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Pani Ka Peda

Krashna Chandra · 2011/03

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डान भारती 4/14, रूपनगर, दिल्ली-110007

पानीका
पद्य
कुन चन
SY

प्रकाशक
नान भारती,
4/14, रूपनगर
दिल्ली 110007
सर्वाधिकार
सुरक्षित
मूल्य
3800
प्रथम सस्करण
1990
मुद्रक
जतिन प्रिंटस,
नवीन शाहदरा, दिल्ली-32

क्रम
1
पानी का पेड
क्या करू 18
अमरीका से आने वाला हिंदुस्तानी 32
सौ रुपये
41
सपनो के इशारे 52
घर 67
हवा के बेटे 75
प्रखर ज्योति 93
परमात्मा 103

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पानी का पेड़ जहा हमारा गाव है वह दाना आर रुष मूखे पवतो की पथरीली शृखलाए है। पूर्वी पवत माला बिलकुल नगी है, वनस्पति नाम का नही, केवल उनके अदर नमक की खाने ह। पश्चिम पवत माला पर थूड, बकड, अमलतास और वीर क वक्ष उग हुए है। उसकी चट्टाने श्यामल है परतु इन श्यामल चट्टाना म मीठे पानी व दा जनमोल चश्मे है और इन दा पवत मालाआ कवीच, पटी म हमारा गाव आवाद है। हमार गाव म पानी बहुत दुलभ है । जब म मैंने होश सभाला है, अपन गाव के आकाश का तपत हुए पाया है, यहा की धरती को हाफत हुए दखा है और गाव वाला क परिश्रम करन वाल हाथा और चहरा पर एक एसी तरसी हुई भूरी चमक देखी है, जो शताब्दियो की अतृप्त तृष्णा से उत्पन हाती है। हमारे गाव के मकान और जामपास की धरती भूरी दिखाई पड़ती है । धरती स वाजर की जो फ्मल पदा होती है, वह भी भूरी बल्कि श्यामल-सी होती है । यही दशा हमार गाव व क्सिाना की है और उनके क्पडो की है। केवल हमार गाव की स्त्रिया का रग सुनहरा है, क्याक्वेि चश्म से पानी लाती है। बचपन से ही मेरी स्मृतिया, पानी की स्मतिया है। पानी की तडप और उसकी मुस्कान, उमका मिल जाना और फिर उसका खो जाना- यह धरती इसी + विरह को तथा इसी क मिलन की कहानी की पृष्ठ- भूमि है। -- मुझे याद है, जब मैं बहुत घाटामा था, ता दारी यमाय गाव की पाटी व नीच बहती हुई रवल नदी व विनार कपडे धान जाता था। दादी कपडे धाती थी मैं र मगाने लिए नदी किनार की चमकती हुई भूरी रत पर डाल दिया करता था। इस नदी म पानी बहुत कम था। यह बडी दुबली पतली नदी थी-घरहरी और मट गामिनी, जस हमारे मरार पदाया की लडपी वाना । मुये इस नदी माथ खेलन म उतना ही जानद मिलता था जितना याना के साथ मेनन म । दाना की मुस्कान मीठी और मधुर थी और मिटाम का मूल्य वही लोग जानत है जा नमक की खाना म काम करत है। मुझे याद है हमारी ग्वत्र नटी मान म वेयर छ महीन वस्ती थी- छ महीन के लिए सूप जाती थी। जब चत्र का महीना जान लगता, तो नदी सूखनी शुरू हो जाती और जब वमाख उनग्न लगता तो बिलकुल सूर्य जाती और उसकी तह पर कही कही छोट छाट नीन पत्थर पडे रह जात या नम नम कीचड जिस पर चलत हुए एसा लगता जम रशम 4 मार गलीचे पर घम रह हो। कुछ ही दिना म नदी का कीचड भी सूख जाता और उसक मुख पर दरागे और पपडिया वा जाल मा फल जाता-ठीक वम ही जम किसी परिश्रमी क्सिान + हाठा पर मूखी पपडिया जम जाती है । फिर एमा लगता जस उसकी गम गुदगुदी रत न वर्षों स पानी की एक बूत भी नहीं चपी मुझे याद है, पहली बार जब मैंन नदी को इस तरह मूखत पाया था तो बिलकुल व्याकुल और चितित हो उठा था और उम चिंता म रात को सो न सका था। उस रात दादा न गोट म लार मुये अजीब-अजीब कहानिया सुनायी थी । और मागे रात दाती की गाद म लट लट मुखे रवेल नदी की बहुत सी प्यारी प्यारा बात याद आती रही थी। उसका होल होन पत्थरा पर ठुमकत हुए चलना और पत्थरा के बीच स उसका वेग स और स्तरावर निकलना-जस बभी-कभी बाना नोध म गली के नुक्क्ड से गुजर जाया करती थी। नदी जहा एसे पत्यरो पर में गुजरती थी जो पास-पास होत थ, वहा । 2/पानी का पेड मैं और बानो वाजर के डठला से बनी हुई पनचक्की लटकालत और गीला आटा पिसवात रहत थे। और पनववी नदी की मर गति के बावजूद कैस-क्स तज चक्कर लगाकर घूमती थी ? परतु अब यह नदी सूख गयी थी। इन सब बाता को याद करके मैंन दादी से कहा, "दादी, यह हमारी नदी कहा चली गयी" "धरती के अदर छिर गयो है।" । 'क्या?" "सूरज के डर से।" "क्या यह सूरज से क्यो डरती है ? सूरज तो बहुत अच्छा होता 'सूरज एक नहीं है वटा, सूरज दो हैं-एक तो जाडा का सुरज है, वह बडा अच्छा और दयालु है। दूसरा गर्मिया का है यह बहुत ज्यादा चमकीला और गुस्से वाला है । और ये दोना सुरज वारी-बारी म हमार गाव मे जात है । जब तक जादा का सूरज रहता है वह नदी स खुश रहता है। परतु जब गमिया का जालिम सूरज आता है तो हमारी नदी के शरीर से उसका वस्त्र उतारना शुरू कर देता है। हर रोज कपडे की एक तह उतरती चली जाती है । और जब बैसाख का अतिम दिन आता है ता नदी के शरीर पर पानी की एक पतली सी चादर रह जाती है । और उस रात को हमारी नी लाज के मारे धरती म छिप जाती है और वाट जोहन लगती है जाडा के मूरज की, जो उमक लिए पानी की नयी पाशा लायेगा।" मैंने आखें थपकात हुए कहा, 'सचमुच गर्मियो का मूरज तो बहुत बुरा है " तालो, अब सो जाओ, बेटा। मगर मुझे नीद नहीं आ रही थी इसलिए मैंने एक सवाल और पूछा, 'दादी, यह हमारे नमक के पहाड का पानो क्डवा क्या है । हमार गाव क बच्चे पानी के बारे में बहुत सवाल करत है। पानी उनकी जिनासा को सदैव सचेत करता रहता है । दूसरे गाव म जहा पानी पानी वा पड/3 बहुत हाता है, वहा व वच्च शायद सान के द्वीप ढूढत होग या परिस्तान का रास्ता पोजत हाग । लकिन हमार गाव म ता बच्चे होम सभालत हो पानी की खोज म निक्ल पडत हघाटी म और पहाडी पर पानी खाजन का सल सलत है। मैन भी अपन वचपन म पानी योजा था और नमक के पहाड पर पानी के दो-तीन चश्मे खोज निकाल थ। विस तरह कापत हुए हाथो स मैन चट्टाना व बीच से शिसक्त हुए पानी को अपनी छोटी छाटी उगलिया का सहारा दकर बाहर निकाला था । और जब पहली बार मैंन उस अपनी आफ म लिया, तो पानी हाथ म या काप रहा था जस काइ नयी नयी परडी हुइ चिडिया क्सिी बच्च व हाया म फडफडाती है। फिर जव म उस जाक म भरकर अपनी जीभ तक ल गया, तो मुझे याद है, मेरी कपकपाती खुशी कम एक क्टु प्रतिक्रिया में बदल गयी थी। पानी ने जीभ तक जाते ही विच्छू की तरह डक मारा और उसक विप ने मेरी जात्मा तक को क्डवा कर दिया। मैंन पानी थूक दिया और फिर विसी नय चश्म की खोज म चल पडा । परतु नमक के पहाड पर मुये अब तक मीठा चश्मा न मिला इसलिए जब नदी सूखन लगी ता मीठे पानी के चश्मे की याद ने मुझे विह्वल कर दिया और मैंन दादी से पूछा, "दादी, यह नमक वे पहाड का पानी कडवा क्या है ?" दादी ने कहा, यह एक दूसरी कहानी है।' "तो सुनाआ 'नही, जब सो जाओ। "नही, सुनाआ । नहीं तो हम रो देंग। "अच्छा वावा सुनाती हू, पर तुम चिल्लाआग तो नही" "नही। 'और न बीच बीच म टोकाग?' नहीं। "अच्छा तो सुनो ! यह उस पार जो नमक की पहाडी दखत हो, क्मिी जमान म एक औरत यी जो उस पहाड की ब्याहता थी जहा आज कल मीठे पानी के चश्मे है। - 4/पानी का पड़ "फिर?" ‘फिर एक दिन दानवो मे बडी लड़ाई छिडी और यह सामने का पहाड, जो इम औरत का आदमी था, लडाई में भर्ती हो गया और अपनी औरत को छोड गया। जाते समय अपनी औरत से कह गया कि वह उसके आने तक कही न जाये क्सिी मे बात न करे, वम, अपने घर का खयाल रखे।" "अच्छा।" 'फिर कई वप तर वह औरत अपने पति दानव की बाट जोहती रही । परतु उसका पति लडाई से न तोटा । आखिर एक दिन एक सफेद दानव उमरे घर आया और उसकाम्प देखते ही उससे प्रेम करने लगा।" "प्रेम करना किसे कहत हैं, दादी?" दादी स गयी वोली, “तूने फिर टोका" मैंने मन म साचा अगर दादी उठ गयी ता वाली कहानी सुनने को न मिलगी । कहानी दिलचस्प होती जा रही है इसलिए चुपके से सुन लेनी चाहिए। प्रेम करने का मतलब बाद म पूछ लग । इसलिए मैंने जल्दी से मोचकर कहा, "अच्छा अच्छा दादी, अब आगे सुनाओ। जब नहीं टोकेंगे।" नादी वडी रुखाई म बोली, जम उह कहानी वा आग वाला हिस्सा पसद नहीं है। कहने लगी "होना क्या था । पश्चिमी पहाड की औरत के वफा निकली। जब उसे सफेद दानव ने झूठमूठ विश्वास दिलाया कि उसका पति लडाई म मारा गया है तो उमन मफेट दानव स ब्याह कर लिया।' "दानवो म लडाई क्या हुई थी?" 'तूने फिर टाका" दादी बहुत नाराज होकर गोली, "चल, आगे नही सुनाऊगी।' "नही दादी जी, मेरी अच्छी दादी जी अब अव बिलकुल नहीं टोक्गा'-मैंन खुशामद करते हुए कहा । इम पर नादी कुछ पमोजी, 'फिर एक दिन बहुत वर्षों बाद बूढा दानय घाटी मे आया। यह उमी औरत का पहला पति था। जब उमने पानी का पड/5 अपनी औरत को सफेट दानव के साथ दखा, ता उसे बडा त्रोध आया। उसने कुल्हाडा लेकर अपनी औरत और सफेद दानव को बल पर दिया। फिर वह स्वय भी मर गया। फिर य दानव लोग पत्थर के पहाड बन गय-बूटा दानव भी और उसकी औरत भी। चूकि बूढे दानव का अपनी औरत म प्यार था, इसलिए उसम मीठा पानी है। इसक विपरीत चूकि औरत न व-वफाई की थी, सलिए उसमे खारा पानी है। खार पानी का कारण यह है कि वह औरत पश्चात्ताप के आसू रोती रहती है जव उसके आसू सूख जात ह तो नमक के डल बन जात है जिह हर राज तुम्हारा वाप पहाट के जदर स खोदकर निकालता है। फिर? 'फिर कहानी खत्म।" कहानी यत्म हो गयी और मैं भूल गया कि मन क्या पूछा और मुये क्या जवाब मिला । मैंन कहानी सुनी, चन की साम लिया और लटत ही गहरी नीद मो गया। सात मात मरी आखा सामन नमक की खान का दश्य जाया जहा मर जव्वा काम वरत थ और जहा जवान हार मुझे काम करना था। माह क्तिनी वडी सान थी। चारा जार नमक की दीवारें नमक के खव नमक के आईन। एक आर नमक की पील थी, जिसक चारा जोर नमक की दीवारें थी और नमक की छन थी जिसस वूद वूद नमक का पानी रिसता था और नीचे गिरकर थील बन रहा था।' मेर अब्बा इस योल को दखकर बाल ' यहा इतना पानी है, परतु फिर भी कही पानी नहीं है। दिन भर नमक की सान म काम करत करत सारे शरीर पर नमक को पतली सी तह जम जाती है, जिस खुरचो ता नमक चूरा चूरा होकर गिर पड़ता है। उस समय क्तिनी अकुलाहट होती है । जी चाहता है वही मीठे पानी की झील हो और आदमी उसम गोत लगाता जाये। पानी। पानी।। सारे गाव म पानी कही नही या। पानी नमक के पहाड़ पर भी नहीं 6/पानी का पह था। पानी या ता सामन के पहाड पर जिसन प्रेम के साथ छल नहीं किया था, या पानी फिर रवेल नदी म था। परतु यह नदी भी वप मे छ महीन गायब रहती थी। एक दिन ता यह बिलकुल ही गायब हो गयी, हमेशा के लिए । आज उसकी जगह नील पत्थर है और मूखी रेत । और उसके किनारे चलन वाली औरता को निराश आखें आज तक उसकी राह तकती है। परतु यह मेर वचपन की कहानी नहीं है। यह मेरे लडवपन की कहानी है, जब हमार गाव स बहुत दूर, उन पहाडी शृखलाआ के दूमरी मोर, सक्हा मील लबी चौडी जागीर के मालिक राजा अकबर अली खा न हमार दहात वाला का इच्छा के विरुद्ध वेन नदी का बहाव मोडकर अपनी जागीर में कर लिया। आर हमारी घाटी को तथा निकटवर्ती प्रदश को सूखा, बजर और वीरान कर दिया। उस समय हमार गाव वाले इस तरह यथित हा उठे जैम बहुत-स वालक अपनी मा के मरने से अनाथ हा जात है । इस प्रकार रवेल नती हमार लिए मर गयी, उसका पानी मर गया । और हमार लिए एक सपती याद छाड गया। भये याद है, उस समय हमार गाव वालो ने दूसरे गाव वाला से मिलकर सरकार का एक अर्जी दी, राजा जकबर अली खा के अत्याचार के विरुद्ध । उहान सरकार म अपनी खोयी हुई नदी मागी थी, क्याकि नदी घर की औरत की तरह होती है । वह घर म पानी दती है, खेता को सोचती है । कपडे धाती है, शरीर का माफ करती ह । नदी के बिना हमारा गाव एसा था जैम विना औरत का घर। गार वालो को बिलकुल ऐमा लग रहा था, जसे किमी न उनके घर से उनकी वटी का अपहरण कर लिया हो। उनके अदर वही रोप था, वही काध था, उनके वही तवर थे, वही है मरने मारन के अदाज थे। लेकिन राजा अक्वर अली खा चकवाल के इलाके का सबसे बड़ा जमीदार था । अफमरा साथ उसका मेल जोल था। नमक की खान का ठेका भी उसी के पास था। नतीजा यह निकला कि गाव वाला का उनकी नदी न मिली, उलट हमार गाव के बहुत स लाग, जो नमक की खान मे काम करते थे, निकाल नई दिये गय । उनका दाप देवल यह था कि उहोन अपने गाव की अपहरित - पानी का पड/7 नदी का वापस लौटान की माग की थी। मुपे याद है उस दिन बन्दा कापत कापत घर म आय थ । उन चहर का रग उडा हुआ था और वे वार बार अपने कानो को हाय लगाकर कहत 'तोबा-तावा, सी गलना हुई । वह ता कुछ ऊपर वाल को महर थी किवच गया, वरना राजा मारव ता मुझे भी निकाल दन । मैं ता जब कभी राजा नाहर व विरुद्ध जर्जी न दगा चाह व पानी छाड, मरा लडकी हो क्या न उठावर ल जाय । तोबा नावा।' और यह भी सच है कि हमार गाव म पानी की इज्जत, वटा को इग्जत की तरह बहुमूल्य है-पानी, जा नीवन प्रदान करता है पानी ना नमा म ग्वत वनकर प्रवान्निहाता है पानी जा मुह धान को नहीं मिलता, पानी जिसके अभाव म वस्त्र मन आर गट रहन हैं, मिर म जुए, शरीर पर पगान वी धारिया और आत्मा पर पार जमा रहता है। यह पाना तो मान म अधिर मूल्यवान है और वटा स अधिक स्पवान । उमका मूल्य और मान तो हमार गाव वाला म पूछिए जिनका जीवन पानी के लिए तडन पगडन व्यतीत होता ह । एक बार मामन के पहाड क मीठे चश्मे स पानी तान के लिए सरवर खा की बीवी मला और अय्यूब खा का बीवी आयशा-दोनो आपम म लड पडी थो, यद्यपि दाना इतनी गहरी सलिया थी कि हर ममय माथ रहती थी। घर भी उन माघ-माथ थे चश्मे में पानी लन इक्टठे जाती थी। पहल एक पिर दूसरी पानी भरती थी। बारी-बारी एक दूसरे का पडा उठवाकर सिर पर रखना और फिर बात वरती पर लौटती थी। परतु उम दिन न जान क्या हुआ, दाना को जाने क्या जल्ली योनि एक कहती पहले पानी म भगी और दूसरी कहती कि पहल मैं । शायद उ एक दूसर पर नाध नही था शायद उहाव इस बात पर था कि यहा मोठे पानी का एक ही चश्मा था जहा नती के मूख जान के बाद लोग दूर पानी नन जात थे । मुह अधेर ही औरतें घड़ा कर चल पडना । जब वहा पहुंचती ता या ता एक तवी लाग्न पहल से लगी हाती या चश्मे के मुहम एक एमी पतली-माधार निक्लन देखती, जो आध घट म मुक्ति में एक घडाभग्नी और तीन कोम का आना जाना आस्लम कम न था। लगद का कारण कुछ भी हो, अमली . 8/गनी का पड .

