Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner
Ratansamuchya Mangal
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८२
मुंबई पायपोनी पास शान्ति मुपाकर प्रेसमें
चीमनलाल सांफरचंद मारफतीयाने
मुद्रित कीपा.
रत्नसमुच्चय मंगलाचरणं ॥ ॥ अथ श्रीजिनायनमः ।। अथ रत्नसमुच्चय ग्रंथ प्रारंन । तत्रादौ मंगलावरणं ॥ आदिनाथंजिनंनत्वा, धर्मशीलंचसद्गुरूं ।। गीर्घाणीहृदयेधृत्वा, लिखामिरत्नसंचयं ॥ १ ॥ श्रेया नव्यजीवा नां, तत्वामृतादिमेलनं, आवश्यकादिकत्यं ॥ तपस्याविधिनिर्णय ॥२॥ द्वादशमासपर्वानि, पौषधंदेववंदनं ॥ स्तोत्राणिस्तवनरम्य, स्वाध्यायंगुरुवंदनं ॥ ३॥ इत्यादिबहुरलेन, धर्मरत्नसमुच्चयं ॥ जातोयंकल्पकल्याणं, नित्यानंदवतंपदं ॥ ४ ॥ ७६ अथ ग्रंथ संग्रहकृत्संक्षेप गुरु प्रशस्ति । श्रीमझोर जिर्ने तीर्थतिलक सद्भुतसंपन्निधिः, संजझेसुगुरुः सुधर्मगणनृत्तस्यान्वयेसर्वतः ॥ पुण्येचांद्रकुलेऽनवत्सुविहितपदेस दाचारवान् , सेव्यशोजनधीमतां सुमतिमानुद्योतनःसूरिराट् ॥ ५ ॥ प्रासीतत्पदपंकजैकमधुरुत्श्रीवईमानानिधः, सूरिस्तस्यजिनेश्वरा हयगणनृजातोविनेयोत्तमः ॥ यःप्रापत्ननसिद्धिपक्तिसरदि । १०८० । श्रीपत्तनेवादिनो, जित्वासविरुदंकतीखरतरे पाख्यं वृपादेर्मुखात् ॥ ६ ॥ तत्पदानुक्रमेश्रीमत्, सूरिश्रीकुशलानि ॥ दादाविरुदविख्यातः, पूज्यपादगुरुर्वरः ॥ ७ ॥ हेमकीर्तिप, यायः, जातोसोसकलायणीः ॥ शाखाविस्तारितायेन, केमवाटी चरंजयी ।। ।। सुसाधुपदविक्षातः, धर्मशीलवुधायणी ॥ पाव हानेकन्नव्यानां, ज्ञानक्रियाप्रपालकाः ॥ए ॥ तच्चरणसमालोढा, नि नकुशलानिधः ॥ धर्ममग्नसमाधिस्था, स्तुवंतिबदुमानवाः॥१०॥ पाध्यायसदाचारा, वादीनांमाननंजका ॥ शास्त्रार्थविजयंप्राप, सं दंयुक्तिवारिधिः ॥ ११ ॥ पाठकझक्सिारण, स्तोयग्रंथसंग्रहः ॥ वपरोपकतेसम्पग, प्रसिद्धप्रापितमया ॥ १२ ॥ सुशिष्यदेमचंद्रेश, मामरसबविचः ॥ श्रीसंघरुत्सहायेन, मुवयांशोसकारैः ॥१३॥ . " (४) यंत्रेमुदापित्तंसम्यग् , यंत्राध्यदेणशोधितं ॥ पठक:पाठकेन्योवै, नि व्यंश्रेयश्चमंगलं ॥ १४ ॥ श्रीविक्रमपुरेरम्ये, वृहत्खरतरेगणे ॥ वृद दीपाश्रयस्थाने, पुस्तकेदमिलिप्यति ॥ १५ ॥ इस पुस्तकोंका सर्व रकम खरच तथा इसका लान शुन्न इमारे पोपपुत्र शिप्प पं । श्रीक्षेमचंद चि। पेमचंद चि। चमरचंका दे. दमने हमारा सर्व स्वउपासरा पुस्तक धनमालका गलक इन तीनोकों किया है, दूसरा किसीका दावा नजर नहीं । नं ॥ दसकत । उ०i श्रीरामलालगणिःका खुद ॥
. ७५ शेत ॥ रत्नसमुच्चय-रामविलास ॥ ॥ स्वकुलप्रकाशक आचार्यपट्टावली ।। शासननायक श्रीमहावीरस्वामी, तत्पट्टे २ श्रीसुधर्मास्वा मी, तत्प? श्रीजंबुस्वामी ३, तत्पट्टे ४ श्रीमन्नवस्वामी, तत्पट्टे ५ श्रीशय्यंन्नवसूरिः, तत्पट्टे ६ श्रीयशोजइसूरिः, तत्पढे ७ श्रीसंनू तविजयस्वामी, तत्पढे ७ श्रीनचाहु स्वामी, तत्पट्टे ए श्रीयूसन्न इस्वामी, तत्पट्टे १० श्रीार्यमहागिरी, तत्पट्टे ११ लघुभ्राता श्रा यसुहस्तिसूरजी नये सो वीरनगवानसें २३५ वरसे संप्रतिराजा तथा एवंतीसुकमालकू प्रतिबोधके धर्मका यहोत नद्योत किया ११, तत्पट्टे १२ श्रीसुस्थितसूरी १ को सूरिमंत्र का जाप कीया तबसे कोटिकगच प्रसिद्ध नया, इस तरे पट्टानुपट्ट १६ में श्रीवजस्वामी दश पूर्वधर बमे प्रनावीक विद्यासिद्ध नये नोंसे वजशाखा प्रति द्ध नई, तेसेंश १७ पट्टपर श्रीजिनचंसूरी हुये इनोंसें चंकुल प्रसिद्ध नया, इस तरे पट्टानुपाट नगवानले ३० में श्रीनद्योतन सूरिः नये सो एक तो निजशिष्य नर उसरा साधुनके ७३ अपने विद्यार्थी शिष्योकों आचार्य पद दिया तबसें ०४ गब नया, यह ७४ गहोंके आचार्य बमे प्रनावीक धर्मोद्योतक नए, इन नद्योतनसूर जीके निजपाटधारी बाबूजीतीर्थ प्रगटकर्ता विमलमंत्री प्रतियो धक ३५ पट्टे श्रीवर्द्धमानसूरिःजये, ४० पट्टे श्रीजिनेश्वरसूरिः नये सो अगदलपुरपट्टणमें उर्वनराजाको सन्नामें चैत्यवासियोंको शा स्त्रार्थ में जीतकर सं ॥ विक्रमके १००० के वर्पमें पाटसके राजाने खरतर विज्ञद दिया, अतिशयपणे खर-सूर्यकी तरे ज्ञानकरके क समलायमान । अथवा क्रियाकरके अतिशयपणे कर ज्ञानसंयुक जिसमें खर कहीये बमे कोर इस वास्ते खरतर विरुद पाया,
टिकगच बजशाखा चंकुल खरतर विरुद एसें: नेद नवदी
त शिष्यकू कहणा सरू लया, इनोंके ४१ में पट्ट दिल्ली के बाद
इ प्रतिबोधक जीवहिंसा माणेवाले श्रीमालमहतियाण गोत्र
वोधक श्रीजिनचंसूरिजी नये, फेर इनोके पट्ट ४२ में इनोके
जाता श्रीस्थंनणातीर्थ नर नवांगवृत्ति प्रगटकर्ता श्रीअन्नयदेव.
नये, तत्पट्टे ४३ में अठारे हजार वागमीश्रावक प्रतिबोधक
जनवबनसूरिः युगप्रधान नये, तत्प? धध में महा प्रस्तावीक.
धान श्रीजिनदत्तूरिः नये जिनो चितोमर उकयणी
नसे साढीतीन कोटी विद्यानायकी पुस्तक निकालके साथ
विनवीर चौसठ योगणी एक लाख तीस हजार घर राजन्य
को तथा ब्राह्मणोंको प्रतिबोध देकर उत्तवास वाया, उसः
तीन गोत्र स्थापन करा, पारख कोठार) सूणिया राखेचा
पुरखा गजेम इत्यादिक वद गोत्र नामके फेरफारसे इस बखत
करीब होगये है, वह गुरुका गुण लिख नहीं सकते, वह
क बमे दादाजीके नामसे सर्व जगे प्रसिद्ध दे, तत्पट्टे ध
'धारी दिल्लीके बादसाह प्रतिबोधक अनेक चमत्कार दि-
जैनधर्मका उद्योत करणेवाले श्रीजिनचंडसूरिः नये जिनों
के नरवजारमें दाग नया धमा चमत्कार देख पादसाहा.'
क मानने पूजणे लगे, यह दूसरे दादाजी जये: अनुक्रमे
ट्टपर महामनावीक कुशवसूरि जी नये, सो . प्राचार्यपद
विनवीर..चोसम्योगणीकू वसकर संघमें बकेर नपगार
रमल बोयरेकी जिहाज व्याख्यान वांचते हुये पंखीरूप
दरियाव में तिराई एसें परमोपकारी अंतमें फागुण.
स्वर्गवाश नये, फागुण सुदि.१५ सोमवारको प्र.
दरशण दिया, तिसपीठे नक्तलोकोंका उपगार
. जगेर करने लगे इस वास्ते श्रीसंघनें अपणे प्राचार्यको इष्टदेव समझके सर्व नगर गामरमें चरणमार्स स्प्रून स्थापन कर दादा जीके नामसे वंदन पूजन करपे लगें, सर्व जगे दादागुरूका जश प्रख्यात नया, प्रत्यक्ष परचा देणेवाले यह तीसरा दादाजी नये, इनोंके पाटानुपाट ६१ में श्रीजिनचंइसरि नये, जिनोने अकबर चादहळू अनेक चमत्कार काजीकी टोपी तीन बकरीका बताणा 'इत्यादि दिखाकर अमारि नदघोषणा फिरवाई, सर्व वेपधारियों की दिंस्थानमें रक्षा करवाई, क्रियानद्धार कर पतितोंकों गंटा गच्चकी व्यवस्था करमचंद वगवतकी वीनती सर्व समयानुसार बांधी, श्नोंके पट ६२ में श्रीजिनसिंहसूरिः, नाके पट्ट ६३ में श्रीजिन राजसूरिः श्नोके समयमें प्राचार्य गछ सागरचंसूरिःसे जया, नोके पट्ट ६ध में श्रीजिनरत्नसूरिः श्नोके समय रंगविजयसूरिसे रंगविजय गच नया, श्नोके पट्ट ६५ में श्रीजिनचंसूरि, नोके पट्ट ६६ में श्रीजिनसुखसूरि, तत्पढ़े ६५ में श्रीजिनन्नक्तिसूरजी जये, नोके पट्ट ६७ में श्रीजिनलान्नसूरजी नये, नोके पट्ट ६ए में श्रीजिनचंद्रसूरिजी नये, इनाके पट्ट ७० में श्रीजिनदर्पसूरिजी नये, नोके पट ७१ में श्रीजिनसौनाग्यसूरिजी नये, इनोके स मयमें मदेसूरिजीसे मंमोवरागच नया, नोके .७२ में पट्ट 'श्री जिनदंससूरिःजी नये, श्नोके पट्ट ७३ में श्रीजिनचंद्रसूरिः नये; श्नोके पट्ट ७ में श्रीजिनकीर्तिसूरिःजी वर्तमान विजयराज्यै ॥ 11 ग्रंथ संग्रहकर्ता कुल प्रकाशक पूज्यश्रेणी॥ ॥ दादासाहिब श्रीजिनकुशलसूरिः महाराजके शिष्य म. होपाध्याय श्रीक्षेमकीर्त्तिगणि:जीने जं । यु । प्रन। श्रीजि नपद्मसूरिःजीके चखतमें साधूलोक "प्राचार्यमहाराजके पालमें ब- दाँत पो रहे उर 'यमे२ ज्ञानवंत क्रियातोको चार जगे चतु' .
सि-करणे, नेजेगये, थोमे वहोत रहेथे सो नी गोचरी मिल्ल मी चलेगयेथे उस वखत श्रीजीके पास फकत श्रीनपाध्यायजी ही बैठेथे, श्रीजीका मिलनूमीका हाथ धुलाणेकू न, अपणे वि.. यापाठकजीका एसा स्वरूप देख श्रीजीने कहा, पाठकजी आप विराजो समयका वमा अपरवलीपणा हे सो गछमें साधू बहोत कम होगये तो आप मेरे हाथ धुलाणे नछे, दादासाहिवके वखत कैसे२. ज्ञानवंत क्रियावंत जगतजीव हितकारी कैसे२पंमित वि- द्यमान थे, अब यह गल किसदशाकू पोदचा हे, योमा समुदाय, जिसमें सुपात्र तो बहोतही थोमे हैं, तब उपाध्यायजीने कहा म- हाराज. यह वह खरतरमें किसी बातकी कमी नही रदेगी अनी गुरुदेवकी रुपासें यती२ होजायगें, एता कह दादासाहि बका ध्यान करते नपाश्रयसें विहार कर वस्तीके वाहिर जा बैठे, गुरुके. ध्यानमें लीन नये, इतनेमें किसी राजाकी वरात व्याह क- रणेकुं जारदीथी, साधूमुनिराजकू वैठे देख पाशमें आके वंदन नमस्कार कर गुरुके सन्मुख बैठ गये, श्रीनपाध्यायजीने शांतरश का जरा वैराग्यमई नपदेश दिया सो उन पांचसें राजपूतोने वि- वादकी वांग गम दीक्षा ली, दादासाहिवनें देवशक्तीतें सबोकों धमोपगरण वेप दीया, इन सबोंकों लेकर श्रीप्राचार्य पास पाये, सूरिश्वरनें कहा, केमाजी, धामकीधाम लेयाये, उपाध्यायजीने कहा तथास्तु, मेरे शंतानी केमधाम नामहीसे प्रसिद्ध रहे, नस दिनसे वृहत्साखा केमधाम विस्तारनावकं प्राप्त जई. यह. साखाकी नत्पत्ती संवत् विक्रम तेरेसेमें सीवाणची देशमें नई, जो अब जोधपुरराज्यके प्राधीनमें प्राधीनमें प्रसिद्ध दे, इस साखामें चमेश विद्वान होते. खेयाये जिनोके बनाये अनेक प्रकरण काव्य न्याय टीका वगेरद विद्यमान दे, नस शाख! .
में उपाध्यायं श्रीनेममूर्तिजीजलिः तत् शिष्य ! श्रीक्षेममाणि
कजीगणिः तत् शिप्य । पंमित प्रवर श्रीविनयन्नद्रजिज्ञणिः तत्
शिष्य श्रीपं । प्र । लब्धिहजिमणिः तत् शिष्य पं । म । श्रीधर्म
शीलजिणिः (श्रीसाधूजी) तछिप्य पं। प्र । श्रीकुशवनिधानजि
मणिः तछिप्पोपाध्याय श्रीयुक्तिवारिधिः श्रीझद्वितारगणिजित्संगृहीत
रत्नसमुच्चय ग्रंथ तया रामविलाश तधिष्य पं । क्षमाप्तौलाग्यमुनिः
चि । पेमचंद चि । अमरचंदकी तरफसे यह ग्रंथ सब जीवोंके न.
पगारार्य पढणेकू उपाया। श्रीबीकानेरमें सं। १एपए की ज्येष्ट
यदि पंचमी को जेन संस्कृत पाठशाला जैन बालकोंके पग्नार्थ
स्थापन करी हे इसमें मदत देणेवाले धर्मज्ञ पुरुषों के नाम वीका.
नेरमें दिया ।।
४१ रु। श्रीनग्रसेग्जी चांदमसंजी ढढा
११रु । श्रीमगनमसजी मंगलचंदजी कावक,
११ रु । श्रीसदारामजी गोलग.
११ रु। मानमसजी केसरीचंदजी साम.
११ रु । श्रीचूनीलालजी गोलग,
१००। श्रीराजरूपजी देवचंदजी नादढा.
रु । श्रीश्रासकरणजी घरदिया.
। श्रीवादरमसजी जसकरणजी रामपुरिया
११रु । श्रीसिरवारमलजी तातेम.
२५ रु । श्रीबालचंद कनीराम प्रान्तम मुमचाला.
३ रु । श्रीश्वराजजी नाहटा,
मागे जो विवेसी पाचक इस पाठशालाएं मंवत्त बैंगे तो
ज्ञानका अक्षयनिधान पायेंगें, जतीलोकोंके फेयक शियन।
मित तलशानी न जायगे, जनपक्षक वधेगें, तर जो नही
(१०) देते दें मनोको हरतरे श्रावकलोक शिक्षा देकर पढाणेकुं नयमयंत करणा यद काम श्रावक मातपिता नर गुरुलोकोंका है, इस नदी पढणे के समय जैनके पधारी र नेपधारणीयां अनेक कामौके वश नरकके पात्र नर धर्म• खजाते है, क्यों को दशक:- कालक सूत्रमें लिखा दे ( ।। सूत्रं पढमं नाणं तन दया ॥) पह- ली सम्यग्ज्ञान दोय तो फिर पी दया पाल सकता है ।। झा. नोका जन्म सुघरता दे अज्ञानीका सर्वया नही, वाजै गृहस्थ एसा कहते हैं हमारे नावे विगमे तो क्या नर सुधरे तो क्या, हम नतो श्नोंकों गुरुकरके मानेगें न अन्नवस्त्र देंगे, देंगेतो मानरहित कंग- लोकी तरे । हम पढाणेकी क्यों कोसीत करें ॥ उत्तर ॥ यह स. मझसे तो जैनधर्म अमावश चंश्ताकू प्राप्त होता है, इस बुदितें जैनधर्ममें पूनमचंद्रता कसे द्योत करें, श्राद्धविधी विवेकविलाशादि श्रावकाचार ग्रंथोमें एसा लिखा हे धर्माचार्यके नचिताचरणमें ध- मसें नृष्टनये धर्माचार्यकुं फेर जिनधर्ममें श्रिर करे तो वदला करे, दस वीस आदमी एकठे होकर निंद्या करणेसें विगामका सुधार नही होता, धर्ममें घिर करणेकी असली जम विद्यावृद्धि हे, स्वन्नाव कोई किसीका नही मिटा सकता यह तो निश्चै दे, तथापि कारणसे कार्य होता हे, कारण तो विद्या पढणा हे कार्य सो श्री क्रिया चोथा पांचमा हा सातमा गुणगणा चढणेरूप हे ॥ ग्यानी सासोसास करम करे सो नास ॥ इत्यादि वचन तीर्थंकरोका हे सो विचारणा, प्रश्न । दम जतियोंकों धर्माचार्य नही मानते ? ॥ नत्तर को कृतघ्नी अपणे पितासे पितानाव न ररके तो उसका क्या कोई कर सकता है लेकिन संसारमें वह लायकचंदतो नही गिणाजाता, ए- सं श्रीश्रीमान श्रीमाल सवाल पोरवालादि जैनवर्गके धर्माचार्य तो जतीही हे, जतियोंसें पढ़ते हैं, धर्म सुणते दे, सामायक पोसा ॥ प्रश्न॥ समिक्षमणा करते हैं, मंदिरोमें गायन पूजा चोपी श्रादि वावते हे यह तो चलता उपगार हे, म जतियोंके कमेरोने तुमारे वझे- गेको चिंतामणी रत्न जेसा जैनधर्म दीया है, यह नपगार सबसे वमा हे. ॥ प्रश्न.॥ एसोंको तो हम मानते हे लेकिन सुगाणे पढाणेवाले तो कम र धर्म सजागेवाले बहोत जिनोकों केर्स माने? ॥ उत्तर ॥ सच है, इस वातका निर्राय हमने आगे लिखा हे सो वांचो, एक श्रावकका सतीलोक चेला क्यों करते हैं श्नोंसें यथार्थ धर्म पलता नही ? । उत्तर ॥ यथार्थ धर्म तो यथाख्यात चारित्र• कहा हे सो तो वजज्ञपत्ननाराच सं. हरान विच्छेद होतेइ गया, सामायक वेदोपस्थापनी यह दोष रहा, जिसमें ली नसर्ग नर अपवाद, सो नस्तर्ग तो सुप्त, अपवादको प्रवृत्ती, सरागसंजमी रहे,चीतरागसंजमी लुप्त, इत्यादिक कग्नि मार्ग सूत्रोंमें वांवणे योग्य ठहरगया, पापसमें कयायकी चोकमीका व. रतावा देखके मध्यस्य हो के रहै, आरंजत्यागको इमेसा युक्षि रखे पंचमकालमें वोही साधू दे, जतियोके चेला वणाणेमें इतना फायदा हे-मिथ्यात्वकुलसें जैनकुल में लाणा, खेती आदि गृहस्थाश्रम- का पाप ज्ञानपढे बाद आपसेंही गेमदेणा, केश्यक इनों में चोथा पांचमा वहा सातमादि गुणवाणे चढसा, श्रावगवर्नका इस नव परनव संबंधी अनेक कार्योंका सघाणा, इत्यादि लान परजीवकू सच्च धर्मकी श्रद्धा कराणेवाला तीर्थकर गोत्रकर्म बांधता है, प्रोममें विचारणा ॥ प्रश्न-जिनोकुं पढाया नही ना गुरु मरे वाद गुरूके क. माये धनसे पापारन करे तो वह पाप चेलेका गुरुकुं जरूर लगे या नही ? उत्तर-जिस मातापिताने मरणके वखत सर्व परिग्रह वोसिराय दिया ननोकों पाप नही, उस परिग्रहसे करे जो पापारल सो करोयालेकू लगेगा, मातापिताकुं नही, यद्द जैनधर्मका .
मर्म है, मातापिता गुरु शुन अनुदान सिखलाते हे संतान वेस
करे तो जरूर शुजफल मिले,
जूआ
चोरी आदि कुविसन गुरु ति.
खलाते नदी इस वास्ते करै करावै.श्रनुमोदे चसकू पाप लगे ।
घोकानेर.वडे उपासरे पास जैनविद्याशालामें न० । श्रीराम
लालजीगणिः पं । क्षेमचंदजी मुनि पासे इतनी पुस्तकें मिलेगी.
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४
रनसमुभव
सोलेचाणक्य स्वरोदय जापा
करुणायनीस। दादासाहिवपूजा
मूर्तिमंकणका यदन्नुत यंत्र सिझमूर्तिः
सर्यपूजामहोदधी खरतरगतपगकी
मायकम्पपदारालंकार
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G
४
विज्ञापन. ॥ अथ वर्तमान आचायोंके करणे योग्य कर्तव्य ।। ॥ प्रथम तो आचार्य जातिवंत रूपवंत जर विद्यावंत सुशी. सदी होणा चाहिये, चाहे आचार्यका शिष्य होय चाहे नक्त लक्ष- सवाला उसरा कोई होवे, यह सर्व संघकी सम्मतीसही होगा, फेर हमेंसा शास्त्राच्यासी होणा, बहोत प्रमादवंत नहीं होगा, देश देन काल जाव मुजप सदा गवकी सारसंन्नालसें जैनधर्मके दीप- क होणा, वेजा चलणसे यतीयोंको हटकणा, ननोके मन मुजब नही चलणे देशा, सांगित पुरुपकी संगत नही करणी, नन्नय काल प्रतिक्रमण करणा, अन्नसके त्यागी होणा, सूरिमंत्रका नित्य जाप करणा, देवदर्शन र धापनाचार्यादि पमिलेहण करणा, जती जतपीकू शुइ परंपरागम वेप नर संघ तारीफ करे एसे मार्ग में प्रवाणा, इस नपरांत जो आज्ञा न माने नसकू गणादही करणा, स्वार्थके वश कसूरदारका पक्षपात न करणा, अवै सुशील पंडितो की सोहबत करणी, क्षमावंत नी होणा, समय नी सोचणा, न. पदेश करणमें हुतियार दोपा, नपाध्याय वाचकादिपद योग्य नर मितकू देणा, स्वार्थके वश मूर्ख जर भयो र बुद्धिहीन अव- स्थावृद्ध कलहकारकू न देणा, अपणे२ गच्छके अविष्टायक क्षेत्रपा- ल मानतद्रादिकके साहायसें धर्मके द्योत वास्ते मंत्र यंत्र तंत्रा- दिक विद्या लब्धिवलसें संघमें परोपकारी अष्ट माहा प्रत्नावोक दोणा ॥ इति ॥ ।। अथ उपाध्याय कर्त्तव्य ।। ॥ सूत्र अर्थ अनेक शाखोके पहने र पढ़ारोवाले होगा, अर्धमानविद्याका..नित्य जाप करणा, रात्रीचोविहार · नवकारसी . . --...
'(१४ प्रादि तपके कर्ता, शिप्यादि वर्ग• सुविहित मार्गमें चलाणा, गठ के घोरी आधारभूत साक्षात् प्राचार्य तुल्य शुन्न अनुष्ठान के कर्ता होणा।। इति ॥ ॥ वर्तमान त्यागीसाधूओंके कर्त्तव्य ॥ ॥ गुजरातादि एकदी देशमें सुखार्थी होके रहणा नही, जहां पुस्तकोके नंकार नहीं दे नहां पुस्तक लिखवाके नंमार करवाणा, अपणी निश्रायें हजारो रुपेके पुस्तक लिखवाके श्रावकों पास लेगा यह साधूनंका धर्म नही, फकत अप- ऐसें नठे नर नित्यं हण होय इतने मात्र पुस्तक रखणा, वांचनेकुं चहीये तो ज्ञान मारसे लेकर पीवा देणा, जहां चोमासा करे अथवा शेपाकालमें रहणा नस क्षेत्र में जिस२ व. स्तुकी आवश्यकता होय सो नहां नपदेश दे के करवाकर सही क्षेत्रके संघके सुप्रत करवादेणा, अथवा उसरे केत्रोके समर्थ भाव. कोंसे करवाके नेजादेशा, गृहस्थोसें वैयावच्च कराणी नही, उती योगवा इसकालमें श्केला विचरणा नही; जंघात घट जाय तो एक जगे रहणा, जती पंमिताहीसे तो पहली ज्ञान पढे र फेर कृतघ्नी होकर ननही की पीठी हीलणा नर निंद्या करणा यह योग्य नही, धर्मके श्रादि रक्षक नर बीजभूत जतीही दे क्योंकी जतियोंफेदी प्रतिबोधक सवाल पोरवाल र श्रीमालादि श्रावक हैं, फेर इन जतीयों में ही हजारों त्यागी वैरागी इस पते सम- योनी होतेयाए दे, तपा सत्यविजयजी 'जिनके शंतानमें बुंटे- रायजी नर आत्मारामजी वगेरे नये हे, खरतर अमृतधर्मजी नपा- ध्यायजी कमाकल्याणजी श्यते.पूर्वपुरुष.इनके संतान धर्मानंदजी राजसागरजी सुखसागरजी वगेरे नये देंजर विद्यमान समपमें मुनिराज शिवजीरामजी मोहणलालजी. किरपावंदजी नापचंदनी वगेरे अनेक विचरते हैं सो तुम हम देखते हैं, इस वास्ते झानः दर्शन चारित्र इन तीनूंकी जम इन पुरुपोके जतीही हे इस वास्ते जतीयोका घराणा रत्नोकी खाण हे, खाणमें रत्न कालपाके निकल- ते हैं, जतीनी प्रमादी उठे गुणस्थानको केश्यक वर्तते हे तर आजकलके साधूती केश्यक प्रमादी गुणस्थानवी हे इस वास्ते केश्यक तो गंने दोप लगाते हे केश्यक प्रगट, केश्यक तो जती- योमें नाव करके पंचम गुणाणी हे केश्यक चतुर्थ गुणामणी, इसी तरे साधुनके मुजवही शुन्न नावसंयुक्त जतियोके नाव श्रा- श्री गुणाणा समझणा, निश्चयसम्यक्त तो साधू एक पाश्री तथा जती आश्री केवलीनगवान कह सकते है तथापि जैनधर्ममें व्यव- हार शुन्न बलवान हे, लोचादि कायक्लेस तपके फल मनुष्य देव थाश्री सुखकी अधिकताईके हे, देखो गुणस्यानककमारोहप्रकर्ण रत्नशेखरसूरि कृत ॥ कषायकी बहुलता आजकल साधूनमें ज्यादा देखणेमें श्राता दे, गणश्वालोलें आपसमें देष रखते है, खरतर तथा तपोके ना देखणेमें प्राता है, जब कषाय विद्यमान हे तो सिइिपद केसे सधेगा वलीहारी ननहींकी हे जिनोंने कपायकी चो. कमी त्यागी हे. किंबहुना ॥ इति ॥ ॥ अब जतीलोकोका संक्षेप कर्तव्य ॥ ॥ जाति ब्राह्मन वणिक् राजपूत जाट वगेरे उत्तम जाती का चेला तीन च्यार वर्षको अवस्थावाला होय सो लेगा यावत् धारे वर्ष तकका नपरांत कमरवाला पढता नही जर बहोत गेटा. लेणेसें धाय रखणी होती हे नसकी पालगेट करणळू तब वहोतसे कमजात अपणी एचकू विपाणेकू निंदा करतेहुये कलंक लगाते हे लेकिन न्यायवंत तो पूर्वीपर विचारे विगर मूंमसं वात नदी निका- लते मूखोंके कहणेसें सोना पीतल नही वणता, उष्टोंका स्वन्ना .
वहीं होता है सौ गुणमें नगुण निकालते हे, नर्तृहर लिखता है- सूरवीरकुं निर्दऽ . कहते हे गमखारोयालेकू मरोक केते हे ब्रह्म- चारीकू नामर्द इत्यादि अनेक दृष्टांत हे, खैर एसे चेलेकू मुखपाठ जैनधर्मका अवस्य कर्त्तव्यं गुणाना नित्त फेर अकर यांचने सि. खाणा अक्षर जमाणे चोलखा पाटी सिखाणी फेर कोश व्या- करण काव्य न्याय ज्योतिष वैद्यक बुध्यानुसार सीखाकर जी- वविचारादि पट् प्रकर्ण सूत्र सिद्धांतोकी व्याख्या सिखापी, चोल- पट्टा मुंहपत्ती नघा मांझा चेदर पांगरणी स्वेत हमेसा रखया, म- स्तकके वाल केचीसे कतराणे या उस्तरेसें मुंमाणा, पादत्राण स्वे. त बस्त्र ऊपर दियेहुये शीत नप्य कांटा वगेरे के उपसर्ग मरुधर देशपाश्री पहरणे दक्षिण पूर्वमें प्रायें नही नहीं एसा नपसर्ग नही देश विरुधके कारण त्याज्य हे, प्रवचनसारोधार ग्रंथमें का- रणविशेष साधूनको पादत्राण पहरणेकी आज्ञा हे, पुस्तक लि. खणा पातरे पाटी वगेरे रंगणा ऍग्रया तिरपणीके मोरे वणाणे माला.वगाणी गेकरे पढाणा मंत्रविद्यामें शलाता रखपी सोनी जिनधर्मके अन्यके नहीं, रातर्फे चोविहार नवकारसी पोरती प्रमुख यथाशक्ति तप करणा, दोनुं वखत परिक्षमणा करणा, उत्ती शके सञ्चित त्यागणा, राजदमे लोक में एसे रस्ते नही चलणा, कुलम- र्याद सोपणा. नही, चिलमचुट्टा. वगेरे जैनधर्मके कायदेके वरखि सापनसा, पीणेवालेकी संगत. नही वेग्गा, कुक्तिनीयोकें संगतसे लगता है, श्रावक जो द्रव्य देवें सो सुक्रतार्थ लगाया तीर्थ- चेला लेणा ननो खिलाणा पिलाणा पंतोकों रुजगार देके पढाणा, पुस्तक लिखाणा अंत समय “जीवराशी खमाय गही सुरुतकी अनुमोदना कर सब वोसराके परजव. सा: देणाः॥ इति 1... १
11 अथ श्रावकोंका कर्त्तव्य ।।
॥ सुखनंबोधी श्रावकोंके कीस गुण सिंहांतों में लिख
नस गुणोकू धारणा चाहिये. गांगसूत्रमें साधुनकी प्रतिपाल
रणेंसें श्रावकोंकं मातापिता तुल्य लगतनें कहा हे, बालक
नौ करे तोनी मातापिता अपणे शंतानपर अंतरंगसे कन्नी
नहीं करते हैं, इसी तरे श्रावकोंकू साधुलोकोंसें वर्तगा चा
नेपधारीसाधूनमें कोर तरेकी एब दीखपमे तो एकांतमें हिता
देके
ढमाणा चाहिये, नहीं माने तो वालकहूं धमकावे जेसें
काणां चाहिये, इस उपरांत सुधरते नही दीखेतो कोंकी वि
ता समझ के एसोंकी संगत न करे, जैनधर्मकू लजावै एर्स
कोइ नही होय तर शरीरके परवशता अथवा देश केत्र काल
के कारण अपवादमार्गमें चलते होय नर गुणवान होयत
गुणकी कदरदानो नारायणकृष्णकी तरे जस्रं करणी, रEि
मकू लजावै एसा होयतो नहांसे रुकसत करादेशा. जिन
नर नपातरेकी आवंद खरचकी सारसंन्नाल जरूर करे, विनास
किये बहोतसे मंदिर नपासरोंकी तजवीजें बिगम रही है,
लोक खागये हे, ती शक्त इस वातका खयाल हरतरेसें को
पणा लमका लम्कीयोकुं संसार विद्या नर धर्मकी मजबूती
ऐकू पझिमणा वैत्यवंदनादि श्रावकाचार नर जैनन्या
स्त्री अकर बचपणेसें सिखलाणा चाहीये देव गुरु नर वर
जयतोकी संगत करवाणी चहिये, विरादरीमें सनातन कुलम
दसें जो विपरीत प्राचारणा कर उसकी देखदेख आपने
। वसे जहांतक नणोंको भी रोकणा, विद्यमान अंग्रेजी इल्म से
कू सिखलाये तो पहली जैन न्यायतें हुंसियार कर पीने सिख
क्योंकी इस अंग्रेजी श्ख्मकी ज्यादा किताबोंके पढऐसें पीने
,
.
(१०) - सत्य सनातन दयाधर्मका मुपदेश सगणा मुसकिल होता दे, निधर्मकी नन्नती पर कमर बांधणा नर अंग्रेजीमें चोथे दरजे स होकर हाल मुकाम जेपुरमें ढढ़ा गुलाबचंदजीकों दम धन्य- द देते हैं इस वजे वेलासक पढे नर पढाये, जैनधर्मके कायदेकी जबूती नर तारीफ़ जिसने समझा हे वोही जाणता हे नर लस- • मुसककी वसवो कब लग सकती है, जिनोंको संसारमें अनी होत नवभ्रमण करणा वाकी रहा हे ननोंकों जैनधर्म किसी तरे चता नदी. को संका करेगा जैनधर्ममें पंथ न्यारे२ दे मानेनी कोन सज्ञानर कोण कूठा ? (नत्तर ) हे जव्य हमने पेस्त- ही सिखा दे न्याय जो जैनका सात नंगरूप दे उसकूँ समझा र वस्तुन पर घटातेही यथार्थ मार्ग मिल सकता है. ( प्रश्न) इ. ती बुद्धि र परिश्रम तो करणेवाले प्रोफे में सो एसा न्याय प- 5. निधया करे सहजमें निश्चय केसे दोय ? (नत्तर ) जो इतना ही समझो तो जो झपनदेवजीसे लेकर श्राज दिनतक जो स- जतन जैनधर्म चलता याया दे योही जैनधर्म सध्या हे वीचर अल्पज्ञोने यइंकारके वस मनोकल्पित फंदसे एक नय पकरके पनेर मत खसे किये है, पट्शास्त्री चौदेपूर्वधारी दशपूर्वधारी युक्तोंकार नगवान नचा दुस्वामी नमास्वाती नाप्यकार जिन- गणी क्षमाश्रमण इत्यादि पंचांगीकार जो समुद्र सरीपे चुदी- धणी ननोंने जिस बातका निश्चय किया वोही सचा जैनधर्म मकता, आयगधर्मवालों पर कमा उपगार रत्नमानसूरि र दादा जिनदत्तसूर प्रमुख थाचार्योने किया सो कश्यक पापान बातें तो इस जातीके कायदेसेंटी यंध होगई दे, जैसे मयका पा र मांसादि अनय खापा सेकिन अाजकल कर्मके यस र एसे उनम कुलमें निरसी पोनें योगतीको समकया.
