती, तयतकसंशयकासमूल नाश नहीं होता [१६८ ] जोप राम-चरन-रति होती। तो कत त्रिविध मूल निसिवासर सहते विपति निसोती ॥१॥ जो संतोष सुधा निसियासर संपनेहुँ कबहुँक पावै । तौ कत मिपय बिलोकि झूठ जल मन कुरंगज्यों धावै ।।२।। जो श्रीपति-महिमा बिचारि उर मजते भावं यदाए । तौ कत द्वार-द्वार कूकर ज्यों फिरते पेट खलाए ॥३॥ जे लोलुप भये दास आसके ते सवहीके घेरे । प्रमु-विखाम आस जीती जिन्ह, ते सेवक हरि केरे ॥४॥ ...... m

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नहिं एको आचरन भजनको, विनय करत ही ताते ।
कीजै कृपा दामतुलसी पर, नाथ नामक नाते ।।५।।
मानार्थ-यदि श्रीरामचन्द्रजीके चरणों में प्रेम होता, तो रात-दिन
नों प्रकार के फट और निमालिस विपत्ति ही क्यों सहनी पड़ती ॥१॥
दि यह मन दिन-रातमें कमी म्यानमें भी सन्तोषरूपी अमृत पाजाय, तो
संख्यरूपी झूठे मृग-जलको देखकर उसके पीछे यह मृग धनकर क्यों
हे ॥२॥ यदि हम भगवान् लक्ष्मीकान्तकी महिमाका हृदयमें विचार-
र प्रेम बहाकर उनका भजन करते, तो माज फुत्ते की तरह द्वार द्वार
र दिखाते हुए क्यों मारे-मारे फिरते ? ॥३॥ जो लोभी आशाके दास
न गये हैं, ये तो समीके गुलाम है (विषयोंकी आशा रग्वनेवालेको हो
यिकी गुलामी करनी पडती है) और जिन्होंने भगवान्में विश्वास फरफे
शाको जीत लिया है, वे ही भगवान के सच्चे सेवक हैं ॥४॥ मैं आपसे
सलिये पिनय कर रहा है, कि मुझमें भजनका तो एक भी आचरण
हो है । (केवल आपका नाम जपता है)। हे नाथ! तुलसीदासपर
सनामके नातसे ही कृपा कीजिये ॥५॥
[१६९]
जो मौहि राम लागते मीठे।
नवरस पटरस-रस अनरस ह जाते सब सीठे ॥१॥
पंचक विषय विविध तनु धरि अनुभव सुने अरु डीटे ।
यह जानत हौं हृदय आपने सपने न अघाइ उनीठे ॥२॥

- भावार्थ-यदि मुझे धीरामचन्द्रजी ही मीठे लगे होते, तो संमा किसको दया करके (भवयन्धनसे छूटनेके लिये) परवाने नहीं लिया तीरा, मीठा, कमेला, सहा और नमकीन-ये छ: मोबनला तुलसिदास प्रमुसों एकहि बल पचन कहत अति ढीठ । नामकी लाज राम करुनाकर केहि न दिये कर चीठ ॥२॥ नयरस एवं (मोजनके) छः रसा नीरस और फीके पड़ जाता रामजी मीठे नहीं लगत, इसीलिये विषय भोग मीठे मालूम होते हैं)। में भाँति-भांतिक शरीर धारणकर यह अनुमय कर चुका हूँ तयामैने और देखा भी है कि (संसारके) विषय टग हैं। (मायामें मुङः परमार्थरूपी धन हर लेते हैं) यद्यपि यह मैं अपने जीमें अच्छी र जानता हूँ, तथापि कमी, स्वप्नमें भी, इनसे तृप्त होकर मेरा मन उकताया (फैसी नीचता है ?) ॥२॥ पर तुलसीदास अपने र श्रीरघुनाथजीसे एक ही वलपर ये दिठाई-भरे वचन कह रहा है। वह यल यह है, कि) हे नाथ ! आपने अपने नामकी लाजसेवि हैं ? (जिसने आपका नाम लिया, उसीको मुक्तिका परयाना मिल इसीलिये मैं भी यों कह रहा हूँ) ॥३॥ [१७०] यो मन कबहूँ तुमहिं न लाग्यो । ज्यों छल छाँहि सुभाव निरंतर रहत विषय अनुराग्यो ॥१॥ मार, हास्य, करुणा, यीर, रुद, भयानक, वीमास, अद्भुत 'ये नौ रस हैं। और an ७५ विनय-पत्रिका ज्यों चितई परनारि, सुने पातक-प्रपंच घर-घरके । त्यों न साधु, सुरसरि-तरंग-निरमल गुनगन रघुपरके ॥२॥ ज्यों नासा सुगंधरस-बस, रसना पटरस-रति मानी। राम प्रसाद-माल जूठन लगि त्यों न ललकि ललचानी ॥३॥ चंदन-चंदयदनि भूपन-पट ज्यों चह पाँवर परस्यो । त्यो रघुपति-पद-पदुम-परस को तनु पातकी न तरस्यो ।। ४ ॥ ज्यों सब माँति कुदैव कुठाकुर सेये यपु बचन हिये हूँ । स्यों न राम सुकृतग्य जे सकुचत सकृत प्रनाम किये हूँ ॥५॥ चंचल चरन लोम लगि लोलुप द्वार-द्वार जग पागे । राम-सीय-आश्रमनि चलत त्यों भये न अमित अमागे ॥ ६॥ मकल अंग पद-विमुख नाथ मुख नामकी ओट लई है । है तुलसिहिं परतीति एक प्रभु-मूरति कृपामई है ।।७।। मावार्थ-मेरामन आपसे ऐसा कभी नहीं लगा, जैसा कि यह कपट डोरकर, स्वमायसे ही निरन्तर विषयों में लगा रहता है ॥१॥ जैसे पराई रग्रीको ताकता फिरता ई, घर-घरके पाप-भरे प्रपञ्च सुनता है, धमे न तो कभी साधुओंके दर्शन करता है, और न गाजीको निर्मल गरों के समान धीरघुनाथजीशी गुणायली ही सुनता हूँ ॥२॥ जैसे नाक भयो भी मुगन्धके रसके अधीन रहती है, और जीम छः रसॉसे मेम करती है, पैसे यह नाक भगवान्पर घदी हुई मालाके लिये भार जीर मगयत्-प्रसादके लिय की ललक ललक कर नहीं ललवानी ॥३॥ असे पर मधम शरीर पन्दन, चन्द्रवदनी युवती, मुन्दर गहने मौर

कष्ट नहीं उठाया) ॥६॥ हे प्रमो!(इस प्रकार) मेरे सी मंगो
(मुलायम) कपडॉको स्पर्श करना चाहता है, वैसे श्रीरघुनामा
चरण-कमलॉका स्पर्श करने के लिये यह कभी नहीं तरसना
मैंने शरीर, वचन और हृदयसे, पुरे-युरे देवों और दुष्ट स्वामियों
प्रकारसे सेवा की, वैसे उन रघुनाथजीको सेवाकभी नहीं की जान
सेवासे) अपनेको खूब ही कृतम मानने लगते हैं और एक यार
करते ही (अपार करुणाके कारण) सकुचा जाते हैं।
चञ्चल चरणाने लोभयश, लालचीवनकर, द्वार द्वार ठोकर मारी है।
ये अमागे श्रीसीतारामजीके (पुण्य ) आश्रमॉमें जाकर की
भी नहीं थके। (स्वममें मी कर्मा भगवान्क पुण्य माधमाने जाने
घरणोंसे विमुख हैं। केवल इस मुमसे आपके नामी भोट ले र
(और यह इसलिये कि) तुलसीको एक यही निधय है कि मामी
रुपामयी है (आप कृपासागर होने के कारण, नामक प्रमायसे)
अवश्य अपनालेंगे)
[१७१]
कीजे मोको जमजातनामई ।
राम! तुमसे मुचि मुहद साहिहि, में सठ पीठि दई ॥१॥
गरमगाम दम माम पालि पितु मातु-रूप दित कीन्हों।
जहि पियक, ममील सलहि, अपराधिहि आदर दीन्हों।।२।।
कपट कसें अंतरजामि सों, अप म्यापकहिं दुगरी।
ऐसे समनि इमेरक पर रघुपति न झियो मन पारी ॥३॥

विनय-पत्रिका , है . उदर मरौं किंकर कहाइ बेच्यो विषयनि हाथ हियों है । - मोसे पंचक को कृपालु छल छाँड़ि के छोह किया है ॥४॥ पल-पलके उपकार रावरे जानि बूझि सुनि नीके। भिद्यो न कुलिसहुँ वे कठोर चित कबहुँ प्रेम सिय-पीके ॥५॥ खामीकी सेवक-हितता सप, कछु निज साइ-द्रोहाई । में मति-तुला तौलि देखी भइ मेरेहि दिसि गरुआई ॥६॥ एतेहु पर हित करत नाथ मेरो, करि आये, अरु करिहै । तुलसी अपनी ओर जानियत प्रभुहि कनौड़ो भरिहैं ॥७॥ भावार्थ-हे नाथ ! मुझे तो आप यमकी यातनामें ही डाल दीजिये, (नरकोंमें ही मेजिये) क्योंकि, हे श्रीरामजी ! मैं ऐसा दुष्ट है कि मैंने आप-सर्राग्ने पवित्र और मुहृद् (चिना ही कारण हित करनेवाले) स्वामीको पीठ दे रक्खी है ॥१॥ गर्भ में आपने माता-पिताके समान दस ' मीनेनक मेरापालन-पोषण कर (कितना) हित किया।मुझमूर्खको आपने 'शुद्ध भान, मुझ दुष्टको सुन्दर शील और मुझ अपराधीको आदर दिया। (इतनेपर भी में आपका भजन न करके आपसे उलटा ही चलता हूँ) ॥२॥ मैं अन्तर्यामी प्रभुके साथ भी कपट करता हूँ, घट-घट में रमनेवाले मर्यव्यापीसे अपने पाप छिपाता है। (परन्तु धन्य है आपको कि) ऐसे दुर्बुद्धि और नीचनौकरपरभौहेरामजी! आपने अपना मन प्रतिकूल नहीं किया ॥३॥ पेट तोमरता हूँ, आपकादासकहाकर, किन्तु हृदयको विषयों- के हाथ येच रक्या है तो भी मुझ-सरीखे ठगपर भी है कृपालु! यापने निष्कपट-भावसे कृपा ही की है ॥en आपके पल-पलके उपकारोंको n .

-- कछ मिल जायगा उसीमें सन्तुष्ट रहँगा, किसीसे (मनुष्य या देयतास) यिनय-पत्रिका मलीमौति जानकर, समझकर और सुनकर मी मेरा बस मी में कटार वित्त कमी श्रीजानकीनाथजीके प्रेममें नहीं मिदा ॥ मैंने अपनी युखिरूपी तराजूपर एक और स्वामीकी सारी सेवक चन्म और दूसरी ओर अपना जरा-सा स्वामीद्रोह रसार तौला, तब देखने मेरी ही ओरका पलड़ा भारी निकला ॥६इतनेपर मी हे नाथ! कृपाकर मेरा हित ही करते चले भा रहे हैं, करते हैं और वर्ग तुलसी अपनी ओरसे जानता है, कि इस कनौडेका, (पहमानसे हुपका) प्रभु ही पालन करेंगे ॥७॥ [१७२] कपहुँक हौं यहि रहनि रहौंगो। श्रीरघुनाथ कपाल-कृपा ते संत सुमाव गहाँगो॥१॥ जथालाम संतोष सदा, काहू सों कछु न चहौंगो । पर-हित-निरत निरंतर, मन क्रम बचन नेम निवहाँगो॥२॥ परुष वचन अति दुसह श्रवन सुनि तेहि पावक न दहीगो । विगत मान, सम सीतल मन, परशुन नहिं दोप कहाँगो ॥३॥ परिहरि देह-जनित चिंता, दुख-सुस समबुद्धि सहौंगो । तुलसिदास प्रभु यहि पथ रहि, अविचल हरि-भगति लहाँगो॥४॥ भावार्थ-क्या मैं कभी इस रहनीसे रहूँगा?फ्याकृगलु श्रीरघुनाथ जीकी कृपासे कभी मैं सत्तोंका-सा मा प्रहण करूँगा ! ११ 4 ...

यिनय-पत्रिका . . भी नहीं चाहूँगा। निरन्तर दूसरॉकी मलाई करनेमें ही लगा रहुँगा। पचन और कर्मसे यम-नियमों का पालन करूँगा॥२॥ कानोंसे कठोर और असहा पचन सुनकर भी उससे उत्पन्न हुई (फ्रोधी) मे न जलूंगा। अभिमान छोड़कर सबमें समबुद्धि रहेंगा और मनको न्त रका,गा। दूसरोंकी स्तुति-निन्दा कुछ भी नहीं करूँगा (सदा पके चिन्तनमें लगे हुए मुझको दूसरोंकी स्तुति-निन्दाके लिये नय ही नहीं मिलेगा) ॥३॥ शरीर-सम्बन्धी चिन्ताएँ छोड़कर व और दुःखको समान-भायसे सहँगा । हे नाथ ! क्या तुलसीदास न (उपर्युक्त) मार्गपर रहकर कभी अविचल हरि-भक्तिको प्राप्त रंगा?॥४॥ [१७३] नाहिंन आवत आन भरोसो। यहि कलिकाल सकल साधनतरु है श्रम-फलनि फरो सो॥१॥ तप, तीरथ, उपवास, दान, मख जेहि जो रुचै करो सो। पायेहि पै जानियो करम-फल भरि भरि वेद परोसो॥२॥ आगम-विधि जप-जाग करत नर सरत न काज खरो सो। सुख सपनेहु न जोग-सिधि-साधन, रोग चियोग धरो सो ॥३॥ काम, क्रोध, मद, लोभ, मोह मिलि ग्यान विराग हरो सो। विगरत मन संन्यास लेत जल नायत आम घरो सो॥४॥ • अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह, शौच, सन्तोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर-प्रणिधान-ये दस यम-नियम है।

दान, यज्ञ आदि जो जिसे अच्छा लगे सो करे। किन्तु इन सबकाँका कार्यकी सिद्धि नहीं होती। योग-सिद्धियोंके साधनमें मुख स्वामी नहीं है (क्रिया जाननेवालोंके अभावसे) इस साधनमें भी रोग और वियोग प्रस्तुत है (शरीररोगी होजाता है, जिसके फलखरूप प्रियजनोंसे विछोह हो जाता है।) ||३|| काम, क्रोध, मद, लोम और मोहने मिलकर मुनियोंके अनेक मत है, (छ: दर्शन है) और पुराणों में नाना प्रकार के पहु मत मुनि यहु पंथ पुराननि जहाँ-तहाँ अगरी मो! गुरु कयो राम-मजन नीको मोहिं लगत राज-डगरी मी तुलसी पिनु परतीति प्रीति फिरि-फिरि पचि मर मर सो। रामनाम-योहित मर-सागर चाह तरन वरो सो ६५ भावार्थ-(श्रीराम नामके सिया) मुझे दूसरे किमी (माधन) भरोसा नहीं होता । इस कलियुगमें समी साधनरूपी वृक्षमि केवन परिश्रमरूपी फल ही फल रहे हैं अर्थात् उन साधनोंमें लगे रहने केवल श्रम ही हाथ लगता है, फल कुछ नहीं होता ॥१॥ तप, तीर्य,मा फल पानेपर ही जान पड़ेगा, यद्यपि वेदोंने (पत्तल) भर-भरकर फलाको परोसा है । भाव यह कि वेदॉम इन कौकी बड़ी प्रशंसा है परन्तु कलियुग इन्हें सफल ही नहीं होने देगा तय फल कहाँसे मिलेगा ?।। शास्त्रकी विधिसे मनुष्य जप और यक्ष करते हैं, किन्तु उनसे असली शान-वैराग्यको तोहर-सा लिया है। और संन्यास लेनेपर तो यह मन ऐसा बिगड़ जाता है, जैसे पानीके डालनेसे कश्चाधड़ा गल जाता है । पन्य देखकर जहाँ-तहाँ अगदा-सा हो जान पड़ता है। गुरुने मेरे लिये विनय-पत्रिका जिनको ही उत्तम पतलाया है और मुझे भी सीधे राजमार्गके । पही अच्छा लगता है ॥५॥ हे तुलसी ! विभ्यास और प्रेमके यिना पार-चार पच-पचकर मरना हो, घद भले ही मरे, किन्तु संसार- मे तरनेके लिये तो राम-नाम ही जवाज है। जिसे पार होना हो, सपर घदकर) पार हो जाय ॥६॥ [१७४ ]ni के प्रिय न राम-पैदेही - जिये ताहि कोटि परी सम, जद्यपि परम सनेही ॥१॥ तो छोड़िये ज्यो पिता प्रहलाद, विभीपन पंधु, भरत महतारी । लि गुरु तज्यो त प्रज-पनितन्हि, भये मुद-मंगलकारी ॥२॥ साने नेह रामके मनियत सुहद मुसेन्य जहाँ लौं। अंजन कहा ऑखि जेहि फूट, बहुतक कहीं कहाँ ली ॥३॥ तुलसी सौ सय मोति परम हित पूज्य प्रानने प्यारो। नामों होप सनेह राम-पद, एतो मतो हमारी ॥४॥ भावार्य-जिसे श्रीराम-जानकीजीप्यारे मदी, उमे फरोदामोंक म छोड़ देना चाहिये, पाई पदमपना अत्यन्त ही प्यारा क्यों म ।। (उदाहरण के लिये देखिये) मनाइने सपने पिना (हिरण्यकशिपु) निमीपणाने सपने मा मरतीने मपनी माता (कपी) दिया, परतु मी मागर्थ-जिगशी धीगमयाद्रजीमनीतिमदीपदामसंगर गदकुम भीर, गुभा समान वृयाहीजी गदा काम, मराहोनीद मय, मूमधारयासतोगीमा पर सिगात विनय-पत्रिका आनन्द और कल्याण करनेवाले हुए ॥२॥ जितने सुहृद् और मही' पूजने योग्य लोग हैं, वे सब श्रीरघुनाथजीके ही सम्बन्ध और प्रेमसे जाते हैं। यस, अय अधिक क्या कहूँ। जिस अझनके लगानेसे मौन । जायँ, यह अअन ही किस कामका? ॥३॥ हेतुलसीदास जिसकेक (जिसके संग या उपदेशसे) धीरामचन्दजीके चरणों में प्रेम हो या प्रकारसे अपना परम हितकारी, पूजनीय और प्राणोंसे भी अधिक है। हमारा तो यही मत है ॥४॥ [१७५] जो पै रहनि रामसों नाही। लगन तो नर खर कूकर सूकर सम वृथा जियत जग माहीं ॥१॥ काम, क्रोध, मद, लोम, नींद, मय, भूख, प्यास सपहीके । मनुज देह सुर-साधु सराहत, सो सनेह सिप-पीक ॥२॥ पर, सुजान, सुपूत सुलच्छन गनियत गुन गरुआई। पिनु हरिभजन इंदारुनके फल तजत नहीं फरुआई ॥३१॥ फीरति, कुल, करतूति, भूति मलि, सील रारूप सलोने । तुलमी प्रम-अनुराग-रहित जस सालन साग अलौने 11 NA लिये देवता मारमनपराको प्रसंगा का है।

२८३ विनय-पत्रिका पह तो श्रीसीतानाय रघुनाथजीका प्रेम ही है (भगवत्प्रेमसे ही मनुष्य- जीवनकीमार्थकता है)॥२॥ कोई शूरवीर सुचतुर,माता-पिताकीआना. में रहनेवाला सुपूत, सुन्दर लक्षणवाला तथा घड़े-बड़े गुणोंसे युक्त भले ही श्रेष्ठ गिना जाता हो परन्तु यदि वह हरिभजन नहीं करता है तोघद्द इन्द्रा. पणके फलके समान है, जो (सब प्रकारसे देखनेमै सुन्दर होनेपर भी) अपना फड़यापन नहीं छोड़ता ॥३॥ कीर्ति, ऊँचा कुल, अच्छी करनी पड़ी विभूति, शील और लावण्यमय स्वरूप होनेपर यदि यह प्रभु थीरामचन्द्रजीके प्रति प्रेमसे रहित है, तो ये सय गुण ऐसे ही है, जैसे बिना नमककी साग-भाजी ॥४॥ [१७६] ख्यो राम सुस्वामी सों नीच नेह न नातो।एते अनादर हूँ तोहि ते न हातो।। गोरे नये नाते नेह फोकट फीक देहके दाहक, गाहक जीके ।२। अपने अपने को सब चाहत नीको। मूल दुहुँको दयालु दूलह सी को 1३। जीवको जीवन प्रानको प्यारो । सुखहूको सुख रामसो पिसारो ४| कियों करेंगो तोसे खलको भलो। ऐसे सुसाहब सों तू कुचाल क्यों चलो।५। तुलसी तेरी भलाई अजहूँ झै । रादउ राउत होत फिरिक ज्झै ६॥ मावार्थ-अरे नीच!तूने तोश्रीरामचन्द्रजी सरीखेमुन्दर स्वामीसन तोमेमही किया और न सम्बन्ध ही जोड़ा। परन्तु इतना अनादर करनेपर भी उन्होंने तुझे नहीं छोड़ा सूने (जन्म-जन्मान्तरमें) नये-नये नात और नया-नया प्रेम जोड़ा जा सय व्यर्थ और नीरस थे तथा (उलटे) २८ मय-पत्रिका या म्यार्थी तो पागलोंकी-सी ही पाने किया करते हैं। (मार य माप जो नित्य अपने जनॉपर कृपा-दृष्टि रखते हैं उनके लिये तो ता है कि माप चाहे उदासीन हो जाये और मेरे लिये यह अभिमान यात कहता हूँ कि मुझे तो आपकी ही आशा है, यह पागलौकीस हीनो) ॥१॥ जो मय पानीका दान करता है, सारे प्राणियोंक करता है उसे किस यस्तुकी कमी है ? पानी देकर जीयनको रक्ष नेवाले मेघको क्या चाहिये । परन्तु प्रेमका भटल नियम निवाहने ण पपीहेकी ही सराहना होती है। भाव यह कि मेघ पपीहेको बिना किसी स्वार्थ के स्वातिका जल देता है, इसमें उदारता मेघकी ही है, तु दूसरी ओर न ताकनेके कारण सराहनाचातककी हुआ करती है। करनेवाले जलको मछलीसे लेशमात्र मी ठाम नहीं है, मछलीके लिये जलको छोड़कर, ऐसा कौन-सा स्थान है, जहाँ वह ने प्राण बचा सके? भाव यह कि वह जलको छोड़कर कहीं भी घेत नहीं रह सकती। इसी प्रकार आपको मुझसे कोई लाम नहीं। तु मैं आपको छोड़कर कहाँजाऊँ ? आपको अपनी शरणरसनामी 1 और तारीफ भी मेरी ही होगी ॥३॥ मैं आपकी यलया लेता है, ये, बड़ोंके सहारे (सदा) छोटे यवते आये है, जहां-तहांसरसिकोंके खोटे भी चला करते हैं। भाय यह है कि भापके समक्तमसली हैं, और मैं पाखण्डी, नकली सिका होनेपर भी आपके नामकी से भवसागरसे तर जाऊँगा । आपके दरवारम भले थुरे समाका णि होता है, चाहे कोई आपके अनुकूल हो या प्रतिकल हो (जैस पण सम्मुख था तथा रायण विमुख था पर दोनों ही मुक्त हो गये) और पुष्ट बिनय-पत्रिका हे श्रीरामजी! मुझे तो केवल आपके कल्याणकारी नामका ही मरोसा है ॥५॥ हे नाथ ! कह देनेसे सव धात बिगड़ जायगी, (सारा भेद खुल जायगा) इससे मनकी मनदीमें रखना अच्छा हो फिर माप तो हे कृपानिधान ! तुलसीके मनकी सब जानते ही हैं ॥६॥ राग बिलावल [१७२] कहाँ जाउँ, कासों कहीं, कौन मुनै दीनकी । त्रिभुवन तुही गति सब अंगहीनकी ।।१।। जग जगदीस घर घरनि घनेरे हैं। निराधारके अधार गुनगन तेरे तेरे है॥२॥ गजराज-काज खगराज तजि धायो को। मोसे दोम-कोप पोसे, तोसे माय जापों को ॥३॥ मोसे कर कापर कुपूत कौड़ी आपके । किये पहुमोल ते करपा गीध-याधके ॥ ४॥ तुलसीकी तेरे ही बनाये, पलि, पनगी। प्रभुकी विलंब-अंब दोप-दुरा जनगी॥५॥ भाशर्य-कहाँ जाकिमसे कई ! कौन रस (माघनरूपीधनगे ऐन) दीनको सुनेगा मुस-सरोगेसपतराम साधनहानी गति तो,मानों मोकॉमें एकमात्र हो । यो तो दुनियामे घर पर अगदीश' मरे ६(समी भपनेको पर कहत) परजिसके कोमाधार नहीं, उमरे नय-पत्रिका ये तो एक तेरे गुणसमूहका (गान ही) आधार है।भाव यह कि तेरे ही गेका गान कर वह संसार-सागरको पार करता है ॥२॥ गजराजको डानेके लिये गरुड़को छोड़कर कौन दौड़ा था ? जिसने मुझ जैसे रॉके भण्डारका भी पालन-पोपण किया, पेसा एक तुझे छोड़कर, र किसको किसमाताने जना है? ॥३॥ मुझ जैसे फर, कायर, कुपूत और पी कौड़ीकी कीमतवालोंको मी, हे जटायुके श्राद्ध करनेवाले ! तूने मूल्य यना दिया ॥४|| यलिहारी! तुलसीकी (बिगड़ी हुई) यात तेरे ही ये यन सकेगी। यदि तृने मेरा उद्धार करनेमें देर की, तो फिर पा पीमाता दुःख और दोपरूपीसन्तान हीजनेगी।माय यह कि तू कृपा के शीघ्र उद्धार न करेगा तो मैं पाप और दुःखोसे ही घिर जाऊँगा ॥५॥ [१८०] यारक रिलोकि पलि की मोहिं आपनो। राय दसरथक तू उथपन-यापनो ॥१॥ साहिब सरनपाल न दूसरो। वेरो नाम लेत ही सुसैत होत ऊमरी ॥२॥ करम तेरे मेरे मन गड़े है। देग मुने जाने में जहान जेने पड़े हैं ॥३॥ फोन किया समाधान सनमान सीलाको। मृगुनाथ मो रिपी जितया कान लीला को॥४॥" मातृ-पितु-पंधु-हित, लोक-वेदपाल फो। पोटको अपन, नत करत निहाल को ॥५॥ सपल ! विनय-पत्रिका संग्रही सनेहयस अघम अधम असाधुको। गीय सहरीको कही करिद मराघु को ॥६॥ निराधारको अधार, दीनको दयालु को। मीत फपि-कवट-रजनियर-मालु को ।।७।। रंक, निरगुनी, नीच जिवने निवाजे हैं। महाराज गुजन-समाज पिराज ॥८॥ साँची बिरुदायली न पदि कहि गई है। मीलसिंधु। दील तुलमीकी पर मई है ॥९॥ भावार्थ-देमा, पलिहारी ! एक पार मंग मोर देगर मुरो पना कीजिये। धीरानन्दन ! माप गरेप जीपीको मिागे अमानेपाले ६१५ मापक रमाग को द्वारा रानांत पाटनेपाना रासिमान् मी पापा नाम नही पा in मी जारोमाता भाष पानि माप गुगामी मीभामा भनि-मामी मामार पाम भान AIMER भायम भीर मेरे मन में गर (. नपरोसार मामा, पिरामारिसना सापामार मुगि) र म सी भी रंग, गुमभीर meriratो मिमि गाणे Intra tri मार मान, मो.fmt rai ryan niy kinant( free mini २५ यिनय-पत्रिका लिये किसने लोक और वेदकी मर्यादाका पालन किया ? अपने यवनांक अडिग कौन है ? और प्रणाम करने ही प्रणतको कौन निहाल कर देत है ? (फेयल एक श्रीरघुनाथजी ही) प्रेमके अधीन होकर किस नीचों और दुप्पोको इकट्ठा किया, अपनाया? गीध और शवरीका रिता माताकी तरह कौन धाद्ध करेगा ?n जिनके कहीं कोई सहारा नई है, उनका आधार कौन है ? दीनॉपर दया करनेवाला कौन है ? औ वन्दर, मल्लाह, राक्षस तथा रीछाका मित्र कौन है ? (सियारघुनाथजी दूसरा कोई नहीं) ॥७n हे महाराज! आपने जितने कंगाल, मूर्स और नीचोंको निहाल किया है, वे सब ही याज सन्तोंके समाजमें विराजित हो रहे हैं ॥८॥ यह आपको सी-सशी वड़ाई कही गयी है,(एक अक्षर भी) बढ़ाकर नहीं कहा है। किन्तु हे शीलके समुद्र! तुलसीदासके ही लिये इतनी देर क्यों हो रही है ? ॥२॥ [ १८१] केहू भाँति कृपासिंधु मेरी ओर हेरिये । मोको और ठौर न, सुटेक एक तेरिये ॥१॥ सहस सिलातें अति जड़ मवि मई है। 1. कासों कहीं, कौने गति पाहनहिं दई है ॥२॥ पद-राग-जाग चहीं कौसिक ज्यों कियो हो । कलि-मल खल देखि मारी भीति मियो हो ॥३॥ करम कपीस पालि चली-प्रास-प्रस्यो हौं । चाहत अनाय-नाय! तेरी बांह पस्यो हो ॥४॥ :

विनय-पत्रिका
महा मोहावन विभीषन ज्यों हयो हो।
त्राहि, तुलसीस ! बाहि, तिहूँ ताप तयो हौं ॥ ५॥
भावार्थ-हे रुपासागर किसी भी तरह मेरी ओर देखो। मुझे और
ही ठौर-टिकाना नहीं है, एक तुम्हारा ही पका आसरा है ॥१॥ मेरी
द्धि हजार शिलाओस भी अधिक जड़ हो गयी है। (अब मैं उसे चैतन्य
रनेके लिए) और किससे कहूँ ? पत्थरोंको ( तुम्हारे सिवा और)
कसने मुक्त किया है ? ॥२॥ जिस प्रकार महर्षि विश्वामित्रने (तुम्हारी
स-रेसमें निर्वि) यश किया था, उसी प्रकार मैं भी तुम्हारे चरणों में
मरूपी एक या करना चाहता हूँ।किन्तु कलिके पापरूपी दुष्टोंको देख-
र मैं बहुत ही भयभीत हो रहा हूँ। (जैसे मारीच, ताइका आदिसे
पुमने विश्वामित्रके यशकी रक्षा की थी वैसे ही इन पापोंसे बचाकर
झे भी चरणकमलोंका प्रेमी यना लो)॥३॥ कुटिल कर्मरूपी यन्दरोंके
लपान् राजा यालिसे मैं यहुत डर रहा हूँ, सो हे अनार्थोके नाथ! जैसे
एमने यालिफो भारफर सुग्रीको अभय कर दिया था, उसी प्रकार मुझे
सो अपनी बाहुकी छायामें घसा लो, इन काठेन कर्मोंसे पवाकर
अपना लोnan जैसे रावणने विभीषणको मारा था, उसी प्रकार मुझे
सौ यह महान् मोह मार रहा है; हे तुलसीके खामी मैं संसारके तीनों
आपोसे जला जा रहा हूँ, मेरी रक्षा करो, रक्षा करो ॥५॥
[१८२]
नाथ ! गुनगाथ सुनि होत चित चाउ सो।
राम रीझिबेको जानौं मगति न माउ सो ॥१॥

विनय पत्रिका
करम, सुभाउ, काल, ठाकुर न ठाउँ सो।
सुघन न, सुवन न, सुमन, सुआउ सो॥
जाँचौं जल जाहि कहै अमिय पियाउ सो।
कासों कहीं काह सो न बढ़त हियाउ सो॥
याप ! बलि जाउँ, आपु करिये उपाउ सो ।
तेरेही निहारे परे हारेह सुदाउ सो॥
तेरेही सुझाये सूझ असुझ सुझाउ सो।
तेरेही पुझाये पूरी अयुझ पुझाउ सो ॥५
नाम-अवलंयु-अंयु दीन मीन-राउ सो।
प्रमुसों यनाइ कहीं जीह जरि जाउ सो ॥६
सप माँति गिरी है एक सुपनाउ सो।
तुलसी सुसाहिहिं दियो है जनाउ सो ॥७
मावार्थ- माय! भापक गुणोंकी गाया सुनकर मेरे चिरा
गा होता है, किन्तु गमती! जिम मनि भोर मायगे भार
होने से नहीं जानता कारण कि नती मेरे कर्म मः
मम्ममाप उत्तम, भीर न ममय भष्टा (कलियुग में
मानिक न पहीटर-दिकागान (साधनली उत्तम) धा
(सायरन (परमार्थ मानेयाला) म मन
म(मानगंगापिgi) सम मायुदkinria,मायामासिकाए
मान मेरे पाग नहीं है, सब प्रकार निराध, मिल
(प्याम मारे) पाली माँगता है यह उटा मुग डीभगत पिता

विनय-पत्रिका लिये कहता है। मैं अपनी बात किससे कहूँ ? किसीसे भी कहनेकी हिम्मत नहीं पड़ती ॥३॥ हे यापजी । बलिहारी! आप ही मेरे लिये तो कोई अच्छा उपाय कर दीजिये। क्योंकि आपके (रुपादृष्टिसे देखते ही हारनेपर भी अच्छा दाँव हाय लग जाता है। भाव, बड़े-बड़े पापी भी आपकी कृपास बैकुण्ठके अधिकारी हो जाते हैं ॥४॥ आप यदि सुझा दें तो अदय वस्तु भी दीखने लगती है, और आपके समझा देनेपर नहीं समझमें आनेवाला (आपका स्वरूप) पदार्थ भी समझमें आ जाता अब आप उसे ही समझा दीजिये ॥५॥ देखिये, आपके नामका जो अवलम्बन है, वही तो पानी है और उसमें रहनेवाला मैं दीन मीनोंका राजा हूँ, यड़ा भारी मत्स्य हूँ। मैं जो अभुके सामने इसमें कुछ भी बनावटी बात कहता होऊँ, तो जीम जल जाय ॥६॥ मेरी बात सभी तरहसे बिगड़ चुकी है, केवल एक ही अच्छा वानकवनरहा है, और यह यह कि तुलसीदासने यह बात अपने दयालु स्वामीको जनादी है। (अय स्वामी आप ही विगड़ी बनावेंगे) ॥७॥ राग आसावरी [१८३] राम ! प्रीतिकी रीति आप नीके जनियत है। बड़ेकी बढ़ाई, छोटेकी छोटाई दरि करे, ऐसी विरुदावली, बलि, पेद मनियत है ॥१॥ गीपको कियो सराध, भीलनीको खायो फल, सोऊ साधु-सभा भलीभाँति मनियत है।

कलिकाल अपर उपाय ते अपाय भये, ..
पिनय पत्रिका
राबरे आदरे लोक पेद हूँ आदरियत,
जोग ग्यान
वें गरू गनियत है॥
प्रमुकी कृपा कृपालु ! कठिन कलि हूँ काल,
महिमा समझि उर अनियत है।
तुलसी पराये पस भये रस अनरस,
दीनबन्धु! द्वारे हट उनियत ॥
मावार्थ-हे श्रीरामजी! प्रीतिकी रीतिमापहीमलीमाँति जान
यलिहारी ! घेद आपकी विरदावलीको इस प्रकार मान रहे हैं कि
यडेका यप्पन ( अभिमान), एवं छोटेकी छोटाई (दीनता)
कर देते हैं ॥१॥ आपने जटायु गीधका श्राद्ध किया और शबरीके
(येर)खाये: यह यात मी सन्त-समाजमें अच्छी तरह बखानी जा
कि जिस किसीका आपने आदर किया, लोक और घेद दोनों ही उ
आदर करते हैं। आपका प्रेम, योग तथा मानसे भी यहा माना
है ॥२॥ हे कृपालु ! आपकी कृपासे इस कठिन कलिकालमें भी आ
महिमाको समझकर भक्तजन हृदयमें धारण करते हैं । यद्यपि तुन
दूसरोंके (विपयोंके) अधीन होनेके कारण (आपके प्रेमसे) अन्
अर्थात् प्रेमहीन होरहा है, तथापि हे दीनबन्धु ! वह आपके द्वारपर
दिये येठा है (आपकी कृपा-दृष्टि पाये चिना हटनेका नहीं ) ॥३॥
१८४]
राम-नामके जपे जाइ जियकी जरनि ।
जैसे तम नासियेको चित्रके वरनि ॥१॥

यिमय-पत्रिका करम-कलाप परिताप पाप-साने सब, ज्यों सुफूल फूले तरु फोकट फरनि । दंम, लोम, लालच, उपासना विनासि नीके, सुगति साधन भई उदर भरनि ॥२॥ जोग न समाधि निरुपाधि न पिरागम्यान, पचन रिसेप पेप, कहूँ न करनि । कपट कुपथ कोटि, कहनि-रहनि खोटि, सकल सरा, निज निज आचरनि ॥३॥ मरत महेस उपदेस हैं कहा करत, सुरसरि-तीर कासी धरम-धरनि । राम-नामको प्रताप हर कहै, जपं आप, जुग जुग जाने जग, चेदहूँ परनि ॥४॥ मति राम-नाम ही सों, रति राम-नाम ही सों, गति राम-नाम ही की विपति-दरनि । राम-नामसा प्रतीति प्रीति रासे कपहुँक, तुलसी दरेंगे राम आपनी दरनि ।। ५॥ भावार्थ-धीराम-नाम जपनेसे ही मनकी जलन मिट जाती है। एम कलियुगम (योग-यमादि) दूसरे साधन तो सब यैसे ही ध्यर्थ हो गये है जैसे अँधेरा दूर करने के लिये चित्रलिमित मूर्प घ्य १॥ कर्म तो यहुतेरे दुप और पापोंमें मने हैं। कोका करना हम ममप ऐमा है, जैसे किसी प्रक्षम यदी मुन्दर फलफूले पर फल लगे

विनय-पत्रिका
ही नहीं। दम्भ, लोभ और लालचने उपासनाका भलीमोंति नारा कर
दिया है। और मोक्षका साधन ज्ञान आज पेट भरनेका साधन हो रहा
है। (इस प्रकार कर्म, उपासना और ज्ञान तीनोंकी ही धुरी दशा है) ॥२॥
न तो योग ही बनता है, न समाधि ही उपाधिरहित है, वैराग्य और
शान लम्बी-चौड़ी बातें बनाने और वेष बनानेभरके ही रह गये हैं।
करनी कुछ भी नहीं, केवल कथनी है। कपट-भरे करोड़ों कुमार्ग चल पड़े
हैं। कहनी और रहनी सभी खोटी हो गयी हैं। सभी अपने-अपने
आचरणोंकी सराहना करते हैं ॥३॥ (एक राम-नामकी महिमा रही
है ) शिवजी गंगाके किनारे काशीकी धर्म-भूमिपर मरते समय जीयको
फ्या उपदेश देते हैं ? श्रीराम-नामके प्रतापका वर्णन करते हैं। दूसरों
से कहते हैं और स्वयं भी जपते हैं। अनेक युगोंसे इसे संसार जानता है
और वेद भी कहते चले आये हैं ॥५॥ अथ तो राम नामहीमें भपनी
धुद्धिको लगाना चाहिये, राम-नामहीसे मेम करना चाहिये और राम
नामहीकीशरण लेनीचाहिये क्योंकि एक यही साधना जीवको जन्म
मरणरूप विपत्तियाँको दूर करनेवाली है। हे तुलमी ! राम-नामपर
विश्याम और द प्रेम यनाय रक्सेगा, तो कभी-न-कमी धीरामजी
अयश्य ही अपने दयालु स्वभायसे तुझपर दया करेंगे ॥५॥
[१८५]
लाज न लागत दास कहावत ।
सो आचरन रिमारि माय वजि, जो हरि तुम कह भायत ॥१॥
मकल संग नजि भजत जाहि मुनि, जप तप जाग मनायत ।
मो-मम मंद महाकुल पाँर, कौन जतन दि पारत ॥२॥

विनय-पत्रिका हरि निरमल, मलग्रसित हृदय, असमंजस मोहि जनावत ! •जेहि सर काक कंक चक सूकर, क्यों मराल तहँ आवत ॥३॥ जाकी सरन जाइ कोविद दारुन त्रयताप घुझावत । तहूँ गये मद मोह लोम अति, सरगहुँ मिटत न सावत ॥४॥ भव-सरिता कहँ नाउ संत, यह कहि औरनि समुझावत । ही तिनसों हरि! परम वैर करि, तुम सों भलो मनायत ॥५॥ नाहिंन और ठौर मो कहँ, ताते हठि नातो लावत । राखु सरन उदार-चूड़ामनि ! तुलसिदास गुन गावत ॥६॥ भावार्थ-हेहरे मुझे (आपका)दास कहलाने में सजामीनहीं आती! जोमाचरण आपको अच्छा लगता है, उसे मैं बिना किसी विचारके छोड़ देता है। (सन्तोंके आचरण छोड़ देनमें मुझे पश्चात्तापतक भी नहीं होता। इतनेपर भी मैं आपका दास बनता हूँ) ॥१॥ मुनिगण जिसे सब प्रकारकी थासक्ति छोड़कर भजते हैं, जिसके लिये जप, तप और यज्ञ करते हैं, उस प्रभुको मुझ जैसा मूर्ख, महान् दुए और पापी फैसे पा सकता है ? ॥२॥ भगवान तो विशुद्ध है और मेरा हृदय पापपूर्ण महामलिन है, मुझे यह असमन्जस जान पड़ता है। जिस तालायम कोए, गांध, यगुले और स्भर रहते हैं यदी ईस क्यो बाने लगे। माय यह कि मेरे काम, क्रोध, लोम, मोद्दभरे मलिन हृदय में भगवान् नहीं आयेंगे । यह तो उन्ही मुनियों के उदय-मन्दिरमै विहार करेंगे जिन्होंने निष्काम कर्म, पैराग्य, मनि, मान मादि साधनाद्वारा अपने हदयको निर्मल यना लिया है ॥३॥जिन (तीयों) को शरणमें जाकर सानके साधक पुरुष सांसारिकतीनों कटिन तापोंको

