Shri Abhaya Jain Granthalaya, Bikaner
Sham Dravya Vichar
Front matter
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४
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व्यवसायी मनुप्यो वाचन, मनन करी शकता
नथी. तेोने आ लघु ग्रन्य वडे 'पद्रव्य
नो अभ्यास थाय ते माटे सान्त्रविशारद गुरु-
वर्य श्रीमद् बुद्धिसागरमीसूरीश्वरे सं. १९५८
नी सालमां पादरा गामे आ ग्रन्थ रच्यो हतो
अने तेने वकील मोहनलाल हेमचंदे पोते प्रगट
को हतो. आ ग्रन्थनी प्रथम आत्ति खलास
थवाथी अने अभ्यासीओने ते उपयोगी होवाथी
फरीथी वकील मोहनलाल हेमचंदनी द्रव्य
साहाय्यथी मंडळने ग्रन्थमाळाना ३५ मा ग्रन्थ
तरीके प्रगट करवानो शुभ प्रसंग मल्यो छे.
प्रथम आटति करना केटलेक स्थळे श्री-
मदे स्वहस्ते मृयागे वधारो कर्या छ भने नेमा
पग ग्याम करी समकिनतुं स्वरूप विशेष प्रकारे
मालम्ब्यु छ..
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वीजाओने से मार्ग प्रेरयो. एवी आशा
आ ग्रन्थना प्रगटार्थे द्रव्यनी स्हाय करनार
कील मोहनलाल हेमचंदने धन्यवाद
विरमीए छीए.
मुंबाई.
चंपागली,
जेष्ट वदि ११
ली.
अध्यात्म ज्ञानप्रसा
मंडळ.
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લંબીએ તેને પ્રેમપૂર્વક વાંચે છે. દરેક ગ્રન્થોમાં અધ્યાત્મજ્ઞાન અને તત્ત્વજ્ઞાન સંબંધી વિવેચન છે. વૈરાગ્ય, ઉપદેશક અને બોધક, પદો-ભજનો- તે તે વિષયમાં ભિન્નતા કરી નાખે છે. દરેક પદને સાર વિચારણીય છે. અનેકાન્ત દષ્ટિથી, હૃદયની વિશાળતાપૂર્વક અને પ્રિય તથા પથ્થ- વાણીથી હરેક જણને ઉત્તમ બનાવી શકાય છે અને તે મુજબ આ ગ્રન્થ છે. માત્ર વાંચકેના હિતાર્થે ઉદાર ગ્રહસ્થાની સહાય વડે, કેઈપણ ગ્રન્થપ્રકાશક મંડળ કરતાં ઓછામાં ઓછી કીંમત રાખવાની પહેલ આ મંડળેજ કરી છે–ઓછી કીંમત છતાં છપાઈ- કાગળ-બંધાઈ વગેરે કામ સુંદર થાય છે, તદ્દ ઉપરાંત વધુ પ્રચારાર્થે–પ્રભાવના વિદ્યાથીઓને ઈનામ, અને ભેટ આપનાર માટે વધુ નકલો મંગાવનારને નશીલીકમાં હોય તો) બની શકતી ઓછી કીંમતે આપવામાં આવે છે.
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100 શ્રાવક ધર્મસ્વરૂપ ભાગ ૧ લો (આવૃત્તિ ત્રિીજી) ૪૦ ૦-૧–૦ શ્રાવક ધર્મસ્વરૂપ ભાગ ૨ જે (આવૃત્તિ ત્રિીજી). ૪૦ ૦–૧–૦ ભજન પદસંગ્રહ ભાગ ૬ . ૨૦૮ ૦-૧૨-૦ . વચનામૃત ૩૮૮ ૦-૧૪૦ ચગદીપક. ૨૬૮ ૦-૧૪-૦ - જેના ઐતિહાસિક રાસમાળા ૪૦૮ ૧-૦-૦ + આનન્દઘન પદસંગ્રહ ભા- વાર્થ સહિત ૮૦૮ ૨-૦–૦ ઃ અધ્યાત્મ શાન્તિ (આ- વૃત્તિ બીજી)… ૧૩૨ ૦૩-૦ 9 કાવ્યસંગ્રહ ભાગ ૭ મે, ૧૫૬ ૦–૮–૦ - જૈનધર્મની પ્રાચીન અને અર્વાચીન સ્થિતિ… ૯૬ ૦૨-૦ - કુમારપાલ ચરિત્ર (હિંદી). ૨૮૭ ૦-૬-૦ s ૩૦. ૩૧. ૩૨.૩૩.૩૪. સુખસા- ગર ગુરૂગીતા તથા પટ્ટાવ- લીસહ ગુરુચરિત્રવિભાગો. ૩૦૦ ૦-૪- ૩પ દ્રવ્ય વિચાર (દ્વિતીયાવૃત્તિ)૨૪૮૦-૪-
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- 4
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गणित चरण करण कथा, द्रव्य ए चार उदा
द्रव्य ए चारमा सारले, धरतां भवजल पार
अति गहन द्रव्यानुयोग, उदधि सम कहे जि
तेनो लेश हुँ वर्णवू, अति उत्कंठित दीन
भाग्य दशा जो आकरी, सद्गुरु करुणा होय
निर्मळ बुद्धयादिकथी, समजे विरलो कोय ४
योग्य जीवने एहनो, लागे मनमां राग;
सम्मतिग्रंथे भाखीयु, ते साधु महा भाग
उदासीनता संपजे, धरतां एहनुं ध्यान
निर्मल थावे आतमा, पामे केवलज्ञान
द्रव्यतणा पड़ भेद छे, धर्माधर्म विचार
आकाश पुद्गल कालने, आतम ए मनोहार७
पंच धुर ते हेय छे, आतम उपादेय
गुण पर्याय छे तेहना, भविजन ने हेय ज्ञेय ८
६
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(४)
ज्यां मुधी आत्मानुं शुद्ध स्वरुप
लखातुं नथी त्यांसुधी शुद्ध सदहणा थतीन
श्री जिनेश्वर कथीत वाणी सांभळय
आत्मानुं स्वरुप यथातथ्य समजायछे,
ज्ञाननो घणो खप करवो. ज्ञान विना
अजीव आदि पदार्थनुं सम्यक् ज्ञान
नथी. आत्मा नित्य केवी रीते छे अ
केवी रीते छ; उत्पाद व्यय अने ध्रुव
स्तु छ तेनुं ज्यां सुधी ज्ञान थतुं नथी, त्य
धी जीव सम्यक् वस्तुः जाणी शकतो
अने हेय ज्ञेय अने उपादेय पण जाणी
तो नथी. सम्यक् वस्तुना ज्ञान थकी सम
प्राप्त थाय छेमाटे ज्ञाननी आवश्यक
ज्ञानना पण वे भेद छ १ व्यवह
२ निश्चयज्ञान.
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अनंत वीर्यनो भोक्ता आत्मा अरुपी असंख्य (६) अनंतशान, अनंन दर्शन, अनन्त नारित्र अने प्रदेशमयी छे. तेनुं जे ज्ञान तेने निश्चय ज्ञान कहे छे. आत्मा वस्तु अनादि अनंत छे, तेने अ- नादिथी कर्मनो संयोग थयो छ, तेथी दुःखी थाय छे.भवी साथे कर्मनो संबंध अनादि सांत भांगे छे. अभवी साथे कर्मनो संबंध अनादि अनंतमे भांगे छे. कर्मनाआठ प्रकार छे-ज्ञानावरणीय, द- र्शनावरणीय, वेदनीय, मोहनीय, आयुष्य, नाम,गोत्र,अने अंतराय एम आठ कर्म छे, तेनी उतर प्रकृति १५८ छे. ते कर्मरुप जड वस्तु- नो प्रपंच विचित्र छे. जेम ब्राह्मीरुप जड औ-
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स्तकाय (५) काळ (६) जीवास्तिकाय-ए उ द्रव्य शाश्वतां छे. ए छ द्रव्यना अनुक्रमे गुण कहे छे. १ धर्मास्तिकायना गुण ४ (१) अरुपी २) अचेतन (३) अक्रिय (४) गतिसहाय २ अधर्मास्तिकायना गुण ४ (१) अ- पी २ अचेतन (३) आक्रिय (४) स्थितिसहाय ३ आकाशास्तिकायना गुण ४ (१)अ रूपी (२) अचेतन (३) अक्रिय (४) अव- हनादान ४ पुद्गलास्तिकायना गुण४ (१) रुपी (२) अचेतन (३) सक्रिय (४) मिलण विख- रण पूरणगलन ५ कालद्रव्यना गुण ४ (१) अरुपी
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(१०) (४) स्पर्श (अगुरुल- घु सहित) ५ कालद्रव्यना (१) अतीत(२ अनागत (३) वर्तमान(४)अगुरु लघु ६ जीवद्रव्यना (?) अव्यावाध (२) अनवगाह (३) अमूर्तिक (४) अगुरु लघु ए छ द्रव्यना छ पर्याय कह्या. हवे ए छ द्रव्यना गुण पर्यायर्नु साध- र्यकहे छे. अगुरु लघु पर्याय छए द्रव्यमां सरखो छे. अरुपी गुणे करी पांच द्रव्यनुं साधर्म्य छे. एक पुद्गल द्रव्यमां अरुपी गुण नथी. का- रण के पुद्गलद्रव्य रुपी छे. तया अचेतन गणे फरी धर्मास्तिकाय: अधर्मास्तिकाय आ- (१०) ३ रस (४) स्पर्श (अगुरुल- घु सहित) ५ कालद्रव्यना (१) अतीत(२ अनागत (३) वर्तमान(४)अगुरु लघु ६ जीवद्रव्यना (?) अव्यावाध (२)अनवगाह (३) अमूर्तिक (४) अगुरु लघु ए छ द्रव्यना छ पर्याय कह्या. हवे ए छ द्रव्यना गुण पर्यायर्नु साधhकहे छे. अगुरु लघु पर्याय छए द्रव्यमां सरखो छे. अरुपी गुणे करी पांच द्रव्य साधर्म्य छे. एक पुद्गल द्रव्यमां अरुपी गुण नधी. का- रण के पदगलदव्य रुपी छे. तथा अचेतन (११) शः पुद्गल अने.काल ए पांच द्रव्यनुसा- मिपणु छे. जीवद्रव्यमां अचेतन गुण नथी, वेतनालक्षणोजीव इति वचनात् सक्रियगुणे री जीव तथा पुद्गल ए वे द्रव्यनुं व्यव- रथी साधर्म्य छे. कर्म थकी रहीत सिद्ध वोमां सक्रिय गुण नधी, वाकीना चार व्यमा सक्रिय गुण नथी; गति सहाय गुण क धर्मास्तिकायमां छे. वाकीना पांच द्रव्य- । नथी, स्थिति सहाय गुण एक अधर्मा- स्तकायमां छे, वीजा पांच द्रव्यमां नथी. था अवगाहना गुण ते एक आकाशास्ति- काय द्रव्यमां छे, वाकीना पांच द्रव्यमां न- मी. वर्तना गुण एक काल द्रव्यमां छे, वीजा पांच द्रव्यमां नथी, मिलण विखरण गुण पु. द्गल द्रव्यमां छे, वाकीना पांच द्रव्यमां नथी,
(१२)
FI'It isfoletſ gut it is a train
Tit, .
