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Teekha Suraj
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तीखा सूरज
(उपन्यास)
-
1 نفر نشن هند للمغا- 45.pkh
तीरका
सूरज
दयाशंकर
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समर्पण
'जोजी जा रही है, अब कब माएँगी ?'
'अब नहीं माऊँगी।
'जब हम लोगों के इम्तिहान शुरू हों, तब जरूर मा जाइएगा।'
'इम्तिहान तुम लोगों के गर्मियों में होंगे, और गर्मियों में तो मा ही
नहीं सकती। बहुत परेशान होती है गर्मियों में ।'
'खैर, रक्षा बन्धन पर जरूर आ जाइए। तब तक तो बरसात शुरू
हो जाती है । मच्छा।
भव
इम्तिहान भी पाएगा, रक्षा बन्धन भी माएगा, वहुत कुछ भाएगा,
प्रमा जीजी नहीं पाएंगी-
उन्हीं को
जो एक माह की बच्ची के रूप में शेष हैं, हमारे निकट ।
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तीखा सूरज
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१ फ्लैक का ठुठ उगल देने के बाद उसे लगा जैसे उसकी व्यस्तता समाप्त हो गई है। खुद लादी हुई व्यस्तता। और अब उसे महसूस हुआ कि सूरज को तेज-तेज किरणें उसके सर- माथे को ऊपर से सीधे-सीधे बैध रहो हैं । लायन्स क्लब के सौजन्य से बना यह नया बस-स्टाप मुलस गया है और सूरज की पूरी गर्मी उसके अन्दर भर गई है। सिटी बस का इन्तजार करती भीड़ पसीने में चुहचुहा रही है मौर परेशानी तथा एक मजीष खिझलाहट से वह भीड़ एक गुथा हुमा गुच्छा हो गई है। पपी के झोर तथा एक दूसरे से झगड़ते वालों की तरह। सामने की कोलतार पुती सूनी सड़क पर निगाह पड़ी तो उसने देखा, सोधी पड़ रही तेज किरणों की वजह से वह कोलतार पहले की अपेक्षा गोकि वक्त मगर उस पुरानी घड़ी से बाहर निकल आए तो उसको दारी उम दिन वा मात्मविश्वास, भय तो कभी-कभी उसे भी लगने लगता है कि एक दम्भ ही था, सिर्फ दम्म, कोरा दम्म । दम्भ ही सही, लेकिन माज भी जब उने उस दिन का इल्म होता है, वह भरने मापको रोमांदित १०॥ तीखा सूरज काफी पिघल गया है और उसमें साइकिल, रिक्शे, तांगे और टैक्सी के पहियों के हल्के-हल्के खांचे खुप गए है । सूरज की रोशनी उन खांचों के बीच से उठकर हल्की-हल्की चमक पैदा कर रही है, कोई बड़ी चौंधियाहट नहीं है । पिछले दो घंटे से कोई बस या ऐसी ही कोई भारी गाड़ी इघर से नहीं गुजरी है और इसीलिए उसके दृष्टि-पथ के समानान्तर सड़क पर कोई बड़ा खांचा नहीं है इस वक्त, बड़ी चौंधियाहट का । सड़क पर दायें-बायें वस को टटोलती उसकी निगाहें अचानक अपनी फ्लाई पर बंधी पुरानी घड़ी पर चली गई। प्रांखें मिच-मिचाकर उसने फिर देखा, गौर से । लेकिन उसकी प्रांखों के सामने धुंवाया हुआ घड़ी का डायन था, जैसे सुइयों के साथ-साथ डायल के ऊपर अंकित समय बताने वाला हर चिन्ह, सूरज को तेज गरमी से पिघल गया हो । गरदन के पीछे से पसीने में तर नपने सफेद रूमाल को उतार कर उसने उसे दाएं हाथ में पकड़े-पकड़े एक झटका दिया। भीगा हुया रूमाल खुलकर भूल गया । थोड़ी देर तक वह नीची निगाह किए उस रूमाल का हिलना देखता रहा । अचानक उस रूमाल को उसने अपनी मुट्ठी में झपट लिया। हंसा, पता नहीं कितनी देर से ये हरकतें कर रहा था वह । "खुद को व्यस्त करने का अच्छा तरीका निकाला नरेन", अपने प्रापसे ही कहा उसने मौर अपने से ज्यादा उम्र वाली घड़ी में इस बार काफी प्रात्मदृढ़ता से समय को देखा, हथेली क्या करतब कर दिखाएगी, कहा नहीं जा सकता । क्या धुरा या गया है। - होने से नहीं रोक पाता । भौर सिर्फ रोमांचित ही नहीं होता वह दिमागी तौर पर संघर्ष करते-करते उसे इस बात का अहसास भी हो जाता तोखा सूरज || ११ है कि उसका यह दम्भ उसको शिरानों में एक नई स्फूति इंजैक्ट कर देता है। उसका यह दम्भ तब फिर से प्रात्म-विश्वास में बदल जाता है। डा० विनय के अचानक क्लास छोड़कर चले जाने पर क्लास में व्याप्त समूचे सन्नाटे को तोड़ती हुई एक भावाज जिस बुलन्दो से गूंज रही थी, क्या वह वाकई एक दम्भ मात्र थी। "चले जायें डा. विनय के चमचे, बेचारे बाहर इन्तजार कर रहे हैं।' इसके तुरन्त बाद पूरे क्लास में जो खामोशी छायी, तो काफी देर तक छायो रही थी और वह उसी मुद्रा में अपनी बैंच पर खड़ा रहा था। आगे की बेंच पर की तिलमिलाहट धीरे-धीरे मुखर हो उठी थी। शायद अपने पिता का अपमान न सहा गया उससे । पहले पीछे धूम गई थी सरिता, और तब झटके से खड़ी हो गई थी । निगाहों की इतनी भया. भक मुठभेड़ सिर्फ उसी दिन हुई थी । सरिता का तना हुआ चेहरा देखकर एकबारगी नरेन भी कांप गया लेकिन तुरन्त ही वह किसी प्रस्तर मूर्ति की तरह दृढ़ हो गया था । 'कांग्रेच्यूलेशन मिस्टर नरेन, पढ़ाई में ही नहीं, लड़ाई में भी तुम्हारी फर्स्ट पोजीशन रही क्लास में । कोई तुम्हारे खिलाफ नहीं बढ़ सकता।' कहने के बाद सरिता ने जिस तरह से एक उड़ी-उड़ी सी निगाह पूरे क्लास पर डाली थी और जिस तरह से उसने मुंह बिचकाकर लेक्चर थिएटर के दरवाजे की पोर रुख किया था वह नरेन के हृदय में चुभ गया था। उसे वह कभी नहीं भूल सकता । तब वह ठगा-सा सरिता और उसकी सहेलियों का क्लास से बाहर जाना देखता रहा था। और जिस दिन उसे यह महसास हुमा कि सरिता ने उसे उस दिन भरे क्लास में पहली बार 'तुम' करके सम्बोधित किया था तब तक बहुत देर हो चुकी थी। वह एम० ए० फाइनल कर चुका था और कक्षा की मेरिट लिस्ट उसकी मांखों के सामने पड़ी थी। उस दिन का सरिता की मांखों का यकायक छोटा हो जाना । धौंकनी की तरह की, सोने पर विपकी फाइल को भी पारकर भाने वाली, तेज- कोई उसे बड़ी देर से लपड़िया रहा था। लगातार । उसने मांखें खोल १२ || तीया मूरज तेज सांसों को वेंच पर सड़े होने से लेकर कमरे से बाहर जाने तक के वक्त में, वक्त के 4.3 होने की बजाय न गिन पाने की मसमर्थता तब समझ में भाई थी नरेन को । जी चाहते हुए भो नरेन भरे क्लास में मिली कांग्रेवुलेशन को सरिता के फर्स्ट पोजीशन पाने पर उसे अकेले में मिलकर भी वापस न कर सका था उस दिन । उस वार प्रपनो संफिन्ड पोजीशन पर बधाई देने वालों को 'थंक्यू' भी नहीं कहा उसने । कोई लड़की मासानी से किसी को छोड़ सकती है, यह बात उसकी समझ में भा गई थी और वह अपने विश्वास के लिए इस सय की परवाह भी नहीं करता था । लेकिन जरा सी बात के लिए सरिता सब कुछ भुला- कर उसकी दुश्मन बन जाएगी यह उसने नहीं सोचा था । कोई बड़ा मप- राध नहीं था उसका । कोई भारी अपमान नहीं किया था उसने डा० विनय का । वे सरिता के पिता थे लेकिन उसके भी कुछ थे। वह मच्छी तरह जानता था कि डा० विनय गुस्से को पाले रखने वाले व्यक्तियों में से नहीं थे । वह तो बात फंस गई थी वरना वह ही कुछ कभी कहता ? हमेशा श्रादर किया है उसने डा. विनय का । उस दिन के बाद भी । शायद डा. विनय सब कुछ भूल भी गए थे। लेकिन अब जाहिर है कि सरिता उस दिन को नहीं भूली थी। डा. विनय का सबसे बड़ा चमचा तो वह ही था एक बात वह तब नहीं जानता था। वह खुद कम समझदार थापा सरिता ही अभिनय बहुत अच्छा कर लेती थी। कभी उसे सरिता को प्रवेगात्मक भावनायों का पता नहीं चला। वरना हो सकता था, वह उसे मना लेता । सब कुछ टाल जाता । वैसे भी वह सब कुछ तो भूल हो चुका था । अच्छा होता कि वह सब कुछ याद रखता । याद रखता और डा विनय के घर माने जाने में उस दिन के बाद से फर्क महसूस करता। सरिता के बदले हुए तेवरों को पहचानता होता । सब कुछ धूल हो गया। सोचा था, टाप करने पर यही इसी यूनिवर्सिटी में लग जायगा मोर.... ली लेकिन तब भी उसे कुछ दिखाई नहीं दिया 1 पांखों के भागे गहरा ।
तीखा सूरज || १३ नीला भंधेरा छा गया था, एक्जाम में लास्ट पेपर के वक्त के सरिता के मांचल की तरह।" और तब ध्यान माया उसे कि वह घर से सुबह साढ़े माठ बजे सिर्फ पाय पीकर निकला था। नौ बजे से वह इस बस स्टाप पर खड़ा सिटी बस की प्रतीक्षा कर रहा है भोर मब सूरज भासमान फाड़े डाल रहा है । इस बीच बस के न आने के बावजूद अपनी जेब में पड़े पैसों के एक-एक सिगरेट के हिसाब से कम होते चले जाने की मजदूरी से बंधा वह किस क्षण अपने अन्दर और बाहर की गर्मी के एकात्म हो जाने के साथ-साथ वहीं गिर पड़ा, उसे कुछ नहीं मालूम । अभी भी जमीन पर पड़ा था वह और लोग उसके चारों प्रोर घिरे हुए थे । अपने ऊपर झुके एक-एक व्यक्ति का चेहरा उसने बड़े गौर से देखा लेकिन वह नहीं समझ सका कि वे लोग उस पर तरस खा रहे है या यकायक वह उठने लगा । अपनी पीठ और कमर में कुछ करकराता सा लगा उसे, किसी पुरानी पीर के पुनः उभर माने की तरह । उसे लगा कि उठ पाने में वह पहले जितना सक्षम नहीं है और उसका सर भी सुर- सुरा रहा है । लेकिन वह उठकर खड़ा हो गया, वस-स्टाप की खुरदरी दीवार का सहारा लेकर । "मैं''''भाई'लोगो' "मुझे नौकरी के सिलसिले में एक इण्टरव्यू देने जाना है. "साढ़े ग्यारह पर क्या बस निकल गई""भाई साहब, क्या टाइम हुआ है,"प्लीज""" नरेन लगभग रुपांसा हो गया था। वह देख रहा था कि किसी ने उसके एक सवाल का भी जवाब नहीं दिया। उसने अपने शब्द फिर बुदबुदाए लेकिन प्रतिक्रिया-स्वरूप उसके आस-पास के लोग इधर-उधर चले गए। किसी ने उसके लिए कुछ नहीं किया। 'क्या सवको जुबानें भी फुतर ली गई हैं ?' चाहा कि जोर से चोखे वह लेकिन उसने महसूस किया कि अव उसके गले में कोई मावाज शेप नहीं रह गई है। होठों के चिपचिपेपन को अपने रुमाल से पोंछ देने की नियति के १४ || तीखा सूरज वह । मसलन पुरानी साथ-साथ उसे ख्याल आया कि अब यह भी हो गया है उसे । एक बार निरीह हो जाने के बाद अब वह निरन्तर निरीह होता चला जाता है मौर तमाम जरूरी चीजें ऐन मौके पर भी भूला रहता ही सही, उसके हाथ में घड़ी बंधी हुई है मौर कोई दूसरा न सही वह तो उस घड़ी का मिजाज जानता है । लेकिन गरदन मुकाकर और हाथ उठाकर समय देख लेने के बाद उसे फिर मायूसी ने धर दबोचा। वस का इन्तजार भी बेकार है मन । बेकार । धूप की चिल-चिलाहट की नरमी का कायल हुए बिना ही वहाँ से सरक लिया वह ।
२ रात गहरा गई तो नरेन अपने ही घर में चोरों की तरह चुपचाप धुस भाया । चुपचाप । जैसे सबेरे चाय पीने के बाद बिना किसी को बताए चुपचाप चला गया था, उसी तरह चुपचाप लौट भाया। चुपचाप।बेहद पका हुमा । जैसे दिन भर अत्यन्त व्यस्त रहा हो। अपना कमरा खोलकर वह उसके अंधेरे में समा गया । अंधेरे में ही उसने किवाड़ भेड़े और अनमने भाव से स्विच मान कर दिया । कमरा दूधिया सूरज की रोशनी से भर गया। उसने बल्व को जिसके अन्दर का उसे कुछ नहीं दीख रहा था, इस तरह धूरकर देखा मानों वह उसको समूची रोशनी को अपनी आंखों में समेट लेगा।
रए दी । नरैन बुध देर बिना बोरे माधुरी मोर पाली दोनों को बारी-बारी मापरी पोहा दिसमिता गई फिर तुरन्त ही उसका गला भर पान और १६ || तोखा सूरज लेकिन जल्दी ही उसकी पांखों में कातरता झलक माई । ममी-अभी रसोई में भी कुछ सटका हुमा था । उसने जल्दी-जल्दी अपने कमीज मौर पैन्ट को उतार कर विना धूल फाड़े रस्सी पर फेंक दिया मौर उस पर से चारखाने की लुंगो खोंच ली । रस्सी पर कुछ देर तक पन्ट भूलती रही फिर अचानक टप्प से पैन्ट की जेब में से पिचका हुमा सिगरेट का पैकेट उतर पड़ा। "याप रे!" जैसे सिगरेट का यह डिब्बा ही विश्वयुद्ध का मूल माघार बनने जा रहा हो, इस प्राशंका से नरेन कांप गया पौर दौड़कर उसने वह पकेट उठा लिया। लगभग दौड़कर ही मालमारी का दरवाजा खोला उसने 1 ऊपर के साने में उस पैकेट को एक कोने में छुपा दिया । "अब यह मधिक सुरक्षित है।" उसने सोचा। मालमारी से हटा तो उसके पैरों पर कई कागज मा गिरे । उठाकर देसा । ये सब के सब उसके गुड एकेडेमिक कैरियर के सर्टीफिकेट्स थे। जैसे, परों पर मौंधे होकर सबके सब प्रभयदान मांग रहे हों। "हमारा कोई कुमूर नहीं हुजूर, हम बिल्कुल निर्दोष है । लेकिन हम इत्ते के इते सारे सर्टिफिकेट्स भापको नौकरी दिलाने में समर्थ नहीं हो पा रहे, हिर भी हमारी रक्षा कीजिए, रक्षा कीजिए । मोर कोई सेवा हो तो हम हाजिर है । हम भार हैं । हमें राहेज कर रखिए । हम"।" दरवाजा एला मोर तब नरेन की निगाह रघर दौड़ी । मापुरी थी। मोह !..."तू मय तक सोई नहीं ?" मापुरी कुछ नहीं बोलो । चुपचाप हाय में पड़ी पाली चारपाई पर से देगता रहा। फिर योग पागता है सूने अभी तक रोटी नहीं साई ।" और नरेन ने तेज-तेज नजरें माधुरी के चेहरे पर जमा दो । पले थे. नोये एर उस गटक सेने ये याद यह फूट पड़ी- हीया सूरज ।। १७ "तुम इतने रूपे परों हो गमे होमपा ?" भइया मोर मामी को मा जाने दो, सरिन पया तुम भी यही गुम हो कि प नहीं सम- मनी? मी दुप नहीं समझती? मुझे भी बिना पुष पसाए गुयह मुबह ही सिर्फ पाप मेरर परो गए।"मोर उस पर ममी तुम पास की तरह महोगे, मुझे पिस्तुल मूग गही है, मेरा पेट भरा हुपा है"वह रास्ते में एक कालेज का दोस्त मिल गया था जो प्रय कहीं.", तुम पाहते हो कि में भी चरा पर विश्वास कर T"मना" भापर मापुरी रोने मगठी मरिन सभी गरेल को पाना होग ने भटक दिया । उपमुग, यह पारकत यहत कसा हो गया है, पपनी प्यारी यहिन के लिए भी, मगर पों ?? उराशे पास कोई पवाय नही। यह हंसने लगा मोर पोट से पफड़फर उसने मापुरी को पारपाई पर घर लिपा । "पसी पन्हीं की, पता नहीं कहा गया सोपती रहती है। मैंने कर कहा कि "मुझे पता नहीं गया कि मेरी यहिन है । भूतो येठो होगी। यह यो"यह तो पान ज्यादा काम में फंस गया, इतना व्यस्त रहा कि.... घर मा । पोहा तू भी सा से । मे।" स्सागूला उदरस्य करने के याद दोनों ने पुराने पीतल के बड़े वाले सोटे से थोड़ा-थोड़ा पानी पिया और तब सगा कि दोनों के चेहरे मादमियों के चेहरे हैं । पोड़ा-योटा शान्त, प्रतिस्य । मरेन चारपाई पर सेट गया पौर माधुरी चुपचाप यहाँ बैठी रही। पोड़ी देर बाद हल्के मे माधुरी ने पूप दिया-"तो जनाय माज दिन भर माम में व्यस्त रहे ?" मोर तब मरेन को सगा, कि यह राय कुछ सयरो छुपा सकता है सेकिन अपनी इस बहिन से नहीं । उसे अपने अन्दर ही एक पलवलाहट का पहसास हुमा भौर वह धीरे-धीरे रांयत स्वर में पूरे दिन की व्यथा-कया माधुरी को सुना गया । सिर्फ यस स्टैंड पर अपने गिरने की यात वह माधुरी से भी छुपा गया। लेकिन उसका ध्यान भाते ही उसे अपने बाहर-भीतर चारों मोर एक तेज गिलगिलाहट का अनुभव हुमा। लगा कि मस्तिष्क की १६ || तोखा सूरज । । लेकिन जल्दी ही उसकी पांखों में कातरता झलक माई । मभी-अभी रसोई में भी कुछ खटका हुमा था। उसने जल्दी-जल्दी अपने कमीज मौर पैन्ट को उतार कर बिना धूल झाड़े रस्सी पर फेंक दिया मौर उस पर से चारखाने को लुंगो खींच ली । रस्सी पर कुछ देर तक पेन्ट झूलती रही फिर मचानक टप्प से पेन्ट की जेब में से पिचका हुमा सिगरेट का पैकेट उतर पड़ा। "वाप रे!" जैसे सिगरेट का यह डिब्बा ही विश्वयुद्ध का मूल माघार बनने जा रहा हो, इस प्राशंका से नरेन कांप गया मौर दौड़कर उसने वह पैकेट उठा लिया। लगभग दौड़कर ही मालमारी का दरवाजा खोला उसने । ऊपर के खाने में उस पैकेट को एक कोने में छुपा दिया । "अव यह अधिक सुरक्षित है।" उसने सोचा। पालमारी से हटा तो उसके पैरों पर कई कागज मा गिरे । उठाकर देखा । वे सब के सब उसके गुड एकेडेमिक करियर के सर्टीफिकेट्स थे। जैसे, पैरों पर पौंधे होकर सबके सब अभयदान मांग रहे हों। "हमारा कोई कुसूर नहीं हुजूर, हम विल्कुल निर्दोष हैं। लेकिन हम इत्ते के इत्ते सारे सर्टिफिकेट्स मापको नौकरी दिलाने में समर्थ नहीं हो पा रहे, फिर भी हमारी रक्षा कीजिए, रक्षा कीजिए । मौर कोई सेवा हो तो हम हाजिर हैं । हम मापफे है । हमें सहेज कर रखिए । हम"।" दरवाजा खुला और तव नरेन की निगाह उघर दौड़ी। माधुरी थी। मोह !..."तू मब तक सोई नहीं ?" माधुरी कुछ नहीं बोली । चुपचाप हाथ में पकड़ी थाली चारपाई पर रख दी । नरेन कुछ देर विना बोले माधुरी पोर थाली दोनों से देखता रहा । फिर बोल पड़ा-“लगता है तूने अभी तक रोटी नहीं खाई।" और नरेन ने तेज-तेज नजरें माधुरी के चेहरे पर जमा दी। माधुरी थोड़ा तिलमिला गई फिर तुरन्त ही उसका गला भर माया मौर गले के नीचे एक उसांस गटक लेने के बाद वह फूट पड़ी- बारोवारी तीखा सूरज | १७ "तुम इतने रूखे क्यों हो गये हो भैया ?""बड़े भइया और भाभी की बात जाने दो, लेकिन क्या तुम भी यही समझते हो कि मैं कुछ नहीं सम- मती ? मैं भी कुछ नहीं समझती ? मुझे भी बिना कुछ बताए सुबह-सुबह ही सिर्फ चाय लेकर चले गए।"और उस पर अभी तुम कल की तरह कहोगे, मुझे बिल्कुल भूख नहीं है, मेरा पेट भरा हुआ है"वह रास्ते में एक कालेज का दोस्त मिल गया था जो अब कहीं"", तुम चाहते हो कि मैं "मैं भी उस पर विश्वास कर लू"भला"" शायद माधुरी रोने लगती लेकिन तभी नरेन को अचानक होश ने झटक दिया । सचमुच, वह माजकल बहुत रूखा हो गया है, अपनी प्यारी बहिन के लिए भी, मगर क्यों ? क्यों ?? उसके पास कोई जवाब नहीं । वह हंसने लगा और पीठ से पकड़कर उसने माधुरी को चारपाई पर बैठा लिया । "पगली कहीं की, पता नहीं क्या-क्या सोचती रहती है । मैंने कब कहा कि "मुझे पता नहीं क्या कि मेरी बहिन है । भूखी बैठी होगी। वह तो "वह तो आज ज्यादा काम में फंस गया, इतना व्यस्त रहा कि" खैर मा। थोड़ा तू भी खा ले। ले।" रूखा-सूखा उदरस्थ करने के बाद दोनों ने पुराने पीतल के बड़े वाले लोटे से थोड़ा-थोड़ा पानी पिया और तब लगा कि दोनों के चेहरे पादमियों के चेहरे हैं । थोड़ा-थोड़ा शान्त, प्रकृतिस्थ । नरेन चारपाई पर लेट गया और माधुरी चुपचाप वहीं बैठी रही। थोड़ी देर बाद हल्के से माधुरी ने पूछ दिया--"तो जनाब आज दिन भर काम में व्यस्त रहे ?" और तव नरेन को लगा, कि वह सब कुछ सबसे छुपा सकता है लेकिन अपनी इस बहिन से नहीं । उसे अपने अन्दर ही एक खलवलाहट का पहसास हुमा भौर वह धीरे-धीरे संयत स्वर में पूरे दिन की व्यथा-कया माधुरी को सुना गया। सिर्फ़ बस स्टैंड पर भपने गिरने की बात वह माधुरी से भी छुपा गया। लेकिन उसका ध्यान भाते ही उसे अपने बाहर-भीतर चारों मोर एक तेज गिलगिलाहट का अनुभव हुमा । लगा कि मस्तिष्क को १८ || तोखा सूरज सारी नसें आपस में टकरा गई हैं और एक विचित्र पीड़ा सी समूचे शरीर को सनसनाए दे रही है । नरेन एक लंवा मौन साध गया। माधुरी भी चुपचाप पूरी बात सुनती रही। काफी देर तक वह भी असमंजस में पड़ी बैठी रही। फिर अपने मांचल में से एक पतला सा लिफाफा निकाल कर नरेन की मोर बढ़ा दिया उसने । नरेन एकटक उस लिफाफे की तरफ देखता रहा । पागलों की तरह झपट कर उसे अपनी मुट्ठी में भर लिया। "नौकरी" !"नहीं नौकरी के लिए इण्टरव्यू का काल-लैटर !! उसको पाखें हर्ष से चमक उठीं। फाड़ कर जल्दी-जल्दो पढ़ा, देशी शूगर मिल्स की भोर से था। कल को ही बुलाया है ! उसकी मांखों की चमक फिर यकायक बुझ गई । क्या फायदा ? कल भी उसे कोई बस न मिली तो? बुझी-बुझी पाखें सामने की दीवार को देख रही थों, सामने से हथेली भर प्लास्टर खुट गया था मौर उसके बीचोंबीच एक छिपकली मा चिपकी थी। कीड़े-मकोड़ों को चटपट निगलती हुई । "कहीं से""माधुरी, मुहल्ले में किसी के पास साइकिल है ?" अचानक ही पूछ बैठा नरेन । खुशी की कोई संभावना भी मन के किसी कोने में शेष थी शायद। "हो जाएगी", धूरते हुए माधुरी ने कहा । "तव ठीक है। मब तू जा, सो जा। सुबह चाय पर जगा लेना । जा। जा।" नरेन को माधुरी पर बड़ा प्यार पा रहा था । एक वही तो है जो नरेन को थोड़ा बहुत समझती है घर भर में । और नरेन भी उसके लिए चिन्तित है; इण्टर कत्र को पास कर चुकी । मामी ने यहीं माकर इण्टर का इम्तहान दिया था। माधुरी? अगर न होती तो शायद नरेन हार जाता। यह रोज-रोज घर न माता । चला जाता तो चला ही जाता । घर वह किसके लिए वापस भाता?"