पिनय पत्रिका
युगपदो मी जानेर मुम तो अहंकार, ममान मीर लोन और भी
मधिक मनायेंगे, कांकि मोतियाहाहमाम मी नहीं यूटना, अहाँ मी
सामाफिरता में हमराको यह कहार समझाता फिरता
है,जि.पो, समारपीन पार जानरलियमन्तजन होनाका है:-
किया। मैं (थप) उनसे पड़ी भारी शत्रुता करके मारमे माना
कल्याण पाहता (परपमा होनेर मी कहाँ जाऊँ) मुझे और
कहीं ठौर-ठिकाना नहीं है। इसी (मालायक होता हुआ मी) मापसे
जबरदस्ती सम्पन्यजोड़ता फिरता है। दातामा शिरोमपिरघुनाथडी:
यह तुलसीदास मापफे गुण गा रहा है, (मलाई-युराईकी मोरन
देगकर अपने दयालु स्पमायसे ही) इसको अपना लीजिये ॥६॥
[१८६] 1.
कॉन जतन विनती करिये।
निज आचरन पिचारि हारि हिय मानि जानि डरिये ॥१॥
जेहि साधन हरि ! द्रवहु जानि जन सो हठि परिहरिये ।
जाते विपति-जाल निसिदिन दुख, तेहि पथ अनुसरिये ॥२॥
जानत हूँ मन पचन करम पर-हित कीन्हें तरिये ।
सो विपरीत देखि पर-सुख, पिनु कारन ही जरिये ।।३।।
श्रुति पुरान सपको मत यह सतसंग सुदृढ़ घरिये ।
निज अभिमान मोह इरिपा बस तिनहिं न आदरिये ॥४॥
सोइ प्रिय मोहिं सदा जाते भवनिधि परिये ।
अप नाथ, कौन पलवें संसार-सोग हरिये ॥५॥

विनय-पत्रिका
जब कप निज फरुना-सुभाष, बहु तो निस्तरिये।
तुलसिदास विस्वास आन नहि, कत पचि-पचि मरिये ।।६।।
भावार्थ- हे नाथ ! मैं किस प्रकार आपकी विनती करूं? जय अपने
(नीच) माचरणोंपर विचार करता हूँ और समझता हूँ, नव हृदयमें हार
मानकर डर जाता हूँ (प्रार्थना करनेका साहस ही नहीं रह जाता) ॥१॥ हे
हरे! जिस साधनसे आप मनुष्यको दास जानकर उसपर कृपा करते हैं उसे
तो मैं हठपूर्वक छोड़ रहा है। और जहाँ विपत्तिके जालमें फंसफर दिन-
रात दुःख ही मिलता है, उसी (कु) मार्गपर चला करता हूँ॥२॥ यह जानता
कि मन, वचन और कर्मसे दूसरोंकी भलाई करनेसे संसार-सागरसे
तर जाऊँगा, पर मैं इससे उलटा ही आचरण करता हूँ, दूसरोंके सुखको
देषकर बिना ही कारण (ईर्ष्याग्निसे) जला जा रहा हूँ ॥३॥ वेद-पुराण
सभीका यह सिद्धान्त है कि खूय दृढ़तापूर्वक सत्संगका आश्रय लेना
चाहिये, किन्तु मैं अपने अभिमान, अज्ञान और ईयां यश कमी सत्संगका
आदर नहीं करता, मैं तो सन्तोंसे सदा द्रोह ही किया करता हूँ ॥४॥
(धात तो यह है कि मुझे सदा यही अच्छा लगता है, जिससे संसार-
सागरहीमें पड़ा रहूँ। फिर, हे नाथ ! आप ही कहिये, मैं किस पलसे
संसारके दुःख दूर करूं? ॥५॥ जव कभी आप अपने दयालु स्वमायसे
मुझपर पिघल जायेंगे तभी मेरा निस्तार होगा, नहीं तो नहीं क्योंकि
तुलसीदासको और किसीका विश्वास ही नहीं है, फिर घद किसलिये
(थन्यान्य साधनोंमें) पच-पचकर मरे ॥६॥

विनय-पत्रिका [१८] ताहि ते आयो सरन सबेरें। ग्यान विराग मगति साधन कछु सपनेहुँ नाथ ! न मेरे ॥१॥ लोभ-मोह-मद-काम-क्रोध रिपु फिरत रेनि-दिन धेरें । तिनहिं मिले मन भयो कुपथ-रत, फिर तिहारैहि फेरें ।।२।। दोप-निलय यह विषय सोक-प्रद कहत संत श्रुति टेरें। जानत हूँ अनुराग वहाँ अति सो, हरि तुम्हरेहि प्रेरें ? ॥शा विप पियूप सम करहु अगिनि हिम, वारि सकहु विनु धेरें । तुम सम ईस कृपालु परम हित पुनि न पाइहाँ हेरें ॥४॥ यह जिय जानि रहौं सब तजि रघुवीर भरोसे तेरें। तुलसिदास यह विपति पागुरौ तुम्हहिं सों घनै निवरें ।।५।। भावार्थ-हे नाथ! (केवल तुम्हारा ही भरोसा है) इसी कारण मैं पहलेसे ही तुम्हारी शरण में आ गया हूँ। शान, वैराग्य, भक्ति आ साधन तो मेरे पास स्वप्नमें भी नहीं हैं (जिनके घलसे मैं संसार सागरसे पार हो जाता) ॥१॥ मुझे तो लोम, अज्ञान, घमण्ड का और क्रोधरूपी शत्रु ही रात-दिन घेरे रहते हैं, ये क्षणभर भी मेरा पिण नहीं छोड़ते। इन सबके साथ मिलकर यह मन मी कुमार्गी हो गया। अय यह तुम्हारे ही फेरनेसे फिरेगा ॥२॥ सन्तजन और घेर पुकार कहते हैं कि संसारके यह सब विषय पापोंके घर ई और ७५ भी मेरा उन विषयों में ही जो इतना मनुराग ! यह तुम्हारी ही प्रेरणासे तो नहीं है। (नहीं तो मैं जान- जाल

विनय-पत्रिका
धूझकर ऐसा क्यों करता!) ॥३॥ (जो कुछ भी हो, तुम चाहो तो)
विषको अमृत एवं अग्निको घरफ बना सकते हो और विना ही जहाजोंके
संसार सागरसे पार कर सकते हो। तुम सरीखा कृपालु और परम हित.
कारी खामी ढूँदनपर भी कहीं नहीं मिलेगा। (ऐसे स्वामीको पाकर भी
मैंने अपना काम नहीं बनाया तो फिर मेरे समान मूर्ख और कौन
होगा?) ॥४॥ इसी यातको हृदयमें जानकर, हे रघुनाथजी ! मैं सब छोड़-
छाड़कर तुम्हारे भरोसे आ पड़ा हूँ। तुलसीदासका यह विपत्तिरूपी
जाल तुम्हारे ही काटे कटेगा 10
[१८८]
मैं तोहिं अब जान्यो संसार।
बाँघि न सकहिं मोहि हरिके पल, प्रगट कपट-आगार ॥१॥
देखत ही कमनीय, कट नाहिंन पुनि किये विचार ।
ज्यों कदलीवरु मध्य निहारत, कबहुँ न निकसत सार ॥२॥
तेरे लिये जनम अनेक मैं फिरत न पायों पार ।
महामोह-मृगजल-सरिता महँ वोरथो हौं वारहिं बार ॥३॥
सुनु खलाछल-बल कोटि किये घस होहिं न भगत उदार ।
सहित सहाय तहाँ पसि अब, जेहि हृदय न नंदकुमार ॥४॥
तासों करहु चातुरी जो नहिं जानै मरम तुम्हार ।
सो परि दरै मर रजु-अहि दें, यूझै नहिं व्यवहार ॥५॥
निज हित मुनु सठा हठन करहि, जो चहहि कुसल परिवार ।
तुलमिदास प्रभुके दासनि तजि भजहि जहाँ मद मार ॥६॥

विनय-पत्रिका भावार्थ-थर (मायावी) संसार अब मैंने तुझे (यथार्य) जान लिया, तू प्रत्यक्ष ही कपटका घर है, पर अय मुझे मगवानका यल मिल गया। इससे तू (अपने कपटजालमें) मुझको नहीं बाँध सकता, (परमात्मा यलका आश्रय लेते ही परमात्माकीमायासे यना हुआसंसार सर्वया निट गया, इसलिये अब मैं संसारके मायावी फन्देमें नहीं आ सकता) तू देखनेमात्रको ही सुन्दर है, पर विचार करनेपर तो कुछ भी नहीं है, वस्तुतः तेरा अस्तित्व ही नहीं है। जैसे केलेके पेड़को देखो, उममेसे कभी गूदा निकलता ही नहीं (कितना ही छीलो, छिलका-ही-छिलका निकलता जायगा। यही दशा संसारकी है ॥२॥ अरे, तेरे लिये मैं अनेक जन्मों में भटकता फिरा, अनेक योनियों में गया, पर तेरा पार नहीं पाया। तू मुझे महामोहरूपी मृगतृष्णाकी नदीमें यार-बार दुधाता ही रहा ॥३॥ अरे दुष्ट! सुन, तू चाहे करोड़ों प्रकारके छल-वल कर; पर भगवान्का परमभक्त तेरे वशम नहीं हो सकता, दू अपनी ( विषयोंकी) सेना समेत वहीं जाकर डेरा डाला जिस हृदयश्रीनन्दनन्दन श्रीकृष्णा भगवान्का वास न हो (जिस भक्त के हृदय में भगवान्का घास है यहां तेरा क्या काम ?) ॥४॥ जो तेरा भेद न जानता हो, उसीके साथ अपनी कपटकी चाल चलावही रस्सीरूपी साँपसे डरकर मरेगा, जो उसके भेदकोन जानता होगा ॥५॥ अरे शठ अपने हितकी यात सुन, जो तू फुटुम्ब समेत अपनी सैर चाहता है तो हठन कर। तुलसीदासके प्रभु श्रीरघुनाथजीके सेवकोंको छोड़कर तू यही भाग जा जहाँ महंकार .इससे सिद्ध है कि गोसाईजी भीराम और भीकृष्णमें कोई भेद नहीं मानते थे, जो वास्तविक सिद्धान्त है।

३०३ विनय-पत्रिका और काम रहते हो (जहाँ राम रहते है यहाँ अहंकार तथा काम नहीं; और जहाँ ये नहीं, वहाँ मायाका संसार कैसे रह सकता है?) ॥६॥ राग गौरी [१८१] राम कहत चलु, राम कहत चलु, राम कहत चलु भाई रे । 'नाहिं तौ भव-गारि मह परिहै, छूटत अति कठिनाई रे ॥१॥ चाँस पुरान साज सब अठकठ, सरल तिकोन खटोला रे। हमहिं दिहल करि कुटिल करमचंद-मंद मोल विनु डोला रे॥२॥ चिपम कहार मार-मद-माते चलहिं न पाउँ बटोरा रे । मंद चिलंद अभेरा दलकन पाइय दुख झकझोरा रे ॥३॥ काँट कुराय लपेटन लोटन ठावहिं ठाउँ बझाऊ रे । जस जस चलिय दरि तस तस निज यास न भेंट लगाऊ रे ॥४॥ मारग अगम, संग नहिं संबल, नाउँ गाउँकर भूला रे । तुलसिदास भव-त्रास हरहु अब, होहु राम अनुकूला रे॥५॥ भावार्थ-अरे भाई राम-राम, राम-राम कहते चलो, नहीं तो कहीं संसारकी घेगारमें पकड़े जाभोगे तो फिर छूटना अत्यन्त कठिन हो जायगा । (राजाकी येगारसे दो-चार दिनों में छूटा जा सकता है, पर संसारका जन्म-मरणका चक्र तो भान न होनेतकः सदा चलता 'करमचन्द' बुरे प्रारम्धके लिये व्यगोक्ति है । बड़ी-बड़ी या बनाता है, भाने करमचन्दकी करतूत तो देख लोग ऐसा कहा करते हैं।

विनय-पत्रिका ही रहेगा । यदि राम-राम जपता चला जायगा, तो माराज- विषयरूपी शत्रु तुझे गारमें न पकड़ सकेंगे। क्योंकि रामके दामा रामकी माया नहीं चलती ) ॥१॥ कुटिल कर्मचन्दने (हमारे पूर्व-जन कृत पाप-कर्मों के प्रारम्यने) बिना ही मोलके (संसार-चक्रकी कमी नुसार स्वाभाविक गतिके अनुसार) ऐमा धुरा खटोला (मजनहीं- तामसप्रधान मनुष्य-शरीर) में दिया है कि जिसके पुराना तो बाँ- (अनादिकालीन अविद्या-मोह) लगा है, जिसके साज सब अंटसंट (चित्तको तामस विषयाकार वृत्तियाँ हैं, जिनके कारण शरीरमै बुरे काम होते हैं-मनुष्य कुमार्गमें जाता है) जो सीधा तिकोन है (यल अर्थ काम और सकाम धर्मकी प्राप्तिमें ही लगा हुआ है, जिसे मोक्षका ध्यान ही नहीं है) ॥२॥ जिसके (उठाकर चलनेवाले) कहार विपम कामके मदमे मतवाले हो रहे हैं (शरीरको चलानेवाली पाँच इन्द्रियाँ हैं, कहारॉकी जोड़ी होनी चाहिये, पाँच होनसे जोड़ी नहीं है इसीलिये विषम हैं, एक से नहीं हैं और पाँचों ही इन्द्रियाँ विषय-भोगोंके पीछे मतवाली हो रही हैं । कुकमौके कारण जय शरीर और मन ही तामम विषयाकार हैं तब इन्द्रियाँ विषयोंसे हटी हुई कैसे हो?) और वे पौत्र बटोरकर-समान पैर रखकर नहीं चलते। (इन्द्रियाँ अपने-अपने विषयोंकी ओर दौड़ती है) इससे कमी ऊँचे कमी नीचे चलनेसे धके और झटके लग रहे हैं, इस खींच-तानमें बड़ा ही दुःस हो रहा है। ( कभी स्वर्ग या कीर्ति आदिकी इच्छासे धर्म-कार्यमें, कभी मोगोंकी प्राप्तिके लिये संसारके विविध व्यवसायोंमें, कभी कामयश होकर स्त्रियों के पीछे।मो मी समानभावसे नहीं-शब्दस्पर्श,रूप,रम, गन्ध इन अपने अपने विग्यो- और , ।

बिनय-पत्रिका द्वारा कभी ऊँचे और कभी नीचे जाती हैं, फलस्वरूप जीव महान क्लेश पाता है) ॥३॥ रास्ते काँटे बिछे हैं, कंकड़ पड़े हैं, (विपैली) वेलें लपेटती हैं और झाड़ियाँ उलझा लेती हैं, इसप्रकार जगह-जगह रुकना पड़ना है । (परमात्माको भुलाकर सांसारिक विषयोंके घने जंगलमें दौड़नेवाली इन्द्रियोंको विषय-नाशरूपी काँटे, प्रतिकृल विषयरूपी कंकड़, घर-परिवारकी ममतारूपी लपेटनेवाली वेलें और कामनारूपी उलझन है, जिनसे पद-पदपर रुककर दुःख भोगते हुए चलना पड़ता है।) फिर ज्या-ज्यों आगे बढ़ते हैं त्यों-ही-न्यों अपना घर दूर होता चला जा रहा है। (संसारफे भोगोंमें ज्यों-ज्यों मन फॅसता है त्यों-ही-त्यों भगवत्: प्राप्तिरूप निज-निकेतन दूर होता जाता है ) और कोई राह बतानेवाला मी नहीं है । ( विषयो पुरुष सन्तोंका संग ही नहीं करते, फिर उन्हें सीधा परमार्थका रास्ता कौन यताये संगवाले तो उल्टा ही मार्ग पतलाते हैं)॥४मार्ग यड़ा कठिन है, (विषयोंक माइ-संपखाड़ों और पहाड-जंगलोंसे परिपूर्ण है) साथम (भजनरूपी) राह-वर्च नहीं है, यौ. तक कि अपने गाँधका नामतक भूल गये (भूलकर मी परमारमाका नाम नहीं लेते और परमात्म-स्वरूपपर विचार नहीं करते, अतपय मगवानकी छपा दिना इस शरीरके द्वारा तो परमपदरूपी घर पहुँचना असम्भव ही है)। इसलिये श्रीरामजी अप मापही कृपा करके इस तुलसीदासके (जन्म-मरणरूपी) संसारभयको दूर कीजिये ॥५॥ [१९०] सहज सनेही रामसों ते कियो न सहज सनेह । ताते भव-भाजन भयो, सुनु अबहुँ सिखापन एह ॥१॥ २० .

३० । , - पिनय-पत्रिका ज्यों मुस मुकर पिलोकिये अरु चित न रह अनुहारि । त्यों सेवतहुँ न आपने, ये मातु-पिता, मुत-नारि ।। २ ।।. दंदै मुमन तिल वासि कै अरु खरि परिहरि रस लेत । म्बारथ हित भूतल मरे, मन मेचक, तन सेत ॥३॥ करि वीत्यो, अब करतु है, करिवे हित मीत अपार । कबहुँ न कोउ रघुवीर सो नेह निवाहनिहार ॥४॥ जासों सब नातो फुर, तासों न करी पहिचानि । तातें कछु समुझ्यो नहीं, कहा लाम कह हानि ॥५॥ साँचो जान्यो झूठको, झूठे कहँ साँचो जानि। को न गयो, को जात है, को न जैह करि हितहानि ॥६॥ वेद कह्यो, बुध कहत हैं, अरु हाँहुँ कहत ही टेरि । तुलसी प्रभु साँचो हितू, तू हियकी ऑखिन हेरि॥७॥ भावार्थ-तूने खमावसे होस्नेह करनेवाले श्रीरामचन्द्रजीसे स्वाभाविक स्नेह नहीं किया। इसीसे तूसंसारी हो गया है(जन्म-मरणके चक्रमें पड़ा है), परन्तु भय भी यह शिक्षा सुन ॥१॥ जैसे दर्पणमें मुखका प्रतिविम्य दीस पड़ता है, पर यह मुख वास्तवमै दर्पणके अन्दर नहीं होता, पैसे हो ये माता, पिता, पुत्र और स्त्री सेवा करते हुए भी अपने नहीं है (मायारूपी दर्पणके माथ तादात्म्य होनेसे ही इनमें अपना भाव दीखता है ) १२॥ (संमारका सम्बन्ध तो स्वार्थका है) जैसे तिलोंमें फूल रख-रपकर सुगन्धमय यताते हैं किन्तु तेल निकाल लेनेपर पलीको व्यर्थ समझ ... वैसे ही सम्यन्धियोंकी दशा है (अर्थात् जबतक स्थाप-

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३ 6 पिनय पत्रिका जाको मन जासों बध्यो, ताको सुखदायक सोइ । सरल सील साहिब सदा सीतापति सरिस न कोइ ||४|| सुनि सेवा सही को करे, परिहर को दूपन देखि । केहि दिवान दिन दीन को आदर-अनुराग बिसेखि ||५|| खग-सबरी पितु-मातुज्यों माने, कपि को किये मीत । केवट मेंटयो भरत ज्यों, ऐसो को कहु पवित-पुनीत ||६|| देह अमागहिं भागु को, को राख सरन समीत । वेद-विदित विरुदावली, कवि-कोविद गावत गीत ||७|| कैसेउ पाँवर पावकी, जैहि लई नामकी ओट । गाँठी बाँध्यो दाम तो, परख्यो न फेरि खर-खोट ॥८॥ मन मलीन,कलि किलविपी होत सुनत जासु कृत काज। सो तुलसी कियो आपुनो रघुवीर गरीब-निवाज ॥९॥ भावार्थ-सच्चे स्नेहीतो केवल एक कोशलेन्द्रीरामचन्द्र ही हैं। प्रेमका कृतज्ञ रामजीके समान कोई दूसरा दयालु नहीं है ॥१॥इस शरीर से सम्बन्ध रखनेवाले समी स्वार्थी हैं, देवता व्यवहारमें चतुर हैं (जिननी सेवा करोगे, उतना ही फल देंगे। और यदि कुछ विगढ़ गया, तो सारा किया-कराया ध्यर्थ करदेंगे)।दुखी, नीच और अनाथका हित करनेवाला श्रीरघुनाथजीके समान दूसरा कौन है ?(कोई भी नहीं)॥२॥(अय प्रेमियोंकी स्था देखिये ) राग अयया संगीतका स्वर निर्दय होता है (उसीके कारण येचारा हिरण जालमें फंसकर मारा जाता है)। अग्नि सके नाथ समान ध्ययहार करनेवाली है। (देचारे पतंगको उसीमें पड़कर

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विनय-पत्रिका knon जिसने उनके नाम (राम) का माश्रय लिया, चाहे यह कैम ही नीव भोर पापी क्यों न हो, उसे श्रीरामने इस तरह अपना लिया जैसे की (मिले हुए) धनको (नुरन्त ) गाँटमें याँध लेता है, और उस मरे या नोटेपनको भी नहीं परवता Men जो ऐसा मलिन मनवाल है कि जिसके कलियुगमें किये हुए कर्माको सुनकर सुननेवाले भी पापी हो जाते हैं, उस तुलसीदामको भी उन्होंने अपना दास मान लिया। श्रीरघुनायी ऐसे ही गरीयनिवास है nen [१९२] जो पै जानकिनाथ सों नावो नेह न नीच । खारथ-परमारथ कहा, कलि कुटिल बिगोयो बीच ॥१॥ धरम चरन आश्रमनिके पैयत पोधिही पुरान । करतब बिनु वैप देखिये, ज्यों सरीर विनु प्रान ॥२॥ चिहित साधन सबै, सुनियत दायक फल चारि । विदित राम-प्रेम विनु जानियो जैसे सर-सरिता विनु पारि ॥३॥ . नाना पथ निरपानके, नाना विधान बहु माँति । तुलसी तू मेरे कहे जपु राम-नाम दिनरांति ॥ ४॥ मायार्थ-भरे नीच! यदि श्रीजानकीनाथ रामचन्द्रजीसे तेरा प्रेम और नाता नहीं है, तो तेरे स्वार्थ और परमार्थ कैसे सिद्ध होंगे। इस अवस्थामें तोफुटिल कलियुगने तुझकोपीच हीटग लिया,(जिससे लोक- परलोक दोनों ही बिगड़ गये) ॥१॥ (भगवान्के प्रेमसे विहीन लोगों के

।
विनय-पत्रिका
लिये ) वर्ण और आश्रमके धर्म केवल पोथियों और पुराणों में ही लिखे
पाये जाते हैं। उनके अनुसार कर्तव्य कोई नहीं करता, ऐसे कर्तव्य-
हीन कोरे भेप वैसे ही हैं जैसे विना प्राणों के शरीर हों। (उनसे कोई
लाम नहीं) ॥२॥ सुनते हैं कि वेदोंमें जितने प्रसिद्ध प्रसिद्ध ( यश
आदि) साधन है, वे सब अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष चारोको देनेवाले
हैं। किन्तु विना श्रीराम-प्रेमके उन सबका जानना-मानना चैसा ही है, जैसे
विना पानीके तालाय और नदियाँ । सारांश यह कि भगवत्-प्रेम-विहीन
सभी क्रियाएँ व्यर्थ हैं ॥३॥ मुक्ति के अनेक मार्ग हैं और भाँति-भाँतिके
साधन हैं, किन्तु हे तुलसी! तू तो मेरे कहनेसे दिन-रात केवल राम-
नामका ही जप किया कर (रातो इसीसे कल्याण हो जायगा)॥४॥
[१९३]
अजहुँ आपने रामके करतब समुझत हित होइ ।
कहँ तू, कहँ कोसलधनी, तोको कहा कहत सब कोइ ॥१॥
रीझि निवाज्यो काहिं तू, कर खीशि दई तोहिं गारि ।
दरपन वदन निहारिक, सुविचारि मान हिय हारि ॥२॥
विगरी जनम अनेकफी सुधरत पल लगै न आधु ।
'पाहि कपानिधि प्रेमसों कह को न राम कियो साधु ॥३॥
यालमीकि केवट कथा,
कपि-भील-मालु-सनमान ।
सुनि सनमुख जो न रामसों, तिहि को उपदेसहि म्यान ॥४॥
का सेवा सुग्रीवकी, का प्रीति-रीति-निरपाहु।
जासु बंधु पध्या न्याय ज्यों, सो सुनत सोहात न काहु ॥५॥

यिनय-पत्रिका
भजन रिमीपनको कहा, फल कहा दियो रघुराज ।
राम गरीय निवाजके पड़ी बांहबोलकी लाज ॥
जपहि नाम रघुनाथको, चरचा दूसरी न चाल ।
सुमुख, मुखद, साहिब, सुधी, समरथ, कपाल, नवपालु Ihsil
सजल नयन, गदगद गिरा, गहबर मन, पुलक सरीर ।
गावत गुनगन रामक कैहिकी न मिटी मव-मीर ll
प्रभु कृतग्य सरवग्य है, परिहरु पाछिली गलानि ।
तुलसी तोसों रामसों कछु नई न जान-पहिचानि ।।९।।
भावार्य-अय भी यदि तू अपनी (नीच करतूतोंको और श्रीरामजीके
(दयासे पूर्ण ) करतयों को समझ ले, तो तेरा क्ल्याण हो सकता है; कहाँ
तू (रामविमुख, विषयों में लगा हुआ जीय) और कहाँ (अहेतुकी दयाके
समुद्र) कोशलपति भगवान् श्रीरामचन्द्रजी तुझेसब लोगक्या कहते हैं।
(कि यह रामका भक्त है। भक्त और भगवान्में कोई भेद नहीं होता।ऐसा
कहलाना क्या तेरी करतूतोंका फल है?)१॥ अरे, जरा (बियकरूपी)
दर्पणमें (अपने मनरूपी ) मुखको तो देख कि कय तो श्रीरामजीने प्रसन्न
होकर तुझपर कृपा की है और कप गुस्सेमें आकर तुझे गालियां दी है।
(विचारनेसे तुझे यह स्पष्टप्रतीत होगा किनारामने तोसदा कृपा ही की है,
जो कुछ दोष है, सो तेरा ही है। भगवान् गुस्से होकर गालियों देने लगे
निस्तार ही कैसे हो?) फिर (अपनी करतूतोंके लिये)
(न तो यह समझ कि मेरी करनीसे में मत कर
न उनपर दोषारोपण ही कर कि भक्त होनेपर भी ये मेरा
तो.
.

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विनय-पत्रिका घाले और समीयाहर-भीतरकी,आगे-पीछेको वाताको जाननेवाले हैं (उन से तेरी कोई करनीछिपी नहीं है)। तुलसीदास ! रामजीसे तेरी कुछ नदी जान-पहचान नहीं है। ( उनपर दृढ़ मरोसा रस) ॥९॥ [१९४] जो अनुराग न राम सनेही सों। तौ लयोलाहु कहा नर-देही सॉ ॥१॥ जो तनु धरि, परिहरि सब सुख, भये मुमति राम-अनुरागी । सो तनु पाइ अयाइ किये अय, अवगुन-उदधि अभागी ॥२१॥ ग्यान-चिराग, जोग-जप, तप-मख, जग मुद-मग नहिं योरे। राम-प्रेम विनु नेम जाय जैसे मृग-जल जलधि-हिलोरे ॥३॥ लोक पिलोकि, पुरान-बैद सुनि, समुशि-यूझि गुरु ग्यानी । प्रीति-प्रतीति राम-पद-पंकज सकल-सुमंगल-सानी 118 अब जानि जिय, मानि हारि हिम, होइ पलक महनीको । गुमिरु सनेहसाहित हित रामदि, मानु मतो तुलगीको ॥५॥ भागर्य-यदि परम नही श्रीरामचन्द्रमा प्रति प्रेम नहीं तो मादागेर धारण करनेमे दाम ही क्या दुगा? (मगयानमें मनाय प्रेम होना ही नीमनुष्य-जीयनका परम दाम जिम सो धारण कर गुर युनियाले पुगत मारे गंगा मुनीकी (वि) MET धीगमधीमीयन , उम (दुर्टमासकोमीपाका महालीम भमागेनने दमा-भरापापो!ि२॥ जगन्में मान, पांग, मन, या पारिभातम (मौन) मागीतकमीfrfont

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१ विनय-पत्रिका कुचालॉको चला दिया है ॥२॥ जहाँ जहाँ यह मन अपना हित देखर है, यही नित्य नये दुम्म यदते ही जाते हैं। रुचिको अच्छी लगनेवार यात दूरसे ही डरकर भाग जाती हैं और जिनको मन नहीं चाहर ये ही अपार चीजें सामने आ जाती है। यर्थात् मुखके लिये चेष्टा करने भी अपार दुःख ही आते हैं ॥३॥ मन चिन्तामा इव रहा है, शर रोगोंके मारे व्याकुल है, और पाणी झूठी तथा मलिन हो रही है (म असत्य, कठोर और कुवाच्य ही योलती है)। किन्तु यह सब है हुए भी हे नाय! आपके साथ इस तुलसीदासका सम्बन्ध और प्रे ज्यों-का-त्यों बना हुआ है। (धन्य हैं जो इस प्रकारके अधमके साथ। प्रेमका सम्बन्ध स्थायी रखते हैं।) ॥४॥ [१९६] काहेको फिरत मन, करत बहु जतन, मिटै न दुख बिमुख रघुकुल चीर । कीजै जो कोटि उपाइ, त्रिविध ताप न जाइ, कह्यो जो भुज उठाय मुनियर कीर ॥ १॥ सहज टेव रिसारि तुही धौं देखु बिचारि, मिल न मथत पारि घृत विनु छीर। समुझि तजहि भ्रम, भजहि पद-जुगम, .. सेवत सुगम, गुन गहन गंभीर ॥२॥ आगम निगम ग्रंथ, रिपि-मुनि, सुर-संत, सब ही को एक मत मुनु, मतिधीर ।

पिनय-पत्रिका
तुलसिदास प्रभु दिनु पियास मरे पसु,
जयपि है निकट सुरसरि-तीर ॥३॥
मावार्थ-अरे मन! तू किसलिये बहुत-से प्रयत करता फिरता है ?
जरतकतू धीरघुकुल-शिरोमणिरामजीसे चिमुग्ध है तयतक (दूसरे कितने
मी माधनोंसे तेरा दुःख नहीं मिटेगा)।भगवद्विमुख करोड़ों उपाय क्यों न
करे, पर उसके दैहिक, दैविक, भौतिक तीनों ताप नष्ट नहीं हो सकते, यह
यात मुनि श्रेष्ठ शुकदेवजीने भुजा उठाकर कद्दी है ॥१॥ अपने स्वभावकी
टेकको छोड़कर-श्रीराम-विमुखताको आदत छोड़कर एकाग्र चित्तस तू
ही विचारकर देय कि कहीं पानीके मथनेसे, विना दूधके घी मिल सकता
। (इसी प्रकार विषयोंमें रत रहनेसे कभी सुख नहीं मिल सकता)।
इस यातको समझकर भ्रमको छोड़ दे, और श्रीरामचन्द्रजीके उन युगल
चरणोंका भजन कर, जो संचासे मुलभ है और सद्गुणोंके गम्भीर बन
हैं, अर्थात् जिन चरणों की सेवा करनेसे विवेक, वैराग्य, शान्ति, सुख
आदि अनायास ही प्राप्त हो जाते हैं ॥२॥ बुद्धि स्थिर करके शास्त्रों, वेदों,
अन्य अन्यों, ऋषियों, मुनियों, देवताओं और सन्तोंका जो एक निश्चित
सिद्धान्त है, उसे मुन (यह सिद्धान्त यही है कि सब आशाओंको
छोड़कर श्रीभगवानके शरण होना चाहिये ) हे तुलसीदास ! यद्यपि
गंगाका तट निकट है, तो भी विना सामीके पशु प्यासा ही मराजाता
(इसी प्रकार यद्यपि भगवत् प्राप्तिरूप परमसुख सहज ही मिल सकता
पर भगवानकी शरण हुए बिना यह दुर्लभ हो रहा है) ॥३॥

पिनय-पत्रिका ३१ [१७] नाहिंन चरन-रति, ताहि ते सही विपति, कहत श्रुति सकल मुनि मतिधीर । वस जो ससि-उछंग मुघा-सादित कुरंग, ताहि क्यों भ्रम निरखि रविकर-नीर ॥१॥ सुनिय नाना पुरान, मिटत नाहिं अग्यान, पदिय न समुझिय जिमि सग कीर । बधत बिनहिं पास सेमर-सुमन-आस करत चरत तेइ फल दिनु हीर ॥२॥ कछु न साधन-सिघि, जानी न निगम-विधि, नहिं जप-तप, वस मन, न .समीर । तुलसिदास भरोस परम करुना-कोस, प्रभु हरिहै विपम भवभीर ॥३॥ भावार्थ-श्रीरघुनाथजीके चरणों में मेरा प्रेम नहीं है, इसीसे मैं विपत्तियोंको मोगरहा है, (मराही नहीं) वेदोंऔर समस्त बुद्धिमान मुनियों- का (मी) यही कहना है। क्योंकि जोहिरणचन्द्रमाको गोदमें बैठा अमृतका स्वाद ले रहा है, उसेमला मृगतृष्णाकेजलमेंभ्रम फ्यों होगा? (जिम जीवने श्रीराम-पद-कमलोंके प्रेमानन्दका अनुमय कर लिया यह मिभ्या मंसारी सुखों में क्यों भूलेगा?)॥१॥ जैसे पक्षी (तोता) पढ़ता तो सय रमझता कुछ नहीं है, वैसे ही विना समझे अनेक पुराण सुननेसे प्रभान हाँ मिटता। (अज्ञानी) तोता शिना ही फन्देके स्थयं बंध जाता है। , विनय पत्रिका माप ही चांगली पकड़कर लटक रहता है; घद्द (मूर्ख तोता) सेमरके फूलकी बाशा करता है पर ज्यों ही उसमें चोंच मारता है, उस यिना गूदेका फल मिलता है अर्थात् रुईके सिया उसमें खानेके लिये कुछ भी नहीं मिलता, तप पछताता है (इसी प्रकार मनुष्य विषयरूपी चांगली पकड़कर आप ही बधा रहता है तथा विषयोंसे सुखी होनेकी आशासे उनके घटोरनेमें लगा रहता है, परन्तु विछुड़ते ही दुखी हो जाना है) ॥२॥ न तो मेरे पास कोई साधन है और न मुझे कोई सिद्धि ही प्राप्त है। न में वैदिक विधियों को ही जानता हूँ, न मुझे जप-तप करना आता है और न प्राणायामसे ही मैंने मन घशमें किया है। इस -अतुलसीदासको तो करुणाके भण्डार भगवान रामचन्द्रजीका ही एकमात्र 'भरोसा है। वही इसकी भयानक सांसारिक विपत्तिको दूर करेंगे, जन्म-मरणसे मुक्त करेंगे ॥३॥ [१९८] मन पछितैह अवसर पीते। दुरलम देह पाइ हरिपद भजु, करम, वचन अरु ही ते ॥१॥ सहसपाहु, दसबदन आदि नृप बचे न काल बलीते । हम हम कार धन-धाम सँवारे, अंत चले उठि रीते ॥२॥ मुत-चनितादि जानि म्यारथरत, न करु नेह सपही ते । अंतहुँ तोहिं तजेंगे पामर ! तू न तजे अबही ते ॥३॥ अब नाहिं अनुरागु, जागु जड़, त्यागु दुरासा जी ते । बुन काम अगिनि तुलसी कहुँ, विषय-मोग बहु धी ते ।। ४ ।। राग भैरवी

३२
यिनय-पत्रिका
भावार्थ-अरेमन!(मनुष्य-जन्मकी मायुकायह) मुभयसरवीतजा
पर तुझे पछताना पड़ेगा। इसलिये इम दुर्लममनुष्य-दारीरको पाकर कर्म
पचन और हदयसेमगवान्केचरण-कमलोंका भजन कर ॥॥ सहस्रका
और रावण आदि (महाप्रतापी) राजा भी बलवान् कालसे नहीं बन
सके, उन्हें भी मरना पड़ा। जिन्होंने 'हम हम' करते हुए धन और धान
सँभाल-समालकर रक्खे थे, वे मी अन्तसमय यहाँसे खाली हाय हाच
गये (एक फोड़ी मी साय न गयी)॥२॥ पुत्र, स्त्री आदिको स्वार्थी समझ
इन सबसे प्रेम न कर। अरे अधम! जब ये सब तुझे अन्त समयमें हो
ही देंगे, तो तू इन्हें अभीसे क्यों नहीं छोड़ देता ? (इनका मोह छोड़कर
अमीसे भगवानमें प्रेमक्यों नहीं करता?)॥३अरे मूर्ख!(अमान-निद्राम)
जाग, अपने स्यामी (श्रीरघुनाथजी) से प्रेम कर और हृदयसे (सांसारिक
विपर्योसे सुखकी ) दुराशाको त्याग दे, (विषयोंमें सुख है ही नहीं, तब
मिलेगा कहाँसे ? ) हे तुलसीदास ! जैसे अग्नि बहुत-सा घी डालनेसे नहीं
बुझती (अधिक प्रज्वलित होती है), वैसे ही यह कामना भी
ज्यों-ज्यों विषय मिलते हैं त्यों-ही-त्यों बढ़ती जाती है । (यह तोमन्तोप-
रूपी जलसे ही वुझ सकती है) ॥४॥
मंह
काहेको फिरत मूद मन पायो ।
वजि हरि-चरन-सरोज सुधारस, रविकर-जल लप लायो॥१॥
त्रिजग देव नर असुर अपर जग जोनि सफल भ्रमि आयो ।
गृह, पनिता, सुत, पंधु भये पहु, मातु-पिता जिन्ह जायो ॥२॥

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पिनय-पत्रिका भोगोंकी प्राप्ति होगी कामनाकी अग्नि उतनी ही अधिक मड़कगी) Pl जय विषयोंकी प्राप्ति नहीं हुई तब तुझे बड़ा दुख हुआ, (उनके नारास और उनके मिल जानेपर भी)बड़ी विपत्ति प्राप्त हुई, खप्नमें मीसुख नहीं मिला। इसलिये येदोंने इस विषयरूपी धनको, दोनों ही प्रकारसे, भूतकी आग समान दुःखप्रद यतलाया है (मतलब यह कि विषयी लोगोंको न तो विषयकी प्राप्तिम सुम होता है, और न अप्राप्तिम ही) ॥५॥ अरे ! तेरा जीयन क्षण-क्षणमें क्षीण होरहा है, इस दुर्लभ मनुष्य-शरीरको तून व्यर्थ हीखो दिया । अतएव, हे तुलसीदास!तूसंसारी सुखकी आशा छोड़कर केवल श्रीहरिका भजन कर । सावधान, कालरूपी साँप संसारको साये जा रहा है (न जाने, कय किस घड़ी तू भी कालका कलेवा हो जाय) ॥६] [२००] L- ताँबे सो पीठि मनहुँ तन पायो । नीच, मीच जानत न सीस पर, ईस निपट विसरायो ॥१॥ अवनि-खनि,धन-धाम,सुहृद-सुत, को न इन्हहिं अपनायो ? काके भये, गये सँग कार्क, सब सनेह छल-छायो ॥२॥ जिन्ह भूपनि जग-जीति, याँधि जम, अपनी बाँह बसायो । तेऊ काल कलेऊ कीन्हे, तू गिनती का आयो॥३॥ देखु बिचारि, सार का साँचो, कहा निगम निजु गायो । भजहिं न अजहुँ समुझि तुलसी तेहि, जेहि महंस मन लायो ॥४॥ भावार्थ-अरे जीव ! मानो तूने तोयेसे मढ़ा हुआ शरीर पाया है ! (तमी तो कच्चे घड़के समान फूटनेयालं, पानीके युदेके समान

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! पिनय-पत्रिका गई न निज-पर-घुद्धि, सुद्ध है रहे न राम-लय लाये । तुलसिदास यह अवसर पीते का पुनि के पछिताये ||५|| भावार्थ-मनुष्य-शरीर पानेसे क्या लाभ हुआ जब कि घह कमी, स्वममें भी, मन, वाणी और शरीरसे दूसरे के काम नहीं आया ॥१॥ विषय- सम्बन्धी जो सुख स्वर्ग, नरक, घर और यनमें बिना ही घुलाय, आपसे आप आ जाता है, उस सुग्यके लिये, अरे मन ! तू अनेक प्रकारके उपाय कर रहा है ! समझानेपर भी नहीं समझता ॥२॥ हे मूद ! तूने अशानके वश होकर परायी स्त्रीके लिये और दूसरोंसे घेर करनेके लिये मनमाने आचरण किये । गर्भमै महान् दुःख, दारुण कष्ट और विपत्ति भोगी थी उसे भूल गया (यह नहीं सोचा कि हन मनमाने कु-काँसे फिर : वही गर्भयासके दुःख भोगने पड़ेंगे ) ॥३॥ डर, नींद, मैथुन और भोजन आदितो संसारमें जन्म लेनेवाले सभी जीवॉमें एक-से हैं। परन्तु तो देवताओंको भी दुर्लभ मनुष्य-शरीरको पाकर उससे भी भगवानका भजन नहीं किया और अहंकार और घमण्डमें उसे खो दिया ॥४॥ जिनकी मेरे-तेरेकीभेदबुद्धि नष्ट नहीं हुई और शुद्ध अन्तःकरणसे जिन्होंने श्रीराममें चित्तको लीन नहीं किया उन्हें, हे तुलसीदास ऐसा यह (मनुष्य- शरीरका) सुअवसर निकल जानेपर फिर पछतानेसे क्या मिलेगा! (इसलिये चेतकर अभीभगवान्केभजनमें लग जाना चाहिये) ॥५॥ [२०२] : काजु कहा नरवनु धरि सारयो । पर उपकार सार श्रुतिको जो, सो धोखेहु न विचारयो ॥१॥ तूने