कोइराना होगा।
एक मानिहाग, नी ।
काग, बीगो माहाश, " पण
गुण तगा नार पगाय सरसाक, मन
अचेतन, भक्रिय एवण पुणे करी
व्य पण प समानछ.
हवे एछ द्रव्यना गुण पर्याय
जाणवाने मूत्रपाठ गाथा कहे छे.
परिणामि जीव मुत्तो सपएसी पर
किरिआर्य ॥ णिचं कारण कत्ती ,
इयर अपरेसे
पण वी- गामी छे. कारण के धर्मास्तिकाय पोतानामां नश्चयनये परिणमी रयुं छे, मा पांच द्रव्यमा परिणमतुं नथी. वीजुं अ- मास्तिकाय द्रव्य पण निश्चयनये पो. नाना स्वरुपमा परिणमी रहुं छे, पण वी- ना पांच द्रव्यमा परिणमतुं नथी. आकाशा- स्तकाय पण निश्चयनये पोताना स्व- समाज परिणमे छे. काल द्रव्य पण निश्चय नये पोताना स्वरुपमा परिणमी रघु छे, पण वीजा पांच द्रव्यमा निश्चयनये परिणमतुं नथी. जो निश्चयनये जीव पुद्गल द्रव्यमा परिणमेतो कोइकाले कर्म थकी रहीत थइ सिद्धिपद पामे नहीं. व्यवहारनये जीवनाटकीयानी पेठे एकेंद्री; वैरेंद्री; तेरेंद्री; चौरेंद्री; देवता; मनुष्य तिर्यच;
(१४) नारकी. भने समामि पनंद्रीण पुद्गलना वेप मेहेरी नवां नवां ना आत्मभान भूल्यो छतो चार गा सार नगरना चोराशीलाख चउटाम दिकाळथी अनेक दुःख सहन करत फरे छे. ए रीते आ जीव कर्मरुप पु. परिणम्यो छतो भटक्या करे छे. प- श्वयनये जीव सदा शाश्वतो छ, सत्ताए सिद्ध समान छे. व्यव जीव अने पुद्गल ए वे द्रव्य परिणा- तथा पुद्गलास्तिकाय द्रव्यना पण । नये परमाणुआ सर्व पोताने स्म रह्या छे, अने व्यवहार नये ..
(१५) काले ए खंध विखराइ जात नहीं. सदा का- ल खंध भावेज रहेत. परंतु तेमतो रहेता नी, माटे व्यवहारनये पुद्गलना पर- माणुआ मळी खंध थाय छे, अने पाछा संघ विखराइ पण जाय छे. निश्चयनये परमाणु- आओ पोतपोताने स्वभावे सदा शाश्वता छे, पण कोइ काले बधशे घटशे नहीं. वाळ्या वळशे नहीं. गाळ्या गळशे नहीं. एरीते ए छ द्रव्य निश्चयनये पोतपोताने स्वभावे परिणामिक जाणवां, व्यवहार नये धर्म; अधर्म आकाश; अने काल ए चार द्रव्य अपरिणामी छे. अने जीव तथा पुद्गल ए द्रव्य परिणामी छे. केमके व्यवहार नयने मते जीव समये समये अनंतां कमरुप वर्ग- णानां दळीयां ले छे, अने समये समये अनंतां वे
(११)
कर्मरुष नर्गणानांदळीयां खेरने के, गण
अयनये कर्मनुं ग्राण जीन करतो
कोइ काले कर्मयकी रहीत याय
आत्मा राग अने देणे परद्रव्यम
रिणमे छे, रागद्वेष रुप मोहनी अशु
पुद्गल परमाणुआना स्कंधोने ग्रहण
अने मनुष्य देवता नारकी तथा तिय
शरीर रुप खंध प्रते नीपजावे छे. ते
स्थिति प्रमाणे रहे छे, वळी पाछा खेर।
वळी वीजा परमाणुआओने ग्रहण करी
-
पुद्गल परमाणुआ स्कंधरूपकर्मने ग्रहण क
पाछा खेरवे छे, एम व्यवहार नये अना
काळथी जीव
शरीर
रुप
खंधने
नीपजावे
छे
,
केटला-
(१७) द्गलनो संबंध थवाथी जीव सुख माने छ, अने अशुभ पुद्गलनो संबंध थवाथी जीव दुःख माने छे, ते पुण्य पापरुप जाणवू पण ए स्ववस्तु नथी. एम व्यवहार नयथी जीव अने पुद्गल ए वे द्रव्य परिणामी छे. हवे छ द्रव्यमां जीव द्रव्य अने अजीव द्रव्यनुं स्वरूप वतावे छे, नाणंच दंसणंचेव चरितंच तवोतहा, वीरियंउवओ- गो एअंजीअस्सलखणं. ॥१॥ अर्थ-ज्ञान, दर्शन, चारित्र, तप, वीर्य अने उपयोग जेनामां होय, तेने जीव कहे छे. अने वाकीनाने अजीव कहे छे. धर्मास्तिकाय, अधर्मास्तिकाय, आकाशस्तिकाय, पुद्गला- स्तिकाय अने काल, ए पांच द्रव्य अजीव
(१८)
छे. कारण के ज्ञान, दर्शन, चारित्र
वीर्य अने उपयोगरुप जीवनुं लक्षण तेम
नथी. जीव द्रव्य ते जीव छ, 'चेतनाल
जीव इतिवचनात् '
छए द्रव्यमा पुद्गल द्रव्य मूर्तिमंत
अने शेप पांच द्रव्य अमूर्त छे. धर्म,
आकाश, अने काल
अमूर्त छे. जीवद्रव्यना वे भेद छ. ि
अने संसारी, तेमां सिद्धना जीव 3
तिमंत छे. अने
अने संसारी जीवो क
पाधिथी मूर्तिमंत छ. निश्चयनये 5
अरुपी छे माटे अमूर्ति कहेवाय छे.
व्यवहारनये की
ए चार
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(२०)
अने एकेक परमाणुभामा जनता गाय र
छे.
परमाणुभा अनंत के. एरीते पान -
सप्रदेशी छे, भने कालद्रय भादेशी ।
एनो गणित काल तो उत्पाद व्ययरुप पर
टण स्वभावे अढी दीप प्रमाणे जाणवो.
रीते पडू द्रव्यमां सप्रदशी भने अप्रदेशीन
विचार करो.
पद् द्रव्यमांत्रण द्रव्य एक, अने त्रण
द्रव्य अनेक जाणवां. कारण धर्मास्तिकायद्र
व्य असंख्यात प्रदेशी,लोकव्यापी एक जाण
बु. तेमज अधर्मास्तिकाय द्रव्य असंख्यात
काशास्तिकाय द्रव्य पण अनंत प्रदेशी लोका-
लोकव्यापी एक जाणवू, एम ए व्रण द्रव्य
ते एक कहीए, अने जीव द्रव्य छे ते लोक
प्रदेशी
लोकव्यापी
एक
जाणवू
.
तेमज
आ
.
(२१) व्यापी अनंता जाणवां, ते एकेक जीवना अ- संख्याता प्रदेश छे, अने एकेक प्रदेशे अनं- ति कर्मनी वर्गणाना थोकडा लाग्या छे. तथा जीवथकी रहीत घटपट दंड प्रमुख वीजा पुद्गलना छुटा स्कंध पण अनं- ता छ, माटे जीव थकी पुद्गल द्रव्य अनंत- गुणां जाणवां, अने एकेकी कर्म वर्गणामां अनंत पुद्गल परमाणुआ रह्या छे ते परमा- णुआ द्रव्य थकी सदाकाळ शाश्वता छे,माटे एकेक परमाणुआमां अनंता उत्पाद व्ययरुप कालना समय अतीतकाले व्यतीत थइ गया, तथा हजी पण अनंता समय आवते काले व्यतीत थाशे, अने परमाणुआ तो तेना तेज सदाकाळ शाश्वता छे. माटे पुद्गल द्रव्य थकी पण काळद्रव्यना समय अनंता जाणवा, (२२) परीते नी पुदगल ने हाल मण नेक कहीए. एरीने एक मनेनो विचार पर द्रव्यमांकगो. हवे पद् द्रव्यमा क्षेत्र भने क्षेत्रीनो विचार दर्शाये छे. वाकीनां धर्म, अधर्म, काल, पुद्गल, अने छे, माटे क्षेत्री जाणवां. ते केवी रीते रह्यां ग्रहण करीने तेना खंड [ भाग ] एवा करी एके एक खंडना वे खंड न थाय. एवा सूर क्ष्म खंड प्रमाणे आकाश क्षेत्र लइए, मां आकाशना असंख्याता प्रदेश रया छे, अने तेटला- छ द्रव्यमां आकाश द्रव्य , क्षेत्र के अने आत्मा , ए पांच द्रव्य आकाश क्षेत्रमा रहे छे ते बतावे छे . आंखनी पांपणनो एक वाळ
(२३)
टलामां धर्मास्तिकायना असंख्यात प्रदेश छे,
था अधर्मास्तिकायना पण असंख्यात प्रदेश
छ. अने निगादीया गोला पण असंख्याता
ह्या छे. ते सर्व पड्या मुकीने तेमांहेलो एक
गोळो लहीए ते एक गोळामां असंख्याती
निगोद रही छे. ते असंख्याती निगोद पडती
मुकीने ते मांहेथी एक लहीए, ते एक निगो-
दमां पण अनंता जीव रह्या छे, ते जीवनी
गणत्री बतावे छे, अनादि एक अतीतकाल
छेडा रहीत, अनंतो काल गयो, तथा
अनागत काल ते पण छेडारहीत छे. ते सर्वेना
जेटला समय थाय, तेनी साथे वर्तमान का-
लनो एक समय पण गणवो. एटले अतीत
अनागत अने वर्तमानकालना जेटला समय
थाय, ते सर्वने अनंतगुणा करीए एटलाजीव
(२४) एक निगोदमा रह्या छे. ते सर्व जीव पड्या मुकीने ते मांहेथी मात्र एक जीव लइए ते एक जीवना असंख्याता प्रदेश छे. ते मध्ये एकेका प्रदेशे अनंती कर्मनी वर्गणाओ लागी छे. ते सर्व वर्गणाओ पडती मुकीने ते माहेथी एक वर्गणा लहीए, ते एक वर्गणामां अनंता पुद् गल परमाणुआ रह्या छे. ते वतावे छे. प्रथम परमाणुआना वे भेद छे. एक छुटाप- रमाणु अने वीजा खंधना. वळी स्कंधनावे भेद छे. एक जीव सहीत खंध, अने वीजा जीव रहीत खंध, ते घटपट दंड प्रमुख अजीव खंध जाणवा. त्यां प्रथम जीव सहित खंधनो विचार लखीए छीए. वे परमाणुआ भेला थाय ते वारे व्य- णुक खंध कहेवाय छे, त्रण परमाणुआ भे- (२५) लाथाय, तेवारे त्र्यणुक खंध कहेवाय छे, एम असंख्याता परमाणुआ भेळा थाय, त्यारे अ. संख्याताणुक खंध कहेवाय छे, एटला पर- पाणुआना खंध थाय त्यां सुधीना खंध ते सर्वे जीवने ग्रहण करवा योग्य थता नथी. एटला परमाणुआना खंधने कोइ जीव ग्र- हण करी शकतो नथी. परंतु अभव्य राशिना जीव चुम्मोत्तरमे वोले छे, ते थकी अनंत गु- गाधिक परमाणुआ ज्यारे भेला थाय, ते वारे औदारिक शरीरने लेवा योग्य वर्गणा थाय छे. ते औदारिकनी वर्गणाथी अ- नंत गुणाधिक दलीआंजेवारे भेलांथाय तेवारे वैक्रिय शरीरने लेवा योग्य वर्गणा थाय छे. वैक्रियनी वर्गणाथी अनंत गुणाधिक दळीयां जेवारे भेळां थाय, तेवारे आहारक TAITRI STET } 1.i गाit frintimill, ifs fif गाना til सोनामनी बाणान र मनन गणा धिक दळीनां भगा नाग, सारे मानने लेवा योग्य नगणा पाय , प सातमी मनो वगणायकी पण बाटमी हामण वर्गणामां मन- तगुणाधिक परमाणुभा स्कंध जाणवा . पती जीवने रागद्वेपनी अशुद्धताथी अनंत कमनी
(२७)
वर्गणाओ लागी छे, तेथी जीवना ज्ञानादिक
गुण दवाई गया छे. माटे जीव थकी पुद्गल
दव्य अनंत गुणा जाणवा. ते पुद्गलरुपी छे.