तीखा सूरज || १६
माधुरी चली गई थी। नरेन ने उठकर किवाड़े उढ़का दिए और फिर
वह अपनी अलमारी तक गया । कुछ सफेद ताव और अपने सर्टिफिकेट्स
का पुलन्दा फिर एक बार निकाला, और सिगरेट ।
सिगरेट सुलगा कर वह फिर व्यस्त हो गया।
३
,
"तुमने फिर बेइमानी की, वेईमान कहीं के।"
"चलो-चलो रोमो मत, रोमो मत।"
"साक चलें, मात हो रही है तुम्हारी।"
"मात ? कैसे । कहाँ.."
"तुम एक घर चल सकते हो सिर्फ", सुमन ने काले वाले बादशाह
को उठाकर वग़ल से दो घर पीछे खिसका दिया । "यहां। और यहाँ मेरे
घोड़े का जोर है । यहां अंट का । हो गई न मात?" सुमन ने उंगलियां
नचाई।
"हाँ भी। मात तो हो हो गई।" अशोक ने कुटिलता का भाव धारणा
करते अपने बादशाह को बगल से फिर दो खाने मागे बढ़ा दिया. "मैं
---
तोखा सूरज || २१
यहाँ चलता हूँ।".
"तुम यहाँ नहीं चल सकते।"
"क्यों नहीं चल सकते"
"तुम्हें 'शह' लग चुकी है।"
'.
"नहीं, अभी कहाँ लगी है । साले भूठ बोलता है।"
"झूठ तू बोलता है, मौर बेइमानी करता है।"
"मां भी हो।"
"हाँ, हाँ क्या ! माज तक कोई बाजी जीती है तूने बिना बेइमानी के ।
चुगद कहीं का, बेईमान ।"
"देख बे, जुवान संभाल कर बोल..."
"अरे, तो रोब किसपे जमा रहा है," कहते हुए सुमन ने सबोर्ड को
उठाकर तिरछा फेंक दिया। इस पर प्रशोक गुस्सा गया और उसने खींचकर
एक हाथ सुमन के माथे पर सीघे मारा । सुमन भी बेखबर नहीं था, भट
से भिड़ गया अशोक से । दोनों गुत्थमगुत्था होकर तखत पर लोटने लगे।
अचानक सुमन तखत पर से नीचे फर्श पर लुढ़क पड़ा । फर्श के स्पर्श
के साथ ही वह जोर-जोर से चीखने लगा।
चीख सुनकर रसोई में सुबह का नाश्ता बना रही अशोक की माँ
सुरन्त उठकर बैठक में भा गई । कोठरी का दृश्य देखते ही वह चिल्लाने
लगीं।
"हे भगवान ! इस घर में सत्यानाश ही सत्यानाश है । भरे कम्बस्तो !
तुम दोनों सोलह-सोलह साल के धींगड़े हो गए लेकिन अभी भी वही बचपना।
बच्चों की तरह लड़ते-झगड़ते हो।" फिर मशोक का कान उमेठने लगों,
"तूने ही शैतानी को होगी।""भच्छा, चलो उठो । नाश्ता-वाश्ता कर लो।
चलो । उठो। चलो।...."
दोनों भी एक नंबर थे। चाय नाश्ता वे दोनों अपना-अपना बैठक में
२२ ॥ तोसा मूरज
हो उठा लाए भोर फिर से उनकी शतरंज की बाजी जम गई । फिर वही
तू-तू मैं-मैं शुरू हुई।
तू साले...
तू साले...
,
यकायक सुमन की निगाह दरवाजे पर चली गई । माधुरी को मन्दर
घुसते देखकर वह चुप हो गया । अशोक भी घुप हो गया। अशोक ने सुमन
को कोहनी मारी तो उसने रसोई को भोर इशारा कर दिया। मशोक ने
उझक कर देखा, "माधुरी !"
फिर वे दोनों खिड़की के पास सट कर खड़े हो गए। दोनों माधुरी
को घूरने लगे। कभी-कभी वे एक दूसरे को देखते भौर मुस्करा देते ।
थोड़ी देर बाद माधुरी चली गई और तब कहीं जाकर उन दोनों की
तंद्रा टूटी।
"तुमने देखा", अशोक चिल्लाया ।
"हाँ," सुमन ख़ामोशी से. बुदबुदायां।
"क्या?" ऐशोक भन्नाया । .
"मौसी ने मेरी साइकिल उसे दे दी।" सुमन ने कमरे की छत की
मोर ताकते हुए बड़े शहीदाना अन्दाज में कहा ।
"माय, हाय । तो इसमें रोने की क्या बात है, उसे क्या पता कि
साइकिल तुम्हारी ही है । और अगर पता है भी तो शाम को वापस कर
जाएगी। न देगी तो देखेंगे।"
सुमन ने कोई जवाब नहीं दिया । यूं ही गुमसुम बना रहा । शायद
माधुरी के शाम को भाने की संभावना उसके भी दिमाग में थी।...
"माँ हमें बच्चा ही समझती हैं न सुमन ?" मशोक ने मौन भंग
किया।
"हां," सुमन पूर्ववत् था।
"मगर मैं बच्चा नहीं हूँ।"
"ऍ"
तोखा सूरज || २३
"और तू क्या कहा करता है हर बार ?"
"क्या ?"
"कि माज तक तूने कोई बाजी जीती है विना बेईमानी के ?"
"हाँ, हाँ । कौन सी बाजी जीती है तूने बिना."
"अब जीतूंगा प्यारे । मब जीतूंगा।"
"क्या ? कौन सी बाजी?"
"मन्धे की बेटी!"
"धन्धे की बेटी ?"
"माधुरो।" अशोक ने कहा।
"माधुरी !" सुमन का मुंह खुला का खुला रह गया ।
साली नरेन साइकिल से उतरा तो बुरी तरह हांफ रहा था । साइकिल पकड़े- पकड़े ही उसने गरदन धुमाकर दायों मोर बरामदे में देखा, पूरा का पूरा था। इकलौती बेंच पर कोई सफेद कपड़े पहिने चपरासीनुमा एक मदद मादमी जरूर नजर पाया उसे। वह माश्वस्त हुमा । चलो, मैं सबसे पहले मा गया । अब मुझे ज्यादा समय मिलेगा तो जरूर लोगों को इम्प्रेस कर सूंगा । हो सकता है, और किसी को बुलाया हो न हो। अगर ऐसा है तब तो यह नौकरी उसको हो ही गई। सोचते-सोचते वह थोड़ा खुश हो गया। साइकिल को जल्दी-जल्दी लाक करके वह मागे बरामदे की ओर लपका । मापे पर लुढ़क भाए बालों को सीधे हाय की उंगलियों से पीछे मटकारने के बाद वह बेंच पर बैठे व्यक्ति तक पहुंच गया ।
तीमा सूरज || २५ "ए माई, इपर कोई इस्टरव्यू-विन्टरप्यू." "इण्टरव्यू देने माने पाए हो?" चपरासी की कहकदार मावाज सुन• कर थोड़ा सहम गया नरेन । "हाँ, हो । लेकिन क्या मैं....क्या मोर लोग अभी नहीं पाए ? फित्ते लोग बुलाए गए है ?" कहकर नरेन चुप हो गया । यह देख रहा था कि चपरासी टस से मस नहीं हुमा था, न उसके किसी सवाल का जवाब दे रहा था बल्कि उसे पूर-पूर कर देख रहा था। नरेन को लगा कि यह चपरासी बड़ा बदतमोज मादमी है । अभी भी उसे घूर-पूर कर देखे जा रहा है ! भगर नरेन की जगह कोई सड़की होती तो जरूर मय तक उसकी चप्पलें चपरासी के सर पर चटकना शुरू हो गई होती । नरेन का मुंह गुस्से से भर उठा। लेकिन उसने देखा कि चपरासी का काला चेहरा और ज्यादा काला तथा सख्त होता जा रहा है, तने हुए चमड़े की तरह । मचानक उसका चेहरा ढीला पड़ गया। "इण्टरव्यू हो चुका है साहब, पाप वापस जा सकते हैं।" चपरासी ने उद्घोष किया, जैसे महाभारत में दिन भर का धर्म-युद्ध हो चुका हो पौर अचानक शाम हो गई हो । नरेन को लगा कि वह मभी चूर-चूर होकर वहीं फर्श पर बिखर जाएगा । खड़े रह पाने की ताकत जवाब दे गई लगी। "क्या ?....क्या ? इण्टरव्यू हो गया? कब ?" कहते हुए नरेन भी उसी चपरासी की बगल में बैठ गया। चपरासी ने मुंह बिचकाकर उसे एक बार फिर देखा और, थोड़ा परे सरक गया, मुंह फेर कर । नरेन को हेफनी सी छुट गई फिर । रूमाल निकाल कर चेहरे मोर गरदन का पसीना पोछा और फिर अपने चेहरे को रुमाल से रगड़ने से उसे कुछ राहत महसूस हुई तो उसने उस पर ध्यान दिया । गर्मो फिर काफी चढ़ गई थी। काफी देर तक वह वहां बैठा रहा और अपने को संयत करने २ २६ || तीखा सूरज कोशिश करता रहा । आखिर वह इतना नर्वस क्यों हो जाता है ? फुस्स- फुस्स । पहले तो इतना कमजोर कभी नहीं था वह । जरा सी बात को लेकर अब इतना परेशान हो जाता है कि उसे कुछ नहीं सूझ रहा था। कुछ भी नहीं, सिवाय इसके कि यह भी पहले कई बार भुगती हुई स्थिति है, कोई नई बात नहीं है । पिछले दो साल से ही"" उसके दिमाग में कुछ बिजली की तरह कौघा और फिर उसके चेहरे फी मुरझाहट अांखों की कोरों से नीचे उतर गई। "क्या लोग अभी अन्दर बैठे है ?" लेकिन उस चपरासी ने जैसे कुछ सुना ही न हो । नरेन ने उसे हाय से हल्के से छुपा मोर बड़े आत्मीय शब्दों में फिर से फुसफुसाया । उस व्यक्ति ने उत्तर में नरेन को सिर्फ पूरा । कोई जवाब नहीं दिया । जेब को टटोला नरेन ने । एक रुपया । माधुरी ने रख दिया था, रास्ते में कुछ लेकर सा लेने के लिए । नरेन की उंगलियां फौरन जेब के अन्दर घुस गई । रुपया निकालते वक्त उसे ऐसा लग रहा था जैसे वह खुद ही अपनी जेब काट रहा हो। नरेन ने फुर्ती से काम लिया। उस व्यक्ति की मुट्ठी में रुपये ने पहुंचते ही चमत्कार सा किया । तुरन्त ही उसके चेहरे का भाव बदल गया। बड़ी हमदर्दी के स्वर में बोला-"क्या नाम बताया आपने? मैं अभी जाकर कहे देता हूँ। मागे राम जाने।" और वह चपरासी अन्दर चला गया। नरेन ने तात्कालिक प्राश्वस्ति के साथ एक गहरी सांस ली, पपने कपड़ों की भोर देखा और उठकर खड़ा हो गया । कमीज का कालर तथा पंट की क्रीज भन्दाजे से ठीक की। शायद काम वन हो जाए। चपरासी वाहर निकल पाया था। चुपचाप उसने नरेन को अन्दर जाने का इशारा किया। नरेन जल्दी से दरवाजे तक पहुंचा। एक बार फिर दयनीय दृष्टि अपने कपड़ों पर डाली और एक गर्म सांस ली उसने । भन्दर प्रविष्ट होने के लिए माझा की प्रतीक्षा यो। पांच मादमी सामने की तीखा सूरज || २७ मेज पर जमे हुए "यस, कम इन ।" तोप का एक गोला दगा हो जैसे । नरेन ने सबको मभिवादन किया और उनके कहने के साथ धन्यवाद देता हुआ कुर्सी पर बैठ गया। "हाँ, तो,"माप एम० ए० फर्स्ट क्लास है, सेकन्ड पोजीशन इन द यूनिवर्सिटी ? अं?" एक महाशय ने उससे इस प्रकार पूछा जैसे उन्हें कुछ शक हो ! होने को तो नरेन जलकर राख हो गया लेकिन चूंकि उसने अब तक तमाम इण्टरव्यू फेस किए थे, इसलिए वह ऐसी सिच्युएशन से निपटना बड़ी अच्छी तरह सीख गया था। कहा कुछ नहीं उसने, सिर्फ फेस एक्स- प्रेशन से ही उनकी बात का समर्थन कर दिया । पाँचों व्यक्ति एक साथ चौके । शायद हड़बड़ा भी गए थे । ऐसे विचित्र एप्लोकांट को तो उन्होंने शायद कल्पना भी न की होगी। मरेन मन ही मन मुस्कुराया । मुस्कुराया ? पंद्रह साल की उम्र से पाला सपना तो पूरा हुमा नहीं और अब शायद पूरा होगा भी नहीं । लगा- तार चार साल तक पूना फिल्म इंस्टीट्यूट से सिलेबस तथा एडमिशन फार्म मगाता रहा था वह, सवको पूरा-पूरा भरा भी, लेकिन पोस्ट किसी को नहीं कर पाया । खैर, उसका यह टैलेन्ट ही काम कर जाए तो खुशी होगी उसे । खुशी होगी, बल्कि बहुत खुशी होगी । उतनी ही खुशी होगी जितनी कि इंस्टीच्यूट से निकलकर किसी फिल्म में अपने हीरो साइन होते वक्त उसे होती। हीरो लेकिन सामने के चेहरों को देखते ही वह फिर से डर गया । उसे अपना सपना फिर टूटता लगा । किसी टूटे हुए शीशे को संवार कर यूं रखे रहना कि फिर से जुड़ जाने का भ्रम हो, उस भ्रम के भी पुनः खण्ड- खण्ड हो जाने की अनुभूति हुई नरेन को । अपना पात्मविश्वास भी ढहता लगा उसे। "खैर जो है सो है" जैसे नरेन ने कोई पक्षम्य अपराध किया हो एम. ए. में फस्र्ट माकर और उस अपराध को तरह देने के एहसान को नरेन २८ || तोखा सूरज ... पर थोपते हुए कहने को मजबूर थे शायद वे सामने वाले सज्जन । "और कुछ भी है पापके पास ?" यह सवाल पिछले दो साल से तोड़ता चला आ रहा है नरेन को । और वह भी कसा जिद्दी है कि हर बार इस प्रश्न के बाद उसका भोला जवाब होता है- "जी, और कुछ ? "मैं समझा नहीं !" 'देख बेटा नरेन, गौर से देख । उन पांचों के चेहरे किस रंग से पुत गए है ? तू उसे पहिचानता है ?' उसने अपने माप से कहा, इतना तो तू जान ही गया है दो साल में "अच्छा, तो पाप यह नहीं समझते!" समझने को कोई बच्चा है नरेन । दिक्कत तो यह है कि वह जरूरत से ज्यादा समझता है । देखा भी नहीं, जाना भी नहीं कि किसने क्या कहा है, उठा और झटपट बाहर पा गया। बाहर वह चपरासी नहीं था। उमस काफी बढ़ गई थी। जोरों से प्यास लगी उसे, जैसे गर्म-गर्म रेत उड़ेल दी गई हो गले में । लेकिन उसने निश्चय किया कि इस फर्म के कम्पाउण्ड का वह पानी भी नहीं पिएगा। दौड़कर साइकिल का ताला खोला । हर बार की तरह इस बार भी उसके हाथ कांप रहे थे, जैसे किसी का खून कर देने के लिए वे हाप बेचैन हो, फड़क रहे हों। उसके मन में माता भी है, इसी वक्त किसी का खून कर दिया जाप, मगर किसका, कोई माकार उसकी पकड़ में नहीं पाता। वह जोर-जोर से चिल्लाकर गाली देना चाहता है, सालो, हरामी के पिल्लो, मैं हूँ ! मैं फर्स्ट क्लास हूँ, फस्ट पलास ! मौर यह मैं अपने पाप हूँ, हैट को मक्खन लगाकर नहीं । मेरी योग्यता.... दिखा दूंगा । नालायको ! मुझसे मांगते हो किसी का वह कुछ नहीं कह पाया, लेकिन उसकी जुबान जैसे तालू से ही विपक कर रह गई। दो साल से वह इन कारनामों में व्यस्त है, बुरी तरह से । अभी भी तोखा सूरज || २९ वह ढीला नहीं पड़ा लेकिन, बाद को चाहे शान्त रहे, तुरन्त तो उसके मन में खलबली मच जाती है । दो साल से देख रहा है वह, माज भी। माफ नहीं कर पाता, टाल नहीं पाता, उसे गुस्सा आ ही जाता है । गुस्सा, जो उसकी नियति में नहीं था । क्यों हो जाता है वह ऐसा ? उसके पास उत्तर नहीं है। पीछे से कैरियर पकड़कर जब किसी ने हिलाया तो उसे होश माया । मोह, साइकिल लिये लिये ही काफी दूर पैदल निकल माया था वह । "मैं तेरा वहीं से पीछा कर रहा हूँ।" पीछे मुड़ते ही एक जानी-पह- चानी मावाज तमाचा मार गई उसे । "हलो, अविनाश ! तुम इधर कैसे ?" मुस्कुराहट को जिस खूबी से मोड़ लेता है नरेन, हरेक के वश का नहीं । "बेटे, तुम वतामो कि भन्दर कैसे घुसे थे?" यूनिवर्सिटी छोड़ देने के बाद तरस गया नरेन अपनी ही भाषा के लिए। बहुत सी चीजों के साथ- साथ वह भी कहीं छूट गई है। "मजे, इधर चला पाया तो चला माया । मन्दर भी चला गया तो क्या हो गया यार, देख ना, वैसे का वैसा ही निकल भाया हूँ बाहर ।' नरेन की इस भाषा में एक जोरदार ठहाका होता था यहाँ भाकर । उसने चाहा कि से लेकिन पता नहीं क्या हो गया उसे । लाफिंग गैस सूंघ लेने पर चेहरा जो रोना-सा हो जाता है, अविनाश ने देखा नरेन भी ठीक उसी तरह हंस रहा है । ठक-ठक । सूखा-सूखा सा सब कुछ । "मजाक मत कर यार", अविनाश गंभीर हो गया था, "सच बोल, फिर इण्टरव्यू का ही चक्कर था न ?" "था तो, मगर मजाक कौन कर रहा है बै?" क्यों हो उठा गरम । भविनाश पर नरेन, दोनों के लिए पहेली। इस पल दोनों एक दूसरे को देख रहे थे, सिर्फ देख रहे थे । जैसे दोनों के वोल खो गए हों और उनकी बाकी दूसरी मुद्राएँ भी चुरा ली गई हों। थोड़ी देर खड़े रहने के बाद दोनों ने अपने-अपने सरों को लगभग एक- ३० ॥ तीखा सूरज साथ भटका दिया। "मजाक!" अविनाश बोला। "मजाक !!" नरेन हंसा । अल्मड पार्क के नजदीक आते-पाते उसकी साइकिल फिर लड़खड़ा गई । उसाँसें लेता मन खुद ही इतना बोझिल था कि साइकिल संभालने का उसे होश ही नही रहा । वह गिर पड़ा था। इस बात पर उसने पहले भी कई बार सोचा था । लोग साइकिल से गिरने पर तुरन्त उठ खड़े होते हैं चाहे वे कितने ही भूखे हों, दुर्बल हों या वोमार हों। पोर उसने पाया कि अभी उसकी फुर्ती भी पूरी तरह से चुक नहीं गई है । ऐसे मौकों पर वह अपने माप पर कतई माश्चर्य नहीं करता। प्यास यब उसे फिर से सता रही थी। बीच में थोड़ी देर को, लगा था यह दब गई है, लेकिन वह अब फिर से उठ खड़ी हुई थी । दूने जोशो- खरोश से। तभी उसे ध्यान माया कि पूरा दिन गुजर चुका है और सूरज का जोर खत्म हो गया है । लाइवेरो जरूर मद तक बन्द हो गई होगी, उसने सोचा, लेकिन वहाँ एक नल है मौर वह वहां कम से कम पानी तो जी भर कर पो सकता है, बिना किसी के टोके हुए। साइकिल की टोह ली, गनीमत है कि अभी कोई डिफेक्ट नहीं माया है, धरना पता नहीं"दूसरे को साइकिल ! वह म्यूजियम की बगल से लाइब्रेरी की ओर रुख करके पार्क में घुसा। उसकी मांखों में इस वक्त तृष्णा थी सिर्फ़ । वितृष्णा सी। हठात् उसकी निगाह दायों मोर के सान पर चली गई। सूना लान मौर उसके बीचों-बीच चार सोड़ी ऊंचा छोटा सा चबूतरा । चौकोर । उसको निगाहें घोरे-धीरे ऊपर उठ रही थीं। पत्थर का एक स्टैण्ड जिस पर पास पौर काई जमी हुई थी।
तोखा सूरज || ३१ और जब पत्थर के अन्तिम सिरे पर निगाह पहुंची तो वह चौंक गया। अब तक यह ऐसा का ऐसा ही है। किसी मूर्ति की स्यापना भभी तक उस पर नहीं हो सको? पिछले दो साल से साइकिल रास्ते से भटक गई थी । लान के चारों ओर तने कांटेदार तारों के बीच मगला पहिया घुस गया था, किसी ढीठ वालक की तरह । वह फिर नर्वस हो गया । हांफने से शुरू करके वह पब्लिक लाइब्रेरी को मोर दौड़ पड़ा। साइकिल पटक कर वह नल से जा लिपटा और टोटी मुंह पड़ा दिया। "भव वे दिन चले गए मित्र, जव मेरे द्वारे एक गाय और एक भैंस बंधी रहती थी, और तुम हंसोगे यार, वपचन में मैं अपनी गाय का बछड़ा हुमा करता था, उसके अपने बछड़े से भी ज्यादा।" पता नहीं नरेन ने कितनी बार यह वात यूनिवसिटी कैपटेरिया में दोस्तों के साथ चाय भौर काफी लेते हुए दुहराई है, "मैंने बचपन में, जहाँ तक मुझे याद है कभी गिलास में दूध नहीं पिया; वस सीधे गए मोर जुट गए।" यह कहते- कहते, सुन-हंस रहे लोगों को हंसी में वह भी शामिल हो जाता था। जोर से हंसते हुए। लेकिन नल छोड़ने के बाद उसे मुस्कुराहट नहीं सूझी। थकान के बाद कोई राहत नहीं मिली थी। पानी या, जाकर पेट में लगा भौर सीधा दिमाग में चढ़ गया। लगा उसका दिमाग गोला हो गया है। उसे ठसा लग गया था और पानी उसकी मांखों तथा नाक में उतर पाया था। परे- शानी के कारण वह वहीं जमीन पर बैठ गया ।
५ अशोक पौर सुमन माज दिन भर में एक बार भी नहीं लड़े । शतरंज के मोहरे भी टोन के डिब्बे में कैद कोई शोक सभा सी कर रहे थे। वे दोनों शतरंज के मरीज थे मोर यह किसी के लिए भी माश्चर्य की ही बात होती कि सुबह चाय पीने के बाद भी कोई चकल्लस नहीं, मौर दोपहर में भी बाहर फड़ नहीं जमा । उन दोनों को एक दूसरी ही बीमारी ने दबोच लिया था। माधुरी को पहले भी कई बार देख चुके थे। कभी कुछ नहीं हुमा था । लेकिन भाज देखकर लगा कि कुछ हुमा है । उनके दिमाग में पया हो गया था, ये खुद महीं जानते थे। दिन भर दोनों मलग-अलग सोचते रहे पर उनकी समझ में माया बुध नहीं।
तोखा सूरज ।। ३३ जैसे दोनों को ही जिन्दगी बदल गई हो, दिन भर दोनों बहुत गंभीर रहे । उदास से । कभी-कभी एक दूसरे को देख लेते । देखकर खीझ माती थी उन्हें । चुप थे और चुप्पी की वजह से उन्हें गुस्सा भी मा रहा था । यह उनकी जिन्दगी का पहला दिन था कि वे एक दूसरे के पास से उठ भी गए । बिना बोले । चुपचाप । और दूसरे ने उसे जाने से रोका नहीं, न ही जाकर सवर ली कि कोई कहाँ चला गया है । दिन भर वे इधर से उधर टहलते रहे, बेचैन से । दरमसल उन्हें अपनी परेशानी की वजह समझ में नहीं आ रही थी। शाम को अशोक की मां ने देखा कि दोनों लड़के छत पर बैठे हैं। चारपाई पर एक दूसरे से पीठ सटाए, मुंह पर हाथ रखे । उन्होंने सोचा शायद दोनों में फिर झगड़ा हो गया है मौर वे फिर एक दूसरे से बहुत नाराज हो गए हैं । आंगन में खड़े-खड़े ही उन्हें पावाज मपना नाम पुकारा जाता सुनकर दोनों चौंके । फिर पलटकर देखा, मांगन में मां खड़ी थीं। अशोक ने सुमन को कोहनी मारी और जल्दी से नसनी पकड़कर नीचे उतरने लगा । मनमना सा बैठा सुमन भी उठा और माहिस्ता-आहिस्ता भशोक के पीछे-पीछे नीचे उतर गया। दोनों के उतरे हुए चेहरे देखकर प्रशोक की मां को कुछ चिन्ता हुई। "वयों रे लड़को, तुम दोनों की तबियत्त ठो ठोक है न ?” कहते हुए उन्होंने सुमन और अशोक के माथे और बालों पर बारी-बीरे से हाथ रखा। फिर दोनों के हाथ पकड़े, सब कुछ सामान्य था । "कुछ नहीं मां, हम लोग बिल्कुल ठीक हैं। क्या हुआ है हमें ?" अशोक ने मां को देखा और फिर सुमन को मोर देखा। फिर वह खिलखिला पड़ा । सुमन भी हंसा । "लो, तुम दोनों ने तो मुझे हैरान हो कर दिपा ।" भशोक की मां उन्हें हंसता देखकर आश्वस्त हुई । फिर, “मरे शाम हो गई, भाज तुम लोग बगीचे में नहीं गए ? माज मखाड़ा नहीं होगा क्या?" 4 ३४॥ सोसा सूरज पशोक मोर सुमन ने एक दूसरे को फिर देसा। फिर ये धीरे-धीरे दरवाजे से बाहर हो गए। पाएं मोर की गली से मुड़कर वे पर ये पिध- वाहे पहुंच गए और यहाँ से सीधे बगीचे को मोर हो लिए। यह बगीचा पशोक के वाया ने पाला पा, अपना जो जान लगाकर । ये इस बगीचे को प्यार भी बहुत करते थे, उतना ही जितना कि नन्हें से पोते अशोक को। प्रशोक को भव अपने वाया की शकल तो याद नहीं लेकिन यह बगीचे में यनी यावा की समाधि पर रोजाना माया जरूर टेकता है, क्षक्षा से । गर्मी की छुट्टियों में जव सुमन भी यहीं या जाता है तो मजे से कटती है इसी बगीचे में । दोनों ने व्यायाम के निमित एक प्रसाड़ा भो सोद रखा है, बाबा की समाधि के बगल में। समाधि पर पहुँच कर दोनों रुक गए । अशोक ने अपना सर मुकाया और सुमन ने हाथ जोड़े । लेकिन दोनों को मुद्राएं रोज से कुछ भिन्न यी और वे अपेक्षाकृत कुछ अधिक ही देर तक सड़े रहे । इसके बाद अशोक ने मपने कपड़े उतारे और अखाड़े में कूद पड़ा। उसने सुमन को भी पुकारा लेकिन सुमन ने सर हिला कर मना कर दिया। अशोक थोड़ी देर के लिए चौंका, "क्यों ?" "ऐसे ही, मन नहीं है माज । तुम्ही करो।" प्रशोक कुछ देर संदिग्ध निगाहों से सुमन को घूरता रहा । फिर भपने काम में जुट गया, "ठीक है।" सुमन काफी देर तक वही बैठा-ठा सोचता रहा फिर यकायक वह उठ खड़ा हुा । उसे लगा कि उसका सर काफी भारी हो गया है भौर दर्द की लहरें उसके पूरे शरीर में झनझना रही है । तेज-तेज कदमों से चलकर वह याग के किनारे तक भा गया । सामने ही पेड़ों का झुरमुट या मोर उस पार को कोई चीज इधर नजर नहीं मा रही थी । उसने चारों ओर देखा, शाम का धुंधलका उतर भाया था। इधर या भी नहीं कोई। उसने जल्दी से अपना दायाँ हाय भण्डरवियर के मन्दर डाल लिया ।
