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Parmatmprakash Prakrt Granth Hindi Bhasha Arthsahit

Surajbhanu · 2009/11

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प्रस्तावना श्रीपरमात्ममकाश अध्यात्मकथनी का ग्रन्थ है-निश्चयनयकी अपेक्षा से ही इस ग्रन्थ के प्राशयको समझने की ज़रूरत है-निश्चय व्यवहार दोनोंही प्रकार की कथनी धर्मात्मा पुरुषो को जानने की आवश्यक्ता है इसही विचार से हमने यह ग्रन्य छपाया है-लेखकों की असावधानी से श्रीजैनमंदिरों मै ग्रन्थ बहुत ही अशुद्ध मिलते है इसकारण शुद्ध करने में बड़ी कठिनाई पड़ती है हमको एक प्राचीन शुद्धालपि प्राकृत ग्रन्थ की मिलगई जिसके आधारपर हमको इस ग्रन्य के छापने का साहस हुवा यदि वह प्राचीन पोथी हमको न मिलती तो हम जैनमंदिरों से वीस प्रति इकट्ठी करने परभी शुद्ध नहीं करसक्त थे-अव भी कहीं कहीं अशुद्धि अवश्य रहगई होंगी जिसकी सूचना विद्वानों के द्वारा मिलनेपर आगामी शुदि करादीजावेगी । भाषाअनुवाद हमने एक भापाटीका के आधार पर किया है-याद कहीं भूल रहगई हो तो अवश्य हमको सूचना मिलनी चाहिये-अनुवाद बहुत सकोच रूप है जिसमें शब्दार्थ और भावार्थ दोनों आगया है आशा है कि हमारी इस अनुवाद की प्रणाली को सब पसन्द करेंगे। सय भाइयों का दास देवयन्द जिला सहारनपुर १२१२००९ } { सरजभानु वकील

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॥श्रीवीतरागायनमः ।। श्रीयोगेंद्रदेव विरचित। सभी मोनावमास्टर जोमवाजा परमात्मप्रकाश प्राकृत दोहा। चौमाना. संधी मोनजानमार " जे जाया झानाग्गिए, कम्म कलंक डहवि । णिच णिरंजण णाणमय, ते परमप्य णवेवि ॥ १॥ जो ध्यानरूपी अग्नि से कर्मकलंक को जलाकर नित्य, निरंजन (कर्म मलसे रहित ) ज्ञानस्वरूप हुवेहैं ऐसे सिद्ध परमात्मा को नमः स्कार होवै॥ ते बंदउ सिरि सिद्धगण, होसहि जेवि अगत । सिवर्मइ णिरुवम पाणमई, परम समाहि भजत ॥२॥ जो अनन्तजीव आगामी काल में रागादि विकल्प रहित परम समाधिको पाकर शिवमई, निरूपम और ज्ञानमई सिद्ध होवेंगे उन को नमस्कार करता हूं। तेहट बंदउ सिदगण, अत्यहि जे विह पैति । परम समाहि महिग्गयए, कम्मंधणइ हुणति ॥ ३ ॥ कर्मरूप ईधन को जलाकर जो श्रीसिद्धभगवान इस समय वि. देहक्षेत्र में विराजमान हैं उनको मैं भक्ति सहित नमस्कारकरताहूं। तेपण वंदउ सिद्धगण, जे णिवाणि वसति । पाणे तिहु यणि गरुयापि, भवसायर न पडंति ।। ४ ।। उन सिद्धों को भी नमस्कार करताहूं जो निर्वाण भूमिमें अर्थात मोक्षस्थान में बसते हैं, तीर्थकर अवस्था में जीवों को ज्ञान देनेके कारण हमारे तीनों भवके गुरु हैं परन्तु वे संसारमें नहीं पड़ते हैं । तेपुणु वंदउं सिद्धगण, जे अप्पाणि वसति । लोया लोउ विसय लुइडु, अछहि विमलु पियति ।। ५ ।। उन सिद्धों को नमस्कार करताहूं जो अपने आत्मस्वरूप में ही पसते हैं और लोक अलोक के समस्त पदार्थों को निर्मल प्रत्यक्ष ज्ञान से देखते हैं ।

(२) केवल दंसण णाण मय, केवल सुक्ख मुहाव । जिणवर बंदउ भत्तियए, जेहि पयासय भाव ॥ ६ ॥ श्रीजिनेंद्र देव को भक्तिभाव से नमस्कार करताहूं,केवल दर्शन, केवल ज्ञान, अनन्त सुख और अनन्त धीरज से मंडित हैं और जिन्होंने जीव अजीव आदिक पदार्थों के स्वरूप को प्रकाश किया है।। जे परमप्प णियंति मुणि, परम समाहि धरोवे । परमाणंदह कारणण, तिषणवि तेवि णवेवि ॥ ७॥ जिन मुनि महाराजोंने परमानन्द के देनेवाली परम समाधि को लगाकर परम पद प्राप्त किया है उन तीनों को मेरा नमस्कारहो- अर्थात् आचार्य, उपाध्याय और साधु को ॥ भावं पणविवि पंच गुरु सिरि जोइंदु जि णाव । भट्ट पहायरि विएणविउ विमलुकरे विणुभाव ॥ ८॥ अपने मनको निर्मल करके और पंचपरमेष्ठी को नमस्कार करके श्रीजोगेंद्राचार्य से प्रभाकर भट्ट विनती करताहै। .गउ संसार वसंतिह, सामिय कालु अनंतु । परमइ किंपिण पत्त सुहु, दुक्खुजिपत्तु महंतु ॥ ९ ॥ ; हेस्वामी! इस संसार में भ्रमतेहुवे मुझको अनन्तकाल बीते परन्तु मैंने सुख कुछ भी न पाया महान् दुःखही उठाया। चउगइ दुक्खहिं तत्त यह, जो परमप्पउ कोइ । चउगइ दुक्ख विनास यरू, कहहु पसायं सोइ ॥१०॥ जो चारगतिकेदुःखों में तप्तायमान होरहाहै और चारगतिकेदुःखों को विनाश कर परमपद प्राप्त करताहै.हे स्वामी उसका वर्णन करो पुणुपुणु पणविवि पंचगुरू, भाचे चित्ति धरेवि ।। भट्टपहायर निसुणि हुं, अप्पातिविहु कहेवि ॥११॥। (आचार्य कहतेहैं। हे प्रभाकर ! तू निश्चयके साथ सुन मैं भक्ति का भाव मन में रखकर पंचपरमेष्ठी को नमस्कार करके तीनप्रकार की आत्माका वर्णन करता हूं ॥ अप्पा तिविहु मुणेव लहु, मूढउ मेल्लहि भाउ । मुणि संणाणे णाणमउ, जो परमप्प सहाउ ॥ १२ ॥ आत्माको तीन प्रकार जानकर प्रथम वहिरात्मभावको छोड़ . . 1 WER 4 और अंतरात्मा होकर केवल ज्ञानपूर्ण परमात्मा का ध्यान कर ।। मूद वियक्खणु वंभुपरु, अप्पा तिीवहु हवेइ । देहु जिअप्पा जो मुणई, सो जगुग मूढ हवेइ ।।१३।। वहिरात्मा, अन्तरात्मा और परमात्मा तीन प्रकारकी आत्मा है जो अपने शरीर को ही आपा मानता है वह मूर्ख अर्थात् वहि- रात्मा है। देहहं भिएणउ णाणमउ, जो परमप्पु पिएइ । परम समाहि परिट्टियउ, पंडिय सो जिहवेइ ।। १४ ॥ जोआत्मा को देहसे भिन्न शुद्ध ज्ञानस्वरूप परमसमाधि में स्थित जानता है वह अन्तर आत्मा है ॥ अप्पा लद्धउ णाणमउ, कम्मावि मुक्के जेण । मिल्लिचि सयलविदव्युतुहुँ,सो पर मुणहि मणेण॥१॥ जो अपने आपे को प्राप्तहुवाहै ज्ञानमई है काँसे रहितहै उसको तू अपने मनको तीनप्रकार की शल्यसे शुद्धकरके परमात्माजान।। तिहुयणा वंदिउ सिद्धिगड, हरिहर झाहिं जोजे । लक्नु अलक्खे धरिवि थिरु, मुणि परमप्पउ सोजि ॥१६॥ तीनलोकजिसकी वंदना करताहै हरिहर आदिक जिसका ध्यान करते हैं वह सिद्ध भगवान् परमात्माहे ।। गिच्च णिरंजण णाण मउ, परमाणंद सहाउ । जो एहउ सो संतु सिउ, तामु मुणिज्जहि भाव ॥ १७ ॥ नित्यहै,निरंजन है अर्थात् रागादिक मलसे रहितहै, ज्ञानस्वरूप है,परमानन्द स्वरूपहै जो ऐसाहै वहही शांतिहै शिवहै ऐसा जान कर तू अपन स्वरूप को अनुभवकर ॥ जो णियभाउ ण परिहरइ, जो परभाउ ण लेइ । जाइण सयलुवि णिच्चुपर, सो सिव संत हवेइ ॥ १८ ॥ जो अपने स्वभाव को नहीं छोड़ताहै और परवस्तुके भावको नहीं ग्रहण करताहै और निजको और परको अर्थात् तीन लोकके त्रिकालवर्ती सर्व पदार्थों को जानताहै वहही शांति शिव है। जासु ण वएग रण गंधु रसु, जासु ण सद्दण फास । जासु ण जम्मणु मरणु ण,विणउ णिरंजण तासु ॥ १६ ॥ जासु ण कोहु ण मोहमउ, जासु ण माया माण । .

ALL AAAL Ani ( ४ ) जासु ण ठाणु ण झाणु जिय, सोजि रिणरंजण जाण॥ २० ॥ अत्थि ण पुण्ण एपाउ जसु,अत्यिण हरसु विसाउ। अत्थि या एक्कुवि दोसु जसु, सोजि णिरंजरण भाउ ॥ ११ ॥ जिसमें वरण, गंध, रस, शब्द, स्पर्शन नहींह अर्थात् देहधारी नहींहै जिसका जन्म नहीं, मरण नहीं वही निरंजन है ।। जिसको क्रोध नहीं मोहनहीं मद नहीं माया नहीं और मान नहीं है जिसमें ध्यान और ध्यानस्थान भी नहीं है उसही को निरंजन जान । जिसके पुण्य पाप नहींहै हर्ष विषाद नहीं है जिसमें किसी प्रकार का भी दोष नहींहै ऐसे जीव को निरंजन अनुभव कर ।। नासु ण धारणु धेउ णीव, जामु ण तंतु ण मंतु । जासु ण मंडल मंडलु मुद्द रणवि, सो मुणिदेउ अणंतु ॥ २२ ॥ 'धारण, ध्येय, जंत्र, मंत्र, मंडल और मुद्रादिक जिस में नहीं हैं वहही देव अनन्तहै ।। वेयहि सत्यहि इंदियहि, नो जिय मुणहु ण जाइ। हिम्मल झाडहिं जो विसउ, सो परमप्प प्रणाइ ॥१५॥ वह परमात्मा वेद शास्त्र और इन्द्रियों से नहीं जाना जाता है.वह निर्मल ध्यानसे ही जाना जासक्ता है। केवल दसण णामणउ, केवल सुक्ख सहाउ । केवल वीरिउ सो मुणीह, जोजि परावर भाउ ॥ २४ ॥ केवल दर्शन केवल ज्ञान, अनन्त सुख और अनन्त वीरज रूप ही को तू परमात्मा जान ॥ एयहि जुत्तउ लक्खणहि, जोपर णिक्कल देव । सो तहिं णिवसइ परमपइ, जो तिल्लोयहिं झेत ॥२॥ जो इस प्रकार के लक्षणों वालाहै और तीनलोक जिसकी ये- दना करताहै जो सर्वोत्कृष्ट है,शरीररहितहै,वहपरमात्मा लोकके अन्त पर तिष्टै है। जेहरु णिम्मलु णाणमउ, सिद्धिहि शिवसइ देउ । तेहउ शिवसइ वंभुपरु, देहहं में करि भेउ ॥ २६ ॥ जैसा निर्मल और ज्ञानमई परमात्मा सिद्ध अवस्था में है वह - - (५) ही परमब्रह्म संसार अवस्था में शरीर में रहता है-अर्थात् यह देह- धारी संसारी जीवही सिद्ध पदको प्राप्त होता है ।। में दिहें तुति लहु, कम्मइं पुन्च कियाइं । सो पर जाणहि जोइया,देहि वसंबु ण काई ॥ २७ ॥ जिस परमात्मा के ध्यानसे पूर्व उपार्जित कर्म नाश होते हैं वह परम पत्कृष्ट जानने योग्य तेरी देहही में बसताहै अन्यकहींनहीं है जित्यु रण इंदिय मुह दुहइं,जित्थु णमण वा वारु । सो अप्पा मुणि जीव तुई, अण्णु परे अचहारू ॥ २८ ॥ जिसको इन्द्रियों का सुख दुःख नहीं है और जिसमें मनकाव्या- पार अर्थार संकल्प विकल्प नहींहै उसही को तू आत्मा जान अन्य जो कुछ है वह पर है उसको तू छोड्दे ।। देहा देहं जो वसइ, भेया भेय गएण। सो अप्पा युणि जीव तुहूं,कि अण्ण पहुए ॥ २९ ॥ देश के साथ एकमेक होकर जो देह में घसताहै और नय कथन से भेदाभेद रूप है अर्थात् देहसे जुदा है,हे जीव तू उसको आत्मा जान अन्य जो अनेक पदार्थहैं उनसे क्या प्रयोजन है । जीवाजीव म एक्कु करि, लक्खरण मेए भेउ । जो परु सो परु मावि मुणि ,अप्पा अप्पु अभेउ ॥३०॥ जीव और अजीव को तू एक मतकर यह दोनों अपने अपने लक्षण से जुदे जुदे हैं जो पर उनको पर जान और आत्माको आत्मामान॥ श्रमण अणिदिउणाणमउ, मुत्ति रहिउ चिम्मत्तु । अप्पा इंदिय विसउ णवि, लक्खणु एहु रिणरुत्तु ॥ ३१॥ मन रहित है इन्द्रियरहित है ज्ञानमई है मूर्तिरहित है चेतन मात्र है इन्द्रियों से नहीं जाना जासक्ता है निश्चय से आत्मा के यह लक्षण हैं। भवतण भोय विरत्त मण, जो श्रप्पा झाएइ । तासु गुरुक्की बेल्लड़ी, संसारिणि तुट्टेइ ॥ १२ ॥ संसार शरीर भोगमें जोमन लगा हुवा था उस मन कोजोआ- स्मीक ध्यान में लगाता है उसकी संसार के बढ़ाने वाली बेल टूट जातीहै अर्थात् संसार परिभ्रमण यंद होजाता है । YYY AAAAAAAALT है (६) देहा देउलि जो वसइ, देव अग्णाइ अणंतु । केवल गाण फुरंत तणु, सो परमप्पु भरंतु ॥ ३३ ॥ संसारी जीवके शरीर रूपी चैत्यालय में जो वसता है वहही देवहै अनादि अनन्त है उसहीको केवल ज्ञानकी शक्तिहै उसंहीको परमात्मा कहते हैं। देहि वसंतुवि रावि छिवई, नियमे देहुवि जोजि । देहें छिप्पइ जोजे णावि, मुणि परमप्पा सोजि ॥ ३४ ॥ जो देहमें रहते हुवाभी देह को नहीं छूताहै अर्थात् देह.रूप नहीं होजाताहै और देहभी उस रूप नहीं होजातीहै वहही परमात्माहै ।। जो समभाव परिष्ठियहं, जो इहि कोवि फुरेइ ।' परमाणदु जगणंतु फुड, सो परमप्पु हवेइ ॥ ३५ ॥ समता भाव अवस्थामें अर्थात् सुखदुःख जीवन मरण शत्रु मित्र आदिक को बरावर समझ कर निर्विकल्प समाधिमे स्थिर होकर जिसको परम आनन्द प्राप्त होताहै वहही परमात्माहै । कम्मणि बद्भुवि जोइया, देह वसंतुवि जोजि । होइ णसयलु कयावि फुड, मुणि परमप्पउ सोजि॥३६॥ यद्यपि कर्मोसे बंधालुवा शरीरमें बसताहै परन्तु कभीभी शरीर रूप नहीं हो जाताहै वहही परमात्माहै उसको तू जान । जो परमत्थे निक्कलुवि, कम्मवि भिएणउ जोजि । मूढासयलु भणंति फुडु, मुशि परमप्पउ सोजि ॥१७॥ जो निश्चय नयसे अर्थात् असली स्वभाव की अपेक्षा शरीर रहित और कर्म रहितहै अर्थात् शरीर में रहना और कर्म बंधन में पड़ना जिसका असली स्वभाव नहींहै मूढमिथ्या दृष्टिलोग जिसको शरीररूप जानतेहैं अर्थात् देहधारी होना उसका अंस. ली स्वभाव समझतेहैं वही परमात्मा है ।। गयणि अणणंतु जि एक्कु उडु, जेहउँ भुवणु विहाइ । मुक्कई जसु पए विविय, सो परमप्पु अगाइ ॥१८॥ जिसके अनन्तानन्तज्ञान में तीनलोक ऐसा है जैसे 'अनन्त आकाश में एक नक्षत्र अर्थात् एक तारा वही ही परमात्मा है। जोड्य विंदहि गाणमउ, जो झाइन्झइ झेउ । + - (७) मोक्खं कारणु अवरउ, सो परमप्पउ देव ।। ३९ ।। श्रीमुनिमोक्ष प्राप्त होने के हेतु जिस ज्ञानमई आत्मा का ध्यान करते हैं अर्थात् अपनी आत्मा का ध्यान करते हैं वहही आत्मा परमात्मा है और देवहै॥ जो जिउ देउलहेवि विहि, जगु बहुविहउ जोइ । लिंगत्तय परिमंडियउ, सो परमप्पु हवेइ ॥ १० ॥ जोजानावरणादिक काँका निमित्त पाकर अर्थात् कर्मों के वश होकर उस स्थावर स्त्री पुरुष आदिक अनेक रूप संसार को उप- जावैहै अर्थात् संसार में अनेक पर्याय धारण करता है उसही को तू परमात्मा जान॥ जसु अभंतरि जगु बसइ, जग अभंतर जोजि । 1 जगवि वसंतुवि जगु जिणवि, मुणि परमप्पउ सोजि ॥११॥ जिसके केवल ज्ञान में सारा जगत् पसताहै अर्थात् सारा जगत् जिसको प्रतिभासता है और वह जगत्को जानने वाला जगत् में घसैहै परन्तु वह जानने वाला जगत् रूप नहीं होजाता है वह ही परमात्मा है। भावार्थ-जैसे किसी वस्तु को देखकर कहदेते हैं कि वह वस्तु हमारी आंख में है और यह भी कहते हैं कि हमारी आंख उस वस्तुमें है परन्तु आंख अलगहै और देखने योग्य बस्तु अलगहै इसही प्रकार संसारके पदार्थों को देखने वाला जीवहै ॥ देह वसंतुवि हरि हरवि, जे अज्झवि णा मुणति । परम समाहि भवेण विणु, सो परमप्पु भांति ।। ४२॥ शरीर के अन्दर जो आत्मा बसता है उसको परम समाधि के भाषसे रहित हरिहर आदिक नहीं पहचानसक्ते है-वह ही पर- मात्मा है। भावामावहि संजबउ, भावाभावहिं जाजि । देहजि दिहउ जिणावरहि, मुणि परमप्पउसोजि॥४३॥ जो निजभाव से संयुक्त और परभाव से रहित है उसको पर भाव से रहित और निजभाव से संयुक्त होकर श्रीजिनेंद्र देवने देहमें देखाहै उसको तू परमात्मा जान ॥ देह वसंते जेण पर, इंदिय गाउ वसेइ ।