अचेतन छे. सक्रिय छे.
पूरणगलन छे.
जीवे अनंती पुद्गल परमाणुआ रुपी अँठ
वारंवार ग्रहण करी, तोपण तेथी तृप्ति पामतो
नथी. पारकी वस्तु पोतानी मानी वेठो छे.
अहो जीव द्रव्य अनंत शक्तिवाळू छे तेने पु-
द्गलद्रव्ये पोताना कवजामां लीधुं छे, तेने
संगे राच्यो माच्यो छे, माटे परवस्तु उपरथी
मोह उतारवो, अने पुद्गल द्रव्य अन्य वस्तु
जाणी तेनाथी दूर रहेg ए सार छे.
पूर्वे कहेली आठ वर्गणा जीवने अनादि
काळथी लागी छे. औदारिक क्रिया आहा-
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(२९) य, अधर्मास्तिकाय, आकाश द्रव्य, अने ल ए चार अक्रिय छे. जीव अने पुद्गल, वे द्रव्य सक्रिय, व्यवहार नये छे. धर्मा- तकाय द्रव्य ते जीव अने पुद्गल ए वे व्यने चालवामां सहाय आपका रुप क्रिया रे छे तथा निश्चयनये अधर्मास्तिकाय पण तीव द्रव्य अने पुद्गल द्रव्यने स्थिर थवामां हाय गुणरूप क्रिया करे छे. तथा नेश्चयनये आकाशास्तिकाय द्रव्य पण नीव तथा अजीवने अवगाहना आपे छे. तथा निश्चयनये काल द्रव्य पण जीव अजीवरुप वस्तुमा पोतानी वर्तनारुप क्रिया करतो जाय छे. तथा निश्चयनये जीव द्रव्य पण पोताना स्वरुपमा रमवारुप क्रिया करतो जाय छे, कारणके जो निश्चय- हिमा गामा नग गुभाशुभ का It'll 67.11 Tour Eiriir ve it fit नगे तो जी पोताना हामी रमना रुपन किंगा रे जे. निरा नये पुद गल परमाणुभा पण अनादि हाळना पा- तानी मळया विखरताका क्रिया करता जाय पोतानी क्रिया करे ले माटे सक्रिय छे. व्यवहारनये धर्म, अधर्म, आकाश तथा जीव अने पुद्गल एवे-द्रव्य सक्रिय जाणवां. कारणके व्यवहार नयने मते जीव रागद्वेपरुप अशुद्धताए करी समय समय अ- कालेजीमा पामा मानिस छे . ए रीत ला द्रव्य निभय नये पोत- अनेकाळ , ए चार द्रव्य अक्रिय जाणवां .
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(३४) जीव चारगतिमां जन्म मरणे देवता, मनुः ष्य, तियंच, अने नारकीरुप नवा नवा भव धारण करे छे, माटे अनित्य कहीए. तथा व्यवहारनये पुद्गल द्रव्यना खंध पण सर्व अनित्य जाणवा. द्रव्यास्तिकायना मते जीव छे, अने अशुद्ध अनित्य पर्याये जीव अशा- श्वतो जाणवो. कारणके अशुद्ध अनित्य प ोये जीव चार गतिरुप संसारमा उत्पाद व्ययरुप पलटण स्वभावे वर्ते छे. ते आवी रीतेमनुष्य भवना पर्यानो व्यय थयो अने देवताना भवना पर्यायनो उत्पाद थयो.वळी तिथंच भवना पर्यायनो व्यय थयो, अने म- अनित्य जाणवा , कारण के पुदगल द्रव्यना खंध वने छे , अने पाछा विखरे छे , माटे असंख्यात प्रदेशी नित्य सदाकाल शाश्वतो नुष्य भवना पर्यायनो उत्पाद थयो.एम जीव अशुद्ध अनित्य पर्याये उत्पाद व्ययरुप प- लटण स्वभावे चार गतिरूप संसारमा सदा- काल वर्ते छे, अने जीव एनोए ध्रुवपणे शा- श्वतो छे, तथा जीवना जन्म मरण थाय छे ते सर्व उत्पाद व्यये थाय छे, माटे द्रव्या- स्तिकनये जीवने नित्य समजवो, अने प- यायास्तिक नये करी जीवने अनित्य सम- जरो. ए रीते पड् द्रव्यमा निश्चय व्यवहारे नित्यानित्यपणुं जाणवू. पड् द्रव्यमा जीव द्रव्यने पांच द्रव्य का- रण रुप जाणवां, अने जीव द्रव्य अकारण जाणवू. जेमके जीवकर्ता अने तेने धर्मास्ति- काय कारण मन्यु, तेवारे जीवने चालवा हालवा रुप कार्य थयु. तेमज जीवकर्ता अने (३६) वारे जीवने स्थिर रहेवा रुप कार्य नीपज्यु. तेमज जीवका अने तेने आकाशास्तिकाय कार्य वन्यु. तेमज जीवकर्ता अने तेने पुद्: गलास्तिकाय रुप कारण मब्युं तेवारे जी- वने समय समय अनंता कर्म स्कंधो लेवा खेरववा रुप कार्य नीपज्यु. तेमज जीव द्र व्यकर्ता अने तेने काल द्रव्य कारण मब्युः तेवारे नवा पुराणा वर्तनारुप कार्य नीपन्युं. ए रीते पड् द्रव्यमां जीवने पांचे द्रव्य कार- घणी मतियोमा संक्षेपे एटलं छे के छ धर्मास्तिकाय, अधर्मास्तिकाय, आकाशास्ति- तेने अधर्मास्तिकाय रुप कारण मळ्यु , ते . कारण मळ्यु तेवारे जीवने अवगाहना रुप ण पणे जाणवा , अने जीव पोते अकारण छे . द्रव्यमा एक जीव द्रव्य कारण छ , वाकीनां
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गुणगाने गुणा करतो कहोगे रेपणा तानपिना नोहली ती it [गमन काशित गयो, भने मायाखानीनी नाही खपानी त्यार पानाj गुणठाणं प्राप्त करी गुणठाणे सर्व विरति गुण गाम्यो. अगीआ रमे वारमे गुणठाणे पहोंची रागद्वेष रुप मो. कर्मनो क्षय करी तेरमे गुणठाणे केवल ज्ञान पाम्यो. ए रीते पूर्वनां गुणठाणांतु करवं तेने शुद्ध व्यवहार नय जाणवो. भानगो मारे जीवने एकसमान गुण देशविरति गुण गात . तया प्रत्याख्या- नीनी चोकडी खपावी तेवार बडे सातमे हनीय कर्म खपाची वारमे गुणठाणे घाती अने उपरनां गुणठाणांनु ग्रहण (३९) जीव कर्मरुप अशुद्धताने टाळे, अने गुण रुप शुद्धताने नीपजावे, ते जीवमां शुद्ध व्यवहार नय जाणवो. हवे वीजा अशुद्ध व्यवहारनये जीव. मां अज्ञान रागद्वेष, अनादिकालना शत्रु थइ लाग्या छे, तेथी जीवमां अशुद्धपणुं जाणवू. ए अशुद्धताए जीवने समय समय अनंतां कर्मरुप दलीय सत्ताए लागे छे. ए अना- दिकालनी अशुद्ध जाणवी. ए अशुद्ध व्य- वहारनये जीवकर्ता छे तेनुं स्वरुप जाणवू. हवे त्रीजा शुभ व्यवहार नये जीप दान, शी- ल, तप, भाव, पूजा, मंभावना, सेवा, भक्ति साधर्म्यवात्सल्य, विनय, वैयाऋत्य, उप- कार, करुणा, दया, यत्ना, मीठं मनोहर व- चन-वोलवं, अने सर्व जीवनुं रुई चिंतवद्धं पनि काली जीभ गीन कोग, मान, माया, लोभ, musi पाग, हास्य, रवि, जगत, ग, शोक, १ भदत, मैथुन, भने परिग्रह, आदि अने- ए अशुभ व्यवहारनये जीवका जाणवो. हवे पांचमा उपचरित व्यवहारनये घर, कुटुंब, परिवार, हाट, वखार,गाम, गरास,देश, चाकर, दास, दासी, वाणोतर, राज्य, वाडी, वन, आराम, कुवा अने सरोवर, ए आदि जुदी छे, तेने जीव अज्ञानपणे पोतानी करी कता जोग , नागा MAIN गंछा , निद्रा , नादी , ममता , हिंसा , मृगा , क प्रकारनी जीवने अशुभ करणी जाणी . अनेक प्रकारनी वस्तु ते पोतानाथी प्रत्यक्षपणे (४१) जाणे छे. तेने मारुं मारु करतो फरे छे, तेनी वृद्धि देखी खुशी थाय छे, तेनो नाश देखी रटे छे, कुटे छे, शोक करे छे, अने तेने माटे पोताना प्राणनो पण नाश करे छे, तेने पोतानुं मानी तेना कामानी जीव, पापनो अधिकारी पोते थाय छे, ए रीते उपचरित व्यवहारनये जीवने कर्ता जाणवो. हवे छटा अनुपचरित व्यवहारनये जीव शरीर आदि परवस्तु, जे पोताना स्वरूपथी प्रत्यक्षपणे जुदी छे, पण परिणामिक भावे लोली भूतपणे एकठी मली रही छे, तेने जीव पोतानी करी जाणे छे. एवां शरीरने जीव अनंतिवार पाम्यो, अने अनंतिवार ते शरीरनो त्याग कर्यो, तोपण अज्ञानपणे जीव तेने पोतानुं करी जाणे छे, तेने वास्ते अ- .