लडाई पानी की थी। दोनो औरता ने देखते देखते एक दूसरे के मुह नोच डाले, घडे फोड डाले, कपडे फाड डाले और फिर रोती हुई अपने-अपन घरा को लौट आयी। वहा पहुचकर सदा ने सरवर खा को भडकाया और आयशा ने अय्यूब या को। दाना के पति फ्राध से पागल होकर, कुल्हाडिया लेकर बाहर निक्ल पडे और इससे पूर्व कि लोग आकर बीच-बचाव करें दोनो ने कुल्हाडियो से एक दसर को ढेर कर दिया। शाम होते हाते दोना पडोसिया का जनाजा निकल गया। हमारे गाव के कब्रिस्तान म बहुत सी करें पानी ने बनायी है। मेरे लडकपन के दिना मे जब ये दोना कत्ल हुए, उस समय सामन के पहाड पर ही मीठे पानी का चश्मा था। परतु बाट म जब मैं और वडा हुआ, तो यहा एक और चश्मा निकल आया। इस नये चश्मे की कहानी भी बडी अनोखी है। यह तब का जिक्र है जग हमारे पूहार में बड़ा भयकर अकाल पडा था और गर्मी के कारण सार नदी नाल और कुए सूख गय थे। केवल कही कही उन चश्मा म पानी रह गया था, जो पहाडा के खड्डो म थे, जहा मूय की किरणे नहीं पहुच पाती थी। उन दिना हमारे घरा की औरतें रात के दो बजे ही उठकर चल दती और चश्म नीचे सदा घडा की एक लबी कतार दिखाई देती, प्यास घडो की एक लवी कतार, जिमम स प्यास से बिलखते बच्चा की आवाजें जाती थी। उम जमान म बहुत से लोग भगवान मे सच्चाई म और नकी म अपनी आस्था खो बठे। उन लोगा में एक जलदार मनिक खा था। उसन थानटार पजल अली से मिलकर उस चश्मे पर पहरा लगा दिया और फिर तहसीलदार गुलाम नबीम मिलकर चश्मे के आसपास की सारी धरती मुरीद ली। फिर रातोरात उसके चारो ओर दीवार गडी कर दी और उसके द्वार पर ताला लगा दिया। इस चश्मे से कोई आदमी, बिना अनुमति के, पानी नहीं ल मकता था क्योंकि अब यह चश्मा जैलदार की मिलक्यित या और जलदार न चश्मे से पानी ले जाने वाला पर टक्म लगा दिया- एक घडे पर एक आना दो घडा पर दा आन । तब सार गाव म इम अयाय अत्याचार के विरद्ध शार मच गया। परतु पुलिस और मरकार जलदार के पक्ष मे थी, और इसलिए कानून भी पानी का पड/9 7 उसकी आर था। और जिगकी भार यानून था, साबा ओर पानी था। इसलिए गाव मे मा जवान और यूट और वन्च इमटले हारर मेर अम्बा नेपाम आय और वान चचा गुतावश अब तुम ही हम इस मुसीयत से छुटकारा दिला मया हो।' अह कसे? मर अग्वा न विम्मित होकर पूछा। माद है या मीठे पानी का चश्मा, जा अब जनदार मलिक या का हा गया है, यूटे हाविम या न कहा, 'तुम्हारा ही साना हुआ है। क्या तुम दूसरा चश्मा नहीं खोज मयत जागिर इम पहाड र गम म, इसकी महाया म और भी तो यही मीठे पानी का चश्मा हागा, जा प्रस्त मानव का अमत पान क्रामक | तुम हम मवम बडे हा, अनुभवी हा, अपना बुद्धि दौडाआ। हम तुम्हार साथ दौड धूप परन यो तयार है। हमार गाय म पानी नही है और पानी अब अवश्य चाहिए। मर जव्या चा पाइ पर कर बैठे थे । तुरत जल्लाह का नाम लेकर उठ खड हुए । माग गाव उन साथ था । पहाड पर चलाइ थी और पाना की तलाश थी। फरहाद वे पहाड काटन स पानी की तलाश अधिक कठिन है यह बात उम दिन मालूम हुइ, क्यापि पानी दष्टि | सामन नही हाता। वह ता छलावे का भाप्ति पहाड की मिलवटा म छिपा हाता है। पानी ता एक खानावदाश है । जाज यहा कल वहा । पानी एक परदशी है जिसक प्यार का कोई भरामा नहीं। पानी का अस्ति व उस भीनी सुगध का भाति है जा तज धूप म उड जाती है । इस पूगार के प्रदप म जहा औरते चरित्रवती और लज्जाशील है, वहा पानी छलिया और हरजाई है । वह कभी किसी एक काहाकर नहीं रहता । वह सदा यहा स वहा, एक स्थान से दूसर स्थान पर, एक प्रदेश स दसर प्रदश म विचरता रहता है । एसे छलिया, एसे हरजाई की खोज के लिए एक कुदाल नहीं, एक एसा शीशा चाहिए जिसके सामन पहाड का वध खुली किताव की तरह रोशन हो जाय । मेर गाव वाला न कुछ समझकर ही मेर पिता को इस काम के लिए चुना था। उम राज हम दिन भर ऊचे ऊचे पवतो की धूल छानन रहे । हमन कहा महा पानी नहीं खोजा-वरिया की घनी झाडिया में चटटाना की 10/पानी का पेड गहरी गहरी दराराम, गहरे अधेर खडडो मे, जगली जानवरो की मादा मे । पानी की खोज म मन सार पुरान चश्मे खोद डाले । लेकिन इनका खोदना एमाही था, जसे आदमी जीवन की खोज में करें खाद डाले। पानी कही नही मिला । एक चोर की भाति उसन स्थान स्थान पर अपने चिह्न छोडे थे । परतु अत म वह जुल दर वही लोप हो जाता था। जाने प्रकृति के विस कोन म, किस स्थान पर, किस गहरी खोह में बैठा हुआ वह अपने चाहन वाला पर हस रहा था। परतु गाव वाला न आशा नही छाडी। वे मारा दिन मेर पिता के पीछे-पीछ पानी की खोज करत रह। जत म जब शाम होन को जायी तो मेरे पिता न माथे का पसीना पोछकर, एक ऊचे टीले पर खडे होकर, उधर दष्टि दौडायो, जिधर सूय अस्त हो रहा था। सहसा उह अस्त होते हुए सूय के नारगी प्रकाश में चट्टाना की एक गहरी दगर म, फरन की घास दिखाई दी। और कहत है जहा परन उगी होती है, वहा पानी अवश्य हाता है । फरन पानी की पताका है और पानी एक विचरन वाला जीव है। पानी जहा जाता है, अपना यडा साथ ले जाता है। एक चीख मारकर मेर पिता उम ओर लपके जिधर फ्रन उगी हुई थी। गाव वाले उन पीछे पीछे भाग । जल्दी-जल्दी म मर पिता न धरती को नाचूना ही स खोदना शुरू किया। धरती जो ऊपर से सरत थी, नीच कामल होती गयी, गीली हाती गयी । अत मे जोर में पानी की एक धार कार आयी और सकडा मूखे हुए कठा स हप की ध्वनि निक्ली । पानी पानी ॥ मेर पिता ने कपकपात हाया स ओक म पानी भरा। सबकी दृष्टि उनके मुखपर थो । सैक्डा दिल नाशा और आशका से धडक रह थे- "भगवान | पानी मीठा हा । अल्लाह । पानी मीठा हा ।।" मेरे पिता ने पानी चखा। 'पानी मीठा है।"- खुशी म चिल्लाय । "पानी मोठा है।'-गाव वाल जोर से चिल्लाय । 'पानी मीठा है।"-सारी घाटी गूज उठी, "पानी मिल गया, पानी मीठा है।" पानी का प3/11 सारी घाटी म ढाल वजने लगे। बच्चे शोर मचाने लगे। गाव वाला न जल्दी से चश्मे को खोदकर अपन घर म ल लिया। अब चश्मा उनके बीच म था और वे उसके चारो ओर थे । और वे मुड मुडकर उसे इस तरह दघ रह ये जम भा अपन नवजात शिशु को निहार निहारकर पुलक्ति हाती है। वह गत मुझे मदव याद रहगी। उम रात का कोई आदमी गाव न जौटा । उस रात गाव वालो ने चश्मे के किनारे जशन मनाया। उस रात तारा की छाव म बरियो की छाया मे माओ ने चून्द सुलगाय और बच्चो को थपर थप पर मुलाया । उस रात कुमारिया न तहक-हक कर मद भगीत गाय-एस गीत जा पानी की तरह स्वच्छ और निमन थे जिनम जगली चश्मा को गूज और जल प्रपाता का प्रवाह था। उस रात मारी औरते सुदर थी सारी धरती उपजाऊ थी, सारी जडें हरी थी और मारे बीज अबुरित होकर फूट पडे थे । यह रात हमार गाय म तर आयी थी, जब मर पिता न भीठा पानी वढ निकाला था। पानी जा मानव र शम या द्रव था, पानी, जो उनकी चाह या अमत था, हमारे गाय म इस तरह आया था जम बारात की डाली पाती है। वह नया चश्मा हमार वीच आज इस तरह होले-होल लजाता यह रहा या जसे नयो दुम्हन ठिठयती हुई जनभान आगन में पग रखती उग रात मेर एक हाय म पानी था दूगर म दाना का हाथ था और आराश पर पुन धुत नारे थे। इस नय चश्मे र माय मेर यौवन-पाल को अगर मुगद स्मृतिमा सधित है। चमक दिनार मैंन यानो मे प्रेम मिया-बाना, जिमया गों व पानी को भानि लभ पा । जिस दयकर विचार आता था कि धरती प य र म मोडे पानी म जान दिनन चरम छिप ह सदर स्मृतिया की जान पिनी यौमी मिलें जमीन पर पडी । पाना या प्रेम कितना मौन पुरापार पा-घरमा प मोच बहन पान पाम मी मानि। वह माया मा पाप्रान पान व मुटपुर मग चम्म म पिनार माता पी- अप पाहाता-मामिवा। मागारमा मुग पर मुम्मान की 12/पानीमापर आभा ऐसे झिलमिला उठती, जस रात्रि के अधकार म प्रभात का प्रकाश। वह घडे को चश्मे की धार के नीचे रख देती। पानी घडे स वाते करने लगता और मैं बानो में । समय बीतता रहता और फिर घडा पानी से भर जाता। हमार मन खुशी से भर जात और हमार जाने बिना, कही दूर मे, सुबह यो धीर धीरे चलकर हमार पास आ जाती कि हम चौंक उठते। फिर में उसका धडा उठाकर उस सिर पर रखी लाल रंग की इडली पर रखता और वह मुस्वराती, पलटती, घूमती ढलवानो पर चली जाती और मैं उस निहारता रहता। मैं उस समय भी उसे निहारता रहता जव दूसरी औरते मेरी ओर देखकर मुस्करान लगती। और मुझे वह दिन याद आ जाता, जब मैंने दानी से पूछा था, 'दादी प्रेम करना किसे कहत है?" और फिर उम चश्मे के किनार की वह रात भी मुझे याद है जब में खान में काम करता था और दिन भर का थका घर लौटता था और चारपाई पर लेटत ही सा जाता था । सवेर ही मेरी आख खुलती थी। कई दिना सबानो स मिलन नहीं गया था, परतु कार चिंता न थी।वह साथ ही के घर म ती थी। उही दिना उसके चाचा का लडका गुफरान आया और चला भी गया, परतु मुये उससे मिलने का अवकाश ही न मिला, क्याकि मैं खान मे नया नया नौकर हुआ था और मुझे काम मीखन का वडा चाव था । और यह तो सब जानते हैं कि नमक की खान मे जापर आदमी भी नमक हो जाता है। एक रात बानो ने कहा कि रात में दो वजे चश्मे पर उससे मिलू । मैं बोला "म बहुत थका हुनाहू।" वह बोली, 'नही, जरूरी काम है । आना होगा।" चुनाचे मैं गया। दो बजे, आधी रात का, चश्मे न कोई नहीं था- हम दानो के अतिरिक्त । मैंने उसस पूछा, "क्या बात है?' वह देर तक चुप रही। मैंने फिर पूछा, "बताओ भई, बात क्या है ? वह बोली, "मैं गाव छोडवर जा रही है . man मेरा दिल धक से रह गया। मुझे लगा, जसे चश्मा बहत-बहत हा गया हो। मेरे गले से एक क्षीण सी आवाज निवती, 'क्यो?" "मेरी शादी तय हो गयी है।" 'किससे?" "चाचा लडके के साथ, जो लाम होकर जाया है।" 'और तुम जा रही हो?" मैंने क्टुता स पूछा। वह चुप हो गयी। मैं भी चुप हो गया। सोच रहा था इमे अभी जान से मार दू, या शादी की रात कत्ल परदू। थोडी देर ठहरकर वाना फिर बोली 'सुना है चरवाल मे पानी बहुन हाता है । सुना है, वहा बहुत बड़े मल होत है ! उनसे जब चाहा, टाटी खोलकर पानी ले सकत हो ।' उसका स्वर आह्लाद से विकपित था। वह शायद कुछ और भी कहती, परतु मेरी उदासी का खयाल करके एक गयी। मैंन उसके बिलकुल निक्ट जाकर उसे दोना कधो से पकड़ लिया और ध्यान से उसकी आखो मे देखा । उसन एक क्षण मेरी ओर दखकर निगाहे झुका ली। उसकी निगाहा म मेरी मुहब्बत स इनकार नही था परतु पानी के प्रेम का इक्रार था। मैंने धीरे से उसक कवे छोड दिये और उमस जलग हावर पडा हो गया । सहसा मुझे ज्ञात हुआ कि प्रेम सत्य, निष्ठा और भावना की प्रगाढता के साथ माथ थोडा-सा पानी भी चाहता है। बानो की आखो में एक ऐसा मार्मिक चाह का उलाहना था मानो वह कह रही हो "जानत हो, गाव म पानी कहीं नहीं मिलता। यहा मैं दा दो महीने नहा नहीं सकती। मुझे अपने आपने, अपने बदन से नफरत भी हो रही बानो चुपचाप चश्मे के किनारे बठ गयी। मैं रात्रि के उस अधकार मे भी उसकी आखा के अदर प्रेमा एक रुपहला स्वप्न दख रहा था स्वप्न जो गदे, बदबूदार, जूओ, पिस्सुआ और खटमला स भर चीथडा म लिपटा हुआ न था, वह स्वच्छ और निमल था। उमसे धुले वस्त्रा और नये जोडे को महक आ रही थी। 14/पानीपापड मैं बिलकुल हताश और वेमस होरर ए आर बैठ गया। रात दो बजे। बाना और दोनो मौन और निस्तब्ध कभी एसा सन्नाटा, जसे सारा ससार भूय है, अभी एमी निम्तन्त्रता जैम सार स्वर सो गय है। चश्मे र मिनार बैठी हुई बालो धीर-धीरे घड़े म पानी भरती रही। पानी धीर-धीर पडे म गिरता हुआ चानो से बात करता रहा मुझमे कुछ कहता रहा, उससे कुछ। पानी की बातें मनुष्य की सुदरतम, स्वच्छनम और स्वस्थतम बातें चानी चली गयी। जब बानो चली गयी तो मुये मुहब्बत की वह कहानी याद आयी, जिसम मुहम्वत रोयी थी और आमू नमक के इल बन गय थे। उस समय मेरी आसाम एक भी आसू था। परतु मेर हृदय म नमक बडे बडे डल इक्टठे हा गय थे । मेरे अतर म नमक की एक पूरा खान थी-नमक की दीवारें, नमक मे पय, नमक की छन और चार पानी की एक पूरी झील । मेर मन और मस्तिष्क पर नमन को एक बारीक मी तह जम गयी थी। और मुझे विश्वास हो चला था कि यदि मैं अमन शरीर का कही से भी सूरचूगा तो आसू फूटकर बह निकलेंगे। इसीलिए मैं पौन बैठा रहा था--निश्चल, निश्चप्ट, भाव शूप । जव बानो उठी थी, तो भी मै वटा ही रहा था, और उससे घसा उठार स्वय ही सिर पर रखा, तो भी मै बैठा हो रहा था और जब वह बलवान पर से उतरकर चली गयी थी, नो भी मैं चुपचाप बैठा ही रहा था क्यारि मेरे पास पानी नही था और बानो पानी के पास जाना चाहती थी। जिस रात बानो का च्याह गुफरान के साथ हुआ, मैंने एक अनोखा स्वप्न देखा। मैंने देखा हमारी बायी हुइ नदी हम वापस मिल गया है और नमक के पहाड पर मोठे पानी ये चश्मे उबल रहे है और हमारे गाव के थीचोदीच एक बहुत बडा पड पडा है। यह पड़ मारा का सारा पानी का पानी का पेड/15 है । इसकी जहें टहलिया, न पस, पतियां सब पानी भी है और इन सबसे पानी गिर रहा है और मह पानी हमार गाव मो यजर धरती का सोच रहा था। और मैंन दया कि विमा हल चला रहा है, औरतें पपडे धो रही हैं, खान म काम करन वाल अपन शरीर सनमा धा रह है, और बच्चे पता हार लिय पानी प पड व पारा आर नाच रह है और याना मर मधे स लगी मुझम बन रही है, “अब हमार गाय म पानी का पड उग आया है, अब मैं तुम्हे छोडकर नहीं जाऊगी।" यह बहा विचित्र सा स्वप्न पा। लपिन जय मैन अवा को सुनाया नावे मार डर के पापन लग। बोले 'तुमन यह सपना दिमी और को तो नही मुनाया' मन वहा नही ता । लेकिन आप डर क्या गम जव्वा यह ता सपनाही है। वे बाल "अर, सपना तो है, लेकिन यह लाल मपना है।' मैंन हमरर कहा 'नही म वा जो सपना मन देता था, वह लाल नही था। उसका रग तो बिलकुल वैमा था, जमा पानी वा होता है । वह पानी का पट था। उसकी टहनिया पत्तिया-सब पानी की थी। उम पड़ पर फ्ला की जगह शीशे की सुराह्यिा लटक रही थी और उनम पानी बच्चो की किलकारिया की तरह चमक रहा था। वे बोले "नही वेटा, कुछ भी हा, यह मपना खतरनाक है । अगर पुलिस ने मुन लिया। या इसका तुमन किमी मे जिक्र किया, तो व तुम्हें उसी तरह पक्टकर ले जायेंग जिम तरह व उन मजदूरो को पकडकर ल गय थे जिहान गाव की नदी को वापस लाना चाहा था इसलिए खर इमी म है कि तुम इम सपन का जिक्र क्सिी से न करा। इस भूल जाआ, जसे तुमने यह सपना कभी नही देखा । क्याकि इस सपन की चर्चा से कुछ न होगा। सूखी नटी सदा सूखी रहगी और प्यासे सदा प्यास रहा।" मुझे अपने अब्बा कठका विपाद और उनके स्वर को निराशा आज तक याद है। शुरू-शुरू मे इसका जिक्र मैन विसी से नहीं किया। 16/पानी का पेड - m लेकिन जब कुछ दिन बीत गय तो मैंने डरत-डरते अपनी यान के मजदूश से अपने सपन का जिक्र किया। परतु मेरा सपना सुनकर भयभीत होने के बजाय ये हसन लगे और जब मैंने उनसे पूछा कि इसम हसने की क्या बात है तो उहोंने कहा कि भला इसमे डरने की कौन सी बात है । यह सपना तो बहुत शुभ है और यहा खान मै हर एक देख चुका है । "क्या सच कहत हा-उसी पानी ये पड का सपना "हा हा, उसी पानी के पड का सपना-सवन दखा है पानी का एक पड हर गाव मे, मोठे पानी मा चश्मा हर नमक की खान म। घबराओ नहीं, एक दिन यह सपना अवश्य पूरा होगा। पहले मुझे उनकी बाता पर विश्वास नहीं हुआ। किंतु अपन साथियो साथ काम करत करत अब मुझे विश्वास हा चला है कि हमारा सपना अवश्य पूरा होगा। एक दिन हमार गाव म पानी का पड अवश्य उगगा, और जो जाम खाली है, व भर जायेंगे, और कपडे जा मले है, वधुल जायेंगे, और जो दिल तरस हुए है वे तृप्त हो जायेंगे। व तप्त हो जायेंगे । और सारी धरतिया, सारी मुहवीं, सारे वीरान और सारे मस्थल पानी से सतप्त होवर लहलहा उठेग । पानी का पड 17 ? क्या करू जगभग माढे नौ वज मरतार मटावहासिंह की फिल्म प्राडक्शन न० 17 चल चल र वाचवान व पहले दो गानो का रिमाडिंग लक्ष्मी स्टूडियो म समान हा गया । बचार मरदार मदावहार सिंह फिल्म इस्ट्री म नये नय जाय थे इसलिए मास्टर अच्छन रावन और गीत गान वानी मिस धनाश्रीन और माज बजान थालान अपने-अपने पमे वही स्टूडिया में रिकाटिंग में पहल ही वसूल कर लिय थे । रिकॉडिंग समाप्त हान के बाद जब तीना साज बजाने वाल स्टूडियो से 'बाहर निकल तो उ हान सोचा कि इस जवमर पर सबस निक्ट का शराबवाना र राड पर पड़ेगा। छोटो माखो और लवी दादी वाला सरमुख सिंह टोलकिया आग जाग हो लिया। उसके पीछे वायलिन बजाने वाला डिमला और बसरी बजान वाला नवाज (जा स्वयं भी इतना दुवला पतला था कि दूर स दखन पर एक बमरी नही ता वास की एक सपची अवश्य दिखाई देता था), चल पडे। यतीना पीन वाल थ। और इस समम तीनो ही दुरी तरह प्यास दिखाई पड़ रहे थे। इस समय उह लक्ष्मी- स्टूडियो स र राड के शराबधाने तक पदल जाना भी अधर रहा था। इसलिए इन नीना ने मास्टर अच्छन राव की पवाइवार को घेर लिया। उसम उम समय मास्टर जी की प्रेमिका मिस धनाश्री वैठी हुई थी, किंतु शराब का प्रेम औरत के प्रेम से कम नहीं होता। बल्कि पीन वाले तो कहते हैं कि शराब का नशा औरत के नश से अधिक दिया और गहरा - /18/ - होता है । खर, यह एक लवी वहस है जो संक्डो वर्षों से त्वल रही है और सकडो वर्षों तक चलती रहेगी। तो मिस धनाश्री की पोजीशान का खयाल न करके तीनो ने मास्टर अच्छन राव से प्राथना की कि ये रह र रोड के शरावखाने पर उतार दें। "तुझ पर साई बाबा मेहरबान हा, मास्टर ।" सरमुपसिंह मीरासिया" केस ढग में बोला। मास्टर अच्छन राव ने मुस्कराकर मिस धनाश्री की आर देखा। सावल रग की, प्यारी-मी,नाजुक-सी लडकी आखें युकाये एक कोन म दुवकी बैठी थी। उसन मास्टर अच्छनराव की ओर देखा भी नही । वितु मास्टर अच्छनराव का पता था कि इस समय मिस धनाधी इम गाडी मे एक क्षण के लिए भी इन लोगो की मौजूदगी को सहन नहीं करगी। मामला टढा था। इधर साज बजाने वाली का बार-बार निवेदन, उधर उम मनमोहिनी मूरत का नि शब्द विरोध । आखिर मास्टर अच्छनराव ने एक जोर का बहरहा लगाकर कहा 'बैठ जानो गाडी म क्वस्तो । साई वावा की दुहाई दकर कहत हा तो मैं कसे टाल सकता है ? क्या जानिया?" यह कहकर मास्टर अच्छनराव ने अपना काल बालों वाला खुरदरा हाथ मिस धनाश्री के कोमल क्धो पर टिका दिया और मोटर स्टाट कर दी। साई बाबा का नाम सुनते ही धनाधी अच्छन राव के कधे म लग गयी। साई बाबा बवई का सबसे बडा पीर है। वह हिंदुओ, मुसलमाना, ईमाइया सिक्खो-सबका पीर है। वबई जैसी कॉस्मोपालिटन जगह म जहा हर धम, जाति और विचार के लोग बसते हैं वहा एक कॉस्मो- पॉलिटन टाइप के साधु महात्मा, पीर पंगबर की भी आवश्यक्ता है जो "साई बाबा' ने पूरी कर दी है। फिल्म इंडस्ट्री के लोग तो विशेष म्प से साई बाबा के बडे भक्त हैं। प्रत्येक नमी पिक्चर के मुह त स पहल साई बाबा के मजार पर चढावा चढाया जाता है । पिक्चर बनने के बीच में फूलो की चादरें भेजी जाती हैं । यदि पिक्चर सफल हो जाये तो यह साई बाबा की कृपा समझी जाती हैं, असपत हा जाये तो पिक्चर बनाने वाल की गलती। दोनो अवस्थाओ मे सांई बाबा का कोई दोप नही । मानव और क्या करू/19 7" देवता मे यही अतर है कि आप मानव को-चाहे वह कितना ही महान क्या न हो-दोषी टहरा सकत है, किंतु आप देवी देवताओ पर किसी प्रकार का कोई दोप नहीं लगा सकते। इसलिए साई बाबा का नाम सुन कर मास्टर अच्छन राव की जानिया मिस धनाश्री चुप होकर रह गया। र रोड क अडडे पर अच्छन राव न गाडी का दरवाजा खोलकर सरमुख सिंह, डिमलो और नवाज को उतार दिया । वायलिन बनान वाला डिमला, जिसकी ठाडी वात चीत करत हुए भी गरदन व साथ एसा कोण बनाती थी जैस वह अब भी पिसी दालिन पर टिकी हुई है, मुस्कराकर वोला 'मास्टर, एक गिलास मार साथ पीना मागता 'नहीं, नही डिमेलो , अच्छन राव अपनी प्रेयसी की और देवर वाला 'अब स्कूगा तो जानिया नाराज हा जायगी। क्या, जानिया ।' और यह कहकर अच्छन राव ने एक जोर का वहकहा लगाया। जब अच्छन राव कहकहा लगाता है तो इसका शरीर इस तरह कापन लगता है जसे भूपात आ रहा हो। साधारणतया लोग वह लगात ही नही और जो लगात है । इतना सक्षिप्त-सा लगात हैं जस मह काई बह्वहा नहीं है मेढक है, जिस उहोन मुह में दाव रखा था, जरा मुह खाला और मढक पडाक स बाहर। कुछ लोग एसा कहाहा लगान हैं। जिसमे आवाज ही नही हाती । बस, मुह होठा स तालू तक खुला हुआ है, अदर सास की नलकी तक दिखाई द रही है किंतु आवाज नहीं आ रही है ।हा, आखो के वार वार खुलन और बद होन स पता लग रहा है कि रोगी पर कहकह का दौरा पड़ा हुआ है। कुछ लोग कहकह म आवाज तो निकालत है किंतु यह आवाज इतनी पतली इतनी बारीक 'हि हि किस्म की होती है कि ऐसा लगता है जसे यह आवाज फेफ्डो में स नहीं आता म से निकल रही है। किंतु अच्छन राव का कहकहा इस किस्म का कहकहा नही है। उसका कहा उसक शरीर की भाति भारी भरकम है। वह जब वहकहा लगाता है तो उस शरीर की सारी विल्डिग हिलन लगती है। एसा मालूम होता है कि कहकहा आतिशवाजी व अनार की भाति उसके सार शरीर से फूट रहा है । हू हू हा-हा की गगनभेदी आवाज बढती ही चली जाती है, यहा तक कि दूसर लोगा का भी बिना कारण ही, उसके 20/पानी का पेड , बहरहे म सम्मिलित होना पड़ता है। अच्छन राव का कहकहा बवडर की भाति आगे आगे बढ़ता ही जाता है। उस समय यही हुआ। कहकहे के मैच में सरमुख सिंह, डिमेलो और नवाज को भी सम्मिलित होना पडा । हसत हसते सरमुख मिह को दाढी के क्लिप घुल गये, और डिमेलो दोहरा हो गया। जब मिस धनाधी ने जरा क्रोध से कहा, "अब चलो भी", तब मास्टर अच्छन राव ने झट से कह- कहा लगाना वद क्यिा, अपने साथिया से क्षमा मागी और अपनी 'जानिया' को लेकर चला गया। तीना माथी र रोड के शराबखाने में दाखिल हुए । यह शरावखाना एक दो मजिली इमारत म है । निचली मजिल मे 'वार है और ऊपर की मजिल मे अलग अलग कमरे हैं-जहा जरूरतमदो के लिए मनोरजन के साधन जुटाये जान है । इस शरारखाने का वातावरण बहुत ही घरेल सा है। बेटर बडे नम और समयदार हैं। शक्ल व चाल-ढाल से पेशेवर राजनीतिज्ञ दिखाई देते है। मेजे न बहुत गदी है न बहुत साफ, और न वे बहुत मूल्य वान है, न बहुत घटिया । यहा हर प्रकार की शराव मिलती है-बढिया से बढिया विलायती शराब और घटिया से घटिया देशी शराब। मजदूर, क्लक दुकानदार, फ्रिम उद्योग में काम करने वाले बीच के दर्जे के पूजी- पति, इजीनियर, विद्यार्थी -भि न भि न मेजो पर बैठे हुए बातें कर रहे है । वातावरण में तबाकू और शराब की गध रची हुई है, पकौडिया और करावा की गध फ्ली हुई है, मूगफली के घी' मे तले जाने वाले अडा की वसाद है और मिली जुली सासा को गध हवा मे तैरती हुई मालूम होती है । दीवारा पर महात्मा गाधी, जवाहरलाल नहरू और माई बाबा के कैलेंडर है। पारसी बार मन की मोटी, लाल नाक पर नीलो नमो का जाल उमरा हुआ है । कभी कभी आर की मजिल से कोई जनाना कहकहा तैरता हुआ आता है, तो एमा लगता है जसे एक क्षण के लिए वादलो के गुबार में विजली चमक गयो । नीचे बार में सबके कान खड़े हो जात हैं। चेहर उस बिजली की रोशनी से एक क्षण के लिए चमक उठते हैं । कोई सुदर स्वप्न कोई आतरिक तडस, कोई सुन भावना मचलकर जाग उठती है। पया रू?/21 नवाज, सरमुख सिंह और हिमलोन बार म घुमत ही चारा ओरनिगाह दौडायो। किंतु, कही कोई मेज पाली नहीं थी। केवल एक कोन म एवं मेज खाली थी जिस पर फिल्मो की पुरानी विख्यात अभिनत्री मिम कन्जन का चित्र उल्टा लटका हुआ था। तीनो व्यक्ति जल्दी स उस मेन की आर लपक । उह उधर जात देखकर वैरा उन पीछे लपका। व अभा बैठन भी न पाय थे कि वैर न बडी नम्रता से कहा, "हुजूर, यह मन दी जा चुकी है।' "क्सिको सरमुष सिंह न दाढी म क्लिप लगात हुए कहा। "एक साहव है।" "चार कुर्मिया हैं, हम तीन है। हमार बैठने के बाद भी एक कुर्सी खाली रगी । व साहब उस पर बठ सक्त हैं।" नवाज न तनिक श्रोध म कहा। 'किंतु यह मेज ता दी जा चुकी है, हुजूर।" डिमलो न वायलिन का केस दीवार पर टागत हुए कहा, "काई बात नहीं । जब व साहब जायेंग, हम उठ जायेंगे । तुम लपककर स्काच ह्विस्की देनीन बड़े पैग ले आआ।" वैरा अब क्या कहता? वह एक क्षण ता। फिर ह्विस्की लने चला तीनो मित्र कुसिया पर आराम से वठ गय। वे अपन चारो ओर के दश्य का अवलोकन करने लग। नवाज की निगाह सहसा मिस बज्जन उलट लटक हुए चित्र की ओर गयी। वह चिल्लाया, 'अर, यह क्मिन मिस बज्जन का चित्र उलटा लटका रखा है ?' वह उठा और उसन चित्र को सीधा करके टाग दिया फिर वह परशान-सा होकर बाला, 'वडे आश्चर्य भी बात है कि यहा हर राज संक्डो आदमी आत है और किसी का ध्यान इस बात की ओर 'लो, पिया। तीन बडे पैग आ गय थे। डिमेलो नवाज और सरमुख सिंह न जहरी से गिलास उठा लिय। सरमुख के होठा और आखा के बीच शायद कोई माग था, घर गया। 22/पानी का पेड उसके होठा से शराब लगी नहीं और उधर उसकी आयो म छनकी नहीं। दूसरे ही घूट म उसकी आखे शरावी हो गयी। बडे मजे म बोला, 'यह शरावखाना है प्यार। यहा थोडी दर म हर चीज उलटी दिखाई दन लगती है । तुम मिस रज्जन के चित्र को रो रह हो। यहा अपन मित्र भी उलट दिखाई दन लगत हैं।" कार के किमी कमरे से किसी लड़की की हसन की आवाज आयी। सरमुख एकदम गभीर हो गया, और धीरे स बहन लगा, "वह साला तो अपनी जानिया क साथ चला गया । हम किसके साथ जायें?' सरमुख के लहजे म घुटन, दुख और निराशा के तीन भाव भरे हुए थे। उसन जल्दी स गिलास खाली कर दिया और वैरे का दूसरा पग लान के लिए कहा। "इतनी जल्दी न चलो,' नवाज ने बडे स्नेहपूण लहजे म कहा। 'बहुत अच्छा, मेर वाप ।" सरमुख ने हाथ जोडत हुए और दाढी हिलात हुए कहा। इतने म एक दुबला पतला, लवा आदमी हाथ म छाता लिय धीर धीरे चलता हुआ उस मेज के निकट आया। उसके साथ माथ वही बरा आ रहा था। "यह हुजूर की मेज है " वैरे ने कहा। सरमुख सिंह और नवाज खडे हो गय। डिमला भी खडा होना चाहता था कि इतने में नवागतुक न वडे मीठे और धीमे स्वर में कहा, 'नही, आप अपना गिलाम पूरा पी लीजिए । तब तक मै यहा कान म खडा रहता नवाज ने उस व्यक्ति को सर से पाव तक देखा। मर पर गोल टोपी, गहरे रंग का बद गले का कोट उसकी सफेद पतलून जिसक पायचे टखना स ऊपर थे, जूत काल और मल, चेहर पर मूछे भी काली और मैली सीजिनक कोने गिरे हुए थे । आखें भी बहुत मैली और काली थी जिनम अस्थिरता नाचती हुई दिखाई पड़ती थी और वे कभी किसी एक जगह न ठहरती। वह बार-बार अपने खुश्क होठो पर अपनी जीभ फेर रहा था। उसका माथा तग और घुटा हुआ था और उस पर गहरी चिंता के कारण बल पड 2.

गये थे। नवाज को वह आदमी बीमार लगा। उमन पालो कुर्मी को सरेत करके कहा, 'पाप ग्रडे क्या है ? यहा वठ जागा न । हमार सापी ने दूसरा पैग मगवा लिया है। अगर काई हज न हा तो हम भी और वह भी अगर आप रजाजत दें तो हम भी दूसरा पग मगवा लें। आप क्या पीयेंग? का हज नहीं ' उस आदमी न टोरी उतारकर मज पर रखी छात को काने म टिकाया और स्वय कुर्मी पर वठकर कह्न लगा, मेरे वर को मालूम है मैं क्या पीता हूँ। दो कुत्ता वाली रम ।' दो पुत्ता वाली रम वार म सबम पटिया माना जाती थी। बरन उसकी बोतल सामने लाकर रखी और नवागतुक न पहला पंग पी लिया। फिर उसन दूसरा पग पीया। फिर वह तोमरा पीना चाहता था कि नवाज ने कहा तो इम हिमात्र म तो आप रम की शायद तीन वोतलें पी जायेगे। तीसरा पंग पीकर आगतुक न कहा "नही, म तो वम एक बातल रोज पीता है। हा किमी किसी दिन जब मन पर वाय ज्यादा होता है तो डेढ पी लेता है । और कभी कभी दो भी पी लेता है। चौथा पग उटेलत हुए आगतुक की निगाह दीवार पर पड गयो । वह उसी क्षण गोध म भरकर यडा हो गया और चिल्लानर बोला, 'यह चित्र क्सिन उलटा लटकाया है ?" सरमुख ने चक्ति हावर कहा 'उलहा नही साधा लटकाया है। मैंने सीधा किया है । पहल यह उलटा लटक रहा था। आगतु अपनी कुर्सी को ढकेलवर दीवार के निकट गया और उसन मिस कज्जन के मीधे चिन का फिर उल्टा करव लटका दिया, और कहने लगा, "यू नहीं, यू सीधा है। इम पर सरमुख को बहुत क्रोध आया। उसन उठकर मिस कज्जन के चित्र को फिर मीधा लटका दिया। आगतु फिर उस उलटा करने जा रहा था कि सरमुख सिंह ने गरजकर कहा, 'यदि चित्र को उलटा किया तो जान से मार दूंगा। आगतुक कापन तगा। . . . 24/पानीका पड डिमलो ने सरमुख से कहा, "तुम ग्रामघा क्यो झगडना है । यह टेबल इसका है, यह छाता इसका है, यह टापी इसका है, यह सामने का दीवार इमपा है, यह इस पर मिस कज्जन का फोटो रकमेगा, अपने बाप का रयोगा, उलटा रवमेगा, सीधा रवसेगा। अम यो क्या है ? तुम सरमुन- सिंह क्या गहा करता है। "नही, हम औरत का अपमान नहीं सहन परगा। हम इस चित्र को सीधा रक्खेगा।" सरमुरा सिंह ने मेज पर घूसा मारपर रहा। 'हम उलटा रक्खेगा,' मागतुक न बहुत नरमी स कहा। "हम सीधा रक्पेगा।' "हम उलटा जागतुर ने अपना वाक्य पूरा नहीं किया। उसने जल्दी जल्दी से अपन गिलास मदा पंग एक-दूमर के बाद उडेल और पी गया । फिर वह मेज पर आग झुक्रर बाला, सुना, हम तुम्ह एक बात बताते हैं। इसके बाद तुम अपन-आप निणय कर लेना कि इस चित्र का यहा उलटा लटकाना चाहिए या सीधा।' उसने जाम का अपन हाथ से घुमाया। उमकी आखें स्वप्नमय हो गयी । धुध चारो आर गहरी हो गयी। ' आज से आठ वप पहल की बात है, आगतुक न अपनी कहानी शुरू परत हुए कहा, 'मैं शोलापुर म छगनभाई की मिल म फोरमन था। वेतन ठीक था, मालिक भी ठीक थे । मैं किमी हडताल वडताल के झगडे म नही पडता था, इसलिए वडे मजे मे क्ट रही थी। न किसी का लना, न किसी का दना, बम, अपने काम स काम । दुनिया जाय चूल्ह म, अपत को क्या? रा एक छोटा मा घर था जिसे मेरी प्यारी प्यारी धमपत्नी सदा दुल्हन की भाति मजाये रखनी थी। मेरी पत्नी बहुत अच्छी थी, बहुत रूपवती, गहुत गुणवती, सुघड और समयदार । जब देखो साफ-सुथरे कपडे पहने एक गुडिया मी दिखाई देती थी। हमारा घर बहुत छोटा था, बम, एक कमरा था जिसके एक कोने मे नत था, किंतु मेरी पत्नी न उस एक क्या करू?/25 " प्रधा। . कमर को इस तरह मजा रया था कि यदि तुम दम्रते तो चकित रह जात । कभी कभी जब मगनलाल हमारे यहा आता मगनलाल कौन था नवाज ने मेरा मित्र है । मडो मे दलाल है।' तुम्हारी उसको मित्रता कैस हुई?" 'एक बार मुझे अपनी धमपत्नी की बीमारी के सिलसिले म चार सौ रपय का आवश्यक्ता पड गयी थी। उस समय मुझे मगनलाल द्वारा हुड़ी पर रुग्या मिला था। तब से हमारी जान-पहचान शुरू हुई थी। बाद में यह जान-पहचान मित्रता म बदल गयी। किंतु यह बहुत वाद की बात है। जिस समय की बात मैं सुना रहा हूँ उन दिनो ता साधारण जान-पहचान ही थी। फिर मगनलाल कभी-कभी हमार घर आया करता था। वह जब भी आता, मेरी पत्नी के सुघडाप का दखकर चक्ति रह जाता। कहता। इस घर की सजावट को दखकर एमा लगता है जैस तुम दोनो का आज हा विवाह हुआ हो। और सचमुच मैं और मेरी पत्नी एक दूमर से एसा ही प्रेम करत थे जस हमारे विवाह को कुछ घटा स अधिक का समय नहीं हुआ। इतना कहकर वह महाशय चुप हो गय और कुछ सोचने लगे। कुछ क्षणा के बाद उहान वोतल म से रम गिलास म उडेली और गिलास को अपने दोना हाया म घुमान लग। फिर वह गिलास का अपन माथे के सामन लाया। उसके माय के बल और गहरे हा गय । "फिर क्या हुआ?' डिमलो न पूछा। 'ठहरो," वह बाला, "वे मेरे जीवन क सबस वढिया दिन थे । उन दिनो की याद में मैं हर रोज एक जाम पीता हूँ । आज तुम भी पियो।" उसन अपना गितास वढाया उसक तीनो साथिया ने उसके गिलास से अपन गिलास टकराये और पी गये। उस महाशय ने अपन होठो परजीभ फैरकर कहा, ' उसके बाद आज सपाच वप पहले तुम्ह याद होगा बिबई पूना और अहमदाबाद म कितनी जोर को प्लेग फैली थी हा-हा, याद है ' हिमलो ने उदास हार कहा, "मेरा बडा भाई उसी प्लग मे भरा था। . " 26/पानी का पड । उमीप्लग का जिक्र है । यह प्लेग शोलापुर में भी फ्ली । शहर खाती होन लगा। मारे वाला कारखाना बद हो गया। सडको पर व गली कूचा म लाशे पडी दिखाई दन लगी। मेरी पत्नी मारे डर के घर स बाहर न निरलती थी, किंतु मुझे ता सौदा लेन और इधर उधर का काम करने के लिए घर से बाहर जाना पहता था।हा, अपनी प्यारी पत्नी का घर से निकलना मैंने बद कर दिया था, क्योकि यह छूत की वीमारी होती है, और कौन जाने क्या हो जाय और मुझे मेरी पत्नी बहुत प्रिय थी। "एक दिन मुये रात के समय हल्का सा बुखार हुआ। कधे म दद होन लगा। फिर गिल्टी निक्ल आयी। मैं बुधार म फुक्न लगा। मेरी पत्नी मेरी आर फ्टी फ्टी आखो से देखने लगी। मैंने उसे तसल्ली देते हुए कहा, 'घबरान की कोई बात नहीं है। दौडकर क्सिी डाक्टर को बुला लाओ।' किंतु श्रीमती जी मेरी और उमी तरह फ्टी आषा से देखती रही। " मैंन तनिक क्रोध से कहा, 'क्या देख रही हो जल्दी से नुक्कड वाले डाक्टर कामय का बुला लाओ। न आये तो नाद फीस साथ लेती जाओ।" मेरी पत्नी ने अपना ट्रक खोला, जिसम वह नकदी रखती थी। देर तक वह सदूक म उथल पुथल करती रही। मुझे यह दरी बहुत बुरी लगी। मैंने कहा, 'क्या कर रही हो यहा प्राण सक्ट मे है और तुम सदूक बोले बैठी हो।' 'क्या करू ? वाहर जाना है तो इही कपडा मे कस जा सकती हू?" "मेरी पत्नी ने कपडे बदले। थोड़ी देर तक और सदूक को उथल- पुथल किया और फिर जल्दी से बाहर निकल गयी । जात जात उससे मैंन कहा 'बहुत जल्दी से डाक्टर को लेकर आओ।" आध घटा बीत गया, किंतु मेरी पत्नी डाक्टर को लेकर न आयी। उन दिनो डाक्टर भी बडे सक्ट मे फस हुए थे। कहा-कहा जाते ? किस- किस को सभालत । न जाने डाक्टर कामथ इस समय कहा हागा ? मैंने क्या करू/27 ?

