Bhartiya Vidya Mandir Shoudh Pratisthan,bikaner

Hindi Sahitya Ka Sanxipt Eitihas

Acharya Shyamsunderdas · 2010/12

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दी-साहित्य का संक्षिप्त इतिहास
भाचार्य श्यामसुंदरदास
नंददुलारे माजपेयी, एम० ए०
इंडियन मेस, लिमिटर, प्रयाग

Pitia m petebed by L Motra, * The Intha Pro Lotted, sbaletud निवेदन पा से प्राचार्य रसामगुरास का"रिरी मापा और साहित्य" मंच प्रकाशित गुण, दमी से उसके एक संदित संसरप की मापश्य कता समझी जामे लगी थी, पर आप से प्रारा उस संबंध का कोई कियास्मक उपोग नहीं हो सका पा । पास में बर दिदी वरपकोष' के सपाररूमीमुव नगेंद्रनाय बसु महोप ने अपने कोषका हिंदी-साहिस्स' शम एक स्वतंत्र निर के रूप में मुझे मिलने की प्राशा दी, तब मैं अम्म कामों में व्यस्त यने के कारण उनका पारेरापासन न कर सका। परत मेरे मस्ताव करमे पर पमु महोरप मे तक हिरा मापा और सारिस्म' पंप के साहित्य संस्क, सिंचत प्राकार में, अपने कार में स्पान रेना स्वीकार किया। मेरी धारणा है कि भाचार्य श्यामतुरररास का रस मप ही 'विरसफोर' में संम्सन योम्प या । या पुस्तिका उसी निपारिपित् परिवर्षित और योषित स्प। अब तागार मिपतन से शेषर पापाय रामर गुरु तक के रिरा-सादिस्प जो विवेचनामक इतिहास प्रप शिते गए हैं उनमें रिरी का संकशिव चित्र उक्ना दी रेत परवा मिना मिप भिम बात के मित्र मिन पापियों पर उनकी अपनी ऐप पाती है। प्राचाप रसाम मुंरदात का उखपत Rया में सर्पमपम प्रपेरा परमेरा एपवा परपेरा दिरी के लिये मौलिक ही मही, एपनी महत्वपूर्ण भीमा परिपत्र गरिस्प के महाप्राप्त अम्बेपी बोही नही गपारप विपार्पियो का भी मिसना पाहिए । यही इत पिस सरय की सार्थकता। में स्वीकार करवा (कित पचन कार्य में में प्रनम्पस्त है और इसमोर मेरी कवि भी नही, तवापि कई कारणों से उक मूध पंप से मेरी विणण प्रति यी और मैं ही उसे संचित करने का अधिकारी भी पा । रखिये युरियों को पिता न कर, मैं पुस्तक के लाप इस कप में अपना नाम मुक्त करने में मसम्न होगा। प्रयाग नर्ददुलारे वामपेपी

विभाग-सूची
पर
विपय
(१) प्रामुख
(२) बीरगापा-कास
(१) मकिपा-मानाभवी यासा
मेममार्गी शाला
राम-मकशाला
२०-२०
"
"
१५-१८
२९-m
(.)रीविकास
(८)मापुनिक भास-पच मबार
मप-प्रवार
(१) उपसंहार

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हिंदी-साहित्य का सक्षिप्त इतिहास (१)भामुख उचर माखरे विस्तृत शौर विशास मूलर में गत हजार वर्षों समरविव हिंदी मपा का सासिय मारत को गावीर और दीप भागानों, प्राधामा और स्पतियों को जानने का प्रनितीय सापन है। पानी मियाला, विस्तार और प्यापकता के कारण ही नही, मारत की सम्पदा और संस्कृति-परंपरा की रक्षा करने के कारण मी दिश साहित्य की महिमा और माम अपार है। मानव-दस के 'सर्प भनव मुर' की भमिम्मना के लिपे और मारत बातीय जीवन अपमिम्पत्ति के लिये हिदी भाहित्य के प्रयास खप और भागीय । मारत सीमाबीन भाम-सम्पदा और प्रायसस्कृति, हिदी-साहित्य पनवीन पयाम्पग पारण र, नवीन रंग रूप में विकसित हुई और मी कसी अपने परिपतनाल और प्रगविपील जीवन प्रविसि रेलम भार मी संपूर्ण उच्चरापप का रियास पनसमूह हिंदी-साहित्य का प्रेम स्वीकार करता है। मारवीप साहित्य की मूल रागिणी सर मुसी है, पर तम्प को मरेर बाद रसना पारिए । री-साहिम भी इसी परंपरा का पालन परता । रेराबासकी पति के अनुरूप जनता की निति का प्रतिसि हिंदी में प्राकाम से ही मिलता है। समूर की पनि जा पा परती है, सादिस्प में भी परिवर्धन हुआ है। इस पि से दिरी गति का मारम से अब पार पाली में सिमठ किया जा सकता है।

२
हिंदी साहित्य का सदित इतिहास
(१)पीरमावा-कान सं.१.१.से १४..।
(२) मधिमाल
सं. १४..से १०
(१) रीति-
७१... से ।
(४) गजात
सं. १८.भाव
निरम ही पे विपियाँ पाविप अपना गपिप की लिपियों की
राय निव अाप नही, फिर मोदी-साहिस्प
वामान
पिरेपन में पे गमान्यत सीकर कीया सकती है।

(२) पीरगाथा-कात पर युग पोर रासनीतिक दलबर क्या प्रगति का था । भारत के सिप भारि परिचमीप प्ररेयो म अरबों के प्रारमय ता बहुत पाले से मारंभ हो पुरेप और एक विस्तृत भू माग पर उनका प्रापिपस्प भी पास कुछ स्पापी ति से प्रतिटित हो पुग पा, परंतु पीछे समस्त उत्तयपपरिरेशियों के पादाट होम लगा और मुसलमानों की विजय पैगमन्सी साहौर, रेस्ली, मुलतान या प्रजमेर मादि में परामे लगी। मामद गमनमी के ग्रामों का मही पुग पा और शायरीन मुरम्मर गोरी मे मीरवी कार में मारव-विजय के लिये प्रयच बिए । पाले वोइस देश पर विदेशियों के प्राहमस, स्पानी अधिकार मात करके पावन करने के उपस से नहीं, केवल पहा की प्रत संपचि दूर से पामेरा से गुमा करते पे | महमूर गगनी ने इसी भागप से समर पार पढ़ाई की थी और पा रेशमिम स्थानों से मिपुत संपरि ले गया था। परंतु कुछ समय के उपरांत प्रामपकारियों के सहप में परिवर्जन हुमा, पे कुष तो पर्मपचार कीया से और ना यहाँ की तुप समृदियाली अपस्पा या पिपुल बन पान्य से बाहर दोहर देश पर प्रपितार जमाने की धुन में सगे । वाराण पूतो में उन साप मा लिया और में उनके प्रपाको निप्पस कराउन गाव समप पामित करते रहे, जिसस उन पर पाले वोपम मरी मरे पर पीरे धीरे राजपून-रादि प्रवकलर से धीम हाती गई भोर अंत में उस मुस्विम-रादि फेमपत बग माग सिर मुजाना पड़ा। परनीतिपाल मीण युग में देश दामामिक स्पति सिवनी यापनीय हो गई थी, इस परम सोग पान देवर से हिरी-साहित्य संचित विधात गुम-सामाम्म पात हुमा पा और देश अनेक पोरे पोरे गा में पर गया था, तब से इर्षवर्धन प्रस्पानी राबव-कासमतिरिक कई गवानिया तक सारे देश को एक सूत्र में बाँधने का प्रबमा ही नहीं । तर शमशा की निरंतर बहिरासी गर्न र नियम की नपी, एसपी व्या म्पायनी शताविमो में यह मीपण दोर अपनी परम सीमा पर पहुँच गया। सर्पयरों में अपने अपने शौर्य का प्रदर्शन करना एक पारस पात पी, कमी मी तो अपना बस हिसाबामे मा मन मासामे के लिये ही अकारण महावारी पाती थी। विप्ता और पुर्त मादि का पापनेत कम समार के लिये एक ही हानिकर सिर तुमा ।मो जीवन पिसी समय शान-विज्ञान का मूग मोत तथा विपनामा प्राधिर्मापक पा, मा प्रविधिकार में पाकर अफ अपशिरमा गया। कालोम प्राधा वितीयो क सामाग्य में इम-समृमिपूर्वक समय बिताते थे, ये अपनी पास कर सकने में असमर्प हो गए । चोमनाप पर मुसलमानों के मासमराका मतिकार नर मंदिर में छिपे राना और अनंगपाल के पी सागरा पीछे धूम पाने पर सारी सेना का माग महाना विपासासीन परम पतन का सुपारपरि प्रम्य स्थानों में पबल बीता प्रदर्शित करने के प्रमेक ऐविवालिक उल्ला लिये है, पर रिर मी मा समाब अपना महा-दुग पर पापानमे में प्रत मर्म रो पाता है और जो अपने पिसासी तथा भरपी यात पीसीका पुतता पन पाया है उसका मागोवा हैपल पर माल पारय पनवा पोक्तातीर मुएनियोको मात्मार्पण करती गई और अपरिणामदी उपतिषी मे पर में और पार बेबी पोर, मिनका मानदेय का जाति को परा मोनना पदया। रेरा के रिसमभाग में गित सपप ऐनी अलि तपा भपकार का सामाम्प पाया तुमा पा, उती ममाग में मगमग ससी यमप

पीरगापा-काल
५
अपमेय भाषामों से उस होकर रिवी-सादिस्य प्रफ्ना राष-काल
पवीत कर पा पादरी की इस गैरापारस्पा में देश की ती
रिपति यो, उसी के अनुरूप उसका साहित्य मो विकसित हुमा।
भीषण इसरत वपा पोर प्रयाति उस युग में बीरगाथाओं की ही
रचना ममय पी, साहित्य की तर्पयोबुती उपति उस काल में होनी
नही सकती थी। पर ठो लापारगाव कमिस समय कोई रेप
सहायों में स्पस्त यवा है और बिस पास में पुरकीही पनि प्रधान
रूप में म्याप्त राता है, उस रात में पीपेस्सासिनी करितानों की
गेंद परा मर में नुनाई पाती है। उस समय एक तो अन्य प्रकार की
रपनाएँ ती री नदी पार को योगी बहुत हावी मी १ वे, मुरवित न
पसान के कारण सीमहीपाल-बरशितो पाती।दिदीक
मान युग में जो प्रेमात पीररस की कविताएँ मिहतो
उत्तमार्ग
पाए पात पा मी उसस पर देना प्रापरक पाकि
सलाचीन कविता की रचना रागानों के प्रामर में ही हुई, प्रप्त उसमें
रामाभित कविता की मायः समी विशेषताएँ मिलती है । पपरि उम
कास राजामों की नीति देश के लिये हिवार नहीं थी और उनके
पारस्परिक पि नपा पर से पा अनि मम्मलित , उसन पेय
की सर्वत्रता को मरम करके ही दम लिया, पारि राजाभित करिया
की वाणी अपने सामिया के काति-कपन में कमी कुरित नही हुई।
उनका पराप राबर होता पाहायर पर कि उस समय क
करि माय रामाभों को मसप्त रखने और उनके पाप-समर्थन
करमे में अपने जीवन परीवार्यता समझ बैठे देश की स्पिति
और मविपरीभार ग्नापान सीम पाटि समपतियों
की ऐसी दीन अपरपा हा पाठी और मिन समय पिता
उपमारों समामेरा नदी ता, उस समय रेरा और जाति
की ऐसी दुणा अपरपमापी जाती है। हिंदी भारि-युग में

हिंदी साहित्य का सवित रविास
भरिग ऐसे ही कवि हुए पिने समार को संपटिव तपा सुम्सपिय
कर उसे विदेशीय प्राणमयों से रक्षा करने में समय बनाने की उनी
पिंधा नहाँ पी चिनी अपने प्राभयरावामी की प्रशंसा वारा स्मार्ष
सापन करने की भी। मही कारण है कि अपर्षद से नृपतियों की
फास्पनिक पीरगापाएँ बनेपात कम तो हुए, पर सब पीरोदी
परिष गापा, उस काम में सिनो ही नहीं गा मौर पर लिखी मी
गई हो यो पप उनका पता नही है।
इन पगामित पिया की रचनामों में न वा निवास सम्मत पट
नामों काही मरिक उम्न मिलता है और न उम्प कोटि के काबिल
काही उग्मेष पासा बावा है। एक पो उस युग की रचनाएँ अप अपने
मून रूप में मिलती ही नहीं और जो कुछ मिलती भी है, उनमें ऐति
हासिक तथ्यों से बहुत कुछ निमिपवा पाई पाती है।परिपने
अधिपतियो का प्रसप रन के लिये दीपनाएँ रंगा उसे बहुत कुछ
इतिश्च की अवहेलना करनी पड़ेगी, साप ही उसकी विषी मेंप
केहणे मानों का प्रभाव होने के कारण उनको मिला
करणम हो सकगा। काश मना करना ही टाप रहावा
प्रतिभास की भोर शिवारानी पड़ती धीर नदनमान्मए
पासिनी महिमा का एक संगोत्र में प्राबर रता पाचा।
इसी की चेत्र में पाती बरती काम्प पारा परपरागत हो गई जिससे
मार पारयो की जीविका तो पचती रहो, पर रविवा उप सस
का पिरमरगा गया । पुगनी रचनामों में पानगात परिपतन न
करके घोर ठसे नवीन रूप में मुनार राम-सम्मान पान पीजाइमा
भारत में पली उमस एपिता तो सास माहादीमा, माप
प्रने
ऐतिहासिक विपरनों का सार मी हो गया। मपो में पर इतने प्रति
बस एसे कि मूल के भो भरिका मए और मूनाफा नगना
मी मरमही तारठिन भयरस दागपा । परिदम प्रपात
पीमत करियोसीपा ऐन से गपा दवा पीर कविता

मीरगापा-कास संगमाभय से हराकर वन-मम् को शारिक मि से न हा माता वो भर करिव कविता की स्विनी प्रयोगति हो गई ती सका सार में अनुमान लिया जा सकता है। इस युग के कवियों की रचनामों में वहाँ-वहाँ सम्पे गाीय माना की मी मला देल पाती है। देशानुराग से प्ररित हार देश के रामुमो का सामना करने के लिये पे अपने मामपदावामोका फेवस मनी वाणी द्वारा प्रास्साहित ही नहीं करते प, परन् गमय पान पर स्पर्य राप में तलवार लेकर मान में दूर पावे ५ और इस प्रकार सवार दवा सम दोनों को चलाने की अपनी सुगमता परिचय देवे पे।कमी कमी येकषि देश के प्रवद्रिम में भापकर पाती का दुरुपयोग भी करते थे, पर पर उस काल की एक ऐमी पापा विशपता मी किरषिगण उससे सर्वया मुक नहीं हो सकते थे। उस युग के कवियों में ठप कोशिकपित्य की मसा मी मिलती है। पपिपीरन के भनेर प्रमों को व्यापक सपा गैमीर म्पास्पा उकालीन कपिता में नहीं पाई जाती पर उनहाने अपनी गलियों में बीर परिणत्रिण में ना नई रमहोप उमापनामा समा अनेक कोमस सन्धियों का समावेश किया है। पास के पारियों का पुर बयन इतना मर्मस्पर्शी तथा सजीव हुआ कि उनके सामने पीपे के पविनों की अनुपात-गमित किंतु माग रचनाएँ नास टी जान पापी है। हिंदी में पीरगापाएँ रोपों में मिलती-पतो प्रबंध-काम्पो केप में और कुछ बीरगीतों फेस में । प्रपम्प में पीर-सविता करमे की मयानी माया सभी सादिस्यों में रिकात संघसी मा रही है। पृप्वीरानरासो-पागमयमो समस्त बीरगापा-युग की मरस अधिक मास्तपूर्ण ना। उन बालपी रिवनी सर मला इस एप में मिलती है उतनी दूसरे अनेक प्रपो में नहीं मिलती। निस बितना बिस्तार दपा मारामातिना साहित्यिक सौगसमें

हिंदी-साविप का दिल इतिहास
मिलता है, अपन उसका भरपंण मी नहीं दिखाई देवा । पूरी जीवन
मामा होने के कारण इसमें पीरगांतों की-सी संकीर्हता तया पर्सना की
एकरूपता नहीं माने पाई है, परन् नवीनता-समन्धित पानी
इसमें प्रषिच्या पचपि रामपरित मानस' अथवा 'पद्मावत' की
मावि इसमें मावों की गानवा या अभिनय पनामों की प्रथरता
उवनी प्ररिक नहीं है, परंख एप्रय में वीर माबो की सी सुपर
अभिम्पकि हु और कही कही कोमात मानाभो वा मनोहारिची
उहियो से रप अपूर्व काम-चमत्कार भा गया है। रसास्मकता
विधार से उसकी मचना दिदी पो से उरहर काम-पयों में हो
साती है। मापा की मापीनता कारस पहप प्रब साधारण पनवा
के लिये तुरूप हो गया,मन्पपा रापरबान के इस पुग में पृषीराज
रासो की उपयोगिता बहुत अधिक हो सकती पी।
बीरगापा-कास प्रपनाम्पा पियानो में मा भारका
निसने अपवर-प्रकार, मधुकर 7 दिसमे यबम जसर्विस
तारगर का जिसमे हम्मीर-काम्प और नस्समिट का विसन मिजपान
रातो सिला है, उस्लेख मिलता है, जिससे पा प्रमाना है कि
मगर कामों की परंपरा बहुत दिनो तक पसीपी। पर गणपूलाम मे
इस प्रकार की प्राचीन पुस्तका की पान न होने पषा अनेक प्रयों के
उनक माशिमा, प्ररिपेफ अपना भारशिवा का कारण धिरी
काउरिया में बंद पोपने कारमात परंपरा का पूर्ण पूर्व इतिहास
उपस्थित करने की सामग्राम वर्गमा अमाप रहा।
भालसंट - मिशनों मे से पर परराईमत पृप्पी
रामरासो पानी एक सर पवनापा १और इमरि
से सांप पक स्प में परमही प्रिया है, परंतु या बात टीम
नहीं जान पाती। पृषीराजरामा तपा भासा में सबसे प्रधान मर
का पाला प रिलीषिपति पृष्पीगर हमारीजी
सानिया दान के कारण उसके प्रपाका मन भरिक उत प्रदान

पीरगापागात
परवा परंतु भारत में यह बात नहीं पाई पाती। इस परगीत
में न सा पृषीराम परित्र की मानता है और न उसकी वीर
एसियो को प्रसा। ऐसा अनुमान किया जाता है कि पाप
माचीन रूप में पनिका मिला हुमा या यो महारे केरल
शासर परमात के दरयार में पता था । परपरेत-शासक पृषीराम
का समकालीन और इन्नौज कपिपति अपरा मित्र सपा
हामंव था।
एस पुस्तक में मपानठ घासा और उयल (उपसिंह) नामक
और घरियो तथा साधारसवा उनके प्रमे मालों और लम्बियों की
बीरगाथाएँ ।। प्राप्तता और उस बनाफर शाला के पहियोगम
और महादेवकालीन परेत अपिपति परमाल के सामने या
सनापनियों में ये सवपि परमास प्रयक दया मीर शासकपा परत
उसकी मी मतना अपने बीर सामंतों की बायता से की बार
पृप्पीराम तर के ग्रामों का विपक्ष करने में समर्थ हुई थी।
भाता, उरत हासन, मुशले प्रादि मीर भावामा फापार
तासीन पोरे हरे राम्पों पर तो पीरो, पमीय स रितुत
सामाग्प प अभिपति पयर्षद मो उनकी पीरता के प्रागे सिर मुसमा
भा। भारदपर पीरगीता में इन पीर मावामों के भ्रम विपारों
सपा माप पावन सापों का वर्णन है। उस समय की कुच ऐगी
रिपवितगई पी प्रित्येक रिता में पीर पापियों के लिपे चपनी
मीरवा प्रर्शन करना प्रावरपका पा और पन्यापयवाला
को पराजित करने पर दी र परदा से रिपार परम का मधिकार
मिलता था। परिदन पुरतर में सुरक्षा मिठना मिग्राहप
परसित किया गया है, उसमें बहुत युप प्रनिरापद भी है, परंतु
सानिरित है कि महान पीर सदा म सपनवापूर्पक मनम
युमपि पोर उनमें रिजवी दार उनीने रासाम्पा पहरण
मी म्पिा पा। पुस्तक के अंत में प्रापेठकम्प रस उपस्थित