(८) उध्वसु होइ गएण फुड,सो परमप्पु हवेइ ॥४४॥ जिसके देहमें बसने से इन्द्रियोंचाला ग्राम बसताहै और जिसके निकलजानेसे उजड़जाताहै उसकोतू परमात्मा जान। भावार्थ- तक जीव देहम रहताहै तबही तक आंख नाक आदिक इन्द्रियां अपना २ काम करती हैं और जब जीव निकलजाता है तब कोई भी इन्द्रिय नहीं रहती है। जो गिय करणाहिं पंचहि विं, पंचवि विसय मुणेइ । मुणिउं गा पंचहि पंचहिवि, सो परमप्पु हवेइ ॥१५॥ जो पांचौ इन्द्रियों के विषय को जानता है और इन्द्रियां इंद्रियों के विषय को नहीं जानती हैं उसही कोतू परमात्मा जाना भावार्थ- पांचा इन्द्रिगं आंख नाक कान, जिहा और त्वचा यह सब जड़ हैं इनमें जानने की शक्ति नहीं है संसारी जीव इन इन्द्रियों के द्वारा इस प्रकार जानता है जैसाकि जिसकी आंख कमजोर होगई वह ऐनक ( चशमे) के द्वारा देखता है परन्तु ऐनकमें देखनेकी शक्ति नहींहै यह देखने जानने वाला जीवहै वहही परमात्मा है। जसु परमत्थे बंधु णवि, जोइय गावि संसारू । सो परमप्पउ झारिणतुं हुं,मुणि मेल्लेवि ववहारू ॥ १६ ॥ जिसका असली स्वभाव कमौके बंधसे और संसारसे अर्थात् अभेकरूप घूमनेसे रहितहै। भावार्थ-कर्मबंध और संसारमें घूम- ना जिसका असली स्वभाव नहींहै वह परमात्मा है उसका तू ध्यानकर और व्यवहार को त्यागने योग्य समझ ॥ रोया भावें वल्लि जिवि, थक्कइ गाण वलेवि । मुक्कहं जसु पए विवयउ, परम सहाउ भणेवि॥ १७ ॥ जैसे किसी मकानमें कोई बेल बोईजावै तो वह उगकर और पढ़कर मकानके अन्दर फैलजावैगी परन्तु यदि मकान बड़ा होता तो और भी लंबी फैलती इसही प्रकार केवल ज्ञान सर्व पदार्थोंको जानता है यदि इससे अधिक पदार्थ होते तो उनको भी जानता- मोक्ष पानेपर जिसमें ऐसा जान है वहही परमात्मा है । कम्मई जासुजांत एवि,गाउ गाउ कञ्ज सयावि । कपि रा जणियउ हरिउणावि, सोपरमप्पउ भावि ॥ १८॥ - AAA (९) -Pra कर्म मुख दुःखरूप अपने र कारज को उत्पन्न करते हैं परन्तु जीव के स्वभाव को नाश नहीं करसक्त हैं और जीवमें कोई नवीन स्व भाव उत्पन्न नहीं करसक्त है वह जीय परमात्मा है उस को तू अनुभव कर॥ कम्मणि बंधवि होइ गावि, जो फुडुकम्म कयादि । कम्मविजोण कयावि फुडु , सो परमप्पउ भावि ॥ १९॥ कर्मोसे बधाडवा भी जो कर्मरूप नहीं होताहै और कर्मभी जिस रूप नहीं होजाते हैं वही परमात्मा है उसको तू अनुभवकर । भावार्थ-कर्म जह जीव चैतन्यहै-जड़ बदलकर चेतन नहीं होता और चेतन बदलकर जड़ नहीं होसक्ता है-कर्म जीवके स्वरूप से भिन्न ही है। किवि भणंति जिउ सव्वगउ, जिउ जहु केवि भणंति । कोवि भणंति जिउ देहसमु, सुरणवि कवि भवति ॥ ५० ॥ कोई जीवको सर्वव्यापी कहते हैं कोई जीवको जड़ बताते हैं कोई जीव को देह परिमाण कहते हैं और कोई जीवकोशून्य कहते हैं । अप्पा जोइय सम्बगड, अप्पा जहुवि वियाणि । अप्पा देह समाणु मुणि,अप्पा सुरण वियाणि ॥ ५१ ॥ आत्मा सर्वव्यापी भी है जड़ भी है देह परिमाणभी है और शून्य भी है ।। अप्पा कम्मवि विज्जियउ, केवल णाणे जेण । ऐयालोउ मुण्इ जिय, सव्वगु बुच्चइ तेण ॥५२॥ जीवात्मा कर्मों से रहितहोकर केवल ज्ञान के द्वारा लोक अ- लोक अर्थात् सर्व को जानता है इस हेतु सर्वगत अर्थात् सर्व- व्यापी कहा है। जोणिय वोहि परिहियई, जीवहं तुष्टइ णाणुः। इंदिय जरिणयउ जोइया, तेजिउ जडुवि वियाणु।। ५३ ॥ जब जीवको अतिन्द्रिय ज्ञान होता है तब इन्द्रियज्ञान कुछ नहीं रहता है इस कारण उस समय इन्द्रियज्ञान से रहित होताहै इसही हेतु जड़ कहा है। भावार्थ । इन्द्रियां जडो व्यवहार में इन्द्रियोंके ही द्वारा ज्ञान होता है परन्तु आत्मीक परमशक्तिके प्रकट होनेपर २ (१०) जीवको शून्य कहा है। इन्द्रियों से भिन्न अतिन्द्रियज्ञान प्राप्त होने की अवस्थाम इन्द्रियां जड़ रूप रहजाती हैं। कारण विरहिउ सुद्ध जिउ, बढइ खिरइ ण जेण। चरम सरीर पमाणु लिउ, जिणवर वोल्लाहि तेण ॥ ५४॥ कर्मरूप कारणके अभाव से सिद्धजीव घटता बढता नहीं है जिस शरीर से मुक्ति होती है उस शरीरके परिमाण रहता है ऐसा श्री- जिनेंद्र देवने कहा है। अहवि कम्मई बहुविहई, णव णव दोसवि जेण । सुद्धहं एक्नुवि अत्थिणवि, सुरणवि वुच्चइ तेरण ।। ५५ ।। सिद्धजीव में आठ कमोसे वा इनके भेदाभेद में से कोईभीकर्म नहीं है और १८ दोषों में से कोई भी दोष नहीं है इस कारण भी अप्पा जणियउ केण णवि, अप्पें जणिउ ण कोइ। दम्ब सहावें णिच्चु मुणि, पज्जउ विणसइ होइ ॥ १६ ॥ आत्मा को न किसीने उपजाया है और न आत्माने किसीद्रव्य को उपजाया है-यह आत्मा द्रव्य सुभाव कर नित्य है परन्तु पर्याय की अपेक्षा उपजता भी है और विनाशभी होता है अर्थात् आत्म द्रव्य तो अनादि नित्य है न पैदा होता है और न विनाश होता है परन्तु पर्याय अर्थात् अवस्था सदा बदलती रहतीहै अर्थात् पर्याय उत्पन्न भी होती है और विनाशभी होती है । तं परियाणाह दव्यु वुहूं, जंगुण पज्जय जुत्तु । सहभृय जाणहिं ताहि गुण, कमभुय पज्जउवुत्तु ॥ १७ ॥ द्रव्य उसको जानो जिसमें गुण और पर्यायहों-जो सहभावी हो अर्थात् द्रव्य के साथ सदा रहे अर्थात् द्रव्य का सुभावहो उस को गुण कहते हैं और जो क्रमवर्ती हो अर्थात् कभी कोई दशाहो कभी कोई उसको पर्याय कहते हैं । अप्पा बुज्झहिं दव्य तुहुं, गुण पुणु दसणु णाणु । पज्जय चउगइ भाव तणु, कम्म विणिम्मिउ जाणु॥ ५८ ॥ आत्मा को द्रव्यजान, दर्शन औरज्ञान उसका गुणजान और चतुरगति परिभ्रमण रूपपरिणमन को कर्मकृत विभावपर्याय जान॥ जीवहि कम्मु अगाइ जिय, जणियड कम्मरण तेण । ।

(११) कम्में जीउवि जगिउ णवि, दोहिंवि आइण जेण ॥ ५९ ॥ जीव और कर्म दोनों अनादिह न तो जीवने कमौको पैदा किया है औरन कर्मों ने जीवको पैदा कियाहै दोनों रस्तु अनादिही से चली आतीहैं आदि कोई नहींहै ।। इड् ववहारिं जीव भाउ, हे उलहेविणु कम्म । बहुविह भावइ परिणवइ, तेणजिधम्म अहम्म ॥ ६० ॥ यह व्यवहारी जीव अपने किये कर्मों के निमित्तसे अनेकभाव रूप परिणमताहै अर्थात् पुण्यरूप और पाप रूप होताहै ॥ तेपुण जीवहि जोइया, अट्ठवि कम्म मणति । जेहिंजि झपिय जीवणवि, अप्प सहाउ लहति।। ६१॥ कर्म आठ प्रकारके हैं जिन से ढका जाकर जीव अपने आत्मीक स्वभाव को नहीं पाताहै ॥ विसय कसायहि रंजियहं, जे अणु भालग्गति । जीव पएसहिं मोहिय, ते जिण कम्म भरणांत ॥ ६२ ॥ विषय कषाय और मोहके कारण जो पुद्गल परमाणु जीवके प्रदेशों से लगते हैं श्रीजिनेंद्र भागवान्ने उनहीको कर्म कहाहै। पंचवि इंदिय अपणु मणु, अण्णावि सयल विभाव । जीवहिं कम्मई जणिय जिय, अण्णुवि चउगइ भाव ।। ६३ ॥ पांच इन्द्रिय, मन, समस्त विभाव परिणाम और चारगति सम्बंधी दुःख यह सब जीवको कर्मों ने उपजायेहैं । दुक्खाव मुक्खावि बहुविहउ, जीवहि कम्म जोइ । अप्पा देखइ मुणइ पर, खिच्छर एउ भणेइ ॥ ६४ ॥ जीवोंको सर्व प्रकारके सुखदुःख कर्मोंनेही उपजायेहैं परन्तु निश्चयनयसे अर्थात् असली स्वभाव से तो जीवात्मा देखने और जानने वालाहीहै ।। वंधुवि मोक्खवि सयलु जिय, जीवह कम्म जणेइ । अप्पा किंपिवि कुणइ रणवि, णिच्छउ एउ भणेइ ॥६५॥ हे जीव बंध और मोक्षको कर्मों नेही उत्पन्न कियाहै निश्चय नयसे जीव बंध और मोक्षका पैदा करनेवाला नहीं है। भावार्थ- यदि कर्म न होते तो बंधऔर मोक्ष यह दो नामही नहोते कमौसे -- - LAAAAAAAA (१२) ही बंध होताहै और कर्मों होके दूर होनेसे मोक्ष अर्थात् बंधन से छूटना होताहै जीवका असली स्वभाव न बंधन में पड़नाहै और न छूटनाहै बंधना और छूटना यह दोनों बात कमाँ ही के कारण पैदा होती हैं ॥ अप्पा एंगुहु अणुहवइ, अप्पुणु जाइ णएइ । भुवणत्यहं विमज्झि. जिय, विहि भागाइ विहि णेइ ॥ १६ ॥ पांगुले मनुष्य की समान जीवात्मा अपने आप न कहीं आता है और न कहीं जाता है-कर्म ही इसजीवको तीनलोक में लिये फिरते हैं। अप्पा अप्पुजि परुजिपरु,अप्पा परुजि रण होइ । परुजि कयाविण अप्पुणवि,रिणयमें पभणहिंजोइ ।। ६७ ॥ आत्मा आत्माही है और पर पदार्थ परही है-नतो आत्मा अन्यकोई पदार्थ बनसक्ती है और न अन्यकोई पदार्थ आत्मा धन- सक्ता है ऐसा जोगीश्वर कहते हैं। गवि उपजइ णवि मरइबंधु ण मोक्खु करई । जिउ परमत्ये जोइया, जिरणवरु एउभणेइ ।। ६८॥ निश्चय नयसे अर्थात् असली स्वभाव से जीवात्मान पैदाहो- ता है और न मरता है न पंधरूप है और न झुक्तिरूप है श्रीजि- नेंद्र ऐसा कहते हैं॥ अत्थिणउप्जउ जर मरण,रोयवि लिंगवि वरण । णियमें अप्पु वियाणि तुहूं, जीवह एक्कुवि सरण ॥ ६९ ॥ देहहि उप्जउ'जर मरण, देहाह वरण विचित्त । देहहिं रोय वियाण तुहूं, देहहिं लिंग विचित्त ॥ ७० ॥ निश्चय नयसे पैदाहोना, जरा अर्थात् वुढ़ापा, मरना, रोग, लिंग अर्थात स्त्रीरूप वा पुरुषरूपहोना, और वर्ण आदिक जीवमें नहीं है यह सब बातें देहही में हैं देहही उत्पन्न होताहै देहही बूढा होता है देहहीका मरण होताहै देहहीने विचित्ररंग, देहही में रोगहै देहही में श्री पुरुष आदिकलिंग हैं। देहाहि पिक्खवि जर मरण, मा भउ जीवकरोह । जोअजरामरु दंभुपरू, सो अप्पाणु मुणेहि ॥ ७१ ॥ छिज्जउ मिज्जउ जाउखउ, जोइय एहु सरीर । .