सामने सरिता मा खड़ी होगी, यह उसे पता नहीं था, वरना हो सकता या नरेन इधर न पाता । यह सब भी अकस्मात् ही हुआ था। नरेन वैसे भी इधर कभी नहीं पाता पिछले दो साल से। वह तो, मल्फ ड पार्क में घुस हो पाया था मौर शाम भी हो गई थी। पर जाने की तबियत बिल्कुल नहीं थी और कोई दूसरी जगह भी उसके दिमाग में चढ़ नहीं रही थी, जहाँ बैठकर वह थोड़ा बहुत हल्का हो लेता । मसल में तो वह बैठना भर चाहता था। कहीं भी, किसी भी एकान्त स्थल में । और इसीलिए वह इघर चला माया था, तोपों के मुहाने के सामने से होकर, इघर, जहाँ संगमरमर का' उसने कभी भी यह नहीं सोचा था कि सरिता जब भी कम्पनी बाग ३६ || तोखा सूरज घूमने पाती होगी तो अब भी वह इधर आती होगी। पहले वे दोनों""" शाक तो लगा था नरेन को और चाहा भी था उसने कि वह सरिता को न पहिचाने, देखकर भी अदेखा कर दे। लेकिन शायद उसी वक्त सरिता ने भी उसे देख लिया था और नरेन के इस हाल में होने के बावजूद भी शायद उसे उसने पहिचान भी लिया था। उसने महसूस किया था कि सरिता को देखकर ग्राज भी वह कुछ बदल गया है, हमेशा की तरह । तभी सरिता ने दूसरी ओर को मुंह किए पास खड़े व्यक्ति की ओर उन्मुख होकर कुछ कहा और नरेन को होश ने झटक दिया । उसका चेहरा तमतमा प्राया। साइकिल को पास ही में खड़ा कर, कुछ दूरी पर सरिता की मोर पीठ करके घास पर धप से बैठ गया नरेन । उसके मन में सरिता के प्रति घोर वितृष्णा और जहरीली नफरत भाग पैदा कर रही थी । उसे लगा कि वह इस माग से मुकाबिला नहीं कर पाएगा, उसे दबा न पाएगा । और यह माग दबी नहीं तो लेकिन उसके प्रयल बेकार जा रहे थे और वह बेतरह छटपटा रहा था। जब भी कभी सरिता की याद मा जाती है, ऐसा ही कुछ हमेशा उसके साथ होने लगता है । यह वह अच्छी तरह से जानता है और इसीलिए वह बेकार होते हुए भी तमाम ऊटपटांग कामों में अपने आपको व्यस्त रखता है, भूले से भी कभी सरिता का स्मरण नहीं करता । कभी-कभी जब सरिता को याद उसके मन में सोने से पहले तक फिर जाती है तो वह उसे बल- पूर्वक दबा जाता है, इतना शक्तिशाली है वह । लेकिन जब सरिता खुद ही सामने पड़ जाए तो उसके लिए कुछ भी कर पाना नामुमकिन हो जाता है। यह बहुत कमजोर हो जाता है, बहुत कमजोर । दो साल पहले होगी सरिता हो । उसके पीछे, इतनी सधी चाल सरिता की ही हो सकती है। हो सकता है वह उसी के पास तक मा रही हो, लेकिन नरेल ने पीछे मुड़कर देना नहीं । सरिता के कदमों की मोर पास माती तेज-तेज पाप उसके दिल के करीब से गुजर रही थी। मरेन ने अपने मापको फिर ।
तोखा सूरज || ३७ से कमजोर होते हुए महसूस किया । लेकिन वह कभी कमजोर नहीं होगा । अब वह सरिता को लेकर कभी कुछ महसूस नहीं करेगा। आज वह सरिता से साफ़-साफ़ कह देगा । हमेशा के लिए वह अव सव झंझट खत्म कर देगा। हार ही सही, लेकिन दो साल से चल रहे इस संघर्ष से मुक्ति पा जाएगा वह् । नरेन ने अपने समूचे पात्म- विश्वास को इकट्ठा करने की कोशिश की। लेकिन"लेकिन... सरिता ठीक उसके पीछे खड़ी हो गई थी। पता नहीं उसके चेहरे पर क्या भाव थे लेकिन वह चुप थी, पिछली कई बार की तरह । शानदार चुप्पी को धनी है सरिता। यह चुप्पी ही नरेन के प्रात्मविश्वास को खा गई। हमेशा की तरह । उसकी प्रात्मदृढ़ता थोड़ी ही देर में पिघल गई। "कसे हो ?" शायद मब तक सरिता संभल गई थी, पीछे खड़े-खड़े हो । नरेन ने पीछे मुड़कर नहीं देखा था, हो सकता है सरिता को यह बहुत ज्यादा खल गया हो। जिद्दी तो वह भी कम नहीं है न । मगर सरिता कुछ कम जिद्दी ही होती तो क्या नरेन को आज यह दिन देखना पड़ता। दो साल पहले खैर, जब सरिता संयत होकर उसके पीछे खड़े-खड़े इतनी देर के 'बाद, बजाय लौट जाने के अगर उससे बोल सकती है तो नरेन भी निरा गवार नहीं । वह अब तेजी से पीछे पलट गया था। चाहता था कि कोई तीखा सा जवाब सरिता को थमा दे ताकि वह वहां से चली जाए । चली जाए और फिर कभी भी न आए। कम से कम चैन से 'बैठ' तो सकेगा वहा मांखें मिल गई थीं। काफी देर तक वे यूं ही बने रहे । काफी ठन्डी थों इस बार उनकी निगाहें । नरेन को याद पाया कि क्लास में निगाहों की जो जवरदस्त मुठभेड़ हुई थी, निश्चित ही काफी गर्म थी । सोचते ही उसकी मांखों का भाव भीग गया । शायद सरिता को भी वह दिन याद ३८ || तोखा सूरज मा गया था। आँखों का रंग बदल गया 1 नजरें भी नरेन की पांखों पर से हटाकर माथे के वीचों-बीच नाक की जड़ पर जमा दो उसने । बड़ी कुशलता से अपने आपको सँभालती हुई फिर से चहकी, "कैसे हो?" नरेन को उसका चहकना कुछ खास बुरा नहीं लगा इस बार । लेकिन बोला फिर भी कुछ नहीं । उसे हिप्नोटिज्म नहीं भातो लेकिन तब भी वह सरिता के चेहरे को ही देख रहा था, निर्विकार सा । उसे लग रहा था कि ऐसी हालत में वह इससे ज्यादा कुछ कर भी नहीं पाएगा। कोई कहाँ तक बोर नहीं होगा? बड़ा सा चेहरा सरिता का, और खीम की छोटी-छोटी लकीरें, छिप तो सकती नहीं । और नरेन फिर पगला गया। "हाँ, हाँ ! हाँ, हाँ ! !" मुंह से बोल फूटा तो । लेकिन उसके इस अजीव पागलपन से सरिता को हैरानी जरूर हुई। "नरेन !" सरिता बिल्कुल सामान्य थी। कोई और लड़की इस जगह चौंक सकती थी। "आप हिन्दी में गोल्ड मेडलिस्ट हैं तो प्रापसे यह उम्मीद तो थी कि प्राप मेरे नाम का उच्चारण बिल्कुल सही करेंगी । मापने बिल्कुल दुरुस्त फरमाया, नरेन !" पता नहीं नरेन यह सब कैसे बोल पास बोलने के लिए तत्काल कुछ था भी नहीं । सरिता के बारे में सोच- सोच कर अपने अन्तर की पीर बढ़ाने से अपने पापको हमेशा रोकता रहा था। और अब मगर उसके पास सरिता से बात करने के लिए फिनिश्ड प्रॉडक्ट की तरह तैयार बातों का सिलसिला नहीं था तो उसे यह अभाव खटकना स्वाभाविक भी था। ऐसे में वह कुछ भी बोलता, लापर- वाही से, सरिता उससे हैरान हो, चौके या न चौंके, कुछ ज्यादा महत्व दे उसे या न दे, समझे या न समझे, नरेन को इससे क्या फर्क पड़ना था ? जो कुछ भी होना था सो तो हो ही गया । इससे ज्यादा और कुछ हो भी नहीं सकता। मौर अगर मौर कुछ होने की गुंजाइश हो भी तो वहीं नरेन अपनी दिमागी विकृति के अलावा मोर पा ही क्या सकता है । जितना है, गया, लेकिन उसके तीखा सूरज || ३६ उससे ज्यादा सहिष्णु वह उस हालत ही में हो सकता है। नरैन को अपने अन्दर कुछ कुलबुलाता और कुछ उमड़ता-घुमड़ता लगा । लगा कि सिर मन्नाकर किरचों में बिखर जाना चाहता है, सरिता के चारों ओर । उसे मस्तिष्क में कुछ तनाव महसूस हुआ, लगा कि अब उसके सोचने की प्रक्रिया यकायक शिथिल हो गई है । तत्काल ही कोई निर्णय न ले पाने की हद से ज्यादा शिथिल । यंत्रवत् उसका दायां हाथ पतलून को जेब के अन्दर चला गया। जैसे 'तंद्रा को हालत में उसने एक सिगरेट निकालो और होठों में भींच ली । फक से दियासलाई की तीली जली और सरिता को महसूस हुमा जैसे नरेन ने तीली की लौ उसकी तर्जनी से छुमा दी हो। दो साल पहले तक यह उंगली इसो कम्पनी बाग में कभी-कभी नरेन के होठों के बीच होती थी। लेकिन इस बार नरेन के मुंह में विल्स फ्लैक थी और तीली की लो उसे सुलगा रही थी। सरिता को लगा कि एक लो उसकी उँगली के सहारे उसके भीतर अभी-अभी उतर गई है और उसका मन धीरे-धीरे सुलगना शुरू हो गया जैसे वह फेम में जड़ी कोई पेन्टिग हो । माईन पेंटिंग । कैनवास पर चिपके हुए रंगों का बेतरतीव कम्पोजीशन । जिसका कुछ मतलब पेन्टर को समझ में होता हो तो होता हो, खुद पेन्टिंग की समझ में कुछ नहीं । सरिता खड़ी-सड़ी सिर्फ देखती रही। मन में भाया भी कि नरेन की सिगरेट छोन कर फेंक दे लेकिन हिम्मत नहीं पड़ी । चीखकर कहना चाहती थी, लेकिन होले से भी मना न कर सकी । बस एक मजीय सी हालत में वहां खड़ी रही । अजीब सी हालत में। पहला फश ही बड़ी बेताबी से लंबा खींच दिया नरेन ने। पोर तब उसे लगा कि अब उसे कुछ राहत है और उम्मीद है कि वह तत्काल हो ढेर नहीं हो जाएगा; कुछ पल मौर जी सकेगा, किसी भी स्थिति का सामना करते हए।
. गया, नरेन ने सिगरेट की राख झाड़ी तो सरिता को लगा जैसे वह स्वयं अस्तित्वहीन होकर नरेन की बगल में गिर पड़ी है; सिगरेट की राख का नन्हा सा टीला होकर । उससे न रहा गया तब । "नरेन !" जैसे यह नाम बहुत ज्यादा लंबा हो गया हो और इस नाम को लेने भर में सरिता को सम्पूर्ण ऊर्जा चुक गई हो। चेहरा थोड़ा खिच और गले की नसें नीली पड गई। "यह सिगरेट"तुम कर क्या रहे हो?" नरेन इस बार मुस्कुरा दिया । “हुँह, विशुद्ध हिन्दी में, धूम्रपान ।" नरेन ने शायद चिढ़ाने के लिए ही कहा हो, सरिता थोड़ा मौर चिढ़ गई। उसे लग रहा था जैसे कोई चीज उसके गले में अन्दर से फंसती जा रही है और उसका स्वर उसके अन्दर ही कैद हुमा जा रहा है । बोलना चाहती है लेकिन मुंह से आवाज निकालने में उसे काफी तकलीफ महसूस हो रही है। "यह तुम पुरुषों को चीज है, लेकिन जानते हो कितनी खतर- नाक है ?" "और कितनी जहरीली है और कितनी माग लगाती है, वगैरह-वगैरह। यही कहना चाह रही हो न ?" नरेन ने सरिता को व्यंग्यपूर्ण कुटिल दृष्टि जैसे कभी-कभी कोई नौकर अपने मालिक को कोई खास गलती सप्रमाण पकड़ ले, दृष्टि को कठोरता मोर निरीहता दोनों मामने. सामने थीं। "जो माग तुमने दी है वह क्या कम खतरनाक है सरिता? शायद उससे ज्यादा खतरनाक कुछ भी नहीं होगा मेरे लिए । मेरा उसी माग में जला जा रहा है। बड़े-बड़े फफोले पड़ गए है सरिता उस पर, लेकिन उस माग की तपिश ममी भी कम नहीं हुई है । यह माग गर कम न होगी तो सरिता मुझे भी मालूम नहीं मेरा क्या होगा । मन्दर माग है, यह पुमा भी मन्दर जा रहा है । थोड़ी देर को कुछ फर्क पड़ जाता है, ताका, व्यक्तित्व -- . तीखा सूरज ॥ ४१ * मैं अपने आप से बच जाता हूँ और फिर से मरने के लिए जिन्दा रह जाता 1 हूँ।""""दो साल के बाद आज पहली बार नरेन का मुंह खुला था और यह उसकी पुरानी पादत है, जब उसका मुंह खुल जाता है तो वह शराबियों की तरह बड़ा लंबा-लंबा बोले ही चला जाता है, बिना बहके हुए भौर उसे कोई टोक भी नहीं पाता। सरिता ने पहले भी कई बार कोशिश की थी, ऐसे मौकों पर वह नरेन का मुंह पकड़ सके लेकिन हर बार उसे निराश । होना पड़ा था । उसका लंबा-लंबा बोलते चला जाना, भावुकों की तरह और बाद में यह कह देना कि मैं भावुक नहीं है, सरिता को कभी भी अच्छा नहीं लगा था। दो साल पहले के बाद से तो हालात और टसं दोनों के काफी बदल गए हैं, फिर भी सरिता ने इतना सब ही बर्दाश्त कर लिया, सरिता ही को भाश्चर्य हुआ। लेकिन जैसे ही उसे ज्यादा लगने लगा वह शिष्टाचार भुला बैठो; नरेन को रुकना पड़ा। सरिता को तेज भावाज सुनकर दूर खड़ा उसका साथी चौंक पड़ा। घबड़ाता हुमा दोड़ा चला भाया । "क्या हुमा, सरिता, क्या हुमा ?" लेकिन सरिता मभी भी तनी हुई खड़ी थी, गुस्से से फुफकारती हुई । नरेन को लग रहा था जैसे सरिता ने एक दंश और मार दिया हो उसे । चुपचाप मुंह लटकाकर बैठा था वह, बैठा रहा । जव सरिता को खुद ही होश माया तो वह संयत हो गई, बल्कि कुछ विनम्न भी हो गई । हंसी भी । "कुछ नहीं, कुछ नहीं । ये मेरे पुराने मित्र हैं, मि० नरेन । छोटी- Tोटी झड़प हो जाना न इनके लिए कोई खास मतलब रखता है और न मेरे लिए ।"और हां नरेन । ये हैं प्रो. मितल । तुम्हारे जमाने में नहीं थे। तुम जानते ही हो मुझे तो लैक्चरर होना नहीं था, वाइ द वे, ये साहब कलकत्ता यूनिवसिटी टाप करके माए थे उन्हीं दिनों, पापा ने मेरी जगह इन्हें दे दो।" नरेन को उठते हुए लगा जैसे वह सर से लेकर पैर तक बीच में ३ ४२ || तीखा सूरज जगह से टूट गया है । चटख गया है । लेकिन वह उठा । उठा मौर अपना मायूस हाथ प्रो० मित्तल की ओर बढ़ा दिया। जब्त किया और जोर से जब्त किया अपने को । तब कहीं जाकर उसके मुंह से ये शब्द कांपते हुए निकले । "कांग्रेचूलेशन प्रो० मित्तल । और हो.सरिता । पापा ने इन्हें, तुम्हारी नहीं मेरी जगह दी होगी। तुम्हें भी कांग्रेचुलेशन ।" नरेन को लगा माज कांग्रेचुलेशन देने के बाद कोई एक बोझ उसके दिमाग पर से खिसक कर दिल पर जम गया है। पता नहीं, उसे फिर पया जुनून सा चढ़ पाया और पता नहीं इतनी द्रोही शक्ति उसके मन्दर फहां से आ गई कि वह अपनी साइकिल उठाकर फौरन भाग निकला वहाँ से, जैसे कोई जंगली भैसा.रेद रहा हो उसे । सरिता और मित्तल दोनों उसे देखते रहे, पागलों की तरह का जो था उसका व्यवहार । सरिता ने उसे जोर की भावाज लगा दी। जैसे कोई भूली बात पुनः याद आ गई हो; नरेन रुक गया था। सरिता उसके पास पहुंच गई। नरेन की यह मुद्रा देख सरिता..विचित्र तरीके से चीक पड़ी। उदासी का इतना वृहत् साम्राज्य 'उसने एक नजर में कभी नहीं देखा मा। थोड़ी देर वह कांपती खड़ी रही और उसके बाद उसके मुंह से जो शब्द निकले, वे मरेन की समझ में नहीं पाए, "देवदास मत बनो नरेन !" सरिता लौट गई थी।
"मवे भो देवदास की प्रोलाद ! अब उठेगा भी या नहीं ?" सुभाष ने रज्जन के कंधे पर माहिस्ता से अपना हाथ रख दिया, "कुछ कल के लिए भी छोड़ । सब प्राज ही पी जाएगा क्या?" बड़े प्यार से उसने रज्जन के हाथ में थमा हुमा गिलास भपने हाथ में ले लिया । "एक तो बेटा तुम नए हो । अन्धाधुन्ध नहीं झेल पामोगे।" कहकर सुभाष ने हाथ में पकड़ा गिलास खाली कर दिया। खाली गिलास रज्जन के सामने लुड़का दिया और खुद भी उसकी बगल में बैठ गया। रजन उस लुढ़कते गिलास को देखता रहा, स्थिर निगाह से। . "रज्जन बेटा,.." सुभाप कुछ कहना चाहता था लेकिन तभी रज्जन उसकी भोर घूम गया। उसकी मांखों से छलकती उदासी देख वह एक ४४ | तोसा सूरज गया । यड़ा निरीह होकर रज्जन उसे देख रहा था, मानो जिन्दगी में उसे पहली बार देस रहा हो। या फिर वह इतना धीमार हो कि सामने वाले चेहरे को पहिवान पाना मुश्किल हो गया हो उसके लिए । सुभाष चुप हो गया और नीचे जमीन की मोर देखने लगा । रज्जन ने भी अपनी गरदन फिर लटका ली। काफी देर बाद सुभाष ने अपना चेहरा ऊपर उठाया, "रज्जन, एक बात कहूँ ?" रज्जन ने भी अपना चेहरा पर उठा लिया । असहाय सूनेपन को समेटे वह बैठा रहा वहीं, कुछ भी नहीं बोला। सुभाष के तई उसमें कोई उछाह नहीं था। "मैं नहीं जानता था रे, कि यार तू भी इस छोटी सी यात पर मयखाने में बसेरा ले लेगा। मरे भई, किसके घर में खटपट नहीं होती? माज हम सब की हालत ही ऐसी हो गई है कि हम अपनी बीवियों तक से बिना लड़े नहीं रह सकते । बल्कि जब हम किसी भौर से नहीं लड़ पाते तो घर जाकर घरवाली से जरूर लड़ते हैं । इस जिन्दगी में सिवा लडाई के कुछ और भी रक्खा है क्या ? कौन साला चैन से मरता है प्राजकन ? हर जगह चिल्ल-पों चिल्ल-पौं है । घर में, बाहर । सबके बाहर और सब के भीतर । वह क्षण बड़ा क्रान्तिकारी रहा होगा मित्र, जिस दिन हम सब की नियति ही कुछ भौर हो गई मौर हम सब लोगों को किसी ने भाग में तड़पने को झोंक दिया । हम सब इस भाग में किलविला सकते हैं सिर्फ, जलकर मरने का सौभाग्य भी नहीं है हमारा । ये सब सुविधाएं उन लोगों को मिली है जिन्हें मरना नहीं पाता और जीने का भी अधिकार नहीं है जिन्हें । वे ही हमसे अलग है । हमें तो कहीं मुक्ति नहीं है, लेकिन मुक्ति के लिए हमें संघर्ष करना ही पड़ेगा, जानते हुए भी कुछ हासिल नहीं होगा हमें । संघर्ष । संघर्ष, जब तक हमारा पुरुषार्थ भी मर नहीं जाता।..." "वस करो सुभाष ! तुम्हें पता है मुझे उपदेश मोर भाषण दोनों से ही सस्त चिढ़ है । तुम तो हो शुरू से ही कमभक्ल, मेरी परेशानी तुम्हारी समझ में नहीं पाएगी।" कहकर रज्जन ने अपना सिर झुका लिया। जैसे - तीखा सूरज || ४५ - . कोई बड़ी पीड़ा दुहरी हो गई हो। सुभाष को चढ़ गई थी लेकिन इतनी नहीं कि कुछ भी फील न करे रज्जन का ऐसा बोलना उसे इस वक्त काफी बुरा लगा हालांकि कोई नई बात नहीं थी। जब वे दोनों ए० डी० एस० में साथ ही साथ थे तब भी रज्जन यू ही सुभाष को झिड़क देता था। सुभाष ने एक खाली चूंट मन्दर गटका और फिर जमीन पर लोटते खाली गिलास को उठाकर मन्दर चला गया। लौटा, तव भी रज्जन उसी तरह बैठा था और सुभाष के हाथ का गिलास भरा हुआ था, लबालब । "हद हो गई यार, अभी तक वैसे ही बैठा है ? मच्छा ले भई, तू पी। ले।" पौर सुभाष ने वह गिलास रज्जन के आगे कर दिया। रज्जन ने सिर उठाकर सुभाष को देखा । फिर अपनी मांखों के सामने का भरा हुआ गिलास देखा लेकिन निश्चेष्ट बैठा रहा । "लो यार, पियो । इस मयखाने में आकर कोई इनकार नहीं करता, जिसे एतराज होता है वह यहाँ तक कभी नहीं मा पाता।" "जिसे एतराज होता है, वह यहाँ तक कभी नहीं मा पाता।" वाकई । जब तक उसे एतराज था इस कमौनी चीज से, वह कभी इधर मा पाया ? लेकिन जब उसने कमीनेपन के कई और वीभत्स रूप देखे तो यह चीज बुरी नहीं रही और वह यहां प्रा गया । रज्जन ने सोचा और फिर उसने भरे गिलास को सुभाष के हाथों में से झपट लिया, तेजी से । कुछ शराब बाहर छलक कर गिर गई थी, मिट्टी में, और मिट्टी के रंग में जब हो गई थी । देखकर सुभाप हल्के-हल्के मुस्कुरा दिया । एक सांस में ही नन ने गिलास खाली कर दिया पोर तब सुभाष उसके पास बैठ गया। "इतना दुःख नहीं करते रज्जन । कोई खास बड़ी बात नहीं है, वह जरूर लोट पाएगी।" "सुभाष !" रज्जन जोर से चीखा लेकिन फिर वह रुक गया।'
४६ | तीसा मूरज कि मागे कुछ भी कहने के लिए उसे अपनी पूरी शक्ति टटोसनी पड़ेगी। "यह कभी नहीं भाएगो सुभाष । मय वह कभी नहीं लौटेगी।" "नहीं रज्जन, अभी तुम्हें भादमी को मुसीयतों का पता नहीं है । उसका इस दुनियां में तुम्हारे सिया पौर है हो कौन ? यह जरूर लौटकर माएगी । तुम्हारे ही पास माएगी । मोर तय..." "नहीं सुभाष नहीं, पब वह नहीं पाएगी। नहीं पाएगी । पौर भगर मा गई तो "तो"तब मैं उसका गला दवा दूंगा।" रज्जन का मुंह पसीने से भर गया था और उसकी सांस भी बहुत तेज-तेज चल रही थी। "अरे यार, यूको गुस्सा । लानत भेजो सुसरी पर । न माए । भ""खत्म हो गई ? प्रच्छा रुको, मोर ले माता हूँ।" कहकर सुभाष उठने लगा तो रज्जन ने उसे पकड़ कर विठा लिया । "नहीं सुभाष ! तू यहीं बैठ । बहुत हो गया । और फिर "मेरे पास पौर पैसे भी नहीं है ।" रज्जन ने अपनी जेब टटोलो। सुभाष ने उसे भिटक दिया। "वा यार ! पहले ही दिन पैसों को फिक्र करने लगा ? मां पार, यहाँ कोई फिक्र नहीं चलती। माज तू मेरी पोर से पिएगा। एक गिलास मौर"और पिएगा।" मौर वह जबरदस्ती वहाँ से उठ गया । रज्जन वहीं बैठा रहा । सुस्ती की ताम-झाम लपेटे । .