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॥ विनय पत्रिका म्मरण नहीं किया न मनस, कर्ममे और पवनमें अपने (सधै) मामी, गुरु, पिना मीर मित्र उन ग्रीरघुनायजीको मुना दिया । नुलामीदाग ! भय तो यही माशा है कि जिसने जटायु गायको ठार दिया था, यही तुमे मी मपनी शरणमें रपयगे ॥ [२०३] श्रीहरि-गुरु-पद-कमल मजहु मन तजि अमिमान । जेहि सेवत पाइय हरि मुख-निधान भगवान ॥१॥ परिया प्रथम प्रेम बिनु राम-मिलन अति दुरि जद्यपि निकट हृदय निज रहे सकल भरिपूरि ।।२।। दुइज द्वत-मति छाडि चरहि महि-मंडल धीर । बिगत मोह-माया-मद हृदय यसव रघुवीर ॥३॥ तीज विगुन-पर परम पुरुप श्रीरमन मुकुंद । गुन मुभाव त्यागे पिनु दुरलभ परमानंद ॥४॥ चौथि चारि परिहरहु बुद्धि-मन-चित-अहँकार । विमल विचार परमपद निज सुख सहज उदार ।।५।। पाँचइ पाँच परस, रस, सन्द, गंध अरु रूप । इन्ह कर कहा न कीजिये, बहुरि परय भव-कूप ।।६।। छठ पटवरग करिय जय जनकमुता-पति लागि । रघुपति-कृपाचारि दिनु नहिं बुताइ लोभागि।। - सात सप्तधातु-निरमित तनु करिय विचार । तेहि वनु केर एक फल, कीजै पर उपकार |८||

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पिनय-पत्रिका ३२८ भवसागर कहूँ ना मुद् संतनके चरन । तुलमिदास प्रयाम बिनु मिलहिं राम दुखहरन ॥२०॥ भाषा-६ मन ! ( अभिमान छोड़कर मगरव-रूपी श्रीगुरुके चरणारविन्दोंका भजन कर। जिनकी मेया करनेस आनन्दयन भगवान श्रीहरिकी प्रामि हो जाती है ॥१॥ जैसे प्रतिपदा (पक्षमे सबसे पहला दिन है) उसी प्रकार (सर्व साधनोंमें) प्रथम प्रेम है । प्रेमके दिना श्रीरामजीका मिलना यहुत दूरकीयात है। यद्यपि यहुत ही निकट सबके हृदय में ही पूर्णरूपसेनियास करते हैं ॥२॥धारभावसे (भचञ्चल विचस) द्वितीयाके समान दूसरा साधन यह है, कि द्वैत बुद्धि (ईश्वर और जीवमें भेद-युद्धि) छोड़कर (समदृष्टिसे) समस्त पृथ्यो मण्डलमें (निश्चिन्त होकर) विचरण करना चाहिये । मोह, माया और घमण्डसे रहित हृदयमें सदा हैं ॥३॥ सृतीयाके समान तीसरा उपाय यह है कि परम पुरुष, लक्ष्मीकान्त श्रीमुकुन्द भगवान तीनों गुणोंसे परे हैं । अतएव (सत्त्व रज और तम) त्रिगुणमयी प्रकृतिका त्याग कर देना चाहिये। ऐसा किये बिना परमानन्दकी प्राप्ति दुर्लम है (जबतक पुरुष प्रकृतिमें स्थित है तभीतक वह जीव है और तभीतक सुख-दुःखका भोक्ता प्रकृतिमेसे निकलकर स्व-स्थ-परमात्मारूपी स्व-रूपमें स्थित होनेसे ही मोक्षरूप परमानन्द मिलता है) ॥॥ चतुर्थीक समान (मगवतः प्राप्तिका) चौथा साधन यह है कि बुद्धि, मन,चित और महंकार--नके समुदायरूप 'अन्तःकरण' का त्याग कर देना चाहिये (जवतक शरीर है श्रीरघुनायजी निवास करते

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पिनय-पत्रिका माधन यह है कि जिमने इस मी दरवाज़ेकी नगरी मर्यान् नी छेदनाले शरीरम रहकर अपने मामाका करगण नहींशिया,पह अनेक योनियाने भटकता हुआ नाना प्रकार धारण बोंको प्राम होगा ( इधनिय आरमा कल्याणके लिये ही प्रयत करना चाहिये) ३१०॥ दामी ममान दमयाँ मापन यह है कि जिमने दमा इन्द्रियाँका मंयम करना नहीं जाना, इन्द्रियोंको यश नहीं किया, उसके सारे साधन निफर हो जाते हैं और उस इन्द्रियोंक दास, अभयमी मनुष्यको भगवान की मानि नहीं हो सकती ॥११॥ एकादशीक समान ग्यारहयाँ साधन यह है कि मनको यश करके एक धीमगयानकी ही सेवा करनी चाहिये । इसीसे (परमार्थरूपी एकादशी) यतका जन्म-मरणके नाशरूप (परम) फल मिलता है। अर्थात् यह भगवान्को माप्त हो जाता है ॥१२॥ द्वादशी दिन दान दिया जाता है, अतः वारहवाँ साधन यह है कि प्रेमा (भगवत्-प्रीत्यर्थ निष्काम वुद्धिसे) दान देना चाहिये जिससे तीनों लोकॉसे भय न रहे ( भगवत्प्राप्ति हो जाय) । उस द्वादशीपी वारहवें साधनका पारण यही है कि सदा परोपकारमें लगे रहना चाहिये । (इस दान और पारणसे) फिर शोक नहीं व्यापता ॥१३॥ प्रयोदशीके समान तेरहवाँ साधन यह है कि जाप्रत्, स्वम और मुघुमि-- इन तीनों अवस्थाओंको त्यागकर भगवानका मजन करना चाहिये (भाय यह कि नित्य-निरन्तर, सोते-जागते,श्रीभगवद्-भजन ही करना चाहिये। भगवान् मन, कर्म और वाणीसे जानने में नहीं आते, क्योंकि (बर्फमें जलको भाँति) धे ही सबमें व्याप्त है और (स्वमके दृश्योंकी भाँति) स्वयं ही व्याप्य हो रहे हैं तथा असीम, अनन्त है (उनको तो यही जान

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यिनय-पत्रिका सन्देहोंके नाश करनेवाले, दुःखोंके दूर करनेवाले और सुमके निधार केवल एक श्रीहरि ही हैं। चाहे जितने ही उपाय कर लो, सन्तों की कपाके बिना वे नहीं मिल सकते (अतःसन्त-कृपा हीसर्व साधनोंमें प्रधान है ) ॥१९॥ संसाररूपी समुद्रसे तरने के लिये सन्तोंके पवित्र चरम रे नौका है । हे तुलसीदास ! (इस नौकापर चढ़कर अर्थात् सन्नी चरणॉकी सेवा करनेसे) दुःखोंके नाश करनेवाले श्रीरामचन्द्रजी दिना ही परिश्रमके मिल जायेंगे ॥२०॥ राग कान्हरा [२०५] जो मन लाग रामचरन अस। देह-गेह-सुत-पित-कलत्र महँ मगन होत विनु जतन किये जस ॥१॥ द्वंद्वरहित, गतमान, ग्यानरत, विपय-विरत खटाइ नाना कम । सुखनिधान सुजान कोसलपति ह प्रसन्न, कडु, क्यों न होंहि यस॥२॥ सर्वभूत-हित, निय॑लीक चित, भगति-प्रेम हद नेम, एकरस । * तुलसिदाम यह होर तपहिंजय द्रव ईस, जेहि हतो सीसदस ॥३॥ माशर्य-जो यह मन श्रीरामचन्दजी चरणों में से दी लग जाय, जमे कि यह पिना ही किमी प्रयतयमापसे ही शरीर, घर, पुत्र, धन १ 'कम' अन्द यक' या कांस्य' का आग मारम होता है, शा पीतयो और कांस्य नोंदा-गंगा मिली धातुको करते हैं, इन दोनों के पास नटार विगह जाती है।

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पिनय-पत्रिका
मावार्थ-ई मन ! यदि तू भगयरूपी करावृसका सेवन करण
चाहता है, तो विषयोंके विकारको छोड़कर साररूप नीराम-नामा
भजन कर और जो मैं कहता हूँ उसयय मी कर(अमीतक कुछ दिम
नहीं) ॥१॥ समता, सन्तोष, निर्मल विवेक और सत्संग-इन चार
ढतापूर्वक धारणकर । काम, क्रोध, लोम, मोह, अमिमान एवं राप
और द्वेषको बिल्कुल हो छोड़ दे, इनका लेशमात्र मी नरहे ॥२॥ कानासे
भगयत्कथा सुन, मुखसे (राम) नामजपा कर, हृदय में श्रीहरिका ज्यान
क्रिया कर, मस्तकसे प्रणाम तथा हाथोंस मगवान्की सेवा किया कर।
नेत्रोंसे रुपासागर चराचर विश्यमय महाराज जानकीवल्लभरामचन्द्र
के दर्शन किया कर ॥३॥ यही मक्ति है, यही वैराग्य है, यही शान
और इसीसे भगवान् प्रसन्न होते हैं, अतएव तु इसी शुम मतका आवरण
कर। हे तुलसीदास ! यही शिवजीका बतलाया हुआ मार्ग है । इस
(कल्याणमय) मार्गपर चलनेसे स्वप्नमें भी भय नहीं रहता (मनुष्य
परमात्माको प्राप्तकर अमय हो जाता है) on
[२०६] .
नाहिन और कोउ सरन लायक दूजो श्रीरघुपति-सम विपति-निवारन ।
काको सहज सुभाउ सेवकवस, काहि प्रनत पर प्रीति अकारन ॥१॥
जन-गुन अलप गनत सुमेरु करि, अवगुन कोटि विलोकि पिसारन।
परम कृपालु, भगत-चिंतामनि, विरद पुनीत, पवितजन तारन ॥२॥
सुमिरत सुलम, दास-दुख मुनि हरि चलत तुरत, पटपीत समारन ।
साखि पुरान-निगम-आगम सब, जानत दुपद-मता अरु पारन ॥३॥

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विनय-पत्रिका ॥ . आरत, अधम, कुजाति, कुटिल, सल, पवित,समीत, कहूँ जै समाहिना मुमिरत नाम चित्रसहूँ वारक पावत सो पद, जहाँ सुर जाहिं न ॥२॥ जाके पद-कमल लुब्ध मुनि-मधुकर, विरत जे परम सुगविहु लुमाहिंन । तुलसिदास सठ तेहि न मजसि कस, कारुनीक जो अनायहिं दाहिन भावार्थ-मजनं करने योग्य, मुख देनेवाला और शरणमे रखनेवाला स्वामी श्रीरघुनाथजीफे समान दूसरा कोई नहीं है।उन आनन्दधाम,दुःलाके नाश करनेवाले, शोकके हरनेवाले, लक्ष्मीरमण भगवान्के गुण गिनने- गिनते कमी पूरे नहीं होते ॥१॥जो दुस्खी, नीच, अन्त्यज, कपटी, दुष्ट पापी और भयभीत कहीं भी आश्रय नहीं पा सकते वे भी विवश होकर 'एक धार ही श्रीरामनाम-स्मरण कर उस (परम) पदपर पहुँच जाते हैं, जो देवता भी नहीं जा सकते ॥२॥ जिनके चरणरूपी कमलों में ऐसे बैराग्य- सम्पन्न मुनिरूपीभ्रमरलुभाये रहते हैं, जिन्हें परमसुन्दर गति मोक्षतकका लोभ नहीं है । हे शठ तुलसीदास ! तू उस अनाधोपर सदा कृपा करने थाले (परम) करुणामय प्रभुका भजन क्यों नहीं करता ? ॥३॥ राग कल्याण [२०८] नाथ सों कौन विनती कहि सुनायौं। त्रिविध विधि अमित अवलोकि अप आपने, सरन सनमुख होत सकुचि सिर नायीं ॥१॥ .

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यिनय-पत्रिका
।
यना फिरता है, परन्तु मन-ही-मन विषयोंका चिन्तन करता हुआउन्होंगे
ताकमें लगा रहता है) २॥ मैं इतना यड़ा पापी है कि मेरे एक रोनर
सौ करोड़ पापी निछावर किये जा सकते हैं, पर तोमी अपनेको सन्नी
गिनतीम सबसे पहले गिनयाना चाहता हूँ,सन्त-शिरोमणि धननेका दावा
रग्यता हूँ। मैं बड़ा ही असभ्य और नीच हूँ, परन्तु यमण्डम्पी पहार
चढ़ा बैठा हूँ । इसीसे तो मूर्म होनेपर भी अपनेको सर्वत्र और मक्तयेट
यतलाता हूँ ॥३॥ हे मगयन् ! कह नहीं सकता कि झूठ है या सब
पर कोई-कोई मेरे लिये यह कहते हैं कि 'यह रामजीका है और मैं मी
यापहीका कद्दलाया चाहता हूँ। हे देव ! इससे मव अपने वानेको टार
रखकर इस तुलसीदासको अपनाही लीजिये (क्योंकि जब आपका कहला-
कर भी दुष्ट ही रहँगा तो आपके विरदी लाज कैसे रहेगी!) मा
टालमटोल न कीजिये ॥४॥
[२०९]
नाहिने नाथ ! अवलंब मोहि आनकी ।
करम-मन-वचन पन सत्य करुनानिधे,
एक गवि राम ! भवदीय पदवानी ॥१॥
कोह-मद-मोह-ममतायतन जानि मन,
चाव नहि जाति कहि ग्यान-विग्यानकी ।
काम-संकलप उर निरखि बहु पासनहि,
आस नहि एकहू ऑक निरयानकी ॥२॥

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मिनय-विता
मनुष्यों की गंगा मीही कठिन है। ये लोग तमी प्रमा
जामोनियमांग किया जाय, या माग दिया जाय और
प्राणोंकी नि गदापी जाय । (पदमप मी मुमग महादसे मदः
माय इन मांगों का माशा करना मी मात्र
(सो गुमर्गी मगुगर लि) परम दुर्ल; पाकि शिव
गुफा गया मुनिरूप मारे मी मा परम-कमटॉक मपुर मारना
पीलिये गदा प्यामेही बने रहने (इस रमको पति-पीत अपवेमी
गही भयाने राप मुनमा मीन तो किस गिनती है।) हाँ, आपत्र
माम मपश्य दीपनिता पायन करनेवाला तथा शान्ति (मोक्ष)टमें
पाला मुना जाता है किन्तु वित्तमें अभिमानकी गाँठे पड़ी रहने
कारण (राम-नामक साधनसे मी) मन फिर भ्रम जाता
इतना यहा समझदार और विद्वान होकर मामूली राम-नाम में इन
अभिमानके मारे रामनामसे मी यश्चित रह जाता है) हे महाराज!
इन सप यातोंको देगते मेरा तो, यम, नरकमें दी जानेका अधिकार है,
मेरे कर्मोंसे तो मैं घोरमसाररूपोभंधेरे कुएंमें पड़ारहने योग्य ही हैं किन्तु
इतनेपर भी मुझे आपका ही पल है। यह तुलसीदास अपने मनमें गुहा
जटायु,गजेन्द्र और हनुमानकी जाति याद करके संसारके उस(जन्म-मरण)
भयको कुछ भी नहीं समझता (अन्त्यज, पशु और पक्षियाँतकका उद्धार
हो गया है तय मेरा क्यों न होगा ? अर्थात् अवश्य होगा) ॥५॥
[२१०]
औरु कहँ ठोरु रघुवंस-मनि ! मेरे ।
पतित-पावन प्रनत-पाल असरन-सरन,
घाँकुरे विरुद
विरुदेव केहि केरे॥१॥

विनय-पत्रिका समुझि जिय दोस अति रोस करिराम जो, करत नहिं कान बिनती पदन फेरे । वदपि है निडर ही कही करुना-सिंधु, क्योज्य रहि जात सुनि यात पिनु हेरे ॥२॥ मुख्य रुचि होत बसिवेकी पुर रावरे, राम! तेहि रुचिहि कामादि गन घेरे । अगम अपयरग, अरु सरग सुकतैकफल, नाम-पल क्यों बसौं जम-नगर नरे॥३॥ कतहुँ नहि ठाउँ, कहँ जाउँ कोसलनाथ ! दीन वितहीन हों, बिकल चिनु डेरे । दास तुलमिहिं बास देहु अब करि कृपा, यसत गज गीध व्याधादि जैहि खेरे ॥४॥ भावार्थ-हेरघुवंशमणि ! मेरे लिये (आपके चरणों को छोड़कर) और दो टीरपापियोंको पवित्र करनेवाले, शरणागतका पालन करनेवाले (वं अनाथाको आधय देनयाले एक आप ही हैं। आपका-सा याँका याना केर पानेवालेका है ? (किमीकाभीनहीं)॥ ॥ हेरघुनाथजी मेरे अपराधों- को मनमममनकर, अन्यन्त ग्रोधमे यद्यपि आपमेरी घिनतोको नहीं सुनते और मेरी भोरमे अपना मुंद फेरे हुए है, तथापि में तो निर्भय होकर, हे रणाके समुद्र! यही कहूँगा कि मेरी बान मुनकर (मेरी दोन पुकार सुनकर) मेरी योर दे गिना भाप कैमेरहाजाता है ? (करुणासागर- से दीनको मार्न पुकार सुनकर फैमे रहा जाय !) ॥२॥ (यदि भाप मेरी

विनय पत्रिका
मनोकामना पूछते हैं, तोसुनिय)मयमे प्रधान गघि नोमेरी मापन
धाममें जाकर नियास करने की है कि नाय ! उस मेरी रविको काम
मोध, लोम और मोहमादिने घेर रक्या है (इनके माक्रमगमे वह कामना
दय जाती है)। मोझ तो दुर्लम हैसर्ग मिलनामी कठिन है, क्योंकि वह
फेयल पुण्योंके फलसे ही मिलता है (मैन कोई उत्तम कर्म तोकिये नहीं
फिर मर्ग कैसे मिले ?) अय रही यमपुरी (नरक) सो उसके समीर मी
आपके नामके यलसे नहीं जा सकता (राम-नाम लेनेयालेको यमराज
अपनी पुरीके निकट ही नहीं आने देत) (इसस) अब मुझे कहींमीरहने
के लिये स्थान नहीं रहा, आप ही यताइये कहाँ जाऊँ? हे कोशलनाय !
निर्धन और दीन हैं (धनी होता, तो कहीं घर ही बनवा लेता), आम्रय -
स्थानके न होनेसे व्याकुल हो रहा हैं। इसमे है नाय ! इस तुलसीदासको
कृपाकर उसी गाँवमें रहने की जगह दे दीजिये जिसमें गजेन्द्र, जटायु.
व्याध (वाल्मीकि) आदि रहते हैं nen
[२११]
कबहुँ रघुवंसमनि ! सो कृपा करहुगे ।
जेहि कृपा ब्याघ, गज, विप्र, खल नर वरे,
तिन्हहिं सम मानि मोहि नाथ उद्धरहुगे ॥१॥
जोनि बहु जनमि किये करम खल विविध विधि,
अधम आचरन कछु हृदय नहि घरहुगे।
दीनहित ! अजित सरखग्य समरथ प्रनतपाल
चित मृदुल निज गुननि अनुसरहुगे ॥२॥

३४३ विनय-पत्रिका मोह-मद-मान-कामादि खल-मंडली सकुल निरमूल करि दुसह दुख हरहुगे। जोग-जप-जग्य-विग्यान ते अधिक अति, अमल हद भगति दै परम सुख भरहुगे ॥३॥ मंदजन-मौलिमान सफल, माधन हीन, कुटिल मन, मलिन जिय जानि जो डरहुगे। दासतुलसी बेद-विदित विरुदावली पिमल जस नाथ ! केहि मॉति विस्तरहुगे॥४॥ भावार्थ-हे रघुवंशमणि! कभी आप मुझपर भी यही कृपा करेंगे, जसके प्रतापी व्याध (याल्मोकि), गजेन्द्र ब्राह्मण अजामिल और अनेक ए संसारमागरसे तर गये ? हे नाथ! क्या आप मुझे भी उन्ही पापियोंक मिान समझकर मेरा भी उद्धार करेंगे? ॥१॥ अनेक योनियों में जन्म १ लेकर मैंने नाना प्रकार के दुष्कर्म किये हैं। भार में नीच माचरणोंकी गन तो हृदयमै नलागे दोनोंका दिन करनेवाले 'क्या आप किमि मीन जीते जाने, मब मन की बात जानने मय युछ करने में समर्थ होने. भीर शरणागनोंकी रक्षा करने आदि अपने गुणोंका कोमल सभायम अनुसरण करेंगे ? ( अर्थात् अपने इन गुणोंकी ओर देपर, मेरे पापा नहीं धिना कर, मेरे मनको पात जानार मपनी मर्यानिमतामे गुर वरणमे परे एका उद्धार नहीं करेंग!) २a मंगेहदयमें मन्नान. महंकार, मान, काम मादि दुर्शवी जी मण्डली पर रही है. उस परियारमात समूल नष्ट करके या भाप मेरे अमावाको दूर करेंगे? मार कपा

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विनय-पत्रिका गिने (न जाने इनके समान कितने पापियों को अपना धाम दे दिया) है तुलसीदास ! यात तो यह है कि जानकी-नाथ प्रभु रामचन्द्रजीने किस. किमको मुक्त नहीं कर दिया, (जिमने शरण ली, उसीको मुक्ति दे दी, फिर मुझे क्यों न देंगे!)॥३॥ [२१३] हरि-सम आपदा-हरन। नहि कोउ सहज कृपालु दुसह दुख-मागर-तरन ॥१॥ गज निज बल अवलोकि कमल गहि गयो मरन । दीन पचन मुनि चले गढ़ तजि सुनाम-धरन ॥ २ ॥ दुपदमुताको लग्यो दुमासन नगन करना 'हा हरि पाहि' कहत पूरे पट विविध घग्न ।।३।। इहै जानि सुर-नर-मुनि-कोचिद सेवत चरन । तुलसिदास प्रभु को न अभय कियो नृग-उद्धरन ॥ ४ ॥ भार्य-भगवान् श्रीहरिके समान विपत्तियोंका दरनेवाला, सहज हो कृपा करनेवाला और दुम्मद दुम्मरूपी समुदसे नारनेवाला दूसरा कोई नहीं है ॥१॥ जय गजगज मरना पल (क्षीण हुआ) देवकर (भेंटके लिये) कमलका फल ले आरकी रणमें गया तय उसके दीन पचन सुनकर मुदर्शनयम ले आप गाएको यही छोड़ तुरन्त (पैदल दौड़ते हुए) चले आये ॥२॥ अथ (मर्ग सभा) दुए दुशासन नौपदीका पल उतारने लगा. तर पंपल उमरतना पाहनपर ही कि साप ! भगपन्, मेरी रक्षा कीजिय' मापने पिपिधरंगोजीमारियांकार लगा दिया Rn (भापकी इमी दीनपरमलतामो) जानकर आना, ३१ विनय-पत्रिका मनुष्य, मुनि मोर पिहान् आपके घरणोंकी सेवा करते हैं। राजा नुगः उद्धार करनेवाले भगयान्न किसको अमय नहीं किया? (जो उनके शरणमें गया, उसीको भमय कर दिया) en राग कल्याण [२१४] ऐसी कौन प्रमुकी रीति? विरद हेतु पुनीत परिहरि पाँवरनि पर प्रीति ॥ १॥ गई मारन पूतना कुच कालकूट लगाइ । मातुकी गति दई वाहि कृपालु जादवराइ ॥२॥ काम-मोहित गोपिकनि पर कृपा अतुलित कीन्ह । जगत-पिता बिरंचि जिन्हके चरनकी रज लीन्ह ॥३॥ नेमतें सिसुपाल दिन प्रति देत गनि गनि गारि । कियो लीन सु आपुमें हरि राज-समा मँझारि ॥४॥ व्याध चित दै चरन मारथो मूहमति मृग जानि ! सो सदेह खलोक पठयो प्रगट करि निज पानि ॥५॥ कौन तिन्हकी कहै जिन्हके सुकृत अरु अब दोउ । प्रगट पातकरूप तुलसी सरन राख्यो सोउ ॥ ६॥ . भावार्थ-(भगवान के सिवा) और किस स्यामीको ऐसी रीति है लिये पवित्र जीयोंको छोड़कर पामरोंपर प्रेम करता ॥३॥ राक्षसी पूतना स्तनों में विप लगाकर उन्हें (मगवान् कृष्ण 1 विनय-पत्रिका को) मारने गयी थी, किन्तु कृपालु यादवेन्द्र श्रीकृष्ण ने उसे माताकी-मी गति प्रदान की (उसका उद्धार कर दिया) ॥ आपने काममोहिन गोपिॉपर ऐसी अतुल कृपा की कि जगत्पिता ब्रह्माने भी उनके चरणों- को धूलि (अपने मस्तकपर) चढ़ायी ॥३॥जो शिशुपाल नियमसे प्रनि- दिन गिन-गिनकर गालियाँ देता था उसको आपने राजाओंकी सभाम (पाण्डयोंके राजसूय यसमें) सबके देखते-देखते अपने में ही मिलालिया॥४॥ भूर्व यहेलियेने तो मृग समझकर आपके चरणमें निशाना लगाकर (याण) मारा, पर उसे भी आपने अपनी दयालुताकी थान प्रकट करके सदेह अपने परमधामको भेज दिया ॥॥ ( इस प्रकारके जीवॉन) जिन्होंने पुण्य और पाप दोनों ही किये हैं उनके लिये तो क्या कही जाय! (फ्योंकि उनका ती सगति पानका कुछ-न-कुछ अधिकार ही था) किन्तु उन्होंने प्रत्यक्ष पापमूर्ति तुलसीको भी तो शरणमें गम लिया है (इसीसे उनकी यान प्रत्यक्ष सिद्ध हो जाती है ) ६॥ [२१] श्रीरघुवीरकी यह पानि । नीचह सौ करत नेह सुप्रीति मन अनुमानि ॥१॥ परम अधम निपाद कॉन ताकी कानि? लियो सो उर लाइ सुत ज्या प्रेमको पहिवानि ॥२॥ गीप फोन दयानु, जो विधि रच्यो हिंसा मानि ? जनक ज्या रघुनाप तायाह दियो जल निज पानि ॥३॥ पॉवर, ११ मानि-मनिन जाति गर्ग गाल प्रागुन मानि । गाना न निमसि पानि सानि ॥१॥ गानिमा गनिमीन मान मानो जानि । भाग पो उहि नारि मेटल दर-दमा मुलानि ॥५॥ कौन रामग गुगीन पाना, जिनः शुमित हानि । रिसे र गमा, पूर्व मान अपने आनि ॥६॥ गम गाज कगन कोमल दानहिन दिनदानि । मजाति में प्रमुख तुलमी इटिल कपट न ठानि ॥ ७॥ भाषा-rपुनापती गीही मानहिये मनमें गिगुर भीमनग्ग प्रेम गमारमायामागमी स्नेह करते(प्रमागमुनि गुद निगरमदान नीर मोर पारी, उसकी क्या रजत थी! दिन भगपान्ने उमका (मनग्य मोर पिपुर)प्रेम पदयानकर उसे पुरमीत पसे लगा लिया ३२n जटायु गीप, जिसे प्रहाने हिंसामय ई. थनाया था, कौन-मा दयालु या!किन्तु रघुनायीने अपने पिताके समान उसको मपने हायसे जलालि दी ॥३॥ शररी समायसे ही मैली-कुचली, नीच जातिकी और समी अवगुणोंकी सानि थी। परन्तु ( उसकी पिशुद्ध और अनन्य प्रीति देसार) उसके हायके फल साद पवान-यघानकर आपने यई प्रेमसे साये non राक्षस एवं शत्रु विमीपणको शरणमें पाया जानकर आपने उठकर उसे मरतकी भौति ऐसे प्रेमसे हृदयसे लगा लिया कि उस प्रेमविशलतामें आप अपने शरीरकी सुध-युध भी भूल गये ॥५॥ बन्दर कौन-से सुन्दर और विनय-पत्रिका शील-समायके थे जिनका नाम लेनेस भी हानि हुआ करती है, उन्हें भी मापने अपना मित्र यना लिया और अपने घरपर लाकर उनका सरकार सादरसत्कार किया ॥६॥ ( इन मय प्रमाणे में सिद्ध कि) श्रीरामचन्द्रजी समायम ही कृपालु, कोमल म्यमाययाले, गरीबोफ. दिन और सदा दान देनेयाले है। अतएय है तुसमी ! न ना कुटिलना और कपट छोड़कर ऐसे प्रभु श्रीराम का ही (विशुद्ध धार धनन्य प्रेम सदा)मजन किया कर [२१] हरि तजि और मजिये काहि ? नाहिन कोउ राम मां ममता प्रनन पर जाहि ॥१॥ कनककमिपु सिंचिको जन करम मन अरु धान । गुतहि दुखवत विधि न परज्यो कालके पर बान ॥२॥ संस-सेवक जान जग, पर मार दिये दम मीम । फरत गम-विरोध मो मपनं न हटग्यो म ॥ ३ ॥ और देवनकी कहा कहाँ, पारयहिक. मीत । फरफान गग्वि लियो कोउ मग्न गपउ मीन ॥४॥ फोन सेवन देत मपति सोकर या गनि । दामतुलमी दीनपर एक. गम ही की प्रीति ॥५॥ भाग-भगवान धाति मर मिसन ? भारपुमापनोगमान गयीमहरी मिरा HTTER रमममा. (ममा गुनिये ) nिirmwari.

चिय-गरिहा
मन मीर घगनग मन, गाजिन्तु ममान (इम कानको जानते हुर मी
उमपुर (महाद)को गाइना ने ममय नहीं रोका (और फलबार
पद पमनोक मला गया। यदि ये पहलेम उमेगा देत तो येमाग
माता ! २॥ मंमार जानता किरायन शिवजीका मन या
उमने का पार भपने मिर काट-काटकरशियीको अर्पित किये ये ग्नुि
जय याद श्रीरघुनाथजीक माय पर करने लगा तब आपने उसे खाने
भीग रोका (यह जानतंकिधीरामजीसाय वर करनेसे यह मारा
লায়ল) n ( মালী মহিলা যং রাত বমী
देयताओंकी नीयातही क्या कहीं जाय येनोसाय के मित्र हैं ही। उनमें
किसी ने भी कमी मयमीत शरणागतकी रक्षा नहीं की सेवा करनेसे
कौन धन नहीं देता है ? (सभी देते हैं। यह तो दुनियाकी चाल ही
है। किन्तु हे तुलमीदास ! दीनॉपर तो एक श्रीरघुनायीका ही स्नेह
है। (ये बिना ही संयाके किये कंचल शरण होते ही अपना लेते हैं।
देवतामाको भाँति सर्योगपूर्ण अनुष्ठानकी अपेक्षा नहीं करते ) ॥५॥
[२१७] -
जो पं दूसरो कोउ होइ।
वौ हाँ यारहि यार प्रमु कत दुख सुनावों रोइ ॥१॥
काहि ममता दीनपर, काको पतितपावन नाम ।
पापमूल अजामिलहि केहि दियो अपनो घाम ॥२॥
रहे संभु विरंचि सुरपति लोकपाल अनेक ।
सोक-सरि चूड़त करीसहि दई काहु न टेक ॥३॥

विनय-पत्रिका विपुल-भूपति-सदसिमहँ नर-नारि कह्यो'प्रभुपाहि' । सकल समरथ रहे, काहु न बसन दीन्हों ताहि ॥४॥ एक मुख क्यों कहाँ करुनासिंधुके गुन-गाथ ? भक्तहित धरि देह काह न कियो कोसलनाथ ! ॥५॥ आपसे कहुँ सौपिये मोहि जो पं अतिहि पिनात । दासतुलसी और विधि क्यों चरन परिहरि जात ।।६।। भावार्थ-हे नाथ ! यदि कोई दूसरा (मुझे शरणमें रखनेवाला) होता, तो मैं बार-बार रोकर अपना दुःख आपको ही क्यों सुनाता? ॥१॥ (आपको छोड़कर ) दीनॉपर किसकी ममता है, पतितपावन किसका नाम है ? और महापापी अजामिलको (पुत्रके धोखेसे आपका नारायण नाम लेनेपर), किसने अपना परम धाम दे दिया ? (पैसे एफ आप ही है और कोई नहीं है) ॥२॥ शिव, ब्रह्मा, इन्द्र आदि अनेक लोकपाल थे, पर शांकरूपी नदी में डूबते हुए गजराजको किसीने भी नहीं बचाया (आपदीको गरुड़ छोड़कर दौड़ना पड़ा) ॥३॥ अब बहुतसे राजाओंकी समामें (नरके अवतार ) अर्जुनकी स्त्री द्रौपदीने (दुःशासनद्वारा सताये जानेपर ) कहा कि 'हे प्रभो! मेरी रक्षा कीजिये'-उस समय पहाँ सभी समर्थ थे, पर किसीने उस वस्त्र नहीं दिया (मापने ही घरखावतार धारणकर उस अचलाकी लाज रफ्ती) ४॥ करणा- सागर ! बाप करुणा-समुद्रक करणापूर्ण गुणोंकी कथाएँ एक मुँहसे कैसे कहूँ। हे कोशलाधीश आपने मतांके लिये अवतार धारणकर फ्या. क्या नहीं किया।(मतोंके हित के लिये सभी पुछ किया) ॥५॥ यदि . ty traf .गोगो विगो देश में जो (मी) या गुरमीमा frritatest artiyाने मार Itihar marta भारी माना गमन गान फलंगकनि-मल, गाल मंगल-करन ॥१॥ गरद-मर गुंदर रनार असन-पारिज परन। समित लालिग सनित करतल धरि अनाम घरन ॥२॥ गंग-जनरु अनंग-रि-मिप कपट-पट पलि-उरन । विप्रलिप नृग पधिरके दुस-दोम दास्न दरन ॥३॥ सिद-गुर-मुनि-पंद-मंदिन मुगद सर कह सरन । मन उर आनत जिनहिं जन होत तारन-वरन ॥४॥ रूपासिंधु मुजान रघुबर प्रनत आरति-हरन । दरस-आस-पियास तुलसीदास पाहत मरन ॥५॥ भावार्य-देहर! क्या कमी माप अपने उन पवित्र चरणोंका दर्शन करायेंगे जो समस्त शो और कलियुगके सभी पापोंके नाश करनेवाले और सम्पूर्ण कल्याणक कारण ! जिन (चरणों) का रंग शरद ऋतुमें उत्पन्न, सुन्दर भौर तुरन्तके खिले हुए लाल-लाल कमलीके समान है, जिन्हें थोलमीजी अपनी सुन्दर हथेलियोंसे दवाया करती हैं।

विनय-पत्रिका और जो अतुलनीय शोमामय है ॥२॥ जो गंगाके पिता है (जिन चरणों- से गंगाकी उत्पत्ति हुई है), कामदेवको भस्म करनेवाले शिवजीके प्यारे हैं, तथा जिन्होंने कपट-ब्रह्मचारीका रूप धारणकर राजा बलिको छला है, जिन्होंने (गौतम) ब्राह्मणकी स्त्री अहल्याको और गजा नृगको (शापसे छुड़ाकर परम सुख दिया) और हिंसक निशाद के सारे दुःख और घोर पाप दूर कर दिये ॥३॥ सिद्ध, देवता और मुनियों के समूह जिनकी सदा वन्दना किया करते है, जो सभीको सुख और शरण देने- पाले हैं, एक बार भी जिनका हृदय में ध्यान करनेस भन्न स्वयं तर जाता है तथा दूसरोंको तारनेवाला बन जाता है ॥४॥ हे कृपासागर सुचतुर रघुनाथजी! आप शरणागतोंके दुःख दूर करनेवाले हैं। यह तुलसीदास अव आपके उन चरणोंके दर्शनकी आशारूपी प्यामके मारे मर रहा है। (शीघ्र ही अपने चरण कमल दिखाकर इसकी रक्षा कीजिये) [२१९ ] द्वार ही भोर ही को आजु । स्टत रिरिहा आरि और न, कौर ही तें काजु ॥१॥ कलि कराल दुकाल दारुन, सब कुभाँति कुसाजु । नीच जन, मन ऊंच, जैसी कोदमेंकी खाजु ॥२॥ हहरि हियमें सदय यूझयो जाइ साधु-समाजु । मोहसे कई कतहुँ कोड, तिन्ह कयो कोसलराजु ॥३॥ २३ और सम्पूर्ण कल्याणके कारण है ? ॥१॥ जिन (धरणी) का रंग शरद ऋतुम उत्पन्न, सुन्दर और तुरन्तके खिले हुए लाल-लाल कमलोंके समान है, जिन्हें श्रीलक्ष्मीजी अपनी सुन्दर हथेलियोंसे दवाया करती है, m Pाने गहन ही मिनात गोमुझे कमी प्रमाण जिग जो माया हो गया हो. (महीली) यह तुलसीदास भी तिमी गमी गार पाणी सोडा मणे जाने लगामात्र या frint m गाणीको शरण देगा [१८] कई दमाही हरि नग्न । ममन गरुन फलंग कलि-मल, मफल मंगल-करन ॥१॥ मग्द-मर मुंदर तरुनवर अमन-चारिज चरन । लन्छि-लालिन ललित करनल छवि अनुपम धरन ॥२॥ गंग-जनक अनंग-अरि-प्रिय कपट-बटु पति-उरन । विप्रतिय नृग रधिको दुख-दोस दारुन दरन ॥३॥ मिद्ध-सुर-मुनि-बूंद-चंदित मुखद सब कह सरन । सकृत उर आनत जिनहिं जन होत तारन-तरन ॥४॥ कृपासिंधु सुजान रघुबर प्रनवआरति-हरन । दरस-आस-पियास तुलसीदास चाहत मरन ॥५॥ भावार्य-दे हरे ! क्या कभी आप अपने उन पविष चरणोंका दर्शन करायेंगे जो समस्त फ्लेशों और कलियुगके सभी पापोंके नाश करनेवाले

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- बिनय-पत्रिका दीनता-दारिद दल को कृपावारिधि पाजु । दानि दसरथरायके, तू वानइत सिरताजु ॥ ४ ॥ जनमको भूखो मिखारी ही गरीबनिवाजु । पेट भरि तुलसिहि जबाइय मगति-सुधा सुनाजु॥५॥ भावार्थ-हे भगवन् ! आज सोरेसे ही मैं आपके दरवाजेपर मा चैठा हूँ। करके रट रहा हूँ, गिड़गिड़ाकर मांग रहा है, मुझे और कुछ नहीं चाहिये । बस, एक कोर टुकड़ेसे ही काम बन जायगा। (ज़रा-सी कृपादृष्टिसे ही मैं पूर्णकाम हो जाऊँगा) ॥१॥(यदि माया कहें कि कोई उद्यम क्यों नहीं करता ? गिड़गिड़ाकर भीष क्यों माँगना है, तो इसका उत्तर यही है कि) इस मयंकर कलियुगमे (उपन साधनापी उद्यमका) यड़ा हीदारुणदुर्भिक्ष पड़गया है, जितने उद्यम और उपाय-साधन है, सभी युरे हैं। कोई-सा मी नियिम पूरा नहीं होता, इसमे आपसे भीख माँगना ही मैंने उचित समझा है। (कलियुगी) मनुमोदी करतून तो नीच है (दिनरात विषयोंके लिये ही पाप रत रहते हैं) और उनका मन ऊँचा है (चाहते हैं सथा मुख मिले, परन्तु मथा मोह रुप मुख चिना भगवत्कृपा हुए मिलना नहीं), कोदकी माज (गुजलाते समय मुग मिलता है, पर पीछे मवाद निकलने पर जलन पैदा हो जाती है उसी) के समान (इन्द्रियोंके साथ विषयका संयोग होनेपर गारराममें तो मुखमामता है, परन्नु परिणाममें महादुर होतासरिय विषय पर दुःखदायी हो, नी यातको ममझकर मन किमी मी उद्यममें मन नदी दयमें डरकर कृपालु मन्त-ममार्गमा किरिया

विनय पात्रका
रीखे (उद्यमहीनको)भी कोई शरणमें लंगा?सन्तान (एक स्वरस)
कर दिया कि एक कोशलपति महाराज श्रीरामचन्द्रजी ही(ऐसा-
रणमें) रख सकते हैं ॥३॥ हे कृपाके समुद्र! आपको छोड़कर
और दरिदताका नाश फौन कर सकता है ? हे दशरथनन्दन !
का याना रखनेवालोमें आप श्रेष्ठ हैं ॥४॥ मैं जन्मका भूखागरीय
नंगा, हे गरीवनिवाज! आपके द्वारपर आकर पड़ा है। बस, अय
तुलसीको भक्तिरूपी अमृत के समान सुन्दर भोजन पेटभर खिला
ये (अपने चरणों में ऐसी भनि दे दीजिये कि फिर दूसरी कोई
ना ही न रह जाय)॥५॥
[२२०]
करिय समार, कोसलराय !
और ठौर न और गति, अवलंब नाम विहाय ॥१॥
वृझि अपनी आपनो हितु आप पाप न माय !
राम! राउर नाम गुर, सुर, म्वामि, मखा, सहाय ॥२॥
रामराज न चले मानस-मलिनके छल छाय।
कोप तेहि कलिकाल कायर मुएहि घालत घाय ॥३॥
लेत केहरिको चयर ज्यों मेक हनि गोमाय ।
त्योंहि राम-गुलाम जानि निकाम देत कुदाय ॥४॥