AAALAAL AAAAAAAAAAAAAAAAAAAAAALAAAA अप्पा भावहि निम्मलर, जे पावहि भवतीर ॥७२॥ हे जीव तू देहमें बुढ़ापा और भरना देखकर भय मतकर अजर अमर जो परब्रह्म है उसही को तू अपनी आत्माजान चाहे शरीर का छेदहो भेदहा वाक्षयहो अर्थात् शरीर चाहे कटे दूदै वानाश होजावै तू उसकी तरफ कुछ ध्यान मत दे तू तो अपनी शुद्धआ. स्मा का अनुभवक्षर जिससे तू संसार समुद्र से पार होजावै ।। कम्मह केरउ भावडर, अण्णा अयण दव्य । जीव सहावहिं भिएणुजिय, णियमें बुज्झहि सच ।। ७३ ॥ अशुद्ध चेतनारूप कयों से उत्पन्न हुवे राग द्वेष आदिक भाव और शरीर आदिक अचेतन द्रव्य यह सब शुद्ध आत्मा से भिन्न है यह बात सब जानते हैं। अप्पा मिल्लिविणारणमउ,अण्ण पगयउ भाउ । ते छंडेविणु जीव तुहुं, भावहिं अप्प सहाउ ॥ ७४ ॥ ज्ञानमई जो आत्मा है उलले जोलिन्नभाव है उन सबको छोड़ कर तू अपनी शुद्ध आत्माका अनुभव फार ।। अहहिं कम्महि वाहिरज, सयलहिं दोसहंचत्तु । दसणणागण चरित्तमज, अप्पा भाविणिरुत्त ।। ७५ ॥ आठ कर्म और १८ दोषोंसे रहित यह जीव दर्शन, ज्ञान, चारित्र रूपहै तू ऐसा अनुभव कर ॥ अप्पड अप्पु मुणउ जिउ, सम्मा दिहि हवेइ । सम्मादिहिउ जीवडउ, लहु कम्मइ मुच्छेद ॥ ७६ ॥ जो जीव आत्मा को आत्मा मानता है वह सम्यक्दृष्टि है स- म्यक्हष्टि ही कम्मों के पन्धन से छूटता है ।। पज्जय रत्तउ जीवडर, मित्यादिहि हवेइ । बंधइ बहुविह कम्मडा, जिणि संसारु भमेइ ॥ ७७ ॥ जो जीवपर्याय में रागी होकर पर्वत है वह मिथ्यादृष्टि है यह ही नानाप्रकारके कमाँ का बंधकरके संसार में रुलता फिरता है। कम्मइ दिढ घण चिकणइ, गुरुयं मेरु समाइ । खाण वियरखणु जीवडउ, उप्पहि पाहिताइ ।। ७८ ।। कर्म बहुत ज़ोरावर और चिकने हैं मेरुकी समान बड़े हैं कर्म - (१४) ही ज्ञानवान् जीवात्मा को कुमार्ग में डालते हैं। जिउ मित्यते परिणामउ विवरित तच्चु मुणेइ । कम्मवि णिमिय भावडा, ते अप्पाणु भणेइ ॥ ७९ ॥ मिथ्यात्वरूप परिणमताहुवा जीव तत्वों को अन्यथारूप जा- नता है और कर्मों के द्वारा उत्पन्नहुचे भावको ही आपा मानताहै।। हउं गोरउ इउं सांवलउ, हांजे विभिण्णउ वण्णु । हडं तणु अंगउ थूल हलं, एहउ मूढउ मण्गु ॥८॥ इंउं वरु बंभरण वइस डर, एडं खनिट इउं सेस । पुरिमु रणउंसउ इत्यिहडं, मुण्णइ मूढ विसेम् ॥ ८१ ॥ तरुराउ बूढउ रूवडउ, सूरउ पंडिउ दिव्वु । खवणउ वंदउ सेवडउ, मूढउ मण्णइ सब्बु ।। ८२॥ मैं गोराहूं मैं सांवलाहूं वा नाना मकारके वर्णवालाहूं मैं मोटाई मैं पतलाहूंइत्यादिक जिनके परिणामहैं उनको मिथ्यादृष्टि जानना। मैं ब्राह्मण हूँ मैं वैश्यहूं मैं क्षत्रीहूं अथवा शूद्र आदिकहूं मै पुरुषहूं वास्त्रीहूं वानपुंसक हूं यह परिणाम मिथ्यादृष्टि के होतेहैं। मैं जवान हूं मैं बूढाहूं मैं रूपवान हूँ मैं सूर्माहूं मैं पण्डितहूं मैं उत्तमहूं मैं दिगम्वरहूं बोधगुरुहूं वा श्वेताम्बर साधूहूं जिनके ऐसे परिणाम, वह मिथ्यादृष्टिजानने । जणणी जणणुवि कंत घरु, पुत्तुवि मित्ताने दच । माया जालुवि अप्पणउ, मूढउ मएणइ सच ॥ ८३ ॥ माता पिता पति स्त्री पुत्र मित्र धनदौलत यह सवमाया जालहैं इन सबको मिथ्यादृष्टि जीव अपने मानताहै ।। दुक्खहि कारण जे विसय, ते सुइ हेउ रमेइ ।। मिथ्यादिही जीवडउ, एत्यु न काई करेइ ।। ८४ ।। इन्द्रियों के विषय जो दुःखके कारण हैं मिथ्यादृष्टि उनही को सुखका कारण जानकर उनमें रमताहै तो वह अन्य कौनसा अकारज न करेगा। कालु लहेविण जोइया, जिम जिम मोह गलेइ । तिम तिम दसण लहइ जिउ,गियमे अप्पुभणेइ ।। ८५ ॥ काल लब्धिकोपाकर ज्यों ज्यों साधुके मोहका नाशहोता है त्यों - BALAAA (१५) त्यों इस जीवको शुद्धआत्मरूप सम्यक् दर्शन की प्राप्तिहोतीहै और निश्चयरूप आत्मा का वर्णन करने लगता है ।। अप्पा गोरउ किएहुरणवि, अप्पा रतुणहोइ । अप्पा सुहुमुवि थूलणवि, वाणिउ णाणं जोइ ॥ ८ ॥ आत्मा न गोरा है न कालाहै न सूक्ष्महै न स्थूल है आत्मा ज्ञान- स्वरूप है यहयात ज्ञानीही जानताहै ।। अप्पा वंभा वइसणीवाणवि खत्तिउ णवि सेन्च । पुरिस रणउसउ इत्थिणवि, रणाणिउ मुग्णइ असेल ।। ८७ ॥ आत्मा न ब्राह्मण है न वैश्यहै न क्षत्रीहै न शूद्रहै न पुरुषह न स्त्री है न नपुंसक है आत्मा ज्ञानस्वरूपहीहै और ज्ञान से सब कुछ जानताहै॥ अप्पा वंदउ खवणु णीव, अप्पा गुरउ साहोइ । अप्पा लिंगिउ एक्कु णविरणाणिउ जाणइ जोइ ।। ८८॥ आत्मा यति गुरु सन्यासी उदासी दंडीआदिक भेषधारी भी नहीं है आत्मा ज्ञानस्वरूपहीहै ज्ञानाही आत्मा को पहचानताहै। अप्पा गुरु रवि सिस्स रावि, पावि सामिउ गावि भिच्च । सूरज कायरु होइ गावि, गघि उत्तम पावि पिच्च ॥ ८९ ॥ आत्मान गुरुहै न शिष्य है न राजा है न रंकहै न शूरवीर है न कायर है न उच्च है न नीच है आत्मा ज्ञानस्वरूप है उस को जानी ही जानता है। अप्पा माणुस देउ गावि, अप्पा तिरिउ रा होइ । अप्पा नारउ कहवि रावि, पाणिउ जाणाइजोइ।। ९० ॥ आत्मा न मनुष्य है न देव है न तिर्यंच है न नारकी है आत्मा ज्ञानस्वरूप है उसको ज्ञानी ही जानता है ॥ अप्पा पंडिउ मुक्खणावि, णवि ईसरु गावि पीस। तरुणावूढउ वालु गावि, अएणुवि कम्म विससु ॥११॥ आत्मा न पण्डितहै न सूर्ख है न विभूतिवान है न दरिद्री न चूढा है न बालक है न जवान है यह सर्व प्रकारकी अवस्था कमाँ ही से उत्पन्न होती है। wwwwwww LAAAAAAAA LAAAALAAAAA LAALAABAR ALAALAILLAAAAAAA LAAAAAAAA पुण्णावि पादवि कालु णहु, धम्माहम्म विकाउ । एक्कुवि अप्पा होइ रणवि, मिल्लिवि चेयरण भाउ ॥ ९ ॥ आत्मान पुण्य पदार्थ है न पाप पदार्थ है आत्माकाल द्रव्य भी नहीं है आकाश भी नहीं है धर्म वा अधर्म द्रव्य भी नहीं है शरीर आदिक पुदत द्रव्य भी नहीं है आत्मा चैतन्यरवरूप है और अपने चेतनास्वभाव को छोड़कर अन्य नहीं होताहै ।। अप्पा संजम सीलनउ, अप्पा देसण गाण । अप्पा सासय सुक्स पउ, जारंगतउ अप्पारण ॥ ९३ ॥ आत्मा संयम, शील, तप, दर्शन, ज्ञानरूप है और अविनाशी मोक्षस्वरूप है आत्माही आत्माको जानता है ।। अण्णुजि दंसण अस्थिरणवि,अण्णुजि अत्थिण रणाग। अण्णुजि चरणु ण अथिजिय,मिल्लचि अप्पा जाण ॥ ९ ॥ हे जीव ! आत्मा से भिन्न अन्य कोई दर्शन,ज्ञान और चरित्र नहीं है रत्नत्रय के समूहको ही आत्मा जान ॥ अण्णुजि तित्थ भ जाहि जिय, अण्णुजि गुरउ म सेव । अएणुजि देव म चिंत वृहुं अप्पा विमल मुएवि ॥ ९५ ॥ हे जीव शुद्ध आत्मा से भिन्न अन्य कोई तीर्थ मत मान कोई गुरु मत से और कोई देव मत जान लूनिर्मल आत्मा को ही अनुभव कर॥ अप्पा दसणु केवलुवि, अण्ण सब ववहारूं । एक्कुजि जोइय झाइयइ, जोतियलोकाहिं सारु ।।९६ ॥ आत्मा एकमात्र ( खालिस ) सम्यग्दर्शनस्वरूप है तीन लोक में सारभूत पदार्थ जो आत्मा है वहही ध्यावने योग्य है ।। अन्य सब व्यवहार है अर्थात् आत्मध्यानके सिवाय धर्म के अन्यलक साधन व्यवहार रूपहीहैं ।। अप्पा झायहि णिम्मलउ, किं बहुएं अएणेण । जो भायंतहिं परमपउ, लब्भइ एवकु खणेण ॥ ९७ ॥ अपनी निर्मल आत्माका ध्यानकर जिसके ध्यानमें एक अन्तर मुहूर्त स्थिर होनेसे मुक्ति प्राप्त होजातीहै अन्य बहुत प्रकार के साधनों से क्याझाम॥ ४४ ULTAAL ALLLLLLLLLLLL ( १७ ) अप्पा णियमणि णिम्मलउ, णिय में वसइ रण जासु । सत्य पुराणइ तवयरण, मुक्खुजि करहि कितासु । ९८॥ जिसके मन में निर्मल अपना आत्मा नहीं वसताहै उसको शास्त्र पुराण और तपश्चरण मोक्ष नहीं देसक्ते हैं। जोइय अप्पे जारिणएण, जग जारिणय हवेइ । अप्पाहि केरइ भावडइ, विविउ जेण वसेइ ॥ ९९ ॥ हे योगी अर्थात् हे साधु जो आत्मा को जानता है वह सब कुछ जानता है क्योंकि आत्मा के ज्ञान में समस्त जगत् झलकरहा है। अप्प सहावि परिठियाहि, एहउ होइ विसेस | दीसइ अप्प सहावि लहु, लोया लोय असेस ।। १००॥ जो जीव आत्मस्वभाव में तिष्ठता है अर्थात् लीनहै उस को शीघही आत्मा दिखाई देजाता है अर्थात् केवल ज्ञान प्राप्त होजाता है और लोकालोक दिखाई देने लगता है ।। अप्प पयासइ अप्पु परु, जिम अंवर राव राउ। जोइय एत्थुम भेति करि, एहउ वत्थु सहाउ ॥ १०१ ॥ जैसे आकाश में सूरज आपको और पर पदार्थों को प्रकाश करता है इसही प्रकार आत्माभी अपने आपको और लोकालोक को दे- खताहै इसमें संशयमतकर यह वस्तुस्वभाव है ॥ तारायणु जलि विवियर, रिणम्मलि दासइ जेम । अप्पइ णिम्मलि विवियउ, लोयालोरवि तेम ।। १०२ ॥ जैसे निर्मल जल में तारे प्रतिषिवित होतेहैं ऐसेही आत्मा के निर्मल स्वभाव में लोकालोक प्रतिबिंबित होते हैं ॥' अप्पवि परुवि वियाणियइं, जें अप्पें मुणिएण । सो णिय अप्पा जाणितुहूं, जोइय णाण वलेण॥ १०३ ॥ जिस आत्मा के जानने से अपने आप को और अन्य सर्य पदार्थों को जान सकते हैं उस ही शुद्ध आत्मा को तू अपने ज्ञान के बल से जान॥ रमाणु पयासहि परम मुहूं, कि भएणे वहुएण । जेण णियप्पा जाणियइ, सामिय एक्क खणेण॥ १०४ ॥ 1 ३ 1

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(१८)
(प्रश्न) हे स्वामी मुझको वह ज्ञान बताओ जिस ज्ञानसे एक
क्षणमें शुद्ध आत्माको जान जाय और जिस ज्ञानके सिवाय और
कोई वस्तु कार्यकारी नहीं है ।।
अप्पा गाण मुणेहि तुहूं, जो जाणइ अप्पाण ।
जीव पएसहिं तेत्तडउ, णाणगयणपमाण ॥१०॥
(उत्तर) आत्मा को तू ज्ञानमईमान वह आत्मा आपही अपने
आपको जानता है निश्चय नयसे अर्थात् असलियत में उस आत्मा
के प्रदेश लोक के बरावर हैं और व्यवहार में शरीर के घरावर हैं
और ज्ञानकी अपेक्षा लोकालोकके बराबर हैं।
अप्पहिं जेवि विभिएण वढ़, नेजिहावं ण णाण ।
ते तुहुँ तिएणवि परिहरिवि, रिणयमें अप्पुत्रियाण ॥ १०६ ॥
आत्मासे भिन्न जो पदार्थ हैं वह ज्ञान नहीं हैं अर्थात् उनमें
ज्ञान नहीं है इस कारण तू सर्व पदार्थों को छोड़कर निश्चयके साथ
आत्मा ही को जान ।।
अप्पा णाणहि गम्मु पर, पाण वियाणइ जेण ।
तिएणवि मिल्लिवि जाणि तुहूं, अप्पा मारण तेण ।। १०७ ॥
आत्माज्ञान में आने योग्य है ज्ञानसेही आत्माजानी जाती है इस
कारण तू और सब घात छोड़कर आत्माको ज्ञानके द्वाराजान ।।
रणाणिय णारिणउं पाएएण,णारिणउ जा ण मुणेहि ।
ता अण्णाणे णाणमउ कि. परवंभु लहेहि ॥ १०८ ॥
ज्ञानीजीव जितने काल तक ज्ञानमई आत्माको नहीं जानता है
उतने कालतक अज्ञानीहुवा परब्रह्मको नहीं पाता है अर्थात् जब
तक रागद्देष में फंसारहता है तब तक परमब्रह्म अर्थात् परमात्मा
को नहीं पाता है।
जो इज्जइ तिम वभुपरु, जाणिज्जइ तम सोइ ।
वंभु मुणेविणु जेरणलहु, गम्मिज्जइ परलोइ ॥ १०९॥
आत्मा के जानने से परलोक सम्बन्धी परमात्मा जानाजाताहै
वहही परमब्रह्म है आत्माही के देखने और जाननेसे वह देखाजाना
जाताहै-भावार्थ आत्माही परमब्रह्म परमात्मा है।
मुणिवर विंदहिहरिहरहि, जो मण णिवसइ देव ।
परहाँजे परतरु णाणमउ, सो बुच्चइ परलोउ ॥ ११० ॥

( १९) मुनीश्वर और हरिहरादिकके मनमें जो देव वसताहै वह उत्कृ- है ज्ञानमई है उसही को परलोक कहते हैं । सो पर वुच्चइ लोउपर, जसु मइ तित्यव सइ । जहिं मइ तहिं गइ जीवहवि, शियमेंजेए। हवेइ ।। १११ ॥ जिसके मनमें वह पसताह जिसको परलोक कहते हैं अर्थात् शुद्ध आत्मा, भावार्थ-परमात्मा का जिसको ध्यान है यह अवश्य परमात्म पद्को प्राप्त होगा-क्यूंकि जैसी मति वैसीही गति॥ जहि मइ नहिं गइ जीव तुहूं, मरणावि जेएा लहेहि । ते परवंभु मुएवि मइ, मा पर दबि कोहि ॥ ११२॥ जैसे तेरी बुद्धि है मरकर तैसी ही गतिको तू प्रास होगा इस कारण परमब्रह्म से बुद्धि को हटाकर अन्य किसी द्रव्य में अपनी बुद्धि को मत लगा-अर्थात् अन्य सर्व पदार्थों से रागद्वेष को छोड़ कर शुद्ध आत्मा का ध्यानकर ॥ जोणिय दव्या, भिएगा जहु, तें परदब वियाण । पोग्गल धम्मग्रहम्म हुन कालवि पंचमु जाणि ॥ ११३ ॥ जो आत्मा से पर पदार्थ है अचेतन हैं उनही को तू परद्रव्य जान, यह पांच हैं पुद्गल धर्म, अधर्म, आकाश और काल॥ जइणवि सद्भुवि कुवि करइ, परमप्पइ अाराउ । अग्गि करणी जिम कट्टागरि, डहइ असे सुविपाउ॥ ११४ ।। जो कोई सम्यक् दृष्टि एक क्षण अर्थात् बहुत थोड़े काल भी आत्मा में अनुराग करता है लीन होता है वह बहुत कर्मों का नाश करता है जैसे अग्नि का एक कण ईधन के बहुत बड़े समूह को शीघही भस्म करदेता है ।। मल्लिवि सयल अवक्खडी,जिय निश्चितित होइ । चित्तु शिवेसिवि परमपइ, देउ गिरंजण जोइ ।। ११५ ॥ हे जीव तू समस्त यखेड़ा अर्थात चिंता को त्यागकर निश्चित हो जा और मन को परमात्मस्वरूप में लगाकर निरंजन देव अर्थात् शुद्ध निर्मल आत्मा को देख ॥ जसिव दंसण परम मुहु, पावहिं झाणु करंतु । तं सुहु भुवाणवि अत्थियावि, मल्लिवि देउ अणंतु। ११६ ॥ .

AAAAAAAAAAAAA 1 (२०) अनन्त देवोंको छोड़कर ध्यान के द्वारा शिव अर्थात् परम आत्मा को देखने से जो परम आनन्द प्राप्त होता है वह आनन्द तीन लोक में अन्य कहीं भी नहीं है ।। जं मुणि लहइ अणं सुहु, णिय अप्पा झायतु । तं सुहु इंदुवि रणवि लहइ, देविहिं कोडि रमंतु ॥ ११७ ॥ अपनी शुद्ध आत्मा के भ्यानसे जो आनन्द साधु को मिलता है वह आनन्द इन्द्रको भी प्राप्त नहींह जो करोड़ों देवांगनाओं से रमता है। अप्पा सण जिरणवरहि, जे सुहु होइ अगंतु । तं सुहु लहइ विराउ जिउ, जा तउ सिउसंत ॥ ११ ॥ अपनी निज आत्मा के देखने से जो अनंत सुख-श्री जिनेंद्र को होताहै वही सुख वीतरागी पुरुष शिवसंत अर्थात् अपनी शुद्धआत्माके अनुभव से पाताहै ॥ जो इय रिणयमरिण रिगम्मलइ, परदीसइ सिवसंत । अंवर णिम्मल घण रहिए, भाणुाज जेम फुरंत ॥ ११९॥ शुद्ध निर्मल मनमेंही शिव संत अर्थात् शुद्ध आत्मा नज़रआ. ताहै जैसे बादलों से रहित साफ आकाश में ही सूरज का प्रकाश प्रकट होताहै ॥ राएं रंगिए हियवइ, देउ ण दी सइ संनु । दप्पणि मइलइ विवु जिम, पहउजाणि रिणभंतु।। १२० ॥ जिसका मन राग अर्थात् मोह में रंगा हुवाहै उसको संतदेव अर्थात् परमात्मानजर नहीं आताहै जैसे मैले दर्पण में प्रतिविम्बनहीं पड़नाहै-हे शिष्य तू ऐसा जान इसमें संदेह नहीं है। जसु हरिणत्थी हियवडइ, तसुणवि वंभुवियारि । एक्कहिं केम समंति वढ, खडा परियारि ॥ १२१ ॥ जिसके मनमें स्त्री बसता है उसके मन में ब्रह्मअर्थात् शुद्धपरमा- स्मा नहीं पसताहै क्यूंकि एक मयानमें दो तलवार नहीं समासक्तीहैं णिय मणि णिम्मालणाणियंह,णिवसइ देउप्रणाइ। हंसा सरवर लीण जिम, महु एहउ पडिहाइ ॥ १२९ ॥ ज्ञानी जीवके निर्मल मनमें अनादि अनन्त देव निवास करता - AAAAALAALA " (२१) है जैसे हंस पक्षी सरोवर में निवास करता है हे शिष्य हमके यहही यात मूझतीहै ॥ देउ रा देवलि गावि सिलइ, गावि लिप्पइ पावि चित्त । भखउ णिरंजा गाणमउ, सिउ सठिउ समचित्त ॥ १२३ ॥ देव अर्थात् परमात्मा जो अविनाशी है कर्मों से रहित है और ज्ञानमई है वह देवालय अर्थात् मन्दिर में नहीं है पाषाणकी प्रतिमा में नहीं है पुस्तक में नहीं है और चित्राम में नहीं है वह समभाव रूप मन में बसता है ।। गण मिलियउ परमेसरहि, परमेसराव मणस्स । वीहिमि समरस दूयाहिं, पुज्ज चडावउ कस्स ।। १२४ ।। मन परमेश्वर से मिलगया और परमेश्वर मनसे मिलगय अर्थात् दोनों एक होगये अब पूजा किमकी कारेये ।। जेण णिरंजए। मणु धरिउ, विसय कसायहि जनु । मोक्खहि कारण एनडउ, अएण ण तंतु ण मंतु ॥ १२ ॥ जिसने मन को विषय कषाय ले रोककर परम निरंजन अर्याद शुद्ध आत्मा में लगाया है वह ही मोक्षके मार्गपर है क्यूकि मंत्र तंत्र आदिक अन्य कोई भी उपाय मोक्षमार्ग नहीं है ।। सिरिगुरु अक्खाहि मोक्ख महूं, मोक्खहि कारण तत्थ । मोक्खहिं केरउ अण्णु फल, जिम जाणउँ परमत्य ।। १२६ ॥ हे गुरु मुझको मोक्ष मोक्ष का मार्ग और मोक्षका फल बताओ जिससे मैं परमार्थको जान॥ जोइया मोक्खुधि मोक्ख फन, पुच्छहु मोक्खहि हेउ । सो निणमासिउ णिसुणि तुहुँ, जेण वियाणहि भेउ ।। १२७ ॥ शिष्य तू मोक्ष, मोक्ष का फल,और मोक्षका कारण पूछता है सो हम जिन पाणी के अनुसार कहते हैं तू निश्चल होकर सुना। धम्माईि अत्यहि कामहि, एयई सयलहं मोक्खु । उत्तमु पभणहि णाणि जिय, अण्णे जण ण साक्खु ॥ १२८ ॥ धर्म, अर्थ और काम इनतीनोंसे ज्ञान के पक्षस मोक्ष उत्तमह क्यूंकि इन तीनोंमें ज्ञानका आनन्द नहीं है, भावार्थ-धर्म अर्थ काम और मोक्ष यह चार पुरुषार्थ जगत् में प्रसिद्ध हैं परन्तु ज्ञान का परम - १