. धणे पर मुस्तेद हुये सुगनेमें श्राते दे, चिंतामणीरत्न समान जैन धर्भ पाय के निरत्नाग्यकी तरे क्यों हायसें फेकते हो पीठे पठ. तावा होगा योझे दिनको जिंगगानी है, मदिरा पोरोमें बावन गुण हे एसें मांतमें देखो जैनतत्वादर्श नापाय, यही चीज अग होती तो तुमारे धमेरे लाखों राजपूत इस चीजोंकों क्यों गोमते नर मुसलमीनोकों नो धमकायदेसें इस वातकी सकत मनाई हे इत्यादि, किंबहुना ॥ जैनपाठशालान स्थापन करणी पढनेवालोंको अन्न वस्त्रादिसे सत्कार करणा चाहिये, जैनकोममे संप नही इसका मूल कारण विद्यारहितपणा है, पं. मित तो दुस्मन लो अग होता है मूर्ख हितकारी नी कामका नही, विद्यावान सब काम विचारकेह। करता है मूर्वके विनाका- रण द्वैप तर अहंकारीपणा होता दे वाकी तो कवियोंने कहा है- उहा ॥ सऊन जाके सो नही, इस्मन नही पचास॥ जरानी जगके क्या किया, नार मरी नव मास ॥१॥ श्रावक जितनी चीज अपणे उपनोगमें लेता हे सो सब नतम चीजका दान करता हे एक स्त्रो वर्जके उस करके जन्मांतरमें लक्ष्मीकी एश्वर्यता नाग कर संसारका पार पुन्यानुबंधो पुन्यसें पाता दे मुक्तिपंय जाते हुये जीवकू पुन्य वोलानरूप दे, अन्न वस्त्र उपयी सज्या पात्रादिक साधुनंकों देचे, देवके निमन अष्टव्य गहणे वस्त्र अनेक प्रकारकी पूजानते दान करे, ग्यानके वास्ते पुस्तक पूग वगेरे ऊजमणे दान करे, सा- धर्मी तथा जैनमितोंकू नगदद्रव्य वस्त्र नोजनादिक यथायोग्य दान करै, तीर्थकर नगवान नी संवत्सरी दान देते हैं, दानधर्म मुख्य हे जगवतीजीमें ग्रहस्यका अनंगदार कहा है, नगवतीसू में तीन गुरु कहे दे सिख्यगुरु र जो कारोगरी सिखलावे सो, क- खागुरु २ जो लिखा पढणादि ५२ कला सिखलावे सो, धर्मगुरु , (२०) सामायक पमिकमणा नवतत्वादिक धर्मका नपदेस दे के मुक्ति पंथ बतलावे सो, इन तीनोंकी श्रावकं यथायोग्य नक्ती करे । अब चननंगी लिखते हैं । सम्यगज्ञानवंत देसें विराधकं । । । कटरूप क्रिया करणेवाला देशाराधक । २ । ज्ञान र क्रियारहित सर्वे विराधक । ३ । ज्ञान र सतक्रियावंत सर्वेआराधक । ४ । ॥ इति पत्रिगुरु निर्णयः ॥ विशेष श्रावकोके करणे योग्य कर्तव्यं देखणा होय तो हमारा पाया श्रावग व्यवहारालंकार देखो । ॥ अथ मंदिरके पूजारीयोंके कर्तव्य ।। मारवाममें प्रायें जैनमंदिर जोजगदीं पूजते हैं ननों में इस वखत प्रायें मिथ्यात्वी बहोत सम्यक्ती वहोनही कम है, गुजरातमें जोजोज जैनमंदिर पूजते । सो सब जैन हैं जिनोंको अन्य देशमें गंधर्व कहते दें. (प्रश्न ) पूर्वोक्त लोजकोंने जैनधर्म कबसे गेका दे ! (उत्तर) पहले श्रीरुपनदेवजीने नोगवंश स्थाप- नकर अपणे कुलके प्रोहित बनाये, पीचै नरतजीने ब्राह्मणवंश स्थापन करा; राजा सूर्ययशने नोगवंशीयोंको पूज्य जाणं जिनम- दिरोंकी सारसंन्नाल सोपी लेकिन जिन मंदिरका चढापा मंदिरके कूटपर धरायोजाताया जैनधर्मी होगसे बलिदान भोगवंशी नही तिथे वो सब परखी जानवर खायांकरते, इनकी अनेक तरेसें पर्व महोउच पर व्य वस्त्र जोजनादिकसे राजा नर प्रजा सब संकार करतेये वो सब नवमें दशम नगवान के अंतरमें मिथ्याधी दोगये बाद कन्नी कोर जैन कन्नी मिथ्यात्वी एसे होते चले थाये, जब २४ से वर्ष पदले. नसीयामें जैनधर्म फेला तब राजाके पुरोहित राज- पतोके संग लोगवंशी फेर जनधी होगये तब राजा नपलदेव प. मार वगेरों में जकी नर बदुमानता के संग जिनमंदिरका पूजारी घशी तामी घाह्मण जोग मुमत कीयागया, जिसके बाद विक्रम (२१) संवत् बारेसमें रामानुज माधवाचारी बगेरोने विष्णु संप्रदाय नि: काली, उसही जमाने में अनेक राजन्यवंशीयोंको दादा दत्तसूरजो ने लाखो वाल फेर वणायें, तब राजवीयोने गुरूसें अरज की इस दयाधर्म के प्रस्ताव निर्दयीपणा हम लोकोसे होगा नहीं राज्य तो सदा थिर रहणा नही आगे दम लोकोंका अहवाल क्या होगा, गुस्ने कहा जो जिनमंदिरोकी नती र जतोगुरुकी सेवा अन्न त्यागादिक हमारा धरायादा जैनधर्ममें जहांतक चलोगे तदा तक पार्टका मालक राजा नेर सर्व थाटका मालक तुमलोक रहोगे तथास्तु वरदान एप्लाई नया; राजानने अपसें नाई स्वजनवर्गी सवालोंकू प्रधान दाकम सेनापती आदि सर्वस्व अधिकार यना- योग्य सुप्रत किया, तबसे २२ सो रजवानोंमें नतवालोंका राज्या- धिकार वणी तबसे तवालीने महरवानी रखके विष्णुमंदिर शि. वालयादिकोका पूजारीपणा नीलोजकोंको सोपा वह नोगवंशी फेरपी घोर मिथ्यात्वी वणवेठे, विद्याहीनता होरोसें सब तरे 'की हीणता होगई आखिरको लोक ब्राह्मण नोजकोंकों कर्म कर करके मानणे लगे पूज्यन्नाव मॅग्गया, जो कन्नो नोजकलोक एसा समझते होंगे की हम तो अंदलतेही शैव वैष्णव थे (उत्तर ) यह समऊकी नल दे हम पहली खिखदिया हे जैनधर्मकी वहु- लायतमें प्रजा जैन रही, बोधोक 'अमल घोद्ध, शांघाविकोके अ- मलमें सांख्य, इत्यादि बातें तवारीकोसे नी पाईजाती है लेकिन जैनधर्म तर मिथ्याधर्म दोनों अनादि कालका दे इतनो नोज- कोंकों जरूर समजैसा चाहिये जो तुमलोक सदा मिथ्याधी हो- ते तो राजा नपलदेव पमारादिक परमजैन तुनारा लागा नर बहु- मान नसवंश परं कन्नी नही लगाते, मियाधर्मीयोका जोर जुत्त- वाले जैनोपर का संग संकताथा इतनेमेंदी समझगा, पीतें ( २२ ) विष्णुमंदिरोको पूजा र राजा वगेरोकी देखादेख संग दोष लगा, उसवालोंने तिथ नहीं कर वध गया. इस तग्दी बहो- तसेसर्वशीनी युप्तामदीसे उतरा धर्म धारलिया तुमको क्या कह सकतेथे, खैर इस बातोंसे हमारे कुछ मतलब नहीं मती जैसी गती दे लेकिन अब हम धागे लिखते है उस पर अमल करशा तुमारा फरज दे, लोकोक कहणावट नो हे “जिसकी खावे बाजर) जिसको लरणी हाजरी” नसमें हरज़ करणेसे -निमकहराम कहलाता हे ॥ अंतरंगनतीसें जिनमंदिरमे कामू देणा, वरतन मखणा, अंगलूहणा धोफे साफ रखणा, वस्त्रोंकी शुद्धी अंगकी शुद्धी विगर जिनमूर्तीका स्पर्श नही करणा, पूजा एसी साफ करणी सो श्रातपास मैल जरा जी नहो रहणे देशा, दीपक जलारोंमें ढकसा वगेरे देकर जीवरका करणी, जल शुभ वागणे आदि पुष्पके जीवजंतु देखणे आदि पूजाकी सामग्री ब- होतही विवेकसे रखणा, देवश्व्यकी चोरी नही करणी, इक्कमें दरकत झालणा नही, देव र गुरुकी सेवा करणेतें तुम्हें सेक्गपद मिला है, जो नावसे करोगे तो जन्म सुधरेगा अगर कोंके वश जो श्रद्धा.नही आवै तो जिसकी व दौलत रोटी आदि . सश्कों रुपे पाते हो.मरणे परणे मंदिर श्रीपूज्य उपासरे के जरीये तुमें सड़कों रुपै श्रावक देते हैं वो सब देवगुरुका प्रताप समझ इन दोनोंकी सेवा तन मनसें बजाया करो ॥ प्रलंविस्तरेण ।। ऊपर उनपदेश में लिखे हे कोइ कगेर लवज लिखा होय तो माफी मांगताह सरसन्नावसे लिखा दे देपसें नही । इस ग्रंयके गपणेमे काना मात्रा ज्यादा या कम जो रह गया होय.सो सुधारके वांचे या गुरुसें.शुःइ करालेवें में मनशु. दिसें सर्व संबसे क्षमा मांगताएं सऊन तो सदा गुणग्राहीही होते.
पी माण (२३) है, चनोंका में सदा आजार मानताएं ॥ यतः ॥ तथापिक्रियत ग्रंथ, संतिपद्यपिउर्जना | नहिदरयुत्नयालोको, दैन्यवानिहवन्ते ।। ॥ १ ॥ अर्थ-ग्रंथ संग्रह तोनी करताहूं यद्यपि उरजन बहोत हे चोरोके मरसे लोक कंगोल नही बंश वेग्ते तेसे १ मेने अपने हायसे लिखरकर मुंव नेजकर शिष्यवोंके केणेसे इसमें सं. ग्रह मैंने अनेक ग्रंथोसे किया , पदोत चीज पं । श्रीप्रवी- रचंजीमुनिःसे लीदे, पुस्तक यह बहोतही रत्नरूप संचय हे, रुपनदेवजीको आदिप्रकर।रे । महावीरस्वामीका । म। इन दोनोंसे वर्णा जो। राम । ननोके मध्यवर्ती सब नगवंतोके गुणोका विलास इतवास्ते इस ग्रंयका रत्नसमुच्चय तथा रामविलास यथार्थ नाम है। ॥ परम मंगल श्रीदादाजीके काव्य सवईया ॥ दाशानुदाशाश्वसर्वदेवाः, यदीयपादाब्जतलेलुति ॥ मरु- स्थलीकल्पतरुःसजीया, कुगप्रधानोजिनदनसूरिः॥१॥ चिंताम- गिः कल्पतरुवराको, कुर्वन्तिजव्या:फिमुकामगव्या ॥ प्रसीदतःश्री जिनदत्तसूरैः, सर्वेपदाइस्तिपदेप्रविष्टाः ॥ २ ॥ नोयोगीनवयोगिनी, नचधराधीशस्यनोशाकिनी ॥ नोवेत्ताल पिशाचराक्षसगणाः, नोरो- गशोगोनयं नोमारीनचविग्रहः, प्रनृतयः प्रीत्याप्रणत्पुच्चकैः ॥ य- स्तेश्रीजिनदत्तसूरि, गुरवोनामाकरंध्यायति ॥ ३ ॥ ॥ अथ स. वया ॥ बावन वीर किये अपणे वश, चौसठ योगण पाय ल. गाई ॥ मारण साश्ण व्यंतर खेचर, नूतरुप्रेत पिशाच पुलाई । बीज तमक कमक लटक, अटक रदै जु खटक्क न काई ॥ कहे मसीह संधै कुरा लीद, दीयै जिनदत्तकी एक पुहाई ॥१॥ इति ॥ राजै झुंन गैरौर, एसो देव नही और ॥ दादौ दादौ नामसे, ज. गत्र जश गायो हे॥ प्रापऐंही नाव प्राय, पूजै सरक लोक पाय ॥ प्यासनकू रानमांकि, पाणी प्रान पायो है | arm - ७ . भ-
.
(२३).
हाउ पुर प्राटसमें ॥ देव गेद नेहते, कुशल वरतायो हे॥ धर्मसी
हू ध्यान घरे, सेवकां कुशल करे, साचों श्रीजिनकुशलसूरि, नाम युं
क्रहायो ॥ १ ॥ कुशल अंग नवरंग, कुशल वणिजै व्यापार, कु-
शल देव देहरे, कुशल धन राजवारे ॥ पुन्य पसाये कुशल कुशल
श्रीसंघ नपीजे, वाहण आवै कुशल कुशल घर२ गाईजे ॥ जिन-
चंद्र सूर पुइ पट्टधर नाम मंत्र प्रारति टले, श्रीजिनकुशल सूरि
पाय पूजतां नव निधान लक्ष्मी मिले ॥ १ ॥ कुशल वमो संतार
कुशल सऊन घर चाहै, कुशले सश्गल माल लधि घर कुशने
श्रावै !| कुशवै घन वरसंत कुशल धन धन्नरुवन्नो, कुशलै घोमां
यह कुशल पदरीय सुबन्नो ॥ एरसो नाम सदगुरुतणो कुशलै जग
रलियामणो, नट्टारक श्रीजिनकुशल सूरि नाम ग्रहणे करी घर
होय वधामणों ॥ १ ॥
(२५) रत्नसमुच्चयग्रंथस्यानुक्रमणिका. पृष्टीक. .. ... م م م م ه م bha ... ... ... - .. ग्रंयोका नाम. १ ॐकार विजसंयुक्तादि मंगलाचरण २ स्वरवर्ण ३ वर्णव्यंजनमाला । शिक्षावाक्य ५ संधिसूत्र ६ हितोपदेश ७ उिनुं जिन नाम सोले सती नाम ॥ प्रतिक्रमण सूत्र प्रारन ॥ ७ नवकारमंत्र... ९ थापनाचार्यजीकी तेरेपमिलेहरा १० खमासमरा ११ सुगुरुने शाता सुखपुबा १२ मुहपत्ती पमिलेदणके पच्चीस बोल १३ अंगकी पच्चीस पमिलेदण १४ सामायकका पञ्चरखारा १५ इरियावदि... १६ तस्सनत्तरी.. १७ अन्नचूससिएणं १८ लोगस्त रए वेसमोसंदिस्सा - .. ... ... ... ... ... - ... ...
हाठ पुर पाटणमें ।। देद गेद नेहसें, कुशल वरतायो हे ॥ धर्मसी,
ह ध्यान घरे, सेवकां कुशल करे, साचों श्रीजिनकुशलसूरि, नाम यु
कहायो हे || १ || कुशल अंग नववंग, कुशल वणिजै व्यापार, कु-
शल देव देहरे, बाल घन राजवारे ॥ पुन्य पसाये कुशल कुशल-
श्रीसंघ नतीजे, वाहण श्रावै कुशल कुशल घर२ गाईजे ॥ जिन-
चंद्र सूर पुद पट्टधर नाम मंत्र प्रारति टलै, श्रीजिनकुशल सूरि
पाय पूजतां नव निधान लक्ष्मी मिले ॥ १।। कुशल वो संसार
कुशल सऊन घर चाहै, कुशले मश्गल माल लधि घर कुशले
पावै ।। कुशलै घन वरसंत कुशल धन धन्नरुवन्नो, कुशलै घोमां
अट्ट कुशल पहरीय सुवन्नो ॥ एरसो नाम सदगुरुतणो कुशलै जग
रलियामणो, जट्टारक श्रीजिनकुशल सूरि नाम ग्रहणे करी घर
होय वधामणों ॥१॥
(२५) रत्नसमुच्चयग्रंथस्यानुक्रमणिका- पृष्ठांक. H ~ ... २ ... ... ... .. ... ... ... ७. ... १० ग्रंशोका नाम. १ ,कारं विंसंयुक्तादि मंगलाचरण ३ स्वरवर्ण ३ वर्णव्यंजनमाला । शिक्षावाक्य... ५ संधिसूत्र ६ हितोपदेश .. ७ चिन्तुं जिन नाम सोले सती नाम ॥ प्रतिक्रमण सूत्र प्रारन ॥ नवकारमंत्र ... ९ यापनाचार्यजीकी तेरेपमिलेहण १० खमासमा ११ सुगुरुने शाता सुखपुबा १२ मुदपत्ती पहिलेदणके पचीस बोल १३ अंगकी पञ्चीस पहिलेद ११ सामायकका पञ्चखाण १५ इरियावदि... १६ तस्सउत्तरी. १७ अन्नससिएण १८ लोगस्त १ए वेसमोसंदिस्सा ... ... ... ... ... ... ... 4. ... ... ...
...
...
...
...
३० दवालय पालान
३ए रात्रि संबंधी अतिचार आलोयश !
५० अगरे पापस्थानक आलोयण...
४१ श्रावकवंदित्तासूत्र
१२ वंदितासूत्र पीकी विधि
४३ थनिमि
१४ आयरिय नवझाए
.
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२६
... ... ... ... ... (२७) ५ श्रावस्यककीमुहपत्ती २७ ४६ सकल तीर्य नमस्कार ४७ परसमय तिमरतरविं २० ४८ संसारदावाकीस्तुति... ४९ कानसग्गमें स्तुतिका पृयग् पाठ ५० अढासु दीवसमुद्दे ५१ जय२ त्रिन्नुवन० सोमंधर चैत्यवंदन ५२. सीमंधर स्तवन ।। श्रीतोमंधर सादिवा... ५३ सीमंधर स्तुतिकी एक गाया महीममणं ५४ सिद्धाचलजीका चैत्यवंदन जपर नानिनरिंदनंद३५ ५५ सिहावल स्तवन । सिद्धाचलगिरिलेट्यारे ३२ ५६ सिद्धाघलयुश्शेत्रुजगिरिनमीये रुपनदेवपुरोक३३ ५७ पहिलेदण विधि ५० सामायक पारनेकी विधि ५९ जयवं दसान्नदो ६. संध्याकालसामापक विधि ६१ देवसी पमिकमा विधि ६२ जयतिप्रश ६३ जपमहापश ६५ महावीर स्तुति।।मूरति मनमोदन कंवरा को० १० ६५ स्तुति कहां पोटेकी विधि ६६ श्रुतवताको स्तुति... ६७ क्षेत्रदेवताकी स्तुति... ६८ वरफनक ४३ ६५ नमोस्तु पर्द्धमानाप... ... ... ... 3 ... ... Ho ... ... ... ... ४१ ... ... ४१
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.. ... ... ... ... ... (0) ९५ परकीसूत्र.... ए६ अपहरी पोसेकी विधि ९७ पोसदका पञ्चरकाण .. ९८ चोवीस ग्रंमिला करणेका पाठ ९९ श्रमिलाकहाकरणा ९३ १०० पांचे शक्रस्तवे देववंदण विधि... १०१ पच्चरकाण पारणेकी विधि. ए५ १०२ राइ संथारा विधि ... १०३ पोसह पारणेकी विधि एए १०४ दिन नग्मां पी पोसह लेणेकी विधि १०० १०५ रात्री चोपुहरी पोतेकी विधि... ૨૦૨ १०६ गणेकमरों चंकमणे... ॥ देववांदणेमें अथवा प्रातःकाल संध्याकालके प्रतिक्रमसमें कहनेकी स्तुति ॥ १०७ दूजकी शुरु ॥ मदी मंझणं. १०३ १०० पांचमीकी शुरु ॥ पंचानंतक०... १०४ १०९ आग्मकी युश॥ चोवीसे जिनवर... १०४ ११० मैनिएकादशी स्तुति ॥ अरस्य प्र० १०५ १११ पार्श्वजिन स्तुति ॥ ३कि चतुर्दशीकी... ११२ निरुपम सुखदायक । नवपद स्तुस्ति ११३ वलि२ हूं ध्याळं ॥ पजूषण स्तुति ११४ सुर असुर बंदियं । नेमजिन स्तुति १०७ ११५ पापायांपुर चाहः॥ दीपमालिका स्तुति... ॥ थुई संग्रद॥ ११६ पंचविदेद विफ. विदरतावीसविहरमान स्तुतिः१०८ ... ... ... ... ...
... ... (३०) ११७ समामोत्तम वस्तुमहापणं ।। पार्यस्तुतिः १०ए ११० वरमुत्तियहार ॥ शपत्नस्तुति ... १०९ ११९ प्रण, परमपुरुष ॥ ज्ञानस्तुति १०५ १२० विश्वनायक सायक ॥ अजितजिन थुर... ११० १२१ यहिनमनादेव० वईमानस्तुति ११० १२२ वीरंदेनं० वीरजिन शुश् १११ १२३ मुरति मनमोदन० वीर थुई १११ १२१ चवीस जिन पंचकल्याणक स्तुति १११ १२५ श्रीशैत्रुजमंझण धादिदेव | सेवज थुई... ११२ १२६ गिरनार शिखरपर० नेमजिनस्तुति ११२ १२७ सुख समकित दायक. शीतल जिनथुई... ११३ १२० मिल चोविद सुरवर० समवसरणस्तुति... ११३ १२९ सेठेजगिर नमियै ॥ चैत्रीपूनमस्तुति ११४ १३० समरूं सुखदायक० नवपदस्तुति... ११४ १३१ शिवसुख दाता ॥ वीसथानकस्तुति ११५ १३२ अरिहंत सिद्ध पवयण० वीसस्थानक युई ११५ १३३ अनुपमगुण आगर० नवपद स्तुति १३४ विमलाचल मंगण जिनवर ॥ शेजय स्तुति ११६ १३५ शांतिजिनेसर जगप्रलवेसर ॥ शांतिनाथ थुर ११७ १३६ मन सुध वंदो नावे नवियण॥सीमंधर स्तुति ११८ १३७ पंच अनंत महंत गुणाकर० पंचमी स्तुति ११८ अरनाथ जिनेश्वर दीका ॥ अग्यारस स्तुति ११९ जयकारी जिनवर वासुपूज्य || रोहणी स्तुति ११ प्रथम तीर्थकर प्रादिजिनेश्वर ॥ परकी चौदशस्तु१२० ... ... ... ११६ -- . ... ... ... .. १३७ ... ॥ अथ स्तोत्र संग्रह प्रादौ सप्त स्मरणानि ॥ १४१ अजित शांत स्तव प्रथम ११२ नल्लासिकम ॥ द्वितिय स्तव लघुअजित शांति १२५ १४३ नमिकण-॥ तृतिय स्तव १४४ तंजयन ॥ गणधर स्तुति चतुर्थ स्तव ११५ मयर दियं ॥ गुरुपारतंत्र्य ॥ पंचम स्तव ११६ सिग्यमवहरिन० पट स्मरणं... १३१ १४७ नवसग्गदरं स्तोत्र ॥ सप्तम स्मरणं १३२ १४० जक्तामर स्तोत्र १३३ १४९ वमी शांति ॥ नोनोन्नव्या १५० जिनपंजर स्तोत्र १५१ किंकप्पत्तरु० वमा नवकार १४२ १५२ तिजयपद्त्त ।। शप्ततिजिन स्तोत्र १४५ १५३ दोसावहारदस्को || नवग्रह पा० १४६ १५४ जगद्गुरु नमस्कृत्य ।। शांति स्तोत्र ११६ १५५ कल्याणमंदिर स्तोत्र ११८ १५६ शपिमंगल स्तोत्र १५२ १५७ लघुजिनसहस्त्रनाम १५५ १५८ महिन स्तोत्र १५० ॥ अथ चुटकर चैत्यवंदन ॥ १५९ सिहो विज्ञाय चक्की ॥ सेठेज चैत्यवंदन १६२ १६. श्रीसेढीतट मेरु धाम ॥ नशापार्श्व चैत्यवंद०१६२ १६१ वंदू जिनवर वीदरमान ॥ सीमंधरजिन चै० १६३ १६२ प्रब देते दीपतो ॥ शिखरगिरी चैत्यवंदन १६३ १६३ प्रथम महेसस्- पद्मनान ।। पद्मनानजिन स्तुति१६३ ... ... ... ... ... ... ...
... ... १६. अवामावामाई ॥ पार्श्व स्तुति ।। १६५ अविरलशब्दघनोधा ॥ सरस्वती स्तुति... १६६ दर्शनं देवदेवस्य ॥ सर्वजिन वंदन सुत्ति १६७ नापामई दोहा । वंदनस्तुतिरूपाहत्याजेहसुल.१६४ १६० श्रीअरिहंत नदार कांति ॥ नवपद चैत्यवंदन १६५ ॥ अथ वमा स्तवन संग्रह ।। १६९ सुगण सनेही साजण श्रीसीमंधर स्वामि १६५ १७० सफल संसार || दूजका कमा स्तवन १६६ १७१ प्रणमुं श्रीगुरु पाय ॥ पंचमीका वमा स्तवन १६७ १७२ पंचमी तप तुमे करो रे प्राणी ॥ पंचमी लघु स्त.१७०. १७३ अमल कमल० अष्टमी लघु स्तवनं १७१ १७४ विमल जिन म्हारे तुमसुं प्रीत । विमल जिन स्त.१७२ १७५ समवसरण वैग नगवंत || मूनग्यारस स्त० १७२ १७६ सारदमात नमूं शिरनामी । शांतिनाथ स्तवन १७३ १७७ चौरासी आसातनाका स्तवन... १७८ चोवीसजिन देहमान स्तवन १७९ चोवीसजिन आयुप्रमाण स्तवन १७७ १८० त्रेसठ शलाकापुरुष स्तवन १८१ श्रीविमलाचल शिरतिलो || संत्रुज स्तवन g १२ सिध्धाचल मंझणस्वामी रे। सिध्याचल स्त० १०१ १०३ रुपनजिनेसर दिनकर सादिव || स्तवनं १८२ १८४ वीर सुणोंमोरी वीनती॥ अमावसका मास्त. १८३ १८५ चोवीस दंमक स्तवन १७५ १०६ शरियावही मिछामिक्कम संख्या स्तवन ૧૮૮ ७८७ पंच समवाय स्तवन.. १० ... ... ... . ... .
... ... (३३) १७ चौदे गुणगणा स्तवन १एप १ए नव तत्व नापागप्रिंत स्तवन... १एए १ए० दमक नायागर्मित स्तवन २१ जीवविचार नापागर्तित स्तवन १९२ समवशरण विचारगति स्तवनं १९३ सुगर सेचूंजगिरिस्वामी ॥ पत्नदेव स्त. रए पासजिनेसर जगतिलो ॥ दशमीका पार्श्वस्त. २१३ २५ मंगल कमला कंद ए ॥ अजित शांति स्त० २१५ १६ मुंहपत्ती पमिलेदण स्तवन २१० २७ आलोयण दंम स्तवनं १ए नंदीश्वर बावन जिनालय स्तवनं २२२ १एए अढाईद्वीप वीस विदरमान स्तवनं २०० जानीमाना पाबूजीनी जात्रा करज्यो २२७ २०१ सकल शाश्वता चैत्य नमस्कार स्तवन... २२७ २०२ नविजन पूजो रे शीतल जिनपती॥ स्तवन २३० २०३ म्हारे परमजिनंदसु लागी पूरण प्रीत जो ।। २३१ २०४ राणपुरो रसियामसो राशपुरा स्तवन... ૨૩૨ २०५ समकित दार गुंनारे पेसता । दर्शन. पा. स्त. २३३ २०६ प्राविजिनेसर अरज सुगीजै । स्तवनं २३३ २०७ देवचंदजी रुत अजितजिन स्त० ज्ञानादिक गुण २३४ २०० चे कर जोमी वीनबूंजी ॥ पालोपरा स्तवन २३५ ॥ श्रानंदघनजी रुत स्तवनं ।। २०९ झपन जिनेसर प्रीतम मादरो... २३७ २१० पंथिमो निदालू रे वीजा जिनतयो रे... धर्म जिन स्तवन ... ... ...
.. ... ... ... (३१) २११ शनवदेव ते धुर सेवो सवे रे... २३ई २१२ अन्निनंदन जिन दरशन तरसिय २३ए २१३ सुमति चरण कज आतम अरपणा २४० २१४ शीतल जिनपति ललित त्रिनंगी २१५ मनमो किमही न बाजे हो कुंथु जिन... ॥ पार्श्वनाथजीके गेटे स्तवन प्रतिक्रमणके ॥ २१६ श्रीशंखसर पास जिनेस नेटिये २४२ २१७ मनमोहन माहाराज २४२ २१७ जयकारी जिनरांज.. २२३ १ए वालेसर मुफ वीनती गोमीचा २४३ २२० घरज सुपीजे अंतरजामी २४४ २२१ प्यारी पासकी देखो मूरति०. २२२ श्रीचिंतामण पासजी २४४ २२३ जीवन म्हारा तेवीसमा जिनरायरे २४५ २२१ सुगण सनेही प्रन्नुजी अरज सुणीज्यो... २१६ २२५ मोरा पास जिनराज २४६. २२६ जिनजी मदिर करीने राज २४७ २२७ तूं मेरे मनमें प्रनू तुं मेरे दिलमें २४७ २२८ मार्ग देशक मोक्षनो ॥ दीवाली निर्वाण स्त० २१८ १२ए सैज झपन समोसरया । तीर्थमाला स्त० २१८ २३० श्राज थापे चालो सदिया ॥ सिद्धाचस स्त० २४९ २३१ महावीरस्वामीका पारणा २५० २३२ पद्मावती जीवरास खमाणादिवराणी पद्मा० २५२ २३३ वाली ब्रह्मा वांदनी ॥ गोमोजीका वृध्यस्तवन २५४ २६४ धम्मो मंगल मुनि ॥ मंगलीक ... ... ... ... ... ... ... ... ...
... ... ... ... ( ३५) २ ३५ आत्मरक्षा स्तोत्र २५९ २३६ सुखकारण नवियण ॥ नवकार छंद २३७ सेवो पास संखेसरो मन सुध्धै... २६१ २३७ वोर जिनेसर केरोसील २६१ १३ए शोल सती वंदु ॥ आदिनाथ आदिदेई... २६२ २५० गौतम स्तवन ।। जय२ मंगल निधान २४१ मुनिन्नेष वर्णन स्तवन २६४ २४३ जवते श्रद्धा शुद्ध नई ।। अरिहंत स्तवनं २६४ २४३ श्रावककी करणी ॥ श्रावक तुं नरे० २६४ २४३ गौतमस्वामीका रास... २६६ २५५ सेज रास ॥ श्रीरिसदेसर पाय नमो २७२ २४६ शिखरजीका रात २७० २५७ मुनिमालका २४८ उिजिन स्तवन ॥ अथ सिझायसंग्रह माला ।। २४९, उपदेशमाला पोसद सिझाय॥ जगत्मामणीतून२७ २५० राइ संयारा पोसह सिझाय ॥ निस्सिही. २५१ निंदावारक सिझाय . २५२ शीतासती सिझाय ।। जलजलती मोलती. ३०२ २५३ अनायोज्ञपि सिझाय । श्रेणिक स्यवामी. ३०३ २५५ प्रतिक्रमण सिझाय ॥ कर पमिकमणोलावसं ३०३ २५५ मांगलिक सरणा चार २५६ ढंढरापि तिझाय २५७ श्रीजिन वाणी रे धन्ना || पन्नांशपीतिज्ञाय ३०६ २५८ देव दाराव तीर्थकर ॥ कर्मसिंझाय ... ... ... ... ... ...
... 0. ... ( ३६ ) २५ए सात व्यसन सिझाय ३०७ २६० चेलणा सती सिझाय ३०७ २६१ वैराग्य सिझाय ॥ नूलो मन नमरा का नमे ३१० २६२ बाहूबल सिझाय ॥ राजतणा अति लोनीया ३११ २६३ अरणक मुनि सिझाय २६४ श्वापूत्र सिझाय ३१२ २६५ मेघकुमार सिझाय २६६ असिझाई निर्णय सिझाय ३१४ २६७ वावीसअन्नद सिझाय ३१५ २६५ गजसुकमाल सिझाय २६ए प्रप्णचंद सिझाय २७० नतपति सिझाय २७१ आत्मनिंद्या २७२ मंदिर जाणेकी नर दर्शन करणेकी विधि ३२४ २७३ चयदे नियम श्रावकके चितारणेकी विधि ३३१ २७४ श्रावकके बारे व्रत नञ्चरावण विधि २७॥ वीसस्थानक लघु स्तवन देववंदनमें करणेका ३३८ २७६ चलोदेखोरी मधुवनको राव ।। पार्श्वजिन स्त०३३ए २७ मेरो मन बस कर तीनो ॥ पार्वजिन स्तवन ३३ए २७० सुणो सुजाण नेमजी ।। स्तवन ३४० २७ए नेमजिनंदजोस श्रांखमली ॥ स्तवन ३४० २०० घाज मनु तोरे चरण लागि ३४० २०१ रात गई अब प्रात दोन नया ३४० .२८२ तुम विन दीनानाथ दयानिध ३४१ २३ जाव घर धन्य दिन० सिमाचल स्तवन ३३१ ... -- ... ... ... ... ... ...
... ... ... 46. ( ३७ ) २७४ श्रीमीमंधर साहिबा ॥ स्तवन ३४१ २०५ मनमो अष्टापद मोह्यो मादरी ३४२ २८६ सुण अरदासा सुगुण. पार्वजिन स्तवन ३५२ २७७ अंतरजामी सुण अलवसर । पार्वजिन स्त० ३४२ २०० प्राण पियारा जीदो पासजी ३४३ २४ए महाराज वधाई वाजे ॥ सुमतिजिन स्त० ३४३ २ए. माज महोछव रंग रसीरी ३३४ ॥ पूजा प्रारंन्न॥ २ए। देवचंजी रुत स्नात्रपूजा २५२ अष्टमकारी पूजाके पाठ श्लोक ३५० २५३ सतरहनेदी पूजाकी विधि ३५२ २ए सतरहलेदी पूजा ३५२ २ए आरतिविध तथा भारती॥ जै जै प्रारति शां० ३६२ २ए६ नवपदजीकी पूजामें चहिये सो चीजोंकीविधी ३६३ २एउ नवपदजीकी वझी पूजा २९८ नवपदपूजामें कलतढालणत. वासकेपपूजा वि. ३७३ २९९ दादाजीकी अष्ट प्रकारी पूजा पाठ श्लोक ३०० दादाजीकी प्रारती . ३०१ सूतक विचार ३७५ ३०२ प्रतिझा विचार ३०३ नहानक विचार ३०४ नव ग्रह दश दिग्पालकी श्राद्वान विशर्जन विधि ३०० ३०५ नवपद मंगल पूजा विधि ३८६ ३०६ नवपद मंस प्रतिरा विधि उजमणे तक ३०९ ... ... ... ... .. ... ... ... ... .
.. ... ... ... .. ... ... ... ... ... || श्रा ३०७ सत्तरसयको गुणनो... ३एए ३०० सत्तरसय तप स्तवन... ४०३ ३०९ कम्मपयको तप गुणनो ४०५ ३१० कम्मपयमी स्तवन ४०७ ३११ नवकार तपस्तवन १०५ ३३३ नवकार तप विधि.. ४११ ३१३ पंच कल्याणक तप स्तवन ४१२ ३१४ रुपिमंमल सुणणेकी पूजणकी विधि ११५ ३१५ जगवंतके नव अंगपूजन उहा... ४१५ ३१६ शिक्षाका उदा ५ ३१७ नवपदोका नव चैत्यवंदन, नव स्तवन तथा युई.४१७ ३१७ शंस्कृतवा चतुर्विशति जिन स्तुति ३१ए नवपद वृद्ध स्तवन ॥सुरमणी शम सहुमंत्र० १२८ १२० नवपद स्तवन ॥ तीरयनायक जिनवरू रे ४२९ ३२१ नवपद ध्यान धरो रे नविका ॥ स्तवन १३० ३२२ लीया चतुरसुजाण नव० स्तवन ३२३ जिन नित नमो नित नमो नमो ॥ स्तवन ... ४३० ३२४ नितप्रति प्रामुं । नवपद थुई ... ३२५ अथ लेती संयुक्त नवपद उनी करण विधि ३२६ अथ तपस्या महणकरणेकुंगुरू पाशजाणेकी वि.४४८ ३२७ नलीकी संक्षेप कजमणा विधि ४१९ ॥ अथ दशमास पर्वाधिकार स्वरूप । प्रथम चैत्रमास पर्वाधिकार प्रथम नलीतप १५० ९ घरापद नसीकरण विधिःमंगलविधि स.दि.२.१५१ ... ...
... ... ... ... .. ... ... १६. ... , (३७) ३३० महावीरस्वामी जन्मकल्याणक पर्व तीसरा ४५६ ३३१ चैत्रीपूनम पर्वाधिकार पर्व ४ देववंदन वि०स०४५६ ३३१ चैत्रीपूनम स्तवन ३३३ नंवर तपस्या करण विधि १५९ ३३४ पैशाखमास पर्वाधिकार घाखातीज ३३५ ज्येष्ट रूप्य १३ श्रीशांति पर्वाधिकार १५ ३३६ भापाढमास १४ पर्वाधिकार १५ ३३७ श्रावणमासमें चुटकर तपस्याधिकार २३८ नाइवमाशमें पर्युषण पर्वाधिकार ३३९ आश्विनमाशमें चसी पर्वाधिकार ३१० कार्तिकमारामें १ पर्वाधिकार... १६॥ ३५१ दीपमाला गुणनो करण विधि... १६ ३४२ ग्यानपंचमी पर्वाधिकार ४६ ३४३ ग्यानपंचमी देववंदन विधि :... ४६ ३४४ ग्यानका वमा चैत्यवंदन थुई ... १६ ३४५ श्रीपाचारांगसूत्र सिझाय ४७९ ३१६ श्रीसुपगडांगसूत्र सिझाय ३४७ श्रीगणांगसूत्र तिझाय ३४७ श्रीसमवायांगसूत्र सिझाय ४७ २४ए श्रीनगवतीसूत्र सिझाय ३५० श्रीज्ञातासूत्र सि० ४७ ३५१ श्रीउपाशकदशासूत्र तिण ३५२ श्रीअंतगादशासूत्र सि० . १७1 ३५३ श्रीअणुत्तरोववाद मूत्र सि० ३५४ श्रीप्रश्नव्याकर्णसूत्र सि० ... ... .. ... ४७ ... ... ... ... ४७ ४७. ... १७॥ ४७ ... ... ... ... ३५५ श्रीविपाकसूत्र सि.... ४७ ३५६ ग्यारे अंग वर्णन सि० ४७ ३५७ मेरे रे मन मानी ज्ञान जरी ॥ ज्ञानका स्त० ४७ए २५७ श्रुत अतहि नलो ।। जिनागमस्तवनं ३५५ कार्तिक चतुर्माश पर्वाधिकार... ४०० ३६० कार्तिक १५ पर्वाधिकार ४०० ३६१ सिद्धगिरि स्त० ते दिन क्यारे प्रावस्यै... ૪૮૨ ३६२ नमो रे नमो सेचुंजगिरी ॥ स्तवनं ॥ ... ४८२ ३६३ अंग कमाहो मोन अतिघणो ॥ सिध्धगिरि स्त० ४८३ ३६४ जात्रा निना' करियै ॥ सिद्धगिरि स्त. ३६५ नाव धर धन्य दिन० सिध्धगिरि स्त. ३६६ मार्गशिरमाश पर्वाधिकार मौनएकादशी ४७५ ३६७, मौन ११ देढसे कल्याणक गुणनो ३६७ पोपमाशे चदि.१० पर्वाधिकार ३६ए माघमाशे मेस्त्रयोदशी पर्वाधिकार ४ए? ३७० फाल्गुनमाशे पर्वाधिकार ३७१ द्रव्यहोली जावदोली अधिकार ॥ दोली स्तवन संग्रह ४७ ।। ३३२ होरी खेलिये नर वदुरन० ३७३ जय बोलो पाश जिनेशरको ३३४ मधुवनमें जाय मची होरी ३३५ यादव मन मेरो दर लियोरे ३७६ इक मुगले नाथ अरज मोरी २३७० सांवरो सुखदाई जाकी विध ० नेना.दरखाई अाज तेरी सू० ४७६. ... ... ... ... ... ७. ...
४९७ 803 ... ४ ४ए ... ... (१) ३७९ एसे फागुण मस्त महीने चोरी, ३७० नेम स्यामसें कहियो मोरी. ३८९ होरी खेलों रेनविक मन यिर करके ३०२ होरीके खेलश्या तूं तो प्रनु०... ३७३ वाके ममताने धूम मंचाई ३७४ समकित विन जीव जगत नंदक्यो ३७५ विसरे मत नीम प्रनजीको ३८६ नेम निरंजन ध्यावो रे ३०७ गढ गिरनारकी तलहटी ३७० धन राजुल तेरो नागरी ३८९ एसी हो तो.हो रही चंपानगरमें ३d बलिहारी हुं विमलाचत गिरकी ३९१ एसे मनु नेमनायं मेरे दिल वतियां ३५२ संन्नव जिन सुखकारी दो लाला ३५३ सारो सोख देंश दिखावो रसिया ३९४ जिनराज जुहारो, क्या वे लव हारो रे ३ए५ मनमोहन गजगतकी कामनी... ३५६ रंग लग्यो गुरु ज्ञान... ३७ चिदानंद खेल फाग... ३९० होरी खेलो नेमसें धायर ३९९ मेरी घटकी गांगरिया रंगसें नरी ४०. वाचो रुपन्न बैठे अलवसर ४०२ गिरगंजकू हमारी वंदनी रे' ४०२ दरशन कियों आज सिखर गिरको ४०३ सिद्धगिरीजीको दरश करले ५०० ५१० ... ५०१ ५०२ ... ५०३ ५०४ ५०४ ५०५ ५०५ . 6 २५५ श्रीविपासूत्र सि... ... ४७० ... ... ४० ... ... ५०६ ... ... ... ... (४२) ४०४ मोदे अपणे रंगमें रंगदे ए ५०५ मेरे पारस प्रनुजीके रंगमंझपमें १०६ गमच्यो जिनद्वार चालो खेलिये होरी । ४०७ १०७ नेमजीसें कहियो मोश माहाराजा तोरे मंदिरमें वरसे रंग " तोरी अंगिया वणी दे सुरंग 10 चिंतामणि चिन घ्यावो रे १४११ मत मारो पिचकारी रे ४१२ नेम मिले तो वातां कीजिये. ४१५ प्रातमतत्व विचारो ज्ञानसे ४१४ साल तेरे नयनोको गति न्यारी ५०७ १५ दर्शन चिन जीव संसार नम्यो ४१६ मत गेमो माने यूंदी रे कोश् चूक यतावो ५०९ ४१७ अटक्यो चित्त हमारो रीजिनच० ५०ए ४१८ मंगल राजै गिरनार... ५०ए रए मंगलकलश ॥ तपस्याविधि स्तवन संग्रह। कल्याणक टीप कन्यापक विधि त स्तवन... .ता तप विधि.. पसरकाश स्तवन पसराप तप विधि ... ... ... ... ५१० ५.३ ...
पूजन विधि ... ... ... ... ... ४१ वीश स्थानक गुणना जर कानसम्ग ममारा ५२२ ४२ए वीश स्थानक मंगल ५२४ ५३० रोहणी तप स्तवन.... ५२ए ५३१ रोदणी तप विधि ५३२ ४३२ उम्मासी तपस्तवन... ५३३ ४३३ उम्मासी तप विधि... .५३४ ४३४ बारे मासी तप स्तवन ४३५ घारे मासी तप विधि ५३५ ४३६ प्रहाईस लब्धि स्तवन ५३६ ४३७ अहाईस सब्धि तप विधि ५३७ -४३० चौदे पूर्व स्तवन ५३ ४३ए चौदे पूर्व तप विधि... ४४० तिलक तप स्तवन ४४१ तिलक तप विधि ५४२ ५४२ शोलिये तपका स्तवन ५४३ ४४३ शोलिये तपकी विधि ५१३ ४४४ पैतालीश आगम तप विधि तया गुणना ५४४ १४५ पैतालीश श्रागम स्तवन ५४५ ४४६ ग्यारै गराधर तप विधि ४४७ ११ गणधर नाम गुगना ५१० १४८ सर्व तपस्या गुरू पास ग्रहण करण विधि ५४ ४४ए सर्व तपस्या पारण विधि ५५१ १५० उपधान तप स्तवन... ४५१ संघ मालारोपण विधिः ... ४५२ संघमालाकी देववंदन विधी ५४९ ... ... ... ܀ ... e. ... ... ... ... ... ... (४) १५३ उपधान तप नित्यकर्तव्यता १९४ नपधान तप विधि ... ४५५ नपधान तप प्रवेश विधि ४५६ उपधान तप उत्क्षेप विधि १५७ वाचना विधिः ४५८ तप संपूर्ण क्रिया निक्षेप विधि ५५९ पमिपुन्ना विगय तप पारण विधिः ४६० क्षमाश्रमणादि प्रत्नात संध्या पमिलेहण विधिः५६१ ९६१ उपधान तप विवरण गाथा १६२ शपिमंगल मंसपूजा विधि .... ४६३ शांतिक पूजा विधिः ५६० 2६९ पंचतीर्थी आरती १६५ चक्रेश्वरी भारती 2६६ चोपम खेलण सिझाय ५७१ १६७ सेठेज खेलस सिझाय ५७२ ।। राग रागणी सरस स्तवन संग्रह १०१ ॥ ४६७ टुक निजर मदरदी क. ५७२ १६ए लोक चवदके पार किनारे १३० सखी सब वनग्न १२१ दो जिन में दरापर० १३२ म्हारा झपन जिनंदने ग. ..१७१ मन सीनो हमारो जिन चरणारे ९४ प्रजितजिन प्यान ५०० ५ यद घरजी मारी सदीयां मुजसे मानी जीने दो गोल ५०१ ... ... ... .. ... ... ... ... .. ... -- ... ५३३ ... ... ...