अपन आपम पूछा। एय घटा और बीत गया। मैं यहोश होन लगा। फिर मुझे पता नहीं क्या हुआ । मैं महाग हो गया। जब होश म आमा ता दारि कमर म रत्न जल रहा है और गरी मागा । सामन दा बहर धुधन म रियाई दे रह हैं । मन बन ममजार धावाज मबहा, मनोरमा पानी दा डाक्टर न मुपे पानी पिलाया। मगन ताल न हास्टर व पान म कुछ महा। किंतु मैंन नहीं सुना कि उमन क्या यहा, पयोकि उम ममय मर यान म भयर शार हो रहा था, बहुत स चूह हम रह थे, लव ल प दाता याल राम अट्टहारा कराए थे। आग की लपटें अपनी लवी नवी जाम निसार मेर गिर वा चाट रही थी। एक चीतारय माथ में बहोश हा गया। मुये पता नहो, म क्तिन दिन यहाग रहा-क्तिन दिन इसी तरह मत्यु और जीवन म बीच लटवता रहा। आखिर जीवन की विजय हुई। मत्यु की विजय होती ता भी चैम तो मुये दुग न होता। और भी तो हजारा लाग थ-जा प्लग म मर गये थे और राज मर रहे थे। मैं भी मर जाता ता क्या बुरा होता। खैर में बच गया। मगनलाल को दिन रात की सवाशुश्रूपा, अनथक परिश्रम, और उसय म्नह की प्रवल शक्ति न मरा जीवन बचा लिया। जिस तरह उमन अपने प्राणा की परवाह न करत हुए मेर लिए दिन रात एक कर दिय उस तरह शायद कोई मा भोजपन बेटे के लिए न कर मरे । मैं चक्ति हू । ससार म एमी भी महान आत्माए है-मनुप्य नही, देवता । मगनलाल ने सात आठ दिन तक एक पलक न झपकायी 'और तुम्हारी पत्नी ?' डिमलो न पूछा। 'वह ता पहल ही रिन भाग गयी थी-सद्क् म म रुपया और जेवर लेकर। "वह तो डाक्टर को बुलाने गया थी न?' हा किंतु वह फिर वापस न आया।" वह ध्यानपूर्वक अपने गिलास को दखने लगा। 28/पानी का पेड । थोडी देर सनाटा रहा। उस सन्नाटे मे दूसरी मेगो पर बैठे हुए लोगो की आवाजें बहुत विलक्षण और किसी दूसरी दुनिया से आती हुई मालूम हो रही थी। डिमेला का एसा लग रहा था जैसे य आवाजे इस दुनिया की नहीं है । वे वही शोलापुरम बैठे है, एक छोटा सा कमरा है, एक स्त्री चार दष्टि से अपने वीमार पति को ताकती हुई जमनी साडी मे जेवर अटकाती हुई भाग रही है, अपनी आप बीती सुनाने वाला प्लेग से कराह रहा है, बाहर एक चिता जल रही है, दिल के अदर भी एक चिता जल रही है, रम पानी नहीं है, अलकोहल है-यह आग बुझाती नहीं, लगाती है। उस व्यक्ति ने अपना पंग खाली करके कहा, " फिर प्लग दब गयी। मेन शोलापुर छोड दिया और यहा बबई में आकर काहनूर मिल म नौकरी कर ली । मेर साथ मेरा मित्र मगालान भी आ गया। हम दोना साथ रहने लग। और यह एक बिलकुल सीधा-सी बात थी कि वह मेरे साथ रहे, क्यापि ससार में मेरे सिवाय उसका और काई नहीं था। और फिर उसन मेर प्राण बचाय थे, तो क्या मैं उसका इतना सा उपकार भीनमानसा "अब वह परल म भैर घर में रहता है । मेरा घर उसी शोलापुर वाल घर की तरह है । अब वह फिर उसी तरह सज गया है, बन सवर गया है। मेरे घर में फिर एक पत्नी है-~स्मवती, गुणवती, सुघड, पहली पत्नी से भी अच्छी। जब मैं उसे शादी करक लाया था तो सारी बिल्डिग चौकनी हो गयी थी--जस किसी की भाखें आश्चय से पटी की फटी रह जायें। एसी सुदर थी मेरी पत्नी। मगनलाल को भी मेरी पत्नी बहुत पसद आयो । फिर धीर धीर मरी पत्नी को भी मगनलाल पसद आने लगा। धीरे धीर मैं उन दोना की आखो को परसने लगा। धीर धीर मैं उन दोना के हृदय टटोलन लगा। धीर धीर मैं उन दोना की अगुलियो की परपराहट से परिचित होता गया। जब उनकी आखें मिलती, या जब वे मेर पीछे कभी चोरी से मिलत और मैं सहसा या निक्सता तो उन दोनो को ऐसा मालूम होता वेस नाट म चुप-से रह जात-तुम जानत हा न, प्रेम जब निस्तब्ध होता है तो कितना स्पट होता है, इसकी चुप्पी में कितनी प्रबल अभिव्यक्ति होती है । मुझे ऐसा लगन लगा जस मैं अपन ही घर म अजनबी क्मा करू/29 हू । उनकी व्याकुल आखें, उडती उडती, रुक्ती रुक्ती भावनाए---तुम जानत हो न और तुम नहीं जानत तो मैं तो जानता हू-~-क्याकि जिस आदमी ने प्रेम को एक बार देखा है यह उसे मदा पहचान सकता है।" उसन कापत हुए हाथा से एक पंग और उडेला। 'धीर धीर मैं कमरे के बाहर बाल्कनी म सोन लगा और व दोनों कमर वे अदर सोन लग। धीर धीर मुझे मालूम हुना कि जब मैं मिल से लौटकर अपन कमरे म आता हू । ता सारी बिल्डिंग चौकनी होकर मुये देखने लगती है -जसे मैं एक साधारण मनुष्य नहीं वरन कोई विलभण-सा पशु है। जब मैं घर से बाहर निकलता हू तय भी इसी तरह, एक विलक्षण मी भावना के साथ लोग मुझे घूरते है । कभी कभी जब रात की शिपटें होती है और मिल म वाम अधिक होता है और मिल के मालिक मुझे बुला लत है ता मैं बिल्डिंग की मीढिया पर लोगो को खुसर पुमर करत दखता हू । मै उनकी बातें सुन नही पाता, किंतु अच्छी तरह समझ सकता' हू कि वे क्या कह रहे है । व भी समझ रहे है कि जा रहा है क्बख्त, अपनी बावी का भडवा जा रहा है, कमजार निकम्मा, भीरु, कायर, नामद जा रहा है, आज रात के शिफ्ट मे जा रहा है और आज रात इसकी पत्नी और इसके मित्र के ठाठ है । और फिर कोई सीढिया के ऊपर से हस देता है और मैं जल्दी जल्दी सीढिया उतरकर बिल्डिंग स बाहर निक्ल जाता है और फिर काम समाप्त होन पर यहा आता है--सीधा इस शराब खाने मे आता है । यह मेज मेरे लिए सदा रिजव रहती है, यह मेज, यह दो कुतो वाली रम की बातल । पाच बरस से मैं यहा आ रहा हूं-- वरावर रोज आ रहा हू , मैं अभी तक यह निश्चय नहीं कर सका कि किसका गला घोटू-~-अपनी पत्नी का, जिसे मैं प्यार करता मित्र का, जिसने मेरे प्राण बचाये थे? अपनी पत्नी का या अपने मित्र का? अपन मित्र का या अपनी पत्नी का?" उसकी आवाज ऊची होती गयी। उसके मुह झाग निक्लने लगे। उसने इतन जोर से गिलाम को अपनी हथेलिया स दबाया कि गिलास हाथा म ही धरनाचूर हो गया और उसके हाथों से खून बहन लगा। पून उसके हाथो से बह-वहकर संगमरमर का मेज पर गिर रहा 30/पानी का पेड़ या अपने था। सगमरमर के टुकडे मे एक लवी-सी दराज थी। खून उस दराज मे घुसकर लोप होता जा रहा था। वह आदमी इस तरह उस बहत हुए खून को देख रहा था जैसे यह उसका खून न हो, क्सिी दूसरे का खून हा। थाडी देर के बाद वह उठा और नल से हाथ धोकर और रूमाल बाधकर वापस आ गया। वापस आकर उसने टोपी सर पर रक्खी, छतरी उठायी, दीवार पर लटके हुए मिस कज्जन के चित्र को उलटा कर दिया, फिर उसन उन तीना को युककर सलाम किया और शराबखाने से बाहर निकल गया। क्या करूं?/31 ----- अमरीका से आने वाला हिदुस्तानी एक दिन की बात है। मैं चच गट स्टशन से निकलकर, रिटज हाटल की पार सिर झुकाव चला जा रहा था कि एकाएक किसी ने मेरे निकट आकर जोर स कहा, "हाइ किड। में धरती से दो फीट ऊपर उछल गया । उछलन के बाद जो नीचे गिरा तो मेर पाव फुटपाथ पर न थे, बल्कि चनवाले की टोकरी म थे। दूसरे क्षण टोक्री औंधी हो गयी थी, और चन धरती पर बिखर गय थे, और चनेवाला मुझे गालिया दे रहा था। मैं मुडकर दखन भी न पाया था कि इतने जार से कौन चिल्लाया है कि किसी ने जोर से मेरी पीठ पर हाय मारा "हाद सकर।' अब जो भडक्कर पीछे देखता हूँ तो एक नौजवान नीले रंग को शाक स्सिन की पतलून पर गुलाबी रग का बुश कोट जिस पर हरे रग तरबूज बने थे पहने खडा था, और मेरी ओर देखकर हस रहा था। मैं इतना क्रोध मे था कि दो चार क्षण तक उसे न पहचान सका। मेरे श्रोध का अनुचित लाभ उठाकर उस नौजवान ने ना म गुनगुनाकर फिर कहा, 'डोट यू नो मी ? (Don't you know me 7) जगमाहन कापडिया।" सहसा मैंने उसे पहचान लिया और मेरे मुह से निकला, "अरे लौवड,तुम हो ? 1321 मैं हाथ मिलान के लिए आगे बढा। जगमोहन कापडिया, हु । हम सब इसे लौचड वहा करते थे । घर वाले जग या जगजग कहा करते थे। यहा तक कि उसकी पत्नी भी उसे जगजी कहकर पुकारती थी, जो आप ममझ जायेंगे कि लौचड से कोई वहुत दूर की चीज नही थी। खैर मैंने अपने प्राध पर काबू पाते हुए पूछा, "कोई तीन साल से तुम्ह देखा नही, कहा गय थे।" "स्टट्स (States) म" अमरीका मे आन वाला आदमी अमरीका को 'स्टेटस' कहकर पुकारता है । स्टटम को ये लोग क्या वहग इसके बारे मे कुछ मालूम नहीं। 'वहा क्या करन गय थे?" "होटल में चला वहा मब बनाऊगा। आल्ड पाव मठहरा हुआ हू। हम दोनो ओल्ड पाक की आर जान लग। इतन म बनवाल न टाक. कर कहा 'क्या शान है । "क्या हुआ भाई ? ' मैंन बड़ी गभीरता से चनेवाल की आर देखत हुए पूछा। "अरे साब, जापन मेरी टाकरी ताड दी, मेर वन गिरा दिय, मरी कोयला की हडिया लुढका दी। और इस पर पूछते हो कि क्या बात है लोचड ने अपनी पतलून की जेब की जिप खीची। उसब जदर एक पील रंग का बटुआ था। उसकी जिप खोली । उसगे से पाच रुपय का नोट निकाला और चनेवाल का दे दिया। चनवाला बडे ध्यान स और बडे अचरज से नोट को उलट पुलटवर दखने लगा कि शायद नोट म भी कोई जिप लगी हो। फिर अच्छी तरह तसल्ली करके उसन नोटको जेब म डाल लिया और जब हम जागे चल गय ता हमारी आर जोर से कहा लगाकर कहन लगा, क्या निराली शान है " जब होटल के कमर म पहुचार हम आराम स वठ गये तो मुझे अच्छी तरह निरीक्षण करत का अवसर मिला । वह सचमुच पहल से अधिक स्वस्थ हो गया था और माटा भी । अब वह बातें भी तेज-तेज करता था। इसस पहले जब वह भारत म था, तो सीधे-सादे ढग से हलक या मुह से बाते करता था। परतु अब एसा लगता था कि प्रत्यक वाक्य, जो वह बोलता जमरीका स साने वाला हिंदुस्तानी / 33 था, हाक से निकलकर नाय की नालिया में घुस जाता था और वहा से घूमता हुआ, नथुना की राह बाहर निकलता था। इमस वाक्य के स्वर में एसी गोलाइया पदा हो जाती थी, जो भापा यो एक नया स्प और अक्सर वाक्य का नये अथ प्रदान करती थी। मैं बहुत दर स उसकी बातें, बल्कि उसकी वातो पी गोलाइया सुनता रहा यह ध्यान दिये विना दि इन गोलाइया के अदर क्या है। इस बीच म मुझे वह घटना याद आ गयो जब जगमोहन और मैं मिटगुमरी के एक स्कूल मे साय पढ़ा परत थे। जब जगमोहन एवं वडी पगडी और तहमद वाधे स्कूल म पढन के लिए आया करता था, तो सब लोग उस पर हसा करत थे। और चचल बच्चे उसकी आर उगली उठा उठा बहत थे लाचड दीन बजाय बीन तहमद मोटा पग्ग महीन उम ममय लोग जगमोहन का लौंचइ कहा करत थे। इस समय भी मैं उसकी बाते सुनते सुनते वही गीत जोर-जोर से गुनगुनाने लगा। जग मोहन वात करता करता चुप हा गया। फिर कुछ क्षणो के बाद शिकायत भरे शला म बाला, 'भइ अब ता मुये लौच न कहा बरा । अब मैं स्टेटस होकर आया हू-ट्रेनिंग लेकर आया हूं।" काहे की ट्रेनिंग लेकर आय हो?" तल निकालने की।" 'क्सिका तेल निकालन की?' काजू का तल निकालन को ट्रेनिंग।" काजू का तल यहा भी तो निक्ल सस्ता है।" 'निक्ल सकता है किंतु अमरीका तेल बहुत अच्छी प्रकार निकालना सिखाया जाता है।' वाह इसके बाद उसन वार्ता का रुख बदलने के लिए मुये वे चीजें दिखायीं . 34/पानी का पेड ht जो वह अमरीका से साथ लाया था। जूतो के दस-बारह जाडे थे । उन जूतो म फीता के स्थान पर लोह की महीन जजीरें, जिह 'जिप' कहत है, लगी हुई थी। जूता पहनकर जजीर खीच लेन से जूता पाव मे स्वय फिट हो जाता है । सामन पतलून मे बटन के स्थान पर जिप लगी हुई थी। कोट की जैबा म जिप लगी हुई थी। कमोजो और स्वेटरो से लेकर जुरागो तक में जिप लगी हुई थी। फिर उसन मुझे कल डर दिखाय, जिनके हर महीने क नये पाने पर एक नयो नगी अमरीकी औरत का चित्र था। मन आश्चय प्रकट करते हुए पूछा, "भई, इन औरतो को जिप कहा है ? ये तो बिलकुल नगी हैं।" उसने मुस्कराकर कनडर बंद कर दिया और उसके ऊपर एक जिप चढा दी और कहने लगा, "देखो, यह रही । अब बतानो अमरीका शानदार देश है कि नहीं?" सचमुच लोंचड । वहा मोजे से लेकर ओरत तक, प्रत्यक वस्तु लोहे की जजीरा म बधी हुई है।" "श्योर, श्योर" जगमोहन बात न ममथत हुए भी सिर हिलान लगा। लौंचड हर बात म श्योर श्योर (sure sure) और फाइन फाइन (Fine) कहता था। और जब कोई वस्तु उसे अधिक पसद आ जाती, तो जोर से 'हूकी" (Hooke) कहता। इसलिए उसकी पतलूने फाइन थी, और स्वंटर हूकी । उसकी कमीजें पाइन थी, और बुश्शट हूकी । उमके जूते पाइन थे और उसकी टाइया हकी। हूकी ने आगे यदि कोई शब्द है तो रेस कोस का 'बुक्की' है। किंतु कभी-कभी फिर लौचड की टाइया बहुत सुदर थी। य दाहरी टाइया थी, अर्थात् सीधी भी पहनी जा सकती थी और उलटी भी। इसके अतिरिक्त उन पर अजीव-अजीव तरह के चित्र बने हुए थे। कुछ टाइया तो ऐसी थी, जो पुरानो छोटा के कपडो को काटर तयार की गयी थी। कुछ टाइयो पर पुरान गलीचो का धोखा होता था। कुछ टाइया, ऐसा प्रतीत होता था कि बच्चो ने अपने हाथों से रगी है। कुछ टाइयो की गाठ इतनी मोटी माती थी कि ऐसा लगता था जस ये गधे अमरीका से भाने वाला हिंदुस्तानी] 35 की गदन म वाधन के लिए तैयार की गयी है। लोचड न एक टाइ मुझे दिखायी। उस पर एक आर पहली बना हुई थी दूसरी जोर शयन कक्ष भीतर एक स्त्री सा रही थी। मैंन पूछा, "यह क्या है। दह वाला, 'यह अमरीकी दाशनिका कोटा है।" वह कैस? वह बाला, 'तुम बताओ।' मैंन यहा में अमरीकी दाशनिक होता ता यता दता। अब तुमका बताना पडेगा। वह वाला श्यार घ्यार | दयो यह टाई रहती है, दिन को पहलिया हा करा। रात को किसी के शयन कक्ष म घुस जाआ।" बहुत खूब, बहुत खूब | क्या दशन है ।" मर मुह स एकरम निकला। और यह टाइदखा।" यह भी दाहरी टाइ थी। इसर एम आर पाइप से धुआ निकल रहा था दूसरी आर दा ऊची एडी के जूत थे, एक टाई के निचले भाग पर, दूसरा बिलकुल ऊपर-और दानो जूता की एडियो म दस इच का फासला था। उसन कहा अनुमान लगाओ, यह क्या है?' मैन साच साचकर वहा, यह टाई कहती है कि तबाकू-नाशा करोग ता पत्नी पीटगी। लाचड हसत हुए बोला 'तुम विलकुल गौग-गाजा हो एक दम गोंग गाजा" मैंन क्रोध से कहा "और तुम एक्दम लौंचड एक्दम लौचड ।' वह मेरी पीठ थपक्त हुए बोला, "देखा काध मे मत आआ। यह टाई सायकाल क समय पहनी जाती है। जब शराब पीन क लिए वार में जाओ, ता इस पाइपवाली तरफ को सामन कर तो। शराब पीओ और सुदर छावरिया की चिट्टी टांगो की ओर देखो। और फिर अगर बाई पसद आ जाये तो टाई का रुख बदलकर उसके साथ डास करा, डास । हा हा हा। - 36/पानी का पेड समझे? डाम अर्थात एक एडी ऊपर, एक एडी नीचे, बीच में दस इच का अतर-रभा नाच की तरह । हा हा हा इसके बाद उमन वुशकोट उतारकर एक अमरीकी कमीज पहन ली, जिसके कट अवे कालर (cut away collar) एक दूसरे से इतना बड़ा कोण बनाते हुए अलग हो गये थे कि उनके बीच एक छाड, तीन तीन टा या बाधी जा सकती थी। परतु इस समय मेरे मित्र ने केवल वही धुआ निकालने वाले पाइप और ऊची एडी के जूतो वाली टाई पर सतोप किया और चूकि शाम हो चुकी थी बबई मे उस समय तक, शराब वदी न हुई थी इसलिए वह मुझे अपन स्पशल 'बार' मे ले गया। वह बोला, 'तुम क्या पियोग?" मैंने कहा, "मिफ ह्विस्की पीऊगा, और अगर ज्यादा जोर दोगे तो उसमें थाडा मोडा टाल लूगा।" वह बाला, "क्या जगली कि है । इसे केवल अग्रेज या अभ ग्रेज हिंदुस्तानी पीते है । इसमे अच्छा तो यह है कि तुम कोका-कोला पियो और च्यूइग गम याओ।" "मम तो मैं रोज माता है," मैंने उत्तर दिया, “कोई नयी बात बताओ।" वह बाला, “वाए, ओ बॉए | आज तुम्ह अमरीकी कॉरन्टेल पिलाता हू।' इसमे बाद वह अपनी मगरमच्छ की पटी सहलाता हुआ 'बारमैन' के पास चला गया और न जाने क्या अट शट शराबें मिलाने को कहता रहा। आखिर जब वह पद्रह वोस मिनट बाद प्रसनता मे हाथा को रगडता हुआ लौटा, तो बरे ने दा गिलास हमारे मामने लाकर रख रिये, जिनम भूर रग का द्रव धा, जो शराब के मुकाबले मे धाडे के पसाब से अधिष मिलता था और उसरे अदर जनून का एक बडा टुडा पड़ा था। इस अमरीकी साक्टल का मजा कडवा, मोठा वावका और क्सला था। ऐसा लगता कि यह कॉक्देन होनोलुलु मे जगली खोपरे को मूअर के माम म सडाकर तैयार की गयी है। मैंने मुह का जायका बदलन के लिए अनून का टुकड़ा उठावर मुह में रख लिया-उप दिनना तम, । अमरीका से आने वाला हिंदुस्तानी / 37

तीखा, खट्टा, सिरके की तरह जीभ को काटन वाला जायका था'
"पर लौचड, यह कावटल है या तेजाव " मैंन झल्लाकर यहा।
मगर लौचड वडे मजे से चुसकिया ल-लेकर काक्टेल पी रहा था
और बातें करता जा रहा था। दो-तीन बॉक्टल पीन के बाद उसका
हालत अजीब हो गयी और उसकी आखें वार रूम की बेलबूटेदार छत पर
गड गयी और वह अमरीका की स्मृतिया मे खा गया।
'हाय, मुझे अमरीका म हाट डाग्ज (hot dogs-~गम कुत्ते) याद
आत हैं।
'गम कुत्ते क्या हात है ? अजीब सा नाम है।" मैंने पूछा।
वह बोला, "अमरीका म गम वुत्ते एक प्रकार के कबाब का कहत
,
"और गम कुता का अमरीका म क्या कहत हैं ?"
उसन मुझे घूरकर दखा और फिर निगाहें फेरकर छत पर गाड दा।
'हाय मुझे हेम बगर (Hame bargar) याद आता है।
यह क्या बला है ?" में पूछे बिना रह न सका।
लौचड याय्या करन लगा। दस मिनट की लबी व्याख्या के बाद पता
चला कि हम बगर म तली हुइ मछलिया वेची जाती हैं।
मैंने जल भुनकर कहा, 'साल, ता इसके लिए अमरीका जान की
क्या जरूरत थी ? यहा हर घर मे हेम बगर है।"
वह बोला, 'हाय, वह वेस वाल"
'यह क्या हाता है ?
बीस मिनट की व्यास्या के बाद पता चला कि अमरीकी बस बाल
वही था, जिसे हम बचपन म मक्ड-डाडा के नाम से खेलत थ । हिमालय
की गाद म और अमरीका से बहुत दूर आज स हजारो साल पहले से
हमारे पुरखे इस सेल का सेलत आय है-बस बाल, हह
और नीकिंग पार्टी (aeeking party)"
लौंचड को आखें अध मुदी हो गयी। वह बोला, तोकिंग पार्टिया
का पहला नियम यह होता है कि कोई पति अपनी पत्नी के पास नहीं
यह क्या?
38/पानी का पड

१ जायगा और पली सदा दूसरे के पहलू म बैठेगीन माह बॉयः माह वाय, मुझे सनसनाटी की वह पार्टी याद आती है। श्री पाउधर वह स्मतिया म खो गया । गम कुत्ते, गम औरतें, खाली पतिले और खाली दिमाग सहसा मुझे मितली-सी हाने लेगी। मैंन कहा, "तुमन अमरीका म और कुछ नही दया , वह वोला, "क्या" "हावड पास्ट का दखा' "कौन" 'पाल राबमन का देखा? वाल्ट ह्विटमन की कविताए पढी बच्चा को स्कूल जात हुए देखा। जगमोहन न कहा, 'मैं सटेटस म इन निरथक बाता के लिए नहीं गया था।" मेरा श्रोध बढ़ता जा रहा था। मैंन लाड की टाई पकड़ ली और कहा, "तुम अमरीका स यह टाइ लाय हा जिसकी एक ओर जूएवाजी है और दूसरी ओर विलासिता कान य, एक ओर शराबखारी है, दूमरी ओर वेश्यावत्ति एक जोर ट्रमन है दूसरी ओर एटमबम । परतु यह तुम्हारा अमरीका है। मेरा अमरीका एसी टाई नहीं। मेरा अमरीका ता एसी दाइ है, जिसके एक आर अब्राहम लिंकन है तो दूसरी और श्रम करने वाला ह्वशी, एक और वाल्ट हिटमैन है तो दूसरी जोर अमरीकी मल्लाह । एक आर पुत्र से प्रेम करत वाला पिता है तो दूसरी ओर पति की पुजारिन पत्नी, एक ओर पैसिरल को शूरवीरता है तो दूसरी ओर शाति की फाखता। इस टाई को मैं गल म बाधता हूँ और इसको सौ बार चूमता हूँ। उसन अपनी टाई छुड़ात हुए कहा, "तुम सदा म वैस में बसे राज- नीतिक बुद्ध रहे। फिर उमन मेरो आर स दृष्टि फेरपर छत पर गाड लो लौर बडे हमरत भरे सहजै म वाला, "हाय, इस दश म क्तिनी घुटन है । वाश, मैं फिर अमरीराजामाता।' "काश, तुम जा मरत" मैंन भरपूर सहानुभूति और यूणा म कहा। अमरीका समान वाला हिंदुस्तानी/39

परतु अबके कोन सी ट्रेनिंग लू'---मेरी धणा को न समथर बड
उतावल पन स उमन कहा, "म्बालरशिप तो मैं किसी न किसी तरह प्राप्त
कारलगा।"
अवक तुम इमानी पापडिया का तल निकालन की ट्रेनिग लना।
इसके लिए तुम्ह सालरशिप भी आमाना स मिल जायेगी । और
अमरीका के शाम वग न इसके लिए मुविधाए भी बहुत जुटा रखी हैं।"
रतना कहार मैं उठा और बाहर चला जाया। लौचड कुछ क्षण
हक्पा बता मेरी आर देखता रहा। फिर उस एन पुतगाली लडकी नजर
आयी जा जपनी सीट पर वठी बैड की गति पर ताल दिय जा रही था।
उसकी टागे बड़ी
सुदर
थी।
चड ने बड़े जार से कहा, "हूकी "~~और अपनी टाई का रस
बदलने म व्यस्त हो गया।
40/पानी का पह