८
घर में घुसते ही उसे टहोका मिला।
"मुन्ना है क्या ?" चारपाई पर पड़े हुए उसके वृद्ध पिता ही थे जो
अब कुछ भी नहीं देख पाते, पिछले दो साल से । नरेन पल भर को ठिठक
गया । माज घर वह जल्दी लौट भाया था। भव बाहर भी वक्त गुजारने
कुछ बनता-बिगड़ता नहीं । सोचा, पिताजी के पास रुके विना ही सीढ़ियां
च जाए। होगा भी क्या, वही पुराने सबाल । मोर वही खीझ भरे जवाद ।
लेकिन कुछ सोचकर वह वहीं रुका रहा ।
"हो, पिताजी", वह वुदबुदाया ।
"बड़ी देर में बोला तू, क्या बात है?"
"कुछ नहीं पिताजी, क्या बोलू?"
४८ || तीखा सूरज "बोलोगे क्या, कोई खास बात तो हुई नही। फिर लौटे हो, कोरे। रोज की तरह । मेरी समझ में नहीं पाता कि दुनिया में तुम्हारे लायक कोई नौकरी नहीं है, या तुम ही किसी नौकरी के लायक नहीं हो ?...." उसने पिता को बीच में हो टोक दिया। "दोनों में से एक भी बात नहीं है पिता जी । मन रखने के लिए माप जो चाहें समझ लीजिए। मैं सिर्फ इतना ही कह सकता हूँ कि मुझे अभी सक नौकरी नहीं मिली।" कहते-कहते वह दांत पीसने लगा, "नौकरी सड़क पर तो पड़ी है नहीं"।" वह सीढ़ियां चढ़ने लगा था और अपने अन्धे बाप की पीछा करती आवाज को उसने जीने से नीचे धकेल दिया था। छत पर पहुंच कर उसने अपना कमरा खोला और धड़ से अन्दर घुस गया। उसे लगा कि हर जगह से ज्यादा सुरक्षित एक यही ठाव है। उसका यह कमरा उसको हर मुद्रा का सहभागी है। शाम का धुंधलका छा गया था। टटोल कर चारपाई ढूंढी मरेन ने मौर विना बत्ती जलाए वह चुपचाप बैठ गया। एक गहरी लम्बी सांस ली। तभी उसने जीने पर किसी के चढ़कर माने की मावाज' सुनी । मब उठकर उसने बत्ती जला दी । डरने से क्या फायदा ? वह अच्छी तरह देख चुका है कि अंधेरा प्रश्नों की बौछार को तीव्रता को कम नहीं करता बल्कि उसे भौर पैना कर देता है और वे सब के सब प्रश्न मन्दर तक समूचे.धंस जाते हैं । मधेरा ज्यादा विकल कर देता है । वह दरवाजे की ही भोर देख रहा था। मां थीं। वे मन्दर मा गई थीं। नरेन उन्हें इत्मीनान से चारपाई पर बैठते देखता रहा । काश उसने हमेशा मां को इत्मीनान ही से चारपाई पर बैठे हुए देखा होता । सर। मां बैठ गई। भाश्वस्त हो गई। "बेटा, तुम्हारे पिताजी ने तुम्हें कुछ कह तो नहीं दिया ? तुम एकदम ऊपर चले पाए । नरेन सोच रहा था कि काश वह वाकई एकदम ऊपर चला जाता । .
तीखा सूरज || ४६ 'लेकिन भाज मां की वाणी रोज से कुछ ज्यादा ही मिठास लिए हुए है, उसने मार्क किया। . "नहीं मां, क्या कहेंगे वे? काफी कुछ तो मैं इसलिए परेशान हूँ कि तुम सब लोगों को मैं बेकार ही में परेशान किए हुए हूँ। मां, मैं एक पल को भी नहीं भूलता कि मैं बेकार रहकर घर पर एक बहुत बड़ा बोझ हूँ; लेकिन मैं मैं....", नरेन मां के सामने ही रुमासा हो गया। "अरे नहीं है। ऐसे थोड़े ही कहते हैं भैया। तेरे पिता जी एक तो काफी बूढ़े हो गए हैं, उस पर जब से उनको माँखें गई हैं, स्वभाव कुछ चिड़चिड़ा हो गया है। लेकिन इस सब के लिए मैं तो हूँ। तुझे अगर कुछ कह दिया हो, तो तू दुरा न मान । इस उम्र में तो सच पूछो बेटा हम दोनों ही सठिया गये हैं। फिर भी, तू तो जानता ही है कि तेरे पिताजी ज्यादा गुस्से क्यों होते हैं ? घर का खर्चा बड़े भइया के जिम्मे है, वह सब करता भी है लेकिन क्या इतने से घर और बूढ़े मां-बाप सुखी रह सकते हैं ? तेरे पिता जी को भी सबसे ज्यादा भरोसा तुझी पर रहा है। अब भी है। सच यता, अगर बड़े की जगह तू होता तो क्या तू भी ऐसे ही करता ?""नहीं न । बस इसी से ज्यादा दुःख उन्हें है कि तू अभी तक कहीं हिल्ले से नहीं लगा। अरे, हम लोगों को क्या फिकर कम है ? हमें भी क्या जूते खाने ही का शौक है ? अब देख तो, घर का पूरा काम माधुरी करती है भोर बहूरानी हैं सो इस वखत भी पता नहीं किस सहेली के साथ गई है सपाटा करने । पाते ही खौखियाना शुरू कर देगी। अरे, मेरी वच्ची क्या इसी तरह पिसने को है ?..." कहते-कहते मां का गला भर माया । नरेन चुपचाप बैठा सुनता रहा। यकायक पूछ बैठा, "मधु कहाँ है, माँ क्या कर रही है ? उसे बुलाना तो।" मां की आंखों में आंसू मा गए थे। मांचल से पोंछते हुए बोली, "अरे हो, मैं तो भूल हो गई थी। देखो मेरी याद को भी क्या हुआ है । रसोई में ही होगी अभी बुलाती हूँ।" मां कमरे के बाहर छज्जे पर चली गई यौं । थोड़ा मांगन में मुकते हुए उन्होंने मावाज सगाई, "माधुरी ।"जरा
५० || तीखा सूरज
ऊपर माना।" कहकर मो फिर मन्दर मा गई यौं। पोड़ी देर में माधुरी
कपर मा गई।
बेटी, बेटे के बीच बैंठी मां के चेहरे पर मय विपाद को एक भी रेखा
नहीं थी।
"क्यों बेटी, रतन मा गया?"
"नहीं मां । भैया तो सुबह हो कहकर गए थे, रात को दस से पहले
नहीं पाएंगे।"
"मच्छा, अच्छा, और बहू ?" । इस बार माधुरी थोड़ा नाराज
हो गई लगी । वात का सीधा जवाय नहीं दिया।
"याज कौन सी तारीख है, मो?"
"तीन, क्यों?"
"अाज पिता जी की पेंशन मिली थी ?" मा माधुरी की जिरहबाजी
से घबरा सी गई।
"मिली थी न?" माधुरो ने जोर दिया ।
"हो । मगर तू यह सब""यह सब क्यों कह रही है ?"
"भैया को सुना रही हूँ ताकि उन्हें भी पता रहे ।"
"माधुरी !"
"कहने दो मां । कह लेने दो। तुम मुझे कभी कुछ नहीं कहने देतीं।"
"उसे मत डाँटो भी।" अब तक धुत बना खड़ा नरेन भौंचक सा था ।
"हाँ तो भान पेंशन के रुपये मिले थे, तो?" मरेन ने पूछा।
"तो पया भैया? वे रुपये भाभी के हाथों में हमेशा की तरह दे दिए
गए है, तो वे माज भी हमेशा की तरह रात का शो देखकर हो वापस
पाएंगी, और क्या ? मो तो सब कुछ जानती है, फिर भी पूछती है ।"
"बस कर माधुरी, तेरा तो सिर फिर गया है माज । इतना सारा
तू कह गई ! ?" मां पाश्चर्य मोर दुःख में सने किसी विचित्र भाव को लिए
नीचे उतर गई।
नरेंन मो को जाते हुए देखता रहा । उसे लग रहा था जैसे उसे बर्फ
+
तोखा सूरज || ५१
की दो सिल्लियों के बीच एक अरसे तक दवाये रखा गया है और आज
मचानक खुले में अभी-अभी छोड़ दिया गया है ।
तभी उसे ध्यान भाया कि माधुरी भी खड़ी हो गई है।
"बैठ जा मधू ।" कहकर नरेन पीछे धूम गया। वह अपने आप को
इस स्थिति में नहीं पा रहा था कि किसी भी तरह की कोई बात कहे ।
काफी कोशिश की उसने कि वह संयत हो सके लेकिन जब माधुरी ने उसे
पुकारा तब भी उसकी आँखें डबडवाई हुई थीं। हृदय भी भरा हुमा था।
"अब मैं इस घर में नहीं रह सकता मधू ।"
"क्यों भैया?"
"ये लोग तुमसे पेंशन के रुपये भी ले लेते हैं ?"
माधुरी ने इस बार कोई जवाब नहीं दिया ।
"मोर यह बात तुमने भी मुझे कभी नहीं बताई ?"
"मां, बाबूजी दोनों ने मिलकर मना किया हुआ था।"
"तो ठीक है, रहो तुम भी मां और बाबू जी के साथ । मैंने फैसला
कर लिया है कि मैं यहां से माज ही चला जाऊंगा।" नरेन ने एक सांस
में ही पूरी बात कह दी।
"भरे वाह भैया । मब तो तुम जान गए हो, तो भी ?..."
"जान गया हूँ, तभी तो."
"लगता है, जानकर भी तुम्हें कोई खुशी नहीं हुई।"
"सुशी।" नरेन चौंका।
"हाँ, हाँ । खुशी।"
"तुझे पता है न मधू, तू क्या कह रही है ?"
"हाँ भैया, मैं पूरे होश में हूँ। जिस दिन पिता जी को पेंशन मिलती
है, रुपये चुपचाप भाभी के हाथों में सरक जाते हैं और जानते हो भैया,
उस दिन घर में पूरी पूरी शांति रहती है। मां को भी कोई कुछ नहीं कहता,
पाबूजी को भी कोई नहीं कोसता भौर सुम्हारी बहन को भी डॉट नहीं
पड़ती । भैया, तुम जान गए न; एक दिन, सिर्फ एक दिन तो कम से कम
५२ ॥ तीखा सूरज मुझे भाभी की डांट-फटकार नहीं सुननी पड़ती। बोलो भैया, क्या तुम चाहते हो कि तुम्हारी यहिन महीने के तीसौं दिन डोट-फटकार सुनती रहे, लगातार ? एक दिन तो मिलता है उसे..." माधुरी माकर नरेन के कन्ये से लग गई थी मौर फफक-फफक कर रोने लगी थी । नरेन को पता नहीं क्या हो गया था, मांखें नम थीं, कलेजा जल रहा था।
९ "तेरा माया तो एकदम जल रहा है रे ।" सुमन को चारपाई पर बैठा मशोक चिन्तित हो गया । कल से सुमन चारपाई पर पड़ा था। कुछ खाया- पिया भी नहीं था। मशोक की मां तो बुरी तरह घबरा गई थी। अच्छे- भले लड़के को यह क्या हो गया ? इस समय मां दवा लेने गई पो मौर मशोक सुमन के पास भकेला पेठा या । सुमन चारपाई पर निढाल हो पड़ा था मौर कभी-कभी सर गर्दन पोर हाथ परों को पटकते हुए छटपटाने लगता था। शायद उसे होश भी नहीं था। अशोक ने किसी को इस तरह करते नहीं देखा था। इसीलिए उसे पौर ज्यादा चिन्ता हो रही थी।
५४ || तोसा सूरज "कैसा महसूस हो रहा है सुमन ।" प्रशोक उस पर झुक भाया । सुमन सिर्फ कराहता रहा। "सुमन ! सुमन ! तुझे क्या हो गया भइया ?" "दादा !" सुमन ने अपनी पलकें उधार ली थों, “दादा ! तुम कहाँ बैठे हो?" "मैं यहाँ हूँ सुमन, तेरे पास । विल्कुल नजदीक ।" अशोक ने सुमन का हाथ पकड़ लिया था। "दादा, मुझे कुछ सुझाई नहीं दे रहा । मेरा सर फटा जा रहा है, मोह"..." "धीरज रख रे । मां दवा लेने गई हैं; मभी मिन्टों में ठीक हो जाएगा तू ।" अशोक वाकई घबरा गया था। सुमन ने फिर मांखें मींच ली थीं। अधिक दर्द मौर बुखार की वजह से वह बेतरह चीख रहा था । थोड़ी देर में मां डाक्टर को लिए मा गई । मशोक उठकर खड़ा हो गया। डाक्टर ने झुककर नब्ज देखी । कानों पर स्टेथिस्कोप चढ़ाकर सुमन के सीने का परीक्षण किया । सीने का परीक्षण उसने दुबारा किया । बुखार तो तेज था ही, सीना भी बेतहाशा घड़क रहा था। टेम्परेचर देखा, एक सो तीन था। बगल में रखे तख्त पर बैठकर डाक्टर ने एक परचे पर सुमन के लिए कुछ दवाइयां लिखीं गौर इन्हें ले पाने के लिए अशोक फौरन चला गया । बैग से सिरिंज और एक इंजैक्शन निकालकर डाक्टर ने सुमन की बांह टटोली। इंजैक्शन लगने के बाद भी सुमन को होश नहीं पाया था। "घबराने की कोई बात नहीं है। कोई खास बीमारी नहीं है, जल्दी ही ठीक हो जाएगा ।"हां, इसे अकेला मत छोड़िएगा।" कहकर डाक्टर अपना बैग उठाकर जाने लगा तो अशोक की मां ने टोका "डाक्टर साहब, हमारा सुमन बहुत नाजुक है। वाकई कोई खास बात तो नहीं है डा. साहब ? देखिए आप मुझसे.." .
तीखा सूरज || ५५ "नहीं, नहीं । कोई विशेष बात नहीं है । ठीक तो हो ही जाएगा। जरूरत पड़े तो फिर बुलवा लीजिएगा। मैं कहीं बाहर तो हूँ नहीं, यहीं मुहल्ले ही में तो हूँ।" "अच्छा डाक्टर साहब !" पोर डाक्टर चला गया । डाक्टर चला गया तो अशोक की मां को ख्याल पाया कि उन्होंने डाक्टर को तो कुछ दिया ही नहीं, "खैर, ठीक हो जाए, सब पहुँचता रहेगा।" उन्होंने सोचा मोर फिर सुमन के कमरे में चली गई। थोड़ी देर में मशोक दवाइयां तथा कुछ फल लेकर बाजार से भा गया। "डाक्टर गए, माँ ?" "हाँ बेटा । लेकिन उनकी फीस रह गई है । हड़बड़ाहट में मुझे कुछ याद ही नहीं रहा । तुम दे भाइयो।" "दे आऊँगा मां, यह बतानो सुमन कैसा है अब?" अशोक सुमन के चेहरे पर झुक भाया था। सुमन की पलकें बन्द थीं जो कभी-कभी कांपने लगती थीं। "अभी एक इंजेक्शन लगा गए हैं।" अशोक ने एक लम्बी सांस खींची भोर फिर सिर लटकाए तख्त पर बैठ गया जाकर। सांझ हो गई थी और बैठक की पिछली खिड़की के बाहर चिड़ियों ने चहचहाना शुरू कर दिया था। चिड़ियों का चहकना अशोक को अच्छा नहीं लग रहा था। मां ने बती जला दी थी भौर बल्ब के चारों और मच्छरों ने तत्काल भुनभुनाना शुरू कर दिया था। अशोक को लग रहा था कि सभी पतंगे माज काफी सुस्त हैं, मानो उन्हें भी सुमन की तरह तेज बुखार हो। यकायक सुमन के दांत पीसने की मावाज से अशोक चौंका । दौड़कर पास गया तो देखा कि सुमन के मुंह से फेन जा रहा है और उसको दाँती मिच गई हैं, हाथ पांव ऐंठने लगे हैं। भशोक ने घबराकर मां को पुकारा।
५६ | तीखा सूरज दोनों ने सुमन को कसकर पकड़ रखा था और चम्मच से उसके दांत खोलने का प्रयास कर रहे थे । थोड़ी देर में दौरा खत्म गया भौर सुमन का शरीर एकदम ढीला पड़ गया। अशोक ने जल्दी से एक टेबलेट सुमन को निगलवाई और लिटा दिया। अब वह शांत था। शायद उसकी तकलीफ भी कम हो गई थी। "मशोक ! तू कल अपने मौसा जी को चिट्ठी लिख दे। मेरा तो जी घबरा जाता है।" "नहीं माँ।" अशोक ने मुस्कुराने की कोशिश की, "पवराने की कोई बात नहीं है । वह ठीक हो जाएगा। कभी-कभी ऐसे भी हो जाता है।" "तुमने मुझे नाली धक्का दे दिया है दादा। दादा मुझे उठामो । मेरे सारे कपड़े गन्दे हुए जा रहे हैं दादा । दादा, दादा ! मेरे मुंह में कीचड़ भर गया है।..." करीब भाधी रात को सुमन का बुखार फिर तेज हो गया था और वह बेहोशी की हालत में बड़बड़ा रहा था। मशोक पास ही बैठा उसका माथा सहला रहा था। "नहीं सुमन ! तुम बिल्कुल ठीक हो । तुम बिस्तर पर हो सुमन । तुम बिस्तर पर हो, भाराम से।..." । !
१०
हारा-थका तो था ही नरेन, दरवाजे पर ही माधुरी को खड़ी देख खून
खुश्क हो गया उसका।
"आप एकदम अन्दर नहीं जा सकते भैया ।" माधुरी ने कड़कते हुए
गंभीर वाणी में उद्घोष किया ।
"क्यों ?" जैसे इतने में ही नरेन के गले का गीलापन खत्म हो गया
हो।
"मेरे पास खुशी को खवर जो है, तुम्हारे लिए," माधुरी थोड़ा मुस्कु-
राई तो नरेन की जान में जान पाई।
"अरे तूने तो मेरी जान ही ले ली होती । खैर"बोल क्या बात है,
५८ | तोखा सूरज "देखो भैया !" माधुरी तुनक गई थी इस वार, "ऐसी बातें मत किया करो । मुझे घर से निकालने में तुम्हें खुशी नजर माती है ?" तुरन्त ही मां और बाबूजी का झुर्रियों भरा बेजान चेहरा नरेन की भांखों के सामने फिर गया। फिर दो चेहरे मौर आ गए प्रांखों के भागे । वह चुप रहा कुछ देर, फिर बोला-"मच्छा, तो तुझे पता है, कौन सी खबर मुझे खुश करेगी?''अरे मधू," उसने माधुरी को अन्दर ठेलते हुए कहा, "कमबख्त नौकरी ही नहीं मिल जाती जब तक, मेरे लिए कोन सी बात खुशी की हो सकती है, भई तुझे पता हो तो हो, मुझे इसका कोई पता नहीं है।" वे दोनों धीमे-धीमे गलियारा पार कर ऊपर के जीने तक पहुंच गए थे। नरेन ने पहली सिड्डी पर पैर रखते हुए माधुरी से पूछा, "अच्छा बता तो, वह क्या बात है?" "नहीं बताती", माधुरी ने नाराज होने का भाव दिखाया, "तुमने मेरी कोई अहमियत ही नहीं समझी । एकदम अण्डर एस्टीमेट कर लिया! अब अपने आप जाकर देख लो, कौन बैठा है तुम्हारे कमरे में।" "मेरे कमरे में!" नरेल चौंका । उसके दिमाग में बिजली सी कौघ गई । झट से पर नीचे खींच लिये और माधुरी को मनाने लगा। "बता न मधू ! कौन है ऊपर ?' उसके माथे पर बल पड़ने शुरू हो गए थे। "न बताऊँ तो?" माधुरी ने बड़े लाड़ से कहा। "तो मैं तेरा गला दबा दूंगा। बता न ।" नरेन का गुस्सा पोर व्यग्नता बड़ी तेजी से बढ़ी जा रही थी। उसे पता ही नहीं लगा कि कब उसने वाकई माधुरी का गला पकड़ लिया। "भरे रे ! भैया ! ! यह क्या कर रहे हो? मार डालोगे मुझे ?" मरेन को होश मा गया और वह अपने माप पर भल्ला पड़ा । विना बात की बात पर उत्तेजित हो जाता हूँ।" "मोह मपू! तू ऐसे क्यों कर रही है, सीधे-सीधे बोलती क्यों नहीं ?"
तोखा सूरज || ५६ नरेन ने इस बार मपेक्षाकृत धर्य पौर विनम्रता से काम लिया। "हाँ, मव सोधे-सीधे बता दूँ तभी खैर है।" माधुरी एकदम पीछे हट गई, "तुम्हें याद है भैया, बचपन में एक रोता नाम की लड़की हुमा करती यो ? वह पाई है, ऊपर तुम्हारे कमरे में है।" माधुरी एक पल को एक गई। "मेरे कमरे में?.."रीता..." "पूरी बात मुनो भया, पहले ही मेरा गला मत पकड़ लेना । मौर वो एक मापके दोस्त हुमा करते थे, जो करम ज्यादा बढ़िया खेला करते थे। तुम्हें याद है." । "हाँ-हाँ ! हपं । दोनों मियाँ धोबी ऊपर बैठे हैं, जामो।" "मियां वीवी !" नरेन की मांखें इस बार खुशी से फैल गई और शाम के अंधेरे में वर्षों से खोई हुई मांखों की चमक नरेन की मांखों में उतर भाई । "मरे मधू तूने तो".." "वाकई खुशी की बात सुनाई न !" माधुरी ने वाक्य पूरा किया। "खैर अब जामो, वे तुम्हारे विना काफी बोर हुए हैं दिन भर । इन्त- जार कर रहे हैं।" नरेन फट से मुड़कर ऊपर चढ़ने लगा और माधुरी उसे खुशी-खुशी ऊपर चढ़ते देखती रही । कितने दिनों बाद आज खुश हुअा है नरेन थोड़ा सा; उसने सोचा और फिर उसकी पलकें भीग आई। "देख हर्प, मैं तुझे उठाकर छत से नीचे दूर खाली खेतों के पार अभी फेंक दूंगा।" नरेन ने हर्ष की किसी बात पर रोता को सुनाते हुए कहा और फिर हर्प के पास ही चारपाई पर बैठ गया। उसकी बात सुनकर हर्ष और रोता दोनों खिल-खिलाकर हँस पड़े।
६० ॥ तीखा सूरज "सुना रीता, इसके हाथ से कभो वाली चाल की गेंद तक फील्ड के बाहर गई नहीं, मुझे उठाकर फेंक देगा?"मवे साले, एक ही प्वाइंट पर मैच हार जामोगे।" हर्ष ने भी नरेल की चुटको ली। लेकिन नरैन इस बार गंभीर हो गया था। पिछले दो साल से उसकी नियति ही ऐसी हो गई है कि हर मिनट बाद तो गंभीर हो जाता है । इन दो सालों में उसे, हँस पाने लायक एक माज ही तो मौका मिला है और वह इसमें भी एकदम हल्का नहीं हो पा रहा है । वातों-बातों में ही कोई. न कोई ऐसी बात जरूर मा जाती है कि उसका मन टीसने लगता है। "तुम्हें पता है हर्ष, यूनिवर्सिटी छोड़ने से पहले वालीबाल को चैम्पि- यन-शिप मेरे हाथों से जाती रही थी।" नरेन कहते-कहते कुछ उदास हो चला था, "मेरी टीम उस दिन भी बहुत अच्छा खेली थी। उसे सिर्फ मेरी वजह से ही हारना पड़ा था । दूसरे दिन के अखबार में भी निकला था, इट वाज अानली मिस्टर नरेन हू' " नरेन ने अपनी निगाहें सामने की दीवार पर टिका दी थीं। उस दिन की याद से उसे बुरी तरह चोट पहुंची थी । लग रहा था जैसे यह कल की ही बात हो और उसके हारने का दर्द एकदम ताजा हो। "मोह छोड़ो यार ! क्या पचड़ा लेकर बैठ गए । मारो गोली । वाली- वाल से ही जिन्दगी नहीं बन जाती।" हर्ष ने बातचीत का रुख मोड़ना चाहा। "तुम ठीक कहते हो यार । अब तो मैं सोचता हूँ कि बजाय वाली- बाल को चैम्पियनशिप या ऐसी ही किसी होड़ के अगर मैंने अपनी जिंदगी बनाने की कोशिश की होती तो ज्यादा अच्छा रहा होता । लेकिन मित्र, एक बात का हमेशा ख्याल रखना, जिस व्यक्ति की महत्वाकांक्षा ज्यादा लम्बी हो जाती है, वह व्यक्ति जरूर बर्बाद हो जाता है, मेरी तरह से । माज जो दिन मेरी आँखों के आगे है, मैंने पहले कभी इन रूखे रंगों के बारे में विचार नहीं किया था। क्या तुम भी मानते हो हर्ष, कि भोगने के लिए बहत कछ पहले से ही नियत होता है ?..."
