Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
Vanshanukram Vigyan
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सरस्वती-सिरीज़ नं०४२
बंशानुक्रम विज्ञान
शचीन्द्रनाथ सान्याल
ড্রাইভ
इंडियन प्रेस लिमिटेड
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सरस्वती-सिरीज़ स्थायी परामर्शदाता -डा० भगवानदास, पण्डित अमाप मा, भाई परमानद, डा. प्राणनाथ विद्यालझार, श्री सत्य व विद्यालङ्कार, ५० द्वारिका प्रसाद मित्र, संत निहालसिह, १० लक्ष्मणनारायण ग, बाबू संपूर्णानन्द, श्री बाबूराव विष्णुपराइकर, परिहत देारनाथ मट्ट, स्याहार राजेन्द्रसिह, श्री पदमलाल पुन्नालाल बसशी, श्री जैनेन्द्र कुमार, चार वृन्दावनलाल वर्मा, सेठ गोविन्ददास, परिडत क्षेत्रेश चटनी, हा० ईश्वराप्रसा- का0 मारकर लिपाठी, डा० परमात्माशरण, 810 कैनोप्रसाद, डा. रामप्रसा- त्रिपाठी, पण्डित रामनारायण मिश्र, श्री संतराम पण्डित रामचन्द्र शर्मा श्री महेश प्रसाद मौलवी फाजिल, श्री रायकृष्णदास, बार गोपालराम गहमरी, श्री उपेन्द्र नाप "अरज", हा ताराच्द, श्री चन्द्रगुप्त विद्यालङ्कार, डा. गोरखमसाट, टा० सत्यप्रकाश, भनुकूलचन्द्र मुकतों, रायसाहब पापडत श्रोनारा पण चवदी, रायबहादुर बाद श्यामसुन्दरदास, पण्डित सुमित्रानन्दन पन, १० सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला',५० नन्ददलार वाजपेयो, प० हजारीप्रसाद दिवेदी, पण्डित मोहनलाल महतो, भोमतो महादेवी वर्मा, पण्डित अयोध्या सिइ उपाध्याय 'हरिमधि', डा० पीताम्बरात बवाल, डा. धारद वर्मा, बाबू रामचन्द्र टडन, पण्डित कैशवप्रसार मिश्र बाबू पालिदास कपूर, इत्यादि, इत्यादि। AN विचारधारा वंशानुक्रम विज्ञान मन्तान और प्रजनन विज्ञान के सबध मे कुछ महत्त्वपूर्ण प्रश्नों के वैज्ञानिक उत्तर शचीन्द्रनाथ सान्याल dr but by K NI Th Idi APLdhan bd पहला परिच्छेद वशानुक्रम-विज्ञान क्या है ? इस संसार में अनादि काल से आज तक ऐसा कभी नहीं देखने में आया कि कोई एक व्यक्ति देखने में किसी दूसरे व्यक्ति के साथ पूर्णतया समान हो। और सम्भव है, अनन्त काल तक ऐसा ही होता रहे। इसका क्या कारण है ? किन्तु सभी ने यह देसा होगा कि एक ही माता-पिता की सन्तान आपस में देसने में कुछ अवश्य मिलती-जुलती हैं। माता-पिता और सन्तानों में भी कुछ सादृश्य रहता है। इसी प्रकार एक . ही माता पिता के पुना और पुत्रियों में कुछ समानता रहते हुए भी उनमें विषमता भी कम नहीं रहती। सर भाई-बहन बिलकुल एक से कत्र होते हैं ? सन्तानें भी माता पिता के सदृश तो होती है, किन्तु बिलकुल एक सी नहीं होती। जिस विज्ञान से माता पिता और सन्तान-सन्ततियों में सादृश्य और विषमता के कारण का अनुसन्धान किया जाता है उस विज्ञान को वशानुक्रम- विज्ञान' कहते हैं। हम अपने माता पिता के गुण अवगुणों के उत्तराधिकारी होते हैं अथवा नहीं, और यदि होते हैं तो कहाँ तक होते हैं, और कैसे पूर्वजों के गुण वंशजो में, उनके जन्म के समय सरमित अर्थात् उत्पन्न होते हैं, एवं जिन गुणों को लेकर मनुष्य जम लेता है उनके आधार पर जाति की उन्नति-अवनति ८ वशानुक्रम विज्ञान पैसे हुश्रा करती है, इन सब बातों के पोई नियम हैं अथवा नहीं ? जीव का जम कैसे हुआ करता है? जम के पूर्व हम यह जान सक्ते हैं अथवा नहीं कि लड़का पैदा होगा प्रथवा लडकी ? इसके भी कुछ नियम है अथवा नहीं ? हम अपने इच्छानुमार पुत्र अथवा कन्या को जन्म दे सकते हैं अथवा नहीं ? यदि पिता का रङ्ग सांवला और माता का गोरा हो, तो उनकी सन्तान के रङ्ग कैसे होंगे १ शिशु क्सि माता पिता से उत्पन्न हुआ है, इसकी क्या पहचान है ? सि रोग को हम पूर्वजों से प्राप्त करते और रिसको नहीं ? सिफलिस (गर्मी) की बीमारी हम पूर्वजों से प्राप्त करते हैं। पागलपन अथना पहरापन पिन रोतियों से वशजों में उत्पन्न होते हैं ? पुरुष के वीर्य में और बी के शोणित में क्या क्या है ? लडको से लडका और लड़के से लड़की बन सकती है अथवा नहीं ? जैसे बगीचे का माली पौधों से धीज सप्रह करता है और फिर अपने इच्छानुसार उन चीजो से फिर पौधे उत्पन्न करता है, वैसे ही मनुष्या का वीर्य भी समह करके रक्या जा सस्ता है, अथवा नहीं ? पुरुप और स्त्री का सयोग हुए बिना भी यनों को सहायता से सुरक्षित वीर्य द्वारा अभीप्सित सन्तान उत्पन्न की जा सकती हैं, अथवा नहीं ? सन्तान उत्पादन की शक्ति न रहने का क्या अर्थ है ? अनोपचार अर्थात् नश्तर द्वारा सन्तान उत्पादन की शक्ति नष्ट की जा सकती है, अथना नहीं ? निक्ट सम्बन्धियों में विवाह का सम्बन्ध होने से फ्या हानि और लाभ हो सकता है ? एक ही व्यक्ति का आधा अङ्ग पुरुष का और प्राधा नारी का हो सकता है, अथवा नहीं ? इत्यानि का ज्ञान वंशानुक्रम विज्ञान से प्राप्त हो सकता है। एक विषय का ज्ञान प्राप्त करते समय दूसरे विषय के ज्ञान के साथ परिचित हो जाना आवश्यक हो जाता है। इस प्रकार एक विज्ञान से दूसरे विज्ञान की उत्पत्ति होती रहती है। वशपरम्परा में गुण .
- वंशानुक्रम विज्ञान क्या है अवगुण कैसे सक्रमित होते हैं, इसका पता जिस विज्ञान से चलता है उसे 'वशानुक्रम विज्ञान' कहते हैं। इस विज्ञान के सम्बन्ध में सोज करते-करते अति अद्भुत और विस्मयकर पातो का पता चला है। इस छोटी सी पुस्तक में उन सब आश्चर्यजनक बातों का परिचय देने की चेष्टा की जायगी। वंशानुक्रम विज्ञान की श्राज अद्भुत उन्नति हुई है, किन्तु जन-साधारण को इस विषय में कुछ भी ज्ञान प्राप्त नहीं है। वशानुक्रम विज्ञान का प्रयोजन और उसकी उत्पत्ति- विज्ञान के आविष्कार के साथ सामाजिक प्रश्नों का अत्यन्त घनिष्ठ सम्बन्ध है, किन्तु किस ज्ञान से समाज का कितना कल्याण होगा, अथवा कुछ भी कल्याण होगा या नहीं, इसको समझ लेना सन समय सहज बात नहीं है। ऐसी बहुत सी सूक्ष्म वैज्ञानिक बातों फा प्राविष्कार हुआ है जिनके साथ सामाजिक अथना व्यावहारिक जीवन का कोई सम्बन्ध पहले पहल नहीं जान पड़ा था। परन्तु समय बीतने पर देखा गया कि यदि विज्ञान को उक्त सूक्ष्म बातों मा आविष्कार न हुआ होता, तो वर्तमान समय की अद्भुत व्याव- हारिक विज्ञान की बातें भी हमे देसने को न मिलती। यदि सामा जिक लाभालाम को परवा न करके, केवल विशुद्ध ज्ञानान्वेपण की प्रेरणा से वैज्ञानिकगण विज्ञान की सोजन करते, तो आज हमें रेडियो, वायरलेस, सिनेमा आदि से परिचित होने का सौभाग्य प्राप्त न हुआ होता। ईथर नाम की किसी वस्तु का यथार्थ में अस्तित्व है अथवा नहीं, इस बात की सोज करते समय अत्यन्त विस्तृत आकाश के सम्बन्ध मे भी कितनी ही नगीन, विस्मयकर और रहस्यमय बातों के आविष्कार हुए हैं। इन्हीं आविष्कारों के परिणाम में धीरे धीरे रेडियो और वायरलेस के अद्भुत और विस्मयक्र व्यापार हमारे सामने आये हैं। इस प्रकार जब केवल शुद्ध ज्ञान के लिए ही ज्ञानान्वेपण क्यिा जाता है तब उसके परि- १० वशानुक्रम विज्ञान रणाम में आगे चलकर समाज का भी क्ल्याण हुआ करता है। इस कारण विशुद्ध ज्ञान के साथ व्यावहारिक ज्ञान का नित्य और घनिष्ठ सम्बन्ध है। यद्यपि वशानुक्म विज्ञान के साथ सामाजिक और वशगत उन्नति अवनति का अत्यत घनिष्ठ सम्बध है, तथापि दूसरे अनेक वैज्ञानिक तत्त्वो की तरह, वंशानुक्रम विज्ञान के आलोचनादि कार्य व्यावहारिक प्रयोजन की प्रेरणा से प्रारभ नहीं हुए थे। जीव विज्ञान के सम्बन्ध में अनुसंधान और गरेपणा करते समय ऐसे बहुत से तथ्यों का पता लगा, जिनके परिणाम में प्रमश जीव विज्ञान से स्वतन्त्र, फिन्तु उसी की शाखा क रूप में, वशानुनम विज्ञान की उत्पत्ति हुई। आजम्ल वशानुक्रम विज्ञान की गिनती एक स्वतन्त्र विज्ञान के रूप में होती है। यशानुनम के सम्बध में एक साधारण सी धारणा मनुष्यो के मन में हजारों वर्षों से चली आ रही है। संसार की अनेक असभ्य जातियों से लेकर बडी-बडी प्राचीन सभ्य जातियों में भी, वशानुक्रम के सम्बन्ध मे, नाना प्रकार के व्यावहारिक ज्ञान प्रालित हैं। आधुनिक समय के बडे-बडे पण्डितों ने नाना प्रकार की असभ्य और बर्वर जातियों की सामाजिक रीति-नीति के विषय में बहुत से अनुसन्धान किये हैं। ऐसा करते समय उन जातियों के सस्ता- रादिको के साथ परिचित होकर वे विस्मित हो गये हैं। उन जातियों में ऐसा भी रीति जातियों का प्रचलन है, जो अनेक प्रशों में आधुनिक विज्ञान से अनुमोदित समझी जा सकती हैं। • देखिए -Han snd His Superstitions P 246 by Prof Carveth Bend of the London University-second edition, 1925 * वशानुक्रम विज्ञान क्या है ११ ईसा के जन्म के छ सौ वर्ष पूर्व प्रोक कवि थियाग्निस् ने यह कहकर आक्षेप किया था कि मनुष्य घोडो, गदहो और भेडों के सम्बन्ध में तो अच्छे वश की सोज इस समझ से करता है कि 'अच्छे से अच्छे को ही उत्पत्ति होना' स्वाभाविक है, किन्तु एक अच्छे वंश का पिता अर्थ के लोभ में, कैसे अनायास ही, अपने पुन का विवाह एक बुरे वश की बुरी लडकी के साथ कर देता है। स्पार्टा जाति के धर्मशास्त्र के प्रणेता लाइसर्गस् ने भी दूसरी जातियो की रीति-नीति को देखकर यह कहा था कि यह बड़े आश्चर्य की बात है कि अपनी गायो, भैसो के बारे में तो दूसरी जातियाँ उनकी नस्ल पर प्रसर दृष्टि रसती है, परन्तु अपनी प्रजा की उन्नति के लिए, मनुष्य वश के प्रति उनका कुछ भी ध्यान नहीं रहता। लाइसर्गस की प्रेरणा से स्पार्टी में विवाह के सम्बन्ध में बड़े कड़े नियम बनाये गये थे। उक्त नियमों का पालन कहाँ तक हुआ था, कहा नहीं जा सकता। विश्व विख्यात ग्रीक दार्शनिक प्लेटो ने भी वश गतगुण-दोषों के प्रति ध्यान रसते हुए, अपनी आदर्श समाज सगठन की कल्पना मे, विवाह के सम्बन्ध में विशेष नियमो का उल्लेख किया है। इसके दो हजार वर्ष पश्चात्, कैम्पानेला नामक एक प्रसिद्ध विद्वान् ने एक दूसरे आदर्श समाज के संगठन की कल्पना की थी। उसमें उन्होंने वशानुक्रम पर ध्यान रखते हुए, सन्तान और समाज की मङ्गलकामना से, मनुष्यों की विवाह पद्धति को नियन्त्रित करने के लिए कहा है ।* भारतवर्ष में वशानुक्रम के सम्बन्ध में बहुत ही स्पष्ट धारणाएँ थी, और उन्हीं के आधार पर भारतीय वर्ण व्यवस्था की प्रतिष्ठा हुई था। इस वर्ण-व्यवस्था के पक्ष में पाश्चात्य-समाज के बडे से घडे * tes - Fogenics by A N Carr-Sanndeis P 22-23 वंशानुक्म निशान पण्डित, दार्शनिक और वैज्ञानिकगण, जैसे कइसलिंग, नीदशे, हाल्डेन आदि ने अति स्पष्ट शब्दों में अपनी सम्मति दी है। मनुष्य, ससार के सर प्रकार के शागार्जन फा अभिलापी है, किन्तु न जाने किस माह के फेर में पड़कर वह अपने विषय में अधिक जानने के लिए विशेष न्छुक नहीं है। इस कारण हम देखते हैं कि पदार्थ विज्ञान की आज जितनी उन्नति हुई है, उतनी उन्नति जीव विज्ञान अथवा मानस विज्ञान की नहीं हुई। मनुष्य होने पर भी हम मानन-तत्त्व और श्रात्मज्ञान के सम्बन्ध में क्तिने उदासीन हैं। ज्योतिष्क-मण्डल म क्या हो रहा है, यह जानने के लिए हम परम उत्सुक हैं, किन्तु मानव-समाज में, वशानुक्म पे पर्याप्त धान के न रहने के पारण विवाहपद्धति, केवल व्यक्तिगत रुचि अभिरचि के अनुसार नियन्त्रित हो रही है और इस कारण समाज को फैसो दुर्गति हो रही है, इसका हमें पता भी नहा है। गाय बैलों, घोडों और कुत्तो के वंशों के बारे में तो पाश्चात्य समाज न जाने कितना भ्यान रखता है, किन्तु मानव परिवार के सम्बय में, प्रीस सभ्यता के अभ्युदय के समय से लेकर आज तक, वह समाज नितात उदासीन रहा है। वंशानुक्रम विज्ञान की बाज बहुत उन्नति हुई है, किन्तु वह केवल पुस्तयों में ही सीमित है, समाज मङ्गल के लिए उसका प्रयोग आज भी नहीं के बराबर हुआ है। - •देखिए ---The World in the Making, key serling The will to Power Nietzsche The Inequality of nan by TPS Haldane आदि आदि। + We bave gained the mastery of almost everything which exists on the surface of tho earth excepting ours rives -Alexis Carell in man the Unnown-P2 1st tdn 1926 वंशानुक्म-विज्ञान क्या है, १३ अनेक पण्डितों की यह राय है कि प्रतिभावान पुरुषों के श्रमात्र से एथेन्स और स्पार्टी का पतन हुआ था। अव्यवस्थित विवाह- पद्धति के कारण रोम के पारिवारिक जीवन में व्यभिचार का स्रोत प्रवाहित हुआ था, जिससे उसका भी पतन हुआ। विवाह- पद्धति के अनियन्त्रित होने से पारिवारिक जीवन में व्यभि. चार का विप प्रवेश करता है, और तब व्यक्तित्व के विकास का उपयुक्त असर नहीं रह जाता। इस प्रकार प्रतिभा के विनाश से समाज में उपयुक्त नेताओं का अभाव होने रागता है, और समाज का सर्वनाश अवश्यम्भावी हो जाता है। इस कारण वशानुक्रम निशान के अनुसार विवाह-पद्धति का नियनित होना अत्यावश्यक है। वशानुक्रम के साथ शिक्षा का भी अत्यन्त घनिष्ठ सम्पन्ध है। इस विषय की आजकल पाश्चात्य देशों में बहुत हो गम्भीर रूप से चर्चा चल रही है। ईसाई समाज में यह भ्रमात्मक धारणा फैली हुई है कि शिशु सर्वथा मस्कारशून्य होकर जन्म प्रहण करता है। वशानुक्रम विज्ञान में इसके विपरीत बहुत से प्रमाण प्राप्त होते हैं। कहा जाता है, हजरत मोहम्मद साहब से किसी ने पूछा था कि किस समय से घातक की शिक्षा प्रारम्भ होनी उचित है। इसके उत्तर में उन्होंने कहा था-'उसके जन्म के कम से कम एक सौ वर्ष पूर्व से ।' उस महापुरुप ने अपने उक्त वाक्य द्वारा वशानुनम की यात को हो सूचित किया था। वासियों की धारणा में शिशु सस्कारयुक्त होकर ही जन्म लेता है। उन सस्कारों के आधार पर ही शिशु का व्यक्तित्व बनता है। इस तत्त्व से परिचित न होने से यथार्थ शिक्षा-व्यवस्था का निर्माण सभव नहीं है। दुर्जन व्यक्ति, शिक्षा प्राप्त कर लेने पर समाज की और भी भयङ्कर क्षति कर सकता है। विद्या से अलफ़त दुष्टजन को भी हमें त्यागना उचित है, जैसे मणि से भूपित होने पर भी सर्प हमारे लिए अत्यन्त भयङ्कर होता है। इस कारण विद्या- भारत- १४ च लयों की व्यवस्था में छात्रों हमारे लिए परम कर्तव्य हो विद्यार्जन करने का सपको को भी नहीं। भारतवर्ष पा प्रकार के कार्यों के लिए अति- अधिकार भेद का रहस्य में जम ही हमे अधिकार प्रदान निवाह पद्धति के साथ भारतीय वर्णव्यवस्था मे इसी । का विशेष रूप से निर्देश है। श्री कैजलिंग ने कहा है कि सस व्यवस्था का श्रादर्श बल प्राप्त कर यह बात भी सत्य है कि जन- करने के लिए उपयुक्त शिक्षा की परम आवश्यकता है। माप्त नहीं करते हैं तो पारिवारिक अधिक नहा पड़ सकता। यदि को अपनी ओर न खींचती हो चलाना भी कठिन हो जाता। पर तुमुल झगडा चल रहा पाश्विक वातावरण का अधिक कि तु बडे से बडे वैज्ञानिक वश परम्परा से हम बहुत कुछ और अविर प्रभाव पडता है।* देखिर -बंगला मासिक श्रीशरावर राय का वशानुक्रम पर एक 14 4 M व .
यशानुक्रम-विज्ञान क्या है जो यह समझते हैं कि वशानुक्रम की अपेक्षा जीव पर पारिपार्श्विक वातावरण का अधिक प्रभाव पड़ता है। प्राच्य देशों में भी वश मर्यादा के प्रति यथार्थ श्रद्धा दर्शार्ड गई है। इंगलैंड के प्रमिद्व कवि श्नी डल्यू० वी० ईट्स ने कवीन्द्र रवीन्द्रनाथ की गीताञ्जलि की भूमिका में एक सुन्दर दृष्टान्त का उल्लेख किया है,-'प्राच्य देशों में आप लोग यथार्थ में ही वश-मर्यादा को अक्षुण्ण रखना जानते हैं। उस दिन मुझे एक म्युजियम के क्यूरेटर (अध्यक्ष) ने एक कृष्णाङ्ग व्यक्ति को दिसलाकर यह कहा था कि वह व्यक्ति, जो चीन देश की प्रदर्शनीय वस्तुओ को सजाकर रस रहा है, मिकैडो के एक प्रिय कलाकार वश का चौदहमा व्यक्ति, है। उक्त परिवार वश परम्परा कार्य में नियुक्त है।" प्रसिद्ध जीव-वैज्ञानिक श्रीयुत जे० प्रार्थर टाम्सन महोदय ने पहा है कि वशानुक्रम-विज्ञान से सम्बन्ध रखनेवाली समस्याएं अन्य समस्त वैज्ञानिक समस्याओं में मनुष्य समाज के लिए सबसे अधिक महत्वपूर्ण हैं ।* सामाजिक प्रयोजन के अतिरिक्त विशुद्ध ज्ञान की दृष्टि से भी, हमें वशानुक्रम विज्ञान से बहुत ही चित्ताकर्षक बातों का पता चलेगा। जैसे कृत्रिम उपायों से सजी और फूलों तथा फलों के पौधों का अद्भुत विकास किया जा रहा है, वैसे ही प्राणियों में भी अपने इच्छानुसार नवीन प्रकार के जीवों की उत्पत्ति की चेष्टा Heredity in the Light of Recent Research by L Don caster pp 49 50 116 Darwin Modern p 101 , भति माधुनिक युग के भी बड़े-बड़े वैज्ञानिकों का मत इसके पक्ष में है। इसके विरुद्ध मी मुष भन्य रड़े-बड़े वैशनिक अपनी राय देते है इस विषय पर मागे चलकर विरतृत रूप से मालोचना दी जायगी। *Hered JA Thomson P I वंशानुक्रम विज्ञान लयों की व्यवस्था में छात्रों के गुण अवगुणो के प्रति दृष्टि रसना हमारे लिए परम पर्तव्य हो जाता है। इसी कारण सब प्रकार से विद्यार्जन करने का सयको समा। अधिकार नहीं है, सर भ्राह्मणों को भी नहीं। भारतवर्ष का यही प्राचीन निर्देश है। अर्थात् सत्र प्रकार के कार्यों के लिए अधिकारी का होना श्रावश्यक है। यही अधिकार भेद का रहस्य भारतीय सभ्यता की एक विशिष्टता है। जन्म ही हमे अधिकार प्रदान करता है। विवाह पद्धति के साथ जन्म का अविच्छेद्य सम्बन्ध है। भारतीय वर्णव्यवस्था में इसी लिए विवाह पद्धति पर नियन्त्रण का विशेष रूप से निर्देश है। इसी कारण प्रसिद्ध जर्मन दार्शनिक श्री कैजरलिग ने कहा है कि संसार में फिर प्राचीन भारतीय वर्ण व्यवस्था का आदर्श वल प्राप्त करेगा। यह बात भी सत्य है कि जाम से प्राप्त अधिकारों को विकमित फरने के लिए उपयुक्त शिक्षा और दीक्षा एवं अनुकूल वातावरण की परम आवश्यकता है। किंतु जन्म से यदि हम गुणों को माप्त नहीं करते हैं तो पारिवारिक वातावरण का प्रमान हमारे ऊपर अधिक नहीं पड़ समता। यदि स्वभाव से ही हमारी पृथ्वी पदार्थों को अपनी ओर न सोंचती होती, तो एक साधारण हथौड़ी का चलाना भी कठिन हो जाता। आजकल वैज्ञानिकों में इस प्रश्न पर तुमुल झगड़ा चल रहा है कि हमारे जीवन पर पारि पाश्चिक वातावरण का अधिक प्रभाव है अथवा जन्मगत गुणों का। कितु बडे से बड़े वैज्ञानिक भी इस घात को स्वीकार करत हैं कि वश परम्परा से हम बहुत कुछ गुण अवगुणों को प्राप्त करते हैं और पारिपाश्विक वातावरण की अपेक्षा उन गुणों का जीवन पर अधिक प्रभाव पड़ता है। इसके विपरीत दूसरे भी वैज्ञानिक हैं, • देसिए ,-बैंगला मासिक पत्र-साहित्य, वैशाख, बँगला सन् १३९९ बीराराभर राय का वशानुरूम पर एक लेख ।
यशानुक्रम-विज्ञान क्या है १५ जो यह समझते हैं कि वंशानुक्रम की अपेक्षा जीव पर पारिपार्श्विक वातावरण का अधिक प्रभाव पड़ता है। प्राच्य देशों में भी वश-मर्यादा के प्रति यथार्थ श्रद्धा दर्शाई गई है। इंगलैंड के प्रसिद्ध कवि श्री डल्यू० वी० ईट्स ने कनीन्द्र सीन्द्रनाथ की गीताजलि की भूमिका में एक सुन्दर दृष्टान्त का उल्लेस किया है,-"प्राच्य देशो में आप लोग यथार्थ में ही वश-मर्यादा को अपुरण रसना जानते हैं। उस दिन मुझे एक म्युजियम के क्यूरेटर (अध्यक्ष) ने एक कृष्णाङ्ग व्यक्ति को दिग्पलाकर यह कहा था कि वह व्यक्ति, जो चीन देश की प्रदर्शनीय वस्तुओं को सजाकर रस रहा है, मिकैडो के एक प्रिय कलाका वश का चौदहवाँ व्यक्ति, है। उक्त परिवार वश परम्परा से उसी कार्य में नियुक्त है।" प्रसिद्ध जीव-वैज्ञानिक श्रीयुत जे० आर्थर टाम्सन् महोदय ने कहा है कि वशानुक्रम विज्ञान से सम्बन्ध रखनेवाली समस्याएँ अन्य समस्त वैज्ञानिक समस्याओं में मनुष्य समाज के लिए सबसे "अधिक महत्त्वपूर्ण हैं ।* सामाजिक प्रयोजन के अतिरिक्त विशुद्ध ज्ञान की दृष्टि से भी, हमें वशानुक्रम विज्ञान से बहुत ही चित्ताकर्षक यातों का पता चलेगा। जैसे कृत्रिम उपायों से सजी और फूलों तथा फलों के पौधों का अद्भुत विकास किया जा रहा है, वैसे ही प्राणियों में भी अपने इच्छानुसार नवीन प्रकार के जीवों की उत्पत्ति की चेष्टा . Heredity in the Light of Recent Research by L Don caster pp 49 50 116 Darwin & Modern p 101, अति आधुनिक युग के मी बड़े-बड़े वैज्ञानिकों का मत इसके पक्ष में है। इसके विरुख भी कुछ अन्य बड़े बड़े वैज्ञानिक अपनी राय देते हैं, इस विषय पर आगे चलकर विस्तत रूप से मालोचना की जायगी। Huredity by J A Thomson P I वशानुक्रम-विज्ञान की जा रही है। चूहे श्रादि पर इसकी परीक्षा प्रारम्भ हो गई है और इस विषय में बहुन कुछ सफलता भी प्राप्त हुई है। वैज्ञानिकों का कथन है कि भविष्य में हम पेड़ पौधो की तरह मनुष्यों को भी हम अपनी इच्छा के अनुसार जम दे सकेंगे। यदि विशुद्ध ज्ञान की दृष्टि से विज्ञान की उन्नति नहीं होगी, तो निशान से हमे सामाजिक लाभ भी अधिक न हो सकेगा। दूसरा परिच्छेद हारविन, गैल्टन और मेन्डेल के आविष्कार डारग्नि-वीसवीं सदी के पहले तक विज्ञान के आधार पर वशानुक्रम का ज्ञान प्रतिष्ठित नहीं हो पाया था। इस बात को तो सभी जानते थे कि सन्तान पिता माता के सहश होती हैं, और एक ही पिता माता की स तान आपस मे देग्यने में एक दूसरी से बहुत कुछ मिलती-जुलती हैं। मनुष्य इस बात को मैक्डों वर्षों से जानता था कि क्टहल के पेड से श्राम नहीं फलता और केले का पेड लगाने से उससे लीची नहीं मिल सकती। मनुष्यों के बारे में भी ऐसा ही नियम लागू है, इस पारणा का भी मनुष्य अनादि काल से पोषण करता चला आया है। "मा को पूत पिता को घोड़ा, बहुत नहीं तो थोड़ा थोडा" यह कहावत उक्त धारणा की पुष्टि करती है। किन्तु वैज्ञानिक रीति से इसकी आलोचना अभी पिछले दिनों से ही प्रारम्भ हुई है। विज्ञान के इतिहास में एफ० जे० गॉल (१७५८-१८२८) नामा एक हास्टर ने, पहले तो वियना और वाद को पेरिस में, अपने परीक्षागारो मे स्नायु के सम्बन्ध मे अनुसन्धान करते समय, १७ हारविन, गैल्टन, मेन्डेल के श्राविकार वशानुक्रम के बारे में भी बहुत से तध्यो का आविष्कार किया था। गॉल के वशानुक्रम सम्बन्धी प्राविष्कार के कारण उन पर ईसाई समाज के पादरी अत्यन्त असतुष्ट हो गये थे। इसका कारण यह था कि ईसाइयों के धारणानुसार जम के समय शिशु संस्कारशून्य होकर ही जन्म लेता है, और वशानुक्रम विज्ञान के अनुसार यह संस्कार युक्त होकर जम ग्रहण करता है। अाधुनिक विकासवाद अथवा विपर्तनवाद की भी मूल धार- णाएँ हिन्दुओं में बहुत समय से प्रचलित है, किन्तु पाश्चात्य समाज में ही उसका वैज्ञानिक रूप प्रक्ट हुआ है। वशानुक्रम विज्ञान भी पहले पहल विकासवाद को ही शाखा के रूप में दिसाई दिया था। सैक्डों पशुपालक और बागानों ने इस बात को समझ लिया था कि बलिष्ठ सोंड के औरस से उत्कृष्ट गाय का जन्म होता है, और फूल तथा फल के पोधो से भी, नई नई शाग्माओं के निकलने से, नये प्रकार के फलो और फूलों के जन्म देनेवाले नवीन पौधों का श्राविर्भाव होता है 10 वैज्ञानिक विकासवाद के आविर्भाव के पूर्व ही दार्शनिक और चिन्तनशील लेसकों ने सर्वप्रथम विकासमाद के सिद्धान्त का प्रचार किया था, किन्तु सबसे पहले लामा और उसके बाद चार्ल्स डारग्नि, वालेस और हरबर्ट स्पेन्सर ने, वर्तमान युग मे वैज्ञानिक विकासवाद को जम दिया। इनमें से लामार्क की सोज और डार्जिन के "प्रॉरिजिन श्राफ स्पीसीज" के सोजपूर्ण तथ्यों के आधार पर वशानुक्रम विज्ञान का वैज्ञानिक आधार प्रतिष्ठित हुआ । वशानुनम को धारणा को छोडकर वैज्ञानिक विकासवाद टिक नहीं सकता। सबसे पहले लामा ने ही वशानुक्म के श्राधार . * देखिए --History of Serence, by wC D Dampier- Vlietl t1n Pp 274 291 १८ वंशानुम्म विज्ञान पर विकासवाद के एक युक्सिङ्गत सिद्धान्त का निर्माण किया था। लामा का जावनकाल ई० सन् १७४४ से २८२६ है और डारविन का जीवनकाल १८०६ से १८८२ है। डारनिन के पहले ही लामा निकासवाद के सम्बध गरेपणा प्रारम्भ कर दी थी। उन्होने १८३० में अपनी गवेपणानों का परिणाम प्रकाशित करा दिया था। डारविन ने इसके बाद ही विकासवाद के सम्बन्ध में अपनी गवेपणा प्रारम्भ की थी। उस गरेपणा के परिणाम में एक नवीन एर थतिव्यापक वैज्ञानिक सिद्धान्त का उद्भव हुआ था। इस सिद्धान्त का अंगरेजी नाम है 'थियरी श्राफ झोल्यूशन', अर्थात विकासवान । इम मिासनाद ने वैज्ञानिक क्षेत्र में जैसा युगान्तर उपस्थित किया था, उसका वैसा ही अद्भुत प्रभाव सामाजिक और धामिक क्षेत्रों में भी देखा गया था। विकामवाद के इन मूल सिद्धातों को लेकर श्राज भी नाना प्रकार की गवेपणाएँ हो रही हैं। नूतन का उभर कैसे होता है, इसकी वैज्ञानिक मीमांसा आज भी नहीं हो पाई है। सोवियट रूम में से भी एक वैज्ञानिक का आविर्भाव हुआ है, जिसने टारपिन के विकासवाद को स्वीकार नहीं किया है। इस पुस्तक मे विकासवाद के सिद्धान्त के सम्बन्ध में अधिक आलोचना न करते हुए हम केवल इतना ही कहना चाहते हैं कि विरासपाद के सिलसिले में ही यशानुक्रम विज्ञान की उत्पत्ति हुई। नूतन का आविर्भाव कैसे होता है, इस प्रश्न ने एक ओर जैसे वैज्ञानिकों के मन को घञ्चल किया है, वैसे ही जीव राज्य में विभेदी की भी कैसे सृष्टि हुई और उनमसरूप क्या है, इसके सम्बन्ध में आज तक वैज्ञानिकों की ग्याज समाप्त नहीं हुई है। नगीन और विभेदो पी सष्टि के प्रश्नों के साथ ही वशानुक्रम विज्ञान का सम्बन्ध है। वंशानुक्रम विज्ञान के सम्बन्ध में इतने वैज्ञानिक आविष्कार हो चुके हैं कि उन्हें विधिपूर्वक क्रम के अनुसार एकर करना टारपिन, गैन्टन, मेन्टेल पे प्राविकार १९ और उनके वालयों को ठीक-ठीक समग लेना थाज अत्यन्त फठिन यात हो गई है। हमें यह भी स्मरण रसना उचित है कि वैज्ञानिक क्षेत्र में किसी मिद्धान्त को हम अन्तिम निर्णय के रूप में नहीं प्रहण पर सरते। वशानुभम विज्ञान के सम्बन्ध में भी यही बात कही जा सकती है। तथापि इस विज्ञ की इतनी सनति हुई है कि यदि सामाजिक क्षेत्र में इसका उपयुक्त प्रयोग हो से समाज का प्रभूत कल्याण होगा। सर मनिमम् गैल्टन (१८२२-१९९१)-दारिन के पश्चात् उनके चचेरे भाई गैल्टन महोदय ने ही आधुनिक वशा. नुक्रम विज्ञान को जम दिया। टारविन के 'ओरिजिा आर पीसीज' नामक प्रय मे, माणियों के सम्बन्ध में जितनी वंशा- नुभम की यातें मिली, उन्हीं तथ्यों का प्रयोग गैल्टन ने मनुष्यों के मम्बन्ध में किया। विशेष विशेष परीक्षाओं में छात्रों ने जैसे जैसे नम्बर प्राप्त किये उनरी तुलना करके गैल्टन ने यह प्रमाणित किया कि जड़ पदार्थों की गति आदि, जैसे गणित शास्त्र के नियमा- धीन रहती हैं, उसी प्रशर मनुष्यों को मानसिक शक्ति का विकास भी, गणितशास्त्र के नियमों मे बँधा हुआ है। गैल्टन ने यह प्रमाणित कर दिखाया है कि अधिकांश मनुष्यों की मानसिक शक्ति की गिनती मध्यम श्रेणी में है। यदि इस मध्यम श्रेणी के एक व्यक्ति की मानसिक शक्ति के साथ उसी समाज के एक प्रतिभावान व्यक्ति की मानसिक शक्ति की तुलना की जाय तो यह देखने में आता है कि साधारण व्यक्ति और प्रतिभावान व्यकि के बीच मानसिक शक्ति का जितना व्यवधान है, और इनके बीच जैसे प्रमश उच्च से उच्चतर शक्ति का विकास देसने में आता है उसी प्रकार, यह भी देखने में आता है कि उसी समाज के एक निकृष्टवम व्यक्ति की तुलना, एक मध्यम श्रेणी में व्यक्ति की मानसिक शक्ति के साथ करने पर, इन दोनों में भी ठीक पहले घशानुनामावन्नान . हो जैसा व्यवधान है। इन दोनों श्रेणियों के घोच, मानसिक शक्ति का हाम भी ठीर पहत ही की तरह, धीरे धीरे मध्यम श्रेणी से निम्न श्रेणी में निम्न में निम्नतर होता जाता है। इस प्रकार श्रेणी- विभाजन के लिए गैन्टन ने प्रति दम ताल मनुष्यों के बीच में देशल ढाई सौ व्यक्तियों को छाँटकर उन्हें एक श्रेणी में टाल दिया था और उम श्रेणी क व्यक्ति का नाम 'एमिनेन्ट, अर्थात् 'शक्ति- मान्' मानन ररया था। इस प्रकार दम साय मनुष्या के बीच से एक विशिष्ट व्यक्ति को छाँटर उमा नाम निस्ट्रियम' अर्थात् प्रतिमावान मानव रकम था। इस प्रकार नामकरण के पश्चात् मनाने यह दिखाया है कि मूद-जड स्वभाव-विशिष्ट मनुष्य के साथ र श्रोर साधारण मनुष्य का जितना अन्तर है दूसरी ओर साधारण मनुष्य के माथ शक्तिमान मनुष्य का भी ठीक उतना ही अन्तर है। प्रामाणिक पुस्तकों पानि की महायता मे प्रसिद्ध व्यक्तियों के जीवनचरित्रा को पढ़कर गैन्टन ने यह दिग्पाया है कि साधारण व्यक्तियों के निकट श्रात्मीय जनों में नितनशक्तिमान व्यक्ति मिन सकते हैं उनकी अपेक्षा शक्तिमान् व्यचियों के श्रात्मीय जनों में बहुत अधिक प्रतिभावान व्यकि मिलत हैं। उन्होंने यह भी दिखाया है कि एक माधारण श्रेणी के व्यक्ति के पुत्र को अपेक्षा एक शक्तिमान व्यक्ति के पुत्र का प्रतिभागान व्यक्ति होना पाँच मौ गुना अधिक है। उन्होंन पशानुनम के सम्बन्ध में तीन पुस्तकें लिखी हैं। उनके दृष्टान्त का अनुसरण करके दूमरे वैज्ञानिकों ने वशानुक्रम के मम्यध में वढी-बड़ी महत्त्वपूर्ण खोजें की हैं, और आज यशानुनम विज्ञान नाना रूप से पल्लवित होकर फल देने की अवस्था में या पहुँचा है। गैन्टन के मा नियमा की आलोचना यहाँ सम्भव नहीं है। यहाँ पर उनके केवल दो नियमों का उल्लेख फर देना बारश्यक है। उनका एक नियम वो यह है कि सन्तान, अपने माता पिता से, इनके श्राधे श्राधे गुणों को प्राप्त करती हैं, मम्मा २१ डारविन, गैल्टन, मेन्डेल के आविष्कार बार अपने माता पिता के माता पिताओं से भी, वे उनके एक चौथाई गुण प्राप्त करती हैं। इसी भाँति वे उनके भी माता पिताओं से, उनके पाठ हिस्से गुण को प्राप्त करती हैं। इसी प्रकार गेल्टन के मतानुसार एक व्यक्ति अपने समाज फा अविच्छिन्न अङ्ग धना है। उनका दूसरा नियम यह है, यदि क्सिी समाज को उच्च, मध्यम और निम्न श्रेणी के व्यक्तियों के हिसाब से विभाजित किया जाय, तो उच श्रेणी की सन्तान मध्यम श्रेणी के व्यक्ति के समीपवर्ती होकर जन्म लेती है, और निम्न भेणी के व्यक्तियों को सन्तान भी मध्यम श्रेणी की निकटवर्ती होकर जन्म लेती हैं। दृष्टान्त के तौर पर लम्बे पिता-माता की सन्तान, उनसे छोटे कद की होगी, किन्तु मध्यम श्रेणी से ऊँची होगी। इमी प्रकार नाटे पिता-माता की सन्तान अपने पिता-माता से तो ऊँची होंगी, किन्तु मध्यम श्रेणी के व्यक्तियों से छोटी होगी। जिस समाज में अनियमित विवाह पद्धति का प्रचलन है, उस समाज में हा ये नियम अधिक लागू है। ग्रेगर जोहन मेन्डेल-इस बात को सभी ने देखा होगा कि एक ही पिता माता की सन्तान देखने मे, अनेकाश में, अपन पिता-माता के सदृश ही होती हैं। किन्तु पिता-माता और उनकी सन्तानों में जैसे एक सादृश्य है, वैसे उनकी आकृति और प्रकृतियो मे भिन्नता भी कम नहीं है। एक ही पिता माता की प्रत्येक सन्तान देसने मे ठीक एक सी नहीं होती है। पिता-माता और उनकी सन्तानो के बीच कुल समानता और कुछ असमानता भी रहती है। कोई सन्तान प्राकृति और प्रकृति मे हू-बहू पिता माता के अनुरूप नहीं होती। माता पिता और सन्तानी में स्तिनी समता और असमता है एव एक ही माता पिता की सन्तानो में भी परस्पर क्तिना मादृश्य है और कितना नहीं, इन सबका अनुसन्धान करना ही वशानुक्रम - २२ पशानुक्रम-विज्ञान विज्ञान का लक्ष्य है। गैल्टन को गरेपणा के परिणाम में हमें इस बात का ज्ञान प्राप्त नहीं हुआ था कि पंश परम्परा के क्रम से, सन्तान माता पिता के गुणों और अवगुणों की अधिकारी को वनती है। आस्ट्रिया के एक सन्यासी, प्रेगर जोहन मेडेल (Gregor Joha Mendel १८२२-१८८४) महोदय न इस विषय पर पौधों को लेकर बहुत परीक्षाएँ का था। नाको ८ साल की परीक्षाओं के परिणाम में घहुत से वैज्ञानिक तथ्यों का आविष्कार हुश्रा है, और उन श्राविष्कारों के आधार पर वशानु मम का ज्ञान यथार्थ विज्ञान के रूप में प्रतिष्ठित हो पाया है। जिस समय डारविन अपनी गोज में लगे थे और जिस समय उन्हाने १८६५ में अपनी एक क्तिान प्रकाशित फा थी, उसी समय मेन्डेल महोदय भी अपने आश्रम में पौधों के वश के सम्बध में परीताएँ पर रहे थे। उन्हान परीक्षाओं का फल एक स्थानीय वैज्ञानिक समिति के पत्र में प्रकाशित किया था, परन्तु करीम चालीस साल तक इनका पता ससार के दूसरे बड़े-बड़े वैज्ञानिका को न था। सन् १९०० मे एगो डी० घाइज, कारन्स और शेरमैक न मेन्डेल के आविष्कार को संसार के सम्मुग्न उपस्थित क्यिा! निलियम वैटेशन आदि दूसरे वैज्ञानिको को परीक्षाओं से मेन्डेल के श्राविकार की पुष्टि हुई। मेन्टेल का आविष्कार--थोडे शब्दों मे मे डेल के प्राविष्कार 11 का वर्णन इस प्रकार क्यिा जा सकता है-मेडेल ने बड़े और छोटे मटर के पौधों को लेकर परीक्षा प्रारम्भ की। जब केवल एक प्रकार के मटर को अलग धोया गया तो उससे क्षेवल एक ही प्रकार के मटर पैदा हुए। किन्तु जर दोनों प्रकार के 'मटर एक साथ लगाये गये, तो उनमें से केवल बड़े प्रकार के मटर के पौधे निकले, छोटे प्रकार के गायब हो गये। परन्तु जब पुन इस नये बडे मटर को लगाया गया, तो देखा गया कि उनमें एक । डारनिन, गैल्टन, मेन्डेल के श्रानिष्कार चौथाई छोटे मटर निकल आये और तीन चौथाई बडे प्रकार के मटर निकले। ये एक चौथाई छोटे मटर के पौधे अलग लगाये गये तो उनमें से सन छोटे ही मटर निकले, बडा मटर एक भी न निकला। उधर तीन चौथाई जो नये प्रकार के बड़े मटर निक्ले थे उन्हें अलग लगाया गया तो उनमे से फिर कुछ छोटे और कुछ बडे मटर के पौधे निकले। इस प्रकार यह देखा गया कि सबसे पहलेपाले बडे मदर के पौधे लगाने से उनमें से केवल पड़े के ही पौधे निकलते हैं और छोटेवाले से छोटे के, परन्तु इन दोनों प्रकार के पौधो मे संयोग होने पर, पहली पीढी में, एक प्रकार का पौधा गायन हो जाता है। अब इस पहली पीढी के बडे मटर से छोटे बडे दोनो प्रकार के पोधे निकलते हैं। किन्तु पहले प्रकार के वडे मटर से केवल एक ही प्रकार के बड़े मटर निक्ले थे। इन विभिन्न प्रकार के पौधों की उत्पत्ति की सरयाएँ पृष्ठ २४ पर चित्र में समझाई गई हैं। उस चित्र से पाठको यो पता चल जायगा कि मिश्रण होने के पश्चात्, पहली पीढी में, छोटे मटर गायब हो जाते हैं और केवल एक ही प्रकार के बडे मटर उगते हैं। परन्तु इस पहली पीढी के मटर के बीज मे टोटे पौधे के बीज छिपे हुए हैं। इस छिपी हुई सत्ता को अँगरेजी मे Recessive Character कहते हैं और उसके बडेपन को अँगरेजी में Dominant Character कहते हैं। हम हिन्दी में इन दोनों लक्षणों को क्रमश "सुप्त" और "व्यक्त" लक्षण कह सकते हैं। पहली पीढी के बडे मटर मे हम 'ध्यक्त लक्षण घडेपन और 'सुप्त' लक्षण छोटेपन को एकत्र पाते हैं। यह मिश्र वंश कहलायेगा। इस मिश्र वश के पौधों के श्रापस के सयोग से, जो दूसरी पीढी उत्पन्न होगी, उसमें एक चौथाई तो बड़े मटर निकलेंगे और एक चौथाई छोटे मटर। इन दोनों प्रकार के छोटे २
बड़ा मटर x छोटा मटर
बडा मटर
छोटा
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--
सर्व छोटे
सब बड़े
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य.