सौ रुपये . मैंन सौ रुपय का काम किया था, मुये मो रुपय मिलन चाहिए, इसलिए मैंन मठम बात की। सठ न कहा, "सोलह तारीख का आना।" मैं सालह तारीख को गया। सेठ वहा नहीं था। उमका बूढा मनेजर, जिसकी चाद साफ थी और जिमका एक दात बाहर निकला हुआ था और जो अपन असिस्टैट का क्सिी गलती पर डाट रहा था, मुझसे बही नम्रता से पश आया, "तुमने सौ राय का काम किया है, तुमको वरावर मौ रुपय मिलेग। किंतु आज सेठ यहा नही है कल आना। मन पूछा 'यदि क्ल भी मेठ यहा नहीं हुआ ता?" मैनजर वाला 'तो मैं प्रवध कर दगा, तुम चिनान करा । तुम्हारा पैसा तुमको मिल जायगा।" मैंन दफ्तर मे बाहर निक्लकर, दो पैसे का पूना पत्ता सकेली मसाला और हरी पत्ती वाला पान खाया। दो पस मे देमी काला काडी और ठडक पाला पान भी खा मक्ता था और मुनठी लाल ममाल वाला पान भी और बनारमी छाटा पत्ता, गोली, डली और इलायची वाला पान या मोहनी तबाकू वाला । वितु मैंने केवल पूना पत्ता मकेली मसाला और हरी पत्ती वाला पान ही खाया, क्यादि मुझे भूख बहुत लग रही थी। मेरी जेब में केवल डेढ-दा आन थे, और यह पान जो मैंने पाया, वाफी माटा 1411 होता है जोर देर तक मुह मे रहता है। और फिर मैंन एक आन का टाम का टिक्ट लिया और ट्राम मे वठकर मैंन जार से सेठ की विल्डिग की मार थूक दिया। दूमर दिन फिर सेठ वहा नही था। उसके मनजर न कहा, "सठ आज भी यहा नही है । और फिर तुम्हारे हिसाब म कुछ गडबड भी है।" मुये क्रोध जा गया। मैं हिसाव द चुका था। मनजर उमे दस बार चेक कर चुका था। फिर भी कही से गलती निकल आती है। परतु में कुछ कह न सका, क्याकि मनेजर का स्वर बहुत ही कामल था, और उसका प्रत्यक शब्द रेशम मे लिपटा हुआ था। इसलिए मैंन भी नम्रता-पूर्वक कहा मेरा हिसाव तो बहुत साफ है। इतना कहकर मैंने अपनी खाकी पतलून की जेब स एक मला-सा कागज का टुक्डा निकाला और मैनजर के साथ ग्यारहवी वार हिसाव थेर करान वठ गया। इतन पैसे रेगमाल फेरन के टतन पम रोगन क, इनने पैसे मजदूरी के । रगमाल और रागन की रसीदे मेर पास थी। मजदूरा पहल में तय हो चुकी थी। सेठ का फर्नीचर मरी मेहनत से जगमग जगमग कर रहा था। मनजर न कहा, हा हिसाब ठीक है । अच्छा, कल आना। किंतु क्ल अवश्य मैंने तनिक जार दकर कहा । हा यल अवश्य ' मनजर न चदिया का सहलात हुए कहा । बाहर आकर मैंन दो पस का पान भी नहीं खाया। एक आन या ट्राम का टिक्ट भी नहीं लिया। पारोजशाह महता राट स साइन तक पदल गया । किंतु दूसर दिन में फिर मठ के दफ्तर गया। आज भी दफ्तर म मठ उपस्थित था। मनजर भी गायव था। मनजर का असिस्टट अपनी चुधियार हुई आखा स एक सिंगल चाय अपन सामन रसे कुछ साच रहा या। उसका मुख अत्यत पीला था मस्तक के निकट मफेद गाला 4 निकट पाला और ठोड़ी के पास मटियाला-सा पा। एमा प्रतीत होता था, नसे किमी न उमर मुख की हडिडया य ऊपर साल की बजाय मल-मल पील-पार पागज काटकर मढ दिय हा। मैं उस मुरामा ध्यान स देशन लगा। 42/पानीमा पर T अमिस्टट न प्याली से दष्टि उठाकर मेरी और देया, और हाय के समेत म मुये कुर्सी पर बैठन को कहा। मैंने पूछा, "सठ जी कहा है?" वह वोला, "मेठ अपने दूसरे दफ्तर म गया है।" "और मनेजर कहा है ?" "मैनजर सठ के तीसरे दफ्तर मग्या है।" "ना मुमे यहा चोटी मजिन में किसलिए बुलाया है।" मैंन जर श्रोध म तज होत हुए कहा । अमिस्टट ने चाय का अतिम क्डवा घूट भी निगल लिया। धीर स बोला, "तुम यहा वठ जाओ, मनेजर अभी माता होगा। उससे बात कर लेना।" 'एक कुसों पर साढे दस बजे स लेकर पौन दो बजे तक पठा रहा । पहल मैन साचा वि एक शीशे का टुकडा लेकर इस सार रोगन को उतार दू, जो मैंन इतनी मेहनत से फर्नीचर पर चढाया था। फिर मैन मोचा कि अपन दोनो हाथो स असिस्टट क नकली चहरे से पीले-पाल धागज के टवडा का उतार दू, ताकि भीतर की हड्डी नगी हो जाय। फिर मैन मोचा कि मनजर को जान से मार दना अच्छा होगा। बहुत देर तक सेठ के लिए दंड सोचता रहा । अत म विचार आया कि इसक समस्त शरीर पर पी नवर मोटा रगमाल रगड दू तो उसकी समस्त खाल उधड जायेगी। इतन म मनजर आ गया। मुस्करात हुए बोला, 'तुम्हारा काम हो गया है किंतु चक मिला है-सौ रुपय का । परतु अव पौन दो बज चुक है, दो बजे बक बद हो जाता है, और बैक यहा स दो मील दूर है । कल छुट्टी है, और परसा रतवार है।" मैंन निराश हाकर कहा, 'हाय ।" "हा'-मैनजर प्रमानना से हाथ मलता हुआ वाला। मैंन रुखाई स कहा, चक मुझे द दो।' पाच मिनट और चरनन मवीत गये, क्याकि चेक पर मरा नाम गलत लिखा हुआ था। मुहम्मद शेख के स्थान पर मुहम्मद रफी लिखा हुआ था। सौ रुपये / 43 "हाय हाय', मैनेजर ने कहा, "बड़ी गलती हो गयी। मुहम्मद शेष लिखत लिखते मुहम्मद रफीक लिय गया। किंतु काई बात नहीं । अब तुम सामवार को आकर नया चेक ले जाना।" मैंने कहा, किंतु यह तो वेयरर चेक है, नाम की गलती से कोई तर नही पडता। तुम मेरे नाम की रसीद ले लो और मुझे चेक दे दो। सोमवार को में कहा आऊगा, वही और धधा करूगा।" "अच्छा तो ले जानो'--मैनजर न रुक्न हाते कहा। चेक लेकर बाहर आया तो दो वजने म पौन नौ मिनट थे। किसी प्रकार भी मैं पैदल चलकर वैक नही पहुच सक्ता था, सौ रुपये का चेक मेरे हाथ में था। किंतु अभी कागज का टुकडा था । उसे मौ रुपये म परि वर्तित करने के लिए बैक तक पहुचना आवश्यव था-दा वजने से पहल केवल एक बात हो मकती थी। मैंन निणय कर लिया और चिल्लाकर कहा, "ए टैक्सी ।' पीली छत और काले शरीर वाली टक्सी मेरे मामने आकर रुक गयी। मने भीतर वठने हुए कहा कालवादेवी रोड व नावे पर चलो। और जरा तेज चलाओ।" जव कालवादवी के नाके पर पहुचा तो दो वजने म दो मिनट थे। परतु वैक कालबादवी रोड पर नही था। यद्यपि चेक पर यही लिखा हुआ था स्तुि वैक कालवावी रोड के नाके पर दिखाई न दिया। दो एक दुकानदारो से पूछा किसी को इतना अवकाश न था। कोरिया मे जग तेज थी। भाव भी ऊचे जा रहे थे। किमी को गरीव वारनिश करने वाल के मौ रुपया की चिता न थी। हारपर मैं एक पजाबी सिख हारमानियम वान की दुकान म घुस गया। आइए आइए क्या वाजा चाहिए आपको?" सरदार ने अपनी उस आरी को छोड़कर जिससे वह लकडी काट रहा था, मुम्लस मुस्कराकर पूछा। मैंने कहा, "मरार जी, मुझे बाजा नहीं चाहिए--मरण नटाइल वैरा पता पाहिए। चेक पर लिया है कालवा दबी रोड, और यहा मही 44/पानी का पह मिलता नहीं।" सरदार जी ने मुसरावर पहा, "बादशाहो, वह वै तो साथ वाली गली मे है। इधर घूम क सट्टा बाजार के उम ओर, पुरान चादी वाले मदिर के पास।" मैन सरदार जी का धयवाद किया। भागा वापस टैक्सी के पास । जब बैंक पहुचा ता दो बजकर दो मिनट थ । नियम ता यह था कि मेरा चेक क्लक का नहीं लेना चाहिए था। वितु शायद क्लक चेक पढने के अतिरिक्त चेहरा भी पढना जानता था। उसने चुपचाप चेव मेरे हाथ से ले लिया। फिर उल्टा करय दया । मुयस कहने लगा,"इस पर दस्तखत कर दो।" मरा नाम मुहम्मद शेख था, किंतु मैंन मुहम्मद रफीक लिया। यह मुहम्मद रफीक कौन था यहा कहा से आया था, कब जम हुआ था उसका, उसकी सूरत कैसी थी, उसके माता पिता कौन थे--कौन जानता है । कुछ जिंदगिया एसी होती ह जिनका नाम चेक पर ही लिखा जाता है और चेक पर ही काट दिया जाता है। मैं टक्मी वाले का बिल चुक्ता करने लगा। दो रुपये दो आने- टैक्सी छोटी थी इसलिए मीटर बढा नही। टैक्सी वडी होती तो पाच- सात रुपय खुल जाते। मैंन प्रसनता से शाति का सास लिया। इतने में किसी ने आकर जोर से मेरे कंधे पर हाथ मारा, और कहा "कहा, दोस्त, भैर यार, वडे टक्सी मे घूम रह हो आज ।' मैंन घूमकर दखा, मेरा दोस्त इसहाक था। इसहाक बडे खुल दिल का आदमी था। वह स्वयं तो अब्दुल रहमान स्ट्रीट म एक खोजे क मकान में, एक तग कमर में रहता है, और वही धधा करता है जो मैं करता हू- अर्थात वारनिश का और पुराने फर्नीचर को फिर से नया कर देने का, किंतु उसकी प्रेमिका मुहम्मदअली रोड और काफ्ड मारकेट के नारे पर एक अच्छे होटल में रहती है। मैन उसे देखा है बड़ी सुदर औरत है । बडे बडे सेठो के पास जाती है। इसहाक इससे पहल उसने पास ड्राइवर था। इसहाक को यह काम पसद नही आया। और वह उसस अलग हो गया। वह औरत इसको बहुत पसद करती है। यह भी उसको चाहता है। सौ रपय/45 पर। । किंतु वह इसे अपन ढरें पर लाना चाहती है, और यह उसे अपन तराक पर रखना चाहता है । दाना में सदैव लहाई होती है, और फिर यह उससे दम बारह दिन नहीं मिलता, फिर वह इससे मिलने का आती है। एस ही यह चक्कर चलता रहता है। कभी कभी जब इसहार कोई मोटी रकम कमा लेता है तो उस जाकर दे आता है । और उसको एक लेक्वर भी थाड आता है। किंतु जिम स्त्री के पाम अच्छा होटल होगा, यौवन हागा, सुर सुडौल शरीर हागा और सोने चादी वाले सेठ होगे, वह वारनिश करने वाल इसहाक को वातें क्यो मुनेगो सोचने की बात है न मित्रा। मैंने इसहाक से पूछा, 'मुझे भूख लगी है, कुछ खानोग?" वह बोला "हा भूखा तो मैं भी हूँ। चला फीरोज का दुकान फीरोज कबाविय की दुकान से खा-पीकर निक्लन व बाद इसहाक ने मुझसे दस रुपये उधार लिये, और अपन रास्त पर चला गया। मुझे इमहाक बहुत पसद है । उसके पास पसे हो तो 'ना नहीं करेगा। सबको खिलायगा। और जब पस नही हाग तो मेरे अतिरिक्त विसी से कज नही मागेगा-मखा मर जायेगा, किंतु किसी स उधार नही गा। एसा मित्र, जो ससार मे मेरे अतिरिक्त किसी और से उधार न त कहा मिल सकता है । मुझे इसहाक की मित्रता पर बडा नाज है । मैं जब भी द्रमहाक से मिलता हू, एक विचित्र-सी प्रसनता, निश्चितता, बच्चो असे आह्लाद का अनुभव करता हूं। मुझे ऐसा लगता है, जस मन म काइ क्लेश नहीं है, कोई क्प्ट नहीं है। जैसे समस्त समार खिलौना स सजा हुआ है, और उसके सारे खिलौने मेरे लिए हैं। कई यक्तिया में कुछ एमी खूबी होती ही है। इस समय इसहाक से मिलकर मेरा मन हल्का फुल्ला हो गया । मैन श्राफ्ड मारपेट स दो सेब माल लेकर खाये । एक भिखारी का दो आने दिये । वहा से चलता चलता बोरीददर आ गया। किंतु जेब म रुपय पे, इसलिए अभी पर जाने को जो न चाहता था। इसलिए बोरीबदर से हानबी रोड पर हो लिया। हानवी रोड की दुकानें मुझे बहुत पसद हैं ! कैसी-क्सी सुदर वस्तुए पड़ी हुई हैं--सुदर टाइया, मोजे पतलून 46/पानी का पेड कपडे, मफ्लर जूते । हर सप्ताह इन शो-यों ने भीतर सुंदर वस्तुर बदले दी जाती हैं और पुराने डिजाइना से स्थान पर नये डिजाइन आ जाते हैं । शाम को घर जाने से पहले मैं प्रायो हानबो रोड के शो-चेमो यो दवा करता हु । जैब मे पैस हा या न हा, इससे कोई मतलब नहीं। परतु म.प्राय अपना काम पत्म करवे बोरीबदर जान के लिए हानवी रोड से गुजरा करता है और हर एक शो-वेस से नाक रगडकर भीतर की सुर वस्तुए देखा करता है । इसम मुझे इतना आनद माता है, जितना बचपन में नये पिलोन देखकर प्राप्त होता था। मैंन अपनी जेब म हाथ डालकर नये-नये तुरतुरे नोटा का थपथपाया और बडी शान मे ईवान एड फ्रेजर के नि-आन लाइटा से जगमगात हुए शो-केस ये मामन जा खडा हुआ। हाय वितनी सुदर कमीजें थी । बादामी रग की साफ सुदर कमीज, उस पर नील और लाल रंग की धारिया। मेरा तो जी मचल गया। मैंने अपनी कमीज के फ्ट हुए कालर को सहलाया । इस लाल रंग की धारीदार कमीज यो पहनकर मैं कैसा दिखाई दूगा । मैंने कल्पना मे अपने आप को यह कमीज पहनकर एक बडे दपण के सामन देखा। वाह, क्या ठाठ थे । और कमीज के दाम थे केवल तीस रुपय । इससे तीन गुना अधिक रुपये इस समय मेरी जैव मे थे । मैं यह कमीज मोल ले मकता था। क्तुि और अच्छी चीज देखने के लिए आगे बढ़ गया। अगले शा-वेस में सुदर साबुन थे, झाग वाले स्पज और तौलिय । इह देखकर आप ही आप नहाने की इच्छा उत्पन होती थी। यह सब मैं मोल ल सकता था। इससे अगल शा-वस म पुरुपा के लिए गाउन थे । भडकील, रेशमी, कढाईदार गाउन जिह पहनकर वारनिश करने वाला भी मिस्र का पाशा दिखाई दे । सत्तर रुपय का गाउन, और उससे अधिक रक्म मेरे पास थी। मैंने उस गाउन को कल्पना में पहना, और एक ईरानी गलीचे पर उडता हुआ, बहुत दूर चला गया। व्याम निमल था। मेरे नीचे सुदर वागा वाली धरती घूम रही थी। और हरी-हरी दूब म एक पतली-दुबली नदी, किसी कोमलागी की भाति, धूप सेंक रही थी। मैंने इस गलीचे को नदी के किनारे उतरने की आज्ञा दी। गलीचा सौ रुपये /47 नदी के किनारे उतर आया, और स्वय ही विठ गया। फिर स्वय ही कहा से एक मुराहो आ गयी और एक योमत हाय, और दो आखें और एक सुदर मुगडा। फिर मुये किमी न टहोगा दिया और कठोर स्वर म क्ग, "आगे बढो, अब विसी और वो भी देखने दो। आधे घटे से यही पडा है। न लेना न देना।" मैंने मुम्बरावर यान एड फेजर के वरदी पोश गुलाम की ओर देखा जो मुझे डाट रहा था और आग चल पडा । बेचारे को क्या मालूम था कि मेरे पास एक वायु मे उड़ने वाला गलीचा, और जेब म सत्तर से भी अधिक रुपयो की रक्म है। मैं इस समय भीतर जाकर इस गाउन का भी माल ले सकता था, परतु जी नहीं किया। हानबी रोड पर इसस अधिक सुदर वस्तु भी अवश्य होगी, आग चलकर देखा जाय । इस वर्दी पाश गुलाम को तो किसी भी समय भुगता जा सकता है । आम चलता चलता, बहुत सी दुकानें दखता भालता जगदवालाल पाटिल की दुकान पर पहुच गया। यहा सुदर शो केसो म कमर पड़े थे जि हे मैं मोल ल सकता था। कैमरे मोल लेकर मैं उन सब पर्नीचरो का चित्र ले सकता था जो पुरान थे, किंतु जिह मेरी वारनिश, मरी मेहनत ने इतना सुदर बना दिया था कि विलकुल नये फर्नीचर की भाति जगमगा रह थे। मैंने सोचा~य कमरे लेकर मैं इसहाक के पास जाऊगा, और उससे कहूगा, 'चल आज तेरी और तेरी प्रेमिका की इकट्ठी तस्वीरें लू ।" मैंने अपना ईरानी गलीचा भगवाया और कमरा हाथ म लेकर सारे ससार के सुदर दश्यो के चित्र उतारने लगा। कैमरे के साथ एक जादू बीन पडी थी, जिसम देखन स तस्वीरें बिलकुल अपनी गहराई के साथ दिखाई देती है-अर्थात जसे मनुष्य बिलकुल आप सामने चल फिर रहे हो, और मकान आप सामन हा, जस आपका घर । तस्वीरें अपनी लवाई-चौडाई और मोटाई के साथ इतनी अच्छी दिखाई देती है कि सिनमा मे भी इतनी भली मालूम नहीं होती। बचपन मे एक बुढिया एक बडी-सी जादू-चीन हमार मुहल्ल म लाया करती थी। और हम लोग एक पैसा दकर तमाशा दखत थे। इस जादू-चीन का देखकर मेरा मन प्रसनता से नाच उठता था। 48/पानी का पह में दुकान के भीतर चला गया। काउटर पर मैंन एक युवक से पूछा, "यह जादूबीन वितने की है " "साढे सतीस काय की।" युवक वही सुदर कमीज पहन था । उमर वाल घुपराले और पीछे को सवारे हुए, नि-आन की रोशनी म नय फर्नीचर वारनिश की भाति चमस्त थे। उसके होंठा पर भी यौवन की वारनिश थी। उसके होठो पर एक गवपूर्ण मुस्कान थी-जा पवल चेक लिखत समय पदा हाती है। उसने मेरी ओर दृष्टि उठायी और फिर घुमाकर उस सुदर युवती की आर दखा, जो अभी-अभी दुकान म मेर में पीछे जायी थी। वह उसकी आर आकपित हा गया आर एव मल मुरपाय पेहर वाला गुजराती जा उसका अमिस्टेंट लगता था, मेरी ओर आ गया। मैन देखा उसके मुख का वारनिश जगह-जगह से उखडा हुआ है । उसन मुस्कराने का यत्न भी नही दिया। मैंन कहा, 'यह जादूवीन मुये दिखा दो।" उमने जादूबीन म एक लपटी हुई फिल्म रपकर मरे हाथा म थमा दी और मुझस कहा, "इसे घुमात जाओ। इस प्रकार स्विच दबात जान स नय नय चित्र तुम्हार सामने आत जायेंगे।" मैंन बटन दबा दिया। टारजन हाथी पर सवार सामन से चला आ रहा था। मैंन बटन दबा दिया टारजन जल प्रपात म छलाग लगा रहा था। नीचे मगरमच्छ क्तिन भयानक प्रतीत हो रह थे। मैंने बटन दबा दिया फूता के गजर, पूनाव हार और फूना के लहग पहने हुए, हवाई द्वीप की सुदरिया नत्य कर रही थी। मैंने बटन दबा दिया किनार की रेत पर शराव, मीठे फल, लजीज विस्कुट और खाने की चीजें एक साफ तश्तरी म पडी थी, और एक स्त्री रत पर आख बद किय बठी थी। उसका मुख मरे इतने समीप था कि मैंने शीघ्रता से बटन दबा दिया सौ रुपय/49 ईरानी गलीचा धरती पर आ गया। मैन पुजली पे मारे गुजराती तक से कहा, "यह जादूबीन ता बहुत अच्छी है-मर वचपन यी जादूवीन स हजार गुना अच्छी है। क्तिन में दोगे?" "साढे सतीस रुपय की जादूबीन आती है । य सपेटी हुई एक दर्जन रगीन फिल्म इसके साथ लेनी पड़ेंगी। दस रुपय की ये हागी। सलटक्स इसके अलावा-पचास से ऊपर रकम जायेगी।" मैंने जेब म हाय डालकर दस दस के नये पुरखुर नोटा को गिना। आपका विश्वास नही आयेगा, किंतु यह विलकुल सत्य है कि इससे पहले मेरे मन मे जादूवीन के अतिरिक्त कोई चित्र न था। परतु नोटा को हाय लगात ही एक्दम मुझे झटका-सा लगा, और बहुत स चित्र बिना बटन दबाय मेर सामने घूमने लगे एक वच्चा पटी हुई कमीज पहन गली व फ्श पर बठा हुआ है और रो रहा है । मैंने पहचाना, यह मेरा बच्चा है । एक स्त्री की सलवार का पायचा दूसरे पायच से ऊचा है । उसकी ओढनी स उसके सिर के उलझे हुए बाल बाहर निक्ले हुए दिखाई दे रहे हैं । मैं समझ गया कि यह मेरी एक व्यक्ति द्वार पर खड़ा है। इसकी सूरत हर क्षण बदलती जाती है । उसका माध प्रत्येक क्षण बढता जाता है। कभी यह मकान मालिक का मनेजर बन जाता है, कभी दूध वाले सेठ का मुनीम, कभी निजली क्पनी का इस्पेक्टर कभी पानी के दफ्तर का अफ्सर । मैन बटन दबा दिया अब मेर सामने घर के फश पर, एक खाली तश्तरी पडी थी, जिस पर एक गिलाम औधा पड़ा था। नोट मरी जेव से बाहर निकले, पर वही हाय मे रह गये। पाउटर वाला सुदर युवक, उस सुदर युवती को कमरा देवार, मेरी बार आ गया। मैं शोघ्रता से घूमकर दुकान से वापस जान लगा। । 50/पानी का पड मैं जानता था कि वह क्ता अपनी मर्वोत्तम गर्वीली वारनिश फिरी मुस्कान से मेर फट हुए बालर को देख रहा है। मेरी पारी जीन की पतलून देश रहा है, जिसके पीछे की ओर दो एव पंचद लग हुए हैं । मुपे मालूम था कि वह मुझ पर व्यगपूवर हस रहा है। मैंन अच्छी तरह स दात भौच लिय । अच्छी तरह से जेया म हाय डालकर नोटा को अपनी मुट्ठी में ने लिया, और नुमायशी शो पेमा मे भावें चुराता सीधा वारीवार की ओर चल दिया। चलन चलत मुझे अनुभव हुआ यि किमी न मेर माय पोर छल किया है। किसी ने मुझे सौ सय दर दो मौसय छीन लिय हैं । साथ ही मरा ईरानी गलीचा और जादूवीन छीन ली है । पिसी न जार स मेरे मुह पर चपत मारी है । विमी न मेर हर नोट पर लिय दिया है, 'तुम्हार लिए मेर कदम प्रत्यर क्षण भारी हान गये। और मैंने अनुभव दिया कि मेरे यम का प्रत्यक नाट भाय की एक लवी जजीर है जिन में स्वय अपन हाथो मे खीच रहा हू। वारीबदर पहुंचकर एकाएक मन निणय किया कि मैं आज गाडी से अपने घर वापस नहीं जा सकता । माज में पदल ही बारीवदर म माइन जाऊगा। बहुत रात वीते मैं पसाहारा अपने घर लौटा। मेरी पत्नी चितित रही थी और मेरी प्रतीक्षा कर रही थी। किंतु जब उसने नाट दय ता अमन हो गयी। मेरी उदामी का कारण वह समझ न मनी। वाली, "क्तुि यह क्या बात है कि तुम आज प्रसन होने के बजाय उदामही " मैंन चारपाई पर वठन हुए कहा, "मेरी जान, आज मुझे यह पता चला है कि यह दुनिया बहुन बूढ़ी हो चुकी है और मुझे ऐसी दुनिया चाहिए, जो बच्चो की तरह नयी, मुस्कराती हो।" वह बोली, "मैं नही समझो तुम क्या कह रह हो?" 'मेरी जान, मैं कह रहा है कि अब पुराने फर्नीचर पर वारनिश करन से काम नही चलेगा अब नया फर्नीचर लाना होगा।" पहा, सौ रुपये/51 सपनो के इशारे परिया के देश म आ निक्ला हूँ। परियाये देश में वह रास्ता जाता है, धरती पर आकाश से छन छनकर आता है। इसलिए यहा की धप बग सुहावनी और सुगधित होती है और घास पर पानी की तरह बहता है कभी वारिण नहीं होती कभी बादल मही गरजते कभी बिजली नहीं चमक्ती, कभी वफ नहीं पड़ती। गर्मी, बरसात, जाडे का यहा पता नहीं लुढक्त आ जात है-एकबाद दूमरा, दूसर के बाद तीसरा, इस प्रकार कर नदी की सरवरत है। और किनारो पर खड़े हुए फल इन परिस्तानी एक बार मैन सपना देखा कि मैं बच्चा ह और गाना चूसत चूमत जो घास के मैदान के नीचे स जाता है, जहा खजूर के बडे ऊच ऊचे वक्ष हैं और झाडियो के जगल, जिनम चीटिया ने बडे-बडे पहाड बना रस यहा तितलिया रग विरग घरो मे रहती है और परियो के लिए शहद तयार करती है । इस देश म कभी रात नहीं होती, कभी दिन नहीं होता, प्रकाश और नदिया बनाती हुई परिया के देश को प्रकाश से सीचती है। इस देश लगता। हर समय बहार का सा समा छाया रहता है। वही से माता मोतिया का ताता वध जाता है। कभी ता य माती बिलकुल प्रवत और पारदर्शी होत है और कभी सगमरमर की भाति ठोस । कुछ समय बार ठोस मोती पारदर्शी बन जात है और फिर मास के गुच्छो म लुप्त हो जात है । जो ठोस माती वच रहत हैं वेधूप को नदी में बहत रहते हैं और परिस्तानी बच्चे उनस सेलते रहत हैं। उन पर सवार होत हैं, उन परब म 152/ बच्चो का तमाशा देखते हैं, और तितलिया केसर की कोपलो पर झूलती रहती हैं । और यहा इत्र की वर्षा होती है । और हवा ऐसे चलती है कि सारा परिस्तान झूम झूम उठता है। यहा हवा, हवा नहीं होती, एक रागिनी होती है । और रागिनी की लय म हर परी सास लेती है । अजीब देश है यह परिस्तान। तव मैं गना घूमते-चूसते पहुचा, तो बच्चा था। इसलिए किसी ने मुझसे पूछ-ताछ या रोक टोक न की । मैं हर जगह घूमता रहा, मोतियो की नावा म वैठकर नदी पार करता रहा । किसी ने भुझसे न पासपोट मागा, न टैक्स या पर, न मेरा गाना छीना। केवल एक राजकुमार को देखा जो कि उदास उदास घूमता था और एक फून द्वार से दूसरे फूल के द्वार मे शाक्ता फिरता था तथा खुबा और झाडियो के जगलो मे मारा मारा फिर रहा था। वह बडा ही सुदर था । परतु उसके होठो पर पपडिया जमी हुई थी और तलवो म छाले पडे थे। और जब वह सास लेता था तो उसकी सास की लय मे से आह निक्लती थी। परिस्तान के लोग उमकी आर देखकर मुस्कराते और चुप हो जाते और खामोशी मे उस रास्ता दे देते । मैं कई दिन उसके पीछे पीछे घूमता रहा । वह मोतियो की नाव में जान वाले हर यात्री को ध्यान से देखना जगल मे याडियो की झापडिया और पत्तो को छतरियो और टहनियो वे खबा के पीछे क्सिी को दूढता । हर बार उसे निराशा होती और वह लौट आता। मैंने एक दिन एक तितली से पूछा, 'यह राजकुमार क्या खोजता फिरता है ?" तितली मुस्करायी, कहने लगी, "तुम्ह मेरी पचरगी साडो पमद मैंने कहा, "मैं क्या पूछ रहा है, तुम क्या जवाब दे रही हो ।' तितली ने फूल के अदर पीले पीने कामल रेशो झूला बना रखा या। वह उन पर जा बैठी और झूले की हिलोरा से फूल का मुनहरी जीरा चारो ओर उड़ने लगा। क्यो धूल उडाती हो?" मैंने क्रोध से कहा, "वडी बदतमीज मालूम होती हो।" सपनो के इशारे/53 मैन हाय वढाया, तोगना एकाएक ओस के मोती से जा टकराया मिह गना है। इसका रस मीठा होता है। हमारे यहा इस नेशकर वह हसी। कहने लगी ‘शहद खाओग?" मैंने कहा, 'पहा मेर सवाल का जवाब दो।" "---उमन इनवार से मिर हिलाया और फूल की पत्ती से द्वार वद कर लिया। मैं चक्ति हा उस वद द्वार की ओर दखने लगा । उम बाहर आस का एक बहुत बडा मोती लटक रहा था। मैं जो उसम शाक पर देखता हू तो एक निराली ही दुनिया पाता हू। नीलम के जडाऊ फश पर एक ऐसी सुदर राजकुमारी नाव रही थी कि उसकी मुस्कान पर परिस्तान योछावर हो सकता है। वह अपना सहलियो के साथ नाच रही थी और मेरी ओर देख देखकर मुस्करा रहा थी। मुये विस्मित दखकर वोली, 'आआ, नाचोगे?' मैन कहा, "जी, मुझे नाचना नहीं आता।' "अच्छा यह क्या है ?" उसने गाने के टुक्डे की आर सबैत कर कहा। " भी बोलते हैं । इसका गुड बनता है खाड बनती है और शक्कर तथा चीनी भी। राजकुमारी कहने लगी, 'तुम बहुत राय वात करत हो। तुम कहा से आय हा "मैं धरती से आया ह।" वह बोली, 'हम भी तो धरती पर रहत है। क्या परिस्तान के अतिरिक्त कोई और देश भी है।" अब उन पर मैं हसा। मैंने कहा, 'आपको कुछ पता ही नहीं-इन परिस्तान के अतिरिक्त इस धरती पर और बहुतर दश हैं । भारत हैं। इगलड है अमरीका है जमनी है, जापान है। और ये देश आपस लहते झगडत रहत है ।' राजकुमारी वात काटकर बोली 'यह गाना मुये दे दो।" में 54/पानी का पेड और वह एक झटके से टूटकर लाखो कणा म बिखर गया । टूटत समय मुये राजकुमारी और उसकी सहलियो के कहकहो की विलीन होती आवाजें सुनाई दी । और मैं अपनी हरक्त पर लज्जित खडा रह गया। आग चला ता बहुत दूर जाकर मुये एक द्रुतगामी टिडटा दिखाई दिया, जो अपन कधे पर उमी राजकुमार को उठाये लिय जा रहा था। राजकुमार से पूछा, "कहा जा रह हो?" "खुवो के जगलो म-हटा, रास्ता न रोका, मुझे देर हो रही है । ओस के मोती उड जायेंगे। गुलाव का सारा जगल मैने छान मारा है- अब खुबा का जगल दखूगा-हटो भी।' मैंने कहा, "भलेमानस, यह तुम प्रतिदिन किसे खोजत हो और असफल रहत हो? इस परिस्तान मे मैंन केवल तुम्ह उदास देखा है ।' टिडडे ने गाकर कहा, "प्रेम ही जीवन है।" मैंने कहा, "तो क्या राजकुमार का किसी से प्रेम है ?" टिडडा बोला, "वाह, तुम्ह पता ही नही।" मैंने गना चूमत हुए कहा, 'भई, मैं परिस्तान म नवागतुक हू, मुझे क्या मालूम ? आज आया हू, कल चला जाऊगा।" राजकुमार ने टिडडे से कहा 'दर हा रही है, और तुम्ह बाते बनाने का बहुत चस्का है।" टिडडे ने कहा "घबराओ नही, आज दिन भर मैं तुम्हार माथ हू । हम राजकुमारी को खोज निकालेंग।" मैंन मुस्कराकर कहा, "तो तुम राजकुमारी को खोज रह हा? अरे मई, एक राजकुमारी ता मैंने अभी-अभी देखी थी-आस के माती म नीलम के फश पर, अपनी सहलियो के साथ नाच रही थी। वह उधर रास्ते मे एक फूल के द्वार ।" राजकुमार यह मुनत ही टिडडे के क्धे से उतरकर, भागा भागा उस ओर गया, जिधर मैंन सकेत क्यिा था। टिडडे न राजकुमार की आर देखकर सिर हिलाया, और फिर अपनी टार्गे धूप को नदी मे डाल दी। और फिर मुझे अपने पास बैठने का सकेत करते हुए बोला, "आओ, तुम्ह इम वेचार राजकुमार की कहानी सपनो के इशारे/55 सुनाऊ ।" 1 - " बहुत अच्छा, यह ला गाना।" "नही नहीं, मैं तनिक कमर के साथ शह मिलाकर खाना :- डाक्टर न परहज करने को कहा है।" अच्छा ता यह कहानी क्या है 'बत लवी कहानी नहीं, एक छोटी-मी क्या है । तुम्ह ता यह मालूम है कि सितारा से आग जहां और भी है।" मैंन कहा, 'हा, मैं जानता हू पिता जी न टिडडा बाला मार यहा माना पिता नही हात । अच्छा, यह अलग बात है । तो सुनो ।" परतु मैन अनुरोध करत हुए कहा "माता पिता नहीं होत तो तुम्हारा पालन पोषण यौन करता है ' तुम्ह पढना लिखना कौन सिखाता है ? तुम्हारी शादी ब्याह कौन करता है और बाजार से गाना मोल लेकर कौन देता "अर भई" टिडडा वोला, हम जीवन की भाति स्वय प्राकृतिक स्प से, उत्पन हात है। हमार हर मास म पान रचा हुआ है। यही हम स्वत मव कुछ बता दता है। हमारे यहा बाजार नहीं है, क्योकि किमी को खरीदन पचन या अपन अधिकार म रखन या चान नहीं है। यह जगल पह फूल यह धूप य नीम क मोती, यह शहद, यह धरती की उपज-सब, सार परिस्तान के लिए काफी है। क्या तुम्हार यहा धरती उपजाऊ नहीं उपजाऊ ता है, और सबके लिए पर्याप्न हा सक्ती है, परतु ।' मरुक गया। " होती? । परतु क्या? 'तुम नही समझागे। टिडडे न वहा 'तुम सच कहत हो । हम तुम भि न भिन ससारों म रहत हैं। तुम हमारी बात नहीं समझ मक्त, हम तुम्हारी बात नहीं समय सक्ते । रितु जो कहानी मैं तुम्ह अब सुनाना चाहता हूँ, वह दोनो ससारो म समान है। यह प्रेम की कहानी है।" 56/पानी का पेड " "प्रेम" मैंन कहा, 'हा, मा मुपे प्रेमलताहरडसम पती है, पिता मुये अपने वक्ष से लगा लेते कभी कभी एक हैं । यही प्रेम है न "हा, यही प्रेम है । परतु प्रेम एव और प्रकार का भी होता है।" "वह कमा प्रेम होता है "जैसे जस ।" वह मेरी ओर देखकर मुसराया। "ओह-तुम्हारा मतलव 'इश्क' से है ।" टिडडा घवरा गया, "ओह, तुम्हार यहा इस प्रेम को 'इश्क' कहते है ? अजीब-सा लगता है-इश्क । सच यह है कि हमार यहा ऐसा प्रेम नहीं होता, जिमे इश्क कहत हो। हमार यहा प्रेम होता है, परतु पीडा पहुचान वाला नहीं । क्सिी पर अधिकार पाकर उसे वश म रखन की इच्छा नहीं होती । यह रोग पहली बार केवल इस राजकुमार को लगा है । पहल- पहने इस राजकुमारी से प्रेम ही था। राजकुमारी का भी इससे प्रेम था। दाना सुखी थे और परिस्तान के उद्यानो म नाचत फिरत थे। राजकुमारी अपनी सहेलिया के साथ और राजकुमार अपने साथिया के साथ रहता था। किसी को काई दुख न था, का अभाव न था । टिडडा सहसा दो मोती वही स लुढ़कन जाय और नदी की मतह पर नावन लगे । नाचत नाचत अलग हो गय । और फिर जलग होकर लुढकने लगे। फिर इकटठे होकर नाचन लग । फिर दा-तीन मोती कही म आय । फिर नत्य शुरू हो गया। अजीव मनोहर दृश्य था। टिड्डे ने कहा, "यही हमारा जीवन है। हमार यहा प्रेम है, 'दासता' नहीं। उल्लाम है, इश्क नही । हम इकटठे मिलकर नाचत हैं, फिर अलग हो जाते हैं । एक मे दो, दो से तीन-और फिर हम एक वृत्त बना लते हैं और उसम सारे परिस्तान को अपनी परिधिमे ले लेत है। परतु राजकुमार ने चाहा कि राजकुमारी को सार परिस्तान से अलग कर दे। वह केवल उसकी होकर रह जाये-किसी से बात न करे किसी के साथ न हसे, 'किसी के साथ न गाये। वह दिन भर उसको निहारता रहता । उसके खिले हुए चेहरे पर विपाद की परछाइया आती गयो, हाठा पर पपडिया जमती रुक गया। सपनो के इशारे 157 गयी और सास की लो से आहे निक्लन लगी।" 'फिर क्या हुआ?" राजकुमारी को भी राजकुमार से अथाह प्रम था, परतु उसके प्रम अधियार भावना का अश न था। अपन अह का, अपन व्यक्तित्व को अलग रयकर वह प्रेम करती थी। उसने राजकुमार का समपान का बहुत प्रयत्न क्यिा, परतु राजकुमार का प्रेम वढता गया, बढता गया। यहा तक कि वह परिस्तान दे वातावरण म वाला वादल बनकर मडराने लगा। परिस्तान के सब लोग भयभीत हो गय--'ह भगवान, अब क्या होगा " फिर क्या हुआ " 'फिर यह हुआ कि राजकुमारी ने खुवा के जगल म जापर, पदा के सबमै बडे वक्ष की परिश्रमा को और अपनी सहलिया को लकर नाचन लगी और आवाहन करन लगी कि वह उसे राजकुमार को दामता में बचा ले । पुवा के सबसे बडे वृक्ष ने उसको प्राथना सुन ली और उसे अपन अचल म आश्रय द दिया। अब राजकुमार मारा मारा फिरन लगा-- राजकुमारी की खोज म। परिस्तान के लोग उस पर हसत ५ परतु अब तो वह उस पर हसते भी नहीं। खैर, जब राजकुमारी नहीं मिली, तो बह भी खुवा के सबसे बड़े वक्ष के पास गया और विनती करन लगा। तब वृक्ष न उसे समझाया कि राजकुमारी किसी की निजी सपत्ति नहीं बन सकती। इसलिए उसे यह दड दिया गया कि राजकुमारी उससे छीन ली इम पर राजकुमार ने बडा विलाप तथा रुटन किया और अपने सच्चे प्रेम की सौगध खान लगा। जत म वक्ष का हृदय पसीजा और उसने राजकुमार का बता दिया कि उसन राजकुमारी को एक ओस के माती म छिपा दिया है। जिम दिन यह राजकुमारी को दूढ निकालगा राजकुमारी उसकी हो जायगीदा सदा के लिए। वम, उसी दिन स राजकुमार राजकुमारी की खोज म ओस के मोतिया महाक्ना फिरता है। परतु परिस्तान म ओस के मोती अनगिनत हैं गयी। और 58/पानी का पर उनका जीवन बहुत थोडा है । वह चमकत है और फिर लाप हो जात है। और राजकुमारी जोस क एक मोती से दूसर मोती म नृत्य करती फिरती है। और कोई उसे दख नही पाता। कोई नहीं जानता कि वह किस बूद, क्सि माती में छिपी है । और राजकुमार सुबह शाम उसे खाजता फिरता है और अमफल रहता है। हा, कभी-कभी वह किसी बच्चे को दिखाई द जाती है-जैस अभी तुम्ह दिखाई दी। इतन मे राजकुमार भागता हुआ वापस आया। उमकी आखा म आसू थे। मुबम कहने लगा, "वहा नो नही है-अब मैं क्या करू वहा ? जाऊ?" फिर टिड्डे का सवोधित करके कहन लगा, "चला, जल्दी से चलो। युवौ व जगल म अभी ओस होगी।' टिडडे ने उमे कधे पर बिठा लिया। जब वह टिडडे पर सवार हा गया तो मैंन राजम्मार से पूछा, "तुम्हारी राजकुमारी का क्या नाम है?" "मोदय ।' उसन आह भरकर कहा। "और तुम्हारा " इश्क' उसन मिर झुकाकर कहा, "तुम्ह मेरा नाम जानन की क्या पडी" "कुछ नही,' मैंन कहा, 'या ही पूछ लिया । लो यह गाना।" "नही नही," राजकुमार ने कहा, "मुझे गने से कोई दिलचस्पी नहीं। मुझे आग पसद है।" 'गन का रम आग को बुझा देता है" मन मुस्कराकर कहा, "लो चसो इमे।" टिड्डा सहसा कहाहा मारकर हसा और वातावरण म छन स लाखा चुलबुने पैदा हो गय और छन से टूट टूटकर गिरत गये जल- प्रपाता के कोलाहल मे सारा व्योम गूज उठा, धूप की नदी ऊपर ही ऊपर चढती गयी और जाकाश की छत से लगकर फवारे की तरह लाखा बूदा मे गिरने लगी और हर बूद म राजकुमारी का नृत्य था और वर्षा की फुहार थी और धुध का रंग गहरा होता जा रहा था । और फिर अध-- और अधकार। और फिर कुछ न था- ज्याति, न कार, और अधकार, सपनो के इशार/59 अधकार, न धरती, न आकाश, न अनुभूति, न नान-वस शूय, महाशू य, अनत शय । शूय और अधकार और पटिया का घीमा पीमा राग बढते-बनते सारे वातावरण म भर गया। और जपचेतन इन्द्रिया फिर से चेतन हाने लगी। अध प्रकाशित वातावरण म जडाऊ स्लभ दृष्टिगोचर हुए। अगर और धूप की सुगध आन लगी। दवता की प्रतिमा के सामने एक हाय घटी बजाने लगा। मैंने देखा, यह मेरा ही हाथ था जा घटी बजाकर देवता की पूजा कर रहा था। मैं एक ब्राह्मण पुजारी था और धोती बाधे, माथे पर तिलक लगाये मत्र पढ रहा था। और मेरी निगाह दवता से भी परे, मदिर की छत से भी परे आकाश की जोर उडती चली गयी। मुये पात हुआ मैं बडा धर्मात्मा, साधु और विरक्त प्राणी हू । दिन रात ईश्वर की महिमा का गान करने वाला, उसकी भक्ति म लीन रहने वाला। मेरी दाढी मुडी हुई थी। मेरा सिर भी मुडा हुआ था। मुडे हुए 'मिर के बीच म गाय के खुर के वरावर मोटी चोटी थी जिसमे गाठ लगी हुई थी। मेर हाथ में लाल थैली थी और उम थली म एक माला जिसके मनसा को मैं दिन में एक हजार एक बार घुमाता था। माला म एक सौ एक मनके थे, दिन मे चौबीस घट थे एक घट म माठ मिनट और एक मिनट म साठ मरिंड और एक सेविंड म एक वार गम नाम। सोत मोते भी मेरा हाय माला फेरता रहता, और सोत मात भी मेरे मुह से राम राम निकलता रहता। मेरी आखें सदैव आकाश की ओर उठी रहतीं। ऐमा अनुभव होता कि मोत जागने, उठन-वठन नाचत गान, हसत बोलत, घटी यमाते पूना-पाठ करते मेरी लौ भगवान से लगी है--'ऐ भगवान तू कहा है। क्मिी ने मुझसे कहा, 'हे भगवान, मेरी पत्नी बीमार है, उस अच्छी जो भगवान की इच्छा 'ह महा मा आज सटट म नौ सी आ जायें।" 60/पानी का पेट "जो भगवान की इच्छा "हे महात्मा, मुझ पर रिश्वत का मुकदमा चल रहा है वचा लो।" "जो भगवान की इच्छा "हे महात्मा, मैंने एक रिश्वतपोर के विरुद्ध कायवाही की है। उसे दड दिला दो।" "जो भगवान की इच्छा " मैं हर समय आकाश की ओर ताक्ता रहता और भगवान के चरणा मे पहुचन की कोशिश करता। मन मे, आत्मा में, शरीर के रोम रोम में भगवान को प्राप्त करने की इच्छा बसी थी, उस भगवान काजा नील गगन के पीछे अपने सिंहासन पर विराजमान था। मेरी आखें जनायास ऊपर उठ जाती। हाथ स्वत आराधना में जुड जात और कठ स एक ही राग निकलता है भगवान, मुझे दशन दो। मुये अपने पास बुला ला, प्रभो। मुझे हर समय अनुभव होता कि मैं अब उड़ा अब उडा। परतु पाव अभी धरती की गदी मिटटी म पसे थे। ऐसा लगता था जैस में कीचड म फस गया हू और प्रयत्न के बावजूद बाहर नहीं निकल सकता। इसीलिए बहुधा में व्याकुल हो उठता और मेरी आत्मा बुरी तरह खडखडाने लगती। परतु मैं निराश रहता, क्यानि मेरी नजरें आवाश की ओर होती पर पाव धरती म गडे हात । और मैं न उड सक्ता और न अपन भगवान तक पहुच सकता था। यद्यपि तपस्या के तेज से मेरी आत्मा इस प्रकार प्रकाश मान थी, जैस पानी की बहुतायत से धान की खेती परतु फिर भी मर मन मे एक अभिलापा थी-मेरे स्यामी, मेरे प्रभु, मुझे मिल जायें। और इसीलिए मेरी आखे सदा ऊपर की ओर लगी रहती। बहुधा मैं सोचा करता-अगर किसी यत्न से मैं उडर आकाशो के परे जा पहुचू, और अपन ईश्वर के चरण जा पकडू, तो क्या वे मरी आत्मा को अस्वीकार कर देंगे--मेरी आत्मा को, जो ब्रह्म का एव अश है । परतु मैं उडू पैस। हाय, यह ऊचा ऊचा आकाश ? मदिर म, घर म, गली मे, सडक पर, बाजार में, नदी के किनारे, कुज सपनों के इशारे/61 म, उद्यान म हर जगह मुझे यही न-बही नारी दिवाई दे जाती थी। परतु मेरी तपस्या न अभी तक मुपे नारी से यिमुरा कर रखा था। मैं नारी का एक दवी मानता था एव मा, जिमरा मौन्य एक पवित्र भावना को जगाता था। जिमा स्नेह हर समय मुपे उमका पुत्र बन जान को विवश करता । और यह पवित्र भावना और यह आध्यात्मिर प्रेम, प्टि कर्ता परमात्मा य मस्प का प्रतिबिंब था, जिससे स्नह को एक चिनारी नारी के हृदय म भी जा पहुची थी। और मैं नारी को देखकर आमू मरी आखो से अपने प्यारे भगवान को दखने लगता, जो मेरी आया मे दूर, बहुत दूर, अपन मिहामन पर विराज मान था। मैं अपनी खोज, अपनी लगन, अपनी आराधना में इतना लान रहता था कि जीवन के पच्चीस वप बीत जान पर भी मुझे नारी प्रेम का ध्यान न आया। इसीलिए मैं जूही को भाव भगिमाओ को न समझ पाया---वह जूही जा सचमुच जूही की भाति सुदर थी, वह जूही जो सदा श्वत वन पहनकर आती थी, वह जूही, जो मेरे संस्कृत के श्लोक बोलत समय भी मेर मुख की ओर ताका वरती, वह जूही, जो माथा टक्त समय अपन आखा के मातिया से घटा मेर चरणा को धोती थी वही जूही जो घटा मदिर की दीवारो स, डयोढी से तगी लगी बडी रहती थी और अपने उत्त आराध्य को निहारती रहती जो ससार से विरक्त, अपनी पूजा म लीन रहता और हाथ उठाय मदिर की छा से भी ऊपर उम अमीम श य की आर देखता था, जिसके परे उसका परमात्मा रहता था। और जूही उसक तेजमान चेहरे की ओर देखती उसकी वलिष्ठ नगी भुजाआ की ओर देखती और फिर उसके पावो की ओर दखती जो सरमराती धोती की रगीन किनारी और सलवटो के बाहर कमल की तरह खिले नजर आत। और जूही की आपा स आमू जारी हो जाते। और नौजवान पुजारी जा में था, उसे सात्वना देता 'घबराओ नही जूही, तुझे परमात्मा अवश्य मिलेंगे । हे भगवान, तरी लीला अपरपार है। रेशमी 62/पानी का पह और मेरी आखें फिर ऊपर की आर उठ जाती। परतु कभी-कभी मुझे लगता, यह ब्राह्मण मैं नहीं है, कोई और है । मैं होते हुए भी नहीं हू । मैं भगवान के चरणो म जा गिरा। गिडगिडाकर दशना की विनती करने लगा। फिर मुझे ऐसा लगा, मैं अचेत हुआ जा रहा है । मुझम हिलने डुलने की शक्ति नहीं रही। मैं देवता के चरणा मे वेसुध पडा हू। एकाएक प्रकाश की एक किरण पत्थर के देवता ने नेत्र से फूटी और सारा मदिर जगमगा उठा। और प्रकाश बढता गया, और आरती के शख घडियाल बजने लगे, और उनके शोर ने मुझे अपनी लहरो पर उठा लिया और उछालकर आकाश की ओर फेंक दिया। 'अहा-अब मैं अतरिक्ष म उडा जा रहा था-हल्का फुल्का, सूक्ष्म । चारा आर नीला आकाश था-और कुछ न था। ऊपर नीचे सब ओर नीलिमा । एक गहरी, अनत, असीम नीलिमा मे ऊपर-ही ऊपर उडता चला गया। फिर भी यह नीलिमा समाप्त होन मे न आयी। फिर मुझे यह भी ज्ञात न रहा कि मैं ऊपर उडा जा रहा हू या नोचे धसा जा रहा है । यह आकाश है या अधा कुआ है, जिसमे नीलिमा के अतिरिक्त कुछ नहीं है । दिन हफ्ते, महीने, वप बीतत गय और मैं उस नीलिमा के भवर मे चक्कर काटता रहा । अब मैं ऊपर का जोर देखता तो वही नीलिमा और गहरी होती दिखाई पडती । अगर नीचे देखता तो बिलकुल अपने पाव तले मण्डी के लाखो जाल पुरे दिखायी पडत । ये माडिया मुझे जीवित खा जायेंगी- इसलिए मैं उनके जाला से ऊपर ही ऊपर उडता रहता। परतु य जाले मेरे पाव से जरा ही नीचे रहते । उनस ऊपर मैं न उठ पाता। ऐसा लगता कि मैं अब गिरा, अब गिरा। मेरे लिए न ऊपर रास्ता था, न नीचे । मैं विश' की भाति बीच मे लटक गया था। ऊपर नीला श य था, तो नीचे मकडियो के जाने और मैं बीच में चमगादड मी तरह लटका रह गया था। एकाएक मुझे अपन अदर दा विरोधी आवाजें, एक-दूसरे से लडती हुई सुनाई दी । एसा पहले कभी न हुआ था। मुझे लगा, जैसे मेरे व्यक्तित्व के दो टुकडे हो गये हैं। दोनो के सिर अलग-अलग हैं, परतु घड, जुड़वा बच्चो की भाति, जुड़े है । दोनो ब्राह्मण भव मेरे अदर लडने लगे। परतु क्या दोनो ब्राह्मण थे, विश्वास नहीं होता, क्योकि एक की शक्ल ता इतनी सपनो के इशारे/63 निकट दानो भाग यही पीपल की टहनियो पर लटक रहे है और मैं मगर भयानक थी, मनहूम थी कि उसे देखकर मुझे अपने स घिन आन लगी। निश्चय ही उनम से एक राक्षस था और दूसरा ब्राह्मण, एक क्लि, दूसरा हाइड । पर थे-~दोनो मेर ही अश। मैं भी दानो ही के अस्तित्व म जीवित था। य दोना हर समय बाद विवाद करत रहते, तू-तू मैं मैं करत रहत गाली गलौच वरत और गुत्थम गुत्था हो जात । य मेरे उस अवस्था को पहुचन के लिए एक दूसर को दापी बताते । अत म मैंने निणय किया कि यदि इस अतद्वद से मुक्ति पाना ही है तो म मक्डी के जाले म कम जाऊ । शायद इस जाल को तोडकर में धरती की ओर चला जाऊ और धरती मुझे अपनी जोर खीच ले। भवर स निकलन का एकमात्र तरीका यही है कि आदमी भवर के केंद्र म सबसे नीचे चला जाय और फिर अपन का भवर की लहरा का सौप दे। मुझे मालूम है कि जब मैंने भवर म गोता लगाये, ता मैं बहुत अधिक आशावादी न था। मेर पाव जाल से टकराय और उसे तोडकर नीच गिरत गय । एकाएक मैन देखा-मैं पीपल के एवं पड़ की ऊपर की टहनिया पर जा रहा है । मुये नीचे आत देखकर एक कौआ जार जोर से कहकह लगान लगा। फिर मैंन देखा मेर व्यक्तित्व के क गली में खडा हूँ। इतने मे जूही आयी और निकट खड़ी हो गयी । मन पूछा, "तुम क्या चाहती हो? वह पीपल व पड़ की ओर सकेत करके बोली, "ये दोना ब्राह्मण कर तब लडत रहगे? मैं जो अब उन दानो से अलग था, और शायद नहीं भी या, क्यानि वे दोना अब भी मुझे अपना जापा ही प्रतीत हाते थे अब उनसे पूछताछ परन गया। मैंन उनस पूछा “तुम क्या चाहत हो?' एक ने कहा 'मैं धरती पर उतरना चाहता हूं।" दूमर न पहा में त्रिशनु बनकर अधर म रहना चाहता हूँ। पहले न कहा 'मुझे जूही के चरणा की धूल ला दो और मरे मस्तक से लगादो। 64/पानी का पर दूमरे न कहा, "मुझे माक्ष चाहिए।" पहल ने कहा "मैं भूपा हू ! मैं भूखा हू।" और वे दोनो लडने लगे। एक टूमरे को खाने लगे। और पहला चिल्लाने लगा, "मुझे बचाओ, मुये बचाओ, मुये धरती पर अ ने दो।" मैं भागा-भागा जूही के पास गया और उसके पाव की धूल चुटकी म ली और पीपल की ऊपरी टहनी पर पहुचकर उन दोना पर छिडक दी। एकाएक मुझे पटका-सा लगा और पीपल के पड की सब टहनिया टूटती गयी, और मैं धम स धरती पर आ गिरा। वातावरण म एक कहकहा गूजा और व दाना एक दूसर में लीन होत दिखाई दिये। एसा लगा जैस एक साप ने दूसर साप को खा लिया है। न मातूम राक्षम ने ब्राह्मण को हडप कर लिया था या ब्राह्मण न राक्षस को। किंतु मन उन दोना को और अपन आपका एक अदभुत तरीके से एक होत पाया । अग जग दुख रहा था और मदिर की चारदीवारी थी और मैं मदिर के फश पर आधा पड़ा था। और जूही मेर पास थी। एकाएक वह पुजारी, जा मैं था, उठ वठा और जूही स पूछन लगा, "तुम कौन हो? "मैं एक विधवा हूँ।" "मुझसे विवाह करागी" जूही ने कहा "मैं पापिन हू, तुम पुण्यात्मा हा। मुये हप न दो, विपाद दे दो।" ब्राह्मण ने उसका हाथ पकडकर कहा "आआ, वाहर चलें । अब यह घर उजड चुका है। इस मदिर म अब कोद नहीं है-ठहरो, अपन चरणो की धूल मुवे दा। यह धूल पाप को पुण्य म परिणत करती है। और वे चलन लग। और मदिर भी उनके साथ साथ चलता गया। दवता ये प्रकाश की किरण फलती गयी और आगन विस्तत होत होत, लहलहात लब आडे तिरछे सेताम बदल गया । और उनम गेहू के सुनहरी पौध लहलहाने लग। पुजारी न फिर निमल आवाश की मार दखा और उस एक बार फिर प्रतीत हुआ कि उसके पाव फिर धरती स उठ रहे है। और पर सपना के इशार/65 उसने घबराबर फिर जूही या हाथ पर ह लिया। और वह फिर घरती पर या। वितु वे दाना एक मरे य हाय मन्हाय दिय, धे- मधा मिलाये, चल गय-क्षितिज की ओर-भितिज से पर। विधवा मैं सपना की घाटी मे गुजरकर विवेत्र के वास्तविक समार म वारम आ रहा था कि माग म एक पानी मिल गय । बाल, "क्या समपे" मैंने उस बच्चे की तरह जिमे नया पाठ मिला हा, रुक्त ना कहा, 'यही लि परिस्तान इम ममार म है और भगवान भी इस समार म है और आकाश की ओर बार बार तारना मूखता है। "शावाश ।। उहान थपको देकर कहा, "और प्रेम' मैंन कहा 'प्रेम म अधिवार भारना नहीं हाती, दाराता नहीं होती, वैध य नही हाता, मौत नहीं होती, और जब का प्रेम को दास, या मत बनान का दुस्माहस करता है ता मोदय इस समार म ता क्या, परिम्नान म भी नही रस्ता और जोम की बूदा म छिप जाता है ।' यह कहकर वे रास्त से हट गय । वाल, 'अब तुम जा सकत हो। परतु मैं चलत चलन रुक गया। मन म एक प्रश्न उठा। पूछ लिया। 'परतु एक उलझन का तो समाधान कीजिए। मेरी समझ म यह नही आता कि इस सत्य के उपरात भो राजकुमार की खोज क्या जारी है अब तक' वे हसकर कहने लग, अच्छा है, तुम प्रेम के वास्तविक स्प से अनभिन रहो। जिस दिन तुम इस भी जान लोगे, तुम्ह जिंदा रहने की जरूरत न रहगी। शाबाश 66/पानी का पेड घर दिन को बबइ जाना पहचाना शहर मालूम होता है। उसकी गतिविधि, उसको दौड धूप, उसकी चहल-पहल और उसके खेल-तमाशे आया मे रसे-बम मालूम होत हैं। परतु रात्रि के समय बबई में सफर करना, और वह भी बारह बजे के बाद ऐसा है जमे अनजान अजनवी समुद्र म नाव खेना। पता नहीं चलता कि कहा पानी गहरा है, और कहा चट्टाने छिपी हुई हैं। कहा भयानक भवर पडत है, और कहा लहरें इधर से उधर को घूम जाती हैं । देखन म लगता है यह एक सीधा रास्ता है । यूनिवमिटी माउड के किनारे से हाकर पडे तार घर को जाता है । उसके किनार एक अग्रेज विद्वान का बुत है, जिसके पास जामुन के दो पड खडे है । परतु रात के समय यहा जेब कतरो की एक टोली होती है । आगे चलिए तो पारसिया का एक कुआ है । कहते हैं कि जब पारमी लोग ईरान से भागकर भारत के तट पर आय थे, तो बदई मे सबसे पहले उहोने इमी कुए का पानी पिया था। इस कारण इस कुए पा पानी अब एक एतिहासिक और धार्मिक महत्त्व प्राप्त कर चुका है। इस कुए के चारो ओर अब एक मजबूत लोहे का जगला है। कुए के ऊपर एक ऊंची कारीट की इमारत है । चाग ओर रोगनको हुई बेचें बिछी हुई हैं । कुए के पास एक नालीदार आला है, जिसमे बहुत से दीप जलते रहते हैं । इन दीपो का प्रकाश आले के बाहर लटके हुए फूलो के हारो से छन छनकर आता है । दिन का पारसी लोग बैंचा पर बठने हैं और कुए का पानी पीते हैं और भगवान की प्राथना में लीन नजर 167/ नही --गोर ठाडी खुजलात हुए हसने लगा, 'दाना का लडाइ दाना चाहत है कि दोनो म से केवल एक यहा पर बैठे। इसलिए दाना चौक दे दता है, उस दिन सतरी पडित मुरलीधर को बुए पर से उठाकर गोखर इनकी लडाइ बडी मनारज होती है। ये नित-नयी गालियो का आविष्कार करत ह िचुनाचे गालियो की शदावती म दिशेप रुचि रखने वाल भाषा विशपन बहुत दूर-दूर से इस दृश्य को दखन जाते है। कभी-कभी बाच-बार म रावकर यभी एक को, कभी दूसर का बढ़ावा देते रहते है जिममसमा आते हैं। रात को इस कुए की छज्जे वाली इमारत क पीछे रामधन झट वाला सोता है और गुलाम अब्बास सिल्क के स्माल और औरता को अगिया वचन वाला और यूसुफ सिंधी पाउटन पेन वचने वाला और नयू चनेवाला और उसका प्रतिद्वद्वी पटित मुरलीधर । प्रतिद्वद्वी का नाम आत ही मैं चौंका। गार और मैं इस रास्ते से जा रह थे। मै फ्लोरा फाउटन जा रहा था, गोर का वडे तार घर म काम था। इसलिए हम दोनो साथ साथ चल रहे थे और गोरे मुये आम पाम का 'भूगोल समझा रहा था। 'प्रतिद्वद्वी क्या?" मैंन गोर से पूछा, 'क्या दोना के बीच कोई औरत थी? औरत पर नही सतरी पर होती है । वात यह है कि कुए व पास जा चन वाला बठता है, उसकी कापी विनी होती है । दानो यहा चन बचत हैं और के सतरी का अपन अपन ढग से रिश्वत देत है । जिस दिन नत्यू अधिर एन के वुत के नीच बिठा देता है, जहाँ कबूतर दिन रात बीट करते रहत हैं। जिस दिन पटित मुरलीधर का दाव चढ जाता है उस दिन नत्यू को हुए स हटाकर गोखल के चुत के नीच विठा दिया जाता है । रात को दाना की दा-तीन घट लडाई होती रहती है और सदा जिए उसी सारी का होता है। बधा रहता है। रात वे बारह बजे के बाद यहा सचमुच बडी रौनव हाती है । परतु जिस दिन स यमुफ सिंधी की हत्या हुई है, उमी दिन स हुए की यह पिछवाडा उजड गया। 'यूसुफ सिंधी की हत्या क्या हुई ठहरा लिया। हम सोग उस समय टीम कुए वाली इमारत में पाच ! वहा पर इस समय कोई नहीं सो रहा था। जगह बिलकुस खासा था। " मैंन गार की वह पपडार उम 68/पारीका पर गोरे के काले हाठा पर एक कडवी सी मुस्कराहट आयी। उसने घूमकर हाकी ग्राउड पार उस नये रेस्तरा की ओर दखा, जिसे आल इडिया वीमम का फरेस के कायकर्ताआ ने सस्ता खाना और सस्ती चाय उपलब्ध करन के उद्देश्य से पाला था। फिर वह लोह के जगले से पीठ लगाकर खडा हो गया। उसन अपनी निकर की जेब से बीडी निकालकर सुलगायी। एक मुमे दी। फिर मेरे को पर हाथ रखकर बोला, "यार, कभी तूने औरता के होटल मे खाना खाया है ?" - 'कमा होता है ?" "पहली बात तो यह है कि वह औरतो का पकाया हुआ नही हाता । दूसरी बात यह कि फीका होता है, और मैं चटपटा, मसालेदार खाना खाने के हह महू । तीसरी बात यह है कि उस समय तो पट भर जाता है, पर योगे दर वाद फिर भूय चमक उठती है। ऐसा लगता है जैम कुछ साया ही नहीं था, जम किसी ने भूप के साथ छल किया था।' "विलकुल ठीक कहत हो," गोर ने मेरे हाथ पर हाथ मारवर कहा, "ईरोज सिनमा का पटान भी मुझे यही वहता था। और फिर आठ आन खाने के लत हैं। इसमे तो हमारी दो आन मी मूगफली अच्छी । पट मे बस जरा-मा दद ही तो करती है।" "पर वह हत्या।" गोरे ने जार से कश लगाया । और वीठीयो जलाकर आधा कर दिया। फिर मुह से धुआ निपात हुए, धीर धीर कहने लगा-जस किसी बड़ी लयो यात्रा की, हजारों वप पुरानी, स्था कह रहा हा "वह सामन जो रेस्तरा है, उसमे एक लडकी बनन माफ करने का काम करती थी।" "लडकी सुदर थी?" मैंन पूछा। "नही, गाली जवान थी। मगर साली क्या जवान घो-मैं खुद दो चार चाय पीन के वहान उसे देखने गया । रामधन फूटवाने को उस पर नजर पी।" यह रामधन फूटवाला मौन पा" पर/69 उस पारसी छुए पास पल बेचता था, जहा नत्यू और मुरलीधर चन गजगर । वह पेला,चीन धीर नहीं बचता थाामाला वहुत कमाना था। और रिश्वत भी बहुत ता पा, यह जगह भी वहत मौजे की है। चार आवाज भी नही दनी पडती थी। लोग आप ही रुक्कर उसस सौतामोल पान रहता था। साते न यूक पूर्वपर गोखल महाराज का चबूतरागदावर दिया है। किसी समय जाकर देखना। वही चाहने वाला था उस लड़की का। मगर साला वडा कजूस था। जव शाम को लडरी अपन वाम-कार स निवटकर उधर उसके पाम आती, तो साला उसे कभी एक आह या एक सव दता। बम, एक फ्ल । और कभी तो वह उसम पम ही उधार माग लेता था ।वहता, 'आज कमाई नहीं हुई। बडा पक्काबदमाशथा--- एक नवर का। वह लडकी पहले ता अपन होस्टल के बरामद मसोती थी, फिर इधर मट वाले की गाडी के साथ अपना बोरिया बिछाकर सान लगी और रोज रामधन स एक खाली लेने के लिए कहती। और रामधन उससे कहता कि खाली तो मेरे पास है उस पर ताला लगा हुआ है, और उमकी चाबी मेर वडे भाई के पास है,जा अपने घर मेरठ गया हुआ है। 'माले पो तुमने नहीं दया ? अर, वितनी ही बार दया होगा । साना बेचते थे। उनके बीच में उनकी साइक्लि-गाडी होती थी, जिस पर वह सजावर वचता था-पश्मीर की नागपातिया, वावुल के अनार, चमन के रास्त पर जब बलक लाग दफ्तर से घटत है, तो हजारों की सध्या में इस फुट पाथ पर उमकी माइक्लि-गाडी पास से गुजरत है । साल र लन लगत। "हा, तो यह था-रामधन । उमका चेहरा माडू.' या। मिर घुटा हुआ था, जिस पर चुटियासदासडी रखताया। कल्ल में सदा की तरह चमत्ता . जब वह लौटकर आयगा, अपने को साली मिल जायेगी। फिर वह तुम्हारा घर होगा। लड़को पर का नाम सुनकर वडी हो मन होती। इसी तरह तीन चार छ महीन बीत गये। रामधन का बड़ा भाई न आया, न चावी मिली न खाली । वही पर खोली होती तो मिलती। वह साला ता उसे चक्मा दे रहा था। एक दिन क्या हुआ कि क्या हुआ? " 70/पानी का पड । "वह लडकी न आयी।" "नही आयी?" "हा, रामधन रात के तीन बजे तक वाट देखता रहा। पर वह लडकी न आयी। यह साला बहुत चवराया। अपन पुलिस के दोस्तो को लेकर इधर-उधर घूमने लगा । दस बारह पशा कराने वाला के घर भी देख डाले। लडकी कही न मिली। लडकी मुबह को लौटी और बहुत पिय हुए थी। "हा, बहुत पिय हुए थी और उसके मुह से बदबू आ रही थी। और वह लगभग व सुघ थी। रामधन न उसे बहुत पीटा "बता साली, विधर मर गयी थी?" लडकी वाली, "एक मद के साथ गयी थी। वह कहता था-'मैं तुये अपने घर म रखूगा'। "फिर साली उमर घर म क्या नहीं रही" -रामधन ने उस लात मारत हुए कहा, "यहा क्यो आ गयी?" लडकी ने कहा, "वह मुये अपने घर नही ल गया। वह मुये एक होटल म ले गया।" रामधन ने उसके सिर बाल पकडकर उसे नीचे गिरा लिया और उसकी पीठ पर दा चार मुक्के जार म मार । लेकिन लडकी का जसे मालूम ही न था कि उसके साथ क्या -यवहार किया जा रहा है । वह उसी शराब के नशे मे कह रही थी, "घर नही होटल, होटल नहीं बरामदा, वरामदा नही साइक्लि गाडी। ह भगवान मुये छाटा मा एक घर ले दो, एक नहा मुना सा घर, बिलकुल इतना छोटा घर, जितनी दूर तक मेरी बाह फल सकती हैं।" फिर रामधन ने उस और पीटा, और पीटा, परतु लडकी मार खाने के बाद भी होश मे न भायी। उसी बे सुधी की अवस्था मे सो गयी और दोपहर को उठकर चुपचाप काम करन चली गयी, जसे कुछ हुआ ही नहीं।" "फिर" 'फिर इस घटना के दा दिन बाद यूसुफ सिंधी इस फुटपाथ पर आ गया। यूसुफ को रामधन फूटवाल की वगल में जगह मिली। वह वहा अपना पडा बिछाकर सिल्क के स्माल बेचता था। कभी फाउटन पेन, घर/71 पभी जुरा, कभी लियन कागज-यहा घालार था । दुबला-पतला, गोर रग का लडाया। आणे वदी नजी मे इधर-उधर घूमनी थीं। वटी जल्दी जल्दी वाते यरता था। दूगर आदमी या माचन का मौका ही न देता था। बडी जल्दी ही उगन यहा अपना रंग जमा लिया। पता नहीं, गाना पहा ग चीजें निकालकर लाता था, बाजार से सदा मस्ता भाव हाता था। धडाधड उममी त्रिी हाती थी। इस पुट-पाय पर मैन वडे वडे तज वरन यात त्म, पर यूसुफ सिंधी का जवाब न था। वम दो तीन घट दुकानदारी परता था। एक ता सुवह दम से ग्यारह तर मर शाम या चार मछ तब । बस, सारा मान सम्म पर डालता था। फिर दिन भर क्या करता था, हमका नहीं मालूम । उस सान के पास भी मान या जगह न थी। वह भी रामधन के पाम, इम कुए की इमारत के पीछ मोन लगा। धीर धीर उमन इम लडकी स मिनना गुरु पर दिया। एक बार उम मिल काम्माल दिया, फिर नौ गज को एक सूती साडी लावर दी। माला था वडा फिजूल खच । रामधन की तरह कंजूस न था । वहुत जल्दी उमन लड़की को अपनी ओर कर लिया। पर ईमान की बात कहता हू, यू मुफ उम लडकी के लिए ही था । बानता था म तुम मानी कम्गा तरे लिए एक खाली लूगा, वहा एर रानी को तरह रखूगा। अगर वह जिंदा रहता तो वह मब कुछ करता । मगर वचारा मारा गया। जिम दिन सौ सय दार परल में एक साली ली, उसी रात मारा गया । अगन दिन सुबह व अपनी खाली में जाने वाल थे, जसा कि नत्थू चनेवाल न पुलिस म बयान दिया । व लोग उस रात बड़ी दर तक वाल करत रह । दर तक धीमे धीमे मुरा म फिल्मी प्रेम गीत गाते रह । जमे उम रात सचमुच उनका व्याह हो रहा हो । छ महीन की मेहनत के वाद यूसुफ न परेल म खानी ती थी। उस रात वह होटल स बहुत मा खाना लाया या जिम लडकी, यू मुफ और नत्थू चनवाल न मिलकर पाया । और मुरली ता पटिन था । इसलिए उमन नही खाया। और राम धन ने तो कई महीना म वहा सोना छोड दिया था। अब वह अपनी माइक्लि गाडी को गायन के बुत पाम रखता था और वही मोता था। जब कभी यू मुफ मिंधी मे नजर मिलता घूरकर अपनी चोटी को बल देने । । के 72/पानी का पड .