तीखा सूरज । ६१ ३ हर्ष ने देखा, वातावरण वाकई बोझिल हुमा जा रहा है, तब उसने हंसते हुए कहा, "छोड़ो यार ! मानने न मानने से कुछ नहीं होता । नथिंग इज फाइनल इन दिस वर्ल्ड । किसी पूर्व धारणा में मेरा कभी विश्वास नहीं रहा, जो कुछ समक्ष है, प्रत्यक्ष है, बस उसी वर्तमान क्षण को मैं जीवन्त मानता हूँ । भूतकाल किसी प्रेत की तरह पीछे पड़ जाए तो सिवाय पछतावे के और कुछ नहीं हाथ पाता और भविष्य को भी ठीक इसके विपरीत हालत है । साथ पछतावे हों तो कोई भविष्य नहीं होता । मैंने तो गणित से एम० एस-सी० किया है और मुझे निगेटिव वैल्यूज़ पर पूरा-पूरा यकीन है । भविष्य को मैं निगेटिव पास्ट समझता हूँ, भूत की प्रतिच्छाया । इसी- लिए जो क्षण हाथ में आ गया है, मेरे विचार से उसे गँवाना कतई अक्ल- मंदी का काम नहीं है । नरेन, क्या इससे पहले हम दोनों ने साथ-साथ कई बार एन्ज्वाय नहीं किया है जब मेरी परिस्थितियां एकदम विकट थीं, फ्लश और किटो के बीच मैं तबाह हो गया था।" कहकर हर्ष एकदम से चुप हो गया। नरेन भी हर्ष का इशारा समझ गया था । "मोह सो सौरो हर्ष! क्या बताऊँ यार, नौकरी के पीछे भटकते- भटकते इन दो सालों के अन्दर मैं भी काफी एकोन्मुखी भौर हताश हो गया हूँ। शीशे के सामने कभी भूले से पड़ जाता हूँ तो कभी-कभी अपने आपको देखकर चौंक उठता हूँ। मेरी खुद समझ में नहीं पाता कि मेरा चेहरा इतना छोटा कैसे हो गया है । तुम्हें कुछ फर्क लगता है मुझमें ?" "खैर चेन्जेज तो सब में आते हैं, माने भी चाहिए । फर्क तो हममें भो पाया है। मुझे भौर रीता को तुमने अलग-अलग देखा था । भव साथ- साथ देखने पर भी क्या हम वैसे ही दिखते हैं ? अरे यार एक मजे की वात बताएँ।" हर्ष की मांखें माकस्मिक खुशी से दिप रही थीं, झट से उसने अपना पूरा शरीर नरेन की मोर मोड़ लिया था, "कभी-कभी तो मुझे लगता है कि मैं हर्ष नहीं हूँ, बल्कि हर्प की खोल में कोई पोर घुस माया है । ऐसा एहसास पहली बार तब हुमा था जब हम लोग इण्टर कालेज ६२|| तीखा सूरज छोड़कर यूनिवसिटी में दाखिल हुए थे। तब भी हैरानी होती थी कि हमारे माँ बाप हमें अपना बेटा मानते थे और हमें लगता था कि हमारे साथ ज्यादती हो रही है । क्योंकि तव अन्दर से कुछ और ही महसूस होता था, हमें खुद नहीं लगता था कि हम उनके बेटे हैं या कि किसी के भी बेटे है ।" एक अत्यन्त रहस्य-भरी वात को कहने और सुनने के बाद के रोमांच को महसूस करने से वे सब दो पल चुपचाप से बैठे रहे । नरेन भी चुप था। दह सोच रहा था कि मव क्या सोचे? इन दो सालों के अन्दर उसके सभी भाव एक दूसरे से मिलकर गड्ड-मड्ड हो गए ये पौर वह उन्हें अलग-अलग छोटकर रखने में अपने पापको समर्थ नहीं पा रहा था । चाहता जरूर था कि इस वक्त कुछ वोले या सुने पर अब उसे महसूस हो रहा था कि उसके पास बोलने या सुनाने के लिए कुछ भी याकी नहीं रह गया है और कमरे की चुप्पी काफी खल रही है । कोई-कोई स्थिति ऐसी ग्राती है कि अनचाहा भी चुपचाप झेलना पड़ता है । रीता शुरू से ही खामोश बैठी थी। इस भयंकर चुप्पो को तोड़ने का उसी ने हौसला किया इस बार । "नरैन भाई साहब ! मापको पता नहीं है मापके पीछे इन्होंने मापको तारीफों के कितने पुल बांधे हैं और अब देखिए भाप चुप है तो भाप भी खामोश बैठे है।" "हाँ रीता! यह बुरी बात है कि हम लोग चुप बैठे है । मेरे पास तो कोई खास बात है नहीं, तुम दोनों को सुनाने के लिए, लेकिन तुम दोनों ने तो चुपके-चुपके शादी भी कर ली, कव कर ली मुझे तो खवर भी नहीं दी भौर अब तुम दोनों को ज्यादतो है कि मेरे सामने चुप बैठो। तुम्हीं लोग सुनामो, मुझे तो सुनने में हो बहुत भला लगेगा।" "भाई साहब ! मापने हमें मब तक बहुत सरप्राइज दिए है, यह तगड़ा सरप्राइज पापको देने के लिए हमने रख छोड़ा था। सच तो यह है नरेन, हमें पता भी नहीं था कि हम दोनों कभी विवाह करके एक भी हो जाएंगे लेकिन यह सब हो गया मोर बड़ी जल्दी हो गया। जानते हो, ठोसा सूरब १३ विवाह के वस्त मि मेरी मां मौजूद पी, उनके मनारा में रिसी को नहीं दुा पाया । दन्त ही नहीं मिला। इसनो जस्सी सब कुष हुमा कि मैं तो पवरा हो गया था। यह तो मो ने सब कुए टोक कर लिया नहीं हो तुझे विश्वास नहीं होता न? सर फिर बताएंगे सभी कुरा लेकिन देरा ले, शादी के बाद मौषा सेरे हो पात भाषा हूँ पहले ! मोर तू यार योर करने पर तुला है हमें।" हर्ष के पेहरे पर मन्तरंग स्मित को पाप पो । "मन्या साले बनो मत । शादी के बाद सीधा सेरे हो पास माया हूँ पहले।" नरेन ने नाटकीच टोन में कहा, "कोई एहसान रिया है मुझ पर? मैंने तो तुम्हें वर्षों पहले ही पति-पलो बना दिया था बेटा । मना भव योड़ा अकेले में गपशप करो। मैं नीचे देसू, साना-पाना संपार हुमा या नहीं । पेट में तो चूहे फत्यक पेश कर रहे होंगे, बों रोता?" कहते हुए नरेन उठ गया। "यार मपने पेट में तो विल्लियों की रेस हो रही है।" पाहर जाते नरेन को पीठ पर जोर की मावाज चिपकाते हुए हंस पड़ा हर्ष, "पड़ा मूडी मादमी है।" "परेशान बहुत हैं।" रीता ने उत्तर सा दिया। "परेशान नहीं होगा तो क्या होगा? मौकरी सगो महीं भौर यह गग चटाने के लिए..." हर्ष उठकर रोता की मोर बढ़ पला । "परे, अरे! भाप वहीं बैठिए," हर्ष को अपने मजदीक माते देखा रीता बोल पड़ो, "माप भी क्या प्रादमी हैं। यहाँ यह राय ? कोई पासा होगा नीचे से अभी।" "माने दो, कोई गैर नहीं पाएगा।" हर्प लापरवाही से जाफर रीता की वगल में बैठ गया भोर मपनी दोनों भुगागों के पीप उराने रीता गो कस लिया। "तुम्हें पता नहीं रोता, जब तुम पहले दिन मौसी के पर माई थी, मैं कैरम खेलने में व्यस्त था। तुम पर पहलो मार गिगाह पड़ी भी तमी, से मुझे कुछ हो गया था। फिर तुम भी चोर्ट पर मेरे पोस्ट जग गई .
६४ || तीखा सूरज
क्या तुम अब भी मपने भापको उतना ही चालाक समझती हो रोता? याद
है तुम्हें जैसे ही
गए थे। लेकिन
चाल में । नरेन
देख रहा था, यह
हर्ष तू रीता से
कहते हैं।" मोर
"हटिए । है
के मरीज हैं।"
हर्ष ने रीता
११ सुबह चाय पीने के तुरन्त बाद ही बड़े भैया चले गए थे और भाभी को भी पता नहीं कौन सा खास काम निकल पाया था; वे भी खुल्दाबाद किसी सहेली के यहां चली गई थीं। घर में माधुरी, नरेन, मां और बाबूजी तथा रीता और हर्प रह गए थे। चाय के बाद वे सब नीचे की कोठरी में पिताजी की चारपाई के इर्द-गिर्द जमा हो गए थे। बहुत दिनों के बाद नरैन पिताजी की चारपाई के पास इस तरह सबके साथ बैठा था सो उसे तो बड़ा अजीब सा महसूस हो रहा था। काफी कुछ उसे शर्म जैसी भी महसूस हो रही थी। थोड़ी देर बैठने के बाद वह उठ गया ।
६६ || तोखा सूरज "भई तुम लोग बैठो, मैं अभी माता हूँ," कहकर वह ऊपर भपने कमरे में चला गया। हपं, रीता, माधुरी या मां, इनमें से उसे किसी ने नहीं रोका-टोका । फिर ये सब पापस में बातें करने लगे । बीते दिनों की बातें, जव हर्प और रोता भी इसी मुहल्ले में रहते थे और नरेन का दोनों के घर खूब पाना-जाना था। क्या दिन थे वे भी। तब रतन भैया यूनिवसिटी में पढ़ते थे । पढ़ते क्या थे, दादागीरी करते थे। समझते थे कि इस तरह से इतिहास बदल देंगे वे । लेकिन ऐसे लोगों का होता क्या है ? हां, अभी तक यूनिवर्सिटी में उनका नाम तो लिया जाता है दादागीरी के लिए। तब नरेन के पिताजी की मांखें बिल्कुल ठीक थीं और उनमें इन बच्चों के लिए मपरिमित स्नेह छलकता रहता था हर वक्त । माज भी किसी को याद नहीं पा रहा उन्होंने तब कभी किसी को भी डॉटा हो, न नरेन को भौर न रतन को । माधुरी को तो वे प्राज भी कुछ नहीं कहते । परे सिर्फ़ वे देख हो तो नही सकते भब, लेकिन महसूस भी नहीं करते क्या ? भव पड़े-पड़े तो कौन चिड़चिड़ा नहीं हो जाता? मौर फिर ये दिन भर नरेन और माधुरी के बारे में हो तो सोचते रहते । जब कोई सोचते. सोचते सोचों के ही जालों में उलझता चला जाएगा और उसके हाथ में कहीं भी 'मन्तिम' का प्रश्न नहीं पड़ेगा, ऐसी हालत में वह कर भी क्या सकता है ? वे नहीं चाहते क्या कि माधुरी के जल्दी ही हाथ पीले हो जायें और वह इस यंत्रणादायी कारागार से छुटकारा पा जाए ? लेकिन कोई अच्छा लड़का ही नहीं मिलता तो वे क्या करें? भव यूं ही तो उसे झोंक नहीं देंगे कहीं। नरेन शादी के नाम से कितना बिचकता है, यह भी वे मच्छी तरह जानते हैं । और ठीक भी है, जब तक नौकरी न लगे उसकी, वे उस पर न तो जोर देते हैं मोर न ही वह कभी इसके बारे में सोचता है। वैसे तो उन्होंने सोच रखा था कि नरेन की पढ़ाई पूरी होने के बाद ही वे उसके शादी भी कर देंगे, लेकिन क्या करें हालात ही बदल गए । रतन की नहीं कर दी थी उन्होंने ? अब उनको प्रांखें चली गई हैं तो" तोखा सूरज || ६७ "बेटा, मेरी मांखें जरूर चली गई हैं लेकिन नरेन घुल-घुल कर कैसा हो गया है, यह मुझसे छुपा नहीं है हर्ष !" "सब ठीक हो जाएगा पिताजी, प्रभी दिक्कत है ही थोड़ी, लेकिन दिन हमेशा एक से थोड़े ही रहते हैं । आप धैर्य तो रखें और हाँ, नरेन की जरा देखभाल रखा कीजिए माता जी, उसे कभी कुछ मत कहा करिये । वह तो भादमी ही बड़ा अजीब है। खुद ही हमेशा दूसरों के दिमागों में पाए संकिण्ड थाट को सोच-सोचकर परेशान होता रहता है वह ।" "हर्ष ! एक उसी पर तो भरोसा है। मैं जानता हूँ कि वह काफी समझदार है और यह भी सोचता हूँ कि जहाँ कुछ थोड़ा ठीक हुमा, हमारे दिन फिर से लौट पाएंगे। इसी आशा में तो जो रहा हूँ, वरना अब इस जिन्दगी में मोर क्या रह गया है ? क्या देखना है मुझे ?" "ऐसा क्यों कहते हैं पिताजी। मापको उमर तो बहुत लम्बी है । नरेन कह रहा था कि जैसे ही उसकी नौकरी पक्की हुई और उसने कुछ पैसा इकट्ठा किया वह पापकी मांखें बनवाएगा। कोई नैचुरली तो आपकी आंखें गई नहीं, माप फिर से खूब देख सकेंगे।" "नहीं बेटा । नरेन लग जाए तो सबसे पहले माधुरी का हिसाब करना है । कोई अच्छा लड़का हो तो तुम भी निगाह में डाले रखना ।" हर्ष ने उत्सुकतावश माधुरी की ओर देखा। माम हिन्दुस्तानी लड़कियों की तरह शादी की बात सुनकर शर्म से लाल-नीली नहीं हो गई थी वह, चल्कि किसी प्रौढ़ नारी की तरह कह रही थी, 'नहीं भाई साहव । भैया के 'लगते ही सबसे पहला काम होगा पिताजी की मांखों का प्रापरेशन ! भोर दूसरा काम होगा नरेन भैया की शादी।" "मरे नरेन भैया की शादी तो कल ही हो जाएगी, तुम तो बस अपनी शादी के बारे में सोचो वन्नो।" इस वार रोता ने माधुरी पर प्राक्रमण किया तो माधुरी शर्मा गई जैसे वाकई दुल्हिन बन गई हो। "मच्या तू शादी करके बहुत शैतान हो गई है री ! क्या नरेन भैया से भी कल तू ही मोर शादी करने जा रही है ?"
६८ || तीखा सूरज "तुमने समझ क्या रक्खा है माधुरी, वह भी कर सकती हूँ लेकिन एक शर्त पर, इन्हें तुम संभाल लेना।" रीता ने कनखियों से हर्ष की भोर देखा। "ऐ रीता की बच्ची !" हर्प गुर्राया। और माधुरी तो जैसे रीता को दबोच हो बैठी । रीता पीछे की ओर झुक गई और मां की गोद में फंस गई। "उई, बचायो मां।" और कमरा समवेत हँसी से गूंजने लगा । "ऐ, माधुरी !" रीता ने ऊपर से, प्रांगन से गुजरती माधुरी को भावाज दी । माधुरी ने खड़े होकर ऊपर की ओर देखा तो रीता ने उसे ऊपर पाने का हाथ से इशारा किया । माधुरी चुपके से ऊपर आ गई। "रीता! कोई खास बात हो तो जल्दी से कह डालो। भैया ज्यादा देर तक नहीं घूमते, भाई साहब को लेकर माते ही होंगे। मौर हाँ, ममी उन दोनों के लिये कुछ नाश्ता-दाश्ता भी तो तैयार करना है।" "तब तो बैठो, नाश्ता वगैरह तो बाद में बन जायगा । दो एक जरूरो बातें करनी हैं ।"मव भई, बुरा तो मानो मत, मुझे तो बड़ी भाभी से बड़ा डर लगता है, वरना वो सब तो मैं कर देती..." "रीता ! मरे, मैं तो जिन्दा हूँ। तू दो दिन के लिए माई है । तेरे यहाँ भाऊंगी तब भी तुझे रसोई में नहीं घुसने दूंगी।" "यह वात नहीं है माधुरी । प्रच्छा बैठो तो। वाकई कुछ जरूरी बातें करनी है।" मौर इसके बाद वे दोनों मन्दर कमरे में नरेन की चारपाई पर जाकर घंठ गई मौर फुसफुसा कर वातें करने लगीं।
तोखा सूरज || ६६ "तुम नरेन भैया को नहीं देख रही हो माधुरी, क्या हालत हो गई है उनकी ?" "क्या करूं रोता, भैया के साथ-साथ परेशान मैं भी हूँ। वैसे मैं पूरा- पूरा खयाल रखती हूँ भैया का।" "वह बात नहीं माधुरी, एक लड़की तुमसे ज्यादा ख्याल रखेगी उनका जो तुम्हारी छोटी मामी कहलाएगी, वह तुम्हें भी प्यार करेगी।" ."मोह रोता ! तुम भैया की शादी के बारे में सोच रही हो?" "क्यों माधुरी ? नहीं ?" "नहीं ऐसी कोई बात नहीं, लेकिन यह कोई प्रासान काम नहीं है। ""माधुरी थोड़ा चिन्तित हो गई। "ऐसी क्या बात है माधुरी?" "रोता!" माधुरी थोड़ी देर रुकी, "अब तुम्हें क्या बताऊं, भैया की कोई बात कम से कम मुझसे तो छुपी नहीं है । उन्हें लड़कियों से सख्त चिढ़ है।" "ऐसा क्या है माधुरी ?' रोता भी चिन्तित हो उठी थी। "कोई भी लड़की जो उन्हें प्यार करना चाहेगी, वे उसे कभी नहीं चाहेंगे । हमारो तुम्हारी बात और है रीता !" "अच्छा मधु ! मगर क्यों ?" "यह न पूछो रोता ! इसे मैं शायद तुम्हें बता भी न सकूगो।" माधुरी एकदम गंभीर थी। रोता कुछ देर खामोश रही। फिर माधुरी की ओर सट गई और उसके कंधे पर हाथ रख उसकी भोर घूम गई । "माधुरी ! तुम्हें पता है, तुम्हारे हर्ष भाई साहब ने मुझसे शादी क्यों की? यह सब नरेन भैया का ही पाशीर्वाद है कि माज हम दोनों साथ- साथ हैं, हमेशा के लिये । माधुरी, यह कोई ऐसी बात नहीं है कि मैं इसे भुला बैलूं, इतनी एहसान-फरामोश तो नहीं मैं । तुम विश्वास रखो माधुरी, नरेन भैया के लिये जो कुछ मुझसे करते बनेगा, मैं, करूंगी । बहिन, क्या ७० || तीखा सूरज तुम नहीं चाहती कि तुम्हारे भया""माधुरो तुम मुझे बतामो, वह बात जरूर बतामो माधुरी । मगर किसी नारी ने भूल से उन्हें पत्थर कर भी दिया है तो कोई उन्हें देवता भी बना सकती है, मधु, मत भूलो । मधु, तुम मुझे बतायो । जरूर कहो मधु !" रीता ने एकदम से माधुरी को मकझोर दिया । उसको प्राखें भर आयी थीं। माधुरी ने एक पल रीता की ओर देखा और फिर उसके गले से लिपट गई, "रीता!" एक ठन्डी सांस ली उसने । "जरूर बताऊंगी रीता । जरूर बताऊँगी । बताती हूँ। मभी लो।" माधुरी उठकर नीचे चली गई । रीता वहीं बैठी-बैठी कुछ सोचने लगी । वह सोच रही थी कि माखिर ऐसी क्या बात हो सकती है जिसके बारे में माधुरी जैसी समझदार लड़की भी बुरी तरह चिन्तित है । थोड़ी देर में माधुरी लौट पाई । उसके हाथों में एक मोटी सी फाइल थी और एक बड़ा सा टीन का डिब्बा था। "रीता ! भैया की सख्ती का ख्याल करके मैं फिर कमजोर हुई जा रही हूँ। शायद"शायद रीता मैं तुम्हें पूरी बात नहीं बता सकूँगी। फिर भी"तुम तो काफी समझदार हो रीता, तुम खुद ही सब कुछ समझ लोगी।" कहती हुई माधुरी रीता के पास फिर से माकर बैठ गई। "मुझे डर लग रहा है रीता । कहीं भैया इस बीच मा न जायें ? तुम जरा दरवाजा बन्द कर दो।" माधुरी को लग रहा था जैसे वह कोई बहुत बड़ा गुनाह करने जा रही हो । उसका दिल भी बड़ी तेजी से घड़क रहा था। "इतना मत घबरामो माधुरी, मब तुम भकेली तो हो नहीं; मैं भी तुम्हारे साथ हूँ।" कहते हुए रीता उठी मोर दरवाजा मन्दर से बन्द कर दिया। माधुरी थोड़ा माश्वस्त हुई। फिर कहने लगी,-"यह सब कुछ मैं तुम्हें निरी भावुकतावश नहीं बताने जा रही रीता, बल्कि मुझे विश्वास है कि तुम जरूर कुछ करोगी। फिर भी, हम मगर कुछ न कर पाएं, तो तोसा सूरज || १ यह सब तुम तक ही रहना चाहिए रोता!" "कसी बातें करती हो माधुरी।"मच्छा हो, अब शुरू करो, नहीं तो वे लोग मा जाएंगे।" "हां, हो ।" माधुरी ने कहा और फिर मोटी वाली फाइल घुटनों पर रखकर रीता को भामंत्रित किया। फाइल खोलते वक्त माधुरी को लगा जैसे नरेन के जिस्म पर उगे किसी जख्म को वह नंगा करने जा रही है। उसे काफी पीड़ा मोर मान- सिक यंत्रणा के बीच से गुजरना पड़ा, लेकिन वह सब कुछ सहन कर गई। इन दो सालों में वह भी काफी सहनशील हो गई थी। "ये हैं रीता, तीन साल के मन्दर दो सौ के करीब माए पत्र ! जिन्हें मीना ने अपनी ससुराल से भैया को लिखा है मौर भैया ने इनमें से एक को भी नहीं पढ़ा है।" "ठहरो मधु । पहले यह बतानो यह कौन सी मीना है ?.."एक ये तुम्हारे पीछे रहती थी, वही तो नहीं ?" "वही । भरे हाँ तुमने तो उसे देखा है। वही लड़की है, उसको दो साल पहले विदा भी हो गई है मोर भब वह ससुराल में है।" "अच्छा ! लेकिन यह लड़की तो, जहाँ तक मेरा खयाल है, बुरी नहीं थी। देखने में भी काफी अच्छी लगती थी तब ।' "बड़ी होकर तो खूब भन्छी हो गई थी।"और नरेन भैया के पीछे तो उसने अपनी जिन्दगी ही बरबाद कर ली । किस कदर दीवानी थी वह, मैं तुम्हें नहीं बता सकती रीता। मुझे तो सब बातें बाद में पता चलीं जब भैया ने मीना का माना-जाना एकदम बन्द कर दिया। तब उसी पगली ने सब कुछ बताया मुझे। उससे पहले ही वह सब कुछ कर चुकी थी रीता !:""मोना ने खुद बताया था कि उन दिनों उसके ऊपर एक नशा सा छाया रहता या भौर वह स्लीप वाकर की तरह उसी मदहोशी में छत को मुंडेर फलांग कर रात को इसी कमरे में मा जाती थी, उस वक्त या तो भैया पढ़ रहे होते थे या सो रहे होते थे। तुम तो जानती हो रीता, ७२) तीखा सूरज । भैया तो शुरू से ही रूखड़ रहे हैं इस मामले में । शर्मामो मत रोता।" मैं आज एक बहुत बड़ा सच खोलने जा रही हूँ। तुम्हें अच्छी तरह याद होगा, हालांकि उन दिनों हम लोग काफी छोटे थे लेकिन निरे बच्चे भी नहीं थे । हर्प भाई साहब तब यहां नहीं पाए थे। एकएक दिन नरेन भैया गुसलखाने में नहा रहे थे और हम तुम दोनों दरवाजे से सटे, किवाड़ों की दरारों के बीच से उन्हें देख रहे थे। मैं तो भाग भायी थी और तू उनके अण्डरवियर बदलने तक भी उन्हें देखती रही थी । यह तूने. ही कहा था कि तुझे पता भी नहीं लगा, कब दरवाजा खुल गया और तू पकड़ी गई थी। मागे को वात मैं नहीं कहूँगो रीता, तू ही मच्छी तरह से जानती होगी। रीता, मोना ने भी यह मुझसे स्वीकार किया था कि नरेन दादा का तो उसे तिलभर सहयोग प्राप्त नहीं हुआ। हमेशा वे भागते रहे और हमेशा वह मड़ी रही । उत्तेजना के अन्धेपन और चरम बेहोशी के क्षणों में ये सब कुछ कर गये लेकिन जब उन्हें होश माया तो उन्हें मीना से बुरी तरह नफरत हो गई। लेकिन मीना माज भी भैया को इतना चाहती है कि बस पूछो मत । ये सारे के सारे पत्र जानती हो रीता, मैंने कैसे कलेक्ट किए हैं ? बड़ी दिलपस वात है यह, लेकिन दिल हिला देने वाली। रीता । मैंने तुझे बता दिया न कि मोना ने ससुराल जाने से पहले मुझे सब कुछ बता दिया था? उसके ससुराल जाने के तीसरे दिन ही नरेन भैया के नाम एक पत्र भाया । इतिफाक से वह पत्र मेरे हाथ लगा लेकिन शराफत के नाते वह पर मैंने भैया को थमा दिया। अब मुझे बहुत मा सोस हो रहा है रीवा कि वह पत्र मैंने भैया को क्यों दे दिया ? मैं माज तक नहीं जान पाई कि नई-नई पोड़ा को न भेल पाने की यातना से मुक्त कोई सड़की दुल्हिन यनने के तुरन्त बाद मपने प्रेमी को क्या लिग गई होगी? मीना भी, इन दो सालों में एक बार भी यही नहीं प्रायो । मिलनी यंत्रणाएं नेल रही है वह अपनी ससुराल में, रोता मगर पे सत तुम पड़ोगी ठो पागल हो जामोगी।