यशानुभम विज्ञान
है
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डारविन, गैल्टन, मेन्डेल के आविष्कार २५ और घडे मटरो को यदि अलग अलग धोया जाय तो इनमें से शुद्ध छोटे और बड़े प्रकार के मटर के पौधे हमेशा निकलते रहेंगे। इन दोनों वशों को शुद्ध वश कह सकते हैं। इस दूसरी पीढी में एक चौथाई घड़े और एक चौथाई छोटे मटरों के वंशों को छोडकर याकी दो चौथाई अर्थात् प्राधे पौधे देसने मे तो बड़े प्रकार के होग, परन्तु ये पौधे मित्र वश के होगे और इनके प्रापस के सयोग से फिर एक चौथाई पड़े और एक चौथाई छोटे शुद्ध वश के पौधे निकलेंगे। धानो बाधे पुन मिश्र वंश के होगे। इस नियम को मेन्डेल का नियम कहा जाता है। इसके अतिरिक्त दूसरे दृष्टान्त भी मिलते हैं, जैसे एक ही जाति के सफेद और लाल फूलों में सयोग होने से पहले गुलामी फूल उत्पन्न होगा और इस मिश्र-गुलायी फूल के आपस के संयोग से मेन्डेलियन नियमानुसार पुन सफेद, लाल और गुलाबो फूल उत्पन्न होते रहेंगे। एक तासरा दृष्टान्त इस प्रकार है-काले और मुलायम लोमनाले गिनी पिग* से सफेद और कडे लोमवाले गिनी पिग फा सयोग होने से, पहली पीढी में, काले तया कडे बालवाले गिनी पिग उत्पन्न होते हैं और इन पहली पीढीवालों में परस्पर मयोग होने से नौ काले तथा फड़े लोमवाले, तीन काले और नरम लोमनाले, तीन सफेद और बड़े लोमवाले एव एक सफेद नरम लोमनाला गिनी पिग उत्पन्न होता है। इस दृष्टान्त में कुछ नयीन प्रकार के गिनी पिग उत्पन्न हुए, परन्तु ये देखने में ही नवीन हैं, यथार्थ में नहीं । इनमें केवल पहले फे, अलग-अलग गुणो के, विभिन्न सम्मिश्रण मान हैं। वश-वृद्धि के ये सन दृष्टान्त मेन्डेल के नियमानुसार ही होते हैं। इन दृष्टान्तो से हमें यह जान पड़ता है कि जीव के विभिन्न गुण अलग अलग रूप से सन्तान में दिखाई पड़ते हैं। इन अलग अलग गुणो को अँगरेजी मे 'मेन्डेलियन * Guinea Pig=चूहा जातीय एक जातु। ।
२६ वशानुनमनवजान फैक्टर्स' कहत हैं। इहें हिन्दी में "गुण", "लक्षण" अथवा "उपकरण" कह सकते हैं। पौधी अथवा जीवों के ये "गुण' ( factors ) स्वतन्त्र रूप से क्रियाशील रहते हैं। सम्मिश्रण हाने पर भी ये लुमन होकर वश परम्परा में क्रियाशील रहते हैं। वशानुक्रम विज्ञान में इस बात का अत्यन्त महत्त्व है। इन फैस्टर्म (तषणों) के विभिन रूप से मिश्रित होने पर अलग-अलग जागो की उत्पत्ति होती है। विभिन्न गुणयुक्त स्त्री और पुस्प के सयोग स उनके विभिन्न स्टर्स" के नाना प्रकार के सम्मिश्रण होते हैं। मन फैक्टर्स की सख्या जितनी अधिक होगी, उनका सम्मिश्रण भी उतना ही जटिल होगा। इस जटिलता का एक उदाहरण यह है कि देखने में तो एक जीन गोरा है, किन्तु उसका यह गोरापन कइ एक गुणों ( Factors) के सम्मिलित होने का परिणाम है। इसी प्रकार एक दूसरे जीव का गोरापन दूसरे गुणों के मिश्रित हाने से उत्पन हुआ है। जब ऐसे दो जीवों का सयोग होगा तर उनकी मन्तान गोरी नहीं भी हो साती है। गोरेपन के अतिरिक्त दुसरे गुणो के सम्बध में भी यही नियम लागू है। यह तत्त्व कितना महत्व रखता है, इसका पता एक दूसरे दृष्टान्त से चलेगा। एक प्रकार का गेहूँ है, जिसमें शांघ कीड़े नहीं लगते। एक दूसरे प्रकार के गेहूँ म भी वही गुण है परन्तु वह भिन्न 'फैक्टस' क सम्मिश्रण से बना है। किन्तु इन दो प्रकार के गेहूँ के सम्मिभण से जिनन प्रकार के गेहूँ उत्पन होते हैं उनमे से एक ऐसे प्रकार का भी गेहूँ होता है, जिसमे बहुत शीन कीडे लग जाते हैं। मेन्डेन के नियमानुसार फैक्टर्स के विभिन्न प्रकार के सम्मिश्रण हाने के कारण सप्त' (Recessive) और 'व्यक्त' (Dominant) लक्षणों के रहने से, ऐसे विचित्र वशों की उत्पत्ति होती है। * देखिए- Human Heredity by Baur Lenz-Pp4547515561 1 Fisclier and डारविन, गैल्टन, मेन्डेल के आविष्कार ये नियम, पौधो और जन्तुओं की तरह, मनुष्यों को भी बहुत कुछ लागू है। मनुष्यों में क्तिने ऐसे 'गुण' (फैक्टर्स) हैं जो वशनों में प्रस्ट होते हैं, इसका पूरा पता अभी तक प्राप्त नहीं है, किन्तु इनकी सख्या बहुत अधिक है। इसके उपरान्त 'मुम' ( Recessive) और 'व्यक्त' ( Dominant) लक्षणो के रहने के कारण वशानुस्म की प्रक्रियाएँ अत्यन्त जटिल बन गई हैं। कभी तो 'सुन' ( Recessive) या 'व्यक्त' ( Dominant) लक्षण केरल वी अथवा केवल पुरुप वशज मे ही प्रकट होता है, अथवा कुछ फैस्टर्स कहाँ-कहीं संयुक्त रूप से ही प्रकटित होते हैं, स्वतन्त्र रूप से नहीं, एव कभी कभी ऐसा भी होता है कि दो फैक्टर्स एकत्र प्रस्ट नहीं होते। ऐसा देखा गया है कि पिता का रोग न तो पुन और न पुत्री में किन्तु पुत्री के सन्तानो में जाकर प्रकट हुश्रा । (इसे अंगरेजी मे Sex-linked characters or factors कहते हैं।) मेन्डेल के नियमो को छोडकर दूसरे प्रकार से भी वशानुक्रम हुश्रा करता है, परन्तु उसके नियमों का अभी तक विशेष पता नहीं चला है। किन्तु किन प्रक्रियाओं से माता पिता के गुण-अवगुण सन्तान में उत्पन्न होते हैं, इसका यथेष्ट ज्ञान प्राप्त हो चुका है। मेन्डेल का आविष्कार श्रोर कृषि आदि को उन्नति- मेडेल के नियमानुसार वशानुक्रम विज्ञान के प्रयोग से यूरोप, अमेरिका और जापान में गृह पालित पशुओं और पेड पौधों की अद्भुत उनति हो रही है। हमारे देश मे प्राय एक ही प्रकार के छोटे-छोटे आलू उत्पन्न होते हैं। अधिक से अधिक कुछ अपेक्षाकृत बडे नैनीताली बालू भी हमें देखने को मिल जाते हैं किन्तु जापान और अमेरिका श्रादि देशो में इतने धडे-बडे आलू उत्पन्न किये गये हैं कि एक एक बालू तौल में डेढ़ डेद पाव से २८ वशानुभम विज्ञान भी अधिक होते हैं, कुम्हडे एक-एक मन तर फे हुए हैं। उन देशों में कोई ऐसी सजी नहीं है, कोई ऐमा फल नहीं है, अथवा अण्डा, मुर्गी, दुम्या, यकरी आदि ऐसा कोई पालतू पशु या पक्षी नहीं है जिसको मेन्टेलियन आदि रीतियो के अनुसार प्रभूत उन्नति न की गई हो। गृहपालित पशु और सेती के यारे में तो वंशानुक्रम-विज्ञान का यूगेप आदि देशों में अच्छा प्रयोग होने लगा है, किन्तु मनुष्य-समाज के सम्बन्ध में अभी तक इस विज्ञान का प्रयोग नहीं के घरापर हुआ है। तथापि श्राज पाश्चात्य देशों में और जापान में, यडी-घडी वैज्ञानिक समितियाँ बनी हैं जिनका कार्य वशानुक्रम विज्ञान के अनुमार समाज का पुनस्सङ्गठन करना है। फितु भारतवर्ष में भाज भी इस निपय पर गम्भीर रूप से विचार तक प्रारम्भ नहीं हुआ है। मेन्डेलियन रीति के अनुसार फैसे पौधो की उन्नति की जाती है, इसके कुछ दृष्टात यहाँ दिये जाते हैं। सेम के पौधे को ले लीजिए। जर इन पौधों को अच्छी सेना की जाती है, जल-वायु अनुकूा होती है एव साद का अच्छा प्रयोग होता है, तर पौधों की अच्छी उन्नति होती है। किन्तु इन पौधों से जो सेम उत्पन्न होती हैं ये सय एक सी नहीं होती। उनमे छोटी बडी सर प्रकार की होती हैं। मेमों में से बडी-बडी सेमों के बीज को यदि अलग कर लिया जाय तो यह देखा गया है कि इन बडी सेमो के बीजो से जो नये पौधे निम्लेंगे, उनमे से भी पहले की तरह छोटी-बडी सेमे उत्पन्न होती हैं, केवल बडी सेमें नहीं उत्पन्न होता । और यदि केवल छोटी सेमो के वीज भी अलग लगाये जायें तो उनमें से भी ठीक पहले की तरह छोटी-बड़ी मेमें उत्पन्न होती हैं। अर्थात् केरल छंटाई से पौधा की अधिक उन्नति नहीं हो सकती।
टारविन, गैल्टन, मेन्टेन के आविफार २९ एक दूसरा दृशान्त लीजिए। इंगलैंड में जो गेहूँ उत्पन्न होता है उसकी नस्ल अच्छी नहीं होती, किन्तु उसी पैदावार अच्छी होती है। इसके विपरीत अमेरिका में जो गे उत्पन्न होता है वह इंगलैंड के गेहूँ से अच्छा होता है, किन्तु अमेरिका के गेहूँ की पैदावार इंगलैंड के गेहूँ से कम होती है। धीन (Biffen) नामक एक वैज्ञानिक ने एक ननीन प्रकार का गेहूँ उत्पन्न करना चाहा, जिसमें उपज तो अमेरिका के गेहूँ से अधिक हो किन्तु गुरण में वह इंगलैंड के गेहूँ से अच्छा, अमेरिका के गेहूँ की तरह हो। बोफेन ( Biffen) ने यह देगा कि अमेरिका के गेहूँ का जो अन्धापन है वह मेन्डेल की भाषा में डामिनेन्ट अर्थात् 'व्यक्त' गुण-युक्त है। जर उन्होंने अँगरेजी और अमेरिका के गेहुओ का संयोग कराया तो उनमें से सब अमेरिका की तरह अच्छे गेहूँ उत्पन्न हुए और इसके बाद की पीढ़ी में मेन्डेल के नियमानुसार एक और तीन के अनुपात में अच्छे और बुरे दोनों प्रकार के गें, उत्पन्न हुए। फिर. इनमे से निर्वाचन फरते करते एक नवीन प्रकार का गेहूँ उत्पन्न हुआ, जिसकी पैदावार तो इंगलैंड के गेहूँ की तरह हुई किन्तु गुण में यह अमेरिका के गेहूँ की तरह हुआ। इसके बाद भी परीक्षाएँ होती रही, और आजकल उनके परिणाम मे इंगलैण्ड के गेहूँ को प्रभूत उन्नति हुई है। गेहूँ के अच्छे होने को यह भी एक पहचान है कि उसमे कीडे जल्टी न लगे और वह अय किसी प्रकार से रोग-प्रस्त न हो जाय। इंगलैंड का गेहूँ जल्दी रोग प्रस्त हो जाता था, कितु रूस का एक प्रकार का घुटका नाम का गेहूँ इस विषय में बहुत अच्छा है। इसमें जल्दी रोग नही पकडता है। घोफेन ने अंगरेजी गेहूँ के साथ रूस के इस घुटका नाम के गेहूँ का सयोग कराया। फिर पूर्वोक्त प्रकार से निर्वाचन के । वंशानुक्रम विज्ञान शराब भी बनती है, शिल्प में व्यवहार-योग्य स्पिरिट भी बनती है और इसके अतिरिक्त इससे दुसरे पदार्थ भी बनते हैं। मुके पेड से कागज तथा नाली रेशम आदि भी बनते हैं। इन सत्र कारणों से अमेरिका में मुद्दों के बारे में भी बहुत सी परीक्षाएँ हुई हैं और उसमें वहाँ पर बहुत कुछ उन्नति की गई है। सेोपियट रूस में गेहूँ के बारे में ऐसी उन्नति की गई है कि यहाँ पर जाड़े को पसल गर्मियों में और गर्मी की क्सल जाडों में उत्पन्न की जा सस्ती है। उस देश में जंगलों में एक प्रकार का पौदा होता है, जिससे रबर निकलती है। रूस के वैज्ञानिको ने उस जगली पौधे को अपनी इच्छा के अनुसार लगाया है, और उमसे अच्छा रबर उत्पन किया है। सन् '३९ के मार्च महीने में मास्को मे इन वैज्ञानिकों का एक सम्मेलन हुआ था। उस सम्मेलन में उपर्युक्त याता पर बहुत प्रकाश डाला गया था । तीसरा परिच्छेद वंशानुक्रम की प्रक्रियाएँ जीव की उत्पत्ति हमारे उपनिषद् के एक महावाक्य से संसार आज भली भाँति परिचित हो गया है-एकोऽहं बहु स्याम् । एक से ही यहुत हुआ है। एक सरिक-से बीज से, क्तिना निशाल वट वृक्ष उत्पन्न हो जाता है। एक मे ही समस्त विचित्रताण परिस्फुट होती हैं। समता से विषमता में, अव्यक्त से व्यक्त में जाने का ही नाम सृष्टि है। यह परिदृश्यमान जगत् कितना वैचित्र्यपूर्ण है, किन्तु इसमा विकास एक यस्तु से ही हुआ है। इस कारण इस ससार मे सहस्रो विचिनताओं के बीच कुछ सादृश्य को कई गुना बढ़ाकर, दिसाया जा सस्ता है। उस समय उमकी आकृति मनुष्य से भी बढ़ जाती है और सर उम कोप के अन्तर्गत नाना प्रसार के अङ्ग-प्रत्यग के विचित्र सचालनों को हम सष्ट देख सकते है। मनुष्य के वीर्य की एक चूद में दस करोड कोप है। दन्त-मनन के एक छोटे रोबर है। अब पाठक अनुमान कर सकते ६का कितने अचार से अभ मरया बनते हैं। होते हैं। इहों पोपा के समूह जीव कोप से ही जीव की उत्पत्ति-जीव दो प्रकार के --एक जिसमे केवल एक ही कोप रहता है और दूसरा जीर की पत्ति कोष सही होती जिसमें बहुत कोष रहते हैं। भारे मे पैज्ञानिक गण कहाँ अधिक जाते हैं। होते हैं- यशानुकाम की प्रक्रियाएँ ३३ भी दृष्टिगोचर होता है। इन विषमताओं में साटश्य को देखना ही ज्ञान विज्ञान का कार्य है। जीव विज्ञान से बाज यह पता चला है कि एक ही प्राणवस्तु विशिष्ट क्षुद्र कोप से समस्त प्राणिजगत् पी सृष्टि हुई है। समार म सरसे क्षुद्र प्राणों में एक ही कोप रहता है। मलेरिया, हैजा, प्लेग प्राति के रोग जिन जीवाणुओं से उत्पन्न होत ह उह वैक्टीरिया कहते हैं। सभवत जीव-ससार में इनसे छोटे जीयां का अस्तित्व नहीं है। एक ही फोप से इनकी देह धनती है ऐसे भी जीव हैं, जिनकी दह अनेक कोपों के सम्मिलन से धनती है। इन कोपों से विस्मयार वस्तु समार में शायद दुसरी कोई न हो। प्राणशक्ति की एक द की जीव-कोप कह सकते हैं कोष एक जीवन्त वस्तु है। मनुष्य-देह में कोटि-कोटि कोप वर्तमान हैं। मनुष्यन्नेह के कोषको सिनेमा के चित्रपट पर, उसकी प्रकृति में जितना वीर्य था सपना है. परकीयापी मका अस और गेम इन व्यक्तिगत कोषों की अपेक्षा कोपों के समूब ३४ -यह एक अत्यन्त वंशानुक्रम विज्ञान संसार में प्रथम जीव की उत्पत्ति कैसे हुई है, कैसे इस जड़ जगत् में सबसे पहले प्राणशक्ति का स्फुरण हुश्रा है- गूद, रहस्यपूर्ण एवं जटिल वैज्ञानिक प्रश्न है। यह आधुनिक विज्ञान का एक विशेप अनुसन्धान का विषय है। हम यहाँ पर केवल इतना ही कह देना पर्याप्त सममने हैं कि प्राधुनिक विज्ञान के अनुसार, प्राण से ही प्राण को उत्पत्ति होती है-ऐसा माना जाता है। और इस प्राणशक्ति का अन्तिम रूप जीवित जोर कोप में ही प्राप्त होता है। कभी तो एक कोप विशिष्ट जीव द्विसण्डित होकर दूसरा जीव बनता है और भी बहु गोपरिशिष्ट जीव से केवल एक ही कोप निकलकर उससे दूसरा जीन उत्पन्न होता है। कभी-कभी यहु-मोप-विशिष्ट जीव-देह से कोपो का समूह अथवा उसका । एक विशेष अङ्ग देह से अलग हो जाता है और उससे नवीन जीव की उत्पत्ति होती है। इसके अतिरिक्त कभी एक ही देह से दो कोप निरनते हैं और इन दोनों कोपों के सम्मेलन से एक नवीन जीव की उत्पत्ति होती है। और कभी कभी दो जीयो से एक एक कोप निकलकर सम्मिलित होते हैं और उससे एक नवीन जीव का जन्म होता है। अत मे कही गई इस रीति म ही मैथुन के परिणाम में जीव की उत्पत्ति होती है। दूसरी रीतियों में विना मैथुन के ही जोव की उत्पत्ति हो मस्ती है। जीव वैज्ञानिकगण कहते हैं कि जैसे और स्थानो में वैसे ही प्राणि जगत् में भी प्रारभेद अर्थात् श्रेणीभेद का करना प्राय असम्भव है। विभिन्न प्रोणियों एक दूसरी से इनने,घनिष्ट रूप से सम्बन्धित है कि एक श्रेणी को दूसरी श्रेणी से अलग करना अत्यन्त कठिन कार्य है, तथापि विषय को समझने के लिए श्रेणी निभाजन की विशेष प्रावश्यक्ता होती है। एफ-कोप विशिष्ट जीर की चंश-वृद्धि तीन प्रकार से हो सस्ती है-(१) एक कोप के दो टुकड़े हो जाते हैं और इस प्रार वंशानुक्रम की प्रक्रियाएँ ३५ एक जीव के स्थान पर दो जीन उत्पन्न हो जाते है। इस प्रकार पिता की देह से दो देहो की उत्पत्ति होती है, और पिता के अस्तित्व का अवसान हो जाता है। जीन उत्पत्ति की इस रीति को अगरेजी में फिशन (Fission) कहते हैं। (२) पिता की देह पर एक नवीन देह उगती है और फिर वह नवीन उद्गत देह पित-नेह से अलग हो जाती है। इस दुमर्ग रोति मे पितृ देह का अवसान नहीं होता। जीव उत्पत्ति की इस रीति को अँगरेजी भाषा में वडिङ्ग ( Budding ) कहते हैं। इस गति में भी एक कोप के ही दो टुकडे हो जाने का दृष्टान्त मौजूद है। (३) एक कोष सेही बहु कोपों की उत्पत्ति होने को स्पॉर यू लेशन (Sporulation) कहते हैं। इस रीति का एक और विशेप रूप भी दृधिगोचर होता है। जर पितृ देह पर एक कोप निकलकर वह उसम अलग नहीं हो जाता और पितृ-देह पर रहते हुए ही वह काप अपना नवीन जीवन प्रारम्भ करता है तब उस विचित्र जीव की कॉलोनी (Colony ) कहते हैं। इन रीतियों में निना मैथुन के ही नवीन जीव की मृष्टि होती है, किन्तु इस नियम का अपवाद दसा जाता है। नहु कोप विशिष्ट जीन की वशद्धि प्रधानत दो प्रकार से होती है-(१) देह का निभाजित हो जाना:-कभी तो केवल एक कोप पितृ-देह से निकलकर एक अलग जीव बनता है, और कभी बहुकोष, सामूहिक रूप से पितृ-देह मे अलग हो जाते हैं। इन कोपों के मामूहिक रूप से ही देह के अङ्ग प्रत्यङ्ग आदि बनते हैं इसका अर्थ यह हुआ कि पितृ-देह का एक श्रङ्ग, देह से अलग होकर, स्वतन जोर धन जाता है । इस रीति में भी मैथुन की क्रिया दृष्टिगोचर नहीं होती। (२) इस दूसरी रीति मे मैथुन के परिणाम मे ही जीव को उत्पत्ति होती है। मैथुन को रीतियो में भी बहुत ही रहस्यपूर्ण वातै पाई जाती हैं। एक तो वह रीति है, वंशानुनम विज्ञान । जन पुरुप का वीर्य स्त्री के अण्ड में प्रविष्ट होता है। ये पुरप और स्त्री स्वतंत्र रूप से जीवन बिताते हैं। ऐसा भी देखा गया है कि एक ही प्राणी में पुरुप का वीर्य और स्त्री का एड दोनों उत्पन होते हैं। पौधों में और निम्नस्तर के जीनों में ऐसे दृष्टान्त प्राप्त होते हैं। कभी कभी ऐसा भी देखा गया है कि पुरुष के वीर्य के साथ सयुक्त न होकर भी स्त्री के अण्डे से ही जीव की उत्पत्ति होती है। इमे अंगरेजी में पार्थेनोजेनेसिस् ( Parthenogenesis) कहते हैं। सबसे सरल आकार विशिष्ट जीव और पौधों में केवल एक ही कोप के अस्तित्व का प्रमाण मिलता है। किन्तु ऐसी भी वस्तुएँ हैं जिन्हें न पौधा ही कहा जा सकता है और न जतु ही। इन वस्तुओं को अंगरेजी में प्रोदिस्टा ( Protista) कहते हैं। ऐसा अनुमान किया जाता है कि प्रोटिस्टा से ही उद्भिज और प्राणियों की उत्पत्ति हुई है, अर्थात् प्राणी और उद्भिजों में मीमा रेखा का सींचना सम्भव नहीं। फोप का विभाजन और उसका परिणाम-कोप के विकास की एक सीमा है। उस सीमा तक पहुँचने पर कोप दो टुकडा में विभाजित हो जाता है। ये कोप के दो टुकडे फिर अपनी पूर्णता को प्राप्त कर लेते हैं। इस प्रकार एक-कोप विशिष्ट जीव से दूसरे जीव की उत्पत्ति होती है। यह दूसरा जीन अपने पिता के पूर्ण अनुरूप होता है। एक कोष के दो टुकडे हो जाने की गति भी बहुत ही रहस्यपूर्ण है। एक कोप के दो टुकडे होते समय उस कोप के अन्तर्गत समस्त वस्तुएँ भी ठीक-ठीक दो हिस्सों में विभाजित हो जाती हैं। फिर वे आधी आधी वस्तुएँ पूर्णता को प्राप्त कर लेती हैं। कोप के अदर शहद जैसा एक अर्ध-तरल पदार्थ प्राप्त होता है। इसे अंगरेजी में प्रोटोप्लाज्म ( Protoplasm) - - कहेंगे। वंशानुक्रम की प्रक्रिया कहते हैं। शहद सदृश इस पदार्थ में एक और अण्डाकार पदार्थ भासमान रहता है। इस भासमान अण्डाकार पदार्थ को उस कोप की "नाभि कह सकते हैं। इसे अंगरेजी में न्यूझ्यिस (Nucleus) कहते हैं। इस नाभि के अन्दर एक प्रकार के और पदार्थ प्राम होते हैं, जो सूत्र के सदृश होते हैं। 'नामि' के अन्दर ये जाल के समान एक दूसरे से लिपट फैले रहते हैं। इन पदार्थों को अंगरेजी में क्रोमोसोमस् ( Ohromo somes ) कहते हैं। इस सूत्र-सदृश पदार्थ को हम हिन्दी वशसून नाभि के अन्दर ये वश-सून (Chromosomes) पानी सदृश एक तरल पदार्थ में भासमान रहते हैं। कोप के विभाजन को अंगरेजी मे मॉइटासिस् ( Mitosis) कहते हैं। इस विभाजन के कई एक स्तर है। यास्तव में कोप का विभाजन तल की धार सटश अविच्छिन्न एव एक परिपूर्ण क्रिया है। किन्तु समझने की सुविधा के लिए इस क्रिया को विभिन्न स्तरों में टालकर हम इस क्रिया को पूर्ण रीति से समझने की चेष्टा करते हैं । इसकी प्रथम स्थिति को अगरेजी में रेस्टिग फेज़ ( Resting Phase) कहते हैं और हिदी में हम इसे साधारण स्थिति कह सकते हैं। इस साधारण स्थिति में न्यूक्लियस अर्थात् नाभि के अन्दर की वस्तुओं को हम ठोक ठीक देख नहीं पाते। इसके अन्दर जो लम्बे और सूक्ष्म सून सदृश पदार्थ रहते हैं वे इस प्रकार एक दूसरे में लिपटे रहते हैं कि उन सूनों को अलग-अलग देखना असम्भव सा है। जिस तरल पदार्थ में ये सून भासमान रहते हैं, उसमें ये मानों कोप की साधारण स्थिति में घुले रहते हैं। जब इस कोष में कोई रन डाला जाता है, तर यह देसने मे आया है कि न्यूक्लियस अर्थात् 'मि' के स्थान पर अधिक रङ्ग एकत्र होता है। फिर जव क्सिी ऐसिड से शानुकम-विज्ञान इस रज का साफ कर दिया जाता है तम फोप का और मन स्थान तो साफ हो जाता है, किन्तु 'नामि' अथवा न्यूलियस क स्थान में कुछ रन रह हो जाता है। मामि' और कोप में स्थित शहद सदश अर्ध-तरल पदार्थ के घर एक सूक्ष्म पर्श रहता है। यह पर्दा और इसके अन्तर्गत नामि' के अन्दर स्थित पानी से तरल पदार्थ म रद्ध नहीं टिकता। किन्तु इस पानी सदृश पदार्थ मे, तैरते हुए, अपेक्षाश्त एक कठिन पार्थ और इसके अतिरिक्त सून-सदृश पुत्र और पदार्थ है। हा सर पदार्थों में ही रङ्ग ठीक ठीक जमता है। ऐसिड क दन पर भी यह रङ्ग जाता नहीं। इन सूत्र-सदृश पदाथा का कोमैटिन (Chromatin) कहते हैं और नाभि के यीच क कठिन पदार्थ को यूक्लिश्रोलसू ( Neucleolus ) कहते हैं। सर कोषों में न्यूस्लिमोलस नहीं रहते हैं। इस नाम के बाहर एक और पदार्थ रहता है जिमका अँगरेजी नाम सेन्ट्रॉमाम (Centrosome) है। सेन्ट्रॉसोम भी सब कोपो म नहीं रहत । इन सब पदार्थों के अतिरिक्त कोप में और भी पदार्थ रहते हैं, जिनका पूरा वर्णन यहाँ पर नहीं दिया जा सकता। रेस्टिङ्ग फेज अर्थात् साधारण स्थिति क याद कोप विभाजन की दूसरी स्थिति का अंगरेजी मे प्राफेज ( Prophase) कहते हैं। हम अँगरेजी नाम इसलिए द रहे हैं कि इससे पाठकों को पाद म इस विषय पर बड़ी पुस्तक पढ़ने में सुविधा होगी। इन सर नामो और इनकी क्रियात्रा से परिचित हो जाने से पाठक को विषय के समझने में बहुत आसानी होगी। इस द्वितीय स्थिति मे कॉमोसोम अथात् यश सून स्पष्ट दिखाई देने लगते हैं और तब यह प्रतीत होता है कि ये बॉमोसोम अर्थात वश-सूत्र जोड़े जोड़े में हैं। इस एक एक जोड़े के एक-एक हिस्से को फ्रोमैटिड्स (Chromatids) कहते हैं। द्वितीय स्थिति में ये वश-सून वंशानुम्म फी प्रक्रियाएं ३९ सङ्कीर्ण होने लगते हैं। छोटे होते-होते ये अपने पीसमें हिस्से तक लम्बाई में छोटे हो जाते हैं। इम दूसरी स्थिति में एक-एक जोड़ा मोमोमोम अर्थात् यश-सूर अलग अलग रहते हैं और उनके दोनो भाग एक दूसरे में लिपटे दिसाई देते हैं। इस दूसरी स्थिति में ये झोमोसोम अर्थात् वश-सून फुएटलापार रहते हैं। एक कॉमोसोम के दोनो भाग कैसे एक दूसरे से युक्त रहते हैं, अभी तक इसका रहस्योट्पाटन नहीं हो पाया है। कोई अदृश्य शक्ति फ्रॉमोसोम के दोनो भागों को एक दूसरे के साथ संयुक्त रखती है। कॉमोसोम अर्थात् वंश सून के दोनों भाग एक दूसरे के बिलकुल अनुरूप होते हैं। कोप विभाजन की दूमरी स्थिति में 'नाभि के पाहर स्थित सेन्ट्रॉसोम भी दो भागों में विभाजित हो जाता है, और ये दोनों भाग एक दूसरे से कुछ दूरी पर खिसक जाते हैं। कोप विभाजन की तृतीय स्थिति में मॉमोसोम और भी छोटे और मोटे हो जाते हैं और इस बीच मे सेन्ट्रॉसोम के दोनो भाग 'नामि' के दोनों तरफ ठीक एक दूसरे के मुकाबले में आ जाते हैं। 'नाभि क इन दोनों स्थानो को, जहाँ पर सेन्ट्रासाम के दोनो भाग एक दूमरे के मुकाबले में श्रा जाते हैं, पोल्म ( Poles ) यहते हैं। इस मुहूर्त में 'नाभि और कोष के अन्दर के राव सदृश अर्ध-तरल पदार्थ के घीच का पर्दा लुप्त हो जाता है, तब क्रॉमोसोम कोप के अदर उस अर्ध तरल पदार्थ में भासमान रहने लगता है। इन सब परिवर्तनों के साथ-साथ कोप के अन्दर स्थित दूसरे पदार्थों में भी परिवर्तन होते रहते हैं। पाठक याद रक्सेंगे कि इस तीसरी स्थिति में सेन्ट्रॉसोम दो भागों में विभाजित होकर, एक दूसरे के मुकाबले में, नाभि' के दोनो ओर आ जाते हैं। इन दोनो पालों में स्थित सेन्ट्रॉमोम के बीच के पदार्थ इस तरह से सज जाते हैं, मानों किसी छोटी सी लकड़ी के टुकडे मे सूत लपेटने से बीच मे फूल आया हो। ये पदार्थ उस समय रेशे जैसे दिखलाई पड़ते वंशानुक्रम विज्ञान हैं। इन दोनों पोनों के बीचोपीच के स्थान को इवेटर (Equator ) कहते हैं। कोप विभाजन की हतीय स्थिति मे मामाम अर्थान् पश-सूत्र इक्वेटर के पास चले आते हैं। इस तृतीय स्थिति को अंगरेजो में मेटाफेन ( Meta phase) कहते हैं। कोप के विभाजन को चतुर्थ स्थिति को अनोफेच ( Ana phase) कहते हैं। इस स्थिति में एक जोड़ा क्रॉमासाम के दोनों भाग, जो कि एक दूसरे के अनुरूप होते हैं, दोनों पोलों का ओर चलने लगते हैं। इस प्रकार प्रत्येक पोल में एक-एक जोडा मोमासाम के श्राधे-आधे भाग एकत्र हो जाते हैं। अर्थात् दोनों पालों में स्थित से हॉमोम के प्राधे आधे टुकडे एक एक नाभि अर्थात् न्यूछियस् को तरह बन जाते हैं, और उन 'नाभियो' में एक जोडा प्रोमोसोम के आधे पाये क्रॉमोसोम आ जाने से एक कोप दो कोषों में परिणत होने लगता है। कोप विभाजन की पाँची स्थिति को टेलोफेज (Telophase) कहते हैं। काप विभाजन को यह अतिम स्थिति है। इस स्थिति में 'नाभि' और कोप के अन्दर स्थित अर्ध-तरल पदार्थ के बीच फिर एक सूक्ष्म पर्दा धनना है, और श्राधे आधे प्रॉमासाम फिर अपनी पूर्णता को प्राप्त कर लते हैं। यह अन्तिम स्थिति, कोप की पहली स्थिति की तरह, साधारण स्थिति में परिणत हो जाती है। एक जोडा क्रोमोसोम का एक हिस्सा फिर कैसे जोडा बन जाता है, इसमें वैज्ञानिकों में मतभेद है। किसी किसी का कहना है कि एक जोडे का आधा हिस्सा प्रॉमामाम कोप में स्थित पदायों से ही अपना जोडा घना लेता है, और किसी किसी का यह अनुमान है कि हिस्सा प्रोमोसोम लम्बाई में दो टुकडे में हो जाता है, और फिर ये टुकड़े अपनी पूर्णता को प्राम पर लेते हैं। प्रकार एक कोष, द्विसण्डित होकर, दो कोपों में परिणत हो जाता है। -
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४२ वंशानुनम विज्ञान ३–(क) और (य)-कोष की तीसरी स्थिति-Metaphase। इस स्थिति में 'वश-सून' (Chromosomes) इक्वेटर (Equator ) में आ गये हैं। ४ (स) NE -(क) और (स)-पोप की चौथी स्थिति--Ana phase । इस स्थिति में द्विसण्डित सेन्ट्रोसोम (Centrosome) की दोना ओर मॉमोसोम ( Chromosomes ) एफनित हो रही है।