(२२)
आनन्द मोक्षहीमें है इस हेतु इन सब में मोक्षही सवसे उत्तम ॥
जइ जिय उत्तमु होइ णवि, एयहं सयलहं सोइ ।
तो कि तिएणवि परिहरिवि,जिवचाहिं परलोइ ।। १२९।।
यदि मोक्ष उत्तम नहोता तो धर्म अर्थ और कामको छोड़कर
श्रीतीर्थकर भगवान् परलोक में क्यूं ठहरते ॥
उत्तमु सोक्खु गण देइ जइ, उत्तमु मोक्ख ण होई ।
ता किं इच्छहिं बंधणहिं, बद्धा पसुयवि सोइ ॥ १३ ॥
यदि मोक्ष में उत्तम मुख नहोता तो मोक्ष उत्तम क्यूं कहाजा
ता जो मोक्ष अर्थात् छूटना उत्तम नहोता तो पशुजो बंधन में बंधे
रहते हैं वह क्यूं छूटना चाहते ॥
भएणुजि जगहाज अहिययरु, गुणगुणु तासु ण होइ ।
तो तइलोगन किं धरइ, णियसिर उपरि सोइ ॥ ११ ॥
जो मोक्ष में जगत् से अति विशेष गुण नहोते तो तीन लोक
मोक्षको अपने सिरपर क्यूं धरता अर्थात् लोक शिखरपर, मोक्ष
स्थान इसही हेतु है कि उसमें तीनलोकसे अधिकगुण
उत्तमु सोक्नु रण दइ जइ,उत्तमु मोक्खु ण होइ।
ता किं सयलुवि कालु निय, सिद्धवि सेवाहि सोइ।। १३२ ॥
यदि मोक्षम अति उत्तम सुख नहोता तोसिद्ध भगवान् सदा
काल मोक्ष में क्यूं रहते॥
हरिहर वंपवि जिरणवरवि, मुनिवरविंदवि भव्य ।
परमणिरंजीण मणु धरिवि, मोक्नु जिजायहिं सब्ब ।।११३ ।।
हरिहर, ब्रह्मा, जिनेश्वर और सर्व मुनि और भव्य पुरुषों ने
परम निरंजन परमात्माको मन में धारण करके मोक्षकाहीसाधन
किया है ।।
तिदुवणि जीवहिं अत्यि णीव, सोक्खहि कारण कोइ ।
मुक्खु मुएविण एक्कु पर, तेरणदि चिंतहिं सोइ ।। १३४ ॥
सद जीव मोक्ष को इस कारण चाहते हैं कि तीनलोक में सिवाय
मोक्ष के और कोई सुखका कारण ही नहीं है !!
जीवहिं सो पर मोक्खु मुणि, जो परमप्यय लाहु ।
कम्म कलंक विमुक्काई, णाणिय वोल्लहिं भाहु ॥ १३५ ॥

AALAALAAAJALL . ते (२३) कर्म कलंक से रहित होकर परमात्मा स्वरूपकी प्राप्ति को ही ज्ञानी लोग मोक्ष कहते हैं ऐसा तू जान ॥ दसण णाणु अनन्त सुहु, समउ ण तुट्टइ जासु । सो परसासउ मोक्ख फलु, विज्जउ अत्थिण ताम् ॥ १३६ ॥ केवल दर्शन केवल जान अनन्त सुख अनन्त वीर्य आदिक परम गुण मोक्षके फलहैं और यह फल कभी अलग नहीं होतेहैं: अर्थात् नित्य रहते हैं और इनके सिवाय और कोई फलनहीं है। जीवहिं मोक्खहि हेड वरू, देसण णारण चरित्तु । पुग्ण तिषणावि अप्पु मुणि, गिच्छइ एहउ वुत्तु ॥ १३७ ॥ व्यवहार में सम्यक् दर्शन सम्यक जान सम्यक् चारित्र यहनीन मोक्षके कारणहैं और निश्चय में शुद्ध आत्माही मोक्षका कारणहै। पिच्छइ जाणइ अणुचरइ, अप्पें अप्पड जोजि । दसणणाण चरित्त जिउ, मोक्खाहि कारणा सोजि ॥१८॥ जीव आपही अपनी आत्मा को देखताहै जानताहै और अनु- भवन करताहै इस हेतु एक आत्माही जोदर्शन ज्ञान और चारित्र रूपहै मोक्षका कारणहै ॥ जं बोलइ ववहारु णड, देसणणाण चरित्तु । तं परिमाणीह जीव तुहूं, में परु होहि पवित्त ।। १३९ ।। व्यवहार नयका यह कथन है कि सम्यक् दर्शन सम्यक् ज्ञान और सम्यक् चारित्र इनतीनों को तू अच्छी तरह जान जिससे तू पवित्र होजावे ॥ दव्बई जाणई जहं ठियई, ताहि जगि मरणइ जोजि । अप्पाहि केरउ भावहउ, अविचलु देसण सोजि ॥ १४० ॥ जिस प्रकार जगत् में द्रव्यस्थिते हैं उनको उसही प्रकार यथावत् जान कर अपनी शुद्ध आत्मा में निश्चल स्थिति होना सम्यक् दर्शनहै ।। दव्य जागाइ ताइ छह, तिहुयणु भरियड जेहि। श्राइविणासवि विज्जियहि, णीयाहिं पमाणिय पहि॥१४१ ॥ द्रव्य जो तीन लोक में भरे हुवेह वह छै ६ हैं उनका आदि और -- .

AAA (२४) -- अन्त अर्थात् उत्पत्ति और बिनाश नहींह-ज्ञानी पुरुषोंने ऐसा कहाहै जीव संचयण दब्बु मुणि, पंच अचेयण अएरण । पोग्गलु धम्माहम्मु गहु, कालि सहिया भिएण ॥ ११२ ॥ एक जीव द्रव्य चेतनहै और पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश और काल यह पांच द्रव्य अचेतनहूँ यह सब द्रव्य भिन्न भिन्न हैं । मुत्तिविहीगाउ रणाणमउ, परमाणंद सहाउ । णियमे जोइय अप्पु मुणि सिच्चुणिरंजण भाउ॥ १४३ ॥ अमूर्तीकहै ज्ञानमईहै परमानन्द सरूपहै आत्मा अर्थात् जीव को तू ऐसा जाम वह अविनाशी और निरंजनहै ।। पुग्गल छव्विहु मुत्तुवढ, इयर अमुत्त वियाणि । धम्माधम्मुवि गइ ठिएहि, कागु प भणहि णाणि ॥१४४ ॥ पुद्गल छै प्रकारकाहै और मृतकहै-पुद्गल के सिवाय अन्य पांच द्रव्य अमूर्तीकहै अर्थात् एक पुद्गल ही मृतकह-औरधर्म द्रव्य चलने को सहकारीहै और अधर्म द्रव्य ठहरने को सहकारी है-ऐसा सर्वज्ञ देवने कहाहै ॥ दब्बई सयलई वरिठियई, णियमें जासु वसति। तं णह दव्व वियाणि तुहूं, जिणवर एउ भणंति ।। १४५ ॥ जिसके पेट में सब द्रव्य घसतेहँ अर्थात् सर्व पदार्थों को अव- काश अर्थात् ठिकाना देताहै उसको तू आकाशजान श्रीजिनेंद्रदेवने, ऐसा कहाहै॥ काल मुणिज्जहि दब्बु तुहुं, वहण लक्खण एउ। रयणहिं रासि विभिएण जिम, तसुअणुयाहि तिहिं भेउ ।। १४६ ॥ तू काल द्रव्य उसको जान जिसका वर्तना लक्षणहै अर्थात्सर्व पदार्थों के परिणमनको जो सहकारी कारण है काल के अणु भिन्न २ हैं जैसे रत्नों के ढेर में रत्न भिन्नर रहते है आपसमें जुड़ते नहीं हैं। जीउवि पुग्गल कालु जिय, एमिल्लेविण दव्य । इयर अखंड वियाणि तुहुं, अप्प पएसहिं सच ॥ १४७॥ जीव पुद्गल और काल इन तीनों के सिवाय जो द्रव्यहँ अर्थात धर्म अधर्म और आकाश यह तीनों एक एक और अखंडित द्रव्यह 노 - (२५) भावार्थ-जीव भी बहुत हैं और ईंट पत्थर लोहा लकड़ी आदिक पुदल भी बहुत हैं और कालके भी अणु बहुत हैं परन्तु आकाश एकही है और उसके टुकड़े भी नहीं होसते हैं ऐसेही धर्मद्रव्य भी एकही है और अधर्मद्रव्य भी एकही है और इनके टुकड़े भी नहीं होसक्ते हैं। दव्व चयारिवि इयर जिय, गमणागमण विहीण । जीउवि पुग्गलु परिहारवि, प भणहिं पाणि पवीण ॥ १४८ ॥ जीव और पुगल के सिवाय जो चार द्रव्य हैं अर्थात् धर्म अधर्म आकाश और काल इनचारोंमें हिलना चिलना अर्थात् क्रिया नहीं है ज्ञानवान पुरुषोंने ऐसा कहाहै । धम्माहम्मुवि एकु जियउ, एाजे असंख पएस । गयणु अणंत पएसु मुणि, बहुावहि पुग्गल देस ।। १४२ ॥ धर्मद्रव्य और अधर्मद्रव्य यह दोनों असंख्यात प्रदेशी हैं और एक एक जीवं असंख्यात प्रदेशी है आकाश अनन्त प्रदेशी है पुद्गल बहुत भांतिहै और कालका एक एक अणु एकप्रदेशी है ॥ लोयायासु धरेवि जिय, कहियई दव्बई जाई । एकुर्हि मिलयई एत्य जागे, सगुणहि रिणवसहि ताई।। १५० ।। पांचा द्रव्य लोकाकाश के अन्दर हैं और आकाश द्रव्यलोक के अन्दरंभी है और लोकके याहरभी है-अर्थात् छहों द्रव्य एक ही स्थान में रहते हैं परन्तु कोईभी द्रव्य किसी दूसरे द्रव्यस मिल कर दूसरे द्रव्यरूप नहीं होजाताहै सष द्रव्य अपने ही गुणों में ठहरे रहते हैं। एयई दब्बई देहियहि, रिणय रिणय कज्जु जणंति । चउगइ दुकव सहति जिय, ते संसारु ममति ॥ १५ ॥ जीव से पृथक् जो पांच द्रव्य हैं वह अपने २ गुणके अनुसार अपना अपना कारज करते हैं इनहींके उपकार को मानकर जीव चतुर्गति रूप संसार के दुःखों को भोगता हुवा भ्रमतारहताहै ।। टुक्वहि कारण मुणि वि जिय, दव्वहिं एउ सहाउ । होइवि मोक्खहि माग्गिलहु , गमिज्जइ परलोउ ॥ १५२ ॥ हे जीव तू इन पांचोही द्रव्यों को दुःखका कारण जान और - A - A (२६) इनको छोड़कर मोक्षमार्ग को ग्रहणकर जिससे मोक्षकी प्राप्तिहो।। लियमें कहिया एह मई, ववहारे ण विदिहि । एवहि णाणु चरित्तु सुरिण, जे पावहि परमेहि ॥ १५३ ॥ व्यवहार नयसे मैंने सम्यक दृष्टिका स्वरूप कहाहै इसही प्रकार सम्यक् ज्ञान और सम्यक् चारित्र का स्वरूप सुन जिस से तू परमेष्ठी को पावै ।। जंजह थक्कहु दब जिय, तं तहिं जाणइ जोजि | अप्पहि करउ भावडउ, णाणु मुरिणज्जहु सोजि ॥ १५४ ॥ जो द्रव्यों को जैले वह हैं लैलाही जानताहै और आत्माको पह- चानता है वह सम्यक् ज्ञान है ।। जाणवि मारिणवि अप्पु परु, जो परभाउ चएइ । सो णिय सुद्धउ भावडउ, पाणिहि चाणु हवेइ ॥ १५ ॥ जो आपको और परको जानकर और मानकर परभाव से बच ताहै वहही अपनी शुद्ध आत्मा में स्थिर होताह जाना कि उसको सम्यक् चरित्र है। जो भत्तउ रयणतयंह, तमु मुणि लक्खा एउ । अप्पा मिल्लिवि गुण णिलउ, अण्णु ण हियवइ दंज।। १५६ ॥ जो रत्नत्रय अर्थात् सम्यक् दर्शन सम्यक् ज्ञान 'और' सम्यक् चारित्र की सेवा करताहै उसके लक्षण तू इस प्रकार जान कि अनेकगुण मंडित जो एक शुद्ध आत्माहै उसके सिवाय अन्य. किसी पदार्थ का वह ध्यान नहीं करताहै ।। जो रयणत्तउ रिणम्मलउ, णाणिय अप्पु भणति । ते आराहय सित्र पयहि, रिणय अप्पा झायति ॥ १५७ ॥ जो कोई आत्मा को अभेद रत्नन्नय स्वरूप निर्मल ज्ञानमई कहताह वह पुरुष शिवपद अर्थात् मोक्षका आराधक होकर अ- पनी शुद्ध आत्माही को ध्यावे है । अप्पा गुणमउ णिम्मलउ, असुदिणु जे झायति । ते परणिय में परम मुणि, लहु रिणव्वाणु लहति ॥ १५८ ॥ जो अपनी गुणमई और निर्मल आत्मा को अनुभव करके ध्यान करतेहैं वे महामुनि अवश्य थोड़े ही काल में मोक्षपद् को प्राप्त होते हैं । । .

- य (२७) सयलहिं मात्थाह जं गहणु, जीवहि अग्गिमु होइ । वत्थुवि सेसुचि वज्जियउ, तं णिय देसण जोइ ।। १५९ ॥ विशेष अर्थात् भेदाभेद रूप जानने को छोड़कर जो सर्व व- स्तुका सत्तामात्र जानना जीवको सबसे प्रथम होताह वह दर्शन है। दसण पुन्च हवेइ फुदु, जं जीवहि विएणाण । वत्थु विसेस मुणंतु जिय, तं मुणि अविचलुणाण ॥ १६ ॥ दर्शन पहले होताहै और ज्ञान पीछे होताहै जिससे वस्तु वि. शेषरूप अर्थात् भेदाभेद रूप जानी जातीहै वह ज्ञानहै । दुक्खवि मुक्ख सहंतु जिय, णाणी झाण तलाणु । कम्महिं णिज्जर हेउ तउ, वुच्चइ संग विहीणु ॥ १६१॥ परिग्रहरहित ज्ञानी ध्यानमें तल्लीन होकर सुख और दुःख दोनों को समभाव कर सहताहै अर्थात् सुख में हर्ष और दुःखमें रंज नहीं मानताहै दोनों को बराबर समझताहै इससे उसके कमी की निर्जरा होतीहै॥ विएणावे जेण सहांत मुणि, मणि समभाउ करेइ । पुण्णहं पावहं तेण जिय, संवर हेउ हवेइ ॥ १६२ ॥ जो मुनि सुख और दुःख दोनों को मन में समभाव करके सहताहै उसको पुण्य और पाप दोनों का संघर होताहै अर्थात् न पुण्य का बंध होताहै और न पापका,भावार्थ-कर्मों का आस्रव उसको नहीं होताहै। अत्यइ जित्तिउ कालु मुणि, अप्प सरूवणि लीणु । संवर णिज्जर जाणि तुहूं, सयल वियप्प विहीणु ।। १६३ । समस्त विकल्प से रहित होकर जितने कालतक मुनि अपने स्वरूप में तल्लीन रहेताहै उतने कालतक उसके संवर और निर्जरा रहतीहै अर्थात् नवीन कौकी उत्पत्ति नहीं होती और पूर्व कर्मों का नाश होता रहताहै। कम्मु पुरक्किउ सोखबइ, अहिणव पेसुणदेई । संगु मुएविगु जोसयलु, उवसम भाउ करेइ ॥ १६४ ॥ 'जों मुनि समस्त परिग्रह को त्यागकर समभाव धारण करता है पह पूर्वकृत कर्मों का नाश करताहै और नवीन कर्मों का पैदा होना बन्द करताहै ॥ 15 .

4 . (२८) दसणु णाणु चरितु तसु, जो समभाउ करेइ । इयरीह इकुवि अस्थि णवि, जिणवर एम भणेइ ॥ ११५ ।। जो समभाव करताहै उसके दर्शन ज्ञान और चरित्र तीनों है और जो इससे अर्थात् समभाव से रहित है उसके इन तीनों में से एक भी नहीं होताहै श्रीजिनेंद्र देवने ऐसा कहाहै ।। जावइ णाणिउ उवसमई, तावइ संजदु होइ । होइ कसायहिं वसि गयउ, जीव असंजदु होइ ।। ११६ ॥ जबतक ज्ञानी पुरुष समभावी रहता है तबतक वह संयमी है और जय कषाय के वश होताहै तव असंयमी होताहै ।। जेण कसाय हवंति मणि, सो जिय मेलहि मोह । मोह कसाय विवज्जियउ, पर पावहि समबोह ॥ १६७ ।। जिससे मनमें कषाय उत्पन्न होतीहै वह त्यागने योग्य मोहहै मोह और कषायके त्याग से समभाव प्राप्त होताहै ।। तत्तातत्तु मुणेवि मुणि, जे थक्का समभाव । ते पर सुहिया इत्थु जाग, जरइ अप्प सहावि ॥ १६८ ॥ जो मुणि तत्व अतत्व को जानकर और समभाव धारण करके अपनी शुद्ध आत्मामें लीन हैं इस जगत् में वहही सुखी हैं । विणिवि दोस हवंति तसु, जो समभाउ करेइ । बंध जु निहणइ अप्पणउ, अणु जगुगहिलु करेइ ॥ १६९ ॥ (निंदा स्तुति)जो समभाष करताहै वह दो दोषोंका भागी होता है एक तो यह कि वह अपने बंधका अर्थात् कर्मबन्धन का नाश करताहै और संसार की रीति से विपरीत प्रवर्तने के कारण जगत् के जन उसको घावलासमझते हैं-अर्थात् जगत्के लोग उसकी नायत उल्टी समझ धारण करतेहैं,भावार्थ-जगत्के लोग पावले होजातेहैं। अण्णु जि दोसु हवेइ तसु, जो समभाव करेइ । सत्तुवि मिल्लवि अप्पणऊ, परिहणि लीन हवेइ ॥ १७० ॥ (निंदा स्तुति ) जो समभाव करताहै उसको और भी दो दोष होते हैं वह मिले हुवे अपने शत्रुकर छोड़ता और लीन होकर पराधीन होताहै भावार्थ-कर्मशत्र को त्यागता है और अपनी है -- - - I (३९) आत्मा में लीनहोताहै अर्थात् अपनी आत्माके आधीनहोजाताहै। अण्णा जि दोस हवेइ तसु, जो समभाउ' करेइ । वियल हवेइ पुण इकलउ, उप्परि जगह चढेइ ॥ १७१ ॥ (निंदा स्तुति ) जो समभाव करता है उसको अन्यभी दो दोष होते हैं वह विफल अर्थात् शरीर से रहित होकर अकेला जगत् के ऊपर चढ़ता है अर्थात् मोक्षको जाता है। जाणिसि सयलहिं देहियहि, जोगि उतीह जगोइ । जहिं पुणु जग्गइ सयलु जगु, साणिसि भणिवि सुवेइ ॥ १७ ॥ रात्रि में जगत्के सर्व जीव सोजाते हैं परन्तु जोगी अर्थात् मुनि महाराज जागते रहते हैं अर्थात् धर्म ध्यान में सावधान रहते हैं और जब सारा जगत् जागउठताहै अर्थात् जगत् के लोग अपने कार्य व्यवहार में लगते हैं उसको जोगी लोग कहते हैं कि अंधकार हो रहाह और जगत् के जीव सो रहे हैं क्यूंकि जगत् के जीवों का संसार व्यवहार में लगना उनकी अज्ञानता के ही कारण होता है, भावार्थ-मुनि महाराजकी यहभी निंदा स्तुति कीगई है कि वह उल्टी चाल चलते हैं रातको तो जागते हैं और दिन को रात बताते हैं। पाणि मुएप्पिण भावसम, केत्यु वि जाइ णराउ । जेण लहेसइ णाणमउ, तेण जि अप्प सहाउ ॥ १७३।। ज्ञानी पुरुष सम भाव को छोड़कर किसी वस्तु में रांग' नहीं करता है जिस ज्ञानमई को वह प्राप्त होना चाहताहै वह आत्माकाही स्वभाव है। भणई मणावइ णवि थुणइ, रिणदइ णाणि ण कोइ । सिद्धि हिं कारण भाव सम, जाणतउ परसोइ ।। १७४ ।। ज्ञानी पुरुष न किसी वस्तु की वार्ता करता है न वार्ता कराताहै न किसीकी स्तुति करता है और न निंदा करता है वह जानता है कि सिद्ध अर्थात् मोक्षका कारण समभावही है । गंयहि उपरि परम मुरिण, देसुीव करइ ण राउ । गंयहिं जेण-वियाणियउ, भिण्णउ अप्प सदाउ ॥ १७९ ।। परम मुनि परिग्रह से न राग करते हैं और न द्वेष करते हैं वह AMITTTTTTTTTEEFINITITI AMAAVANATA - AAAALAAL . AAAAAALALDARAA (३०) जानते हैं कि आत्मा का स्वभाव परिग्रह से भिन्न है ।। विस्यहि उप्परि परम मरिण देसुवि करइ ण राउ । विसयहि जेण वियाणियउ, भिएणउ-अप्प सहाउ ॥ १७६ ।। परम मुनि विषयों के ऊपर राग द्वेष नहीं करते हैं-वह जान- ते हैं, कि आत्मा का स्वभाव विषयों से भिन्न है। देहहिं उप्परि परम मुणि, देसुति करइ ण राउ । देहहिं जेण वियाणियउ, भिएरणउ अप्प सहाउ ॥ १७७ ।। परम मुनि देहसे भी राग द्वेप नहीं करते हैं वह जानतेहैं कि आत्मा का स्वभाव देहसे भिन्न है । वित्त णिवित्तिहि परम मुारण,देसीच करइ ण रा उ । बंधाह हेउ वियाणियउ, एयहि जेण सहाउ ॥१७८ ॥ वत अमन में भी परममुनि राग द्वेष नहीं करते हैं वह इनको वधका इंतु समझनेहैं यहही इनका स्वभावहै अर्थात् व्रतसे पुण्य और अवतसे पाप होता है । बंधहि मोक्खहि हेउ णिड, जो णवि जाणइ कोइ। सो पर मोहें करइ जिय, पुण्णा पाउवि दोइ ।। १७९ ॥ “जो कोई बंध और मोक्ष का हेतु नहीं जानता है वह मिथ्यात्व के उदयसे पुण्य और पापको दो भेदरूपजानता है अर्थात् पुण्यको अच्छा समझता है और पापको बुरा-भावार्थ ज्ञानी पुरुष पुण्य और पापदोनों को त्यागता है ॥ दंसण णाण चरित्तमउ, जो रणवि अप्प मुणेइ । सिद्धिहि कारण भणिवि जिय, सो परमाई करेइ ॥ १८० ॥ मोक्षके जोकारण कहे गये है अर्थात दर्शन ज्ञान और चारित्र कोजो कोई आत्मा का स्वरूप नहीं जानताहै वह इसमेंभेदकरताहै।। जो रणवि भण्णइ जीउसम, पुण्णवि पाउवि दोइ । सो चिर दुक्ख सहंतु जिय,मोहे हिडइ लोइ ॥ १८१ ॥ जो कोई पुण्य और पापदोनों को बराबर नहीं मानताहै अर्थात दोनों कोही मोक्षक विपरीत बंध नहीं समझता है वरण पुण्य को अच्छा जागताहै वह मोहके वशहोकर संसारमें रुलताहै और चि- रकालतक दुःख भोगता है। वर जिय पावइ सुंदरइ, णाणिय ताइ भणंति ।