लगता । मूछे तो साल के थी ही नहीं, कि उह बल तासगर । कुछ न कहता था। एक बार यहा तक हुआ कि यूसुफ 'ना उस लड़की क रामधन को गाडी से फ्ल खरीदकर दिये। रामधन ने उपचाफ फल दिये । मुह से कुछ न बोला। वही बातें करत करते. यू मुमाले लडको पूछा, "आज कौन सा सिनमा दखेग?" हा यह बात तो मैं भूल गया रामधन लडकी को कभी सिनेमा न ले गया था। मगर यू मु ने तो नजी लडकी का कितनी बार दिखाया था। उस रात का" भी, जब वे सुबह अपनी खाली म जान वाले थे, यूसुफ उसे सिनेमा गण था । सिनेमा जान के पहल बडे गव से लडकी की ओर देखकर कहा था -देखा नत्थू, मैं यूसुफ हू, यह मेरी जुलखा है। सिनेमा स आकर दोना वही नत्थू र पास सा गय । नत्थू कहता है, उसन उह मिनमा से लौटत समय नहीं देखा था। एकाएक आधी रात को उसकी नीद खुल गयी थी। लड़की चिल्ला रही थी और यूसुफ सिंधी का मिर धड में अलग उसके सामन पडा था। और सारी धरती जून में भरी थी। "रामधन न मारा?" मैंन पूछा। गोरे न वीडी का कश लगाया, मगर बीडी दुय चुकी थी। उसन बाडी को धरती पर फेंककर मसल दिया। वोला मात को फासी होनी चाहिए । आआ, जाग चल। हम दोना चुपचाप जगल के साथ साथ तार घर की आर वढत गय । फुटपाथ पर चढकर एक पड आता है। उसके तने के नीच एक औरत मायी पड़ी थी। गोर न उसे देखा और फिर अपने पास बुलाकर कहा, 'दख लो, यह वही लडकी है। जब औरता के हाटल से निकाली जा चुकी है । क्तिन ही दिन हालात म रही। वितने ही दिन जाने कहा-कहा पागला की तरह घूमती रही। अब फिर यही आ गयी है। पर अब इसका दिमाग ठीक नहीं है । यह दिन भर इस पड के नीचे बैठी उम कुए की ओर देखनी रहती है जहा भी यूसुफ सिंधी की हत्या हुई थी। इस जगह की धरती खादन लग जाती है। और जब लोग हमकर पूछन हैं, "पगली, तू क्या ढूढ़ रही है ?" तो चिल्लाकर कहती है कि 'मैं अपना घर ढूढ़ रही घर 173 यह स्त्री जोजपने जाचल की छाया में सबटो बहाराका जमद सत्ता गुलाब की टहनी की भाति किमी आगन मरुप रग मुगध की क्ली महकाती, पड़ की काली छाया में वह काली लडकी सोयी पड़ी थी छाया तले एक गहरी छाया । उसके काले सूखे उलझे हुए बाल, उसके माय और उसकी आखा को छिपाये हुए थे। उसकी टार्गे घुटनो तक नगी थीं। पटी हुई साडी कमर पर उडसी हुई थी। और उममे उसने कोई भारी वस्तु छिपाकर रख रखी थी। मैंन गोरे से पूछा, "इसन साडी मे या बाध रखा है ' रोटी' नही, पत्थर । यह इधर उधर से पत्थर उठाकर लाता है। फिर उह कुरा के पानी से नहलाती है। और जब लोग पूछते हैं, "पगली, यह क्या कर रही है ?" तो कहती है, "दखत नही हो-मैं अपन वट को नहला रही है। नहला घुनाकर मैं उस दूध पिलाऊगी। और फिर उस स्कूल इस समय उस लटकी के दोनो हाथ खाली थे। उसका पट नगा था। और उसके चारा आर धूल थी। यह अछा है कि मैं उसकी आधे नहा दर सका शायद उन आखा के अदर कभी न झार सकता। इतना साहस मुपम न हाता । व आख यदि कोई प्रश्न कर बठती तो मैं क्या उत्तर देता। यह स्त्री जो तुलमी के पौधे की भाति पवित्र और पूजनीय होती, यह स्त्री को भेजूगी।" थी, क्या इस समय अपनी छाती स एक पत्थर को चिमटाय घूल में कटा हुई टहनी की भाति पडी थी? क्या? क्या? 74/पानी कापड हवा के बेटे । बहुत समय हुआ, मैंने एक कहानी पढ़ी थी, जिसमे हवा के चार बट थे-पूर्वी याड, पश्चिमी पक्क्ड, उत्तरी झक्कड और दक्षिणी यक्कड । हवा के ये चारो वट एक बडी खोह म अपनी मा के पास रहते थे। दिन भर ये चारा वट धरती और आकाश के बीच अतरिक्ष मे उछलत, कूदत बुलल भरत रहत और साय होत ही अपनी मा के पास आ जाते । और मा उह खाना खिलाकर अलग अलग थला मे वद करके खोह के चारो काना म लटका दती । चूकि य चारा वट वडे नटखट थे, और खाना खात ही लडन- भिडने लगत थ, और इस लडाई भिडाई से दुनिया का बडी हानि होती थी इसलिए इनकी मा न इहें जलग अलग थलो मै वद करन की युक्ति दूढ निकाली थी। उनकी मा बडी विशालकाय थी। उसका अट्टहास मदों के कहकह की तरह भारी और गरजदार था। जब वह अपने बटो को डाटन के लिए अपना मुक्का खान की मेज पर जोर से मारती, तो चारो झक्ड डर के मारे अपनी कुसिया से उछल पडत । वह बडी अक्खड, उग्र स्वभाव की और गरजदार लहजे म बात करने वाली औरत थी। परतु यह बहुत दिनो की बात है। उन दिनो मैं बच्चा था, और इम प्रकार की कहानिया पढता था, और इनमे विश्वास रखता था। परतु इस समय यह कहानी मुझे इसलिए याद आयी, कि उस शाम को, जिसका मैं उल्लेख कर रहा हू, मैं अपने एक मित्र के घर म चाय पीकर लौट रहा था। मेरे मित्र का घर मेरे घर स कोई दो मील दूर था। रास्ते में देवदार का 175/ - एक बहुत धना जगत पडता था और गद नाले माऊचा पहाडी दर्रा था, जिस पर बारह महीने बफ पडी रहती थी। उस समय, चूषि सूय अस्त हो हुआ था इसलिए पश्चिमी आमाश मे उमकी लालिमा शेप थी। मेरे हाथ में एक मजब्त छडी थी। यद्यपि रास्ता बहुत कठिन था, परतु यह मेरी आदत थी कि अपने मित्र के घर से अपने घर तक पदल सर करता आता था। इसलिए मैंन उत्तरी क्षितिज म उठाकर आन वाल बादला का कुछ खयाल न किया और अपने मित्र से विदा लेकर, छडी घुमाता हुआ, अपने घर की ओर चल दिया। पतपड के अतिम दिन थे । किसाना न अपनी फसलें काट ली थी और अब कही कही पहाडी ढलाना पर फसलो के पोत दठल शेप रह गय थे। गहलो म चरवाहे, वजली वजाते टए, ढोर उगरो वो वापस ले जा रहे थे। उनके जानवरा के गल म बधी हुई घटियो की आवाज, उनके पावास उडती हुई धूत म, सोने के सिक्को की खनखनाहट जैमी मृदु मालूम हाती थी। हवा म एक प्राण पापक ताजगी थी। परतु अभी शरद ऋतु की वह मर्दी न आयी थी जिमम जब हवा चलती थी, तो एमा प्रतीत होता था, जैम किसी ने नाक पर वफ की जगुली रख दी है। यू ही छडी घुमाते हुए सीटी बजाते हुए, अपने आप मे बातें करत हुए। मैं आधा रास्ता नय करके दवतार के जगल के पाम पच गया। जगल में घुमत ही मरी भेट डाक हरकार में हुई उसन बताया कि वह मेर लिए बहुत-सी डाक घर छोड आया है। यह समाचार सुनकर मुझे और भी प्रसनता हुइ क्यादि इस पवतीय प्रदश मे डाक, सप्ताह म केवल दो बार आती है । यहा वस्तिया बहुत दूर दूर है, और आन जान के साधन दुलभ इमलिए दूरस्य स्थान पर जब डाक आती है तो मानो शहरी जीवन का एक ताजा झाका आ जाता है और समय वडे रामान से कटता है । और जब डाक नहीं आती, तो आदमी यू अनुभव करता है जैम किसी न उस घट तर पड़े नात की बफ म गाड दिया हो । हमारा मलाम करके अपनी घटी वाली छडी हिलाता हुआ, तज-तन पदमा मजगल की गहराई म दृष्टि से ओझल हा गया। मैंन उत्तरी आकाश थी ओर दष्टि उठायी, जिधर से यान वादल उमड रह थे, और अपनी 76/पानी या पेड ।