रिमादित्य का दित इतिहास
होता है। सब पीर बनाफर मुझ में मारे जाते है, उनकी रानियों सती
हामे के लिये अमन श्री शरण शेती और बचे हुए पपल दो मछि
भाता धार उसका पुष दस ग्रा-पतिरपाग पर रिसीमन
में जा बसते हैं। एकजरी मन का ठकठाक पठाप्रमी पर मही
सग हरा है। पर कोई परि-रल्पित स्पान पान पाता जिसे
निबनवा सपा पार की संजना दी।
इप गरयौव में अनेक मुरों का पर्सन बहुत कुछ एक प्रकार
से पुना है, तापी इसमें प्रमेक मौगासिए मामिया मी पाई गावी
परतु साधारण पाठकों के लिए इतके वर्णना में पड़ा पापय
है। बपपि इसमें सारिस्पिक गुगों की बात कुष म्यूनता पाई गावो है,
पर उचर भारत प्रायः समी प्रदेशों में का प्रचार है। इसमें
गरिठ मुरों की मपानकता मपि बहुत कुछ बना-बनाकर प्रेरित की
गई, परंतु मुर अपरय हुए और उनमें वीर पनागरों में प्रमेय
बार बिगर मो हुई। रचपि जगनिमत प्रारदरअप अपने पूर्व
कप में नहीं मिaar पार उसके मानिक संस्करणो में मपा की नमी-
ता तथा परनामा का बंप प्रत्यपरेर पाता, फिर भी पर एक
हावपूर्ण रचना है।
अमीर सुसरोति प्रकार पद परवा पानि वीरगाथाकारों
रचना में वाहीन रितु मनोवृत्ति का परिचर मिलता है और
इनों के रामसारी भरस्मा का प्रमिसान है उसी प्रकार
मीर तुमगे की रचनामों में हम मुनहमानों के उन मनोमानीनी
लापातेउनके देश में भाएर बस जाम के उपरोल यहां
परिस्पिति से प्रभागन्धित दोर वमा पर्दामापरपातामोरा
प्पान रणार उत्तम हुए। इस शिपार से सपति एम पुनरासी
पतियों में पारणबनचा की वित्तनिवासीपार मी पसे, परंतु
तालीन पति से परिचित होन के लिये हमें उन उपयोगिता
परस्प स्वीय परमी पड़ेगी। मा विकास भी पि मे गुग्री
।

पीरगापा काल
की मसनविदा तथा पनि का प्रौर मी अधिक मास है।
हुपरीवारा प्रयुक लड़ी मोती के गुर भारतीय ससस्प में अब
और पारस के शम्शी भरमार र माया के पिम उबालने
वाले या आधुनिक हिंदी को उर्दू से उत्पम बसाने लगते हैं, तब
उनके प्रमनिवारणार्य मुख्यकी रपनामों का पा सहारा लेना पाया
पातो है ही, मारदीप माषा यामके एक अंग की पूर्ति के लिये
उपारण बनकर सहायता देने में मी उनकी कृतियों में कम काम नहीं
किया।
पर मुसरी की कविता का पास्तविक पल समझने के लिये
इसको तत्कालीन कसानों पर भी प्यान देना होगा । उनकी कुप रप
नाएँ पारसी में और कुछ हिंदी में पाई जाती है और मुघ रचनामो
में मिभित मापा बता दिखाई देता है। पर इम उस समय पी
पारतकता और संगीठ-मसा पर प्पान देवे। तब उनमें रिए और मुस
समान भादों का मेल पाद रें। ऐसा मान पता कि उस समय
हिंदू-मुसहमानों में परस्पर बहुत पुष भादान-प्रदान प्रारंभ । गया
या। पपरि सादिस्य में रिदी के वीरगापा-कास तक अपनी पूर्ण
परपरा का परिपाग नहीं पाया जाता, परंतु यहाँ की माषा मे बहुत
उप पिगोप गम्द प्राने लगे थे। प्रभोर नुमरो ने अपना
"सासिकपारी" यार से मापा मारान-मदान में बहुत
पड़ी सहायता पहुंपार पी। उस पुष पास उपरत सारिप में
प्रादान प्रान मी प्रारंम हुमा ।इस मगर एम
सुवरी की कविता में पुग प्रवचन का बहुत कुम पूर्वमास
पावे।

१. हिंदी साहित्य का संवित इतिहास Cart पीर बना युद्ध में मारे बात , उनकी गनिया पती राने के लिये प्रग्नि की शरण लेता है और बचे हुए पल दो मडि भाषा भार उमापुर दरा गह-परिरयाग कर किसी करीपन मे या बनते हैं। इस पारी बना ठाटक पठा चमी सनरी सग परे। यह कई नियमित स्थान मान पावारिसे निबनवा सपा कारसीमना होती है। इस गैरगीत में प्रमेक पुगेका पर्यन बाध रुपएकही प्रकार से इमा है साथ ही इसमें प्रमेक मांगाशिक प्रगनियाँ मा पाई माती हपातु भारच पाठकों के लिये इतके वर्पनों में बड़ा पार्षय है। यपि इसमें साहिस्पिक गुणों की बहुत इच म्यूनता पावावा पर उचर भारत के प्रार सभी प्रदेशों में का प्रचार है। इसमें बर्दिव युदो की मयानकता पचपि बहुत इचममा-महार अंकित की गई, परंतु युद्ध अपरम हुए ये घोर उनमें बार बनाने को अनेक बार बिवर मो हुई पी । सपति पगनिकमा मामरा अपने पूर्ण रूप में नहीं मिलता पीर ठसा आधुनिक संस्करणों में भपा की नवी- ना तथा परनामों का प्रक्षेप प्रत्यय देख पाता है पिर मी पर एक सत्यपूर्ण रचना है। अमीर खुसरो–स प्रकार चंद गरमाई माथि पोरगापाभाये कोरपना में वकालीन रिपू मनोपिका परिचय मिलता है और दुर्गा के रागदरवारों की अवस्था का प्रमिशन सा है उसी प्रकार अमीर गुठरोपी रचनामो में हम मुसलमानों के उन मनोमानो की मानक पातेवा उनके इस देश में प्राकर बस जामे के उपरांत यहाँ की परिस्थिति से प्रमावान्वित होकर तमा यहाँ की घावश्यकतानीका ध्यान रखकर उत्पत्र हुए थे। इस विचार से पपपि हम दुसरोकी इलियों में साधारण बनता की वित्तचिरों की धाप नहीं पाये, मत समकालीन स्थिति में परिचित होने के लिये हमें उनकी उपयोगिता अपश्य स्वीकृत करनी पड़ेगी। मापा के विकास की पिसे खुसये

पीरगाथा कास
की मसनपियों तथा पोलिस का और मी अधिक मास है।
दुसरा पाय प्रयुक्तही बोलो कपुर मारतीय सरप में भरण
और पारस के रामा की मरमार करके मामा के कृत्रिम उ बोलने
बात पर मापुनिक रिलीव से उत्पष रखतामे सगते हैं, वन
उनके प्रमनिवारणार्य गुरुर की रपनामों का पा सारा सेना पड़ता
मोदी, मारसीय मापा-ग्राम के एक अंग की पूर्ति के लिये
ठपारय पनहर सहायता देने में मी उनकी पतियों ने कम काम नहीं
किया है।
परंतु मुसरा की परिता का पास्वपित रास्व सममाने के लिये
हमको क्लासीनसामा परमी मान देना होगा । उनकी कुछ रच
नाएं पारसी में और कुछ दिदी में पाई जाती और कुछ रचनामों
में मिभिव माषा का प्रयोग रिपाई देता है। पर हम उस समय की
पास्तुकला और संमीत-ससा पर प्मान देते हैं व उनमें रिंदू और मुस
समान धारों का मस्त पाते हैं। ऐसा पान पड़ता है, कि उस समय
दि-मुसलमानों में परस्पर पात च पादान-पान मारमरा गया
पा। परि नास्त्रि में दिदी बीरगापा-काम तक अपनी पूर्व
परपरा का परित्याग नहीं पाया मावा, परंतु यहां की माषा में महुत
इप पिरेशोष राम पाने लग पे। समीर मुनरो ने अपना
"पाचिम्पारो"पार परफ माषा के प्रादान प्रान में बहुत
सो बापता पहुचाई की। उसके इष कास उपररव साहित्य में
मापों का मारान मदान मी प्रारंम मा । इस प्रगर हम
पुटरो की बिना में युग प्रपतन का पहुत प पूजामास
है।

। (३) भक्ति-का-शानाश्रयी शाखा मसिह पीरशिरोमणि हम्मीर के पवन के पार हिंदी साहिल में बीरगापामों की रचना शिपिस पा गई पी। कबीर प्रादि संवपिनों केसम्म के समय रिए पाति की यही एशा हो या पी। पर एमप और परिस्थिति मनीरपरबार के लिये बहुत ही उपयुक्त पी। परि उसकीमार पक्षपाती तो उसका सना शापित कठिन होबावा, परत कबीर पावि नपानी कौरव से इस अवसर से साम उठाकर पनवा को मधिमार्गी भोर मच किया और मदिमाग का प्रचार पिया । प्रत्येक प्रकार की मति के लिये बनवा समप मार नही भी। मूवियों की प्रवक्ता वि• १८ में पड़ी परवा से प्रकार हो पुर्ग बी, बब कि मामूद गबनषी मे प्रात्मरदा से विरत पर सप रसेप, भवाहनों के देखते रेलवे सोमनाप का मंदिर नप करके उनमें से इनायेका सलमार के पार उतारा पा और रूर में अपार धन मास किपा पा । गर्वेद्र की एक ही टेर सुनकर दौर पाने माणे और मार से उसकी रचा करनेवाले सगुग मगान् बनवा पार से पार संकर कार में मी उसकी रमा के लिये मावे दुर न दिखाई दिए । प्रतएव उनकी मार बनता को साण मार कर सकना चर्ममा पा । पंढरपुर के मकमरोमणि नाम की सगुस मधि पनवा को पाटनबर की। लोगों में उसका पैसा अनुसरण न किया पैसा मागे पसार पीर मादि संत कवियों का किया और अंत में में मौ मानामित निर्गुस मकिपी पोर मुन्ना पड़ा। उस समय परिस्पिति फेबच निराकार और निगुष प्रादी मफि के अनुकूल पी, पपि निर्गुग की शफि का मही मति अनुमब नही लिया बा समयापा, उमा भामासमात्र मिझ सध्या पा। पर प्रयास वाह-पाय में गाते हुए मनुष्पक शिये पर इनस्य मनुप गा मचिकाह-मानाभसी गाला रान किस काम की जो उसकी रपा के लिये तत्परता नविक साउसकी मार बहकर पाता हुमा तिनका भी बीवन की माया पुनगदीप्त कर देता है और उसी का सहारा पाने के शिये पामनापास राप पदा देखा है। स्व कवियों ने अपनी 'नर्गुण मधिक दारा मार- वीप पनवा के एएस में यही माया उत्पन करके उसे कुछ अधिक समय तक विपत्ति की इस अपाह बल-राशि के ऊपर बने रमेकी उजना दी। पपपि सहायता की माया मागे बदे दुराप को पास्तविक सदाय सगुग मफि से ही मिशा और फेजश राममधिही उसे किनारे पर लगाकर सर्वथा निरापद कर सकी; पर इससे बनता पर होमेवाले कबीर, दार, रैदास प्रादि संतों के उपकार का माल कम नहीं हो पाता। कीर यदि पनवा को मति की प्रार न मारते पोक्सा या संभव था कि राग इस प्रकार प्रति मूंद करकर, वलसी कारण कर लेवे । वारोग पहल परियाका मानिाव ऐसे समर में हुमा जब मुसलमानों क अत्याचारों से पीड़ित मारतीय जनता को अपने जीरित एनेकी माया तक नहीं गा पौ और म उसमें अपने पापका जीपित रपन कीरप्पा ही रोष बी। उसे मृत्यु मा पर्म परिक्वन के अतिरिक्त और कोई उपाय ही मरी देस पड़वा पा । पपपि धर्मग्रीस तस्वो न सगुण उपासना से भागे पनवे पदावे निर्गुण उपा सना तक पहुँपने का मुगम मार्ग बदलाया है और पास्तव में पर साप पुषि-संगत मी पान पावा है, पर उस समय शनवा को सगुण उपासना की निसारवा का परिपस मित पुन पा और उस पर से उतका विश्वास मी उठ चुका था। अतएप कबीर को अपनी म्पपस्या उतरनी पड़ी। मुक्तमान मी निगुयोपासक थे। प्रवएप उनसे मिलते पुनवे पप पर तगार पर प्रादि ने रि जनवा को संवार और याति प्रदान करने का उपाय किया । यपरि रत उद्योग में उभरें पूरी पूरी सरमवा नहीं हुई, मावि या किसीर के निगुवापार ने तुलसी भार तर सगुग्नार के लिये याग प्रस्तुत परिया प्रार

दी-साहिल का संदिस इतिहास
उसर्गर मारत के मागी पर्ममर बीवन के लिये उसे बहुपकुश स्तर
और परिपत कर दिया।
वित समप निर्गुग संत कवियों का प्राविरि हुमा बा, पा
समय की मक्ति कीसरा पाउस हार को बढ़ाने के मकस कारण
प्रस्तुत थे। मारवीप पौववार और मुसलमानी एयरवार मेरे
कीमोर पान महीं दिया गया और दोनों के विविध मिमह केस
में निर्गुण भकिमार्ग पल पहा । रामानंद के बारा शिपों में से कुष
इस मार्ग के समर्थन में प्राच हुए जिनमें से पीर ममुतये । इनके
प्रतिरिव सेना, पमा, मानर पीपा और रैदान ये, परत उनका उपना
समापन पहा बिवना बीता।
मुसलमानों के प्रागमन से रि-मार पर एक और प्रभाव पड़ा।
पद-रशिवराओं कीका उम्मेष हो गया। उनोंने देखा कि मुण्ड
मानों में दिया और सोश मे नही सपमा ने पारपरे
सपक, उनके मबसाय मे उनमें कोई मेधन ही माता है, न उनमें
को बोगी और न कोपा । भएप इन बरामे हुए शो में
सेकस ऐसे महारमा निको चिनोने मनुष्यों की एकता उक्वि
करामे का विचार सास नबोस्थित मधि-तर्रम में सम्मिलित ने
के कारय -समाष में मसित मेर-भाष के विमदिरोशन होने
सगा। रामानरबी ने सबोलिये मदिका मार्ग सोश दिया । नाम
देव परबी, रैदाव चमार, पाव हुनिया, चीर पलासा आदि समाव
की नीची मेशीसी, र उनका नाम भार तक मार से लिया
बावा।
साहित्यिकान से देखने पर मी हम स्व करियो का एक
सिरोप स्पान पावे।।पाठीक बारी और यम प्रारिकी
सी मापानी प्रवद्रता का अभिमान ये कपि नहीं कर सके और न
सूर, इससी की परमया और म्याफ्ता होइनकी कविता में पाई जाती
पायसी ने प्रकृति के नाना म्मों के साप अपने आप की वैती

महिसास-सानाभवी शाला १५ एम्फ्ता दिम्बाई है, अनेक निगुग्ध संत कपि ववनी उपयवा से पर महा दिखा सक। यह सब इन्ते हुए मी इन सपियों का स्पान सिरी- सादिस्व में परबत उत्सर्पयपूर्व सपा उम्प समम्प्र सायगा। भापा की मजिसता फम से हुए मी उसमें प्रमावोत्पादकता बहुत है और उनकी वीरता से भागों में म्यापकता की बहुत कृषकमी दो गाती है। उनके संदेशों में बो माचा है, उनप उपदेशों में पप उदारता है, उनकी वारी उकियों में गो ममायोचारकता है, या निरपर हो उपच कोरिकी। कविता के लिये उनाने कविता नहीं की है। प्रारम कुछ मम्मि मसिद संत कमियों की बालिका विरोपवानों का वेिप में उल्लेख करते हैं- कबीर :-भर तर अनुपानों के अनुसार महारमा चीरदार का बन्म-भपत् और मृत्यु-सयत् १५७५ माना जाता है। पपनि निररसपूर्वक नीरा पा सावा, फिर भी सब पाठों पर विचार करने से इस मठ के ठीक होने की प्रति संभावना है कि वापसी या किसी तिमी के गर्भ से उत्पन और मुसलमान परिवार में सानित पाशिवरायाचित् उनका पात्याल मगार में पीठा था और पीपे से पानी में प्रापर बसे ये वहां से प्रवास कप पहल उन पुना मगर पाना पड़ा। प्रसिद्ध सामी रामानंद सोनोने अपना गुप स्वीगर किया था। अप लोगों का सर मी म उनके गुरु रोपवी नामको पूर्व मुखत्तमान पीर पे धर्मदात और मुरत पोयम नाम के नरेदोले हुए।सीर की मारे पापे धमास मे पचीनमा में चार पंप की एक प्राय यागा पत्ताई और तुरतगोपात पाणीवासी शापा की पहरी अधिकारी एसीर साप प्राय साई नाम मी लिया जाता है। हेमपत- सोई उनकी पत्नी और कमास उनमपुत्र पा। पीर बात पे । उनको सलंग से पद, उपनिरो मोर पोरा दिरा-मानित का सहित इतिहास नायक स्पान में पी और यही स्थान प्रयक पापियों का मुस केंद्र बना हुआ है। रात का प्रचार-ऐन अधिकतर राजपूताना वपा उसके पास पास कामात पा, अतः उनके उपदेशों की माषा में रावस्थानी का पुर पापा प्राता । संत कलियों की मावि राव ने मी सालि सपा पर पारि मिनमें सतगुरु की महिमा, पर की मापकता, बावि-पति की प्रगतना भाति के उपदेश दिए गए हैं। इनकी बाली में कबीर की बागी में सरसता वा पत्र प्रपिक , यपपि ये पोरके समान मतिमाशासी नहीं । पनीर तर्कप्रिय थे, अपाउने वार्षिक पीसी कठरिता मी धारण करनी पड़ी पी; परंतु दादू ने इपय की सन्नी मनु मूतिया का ही प्रमिम्ममन किया है। इनकी मुख संवत् १५५ में हुई थी। भारम-काज के संत कवियों में पे पड़े विसे पान पड़ते है। मलूकदास-चौरंग के समकालीन निगुरा मत मिले। "अजगर पर न पाकरी पीकर नाम 'बासा मसिम पानी की रचना है। इनकी मापा साधारण संत कवियों की अपेक्षा अधिक गुम और संस्कृत हांसी पी और इनको बोका मी शान पा । बसान वा गरमोष नाय की इनकी रो पुस्तः प्रति मिन राम्म क्या मम भादि की मनोहर बादी बफ की गई है। एक तो माठ वर्ष की अवस्था में से १०३६ में इनकी मुख यी । येकमा विद्या इमादा बाद निवासी थे। सुंदरदास-इन संस हतियों में सबसे अधिक विद्वान् पया परित पनि सुंदरवास हुए। मुंदरदास दामास की शिप-परंपरा में।"नका अध्ययन विशेप विस्तृत मानान कापी में प्रापर शिवा प्राप्त की थी। सुररदास की मापा गुर काम-मापा है और उनकी पानी में उनक उपनिपरी मादि से परिचित होने का फ्वा पसवा है, परंतु कपीर धादिको मौति उनमें समाषधि मौलिकता महिनास-मानाभपी शाखा सभा प्रविमा अधिक नहीं पी, इससे उनका प्रमाव मी विशेष नहीं पड़ा। सुंदरदास के अतिरिक्त संता में प्रदर अनम्म, धर्मदास, जगमीवन प्रादि का नाम मी लिया गावा है, साप तरी तुसती सारण, गामिद साहब, मीक्षा याब, पलटू साहस पारि भमक संत हुए जिनमें से अधिकार का साहित्य पर का विशेष प्रभाव नहीं पड़ा। परंतु सतो की परंपरा का अंत नहीं । गया और न्यूनापिक रूप में यह परावर बसतीही और अब तक यही जा रही है। पयपि सारिस्मिक समीचा में निर्मुस संत पियों को उम्मतम स्पान नहीं दिया जाता, पर इससे हम उन किए हुए उपकार नहीं भून सफ्ते । मुमक्षमान और रितू संम्पतियों के उठ संपर्य-कास में जिस शांतिमयी वाशी की प्रापश्यकता थी, उसी की प्रमिबना संतों में की। मग मी रिरीके प्रभान कारयों में पीर प्रारिका उम्प रमान है और प्रचार गोपि से सो महात्मा तुससीदास बाद नदी का नाम लिया आगगा। इसमें सरेश नहीं किस युग में रन व महास्मानों कारण हिंदी साहित्य का बड़ा उपकार हुमा ।