AAAAAAA म AALAAAAAAAA जीवहिं दुक्खई जरिणवि ला, सिवगइ लाइ कुणनि ॥ १८२ ॥ ज्ञानी लोग ऐसा कहते हैं कि वह पापभी श्रेष्ठ और सुंदरहै जिसके कारण जीव दुःखको जानकर मोक्ष मार्ग में लगजावे ॥ पुग्ण पुरणइ मल्लाइ, रणारिणय नाइ भणंति । जीवहिं रज्जइ देवि लहू, दुवइ जाई जणंति ॥ १८३ ॥ ज्ञानी पुरुष ऐसा कहते हैं कि वह पुण्यश्री मला नहीं है जो जीव को राजा आदिक की पिभूति देकर अर्थात् विषय कपाय में लगा. कर दुःख उत्पन्न करताहै ।। वर णिय देसण अहि मुहउ, मरणवि जीव लहीस । मा णिय देसण विम्मुद्दउ, पुराणवि जीव करीस ॥ १८४ ॥ निःसंदद मुझको सम्यक् दर्शन श्रेष्ठ है चाहे उसके होने से मरणही प्राप्त होताहो निःसंदेह मुझको दर्शनकी बिमुखता अर्थाद मिथ्यात्व पसन्द नहीं है चाहे उस मिथ्यात्व के होते हुवे पुण्यही प्राप्त होताहो॥ ने णिय देसण महि मुहा, सुक्ख अणंतु लति । ते पिण पुण्ण करंताहि; दुक्ख अणंतु सहति ॥ १८५ ॥ जो जीव सम्यक् दर्शन के सन्मुखहैं वह निःसंदेह अनन्त सुख पाते हैं अर्थात् मोक्ष में जाते हैं और जो इसके विना अर्थात् मिथ्या दृष्टि, वह पुण्य करते हुये भी अनन्त दुःख भांगत भावार्थ अनन्त दुःख रूप संसार में रुलते है ।। देवहिं सच्चहिं मुरण वरहि, भत्तिए पुरण हवेइ । कम्मक्खउ पुणुहोइ णवि, अजउ सति भणेइ ।। १८६ ॥ देव शास्त्र और मुनि की भक्तिसे पुण्य होता है परन्तु कमौका क्षय अर्थात् मोक्ष नहीं होता है संत लोग ऐसा कहते हैं ।। देवहि सच्चहि मुणि वरहि, जोविदेसु करइ । णिय में पाउ हवेइ तसु, जिं संसार भमेइ ।। १८७ ॥ जो कोई देव गुरु शास्त्र से रेप करताहै उसको अवश्य पाप होताहै जिससे वह संसार में रुलताहै अर्थात् इनकी भक्ति करने से पुण्य और इनकी निंदा करने से पाप होताहै पाप और पुण्य दानाहीसे संसार परिक्रमण है ।। VM - - HALAIN ( ३२ ) पावे णारउ निरिउ जिउ, पुण्ण अमरु वियाणु । मिस्से माणुस गइ लहइ, दोहिवि खइ रिणवाणु ॥ १८८ ॥ पाप से जीव नरक और तिथंच गतिको पाता है और पुण्य से देव गति मिलती है और पाप पुण्य दोनों मिलकर मिश्रसे मनुष्य गति पाताहै और पाप पुण्य दोनोंके क्षय होनेसे मोक्षकोप्राप्तहोताहै। बंदणु णिदणु पडिकवणु पुण्णहि कारण जेण । करइ करावइ अणुमणइ, एकुाव णाणि ण तेण ॥ १८९ ॥ वंदणु णिदग्गु पडिकवणु, णाणिहि एउण वत्तु । एकुवि मल्लिवि पाणमउ, मुद्भउ भाउ पवितु ॥ १९ ॥ वंदउ दिउ पडिकवउ, भाउ असुद्धउ जासु । परतसु संजम अत्थिणवि, जे भण सुद्धि ण-तासु ॥ १९१॥ बंदनाअर्थात् देवगुरू शास्त्रकी पूजनिंदा अर्थात् अपनी निंदांकरना पश्चाताप करना और प्रतिक्रमण यह तीनों क्रिया जो पुण्य के उपजाने वाली है इनमें से एक को भी ज्ञानी पुरुष अर्थात् मोक्षकी सिद्धिकरने वाला नहीं करता है न कराता है और न इनकी अनुमो- दना करताहै एक ज्ञानमई और शुद्ध आत्मा के ध्यान को छोड़ कर पवित्र भाव का धारक ज्ञानवान बंदना आलोचना और प्रति. प्रामण नहीं करता है-बंदना आलोचना और प्रतिक्रमण वहही क- रताहै जिसकामाव अशुद्धह और जिसका मन शुद्ध नहीं उसके संयम नहींहै-भावार्थ मोक्षकी सिद्धि करने वालातो शुद्ध आत्म- ध्यान में लगताहै और पुण्य क्रियाओं को अर्थात् शुभोपयोग को भी त्यागताहै--क्यूंकि शुभोपयोग से शुद्ध और पवित्र भाव नहीं होतेहैं- पुण्य बंधही होता है और मोक्ष होता है शुद्धभावसे इसकारण पुण्य बंधके कार्य भी वह नहीं करताहै-बंदना आदिक शुद्धभाव नहीं है इसहेतु अशुद्धही है और जब भाव शुद्ध नहीं तब संयमनहीं अर्थात् मोक्षकी सिद्धि करनेवालेका संयम शुद्धात्मस्व रूप में होनाही है ॥ मुई संजम सील तउ, सुद्धहि देसण णाण । सुद्धाहे कम्मक्खउ हवइ, मुद्धउ तेण पहाण ॥ १९ ॥ उसकाही अर्थात् शुद्धोपयोगी काही संयम शुद्ध है उसही का शील शुद्धहै उसही का दर्शन ज्ञान शुद्धहै उसहीका कौंका - --- MALABALADA (३३) क्षय करना शुद्ध है उसहीका प्रधानपना अर्थात् परमात्मा होना - है - भाउ विसुदउ अप्पणउ, धम्म भणेविण लेड्डु । चचगह दुक्खहि जो धरइ, जीउ पडतहु पहु ॥ १६ ॥ चतुरंगति रूप दुःखसागर में पड़े हुवे जीवका जो उद्धार करता है वह अपना विशुद्धभाव है जिसको धर्म कहते हैं इस कारण शुद्ध भाव ग्रहण करना चाहिये। सिद्धार्ह केरा पंथटा, भीउ विमुदउ एक्कु । जो तमु भावहिं मुणि चलइ,सो किम होइ विमुक्छ॥ १९४ ॥ मुक्ति पासिका मार्ग एक पिशुद्धभाव ही है और कोई मार्ग नहीं है जो मुनि शुद्ध भावों से गिरता है उस को मुक्ति कैसे हो सक्ती है ।। जाहि भावाहि ताई जाहि जिय, जंभावइ करि त जि । के मइ मोक्ख ण अस्थि पर, चित्तहिं सुद्धि ण जे जि ॥ १९५ ॥ जहां चाहे:जावै जो चाहे क्रिया करै परन्तु जिसका मन शुद्ध नहीं है उसको मोक्ष नहीं प्राप्त हो सका है। सुहपरिणा में धम्म पर, असु हे होइ अहम्मु । दोहिवि एहिवि वज्जियउ, सुद्ध ण बंधइ कम्मु ॥ १९ ॥ शुभ परिणामों से धर्म अर्थात् पुण्य होता है और अशुभ परि- णामों से अधर्म अर्थात पाप होता है और इन दोनों से रहित, हो कर शुद्ध परिणामों से कर्म बंध ही नहीं होता है भावार्थ न पुण्य होता है और न पाप दाणे लव्मइ भोउ पर, इंदत्ता जितवेण । जम्मण मरण विवाब्जियउ,पउ लब्भइणाणण ॥ १९७ ॥ दान करने से भोगों की प्राप्ति होती है इन्द्रयों को जीतने अर्थात् तप करने से स्वर्ग का इन्द्र होता है और ज्ञान से जन्म मरण से रहित अवस्था अर्थात् परमपदको प्राप्त होता है ।। देउ णिरंजणु ऐउ भणई, गाण मोक्षु णभंति । णाण चिहूणउ जीवड़ा, चिरु संसार भमंति-॥ १९८ ॥ श्री वीतराग देवने ऐसा कहा है कि ज्ञान से ही मोक्ष होती है . 1 ५ . ...... (३४) जो जीव ज्ञान विहीन है वह चिरकाल तक संसार में रुलताहै ।। याण विहीणह मोक्खपउ, जीव म कासु चिजोइ । बहुयइ सलिलु विरोलियइ, करु चोप्पडउ 'ण होइ ॥ १९९ ॥ ज्ञान विहीन होकर जीव किसी प्रकारभी मोक्ष पद प्राप्सनहीं कर सकता है जैसे कि कितना ही पानी पिलोया जाचे परन्तु हाथ चीकना नहीं होगा। जणिय वोहहिं वाहिरउ, रणानि कन्जु ण तेण,। दुक्खहि कारण जेण तउ, जीवहिं होइ खणेण ॥ २.०० ।। निज शुद्ध आत्मा के बोध से रहित जो ज्ञान है वह कुछ कार्य कारी नहीं है वह दुःख काही कारण है ।। तं. णिय णाणुजि होइ णवि, जेण पवइ राउ। दिणयर किरणहिं पुरउ जिय, कि बिलसइ तमराउ ।। २०१।। वह ज्ञान नहीं है जिस से राग द्वेष उत्पन्न हो ज्ञान के सूर्य की किरणों के प्रकाश होने पर यह जीव राग रूप अंधकर को किस प्रकार भोग सक्ता है अर्थात् जैसे सूर्य के उद्य में अंधे- रा नहीं रहता इसही प्रकार ज्ञान प्राप्त होने पर राग द्वेष नहीं A&AAAAA. - . रहता है। 1 1 अप्पा मिल्लिविणाणियहि,अण्णु ण सुंदरु वत्थु । जेण ण विसयाहि मा रमई, जाणं तहि परमत्थु । २०२ ।। ज्ञानी पुरुषको आत्म स्वरूप के सिवाय अन्य कोई वस्तु सुंदर नहीं है जिन का मन विषयों में नहीं रमता है वह ही परमार्थ को जानते हैं । अप्पा मिल्लिविणाणमउ, चित्ति ण लागइ अण् । मरगउ जेण वियाणियउ, तहिं कचि कउ गएणु ॥२०३।। ज्ञानी का चित्त आत्मा के सिवाय और किसी वस्तु में नहीं लगता है जिसने मरकट माण को जानलिया है वह कांच को क्या गिनता है। भुजंतहिं णिय क मु फलु, जो तहिं राउण जाइ । सो रणवि बंधइ कम्मु फुरणु, संचिउ जेण विलाइ ।। २०४ ॥ कर्मों के फल के भोगने में जिस का राग दूर नहीं हुआ है अर्थाद - ALAAAAAL-SALLALAAAA AAA (३५) जो सुख दुःव मानता है वह फिर नवीन कर्म बांधताहै कर्मों का उदय आना और फलदेना तो संचित कर्मों का नाशहोनाहै परन्तु जो सुख दुःख मानताहै वह आगामी को फिर कम बांधलेताहै ॥ भुजंतुषि णिय कम्म पालु, मोहे जोजि करेइ । भाउ असुंदर सुंदरुवि, सो परु कम्मु जणेइ ।। २०५ ॥ कर्मों के फल भोगने में जो जीव मोहके कारण शुभ अशुभ भाव करता है यह नवीन कर्मों को उत्पन्न करता है ।। जो श्रणुमित्तुवि राउ मणि, जाम ण मेल्लइ एत्यु । सोवि गण मुंचइ ताम जिय, जाणतुवि परमत्यु ।। २०६ ॥ जिसके मन में रंच मात्रभी राग रहगया है वह यदि परमार्थ फो जानताभी है तो भी वह कर्मों के बंधन से नहीं छूटताहै ।। बुझइ सत्थइ तउ चरइ, पर परमत्थु ण वेइ । ताच रण मुच्चइ जाम गावि, पहु परमत्युग्ण वेइ ।। २०७ ।। जो पुरुप शास्त्रको समझताह और तपश्चरण करताहै परन्तु परमार्थ को नहीं जानताहै यह कर्मों का नाश नहीं करसक्ता है और परमार्थअर्थात् मोक्षको नहीं पासक्ताहै ।। सत्यु पनुचि होइ जडु, जो रण इणेइ वियप्पु । दहिवसंतुवि रिणम्मलउ,णवि मएणइ परमप्पु।। २०८ ॥ शास्त्र को पढकर भी जो कोई विकल्प को दूर नहीं करताहै वह मूर्खहै और वह निर्मल शुद्ध परमात्मा को जो सांसारीक जीवों के देहमें बसताहै नहीं जानताह ।। वोहि णिमितें सत्युकिल, लोए पढिनइ एत्यु । तेणवि बोहुण जासु वरु, सो किं मूढ ण तत्थु ॥ १०९ ॥ लोकमें सर्व शास्त्र बोध होने के निमित्तही पढेजातेहैं-शास्त्रोके पढने से भी जिसको श्रेष्ठ बोध नहीं हुवा अर्थात् परमार्थ का नहीं जाना वह किस हेतु से मूर्ख नहीं है अर्थात् अवश्य वह अ. त्यन्त मुर्ख है। अक्खरहा जोयतु ठिउ, अप्पि ण दिएणउ चित्तु । करणवि रहियउ पयालु जिम, पर संगहिउ बहुत्तु ।। २१० ॥ जो कोई अक्षरों कोही दृढताहै और आत्मा में चित्त नहीं देता V (३६) है वह ऐसाहै जैसा कोई मनुष्य बहुत सी पराल अर्थात् भूसी को जिसमें अनाज बिलकुलनहो इकट्ठी करताहो ॥ तित्थे तित्थ भमंताहिं, मूढहिं मोक्ष ण होइ । णाण विवजिजउजेण जिय, मुणिवरु होइण सोइ॥ २११॥ तीर्थ स्थानों में भ्रमणे से मूढ मति को मोक्ष नहीं होसक्ती है इसही प्रकार, ज्ञान रहित जीव मुनि नहीं होसक्ता है ॥ णाणिहि मूढाहिं मुणिवरहिं, अंतरु होइ महंतु । देहुजि मिल्लइ णाणियउ, जीवाई भिएणु मुणंतु॥ २१२ ।। ज्ञानी और मूर्ख मुनि में बड़ा भारी अंतर है ज्ञानी तो जीव को शरीर से भिन्नजान कर देहको भी छोड़ना चाहताहै। लेणहि इच्छइ मूढ पर, भुवणवि एहु असेस । बहु विहि धम्म मिसेण जिय, दोहावे एहु विसेस।। २१३ ॥ और जो मूर्ख है वह अनेक प्रकार धर्म के मिस अर्थात् पहाने से सारे जगत् को ग्रहण करना चाहताहै दोनों में अर्थात् ज्ञानी और भूख साधुमें यह भेद है ॥ चेल्ला चेल्ली पोत्थियहि, तूसइ मूढ णिमंतु । एयहिं लज्जइ णाणियउ, वंधहि हेउ मुणंतु ॥ २४ ॥ चेला चेली और शास्त्र में मूर्ख साधुनिःसंदेह हर्ष मानताहै परन्तु ज्ञानी पुरुष इसको बंधका कारण जानकर लज्जा करताहै ॥ चट्टइ पट्टइ कुंडियइं, चिल्ला चिल्लियएहिं । मोह जणेवण मुणिवरह, उप्पहि पाडिय तेहिं ।। २१५ ॥ चट्टी पट्टी औ कुंडा अर्थात् कलम दावात काग़ज तरवृती आदिक और चेला चेली यह संघ मुनि को मोह पैदा करके नीचे गिराते हैं केणवि अप्पर वंचियउ, सिरु लुंचिवि छारेण । सयलवि संगण परिहारय, निणवर लिंग धरेण ॥ २१६ ॥ जिमने सिरके वालों का लोच करके दिगम्बर रूप धारण किया है परन्तु सर्व परिग्रह को नहीं छोड़ा है अर्थात् रागद्वेष जिस में विद्यमान है उसने अपने आप को ठंगा है ।। जे जिण लिंगु धरेवि मुणि, इट्ट परिग्गह लिति । छद्दि करविणु तेनि जिय, सा पुणु छद्दि गिलति ॥ २१७ ॥ . - (३७) जो मुनि दिगम्बर लिंग धारण कर के फिर इष्ट वस्तु को अर्थाद जो वस्तु अच्छी मालूम हो उस को ग्रहण करताहै वह बमन अर्थात् के की हुई वस्तु को फिर खाता है । लाहहं कित्तिहि कारणिण, जे सिव संगु चयंति । खीलालग्गिवि तेजि मुणि, देउलु देउ इंति ।। २१८ ॥ लोभ वा यशकीर्ति के वास्ते जो मुनि शिवसंग को छोड़ता है अर्थात् शुद्ध आत्म ध्यान से डिगता है वह एक कील के वास्ते देव मंदिर को जलाता है वा ढाता है ॥ अप्पड मएणइ जो जिमुणि, गरुयइं गंथहिं तित्थु । सो परमत्ये जिणभणई, उ बुझइ परमत्थु ॥ २१९ ।। जो मुनि परिग्रह से ही अपने को पड़ा मानता है वह परमार्थ को नहीं पहचानता है परमार्थ कथन में श्रीजिनेंद्रदेव ने ऐसा कहा है। वुज्झतहं परमत्यु जिय, गुरु लहु प्रत्थि ण कोइ । जीवा सकलावि भुपरू, जेण बियाणई सोइ ।। २२० ।। जो परमार्थ को पहचानते हैं वह ऐसा कहते हैं कि जीव में छोटा पड़ा कोई नहीं है सबही जीव परमब्रह्म हैं ।। जो भत्तउ रयणत्तयह, तसु मुणि लक्खण एउ । अत्थउ काह मि कुहिल्लियई, सो तसु करइ ण भेउ॥ २२१ ।। जो मुनि रनत्रय की भाक्त करता है उसका यह लक्षण अर्थात् पहचान है कि वह सब जीवों को समान मानता है जीव किसी ही प्रकार का शरीरधारी हो वह उस में किसी प्रकार का भेद नहीं करता है-अर्थात् यह नहीं कहताहै कि यह तिर्यच है यह मनुष्य है यह गधा है यह घोड़ा है ।। जीवहं तिहुयणि संठियह, मूढ़ा भेउ करति । केवलणाणई गाणि फुड, सयनुवि एकु मुणति।। २२२ ॥ तीनों लोक में पास करने वाले जीवों में मूर्ख लोग भेदकरते हैं अर्थात् उनको नारकी, देव, मनुष्य आदिक समझतेहैं परन्तु ज्ञानी पुरुष सर्व जीवों को ज्ञानमयी अर्थात एकही प्रकार के समझते हैं। 17 AAA (३८) - जीवा सयलविणाणमय, जम्मण मरण विमुक्क । जीव पएसहि सयल सम, सयलावि सगुणहिं एक्क ॥.२१३ ।। सपही जीव ज्ञानमयी हैं और जन्म मरण से रहित हैं अर्थात् किसी जीवका आदिअन्त नहीं है सम जीव सदासे है और सदा रहगे और जीवके प्रदेश की अपेक्षा भी सब जीव समान हैं और शुद्धगुण अर्थात् अनन्त दर्शन अनन्तज्ञान अनन्त सुख आदिक गुणों की अपेक्षा भी सब जीव एकही हैं ।। जीवहं लक्खा जिणवरहि, भासिउ देसण णाण । तेण ण किज्जइ भेउ तह, जइ मण जाउ विहाण ।। २२४ ।। श्रीजिनेंद्रदेवने जीवका लक्षण दर्शन और ज्ञान वर्णन किया है जिसके मन में प्रभात हुई है अर्थात् ज्ञानका प्रकाश हुवाहै वह जीवों में भेद नहीं करता है अर्थात् सब को दर्शन और ज्ञानकी शक्ति वाला मानता है। बम्ह हु भुवणि वसंताहं, जे रणवि भेउ करंति । ते परमप्प पयासयर, जोइय विमुलु मुणंति ॥ २२५॥ तीन लोक में बसतेहुवे परब्रल स्वरूप आत्माओं में जो कोई भेद नहीं करते हैं वह परमात्मा का प्रकाश करने वाले योगी सर्व जीवों को निर्मल और शुद्ध मानते हैं ।। राय दोसवे परिहरिवि, जे सम जीव णियंति । ते समभाव परिडिया, लहु रिणव्वाण लहंति ॥ २२६ ॥ जो मुनि राग द्वेष आदिक विपरीत भावों को दूर करके सर्व जीवोंको समान जानते हैं वह समभाव में स्थिर होकर शीघ्र नि. वाण पदको प्राप्त करते हैं। जीवहं दंसणु णाणु जिय, लक्खा जाणइ जोजि । देह विभेऐं भेउ तह, णाणिकि मरणइ सोनि ॥ २२७ ॥ जो कोई दर्शन और ज्ञान को जीचका लक्षण जानताहै वह शरीर के भेदसे जीवों में कैसे भेदकर सक्ता है अर्थात् भेद नहीं करता है ।। देहवि भेयई जो कुणई, जीवहिं भेव विचित्र । सो.णावि लक्खणु मुणइ तह, दंसण णाण चरितु ॥ २२८ ।। , जो कोई शरीर के भेदसे जीवों में भेद करते हैं वह दर्शन ज्ञान और चारित्र को जो आत्मा के लक्षण हैं नहीं जानते हैं । अंगई सुहुमई वादरई, विहिवसि हुनि जि वाल । जिय पुगु सयलवि तित्तडा, सम्वत्यधि सय काल ॥ २२९ ॥ शरीर का छोटा बड़ा और बालक और वृद्ध आदिक होना यह सब कर्मों के वशसे है परन्तु निश्चयरूप अर्धात् असलियत में सर्व जीव सर्वथा सर्वकाल में एक समानहीहैं। सत्तुवि मित्तुवि अप्पु परु, जीव असेसुवि एइ । एक्कु करेवियु जो मुणइ, सो अप्पा जाणेइ ॥ २३० ॥ शत्रु मित्र आपा पर और अन्य सब जीवों को जो एक समान मानताहै वहही आत्मा को जानताहै ।। जो णवि मरणइ जीव जिय, सयन्नवि एक्क सहाव । तासु ण थक्कइ भाउ सम, भवसायर जो णाव ।। १३१ ।। जो सब जीवों को एक स्वभावरूप नहीं मानताहै उसको सम भाष नहीं होताहै समभाव भवसागर से तिरनेके वास्ते नाव के समान है। जीवहं भेउ जि कम्म किड, कम्मुवि जीउ ण होइ । जेण विभिएणउ होइ तई, कालु लहेविण कोइ ।। १३२ ।। जीवों में जो भेद है वह कर्मों का किया हुवा है परन्तु कर्म जीव नहीं होजाते हैं अर्थात् जीवसे भिन्न है क्यूंकि काल लब्धि पाकर कर्म जीवसे अलग होजाते हैं । एक्कु जिकरिमणविएण करि, में करिवरण विसेप्नु । एक्के देवें जिं वसइ, तिहुयणु एहु असेठ ।। २३३ ।। तू सब जीवों को एक समान ही मान यह मनुष्य है यह तिर्यच है इत्यादि भेद मतकर एकही देव अर्थात् एक शुद्धआत्मा जिस प्रकारकी है तीन लोकके जीवों को तू वैसाही जान ।। पर जाणंतुवि परम मुणि, पर संसग्गु चयति । पर संसग्गइं पर पयह, लक्खहं जेण चलति ॥ २३४ ॥ परममुनि परवस्तु को जान कर परवस्तु का ससंग छोड़ते हैं-और जो परपस्तु से संसर्ग करते हैं वह निशाना चूक जाते हैं (४०) अर्थात् शुद्धआत्मध्यान से गिरजाते हैं । जो समभावहं वाहिरउ, ते सहु मं कर संग । चिंता सायरि पडहि पर, अएणुविदुज्झइ अंग ॥ २३५ ॥ जो कोई समभाव से रहित है उसके साथ संग अर्थात् मेंल मत कर क्यूकि उनका संग करने से तू चिंता के समुद्र में पड़जावैगा और व्याकुलता प्राप्त होकर तेरा शरीरभी जलगा। भल्ला हवि ण सति गुण, जहुँ संसग्गु खलेण । वइसाणरु लोहहं मिलिउ, ते पिट्टियइ घणेण ॥ २६ ॥ दुष्ट की संगति से उत्तम गुणभी नाश होजाते हैं जैसे अग्नि भी लोहे की संगति से घण से पीटी जाती है ।। जोइय मोहु परिचयाह, मोहु ण भल्ला होइ । मोहासत्तउ सयलु जगु, दुक्ख सहतउ जोइ ॥ ३३७ ॥ यह मोह त्यागने ही योग्य है मोह किसी प्रकार भी भला नहीं है सर्व ही संसार मोहमें आसक्त हुवा दुःख उठारहा है ।। ने सरसे संतुह मण, विरसि कसाउ वहति । ते मुणि भोयण घार मुणि, णवि परमत्थु मुणति॥२३८ ॥ जो स्वादिष्ट भोजन में संतुष्ट हैं और अस्वादु भोजन में द्वेष करते हैं अर्थात् पसन्द नहीं करते ऐसे मुनिको तू भोजन गृद्धि समझ वह परमार्थ को नहीं जानते हैं ।। सावि पयंगा साद मय, गयफासें णासति । उलिउल गंधे मच्छ रासि,तिम अणुराउ करंति ।। १३९ ।। रूप में आसक्त हुवा पतंग और शब्द अर्थात् करण इंद्रिय में आसक्त हुवा हिरण और स्पर्श इंद्रिय में आसक्त हुवा हाथी और गंध में आसक्त हुवा भौरा और रस में आसक्त हुवा मच्छ नाश को प्राप्त होता है। जो इय लोह परिचयहि, लोहु ण भल्ला होई । लोहा सत्तउ सयलु जगु, दुक्रव सहतउ जोइ।। २४० ॥ तू इस लोभ का त्याग कर लोभ भला नहीं है-लोभ में ही आसक्त हुवा सारा जगत् दुःख उठा रहा है ।। minim LAA (४१) ताल अहिरणि वरि घण.वडणु, संडस्सय लुचोदु । लोहहं लग्गिाये हुयवहई, पिक्खु पडतउ तोडु ॥ २४१ ॥ लोहे के साथ लगनेसे अर्थात् लोहे का लोभ करके आग्निकी यह अवस्था होतीहै कि नीचे अहरण है ऊपर से घण पड़ता है बीचमें से संहासी ने पकड़ रक्खा है और टूट टूट कर चिंगारी अलग पड़रही हैं। जोइय णेहु परिचयहि, हुण भल्ला होइ । हा सत्तउ सयलु जगु, दुक्ख सहतउ जोइ ।। २४२ ॥ तू इस स्नेह ( प्यार मुहब्बत) का त्यागकर स्नेह भला नहीं होता है सारा जगत् नेह ही में आसक्तहुवा दुःख उठारहा है ।। जल सिचणु पयाणिदलणु, पुण पुण पालण दुक्ख । णहह लग्गिवि सिलणियरु, जति सहतउ पिक्खु ॥ २४३ ॥ तिलको तेल के साथ नेहलगानेसे इतने दुःख उठाने पड़ते हैं कि वह पानी में भिगोया जाताहै पैरों से दल मलाजासाहै अर्थात इस प्रकार उसका छिलका उतारा जाताहे फिर कोल्हू में डालकर बार पार पीला जाता है ।। तेचिय धरणा तेचिय सउरिसा, तेजियंतु जियलोए । वोहहदहम्मि पडिया, तरांति जे चेव लीलाए ॥ २४४ ॥ वह जीव धन्य हैं वह जीव सत्पुरुष हैं वहही इस जीव लोक में जीते हैं जो योवनरूपी द्रह में पडकर लीला करते हुवे निक- लते हैं अर्थात् सम्यक् दर्शन सम्यक् ज्ञान और सम्यक् चारित्र को प्रकाशते हैं। मोक्खुजी साहिउ जिणवरहि, छडिवि बहु विह रज्जु । भिक्ख भरोडा जीव वुहूं: करहि ण अप्पउ कज्जु ॥ २४५ ॥ श्रीजिनेंद्र भगवान्ने मोक्षका साधन करने के वास्ते बहुत प्रकार का राजपाट छोड़ा तू भिक्षा से पेट भरने वाला अर्थात् कंगाल होकरभी अपना कार्य अर्थात् मोक्ष का साधन क्यू नहीं करता है। पावहि दुकाबु महंत तुहूं, जिय संसार भमंतु । महावि कम्मई णिलिवि, वच्चहि मोक्खु महंतु ।। २४६ ।।