1 वशानुक्रम की प्रक्रियाए ५.(क) GO 00 - ५-(क) और (स)-कोप निभाजन की पांचवी स्थिति- न्युठियस के, केन्द्रबिन्दु, नाभि के चारो ओर पर्दा बन रहा है एव दो अलग कोप वन रहे हैं। ६-अतिम स्थिति --एक कोप से दो कोप बन गये हैं। इसी प्रकार, एक कोप विशिष्ट जीन का वशद्धि एन बहु कोप- विशिष्ट जीवन्देह की उत्पत्ति तथा उसका विकास एक कोप के द्विसण्डित होने पर और फिर उसकी पूर्ण परिणति होजाने पर ही हुआ करता है। मनुष्य का जन्म किस प्रकार होता है-हम पहले ही बता चुके हैं कि ऐसे बहुत से प्राणी हैं जिनका जन्म बिना मैथुन के ही हुआ करता है। किन्तु मनुष्य का जन्म मैथुन से ही होता है। पुस्प देह नि मृत शुक्र के माथ स्त्री देह स्थित अण्ड के सम्मिश्रित होने पर ही सन्तान की उत्पत्ति होती है। पुरुष का शुक्र और स्त्री का अण्टकोप विशेष प्रकार के जीव-कोप हैं। जीन देह से जीव देह की उत्पत्ति नहीं होती। जीव-देह 'असत्य कोप हैं। ये जीव-वस्तु से पूर्ण हैं, जीवन्त हैं, किन्तु इन कोपों से जीव की उत्पत्ति नहीं होती। पुरुष के वीर्य में अथवा वंशानुनम विज्ञान स्त्री के अएटकोप में जो कोप वर्तमान हैं, उन्हें अंगरेजी में जर्म सेल्स ( Germcells) अथवा ग्यों मेट (Gamete) कहते हैं। हिन्दी में हम उन्हें वीज-कोप कहेंगे। पुरुप या शुक्र अर्थात् वीज कोष जन स्त्री के डिम्बकोप अथवा डियाणु (Orum) में प्रविष्ट होता है तभी जीव का जन्म होता है। हिन्दुओं के वैद्यक अन्य "भाव प्राश" में अवश्य यह कहा गया है कि पुम्प के संसर्ग से रहित होकर भी स्त्री जीव को जाम दे सकती है। निम श्रेणी के जीवों में यह बात पाई गई है, किन्तु मनुष्य क बारे में इसका कोई दृष्टान्त हम उपल ध नहीं है, यद्यपि ऐसा कहा गया है कि हजरत ईसा का तथा श्रीरामकृष्णदेव का जन्म पुरुप संसर्ग से नहीं हुआ था। साधारणतया एक समय में एक ही पुश्रीजकोष स्त्री के डिम्याणु में प्रवेश कर सकता है। पुरुप के शुक्र में झोटि कोटि बीज कोप रहते हैं। इनमें से केवल एक ही बीज-कोप स्त्री के डिम्बाणु में, अर्थान् स्त्री बीज-कोप में, प्रवेश कर पाता है। एक पुं वीज- कोप के, स्त्री के एक डिम्बकोष में प्रविष्ट हो जाने पर डिम्बकोप का बाहरी पर्दा इतना पठिन हो जाता है कि फिर उसमे दूसरा पुं बीज-कोप प्रवेश नहीं कर पाता। सभव है, पुंघीज-कोपों में यह प्रतिद्वन्द्रिता हो कि कौन बीज-कोप सबसे पहले स्त्री के अण्ड कोप में प्रविष्ट होगा। ऐसा भी अनुमान होता है कि स्त्री का अगटकोप भी पुरुप के वीज कोप को अपनी ओर आकर्पित करता है। पुरुष के कोटि कोटि बीज-कोप स्त्री के अण्डकोप के चारों और तैरते रहते हैं। एक समय अण्डकोप का एक अंश कुछ स्फीत हो उठता है और उसमें केवल एक ही पु योज-कोप प्रवेश कर पाता है। लक्ष वोटि पु-बीज कोपो की आपस की प्रतियोगिता में केवल एक ही पुधीज-कोप सफलता को प्राप्त करता है, बाकी सन यही अण्डकोप के चारों ओर तैरते-तैरते क्निष्ट हो जाते हैं। इस प्रकार जीव से ही जीव की उत्पत्ति होती है। किन्तु पिता अथवा वंशानुनम की प्रक्रियाएँ माता का एक मिन्दु भी रक संतान को प्राप्त नहीं होता-काज कोप से ही भ्रूण की उत्पत्ति होती है और एक भ्रूण फोप से ही जीर की पूरी देह बनती है। किन्तु यीज-योप पूर्ण देह को धनापर भी स्वय पूर्ववत् देह से भिन और परिपूर्ण रहता है। हमारे शाम्रा में कहा गया है-पूर्णस्य पूर्णमादाय पूणमेवावशिप्यते । बीज कोप इसका जीवन्त दृष्टात है। एक चीज कोप से वश- परम्परागत अन त पुरुषों का जन्म होता रहता है, किन्तु वह योज- कोप फिर भी पूर्यवत् हो बना रहता है । जीन उत्पत्ति से पढकर दूसरी कोई आश्चर्यजनर घटना इस संसार में नहीं हो सकती। जैसे एक मशाल से दूसरी मशाल मे अग्नि प्रज्वलित का जा सकती है, उसी प्रकार एक ही प्राणविन्दु मे अनात जीनों का जन्म होता रहता है। स्त्री का अण्डकोप अथवा अण्टाणु पुरुष के बीज-कोप से बहुत बड़ा होता है। जन पुरुप-वीज-कोप की 'नाभि' अर्थात् न्यूक्लियस स्त्री अण्डाणु की नाभि से युक्त होती है, तय भ्रूण- कोप का जम होता है। इस भ्रूण-कोप को अंगरेजी में जाइगोट (Zygot ) कहते हैं। यही जी का जन्म है। एक भ्रूण कोप द्विसएिटत होकर दो कोपो में परिणत होता है। इस प्रकार दो मे चार और धार से चार हजार और चार हजार से कोटि-कोटि कोपो की सृष्टि होती है। किसी कोप-समूह से त्वचा बनती है, किसी से हड्डी और क्सिी से चक्षु । इस प्रकार स्त्री और पुरुष के एक एक कोप के मिलने से एक नवीन कोप की उत्पत्ति होती है और इस एक नवीन कोप से जीव की परिपूर्ण देह एव बीज कोष बनते हैं । क्रॉमोसोम और जेनि-प्रत्येक जीव कोप में एक एक के द्र- निन्दु अथवा 'नामि' रहती है। इन केन्द्र पिन्दुओ मे, अर्थात् नाभियों में, कुछ सूत्राकार पदार्थ रहते हैं। कोप के विभाजित होने के पूर्व ये सूत्र स्पष्ट दिसाई नहीं देते। कोप के तरल पदार्थ में ये घुले से रहते हैं। इस घुली हुई अवस्था मे इन्हे क्रोमैटिन 1 ४६ वंशानुनम-विज्ञान मस्तक मध्यरथान का केन्द्रबिन्दु লুবি আঁধাঁ । प्रैटोसारम् भात शहदमा भर तरल पण मम्मेष भाव अंगरेजी में मेग्नेय पूंछ पुरुष के बीय में पेने अणु प्रमाण कीट रहत है, यही नाका भएतागु । यहा की या पुरुष के बीज-बाप है बीज छोप है (१) पुरुष के बोन-दोष से पूँछ अलग हा गई है। पुरुष रावीय भथात् चीन कोष स्त्रीचे अण्डागु अथात् बीन कोष में प्रविष्ट हो रहा है। पुरुप योर-पोपवीना द्रवित होने लगी है सेद्रोसोम विभाजित है लगा है (५) पुरुष और स्त्रीबीज कोष जीना पुरुष और स्त्रीमि क्रोमोसोम निबाईने
वंशानुगम पो प्रक्रिया
प्रोमोसोममा विभागा
भागाभारा
(E)
एकोप मदोगनी उत्पधि
बम रथात परम्पीक
भरटागु रन
गरायुयानी जिम '
भ्रम
हवा और पया माँ के पेट में पर
परिरापागा
इस स्थान पर मी
श्री जर वासुमती अपार राम्बला
होती ६ तर उसरा भागणु
जरायु को और पलता है
योगदार मे पुरुष वीजचोप
जरायु के भीतर से श्री भण्डागु
वी भर जाता है
४८ चशानुनम विज्ञान कहते हैं। और कोप के विभाजित होते समय जब ये स्पष्ट दिसाई देने लगते हैं, तर इन्हे कॉमोसोम कहते हैं। इन कॉमोसामों में और भी सूक्ष्म पदार्थ हैं, जिन्हें अगरेजी में जेनि (Gene) कहते हैं। बहुसंख्यक जेनियों के माला सदृश एक सूत्र में गुंथे रहने से मानो एक एक क्रोमोसोम बना है। ये सब बातें पहले ही यता दा गई हैं। इन सब बातों को ध्यान में रसते हुए श्रन हमें आगे वढना होगा। प्रत्येक जाति के जीव-कोपों में, एक ही प्रकार के एर एक ही सरया में, यश-सून (Chromosome) जोडे जोडे में रहते हैं। मनुष्य-मान के जीव-कोपो में प्रति श्रवस्था में, चौबीस जोडे अर्थात् ४८ वंश सून रहते हैं। एक प्रकार की मम्सी में केनल चार जोडे ही रहते हैं, और किसी क्सिी जीव में ८०० जोडे अर्थात १६०० मॉमोसाम पाये गये हैं। एक जोडे कॉमोसाम का एक एक भाग उसके दूसरे भाग के बिलकुल अनुरूप होता है। इस अनुरूपता को अंगरेजी मे होमोलोगस् (Homolo gous) कहते हैं। जब कोप का विभाजन होता है, तब एक एक मोमोमोम लम्बाई में दो-दो टुकड़ों में विभाजित हो जाता है। इन टुकडो को अंगरेजी में क्रोमैटिड्स् ( Chromatids) कहते हैं। साधारण जीन कोप का इसी भाँति संगठन होता है। किन्तु बीज-कोप का सङ्गठन कुछ और प्रकार का होता है। बीज-कोप में प्रॉमोसोम जोडे जोडे में नहीं रहते हैं। जैसे मनुष्य की देह के कोप में चौगीस जोड़े अर्थात् ४८ कॉमोसोम हैं, किन्तु मनुष्य के वीज-कोप में ये २४ क्रॉमोसोम, जोडे-जोडे में न रहकर, हर एक जोडे का एक एक कॉमोसोम, अलग अलग रूप में रहता है। इस कारण जन स्त्री और पुरुष के बीज-कोप सम्मिलित होते हैं, तब स्त्री बीज-कोप से २४, एव पुरुष बीज कोप से २४ मॉमोसोम, सम्मिलित होते हैं, और तर भ्रूण कोप म, २४ जाडे अर्थात् ४८ कॉमोसोम पन जाते हैं। देह के साधारण कोप में जितने मॉमोसोम शानुक्रम की प्रक्रियाएं । . लक्षण के लिए अलगातार ४९ रहते हैं, उन्हे अँगरेजी में डिप्लॉयड ( Diploid ) कहते हैं। और धीज कोप के ( Gametes) क्रॉमोसोम को हैप्नायड (Haplord ) कहते हैं। अर्थात् जर देह के साधारण कोप में कॉमोसोम (वश-सूत्र) जोडे-जोडे में रहते हैं, तब ये टिप्लोगड़ कहलाते हैं, और जन वे वीज कोप में (Germcells अथवा Gametes ) जोडे में न रहकर केवल एक-एक के रूप में रहते हैं, तय हैप्लायड् कहलाते हैं। इस प्रकार मातृ और पितृोपा से प्लॉयड मोमोसोम मिलकर डिप्लॉयड् प्रॉमोसोम बन जाते हैं इस प्रकार भ्रूण-कोष अर्थात् जाईगाट में स्त्री और पुरुष के समान- समान घश-सूने और उनके साथ साथ उनके गुण भी चले आते हैं। अर्थान् यश-सून मे, क्रोमोसोम्स में जो जेनि रहते हैं, उन्हीं के आधार पर माता पिता के गुण श्रगुण सन्तान में चल पाते हैं। इन गुणों को फैक्स ( Factors) कहते हैं। अर्थात. 'जेनि' और 'फैक्टस' समान पदार्थ हैं। 'जेनि' या "यश लक्षण-चीज"-प्रयेक 'वश-सूर' में यह से दाने होते हैं, यही दाने पूर्वजों के गुण-अवगुणो को दाहों ले पाते हैं। ऐसा अनुमान किया जाता है कि कान एक-एक गुण अवगुण का वाहक है। इन्हीं दानों मे जेनि ( Gene ) कहते हैं, हिन्दी में हम इन्हें न सकते हैं। इन्हीं 'जेनि' मे ही वंशगत तहण अन्तर एक एक जेनि एक-एक लक्षण अथवा स्ट पु एव स्त्री, दोनों के बीज कोपों मे ही, जेनि में है। दोनों धीज कोपों के प्रत्येक शत्र में उक्त जेनि के सस्थान भी एक मेदीन: वश मूत्र में जो जेनि जिस म्यार वही जेनि ठीक उसी स्थान पर है। - वैशानुमाम विज्ञान शिता से सन्तान में आ जाता है। वंशानाम विजान में यह एक अनोसी बात है। जीव की देह समम रूप से एक परिपूर्ण यस्तु है। "समें एक श्रङ्ग का प्रभाव दूसरे अङ्ग पर पड़ता है। इस कारण यह सममना कि केवल मॉमोसोम अर्थात् वंश-सून अथवा जेनि ही वश लनणों का एकमान वाहक है सोश में एवं सपावस्था में सत्य नहीं है। किसी भी एक श्रेणी के प्राणों की देह में एक ही प्रकार के कोप होते है, और उन कोपों में मॉमासाम अर्थात् वंश-सूर की संख्याएँ भी एक ही होती हैं। कॉमोसोम तो दृष्टिगोचर होते हैं, किन्तु उनमें जो जेनि रहते हैं, वे अभी तक दृष्टिगोचर नहीं हो पाये हैं। घशानुक्रमविज्ञान के एक घुर पर पएिटत अमेरिका निवासी श्रीयुत टी० एच० मॉर्गन महोदय ने इस विषय में गोज की है। उनकी खोज से यह ज्ञात हुआ है कि मॉमोसाम में जेनि रहते हैं। ये जेनि वंश लक्षण के बाहर प्रमाणित हुए हैं। मौन सा जेनि किस गुण का वाहक है, इसका पूरा पता तो नहीं चला है, लेकिन बहुत कुछ पता चल गया है। धैज्ञानिकों ने प्राज तक किसी भी जेनि को न तो स्वतन्त्र रूप में देख पाया है और •देखिर --Scientibe Monthly-February 1936 Pages 9 to 110 'Leukemic cells arose from lenketnic cells and only from leukemic cells the leglenic cells are direct lineal ate cendants from the spontaneous case in which they originated the change that rendered certain cells Brokemic 18 inherited by their degendants indefinitely 1f genes i ere the only means of genetic transin ission, we woald think that this inherited change in Folbed genes bot reciprocal crosses have shown that some non chromo omal mechanism is also indicatad वंशानुक्रम की प्रक्रियाएँ । न उसके रासायनिक स्वरूप को ही समझ पाया है। उनकी यह दृढ धारणा हो गई है कि दही के जामा की तरह जेनि की भी क्रिया होती है। यह स्वयं परिवर्तित न होकर जीन-देह में अद्भुत परिवर्तन ला सकता है। बहुत से आधुनिक वैज्ञानिमें के मनानुसार जेनि हो जीवन का सूक्ष्मतम बिन्दु अथवा अणु है। विज्ञान के क्षेत्र में हमें दो प्रकार की यातें मिलती हैं, एक तो वास्तविक घटना, जिन्हें हम सध्य कह सकते हैं, दूसरी वास्तविक घटनाओं के आधार पर वैज्ञानिकगणों द्वारा निर्मित सिद्धान्त । विभिन्न घटनाओं को एक सूत्र में प्रधित करना सिद्वान्त का कार्य है। जब पुन नगीन घटनाओं, तथ्यों के आविष्कार से एक नवीन जटिलता की सष्टि होती है, तय सिद्धान्तों में भी परिवर्तन की प्रावश्यकता हो जाती है। वंशानन म-विज्ञान में 'जेनि' का स्थान वास्तविक घटना अथवा तय की अपेक्षा सिद्धान्त के पर्याययुक्त होना अधिक उपयुक्त प्रतीत होता है। क्रोमोसोम के बारे में यह बात नहीं कही जा सकती। 'जेनि' के सम्बन्ध में कितनी ही जटिलवाएँ दृष्टिगोचर होती हैं, इसका कुछ परिचय यहाँ दिया जाता है। परीक्षाओं के परिणाम में यह देखा गया है कि एक ही जेनि के प्रभाव से फई एक विशेष गुणो की उत्पत्ति होती है और कई एक जेनि के सामूहिक प्रभाव से केवल एक ही गुण को विकसित होते हुए देखा गया है। इस प्रकार केवल एक-एक जेनि अथवा फैक्टर से एक एक गुण का स्फुरण नहीं होता है। किसी एक व्यक्ति में जितने फैक्टर्स, जेनि अथवा वश-लक्षण-श्रीज हे, वे एक दूसरे पर प्रभाव डालते रहते हैं। इस कार्य को अंगरेजी में जेनि कॉम्प्लेक्स (Gene- Complex) कहते हैं। जेनि कॉम्लेक्स को किया पारिपाश्विक वातावरण पर बहुत कुछ निर्भर करती है। । ।
वंशानुनम विज्ञान १९३९ के मार्च महीने में मास्को में जो वैज्ञानिकों का सम्मेलन हुआ था, उसमे ऐसे मण्डे लगे हुए थे, जिनमें यह लिसा था- "डार्विन के मएडे के नीचे" ("Under the banner of Darwin")! सोरियट रूस के वैज्ञानिकगण इस प्रभार मेन्टेन की हँसी उड़ाते हैं,-एक पाप ओर तीन माँ की वरह अथना एक माँ और तीन बाप की तरह। राजनीतिक उत्तेजना की तरह वैज्ञानिक पियो में भी सोवियट रूस में वैज्ञानिकों में भी मेन्डेल और मॉर्गन के विरुद्ध विपम उत्तेजना फैली हुई है। वहाँ के बहुत से नवीन वैज्ञानिक विश्वविद्यालयों से मेन्डेल, मोर्गन आदि का बहिष्कार करना चाहते हैं।* लिंकेज तथा कपलिंग की प्रप्रियाएँ-मॉमोसोम अर्थात् वश-सून तथा जेनि अर्थात् वश लक्षण चीज श्रादि के सम्बन्ध में मे डेल के नियम को ध्यान में रसन से यशानुक्रम के ज्ञान के सम्बन्ध की यहुत सी बातों को समझना सरल हो जाता है। गोरी माता और काले पिता से स तानों के रन मे होंगे, ससार में दी मनुष्य क्यों हू-बद एक प्रकार के नहा होत हे, रोग कैसे वशजों में उत्पन हो सकते हैं, लिग भेद की उपत्ति कैसे होती है, इत्यादि विषयों को समझना र सरल हो जायगा। वशना में परिवर्तन के तीन कारण हो सक्त है-(१) एक ही प्रकार के वंश-लक्षण-वीज के रहत हुए भी दा व्यक्तियों में पारि- पाश्चिक वातावरण के कारण बहुत से परिवर्तन दिखाई दे सकते है। (२) मैथुन के कारण माता पिता से विभिन्न लक्षणयुक्त बीजों के उत्तराधिकारी होने के कारण वशजों में नाना प्रकार के परिवर्तन निमाई देते हैं। वशसून (Chromosome) अथवा वश लक्षण श्रीज ( Gene) के विभिन मार से सम्मिभिन होने के •देखिए-Journal of Heredits April 1940 वंशानुग्म की प्रक्रियाएं पारण ये विभिनताएँ उत्पन्न होती हैं। (३) कभी कभी वश लक्षण-धीज (Gene ) में हो कुछ अज्ञात कारणों से परिवर्तन आ जाते है । तर पीज कोपमे परिवर्तन हो जाने के कारण जीय. फोप में परिवर्तन हो जाता है। इस प्रकार एक नवीन जाति की उत्पत्ति हो जाती है। इन परिवर्तनों के अंगरेजी नाम कम से ये हैं-(१) मॉडोक्केिशनम ( Modifications or paravariations ), (२) कॉम्बिनेशन्स (Combinations or mixovariations ), (3) FYÈTIA ( Mutations or idiovariations )! मनुष्यों पर वशानुक्रम की परीक्षाएँ सम्भव नहीं हैं, इस कारण पौधो तथा निन्न श्रेणी के कीट पतगों पर ही परीक्षाएँ हुई हैं। मनुष्यों की एक पीढ़ी के गुजरने में औसतन् ३० साल लगत हे। वशानुक्रम को समझने के लिए वोस-बीस, चालीस चालीस पीढियों तक की परीक्षाओं की आवश्यकता होती है, इस कारण तथा मनुष्यो मे अपने इच्छानुसार पुरुषा और स्त्रियों में सयोग कराना सम्भव नहीं है, इस कारण भी वशानुक्रम क सम्बन्ध में मनुष्यो पर परीक्षा सम्भा नहीं है। ऐसी स्थिति में एक प्रकार के फलो पर की मक्खिया को लेकर अमेरिका के प्रसिद्ध वैज्ञानिक टी० एच० मॉर्गन महोदय ने लाखों परीक्षाएँ की हैं। इन मक्सियों का वैज्ञानिक नाम डॉसोफीला (Drosophila) है। इन्हे पालना बहुत सरल काम है। थोड़े समय मे इनके बहुत से बच्चे पैदा होते हैं। इनरी एक-एक पाढा पन्द्रह दिन में समाप्त हो जाती है। डॉसोफोला मेलानोगस्टार (Droso phila Melanogaster) नामक मस्खियों की एक लाख पीढियो का इतिहास मार्गन महोदय ने सग्रह किया है। इनके वशजो में चार सौ प्रकार के मौलिक परिवर्तन अर्थात् म्यूटेशन (Mutations) पाये गये हैं। इन मक्सिया में चार श्रेणियों के फैक्टर्स अथवा में वंशानुरूम-विज्ञान जेनि है और इनके कोपा में चार जोडे कॉमोसोम अथवा पासूत्र रहते हैं। ड्रॉसोफीला मिरलिस नामक उसी मस्त्री कोइ और जावि में जोडे कॉमोसोम पाये गये हैं और दसा ही एक तीसरी जाति डोसोफीला अपस्मयुरा में पाँच जोडे फ्रॉमासान पाये गये हैं। इनमे जितन जोडे कॉमोसोम हैं, उतने हा चश-लक्षण योज के समूह मी अर्थात् जेनि के समूह भी प्रकार होंगे। अर्थात् जातियों की विभिनता क्रोमोसोम के जोड़ों का सस्याओं के भेद पर निर्भर है। चार बार की सहसा प्रकार के परीक्षाओं के परिणाम में यह जान पड़ा है कि प्राणियों मे दया मनुष्यों में भी जितनी विभिन्नताएँ दिखाई देती हैं, उनके मूल सबसे बडा कारण शत-शव प्रकार के वश-लनण-योज अर्थात् हरे डिटरी फैक्टर्स अथवा जेनियों के विभिन्न प्रकार के सम्मिश्रण हा हैं। इस सम्मिभरण-जनित भेद के साथ मौलिक भेद अर्थान म्यूटेशन का बहुत बड़ा अन्वर है। इसके पूर्व हमने यह सममाया है कि कैसे एक कोप द्विसपिटत हो जाता है और उससे दो कोप बन जाते हैं। दो कोपा के बनते समय उनके वस-सूत्र भी कैसे विभाजिव होते हैं, इसे भी हमने सममा दिया है। इसके सम्बन्ध में यहाँ पर कुछ और नवीन चातें बताई जा रही हैं। किसी भी जीव में जितने चारिरिक लदाण दिमाई देते हैं, उनके साय उन जीवो के मोमोसोमों का, अर्थात् वश-सूनों का एक अविच्छेद्य सम्बन्ध है। जैसे, जिस जाति के जीव मे पाँच जोडे ग्रामोसोम रहते हैं, उस जाति के जीन में चार श्रेणी के चारित्रिक लक्षण पाये जायेंगे। किन्तु मेन्डेल के सिद्धान्ना- नुमार जीव में जितने फैक्टर्स का होना अर्थात् चारितिक लक्षणों का होना सम्भव है, उसमें स्तने जोड़े कॉमोसीमस् नहीं पाये जाते। इस प्रकार और भी बहुत-सी बातों के कारण वैज्ञानि ने इस बात का अनुमान किया है कि कॉमोसोम के भी क्षुद्रातिशुद्र वशानुक्रम की प्रक्रियाएँ एक श्रश हैं जो कि माला के दानों की तरह एकत्र गुथे हुए रहते हैं। इही बुद्रातिशुद्र अशा को जेनि ( Gene ) कहा गया है। +कोप के दो कोपों में विभाजित होते समय मॉमोसोम अपने क्षुद्रातिशुद्र अशों में टुकड़े टुकडे होकर विसर नहीं जाते, वरन् मॉमोसोम अर्थात् वश सून के जेनि अर्थात् वश-लक्षण-धीज सामूहिक । रूप में सम्मिलित होते हैं। इस सामूहिक रूप से मग्मिश्रित - होने को अंगरेजी में कपलिग (Coupling) अथना लिकेज ( Linkage) कहते हैं। जिन क्रियाओं से ऐसा होता है उन्हे अंगरेजी मे सिगल क्रासिंग प्रोवर (Single Crossing Over), टरल क्रासिङ्ग श्रोवर ( Double Crossing Over ) श्रादि कहते हैं। क्रोमोसोम के विभाजित होते समय जेनियों के सामूहिक रूप में सम्मिलित होने के कारण, माता पिता और उनकी सन्तानो में कुछ समता और कुछ विपमता दोनों चातें आ जाती हैं। इस कासिङ्ग ओवर की प्रक्रिया के पारण कुछ वश-लक्षण एकत्रित रूप से विकसित होते हैं। जैसे गोरे रङ्ग के साथ त्वचा का भी सूक्ष्म होना प्राय देसा गया है। डासोफीला में मार्गन महोदय की परीक्षाओं के परिणाम में कई सौ चारितिक लक्षण ( Mendelising Hereditary Factors) पाये गये हैं, जिनमें पार प्रकार के कपलिङ्ग के दृष्टान्त पाये जाते हैं। हॉमोफीला के बीज कोष में केवल चार मॉमोसोम है। जिस समय भ्रूण कोप से जीव कोप और बीज-कोपों की उत्पत्ति होती है, उसी समय लिंकेज और पपलिङ्ग थादि की प्रक्रिया भी होती जाती हैं। इस लिकेज के कारण ही कमी-कभी ऐसा भी होता रसा गया है कि कोई कोई रोग तो केवल पुरुप मे ही दिखाई दते हैं और कोई कोई केवल स्त्री में। इसके अतिरिक्त ऐसा भी होता है कि माता पिता के कुछ रोग तडकी द्वारा ही वशजो में " नहींइसका भी उल्लेख पहले ही कर ।
- ६० यशानुक्रम-विज्ञान दिया गया है। ऐसा होने का कारण लियज की प्रक्रिया में ही निहित है। हिमोफीनिया एक ऐमा रोग है, जिसमे एक बार देह के किसी म्यान के क्ट जाने पर रक्त का प्रवाह क्सिी प्रसार भी बन्द नहीं होता। एसे रोगी अधिक दिन जीवित नहीं रहते। जिस जेनि मे यह रोग उत्पन्न होता है, उमरे केवत एक के प्रभाव से पुरुप मे ही यह रोग उत्पन होता है, स्त्री में नहीं। किन्तु इस प्रकार के दो जेनि के सम्मिश्रण में स्त्री में भी यह रोग उत्पन होता है। हिमोफीलिया रोग-प्रस्त व्यक्तियों का 'ब्लीडर्म' भी कहते हैं। 'ब्लीडर्स' अपनी माताओं मे ही इस रोग को प्राप्त होते हैं, किन्तु ये माता स्वय इस रोग से मुक्त रहती हैं। यह दोप कई पुश्त ता माता से कन्या एर नमसे उसकी कन्या श्रादि क्रम से सन्तानों में संक्रमिन होता रहता है, किन्तु कन्याएँ रोगप्रस्त न होकर उनके लडके ही रोगी बनते रहते हैं। पिता से यह रोग पुन को प्राप्त होते कभी नहीं देखा गया है। "ब्लीडर्स' अपनी विवाह योग्य श्रायु को कदाचित् ही प्राप्त होते हैं। उनके पूर्व ही उनकी मृत्यु हो जाती है। आज तक यह रोग केवल पुरुपों में ही होत देसा गया है। जो नाडियाँ इम रोग को अपनी देह म वहन करती हैं उन्हें 'कटक्टर्स' (Conductors) कहते हैं। यह रोग मा प्रदेशों में नहीं दिमाई देता। अमेरिका के सयुक्त राष्ट्र में भी जन कभी यह गेग दिखाई दिया, तर यही सन में पाया कि जिन परिवारों में यह रोग उत्पन हुश्रा, रन परिवारों का सम्यघ युरोप मे ही रहा । कहा जाता है, महारानी रिस्टोरिया की दह में दस गंग का वीज था। 1 . देखिए,-Horan Henditr-Pt 345047 ३१ लिङ्गभेद का रहस्य चौथा परिच्छेद लिङ्गभेद का रहस्य यौन श्राफर्पण -पुरुष और नारी-मनुष्य-जन्म से पढकर कोई दूसरी अधिक रहस्यपूर्ण वात इम ससार में नहीं है। इसके बाद ही अन्य विस्मयजनक वस्तु लिङ्गभेद का प्रश्न है। पुरप और नारी में जो रहस्यपूर्ण प्रभेद हैं, उनसे मनुष्य दङ्ग रह जाता है। पुरुष और नारी के बीच इतना मोहक आकर्पण न जाने क्या है। पुरुप नारी को जानता है पहचानता है, किन्तु उसके बारे मे मनुष्य के मन मे रहस्य की सीमा नहीं है। नारी भी पुरुष का साहचर्य पाने के लिए न जाने कितनी उत्सुक रहती है । यौग्न की उमङ्गो मे दुनिया को माया छिपी हुई है। इसका बहुत कुछ रहस्योद्घाटन आज होने लगा है। किन्तु श्राश्चर्य की बात तो यह है कि एक रहस्य का उद्घाटन होते ही दूसरा सामने आ जाता है। इस प्रकार ज्ञान के सम्प्रसारण के साथ-साथ हमें, गम्भीर से गम्भीरतर रहस्यो का सामना करना पडता है। मनुष्य का जन्म तो एक स्मिय- कर वस्तु है ही, किन्तु यदि हम इस बात पर ध्यान दें कि संसार मे पुरुपो और नारियो की सरया कैसे प्राय समान है, तो आश्चर्य की सीमा नहीं रहती। यदि पुरुषों से नारियो की सरया कहीं अधिक हो जाय तो मनुष्य-समाज में न जाने कितनी सलगली मच जायगी। मनुष्य अभी तक अपने इच्छानुसार लडका अथवा लडकी को जन्म नहीं दे सस्ता है। किन्तु क्सि कारण लडका होता है और किस कारण लड़की, इस रहस्य का कुछ पता चलने लगा है और इसकी भी आशा होने लगी है कि भविष्य में हम लडका अथवा लडकी के जन्म पर नियन्त्रण कर सकेंगे।
१२ वशानुक्रम विज्ञान किन्तु ससार में लड़के एवं तक्यिों प्राय समान सख्या मे स्यो जन्म लेती है, यह वात आज भी रहत्यात ही रह गई है। प्रसिद्ध प्रीक दार्शनिक प्लेटो ने, ईमा के जम से तीन सौ वर्ष पूर्व, यह कहा था कि स्त्री और पुस्प प्रारम्भ मे एक हो व्यक्तित्व में समाये हुए थे, किन्तु देवता की क्रोधामि ने उन्हें अलग अलग कर दिया था और तब से वे दोनों एक दूसरे के साथ पुन सम्मिलित होने के लिए चिरलालायित है। प्रसिद्ध जीव वैज्ञानिक अध्यापक यू ने कहा है कि यौन आकर्षण की इससे अधिक सुदर व्यारया सम्भव नहीं। हमारे देश के अति प्राचीन शान मनुस्मृति में भी कहा गया है कि विधाता ने अपनी देह को द्विधा विभक्त फरके आधे अश से पुस्प का एव दूसरे आधे अंश से स्त्री का सृजन किया है ।( मनु० १३२) प्राणि जगत् में ऐसे बहुत से दृष्टान्त प्राप्त हैं जहाँ स्त्री और पुरुष अलग अलग न रहकर एक ही व्यक्तित्व में समाये हुए रहते हैं। पौधों में भी इसके बहुत से दृष्टात मिलते हैं । घोंघे (earth worm) आदि कीटों में स्त्री और पुरुष अलग अलग नहीं होते। प्रत्येक बाधा पुरुष और स्त्री दोनी के ही लक्षण से युक्त होता है। युवावस्था को प्राप्त होते ही वे अपने अपने साथी को ढूँढत हैं एव दोनों ही एक दूसरे के गर्भ मे सन्तानों को जन्म देते हैं। भोग के समय दोनों ही पुरुष और स्त्री के रूप में व्यवहार करते हैं। और भी निम्न श्रेणी के जीवो में मैथुन के न होत हुए भी जीप की उत्पत्ति होती है, जैसे क्षुद्रवम प्राणी "अमीरा" अथवा रोग उत्पादर जीवाणु जिहे "बैक्टीरिया" कहते हैं। य एक कोप निशिष्ट जीर होते है। इनमी वशद्वि एक कोप के द्विग्नरिटत हो जाने पर ही होती है। इन जीवो को न पुस्प ही वह सस्ते हैं और न स्त्री ही। इसी प्रसार एक कोप निशिष्ट एक और प्रकार का जीव है जिसमे P- - निङ्गनेद का क मनन कद वीच जाचित प के गन्ते सदन पिन को मजियों होती है, fish) रहने एक नवीन बार - -- या-shra - जीन कमम्पटमETC चिड़ियों भी Mmsirt t *** जीवों में श्राकर भी, Frxsagलचित्रता अंगरम गाय, तिए पुषuri xx थायश्या ft Hamana अपने इन्छा पाहु दर जीर पर्थात् और योग क्या पुरुष के न साथ ही न्त्रण करके अपने जीव उत्पन्न कर मेह में प्रविष्ट हो होती है जो यार को मी मन जा मन । निन्द पुरुप - - है और arriagnoयह तो एक ₹ है, Mi भाभी जाँाही St मा Orwa
मशानुनमा विज्ञान
६४
मिलने से एक सीन जीर की सत्यत्ति होती है। एडिनरग
विश्वविद्यालय के प्रसिद्ध अध्यापक मयू महोदय ने उपर दिये
गये दृष्टान्ता के आधार पर यह कहा है शिवशद्धि के लिए
यो। पापण का होना अत्यावश्यक नही है। कुछ मानि
फा पहना है कि यौन पारर्पण पे द्वारा प्रति जीवों की यंगद्धि
पराती है। मयु साहय इसका विरोध परने हैं। प्रसिद्ध मारिए
सत्त विद् प्लाटिस (Alterdes ) महोदय ने भी यदुव से
हमाली का उद्वरण परके यह दिलाया है कि यस मन्वानोपा
दन के लिए भी प्राणियों में पुरुषों थोर खियों का आकर्षण नले
हुश्रा करता। 'यू' साहय का कहना है कि यौन धारर्पण क्या
यस्तु है, इसरा उत्तर विज्ञान प्रान नही दे मरना। (Vedo
not know what sex is~-FATE. Crer in an
article on 'ser in the 'outline of Modern
Knowledge' ) जय यिना मधुन के भी सन्तान को उत्पत्ति
हो सकती है तो यौन पायर्पण को क्या श्रावश्यकता है? येवल
श्रानद के लिए?