तोखा सूरज ||७३ हाँ, तो, वह पहला पत्र, रीता मुझे मच्छी तरह याद है, भैया ने विना खोले बिना देखे बड़ी"..."यहाँ भाकर माधुरी योड़ा रुक गई थी। शायद उसके अन्तर में वेदना प्रवल थो, "बड़ी बेरहमी से फाड़ दिया रीता! चिन्दियों में । और उसका एक भी पुरजा मुझे नहीं मिला।" माधुरी की मखें सजल हो मायो थों, "रीता । मुझे नरेन भैया की वह तनी हुई मुद्रा जव भी याद माती है, मैं माज भी डर के मारे थर-थर काँपने लगती हूँ। क्या नयावह दृढ़ता पो उनको मांखों में उस दिन, रीता मगर तू देखती तो मोना मगर उस वक्त सामने होती तो जरूर विदेह हो जाती।" माधुरी थोड़ी देर के लिए रुक गई थी। कहते-कहते पा गए पसीने की बूंदें उसके माथे पर साफ-साफ झलक रही थीं मौर रीता तो जैसे काठ बनी बैठी थी। "उसके बाद मैंने क्या किया रीता, एक भी सैंटर सीधे-सीधे उनके हाथों में नहीं पड़ने दिया । जो भी मीना का पत्र होता मैं उसे रोक लेती । फाड़- कर चिट्ठी निकाल लेती भोर लिफाफे में एक सादा कागज डालकर लिफाफा गोंद से चिपका देती। तुम ताज्जुब करोगी रीता। इस तरह से करीब पचास-साठ लिफाफे भैया वगैर देखे फाड़ते रहे और मैं उन्हें ऐसा करते खुद इन्हीं परंखों से देखती रही। बाद में भैया नौकरी की वजह से इतना परेशान रहने लगे कि मैंने लिफाफा भी देना बन्द कर दिया । और तब तो पिछले दिनों मैंने ही भीना को एक पत्र लिखा था, उसके लेटर पाना बन्द हो गए है । इस स्थिति को भी मीना कैसे भोग रही होगी रोता क्या तुम मासानी से सोच सकती हो विना डिस्टर्ड हुए?" "तुमने तो मेरे मन में बहुत सारा दर्द भर दिया माधुरी !" "नहीं रीता यह सब कुछ भी नहीं है । भैया के मन में जितना दर्द समाया है, उसे हम और तुम मिलकर भी नहीं समेट सकती।" माधुरी ने फाइल को एक झटके से बन्द करते हुए कहा, "जरा दरवाजा खोलकर नीचे मां से पूछो तो, भैया मा तो नहीं गए । मैं तो सिर्फ इतना जानती हूँ रोता कि अगर यह फाइल भैया ने देख ली, तो वे मुझे जिन्दगी भर कमी ५ ७४ || तीखा सूरज माफ नहीं करेंगे और अभी, इसी वक्त, यह घर, यह शहर छोड़ देंगे।" "मधू ! तूने तो मुझे डरा दिया ! अच्छा छोड़ो । मगर प्रा भी जायें तो हम लोग दरवाजा नहीं खोलेंगे । वस । तुम सुनाती जाओ।" सामने की दीवार को स्थिरता ने माधुरी को हिम्मत दी कि वह मौर कुछ भागे कह सके । "मौर यह टीन का डिव्वा देख रही हो रोता!" माधुरी ने डिब्बे का ढक्कन खोल दिया। कागज के छोटे-छोटे बेलौस टुकड़े ढक्कन खुलने के बाद उस डिब्बे में कुलबुलाने लगे थे। रीता ने झांक कर डिब्बे में देखा और फिर माधुरी की और मुंह कर लिया । "ये टुकड़े भी मैंने इकट्ठे किये है रीता ! पिछले दो साल से भैया की हालत ज्यादा खराब रही है । यूनिवर्सिटी छोड़ देने के बाद भैया दिन भर उदास मोर खोए-खोए से रहते। जब नौकरी के चक्करों में मा गए तो रीता मुझे पता नही भैया का 'दिन' किस तरह बीता करता है; भल- वत्ता रात को सोने से पहले वे सरिता को एक चिट्ठी जरूर लिखते हैं और फिर पागलों की तरह उस चिट्ठी को एक बार पढ़कर दांतों-नाखूनों से बुरी तरह फाड़ देते हैं। कई बार ऐसा करते मैंने उन्हें छुपकर देखE है। शुरू-शुरू में तो मुझे काफी डर लगता था लेकिन बाद में यह मेरे लिए भी सामान्य हो कर रह गया, सिर्फ एक टीस घर कर गई हृदय में । सुबह भैया के जागने से पहले मैं चारपाई के पास-पास विखरे इन बेतरतीब टुकड़ों को संवारती । कई बार मैंने जोड़-जोड़कर पढ़ना भी चाहा लेकिन जो कुछ जोड़ने पर बनता था लाख सर मारने पर भी मेरी समझ में कुछ नहीं पाता था। पता नहीं किस भाषा में लिखते थे भैया? यह उनकी दिमागी विकृति के अलावा और क्या हो सकता है रीता? उन्हें कोई देव भाषा भी माती है, मुझे विश्वास नहीं । तमी से मैं भैया के लिये ज्यादा परेशान रहने लगी हूँ और रीता, यही से भाभी की डांट फटकार मुझपर दुगनी हो गई । बड़े भैया ने माज तक तो भाभी से एक शब्द भी कहा मोर न ही कभी यह जानने की कोशिश की - । तीखा सूरज || ७५ कि नरेन का क्या हो रहा है ? माँ अगर बाबूजी को न देखें तो उन्हें संभा- लने वाला कोई नहीं, ले देकर मैं ही अकेली रह गई हूं नरेन भैया की देख- भाल करने के लिए। लेकिन उनकी इस रोज-रोज की बीमारी ने मुझे ज्यादा ही तंग कर दिया था; एक दिन जाकर मैं सरिता से मिली भी। वै भैया के साथ-साथ ही पढ़ती थीं और भैया के प्रोफेसर की सड़की हैं । रीता, किसी भी तरह से भई मैं तो सरिता को दोषी ठहरा नहीं पाती । तुम भगर रुको दो एक दिन तो मिलाऊँगी तुम्हें सरिता से । खुद देखना कि कितनी मच्छी लड़की है । फस्ट पोजीशन आई है फाइनल इयर में भैया के साथ, लेकिन जब उसने यह टीन का डिब्बा देखा था, सच मान, उसको प्रांखों में भो मासू मा गए थे । तुम्हें पता है रीता, भैया की उसी साल सैकिण्ड पोजी- शान रह गई पो भौर मैं समझती हूँ इसी एक गम ने भैया को बदल डाला। भव उन्हें हर वक्त यही लगता रहता है कि वे एक पिटे हुए इंसान है और मब वे किसी काम के नहीं रह गए हैं । तुझे कैसा लगता है रीता कि इतना काबिल मादमी और दो साल से बेकार ? मुझे तो लगता है कि भैया का पागलपन, उनके दिमाग पर छाया हुमा फोहरा शायद एक पल को भी दूर नहीं होता, उस वक्त भी नहीं जब वे कहीं नौकरी के लिए इण्टरव्यू देने गए होते हैं । मैंने बहुत कोशिश की भैया कभी तो सामान्य रहा करें, लेकिन जो कुछ भी है सो तुम देख ही रही हो रीता । एक सतरा भौर है रीता जो मुझे कभी-कभी मधिक विचलित कर देता है । तुम्हें याद होगा शायद, जब हम छोटे-छोटे थे तब भी नरेन भैया एक विचित्र प्रकार की दृढ़ता के एकमात्र अधिकारी ये । हममें से कोई मगर पुराने अखबार को कापी के ऊपर इस लिहाज से लपेटना चाहता कि कापी का कवर साल भर उस प्रखवार के रद्दी टुकड़े के पीछे सुरक्षित रहे तो नरेन भैया इतना डांटते थे कि कभी-कभी तो मेरे भी मामू निकल पाते थे। रद्दी पखवार का उपयोग मौर हो ही क्या सकता था ? लेकिन भैया सबसे पहले उपयोग शब्द की धुनाई करते ये पौर बाद में यह साबित करते थे कि मसवार या कोई चीज़ कभी रद्दी नहीं होती।
७६ || तीखा सूरज उपयोग के आधार पर चीजों को रद्दी घोषित करने वाली प्रवृत्ति को वे बेहद बुरा मानते थे । यही प्रवृत्ति प्रादमी में छोटी-छोटी चीजों से शुरू होती है और एक दिन वह मादमियों को भी इसी प्रवृत्ति का मनजाने जाने में शिकार बना डालता है । जब भी कोई अखबार का रद्दी टुकड़ा फाड़कर लापरवाही से इधर-उधर फेंकता था, नरेन भैया को लगता था कि किसी वेबस इंसान के अनुपयोगी होते ही उसे मार डाला गया है जब कि वह अभी और जीना चाहता था। सब चीजों के अर्थ थे भैया के पास । लेकिन रीता ! अब मुझे लगने लगा है कि कहीं कोई बहुत बड़ी गड़बड़ी हो गई है और बहुत सी चीजों के पर्य भैया के हाथ से फिसल गए है । मीना के लिखे पत्रों और सरिता को लिखी चिट्ठियों को इतनी बेरहमी से फाड़ डालने का क्या मतलब हो सकता है रोता ? किस चीज का अर्थ काटना या फाइना हो जा सकता है भला? फिर सरिता का मामला तो... मुझे सरिता से एक ही शिकायत है रीता । मेरा तो माथा घूम गया सोचते-सोचते लेकिन मेरी समझ में नहीं माता कि नरेन भौर सरिता के बीच कौन सा न भरा जा सकने वाला गैप मा गया है कि जब मैंने सरिता से कहा था कि वे दोनों हमेशा के लिए एक हो जाएँ, पया यह बहुत ज्यादा गलत होगा ? जानती हो रीता, सरिता ने क्या कहा था? पहले तो यह बहुत देर तक चुपचाप यूं ही बैठी रही थी । शायद मेरे प्ररन पर जरूरत से ज्यादा गहराई से सोच रही पी सरिता । बाद में या पौड़ा युक्त स्वर में बोली पो, "माधुरी ! मय तो यह नामुमकिन है । हम दोनों एक दूसरे को साथ-साथ रहकर चाह पुके । मय हम मसग-अलग रह कर ही एक दूसरे को पाह सगे।"तुम नरेन का सयाल रराना जब तर उनको शादी न हो जाय । मैं जानता हूँ मापुरी, इतना बड़ा काम गोपन यानी मुम्हारी मप कोई नहीं हूँ में।" मोर इसके याद फिर मौन हो ग- तीखा सूरज || ७७ थो सरिता । इतनी मौन, कि काफी देर तक तो छेड़ने की मेरो हिम्मत नहीं हुई। मैंने उससे लाख पूछा रीता, कि पाखिर ऐसी क्या बात हो गई है कि के साथ-साथ नहीं रह सकते और अगर साथ-साथ रहें भी तो एक दूसरे को प्यार नहीं कर सकते, ठीक उसी तरह से, जैसे, वे एक दूसरे को प्यार करते रहे थे ? लेकिन उसने नहीं बताया तो नहीं ही बताया। हर बार यही कहा उसने, "नहीं मापुरे नहीं । पूछो मत । मैं वता भी नहीं पाऊंगी। शायद तुम्हारे नरेन भैया भी कभी नहीं बता पाएंगे। बताना तो एक तरफ रहा माधुरी, हमें उसे खुद के अन्दर दुहराने तक में मौत से गुजरने तक फी यंत्रणा का महसास होता है । यता पाना मगर मासान होता तो माधुरी" उसके बाद वह चली गई, मेरे लिए एक पहेली छोड़कर । जाते वक्त भैया का खयाल रखने की बात कहना नहीं भूली थी सरिता । पौर रीता, उसने भी ठोक ही कहा था। भैया ने मुझे सब कुछ वता दिया लेकिन यह पहेली मेरे लिये माज भी पहेली बनी हुई है । मायद भैया भी किसी को वह नहीं बता पाएंगे; शायद ये भी उसे दुहराने भर में ठीक येसा ही अनुभव करते हों जैसा सरिता ने कहा था। लेकिन रीता इससे कोई समस्या हल थोड़े ही होती है। विश्वास नहीं पाता रीता कि ऐमी भी कोई बात हो सकी होगी ! मगर मैंने इन प्रांतों से युध न देशा होता पौर कोई पौर मुझे यह सब बताता तो रीता मैं पूर्व हंसती। ऐसा कोई दर्द, ऐसी कोई बात ? जैसे संघर्षहीनता के बीच से मनाना हो कोई संघर्ष उठ राड़ा हो पता नहीं माधुरो इतना सब कैसे यह गई पो सेरिन इस जगह माकर उसमे मागे न यहा गया और वह रीता के कप से सगकर रोने लगी। रीता भी काफी उदास हो गई पो भोर सय पुप जानार हो उसका, मगता था दिमाग ही यंठ गया था।" "गावाग मधु ! तुम्हारे पास तेज दिमाग के पापा सोपने-माने ७८ | तीखा सूरज तथा सहने की शक्ति का मक्षय भण्डार है, मुझे आज पता लगा । खैर, घबरामो नहीं, बस प्रव समझ लो कि सब ठीक हो जाएगा। माज मुझे सोचने दो, कल तुम्हें बताऊंगी। वैसे, मेरा दिल कह रहा है। अच्छा- पच्छा भव वस करो।" कहकर रीता ने माधुरी का चेहरा अपने हाथों में भर लिया।
१२
रात में रोता ने हर्प को सारो यात बता दीं; इस यायदे
साय कि
यह मरेन से इस बारे में कुछ नहीं फहेगा। सुनकर हर्प भी काफी गंभीर
हो गया।
"बड़ी विकट समस्या है ?" रोता ने पहा ।
"हो ।" हर्ष ने पड़े-पड़े जवाब दिया ।
"मर्द को
मुपारना
"म्म मजाक कर रही हो रोता, मुझे पता नहीं कंगा-गा महसूस हो
रहा है भव ।"
"मरे मभार नहीं यावा ! जरा पान मे सोची और मुझे भी गोपने
दो।"पहार रोता दूसरी मोर करवट से गई।
८० तोला सूरज
काफी देर तक वे दोनों अलग-अलग सोचते रहे। फिर अचानक रीता
के दिमाग में कोई स्कीम चढ़ गई।
"ऐसा करते है।"
"वोलो", हर्प फौरन उसकी मोर मुड़ गया।
"हम लोग मसूरी का प्रोग्राम बनाते है और तुम किसी तरह नरेन
भैया को साथ चलने के लिए राजी कर ली। देखो पन्द्रह दिन में ही कुछ
न कुछ हो जाएगा।" रीता ने बड़े विश्वास के साथ कहा,
"मौर देहरादून
से ऊपा को भी साथ ले लेते है । तुम समझ रहे हो न?"
"ठहरो-ठहरो । अब मुझे सोचने ।"
"लो भई सोचो । मरे इतने में सोचने की कोन सी बात है ?" रोता
पोड़ी चिढ़ गई थी।
"है, तभी तो कह रहा हूँ।"
"यपा?"""ऊषा के लिये तो तुम कहते हो, बहुत पहले से तुमने नरेन
को चुन रपसा है !"
"यही तो । मव में सोच रहा हूँ कि नरेन के लिये ज्या ठीक रहेगी
या नहीं।"
"जपा पर तुम्हें भरोसा नहीं ?"
"यह बात नहीं रीता । कपा मेरी बुमा को सड़की भले है, मैं उसे सगी
पहन सा जानता हूँ दरमसल दिक्कत नरेन को लेकर है । मय वह बहुत
ज्यादा काम्पलीकेटेड हो गया है। विचित्र सा । रूपा के लिए भी इनकार
कर दे तो कोई बड़ी बात नही । फिर चिन्ता तो यह भी है कि ऊपा उसे
संभाल भी पाएगी या!"
"यस । बोल गए ना पर तुमने हम लोगों को समझ क्या रमसा है ?
ही नरेन के इनकार करने की यान सो यह भी तुम मुझ पर छोड़ दो।
पारियों ने ही उन्हें ऐसा कर दिया है, मकियां ही उन्हें 'यंगा' कर
दंगी।"
"वाह ! ना कुप समझती हो अपने मातो?"
तीखा सूरज || ८१ "और नहीं तो क्या ? बेवकूफ हूँ ?" "नहीं ! कतई नहीं । तुम तो बहुत समझदार हो और मुझे फख है कि मुझे एक समझदार वीबी मिली है।" कहकर हर्ष ने रोता को अपनी और खींच लिया। "शुक्रिया अदा करो, नरेन भैया का।" "अरे बाबा शुक्रिया, शुक्रिया । सौ बार शुक्रिया । उसका शुक्रिया तो मैं जिन्दगी भर अदा करता रहूँगा। पता नहीं वह किन लड़कियों के बीच फंस गया ? नरेन जैसे दोस्त और तो हैं नहीं दुनियाँ में । कोई नरेन उसका भी दोस्त होता तो वह भी जिस लड़की को चाहता होता, उसकी हो गई होती। कोई झभंट ही नहीं था।" कहकर हर्ष ने रीता की पलकों पर होंठ रख दिए । अपने हाथों से वह रीता को गालों, तथा कान के नीचे सहलाने लगा।" "ऊह" रीता ने हर्प को होले से परे कर दिया, "अब नहीं । और फिर हम मसूरी तो चल ही रहे हैं।" "ठीक है।" हर्ष भी उधर को करवट ले गया। लेकिन जैसे ही उसे पता लगा कि रीता उससे मजाक कर रही है, वह फौरन पलट गया। "वाह रोता!" और इस बार उसने रोता को खूब कसकर पकड़ा ।
१३ रजन रात भर करवट बदलता रहा, उसे नींद नहीं मा रही थी। जब से कमला पर छोड़कर चली गई है उसका पर फिर से घरबाद हो गया है । कोई चिराग जलाने वाला नहीं है पर में, पूल्हा जलाने की तो यात हो मलग है । कई दिनों से यह मूसें पेट सिर्फ शराब पिए नरों में पुत्त लोटता है मोर बेसुप हो धारपाई पर पढ़ रहता है, मधेरे में ही। भूप को यजह से नींद नहीं भाती है, तो भी पड़ा रहता है । उमे लगता है जैसे धारपाई पर पर रहने के याद मव उठ जाना उमा काम नहीं है और उसमें सनी माम मर भी नहीं है। गुरे र मगा उपस्ता है तो यह सीया फैटरी को मार गिरते. परते पार देता है। यहीं पाग को एक हो पर बुध सा पी सेवा है और तोखा सूरज || ८३ फिर फैक्टरी में घुस जाता है तो बस शाम को ही निकलता है । कभी- कभी वह सवेरे भी कुछ नहीं खाता लेकिन शाम को जरूर वह रोज हो फैक्टरी से सीधा दारूखाने चला जाता है। रास्ते में देखने वाले देखते हैं लेकिन उसे कोई छेड़ता नहीं । लोग देखते हैं और उस पर तरस खाते हैं। कितना अच्छा प्रादमी था रज्जन मौर किस तरह तबाह हुआ जा रहा है ! लोग सोचते हैं लेकिन कोई उसके लिए कुछ करता नहीं। "मत छुप्रो मुझे सालो । मुझे किसी की जरूरत नहीं।" रज्जन भपने आप ही बड़बड़ाता है। तभी उसे आज की सुबह याद पाती है, “साले हट्टी वाले ने खाना खिलाने से इनकार कर दिया। उस साले को कैसे खबर लग गई कि अपनी फैक्टरी ठप्प होने वाली है ?.."और मुझे वहीं दूसरी जगह काम नहीं मिलेगा ?""मबे साले तुझे पैसा ही तो चाहिए न ? अपना ले लेना, पैसे का गुलाम साला।" रज्जन मन ही मन सोचता है लेकिन अब उससे भूख बर्दाश्त नहीं हो रही थी। वह बुरी तरह छटपटाने लगा था, "घर में तो एक चुल्लू पानी भी न होगा रज्जन, क्या करेगा?" वह अपने भाप से ही कहता है और फिर चारपाई पर पट हो जाता है "साली दुनियां है या कमीने लोगों का जमघट ?" रज्जन ने चाहा कि एक जोर को के कर दे। सारा कुछ उड़ेल दे इस दुनिया के सामने पौर यह दुनियां उसे चाट ले। "बेईमान, दगावाज । चोट्टे वेवफा" उसके मुंह से झाग की तरह गालियां उठ रही थीं। "तू साले कव से खानदानी हो गया था रे? बेटी चो देखते ही मन्दर सरक गया और छोकरों से कह गया किसी को भी उधार चाय मत देना ! देखता हूँ साले तुझे । भरै दुनियां का पैसा मार के भब चाय की दूकान खोली है तो एकदम से बड़ा मादमी बन गया । "कलाकारी दिखाता है । बनता है मादरचो"लिसक्कड़ । कविताई करते हैं ! साले, वे ही तो हो जो धक्के मार-मार के उस अखबार के दफ्तर से बाहर फिकवा दिए गए थे और सरऊ तब पंसे-पैसे को मोहताज कभी इसके मागे ८४ | तोखा सूरज 1 . तो कभी उसके पागे हाथ फैलाते फिरते थे। फंस गया था वह विचारा भोला-भाला शंकर और ऐंठ लिये थे उससे तीन चार सौ, नई किताब निकालेंगे मोर बेटा तुम्हें अपनी जमात में कर लेंगे । देखते जामो, फटाफट तुम कहाँ से कहाँ पहुँचते हो।""मरे साले, उसका कुछ नहीं बिगड़ा लेकिन तेरी नीयत तो उसने जान ही ली । मत कर शुक्रिया बेटा किं उसी के पैसे से तेरी चाय की दुकान चल रही है मौर उसकी दी हुई उतरन से भव साले कप-प्लेट और मेज-कुर्सी साफ करवाते हो। पहनते तो बड़े ठाठ से थे जैसे कि मां के यार ने वनवा के दिये हों। उसी की बदौलत माज साले इस इलाके में टिके हुए हो मजे से, नहीं तो दिन भर में चालीस पान खाने से पहले सौ जूते खाने पड़ते तो सब सुर्ती का मजा गोल हो जाता। कमीना कहीं का । रण्डियों की तरह पान से होंठ रंगे रहेगा और हर वक्त सिसिख्खी खिस्खखी""व्वा ह." रज्जन को वाकई एक के हो गई थी। उसकी मासों मोर नाक में शराब चढ़ पाई थी। बेहोशी की हालत में वह बड़बड़ाता रहा, "पर सालो मैं वेवफा नही । मैं कमीना नहीं । कमीनी कोई चीज थी अगर मेरे पास तो थी साली बेवफा औरत । वो भी अपने यारों के पास चली गई । जाम्रो सव""मरो सालो"मेरा क्या उखाड़ोगे ? मैं एक-एक को रगड़ दूंगा। चली जाय फैक्टरी भाड़ में । भाड़ में जाए नौकरी । भाड़ में जाए दुनियाँ । मरूँगा तो मर जाऊंगा। मरे सालो कितना कर्जा है तुम्हारा मुझ पर जो रोव मारने लगे ? खाना नहीं, चाय नहीं ! दारू नहीं !! हत्या ही न कर दो सब मिल के । मरते-मरते भी सब कर्जा चुका दूंगा। ढाई हजार तो फण्ड जमा है मेरा फैक्टरी में....
१४ "पैसों की परवाह मत कीजिए माता जी, नरेन को जाने दोजिए । कैसे-कैसे तो उसे मना पाया हूँ साथ चलने के लिए । कपड़ों और खर्च की भी माप फिकर न करें, मैं भी तो आपका बेटा हूँ" हर्ष ने वावू जी के कमरे में भाकर नरेन की माता जी को सब कुछ बता देना ठोक समझा, "पौर फिर माता जी कुछ दिनों के लिए उसका यहां से जाना जरूरी है। थोड़ा हवा-पानी बदलेगा तो कुछ हालत में फर्क माएगा ही। यहाँ रहते- रहते तो जल्दी ही उसका दम पुटने लगेगा।" हपं लगातार वोलता रहा, "और वैसे तो हम लोग साथ-साथ ही रहेंगे माता जी । नरेन मेरा दोस्त है कि मैं ही हूँ। ऊषा मेरी वह्नि है । इस नाते कुछ भी करने का हक है . मुझे। जैसे ही कोई बात बनेगी, पाप विश्वास रखिए माता जी, सबसे ।
। . पहले मैं मापको खबर दूंगा।"भव बस ठीक ही समझो सब .." मह- कर हर्ष बाहर जाने लगा, "और हाँ एक बात और है माता जी, जब तक मैं कोई खबर न हूँ, माप इस बात को गोल ही रखिए, किसी को भी पता नहीं होना चाहिए इसका।" हर्ष प्रव बाहर मा गया था। फिर वह सीधा रीता के पास चला गया, ऊपर । "रीता । मैंने मां को बता दिया है । तुम माधुरी से भी कह देना कि जब तक हम कोई खबर न दें, वात फैले न । नरेन को तो इस बात का पता लगना हो नहीं चाहिए, नहीं तो सब चौपट हो जाएगा।" "आप अपना काम कीजिए जनाब ! मैं अपना काम कर लूंगी।" रीता ने यूं ही हर्ष से कहा। "ऐ रीता ! ज्यादा बनोगी तो मैं"," हर्प अपनी बात पूरी भी न कर पाया था कि छत पर माधुरी मा गई । वह बुरी तरह झंप गया और नीचे उतरने लगा जैसे उसे कोई खदेड़ रहा हो । रोता और माधुरी हर्ष को नीचे उतरते देखती रहीं फिर वे दोनों खिलखिला कर हंस पड़ी। "देखा माधुरी !" रीता ने कहा । "हां रीता । भब लगता है तुम्हारी तारीफ करनी ही पड़ेगी। शुरु- मात काफी अच्छी है ।" माधुरी ने उत्तर दिया । "अरे शुरुआत ही नहीं, बस तुम देखती जामो । सब काम इतनी ही मासानी से हो जाएंगे। बस जरा धीरज रखो और...!" "मुझे क्या चाहिए रीता, हर्ष और नरेन दोनों भैया तुम्हारे सुपुर्द कर दिए हैं।' "और जो तुम्हें चाहिए मधु वह भी तुम्हें मिलेगा । लेकिन जरा और सन करो । तुम्हारे केस की सुनवाई बाद में होगी, भभी जरा इसे..." "इसे ही सुलझामो रीता, बाकी कोई मुसीबत नहीं है।" फिर हंसते हुए लेकिन विश्वासपूर्ण शब्दों में बोली माधुरो, “मेरा कोई केस नहीं है भाभी।" "अच्छा भाभो !" रोता माधुरी के गले जा लगी। चुहल से फारिग होकर माधुरी रीता की तैयारी में हाथ बंटाने लगी। उसके मन में एक मनजानो खुशी गुनगुना रही थी। .