(४) भक्ति-काल-प्रेममार्गी शाखा पनीर ग्रादि सेवा की बानी परपरी है। उसमें प्रमपी निराकार उपासना का उपदेश दिया गया है और दो सपा पुरामों की निश परके एक प्रकार कदम-रहित परत साधारपूर्ण धर्म की स्थापना का सपना गया है। राम और दीम को एक बराकर हिंदू तथा मुसलमान मर्यो प्रमुख मेल मिलाया गपा है। इसी प्रकार हिंसा और मसि मपण कालान कर सपा नमार और पूजा का विरोध करके इन मतों में किस मार्ग का अनुसरण लिया RANI नहीं पर साधारण बनता की समझ में नही पा सकता था। फिर मीकपीर मानिदेशके वापारय बन-समुदाय पर बो महान् प्रमाव पड़ा, पाने सुनने की बात नही है। संत पो शिले न , उनकी मापा में साहितिचा न पी उनके घर उठपयांग पे समापि उ बनवा मे स्वीकार किया और उनकी विशेष प्रसिति । इसके विपरीत की विपो र उनमार भरिकतर ललित और यामामुमोरिव । उनको भाषा मी पप्पो मची रबी मौर पर मदि का मी उन खान पान कविया की म्या मी कम न थी। फिर मीपातीकार करना पड़ता है कि देश में एक कविरों की न तो अधिक पसिनी और न उनका भपिक प्रचार कुमा। इनमें से अनेक कविता नामाषरोप ही ये और कठिनाई से उनके प्रपों का पतासगा। समथर गरिपिक समाज में मी इन दिरों का विशेष महत्त्वपूर स्मान कमी नहीं माना गया ।इनकी कवितामों के उदाहरण न तो सपप-सपो में मिल और न धार्मिक प्रहों में ही उनै स्थान दिया गया है। समषवा पियों की गस्पोन्मुस मावनाऐं इस की बायु के उपनी मी मनुस नहीपी विवनी बीर भाटिकी भरपरी और मम्पपरिक्स माचीगा।

मदि-काल-प्रेममार्गी शाला
समय से
प्रेमाम्मानक सूकी कापियों की परफ्य बी में मुखयन
पसी। कुपन प्रेरणा के पिता दुसैनगार के भाभित और चिठी
पेण के रोल मान के शिम पे । इन मेम काम्प का नाम मृगापवा
हैमोनोने सन् ११ हिजरी में सिता पा पानगर के अधिपति
गमपविदेर के रामकुमार क्या कापननगर की रामकुमारी मृगावती की
प्रेम-गापा समें अमित्त की गई है। प्रममार्ग के कप तमा स्पाम प्रादि
का पर्यन करते हुप कुतपन मे अज्ञात की मासिकेका का यामास
दिया है। मृगावती के उपरत दूसरी प्रेमगाषा मधुमासदी मिली गई
जिसकीएकपरित पठि शोज में मिली। इसके रचयिता ममन बोही
सरसहप पविये। इन्होंने प्रकृतिको काबगही मर्मस्पर्शी
बखन किया और उन रयों फेरा प्रम्पत की मार बीमपुर
संफेट किपा भगापाकारों में सबस मसिड कम पापी हुए
गिनका पद्मावत काम्प हिंदी का एक संगमयावा खास
पाप्प में कवि मे ऐतिहासिर या स्पनिक पाना के संमोग
से बदीदी गणता सा दी है। इसमें मानप-दस के उन सामाम्प
मायों के वित्रण में बड़ी ही ठरारदा दया सहानुभूति का परिचय
Rया गया है जिनका पेग और जाति की संकीर्यवानों से कुछ
मी संबंध मही। प्राकृतिक एयों का वर्णन करते हुए कमि
की तन्मपवा एतनी बढ़ बादी भर प्रसिस एम जगत्
को एक निरंबन मोवि से प्रामासित पाता और पानराविरेफ
फे कारण उसके नाप पाशाम्पस प्रनुमा करता है। मामठी
के उपरवि उममान, ग्रेप नबी, मुहम्मद मादि भनेर ममापाचार
दुप, पर पापत का मा रियर काम्प पिर नहीं मिला गया।
सगुरोपामा उलयो, तर मादि मक्त पवियों के ग्रामिमात्र से
प्रेमगापापरासी यदि पहन पदीय पर गई थी।
उपयुक्त ममगाधामों में पहुत सी बातें मिसपी सुनती है। एक दो
एनसीरपना मारतोय मरित-काम्पों की सगारौली में न कर भरती

२२ हिंदी-साहित्य का संक्षिप्त विराट की ममनधियों के दम पर है। मिस प्रकार पारसीसी मसननियों में समर-दना, मम्मर गाव की स्तुति, पत्ताचीन राजा की मता भारि उस्तकमारम के पाले होता था, उधौ प्रकार एनमें मी है। मेमगापानों की मापा मी माया एक सी है। यह मापा मगध प्रति की है।इन प्रेम की पीर के पियों का पान पप की भूमि पी पी। घरी के प्रयोग में मी त समुदाय के पवियों में समानता पाई जाती है। बने मामा दोहों और चौपाइयों में ही बरचना की है। मेर प्रमपी मापा इतने उपयुक्त है कि महाकवि तुलसीदास ने मी अपने मतिय रामपरितमानस में लीघरों का प्रयास किया है। पौपाई बंद वो मानो अबधी मापा लिये ही मनाया गया हो, क्योंकि प्रार मापा के कषियों ने इस पर का सफलता पूर्वक उपयोग कभी किया ही नही। समवण की प्रतिम बावबाक प्रेमगापाकार मी कपि मुसलमान । पाठोपा संप्रदाय ही मुसलमानों के सूफी मतका देकर सहा मा या दूसरे हिंदू कवियों में उसी समय के सगमग पगुम्योपासना पर पड़ी और में मक्त के मीवर अम्मत का रास्यमय सापाकार करने की अपेवा पदकोही सब कुबमानमे और मन तार कम में राम और हम की बीवन-गाया प्रस्ति करने में प्राध हुए । मुस्लमान मारम से ही मूर्विशेषी पे ! मा वन एपियों की रौती के प्रचार का पिरोप मुमीता पा। प्रेममार्गी सूपी कवियों ने प्रेम विषय मिस रूप में लगा है उसमें विदेशीयवा ही नहीं है, मारतीय रेशियों का भी प्रमाण है। एसोरस देश की रीति के अनुसार नायक उवना प्रेमोन्मुल नही होता जितनी नाविका होती , परंतु बामती मावि ने फारसी की हेली का अनुसरण करते हुए नायकको प्रपिक मी तमा प्रेमपात्र की मामि मेशिमे मपसीश दिलाया पास्तव में न करिया का प्रेम समुल पा । सूत्री ममम प्रियम्म स्थिर की कामना भी कर मेरते। इसलिये पावसी माल की मी नापक प्रेम का

मकिकासप्रेममार्गी गाता
२५
मानता रेनी पड़ी। परंख मारतीप शैहो क अनुसार प्रसस्य गोपिकाएँ
कम के प्रेम में हीन, उनके लिय में प्याकुल और उनकी प्राप्ति में
प्रपबीत पती स्तर में यह प्रेम मी अपने गुर स्प में ईश्वरो-
म्मुन्न,मोरि मारठीय शि में प्य मगवान् पूरी चाभी फे
भवता, पगमार, योगीपर मार माने जाते है और उनके प्रति
गोरिलायो का मम पुपरे प्रति मानि का मेम समझा बाठा।
दी कवियों पर इस मारतीय गेली का प्रभाव पड़ा पा और उन्हाने
प्रारम में नायक को प्रिपतमा की मासिके लिये प्रस्परिफ पपलीत
मिलाकर ही मतोय नही कर लिया, परन् उपसंहार में नायिका
(भिपतमा ) के मेमाल की मी दिसाया। दूसरी बात पर मी
वितरेरा में प्रेम कीमना सामवहार मीतर हकीमाती
है और उत्तप्प-बुरि से उच्च कम प्रेम का नियंत्रण किया जाता है।
राम और सीता प्रेम ऐना दी। प्ण और गपियों क मेम में
ऐकविम्वा मा गर। परंतु सपियों के प्रेम की सराबर भी
विलास सोनाम नहीं है। मारवोप सूी फपियों मे रण पेश की
प्रेम-परपरा का सिरसार नहीं दिया। उनका प्रेम बहुत कुष लोर
म्यवहार फे परे है, पर फिर भी अनमत महीपा म तो पायव
में नापिका के सतीत तथा उत्तर पनि प्रम मातिाप दिनार
अपने मारतीप हमे का पूरा परिचय रिसान यो मुफ्स बावों के
अतिरित प्रमबर्थना में भरलोन रोका मरला नाकर महति के
दरम्प योगविवित कर महा के प्रेममार्गी परियों मे अपने पापा
को मारतीय हवायु के बात म भनाल र दिपा है।
नवी दिलर मनुनार मंद में मारमा परसारमा में मिल पाती
है।मीनिपे उनम पानी मेंठ पा ममापि दुरावपुरी।
प्रारम में दो पासवनी रही, पर भाग पातरम संपराप फे
रवि पद बाल भूम गए अपरा भारतीय परमा,
प्रपान या चौर जिस अनुमार गुपात भारत का नदीपन, उन पर
पिलधारण्यार

हिरी साहित्य का संक्षिप्त विकास विना अधिक प्रमाण पड़ा कि उमामे नाक और नारिका का मग विसास और सुख-पैन में रखकर अपने प्रेषकी समाप्ति की। सूफी कवियों का प्रेम विरोम्मुस पा। रोमे अपने प्रेम-प्रसंधी में यपपि सौरिसपा ही मौत, परंतु पर सौरिसकपा उनकी पा मुमति को म्पत परमे का साधन-मात्र है। उसका से उनका संरष बहुत पनि नही है, वही कहाँ वाया उन परोन्मुन्न प्रेम के प्रसिजन में समर्थ होती है। पिया का प्रेम विर के प्रति होवा परत रिवर at निराकार है, निर्गुको मत्ता अपनीय है। हो, उसका प्रामास देने के सिपे होसियामा की सहायता क्षेनी पाती है। पपावत कीही कमा कोलेसीविए । उसमें यद्यपि चित्तौड़ प्रधिपति रखसेन और सिंदीप की रामकन्या पयावती की कथा कही गई, परत बारसी में एक स्थान पर पप कर दिया है कि उनकी याकया तो कममात्र है, वास्तव में वे उस वरीय पैम की असिम्पकिमये प्रत्येका केप में उपस रोटी और उसे पर-प्राप्ति की ओर प्रम करती है। यही नहीं, वापसी ने तो अपने समक को और मी सोड रया है और अपनी मा के विविध प्रसंगों सपा पानों को गिर-प्रेम के विविध अवयमों का पंचर बवलारा है। इस प्रकार उनकी पूरी कया एक महान् प्रन्योति परती है। मी प्रापद वर्णन अपत्पर की भोर संकेत करते है कमि की पशि से सवा उनका विशेष महल की। पाठीककिमिकी इस्टिही समीया की मोटि नहीबासी, म साहिल-समाधक सारे पर्गनों को प्रस्तुत न मानकर बीच पीच में अमस्तु की मार समेत माग मानते हैं, परंतु संत पापियों का टीक मापक सममान में हम भूल नही कर सके। बछेन और पसाठी लौकिक से उनका उपना संबंध नहीं पा पिठना अपने परमार्षिक प्रेम से पापया-प्रसंगों में, पीच गाव में, प्रमी के कप और स्वाग मालिकेपर्यन मिलत और प्रमाणिमादिवियतमा मिलन का ऐसा मर्मस्पती

मकिपास-प्रेममागौशासा
पिपरा मिलता हमारी टि सौखिक सीमा से कैसे उठकर उम
पर माती देत पती पिस पार लबाना प्रेममार्गी मत करिया का
दएप था।
पनीर प्रादि का रहस्पबाद नगन्य है, अदाबा उतना
सामोपयोगी नही जिवना बारहा माद सपिया गाभापती ने
प्रफ्नो स्पास्माता को पय पयत् के नाना पाका प्रम्पक के
साप सर परवाई करते हुए दिखाया है। मा जब यह एम जगत्
पम्पक से विद्युत हावा योग के कितने ही प्यापक और रम
गोप पप रिला पाकमा पर इसका उस साथ बिता
है, वप सारी प्रात माना मानदोमनास से नार उठवो है। इस प्रकार
प्रावि की ही सहायता से यापती पस्पवाद म्पक हुमा तक
विपरीत पनीर ने बेदात अनेक वादी सपा प्रम्प बानिक शैलियों
का अनुसरण करते हुए यस्लोद्गार म्पक किए।
जापमा के पास उपरत जब तुलसीरात का मारिभाषा
वर परियों की कविता पीय पक्षी। हिंदुओं की हगध मटिके
मपार में सपियों की निगुण मछि सर न सकी, पर गर । उपमान
पदाँगीर नमकालीन रपि । गार निगमन चिरवी की
गिप्प परपरा में २, रासी पापा इनफ गुरु मेरत १६.. मेनका
पिावसी मामा राम्प लिया गया। सभी प्रेमगाथामा की मानि
इनमें मी पैगपर गुरु धारिकी पाना है और पारया गांगोर को
मी रमरण किया गपाहै।
रखमान न त नबी हुए । पातु इनफे उमनि प्रेममार्गी
परि-पाय माप: निगर-णा गया। यद्यपि कासिमणार, दूर
मुरम्मर, पावित प्रागिरि हावे ये, पर उनकी रचना में इस
पशप पाय माफ पानता-मा गान पानाtitt, मरम्मर
सापती" मम पानी प्रपश्य मुंरपन
पर मेपत्
२८.१ में लिखी गई थी।

२५ हिरी-साहिस्स का संदिप्त इतिहास म्मा मार्यों के विचार से गौर स्सा मापा के विचार से स्फी कमियी ने दिदीको पहले से बहुत मागे बढ़ाया। पीर-गापा-काल में यह पीरोस्लासपूर्व विवा का मग्न हुभा, या मी परिमाप में परिक नही । उस काम की मापा वा विसपुत अविकसित थी। प्रस्ता फपियों काप में पार पा और मी मागी मन गई। उसके उपरांत मीर का समम प्राया। वीर महात्मा म और उनके बारा तारिख में पूत भावनाओं का समावेश हुमा । काम्मल के विचार से उन पूत मारनामों का उत पारे अधिक न हो, पर इससे उनका मात किसी पकार कम नहीं जा पीर की भाषा का बहुत ही विगही itti कुछ पैमानी सही माती, कुष परमापा और कुप अवधी का पुट देकर मोनिकी वार हुई पारमठे सापुमोरे जाम की मलबी हो, सर्व साधारण-पिरोपकार परिमार्जित रुचि रखनेवालों के लिये उसमें कुष मी नही है। सूर्य कवियों ने अपमे उबार मागों को पुए माषा में प्मक कर दोनों ही पेषों में अपनी सपक्षता का परिचय दिया। कबीर भावि संतो को यानी सामूहिक रूप से देश के लिए बड़ी विवकारिणी सिड हुई। परत समितों को मपरपनामोन सामामि रित मी किया पौर साहिस्पिक समृति में भी माता । या ठीकर और तुलसी भाति प्रषण वे से पेममागी कवि पाठ व मुसा दिए गए और विरामी प्रस्मपिक समा गई, पर वना करना ही रोगा किसी का एक माघि मापा देकर रामचरित मानस की रचना में सहायक हाने में जायठी प्रावि किलो का नाम अवश्य बिगा मायगा । रिदुओं के प्रति सानुभूति इन मुसलमान कवियों की साथ विशेषवान पर प्रतिराम उपार और स्वाँव मेम की पीर से ग्रोव-प्रोत था। सबसे सी बस्तु इनका कवितागव पस्पपार है विसकी समया हिंदी साहित्य में नहीं कर सकता। इन मुसलमान भी कवियों की देनादेवी रिव कलियों मे मी उपासानमामों की रचना को । पर इन सब काम्पो काममा भक्तिकाल-प्रेममार्गी याला फैराषिक, ऐतिहासिक अथवा पूर्णवमा सारिपिक है। सूफो कवियों की सनायों में पम कीबो हार प्रारम रूम से म्यास हो रही है, उसका हिंदू कविकों की इन सपनामों में अमाव है। ऐसे कामों में तमासन-पनापती या, दोशामाकरी घउपदी, रसरवन काम्प, पंद्रकता, प्रेमपयोनिषि, कनकमगरी, कामस्म की मा, हरिचंद्र पुराण प्राति इनके मध मना कर देना मापश्यफ किन्दी उपा फ्यानो की परंपरा के परिणामस्वरूप ठन प्रमर काम्पों की हिरी में रचना हुई मिना भरण दिरी-साहिस्स गौरवान्वित और मम्मानित हुना।

दिदी-साविसका सविप्त इतिहास
मरिकी पौ। निंगाई मे विपण स्वामी से मी अधिष पवा से रामा
की प्रतिप्टा की और उन अपने प्रियतम हप्ण के साथ गोशोक में
चिर-निवास परमेसीकारापा का ही परम उती विद्यापति
मे राधा और पप्प की प्रेम-सीता का यो विरार बदन किया है,
उस पर विपशु स्वामी सपा निवाई मतो का प्रमाव मस्पष।
विद्यापति रामा और के संयोग मंयार काही रोपवान
करते है। उसमें मीही प्रश्सीलस्व मीमा गया है। पर भपिकांग
स्पों में प्रिया रापाका प्रियतम के साप पकाहीसालि और
रसपूर्ण सम्मिान प्रदर्पित किया गया है। बगाल के पास पारि
मामक पवियों मे मी राणी प्रपानता स्वीस की है। प्रति
मच और रिकीपरिषी मीराबाई प्रसिख पद "मेरे वा गिरपर
गोपाल दूसरो न क" में गोपाल पद का स्मरपो जो निवार
संप्रदाय के प्रचलन अनुसार है। मीपमा पदो में जो
भरपीलवा देल पाती है, या वास्तव में प्रमाविरे के कारण और
नि सवा साबिक विपापति और मीराबाई पर विप्ण स्वामी प्रथा
निवाई के मत की पाप थी। सिप्णु स्वामी सिखातों में मप्पाचार्य के
और निपाचार्य रामानुब के अनुयागी ।
पस्थमाचा दार्शनिक सिनाव गुमाइतबार प्रसाए । पर
केशान के बदले में महिको पास करते और मकि ही मापन
सपा साप्प मी यवसाई पाती है।
सूरदास-पासमाचार्य के शिपों में सर्वप्रधान, पूरतागर के
रबपिता, रिपी के अमर कवि महास्मा सूरदासपुर जिनकी सरस
पानी से देश के प्रसंस सूसे हदय रे हो उठे और ममाय बनता
कोषीमे कानपीन उमास मिला । सूरपास का बम्म गमगर
११४ मे भाग से मपुरा बामेवाती साकिनारे नया नामक
गाँव मे पचा पा।
मशमा मात्समाचार्य से वासथी की मैट पीस सा

२५ मक्षिकाह-कृप्य मक शासा ये परागी फे पेय में या करते थे। तब से ये उनके शिष्य हो गए और उनकी माला से निस्ल प्रति अपने उपास्य देव और सत्ता की स्तुति में नबीन मगन बनाने लगे। इनको रचनामा का पात् समा सूर सागर मिसमें एकही प्रसग पर अनेक पदा का सेकसन मिलता है। भकिक मारेरा में पीणा साप गात हुए जो तरस पर उन पिकमि मुप से निम्मत हुए, उनमें पुनरति पारे मते ही हो पर उनकी मर्म स्पशिवा और एएयारिता में किसी को कुछ मी तदेर नहीं ले सकता। रसायर संबंध में या पाया कि उसमें समा लास पोका संग्रह। पर अब तक पूरसागर की बो मतियां मिली है उनमें छः हमार से अधिक पद नहीं मिलत । परतु या संभ्या मी पाव पड़ी है। वनी दी कविता उसके रचलिता की सरस्वती का वरद महावि सिद करने के लिए पर्याप्त है। इस प्रप में पप्णीपासलीलासे लेकर उनके मोरुन स्वाग और गोपिकामों के लिए की या फुटकर पदा में पी गई । पेपर मुहर के रूप में ए हुए मी एक मात्र को पूर्णता सापाँगा देते हैं। समी पर गेप , अतः इम दूरसागर को गीति फाप्प कर सकते हैं। गीतिकाम्प में किस प्रकार पारे पाट रमणीय प्रसंगों को लेकर स्पना की जाती है, मस्पक पद रित प्रकार स्वत पूर्स उपा निरपेक्ष हावा है, कवि के अतिरिक रपाद्गार पाने के कारण उठमें बसे पनि पी प्रवयरमा मसती देस पड़ती है, निपरयात्मक कपा मम्मो का बदिपार कर तथा प प्रादि कटार और परा मापोपा उपियेरान पर उसमें से उरलता और मपुरवा के साथ कामतता पसी है, उसी प्रकार एसागर गेप परों में उपमुक समी गाउँ पाई जाती है। पपरि प्य की पूर्ण जीवन-गापा मी सागर में मिमी है, पर उसमें फ्षा पाने की प्रति विश्वकुछ नही देग पाती, कपाल प्रेम, पिरए मार सिमिप माबो सीवेगपूर्ण मरना उसमें की दरी मुरर बन पड़ी है। सूरदास की पीचि दो प्रमर कर देने और पिपरिया में ग्ने हिंदी-सादिस्य का संक्षिप्त इतिहास उपासन मान रने के लिये उनका नावाचार प्रम सूरमागरी प्रर्याप्त है। सूरसागर दिदी बी अपमे रंग की अनुपम पुस्तक है।पार और बात्सप का असा सरस चोर निर्मश मोव इसमें बाबा प्रन्या नहीं देना पड़ता। स्मातिसूक्ष्म मानो वा सूर की पहुंच पाय दी जीपन का परख मात्रिम प्रवाह मी उनकी रचनामों में दर्शनीय है। बारीकिशोर के संबंध में गमीर माफपाएँ सूरदास ने प्रषिक नही की, पर मनुप्पणीपन में कोमलता, सरसता और सरम्वा मी उतनी ही प्रयोगनीय है, शिवनी गंमीरता। तत्कालीन स्पति को देखते हुए सो सूरसका उघोग पौर मी खस्त है । परतु उनकी वि तला सोन स्थिति से संबक रमती हुई मी सार्यकासीन और निरवन है। उनकी उत्तर-मधि में उनकी पारी रचनामों में जो रमणीयता मर दी, मा मतुलनीम है। उनमें नपोन्मेषशालिनी अद्भुत प्रविमा है। उनकी पवित्र बापी मे गोमन्दी ठलियाँ मापसे पाप माकर मिझ गई, अन्य पि उनकी बटन से पी वोग कर सकते है। सूरदास रिती पत्नम की हैं। उनके मोह का दूसरा वि गोस्वामी तुलसीदास को घोड़कर दूसरा नहीं है। इन दोनों महाकविया में कौन बड़ा है या निश्चयपूरकर नाना तरक्ष काम नहीं । महाकवि दास प्रसिरित गपाप के प्रेम में मन, परस पर रचना बदर पाराम परमानर, मनदाय, पमुंबरात, पात म्बामी गोनिरस्वामी माह अरबाप कवि पनामस्वामी और ग्नके पुत्र विम्सनायकी शिम्प-परंपरा में हुए। इन प्रमेक र कमियों से हिरी-साहित्य की प्ररोग भौति हुई। हिवहरिषरा और स्वामी हरिदास प्राधाप बाहर यर महिकाम्प की रचना करनेवालों में ये की रिशेप रीति से मोल योग्य है, क्योकि ये दोनों ही उकल पदों के मवेवा और नाल संप्रदायों के स्था हुए। मारिषराधी माप और निवारी मतों से प्रमाविठये, पर उनीने रापा की उपासना मारा कर रामावस्तमी