नरपे ससर्ग म न पार भी मेढक के यच्चे उत्पन्न हुए हैं।
किन्तु मनुष्य के सम्बन्ध में ऐसा एक भी दृष्टान्त प्राप्त नहीं
हुआ है। यद्यपि मुचत नामक वैयक अन्य में यह उहा है कि
पुरुप के मस्पश में न श्राफर भी मातृगर्भ से मनुष्य का जम
मम्भव है। चूहों के गर्म की परीक्षा करने पर यह ज्ञात
हुथा है कि मैथुन न होने पर भी गर्भस्य श्रएढे से भ्रूण
की उत्पत्ति हुई है, किन्तु यह अण अधिक दिन ता जीवित
नहीं रह पाया । इससे इतना तो अनुमान अवश्य किया जा
सस्ता है कि नर-वीर्य क संस्पर्श में न आकर भी चूहे की
उत्पत्ति हो सकती है।
देखिर-Seeral Life in the antant worll
।
लिङ्गभेद का रहस्य जिन एक कोप निशिष्ट जीवो में केवल द्विसण्डित होकर नवीन जीर की उत्पत्ति होती है, उनमे भी यह देखा गया है कि कुछ दिनों के पश्चात् एक कोप से दो कोपो का होना धीरे धीरे कम होता जाता है। तर फिर दो जीव सम्मिलित होते हैं और इस प्रकार उनमे द्विपण्डित होने की शक्ति पूर्ववत् फिर आ जाती है। इस इधान्त को यथार्थ मान लेने से यह स्वीकार करना पडता है कि जीव की उत्पत्ति के लिए मैथुन का भी प्रयोजन है। किन्तु क्र. साहब कहते हैं कि ऊपर दिये गये दृष्टान्त में कुछ भ्रम है। उपयुक्त आहार के न पाने से ही उक्त जीव में द्विसरिटत होने की शक्ति कम हो जाती थी। इसके विपरीत मैथुन के परिणाम में जीव की उत्पत्ति नहीं भी हो सकती। मनुष्य में भी ऐसी अवस्था आती है। जन स्त्रियों में रजस्वला होने की शक्ति लुम हो जाती है तब मैथुन में श्रानन्द प्राप्त होने पर भी सन्तान की उत्पत्ति नहीं होती। अर्थात् कष साहन के मतानुसार सन्तानोत्पादन के साथ यौन-सयोग अथवा यौन आर्पण का कोई सम्बन्ध नहीं है। किन्तु क्या यह नहीं कहा जा सस्ता कि जीव की क्रमोन्नति के साथ माय उनमे पुरुप और स्त्री के भेदों की भी उत्पत्ति होती है ? एक से बहु होना ही तो विकास का नियम है। इस कारण मैथुन से ही जीनों की उत्पत्ति होना उच्चतर विकास का ही लक्षण हो सकता एक अमीबा' से दूसरे 'अमीया' के उत्पन्न होने पर कोई विचित्रता नहीं दिखाई देती , किन्तु दो जीनो के मैथुन से उत्पन्न जीवा मे नाना प्रकार की विचित्रताएँ दिखाई देती हैं। यह तो एक प्रमाणित वैज्ञानिक तथ्य है । एक से बहुत का होना ही तो सष्टि है। मधु मस्सियों अपने वचो के प्राहार का नियन्त्रण करके अपने इच्छानुसार स्त्री अथवा पुरुष अथवा नपुसक जीव उत्पन्न कर सकती हैं, परन्तु इस बोसनी शताब्दी में भी मनुष्य अपने इच्छा है ६८ में एक वंशानुक्म विज्ञान मे एक्स् कॉमोसाम के साथ पु पीज-योप के x कॉमोसाम मिलकर भ्रूण के कोप में दो एक्स क्रोमोसोम बनते हैं। दो एक्स् कॉमोसाम से स्त्री की दह बनती है और यदि पु-वीर्य से वाइ प्रॉमोसाम वहन करनेवाला काप स्त्री क शण्टाणु में अर्थात् वीज कोप में प्रविष्ट होता है तो भ्रूण बालक-राक्षण-विशिष्ट होता है। कारण इस भ्रूण १ मॉमोसोम के साथ दूमरा y क्रॉमोसोम मिलता है, अर्थात् भ्ररण में xy (एक्स् चाई) क्रॉमोसोम घनते हैं। xy क्रॉमासोम विशिष्ट जीर पुं-लक्षण विशिष्ट होता है। अर्थात् पु-बीज कोप के साथ स्त्री वीज-कोप के सम्मिलिन होते समय ही यह निश्चित हो जाता है कि भ्रूण लडका होगा अथवा लडकी। पाठक यह भी ध्यान में रक्खेंगे कि पु-बीज कोप ही यह निर्णय करता है कि भ्रूण लडा होगा अथवा लडकी! एक वार भ्रूण बन जाने के पश्चात् फिर उसका लिङ्ग परिवर्तन करना असम्भव सी बात है। अवश्य इसमें भी बहुत कुछ रहस्य छिपा हुआ है। यथास्थान इसका उल्लस पिया जायगा। यहाँ एक बात पर और विचार करना रह गया है। यह निर्णय कैसे होगा कि स्त्री के अण्डाणु में x कॉमो- सोमनाला पुनीज-कोप प्रवेश करेगा अथवा y मॉमोसोमाला ? भ्रूण का लडका अथवा लडको होना तो इसी बात पर निर्भर करता है। इस विपय पर आधुनिक विज्ञान निश्चयात्मन रूप से कुछ नहीं कह पाया है। हफैर" नामक एक वैज्ञानिक ने सन् १९२३ ३० मे एक "मैडलर" नाम एक दूसरे वैज्ञानिक ने सन् १९३० ई० में स्वतन रूप से प्रमाणित करने की चेष्टा की है कि यदि माता से पिता की आयु अधिक होती है तो सन्तान अधिकतर पालक होते हैं और यदि माता को प्रायु पिता से लिङ्गमेद का रहस्य अधिक होती है तो अधिकाश समय अन्याएँ ही उत्पन्न होती है। इस सिद्धान्त की पुष्टि भी होती है और इसके निराध में भी बहुत से दृष्टान्त प्राप्त होते हैं। इसी प्रकार कुछ और भी चातें कही गई हैं, जिनका वैज्ञानिक समाधान अभी तक नहीं हो पाया है। ऐसा अनुमान किया जाता है कि बाहरी कारणों से लिङ्ग का निर्णय नहीं होता है। इस बात का एक प्रमाण यहाँ दिया जाता है। मनुष्यों में कभी-कभी यमज ( एक साथ जन्म लेनेवाले दो वचों के जोड़े को यमज सन्तान कहते हैं) सतान उत्पन्न होती हैं। यमज सन्ताने दो प्रकार की होती है-एक तो जन स्त्री के एक अण्डाणु से ही यमज उत्पन्न होते हैं, दूसरा जन दो अण्डाणुओ मे दो पु-धीज-कोप प्रवेश करते हैं, तन अन्य प्रकार की यमज सन्तान उत्पन्न होती हैं। पाले प्रकार की यमज सताने प्राकृति एव प्रकृति में एक दूसरी से अद्भुत प्रकार से मिलती हैं, किन्तु दूसरे प्रकार को यमज सन्तानों में वैसा ही मेल रहता है जैसा कि भाई भाई में और भाई बहनों में रहता है। पहले प्रकार की यमज सन्तान को अँगरेजी में प्राइडेटिकल ट्वीस ( Identical twins) कहते हैं और दूसरे प्रकार के यमज को फ्रेटरनल ट्वीन्स ( Fraternal twins ) कहत है। Identical twins के लिङ्ग एक ही प्रकार के होते हैं, किन्तु Fraternal twins के लिङ्ग एक प्रकार के हो सकते हैं और नहीं भी हो सकते हैं। यदि बाहरी कारणा से लिङ्ग का निर्णय होता हो तो श्राइडेंटिक्ल यमज सन्तानो के लिङ्ग सदा एक प्रकार के कैसे हो सकते हैं। यह भी तो समझने की बात है कि जब दो स्त्री अण्टाणु से यमज सन्तान उत्पन्न होती हैं, त उनके लिङ्ग कभी ता एक ही प्रकार के होते हैं और कभी नहीं भी होते। इस प्रमाण से यह सिद्ध वंशानुनम विज्ञान । । चेष्टा हो रही है कि पुरुप के बीज कोपों को अलग से जीवित रक्सा नाय और उनमें से y और १ प्रोमोसोमवाले बीज कोपों को भी अलग कर लिया जाय। ये चीज रोप फिर समय और सुविधा के अनुसार बी के गर्भाशय मे डाले जा सकते हैं। इस प्रकार अपने इच्छानुसार लड़का अथवा लडकी को हम जन्म दे सक्ने हैं। ये सब काल्पनिक यातें नहा है। आजकल विदेशों में इन सब बातों की परीक्षाएं हो रही हैं। इसके अतिरिक्त एक और भी विस्मयकर बात को परीक्षा हो रही है। चूहों पर इसकी परीक्षा हुई है। मादा चूहों के गर्भ से गर्भाशय अर्थात जरायु को निकालकर अलग जीवित रक्सा जाता है, और नर चूहों से वीर्य को लेकर भी अलग जीवित रक्सा जाता है। गर्भ रहने के बाद भी मादा चूहे के पेट से नवा समेत गर्भाशय को धाहर निकालकर अलग जोनित रखने की चेष्टा हो रही है। सन् १९०१ ई० में वैज्ञानिक होप' (Heape) महोदय एक मादा खरगोश के पेट से बचा समेत गभाशय को दूसरी मादा सरगोश के पेट मे डालने में समर्थ हुए थे। सन् १९२५ ई० में प्रसिद्ध वैज्ञानिक हॉलडेन' ( Haldane ) महोदय ने चुहिया के पेट से बचा समेत गर्भाशय बाहर निसलकर इस दिन तक जीवित रक्सा था। गर्भाशय में बच्चे के लिए उपयुक्त श्राहार पहुँचाना एक भारी समस्या है। इस समस्या के हल हो जाने पर माँ के पेट से बाहर रहते हुए ही जैसे गर्भाशय से जीवित चूहे पा निकलना सम्भव है, इसी प्रकार मनुष्यों में भी मो के पट से गर्भाशय को अलग निकालकर, स्वतन्त्र रूप से, अपने इच्छानुसार बच्चा पैदा करने की आशा वैज्ञानिकगण श्रान करने लगे हैं। जैसे आज हम मुर्गी के अण्डे को यन्त्र में रसर यच्चे पैदा कर लेते हैं, उसी प्रकार भविष्य में वैज्ञानिगण पुरुष के वीर्य को अलग सग्रह करके और स्त्री के लिङ्गभेद का रहस्य पेट से जरायु को अलग निकालकर, मुर्गी के अएटों की तरह मनुष्यों के पचों को भी, यन्त्र की सहायता से उपन्न किया करेंगे। इस प्रक्रिया को वैज्ञानिक परिभाषा में (Eetogenesis) पटोजेनेसिस कहते हैं। श्राजस्ल यूनाइटेड स्टेट्स आफ अमेरिका में ऐसे गुप्त स्थान हैं, जहाँ पुस्प का वीर्य-सग्रह किया जाता है एवं प्रयोजनानुमार स्त्री के गर्भ मे उमे डाला जा सकता है। कालेज के चुने हुए प्रेजुण्ट युवकों से वीर्य साह किया जाता है। इनके नाम अथवा परिचय गुम रक्से जाते हैं। मान लीजिए कि पुरुप के दोप से स्त्री के सन्तान न हो रही हो तो उस दशा में पूर्वोक्त गुप्त स्थान से धुने हुए सुन्दर, विद्वान्, स्वस्थ युवक के वीर्य से स्त्री को गर्भाधान किया जा सकता है। न्यूयार्क में ऐसा ही एक गुप्त स्थान है। गृहपालित पशु आदि के बारे में अब उक्त यात केरल परीक्षा- गारी में ही सीमित नहीं है। श्राजकल पशुओं पर इस विज्ञान पा यथेट प्रयोग होने लगा है। अच्छे अच्छे चुने हुए साँड़ों से वीर्य साह करके उसे रेफ्रिजरेटरों में ( Refrigerators- जहाँ ताप की मात्रा इच्छानुसार कायम रक्सी जा सकती है) संभालकर रक्सा जाता है और आवश्यकतानुसार चुनी हुई गाय को गर्भवती किया जाता है। योरप और अमेरिका के बहुत से प्रदेशों में इस विज्ञान का प्रयोग होने लगा है। दक्षिण अमेरिका से चुने हुए साँड़ों का वीर्य हवाई जहाज द्वारा युनाइटेड स्टेटस आफ अमेरिका में लाया जाने लगा है। इस प्रकार कृत्रिम वंशानुक्रम विज्ञान गर्भाधान की प्रक्रिया को वैज्ञानिक भाषा में श्रॉयटेलेजेनेसिम (Eutelegenesis) कहते हैं। अर्द्धनारीसर--प्राधा पुरुष और वाधा नारी-प्राय समाचारपनों में सबर छपती है कि एक युवती की देह में पुरुष के लक्षण दिखाई देने लगे और पाद को चिकित्सालय में अस्रो पचार (चीर फाड) के पश्चात् वह पुरुप बन गई। इमी प्रकार ऐसे भी दृष्टान्त प्राप्त हैं जहाँ लडका लडकी के रूप में परिवर्तित हो गया है। इसके अतिरिक्त घहुतो ने यह भी देरा होगा कि फ्भी-कभी पुरुष की देह में नारी के चिह्न विकसित होते हैं, जैसे-क्सिी किसी पुरुष के स्तन युवतियों की तरह उय एव स्फीत होते हैं। इसी प्रकार कभी कभी युवतियों के भी भू निकल श्राती हैं। पाठमो को यह सुनकर आश्चर्य होगा कि वर्तमान ऐसे मनुष्य भी हैं, जिनमें पुरुष और स्त्री दोनों के लक्षण एक ही साथ उपस्थित है। स्त्रीत्व और पुरुपत्र के लक्षण, पुरुप और स्त्री दोनों में ही पाये जाते हैं। किसी में कोई लक्षण परिपूण रूप से प्रस्फुटित होता है और किसी अन्य मे दूसरे लक्षण अधिक प्रस्फुटित होते हैं। पुरुप की देह में स्तन के स्पष्ट चिह्न वर्तमान हैं, किन्तु वे स्तन का काम नहीं देते । स्त्रियों मे भी पुरुष का लिङ्ग सूक्ष्म रूप से वर्तमान है, जिसका अँगरेजी नाम लाइटॉरिस (olitoris) है। कभी-कभी स्त्रियों में स्त्रीत्व के लक्षण तो अर्द्ध परिस्फुट होकर ही रह जाते हैं और साथ ही पुरुष के लक्षण भी उनमे सूक्ष्म समय • देखिए--Yon and Heredity-by Amram schenfeld P390391 तो यथार्थ मे पुरुष अथवा नारी केरल स्त्री अण्डाणु अथवा पुअणु लगे हैं जहाँ पर एक विरामी दशिता दिखाती है, किन्तु सामान देने लगते हैं, जिनके कारपछि लिङ्गभेद का रहस्य रूप से पाये जाते हैं। इस विषय पर जोन हफिन्स् के अध्यापक ह्य हैमटन यग (Hugh Hampton महोदय ने विस्तृत विवरणयुक्त एक पुस्तक लिगे। कहना है कि उनके पास वीस ऐसे स्पष्ट दृष्टान्त हैं, छि यह निश्चयात्मक रूप से कहा जा सकता है कि उनका और नारी दोनों के चिह्न वर्तमान हैं। उनमें घी कर पुरप के अण्डकोप ( Both Ovaries and T. दोनों एका पाये गये हैं। इसके अतिरिक्त दूसरे अपेक्षाकृत अधिक प्रेम हैं, जहाँ एक ही व्यक्ति में या तो स्त्री के अगटा( जो अण्डे के रूप में होते हैं ) श्रथा पुर। (Testicles ) पाये गये हैं, किन्तु उस व्यकि: और मादा दोनों के ही लक्षण एक मात्र देते हैं, जिनमें से केवल एक लक्षण तो दुम्भ wer परिस्फुट होते देखा गया है। एन अनि कारण हम उसे लडका अथवा लडकी की परिणाम में ऐसा अनुमान किया जाता है. से एक मनुष्य में उपर्युक्त उमय META अर्थात् जन्म के समय वशानुरूम Hamt. पाहा लक्षणों के कारण श्रम- लड़का है अथवा लडकी है। क्राना पडता है और चिकन वशानुक्रम विज्ञान मन जाती है। उसकी देह मे खी के लक्षण अपरिस्फुट एवं अपूर्ण थे। उन चिह्नों को चिकित्सक की सहायता म क्टवा डाला गया था। विज्ञान की परिभाषा में यह नहीं कहा जा मफ्ना कि कोई एक व्यक्ति परिपूर्ण रूप से पुरुषत्व अथवा स्त्रीत्व के लक्षणों से युक्त होता है। किमी में तो पुरुप बनने की और किसी में स्त्री धनने का सम्भावना प्रबल रहती है। संभव है भ्रूण के विरसित होते समय, सृष्टि प्रवाह को जारी रसने के लिए, प्रति देवी अपने रहस्यमय उपायों से किसी को तो पुरुप बना देती है और किसी को स्त्री। बङ्गाल के एक धार्मिक सम्प्रदाय का नाम 'सहजिया' सम्प्रदाय है। इस सम्प्रदाय के मतानुसार प्रत्येक पुरुप में नारीत्व के भाव भी हैं और प्रत्येक नारी में भी पुरुषत्व के भाव हैं। पुरुप म पुरुपत्व का भाव प्रबल है, इसलिए वह पुस्प है और नारी में नारीत्व का भाव प्रनल है, इसलिए वह नारी है। वे पुरप के आधे धाम श्रङ्ग को नारी-स्वभाव विशिष्ट मानते हैं और स्त्री के दक्षिण अङ्ग को पुरुष-स्वभाव विशिष्ट। यह माय देसा गया है कि स्त्री का बाम स्तन दक्षिण स्तन से अधिक परिपुष्ट होता है। पुरुष का भी दक्षिण अग वाम श्रङ्ग से प्राय अधिक बलिष्ट एवं कर्मठ होता है। हिन्दुओं के पौराणिक प्रथों में भी सृष्टि-क्रम के सम्बन्ध में अमैथुनी सृष्टि का उल्लग्न किया गया है। न्याय-कुसुमासलि में भी इस बात का उल्लस है। हिन्दुओं के देवाधिदेव महादेव शिव को अर्द्धनाराघर कहा गया है। इसका आध्यात्मिक तात्पर्य भी है और पाथिन दृष्टि से भी इसका एक तात्पर्य यह है कि सृष्टि द्वन्द्वात्मक है । प्रत्येक वस्तु मे दोनो भाव एकत्र रहते हैं । केवल क्सिी एक भाव के प्रपल होने से उस वस्तु का, उस मबल मार के नाम के आधार पर, यह नाम पड़ता है। इन दोनों भावों के पारस्परिक x, yकॉमोसोम रहते हैं, और सीवर में द्र,x होते हैं, वे केवल x, अथवा मानान महाममित पुरुषत्व के वश-लक्षण-बीज अयात् सीन,गुन सनमें दूसरे अनेक प्रकार के लाभर वान्यात जिनि भी केवल Y क्रोमोसोम द्वारा ही निकर पनि नहाती है। लिङ्ग भेद की उत्पत्ति के लिए समन्न कॉम मामा सय जेनिया का सम्मिलित प्रभार काम करना ६ मक नामक रोग के सम्मघ में इस विषय परचना की गई थी। अधिनायकत्व में, ए में शिफ लागि परन्तु लिङ्ग लक्षण के विमिद छान म और भी लिङ्गभेद का रहन विकास के अनन्त भेद हैं। आधुनि Eि Trary चलता है कि स्त्री और पुरुपत्र के विधान में जहाँ यह भेद अति सूक्ष्म है यहाँ स्यन्न - देता, किन्तु जहाँ भेट अधिक हो जाता हम उसे देख पाते हैं। वशानुक्रम विज्ञान के अनुसार दी विषय में बहुत वाते जानने योय है। हम परिचित हो गये हैं कि प्रधानन उनि के वशजों में आते हैं। हमने यह भी दे क्रॉमोसोम रहते हैं। किन्तु इस निदान हैं। जिन जेनियों के द्वारा स्त्रीय नामित नहीं रहते। ५और y क्रॉमोसोन में और मंच या मंत्र रहते हैं। इसी प्रकार दूसरे कॉलेज मकानी और पुगप के लक्षण उत्पन्न करनेवाले जेनि भी पान हैं जन अथवा जिटकमिया" लिङ्ग भेद के सम्बन्ध में भी वही दान लागू है। और Y मॉमोमोम में एम "जेनि' अगर छिपी हुई हैं। भ्रूण में प्रयम अवस्था में दो ७८ वशानु-कम विज्ञान रहती हैं। प्राथमिक अवस्था में ये न तो स्त्री के डिम्बाणु की तरह होती हैं और न पुरुष के अण्ड-कोप की तरह। विकमित होते समय भ्रूण को यदि पुरुष बनना है तो वे सूक्ष्म प्रथियों पुरुष के अण्ड-कोप धन जाती हैं, और उनसे जो रस निकला करता है उसके प्रभार से पुरुष के दूसरे लिङ्ग-लक्षण विकसित होने लगते हैं। और यदि भ्रूण को स्त्री धनना है वो उक्त प्रथियों स्त्री के डिम्बाणु वन जाती हैं और उनसे दूसरे प्रकार के रस निर्गत होते हैं। इन प्रन्थियों के साथ हो नल युक्त रहते हैं। इनमें से एक का नाम "मुलरियन्" (Mullerian) और दूसरे का नाम है "वलफियन्" (Wolfian ) डक्ट अथवा नल। जब भ्रूण में खी-लिङ्ग के लक्षण विकसित होते हैं ता 'मुलेरियन्' नल जगयु आदि में परिणत हो जाता है तथा 'वलफियन्' नल शुष्कप्राय हो जाता है और जर भ्रूण मे पु लिङ्ग के लक्षण विकसित होने लगते हैं तर 'मुलेरियन्' नल विकसित न होकर शुष्पप्राय रह जाता है एवं 'वलनियन्' नल पुरुष का वीर्यवाही नल बन जाता है। स्त्री में 'वलमियन्' नल शुष्माय रह जाते हैं। उपर बताई गई प्रन्थियों का पारिभाषिक नाम गोनेड्स् या सेक्स ग्लाण्ड्स् ( Gonads or Sex Glands) है। लिङ्ग भेद के उत्पन्न होने में पहले x अथवा मॉमोसोम का प्रभाव रहता है। ये प्रभाव वशानुम्म के नियमानुसार प्राप्त होते हैं। इसके साथ-साथ 'गोनेड्स्' के रसप्रवाह का भी अत्यन्त महत्त्व पूर्ण प्रभाव लिङ्ग-भेद के कारण के रूप में वर्तमान है। जन 'सेक्स ग्लाण्ड्स' के रसप्रवाह के साथ Y अथवा y कॉमो सोम का सामन्जस्य रहता है तर स्वाभाविक रूप से पुरष अथवा स्त्री उत्पन्न होती है, अन्यथा नाना प्रकार को विचिनताएँ उत्पन्न होती हैं। 'सेक्स ग्लाण्ड्स्' से जो रस निकलता है, उसका पारि भापिस नाम 'सेक्स हरमोनस्' है।
लिङ्गभेद का रहस्य सेक्स हरमोन्स-'सेक्स ग्वाएड्स' का रस एक विस्मय यी वस्तु है। यदि किमो मुर्ग के अण्डकोप निराल लिये जाते हैं, सो मुर्गे फा पीजना यन्द हो जाता है। उसके मस्तक पर का रङ्गीन मांसपिएट शुष्क होने लगता है और उसका रग फीका पड़ जाता है। किन्तु यदि उस मुर्गे फो देह में दूसरे मुरों के जीवित श्रगह- कोप रस दिये जाते हैं तो वह फिर पूर्ववत् पोंग देने लगता है एवं उसमें दूसरे पुरुपन्य के ततए दिखाई देने लगते हैं। यदि क्सिी मादा चूहे के पेट से अपहाणुषों को निकारा लिया जाता है, तो उसमे कामोद्दीपना नहीं रह जाती एव यह नर के पास नहीं आने देती। किन्तु यदि इस चूरे फी देह मे स्त्री अण्डाणु का रस अर्थात् स्त्री हॉरमोन इन्जेक्ट ( Inject ) कर दिया जाता है तो उसमें फिर पूर्ववत् कामोद्दीपना होने लगती है, फिर वह नर चूहे को पाम आने देती है आदि, आदि । इसी प्रकार जन रिसी पुरुष की देह से अण्डकोप निराल लिये जाते हैं और उसमें यदि स्त्री 'हॉरमोन' इन्जेक्ट किया जाता है तो उस पुरुष का लिङ्ग शुक और छोटा होने लगता है। इसके साथ-साथ उसकी देह में स्त्रियों के से स्तन विकसित होने लगते हैं और यह घच्चों को दूध पिता सकता है। स्त्री की देह से भो जन अण्डाणु निकाल लिये जाते हैं, एवं उसकी देह मे पु 'हॉरमोन्' इन्जेक्ट किया जाता है तो उसके स्तन शुष्क होने लगते हैं और उसका क्लाइटारिस पुरुप लिग की तरह विकसित होने लगता है। (क्लाइटारिस का परिचय हम पृष्ठ ७४ मे दे आये हैं।) जीर की देह में जो कोप हैं उनमे पुरप अथवा स्त्री, दोना लक्षणों के विरसित होने की घराबर बराबर सम्भावनाएँ रहती हैं। 'सेक्स हॉरमोन के प्रभाव से श्री अथवा पुम्प के लक्षणों में उनका परिवत्तन हो सकता है।
वंशानुक्रम विज्ञान इन सब बातों से यह प्रतीत होता है कि लिङ्ग-भेद के मूल में जेनि, x अथवा y क्रोमोसोम, एव 'सेक्स हॉरमोन्स्' अर्थात् 'सेक्स ग्लाएड' का रस प्रवाह सामूहिक रूप से काम करता है। इन सन के समन्वय से तो स्वामारिक रूप से स्त्री या पुरुप का विकास होता है। जब इन मूल कारणों मे परस्पर विरोध उत्पन्न हो जाता है तो प्रकृति में विचित्रता दिखाई देने लगती है। कुछ निम्न श्रेणी के प्राणियों में स्वाभाविक रीति से ही किसी एक ही व्यक्ति में उभय लिङ्ग अभिव्यक्त होते हैं। वे एक ही समय में 'प्रथना समयान्तर में स्त्री एव पुरुप दोनों के से ही व्यवहार करते हैं। इस श्रेणी के जीयों को "हरमा प्रोडाइट्स" ( Herma Phrodites ) कहते हैं। इसके अतिरिक्त ऐसे भी प्राणी हैं, जिनमे श्राधी देह तो स्त्री-लक्षण युक्त होती है और दूसरी आधी में पुरुष के लक्षण विकसित होते हैं। ऐसे जीवों को "गीनेन्ड्रोमार्फस्" (Gynandromorphs ) कहते हैं। ड्रासोफीला नामक मक्सियो में आधी देह पुरुष की और आधी स्त्री की पाई गई है। संसार में इस प्रकार के और भी बहुत से प्राणी पाये जात हैं मनुष्यों मे यौननावस्था का प्रारम्भ हो जाने के पश्चात् यदि स्त्री की देह से अण्डाणुओं को निकाल लिया जाय तो उसमें विशेष परिवर्तन के लक्षण नहीं दिसाई देते। किंतु यदि यौवना वस्था के पूर्व ऐसा किया जाता है तो अवश्य मनुष्यदेह में भी परिवर्तन दिखाई दने लगते हैं। यौवनावस्था के पूर्व लड़की की देह में स्रीजनोचित लक्षण विकसित नहीं होते। इस कारण यदि उस अवस्था में लड़की की देह से अण्डाणु को निकाल लिया तो यौवनावस्था पाने पर उसकी देह में पुरुष के कुछ कुछ लक्षण दिखाई देने लगते हैं। इसी प्रकार यदि यौवनावस्था के पूर्व लड़के के अण्ड कोप निकाल लिये जाते हैं तो यौवनावस्था जाता । लिङ्गभेद का रहस्य ८१ आने पर उस लड़के में स्त्रीजनोचित स्वभाव एव देहावयव विकसित होने लगते हैं। ऐसे लडके के मूंछे नहीं निकलती, गले का स्वर बिया का सा हो जाता है, आदि-आदि। इस स्थान पर एक बात का स्पष्ट उल्लेग्न कर देना नितात आवश्यक है। यौवनावस्था के प्राप्त होने पर गानेड्स' अर्थात् 'सेक्स् ग्लैण्डस्' के निकाल लने पर भी मनुष्य की दह पर लिङ्ग के सम्बन्ध में कुछ विशेष परिवर्तन नहीं होते। दूसरे पुरुषो की तरह हिजडे भी रतिक्रिया कर सस्ते हैं। 'सेक्स ग्लैण्ड्स' के तीन रसप्रवाह के कारण कभी-कभी दो अथवा तीन वर्ष के वक्षों में भी लिङ्ग-लक्षण परिपूर्ण रूप से विकसित होते हुए देखा गया है। इन्ही अन्थियो के रसप्रवाह एन जेनियो के कारण मनुष्यजाति के सब व्यक्तियों में ही प्राय एक ही समय में यौवन के लक्षण दिसाई देते हैं। संसार भर में सन देशो की स्त्रियों में प्राय एक ही समय में ऋतु माव बन्द हो जाता है। सेम्स ग्लैण्ड्स् के रसप्रवाह से ही भ्रूण के लिङ्ग-लक्षण तथा उसकी पुरुप अथवा खीजनोचित प्रकृति विससित होती है। किन्तु सेक्स ग्लैण्ड्स् के रसप्रवाह का नियन्त्रण कैसे होता है, अथवा जो प्रन्थियाँ सेम्स ग्लैण्ड्स् के रूप में बदलती हैं, उनका नियन्त्रण किन नियमो के अनुसार होता है इसका ज्ञान अभी तक हमे नहीं है। हमने अभी तक जो कुछ लिसा है, उसके आधार पर अब यह थोडा बहुत समझ मे आ सस्ता है कि कैसे युवती युवक के रूप में अथवा युवक युवती के रूप में परिवर्तित हो सकता है। देह के fer-Yon and Heredity by Amram Scheinfeld P 181 and Yon and Heredity-P 182 ८४ वंशानुक्म विमान हॉरमोन का कोई प्रभाव नहीं रहता है एवं ऋण की देह म जी जीन फोप हैं उनमे स्वाभाविक रीति ने ही खोल के लक्षण विसित होते हैं। प्रथा। किमी प्रसार के हॉरमोन के न रहते हुए भी साधारण जीव-योपों में स्त्रीच के लक्षण उपन्न करने पी शक्ति अन्तनिहित है। यदि नर हॉरमोन का प्रभाव नहीं रहता है तो देह का स्वाभाविप विकास त्री के रूप में ही होता है। रिन्तु स्वोर के लक्षणों का विराम एर चार प्रारम्भ हो जाने पर उसके स्थायित्व के लिए स्त्री हॉरमोन भी थावश्यकता "अनिवार्य हो जाती है। इसके विपरीत पुस्त्र के निमित होने फेलिए नर-अएड-कोपों से नर हॉरमोन का रहना अयावश्यक है। यदि किसी देह में पिसी प्रकार को भी सेग्म ग्लएड नहीं रहती है वा यदि रिसी देह में केवल अएटाणु रहते हैं तो उस देह में स्त्री के लक्षण ही विकमित होंगे। चूहा में यह धात पाई गई है। नर हॉरमोन फे रहने से देह में नर-लिङ्ग फे लक्षण ही विकसित होते हैं। इन परीक्षामा से हम इस सिद्धात पर पहुँचते हैं कि भ्रूण की देह में स्वाभाविक रूप से स्त्री बनने की शक्ति रहती है, किन्तु यदि नर हॉरमोन का प्रभाव पा जाता है तो वह देह पुरुप के रूप में परिणत हो जाती है। प्रारम्भिक अवस्था में भ्रूण की देह खो पनने के योय होती है, यदि उस अवस्था में नर हॉरमोन का प्रभाव श्रा जाता है तो वह पुरुष के रूप में ही परिणत हो जाती है। यदि ऐमा ही होता हो तो उभय लिग उत्पन्न होने का रहस्य कुछ समझ मे श्रा सक्ता है। एक नियत समय के अन्दर यदि पुं हॉरमोन उत्पन्न हो जाता है, तो ऋण पुल्लिङ्ग-युक्त होता है। और यदि इस पुं हॉरमोन के उत्पन्न होने में कुछ विलम्न हो जाता है तो सभय लिङ्ग-विशिष्ट जीव उत्पन्न हो जाता है। इस विलम्य का परिमाण जिवना अधिक होता है, जीव में पु-लक्षणों Or लिङ्गभेद का रहस्य की अपेक्षा स्त्री-लक्षणों के अधिक विकसित होने की उतनी ही सम्भावना रहती है। यह सिद्धान्त मनुष्य के लिए भी लागू है। स्त्री और पुरुष में प्रमेद-पुस्प देह के जीव-कोप जिनका पारिभाषिक नाम 'सोमाटिक सेल्स'---Somatic Cells- है और घीज कोष का स्पर्म अथवा जर्म सेल्म-Sperm Germ Cells-स्त्री देह क जीव कोपों से अपेक्षाकृत बडे होते हैं। स्त्री और पुरप के साँस लेने की रीतियो में भी अन्तर है। उन दोनों को नाडियों की रीति में भी स्पष्ट अतर रहता है। शरीर के अन्दर जितनी रासायनिक और अन्य प्रकार की रियाएँ होती रहती हैं, उनमे भी स्त्री और पुरप में भेद हैं। प्रसिद्ध जर्मन दार्शनिक शपेन हावेर महोदय ने वंशानुक्रम के सम्बन्ध में, वैज्ञानिक युग के श्रारम्भ होने के पूर्व, दृढता-पूर्वक यह कहा था कि मानव अपनी माता से ही मस्तिष्क अर्थात् चिन्तन शक्ति को प्राप्त करता है और अपना व्यचिव पिता से। मितु श्राज यह प्रमाणित हो चुका है कि चिन्तन-शक्ति केवल एक जेनि के आधार पर नहीं बनती। वास्तव में कई जेनियो के सम्मिलित प्रभाव से ही चितन शक्ति का विकास होता है। इसी प्रकार चरित्र का विकास भी किसी एक जेनि के आधार पर नहीं होता। शपेन हावेर के इस कथन का कि पुत्र अपने गुणों के लिए माता का अत्यन्त ऋणी रहता है, आधुनिक विज्ञान से कुछ समर्थन प्राप्त होता है। इसके विपरीत गैल्टन महोदय ने बहुत से दृष्टान्त सग्रह करके यह दिसाया है कि प्रसिद्ध व्यक्तियों के जो श्रात्मीयवर्ग यश प्राप्त कर चुके हैं, उनमें स्त्रियो की अपेक्षा पुरुषों की संख्या ही • Prof FAE Crew-article on Sex In "An oatline of modern Knowledge" P 284 वंशानुक्रम विज्ञान अधिक है। गैल्टन महोदय ने यह भी कहा है कि वैज्ञानिकों के बुलों में मातृकुल का प्रभाव ही सन्तान पर अधिक पड़ा है। उन्होंने यह दिखाया है कि बडे बड़े वैज्ञानिस यी ४३ मावाओं में से ८ माताए ऐसी थी जो उनके पिताओं से अधिक गुणशालिनी थीं। आधुनिक विज्ञान के अनुसार इस बात का समर्थन होता है। स्त्री पुरुपो में जो प्रभेद हे, वे भी वंश परम्परा से प्राप्त जेनि के आधार पर ही होते हैं। कुछ वश-लक्षण ऐसे हैं, जो कन्या द्वारा ही सरमित होते हैं। कन्या मे दो १ (एक्स् ) मॉमोसोम रहते हैं अर्थात् वंशगत लक्षणा के पुनापेक्षा कन्या में अधिक संक्रमित होने की सम्भावना रहती है। पुत्र मे तो केवल एक र क्रॉमोसोम रहता है, दूसरा y मॉमोसोम होता है। कुछ ऐसे भी वंश लक्षण होते हैं, जो पुनो द्वारा ही वशजों में सममित होते हैं। पुरुपों में प्रकृति पर विजय प्राप्त करने की विशेष शक्ति रहती है। युद्ध एवं शिकार में पुरप त्रियों की अपेक्षा अधिक शक्ति का परिचय देता है। स्त्रियों को मुग्ध करना भी पुरुष का ही काम है। प्रकृति के नियमानुसार सन्तान प्रतिपालन का भार पुरुषों की अपेक्षा स्त्रियो पर अधिक पड़ा है। स्त्री की अपेक्षा पुरुष को ही स्त्री अविक आपपित करती है। स्त्री सोच-समझकर, बूझार पुरुषों को अपनी ओर आकर्पित नहीं करती। पुरुप के सानिध्य म स्त्री लज्जा से विवश हो जाती है, किन्तु उसकी विवशता से पुरुप के मन में एक विचित्र श्राफर्पण का अनुभव होता है। पुरुष के सम्बन्ध में स्त्री का आचरण सकोच से भरा हुआ होता है, किन्तु उस सोच के कारण ही पुरुष के मन में स्त्री के प्रति एक सम्मोहन की सृष्टि होती है। खियो और पुरुषों के व्यवहारों में उसके कारण प्राय एक गलतफहमी होती है। कभी तो पुस्पो पर और कभी स्त्रियो पर यह लान्छन लगाया जाता है कि उनकी तो स्वभाव से ही दुष्ट प्रकृति होती है। जान जो विशेष अतर ८७ लिङ्गभेद का रहस्य कभी तो यह कहना पडता है कि सनातन पुरुष स्त्री को आकर्पित करता है और कभी यह कि सनातन नारी पुरुष को आकर्षित करती है। यथार्थ में बात यह है कि लियो और पुरुषों की प्रकृतियो में एक व्यवधान अवश्य है और वह स्वाभाविक ही है। कुछ जर्मन पएिटतो की राय मे लियो का स्वभाव पुरुषों से अनेक बातों में श्रेष्ठ है । उनकी राय में पुरुषों की अपेक्षा स्त्रियाँ कम भ्रष्टा गव क्म झगडालू होती हैं। किसी घटना के घट जाने के पश्चात् स्त्री मे उसका प्रभाव पुम्पों की अपेक्षा अधिक स्थायी एव अधिक गम्भीर होता है। वो पुरुपों की अपेक्षा कला कौशल में अधिक दक्ष होती है किन्तु विज्ञान तथा गणित में पुरुप स्त्री की अपेक्षा अधिक दक्ष होता है। राजनीति में स्त्री की उतनी रुचि नहीं रहती जितनी धार्मिक वातों में रहती है। सन्तान प्रतिपालन में स्त्री की स्वाभाविक रचि पुरुषो से कहीं अधिक रहती है बुद्धिवृत्ति की परीक्षाओं में समवयस्क लड़के और लड़कियाँ एक सा ही सफल होती हैं। किन्तु इस स्थान पर हमें यह स्मरण रसना उचित है कि बाल्यावस्था पर किशोरावस्था मे लडकियाँ लड़कों की अपेक्षा अधिक परिपक्व हुआ करती हैं। बाल्यावस्था से किशोरावस्था में लड और लडक्थिा के प्रभाव और बुद्धि- वृत्तियो मे बहुत अन्तर बढ जाता है। किन्तु पण्डित एल० एम० टरमैन की परीक्षाओं में लडकियों की अपेक्षा लडके बुद्विवृत्ति में अधिक प्रखर प्रमाणित हुए थे। लड़कों की अपेक्षा लड़कियों में मानसिक एव शारीरिक विकास अधिक शीन होता है। किन्तु स्कूलो एवं विश्वविद्यालयों के छात्र तथा छात्राएँ समान रूप से ही परीनोत्तीर्ण होती है। कभी-कभी इन परीक्षाओं में लड़कों की अपेक्षा लड़कियाँ अधिक सफलता दिखाती हैं। उनका अति उज्ज्वल सफलता को देखकर यह आशा उत्पन्न होती है कि भविष्य जीवन में ये लड़कियों न जाने कितनी उन्नति करेंगी, किन्तु ६ वशानुनम विज्ञान सांसारिक जीवन की सलमनी में पड़कर उनकी प्रतिभा न जाने कहाँ लुम हो जाती है। पर्यवेक्षण-शक्ति एवं स्मृति-शक्ति में नारी पुरुप से पिछडी हुई नहीं है, किंतु साहित्य के क्षेत्र में अथवा नवीन की सृष्टि में साधारणतया नारी पुरुप की अपेक्षा अधिक दतना का परिचय नहीं दे पाई है। सम्भवत इसका कारण यह नहीं है कि नारी की मानसिक शक्ति पुरुप से कम है, वरन् इसका यह कारण है कि नारी की अभिरचि पुरुप से मित्र है। नारी की प्रेरणा पुरुष की अपेक्षा भिन्न दिशा की ओर प्रवाहित होती है। साधारणतया नारी पुरुष की अपेक्षा अधिक हठ रखनेवाली होती है। किन्तु उसकी जिद पुरुप की जिद से भिन प्रकार की होती है। नारी सुन्दरी एवं प्रिया होने की प्रमिलापिणी होती है, पुरुष कर्ता होने का अभिमान करता है, उसके मन में शक्तिमान होने की दुराशा रहती है। पुरुप दूसरों पर श्रारमण करने में जितने उहास का अनुभव करता है स्त्री कष्ट सहन करने में उतनी ही क्षमता रखती है। प्रकृति की अव्यर्थ प्रेरणा से नारी पुस्प को भुलावा देती रहती है, और उसी के अमोघ नियत्रण से नारी साततियों के जम देनेपाली बनती है। इसी कारण पुरपण्वं सन्तान सन्ततियों की रचि अभिरुचियों पर स्त्री का ध्यान लगा रहता है । स्त्री की वासना कामनाएँ पुस्प और सन्तान सन्ततियों पर श्रव- लम्बित रहती हैं। पारिवारिक जीवन में स्त्री का एक विशेष स्थान होता है और उम श्रपस्थिति के कारण पुरुप की अपेक्षा नारी अधिक महानुभूति-सम्पन्न होती है। पराई पीर की अनुभूति नारी मे पुरुप की अपेक्षा कहीं अधिक रहती है। किन्तु उसकी सहानुभूति गृह परिवार के सकोण घेरे में ही अधिक स्मृत्ति पाती है। यदि ऐसा न होता तो नारी के पारिवारिक जीवन के केन्द्र से अलग निकल जाने की गम्भीर सम्भावना रहती। नारी का स्नेहार्पण पति और सन्तान की ओर सीमित रहता है। पति के गया । पुस्प और स्त्री का पारस्परिक भाकपण मन मे माया मोह उत्पन्न करने मे ही स्त्री का कृतित्व है । पुरुष स्त्री की अपेक्षा अधिक स्वार्थपर एव अपने में अधिक मन रहने का अभ्यस्त 1 निस्वार्थ बुद्धि से प्रेरित हो काम करना एवं केवल ज्ञान प्राप्ति के लिए ज्ञाना वेषण करने का दृष्टान्त मनुष्यो मे भी दुर्लभ है। ऊपर का विवरण जर्मन वैज्ञानिको के मतानुसार दिया उक्त विवरण से जर्मन पण्डितो की मानसिक गति का परिचय मिलता है। निस्सन्देह त्रियों और पुरुपो की प्रकृति में यथेष्ट अतर है। इसका यह अर्थ नहीं कि पुरप नारी की अपेक्षा श्रेष्ठ है। इसका केवल इतना हो तात्पर्य है कि स्त्री एव पुरुप के क्षेत्र भिन्न है। अपने अपने क्षेत्र में पुरुप अथवा स्त्री प्रधान है। स्त्री की प्रवृत्तियाँ सीमित क्षेत्र मे अत्यन्त गम्भीर हुआ करती हैं, पुस्प की प्रवृत्तियाँ व्यापक रूप से क्रियाशील रहती है, इस कारण साधारणतया पुरुष की भावना कामना स्त्री की अपेक्षा कम गम्भीर हुआ करती है। किन्तु किसी एक विषय पर मन हो जाने से स्त्रियों अथवा पुरुषो में कोई विशेष अन्तर नहीं रहता है। स्त्री भी जिस विषय पर मन से लग जायगी, उस विषय मे वह पुरुष की अपेक्षा क्म दक्षता नहीं दिखायेगी। पाँचवाँ परिच्छेद पुरुष और स्त्री का पारस्परिक आकर्षण योन मोह और भाकर्षण-योगसूत्रों में एक स्थान पर यह कहा गया है कि कुछ औपधियों के प्रयोग से भी समाधि की अवस्था प्राप्त की जा सक्ती है। अर्थात् मानसिक नियात्री के परिणाम में जिस अवस्था को हम प्राप्त कर सकते हैं, उसी अव- स्था को हम औषधियों के प्रयोग से भी प्राप्त कर सकते हैं।