फरगल को अच्छी तरह अपने शरीर पर लपट लिया। मैंने अपनी चात तज कर दी, क्योकि हवा मे शीतलता बढती जा रही थी और उत्तरी आकाश मे वादल भयकर स्पधारण कर रहे थे, और बडी तजी से कडे नाल के दरें की ओर बढ़ रहे थे । मैंने सोचा, यदि मैं इन वादलो के आने से पहले कडे नाने को पार कर लू तो अच्छा हो, वरना बफ और जोली का सामना करना पड़ेगा। थोडी देर मे हवा तज चलने लगी । उस शीतल थपडे मेर गालो को छूने लगे। और उसके तेज झोके एक उमत्त आह्लाद से चीखत हुए, दवदार के वृक्षो म से गुजरन लग। और इस समय मुये एडरसन की वह कहानी याद आयी, जिसका मने ऊपर उल्लेख किया। मैन मुस्कराकर तथा परगल को अपन शरीर पर और अच्छी तरह लपटत हुए कहा, 'हवा का वटा, उत्तरी झाड आ रहा है।" 'गाव, गाव'-उत्तरी झक्कड देवदार के लटटुओ को गिराता हुआ, और उसकी टहनिया का तोडता त्रोध म गुर्राया। और फिर ओल पडन शुरू हो गय । ओल और वर्षा के बडे बडे छोट हवा के तेज फर्राट, 'तरड- तरड' देवदार के वक्षा के गिरने की जावाजें 'धाय धाय' पानी गिरना और चट्टाना का टूटकर घडडो म गिरना और इन सवा ऊपर उत्तरी झक्कड की विकराल चिंघाड । प्रलय का दृश्य वध गया। थोडी दर म चारो ओर धुध छा गयी। रास्ता दिखाई पडना बंद हो गया। कई बार मैं खडडे मे गिरते गिरत बचा। मेरे जूत भीग गय, मेर कपडे भीग गय, मेरा सारा शरीर भीग गया। फिर भी मैं चला जा रहा था। इस जगल म, इस तूफान से कही बचाव न था।दएँ म भी काई सुरक्षित स्थान न या। हा, अगर मैन बडे नाल पा पार कर लिया, तो उमर दूसरी ओर मेरा घर होगा, दहकती अगीठी, आश्रय और आराम । इस विचार के आत ही मैंने अपनी रफ्तार और तज कर दी। यद्यपि धुध गहरी हा रही पी, मगर रास्ता वर्षों स जाना पहचाना या । मैं घर पहुच ही जाऊगा। बहुत दर तक मैं धुध मे चलता रहा । धुध गहरी हाती गयो । अधेरा बढ़ता गया । अधेर के साथ-साय तूफान भा तेज होन लगा। पर न जगल पत्म हुआ न पडे नारे का दर्रा दिखाई दिया। हवा के वट/77 'यही में रास्ता तो नहीं भूल गया बडे नाल ने दर म एर विशेषता है। यहा पहुचरर जोर म आवाज लगाओ आवाज गूजयर, चार-पाच वार घूम घूमकर धारम आता मानम होती है। मैंन जोर में आवाज दी, "हा-हा था।" हा-हा आ।' मेरी आवाज बारिश म भीगती हुई, घायल पक्षी को तरह पडफडाती हुई, रात्रि के अधयार म यो गयी। वहीं समाई गूत्र सुनाई न दी। 'हा-हा आ' मैं फिर जोर से चिल्लाया। 'गाव, गाव'-उत्तर म उत्तरी झवड वी चिघाड आयो। अब स्पष्ट हो गया कि मैं रास्ता भूल गया है। मुझे कुछ पता न था, में कहा जा रहा हू, विघर जा रहा है। धुध वृक्षो म भर गयी थी, झाडिया मे भर गयी थी खाई-पडडा म भर गयी थी। और इस कारण खाइ और खडड घाटी से समतल दिखाई पडत थे। हर घडी घाई-गुड में गिर जान का खतरा था। हर कदम पर मौत के आचरा की सरमराहट सुनाई पडती थी। मेरे सार शरीर में सनसनी थी। मेरे दात क्टिविटा रह थे। फिर भी मैंने चलना न छोहा। यदि मैंने चलना भी बद कर दिया तो ठड के मारे मेरा रक्त भी जम जायगा। थोडी दर चलने के पश्चात मुये सफेट सफे- धुध म क चा-सा द्वार दिखाई दिया। वह द्वार हवा मे जैस अधर था। उसके चारा आर धध छायी हुई थी। मारे प्रसनता के मेरे मुख से चीख निकल गयी। दोडकर मैं द्वार पर पहुचा और जोर-जोर से द्वार खटखटाने लगा। थोड़ी देर बाद द्वार खुला और एक बुढिया वाहर आयी। उनके हाय मे एक बडी लालटेन थी। उसने लालटेन उठाकर मुये अच्छी तरह धुरा । फिर बडे ककश स्वर म बाली, 'क्या है ? "मुसाफिर हू रास्ता भूल गया हू तूफान म घिर गया है।" उत्तरी शक्कड का एक योका आया और द्वार जार से खुल गया। बुढिया ने अदर जाते हुए कहा, 'अदर चले आओ।" अदर गया तो एक बहुत बडी खोह दिखाई पड़ी-बहुत ऊची और 78/पानी का पेट बहुत गहरी । खोह की चटटानें कई जगह से फट गयी थी, और प्राकृतिक रोशनदान से बन गये थे। इन रोशनदानो से ऊपर की चटटाना पर जमी हुई बफ साफ दिखाई पड रही थी। मैंन खोह के इधर उधर दष्टि दौडायी। कुछ जानी पहचानी-सी खोह प्रतीत हुई । एक कोने मे झरना गिरकर खोह मे जा रहा था। अदर ही- अदर बहुत सी चटटाना पर विचित्र झाडिया उगी हुई थी। छत से वफ के बडे-बडे झाड लटक रह थे-बिल्लौर से भी अधिक सुदर और श्वेत । खोह के बीच में एक बडी मेज थी और उसके सिरे पर एक भीमकाय युवक बठा हुआ अपनी भूरी दाढी सुजला रहा था। उसने सफेद समूर का एक फरगल पहन रखा था। जब वह मुस्कराता था, तो उसकी आखें बिजली की तरह चमक उठनी थी, और जब वह कहकहा लगाता था तो उसके मुह से ओल गिरते थे। सहमा वुढ़िया ने कहा, "यह मेरा बेटा उत्तरी अक्कड है। अभी- अभी तुम्हारे साथ आया है।" एकाएक मुये सब कुछ याद आ गया। मैं हवा की खोह म था। यह मरे मामने कुर्सी पर उत्तरी झक्कड बैठा हुआ मुस्करा रहा था। 'रास्ते मे मैंने तुम्ह खूब परेशान किया –उत्तरी झक्कड ने कहकहा सगाते हुए, वडे प्रमनता भरे स्वर म कहा, 'मैं तुम्ह एक गहरे खडड में फेंकने वाला था, पर मैंने तुमको छाड दिया-हा-हा-हा।" "तुम इसे खडड म फेंक दते तो मैं तुम्हे तुरत इस थैले म बद कर दता।" अब मेरी दष्टि दीवार पर लटके हुए बडे-बडे थला पर गयी। चार पल ये मैंने बुढ़िया से पूछा, "तुम्हार बाकी तीन लड कहा हैं ?" बुढ़िया ने बड़ी कठोरता से कहा, "तुम्ह कैसे मालूम कि मेर तीन बैट और भी हैं ?" मैंने कहा, "मैं इससे पहले भी इस खोह में आ चुका हू ।' "क्व? और कसे?' "एक कहानी के साथ । । हवा के बेटे/79 की रिपोट तो दो न ।"-बुढिया ने मुझे दूध और शहद का भरा कटोरा व दोटा। जब वह मुयसे भी तेज दौडा तो मैं उससे भी तेज दौगा परतु अत म वह मुझसे जागे निकल गया। वह मानव का पहला जहाजपा जो उत्तरी ध्रुव पर उडा और नयी दुनिया और पुरानी दुनिया के बीच म चला गया और स्लजोकोपीचने वाल द्रुतगामी कुत्ता साप दोडता रहा । देगा मनय नय शहर बसाये जा रहे थे। नयनय वारयानों चिमनियो से धुआं निकल रहा था और सरडा-हजारो मील बजरसर पहली बार फ्मल बायी जा रही थी। और लाखा आगमी धेश बुढिया जोर से हसी। "तुम्हारे जसे मूख के लिए मेरे पास कोई पाचवा थला नहीं है, वरना तुम्ह भी उसमे बद कर देती। इस खोह म कोई नही आ सकता। यह तो मेरे वेटे झक्कड के आने का समय था कि मैंने द्वार खोल दिया, वरना तुम्ह तो इसका द्वार भी न मिलता । चलो, कोई बात नहीं। तुम आ गय होता इस अलाव के पास आ जाओ, नही तो तुम्हारी हडडी तर सर्दी में चर्ष जायगी। मैं तुम्हार लिए दूध और शहद लाती हू उत्तरी यक्कड न होठ चाटते हुए कहा, 'मुवे भी भूख लगी है। मा "तुम्ह भी सब कुछ मिलेगा पर तुम अपन दिन भर क काम हुए कहा। उत्तरी झक्कड न कहा, "मैं उत्तरी ध्रुव से आ रहा हू । वहा देर तव आरोरा वाट पालिस की रोशनिया से खेलता रहा । सफेट राधों का बफ पर दौडते दखता रहा । आइसबग आधे से ज्यादा पानी म डूब हुए थे और एक समुद्री जहाज वफ को काटता हुआ धीर धीर आगे व रहा था। मैंने एक हवाइ जहाज के साथ दौड का मुकावला किया, जो पहला बार उत्तरी ध्रव पर उडने आया था। वह तेज दौडा, तो मैं भी तब सवस छोटा रास्ता मालूम किया। बुढिया बडे ध्यान से सुन रही थी। उत्तरी पक्वड ने कहा 'वहा से नीचे आकर मैं साइबेरिया में रही मिलावर याम पर रह थे।' 80/पानी या पड बुढिया की आखें खुशी स चमकन लगी। वह कुछ कहन वाली थी कि द्वार पर जोर से खटखटाहट हुई। वह मेरी आर मुडकर बोली, 'यह मेर बेटे दक्षिणी यक्कड की खटखटाहट है। मैं इस खूब पहचानती है। यह मेरा सबसे प्यारा और चहता वटा है । यह दक्षिणी समुद्रा पर से आता है और मेरे लिए सदा भाति भाति के उपहार लाता है।' बुढिया भागी भागीद्वार कीजोर गयी जहा उसका बेटा द्वार खट- खटा रहा था। इतन म उत्तरी झक्क्ड अपनी कुर्सी से उठा और उसने दूध का भरा एव मटका उठाया और गटागट उसे खाली कर दिया। फिर उसन शहद का एक बडा मटका उठाया जार उस भी एक क्षण म खाली कर दिया। फिर वह निश्चित होकर अपनी कुर्सी पर जा बैठा। इतने म द्वार पर चीत्कार मुनाई पड़ी। हम दोना न घबराकर उधर दखा। बुढिया घबरायी हुई, व्याकुल, अपन वट दक्षिणी याड को सहारा दकर ला रही थी। दक्षिणी यक्कड की आख नीली थी। मस्तक चौडा था। सिर पर तोत के हर पखो की टापी थी। गल म दक्षिणी समुद्री द्वीपा के मूगो जार कौडिया की माला थी और लाल फूला हार । उस विशाल वक्ष पर पाम्पास घास उगी हुई थी। और जब वह चलता था तो उसकी पग ध्वनि म लाखा चरागाहो के करोडा पशुओ के गला की घटिया का मधुर स्वर सुनाई पड़ता था। परतु आज उसके सिर पर तोत के हर पखा वाली टोपी जली हुइ थी। उसके गले के हार के फूल मुरझाय हुए थे। उसके वक्ष पर उगी हुई घाम जल गयी थी। और जब वह चलता था तो उसके पगो से मौत का राग सुनाई पडता था। वह धीर धीर अपनी मा की वाहा का सहारा लिय हुए मेज की जार बढ रहा था, और मैंन देखा कि उसके शरीर दाहिन अग पर सब जगह आवल ही-आवल पडे हुए थे। उत्तरी झाट झटकर उठ खड़ा हुआ । उमा चहरा शोध स तप कर लाल सुख हो गया, 'तुम्ह क्सिन मारा है, भाई। मैं उस पाजी का मिर तोह दूगा, उस जिदा बफ म गाड दूगा।" दक्षिणी शाबड हाफ्ता हुआ एक कुर्सी पर बठ गया। मा भागी भागी हवा के बेट/81 द्वीपा में नारियल दे वक्षा स खेलता रहा। सुदर स्त्रिया हवाइयन उसके लिए दूध और शहद का मटका लायी। दूध और शहद पीकर उमा जी जरा सभला तो मा न पूछा, "मेर वट को लेकर धरती से आकाश तक आज तर योई परास्त न पर सवा। फिर बता वह कौन दुष्ट अयायी है, जिसने तर शरीर पर य घाव और आवल डाल। मैं उसका खून पी लूगी।' दक्षिणी पाडे न मा यो जबदस्ती कुर्मी पर विठाते हुए कहा, "आवेश म न आओ। पहल मेरी बात सुन लो। में दक्षिणी ध्र व से आ रहा था। मैंन हल मछली का शिकार करने वाले जहाजों की मदद की। समुद्र मे लहरें पैदा वी। लहरा मे रास्त वनाय । गम पानी की धारा को ठडे पानी मे ले गया और फिर दोना या मिला दिया। फिर में दक्षिणी 'सहमा क्मिी ने नत्य दखता रहा । मैं वादला को उडाकर ग्राजील के बना म ल गया और हवाना म लाखो घोडा की टापो क साथ दौडता रहा। दौडत दौरत जब मैं थक गया और तीसरा पहर हाल लगा तो मैंने घर को राह ला । हौले हौले चलता हुआ जब मैं नवादा के रेगिस्तान स गुजर रहा था, तो एक गाला मेरे ऊपर फेंका । एक क्षण के लिए इतना प्रखर, प्रचड प्रकाश फैला कि उसके सामन क्रोडा बिजलिया की वोध फीकी थी। अगल क्षण एसा ताप वढा जसे सूय पृथ्वी पर उतर आया हा। हौल-होले एक पालें, नारगी और ले रग का विपला वादल उठा और मेरा गला घाटन लगा। मैं चीखता, चिल्लाता सासता नवादा रगिस्तान से भागा । लकिन यह देखो, मेरे बदन पर फिर भी ये आवले पड गय और मर सिर की खाल लाल हाकर उतरती जा रही है । बूढी मा ना सजल हो उठे। उत्तरी झाड भावना स विह्वल होकर भाई की आर बढा ही था कि दक्षिणी झक्कड चिल्लाया, ' मुखे मन छूना, मेर पास मत आना । मा का सहारा रावर ही मैंन भूत की है। कहते हैं उस विपले गोले का धुआ भी विषला है। जिससे भी छ जाता है, उम भी गलान लगता है। मा कुछ कहने वाली थी कि द्वार पर फिर खटखटाहट हुई। मा मुडकर द्वार की ओर जाने लगी। द्वार खुला और फिर एक चीत्वार, पहली से लोग 82/ पानी का पड़ भी अधिक मार्मिक और कातर सुनाई दी। हम सब द्वार की ओर देखने लग कि अब क्या आफत टूटी। मा फूट-फूटकर विलाप कर रही थी और अपना मिर पीट रही थी, और उसके पीछे पीछे उसका तीसरा बेटा पूर्वी पक्कड, लगडाता हुआ चला आ रहा था। उमा सिर के बाल एकदम सफेद हा गये थे, और शरीर मे खाल उतरकर लटक रही थी, और वाहो और टागा से रक्त बह रहा था। और वह एक आख से अधा हो चुका था। उमन बहुत पूर्वी झक्क्ड एक चीनी था । वह अपने घर म सबसे अधिक गुद्धिमान गभीर और शात-स्वभाव माना जाता था। उसकी रिपोट, जो वह मा को सुनाता था, सबसे अधिक रोचक और विचारपूण हाती थी। उसन बहुत कुछ देखा सहा और अनुभव क्यिा था--दासता और दरिद्रता, शोपण और विदशी शासन लोह, कायल और चाय के लिए मानव का व्यापार । आसू देखे थे। बहुत सी कठिनाइया झेली थी। बहुत-सी छोटी छोटी प्रसनताए और न ही नही मुस्कराहटें जसे काम करत-करत पा जान पर जुगनू की भाति दमक्ता हुआ गीत प्रेम से भरपूर एक सजीली दृष्टि यौवन की मह म बसा हुआ किसी का कपकपाता स्पश । उसन जापान में चरी की बलिया से कहानिया सुनी थी। हुआग हा के चीनी मल्लाहो स मेहनत का राग सुना था। वर्मा म धान क हर भर खता के वाला म बडे प्रेम से उगलिया फेरी थी। भारत के वारखाना म मजदूरा का इद्र धनुप स रगीन वस्त्रा तान-बान पूरत देखा था। वह हर रोज आकर अपनी मा को जीवन और श्रम, साधना और महनशीलता की कहानिया सुनाता था। उसकी मुस्कान मे विशाद की एक हल्की सी धनक होती थी और उसके शरीर से लौंग, इलायची जीरा और उष्ण प्रदेशा के घने जगला मे खिलन वाल अजनबी फूलो की महम आती था। उसकी वाणी म बाती द्वीप की स्त्रिया सौंदय को-सी कामलता थी, और जब किमी की बेवफाई का जिभ करता, तो उसकी जाम्बा म इडानशिया के ज्वालामुखी पक्ता का लावा चमकन लगता । यह तीसरा वटा-पूर्वी हक्कड, सचमुच सब वेटा से निराला अनोखा था। आज तक उस किसी ने लड़ते झगडत न देखा था। उसन अपन को यह अवसर नहीं m - "क्सिने तुम्ह यह दुख दिया?"उत्तरी झवड सहसा त्रोध म आकर "कसे मालूम नहीं? तुम्ह मालूम होना चाहिए।' दक्षिणी थक्कर चरवाह को बासुरी का गीत सुनने लगा। फिर वहा से प्रशात महासागर अठखेलिया करके मछलिया को बुलाने लगा। बडी सुहावनी धूप था। लगी। सहसा एक जार का विस्फोट था। समुद्र का पानी हजारा गज नारियल पुप्पा और ताआ, अबोध बालको और सुदर, कजरारनयनों वाली वामिनिया स सुर्मा जत सुशोभित एक छोटा सादीप, जिसमें तटों दिया था कि वह उसे थल मे बद परे। मा ने चिल्लात हुए कहा, 'यह तुम्ह हुआ क्या है ? तुम तो कभी क्सिी से नहीं लड़त थे । मैं तो तुम्हें अपना सबसे सभ्य और सहनशील बेटी कहती थी। पूर्वी झक्कड ने कराहत हुए कहा, 'वडा दद हो रहा है, मा एसा दद तो आज तक मैंन कभी नहीं महसूस किया। बडे-बडे दुख उठाय हैं मैंन, पर एसा दुख आज तक नहीं देखा।" मुक्का तानते हुए वाता। "मुझे मालूम नहीं। आग बढकर बोला। पूर्वी झक्कड न होल हौले कहना शुरू किया, ' यह सब कुछ बहुत ही साधारण रूप म शुरु हुआ । मैं यानसी नदी के किनार क्सिाना को चावल के खेत तयार करत देख रहा था। फिर वहा चला गया। मैंन जापानी नौकाओवादवान खोल दिय और लहरा समुद्र इतना शात था, उसवा रग इतना निथरा निथरा नीला था कि मुष उसकी गहराइया म रग रग व मूगो के गलीच विछे दखकर नीदार उपर को उठला । समुद्र म एक गहरा सा भवर नजर आया और तार स सौदय और श्रम की महक आती थी, सहसा मेरी आवा सामन उस भवर के गभ म समा गया। मुपे अभी तक वहा व वासिया का हृदय पाही चीत्कारें याद है।' पूर्वी साउन अपना सिर अपन हायो में ल लिया और मज पर मुर - आवर जापान म एक मे गया। 84/पानीमा पर । खोह मे कुछ क्षणो तक पूण निस्तब्धता रही। केवल थरने के गिरने की आवाज सुनाई देती रही। कुछ क्षण पश्चात उसने अपना सिर उठाया। उसकी एक आख जल चुकी थी परतु दूसरी म एक आसू अभी तक झलक रहा था। उसन धीर से कहना जारभ क्यिा, 'दूसर क्षण एक बहुत बडा बादल, गोभी के फूल की भाति फैलता हुमा अतरिक्ष के बीच मे चक्कर खाने लगा । उसका रंग पीला, नारगी और ऊदा था। उसम विपला धुआ भरा था । वह विपला धुआ मेरा गला घाटने लगा और मैं वहा से चीखता- चिल्लाता भागा-कोरिया से जापान, जापान से फिलीपीन, फिनीपीन से 'सिंगापुर और सिंगापुर से आस्ट्रेलिया। अचानक आस्ट्रेलिया के एक रेगिस्तान में मैंने फिर वही विम्फोट देखा-वैसी ही चमक वैसा ही घडाका, वैमा ही घुआ। यह जो तुम मेरी खाल जगह जगह मे उपडी हुई देखत हो, यह उही विस्फोटो का परिणाम है। सहमा दक्षिणी पकड अपने पूर्वी भाई के सामने जा पडा हुआ और उम अपने शरीर के घाव और आवले दिखाये। "क्या तुम्हारे क्षेत्र में भी इसी प्रकार के विस्फोट हो रहे है ? 'पूर्वी शक्ड ने चौंक्कर पूछा। दक्षिणी थक्क्ड ने खामोशी से अपना सिर झुका लिया। बूढी मा ने व्याकुल होकर बडे चितित स्वर में कहा, "यह ससार को क्या हाता जा रहा है ? इममे पहने भी मेर वेटों ने मानव के युद्ध देवे हैं जब हवा में तीर मनमनात थे जब लोहे की गोलिया चीखती हुई कान के पास से गुजरती थी, जब गोले फ्टार तबाही फैनात थे। परतु मेरे बेटा के शरीर पर उनका कोई असर न हुआ था। अबकी बार यह कसी आग है, जो सैकडों मील तक मब चुछ युलमा डालती है।' "अब म समार की सप्टि हुई है, हवा के बेटे आज तक पायल नही इए।' उत्तरी सवड ने विस्मित स्वर म कहा। "परतु अब क्या होने वाला है?" 'सब मर जायेंगे हवा के सब बेटे मर जायेंगे। हम मवने घूमकर देखा, 'यह हवा का चौथा वैटा, पश्चिमी झक्कड बाने वेट/85 कारखाना म विपली गैसोन सिलेंडर ढल रह है। इस बार मानव जाति उनरी झक्कड बोला "हम धरती की काख म बीज डालत है, फला म जिधर से आ रहा हूँ" पश्चिमी यक्कड उसी लहर म बालता बोल रहा था। वह द्वार पर खडा, एक सुदर सूट पहन और हाय म हैट पक्डे, हम सबकी ओर एक व्यग्यपूण मुस्कान के साथ देख रहा था। वह रवा क बेटा म सबसे अधिक सुदर और सजीला था। उसकी वाणा में आपण उसकी आखा मे नश की चमक, उसके होठा पर मुस्कान और उसक पावा म नाच की थिरक थी। वह हौले हौल एक नयी धुन गुनगुनाता हुआ खाद के पश पर अपन नय बूट बजाता हुआ, नाच को गत पर थिरकता हुआ हमार पास आया। हमार पास आकर उसन अपनी पतलून का जब से चादी का एक फ्लास्क निकाला, और उसे अपने मुह से लगाकर गट-गट शराब पी गया। फिर एक सुगधित रेशमी स्माल स उसने अपना मह पाहा और हमारी ओर दखकर नाटकीय ढग से कहन लगा, 'सब मर जायेंगे हम सब मर जायेग, मानव । मानव ने मरने का निश्चय कर लिया है। वह इस युद्ध म हम सबका मारकर स्वय मर जायेगा।" 'तुम क्या कह रह हो, मर बच्चे, मा अत्यत भयभीत और व्यथित हाकर वाती 'आज बसी साथ आयी है ? मेरा जो बेटा आ रहा है, मौत का सदश लकर आ रहा है । गया वहा दिन रात मोचैवलिया हो रही है, खाईया खोदा जा रही है, धरती के गम म हथियारो की फक्टरिया स्थापित की जा रही हैं, व बार जार लडाकू हवाई जहाजा के लिए विशाल अडडे बनाय जा रह है एक विस्फोट स अपन-आपका उडा दन वाली है। इसलिए पियो, मजस पियो, जी भर कर पिया।' पश्चिमी झक्कड ने फिर वही चादी का पलास्क निकाला, और उसम शराब उडेलकर फिर मुह स लगा लिया। मा न कहा, अगर हवा के बेट मर गये, तो जिदा कौन रहगा म सुगधपदा करत है । पहाडा परजगल उगाते हैं और तरसत हुए मदाना पर वर्षा वरसार हैं। हम शुष्क और उष्ण प्रदेशों में शीतल पवन कामों बनकर जात है और जमा दन थाली सर्दी को अपन सास की आच से 86/पानी का पह पिघलान हैं । बहार हमार दम मे है, और वनस्पति का अस्तित्व हमारी सास से है । गटी पा समीर और अगर की शराय हमार प्रभाव से है । जब कोई विडती के नीचे पडा हाकर अपनी प्रेयमी ने लिए वायलिन बजाता है, तो वापनिन वे उस राग पाहम उसवी प्रेयमी ये काना तक पहुंचात है । इमलिए रागिनी का अस्तित्व हमार दम मे है और प्रेम के प्राण हमार दम से है । और मानव हमम इम प्रयार रहता है, जैस मछली जल मे। इसलिए अगर उमन हम विप देकर मार डाला तो स्वयं भी एक क्षण जीवित न रह सकेगा।" अब हवा व चारा बैट मरी ओर देय रह थे। मा बोली, "हम तो हवा है, पर तुम मानव हो। तुम क्या कहत हो? इस विपत्ति के टालन क उपाय क्या है?" "कोई उपाय नही, काई उपचार नहीं। हम सब मर जायेंगे।' पश्चिमी झापड शराव व नश म लहक्कर बाला। उमकी मा न प्राध म उसका पूरा और बाली, "इसके बाद भी अगर तुमने अपनी वक्वास बद न की तो मैं तुम्ह थैल म बद कर दूगी।" पश्चिमी झपद न अपन हाठा पर जगुली रखकर कहा 'शिशु । बहुत अच्छा मा, मरी अच्छी मा, अब मैं कुछ नहीं बहूगा।' अब हवा के चाग वेट मेरी जार दख रह थे । मैं अपनी कुर्मी पर बडी विक्लता म क्समसाया। जत मे मुझे बालना ही पडा। मन कहा, "मैं अधिक कुछ नहीं जानता। परतु विद्वाना और नानी पुरुषा स सुना है कि इस धरती और आकाश के बीच म कही स्वग है। उसके अदर एक वृक्ष है । यह पान का वृक्ष है ।' "वही पेड न, जिसका पल आदम न खाया था और फ्लस्वरूप स्वग स निकाला गया या?' 'हा ! अगर तुम मुझे वहा ल चला, ता शायद उस वक्ष स इम सकट से बचन का काई उपाय मालूम हो सके।" "तो यू कहा कि तुम फिर उस वजित वक्ष का फल खाने पर तुले हुए हो ।" दक्षिणी झक्कड न मेरा और गहरी दष्टि से देखते हुए कहा । 1 हवा के बेट/87 "कोइ हज नही है बरिक मैं तो समयता हूँ कि मानव को महानता इसी मे निहित है।" "पागल हुए हा' मदा के लिए नरक म योक दिये जाआगे।" "इमको तुम चिंता न करो। केवन मुपे वहा जाना। फिर मैं सब देख लूगा।" उत्तरी यक्कड न अपनी मा की आर दखा 1 मा ने धीरे से अनुमति में सिर हिलाया । कहने लगी 'यह इमरे जीवन मरण का भी तो सवाल है। तुम इसे ल जाआ। दूसरी सुबह उत्तरी पक्कड ने मुये अपने क्धे पर बिठाया और मदानो, जगला, रगिस्ताना और पवता के ऊपर उडन लगा। यहा से समुद्र, ताल और नरिया चाटी की लकीरें दिखाइ पडती थी। हम लाग हजारा मील ऊपर ही ऊपर चल जा रहय। "क्या स्वग आकाश म है नही वह धरता के भीतर है। परतु इसका मान बहुत कम लागा का है क्योकि उसका द्वार बहुत ऊचा है। उमक द्वार पर एक पक्षी का पहरा है । इस पक्षी का एक पख जीवन और दूमरा पख मत्यु है । उम द्वार की आधी मेहराब वफ की बनी हुई है और आधी धूप की । उस द्वार व दो पट हैं ---एक दिन का दूसरा रात का। यह द्वार बडा ही विचित्र है । जब मनुष्य उसम म गुजरता है ता यू मालूम होता है जम मौत के मुह म म गुजर रहा हो और जीवन की ओर जा रहा हा । मैंन कहा "मुये नान का वर दखने की बडी चाह है। उत्तरी धाड न कहा देखने म यह वक्ष खास विचित्र नहीं है। यह एक मीधा-साता वक्ष है पर बहुत ऊया। इसका तना लवा और पहला है। सार तन पर कहा काद टहनी नहीं, जिसका महारा लकर मनुष्य इम पर चढ सा । बस दढ निश्चय और निरतर परिश्रम से इस पर चढना पडता है। चाटी क बिलकुल ऊपर जाकर इम वषम एक टहनी फूटी है। इम टहनी के कार केवल एक पत्ता लगा हुआ है। यही वह वजित फ्ल 88/पानी का पह "मुये ले चलो, तुरत वहा ले चलो।" मैं जधीर हाकर बोला। "अब हम अपनी मजिल के निकट आ रह हैं"-इतना कहकर उत्तरी झक्कड ने वादलो मे गोता मारा। और मुमे सुनाई पडा जसे चारा ओर आगन वाजे वज रह ह । मैंने महसूस किया जसे हल्की-हत्की सुगध चारो ओर फैल रही है । धप और कपूर का धुआ चारा आर स मेरी चेतना पर छाता जा रहा है । मेरी आखें आप ही आप बद हाने लगी। थोड़ी देर बाद जब मेरी आखें खुली तो मैंने अपने को स्वग के उद्यान म पाया। यहा जितने फूल थे, सबके आखें थी। वे तितलिया की भाति अपनी टहनिया मे उड सकत थे, इसलिए उह तो तोडन की जावश्यक्ता न पडती थी। यहा जितन पशु थे वे वक्षा स फ्लो को माति लग हुए थे। यह मोर का वप था। इसका हर पत्ता मोर का पख था। यह कोयल का वक्ष था, इसका हर पत्ता कोयल की भाति चहचहाना था। यह बदर का वक्ष था, इमका हर पत्ता बार की भाति एक टहनी से दूमरी टहनी पर उछनता कूदता फिरता था। यहा हर सुगध का रग था और यहा की परिया सुगधा के रगीन वस्त्रा म लिपटी फिरती थी। उन शरीर विल्लौर की भाति पारदर्शी थे। परिया की रानी मेर पाम आयी। बाली "तुम ज्ञान का वक्ष दखना चाहते हो" 'हा'-मैंने मिर हिलावर उत्तर दिया। "ज्ञान का वक्ष दखने का एक दड होता है। तुम उस भागन का तैयार हो" "हा, वह दड क्या है "तुम्ह प्रेम त्यागना होगा। "त्याग दूगा।" " . "विलाम" . "वह भी त्याग दूगा।' व्यमन -2 "सब त्याग दूगा। "देखो, पान के वक्ष पर चढने चढते तुम्हारे वस्त्र तार तार हो जायेंगे हवा के बेट/89 . तुम्हारा शरीर काटा स छिन जायगा, तुम्हारी हथेलिया और तुम्हार तलवा में रक्त बहन लगगा।' काई चिता नहीं। तुम्हार लिए दिन नहीं होगा, और रात नही होगी। तुम न धूप म बैठ सकाग न छाव म, न राग दख सकोग, न नृत्य दख सकाग।" मुये सब कुछ मजूर है।' तो आओ मर माथ।' ज्ञान का वृक्ष बहुत ऊचा निक्ला-मेरी कल्पना, मर अनुमान स भी बहुत ऊचा । बादल उसक मध्य म मडरा रह थे, और वह उनस भी बहुत ऊपर आसमान म वात करता दिखाई पड़ता था। उसकी चाटी पर एक टहनी वाह की तरह निक्ली हुई पी, और उसक साथ एक पत्ता लटक रहा था-पान की शक्ल का, या जादमी के दिल की शक्ल जसा। यही वह वजित वक्ष है।' परिया का रानी बाली "और इसी + पत्ते पर तुम्हार प्रश्न का उत्तर लिखा है।" उत्तरी झक्कड न कहा, "हवाए मर जायेंगी, अगर तुम इस प्रश्न का उत्तर नही लाजोग। पान के वक्ष पर चढना अत्यत कठिन था। दा हाथ ऊपर चढता था, ता एक हाथ नीचे फिसल आता था। बीच म बडी बडी स्कावटें आयी। पहले ता प्रेम आया जा मेर नयना की ज्योति और आत्मा का शृगार था और जिससे मेरा जीवन स्पदित था। उसे छोडकर आगे बढ़ना पड़ा। आखा के सारे जासू पटक देन पडे । एक को छाडकर शेष सब इच्छाए, कामनाए त्यागनी पड़ी। फिर चारो ऋतुए आयी और अपन समूचे हथियार लायी। वहार के फूला न इशारे किये । फिर गर्मी एक चिलचिलाती प्यास की भाति शरीर क अग अग म घुसकर वछिया का तरह वार करती रही। फिर जाडा जाया और हटिडया को बजान लगा और बोले भाला से शरीर को गोदन लगा। फिर शहतूतो की सुगन्ध आयो और अपन पास बुलान लगी। हवाए मर जायेंगी हवाए मर जायेंगा -नीच स उत्तरी पक्क्ड चिल्लाया। । 90/पानी का पेड जब शहतूत की सुगध आयी तो बहुत से विचार आय, बहुत से सशय, वहुत-सी शकाए आयो-'इस तपस्या का कोई लाभ? इस बलिदान का कोई उद्देश्य ? इस उम्र को यू गवाने का कोई फल ?' और कानो मे भाति- भाति के सगीत बजन लगे, क्तिन ही कमल से सुदर पगो के पायल झनक उठे कितनी ही निगाहा की कोमल भावनाआ का माहन लगी, क्तिन ही खजाना के मोती परो मे बिखर गये। मोह और माया की समस्त मोहलताए, अपना जाचल पसारकर खड़ी हो गयी। परतु उत्तरी झक्कड की आवाजें बराबर कानों मे आ रही थी, "हवाए मर जायेगी, हवाए मर जायेगी।' चटत चढते जब सब छूट जात है, और माग में कोई नहीं आता तो नीरवता और निम्त धता आती है । एसा अनुभव होता है जसे सब कुछ समाप्त हो गया है, सब कुछ शूय के गव में समा गया है, कोई साथी नहीं, कोई सगी नहीं कोई साथ में साम लने वाला नहीं। तुम हो, और कोइ नही है । मनुष्य जब इस अनुभूति से गुजर जाता है तो बुढापा आता है। शरीर शिथिल और अग नि शक्त हो जाते है । मजिल एक गज रह जाती है परतु साहस जवाब दे जाता है-'छोड दो, विश्राम करो। छोड दो विश्राम करो। चाटी एक फुट रह जाती है परतु सक्ल्प जी छाड बठता है-छाड दो, विश्राम करो छाड दा, विश्राम करा । जाखें बद कर ला और इस तन सनीचे रपटते चल आओ। नीचे रपटत चले जाने में कितनी राहत, कितना जानद है।" 'हवाए मर जायेंगी, हवाए मर जायेंगी। मैंने अतिम प्रयत्न क्यिा हाथ बढाकर कपकपाती अगुलियो स टहनी का पत्ता तोड लिया। पत्ते का तोडना था कि ज्ञान का वक्ष बठता चला गया, धरती के गभ मे धसता चला गया। उसकी ऊचाइया धरातल में समाने लगी। और दूसर क्षण मुझे महसूस हुआ, मैं उसी खोह मे हूँ। मेर हाथ म इसान क दिल की शक्ल का एक पत्ता है। और पत्ते पर केवल एक शब्द लिखा हुआ हवा के वेटे|श "शाति।" "शाति ?" मैंने निराश होकर कहा, "इम एस शब्द से क्या होगा" "मुये दिखाओ"-मेरे कानो में एक मधुर-मी आवाज आयी । मैंने मुड़कर देखा परिया की रानी खडी थी। मैंन पत्ता उसके हाथ म दिया। परी ने उस पत्ते पर अपने हस्ताक्षर क्यि और मुथसे वह्न लगी, "अब इम पत्ते को तुम सारी दुनिया में ले जाओ और घूम घूमकर लोगो में हस्ताक्षर कराओ।" "मगर हस्ताक्षरो से क्या होगा ?" मैंन फिर निराशा के स्वर मे पूछा। परी ने मुस्कराकर कहा, "जव शत मे श द जुड़ता है तो कालिदास और शेक्मपीयर बनते है । पत्थर मे पथर जुडन ह तो ताजमहल बनता है । जव हस्ताक्षर मे हस्तातर जुडेंग, तो वह जजीर तयार होगी, जिसम ससार के मारे युद्ध चाहने वाले बध जायेंगे।" महमा मेरी समझ म सब कुछ आ गया। मैन शाति के उस पल्लव को अपन वश म लगाया और खोह मे बाहर निकल आया। खाह के बाहर तूफान थम चुका था। चारा आर सुनहरी धूप खिली हुई थी। दूर दूर तक घाटियो म शाति की घटिया बज रही थी। 92/पानी का पेड प्रखर ज्योति बचपन की कहानी है। मेर माता पिता मर चुक् थ और मैं अपन वावा के पास रहता था। बावा गाव के स्वामी थे और उनकी गणना गाव के धनी जमीदाराम हाती थी। उनके व्यक्तित्व की छाप आज भी हृदय पर अकित है। याद आती है ता शरीर म एक झुरपुरी-सी दौड जाती है । गठा हुआ शरीर, लवा क्द, गलगुच्छे, आयें क्यूतर की तरह लाल-लाल और वाणी म शेर यी सी गरज-एस मनुष्य को देखत ही मन पर आतक-माछा जाता है । आजकल एसे आदमी कम ही देखने म आते है । मुये याद है जव गरजकर वे मुझे डाटत थे, ता मेरा सारा शरीर थर्रा उठता था, और यदि हमारा बूढा नौकर जुम्मन मुझे न बचा लिया करता, तो अब तक मैं अवश्य ही दूमर लोक म होता। उन दिना में तीसरी कक्षा में पढता था। मेरे दादा मुझे किसी के साथ खेलने नही देत थे। मेरा घर दूसरा म बिलकुल अलग थलग, एक ऊच टीले पर था। मेरे बाबा दिन भर शराब पीत थे और जब शराब नहीं पीत थे, ता हुक्का पीत थ, और जव हुक्का नहीं पीत थे तो सोत थे । इतने बडे घर म दो नौकर और एक माई थी, जिसका पीला मुरझाया चेहरा देखकर चुडला की याद आती थी । प्राय वह बैठी बडबडाती और अपने से बातें करती थी और कभी अपन पीले गद दात निकालकर एसा वहशि- याना कहकहा लगाती थी कि मेरे शरीर के रोगटे खडे हो जाते। अक्सर वह मुझे स्वप्ना मे दिखाई देती । मेरे ऊपर अपने पोल-पीले दात 193/ दूध पीता जौर उम मुगध निकाले चढी चली आती। जब वह दिखाई न दती, ता बाबा की साल लाल प्रोधित आयें घूरती दिखाई दती। मैं चीन मारवर विस्तर से उछल पडता। फिर जुम्मन मुये पुचपारकर मुलाता और घटा तर मेरे पास बैठा रहता था। मैं अपनी नही-नही उगलिया से उस जगूठे को पक्डकर साने की कोशिश करता और अत में उसकी थपक्यिा स गहरी नीद मो जाता। मैन अपन पिता को न देखा था। जव उनकी मृत्यु हुई, तब मैं माता के गम में था। जब मेरी माता चल बसो, तब मैं केवल तीसरी कक्षा मे आया था। इसलिए माता पिता के लाड-प्यार से मैं वचित ही रहा। मा की याद भी बहुत धुधली धुधली है। बार-बार कोशिश करता हू, परतु उनकी जाकृति आखा के सामने नहीं आती। मैं याद नहीं कर सकता कि वे क्सी थी। केवल उनकी गम गम गुदगुदी गोद की कल्पना कर सकता हू और उनके भरे भरे स्तनो की जिनसे मैं था, को सूघ सकता है, जो उनके शरीर से निकलती थी। यह सुगध अभी तक, वर अवस्था ये वावजूद मेरे नथुनो म बसी है। परतु जब मैं वच्चा था, तव माता पिता की याद नहीं सताती थी। एक नीरवता, एक उधकार, इस घर मे छाया मालूम हाता था । कमर बहुत लबे चौडे दरवाजे बहुत ऊचे ऊचे और छतें आकाश से बाते करती मालूम होती थी। हर समय ऐसा लगता था जसे सब कुछ टूटकर सिर पर गिर पडेगा । इस प्रकाशहीन मूनेपन मे अपना मास भी अजनबी मालूम होता था। घर से कुछ दूर नदी किनारे एक पनचक्को थी। पानी उसके पाटो के तले से निकलता था, और दूसरी जोर दनान पर सफेद झाग उडाता हुआ ओमीले मोतियो की फुहार विखेरता, नीचे घाटी की ओर बहता था। पन चमी प पाट अब चलते न थे । पर किसी जमाने में यह पनवक्की चलती थी। परतु मेर बाबा को सहन न था कि उनके घर में इतन निस्ट पन चक्की हो और गरीव विसान और नीच जाति के लोग आकर अपना आटा पिसवायें स्त्रिया वहा इक्टठी होकर बातें करें, ठिठोली करें और शोर मचायें । इसलिए पर्नेचक्की बद हो चुकी थी, और पनचकी के अदर 94/पानी का पेड भाग की झाडिया उगी हुई थी, जिनमे नीलराज को कोमल बेल क चौडे- चौडे पते और बडे बडे फूल विस्मय स आखे खोले दिखाई पडत थे । कदाचित वह यह न मालूम कर सके थे, कि वे यहा क्या खिले है, जहा कोई उह नही देख सकता। यदि वे किसी वाग म, किसी चश्मे के किनारे, क्सिी बाट म उग होते तो भी कोई बात होती । परतु यहा मैं अवश्य इहे दखता था। माझ के विषादपूण वातावरण म जब हवा के पाक हल्ली हल्की मिस किया लेत है, और दिन भर की थकी हारी तितलिया भग के वामल तुरयो और नीलराज के फूलो से लिपट जाती है, उनकी मादक सुगध से वे मुध होकर सो जाती है तब मैं घास पर लेटकर उह दखता । मै उनकी गहरी नीद के नशे को अपनी पलको पर महसूस करता । फिर झीगुर और मजीर बोलने लगते। पानी के किनारे मढक टर्रान लगत । और यह नशीला, गुजारमय उदास वातावरण मेरी पलका को इतना भारी कर दता, कि मैं वही सो जाता । जुम्मन ने बहुधा मुझे वही, चक्की व पास मोया पाया था। वह मुझे य् सोता देखकर चुपक स गार म उठा लता और घर लाकर विस्तर पर सुला दता। और सुबह जब मैं उठता, तो यह जानकर बड़ा हैरान होता कि मैं घास पर नही, मखमल के गद्दे पर साया पडा है। न पानी है, न फूल है, न मढा है न तिरातिया है। वही साय-माय करता हुआ घर है, वही ऊची ऊची दीवारें है, और वही बावा की लाल-लाल डरावनी आयें है । कभी कभी में पनचक्कीस भी आगे चला जाता था। घाटी पर चढ़ कर, और पुराने मदिर की टूटी फूटी इमारत से गुजरकर, उस बडी चट्टान के पास जा पहुचता, जो नदी के पश्चिमी किनार पर थी। चट्टान खडी थी और पानी, बूद-बूद करक, ऊपर से नीचे गिरता था। इस पानी मगधक और चूना घुला हुआ था, जिसस धरती पर तिकोनी और चौकानी शक्ले बन गयी थी। चट्टान पर इतनी काई जमी हुई थी कि छून म मखमल और सावुन के झागा-सी कोमल लगती थी। काई कही से हरी, कही से कदी, वही से गहरी कासनी थी। यहा पर एक छोटी-सी खोह भी थी, जिसके अदर क्मिी ने चारो ओर सिंदूर पात रखा था। मैं अक्सर सिटलो और छिपकलिया को यहा सोत हुए देखता । कभी कभी बाई जगली प्रखर ज्योति/95 , खरगोश अपन लवे लवे कान खडे किये हुए हवा को सूघता दिखाई देता और फिर एक छपाके मे, सफेद ऊन का गाला बना हुआ, दौडता हुआ आखो से ओझल हा जाता। वस, यह पनचक्की, यह वूद बूद गिरता पानी और यह खोह-मेरे एकात के साथी थे । यही मेरे सगी, सहचर और स्नही थे। घर म मेरा जी न लगता क्योकि बावा स्कूल के लडको के साथ भी खेलने न देते थे । घर स बाहर किसी मनुष्य की शक्ल दिखाई न देती थी—इतना अलग-थलग था यह घर । यह भी पता न लगता था कि स्कूल स लौटन के बाद लडके कहा समा जाते हैं। क्या उनके घर मे भी यही भयानक एकात है। एक दिन की घटना है कि मैं दोपहर तक अपन साथिया के साथ सलता रहा। एस समय पड का हर पत्ता, धाम का हर गुच्छा, जगल का हर टिडडा मेरा मित्र बन जाता अपन और जगल के जीवन के उन रहस्या का उदघाटन करता, जो मानव न आज तक काना म नही सुन और आखो से नही दम । क्तिनी रोचक कितनी महत्त्वपूण आर कितनी बहुमूल्य होती है वे कहानिया, जिह हम बडे होकर भूल जात है। काश, हम उह याद रख सकें उह उमी श्रम, उसी सच्चाई, उसी भावपूर्ण ढग से ससार के सामन रख सकें, जिमसे हमन बचपन म उह सुना था । तब शायद यह जीवन बदल जाये यह सारा विश्व बदल जाय, उसका अधापन, उमकी प्रकाशहीनता उसकी अनानतापूण स्वाथपरता बदल जाय, वह एक नये प्रकाश, नय स्प और नय नाह्लाद में जगमगा उठे। काश, मानव बचपन की उन कहानियो को याद रखे जीवन व उस रोमावारी रहस्य फो याद रखे जो उमन जल की कापती हुई क्वारी बूद से, नीलराज की अलबली क्ली स घास के कोमल अकुर से और हवाआ म उडत हुए पतझड ये अतिम पत्ते से सुना था। मढव अब भी टर्राते है नीलराज के फूल अब भी मुस्करात है, चट्टाना से पानी अब भी बूद-बूद टपकता है, परतु मानव के कान बहर हा चुके हैं, आखें अघी और बुद्धि मद हो चुकी है । अब वह सरगोश और फूल स नही, वारूद और खून से सेलता है, और रात दिन रोता है और नहीं जानता कि वह क्या राता है। वह नहीं जानता कि उसने अपन बचपन क साथिया के साथ धोखा दिया है। उस 96/पानी कापड मालूम नहीं, उसकी आत्मा म किस गद्दारी का जहर छलकता है, उसकी आखा में किस टोस के आसू है। वह अधा हो चुका है और अधेपन म जिन भयानक स्वप्ना का दखता है, उह अपने जीवन मे व्यवहार का रूप देता है। - यद्यपि मैं अब बूढा हो चुका है, और जीवन अस्ताचल की तालिमा की भाति प्रति क्षण डूबता चला जा रहा है तो भी मुये वह दिन अच्छी तरह याद है, जब मैं इतवार के दिन अपन साथिया साथ खेलता रहा मैन अपने साथिया से कहा था कि मुझे भूख लगी है, मैं घर जा रहा है । मुझे याद है, उस टिडडे न मरा मजाक उडाया था । उसन कहा था कि वह तो पास क गुच्छा पर फुदक्त फुदकत अपना नाश्ता कर लेता है। फूल एस मुस्कराया था, जम कह रहा हो कि वह ता खाना ही नहीं पाता। हवा म कपकपाता पत्ता बह रहा था कि वह तो हवा ही स अपना भोजन प्राप्त कर लेता है। उसन मेरा मजाक उडाया कि हम खाना आग पर जलाार बनात है, तरह-तरह की गध क वधार देत है और इस जल गध- पूण खान को खाकर दिन भर खट्टी-खट्टी डकारे लन है । और इस पर अपन का बुद्धिमान, सभ्य और स्वस्थ समक्षत है । सव मानिए वचपन म य मब क्टु सत्य अपन साथिया स सुन थे। परतु अब मै कुछ नही सुनता, अब मैं गद्दार हूँ, वे मुझसे बातें नही करत । खर, मुझे बडे जोरों को भूख लगी थी और मैं वहा स चल दिया। भगवान जान यह क्स हुआ कि मैं रास्ता भूल गया और घाटी के नीच आन क बजाय, घाटी पर आ निक्ला। यह अजीब स्थान पा-मनमान और वीरान, पथरीला और खुश्क । चारो ओर लाल ताल बजरी फली हुई पो। सिर पर सूरज चमर रहा था और पानी काही निशान न था। मर निकट शीशम का एक पड था। जड मे पास से उसके दा तन हो गय ५। ऐसा लगता था, जस य दो तने नहीं है, दो आदमी हैं जा उमटू बठे भुर्गी हलाल कर रहे हैं । मैंन देया दि में रास्त से बहुत दूर आ गया है। रास्ता, जो मेरे घर को जाता था, बहुत नीच रह गया था। मैंने इस पड का सहारा लिया और इसरे दोना तनो में बीच से पसाग कर भागे बदा। यहा पर कभी विटग का वृक्ष रहा हागा, परतु पिसी न इस वक्ष को काटकर जला दिया था। धरती म कायले दवे पडे थे और आस पास की मिट्टी भी जली हुई दिखाई देती थी। विटग का वृक्ष यद्यपि जल गया था, फिर भी उसकी जड़ें फूट आयी थी। उहनि अपनी नन्ही- नही लचकोली कोमल वाह धरती से बाहर निकाल ली थी। और वे वाह अब हरे-हरे पत्ता के झुरमुटो मे छिप गयी थी। मेरे लिए यह स्थान, यह दृश्य, यह वातावरण विलकुल नया था। मैं घुटनो के बल बैठकर इन हरी भरी टहनिया की ओर बढा । सहसा हवा चलने लगी और विटग के पत्ते हप स नाच उठे। मैं जब 7 हरी भरी दहनिया के समीप पहुचा तो जैसे सारा ससार ज्योतिमय हो उठा। कोई गान लगा कोई नाचन लगा, किसी के पायल झनक उठे, शहनाई बज उठी, और कुमारिया वै यहाहा के स्वर बिखर गय। यह मब कुछ मैंने अपने वाना में सुना। और याखा से जिनासा और मन म खोज की मनसनी लिय में टहनिया की आर बढता गया। मुझे अपनी ओर आन दबकर विटग की टहनिया सहमा बोल उठी, "आओ आओ, नह वालक, तुम भी इम हप, इस उरलास, इस अनत नृत्य और असीम जाह्वाद म लीन हो जाओ।' मैं और आग बढा। मैं देखना चाहता था कि य शहनाइया के स्वर और कुमारियो के कहकहे वहा से आ रहे हैं। मैंन पत्तो का इधर उधर हटाकर अदर झाका। क्या दग्रता हूं कि इन पत्ता ये मोच वाल चमडे का एक पुराना ववमा पहा है और उम बक्म व अदर सावलेसे रग का एक प्यारा-सा बच्चा पहा है। यच्च ये बाल घुपरान थे । आखें छोटी छोटी थी। परतु उन आयों मे निकलती निगाह इतनी पनी था कि हृदय म वरमे सी तरह पुरी जाती पी। उमर मुप पर मुम्बान न थी, विपाद भी न था, शिपामा भी न थी। चम, पह चुपये मे रेटा था और जब मैंन उम अपनी बांहा म सना पाहा, तो यह बरे शात भाव स मेरी गाद मथा गया। उमरा भरा भरा मामल गरीर मेरो प्यारी आत्मा को तप्त करता चला गया। मैन अनुभव पिया रियध्चे का गाद म सतही नृत्य पीडामार यद हा गयो पी। शहनाईने स्वर मोन हा गय ५। कुमारियों व महाह एक माय निस्तम्भता म यदम 2 बच्चा अब मेरी गोद म था। मैंन बच्चे से पूछा, "तुम कौन हो?" बच्चे ने बडे शात स्वर में कहा, "मैं प्रेम का देवता है।" मैंने पूछा, "तुम यहा अकेले कैसे रहते हो? तुम्हें डर नही लगता मुझे तो अपने कमरे म भी डर लगता है।' उसने कहा, "मैं क्या करू, मुझे यहा अकेला छाड दिया गया है।" मैंने उसे उठा लिया और चलने लगा। चनत चलते मैंने उमस कहा, "मैं भी अकेला हूँ। आओ, हम तुम इकट्ठे रहगे।" एकाएक उसने पूछा, "तुम्हारा घर कहा है " मैंने उगली के इशार में अपना घर दिखाया, "वह हमारा घर है। यहा से जो पगडडी नीचे को जाती है, यही हमारे घर को जाती है। मैं अपन बावा के पास रहता है।" उसने कहा, "ओह, तुम अपने बाबा के पास रहते हो?" मैंने कहा, "हा, मेरे माता पिता भर चुके हैं।" वह बोला, "मेरी मा भी मर चुकी है।" मैंने देखा उसकी आखो म आसू छलक माये । मैंने उसे जार स छाती से लगा लिया और कहा, "चलो हमार घर । हम दाना साथ रहेंगे।" उसके होठो पर एक विवादपूण मुसान आयी । उमने धीर से कहा, "मैं तुम्हारे घर नहीं जाना चाहता । मैं यही रहूगा।" यह कहकर वह मेरी गोद से मर गया और फिर टहनियो क झुरमुट म लोप हो गया। मेरा विचार है उस समय मैं उसके यो बातें करने और इस प्रकार चले जाने पर तनिक भी विम्मित न हुआ। मैंने कदाचित यह भी न सोचा हागा कि यह इतना नहा सा बच्चा कसे बोलता है या किस प्रकार चलकर पुरमुट मे गायब हो सकता है । न मुझे उसके एक उजाड स्थान पर मिलने से, न उसके बातें करने से विशेप अचरज हुआ। मैंने यह भी ध्यान न किया कि प्रेम का देवता भी कोई विशेष व्यक्ति होता है । मैंने प्रेम के देवता का उसका नाम ही समझा । मुझे उसकी यह बात भी असाधारण न लगी कि उसने मेरे घर जाने से इकार किया। सच पूछो तो मेरा भी जी उस घर म रहन को न प्रखर ज्योति /99 चाहता था। इसलिए मुझे इस घटना मे कोई रहस्यपूण बात मालूम न हुई। हा, इस बात पर अचरज अवश्य हुआ कि मुझे यादमी का बच्चा मिला था, और वह भी सिर से पाव तक नगा, और इतना प्यारा, और भरे जगल म विलकुल अकेला घर जाकर मैंन बाबा से इस घटना का जिन किया। जुम्मन भी वही खडा था और बूढी माई भी आकर यह किस्सा सुनन लगी। वे सब लाग चुपचाप मेरी बात सुनत रहे । मैंने देखा उन दोनो म से किसी ने मेरी वात का प्रतिवाद नही किया। मेरा विचार था, मेर वावा मुये पीटंग। परतु वह कुछ न बलि । कुछ ठहरकर उहान पूछा, 'वह नहा सा बच्चा तुमन कहा दखा या? वह जगह ठीक ठीक बताना।" म वह जगह बताना भूल गया था। मैंन कहा, 'उधर घाटी में एक जगह है जहा चारा आर लाल लाल बजरी बिखरी हुई है। वहा घास का एक तिनका भी नहीं है। हा, शीशम का एक पड है और बिटग का एक जला हुआ वक्ष, जिसकी जड म से अब नयी-नयी टहनिया फूट आयी है।" "बिटग का जला हुआ वक्ष यह सुनते ही मेर बाबा का रग उहा। फिर वे घडाम से धरती पर गिर गये । जुम्मन भय स घिघियाने लगा और बूढी माई-वह हसन लगी। एसी भयानक वहशियाना हसी मैन अपन' जीवन म कभी नही स्नी । न ऐसी हसी फिर भी सुनन की इच्छा रस्ता उसी रात बहोशी की हालत मे बाबा चल वस । बूढी माई बिलकुल पागल हो गयी और कपडे पाहवर गाव म पिरन लगी। बाबा के बाद मैं ही गाव का स्वामी था। नवरदार और जैलदारभी। जुम्मन अब मेर कमरे म मेर साय सोता था क्योति वावा और बूढी माई के चले जान के बाद मुझे इस घर मे और अधिक हर लगन लगाया। कभी कभी जुम्मन मुझे अजीब सी दष्टि से रसता और पूछता, "क्या तुमन सचमुच उस बच्चे को देखा था? और मैं कहता, "मैं कोई झूठ बोलता हू' चला, फिर किसी दिन 100/पानी का पेड -- - वहा चलें । मेरा विचार यह है वह बच्चा अभी तक यही होगा-निटम को रनिया के पीछे। तुम चुपके स पीछे पीछे आना में उसका नाउँ करूगा । फिर मैं उसे गो- म उस लूगा । तुम आकर उसे मुसिख लेना अत एक दिन में और जुम्मन वहा गये रिपुरतु न अब वहा पत्तै नाच रन थे, न शहनाइयो के स्वर और न कुमारियों पहरहे सुनाई दे रह थे। मैने बार बार टहनिया और दखा, वहा पुछन या पेवल एक और मिट्टी में दवा काले रंग का वाडे का बक्सा पडा था, चारो ओर लाल लाल वजरी थी और शीशम का पेड और बिटग का जला हुआ वृक्ष, और वही पगडडी जो मेर बाबा के घर की आर जाती थी। जुम्मन का रंग फीका पड़ गया। उसने मुझसे कुछ न रहा। थोडी दर वाद बोला "चला घर चले।' हिर समय बीतता गया । और में बडारी गया । तब मुझे बताया गया, मेरे बाबा को गाय को एक कुमारी से प्रेम हो गया था-~~जगाध प्रेम । कुमारी गभवती हो गयो। सहमा वावा को दो-तीन मास के लिए बाहर जाना पड गया। लोट तो पता लगा कि उनकी प्रेमिका में बच्चा हाने बाला है। किसी ने बता दिया, यह बच्चा उनका नहीं, किसी और का है मेरे बाबा बडे सदेही, मकोण हृदय और कानाच्च थे । एक दिन जब बह लड़की मेरे बाबा स मिलन उमी घाटी पर विदग के वृक्ष के नोच आयी, तो मेर भावा ने सरेह, माध और ईर्ष्या भाव के अधीन उसे वही भार हाला । वे नबरदार थे, जेलदार थे, सबसे धनी जमीदार थे, इसलिए बच गये । विसी को उनके विरुद्ध बोन का साहम न हुआ मेरे बाबा न विटग का वह वृक्ष भा जला डाला, जिसक तले वे मिला करते थे, जिससे उसकी कोई भी निशानी शेप न रह । उनकी प्रेमिका इसी बिटग वृक्ष के नीचे मारी गयी थी। वह प्रेम का त्वना कदाचित् वही बालक होगा, जो उस स्त्री के पेट में था और जा कई वष बाद मुझे जले हुए विग की टहनिया के बीच मिला। और वह लड की उस बूढी माई की बेटी भो, जा अव पागल हो चुकी - प्रखर ज्योति / 101 वह हरी भरी घाटी उसी दिन से वीरान हो गयी । यहा घास तक पैदा न हाती थी। पहाड की चाटी से लवर घाटी के उस कोने तक, घाटी का वह भाग वनस्पति से पूर्णतया वचित हो गया। वितन अचरज की बात है कि लोग इस बात पर विश्वास नहीं करत । उह यह कहानी सुनाता हू ता व समझत है कि मैंन शायद स्वप्न दखाया। मैं वच्चा था, बिटग की टहनिया म सा गया और फिर इस खूनी काड न स्वत मेरी उप चतना म करवट ली। परतु यदि यह स्वप्न भी हो, ता भी मैंन इस यथाथ से अधिक स्पष्ट और विश्वसनीय स्पम दया। कस अपनी आखापर विश्वास न करू? मैंन वहा उस बच्चे के अतिरिक्त, न उस लड़की को देखा, न छुरे को न जलत हुए विटग का । अब सोचता हू शायद वह प्रेम का दवता ही था, जिसन मेरी छाती से लगाकर अपना तीर वावा की छाती म पार कर दिया और वे इस चोट को सह न सक। परतु मेरा विचार है, मेर वाया इसस पहले ही मर चुके थे। वे जीवित भी थे, तो मुर्दो स बदतर। और आज हमार बीच लाखो कराडी एस आदमी है, जो रात दिन प्रेम का सहार करत ह- क्सिी बिटग के नीचे, क्सिी सोफे के किनारे किसी घर की चारदीवारी मे । वे अपनी प्रेमिका की हत्या कर देते है, और नहीं जानत कि ऐसी हर हत्या कही न कही विसी हरी भरी घाटी को वीरान कर देती है। वे किसी निर्दोप असहाय और अबोध बालक को अकेला छोड दत है, और वे नहीं समझ पाते कि उनके लिए जीवन और ससार इतना सीमित क्यो हा गया है चारा आर लाल लाल बजरी क्यो है, धरती के सोत क्या सूख गयें है और उसका कण कण क्या वरण प्रदन कर रहा है । कुछ नहीं समय सक्त और अधे पथिको की भाति उस बजर, वीरान पथरीली पगडीपर चलत चले जात है, जो मेर बाबा क घर कों य लोग जाती है। 102/पानी का पड परमात्मा परमा मा की आखें कापस लालहा गयी। उसने क्रोध भरी दृष्टि से स्वग के बड़े पुजारी की आर दर कहा, "हमीरपुर ग्राम म पासी किसान और उसका परिवार क्तिने दिनास पावे कर रहा है, और तुमने अभी तक उसके लिए कुछ नही क्यिा ?" बडा पुजारी थर थर कापने लगा। हाथ जोडवर बोला, "प्रभा, मन तो बडी चेष्टा की है, किंतु क्या करू, वेचार का भाग्य ही एसा है। कोई युक्ति कारगर नही होती।" "कस नहीं होती? परमामा ने अपने दड को फ्श पर मारकर कहा, और समस्त ब्रह्माड म प्रकाश वर्षा-सी हो गयी। 'चला, हम देखत हैं, पासी किसान हमारा भक्त है। वह प्रत्यक समय हम याद करता है । यह हमारा धम है कि हम विपत्ति के समय उसकी सहायता करे। "सत्य वचन प्रभा ।' बडे पुजारी ने माथा टक्कर कहा। पासी किसान ने द्वार खोला। बडे पुजारी ने अपन साथी की आर सक्त करके कहा, "यह परमात्मा है।" पासी किसान परमात्मा के चरणो में गिर पड़ा। "मेरे घम, मेर मान व रक्षक ! मुझ पर दया करा। दो दिन से बच्चे भी भूसे हैं। उनका बिलखना मुपसे देखा नहीं जाता। अपने भक्त की /103/ सहायता कीजिए।" परमात्मा न पूछा, 'तुम्हारे पाम अनाज था वह क्या हुआ वडे पुजारी न खाता दखकर कहा, "तुम्हार पाम दम बीघे भूमि है । इम वप हमने वर्षा भी काफी मात्रा में स्वीकार की पी। वह सबकी सब तुम्हारी भूमि पर पडी। इस बात म वर्षा का मारा हिमाव लिखा है। इस वप बजट म हमन अकाल भी नही रखा, क्वल विमाना की भलाई न लिए, ताकि उह किसी प्रकार की शिकायत न रह ! इस पर तुम कहते हो कि तुम भूग्वे हो। विमान न हाथ जाडकर कहा "प्रभा । मर पाम भाडा-मा अनाज बचा था, वह भी दनिया उठावर ल गया।" परमात्मा ने अपना दडपश पर मारा और धरती भय स काप उठी। कई स्थाना पर भूकंप के झटके आये और हजारा मिट्टी क घर गिर पड़े । परमात्मा न साध भरी दृष्टि म इधर उधर दबा फिर कहा 'पुजारी, हम उस वनिय घर ल चला। जा आना ।' बडे पुजारी ने हाथ जोडकर, माथा टक्कर कहा। वनिया धवराकर बाहर निकला। बडे पुजारी ने कहा "आप परमात्मा है । 'जी' बनिय ने बत्तीमी बाहर निकालत हुए वहा ही, ही, ही। चीटी घर भगवान आय है। निधन, भूखा वनिया, भला क्या सेवा कर मक्ता है । किंतु फिर भी जो कुछ है, भगवान का दिया है । आइए, भीतर आइए पधारिए । कुछ क्षणो म परमात्मा क चारा ओर वनिय के बच्चे-बाल इकटठे हो गये और नाचन लगे। एक वच्चा वधे पर चढ बठा और एक ने जेवें टटोलनी आरभ कर दी। तारो के जवाहरात ओस व मोती, चादनी के तार मूय का सोना सब कुछ जेबा म स निकाल लिया और फिर अपनी माधी गोद में डाल दिया। बनिये और उसकी पत्नी ने भगवान को आसान पर बैठाया और गले - 104/पानी का पेड मै हार डाले, और फिर बोले, "भगवन । हम आपके लिए इस गाव में एक तिमजिली धमशाला बनवाना चाहते है, परतु हम निधन हैं । हम इतना धन दीजिए कि हम ।" एकाएक भगवान की आखें अगरेकी भाति चमकने लगी। उहाने प्रोध में वापते हुए स्वर म बनिये को टोक्कर कहा, "तुम्ह लज्जा नहीं आती? तुमने पासी किसान के घर से अनाज उठा लिया। अब वेचारा भूखा मर रहा है।" वनिय ने दडवत की और धरती पर सिर रखकर बोला, "मेरे पास जो कुछ है भगवान का है। किंतु एक विनती है। पिछले वर्ष अकाल पडा था, तब मैंन पासी किसान का चार मन गेहू उधार दिया था। पासी ब्याज समेत मूल चुकान को राजी था। इसलिए जब फसल तयार हुई, तो उसन अपनी इच्छा से मुये अनाज लौटा दिया।' 'चार मन गहू पर ब्याज कितना होता है " परमात्मा ने पूछा। "क्वल चार मन, भोले बादशाह | दीनदयाल, वस चार मन ।' परमात्मा ने बडे पुजारी की ओर देखा। उसने खाता खोला और पने पलटकर बोला, "इतना व्याज उचित है । खात मे लिखा है।" वनिय न प्रस न होकर कहा, "मैं भगवान के आदेशो के विरुद्ध कोई काम नहीं करता । हा, वह जो गाव का जमीदार है, वह बडा अत्याचारी है । विमानो का बडा दुख देता है । बलपूर्वक अनाज हडप कर लेता है।" परमामा न बडे पुजारी को आज्ञा दी कि वह जमीदार के यहा । चले। परमात्मा को जाते देखकर बनिया गिडगिडाया और बोला, 'और देवता, वह मेरी तिमजिली धमशाला जमीदार के घर मुजरा हो रहा था। वह बडे आदर से पेश आया। "आइए, जाइए, परमात्मा जी। यहा इस कुर्सी पर बठिए-इस कुर्सी पर, मेरे निक्ट। यह दखिए, मैन जयपुर से नयी नाचने वाली बुलायी है । इसकी कमर का लोच देखिए। इसका नाच-हाय-हाय । बडे दिनो के परमात्मा / 105 बाद आप दशन हुए है। बचपन म एक दावार मा के साथ मदिर गया था, (हसकर) आपको सूरत मव तो पहचानी नहीं जाती। कई दिना स साच रहा था कि मदिर मे आपकी नयी मूर्ति की स्थापना करा दू, परतु क्या करू, लडाइ के कारण खच इतने बढ गये हैं कि ।खर, मैं प्रण करता हू कि अगले वप आपकी नयी मूर्ति अवश्य स्थापित करा दूगा।' परमात्मा ने कहा, 'हम उस पासी किसान के बारे म ।" 'हाय, हाय क्या अदा है " जमीदार ने नाचन वाली की ओर देखते हुए कहा। भगवान ने बड़े पुजारी की ओर घूरकर देखा, किंतु वह नाच देखने मे इतना लीन था कि उसन कोई ध्यान न दिया। लाचार परमामा का फिर करना पड़ा, "उस पासी किसान के सवध मे हम 'अजी आप किस कमीने की बाते करते है ? वह तो साला बडा बदमाश है। उसके पास भूमि है, वह वास्तव म मेरे पिता की दी हुई है। मेरे पिता ने प्रस न होकर दी थी। वास्तव में मेरे पिता को धरती दने का कोई अधिकार ही न था। सयुक्त परिवार की सपत्ति किमी गैर क्सिान को क्स दी जा सकती है ? यह तो मरासर गैर कानूनी कायवाही है । मगर यह तो एसा जानिए कि मैं जरा आपका भक्त हूँ। क्वल अपना भाग लेता हू-अनाज म से केवल एक तिहाई भाग । वरना देखा जाय ता वह भूमि मेरी है। परमात्मा ने पुजारी से कहा, "खाता देखो।" "अय?" बडा पुजारी अभी तक नाचन वाली की आर देख रहा था। परमात्मा ने चिढकर कहा, "खाता देखो, यह भूमि किसकी है ?' बडे पुजारी ने खाता देख भाल कर कहा, "जमीदार सच कहता है। धरती का मालिक वही है।' जमीदार ने कहा "देखा भगवन, आपका दास भला काह का यूठ वोलेगा? अरे | आप ता उठ खडे हुए। जरा गाना सुनिए । अरे भई मुन्नू, जरा पान बनवा लाना । वह जरा अररर, उधर न जाइएगा हुजूर । उधर पर्दा है। हा यह रास्ता है। ' वास्तव में मैं स्वय चाहता । 106/पानी का पेड है कि क्मिाना की सहायता करू । परतु क्या करू साहब, मालगुजारी इतनी है कि तोबा भली । इलायची लीजिए । तनिक रियासत के हाकिम स मिलिए । यदि वह मालगुजारी कम कर दे तो सारी कठिनाइया दूर हो जायें।" चपरासी ने कहा "इस पर्चे पर अपना नाम, पता और काम लिख दीजिए । साह्य इस ममय सर फराटा मुवी से बातें कर रहे है।" भगवान ने पर्चे पर अपना नाम लिख दिया। चपरामी पर्चा लकर भीतर गया। थोडी देर बाद बाहर आया। बोला, "साहब बालते हैं, पाच मिनट ठहो। वे अभी खाली होत है । साहब ने बडे पुजारी को भी सलाम बोला है।" पाच मिनट बाद पशी हुई। रियासत के हाक्मिन बडे कोमल और विनयपूण स्वर म कहा, "वास्तव में मर करटा मुदर्जी स भेंट का यही समय निश्चित हुआ था। इसीलिए आपको प्रतीक्षा करनी पडी। नहीं ता, क्षमा कीजिए, मैं तो आपकी प्रजा का सेवक हूं।' 'पासो क्सिान भूखा है । आप,मालगुजारी बहुत लेत है । यह बहुत वुरी बात है। "दखिए देखिए, आवश में न आइए ।' हाकिम बड़े नग्न स्वर में बोला, 'मुये रियासत का राज काज चलाना है। इमक लिए रुपया चाहिए । रुपया कहा से आयेगा, यदि मैं किसाना से मालगुजारी न लू' आजक्ल चारो आर की रियासत वैरी हो रही है, इसलिए शस्त्र बनाने वाले कारखाने लगान पड़ रहे है । इन स्वखों को पूरा करने के लिए मालगुजारी और लगान बढा दिय गय है । इसमे आखिर पासी किसान ही का लाभ है । नहीं तो रियासत के साथ साथ उसकी धरती भी दूसरी रियासता के पास चली जायेगी।" बडा पुजारी बोला, 'हाकिम ठीक कहते हैं।" हाकिम बोला, "मैं तो सदा से आपदा सेवक हू। किंतु यह तो परमात्मा 1107