... ... ... ... ... ... (४५) ४७३ तुं मेंमा प्रन्नु ण दिल वसणाचे ५७४ ४१७ हम जाणत दे तुम तारोगे ४७९ पंथीमा पंथ चलेगो ४८० तेवोशमा जिनराज जोमे पारे कोण जुगो ५७५ ५८१ केसे काज सरे मादाराजविन केसें० ५७५ ४०२ राजरी वाई वाजे ४८३ मोतनकीमाला जिनगल सोहे... ५७६ ४७४ रहे तुम आज क्यूं जीवन उराय ४७५ हे माय वांकमी करमगति जाय न कही ४८६ म्हांने प्यारो लागे जी थारो नपदेश ५८७ मेरो पिया परसंग रमत दे ५७७ ४८० वरपित वचन करी. ५७७ ४७ए या घरी में रंग ४ए० चिहुं नर वदरिया वरसे ५७७ ४एर मोरवा पपश्या बोले ६७८ ४५२ समझ नर जीवण थोरो ५७७ ४७३ मत कर मान गुमान ५७० ४२ निश दिन जोन थारी वाटमी० ५७ ५९५ श्राज तो हमारे भाग्य वीरप्रनु पाए हे ५७९ ४९६ बावरो रे आज भनवो मेरो তন ४५७ रुपन विहारी थारीतो रवि न्यारी हो... ४ए सुरा मन होनहार न टरे रे ५७९ ४९९ सदियोरी मिल चालो अनु पूजन काज... ५०० ५०० मनवा जिनंद गुण गाय रे ५.१ चलो देखोरी मधुवनको राव.... ... ... ... ५७७ ... ... ... ... ... ... ... ...
.... ... ५७० .. ... ... . ... ५७३ - ... ... ५०३ ५०२ राखू रे हमारा घटमें .५०० ५०३ तेरे दरशको चाह लग्यो ५० घारे मुखमारी दो वारी राज... ५०५ एसी विध तेने पाई रे ५०६ मोदि अपणो कर जाणो प्र० ५०१ ५०७ वीर प्रन्नु तेरी दोस्ती में ५८१ ५०० नोर जयो अब जाग वाचरे. ५७२ ५०ए जाग रे सब रैण विहाणी ९१० सांवरो सलूनो सखी... ५११ आज रुपन्न घर आवै :०३ ५१२ अंगण कलप फल्योरी ५७३ ५१३ कगेने मोरा प्रातमराम ९१४ नज मन नानिनंदन देव ५०३ ५१५ श्रावो नेम रह जावो सदन ૯૮૪ ५१.६ कीरतीबाग मन प्रेम लाग ૯૮૪ ५१७ अधम जग काम नये अंगीवान ५०४ ५१.७ प्रनु तेरी सूरतिगा लागे नती... १७९ ५१९ आयो सही अब जान कहाँ ५२० घोर पल दिन निशदिन... ५२१. सुमतानें क्या कर मारा रे ५२२ तुम तो जले विराजो जी ॥ शिखर गिरि स्त०५०६ ५५३ शिखर गिरि जुहारो॥ ५६ ५२४ सांवरिया में दोगे दरश तिहारो." ५२५ विन्नुवन नायक वीरजी ॥ पावापुरी स्तवन ५८७ २६ निरख दीया इरख नरे। चंपापुरी स्तवन ६८८ ... मा ५८६ ... ... . ૮૩ N ... .. ५०ए एनए ५ए. एए. ... ... ... .. ५ए. ... ... ... .. ... (४७) ५२१ में मुब देख्यो गोमीपारसको... ५२८ किरपा करो रे गोमीपाश जिनेसर ५२९ मुजरा साहिब मुजरा साहिब... ५३. घंट वाजै घननननन... ५३१ निरंजन सांइयां रे. ५३५ एसे सहर विच कोनसा दिवान दे ५३३ आय रहो दिलबागमें ५३१ रहो२रे यादव दो घमिया ५३५ विराजो बंगलामें ५३६ किण देखा हमारा स्वामी ५३३ अवधू सो जोगी गुरु मेरा ५३० अवधू एसो ज्ञान विचारी ५३९ ईसा तूं मानसरोवर वासी ५५. बेर नही श्रावै अवसर० ५११ ये जिनजीके पाये सागरे ५४२ चित्त में धरो रे पारे चित्तमें घरो ५४३ अवधू निरपक्ष विरला कोई ५४४ चलता जरूर जाकुं ताकुं केसा सोचणा ५१५ समझ पर मोहे समझ परी... ५४६ जलांजी मेरो नेम चल्यो गिरनार ५४७ रसना सफल नई मेंतो गुण. ५४८ राजन पुकारे नेम पिया ५४ए कोन किसीको मित्त ५५० आदीसर जिनराज... ५५. गोमी गाईये मन रंग 4. . --- ५३ ... ... ५९३ ५९४ ... ५ए? ५९५ ... ... ... ५एप ... पए५ ५९६ २६ . ... दए७ दए दए ... ५५२ हारे हूं तो मोह्यो रे साल ५५३ प्रनुजी से लोगो मारो नेद" ५५१ खतरा दूर कर ५५५ रे जीव जिनधर्म कीजीये ६५६ सो३२ सारी रेन गमाई ५५७ चंदा प्रन्नुजीसें ध्यान रे ५५८ ते शिवपुर गये रहे रे ६५ए' म्हारे चले रे कंगो वे द्यामो जनो रे ५६०' धन२ ते दिवाली मारे पानी ५६१ धनश् आजूनो दिन रलियामणो रे ५६२' म्हारे आज श्रानंद बंधामणारे ६६३. सवालाख टकानी जाय एक धमा ५६४' आयोरने प्यारा नैम अमं घर ५६५ मनमोहन पारस प्यारारे' ५६६ मेरे मन नावनकी बिनीकीजी ५६७ सादिव सुगुणं सुपारससे ५६७ सांवरिया पासजी सुखं दीजे... ५६ए तुम जो शपन प्रनु प्यारा जग०.. ॥ अथ लावण्या संग्रह ३४ धन १०॥ ९७० अगमदूंर व चोधी । ५७२ आखातीजकी लावणी ५७२ दीवालीकी लावणी ५७५ सीमंधर जिन लावणी : ५७४ अजीमगंजमें सांवलियाजीकी लावणी २७५ नेमनाथ मेरी अरज सुगीजे दए ५एए ६०२ ६०१ ६० .. - ... ६१३ ... भए ) ए७६ तुम जपो मंत्र नवकार ॥ जिनदाशादि तपन ६०ए ५७७ चल चेतन अब उठकर० ५७८ तुम नजो जिनेसर देव ५७ए तुं कुमति कलेसरा नार लगी क्युं केमे... ५८०. तुम तजो जगतका ख्याल ५८१ दे गया दगा दिलदार ॥ नेमजीकी लावणी ५८२ मुखक वीच मगसो पारसका... ५८३ सुरुतकी वात तेरे हाय रती ना रही रे... ६१५ ५८४ तुम तज कर राजुल नार ६५५ ५८५ पाप समझका घर नहीं पाया ५८६ नमुं२ में गुरु निग्रंथकू ५८७ करूंश में एसे सदगुरु ५८८ तजूं में नन कुगुरुकूँ ५८९ यो जिनदाश फूगेरे गे ५९० जब तन दोस्ती हे इद मस्ती ५९१ अरज हमारी सुणो दीनपति... ५९२ मुकि जाणेकी मिगरी ५९३ अनुन्नव पद गिरी... ५९४ नेमकी जान बणी जारी ५९५ नेमनाथजीका चोमासा ॥ गई घटा ग. ६२३ ५९६ सुमति कुमतिका विवादरूप लावणी पए सफ शोले सिणगार हुई हुसियार ६२६ ए चंदावदनी मुखसें कदती गिरनारीकुं. ५९९ को देख्या रे हो सांवलिया साहिब ६२० ६०. सुजो वातां राव सदाशिव... -. ... ... ... ... 7 ... ... ... ... ... ... (10) ६०२ केशरीयानाथजीकी मांहातमी लावी ६२९' ६०२ पार्श्वप्रन्तु आरती लावणी ६०३ आदि जिनेस कीयो पारणों ६०४ अजितनाथजीकी लावणी ६०५ पिया मेरा गिरनार सिधाए । नेला. ६०६ दीवाली स्तवन ।। धनर मंगल एह सकलदिन६३७ ६०७ मारे दीवाली थई आज प्रलु मुख जोवाने ६७ ६०७ पोदोश जी झपन विहारी ६३८ ६ए कीजे मंगल च्यार आज घर ६१० सिक्षाचल गिरनेटो रेनविजन ६३० ६११ जगतमें नवपद जयकारी ॥ लावणी ६१२ ध्यान घरो नवपदका चेतन ६४० ६१३ चलो सखी जिन मंदिरमें जग नवपद... ६४० ६११ सांवरो लागे प्यारो प्रनु मनमोहनगारो॥ दोरी ६५१ ६१५ श्राज सुरंग घन वरसत होरी... ६४२ ॥ श्रथ-वारे मासा ॥ ६१६ मरुदेवाजी सोच करत हे मनमें ६४२ ६१७ नेमनाथजीका वारेमासा ६४४ ॥ स्तोत्र चुटकर संस्कृतबंध ७ ॥ ६१० सकल मंगल केलि. शीतल स्तोत्र ६१ए विशद गुण विचित्रं. पार्व० स्तोत्र ६५६ ६२० यस्य ज्ञान दया० शंखेश्वरपार्श्व स्तोत्र.. ६४ २१ सदमी निदानं० पार्व० स्तोत्र ६४७ २२ गोमीयामे० शंखेश्वरपार्श्व स्तोत्र २३ विशदसद्गुण पार्श्व स्तोत्र ... ... ... ... ... ६१८ ६१८ ... ...
... ... ६५० ... ... ६५५ ... # ... ६५९ .. .. (५१) ६२ श्रीमत्यार्श्वजिनेश्व० पार्श्व स्तोत्र श्राद्य श्रीझपन चतुर्विंश० स्तोत्र ६२६ मंगलाष्टक स्तोत्र ... ६२७ परमात्मा स्तोत्र ६२० नमस्कार स्तोत्र ।। अथ तपग सामाचारी ।। ६२९: पुण्य प्रकाश पालोयण स्तवन ६३. नरहेसरन सिझाय... ६३. मन्दजिणाणं सिझाय ६३२ सकल तीर्थ वंदना ६३३ सकलाहस्तोत्र ६३४ शांतिकर स्तोत्र ६३५ सीमधेर चैत्यवंदन । सीमंधर परमातमा ६३६ श्रीसीमंधर जग घणी ६३७ सिगिरी चैत्यवंदन ॥ विमल केवल ६३८ श्रीशजय सिद्धक्षेत्र ६३९ परमात्मा चैत्यवंदन० परमेश्वर परमात्मा ६४० सुणो चंदाजी सीम. सीमंधर स्तवन : ६४१ प्रांखमीथे में श्राज० सेर्बुजा स्तवन : ६४२ विमलाचल नित बंदिये ॥ स्तवन ६४३ पंचतीर्थ संस्स्तव स्तवन राजुल सिझाय ॥ निजीर नाम ६४५ श्राफरखो तूटाने सांधो० तिझाय ६४६ श्रादि देव अरिहंत न.1 पंचती० चैत्यवं० ६४७ ऽविध धर्म जिन ३० दूज चैत्यवंदन ६६४ . ६६५ ... ... .. ६४४ नेम ... ... ६७० ... (५३) ६४८ त्रिग वैग वीर जिन || ग्यानपंचमी चैत्यव०६७ ६४९ महा सुदि प्रारमनें. अष्टमी चैत्यवंदन ६७६ ६५० शाशन नायक वीरजी. श्यारश चैत्यवंदन ६७ ६५१ सीमंधर जिनवर स्तुति० ६५२ श्रीसीमंधर देव सुईकर ॥ थोय ६५३ दिन सकल मनोहर । वीजनी थोय ६५४ श्रावण सुदि दिन पंचमी ए॥पांचमनी योय६७ = ६५५ मंगल आठ करी० आग्मनी योय ६७६ ६५६ एकादशी अति रूवमी ॥ ग्यारश थोय ६८ ६५७ स्नातस्या प्रति० चवदशनी थोय ६७८ ६५८ कल्याणकंदनी योय... ६७ ६५९ श्रीशत्रुजय गिरि तीरथ० थोय ६६० महाविदेह के सीमंधर स्वामी ।। थोय' ६६१ पंचेदिय संवरणो ६७८ ६६२ सामाश्यवयजुनो ॥ सामायक पारवागाया ६६३ सागरचंदो ॥ पोसद पारवा गाया ६६० जगचिंतामणि चैत्यवंदन ६७० ६६५ थतीचारनी ८ गाया... ६६६ विशाललोचन स्तुति ६६७ सुयदेवया लगवई । स्तुति ६६८ जीसे खिने सादू । क्षेत्रदे० स्तुति ६६९ सामायक लेवा विधि ६७० सामायक पारवा विधि १७१ देवशिक प्रतिक्रमण विधि १७२ राई प्रतिक्रमण विधि ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ...
... ... ... ... (५३) ६७३ पस्की प्रतिकपण विधि ६०५ ६७४ चनमाशी प्रतिक्रमण विधि: ६८७ ६७५ संवत्सरी प्रतिक्रमण विधि ६० ६७६ पमिलेदण करवानी विधि ६७७ ६७७ पञ्चरकाश पारवानी विधि ចច ६७० पुस्कलवर विजय जयो । श्रीमंधर स्तवन { ចច ६७९ वीज तिथीनो स्तवन वमो ॥ प्रगमी शार० ६०॥ ६८० पंचमी वृक्ष स्तवन ॥ सुत सिधारथ० .. ६२ श्रापमर्नु वृद स्तवन ॥ मारे गम ध० ... ६६ ६०२ एकादशी वृह स्तवन ॥ जगपतिनायक० លច .६८३ मादावारस्वामीहाल रियु ६७४ निंदा म करज्यो कोईनी सिझाय ७०३ ६८५ देववांदवानो विधि ६०६ ज्ञानविमलजी रुत धनमाशी देववंदन... श्रादिनाथ चै० थोय स्तवन .. ७०४ अजितनाथ चैत्यवंदन, योय संनवनाथ, अभिनंदन चैत्यवंदन थोय... सुनातिनाथ, पद्मपन्न, सुपार्श्वनाम चे श्रोप७०७ झनु, सुविधिनाथ, सितलनाथ चै० यो०७०८ श्रीश्रेयांस, वासुपूज्य, विमलनाथ चै० योग ७०ए धर्मनाथ, शांतिनाथ चै० श्रोय स्तवन... ७१० कुंथुनाथ, धरनाय, मलिनाय चैः योय मुनिसुव्रत, नमिनाथ, नेमिनाथ चैः योय ७१३ पार्श्वनाथ चैत्यवंदन श्रोय स्तवन महावीरस्वामी चैत्यवंदन योय स्तवन ७१६ ... ७.४ ... ७०५ ७११ (५४) शाश्वता अशाश्वताजिन चैत्यवंदन थोय नीलमी रायण तरु तले ॥ सिध्याचल स्तवन ७२० नेम निरंजन देव के ॥ गिरनार स्तवन... 990 श्रावो श्रावोने राज अर्बुद गिरी स्तवन... ७२२ अष्टापदगिरी जात्रा करगळ ॥ अष्टा० स्तवन ७२२ समेतशिखर गिरी नेटीये रे ॥ शि० गि० स्त० ७२३ ६७३ सत्तरन्नेदी जिन पू० प!पण श्रीय ७२१ ६०० नेमनाथजी घारेमाशो ॥ शीयाले खाटू. ७३१ ६नए अपठरा करती भारती जिन आगे ७२६ ६९० पहली तो समरूं हो. नेम राजेमती सिझाय ७२६ ६९.१ गोतमस्वामी पूग करी ॥ मुक्ति वर्णन सिझाय७२८ ६ए२ नेमनाथजीरो सिलोको २९ ॥ अथ चोढालीया संग्रह। दए३ विजयसेन विजयासेगणी चोढा० '६९खुकार राजा नृगु. मोहितरो चो० ७३३ .६९५ दान.शील तप नाव चौढालीयो ॥ अथ वेद संग्रह ।। ६९६ सेवो वीरने चित्तमां नित्य धारो० ७५३ .६९७ . नंवकार बंद ॥ वंगित पूरे विविधपर० .६९८ घंघरनीसाणी ॥ सुख संपति० ४७ .॥ दादा गुरुदेवं स्तवन संग्रह ।। ६९९. विसशै शदिसमृद्धि ७५२ ७०० वर लाउ विलाश० श्रीजिनदत्तः १७०१ रिसह जिनेसर० कुंशलसूरि० ७०२ आयो सहुः श्रीसंघ, . ७५ ... ... ... ... ७५२ ७५५ ... ... ... ७५६ ७५६ ७५७ ७५७ ७५त ७५० . ... ... ७पए ७५९ ७६० ( २५) ७०३ सदगुरुजी थे सांजलो ७०४ दादा चिरंजीवो ७०५ गाजे जिनकुशल गमाले .०६ सहा मेरे श्रीजिनकुशल गुरु ७०७ श्रायोश जी समरंता दादो. ७०० नाया नक्तिसूं.पूर रहो रे ७०९ पूजो जवि हितसं कुलाल सुरिंद ७१० श्राज करो रे नगद श्रीजिनकुशल ७११ में निरख्या गुरु मदारान ७१२ चरणकी चरणकी वारीजा० ७१३ अब मोदि दरशण दीजै कु०... ४१४ कुशल गुरु कुशल करो नरपूर ७१५ सदगुरु पूजण जावस्यां ७१६ श्रीसदगुरुजीसे वीनती रे ७१७ सदगुरु दीनदयाल... ७१० सुगुरु मेरी वेझिया पार० ११५ देरख्या में दरश तिहारा १२० सदा सहाई कुशल सूरिंद १७२१ जिनकुशत सूरिद गुरु सदा नमो ७२२ उत्रपती शारे पाय नमें जी ३२३ सदगुरुजी सुणो मोरी अरजी... ३२१ सदगुरुके चरण चित साय२... ३२५ दोरी खेलो नचिफ सदगुरुके संग ७२६ गुरु पूज रचो रे मुहानी ७२७ सदगुरुजीके दार मची दोरी... ७६० ७६० ... ७६२ ... ७६४ ... .. ... ७६६ ७६६ ... ... ... ... ... ... ... ७६७ (५६) ७२' केसेंअवसरमें गुरु रस्की लाज. ७२९ श्रीजिनकुशल सूरीसर सादिव... ७३० श्रीगणधर गुरु कुशल सूरिंदके ७३१ कुशल गुरु देखके दरशण ७३२ कुशल गुरु दरशन दीजे दो ७३३ पूजो जो रेन्नाई... ७६७ ७३४ ९तो अरज करुं करजोमने ७६७ ७३५ सांगानेर विराज ७३६ सदगुरुजी म्हारा खावणी ... ७६७ ७३७ मोरी सखी सइयां सावणी ७६९ ७३८ कामित कामगवी ॥ श्रीजिनचं स्तवनं ७३९ श्रीसोजाग्य सूरी स्तवनं ॥ देशना वधावा संग्रह। ७. वीरजी दिये ते देशना रे ३१ ७१ गुणनिधि श्रीजिनचंद मुशिंदा ७१२ श्रीजिनचंद सूरीसरू ७१३ एदवा सदगुरु वांदिये ७७३ ७४४ सुखकर स्वामी श्रीतीर्थकरू रे ७५५ मोतोपमे मेद वरसीयो ७७५ ७१६ जिनशासन जयकारी | गुंदली ७७५ ७५७ मुणिये सदगुरु देशना ए सदियां ।। गुंदली ७६ ७१८ सुगुरु म्हारा ज्याजनी पर तारो BUए वृहत् खरतर गछ सुद्ध सित सामाचारी ३० ৩৩০ ... ... ७७० .. ... ... ७७२ ... ...
॥ श्रीजिनाय नमः ॥ श्रीसद्गुरुभ्यो नमः ।।
॥ रत्नसमुच्चय ॥
॥ मंगलाचरण ॥
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ॐकार बिंदुसंयुक्तं । नित्यं ध्यायति योगिनः॥
कामदं मोक्षदं चैव । ॐकाराय नमोनमः ॥१॥
॥ कवित॥
नकार उदार अगम्म अपार । संसारमें सार पदारथनांमी ।।
सिद्धिं समृद्धि सरूप अनूप । भयो सवही सिर नूप सुधामी ॥
मंत्रमें यंत्रमें ग्रंथके पंथमें । जाकुं कियो धुर अंतरजांमी ।।
.पंचही इष्ट वसे परमेष्ट । सदा भ्रमसी करै ताहि सलामी ॥ १ ॥
नमो निसदिस नमायके सोस । जपो जगदीश सही सुखदाता ॥
जाकी जगतमें कीरति जागत । भागतहे सब ईत असाता ॥
इंद नरिंद दिणिंद फुणिंद । नमाएहें वृंद आनंद विधाता ||
धोरी धरम्मको धीर धराधर । ध्यान धरे प्रमसो गुण ध्याता
॥ अथ गुरुमहिमा नमस्कार ॥
महिमा जिणकी महिमें । जिनदीनो महा इक ग्यान नगीनो ॥
दूर भग्यो भ्रम सो तम देखत । पूर जग्यो परकास नगीनो ।
देतहि देतहि दूनो वधै । अरु खायोहि खूटत नांहि खजीनो।
एसो पसाय कियो गुरुराय । तिणें धमसो पदपंकज लीनो ॥१॥
अज्ञानतिमिरान्धानां । ज्ञानाञ्जनशलाकया ।
नेत्रमुन्मीलितं येन । तस्मै श्रीगुरुवे नमः ॥ १॥
) ॥ श्रीसरस्वत्यै नमः || श्रीसारदायै नमः ॥ सरस्वती महाभागे । वर दे कामरूपिणी ।। विश्वरूपी विसालाक्षी। दे विद्या परमेश्वरी ॥ १ ॥ सरस्वतो मया दृष्टा । वीणा पुस्तक धारिणी ॥ हंस वाहन संयुक्ता । विद्या दान वरप्रदा ॥ २ ॥ ॥ दीर्घाक्षरें सरस्वती नमस्कार ।। सिद्धारूपी साची देवा सारे जीको नीकी सेवा । रागे आए लागे पाए जागे मोटी माईहे । चंगी रंगी वीणा वागे रागे सारे रागे गावे । हावे भावे सोभा पावे ग्याता जा• गाईहे ।। हंसी केसी चाली चाले पूजी वंदी पीडा टाले । लीलासेती लाले पाले सुद्धी बुद्धी दाईहे ।। सोहे वानी नीकी वानीजाकुंग्यानी प्राणी जाणी। एसी माता शाता दानी धर्मसीहें ध्याईहे || १ ॥ ॥ स्वर वर्ण ॥ श्र श्रा ऊ ऋ ऋ ऋ ए ऐ = औ अं अः || व्यंजन वर्ण ॥ क ख ग घ ङ । च ज ज ञ । टस मद । तथद ध.न । प फ वन मा य र ल व श प स ह ।।ज्ञ॥ क का कि की कु कू के कै को कौ कं कः ॥ कय दृष्ट नृ व मृग स्ट है ॥ क्य व्य ग्य घ्य च्य व्य ज्य व्य व्य ड्य एय त्य व ध्य न्य प्यन्य म्य व्यख्य श्य प्य स्य क्ष्य ||कग्रव्रजतद्र प्रव नव श्र स्वरु॥क ग्व एव त्वदन्व म्व स्त्व श्व प्व स्व ॥ कम न नम्नमाण स्न क्षण।। कम ग्मध्म च्म एम.ग्नन्म इमप्म स्म क्ष्म । केर्ख ग घ ॥ क रक ग्ग ग्य छु। च छ ज झ ञ (३) हम त त्यहन्न ।। प फ ब म म य्यरल घश प्प स्स ॥ त्र्य त्स्य टू ॥ १।२।३ । । ।५।६। 1ए।१०।१।१०0000 180000 200000 ॥ १००००००॥ स्वस्तिश्री कृष्णवृह्मस्था । पिवद्रावास्युश्च स्वस्करा ॥ पृथ्वीभवल्गुश्रेष्ठात्म । नम्यास्तेहृद्यज्ञप्तिदा ॥ ॥ अथ शिक्षावाक्य ॥ गुरुशुश्रूपया विद्या । पुष्कलेन धनेन वा ॥ अथवा विद्यया विद्या । चतुर्थ नैव कारणं ॥ १ ॥ विद्वत्वं च नृपत्वं च । नैव तुल्यं कदाचन ।। स्वदेशे पूज्यते राजा । विद्वान् सर्वत्र पूज्यते ॥ ५ ॥ पंमितेच गुणा सर्वे । मूर्खे दोपा हि केवलं ॥ तस्मात्पूर्व सहस्रेषु । प्राज्ञ एको विशिष्यते ॥ ३ ॥ नक्षत्रनूपणं चंद्रो । नारीणां नूपणं पतिः ।। पृथिव्या नूपणं राजा । विद्या सर्वस्य नूपणं ॥ ५ ॥ माता शत्रुः पिता वैरी । वालो येन न पारितः॥ न शोलते सन्नामध्ये । हंसमध्ये बको यथा ॥ ५ ॥ सालयेत्पंचवर्षाणि । दशवर्षाणि तामयेत् ।। प्राप्ते तु पोमशे वर्षे । पुत्रं मित्रवदाचरेत् ॥ ६ ॥ चरमेको गुणी पुत्रो। न च मुर्खशतान्यपि ॥ एकश्चन्द्रस्तमो हन्ति । न च तारागणोपि च ॥७॥ अविद्यं जीवितं शून्यं । दिशःशून्यास्त्वांधवा ॥ पुत्रहीनं गृहं शून्यं । सर्वशून्या दरिद्रता ॥ 5 ॥ न च विद्या समोरधु । न च व्याधिसमो रिपुः ।। न चापत्यसमः स्नेहो ॥ न च देवात्परंवलं ॥ ए॥ किं तया क्रियते धेन्वा । यानसूतेनदुग्धदा ॥ - ।
(१) कोऽर्थःपुत्रेण जातेन । यो न विद्वान्न नक्तिमान् || १० नपदेशो हि मराणां । प्रकोपाय न शांतये॥ पयःपाननूजंगानां । केवलं विपवर्दनं ॥ ११ ॥ मातृवत्परदाराश्च । परद्रव्याणि लोष्ठंवत् ।। आत्मवत्सर्वनूतानि । विदंते धर्मवुद्धयः ॥ १२ ॥ ॥ अथ सन्धिसूत्र ॥ ॥ सिद्धोवर्णः समानायः तत्र चतुर्दशादौस्वराः दशसमान तेषांदाद्वावन्योऽन्यस्यसवर्णो पूर्वोह्रस्वः परोदीर्घः स्वरोवर्णः बज नामी एकारादीनिसंध्यक्षराणि कादीनिव्यंजनानि तेवर्गापंचप वर्गाणांप्रथमद्वितियौ शपसश्वघोषाः घोपवंतोऽन्ये अनुनासिकाः त्रणनमाः अनतस्थाः यरतवाः नषमाणः शपसहाः अतिवितर्ज नीयः कःइतिजिह्वामूलीयः पाश्त्युपम्मानीयः अं इत्यनुस्वारः पूर्व परयोरोपलष्चौपदम् अस्वरव्यंजनं परंवर्णनयेत् अनतिक्रमयन विश्लेपयेत् लोकोपचारात्यहणसिद्धिः इतिसंधौसूत्रतः प्रथमचरण समाप्तः ॥ ॥ हितोपदेशः॥ 'अंहतोभगवंतइंद्रमहिताः । सिद्धाश्च सिद्धिस्थिता ॥ आचार्या जिनशासनोन्नतिकराः। पूज्या उपाध्यायकाः ॥ श्रीसिद्धांतसुपाठका मुनिवरा । रत्नत्रयाराधकाः ॥ पंचते परमेष्ठिनः प्रतिदिनं । कुर्वतु वो मंगलं ॥ १ ॥ अर्थः-(एते पंचपरमेष्ठिनः प्रतिदिनं वः युप्माकं मंगलंकुर्चतु जो पंचपरमेष्टिपददे सो हमेसा तुमन्नव्यजीवोंकू मंगलकरो. के- दे पंचपरमेष्ठि (थईतोन्नगवंतद्रमहिता) प्रथम परमेटि श्री हंतदेव थापकर्मरूप अंतरंगवैरियोको हणे सोथरिहंत कदीजै, श्री घरिदंत केसेंदे, केवलज्ञान केवलदर्शन संयुक्तहे. फेर अरि- 1: केसेकहे जगवंत नगशब्दके अनेकार्थ कोरमें चौदे ..
अर्थदे ।। सूर्य १ ज्ञान महात्म ३ यश ४ वैराग्य ५ मुक्ति रूप ७ वीर्य प्रयत्न ए हा १० श्री लक्ष्मी ११ धर्म १२ ऐश्वर्य १३ योनि १४ इन चवदे अर्थमसे दो अर्थकू वर्जकर वाकी १२ अर्थ अरिहंत नगवंतमेंहे एकतों सूर्य १ दुसरी योनि २ यह दो टालकै फेर श्री अरिहंत नगवंत केसेंकहें (इंद्रमहिता) चोसठ ई. द्रोसें पूजनीक बारेगुणोसें विराजमानदै सो वारे गुण एसे प्रथ- मतो अरिहंतमें अद्भुत रूप होताहे रोग नर पसीना नर मैलर- हित बमा खसबोदार सरीर होतादे १ सासोश्वासमें कमलके फूल जेसी खसवो होतीदे २ लोदी नर मांस गनके दुध जैसा स्वेत होताहे ३ आहार नीहारकी विधि श्रदृस्य होतीहे अर्थात् चर्म चकुवालेकों दिखाई नहीं देता । यह ज्यार अतिशयगुण जन्मसेंही होताहे नर वाकीके आगगुण केवलज्ञान नत्पन्न नये वाद होताहे अशो- कवृक्ष लगवानके सरीरसें घारेगुणा ऊंचा होताहे जिसकी गया वेरनेसे रोगसोकादिक दूर होताहे १ सुरपुष्पवृष्टिः देवतोके स- मुह गोमे पर्यंत पंचरंगेफूलोंकी वरसात करे श्राकाससे गिरते सीधे गिरे । वीट नीचा रहे पांखमी कपर रहे २ । ( दिव्यध्वनि) एक योजन तक देवता मनुष्य तिर्यंच सब जीव अपणी नापा यथावस्थित समके एसा ननोंकों मालम देवेके लगवान हमारी वोलीमही उपदेश दे रहे सोही वात सिद्धांतोंमें कदाजीह ॥ गाथा ॥ एगाइंगिराणेगे । संदेहदेहिणंसमंछित्ता ॥ तिदुअणमj- सासंता । थरिहंताकुँतिमेसरणं ।। ३॥ वामर ४ नगवानके दोनों तरफ इंद्र चम्मर ढोलता रहै ॥ श्रासनञ्च ५ नगवंतके घे. • इंद्रादिक देव रचित फटिकरत्नका सिंहासण रहै ५॥ नाममलं ६ नगवानके पिगमी भामंगल रहे जिस्से नव्यजीव जगवानके तरफ देखसके नगवंतके च्यारमुख व्यासंदिसामें दीखाइदेवे भग. 'वान पूर्व दिशामें मुख करके बैठे नर तीन दिसामें नगवंतकी प्र- -
कोऽर्थःपुत्रेण जातेन । यो न विद्वान न तिमान ||
नपदेशो हि मर्खाणां । प्रकोपाय न शांतये ।।
पयापानन्नूजंगानां । केवलं विपवर्दनं ।।११।।
मातृवत्परदाराश्च । परद्रव्याणि लोष्टवत् ॥
आत्मवत्सर्वभूतानि । विदंते धर्मवुद्धयः ॥ १२
॥ अथ सन्धिसूत्र ॥
॥ सिद्धोवर्णः समानायः तत्र चतुर्दशादौस्वराः ।
तेपाहादावन्योऽन्यस्यसवों पूर्वोहूस्वः परोदीर्घः स्वरोव
नामी एकारादीनिसंध्यराणि कादीनिव्यंजनानि तेर
वर्गाणांप्रथमद्वितियौ शपसश्चघोपाः घोषवंतोऽन्ये अनुन
प्रपनमाः अनतस्थाः यरतवाः नमाराः शपसदाः अः
नीयः कः तिजिहामूलीयः पश्त्युपम्मानीयः अं इत्यनुः
परयोरोपलचौपदम् अस्वरंव्यंजनं परंवर्णनयेत् अ.