सागुममापान - भारतीय श्रध्यात्मवाद के दृष्टिकोण से मानसिक क्रिया भी जड़वाद के सिद्धान्त पर प्रतिष्ठित है, अर्थात् मानसिक सत्ता भी जड जगत् की ही पर्यायमुक्त है। आधुनिक वैज्ञानिकों में तथा पाश्चात्य देशो के जनमाधारण में भी प्राजक्ल जडवाद तथा अध्यात्मवाद को लेकर एक द्वन्द्व चल रहा है। कुछ वैज्ञानिक केवल जड विज्ञान के आधार पर ही समस्त समस्यायों की मीमांसा करना चाहते हैं। और दूसरे वैज्ञानिक जडवाद के अतिरिक्त मानसिक सत्ता के आधार पर भी वैज्ञानिक प्रश्नों की आलोचना और मीमांसा करना चाहते हैं । इन दूसरी श्रेणी के वैज्ञानिको के मतानुसार मानसिक सत्ता, जड़ सत्ता से एक अलग वस्तु है। इनकी राय में मानसिक सत्ता एव चैतन्य एक ही हैं। जड़वादियों ने अनेक परीक्षाओं के आधार पर यह सिद्ध कर दिसाया है कि रासायनिक द्रव्यों के प्रभार से मानसिक प्रकृति बनती बिगडती है। अत उनका कहना है कि मानसिक सत्ता भी जड वस्तुओं का ही परिणाम है। स्त्री और पुरुष एक दूसरे के प्रति जैसे आचरण करते हैं, स्त्री पुरुष के प्रति और पुरष स्त्री के प्रति जिस प्रकार श्रापित होते रहते हैं, उनके मूल मे भी देहस्थित प्रन्थिया के रमप्रवाह का ही अव्यर्थ प्रभाव है। मनुप्य तथा अन्य प्राणियों की देह में दो प्रकार की प्रन्थियाँ रहती हैं, एक तो पुरुष के अण्डकोप और स्त्रियों के दिम्नाणु जैसी प्रन्थियों, दूसरी प्रकार की प्रन्थिया को अँगरेजी मे 'टस्टलस् ग्लैण्डस्' (Ductless Glands) अर्थात् नल विहीन प्रन्थियां कहते हैं। स्त्रियों और पुरुषों की चारित्रिक तथा मानसिक प्रकृतियों इन प्रन्थियो के विविध प्रकार के रस प्रवाह पर बहुत कुछ निर्भर हैं। यदि स्त्री की देह से अण्टाणु निकाल लिये जाये तो पुरप के प्रति स्त्री का समस्त प्रार्पण हवा हो जायगा।
पुस्प और स्त्री का पारस्परिक आकर्षण ९१ जिस यौन आर्पण के आधार पर ससार के श्रेष्ठ उपन्यास और काव्य रचे गये हैं, असाधारण प्रतिभावान कलाकार के निपुण तृलिकाघात से जिस अद्भुत चित्राला का विकास हुआ है और मङ्गीत को अपूर्व मूर्चना की सृष्टि हुई है, वह पाकर्षण तभी सम्भर हुआ है जब मनुष्य देह में प्रन्थियों से स्वाभाविक रूप में रस प्रवाह हुआ है। लियो और पुरुषों में परस्पर आकर्षण का रहस्य इन प्रथियो से रस निर्गमन में ही छिपा हुआ है। चूहों पर परीक्षा कर देखा गया है कि जब चुहियो के पेट से अण्डाणु निकाल लिये जाते हैं तब चे चूहों को पास नहा आने देती। किन्तु यदि फिर उनकी देह में अण्डाणु अथवा उसका रस प्रवेश कराया जाता है, तो वे फिर चुहियों का सा आचरण करने लगती हैं, चूहों को पास आने देती हैं और उनसे भोग करने को प्रस्तुत हो जाती है। अण्डाणु और अण्डकोषों को छोडकर जो दूसरी श्रेणी की ग्रन्थियाँ हैं, उनका भी प्रभाव कुछ कम नहीं है। यदि किसी पुरुष की देह से मस्तिष्क के नीचे की 'पिटुइटॉरी' प्रन्थि निकाल ली जाय तो पुरुष के अण्डकोप भी शुकमाय हो जायेंगे, और इस कारण पुरुप में सब प्रकार के यौन लक्षण लुप्तप्राय हो जायेंगे। तन उसके मन में स्त्री के प्रति किसी प्रकार का श्रापण नहीं रह जायगा। यदि फिर उसकी देह म 'पिटुइटॉरी' प्रन्थि का रस प्रवेश कराया जाय तो पुन वह व्यक्ति पुरुषोचित आचरण करने लगेगा। स्त्रियों के लिए भी ये ही बातें लागू हैं। अर्थात् "गोनाडस" अथवा 'सेक्स ग्लैण्डस्" का कार्य "डक्टलेस ग्लैण्ड्स्" के रस प्रवाह पर निर्भर रहता है। यदि किसी व्यक्ति में "पिटुइटॉरी' प्रन्थि अपूर्ण रह गई हो, अथवा किसी कारण उससे रसप्रवाह न होता हो तो उस व्यक्ति के "सेक्स ग्लैण्ड्स्" भी क्रियाशील नहीं होंगे।
९. वंशानुक्रम विज्ञान यदि यौवनावस्था के पूर्व ही रिसी प्राणी की देह में 'पिटुझ्दारी प्रन्थि का रस प्रवेश कराया जाय तो अपनी अवस्था के पूर्व ही उसकी देह में यौवनोचित लक्षण विकसित होने लगेंगे, स्त्री के अण्डाणु अपने समय के पूर्व ही पुष्ट हो जायेंगे, पुरुष का लिग भी यौवन के पूर्व ही अपनी पूर्ण अवस्था को प्राप्त हो जायगा। इस विषय में एक और बात पर ध्यान रसना आवश्यक है। स्त्री और पुरुप, दोनों के ही 'पिटुइटारी' प्रन्थियों के रम एक ही प्रकार के होते हैं। केरल चात यह है कि पिटुइटॉरी' प्रथि से रस निर्गमन न होने पर मेकम ग्लैण्ड्स भी क्रियाशील नहीं होते हैं। इस कारण यौन आचरण एव विविध प्रकार के यौन आकर्षण के मूल मे दोनों प्रकार की प्रन्थियो का समान प्रभाव रहता है। वैज्ञानिकगण मनुष्य-देह की अनेक प्रकार की प्रन्थियों से रस सग्रह करने में समर्थ हुए हैं, और उनके रासायनिक विश्लेपण करके परीक्षागारो में उक्त अनेक प्रकार के रस प्रस्तुत करन में भी समर्थ हुए हैं। जडवादियों का कहना है कि मानसिक सत्चा जड उपादान से कोई सतन्त्र एव रहस्यमय वस्तु नहा है। मानसिक प्रकृति देह का ही एक निकार अथवा विकास है। अर्थात् पिटुटोरी प्रन्थि के रस निर्गमन पर ही काम क्ला का भी विकास होता है। मनुष्य का मन अथवा उसकी मानसिक क्रिया भी ग्रन्थियों से रस निर्गमन पर अवलम्बित है--स्न्तुि पिटुइटोरी ग्लैण्ड का रस निर्गमन भी मानसिक इच्छा पर-मानसिक मचि अभिरचि पर-कम निमर नहीं रहता। जडवादी कहते हैं कि काम, मोध, लोभ, मोह, भय मैथुनादि सभी मानसिक स्यिाएँ प्रथियों से रस निर्गमन पर अवलम्बित है। उसी के साथ-साथ यह वात भी अत्यन्त सत्य *देसिए-Serence in the Making by Gerald Heard पुरुष और स्त्री का पारस्परिक श्रादर्पण है कि उन ग्लैएट्स की नियाएँ भी व्यक्ति की इच्छा पर कम निर्मर नहीं करती। मैथुन के परिणाम में भी प्रन्थियों की प्रकृति बनती निगडती रहती है। प्रन्थियों के रस प्रवाह के साथ वंशानुक्म विज्ञान का बहुत घनिष्ठ सम्बन्ध है। नेचरल सिलेक्शन अथना अन्य किसी प्रकार की व्यारया से इस समस्या का कोई समाधान नहीं होता है कि सर प्रसार के प्राणियों में क्यों एक ही निशेप अवस्था में यौवनोचित लक्षण दिखाई देते हैं। कुछ वैज्ञानिको का कहना है कि मैथुन की अवस्था में देह की प्रन्थियों में भी परिवर्तन होते हैं और उनके प्रभार से जीव कोप तथा योज-कोप दोनों में ही परिवर्तन हो जाते हैं। इसी कारण मनुष्यों की एक विशेष अवस्था में ही यौन लक्षण विकसित होने लगते हैं। इस बात में अभी वैज्ञानियों में यथेष्ट मतभेद है। इस विषय की आलोचना दूसरे परिच्छेद में विस्तृत रूप से की जायगी। मैथुा के समय मैथुन के कारण जीव देह में विशेष परिवर्तन होते हैं, इसमे सन्देह नहीं और इस बात में मतभेद भी नहीं है। मतभेद इस बात में है कि उन परिवर्तना के कारण यीज कोपा में भी परिवर्तन होते हैं अथवा नहीं। यथार्थ घात यह है कि व्यक्ति का आचरण, उसका व्यक्तित्व, आदि केवल एक ही तत्त्व पर अवलम्बित नहीं हैं। व्यक्ति के सस्कार, उसकी कामना वासना, इच्छा अभिरुचि, सहजात सरकार श्रादि का निर्माण न केवल जेनि पर निर्भर है, न प्रन्थियों के रस मनाह पर। इस ससार मे कोई भी वस्तु ऐसी नहीं है जो केवल जड हो अथवा केवल चेतन हो। यह विश्व जड चेतनात्मक है। मनुष्य के आचरण सर्वोपरि सहजात संस्कारो पर निर्भर हैं। ये सहजात सस्कार कहाँ से आते हैं, कैसे उत्पन्न होते हैं, इनका यथार्थ उत्तर विज्ञान आज भी नहीं दे पाया है। वशानुक्रम विज्ञान से इन प्रश्नों पर कुछ प्रकाश अवश्य पडता है, किन्तु पूर्व ९४ वशानुभम विज्ञान का रहस्य रहस्यावृत ही रह जाता है। विभिन्न प्रकार की प्रन्थियो मे नाना प्रकार के रस निर्गत होते रहते हैं। उनके प्रभाव से मानसिक क्रियाएँ एव विकास होते रहते हैं। इसी प्रकार मानसिक चेष्टाओ के परिणाम में भी प्रन्थियों से रस निर्गमन होता है। विशेष विशेष जेनि के कारण मनुष्य में विशेष विशेष गुण विकसित होते हैं। उनके ही कारण देह मे नाना प्रकार की प्रथियाँ भी उत्पन्न होती हैं। फिर केवल एक एक जेनि के ही आधार पर वश-लक्षण नहीं उत्पन्न होवे। सम्पूर्ण जेनि के सम्मिलित प्रभाव से ही जीव देह बनती है। पिटुइटॉग' आदि प्रन्थियो के प्रभाव से शारीरिक और मानसिक प्रकृति का विकास होता है और मानसिक और शारीरिक क्रियाओं के परिणाम में प्रन्थियो मे भी परिवर्तन होते रहते हैं। अध्यात्मवाद के अनुसार एक ही तत्त्व के दो विभिन्न प्रकार के विकास होते हैं, एक विकास में जड का प्राधान्य रहता है, दूसरे प्रकार के विकास मे चैतन्य का प्राधान्य रहता है। इस सिद्धान्त के अनुमार यदि वैज्ञानिक प्रश्नों की मीमांसा एव खोज की जाय तभी यथार्थ ज्ञान का उदय होगा एव सब प्रकार के विरुद्ध अविरुद्ध प्रश्नों का समाधान सम्भव होगा। छठा परिच्छेद सन्तान का पितृत्व कैसे निर्धारित हो ? विगत महायुद्ध के अवसर पर नाना देशों के सैनिकों की देहों से रक्त लेकर परीक्षाएं की गई थीं। उन परीक्षाओं के परिणाम में यह ज्ञात हुआ था कि साधारणत ससार के मनुष्यों में चार प्रकार के रक्त हैं। गहरी चोट पहुँचने के कारण अथवा अधिक फट जाने के कारण या अन्य किसी कारण यदि 1 । . सन्तान का पितृत्व कैसे निर्धारित हो ९५ रोगी को देह से अधिक मात्रा में रक्तस्राव हो जाय तो दूसरी दह से उस रोगी को देह में रक्त पहुँचाया जाता है। पहले । पहल इस प्रकार रक के लेन देन के कारण कभी तो रोगी वच गया है और कभी उसको मृत्यु भी हो गई है। ऐसे दो विपरीत परिणामों के कारण अनुसधान करते समय इस बात का पता चला कि मनुष्यों की धमनियों में प्रधानत चार प्रकार के रक्त प्रवाहित होते हैं। यदि दो व्यक्तियों के रक्त एक ही प्रकार के हों तो एक का रस दूसरे की देह में अनायाम हो प्रवाहित कराया जा सकता है। इसमें कोई शका की बात नहीं है। इस प्रकार के रक प्रवाह से रोगी की उन्नति ही होती है, हानि नहीं हाती। किन्तु यदि दो व्यक्तियों के रक्त दो मिनार के होते हैं, तो एफ का रक दूसरे की देह मे सञ्चालिन कराने से रोगो को मृत्यु हो जाती है, क्योंकि उक्त दो प्रकार के रक्त एकत्र सम्मिभित होने से जम जाते हैं, रक का प्रवाह रुक जाता है और रोगी की मृत्यु हो जाती है। वशानुक्रम के नियमानुसार उक्त चार प्रकार के मनुष्यों के पशजों में भी चार प्रसार के रक पाये जाते हैं। पिता और सन्तान में एक ही प्रकार के रक्त का होना आवश्यक है। माता और पिता के दोना प्रकार के रक्तों का सन्तानों में सक्रमण मेहेन के नियमानुमार होगा। वैज्ञानिक खोज के परिणाम में यह जाना गया है कि केवल तीन प्रकार के जेनि के प्रभाव से पार प्रसार के रक्त उपज होने हैं। इन वान जेनियों के नाम प, पी और ओ रम्ये गये हैं। साधारण व्यक्ति के समझने के लिए मना हा पहना पर्याय होगा कि उक्त तीन प्रकार के लेनियों से रक में प्रयान्त तीन प्रकार की वस्तुएँ उत्पन्न होती है। एजेनि से एक प्रकार का पदार उत्पन्न होता है, जिसका नाम "एन्टिजेन ए (Antigen A) सखा जा माता है।
९४ वशानुक्रम विज्ञान का रहस्य रहस्यावृत ही रह जाता है। विभिन्न प्रकार की प्रथियों से नाना प्रकार के रस निर्गत होते रहते हैं। उनके प्रभाव से मानसिक क्रियाएँ एव विकास होते रहते हैं। इसी प्रकार मानसिक चेष्टाओ के परिणाम में भी प्रन्थियों से रस निर्गमन होता है। विशेष विशेष जेनि के कारण मनुष्य में विशेष विशेष गुण विकसित होते हैं। उनके ही कारण देह मे नाना प्रकार की अथियां भी उत्पन्न होती हैं। फिर केवल एक एक जेनि के ही आधार पर यश-लक्षण नहीं उत्पन्न होते । सम्पूर्ण जेनि के सम्मिलित प्रभाव से ही जीव-देह घनती है। पिटुइटॉग' आदि प्रन्थियों के प्रभार से शारीरिक और मानसिक प्रकृति का विकास होता है और मानसिक और शारीरिक क्रियाओं के परिणाम में प्रन्थिों में भी परिवर्तन होते रहते हैं। अध्यात्मवाद के अनुसार एक ही तत्त्व के दो विभिन्न प्रकार के विकास होते हैं, एक विकास में जड का प्राधान्य रहता है, दूसरे प्रकार के विकास म चैतन्य का प्राधान्य रहता है। इस सिद्धान्त के अनुसार यदि वैज्ञानिक प्रश्नो को मीमांसा एव सोज की जाय तभी यथार्थ ज्ञान का उदय होगा एवं सब प्रकार के विरुद्ध अनिरुद्व प्रश्नों का समाधान सम्भव होगा। छठा परिच्छेद सन्तान का पितृत्व फैमे निर्धारित हो ? विगत महायुद्ध के अवसर पर नाना देशों के सैनिकों की दही से रक्त लेकर परीक्षाएँ की गई था। उन परीक्षाओं के परिणाम में यह ज्ञात हुआ था कि साधारणत ससार के मनुष्यों में चार प्रकार के रक्त हैं। गहरी चोट पहुँचने के कारण अथवा अधिक कट जाने के कारण या अन्य किसी कारण यदि - शजों में भी चार प्रसार के रक्त पाये जाते हैं। पिता और और पिता के दोनों प्रकार के रक्कों का सन्तानों मे सक्रमण मेन्डेल के नियमानुमार होगा। वैज्ञानिक खोज के परिणाम में ए, घी और ओ रपये गये है। जेनियों से रक्त में प्रान्त तान प्रकार की वस्तुएं Antigen A) मा । सन्तान का पितृल कैसे निर्धारित हो रागी की देह से अधिक मात्रा में रक्तस्राव हो जाय तो दूसरी देह से उस रोगी को देह मे रक्त पहुँचाया जाता है। पहले पहल इस प्रकार रक्त के लेन देन के कारण कभी तो रोगी बच गया है और कमी उसकी मृत्यु भी हो गई है। ऐसे दो विपरीत परिणामों के कारण अनुसन्धान करते समय इस बात का पता चला कि मनुष्यों की धमनियों में प्रधानत चार प्रकार के रक्त प्रवाहित होते हैं। यदि दो व्यक्तियों के रक्त एक ही प्रकार क हों तो एक का रक्त दूसरे की देह में अनायास ही प्रवाहित कराया जा सकता है। इसमें कोई शका की पात नहीं है। इस प्रकार क रक्त प्रवाह से रोगी की उन्नति ही होती है, हानि नहीं होती। किन्तु यदि दो व्यक्तिया के रक्त दो मिा प्रकार के होते हैं, तो एक का रक्त दूसरे की देह मे सञ्चालित कराने से रोगो की मृत्यु हो जाती है, क्योंकि उक्त दो प्रकार के रक्त एकत्र सम्मिश्रित होने से जम जाते हैं, रक्त का प्रवाह रुक जाता है और रोगी की मृत्यु हो जाती है। यशानुक्रम के नियमानुमार उक्त चार प्रकार के मनुष्यों के सन्तान में एक ही प्रकार के रक्त का होना आवश्यक है। माता यह जाना गया है कि केवल तीन प्रकार के प्रभार चार प्रसार के रक्त उत्पन्न होते है। के लिए इतना ही कहना पर्याम होगा कि उन के साधारण इन तान जेनियों व्यक्ति जेनि मे एक बार का पाये उत्पन्न होता, - वशानुक्रम विज्ञान जेनि से "एन्टिजेन बी" (Antigen B) उत्पन होता है। श्री जेनि से किसी प्रकार का "एन्टिजेन, उत्पन्न नहीं होता है श्री जेनि से जो पदार्थ उत्पन्न होते हैं वे अधिक तीज नहीं होते हम अपने माता-पिता से अपने अपने रक्त के लिए दो-दो जेनि प्राप्त करते हैं, अर्थात् एक माता से और दूसरा पिता से। इसलिए हमारी देह में जेनि निम्न प्रकार के जोड़े में प्राप्त होंगे-AA, BB, अथवा 00, अन्यथा मिश्रित जोडे, जैसे-AB, AO अथवा BO| जब A और B दोनो जेनि एकन रहते हैं, तर दोना के गुण समान रूप से प्रबल रहते हैं। किन्तु 0 जेनि का प्रभाव A अथवा B के साथ रहने से स्पष्ट नहीं होता है, A0 में A का और BO में B का प्रभाव प्रबल रहता है। इस प्रकार पिता-माता से प्राप्त जेनि के आधार पर मनुष्य के रक्त चार प्रकार के बन जाते हैं,-सांकेतिक चिह्नों में इसी सिद्धान्त को व्यक्त करने पर इसका समझना सहज हो जायगा। A+A अथवा A+0 से जो रक्त धनेगा, उममे केवल 'एन्टिजेन ए" नामक पदार्थ ही प्रधानता को प्राप्त होगा। इसी प्रकार B+ B अथवा B+ 0 जेनि के मिश्रित होने पर जो रक्त बनेगा उसमें केवल "एटिजेन वी" पदार्थ ही प्रधानत रहेगा। AB म दोनों पदार्थ समान रूप से रहेंगे। 0+0 में केवल 0 प्रकार को वस्तुएँ रहेंगी। अर्थात्- A+ A या A+0= A प्रकार का रक्त, B+ B या B+0%DB प्रकार का रत, A+ B = AB प्रकार का रक्त एव 0+0=0 प्रकार का रक्त। 'AB' रक्त में यदि A प्रकार का अथवा B प्रसार का अथवा 0 प्रकार का रक्त सञ्चालित किया जाय तो कोई हानि नहीं होगी। किन्तु 0, A अय Bप्रकार के रक्त में 'A' रक्त मिश्रित करने पर हानि होगी। क्योकि 'AB और 0 में, 'AB' और A में एव 'AB'
सतान का पितृत्व मे निर्धारित हो
और B में विभिन्नताएँ है। इसी प्रकार. 0 प्रकार के रफ में
कवल 'A अथवा केवल B अथवा 'AB भरार के रक्त
मिश्रित होने पर भी रक्त जम जायगा। किन्तु 0 प्रकार का
रक्त अय प्रकार के रक्तों में अनायास ही मिश्रित किया जा
सकता है। अर्थात्-
AB में A अथवा Bअथवा 0 प्रकार के रक्त मिश्रित
किये जा सकते हैं, इसमे कोई हानि नहीं होगी।
किन्तु 0, A अथवा Bार के रक्त में 'AB' रफ नहीं
मिलाया जा सस्ता है।
० रक्त में भी अन्य प्रकार
रक नहीं मिलाये जा सस्ते
कितु रक्त-अन्य प्रकार के रक्त में अनायास मिश्रित फिर
जा सकता है
मनुष्यों में चार प्रकार के रक्त होने के कारण साधारणतया एक
के साथ दूसरे के मिनित होने पर हानि की सम्भावना रहती है।
एक की देह से अन्य की देह मे रक्त सञ्चालित करते समय
इन सब बातों पर ध्यान रखना आवश्यक है। मनुप्यों में
चार प्रकार के रक्त होते हैं, इसके अनुसन्धान के पूर्व यह एक
विस्मय की बात थी कि भी तो रक्त सञ्चालन से लाभ हुश्रा
और कभी हानि हुई। श्राज इम समस्या का हल हो गया है।
जैसे काली ऑसोवाली माता के गर्भ से विडालाक्षी कन्या का
जन्म सम्भव होता है, वैसे ही माता पिता अथवा सन्तान के
स्तों में भी अन्तर होना सम्भव है।
क्सिी सन्तान के पितृत्व का निर्णय करते समय उपर
बताये गये सिद्धान्तो का प्रयोग किया जाता है। अमेरिका के
संयुक्त राष्ट्र के न्यायालयों में रक्त परीना के उपर्युक्त सिद्धान्तो
को स्वीकार किया गया है। “यू एण्ड हेरेडिटी" नामक पुस्तक
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। ९८ वशानुक्रम विज्ञान मे अमेरिका के न्यायानया के कुछ दृष्टान्त दिये गये हैं। उनमे से एक दृष्टात का उल्लेख इस स्थान पर किया जाता है। अमेरिका की एक युवती वहाँ के एक गएय-मान्य व्यक्ति के विरुद्ध अदालत में यह अभियोग लाई थी कि उक्त व्यक्ति ने मेरे साथ विवाह करने का वादा क्यिा था एव उसके औरस से मेरे सन्तान उत्पन्न हुई है। इस कारण मुझे क्षति पूर्ति स्वरूप इतने रुपये दिये जायें। न्यायाधीश ने अमेरिका के प्रसिद्ध वैज्ञानिक टा० रूफस ई० स्टेट्सन को उक्त युवती और उसकी सन्तान के रक्ती की परीक्षा करने को कहा। परीक्षा के परिणाम में पता चला कि युवती का रक्त 0 प्रकार का था और उसके सतान का रक्त A प्रकार का था। इसका तात्पर्य यह था कि माता की ओर से सन्तान को केवल 0 प्रसार का जेनि प्राप्त हो सकता था। इस कारण उक्त सन्तान को पिता की ओर से ही A प्रकार का जेनि प्राप्त होना सम्भव था। इस प्रकार पिता का जेनि (जिन जेनियों से रक्त की प्रति बनी है) B प्रकार का नहीं हो सकता था, क्योंकि सन्तान को 'A' जेनि प्राप्त हुआ था। इस युक्ति के अनुसार पिता का रक्त 'A' अथवा 'AB' प्रकार का ही हो सकता था। डा० स्टेट्सन साहब ने उक्त पिता के रक्त की परीक्षा करके देखा कि उसका रक्त '0' प्रशर का था।- अत्र इसमे कोई सन्देह नहीं रहा कि उक्त सन्तान का वह पिता नहीं था। अदालत ने भी डाक्टर के मतानुसार यही राय दी। A, B और 0 जेनियों के अतिरिक्त रक्त को प्रकृति दो और गौण जैनियों से भी बनती है। उन दो जेनियो के नाम 'M' और 'N' जेनि रक्से गये हैं। अर्थात् A, B, AB, और 0 प्रकार के रक्त के अतिरिक्त MM अथवा NN अथवा MN गुण भी रक्क में मिलते हैं। एक देह से दूसरी देह में रक्त सञ्चालन के लिए M और N का किसी प्रकार का प्रभाव परलक्षित होता है, किन्तु सन्तान का पितृत्व कैसे निर्धारित हो ९९ सन्तान के पितृत्व निर्णय करने के लिए और N के होने का महत्त्व है। इन परीक्षाओं के परिणाम में वैज्ञानिक केवल इतना ही कह सकता है कि अमुक व्यक्ति अमुक सन्तान का पिता नहीं हो सकता, किन्तु इसके विपरीत यह पात निश्चयात्मक रूप से कभी कही नहीं जा सकती कि अमुक व्यक्ति अमुक सन्तान का पिता अवश्य है। विज्ञान इतना ही कह सकता है कि अमुक व्यक्ति अमुक सन्तान का पिता हो सस्ता है। अर्थात् पिता में जिस श्रेणी का रक्त है, उम श्रेणी के रक्तवाले और भी सैक्डो व्यक्ति संसार में हैं। आधुनिक विज्ञान के अनुसार पितृत्व के विरोध में ही प्रमाण उपस्थित किये जा सकते हैं, उसके पक्ष में निश्चयात्मक प्रमाण नही दिये जा सकते। M और N प्रमाण के अनुसार एक और दृष्टान्त “You and Heredity" ग्रन्थ में दिया गया है। एक विवाहित स्त्री ने अदालत में यह दावा किया कि मेरी सन्तान मेरे प्रेमी की है, मेरे पति की नही है। उसके पति ने दावा किया कि सन्तान मेरी है। A, B, AB और 0 श्रेणियों के रक्त के प्रमाणानुसार यह देखा गया था कि पति उक्त सन्तान का पिता हो सकता है। किन्तु पति के और सन्तान के दुर्भाग्यवश M और N प्रमाणानुसार यह सिद्ध हुआ कि पति उक्त सतान का पिता नहीं हो सक्ता था। पितृत्व निर्धारण की परीक्षाओं में एक और कठिनाई आ पडती है, सन्तान का रक्त परीक्षा के लिए परिपुष्ट होने में एक पूरा वर्ष अथवा उससे भी अधिक समय लगता है। किन्तु जन्म के थोडे दिनों के अन्दर ही पितृत्व निर्धारण के लिए बधो के रक्त की परीक्षा की आवश्यक्ता होती है।
वंशानुक्रम विज्ञान ऊपर दिये गये सिद्धान्ता की संक्षिप्त, स्पष्ट और सरल व्यारया नीचे दी जाती है, - पति बच्चे का पिता नहीं है। यदि बच्चे के रस की श्रेणी और स्त्री रक्त की श्रेणी पति के रक की श्रेणी निम्न प्रकार की हो निम्न प्रकार की हो निम्न प्रकार की ही 0 श्रेणी चाहे किसी भी श्रेणी का हो, AB श्रेयी AB श्रेणी चाहे किसी भी श्रेणी का हो 0 श्रेणी A श्रेणी ॥ श्रथवा B श्रेणी 0 अथवा B श्रेणी B श्रेणी 0 अथवा A श्रेणी 0 अथवा A श्रेणी एक और प्रकार के प्रमाणानुसार पति बच्चे का पिता नहीं हो सकता है। यदि बच्चे के रक्त में गौण लक्षण निम्न प्रकार का हो और स्त्री के रस में गौण लक्षण निम्न प्रकार का हो पति के रक्त में गौण लक्षण निम्न प्रकार का हो M N N चाहे जिस प्रकार का हो चाहे जिस प्रकार का हो N M MN N MN M घौर्य उत्पादन की शक्ति-सनातन वीज कोप २०१ सातवॉ परिच्छेद धीर्य-उत्पादन की शक्ति-सनातन पोज-कोप स्त्री के प्रण्डाणु में पुरुष के वीर्य से फेवल एक चीज कोप के प्रवेश करने पर जोर को देह बनती है। भ्रूण रूपी एक जीव कोप के क्रमश विभाजित होने पर जीव देह का निकास होता है। इसका परिचय हमे प्राप्त हो चुका है। एक भ्रूण कोप से महस्र कोपों की उत्पत्ति होती है। ये सन कोप अथवा जीव कोप, धीरे धीरे, एक-एक, विशेष कार्योपयोगी, मास-पेशी, अस्थि, मजा आदि विभिन अङ्गों के रूप में बनते जाते है। कितु कुछ कोष अलग रह जाते हैं। देह के बनने बनाने में ये कोई कार्य नहीं करते। देह के विनष्ट होने पर भले ही ये नष्ट हो जाये, अन्यथा इनका नाश नहीं होता। इन्ही कोपो से वीर्य अथवा वीज-कोप बनते हैं और ये पुन सन्ततिया मे पहुँच जाते हैं। इस प्रकार इन चीज कोपो का कभी भी नाश नहीं होता। एक हिमाव से ये अविनाशी हैं। जन्म के समय से हो बालक के अण्डकोपो में ये विशेष कोष्ठ रहते हैं, जिनसे कैशोरावस्था के बाद यौवनावस्था में वीर्य उत्पन्न होता है। जिस प्रकार केवल एक कोप से ही लास्रो कोप उत्पन्न होते हैं उसी प्रकार कुछ वीज कोपो से ही लासों वीज-कोप उत्पन्न होते हैं। यह प्रश्न उठ सकता है कि क्या मनुष्य देह मे वीर्य उत्पादन की शक्ति सीमित है अथवा नहीं ? साधारण रीति से यह कहा जा सस्ता है कि मनुष्य मे वीर्य उत्पादन की शक्ति सीमित नहीं है। केवल एक बार के वीर्यपात से पीस करोड से लेकर पचास करोड वीज कोप निम्लते हैं। फिर भी जिन कोषों से ये उत्पन्न होते हैं, वे पूर्ववत् हो क्रियाशील एवं शक्तिशाली रह जाते हैं। जनता ।
। वंशानुक्रम विज्ञान दह नोरोग एवं स्वस्थ बनी रहती है, उस समय तक वीर्य उत्पादन की शक्ति मनुष्य में रहती है। किन्तु स्त्री के अण्डाणुा की सरया सीमित है। जन्म से ही कन्या की देह में एक सीमित संख्या के अपरिपाय अण्डाणु रहते हैं। स्त्री के बीज कोष अण्डाणुषों में परिवत्तित हो जात हैं यौग्नावस्था में प्राय २८ दिन में फेल एक अण्डाणु ऋतु के समय निकलता है। प्राय ३५ वर्ष तक स्त्री के अण्डाणु निक्लते रहर है। उसके पश्चात् स्त्री के लिए ऋतुमाल बन्द हो जाता है। अण्डाणु यौग्नावस्था में ही परिपक्व होते हैं किन्तु अण्टाणु में भीतर के वश सूनों में (Chromosomes ) कॉमोसोम में को परिवर्तन नहीं होता। सन्तान के वीर्य अथवा अण्डाणु में जो वश-सूर (Chrome somes) रहते हैं वे पिता माता के वश सूना के ही जीवित अंश हैं। वृहदारण्यक उपनिषद् में कहा गया है कि पति स्वयं स्त्री के गर्भ में प्रवेश करता है और तर सन्तान की उत्पत्ति होती है। पिता और माता अपन अपने पिता माताओं से जो वंश सून प्राप्त करते हैं, उन्हीं के शो को वे अपनी सन्तानो को देत हैं। इस प्रकार जीवनी शक्ति का प्रवाह न जाने रिस अतीत युग से चला आ रहा है। श्राठवॉ परिच्छेद प्रायु और वश साधारण रीति से यह कहा जा सकता है कि किसी किसी वश में मनुष्य अधिक दिन जीवित रहत हैं और किमी किसी वश में मनुष्य की आयु थोड़ी होती है। साधारण व्यक्ति की यह धारणा कुछ सीमा तक सत्य है।
श्रायु और वश १०३ । कुछ डास्टरों की राय तो यह है कि मनुष्य की आयु जन्म के समय ही निर्दिष्ट हो जाती है। भविष्य में, यदि बास्मात् पिसी दुर्घटना के कारण, गाडी के नीचे दबकर अथवा छत से नीचे गिरकर, अथवा साँप के काट लेने से मृत्यु नहीं होती है तो किसी बीमारी के कारण अथवा साधारणतया व्यक्ति की मृत्यु एक निर्दिष्ट समय पर ही होगी। किसी भी उपाय से न तो स्मिी की वायु बढ़ाई जा सकती है और न घटाई जा सकती है। जन्म के समय पिता, पितामह, माता, मातामह, पितामही, मातामही श्रादि से वंश-सूनों के द्वारा वश के जो गुण अवगुण प्राप्त होते हैं, उन्हीं के आधार पर आयु धनती है। परिमित श्राहार और विहार के कारण स्वास्थ्य सुदर बन सस्ता है, नाना प्रकार के रोगों से बच सकते हैं, किन्तु थायु नहीं बढ़ सकती। इमा प्रकार दुराचरण से सास्थ्य निगढ़ सकता है, रोगी बन सकते हैं, तथापि आयु नहीं घट जायगी। इसका कारण यह है कि वशगत गुण अवगुणों के कारण हम जिस जीवनी शक्ति के सन्तराधिकारी धनते हैं, उसी के थाधार पर हमारी आयु भी बनती है। बाहरी कारणों से उसमें कोई अन्तर नहीं पड सक्ता। इस ससार मे, जीवित वस्तुश्री में, वृक्षो से अधिर और किसी की भी थायु नहीं होती। वृक्षों में भी थलग अलग यश-लक्षण होते हैं। पेड़ पौधो की आयु मे भी नाना प्रकार के तारतम्य होते हैं। कोई पौधा केवल एक वर्ष में ही मर जाता है, कोई एक ऋतु मे समाप्त हो जाता है और कोई घृक्ष बहुत वर्षों तक जीवित रहता है। आस्ट्रेलिया में एक प्रकार का वृक्ष है, जिसकी आयु वर्तमान समय में १५,००० वर्ष हो चुकी है। इस श्रेणी के वृक्षो का नाम मैकोजामिया' है। भूमि और जलवायु आदि विविध कारणो से भी वृक्षों की आयु कुछ सीमा तक घटती-बढ़ती है, वृक्षों पर उन सबों का प्रभाव भी कुछ कम नहीं है, किन्तु घृक्षों की प्रकृति में भी कुछ १०४ वशानुक्रम विज्ञान तत्त्व है, जिसके कारण कुछ वृक्षा की आयु अधिक होती है और कुछ को कम। एक ही जल-वायु और एक हो भूमि में विभिन जाति के वृक्ष विभिन्न समय तक जीवित रहते हैं। अर्थात् वृक्षों में भी वशगत धारा वर्तमान है। वन्य जन्तुओं में भी वशगत धारा के हिसाब से कोई वो अधिक दिन तक जीवित रहता है और कोई थोडे दिनो तक। व य ज तुओं को हर घडी नाना प्रकार के सकटों का सामना करना पड़ता है, तथापि साधारणतया विभिन श्रेणी के जीवों की आयु कम अधिक होती है। यदि हाथिया की ठीक-ठीक सेवा की जाय और उहे यन पूर्वक रक्खा जाय तो वे नरे से सौ वर्ष तक जीमित रह सकते हैं। अश्व की आयु साधारणतया ४५ वर्ष तक की होती है, कुत्ते और बिल्ली बीस वर्षे तक जीवित रहते हैं, बैल तीस वर्ष तक जीवित रहते हैं। उपनिषदों मे मनुष्य की आयु का प्रमाण १०० वर्ष तक कहा गया है। किन्तु महाभारत और पुराणों में मनुष्यों की आयु सहस्र वर्ष तक बताई गई है। ईसाइयों की धर्मपुस्तक 'चाईबल' मे भी प्राचीन काल के मनुष्यों की श्रायु प्राय सहस्र वर्प ही बताई गई है। किन्तु क्सिी क्सिो का कहना है कि विश्वव्यापी महाप्लावन के पूर्व वर्ष की गणना प्लावन के बाद की गणना से भिन्न थी। 'बाईवल' में ही मूसा आदि कुछ व्यक्तियों की आयु १८० वर्ष तक बताई गई है। अाधुनिक समय में कभी कभी ऐसा सुनने में आया है कि अमुक व्यक्ति की आयु १०५ वर्ष की थथया १८० वर्ष की है।- ऐसे दृष्टान्तो को छोडकर वैज्ञानिक रीति से बीमा कम्पनियों में जो गणनाएँ होती हैं, उनसे यह ज्ञात हुश्रा है कि वर्तमान समय में अमेरिका के संयुक्त राष्ट्र में प्रतिलत व्यक्तियों में केवल एक स्वपि १०० वर्ष जीवित रहता है। किन्तु औसतन अमेरिका के ।
आयु और वंश १०५ मनुष्यों की आयु पुरुष के लिए ६० वर्ष एवं स्त्री के लिए ६४ वर्ष की है। इसके अतिरिक्त विशेष विशेष यशों में मनुष्यों की आयु मिन भिन्न प्रकार की है। इस बात को रेग्यकर यह धारणा उत्पन्न हुई है कि मनुष्यों की श्रायु भी वंश परम्परा से प्राप्त जेनि फे आधार पर क्म या अधिक होती है। इस नित्य परिवर्तनशील संसार में कोई भी वस्तु अपरिवर्तित अवस्था में नहीं रह सकती। विश्व प्रकृति की भौति, मनुष्य समाज में और संसार की विभिन जातियों में भी धीरे धीरे नाना प्रकार के परिवर्तन हो रहे हैं। १०० वर्ष पूर्व जापान को विशेषता के बारे में फिसको क्या पता था। इसी प्रकार आज से १०० वर्ष बाद भी न जाने कौन अज्ञात अयना ज्ञात जाति समार के रवमय पर अपनी अमावनीय विशेषता का परिचय दे सकेगी। गनुप्य-समाज मे नाना प्रकार के परिवर्तना के माथ-साथ मनु'यो के आयुकाल मे.भी परिवर्तन दिखाई देते हैं। विगत १८वीं शताब्दी में, यूरोप मे, मनुष्य की आयु औसतन ३५ वर्ष तक की होती थी। ई० सन् १९०१ में यह ५० वर्ष तक पहुँच गई थी। श्राज, औसतन, मनुष्य की आयु अमेरिका में ६० वर्ष की होती है। चिकित्साविज्ञान की उन्नति के कारण डिप्थिरिया और कुकुर- साँसी आदि रोगों से अब १०० मे ८० बच्चे बच जाते हैं। ताऊन, हैजा श्रादि धीमारियों से भी पहले की अपेक्षा आजकल क्रम आदमी मरते हैं। इस प्रकार पूर्वापेक्षा श्राजकन अधिक मनुष्य जीवित रहते हैं, किन्तु व्यक्तियों की आयु इन सब बाता से अधिक चढी नहीं। फेवल वचों के लिए ही यह कहा जा सस्ता है कि आधुनिक युग में उनके बचे रहने की आशा पहले से बढ़ गई है। मनुष्यों की मृत्यु कैसे और क्यों होती है, इसका ज्ञान अभी तक विज्ञान को प्राप्त नहीं है। किसी वैज्ञानिक का कहना है वशानुक्रम विज्ञान कि मनुष्य-वेह में कोई-कोई अंग सड़ने लगता है। दूसरे वैज्ञानिकों का कहना है कि हमारी धमनियों में रक्त प्रवाह की शक्ति कम हो जाती है और उनमें दूसरे प्रकार के भी परिवर्तन हो जाते हैं इसी से मनुष्य की मृत्यु हो जाती है। ऐसे भी वैज्ञानिक हैं जो कहते हैं कि देह की प्रथियो की शक्ति लुप्त हो जाने के कारण मनुष्यों की मृत्यु हो जाती है। कितु चशानुक्रम विज्ञान के अनुसार यह मत सबसे प्रत माना जाता है कि वश परम्परा से प्राप्त जेनि के कारण ही मनुष्यों की आयु जम के समय से ही निर्दिष्ट हो जाती है। सम्भव है, विशेष विशेष जेनि के कारण, देह के विशेष विशेष प्रग एक नियत समय पर क्षय को प्राप्त होते हो। हदय यन्त्र मा नियन्त्रण, सम्भन है, किसी एक जेनि द्वारा होता हो, अथवा कई एम जेनि के सम्मिलित प्रभाव से देह रूपी यात्र के विशेप-विशेप अग एक साथ नियनित होते हों। वैज्ञानिकों ने मनुष्यदेहाश्रित कुछ विशेष-निरोप जेनि की पहचान र ती है। उनमें ऐसे भी जेनि हैं, जिनके कारण मनुष्यों की मृत्यु हो सकती है। पेड-पौधों और जन्तुओं में भी ऐसे जेनि प्राप्त हुए हैं। ऐसे भी जेनि हैं, जिनके कारण गर्भावस्था में ही अथवा जन्म के थोड़े दिनो के अन्दर ही, जीन की मृत्यु हो जाती है। हमें ऐसे परिवार मालूम हैं, जिनमें बच्चे अत्यल्प समय के अदर ही मर जाते हैं। जिन निम्न श्रेणी के प्राणियों को लेकर वशानुनम के सम्बन्ध मे परीक्षाएँ की जाती है, उनम ऐसे मृत्युवाही अने जेनि का पता चला है। किन्तु मनुष्यों में इस प्रकार के प्राण नाश थोड़े जेनि का ही पता चला है। इस प्रकार के और भी शिवी सोज आज तक हो रही है। कभी- कमी ऐसा देखा गया है कि स्त्री गर्भधारण का अनुभव करती है, किन्तु थोडे ही दिनों में मालूम होता है कि वह गर्भवती नहीं हुई थी। । 1 देगा आयु और यश १०७ ऐसे पानसरों पर वैज्ञानिकगण अनुमान करते है कि स्त्री यथार्थ में गर्भवती हुई थी, किन्तु मृत्यु-वहनकारी जेनि के कारण उस गर्भ का नाश हो गया। जेनि के कारण ही कभी कभी गर्भ- पात भी हो जाता है। जिस जेनि के कारण मृत्यु हो सकती है वह जेनि किसी भी देह में अकेले नहीं रह सकता। अथवा यो कहना और भी उचित होगा कि किसी एक जेनि के कारण प्राणी की मृत्यु नहीं हो सस्ती। ऐसा होना सम्मव ही नहीं, क्योंकि जिस जेनि के कारण मृत्यु हो सस्ती है, वह जेनि उत्तराधिकार के मूत्र से पन्चे में आ ही नहीं सकता। भ्रण मे प्राते ही तो वह भ्रूण को नष्ट कर | इस कारण यह अनुमान किया जाता है कि मृत्यु-बहन- भारी जेनि अकेले कार्यकारी नहीं होते। दो प्रथना उससे अधिक जेनि मामूहिक रूप में कार्यकारी हो सकते हैं। ऐसे विपाक्त जेीि में से एक को तो पिता की ओर से और दूसरे को माता की ओर से सन्तान प्राप्त कर सकती है। एक प्रकार के रोग में बच्चों की अगुलियाँ नहीं के बराबर रहती हैं। अनुमान किया जाता है कि वश परम्परा से प्राप्त जेनि के प्रभाव से ही ऐसा होता है। वैज्ञानिको के निकट एक ऐसा दृष्टान्त उपस्थित है, दो निफ्ट श्रात्मीय, चचेरे भाई-बहनो के सम्मिलन से एक ऐसी कन्या का जन्म हुआ था, जिसके न पैर को एक भी उँगली थी और न हाथ की। दो वर्ष की आयु में इस लडकी की मृत्यु हो गई थी। होमो फिला एक और प्रकार की बीमारी है। इस रोग में एक बार रक्त स्राव प्रारम्भ हो जाने से फिर रक्त का निकलना बन्द नही हो सकता, पौर रोगी की मृत्यु अनिवार्य हो जाती है। इस रोग की भी उत्पत्ति वश परम्परा से प्राप्त जेनि के कारण ही होती है। इस रोग के मूल में भी दो जेनि ही क्रियाशील रहते हैं। हीमोफिला" रोग युक्त कोई भी व्यक्ति अधिक दिन जीवित नहीं रह सकता। ।