१५ एक काली झील मासमान में तिर भायी है मौर हवा में उफन रही है । तपती हुई तलहटी में खड़ा नरेल ऊपर को प्रांखें किए उस झील के काले धुएं के पीच तरते कई लोगों के चेहरे धुंध के बावजूद एकाएक शिकन के साथ स्पष्ट देख रहा है। वे सब मस्थिर छटपटाहट के बीच भयंकर रूप से तिलमिला रहे हैं। सारे के सारे । बैचैनी से, जीने की सजा सी काटते हुए। धुएं की एक जबरदस्त लहर नरेल की मांखों में बैठ गई और उसके मस्तिष्क में पढ़ गई । काली झोल के बीचोंबीच तरता एक चेहरा उसके काफी नजदीक माकर मंडराने लग गया था । इस चेहरे पर मांखों को जगह सिर्फ छोटे-छोटे गड्ढे थे, सब कुछ ८८ | तीखा सूरज जिनमें डूब गया था मौर अब वे किसी पुराने बर्बाद कुएं की तरह बन्द पड़े थे। पहले इन गढ़ों में कुछ न कुछ हमेशा जगमगाता रहता था लेकिन एक दिन"। एक दिन अंधेरे का एक बहुत बड़ा तूफान पाया और उसका एक बहुत बड़ा थक्का भांखों में अपने समूचे पनेपन के साथ बैठ गया मौर एक पुरानी इमारत खंडहर हो गई। इस चेहरे पर सफेद दाढ़ी बड़ी बेतरतीबी से चिपको हुई है मानो हर वार कुछ कबूतर चेहरे पर उतरते और चेहरे का कुछ भाग नोच कर ले जाने के बदले अपने सफेद बुर्राक परों का चूरा वहीं छोड़ जाते रहे । नाक के ऊपर माथे के वीचों-बीच एक बहुत बड़ा गूमड़ भी ताजगी लिये हुए है। किसी उजाड़ चरागाह के बीच ढूंठ बन कर खड़े किसी उदास चरवाहे की तरह। अपने लहूलुहान हाथों के बिल्कुल नाकाम हो जाने से पहले इस चेहरे ने एक बड़ा अजीव काम किया; अपने सर के सारे बाल चीथ डाले । इस चेहरे के ठीक पीछे एक जनाना चेहरा झांकने लगा है । गोल, गोल । धूमता हुआ। चूंघट निकालने से लेकर उसके छलनी छलनी हो जाने तक की विष-यात्रा को पार कर सहज ही बुढ़ा गया चेहरा । इस चेहरे पर कभी गुलाब उगे थे। अब सिर्फ बर्फ है । जमी हुई प्यास को तरह । गलती हुई । टुकड़ों में। और बर्फ के बीच असली माकृति सिकुड़ गई है इस चेहरे की । लड़ने का पूरा जोश रोने में पारंगत कर गया है इस चेहरे को और यह चेहरा हर वक्त पहले वाले चेहरे से चिपका रहता है । भूल चुका है सब कुछ यह चेहरा । याद नहीं कि खुद के पैदा किये दो गुलाब मौर एक गुलदाऊदी अभी भी मांगन में पड़े हैं । सिर्फ अपनी तार-तार हुई जा रही धोती के गीले. पन को सुखाने के लिए मांगन में लगाई गई झरवेरी के कांटेदार सहारे भर को सराहने के लिए मजबूर है यह चेहरा । कोई भी मायाज इसके कानों से सिर्फ टकराती है मौर प्रांखों में इसने भी अंधेरे को समो रखा है, पहले वाले चेहरे की तरह । दोनों चेहरों में मंधेरे का बहुत बड़ा रिश्ता है।
ताखा सूरज || ८६ घूसे को तरह दनदनाता एक मर्द का सख्त चेहरा । जिद्दी काठ के दरवाजे की तरह । पूरी झोल के कालेपन को पी जाने की कोशिश की थी इस चेहरे ने और प्रब यह चेहरा ही इतना काला हो गया है कि इस धुप- पुएं के बीच काले चांद की तरह चमकता है। शाहजहाँ से होड़ लेने गया था यह, ताजमहल के करीय । भोर यहाँ इसे कालो चाँदनी 'मिली। इसका चाँद सा चेहरा उसके साथ काला हो गया पोर फिर फाली चांदनी दंश मारने लगी। दंश मारने की मादत की पहली खिलाफत में ही यह चेहरा फाठ हो गया भोर मय इसे भील के कार नीचे तया वाहर या अन्दर की कोई सवर नहीं 1 कोई भी चीज़ इसके मा पर भव सहर नहीं पैदा करती । मूंगा भी हो गया है शायद यह । कानों के भीतर से होता हुमा एक ताला इसको जुवान को पोड़ गया है, पोर इसके दिमाग में एक फोड़ा पक रहा है। झील में रिते लोगों को उमा मदाद चाहिए । अभी-अभी एक शहनाई गूंजी यो मौर उगमी गूंज नरेन के पानी में पुल गई। गुलदाऊदी ग गन्हें से पौधे पर एक चहा टंगा हुमा है, येवरा, निरीह । पाली झोप फे निवासियों में साई इराने अपनी हर एक पारी गोन पुर्यान कर दो है । सगप में काफी पहले ही बगिपत सो मार्च में धन गई है भोर यह इस झोन में एक रेत के महल बन पाने का मामार मार रहा है। मह मेहरा पहने है सभी पहरों में धान बारी-बारी में गामी परने उतरमा है मोर प्रोगन को झरवेरी से मनमानी पेटमा रिश्ता दरग पार पता है। कभी भी करबेरी कोटी कोपने कार मेग्ने में नागर नही निराइम पंह ने, इसको कोशिस र रिपोट से रामन पोर रियो चेहरे सर गुहार म र पापा पने सोच बस के उहा-पुनाए और हा पेहरा साने सादर मी ओम काली मन में एक एन निरई मेन में माने न रोहा-रूपमा लिए पूरा १० || तीखा सूरज ... से पहले यह चेहरा कई वर्षों तक अपने पापा के फ्रिज में रखा रहा था। वहाँ से निकलते-निकलते यह चेहग सुद ही एक फ्रिज हो गया था। और यह चेहरा ? तुरन्त ही खोली गई बोतल में से गिलास में उड़ेली जातो शराव की तरह । सर पर बालों के छाते की जगह फायड की कोई मोटी सी किताब रखी है और यह माथे पर छड़ी ? यह छड़ी कभी नरेन को भी छूती थी और कभी-कभी इस चेहरे और नरेन के बीच सिर्फ यही घड़ी होतो थी।" यह दो चेहरे एक साथ पाए । काली झील अन्दर भी मुस्कुरा सकने की ऊर्जा से लस । ये उसे भी अपना हमसफर बनाना चाहते है । लेकिन ये दोनों चेहरे डाक्टर की दी हुई टैग्लेट्स क्यों बनते जा रहे है ? और यह काली झील में क्या हो गया है ? सव चेहरे एक दूसरे का पोछा सा कर रहे हैं और गोल-गोल चक्कर काट रहे हैं।" और ये कौन से चेहरे है जो सबसे ज्यादा तेज-तेज भागे जा रहे है ? नरेन उन्हें नहीं पहिचान पा रहा है । और इन चेहरों के रंग भी बड़ी तेजी से बदलते जा रहे हैं। मरे ! अरे !!.."कालो झील पूरी की पूरी क्यों हिलने लगी ? और यह उलट जाएगी? नरेन ने भट से भपनी माँखें खोल दी । हपं उसके ऊपर झुका हुमा था। "उठो नरेन ! उतर अब । देहरादून पा गया ।" "इघर कहाँ लिए जा रहे हो हर्ष" नरेन को नीद अभी पूरी तरह उचकी नहीं थी। वैसे भी वह बहुत दिनों से नही सो पाया था, करीब पिछले दो साल से । जरा सी देर को फुर्सत मिली थी और वह ट्रेन के कम्पार्टमेन्ट में पता नहीं क्या सोचता-सोचता न जाने कब सो गया था। फिर जो सपना देखा उसने वह उसे और शिथिल कर गया था । देहरादून तीखा सूरज || ६१ में रात के दस बजे तो काफी सर्दी हो जाती है । ट्रेन से उतरने के बाद पता नहीं नरेन को वे कहाँ लिये चले जा रहे थे। "घर !" शायद हर्ष मुस्कुराया भी था। अंधेरा होने की वजह से नरेन उसे देख तो नहीं सका अच्छी तरह अलबत्ता चौंक कर देखने के बाद उसे हर्प की चाल से लग रहा था जैसे वह किसी सरप्राइज़ के चक्कर में हो। "पहले यार ! जब हम लोगों का टूर पाया था इधर, तुझे याद तो है न हर्ष, हम लोग जैन धर्मशाला में टिके थे। कमरा नं. ४ में ।" "यह कोई टूर नहीं है बड़े भाई । यहाँ रुकने के लिए मेरा घर भी "तेरा घर है ?" नरेन ने आश्चर्य व्यक्त किया। "मबे हद हो गई यार," हर्ष ने थोड़ा चिढ़ते हुए उसे पकड़ा, "हमने तुझे बताया था कि नहीं, हमारी बुमा यहीं माकर रहने लगी है । वे यहाँ के डिग्री कालेज में प्रोफेसर हैं ।" नरेन को कुछ याद आया। हां, बताया तो था हर्ष ने । भौर ट्रेन में तो रीता भी इन देहरादून वालों के बारे में बातें करती भायी थी । सचमुच हद तो हो गई । इतनी सी बात याद नहीं रख सकता भव वह ?... पता नहीं किघर-किधर को मुहे वे सब भौर कितनी देर चले, हर्ष ने उसे रुकने का इशारा किया था तो वह रुक गया था। हर्प ने मागे बढ़कर सामने वाले घर का दरवाजा खटखटाया मोर नरैन किसो जादुई गुफा के खुलने की प्रतीक्षा के रोमांच से भर उठा । वह देख रहा था कि हर्ष ने अपना ठन्ड से कांपता हाथ फिर से किवाड़ों पर मारा था मौर भब उसके दस्ताने पहिने हाथ लगातार दरवाजे को एक मामूली सी चोट पहुँचा रहे थे । थोड़ी देर के बाद दरवाजा खुला भोर हर्ष के बिल्कुल समीप एक भर- पूर माकृति पाकर सड़ी हो गयी। "ऊपा। हम लोग है । कब मे दरवाजा पिटपिटा रहा हूँ।"हर्ष ने यही जल्दी-जल्दी कहा लेकिन फिर भी उसके गब्द सदिया गए थे।
६२ || तीखा सूरज - "भैया ? नमस्ते।"मामो "पा जायो सब लोग", कहती हुई वह प्राकृति मन्दर हो गई। फिर एक-एक करके वे मन्दर प्रविष्ट हुए । नरेन ने कुली से सामान खुद ले लिया था। उसे पैसे देने के याद वह भी अन्दर घुसा । "पौर भी कोई है ?" वह प्राकृति प्रभी तक दरवाजे के पास हो थी। अब उसका हाथ दरवाजे को सांकल पर चला गया था। नरेन के नकार में सिर हिलाते ही उसने खट से कुन्डी चढ़ा दी । एक हल्की ध्वनि को बड़ी तीव्रता से महसूस किया नरेन ने और फिर उस छाया के साथ कुल सामान को घसीटते हुए वह मन्दर की भोर बढ़ा। "कुछ छोड़ दीजिए । मैं ले लेती हूँ।" उस माकृति से एक गुनगुना- हट' सी उभरी। "नहीं, नहीं ।" कहकर नरेन ने पूरे सामान पर अपनी पकड़ मौर तेज कर दी। "क्या प्रादमी हैं !" उसे हर्ष पर गुस्सा पा रहा था, “घर आ गया तो फट से भन्दर घुस गए । ख्याल भी नहीं कि कोई मौर भी आया है साथ में ! पोर कि सामान भी एक मादमी के मुकाविले ज्यादा है।" लेकिन वह घसीटता हुमा पूरा सामान खुद ही अन्दर ले माया । पता नहीं क्यों उसे एक विचित्र घबराहट का अनुभव चुपके चुपके हो रहा था। वह जल्दी से एकदम अकेला होना चाहता था । "नरेन ! मैं यहाँ हूँ।" एक कमरे में से रीता के हंसने की मावाज माई थी और फिर हर्ष का स्वर सुनाई दिया था। "मच्छा ।" नरेन भी उसी कमरे में घुस लिया । मन्दर एक छाया और थी, कुछ-कुछ उसकी मां की छाया से मिलती- जुलती भुको हुई सी, सौम्य सी । लेकिन कमरे में लगभग अंधेरा था । एक मोमबत्ती पता नहीं कब से जल रही थी भोर अब वह अपने माखिरी मंक का चीत्कारपूर्ण परिमंचन कर रही थी । नरेन को लगा कि वह मोमबत्ती उसके मन्दर गली मोर मय थोड़ी ही देर में समचा अंधेरा फैलने तीखा सूरज || ६३ । वाला है। "नरेन हो क्या ?" उस वृद्ध छाया पूछा "हाँ बुना जी । प्रणाम ।" नरेन ने उत्तर दिया । "जीते रहो बेटा। अच्छी तरह से तो हो। लेकिन तुम्हें तो कंप- कंपी छूट रही है । अपा, जरा अंगीठी गर्म कर दो। ये लोग काफी ठिठुर गए है, आज दिन में पानी भी तो क्या जोर का बरसा था कि बस देखते ही रहो ।"और हां, एक मोमबत्ती और दे जामो ऊपा । यह तो गई।" हंसते हुए बुया जी ने नरेन की मोर देखा, "बिजली भी माज शाम से ही गोल है इधर की,""बड़ा वैसा लग रहा होगा।" "नहीं नहीं"कभी-कभी चली ही जाती है बिजली," नरेन ने जल्दी से कहा, "विजली जाने का रिवाज हमारे हिन्दुस्तान में काफी है।" "सो तो है ही खैर । परे ऊषा ।" "मा रही हूँ माँ ।" दूसरे कमरे से एक खीझ भरा स्वर उठा । लगता था जैसे यह कोई चीज़ ढूंढ रही थी और वह उसे नहीं मिल रही थी।
१६ अव उसे लग रहा था कि जरूर कुछ देर लिये बदल गया था वह । मगर कैसे ? उसे खुद पर ही माश्चर्य हो रहा था । वल्कि अब तो भगर कोई और भाकर कहे कि "नरेन ! तुम ट्रेन में सो गए थे भई" तो वह शायद न माने । सोया तो वह वर्षों से नहीं। पिछले दो साल से उसे नोंद मा कहाँ रही है ? यहां भी उसको छटपटाहट इस वजह से कतई नहीं है कि यह जगह दूसरी है, घर भी अजनबी है और घर वाले भी। भजनबी होने को तो मब उसके लिए सव अजनवी हो तो हैं । मौर इससे उसे मव फर्क ही कहीं पड़ता है। पिछले दो साल में तो उसने किसी के भी बारे में कुछ खास तरीके का सोचना बिलकुल छोड़ दिया है । या कि मपने माप ही छूट गया है । नरेन को लगता है कि दोनों बातें एक ही है।
तीखा सुरज || ६५ तरह मंधेरा उसने वेचनी के विचित्र क्षणों में एक करवट मोर बदल ली। बोले होकर एक जोर की सांस लो और तब उसे महसूस हुमा कि मन्दर मोर बाहर कोई खास फर्क नहीं है। यहां कमरे में भी बाहर की और ठंढक दोनों मौजूद है । तव वह चित्त हो गया। अपनी डी एड़ियों को रगड़ने के बावजूद अभी तक उसको समझ में यह नहीं माया था कि पैरों के नीचे दबा हुमा कम्बल हर्ष का है या उसका चाला ही है, फटा, पुराना या फिर इसी सिलसिले में मागे सोचने की अपेक्षा उसने चाहा कि उसे एकदम से नोंद आ जाए, या फिर चारपाई या कपड़ों में वहाँ सटमल पैदा हो जाएं या मच्छरों को एक टुकड़ी वहां अंधेरे में मा जाए भौर वह उनसे जूनने में अपने आपको व्यस्त कर ले । सुबह चाय लेकर हर्प ने जव उसे दबोचा तब भी यह जगा हुमा पा। कम्बल जरूर उसने अपने चारों ओर कसकर सपेट लिया था जिसे उसने भव अपने से अलग कर दिया था मौर चारपाई पर उठकर पेठ भी गया था। रात के बादल अव भी छाए हुए थे लेकिन सवेरे की रोशनी कमरे में घुस माई थी। नरेन ने रात को ही मन्दाजा लगा लिया था कि यह कम्बल न तो हपं का था और न उसी का । यह सेवा मेजवान की ही यो। उसके लिये भी चाय लेकर ऊषा और रीता कमरे में मा गई पो। "कहो भई, रात कैसी कटी ?" हर्ष ने अपनी पाय सिप करते हुए पूछा। । "मजे से। लेकिन पार""मच्छरों तया सटमलों का प्रभाव पुरी तरह से खटका ।" नरेन ने भी चुटकी ली। सब हंस पड़े । हंसते-हंसते जपा ने नरेल को गौर से देखा + १६ || तीखा सूरज योली-"क्या फर्क पड़ता है। मच्छरों पोर खटमलों के न होने से कौन से पाप पाराम से सोए ? प्रापकी मासे बता रही है..." "कि मैं रात भर जागा हूँ।"है।" नरेन को लगा जैसे उसे चोरी करते हुए पकड़ लिया गया हो, "नहीं भई। कम्बल तान के पाराम से सोया हूँ मैं तो । मांखों पर माप न जाइए, वे तो पता नहीं, क्या न बता दें श्रापको।" कहकर नरेन ने हंसना चाहा लेकिन हंस लेने के बाद उसे खुद महसूस हुआ कि उसकी हंसी सिर्फ खिस्स-खिस्स होकर रह गई थी भोर कि उसके साथ इस बार कोई मोर भी नहीं हंसा था । नरेन ने उन लोगों के चेहरों को अलग-अलग करके देखना चाहा लेकिन उस वक्त यह संभव नहीं था। वे सब पापस में एक दूसरे को देखते रहे थे। उसे महसूस हुआ कि एक पल को उन लोगों ने उसे इग्नोर सा कर दिया है और वह इन लोगों के बीच बैमतलव अकेला पड़ गया है । उस सब के साथ-साथ अपने ऊपर भी काफी गुस्सा मा गया लेकिन वह इस गुस्से को आसानी से दवा गया । फिर भी, उसकी रात भर जागने की वजह से लाल हुई आंखें पोर ज्यादा लाल हो गई थी जैसे कोई कांच का टुकड़ा काफी गरम होने के बाद लाल हो जाता है और थोड़ी ही देर में बजाय पिघलने के चटख कर किरचों में बिखर जाता है। एक चूंट में ही उसने अपनी चाय खत्म कर दी और तब उसने मह- सूस किया कि उसके मुंह का स्वाद बेहद-चेहद बदल गया है । लग रहा था जैसे कच्ची मूंगफलियों को छिलके समेत चबा लेने के तुरन्त बाद ही एक गिलास बर्फ की तरह ठन्डा पानी पी लिया हो उसने । उसका मुंह अपने भाप कई कोणों पर विचक गया । उसे पता नहीं कब वे लोग विना उससे जवाब की अपेक्षा किये, बातें करना शुरू कर चुके थे और कब तक करते रहे थे। उसे यह भी ध्यान नहीं था कि उसने कब दुवारा कम्बल उठाकर अपने ऊपर डाल लिया था पौर कब वह फिर से चारपाई पर पसर गया था।
तीखा सूरज }} ६७ "मरे यार ! तू तो फिर घुस गया । उठना नहीं है क्या ?" हर्ष ने नरेन से कहा था और शायद पहली ही बार में नरेन ने कोई उत्तर नहीं दिया था। जब हर्प ने अपने मापको पूरा का पूरा उससे मुखातिब किया तो नरैन चौंका था और दुवारा पूछने पर बोला था-' -"नहीं यार ! अव जब तुम जान ही गए हो कि मैं रात में सो नहीं पाया, मुझे अपनी नींद पूरी करने दो। आराम करने से हालत बेहतर हो जाएगी; लेकिन मेरी वजह से तुम लोग अपना प्रोग्राम मत बदलो । मुझे माराम करने दो । इस वक्त तो, पता नहीं जो कैसा हो रहा है। लेकिन कोई चिन्ता की वात नहीं है ।"."बदहवासी के से मालम में वह पता नहीं क्या-क्या बोले जा रहा था। "मच्छा !" हर्प ने उसकी बात सुन लेने के साथ-साथ उसे घूरना भी शुरू कर दिया था। "हाँ-हाँ ।..." और इसके बाद नरेन रुक गया था और उसकी आँखों में खुद के पागलपन का एहसास तैरने लगा था जैसे कोई बर्फ का नुकीला टुकड़ा हवा में तैरने लगे। तब एकदम से नरेन ने अपने आपको ढीला छोड़ दिया। कुछ-कुछ उन्हीं लोगों की मरजी पर सा । "अभी हम लोगों का कोई प्रोग्राम बना ही कहाँ है ।" खैर तू माराम कर ले, देखेंगे तब।" कहकर हर्ष उठ गया था और सड़े होने के बाद उसने रीता तथा ऊपा को एक साथ देखा । यकायक हर्प चौंक गया । ध्यान से देखा, दोनों के कन्धे एक ऊंचाई पर मिले हुए थे। "और हाँ भाई । कोई चीज, कुछ जरूरत पड़े तो आवाज दे लेना। समझ गए न भाई साहब । यह मुझे प्रापसे जरूर कहना पड़ता है । मानो रीता।" जाते-जाते हर्ष एक तीर और छोड़ गया था। उसके जाने के बाद कप-बसी को समेट कर ऊषा तथा रीता भी वहां से खिसक ली थी । जाने से पहले उन दोनों ने नरेन को भर नजर देखा था। उनके जाते ही नरेन ने फुर्ती से अपने आपको कम्बल के नीचे छुपा .