(१२) सनगत एटले प्रकारे बगाहारनपने मते जीतने कतारण देखाइयु. सनगयइयर तां देशव्यापी द्रव्य, छ द्रव्यमा केटला पामीए ते कहे छे. पद्रव्यमां एक आकाशद्रव्य, लोकालोकव्यापी छे, अने पांच द्रव्यदेश व्यापी जाणवां, धर्मास्तिकाय असंख्यात प्रदेशी लोक व्यापी जाणवू. अधर्मास्ति- सर्व नाकानीपार , गगन , माण , पण । वस्तु पोगानी गती नगी , पीनी . न भार भागपगते नगनहिल गर सर्वव्यापी द्रव्य केटलां अने इयर कहेतां हारनग जीता जाणतो . एरीते ।
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(४३) काय द्रव्य असंख्यात प्रदेशी लोकव्यापी जाणवू. तथा कालद्रव्य गणितकाल ते अढी- द्वीपव्यापी जाणवं. तथा जीवद्रव्य पण लो- कव्यापी जाणवू. तथा पुद्गलद्रव्य पण लोक व्यापी जाणवू. अकेक जीवने, सत्ताए अ- नंता कर्मरुप पुद्गल परमाणुआ स्कंध ला- ग्या छे. तथा तेः थकी वीजा छुटा लोक- व्यापी पुद्गल परमाणुआस्कंध पण अ- नंता छे. ते सर्वे लोकव्यापी छे. ए रीते ए पांच द्रव्य देशव्यापी जाणवां. अने एक आ- काशास्तिकाय द्रव्य, अनंत प्रदेशी, सर्वव्या- Ans.
पण करतां नथी. जेम कोइ दुकान उपर पां-
च वाणोतर रहेता होय ते सर्व पोतपोतार्नु
व्य भेळां रह्यां छे. छ द्रव्य पोतपोतानी म.
र्यादामा वर्ते छे, पण निश्चयनये कोइपण वी
जामां मांहेमांहे भळतां नथी, माटे अप्रवेशी
(४४)
जता नयी, अने एक वीजान कोइकोइनु कान
कार्य
फरमाव्या मुजव
सहुनी मर्यादामां चाले, तेम लोकमां छ ।
कर्या करे, अने सड
जाणवां. एरीते पड् द्रव्यनुं स्वरूप बार भी
भव्य जीवोए जाणवू.
हवे एकेका द्रव्यमां आठ पक्ष कहे
आठ पक्षनां नाम-एक नित्य, वीज
अनित्य, श्रीजो ऐक, चोथो अनेक, पांचा
संत्, छठो असत्, सातमो वक्तव्य, आठ
अवक्तव्य.
(४५) धर्मास्तिकायना चारगुण नित्य छे. तथा यायमां धर्मास्तिकायनो एक खंध नित्य छे. कीना देश, प्रदेश, अने अगुरु लघु, एत्रण र्याय अनित्य छ, अधर्मास्तिकायना चार गुण, तथा एक लोकममाण खंध नित्य छे. अने वाकीना प्रण पर्याय अनित्य छे. आ- काशास्तिकायना चार गुण, तथा लोकालोक प्रमाण खंध नित्य छे, अने देश, प्रदेश, तथा अगुरु लघु, ए त्रण पर्याय अनित्य छे. का- लद्रव्यना चारगुण नित्य छे अने चार प- र्याय अनित्य छे. पुद्गल द्रव्यना चार गुण नित्य छ, अने चार पर्याय अनित्य छे. जीव द्रव्यना चार गुण, अने त्रण पर्याय नित्य छे, अने एक अगुरु लघु पर्याय, अनित्य छे. ए रीते नित्यानित्य पक्ष कह्यो.
हवे पड् द्रव्यमां एक अनेक पक्ष व
ताचे छे.
एक धर्मास्तिकाय, वीजो अधर्मास्ति
काय, ए वे द्रव्यना खंध लोकाकाश प्रमा
एक छे अने गुण अनंता छे.आकाश द्रव्य
लोकाकाश प्रमाण खंध एक छे. अने गु'
अनंता छे. पर्याय अनंता छे, प्रदेश अनंत
छे, माटे अनेक छे. काल द्रव्यनो वर्तनार
गुण एक छे, अने वीजा गुण अनंता
पर्याय अनंता छ, समय अनंता छ, केम
अतीतकाले अनंता समय गया, अने अन
गत काले अनंता समय आवशे, तथा व
मानकाले समय एक छे माटे अनेक पर
छे. पुद्गल द्रव्यना परमाणुआ अनंता छे
एक एक परमाणुमां अनंता गुणपर्याय
(४७) अनेकपणु छे, अने सर्व परमाणुमा पुद्गल- {णुं ते एकज छे. जीव द्रव्य अनंता छ, ए- केका जीवमा प्रदेश असंख्याता छ, तथा गुण अनंता छे. पर्याय अनंता छे ते अनेकपणुं छे, पण जीवितव्य सर्व जीवोमां एक स- रखं छे, माटे एकपणुं छे. इहां शिष्य पुछे छे के- सर्व जीव एक सरखा छे तो मोक्षना जीव सिद्ध परमानंद नयी देखाय छे, अने संसारी जीव कर्मवश {डया दुःखी देखाय छे, तेनुं केम ? तेने उ- तर आपे, छे के-निश्चयनये तो सर्व जीव सद्ध समान छे, माटेज सर्व जीव कर्म ख- गवी सिद्ध थाय छे, तेथी सर्व जीवनी सत्ता एक छे, वली शिष्य पुछे छे के जो सर्व जीव सिद्ध समान कहो छो तो अभव्य जीव पण सिद समान ले एम ठगं, गने नेतो माझे जाता नथी, नेनुं केग ? ने उत्तर आपके के अभव्य ने कर्म नीकणांके, अने अभ- व्यमां, परावर्त धर्म नयी, तेथी सिद्ध, यता नथी. अभव्यने कर्मनी संबंध अनादि अ. नंतमे भांगे छे, तेथी कोइ काले ते मोक्ष जशे नहीं. भव्य जीवमा परावर्त धर्म के माटे कारण सामग्री मळ्याची पलटण पामे छे अने गुणश्रेणि चढीने सिद्ध थाय छ, आत्माना आट रुचक्र प्रदेश, निश्चय नयी भव्य तथा अभव्य सर्व जीवोना सिद्ध स- मान छे, माटे सर्व जीवनी सत्ता एक सर- खी छे. ए आठ रुचक प्रदेशने कर्म वील. कुल लागतां नथी ते आचारांगसूत्रनी श्री शिलांगाचार्य कृत टीकाना लोकविजय अ.
(४९) नमा प्रथमोद्देशके कयुं छे. हवे सत् तथा असत् पक्ष कहे छे. ए व्य स्वद्रव्य, स्वक्षेत्र, स्वकाल, अने स्व- पणे सत् एटले छता छे. अने परद्रव्य त्र, परकाल, अने परभावपणे असत् ए- अछता छे. तेनी रीत वताववाने माटे ए द्रव्यनो द्रव्य, क्षेत्र, काल, अवे भाव, ये छीए. दव्वंगुणसमुदा खित्तंओगाहवणाकालो गुणपज्जाय पवत्ति भावोनिअवश्थुधम्मोसो॥१॥ धर्मास्तिकायनो मूल गुण चलण सहाय गो ते स्वद्रव्य, अधर्मास्तिकायनो मूल गुण
छे. जीव द्रव्यनो स्वक्षेत्र एक जीवना असं.
स्थिति राहायगणो ते स्वदन्ग जाणतो. आ.
काशास्तिकायनो मूल गुण अवगाहपणो ने
स्वद्रव्य, कालद्रव्यना मूल गुण तेनालक्षण
पणो ते स्वद्रव्य जाणवो.नया पुद्गल द्रव्य
नो मृलगुण पूरण गलनपणोते स्वद्रव्य जा
णवो. जीव द्रव्यनो मूल गुण ज्ञानादिकचे
तना लक्षणपणो ते स्वद्रव्य, पछ द्रव्यना
हवे पड् द्रव्यनो स्वक्षेत्र कहे छे-धर्मा-
स्वक्षेत्र एक परमाणु छे. परमाणुआ अनंता
स्वद्रव्यपणो करो.
स्तिकाय अने अधर्मास्तिकायनो स्वक्षेत्र असं-
ख्यात प्रदेशमय जाणवो. आकाश द्रव्यनी
स्वक्षेत्र अनंत प्रदेशमय जाणवो. काल
व्यनो स्वक्षेत्र समयरुप छे.
पुद्गल द्रव्यनो
(५१) ख्याता प्रदेश छे. हवे स्वकाल ते पद्रव्यमा अगुरु लघु- नो छे. छए द्रव्यना पोत पोताना गुण पर्याय ते सर्व द्रव्यनो स्वभाव जाणवो. सारांशके धर्मास्तिकायमा पोतानाज द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव छ, पण वीजा पांच द्रव्यना नथी. तथा अधर्मास्तिकायमां पण पोताना ज स्वद्रव्य, क्षेत्रकाल, भाव छे पण वीजा पांच द्रव्यना नथी.आकाशास्तिकायमांआकाशनाज स्वद्र- व्यादिक चार छे, पण वीजा पांच द्रव्यना नथी. तथा काल द्रव्यमां कालना स्वद्रव्या- दिक चार छे, पण वीजा पांच द्रव्यना नथी. पुद्गल द्रव्यना स्वद्रव्यादि चार पुद्गल द्र- व्यमा छे, पण वीजा पांच द्रव्यना नथी.तथा जीव द्रव्यना स्वद्रव्यादिक चार ते जीव द्र- स्बद्रव्य, कालन्यनो मूल गुण वर्नना लक्षण स्थिति राहायपणो से समद्रग जाणतो. मा. काशास्तिकायनो मूल गुण अवगाहपणी ने पणो ते स्वदव्य जाणवो. त्या पुद्गल द्रव्य- नो मूलगुण पूरण गलनपणोते स्वद्रव्य जा. वो. जीव द्रव्यनो मूल गुण ज्ञानादिकचे. तना लक्षणपणो ते स्वद्रव्य, पछद्रव्यनो हचे पड् द्रव्यनो स्वक्षेत्र कहे छे-धर्मा- व्यनो स्वक्षेत्र समयरुप छ, पुद्गल द्रव्यनो छे. जीव द्रव्यनो स्वक्षेत्र एक जीवना असं. स्वद्रव्यपणो कयो. स्तिकाय अने अधर्मास्तिकायनो स्वक्षेत्र असं ख्यात प्रदेशमय जाणवो. आकाश द्रव्यनो स्वक्षेत्र अनंत प्रदेशमय जाणवो. काल स्वक्षेत्र एक परमाणु छे. परमाणुआ अनंता
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गमा के, पण नीना पांग गना न
"गुणपर्गायनान्यम् ." अल्पशी अभेदार
गुणपोय होय तेने द्रव्य को ले तथा स्व
धर्मनो आधारवंतपणो तेने क्षेत्र को छे, अ
उत्पाद व्ययनी वर्तना तेने काल कहे ।
तथा विशेष गुण परिणति, स्वभाव पनि
णति, पर्याय प्रमुख ते स्वभाव कहीए.
अत्र एक-भेद स्वभाव, बीजो-
स्वभाव, त्रीजो-भव्य स्वभाव चोथो-अ
व्य स्वभाव अने पांचमो-परम स्वभाव
पांच स्वभाव जाणवा.
तेमां द्रव्यना
मने पोतपोताना स्व स्व कार्य करवेकरी
स्वभाव छे, अने अवस्थानपणे अभेद र
अणपलटण स्वभावे अभव्य
भाव छ. तथा पलटण स्वभावे भव्य स्वभ
सर्व
भाव छे.