१०८ वंशानुक्रम-निशान यदि कुछ जेनि के कारण गर्भावस्था में, अथवा शिशु अवस्था में या बाल्यावस्था मे जीव की मृत्यु हो सकती है, तो ऐसे भी जेनि हो सकते हैं जिनके कारण किसी दूसरे नियन समय पर, अधिक अवस्था में मनुष्य की मृत्यु होती हो। अभी तक येज्ञानिक रीति से इस सिद्धान्त की पुष्टि नहीं हुई है। किन्तु वंश के हिसान से यह देखा गया है कि किसी किसी घर में लोगों की आयु फम होती है और रिसी किसी में अधिक। उत्तराधिकार-सूत्र से जेनि को पाना हो इसका कारण है। अमेरिका और यूरोप प्रादि देशों में धीमा-यम्पनियों ने सैकड़ो परिवारों की परीक्षाएं की है। उन परीक्षाओं के आधार पर यह कहा जा सकता है कि मनुष्यों की प्रायु दीर्घ और अल्प होना वशगत है। धीमा-कम्पनियो का कहना है कि जिस व्यकि के माता पिता अधिक दिन जीवित रहें, इस व्यक्ति की आयु अधिक होने की सम्भावना है। जिस वंश में माता पिता अधिक दिन जीवित रहते हैं उस वंश में बीस वर्षयाले व्यक्ति के जीवित रहने की आशा अन्य यश की अपेक्षा कम से कम ढाई वर्ष अधिक की जा सकती है। जिस वंश मे माता पिता ७५ वर्ष तक जीवित रहें उस वंश के ३० वर्ष के व्यक्यिों में से प्रतिशत २६ ६, ८० वप तक जीवित रह सकते हैं। और जिस वंश में माता पिता ६० वप तक जीवित रहें, उस वश में, प्रतिशत २०३ व्यक्तियों की ३० वर्ष की अवस्था में यह श्राशा की जा सकती है कि वे ८० वर्ष तक जीवित रहेंगे। डाक्टर रेमण्ड पर्ल महोदय ने बहुत-सी परीक्षाएं की हैं। उनकी दृढ राय यह है कि वश परम्परा से प्राप्त जेनि के श्राधार पर ही मनुष्यों की आयु कहीं दीर्घ होती है और यही अल्प । डा० पल ने यह देखा है कि जो लोग १० अथवा १०० वर्ष तक जीवित रहे, ऐसे १०० व्यक्तियों में से ८७ के माता अथवा माता- और वंश श्रायु १०९ पिता, दोनों की आयु दीर्घ थी। उनमे से ऐसे बहुत से व्यक्ति थे, जिनकी मातामही, पितामह श्रादि पूर्वजगण अधिक श्रायु- वाले व्यक्ति थे। इसमें कोई सन्देह नहीं कि पारिपार्श्विक वातावरण का प्रभाव भी मनुष्यों पर कम नहीं है। गरीब घरों में चचों की मृत्यु बनिस्बत अमीर घरों के अधिक होती है। इस स्थान पर एक और रहस्यपूर्ण वात का स्मरण रसना अच्छा होगा। साधारणतया लोग यह समझते हैं कि स्त्री की अपेक्षा पुरुष अधिक शक्तिशाली है। किन्तु वास्तविक क्षेत्र में खी पुरुष की अपेक्षा अधिक जीवित रहती है। ई० सन् १९३५ को गणना के हिसाब से अमेरिका की Metropolitan Life Insurance Co ने निम्नलिखित हिसाब लगाया था- जीवन की श्राशा (यूरोपियनों के लिए) किस श्रायु मे पुस्प जीने की आशा स्त्री जीने की याशा कर सकता है कर मस्ती है ३० वर्ष और भी ३८ वर्ष और भी ४१ वर्ष " " ४० वर्ष ५० वर्ष ६० वर्ष ७० वर्ष ८० वर्ष २९ वर्ष २० वर्ष १५ वर्ष ३२ वर्ष २४ वर्ष १६ वर्ष १० वर्ष " " ५ वर्ष ९ वर्ष ५६ वष वैज्ञानिकगण इस सोज में लगे हुए हैं कि हम मृत्यु से कैसे बच सकते हैं। इसी सम्पर्क में प्रायु के सम्यन्ध में भी खोज हो रही है। बहुत से वैज्ञानिक यह आशा कर रहे हैं कि मनुष्यों को वायु १२० वर्ष तक घदाई जा सकती है। मेचनि पशानुमाम विज्ञान ११० फाफ नामक एक रूस के वैज्ञानिक भाशा करते हैं कि मनुष्यों मी आयु १८५ वर्ष तक पहुँच सकती है डा० लेकमिस परल अमरिका के एक यहे भारी वैज्ञानिक है। इहें नोपेरा पुरस्कार प्राप्त हुआ है। विज्ञान के क्षेत्र में होने अति पाश्चर्य-जनक यार्य करके दिग्पाया है। प्राणि देह से इहोंने मांसपेशी और दूसरे अगमयों को काटकर निकाल लिया है और उन्हें मातों में रखकर अपने इवानुमार जितने दिन चाहा जीवित रस्मा, मितु जब ये मांसपेशी अथवा जीव-देह के अग प्रयंग मनुष्य-देह के प्रग के रूप में रहते हैं, तर उनका स्वतन्त्र अस्तित्र ही रहता है। जोषित देह मे ये श्रग किसी एक मूल तत्व के नियन्त्रण में रहते हैं, इस कारण हामा जीवित रहना और पृद्धिमाप्त होना समग्र जोर के प्रयोननानुसार होता है। इस दृष्टि से विचार करने पर यह "प्राशा की जा सकती है कि भविष्य में विज्ञान को सहायता 'से हमारी प्रायु अपनी इच्छा पर बहुत पुत्र प्ररलम्चित रहेगी। एक और थाश्चर्य की बात का उल्लेख करके हम इस अयाय को समाप्त करेंगे। फुछ ऐसे पोट पतग हैं, जो पुत्र कारणों से मृतात् हो जाने हे, मितु अनुकूल वातावरण में जन वायु क सस्पर्श में प्राकर वे पुन जीवित हो जाते हैं। मृनवत् प्रास्या में वे पचा को तरह इधर-उधर उडी रहते हैं, लितु जीवित होने पर वे फिर जीवित प्राणियों की तरह प्राचरण करते हैं। उत्तर मेर मे रूस के वैज्ञानिकों ने वर्क में जमे हुए पेड पौधों को पुन सजीवित कर पाया है। यूरोप में भी कुछ जीवों को वर्क में रपार यह देखा है कि उस समय क लिए वे मृतात् हो जाते है, किन्तु उन्हें पुन जीवित किया जा सकता है। अर्थात् यदि मनुष्यों को भी वर्फ मे ढक्कर सौ वर्ष तक मृतवत् रक्सा जाय, तो सौ वर्ष के बाद उनके जीवन का पुनरारम्भ हो सकेगा।
इन दो जीनों फीन माता है न पिता, क्योकि एक झोप से दो
कोपा के हो जाने पर प्रथम कोष का अस्तित्व ही नहीं रह जाता
श्रा जाता है। पुन इन नवीन कोपा का प्रत्येक फोप फिर
द्विरसरित होता है। इस प्रकार अतीत काल से लेकर श्राज तक
जीवनी शक्ति का अग्वएड स्रोत नित्य प्रवाहित होता
इस प्रकार एक हिसाब से जीरनी शक्ति अविनाशी है।
अस्था मे जीव के लिए मृत्यु नहीं थी।
वंश और वातावरण
यहाँ पर अपने देश पेठयोगियों का भी उपकर देना
श्रावश्यक है। हठयोगियों का दावा है कि उनकी प्रियाओं के
अनुसार मनुष्य अपने इच्यासार सस्य एवं जीवित रह सपने
है। आधुनिक विज्ञान को अभी इस बात का पता नती है।
नवों परिच्छेद
वश और वातावरण
सोमाटोसाम् और जर्मसारम् अर्थात जोरमेह के कोप श्रयमा
जीव-कोप और वीर्य अथवा योज-योप-प्रआधुनिक विज्ञान
मतानुसार जीव से हो जोर की उत्पत्ति होती है। पिस प्रतीत
युग में, किस मुहूर्त म सर्वप्रथम प्राण की उत्पत्ति हुई थी, इमा
निर्णय श्रान भी नहीं हो पाया है। किन्तु अनेर पीपात्रों
के परिणाम में यह ज्ञात हुया है कि प्राणदीन वस्तु मे प्राण
की उत्पत्ति नहीं हो सस्ती। प्राण से ही प्राण की उत्पत्ति होनी
आ रही है। अति आदिम अपस्या में एकाप जोर द्विसपिठत
होर दो योपों में, अर्थात् दो जोवों में, परिणत हो जाता है।
। प्रथम कोप का समस्त पदार्थ इन दोनों नवीन को
व्याया
प्राथमिक
।
वशानुम्म-विज्ञान मेघावी नहीं होते। किन्तु यह कैमे पदा जाय कि वश के कारण ही ऐसा होता है, दरिद्रता एवं पारिपाश्विक वातावरण के कारण नहीं? इसी प्रकार भारतीय वर्णव्यवस्था भी वश के आधार पर अवलम्बित है। यह व्यवस्था भी श्राधुनिक विज्ञान के अनुसार समर्थन योग्य है अथवा नहीं, श्रादि आदि प्रश्नों की मीमांसा वशानुक्रम-विज्ञान से प्राप्त हो सकती है। इसलिए यह प्रश्न बहुत महत्त्व का है कि वातावरण अथवा वश के प्रभाव में से कौन अधिक महत्व रखता है। कुछ बातों में तो यह अत्यन्त स्पष्ट है कि वश-परम्परा से प्राप्त गुण अगुणों का प्रभाव अर्थात् धीज-कोपों का प्रभाव वातावरण से अधिक महत्व रखता है। एक दृष्टान्त लीजिए,-- सफेद घुहियों के पेट से यदि सय अण्डाणु निकाल लिये जायें और उसमें काली चुहियो के अण्डाणु रस दिये जाये तो सफेद चुहियों के बच्चे सन के सर काले ही होगे, सफेद नहीं। बच्चे पैदा हा जाने के बाद ही, दूसरे के अण्डाणु चुहियों के पेट में रस दिये जाते हैं और वे अण्डाणु दूसरे के पेट में रहते हुए भी पूर्ववत् क्रियाशील रहते हैं। इतने मिन्न वातावरण मे रहते हुए भी चीजकोष अर्थात् अएटाणु अपने स्वभाव को नहीं छोडते । इसी प्रकार यदि सफेद गुलाब के फूल की डाल लाल गुलाब के पौधों में लगा दी जाती है तो उस लाल गुलाब के पौधे से सफेद गुलाव के फूल ही निक्लेंगे, लान नहीं। चूहों की भांति दूसरे प्राणियो के पेट से भी अण्टाणु निकालकर परीक्षा की गई है। इन सन परीक्षाओं के परिणाम में यह निश्चयात्मक रूप से निर्धारित हो जाता है कि बीजकापों पर पारिपाश्विक वातावरण का कोई प्रभाव नहीं पड़ता। निम्न श्रेणी के जीवों एव पेड-पौधों पर और भी अनेक प्रकार की परीक्षाएँ हुई हैं, और उन सब परीक्षाओं के परिणाम में यह प्रमाणित हुआ है कि साधारणतया •देखिए-Human Heredity by Baur Fischerittenr- वंश और वातावरण चीजकोपों पर बातावरण का प्रभाव नहीं पड़ता निम्न श्रेणी के जीवों और पौधों को लेकर जैसी परीक्षाएं हुई है, वैसी परीक्षा मनुष्यों पर करना सम्भव नहीं है। किन्तु जो नियम पेड. पौधों के लिए एवं निम्न श्रेणी के जीवों के लिए लागू हैं, वे नियम मनुष्यों के लिए भी लागू होंगे ऐसा समझना युक्ति-संगत एव स्वाभाविक है। प्राणियों पर वातावरण का भी यथेष्ट प्रभाव पड़ता है, इसमे कोई सन्देह नहीं। यदि सगठिन एवं व्यापक रूप मे शिवा की व्यवस्था की जाय एव दरिद्र तथा अर्थशाली घरों के लड़को तथा लड़किया के लिए समान रूप से रहने और साने पीने की व्यवस्था की जाय, तब यह पता चलेगा कि वंश के हिसाब से क्तिने पालक प्रबर बुद्धिगाले निकलते हैं और कितने नहीं। सोवियट रूस में इसकी परीक्षा हुई है और यह ज्ञात हुआ है कि प्राकृतिक कारण से वशगन गुण अवगुणों के उत्तराधिकारी होने के कारण व्यक्ति व्यक्ति में बहुत अन्तर है। किन्तु सामाजिक क्षेत्र में इस सिद्धान्त का प्रयोग करते समय बहुत सावधान होने की आवश्यक्ता है। पेशगत गुण अवगुणों के हिसाब से कहीं भी समाज की व्यवस्था नहीं हुई है। भारतीय वर्णन्यवस्था के आधुनिक रूप में न जाने कितनी ग्रुटियां श्रा गई हैं। हमारे समाज में भी आज गुणी व्यक्तियों के लिए उपयुक्त स्थान नहीं है। वहुत से वैज्ञानिक इस मत के अधिक पक्षपाती हैं कि वंश की अपेक्षा शिक्षा-दीक्षा और पारिपार्श्विक वातावरण का अधिक महत्त्व है। उनका कहना है कि सामाजिक वातावरण और शिक्षा-दीक्षा के कारण सभी मनुष्य उपयुक्त रूप से शिक्षित किये जा सरते हैं। P39 -जन दो ११८ चंशानुनम विज्ञान वे वश के फेर में पड़ना नहीं चाहते। वे लोग वैज्ञानिक दृष्टि से इस बात की सोज कर रहे हैं कि वंश के हिसाब से, समान रूप से मानसिक शक्ति श्रादि के उत्तराधिकारी होने पर भी, पारिपाश्विक वातावरण के कारण मनुष्यों में विभिन शक्तियों का पुरण सम्भव होता है। यमज सन्तान को लेकर आज भी परीक्षाएँ हो रही हैं। यमज सावान दो प्रकार की होती हैं। जब एक ही स्त्री अण्डाणु में एक पु-बीजकोष प्रवेश करता है तो कभी-कभी एक ही भ्रूण दोश्रमो में परिणत हो जाता है और तम दो बच्चे एक साथ जम लेते है। ऐसे वचों को 'मनोवल ट्विन्स' (Monoval Twins) कहते है। एक दूसरे प्रकार के यमन सन्तान होते हैं, अण्डाणुओं मे दो पु-बीज-कोप अलग अलग प्रवेश करते हैं तय दो बच्चे एक ही पेट में तो जन्म लेते हैं, किन्तु उनका विकास दो भाइयों की तरह होता है। ऐसी यमज सन्तानों को प्रेटर्नल दिवस ( Fraternal Twins ) कहते हैं। 'मनोवल' अथवा 'श्राइडेटिक्ल' ( Identical ) टिरस एक ही लक्षणोवाले होते हैं, प्रोटर्नल ट्विन्स एक ही लिङ्ग-विशिष्ट हो भी सकते हैं और नहीं भी हो सक्ते । वे, दोनो लडके प्रथवा दोनों लड़कियाँ या एक लडका और उसकी साथी एक लडकी भी हो सकती है। वंशानुनम की दृष्टि से अर्थात् वशगत गुण अवगुणा के उत्तराधिकारी होने की दृष्टि से मनोवल दिवन्स मानों एक ही व्यक्ति के दो शरीर हों। गैटर्नल दिवन्स मानों दो भाइयों अथवा दो बहनों अथवा एक भाइ और एक बहन ने अचानक, एक ही साथ माँ के पेट में जन्म लिया हो। माई भाई अथवा भाई वहनों में जो अन्तर रहता है, ठीक वैसा ही अन्तर मेंटर्नल ट्विन्स में भी रहता है। .
वश और वातावरण मनोनरा दिनन्स के विभिन्न अङ्ग-प्रत्यगों में अत्यन्त प्राश्चर्य जनक सादृश्य रहता है। टर्नत दिवस में उतना सादृश्य नहीं रहता। मनाल टिनन्स में निम्नलिखित विषयों पर अत्यन्त सादृश्य रहता है-(१) लिग एक ही प्रकार का होगा. (२) रक्त भी एक प्रकार का ही होगा, (३)रक का दवाव ( Blood Pressure) एक होगा, (४) नाड़ी की गति एय श्वास प्रवास की गति भी एक प्रकार की होगी, (५) आँस का रह एव दृष्टि- शक्ति भार की होगी, (६) देह का रङ्ग, बालो का रङ्ग एवं यात में यदि कोई चाहो तो वे सब एफ प्रभार के होंगे, (७) हथेली, पैर के तलरे एवं उँगलियों का ढाँचा एक सा होगा। (८) उनकी लम्बाई, वजन, मस्तक का ढाँचा, ग्वं मुबडे की पावट एक सी होती हैं। फ्रेटर्नल विन्म में सक्क मार का कोई सादृश्य नहीं होता। वैज्ञानिकगण, मनोरल' एव टर्नल' ट्विन्म के बारे में रत्ती रत्ती घातों पर ध्यान देते हैं। वे जानना चाहते हैं कि यदि 'मनोबल' ट्विन्स यचपन से ही अलग अलग रस दिये जाते हैं, तो उनो मिसी प्रकार की चरित्रगत विभिन्नता उत्पन्न होती है अथवा नहीं। यदि मनोवल टिवन्स के चरित्र अलग अलग रक्से जाने पर प्रतग थलग रूप से विकसित होते हैं, तो यह समझा जायगा कि वश से वातावरण का प्रभाव प्रगल है। और यदि उनके अलग प्रतग रक्से जाने पर भी उनके चरित्र का निकास एक प्रकार में ही होता है तो यह मानना पड़ेगा कि पारिपार्थिक वातावरण की अपेक्षा वंश का प्रभाव ही प्रनल होता है। इसी प्रकार गैटर्नल ट्विन्स के एक साथ लालित पालित होने पर यदि उनके चरित्र का विकास एक सा हो होता है, तो वंश की अपेक्षा वातावरण का ही प्राधान्य माना जायगा। ८ १२० वंशानुम्म विज्ञान यह देसा गया है कि एक ही परिवार में लालित-पालित होने पर भी भाई भाई के चरित्र में जितना सारश्य रहता है, फ्रेटर्नल दिइन्स के परस्पर के चरित्र में उनसे अधिक सादृश्य होता है। स्न्तुि मनोवल दिवस में यह सादृश्य प्रेटर्नल ट्विन्स की अपेक्षा कहाँ अधिक रहता है। कभी कभी ऐमा भी देखा गया है कि जम के समय मनोवल ट्विन्स में से एक मृत अवस्था में माँ के पेट से निम्लता है। यदि मनोवल अर्थात् प्राइडेटिकल ट्विन्स यथार्थ में सबोग रूप से एक ही होते तो जम के समय दोनों ही मृत अवस्था में जम लेते अथवा दोनों ही स्वस्य अवस्था में। इस कारण यह अनुमान किया जाता है कि मनापल ट्विन्स भी सर्वाङ्ग रूप से एक प्रकार के नहीं होते एव माँ के पेट में भी वे सङ्गिरूप, एक ही वातावरण मे, नहीं वृद्धि प्राप्त करते हैं। मनोवल विन्स अथो। आइडेन्टिकल दिनस में परस्पर जो अन्तर रहता है उसके भी कारण हैं। भ्रूण कोप के द्विग्यण्डित होने के समय पर भी यह विभिन्नता निर्भर करती है। यदि भ्रूण कोप के यनते हो कोप का विभाजन हो जाता है, तर दोनों यमेज सन्तानों में यथार्थ में बहुत बडी समता रहती है, माना एक ही जीव दोना देहा में जीवन धारण करता हो। किन्तु यदि भ्रूण की देह बनने में कुछ समय बीत गया हो एव देह के दक्षिण और वाम अगों का बनना प्रारम्भ हो गया हो, तब उस अवस्था में भूक द्विपण्डित होने पर दक्षिण भाग से उत्पन्न बचा दूसरे बच्चे से कुछ अधिक पुष्ट होगा एव वह दूसरे बच्चे से कुछ पहले ही जन्म ले सस्ता है, इस प्रकार यमज स तानो में से प्रथम बच्चा दूसरे से वजन में भी कुछ अधिक भारी होगा। इसी कारण यमज सन्तानों मे जो पचा प्रथम ज म लगा, वह परवर्ती जीवन में दूसरे से शारीरिक और मानसिक गुणों में भी अधिक परिपुष्ट होगा।
वश और वातावरण १२१ दर्पण में अपने मुस को देखते समय हम अपने मुख के विशेप विशेष लक्षणों को अपने प्रतिबिम्न में जिस प्रकार देस पाते हैं, उसी प्रकार कभी कभी मनोपल यमज सतानो में समान-समान लक्षण दर्पण के प्रतिविम्ब जैसे बन जाते हैं। अर्थात् जो लक्षण एक के दक्षिण अङ्ग में दिखाई देगा, वही लक्षण दूसरे के वाम प्रङ्ग में दिखाई देगा। अति प्राथमिक अवस्था मे भ्रूण के निभाजित होते समय यदि विभाजन अपूर्ण रह जाता है तो नाना प्रकार के विचित्र रीति से जुड़े हुए यमज मतान जन्म लेते हैं। सभी एक ही देह मे दो मस्तक बन जाते हैं, अथवा एक देह में चार हाय चार पैर निकरा आते हैं। साधारणतया पिसी किसी वश मे यमज सन्तान प्रधिक जन्म लेते हैं, अर्थात् यमन सन्तान का होना वंशगत लक्षण है। यूरोप में और अमेरिका के युक्त राष्ट्र में प्रति ९० मे एक यमज सन्तान जन्म लेती है और जापान में प्रति १६० में १ यमज सन्तान होती है। माता की आयु अधिक होने पर ही फैटर्नल टिवन्स का जन्म सम्भन होता है। कभी कभी किसी किसी माता के एक साथ तीन-तीन बच्चे भी जन्म लेते हैं । कभी तो एक ही अण्डाणु से तीनो जन्म लेते हैं, और कभी कभी दो अण्टाणुओं से तीन के जन्म होते हैं, जिनमें दो तो मनोवल अर्थात् प्राइडेटिक्ल दिइन्स होते हैं और तीसरा 'फ्रटर्नल दिवन' होता है। ऐसा अनुमान किया जाता है कि प्रति ८,००० ज म मे एक बार तीन यमज सतानों का जन्म होता है। कदाचित् एक साथ चार सतानों का भी जन्म होता देखा गया है। प्राय ७.०,००० जन्म में एक बार चार सन्तानो का एक साथ जन्म होता है। ये सब प्रॉकडे यूरोप के ही हैं। सन् १९३४ को मई में अमेरिका में ५ बहनें एक साथ उत्पन्न लेकर वैज्ञानिक रीति से अत्यन्त सावधानी, ।
१२० वशानुनम विज्ञान के साथ परीक्षाएँ की गई हैं, उनके परस्पर के व्यवहार के प्रति अत्यन्त ध्यान रक्सा गया है और उनके प्रत्येक श्राचरण का निरीक्षण किया गया है। उन पाँच यमज लडक्यिों में जो सबसे बडी थी वह और मय बहनों के साथ बहुत ही प्रेम से मिलती-जुलती थी। पढन तिसने में, बुद्धि विवेचना में वह सनसे होशियार थी, किन्तु सेल पूद के समय वह दूसरी बहनों को सबसे अधिक मौका देती थी। दूसरी यहन हर बात में अपने को ही श्रागे रसती थी। वह चाहती थी कि सर वहनें मेरी ओर ताफ्ती रहें। तीसरी यहन भोली भाली अपन में मस्त लड़ी थी। उसे यह परवा नहीं थी कि कौन सेल-कूद में सबसे आगे घढ पाती है, और मुझे अधिक मौका मिलता है अथवा नहीं। चौथी बहन के बारे में कुछ कहना कठिन था, क्योकि वह कभी कुछ और कभी कुत्र करती थी। पाँचवीं यहि 7 सबसे कमजोर एवं प्रपटु थी। हर यात में उसे सहायता की आवश्यक्ता थी। उमरी बड़ी बहन हर घडी उसकी सहायता के लिए उमके पास दौड रोड़ श्राती थी। जेनि के हिसाब से इन पांचों लडमियों की देह मे एक ही प्रकार के जेनि थे, किन्तु वास्तविक जगत् में ये पांचों एक दूसरी से स्तिनी भिन्न थीं। इस दृप्रान्त से यह भी अनुमान काना अस्वाभानिक नहीं है कि जेनि क श्राधार पर ही व्यक्तित्व के विकास का समस्त रहस्य सद्घाटित नहीं होता है। आधुनिक विज्ञान पूर्वजम को मानता नहीं। सम्भव है, भविष्य मे मानना पडे । पूर्वोक्त पाँच बहनों के सिवा दूसरी यमज स तानो को लेकर भी दूसरी प्रकार की परीक्षाएं हुई हैं। एक मनोवल यमज स तानी के जम के थोडे ही दिनों के अन्दर उनके माता पिता की मृत्यु हो गइ । उनके निकट आत्मीयो मे से एक ने उन यमज लड़क्यिों में से एक को पाला, दूसरी को दूसरे ने ।
यश और वातावरण १२३ पाला। सबसे पहले तो परीक्षा परके यह देस तिया गया कि ये यमज लडकियाँ मनोरल ट्विन्स है अथवा नहीं। फिर कुछ यो के पश्चात् वे लडमियों एकर हुई तर उनको बुद्धि की परीक्षा की गई। उनके स्वाल और कालेज की परीक्षाओं के फ्लो की तुलना की गई। इस प्रकार यह देया गया कि विभिन्न वातावरण के कारण दोनों बहनों में युछ कुछ अन्तर हो गया है। अर्थात् वैज्ञानिकों के मतानुसार उपर्युक्त दृधान्त से यह मित हुया कि वंशगत जेनि की अपेक्षा वातावरण अधिक प्रमल है। किन्तु इन दोना लडकियों के चरित्रों में जो अन्तर पाया गया यह बहुत अधिक न था। यह बात सत्य है कि दोनों लडक्यिों हो सर के वातावरणों में लालित मालित हुई थी, एक दूसरी मे अधिक पीडित हो गई थी एक राड़की के साथ एक परिवार का व्यवहार अच्छा नहीं हुआ था, आदि, आदि कारणों से उनकी प्रतियों में अवश्य कुछ अन्तर हो गया था।- इस दृष्टान्त से एक और प्रश्न उदित होता है। ऊपर के दृष्टान्त से हमने केवल इतना ही जान पाया कि दो लड़कियों, वंशपरम्परा से प्राप्त गुण-अवगुणो की उत्तराधिकारी समान रूप से होने पर भी, विभिन्न वातावरण में उनके परस्पर के चरित्र और स्वभार कुर भिन्न भिन हो गये। यह भिन्नता भी अधिक नहीं थी। किन्तु हमारे सम्मुस सबसे महत्त्व का प्रश्न तो यह है कि यदि वश के हिसाब से दो व्यक्ति समान रूप से बुद्धिमान् एवं मान सिक तथा पाििनक स्वभाव मे भी समान न हो तो क्या उनमें मन्द बुद्विवाला व्यक्ति, शिक्षा-दी और पारिपाश्चिक वाता वरण के प्रभाव से, दूसरे व्यक्ति के, जो साभाविक रूप से अधिक बुद्विमान था, बराबर हो सकता है ? अर्थात् पशगत विभिन्नताएँ रहते हुए भी क्या पारिपार्श्विक वातावरण के कारण, उपयुक्त शिक्षा-दीक्षा के कारण, मन्द बुद्धिवाला, क्रूर स्वभाव विशिष्ट व्यक्ति
१२४
पेशामा-रिक्षा
बुद्धिमान् पर दयार म्पमाव-विशिष्ट बन जायगा। यह पान
सत्य है कि यमज सधानों को लश परीक्षा करने से पफ बड़ी
सुविधा यह ral है कि ये दो यश के हिमाय से ताram
फेदी गुग-मम्पन हांगे, किन्तु इस पात मता पर मदेर
ही नदी कि वशगत उत्तराधिकार-सूम मे हम पिन गुण पर
गुग्गों को, स्मि स्वभाव को प्राप्त होते है ये परिशिष्ट यालारण
के लिए ही मत्य य पार्य, सर्शनस्था में ये समान र
में सन्य ही दो मरते।
अध्यापक न्यूमैन ( Professor Nex man) महोय
पहुन सी यमन सन्तानों की परीत परय दानियों पर पहुँचे-
श्रादहेन्टिकल दियन्म के चरिय में या उनके समान,
उनी युद्धि एनरे शारीरिफ गठा प्रादि प्रादि रिपयों में स्वनी
अधिर ममानता होती है कि पयल यातारण के आधार पर
या सम्मन नर्ग। मोग विन्स, अथ एक प्रमाणु मे
त्पन्न दो यमन सन्तान यदि अलग अलग रहकर मिन गिप
पावारण में लातिन पारित होते हैं, तो भी उनका पारपरिष मेन
मे प्रंटर्नल टिम फे पारस्सरिक पारिवारिक मेल को प्रपेश पा
अधिक होता है जो एक ही परिधार में, एक ही धातावरण में लान
पानित होने हैं। इस कारण यह अनुमान किया जा माता है
कि वंश परम्परा से प्राप्त गुरा अरगुण के कारण मनुष्य का रिय
पहत पुर यनता है। इसके माथ-माय यह भी स्मरण ग्मना
श्रावश्यक है कि धारडेटिरल दिवस में निवनी शामरिक माना
है, उनी भगता मासिक अथवा साधारण व्यक्तिन्य क बार में
नहा है। सक्षेप में अध्यापन न्यूमा का कहा है-शारीरिक
लदणा के सम्बन्ध में वातावरण की अपेरा यश का प्रभार अधिर
होता है, किन्तु व्यक्ति की युद्धि के विकसित होने में वश की
अपेक्षा यातावरण का प्रभाव अधिक प्रबल होग है। शिक्षा
यश और वातावरण १२५ दीना के बारे में वातावरण का प्रभाव और भी प्रभावशाली होता है, और व्यक्तित्व एव साधारण स्वभाव के विकसित होने में पारिपाश्चिक वातावरण का प्रभाव सर्गापेक्षा प्रगल प्रमाणित हुआ है। अध्यापक जे० लैंग ने भी यमज सतानी को लेकर परीक्षाएं की हैं। उनकी परीक्षा का फल दूसरो से कही भिन्न है। अध्यापक लैंग ने ऐसे दृष्टात उपस्थित पिये हैं, जिनसे यह श्रव्यर्थ रूप से प्रमाणित होता है कि यश के श्राधार पर हम जिन प्रवृत्तिया के उत्तराधिकारी होते हैं, उनके कारण हमारा जीवन भाना पहले से ही एक बँधे हुए रास्ते पर चलने के लिए निश रहता है। अध्यापक लैंग ने अपनी परीक्षाओं के फल 'क्राइम एज डेस्टिनी' (Crimes Destiny ) नामक पुस्तक में निरसे उक्त पुस्तक मे स एक दृष्टान्त का उल्लेख यहाँ पर किया जाता है। एक परिवार मे दो यमज लडकियो का जन्म हुआ। कितु घटनाचक्र के फेर मे पडकर उन दोनों लड़कियों में से एक ने स्कूल और कालेज की शिक्षा पाई, एव बाद को उसे स्कूल में पढाने का काम मिल गया। दूसरी लडकी का उपयुक्त शिक्षा नहीं प्राप्त हुई, एव अल्पशिक्षित होकर वह किसी कारखाने में काम करने तग गई। कुछ दिनो के पश्चात् सहसा एक दिन दोनों लडरियाँ दोनों अलग अलग जगहों से अपना अपना काम छोडकर चली आई। दोनो ने ही अपने अपने ऊपरवाले अफसरों से झगडा करके नौकरियों छोड दी थीं। इससे भी श्राश्चर्य की बात यह थी कि दोनों ने ही ठीक एक ही समय में नौकरियों छोड़ी थीं। उन दोनों लड़कियों के जीवन में इसी प्रकार और भी घटनाएँ हुई, जिनके कारण हमे यह स्वीकार करना ही पडेगा कि वशगत गुण अवगुणों के कारण हमारा जीवन पहले से ही एक निर्धारित रास्ते पर चलने के लिए घोडा- बहुत विवश रहता है। पारिपाषिक वातावरण एवं शिक्षा दीक्षा १२६ वशागुमम विज्ञान के कारण जीवन में अवश्य पुछ परिवर्तन हो जात है, किन्तु साधारण रीति से हमारा जीवन एक निर्धारित गस्ते पर चलने के लिए थोड़ा बहुत पाध्य रहता है। भारतीय फलित ज्योतिष के अनुसार यह कहा जाता है कि समप्र जीवन की होनेवाली घटना मरल सम्भावना के रूप में पह 7 से हो वर्तगान रहती हैं। किन्तु पारिपाश्विक वातावरण के कारण व्यक्तिगत उद्यम उद्योग के परिणाम में उक्त सम्भावनाओं में फुट फुट परिवर्तन हो जाना सम्भव है। किन्तु साधारणतया ऐसे दचित्त फर्मशीत व्यक्ति संसार में दुर्लभ है। आधुनिक वैज्ञानिस्गण अध्यापक लेंग क प्रमाणों को स्वीकार करने में कुछ हिचाते हैं, किन्तु लैंग के मत को वे लोग एक्दम अस्वीकार नहीं कर पाते। उन लोगों का फेवल इतना ही कहना है कि लेंग ने थोड़े दृष्टातों को लेकर एक व्यापक परिणाम निकाला है। ये दूसरे दृष्टान्तों के आधार पर लैंग के मत में कुछ सुधार की आवश्यस्ता अनुभव करते हैं। इस स्थान पर हम एक और घात का उल्लेख करना प्रावश्यक सममते हैं। भारत में एक संन्यासी हो चुके हैं जो सोऽह स्वामी के नाम से प्रसिद्ध थे। अपनी जवानी में वे सरफ्स के खिलाडी थे। सरक्स में रहते समय शेरा के साथ सेना परते थे और कभी-कभी सेलत समय वे अपने मुग्य को शेर के मुस में अनायाम रख देते थे। उनके एक पडे भाई थे। वे संयासी हो गये थे। पर साधारण दृष्टि से वो लोग यही कहेंगे कि एक भाई संयासी हुए और एक भाई सिलाड़ी। किन्तु सूक्ष्म दृष्टि से देखने पर यह जान पड़ता है, कि जो भाई संन्यासी न हुए, उहें भी जीवन की माया नथी। देखने में तो वे मरकस के खिलाड़ी थे कितु अन्त प्रकृति में वे भी निर्मोही थे एवं उत्तर काल में ये भी सन्यासी ही हो गये। इस प्रकार उपर देसने में दो व्यक्तिया के चरित्र भिन्न जान पड़ सकते हैं किन्तु सूदम दृष्टि से अदृष्टवाद और पुरुषकार दसने पर उन प्रतीयमान दोनों विभिन्न चरित्रों में युनियादी गति से कुछ समताएँ भी दीस पडेंगी। मस प्रकार सूरम गति मे विचार करने की प्रापश्याता है। यमज सन्तानों का एक और दृष्ट्रात यहाँ दे देना आवश्यक है। वाईटज नामक एक वैज्ञानिक भी यमज सन्तानों का लकर परीक्षाएं की हैं। उनकी परीक्षित दो यान को कान की धीमारी हो गई थी। उन दोनो यमज पहना यो एक ही प्रायु में यह बीमारी हो गई थी, अच्छी हो जान के याद फिर उन्हें एक ही प्रायु में कान का रोग उत्पन्न हो गया। दोनों के फान एक ही मार से बहने लगे थे। इसका तात्पर्य यह है कि दो व्यक्तियों पे स्वतन्त्र जीवन एक ही सून से बँधे हुए थे एवं हम मनुष्य, अपन को जितना म्वत्र सममते हैं, वास्ता मे उतने स्वतन्त्र नहीं हैं वैज्ञानिक लेंग के सिद्धात के साथ वैज्ञानिक वाइटज का दृष्टान्त मिलता-जुलता है।* दसवाँ परिच्छेद श्रदृष्टवाद और पुरुपकार यदि जन्मगत सहकारी के आधार पर ही हमारा जीवन बनता निगडता है, तो क्या एक मूळे अष्ट्रवाद क मोह मे हमे निश्चेष्ट रह जाना पडेगा? अपने उद्यम के सहारे क्या हम अपना जीवन बना नहा सकने ? इस सम्बन्ध में हजारों बातो की एक बात यह है कि समाज में सर प्रकार की उन्नति के गस्ते सब के लिए ममान रूप से खुने रहने चाहिए। जन्म के कारण पिसी के लिए भी उति का मार्ग * Human Heredity--P 268
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यशानुक्रम विज्ञान
चन्द नहीं रहा पाहिए। मितु विज्ञान की दृष्टि से इस बात
की साज होनी नितात आवश्यक है कि जन्म से ही मनुष्य विशेष
विशेष गुणों अपगुणा और संस्कारी को लेकर ही जीना प्रारम्भ
परता है। जन्म से ही एक मनुष्य दूसरे मनुष्य से अधिक
बुद्धिमान् , 'अधिक स्मृति-शक्ति-सम्पन्न, अधिक मेधावी हो सम्ता
है। इसके अनेक शत प्राप्त है।
पुष दिन पूर पोलण्ड मे एक दम्पती अमेरिका गये थे।
इस दम्पनी के लड़के साम्यूएल रेशेस्त्री, की आयु उस समय,
केरल श्राठ वर्ष की थी। दृमरे समवयस्क घालरों से शेरकी
बुत्र अधिक दुर्घल एवं छोटा अँचता था। किन्तु यही छोटा सा
वाला एक रात, असीय योस या तीस यडी आयु के शतरल के
खिलाड़ियों से अफेना, एक ही समय सेना था।
खिलाड़ियों को उस पालक ने पगस्त क्यिा था, फेवल दो व्यक्तियों
के साथ उसकी याजी घराचर रही ।*
इसी प्रकार एक बालक गणितशास्त्र में अत्यन्त पारदर्शी
था। वह बड़े बड़े प्रश्न यों ही जनानी बिना अम के मेरेगा
में हल कर देता था।
ऐसे भी बालकों और यालियों ने जन्म निये हैं जिहोंने
सद्गीत-शाम्य में असाधारण दक्षता दिखाई है।
इन मम दृशतों से यह मानना ही पड़ेगा कि जन्म के साथ
ही मनुष्य अपने अपने विशेप विशेष सरकारों को लेकर हो 'प्रावे
है। पारिपाश्विक वातावरण के कारण संस्कार कहीं तो निमित
हो जाते हैं और कहीं विकसित नहीं हो पाते। हमारी सामाजिक
व्यवस्था ऐमी नहीं है, जिसमे उपयुक्त व्यक्ति को योय अवसर
माप्त हो सके।
उन मत्र
* Yon and Heredity-P 283
निकामवाद में उच्चा-शक्ति का प्रभाव १२९ इतिहास में यह भी देखा गया है कि अत्यन्त प्रतिकूल वाता- वरण के बीच नडे रडे प्रतिमावान् व्यक्ति अपनी अत्तर्निहित जमगत शक्ति के आधार पर जीवन को सफल बना गये हैं। उनका व्यक्तित्व वातावरण का परिणाम नहीं था। वशानुनम विज्ञान के अध्यापरगण कहते हैं कि जेनि के विभिन्न गति से सम्मिनित होने से ऐसे असाधारण प्रतिभावान् व्यक्तियों का जन्म होता है। वे पूर्व जन्म को स्वीकार नहीं करते। सम्भव है, पुष दिनो के पश्चात् पूर्व जन्म के बारे में भी वैज्ञानिकों को कुछ तथ्य मिल जायें। ग्यारहवाँ परिच्छेद विकासवाद में इच्छा-शक्ति का प्रभाव विकामवाद के साथ वशानुक्रम विज्ञान का अत्यन्त घनिष्ठ सम्बन्ध है। उसका उल्लेख हमने पूर्व परिच्छेदा में कर दिया है। इस स्थान पर प्रश्न यह है कि अपने जीवनकाल मे हम जिस विद्या का धर्जन करते हैं, अथवा जीवन भर मे हम जो अभ्यास धना लेन हे, उनरा प्रभाव हमारी सन्तानो पर भी पडता है अथवा नही ? अर्थात् अपने पूर्वजो से हम जिन जेनियों के उत्तराधिकारी बनते हैं, क्या अपने जीवनकाल मे, अपने कर्मों द्वारा हम उन जेनियों में परिवर्तन ला सस्ते हैं ? जेनि के परिवर्तित हुए निना हमारी सन्तान कैसे हमारे कर्मों की उत्तराधिकारिणी बन सस्ती हैं। अब हमें यह देसना है कि विकासवाद के साथ इन सब प्रश्नो फा क्या सम्बन्ध है। विकासवाद की थ्योरी में यह प्रश्न सड़ा होता है कि प्रकृति मे विचित्रता कैसे उत्पन्न हुई ? किसी एक जाति वंशानुक्रम विज्ञान है। इस प्रथा के अनुसार पुंल्गेिन्द्रिय के अगल भाग का चमडा काट दिया जाता है। सहस्रा वपों से यह प्रथा चली श्रा रही है, किन्तु इतने दिनों की चेष्टा के याद भी मुसनमाना और यहूदियों के वोज कोषों में कोई परिवर्तन उत्पन्न नहा हुश्रा। तथा कथित असभ्य जातियों में देह पर तरह-तरह की तस्वीरें बनाते हैं, वे भी वशपरम्परा में सन्तानों में अपने से नहीं चली पाती। अर्थात् जीवन-काल के उपार्जित अभ्यास के परिणाम में चीन कोप में काई परिवर्तन नहीं होता। एक प्रसिद्ध वैज्ञानिक अंगास्ट वाईजमैन महोदय ने इस विषय को लेकर बहुत परीक्षाएँ की हैं। वे बीस पुश्त तक चुहिया की पूंछ काट देत रहे, किन्तु बीस पुश्त के बाद भी चुहियों की पूंछ छोटी नहीं हुई। इसके विपरीत रूस के एक प्रसिद्ध वैज्ञानिक पैलव न भी इस विषय का लेपर परीक्षाएँ को और उन परीक्षाओं के परिणाम में उन्होंने यह कहा कि जीवन-काल के अभ्यास के परिणाम में जो सरकार बनते हैं, वे सन्तान सन्ततियों में भी दिखाई देते हैं। इसके उत्तर में दूसरे वैज्ञानिकों ने यह कहा कि पेलन की थ्योरी के अनुसार उनकी इस नवीन परीक्षा के परिणाम में पुर असमजस पड़ता है। कडिशड रिफ्लेम्स थ्योग के अनुमार स्नायु मएती की कार्य प्रणालो एक विशेष धारा में अथवा मार्ग से सञ्चालित होती रहती है। रिसी एक रिशेप समय में घएटी की आवाज की जाती है और उमी समय एफ फुत्ते को श्राहार मामी भी दी जाती है। हम प्रमार कुछ दिनों के पश्चात् निर्धारित समय पर घण्टी तो धनाई जाती है किन्तु प्राहार-सामग्री नहीं दी जाठी। इस अवस्था में श्राहार- सामग्री के न रहने पर भी कुत्ते की जिद्या से लार टपकती है। अर्थात् एक निर्वाग्ति समय पर घण्टी बजने के साथ जिला से लार स्परने का कोई साक्षान् सम्बध नहीं है, किन्तु एक विशेष रूप के विकासवाद में इच्छा-शक्ति का प्रभाव १३३ अभ्यास के कारण घण्टी बजने के साथ साथ कुत्ते की जिह्वा से लार टपकने लगती है। इस प्रकार की लार टपलने को कडिशंड रिपनक्स कहते हैं। पैवलन महोदय ने तीस पीदियों तक अपने जीवों को लेकर परीक्षा की। उन परीक्षाओ के परिणाम में पैवलर ने देखा कि तीस पीढियो के बाद उनके जन्तु उनकी दी हुई शिक्षा को पूर्वापेक्षा और शीघ्र सीस लते थे। अर्थात् कटिशड रिमलेक्स के सिद्धा तानुसार जिस कार्य क होने में स्नायु मण्डलों को कार्य प्रणाली एक विशेष मार्ग पर सञ्चालित होती है, तोस पीढ़ियो की शिक्षा के पश्चात् वह वात नहीं रह गई । इसका तात्पर्य यह होता है कि प्राणियों के व्यवहार की व्याख्या के लिए दिशड रिपनास की थ्योग की काई आवश्यक्ता नहीं है। इस प्रकार पैलव की दो प्रकार की परीक्षाओं के परिणाम का प्रयोग एक दूसरे के विरुद्ध किया जा सकता है। इसक अतिरिक्त दूसरे वैज्ञानिको का यह भी कहना है कि पैवलन के जन्तुओ मे शिक्षा ग्रहण करने का शक्ति घढ नहीं गई, वरन् पैचलन और उनके साथियों में ही शिक्षा-दान करने की शक्ति बढ़ गई। पवलव के अतिरिक्त अध्यापक मैक्डुगल ने भी चूहे। पर दूसरे प्रकार की परीक्षा की। यह परीक्षा भी कई पीढियों तक हुई। मैग्डुगल के कथनानुसार यह प्रमाणित होता है कि जीव के अपने जीवन-याल मे जो नवीन सस्कार उत्पन्न होते हैं, उ7 सस्कारा को उतराधिकार-सून से उस जीन की स ताने भी प्राप्त करती हैं। दूसरे वैज्ञानिक मैक्डुगल माहब की परीक्षाओं को स्वीकार नही करत । क्या मद्यपायी मनुष्य की सन्तान भी मद्यपायी होगी? इस प्रश्न को लकर भी बहुत परीक्षाएँ हुइ हैं। किन्तु मनुष्यों को लेकर परीक्षा करना सम्भव नहीं। दूसरे निकृष्ट जीव-जन्तुओं पर नाना प्रकार की परीक्षाएं हुई है। वैज्ञानिकों ने कई पीढियो तक पिग, चूहे आदि आदि जन्तुओं को शराब पिलाकर । खरगोश ...