पिनए-पत्रिका अनि याके कपट-करना, अमिन अनप-अपाय । गुनी हरिपुर पसत होत परीछितहि पछिताय ॥५॥ कृपासिंधु । विलोकिये, जन-मनकी मामति साय ! सरन आयो, देव ! दीनदयालु ! देखन पाय ॥६॥ निकट योलिन परनिये, पलिजाउँ, हनिय न हाय । देखिई हनुमान गोमुख नाहरनिक न्याय ॥ ७ ॥ अरुन मुख, धू पिकट, पिंगल नयन रोप-कपाय । पीर सुमिरि समीरको घटिहै चपल चित चाय ॥ ८॥ विनय सुनि विहँसे अनुजसों पचनकै कहि माय । 'मली कहीं' को लपन हूँ हसि, पने सकल वनाय ॥ ९ ॥ दई दीनहिं दादि, सो सुनि सुजन-सदन वधाय । मिटे संकट-सोच, पोच-अपंच, पाप-निकाय ॥१०॥ पेखि प्रीति-प्रतीति जनपर अगुन अनघ अमाय । दासतुलसी कहत मुनिगन, 'जयति जय उरुगाय ॥११॥ मावार्थ-हे कोशलराज!मेरी रक्षा कीजिये।आपके नामको छोड़ मुझे न तो कहीं और ठौर-ठिकाना है, और न किसीका सद्वारा ई (मेरी तो यस, आपके नामतक ही दौड़ है) ॥१॥ आप खयं सम बूझकर अपने सेयकोंका ऐसा कल्याण कर देते हैं, जैसा (सगे) मान पिता भी नहीं करते (माता-पिता भी मोससुख नहीं दे सकते)। श्रीरामजी! आपका नाम ही मेरा गुरु, देवता, स्वामी, मित्र और सहाय हे नाथ ! भापके 'राम-राज्य में मलिन मनवाले (कतिकाल बिनय-पत्रिका के कपटकी छाया भी नहीं पढ़ सकती; किन्तु यह कायर कलिकाल उसी क्रोधके कारण मुझ भरे हुएकोमी अपनी चोटोंसे घायल कर रहा है। (इसे इतनाभी तो भय नहीं कि मैं 'रामराज्य' में यस रहा हूँ) ॥३॥ जैसे गौदह मेढ़कको मारकर सिंहके वैरफा बदला लेना चाहता है, वैसे ही यह मुझे आपका दास जानकर मुझपर गहरी चोट कर रहा है (दुःख नो इसको आपसे है, क्योंकिजिसकामन आपके राज्यमें बसता है, उसमें यह प्रवेश नहीं कर पाता; परन्तु आपपर नो इसका जोर चलता नहीं, मुझसरीने क्षुद्रदासको मतारहा है) ॥४॥ भगवान के परमधाममें आनन्द पूर्वक निवास करनेवाले महाराज परीक्षितके मनमें भी इसकी कपट- मिरी करनूतो, असंख्य अनीतियों और (साधुओंके मार्ग में डाले गये) अनेक विभ-वाघानीको सुनकर पछतावा हो रहा है (इसीलिये कि इसे पकड़कर हमने क्यों जीता छोड़ दिया?)॥५॥ हे कृपासागर तनिक कृपादृष्टि कीजिये, जिससे इस दासके मनकी पीड़ा शान्त हो जाय । हे दीनदयालो ! हे देव! मैं आपके चरणोंका दर्शन करनेके लिये आपकी शरण आया हूँ ॥६॥ यदि आप (दयावश) उस (कलियुग) को पास धुलाकर रोकना नहीं चाहते, या उसकी 'हाय-हाय' की पुकार सुनकर उसे मारना नहीं चाहते, नो मैं आपकी वलया लेता हूँ (आप तनिक हनुमानजीकोहीसंकेत कर दीजिये, आपका इशारा पाकर)ये इसकी थोरवैसे ही देखेंगे,जैससिंह गायक मुखकी ओर देखता है॥७॥(इस प्रकार कलियुगकी कुटिल करनीके कारण)जय हनुमानजी लालमुँह टेढ़ी माहे और पीली आँखोंको क्रोधसे लाल कर लेंगे, तर पवनकुमार पौरपर विनय-पत्रिका है हनुमानजीका स्मरण कर इसचञ्चल चित्तवाले (कलि)का सारा चम्पत हो जायगा (यह अपनी सारी शक्ति मूल जायगा) at मेरीय विनती सुनकर धीरघुनाथजी मुसकराये और अपने छोटे मा सपना इन बातोंका तात्पर्य समझाया (कि, देसो, तुलसी कैसा' चतुर ।। लक्ष्मणजीने हँसकर कहा कि ठीक ही तो कहता हापसास प्रकार से सारी बात बन गयी ॥९॥ भगवान् श्रीरामचन्द्रजीने रसगरीका कर दिया । यह सुनकर सन्तोंके घर यधाई यजने लगी। दुल, चिन' छल-कपट और पापके ममूहसय नष्ट होगये ॥१०॥ निर्गुण (धारामजी अपने दासपर ऐसी भलौकिक (त्रिगुणमयी लौकिक प्रीति नहीं) पर और मायारहित प्रेम भीर विश्यारा देशकर, हे मुलसीदारा! मुनि।। कहने लगे कि 'विपुल कीर्तियाले भगवान्की जय हो, जो ॥११॥ [२२१] नाय! कृपा ही फी पंथ चितयत दीन ही दिनराति । होर धी केहि काल दीनदयाल ! जानि न जाति ॥ १॥ गुगुन, ग्यान विगग-मगति, गु साधनानिकी पोनि । भने पिकल पिलांकि कलि अप-अवगुननिकी पानि ॥३॥ अनि अनीनि-रानि मा मुई तरनि ते मानि । भाउँ को ? पनि आउँ, को न टाउँ, मनि मानि ॥३॥ मदिन न आपनो कोर, पाप! कटिनमोनि। मीचिये नमी, मालि माल गुमानि॥४॥ 411

विनय-पत्रिका
भावार्थ-हे नाथ! मैं दीन दिनरात आपकी रुपाकी ही वाट देखता
रहता है । हे दीनदयालो! पता नहीं, आपकी यह रुपा मुझपर कर
होगी?॥१॥ (देवीसम्पदाके) सद्गुण,भान वैराग्य और भक्ति आदिसुन्दर
साधनों के समूह कलियुगको देखते ही व्याकुल होकर माग गये। रह गये,
पापों और दुर्गुणोंके समूह ॥२॥ बड़े-बड़े अन्यायों और अनाचारोंसे
पृथ्वी सूर्य से भी यधिक गरम हो गया है (यहाँ सिवा जलनेके शान्तिका
कोई साधन ही नहीं रहा) अघ में कहाँ जाऊँ ? मैं आपकी वलया ले
रहा हूँ। मुझे और कहीं ठौर-टिकाना नहीं है। मेरी बुद्धि बड़ी ही
प्याकुल हो रही है ॥३॥ हे यापजी ! इस अपनी देहके सहित कोई भी
अपना नहीं है (किसका सहारा लैं)। सभी कठोर दुराचारी दिग्वायी
देते हैं। हे घनश्याम यह तुलसीरूपी फूली-फली धानकी खेती सूखी
जारही है, अब भी मेध वनकर (कृपा-जलकी वर्षास) इसे सींच दीजिये ॥४॥
[२२२]
वलि जाउँ, और कासों कहौं ?
सदगुनसिंधु स्यामि सेवक-हितु कहुँ न कृपानिधि-सोलही ॥१॥
जहँ जहँ लोम-लोल लालचयस निजहित चित चाहनि चहीं।
तहँ तहँ तरनि तफत उलूक ज्यों मटकि कुतरु कोटर गहौं ।। २ ।।
काल-सुभाउ-करम विचित्र फलदायक सुनि सिर धुनि रहीं।
मोको तो सफल सदा एकहि रस दुसह दाह दारुन दहीं ॥३॥
उचित अनाथ होइ दुखमाजन भयो नाथ ! किंकर न हों।
अप रायरो कहाइ न यूझिये, सरनपाल ! साँसति सहीं ॥४॥

विनय-पत्रिका महाराज ! राजीवरिलोचन ! मगन-पाप-संताप हो। तुलसी प्रमु! जय तर जेहि तेहि बिधि राम निवाहे निरवहाँ ॥५॥ भावार्थ-प्रमो, बलिहारी! (मैं अपने दुःख)और किसे सुनाऊँ आरके सदृश सद्गुणोंका समुद्र सेवकोंका कल्याण करनेवाला और कृपानिधान खामी अन्यत्र कहीं भी नहीं मिलता ॥१जहाँ-जहाँ लोम और लालव- वंश चञ्चल चित्तमें अपने कल्याणको कामना करता है, वहाँ यहाँसे मैं इस तरह निराश हो लौट आता हूँ, जैसे सूर्यको देखते ही उल्लू मटकता हुआ आकर वृक्षके कोटरमें घुस जाता है (जहाँ जिसके पास जाता है। यहाँ दुःखकी आग तैयार मिलती है ) ॥२॥ जव यह सुनता है कि काल, स्वभाव और कर्म विचित्र फल देनेवाले हैं, तय सिर धुन-धुन कर रह जाता है, क्योंकि मेरे लिये तो ये तीनों सदा एक से ही हैं, मैं तो सदा ही दुःसह और दारुण दाहसे जला करता हूँ ॥३॥ हे नाथ ! मैं अवतक अपनेको अनाथ समझकर दुःखोंका पात्र बन रहाथासोउवितही था, क्योंकि मैं आपका दास नहीं बना था; किन्तु हे शरणागत-रक्षक! य आपका (दास) कहाकर भी मैं दुःख भोगरहा है, इसका कारण समझ में नहीं आ रहा है ॥४॥ हे महाराज हे कमलनेत्र 1 में पाप-सन्ताने इय रहा हैं। हे प्रभो ! तुलसीदासका तभी नियांह हो सकता है. जर आप ही जिस-किसी प्रकारसे उसका निर्वाह करेंगे ॥५॥ [ २२३] कबहुँ करि जानिहीं। म गरीवनिवाज राज-मनि, विरद-लाज उर आनिहीं ॥१॥ P-

है परिनाम भलो
विनय-पत्रिका
सील-सिंधु, सुंदर, सब लायक, समरथ, सदगुन-खानि हो ।
पाल्यो है, पालत, पालहुगे प्रभु, प्रनत-प्रेम पहिचानिहीं ।। २ ।।
वेद-पुरान कहत, जग जानत, दीनदयालु दिन-दानि हो ।
कहि आवत, बलि जाउँ, मनहुँ मेरी बार विसारे यानि हो ॥३॥
आरत-दीन-अनाथनिके हित मानत
लौकिक कानि हो।
तुलसीको सग्नागत-मय भानि हो।॥४॥
भावार्थ-हे नाथ ! क्या कभी आप मुझे अपना समझेंगे ? हे गम !
पि गरीयनिवाज और राजाधिराज है। क्या आप कभी अपने विरदकी
जिका मनमें विचार करेंगे?॥१॥आपशीलके समुद्र है, मुन्दर है,मब कुछ
रनेयोग्य है, समर्थ हैं और सभी सद्गुणोंकी खान हैं। हे प्रभो ! आपने
रणागतोंका पालन किया है, कर रहे है और करेंगे।क्यारम (तुच्छ)
रणागतका मेम मी पहिचानंग ? ॥२॥ चंद और पुराण कर रहे है,
या संसार मी जानता है कि भाप दीनोंपर दया करनेवाले और प्रति.
न उन्हें फल्याण-दान देनयाले हैं। पाध्य होकर कहना ही पड़ता है, मैं
पिकी यलया लेता है, आपने मानो मेरी यार अग्नी आदतको दी भुला
या ६ ॥३॥ आप दीन, दुम्बियों और अनाया हित होनेपर भी क्या
मारका (यह भय मान रहे हैं? (
किस पापीको अपनाने कहाँ को
न्यायी न कर दे।) जो कुछ भी हो. तुलमोदामका तो अन्नमें कल्याण
होगा, क्योकिभाप शरणागतमयीमान करनेवाले ॥४॥
[२२४]
(पुवरहि फरहुँ मन लागिह ?
सय, कुचाल, कुमति, कुमारथ, कुटिल कपट कर न्यागिह ॥१॥

प्रेमरूपी चाशनीमें पागेगा? माय यह कि फ्यातू प्रेमपूरित हृदयसे कमी
पिनय-पत्रिका
जानत गरल अमिय विमोहनम, अमिय गनत करि आगि है।
उलटी रीति-प्रीति अपनकी तजि प्रमुपद अनुरागिह ॥ २॥
आखर अरय मंजु मृदु मोदक राम-प्रेम-पगि पागिहै।
ऐसे गुन गाइ रिशाइ सामिसों पाइहै जो मुंह मॉगिह ॥ ३॥
तू यहि विधि सुख-सयन साइहै, जिसकी जरनिभूरि मागिई।
राम प्रसाद दासतुलसी उर राम भगति-जोग जागिहै ॥४॥
मावार्य -मरे मन ! क्या कभी तू धीरघुनाथजीसे मी लगेगा?रे
कुटिलतू कुमार्ग, युरीचाल, दुर्बुद्धि, धुरी कामनाएँ और छल-कपट कर
छोड़ेगा? ॥५॥ तू पड़े भारी अज्ञान के पश होकर (विषयरूपी ) विषको
तो अमृत मान रहा है और (भगवान् के मजनरूपी) अमृतको आगके समान
(दुःखदायी) समझ रहा है अपनी इसउलटी रीति और विषयोंकी प्रीति-
को त्यागकर तू श्रीरामजीके चरणों में का प्रेम करेगा? ॥२॥ कब तू राम-
नामके सुन्दर अक्षर और कोमल अर्थरूपी लड्डुओंको श्रीरघुनाथजीके
अर्थसहित श्रीराम नामका जप करेगा ? जो इस तरह अपने स्वामी के
गुणोंको गा-गाकर उन्हें रिझा लेगा, तो तुझे मुँह-माँगा पदार्थ मिल
जायगा ॥३॥ इस प्रकार ( करनेसे ) तू (मोक्षकी) मुम्ब-सेजपरसदाके
लिये सो जायगा और तेरे मनकी (अविद्याजनित) यड़ी भारी जलन
(आत्यन्तिक रूपसे) भाग जायगी। हेतुलसीदास! श्रीरामजीको कृपासे
तेरे हृदयमें श्रीरामजीका प्रेमरूप भक्तियांग सिद्ध हो जायगा ॥५॥

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१ यिनय-पत्रिका (भाहल्या), मील, पप्ली (जटायु), मृग (मार्गन) और राक्षस (विभागम) इनामों में किम कर्म गुमथे?(किन्तु भगवानने इन सबका उद्धार कर दिया) ॥३॥ मेरे लिय तो एक राम-नाम ही कल्पन्न हो गया है, पद कृपालु श्रीरामचन्द्र की कृपास हुआ है। (इसमें भी मेरा कोई पुगवार्य नहीं है)।मय तुलमी इस अनुप्रहके कारण ऐसा मुमी और निधिन्त है, जैसे कोई पालक अपने माता-पिता राज्यमें होता है ॥७॥ [२२६] . भरोसो जाहि दूसरी सो करो। भोको तो रामको नाम कलपतरु कलि कल्यान फरी॥१॥ करम उपासन, ग्यान, वेदमत, सो सब माँति सरो। मोहि तो 'सावन के अंघहि' ज्यों सूझत रंग हरो॥२॥ चाटत रह्यो सान पातरि ज्यों कबहुँ न पेट भरो । सो हो सुमिरत नाम-सुधारस पेखत परुसि घरो ॥३॥ खारथ औ परमारथ ह को नहि कुंजरो नरो । सुनियत सेतु पयोधि पपाननि कार कपि-कटक नरो॥४॥ प्रीति-प्रतीति जहाँ जाकी, तहँ ताको काज सरो। मेरे तो माय-बाप दोउ आखर, हौं सिसु-अरनि अरो॥५॥ संकर साखि जो राखि कहीं कछु वा जरि जीह गरो । अपनो भलो राम-नामहि ते तुलसिहि समुझि परो॥६॥ भावार्थ-जिसे दूसरेका भरोसा हो, सो करे । मेरे लिये हो इस कलियुगमें एक राम-नाम ही कल्पवृक्ष है, जिसमें कल्याणरूपी फल फला

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विनय-पत्रिका है।मार यह कि राम नाममे ही मुझे तो यह मगपर प्रेम प्राप्त हुमा ॥१॥ यद्यपि एम, उपासना मोर मान, ये पेदिक मिसान्त सभी सय रमे म किन्तु मुझे तो, मापन के अन्धकी भौति, जो देता है हराही हगरंगदीगता है। (एकराम-नाम दीनारदा?) २॥ की नारे (भनेक टी) पसलोंको घाटता पिरापर कमी मेरा पेट मिरा भाइ मैं नाम-स्मरण करनेमे मनरम परोसा हुमादेगनाई। नि भनेक देवमोग्य भोग भोगे, परन्तु कहींमि नहीं । पूर्ण, नित्या मानन्द कहीं नहीं मिला। भय श्रीराम नामका मारण करते ही मैं रहा है कि मुक्तिकाचाल मेरे गामों पैरोमा पंगाई मर्यात् मक्षा- दरूप मोझरतो मैरामधिकार ही हो गया । परमी थालीके पदार्थ जय चार सय माले मी प्रकार मास तो जपचा तमी मिल जाय। एतु मैं तो मुक्त पुरुषाको कामनाका यस्तु श्रीराम-प्रेम-रमका पान कर है।) ॥३॥ मेरे लिये राम-नाम स्पार्थ और परमार्थ दोनोंका ही mun है, (मुक्तिरूपी म्यार्थ मीरमगयत्प्रेमरूपी पग्म अर्थ दोनों ही मुझे राम-नामसे मिल गये)। यह यान 'हाथी है या मनुष्य' की सी दुविधा री नहीं है (क्योंकि मुझे तो पास ) | मैंने सुना है कि इसी नामके मावस यन्दरॉकी सेना पत्थरोका पुल बनाकर समुद्रको पार कर गयी पो ॥४॥ जौ जिमका प्रेम और विश्वास है, वहीं उसका काम पूरा हुमा है (मो सिद्धान्त के अनुसार) मेरे तो मौ-याप ये दोनों अक्षर-'र' और 'मा-है। मैं तो इन्हींके आगे बालहटसे अड़ रहा है, मचल रहा है ॥५॥ यदि मैं कुछ मी छिपाकर कहता हो, तो भगवान् शिवजी साक्षी हैं, मेरी ओम जलकर यागलकर गिर जाय। (यह 'कवि-कल्पना' या अत्युक्ति नहीं यिनय-पत्रिका है, सच्ची स्थितिका वर्णन है) यही समझमें आया कि अपना कन्यार एक राम नामसे ही हो सकता है ॥६॥ [२२७]. नाम राम राबरोई हित मेरे। खारथ-परमारथ साथिन्ह सों भुज उठाइ कहाँ टेरे॥१॥ जननी जनक वज्यो जनमि,करम विनु विधिहु सृज्यो अवईरे। मोहुँसों कोउ-कोउ कहत रामहि को, सो प्रसंग केहि करे।॥ २॥ फिरयौ ललात बिनु नाम उदर लगि,दुसउ दुखित मोहि हेरे । नाम-प्रसाद लहत रसाल-फल अब हो पपुर पहेरे ॥३॥ साधत साधु लोक-परलोकहि, सुनि गुनि जतन पनेरे। तुलसीके अवलंघ नामको, एक गाँठि कर . फेरे॥४॥ भावार्थ-हे रामजी ! आपका नाम ही मेरा तो कल्याण करनेवाला है। यह यात में हाथ उठाकर स्वार्थक और परमार्थक समी मंगो. माथियोंस (परिपारफे लोगोंसे और साधकॉसे) पुकारकर करता (घोषणा कर रहा है ॥३॥ माता-पिताने तो मुझे उत्पा करके ही छोड़ दिया था, प्रमाने भी भमागा भऔर कुछ वेब सा बनाया या। फिर भी कोई-कोई मुझे 'म' (दास) कहते हैं, यह fm अभिप्रायसे कारनं १ (यह राम-नामRTE HIR ) २॥ राम-नाम शरण नहीं दिया था भय में पेट मग्न हो (बार-बारपर) समयानामिनायाभोर या दुषको मौन होता था ( मी गायी) धीगमकी कृपांग पर मेलिंग जीवाण

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यिनय-पत्रिका
३६
होगा, तो यह इस यातको भी स्वीकार नहीं करता, यह कहता
यदि श्रीराम मिलनेसे राम-नाम छोड़ना पड़े तो मुझे श्रीराम
मिलनेकी आवश्यकता नहीं है। मुझे तो उनका नाम ही सदा चाहिये
पैसे नाम-प्रेमीसे राम कितना प्रेम करते हैं। मोतोयल राम ही जान
है; गोसाईजी कहते है कि जो इस प्रकार रामनामका मतवाला है
उसका इस कराल फलिकालमें, भादि, मध्य और अन्त, तीनों ।
फालोंमें (कल्याण होगा) ॥१नामकी महिमा समझकर अभिमान
लोभ, मज्ञान, मोध और काम सकुचा जाते हैं, सामने नहीं आने ।
सजनसदाराम-नामका जप करते रहते हैं, उनपर कड़ी धूप भी याच
कर देती है (महान्-से-महान् दुःख मी सुखरूप बन जाते हैं) ॥२॥
यदि कोई कहे कि नामके प्रभावसे पत्थरमें कमल उत्पन्न हो गया,
तं.
उसे भी सच ही समझना चाहिये (क्योंकि रामनामके प्रभाव
असम्भव भी सम्भव हो जाता है) जिस नामको सुनने और सरप
करनेसे भीलनी शवरी मी परम भाग्यवती तथा शील और पुण्यमरी
बन गयी (उससे क्या नहीं हो सकता?) ३n वाल्मीकि और
अजामिलके पास तो कोई भी साधनकी सामग्री नहीं थी, किन्तु उन्होंने
भी उलटे-पुलटे राम नामके माहात्म्यसे धुंधचियोंसे जयाहरात जीत
लिये (परम रन परमात्माको प्राप्त कर लिया) ॥४॥ नामकी शक्ति
श्रीरघुनाथजीसे भी अधिक है, (क्योंकि धीरामजी इस मामसे ही
वशमें होते हैं) इस राम-नामने ग्रामीण मनुष्योंको चतुर नागरिक पना
दिया (असभ्योंको परम पुनीत महात्मा यना दिया)। जिमे जाकर
तुलसीदास सरीखे बुरे जीव भी डंके की चोट अच्छे हो गये (किर
कहनेको क्या रह गया?) ॥५॥

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विनय-पत्रिका
३७
[२३०1
अकारन को हितू और को है।
विरद 'गरीय निवाज' कॉनको, भौह जामु जन जोह ॥१॥
छोटोचड़ो चहत सब सारथ, जो विरंचि विरची है।
कोल कुटिल, कपि-माल पालियो कान कृपालहि सोहै ॥२॥
काको नाम अनख आलस कहें अघ अवगुननि विछोहै।
को तुलसीसे कुसेवक संग्रह्यो, सठ सब दिन साई द्रोहै ॥३॥
भावार्थ-विना ही फारण हित करनेवाला (श्रीरामचन्द्रजीको छोड़
कर) दूसरा कौन है? गरीयोंको निहाल कर देने का विरद किसका है.
कि जिसकी (रुपामयी) भृकुटीकी और भक्त ताका करते हैं ॥१॥
छोटे या बड़े जो भी ब्रह्माके रचे हुए हैं वे समी अपना स्वार्य सिद्ध करना
चाहते हैं, (विना स्वार्थके कोई किसीका हित नहीं करता)।मला, मील
वन्दर और रीछ आदिका पालन-पोषण करना (श्रीरामजीके सिवा)
दूसरे किस कृपालु स्वामीको शोमा देता है ? ॥२॥ ऐसा किसका नाम है
जिसे आलस्य या क्रोधके साथ भी लेनेपर पाप और अवगुण दूर
जाते हैं ? ( श्रीराम-नाम ही ऐसा है)। जिसने मूर्वतायश सदा अपने
स्वामीसे द्रोह किया है, उसतुलसी-सरीखे नीच सेवककोमीअपना लिया
(इससे अधिक अकारण हित करना और क्या होगा!)॥३॥
[२३१]
और मोहि को है, काहि कहिहीं ?
रंफ राज ज्यों मनको मनोरयं, केहि सुनाइ सुख लहिहीं ॥१॥

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विनय-पत्रिका . उसीमें परम सुख है) ॥३॥ इस दासके मनमें बस एक यही कामना कि यह मदा तुम्हारी जूती पकड़े रहे (शरणमें पड़ा रहे)। या तो मुझे घचन दे दो (कि हम तेरी यह कामना पूरी कर देंगे) अथवा इस धानां मनमें निश्चय कर लो कि हम तुलसीका यह प्रण नियाद दंगे ॥3 [२३२] दीनबंधु दूसरो कह पावों को तुम बिनु पर-पीर पाई है ? केहि दीनता सुनायों ॥१॥ प्रभु अकृपालु, कृपालु अलायक, जहँ-जह पितहिं डोलावों । इहै समुझि सुनि रही मौन ही, कहि भ्रम कहा गया ॥२॥ गोपद युड़िये जोग करम करी, यानि जलघि यहायों। अति लालची, काम-किंकर मन, मुख राबरी कहायों ॥३॥ तुलमी प्रभु जियकी जानत सप, अपनो कछुक जनारों। सो कीज, जेहि भाँति छोड़ि छल द्वार परो गुन गावों ॥४॥ मापार्य-(तुम-मा) दीनबन्धु मग कहाँ पाऊँगा? मग! तुमको छोड़ कर पाये (मन) दुपये दुणी होगाटा द्वारा कान है? अपनी बीनताका दुमड़ा किंग मारोगा फिर?जा भपने मनको माता पदों पदों की तो ऐसे मामी मित जिनके दशामही है और कही मिळत नांदगालुतो है, vie (भगम) । यह गुन-गमाकर शुगर जा.in मा -सामने कुरा भाना मामयों ना (मे मील भाग'

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रोग-वियोग-सोग-श्रम-संकुल बड़ि वय वृथहि अतीति ॥२॥ भावार्थ-सुन्दर (मनुष्य) जीवन व्यर्थ ही बीत गया।सनिकमा यिनय-पत्रिका घमण्डम मनयाली युद्धि एवं करोड़ों बुरेपुर कर्म-इन मकं कारन परम पद और शान्ति कैसे मिल सकती है? २॥ सन्तों और गुरुको सेवा करने तथा येद और पुराणोंके सुननेसे परम शान्तिका ऐसा निश्चय हो जाता है जैसे सारंगी यजते ही राग पहचान लिया जाता है। हे तुलसी ! प्रभु रामचन्द्रजीका स्वमावती अवश्य ही कल्पवृक्षके समान है (जो उनसे मांगा जाता है, यही मिल जाता है) किन्तु, साथ ही वा ऐसा है, जैसे दर्पणमें मुखका प्रतिविम्य । जिस प्रकार अच्छा या बुरा जैसा मुँह बनाकर दर्पणमें देखा जायगा, यह वैसा ही दिखायौदेगा. इसी प्रकार भगवान भी तुम्हारीमावनाके अनुसार ही फल देंगे ॥३॥ [२३४] जनम गयो बादिहिं वर वीति । परमारथ पाले न परयो कछु, अनुदिन अधिक अनीति ॥३॥ खेलत सात लरिकपन गो चलि,जौरन जुवतिन लियो जीति । . राग-रोप-इरिपा-विमोह-चस रुची न साधु समीति । कहे न सुने गुनगन रघुबरके, मइ न रामपद-प्रीति ॥३॥ हृदय दहत पछिवाय-अनल, अब, सुनत दुसह भवभीति । तुलसी प्रभु । होइ सो कीजिय समुझि रिदकी रीति ॥४॥ परमार्य पल्ले नहीं पड़ा।दिनों-दिन अनीति बढ़ती ही गयी १॥ लड़कपन तो खेलने-खाते यीत गया, जवानीको प्रियाने जीत लिया और .

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U विनय-पत्रिका घमण्डस मतवाली बुद्धि एवं करोड़ों बुरे पुरे कर्म-इन सबके कार परम पद और शान्ति कैसे मिल सकती है? २ सन्तों और गुरु सेवा करने तथा वेद और पुराणोंके मुननेसे परम शान्तिका ऐम निश्चय हो जाता है जैसे सारंगी बजते ही राग पहचान लिया जाना है हे तुलसी ! प्रभु रामचन्द्रजीका स्वमाय तो अवश्य ही करके समान है (जो उनसे माँगा जाता है, वही मिल जाता है) किनु, साथ ही या ऐसा है, जैसे दर्पणमें मुखका प्रतिविम्य । जिस प्रकार भन्दा पारा जैसा मुँह बनाकर दर्पणमें देखा जायगा,यह वैसा ही दिखायीदेगा, इमो प्रकार भगवान् मी तुम्हारोभावनाके अनुसार ही फल देंगे ॥२॥ [२३४] जनम गयो बादिहिं पर पीति । परमारय पाले न परयो फछु, अनुदिन अधिक अनीति ॥१॥ खेलत सात लरिकपन गो चलि,जीवन जुपतिन लियो जीनि । रोग-वियोग-सोग-श्रम-संकूल पदिय पृयहि अतीवि ॥२॥ राग-रोप-परिपा-पिमोह-यस रुची न साधु-समीति । कहे न मुने गुनगन रघुपरके, मदन रामपद-ग्रीति ॥३॥ हृदय दहन पछिताय-अनल अप, मुनत दुमह भवभीति । सुलमी प्रम में होर सो फीजिय गममि पिरदकी रीति ।। मायाय-गुमा (मनुष्य) जीवन यापति गामी परमार्थ पाले नहीं दिनों-दिन भीतिवाना होगी RTER तो मरने-माने बीत गया, अनामती प्रियाने मीन या भार

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विनयपत्रिका ६ और उनको मगयानमे भी अधिक समय रपया है ! लिय निरन्तर करोड़ों उपाय करते-करते कमी पर नहीं दुमे (दिन विषय भोगोंक मुलमिया-उधर भटकताफिरा) हृदय राम्नक माँति सदा मैला दीयना रक्षा कमी निर्मल अथवा स्थिा नहीं हुआ इस दीननाको दूर करने लिय अगणित उपाय मनमें मोवे. तुलसी! चिन्तामणि (श्रीरघुनाथजी) को पहचाने बिना बित चिन्ता नहीं मिट सकती (परमात्माका और उनकी मुदताका होनेसे ही चिन्ताओंका नाश होगा)मा [२३६] जो पै जिय जानकी-नाथ न जाने । तो सब करम-धरम अमदायक ऐसेइ कहत सयाने ॥१॥ जे सुर, सिद्ध, मुनीस, जोगविद वेद-पुरान यखाने । पूजा लेत, देत पलटे सुख हानि-लाम अनुमाने ॥२॥ घोखेहू सुमिरत पातकपुंज पराने। विप्र-यधिक, गज-गीध कोटि खल कौनके पेट समाने ॥३॥ मेरु-से दोप दरि करि जनके, रेनु-से गुन उर आने । तुलसिदास तेहि सकल आस तजि मजहि न अजहुँ अयाने ॥४॥ भावार्थ-अरं जीव ! यदि तूने श्रीजानानाथ रघुनाथजीक (तत्त्यसे) नहीं जाना तो तेरे सव कर्म,धर्म केयल परिश्रम ही देनेवाले हैं। (उनसे कोई यसली लाम नहीं होगा) युद्धिमान् पुरुषोंने ऐमा ई कहा है। (श्रीरामचन्द्रजीको तत्वसे जान लेने में ही सारे कर्म-धर्माकी काको नाम

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३ करती?) ॥२॥ संसारके मांगोंकी यात कलियुगरूपी कुमुदिनी विनय-पत्रिका बाद-विवाद,स्वादतजिमजिहरि,सरसंचरिवचित लावहि। तुलसिदास भव तरहि, तिहूँ पुर तू पुनीत जस पावहि ॥५॥ भावार्थ-अरी जीम! तू श्रीरामजीका गुणगान क्यों नहीं करतं दिन-रात दूसरोंकी निन्दा कर फ्यों व्यर्थ ही आसकि यहारा है ? ॥१॥ मनुष्यके मुघरूपी सुन्दर और पवित्र मन्दिर में यसारक्या उ लजा रही है ? (विषयकी यातें छोड़कर श्रीराम-नाम क्यों नहीं देती। चन्द्रमाके पास रहती हुई भी अमृतको छोड़कर क्यों मृगतृप्याके जल लिये दौड़ रही है ? (श्रीराम-नामरूपी अमृतका पान क्यों मार (विकसित करनेके लिये चाँदनीके सदृश है, उसे गूप कान लगा। प्रेमपूर्वक सुना करती है।भरी जीम उस विषय चर्चाकोरोककर पीडरिक सुन्दर यशका गान कर, जिससे कानोंका कलंक दूर हो (विषयोंकी पान निरन्तर सुनते-सुनते कान कलंकी हो गये हैं, उनका यह कर्मक भगयस्कयाके श्रवण करनेसे ही दूर होगा) ३ युधिरूपी गुवर्ण भौर युनिरूपी मुन्दर मणियोंका रख-रचार एक धार तयार कर भार उम दाको शरणागतोंको मुम देनेयाले गर्षयुलरपी कमलके (प्रति करनेवाले) सूर्य महाराज रामचन्द्रशीको पहिना । (यिगुर पुदि मौर उनम युनियोंद्वारा निधय कर धीहरिका नाम-गुण-हीन मकर) पाद-विवाद तथा मादको डोरकर श्रीहरिका मान कर और Att ग्मीली धोलामें कोरगा। पदिनमा करेगी तो गुलमी मर गागागं पार हो जायगा (जन्म-मरणमे गुन हो जायगा) भौरा भी नीमाटीमें पवित्र कौनिको प्राणी arl

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- मधर्मा पाटनमनित भीमार महकी भी धीरजी पिना विनय-पत्रिका उतपति पांडु-सुतनकी करनी सुनि सतपंथ डरयो । ते त्रैलोक्य-पूज्य, पावन जस सुनि-सुनि लोक तरयो ॥२॥ जो निज धरम वेद-बोधित सो करत न कछु विसरयो । मिनु अवगुन कृकलास कूप मजित कर गहि उधरयो ॥३॥ ब्रह्मा-पिसिख ब्रह्मांड-दहन-छम गर्भ न नृपति जरयो । अजर-अमर, कुलिसहुँ नाहिंन मध, सो पुनि फेन मरयो ॥४॥ विप्र अजामिल अरु सुरपति तें कहा जो नहिं निगरयो । उनको कियो सहाय बहुत, उरको संताप हरयो ॥५॥ गनिका अरु कंदरपते जगमहँ अप न करत उपरयो । तिनको चरित पवित्र जानिहरि निज हदि भवन धरयो ॥६॥ फेहि आचरन भलो मानें प्रभु सो तो न जानि परयो । तुलसिदास रघुनाथ-कृपाको जोयत पंथ खरयो । भावार्थ-जिमे श्रीदरिने पदतापूर्वक दयमे लगा लिया. पही मुनाल, पवित्र है, येदका माता भोर गमात विधा एवं सद्गुन मामा (जिमा भगवान कृपा करते हैं, मारे गद्गुण माना गौण भगाने लिंग उस पर भारी मा जात ka mms पनि भार उमकी कानुनको सुनकर गरमागरमा गया था। ये ही धारिणाम, नीनों लोकॉमें गूजनीय हो गय भार उन परित मा गुन गुना योग ना ग शिमगा नगर्न mile मायामाrimary -

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विनय पत्रिका
भावार्थ-हे रामजी! जिसपर याप प्रसन्न हो गये, वर
पुण्यात्मा है और यही पवित्र है । वेदशा (पिंगला), गीध (जटा
चहेलिया (वाल्मीकि) जो परम धाम चैकुण्ठको चले गये, उग्र
प्रयागमें जाकर तप किया और कण्डोंको भागमें जलकर मरे
राजा नृग कमी वेदोक्त मार्गसे नहीं डिगा था, किन्तु संसार
है, उसने फितने दुःख भोगे (गिरगिटकी योनि पाकर हता
कुपैमें पड़ा सता रहा!) और यह हाथी कहाँका दीक्षित या.!
एक धार याद करते ही आप अपने वाहन गरड़को छोड़कर म
चफ लिये दौड़े आये ? ॥२॥ देयता, मुनि और प्रामों के ऊँचे
छोड़कर आपने गोकुलमें एक गोप (मन्दजी) के घरमें जन्म
कौरय पति राजा दुर्योधन ऐश्वर्यको ठुकराकर भापने ('
विदुरके घर जाकर (साग-भाजीका) मोजन किया ॥३॥ भगयान
अनन्य प्रेमी मक्तोंके साथ यहुन मला मानते राम मनग्य
की रीति पुछ-कुछ आपने भनुनको पतापी पी लगी
धीरामजी तो माल म्यामायिक विशुद्ध प्रेम मधीन , भूगांत
गाधन थे ये, मे पानीको चिकनाई(पानी पाने
पंक दिय सागर किना-गा मादम होता है, पर पर ri
का-याला हो जाता है। इसी प्रकार दूसरे माधोंगे जाना
पनि होने पर कि गुण तो मिलता है भाग्नु गरी कामना *
"मट वाला)
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विनय-पत्रिका परन्तु जब उनसयका काम पड़ा, तब आप सन्त-समाजको भी छोहार (उनकी सहायता लिय) यहाँसे चल दिये ॥३n आज मी इस आरके दरवाजेपर ऐमोका ही अधिक आदर है और न जाने कितने पात्र नित्य पवित्र यनाये जाते हैं। येमा होते हुए भी अबतक मेरी सुनाई यो नहीं हुई?क्या में कम पापी है ? संसार में जितने दुष्ट हुए हैं, है और हाँग घेसय तो मेरे पसंगेमें मी पूरे न होंगे शा अयतकतो मैं मापके करतबी और टक लगाये देख रहा था, (याट देखता था कि मेरा मी उद्धार की कर देंगे)। परन्तु आपने इधर कोई ध्यान नहीं दिया। इसलिये घसा अर तुलसीदास मापक नामका पुतला बाँधेगा, क्योंकि मुझसे अब इतना उपहास सहन नहीं होता [२५२] तुमसम दीनबंधु, न दीन कोउ मोसम, सुनहु नृपति रघुराई । मोसम कुटिल-मौलिमनि नहिं जग,तुमसम हरि! न हरन कुटिलाई ॥१॥ ही मन-वचन-करम पातक रत, तुम कृपाल पतिवन-गनिदाई । हो अनाथ,प्रभु! तुम अनाथ-हित,चित यहि सुरति कबहुँ नहिं जाना हौं आरत, आरति-नासक तुम, कीरति निगम-पुराननि गाई । हाँ सभीत तुम हरन सकल भय, कारन कवन कृपा विसराई ॥३॥ • जब नर्टीको खेल दिखानेपर कुछ नहीं मिलता, तब ये कादेवा घटना बनाकर बॉसपर लटकाये हुए कहते फिरते हैं कि देशो यह बैमा अनुदार है। इसने लनित होकर उनको कुछ-न-कुछ दे ही देता है । इसी तरह मैं भी एक पुतगबना। लिये किस्गा । लोग पूरेंगे, तो यही उत्तर दूंगा कि यह अयोपाधिर मार श्रीरामचन्द्रजी है ! इससे आपको लाज लगेगी तब भारही अपनायेंगे।

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॥३॥ मैंने सुखकेलिये बहुत-सेसाधन किय, परमगयधरणास विनय-पत्रिका जननि जनक, सुत-दार, पंधुजन मये बहुत जहं-वह ही जायो। सब स्वारयहित प्रीति, कपट चित, काह नहिं हरिमजन सिखायो ॥२॥ सुर-मुनि, मनुज-दनुज, अहि-किन्नर, में वनु धरि सिर काहि न नायो। जरत फिरत प्रयताप पापघस, काहुन हरि करि कृपा जुड़ायो । जतन अनेक किये सुख-कारन, हरिसद-विमुख सदा दुख पायो । अप थाक्यो जलहीन नाव ज्यों देखत निपति-जाल जग छायो 187 मो कह नाथ! बूझिये,यह गति सुख-निधान निज पति विसरायो । अप तजि रोप करहु करुना हरि! तुलसिदास सरनागत आयो 11 भावार्थ-यही जानकर मैंने (सय मोरसे हटाकर) आपके चरमोन चित्त लगाया है कि हे नाय ! आपके समान, विना हो कारण, हित करनेवाला दूसरा कोई नहीं है, ऐसा पैदऔर पुराण गाते हैं ॥१॥ अदा- जहाँ (जिस-जिस योनिमें) मैंने जन्म लिया, वहाँ यहाँ मेरे बहुत सेपिता- माता, पुत्र स्त्री और भाई-वधु हुए परन्तु ये सभी स्वार्य-साधनके लिये मुझसे प्रेम करते रहे, उनके मन छल-कपट रहा। इसीलिये किसीने भी मुझे श्रीहरिका मजन नहीं सिखाया (समी संसार में फंसे रहने की शिक्षा देते रहे,भगवद्गजनकाउपदेशनहींदिया)॥२॥शरीर धारणकर मैंने(मपनी भलाई करनेकेलिये) देवता मुनि,मनुष्य-राक्षस, सर्प-किनारमादिकिसको सिर नहीं नवाया?(सभीके चरणों में सिररख-रखकर खुशामई को) किन्तु हे हरे! पापके फलस्वरूप तीनों तापसे जलते फिरते हुए मुझको किसीने किया। (मोक्ष प्रदान कर संसारका ताप कोनी