. (४२) तूने संसार में भ्रमण करके महान दुःख उठाये हैं अब तू आठकों का नाश करके परमपद अर्थात् मोक्ष की प्राप्ति कर ।। जिय अणु मित्तुविदुक्खडा, सहण ण सक्काहे जोइ । चउगइ दुक्खइं कारणइ, कम्मइ कुणहि कि तोइ ।। २४७ ।। जो तू थोड़ासा दुःख भी नहीं सह सक्ता है तो, तू कर्मों को क्यू करताहै जो चारों गति के दुःखों के कारण हैं । धंधइ पडियउ सयलु जगु, कम्मई करइ अयाणु । मोक्खहिं करण एक्कु खणु, णवि चिंतइ अप्पाणु ॥ २४८ ॥ मूर्ख जीव सारे जगत् के धंधों में पड़कर कर्म उपार्जन करताहै परन्तु अपनी आत्मा का ध्यान एक क्षणमात्र के वास्ते भी नहीं करता है जो मोक्षका कारण है। जो णिहि लक्खइ-परिभमइ, अप्पा दुक्ख सहंतु । पुत्त कलत्तइ मोहियड, जारण गाणु फुरंतु ॥ २४९ ।। जो अपनी आत्मा को नहीं पहचानता है वह दुःखः उठाता हुवा भ्रमता रहताहै-जिसका ज्ञान प्रकाश नहीं हुवाहै वह पुत्र और कलन में मोहित रहताहै अर्थात् आत्मा को नहीं पहचान सक्ता है। जीव म जाणहि अप्पणउ, घरु परियणु तणु इछ । कम्मायचउ कारिमउ, आगमि जो इहि दिछु ।। २५० ।। हे जीव तू घर परिवार शरीर और मित्रको अपना मत जान यह सब कमी के उपजाये हुवे हैं शास्त्र के जाननेवालों ने इसही प्रकार देखा है ।। मोक्नु रण पावहिं जीव वुहुं, घरू परियणु चितंतु । तो वरि चिंतहि तज जितउ, पावहिं मोक्नु महंतु।। २५१ ॥ हे जीव घर परिवार की चिंता में तुझको मोक्ष प्राप्त नहीं होस- क्ता है इस कारण तूतपकी चिंताकर जिससे महान् मोक्षकी प्राप्तिहो मारिवि जीवह लक्खडा, जं जिय पाउ करीसि। पुत्त कलत्तहं कारणिण, तं तुई एक्कु सहीस ॥ ॥ २५२ ॥ पुत्र कलत्र के वास्ते जो तू लाखों जीवों को मारता है और पाप कमाताहै उसका फल तुझको अकेलाही भोगना पड़ेगा.।। MIT AALALA (४३) मारिवि चूरिवि जीवड़ा, जे तुहु, दुक्ख करीसि । तं तहं पासि अणंत गुणु, अवसई जीव लहीसि ।। २५३ ।। हे जीव जीवों को मारकर और 'चूरकर जो तू दुःख देताहै उससे अनन्त गुणा दुःख तुझको अवश्य सहना पड़ेगा ।। जीव वह तई परयगइ, अभय पदाणे सग्गु । वे पहजवला दरिसिया, जहिं भावइ तर्हि लग्गु।। २५४ ।। जीव की हिंसा करने से नरकगति होतीहै और अभयदान देनेसे अर्थात् अहिंसा व्रत धारण करने से स्वर्ग होताहै-दोनों पंथ प्रक- ट रूप दीखतेहैं जो अच्छा लगै उसही में लग ।। मूढा सयलुपि कारिमउ, भुल्लउ मा तुस कडि । सिवपय णिम्मलि करहि रइ,परु परियलु लहु छडि।। २५५ ॥ हे मूर्ख तू सब कामों में भूलाहुवा है तुस अर्थात् छिलका इकट्ठा मतकरतू निर्मल शिवपद में अनुरागकर और घर परिवारको छोड़दे जाइये सयलुवि कारिमउ,णिकारिमउ ण कोइ । जीवें जंतें कुडिण गयइ, उपडिच्छंदा जोइ ॥ २५६ ॥ संसार के सब कामों में अविनाशी अर्थात् सदारहने वाला कोई कार्य नहीं है दृष्टान्त रूप देखा कि मरणेपर यह शरीर भी जीव के साथ नहीं जाता है ।। देउलु देउवि सत्थ गुरु, तित्युवि वेउवि कन्बु । बत्थु जु दीसइ कुसुमियर, इंधणु होसइ सब्ब ।।२५७ ॥ मंदिर, प्रतिमा, शास्त्र, गुरु, तीर्थ, वेद, काव्य और जो कुछ फल फूल इस संसार में दीखता है वह सब ईधन होजायगा अर्थात् नाशको प्राप्तहोजायगा भावार्थ नित्य कोई वस्तु नहींरहेगी। इक्कु जि मिल्लिवि बंभुपरू, भुवणुवि एहु असेम् । पुहमिहि रिणम्मिउ भंगुरउ, एहउ बुज्झवि सेसु ।। २५८ ।। एक परव्रम अर्थात् शुद्ध आत्मा के सिवाय जगत में अन्य जो जो दशा देखने में आतीहै वह सप विनाशीक है तू इस प्रकार समझ॥ जे दिवा सू रुग्गमणि, ते अथवाणि ण दिछ । ति कारणि वढ धम्मु करि घणि जोवणिका तिह ॥ २१९- ।।