विश्लेपयेत् लोकोपचारात्यहणसिद्धिः इतिसंधौसूत्रतः
समाप्तः ॥
(७) णकार नयनिकेपागमापर्यायसंयुक्त सिद्धांतकेपढाणेवाले' २५ गुं. पोसें विराजमान एसे श्रीनपाध्याय महाराज श्रीसंघमें सदा मं- गल करो ४ ॥ (मुनिवरारलत्रयाराधकाः) पंचम परमेष्टिपदमें सरव साधूमुनिराजजी केसेकहें श्रीसाधूमुनिराज ज्ञान १ दर्शन ए चारित्र ३ इन तीन रत्नोके आराधक पांचे सुमतेसमता तीने गुप्ते- गुप्ता उक्कायके पीहर कुरकीसंवल चारित्रपात्र मोक्षमार्गके साधक एसे सब साधूमुनिराज सत्ताईस गुणोंसें सोनित श्रीसंघ सदा मंगल करो ५ ॥ इति हितोपदेश दोनोके कल्याणार्थे । ॥अथग्नुिंजिननाम॥ ॥ अतीतचोवीसी ॥ १ श्रीकेवलज्ञानीजी २ श्रीनिर्वाणीजी॥ ३ श्रीसागरजी । श्रीमहायसजी ५ श्रीविमलदेवजी ६ श्रीसर्वानुन्नतिजी ७.श्रीश्रीधरजी ८ श्रीदत्तस्वामीजी ए श्रीदामोदरजी १० श्रीसुतेजनाथजी ११ श्रीस्वामीजी १२ श्रीमुनिसुव्रतजी १३ श्रीसुमतिनाथजी १७ श्रीशिवगतिजी १५ श्रीप्रस्तागजी १६ श्रीनमिश्वरजी १७ श्रीअनिलनाथजी १८ श्रीयशोधरजी रए श्रीरुतार्यजी २० श्रीजिनेश्वरजी २१. श्रीशुद्धमतोजी २२ श्रीशिवकरजी २३ श्रीस्यन्दनजी २५ श्रीसंप्रतिस्वामीजी ॥ वर्चमानचोवीसी ॥ १ श्रीऋपनदेवजी २ श्रीयजितनापजी ३. श्रीसंनवनाथजी । श्रीअन्निनंदनजी ५ श्रीसुमतिनाथजी ६ श्रीपंप्रन्नूजी - तमा व्यतर देवता स्थापन करै लेकिन भगवानके अतिशय ध्यारोंहादिसामें वारेपरखदाकू अपने सामने उपदेश देतेनये दि खाश्देवे ६॥ कुन्नी आकाशमें देव ते देवउंचनीचानित्र बजार ७ ॥ रातपत्रं लगवंतके विहारकी वखत मस्तकपर तीन त्र रहै ७ ॥ यह प्रावगुण देवतोंके किये होतेहे एसे अरिहंत देवाधिदेव चोतीस अतिशय विराजमान तीत वचनगुण सोजित एक हज़ार श्राउ वहणावंकत अगरे दूपणरहित शांत दांत कृपासागर त्रैलो- क्यनाथ तीन जगल्के गुरु वर्तमान कालमें महाविदेह क्षेत्रमें के- वलज्ञान केवलदर्शनसे लोकालोकका नाव देखतेनये पृथ्वीमंगल- पर नव्यजीवोंके मनोरथ पूरणथके विचरतेहें एसे अनंत गुण विराजमान अरिहंत देवाधिदेव श्री संघ सदा मंगल करो १ ॥ (सिद्धाश्चसिद्धिस्थिता) दूसरे पदमें श्री सिद्धमहाराजकं नमस्कार दुन केसेकहें श्री सिद्धमहाराज प्रष्ट कर्मरूपकाप्टकों शुलध्यानरुप थनिसें जमकर सिद्धगतिको प्राप्तन्नये अनंतज्ञान अनंतदर्शन अ. नंतचारित्र अनंततप अनंतवीर्य संयुक्त जन्म जरा मरणरोग सोक जयादिकसे रहित चदै राजलोकमें सबजीबोके मनोगतभाव एकस- मयमें जाणते नर देखतेथके लेकिन प्रात्मगुणोंमे मग्न रहेलये एसे श्रीसिदमहाराज श्रीसंघमें सदा मंगल करो ॥२॥ (श्राचार्या- जिनशासनोन्नतिफरा) तीसरे पदमें श्रीराचार्यमहाराजकू नम- स्कार दुन केसेकहे श्रीयाचार्यमाहाराज उत्तीसगुणोंसें विराजमान मुक्तिमार्गके साधक कर्मशत्रकेविराधक पंचाचारपालक अबुधजीव- प्रतिबोधक कमागुणनंकार समदृष्टी तरण तारण धर्मकेधौरी जिन- झासनके मन्नतिके करणेबाले एसे परमनपगारी श्रीपाचार्य महा- राज श्रीसंघमें सदा मंगल करो ३ ॥ (पूज्यानपाध्यायका श्री इतिसुपाटका) चोथे परमेष्टिपदमें जीपाल्या. भार हुन रोकदे श्रीउपाघ्यायमहाराज बादशांगी ७ श्रीपभाननजी श्रीअनन्तवीर्यजी ॥ श्रीसूरमन्नूजी २० श्रीविमलजी ११ श्रीवजधरजी १२ श्रीचंद्रानमजी २३ श्रीचंद्रबाहजी १५ श्रीनजंगजी २५ श्रीनेमप्रनजी १६ श्रीईश्वरजी २७ श्रीचयरसेनजी १० श्रीमहानदजी' १५ श्रीदेवयशजी २० श्रीजितवीर्यजी, । च्यारसाश्वतातीर्थकरनाम ।। र श्रीऋपनाननजी २ श्रीचंद्राननजी ३ श्रीवारिपेणजी ५ श्रीवर्धमानजी एते चत्वारनामा जिना साश्वतैव नवंति ॥ ॥ अथ सोले सतोनाम ॥ १ श्रीवामीजी २ चंदनवालाजी ३ श्रीराजीमतीजी श्रीद्रोपदीजी ५ श्रीकौशल्याजी ६ श्रीमृगावतीजी उ श्रीसुलसाजी श्रीशीताजी एए श्रीसुन्नद्रानी २० श्रीशिवाजी २१ श्रीकुंतीजी १२ श्रीशीलवतीजी २३ श्रीदेवदंतीजी १४ श्रीपुष्पचूलाजी १५ श्रीप्रत्नावतीजी १६ श्रीपद्मावतीजी इत्यादि वडी सतियोंको त्रिकाल वंदना ॥ ---------- --
॥परमेष्ठिने नमः॥
॥ अथवा ॥
॥ श्रीश्रावकस्य विधिसंयुक्त देवसिराइ ।
॥ प्रतिक्रमणादि सूत्रम् ॥
॥ तत्र प्रथम ॥
॥ प्राभातिक सामायिक विधिप्रारंभः ।।
C0
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॥ अथ नवकारमंत्रः॥
॥ णमो अरिहंताणं ॥१॥ मो सिद्धाणं ॥२॥ मो
आयरियाणं ॥शा गमो नवद्यायावं ॥३॥ मो सोए सव्यसा
हूणं ॥ ५ ॥ एसो पंच पमुकारो ॥ ६ ॥ सव्वपावप्पणासयो ।
॥।॥ मंगलाणं च सव्वेसि ॥ ॥ पढमं हवश मंगलं ॥
इति ॥ १॥ यह नवकार तीन बेर
गुण
के थापनाजीकी थापना
करे, तब तेरे बोल चिंतचे, तो कहते हैं।
। || अथ थापनाचार्यजीकी तेरे पडिलेहणा ॥
॥ शुद्ध स्वरूप धारु ॥ १ ॥ ज्ञान |॥ १ ॥ दर्शन ॥३॥
चारित्र ॥ ३ ॥ सहित सदहणा शुद्धि ॥ ॥ प्ररूपणा शुद्धि ।
॥२॥ दर्शन शुझि॥३॥ सहित पांच प्राचार पालुं ॥ ॥ प
ला.॥२॥ अनुमोई ॥ ३ ॥ मनोगुप्ति ॥ १ ॥ वचन गुप्ति ।।
॥२॥ कायगुप्ति || आदरं ॥ ३ ॥ एवं तेरे बोल श्रीधर्मरत्नप्रकर
सूत्रवृत्तिमें कहे हैं. ॥ इति ॥ ३ ॥
॥ पी गुरुजीके सामने अथवा थापनाचार्यजीके सामने
खमा हो के तीन खमासमण देवे, सो लिखते हैं ।।
11 अय समासमण ॥
चामि खमासमणो दि जावणिकाए निसीहिआए म
चएण बंदामि ॥ इति ॥ ३ ॥
। ॥ अथ सुगुरुने.शाता सुखपृछा ॥ ॥ चकार नगवन् सुहरा, सुहदेवसी, सुख तपशरीर निरा वाथ सुखसंयम यात्रा निर्वहोगेजी ? स्वामी शाता जी? इति ।। ॥ ५ ॥ एम गुरुने कही नमस्कार करे, तेवारें गुरु कहे दे: वगुरु प्रसाद ॥ ॥ पी नीचे बैठके जिमणा हाथ नीचा करके अनुति मि कहे पीने खमासमा देके चाकारेण संदिस्तह लगवन् सामायिक सेवा मुहपनी पमिलेहुँ ? गुरु कहे, पमिलेह. पी, श्वं. कही दूजी खमासमण देई मुहपत्ती पमिलेहे ॥ ॥ अथ मुहपत्ती पडिलेहणके पच्चीस बोल लिखते हैं । सूत्र, अर्थ साचो सईहुँ ॥ १ ॥ सम्यक्त्व मोहनी ॥ २ ॥ मिथ्यात्व मोहनी ॥३॥ मिश्र मोहनी ॥धा परिहरूं. यह चार बोल मुहपत्ती खोलती बिरीयां कहणां ॥ ॥ कामराग ॥ १ ॥ स्नेहराग ॥२॥ दृष्टिराग ॥३॥ परि हाँ ।। यह सात बोल प्रथम कहीजें ।। ॥ सुगुरु ॥ १ ॥ सुदेव ॥२॥ सुधर्म ॥ ३ ॥ पादरुं । । कुगुरु ॥ १ ॥ कुदेव ॥ २ ॥ कुधर्म ॥ ३ ॥ परिहरु ॥ ज्ञान ॥१॥ दर्शन ॥२॥ चारित्र ॥ ३ ॥ आदीं। यह नव पमिले. हण मावे हाधे करीयें ॥ ॥ज्ञानविराधना ॥ १ ॥ दर्शन विराधना ॥ २ ॥ चारित्र- विराधना ॥ ३ । परिदरूं । मनोगुप्ति ॥ १ ॥ वचनगुप्ति ॥.॥ कायगुप्ति ॥ ३॥ आदरं ॥ मनोदमं ॥१॥ वचनदंम ॥२॥ काय- दंग ॥ ३ ॥ परिहरं । यह नव पमिलेहण जिमणे हायतें करणी ॥ यह पञ्चीश बोल मुहपत्तीके जानने ॥ ॥ अव अंगकी पच्चीश पडिलेहण लिखते हैं। ॥ कृष्णलेश्या ॥ ॥ नीललेश्या ॥.॥कापोतलेश्या ॥ ३ ॥ ए तीनुं नीलामे मस्तकें परिहरु.॥ :- ॥शदिगारव ॥ १ ॥ रसगारव ।। २ ।। शाता गारव ||३|| ए तीनू मुखें परिदलं ॥ ॥ मायाशल्य ॥१॥ नियाणाशय ॥2॥मिवादसणं- शल्य ॥ ३॥ ए तीन हीये परिहरु । ॥ क्रोध ॥१॥ मान ॥२॥ ए दोय जिमणे खन्ने परिहरु। ॥ माया ॥ १ ॥सोन॥॥ए दोय मावे खंने परिहरु । ॥ हास्य ॥१॥रति ॥ २॥ अरति ॥३॥ए तीन मारे हाथे परिदरूं॥ ॥ जय ॥ १ ॥ शोक ॥ २ ॥ दुगंधा |॥ ३ ॥ ए तीन जिमणे हाथे परिहरु । पृथ्वीकाय || १ || अप्पकाय ॥ २ ॥ तेककाय ॥ ३ ॥ ए तीन मावे पगे परिद ॥ ॥वानकाय ॥ १ ॥ वनस्पतिकाय ॥२॥त्रसकाय ॥३॥ एतीन जिमणे पगे परिदरुं॥इति मुहपत्ति पमिलेहणा संपूर्णा खमा होय के चामि खमासमणका पाठ,कदे श्वाकारेण संदिस्सद जगवन् । सामायिक संदिस्सावं ? गुरु कहे संदिस्तावेद ॥ पी चं. कदे के फेर खमासमरा दे के श्चा० ॥ जा ॥ सामायिक वावं ? गुरु कहे गएद ।। ॥पी श्चं कही खमासमरा देश थोमो जुकी तीन नव- कार गणी श्चाकारेण संदिस्सह नगवन् पसान करी सामायिक मक नचरावोजी ॥ गुरु कहे नचरावेमो । पी करेमि नंते नामाश्य इत्यादि सामायिक सूत्र तीन वार नचरे । ॥ अथ सामायिक पचख्खाण ॥ ॥ करेमि नंते सामाइयं, सावऊ जोगं पचरखामि ॥ जाव पावासामि ॥ दुविदं तिविदेणं मशेणं यायाए कारणं; 1. .॥पी न करेमि, न कारवेमि, तस्स नंते परिकमामि निंदामि गरिहामि अप्पाणं वोसिरामि ॥ इति ॥६॥ ॥पी खमासमए दे के इचाकारेण संदिस्सद जगवन इरियावदियं पमिकमामि॥ गुरु कहे पमिकमद. पीछे कही ।। चामि पमिकामनं रियावहियाएइत्यादि पाठ कहे, सो लिखते हैं।। ॥ अथ इरियावहियं ॥ ॥श्वाकारेण संदिस्तह जगवन् । इरियावहियं पमिकमा मि॥छं चामि पमिकमि ॥१॥ इरियावहियाए विराहणाए ॥ ॥ गमनागमणे ॥ ३॥ पाकमणे वीयक्षमणे हरियक्रमणे ॥ नेता नत्तिंग पणग दग मट्टी मकर संताणा संकमणे ॥ ॥जे मे जीवा विराहिया ॥ ५ ॥ एगिदिया वेदिया तेइंदिया चनरिदि या पंचिंदिया ॥६॥ अनिहया वत्तिया लेसिया संघाश्या संघट्टि या परियाविया ॥ किलामिया नदविया गणान हाणं संकामिया जीवियाने ववरोविया ॥ तस्तमिछामि ॥ ॥ इति ।। ॥ अथ तस्स उत्तरी ।। ॥ तस्त नतरीकरणेणं ॥ पायचित्त करणे ॥ विसोहीकरणे ॥ विसनीकरणेणं ॥ पावाणं कम्माणं ॥ बिग्यायगाए ॥ गामि . फानस्सग्गं ॥७॥ ॥ अथ अन्नत्य उससिएणं ॥ ॥अन्नच नप्तसिएणं नीलिए खासिएणं ठीएक जनाइएणं नमुएणं वायनिसग्गेणं जमलिए पिनमुचाए ॥१॥सुदुमेदि अंगतंचा क्षेहि ॥ सुद्धमेहि खेलसंचालेहिं । सुहमेहिं दिसिंचालहि ॥२॥ एव माइएहि भागारेहिं । अन्नग्गो अविराहिन । दुङ मे कास्तग्गो ॥ ३ ॥ जाव अरिहंताणं नगवंताणं नमुक्कारेणं न पारेमि ॥४॥ तावकायं वागणं मोरोणं फाणेणं अप्पाणं वोसिरामि ॥५॥ त ॥ए । इहां चार नवकार अथवा एक लोगस्सको कानस्सग्ग करे. पीणमो अरिहंताणं कहे के कानसमग्ण पारमुखले प्रगट लोगस्स कहे, सो लिखते हैं। ॥ अथ लोगस्स ॥ ॥ लोगस्त नहोयगरे ॥ धम्म तिचयरे जिणे ॥धारिहते कित्तसतं ।। चनवीसंपि केवसी ॥१॥नसन्न मनियंच चंदे ।। संन्नव मनिणं दणं च सुमई च ॥ पठमप्पहं सुपास ॥ जिणं च चंदप्पह चंदे ।। २॥ सुविहिं च पुष्पदंतं ॥ सीअल सिङस वासु पुङ च ॥ विमल मशंतं च जिणं ॥ धम्म संतिं च वंदामि ॥ ३॥ कुंथु अरं च महिं ॥ वंदे मुणिसुधयं नमि जिणं च ॥ वदामि रिक नेमि ॥ पासं तह वक्ष्माणं च ॥ ४ ॥ एव मए अनियुआ || वि हुय रय मला पहीण जरमरणा || चनवीसंपि जिवरा ॥ तिवय रामे पसीयंतु ॥ ५ ॥ कित्तिय वंदिय महिया ॥ जे ए लोगस्त न नमा सि ॥ आरुग्ग बोहिलानं ॥ समाहिवर मुत्तमं दितु ॥ ६॥ चंदेसु.निम्मलयरा ||आपञ्चेसु अहियं पयासयरा । सागरवरगंजीरा । सिदा सिदि मम दिसंतु ॥ ७ ॥ सबलोए० ॥ इति ॥ १० ॥ खमासमण दे श्वा नगवन बैसलो संदि स्सावं ? गुरु कहे संदिस्सावेह ॥ पीछ कहे के वली खमा- समण दे कर ॥ श्चा० ॥ जगवन् बेसणो गठं ? गुरु कहे गएह ॥ फेर छ कहे के खमासमण दे कर श्वा ।। न ॥ सिकाय संदिस्सावं ? गुरु कहे संदिस्तावेह ॥ पी छ कहे के वली खमासमण दे कर श्वा० ॥नग || सिद्याय करूं? गुरु कहे करेह || फेर खमासमण दे के श्छा खमे हो कर थाउ नवकार कह कर सचाय करे. तथा जो शीतकालादि होवे: तो खमासमण दे के इचा ॥ ज० ॥ पांगरणो संदिस्सावं ? गुरु कहे संदिस्तावेह ॥ पो छ कह कर खमासमण दे कर श्छा० ।। ॥ पांगरयो पमिग्याचं? गुश.कहे पमिग्याएह ॥पी छक ॥
(१५) ही वस्त्र ग्रहण करे तथा सामायिकवंत अथवा पोलासहित श्रावक वांदे तो "वंदामों" ऐसो कहे. और जो कोई दूसरो वांदे तो, सि थाय करेह. एसे कहे ॥ इति प्रान्नातिक सामायिक ।। ॥ अथ राइ अतिक्रमणविधि प्रारंभः ।। ॥ प्रथम एक खमासमरा दे के छा० ॥०॥ चैत्यवंदन कर ? गुरु कदे करे ॥ पीछं कही जयन सामि जयउँ सामि इत्यादि कदे, सोही लिखते हैं। ॥ अथ सकलतीर्थकरनमस्कारो लिख्यते ॥ ॥ जयन सामिय जपन सामिय, रिसह सेतुंजि नऊंति ।। ॥ पहु नेमिजिण, जयउ वीर सञ्चनरिमंझरा ।। १ ॥रुपच्छेद मुगिसुदय, महुरिपास उह ऽरिय खमण ॥ श्रयर विदेहिज तिह- यर, चिहुंदिसि विदिसि जं केवि । तीआणागय संपर्य, व जिरा सवेवि ॥२॥ कम्मन्नूमिहिं कम्मन्नूभिहिं पढम संघयणि नमोसन सत्त- रिसन, जिणवराण विहरंत लाई ॥ नवकोमोहिं केवलिया, कोमि सहस्स नव सादु संपर ।। संप जिणवर वीस मुणि, बिहुँ कोमीहिं चरनाण ॥ समराह कोमी सहस्स , युणिकर निच विहाणं ॥ १ ॥ सत्ताणवर सहस्सा, लखा उप्पन्न अरु कोमीन ॥ चन- सय गयासीया, तिब्रुक्के चेश्ए बंदे ॥ २॥ वंदे नव कोमि सयं, पणवीस कोमि लख तेवन्ना ॥ अभावीस सहस्सा, चनसय अम. सिया पमिमा ॥३॥ ११ ॥ ॥ अथ जंकिंचि ॥ ॥ जंकिंचि नाम तिवं । सग्गे पायाले माणुसे सोए । जाई जिणबिंधाई !! ताई सवाई वंदामि ॥१॥ इति ॥ १२॥ ॥ अथ नमुत्थुणं वा शकस्तव ॥ ॥ नमुधुणं अरिहंताणं, नगवंताणं ॥ १॥ आइगराप, ति: .
, गराणं, सयं संयुदाणं ॥ २ ॥ पुरिसुत्तमाणं, पुरिससीहाण, पुरि सबरपुमरीमाणं, पुरिसवरगंधहमीणं ॥ ३ ॥ सोगुत्तमाणं, लोगः नाहा, लोगहियाणं, लोगपईयाणं, सोगपडोगराणं ॥ ५ ॥ श्रतः यदया, चरखुदयाए ॥ मग्गदयाणं, सरणदयारा, योहिदयार ॥५॥ धम्मदयाणं, धम्मदेसियाणं ॥ धम्मनायगाणं, धम्मसा- रही, धम्मवरचामरंतचझवहीणं ॥ ६ ॥ अप्पमिहर वरनारा दसण धराणं, वियह उनमाणं ॥७॥ जियाणं जावयाणं, तिनाणं तारयाणं, बुशाणं वोहयाणं, मुत्ताशं मोगारां ॥ ७ ॥ सधणं सबदरिसिणं, सिव मयल मरुय मयंत मखय मवाबाह मपुारा- वित्ति || सिद्धि गइ नामधेयं ॥ गणं संपत्ताणं, नमो जिणाणं, जिथ नया ॥ ए. || जेब अश्या सिदा ॥ जेजविस्तंति शागए काले ॥ संपश्यवट्टमाणा ॥ सधे तिविहेण वदामि ॥१३ ।। ॥ अथ जावंति चेइआई॥ ।। जावंति चेश्आई। नद्वेय अहेअतिरिअलोएम सवाई ताई वंदे ॥ हसंतो तव संताई॥१॥ इति ॥ १३ ॥ ॥ अथ जावंत केवि साहू ॥ ॥ नगवन् जावंत केवि साहू ॥ नरहेरवय महाविदेहे ॥ सद्यसि तेसिं पणन ॥ तिचिहेण तिदम विरयारां ॥१॥ इति ॥१५॥ ॥ अथ परमेष्ठिनमस्कारः। ॥ नमोऽहस्तिनाचार्योपाध्याय सर्व साधुन्यः ।। ॥ अथ उपसर्गहरस्तवनं । ॥ नवसग्गहरं पासं ॥ पासं वदामि कम्मघणमुझं। विसह- रविसनिन्नासं || मंगलकलाणावासं ॥ १ ॥ विसहरफुलिंगमंत ॥ कंठे धारे जो सया मणुन ।। तस्स गहरोगमा । 5 जरा जति नवसामं ॥ २ ॥ चिन्न दूरे मंतो !! तुच पणामो वि बहु- ने हो ।। नरतिरिएसुधि जीया ॥ पार्वति न रुख दोहग्गं । ...
-- : (१७) ॥३॥ तुह सम्मचे जझे ॥ चिंतामणि कप्पपायवप्नहिए ॥ पाति अविग्घेणं ॥ जीवा अयरामरं गाणं ॥ ॥ श्य संथुन महायस ॥ नतितरनिनरेण हिरण ॥ ता देव दिजा बोहिं ॥ नवे नवे पासजिणचंद ॥ ५ ॥ इति ॥१६॥ ॥ अथ जयवीअराय ॥ ॥ जय वीराय जगगुरु ।। होन ममं तुह पन्नावन नया नयनिव्वे मग्गा, गुंसारिया ३ फलसिद्धी ॥ १ ॥ लोगविशदचा 11 गुरुजणपूषा परचकरणं च ॥ सुहगुरुजोगोतवय, ण सेवसा धान्नव मखंका ॥ २ ॥ १७ ॥ ॥ इत्यादि जयवीयराय पर्यंत चैत्यवंदन करे ॥ पाठे खमासमरा दे के श्या० ॥ न ॥ कुसुमिणसुमिण राई पाय चित्त विसोहणवं कानस्सग्ग करुं ? गुरु कहे करेह पी चं कह कर कुसुमिण दुसुमिण राई पायचित विसोहण करेमि फान स्सगं ॥ अन्नच नससिएणं ॥ इत्यादि पाठ कहे के सोले नव कार अथवा चार लोगस्सका चंदेसु निम्मवयरा पर्यंत चिंतन कर के कानस्सग करे ।। पी एमो अरिहंताणं कह कर काम स्सग पारी मुखसे एक लोगस्तका पाठ प्रगट कहे, जो रात्रिमें गुण संबंधि मोटको दूपण लागो होवे तो कानस्सग्गमाहे ।। सागर वरगंजीरा ॥ पर्यंत चिंतये ॥ इति संप्रदाय ॥ । अब पमिकमणां ठायवेका अवसर हुवा ।। जब खमासम ण देश श्रीयाचार्यजी मिश्र कहि के वांदियें ॥१ || खमासमण देश श्रीनपाध्यायजी मिश्र कहिके वांदिये ॥ २ ॥ स्पमासमण देई जंगम युगप्रधान वर्तमान नद्यारक श्रीपूज्यनीका नाम ले के वां दीय ॥ ३ ॥ खमासमण देश के सर्व साधुजीकुंवादिये ॥ ४॥ इस तरे चार खमासमणसें पमिकमलां गयी गोमालीयें पैठ के मस्त क नमाय कर दोन हाथे मुहपनी मुहमे दे कर ।। सबस्सविराश्य - . - . गराणं, सयं संयुदाणं ॥ २॥ पुरिसुत्तमा, पुरिससीहाणं, पुरि सवरपुमरीआणं, पुरिसवरगंधाची ॥ ३ ॥ सोगुनमाणं, लोगः नाहाणं, लोगहियाणं,सोगपईचाणं, लोगपडोगराणं ॥४॥ अन्न: यदयाणं, चरवुदयाणं ॥ मग्गदयाणं, सरदयाशं, घोहिदयाणं ॥५॥ धम्मदयाणं, धम्मदेसियाणं ॥ धम्मनायगाणं, धम्मसा- रहीणं, धम्मवरचानरंतचझवहीणं ॥ ६ ॥ अप्पमिहय वरनाण दसण घराणं, विधट उनमाणं 30 जियाणं जावयाणं, तिन्नाणं तारयाणं, बुज्ञाणं बोयाणं, मुत्ताणं मोअगाणं ॥G सपणं सबदरिसिणं, सिव मयल मस्य मयंत मरन्खय मघाबाह मपुणरा- विति । सिद्धि गइ नामधेयं ॥ गणं संपत्ताशं, नमो जिणाणं, जिअ नयाणं ॥ ए || जेअ अईआ सिद्धा जेअनविरसंति णागए काले ॥ संपश्यवहमाणा ॥ सधे तिविहेण वदामि ॥१३॥ ॥ अथ जावंति चेइआई ।। ॥ जावंति:चेश्याई। नअ अहेअतिरिअलोएम सवाई ताई वंदे || हसंतो तब संताई ॥१॥ इति ॥१४॥ 11 अथ जावंत केवि साहू ॥ ॥ नगवन् जावंत केवि साहू ॥ नरहेरवय महाविदेहे ॥ सोसि तेसिं पणन ॥ तिधिहेण तिदम विरयारां ॥१॥ इति ॥१५॥ ॥ अथ परमेष्टिनमस्कारः।। ॥ नमोऽर्हत्सिाक्षाचार्योपाध्याय सर्व साधुन्यः । ॥ अथ उपसर्गहरस्तवनं ॥ । नवसग्गहरं पासं ॥ पासं वंदामि कम्मघणमुकं । विसह- रविसनिन्नास || मंगलकल्लागावासं ॥ १ ॥ विसहरफुलिंगमंत 11 कंठे धारे जो तया मणुन ।। तस्स गहरोगमारी {{ जरा जति नक्सामं ॥२॥ चिन दूरे मंतो || तुध पणामो वि बहु- फलो हो ॥ नरतिरिएसुवि जीवा ॥ पाति न ऽख्ख दोहगं ॥ .. .
. ॥३॥ तुहःसम्मने खड़े ॥ चिंतामणि कप्पपाययप्रहिए ॥ पात्ति अविग्घेणं ।। जीवा अयराम गणं ॥ ४ ॥ अ संथुन महायस ॥जतितरनिम्नरेण हिआएण ॥ ता देव दिला घोहिं ॥ जवे नवे पास जिणचंद ॥ ५ ॥ इति ॥ १६ ॥ ॥ अथ जयवीराय॥ ॥ जय वीराय जगगुरु ॥ होन ममं तुह पनावन नय।। जवनिम्न मग्गा, णुसारिया इस फलसिद्वी ॥ १ ॥लोगविशद्धञ्चा 3 11 गुरुजणपूधा परचकरणं च ॥ सुहगुशजोगोतवय, ण सेवणा थानव मखमा ॥२॥ १७ ॥ ॥ इत्यादि जयवीयराय पर्यंत चैत्यवंदन करे ॥ पी रखमासमरा दे के श्या० ॥ न । कुसुमिणमिण राई पाय चित्त विसोहणवं कानस्सग कसं ? गुरु कहे करेह पीछ कह कर कुसुमिण दुसुमिण राई पायचित विसोहणावं करेमि फान स्सगं । अन्न उससिएणं ॥ इत्यादि पाठ कहे के सोले नव कार अथवा चार लोगस्सका चंदेसु निम्मलयरा पर्यंत चिंतन कर के कानस्सग करे ॥ पीठे मो अरिहंताणं कह कर कान स्सग्ग पारोके मुखसें एक लोगस्तका पाठ प्रगट कहे, जो रात्रिमें गुण संबंधि मोटको दूपण लागो होवे तो कानस्सग्गमाहे ।। सागर बरगंजीरा ॥ पर्यंत चिंतये ॥ इति संप्रदाय ॥ । अब पमिकमणां गयवेका अक्सर हुवा ॥ जर खमासम ण दे श्रीयाचार्यजी मिश्र कहि के वांदियें ॥१॥ रखमासमण देश श्रीनपाध्यायजी मिश्र कहिके वांदिये ॥२॥खमासमा दे जंगम युगप्रधान वर्तमान नट्टारक श्रीपूज्यजीका नाम ले के वो दीयें ॥ ३ ॥ खमासमण देश के सर्व साधुजीकुंवादिय ॥ ४ ॥ इस तरे चार खमासमणसे पमिकमयां गयी गोमालीयें पैठ के मस्त क नमाय कर दोनु हाये मुहपत्ती मुहमे दे कर ॥ सबस्सविराश्य ३ (७ ॥ इत्यादि पार कहे. परंतु श्चाकारेणसंदिस्सह , इस माफ न कहे। ॥ अथ सघस्सवि॥ ॥ सघस्सवि देवसिय ऽचिंतिथ मासिय दुचियि ३६ कारेण संदिस्तह जगवन श्छं ॥ तस्स मिछामि दुकर्म । ॥१॥सवेरका देवसिके ठिकाने राश्यं ऐसा पाठ कहे। ।। पी नमुचणं कह के खमा होय के ॥ करेमि नंते भाश्यं सावधं जोग पञ्चकामि || इत्यादिक पाठ कहे । पी हामि कानस्सरगं जो मे राश्ना ॥ यह पाठ कहे । सो लिखते हैं ॥ अथ इच्छामिगमि ॥ ॥छामि ठामि कानस्सगं । जो मे देवसिन अश्यारो। 5॥ काश्न वाश्त माणसिन । नस्सुत्तो नम्मग्गो अकप्पो ॥ श्रः रणिको ॥ उद्यानं ॥ दुधिचिंतिन अगायारो अणिधिनयो । सावगपानग्गो || नारो तह दसणे चरित्ताचरिते ॥ सुए सामाइए तिन्हं गुत्तीणं ॥ चनन्हं कसायाणं ॥ पंचन्हमणुधयाणं ) तिन्हें पचया ॥ चनन्हें सिरकावयारणं । वारसवियस्त सावगधम्मस्स । जं खंमिश्र जं विराहिलं | तस्स मिठा मि दुकर्म ॥ इति । हां देवत्तियंके छिकाने राश्य कहेनां...इति ॥ १५ ॥ ॥पी तस्सनत्तरी०॥ श्रन्न नससिएणं कह कर चारित्र दिनिमित्त चार नवकार अथवा एक लोगस्सका कानस्सग कर पारि के दर्शन शुद्धि निमिने प्रगट लोगस्स कही सबलोए अरिहंत चेयाए । करेमि कानस्सग्गं बंदण वत्तिमाए ॥ इत्यादि कहना सो लिखते हैं। ॥ अथ वंदणवत्तिआए । ॥ वंदरावतियाए, पूअश वनिपाए । सक्कार वनिपाए, स न्माण पत्तियाए · । योहिलाज वत्तियाए । निरुवसांग बतिमाएं 5 -- (१) ॥ १॥ सदाए मेहाए धीईए ॥ धारणाए अणुप्पहाए । वठमाणी एममि. कानस्तग्गं ॥ ॥ इति ॥ २० ॥ पी अनकही चार नवकार अथवा एक लोगस्तका, कानस्लग करके पारके ज्ञानाचार शुक्षि निमित्त पुरकरवरदी० ॥ सुयस्स: नगवन करेमि कानस्लग ॥ इत्यादि पार कहे, सो लिखते हैं। ॥ अथ पुरकरवरदी॥ : ॥ पुस्करवरदीववे, धायस्तो अजंबुदीवेन ॥ जरदे रवयः विदेहे, धम्माइगरे नमंतामि II.१ ॥ तमतिमिरपमसाविई, सणस्ता सुरगशनरिंदमहिग्रस्त ॥ सीमाधरस्त वंदे, पप्फोमिन मोहजाल स्त ॥ २॥ जाई जरामरण सोगपणासणस्त, कक्षाण पुरुषलविः सालसुहावहस्त.॥ को देवदाराव नरिंदगणचिप्रस्त, धम्मस्त.सार मुवलन करे पमायं ॥ ३ ॥ सिस्नो पप णमो जिएमए, नंदी सया सलमे ॥ देयं नाग सुवन्न किन्नर गण; स्तन नावचिए । लोगो जब पनि जगमिश, तेलुकमचा सुरं ॥ धम्मो वहन साः सन विजयन, धम्मुत्तरं वन ॥ ४॥ इतिः।। ३१ ।। सुअस्त ना गवन करेमि कानस्तागं वंदावसिाए ॥ एपाठ पूर्ण कह कर अनवूससिएणं कह. के पाठ नवकार अथवा दो लोगस्सका कान स्सग करे. कानस्तागके मांहे श्राजुशा चार प्रहर चिंतये. सो प्रा में लिखेंगे. पी सिक्षाणं. बुद्धासंका पाठ: कहे, सो लिखते हैं. ॥ ॥ अथ सिद्धाण बुद्धाणं॥ ॥ सिद्धाणं युद्धाणं, पारगयाणं परंपरगया । लोअग्ग- मु.. वगयाणं, नमो सया सद्यसिद्धा- ॥ १ ॥ जो देवाणवि देवो, जं देवा पंजली नम संति ॥ ते देव देव महि, सिरसा चंदे महावी रं॥ २॥ मोवि नमुमारो, जिरावरवसहस्त वदमास्त.।। सं सारसागरान, तारे नरं व नारि वा ॥ ३ ॥ नहिंर सेल सिहरे,, , . ) दिरका नाणं निसीहश्रा जस्स ।। तं धम्मचकवाद, परिमिन मसामि ॥४॥ चत्तारि अ दस दो, यवंदिया जिवरा चनवास | परम निष्क्षिा, सिद्धा सिदि मम दिसंतु ॥ ५. | इंति ॥श्शा 11 अथ वेयावचगराणं॥ || वेयावक्षगराणं तंतिगराएं । सम्मदिहि समाहिगराणं ॥ इति । करेमि कानस्सग्गं ।। अन्नच ॥ इति ॥ २३ ॥ " पीछे संमासा प्रमाऊन पूर्वक वैठ के तीसरे प्रावस्सग सूत्र वादणा निमिते मुंहपत्ती पमिलेहुं ? गुरु कहे पमिलेद । मुहपत्ती पमिलेदे. पी3 वांदणां दे. तिनका विधि कहते हैं। ॥ अवग्रहके बाहिर उन्ना हुआ प्राधा नीचा नम कर चामि खमासमणो वंदिन जावणिकाए निसीहिआए अणुजा- पद मे मिनग्गई. इतना पाठ कह कर भूमि प्रमार्जन करता हुआ निसीदि कद के कवुक अवग्रहमें प्रवेश कर के समासा प्रगाऊन फर के नकम ये के मावे दायमें मुदपनी ले के मात्र कानसें ले.के जिमणा कान पर्यंत निजाम पूंजी, मुदपनी ग्रा रख के तिसके मध्य नागमें गुरुचरणकी कल्पना कर के दो कायं इत्यादि थायर्न कर के कबुक नीचा नम कर मस्तकें अंजलि गुरु सन्मुख दृष्टि स्थापन कर के खमणिको कितामों ॥ इत्यादि पाठ कदे. पा घर ॥ जताने ।। इत्यादि प्रावर्तन कर में सका होके पीछे पगमें मि पूंजता हुया अवमहसे बाहिर निकल स्वस्थान पर यावे. उहाँ भावस्तियाए ॥ इत्यादि पाठ सरदे, सो लिखते हैं। । अब मुगुरुवांदणां॥ ॥ श्यामि समासमणी बंदिन, लायणिकाए नितीहियाए । प्रजापद मे मिग निसीहि ॥ यदी कार्य काय संकास, मानको ने रिलायो । अप्पकिनंताशं यह सनेश ने, वियतो फर
(२१)
वश्मंतो जत्ता ने जवणिच ने, खामे मि खमासमणो ॥ देव.
। सि वकम्मं आवसियाए, पमिकमामि खमासमणाणं ॥ देव-
: सिमाए, पासायसाए ॥ तित्तीसन्नयराए जं किंचि मिचाए, मण-
उकमाए, वयऽकमाए कायऽकमाए कोहाए, माणाए, मायाए, को-
नाए, सबकालिआए, सब मिचोवयाराए, सबधम्माश्रमणाए ।
श्रासायणाए जोमे अश्वारो कन, तस्स खमासमणो पमिकमामि।
निदामि गरिहामि अप्पाणं वोतिरामि ॥ १ ॥ दूजी वारके चांदणे
श्रावलिआए ए पद न कहेना, अने राश्ये राश्न वश्कतो, तथा
चनमासीय चनमासीन वश्कतो, परकी परको वश्कतो, संवद्य-
रीयेसंक्रीन वश्कतो || एसीतरेंपाठकहेनां ।। इति ॥ २४॥
॥ अथ देवसियं आलोउं ।।
॥ चाकारेण संदिस्सहलगवन् देवसिय थालो छ।आ-
लोएमि, जो मे॥इति ॥ २५॥ देवसियंके रिकाने राश्यं कहेनां ॥
॥पी रात्रि संबंधि अतिचार गुरु समक्ष आलोवे, सो क-
॥ अथ आलोयण लिख्यते ॥
॥ आजुगा चार प्रहर दिवसमें जे में जीव विराध्या होय
॥ सात लाख पृथिवीकाय ॥ सात लाख अप्पकाय ॥ सात लाख
तेनकाय ॥ सात लाख वानकाय ॥ दश लाख प्रत्येक वनस्पति-
काय ॥ चनदे लाख साधारण वनस्पतिकाय ॥ दोय लाख बेई-
द्रिय ॥ दोय लाख तेंद्रिय ॥ दोय लाख चौरिंद्रिय ॥ चार लाख
देवता ॥ चार लाख नारकी॥ चार लाख तिर्यंच पंचेंद्रिय ॥ चनदे
लाख मनुष्य ॥ एवं चार गतिके चौराशी लाख जीवायोनिमें,
माहारे जीवे जे कोइ जीव हण्यो दोय, हणाव्यो होय, हणतां
प्रत्ये जलो जाएयो दोय, ते सधे हुँमन वचन काया करी मिडा
मि कम ॥ शति ॥ २६ ॥
कायं इत्यादि श्रावत कर के कबुक नीचा नम कर मस्त अंजलि कर के गुरु सन्मुख दृष्टि स्थापन कर के खमणिो ने किसानों ॥.त्यादि पाठ कहे. पीठे फेर । जत्ताने ॥ इत्यादि आवर्तन कर के खमा होके पी पगसे नमि पूंजता हूया अवयहसे बाहिर निकलकें स्वस्थान पर थावे. नहीं प्रावस्सियाए ॥ इत्यादि पाठ . दिरका नाणं निसीदया जस्स ॥ तं धम्मचकहि, मरिहने, मसामि ॥४॥ चत्तारि अह दस दो, यवंदिया जिसवरा चन i परमह निअिहा, सिदा सिदिं मम विसंतु ॥ ५ ॥ इति in ॥ अथ चेयावयगराणं॥ 11 वेयावञ्चगराणं संतिगराणं ॥ सम्मदिति समादिगण इति ।। करेमि कानस्सग्गं || अनम ॥ इति ॥ १३ ॥ ॥पी संमासा प्रमाऊन पूर्वक बैठ के तीसरे प्रावस्सग सु- बादशा निमिते मुहपत्नी पमिलेहुं ? गुरु कहे पहिलेद ॥ मुहपत पमिलेदे. पी वांदणां दे.तिनका विधि कहते हैं। ॥ अवग्रहके बाहिर नन्ना दुआ प्राधा नीचा नम कर इचामि खमासमणो वंदिन जावणिकाए निसीहिपाए अगुजा- पद मे मिनग्गरं. इतना पाठ कह कर नूमि प्रमार्जन करता हुआ निसीहि कद के कवुक अवग्रहमें प्रवेश कर के संभाला प्रमार्जन कर के उक्का वेट के माधे हायमें मुदपत्नी ले के मारे कानसें ले.के जिमणा कान पर्यंत निजाम पूंजी, मुद्दपनी शार्गे रख के तिसके मध्य भागमें गुरुचरणको कपना कर के ॥ प्रो सर्व कदे, सो लिखते हैं। ॥ अथ सुगुरुवांदणां॥ ॥ चामि खमासमतो वंदिन, जावणिकाए || अणुजाणद मे मिनुग्गई निसीहि ॥ अहो का समणिो ने किलामो || अप्पकिनंताणं बद्ध • .
(२१)
वश्कतो जत्ता ने जवपिडी बने, खामे मि खमासमणो ॥ देव.'
सि वश्कामं आवसियाए, पमिकमामि खमासमणाणं ॥ देव-
सिआए, पासायलाए ॥ तित्तीसन्नयराए जं किंचि मिछाए, मल-
उक्कमाए, वयउक्कमाए कायकमाए कोहाए, माणाए, मायाए, सो.
जाए, सबकालिश्राए, सब मिछोवयाराए, सबधम्माश्कसणाए ।
श्रासायगाए जो मे अश्वारो कन, तस्स खमासमयो पमिकमामि
निंदामि गरिहामि अप्पाणं वोसिरामि ॥ १ ॥ दूजी वारके वांदणे
श्रावसिाए ए पद न कहेना, अने राश्य राश्न वश्कतो, तथा
चनमासी चनमाप्तीन वश्कतो, परकीय परको वश्तो, संवन्ध-
रीयेसंवचरीन वक्रतो ॥ एसीतरेंपाठकहेनां ।। इति ॥ २४ ॥
॥ अथ देवसियं आलोउं ॥
॥ चाकारेण संदिस्सहलगवन् देवत्तियं पालो चं|श्रा-
लोएमि, जो मे॥इति ॥ २५॥ देवलियंके छिकाने राश्यं कहेन ।
॥ पी रात्रि संबंधि अतिचार गुरु समक्ष बालोवे, सो क-
.
॥ अथ आलोयण लिख्यते ॥
|| आजुणा चार प्रदर दिवसमें जे में जीव विराध्या होय
। सात लाख पृथिवीकाय ॥ सात लाख अप्पकाय ॥ सात लाख
तेनकाय ।। सात लाख वानकाय || दश लाख प्रत्येक वनस्पति-
काय || चनदे लाख साधारण वनस्पतिकाय ॥ दोय लाख बे-
द्विय ॥ दोय लाख तेंद्रिय ॥ दोय लाख चौरिद्रिय ॥ चार लाख
देवता ॥ चार लाख नारकी ॥ चार लाख तिर्थच पंचेंद्रिय ॥ चनदे
साख मनुष्य ॥ एवं चार गतिके चौराशी लाख जीवायोनिमें,
माहारे जीवे जे को जीव हण्यो दोय, दणाव्यो होय, हणता
प्रत्ये नलो जाएयो होय, ते सधे हुँ मन वचन काया) करी मिला
मि कम ॥ इति ॥ २६ ॥
॥ अथ अढारे पापस्थानक आलोउं॥ ॥ प्राणातिपात ॥ १ ॥ मृपावाद ॥ ॥ अदत्तादान ३|| मैथुन ॥.. ॥ परिग्रह |॥ ५ ॥ कोध ॥ ६ ॥ मान ॥ ७ ॥ माया ॥॥ लोन ॥ ए.॥ राग ॥ १० ॥ देष ॥ ११ ॥ कलह ॥ १२ || अन्यारख्यान || १३ ॥ पैशुन्य |॥ १५ ॥ रति ॥ अरति ॥१५॥ परपरिवाद ॥ १६॥ मायामृपावाद ॥ १७ ॥ मिथ्यात्वशख्य ॥१७॥ ए अढारे पापस्थानक तेव्यां होय, सेवराव्यां दोय, सेवता प्रत्ये ना जाएयां दोय, ते सत्वे हुँ मनें, बचनें, कायायें करी तस्स मिछा मि.5॥ ॥ ज्ञान, दर्शन, चारित्र, पाटी, पोथी, उवणी, कवली, नव करवाली, देव. गुरु धर्मकी थाशातना करी होय ॥ पनरे, कर्मादा नोकी. आसेवना कररी होय || राजकथा, देशकथा, स्त्रीकथा, नक कथा करी होय. और जो कोई पाप पर निंदा कीधुं दोय, कराव्यु होय, करता अनुमोद्यं होय सो सर्व मन वचन, कायायें करके, दि. यस अतिचार पालोयणे कर के पमिफमणामे यासोन ॥ तस्स मिचा मिया ॥ इति आलोयणं ॥ इहां प्रत्नातके पमिकमरोमें दिवसके ठिकाने रात्रिका पाठ कहेनां ।। इति ॥ २ ॥ ॥ पीनें सबस्सवि राश्यं ॥ इत्यादि पाठ कदे. तिा श्याका० ॥ न ए पद कहने पालोया दुआ अतिचारका प्रा. पचिन मागे ।। गुरु कहे पमिहमद ॥ पी छं तस्स मिशामि उका कह के संमासा प्रमाऊन कर के यासन पर येठे के जि. मशा गोमा वा रख के मावा गांमा नीचे कर के ऐसें कहे कि वन! सूत्र नगुं? दर गुरु कहे जरोह ॥छ कहि तीन, ..अरु तीन वार करोमि ते ॥ नरा के श्यामि पनिक नो मेरा साहि कह कर ॥ तं निदे तंच गरिदामि पर्यंत बंदिता सूत्र कहे. सो लिखते हैं ।। पी खमा हो के अनुति चमि आराहणाए इत्यादि संपूर्ण कहे, सो लिखते हैं । ॥ अथ श्रावक वंदितासूत्र ॥ ॥ वंदित्तु सब सिद्धे, धम्मायरिए अ सबसादू अ॥ श्वामि पमिकामिन, सावगधम्माश्यारस्त ॥१॥ जो मे वपाश्यारो, नाणे तह दसणे चरिते थ ॥ सुहुमो थ बायरो वा, तं निंदे संच गरिहामि ॥ ५ ॥ऽविहे परिग्गहंमि, सावळे बहुविहे अ प्रारंले ॥ कारावणे अकरणे, पमिकमे देवसिय सबं ॥ ३ ॥ सं वक्षमिदिएहि, चनहिं कताएहिं अप्पसहि ॥ रागेश व दोसेष व, ते निदे ते च गरिहामि ॥ ३ ॥ आगमणे निग्गमणे, गणे चं. फमणे थणानोगे अन्तिनगे श्र निगे, पमिकमे ॥ ५ ॥ संका फैख विगिंधा, पसंस तह संयवोकुलिंगीसु ॥ सम्मत्तस्स मारे, पमिकमे॥६॥ उमाय समारंजे, पयणेथ पयावसे अजे दोसा ॥ अत्ताप परम, उन्नयन चेय तं निंदे ॥ ७ ॥ पंचएहमणुध: पाणं, गुणवयाणं च तिराह मश्यारे । सिरकाणं च चनाहं, पमित कमे ॥ ७॥ पढमे अणुवयंमि, थूलग पाणाश्वाय विरईन । थायरिम मप्पस, श्च पमायप्पलगेणं ॥ ॥ वह बंध विछेए, अश् नारे लन पाण युछेए । पढमं वयस्स इयारे, पमिकमे० २७॥ बीए अणुमि, परिशुलगप्रविध वयण विरई nाया- रिश्रमप्पस, श्च पमायप्पसंगेणं ॥ ११ ॥ सहसा रहस्स दारे, मोसुवएसे अ कूमलेहे अ॥ वीयं वयस्त इभारे, पमिछमे ।। १२॥ तश्ए अणुक्यमि, थूलग परदव्वहरण विरई ॥ शायरिथ मप्पस, छ पमायप्पसंगम् ॥१३॥सेनाहमापळगे, तपकिरवं विरु३ गमणे थ ।। कूमतुल कूममाणे, परिक्रमेण ॥ १५ ॥ चन्छे प्रभुघमि, निशं परदारगमश विरश्न ॥ श्रायरिध मप्पस, व पमायापसंगेणं ॥ १५॥ अपरिगहिया कनर, प्रशंग वीवाह तिब्ब . . .