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... mudit- जन सुर ज अ marn. और हुन् । torrग मानकरी TAITERT Immmm पानीमा Trimuीम (E) ! marati अपना र नयाई rrerim मारवाद T"म शोल जमरा है. पदार rrier सरिज मांग को निकम मावा और फलम्बा है! को सराप विशिवार are PT AATri) ममदर इदा है कि) अपने ही (दस) NEPAIRAT MEETTER देनेवाला) जोक्स सऐप गर्ने अपना मन तक रद है। पर कोटा सिवा और कान है) असमतोको मान-निशान नदार। भूसंमायायात पुरापने कहा है। इस रोलमेर से अपित प्रतीत हो इस दुबमालिको [२४.] मन बहुत विगायो। विष सुनहु करुनामय, में बग सिर ।

- २० विनय-पत्रिका सीतल मधुर पियप सहज सुख निकटहि रहत दूरि जनु खोयो । बहु माँतिन श्रम करत मोहवस, पृथहि मंदमति पारि पिलोयो |२|| करम-कीच जिय जानि,सानि चित,चाहत कुटिल मलहि मल धोयो। तपात सुरसरि विहाय सठ फिरि-फिरि विकल अकास निचोयो ॥३॥ तुलसिदास प्रभु! कृपा करहु अब, मैं निज दोष कछु नहिं गोयो । डासत ही गइ चीति निसा सब, कबहुँ न नाथ! नींद भरि सोयो ॥४॥ भावार्य-इस मूर्ख मनने मुझको खूब ही छकाया । हे करुणामय ! मुनिये, इसीके कारण मैं पारम्यार जगत्में जनम-जनमकर दुःखसेरोता मिरा शीतल और मधुर अमृतरूपसहजसुख (प्रमानन्द) जो अत्यन्त निकट ही रहता है, (आमाका स्वरूप ही सत् चित् थानन्दघन है) मैंने समनके फेरमें पड़कर उसे यो भुला दिया, मानो यह यहुत ही दूर हो। मोहयश अनेक प्रकारसे परिश्रम कर मुझ मूर्खने ध्यर्थ ही पानीको विलोया (विषयरूपी जलको मथकर उससे परमानन्दरूपी घी निकालना चाहा) ॥२॥ ययपि मन में यह जानता था कि फर्म कीचड़ है, (उसमें पढ़ते दो सय ओरसे मलिनता छा जायगी) फिर भी वित्तको उनी सानकर (प्यास बुझानेके लिये) मैं कुटिल, मलसे ही मलको घोपा पाहता प्यास लग रही है,पर में ऐसा दुष्ट हूँ कि श्रीगंगाजीको करदार-बारध्याकुल होमाकाश निचोदता फिरता है (सपे सुसकी पातिके लिपे गुसम्पविषयों में भरकता देनाय ! मैंने अपना एक मीदोष मापसे नहीं छिपाया,मतःमय इस तुलसीदासपर कृपा कोजिये। ममेरिछीना रिछात-पिछाते हीसारी रात थोत गयी, परहे नाथ! कमी

विनय-पत्रिका
नींदभर नहीं सोया । (सुख प्राप्तिके उपाय करते-करते ही जीवन है
गया, आपको प्राप्तकर पूर्णकाम हो योधरूप सुखकी नोंदमें कभी ना
सो पाया। अब तो कृपा कीजिये) ॥३॥
[२४६]
लोक-बेद हूं विदित पात सुनि-समुझि :
मोह-मोहित विकल मति थिति न लहति ।
छोटे-बड़े, खोटे खरे, मोटेऊ बरे,
राम ! रावरे निबाहे सपहीकी निवहति ॥१॥
होती जो आपने यस, रहती एक ही रस,
दुनी न हरप-सोक-साँसति सहति ।
घहतो जो जोई जोई, लहतो सो सोई सोई,
केहू माँति कास्की न लालसा रहति ॥२॥
फरम,काल,सुमाउ गुन-दोपजीव जगमापाते,
सो समै
समै माद चकित चहति ।
इसनि-दिगीसनि,जोगीसनि मुनीसनि ह
होड़ति छोड़ाये तें, गहाये में गहनि ॥३॥
मतरंजको सो राज, फाठको गर्व समाज,
महाराज यानी रची, प्रथम न इति ।
तुलमी प्रमुक हाय हारियो जीतिमा नाय!
पर पेप, पर PPT सारदा कहति ॥५॥

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शिमय-पत्रिका [२४७] राम जपुजीह ! जानि,प्रीति सो प्रतीत मानि, रामनाम जपे बैहे जियकी जरनि । रामनामसो रहनि, रामनामकी कहनि, कुटिरोमोन्ट-हरनि ॥१॥ मला पराउ, मगर कही आपनी करनि । से सपोह मुगति हेतु, उसा मादर संमु सहित घरनि ॥२॥ पाहे अपाप-अपराध-निधि, भामरा जपे पूजे मुनि अमरनि । सरसोरमकोल्यो सिंधु पटजहुँनाम-बल, बारोहिय, खारो भयो भूसर-डरनि ॥३॥ २५ ार, सेप-सुक पार-बार मावि-अनुसार पुध पेदा परनि । मसामधेनु तुलमीको कामतरु, रामनाम है रिमोह-तिमिर-तरनि ॥४॥ art-शोर राम-नामाकर,रामनाम (m कराएकराम-नाम असतो मामक पगपणशंभीरनाम .4 पिनय-पत्रिका पियनशिया कर (मप्रकारमामशागति) कुटिल कलियुग Hri gमों पर माटॉमी निशानी Inम-नामक प्रमायम पोश (मर्षत्रपम) पूजे जान गणेशजीन भएनी करनीको म्पयं कदा छ छिराकर नहीं रखना पक्ष राम-नाम संमारपीममुद्रका पुल (इसपर धार मनाउन सहज ही भयामागरमे नर जातकाशीमें भगवान् शंकरमी पार्वतारमदितीयोगी मोक्षदेनकरिये गम-नामको अपा करने २ पाल्मीकिशाप मनात पाप किन्तु उत्स्टा नाम 'मरा मरा' उपकर ये ऐम हो गये कि मुनियों और देवनामाने मी उनकी एजा की। मगम्य पिने भी सी राम-नाम यसपर पिण्याचल- पर्वतको रोक लिया एवं समुद्रको मुमा दिया था। पीछे यह समुद्र उन्हीं, पालण (अगस्त्य)फेमयम इदयमें हार मानकर गात हो गया ॥३॥ राम-नामकी अपार महिमा है। र, शुकदेय, पेद और पण्डिनाने धार पर अपनी बुद्धिके अनुसार इसका वर्णन किया है। गम-नाममे प्रीति ना नुन्टमीदासके लिये कामधेनु और कल्पवृक्ष ही है (उसे तो इसी राम-नाममे मनचादा दुर्लभ पद मिला है)। अधिक पया, यह राम नाम मानके अन्धकारको दूर करने के लिये माझान् सूर्य ? nam [२४८] पोहि, पाहि राम! पाहि, रामभद्र, रामचंद्र ! मुजस श्रवन मुनि आयो हो सरन । दीनबन्धु! दीनता-दरिद्र-दाह-दोप-दुख दारुन दुसह दर-दुरित-हरन ॥१॥ - F पिनया जर जर जग-जाल म्यापन करम काल, गर सल मर मये भूतल मरन । तर नव मनु परि, भूमि मार दरि करि पाप मुनि, सुर, साधु, आश्रम, परन ।।२।। बैद, लोक, मासासी, काही रती न रासी, रावनकी मंदि लोगे अमर मरन । ओक द रिमांक किये लोकपति लोकनाय रामराज मयो परम पारिह चरन ॥ ३॥ सिला, गुह, गीप, कपि, मील,मालु, रातिचर :: म्न्याल ही कपाल कीन्हे तारन-वरन । पील-उद्धरन ! सीलसिंघु ! टीठ देखियतु । तुलसी पै चाहत गलानि ही गरन ॥४॥ भावार्थ-दे श्रीरामजी! कल्याणम्वाप रघुनाथजी रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये । आपका सुयश सुनकर शरण आया हूँ। हे दीनबन्धो ! आपदीनता, दरिदता,सन्ताप, दोप, दारुण दुःख और असहनीय मयतया पापाको नाश करनेवाले हैं ॥१॥ जय-जय साधु (सन्त और गौ-बाशय) काल और कर्मक वश हो जगजालमें फंसकर व्याकुल हुए और सब कुट राजा पृथ्वीपर भारस्वरूप हुए, तब-तब आपने अयतार-दारीर धारण कर (दुष्टोंका संहार कर) पृभ्यीका भार दूर कर दिया और मुनि देवता, सन्त एवं वर्णाश्रम धर्मकी पुनः स्थापना की ॥२॥ वेद और संसार दोनों ही इसके साक्षी है कि जब रावणने किसीकी भी प्रतिष्ठा नहीं -

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भावार्थ-देधारामजी! हे कल्याणस्वरूप रघुनापजी मार रक्षा कीजिये । भापका सुयश सुनकर शरण माया दीनायो।। भावदीनता, दरिद्रता, मन्ताप.पोलावारण दुलमीरममानीव माया पापाको मारा करनेवाले हैं॥१॥ जय-जय साधु (सन्त भीरगाव) राशायीपर मारम्याप हुए, तर तर मापने भतारवारमा जब जब जग-जाल व्याकुल करम काल सब खल भूप मये भूतल-मरन तब तब तनु धरि, भूमि-भार दूरि करि थापे मुनि, सुर, साधु, आश्रम, परन ॥२॥ वेद, लोक, सब साखी, काहूकी रती नराखी, रावनकी बंदि लागे अमर मरन, ओक दै विसोक किये लोकपति लोकनाय रामराज भयो घरम पारिह चरन ॥३॥ सिला, गुह, गीध, कपि, भील,माल, राविचर, ख्याल ही कपाल कीन्हे तारन-तरना... पील-उद्धरन ! सीलसिंधु ! ढील देखियतः 2, तुलसी पै चाहत गलानि ही गरन ॥४॥ काल भोर कर्मके यश दो जगमासमे मारण्याकुसाप मोरा कर (का हक मार कर दिया और देवना, मात एवं वर्णाश्रम-धमा पुनःस्थापना की और tam दोनोंडीस सानी कि रायन किमाही मी * re

१५
विनय-पत्रिका
(हने दी और देवतागण उसके कैदखानमें पड़े-पड़े मरने लगे, तय हे
भगर आपहीन उन लोक-पतियोंको इन्द्र, कुवेर आदिको आश्रय देकर
शोकरहित किया और उन्हें फिरसे अपने-अपने लोकोका खामी धनाया,
और हे रामजी! आपके राज्यमें धर्म चारों धरणों से युक्त (धर्मराज्य) हो
गरा (सत्य, नप, दया और दान विकसित हो उठे) ॥३॥ हे कृपालो !
मारने लीयापूर्वक ही अहल्या, निपाद, जटायु, घन्दर, भील, भालु और
राशमाको तरणतारण कर दिया, ( उन्हें तो तार ही दिया, परन्तु
दूमरॉको तारनेकी शक्ति भी उनको दे दी। जिस किसीने उनका संगया
अनुकरण किया, यह भी तर गया।) हे गजराजके उद्धारक! हे शीलक
मागर! इस तुलमीपर जो आपकी ओरमे कुछ ढील-मी दिखायी देती है,
इसमे यह मारे ग्लानिके गला चाहता है। अतएव हाकर इसका भी
घोष हो उद्धार कीजिये ॥४॥
[२४९]
भली भांति पहिचाने जाने साहिब जहाँ ली जग,
जूड़े होत थोरे, थोरे ही गरम ।
प्रीति न प्रवीन, नीविहीन, रीतिक मलीन,
मायाधीन सर किये कालह करम ॥१॥
दानव-दनुज पड़े महामा
महामा मुंड
मुंड घड़े,
जीते लोकनाथ नाथ! पलनि भरम ।
निरीशि दिये पर, सीमि-रवीमि पाले घर,
आपने नियाजही न काहको मरम ॥२॥

एकरूप, वोहि
बिनय-पत्रिका
सेवा-सावधान तू सुजान समस्थ साँचो,
सदगुन-धाम राम! पावन परम
सुरुख, सुमुख, एकरस,
विदित बिसेपि घटघटके मरम
तोसो नतपाल न कपाल, न कंगाल मो सो
दयामें बसत देव सकल • धरम
राम कामतरु-छाँह चाहै रुचि मन मॉड,
तुलसी विकल, पलि,, कलि-कधरम
भावार्थ-जगत्में जहाँतक मालिक हैं, उनको मैंने म
समझ और पहचान लिया है। ये थोडेमें ही प्रगम हो
भार थोड़े ही गरम हो उठने है।म तो ये प्रेमो निभाने की
भीर न नीति ही जानते हैं। उनकी चाल सरपुरी पोजिका
भीर मायाने उन्हें अपने अधीन कर
रामाय!
पटक भ्रमग पड़े पड़े वैयक्षानय भादि महामूर्ण वनकर (ग)
पद गये थे भार उन्होंने टोकपालोको मीजीत लियाlni
इनके मालिकाने (पनामाने) पहले तो (नके नारी
(मनमान) पर दिय, परपोडेग नागा होगा
वादा ग !ि (भागती मार्यमा करणे) भान है।
विगानं गमय किमीको मौशमापी रामी ! गा
भी भारी भी मौत पोति प्रrrt
स्थान पर परमपिता nrren'

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प्रमाणीपनवधायगा)महाराजाविधारिप, मामा की हिरोहीलिये क्योंलना पिजम्ममा विनय-पत्रिका रीति सुनि राबरी प्रतीति-प्रीति रावरे सों, डरत हौं देखि कलिकालको कहरु । कहेही बनेगी के कहाये, बलि जाउँ, रामा; 'तुलसी ! तू मेरो, हारि हिये न हार ॥४॥ भावार्य-हे नाथ! यदि मुझे कहीं कोई दूसरा स्वामी या माध के लिये) स्थान मिल जाता, तो में यार-यार आपको पुकार अप्रसन्न न करता महाराज रामचन्द्रजी ! मुझसरीपे भालसियों और अभागोंको तो आपने ही पाला-पोसा है। मतपय दे रुपालो! मा मेरे राजा है और अयोया ही मेरे (रहने के लिये शहर है तो मैंने दिक्पाल, सूर्य, गणेश और पार्यतीद्दीकी प्रेमपूर्वक संघा की और न (श्रद्धासहित) प्रहा, शिय और विष्णु की ही उपागमा की। मेरा नो योग-क्षेम एक राम-नामसे दी है।(राम-नामसे ही मुझे तो भग्रामी प्राप्ति और प्राप्त साधनकी रक्षा ) उनीसे मेरा है, गरी मेम भार उसी में अनन्यता है। उसका भरोमा मेरे लिये भगाने गमान है भार दूसरे मय माधन यि गमान ६४२ . मनायो ना!मेरे गायीचोर भौर चौकीदारमयभापही हाध मग मी पात भोकमरीकाई(मापकाम, बोध, लोभ, मोह भारिपोरोमोमगा. कर विपक-यायमणी पौकीदारको मचंत कर ग तो मेरा राम मा कामोंमें देवताभोंके कामोंमें मार दीन दुनियोंके कामो कपा मा ।

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विनय-पत्रिका औरनिकी कहा चली एक बात मले मली, राम-नाम लिये तुलसी हूँ से वरत ॥ ४॥ भावार्थ-हे रामजी ! आपके स्वभाव, गुण, शीलकी महिमा और प्रमावको श्रीशिवजी, हनूमानजी, लक्ष्मणजी और मरतजीन ही(तस्वमें जाना है, (इसीसे) उनके हृदयरूपी सुन्दर थामलेमें आपके प्रेम कल्पवृक्ष सुशोभित हो रहा है, जिसमें परमसुसरूपी सरस फूल-फत फूलते और फलते हैं । (जो भगवान्के गुण-शीलकी महिमा जान लेता है, उसका हृदय मगवत्-प्रेमसे ही मर जाता है, और जिस हद भगवत्प्रेम भरा है, उसी परमानन्द नियास करता है) ३१॥ आप भावे स्वभावके वश होकर शिवजीको स्वामी, हनूमान्जीको मित्र मौर लमन तथा मरतको अपना भाई मानते हैं और ये सब आपको अपना मालिक मानते हैं, प्रेममें सदा सावधान रहते हैं और डरा करते हैं। कहीं प्रेमकी अनन्यता और विशुद्धतामें कमी न आ जाय।) यदि स्वामी और सेवक दोनों इस रीतिसे प्रेम करते रहें, और (प्रेमके) मोति- नियोको सदानियाहते रहे तो उनके (प्रेमको) टेक कमीटल नहीं पाती और वह सीमाको पहुँच जाती है ॥२॥ शुकदेव, सनकादि प्रहार और नारद आदि भक्तगण कहते हैं कि परमविरक्त होनेसे ही धीरपुनाय जीकी महान् (अनन्य विशुद्ध) भक्ति मिलती है (मोगोंसे परम पैराग उसीको प्राप्त होता है जो भगवान्को तत्त्यसे जान लेता है, भएर परमात्मा) शान दिना मक्तिकी प्राप्ति नहीं होती किन्तु यह माम? नाथ ! यापके हाथमें है (शान किसी साधनसे नहीं होता, या हो .

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विनय-पत्रिका खाँग घोसाधुको, कुचालि कलिते अधिक, परलोक फीकी मंति, लोकरंगई। बड़े कुसमाज राज! आजुलौं जो पाये दिन, महाराज ! केहू भाँति नाम-ओट लई ॥४॥ राम! नामको प्रताप जानियत नीके आप, मोको गति दूसरी न विधि निरमई । खीझिये लायक करतब कोटि कोटि कर, रीझिये लायक तुलसीकी निलजई ॥५॥ भावार्थ-हे मेरे यापजी ! मैंने अपने ही हाथों मानी करनी माता यिगाह डाली है, आपकी यलेया लेता है, इस लोभी भीर रंगी या एक बार तो मुधार दीजिये। क्योंकि जिम जिमफे माय भाग्ने भग की उमीकी यान थन गयी (दया करके आज मेरी भी विणही बना दीजिय) ॥१॥ शरीर गंगी है, मन पुरी युरी कामनामगि मरिन । रहा है भीर याणी मागेकी निन्दा करते और गाठ पोम पोहत मा गया है। (जिम तन-मन-धन साधन होने ये तीनों ही गाधन योग्य नहीं , परातु) गाधनों का यह निगमकरिना गा पेपर नहीं होने हममे (भय तो शानिध! आपकी RTE मी भन्टी है, जो मेरी विगही पातको पनामी (माकी हागडी गुष्ठ गायन हीनका सुधार होगा माप गायिका परिका पाल, दुमिणों मनाला दिल, निराधार मान : 'थामाणिक) दगलु frg, में तो इसमें कमी । *

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बिनय-पत्रिका
कोई नहीं
लाले पाले, पोपे ताप आलमी-अमागी-अथी,
नाय ! अनायनिमों मरे न उरिन ।
म्वामी समरय मो, ही विहारी जैसा तसा
काल-चाल हेरि होति हिये धनी थिन ||२||
खीमि-रीमि, विहंसि-अनख, क्यों हूँ एक बार
'तुलसी तू मेरो', बलि, कहियत किन ?
जाहिं मूल निरमल, होहिं सुख अनुकूल,
महाराज राम ! राबरी साँ, तहि छिन ॥३॥
मावार्थ-हे श्रीरामजी! मुझे यपनीहीशरणम रमिये, क्योंकि(मुझ
सरीको) सदासे पार ही अपनाते माये हैं। यह सभी जानते हैं कि
तीनों लोकों और तीनों फालोम आपके समान दयालु दूसरा
है। हे नाय! आर्त शरणागतोंकी रक्षा करनेवाला आपके मिया दूसरा
कौन है ? nan आपने हीमालमी, अभागे और पापी लोगोंका लालन-
पालन किया, उन्हें पाला-पोसा और प्रसन्न रमसा तिसपर मी हे नाय!
आप उनसे कमी उऋण नहीं हुए। हे खामी ! आप तो समर्थ हैं। पर मैं
(मला-धुरा) जैसा कुछ हूँ, यापहीका हूँ । कलिकालकी चाल
देखकर मेरे हृदय में बड़ी घिन हो रही है (यह शंका है कि कहीं यह दुष्ट
आपके चरणों की ओरसे मेरे मनको फेरे न दे।) २ बलिहारी!एक
थार नाराजीसे अथया राजीसे, मुसकराकर या अनसाकर किसी भी
तरह इतना क्यों नहीं कह देते कि 'तुलसी! तू मेरा है' ? इतना कह
देनेमाप्रसे ही, हे महाराज रामचन्द्रजी ! मैं आपकी दापय गाकर
कहता है, उसी क्षण मेरा सारा दुःम जड़से नाश हो जायगा और
समस्त सुख मेरे अनुकूल हो जायेंगे ॥३॥

24 १०५ विनय-पत्रिका है [ २५४] राम ! रावरो नाम मेरो मातु-पितु है। सुजन-सनेही, गुरु साहिय, सखा-सुहृद, राम-नाम प्रेम-पन अविचल चितु ॥१॥ मतकोटि चरित अपार दधिनिधि मथि लियो कादि वामदेव नाम-घृतु है । नामको भरोसो-बल चारिह फलको फल, सुमिरिये छाडि छल, मलो कृत है ॥२॥ म्यारथ-साधक, परमारथ-दायक नाम, राम नाम सारिखो न और हितु है। तुलसी सुभाष कही, साँचिये परंगी सही, सीतानाथ नाम नित चितह को चित्तु है ॥३॥ भावार्थ-हे श्रीरामजी! आपका नाम ही मेरामाता-पिता, म्यजन- मम्बन्धी, मेमी, गुरु, स्थामी, मित्र और अहेतुक द्वितकारी है। और मापके नामसे जो मेरा अनन्य प्रेम है, वही मेरा अटल धन है ॥२॥ शिवजीने सौ करोड़ चरित्रम्पो अगाध दधि-सागरको मथकर उसमे पम-नामरूपी थी निकाला है। आपके नामका यल-भगेसा मयं, धर्म, काम और मोक्ष चारों फलोका (चरम) फल है। कपटमाय छोड़कर इसीका स्मरण करना चाहिये। यही सोनम य है २॥ आपनाम .गीता तो श्रीभगवान जप-यसको अपना स्वरूपही रतलाया १-पगना जयशोम।

20
आप उनसे की उऋण नहीं हुए। हे स्वामी! आप तो समर्थ है. पर में
(भला बुरा) जैसा कुछ हूँ, आपहीका हूँ । कलिकालकी चा
दनेमात्रमेही, हे महाराज रामचन्द्रजी! मैं आपकी शपय माकर
लाले पाले, पोणे नाग आलमी-अमागी अधी,
नाय ! पे अनायनिमों म न उरिन ।
मामी गमग्य मो, हो निहाग जैमो-तमो
काल-लाल हेरि होति हिंग घनी विन ||२||
मीशि-रीमि, विहंमि-अनस, क्यों हूँ एक बार
'तुलसी तू मेरो', बलि, कहियन किन ?
जाहि मूल निगमल, होहिं मुख, अनुकूल,
महाराज गेम ! गरी मी, तेहि छिन ॥३॥
मावार्थ-दे घोरामजी 'मुझे अपनी ही शरणमै रम्बिये, क्योंकि(पुर
मर्गमको ) मदासे मारती अपनाने आये हैं। यह सभी जानते हैं कि
नीनो लोको और कालो आसमान दयालु दूसरा कोई नहो
है। हे नाथ ! आर्त शरणागतों की रक्षा करनेवाला आपके सिवा दुमरा
कौन है ? ॥१॥ आपने ही आलमी, अभागे और पापी लोगोंका लालन
पालन किया, उन्हें पाला-पोमा और प्रसन्नरक्साःतिसपर मी हे नाथ!
देखकर मेरे हृदय में यही दिन हो रही है (यह शंका है कि कहीं यह दुष्ट
आपके चरणोंकी ओर से मेरे मनको फोनदे।) बलिहारी ! एक
वार नागजीसे अथया राजामे, मुसकराकर या अनखाकर किसी भी
तरह इतना क्यों नहीं कह देते कि 'तुलसी! तू मेरा है' १ इतना कह
कहता हूँ, उसी क्षण मेरा सारा दुस जइसे भाश हो जायगा और
समस्त मुख
मेरे
'अनुकूल हो जायँगे ॥३॥

विनय-पत्रिका [२५४ ] राम ! राबरो नाम मंगे मातु-पितु है । मुजन-सनेही, गुरू माहिय, सखा मुहृद, राम-नाम प्रेम-पन अविचल वितु है ।।१।। सक्कोटि चरित अपार दधिनिधि मथि लियो कादि बामदेव नाम-धृतु है। नामको भरोसो-चल चारिह फलको फल, सुमिरिये छाडि छल, मलो कृतु है ॥२॥ सारथ-साधक, परमारथ-दायक नाम, राम-नाम मारिखो न और हितु है। तुलमी सुभाव कही, सॉचिये परंगी सही, सीतानाथ नाम नित चितह को चितु है ॥३॥ भावार्थ-हे श्रीरामजी! आपका नाम ही मेरामाता-पिता, स्वजन- बन्धी, प्रेमी, गुरु, स्वामी, मित्र और अहेतुक हितकारी है। और पिके नामसे जो मेरा मानन्य प्रेम है, यही मेरा अटल धन है ॥१॥ यजीने सौ करोड़ चरित्ररूपी अगाध दधि-सागरको मथकर उससे मि-नामरूपी घी निकाला है। आपके नामका वल-मरोसा अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष चारों फलोंका (चरम) फल है। कपटभाव छोड़कर इमीका स्मरण करना चाहिये। यही सर्वोत्तम यज्ञ है॥२॥ मापकानाम • गीतामें तो श्रीभगवानने जप-यडको अपना स्वरूप ही बतलाया है-यशाना जायजो मि।

पिनय-पत्रिका गी गमारिक म्यायका मायनेयाला पर परमाणु (मोस) का प्रदान कानयाला धीराम-नामममान द्वित करनेवाला और कोई भी नहीं है। यह यात शुलमाने म्यमायमे ही कही है। अनएर सचमुच ही सार सही पडेगी जानकीरमण धोगमका नाम चित्तका मी विद है ।। [२५] राम ! रावरो नाम साधु-मुरतरु है। सुमिरे विविध धामहरत, पूरत काम, सकल सुकृत सरसिजको सरु है ॥१॥ लामहूको लाम, मुखहको सुख, सरयस,... पतित-पावन, डरहूको डरु नीचेहको ऊँचेहको, रंकहूको रावहको ... सुलम, सुखद आपनो-सो. घरु है ॥२॥ वेद ह, पुरान इ, पुरारि हू पुकारि कह्यो, . . नाम-प्रेम चारिफलहको' फलं है। ऐसे राम-नाम सोनप्रीति,न प्रवीति मन, मेरे जान, जानियो सोई नर खरु है ॥३॥ नाम-सोन मातु-पितु, मीत-हित, बंधु-गुरु, साहिब, सुधी, सुसील, मुधाकर है। नामसों निवाह नेह, दीनको दयालु ! देह, दासतुलसीको, बलि, बड़ो वरु है ॥४॥ 9 घाम-धर्म-ताप । अनेक प्रतियोम घाम पाठ है । परन्तु धामका अर्थ 'ज्योति' तक है । परन्तु 'ताप' कदापि नहीं भी धाम स्वीकार्य नहीं है। .

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(दीन और पतितोंको तारनेवाले होकर मी मुझ शरणागत दीनको अब
तक क्यों नहीं अपनाया? यही सोचकर हृदयम जलन होने लगती है
और इसीसे मनमानी यात कह बैठता है) ॥२॥ (और कहूँ मी किससे,
कालही, कमकी कुमांगति मान॥
फग्न पिसार मार रन न कह का
गाल परामर कहां से लहन ।
नागी मदिमा मुनि, समुसि आपनी ओर,
हरि हारि के हर दर दहन ॥२
ममा न, सुमाकन, सुनिए न, प्रम आर,
माय-याप तही मांची तुलमी करता
मेरी ता पोरी, मुधरंगी रिंगरियो, पलि,
राम ! रायरी सी, रही रावरी चहत ॥३||
मापार्य-६ धारामजी! कई विना तो रहा नहीं जाता और
देनेपर कुछरस (मला) नारदाता(थात यह है कि) मापस
थोड म्यामीका माधय पाकर मी में मापका धुरा या मला हेयक क
मौर कर्मके कारण भसन्धि मोग रहा हूँ ॥१॥ (व्याध निषाद आई
यह पनपर) विचार करता है, पर कहीं कुछ मी रहस्य नहीं मिल
कि इन सय लोगोंने कहाँसे पडापन मात किया? (सुना जाता है,आपने
इनको दीन जानकर अपना लिया, जिसमें ये सब महान् पूज्य हो गरे
थापकी (ऐसी) महिमा सुन-समझकर जब अपनी दशाकी ओर देखर
हूँ तो निराश हो जाता है और घबराहटसे हृदय जलने लगता

०९ विनय-पत्रिका पॉकि) न तो मेग कोई मित्र है, नसशा सेधक है, न सुलक्षणा स्त्री है और न कोई नाय है। मेरे तो माँ-चापापही हैं, तुलसी यह सची यात हरहा है। मेरी तोथोड़ी-सी यात है, विगढ़ी होनेपर भी सुधर जायगी; नु, यलिहारी! मैं आपकी शपथ खाकर कह रहा हूँ, मैं तो आपकी त ही रखना चाहता हूँ (कहीं आपका पतितपायन और शरणागत- सल पाना न लज़ जाय) an [ २५७ ] दीनबन्धु दरि किये दीनको न दूसरी सरन । आपको मले हैं सप, आपनेको कोऊ कहूँ, सबको भलो है राम ! रावरो चरन ॥१॥ पाहन, पसु, पतंग, कोल, भील, निसिचर काँच ते कृपानिधान किये सुपरन । दंडक-पुडुमि पाय परसि पुनीत भई, उकठे पिटप लागे फलन-फरन ॥२॥ पतित-पावन नाम चामहू दाहिनो, देव ! दुनी दुसह-दुख-दूपन-दरन । सीलसिंधुत्तोसों ऊँची-नीचियों कहत सोभा, तोसो तुही तुलसीको आरति-हरन ||३|| भावार्थ-हे दीनबन्धों! यदि आपने इस दीनको (अपनी शरणसे) घटा दिया, तो फिर इस और कहीं शरण न मिलेगी। क्योंकि अपनी

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। ४०९ विनय-पत्रिका क्योंकि न तो मेरा कोई मित्र है, नसथा सेवक है, न सुलक्षणा स्त्री है और न कोई नाथ है। मेरे तो माँ-बाप यापही है, तुलसी यह सची पात कह रहा है। मेरी तोथोड़ी सी यात है, विगढ़ी होनेपर भी सुधर जायगी; किन्तु, बलिहारी ! मैं आपको शपथ खाकर कह रहा हूँ, मैं तो आपकी पान ही रखना चाहता हूँ (कहाँ थापका पतितपापन और शरणागत. बल्मल याना न लज जाय) ॥३॥ [ २५७ ] दीनबन्धुरि किये दीनको न दूसरी मरन । आपको मले हैं सब, आपनेको कोऊ कहूँ, सबको भलो है राम ! राघरो चरन ॥१॥ पाहन, पसु, पतंग, कोल, भील, निसिचर काँच ते कृपानिधान किये सुपरन । दंडक पुहुमि पाय परसि पुनीत भई, उकठे विटप लागे पतित-पावन नाम पाम ह दाहिनो, देव ! दुनी दुसह-दुख-दूपन-दरन । सीलसिंधु! तोसों ऊँची-नीचियो कहत सोभा, तोसो तुही तुलसीको आरति-हरन ॥३॥ भावार्थ-हे दीनबन्धो ! यदि आपने इस दीनको (अपनी शरणस) हटा दिया, तो फिर इसे और कहीं शरण न मिलेगी। क्योंकि अपनी --- फलन-फरन ||२|| न

विनयविका
मला चाहनेवाले तो प्रायः मनी है, किन्तु अपने दामाशा कर
करनेवाला को विरला श्रीरामजी सकामलाकरनेाळेने
आपके चरण ही, (मापके चरणोंक आधसे भले-बुरे सनी
पल्याण होता है पत्थरकी शिला (बहत्या), पशु (बन्दर,
पनी (जटायु), कोल-मील, गक्षम (विमीषण) मादिको है कृपानियान
आपने काँचसे सोनायना दिया (विपर्यायजिनको मुक्त कर दिया) इड
यनीम्मि आपके चरणोंका होत ही पवित्र हो गयी और उमई
सूखे पेड़ फिर फलने-फलने लगेशआपका पतित-पायन नाम,जो आरले
चिमुम्ब हैं उनका मी कल्याण करता है (धुभावसे मउनेवाले भी
तर जाते हैं ) हे देव ! संसारमें असह्य दुःसों और पाराका मार
करनेयाला आपको छोड़कर दूसरा कोई नहीं है । माप शोलके समुद्र
हैं, अतएव आपसे नीची ऊँचौबात कहने में मीशोमा ही है (अधिक क्या
कहूँ)। तुलसीके दुःख दूर करनेवाले तो घस आरसरीखे एक आप ही।
(इसीसे शरण पड़ा है) ३n ,
-[.२५८ ]::
जानि पहिचानि में विसारे ही कृपानिधान!- :
एवो मान ढीठ ही उलटि देव सोरि हों।
करव जवन जासों जोरित्र को जोगीजन,
तासोक्योंह जुरी, सोअमागोवैठो तोरि हो।।१।।
मोसे दोस-कोसको भुवन कोस दूसरो न,
आपनी समुझि मुझि आयो टफटोरि हो।
म
T

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विनय-पत्रिका
दूसरा कोई भी नहीं है। इसलिये मुझ झूटे, लालची और उगोद
हटा दीजिये, नहीं तो मैं अमृत-सरीखा जल शूकरीकी तरह गद
डालूंगा (आपका भक्त कहाकर बुरे कर्म करूँगा तो आप निर्म
कलङ्क लग जायगा) ॥३n (अतएव) या तो मुझे मच्छी नरहम
(अपनी शरणमें)रख लीजिये,नहीं तोमुझ नीवकीमार ही डालिय
आप ही इन दोनों वातोपर विचार कर लीजिये, अय में आपका
न करूंगा। तुलसीने यार-चार लकीर खाँचकर सदी यात कही
आपभीदेरी करेंगे, तो आपके नामकी महिमारूपी मौकाको उप
( मेरो दुर्दशा देखकर लोग आपके नामका विश्वास छोड़ देंगे)
[ २५९ ]
रापरी सुधारी जो विगारी विगरंगी मेरी,
कहीं, बलि, वेदकी न, लोक कहा फहंगो !
प्रभुको उदास-भाउ, जनको पाप-प्रमाउ,
दुहूँ भाँति दीनबन्धु ! दीन दुख दहंगो ॥१॥
मैं तो दियो छाती पवि, लयो कलिकाल दषि,
साँसति सहत, परपस को न सइंगो!
पाँकी विरुदावली पनगी पाले ही कपाल !
अंत मेरो हाल हरि या न मन रहेगी ।।२।।
करमा-परमी साधु-सेवक, विरत-रत,
आपनी मलाई थल कहाँ फोन लहगो।
तेरे मुंह फेरे मोगे फापर-कपूनगर,
लटे मटपटेनि को कौन परिगहगी ॥३॥

विनय-पत्रिका काल पाय फिरत दसा दयालु ! सपहीकी, दोहि पिनु मोहि कयहूँ न कोऊ चहगो । वचन-करम-हिये कहाँ राम ! सौंह किये, तुलसी 4 नाथके निवाई निबहगो ||४|| भावार्थ-यदि आपको सुधारी हुई मेरी बात मेरे बिगाड़नसे बिगड़ यगा तो, मैं तुम्हारी चलैया लेता हूँ, फिर घेदकी तो जाने दीजिये, मार क्या कहेगा ?(वेदमें कुछ भी लिखा हो, संसार तो यही कहेगा तुलमी ही ईश्वर है, क्योंकि उसने रामजीकी बनायी यातको विगाड़ या) प्रमुकी उदासीनता और मुझ दासके पापोंका प्रभाव, यदि ये दोनों इल गये तो हे दोनयन्धी ! यह दीन दुवके मारे जल मरेगा । (मैं तो हापापी ही, पर आप भी उदासीन हो जायेंगे तो फिर मेरी यही हो गति होगी) ॥१॥ मैंने तो अपनी छातीपर बन रख लिया है (दुग्ध पहने के लिये तैयार हैं, परन्तु पाप नहीं छोड़ता) क्योंकि कलियुगने मुझे दया रपया है। इसीसे कर सह रहा है। (मैं ही क्यों) जो भी परतन्त्र होगा, उसे कष्ट सहने ही पड़ेगे। किन्तु हे कृपालु ! आपको तो अपनी योगी विरदायलोके वश होकर रक्षा करना ही पड़ेगी। (अमीन सदो,) अम समय तो मेग (धुरा) हाल देखकर आपका यह उदासीन मायग्द मही पकना (दयालु म्यभाषसे मेरा दुःख देखा ही नहीं जायगा, तय दोहवर बनाना होm) कर्मकाण्डी, धर्मारमा, माधु, सेवक, विरक्त भाररिपो जार मतोअपने-माने भले कमा.अनुमार की फोर सा म्यान पा हो जायेंगे, पम्नु आपके मुंह फेर सेनेमे (उदासीन हो जाने) असमीने काया, पून, फर, साधनहीन और पतित जीयाको कान

निमगांधका
भाभा देगा! (कामीमही) दगालो! काल पाकर मौकी
Tikमीक दिन किन्ने है, परन्तु मापको छोड़कर मुझे ती
को नहीं गागा (मागे माययको छोड़कर मुमे कहीं कोई स्थान
मिका)मजी! मापी गय माकर यचन, कर्म और
फाया किया तुलमी मा नायक होनिया निमंगा ॥
[२६]
साहिब उदास मये दास खास खीम होत
मेरी कहा चली ? ही बजाय जाय रह्यो हो ।
लोकमें न ठाउँ, परलोकको मरोसो कौन ?
हो तो, पलि जाउँ, रामनाम ही ते लह्यो हौं ॥१॥.
करम, सुमाउ, काल, काम, कोह, लोभ, मोह
ग्राह अति गहनि गरीची गाड़े गझो हो ।
छोरिवेको महाराज, बाँधिवेको कोटि भट,
पाहि प्रभु! पाहि, तिहुँ ताप-पाप दह्यो हो ॥२॥
रीझि-बूझि सबकी प्रतीति-श्रीति एही द्वार,
दूधको जरथो पियत पँकि कि - मझो हौं ।
रटत-रटत लट्यो, जाति-पाँति-भाँति घट्यो,
जूठनिको लालची चहौं न दूध-नह्यो हौं ॥३॥
अनत चह्यो न भलो, सुपथ सुचाल चल्यो
नीके जिय जानि इहाँ भलो अनचरो हो ।
तुलसी समुझि समुझायो मन बार बार,
अपनो सो नाथ हसों कहि निरपझो हो ॥४॥