भति-काल-पा-मक्क शामा
संप्रदाय की मशिदी। उनके "राग-मुगानिषि" और "ति पौराठी"
नाम प्रप के समी पद प्रापत कामत और सरस मावाफ्य। इनके
शिप्मों में बदाम और म्पामत्री प्रधान हुए, शिनकी रचनामा में हिंदी
की पास भी दिए । प्रत्यंत कोमल भावापन सरस पोकरपपिता
रतसान मोस मुग ६ मकिपोत में मम महामपि हुए।
भकवरी दरवार-दन मत करियों के समगतीन प्रसिद्ध
मुगम-सम्रार प्रकपर र दरपार में मी मनेक दिया। प्रभय मिला
था। अम्पर का रायतकाल नुस्ख ग्रौर ममी म मेपल था। मय
की प्रतिमाएं पकी ही जा रही थीं। हिन भीर मुसलमानों का
साम्प बादा पा। ऐस अपसर पर नौनिकार और मुस्किार कवियों
काम्पुरय स्यामापिथा।
रहीम -अफवर दरबार उप समचारी पत हुए मी ये
रिंदी पारिता की मार गिर प। नीति के मुंदर मुंरर से रनोंने
ही मर्मिरता से करे। बीरन सुन-बैमर का प्रप्पा अनुभव
करने फारम रहीम की तत्संबंधी उसिपो में संत माप-पंजना
है। दारों क अतिरिक्त इदाने पर सोरठा, सरैया, कपित्त भादि
अनेरघरों तया रस्त कपो में मी ग्चना की। उनमा
बरपै परों में लिाग नापिकामेर टेट अपपीमापुर्य से ममन्पित
। पारने कि गोस्पामी तुलस वा मे मम प्रमारित
दोकर मी पर में पर रामायण लिपी पी। गासामीरी की
दी मति दीम का प्रपती पौर प्रसमाग दानों पर समान प्रधि
पार पा और गोम्पामीजी पीरपनामों की मति इनपी रचनाएँ मी
पनता में प्रस्परिक प्रचलित हुई । गरमी की सरनी मर
पीपौर दोनों में नामाई माप मी या । ये पोही उगाय पानी ये
पौरनमा घुनुमा पहाडी राित, दम मोर सस्स पा।
गग भार नरहरि दरानो हरी प्रसर फे दरसर मेर
दिमी पे । मंग की गार और बीररस पी जोरपनाएँ यही में

हिंदी-सादिस्म का संदित इतिहास मिही, उनसे मापा पर इनके अधिकार और वामन का पता चरण है। पनवा में इनका पहा नाम है, परंतु इनकी एक मी रचित पुस्तक अब तक नहीं मिली । “लसी गैग दोङ मए, मुभचिन के सारार" की पटिइनीको सश्स करकही गई है। नगरि बदीन अपर के परवार में सम्मानित हुए थे। मते १क पारगाह मे इनका एक चप्पय सुनकर अपने राप में गोपथ बद कर दिया था। नीति पर इनाने अधिक पर लिने । प्रकार दरबारियों में पीरवल और टोरमच मी करियो गए। नीरक्त प्रकार के मत्रियों में पेचौर अपनी पाचातरी पा मिनो लिये प्रमिइनके प्रामय में कमियों को अप्पा सम्मान मिला पा और एनोंने स्वम प्रयमापा में सरस और गनुपास रचना की थी। महाराग गेहरमन के नीति-सबंधी फुटकर पर मिलते वो कविता कीम से बहुत उच्च कोटि के नहीं है। इनके अतिरिक्ष मनाहर, दायराम मारि कपि मी मानरी दरवार में प। स्वब बादया प्रकार की मी अमभाषा में कृष रचनाएँ पाई जाती है। मापा को वना बका राषसम्मान रसके पाले कभी नही मिशा पा। दरबार ऐपपछि फपियों में सेनापतिका स्थान सोचनामे पटशापों का पर्थन किया है जोपाही समाही टुमा है। इन माविकी सूक्ष्म रुपम बातों का अनुभव मी या और इनका निरीक्य मी निरोप तीन या ।इनकी पियक समय की मदि और राम की रचनाएँ विस पर स्पानी ममाव गलती है। इनकी मापा प्रय की मामीत्य बोचे हुए मी प्रमाण है। इनका कवितरखाकर अब तक अपकाधित है। इसी साल की रखनामों में नरोतमदास का "सुवामा परिम" भी पो मीठा की रिसे अच्छा है। इस प्रकार हम रेलसे कि प्रकार और पााँगौर कराचवकास में हिंदी कविता, मा मापा और कमा मावों की मि से विशेष प्रौद हो गई।

(७) रीति-काल चिरी में सूर और तुलसी के समय तक साहित्य की इनी अधिक भमिदिरा जी पी फिड शोगों का प्वान भाषा और मारों को प्राव करने समा संस्कृत की काम्प-रीति का अनुकरण करने की प्रोर लिच या पा।इसका परपर्य नही सूर और तुलसी तया उनके पूर्व के सरूपियों में प्रासगरिकता नहीं थी अथवा पे काम्प रीति से परिचित हो न ५ । ऐसी बात नहीं यो। अनेक कवि पूर्ण पान और काम्प साविद् थे । ये सूक्ष्म से एम पालकारिक धियों का पूरा पूरा शान रखते । स्वयं महात्मा तुलसीदासजी ने अपनी मनमिया का विज्ञापन देते हुए मी प्रम और अपधी दानों मापामों पर अपना पूर्ण प्राधिपस्प वपा काम्प-रीति का एहमदम अमिहान रिहाया । प्रवर इतना ही कि उनकाम्पससाको साधन-मात्र पनाकर रचना रनी थी, साप्प पनाहर नहीं । अतएप नोंने प्रसंगारों पारि से धायक का काम लिया है, खामी का नही। इस रिपरीत पीछे के जाति हुए, उन्हाम काम्पबला की परिपुरि को ही प्रपान मानकर रोप सप बातों का गीय स्पान दिया पार मुहकारा एक एक प्रप्तकार, एक एक नापिस अपना एक एफपतका वर्णन किया है। माग पल कर पर प्रपा इतनी प्रतित हुई किमिना रीति-मब क्षिसे एपि-कर्म पूरा नदी समझा जाने लगा। मादिरप के कासको हम इसी सिपे रीति-काम पर नीचे रवि-माश कुप मुल्स परियो तपा मापार्यों गठित विवरण मापाता है। फेरायटास-पचति समय विभाग के अनुसार देशपदाम भकि- पात में पन्नोर पपपि गाम्यामी नुमतीतास पाहि के समकालीन दल तया रामनगि प्रादि प्रय लिगने के कारण ये ।

रिवी साहित्य का मषिप्त इतिहास नहीं जा सकते, परंतु उन पर पियो काज सरमास मामिल का पवना अधिक प्रभाव पड़ा या प्रिपने काम कीपिकाप्प-पारा से पृमा होर वे पमत्तारवादी कल हा गए और क्रीि में रीति-प्रो की पीपय प्रावधानाय शहाए । रावदा मागधे रागा मितसिंह नामित दरबारी कवि परमत-साहित्य-ममन परित परंपरा में उत्पनहाने कारण इनकी मरसि रीति-प्रमोसी मोर हुई पी। संसात से पूर्ण परिचित होने के कारण इनकी मापा रस मिभित और साहित्यिक है। नीतियों में फनिमिया, रतिपिपा, यमछिका भारि मुरूम है। पति पर के पर भी माराम, गोप, ममनताश मावि मे रीति-सारिस्म के निर्माण का मारम किरा पा, पर उनकी रचनाएँ केवदास में सवामुक्त प्रयास के सामने एकांगी गई हैं। रीति-कास के इन प्रथम प्राधाय राम रास का स्थान हिंदी में बहुत अधिक है। रुप मालोषक उन महान करते हैं, पर हरसहीन बार संबोषित करने में हम उनके प्रति अन्याय करते है, पोंकि एक तो उनकी दमहीनवा पानी- समझो मानता है और फिर अनेक स्थानों में उनोंने पूर्ण सहदय होमे का परिचय दिया है। मित पि की रसिकवा पापस्था तक पनी से, उसे हदयहीन मा भी से या समता पामार मारम कियपदास ठन कविऍगों में नही गिमे जा सकते जो एक विशिर परिस्थिति निर्माता को अपने समरबी परिस्थिति बारा निर्मित और उसके प्रत्या प्रविधि हैं। चितामणि और मतिराम-बिपाठी-धु मुफ रो में रीति-रोशी की रचना करनेवाला में धप्रगामी हुए । पितामयिक काम्पविरेश, विपतर, पप्पकारा मादिगडी ही सरस करिता उस्त । मनिराम तो अपनी मापा और मायो कसरत सुरसामाविक मार के लिये रीठिकाड के मर्मभेत वियों में परिगवित पुर। रसराष और सविततधाम रीति-पार की मेहरबनाएँ इनकी दो विपा है। ।

रीतिकात विहारीलाल-रीतिकाल के नियों में प्रसिद्धि की दर से चिरी अम्पतम है। बिहारी उस भेषी के ममीद में सबसे अधिक मिया प्रमग प्रशय दाहों की कारगरी पर मुग्प होते और पाठ की करामात पसंद करय हैं। मंदिय और प्रेम के मुंदरतम चित्र चिरी मे नीचे है। पर प्रकरण की मोर उनकी प्रापि सबसे अधिक पी। उनकी कविता मावश्यकता से अधिक नपी-तुला रागाने पारस मर्ष स्वामारिकता-समन्वित नहीं है। मिसरी ने पाट-बार देखने में बिना परिबम उठागा होगा, उतना ये पदि दस की टोर में करते तो दिदी निवा उने पार अपित सौभाग्यशालिनी दी। या सप ने हुए मी उनकी सवा दी की अमर कृति फरलायगो और भेगी विरोप क साहित्य-समीचा वषा काम्प-प्रमिया के लिये तो पर समेट रचना दी। दो से चारे घर में इतन मलकाये की समत बामना करने में शिकारी की रसर का कदाचित् री काई कवि दिी में मिल। हम-पे गये के रहनेवाले कान्यकुब्ज गायनका कापदेर पका प्यापर और विस्तृत पा। रीति-कास क कवियों में स्तनी मापना पोर ही नहीं देख पाती । देप को सौरय विति सप्त मतः मर्मस्पशिनो है। परंतु इन गायन का मुख्य विपस प्रम है। रीति-बाल पार से प्राचार्यों में इसकी गणना की माता। रीति संबस्निी उनी म सा उमापनानों का उत्सव मिभयुमो ने पिटिशारीरि से निकाय समस्त विपा मेरेर का स्पान पापाप गगरात से उपनाये माना पा मकदा पाकर भीतर म विहारी से निप्र टार सरते हैं, परंतु अनुमम भोर सूरम- रशिया में उप पारि पी पाम्प प्रतिमा का मिश्रण परमे और सुंदर इस संपंच में 4 पास मि शामी मत वृत्तरा। .

। ४२ हिंदी साहित्य का सचिन इतिहास पापनामों की अनाती यदि लेकर विकसित होने के कारण निरी काम्प-छप में महदस और प्रेमी कवि देव को रीति-कास का प्रमुख कवि स्वीकार करना पड़ता है। मिसारीदास-पे मोगा, प्रतापगढ़ (मगर) के यमेका कायस्प पिनका काम निर्णम प्रथम मी रीति रिचार्पियो का मिरच। मिलाराम के प्राचार्यत्व की बड़ी मराठा की बाठी हैऔर रीति के सम प्रमों का निवेपन करने के कारण उनकी कृतियाँ पई पादर से देली जाती हैं। उनकी सुरर समीक्षामो सपा मौखिक उसामनामों का उस्लेस मी किया गया है। कविता की रिसे पाययी की रचनाएं बहुप उभी नहीं उठी। रीतिकारा पूर्वपती माविमा मागो को लेकर सर्वप विपपसा करने में पपपि से पद्ध, पर मानों के निर्धार की मौक्षिक राणि न होने के कारण गर्ने सफलमा कम मिली है। भवन में रहन गुम पावी प्रगमापा लिख साना तो पाठ ठिन है, पर पासमी की माषा सामाग्बा गुरभीर साविस्मिक है। इससे उनके मनभाषा के विस्तृत समान का फ्या धमता है। समीषा पनि प्रभाव के कारण ति की सीक पर पलनेमाले अमेरकरियों से मिलारीका का स्पान ठरा है, पर करियों की गहरा पी पंकि मैं मी त्यान नहीं रिमा गया। पवाकर-ति-काल प्रतिय बरस के पटाकर सबसे प्रसिद करिहै। वय प्रापद मोइनकार मा के पुत्र । पिठा की मसिम कारग भनेक रागदरबाये में इनका सम्मान हुमा पा। इनकी गाररस की कविताएँ इसनी मसिद किएनके नाम पर रितमे ही कपि नामधारिपों ने अपनी स्थित बासनामों से ज्ने उद्गाय को मनमामे कग से फैलाया । प्राग मी इनके नाम की भोर लेकर बहुत-सी भरतीत रचनाएँ देशातों की कविमरती में सुनी सुनाई पाती। पाकर की प्रतियों में पति मोमा परखीलात है तो उनके अनुकरणकारियों में उसका गया । फ्याफर की अनुमासप्रियता मी रोतिकास ४ गत प्रनिर है। यहाँ अनुमासों की ओर अधिक मान विमा पारया यहाँ मायोका नसर्गिक प्रबार अपरय मग हा और भाषा में प्रवरस तोड़-मरोगकरनी पोगी। संतोष की मास इतनी ही ठनफे मंदों में उनकी माष पारा को मरस सईद प्रबार मिला है, जिनमें हारों की सुंदर वाम्ना के बीच में सुंदर चित्र सो किए गए है। इसके प्रविरित काशिदास त्रिवेदी, फुलपति मिम, उप कपि, मात पनि पनाना, ठाकुर कमि, वोपनिधि, पान कपि, दूलाह दिखदेव, मेवाम, पमनेस, प्रतापनादि, मोषा, भूपति (गमा गुरुदच सिंह), मग्न मिम, महारास पासव सिंह, परावानरन, रसुनाप, रसनिधि, रमशीन, रमिक मुमति, मीपर या मुरलीधर, मीपति, सुखदेव मिम प्रादि के नाम उस्तपनीय है। मपण और लात-हिंदी के इस सतोम्पाप्त गंगार प्रभार के बीच भूपस और साप्त का अम्पुदय हुआ, गिनोंने गावीप पागति का राषियासी उपरम किया औरंगजेब के पार्मिक कारपन कारय पर रितू पाति का अस्तित्व ही सम्पम रा गया, वर्ष प्रतिकार की प्रेरणा से महारा-गति का प्रम्पुश्व दुभा । इस शक्ति को संपत्ति परनवाले पत्रपति शिवाजी हुए बिन माग प्रदर्शन का काम समर्ष गुरु रामदाम मे किया था । शिवानी के अतिरिफ झुंदेसर के प्रसिद्ध अधिपति पत्रात मे मी स्थानीय रायपूर-शक्ति का उचित करने का सपस प्रयास किया था। इस प्रकार मारापू और मप्पदेश की प्रति का यो दरपान हुआ, उसमें राष्ट्रीयता की पूरी पूरी मसा दिपाई पड़ी। पाम स इन दानो पापापको को पातमा साक्ष से मुरलिया का बहसाग मो प्राप्त एमा, मिस एपि वपन में बड़ी सहायता मिली। यातियों प तरबान में अब कमी महारमानों, मोडायो सपा कपिपास मम्मिमिव सहायता मिलती है, तब पर पी सीमाम्य की दूसना पाटी चोर उससे उन पासामा पा पर बहुत इष निरिपत और निपारित दाता| उगी काल में सिम्पो प्रमा ।

हिंदी-सादिस्त का संक्षिप्त इतिहास का मी उदय हुमा और उनाने गपूटिव की साधना में पूरा पूरा सा माग दिया, पर सिपस धर्म का प्रारम सतो कीपाशी वमा उनी की मरति मोर प्राठि के अनुकत हुआ था। पीछे से समय की स्थिति ने स्त पर्म पर ऐसा प्रभाव क्षा कि मा सत सापुमों के धर्म का बाना उखारकर वीरों की बेरा-भूषा सपा कठियों से मुसरिमठ और प्रकट हो गया। पचपि गुरु गोपिरहि समय में हिंदी कामों की रचना दुई, पर ये बीरगापारमक नहीं पे वरम् उप समय क साहित्य की प्रगति के अनुकम थे। भूपरा और साल की रचनाभों पर विचार करते हुए हमें पर भूल न जाना चानिए कि इनका प्राविवि उस काल में एमापा जिस काल में रीतियों की परपरा ही सर्वत्र देत पड़ती पी। नाविका मेर की पुस्तकों, नमशित पानी और गाररस के फुटकर पचा का यो मचल प्रवाह उस समय पधा पा, उमसे पार राना तकालीन किसी कवि शिर बड़ा होकठिन था। मपरा और लाख मी उस सर्वतोमुस प्रबाह से एकदम से न इसके । पापि ममय की समी गचनाएँ माया वीररस की परतु ठनोंने अपने "शिवराजम्पर" नामक प्रप में उन रपनानो को विविध प्रकारों प्रावि के ठारय ससम्म रमा है। यह बाल-बाल बा| उस समय इससे व सकना पर मव था। इसी प्रकार सातकवि ने मीपत्रपि पोरस पार किया या, तथापि "विशुनितास" नामक नाविका-मेर की एक पुस्खा उन्होंने वित्त दी गाली। कविवर साह के 'पत्रकारा' नामक में प्रसिद वासाला वीरगाथा प्रचित और प्रबंध-काम केप में हाते हुए मी उसकी रचना अवंत मौड़ और मार्मिक हुई। महाकवि मुपज की ही माति कवियर साल के इस प्रब में पातीपता की मावना मिलती है और उन्ही की मििवनकी इस रचना में गंगाररस नहीं घाने पाया।