अगुरागे ॥ चमच वयस्त धारे, पमिकमे० ॥ १६ ॥ इनो अणु पं, चमंमि आयरिश मप्पसमि || परिमाण परिचए, श्च पमाय गणं ।। १७ ॥ धण धन्न खित्त कबू, रुप सुबन्ने अ कुवित्र माणे ।। उपए चनुप्पयंमि, पमिक्कमे ॥ १० ॥ गमस्स य माणे, दिसासु नटुं अहेअ तिरियं च ॥ वुझिसश्थतरदा, पढम् गुसाम्चए निदे ॥ १ए । मङमि अ मंसंमिश्र, पुष्फे अफसे गंधमल्ले अनवनोग परिनोगे, बोयंमि गुणवए निदे॥२०॥सा पमिव ॥ अपोल उपोलिभं च आहारे॥ तुलोसहि नस्करण पमिक्कमे ॥ २१ ॥ इंगाली वणसामी, नामो फोकी सुबह कम्मं ॥ वाणिजं चेव दं, त लख रस केस विसविसयं ॥ २१ एवं खु जंतपिल्लणं, कम्म निलंग्णं च दवदाणं ॥ सरदह तसा सोस, असई पोसंच वजिता ॥ २३ ॥ सवग्गि मसल जंतग, तम को मंत मूल नेसले ) दिन्ने दवा विएवा, पमिक्कमे ॥ २७ न्हाणू वा वन्नग, विलेवणे सहरूव रसगंधे ॥ वचासण आन्नररो पमिक्कमे०॥ २५ ॥ कंदप्पे कुक्कुपए, मोहरि अहिगरण नोग श्रास रिते ॥ ममि अणमए, तश्पंमि गुणव्वए निदे ॥२६॥तिविह उप्पणिहारो, अगवाणे तहा सर विहुणे, ॥ सामान वितहकए पढमे सिरकाबए निंदे ॥ २७ ॥ श्रावणे पेसवणे, सद्दे रूबेश पुग्गलखेवे । देतावगा सियंमि, बीए सिस्कावए निदे ॥२०॥ संथा रुचारविही, पमाय तह चैव नोयणान्नोए ॥ पोसह विहि विवरीए, तश्ए सिरकावए निदे ॥ श्ए । सञ्चिते निस्किवणे, पि- हिणे-बबएस मछरे चैव ॥ कालाश्क्कम दाणे, चनछे सिकायएं । सुहिए सब उहिए मुअ, जामे असंजएस अणुकंपा वासराव, तंनिंदे तं च गरिहामि ॥ ३१ ॥ सासु . कउ तव चरण करण जुनेतु ।। संते फासु अ दाणे, EE , (२५) तं निंदे तं च गरिहामि ॥३शा इहलोए परलोए, जीविन मरणे अ प्रासंस पनगे ॥ पंचविहो अश्आरो, मा मय दुङ मरणंते ॥३३॥ कारण काइअस्स, पमिक्कमे वाइअस्स वायाए || मणसा माणसि- अस्स, सबस्स वयाइधारस्त ॥ ३४ ॥ वंदरावय सिरकागा, श्वेतु सन्ना कप्ताय दंमेसु || गुतीसु अ समिईसु अ, जो अश्यारो अतं निंदे ॥ ३५ ॥ सम्महि जीवो, ज विदुपावं समायरे किंचि ॥ अप्पोसि हो बंधो, जेण न निबंधसं कुणश् ॥ ३६ ॥ तं पिहुसपमिक्कमणं, सप्परिश्रावं सननरगुणं च ॥ खिप्पं नक्सामेइ, वादिध सुसिरिकन विजो ॥ ३७ ) जहा वितं कुगयं, मंत मूल विसारया ।। विजा दणंति मंतेहिं, तो तं हवा निविसं ॥ ३७॥ एवं अविदं कम्म, राग दोस समति || आलोयंतोष निंदतो, खिप्पं हण सुसावन ॥ ३ए ।! कय पावोवि मणुस्सो, श्रालोश्य निदिय गुरुसगासे || हो अरेग सहु, हरिश्र नरुच जारवहो 11. ४०. ॥ श्रावस्त एण एएण, साव नवि बहुरन हो । उस्काण मंत किरिश्र, काही अविरेण कालेण ॥४१॥ पालो- अशा बहुविदा, नयसंन्नरिया पमिक्षमणकाले । मूल गुण उत्तर- गुणे, तं निंदे तं च गरिहामि ॥ ५५ ॥ तस्स धम्मस्ल केवलि पन्नतस्त ॥ अनुनिमि पारा, दणाए विरामि विराहणाए । तिविहेश पमिकतो, वंदामि जिणे चनवीसं ॥ ५३ ॥ जावंति वेश्आई. ujy ॥ जावंत केवि साढू० ॥ ४५ ॥.चिर संचिय राव पणासणीइ, नवसयसहस्त महणाए ॥ चनवीत जिण वि. ग्गय कहा, योदंतु मे दिग्रहा ॥ ५६ ॥ मम मंगल मरिहंता, सेता साहु सुरं च धम्मो थ ।। सम्मदिछी देवा, दितु समादि च दि च ॥ ७ ॥ पमिसिद्धाणं करणे, किसाण मकरणे पमिक- रणे ॥ असहहणे अ तहा, विवरीय परूवणाए थ ॥10॥ खा- मि सध जीवे, सधे जीया स्वमंतु मे ॥ मित्तीमे सब नूएसु, वेर , - - मसं न केरा ॥ ४ ॥ एव मई भालोम, निविन गर दिला. विध सम्मं ॥ तिविदेश पमिकतो, वंदामि जिणे चनधीसं ॥५० ॥ इति ॥रा इदा प्रनातके पमिकमरामें देवसिके ठीकाने राश्य फदना ॥ पी दो.वावणां देकर प्रवपदमांदियकोज कदे ॥वा फा० ॥ सं० ॥०॥ अनुनिमि अग्निंतर ॥ राश्यं खामेमि ! गुरु फदे 'खामेद ॥ संमासा प्रमार्जन पूर्वक गोमाली पेट के, पाद पहिलेदि ॥ मुदपत्नी यामदायतूं मुखें देई, दक्षिण दाय गुरु सामो करी॥नीपो नम्यो धको जंकिंचि अप्पनिय ॥ इत्यादि संपूर्ण कदे ॥ ॥ अथ अमुनि ॥ ॥णकारेण संदिस्सद जगवन अतिमि अप्रिंतर पेव- लामे ॥ साममि देवसिपं जंकिंचि परिर्ष नने पाणे पिणए येभापधे प्रासावे संसाये ग्यासणे ॥ रामासणे अंतर घासाए परिजासाए ।। जं किंचि || मझक्षिणय परिदी - im मारा।। नु जागद पदं न जाणामि ॥ तस्रा मिशन इति॥ ॥el गुरु पण मिणमि पुजकदे. पाप गराई INRमान करता सुमा पगरों प्रमद पादिर श्राप के माय. (१५ पाए जायादिनीन गाया कहे, सो रिसते ।। ॥ अप आयरिंग उपहाए । 'मामि उपचाए, सीसे सादमीए एसगणे म ने पा, सोनिणि साममि ||१|| सबस समय मितशि समाना, with२ मनीरामासनादधामो निमि ex.२ समाना, समामि सम्म महरि (१७) पी करेमि नंते धामि गमि कानस्सग्गं तस्सुत्तरी० ॥ श्रीमहावीर स्वामी उमासि तप चिंतवणा निमित्तं करेमि फान- स्सग्गं अन्नबू० ॥ कहि के कानस्सग करे, कानस्सग्गमें श्रीवीर- कृत उम्मासी तप चिंतपन करे ॥ चोवीश नवकार अथवा उ बोगस्तका कानस्सग करे, कानस्तग्ग पारि प्रगट सोगस्स कहे ।। ॥ श्रावश्यफकी मुदपत्ती पहिलेहुं ? गुरु कहे पहिलेद ॥ मुहपत्ती पमिलेही वे वांदगा देई सफल तीर्थनाम खश नम: स्कार करे, सो लिखे हैं. ॥ अथ सकल तीर्थ नमस्कार ।। ॥स्रग्धरा उत्तम् ॥ ।। समक्या देवलोके रविशशिनवने, व्यंतराणां निकाये, नक्षत्राणां निवासे प्रहगणपटले तारकाणां विमाने॥पाताले पन्न- गेंद्रे स्फुटमणिकिरणे ध्वस्तसादांधकारे, श्रीमतीर्थकराणां प्रतिदि- वसमहं तत्र चैत्यानि वंदे ॥१॥ वैताढचे मेरुभंगे रुचकगिरिवरे कुंमले हस्तिदंते, वरकारे कूटनंदीश्वरकनकगिरी नैषधे नीलवंते ॥ शैले चैत्रे विचित्रे यमकगिरिवरे चकवाले हिमाद्रौ ॥ श्रीम०॥३॥ श्रीशैले, विध्यभंगे विमल गिरिवरे ह्यर्बुदे पावके वा, सम्मेते तारके वा कुलगिरिशिखरेऽष्टापदे स्वर्णशैले । सह्याद्री वैजयंते विमल- गिरिवरे गुर्जरे रोदणाद्री ॥ श्रीम०॥३॥ प्राघाटे मेदपाटे क्षि- तितटमुकुटे चित्रकूटे त्रिकूटे, लाटेनाटे चधाटे विटपिघनतटे देमकूटे विराटे । कर्णाटे हेमकूटे विकटतरकटे चक्रकूटे च जोटे ॥ श्री. ॥४॥श्रीमाले मालवे वा मसपिनि.निपधे मेखले पिछले वा. नेपाले नाहले वा कुवलयतिलके सिंहले केरले वा ॥ माहाले कोशले. वा विगलितसलिले जंगले वा ढमाले ॥ श्रीम० ॥ ५॥ धंगे बंगे कलिंगे सुगतजनपदे सत्प्रयागे तिलंगे, गोमे चौमे मुरमे वस्तरद्रवि द्रियाशे च परे ॥ श्रादें मादे पुलिंद द्रवियलये कान्यकुब्जेमुराप्ने ॥ श्री० ॥ ६ ॥ चंदायां चंद्रमुरव्या गजपुरमयु- रापत्तने चोऊ यन्या, कौशव्यां कोशलाया कनकपुरवरे देवगिर्षी च काश्यां ॥ रासक्ये राजगेहे दशपुरनगरे नदिले ताम्रलिप्यां ॥ श्री०॥ ॥ स्वर्गे मत्येऽतरिके गिरिशिखरहदे स्वर्णदीनीरतीरे, शैलाये नागलोके जलनिधिपुलिने नूरुदाणां निकुंजे ॥ मामेऽरपये वने वा स्थलजल विपमे उर्गमध्ये त्रिसंध्यं ॥ श्रीम० || G॥ "श्री. मन्मेरौ कुलाद्रौ रुचकनगवरे शाल्मलौ जंबुवृक्ष, चौऊन्ये चैत्यनंदे रतिकररुचके कमले मानुपांके || इस्कारे जिनाद्रौ च दधिमुखगिरौ व्यंतरे स्वर्गलाके, ज्योतिलोंके नवंति विनुवनवलये यानि चैत्या- सयानि" ||ए।चं श्रीजैनचैत्यस्तवनमनुदिनं ये पति प्रवीणाः, प्रोद्यत्कल्याणहेतुं कलिमलहरणं नक्तिनाजत्रिसंध्यम् ॥ तेषां श्री- तीर्थयात्राफलमतुलमलं जायते मानवाना, कार्याणां सिदिशः प्रमुदितमनसां चित्तमानंदकारि ॥१०॥इति चैत्यवंदनं संपूर्णम्॥ इति ॥ ३२॥ पी- गुरुमुखें पञ्चरकाण करि के ॥ चामोनि सद्वियं कहि गुरु एक गायाकी स्तुति कदे. ॥ पीणमो खमासमणाणं णमोऽईत्सि-शं० ॥ कह कर, परसमय तिमिरतरशिं ए तीन गाथा कदीजे सो लिखते हैं । ॥ अथ परसमय तिमिरतरणि ।। ॥ परसमय तिमिरतरणिं, नवसागर वारि तरण वरतरणि ॥ रागपराग समीर, वंदे देवं महावीरम् ॥ १ ॥ निश संसार विदारकारि, पुरन्तन्नावारिगणा निकामं ॥ निरन्तरं केवतिसत्तमा नो, जवावदं मोहनरं दरंतु ॥ २ ॥ संदेहकारिकुनयागमहटगूद, संमोदपंकदरणामसवारिपूरम् ॥ संसारसागरसमुत्तरणोरुनाव, वी. रागमं परमतितिरं नमामि ॥ ॥ परिमनरलोनालीदलोला. समाता, वरकमलनिवास दारनीमारदासे । अविरलनविकारागार (ए) विधिनिकारं, कुश कमलकरं मे मङ्गलं देविसारम् ॥ ४ ॥ इति ॥ ३३ ॥ अथवा संसारदावानी तीन गाया कहेवे, सो लिखते हैं। ॥ अथ संसारदावा स्तुति ॥ ॥ संसारदावानलदाइनीरं, संमोहधूलीहरणे समीरम् ॥ माया रसादारपसारसीरं, नमामि वीरं गिरिसारधीरम् ॥ १ ॥जा. वावनाम सुरदानवमानवेन, चूलाविलोलकमलावलिमालितानि ॥ संपूरितालिनतलोकतमीहितानि, कामं नमामि जिनराजपदानि तानि ।। २ । बोधागाधं सुपद पदवी नीरपूरानिराम, जीवाहिंसा. विरललहरीसंगमागाहदेदम् ॥ चूलावेलं गुरु गममणी संकुलं दूरपारं, सारं वीरागमजलनिधि सादरं साधु सेवे॥३॥आमूला लोखधूली बहुल परिमला लीढलोलालिमाला. ऊंकारा रावसारा मसदसकमलागार- नूमीनिवासे || यासंन्नारसारे वरकमलकरे तारदारान्निरामे, वा- 'गीतंदोददेहे नवविरहवरं देहि मे देवि सारम् ॥ ४ ॥इति ॥ ३५ ॥ ॥ इत्यादि तीन गाथा नणी, शक्रस्तव कहे. पी3 खमा दो कर अरिहंत चेश्या करेमि कानस्सग्गं । वंदरावसिाए अन्नचू० ।इत्यादि पाठ कहि के॥ .|| कानस्लग्गमाहे एक नवकार चितवी ॥ एक श्रावक प्रथम काउस्सग्ग पारी नमोऽईतिश कही। एक गाथा स्तुति कहे, सो लिखते हैं। ॥ अश्वसेन नरेसर, दामादेवी नंद ॥ नव कर तनु निरुपम, नील वरण सुरखकंद | अहि संग्ण सेवित, पनमावर धरणिंद ॥ प्रद ऊठी प्रण, नित प्रति पास जिणंद ॥ १॥ ए गाथा एक जरा कहे ।। दूसरे सब काउस्सग्गादे रह्या हुआ सुणे ॥ पीठे रामो अरिहंताएं कहि के कामस्सग्ग पारे || इस तरे आगे. पण जाणणा॥ पी- लोगस्त कहे ॥ सधलोए अरिहंत चईआएवं वंदा- , , 4 . वनि० ॥ अनबू० ॥ इत्यादि कहि के। एक नवकारका कानस्सग फरी पारि के दूजी स्तुति कहे, सो लिखते हैं । । कुल गिरिवेयर, कणयाचल प्रनिराम ॥ मानुपोनर नंदी, रुचक कुंमल सुखगम ॥ नुवणेसुर व्यंतर, जोइस विमापी नाम || वर्ने ते जिणवर, पृरो मुझ मन काम ॥२॥ ॥ पी पुस्करबदीवष्वे कहि के सुयस्त नगवन बंदश अन्न 0 कही ॥ एक नवकारका कानस्सग्ग पारि के ॥त्रीजी स्तुति कदे, सो लिखते, ॥ जिहां अंग इग्यारे, वार उपंग उठेद ॥ दस पयन्ना दारख्या, मूल सूत्र चनन्नेद ॥ जिन ागम पाव्य, सप्त पदारय जुत्त ॥ सांजलि सईदतां, बेटे करम तुरत्त ॥ ३॥ . ।। पी3 सिक्षाणं वुशाणं ॥ कह के यावञ्चगराणं ॥ अन्नधू कही ।। एक नवकारका कानस्सग्ग करी पारि के एमो- ऽईसिद्धा कह के चोथी स्तुति कहे, सो लिखते हैं। ॥ पनमावई देवी, पार्श्व यक्ष परतक्ष ॥ सहु संघनां संकट, दूर करेवा द६ ॥ समरो जिनन्नक्ति, सूरि कहे इक चित्त ॥ सुख सुजस समापो, पुल कलत्र बहु वित्त ॥ ॥ इति ॥ ३५ ॥ ॥ पी3 नीचा बैठ के पमोतूणं कहि के ॥ तीन खमा- समणे पूर्वोक्त रीते ॥ प्राचार्य, उपाध्याय, सर्वसाधु बांदे । ' ॥ अथवा कई ठिकाने जिमणो हाथ नीचो करि; मुखें मुहपतो देई अहानु कहे हैं, सो लखते हैं ॥ इति संप्रदाय ।। ॥ अथ अढाइनेसु ॥ : ॥ अवासु ॥ दीव समुद्देसु ॥ पन्नरससु कम्मभूमीसु ॥ जावंत फेवि साहूं ॥ रयहरण गुपमिग्गधारा पंचमदायधार।। अंदारसहस्स सोलंगधारा || अस्कयायारचरित्ना ॥ ते सके. सिरसा मणसा मचएग बंदामि ॥ इति ॥ : . . -- ॥ इतना विधि किया पी. स्थिरता हुवे तो खमासमय तीन बखत देई ।। चाकारेण संदिस्सह जगवन् । चैत्यवंदन करु जी. यह पाठ कह कर पैत्यवंदन करे, सो लिखते हैं। ॥ अथ चैत्यवंदन ॥ ॥ जय जय विन्नुवन आदिनाथ, पंचमगति गामी ॥ जयं जय करुणा शोत दांत, नविजनहितकामी॥ जय जय इंद नारद सुंद, सेवित सिरनामी ॥ जय जय 'अतिशयानंतवंत, अंतर्गत जामी ॥ १ ॥ पूरव विदेह विराजता ए, श्री सीमंधर स्वाम ।। त्रिकरणशुद्ध निहुँ कालमें, नितप्रति करुं प्रणाम ॥२॥ जं किं. चिनाम ति ॥ नमोचूर्ण जावंति चेश्या जावंत केवि साहू र मोऽईत्सिदाचार्योपाध्याय सर्वसाधुभ्यः ॥ तक कहि के सीमंधरजीका स्तवन कहे, सो लिखते हैं ॥ ३७ ॥ ॥अथ सीमंधरजिनस्तवनम् ॥ ॥ जगजीवन जग वालहो ॥ ए देशी ॥ ॥श्रीतीमंधर सादिबा, वीनतमी अवधार बाल परम पुरुष परमेसरू, प्रातम परम आधार लाल रे ॥ श्री० ॥ केवल ज्ञान दिवाकरु, नांगे सादि अनंत लाल रे ॥ नासक लो- कालोक के, ज्ञायक शेय अनंत लाल रे ॥ श्री० ॥ १ || इंद्र चंद्र चक्कोलरू, सुर नर रदे कर जोग लाल रे ॥ पदपंकज सेवे सदा, श्राडूंता इक कोम लाल रे ॥ श्री ॥२॥ चरण कमलपिंजर चसे, मुन मन ईस नित मेव लाल रे ॥ चरण शरण मोहि प्रा. शरो, नव नव देवाधिदेव लाल रे ॥ श्री०॥ ३ ॥ अधम उभारण गे तुम्हें, दूर हो नव एक लाल रे ॥ कहे जिनदर्प मया करी, देजो अविचल सुरक लाल रे ॥ श्री० ॥ ४ || इति ॥ ३७॥ .... ॥ पी जयवीयरायः वंदशवतियाए.॥ अन्नबू०: कहि रे के 1. एक नवकारका कानस्सग करे ।। पारि के नमोऽईसिद्धा कही । एक शुश्नी गाथा कहे, सो लिखते हैं। ॥ महीमरणं पुरससोवन्न देई, जणाणंदणं केवखन्नारागेई॥ महारावलछी बहुबुद्धिरायं, सुसेवाम सीमंधरं तिवरायं ॥१॥श्म होज थिरता हुवे तो, श्रोसिदाचलजीका चैत्यवंदन करे, सो लिखते हैं। ॥ अथ श्रीसिद्धाचलजीनुं चैत्यवंदन ।। ॥ जय जय नानि नरिंद, नंद सिदाचल मंझरा ॥ जय जय प्रथम जिणंद चंद, नव उःख विहंमण ॥ जय जय साधु सुरिंद विंद, वंदिय परमेसर ।। जय जय जगदानंद कंद, श्रीरिपन्न जिणेसर ॥ अमृतसम जिन धर्मनो ए, दायक जगमें जाण ॥ तुझ पद पंकज प्रीति धर, निशिदिन नमत कल्याण ॥१॥ किंचि नामति ॥ णमोठणं ।। जावंति चेश्या० ॥ जावंत केवि साहू०।। समो- ऽहरितक्षाचार्योपाध्याय सर्व साधुन्यः तक कदि के श्री सिझचल- जीका स्तवन कहे, सो लिखते हैं ॥ ३५ ॥ ॥ अथ श्रीसिद्धाचल स्तवनम् ।। ॥ सिक्षचल गिरि नेट्यां रे ॥ धन्य नाग्य हमारां ॥ विम. साचलगिरि० ।। एह गिरिवरनो महिमा महोटो, कहेता न आवे पारा ॥ रायण रूख समोसर्या स्वामी, पूर्व नवाणू वारा रे ॥ ५० ॥ १ ॥ मूलनायक श्रीआदिजिनेश्वर, चोमुख प्रतिमा चार ॥ अष्ट द्रव्यसै पूजो नाचें, समकित मूल आधारारे || ध० ॥२॥ दूर देशंथी हुं हां आयो, श्रवण सुनी गुण तोरा ॥ पतित नहारण विरुद तुमारा, एवं तीरथ जग सारा रे ॥ ५० ॥ ३ ॥ नाव नक्तिले प्रनू गुण गावे, अपना जन्म सुधारा ." जात्रा करि नविनन शुन्न नावें, नरक तिर्यंच गति वारा रे ।। ध०॥४॥ संवत अदारे व्यासी मास आपाढे, यदि आपम नोमवारा ।। , प्रन्नुके चरणं परतापसिंहमें, क्षमारतन प्रनु प्यारा रे ॥ ५० ॥५॥ ॥ पी जयवीयराय० ॥ वंदणवत्तियाए०॥ अन्नबू०॥ कहिके, एक नवकारका कानस्सग करी॥पारिके नमोऽहत्तिक्ष०॥ कहि के। ॥ शेजगिरि नमियें, रुपनदेव पुंमरीक ॥ शुन्न तपनो महिमा, सुणि गुरु मुख निरवीक ॥ शुद्ध मन नपवासे, विधिशुं चैत्यवंदनीक (! करियें जिन आगल, टालो वचन अलोक ॥ १ ॥ इति ॥ ३१ ॥ पीठे फुरसद होवे तो पमिलेहण करे, सो लिखते हैं।। ॥ अथ पडिलेहण ॥ ॥ खमासमण देई चाकारेण संदिस्सह जगवन | पमि- खेहण संदिस्साचं ? गुरु कहे. संदिस्साएह || बीजे खमासमणें ॥ iश्चाका० ॥ सं० ॥ ज० ॥ पमिलेहण करूं ? गुरु कहे, करेह ॥ पी , कही । मुहपत्ती पमिलेहे ॥ इमहीज दोश खमासमणे थंग पहिलेहण संदिस्सा || अंगपमिलेहण करूं, कहीके घोतियु कणदोरो पमिलेहि के ॥ खमासमरा देई श्चाकार जगवन् पसान करी पमिलेहण पमिलेहावो जी. एम कही ॥ थापनाचार्य पहिलेह रके, अने जो गुर्वादिक थापनाचार्य पमिलेहे, तो पंप खमासमण देई आग्या मागे, पी. खमासमय देई ॥श्चा० ॥ सं० ॥ ॥ मुहपत्नी पमिलेहुं ? गुरु कहे पमिलेहेह पी- चं कही । मुहपत्ती पमिलेहि ॥ दोय खमासमणे ॥३- घाफा० ॥२०॥०॥हि पमिलेहश संदिस्सा नही पनि- सेहण करूं || एम कही कंवल वस्त्रादि पमिलेहे ॥ पी, पोपध- शाला प्रमार्जी काजों, विधिY परवी खमासमण देई इरियावही पमिकमे ॥ ए मूल विधि जाणवो || इतनी स्थिरता न होवे,तोनी इंटिपमिलेहण तो अवश्य करणी ।। अवनी प्राये एही करते दिन खते हैं ।
, । अब सामायिक पारणेका विधि कहे है ।। ॥पी सामायिक पारे । एक खमासमण देई । मुहपत्ती पमिलेहे || फिर खमासमण देई॥श्चा०॥२०॥ न०॥सामायिक पारुं । गुरु कहे पुणोवि काययो, पी यथाशक्ति कही बली खमा- समण देई कहे. चाका० ॥ सं०॥०॥ सामायिक पारेमि ॥ गुरु कहे पायारो न मोत्तयो || पीठे तहत्ति कही, श्रई नमि कन्नो यको, तीन नवकार गुणी नीचो गोमालीये बेसी मस्तक नमावी ॥ जयवं दसमनदो ॥ इत्यादिगाथा कहे, सो लिखते हैं। ॥ अथ भयवं दसपनदो ॥ || नयवं दसम्म नदो, सुदंसपो थूसिलद्द वयरोय ।। सफनी यगिहचाया, साहू एहं विहा हुंती ॥ १ ॥ साहूरा बंदणेणं, ना. संभ पावं असंकिया नावा ॥ फासु अदाणे निकर, अनिग्गहो नाग माईणं ॥२॥ नमो मूढमो, किसिय मिपि संनरर जीयो । जं च न निरामि महं, मिठामि एक्कम तस्स ॥ ३ ॥ जं जं मरोण चिंतिय, मसुई वायाश्नासिय किंचि |} असुहं काएप कयं, मिछामि उक्कम तस्स || ४ || सामाश्य पोसहस, व्यिस्त. जीवस्स जाइ जो कालो । सो सफलो बोधवो, सेसो संसार फलहेत |!! सामायिक विधे लीधुं विधे कीथु, विधि करतांप्रविधि माशा.. तना लगी होय, दश मनका, दश ववनका, वारह कायाका, बत्तीस दूपणमाहि जो कोई दूषणलगा होय, सो सहु मन कर, वचन: कर, कायायें करी मिछामि ॥ इति सामायिक पोसह पारवानी गाथा ॥ ॥ अथवा पहिला सामायिक पारी के पी पमिलेहण करे. हां ययायोग्य अवसरे गुरुकू मुहराइ पूर्व ।। दूसरा खमासमण देचे, श्रोजिनपत्ति सूरिजीकी सामाचारीमें एतें कहो हे ॥ इति सामायिक पारण विधि ॥
(३५) ॥ अथ संध्याकाल सामायिक विधिलिख्यते ॥ पिनले पहोरे धर्मशाला प्रमार्जी वस्त्रादिक पमिलेहे. जो अधेरो आयो हुवे, तो दृष्टिपहिलेहण करे ॥ पी गुरु आगे अथवा थापनाचार्यजी आगे धावी भूमि प्रमार्जी पासण वाम पास मूकी खमासमण देई कहे । श्छाका० ॥ सं० ॥ ॥ सामायिक मुहपत्ती पमिलेहुं ? गुरु कहे पमिलेहेह, श्चं कही ॥ फिर खमास- मा देई मुहपत्ती पमिलेहे,॥ पी खमासमण देई ॥ इचाका० ॥ सं०॥ नसामायिक संदिस्सा ? गुरु कहे संदिस्तावेह ॥ फिर खमासमण देई चाकाon सं०॥०॥सामायिक गर्ने ? गुरु कहे, गएह ॥ चं कही फिर स्वमासमण देई ॥ अविनत थई तीन नवकार गुणी कहे. डकार लगवन् ! पसाळ करी सामायिक दंझक नचरावो जी | गुरु कहे नचरावेमो । पो करेमि ते सामाश्यं ॥ इत्यादि सामायिक सूत्र गुरु वचन अनुनापण करतो थको तीन वार नचरी खमासमण देई ।। चाका० ॥ सं०॥०॥ रियावहियं पनिकमामि ? गुरु कहे पमिकमेह ॥ पीछ कही। श्चामि पमिकमिनं ॥ हरियाव- हियाए इत्यादि पानसे इरियावहियं पमिकमी ।। एक लोगस्सका कामस्सग्ग करी, मो अरिहंताएं कही, कानस्तम्ग पारी मर प्रगट सोगस्त कही, नीचे बैठ के महपत्ती पमिलेहि चांदणां देई कहे. इचाकार जगवन् ! पसान करी पक्षकाण करावोजी. पार्ने गुरु, दिवस चरिम पचरकाण करावे ।। गुरु अन्नावे श्रापनाचार्य ' समझें अथवा स्वमुखें, अथवा मेरा साधर्मी मुरखें पञ्चरके ॥ श्रने । जो तिविहार उपवास कीधो हुवे, तो मुहपत्तो पमिलेहि पञ्चरकापण करे ॥ वांदणां न देवे, अने जो चनबिहार उपवास हुवे, तो पञ्च. रकाण करवू दे नही ॥ ते माटें मुहपत्ती नहिं पमिलेहे.॥ ए विस्तार विधि है ।। पी एक खमासमण दे डाका ॥ सं० - ज०॥ सिद्याय संदिस्सानं ? गुरु कहे, संदिस्तावेह. पं. चं कही वली खमासमरा देई॥छा. || सं० ॥ न.॥ सिआय करूं? गुरु कहे करद ॥ पीचं कही । खमासमा देई ।। नन्नो अको मधुर स्वरें आठ नवकारनी सिकाय करे ॥ पीठे स्वमासमण देई ॥ श्चा० ॥ सं० [॥ न ॥ वेसणुं संदिस्सावं ? गुरु० संदिस्सावेद ॥ फिर खमासमण देई श्चा० ॥ सं० ॥ ॥ बेसगुं गगन ! गुरु कहे, गएह ॥ पा3 चं कही जो शीत कालादि हुवे तो खमासमण देई ॥ श्चा० ।। सं० ॥ न ॥ पांगरपुं संदिस्सावं ? गुरु कहे, संदिस्सावेद ॥ फिर खमासमण देई । चा० ॥ सं॥ ज०॥ पांगरणुं पमिग्घावं ? गुरु कहे पमिग्याएद ॥ पी चं कही शुन्न ध्यान करे ॥ इति संध्यासामायिक विधिः ॥ ॥ अथ देवसि पमिक्कमण विधिलिख्यते ॥ ॥ प्रथम त्रण खमासमण देई ॥ छा०॥ सं० ॥ ॥ चैत्यवंदन करूं ? गुरु कहे करेद, पीछे कही ॥ जय तिदुयण कहे ॥ जिसमें परकी तथा चनमासी तथा संवचरीके रोज तीस गाया कहेनी ॥ और दिनोमें तो पांच गाथा पदेलेकी, और दोय गाथा पिगमीकी, एवं सात गाथा कहेनेकी प्रवृत्ति देखणेमें आवे हैं. अब जयतिदुअण लिखते हैं। ॥ अथ जयतिहअण लिख्यते ।। ॥ जय तिहुअरा वरकप्परुरक जय जिरा धन्नं तरि, जय तिहुश्रण कक्षाकोस उरिकरि केसरि ॥ तिहुश्रण जण अविलं- घियाण नुवणचय सामित्र, कुणसुसुदाई जिणेस पास नणय पुरधि ॥१॥.तई समरंत लदंति कत्तिवर पुत्त कलत्तहि,धम सुवन्न हिरण पुरण जणन्नुजदि रङदि ॥ पिकहि मुरक असंखसुरक तुद पासपसाश्ण, श्य तिहुअण वरकप्परुरक सुरकहि कुण मदजिए!! २॥ जरजर परिजुस वणगाठ सुकुष्णि, चाकुरकोणखएणखुम (३७) निरसतिप्रसूतिण ॥ तह निण सरणरसायण बहु हुँति पुणपक, जय धवंतरि पास मदवि सु९ रोगहरो नव ॥ ३ ॥ विजाजोस मंततंततिदिन अपयनिय, नुवणघुश्र प्रविद सिहि सिकर तुद नामिण || तुह नामिण थपवित्ननवि जण होइ पवित्तन, तं ति- दुश्रण कल्लायकोत तुह पास निरुत्तन ॥ || खुद्द पवत्त मंत संत जंता विसुत्तर, घरथिरगरलगहुग्गखग्गरिनवगविगंजः ।। अधिपसच अणन पच निधार दय करि, रिअई हरन सुपासदेव रिकरिकेसरि ॥ ५ ॥ तुद आशार्थनेजीमदपुर सुरवर, रस्कस जरक फणिंद विंद चोरानलजलहर ।। जलथलचारिरनदखुद्द पतुनोणि जोश्य, श्यतिहुश्रणअविलंधिाण जय पास सुसामिय ॥६॥ पवित्र अब अणबहिउन्नचिनर निप्पर, रोमंचं चिअचारु- काय किमारनरसुरवर | जसुसेवहिं कमकमलजुअल परकालिम कलिमलु, सोनुवणनयसामि पास महमद्दन रिनबलु ॥ ७॥ जय जोश्यमणकमलनसवनय पंजरकुंजर, तिदुअराजण आशंदचंद नुवरात्तयदिणयर ।। जय मश्मेणि वारिवाद जयजंतुपियामह, थंनणयअि पासनाद नादत्तणकुरामह ॥णा बहु विहवएशुअवस्णु सुरुणु वलिन उपसहि, मुकधम्मुकामबकाम नर नियनियसबहि ॥ जं जायज्ञ बहु दरिसराव बहु नाम पसिन, सो जोइ अमण कमलजसससह पास पक-इन ||नयविप्रल रशमगिरदसण, धरहरिण सरीरय, तरलिअ नयणविसमणुसुमांगग्गिर गिरकरुणाय । तइंसदसतिसरंति कुंति नरनासिय गुरुदर, महविजविसङास पास जय पंजरकुंजर ॥ १० ॥ पपासविविधसंतनित्तपत्तपविलिय, वाहपवादपयूढरूढ उइदाहसुपुलश्य॥ मगणूदिमएलसनुतण पुषभ- प्पाणंसुरनर, श्य तिदुपण आणंदचद जय पास जिणेसर ॥ ११ ॥ तुद कल्लापमहेसुघंटटकारवपिल्लिा, वखरमलमहलन्नत्तिसुरवरगं- जुलिय। इबुप्फलिम पवनयंति नवरोहिमदूसव, इय तिदुअल . .
आणंदचंद जयःपाससुहुनव ॥ १२ ॥ निम्मल केवल किरणनिय रविदुरिअ तमपदयर, दंतिम सबसषयचं विटरिश्र पहाजर ॥ क- लिफखुसिभ जण धूप्रलोयलोयाअगोयर, तिमिरई निरुहर पासनाद नुवनय दिणयर ॥ १३ ॥ तुह समरणजसवरिससित्त माणव मई मेणि, अवरावरसुदुमचबोह कंबलदलश्रेणि ॥जाया- फलनरत्नरिय हरिय ऽहदाह अगोवम, श्यम मेशि वारिवाह दिलिपास मई मम ॥१५॥ कय अविकल कल्लाणवक्षिनवरि- यादवj, दाविप्रसग्गपवग्गमग उग्गगम वारणुं ॥ जय जंतुद- जगएणतुलजंजणियहियावहु, रम्म धम्म सो जयन पास जप जंतु पिप्रामद ॥ १५॥ नूवणारमनिवास दरिश्रपरदरिसणदेवय, जोइणिपूधणखित्तवाल खुद्दासुर पसुक्य ॥ तुद उत्तम सुन सुरु अविसंतुलचिाहिं, श्य तिहुश्रण वणसिंह पास पावार पणासदि ॥ १६ ॥ फणिफणफारफुरंतरयण कर रंजिश नहयल, फसिपी कंदलदलतमाल निल्नुप्पलसामल || कमगसुर नवसग्गवग्ग संस- ग्गभगंजिन, जप पञ्चरकजिणेस पास यंत्रणय पुरहिअ ॥ १७ ॥ मदमणतरलपमाणनेयवायाविविसंग्लु,नियतणुरवि अविण्यसहाव पालसविदिसंघलु ॥ तुइमादप्पपमाणदेव कारुणपवसन, श्यमा इमाप्रवदीरपासपासहिविलवंतन ॥१॥ किंकिकप्पिनरोयकलु- शुकिंकिंवनपिन, किं पनचिनिकिन्देवदीणयमविलंपिन || का- सुनकियनिप्पललनुमोदिऽदत्तई, तदविन पननताण किंपिपई पटु परिचनई ॥ १९ ॥ तुहूं सामिद तुहं माप वप्प तुई मित्तपियंकरु, नुहुँ गा तुहुँ म तुंदिज तारा तुहुँ गुरु पेमंकर ॥ दवं इदन्नरनारप्रवरान रामलनिग्गन, सीन तुद फमक- मस सरणजिशपासद चंगळ ॥ २० ॥ पकिविकपनीरोप. सोपकिविपावियसुदसय, किविमईमंतमदंतकेवि किचिसाहिपति- बएप निविनिमरिनयग्गके विजसपवलिय नुमत, मई अपदी. , रदिकेणपास सरणागयवघल ॥११॥ पञ्चुवयारनिरीदनादनिप्पल्स पयोअण, तुहुं जिण पासपरोवयार करुणिकपरायण ।। सत्तुमित्त सम चित्तवित्तिनयनिंदअसममण, मा अवहीरिअजुग्गन विमई पासनिरं. जरा ॥ १२॥ इनं बहुविदउहतत्तगत्ततुहुँ उदनासणपरु, दवं सुपणहकरुणिकगण तुई निरुकरुणाकरु ॥ चंजिश पासप्रसामि- सालु तुहुँ तिहुअणसामित्र, जं अवहीरहि मई ऊखंतश्य पासन सोहिन ॥ २३ ॥ जुग्गाजुग्ग विनागनादनहुजोश्रणतुहसम, नव- गुवयारसु हावन्नाव कझणारससत्तम ॥ समविसमह किंधण नए नुविदासमंतन, श्य उहबंधव पासनाह मई पास धुणंतत्र ।। २५ ॥ नयदीशहदीणयमुएवि श्रमविकिविजुग्गय, जं जोश्यनव- याज्ञकरश्नवयारसमुझाय ॥ दीणद दोगनिहीणजेणतुहनाहिण. चलन, तो जुग्गनअहमेव पासपाल हिमई चंगन ॥ १५ ॥ अहा- पविजुग्गयघिसेस किविमलहि दीणह, जं पासविनवयाशकर तुइनाद समग्गह ॥ सुचियकिल कवाणुजेण जिण हुम्द पसीयद, किं अगुंग तंचेव देव मामअवहीरद ॥ २६ ॥ तुद पत्रण नहु हो विहल जिएजाणन किं पुण, हनं उरिकन निरुसत्तचत्तक्कहु उस्सुयमण ॥ तं मम निमिसेस एण एनविकर सप्रश्, सञ्चं जं नुस्कियवसेण किं नंबरु पच ॥ २७ ॥ तिहुअणसामिश्र पासनाद. मई अप्पपयासिन, किऊन जं नियरूवसरिसुनमुटुंबहुं जंपिन । अएणु श जिगजगतुहसमोविदस्किलादयासन, जश्वगिहासि तुंदिजश्रददाकिहोइसहयासन ॥ २० ॥ जर तुहरूविणकिण विपेश पाइणवेलेविन, तवजागुंजिशपाप्त तुम्ह दचंअंगीकरिअन ॥ श्यम- हचिनजं न हो सातुइनुदावण, रकंतह निकित्तिणे य जु- ऊश्वदीरण ॥ ए || एवमहारिहनतदेवश्यन्हवामहसन, जं अगलिय गुणगहण तुम्ह मुणिजपप्रणिसिन || श्य मई. पसि- यसुपासनादर्थनणयपुरष्यि, श्य मुणिवरसिरि अन्नयदेव विप्लव
॥
(४०)
श्राणि दिय ॥ ३० ॥ इति श्रीस्तंन्ननकतीर्थराजश्रीपार्श्वनायस्त
वनम् ॥
पीठे जय महायस कहे, सो लिखते हैं
॥ अय जय महायस प्रारंभः ।।
॥ जय महायस जय महायस जय महानाग जय चिंतिय
सुद फलय ।। जय समउ परमबजाय, जय जय गुरु गिरिम
गुरु ॥ जय ऽहत सत्ताण ताणय, नायध्यि पातजिए || न
वियद नीम नयतु, नव प्रवर्ण ताणं तं गुण ॥ तुऊति संज
नमोतु ॥ १ ॥ इति ॥
॥ पी शकस्तव कद के स्वमा दो कर अरिहंत वेश्याणं.