विनय-पत्रिका मावार्थ-जय मालिक उदासीन हो जाता है तव खास नौकर भी ग्बाद हो जाता है, फिर मेरी तो बात ही क्या है ? मैं तो उंकी चोट धोंमें यहा चला जा रहा है। जब मेरे लिये इस लोकमें ही कहाँ ठौर हाँ है, नय परलोकका क्या भगेला कर ? हे श्रीगमजी ! मैं आपकी लिया लेता है, मैं तो एक मापके नामहीके हाथ विक चुका हूँ (मेरा टोक परलोक तो उसी से बनेगा) ॥१॥ कर्म, म्यमाय, काल, काम, क्रोध, गेम और मोहरूपी बड़े-बड़े ग्राहोंने और (माधनहीनतारूपी) धोर पदनाने मुझको बड़े जोरसे पकड़ रखा है। हे महाराज ! याँधने के ये करोड़ों योद्धा है, परन्तु यन्धनसे छुड़ाने के लिये तो केवल एक पपही है अतपय हे प्रभो ! मेरी रक्षाकीजिये, रक्षा कीजिये । मैं पापरूपी नों तापसे जल रहा हूँ (अपनी कृपादृष्टिकी सुधा-वृष्टिसे इन तापोंको मित कीजिये ) ॥२॥ हे प्रभो ! (दूसरे किसके पास जाऊँ?) सयकी रोम- न और पीनि-विधान एक आपके ही द्वारपर है। (आपके ही दिये हुए अधिकारस देवतागण यापके ही खजानेसे अपने संघकोंको कुछ दिया पाते हैं, परन्तु वे मुक्ति नहीं दे सकते। उन मयको पूजा भी आपकी की पूजा होती है, क्योंकि सबके मूल आप ही हैं)। मैं तोद्धकाजला मट्ठा मी कपूककर पीना है। भाव यह कि आपको छोड़कर दूमरॉकी परमपुर और दिव्य-शान्ति नहीं मिली. इमलिये बहुत पावधान होकर चलता है। सुखके लिये देवतामाको पुकारते-पुकारतधार गया, धौर जाति-पानिनथाचाल-चलन समीसहाथ धो येटा । इसलिये भर में केवल आपके जूटना हो लालची हैं। मैं धसे नहीं नहाना चाहना । माय, मुझे पके पश्चर्य की इच्छा नहीं है,मैं ना कंपल याप मजन कमी मापना गाया भी कहीं (दूमा im) गुमा गाल मनार माना कन्याग न Mir Tal (मा)मार न पाकर भी मर (माग मनोगद गनिमयमार नियत पहा) ARIET पनि नपा- ममा दिया है और यह म भी कर fafarmi गया कि उमा नियां वाय [२६..] मेरी न पने मनाये मर कोटि कलप ली राम! रारं बनाये बने पल पाउ में। निपट सयाने ही कपानिधान! कहा कहाँ ? लिये घेर पदति अमोल मनि आउ मानस मलीन, करतय कलिमल पीन जीह हुन जप्यो नाम, प्रक्यो आउचाउ मैं । कुपथ कुचाल चल्यो, मयो न भूलिहू मलो, याल-दसा हु न खेल्यो खेलत सुदाउ मैं ॥R देखा-देखी दंम तें कि संग तें मई मलाई, प्रकटि जनाई, कियो दुरित-दुराउ मैं । राग रोप दोप पोपे, गोगन समेत मन, द्वप इनकी मगति कीन्ही इनही को माउ मैं ॥३॥ आगिली-पाछिली, अपहूँ की अनुमान ही वें झियत गति, कछ कीन्हों तो न काउ मैं । - . पिनय-पत्रिका जग कह रामकी प्रतीवि-प्रीति तुलसी है, ठे-साँचे आसरो साहब रघुराउ मैं ॥४॥ भावार्थ-देशीरामजी! मेरोसदति मेरे पनाये (साधनोंके द्वारा) ठोकरोड़ो करातकभी न दोगी, परन्तु माप करना चाहे तो पाय पलमें ही हो सकती है। कृपानिधान ! मैं क्या कहूँ,माप तो स्वयं परम चतुर है, मैने मनमोल मणिके समान मायुके बदलेमें (विपयरूप)घेर ले लिये। (जिम मनुष्य-जीयनकोमापकी मानिमें लगाना चाहिये था उसे विषयों में लगाकर व्यर्थ खो दिया) १ (जिससे मेरा) मन मलिन हो गया तया कलियुगके कारण (कु) कर्म और भी पुष्ट हो गये, नित्य नये पाप यहते गये।जीमसेमीमापकानाम नहींजपा,सदा माय-बायें ही यकता रहाधुरे-चुरेमागीपर कुचाले ही चलता रहा। भूलकर भी मुझसे कभी किसीका मला नहीं था। अरे! बचपन में खेलते समय भी कभी भच्छा हाय हाय नहीं लगा (भगयत्-सम्बन्धी रोल नहीं खेला) ॥२॥ हाँ, किसीकी देखा-देगी (भकिका खाँग दिखलाने के लिये) दम्भसे या सत्सङ्गाके प्रमायसे कमी को अच्छा काम बन गया तो उसे हिंदोरा पीटना हुआ कहता फिरा, और (मनसेचाह-वाहकर)जो पाप किये उन्हें छिता रहा । राग, द्वेष और क्रोधको तथा इन्द्रियोसमेत मनको सदा पालना पोरता रहा। सदाराग, द्वेप और क्रोधके तथा मन-इन्द्रियोंके ही पशम रहा।इन्हींकी भक्ति की योर इन्हींसे भम किया ॥३॥ मैंने अपनी पीती हुई, वर्तमान तथा मविष्यकी दशाका अनुमान करके यह समझ लिश है कि मैंने कभी कोई भला काम नहीं किया। किन्तु संसार कह रहा है कि-'तुलसी रामजीका है और मुझे भी आपपर विश्वास और प्रम।ममा मलहो या गम, हे पामी धीरघुनापती ! मापीमार पड़ा। [२२] कमो न परत, मिनु कह न स्पो परत, पड़ो मुस कहत पड़े सों, पति, दीनता । प्रसकी पढ़ाई पड़ी, आपनी छोटाई छोटी, प्रमुकी पुनीवता, आपनी पाप-पीनता ॥१॥ दुह और समुझि सचि सहमत मन, सनमुख होत सुनि सामी-समीचीनवा । नाय-गुनगाय गाये, हाय जोरि माय नाये, नीचऊ निवाजे प्रीति-तिकी प्रवीनवा ||२|| एही दरवार है गरव तें सरव-हानि, लाम जोग-छमको गरीबी-मिसीनता । मोटो दसकंघ सो न बरी सिमीपन सो, पूझि परी रायरेकी प्रेम-पराधीनता ॥३॥ यहाँको सयानप अयानप सहस सम, सुधौ सतमाय कह मिटति मलीनता। गीध-सिला-सबरीकी सुधि सब दिन किये होइगी न साई सों सनेह-हित हीनता ॥४॥ सकल कामना देत नाम तेरो कामठरु, सुमिरत होत कलिमल-छल-छीनता ।

-- विनय-पत्रिका करनानिधान ! परदान तुलसी पहत, सीतापति-भक्ति-गुरसरि-नीर-मीनता ॥५॥ भावार्य-दं नाय ! कुछ कहा भी नहीं जाता और कई पिना रहा भी नहीं जाता। मापकी पलया लेता है (यद्यपि) पड़ों के सामने अपनी परीरो मुनाने में पछुत मुख मिलता है। (तथापिकदा तो) प्रभुका महान् पारन और कहाँ मेरी छोटी-मीक्षुद्रता; कहा तो प्रभुर्की पवित्रता और कहौ मेरे पापाकी अधिकता ॥१॥ इन दोनों ओरफी यातापर विचार के मन संकोच मारे महम जाता है (कुछ कहने की हिम्मत नहीं होती, र पीछे पड़ने लगते हैं), परन्नु स्वामीकी सुन्दर माधुना (शरणागत कैमा भी दीन-हीन-मलिन हो, आप उसको मादरफे साथ अपना ही लेते है) को सुनकर यह मन फिर सम्मुख जाता है। हे नाथ ! आपके गुणोंकी गाथाओंको गानमधीर हाथ जोड़कर मस्तक नवानेमे आपने नीचोंको भी निहाल कर दिया है (यह आपके प्रेमकी रीतिकी चनुरता है) ॥२॥ इस दरवारमें गर्यसे सर्वनाश हो जाता है और गरीबी एवं नम्रतासे ही योग-वेमकी प्राप्ति होती है। रावण-मरीखा तो कोई प्रतापी नहीं था, और विसीपणके समान कोई दीन-दुर्यल नहीं था। परन्तु इस प्रसंगमें आपकी प्रेमको पराधीनता ही (स्पष्ट) ममझमें आती है। .(शरणागत दीन विभीषण लक्षाका राज्य और अपनी अनन्य भक्तिका दान कर दिया तथा रावणका सर्वनाश करडाला) ॥३॥ यहाँ, अर्थात्थापके दरवारमें की हुईचतुरता हज़ारों मूर्पताकेममान है। यहाँ तो सीधे-सादे सच्चे भायसे अपना दोष स्वीकार कर लेनेमे ही सारी मलिनता मिट जाती है। यदितू

प्रम। म पार लगा गम है ना
पाही भागा पहा॥
[...]
कयो न परत, पिनु को न म
पड़ो मुम कहत पड़े मो
प्रभुकी पढ़ाई पड़ी, आपनी छां
सुकी पुनीनना, आप
दह और ममुनि मचि मा
सनमुन्य होत मुनि म
नाथ-गुनगाय गाये, हाय जोरि
नीचऊ निवाजे प्रीनि
गही दग्वार है गरब तें
लाम जोग-छेमको
मोटो दमकध सो न बगे ।
यूझि परी रावरे
यहाँका सयानप अयानप
सूघो मतमाय कहे
गीध-सिला-सबरीकी मुधि म
होइगी न साई सो
सकल कामना देत नाम
सुमिरत होत.

भीतर दोनौकी बात जाननेवाले हैं। आपके सामने मुँहकी और हृदयकी
विनय-पत्रिका
अपना स्वामी मानकर उसके साथ विशुद्ध प्रेम करनेका नियम
लिया है और सुन्दर आचरणाम उसकी रुचि है ॥ १॥ पाप और
पुण्यके यश होनेके कारण मुझे समीके साथ रहना पड़ा, इसमें
मैं अपनी और परायी दोनोंहीकी चालोंको परख चुका हूँ । है
नाथ ! मुझे अपनी भलाई या धुराईकी न तो कोई चिन्ता है. न
डर है। (आपके शरण होनेपर भी यदि भले-बुरेकी चिन्ता लगी
रही या भय बना रहा तो यह शरणागति ही कैसी?सामीके शरण होते
ही में निश्चिन्त और निर्मय हो गया है।) यह मैं श्रीसीतानाथजीकी
शपथ खाकर सच-सच कह रहा है ॥२॥ (धनावटी बात कहूँगा तो वह
अलेगी ही नहीं, गॉकि) मा शान और वाणीके स्वामी हैं। बाहर और,
यात कैसे छिप सकती है ? तुलसी आपका है और आप तुलसीका हित
करनेवाले हैं। इसमें मैं यदि (कुछ भी कपट) रखकर कहना होऊँ तो मैं
धको मावी हो जाऊँ। माय, जैसे मक्खी घीमें गिरकर नुरन्त भर
जानी है, उसी प्रकार मेरा भी सर्वनाश हो जाय ॥३॥
[२६४ ]
मेरो कयो सुनि पुनि भाव तोहि करि सो।
चारिहू पिलोचन पिलोकु तू तिलोक मई
तेरो तिहु काल कहु को है हितू हरि-सो ॥१॥
नये-नये नह अनुमये देह-गेह पति,
परखे प्रपंची प्रेम, परत उपरि सो।
मुहद-समाज दगापाजिहीको सौदा-स्न,
जब जाको काज तब मिले पाय परि सो॥२॥

. (स्वार्थ) होता है तय घह पैरोपर गिरने लगता है (परन्तु काम निकल पिनय-पत्रिका विपुध सयाने, पहिचाने कंघी नाही नीके, देत एक गुन, लत कोटि गुन मरि सो। करम-धरम रघुबर चिनु, राखको सो होम है, ऊसर कमा बरिसो॥३ आदि-अंत-बीच मलो, मलो कर सबहीको जाको जस लोकवेद रहो है गरि सो । सीतापति सारिखो न साहिब सील-निधान, कैसे कल पर सट ! बैठो सो विसरि-सी ॥४॥ जीवको जीवन-पान, प्रानको परम हित प्रीतम, पुनीतकृत नीचन, निदरि सो। तुलसी तोको कृपाल जो कियो कोसलपाल, चित्रकूटको चरित्र चेतु चित करि सो ॥५॥ भावार्थ-अरेमन! एक यार तू मेरी यात सुन ले। फिर तुझे जो अच्छा लगे सो करना । तू अपने चारों नेत्रों (दो वाहरके और मन-बुद्धिरूप दो भीतरके) से देखकर पता कितीनों लोकों और तीनों कालोंमें भगवान्के समान तेरा हित करनेवाला कहीं कोई है? शरीर-रूपी घरमें रहकरहून (अनेक योनियों में) नये-नये (सम्बन्धियोंके) प्रेमका अनुभव किया और उनके कपट-भरे प्रेमको भी परख लिया। अन्तमें सबके प्रेमका भेद पुल गया। (जगत्के इन विषय जनितसम्बन्धी) मित्रांका समाज क्या है !यह दगाबाज़ीका सौदासूत (लेन-देनका व्यवहार) है। जय जिसका काम - मूलासा यठादै,फिर तुझे कैसे कल पड़ रहा है ॥४॥ अरे जो जीवका बिनय-पत्रिका जानेपर कोई बात भी नहीं पूछता1) ॥२॥ देवता भी बड़े चतुर हैं, तून 'उनको मलीभाँति पहचाना है या नहीं ? ये पहले करोडगुणा लेते हैं तब कहीं एकगुणा देते हैं। अब रहे कर्मधर्म, सो ये भी श्रीरामके (बार) विना केवल परिश्रममात्र हैं। (जो भगवानको छोड़कर ईश्वरकी परवा न कर केवल अपने सत्कर्मोपर विश्वास करते हैं, उनके घे सत्कर्म उहर हो नहीं सकते) उनका करना तो राख हयन करने या असर जमीनपर पानी यरसने के समान (निष्फल) है ॥३॥ जो आदिमें, मध्यमें और अन्तमें भले हैं और सभीका सदा कल्याण करते हैं, तथा जिनका पर लोक और चेदमें सर्वत्र फैल रहा है ऐसे श्रीसीतानाथ रामचन्द्रजीके समान शील निधान स्वामी दूसरा और कोई नहीं है। अरे दुष्ट! तू उसे जीवन, प्राणाका परम हित, अत्यन्त प्रिय और नीचॉको पवित्र करनेवाला र उसका निरादर कर रहा है। तुलसी ! कोशलपति कृपालु श्रीराम- नीने तेरे लिये चित्रकूट में जो लीलारची थी (घोडॉपर सवार दो मुन्दर उगपूत वीरोंके घेशमें साक्षात् दर्शन दिये थे) उसे चित्तम स्मरण कर ॥५॥ [२६५ ] तन सुचि, मन रुचि, मुख कहाँ 'जन हौं सिय-पीको। हि अभाग जान्यो नहीं, जोन होइ नाथ सो नातो-नेह न नीको ॥१॥ जल चाहत पावक लही, विष होत अमीको । लि-कुचाल संतनिकही सोइ सही,मोहि कछ फहमनतरनि तमीको।।२।। जानि अंथ अंजन कई पन-पापिनी-धीको । नि उपचार विकारको सुविचार करा जब तप पुधि चल हाहीको ||३|| যিনায়িকা प्रम सों कहत सकुचात ही, परी जनि फिरि फीकी । निकट पोलि,पति,परजिये,परिहरे ख्याल अब तुलमिदास बड़जी- मायार्थ- प्रमो में शरीरको पवित्र ग्मना है, मनमें मी ( प्रेमकं लिये ) रचि और मुंहसे मी कहना है कि मैं श्रीसीतानाथ संयक है। किन्तु समझ में नहीं माता कि किस दुर्भाग्यके कारण न माध मेग सर्वश्रेष्ठ सम्बन्ध और प्रेम नहीं होता ? मैं पानी च हैं तो आग मिलती है और इसी प्रकार अमृतका जहर बन जान (शान्तिके यदले. अशान्तिकी जलन मिलती है और अमृतरूपी मत अभिमानरूपी विष पैदा कर देते हैं।) सन्ताने कलियुगको जो कुटिल कही हैं वे मय ठीक हैं। मुझे सूर्य और रात्रिका कुछ मीशान नहीं (अर्थात् में शान और अज्ञानको यथार्थरूपसे नहीं पहचान सकता) कलियुग मुझे अन्धा समझकर चनकी सिंहनीके घीका अ लगानेको कहता है, जब मैं यह विकार-मरा उपचार सुनकर उस विचार करता हूँ कि मुझे उसका घी कैसे मिले (अज्ञानरूपी या वासनारूपी सिंहनीरहती है। विषय उसकायो है। यह तो समपि जाते खाजायगी। विषयोंमें फंसे हुए जीयको ज्ञानरूपी नेत्र कैसे मिल सकते हैं। नव वह मेरे हृदयके घुद्धि-बलकोहरलेता है॥३॥(बुद्धिधलके नष्ट हो जाने मुझे कलियुगका बताया हुआ उपचार यानी विषय भोग अच्छा लगत है और मैं उसी में लग जाता है। इसी विनके कारण मैं आपके साथ सर्वश्रेष्ट सम्बन्ध और प्रेम नहीं कर पाता) आपसे कुछ कहना है, पर उसे कहते संकोच हो रहा है कि कहीं मेरी यात फिर फीकी न पा जाय (खाली न चली जाय) इससे में आपकी पलया लेता है, (यात या विनय-पत्रिका हॉसुपरनवरनकियो,नृपतें भिखारिकरि,सुमति कुमतिकरयो ही।। कि जरा अपने पास घुलाकर इसे (कलियुगको रोक दीजिये, जिससे यह तुलसी-सरीखे जद जीवोंका खयाल छोड़ दे ॥४॥ [२६६] ज्योज्यों निकट भयो चहीं कपालु ! त्यो त्यों रिपरयो हौं । तुमच(जुग रस एकरामही हूँ राबरो,जदपिअप अवगुननि मरथो हौं।। पीच पाइ एहि नीच पीच ही छरनि छरयो हौं। ४ अगनित गिरि-कानन फिरयो, चिनु आगि जरयो हौं । चित्रकूट गये ही लखि कलिकी कुचालिसब,अवअपडरनिडरथोहो॥३॥ माथ नाइ नाथ सों कहीं, हाथ जोरि खरयो हौं । वीन्होंचोरजियमारिहैतुलसी सोकथासुनि प्रभुसोंगुदरि निपरयोहौं।४। भावार्थ-हे पानिधान ! ज्यों-ज्यों मैं आपके निकट होना चाहता ईन्यो हो-त्यों दूर होता चला जाता हूँ।हे रामजी ! आप चारों युगोंमें सदी एकरस हैं और मैं भी आपका रहा आया है, यद्यपि मैं पा और मगुणोंसे भरा हैं ॥१॥ आपसे अलग रहनका मौका पाकर इस नीच कलियुगने मुझे धीचहीमें अलोस छल लिया (अक्षानसे ही इसको जीयत्व प्राप्त हो गए।) में सुवर्ण था, पर इसने कुधर्ण कर दिया। (नित्य आनन्दघनरूपसे दुःखग्रस्त जीयरूपमें परिणत कर दिया। राजासे कंपना डाला और मानीसे अज्ञानी कर डाला ॥२॥ नयम में ( अनेक योनियों में ) अगणित पहाड़ों और जंगलों में भटकता रहा और यिना tो मागके (महानजनित दुःखदायानलसे) जलता रहा । परन्तु अब मैं चित्रकूट गया, (और यहाँ आपका मेमपूर्षक मजन करने Y .' विनय-पत्रिका लगा) तव (आपकी रुपासे) मैं इस कलिकी सारी कुचाल तो सम- गया(तथापि) अय में अपने ही डरसे डर रहा है ॥३॥ में हाथ जोड़ा प्रभुके सामने खड़ा हुआ मस्तक नवाकर कह रहा है कि पहचान हुआ चोर फिर जीयको (प्रायः) मार ही डालता है। (कलियुग हुआ चोर है, यह दाँव देख रहा है) इस यातको सुनकर अपने स्वामीसे विनय करके निश्चिन्त हो चुका (अय भाप उचित समझकर उपाय कीजिये) ॥ [२६७] पन करि हौं हठि आजते रामद्वार परयो हौं । 'तूमेरो'यह बिन कहे उठिहीनजनममरि,प्रभुकी सौकरि.. दै द धका जममट थके, टारे न रयो हो। .. जना. हौं मचला ले छाडिहीं, जेहि लागि अरयो हो । तुमदया, , प्रगट कहत जो सकुचिये, अपराध-मरयो ही सौ मनमें अपनाइये,तुलसीहि कृपा फरि,फलि पिलोकि मावार्थ-दधीरामजी माजरी मस्याग्रह करनेकी भाषक शारर गयाजनक मार यह न कहेंगे कि तर में याम जीयनमा नहीं उठेंगा, पह में भापकी A (यद म गमगा कि पुस्लिमो धो ) पमत मु पो मार-मारकर पाप मुझे .. AM

नरक द्वारस हटाना चाहा, पर में यहमिट घटा दही
(इतने अधिक पार पि कि मनेर टीवन नाही.)
संगार वारपार जन्म लेकर (माताक) पेटको समयमा
तर कहीं मरकका निरादरकर यहाँय निकला दिया
लिये मचल गया है मौर. यह वटा रम शाहीर
मार दयालु हैं, (मेरा भहना दबकर यलमें) पारदरमाला
ही पड़ेगी। मैं मापकी या लेना (अपनी ही है, जब नुस्
डालियेदरम कीजिये । पाक में प्लानि मामला:
(लोग कागे कि ऐसे दयालु म्यामीक नायर घना दिन दिन
1
पनि पप, इमलिप नाम्त लना कर दीपिकि 'हुरमा मंगम,
लना सुनते ही धरना स्याग दूंगा) में था मगर,
कारजस परिभाषको सक मामन प्राटमें कई गंगा
तोएपाकर मनमें ही गुलमानोमाना सीनिय स्याँकिलिकाय
भाग पग गरा
[२८]
तुम अपनापी तर मानिहीं, जर मन शिरिपरि
अहिगुमाव रिपपनि लग्यो,
गुती प्रीति, प्रीति माती, नप

पिनय-पत्रिका
लगा) तय ( आपकी कृपासे) मैं इस कालकी सारी कुचाल तो
गया (नयापि) अब मैं अपने ही उरसे डर रहाई ॥३॥ में हाथ जो
प्रभुके मामने खड़ा हुआ मस्तक नवाकर कह रहा है कि पहन
हुआ चोर फिर जीयको (प्रायः) मार ही डालता है; (कलियुग पहन
हुआ चार है, वह दाँय देख रहा है) इस बातको सुनकर तुन
अपने स्वामीस विनय करके निश्चिन्त हो चुका (अब आर सय
उचित समझकर उपाय कीजिये)
[२६७]
पन करि ही हठि आजुते रामद्वार परयो हौं ।
'तू मेरो'यह बिन कहे उठिहीनजनममरि,प्रभुकी सौकरि निरयोही
दै दे धक्का जमभट थके, टारे न टरयो हौं ।
उदरदुसह साँसतिसही पहुचारजनमिजग,नरकनिदरिनिकरया हो।
हौं मचला लै छाडिहीं, बेहि लागि अरयो हौं ।
तुम दयालु,बनिह दिये,पति, पिलँपनकीजिये,जातगलानिगरयो हौं ।
प्रगट कहत जो सकुचिये, अपराध-भरथो हो ।.
वौ मनमें अपनाइये,तुलसीहि कृपा करि,कलि विलोकि हहरयो ही।
भावार्थ-हे धीरामजी! आजसे मैं सत्याग्रह करनेकी प्रतिज्ञा कर
आपके द्वारपर पड़ गया है। जबतक भार यह न कहेंगे कि 'तू मेरा
तबतक मैं यहाँसे जीवनभर नहीं उढूँगा, यह में मापकी शपप गाय
कह चुका हूँ ॥१॥ (यह न समझियेगा कि पुलिसके घने सार
उठ जाऊँगा) यमदूत मुझे धो मार-मारकर थक गये, मुझे जबरदस्ती
म
।

विनय-पत्रिका रक्के द्वारस हटाना चाहा, पर मैं वहाँस उनके हटाये हटा ही नहीं इतने अधिक पाप किये कि अनेक जीवन नरकम ही पीते !)। संसारमें वार-चार जन्म लेकर (माताके ) पेटकी असह्य पीडाको सहा, उप कहीं नरकका निरादरकर वहाँसे निकला हूँ ॥२॥ जिस चीजके लेये मचल गया हूँ और अद्र पैठा हूँ उसे लेकर ही छो, गा, क्योंकि राम दयालु है, (मेरा अहना देखकर अन्तम) आपको यह चीज देनी पड़ेगी। मैं आपकी यलैया लेता हूँ (जब देनी ही है, तब तुरन्त दे गलिय) देर न कीजिये। क्योंकि मैं ग्लानिके मारे गला जाता है। लोग कहेंगे कि ऐसे दयालु खामीके द्वारपर धरना दिये इतने दिन गित गये, इसलिये नुरन्त इतना कह दीजिये कि 'तुलसी मेरा है।' यस, तिना सुनते ही मैं धरना त्याग दूंगा) ॥३॥ मैं अपराधोंसे भरा, म कारणसे यदि आपको सबके सामने प्रकट में कहते संकोच होता है रुपाकर मनमें ही तुलसीको अपना लीजिये क्योंकि मैं कलिको देखकर हुन यथरा गया हूँ ॥४॥ [२६८) तुम अपनायो तब जानिहीं, जब मन फिरि परिहै । हि मुभाव विषयनि लग्यो,तेहिसहजनाथ मों नेइ छाडि छलकरिह। सुतकी प्रीति, प्रतीति मीतकी, नृप ज्यों डरररिहै । श्पनोसोसारय स्वामिसों, पहुँ विधिधातकज्यों एकटेकनेनहिरिह २ हरषिहे न अति आदरे, निदरे न जरि मरिहे। सनिलामदुखसुखसरसमवितहितअनहित, कलि-कृपारिपरिहरिहं ३

पिता-पत्रिका
मा)शप ( मापी) #मलिक मा कुमाल गोह
गया (गण) भयमान ही डामरामैं हाय -
प्रमु गामने गा मा मना मार कर रहा है कि
दुमा पारिजायको (माप:) मारही बाटना (कलियुग पा=
दुमा गार पर यम रहा है) इस गानको सुनकर न
माने मामीम पिनय कर निधित दो गुका (मर मार सर
उचित ममाकर उपाय कीजिये) 20
[२७]
पन करि ही हठि आनुते रामदार परयो हो ।
'मेरो'यह पिन कहे उठिहीनजनममार,प्रभुर्कासाकरि निवरयोई
दे दे धका जममट यके, टार न टरपो हौं।
उदरदुसह साँसति सही बहुवारजनमिजग,नरकनिदरिनिकरथी हौं
ही मचला ले छाडिहीं, हि लागि अरया हो।
तुम दयाल पनिहै दिये,बलि,पिलबनकीजिये,जातगलानिगरयो।
प्रगट कहत जो सकुचिये, अपराध-मरया हौं ।
ती मनमें अपनाइये,तुलसीहि कृपा करि,कालि बिलोकि हहरयो हो।
मावार्य-हे धीरामजी! आजसे मैं सत्याग्रह करने की प्रतिक्षा कर
आपके द्वारपर पड़ गया है। जयतक आप यह न कहेंगे कि 'त् मेरा
तबतक मैं यहाँसे जीवनमर नहीं उ,गा, यह मैं आपकी दापय सा=
कह चुका हूँ ॥१॥ (यह न समझियेगा कि पुलिसके पक्के साकर
उठ जाऊँगा) यमदूत मुझे पसे मार-मारकर यक गये, मुझे जबरदस

४२७
विनय-पत्रिका
नरकके द्वारस हटाना चाहा, पर मैं यहाँस उनके हटाये हटा ही नहीं
(इतने अधिक पाप किये कि अनेक जीवन नरकमें ही पीते !):
संसारमै यार यार जन्म लेकर (मानाके ) पेटकी असह्य पीडाको सहा,
तय कहीं नरकका निरादरकर यहाँसे निकला हूँ ॥२॥ जिस चीजके
लिये मचल गया हूँ और बढ़ बैठा हूँ उसे लेकर ही छोईंगा, क्योंकि
मार दयालु हैं, (मेरा अडना देखकर अन्तमें ) आपको यह चीज देनी
ही पड़ेगी। मैं आपकी वलैया लेता हूँ (जब देनी ही है, तब तुरन्त दे
हालिये देर न कीजिये। क्योंकि मैं ग्लानिके मारे गला जाता हैं।
लोग कहेंगे कि ऐसे दयालु सामीके द्वारपर धरना दिये इतने दिन
न गये, इसलिये तुरन्त हतना कह दीजिये कि 'नुलसी मेरा है।' यस,
तना सुनते ही मैं धरना त्याग दंगा) ३५ मैं अपराधोंसे भरा है,
म कारणसे यदि थापको सबके सामने प्रकट में कहते संकोच होता है
कृपाकर मन ही नुलसीकोअपना लीजिये क्योंकि मैं कलिको देखकर
हुन यारा गया
[२६८
तुम अपनायो तब जानिहीं, जब मन फिरि परिह ।
हि सुभाष विषयनि लग्यो,तेहिसहजनाय सों नेह छारि छलकरिर्ह १
सुतकी प्रीति, प्रतीति मीवकी, नृप ज्यों डरदरिहै ।
पिनोसोखारय स्वामिसों, चहुँ विधिचातकज्यों एकटेकनेनहिंटारिहं २
हापि न अति आदरे, निदरे न जरि मरिहे।
निलामदुःखसुखसबै समचिवहितअनहित, कलि-कुचालिपरिहरिह.३
॥४॥

जीवन ज्योंजीवको, मनिज्यों फनिको हित,ज्यों धन लोभ-लीन= विनय-पत्रिका प्रमु-गुन सुनि मन हरपिह, नीर नपननि दरिह । तुलसीदास मयो रामको, बिस्वास, प्रेम लखि आनंद उमगि उर भावार्थ-जय मेरा मन ( आपकी ओरको) फिर जायगा, समगा कि आपने मुझे अपनालिया। जब यह मन, जिम म्यमापसे ही विषयोंमें लग रहा है, उसी प्रकार कपट छोड़कर माय प्रेम करेगा (जबतक ऐसा नहीं होता तबतक में कैसे समझ मुझको आपने अपना दास मान लिया) जैसे मेरा वह मन प्रेम करता है, मित्रपर विश्वास करता है और राज भयंसे उरत= वैसे ही जब यह अपना सय सार्थ केयल स्वामीसे ही रक्खेगा चारों ओरसे चातककी तरह अपनी मनन्य टेकसे नहींटलेगा (पकम- ही निर्भर करेगा) ॥२॥ अत्यन्त आदर पानेपर जब उसे हर्ष नई निरादर होनेपर वह जलकरन मरेगा और हानि-लाम, सुख-दुःसामन बुराई सबमें वित्तकोसम रक्खेगा और कलिकालकी कुचालोको(सर छोड़ देगा ( तभी मानूंगा कि नाथ मुझे अपना रहे हैं ) ॥३॥ और मेरा मन प्रभुका गुणानुवाद सुनते ही हर्ष में बिल हो जायगा, मेरेने प्रेमके आँसुओंको धारा यहने लगेगी तभी तुलमीदामकी यह होगा कि यह धीरामजीका हो गया। तब उस (अनन्य) प्रेमको देशर हृदयम आनन्द उमड़कर भर जायगा। (हे प्रभो शीघ्र ही अपना मेरी ऐमी दशा कर दीजिये) Han [२६९) राम कबहुँ प्रिय लागिही जैसे नीर मीनको? विश्व

है
विनय-पत्रिका
ज्यों सुमाय प्रिय लगति नागरी नागर नवीनको ।
त्यों मेरे मन लालसा करिये करुनाकर ! पावन प्रेम पीनको ॥२॥
मनसाको दाता कहैं
श्रुति प्रभु प्रवीनको।
तुलसिदासको भावतो, पलि जाउँ दयानिधि ! दीजै दान दीनको १३॥
भावार्थ-हे श्रीरामजी ! मुझे क्या कभी आप ऐसे प्यारे लगेंगे,
जैसा मछलीको जल प्यारा लगता है, जीवको सुखमय जीवन प्यारा
लगता है, मापको मणि प्रिय लगती है और अत्यन्त लोभीको धन
प्यारा लगता है ? ॥१॥ अथया जैसे नवयुवक नायकको स्वभावसे ही
नवयुवती चतुरा नायिका प्यारी लगती है, वैसे ही हे करुणाकी खानि ! मेरे
मनमें केवल आपके प्रति पवित्रयोर अनन्य प्रेमी ही एक लालसा उत्पन्न
कर दीजिये ॥२॥ वेद कहते हैं कि प्रभु मनमानी घस्तु देनेवाले हैं और
पंडे ही चतुर है (विना ही कहे मनकी यात जानकर उसे पूरी कर देते
६)। हे दयानिधे ! मैं आपकी यलेया लेता है, इस दीन तुलसीदासको
मी उसकी मनचाही धस्तुका दान दे दीजिये ॥३॥
[२७०]
कबहुँ कृपा करि रघुबीर ! मोह चितहो ।
मलो-युरोजनआपनो,जियजानिदयानिधिा,अपगुनअमितवितहो।।१॥
जनम जनम हो मन जित्यो, अप मोहि जितेहो।
हो सनाथ हेही सही, तमह अनाथपति, जो लघुवहि न मितहो ॥२।।
विनय करों अपभयहु ते, तुम्ह परम हित हो।
तुलसिदास कासों कहै, तुमही सब मेरे, प्रभु-गुरु, मातु-पित हो ॥३॥

येनय-पत्रिका मावार्थ-हे रघुवीर! कमी कृपाकर मेरी और भी दे यानिधान ! 'मला-थुरा जो कुछ भी हैं, आपका दास है। गनमें इस यातको समझकर क्या मेरे अपार अवगुणोंका अन्तक अपनी दयासे मेरे सब पापोंका नाशकर मुझे अपनालेंगे ? अवसे पूर्व) प्रत्येक जन्ममें यह मन मुझे जीतता चला आया ससे हारकर विषयोंमें फंसता रहा हूँ), इस बार क्या आप मुझे नता देंगे? (क्या यह मेरे वश होकर केवल आपके चरणों यगा ?) (तब) में तो सनाथ हो ही जाऊँगा किन्तु मार रीक्षद्रतासे नहीं डरेंगे, तो 'अनाय पति' पुकारे जाने लगेंगे चितापर ध्यान न देकर मुझे अपनालेंगे तो यापका मनाय-नाथ सार्थक हो जायगा) ॥२॥मैं अपने ही डरफे मारे आपसे यो वित रहा हूँ। आप तो मेरे परम हितू हैं। (परन्तु नाथ !) यह तुला अपना दुःख और किसे सुनाने जाय ? क्योंकि मेरे तो मालिक माता, पिता आदि सब कुछ केवल आप ही है ॥३॥ [२७] जैसो हौं तैसो राम रावरो जन, जनि परिहरिये । कृपासिंधु, कोसलधनी ! सरनागत-पालक, दरनि आपनी दरिये। हौं वा निगरायल और को, चिगरी न बिगरिये । तुम सुधारि आये सदा सबकी सही विधि, अप मैरियो सुघरिये । जग हंसिहै मेरे संग्रह, कत इहि डर डरिये । कपि-केवटकीन्हेसला जेहिसील,सरलचित,तेहि मुमाउअनुसरिय .

मौर) ४३१ विनय-पत्रिका अपराधी तउ आपनो, तुलसी न विसरिये । इटियो बाँह गरे पर, फटेहु विलोचन पीर होत हित करिये ।।४।। मावार्य हे थारामजी ! मैं (भला-बुरा) कैसा भी हूँ, पर हूँ तो बापका दास ही इससे मुझे त्यागिय नहीं। हे कोसलनाथ! आप कृपाके समुद्र और शरणागतोका पालन करनेवाले हैं। अपनी इस शरणागत- वत्सलताकी रीनिपर ही चलिये ॥१॥ मैं तो (काम, क्रोध आदि) दूसरोंके दारा पहले ही विगाड़ा हुआ हूँ, इस बिगड़े हुएको (शरणमें न रखकर न विगाड़िय । आप तो सदा ही सबकी सय तरहसे सुधारने आये है। अथ मेरी भी सुधार दीजिये ॥२॥ मुझे अपनानेमें जगत् आपकी ईसी करेगा, आप इस इरसे क्यों डर रहे हैं ? (आपका तो सदामे यह पाना ही है। ) आपने अपने जिस शील और सरल चित्तसे यन्दरों और कंचरको अपना मित्र बनाया था, मेरे साथ भी उसी स्वमायके अनुसार पर्ताव कीजिये ॥३॥ यद्यपि में अपराधी हैं, पर हैं तो आपका ही। इसलिये तुलसीको आपन भुलाइये । (अपना) टूटा हुआ भी हाथ गले पंघ जाता है और फूटी हुई औंसमें भी जब दर्द होता है, नव उसके पच्छे फरानेकी चेष्टा की ही जाती है। इसी प्रकार में भी यद्यपिटूटी यौह और फूटी आँपके समान किसी कामका नहीं हूँ तथापि भापका हो इसलिये आप मुझे फैसे छोड़ सकते हैं?) RH [२७२] तुम जनि मन मैलो करो, लोचन जनि फेरो। सनहराम! चिनु रावरे लोकहु परलोकहु कोउ न कहूँ हितु मेरो ।।

विनय-पत्रिका
.
अनेरो।
अगुन-अलायक-आलसी जानि अधम
अधनु
खारयके साथिन्ह तज्यो विजराको-सोटोटक,औपट उलटिन हेरी।
मगतिहीन, वेद-बाहिरो लखि कलिमल घरो।
देवनि देव ! परिहरयो, अन्याव न तिनको, ही अपराधी सर केगे।
नामकी ओट पेट भरत हों, पै कहावत घरी ।
जगन-विदित पात है परी, सममिये घी अपने, लोक सिंगे।
ह जर-तप तुम्हहिं में तुलसीको मलेरो।
दिनःह-दिन देश पिगरि है,पति जाउँ,पितंप किपे,अपनाइपे गोरी।
भाग-धीरामजी! माग गुगपा मन मेना मेरी
भोर गाना (काली) मनकिताय । (गुगको माग
तोय मीर न मानी TREn) mrat.
टो. मी पायो film in marity
को गाही १ मुशे गुणदान, माया Attr we
सीन भी निमा गम (जग) rifilafari
zzirf tra Mar TRENT पुणे मी
mi (re ही गाना frrent मातर
fe मुझे नहीन पीक मागाfrj
Trinetमानामा पEisfrITA IN
iiwar मी attituteTMEET HIMinik
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मारामाmrint भी मास
THExtraROIRAT AMEtianet

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विनय-पत्रिका
10
दृष्टियोंमें जो आपको अच्छी लगे, उसी दृष्टिसे जल्दी (मेरी मोर
लीजिये (यस, मेरा काम तो आपके देखते ही यन जायगा) । (42
है कि) तुलसीदासको अब अपना लीजिये, इसमें देर न कीजिये
अय जीवनका अन्त बहुत ही समीप आ गया है nan
[२७४]
जाउँ कहाँ, ठौर है कहाँ देव ! दुखित-दीनको ?
को कृपाल स्वामी-सारिखो, राख सरनागत सब अंगवल-विहीन
गनिहि, गुनिहि साहिय लहै, सेवा समीचीनको ।
अधम
अगुन आलसिनको पालियो फपि आपो रघुनायक नवीनको
अपन
मुखकै कहा कहीं, विदित है जीकी प्रभु प्रमीनको ।
तिहू काल, तिहु लोकमें एक टेक रावरी तुलसीसे मन मलीनर
भावार्थ-हेदेय! को जाऊँ? मुझ दुखी चीनको कदौ टोर-टिकाम
भापर्क समान कृपालु म्यामी और कौन है, जो सय प्रकार साथ
पल मिहीन शरणागतको धाश्रय दे ११ (माको छोड़कर गm
जादूमा मालिक हैं, तोधनो, गुणयान यानी सद्गुणसम्पन भीरम
भाँति सेया करनयाले मेयककोसीमानात (ममतोधनपानमा
को मद्गुण है और न मैं भलीमोनिसंथा करनयामागुश सीमा
मण्या निधन (माधनहीन), गद्गुणोंगे हीन मागियों का पालन पोर
करमानी निरय उगाहीधीगपुनायीको हो शोमा
क्या कई प्रमा ! मापना गर, मेरा मा जाने ।

विनय-पत्रिका मुलमी सरीखे मलिन मनचालेके लिये तीनों लोकों (स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल) और तीनों कालॉमें एक आपका ही सहारा है ॥३॥ [२७५] द्वार द्वार दीनता कही, काहि रद, परि पाहू ।।' हैं दयालु दुनी दस दिसा,दुख दोप-दलन-छम,कियो न सँभापन काहू।१। तनु जन्यो कुटिल कीर ज्यों, बज्यो मातु-पिता हूँ। जनतेउ काहको रोप,दोष काहियों,मेरेही अभाग मोसों सकुचत छुइ सब छाँह।२। दुखित देखि संतन कह्यो, सोचे जनि मन माँहूँ। गेसे पसु-पाँवर-पातकी परिहरे न सरन गये, रघुबर ओर निघाहूँ ।।३।। तुलसी तिहारो भये भयो सुखी प्रीति-प्रतीति विनाह । मकी महिमा,सील नाथको,मेरो भलो विलोकि अब तें सकुचाहुँ,सिहाहूँ भावार्थ-देनाथ!मेद्वार-द्धारपर दाँत निकालकर और पैरो पड़-पड़. कर अपनी दोनता सुनाता फिरा दुनिया में ऐस-पेसे दयालु है, जो दशों दिशाओंके दुःखों और दोपॉके दमन करनेमें समर्थ हैं, किन्तु मुझसे तो किसीने यात भी नहीं की ॥१॥ माता-पिताने मुझे ऐसा स्याग दिया, जैसे कुटिल फीडा अर्थात् सर्पिणी अपने ही शरीरसे जने हुए (य) को स्याग देती है। मैं किसलिये तो क्रोध कीं और किसको दोष दूं? यह सब मेरे ही दुर्भाग्यसे हुआ। (मैं ऐमानीच हैं कि)मंग छायातक छूनेमें भी लोग मंकोच करते हैं ॥२॥ मुझेदुषो देखकर सन्तोंने कहा कि तमनमें चिन्तान फरा तुझ-सरीखे पामर और पापी पशु-पक्षियोतकको, शरणमें जानेपर, श्रीरघुनाथजीने नहीं त्यागा और अपनी शरणमें रखकर उनका

।
विनय-पत्रिका
भग्नतक निर्याद किया(तूमीउन्हींको शरणमें जा) ॥३यह तुलसी तमीमे
आपका हो गया और आपपर रामकी प्रीति-प्रतीनिन होनेपर मीनीने
यह यई मुममें मी है। (प्रानि-प्रतीति होती,तो आनन्दकी कोई सीमाहीन
रहती) हे नाय आपके नामकी महिमा तथा शीलने ( मेरी नालायकी
होनेपर मी) मेरा कल्याण किया, यह देखकर अब मैं मन-ही-मन सकुचाता
हैं (इसलिये कि मैंने कृपा-पात्र होनेयोग्य ना एक मी कार्य नहीं किया.
फिर भी मुझ कृतघ्नपर प्रमुकी ऐसी कृपा है) और आपकी शरणागत-
वत्सलताकी प्रशंसा करता हूँ ॥४॥
[२७६]
कहा न कियो, कहाँ न गयो, सीस काहि न नायो ?
राम राबरे दिन भये जन जनमि-जनमि जग दुख दसहू दिसि पायो॥३॥
आस-विवस खास दास है नीच प्रमुनि जनायो।
हा हा करि दीनता कही द्वार-द्वार चार-चार, परी न छार, मुह वायो ॥२॥
असन-यसन विनु वायरो जहँ-वह उठि धायो ।
महिमा-मान प्रिय प्रानते तजिखोलि खलनिआगे,खिनु-सिनु पेट खलायो
असु
नाथ ! हाथ कछु नाहि लग्यो, लालच ललचायो ।
साँच कहौं, नाच कौनसो,जो न मोहिलोभ लघु हौ निरला नचायो।।४।।
श्रवन नयन-मन मग लगे, सब थल पतितायो ।
अग
मूड मारि, हिय हारिक, हित हेरिहहरि अपचरन-सरन तकि आयो।।५।।
दसरथके ! समरथ तुही, त्रिभुवन जसु गायो।
तुलसी नमत अवलोकिये, बलि, वाह-योल दे विरुदावली पुलायो ॥६॥

-- - पिनय-पत्रिका भावार्थ- मैंनेक्या नहीं किया? मैं कहाँ नहीं गया? कौन-सी जगह जानेको यची ? और किसके आगे सिर नहीं झुकाया ! किन्तु, हे श्रीगमी ! जबतक आपका दास नहीं हुआ, तयतक जगत्मे यार-यार जन्म ले लेकर मैंने दशों दिशाओमें केवल दुग्य ही पाया (कहीं सामने भी सुप नहीं मिला) ॥१॥ (आपका) वास दाम होनेपर भी में (भ्रमः यश विषयोंसे मुम्ब मिलनेकी) आशा यशमै होमशुद्ध हृदयके मालिकोंके मामने अएनेको जताना (समर्पण करता) फिरा और पार-धार द्वार भारपर पानी परीयों सुनाकर मुँह यापा, पर उममें पाक भी न पड़ी। (सुध-शान्तिका कहीं आभाम भी नहीं मिला) ॥२॥ भोजन भीर घरको पिना पागलकी नरह जाता दौड़ता फिरा । मागोंसे प्यारी मान भनिष्टाको त्यागकर दुपाके सामने क्षण सणमें अपना यह (पाली) पेट पोलकर दिमाया ॥३नाथ! (विषयोंक) होमफे मारे पहुन ही भालच किया पर कही कुछ भी हाथ नहीं लगा। मैं सच करना है। पेमा कौन-सा माय जो नीच लोमने मुडा निर्लजको न नचाया iilin कान, भौ भीर मनको भी अपने-अपने मार्ग में लगाया, परन्तु मी जगह उदटा पतित होता गया। (मय राते महागजे मी लिप। कदी किसी विषय बिमारे द्वारा भी गुग शान्ति नहीं मिली, नए सिर पीट कर यमें धार मान गपा-निगा हो गया। मांगे भर पपराकर भापकरण र मापा घrir. म मुरो भपना हित दिपायी देता. दारणमा! ti RETTीनोपनायाantaghw चरणों में प्रणाम कर रहा, रमही भार लिप, मारा विनय-पत्रिका ४16 लेता हूँ। आपकी विरदावलीने ही मुझे बाँह और वचन देकर युलाया। ( आपके पतितपावन और शरणागतवत्सल विरदी देगममें भी कल्याण क्यों न होगा?)॥६॥ [.२७७] राम राय । विनु राबरे मेरे को हित साँचो ? खामी सहित सबसों कहीं,सुनि गुनि पिसेपि कोउ रेख दूसरी खांचो।। देह-जीव-जोगके सखा मृपा टाँचन टाँचो । किये विचार सार कदलिज्यों,मनि कनकसंग लघु लसतबीच विचार 'बिनय पत्रिका दीनकी,बापु! आपु ही बाँचो । हिये हेरि तुलसी लिखी, सो समाय सही करि यहुरि पूछिये पाँची ॥३॥ मापार्य-हे महाराज श्रीरामचन्द्रजी! मापको छोड़कर मेरा राधा दितू और कौन है ? मैं अपने स्वामीसहित सभी कहता है, उसे पुन' समझकर यदि को और यहा हो, तो दूसरी लकीर नीय दीजिये ॥१॥ शरीर मौर जीयामा सम्पन्धक जितने पाया हित मिलते हैं, सा (ममत् ) मिथ्या टोकॉम मिले हुए है। (गंमारयोगमी माय मागिर घ) विचार करनेपर ये ममा केलेक पेड़क मारके समान है। (जग के गरको सीखने पर हिला ही निकल रही गंगारक गा मी सारहीन कपल भन्नामानित) से ही गुल्ला जान गा. जमे मणि-सुवर्ण के. गंयोगमे यीच-बीच आपकीय भी गोमा. शाली! मदीना मिली कि तो भाrith पाहिये । (निमी मोस म गया)। मुलगीन गमे भारी ४३९ विनय-पत्रिका सीवाने ही लिखी है, इसपर पहले आप अपने (दयालु) स्वभावसे 'सही' बना दीजिय। फिर पीछे पञ्चासे पूछिये ॥३॥ [२७८] पवन मुवनारिषु-दवन भरतलाल लखन दीनकी । निज निज अवसर सुधि किये,बलि जाउँ,दास-आस पूजि है खासखीनकी? राज-द्वार भली सब कह साधु-समीचीनकी । सुकृत-मुजस,साहिब-कपा, स्वास्थ-परमारथ,गति भये गति-विहीनकी।२। समय सँमारि सुधारिबी तुलसी मलीनकी । भीति-रीति समुझाइवी नतपाल कृपालुहि परमिति पराधीनी ||३॥ भावार्थ-हे पवनकुमार ! हे शत्रुभजी ! हे भरतलालजी ! हे उसनलालजी! अपने-अपने अवसरसे (मौका लगते ही) इस दीन तुलसीको याद करना। मैं आपलोगोंकी यलैया लेता है। आपके (पापूर्वक) ऐसा करनेसे इस सर्वथा दुर्वल दासको आशा पूर्ण हो जायगी (श्रीरघुनाथजी मेरी पत्रिकापर 'सद्दी' कर देंगे) ॥१॥ राज- दरगारमे सधे माधुओंकी तो सभी अच्छी कहते हैं, इसमक्या विशेषता है। किन्तु यदि आपलोग इस शरणरदित दीनकी सिफारिश कर देंगे, तो इसको भगवानकी शरण मिल जायगी, आपको पुण्य होगा और सुन्दर पश लेगा, आपके स्वामी आपपर कृपा करेंगे (फ्योंकि यह दीनॉपर दया करनेवालोपरम्वाभाविक ही प्रसन्न हुआ करते हैं) माप सार्थ और परमार्थ दोनों यन आयेंगे ॥२॥मलिये भयसर देखकर (मौका पाते ही) इस पतित तुलसीको पात सुधार देना । शरणागत.