(८) आधुनिक काल-पय-प्रवाह कविता में परिवर्तन-रिंदरी की हासकारिणी गंगारिक कविता के प्रतिकूल प्रांदोलन का भीगसरा उस दिन से समझा पाना बारिए निम नि मारतेंदु हरिवन ने अपने "भारत-बुर्दशा" नाटक के मारम में समस्त देशवासियों को सबोषित करके ऐश की गिरी हुई प्रबरपा र उनै आँसू बहाने का प्रामवित किया पा। इस देश की चोर यहाँ के सामिल के इतिहास में पर दिन किसी अन्य महापुरप के अपनी सिम से किसी प्रकार कम महत्पूर्व नहीं है। उस दिन राता- नियों से सोत साहित्प बागने का उपक्रम किया था, उस दिन सदियों की अनिरकर परपरा के विम्म मबस नि की पोरया हुई पी। उस दिन दिम-मिप देश को एक सूत्र में बांधने की एम मावना का उप मा पा । उसी दिन देश और पातिप्राय एक सकषि में सम्पे जातीर जीवन की माताई दी और उसी दिन संबीय प्रवीप मनाचिया का अंत करने के लिये स्वम सरस्वती मे राष्ट्रमाषा फे प्रतिनिपि पिकेट में कर एक राष्ट्रीय मावना उपयमित की थी। मारत माता की गोरकस पनि देश ने और देश के मादिस्य मे उसी नि मी पी और उसी दिन सुनी पी टूटी-फूटी गंगारिफ बीशपरले गेभीर मंगर, जिस मुनते ही एक नवीन जीपन र उस्तान में परमार उठाया। गरा गममान राय, स्वामो "पानर, मारतेंदु हरिरना धादि उग मे सामाशिम, ममदापा, राम्नीनिक व्या साहित्यिक क्षेपों में सहमपत्त मनी उसके परिणाम-सम्पपमे मधिल मास पूर्व पात , आमता में शिवा की अभिर्मच। मकव तथा उत् पारसी पोचार प्राप परनेवासी प्ररया सामी दयानद से अधिक हिरो-शाहिस्सा संक्षिप्त इतिहास अनेकमुसी सादिस्पती फारच मिम मित्र पाठकों की सदको मिम मिय प्रकार से मासि करते हैं। पति नाथूरामजी रामा मिस पण यम-निर्माता और की है। भार्यममागी होते हुए भी उनकी सब कविताएँ सांप्रदायिक नहीं हो गई और रुप में तो उत्तम करके कपिलकीमत मिशतीगाररत र पधारी विरों की मावि मी पनीने कप बिसाएँ दी, पर वे उनके योग्य नहीं पी जा सकती। मैयिलीशरण गुम-बाबू मैथिलीशरणगी गुप्त मानिक सी- बोली के वपस प्रसिद प्रतिनिधि कवि । परित महाबीरप्रचार विदेरी के ममात्र में राकर उनहाने अपनी भाषा का बड़ा ही मुरर और परिमार्मिटप ला किया। विधीमी की ही माथि उनकी भाषा में संसप का पुर रावा है, पर 'पियप्रवास' की माठि पर प्रविषय संस्कृत-गर्मित नही रोता । नई के पाच ही बोरे गमों को भाग करने के कारण पे परित गमाप्रसाद 'सनही बी की उमिभित कविता-मौली से मी रिमिन्न रूप में हमारे सामने मामापा की रवि से उनका मप्पम मार्गहीमा मायगा । लोकप्रियता की मैपितापरवली को मिलना गौरव प्राप्त मा है, उतना भामुनिक काल में किसी कार को नहीं मात दुमा । यसबी की 'मारख-मारवीं व मी देश मेमी मषमकाका पयार होती है। उसके रेमो पर रिली-मापा मापी मनवा की बिहा की नोक पर बरे पते ।विने ही नौनिए पनि भर मी उसका अनुसरण कर देने वाले पर काम की लिसे उसका विरोप मास्य नहीं है। कामकी से उनका जापपर' संस्काम्म उकामा है। उसमें मीररत का पूर्व परिपाक मोर बीच पीच में करवरस के मुरर बीटे देवर मन रसमम हो बापा है। उनका अन्य रपमानों में पंचमी सर्वमेय। उसमें समय का परिष भारी उम्पस विविध मा है, और पूर्व पुस्तक में सुपर पणे की मनोसीबा देख पड़वी गुप्तमी का प्राधुनिक समय का प्रतिनिधि कम होना इसी बात से लगता है कि उनकी पापाषाए

भापनि स-पप-प्रपार
रंग की रचनाएँ मी उस मेसीबिया की मसा पा चुकी है।
गुप्तरीकी समिधा में कहीं पनिम्ता नहीं रेल पती। गुमची ने
साकेत' नामक एक महाकाम मी सिपा । उसके बहुत-से प्रय
हिरीतामपिफ मासिक पाँ सपासमय प्रकाशित पते थे।
गुमजी कीरत इति ने निश्चय ही उन्हें हिंदी के प्राधुनिक कवियों में
उपप्रासन परान किया। उमान बैंगला के प्रतिम कवि मारकेश
मदन रप के 'मेपनादा', 'वीरांगना', 'विरदिशी गगना' मा
नवीनमा सेन से पतासीर पुर' का मी बिदी में अनुवाद किया है।
इन अनुपायों में गुममीका प्रमुख सालता मिली है। इनकी
रिमवर पमता का पता दो पलवा दी, पडीवाली की पद-प्रति
भीमरती है।
सनेहीनी भार दीननी-पडित गयाममाद शुक्ल तनही पौर
साता मगमानवीन उ मिसी माषा में बिठा के अनुपापी नों
ही राष्ट्रीयता के माप कर मार और रानों की रचनाएँ भाग
स्पिनी हुई।तर इतना ही समेहामी ने भाधुनिक समाजका
अपनी विवा का सस्प बनाया और नमी महाराणा प्रताप, शिवाजी
धादि वीर सुपतियों की प्रशस्तियां लिपन में सारे। राष्ट्रीय
रपियो पापी र मापा क्षेत्रर नही बना पावा, सौतो
पनतापमानित भाषा का प्राभप लेना पावासी से
सोही घोर दानगी दोनाम दी मास उपयुफ नाम किया है।
पीलिया का पूर्व परमठा मी मिन सम्वीर पीय
पालना में सब सम्मिलित पीर सपा पनना का मुक्ति
का पपपलामरभाण प्राति और पदिरों में ऐना का किपा
पाffin धानिए मील कपियों में पति माग्नशात पनुरा
और परित पालाम शर्मा 'नवीन' पी से प्रसनीस्प
का शयगा । सनेहोसी की पगंगारिक रचनाएँ प्रदी नहीं हुई
द, पर वे उस मारमिरवि हैं।

सप्रति
ર
हिंदी साहित्य का संविम इतिहास
शुक्लनी-परित रामा शुक्र की महिमि उता गप-वेता प्रोस
समासापक की रिसे है, उनकी कविताएँ उन अपिल सम्मानित
नहीं की। परिज प्रचिरिक वनकी मल रचनाएँ
उपर विपरी पही, संगीत नहीं हुई है। समीरी के विद्वान्
पौर रार्शनिक मातापकपरंतु उनकी सहरक्वा मी निरोप उस्लेस
पोम्प है। पम्प प्रकृति के उगा और रमे सास्म के प्रति मी उनका
मितना अनुरागी उतना पगी में मिले हुए गुशाय
मही। सीवर को गोही माफ स में पेचने की प्रेत पिशायीको
मिली है। उनके माहतिक परन दुर-परिव के समय उनसे
उनका सम्म निरीक्षण विभागित सारे 'दम मपुर मार
सीक उन फरफर पचों में ही म्याग भौर की मीठी पुरवियों के
गय मानप-सयाब की पुर्पक्षता और प्रांगारिता का नम रूप
रिचाया गया है।
त्रिपाठीजी-ति यमनरेश बिपाटी ने हिंदी में मिशन',
'पपिक, तपा 'स्वप्न' नामक वीन सामानों की रचना की।
उनका मापा में संस्कार का सौवय रानीय अपपि उनमें मापों की
मधुरता नहीं है, पर एक ही वस्तु कोणी मुरता से कई र मलामे
में उपड़ी सफलता मिली। राप्रोगवा की माषना उनकी पुलकी
मैं मरी पट्टी से राम्नौविक के बोबोम्पधियों में उनकी
मरामा की, पचपि उनकी राजनीति भी कहीं उनकी कविता में
बापक होगी। विषमा पर उनकी एक मुष्टक
रखवा रिरी में उनकी मन की रुतियों में उप स्थानको प्रकि-
कारी।
प्रमभापा के माधुनिक फषि बमाषा में कविता करने-
बातो में इरिस्पा के सपर प्रेमन और श्रीपर पाठक भोलि हुए।
इनका उम्स पर विमा बाबुनान प्रचार सार परिव
हस्पमाराम गा मिरव और बापू बगावात रस्नाकर का नाम

-
प्राधुनिसह-पच बार
सिरोप देवीप्रसार पूर्ण कानपुर के बीच मेरे मममापा
पिछी करिता करते है। उनके चकता-मानुकुमार' नाराके
सरप ऐसे उतर हुए रे भोर मतिराम का नमवा करते
है। उनाने काशिरास अमर फाध्य 'मेयर' का अपमाश में
चारापरणयन' नाम से अनुवाद मो दिन बोली में मी
सिधा करते । उनकी सर विवायों में शीतला-धम्म' नामक
पिता अपनी बन पड़ी।
पति सपनारायण अपिरस्न मंडल (घागरे) नेसाले,
बनरी फेअनन्त मनाही रसिक और सरह समाप के मालि
। उनकी बपनामों में सनी मापुरी सपासप मरी है। उनकी
पुरविामा का संपर 'हर-वरंग' नाम से प्रसारिता पुरा
है। उनोने मबतिरे, 'मालती-माधव नार का पेडा सरस और
मधुर प्रमुगार मया, जिसमें मौलिकवा का प्रमास ममता है।
देश के कुष मापुस्पो से महात्मा गांधी, पीपीच, स्वामी
यमदी, सामान्य शिका मादिदी जा मरास्तियाँ सत्यनारामचनी
से सिपी मी पो मादकी। स्वरेशानुराग की सपी मा
विमानेगाडे पोोपिया में उनकी गाना पगी।
रस्नाफरनी यसमारा के मापुतिर सतर कविताना
'रसिमर काम्प मुंरर हुमा है, पर 'मापवर' नामा नगीन
रपना में इनकी सपी प्य-प्रतिमा ममा उठी। मेष में रखा
परगी मेमात नाना के साप अपने पारित मागेका
सामसदिपा पारबारजीको मारानीती पपारी दी
मस्ती और अनुमापो प्रात करने में उमोने मानिस
मनापिठानसिद्धांतों का उपपोग रियामामाग
दे
परिया में रिपगी सरासरी मी प्रदीप्रविधि।ये मनसायनिक
हैौर पर-रम कीविठा करमराडे । यी पर पुरा समाचा
कामही है सपरि उपयुक्त परियों की रचनाएँ सहर भी और

रिहरी साहिस का पित इतिहास पठित बनवा में उनका प्रबार मी मा है। मापुनित कासरे प्रामापा के पियों में रखाकरजी का स्पान उपभोग भन्य कविगण स पुग के मन कमियों में परिव स- नारमय परिव, बार सिमारामशरण गुप्त, परिव अन्य शर्मा, पंडित गिरिधर शर्मा, पशिव कामवासार गुरु, पति रामचरित उपाणाम, परिव तापनप्रसाद पड़िय, गर गोपालगरा सिंह, भीमती सुमा कुमारी चौहान प्रावि मी उगलेसमोस।। सनारायणगी श्री भाषा पशवी दुताबादी है। उनकी कविता में पूरी रसारमकवारी कीलीरिक विवानों में उनकी 'बन विहंगम' सीपक रखना उकरते। विपायमगरसमी में सामाजिक कुरीतियों पर पनी तोम ममममी और कम पिता पीकरितपर स्वामी ममाष पो बिना नहीं गया। समान-नीति को कामापयोगी बनाने की विधि हिरी में सियाराम शरवानी का सपसे अधिक प्रावी है। पत्र में उनकी सफलता प्रायः प्ररितीप है। बीररस की कटी हुई कपिणा करमे के कारण परित अनूप शर्मा का कम लोग धानिक भूपण वास्तव में उनकी अमेष रचनाएँ अपूर्ण भोगस्बिनी पुई है। परित गिरिपर एमा "नपरस' सतत के निशान और रिपरीको पिने गुर पाठी और मंगला की पिवा पुस्तकों के अनुराद में प्रप्ती मण मिली। गुरमीकी कपिवानों में प्यार के नियमों की अपनी रचा हुई। पंडित रामचरित उपाध्याय और परिव लोचनप्रसार पडिय को प्राचाय महावीरप्रसाद त्रिवेदीशी में प्रास्वाहन रेकर कपि बनाया था। उपापापसी की रामचरित-रिवामसि अफ्न देग की सुरर पुसको। पपिपी की छोरी भेरी रचनाएँ अपी। ठाकुर मोगतगरत सिंह सरस्वती और हरी पी पाया में ही बनकर पि हुए 11'मापणी में उनको कट रचनाएँ अभी हुई। धीमवी मुमला- कुमारी निरपरीष समय की सबसे अभी महिमा कपि। उनकी रचनाएँ परख और सजीव होती है। सनमें मुमार, विश्वा

मामुनिक कास पचमबार
पूरा मावों की न्यूनवा नहीं होती। इन कमियों के अतिरिक स्वर्गीय
परित मनन दिदी और परित माखनलास पतुर्वेदीमारि की कविताएँ
भी महत्व रखती। पंडित मासनलाल चतुर्वेदी की रचनाएँ पुरानी
शेती और नगीन घायादारी राखी दोनों के बीच की है। पुरानी
होली के विचार से उनकी कृतियाँ छायावाद लिए हुए रोती
और धागावादी रचनामा मे ये सबसे अधिक मुलझी हुई होती है।
भी बासरण शर्मा 'नर्मान की कुछ रचनाएँ अम्मी हुई।
छायावाद-हिंदी की फाम्प पारा का सामान्य परिचय उपर
Pया गया है। अब पा समय से हिंदी कविता में रास्पबार या पापा
बाद की सरिदायी है।पुछ साग यस्यबाद या छायावाद का पाप्या
स्मिकरिता पतसा और पाश्चारय देशों उदाहरण द्वारा या
सिर करते हर्मगुरुओं और शानियों में ही रास्पषाद की पिता
या अनेक रास्पबादी कवि पदापिक परियों की मेयी
में भागे, नोकि उनकी कविता में सोकसामान्य मावों का समावेश
नहीं है, विमित्र संप्रदायों की मिधार परंपरा के अनुसार उसकी रपना
है। परंतु गस्पबाद भी पबिता समिदायिक प्रापार का मास
पिरिना भी मिली पासपतीगा के प्यार, पारस के उमर
पाम पर भारत के जापसी प्राति कनिया ने बाद कुछ ऐसीरी
कविता की । पर टीफ है कि उनको काम्पमत अनुभूटिश सामान्य
अनुभूतिया सपिमियों पर रे सत्य हैं, अता उनमें रमास्मपमा पूरी
माषा में पाई जाती है रोकेपपिपासमी ने महति के विविध रूपों
में अनंत दिग्दर और अनंत संयोग की जा मला दिसलाई उमका
उगान रस प्रमुमन रिसा पा, पल की माप की विसरतीक
प्रापार पर अपत्तरित मदिरी बीमाधुनिक रास्पबार की
परिया में पानीपत प्रापिपता प्रपश्य मुस माईत प्रापु
मक परमार के उत्पादन में हिंदी कपिमा समीनाप न
कोरपनायो स एष प्ररणा मिली। पापारी

दिदी-छादिलका प्रदिप्त इतिहास सरफनेवाची पाव उसके माबोको चपासादकता है। चार उच पार पो जीवन है उसका ग्रस्प मान देना बलिये सुगम नही है। पार्शनिक सिवों की अनुभूति भी सबका काम नही। समय बहुत सी ऐसी रचनाएँ हो ही गोदन पोषों से मुक्त नहीं की पा साठी) पर न पाठों में निराश होने की भावरसम्या नहीं कुप सस्प और निस्प होगा पर स्थायी रूप प्रसर रोगा, भम्म सब बातें अपने पापही नपो जागी। समय प्रमाण और विपा के प्रसार अब यह प्रभाव संमत पालियों में रहने लगेगा सरिदी फरिवाना विकास महादी मनोरम हागा। छायावाद के कवि- यहाँ पर पा देना भी पार भापश्या पान पड़वा विहिरी रहस्पपारी कवियों में जिनकी मणना हाती है, वे सबके सब पसवादी नहीं है। उनमें से कप मे गे पस्नबाद की एक मीबिठा मही शिही। मैंगरेजी सीरिक पारिता बंग पर रखना करनेवाले तिने ही नवीन कवि रास्पबारी कराने को। बापू चपराकर प्रसाद कुछ परणे से ही पसवार की रचनाएँ करने लगे थे। उनकी कविता में सुपीकवियोमाग अधिषवर पाया बावा, पनि गरेमी परिवा की पालिरा मी उनमें कम नहीं है। मगरणी ने सव साहित्य का मी अश्या अपयन किया है और इनकी पिता की मापा स्वप्रधान होती है।मारठीप प्रविवार को लेकर कामक्षेत्र में मानेमाने कवियों में पति व विपाठी मुरत हैं। उन्होंने तया परित मित्रानंदन पंत ने पश्चिमीच रोची का प्ररिक मभय लिया और रवींद्रनाम की मति पर कविता की मी सायणा सी है। साम् हिप से देखते हुए छापावादियों में भी सुमित्रानंदन पंत की रथ नाएँ भेगी। उनके मानों की उड़ान बहुत ऊँची। उनकी मापा संस्कार बहुल हाली है, पर यह निश्चम रूप से बाबा सकता है कि उनकी रचनाओं में लाडीबोली बहुत इप कोमल होकर पाई है। पंडित मोइनहाय महतो की रचनामों में मी यसबार की नाप । सीवनाव प्राधुनिक फास-पच-प्रबार कामगुरु स्वीकार करनेवाले ये ही है, यपि रपीद्र की कविता की मागी बहुप नकल सबने की। हिंदी फरिदा का मविप्प -अब तक की पिता का मो पिष रस ऊपर दिया गया है, उससे या तो प्रकार होता है कि पिता की अनेकरूपी प्रगति इस युग में रोगी है, पर साप हो या मी मार होता शिविशेष प्रापिर महावियों का अम्युटय प्रब सक नरी ड्या है। पर युग दिवा फे सरवोमुत विकास का है। परियाय पैलियों का प्राण इस युग की प्रपान विशेषता है । माहित्य के प्रत्येक घर में प्रगति हो रही परि मी अबसर परिवर्तन काही पुरा पल रहा है। परिपतन के पुग म बीवन की महान् और निरालीन माषनामों को सेर काम्प-पना करना माव' प्रतमय होता है। सादिस्पकारों का सक्ष्स जमा परिवर्तन की मार से घटकर जीवन बीमार नहीं पाता, सरकारका साहित्य की सशि नही हसरती। परंतु इत ममप ऐरा पी यमनतिक और सामाभिक रिपति भी अच्छी नहीं । प्रतिमायाप्ती प्रमेर पनि साहित्य क्षेत्र से प्रसग काम करते हैं। वादिस्य अपतफ जीवन से गानवारे पारा सिपलाक नंदन- निष पना पुमा है। इसशिय सम्मनिर उस पार से पिरत एते मासिक पिपेपामाग्य से बात है। मोर मांस + उत्तर मारिपार अपन ठियों के मोवर से उसम हुए पे, दमाण देगनेपास कदर से नहीं। भारत में मी प्रति ना ही युग मापा पुमा है। प्राणा कोजामिनार महिम में सहमतोमास इसपल पीर रिलीम्पिामा उपप गा बिमस हिंदी पिता की पागग सापनाऐगी और विनष्ठ प्रगत मारतोय परम्मामो भरमाग () माधुनिक काल-गय-प्रवाह भाधुनिक युग की सबसे पही विरोषवामामोसी में गप का विकास I इस मापा का इतिहास यही रोपापा मापा मेरठ बारामार के प्रदेश में पाशी गाती है और पाते यही तक इसके मवार की सीमा पी, बाहर इसका बहुत कम मबार पा। पर बा पुस्तमान व देश में गए और उन्होंने पहाँ अपना राम स्पापित जलिया, तब दिल्ली में युमनमानी शासन होने के कारण विशेप प से सनोंने उसी प्रदेश की मापा साली को अपनाया। या काय एक दिन में नहीं हुभा परब, पारस और सर्विस्वान से प्राप हुर सिपाहियों को पाबालों से बातचीत करने में पाये बड़ी कठिनवा वीपी।नये उनकी अरबी भरती सममले में और नये नसी रिबी । पर मिना याम्पहार के काम पसना असमर पा, मतानों ने दोनों के कुछ पराम सीसकर किसी प्रकार प्रापान प्रदान का मार्ग निकाला । यो मुसलमानों की उर्दू (पास्नी) में पहले पाच एक खिचड़ी पकी जिसमें पराश बाबत व जीवली के , सिर्फ नमक भागंतुकों में मिक्षापा। प्रारंभ में तो बा निरीपागाहपोती बी, पर बीरे धीरे मनपर बामे पर और मुसलमानों को पर्यापी मापा के विकाठी ठीकसान दो माने पर इसका हम कुछ स्पिर दो पता। हाँ पर हद भगुर बोलनेवालों से ही गलत बालबाने के लिये शाहगाको "गुखौ समीर इखच्चै पशुबोगनवा स्मत कामपार करना पापा,पाँबायकी पा से लोगों के मर से गुर मगुरु न निभाकर सही गलत निकता करता है। भारत से अंगरेगी पो-सिले मी अपने नौर से एक मनास पानी न मांगकर एक गिलास ही मांग, से उठ हमर मुस- मुत उम्बारमौर परस्पर मोच-सोकर अनुरोप से हम अपने "