करेमि फास्सगं चंदणवत्तिमाए । अनयू०॥ स्पादि पाठ
फद के फाउम्सग्गमांदे एक नवकार चितवी एक श्रावत कान.
रसग पारी नमोऽसिक्षा० ॥ फदी एक गाया स्तुति कदे, तो
लिखते
॥ अथ महावीरजिनस्तुति प्रारंनः॥
11 मूरति मन मोदन, कंपन कोमज काय ॥ सिदारण
नंदन, प्रिदालादेवी समाय । मृगनायक संग्न, सात हाय तनु
मान । दिनदिन मुख दायक, स्वामी श्रीवर्द्धमान || १ ॥
! ए स्तुति एक प्रावक कहे. अरु दूगर श्रावक सब फाउ.
म्माम रहे यमुने, पीई पामा परिहंतापां कह के काठमाण
परे. सीनरें प्रागें पस म्नुनिको पारों गाया जान लेना.
सोगाम कद का सोए अरिहंन पक्ष्या यंद.
शनिक अनदः। कहि के एक नवकारमा काठमाग की,
रजत म्नुनि। दूसरी गाया ई, सोभिने।
मुर नाशिनर,डिन पर प्राविंद ॥ कामित नर
नव मुकंद नदिने ती प्रदान
(४१) शिदीस ॥ चोवीशे जिनवर, प्रणमुं विशवा वीस ॥ यह" दूसरी गाथा कहि के कानस्सग्ग पारे. पी3 पुरकरवरंदो० बंदणवतियाए। अन्नतू० कदि कें, एक नवकारका कानस्सग्ग कर के, पारि के वक्त' स्तुतिको तीसरी गाया कहे, सो लिखते हैं । ॥ अरथें करि श्रागम, नारख्या श्रीजगवंत ।। गणधरने गूंख्या, गुणनिधि ज्ञान अनंत ॥ सुरगुरु पण महिमा, कहि न शके एकंत ॥ समरूं सुखप्तायर, मन शुक्ष सूत्र सिहति ॥ ३ ॥ यह गाथा कहि के सिद्धाणं युद्धाणं० ॥ वेयावञ्चगराणं अन्नवू० ॥ कहीं कालस्सग पारी उक्त स्तुतिकी चोथो गाथा कहे, सो लिखते हैं । ॥ सिद्धायिकादेवी, वारे विधन विशेष ॥ सहु संकट घूरे, पूरे पाश अशेष ॥ अहोनिश कर जोमो, सेवे सुर नर इंद ॥ जपे गुण गण इम, श्रीजिनसान सृरिंद ॥४॥ इति महावीर जिन स्तुतिः ॥ यह चोश्री स्तुति कहिक बैठ के नमोजूरां कहे, पी एक समासमण देई के श्रोप्राचार्य मिश्र दूसरा खमासमण दीये. प 3 श्रीनपाध्यायजी मिश्र तीसरा खमासमयदे कर श्रीवर्तमान था. पार्यजीकर नरम ले के मिश्र चोथे खमासमणमें सर्व साधुजी मिश्र इसी तरें कह कर गोमालायें बैठ के मस्तक नमावी सघस्तवि देवसियन इत्यादि कह कर तस्स मिचामि कम कहे, परंतु 'इ- शाकारेण संदिस्सह चं' ए पद न कहे ॥ ॥ पी खमे हो कर करेमि ते सामाश्यं०॥ चामि गमि कानस्सगं जो मे देवसिन० ॥ तस्सुत्तरि ॥ धनबू० ॥ इत्यादि कहि कें, पाठ नवकारका कानस्सग करे, कानस्सग्गहि थाना चन प्रहरमें ॥ इत्यादि पांठ मनमें चिंतची, पमो धरिहंताएं कही मानस्सग्ग पारि के प्रगट लोगस्स. कहे ।। , ६ . (४२) .-11-पी संमाता-प्रमाऊन पूर्वक वैठ के तीसरे भावश्यक सूत्र बांदणां मुहपत्ती पमिलेहुं ? गुरु कहे पहिलेदेह. पा मुइ- पत्ती पमिलेहि के वांदणां देवे. पी अवग्रहमादिज नलो धको श्चा०॥ सं० ॥ न० ॥ देवसियं आलोर, एसा कहे. तब गुरु कहे बालोएच. पीई छ अालोएमि० ॥ यह पाठ कद के अति- चार सालोवे. पी सबस्सवि देवसियं इत्यादिधी मामाने भा- कारेण संदिस्सद पर्यंत कहे, तव गुरु पनिझमद. यह पाठ कहे ।। ॥ पीचं तस्स मिछामि कहि के संमासा प्रमार्जि प्रमार्जित नूमिये श्रासन पर बैठ के लगवन् ! सूत्र नपुं एता कहे. तब गुरु कहे नरोड़. पी3 चं कड़ी तीन नवकार गशी, तीन करोमिते नमोने चामि पमिशामिनं जो मे देवसित इत्यादि कही एक श्रावक बंदिसु कहे. दूसरा सब सुने. पी रखमा हो कर अनुनिमि पारादणाए इत्यादि संपूर्ण पाठ कदी, दो वांदणां देवे, अरु प्रवनदाहिज खमा दुवा इचा० ।। सं० ॥ ज० ॥ अनुन्निमि अप्रिंतर देवसियं खामे ? गुरु कदे, खामेह ॥ ॥पी इथं खामि देवसियं कदि के गोमाली पैर के वाम हाये मुदपत्नी मुखें घर के दक्षिण हाथ गुरु सन्मुरप कर फें सर्व पाठ कहे. पी विपिसती दो वदिशा दे कर श्रापरिय उव. द्याप स्पादिप्रण गाथा कहिके करेमि ते सामाश्यं शामि जामि कानस्सगं इत्यादि कही चारित्र शुझिनिमिन करेमि कान. सगं अनमः ॥ कहि के यात नवकार यया दो सौगस्नका काउस्सग करी पारि के पीठ दर्शनादि निमित प्रगट सौगस्त नदी सबलोए अरिहंत श्या०॥ वंदावनिक अन्न ॥ कदि एक सोगम्मता फाउस्सग कर) पारि के ज्ञान दि निमित फरि सुपस्म नगरळ ॥ वंशय निकायमा 5 (५३) 11 कहि के एक लो. सका काउस्तम्ग करे, पी, पारि के सिद्धाणं बुशाणं कहि के वेयावच्चाराणं न कहे. .पी सुयदेवयाएं करेनि कानस्सगं अमडू०॥ कही एक नवकारनो कानस्सग्ग करें. पी गुरुका योग न होवे तो एक श्रावक कानस्लग्ग पारि गमों अहरितद्धा. कहि के श्रुत देवताकी स्तुति कहे. गुरु हुवे तो गुरू फदे. और दूजा सर्व स्तुति सुण के कानस्सग्ग पारे. अब श्रुतदे वताकी स्तुति कहे, सो लिखते हैं। ॥ अथ श्रुतदेवताकी स्तुति ॥ .. : || मुवर्णशालिनी दयाद्, द्वादशांग! जिनोमवा ॥ श्रुतदेवी सदा मध, मशेषश्रुतसंपदम् ॥ १ ॥ पीस्वित्तदेवयाए, करेमि कानस्सगं० ॥अन्नबू० ॥ कहि के, एक नवकार चिंतवी पूर्वली परे क्षेत्रदेवताकी स्तुति कई, सो लिखते है. ॥ अथ क्षेत्रदेवताको स्तुति ॥ ॥ यासां क्षेत्रगताः संति, साधवः श्रावकादयः ॥ जिनाज्ञा साधयंतस्ता, रदंतु क्षेत्रदेवताः ॥ ३ ॥ इति ॥ ॥ पा खमा हुवा एक नवकार कही, संमाता प्रमार्जि चकमूषैत्र के प्रावश्यकको मुहपत्ता पहिलेहुं ? गुरु कहे पहिलेदेह. ॥ पी- मुहपत्ती पमिलेदी विधिशुं दो वांदणां देश में वर- कनक कहे, सो लिखते हे. ॥ अथ वरकनक प्रारंभः ॥ । वरकणय संख विद्रुम, मरगय घश सन्नि विगय महिं ॥ सित्तरि सयं निशाणं, सधामर पूश्यं वंदे ॥ स्वाहा ।1.१ ॥ जवणवय वाण मंतर, जोसमास विमाण वासीय जे देवि बुध्देवा, ते सच्चे नवसमंतु मे स्वाहा ||१|| पञ्चस्काण नदि लिया होय तो करे | सामायिक चोइसको पमिकमयां, वांदगां, काB. . . , ४५) स्सग, पञ्चरकाण, आवश्यक सांधतां कानो, मात्रा, उंगे श्र धिको श्रदर चंचो नीचो को होय, ते सर्वे मन, वचन, काया करी मिनामि उकळं ॥ इचामो अणुसहि० ॥ कही बैंठ. पं गुरु एक स्तुति कह्या पीवें श्रावक समस्त, मस्तकें अंजलि करिकें णमो खमासमणाणं ॥ णमोऽहसिक्षा०॥ कही। णमोऽस्तु वईमानायक इत्यादि तीन स्तुति कहे. श्राविका णमो खमासमणाणं कही सं. सारदावाकी स्तुति कदे. ॥ अथ नमोऽस्तु वर्द्धमानाय ॥ || नमोऽस्तु वहमानाय, स्पईमानाय कर्मणा ॥ तळयावा. ममोकाय, परोक्षाय कुतीर्थिनाम् ॥ १ ॥ येपां विकचारविंदराज्या ज्यायः कमकमलावलिं दधत्या || सहशैरिति संगतं प्रशस्य, कथितं संतु शिवाय ते जिनेन्द्राः ॥ ॥ कपायतापादितजंतुनिर्वृति, क- रोतियो जैनमुखांबुदोजतः ॥ स शुक्रमासोनववृष्टि सन्निनो, ददातु तुष्टिं मयि विस्तरोगिराम् ॥ ३ ॥श्वसितसुरनिगंधा लोढनुङ्गोकुरङ्ग, मुखश शनमजलं विनती या विनति ॥ विकच कमलमूच्चैः साऽ स्त्वचिंत्यप्रनावा, सकलसुखविधात्री प्राणन्नाजां श्रुताङ्गी॥३॥इति।। ". ।। यह तीन गाया कहि के पीसें णमोचूर्ण० काहे कें. एक श्रावक खमासमण दई कहेः-इचाका० ॥ सं० ॥०॥ स्तवन नपुं ? दूसरा खमासमण देई कहे ॥ चा० ॥ सं०॥०॥ स्त- चननणुं स्तवन सानो ? गुरु कहे, नरोह सांजलेह, पी आसन पर बैठ के नमोऽहसिद्धा० ॥ कहि के बमो स्तवन कहे, सो लि- स्वते हैं। 11 अथ श्री चिंतामणि पार्थजिनस्तवनम् ।। | | नविका श्रीजिनविंव जुहारो, श्रातम परम प्राधारो रे ॥श्री जिनप्रतिमा जिन सारखी जाणो,न करो शंका 1. .
, , ( ५) काई । आगम वाणीने अनुसारें, राखो प्रीति सवाई रे ॥ श्री०॥ १ ॥ जे जिनपिंव स्वरूप न जाणे, ते क ये किम जाणे ॥ तूला तेह अज्ञाने नरिया, नहिं तिहां तत्त्व पिगणे रे ॥ज. ॥ श्री० ॥ २ ॥ अंबम श्रावक श्रेणिक राजा, रावण प्रमुख अनेक ॥ विविधपरें जिन नगति करता, पाम्या धर्म विवेक रे ॥ न०॥ श्री. ० ॥ ३ ॥ जिन प्रतिमा बहु जगतें जोता, दोय निश्चय उप- गार ॥ परमारथ गुण प्रगटे पूरण, जो नो पार्द्र कुमार रे ॥ नक' ॥ श्री० ॥ ॥ जिनप्रतिमा श्राकार जलचर, बहु जलधि ममार ॥ ते देखी बहुला मत्स्यादिक, पाम्या विरतिप्रकार रे ।। न० ॥ श्री० ॥ ५ ॥ पांचमा अंगें जिनप्रतिमानो, प्रगटपणे अधिकार || सूरियान सुर जिनवर पूज्या, राय पसेणी मझार रे ॥ ज०॥ श्री० ॥६॥ दशमें अंगें अहिंसा दाखी, जिन पृज्या जिनराज | एहवा श्रागम श्ररथ मरोमी, करिये केम अकाज रे ज० ॥ श्री० ॥ ७ ॥ समकित्तधारी सतीय द्रोपदी, जिन पूज्या मन रंगे 11 जो जो एहनो अरथ विचारी, ॥०॥ श्री० ॥ ॥ विजयसुरें जिम जिनवर पूजा, कीधी चित्त थिर राखी ॥ द्रव्य नाव बिहुँनेदें कोनी, जीवानिगम ते साखी रे ॥०॥ श्री०॥ ए ॥ इत्यादिक बहु आगम सारखें, कोई शंका मति करजो || जिनप्रतिमा देखी नित नवली, प्रेम घणो चित्त धरजो रे ॥ न० ॥ श्री०॥१०॥ चिंतामणि प्रन्नु पास पसायें, सरधा होजो साई ॥ श्रीजिनलान सुगुरु नपदेशे, श्रीजिनचंद्र साई रे ॥ न०॥ श्री०॥॥११॥ इति श्रीचिंता मणि पावजिन स्तवनम् ॥ ॥ पावें तीन खमासमणे आचार्य, उपाध्याय, सर्व साधु वांदी अहाश्तु कहनां, फेर खमासमणे ॥ श्चाका ॥ सं० ॥ न । ज्ञाता अंगेरे () देवसि पाय चित्त विशु निमित्तं कानस्सग करूं? गुरु कहे, करेइ. पी चं फदि के देवसि पायर्याउन विशुक्षि निमित्तं करेमि कान- स्तम्ग अनचू ।। कदि शोले नवकार अथवा चार लोगस्तका काउ- स्सग करे, पारी के लोगस्स कहे. ॥पा खमासमण देकर श्यामा० ॥ सं० न० ॥ खु. होवदव नमायण करेमि कानस्सग्गं || अन्ननू० ॥ इत्यादि कही शोल नवकार अथवा चार लोगस्सका कानस्सग करे, पारि के । प्रगट :लोगस्स कहे. पी खमासमय देई ।। सजाय संदिस्सा फेर खमासमरा देई सजाय करूं? तीन नवकार गुणीजें, पीनें खमा. समण देई के ॥ छा० ॥ सं० ॥ लगवन् चैत्यवंदन करूं जी ॥ ऐसा कह कर धंनणा पार्श्वनाथजीका चैत्यवंदन करे, सो लिखते है ।। ॥ अथ श्रीथंभणा पार्श्वनाथजीका चैत्यवंदन : ॥ श्रीसेढीतटिनीतटे पुरवरे श्रीस्तंन्नने स्वर्गिरौ,' श्रीपूज्या. जयदेवसूरिविबुधाधीशैः समारोपितः ॥ संसिक्तः स्तुतिनिर्जलैः शिव फलं स्फूर्जत्फणापल्लवः, पार्श्वः कल्पतरुः समे प्रथयता नित्यं मनो- वांवितम् ॥ १ ॥ आधि व्याधिदरो देवो, जीरावल्लशिरोमणिः ॥ पार्श्वनायो जगन्नाथो, नित्यनायो नृणां श्रियेत !" .....; .पी नमोचणंसें लेके जयवीयराय सुधो कहे ॥ पं वमासमणपूर्वक मस्तक नमावी सिरि धनणयध्यि पास सामिणो त्या द्धि दोय गाथा,कद्दे, सो लिखते हे ... : || अथ श्रीथंभणयव्यिपाससामिणो। जीयनणयध्यिपाससामिणो से सामीशं ॥ 11ग, सुरासुराणं च सधेसि ॥१॥ एस. महं. सरण विन सत्तीए । नतीए गुण सुव्यस्त, संघस्त समुद्र ॥ समुन्नय कार काउस्सगं करा १०. तिः॥
(४७) ॥ श्रीयंत्रणा पार्श्वनाथजी भाराधा निमिसं करेमिका ससम्॥पी खदो के बंदणव०॥ अन्न।कही चार लोग- स्सका काठस्सग करि के पी पार। प्रगट सोगस्त कहो के। श्रीखरतरगच सिणगारहारजंगम युगप्रधान नद्यारक दादाजी श्री निनदन सूरिजी चारित्र चूमामणीजी आराधवा निमित्तं करेमि कानस्सग्ग || अन्नवू० कहि के, एक लोगस्सका कानस्सग करे; पी प्रगट लोगस्त कह के ॥ श्रीखरतरगच्छ सिणगारहार जंगमयुग प्रधान नद्यारक दा दाजी.श्रीजिन कुशल सूरिजी चारित्र चूमामणिजी धाराधवा निमित्तं करेमि कानस्सरगं ॥ अन्नछू० कहि के एक लोगस्सका कामस्सग्ग करे, पी प्रगट लोगस्त कहि बैठ के मावो गोमो चंचो करि के खमासमरा देई के, धा० ॥ सं० ॥ न० ॥ चैत्यवंदन करूं जी. ऐसें कदि के चैत्यवंदन करे, ॥ अथ चउकसाय ॥ ॥ चनकताय पमिजूरण, उऊय मयरा बाण मुसुमूरण ॥ सरस पियंगु वगु गय गामिल, जयउ पाल नुवनय सामिन ॥१॥ जसु तणु कंति कमप्पसिणिन, सोहर फणमणि किरणा लिद्धन ॥ नंनव जलहर तमिलय लंग्यि, सो जिणु पातु पयधय . , वंचिय॥३॥ ॥अहंन्तो जगवंत इंद्रमहिताः सिद्धाश्च सिडिस्थिता, प्रा. चार्या जिनशासनोन्नतिकरा पूज्या नपाध्यायकाः ॥ श्रीसिक्षांतसु पाउँका मुनिवरा रत्नत्रयाराधकाः, पंचते परमेष्ठिनः प्रतिदिनं कुर्वतु वो मंगलम् ॥१॥ || पीठे नमुचूरांसें ले के जयवीयराय पर्यंत कहि के परकी; चनम्मासी अरु संवधरीके रे- (0) दिनोमें चोटी शांति मुणे, सो लिखते हैं. ॥ अथ लघुशांतिस्तवः ॥ ॥ शांति शांतिनिशांत, शांतं शांताशिवं नमस्कृत्य ॥ स्तोतुः शांतिनिमित्तं, मंत्रपदैः शांतये स्तौमि ॥१॥ नमिति निश्चितव- चसे, नमो नमो नगवतेऽर्हते पूजाम् ।। शांति जिनाय अयवते, यशस्विने स्वामिने दमिनाम् ॥ २॥ सकलातिशेपकमहा; संपत्ति- समन्विताय शस्याय ॥ त्रैलोक्यपूजिताय च, नमोनमः शांतिदेवाय ॥ ३ ॥ सर्वामरसुसमूह, स्वामिकसंपूजिताय निजिताय ।। नुवन.. जनपालनोयत, तमाय सततं नमस्तस्मै ॥ ४ ॥ सर्वरितोपना- शन, कराय सर्वाशिवप्रशमनाय || उष्ट ग्रह नूतपिशाच, शाकि- नीनां प्रमथनाय ॥ ५ ॥ यस्येति नाम मंत्र, प्रधानवाक्योपयोग- कृततोपा ॥ विजया कुरुते जनहित, मिति च नुता नमत तं शांतिम् ॥ ६॥ नवतु नमस्ते नगवति, विजये सुजये परापरेर जिते ॥ थपराजिते जगत्यां, जयतीति जयावहे नवति ॥ ७ ॥ सर्वस्यापि घ संघस्य, नद्ग कल्याण मंगलप्रदेसाधूनां च सदा शिव, सुतु- टिपुटिनदे जीयां ॥ ॥ नव्यानां कृतसिइ, निति निर्वाणजननि ! सत्त्वानाम् ॥ अनय प्रदान निरते, नमोस्तु स्वस्तिपदे तुन्यम् ।। ए॥ नक्तानां जन्तूनां, शुनावहे नित्यमुद्यते देवि ! ॥ सम्यगृह- टीनां पृति, रति मति बुद्धि प्रदानाय ॥१०|| जिनशासननिरताना, शांतिनतानां च जगति जनतानाम् ॥ श्रीसंपतोनि यशो, वर्द्धिनि ! जय देवि विजयस्व ॥११॥ सलिलानल विपविषधर, उष्ट ग्रह राज रोगरगन्नयतः ॥ राक्षस रिपुगण मारी, चौरतिश्वापदादिः ॥ १२ ॥अथरदा रक्ष सुशिवं, करु कुरु शांति च कुरु कुरु सदेति ॥ तुष्टिं कुरु कुरु पुष्टिं, कुरु कुरु स्वस्ति च कुरु कुरु त्वं ॥ १३ ॥ जग- पति गुणपति शिवशांति, नुष्टि पुष्टिस्वस्तिह कुरु कुरु जनानाम् ।। . - (ए) उमति नमो नमो हाँ, हैं। हूँ हः यः कः ही फट् फट् स्वादा ||१|| एवं यन्नामाकर, पुरस्सरं संस्तुता जया देवी ॥ कुरुते शांति नमतां, नमो नमः शांतये तस्मै ।। १५ ।। इति पूर्वसूरि दर्शित, मंत्रपद- विदर्मितः स्तवः शतिः ॥ सलिलादिन्नय विनाशी, शांत्यादिकरश्च भक्तिमताम् ॥ १६ ॥ यचैनं परति सदा, शृणोति जावयति वा यथायोग्यम् ।। स हि शांतिपदं यायात्, सूरिः श्रीमानदेवश्च ॥१७॥ नपसर्गाः क्षयं यांति, विद्यते विघ्नवल्लयः ॥ मनः प्रसन्नतामेति, पूज्यमाने जिनेश्वरे ॥ १० ॥ सर्वमंगल मांगल्यं, सर्व कल्याण कारणम् । प्रधान सर्व धर्माणां, जैनं जयति शासनम्।।१७॥ इति॥ ॥पी चीराकका श्रथवा वीजलीका चांदणा पमा होय तो इरियावहि० तस्सुत्तरी• अन्नवू० कहि के, एक लोगस्सका कान- स्सग करे, पं 3 प्रगट लोगस्स कहो पूर्वलो परें सामायिक पारे. पी एक स्तवन दादाजोको कहे ॥ इति देवसी पक्किमण विधिः संपूर्णः ॥ ॥ अथ कमलदलस्तुतिः ॥ ॥ कमलदलविपुलनपना, कमलमुखी कमलगर्लसमगौरी ॥ कमले [स्थता नगवता, ददातु श्रुतदेवता सौख्यम् ॥ १ ॥ ज्ञाना. दिगुण युताना, स्वाध्यायध्यानसंयमरतानाम् ॥ विदधातु नुवनदेवी, शिवं सदा सर्वसाधूनाम् ॥ ३॥ यस्याः क्षेत्रं समाश्रित्य, साधुतिः साध्यते क्रियाः ॥ सा क्षेत्रदेवता नित्यं, चूयान्नः सुखदायिनी ॥ ३॥ इति क्षेत्रदेवता स्तुतिः ॥ ॥ कल्याणकमला मेह, नीलदेहं महासहै ॥ नवखमानिधे पार्थ, सदा ध्यावामि मानसे ॥
. ॥ अथ छुटक चेसवंदनस्तुतिर्लिख्यते ।। ॥ तत्र प्रथम श्रीपार्थजिन स्तुतिः ॥ ॥ तकलकुशलवतो, पुष्करावर्त्तमेघो, उरिततिमिरलानुः, कल्पवृक्षोपमानः ॥ नवजलनिधिपोतः सर्वसंपतिहेतुः, स जयतु सततं वः, श्रेयसे श्रीपार्थदेवः ॥१॥ इति श्रीपार्थजिन ॥ ॥ अथ जिनस्तुतिः॥ || दर्शनारितध्वंसी, यंदनानिचितप्रदः ॥ पूजानात्पूरकः श्रीणां, जिन साक्षात्सुरद्रुमः ॥ २ ॥ इति ।। ॥ अथ आदिजिन स्तुतिः॥ ॥ सुवर्णवर्ण गजराजगामिनं, प्रलंबचाई सुविशाललोचनम् ॥ नरामरेंद्रैः स्तुतपादपंकजं, नमामि नत्या झपन्नं जिनोत्तमम् ।। ३ ॥ इति श्रादिजिनस्तुतिः ॥ अथ शांतिजिन स्तुतिः ॥ ॥ सोलम जिनवर शांतिनाथ, सेयो शिर नामी ॥ कंचन वरण शरीर कांपि, अतिशय अन्निरामी॥ अचिरा अंगज विश्व- सेन, नरपति कुलचंद ॥ मृगलंउन धर पद कमल, सेवे सुरनरद्वंद ॥ जुगमां अमृत जेहवी ए, जास अखंमित आण ॥ एक मनें आराधता, लदिये कोमि कल्याण ॥ ॥ श्रीशांतिनाथस्तुतिः ।। ॥ अथ नेमिनाथस्तुतिः।। .॥ प्रह सम प्रामुं नेमिनाथ, जिनवर जयवंत ॥ यादव. कुल अवतंस हंस, उत्तम गुणवंत ॥ समुद्र विजय शिवा देवी जास, मति सहित नदार ॥ सुंदर श्याम शरीर ज्योति, सोहे सुखकार ॥ गढ गिरनारे जिण लघु ए, अमृत पद अनिराम ॥ नास क्षमा कल्याण मुनि, निशिदिन नमत कल्याण || ५ ॥शति श्रीनेमिनाथ (५१) ॥ अथ श्रीपार्श्वनाथ स्तुतिः ॥ ॥ पुरसादाणी पास नाद, नमिये मन रंग ॥ नील वरण अश्वसेन नंद, निरमल निःशंक | कामित पूरण कलप साख, वामा- सुत सार ॥ श्रीगोमा पुर स्वामि नाम, जपियें निरधार ! त्रिनु- वनपति त्रेवीशमो ए, अमृत सम जसु वाण ॥ ध्यान धरतां एहनु, प्रगटे परम कल्याण ॥ ६ ॥ इति पार्श्वनाथ स्तुतिः ॥ ।। अथ श्रीमहावीर स्तुतिः॥ ॥ वंदूं जगदाधार सार, शिव संपनि कारण ॥ जन्म जरा मरणादि रूप, लव ताप निवारण ॥ श्रीसिदारण तात मात, त्रिशला तनुजात ॥ सोवन वरण शरीर वीर, त्रिनुवन विख्यात ॥ अमृतरूपें राजतो ए, चोवीशमो जिनराय ॥ क्षमाप्रमुख कल्याण मुणि, आपो करि सुपसाय ।। उ ॥ इति श्री महावीर० ॥ ॥ अथ पाक्षिकादि पडिकमणविधिर्लिख्यते ॥ ॥ तिहां प्रथम वंदित्तु सूत्र पर्यंत देवसिक पमिकमी ॥१॥ खमासमण देई देवसी पालोश्यं पमिकता ॥श्चा० ॥ सं०॥ न० ॥ पक्षिय मुहपत्तो पनि हुँ ? चनमासोएं चनम्मासियं मुद्द- पत्ती, संवचरीये संवचरी मुहपत्त। पहिलेहुं ? एम कहे. पी गुरु कहे, पमिलेहेह ।। पी इचं कहे, दूजी खमासमण देश, मुहपत्तो पमिलेही, वांदणा देई, तिहाँ पस्कीमें परको वश्कतो ॥ चनमासी पमि० ॥ चनमासी वश्तो संवकरी में संवचरो वश्कतो, एम यथायोगें कहे || पी गुरु कहे. पुण्यवंतो देवसीने स्थानके पा. रिकक !! चनमालिक सांवचरिक नजो, कि जयपा करजो. मधुर स्वरें पमिकमजो, खासे सो विवरा शुद्ध खासजो. मामलमें सावचेत रहेजो, पा सघलाही तदत्ति कदे ॥ पी कठी। चाका० ॥ सं० ॥ न० ॥ संयुद्धा खामरोणं || अनुन्निमि अप्रिं- . .