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गम रण. पगमा भाठ पक्ष कमा. हने नित्य तथा भनिन्य पक्षयी चतुर्भ- गी उपनी ते बताने ले. जनी आदि नी अने अंत नथी ते अनादि अनंत पहेलो भां- गो जाणवो. तथा जेनी आदि नथी पण अंत छे, ते अनादि सांत बीजो भांगो जा. णवो. तथा जेनी आदि पण छे अने अंत पण छे, ते सादि सांत त्रीजो भांगोजाणवो. वळी जेनी आदि छे, पण अंत नथी, ते सादि जीव द्रव्यमां ज्ञानादिक गुण ते अनानि बमां गुंथ्यो नेना गगंग्यातमा भागे हाल प्रा. अनंत नामे चोयो भांगो जाणवो. हवे ए चार भांगा द्रव्योमां केवी री उतरे छे, ते वतावे छे. अनंत छे, नित्य छे. भव्य जीवने कर्म सा
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मोधमोदि द्रव्य पोताना चलण राहकारादि
? नीमने नाणे मिल
हेतुं ते गांग.
२ जे द्राना पगनं मान ले ग
ग्यंजनपांग.
३ एक गणशी अनेहता याय. जेमध.
गुणथी अनेक जीव तथा पुद्गलने सहाय
करे तेने गुणपर्याय नय कहे छे.
४ एक गुणना घणा भेद ते गुण
व्यं-
जनपर्याय कहीए.
५ स्वभाव पर्याय ते
अगुरु लघु
पर्या-
यथी जाणवो. ए पांच पर्यायो सर्व द्रव्य
मां छे.
६ विभाव पर्याय ते जीव पुद्गल ए
(६७) वे द्रव्यमां छे. जीव जे चार गतिना नवा नवा भव करे ते जीवमां विभाव पर्याय तथा पुद्गलमां खंधपणु ते विभावपर्याय जाणवो. हवे पर्यायना वीजा छ भेद कहे छे-- एक अनादि नित्य पर्याय, ते पुद्गल द्रव्य- नों मेरु ममुख. चीजो सादि नित्य पर्याय ते जीव द्रव्यनी सिद्धावस्था सिद्धावगाहनादिक. त्रीजो अनित्य पर्याय ते समय समय- मां द्रव्य उपजे विणसे छे ते. "सादिसां- त पर्याया भव शरीराध्यवसायादयः" इति नयचक्रे. चोथो अशुद्ध अनित्य पर्याय ते जन्म मरण थाय छे, ते वडे कहेवो. पांचमो उपाधि पर्याय ते कर्म संबंध. छठो शुद्ध पर्याय जे मूल पर्याय, सर्व द्रव्यना एक सर- खाछे ते एवं पर्यायार्थिकतुं स्वरुप कां. नय माधर्मादि द्रव्य पोताना चलण सहकारादि (६६) १ जीवने भव्यपणुं तथा सिद्धपणुं हे ते द्रव्यपर्याय. द्रव्यना प्रदेशनुं मान ते द्रव्य व्यंजनपर्याय. ३ एक गुणथी अनेकता थाय. जेमध- २ पुद्गलने सहाय गुणथी अनेक जीव तथा करे तेने गुणपर्याय नय कहे छे. ४ एक गुणना घणा भेद ते गुण व्यं जनपर्याय कहीए. ५ स्वभाव पर्याय ते अगुरु लघु पर्या- यथी जाणवो. ए पांच पर्यायो सर्व द्रव्य मां छे. ६ विभाव पर्याय ते जीव पुद्गल ए
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(६७) वे द्रव्यमा छे. जीव जे चार गतिना नवा नवा भव करे ते जीवमा विभाव पर्याय तथा पुद्गलमा खंधपणु ते विभावपर्याय जाणवो. इवे पर्यायना वीजा छ भेद कहे छे- एक अनादि नित्य पर्याय, ते पुद्गल द्रव्य- नो मेरु प्रमुख. वीजो सादि नित्य पर्याय ते जीव द्रव्यनी सिद्धावस्था सिद्धावगाहनादिक. बीजो अनित्य पर्याय ते समय समय- मां द्रव्य उपजे विणसे छे ते. त पर्याया भव शरीराध्यवसायादयः" इति नयचक्रे. चोथो अशुद्ध अनित्य पर्याय ते जन्म मरण थाय छे, ते वडे कहेवो. पांचमो उपाधि पर्याय ते कर्म संबंध. छठो शुद्ध पर्याय जे मूल पर्याय, सर्व द्रव्यना एक सर- खाछे ते एवं पर्यायार्थिक स्वरुप कां. नय "सादिसां- १ जीवने भव्यपणुं तथा सिद्धपणुं क- हे ते द्रव्यपर्याय. २ जे द्रव्यना प्रदेशनु मान ते द्रव्य व्यंजनपर्याय. ३ एक गुणथी अनेकता थाय. जेमध- मधिर्मादि द्रव्य पोताना चलण सहकारादि गुणथी अनेक जीव तथा पुद्गलने सहाय करे तेने गुणपर्याय नय कहे छे. ४ एक गुणना घणा भेद ते गुण व्यं- जनपर्याय कहीए. ५ स्वभाव पर्याय ते अगुरु लघु पर्या- यथी जाणवो. ए पांच पर्यायो सर्व द्रव्य मां छे. ६ विभाव पर्याय ते जीव पुद्गल ए
(६७)
वे द्रव्यमां छे. जीव जे चार गतिना :
नवा भव करे ते जीवमा विभाव पर्याय त
पुद्गलमां खंधपणु ते विभावपर्याय जाणवं
हवे पर्यायना वीजा छ भेद कहे।
एक अनादि नित्य पर्याय, ते पुद्गल द्र
नो मेरु प्रमुख. वीजो सादि नित्य पर्याय
जीव द्रव्यनी सिद्धावस्था सिद्धावगाहनादि
त्रीजो अनित्य पर्याय ते समय सम
मां द्रव्य उपजे विणसे छे ते. “सादिर
त पर्याया भव शरीराध्यवसायादयः" इ
नयचक्रे. चोथो अशुद्ध अनित्य पर्याय
जन्म मरण थाय छे, ते वडे कहेवो. पांच
उपाधि पर्याय ते कर्म संबंध. छठो छ
पर्याय जे मूल पर्याय, सर्व द्रव्यना एक स
खा.छे ते एवं पर्यायार्थिकनुं स्वरुप कई..
? जीवनका पांग २ ने माना नि माग जननांग ३ पगणीला माग. मन- মামী: নানা বলা যায় गुणयी अनेक जीव नया पुदगलने सहाय रे तेने गुणपर्याय नग कर ले. ४ एक गुणना घणा भेद ते गुण व्यं- नपर्याय कहीए. पर्या- ५ स्वभाव पर्याय ते अगुरु लघु यी जाणवो. ए पांच पर्यायो सर्व द्रव्य. छे. ६ विभाव पर्याय ते जीव पुद्गल ए (६७) वे द्रव्यमां छे. जीव जे चार गतिना नवा नवा भव करे ते जीवमा विभाव पर्याय तथा पुद्गलमां खंधपणु ते विभावपर्याय जाणवो. इवे पर्यायना वीजा छ भेद कहे छे- एक अनादि नित्य पर्याय, ते पुद्गल द्रव्य- नो मेरु प्रमुख. वीजो सादि नित्य पर्याय ते जीव द्रव्यनी सिद्धावस्था सिद्धावगाहनादिक, बीजो अनित्य पर्याय ते समय समय- मां द्रव्य उपजे विणसे छे ते. “सादिसां- त पर्याया भव शरीराध्यवसायादयः" इति नयचक्रे. चोथो अशुद्ध अनित्य पर्याय ते जन्म मरण थाय छे, ते वडे कहेवो. पांचमो उपाधि पर्याय ते कर्म संबंध. छटो शुद्ध पर्याय जे मूल पर्याय, सर्व द्रव्यना एक सर- खाछे ते एवं पर्यायार्थिक स्वरुप कां. नय
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(७१)
तुं निर्वाण थयां घणो काळ गयो छे, पण
माज दीवालीना दीवसे वीरनिर्वाण छे,
इम जे कहेवं ते वर्तमानकालमां अतीत
कालनो आरोप को जाणवो. तथा आज
मी पद्मनाभ प्रभुनो निर्वाण छे, एम जे कहेवू
वर्तमान काळमां अनागतकालनो आरोप,
इची रीते अतीतना वे भेद छे. तथा अना-
तिना बे भेद छे तथा वर्तमानना पण वे
भेद छे ते सर्व मळी कालारोपना छ भेद
नाणचा. चोथो वळी कारणविपे कार्यनो
आरोप करवो ते कारणाद्यारोप जाणवो.
ते कारण चार छे. १ उपादान कारण,
२ निमित्त कारण.३ असाधारण कारण.
४ अपेक्षा कारण. तेमां बाह्यद्रव्य क्रिया ते
साध्य सापेक्षवालाने धर्मर्नु निमित्त कारण
-!
(७३) (२) संग्रहनय. सामान्यवस्तुसत्ता संग्राहक संग्रहःस- द्विविधः सामान्य संग्रहः विशेषसंग्रहश्च सा- मान्य संग्रहो द्विविधः मूलतऊत्तरतश्च मूलतोऽ स्तित्वादिभेदतः पविध उत्तरतो जाति समु- दायभेदरुपः जातितः गवि गोत्वं, घटे घटत्वं, वनस्पतौ वनस्पतित्वं, समुदायतो सहकारा- त्मके वने सहकारवनं, मनुष्यसमूहे मनुष्य द्वंद, इत्यादि समुदायरुपः अथवा द्रव्यमिति सामान्य संग्रहः जीव इति विशेष संग्रहः अर्थः सामान्ये करी मूल सर्व द्रव्य व्यापक नित्यत्वादिक सत्तापणे रह्या जे धर्म तेनो जे संग्रह करे तेने संग्रहनय कहे छे. तेना वे भेद छे. १ एक सामान्य सं- ग्रह २ वीजो विशेष संग्रह.