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प्राधुनिक काल-पा
भारपा उमा कुवा पा काठका घरहेने पोर सय
करके म, एप पसेग मामन मुनार मी नी पोकते ।
सिपाही दी, मुस्तसही दियो, दरिताक हिंदी और दलिग की
दर पर सम समप हिंदी फाखादी मी पर पीछे मा राम
ससस मैच मनपर उसी प्रकार उस मापा लिये ममुक होने लगा
रिस वा संहत पा लिय पत संतत गए । मुसलमानो मे
मम्मी सति प्रपारा सरमे सापन मानकर इस मापा को
तूब उमप दिया मोर जावद पनत गर, म प्रपन साप लते
गए। उननि इसमें प्रपल फारसी टपा भरको फरामोनीही उनक
गुरम्प में अरिकता नपरी, रियासक सारण पर मी फारसी
भरणी प्पारण पारंग पढ़ाया।म प्रपस्या म इन दो स्पबागए,
एकदा पिरलाता हा प्रौर मय उ' नाम से मसिर था।
सानो प्रयमित गुम्दा फमाएर, पर पारस का सरन हिंदी
की अनुमार पर, अंगरेज ने इसका एक दोसरा स्प हिदुस्तानी
पनापा । घरप इस समय सापाक तीन सबसमान है-(१)
शुबलि दुभोमानिचित्र मारा घोर मिसग प्रचार
रितुपा में, (२) उयू गितमा परार पिरापार मुसलमानों में।
पोर पाउना सारिस्प पी और सिर मुमणमा पपा परितुषों
सीपर पाहर का सामनाला मारा है भार (1) लिम्वानी
गिनमें गापार व दिदी उम्पानों प राम मपुट दान में चोर गिमा
पान स लोग बालचाल में पपार करते हैं। इसमें प्रमी साहित्य
पीरपना पार पम है। हम सीमर प क मूस में गयनीतिक
प्रमादी में गवनी गय के गन्माता सरसूरी सास माने
पाने है । पर अप उन अंगरको कपमा समाने ग्राने
रेपन्स गप प्रस्तित्व सिसमें सीजन मगरले पार
वारयारक या रत् १२.क
पा । उसमे "पर

10 दिदी-साहित्य का संदिप्त इतिहास घर बग्नन की महिमा' महीवाली के गप में विसी है। उस पर का कोई प्रामाविक गपशेल न मिझने के कारण उसे साड़ीघोली का मपम ग-शेला मानना चाहिए । मत् ११८. में बटमच मे राम स्पानी पर्चा में "गोरा पारसरी पार" लिसी पो, उसका अनुसार संवत् १८८१ में किसी ने इसी मापा तत्कालीन गप में मारे। लम्बी लाह रिदमी को प्रापुनिक रूप देनेने मी न । उनले और पाने का मुखी सामुन का किया हुमा मामबत कारिदी भनु पाद 'मुन्नसागर' पर्वमान है। हमनतर राडाा, तरलूमी लाह तपा सरल मम का समय माता है। गाउमाला की रचना में गुद समय रामौत मयाग है। उनकी मापा सरल और सुगर, पर पापा की रचना ठ रंग की है। इसी लिपे कुछ लोग उसे बरी का नमूना न मानकर उन पुराना नमूना मानते हैं। लालूरी सास पे प्रेमसागर' से सदा मिथके 'नासितोपास्वान की मापा अधिक पुष्ट और सुंबर है। प्रेमसागर में मिमि प्रयोगों के कप स्पर नहीं देख पावे । करिव करिके, मुशाय, पुयाय करि, शाप करके, मुलायमर आदि अनेक रूप अधिकता से मिलते मत मिभ में या बात नहीं है। सारंग या पनि विलियम बाग के अधिकारियों, विशेषकर गस्टर गिकिरर की क्या हिरी गप का प्रचार का भीर उसका मापी माग प्रराक्ष वमा मुममस्थित हो गया, पर सरलूगी शाम उसके पन्मदावा नहीं थे। बिस प्रकार मुसलमानों कोपा से रिशरी का प्रचार और प्रसार या उसी मकार मँगरेजों की Fपा से रिदी गचका स्स परिमार्षित और स्थिर होर रिपरी-मारित्प में एक नपा पुग उपस्थित परमे का मूल प्रापार अपना मकान कारव इमा 1 उपर्युक पार क्षेतको ने हिंदी को पाने परत पति की और उसमें अपरपना की प्रेणा की। इनमें मुंगी मपाल और सदस मिमी भाषा प्ररिक उपयुक्त ठरती है। इनमें स्वासुल का प्रषिक सम्मान भाधुनिक कासार पवार मिमना पारिए, म्याकि ये इव पाने मी हुए और इनाने कुषमणि साड भाषा का प्परहार भी किया। इनक उपरत विदेशों से भाई रे रिशियन मटका पार करनेपाली धमतस्यानो प्रपा मिराना ने दिल में अपने पुष पम-मपो, निराकर बाइबिल, का अनुपार किया। पाइपित का अनुसार भापा की जी से पड़ा महत्वप्य है। यह देश विस्तृत भू माग में फसी हुई तडीपोती की गमान्यत' साधु मारा में लिया गया है। शासक अंगरेजों ने मुसलमानो की उनको कचारियों में जगह दी पी, पर धर्म प्रचारक मिशनरी या मसी मति पानवे पकि उपहा के जन-समार की माग की नही इसी लिये पाइपित का प्रमु गुर तिरी में हुमा मा । उफ्न उससे पहुद पर रखा गया। उसपी मापा का रेप सदानुन बम्लूजी सास की दी मति, पर विरेगीय स्पना शैली के कारण पोड़ा-बहुत अंतर अवश्य देख पाता है। मसलूजी लार के मापा में मरी बोली मिली , पर उपयुंफ अनुपार मयों में उसका बहिष्कार कर मानो सीलोनी के मागमी प्रभार की पूस यूपना मारी गई है। जब ईसाइया भी धर्म पुस्खाल सी की सब पापने की पत इस देश में भा पुचीची, मिसा पुरव प्रचार में कोतायता मिली। दापपान के जाने पर रिरी की पुस्ता गीता सबसपाही। रवी समप सरफारी अंगरेजी स्कूल भी मुसे और इनमें रिरी उईका मगड़ा पड़ा किया गया । मुसलमानों की मार सरकार का पर सममाया गपा दिउसे पार दूसरी मापा पुट प्रांत में दी महापारियों में उर्दू का प्रपाम दमा, मदरसों में मो ऐना पाहिए। परंतु मया मिरसार पाहुन दिनों यही किया जा पता । देपनागरी शितिकी नरतवा और उसका ऐगम्पापी प्रभार अपरेगोनी में माधुम या । मिति के विचार से उपरी किया और अमुस्युनता मी भागा रे सामन माती गा रही थी। परंतु नीति सब परिसा या समता है। 4गरेर समकार मी नही २२ दिदी-सामिप का संक्षिप्त इतिहास समझना घाइते पेसी समय मुख्यात में स्लों के स्पेर दिदी के परपावी लागी के राम शिवप्रसाद नियुक्त किए गए । राम साहवरे मयम से पवनागरी लिपि स्वीकार की गई और स्कूलों में हिंदी कास्पान मिता । रामा साहब ने अपने भनेर परिचित मित्रों से पुरे सितारे मौर पर भी लिखी। उनकी शिनी व प्रची रीि मिलती है पर अधिकार में उर प्रधान मारा ही नामे शिली। ऐसा उनाने समय और नीति को रखते हुए अप्पा ही किया । इनकी रसीदुई पुस्तकाती नामावलीमार-रामाला, गात बाग, लियाकुर, पामामनरवन, हिरी म्याकरण, भूगोल इस्वायतक, छोय स्वामथक भूगोह, इविकास-तिमिर-नायक, गुटका, मानप बर्मगर, सो ऐर मारपिन, सिखों का उपग और प्रस्त, स्वरयोग उई, अंगरेमी अपरों के सीलम का उपाय, राणा मोम का सपना और पीरसिंह का पर्चात। न प्रपों में से कई सप्रामात्र और पनिकवर राणा साहस केही बनाए । राजा साग की माषा पर्तमान भाषा से बात मिलती है, कोम पर साधारण सातपाट की मोर अधिक मुश्ती है और उतम उ राम्दों का मी कुछ प्रापिक्स मोने पर भी बनाए हैं पर सिरोपतमा गप ही लिखा है। मेनपावसपी। इनका काम संवत् १८ में और सर्पवास RE५R में हुआ। इसी समम गमग हिंदी में संस्कृत पदमा नाटक धादि का अनुवाद करमेषाले राणा नमवसि हुए । भागरा के गवाहे ये।इनका कविता-कास सरत् १९१५पर अपर। ये बत् ११३ में पुरी पोस्टर नियत हुए और १४ में पान मिसौ । संवत् २८२० में सरकार से पन राशी पदपी राममकि के कारस मिठी। इनका बन्म सबत् १७ में हुमा मौर १९५६ में इनका स्वर्गवास हुमा। या बारव ने पणे पास लारशी में कावरासत "वना नारका अनुवाद गप में रक संवत् १८१६ में प्रकाशित भामुनिक काल-गप मबार मा। इस पुस्तक परिदी रसिकों में बहुत बड़ा सम्मान हुआ। संपत् १२ विद्या प्रसिद्ध हिंदी प्रेमी फेहरिस मिनधर महारास । इसे रंगलिस्तान में करवाया। इस पुस्तक का रंग में वहां तक पाबर मिशा कि रिपन सिरिस सर्विस की फोदा पुम्त में सम्मि सेत की गई। संपत् १९में राजा साहस नेरपुश सभमुबाद गय + मूत रलोकों के साथ प्रसारित किया। यह एक बहुत ही पुस्तक। 'बर १६५८ में इन महायम ने प्रसिद्ध मरत के पूवार्द का पा पार पालामा और संवत् १६४. में उसके उपराई मी अनुपार पायिव करके प्रप पूर्ण कर दिया । पाप चौपाई, वा सारठा, रोतरिसी, उमा, पप्पे, पिमा और पनादरी वाम पनाया गया है, जिनमें सनैया और पनाघरी प्राय भपिनमि दादा, खोरठा और पौगायों में लीव की मापा रखी और शेष घरी में ममापा । इनके गच में भी दो-सार स्थानों पर प्रामापा मिल गई, परंतु उसकी मात्रा एव ही कम है। इनकी मापा मधुर एवं निरोप। बर्चमान हिंदी-मापा का पपार पर व मारतपर्व में रहेगा साफ दिन्माती में रागा सादर माम यो मार बलिया बापगा। गप के क्षेत्र में मारतेंदु और उनके समकालीन- भारतेंदु हरिश्मा कपरचेत्र में भात ही दिल में समुप्रति या बुग प्रापा । पालीवासी गप का विकास हावा रहा और पाठ यातामों के उपयुष पोरी मामी पुस्तः सिपी पावी पी पर अप साहिम कभनेर भगों पर पाम दिसा गरा धीर उनमें पुस्लानपना कामपन रिमा गया। मारनामे अपने वेगास भमग फे उपरांत पंगता फे भाटकोका अनुसार दिया और मौसि नारो की रचना। परिवा में देश प्रेम मापों का प्रादुर्भार मा । पम-पमिका निराली 'रिश्मा मामीन' और 'रिपंत पवित' मारतेंदुनी के पर पार निरंप मी मा जाने लगे। उनके सिरामेरामों में - हिंदी-साहिवघा सेविप्त इतिहास प्रविरित परिव पाखाप्प मा, पं.प्रवाफ्नाराम मिम, पंडितहरी- नायपस चौधरी, ठाकुर जगमोनसिंह प्रादि थे। माजी का जन्म संवत् १६.१ में प्रयार में हुमा था मे संस्कृत के अपने विवान् और भाषा के एक परम प्राचीन सरबत् १६५ में प्रयाग से स्विी प्रदीप नामक एक सुंदर मासिक पत्र मायः १२मका निकलता या । मागी उस सदैव सपादक है। इनकी गोलन पटवा एवं गमीरता उबवोमावेन सराानीय है। कलियज की पमा, रेल का निकर सेख, बाल विवाह नाटक, प्रगान का करान, प्लन समपारी, प्रादि लेल इनके चमत्कारिक है। पनावती, गर्मिया और पइसेन नामक उधम नाटक-प भी मरी ने रपे । नाटककारों में भीनिवासवास और रामा+दाता नाम उस्लेख गम्मि। 'परीपागुर नामक एक मात्रा उपन्यास भी उस समय तिला यमा। प्रायतमावाब कामों में स्वामी दयानंद के उपाँव समसे मषि पशिव भीमसेन यर्मा हुए, मिशेने भारतमार का अश्वा साहित्य कार रिजापति परिकारष्ठ पास भी उसके मौशिष देश में से । प्रसवारनपीया में बापू पासाद गुन सपसे अधिक प्रस्मि हुए। गुममी का जन्म संवत् १६२२ में रोक मिो में दुमा वा इनका रिरी मन से सरेर यही कवि पी और हलाने पत्रों के स्पारन से ही अपनी वीपिका मी घसाईपापनेसात वर्ष गवाणीका पावन लिया और पिर मारतमित्र भाप बीवन पर्मत पारकरे। अपने रानापती नाटिका, हरिदास, विषण्मु का सि, स्फट रविवा, सेखौना पारि परवा मी रची। इनकी गर और पप रचनामों में मनाक की मात्रा भर यदी पी और बड़ी मनावकाठीभी। होलीक में पे टेस् मादि सूप मानानका विषयमका निप एकाही लोकप्रिय पोइनका स्वर्गवास संवत् १९५४ मे एमा। इस प्रकार हम देख लगाके मिप्र अंगों को लेकर को दी उस्साहपूर्वक उनमें मौलिक रपनाएँ परवाह रिवी के ये उपाय

प्रापनि बाल-बाप-प्रपार
बोस गुम अपमर पर ठदव र थे। 'नकी वाशी म दिदाक
पासकास की ममरे, पर पोषनागम की सूचना मी मिलती है।
पेण प्रेम और गति प्रेम की भावनात्रा को लेकर माहिम्प-क्षेप में
मान कारण इन ती ग्यनार्प हिंदीम अपने उगमनाली
मारतेंदु की नाटक रचना शैली में भारतीय शैली और पारपारप
रोती का सम्मिमय हुमा है। मारतीय शैली और गमा
वया विषमक प्रालिको बदलार मैंगला ग पर अंक और रस
की परिपारी पनी, पर संस्कृत के सूमपाय, नटी, प्रस्तावना भाटिया
लो बने रहे। परिणी का पिशव करने में मारतेंदु मे संसब के
परपोडा अनुवरण बिया पात्रों की बधिर विशेषवामाकी
मार पान नहीं दिया। सपरि उन अनेक नाटा अनुवादित नाटक
दो और उनके मौलिक अधिकांश नाटका मे मी कपानका निमारा
उन्नही परना पड़ा, पर नाटकों में उनाने अपनी पानफ
निमाय की किस प्रपा परिपप Pया। समापिएर में सत्य
का उप मारा साया गया है। प्रम्प नारपों में प्रेम की पवित्र
पारा हो । मारततुर्दशा में सरेशानुराग वमा उटाहै। मारवंतु
की परिमार्जित गप रोधीका पहार उनके समी नारकों में देस
पावारे विषम और प्रसेगरे अनुसार मारा सरस अपना
पनि दो गई। हासा भौनिवासास के रियपीर प्रेममोहिनी',
'संयागिता सपपरमादि नाटक तथा बाबू रापाहप्पदासा'मदा
राक्षा प्रवार' नाररु गहिरिपारष्टि से अच्छे है, पपपि रगयाहारे
उपयुक्त मही। प्रेमपनमीका 'मारवाडौमाम्प' नारा भी प्रया है, पर
पटुव बहा गया है। या देशांमसा पूर्व का भारता मानकुमार
नारस गराम की ऐसी में जिती गई दुर है।
नागरी प्रचारिणी समा भार सरस्वती-गिरि
सिरहामायापद और उस्तानसामोरे त्या