. , (५३) तर परिकयं ॥ ३॥ सामेकं ? गुरु कहे, खामेदं । प. मस्तके अंजलि करतो यको, चं खामेमि परिकयं ॥३॥ कहो, गोमालीये बेसी मस्तक नमावी दक्षिस हाथ गुरु सादामो फर, मुइपत्नी मुखें देई ॥ परिकथे पनरसनं दिवसाणं पनरसङ्घ राईणं जं किंचि अप्पत्नियं ॥ इत्यादि सर्व पाउ कहे, चनमा चन्द्रं मासाणं श्र. एवं परकाणं वीसोत्तरसो राइदिवाणं जं किंचि अप्पत्नियं ।। इत्यादि कहे. संवचरी उचालसद मासाणं चनवीसई परकाणं तिन्निसय- सहिराइदिया ॥ जं किंचि अप्पत्तियं इत्यादि कहे ॥ तेवारें गुरु पण मिचामि उक्क कहे ॥ तिहां दोय साधु नचरता हुवे तो पा- खिये तीन, चनमासीयें पांच, संवचरीयें सात साधुने खमावे ।। ॥पी3 नग अवग्रहमांहि रह्यो कहे ॥ श्चा० ॥ सं० ॥ न० ॥ परिकयं बालोवू ? गुरु कहे बालोएद ॥ पीने छ बासोएमि, जो मे परिकन ॥३॥ अश्यारोकन, नणी ॥ संकेपे अथवा विस्तारें पाखी चनमासी संबचरी, अतिचार आलोवे, सो लिखते ह॥ ॥ अथ वृहदतिचारा लिख्यते ॥ ॥ नाणंमि दंसणंमिय, चरणमि तवेय तहय विरियंमि ।। आयरणं आयारो, इअ एसो पंचहाभणिओ ॥ १ ॥ ज्ञानाचार १, दर्शनाचार २, चारित्रार ३. तपाचार ४, वोर्याचार ५. एवं पांच विधि आंचारमांहि जिको अतिचार पक्ष दिवसमांहि सूक्ष्म, बादर, जाणतां अणजाणतां हुओ होई, ते सहू मन, वचन, कायाई करी मिच्छामि दुबई ॥ ॥ अथ ज्ञानाचारना आठ अतिचार ।। ॥ काले विणए वहुमाणे, वहाण तहह्य निन्दवणे ।। बंजण . इत्यादि मूत्र (५३) अत्य तदुभए, अठविहो नाण मायारो ॥ १ ॥ ज्ञानः-कालवेला, मांहि पदिउं गुणिलं नही, अकाले पढिरं, विनय हीन बहुमान हीन उपधान होन श्री उपाध्यायकनें नही पदिउं, अथवा अनेरा- कने पदिऊँ अनेरो गुरु कालो व्यंजन अर्थ तदुभय कूडो पढ्यो, देव वांदणे पडिकमणे सिचाय करतां, पढतां, गुणतां, कूडो अक्षर काने मात्रे अधिको ओछो आगल पाछल भण्यो, सूत्र अर्थ कूडा भण्या, भणीने पोसायों, तपोधन तणे धर्म काजो अण उधरे दांडो अण- पडिलेही, वसती अणसोधी, असिचाई अणोझा कालवेलामाहि दशवैकालिक प्रमुख सिद्धांत भण्यो गुण्यो, योग वहां पखें भण्यो ज्ञानोपगरण पाटी, पोथी, ठवणो, कवली, नवकरवाली, सांपड़ा सांपडो वही दस्तरी ओलीया कागल प्रमुखमतें आशातना हुई, पग लागो थूक लागो ओसासे मूभ्यो कनें छतां आहार नोहार कोधो, ज्ञानद्रव्य भक्षण भक्षण उपेक्षण कोधो, प्रज्ञापराचे विणाश्यो विणसतो उवेख्यो, छती शक् सार संभाल न कोधी, ज्ञानवंत प्रतें मधर वह्यो, अवज्ञा आशातना कीधी, कोई प्रते भणतां गुणतां प्रदेष मत्सर अंतराय अपवात कोधो. मतिज्ञान, श्रुतज्ञान, अवधि- ज्ञान, मनःपर्यवज्ञान, केवलज्ञान. ए पांच ज्ञानतणी असहहणा कोधी, कोई तोतडो बोबडो हस्यो, वितक्यों आपणा जाणपणा तमो गर्व चिंतव्यो, अष्टविध ज्ञानाचार विषान जिको अतिचार पक्ष दिवसमाहे सूक्ष्म, बादर, जाणता, अजाणतां, हुवो होय, ते सह मन वचन कायाई करी मि०॥ . दर्शनाचारना आठ अतिचार ।। । निस्संकिय निकंखिअ, निधितिगिचा अमूढदिछी अ ।। उवह गिरी करणे, वचल पभावणे अछ।॥ १ ॥ देव गुरु धर्म तणे विषे निःशंकपणो न कोधो, तथा एकांत निश्चय धर्यों नहीं, (५६) भाल न कीधी, लहिणे देणे किणहीप्रलंघाव्यु, तेणें भूखे आपण जिम्या, अणगल पाणी वावरयु, रूडे गल्यु नहो, गलाव्यु नही, अणगल पाणी झील्यां लूगडां धोयां, इंधण अणसोध्यु जाल्यु. साप कानखजूरा सुलहला माकड जूआ गोगिंडा साहतां मूआं, दू. खव्यां, रूडे थानक न मूक्या, कोडी मकोडी उदेहो घीवेली कातरा चूडेली पतंगिया डेडका अलसिया ईली कृति डांस मसा वगतरा माखी प्रमुख जे कोई जीव विणटा चांपिया दूहव्या माला हलावतां पंखी काग चिडकलानां इंडां फूटां, अनेरा एके- द्रियादिक जिके जीव विणठा चाप्या, दूहव्या, हालता चालतां अनेरं कांइ काम काज करतां विध्वंसपणुं कीधुं. जीव रक्षा रूडे न कोधी, संखारो सूकव्यो, सुल्या धान तावडे दीवां, दलाव्यां, भरडाव्यां, खाटला तावडे झाटक्या, मूक्या, मूकाव्या, जीवाकुल भूमि लीपावी, वाशी गार राखी रखाची, दलणे सांडणे लीपणे रूडी जयणा न कीधी. आठम चउदशना नियम भांग्या, धूणी करावी || पहिला प्राणातिपात व्रत विपइओ अनेरो० ॥१॥ ') वीजुं स्थूल मृपावाद विरगणनतें पांच अतिचार ॥ ॥ सहसा रहस्सदारे, मोसुवएसे य कूड लेहे य॥. सहसा- कारः-किणहिक प्रतें अयुक्तो आल दीधो, किणहिक प्रतें एकांतें वात करतां देखी तुम्हें तो राजविरुद्ध चितवो छो. इत्यादिक कवं. स्वदार मंत्र भेद कीधो, अनेराई किणहीनो मंत्र आलोच मर्म प्रकाश्यो, किणहीने कूडी बुद्धि दीधी, कूडो लेख लिख्यो, कूडी सांख भरी, थापण मोसो कीधो, कन्या दोर गाय भूमि संबंधिया लेइणे देयणे व्यवसाय वाद वढावदि करता मोटकुं झूठ बोल्यु, हाय पग भणी गाल दीपी, करडका मोड्या, अधर्म वचन बोल्यां । पावाद व्रत विपइ॥
.. (५७) ॥त्रीजे अदत्तादानविरमण व्रतना पाच अतिचार ॥ तेना- हडप्पळगे. घर बाहिर क्षेत्र खले पराई वस्तु अणमोकलावी लीधी, दीधी, वावरी, चोरीनी वस्तु मोल लोधी, चोर धाडीत प्रते संबल दीधु, संकेत कर्तुं. विरुद्ध राज्यातिकम कीधो, नवा पुराणां सरस विरस सजीव निर्जीव वस्तु तणा भेल संभेल कीधा, खोटे तोल मॉन माप वहोरयां, दाणचोरी कोधो, साटे लांच लीची, माता पिता पुत्र कलत्र परिवार वंची जुदो गांठ कीवी, किणहीने लेखे पलेखे भुलब्युं, पडी वस्तु ओलवी लोधी, बीजे अदत्तादान व्रत विपइओ०॥ ॥ चोथे स्वदार संतोप मैथुनबतें पांच अतिचार ॥ अपरि ग्गहिया इत्तर, अणंग वीवाह तिवअणुरागे ॥ अपरिगृहोतागमन, इवरपरिगृहितागमन. विधवा वेश्या स्त्री कुलाङ्गना स्वदार शोक- तणे विपे दृष्टिविपर्यास कीधो, सराग वचन बोल्यां, आठम चउदस अनेराई पर्व तिथि तगा नियम भांग्या. धरधरणां कीयां कराव्यां, अनुमोदीयां, कुविकल्प चिंतव्या, अनङ्गक्रीडा कोधी, पराया विवाह जोड्या काम भोगतणेविषे तीवाभिलाप कोधो, फुस्वा लाघां, नट विट पुरुपगुं होतुं की, चौथे मैथुन व्रत वि. ।। पांचमे परिग्रहपरिमाणवतें पांच अतिचार ॥धण धन्न सित्त वधू ॥ धन धान्य क्षेत्र वस्तु रूप्प सुवर्ग कुप्प द्विपद चतुष्पद नव परिग्रह तणा नियम उपरांत वृद्धि देखी मूर्चा लगें संक्षेप न कीघो. माता पिता पुत्र कलत्रादि तणे लेखें कीचो, परिग्रह परिमाण लेई एव्यो नहीं. पदी वीसारिओ, नियम वीसारिओ ( पांचमे परिमाण व्रतविपइओ०॥ ॥ छठे दिगविरमणबतें पांच अतिचार || गमणस्सय परि भाणे ॥ उदिति अधोदिति तिर्यदिसि जायया आयवा.तणो ८
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(एए) कीधा कराव्या, तिलादिक संचीया, फागुण मास उपरांत राख्या. कूकडा सूडा प्रमुख पोप्या, अनेरुं जे काई बहु सावध कठोर कर्मादिक समाचर्यु | सातमा भोगोपभोग व्रत विषइओ०॥ ॥ आठमा अनर्थ दंड विरमणवतना पांच अतिचार ॥ कं- दप्पे कुकुइए० ॥ कदर्प लगें विटनी परें हास्य कुतूहल मुखादि अंग कुचेष्टा कीधी, मूरखपणा लगें कुणहोने असंबद्ध वाक्य बोल्या. खांडा कटारो कुसि कुहाडा रथ ऊखल मूसल अगन घरटी आदिक सज करी मेल्या, माग्यां आप्यां, कणक वस्तु ढोर लेबराव्यां, अ. नेरो कांइ पापोपदेश दीधो, अंघोल नाहण, दांतण, पगधोअण पाणी तेल अधिक आण्यां, हीडोले हींच्या, राजकथा देशकथा भक्तकथा स्त्रीकथा पराइ वात कीधी, आर्त रौद्र ध्यान ध्यायां, कर्कश वचन बोल्या, करडका मोड्या, संभेडा लाया, भेसा सांढ कूकडा, मिंढा श्वानादि जूझतां कलह करतां जोयां, साधी लगें अदेखाई चिंतवो माटो मीटुं कण कपासिया काजविण चाप्या, तेह उपर बयठा, आले वनस्पति खुंदी, छास पाणी विरस तेल गुल आम्लवेतरस बेरजादिक तणां भाजन उघाडां मूक्यां. ते मांहि कीडो कंथुआ माखी उंदर गिरोलो प्रमुख जीव विणठा, सूडा प्रमुख जीव क्रीडा हेते बांधी राख्या, घणी निद्रा कीधी, राग द्वेष लगें एकने झदि परिवार वांछी एकनें मृत्युहाणि विमासी आठमा अनर्थ दंडबतवि०॥ I.नवमा सामायिकबतें पांच अतिचार ॥ तिविहे दुप्पणि. डाणे सामायिक लीधे मन आहट दोहट चिंतव्यु, वचन सावध बोल्युं, काय अण पडिलेयु हलाव्यु, छती वेलाई सामायिक न लीधं, सामायिक लई उघाडे मुख बोल्या, ऊंच आवी कोधी, वीज दीवा तणी उजाही लागी. कण कपासोया माटी मीटुं नील फूल - - . (६०) हरिकायना संघट्ट हुआ, पुरुष तिर्थचना संघट्ट हुआ, तथा स्त्री तिथंची आभडी, मुहपत्तोयो संघट्टी, सामायिक अण पूरउं पारि पार, वीसारिठ, नवमे सामायिक व्रतविषइयो ।। ॥ दशमे देशावकाशिक या पांच अतिचार ॥ आणवणे पेसवणे ॥ आणवणप्पओगे पेसवणप्पओगे सदाणुवाइ स्वाणुः वाइ बहिया पुग्गल स्कवे ॥ नियमित भूमिकामांहिवाहिर थको काइ अणाव्यु, आप कन्हाथी वाहिर मोकल्या, साद करी रूप देखाडी कांकरी नाखी आपणपणंछतुं जणाव्युं ॥ दशमे देशाव- कासिग व्रतविपश्यो० ॥१०॥ ।। इग्यारमे पोपधोपवास व्रतें पांच अतिचार ॥ संथारुवार विही, पमाय तह चेव भोअणा भोए० ॥ पोसह लीधे संथारा तणी भूमि वाहिरला थंडिलां दिवसें शोध्यां पडिलेह्यां नहीं, मातरं अण- पडिलेडं वावरिउं, अणपुंजी भूमिकाई परठविउ, परठवतां चिन्तवणा न कीधी, अणुजाणहजस्सुग्गहो न कहो. परदव्यां पुढे वार त्रण चोसिरामि वोसिरामि न कह्यु. पोसहशालामांहि पइसतां नीसरतां निस्सही आवस्सही कहेवी वीसारी, पृथ्वोकाय, अप्पकाय तेऊकाय वाउकाय वनस्पतिकाय त्रसकाय तणा संघट्ट परिताप उपद्रव दुआ, संथारा पोरसि तणो विधि भणवो वीसारिओ. पोरसिमांहि रंध्या, जविधि संथारं पायर्य, काल वेलायें पडिकमणुं न कीधं, पारणा. दिक तणी चिंता निपजाबी, कालवेला देव बांदवा वीसारिया, पोसह असुरो लीयो, सवारो पारोयो पर्व तिथि आची पोसह लोधो नहीं ॥ इग्यारमे पोपयोपचास प्रतविपइयो। । पारमे अतिथि संविभागमतें पांच अतिचार ॥ सचित्ते निरखवणे०॥ सचित्तवस्तु हेठे ऊपरि थके महातमा प्रते अमूमतुं दी), अदेवा तणी मूझतुं फेटी अमझतुं कीधु, देवा ।
, तणी पुढे असूझतुं फेडी सूझतुं कीधु, आपणुं फेडी परायुं की , विहरवा वेला टलि गया असुर करी महातमा तेब्या, मघरलगें दान दीधं, गुणवंत आवे भगति न साचवी, छती शक्ति साध- र्मिक वात्सल्य न कीधुं, अनेराइ धर्म क्षेत्र सीदाता छती शने उद्धर्या नहीं ॥ वारमे अतिथि संविभाग व्रतविपइयो०॥ ॥ संलेहणा तणा पांच अतिचार. इहलोए परलोए० ॥ इहलोका संसप्पलगे परलोगासंसप्पन्गे जीविआसंसप्पळगे मरणा संसप्पन्गे कामभोगासंसप्पन्गे इहलोक मनुष्यभव मान महत्व लोक तणी सेवा ठकुराई बलदेव वासुदेव चक्रवर्ति पद वांछया. परलोक इंद्र अहमिंद्र देवाधिदेव पदवी वांछी, सुख आव्ये जीव वा तणी वांछा कीधी, दुःख आव्ये मरवातणी वांछा कोषी, कामभोग तणी इच्छा कीधी ॥ संलेहणानतवि० ॥ ॥ तपाचार वारभेदे ॥ छ अभ्यंतर, छ वाहिर, अणसणमू गोयरिया, अणसण कहीयें उपवास, ते पर्वतिथि छतो शक्त की) नही. ऊणोदरी ते पांच सात कवल ऊणा रह्या नही, द्रव्य संक्षेप विगय प्रमुख परमाण कीधुं नहीं. आसनादिक काय किलेश न कधिो, संलोणता अंगोपांग संकोच्यां नहीं, नवकारसी पोरसी गंठसी मूठसी साहपोरसि पुरिमह एकासणो वेआसणो नीवी आंपिल प्रमुख पञ्चरकाण पारवां वीसार्या. वेसतां नवकार भण्यो नही, ऊउतां दिवसचरिमं न कीधु, नीवी आंबिल उपवासादिक तप करी काचुपाणी पीयूं, वमन थयं । बाह्य तपवत विपइयो । ॥ अभ्यंतर तप॥ पायचितं विणओ० गुरुकने मन मुझे आलोयणा लीधी नही, गुरुदत्त प्रायछित तप लेखा शुद पुह- चाहयुं नहीं, देव गुरु संघ साहम्मो प्रतें विनय साबच्यो नही वा- चना पृचना परावर्तना अनुप्रेक्षा धर्मकथा लक्षण पंचविष सिजाय - (६२) कीधी नहीं, धर्मध्यान शुक्लध्यान ध्यायु नही, कर्म क्षय निमित्त लोगस्स दस वीसनोकाउस्सग्गन कीधो|अभ्यंतर तप विपइयो० ॥ ॥ वीर्याचारना तीन अतिचार ॥ अणमूहिय बलविरीओ, परिकमइ जो जहुंत ठाणेसु ॥ जुजइअ जहा थाम, नायद्यो वीरि- यायारो ॥ १ ॥ पढवे गुणवे विनय वेयावच देवपूजा सामायिक दान शील तप भावना प्रमुख धर्म कृत्यतणे विषे मन वचन कायतणुं छतुं बल वीर्य गोपव्युं, रूडां पंचाग समासमण न दीघां, पेठां पडिक्कमणुं कीg ॥ वीर्याचारव्रत विषइयो०॥ ॥ नाणाइ अह अइ वय, समसंलेहण पण पनर कम्मेसु ॥ बारस तवविरिअ तिगं, चउवीस सय अईयारा ॥ १ ॥ पडिसिद्धाणं करणे०॥ ॥ जिनप्रतिषिद्धवावीस अभक्ष्य बत्तीस अनंत काय बहुबोज भक्षण महाआरंभ महापरिग्रहादिक कोघां, नित्यकृत्य देवपूजा सामायिकादिक तथा तीर्थ यात्रादिक न कोधां, जीवाजीवादि वि. चार सदहिया नहीं, आपणी कुमति लगें उत्सूत्र प्ररूपणा कोधी, माणातिपात १, मृषावाद २, अदत्तादान ३, मैथुन १, परिग्रह ५, कोध ६, मान ७, माया ८, लोभ ९, राग १०, द्वेष ११, कलह १२, अभ्याख्यान १३, परपरिवाद १४, पैशून्य १५, अर- तिरति १६, मायामृपावाद १७, मिथ्यावशल्य १८. ए अढारह पापस्थानकमांहि जे काइ कोधो कराव्यो अनुमोद्यो॥ एवं प्रकारें प्रावक धर्मे श्रो सम्यक्त्व मूल बारह व्रत चोवीसां सो, अतिचार नांहि जिको कोइ अतिचार पक्ष दिवसमांहि सूक्ष्म पादर जाणतां हुवो होय ते सह मन वचन कायायें करो मिठामि दु- श्रीश्रावकोंके बारह व्रतका अतिचार संपूर्ण । जज न ॥पी सबस्सवि परिकय ॥ इत्यादि श्याकारेण संदिस्सद पर्यंत कदे. तेवारें गुरु कहे. चनण पमिकमद, चनमा उठेय पमिछमद. संवचरी अम्मेण पमिकमह.श्चं तस्स मिवामि कम कदी. हावशावर्त वांदणां देवे. पी- इचाकारेण संदिस्तह नगवन् देवसिय आलोश्यं पमिझता || १ ॥ पत्तेयरखामणेणं, अनुनिमि अप्रिंतरप स्कियं ॥ २॥ खामेळं ? गुरु कहे खा ॥ पी चं खामे मि परिकयं ॥ ३ ॥ इत्यादि पाठ सर्व पूर्वं कह्यो, तिम कही मिछामि उकरू देई खमावे, पाबे वांदणा देई.नगवन् ! देवसियं पालोश्य पमिकता पस्कियं ॥३॥पमिकमावद ? गुरु कदे सम्म पमिकमद. पी कही करेमि नंतेसामाश्याश्यामि गमि कानस्तग्गजो मेपरिकन ॥३॥ इत्यादि कही, तस्सुत्तरी अनबूकही। कानस्सग करे, गुरु, पाखीसूत्र कदे, ते सनिले, अने गुरुथको जूदा पमिकमता हुवे, तो एक श्रावक खमातमण देई कहे. नगवन् ! सूत्र ? गुरु कदे, नणेह. एसो वचन मनमें धारीचं कही, उन्नो यको, हाथ जोको मुहपत्ती मुखें देई, तीन नवकार कदी, मधुर स्वरें सूत्रार्थ मनमें चिंतवतो वैदिसु सूत्र गुणे. बीजा श्रावक करेमि नं ते चामि गमि कानस्सग्ग तस्तुत्तरी अन्नडू कही कानस्सग्गमें रह्या सुणे. सूत्रप्रति गमो अरिदंताशं कही. कानस्तग्ग पारी, नना स्यका तीन नवकार गुणी बेसे. पी॥ ३ ॥ नवकार ॥ ३ ॥ करेमि नं ते कही, चामि पमिममि जो मे परिकळ ॥ ३ ॥ इत्यादि कही, वंदित्तु सूत्र गुणे, पमिकमे देवसियं सई । एदने विकारों पमिकमे परिकथ, चनम्मासियं संवरियं सवं कहे. पी3 की, अनु- ओमि धाराहणाए इत्यादि पूर्ण नणी, खमासमण देई इचा० ॥ सं० ॥ न मूलगुण उत्तरगुण अतिचार विशुदि निमित्तं, कालस्सग करूं ? गुरु कहे करेह, पी, श्चं कही, करेमि ते , . (६५) सामा० श्चामि गमि कानस्सगं तस्मु० अन्नतूं० इत्यादि कही, पाखीय वार लोगस्त चनमासिये वीस लोगस्त संवधरीय चालीस लोगस्सनो कानस्सग करे, एक नवकार ऊपर, कानस्सग करी. पारी लोगस्त कहे. वेसी मुहपनी पहिलेही, बे बांदा देई इछा० ॥ सं०॥ ज० ॥ समाप्ति खामणेणं ।। श्रनुहियोमि अप्निंतर प. स्कियं ॥ ३ ॥ खामेळं ? गुरु कहे खामेह. पी चं खामेमि पं. स्कियं ॥ इत्यादि पाठ पूर्व कह्यो. तिम कहे, पी3 श्वाका० ॥ संगनलपाखी॥३॥ खामणां खामू ? गुरु कहे, पुण्यवंतो चार वेर खमासमण देई. तीन तीन नवकार फही, पाखी ॥ ३ ॥ समाप्त खामणां खामेह, पी, श्रावक एक खमासमण देई. मस्तक नीचे नमावी, तीन नवकार गुणे, श्म चार वार कहे, पी, गुरु कहे निचरिंग पारंगाहोह. पी श्रावक कहे. श्यामि अणुस कही, गुरु कहे, पुण्यवंतो पारखीने लेखे, एक नपवास अथवा दोय प्रा- दिल धनवा तीन नीवी, अथवा चार एकासणां, अथवा घे हजार साय करी, एक उपवासनी पें पूरज्यो, पाखीने स्थान देवसिक नणजो. एम चनुमासे ए सच उगुणो कदणो, संवधरी त्रिगुणो कहतो. पा जिणें तप कीधो हुवे ते पसध्यं कहे, न कीघो हुवे ते तदनि कहे ॥ पीछे ये पांदणां देई, अनुध्यिोमि य. प्रिंतर देवसिय स्वाममि इत्यादि कहे, पीछे ये बांदणा देई. याय रिय उपाए तीन गाया करे, इम घागे सर्व विधि देवसिक पहिकमणानी करे, पण इतरो विशेप दे. श्रुतदेवतानो कानस्सग करी स्तुति पाई. पी जयण देवयाए करेमि कासगं. इत्यादि विधे नवनदेवताको कारसग फररी स्तुति कहे, सो लिखते हैं. ॥ अथ भुवनदेवता स्तुति ॥ ॥ चतुर्वपि संघाय, देवी नुसन्यासिनी ॥ निहत्य पुर. वान्पेश, कगेतु मुलगंधयम् ॥ १ ॥ . .
. (६५) । क्षेत्रदेवतानो कानस्सग करे, तथा तीने पर्व बडा स्तवन अजितशांति कहणी, सयु स्तवन उपसर्गहर स्तोत्र कहो, तथा पनिकमणो पूरो हुवा पी- एक श्रावक गुर्वाज्ञायें, नमोऽहस्ति- द्वाप कही, वडी शांतिका स्तोत्र कहे, बोजा सर्व सुखे, जिपने रात्रि पोतह न हुवे, ते पोसह सामायिक पारी सानले ॥ इति पाक्षिकादि तीन पडिझमणविधि ॥ ॥ अथ दस पञ्चरुवाणविचार लिख्यते ।। ॥तिहां प्रथम चनदे नियम संन्नारे, सो इस तरें पञ्चरखाण करे ॥ उग्गए सूरे नमुकार सहियं मुंउसहियं पञ्चरखा चनविपि श्राहारं असणं पाणं खामं साइमं यमवणानोगेणं सहसागारेणं महत्तरागारेणं सबसमादिवत्तियागारेणं विगश्न पञ्चस्काइ. असवणा- नोगेणं सहसागारे लेवालेवसं गिदिवसंसि नरिदवस विधेगे पमुञ्चमरिकएप पारिछावणियागारेग महत्नरागारेण तपसमादिवत्ति- यागारेणं देसावगासियं नोगपरिनोगं पञ्चकाइ. अपवणानोगेणं सहसागारेणं महतरागारणं सधसमाहियत्तियागारेणं वोसिर ।। इति नवफारसी पञ्चरकाण ॥१॥ ॥ तथा जो श्रावक नियम संजारे नहिं, सो विगका र देसावगातिकका श्रागार न पच के. निकेवल नवकारसो श्रादिक पञ्चरकाण करे. सो लिखते हैं। ॥ नग्गए सूरे नमुकार सहियं पञ्चरकार ॥ चनधिहपि पाहारं असणं पाएं खाइमं साइमं थन्न । सहा वोतिरामि ॥ शशि नव- फारसी पशरकाण ॥ प्रागार ॥२॥ ॥ पोरसी मुंसी पञ्चकामि, नग्गए सूरे चनधिहपि थाहारं असणे पाणं खाइमं साइमं अपना सहसा०॥ पहाकालेशं निमा मोहणं । साहुवयशेणं सब विगश्न पञ्चका ९ परें कदणां ॥ इति पोरिसी पचरकाप ||२॥श्रागार ॥ ६ ॥ ॥ इस माफक साह पोरसीका पशरकाण जागना. इतना विशेष है, पोरसिं पच्चरकाइके ठिकाने हां साहपोरसिं पञ्चरका कदणां ॥ इति साह पोरसिपञ्चरकाण ॥ श्रागार ॥ ६ ॥ ।। सूरे नग्गए पुरिमलु अयलु वा पञ्चरकार, चनधिपि आ- दारं असणं पाणं खाश्मं साश्मं अम०॥ सह० ॥पच० ॥ दिसा. मो० ॥ साहु | मह० ॥ सब० ॥ विगश्न पञ्चरकार इत्यादि पूर्ववत् ॥ इति पुरिमपञ्चरकाण ॥ ३ ॥ आ ॥ ७ ॥ ॥ पोरसिं साढ़ पोरसिं वा पञ्चरकाइ, नग्गए सूरे चनवदंपि थाहारं असणं पाणं खाश्मं साइमं अम० सह० पळ० दिता० साहु सब एकासगं विघासणं वा पचरकार, विहं तिविपि यांहारं असणं खाश्मं साश्म अल सह. सागारिश्रागारेणं श्रा. नहरापसारेणं गुरुअनुषणेणं पारि० मह० सघ. देसावगासियं. इत्यादि पूर्ववत् ।।३इति एकासण विभासण पञ्चस्काण ||प्रा०|| ॥ पोरसिं साह पोरसि वा पञ्चरकाश. नग्गए सूरे चनधिदंपि आहारं असणं पाणं खाश्मं साइमं श्रम सह० पचाका० दिसा० सादु० सघ० एकासणं एगहाणं पच्चरका. ऽविहं तिविहं चनबिपि थाहारं असणं खाश्मं साइमं अस० सह. सागारिश्रागारेणं गुरु- अनुमणेणं पारिव० मंद सब० देसाव० इत्यादि पूर्ववत् ॥ ५ ॥ इति एकलवाणा पञ्चरकाण || आगार || SI ॥ पोरसिं साह पोरसिं वा पञ्चरका नग्गए सूरे चनविहंपि आहारं असलं पाणं खाश्मं सा० अस० सद० पच. दिसामो० साहु० सब. थायंधिलं पञ्चरकाश्. यसव० सह० लेवालेयेणं गि. इस सिलेणं नरिकन विवेगेणं पारिता० मद० सब० एकासवं प- वस्काइ.तिविहंपि आदारं असणं खामं साइमं अप० सहः
सागारिभागारेणं आनणपसारेणं गुरुअनुगणेणं पारि० मह.
सब० वोसिर ॥ ६ ॥ इति बिल पञ्चरकाण ॥ श्रागार ।। 0॥
॥ पोरसिं साह पोरसिं वा पञ्चरवाश्.नग्गए सूरे चनविदंपि
थाहारं असणं पासं खाश्मं साइमं अमन० सद० पठ० दिसा०
सादु० सव्व० ॥ निबिगश्यं पञ्चख्खामि. अम० सह० लेवालेवेणं
गिहरसंसिटेणं नस्वित्तविवेगेणं पञ्चमख्खिएणं पारि० मह०सव्व०
एकासवं पञ्चख्खाइ. तिविहंपिाहारं असणं खाश्मं साश्मं अम०
सह० सागा० आनदृ० गुरु० पा० मह० सव्व० देसावगालियं
लोगपरित्नोगं पञ्चख्खामि. अहा० सह० मह० सव्व० वोसिरामि
॥इति नीवी पचख्वाण || आगार ॥॥
॥ सूरे नग्गए अप्नत्नपच्चरुखामि. चनविहंपिाहारं असणं
पाणं खाइमं साइमं अहा सह० मह० स०व० देसावगालियं
नोगपरिलोग पञ्चरुखामि. अम० सह० म० सव्व० वोसिरामि ॥
इति चनधिहार उपवात पच्चख्खाण ॥ ए |
॥ सूरे नग्गए अप्रत्तई पचख्खामि, तिविहंपि श्राहारं असणं
खाइमं सामं अ० सह० पाणहार पोरसिं साह पोरसिं पुरिम
अवलु वा पञ्चरुखार अम० सह० पछ. दिसा० साहु० सब
देसावगासियं नोगपरिनोग पञ्चख्खामि. अ०स० म० सव्व० वो-
सरामि ॥ इति तिविहार नपवास पच्चख्खाण ॥
॥ पोरसिं
साडु पोरसिं पुरिम९ अव९ वा पञ्चस्कामि. उग्गए
सूरे चनविदंपि आहारं असणं पाणं खाश्मं साश्मं प्र० सह.
पच० दिसा० साहु० सव्व० एकासणं एगाणं दत्तियं पञ्चख्वामि.
तिविहं चनविहंपि आहारं असणं पाणं खाश्मं साश्मं अपा० सहक
सागा० गुरु० मह० सव्व० विगश्न पञ्चख्खामि. इत्यादि पूर्ववत्.
देसावगासियं इत्यादि पूर्ववत् ॥ इति दनिपञ्चख्खाण ॥ ए॥
(६) दिवसचरिमं पच्चस्खा.चन चिदंपि याहारं असणं पाएं खाइमं साश्मं श्रम सह० मह० सव्व० वोसिर ॥ इति दिव- सचरिम पञ्चख्खाण ॥ १० ॥ ॥ दिवसचरिमं पञ्चख्खामि विपि आहारं असणं खाइम अम० सह० मह० सव० बोसिरामि. देसावगासियं पूर्ववत् इति 'दिवसचरिम विहार पञ्चख्खाण || ए | ॥ पाणहार दिवसचरिमं पञ्चरखामि अन्न सह० मह. सव्व० चोसिरामि ॥ इति पाणहार नपवासरो पञ्चरुखाण ॥ ए॥ ॥नवचरिमं पञ्चख्खाशतिविपि चनचिपि आहारं असणं पाणं खामं साइमं अन्न सह महण सव्व वोसिर । आगार नवचरिम, दोश्रागारकानी होय ॥इति नवचरिम पञ्चखाण ।। । तथा इमहिज गंसिहि मुहितहि अंगुष्सहि प्रमुख अ. 'नियह पच्चख्खागकेन्नी ए चार आगार, अन्न सह० मह० सव्व० वोसिर ॥ पांचमो चोलपट्टागारेणं सो साधुको होय ॥इति प्र- निग्रह पञ्चख्खाण ॥ ॥ अहला नंते तुह्माणं समीधे देसावगासियं पञ्चस्खामि 'दंघ वित्तन कालन नावन दव्वन देसावगासियं खित्तनणं नव वा असावा कालनणं मुहुनधारणाप्रमाणे जावनियमं पञ्चस्त्रवामि नावनणं जावगहेणं न गहिकामि खेणं न सिजामि श्रोण- "कवि रायकेण वा एसो परिणामो न पमिव ता अन्निग्गह मणालोग सहस्सागारेणं महत्चरागारेणं सधसमाहिवनिया- गारेणं वोसिर ॥ इति देसावगासी पञ्चस्खाण ॥ ॥ तथा साधु पञ्चकाण करे. तब देसावगासी नही पच्चरके. अरु तिविहार उपवासमें पिलमें नीवी में एकासश प्रमुखमें पाणस्सका उ श्रागार पच्चरके सो दिखाये हैं. पापस लेवामेण या . . - ( ६ ) असेवामेण वा अच्छेण वा बहुलेश वा तसिचेण वा असिण वा वोसिर॥ ॥ अथ पचख्खाण आगार संख्या ।। ॥ दोचेव नमुकारो आगार उच्च हुंति पोरसिए । सचेचत्त पुरमिद्वे, एगासणंमि अव्व ॥ ? सने गहायस्सन, अवय प्रा. यंबिलंमि श्रागारा ॥ पंच वयना, उप्पाणे चरिमचत्तारि ॥ ॥ पंच चरो अन्जिगहे, निवीए अमनवय आगारा | अप्पावरणे पं. चन, हवंति सेसेसु चत्वारि ॥ ३ ॥ इति श्रागार संरव्या ॥ ।। अथ पच्चखाणके आगारोका अर्थ लिख्यते ॥ ॥ उग्गएसूरे नमुक्कार सहियं पञ्चवाइ चनधिहपि श्राहारं ।। अर्थः-इहां गुरु कहे पञ्चरत्वाइ.शिष्य कहे पञ्चरव्वामि. पञ्चरवाश्का अर्थ सब जगे अंगीकार यांची जाणना. जेसे सूरज नदय हुआ पोठे नवकारसी व्रत अंगीकार करूं. यह पञ्चरखाण मुहुर्त कहते दो धमी काल उपरांत जहां तक नवकार गुणकर पारूं नहीं तहां तक चनवि० च्यारोही थाहारका त्यागरूप बत अंगीकार करूं. सो ध्यार प्रकारका श्रादार इस मुजब दे. असन कहते अन्न, चावल, गहूं, मुंग, चणा, ज्वार, वगेरे सब अनाज सात गहूं जबकू आदि लेकर सब तरेका पाटा सब तरेका साग तरकारी लक्षू वगेरे सब तरेका पकवान सूरणादिक सब तरेका कंद दूध दही रोटी राव घाट सब पतली नर नरम वस्तु हींग बेसण सूफ लूंग सेंधवादिक इत्यादिक सब अप्तणमाहि जागना ॥१॥ पाणं इसका अर्थ श्रावण जवोदक तुपोदक तंउलोदक गरमपाणी शुद्धोदक कहते सब अाप- काय || खाश्मं कहते खादिम सूखमी नालेर खजूर द्राख सेक्या 'अनाज श्रांबा केला काकमी अखरोट खारक विदाम वगेरह सब जातका मेवा सब जातका फल खादंम जागना |||| सामं कहते (30) स्वादिम तंबोल इंगि मिरच पीपर हरमे बहेमा अवता तुली कसेला काया मोलेग तज तमालपत्र इलायची लॉग वायविमंग अजमा अजमोद कुलिंजन कवावचीपी कचूर नागरमोया कांटासे लिया कुंन्नटिया पानसुपारी पोहकरमूल जवासाकीजम यावची वांवल- गल धवगलि खेजमेकी गालि खयरसार यह सब स्वादिम वस्तु जापाना ॥ ४ ॥ अब अनाहार चीजे कहतेहैं नींवकीगलि जम पान सिखी गोमूत्र गिलोय चिरायता अतीस कूझेकीगलि चंदन- कीराख रोहिणीकीगलि पीपलामूल वच धमाता रुगए। एलिया चिरमी कयर बोरकीज इत्यादिक अनाहार चीज चा मुजब धो- मणा यह जो चाविना श्रनिष्टपणे लेवे तवता अनाहारहे अगर जो श्या संयुक्त लेवे तो श्राहारका दूपण लगे. पञ्चरखापाका अर्थ जाणे विगर जो पचरूखाण करे सो अंधा पचरूखापाहे इस वास्ते संकेप मात्र आगारोंका अर्थ लिखतेहे. जिस पचरूखागमें जितना आगार होय सो रखकर हमारे पञ्चख्खापाहे. अन्नपानोगेणं कहिये श्रना- नोग टालके किया जो पञ्चख्खाण. अत्यंत नूल जाणेसे कोजी चीज नूल के मुंमे मालली होय लेकिन जाणे वाद तत्काल नसी वखत पीग नाख देवे तो पञ्चरूखाणमें भंग नही. नर जाणे वाद नकल करे तो पञ्चखाण निचे नंग होय ॥१॥ पचन्नकालेणं कहते कालकी प्रचन्नता. आकाशमें गर्द कमती होय आकाशमें बदल बाये होय तेसे पहामकीनट आजावे सूरज नही दीखे तव ज- 'रमसुं पञ्चख्खाणका वखत पूरा दुवा जागकर भोजन करे तो व्रत नंग नहीं ॥॥ दिसामोहेणं कहतां दिसा नूलकर पूरवकू पछिम जाणकर पञ्चरकाणका काल पूरा हुये विगर लोजन कर सेवे तो व्रत जंग नही ॥३॥ सहस्सागारणं कहतांसहसात्कार बहोत नताव खके योगसे अथवा अकस्मात् विलोक्ते तोलते पी वगेरेका गंदा
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(७०) स्वादिम बोल संलि मिरच पीपर हरमे बहेमा अवज्ञा तुलगे कसेला काया मोलेगी तज तमालपत्र इलायचो लोंग वायविमंग अजमा अजमोद कुलिंजन कवायचोणी कचूर नागरमोथा कांटासे लिया कुंनटिआ पानसुपारी पोहकरमूल जवाताकीजा वावची वांवल- ठगल धवगालि खेजमेकीगालि खयरसार यह सब स्वादिम वस्तु जाणना ॥ ४॥ अब अनादार चीजे कहतेहें नींवकीगलि जम पांन सिली गोमूत्र गिलोय चिरायता अतीत कूझेकीगालि चंदन- कीराख रोहिणीकीगलि पीपलामूल वच धमासा संगठी एलिया चिरमी कयर घोरकोजम इत्यादिक अनादार चीज चा मुजब गो- मणा यह जो चाविना अनिष्टपणे लेवेतब ता अनादारहे अगर जो श्या संयुक्त लेवे तो प्राहारका दूपए लगे. पञ्चव्वाणाका अर्थ जाणे विगर जो पञ्चरवाण करे सो अंधा पञ्चरुवाए। इस वास्ते संक्षेप मात्र प्रागारोंका अर्थ लिखतेहे. जिस पञ्चरुवापामें जितना श्रागार होय सो रखकर हमारे पच्चस्खाहे. अनवपालोगेणं कहिये अना. लोग टालके किया जो पञ्चख्खाण. अत्यंत नूस जाणेसें कोश्नी चीज नूल के मुंमे मालली होय लेकिन जाणे वाद तत्काल उसी बखत पीग नाख देवे तो पचरूखाणमें नंग नही. जर जाणे याद अक्षरा करे तो पञ्चखाण निश्चे नंग होय ॥१॥ पचनकालेणं कहते कालकी प्रचन्नता. श्राकाशमें गर्द कमती होय आकाशमें यदल गये होय तेसे पहारकीट भाजाये सूरज नही दीखे तब न. रमसुं पञ्चखाणका वखत पूरा दुवा जागकर भोजन करे तो व्रत नंग नही ॥२॥ दिसामोहेणं कहता दिसा नूलकर पूरवकू पf जाणकर पञ्चस्काणका काल पूरा हुये विगर जोजन कर व्रत नंग नदी ॥शासहस्सागारेसं कदतां ससा 'बके योगसें अथवा यकस्मात् धितोपते तोलते घी (७३) पगामसिद्याए निगामसिघाए संथारानवशाए परियणाए माट:- पाए पसारणाए उप्पश्यासंघहणाए कपए कफराईए गए जनाए श्रामोसेससर कामोसे प्राग्लमानलाए सोअणवत्तियाए श्वोधिप्प. रियालिमाए दिनविपरियासिाए मपाविप्परिआसियाए पाए. नोयएविप्परिमासिवाए जोमेदेवसिन अश्यारोकन तस्समिछामि- एक पमिकमामि गोपरचरिआए निवायरित्राए नग्वारकाम न. ग्धामणाए साणावचादारा संघदृशाए मंझोपादुनिआए वक्षिपाहु- मिसाए ग्वणापाहुझिाए संकिएसहस्सागारे आणेसणाए पाणेस- गाए आणजोयणाए पाणनोयणाए बोअनोयगाए हरियत्नोयगाएं पछाकम्मियाए पुरामम्मियाए यदिहमाए दगसंसहमाए रपसंसह हमाए पारिसामनिवाए पारिवलियाए महासनिस्काए जन- गमेणं नपायरोसणाए अपरिशुरू पमिग्गहियं परिनुत्तंवा जनप- रिचणि तस्समिछामिडक्कम पमिकमामि चानका सिद्यायस्त' अंकरणयाए नन्ननकालं नंमोवगरणस्त अप्पमिलेहणाए अप्पमजा- पाए उपमऊसाए अश्कमे वश्कमे अश्यारे घशायारे जो मे देव: सि अश्वारो फन तस्स मिचामि उक्कम पमिकमामि एगविहे संजमे पमिकमामि दोहिं बंधणेहिं रागबंधोणं दोसबंधोणं' पमिकमामि तिहिं दंमेहिं मणदणं वयंदमणं कायदंग' पमिकमामि तिहिं गुत्तोहि मणगुनीए वयगुत्तीए कायगुत्तोए पमिनमामि तिहिं सल्लेहि मायासलेणं नीयाणासलेणं मिछाई सबसलेणं पमिकमामि तिहिं गारवेहिं इहीगारवेणं रसगारवेणं' सायागारवेणं पमिकमामि तिहिं विराहणादिं नाणविरादगाए' दसणविराहणाए' चारिच विरादणाय' पमिकमामि' चनाहिक साएदि कोहकसाएणं माणकसाएक मायाकसाएणं सोहकताएंग पमिकमामि चदि समाहिं आहारसमाए नरससाए मेहुणेतमा १० (3) एकाशनादि व्रतधारी साथू गुरुके थाहासे उसरी वरखतनी प्रा. हार करे तो व्रत नंग नही ||११|| लेवालेवेणं कहतां नोजन कर- ऐका (पाल प्रमुख नाजन नसके अंदर घृतादिक विगय द्रव्यका अंसलगानयाहे उसकू हाथ वगेरेमें पूठ झाला नस परनी किंचित्वे मालम सालगारहे नसमें आयंबिलादि व्रतवाला नोजन कर लेवे तोत्रत नंग नहीशा नरिकन विवेगेणं कहतां प्रायविलादि पञ्च- ख्वाणमें नही खाणे योग्यजो विगय द्रव्य प्रमुख नसका फरस खाणे योग्य द्रव्यसें हो गया होय वो चीज खाणेमें आवे तो व्रत नंग नही लेकीन नो विगय श्रादि देकर पतला द्रव्य तो हाथ नगय सके नही एसे द्रव्यसें फरस हुआ होय तो उसके खाणेसें व्रत नंग नही ॥१३॥ गिहत्यसंसिडेणं कहतां लोजन पुरपे जिससेती एसी कु मंग-प्रादि देकर नाजन विगय प्रमुख द्रव्यसे वेमालम खरमी होय प्रत्यक निजरसे कदाचित्मालम न होय तब जो उसही वासरासे नोजन पुरसे तोनी व्रत नंग नह) १४ पडुचमुखिएणं कहता सर्व था सूखी रोटी खारवरा प्रमुख द्रव्य किंचित्मात्र घृतादिकसें वेमा- लम चोपणेमें आयाहे लेकिन घृतादिकका स्वाद नही मालम देता हे तो नोवो पञ्चरवाणमें नस द्रव्यकू खाणेमें आये तो यत नंग नही नर जो धारधिगय लेवे तो व्रत नंग होय ॥ १५॥ इति पनरे पञ्चरवाणका श्रागारार्थ संपूर्ण ॥ ॥ अथ साधू प्रतिक्रमणसूत्र लिख्यते ।। ॥ चनारिमंगलं अरिदंतामंगलं सिझमंगसं साहूमंगलं फेय- सिपाहतो धम्मोमंगलं? चनारितोगुनमा अरिहंतालोगुनमा सिमालो गुनमा साहसोगुनमा फेवसिपएानोधम्मोलोगुत्तमो २ चचारिसरणं पयामिश्रारहतेसरणंपवामिसिदेशरणंपव्वकामिसाहमरणंपन्न आमि केवलिपक्षानं धम्नंसरणंपञ्चकःमि ३ चामि पनिमामि पगामसिद्याए निगामसिद्याए संथारानवहणाए परियणाए माट: पाए पसारपाए उप्पश्यातंघट्टपाए कश्ए ककराए गए जंजाइए श्रामोसेससर स्कामोसे पानलमानसाए सोअपवत्तियाए वोषिपं. रियासिआए दिखीविपरियासिाए माविपरिआसियाए पाएर- जोयाविपरिमासियाए जोमेदेवसिन अश्यारोकन तस्तमिजामि- दुक पमिकमामि गोयरचरिमाए लिखायरिआए नग्धामकवाम 7. ग्घारणाए ताणावचादारा संघट्टशाए मंझोपाहुमिश्राए बसिपाहु- मिश्राए व्यणापाहुनिआए संकिएसहस्सागारे आणेसणाए पारोस- पाए प्राणनोयखाए पागनोयगाए बोशनोयगाए हरियलोयगाए पंचामम्मियाए पुराकस्मिथाए अदिमाए दगसंसहमाए रमसंसह हमाए पारिसामनिभाए पारिठावणियाए नहासनिरकाए जन- ग्गमेशं नपायरोसशाए अपरिश्रुई पमिग्राहियं परिनुवा जनप- रिध्वणि तस्समिछामिऽकम पमिकमामि चाउक्कासं सिद्यायस्त अकरणयाए ननकासं नंमोवगरस्त श्रप्पमिलेहणाए अप्पमा पाए उप्पमऊशाए अश्कमे वश्कमे अश्यारे प्रणायारे जो मे देव- सिप्रश्वारो कठ तस्त मिछामि कम पमिकमामि एगविहे असंजमे पमिकमामि दोहिं बंधणेहिं रागबंधशेणं दोसबंधणेणं (२) एकाशनादि प्रतधारी साधू गुरुके प्राझासे उत्सरी वखतनी मा. हार करे तो व्रत नंग नही ॥११॥ लेवालवणं कहतां लोजन कर. का पाल प्रमुख नाजन उसके अंदर घृतादिक विगय द्रव्यका अंसलगानयाहे नसकू हाथ वगैरेसें पूठ माला नस परजी किंचित्वे मालम सालगारहे नसमें आयंबिलादि व्रतवालालोजन कर सेवे तोव्रत नंग नही ॥१॥ नरिकत्तविवेगणं कहतां श्राय पिलादि पञ्च- ख्वाणमें नदीखाणे योग्यजो विगय द्रव्य प्रमुख नसका फरस खाणे योग्य द्रव्यसें हो गया होय वो चीज खाणेमें यावे तो व्रत नंग नही लेकीन नो विगय श्रादि देकर पतला द्रव्य सो हायसें नाय सके नही एसे द्रव्यसें फरस हुआ होय तो उसके खाणेसें व्रत नंग नही ।।१।। गिहत्यसंसिरेणं कहतांनोजन पुरपे जिससेती एसी मग प्रादि देकर नाजन विगय प्रमुख द्रव्यसें वेमालम खरको ।
(५) सायसाए सारांत्रा० साहूगोवंश्रा०सावयाणंपा०तावियाणंग्रा० दे वासंग्रामायदेवीरांया हलोगस्सा० परलोगस्सा. केवलिपन्न नस्तधम्मस्मश्रा०सदेवमणुप्रासुरस्सलोगस्ता०सव्वपासनूअजी- वसत्ताप्रा० कालस्सा०सुअस्तया० सुयदेवयाएासा० वायगा रिअरसा जंवाई वच्चामेलिय हीनरकरियं अचस्करिअं पयहोणं विणयहोणं जोगहीणं घोसहीणं सुदिन्नं छुपमिचियं अकालेक- नप्तान कालेनकनसका असझाइए सजाश्यं सजाइए नसजा- श्यं तस्स मिलामि उकम णमो चनवीसाए तित्ययराणं नसना. माहावीरपावसाणाणं णमेव निग्गंधं पावयणं सच्चं अणुत्तरं के- वषियं पम्पुिर्ण नेपानपं संसुदं सलगत्तणं सिदिमगं मुनिमग्गं निजाणमग्गं निव्वारामगं अवितहमविसंधि सव्यरकपदीरामग्गं इत्यध्यिाजीवा सिचंति बुश्चति मुचंति परिनिघायंति सबख्खाण- मंतंकरति धम्मं सद्दहामि पत्तियामि रोएमि फासेमि पालेमि अ. गुपालेमि धम्नं सहतो पत्निश्रतो रोयंतो फासंतो पालितो श्रणु- पाखितो तस्त धम्मस्स केवलिपन्नत्तस्स अप्नुनिमि धाराहगाए विरतमि विराहणाए अंजमं परियाणामि संजमं नवसंपळामि अन्नं परिमायामि बंनंनवसंपामि अक परिश्रामि कप
छ)
ए परिग्गहसमाए पमिकमामि चनहि विगहादि शठिकहाए नत्त.
फदाए देसकहाए रायकदाए पमिक्षमामि चनदि काणेदि अद्देशं
काणेणं रुद्देरामाणेणं धम्मेमाणेणं सुक्केणंकाणेणं परिकमामि
पंचदि फिरियादि काश्याए अदिगरणियाए पान.सयाए पारताद.
पीपाए पाणायवायकिरियाए पमिकमामि पंचहिं कामगुपोदि
सद्देणं स्वेणं रसेणं गंघेणं फासेणं पमिकमामि पंचदिं महपएर्टि
पाणाश्चायानविरमणं मुसावायानवेरमसं अविनादाणावरमा
मेहुणानुवरमां परिग्गहानबेरमणं पक्किमामि पंचदि समिईदि
रियासमिईए नासाप्तमिईए एसणासमिईए मायाणनंमत्तान
खेवणासमिईए नचारपासवण खेलजल्लसंघापारिवणियासमि-
ईए पमिकमामि हिं जीवनिकापदि पुढविकाएणं पानकाए
तेनकाएक वानकाएणं वणस्सईकाएणं तस्सकाएणं पमिकमामि
वहिं लेसाहिं किन्हलेसाए नीललेसाए कानलेसाए तेनलेसाए प.
नमसाए सुफलेसाए परिकमामि सनहिं नहारोहिं अदि म.
यषणे िनवहिं बनचेरगुत्तीईि दसविहे समगधम्मे एगारसदि
उवासगपमिमादि वारसहिं निरकुमिमादि तेरसहिं किरिया-
खेदि घनदातहिं नूयगामेहिं पहारसदि परमाहम्मिएहिं सोलसएदि
गाहादि सतरसविहे असंजमे प्रहारसविहे अयंने इगुणवीसाए ना.