वशानुक्रम विज्ञान १३४ देसा है कि उनके जेनि में कोई परिवर्तन नहीं हुआ। स्त्री जन्तुओं को मद्य पिलाकर देखा गया कि उनके बच्चे भ्रूण अवस्था में ही अधिकाश विनष्ट हो गये, किन्तु जो जीवित रहे वे दूसरे बच्चों से अधिक घलिष्ठ हुए। कितु पण्डित ब्लुहम ने जो परीक्षाएँ की हैं, उनसे यह ज्ञात होता है कि जब बहुत दिना से चूहों को मद्य पिलाया जाता है और उनसे ऐसी चुहियो के साथ जोडा लगाया जाता है जिन्हें शरान नहीं पिलाई गई है तो चुहियों की अपेक्षा चूहे अविक जन्म लेते हैं, किन्तु जब चूहा और चुहियों, दोना को ही अत्यधिक मात्रा में शरान पिलाई जाती है तर उनको सतान को बहुत प्रायात पहुँचता है, भ्रूणावस्था मे ही बहुतों की मृत्यु हो नाती है और जो सन्तान ज म लती भी हैं वे दूसरों की अपेक्षा दुवल होती हैं और कभी कभी विक्लाग भी होती है। किंतु इस स्थान पर एक बात का स्मरण रसना अत्यत श्रावश्यक है। इन परीक्षाओं मे चूहा चुहियों को जिस अत्यधिक मात्रा में शरायो धनाया जाता है, मनुष्य में इतनी शरान पीनेवाले एक भी व्यक्ति या मिलना कठिन है। इस प्रशर प्रत्यधिक मद्य के प्रभाव से ही जे में परिवर्तन उत्साहात है। इस परिवर्तन को जीन के लिए कल्याणकारी भो नहीं समझ सस्ते । जेनि के इस मकार परिवर्तित हो जाने को पारिभाषिक शब्द में म्यूटेशन (Mutation) कहते हैं ।। श्रागे चलकर म्यूटेशन के बारे में विस्तृत अालोचा की जायगी। इस स्थान पर एक और दृष्टान्त का उन्लेस कर देना आवश्यक है। इस बात को कोई भी वैज्ञा निक अमोरार नहीं कर सकता कि व्यक्तियों में दो प्रकार के जेनि गह सरते हैं, एक उमिनान्ट (Dominant) अर्थात् व्यक्त, और सिर-You Hereditr P328 सिर-Naman Heredity Ip 999 विकासमाद में इन्छा शक्ति का प्रभाव दूसरा रिसेसिर ( Recessive) अर्थात् सुत। जिम शारीरिक आवेष्टन में एक प्रकार का जेनि रियाशील रह सकता है, उसी आवेष्टन में, दूसरे प्रकार का जेनि भी, अध्यक्त, किन्तु जीवित एवं अविकृत रूप से रह सकता है। श्वेत शरीरयाले जीव की देह में कृष्ण वर्ण उत्पन्न करनवाला जेनि वर्षों तक रहन पर भी उसमे कोई परिवर्तन उत्पन्न नहीं होता। म्यूटेशन और विकासवाद-विकासवाद को प्योरी में, नवीन की उत्पत्ति कैसे होती है, इस प्रश्र का अत्यन्त महत्त्व है। किन्तु इस प्रश्न का उत्तर आज तक प्राप्त नहीं हुअा है। अध्यापक मॅरंगन और अध्यापक मूलर महोदयों ने 'एक्स रे श्रादि किरणों के आघात से जेनि में नाना प्रकार के परिवर्तन उत्पन्न किये हैं। माय सभी आधुनिक वैज्ञानिक म्यूटेशन के आधार पर विकासवाद की व्यारया करना चाहते हैं। "क्स रे" के अतिरिक्त एक और प्रकार की किरणें हैं, जिनका पारिभाषिक नाम 'कॉसमिक रेषा' है। ये किरणें कहां से पाती हैं, इसका आज भी निर्णय नहीं हो पाया है। ये किरणें समतल भूमि की अपेक्षा पहाड़ों में एव आकाश के उच्च स्तरों में अधिक धन रूप से निपतित होती हैं। हवाई जहाजो पर केले पर पी मस्सियो को आकाश में १३ मील ऊपर ले जाया गया था। उस उघ आकाश में, समुद्र के स्तर की अपेक्षा पाँचगुना अधिक म्यूटेशन होता है।- किन्तु अनेक वैज्ञानिक म्यूटेशन के आधार पर विकासवाद की व्यारया सफल नहीं सममते। उसका प्रथम कारण यह है कि म्यूटेशन से, अधिकाश समय, प्राणियों का विकास नई हो सकता, अधिकांश समय म्यूटेशन के कारण पिकलाग प्राणियो की उत्पत्ति होती है, जीवन संग्राम मे वे विजयी नहीं हो सकते। कदाचित् सहस्रों में एकाध घार म्यूटेशन के परिणाम में उच्चतर जीव की उत्पत्ति होती हो। किन्तु इस उच्चत्तर जीव से अपनी वशानुम्म विज्ञान श्रेणो के जीव की उत्पत्ति कैसे हो? कारण विगाह के परिणाम में इस सच्चतर जीन का यश निम्न दिशा की और अध पतित हो सकता है। अधिकांश समय म्यूटेशन के कारण जीव-देह में जेनि का संख्या पूर्वापेक्षा कम हो जाती हैं। विस कारण म्यूटशन उत्पन होते हैं, इसका अभी तक कोई ज्ञान माप्त नहीं हुआ है। प्रकृति में अस्मात् म्यूटेशन उत्पन्न हो जाते हैं। म्यूटेशन प्राय तीन प्रकार के होते हैं,-(१) फैक्टर म्यूटेशन उसे कहते हैं, जहां मॉमोसोम के जेनि में परिपत्तन उत्पन्न हो जाते हैं। (२) दूसरे प्रकार के परिवर्तन, मॉमोसोमों के दुगुने अथवा तीन गुने हो जाने के कारण उत्पन्न होते हैं। (३) तीसरे प्रकार का म्यूटेशन वह है, जहां विभिन्न कॉमोसोमों के जेनि में बहुत प्रसार के लेन-देन हो जाते हैं, इस प्रकार के परिवर्तन की रीति को कम्नि नेशन, अर्थात् विभिन्न प्रकार के सम्मिश्रण एष म्यूटेशन के बीच का एक प्रकार कहा जा सकता है। इन तीनों प्रकार के म्यूटेशनों में से प्रथम प्रकार का म्यूटेशन, जिसके कारण प्रकृति में यथार्थ नगी की उत्पत्ति होती है, जीर की प्रमोनति के लिए अधिकाश समय हानिकारक ही होता है । जो हो, अधिकांश वैज्ञानिक यह समझते हैं कि विकासनाद् की व्याख्या फेवल म्यूटेशन के आधार पर ही सम्भव है, अन्यथा नवीन की कैमे उत्पत्ति होती है, इस समस्या की मीमासा सम्भन नहीं । युगो डी० प्राइस ने ही मर्वप्रयम म्यूटेशन के सिद्धान्त को व्यारया की थी। इसके पूर्व पण्डित चाइनमैन ने इस सिद्धान्त का प्रचार किया था कि योज कोप में, अर्थात् जमप्लास्म में, बाहरी कारणों से कोई परिवर्तन नहीं हो सकता। इनके विपरीत ई० टल्यू० मैक्साइड, ई० एस० रसेल, डबल्यू० मैक्डुगल आदि दूसरे घडे-यडे वैज्ञानिक इस सिद्धान्त के पक्षपाती निकासवाद में इच्छा शक्ति का प्रभाव हैं कि जीव, अपने जीवनकाल में, अपनी इच्छा और चेष्टा के कारण अपनी देह मे ऐसे परिवर्तन ला सकता है कि उसके सन्तान भी उन परिवर्तनों के उत्तराधिकारी बन सकते हैं। वाइजमैन महोदय ने अपने पक्ष के समर्थन में दो प्रकार की युक्तियाँ उपस्थित की थी। उनकी एक युक्ति यह थी कि अभ्यास के कारण देह में अर्थात् जीव कोपों में जो परिवर्तन उपस्थित होत हैं, वे फिर किस प्रकार बीजकोपो मे (अर्थात् जर्मप्लाज्म में) भी सक्रामित किये जा सकते हैं। अर्थात् जीव-कोपों के परिवर्तनों से कैसे चीज कोपों में भी परिवर्तन उत्पन्न होते हैं, इसका कोई लक्षण अथवा परिचय हमें प्राप्त नहीं है। उनकी दूसरी बात यह थी कि चूहो की पूँछ काट काटकर, ३० पीढियो मे भी, उन्होने चूहों में छोटी पूंछवाले चूहो को उत्पन्न नहीं कर पाया। मैकवाइड इसके उत्तर मे यह कहते हैं कि पूँछ काट लेने से प्राणी मे कोई अभ्यास तो बनता नहीं। जब किसी नवीन परिस्थिति में, अपनी चेष्टाओं के कारण, प्राणी में कोई ननीन अभ्यास उत्पन्न होता है, तो उसी अभ्यास के कारण ही जीव के बीज-कोपी में परिवर्तन उत्पन्न हो सकता है, अन्यथा नहीं। इसी प्रकार सुन्नत करने की प्रथा से भी किसी अभ्यास की सत्पत्ति नहीं होती है। उक्त प्रथा के कारण मनुष्यों को किसी प्रकार का नतीन अभ्यास डालने की कोई प्राय श्यकता नहा होती है। इस कारण वाइजमैन की परीक्षा से यह प्रमाणित नहीं होता है कि नगीन परिस्थितियों में, अभिनव उद्यम के कारण, नवीन अभ्यास के परिणाम मे, मनुष्य के बीज कोपो में भी परिवर्तन उत्पन हो जाते हैं यह सिद्धान्त श्रमात्मक है । वाइजमैन को प्रथम युक्ति के उत्तर में मैकलाइड महोदय कहते हैं कि माता पिता से प्राप्त मॉमासामों से कैसे जीर के अंग प्रत्यग वनते हैं, इसका भी ज्ञान आज हमें प्राप्त नहीं है, यद्यपि मामासाम से ही जीव-देह का प्रत्येक अंग प्रत्यग बनता है, इसमे कोई सन्देह नहीं है।
१३८ वंशानुक्रम विज्ञान मैनादड श्रादि वैज्ञानिकों की राय में, म्यूटेशन के सिद्धान्त से भी विकासवाद अर्थात् प्रमोन्नतिवाद की व्याख्या युक्ति-सगत नहीं प्रतीत होती है। इन वैज्ञानिकों का कहना है कि म्यूटेशन तो रोग से ही उत्पन्न होता है। मैक्नाइड आदि वैज्ञानिकरों की राय मे यूगो डी० प्राइस की परीक्षाएँ घुटि पूर्ण हैं। टनियर नाम वैज्ञानिक ने अपनी नवीनपरीक्षायों के श्राधार पर यह प्रमाणित करने की चेष्टा की है कि श्राभ्य तरिष दुर्यलता के कारण कभी-यमी वीजकोपों में भी दुर्बलता नत्पन्न होती है । इसी दुर्बलता के कारण धीज कोपों में भी परिवर्तन सम्पन्न हो जात हैं। ऐसे परिवर्तन पो ही म्यूटेशन कहा जाता है। म्यूटेशन के कारण जीन की उन्नति न होकर अधिकांश समय उसकी अवनति ही होती है। घहुवर्पयापी परीक्षाओं के आधार पर टर्नियर उक्त सिद्धात पर पहुँचे हैं। अभी ये परीक्षाएं समाप्त नहीं हुई हैं। इस बात को तो सभी वैज्ञानिक स्वीकार करते हैं कि म्यूटेशन के कारण अधिकांश समय प्राणी की अवनति होती है। अर्थात म्यूटेशन उति का लक्षण नहीं है। लामार्क, डारविन श्रादि कुछ पहले के वैज्ञानिक एवं वर्तमान काल के जीवित वैज्ञानिक-मैक्डुगल, मैक्नाइड, ई० एस० रॉसेल श्रादि इस पक्ष का समर्थन करते हैं कि जीव, अपने जीवनकाल में, अपनी चेष्टा एव अभ्यास के कारण अपने योज-कोपों में परिवर्तन ला सक्ते हैं, किन्तु ये परिवर्तन इतने सूम एव अल्प होते हैं कि इनके प्रभाव के स्पष्ट रूप से प्रकटित होने में कई पीढियों लग जाती हैं। इस कारण साधारणतया यही कहना पडता है कि वातावरण के कारण जीर में जो स्थायी परिवर्तन उत्पन्न होता है, उसकी अपेक्षा पूर्वजों से प्राप्त जेनि के आधार पर वंशानुक्रम की धारा का ही मनुष्यों में अधिक प्रभाव है। व्यवहार में, वातावरण का अपेक्षा वंशानुनम का ही प्रभाव, मनुष्य पर अधिक देस पडता है। एक नैज्ञानिक के मतानुसार मनुष्य पर शिक्षा दीक्षा, सामाजिक रीति ।
वंशानुक्रम और स्वास्थ्य १३९ नीति, जलवायु आदि पारिपार्विक वातावरण का प्रभाव प्रतिशत दम (१०) और वशानुक्रम की धारा का प्रभावप्रतिशत न रे (९०) होता है। अत्यधिक मद्यपान से भी बीजकोपा में परिवर्तन उत्पन्न हो जाता है और उससे वश की अगति होती है। अत्यधिक मद्य- पायियों को सन्तान साधारणतया रोगी, मूर्स आदि होती हैं। त्रियों पर मद्यपान का और भी युग प्रभाव पड़ता है। वारहवाँ परिच्छेद घशानुक्रम और स्वास्थ्य जीवित और जड वस्तु मे यही अन्तर है कि जीवित वस्तु अपने पारिपार्श्विक वातावरण से, अपने जीवनवारण के अनुकूल रस और पदार्थ संग्रह करती रहती है, एवं प्रतिकूल वातावरण से वचती रहती है। जड पदार्थ में इस प्रकार वातावरण के साथ उसका न कोई सघर्प होता है, और न कोई लेन-देन । फलत पारिपाश्विक वातावरण के साथ जीन का जिस दिन लेन-देन समाप्त हो जाता है, उस दिन उसकी मृत्यु हो जाती है। जीव के लिए पूर्ण रूप से स्वस्थ होने का अर्थ है, पारिपाश्विक वातावरण के साथ उसका परिपूर्ण सामजस्य स्थापित होना । इस सामजस्य में जितनी कमी रह जाती है, जीप के पूर्ण रूप से स्वस्थ होने में भी उतनी कमी रह जाती है। इस दृष्टि से कोई भी एक व्यक्ति पूर्ण रूप से स्वस्य नहीं है, कारण पारिपार्धिक बाता घरण के साथ किसी जाव का परिपूर्ण सामवस्य नहीं है। कोई जीन, इस दृष्टि से, दूसरे जीव से अधिक स्वस्थ है, और कुछ अन्य जीनों से कम। इस सिद्धान्त के अनुसार, जीव विज्ञान की दृष्टि से, स्वास्थ्य एव रोग में कोई विभाजक रेया पींचना कठिन है। जिस समय जीत के साथ पारिपाश्चिक वातावरण का सामञ्जस्य स्थापित नहीं हो पाता है और जीव के लिए प्राण धारण करना ।
१४० वशानुनम विज्ञान कठिन हो जाता है, उस समय कहा जाता है कि जीन रोग प्रस्त हो गया है। जीवन धारण के लिए कुछ साधारण सी असुविधा हो जाने को रोग नहीं कहा जायगा । यथा-यदि हम फूलों के रङ्ग को ठीक-ठीक पहचान नहीं पाते तो उससे जीवनधारण करने में विशेष पठिनाई नहीं होती है । इस कारण इसे दोप कह सकते हैं। किन्तु इसे रोग कहना ठीक नहीं होगा। सर्वप्रथम एक रूस के वैज्ञानिक न ई० सन् १८९५ मे स्वास्थ्य के विषय में सष्ट रूप से पारिपाश्विक वाता वरण के साथ सामजस्य की बात कही थी। किन्तु इस सामञ्जस्य का अर्थ जीवित रहना और अच्छी तरह जीवित रहना होगा। स्वास्थ्य का एक और भी तात्पर्य है। किसी व्यक्ति में यदि सन्तान-उत्पादन की शक्ति न रहे तो उस व्यक्ति को सभी रोगी कहेगे। वितु सन्तान उत्पादन करने की शक्ति न रहने से जीवन धारण करने में कोई कठिनाई नहीं होती, इस कारण एक जर्मन वैज्ञानिक का कहना है कि जीवित रहने का अर्थ केरल व्यक्ति के लिए न समभकर जाति के लिए समझना उचित है। प्रकृति में भी व्यक्ति से जाति का ही अधिक महत्त्व है। गर्भय नणा से पीड़ित होकर जव नारी शय्याशायी होती है, तब उसे कोई भी रोगी नहीं समझता । जाति के जीवित रहने के लिए नारी की यह गर्भ यन्त्रणा सार्थक हो जाती है। क्श-वृद्धि से ही जातीय जीवन की रक्षा होती है। तेरहवा परिच्छेद वशानुक्रम और रोग व्यक्ति के साधारण स्वास्थ्य के लिए बहुसरयक जेनि का सम्मिलित प्रभाव क्रियाशील रहता है। रितु क्सिी रोग की उत्पत्ति के लिए कभी-कभी एक जेनि का ही प्रभाव दिखाई देता है। अनेक परीक्षाओं के परिणाम में यह निश्चय हो पाया है कि कुछ रोग तो हम माता पिता से प्राप्त करते हैं, और कुछ नहीं।
यशानाम और रोग १४१ जो रोग हम माता पिता से मात्र फरते हैं, उन्हें तो वशगत रोग का सम्न हैं, दृमरे रोगी को नहीं । ऐसा भी होता है हि माता पिता से हम यथार्थ रोग पो मात न होर, गेगी होने की दुर्यलता को प्राप्त करते हैं। अपने अनु फूल वातावरण में सो वह रोग परिस्फुट दो पड़ता है, अयथा यह प्रक्ट नहीं होता। यदि हमारे पिता को तपेदिक मी बीमारी हुई तो यह आवश्यक नहीं है कि हमे भी अर्थात् हमारे भाई दिनों में से स्मिी न किसी को भी वा, यीमारी हो। फेरत इतना होगा कि मृत के कारण अथवा सर्दी के या शरीर के दुल हो जाने के कारण हममें से किसी को वह रोग हो जाय। प्रतिदिन की परीक्षा के परि- णाम मे हमें यह बात होता जाता है कि कौन से रोग हमें माता- पिता अथवा यश परम्परा से प्राप्त होते हैं, और फोन से नहीं। उपर्दश हम कमी यश-सूत्र में प्राप्त नही परते। इस बारे में साधारण व्यक्ति की धारण एक्दम भ्रमात्मक है। होता यह है कि यदि माता अथवा पिता उपदश-रोग से पीड़ित हो और उस पीड़ित अवस्था में हो गर्भ का सन्चार हो, वय हत के कारण बच्चे में भी उपदश रोग की उत्पत्ति हो सकती है, अन्यथा नहीं। गर्मी पा रोग अच्छा हो जाने पर यदि गर्भ की उत्पत्ति होती है वन कापि बच्चे में गर्मी का रोग नहाँ दिसाई देगा। यदि यह रोग वंश परम्परा में उत्पन्न होनेवाला होता तो अच्छे हो जाने पर भी मनुष्य की सतान मे यह रोग उत्पन्न हो सकता। किन्तु ऐसा नहीं होता। वशगत रोग और सृत के कारण जो रोग उत्पन होते हैं, उनमें यथेष्ट अन्तर है। यदि उपदश रोग को ठीक समय पर उपयुक्त चिकित्सा हो एव इस रोग की मृत से बचने के उपायों का ठीक ठोक प्रयोग हो तो दो तीन पीढ़ियों के अन्दर यह रोग सदा के लिए दूर हो जा सस्ता है। किन्तु वशगत रोगों को दूर करता अत्यन्त कठिन कार्य है। वशगत रोगा के मूल मे तो विशेष विशेष ritika.* १४२ घंशानुक्रम विज्ञान जेनि क्रियाशीत होते हैं। इन रोगों से बचने के लिए विवाह पद्धति पर विशेष रूप से नियन्त्रण की आवश्यकता है। इस कारण कौन से रोग वशगत हैं और कौन से नहीं, इसका ज्ञान होना अत्यत श्रावश्यक है। वर्षों से इस विषय पर परीक्षाएँ हुई हैं और श्रा बहुत रोगों के विषय में अन्या ज्ञान प्राप्त हो चुका है। एलविनिज्म अर्थात् धरल रोग वशगत हुश्रा करता है। सात सौ घरों के वंशवृक्ष बनाये गये हैं, जिनमें धवल रोग उत्पन हुए थे। धरल रोग "सुप्त-राक्षण" विशिष्ट है । पाठकों को याद होगा कि सुन(Rece ssive) एव व्यक्त (Dominant) लनण किसे कहते हैं। जर किसी व्यक्ति की देह में दो भिन्न प्रकार के जेनि उपस्थित रहते हैं, जिनमें एक दूसरे के विपरीत लक्षण रहते हैं तब एक लक्षण तो व्यक्त होता है और दूसरा सुन रह जाता है । किन्तु यह सुन लक्षण मरता नहीं, कई पीढियों के बाद भी, अपने अनुरूप दूसरे जेनि के साथ सम्मिलित होते ही व्यक्त हो जाता है। घरा रोग भी रिसेसित्र अर्थात् सुप्त-लक्षण नाहक जेनि के कारण उत्पन्न होता है। जिस वंश में किसी सुम लक्षण नोज वहन करनेवाले जेनि के कारण किसी रोग की उत्पत्ति होती हो, उस वंश में यदि निकट आत्मीया में विराह होता रहे तो दो रिसेसिव जेनि के एक्त हो जाने की बहुत मम्मानना हो जाती है। और दो रिसैसिव जेनि के एकत्र होने से ही रोग व्यक्त हो जाता है। इस कारण साधारणतया निकट श्रात्मीयों में पिाह करना कदापि उचित नहीं है। एलनिनिम् अर्थात् धवल रोग-युक्त वशों के वशक्षादि की परीक्षा करने पर यह ज्ञात हुआ है कि अधिकांश समय उन वंशों में निकट श्रात्मीयों में विवाह हुए थे। एक ऐसे वश-वृक्ष के अनुसार यह देखा गया कि एक चाचा ने अपनी भतीजो से रिचाह कर लिया था। उसके वश में छ सन्तानों में दो तो रोग मुक्त थे, कि तु चार धवल रोग- युक्त थे। उसी वंश में दो चचेरे भाई बहिनों ने विवाह कर लिया वशानुक्रम और रोग १४३ था। उनके तीन मन्तानों में से एक घपल-रोग निशिष्ट था। उसी वश में दूसरे लोगों ने आपस में विवाह नहीं किया था। उनकी सन्तानों में एक भी सन्तान धवल रोग पिशिष्ट नहीं थी। निकट-दृष्टिरोग (Short sightedness ) वशानुक्रम से उत्पन्न होता है । चनु के एक और रोग प्रास्टिगमैटिज्म ( Astigmation ) की उत्पत्ति भी वशानुक्रम के अनुमार होती है। एक वंश में तो यह रोग पाँच पुश्तों तक उत्पन्न होता गया। ससार के विभिन्न स्थानो में मनुष्य विभिन श्राकार-विशिष्ट होते हैं। किन्तु मनुष्य-देह के साधारण अश्यत्रो में थोडा बहुत अन्तर होने पर भी कुछ विशेष हानि नहीं होती। हाँ, यदि चयु के प्राभ्यन्तरिक अशो मे थोडा-सा भी अन्तर उत्पन्न हो जाता है तो दृष्टिशक्ति में भी अत्यन्त गम्भीर दोप उत्पन्न हो जाते हैं। इस कारण यदि ससार की दो विभिन्न जातियों के स्त्री पुरुपो में विवाह होता है, तो निकट दृष्टिरोग की उत्पत्ति हो सकती है। जैसे निस्ट सम्बन्धियो में विवाह होने से वश में रोग की उत्पत्ति हो सकती है, उसी प्रकार दो विभिन जातियों के स्त्री-पुरुषों में विवाह होने से भी रोगो की उत्पत्ति हो सकती है। एक दूसरे प्रकार का चक्षु का रोग चार परिवारों में होते देखा गया। अनुसन्धान करने पर यह पता चला कि सात पीढी पहले इन परिवारों के एक ही पूर्वज को यह रोग था, अर्थात् सात पुश्त तक रोग के बीज क्सिी परिवार में वश परम्परा से चने पा सकते हैं। इसका यह भी तात्पर्य है कि अच्छे और बुरे के बीज, सात पुश्त तक तो अवश्य ही जीवित रह सकते हैं, यद्यपि उनका व्यक्त होना पारि- पार्श्विक वातावरण और दूसरे जेनि के साथ सम्बन्ध स्थापित होने पर निर्भर करता है। प्राचीन हिन्दुओं को यह ज्ञान कैसे प्राप्त हुआ--यह स्वतन्त्र प्रश्न है ! कितु इसमे कोई सन्देह नहीं कि हिन्दुओं की वर्ण व्यवस्था का प्राधार वशानुक्रम विज्ञान की HOM १४४ वशानुम्म निज्ञान हिन्दुओं के धारणानुसार ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य प्रादिवों के लक्षण कई पीढियो तक अभियफ न होने पर भी नष्ट नहीं होते। आधुनिक विज्ञान भी इस घात का समर्थन करता है। इस प्रकार का आधुनिक विज्ञान का प्राचीन विज्ञान से मेल होना एक प्राक- स्मिक घटना नहीं है। मोतियाविन्द भी एक और चक्षुरोग है जो वशानुम्म से उत्पन होता है। मोतियामिन्द के उत्पन होने की अवस्था भी प्रत्येक परिवार के लिए कुछ निश्चित सी रहती है। किसी किसी परिवार मे बाल्यावस्था में ही यह रोग उत्पत होते देसा गया है। दूसरे परिवारों में यौवनावस्था के प्रारम्भ होते ही यह रोग उत्पन्न होता है। कुछ परिवारों में मध्यवयसू में ही यह रोग उत्पन्न होते देखा गया है। इस सम्बध में एक और रहस्यपूर्ण बात का पता चला है। किसी परिवार में सा होते देखा गया है कि एक पुश्त में तो मोतियाबिन्द वृद्धावस्था में उत्पन्न हुआ, दूसरी पुश्त में यह रोग ४० वर्ष की आयु में उत्पन हुआ, तीसरी पुश्त में ३० वर्ष की आयु में, ४ थी पुश्त में यह रोग ७ वर्ष की आयु में उत्पन हुआ एव ५वों पुश्त में, जन्म के थोडे ही दिनों के अन्दर यह रोग होते देखा गया। एक वैज्ञा निक ने उपर्युक्त वंशवृक्ष को वैज्ञानिकों के सम्मुख उपस्थित पिया था। वैज्ञानियों में इस विषय को लेकर यथेष्ट आलोचनाएँ हुई थी। कुल वैज्ञानिको की धारणा थी कि उक्त वशवृक्ष के सग्रह करने में कुछ दोष रह गया है। एक ब्रिटिश वैज्ञानिक ई० नेट्ल शिप महोदय ने एक परिवार का वशक्ष सग्रह किया था, जिसमें रतौंधी की बीमारी ९ पुश्त तक होती गई थी। उक्त परिवार में २११६ व्यक्तियों में से १३५ को रतौंधी हुई थी। एक और विचित्र प्रकार का रोग होता है, जिसमे दिन में अथवा अधिक तीत्र प्रकाश में तो निगाई नहीं देता किन्तु चाँदनी रात में दिखाई देता है। इस रोग में रोगी व्यक्ति को रङ्ग का कोई ज्ञान नहीं होता है।
वशानुक्रम और रोग है । १४५ इसे दिवान्धता (Day Blindness) कहते हैं। एक वंश में चचेरे भाई बहिनों में विवाह होने के परिणामस्वरूप चार सन्तान में तीन सन्तानों को यह रोग हो गया था। यह रोग भी वंश- गत होता है। इससे शात होगा कि निस्ट सम्बधियों में मिाह करना कितना भयावह गस भी वशगत है। यह अनेक कारणों से उत्पन्न होता है। पभी-कभी मरतक के धर्म से अत्यधिक तेल पदार्थ निकलता है और उसके पश्चात् बाल गिरने लग जाते हैं। कभी-कमी मस्तक में अत्यधिक फ्यास हो जाने के पश्चात् पाल गिरने लग जाते हैं और गखापन उत्पन्न हो जाता है। गसापन नी की अपेक्षा पुरुप में अधिक उत्पन होता है। यह भी कहा जाता है कि नपुंसकों को यह रोग नहीं होता। कैन्सर-इस रोग के नाम को सुनते ही मन में एक आता की सृष्टि होती है। वैसर रोग को समझने के लिए हम फिर कोप विभाजन के प्रति ध्यान देना पड़ेगा। हमने यह देसा है कि एक कोप से ही सहस्र योपों की उत्पत्ति होती है और उन कोपों से धीरे धीरे हमारी देह बनती है। हमने यह भी देखा है कि अमेरिका के एक प्रसिद्ध वैज्ञानिक एलेक्सिस फेरेल ने फैसे जीवदेह से एक एक अङ्ग को निकाल पर उसे काँच के योततों में जीवित रक्सा है। कैरेल महोदय ने यह प्रमाणित कर दिया है कि जीव देह के कोप, देह से अलग होकर न केवल जीवित ही रह सरते हैं, परन् श्राहार मिलने पर एव उपयुक्त वातावरण में रक्से जाने से वे जीवित रहने के साथ-साथ वृद्धि भी करते हैं। उनके जीवित रहने की एव वृद्धि प्राप्त होने की सीमा भी नहीं है। फिन्तु जीव देह में रहते समय वे कोप अनियमित रूप से वृद्धि प्राप्त नहीं करते। प्रयोजनानुमार ये एक सीमा तक ही वृद्धि प्राप्त करते हैं। इस नियन्त्रण का केन्द्र कहाँ है और पैसे यह नियन्त्रण होता है, ये सब १४६ वंशानुक्रम विज्ञान अत्यन्त रहस्य पूर्ण प्रश्न हैं। किन्तु जब कोई कोप अथवा फोपों फा समूह इस नियन्त्रण से परे चला जाता है और उसकी अनियन्त्रित पृद्धि होती है, तब उसे रोग कहा जाता है। कोपों की ऐसी पनि यन्त्रित वृद्धि को 'ट्य मर' कहते हैं। फैन्सर एक प्रकार का 'ट्य मर' है। 'केसर का रोग कैसे उत्पन्न होता है, इसके सम्बध में वैज्ञानिका को पर्याप्त ज्ञान नहीं है। 'केसर देह के सिी भी स्थान में उत्पन्न हो सकता है। इसके सम्बन्ध में एक और विचित्र घात यह है कि एक बार किसी स्थान पर कैन्सर रोग मस्त कोषों की उत्पत्ति के बाद वे कोप रक्त प्रवाह के साथ-साथ देह के अन्य किसी भी स्थान में जाकर विकसित हो सकते हैं। इस प्रकार इस रोग की ध्वस-लीला अत्यन्त भयङ्कर होती है। कहा जाता है कि मनुष्य में जितने प्रकार के रोग सम्भव है, "कैन्सर" उनसे भी अधिक प्रकार के हो सकते हैं। इन विभिन्न प्रकार के कैसरों मे कुछ रोग तो सम्भवत यशगत होते हैं, दूसरे नहीं। घुछ बाहरी कारणों से देह के किसी स्थान पर अनावश्यक प्रदाह होने से अथवा अन्य कारणो से 'कैन्सर' की उत्पत्ति हो सकती है। अमेरिका के निउ जर्सी' नगर में एक घड़ी के कारखाने में जो लड़कियों काम करती थीं, उन्हे रेडियम' से काम पडता था। उन लडकियों में से प्राय प्रत्येक लडकी की मृत्यु 'कैन्सर रोग से हुई थी। कहा जाता है कि 'फैन्सर' म्यूटेशन का परिणाम है। एक जापानी वैज्ञानिक 'ईशोकावा' ने सरगोशों के चमडे पर बार चार अलकतरा लेपन करके कैसर रोग को उत्पन्न किया था। 'एक्स रे' के अनपरत प्रभान में भी कभी-कभी यह रोग उत्पन हो जाता है। बहुत से डाक्टर भी एक्स रे से काम लेते लेते कैन्सर रोग से पीडित हुए हैं और उसी रोग से उनकी मृत्यु भी हुई है। किन्तु एक्स रे से कैसर रोग अच्छे भी होते हैं। सम्भ- चत एक्स रे के अधिक प्रयोग से इस रोग की उत्पत्ति होती हो।
वंशानुक्रम और रोग १४७ तपेदिक की बीमारी-मानव इस रोग से जितना डरता है, उतना और किसी रोग से नहीं। इस रोग के बीजाणु होते हैं, जिहें (tubercle bacillus) ट्युबरक्ल वैसिलिस् कहते हैं। मृत से ही इस रोग की उत्पत्ति होती है। किन्तु एक बार इस रोग के उत्पन्न हो जाने पर घशानुक्रम के नियमानुसार यशजो में यह रोग उत्पन्न हुआ करता है। तपेदिक के बीजाणु सर्वत्र विद्यमान हैं, किन्तु दुर्वल एव अनुकूल देह में ही इस रोग की उत्पत्ति हो सकती है। स्वस्थ देह में ये बीजाणु अपना प्रभाव नहीं दिखा पाते। देह के दुर्बल हो जाने पर नाना प्रभार के रोगो की उत्पत्ति होती है। पूरा आहार न मिलने पर, नमी से पूर्ण स्थान मे रहने से तपेदिक का शिकार हो जाना सहज हो जाता है। ऐसा कहा जाता है कि किसी न किसी समय सभी पर एक न एक बार तपेदिक के बीजाणु आक्रमण करते हैं, किन्तु देह के स्वस्थ रहने के कारण ये रोग उत्पन्न नहीं हो पाते। वशानुक्रम के अनुसार जब यह रोग क्सिी वश में उत्पन्न होता है, तर यह नहीं होता कि वश में सभी को यह रोग हो। साधा- रणतया होता यह है कि तपेदिक रोगवाले घश को कुछ सन्तानो में इस रोग के उत्पन्न होने की सम्भावना रहती है। यदि छूत- छात से बचकर, सन्तान अपने स्वास्थ्य को ठीक रस सके, तो सम्भव है उस वश मे यह रोग उत्पन्न न हो। संसार की कोई कोई जाति इस रोग से अधिक श्राकार होती है और कोई को इसम सन्देह नहीं कि यह रोग वशपरम्परा से निना फैलता है, छत से उतना नहीं फैलता। अमीर घरों में भी भाषा प्रहार कुछ कम नहीं होता है। चार सहस्र त inमस्त परिवारों को परीक्षा करके पण्डित 'वाइनमार्ग' ने गा मृग है कि अमीर घरों मे तपेदिक की बीमारी में जितनी syring, में उतनी नहीं हुई। श्राजक्ल भी RMATRA इन दिएका कम।
घशानुक्रम विज्ञान पर सोज कर रहे हैं। कुछ डाक्टरों का यह भा कहना है कि जिस वश मे बहुमून रोग होगा उस वंश में सपेदिक की बीमारी उत्पन्न होने की विशेष सम्भावना रहती है। चौदहवाँ परिच्छेद निकट सम्पन्धियों में विवाह टेलिजॉनी जनसाधारण की यह धारणा है कि गर्भावस्था में यदि नारी के मन पर किसी कारण किसी प्रकार की प्रबल छाप पड़ जाती है तो उसका प्रभाव उसकी सन्तान में भी दिखाई पडता है। इस विषय को लेकर बहुत परीक्षाएँ हुई हैं, किन्तु वैज्ञानिकगण आज इस बात को स्वीकार नहीं करते। किन्तु यह भी हम नहीं भूल सकते कि भ्रूण को, माता के जठर में बहुत दिनों तक रहना पड़ता है और इस बीच माता पर पारिपाश्विक चातावरण का प्रभाव भी अवश्य ही पड़ता है। इसलिए यह भी सम्भव नहीं कि उस प्रभाव के कारण माता में तथा भ्रूण भी कुछ परिवर्तन न होता हो। पशुपालकों में तथा साधारण जनता में भी यह धारणा बहुत प्रचलित है कि एक बार स्त्री से पुरुप का सयोग हो जाने से, स्त्री में इतना परिवर्तन हो जाता है कि दूसरे पुरुप से सन्तान उत्पन होने पर पहले पुरुष का कुछ प्रभार उसमें भी दिखाई देता है। इसी को अंगरेजी मे टेलिजॉनी कहते है। मैथुन के पश्चात् स्त्री यदि गर्भवती नहीं भी होती है, तथापि पुरुष के वीर्य का कुछ अंशत्री की योनि में रह जाता है एव कालक्रम से वह अश सी की देह में मिल जाता है। इस प्रकार प्रति मैथुन के पश्चात् पुरुष की देह से निसृत कुछ अंश स्त्री देह का प्रश बन जाता है। डा० मेरी स्टोप्स ने भी इस बात पर मनुष्यों पर वश और वातावरण का प्रभाव १४९ जोर दिया है कि पुरुष-देह से नि मृत वीर्य आदि मैयुन के पश्चात् स्त्री की देह में सम्मिलित हो जाते हैं। इस प्रकार पुरुप और स्त्री की देह धीरे धीरे एक दूसरे के सदृश यनती जाती है। पन्द्रहवाँ परिच्छेद मनुष्यों पर वश और वातावरण का प्रभाव अमेरिका के 'न्यूजर्सी' शहर में मानसिक रोगों का एक चिकित्सालय है। ई० सन् १८९८ में इस चिकित्सालय के डा० एच० एच० गार्ड महोदय अकस्मात् दो परिवारों के सम्पर्क में आये। एक ही पूर्वज के ये दोनों वश थे, फिर भी इनमें विषमता थी। एक परिवार के व्यक्ति सचरित्र, बुद्धिमान् एवं धनी थे, दूसरे परिवार के व्यक्ति असचरित्र, लम्पट, शरारी और पोर थे। डा० गडार्ड महोदय ने इन दोनों परिवारों को 'कल्लीकॉक' नाम दे दिया। "कस्लीकॉक" शद का अर्थ है-'भना चुरा'। बहुत अनुसन्धान के बाद गडार्ट महोदय को पता चला कि ये दोनों परिवार एक सैनिक के वंशज हैं। उसका नाम माटिन था। अमेरिका के गृह युद्ध के समय मार्टिन ने एक सराय में एक दुर्वल चित्त की नारी के साथ प्रसङ्ग किया था। उस नारी से एक सन्तान उत्पन्न हुई। यह पुत्र बहुत बुरा निकला। आसपास के व्यक्ति उससे तग पा गये थे। इसी सन्तान के वंश में जिननों का जन्म हुआ, वे सबके सब दुराचारी निफने। किन्तु उस गृह युद्ध के पश्चात् माटिन ने एक अच्छे घर में विवाह किया। वह क्वेकर नामक एक धार्मिक सम्प्रदाय की लड़की थी। इस लडको से जितनी सन्तान उत्पन हुई वे सयकी सब भलीमानस निकली। इसके भी पूर्व ई० सन् १८७४ में, न्यूयार्क जेल के निरीक्षक श्री डागडेल महोदय ने एक परिवार की परीक्षा की थी। इन्हाने देसा कि शहर के एक मुहल्ले मे निम्न ।