सही है। रघुनाथ हाथ यिनय पत्रिका बरसल कृपालु रघुनाथजीसे मुझ पराधीनके प्रेमकी रीतिकी : समझाकर कह देना ॥३॥ [२७२] मारुति-मन, रुचि भरतकी लखि लपन कही है। कलिकालहु नाथ! नाम सौंपरतीति-प्रीति एक किंकरको निवही है। सकल सभा सुनि लै उठी, जानी रीति रही है। कृपा गरीबनियाजकी, देखत गरीबको साहब घाँह गही है ।- विहँसि राम कयो 'सत्य है, सुधि मेंहूँ लही है'। मुदित माथ नावत,वनी तुलसी अनाथकी,परी; रघुनाथ प्रसंग-भगवान् श्रीरामका दिव्य दरबार लगा है, प्रभु जगजन श्रीजानकीजीकेसहित अलौकिकरतजटित राज्यसिंहासन पर विराज हैं। हनुमानजी प्रेममग्न हुए नाथकी और अनन्य दृष्टिसे निहारते हुपय दवा रहे हैं।भरतजी,लक्ष्मणजी और शत्रुजी यपने अपने अधिकारानुस् सेवामें संलग्न हैं। उसी समय तुलसीदासजीकी विनय पत्रिका पहुंची तुलसीदासजीको प्रार्थना सयको याद थी। भक्त-प्रिय मारति श्रीहनुमान और भरतने धीरसे लक्ष्मणसे कहा कि यदा अच्छा मौका है, समय तुलसीदासको घात छेड़ देनी चाहिये । लक्ष्मणजीने उनकी रात देखकर प्रभुको सेवाम विनय पत्रिका' पेश कर दी। भावार्थ-हनुमानजी और भरतजीका मन और उनकी रुचिको देना लक्ष्मणजीने भगवान्से कहा कि हे नाथ! कलियुगमें भी आपके एक दासको भापके नामसे नीति और प्रतीति निभ गयी (देविय, उसकी या विनय-पत्रिका सशी विनय पत्रिका भी आयो है) ॥१॥ इस यातको सुनकर सारी सभा एकमतसे कह उटी कि हाँ, यह यात सर्वथा सत्य है, हमलोग भी उसकी रीति जानते हैं। गरीव-नियाजभगवान् श्रीरामजीकी उसपर(बड़ी)कृपा है। सामने सबके देखते-देखते उस गरीयकी याँह पकड़कर उसे अपनालिया है। सबकी यात मुनकर थीरामजीने मुसकराकर कहा कि हाँ, यह सत्य है, मुझे भी उसकी खबर मिल गयी है। (श्रीजनकनन्दिनीजी कई बार पद चुकी होगी, क्योंकि गोसाइजी पहले उनसे प्रार्थना कर चुके हैं)। बस, फिर क्या था-अनाय तुलसीको रची हुई यिनय-पत्रिकापर युनायजीने अपने हायसे 'सही' कर दी। अपनी बात यननेपर मैंने मी परम प्रसन्न होकर भगवान्के चरणों में सिर टेक दिया (सदाके लिये शरण हो गया) ॥३॥ श्रीसीतारामार्पणमस्तु नाकमामा पकअमुर था।उग, तीनजEPA दम्मामी और कमलनगन | उन सीनान म्हारा irt परिशिष्ट पदोंमें आये हुए कथाप्रसंग पद-संख्या ३-कालकूट-विप- देवता और असुरोंने एक बार मेरु-पर्वतकी मपानी और शेषनामा दण्ड बनाकर समुद्रका मन्यन किया । उसमें सबसे पहले हलाहल ति निकला और उसने दशौं दिशाओंको अपनी ज्यालासे व्याप्त कर दिया। फिर तो देवता और असुर सभी ग्राहि-त्राहि करने लगे। सयोंने फिर विचारा कि बिना भक्तवत्सल भगवान् शङ्करके इस महाधानक विपत्रण पाना कठिन है । इसलिये उन्होंने एक साथ आत-सरसे भगवान् गहने पुकारा | मक्क-आर्नि-हर करुणामय भगवान् शङ्कर शीघ्र ही प्रकार और उनको मपभीत देखकर हलाहल विषको उठाकर पान कर गये। परत शीघ्र ही उन्हें ग्मरण हुआ कि हदपमें तो पर अपनी अगिर सुधि के पाप विराममान है, इमलिये उन्होंने उस विषको कण्ठमे नाचे मही उतरने दिए। ठम विपके प्रभावमें उनका कण्ट नीला हो गया और दोषपूर्ण बात मगमनका भूपग बन गया तमासे शिव नीलकार पाने लगे। त्रिपुर-बध- ... - । जिससे उनकी मुक्ति हो जाती है। परिशिष्ट और शिवजीको प्रसन्न किया तथा उनसे अन्तरिक्षक तीन पुरोंका अधिकार प्राप्त किया । अधिकारमदसे उन्मत्त व असुर फिर नाना प्रकारके अन्याचार करने लगे। उनके उपद्रवसे सारा विश्व काँप उठा और देवतालोग पीड़ित हो उठे । अन्तमें सोने मिलकर विष्णुभगवान्को अध्यक्षतामें भगवान् शकरका सदन झिया । शिवजी शीघ्र प्रकट हुए और एक ही बाणमें तीनों पुरोका विध्वंसकर तीनों राक्षसोंका नाश किया । तबसे इनका नाम काशीमें मृत्यु-समय जीवमात्रको श्रीशङ्कर 'राम-नाम' का मन्त्र देते हैं, 'रिपुरारि' पड़ा। काशी-मुक्ति-- काम-रिपु (मदन-दहन)~ सती-दाहके पश्चात् भगवान् शङ्कर हिमालय-पर्वतके प्रान्तरमें एक निर्जन स्थानमें समाधिमन्न हो गये। उसी समय सतीने पार्वतीके रूपमें हैनाचल नामक पर्वतराजके घर जन्म लिया । उधर तारकासुरके अन्याचार- के मारे समस्त देवताओं के साथ इन्द्र के नाकोंदम आ गया। तारकासुरके वध विषयमें यह निधय था कि यह महादेवके पुत्र के द्वारा मारा जायगा । परन्तु भगवान्-शङ्कर समाधिमग्न थे इसलिये उन्हें बड़ी चिन्ता हुई। ग्योंकि तारकासुरका अन्याचार असा हो रहा था । अनः उन्होंने कामदेवको महादेवका ध्यान तोड़ने के लिये भेजा। इधर पार्वती, किशोरावस्थाको प्राप्त हो तथा नारदमुनिके मुखसे पह भविष्यद्वाणी सुनकर कि भूतभावन महादेव ही उसके पति होंगे, परिशिष्ट पदोंमें आये हुए कथाप्रसंग पद-संख्या ३-कालकूट-विष- देवता और असुरोंने एक बार मेरु-पर्वतकी मयानी और शेषनाम दण्ड बनाकर समुद्रका मन्थन किया । उसमें सबसे पहले हलाहल शिश निकला और उसने दशों दिशाओंको अपनी ज्वालासे व्याप्त कर दिया । फिर तो देवता और असुर सभी त्राहि-त्राहि करने टगे। सर्वोने मिलकर विचारा कि बिना भक्तवत्सल भगवान् शङ्करके इस महाघातक विषसे पाना कठिन है । इसलिये उन्होंने एक साप आर्त-खरसे भगवान् सब पुकारा । भक्त-आर्ति-हर करुणामय भगवान् शङ्कर शीघ्र ही प्रकर और उनको भयभीत देखकर हलाहल विषसो उठाकर पान कर गये । शीघ्र ही उन्हें स्मरण हुआ कि हृदयमें तो ईश्वर अपनी अग्विज क विराजमान हैं, इसलिये उन्होंने उस विषको कण्ठसे नीचे नहीं । उस विषके प्रभावसे उनका कण्ठ नीला हो गया और भगवान्का भूपण बन गया तमासे शिव 'नीलकण्ठ त्रिपुर-बध- तारक नामका एक असुर था। विद्युन्माली और Fri. 7 F

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यिनय-पत्रिका १७-भगीरथ-नंदिनी- सूर्यवंशमें सगर नामके महा ऐश्वर्यशाली राजा हो गये हैं, उन्होंने समुद्रको खनवाया था जिससे उसका नाम सागर पड़ा है। महा सगरकी दो रानियाँ यो। एकसे अंशुमान् पैदा हुए और दूसरीसे साठ ह- पुत्र उत्पन्न हुए । महाराज सगरके प्रतापसे देवराज इन्द्र बहुत ही भवन रहता था और उनसे ईया किया करता था। महाराज सगरके अपने यज्ञके स्वच्छन्द विचरनेवाले घोड़ेको उसने चुराकर योगेभर कपिठ-मुनि आश्रमपर बाँध दिया । उसे खोजने के लिये सगरके साठ हजार पुत्र नि और मुनिके आश्रमपर घोड़ेको बँधा देख उन्हें कुवाप्य कहा। इसमें फोरि हो मुनिने योगवलसे उन्हें भम्म कर दिया । महाराज अंशुमान्के पु भगीरप हुए, उन्होंने महातप करके पतितपायनी श्रीगङ्गाजीको भूतका लाकर उन लोगोंका उद्धार किया । इसीसे श्रीगङ्गाजीको 'भागोरमी' 4- 'मगीरप-नन्दिनी' आदि नामोंसे पुकारते हैं । १७-जहु-बालिका- जय महारान भगीरप गाजीको अपने रयके पीछे-पीछे भूकमें हा रहे थे, उम ममय गलाका प्रयाह जा मुनिके आश्रमगे होकर निकला। मुनि प्यानायस्थित थे, प्रशाहको आने देश उन्होंने उसे उठाकर पी लिया। पी महारान भगीरपने उनकी स्तुतिकर उनको प्रराम किया । नव मुनिने जगत्के हितार्थ गानाको अपने से निकाल दिया | नीम गलानी का नाम बहुगुना, 'शादी' पा। १८-विपुगनिमिरपामिनी- महामात्र माग्यनं एक नामीको प्राण का किला - - परिशिष्ट यह कठिनाई सामने आयी कि यदि गङ्गाकी धारा वहाँसे सीधे भूलोकपर गिरेगी तो उससे भूलोक जलमग्न हो जायगा । इसलिये उन्होंने भव-भय- हारी मगवान् शङ्करकी स्तुति की और शङ्करजीने ब्रह्मलोकसे अवतरित होती हुई गङ्गाकी धाराको अपने जटाजालमें रोक लिया। इसीसे श्रीगङ्गाजीको त्रिपुरारि (शिव) के मस्तकमें निवास करनेवाली कहा जाता है । २२-करनपंट- काशीमें एक ब्राह्मण शिवका बड़ा ही अनन्य भक्त था । वह शिवके सिवा और किसी देवताका नाम भी नहीं सुनना चाहता था। इसलिये उसने अपने दोनों कानों में दो घण्टे लटका ग्वाते थे जिससे किसी दूसरे देवताका नाम कानों में न आने पावे । कोई मनुष्य यदि उसके सामने किसी अन्य देवताका नाम लेता तो वह घण्टा बजाते हुए दूर भाग जाता । इसी कारण उसका नाम 'करनघट पड़ गया था। यह जिस स्थानपर रहता पा यह स्थान आज भी कर्णघण्टाके नामसे पुकारा जाता है। २४-विधिहरिहर-जनमे- चित्रकूट में महर्षि अत्रि और उनकी परम साध्वी पतिवता लीअनम्या रहती थी। दोनों पुरुष-स्त्रीने पुत्रको कामनासे अति कठोर तप किया । और मझा, विष्णु और महादेव तीनों नामोंसे पुकार-पुकारकर भगगनकी स्तुति की, तब भगवान् तीनों रूपमे प्रकट हो गये और पर मांगने के लिये का । अनम्याने यह घर माँगा कि मेरे गर्भसे तुम्हारे समान पुत्र हो। निदेव 'तथास्तु' कहकर अन्तर्शन हो गये। पीछे बहाने चन्द्रमाके कपमें, विपने दत्तात्रेपके रूपमें और शिवने दुर्गासाके रूपमें उन्म लिया। - ।

वहीं शिवजी श्रीरामावतारमें हनूमान्के रूपमें अवतीर्ण होकर श्रीरामचन्दी- विनय-पत्रिका २५-उदित चंड-कर-मंडल-ग्रासकर्ता- वाल्मीकि रामायणमें कथा आती है कि एक दिन प्रात अमावस्याकं दिन हनूमान्जीको बहुत मूख लगी थी। उन्होंने उगने लाल रंगके बाल-मूर्यको देखा और फल समझकर उनके ऊपर वे टपके, एक ही झटक पकड़कर निगल गये । दैवात् उस दिन ग्रहण भी बेचारा राहु जब सूर्यको ग्रहण करने के लिये आया तो देखा चारों अन्धकार है और सूर्यका कहीं पता नहीं। इससे निराश होकर इन्द्रक पास पहुँचा और गिड़गिड़ाने लगा कि आज मैं क्या खा सूर्यको तो किसी दूसरेने खा डाला । यह सुनकर इन्द्र राहुको साथ । दौड़े । हनूमान्जीने जब उन दोनोंको आते देखा तो वे उनको भी खाने लिये लपके । इसपर इन्द्रने उनको ठुड्डीपर ऐसा वर मारा कि हम मलित हो गये और वज्र भी टूट गया । तभीसे महावीरजीका हनूम- नाम पड़ा। रुद्र-अवतार- एक बार शिवजीने श्रीरामचन्द्रजीकी स्तुति की और यह वर माँ कि 'हे प्रभो ! मैं दास्यभावसे आपकी सेवा करना चाहता हूँ। इसलिये इप मेरे इस मनोरयको पूर्ण कीजिये ।' श्रीरामचन्द्रजीने 'तथास्तु' कहा के सेवकोंमें प्रमुख पदको प्राप्त हुए । मुग्रीव-सिन्छादि-रच्छन-निपुन- श्रीहनुमान्जीने सूर्यनारायणसे शनास-विद्याकी शिक्षा पापी को।

परिशिष्ट (सको दक्षिणाकै स्थानमें श्रीमूर्यनारायणने हनूमान्जोसे कहा था कि देखो, हमारे पुत्र सुनावको तुम सदा रक्षा करना ।' हनूमान्जीने आजन्म सुग्रीवको रक्षा की। यालि बलमालि वध मुख्य हेतू- सीता हरणके बाद जब भगवान् श्रीरामचन्द्र और लक्ष्मण सीताको दते-द्वेदते ऋष्यमूक-पर्वतके समीप पहुँचे तो पहले हनूमान्जीने ही उनसे मेंट को नया उनको ले जाकर सुप्रीवसे मिलाया और उनमें पारस्परिक मैत्री यापन की। यही मैत्री बालिबधका कारण हुई। इसीसे बालिके वधमें उम्य हेतु श्रीहनूमान्जी माने जाते हैं । सिंहिका-मद-मथन- सिंहिका नामकी एक राक्षसी समुद्रमें रहती थी। उस मार्गसे जो गौव आकाशमें जाते थे, उनकी परछाई जटमें देखकर वह उनको पकड़ उनी थी और खा जाती थी । जय हनूमान्जी सीताजीकी खोजमें आकाश- से टका जाने लगे तो उस राक्षसीने उनके साप भी वही व्यवहार करना चाहा । परन्तु हनुमानजी उसकी चालको समझ गये और उसको रक हो मुष्टि-प्रहार के द्वारा परलोक भेज दिया । दमकंठ-घटकरन, पारिद-नाद-कदन-कारन- राम-रायण युद्धके समय जब रावण युद्ध में विजय प्राप्त करनेके टिये भनेय यज्ञका अनुष्ठान करने लगा तो इसकी सूचना विभागने श्रीरामकी सेनामें दी और कहा कि यदि रावण इस अनुष्ठानमें सफल हो गया तो पिनय-पत्रिका उसको मारना फिर अन्यन्त काटिन हो जायगा । इसलिये उसके विध्वंस करना चाहिये । श्रीहनूमान् ने इस कार्यका मार अपने लिया और ये यानरोंकी एक सेना टेकर यहाँ पहुँच गये तथा उस विध्वंस कर दिया । इसके पश्चात् रावग युद्ध-भूमिने लड़ने के लिये और मारा गया । इस प्रकार श्रीहनुमान्जी उसकी मृत्युकै कारण कुम्भकर्णको रणमें बटरहित करनेमें भी श्रीहनुमान्जी हो कारण थे। मेघनादने जब लक्ष्मणजीको शक्तियाण मारा या तो वे मूछिन ही उनकी मूर्दाको दूर करने के लिये हनुमान्जी हो धौलागिरिक साप सन्न यूटी लाये थे। और उस बूटीके द्वारा मूळसे उठनेपर दूसरे ही दिन लान- मेघनादको मारा था, इसी कारण श्रीहनूमान्जी मेघनादके बक्के । माने जाते हैं। कालनेमि-हता- यह रावणके पक्षका महाधूर्त राक्षस पा । जब हनुमान्जी लक्ष्मण मूर्जा हटाने के लिये सञ्जीवनी-यूटी लाने गये थे तो रास्तेमें इसने साधुका धारणकर उनको छलना चाहा । हनूमान्जीको उसकी माया मादम गयी और तुरन्त ही उन्होंने उसको परलोक भेज दिया । इसीसे हनुमान काटनेमि-हन्ता कहलाते हैं। २८-भीमार्जुन-च्यालसूदन-गर्वहर- महाभारतमें कथा आती है कि पाण्डवोंके वनवासकालमें एक दिन भीम अपने पराक्रमके मदमें मस्त हुए कही जा रहे थे। उनके मार्ग बड़ा भारी बन्दर सोया हुआ मिला। भीमके गर्जनसे उसकी आँखें सु= --- - परिशिष्ट गयौं ! भीमने उसे मार्गसे हट जानेके लिये कहा । बन्दरने उत्तर दिया- 'माई में वूदा हो गया हूँ। तुम्ही जरा मेरी पूँछको हटाकर चले जाओ।' मोमके सारी शक्ति लगानेपर भी वह पूंछ टस-से-मस नहीं हुई । पीछे जब उन्हें यह मालूम हुआ कि यह कोई सामान्य बन्दर नहीं है, बल्कि यह महापराक्रमाली हनूमान्जी हैं तो उन्होंने नतशिर हो उन्हें प्रणाम किया । इस विषयको एक दूसरी कया और आती है कि एक बार भीमने हनुमान्जोसे निवेदन किया कि आप मुझे उस रूपका दर्शन दें जिस रूपसे आपने राम-रावण युद्ध में भाग लिया था। हनूमान्जीने कहा कि मेरा यह रूप अत्यन्त ही विकराल है, उसे देखकर तुम डर जाओगे । पान्तु जब गर्वके साथ भीमने बहुत आग्रह किया तो हनूमान्जी तत्काल हो उस रूपमें प्रकट हो गये । भीमकी आँखें भयके मारे बन्द हो गयी और ये पर-थर काँपने लगे। हनुमान्जीकी महिमा देखकर उनका गर्व दर हो गया और वे उनके चरणों में गिर पड़े। महाभारत के युद्ध में अर्जुनके रथकी धजापर हनूमान्जी वैठे रहने । परन्तु यह बात अर्जुनको मालूम न थी। जब अर्जुन और कर्णका सामना हुआ तो अर्जुनके बाणसे कर्णका रप बहुत दूर चला जाता पा परन्तु कर्णके बाणसे अर्जुनका रय बहुत ही थोड़ा हटता था । तथापि भगवान् अर्जुनके बाणको प्रशंसा नहीं करते और कर्णके बाणकी प्रशंसा करते थे। इससे अर्जुनके दिलमें यह गर्व होता था कि भगवान् ऐसा क्यों कहते हैं । अन्तर्यामी भगवान् श्रीकृष्ण यह सब जानते थे। एक बार हनूमान्जोसे रथकी ध्वजासे अलग हो जानका इशारा किया । उनके हटते ही जैसे कर्णका बाण छूटा, अर्जुनका रप कोसों जा गिरा। उन्होंने विनय-पत्रिका इससे अर्जुनको बड़ा ही आधर्य हुआ और उन्होंने भगवान् से इस कारण पूछा । भगवान्ने बतलाया कि 'हनूमान्के पराक्रमसे ही तुम्हान रथ स्थिर रहता है, वे रथकी प्वजापरसे हट गये हैं। यदि मैं भी यहाँ । रहता तो न जाने तुम्हारा रय कहाँ चला जाता। भगवान की इस बात अर्जुनका गर्व दूर हो गया । गरुड़जीको अपने तेज चलनेपर बड़ा ही गर्व था। एक बार भगवान् श्रीकृष्णने श्रीहनूमान्जीको बहुत शीघ्र बुला लाने के लिये गरुको भेजा | गरुडजी यहाँ गये और उन्होंने हनुमान्जीको साथ चलने के लिये कहा । हनूमान्जी बोले, आप चलिये, मैं अभी आता हूँ, गरुड्ने समशा देरसे आयेंगे, इसलिये कहा, साथ ही चलिये, हनुमान्जी बोले, मैं राम-कपासे आपसे आगे पहुंच जाऊँगा । इसपर गरुडको बड़ा ही आचर्य हुआ और ये खूब तेजीसे चले । भगवान्के सामने पहुंचनेपर ये क्या देखते हैं कि हनूमान्जी पहलेहीसे वहाँ विराजमान है। यह देखकर गाजीया गर्न जाता रहा। सम्पाति- सम्पाति गोधराज जटायुके छोटे भाई थे। एक दिन दोनो भाई होड़ा-होड़ी सूर्यको छने के लिये आकाशमें उडे । जगायु तो बुद्धिमान् थे, ये मूर्यके उत्तापके भयसे मूर्यमण्डल के समीप न जाकर लौट आये, पर सम्पातिको अपने पराग्राममा घमण्ड था, ये आगे नही गये और सूर्य के समीप पहुँचने ही उत्तम किरणोसे उनके पञ्च लग गये और ये मान्यज्ञान-गनपर धामगे आ गिरे। फिर जय गुपीय आगे सोना- बीको मोजमें थानर और निकले और उस पर पह परिशिष्ट सम्मानिने ही उन्हें सीताजीका पता बताया । हनूमान्जीकी कृपासे सम्पानिके पड़ जम गये और उनके नेत्रोंमें ज्योति आ गयी तथा उन्हें दिव्य शरीर प्राप्त हो गया। २९-महानाटक-निपुन গহনুমানুলী নই মাহী বি আঁহ যাবনা , মুসান্যাল उन्होंने सत्र विद्याएँ पदी थी। कहा जाता है कि श्रीहनूमानजीने एक महानाटक टिएकर श्रीराम-चरित्रका विस्तृत वर्णन किया था। परन्तु उसके सुनने का कोई अधिकारी न पाकर उसे उन्होंने समुद्र में फेंक दिया । उसी के पत्र-तत्र विखरे कुछ अंशोंको दामोदर मिश्रने सालन करके पर्तमान 'हनुमनाटको' की रचना की है। ३९-संजीवनी-ममय- जय हनूमान्जी हिमालय पर्वतसे सनीवनी-यूटी से कर आकारा-मानसे अयन्त तीन गतिमे टोटे आ रहे ५ उस ममय भरतने उन्हें देखन समझा कि कोई मायायी गस जा रहा है। लिये उन्होंने एक पाग या जो हनुमानजोसो रगा और यह हा राम ! हा राम : बहने ए रमनपर गिर पड़े । 'गम' शब्द सुनकर भरतको पका हुआ और उन्होंने दौर हनुमान्जीको उटा पमे मा दिया। मी ममप उनसोपान पर नेकी महिमा जानने आयो। ४०-लपणामुर- नगर माराका अनाधारी प्रतापी अगुर गमा गई दायरोंगो मौन पाने में। .

गौतम-ऋपिकी पत्नी अहल्या परम रूपवती थी। उसके सौन्दर्यको यिनय-पत्रिका महाराजा श्रीरामचन्द्रजीके यहाँ उनकी फरियाद आयी तो शत्रुघ्ने महाराजसे लवणासुरको दण्ड देनेके लिये स्वयं जानेकी आज्ञा माँगी । और आज्ञा प्राप्त होनेपर मथुरा जाकर उन्होंने अपने प्रबल पराक्रम लवणासुरका नाशकर प्रजाको सुखी किया। ४३-रिपि-मख-पाल- विश्वामित्र-मुनिके आश्रमके समीप राक्षसोंने बहुत उत्पात मचा रक्खा पा । ये तपस्यामें अनेकों प्रकारसे विन डालते थे। उनके उपद्रव व्याकुल होकर विश्वामित्र-मुनि अयोध्या महाराज दशरपके दरबारमें आ और महाराजसे अपने यज्ञको रक्षाके लिये श्रीराम-लक्ष्मणको माँगा महाराज अपने प्राणप्रिय पुत्रोंको पहले तो अलग करना नहीं चाहते थे परन्तु महामुनि महर्षि वशिष्टको अनुमतिसे उन्होंने श्रीराम-लक्ष्मणाकं विश्वामित्र-मुनिके सुपुर्द किया। श्रीरामचन्द्रजीने लक्ष्मणको साथ लेकर मुनिके यज्ञकी रक्षा की और ताड़का, मुबाहु प्रमृति राक्षसोंको, जो यज्ञ-ध्वंस किया करते थे, मार डाला। मुनिबधू-पापहारी- देखकर इन्द्रका मन मोहित हो गया और एक दिन सायंकाल जब गौतम- पि सन्च्या-वन्दनके निमित्त बाहर गये थे उसी समय इन्द्र गौतमका रूप धारणकर अहल्याके पास गया और उससे अपनी अमिटापा प्रकट की। कुसमय समझकर पहले तो उसने अस्वीकार किया पर पीछे पति-आध समझकर उसने खीकार कर लिया । इतनेहीमें गौतम-ऋपि आ गये। उन्होंने ।

परिशिष्ट गाष्टिसे सारा रहस्य जान लिया और क्रोधित होकर इन्द्रको शाप दिया क 'जा तेरे सहस्र भग हो जाय ।' तथा अहल्याको शाप दिया कि 'तू यरकी हो जा ।' पीछे जब उनका क्रोध शान्त हुआ तो उन्होंने नोंके शापका इस प्रकार प्रतिकार बतलाया कि श्रीरामचन्द्रजीके चरण- पर्शसे अहल्पाका उद्धार होगा और जब श्रीरामचन्द्रजी शिवके धनुपको हिंगे, उस समय इन्द्र के सहस्र मग सहस्र नेत्रों के रूपमें परिणत हो जायेंगे । काक करतूति-फलदानि- एक दिन चित्रकूटमें सीताजीके अपूर्व सौन्दर्यपर इन्द्रका पुत्र जयन्त हित हो गया। और कौएका रूप धारणकर सीताजीके पैरोंमें चोंच रकर भागा । श्रीरामचन्द्रजीने पैरोंसे रक्त प्रवाहित होते देख सीकके बाणसे से मारा । जयन्त भागने लगा और बाण उसके पीछे लगा। वह सम्पूर्ण याण्डमें ' मागता फिरा परन्तु कहीं भी उसे शरण नहीं मिली। लाचार कर वह श्रीरामचन्दजीके शरणमें आ गिरा । भगवान्ने उसके प्राण तो ही लिये पर उसकी एक आँख ले ली । १९-फालिय- यमुनाजीमें एक बड़ा ही भयङ्कर सर्प रहता था । उसका नाम कालिय }| उसके विपके मारे यहाँका जल सदा खौलता रहता था । श्रीकृष्ण- गवान्ने उसको नायकर अपने घशमें कर लिया। पीछे यह यमुनाजीको गोड़कर समुदमें चला गया। यह पा श्रीमद्भागवतमें मिलती है। अंधक- अन्धक बड़ा उपदयी और बलवान् दैत्य था । यह हिरण्याश्या पुर । मसाजीको आराधना करके इसने यह घरदान प्राप्त किया था कि विनय पत्रिका 'जब मुझे ज्ञानको प्राप्ति हो जाय तब ही मेरा शरीरान्त हो, सदा जोता रहूँ।' यह वरदान प्राप्तकर उसने त्रिमोशीको ज उसके भयसे देवना मन्दराचल-पर्वतपर चले गयें। यह यहाँ में उनको असित करने लगा। इसपर देवना प्राहि-त्राहि करने आर्नखरसे उन्होंने महादेवजीको पुकारा । महादेवजी के साप अन्= वडा भयङ्कर युद्ध हुआ, अन्नमें महादेवजी ने उसे एक त्रिशूल मार- यह असुर यहीं बैठकर महादेवजीक ध्यानमें मग्न हो गया। महादेव कि 'यर माँग।' उसने यह यर माँगा कि 'हे प्रभो! मुझे आपसी अन प्राप्त हो ।' यह कथा 'शिवपुराण में है। दच्छ-मत्र- दक्ष प्रजापतिका एक कन्याका नाम सती था, उमा विह के साथ हुआ था। एक यार ब्रह्माको समा राय देशना गित पर्यो दश प्रजापति पहुँचे। उनकी अम्पर्षनाफे यि प्रा. साप देवरा उट गई हुए, परन्तु शिवजी अंटे ही रह गये । इगसेस पर को बड़ा क्रोध हुआ और उन्होंने इमरी बददायक उमेयगए किया । 30 पा शिष अतिरिक्त सर देपा युरि गनाधार को मिल तोवर शिनीकी अनुमति विना पिता पधी गयी और यहाँ पहुँयका प्र पर fatt हमने न देगा ही कपको यmi र मम्म समाचार सुना शिव वीरमको यन- विर का नेहा का विसंगरिया --- परिशिप ५४ चेदगर्भका- ब्रह्माजीक पुत्र सनकादिने एक बार अपने पितासे पराविद्यासम्बन्धी बुन्छ प्रश्न पूछे। जब ब्रह्माजी उन प्रश्नोंका यथेष्ट उत्तर न दे सके तो उन्हें अपने ज्ञानपर अड़ा गर्व हुआ। ब्रह्माजीने उनके हृदयकी बात जानकर श्रीविष्णुभगवान्का स्मरण किया और विष्णुभगवान् यहाँ शीघ्र ही हंसक रूपमें प्रकट हो गये। फिर सनकादिने उस हंससे पूछा कि 'तु कौन है ?' इसी प्रश्नपर हंसभगवान्ने सारो पराविद्याका साराश कह सुनाया । उसे सुनकर सनकादिका अभिमान जाता रहा । निम्बार्क- सम्प्रदायवाले इसी हसभगवान्को अपने सम्प्रदायका आदि आचार्य पानते हैं। ५६-भूमि-उद्धरन- सत्ययुगमें हिरण्यकशिपु और हिरण्याक्ष नामक दो महाप्रतापी असुर हो गये हैं। यह दोनों भाई थे। हिरण्याक्ष भूमिको चुगकर पातालमें ले ग्या । भगवान्ने शूकर-रूप धारणकर हिरण्याक्षको मारा और भूमिका उद्धार किया । इससे भगवान् भूमिके उदारक माने जाते हैं । इसके सिवा जैव-जब इस पृथ्वीपर पापियोंका अत्याचार बढ़ता है और पृथ्वी धवडा उठनी है तब-तब भगवान् अवतार लेकर पापियोंका नाशकर भूमिका उद्धार करते हैं। भूधरनधारी- यह कथा तो प्रसिद्ध ही है कि जब भगवान् श्रीकृष्णके कहने से ब्रज- वासियोंने इन्द्रको पूजा रोक दो तो इन्द्र व्याकुल होकर प्रलयमेधको लेकर

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--- परिशिष्ट शवजीके अयनसे भगवान्ने उसे अभय कर दिया। तत्पश्चात् अनिरुद्ध और उपाका विवाह हुआ। यह कया भी श्रीमद्भागवतमें आती है । मय- भय नामका दानव बड़ा ही कला-कुशल था । इसके कलाकी प्रशंसा हाभारत, रामायण आदि धर्म ग्रन्थों में यत्र-तत्र मिलती है । वर्णपुरी लंका- ज निर्माण इसीने किया या । महाभारतमें इन्द्रप्रस्थ के अपूर्व नगरका देर्माना भी यही मय दानव था । यह भगवद्भक्त था । द्विजवंधु- विजबन्धुका अभिप्राय अंजामिलसे है । यह बड़ा ही दुराचारी और हापातकी ब्राह्मण था। इसके छोटे लड़केका नाम नारायण पा । जब . रते समय यमदूत इसे मुझे बाँधने लगे तो यह भयभीत होकर आतस्परसे नारायण नारायण' पुकारने टगा । इस पुकारसे उसका पुत्र तोनहीं थापा, र भगवान् नारायणके दृत वहाँ आ पहुंचे। उन्होंने हठपूर्वक यमदतोंसे २.कहकर उसका पिण्ड छुड़ाया कि 'यह परम वैष्णव है, इसने बड़े ही तम्बरसे भगवानका नामोच्चारण किया है।' 10-मारकंडेय "प्रलयकारी- मार्कण्डेय ऋषि पचपनसे ही बड़े धीर्यवान् और तपोनिष्ट थे । उनपर उम तपस्याको देखकर इन्द्र भी भयभीत हो गये थे और उसमें वित उपम्भित करने के विचारमे कामदेवको अपनी सारी सेना साप भेजा था। परन्तु फायदेय पोटि कला करके भी अपने प्रयतमें मत नहीं रह सके याद मान् नर-नारायणरूपसे उनके सम्मुख उपस्थित हुए और उन पर - निराश हो गया तो उसने आर्तभावसे भगवान्को पुकारा न छोड़ा, न छोड़ा। वह उसे गहरे जलमें खींचने लगा। पिना-4fat मांगनेहा मास-मुनिने मानक माया देने प्राटी T-IPT RAIT जलन होते हुरि ७८-टिप- एक बार कुवेर पुत्र ननाघर और मगिमायने प्रमादव नार- हंगी उहापोमर नाराजीने उन्हें मार दिया कि 'दम टंग जयुति हो, जाओ हो जाओ।' पछि जर उन लोगोंने : की तय दपाट नारद मुनिने शापादारनिमित्त कह दिया कि जय भगवान् श्रीकृष्ण का अपनार होगा तो उनके चरणोंके स्पमि तु उदार हो जायगा। यह दोनों माई नारदके शापसे गोकुळमें अर्जुन बन गये । एक दिन यशोदाजीने किसी अपराध के कारण बालक श्री- अखटसे बाँध दिया। भगवान् रेंगते हुए, उड़े हुर वृक्षोंके पास जा और वृशोंको, यीचमें उपलको अडाकर ऐसा झटका दिया कि तुरन्त = पृक्ष गिर पड़े और वृश्चम्प त्यागकर दिव्य यक्षरूपसे भगवानको र करने टगे । भगवान्ने उन्हें मुक्ति प्रदान कर दी। ८३--तरयो गयंद जाके एक नाय- एक बार एक तालाबमें एक बड़ा भारी मतवाला हापी हयिनिय साथ जल-विहार कर रहा था । इतनेमें एक ग्राहने आकर उसका 7 लिया। हाथीने अपने पैरको छुड़ाने के लिये सारी शक्ति लगा दी व १६. परिशिष्ट - सके मुंहसे 'हरि' नाम निकलना पा कि भक्त-भय-हारी प्रभु अपने वाहन रहको छोदकर शोध वहाँ उपस्थित हो गये और उन्होंने ग्राहको मारकर न हाथी के दुःखको दूर किया । श्रीमद्भागवतके आठवें स्कन्धमें यह कया जेन्द्रमोक्ष' नामसे विस्तारपूर्वक लिखी गयी है । ६-मुरुचि- राजा उत्तानपादकी दो रानियाँ थी--सुरुचि और सुनीति । राजा रुचिको ही अधिक मानते थे। दोनों रानियों के दो पुत्र थे। एक दिन पुन ध्रुव सुरुचिके लड़के के सामने राजाको गोदमें जा बैठा । इचिसे । यह देखा न गया । यह दौड़ी आयी और उसको डाँट-फटकार गाने, राजाको गोदसे उतार दिया । यह रोता हुआ अपनी माँ के पास । उसकी मॉने दीनबन्धु अशरणशरण भगवान्के गुणोंका वर्णनयर पके मनको भगवान्यी ओर लगा दिया । पछि बालक ध्रुपने याल्प-जीवन- ही पोर नपन्याकर प्रभुको प्रसन्नकर राज्य और परमपद प्राप्त किया। নবিষ্য ७-रिपु राहु- जब समुद्र-मन्थन के समय समुदसे अमृत निकाटा तो देय और । देयता उसके लिये आपसमें लाने सगे। रिभान्ने मोहिनी गाप पारणकर अमनके घईको अपने हाप से रियादिय उनके पर मोहित हो गये, उन्हें अमृता पान ही नहीं रहा। एक और देवता और इसरो और देय बैठ गये। अमृता पाय जाना देवनाओंकी निगे म ! राष्ट्र नाममा दोष निगरानी मोलको समझ पर हर बल्गार गर्ष-दादमागे दीप देवगनों में जाकर रेट पर।