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(७७) दृष्टांत-जेम कोइक मन्युष्ये प्रभाते दा- तण करवाने अर्थे पोताना घरना वारणे वे- शीने चाकरने कहूं के दातण लेइ आवो ! तेवारे चाकर पुरुष, पाणीनो लोटो, रुमाल, दातण एम सर्व चीज लइ आव्यो. शेठे तो एक दातण नाम लइने मंगाव्यु हतुं पण स- वनो संग्रह करी चाकर लइ आव्यो ते रीते संग्रहनय जाणवो. (३) व्यवहारनय. संग्रहग्रहीतवस्तु भेदांतरेण विभजनं व्यवहरणं, प्रवर्तनं चा व्यवहारः. सद्विविधः शुद्धोऽशुद्धश्च ।। संग्रहनये ग्रहीत जे वस्तु तेने भेदांतरे वेहेचबुं, तेने व्यवहारनय कहे छे. जेम द्रव्य - (७७) दृष्टांत-जेम कोइक मन्युष्ये प्रभाते दा- तण करवाने अर्थे पोताना घरना वारणे वे- शीने चाकरने कद्दु के दातण लेइ आवो ! तेवारे चाकर पुरुष, पाणीनो लोटो, रुमाल, दातण एम सर्व चीज लइ आव्यो. शेठे तो एक दातण नाम लइने मंगाच्यु हत्तुं पण स- र्वनो संग्रह करी चाकर लइ आग्यो ते रीते संग्रहनय जाणवो. (३) व्यवहारनय. संग्रहग्रहीतवस्तु भेदांतरेण विभजनं व्यवहरणं, प्रवर्तनं वा व्यवहारः सद्विविधः शुद्धोऽशुद्धश्च ।। संग्रहनये ग्रहीत जे वस्तु तेने भेदांतरे वेहेचवू, तेने व्यवहारनय कहे छे. जेम द्रव्य
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(७९) सर्व द्रव्यनी स्वरुप शुद्ध प्रवृत्ति-जेप धर्मास्तिकायनी चलण सहायता तथा अध- मास्तिकायनी स्थिति सहायता तथा जी- वनी ज्ञायकता इत्यादिकने वस्तुगत शुद्ध व्य- वहार कहीए. द्रव्यनो उत्सर्ग नीपजवा माटे जे रत्न- यिनी शुद्धता गुणस्थाने श्रेणि आरोहणरुप ते साधन शुद्ध व्यवहार कहीए. अशुद्ध व्यवहारना वे भेद छे. १ सद्भुत व्यवहार २ असद्भूत व्यवहार. तेमांजे क्षेत्रे अवस्थाने अभेदे रहा जे ज्ञानादिगुण तेने परस्पर भेदे कहेवा ते सद्भुत व्यवहार. तथा हुँ क्रोधी छु, हुं मानी छु, अथवा दे- वता छु, मनुष्य छ, इत्यादि देवतापणे ते हे- तुपणे परिणमतां ग्रहां जे देवगति विपाकी
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(८१) १ वहेचणरुप व्यवहार, २ प्रवृत्तिरूप व्यवहार. प्रवृति व्यवहारना त्रण भेद छे. वस्तु- त्ति, साधनमवृत्ति, लौकिकमवृत्ति. तेमां साधन प्रवृत्तिना त्रण भेद छे. १ जे अरिहंतनी आज्ञाये शुद्ध साधन मार्गे इह लोक संसार पुद्गल भोग आसं- सादिदोप रहीत जे रत्नत्रयिनी परिणति, रभव त्याग सहित ते लोकोत्तर साधन म- वृत्ति नामे पेहेलो भेद जाणवो. २ स्याद्वाद विना मिथ्याभिनिवेप स- हित साधन प्रवृत्ति ते दुःपावचनिक साधन प्रवृत्ति. ३ लोकना स्व स्वदेश कुलनी चाले भत्ति ते लोक लता पनि T ST.
(९०) तेने भगवती सूत्रमा अव्रती तथा अपच्च खाणी कहा छे. आ कथन जे वाद्यभावमां राचे छे अने आत्मस्वरूप जाणवा खप क- रता नथी तेने फटका तरीके छे. एकांत जिन. वचन नथी. दान, पूजा, तप अने क्रिया प्रमुख सापेक्षत्रुद्धिथी मोक्षy कारण छे. कारणे कार्य नीपजे इति वचनात् ॥ आत्मानुं स्वरूप ओळखवाने बहु उद्यम करवो. मुनिपणुं आत्मानुं स्वरूप जाणवा- थी थाय छे. जेम जेम आत्मानुं स्वरूप ग्र- हाय छे, तेम तेम परभावनो त्याग थाय छे. श्री उत्तराध्ययन सूत्रमा कयुं छे के " मुणीरन्नवासेणं " जंगलमां वसवाथी कंइ मुनिपणुं प्राप्त यतुं नथी, पण "नाणे- -
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(१०१) समये द्रव्यमां छे. जे समयमां शुद्ध स्वगु- णनी अस्ति छे तेज समयमां परगुणनी नास्ति पण छे. यस्मिन् समये शुद्ध स्वगुण स्य अस्तिता आत्मनि तस्मिन् समये एव परगुणस्य नास्तिता आत्मनि वोध्या. माटे अस्ति नास्ति ए वे भांगा एक समय- मा भेला छे ते स्यात्अस्तिनास्ति त्रीजो भांगो थयो. ४ स्यात्अन्वक्तव्य. अस्ति अने नास्ति ए वेउ भांगा एक समयमां छे, तो वचने करी अस्ति एटलं वोलतां असंख्या. ता समय लागे, तेथी नास्ति भांगो तेज वखते कहेवाय नहीं, अने जो नास्ति भांगो को तो अस्तिपणो आव्यो, माटे एकज अस्ति कहेतां थकां नास्तित्व तेज स...
जाय नहीं. कारण के एक अक्षर वोलतां असंख्याता समय लागे छे. माटे वचनथी मये द्रव्यमां छे, ते कहेवाणो नहीं. माटे मृपावाद लागे, तेमज नास्ति कहतां अस्तिनो मृपावाद लागे, माटे वचने करी अगोचर छे. एक समयमां वे भांगा वचने करी कह्या अगोचर छे, भांगो जाणवो. ते चोथो स्यात् अवक्तव्य ५ अबक्तव्यपणो वस्तुमां अस्तित्व- नो पण छे. माटे स्यात् अस्ति अवक्त- व्य ए पांचमो भांगो जाणवो. ६ नास्तित्वनो पण अवक्तव्य पणो वस्तु मध्ये छे माटे स्यात् नास्ति अव- क्तव्य ए छहो भांगो जाणवो.
(११९) मां बीना समयमां अनंत परमाणुभा तथा ननंतजीव प्रदेशने चलणसद्दापीपणो थयो. चारे असंख्याता चलणसहायनो व्यय, प्रने अनंता चलणसहायनो उपनवो, अने चलणसहाय गुणपणे ध्रुव एम धर्म द्रव्य- मध्ये उत्पाद, व्यय, अने ध्रुवपणो. थइ रहो छे. ते प्रमाणे अधर्म, आकाशादि द्रव्यमा जाण, तथा बली कार्य कारणपणे उत्पाद, व्यय तथा अगुरु लघुपर्यायना चलननो उ- त्पाद, व्यय, पंचास्तिकायमां कडेवो. तथा कालद्रव्य ते उपचारथी द्रव्य छे. तेनुं सर्व स्वरूप उपचारथीज कहे. ए रीते सर्व द्र- व्यमां सत्पणो छ, जो अगुरु लघुनो भेद न थाय, तो प्रदेशोनो माहोमा हे भेद थाय नहीं. माटे अगुरु लघुनो भेद सर्वमा छे:
लहा गणटाणा गुनी होग, कारण के
प,
mi
;, गो!!! { .
गामी पापी मानोसणा
शो, riमानी समान आ
Titm मा पनी महारा
जणार.
भागानगा परिणाम पांवमा नया
छह गणटाणं प्रगत , माटे त्यां । ध्या-
ननो परिणाम संभव छे.
२ रोद्र ध्यान.
१ हिंसानुबंधी ध्यान २ मृपानुवंधी-
रौद्रध्यान ३ अदत्तानुबंधी द्रध्यान ४ परि-
ग्रहानुबंधीरौद्रध्यान.
(१४५) २ शरीरमा रह्यो जे आपणोजीव तेमां परिहंत, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय, अने धुपणाना सर्व गुण छे एडवू जेध्यानते पिं- स्थ ध्यान कहीए. अथवा गुणीना गुण- ध्ये एकत्वता उपयोग करवो ते पिंडस्थ यान जाणवू. ३ शरीरकर्मादि रूपमा रह्यो थको पण रो आत्मा अरुपी अनंतगुणी छे, शरी- मां रहेला आत्मामां ध्यान वडे तल्लीन थq. ब्रह्मरन्ध्रादि स्थानोमां ध्यान धरचु, तेने पिं- स्थध्यान कहे छे. ए त्रण ध्यान धर्म ध्या. नमा गणवां. ४ रूपातीत, निराकार, निःसंगी, नि- मल, संकल्प विकल्प रहित, अभेद, एक, शुद्ध, सत्तारूप, चिदानन्द, अ- --- पन कीया पली शेग तेर पति साने, अ- 'कर्मी भाग, गर्न कियाशी रहित माय ने स. मुछिन कियानिति शुकलल्यान जाणगं. पध्यान भ्यागतां शेप कर्मगति दलसरण- रूप क्रिया ऊछेदे. अवगाहना, देहमानमांगी बीजो भाग घटाटे, शरीरनो त्याग करी अहीथी सातराज ऊपर लोकने अंते जइ सिद्ध थाय. हवे बीजां चार ध्यान कहे छे. (१) पदस्थ (२) पिंडस्थ (३) रूपस्थ रूपातीत. १ अरिहंत, सिद्ध, आचार्य, उपा- ध्याय अने साधु ए पंचपरमेष्ठीना गुणने संभारे, तेनुं हृदयमा ध्यान करे ते पदस्थ ध्यान जाणवू. .
. (१४५) २ शरीरमा रह्यो जे आपणोजीच तेमां अरिहंत, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय, अने धुपणाना सर्व गुण छे एहवू जेध्यान ते पिं- इस्थ ध्यान कहीए. अथवा गुणीना गुण- मध्ये एकत्वता उपयोग करवो ते पिंडस्थ ध्यान जाण. ३ शरीरकर्मादि रूपमा रह्यो थको पण मारो आत्मा अरुपी अनंतगुणी छे, शरी- रमा रहेला आत्मामां ध्यान वडे तल्लीन थq. ब्रह्मरन्ध्रादि स्थानोमां ध्यान धरवू, तेने पिं- इस्थध्यान कहे छे. ए त्रण ध्यान धर्म ध्या. नमां गणवां. ४ रूपातीत, निराकार, निःसंगी, नि- मल, संकल्प विकल्प रहित, 'अभेद, एक, शुद्ध, सत्तारूप, चिदानन्द, असङ्ग, अखंड,
धन कीमा पानी शेष राति सणाने. ५-
'कर्मी भाग, गर्व किगाशी रहित भाग ते रा-
मुछिन किगानिवृत्ति शुफल यान जाण
एगान ध्यावतां शेष कर्मप्रकृति दलसरण
रूप क्रिया ऊदे. अवगाहना, देहमानमांगी
श्रीजो भाग घटाटे, शरीरनो त्याग करी
अहींथी सातराज ऊपर लोकने अंते जा
सिद्ध थाय.
हवे वीजां चार ध्यान कहे छे. (१
पदस्थ ( २ ) पिंडस्थ ( ३ ) रूपस्थ (४)
रूपातीत.
१ अरिहंत, सिद्ध, आचार्य, उपा
ध्याय अने साधु ए पंचपरमेष्ठीना गुण
संभारे, तेनुं हृदयमा ध्यान करे ते पदर
ध्यान जाणवू.