१८|| तीखा सूरज लिया। बाहर पानी को बूंदें यकायक तेज हो गई थी और कंपकंपी की एक लहर अन्दर धंस माई थी। , शाम को हर्प उसे जबरदस्ती खींच ले गया। दिन भर के बाद भी उसका मूड हल्का नहीं हो पाया था और इस वक्त भी घूमने पामने की कोई तबियत नहीं हो रही थी, फिर भी कुछ सोचकर मना नहीं किया हर्ष को उसने। राजपुर रोड से पल्टन बाजार मौर फिर वहां से दिग्विजय टाकीज की ओर जाकर बाई मोर को मुड़ गया था हर्ष, साथ-साथ चलता रहा नरेन, बेमतलब सा। हवा में अभी भो नमी थी भौर सड़कें एक हद तक गीली थीं। पानी नहीं वरस रहा था, लेकिन लगता था कभी भी बरसना शुरू हो सकता है। नरेन ने देखा, लोगबाग इसी वक्त काफी भागम-भाग में हैं, न किसी को खुद देख रहे हैं और न खुद ही महसूस कर रहे हैं कि कोई उन्हें देख रहा है। अपने आप के देखे जाने के एहसास को लेकर लड़कियां काफी लापरवाह सी दौड़ी चली जा रही थीं । देखकर नरेन को थोड़ी तसल्ली हुई और तब उसने एक चैन की सांस लेनी चाही। "थक तो नहीं गए नरैन ?" नदी के पुल पर पाकर हर्प रुक गया था मोर नरेन को देख रहा था। फिर खुद ही पुल पर, रूमाल बिछाकर बैठ गया। थोड़ी देर खड़े रहने के बाद नरेन भी बैठ गया। हालांकि उसकी तबियत बैठने को उस वक्त कतई नहीं हो रही थी। पता नहीं क्या था। चाह रहा था कि ऐसे में चलता ही चला जाए, यूं ही, दूर खूब दूर, जहाँ उसको जान पहिचान का कोई न हो । और जब थक जाए' चलते- चलते, तो वहीं कहीं गुम हो जाए।
तोसा सूरज ||६९ लेकिन अब वह हर्प के पास ही बैठ गया था, बिना वोले । अनमना- "यह नदी बह रही है नरेल," हर्ष ने अपने और नरेन के बीच मा गए मौन को तोड़ते हुए कहा । "इसकी खास बात तुम्हें याद है कि नहीं ? पहले जब पाए थे, शायद"""शायद तब इसमें बिल्कुल पानी नहीं था। मभी है तो कुछ देर में बरसात खत्म हो जाने के बाद फिर से यह सूखी हो जाएगी। इतना डेर सा पानी "इतनी भरी-भरी सी दिखने वाली नदो।"ौर थोड़ी ही देर में बिल्कुल सपाट । ट्रक भी इसमें दौड़ते चले जाएँ। अजीव रास्ता बन जाती है यह नदी। अभी हो तो हाथी भी वहता चला जाए और तव ट्रक अच्छा, लगता है न अजीव ?" एक रौ में बोलते चले जाने के बाद वह नरेन को मोर घूम गया । उसे बड़ी हैरानी हुई जब उसने देखा कि नरेन अभी तक यूं ही गुमसुम सा बैठा है और काफी उदास ! पता नहीं, उसकी बातें उसने सुनी भी थीं, या यूं ही ? "तुम पार""अच्छा कुछ पता है, मैंने अभी-अभी क्या कहा था ?" नरेन मुड़ गया या हर्ष की ओर लेकिन उसके हाव-भाव में कोई परिवर्तन नहीं हुआ था। हर्ष को लग रहा था कि वह खुद बड़ी भजीब मन:- स्थितियों में फंसता जा रहा है नरेन के साथ-साथ, और कि इस हालत में वह नरेन को चुप होकर एकटक देखता भर भी नहीं रह सकता । तव वह फिर से बोलने लगा था। उसका ख्याल था कि चुप होकर किसी स्थिति को झेलने की अपेक्षा कई बार उस क्षण बोलते हुए काफी हल्का हुमा जा सकता है । लेकिन उसे अन्दर ही अन्दर कहीं यह डर भी था कि मरेन कहीं नाराज न हो जाय । नरेन के तब भी चुप रहने पर वह ही फिर बोला- "महाराज ! मैं कुछ कह रहा हूँ । देहरादून के इस बाहर वाले पल पर बैठा हूँ मापके साथ । क्या प्राप बता सकेंगे कि इस वक्त आप कौन सी दुनिया में हैं ?" कहने के साथ-साथ हर्ष ने अपने दोनों हाथ भी जोड़ दिये १००॥ तीखा सूरज । यह उसका अपना ट्रम्प कार्ड था और इस बार नरेन बिना मुस्कराए न रह सका। “यार, तुम्हें तकलीफ तो काफी हो रही होगी। लेकिन मैं सब सुन रहा था।" "खाक सुन रहे थे "साली कितनी मजेदार चीज थी प्रोफेसर भट्टाचार्य जी की फिलास्फी ! उसी का सूत्रपात करने जा रहा था और तुमने वाले एकदम मूड चौपट कर दिया।" हंसा भी था नरेन इस बार और हर्ष की पोर थोड़ा खिसक भी भाया था। "फिलास्फी ।"अच्छा तू भई चालू रह । वैसे मेरी फिलास्फी"।" "सब जानता हूँ यार, तेरी मेरो उसकी सबकी फिलास्फो जानता हूँ। यह भी जानता हूँ कि दुनियाँ में ज्यादातर लोग ऐसे हैं जिनके पास कोई जीवन दर्शन नहीं है और कि विना जीवन दर्शन के मादमी किसी भी टेण्डर करेक्टर पर बड़ी जल्दी फिसल जाते हैं; दृढ़ नहीं होते थे। मगर तूने कभी यह भी सोचा है नरेन, किप्रय तुझे देखकर मुझे भी हैरानी होने लगी है।" इस बार हर्ष गंभीर हो गया था। मरेन थोड़ी देर रुका रहा उसके बाद उसने हर्ष के कंचे पर धीमे से हाथ रख दिया । हर्ष ने महसूस किया, इस बार नरेन के पंजे में कुछ दग है मौर कंधा भी थोड़ा बोझिल हो गया है। "हर्ष !" नरेन के होंठ धीरे से हिले लेकिन तुरन्त ही फिर से शान्त हो गए। ऐसा लगता था जैसे वह अपने मन्तर को सबसे घनीभूत वेदना को इस क्षण समूची प्रामाणिकता के साथ कह डालना चाह रहा हो लेकिन ऐसा करते हुए उसे उस वेदना से एक जोरदार जंग करनी पड़ रही हो। एक मुद्दत से निर्विकार चेहरे पर कुछ रेखाएं सिंच भायी थीं। "तुम मुझे बच्चों की तरह बहलाकर यहां ले भाए हो हपं, लेकिन क्या तुम सोचते हो, मैं भी इसी तरह सुम्हारे साथ चला माया हूँ?" नरेन इस बार गंभीर तो या ही, सरल भी बहुत हो गया था इस दम । हर्ष को साखा सूरज || १०१ लगा कि शायद उसको जिन्दगी में आज से पहले इतना नाजुक क्षण कभी नहीं पाया है । वक्त के साथ पूरी-पूरी ईमानदारी निभाते हुए हर्ष ने नरेन की ओर देखा और फिर अपना दायाँ हाय नरेन के कन्धे पर रख दिया । नरेन को देख रहा था वह, अभी भी। लगता था इस क्षण बोलने का अधि- कार उसे नहीं है। नरेन ने हर्ष की आत्मीयता में से अपने प्रश्न का उत्तर पा लिया था। पिघले हुए शीशे की तरह बहने लगा फिर वह; खण्ड-खण्ड । "बहने की बात करते हो हर्ष, पहाड़ों के पास आकर देखोगे, हर सरिता को ऐसा ही पामोगे । जानते तो हो न, ये नदी यही पैदा हुई है । पानी है । सूख जाती है । रास्ता बन जाता है । लेकिन तुमने कभी यह भी सोचा है हर्ष, अगर यह सरित जम जाय तो फिर कौन सा रास्ता बनता है ?" नरेन कह रहा था, हर्प सुन रहा था। "हेरान मत होमो मेरे दोस्त, हैरान मत हुमा करो। और..." नरेन ने अपनी आँखें ऊपर उठा दी थीं। कोई दृढ़ता थी जो हर्प की आँखों में तरल हो गई थी लेकिन इस वक्त उसने नरेन से आँखें मिला रखी थीं। "मेरे चैन को फिकर मत करो हर्प । मुझे कभी चैन नही मिलेगा अव ।" कहने के बाद नरेन को लगा, अब वह हर्ष से उतनी ही आसानी से भाँखें नहीं मिलाए रख सकता। "अकलमन्द आदमी की एक ही ट्रेजिडी है हर्ष ! जब उसे यह मालूम हो जाता है कि यह दुनियां अपनी ही रफ्तार से चलती चली जाती है । न उसके जिन्दा रहने से इस दुनियां पर कोई असर होने वाला है और न उसकी मौत हो इस दुनिया में कोई फर्क ला सकती है। तब वह बौखला जाता है और अपना सब कुछ लगा देता है उन हरकतों को करने में, जिससे इस दुनिया पर उसका थोड़ा बहुत मसर सावित हो सके । होता कुछ नहीं, इधर खिसकामो, उधर खिसकायो, नीचे ठेलो, ऊपर फेंको। दुनियां यहीं को वहीं रहती है मौर वह मादमी इसी चक्कर में सत्म हो जाता है। लोग उदार होते हैं मोर मान लेते है कि अमुक ने दुनियों को इधर से उधर १०२ ॥ तोखा सूरज कर दिया। तुम्हें पता नहीं हर्ष, यह एक बहुत बड़ा सच है, सूरज जितना । पौर तीखा भी । यह सच आदमी के अन्दर होता है। दुनिया भर की किताबें पढ़ो, हर किताव के सच को, बाहर के सच को, इस एक अन्दर के सच से भाइर्डन्टीफाई किया जा सकता है । लेकिन हर्प, सूरज में रोशनी के अलावा तपिश भी होती है । वह जलाता भी है । मुझे ऐसा लगता है हर्प जैसे मैंने एक सूरज निगल लिया हो और उसकी पैनो-पनी किरचें मेरे पेट में अभी भी वाकी हों । शायद वे हमेशा रहें, मेरे ही अन्तर को सालते हुए । मैं अन्दर से खुरदरा और एक मायने में कमजोर भी हो गया हूं। जिन्दगी भर किसी और झूठे सच से कोई भी समझौता समझो मैं नहीं कर सकूँगा और शायद भपने अन्दर के तीखेपन तथा तिलमिलाहट से कभी मुक्त न हो पाऊँ मैं । लेकिन..." नरेन इसके बाद चुप हो गया था मौर फिर थोड़ी देर बाद पुल मे नीचे उतर भी पड़ा था। "कोई ज्यादा हर्ज न हो तो हम लोग चलें ?" नरेन ने ही पूछा था मौर हर्ष भी नीचे उतर पड़ा था। रात भी हो चली थी भोर कोहरा भी घना होने लगा था। वे दोनों चुपचाप काफी दूर तक चलते रहे। बिना वोले । दिग्विजय टाकीज पर माकर घर की ओर जाने के इरादे से वे लोग मुड़ चुके थे, तभी नरेन बोला था-"माज मैं खाना नहीं खाऊंगा हर्प !" हर्ष ने सुन लिया था, चुपचाप ।
१७ सुबह ही सुबह नरेन इतनी जल्दी जाग गया, उसे खुद माश्चर्य हुआ। उठकर चारपाई पर बैठ गया वह । सर्दी थी सो कम्बल लपेट लिया । उसे सोचते रहने का कोई खास मौका नहीं मिला । दरवाजा हल्के से धक्के से ही खुल गया था और रीता मन्दर मा गई थी। "जाग गए भैया ! मब कैसी तबियत है ?" "एकदम मन्छी ! क्यों, क्या कह दिया हर्प ने ?""मरे मुझे कुछ हुमा थोड़े ही था।" नरेन खिलखिला कर हंस पड़ा। वह जानता था कि उसने रात को जो खाना नहीं खाया था तो हर्ष को कुछ जरूर ऐसा-वैसा कहना पड़ा होगा सबसे । रात को किसी ने परेशान नहीं किया था। यह माकर चुपचाप सो गया था और उसे किसी ने नहीं घेड़ा था।
१०४ || तोखा सूरज "नहीं नहीं ! कोई...." "कुछ भी नहीं रीता ! "तुझे मोर समझदार होना चाहिए था। अच्छा मेरी चाय ?" नरेन बड़ा लाइट मूड में है, यह देखकर रीता को पान्तरिक खुशी हुई। "अभी लो।" वाहने के तुरन्त याद वह दरवाजे से बाहर निकल गई। नरेन ने चैक किया कि जाते वक्त रीता के पैरों में मधिक ग्रावेग था । थोड़ी देर बाद चाय लेकर ऊपा पाई। "अब कैसे हैं पाप ?" शब्दावली मौर ऊपा की मुद्रा देखकर मरेन चौंक पड़ा। रुक कर बोला, "ठीक हूँ।""क्या हुमा था मुझे ?" कहते- कहते नरेन कुछ रूखा हो पाया था। हाथ बढ़ाकर चाय का प्याला ले लिया और सिप करने लगा। "ईश्यर करे मापको कुछ हो भी न,"कभी।" नरेन इस बार फिर चौंका था। अबकी बार उसने ऊपा को गौर से देखा। "चाय में चीनी कम है।" उसने एक लंवा चूंट भरते हुए कहा था। "चीनी ! भोह ! तब रुकिए," और ऊपा हड़बड़ाती हुई तेजी से बाहर चली गई थी। नरेन ने एक और लंबा चूंट भर कर प्याले की शेष चाय भी सुटक लो। उसे लगा कि इस बार चाय को इतनी जल्दी पी लेने के बाद चेहरा गले तक कुनकुना हो गया है । पहले सहस्रधारा चला जाए या डाक पत्थर, नरेन ने इस बहस में भाग नहीं लिया था। जब ऊपा की माता जी ने माज मसूरी ही घूम माने की सलाह देकर झगड़े का निपटारा किया था, तब भी उसने कोई विशेष उत्साह नहीं दिखाया था । और जब वे लोग देहरादून मसूरी को रवाना भी हो चुके ये तब भी कपड़ों आदि के बारे में उसने कोई रुचि नहीं ली थी।
तीखा सूरज || १०५ टोल-टैक्स देने के लिए जब बस रास्ते में रुकी तब गिनती से उसे पता चला कि वे लोग चार मादमी हैं और इस हिसाब से हर्प ने छः रुपये कण्डक्टर को पौर दिये हैं। वस रुकी है, तब तक चाय या काफी ही पी लेने के बारे में शायद रीता ने कहा था लेकिन अब जब वह काफी पी रहा था तो इस क्षण उसे याद था कि काफी पीने की च्वाइस ऊपा की थी। सांप की तरह टेढ़ी-मेढ़ी काली सड़कें पहाड़ियों की गोद में किसी तिलिस्म के बसे होने जैसा एहसास फिर कराने लग गई थी। वह देख रहा था कि हर्ष और रीता दोनों, पहाड़ियों के नीचे इन्हीं चवकरदार सड़कों पर आ-जा रही टैक्सो, ट्रक और कार तथा वसों को काफी दूर-दूर तक देख रहे थे। एक बार मोड़ पर नरेन ने भी नीचे झांक कर देखा। काफी तीखी कगार मोर उस पर तिरछे उगे हुए पेड़ों के अतिरिक्त उसे कुछ और दिखाई नहीं दे रहा था। अगले मोड़ तक वह तमाम कगारों को ही देखता रहा जो काफी शार्प थीं और वड़ी फूहड़ सी लग रही थी । मोड़ पर की तेजी में उसे लगा जैसे बस सड़क पर से उतर कर एक बहुत ही भुरभुरी कगार पर उछल गई है और थोड़ी ही देर बाद वह कगार ढहकर इतने सर्द मौसम में उसे पसीना मा गया था अपनी कल्पना पर । रूमाल निकालकर उसने घबराहट को चेहरे पर से एकदम पोंछ देना चाहा । तभी उसे ध्यान पाया कि कहीं उसकी अतिरंजना पर कोई ध्यान तो नहीं दे रहा ! बगल की सीट पर देखा । दूसरी ओर की खिड़की से उन रूखे पहाड़ों को बड़े गौर से देख रही थी ऊपा । उसे नहीं देख रही है वह, जानकर उसे काफी राहत मिली और तब उसने अपनी निगाह मागे की सीट पर उठा दी। हर्प और रीता भी वैसे हो बैठे जैसे-जैसे वे ऊपर पहुँचते जा रहे थे, मौर अधिक घने बादल उनसे टकराते जा रहे थे। वे पूरी तरह से कोहरे में घिर गए थे। पूरी बस लगता था अन्दर से भीग गई हो । नरेन ने देखा, उघर की सीट पर ऊषा ने खिड़की का शीशा चढ़ा दिया था । अन्दर, अपने तरफ की खिड़की उसने हुए थे। १५ १०६ || तोखा सूरज भी बन्द कर ली। "कान वाघ लो नरेन, नहीं तो सरदी लग जाएगी।" हर्प ने पोछे मुड़कर उसे देखा था। "हाँ, हाँ।" कहते हुए नरेन ने मफलर को गले से निकालकर कानों को बांधने के लिए पीछे से निकाला, देखा, ऊपा उसे ही देख रही थी। बड़ी सीरियस नजर मा रही थी। दो संकिण्ड नरेन भी उसे देखता रहा तो ऊपा के चेहरे पर मुस्कुराहट उभर आई। नरेन फौरन नीचे देखने लगा और हड़बड़ाहट में उल्टी तरफ से मफलर को कानों पर लपेटने लगा। "बस, हम लोग मा ही गए मसूरी। क्यों भैया ?" बोलते हुए अपा हर्ष की ओर मुखातिब हो गई थी। .
१८
बहुत देर तक माधुरी सोचती रही। पत्र नरेन भैया को लिखे या
रोता को?
घर के सब लोग शायद सो गये थे लेकिन माधुरी को इस वक्त तक
नींद नहीं पाई थी। बहुत दिन हो गए भैया को गए हुए, अब तक कोई
खबर नहीं मिली । रीता ने भी नहीं लिखा कि आखिर अब तक कुछ हुआ
या नहीं ? उसने तो चलते वक्त रीता से कहा भी था, "ज्यादा खुश मत हो
जाभो रीता, प्राब्लम इतनी सीधी नहीं है ।" रीता सिर्फ मुस्कुराई थी
उस वक्ता
माधुरी रीता को ही पत्र लिखने बैठ गई फिर ।
मेरी अच्छी रीता!
F- -
१०८ || तोखा सूरज ? उम्मीद है दिन सूब हंसी-सुशी में जा रहे होंगे। मैं भी ठीक हूँ । हर तरह से ठीक । थोड़ी सी चिन्ता जरूर है, तुम्हारी पोर से । तुमने पत्र जो नहीं डाला है अभी तक । कितने दिन हो गए तुम लोगों को गए हुए शायद तुम भूल गई होगी रीता, भले यहां हूँ मैं, लेकिन मेरा मन हरदम . तुम लोगों के साथ ही है । प्रच्छा, जैसे ही मेरा यह पत्र तुम्हें मिले, फौरन एक पत्र डालना और उस पत्र में अब तक पत्र न डाल पाने के लिए क्षमा जरूर मांगना, नहीं तो तुम्हें माफ करना मुश्किल हो जाएगा मेरे लिये । समझी। माधी रात हो चुकी है रोता । सव सो रहे हैं, पता नहीं तुम..... संर मैं तो वजाय सोने के इस वक्त तुम्हें लिस रही हूँ। तुम लोगों को गए हुए वैसे तो बहुत कम समय हुमा है फिर भी मुझे ऐसा लगता है जैसे तुम लोगो को गए हुए वर्षों बीत गए । सच, अपने प्रासपास को देखकर भी ऐसा ही लगता है रोता ! भला कोई इतने ही दिनों में इतना सब कुछ बदल सकता है कहीं! मैं मुंझला नहीं रही हूँ रीता ! पता नहीं तुम्हारे पास अब तक कुछ बदला या नहीं, यहां तो वाकई बहुत कुछ बदल गया है । पच्छा हो कि वहाँ भी कुछ वदला हो । तुम कुछ कर पाई होवो मेरे भैया के लिए रीता, तो इससे ज्यादा खुशी की बात मेरे लिये और कोई नहीं होगी । मगर भैया में कुछ चेन्ज हुमा होगा, तब तो रोता, तुम्हारा एहसान मानना ही पड़ेगा। सर । जो कुछ भी मैं तुम्हें लिख रही हूँ, यह सिर्फ तुम्हारे लिए ही है । भैया में मगर कोई चेन्ज न माया हो तो उन्हें कुछ भी मत बताना । ग्वालियर से मामा जी को चिट्टी पायी है । वे सब युध जानते हुए भी हम लोगों पर नाराज हो गए है। वैमे उनका यहना भी ज्यादा गलत नहीं है । पिपने दो साल से तो टाल हो रहे हैं, यह तीगरी यार भी हम लोगों ने टाल दिया। मामाजी की सस्त हिदायत थी कि इस यार ये कुछ नहीं मुनगे। साल में मिकं दुध दिनों के लिए यहाँ म भाता है। कितने लोगों ।
तीखा सूरज || १०६ को तो उससे अपनी आँखें वापस मिल जाती है । जैसे ही उनकी चिट्ठी मिले, हम फौरन पिता जी को लेकर वहाँ पहुँच जायें। लेकिन उन्हें गुस्सा इसी बात का है कि किसी को भी कोई खास फिकर नहीं है उनके प्यारे जीजाजी की । इस वार भी लेकर नहीं पहुंचे और कैम्प फिर उठ गया । तुमसे क्या छिपा है रीता, क्या हम पिता जी को फिर से देखते हुए नहीं देखना चाहते ?""लेकिन.. मैं तुमसे कह भी क्या सकती हूँ रीता, कोई विन्दु कल किस दिशा में होगा, कुछ भी नहीं कहा जा सकता । दिशाहीन सा दिखता है लेकिन कभी भी कोई बिन्दु अदृश्व नहीं होता। कल भैया के प्रोफेसर डा. विनय का नौकर पाया था, सरिता का नौकर । तुम्हें भी जानकर दुःस होगा रीता, सरिता माजकल कानपुर के टी० बी० सैनिटोरियम में एडमिटेड है। जब से मैंने सरिता की इस हालत के बारे में सुना है, मैं एक भयानक खतरे की संभावना में घिर गयी हूँ। सरिता और नरैन के बीच की गुत्थी मेरे लिये क्या, शायद सबके लिये ही एक पहेली ही होगी रीता""भैया तो बिल्कुल ठीक-ठाक है ? तुम मेरा यह पत्र पाते ही मुझे एक टेलीग्राम कर देना, मुझे काफी घबराहट हो रही है।" तुम्हारा तार और चिट्ठी मुझे दोनों ही मिलने चाहिए । कुछ न मालूम रहने पर मेरो हालत क्या होती है, रीता, तुम्हें तो समझना चाहिए । वात मेरी कतई समझ में नहीं पाती। पता नहीं क्या हो गया है, तुम्हारे जाने के बाद से अब तक मैं मीना को भी लगातार दो पत्र लिस चुकी हूँ, लेकिन उसने कोई जवाब नहीं दिया ! सुना था उसे कोई डिलीवरी होने को थी। कहीं वह नहीं रोता, ऐसा नहीं हुमा होगा। मैं तो खामखा घबरा रही हूँ । मोना सब कुछ सह सकी होगी, मुझे पूरी उम्मीद है। ईश्वर करे वह बिल्कुल ठोक हो। पपी मर गया है रीता ! तुम्हें याद तो है न, ववपन में जब हम लोग खेला करते थे मांगन में, तो दिन में भी मक्सर किसी भारी भरकम जानवर 1 ११० ॥ तोखा सूरज की परछाई को मुडेर पर कूदते देख कर कितना डर जाते थे हम ! कितने बन्दर माते थे छत पर लेकिन हमारे पपी ने उन बन्दरों के छक्के छुड़ा दिये थे रीता । क्या मजाल कि माज भी कोई बन्दर छत पर मा जाए। और जब छत पर बैठकर हम लोग दूर ताका करते थे तो बतासो चाचो का आँगन देखकर कितने खुश हुआ करते थे । सबसे बड़ा माँगन था उनके घर में। गेंदा, सूरजमुखी भोर कनेर के अलावा वोगन-विलिया के फूल ही फूल नजर आते थे उनके आंगन में। अब तो खैर घर के पीछे बगीचे में ही उन्होंने सब फूलों को पहुंचा दिया है । आँगन में तो, अब जब कभी ऊपर छत पर चढ़कर देखती हूँ, चाची का इकलौता अशोक कभी- कभार दिखाई दे जाता है । उस घर में एक दुर्घटना हो गई है, चाची की वहिन का लड़का भाया हुआ था इन्हीं दिनों, परसों गुजर गया वह ; यहीं । जवान होता हुआ लड़का था रीता, चल वसा । सच रीता! कितना कुछ नहीं बदल गया इन थोड़े से ही दिनों में ? किस्मत भगर कोई चीज होती भी हो तो होती बड़ी नटिनी है। क्या-क्या नाटक नहीं रचा देती यह ? नरेन भैया ने आज से दो साल पहले रज्जन भाई साहब से सिर्फ इस बात पर दोस्ती सत्म कर दी थी कि जिस लड़की को लेकर रज्जन घर बसाना चाहते थे, वह लड़की नरेन भाई साहब की निगाहों में कतई अच्छी नही थी और उनके मना करने के बावजूद रज्जन भाई साहब उस लड़की को लेकर घर में बैठ गए थे । तुम सोचोगी तो पता नहीं तुम्हें कैसा लगे रोता, कि जिस लड़की पर रज्जन भाई साहब को बहुत ज्यादा भरोसा और विश्वास था, वह उनकी तमाम ईमानदारी के बावजूद घर से भाग गई । कल बड़े भैया कह रहे थे कि रज्जन पागल हो गया है। उसकी फैक्ट्री जहाँ वह काम करता था, ठप्प हो गई है मौर कोई दो हजार के करीव उसका फण्ड मिलने वाला था उसे, फैक्ट्री के मैनेजर ने दाब लिया है। कोई ईमानदार मादमी किसी की बेईमानी सह कहाँ पाता है, रीता । रजत भाई साहब का सा भादमी पागल नहीं होता तो मोर क्या होता ?
तीखा सूरज || १११ कोई एक हो बेईमान थोड़े ही है अपने हिन्दुस्तान में । हाँ, भैया को बता देना कि जौनपुर डिग्री कालेज से एक लिफाफा और पाया है । भैज इसलिये नहीं रही हूँ कि भैया अगर अभी भी पहले की ही तरह है तो यह पत्र भी उनके लिये निरर्थक होगा। फिर से लिखा है उन लोगों ने कि ग्राफर ज्वाइन कर लीजिए, लेकिन मिलेगा आपको ढाई सो हो । हालांकि दस्तखत चार सौ रुपये पर करना होगा ! विद्रूपता की भी कोई हद होती है रोता ! भई बहुत लम्बा हो गया लेटर, अब बन्द करती हूँ, इस साशा के साथ कि तुम्हें अपने मिशन में पूरी-पूरी सफलता मिली होगी और तुम जल्दी ही ऊपा को लेकर हमारे यहाँ प्रामोगी । समझी भाभी! -तुम्हारी बहिन माधुरी माधुरी ने पत्र लिख लेने के बाद कागज को तहाया और फिर एक खाली लिफाफे में रखकर बन्द कर दिया। कल इस पर टिकट लगाकर पोस्ट कर दूंगी, सोचते हुए उसे लगा कि अब उसे बेचैनी के मुकाबिले कुछ राहत है।
. १९ एक नदी उसके पैरों के पास फूट पड़ी है और यहीं कहीं नीचे उतर कर इन पहाड़ियों में गुम हो गई है, नरेन ने सोचा। पहले जब उन लोगों का टूर माया था तो लाल टिब्बा की चोटी के इस मोर नरेन के पीछे सरिता माकर खड़ी हो गई थी। एक वड़ा सा ग्लेशियर उसकी पीठ में प्रा लगा। पीछे मुड़ा। सरिता मुसुरा रही है, जैसे एक साथ दो रसगुल्ले गपक लिये हों। सोचकर उसे बड़ी घबराहट सी होती है मौर उसी हड़बड़ाहट में वह पीछे मुड़ जाता है । पता नहीं ऊपा कब से उसके पीछे खड़ी थी। नरेन को लगा जैसे उसके सून में एक सुरसुरी सी पैदा हो गई है।
२० नल को तेज धार उसे सर से नीचे तक चीर गई है, अचानक नरेन को महसूस हुआ । वाथरूम से लगे कमरे में बैठे लोगों की बातें उसे बिल्कुल साफ-साफ सुनाई पड़ रही थीं। ऊपा की पावाज अनजाने ही तेज हो गई थी, "रोता भाभी ! मां का ही सही लेकिन मैंने इस अनुभव को कभी गलत नहीं माना । हमेशा मुझे यही सच लगता रहा रीता, कि सौन्दर्य अपने आप में भले निहायत कमजोर चीज है लेकिन उसमें एक गुण तो जरूर है। वह सामने वाले को और भी निर्बल कर देता है, सामने वाला कितना ही बलशाली और कठोर क्यों न हो। लेकिन रीता, मुझे आश्चर्य ही नहीं अफसोस भी है, भारी अफसोस । नरेन के अन्दर कुछ ऐसा जरूर है जिसमें प्रव सौन्दर्य भी कोई ११४ || तीखा सूरज फर्क नहीं ला सकता । देखने में मैं बुरी नहीं रोता, यह मैं अपने माप कह रही हूँ। मुझे इसका पता है""मुझे अफसोस है रीता, मुझे अफसोस है." और ऊपा की सिसकियां सुनते हो नरेन को लगा जैसे कोई तेज-तेज घूमने वाली धारदार चीज उसके अन्दर अब और भी ज्यादा तेजी से घूमने लगी है और उसके अन्दर के कटाव और भी बढ़ते जा रहे हैं।
२१ पेट को कस कर पकड़ रखा था नरेन ने। बड़ी देर तक वह दर्द से घटपटाता रहा, फिर उसने अपनी दोनों माँखें बन्द की और उस काली झील के अन्दर एक जोरदार छलांग लगा दी। सारा शहर जैसे धुएं की पर्त में गुम हो गया था या फिर नरेन की पाखों में ही कोई अजनबीपन उतर पाया था जो उसे अपना शहर ही पहिचान में नहीं पा रहा था। इस जगह कोई फैक्ट्री थी जो हमेशा धुमां उगलती थी मौर हर घंटे चोखती थी। काफी देर से वह यहां अपना पेट
११६ || तोखा सूरज
पकड़े खड़ा है लेकिन यहां उसे कोई हरकत नजर नहीं भा रही । सब कुछ
जड़ हो गया क्या?
धीरे-धीरे चलकर अपने मुहल्ले में दाखिल हो गया फिर वह ! मुहल्ले
का एकमात्र बगीचा एकदम खामोश पड़ा था भौर पूरे मुहल्ले पर एक
अजीब सी मुर्दनी छाई हुई थी।
किसी अंधे भिखारी की तरह भटकता हुआ वह अपने घर के दरवाजे
तक पहुंच गया था। उसके मकान को दीवारों से सड़े प्याज जैसी बदबू भर
रही थी।
हाथ लगाने से दरवाजा खुल गया था और वह चुपचाप अपने पिता
के कमरे की ओर बढ़ गया था। शायद 'वे' सो रहे थे।
उसे जोरों की प्यास महसूस हुई और उसने पिताजी के सिरहाने रखा
लोटा अपने मुंह से लगा लिया।
कोई इस कमरे में भा रहा था।
"मां !" उसने कहना चाहा लेकिन उसे लगा जैसे उसके अन्दर उमड़ता-
घुमड़ता तीखा कुछ अव उसके गले में आकर फंस गया है।
चाहा कि गले को सहला ले, लेकिन अपने हाथ को गरदन तक ले जाने
के बीच वह तेजी से चौंक पड़ा।
उसकी गरदन बाहर से भी जकड़ी हुई थी।
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दयाशंकर
जन्म : १७ जनवरी १९५५, करहल ( जिला मैनपुरी )
एम. एस-सो० (प्योर मेमेटिक्स ) इलाहाबाद
विश्वविद्यालय के छात्र ।
अमी तक चार-पार कहानियां पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित
तीखा सूरज पहना उपन्यास है।
दूसरा उपन्यास
'अकेले आदमी का सफर'
प्रकाशित हो रहा है।
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