पिनय-पत्रिका मोहिनीने उमे मी अमन पिटा दिया, यह अमर हो गया । परन्तु मूर्य और चन्द्रमा संगतम भगवानको जब यह मादम हुआ तो उन्होंने अपने व से राहुल सिरको घड़मे अग कर दिया। रि सिर राह हो गया यह गंतु । उसी पुराने वैरमे राष्ट्र प्रहणके द्वारा चन्द्र और सूर्यको कष्ट देना है। ९३-मृगराज-मनुज- प्रहादकी फया प्रसिद्ध हो है । हिरण्यकशिपु नामका एक महा- प्रतापी दैत्य हो गया है। उसने घोर तप करके ब्रह्मासे यह वरदान माँगा था कि मैं न नरसे मर न पशुसे, न दिनमें मर्स न रातमें, न अन्नसे मन शस्त्रसे, न घरमें मरूंन बाहर । यह वर प्राप्तकर वह अन्यन्त निरङ्कुश होकर राज्य करने लगा । उसके अन्याचारसे त्रिलोकी कॉप उठी। कोई मी मनुष्य जप-यज्ञ, पूजा-पाठ उसके राज्यमें नहीं करने पाता या और जो कोई भगवद्भजन करता उसे वह तरह-तरहकी यन्त्रणा देता । उसका पुत्र प्रहाद यड़ा ही भगवद्भक्त था । उसने पिताके कितना ही कहने- पर भी, अपनी टेकको नहीं छोड़ा । इसके लिये उसे भाँति-भाँतिको पीडा पहुँचानेका प्रयत्न किया गया । परन्तु सब निफल हुआ । एक दिन राज- समामें प्रहादको खम्भेमें बाँधकर हिरण्यकशिपु कहने लगा कि 'अपने भगवान्को दिखला, नहीं तो आज तू मेरे तलवारकी घाट उतरेगा।' प्रहार ने कहा कि 'भगवान् सर्वत्र है, वह खम्भेमें है, तुममें है, मुझमें है, तुम्हारी तलवारमें और इस खम्भे में भी है । इसपर हिरण्यकशिपुने अत्यन्त क्रोधिन होकर उसे मारने के लिये तलवार उठायी हो थी कि भक्त प्रहादके वचन- परिशिप को पुप करने और उसे सकटसे छुड़ाने के लिये भगवान् नरसिंह (आधा मनुष्य और आधा सिंह) रूपसे खम्भेको पाइकर निकल आये और हिरण्यकशिपु- को दरवाजेपर घसीटकर अपने ज पर रखकर अपने नोंसे उसके कलेजे- शे पादकर मार डाला। नरनारी- जय दुर्योधनने जुए में पाण्डवाका सर्वस्व जीत लिया और अन्त में पदीको भी दविपर रखकर जब पाण्श्य हार गये, नय उसने दुःशासनके हारा द्रौपदीको भरी हुई राजसभामें युल्यायर नगा फग्नेको आज्ञा दी। संग सभामें भीष्म, द्रोण आदि महामहिम योद्धा तथा पाँचों भाई पाण्क्ष्य की थैठे थे, परन्तु दुर्योधनकी इस आापर किगीफे मुंहमें एक भी शब्द र निकला । दुशासन द्रौपदीके सिरके केशीको पकाकर घसीटना हुआ पा-माइपके घोचमें टाया और उसकी सारीको पकड़कर पीचने टगा। पाने फरणापूर्ण नेत्रोंसे सभाको ओर देया परन्तु जप कोई भी उमरी अशयता के लिये आगे पदता न दिपाया दिया तो उसने अपनी पत्र चाने के लिये भात सरसे करणासिन्धु भगवानको पुफाग । भगवान् ने उसको पुकार पुन । ( दुरुगज-मन्Y ) दुःसन गोको १.पने पक गया पातु उममा फोर न एगा। प्रमुख पाये आगे की एकम पी पदीयो काज हो । अर्जुन नर' परिक भागर माने जाने से दोपदीयो 'गर-माग पहा गई। ५५-निगा- शिमा एक या एक दिस बिगो मोहन राय विनय-पत्रिका तो उसे वडी ग्लानि हुई। वह सोचने लगी कि जितना समय में पापपूर्ण प्रतीक्षामें लगाया उतना यदि भगवान्क भजनमें गाती उदार हो जाता । उसी दिनसे उसने वेश्या-वृत्ति छोड़कर भगव मन लगाया और भगवान्की कृपासे उसका उद्धार हो गया । व्याध- प्राचीन कालमें रत्नाकर नामका एक व्याधा पा । यह माझा उत्पन्न होकर भी व्याधाका काम करता था। यह जङ्गलमें पशुओंका करनेके सिवा वनके मार्गसे होकर जानेवालोंका सर्वस्व भी छीन लेता एक दिन, देववश, देवर्षि नारद उसी मार्गसे होकर निकले । रमाकरने उ घेर लिया। नारदजीने उससे कहा कि तुम यह घोर कर्म जिनके लिये कार हो, वह तुम्हारे इस पाप-कर्मक मागो न होंगे । रसाकर इसपर कुटुम्बके लोगोंसे इस विषयमें पूछने के लिये गया । जब उसके परिव लोगोंने साफ-साफ कह दिया कि हम तुम्हारे पापके भागी नहीं हैं तो नारदजीके पास आकर उनके पैरोंमें गिर पड़ा और क्षमा याचना य हुए पूछा कि 'मेरा अब कैसे उद्धार होगा! नारदजीने उसे 'राग' मन्त्र उपदेश दिया। उसने कहा कि मैं राम-मन्त्र नहीं जप सकता, तब देवरि उससे रामका उलटा 'मरा-मरा' जपनको कहा । इसीके प्रताप से पीछे य- व्याध 'वाल्मीकि मुनिक नामसे प्रसिद्ध हुआ। ९७-मुरपति कुरुराज, पालिसी.....चर रिसहते- मुरपति- एक यार देवर्षि नारदजी स्वर्गसे पारिजान-गुप साकर समिती दे गये । सत्यमामाको उसके टनेको इप्या हुई। परम्नु रोल निकै कारण - परिशिप रुक्मिणी से यह मांग नहीं सकती थी और रुक्मिणीके पास वैसे पुष्पका होना मी उससे देखा नहीं जाता था। इसलिये उसने पारिजात-पुष्पके लिये मान या । यद्यपि उसका यह हठ और मान ईर्ष्यायुक्त होनेके कारण अनुचित था, परन्तु भगवान्ने भक्तिवश उसपर कुछ ध्यान न दिया और स्वर्गमें जाकर न्द्रसे लड़कर पारिजात-वृक्ष ही उखाड लाये और सत्यभामाके भवनके सामने बगीचे में उसे लगा दिया । कुरुराज- पांचों भाई पाण्डवोंका मिटकर द्रौपदीको रख लेना, कौरवोंके साप पेटना तया द्रौपदीको भी दावॅपर रख हार जाना आदि पाण्डवोंके त्यक्ष दोप थे, परन्तु उनकी भक्ति देखकर भगवान् कृष्णने उनकं दोपोंपर पान नहीं दिया और उनका पक्ष लेकर कुरुराज दुर्योधनसे वैर बाँध लिया । वालि- यद्यपि मुसीयका भी पक्ष बिल्कुल निर्दोष न था तथापि मुनीयको मक्तिके में होकर भगवान्ने इन बातोंका कुछ भी खपाल न करके यालिको मारा और सुग्रीवको राज्य दिलाया। १८-जमुमति हठि चाँध्यो- एक बार यशोदाजी दूध मप रही थी। उसी समय बालक श्रीकृष्ण भूपे हुए उनके पास आये, माता उन्हें गोदमें उठाकर प्रेमसे दूध पिलाने गा, इतनेमें घुन्हेपर चढ़े हुए पात्रमें दृघका उफान आ गया । पशोदाजी श्रीकृष्णको गोदसे नीचे उतारकर उस धके पात्रको उतारने गयी । उसे बाटक कृष्ण बहुन रूठ गये और उन्होंने दहीके मटकेको उलट दिया और । ३० ग्राह्मणोंकी आज्ञासे इस दोपके परिहारके लिये राजाने एक लसीका पता ले लिया। इतने में दुर्वासा-ऋपि आ गये और बिना आज्ञा लिये हुए रामाके विनय-पत्रिका दूसरे घरमें जाकर ऊखटपर चढ़कर माखन खाने लगे। माताने वा आकर देखा कि दहीका वर्तन उलटा पड़ा है और श्रीकृष्णका पता न= है । यह क्रोधित हो उठी और श्रीकृष्णको सजा देनके लिये ढूंढ़ने लगी जब वह उस घरमें पहुँची जहाँ कृष्ण मक्खन खा रहे थे तो कृष्ण माता मारके डरसे ऊखलसे उतरकर भागने लगे। माताने उनको पकड़ और लगी रस्सीसे उन्हें ऊखलमें बाँधने । परन्तु जिस रस्सीसे वह बाँधन चाहती थी वही रस्सी छोटी हो जाती, यों तमाम घरमरकी रस्सी लाकर जोड़ दी परन्तु तिसपर भी श्रीकृष्ण न बँध सके । तब पककर उनकी ओर देखकर मुस्कराने लगी । कृपामय भगवान् माताकी कठिनाईको देश- कर खयं बँध गये। अम्बरीप- महाराज अम्बरीप परम भक्त थे, एकादशी-व्रतके बड़े ही प्रसिद्ध व्रती थे। एक एकादशीको दुर्वासा-ऋपि उनके घर आये । महाराजने उनको द्वादशीके दिन भोजन करनेका निमन्त्रण दिया । क्योंकि यह द्वादशीको ब्राह्मण-भोजन कराये बिना पारण नहीं करते थे। दुर्वासा-कारि स्नान-ध्यान करनेके लिये बाहर गये और उनको यहाँ बहुत देर हो गयी द्वादशी थोड़ी ही थी, उसके बाद त्रयोदशी हो जाती थी और शास्त्रोंकी यह आशा है कि एकादशी व्रत करके द्वादशीको पारण करना चाहिये । तुलसीदल ले लेने पर वे आगबबूला हो गये और उन्होंने क्रोधित हो महाराजको शाप दिया कि 'तुझे जो यह घमण्ड है कि मैं इसी जन्मने ४६७ परिशिष्ट मुक हो जाउँगा यह मिथ्या है, अभी तुम्हें दस बार और जन्म धारण करने पड़ेगे।' इतना शाप देनेके बाद उन्होंने एक कृत्या नामक राक्षसीको मैदा किया, जो पैदा होते ही अम्बरीषको खाने के लिये दौड़ी । भक्तकी रह दुर्दशा भगवान् से देखी न गयी, उन्होंने शीघ्र सुदर्शन चक्रको आज्ञा दी । उसने कृरयाको मारकर दुर्वासा ऋपिका पीछा किया । दुर्वासाजी तीनों कोंमें भागले फिरे पर किसी ने उन्हें आश्रय नहीं दिया । अन्तमें वे भगवान् वेणुके पास गये और उनकी आज्ञासे लौटकर महाराज अम्बरीपके चरणों- र आ गिरे । राजाने चक्रको स्तयन करके शान्त किया । इसके बाद वेष्णुभगवान्ने प्रकट होकर दुर्वासा ऋषिसे कहा कि आपने हमारे भक्तको शाप दिया है, उसे मैं ग्रहण करता हूँ। उनके बदलेमें मे दस बार रीिर धारण करूंगा। उग्रसेन- संसके बापका नाम उग्रसेन था। कंस अपने पापको कैद करके आप राजगद्दीपर बैठा था। उसके अत्याचारोंसे प्रजा त्राहि-त्राहि करती थी । भगवान् कृष्णने कसको मारकर उग्रसेनको गद्दीपर बैठाया और आप स्वयं उनके द्वारपाल बने। ९९-गुदामा- सुदामाको कथा प्रसिद्ध ही है। यह श्रीकृष्णजीके सहपाठी मित्र थे। विद्याप्पयनके अनन्तर यह अत्यन्त दरिद्र हो गये। अपनी स्त्रीके कहने. मुननेपर यह भगवान श्रीकृष्णसे मिलनेके लिये द्वारका गये । यह इतने दरिद ये कि अपने मित्रसे मिलने के लिये चार मुट्टी चावल मेंट ले गये थे।

विनय-पत्रिका भगवान्ने इनका बड़ा ही सम्मान किया और चार मुट्ठी चारलंके उन्हें पूर्ण समृद्धिशाली बना दिया । १०६-केवट- जब भगवान् श्रीरामचन्द्रजी सीता और लक्ष्मणके साय वन समय गंगाके किनारे पहुँचे और पार जाने के लिये केवटसे नाव माँ उसने प्रेमसे गदगद होकर कहा-'हे स्वामिन् ! मैं आपके मरमको ज हूँ । आपके चरणों को छू करके पत्थर सुन्दर स्त्रीके रूपमें परिणत हो मेरी नाय तो काठकी है, कहीं यह भी मुनिको स्त्री बन जायगी तो जीविका ही जाती रहेगी। इसलिये यदि आप पार जाना चाहते है पहले अपना पैर धोने दीजिये । निपादकी मक्ति अपूर्व यौ । उ- भक्तिके ही कारण भगवान्ने उससे अपने चरण धुलाकर कृतार्थ किया शवरी- यह जातिको भोलनी थी। मता-प्रषिकी सेवा करते-करते भगवद्भक्तिको प्राप्ति हो गयी थी। सीताहरणके पश्चात् जब लक्ष्मण साथ भगवान् सीताको खोजमें वनमें भटक रहे थे तो रास्तेमें भीलनी आश्रम मिला । उसने भगवान्का बड़ा सत्कार किया तथा प्रेममें थे। होकर भगवान्को पहलेसे चख-चखकर देसे हुए पेड़ोंके सुन्दर बेर दि और भक्तवत्सल भगवान्ने उन्हें सराह-सराहकर खाया । यह क- प्रसिद्ध ही है। गोपिका- गोपियोंको प्रेमामक्ति प्रसिद्ध है। भगवान् श्रीकृष्णने प्रेम के पदोमू- हो गोपियोंके साथ रास किया था। - परिशिष्ट विदुर- चेदुर दासी-पुत्र थे। परन्तु श्रीकृष्णभगवान्में इनकी अपूर्व भक्ति -सी कारण भगवान् जव हस्तिनापुर गये तो दुर्योधनके घर न जाकर 5 आतिथ्यको ही उन्होंने स्वीकार किया। जब भगवान् विदुरके ईचे उस समय विदुर घरपर नहीं थे। उनकी पत्नीने भगवान्का र किया । वह केले लेकर भगवान्को खिलाने बैठी परन्तु प्रेममें वेसुध थी कि केले छीलकर नीचे गिराती गयी और छिलके भगवान्के । प्रेमके मिखारी भक्तहियहारी प्रमु उन्हीं छिलकोंको भोग लगाने - भगवान्ने विदुरके कुल-शीलका विचार न कर उनकी भक्तिको ही नता दी। विदुरके साथ भगवान्का सख्यप्रेम था। कुबरी- यह कंसकी दासी थी। जब श्रीकृष्णभगवान् मथुरामें कंसके दरबार- ना रहे थे तो वह रास्ते में कंसके लिये चन्दनका अवलेप लिये जा रही । भगवान् श्रीकृष्णकी यह परम भक्त थी। भगवान्ने उसके प्रेमके रण उसके उस चन्दनके अवलेपको अपने शरीरमें लगाया और उसके बड़ेपनको दूर कर दिया। कंसको मारकर लौटनेपर भगवान्ने इसके तिथ्यको स्वीकार किया था। २८-रक्तबीज- यह एक महाप्रतापी दैत्य था । इसने घोर तपस्या करके श्रीशिवजीसे ह वरदान प्राप्त किया था कि 'मेरे शरीरसे जो एक वूद रक्त गिरे तो उमसे सहस्रों रक्तबीज पैदा हों।' इस वरको प्राप्त कर इसने त्रिलोकीको 1- विनय-पत्रिका भयसे कम्पित कर दिया था । सब देवताओंने अन्तमें मिलकर भगाने महाकालीकी स्तुति की। महाकाली प्रकट होकर रक्तबीजसे युद्ध करने लगी। परन्तु जब उसके एक बूंदसे सहस्रों रक्तबीज पैदा होने टो तो महाकालीने अपनी जीभ इतनी लम्बी बढ़ायी कि जितना रक्त उन रक्तबीज दैत्योंके वदनसे गिरता उसे ऊपर ही चाट जाती । इस प्रकार रक्तबीजका संहार उन्होंने किया । यह कथा दुर्गासप्तशतीमें विस्तारपूर्वक दी गयी है। १४५-विभीपन- विभीषणने रावणको समझाया कि 'श्रीरामचन्द्रजी जगतपिता परमात्मा हैं और श्रीसीताजी जगजननी हैं । इसलिये तुम जगजननी श्रीसीताजीको - उनके पास लौटाकर उनसे क्षमा माँगो । ये प्रभु दयालु हैं, तुम्हें क्षमा कर देंगे।' इस बातको सुनकर रावण बहुत ही क्रोधित हुआ विमीपणको लात मारकर अपने नगरसे बाहर निकाल दिया। विभागने निराश और निराश्रय होकर मनमें कहा- जिन पायनकी पादुकनि भरत रहे मन छ। से पर भानु बिलोकिहीं इन नयननि भा जाह। इस प्रकार अनन्यमायसे भावित होकर जब विभीषण भगवान के भरण- में आ गिरा तो मगवान्ने उसे प्रेमसे लंकेश कहकर हदपसे साया । प्रमुग मतयामटनाका यह कैसा उदाहरण है। १६२-दम मीम अरपि- प्रबर-प्रतापी राजा रावण एक बार कैमरा-पर्यतपर जाकर और २१ परिशिप करने लगा। उसने घोर तप करके अन्तमें अपने सिरको काट-काटकर अग्निमें हवन करने लगा। जब नव सिर काटकर हधन कर चुका और दसवाँ सिर काटने के लिये खग उठाया तब शङ्करजी वहाँ प्रकट हो गये और उन्होंने उसमे वर मांगने के लिये कहा, फलस्वरूप उसे टड्काका राज्य मिला। १७४-चलि- जब राजा बटिने वामनभगवान्को तीन पग पृथ्वी दान देनेका पचन दे दिया तब शुक्राचार्य ने उसको श्रीविष्णुभगवान्के छलके विषय में बहुत युछ समझाकर दान देनेसे रोका । परन्तु सत्यसकल्प राजा बलि अपनी प्रतिज्ञासे तनिक भी न हटा । उस समय उसने अपने गुरु शुक्राचार्यका सत्यके पीछे परित्याग कर दिया । २१३-नृग- सत्ययुगमें राजा नृग बड़े ही दानी गजा हो गये हैं। यह नित्य एक करोड़ गो-दान किया करते थे। एक बार एक माह्मणको दान दी गाय भूलमे आकर उनकी गायोंमें मिल गया और उन्होंने उसे अपने गयों के साथ दूसरे प्रामणको दान कर दिया । पहटा मापस अपनी भूटी यको तलाश करता हुआ जय दूसरे प्रागको गायोंमें उसे घरते हुए देगा तो उस ETFTको धार बनाकर अपनी राय हाँक से पारि दोनों बामगो गा होने लगा। दोनों एले-गइले राजाके पस पर और राजाको माफ करने के लिये कहा। राशा दोनोंकी बने पुलकार सिर हिलाता रहा । पुष उस समय न आपा शि. या विषा बार सर ये दोनो माग मंधित हो उ, रहन गयो रार ब महाकालीकी स्तुति की। महाकाली प्रकट होकर रलीज पुर हैं और श्रीसीताजी जगजननी है। इसलिये तुम जगननी Trt पर दंगे।' इस यातको सुनकर रायग यातही विभीषणको सात मारकर अपने नगरसे बाहर निकाIATT) विनय-पत्रिका भयसे कम्पित कर दिया था । सब देवताओंने अन्तने मिरा लगी । परन्तु जब उसके एक बूंदसे सहस्रों रक्तबीज पेश होने में तो महाकालौने अपनी जीभ इतनी लम्बी यदायी कि बिना र रक्तबीज दैत्योंके बदनसे गिरता उसे ऊपर ही चाट जाती I TEET रक्तबीजका संहार उन्होंने किया । यह कपा दुर्गासप्तशतोतिर दी गयी है। १४५-विभीपन- विभीषणने रायणको समझाया कि श्रीरामचन्द्रजी जाति उनके पास लौटाकर उनसे शामा माँगो । ये मुदपार निराशा और निरामय होकर मन में कला--- त्रिम पायनको पानि भाल हो l पर प्राण शिहोमिन पनि । गप्रकार अनन्यमा गाविस हवामा में आ गिरा तो भगवान उगेगीग मनगटाका यह मा पाडा १६२-टम मीम प्री- परित करने लगा। उसने घोर तप करके अन्तमें अपने सिरको काट-का- अनिमें हवन करने लगा। जब नव सिर काटकर हयन कर चुका और ः मिर काटने के लिये खड्ग उठाया तब शङ्करजी वहाँ प्रकट हो गये उन्होंने उससे घर मांगने के लिये कहा, फलवरूप उसे लङ्काका राज्य मि १७४-चलि- जब राजा बलिने वामनभगवान्को तीन पग पृथ्वी दान यवन दे दिया तब शुक्राचार्यने उसको श्रीविष्णुभगवान्के छलके वि बहन कुछ समझाकर दान देनेसे रोका । परन्तु सत्यसकल्प राजा अपनी प्रतिज्ञासे तनिक भी न हटा । उस समय उसने अपने शुक्राचार्यका सत्यके पीछे परित्याग कर दिया । २१३-नृग- सत्ययुगमें राजा नृग बड़े ही दानी राजा हो गये हैं। यह एक करोड़ गो-दान किया करते थे। एक बार एक माह्मणको था- गाय भूलसे आकर उनको गाय मिल गया और उन्होंने उसे হাঁ হাথ ব্যয় সান্তালী নে জা ৈিব । যত সালে প্রথম यसो तगारा करता हुआ जब दूसरे मालकी गायोंमें उरी घाई देगा तो उस मासको चोर बनायार अपनी गाय कि ले घटा दोनों प्रागो, गदा होने लगा। दोनों सहते-गाते रामाणे- पा और राजाशी सा करने के लिये कहा। राजा दोनोव- उनकार सिर हिलाता रहा । पुष उपके मन में न बापा कि पर भार । सर वे दोनों मामा झोशित हो उ, उन्होंने रासायं विनय-पत्रिका दिया कि 'हे राजा ! तूने हमें धोखा दिया है, इसलिये जा, गिरगिटक- योनिको प्राप्त हो । राजा गिरगिट हो गया और वैचारा सहतवपर्यन्त द्वारकाके एक कुएँ में पड़ा रहा । श्रीकृष्णावतारमें भगवान्ने उसे कुरसे निकाला। फिर शापमुक्त होकर वह दिव्य शरीर धारणकर वैकुण्ठ चला गया। २१४-पूतना- यह पूर्वजन्ममें एक अप्सरा थी । वामनभगवान्का बासखरूप देख- कर, वात्सल्य-स्नेह-यश, इसकी इच्छा हुई थी कि मैं इस बालकको पुत्र बनाकर अपने स्तनोंका दूध पिलाती । अन्तर्यामी भगवान् उसको मनो- वाञ्छा जान गये। यह अप्सरा किसी घोर पापके कारण पूतना नाम्नी राक्षसो बनी । श्रीकृष्णावतारमें भगवान्ने यन्सवत् उसका सन्यपान करते हुए उसे स्वर्ग भेज दिया। सिमुपाल- यह चैदि-देशका राजा था। यह वहा ही पराममी था। कहते हैं कि रावणने ही दूसरे जन्ममें शिशुपालके रूपमें जन्म लिया । यह बड़ा दुष्ट था । प्रतिदिन सबेरे उठकर भगवान् श्रीकृष्णको सौ गालियाँ दिया करता था । भगवान् कृष्ण उसको गालियाँ सुनते और सह लेते थे। क्योंकि उसकी माता श्रीकृष्णके पिताकी बहिन थी। और उसने श्रीकृष्णसे पह वर ले लिया था कि यह शिशुपालके सौ अपराधोंको प्रतिदिन क्षमा कर देंगे। एक दिन पाण्डयोंकी समामें श्रीकृष्णको यइ गालियां देने गा। गालियोतक तो भगवान्ने उसे क्षमा किया । परन्तु जब उसने गाली देना बलिने उमर अपना आसन जमाया महागज उप उभाम रटे तो ७३ परिशिष्ट २ नहीं किया तो भगवान्ने चक्रसुदर्शनसे उसके सिरको काट डाला । प-देम्पले उसको आत्मज्योति भगवान्के श्रीमुग्वमें प्रवेश कर गयी। भगवान् श्रीकृष्णके चरणों में पके चिह्न देखकर उसे नेत्रका भ्रम हो गया था और उसने हरिण समझकर भगवान्के चरणोंमें तीर मारा था। पछि जब बद समीप आया और चतुर्भुज भगवान् श्रीकृष्णको देगा तो उसे बड़ा ही दुःख और पचाताप हुआ। परन्तु भगवान्ने उसे शान्ति दान करते हुए सदेह स्वर्गको भेज दिया । २२०-परीछितहि पछिताय- एक पार महाराज परीक्षित शिकार ग्वेटते-ग्रेटत निर्जन यनमें निकल । यहाँ उन्होंने देखा कि एका काला पुरुष मूमल हायमें लिये एक गाय और एक लेंगदे बैलको ग्वदेह रहा है। जब पानेपर मादम हुआ कि २६ काटा पुरुष कलियुग है और उसके भयसे पृथ्वी गाय और धर्म वैठका रूप धारण कर भाग रहे हैं, तो महाराजभ पोधिन होकर तयार निकाल और कलियुगको मारने के लिये ददि । इसपर पद काला पुरुष अपमान खार महाराजफे चरणोंपर गिर पड़ा । महाराजने उमे शरणागर जानवर दिया और चोदर मानी रहने के लिये उसे अभय कर दिया। उन पर्ण भी । महाराज गिरपर सोने का गुट का ये मानाने अषपसमे प्यार हो या पानायमित प्रतिक ने और

mantra Pratrint
के PHOTamil गया!
११ PM पर कोर
परि मात्र को
razो मग मनन नो पोका
पक्ष में बने उगे योग मा श्रीगम
चन्दा मे कार में किया ! पाप र उनै मारने
दिपार
होने म हूको मनको शा और
धन्दाहा माग हो आना प मनमा । दइ मायामुग बनकर
सपने भगवानको पूर्ण के सपने हर निकाय । शबानाजीने
भगवानम उम मृगको मारकर का FRधने के लिये वहा ।

परिशिष्ट भगवान् उसके पीछे चले और मृगके मरण-समयके आर्तनादको सुनकर श्रीजानकीजीकी आज्ञासे लक्ष्मणजी मी उधर ही निकल पड़े। एकान्त देखकर रावण आया और पर्णकुटीसे श्रीसीताजीको रथपर बैठाकर लङ्का है गया ( मारीचको मारकर भगवान्ने उसे सहनि प्रदान की। १२२६-नहिं कुंजरो नरो- महामारतके युद्ध में कौरवोंकी ओरसे लड़ते हुए द्रोणाचार्य अब पाण्डवोंकी सेनाका संहार करने लगे तब श्रीकृष्णभगवान्ने अर्जुनसे कहा कि अव तो द्रोणाचार्यका वध किये बिना नहीं चल सकता । परन्त पर्जुनको गुरुवध करनेकी हिम्मत नहीं हुई। तब भगवान्ने भीमके धारा वरूपामा नामके हाथीको मरवा डाटा प्रोणाचार्य के पुत्रका भी अवरपामा माम या और वह उनको यहे हो प्यारे थे । जब 'अश्वत्थामा मारा गया यह आवाज प्रोणाचार्य के कानों में पहुँची तो उन्होंने धर्मराज युधिष्टिरसे पूछा कि फोन अश्वत्पामा मारा गया । युधिष्टिरने कहा-'अश्वापामा इनो मरो वा कुञ्जरो वा ।' अर्थात् अश्वत्थामा मनुष्प मारा गया थाहायी। छोणाचार्य या हाथी (या कुझरोका) इस अंशको म सुन सके । राम. मोनिका पालन करते हुए धर्मराजने सत्यको रक्षा करनी चादी, पर यह महो सका तप बोटनेका कलंक उनके जीवनपर लग हो गया। भारत, मरण सुनकर श्यों ही द्रोणाचार्य महिल में हुए यो हो परानने समका प्रवक काट लिया ! 'नो या कुलरो को भी बापतके कप प्रफुक होने लगा।

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परिशिए वेस चिन्तामें आप पड़े हैं, रामनाम लिखकर उसकी ही परिक्रमा करके देखिन्त हो जाइये । रामनाममें ही अखिल सृष्टि निहित है। फिर पिया था, गणेशजीने चट रामनाम लिखकर उसकी परिक्रमा कर डाली और उबसे पहले ब्रह्माण्डकी परिक्रमा कर आनेके फलस्वरूप सर्वप्रथम पूज्य हो ये । यह राम-नामको महिमा है ! नामप्रमाव जान गनगऊ । प्रथम पूजियत नाम-प्रभाऊ ।। रोक्यो विन्ध्य- कथा आती है कि विन्ध्याचल-पर्वत बहुत ही ऊँचा था। सूर्यकी चण्ड किरणें जब उस पर्वतके आश्रय रहनेवाले वृक्ष-लताओंको झुलसने गी तब उसे बड़ा रोप उत्पन्न हुआ और सूर्यनारायणको ढक लेने के देपसे यह अपने शरीरको बढ़ाने टगा। इससे सारे देवता भयभीत हो दि और सबने आकर अगत्य-अपिसे प्रार्थना की । महर्षि अगत्यनीने मि-नामका स्मरणकर विन्ध्याचलके मस्तकपर हाथ रखकर कहा कि 'देख, सितक मैं यहाँ न लौट आऊँ तबतक तू यहाँ ऐमा ही पड़ा रह ।' गम्यजी फिर न लौटे और यह पर्वत ज्यों-का-त्यों आजतक पड़ा है। यह है पोराम-नामकी महिमा । २५७-दंडक पुहुमि पुनीत भई- पाया है कि एक बार बड़ा भारी दुर्मि पा | मर ऋगिन अपने-अपने आश्रमोंको छोड़कर गौतम-शपिके आश्रमा डा टहरे । पौड बिनय-पत्रिका जाने जब दुर्भिक्ष मिट गया तो वे गौतम-ऋपिसे विदा माँगनेके लिये गये । पिने उनको उसी आश्रममें रहने के लिये कहा तथा अन्यत्र जानेके लिये मना किया । तव उन ऋषियोंने एक मायाको गौ रचकर गौतम-ऋषिके स्तन खड़ी कर दी । ऋपि जब उसे हॉकनेके लिये गये तो वह गिर पड़ी और मर गयी । इसपर वे सारे ऋषि उनके ऊपर गोहत्याका दोष मढ़कर लगे। गौतम-ऋपिने योगबलसे जब उनकी इस मायाको जाना तब मोरित होकर शाप दे दिया कि तुम जहाँ जाना चाहते हो यह देश अपवित्र-नष्ट भ्रष्ट हो जायगा । तभीसे वह दण्डकावनके नामसे प्रसिद्ध हुआ और यही कभी कोई लता-वृक्ष नहीं उगते थे, सदा वह प्रदेश धौरान रहता था। मगान् । श्रीरामचन्द्रजीके चरण धरते ही वह उजाद प्रदेश पवित्र और हरा-मरा हो गया ।

परमार्थ-ग्रन्थमालाकी नौ मणियाँ
(१) तत्व-चिन्तामणि (भाग १)
मूल्य 112) सजिल्द 11-)
"पुमप धर्मका माव बदा जागरूक १, प्रत्येक पृष्ठसे सचाई
और सात्वियी अशा प्रकट होना । लख सो अमलाप है। -मा।
(२) मानव-धर्म
श्रीमनुमहाराजकथित धर्मके दक्ष प्रकारके भेद बदी सरन, मुबोध
मारा उदाहरणोगहित समझाये गये है।
(३) साधन-पथ
इसमे साधन पथके यिो, उनके निवारण के उपायों सपा सहायक
सानोरास्तृित वर्णन किया गया। मूल्य
(४) तुलमी-दर
भीरनुमानप्रसादकी पोरके २३ लेग और कविताभोका
2, मूम्य 1) जिन्द
(५) माता (टेगा-श्रीअरविन्द)
म पुगको पार्ममा पानिगरी भेजार भार
पोधि र उनी से सावधानीगा।1) मार
(६) परमार्थ-पावती
भोरया गोसासारे पापारी ५१ पा मग
1)भार
(७) नंप
Argent पोसभोyि,
गु१५.रा.)
(८)भर (P-मापसे) मा
(९) तुरचिन्तामति (भाग २)
inter Pri.ar
tml)
m-minitiar

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गीता-यल मूल,
गीताप्रेसकी गीताएँ
गीता-मूल, पदद, अन्वय और साधारण भाषाटीकासहित,
आकारडिमाई ८ पेजी,मोटापागज,४५७०, सचिन,मजिल्द ११)
गीता-प्रायः सभी विषम ११) यालीके समान, आकार २२४२५
सोच्द पेजी, पृष्ठ ४६८, मूल्य 19) राजिन्द
गोवा-गोक, साधारण मापाटीपारहित, आकार २०४३० सोलह
पेजी, पृष्ठ ३१६, मोटा टाइप, सचित्र, मूल्य।) सजिन्द" 19)
मोटे अक्षरयाली, सचित्र, मूल्य 1-) जिल्द )
गीता केवल भाशा, इसमें श्लोक नहीं है। आकार २०४३. मोगर
पेजी, पृट २००, अपर मोटे, एषः चित्र, मूल्य ।) सहित )
गीना-साधारण माघाटीका, पावेट-साइज, सभी विषय !) पाग
समान, १४ ३५२, मूरूप-)। सजिल्द
गीता मूल तावीजी, साइज २४२, ४२९६, सचित्र,मबिन्द -)
पीता-यूम, रिष्णुसहस्रनामस्त, पृट १३२, राचित्र, समिद
गोता-snxt.rय साउदो प में सपूर्ण
गीता-गरा अपाय अहित पारेर-साल...'
गीता-पी(Gita-List)-भनुमान२...गीता का परिचय म्. 1)
गीता परीपन् १९३४ वी (त्समें पूतीमा)
FATEI-)
गीता-(भीण-शन) मूग, मोपो मने से उनका दी
पघानुपर, मुराद
श्रीमद्भगवद्गीता (अन्य भाषाओं में)
गोला-गुमटीtaftelliterare.)
तारी
ना-Ma(fort)) .. )
Teri
mimge
.)
"

भापाटीकासहित संस्कृतशास्त्रग्रन्य
श्रीआद्यशंकराचार्यजीकी पुस्तकें
श्रीमद्गीता
धाकरमागका मरल हिन्दी अनुपात
में भूप मायक गामी अयं निगर पढ़ने मोर
गमान गुगमा कर दी गयी है। भूति, रगति, इतिहाकि उन
ममा गरन मासिा गया है। मामा पदाको अनग-अलग करके
लिमा गाभिन्तमें गीता में भाये हुए हरेक शब्दकी पूरी मूनी दी गयी है।
अपम सरकरण रामार हो जानेर कर मासमे माँग लौटानी पड़
दी थी । म दुगरा सरकरण घर गया है। साइज २२४२९ आठपेजी,
४५१९, सीन चिमदिन, मू. साधारण निर२॥) यदिपा जिल्ल २)
श्रीविष्णुसहस्रनाम शांकरमान्य
हिन्दी अनुवारसहित, नित्य पाटके सोत्रोंमें विष्णुमइवनामका
यहुत प्रचार है। भगवान के नामों के रहस्य जानने के लिए इस अद्वितीय
सचित्र प्रन्यका मूल्य =) बहुत ही मुम्भ रखा गया है।
विवेक-चूडामणि
मूल श्लोक हिन्दी-अनुवादसहित, सचित्र, मूल्य १०) सजिल्द ।।)
प्रयोष सुधाकर
इस छोटे-से महत्त्वपूर्ण अन्त्यमें विषयभोगोंकी तु-उता दिखाते हुए
आत्मसिद्धिके उपाय बताये हैं। प्रेमार्णव श्रीकृष्ण भगवान के ध्यान योग्य
मुन्दर चित्रसहित पृष्ठ ८०, मूल्य )।
अपरोक्षानुभूति
वेदान्तका छोटा-सा अन्य है । सचित्र, मूल्य)
प्रश्नोत्तरी
बड़ी ही उपादेय पुस्तिका है,मूल श्लोक हिन्दी अनुवादसहित,म)।
पता--गीताप्रेस, गोरखपुर

प्राचीन सद्ग्रन्थ
एक सन्तका अनुमय-(श्रीनारायण वामांनी अनुभव)
छोविष्णुपुराण-आठ सुन्दर चित्र, एक तरफ लोक और उनके
सामने शै अर्थ है, हालही में प्रकाशित हुआ है। जल्दी
नहीं करनेवालेको दूसो संस्करणकी राह देखनी पड़ेगी,
मूल्य साधारण जिद २॥) कपड़े की जिद २1)
मायामरामायन-सातौ काण्ड, मूल और अर्थसहित, माह
सुन्दर चित्र, मूल्य 11) कपड़ेकी जिल्द
श्रीमद्भागवत एकादशस्कन्ध-मूल और अर्थसहित, सचिन,
पृष्ठ १२०, मूल्य केवल 11) सजिश्व
भक्तोंके जीवन-चरित्र
प्रीचितन्यचरितावलो-(E 1) चित्र, पृय ३२, मू००)
सजिद 10
(ण्ड २) सचिन, पृष्ठ १५. भू.)
(सीसरा माग प रहा है, कुल पाँच भाग होंगे।)
भागयतरन महाद- विन, ३४० पृष्ट, मु.1) स1ि)
देवर्षि नारद- Neem) सकिन
থাকাংখী-বিয়ে নয়, এ , বিগ, মূখ ~ে-
थोपस्नाय-चरिख-हिन्दी श्रीएकनासीको जीवनी भीनक
दूसरी मही देखी, पाम उपदेश ई मधिन, भूप
श्रीगमकृष्ण परमहंस-सचिन, पृष्ठ-सत्या २५., मगध
मतभारली-(चित्र)दिता मौकी कमाएं,म.) 8.
"
पता-गीताप्रेस, गोरगर

... है ... ... ... ... ... सुन्दर-सुन्दर पुस्तकें लेखक-धीवियोगी हरिजी गीतोक्त सांख्ययोग *प्रेम-योग सचित्र ११) गीताका सूक्ष्म विषय गीतामें भक्ति योगसचित्र श्रीप्रेमभक्तिप्रकाश भजन-संग्रहचारोंभाग ) / मगवान् क्या हैं? लेखक-श्रीमोडेबावाजी त्यागसे भगवत्प्राप्ति -) श्रुति-रत्नावली 1) धर्म क्या है। ) लेखक-ग्रीहनुमानप्रसादजी पोदार वेदान्त छन्दावली ॥ स्त्री-धर्मप्रश्नोत्तरी लेखक-श्रीजयदयालजी गोयन्दका आनन्दकी लहरें - गीता-निवन्धावली 8) मनको वश करनेके उपाय सच्चामुख, उसकी प्राप्तिके उपाय -)| समाज-सुधार गीताके कुछ जानने योग्य विषय - ब्रह्मचर्य ... श्रुतिकी टेर ... ... ... फुटकर पुस्तकें 1) रामगीता सटीक ... ... ... दिनचर्या ज्ञानयोग हरेगमभजन प्रजकी झाँकी 1) सन्या हिन्दी विधिसदिव मनन-माला 2) बलिवैश्वदेवविधि चित्रक्टकी झाँकी .)/ सेवाके मन्त्र मनुस्मृति दूसरा अध्याय - सीतागमभजन हनुमानवाहक -भीहरिसंकीर्तनकी धुन आचार्य के सदुपदेश -)| पातालयोगदर्शन मूल सम-महारत -) लोभमें पाप विष्णुसहस्रनाम )|| सजिल्द ) गजलगीता पता-गीताप्रेस गोरखपुर -सस्करण समास हो गया, सपनेपर मिगी। ... ... ... भाषा पर भाषा ...

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Vinaye Rag Bilaval

Author
Tilsi Dass
Title
Vinaye Rag Bilaval
File name
Vinaye Rag Bilaval
Text
OCR done
Citation
1920
Published
2011/08
Publisher
Xxxx
Language
Sanskrit
Pages
516
Library
Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner
DLI number
310969
Barcode
99999990314405.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
RqQlBZL5Ej3
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