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(१९१) मिथ्यालने पाम रहे. उक्तंच कल्पमा• प्ये--आलंवण मलहंती, जहसठा- णं न मुंचए इलिआ, एवंअकयति पुंजी । मिच्छचिउवलमीपद ॥ मिच्छत्तंजमुइन्नं, तंखीणंअणुइ- चउवसंतं । मीसीभावपरिणयं । वे इज्जंतं खओवसमं ॥ तच सत्कर्म- वेदकमप्युच्यते, औपशमिककं- तुसत्कर्मवेदनारहिमित्योपशमिक- क्षायोपशमिकयोभदः॥ सास्वादन सम्यक्त्त-अनंतानुबंधी क. पायना उदये उपशम समकित चमतां. मि- थ्यात्व गुणस्थानक पाम्या पहेला आंतरे । -. --- भयोपशमसम्यकन्व = अनंतानुवंधीनी चोकडी, मिथ्यात्वमोहनीय, मिश्रमोहनीय अने ममकिनमोहनीय ए सात प्रकृतिनो प्र- देशोदय अने समकिन मोहनीयनो प्रदेशोदय अने ग्योदय जेमां होय नेने अयोपशम स- म्यक्त्व कहे छ. कम्मगंथेसुधुवं । पढमोवसमी करेइ तिपुंज! तब्बडीओपुणगच्छ- इ। सम्मे मिसंमि मिच्छेवा ॥ उपशम सम्यक्त्वी च्युत थतां जो जीव सम्बत्व मोहनीयन पामे छे तो तेने भयोप- शम सम्यक्त्वनी प्राप्ति थाय छे. कर्मग्रन्थना मत प्रमाणे एम जाणवू. सिद्धांतना मत म- माणे ऑपशमिक सम्यक्त्वथी च्युत अवश्य
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जघन्य एक समय अने उत्कृष्ट छ आवली- का मुधी क्षीर वमन स्वाद सरखो जे भाव छे तेने सास्वादन सम्यक्त्व कहे छे. सास्वादनं च पूर्वोक्तौपशमिक सम्यक्त्वात् यततो जघन्यतः स- मय उत्कर्षतश्च षडावलिकायाम वशिष्टायामनन्तानुवन्ध्युदयात्तद्व-- मतदास्वादरूपं यतः ॥ उवसम सम्मत्ताओ चयओमिच्छं अपाव- माणस्स सासायणसम्मत्तं तयंत- रालं मि छावलियं ॥ वेदक सम्यक्त्व-अनंतानुबंधीनी चो- कडी मिथ्यात्व मोहनीय मिश्रमोहनीयने तद्द.
(१९३) भय करी सातमा गुणस्थानकमां यम- तिमोहनीनो छेल्लो ग्रास (भाग) भोग उपजे के लेने वेदकसम्यक्त्व काहे ले. क्षपकणिं प्रपन्नस्य चतुरन तानुवन्धिपु मिथ्यात्वमिश्रपुञ्ज ये च क्षपितेपु सत्सु क्षप्यमाणे म्यक्त्वपुले तत्सम्यक्त्वचरम पणोद्यतस्य तच्चरमपुद्गलवेदन पम् ॥ क्षपकणि अंगीकार करेलाने अनन्ता घुवंधी चार कपाय मिथ्यात्व अने मि' र छ प्रकृति क्षय करे छते अने सम्यक्त मोहनीय पुंज सप्यमाण करे छते सम्यक (१०३) शिः सादिपर्यवसानेति या वपायस- हचारिणी श्रेणिकादेरिय सम्यगट्ट- प्टिः : तदशुद्धं क्षायिकं तस्य च सा- दिसपर्यवसानत्वादस्ति प्रतिपातो य- दुक्तं गंधहस्तिना तत्र या च अपाय सद्रव्यवर्तिनी अपायो मतिज्ञानांशः सद्रव्याणि शुद्धसम्यक्त्वदलिका. नि तद्वर्तिनी श्रेणिकादीनां च सद्र- व्यापगमे भवत्यपायसहचारिणी सा सादिः सपर्यवसाना चेति केवल- ज्ञानोत्पत्तौ अपायक्षये अपायः म. तिज्ञानांशः तत्क्षयेऽसौ भवति न (२९७) प्रथमकपायोदये तत्काले तदुदया भावात ततक्षये पव तस्योपपत्तिरि- त्यलं प्रसन्न इति गृद्धाशुन्द्रं क्षा यिक विभेद. श्रीकृष्ण श्रेणिक वगैरेने क्षायिक सम्यक्त्व रनं. सेमने चारित्रनी क्रियाप्रोपर अत्यंत गग होवाथी रोचक समफित पण कवाय ले. खीणे दंसणमोहे-तिविहमि विभव- निआणभूमि निपञ्चवायमउलं-सम्मत्तं खाइयं होइ ॥१५ कारक सम्यक्त्व-तत्रकारकं सू (१) मा शुला कित, तस्मा एव प गतसम्मलोत्पादकत्वेन सम्य तिरुपलात् तदवच्छिन्नं वा सम्य. गलं कारकसम्यक्त्वं । एतच्च विशु- चारित्रिणामेव ॥१॥ सुवामा शुद्धक्रिया तेज कारक स; म्यक्त्व छे ते क्रियानेज परगत सम्यक्त्वो- त्पादकपणावडे सम्यरूपत्व छे, ए हेतु थकी तदवच्छिन्नसम्यक्त्वने कारकसम्य- कत्ल कहे छे. विशुद्ध चारित्रवंतोने कारकस- म्यक्त्व होय छे. स सम्यकत्व-रोचयति स.
(१९९)
म्यगनुष्टानप्रवृत्ति, नतु कारयती-
ति रोचकम्, अविरतसम्यग्दृशां कृ-
प्णणिकादीनां ॥१॥
सम्यक् अनुष्ठाननी प्रतिनी मचि क-
रावे पण चारित्रनी प्रति करावी शके
नहि तेने रोचक सम्यकत्व कई छे देशवि-
रत्यादि धर्मनी क्रियाओ रुचे पण ते करी
शकाय नहि कृष्ण श्रेणिकादिकनी पेठे.
दीपक सम्यक्त्व-दीपकं व्यञ्च-
कमित्यनर्थान्तरम् , एतच्च यः स्वयं
मिथ्यावृष्टिरपि परेभ्यो जीवाजी-
वादिपदार्थान् यथावस्थितान् व्यन-
- स्याङ्गारमईकादेद्रष्टव्यम् ॥१॥
(१९८) त्राज्ञा शुद्धा क्रियैव, तस्या एव प- रगतसम्यक्त्वोत्पादकत्वेन सम्य- क्त्वरूपत्वात् तदवच्छिन्नं वा सम्य- क्त्वं कारकसम्यक्त्वं । एतच्च विशु- दुचारित्रिणामेव ॥१॥ सूत्राज्ञा शुद्धक्रिया तेज कारक स: म्यक्त्व छे ते क्रियानेज परगत सम्यक्त्वो- त्पादकपणावडे सम्यक्रूपत्व छे, ए हेतु थकी तदवच्छिन्नसम्यक्त्वने कारकसम्य- त्व कहे छे. विशुद्ध चारित्रवंतोने कारकस- म्यक्त्व होय छे. रोचक सम्यक्त्व-रोचयति स.
(२१३) माणे तेओ निश्चयसम्यक्त्वनी व्याख्या करें ? पण तेनो प्रवचनसारोद्धाररत्ति-नंब- द प्रकरणत्ति-धर्मसंग्रहत्ति-आचारांगसूत्र का बगेरेमा कथेला निश्रय सम्यक्त्वनी गये मतभेद देखाय छे, नवपदप्रकरणवृत्ति, मिसंग्रह वगेरेमा शायिक समकितने निश्चय मिकितधी भिन्न गण्यु छे अने श्रेणिकने क्षा- पेक सम्यक्त्व छतां निश्चय सम्यक्त्व नथी म स्पष्ट कथ्युं छे. आगमसारना कानी । निश्चय सम्यक्त्वनी व्याख्या करी छे ते ण उपरनी व्याख्याथी भिन्न पडे छे तो ण अनुभवनी अपेक्षाए अप्रमत्त साधुओने ने निश्चय सम्यक्त्व कथ्यु छ तेनी साथे सं- बंध कथंचित् वंधवेसतो आवे छे. अप्रमत्त साधुओ, निश्चयनयनी अपेक्षाए पोताना आ- माधातष्टात ॥ आ प्रमाणे निश्चयनय सम्यक्त्वनुं स्व- रूप अवबोधg. शुद्ध ज्ञान दर्शन चारित्र प- रिणति रूप आत्मा तेज निश्चय सम्यक्त्व छे. वाह्य रागादि संकल्प विकल्प रहित निरुपा- धिमय शुद्धान्म बोध स्थिरता, लीनता तन्मय परिणति तेज निश्चय सम्यक्त्व अवबोध. आगमसारकर्ता देव-गुरु अने धर्मनी श्रद्धाने व्यवहारसम्यक्त्व कहे छे अने आ- त्मा तेज देव, आत्मा तेज गुरु अने आत्मा तेज धर्म एवी श्रद्धाने निश्चयनय सम्यक्त्व कथे छे. प्रश्नोत्तररत्नचिंतामणिमां शेठ अ. नुपचंद मलुकचंद जणाये छे के उपशम स- म्यक्त्व-क्षयोपशम सम्यक्त्व अने क्षायिक सम्यक्त्व तेज निश्चय सम्यक्त्व ले. आ प्रom नेत्री निश्यसम्मानी व्याख्या में पग नेनो वचनसारोद्धारयनि-नव- करणधि-धर्मसंग्रारति आगारांगमूत्र वाग्यां कला निधय सम्पयत्यनी मनभेद देखाय छे. नवपदपकरणत्ति, संग्रह बगरमा धायिक समफितने निश्रय केनधी भित्र गणू ले अने णिकने सा- : सम्पपल छनां निश्चय सम्यक्त्व नथी स्पष्ट कम्युं छे. आगमसारना पीनी निश्चय सम्पयत्वनी व्याख्या करीले ते उपरनी व्याख्याधी भिन्न पडेटे नो अनुभवनी अपेक्षाए अप्रमत्त साधुओने निश्चय सम्यक्त्व कम्युं छे तेनी साथ सं- कथंचित् बंधवेसतो आवे छे. अप्रमत्त धुओ, निश्रयनयनी अपेक्षाए पोताना आ न्द्रिग निगन मीमी गने उपयुक्त जण प्र- कारना जवानाने पारभषिक आगित ग- गरम पण होतं नशी. कारणके क्षायिक गम्गापिनो नेगीगां उत्पाद यतो नथी. उपयुक्त गंग्यातायुष्कराशिपंचेन्द्रिय तिर्यच गीभा तथा प्रण प्रकारना देवताओने उपशम अने क्षयोपशम सम्यक्त्व थाय छे. एकेन्द्रिय, द्वीन्द्रिय, श्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय अने असंक्षिपोन्द्रिय जीवोने ते भव वा परभवनी अपेक्षाए त्रण सम्यक्त्वमाथी एक पण सम्यक्त्व होतुं नथी. बादर, पृ. वी, जल, वनस्पति, दित्रिचतुरिन्द्रय जीवो अने असंज्ञिपंचेन्द्रियोमा पर्याप्ताव- स्थामां पारभविक सास्वादन सम्यक्त्व अने पर्याप्त संज्ञी पंचेन्द्रियमा ताभविक पमाय छे. (२१७) मुक्ष्म एकेन्द्रिय वादर तेज वायुमा स- म्यक्त्वलेश्यावंतोना उत्पादनो अभाव छे माटे सास्वादन तओमां नथी ए कार्मग्रन्धि- के अभिमाय छे. मूत्राभिप्रायवडे तो पृधि- वी आदि एकेन्द्रियोंने सास्वादन सम्यक्त्व नथी. यदुक्तं प्रज्ञापनायाम् , पुढवि- काझ्याणं पुच्छा गोयमा पुढविका- श्या नो सम्मदिट्टी नो सम्मामि- च्छदिट्टी एवं जावणप्पश्काघ्या-॥ इति प्रवचनसारोद्वारे १४९ द्वारे॥ पञ्च सम्यक्त्वानां कालनियममाह- अंतमुहूत्तोवसमो, छावलिसासा- णवेयगोसमओ, साहियतित्तीसायर- खड्यो गणो वओवपमे ।। -- न्द्रिय तिर्यंच स्त्रीओ अने उपयुक्त त्रण प्र- कारना देवताओने पारभविक क्षायिक स- म्यक्त्व पण होतं नथी. कारणके क्षायिक सम्यक्दृष्टिनो तेओमां उत्पाद थतो नथी. उपर्युक्त संख्यातायुष्कसज्ञिपंचेन्द्रिय तिर्यच वीओ तथा त्रण प्रकारना देवताओने उपशम अने क्षयोपशम सम्यक्त्व थाय छे. एकेन्द्रिय, द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय अने असंज्ञिपञ्चन्द्रिय जीवोने ते भव वा परभवनी अपेक्षाए त्रण सम्यक्त्वमांधी एक पण सम्यक्त्व होतुं नथी. बादर, पृ. थ्वी, जल, वनस्पति, दित्रिचतुरिन्द्रय जीवो अने असंज्ञिपंचेन्द्रियोमा पर्याप्ताव- स्थामां पारभविक सास्वादन सम्यक्त्व अने 'पर्याप्त संज्ञी पंचेन्द्रियमा ताति (२२१) क्षायोपशमसम्यग्दृष्टि थाय छे. ते प्रथम क्षयोपशम सम्यक्त्वने पामे छे. अन्य तो एम कहे छे के-" अन्यस्तु यथाप्रवृत्ति करणत्रयक्रमेणान्तरकरणे उपशम- सम्यक्त्वं लभते पुजत्रयं त्वसौ न करोत्येव ततश्चौपशमिकसम्यक्- स्वाच्च्युतोऽवश्यं मिथ्यात्वमेव याति यथाप्रवृत्तिकरणादि वणना अनुक्रमे अन्तरक- रणमां उपशम सम्यक्त्व पामे छे अने जीव, त्रण पुंजने नथी करतो ततः पश्चात् उपशम सम्यक्त्वथी चवेलो अवश्य मिथ्यात्वने पामेछे. प्रथम सम्यक्त्व पामे छे तो कोइ जीव सम्यक्त्वनी साथे देशविरति वा सर्वविरति- पामे छे. सास्वादन सम्यक्त्वी कंइ पण पडिानुग्रहशक्तितः॥ वेदक अने क्षायोपशमिक सम्यक्त्वने पौद्गलिक कहेवामां आवे छे अने उपशम अने नायिकने अपौद्गलिक कहेवामां आवे छ. उपशमक्षायिकसम्यक्त्वयोः पु. द्गलवेदनस्य सर्वथैवाभावात्. चार गतिमां संक्षिपर्याप्त पंचेन्द्रिय जी- वने प्रथम सम्यक्त्वनो लाभ थाय छे. उपशम सम्यक्त्वथी च्युत जीव क्षयोप- शम दृष्टि-मिश्रदृष्टि वा मिथ्यादृष्टि थाय छे. सिद्धांतना मत प्रमाणे अनादि मिथ्यादृष्टि जीव, तथाविधसामग्री सद्भावे अपूर्व क- रण वडे व्रण पुंज करीने शुद्ध पुद्गलोने वेद- तो छतो उपशम सम्यक्त्व पाम्या विनाज - अन्यस्तु यथाप्रवृत्ति (२२१) क्षायोपशमसम्यग्दृष्टि थाय छे. ते प्रथम क्षयोपशम सम्यक्त्वने पामे छे. अन्य तो एम कद्दे छ के- करणत्रयक्रमणातरकरणे उपशम- सम्यक्त्वं लभते पुजत्रयं त्वसौ न करोत्येव ततश्चौपशमिकसम्यक्- स्वाच्च्युतोऽवश्यं मिथ्यात्वमेव याति यथामत्तिकरणादि णना अनुक्रमे अन्तरक- रणमां उपशम सम्यक्त्व पामे छे अने जीव, त्रण पुंजने नथी करतो ततः पश्चात् उपशम सम्यक्त्वथी चवेलो अवश्य मिथ्यात्वने पामेछे. प्रथम सम्यक्त्व पामे छे तो कोइ जीव सम्यक्त्वनी साथे देशविरति वा सर्वविरति- पणु पामे छे. सास्वादन सम्यक्त्वी कंइ पण पांडानुग्रहशक्तितः ॥ वेदक अने क्षायोपशमिक सम्यक्त्वने पौगलिक कहेवामां आवे छे अने उपशम अने क्षायिकने अपौद्गलिक कहेवामां आवे छे. उपशमक्षायिकसम्यक्त्वयोः पु. इलवेदनस्य सर्वथैवाभावात्. चार गतिमां संक्षिपर्याप्त पंचेन्द्रिय जी- वने प्रथम सम्यक्त्वनो लाभ थाय छे. उपशम सम्यक्त्वथी च्युत जीव क्षयोप- शम दृष्टि-मिश्राष्टि वा मिथ्यादृष्टि थाय छे. सिद्धांतना मत प्रमाणे अनादि मिथ्यादृष्टि जीव, तथाविधसामग्री सद्भाचे अपूर्व क- रण वडे त्रण पुंज करीने शुद्ध पुद्गलोने वेद- तो छतो उपशम सम्यक्त्व पाम्या विनाज
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पामतो नथी. उक्तं च शतकबृहचूर्णी- उवसमसम्मदिट्ठी-अंतरकरण- ठिओ कोइ देसविरयपि लंभइ कोई पमत्तभावपि ॥ सासाइणो न किंपि लहे इति ॥ पुंजत्रयसंक्रमश्च कल्पभाष्ये ए- वमुक्तः मिथ्यात्वदलिकान् पुद्गला- नाकृष्य सम्यग्दृष्टिः प्रवर्धमानपरि- णामः सम्यक्त्वे मिश्रेच संक्रमयति। मिश्रपुद्गलांश्च सम्यग्दृष्टिः सम्यक्- त्वे मिथ्याष्टिश्च मिथ्यात्वे सम्यक्- (२२३) त्वपुद्गलांस्तु मिथ्यात्व संक्रमयति न तु मिश्रे॥ प्रवर्धमानपरिणामी सम्यग्दृष्टिजीव, मि- ध्यात्व पुद्गलोंने आफपी सम्यक्त्वमां अने मिध्यात्वमा संक्रमावे छे. सम्यग्दृष्टि जीव, मिश्र पुद्गलोने सम्यक्त्वमा संक्रमाचे हे अने मियादृष्टि जीव मिथ्यात्वमा संक्रमावे छे तथा मिथ्यादृष्टि, सम्यक्त्व पुद्गलोने मिथ्या- त्वमा संक्रमावे छे पण मिथमां नहीं. मिच्छमि अखींणे-तिपुंजा सम्म- दिष्टिणो नियमा खीणमि उमिच्छ.. ते-दुएगपुंजी व खवगोवा ॥ मिथ्यात्व अक्षीण यये छते सम्यग् दृ- .
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वी. गीतार्थ आत्मज्ञानी ध्यानी सद्गुरुन
घरणकमल सेववाथी सम्यक्त्वनी पारि
थाय छे.
उपर प्रमाणे सम्यक्त्वना जे जे भेद
कहा छ, तेनी प्राप्ति माटे प्रयत्न करवो एज
उत्तम पुरुपोनुं कर्तव्य छे. आगमोनो नय
निक्षेप प्रमाणोथी अनुभव करीने राग द्वेष
रहित आत्माना समभाव स्वरूपमा परिणम
एज परमसाध्य कर्तव्य छे.समभावे परिणमतां
आत्मा केवल ज्ञान प्राप्त करी मोक्ष पामे छे.
सेयंवरो वा आसंवरो वा.
बुद्धो वा अहव अन्नो वा
समभावभावी अप्पा--
लहइ मुकं न संदेहो ॥
*नांवर मादिगंबर.युख भगया अपना वेदांती, मंदिर. पी. गुमरमान, चम्ति य. गरे गर्भ में होगा परंतु ममभाने भानाने पात्री मपभाचं नियत: परिणमी ममभानी याच मोस पापकर्मावरमनी सग करी मम्मपन्नादिने माम फनी परिपूर्ण गुण- मपी यनी मिल पट परमान्मा याय रहे. सर्व सिद्धांतनो मार एटे के मम्परत्वादिनी प्राप्तिकरी आत्माने समभाष भाययो. सम- माघ परिणमता कमायनी मन्दनाए भने शीणता, निसर्ग सम्यपचनी भाति धाय छे भने सफल कर्मने निवारी परिपूर्ण शुद्र बुद्ध बने है. समभाचे परिणमता सहजानन्दगोगे सम्मरत्वनी प्राप्तिनो। मव करीनकाय .
वी. गीतार्य आत्मज्ञानी ध्यानी सद्गुरुनां
चरणकमल सेक्वाथी सम्यक्त्वनी प्राप्ति
थाय छे.
उपर प्रमाणे सम्यक्त्वना जे जे भेदो
कह्या छे, तेनी प्राप्ति माटे प्रयत्न करवो एज
उत्तम पुरुषोनुं कर्तव्य छे. आगमोनो नय
निक्षेप प्रमाणोथी अनुभव करीने राग द्वेष
रहित आत्माना समभाव स्वरूपमांपरिणमवू
एज परमसाध्य कर्तव्य छे.समभावे परिणमतां
आत्मा केवल ज्ञान प्राप्त करी मोक्ष पामे छे.
सेयवरो वा आसंवरो वा.
बुद्धो वा अहव अन्नो वा
समभावभावी अप्पा-
लहइ मुखं न संदेहो ॥
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आगमसार, नयचक्र आदि ग्रंथोनी
सहायताथी ते ग्रंथोना अनुसारे भव्यजीवो-
ना उपकारार्थ पद्रव्यविचारग्रन्थ वना-
व्यो छे. तेमां कांइ वीतरागनी आज्ञा
विरुद्ध भापण थयुं होय, लख्यु होय,
ते त्रिविधे करी मिच्छामि दुबडं दउं छं. आ
ग्रंथमां विभ्रम चित्तथी कोइ दोप थयो होय
तो ते सुधारवा पंडितपुरुपोए कृपा करवी.
शुभे यथाशक्ति यतनीयं ए न्यायने
अनुसरी में उद्यम कर्यो छे, तेथी हुँ मारी
महेनत परोपकार थये छते, सफल मानु छ,
आ ग्रंथ पंडित पुरुषोने योग्य छे.
आ ग्रंथ यांची व्यवहार मार्गे चाली हृदयमां
निश्चय दृष्टि राखशे ते आत्ममुख पामशे.
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९ पानी, विसागर गागाः गुमगागर विमलेना, नियत हाय.८ नाग नरणाने रोगतो, नदिको एमः भोगणे ने भारशे, ते पामे सुराग. गां लगे शशी भान हे, जगगां करे प्रकाशः तावत् भविजन भानुराग, गहने करो गुगास.१० प पनद्रव्य विचार ग्रन्थ, जिनवाणीशी रसाल; भणशे गणशे ते भवी, लहेशे मालमाल.॥११॥ संपूर्णम्. ॐ शान्तिः ३
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