. (४४) सूर्य के उदय समय जो प्रकाश होताहै वह अन्त में अर्थात् संध्या समय नहीं रहता है इस कारण तू उत्तम धर्म का सेवन कर धन यौवन में क्या रक्खा है ।। धम्मु ण संचिउ तउ ण किउ, रुक्खें चम्म मरण । खज्जवि जरउद्देहियए, णरइ पडिबउ , तेण ॥ २६० ॥ जो कोई धर्म संचय नहीं करता है और तप नहीं करता है उसके शरीर का चमड़ा वृक्षकी समान है अथवा वह चमड़े का वृक्ष है वह अभक्ष भक्षण करके निशंक प्रवरतता है और नरक में पड़ता है। अरि जिय जिणपए भत्ति करि, सुहि सज्ज अवहरि । ते वप्पणवि कज्जणवि, जो पाडइ संसारि ॥२६१ ।। अरे जीव तू जिनेंद्र के चरणोंकी भक्ति कर और मित्र कलत्र आदिक को छोड़दे इन मित्र आदिक से कुछ भी प्राप्ति नहीं । वह संसार में ही डुबोने वाले हैं ।। विसयह कारणि सव्वु जणु, जिम अनुराउ करेइ । तिम जिण भासिए धम्म जइ, एउ संसारि पडेइ ॥ २६१ ॥ संसार के सर्व जीव विषयों के कारणों में जैसा अनुराग करते हैं यदि ऐसा अनुराग श्रीजिनेंद्र भाषित धर्म में करें तो संसार में न पड़े। जेण ण विएण उ तवयरण, गिणम्मलु चित्त कवि । अप्पा वंचिउ तेण पर, माणुस जम्मु लहेवि ।। २६३ ॥ जिसने निर्मलचित्त होकर तपश्चरण नहीं किया उसने मनुष्य जन्म पाकर अपने आपको ठगा है । ए पंचिंदिय करड़ा, जिय मोकला मचारि । चरिवि असेसुवि विषय वणु, पुणु पाडहिं संसारि॥ २६४ ।। हेजीव तू इन पंच इन्द्रिय रूप ऊों को स्वच्छन्द मतचरा अ- र्थात् इन्द्रियोंको स्वछन्द होकर विषय भोग-मत भोगने दे वह इन्द्रियां विषयों को भोगकर तुझको संसार में गिरादेंगी। जोइय विसमी जोयगइ, मणु संठवरण ण जाइ। इंदिय विसय जि सुक्खड़ा, वलि वलि तित्थु जि जाइ ॥ २६५ ॥ - AAAAAAALALLAAAAAALA (४५) हे जोगी जोगकी गति बहुत कठिन है मन स्थिर नहीं होताहै- मन इन्द्रियों के विषय सुक्खों पर चल चल जाता है अर्थात् मोहित होता है। विसय मुहइ वेदिवहडा, पुणु दुक्खहं परिवाडि । भुल्लउ जीव मवावि तुहूं, अप्पुणु खधि कुहाडि ॥ २६६ ॥ विषय सुख भोगने से फिर दुःखके परिवार को पालनाहै अर्थात् विषय सुख भोगने का फल बारबार दुःख उठानाहै हे मूर्ख जीव तू अपने कंधेपर आप कुहाड़ा मतमार ॥ संता विसय जु परिहरइ, वलि किज्जलं हउँ तासु । सो दइवेण जि मुंडियउ, सीसु खडिल्लउ जासु ॥ ५६७ ॥ जो संत पुरुष विषयों को छोडतेहैं मैं उनपर किसप्रकार बलबल जाऊं अर्थात् वह धन्य हैं-जिसके शिरपर पालनहीं होतेहैं वह तो आपसे आपही मुंहा हुवा है इसही प्रकार चौथे काल में श्री अरि. हंत देवोंके उपदेशसे विषय कषायों को छोड़कर जो मुनि होतेहैं उनका तो सहज ही मुनि होनाहै परन्तु जो इस पंचम कालमें वि. षयों को त्यागते है उनका आश्चर्य है वह धन्यहैं । पंचई णायकु वास करहु, जेण हुँति वसि अण्ण । मूलवि गहई तरुवरहं, अवसइ मुक्काह पएण ॥ २६८ ॥ पांच इन्द्रियों का जो नायकहै अर्थात् मन उसको तू षशकर जिसके यश होने से सव इन्द्रियां घश में होजाती हैं जैसे कि वृक्ष की जड़ काटनेसे सारा वृक्ष सूख जाताहै ॥ विसयासत्तउ जीव तुहूं, कित्तिउ कालु गमीस । सिवसंगमु करि णिचलउ, अवसई मोक्खुलहीस ॥ २६९ ॥ हे जीव विषय भोगों में आसक्त हुवे तुझ को बहुत काल व्यतीत होगये हैं अबतू निश्चल होकर शिव संगमकर अर्थात् शुद्ध आत्मा का ध्यान कर जिससे तुझ को अवश्य मोक्ष की प्राप्तिहो॥ इहु शिवसंगमु परिहरिवि, गुरुवइ कहिवि मजाहि । ने सिवसंगमि लीणणवि, दुक्खु सहता चाहि ।। २७० ॥ शिव संगम अर्थात् शुद्ध आत्मध्यान को छोड़कर हे शिष्य AAAAAAN -- M (४६) तू और कहीं मतजा अर्थात् अन्यकिसी यात में चित्त मत लंगा क्यूकि जो आत्मध्यान में लीन नहीं होते हैं वह दुःखही सहते हैं । कालु अणाइ अणाइ जिउ, मवसायसवि अणंतु । जीवें विएिणण पत्ताई, जिणुसामिउं सम्मत्तु ॥ २७१ ।। काल भी अनादि से है और जीव भी अनादि से है और संसारसागर अनन्त है परन्तु श्रीजिनेंद्र देव और सम्यक्त्व का पता जीवके विना और कहीं न लगा अर्थात् सारे जगत् को ढूंढ मारो परमात्मा और सम्यक्त्व यह दोबातें जीवकेही. लक्षण मिलैंगी अन्य कहीं भी नहीं मिलेंगी इसकारण आत्मध्यानही में लगना चाहिये। घर वासउ मा जाणि जिय, टुकिय' वासउ एहु । पासु कर्यते । मंडियउ, अविचलु णीसंदेहु ।। २७१ ॥ हे जीव घरकाबाम अर्थत् स्त्री पुत्र आदिक में रहकर घर ब- साना जोहै इस को तू इस के सिवाय और कुछ मत जान कि यह निःसंदेह एक अचल फांसी तेरे टांगने को गाड़ी गई है इस वास्ते घर बास छोड़ना योग्य है। देहुवि जेत्थु ण अप्पणउ, तर्हि अप्पणउ किं अएणु । परकारणि म णगरुष तुई, सिव संगमु अवगएणुः ।। २७३ ॥ जब देही अर्थात् शरीर भी अपना नहीं है तब अन्य कौन पदार्थ अपना हो सकताहै अर्थात् कोई पदार्थ अपना नहीं है इस कारण हे उत्कृष्टजीव तू परके कारण शिव, संगम, अर्थात् शुद्ध आत्मध्यान का निरादर मतकर अर्थात् आत्मध्यानको सतछोड़ ।। कारि सिव संगमु एक्कुपर, जहिं पा.विज्जइ सोक्तु । जो इय अण्णु म चिंति तुहूं, जेण ण लव्भइ मोक्खु.।। २७४ ॥ तू एक ही से शिव संगम कर अर्थात् एक शुद्ध आत्मा का ही ध्यान रख जिससे तुझको सुखकी,प्राप्तिहो अन्य किसी वस्तु की चिंता मतकर क्यूंकि अन्य पदार्थकी चिंता करने से तुझको. मोक्ष की प्राप्ति नहीं होगी। वलि किउ माणुस जम्मडा, देखे तहं पर सारु । जइ उट्ठभइ तो कुहइ, अह डझड तोच्छारु ॥ २७५ ॥ -1 (४७) मनुष्य शरीर के पलहारी, जो देखने में अति सुंदरहै परन्तु यदि इसका ढकाढोल खोलदियाजावै तौ अति पिणाचना है और यदि इसको आग लगजावै तो राख होजातीहै । उच्चलि चोप्पडि चेट्टकार, दोह सु मिट्ठा हार । देहह सयल णिरत्थ गय, जह दुज्जणि उचयार ॥ २७६ ।। देहको धोना अर्थात् कुरला करना हाथ धोना और चोपड़ना अर्थात् तेल फुलेल लगाना और कुंकुमादिक लगाना मीठा, भोजन देना यह सब निरर्थक है जैसा कि दुर्जन का उपकार करना व्यर्थ होताहै ।। जेहउ जज्झरु णरयघरू, तेहउ जोइय काउ । णरय णिरंतरू पूरियर, किम किज्जइ अणुराउ ।। २७७ ।। जैसे झाजरा अर्थात् छिद्र सहित बिष्टा का पात्रहो जिसमें से विष्टा गिरता रहै एसाही यह शरीर है जिसमें से मलमूत्र आदिक निकलता रहताहै-ऐसे शरीर के साथ कैसे अनुरागकियाजावै ॥ दुक्खइं पावई अमुचियहं, तिहुयणि सयलई लेवि । एयहि देहु विणिम्मियउ, विहिण वइरु मुणेवि ।। २७८ ।। विधना अर्थात् कर्मोंने जीव के साथ बैर करके समस्त दुःख तथा समस्त पाप और समस्त अशुचि पदार्थ इकडे करके यह शरीर बनाया है। जो इय देहु घिणावणउ, लज्जाह किरण रमंतु । वाणिय धम्म हरइ करहि, अप्पा बिमलु करंतु ॥ २७९॥ हे ज्ञानी ऐसी घिणावणी देहके साथ प्रीति करने में लज्जाकर तू इससे क्यूं रमताहै इसको छोड़ और अपनी आत्माको निर्मल करने के अर्थ धर्मकर ॥ जो इय देहु परिचयहि, देहु ण भल्ला होइ । देह विभिएणउ णाणमउ, सो तुई अप्पा जोई ॥ २८० ॥ यह जो देह है इस का तू त्याग कर, देह भली नहीं है देह से भिन्न जो ज्ञानमयी आत्मा है उसही की तू खोज कर ।। दुक्खहं कारण मुणिवि मणि, देहुवि एहु चयति ।

है AAAAAL AAAA 3 AMMANS (४८) जित्यु ण पावहिं परम सुहु, तित्थु कि संतवसति ॥ २८१ ॥ सत्पुरुष देह को दुःख का कारण जानकर देहकी ममत्व को छोड़ते हैं जिसमें परमसुख की प्राप्ति न हो उसमें सत्पुरुष कैसे रमैं अर्थात् नहीं रमते हैं। अप्पा यत्तउ जं जि मुह, तेण जि करि संतोस । पर सुहु वढ चिंतंतयह, हियइ ण फिटइ सोसु ॥ २८२ ॥ तू अपने आत्मीक सुख में संतोषकर पर पदार्थ से जो मुख उत्पन्न होता है उस से तृष्णा दूर नहीं होती है ।। अप्पहं णाणु परिचइपि, अण्ण अस्थि सहाउ । एडु जाणेविणु, जोइयहो, परह म बंधडु राउ ।। १८३ ।। आत्मा ज्ञान स्वभाव है सिवाय इसके उसका और कोई स्वभा- व नहींहै ऐसा जानकर हे योगी अन्य किसी पदार्थ से तू रागमतकर।। विसय कसायहि मण सलिलुणविडडुलिज्जइ जानु। अप्पा णिम्मलु होइ लहु, वढ पञ्चक्खु वि ताम् ।। २८४ ॥ जिसका मन विषय कषाय में नहीं डोलता है अर्थात् संकल्प विकल्प से रहित है-उसको सम्यक्तरूप नेत्रों से अपना शुद्धआ- त्मा प्रत्यक्ष नजर आता है। अप्पा परहं ण मेलविउ, मणु मारिवि सहसति । सो वढ जोपं किं करइ, जासु ण एही सत्ति ॥२८५॥ अपनी आत्मा को परपदार्थ में न लगाना और समाधि रूपहथि- यार से मनको मारना यह काम जिससे नहीं होसक्ते हैं वह योगी बनकर क्या करेगा अर्थात् उसका योग वृथाहै ।। अप्पा मिल्लिवि णाणमउ, भएणुजि झायहिं भाणु । वढ अण्णाण विभि यह, कउ तह केवल णाण ॥ २८६ ॥ अपनी ज्ञानमयी आत्मा को छोड़कर जो अज्ञानी पर पदार्थ का अवलम्बन करके ध्यान करता है अर्थात् पर पदार्थ में ध्यान लगा- ताहै उसको केवल ज्ञान कैसे प्राप्त होगा भावार्थ जो अपनी शुद्ध आत्मा का ध्यान नहीं करता उसको केवल ज्ञान प्राप्त नहीं हो सकता है। मुएणउ पउ झायंताई, वालवाले जोइयडाहं ।

मुण्णु। ( ४९) समरस भाउ परेण सहु, पुराणु ण पाडाव जाहिं।।।।०८७॥ जो योगी पुण्य पापसे रहित हैं और शुद्ध आत्माका ध्यान शुभ अशुभ विचार से रहित होकर करते हैं वह धन्य हैं मैं उनपर बलिहारा जाऊं॥ उन्चासि पसिया जो करइ, वसिया करइ जो वलि किज्जउ तमु जोइयह, जासुण पाउ ण पुण्ण ॥ २८८ ॥ जो उजड़े हुवे को यसाता है और बसे हुवे को उजाइताहै अ- र्थात् अपनी आत्मामें शुद्ध स्वभाव को प्राप्तकरता है और राग- द्वेषादिक भावों को दूरकरता है और जिसके पाप हैनः पुण्य है ऐसे योगीपर मैं कैसे बलिहार जाऊं अर्थात् वह योगी.धन्य हैं। तुइ मोडु तडात्ति जहिं, मणु अत्यवगु होजाई । सो सामिय उवरामु कहि, अरणे देवें काई ॥ २८२ ॥ हे स्वामी ऐप्ता उपदेश कह जिससे तुरंत मोह टूटजावै और मन स्थिर होजावै अन्य किसी देव आदिक से क्या प्रयोजन है अर्थात् हमारा प्रयोजन जो मुक्तिप्राप्त करने का है वह किसी देव आदिक से पूरा नहीं होसक्ता है मुक्ति तो मोह के दूरहोने और मन के स्थिरहोने से ही प्राप्तहोसक्ती है इसकारण उस ही का उपदेश कर। रणासावि 'णिग्गउ सासडा, अंवरि जित्यु विलाइ । तुट्टइ मोहु तडत्ति तहि, मणु अत्थवण होजाइ ॥ २९० ॥ जहां अर्थात् जिस ध्यान में नाक से निकलनेवाला सांस तालूरंध्र (दशवां द्वार) से निकलने लगता है उस ध्यान में मोह तुरंत ही दूर होजाता है और मन स्थिर होजाता है-(ध्यान का विषय अन्य ग्रन्थों से पढ़ना चाहिये तब यह कथन समझ में आवैगा) मोहु चिलिज्जइ मणु मरइ, तुइ सामुणि सासु । केवलणाणुवि परिणवइ , अंबरि जाहं शिवाम् ।। २९१ ॥ जिसका निज शुद्ध आत्मा में निवास है अर्थात् जो कोई अपनी आत्मा के ही ध्यान में मग्न है उसका मोह नाश होजाता है,मन मरजाता है अर्थात् स्थिर होजाताहै और नाक से सांस लेना भी टूट जाता है अर्थात् सांस तालूरंध से निकलता है उस ही को केवल ज्ञानहोता है-और मुक्ति प्राप्तहोती है। ७ IAAAAAALA LAAAAL (५०) 4 जो आयासहिं मणु धरइ, लोगलोय पमाणु । तुट्टइ मोहु तडचि तमु, पावइ परहं पवाण ॥ २९१ ।। जो कोई आत्मा को आकाश के समान लोक और अलोक के बरावर अपने मन में धारण करता है उसका मोह तुरंत टूटजाता है और परमपद प्राप्तहोता है-भावार्थ जिस प्रकार आकाश स्वच्छ है पर द्रव्य से भिन्न हैं और लोकालोक में व्यासहै इसही प्रकार आत्मा भीस्वच्छ और निर्मल है और सर्वज्ञ होने के कारण उसका ज्ञान लोकालोक में फैलता है इस हेतु जो कोई आकाश के समान अपनी जीवात्मा का विचार करताहै वह मोहका नाश करताहै ॥ देहि वसंतुवि णवि मुणिउ, अप्पा देउ अणंतु । अंवरि समरासे मणु धरिवि, सामिष णटु णिभनु।। २९३॥ हे स्वामी मैंने वृथा काल गंवाया और अपनी देहमें बसती हुई अनन्तशक्तिवान् आत्मा को न जाना और आकाश केस- मान समता भाव मन में धारण न किया। सयलवि संग रण मेल्लिया, गवि किउ उत्सम भाउ । सिवपय मग्गुवि मुरिणउ णवि, जहिं जोएई अणुराउ ।। २९४ ॥ घोरुण चिरणउ तवयरणु, जणिय वोहहंसारु । पुरणावि पाउविं दळु णवि, किम छिज्जइ संसारु ॥ ३९५ ॥ सर्वप्रकारके परिग्रह को दूरनहीं किया और न उपसमभाव धारण किया और मोक्ष और मोक्ष के मार्ग को जिससे योगी जन अनुरा- ग करते हैं नहीं जाना और वह तपश्चरण नहीं किया दुर्द्धरपरीसह काजीतना जिसका चिह्न है और जो सारभूत है अर्थात् मोक्ष प्राप्तिका असली कारण है और पुण्य और पापको नष्ट नहीं किया तव यह संसार परिभ्रमण कैसे दूरहो । दाणु ण दिएणउ मुणिवरह, णवि पुजिउ जिणणाहु। पंच ण वंदिय परमगुरू, किम होसइ सिवलाहु ॥ २९६ ॥ मुनिको दान नहीं दिया और श्रीजिनेंद्रदेवकी पूजा नहीं की और पंचपरमेष्ठी की वंदना-नहीं की तय मोक्ष सुखका लाभ कैसे होगा। अद्धम्मीलिय लोयणइ, जोउ किन्झ पियएहि । -- (११) एमइ लन्मइ परमगइ, णिचिंतहि ठियएहि ॥ २९७ ॥. आधी आंख खुले रखने से वा आंख विल्कुल बंदकरलेने से परम पदकी प्राप्ति नहीं होती है वह तो चिन्ता के दूर होने से ही प्राप्तहोता है-भावार्थ ध्यान करने के समय आधी आंख उघा. ड़कर वा सारी आंख मूंदकर बैठजाने से क्याहोता है-जबतक चिन्ता दूर नहीं हुई है। जोइय मेल्लाहि चिंत जइ, तो तुदृइ संसारु । चिंता सत्तउ जिणवावि, लहइ ण हंसाचार ॥ ९९८ ॥ यदि तू चिन्ता को छोड़देगा तो तेरा संसारपरिभ्रमण दूर होजायगा श्रीजिनेंद्रभगवान् कोभी संसार अवस्था में जबतक चिंताका सद्भाव रहा तबतक आत्मस्वरूप को प्राप्त न होसके । जोइय दुम्मइ कवण तुहूं, भव कारणि ववहारि । वंभु पवंचहि जो रहिउ, सोजाणिविमणु मारि॥ २९९ ॥ हे जीप तुझ में कैसी मुर्खताई है कि संसार में परिभ्रमण करने का कारण जो व्यपहार है उसमें तू लगता है तू सर्वप्रकार के अपंच से रहित अर्थात शुद्ध ब्रह्मको जान और अपने मन को मार अर्थात् स्थिर कर ।। सबहिं रायहि छह रसहि, पंचहि रूवहि जंतु । चित्तु णिवारिवि झाइ तुहूं, अप्पा देउ अणंतु ! ३०० ॥ सर्वप्रकार के राग, षटरस, पंच प्रकार के रूप को चित्त में से दूर करके तू अपनी आत्मारूपी अनन्त देव का ध्यान कर ॥ जेण सरूकें झाइयइ, अप्पा पहु अणंतु । तेण सरूवें परिणवइ, जहं फलिहउ मणि मंतु ।। ३०१॥ यह अनन्त आत्मा जिस स्वरूप का ध्यान करती है तिसही रूप परिणव जाती है अर्थात उसही रूप होजाती है जैसे फटिक मणि के साथ जिस रंग की डांक लगा दीजावे वैसाही रंग मणि का हो जाता है। एहु जो अप्पा सो परमप्पा, कम्म विससें जायउ जप्पा। 'जावहि जाणइ अप्पें अप्पा, तावई सो जी देउ परमप्पा ।। ३०२ ॥ यह जो आत्मा है यह ही परमात्मा है कर्मों के बशसे परा- - HLAAAAM (५२) , धीन होरहा है और जय अपनी आत्मा को जान लेता है तब ही वह परम देव होजाता है। जो परमप्पा णाणमउ, सो इउ देउ अणंतु । जो हउ सो परमप्पु परु , एहउ भावि णिभंतु॥ ३०३।। जो परमात्मा ज्ञानमयी है वह ही अनन्त देव है उमही परमात्मा को तू निःसंदेह अनुभवन कर ।। रिणम्मल फलिहहं जेम जिय, भिणउ परकिय भाउ । अप्प सहावई तेम मुणि, सयलुवि कम्म सहाउ॥ ३०४ ।। जिस प्रकार निर्मल फटिकमणि डांक के लगने से डांक के रंग को ग्रहण करती है परन्तु असलियत में वह शुद्धही होती है इस ही प्रकार तू अपनी आत्मा को जान कि कमों के कारण उसका विपरीत भाव होरहा है असल में आत्मा शुद्धही है । जेम सहावे हिम्मलउ, फलिहउ तेम सहाउ । भीतए मइलु म मरिण जिय, मइलउ देक्खिीव काउ॥३०५॥ जिस प्रकार फटिक मणि निर्मल है इसही प्रकार आत्मा निर्मल है तू शरीर को मैला देखकर अपनी आत्मा को मैलामत मान ॥ रत्ते पत्ये जेम बहु, देहु ण मरणइ रत्तु । देहें रत् णाणि तह, अप्पु ण मरणइ रत्तु ॥ ३०६ ॥ जिएवं वत्थे जेम बहु, देहु ण मरणइ जिएणु । देहें जिरणे णाणि वई, अप्पु ण भएणइ जिएणु।। ३०७ ॥ वत्यु पण?ई जेम बुहु, देहु ण मरणइ छ । देहे णनें णाणि तह, अप्पु ण मरणइ छ । ३०८ ॥ भिएणड वत्युजि जेम जिय,देहहो मगणइ णाणि। देहु विभिएणउणाणि तह, अप्पहं मएणइ जाणि।। ३०९ ॥ जिस प्रकार लालवस्त्र पहने हुवे मनुष्य का शरीर लाल रंग का नहीं समझा जाताहै इसही प्रकार ज्ञानी जन लालरंगका श- रीर देखकर आत्माको लालरंगकी नहीं मानते हैं ।। जिस प्रकार जीर्ण अर्थात् बोदे पुराने वनको देखकर शरीर जीर्ण नहीं माना जाताहै इसही प्रकार ज्ञानी पुरुष देहको जीर्ण देखकर आत्माको जीर्ण नहीं मानता है । .