सोचिए कि क्या यह मेरा धम नहीं है कि मैं रियामत की रखा गनुओ के
हमले से करू
?"
वडा पुजारी बोला, "हाकिम ठीक रहत हैं।"
चौबे जी मदिर के द्वार पर बड़े हुए भग घोट रह थे । मदिर के चारो
ओर पलदार दक्षो का बाग था और बाग में मिली पाच एकड भूमि,
जिसम अनाज, सब्जी-तरकारी सब कुछ होता था।
परमात्मा ने कहा, "यह अनाज तुम पामी विमान को दे दो।"
चौवन भग का लोटा चढाते हुए कहा, "बावल हुए हैं आप? यह
अनाज यह फल, यह फुलवारी सब भगवान के अषण है। और जो वस्तु
एक बार भगवान के अपण कर दी जाय उसे कोई दुमरा मनुष्य नहीं ले
सकता । या आर परमात्मा होर इतना भी नहीं जानते ?"
परमात्मा न वडे पुजारी की ओर देखा, और बडे पुजारी ने परमात्मा
की ओर । फिर वडे पुजारी ने मिर हिसार कहा, "चौबे जी ठीक कहन
हैं । खात म एमा ही लिखा है।"
.
सायकाल को थके हारे दोनो मायी पासी किमान के द्वार पर वापस
पहुच गये । पासी के घर के भीतर मे रोन पीटने की आवाजें आ रही
थी। छोटा लडका भूख स निढाल होकर मर गया था।
और किसान की पत्नी अपनी छाती पीट रही थी।
पासी किसान ने पूछा "अनाज लाये?"
परमात्मा ने सिर झुका लिया।
वडा पुजारी बोला, "धोरज धरो पासी किसान-धीरज के
अतिरिक्त और कोई चारा नहीं ।'
"
'हाय मेरा लाल | हाय मेरा न हा चाद ' पासी की स्त्री बिलख
उठी।
एकाएक परमात्मा का चेहरा प्रसनता से खिल उठा। उसने सिर
108/पानी का पेड़