दिदी-साहित का संक्षिप्त इतिहास पर साहिस्पिक प्रगति उस काम के मनोयोग और तिरीपणा परिचायक हुई है। इस कार के उपयंत गहिस्प के समी अगों की की सुपर उपति हो पाती और प्रत्येक क्षेत्र में अच्छे अपलकों का प्रम्पुरय हुमा। १५वी तामि के प्रतिम दयार में माहिर छौमापसेदो ऐसी बातें मिनस रियरी-साहित्य की प्रमिति में पड़ी सहायता पहुंची। इनमें से प्रथम माग्री की 'नागरीप्रचारगी समा' की स्पाफ्ना और पितीय माग से 'सरस्वती' मासिक पत्रिका का प्रकारान । संवत् १९५० में काशी के उत्साहो साहिस्वियं ने, जिनमें गर बहादुर रसामर्सपरदास प्रमुख, नामरीमचारिवी उमा कोपन्म दिया। समा का टरेस नागरी लिपि वपा हिरी मापा का प्रचार, प्रसार सपा उपति परना पा । समा अपने सारेस में पूर्व सपना हुई और उसमे वी माषा और सादिस्म कीबो सेवा दी उस पर किसी मी संस्थाको गौरव हो सकता है। समा ने संयुफ मात के न्यायालयों में हिंदी को स्पान दिसावा, शिरी के माचीन प्रपों का अनुसपान करके उने प्रकाशित करमा, पारिवारिक देकर उस कोटि के साहित्यकारान को प्रात्साहन प्रदान किया, हिंदी में विज्ञान-संबंधी रामों की रचना करके "री शनिक कोय" निर्माण कराया और परली रामसायर केलारा पार और मासपूर्ण समकोण बनवाकर प्रकाशित किया। इस प्रकार दिदी-साहित्य क्षेत्र के निर्माण का यदुव कुछ प्रारमिक कार्यसमा के द्वारा दुमा है। काशी नागरी-यपारिशी समा के प्राय यर पर स्यामसुरपात पे । उनमें सगठन करम और संस्था का सुधार स से संचालन करने की अपूर्व पमता पी। लोगों से काम लेना मूर पानते । प्रका नागरी प्रचारिसी समा की सफलता का मागा संपूर्ण भेग वाधाहर ही को मास या । इस प्रतिगत् पा सादर का पिर भुशी और शाऐगा ! नागरी प्रचारिदी समा मिचाह कार्य र प्रविरिफ पा स्पायबरपास मे प्रयरवना के न मे मी 10 माधुनिक काल-प-प्रवाह महत्वपूर्ण ही नहीं पुगमनक कार्य किया है और रिरीके प्रमेक रिक अंगों की पूर्ति की है। कासेगों की उपचाभों के उपयुष प्रपों के निवास प्रमाव का बाबू ताव को उस समय प्रमुमप हुमा पा जाये पाने पालकाशी विधरिपालय में हिंदी-दिमाग की रपारना करने और रिशिदा का कायम बनाने के लिये पूग्प मासपीसगी बारा बुचाए गए थे। सर्वप्रथम बापू साहय ने ही समय कि मपन्निव वाहवाही समा सोचनामा से काम न पोगा, इसलिये उनोंने 'साहित्पाखोचन' मित पर प्रासापना-संबधी मोर cिell को अपी पप समझाया। सारिस्पासाचन में पश्चिम और पूर्व के साहित्य साव का मार्मिक और तुलनामा पिवचन मिया गपानी मिदवा का प्यापारिक कप रितलात हुए गा बाहर ने रिदी कलियों पर भालाबनात्मक निष लिले मिनमें 'मारतेंदु हरिश्पद्र' मा 'दलसीदास की जीवनी मुख्य १। सारिया प्रासोपना के उनही मिळtars) और अधिक स्पा हुए मापने हिंदी मापा और साहित्य' नाम का एक प्रावरणीय प्रपतिमा जोगाटर प्रिपर्सन पैसे मापाबानिया बारा मरासित और माया पति महापीप्रसाद दिदी बारा पुरतवमा । सादिस्प क्षेत्र में दो नहीं मापा क्षेत्र में मो मापने मदपपूरा अमुनपान कौनसीपी जिता निदर्शन मापा मारा चित्रान' नामाप समार उपभेशी के पाठकों और विद्यार्षिया उपयुत प्रप रपना कामापमित कार्य प्रापमेरी पिया और प्रपताप्रापहीत क्षेत्र के सर्वप्रमुर पति थे। मसनवा की बात है कि प्रारकी गई रिया में काम परनेगाले भने विद्वान् इस समपरिरी में बतमान निम्याप अपनी रपनामा से सपा परिगत नि ले मी प्रेरणा परते रहते।काणी रिपरिपालय दिराशिक्षा का प्रपानन्द्र हो रहा है घोरप से शिक्षा प्राप्त भनेर नगपुर क्षेत्र में गौरवपूप कार्यररोसा पिय भेप वा गहन दोदी प्रास है। रखेत में माल प्राचार्य परित महावीरपठार हिलमे दिदी साहित्य का संक्षिप्त इतिहास 'सरस्वती' द्वारा 'भाषा-संस्कार का पैसा बुगपरिनर्तनकारी उद्योग किना, पैसा दी उदाग वा सादर न 'साहिस्पसंसार' हिना और ये ही पानो महानुभाष यतमान हिंदी-गारित की सबसे उम्पस वपा भेप-कारिणी सिम्बियो ।नागरी प्रचारिणी उमा में अपने यहाँ 'भारत-मा-भवन' सोनकर मारत की माचीन पत्ता सामग्री की रबा का मी स्तुस्प प्रसा किया है, जिसका भेव राय कृपारास को।। समा 'नागरी प्रचारिणी पत्रिका' नाम की एक पुरावन लोग-विपक त्रैमासिक पत्रिका मी निभाती है, मिला मन्मडली में समुचित सम्मानी। शिस समय प्रपाग की मसिब मासिक पत्रिका 'सरस्पती' का बम्म दुभा उस समय रिती में उथ कोटि की मिगुर साविस्पिक पत्र पत्रिकामों का प्राय सपा प्रमाण वा। संपारकमबर पटित महावीमसारणी हिरोके संपाक में 'सरलती' मेरिबी-गाविस्म की प्रगति पर मरण पूर्व प्रमाव गला । उस समय लड़ापोली हिंदी-गध की नमाम्य रूप से और पथ की भांशिक रूप से मापा बन चुकी थी, परंतु मी तर उसके सरकार कामयन प्रारम मी दुमा पा! हिवेरीगी के समान म्याकरणविद् और प्रामाविक विान् केशों में जाकर 'बरसती' में भाषा-मस्कार का महान् कायसंपारन लिया। गापासेहीमाबा अधीकि भी रिपेदीमी ने सहीलोसी को रिवी-पप में प्रतिषित करने में विवना अधिक कार्यमा है। परंतु निसरी-गयी भाषा को मी परिमार्जित करने का गौरवमय भेग भी भी सिगरीबी कोही। उन्होंने भाषा कोकार-चारहरमुसका बनाया,म्बार रिमोभी मतिया की, सेमी नगीन रोसकों का प्राध्यान नपा और पारपारस सम्बया के प्रेमी सैमो नवयुवकों को अंगरेजी की ओर से प्यार दी की और मावि किया। हिंदी साहिल के अमेझो वर्षमान समसिद्ध सीर की 'सरस्वती' की ही गोद में पार को हुए । वनोने रवेदी में ही दिल की प्रथम दीला मास की पी। द्विवेदी की माधुनिक पात-पप-प्रबार ए लेपन शैली मप्पम मेसीसी। उसमें न दा संमत राम्दो कावास्य हता है और न उर्दू समाबी प्रचुरता । उनकी मापा एकत-मिभित ली है, परतु उसमें प्रापरयावानुमार उदू सम्मो का मी पपोषित समावेश होता। इस प्रकार काशी नागरी-प्रचारिसी ममाडी स्थापना और सर स्पती' पत्रिका के प्रकाशन से हिंदी-गवनी उपति का पर्याप्त मास्साहन भात दुमा । मापा में प्रोदवा माई, र सामपपती दुई और उसमें भने सुंदर रालियों का प्राविवि हुमा । बित प्रकार उद में लखनऊ और देहसी रोप्रोसरी विमित्र रोलिया। उस प्रकार दिदी में रमान भेद के अनुसार सो मेद तो नहीं मा पर स्विनी दी पक्तिमत रोशिया उत्पमा, यो मागे पलार पर्याद शिया बन गई और पर उभर म गिरकर घुध खानों पर बा मटकी, मिनसे स्थान मेर का उपप्रम प्रारम हो गया । समप रसूल स्प से दोन मिप स्थानों में तीन मिप रोलियों रेप स्परता दीसते है। काशी अधिकारा सेपर संसद बहुत मापा का प्रयोग करते हैं। ऐसी की भोर के सेगा-गर अपनी माग में गई कारती के साधारण समीपस्तवता पूपा मार करते सतना और कानपुर के साहिस्पिो पर परिव मदारप्रसाद विदी का पर्याप्त प्रमाव , म उनाने मम्म मार्ग भरतपन रिया। उनकी मात्रा में सेहत राहते. परतु उशमा मी पपारित समारेय रखा है। म यती अन्य रोलियों की प्रपदा प्रतिसारपिप दुई। इसके प्रतिदिन हास्प पिनापन मुवादसा, म्पग, पामरान, रान, उम्पास, पानी प्रारिममिप विपरोप उपपुरविनी दी गलियों मातुमार मा चौर हारहा है। पहुत सी म्पूनवामा करते हुए मीन गलियों से पर प्रस्तपाता किपिभिम रायपावित प म प्रहर करने की एमठा माषा में उपस्थित है।रा में अन शिवा का माप्पम अंगरेजी।भारमल अंगरेपी उम्म शिश-मास प्रमे .. रिदी-साहित्य का संचित इतिहास शिान हिदी की मार मुकये है, जिसके कारण माषा पर अंगरजी रचना-प्रशाशीका विरोष प्रभार पारिद प्रावश्यकता से अधिक परगा। न केवल अंगरेजी के सहसों राम मनुरावित होकर निरी केशर-माहार में प्रवेश करो, बरन् अंगरेजी पर-सिम्बास तक की चामा हिंदी में भिगोचर होने लगी है। इस मकार हिरी में किचनी ही पेशियों का विकास हुमा और हो रहा है। मासिक पत्रिकामों के निकलने से सामरिक साविस्म की मम्मी भीधि । राजनीतिक मायोजन के फल-स्वम्प दिदी को राष्ट्रभाषा बनाने का उपोग किया बापा है। राजनीतिक भावोजन और शिक्षा की उमति के साथ ही पत्र-पत्रिकाएँ पड़ती जा रही है। साहित्य के सब अंम मर रो। विभ मियाना में हिंदी उच्चतम कचाओं में पाई जाने लगी है । विषिष विपरोकी महत्वपूर्ण पुस्वर मकाशित होगी। समालोचना-मारवेषु हरिचर के समय से ही साहिस्पिक समाप्ताचना होनसगी थी, पर पंडित महागीरप्रसाद शिरी के समय से उसका सम्म निरिनप हुमा । विषेदोगी की समालोचनाएँ अपि काय निर्दबारमक हाती थी। सरस्वती में पुस्तकों की मी भोर संसार पारिदी के कवियों की मी हिदायी ने समालोचनाएँ मिली। हिरवीगी की पसाई पुस्तक समीक्षा की संलिप्त प्रयाप्ती का मनुसरप प क मासिक पत्रिकामों में हो रहा है। रिपेडीगो की समासोचनाएँ मापा की गड़बड़ी को दूर करने में बहुरा तहापा हुई, साप दो पासोचना में संपत होकर सिसने का बैग भी प्रतिमित दुमा । विमलीमीरे समकालीन समालोचको मै मिभरपुत्रों का स्पान रोप मालपूर्ण है। उनका निपी-साहित्य का इतिहास-प्रेप पोरग की परवी रखना होने कारण यही मममम पर हुई। "नवरा' में कलियों की समालोचना का सूत्रपात दुमा । उनकी प्रलोचनामों के मेष में विशनों में मठमेरो सकता है चौरमी, पर समालोचना कार्य प्रारम करने के कारण मिप्र बंधुनों का दिदी-साहित्य पर

७१
मापुनि कालाप प्रबार
श्रण और उसे स्वीगर न करना वमता माना बामगा। इस बात
कामिना प्यान रखे कि सब बातों में प्रमिक विकास होता है, पूर्व
कलियों को गुम्छ मानना जहां अनुरित है इस बात का मी प्मान
ना पाहिए कि हमारेशान तपाभनुभवीपति निरवर हावी यती
है, इसम्मिय सादिस्य विपापियों समालोचक तथा निमातामो
अपने अपने मतो दो बेदवास मान पैठना, मवावित सप्पों की
अपरेसना रना तथा भिम मत रपनेवासा कोरेस सममना साहित्य
मागी विकास चौर उपति के लिये शिवकर न सिद्ध गा|
रिरो फेरपियों पर प्रासापनामा लेम पोर पुस्तक विपनेवाला
में पति पार्मिर शर्मा और पति पविहारी मिभ के नाम ठाक्षेप
बाय हिंदी में तुलनारमा माशायना राखी का प्राविमार पति
परिद शर्मा ने किया था। बस्तुन एक नई पीज पी। परित
प्यविदारी मिम में इस पिपय कामागे बढ़ाया है। ग्रांजी की
ण्टी का अनुसरण भन्न सग मे न दिया यह दूसरी बात है,
परंतु पर गली परही है। रामागी की भाषा नई मिशिव भोर
पुरीती होती है। मिर्गी माा सरल और गमीर है।
अगरेजीग पी गमीर मालासनाएँ निपनेातो में राय परापुर
रसामनुररान और परित रामरंद्र गुरु प्रमुप में। तमाखोपना नयी
Hिatat फा निम्पयरन और हिंदी मात्रा के स्पम्प से परिपत्र
पगमे में पापू मार का खुल्प उपोग था। यापमी, तुलसी, सूर
प्रादि पिपा पर राक्रमी निर्मग मुंदर पिरतेपसारमा पालोपना
पेप में भिग गए, पिनस पारियों मानसिक और सास्मर
विमान पर प्रपा प्रभार पावा।परिपालपाको उप्प भामिया
में पाई पाम मान समासामनाभा में गुरुनीसी समालारना सबस
अधिक मासपूर्ण या गददी मारा और गारिय'
सिरी फरमान दी मरस प्रामाणिक, शिवापूर्ण भार Aपात
RT पदुमतत वागी ने मी दार एमालोपनारमा पुल

७२ हिंदी साहित्य का दित इविहार हिसकर हिंदी विकासक्रम को स्पष्ट करने का प्रयच दिया है। मासिक पवित्रामों में समालोचनाएँ लिलमेकाबंग अधिक उम्सुक और प्रशंसनीय होता था या है। परते की अपेक्षा प्पधिगत भाक्षेप की बहुत इष कमी हो गई है। कदाचित् शना अनुचित न होगा कि समासपना का काम बहुत मात्वपूर्स है और उसे सपना पूर्वफ करना सबका काम नहीं है। नाटफ-मम समीचाहिस्पों में नारकों का विवेचन रंगवासाके नियमों, प्रविषयों प्रारको शेर होता है।गरेगी के भनेक शिान् समालोचक वो रंगशाला के अनुपयुक्त नारकों को नारक कातेरी नही । उन देशों में रंगशालाएँ पहुत अधिक विकसित की और प्रत्येक नारफफार उनके नवीनतम विकास से परिचित होला मावश्यक समझता है । नवीन विकास के कारण वो पुरानी नारकीय रचनाएँ प्रामुनि रंगमंच के अनुपयुक हो गई है, प्रणा पिसी हुई रेस पाने लगी, उनको निम्न स्थान दिया जाता है। स्व शेक्सपियर के नारक भी रंगमंच की राशि से पुराने हो गए वा कम देते जावे अपवा सुधारकर ले जाते है । विदीलिये परपीमा की बात अब क पा पारसी (यमंच केही गणो में पीtt, ठसकी अपनी रंगशालाएँ पा ही नहीं अपना मूवक सी है। व्यावसायिक रंगमष दोरी में पराचिद एक मी नहीं। हम लोय अब तक नारक सेलने को नगे काप काम समझते हैं।भनेक प्रापुनिक नारफकार पर पर परसना केबारा नारकीन मविषयों पर विचार करते है, रंगवासामों में जाकर नारक देलकर या शेतकर अपने अनुभव की पति नहीं कर पाते । पारसी रंगमंच अपने पुराने अरगुपों को लिए हुए पसा पाया है।वही मसरवाधिम्य, अस्वाभाषिक भाषा और पनी प्रस्थामाविक मापदरीबा दो एक नारफमालिया है, विपि-स्योहारों पर प से सेतकर ही पेवोय कर देती है। या स्थिति बड़ी ही शोचनीयवा, मराठी,

प्राधुनिकत-गार
०२
गुमराठी मादि मापायो रंगमय विशेष उभव और प्रतिदिन
अपति परते गाते हैं। ऐसी अवस्था में राष्ट्रमापा दिरी पर गर्व करमे
बातों का मस्त चपरस नारा मादी-मारी पंगे को चाहिए
कि सपासमा गोम मारमालिकाका महापता भी दिमापी
शिानो को पारिए किये थासंभव बीम अमिनय-काम को अपने
दाप में से, उम मटा काम ही न समझे हैं । साप हिंदी भापी
जनवा को पाहिए किया हित नाटक मानिया के नाम पर
मलान।
भाधुनिक नाराकारों में पायू पर प्रमाद, परिव बरीनाप
मा पडित मोबियस्सम भादि प्रसिद्ध है। मा प्रेमवरजी ने 'सभाम'
और सपना' नामोना लिन है जिनमें उन समता नही
दुई। पति मानिरहस्सम पद को रंगमय का प्रपा अनुमो धीर
उनको 'परमामा' रिली मारको मे मापपूर्व स्पान रखती है। पौरा
शिमापार पर लिप्ती गई प्रेमी पापबा पंजीपीURE
से पमक उठी है और मार के उपयुष रागा। पेरित गरीनाप
मा नारा प्पम और सिनोकाट दिदी में अपमे गरे
अप्पे पर पहा म्पग्य और पिनो नरी पद परोसन
विपिन और वयदा उमा पान पावा और भी स्प
भीर मनोद मो निम्न भैसौराहामया। भीपास्तानी रेपासनों
सपा पूम, स हमारी पि में ये पुरवि रत्पम रने,
उमा मनोद मा निम्न कोरिगो और उनमा प्रभाव नपपुरमा
पर धम्पा नदी पन्नाश पर प्रसाद फाट-रस नाटक
हैं। उनमें से अधिकार नियमित प्रसादजी ने मापीन
पतिदास राप्रपा प्रम्पसन किया है चोर पापीन भारतीय समार
परिमनमाप
पिदिसलाम में उनी पमता मनोर
रेरा और उस उपयुक्त पतुमिमा राना मगरनीकी
गया है। माननिय रतिरा पारी पसार दर लिएर प्रा

हिरी-साहित्य का संचित इतिरास उनका कामना" नाटक हिरो में अपने बैंग का प्रविधान है। हमारी सम्मति में विधियाँ एनी बरिश और एक दूसरी से ऐसी प्रति खिम माप से मिची हुई हावी कि ठमे प्रसग करके रसाने में कृषिमता प्रा ही जाती है। उनका ' पर' नाम का एकाकी नारक सियास-प्रतिपादन को रिसे अमा, पर नाटकीय घी से त्रुटिपूर्ण है। सियतों को अप्र स्थान मिल गया है, कपोपकपन में नारकीर मभाव एस हो गया है। फिर मो विना वो निासदेर कहा था सकता कनारको के क्षेत्र में प्रसाररीकी रचनाएँ यो मालकी और अब क के नारकारों में ही सर्वए। उपन्यास-'परीचागुद' के उपरांत हिंदी के उपन्यासों में 'चर कावा संतति' का नाम भाग है। बापू देवकीनश्न सभी की इस रपना का उस समय इतना अधिक स्वागत किया गया कि भग हमारे लिये गा पारन की बात हो गई है। सानो निरपरी और उदा लोगों ने 'चकवा स्तवि' पढ़ने के लिये रिदी सीली | पाता के अनुसरया में हिंदी में अनेक उपन्यास लिखे गए। इनके अनतर गर मर्गी के बास्मो का युग माग । उनके अनेक उपन्यास अनुमारित हैं कप मौसिक मी है। पटनामों की भोर प्रारूपण राता है, बरिष के विकास का कही पता नहीं रवा, माषा मी माया देहाती यवी।। इसी समय के खगमग बैंगता कुखमये उपन्यास का निरी में अनुपाद हुमा विससे साविस्पिक उपमानों की मौलिक रचनाएँ मी हाने सगी । पशित कियोतीलाल गोस्वामी ने इस ओर पाछे पास प्रया किपा । उनकी रपनाएँ साहित्यिक है, पर भाषा की वि से सपास नहीं itt। गोस्मामीजी ने अब तक पचासों उपन्याव सियेगे और उनका थोड़ा पाव प्रचार मी है। उनके उपन्याष अधिकारा पाना बिसिर, पात्रों के परिष पिकाठ को भोर कम मान दिया गया है। हीही कासरोप मी सकता है। प्रावनिक उपमात-समीक्षा के अनुगर गोस्वामीमी के उपम्यासों का पाप कम सारितिक मनो।

मापनिकासारवार
उनका पिनाद और परिक्षात कहीही भरलोलवा की सीमा का पहुँच
पावा।
हिरी उपन्यास-६त्र में प्रेमचंपनी की रचनाओं में मुगावर उपरिपत
र दिया। विमानों ने उस पर मीक्षिा उम्पास विरा-सदन'
पा उवापसीसाथ स्वागत किया और 'प्रेमाभम निकलती
दिसभेप उपम्पानगर पसाने । सामाजिक मारा
प्रतिदिय इनपी ससा मूल कारख है। 'रगभूमि', 'कामास',
'प्रतिज्ञा, 'गबन माश नना बिदन दो बार-सा उपन्यास निक
पुरे। प्रमहजी ने रेहाती समारा का गाया अनुभव प्राप्त
रिया पर और उनके मुगदुबारे सममान पे। सामायिक
रीविगो दूर भरने बारम से सनाने मम्प ऐसी मस्त नसी
दो, मीठी दुग्या का प्रय Eि मानमिक अधिपो उत्थान
स्तन सानुदर चिम प्रति सम में प्रभारदजी की प्रसिद्ध है। मन
पीपूर्प कि प्रेमचेरी मिसीपीएम कार में सवार के
पापा उपन्यासका समाध। अमरीक उपन्यास में
पाया-मोर प्रति प्यान पा गया वप्पपारा उसना
पिचार मही रखा गया। नो का उपयुक्त सम्मिए पदामित् उनक
उपनामी के माता और मोगा देवा। कही कही, विशेषर
रंगभूमि' में प्रपरपम्या से प्रति रिवार बिमा गरा। वा
उम्पासोमागा में न र एकदमाग में समाप्त राजावा तो
परित गिरणा पति पिमरनाप रामा पौगि के मा'
उपालम परिव मित्री मनोहर पर पाया है।
वापर प्रमादधीत' नाम उम्पान या निमार
नाम तुसमा है। समस्त उपाठ कमाने पर दमें
समार फ मंग
गिरपाटन परिकर नही हुमा। मपयुपर
साको में पी भी यनद्रामार की परत' प्रदा पिस रेगी
जाती।