वंशानुक्रम विज्ञान श्रेणी के कुछ परिवार रहते हैं। उन परिवारों की उहोंने अन्दी तरह सोज फो। उहें पता चला कि १८ वीं शताब्दी में हो सगे भाइयों ने दो घचलन लडकियों से विवाह कर लिया था। इस परिवार का नाम 'ज्युक्स' परिवार था। इस परिवार में श्रापस मे ही विवाह होते थे। इस कारण इस परिवार की और भी दुर्गति हुई। प्रमश इस परिवार के न्यक्ति बाहर से भी विवाह करने लगे। ई० सन् १८१६ में ज्युक्स परिवार के मम्बध में पुन अनुसन्धान हुआ। इस अनुसन्धान के परिणाम में देखा गया कि ज्युम्स परिवार में कुछ उन्नति हुई है। 'कल्लीकॉक' और 'ज्युक्स' परिवारों पर पारिपाश्विक वातावरण का गहरा प्रभाव पड़ा था। ऐसा होना स्वाभाविक ही था। समाज में ऐसा ही हुआ करता है। हमारे समाज की प्रत्येक श्रेणी अपने अपने वातावरण में ही काम-काज परती रहती है। कलीकॉक और ज्युक्स परिवारों में मैरड़ों व्यक्ति उत्पन्न हुए थे। व मर के सन निष्ट प्रवृत्तिवाले थे। यह स्वाभाविक ही था कि उन परिवारों के व्यक्ति दुष्ट वातावरण में ही जीवन यापन करेंगे। ऐसे दुष्ट वातावरण मे कैसे किसी का स्वभाव सुधर सकता है ? सोलहवां परिच्छेद स्टेरिलाइजेशन किसे कहते हैं? वंशानुक्रम विज्ञान से कृपि-कार्य के सम्बन्ध में जितना लाभ हुश्रा है, उतना लाभ समाज-व्यवस्था में नहीं हुआ। पाश्चात्य देशों में केवल एक विषय पर कुछ जोर दिया जाने लगा है। ममाज में जो व्यक्ति रोगप्रस्त हैं, उ ह स तान उत्पादन करने मे रोका जा रहा है। एक ओर तो सन्तति निरोध का ज्ञान फैलाया जा रहा है, दूमरी ओर स्टेरिलाइजेशन द्वारा सन्तानोत्पादन की शक्ति को - स्टेरिलाइजेशन रिसे कहते है नष्ट किया जा रहा है। रिलाशन से चार-वासना उपभोग मे कोई बाधा नहीं पड़ती। जिम गरी पाप कायंचयः निकलता है, उस नाली या अनोपचार द्वारा काटर मुन्ना याँध दिया जाता है। खियों में रिलाशन मा पनि कार्य है । स्त्रियों के लिए नामि के नीचे के भाग को चीरना पड़ता है, और तत्र जिन नालियों से अण्डाणुजरायुमं श्रात है उन गरिकों को काटकर उनके मुसों को बाँध दिया जाता है। इनकार गर्मादान तो वन्द हो जाता है, किन्तु कामोपभोग में कोई यायान्ही पट्टी। आज से ४० वर्ष पूर्व अमेरिका के एक रेल में डाटा ने, इण्डियाना नाम: शहर म, सर्वप्रथम मरिलाशन काम प्रारम्भ किया था। उन्होंने कैदियों को गर म उन्हें नाइ रिया या। थोडे ही दिनों के अटर मानसिक रोमन व्यता को भी स्टेरिलाइन करना प्रारम्म हो गया व मन् १६०७ ई. में केतीफोर्निया एवं इण्डियाना मान्दों में रिपडेगर के सन्कर में नियम बन गये। आज-कल अमेरिका मन्दों मेममुन्य में कानून बन गये हैं। इस धान्न नमार हो . व्यक्तियो पोस्टेरिलाइन किया गया है। न्ने मनमि। इसका प्रयोग खतरनाक है । न्हापा गजलि रोगासे समाज को हानि पहुँच सम्नी, टन गरियाबाजार करने से समान काम्या है, करवा गिरि 1 गा मनमाने तीर मे स्टेरिलाइन करना प्रारम्म घटाने की हानि है। श्रमरिका के 'कानसास प्राधान्य संस्था से अधिकारीवर्ग असतुष्ट हो गये, में उन्हान न्स संस्था की समस्त लकियों था। इस प्रक्रिया का दुरपयोग होने की यथेट बाराहा। कौन गेग समान के लिए हानिकारक है, श्री कौन नही, इसकी भा मामांसा होना सहज यान नहीं है। १० १५२ वंशानुक्राम-विज्ञान सत्रहवाँ परिच्छेद वशानुक्रम और समाज की उन्नति सामाजिक उन्नति समाज के श्रेष्ठ पुरुषा पर जितनी निर्भर करती है, उतनी और किसी यात पर नहीं। यदि किसी समाज में श्रेष्ठ पुस्प क्म होते जाय, तो समाज की अवनति अपश्यम्भावी है। वर्तमान समय में यूरोप और अमेरिका में शिक्षिन और अच्छे घरानो मे सन्ताना की उत्पत्ति धीरे धीरे कम होती जा रही है और जिन परिवारों में शिक्षा की उन्नति नहीं हो पाई है, जिन परिवारों को हम साधारणतया निम्न श्रेणी के समझते हैं, उनमें सन्तानों की सस्या धीरे-धीरे बढती जा रही है 1 प्रसिद्ध अंगरेच जीववैज्ञानिक श्री जे० पी० एस० हॉल्डेन महोदय का मत है कि जिन समाजों में साधारण परिवारों की अपेक्षा शिक्षित और उच्च घरानों में कम सन्तानें उत्पन्न होता हैं, वे समाज निश्चित रूप से अमति की ओर मुकते हैं। बहुता की यह धारणा है कि समय के अनुसार समाज की जन-सरख्या का बढ़ना एक स्वाभाविक बात है, किन्तु विचार करने पर यह बात सत्य नहीं मालूम पडती। यह वात सरको विदित है कि प्राधुनिक युग में संसार की जन सरया और विशेषार इंगलैण्ड श्रादि की जन संख्या में अद्भुत वृद्धि हुई है। किन्तु इस जन संरया की वृद्धि विगत शतादी में जिस रोति से हुई है, इसके पूर्व वैसी नहीं हुई थी। सन् १८०१ ई० से १८६१ तक साठ वर्ष में इंगलैण्ड की जन मण्या दुगुनी से भी अधिक हो गई। किन्तु ई० सन् १०६६ को जन-सरया के दुगुनी होने में करीन चार सौ साल लग गये थे। सन् १४१५ ई० मे इंगलैण्ड की जन-सख्या १०६६ का जन-सरया से दुगुनी हुई थी, किन्तु श्राज की स्थिति की परीक्षा करने पर ऐसा वशानुक्रम और समाज की उन्नति १५३ प्रतीत होता है कि निकट भविष्य में इंगलैण्ड की जन-सरया घट जायगी, वढेगी नही। एक मत के अनुसार सन् २०३५ ई० तक इगौण्ड और वेल्स की जन सख्या आज से एक दसवाँ भाग घट जायगी। प्रगले पृष्ठ में दिये हुए चिन में विगत ६०० वपा की जन सरया की वृद्धि प्रादि का क्रम दिसाया गया है तथा अगले १०० साल मे वह जन-सरया कितनी गिर जायगी, इसका भी चिन दिया गया है। इस बीच यदि उपयुक्त रोनि से समाज का सुधार न किया गया, तो जन सरया की यह अपनति अवश्यम्भावी है। जैसे इँगलैण्ड की जन सरया की अपनति को आशङ्का की जा रही है, वैसे ही युरोप और अमेरिका के युक्तराष्ट्र के विभिन्न प्रदेशों की अवस्था भी समान रूप से आशङ्कापूर्ण है। यूरोप आदि दशों मे निकट भविष्य मे जन सख्या द्रुत गति से कम हो जायगो, इस बात को सुनकर साधारण व्यक्ति कुछ आश्चर्य में पड़ जाता है। कारण, वह देखता है कि प्रति वर्ष जन-सरया वृद्धि पा रही है, फिर निकट भविष्य में वह गिर कैसे जायगी। किन्तु विशेषज्ञों के इस अनुमान के मूल म जो कारण हैं उनमें से कुछ कारणो का परिचय यहाँ दिया जाता है। जम और मृत्यु के अनुपात की गणना इस प्रकार होती है- जम अनुपात का अर्थ है, प्रति सहस्र व्यक्ति मे कितने जन्म होते हैं। इसी प्रकार मृत्यु अनुपात का अर्थ है, प्रति महस्र व्यक्तियो मे प्रति वर्ष स्तिनो मृत्यु होती हैं। श्रन इन आँकडों पर ध्यान दीजिए। सन् १८९१ ई० मे इंगलैण्ड और वेल्स के जन्म का अनु- पात ३०५ था और सन् १९२१ में यह १९९ हो गया था। उही तीस वर्षों में इंगलैण्ड और वेल्स की जन-सस्या दो करोड नव्वे लास से तीन करोड अस्सी लाग्न हो गई थी। आँकडा से यह जान पड़ता है कि एक ओर तो घट गया जन-सख्या बढ़ अति - पात
SaamreseREAK
१५४
वंशानुनम विज्ञान
रिक्त उसी समय इंगलैएड और वेल्स के बहुत से व्यक्ति
निदेशो में भी चले गये थे। इस कारण भी जन्म की संख्या
PARALLERPRILALA
Artisthan.comtamne
timuvie
१० लासन
स
3300
१४१६
२००५
२०३५
सन् १०६६ ईश्वी से लेकर २०३५ तक इंगलैण्ड और वेल्स
की जन-सरया में परिवर्तन का अनुमान ।
(एच. सी. विवी के साथ से)
घुछ और घट गई होगी तथापि उन प्रदेशों की जन-सरया
बढ गई। इसका कारण यह है कि एक ओर जैसे जम अनुपात
घट गया, उसी प्रकार मृत्यु अनुपात भी घट गया। पिसी एक
वर्ष में जन्म अनुपात और मृत्यु अनुपात के अवर स ही समाज
की जम संख्या में वृद्धि और कमी होती रहती है। वर्तमान
समय में इंगलैण्ड में जन्म अनुपात मृत्यु अनुपात से अधिक है,
वशानुक्म और समाज की उन्नति १५५ तथा विशेषज्ञगण क्यों यह अनुमान करते हैं कि निकट भविष्य में इगलेण्ट की जन-संख्या घट जायेगी ? इस यात में एक रहस्य है। यदि आज पूर्वापेक्षा लड़कियों समाज म कम हो जाये तो अवश्य ही सिट भविष्य में सन्तान को देने के उपयुक्त स्त्रियाँ भी कम हो जायँगी, और इस प्रकार जन-सस्या भी घट जायगी। इस कारण केवल जम और मृत्यु के अनुपात से ही भविष्य में जन-संरया घटेगी अथवा नहीं, यह पहना बहुत कठिन है। किसी समाज में जन सख्या घट रही है अथवा बढ रही है, या यह सरया समान रूप में स्थित है, यह जानने के तिए हमें यह जानना परम आवश्यक है कि वर्तमान समय में प्रति नारी के गर्भ मे स्तिनी ऐसी लड़कियाँ जन्म ले रही है, जो कि भविष्य में माता होने के उपयुक्त होंगी। यूगेप आदि देशों में जन्म अनुपात के घट जाने का एक कारण तो यह है कि उन देशों में श्राजक्ल सन्तति निरोध के साधना का अधिक प्रयोग होने लगा है। दूसरा कारण यह है कि बहुत देशो में भ्रूण हत्याएँ की जा रही हैं। इसके अतिरिक्त कुछ और भी कारण अवश्य होंगे, जिनसे उन देशो के मनुष्यो में यश-वृद्धि की शक्ति भी कम होने लगी है, किन्तु जन्म अनुपात के कम होने का सबसे बडा कारण तो इच्छापूर्वक जन्म निरोध ही है। निम्नाक्ति चित्र में इस बात को दिसाया गया है कि शिक्षित समाज मे, जिममें ज म निरोध की रीतियो का ज्ञान अधिक फैला हुआ है, जन्म अनुपात दूसरी प्रशिक्षित श्रेणियो से कम है। अशिक्षित श्रेणियो मे जम निरोध का ज्ञान अधिक नहीं फैला है। इसके अतिरिक्त पृष्ठ १५६ के चिन से एक और बात पर भी ध्यान आकृष्ट होगा। वह यह कि कपडे की मिलों मे जो औरतें काम करती हैं, उनमें भी दूसरों की अपेक्षा जन्म- अनुपात कम है। ,
१५६
वंशानुनम विज्ञान
जर्मनी में विश्व विद्यालयों के प्रोफेसरों के प्रति घर में तीन से
भी क्म सतानें पाई जाती हैं, कितु उस देश में किमानों के प्रति
च्च पेशवाने
कारीगर
सानों में काम
करनेवाले मजदूर
पहे की मिलों म
काम करनवाल मजदूर
.
५२
१००
१५०
२००
सन् १९२१ ईस्वी में प्रति सहस ५५ वप से कम आयुवाले विवाहित
मनुष्यों के नियमित जम अनुपात का चित्र । यहाँ ५
पेशेवालों का चिन दिया गया है। (एच० सी०
बिबी के प्रथ से लिया गया।)
घर मे ६ से भी अधिक सताने प्राप्त होती हैं। सानियट रूस
में बडे बडे नेताओं के घरो में मामूली मजदूरों के घरो से कम
सताने हैं। इन सब देशों के आँकड़ो की परीक्षा करने पर यह
स्पष्ट हो जाता है कि जिन श्रेणियों को हम आज उच्च श्रेणी समझते
हैं, उन श्रेणियों में, निम्न श्रेणी की अपेक्षा क्म सन्तान उत्पन्न हो
रही हैं। यूरोप और अमेरिका के क्वल दो प्रदेश स्टॉकहाल्म
और ब्रेजील में इसके विपरीत दृष्टात प्राप्त होते हैं। स्वीडेन की
राजधानी स्टॉक्हाल्म में जम निरोध के सम्बन्ध में इतना प्रचार
श्रा है और वहां सामाजिक और शिक्षा-सम्बधी इतने सुधार
वशानुक्रम और समाज की उन्नति २०७ हुए हैं कि वहाँ गरीब घरों में उच्च श्रेणी के घरवालों की अपेक्षा कम सन्तानें उत्पन्न हो रही हैं। ग्रेजील के एक प्रान्त का नाम है मिनास जीराइस (Minas Geraes)। इस प्रान्त के प्रसिद्ध दैनिक पत्र में एक परिवार के विषय मे बहुत ही मनोरजक यात छपी थी। सेन्हॉर मोडेस्टो नामक व्यक्ति के ३३ वर्ष के विवाहित जीवन में ३३ सन्ताने उत्पन्न हुई थीं। उसका विवाहित जीवन २५ मई सन् १९३९ को ३३ साल ११ महीना और १३ दिन का था। उनकी सन्तानों में उन्नीस लडके और चौदह लडकियों थीं। इस सवाद के छपने पर मिनास जोराइस में बहुत चहल पहल मची थी, किन्तु यहाँ पर अच्छे अच्छे घरानों में साधारण तौर पर बारह से चौदह लडके असर जन्म लेते हैं। जॉन वी० ग्रिफिग नामक एक पण्डित ने ब्रेज़ील और चीन की जन-संरया के सम्बन्ध मे सोज की है। इस सम्बन्ध में उनके दो लेस, एक चीन और दूसरा ब्रेजील के सम्बन्ध मे सन् १९२६ और १९४० के 'जनरल ऑफ हेरे- डिटी' में छपे हैं। उनकी सेोज का सागश यह है-अमेरिका के युक्त राष्ट्र के उच्च श्रेणी के परिवारो की अपेक्षा ब्रेजील के उच्च श्रेणी के परिवारों में अधिक सन्तानें उत्पन्न हो रही हैं। वहाँ के गराव घरो में उच्च श्रेणी के घरो की अपेक्षा कम सन्तान जोनित रहती हैं। चीन में भी यही बात पाई गई है। वहाँ भी उच्च श्रेणी के घरों में निम्न श्रेणी की अपेक्षा अधिक सन्तान जन्म लेती हैं जिन्दा रहती हैं। अर्थात् चीन और ब्रेज़ील में निम्न श्रेणी की अपेक्षा उच्च श्रेणी मे जन्म सरया दिन व दिन वढती जा रही रही है। कहा जाता है कि ससार भर में चीन की ही स्त्रियों के सबसे अधिक सन्तानें उत्पन होती है, किन्तु प्रिफिग साहन की खोज से यह ज्ञात हुआ है कि ग्रेजील की माताएं ही सबसे अधिक सन्तानों को जन्म देती हैं। ब्रेजील की जनसरया भी दिन व , वंशानुक्रम विज्ञान दिन खून बढ रही है। सन् १९०० ई० मे ब्रेजील की जन सस्या एक करोड सत्तर तास थी। सन् १९२० में यह संख्या तीन करोड तक पहुँच गई और १९५० म चार करोड अस्सी लास हो गई है। ग्रिफि के अनुमार, अमेरिका के युक्त राष्ट्र में, उच श्रेणी के परिवारा में, दिन ब दिन कम सन्तानें उत्पन्न होने लगी हैं। किन्तु निन्न श्रेणी के परिवारों में, उच्च श्रेणी की अपेक्षा डेढ गुने से भी अधिक सतानें उत्पन हो रही है। अमेरिका के युक्त राष्ट्र में जन्म प्रनुपात पिछले दस वो म प्रतिशत २५ के अनुपात से गिर गया है। पिछले पाँच वर्षों के अन्दर सन् १९३९ ई० मे, अमेरिका के युक्त राष्ट्र में दस तथा दस से कम उम्र के बचो की संख्या सोलह लास कम हो गई है। अमेरिका के गृह युद्ध के बाद वहाँ की प्रत्येक स्त्री प्राय आठ सन्ताना की माता हाती थी और आज वह दो सन्तानों से अधिक की माता नहीं हो रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि किसी समाज को जन सरया व्यों की त्यो रसने के लिए एक दम्पती के कम से कम तीन सन्तानो का होना आवश्यक है। किन्तु अमेरिका क दम्पती प्राज तीन से भी कम सन्तानों के जमदाता हैं। पहले तो अमेरिका के युक्त राष्ट्र के बड़े-बड़े शहरों में ही जन-सन्या क्म होने लगी थी, परन्तु अब प्रामा मे भी यह सस्या कम होने लगी है। गाँवो में भी यह देवा गया है कि शिक्षित और धनी परिवारों में ही जन्म-सरया क्म हो रही है। यह देसो में पा रहा है कि शिक्षा के साथ-साथ जम अनुपात भी घट रहा है। पिछले अस्मी वर्षा से यह देखा जा रहा है कि प्रैजुएटा के परिवारों मे, उन लोगो की अपेक्षा जिन्होंने दलिज की शिक्षा नहीं प्राप्त की है, क्म सन्ताने उत्पन्न हो रही हैं। इसका एक कारण तो यह है कि बहुत मी कॉलेज को शिक्षा प्राप्त लडक्यिों शादी ही नहीं करतीं, दूसरी बात यह है । पशानुक्रम और समाज की उन्नति कि शिक्षित व्यक्ति, पुरुष और स्त्री दोनों ही जान बूमकर वश- निरोध करके, अपनो सन्ताना को सख्या कम कर रहे हैं। ऐसा देखा गया है कि अमेरिका के बडे-बडे गवैये और अन्वे-अन्ये वाद्य यन्त्रों के बजानेवाले छत्तीस परिवाग में ३७ लडके उत्पन हुए हैं। वहाँ के सो विवाहित पुस्तक लेग्यमा के केरल डेढ सौ सतानें उत्पन्न हुई हैं। इनमे ग्यारह लेखिकाएँ भी है, जिनके कुल मिलाकर १२ सन्ताने है इसके कारण ये हैं कि शिातत-जन, अधिक सन्तान के जनक- जननी नहा होना चाहते हैं, इससे एक ओर वे जन्म निरोध कर रहे हैं और दूसरी ओर स्त्रियों बहुत सरया में गर्भ गिरा देती है। डा० फ्रेडेरिक टॉसिग ने अमेरिका के गर्भपात के सम्बन्ध में बहुत सोज का है। उनका कहना है कि अमेरिका के युक्तराष्ट्र मे प्रति वर्ष सात लाय नारियाँ गर्म गिराया करती हैं। इसका या अर्थ होता है कि तीन गर्भरती नारियों में से एक नारी गर्भ गिरा दिया करती है। इनमे से प्रतिशत २५ या ३० नारियों गंग फे कारण गर्भ गिराती है। युरोप और अमेरिका मे गेग को कारगा गर्भ का गिराना गैरकानूनी नहीं है। प्रतिशत ६० से ६५ गारिया गुप्त रीति से गर्भ गिराया करती हैं। इसमें पाने गर्ग मो साक्टग की सहायता से गिराये जाते हैं, और वाघे यासादियां हाथ गिराये जाते हैं। गुप्त रीति से गर्भ गिराये जाने का अमेरिका में प्रति वर्ष श्राठ हजार नारियो मी गृयु Eriti डा० टोसिग के कथनानुमार प्रति नगर्भपास विवाहिम यानी कराती हैं, जिनकी आयु २५ से ३५ मापी in myी अपेक्षा शहरा मे दूने गर्भपात या मmmm trut याद "वेनिस" नगरी में गुप्त रुपमा utha पहले से ५ गुनी बढ़ गई है। Ht if anishtan नारियो र रूप से गर्मपाग with if Atml १६० वंशानुम्म विमान से यह मालूम हुआ था कि यूनाइटेड स्टेट्स श्राफ अमेरिका में प्रति वर्ष गुम रीति से १०,००,००० नारियाँ गर्भपात कराती हैं।* साधारणतया जिा शिक्षित परिवारो की आमदनी कम है, उनमें ही क्म सन्ताने जम लेती हैं। यदि राष्ट्र की ओर मे बच्चो के पालन पोषण के लिए उन परिवागे को सहायता मिले, तो जम की सरया में वृद्धि हो सस्ती है। मन् १९३९ ई० में न्यूयार्क सिटी में करीब तीस हजार नारियों अध्यापन का काम करती थीं। उनमे प्रतिशत चालीस से पैंतालीस नारियो अनिवाहिता थी। कुछ दिन पहले तक उस प्रदेश क फ़ानून के अनुमार अध्यापिकाओ के लिए विवाह करना मना था, किन्तु श्रर इस कानून म परिवर्तन हो गया है। जिस समय अध्यापिकाओं के लिए विवाह परना मना था, उस समय अध्यापि फाओं को छ सौ से लेग्र बारह सौ डालर तक मासिक वेतन मिलता था। धीरे धीरे यह वेतन १, ६०८ डालर से लेकर ३,३३९ टालर तक हो गया है। कुछ उन्नत श्रेणी की श्रध्यापिकात्री के लिए यह वेतन और भी अधिक हो गया है। समाज की जन सरया के बढाने के विषय में विभिन राष्ट्रों की अलग थलग नीतियाँ हैं। जर्मनी, इटली और रूस राष्ट्र में जन सरया के वढाने की नीति बढती जा रही है। सोवियट रूस मे जन-सस्या सघ बढ रही है। सम्भवत इसका एक कारण यह है कि वहाँ पर स्त्रियों के लिए बहुत सी आर्थिक सुविधाएँ हैं। वहाँ पर स्त्रियों को माता बनने में अधिक दिक्ने नहीं उठानी पडतीं। * देविए--Bankruptcy ot Alarriage by T F Calverton P 185187 वंशानुनम विज्ञान और समाजन्यवाया अठारहवाँ परिच्छेद पशानुक्रम-विज्ञान और समाज व्यवस्था प्रसिद्ध जर्मन पण्डित संगार महोदय ने कहा है रिजातीय मम्यताश्री को भी उत्पत्ति, विकास, फीमारामस्था, योयन, जरा और मृत्यु आदि व्यक्तिया की तरह होनी है। भारतीयों के धारणानुसार जातियों को मृत्यु अनिवार्य नगदीव्यक्तियों फेसम्यध मे जैसे जन्म, मृत्यु, पौमार और यौवनावस्या होती है और फिर उसका जन्म पये मी वृद्धि होती रहती है, वैसे ही जाति की भी चस्यत् उनि, अपनति, जन्म, विकास, कौमार, यौरन एवं जरावस्थाएं होती रहती हैं। यह पात भी सत्य है कि जिमका जम होता है, सफी मृयु भी होती है। किन्तु राष्ट्रीय उत्थान और पतन के बारे में भारतीयों की धारणा याद है कि राष्ट्रीय जीवन में इन उत्थान पतना फे युग हुश्रा करते हैं। अर्थात् जातीय जीवन में परिवत्तन चावत हुश्रा करते हैं। आधुनिक वैज्ञानिकों में बहुत्तेरे विद्वान् भारतीय मत के अनुयायो धनते जा रहे हैं। जर्मनी के तीन प्रसिद्ध जीन शानिकों ने मिलकर वशा- नुनम विज्ञान पर एक प्रामाणिक प्रन्य शिखा है। इस प्रथ का नाम दुमन हेरेडिटी (Human Heredity)| अंगरेजी भाषा में इम मथ से बढकर मानर-समाज से सम्बन्ध रसनेगाता वंशानुमम- विज्ञान पर दूसरा कोई अन्य नहीं है । उन तीन सर्वमान्य पण्डित फे नाम हैं, डास्टर अरवीन वावर, डाक्टर अयेजिन शिर एवं डारदर. प्रिट्न लेंज। उक्त पण्डितों का कहना है कि अनियन्त्रित विवाह प्रथा के कारण एवं समाज की उच्च श्रेणियों में, निम्न श्रेणी की अपेक्षा, चंशद्धि कम होने के कारण श्राधुनिक सभ्य समाजों की अधोगति प्रारम्भ हो गई है। आधुनिक पाश्चात्य समाज के बड़े-बडे शिक्षित व्यक्तियों में भी यह धारणा चैठ गई है कि विवाह एक व्यक्तिगत व्यापार है। श्राधुनिक १६२ घशानुक्रम निज्ञान चाण्ड रसेल, वी० एफ० कैलवान, स्मालहाउसेन आदि पएिटता की राय में विवाह बन्धन फा अब कोई प्रयोजन नहीं समझा जाता है। अपने को प्रगतिशील कहनेवाले व्यक्ति आर्थिक एवं अन्यान्य राष्ट्रीय व्यापार मे तो समाज का नियन्त्रण परम पावश्यक समझते हैं, किन्तु विवाह के समय में वे कैसे अनायास ही निश्चिन्त होकर उदासीन रहत हैं। आधुनिक वंशानुम्म विज्ञान के साथ मानों समाज व्यवस्था का कोई सम्बन्ध ही नहीं है। प्रकृति मे स्वाभाविक रीति तो यह है कि दुर्वत जीव जीवन सग्राम में टिक नहीं पाते। उहे साथी नहीं मिल पाता। इस प्रकार प्राकृतिक निर्वाचन के परिणाम में दुर्घलों और पीडितों का लोप होता जाता है, एव स्वास्थ्यमान, कर्मठ व अन्य प्रकार से योग्य प्राणियों की वंश पारा बनी रहती है। किन्तु मानर समाज में ऐसा नहीं हो पाता। गृहपालित पशुओ में भी हम अपनी अभिरुचि के अनुसार अच्छे प्राणियों को चुन लेते हैं और उन्हीं के वश की वृद्धि होने देते हैं। इस प्रकार निर्वाचन के परिणाम मे हम विशेष विशेष प्राणियो को वशधारा को कायम रस सकते हैं, अवाञ्छित प्राणियों की यशवृद्धि का रोककर प्राणियों का भोणि निभाजन अपनी इच्छा के अनुसार कर सकते हैं। यदि 'भ्युटेशन' क कारण रिसीवश में रोगग्रस्त अथवा अन्य क्सिी प्रकार के प्रवादित जीर की उत्पत्ति होती है तो उसमी वशवृद्धि को हम रोक सस्ते हैं। किन्तु श्राधुनिक मनुष्य-समाज में किसी प्रकार का नियन्त्रण नहीं है। अनियन्त्रित विवाह के फलस्वरूप, मनुष्य समाज मे नाना प्रकार के जेनि के अनियमित सम्मिश्रण से वाञ्छनीय एवं अवाञ्छनीय सभान विशिष्ट नाना प्रकार के मनुष्यों के जन्म होते रहते हैं। इसके उपरान्त समाज के श्रेष्ठ व्यक्तियों की सन्ताने निम्न श्रेणी के व्यक्तियो की अपेक्षा कम होने लगी है कारण समाज में जा परिस्थिति उत्पन्न होने लगी है, वह समाज 4.. ।
+ यशानुमम विज्ञान और समाज-व्यवस्था लए कल्याणकारी नहीं है। गृह पालित फुत्तो को हम बच्ची से अच्छी नस्ले बना रहे हैं, कितु मानर-यश के लिए हम बनासीन रहते हैं। यदि पिसी श्रादर्श के अनुसार माना समाज में भी विशेष निशेष भोणियों की उत्पत्ति की चेष्टा की जाय तो जातीय उन्नति का माग अत्यत प्रशस्त हो जाय। जीव विज्ञान और वशानुनम विज्ञान के अनुसार यशोन्नति के मति ध्यान रखने से धीज कोप के अमरत्व की तरह जाति भी सदा भागवन्त धनी रह सकती है। सभ्यताप्रो का विकास समाज के श्रेष्ठ पुरुषो द्वारा ही हुआ है। वंशानुनम विज्ञान के आधार पर समाज की व्यवस्था करने पर समाज में श्रेष्ठ पुरुपो के जम म और उनकी सरयाओ का अपने इच्छानुसार नियन्त्रण करना सम्भव है। आज मसार के प्रत्येक समाज में उच्च श्रेणी के विद्वान, चरित्रवान् और मेधावी पुरुषों की सतानें, साधारण व्यक्ति एव विशेष कर निम श्रेणियों की सत्तानो की अपेक्षा बहुत कम होने लगी हैं। जातीय अपनति का यह एक प्रयल लक्षण है। आधुनिक विज्ञान के अनुसार यह बात माननी पडेगी कि वंशानुनम से प्राप्त अच्छे- खुरे संस्कारों के कारण प्रत्येक समाज में व्यक्तियो मे बहुत निभिन्नताएँ हैं। इन विभिनताधो के आधार पर समाज व्यवस्था होनी चाहिए और यह भी देखना उचित है कि समाज मे अच्छे सम्कारवाले व्यक्ति अधिक से अधिक उत्पन्न हों। यह देखा गया है कि उनत पुरुषो के मस्तिष्क दूसरे पुरुषो से अधिक भारी होते हैं। यूरोप, चीन, जापान श्रादि सभ्य देशो के औसत दर्जे के व्यक्ति का मस्तिष्क निग्रो तथा आस्ट्रेलिया के असभ्य मनुष्यों की अपेक्षा कहीं अधिक भारी हाता है। किसा एक जाति मे भी सच कोटि के विद्वान् एव बुद्धिमान व्यक्तियों के मस्तिष्क, अन्य साधारण व्यक्ति के मस्तिष्क की अपेक्षा अधिक इसमे भी कोई सदेह नहीं कि बुद्धि एन" १६४ पसानुक्रम विज्ञान शफि हम यंश परम्परा में प्रात परते हैं। जीवन में मयुक्त अवसर प्रयाश पा पर प्रवृत्तियों पापसी है। पशाम्म फशियमानुमार, सिपाह-पद्धति के नियन्त्रय में, अच्च सत्तार युप ग्यपियों का अधिर मे अधिक मन्या म जम देगा समार। ऐमा न परत मे ममाज मे अरचे पुष्पों की सध्या पीरे धीरे कम हो जायगी और इम प्रसर ममाज का पता अवश्यम्भावी जायगा। पार गत्य देशों में मयम पाले सन् १९५० ई० मे रोहन में यशानुमग रिता के आधार पर जागीय वति पी व्यस्या परा के लिए एक सा प्रायम हुई यो। प्रमिद्ध मनोवैज्ञानिक नितिगम मैग्गन गहोरप, १९२९ ई० में जापा मम्राट के पास एक पर भेजा जिममे उनहों। अत्यात प्रामह के साथ गर्म- स्पर्शी भाषा में यश-विशान के आधार पर पुत्र प्रस्तान मेने थे। जापान में भी शशि क आधार पर समाजव्यवस्था के सम्पय में पेशानि पी एक समिति दी है, जिसका नाम है, प्रेएड युनिक फीमित। पाश्चात्य देशा पे पटुत से राष्ट्रों म पिराह पर नियन्त्रण करने के लिए नियम पारी हैं। रोगी यक्तियों का विवाह करनेसे रोपने की पेशा हो रही है। हिन्दुओं पी वर्णव्ययस्था यो पोर पाश्चात्य देशों के बड़े बड़े पपिटतो तरा वैज्ञानिको पा ध्यान आकृष्ट होने लगा है। प्रसिद्ध धैज्ञानिक भी० पी० एम० हॉलडेन महोदय ने तो यह पहने का साहस किया है fr 17 दो सौ वर्ष के अन्दर यूरोप म भी हिन्दुश्री की तरह यण यवस्था स्थापित हो जायगी। यशानुनम विज्ञान के आधार पर समाज-व्यवस्था के सम्बन्ध में इस विज्ञान की एक नवीन शासा उत्पन्न हुई है। इसका अंगरेजी नाम 'यूजेनिक्स' है। समाज-व्यवस्था पर इस विज्ञान का पैसा प्रभाव पड़ सकता है, इसफा पूर्ण परिपय यूजेनिम्स शास्त्र में प्राप्त हो सकता है। यह - वशानुक्रम विज्ञान और समाज-व्यवस्था नवीन शास्त्र अभी धन ही रहा है। मानव-जीवन का श्रादर्श क्या होना उचित है, इसका निर्णय हुए बिना समाजशास्त्र का निर्माण होना व्यर्थ है। वैज्ञानिकगण आज इस बात को स्वीकार करने लगे हैं कि बुद्धिवृत्ति की अपेक्षा मानन-जीवन पर हृदय वृत्ति का बहुत अधिक प्रभाव है। बुद्धिमान होने से ही मानव का कल्याण सम्भर नहा, मानर को अच्छा भी होना पडेगा। फुरसत के समय मनुष्य किस प्रकार जीवन वितायेगा, उसके आमोद प्रमोद क्सि ढग के होगे, क्सि रीति से शिक्षा पाने पर उसका जीवन सार्थक होगा, इन सब बातो का निर्णय कौन करेगा और कैसे होगा ? समाज से आर्थिक विषमता को दूर करना एक बडा भारी कार्य है, इसमे कोई सन्देह नहीं, कि तु केवल आर्थिक विषमता के दूर होने से ही मनुष्य अच्छे होने लगेंगे इसका क्या निश्चय है ? ससार भर का दरिद्र शोपित-वर्ग यही फ्ल्पना कर रहा है कि कैसे वह भी ससार के पैसेवाले व्यक्तियों की तरह हो सकेगा। ससार के पैसेवाले व्यक्ति का ही श्रादर्श उसका श्रादर्श हो रहा है। किन्तु यथार्थ दृष्टि से संसार के पैसे- वाले व्यक्तियों के जीवन तो उद्देश्य हीन ही होते हैं। श्राज मानन के लिए एक नवीन सामाजिक और वैयक्तिक आदर्श की नितान्त प्रापश्यक्ता है। इस नवीन, दार्शनिक भावनाओ से उद्भासित, मानव-कल्याण की कामना से अनुप्राणित वैयक्तिक और सामा जिक प्रादर्श के सहारे वशानुक्म विज्ञान के आधार पर नवीन रूप से समाज-व्यवस्था को आवश्यक्ता है। धर्मशास्त्र से ही जीवन का श्रादर्श बनेगा और वशानुक्रम विज्ञान के आधार पर हो नवीन समाज की व्यवस्था होगी।
1 वशानुक्रम के सम्बन्ध में प्रमाण पुस्तकों की सूची :- Human Heredits by Erwin Baur Eogen Fisch and Fritzdewz Translated by eden and Cedar Pa 1931 George Allen and Unwinded London 2 You and Heredity-by Amram Sheinfeld--1939 3 An Introduction to the Study of Herediiy-2 Mlacbride-1931 4 The Study of Heredity by E B Ford--1938 5 Heredity, Engenics and Social Progress by H Bibby 1939 6 Geneties by H E Walter-1923 7 Hereditary Genius by Francis Galton- 8 Science for the Citizen by Lancelot Hoghen- 9 An Outline of Modern knowledge- 10 Natare and Naturel Hoghen-1933 Essays 10 Popular Science-J S Huxley 12 Essays of a Biologist-- S Huxley 13 Evolution The Alodern Synthesis-J S Huxle: 1938 14 The Causes of Evolution-JBS Haldane-1932 15 Evolution and Genetics T H Morgan--1928 16 Journal of Heredity-American Genetic Asso ciation Washington Crime as Destiny-J Lange-1931 Eng trans 18 The Trend of the Race-S J Holmes-- 1921 New York Religion and the Sciences of Life Heredity by J A Thomson 20
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