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(५३ ) वस्त्र के नाश होजाने से जिस प्रकार देहका नाश होना नहीं माना जाता है इसही प्रकार ज्ञानी पुरुष देहके नष्ट होजाने से आत्माका नष्ट होना नहीं मानते हैं। जिस प्रकार ज्ञानी पुरुष वनको देहसे जुदा मानता है इसही प्रकार ज्ञानवान् आत्माको देहसे भिन्न जानताहै ।। एउता जीवड तुझ रिज, दुक्खई जेण जणेइ । सो,परजाणहि मित्तु वुहु, जो तणु एहु हणेइ ।। ३१० ॥ हे जीव यह शरीर तेरा धैरी है क्यूंकि दुक्खों को उपजाता है इस कारण जो कोई तेरे शरीर को हनन करता है मारताहै उस को तू अपना मित्र समझ ॥ उदयहं प्राणिबि कम्मु मई, जे भनेव्वउ होइ । से सई आविउ खविउ मइ, सो परलाहुाजे कोइ॥ ३११ ।। महातपस्वी योगी जन पूर्व सचित कमी को अपने आत्मीक वलसे उदय में लाकर नष्ट करते हैं-वहही कर्म यदि आपही उदय में आकर नष्ट हो जावै तो बहुतही भली यात है अर्थात् कर्मके उदय आनेपर और किसी प्रकारका कष्ट होनेपर आनन्द मानना चाहिये कि इस प्रकार यह कर्म जो उदय आगयाहै अपना फल देकर नष्ट होजावेगा कर्म के उदय से जो कष्ट आवै उसमें क्लेश नहीं मानना चाहिये । रिणठुर वयण सुणेवि जिय, जइ मणि सहण ण जाइ। वो लहु भावहि वंभु परु, जे मणु झत्ति विलाइ ॥ ३१९ ॥ हे जीव यदि तेरा मन खोटे वचनों को नहीं सह सक्ता है तो परब्रह्म अर्थात् शुद्ध आत्मा के ध्यान में लीन होजा जिससे तेरा मन आनंदित होजावै ।। लोउ विलक्खणु कम्म वसु, इत्यु भवंतरि एइ । चोज्जु किइहु जइ अप्पि ठिउ,इत्थमि भवि ण पडेइ ।। ३१६ ॥ कर्मों के घश होकर संसारी जीवों के नाना प्रकार के भेद होरहे अर्थात कोई पशु है कोई मनुष्य है कोई धनाढ्य है कोई कंगाल है इत्यादिक-और कर्मों के ही कारण यह जीव संसार में रुलता है-यदि यह जीव अपनी आत्मा में स्थिर होजावे अर्थात् कर्मों का (१४) नाश कर देवै तो इस को संसार में रुलना न पड़े इस में कोई आ- श्वर्य की बात नहीं है। अवगुण गहणइ महु तणइ, जइ जी वह संतोसु । ते तई सुक्खह हेउ हउ, इउ मरिणवि चइ रोसु॥ ३१४ ॥ जो मेरे अवगुणों को ग्रहण करते हैं अर्थात् मेरी बुराई करते हैं उन को मेरी बुराई करने में आनन्द आता है इस कारण मैं उन के आनन्द का हेतु झुवा अर्थात् मेरे कारण उन का उपकार हुवर ऐसा मान कर और रोष अर्थात् क्रोध को दूर करके संतोष ग्रहण करना चाहिये ।। जो इय चिनि म किंपि तुहुँ, जइ वीहिउ दुक्खस्स । तिल तुस मित्तुवि सल्लहा, वे यण करइ अवस्स ।। ११५ ।। मोक्छु म चिंतहि जोइया, मोक्खु ण चितिर होइ। जेण णिवद्धउ जीवडउ, मुक्खु करीसइ सोइ॥ ३१६ ।। यदि तू दुःख से डरता है तो किसी प्रकार की भी चिंता मतकर अर्थान् चिंता को छोड़ जैसे जरासा कांदा भी दुःखदाई होता है ऐसेही जरासी चिंता भी दुःखदाई होतीहै- हे योगी तू मोक्षकी भी चिंता मतकर क्यूंकि चिंता से मोक्ष नहीं मिलता है-जिसने जीव को वांध रक्खा है उस ही से तू जीव को छुड़ा भावार्थ-चिंता को दूर कर ॥ सयल दियप्पहं जो विलर, परम समाहि भणनि । तेण मुहासह भावडा, मुणि सयलावे मेलति ॥ १७ ॥ समस्त विकल्पों से रहित होने को परम समाधि कहते हैं इस कारण मुनि महाराज समस्त शुभ अशुभ भावों का त्यागकरते हैं परम समाहि महा सरहि, जे बुट्टाह पइसेवि । अप्पा या विमनु वह, भव मल जाते वहेचि ।। ३१८ ॥ जो कोई परम समाधि रूप महा सरोवर में सर्वांग डूश्ता है अर्थात् शुद्ध आत्म ध्यान में लीन होता है वह संसार रूपीमैल को धोकर शुद्ध आत्मा होजाता है । घोरु करतुवि तवयरणु, सयलावे सत्य मुणंतु ! पुरम समाहि विवान्जियत,रणविदेखिइ सिरसंतु ॥ १९ ॥ AAAAAALIALA (१५) जो घोर तपश्चरण करता है और जिसने सब शास्त्र भी पढ़' लिये हैं परन्तु जिसमें परम समाधि नहीं है तो वह शिव संत अर्थात अपनी शुद्ध आत्माको नहीं देखसक्ता है-भावार्थ मोक्ष नहीं पासक्ता है। विसय कसाय विणिदलिवि,जो ण समाहि करति । ते परमप्पई जोइया , णवि आराहय हुँति ।। ३२० ॥ जो विपय कपाय को नाश करके परम समाधि को नहीं करते हैं वह योगी परमपद की आराधना करनेवाले नहीं हैं। परम समाहि धरेवि मुणि, जे परवंभु ण जति । ते भव दुक्खई वहु विहई , कालु अणंतु सहति ॥ ३२१ ।। जो मुनि परम समाधि लगाकर परमब्रह्म अर्थात् शुद्ध आत्मा का अनुभवन नहीं करते हैं वह बहुत कालतक बहुत प्रकार के दुःखों को सहते रहते हैं अर्थात् संसार में भ्रमते रहते हैं । जाम सुहासुह भावडा, णवि सयलवि तुटुंति । परम समाहि ण ताम मणि, केवलि एम भणति ॥ ३२२ ॥ जयतक सर्व शुभाशुभ भाव दूर नहीं होजाते हैं तबतक परम समाधि नहीं होती है ऐसा श्री केवली भगवान् ने कहा है ।। सयल वियप्पहं तुटाई , सिपिय मगि वसंतु | कम्म चउक्कई विलयगइ, अप्पा होइ अरहंतु ॥ ३२३ ॥ सर्वप्रकार के विकल्प को दूर करके और मोक्ष मार्ग को ग्रहण करके चार घातिया कर्मों का नाश करके यह आत्मा अर्हत होजाती है-अर्थात् केवल ज्ञान और परमानन्द प्राप्तहोजाता है ।। केवल णाणहं अणवरउ, लोयालोउ मुणतु । णियमेंई परमाणंद मउ, अप्या होइ अरहंतु ।। ३२४ ।। यह आत्माही अहंत पदको प्राप्त करतीहै और आवरण र- हित केवल ज्ञान से लोक अलोककी सर्व वस्तु को जानतीहै और परमानन्दमयी है। जो जिगु परमाणंद मउ, केवल गाण सहाउ । सो परमप्पउ परमपउ, सो जिय अप्प सहाउ ॥ ३२५ ॥ श्रीजिनेंद्र भगवान् परमानन्दमयी और केवल ज्ञान सुभाव के -- AAAAAAAAAAAAAAMILA * ( ५६ ) धारीहैं वहही उत्कृष्ट परमपद जीवात्माका सुभायहै अर्थात् आत्मा का असली सुभाव वही है जो परमात्माका है और आत्माही पर मात्मपदको प्राप्त होकर जिन बनजातीहै । जीवा जिणवर जो मुग्णइ, जिरणवर जीव मुणेइ । सो समभाव परिडियउ, लहु णिव्वाणु लहेइ ।। ३२६ ।। जो कोई पुरुष जीवको जिनेंद्र देव मानताह और जिनेंद्र भग- वान् को जीव मानता है अर्थात् यह समझता है कि संसारी जीव ही शुद्ध होकर जितेंद्र देव होजाता है वह पुरुष समभाव में स्थित हुवा शीघ्र ही निर्वाण पदको प्राप्त करता है । सयलहं कम्महं दोसहवि, जो जिगु देउ विभिएणु । सो परमप्प पयास तहुं, जोइय रिणय में मण्णु ॥ ३२७ ॥ सर्व कर्मों और दोषों से रहित श्रीजिनेंद्रदेव को ही हे योगी तू परमात्म प्रकाश समझ ॥ केवल सण णाण सुहु, वीरंउ जोनि अणवु । सो जिगु देउ जि परम मुणि, परम पयासु मुगंतु ॥ ३२८ ॥ केवल दर्शन केवल ज्ञान अनन्त सुख अनन्त वीर्य इस प्रकार अनन्त चतुष्टय के धारी श्रीजिनेंद्रदेव ही परम मुनि हैं और वह ही परात्मा प्रकाश है। जो परमप्पउ परमपउ, हरिहरु वंभु विवुद्ध । परमपयासु भणति मुणि, सो जिगुपदेउ विसुद्ध ।। ३२९ ॥ जो परमात्मा परमपदहै जिसको हरिहर वा ब्रह्म वा घुद्ध वा परमात्म प्रकाश कहतेहैं वह शुद्ध जिनेंद्रदेव है ॥ झाणे कम्मक्खड कारीव, मुक्कइ होइ अणन्तु । जिणवर,देवइ सोजि जिय, पभणिउ सिद्ध महतु ।। ३३० ।। श्री जिनेंद्रदेवने उस जीवको सिद्ध महंत बताया है जिसने ध्यान के द्वारा कर्मोंका नाश करके अनन्त मुक्तिको प्राप्त कियाहै जम्मण मरण विवज्जियउ,चउगइ दुक्ख विमुकु। केवल दसण णाणमड, गंदउ तित्थु जि मुख ॥ ११ ॥ वह सिद्ध भगवान् जन्ममरण से छूटकर और चारों गतिके दुःखों से रहित होकर केवल दर्शन और केवल ज्ञान के आनन्द मैं मुक्ति स्थान में रहते हैं । .

(५७) जे जे परमप्प पयास मुणि, भावें भावहि सत्यु । मोहु जिणेविणु सयलु जिय, ते वुज्झहिं परमत्थु ॥ ३३२॥ जो कोई मुनि इस परमात्म प्रकाश को शुद्धभाव से ध्यावहै और जिन्होंने समस्त मोह कर्मको जीतलिया है वेही पर- मात्मपदको पहचानते हैं। अण्णाजे भत्तिए जे मुणहि, एहु परमप्प पयाम । लोयालोय पयास यरू, पावहिं तेवि पयासु ॥ ३३३ ॥ अन्य जो मुनि परमात्मा प्रकाश के भक्त हैं वह सर्व लोका- लोकको प्रकाशकरनेवाला प्रकाश अर्थात ज्ञान प्राप्त करते हैं। परमप्प पयास यह, अणुदिणु णाउ लयंति ! सुदृइ मोहु तहत्ति तहिं, तिहुवण गणाह हवंति ॥३३४॥ जो प्रतिदिन परमात्मा प्रकाश का नाम लेते हैं उनका मोह कर्म तुरंत टूटजाता है और वह तीनलोक के नाथ होजाते हैं । जे भव दुक्खहं वीहिया, पउ इच्छहि णिव्वाणु । एहु परमप्प पयास यह, ते पर जोग वियागु ॥ १३५ ।। इस परमात्माप्रकाश ग्रन्थको आराधन करने के वहहीयोग्य हैं जो संसार दुःख से भयभीत हैं और निर्वाणपदको चाहते हैं । जे परमप्पय मत्तियए, विसयाव जे ण रमंति। ते परमप्प पयास यह, मुणिवर जोगा हवंति ॥ ३३६॥ वहही मुनि परमात्मा प्रकाश के योग्य हैं जिन को परमात्मपद की भक्ति है और जो विषयों में नहीं रमते है ।। णाण वियत्खणु मुद्ध मणु, जो जणु एहउ कोइ । सो परमप्प पयासहं जोग्गु, भणति जि जोइ ।। १३७ ॥ जो विचक्षण ज्ञानी है और मन जिसका शुद्ध है ऐसा जोकोई पुरुषहै वहही परमात्माप्रकाश के योग्य कहागया है। लक्खण छंद विवज्जियउ, एहु परमप्प पयास । कुणई सहावें भावियउ, चउगइ दुक्ख विणासु ।। ३५८ यह परमात्मा प्रकाश जो छन्द अर्थात् कविताई के लक्षण से रहित है अर्थात् कविता का विचार छोड़कर परमात्मपद का जो स्वरूप इस में वर्णन कियागया है उस को जो कोई शुद्धभाव से ध्यावै है उसके चारोंगति के दुःख नाश होजाते हैं ।। .

AAAAAAAAA (५८) एत्थु ण लिव्वउ पंडियाहिं, गुणु दोसुवि पुण रत्तु । भट्ट पहायर कारणइ , मइ पुणु पुणुवि पउत्तु ॥ ३३९ ।। पण्डितों को चाहिये कि इस ग्रन्थमें बारपार एक वातको कह- ने के गुणदोष को न पकड़ें क्यूं कि मैंने प्रभाकरभट्ट के समझाने के अर्थ एक एक बात को बारबार कहा है ।। ज मइ किंपिचि जपियर, जुत्ताजुत्तु वि एत्यु । तं वरणाणि खमं तु महु, जेवुझाई परमत्यु ॥ ३० ॥ इस अन्ध में यदि कोई बात मैंने युक्त अयुक्त कही है तो परमार्थ के जाननेवाले मुझपर क्षमाकरें। ॥काव्य। जं तत्तं णाणसवं परम मुणिगण णिच झायंति चित्ते । ज तत्तं देह चत्तं णिवसइ भुरणे सन्न देहीण देहो।। जं तत्तं दिव्च देहं तिहुवरण गुरुवं सिझए संतजीवे । . तं तत्तं जस्स सुद्धं फुरइ णियमणे पावप सोहु सिद्धं ॥३४१ ।। जिस ज्ञान स्वरूप तत्व को परम मुनिगण नित्य अपने मन में ध्यान करते हैं जो तत्व देहले भिन्न है और, जगत में सर्व देह- धारियों की देह में बसताहै जिस तत्वकी देह दिव्यस्वरूपहै अर्थात् ज्ञानकी ज्योति से प्रकाशमान है और जो तत्व तीन लोकमें प्र- तिष्ठतहै अर्थात् पूजनीकहै और संतजीवों को जिस तत्वकी सिद्धि होतीहै ऐसा शुद्ध तत्व जिसके हृदय में प्रकट हुवाहै उसको नि- श्यरूप सिद्धि प्राप्त होतीहै अर्थात् वह मुक्ति पदको पाताहै । परमपयगयाणं मासो दिन्च काओ। मणसि मुणियराणं मोक्खदो दिबजोउ।। वितय मुहरयाण दुल्लहो जो हु लोए। जयउ सिव सरूवो केवलो कोवि-वोहो ।।३४३ ॥ वह शिवस्वरूप केवली भगवान जयवंत रहैं जिनका दिव्य शरीर है और परमपदको प्राप्त हुवे हैं और जो मुनियों के नाथहैं और जिनका वह दिव्य अर्थात् शुक्ल ध्यानहै जो मुक्तिका देने वालाहै और जो ध्यान विषय सुख में आसक्त जीवों को इस लोकमें प्राप्त होना दुर्लभ है ।।

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छपेहुए सर्वजैनशास्त्र हमारे पास मिलते हैं-
सूरजभानु वकील
देवबन्द, जिला सहारनपुर.
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Parmatmprakash Prakrt Granth Hindi Bhasha Arthsahit

Author
Surajbhanu
Title
Parmatmprakash Prakrt Granth Hindi Bhasha Arthsahit
File name
Parmatmprakash Prakrt Granth Hindi Bhasha Arthsahit
Text
OCR done
Citation
1909
Published
2009/11
Publisher
Moradabad, Lakshaminarayan Press
Language
Sanskrit
Pages
64
Library
Sanmati Library, Jaipur
Classification
Jain sahitya
DLI number
344233
Barcode
99999990234110.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
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