हिंदी साहित्य का संदिस इतिहास भास्पायिका-मामुनिक हिंदी की प्राममारिकाएँ सत के दिवोपरेण प्रक्या रामवरगिरी केडग पर नहीं मिली गई, मैंगरेबी की परी कहानियों की ऐसी पर चिसो गई। घटनामो की सहायता से पात्रों की पछिमत पिरोपवानों को चित्रित करना प्रारकर की कहानियों का मुस्प बल से या है। समार की नीतियों के प्रदर्ग नार्थ मी कहानियाँ सिती बाटी है, ऐतिहासिक तत्वो पर पकाय गलने की एप्पि से भी कहानियाँ शिसी बाती और पागनिक मानियां भी लिखी बाती है। कहानियों में न वो घटनामो का कम प्रषिक पटिश होता है और न जीवन के बोगो चित्र देखाए पावे । हिंदी में प्रास्मारिकामो का प्रारंम करनेवाले गिरियाकुमार भोप नामक मन थे। उनके उपरांत भी बालादर शर्मा, पापपरापर मसार, भी प्रेमचवबी, कौशिकणी, मुवर्णनगी, रावी मावि मानी देसक हुए। प्रसारजी की भास्मारिकाएँ करित्व पूरा होती थी। उनकी कहानियों में प्राचीन इतिहास की खरं पापों की लोग की गई है, कुछ में मनस्वाप कीसम्म समलाएँ सममाई गई। प्रौर कप में पति का परिव स्पा किया गया है। प्रभारी की माषा कहानिया मिस उपयुक्त नहीं है और भायों की झोक में कही कही कृत्रिमवा मा बाठी । प्रेमचनगी की कहानियों में सामा बिक समस्याओं पर अच्छा मारा गहा गया है। उनकी माषा-शैली पानियों के बहुव उपमुक्त हुई और उनके विचार मी सब पर शिसे होगों के विचारों से मिलते गुप्त है। वही कारण है कि प्रेमपरवी की कहानियाँ सबसे प्रति लोमिय। प्रेमरंदगी मोर पसराकर प्रसारबी की मास्पापिकामों में पड़ा भारी अंतर पाक में परनामों को प्रमानना यती है और पूसरी में कारे मानों की। कौशिकवी की कहानियों में परिवारिक जीवन के सोही मार्मिक और सरपे त्रि| उनका क्षेत्र सीमाषद , पर अपनी सीमा के मीवर में भविवीय है। ऐसा पान पाया है कि मनमी ने परमात्म कथा 19 भाधुनिक काल-यच-ग्रवा साहित्य का प्रया अप्पपन किया है। मारतीय बादों की रक्षा परमेसी उनकी पर मशंखनीय है। उनकी कहानियाँ सरस और ऐपना पराजी की यानियों में पवित्व है, परन्नकी मारा अस्पापक प्रसार मा उना मात्र काही नितांत रिपत सागर kधन्य मानीसेमा में भगस्त' के मेनर भीपतुरसेन शास्ती, भी सपायरामा। उपत्री सीपमानिया मम्मी जिनमें उनान परलीखवा नही माने है। उनकी मार प्रभी होती है। सिडी पाटी कहानिया या गरम मविप्प उपस पान पाता है। बारी समय में इस पेत्र में ही उमति हुई है। निषपदा में प्रम तालिका का पुम नहीं पाया। समा सामनाम्मर निपातिरित प्रिय समीनि साभारत परिव पालाप मापौर परिव प्रतापनारायमिके मिर हिंदी की सामावस्था की। उनमें विनोद पारिबारे जो कुष सादिपकी रमायो पति नहीं रोका। परित महावीरमार दिनों में विपारोकी पागमा की निगपासेयो। पेडीकोपारनगाम में वना मस्त रामा पावा पाकिसके स्पर निपपोको देर में मारपीमामापास्मान लिगमेषातो में समीर सरदार प्रशसिहा पान तरसे अधिक माप का है, पर पोहही दिन पार रारमी दिदीको पोर अंगरेजीबी पोर कुम गए । भीमुन गुलारगर और मौत सोमत गनिज नि मी सापारपा प्रादुर के क्षेत्र में परिल राम गुरुल पाम प्रसग सान। माननिस रिलेस के मापार पर उमाने पर मामिनीवेगो पर मना मधमपसमिरमा मानिस लेसन में पारा, प्रमा पपलिया है, तब मप्पम दीपाय निमार प्रमी विशा पान महा या पयासी सादिसलगी पुरि मार दुनेगों का मान जाना भाई पर परी-दिल का विप्त इतिहास पारिए । इन दिनों साहित्यिक विषयों पर मी निएप विडे बाये। और उनमें कुछ महत्वपूर्ण मोहै। साहिस्पिक पत्रिकाएँ-हिंदी की उन्न कोटि की साहिस्पित्र पत्रिकामों में सबसे पहले पनाग से सरस्वती प्रकापित हुई। प्रथम प में इसके सपावन का मार काशी नागरी-पगारिसी समापौर समाण्दों के हाथ में या । विसीय और तृतीय वर्ष में इसका संपादन मान रसामसुंदरदास करते हैं। चौपे गई से इसके संपादन का मार सेपाक प्रबर परित महावीरप्रसाद द्विवेरी के हाथ में गया और बीस बों से प्रशिक्षकास कार्य को करते थे। उनके समय में इस पत्रिका ने बड़ी उपवि की और हिरी मापा तथा साहित्य के दिवगमन मे वसई । सरसती के प्रनतर मापुरी, तब सुपा और नशासमारत मासिक पत्रिकाएँ निस्सने बगी। इन सब मे हिदी की अमात्य सेना की और अब तक ये उस कार को निरंतर पर थी। पीरिती की पप समय ममुख मासिक पत्रिकाएँ है। मासिक पत्रिकामों में नागरी प्रकारची पत्रिका प्रमुख बिठमें माचीन ग्रोप-संबंधी खेल मुस्मतया गते विषय की यह रिवी में एक ही पनिका और बायी नागरीमचारिणी मा की मुस-पत्रिकाबाने पर भी पर उस संस्था कार्यों की सूचना देने की प्रोर ठवना पान नही देवी और न पार-कीपार में ही पाती है। सन् २०११ में रिस्तानी एमोमी सारा रितुस्तानी" नाम की "विमारी" पनिका निकलने सगी है, जिसमें उच्च कोटि के हेल निकसतेस पत्रिका का ममिम उम्बत रेत पपता। गय-भैली का विकास-यो तो गध का विकास बहुत मापीन काठ में पुमा पा, परंतु वारतम्प उस समय से भारम हुआ वित समय मुंशी सदासुखशात, यामला, सरत मिम और सावी सावन मफ्नी बनाएँ की । उस समय को गैसी की अपत्पा नदी की पक्षमा प्रारमिक काल में होनी चाहिए। दिन योगों में बख का .

प्राथमिक काममप प्रबार
प्राचार देय से लिया, उनकी माग में मी सेताकी पाप मग
गई। सास में सामानों की रचनाएँ सामाविक मी
श, क्योकिया भारमिक माना मापारीती में बल का
संचार पुमा, म उसका कोई पत परपर हुमा और न पाठकों में
श्वनी कि उसमयी कि गरेपपास्महरमनाम्रो कामप्पयन र
रन लेखकों में मी दो ह प रिसाई पाठे । एक ने वा
हेमवत पविया कर ही पीमि उपन-उदंगकी मास्परपना एवं
सम-सामनाका पूर्व परिकार किया पार भार दूसरे ने उपन
लेबर शैलीत बमवारपूर्ण बनामे की पेटा की। अभी तक ना
गगो काम पर दुमा श और न मापा का मामन हीरो
महापारम्पारस की मार ठो घास ग्रानाभस्वामापिका
मनावरवर मात होता पा । मुरापर्य के प्रयाग में उपचार अपरस
रमस हो रहा था। दिन ममोन मारय और उचूपन का एकरम
परिकार छिपा उनकी माग समीर मोदी यो परतु रसग
पाचौर पमत्कार पपरय न हो मया था। इस समय प्राय
समीक्षेसत में मनीरता पर करावी पाने का ताप पर
क परिसर प्रारमिसरा सभी अवस्थाएं रसना गली में
उपरिपत्र पाबासाभाविक रूप में उस समय होनी चाहिए थी।
उपस सयमग पपास बों सदाका मारतवर्ष
केप प्रगावासाप में था। उस समय की रचनामोका
रेतन से हरित सवा निवारयो मे सपन पार निरोप
रिया पीर बमी रमनामों में पूरा रूप से रिदीपन पदी निकाला।
नका एमपोगना ही में मुफ्त देसाई पड़वा म बाप
रिम्बार में भारत पाने पर लोगों में मामीण राम्रो
का पार रियासमोश यही मासा पिरित
रोवानि सोमो मे सपेर पद पन को पूर (सकर मारा

दिदी-यादिस्य का संक्षिप्त इतिहास पर पमा शिवपाद और गमा समासिंह गयधेत्र में माते- ही पुननिभौर उप्रारंभ हुया । साधारण सम से विचार करने पर तो यही पा पा सकता है कि उस समय तक नवा माफरद नियमापही निर्वाह दिखाई पाता था और न मापा का ही कोई नस्विर हो सका था। रचना का विस अवश्य हो रहा था, पठन पाठन के विस्तार से अनेक विषयों में गचसी पहुँच पार्रम हो गई थी, और कितने ही विषयों पर पुस्तक लिली पापी पी रिशरी- गध का रुप रप म्यापक थपरक हो माया । उसमें अब भाब-पोतन का क्रममा पिकात होमे गा पा । इस समय प्रधान बात हिंदी उर्दू का मसहा था । राग शिवप्रसाद को सभी रचनामों में उफ्न पुसेग्ने की पुन समाई थी। उनको विश्वास भा-समय ऐसा विश्वास करने के लिये बाप्प किए गए स-कि यदि उपन का परिकार दिपा पायगा वो मापा की पारिवठा नरहो पायगी और उसमें भाव-योवन का पमत्कार और मश न पा सकेगा। यह विचार राणा शरमहसिको ठीक मचा। सा उन्होंने इसके विरोध में अपनी रचनामों में मापा का रूप पूर्ण शुम ही रखा । ऐसा करके उनोने पर स्पर विला दिया कि उपन से पूर पर मी माग बड़ी सरसता से प्रकापित किए जा सकते है, ऐसी अपस्मा में मी बमकार उपस्पिट किला ना सकता है, बिना ठपन का सहारा लिए ही सुंदर से मुंदर रचनाएँ की जा सकती है। श्या निरीधय गान् हरिश्मा मसी मति कर दे। सोच-विचार करने के उपरांत उनमे मध्यम मार्ग के पसंचन का निरषय रिया । उनोने अपनी रचनामों में मापा का माम्मापारिक रूस रसा । न उनोंने उपन का पूर्ण परिकार ही किमा पोर न से उप-मुभस्मा के पदपावी ही बने । माँ नोंने उसे राम्दों का पवहार किया वहाँ उनका वसप सप ही रहा । इस काल में भने पत्र-पत्रिका प्रकाशित होने लगी थी। हिंदी का मबहार-क्षेत्र मप

मामुनिक कालाप-प्रबार
भक्ति पापा ने समा था। मादुची अनेक मानोगी तैयार
रोयर रेसमी दव-संपादक और सहन होगो के
हापों से मापा का रूप त कुष परिमार्जित होगमा । परिव पासहप्प
मा और पंडित मापनासपथ मिश्र की रचनामी में भामसंगना की
सुंदर और पमतारपूर्व महाली सा अनुसरण हुआ। इनका गैशियों में
बखतेपन और पावरारिकता र पापक सामनस्य उपस्थित
पुमा । पति परनारापर पौधरी और पंडित गोविंदनारायण मिम
सननी से मार की रचनाएँ निकली चोक भाव की पोरया
परतीची किमय मापा में रिती प्रकार गत मार-प्रकायन की ही
राति मी परम् उपमें मासेबारिक रूप से उता रचना भी की जा
माती प्रकार के सेना में मानहारिकता प्रारम मई,
परत मापा का जियाली स्वाप दिखाई पड़ा रखना होते हुए
मी पाठकबारेता किसकास में मीमार की
प्रमोहना दी गई। मापा 7 मार्म निरिपत यो हो गया, परंतु वसमें
सौपा प्रमी वाम पासा पासत समय मी ऐसे देवा परिपत्र
जो विरामाजिरिका मादी नदी खेये और सकारण
उनसीरनामों में पीपलवामा मादी पाप में परि
दम परमा पारेका सामावग्ना की लिपाइल
समप अपरम गव-देष में उपस्थित और उनमें एक प्रक्रियाही
रूप प्रवास लाई पापरंतु भाषा का शाम्पर परिमागन न रोटम
मोर मारण-विडिव गुरवनाएँ मोबासकी।
बोमीर समपरा गई थी उनकी पूर्ति मानिकपल में हुई।
पति महावीरमगर दिदी प्रपति रूपों की बावा एपमा से
मारप-संसपी भूठियों मानणर मा। पम्प बास्वरिसर
पण और म्पहार का पिशवा है। इस समय भने
पिरों पर रर और पुर रसना की गई। मोदो मारपिया
पिन में मार, उपाय, निपलादितिराने

हिंदी-साहित्य का संचिप्त इतिहास पर यमा पमप्रसाद और गम समयसिंह के माक्षेत्र में भाठे ही पुन दिदा मौकार मारम हुमा । साधारण पसे विचार करने पर तो यही हा बा सकता है कि उस समय का न तो म्पारण के नियमों का निर्वाह मिसाई पावा था और न मापा का हीको मन स्पिर हो सका पा । रचना का विकास अपश्य रहा था, पटन-पाठन के मिस्तार से अनेक विषयों में गप की पांच मारमो गई थी, और निसने री विषयों पर पुस्तमें लिखी बागी पीरिती- गप का फुपम्प मापक अपस्म हो रहा था। उसमें अम माव-पोसन का क्रममा विकास होने लगा मा । इस उमप ममान बात दी गई का मगहा या । राजा शिवप्रसाद को सभी रचनामों में उफ्न पुग्ने की पुन समाई पी। उनको विश्वास मा–संभव है ऐसा विश्वास करने के लिये वे बाम्प किए गए हा~कि यदि उर्दूपन का परिकार किया जायगा तो मापा की प्यावरिषता नए हो जायगी और उसमें मान-पोतन चमत्कार और बस न पा सडेगा। मा विचार राणा साममहिना ठीक न मरा। पता उनोंने इसके विरोध में अपनी रचनामों में मात्रा काप पूर्व शुर ही रला । ऐसा करके उनाने या स्पर दिना दिया कि ठकुंपन से दूर यर मी भाव बड़ी सरता से प्रकाशित किए जा सकते है, ऐसी अवस्था में मी चमत्कार उपस्थित फिया चा सकता है, बिना उपन का सहारा लिए पी संदर से सुंदर रचनाएँ बीमा सकती है। इस निरीचरा बाबू हरिश्मा मशी माति कर रहे है। सोच-विचार करने के उपरांत उनमे मप्पम मार्ग अवलंबन का निश्चय विषा । उन्होंने अपनी रचनामा में माषा का बड़ा म्यापारिक रूप रमा । न उन्होंने उप्पन का पूर्व परिकार ही किया और नये उ-ए-मुभान्सा के परपावी ही बने । महाँ उनहोंने न के सम्दों का व्यवहार किया पर उनका उन्नय रूपही रखा। इस काल में पके पर-पत्रिकाएँ प्रकाशित होने सगी पीनरी का म्पबहार-पेपर ८१ मानाच-पवार प्रतिमानेखमा पा। मारगी के अनेक सापोगो वैवार रोपर ये समोद पप-सा और साइन पेसो के सपो से नया सात प परिमार्षित हो गया। परिव बालाप्प मा और परिवानाम्पएमभी रपनामों में मारमंगना की मुर और पतारसूप मपाली अनुसरण हुमा। इनकी तिमों में परवेन और माया पापा सामग उरियत एमाव पानापपय पौधरी और पीत गोरि-नागपप मिम की रोवनी प्रकार की रचनाएँ मिली बोरस बात की पोल्पा करतीपी माप में किसी कार पल माष सहायन की ही पति मही है परन् उतने मासबारिक रूप से उत्तरपना मी को गा साती प्रकार में पाराका प्रपरस नाई, परन्तु मापा एकत्रियाती सस्म दिताई पवना हवे हुए मी सतर पारपारे ताकि पल में मी म्पारण की गोलना कीमामा माग निरिपत तो हो गया, परतु उसमें सौर प्रमोसनमा सायात समप भी ऐसे सेतक उपस्थित बालिरामादिपिका प्रयोग ही नहीं करते थे और इस कारण उनकी रचनामों में म्पनी प्रसरता मा पाती पीचर परि एम पाना बारेमा समाव-म्पंगना कीका लिया इस समर प्रवरप गप-क्षेत्र में उपस्थित रं और उनमें एक रियासी मारप दिखाई पका, परतु माराका साम्म परिमाइन नहोसम और पारप-परिव गुरपनाएँ न की पारी। बोरमारत समय पगई पी उता पूर्वि माधुनिक काल में हुई। पंडित महारपसार बिरी मति सरोकी सवलता एवं पेरा से प्पामय पी पुरियो पनुषार दुप्रा । राम्दोपा वास्तविक एम प्रयोग और सारस बात की विशेषता है। इस समय भनेर पिपो पर सुंदर और पुर रचनाएँ पी मरे । यो तो मारवेंदु कार में नाटक, उपपात, निरंपरस्पारि हिराने का हिरी-वारिस का संचित इतिहास पुका भा, परतु इन विषयों के मेलन में म वो अनेक प्रकार की गलियों का सही निमिष दुमा था और न माली मावि उनमें याम मानसिक मावनामों के प्रकारानी प्रणालीका निर्वाह हुमा पा। इस काल में इन विषयों पर विशेष प्पान हिबा गरा । पत-स्वरूप शैली में मी माव-पोवन की मनाशानिक शक्ति का संचार हो गया है। बापू प्रमद और मानू पपकर मसाद की पैमी में परिवत्रिय की मान नवीय और गम्मीर यामना इस बात की साधी ।मा जित प्रकार विचार करने की राधिका विकास होता गया उसी प्रकार मापा में मी मागबनारमा राधि की उमति दावी गई। भाग मितने मकार की शैलियाँ उपस्थित है उनसे यह स्पा परिव हो पापा से गूर मावनामों के प्रकारान में मापा समय है। माष और माषा की तादाम्पमाप्ति पैशी के उत्कर्ष की परम सीमा लाइस RTI में भी परम्पास कर ये। पपारास की 'सामना' में वी प्रकार के पारासम्मका उम्मेप स्वान स्वान पर हुमा है। इनके 'पाय' की अपलिसी कारानियाँ उकसी के गोचर रूप पस्तुत करने में बहुत कुछ सफा हुई। पटनात्मक कमन की एक पिशित प्रणाली का सवित्रतापूर्व और पावहारिक रूपमा प्रेमबर की रचनाओं में मार पाया है। पूसरी मोर मागास्मक तपा ठम्मारपूर्ण माव-म्पमना का एक रूम-विशेष 'प्रसाद" जी की रैली में रिलाई पाता है। वाद-विवार और वार्षिक पन का प्रायपूर्व रूप मी इस हाल में रोषता मपुक होम सगा है। (स प्रकार की प्रैखिर्या भागदेखने में प्रारही। बिनमें मापय के प्रमों की प्रधानवा पती । एकही विषय को बार बार पुएराकर मना और मार-मंगी की एक विचित्रतापूर्ण और चमत्कारपुर शैली म भनुसरण इस युग में विशेष वृमि पा रोका पिने पासोपनामा देत मारारिश्चन्द्र पी के कान में विडे बाने से पे, परंतु पापुनिक काल में परित महावीरप्रसार दिदी की तिरेप पेरा

माधुनिक बाप-प्रकार
से इस विषय का प्रति प्रपार मार सय पर लोगों की पति
मोले गौ। प्रा परित रामचा गुस्स श्रीले गौरवपूर्ण भातो
मना सेवा प्रातिर्मय मा । मासोबना पोषपूर्व गमीर
विवरन शुन्तगी ने प्रारम लिगा। उम्से विरास शेवासीम
ही मातारना भी पा चमत्कार, मनोवैज्ञानिक वमा ईना-मुक
ऐसी साल एकतिरोष स्म पर करेगी।
अभी तक पीर नुसनामक प्रावना पर कोई ऐसा सुरर ग्रंप
नीमकाटित हुआ किसे प्राधार माना पा सके। इसके अतिरिक
पार भनेर रिपोर अनेक व सिसे पायेन मनिष
वियों की शिनों के लियर में घमा प्राधिक नहीं पहावा सप्ता,
मोये परिकमावत्या मनी प्रास।

(१०) उपसंहार
साय पर मामला पर और सामान पदनों में
अभी पूर्ण परिपालना नहीं पाई है, पर तरी दोनों की बोर वापूर
श्रमतर होकी। सप वाव
होकरी मापा और हामिल
का बचमान रूपमा प्रमागरम है। इसमें मापी उपाधि के वीर
पर्चमान वा समम पाकर प्रकरण पत्तमिव और पुमित होंगे।
परिवर्तनकाल में मिन गुणों का उपायों में होना सामाणिक
हिंदी मापा और सारिप के विकास में मारेल पावे और पार
का धर्म मी पूरावया पवितलिव हो पात पस्या में बीयन ,
पास है, उसार, उमंग र सबसे पार पावगी
मविप्पोप्रति के मार्ग पर वापूर्वक अमर होने की गति और कामना
है। किनमें से गए। वे अपरम उमति करते है। रीि में से एक
पर्वमान और उसका सम्नति परमानी और उसे गारिस
मा मनिषादी उम्मत और सुंदर देख पाता। भारतमा
उम्मान • पान ये महानुमायबोमानी हतियों से इस मार्य के
रको भौर मार-मसानों को दूर कर उसे लपम्प, मगल और तुरम्म

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Hindi Sahitya Ka Sanxipt Eitihas

Author
Acharya Shyamsunderdas
Title
Hindi Sahitya Ka Sanxipt Eitihas
File name
Hindi Sahitya Ka Sanxipt Eitihas
Text
OCR done
Citation
1946
Published
2010/12
Publisher
Indian Press,l,m,prayag
Language
Sanskrit
Pages
84
Library
Bhartiya Vidya Mandir Shoudh Pratisthan,bikaner
Classification
History
DLI number
514629
Barcode
4990010022328.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
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