ऊचा करके कहा, "पासी किसान, आओ हम तुम्ह और तुम्हार समस्त परिवार को स्वग ले चलते है।" पासी किसान बाला, "वहा खान को क्या मिलगा?" पुजारी ने कहा, "वहा खाने को कुछ नहीं मिलता। वहा केवल परमात्मा के रूप की छटा-ही घटा है। पासी किसान ने कठार स्वर में कहा, "परमात्मा के रूप की छटा तो यहा भी है।" और यह कहकर उसन द्वार जोर से बंद कर लिया। परमात्मा और बडा पुजारी चक्ति और दुखी होकर बाहर खडे रह गय । जब वे दोनो विभिन्न लोको से हात हुए अपने स्थान पर वापस आय तो वढे पुजारी ने चुपक स परमात्मा के कान मे कहा, ' देखा आपने ये क्सिान स्तिने कृतघ्न हैं ? स्वग मे भी नहीं आना चाहत परमात्मा न रोपपूण स्वर म कहा, 'दपा करो, नरक म डाल दो सबको।' बडे पुजारी न मुस्कराकर कहा, "इसका मैंने पहले ही से प्रवध कर दिया है।"

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Pani Ka Peda

Author
Krashna Chandra
Title
Pani Ka Peda
File name
Pani Ka Peda
Text
OCR done
Citation
1964
Published
2011/03
Publisher
Gyan Bharati Dehli
Language
Sanskrit
Pages
116
Library
Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner
Classification
Literature
DLI number
551269
Barcode
4990010032027.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
S39uskM2wl1
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