पद्ययणेहिं वीसाए असमादियोश्किवीसाए सबलेहि पाचीसाए
परीसहेहिं तेवीसाए सुयगमलयरोहिं घनवीसाए परिहंतहिं पयवी
साए नावशाहिं उन्वीसाए दसाकप्पयवहाराणं नदेसणकालेणं ससा
वीसाए अणगारगुणेहिं अघवीसाए पायारपकप्पर्दि एगुणतीसाए
पावसुधप्पसंगहिनीसाए मोहमीप्रमाणेदिगतीसाए सिद्धाश्गुणेदि
पत्नीताए जोगसंगदेहिं तिनीसाए मासायगाए अरिहंताशं भारसाप
लाए सिद्धापंपासायशाए पायरिमाणमातायाए उवद्यायामा
.ever (५) सायगाए सादूगंधा० साहूणोणंग्रा०साबयाणं ग्रा०सावियाणा०दे वासंग्रामायदेवीणंग्राहलोगस्ला०परलोगस्सा. केवलिपन्न. नस्सधम्मस्मश्रा०सदेवमणुासुरस्तलोगस्सा सव्वपाणअजी- वसनामा० कालस्तश्रा०सुश्रस्सा० सुयदेवयाएासा वायणा रिअस्तया. जंबाइ वच्चामेलियं हीनरकरिअं अच्चरकरिग्रं पयहीणं विणयहोणं जोगहीणं घोसहीणं सुरुदिन्नं, अपमिचियं अकालेक- नसहान कालेनकनसझान असजाइए सजाश्यं सजाइए नसजा- श्यं तस्त मिछामि क णमो चनवीसाए तित्यपराणं नसलाइ माहावीरपझवसाणाणं णमेव निग्गंधं पाक्यसं सच्चं अणुत्तरं के- वलियं पमिपुर नेपानयं संसुद्धं सलगत्तणं लिहिमगं मुत्तिमगं निझामगं निवारामगं अवितहमविसंधि सम्वऽस्कपहीलमग्गं इत्यहियाजीवा सिद्यति बुचंति मुचंति परिनिघायंति सबरवाण- मंतंकरति तंधम्म सद्दहामि पत्तियामि रोए म फासेमि पालेमि अ. गुपालेमि धम्न सहतो पनिश्रतो रोयतो फासंतो पाखितो अणु- पासितो तस्स धम्मस्स केवलिपन्नत्तस्स अनुमि भाराहणाए घिरनमि विराहणाए $संजमं परियाणामि संजमं नवसंपळामि श्रवनं परिमाणामि बंनंनवसंपजामि श्रकप्पं परिमायामि कप्पं , पनिगाहधारा ॥ पंचमहत्वयधारा, श्रधार सहस्स सीलंगधारा 3 प्रखयायार चरिना, ते सव्वे सिरसा मणसा मत्यएणवंदामि ॥ खामेमि सञ्चजीवे, सब्वे जीवा खमंतुम॥ मिनि मे सव्व नूएतु, बेरं मयं नकेणई ॥१॥ एवमहं पालोइय, नंदिन गरदिय मंछियं सम्मं ॥ तिविहेण पमिकतो, वंदामि जिणेचनधोसं ॥२॥ इतिश्री सापू प्रतिक्रमणसूत्रं समाप्तं ॥ ॥ अथ परूखी सूत्र लिख्यते ॥ ॥ तिबंकरे अति, अतिरसिद्धेय तिबसिद्धेअ॥ सिद्धेयजि- णेयरिसी, महरिसि नाणं च वंदामि ॥१॥ जेयइमंगुणरयणसायर, मविरातिऊणं तिन्निसंसारा ॥ ते मंगलं करित्ता, अहमविआराहणा. मिमुहो ॥ २॥ मम मंगलमरिहंता, सिद्धा साहू सुयं च धम्मोय ॥ संती गुत्ती मुत्ती, अजवया मद्दवं चेव ॥३॥ लोगंमि संजया जं करति, परम रिसि देसियमुपारं ॥ अहमवि उवठिनतं, महव्वय उ. धारणं काउं || ४ ॥ सेकिंतं महब्बय उच्चारणा महब्बय उच्चारणा पंचविहा पन्नता राई भोयण वेरमणछठा तंजहा सव्वा पाणाइ- वायाओ वेरमणं सब्बान मूसावायानवेरमणंसव्वा अदिन्नादाणा बेरमणं सव्वान्मेहुणाञ्चरमणं सव्यापरिग्गहाम्वेरमणं सव्वाच- राइभोषणाग्वेरमणं तत्य खलु पढमे भंते महव्वा पाणाइयायान वेरमणं सव्वं भंते पाणाइवायं पञ्चरकामि से मुहम वा वायरं वा तसं दा यावरं वा.नेवसयं पाणे अइवाएबा नेवन्नेहि पाणे अइवायाविजा • पुणे अइवायतेवि अन्नेनसमजाणामिजावजीवाए तिविहं तिविहेणं "पाए काएणं न करोमि न कारवेमि करतंपि अन्ननसमणु भंते पडिकमामि निंदामि गरिहामि अप्पाणं वोसिरामि बत्ती रगयाए चउविहे पन्नते तंजहा दव्यन सिनन कालन पावाछमुजीवनिकाएम सितगं पाणा २ पा.
(3) इवाए सयललोंए कालणं पाणादवाए दियावा राज्या भावण: पाणाइवाए रागेण वा दोसेण वाजंपियमए इमस्त धम्मस्स फेवलि. पन्नत्तस्स अहिंसा लख्खणस्स सबाहिछियस्स विणयमूलस्स खती-. पहाणस्स अहिरणसोवणियस्स उपसमप्पभवस्स नव वंभचेर गुत्तस्स अप्पयमाणस्स भिखावित्तियस्त कुरुवीसंपलस्त निरग्गिसरणस्त संपरखालियस्स चत्तदोसस्स गुणगाहियस्स भिपियारस्स निचि- त्तीलख्खणस्स पंचमहलयजुत्तस्स असंनिहिसंचयस्स अविसंवाइयस्स संसारपारगामियस्स निधाण गमण पञ्जवसाणफलस्स पुलिं अन्नाण याए असवणयाए अवोहिए अणभिगमेणं अभिगमेणका पमाएणं रा- गदोस पडिबद्धयाए वालयाए मोहयाए मंदयाए किड्याए तिगाव- गरुयाए चउकसावगएणं पंचेंदियवसट्टेणं पडिपुनमारियाए साया- सोख्ख मणुपालयंतेणं इह वा भवे अन्नेसुवा भवग्गहणेसु पाणाइ- चाकवा कारिया कीरंतोवा परेहि समशुन्नातं निंदामिग- रिहामि तिविहं तिविहेणं मणेणं वायाए कारणं अइयं निंदामि प- हुपन्नं संपरेमि सब्बं पाणाइवायं जावजीवाए अणिस्सिनहिं नेव सयंपाणे अइबाएजा नेवन्नेहिं पाणे अइवायाविजा पाणे अइवा- यंतेवि अनेनसमणुजाणामि तंजहा अरिहंतसख्खियं सिद्धसख्खियं साहुसस्कियं देवसस्कियं अप्पसस्कियं एवं हवइ भिरकूवा भिरकू- जीवा संजयविस्य पडिइय पञ्चस्काय पावकम्मे दियावाराचा एगोवा परिसागळवा सुत्तेवा जागरमाणेवा एस सलु पाणाइवायस्सवेश्मणे हिएसुहे स्वमेनिस्सेसिए आणुगामिए पारगामिए सचेसिं पाणाणं सबेसि भूयाणं सधेसि जीवाणं सधेसि सत्ताणं अदुरकणयाए अ. सोयणपाए अनरणयाए अतिप्पणयाए अपीडणयाए अपरियाव- णियाए अणुदवणयाए महचे महागुणे महाणभावे महापुरिसाणु- चिन्ने परमरिसिदेसिए पसचे तं दुरकरकयाए कम्मरकयाए मोहक :
(36) याए योहिलाभाए संसारसारणाए तिकटु उवसंपजिताणं बिहामि पदमे भंते मइव्बए उवहिनमि सव्वा पाणाइवायाग्वेरमणं ॥१॥ महावरेदोभते महव्वा मुसावायाधरमणं सव्वं भंते मुसावायं. पच्चरकामि से कोहावा लोहावा भयावा हाराावा नेवसयं मुसंवाइयां नेवन्नेहिं मुसंवायाविया मुसंवायंतेवि अनेनसमणुजाणमि जावजोगाए तिविहं तिविहेणं मणेणं वायाए कारणं न क- रोमिन कारवेमि कतपि अननसमणुजाणामि तस्स भंते पडि-. कमामि निंदामि गरिहामि अप्पाणं वोसिरामि से मुसावाए चउ. बिहे पन्नत्ते तंजहा दव्व सित्तन कालन भावन दव्बनणं मुसा- वाए सव्वदव्वेसु खित्तणं मुसावाए लोएवा अलोएवा कालनणं मुसावाए दियावा राग्वा भावओणं मुसावाए रागणवा दोसेणवा जंपियमए इमस्स धम्मस्स केवलिपन्नत्तस्स अहिंसालरक णस्स सञ्चाहिठियस्स विणय मूलस्स खंतीपहाणस्स अहिरन्नसोवन्नि यस्स उवसमप्पभवस्स नव बंभचेर गुत्तस्स अप्पयमाणस्स भिरका- वित्तियस्स कुस्कीसंबलस्स निरग्गिसरणस्स संपकालियस्त चसदो. सस्स गुणगाहियस्स निम्वियारस्स निचित्तोलरकणस्स पंचमहव्य- यजुत्तस्स असंनिहिसंचियस्स अविसंबाइयस्स संसारपारगामियस्स निव्वाणगमणपज्जवसाणफलस्स पुचिअन्नाणयाए असवणयाए अ- पोहिए अणभिगमेणं अभिगमेणवा पमाएणं रागदोसपडिबद्धयाए. पालयाए मोहयाप मंदयाए किम्याए तिगारवगरुयाए चउफसावग पणं पंचेंदियवसट्टेणं पडिपुन्नभारियाए सायासोख्खमणुपालयतेणं इहं. वाभवे अनेसुवा भवग्गहणेसु मुसावाओ भासिओवा भासाविओवा भासिजतो वा-परेहिं समणुन्नाओतं निंदामि गरिहामि तिविहं तिवि देणं मणेणं वायाएकाएमं अइयं निंदामि पडिपन्न संवरेमि अणागयं पचकामि सव्वं मुसावायं जावजीवाए अणिस्सिहिं नेवसयंमुसंवर वा नवन्नेहि मुसंवायाविद्या मुसंवार्यतेवि अन्नंनसमणुजाणामि तंजहा नरिहंतसख्खियं सिद्ध सख्खियं साहसस्कियं देवसस्कियं अप्पसस्क्यिं चं स्वद भिख्खुवा भिख्खुणोवा संजयविस्यपडिइय पञ्चरुखाय पा- . कामे दियावाराचा एगन्धा परिसागच्वा सुत्तेवा जागरमाणेवा स खलु मुसावायस्सवेरमणे हिएसुहे खमे निस्सेसिए आणुगामिए रंगामिए सव्वेसि पाणाणं सव्वेसिं भूयाणं सब्दोसि जीवाणं स- सिं सत्ताणं अदुख्खणयाए असोयणयाए अजूरणयाए अतिप्पण- ए अपोडणयाए अपरियावणयाए अणुद्दवणयाए मइछे महागुणे आणुभावे महापुरिसाणचिन्ने परमरिसिदेसियपसझे तं दुख्खखयाए मखयाए मोहखयाए पोहिलाभाए संसारुत्तारणाए तिकट्ठ उव- जताणं विहरामि दोच्चे भंते महब्बए उवछिनमि सव्वान मुसा- पाओवेरमणं अहावरे तच्चे भंते महब्बए अदिन्नादाणाग्वेरमणं यं भंते अदिन्नादाणं पचख्खामि से गामेवा नगरेवारनेवा अप्पंवा या अणुवा थुलंवा चित्तमंत्र्तवा अचित्तमंत्र्तवा नेवसयं अदिन्नं हज्जा नेषन्नेहिं अदिन्नं गिहाविजा अदिन्नं गिण्हतेवि अन्नन- जाणामि जावजीवाए तिविहं तिविहेणं मणेणं वायाए कारण करेमि न कारवेमि करतपि अन्ननसमणुजाणामि जावजीवाए न भंते पटिकमामि निंदामि गरिहामि अप्पाणं वोसिरामि से नादाणे चउबिहे पन्नते तंजहा दब्बओ खित्तओ कालओ भा- । दवओणं अदिन्नादाणे गहणदारणियेसु दव्वेसु सित्तओणं नादाणे गामेवा नगरेवा रन्नेवा कालओणं अदिनादाणे दियावा बवा भावओणं अदिनादाणे रागणवा दोसेणवा जंपियमए - उधम्मस्स केवलिपन्नत्तस्स अहिंसालख्खणस्स सचादिठियस्स वि लस्स खंतिप्पदाणस्स अहिरन्नसुवन्नियस्त उवसमप्पभवस्स भचेर यत्तस्स अप्पयमाणस्स भिख्खावित्तियस्म कुरुत्रीसंवकस्म (७०) निरग्गिसरणस्स संपरुखालियस्स चत्तदोसस्त गुणगाहियस्स नि- वियारस्स निबित्तोलस्खणस्त पंचमहव्वयजुत्तस्स असंनिहिसंचि- यस्स अविसंवाइयस्स संसारपारगामियस्स निव्वाणगमणपजवसाण फलस्त पुट्विअन्नाणयाए असवणयाए अबोहिए अणभिगमेणं अभिगमेणवा पमाएणं रागदोसपडिवयाए बालयाए मोहयाए मंदयाए किड्डयाए तिगारवगरुयाए चउक्कसानवगएणं पंचेंदियवसट्टेणं पडिपुन्नभारियाए सावासुरकमणुपालयंतेणं इहवाभवेअन्नेसुवा भवग्ग हणेसु अदिन्नादाणं गहियंवा गाहावियंवा धिप्पंतंवा परेहिंसमणुन्ना ओतं निंदामि गरिहामि तिविहं तिविहेणं मणेणं वायाए कारणं अ इयं निंदामि पडप्पन्नंसंबरेमि अणागयं पञ्चरकामि सबं अदिन्नादा णं जावजोवाए अणिस्सिओई नेवसयं अदिन्नं गिहिजा नेवन्नेहि अदिन्नं गिन्नाविद्या अदिन्नंगिन्नतेवि अन्ननसमणुजाणामि तंजहा अरिहंतसख्खियं सिद्धसरिस्कयं साइसस्कियं देवसस्कियं अप्पसस्कियं एवं हवइ भिखूबा भिख्खुणीवा संजयविस्य पडिहयपच्चस्काय पाव कम्मे दियावा राओवा एगओवा परिसागओवा सुत्तेवा जागरमा णेवा एस खलु अदिन्नादाणस्सवेरमणे हिरासुहे खमे निस्सेसिए आ णुगामिए पारगामिए सब्बेसि पाणाणं सव्वेसि भूयाणं ससि जोवाणं सम्बेसि सत्ताणं अदुसणयाए असोयणयाय अजूरणयाय अतिप्पणयाय अपीडणाय अपरियावणियाय अणुद्दवणयाय महछे महागुणे महागुभावे महापुरिसाणुचिन्ने परमरिसिदेसिय पसछे तं दुरकरकयाय कम्मरकयाय मोहरकयाय पोहिलाभाय संसारुतारणाय त्तिकट्ठ उवसंपवत्ताणं विहरामि तच्चे भंते महब्बए अनुविओमि स- वाओ अदिनादाणाओवेरमणं ॥ ॥ जहावरे चउत्ये मंते मह- बए मेदणाओबेरमणं सई भंते मेहुणं पञ्चरत्सामि से दिवा मा. गुसंवा तिरिसजोणियंवा नेवमयं मेहणंसेविद्या नेवन्नेहिं मेट्टणं- सेवाविद्या मेहुणंसेवंतेवि अन्नेनसमणुजाणामि जावजीवाए तिविहं तिविहेणं मणेणं वायाए कारणं न करेमि न कारवेमि करतंपि अ- न्नसमणुजाणामि तस्स भंते पडिकमामि निंदामि गरिहामि । अप्पाणं वोसिरामि से मेहुणे चउबिहे पन्नत्तेतंजहा दबओ खित्तओ कालओ भावओ दवओणं मेहुणे स्वेसुबा स्वसहगएसुवा खित्त ओणं मेहणे उहलोएवा अहोलोएवा तिरियलोएवा कालओणं मे- हुणे दियावा राओवा भावओणं मेहुणे रागेगवा दोसेणवा जंपि. यमए इमस्त धम्मस्स केवलिपन्नत्तत्त अहिंसालख्खशस्त सञ्चा- हिछियस्स विणयमूलस्स खंतिपहाणस्स अहिरलसोवन्नियस्स उव- समप्पभवस्स नवयंभचेरगुत्तस्स अप्पयमाणस्स भिख्खाविनियस्त कुरुखीसंबलस्स निरग्गिसरणस्स संपख्खालियस्स चत्तदोसस्स गुण. गाहियस्स निव्वतीलख्खणस्स पंचमहब्बयजुत्तस्स असंनिहिसंचिय- स्स अविसंवाइयस्स संसारपारगामिस्स निब्वाणगमणपद्यावसाण. फलस्त पुविअन्नाणयाए असवणयाए अबोहिए अणभिगमेणं अ. भिगमेणवा पमाएगं रागदोसपडियदयाए वालयाए मोहयाए मंद- याए किल्याए तिगारवगरुयाए चउकसाओवगएणं पंचेंदियवसटेणं पडिपुन्नभारियाए सायासोख्खमणुपालयंतेणं इहवाभवे अन्नसुवा भवरगहणेसु मेदणंसेवियंवा सेवावियंवा सेवियतोवा परेहि समणु- न्नाओ तंनिंदामि गरिहामि तिविहं तिविहेणं मणणं वायाए का- एणं अइयं निंदामि पड्डप्पन्नंसंबरोमि अणागयं पञ्चख्खामि सबमेदुणं जावजोवाए.अणिस्सिओहं नेवसयंमेहुणंसेविद्या नेवन्नेहिमेहुणंसे- वाविजा मेहुगंसेवंतेवि अनंनतमणुजाणामि तंजहा अरिहंतसरिख- यं सिद्धसख्खियं साहुसख्खियं देवसख्खियं अप्पसखियं एवं हव- इभिख्खूबा भिख्खुगीवा संजयविरयपडिहयपच्चस्कायपावकम्मे दि- यावा राओवा एगओवा. परिसागओवा सुनेवा.जागरमाणेवा (२) एस खलुमेहुणस्तरमणे हिएसुहे समे निस्तेसिए आयुगामिए पार- गामिए सबेसिपाणाणं सम्वेसिभूयाणं सबेसिजोवाणं सबेसिं- सनाणं अदुख्खणयाए असोयणयाए अजूरणयाए अतिप्पणयाए. अपोडणयाए अपरियावणियाए अणुदवणयाए महछे महागुणे महाणुभावे महापुरिसाणुचिन्ने परमरिसिदेसिएपस तंदुरुखसयाए फम्मख्खयाए मोहखयाए वोहिलाभाए संसारुत्तारणाए निकट्ट उव- संपजिनाणं विहरामि चउत्ये भंते महव्वए उवडिओमि सवाओ-' मेहुणाओवेरमणं । अहावरेपंचमे भंते महन्बए परिग्गहाओ वेरमणं सव्वं भंते परिग्गरं पञ्चरुखामि से अप्पंवा वडंवा अणुंवाथलंवा चिन- मंतंवा अचित्तमंतंवानेवसयं परिग्गरं परिगिहिजा नेवन्नेहिंपरिग्गह परिगिण्हाविद्या परिग्गरंपरिगिन्नतेवि अन्नेनसमगुजाणामि जा- वजीवाए तिविहं तिविहेगं मणेणं वायाए काएणं नकरेमि नकार- वेमि करतंपि अन्ननसमणुजाणामि तस्स भंते पडिकमामि निंदामि गरिहामि अप्पाणंवोसिरामि से परिग्गहे चउबिहेपरमत्ते तंजहा दबओ खित्तओ कालओ भावओ दवणं परिग्गहे सचि ताचित्तमीसेसु दब्बेसुखित्तओणं परिग्गहे गामेसुवा नगरेसुवा रन्ने. सुवा कालओणं परिग्गहे दियावा राओवा भावओणं परिग्गहे अपग्धेवा महग्धेवा रागणवा दोसेणवा जंपियमए इमस्त धम्मस्त केवलिपन्ननस अहिंसालख्खणस्स सच्चाहिहियरस विणयमूलस्स खंतिपहाणस्स अहिरन्नसोवन्नियस्स उवसमप्पभवस्स नववंभचेरगु- नस्स अप्पयमाणस्त भिख्खावित्तियस्स कुख्खोसंवलस्स निरग्गि- सरणस्स संपख्खालियस्स चत्नदोसस्स गुणगाहियस्स निब्बियारस्स निवित्तीलख्खणस्त पंचमहव्वयजुनस्स अविसंवाइयस्स संसारपा- मिस निधाण गमण पचवसाणफलस्स पुषिअन्नाणयाए अस .५ अयोहिए अभिगमेणं अभिगमेणवा पमाएणं राग- (३) दोस पविद्धयाए पालयाए मोहयाए मंदयाए किम्याए तिगारव- गल्याए चउकसावगएणं पंचेंदियवसट्टेणं पडिपुन्नभारियाए साया सोस्कमणुपालयंतेणं इवाभवे अन्नेसुवा भवग्गहणेसु परिग्गहोगा हिच्या गाहाविन्वा विप्पंतोवा पोहिंसमणुनाच तंनिंदामिगरि- हामि तिविहं तिविहेणं मणेणं घायाए कारणं अइयनिदामि पड्डाप- नंसंबरेमि अणागयंपञ्च कामि सर्वपरिग्गई जावज्जीवाए अणिस्सि- नहिं नेवसयंपरिगिहिजा नेवभेहिपरिग्गरंपरिगिहाविद्या परिंग्गह- परिगिण्हतेवि अन्नेनसमणुजाणामि तंजहा अरिहंतसरिक सिद्ध- सस्कियं साहसस्कियं देवसखियं अप्पसस्कियं एवंहवइभिख्खूबा भि- ख्खुणीवा संजयविरयपडिहय पञ्चकाय पावकम्मे दियावा राम्या एगवा परिसागठवा सुत्तेवा जागरमाणेवा एसखलुपरिग्गहस्स. वेरमणे दिएसुई समे निस्सेसिए आणुगामिए पारगामिए सबेसि पाषाणं मधेसिंभूयाणं सधेसिजीवाणं सचेसिसत्ताणं अदुरुखणयाए असोयणयाए अजूरणयाए अतिप्पणयाए अपीडणयाए अपरियाव- णियाए अणुद्दवणयाए महत्थे महागुणे महाशुभावे महापुरिसाणुचिन्ने परमरिसिदेसियपसचे तंदुरकरकयाए कम्मरकयाए बोदिलाभाए सं. सारुतारणाए तिकट्ठ उवसंपन्जिताणं विहरामि पंचमे भंते महधए उहितमि सदानपरिग्गहान्वेरमणं ५ अहावरेछठे भंते महव्वए रा. इमोयणावेरमणं सच भंते राईभोयणं पचरकामि सेअसणंवा पाणवा साइमंवा साइमंवा नेवसयंराई जिजा नेवन्नेहिराइंभुंजाविधा राई - जंतेवि अन्नेनसमणुजाणामि जावज्जीवाए तिविहं तिविहेणं मणेणं वायाए कारण न करेमि न कारवेमि करतंपि अन्ननसमणुजाणामि तस्स भंते पटिकमामिनिंदामि गरिहामि अपाणंवोसिरामि से राई- भोयणे चउबिहेपसत्ते तंजहा दपन खित्त कालन भावन दव्वनणं राईभोयणे असणेवा पाणेवा खाइमेवा साइमेवा खित्तनणं राईभोयमेट -- (४) समयखित्ते कालओणं राइंभोयणे दियावा रत्तिवा भावओणे राईभो यणे तित्तेवा कडएवा कसाएवा आंबिलेवा महुरेखा लवणेवा रागणवा दोसणवा जंपियमए इमस्स धम्मस्स केवलिपन्नत्तस्स अहिंसालक. णस्सं सच्चाहिछियस्स विणयमूलस्स खंतिप्पहाणस्स अहिरनसोवन्नि. यस्स उवसमप्पभवस्त नव बंभचेरगुत्तस्स अप्पयमाणस्स भिरकावि- त्तियस्स कुरकीसंबलस्स निरग्गिसरणस्स संपरकालियस्स चत्तदोसस्स गुणगाहियस्स निम्वियारस्स निबित्तोलरकणस्स पंचमहन्वयजुत्तस्स असंनिहिसंचिअस्स अविसंवाइयस्स संसारपारगामियस्स निवाण- गमणपञ्चवसाणफलस्स पुचिअन्नाणयाए असवणयाए अबोहिए अ. पंभिगमेणं अभिगमेणवा पमाएणं रागदोसपडिबद्धयाए पालयाए मोहयाए मंदयाए किम्याए तिगारवगरुयाए चउकसाओवगएणं पंचेंदियवसट्टेणं पडिपुन्नमारियाए सायासोखमणुपालयंतेणं इहंवा भवे अन्नसुवा भवग्गहणेसु राईभोयणं भुत्वा भुंजावियंवा भुजंतंवा परेहिंसमणुनाओ तंनिंदामि गरिहामि तिबिई तिविहेणं मणेणं वा. याए काएणं अइयंनिंदामि पडुपन्नंसंबरेमि अणागयं पचस्कामि सव्वंराइ भोयणं जावजीवाए अणिस्सिओहं नेवसयं राईभु- जिजा नेवन्नेहिंराईभुंजाविजा राई जंतेवि अन्ननसमणुजाणामि तंजहा अरिहंतसस्कियं सिद्धसरिखयं साहुसस्कियं देवसस्कियं अप्पसस्कियं एवंहवइभिख्खूवा भिग्गीवा संजयविरय पहिहय पनस्कायपावकम्मे दियावा राओवा एगओवा परिसागओया 'मुत्तेवा जागरमाणेवा पसखलुराईभोयणस्सरमणे हिएमुद्देसमे निस्सेसिए आणुगाभिए पारगामिए सव्वेसिंपाणाणं सब्देसिं. मयाणं सन्वेसिजीवाणं सधेसिसत्ताणं अदुरकणयाए असोयणयाए 'मजूरणयाए अतिप्पणयाए अपीडणयाए अपरियावणियाए. .हवणपाए महशेमहागुणे महाणुभावे महापुरिमाणुचिन्ने परमरिसि- (५), देसिएपसत्थे तंदुरुखख्खयाए कम्मरूखयाए मोहखयाए बोहिलाभाए. संसारुतारणाए तिकट्ठ उवसंपजित्ताणं विहरामि छठे भंते महबए उवडिओमिसव्वाओ राईभोयणाओ वेरमणं ॥ ६ ॥ इन्चेइयाई पंच: महन्वयाई राईभोयणवेरमणछठाई अचहियठाई उवसंपब्जिचाणविह: रामि अप्पसत्थायजेयोगा परिणामायदारुणा पाणाडवायस्सवेरमणे एसवुत्ते अइकमे ॥ १ ॥ तिब्बरागायजाभासा तिब्बदोसातवेय मुसावायस्सवेरमणे एसवुत्तेअइक्कमे ॥ ॥ उग्गाहंअजाइत्ता अव- दिनेवउग्गहे अदिनादाणस्सवेरमणे एसवुत्ते अइक्कमे ॥ ३ ॥ सद्दा- रूवारसागंधा फासाणंचविारणा मेहुणस्तरमणे एसवुत्ते अइ- कमे ॥४॥ इछापुछायगेहीय कंखालोमेअदारुणे परिग्गहस्सवेरमणे एसवुत्तेअइक्कमे ॥ ५ ॥ दंसणनाणचरिते अविरहिताठिओसमण- धम्मे पढमंवयमणुरख्खे विरयामोपाणाइवायाओ ॥ ६ ॥ दंसणना- णचरिते अविराहिताठिओसमणधम्मे बोयंबयमणुरख्खे विरियामो- अलियवयणाओ॥ ७॥ दंसणनाणचरिते अविराहिताठिओसमण- धम्मे तइयंवयमणुरख्खे विरियामोअदिन्नादाणाओ ॥ ७॥ दंसण- नाणचरिते अविराहित्ताठिओसमणधम्मे चउत्यंवयमणुरख्खे विर- यामोमेहुणाओ n ॥ दंसणनाणचरित्ते अविराहिनाठिओसम- णधम्मे पंचमंवयमणुरख्खे विरियामोपरिग्गहाओ ॥ १०॥ दंसण- नाणचरिते अविरहित्ताठिओसमणधम्मे छछंवयमणुरख्खे विरयामो- राईभोयणाओ॥११॥आलियविहारसमिओ जुनोगुनोठिओसमणः धम्मे पढमंवयमणुरखे विरियामोपाणाइयाओ॥१॥आलियवि- हारसमिओ जुनोगुनोठिओसमणधम्मे वीर्यवयंमणुरखे विरियामो- अलियवयन१३ आलियविहारसमिल जुनोगुनोठिनसमणधम्मे तईयंवयमणुरख्से विरियामो अदिनादाणा॥१४॥ आलियविहार- समिन जुत्तोगुत्तोटिनसमणधम्मे वउचंचयमणुरख्से विरियामोमेड:
(६)
णा॥ १५॥ आलियविहारसमि जुत्तोमुत्तादिनसमणधम्मे पंच-
मंवयमणुररके विरयामो परिग्गहान ॥ १६॥ आलियविहारस-
मिल जुत्तोगुनोठिसमणधम्मे रईवयमणुररके विरयामोराईभोयणा
है ॥ १७॥ आलियविहारसमिन जुत्तोगुत्तोष्ठि समणधम्मे तिविहे-
णपटिकतो कामिमहयएपंच ।। १०॥ सावजजोगमेगं मिछत्तं
एगमेवअन्नाणं परिवजंतोयुत्तो रस्कामिमहधएपंच ॥ १॥ अण-
क्वजोगमेगं सम्म एगमेवनाणंतु उवसंपन्नोजुत्तो रस्वामिमहत्वए-
पंच ॥ २० ॥ दोचेवरागदोसे दोन्नियझाणाइंअट्टस्हाइं परिवयंसो.
गुत्तो रस्कामिमहयएपंच ॥ २१ ॥ दुविइंचरितंधम्म दोनियझाणाई-
धम्मसुक्काइं उवसंपन्नोजत्तो रख्खामिमहबएपंच ॥ २२ ॥ किण्हा.
नीलाकाऊ तिन्नियलसाऊअप्पसगळ परिवधंतोगुत्तो रख्खामि.
महधएपंच ॥ २३ ॥ तेउपम्हासुका तिन्नियलेसाउसुप्पसगन उव-
संपन्नोजुत्तो रख्खामिमहव्वएपंच ॥ ५५ ॥ मणसामणसञ्चविऊ
वायासचेणकरणसच्चेण तिविहेणविसञ्चविन रख्खामिमहब्बएपंच
॥ २५ ॥ चत्तारियदुहसिजा चउरोसन्नातहाकसायाय परिवचंतो
गुत्तो रख्खामिमहब्बएपंच ॥ २६ ॥ चत्तारियसुहसिज्जा चउब्विहं.
संबरंसमाहिंच उवसंपन्नोजुत्तो रख्खामिमहव्वएपंच ॥ २७ ॥
पंचेवयकामगुणे पंचेवयअण्डवेमहादोसे परिवधंतोगुत्तो रस्कामिम-
हब्बएपंच ।। २७ ॥ पंचेंदियसंबरणं तहेवपंचविहमेवसधायं
मोजुत्तो रस्कामिमहव्वएपंच ॥ २ ॥ छज्जीवनिकाययहिं छप्पिय-
भासा अप्पसत्थान परिवजंतोगुत्तो रख्खामिमहव्वएपंच ॥ ३० ॥
छधिहमप्रितरियं वजंपियछविहंतवोकम्मं उवसंपन्नोजुनो रस्कामि-
महब्बएपंच ॥ ३१ ॥ सत्तभयाणाई सनविहंचेवनाणविप्रंगा परिव-
चंतोगुनो ररकामिमहव्वएपंच ॥ ३२ ॥ पिंडेसणपाणेसण उग्गह-
सनिक्कयामहद्ययणा उवसंपन्नोजुत्तो रख्खामिमहत्वएपंच ॥ ३३ ॥
(3) अहमयाणाई अध्यकम्नाईतेसिबंधिच परिवग्रंतोगुनो रख्खामि महव्वएपंच॥३भा अध्यपवयणमाया दिछाअविहनिहि अहिं उवसं पन्नोजतो रख्खामिमहब्बएपंच ।। ३५ ॥ नवपावनियाणाई संसार- गयनवविहाजीवा परिवचंतोगुत्तो रस्कामिमहत्वपपंच ॥ ३६ ।। न वर्षभचेरगुत्तो दुनवविहवंभचेरपडिसुद्धं उवसंपन्नोजुनो रकामिम हव्वएपंच || ३01॥ उवधायचदसविहं असंबरंतहयसंकिलेसंच परि वजनोगुत्तो ररकामिमहव्वएपंच ॥ ३० ॥ चित्तसमाहिाणा दस चेवदसाउसमणधम्मंच उपसंपन्नोजलो ररकामिमहव्वएपंच ॥ ३५ ॥ आसायणंचसव्वं तिगुणं एकारसंबिवजंतो परिवजंतोगुत्तोरस्कामि महन्वएपंच ॥ ४० ॥ एवंतिदंडविरच तिगरणसुद्धोतिसल्लनिसलो ति विहेण पडिफंतो रखामिमहत्वएपंच ॥४१॥ इच्चेयमहव्ययउच्चारणं थिरनं सबुद्धरणं धिइवलंवसा साहणणेपावनिवारणं निकायणा भावविसोही पडागाहरणं निजूहणा राहणा गुणाणं संघरजोगो प सबद्याणी वउत्तया जुसया नाणे परमको उत्तमो एसखलुतित्वं करहिं रइरागदोस महणेहिं देसिन पढ़यणस्ससारो छजीवनिकाय संजन उवइसिवं तिलक सक्कयंगणं अवगया नमोबुते सिद्धबुद्ध मुत्तनीरय निस्संग माणमूरण गुणरयण सायर मणंस मप्पमेय न मोशुते महय महावीरवइमाणस्स नमोत्थुतेअरहन नमोत्थुते भग व निक्कट इच्चेसा खलुमहन्वयउच्चारणाकया इछामोसनकिनणं काउं नमोतेसिंखमासमणाणं जेहिंइमंवाइयं छविहमावस्सयं भग वंतं तंजहा सामाइयं चउवोसन वंदणयं पडिकमणं काउसगो पञ्च स्वाणं सव्वेहिं विएयमि छविहे आवस्सए भगवंते समुत्ते सअडे सग्गये सन्निजुनीए ससंगहणीए जेगुणावा भावावा अरहंतेहिं भ गवतेहिं पननावा परूवियावा तेभावे सद्दहामो पत्नियामो रोएमो फासेमो पालेमो अगुपालेको तेभावे सहईतेहिं पत्नियंतेहिं रोयतेहि (16) फासंतेहिं पालंतेहिं अणुपालंतेहिं अंतोपरम्सस्स अंतोचउमासीए अंतो संवरस्त जवाइयं पहियं परियट्टियं पुछियं अणुपेहियं अणुपालियं तंदुरखरखयाए कम्मरखयाए मोहसयाए वाहिलाभाए संसारुत्ता रणाए निकटुवसंपजिनाणं विहरामि अंतोपरम्सस्स जनवाइयं नप दियनपरियटियं नपुधियं नाणुपेदियं नाणुपालियं संतेवले संतेवी रिए संतेपु रिसकारपरिकमे तस्सआलोएमोपडिकमामोनिंदामोगरि हामो विउडेमो विसोहेमो अकरणयाए अनुमो अहारिहं तबोकम्म पायचित्पडिवद्यामो तस्समिछामिदुकई नमोतेसिंखमासमणाणं जे हिंइमंदाइयं अंगवाहिरियं उकालियं भगवंतं तंजहा दसवेयालियं कप्पियाकप्पियं चुल्लकप्पसुयं महाकप्पसुयं उववाइयं रायप्पसेणीयं जीवाभिगमो पन्नवणा महापन्नवणा नंदीअणुयोगदाराई देविंद थुन तंदुलक्यालियं चंदा विद्ययं पमायप्पमायं वीयरागसुयं विहार कप्पो चरणविसोही आउरपञ्चरखाणं महापच्चरखाणं सव्वेहिपिए यमि अंगवाहिरिए उकालिए भगवंते ससुत्ते सअछे सग्गंथे सन्नि जुनीए ससंगहणीए जेगुणावा भावावा अरिहंतोहि भगवंतेहिं ५ निनावा परूवियावा तेभावे सद्दामो पत्तियामो रोएमो फासेमो पालेमो अणुपालेमो तेभावेसद्दहंतेहिं पत्तियंतेहिं रोयंतेहिं फासंतेहि अणुपालंतेणं अंतोपरखस्स जंवाइयं पढियं परिअहियं पुचियं अणु पे हयं अणुपालियं तंदुरखरखयाए कम्मरखयाए मोहखयाए बोहि लाभाए संसारुतारणाए तिकट्ठ उवसंपजिनाणंविहरामि अंतोप कस्स जनवाइयं नपढियं नपरियट्टियं नपुछियं नाणुपेहियं नाणुपा लियं संतपले संतेवोरिए संतेपुरिसकारपरिकमे तस्स आलोएमो प डिकमामोनिंदामोगरिहामो विन्टेमोविनोहेमोअकरणयाए अनुठे मोआहारिहं तवोकम्मं पायचिनं पडिवद्यामोतस्समिछामिदुक्कडं न मोतसिं खमासमणाणं जेहिंइमंवाइयं अंगबाहिरियं उकालियं भगवंतं (ए) तंजहा उत्ताधयणाई दसानेकप्पोववहारो इसिभासियाई महानिसीह जंबुद्दोवपन्नत्तो सूरपन्नती चंदपन्नत्तो दीवसागरपन्नत्तो खुड्डियाविमा णपविभत्तो महल्लियाविमाणपविभत्तो अंगचूलिया वंगबूलिया वि वाहबूलिया अरुणोववाए वरुणोववाए गस्लोववाए वेसमणोववाए वेलंधरोववाए देविंदोववाए उठाणसुए समुठाणसुए नागपरियाव लिया निरयावलियान कप्पिया कप्पडिसयान पुफियान पुप्फचु लिया वह्रोदसा आसीविसभावणा दिछीविसभावणान चारणसु मिणभावणाने महासुमिणभावणा तेअग्गिनिसग्गाणं सब्जेहंपिएयं मि अंगबाहिरए कालिए भगवंते ससुत्ते सअछे सग्गंथे सन्निजुत्तीए ससंगहणोए जे गुणावा भावावा अरिहंतेहिं भगवंतेहिं पन्नत्तावापरूवि यावा तेभावेसदहामो पत्तियामोरोएमो फासेमो पालेमो अणुपालेमो तेभावे सद्दहंतेहिं पत्तियंतेहिं रोयतेहिं फासंतेहिं पालंतेहिं अणुपालंतेहि अंतोपख्लस्स जंवाइयं पढियं परिपट्टियं पुछियं अणुपेहियं अशुपा लियं तंदुरुखख्खयाए कम्मरूखयाए मोहरूखयाए बोहिलाभाए सं सारुत्तारणाए त्तिक उपसंपजित्ताणं विहरामि अंतोपख्खस्स जन वाइयं नपढियं नपरियट्टियं नपुछियं नाणुपेहियं नाणुपालियं संते बले संतेवीरिए संतेपुरिसफारपरिक्कमे तस्स आलोएमो पडिक्कमामो निंदामो गरिहामोविउट्रेमो विसोहमोअकरणयाए अनुष्ठेमोअहारिहं तवोकम्मं पायचित्तंपडिवजामोतस्स मिठामिदुक्कड नमोतेसिंखमास मणाणं जेहिंइमवाइयं दुवालसंगंगणिपिडंग भगवंतं तंजहा आयारो सूयगडो ठाणो समवान विवाहपन्नत्तो नायाधम्मकहा- उवासगद सान अंतगडदसान अणुत्तरोववाइअदसान पएहावागरणं विवाग सुयं दिठिवान सुदिडिसुहान सव्वेहिं पिएयमि दुवालसंगे गणिपिडगे भगवंते ससुते सअत्ये सग्गंथे सन्निजुत्तीए ससंगहणीए. जेगुणा वा भावावा अरिहंतेहि भगवंतेहिं पन्नत्तावा. परुवियावा तेभावे स (ए) इहामी पत्तियामो रोएमो फासेमो पालेमो अणुपालेमो तेभावे सह इंतेहिं पत्तियंतेहिं रोयतेहिं फासंतेहिं पालतेहिं अणुपालंतेहिं अंत. पख्खस्स जंवाइयं पढियं परियद्वियं पुच्यिं अणुपेहियं अणुपालियं ते दुख्खरकयाएकामख्खयाए मोहख्खयाए वोहिलाभाए संसारतारणाए त्तिकट्ठ उवसंपजत्ताणं विहरामि अंतोपख्खस्स जनवाइयं नपढियं नप रियट्टियं नपुचियं नाणुपेहियं नाणुपालियं संतेवले संतेवीरिएसंतेपुरिस कारपरिकमे तस्सआलोएमो पडिकमामोनिंदामोगरिहामोविउट्टेमो विसोहेमो अकरणयाए अनुठेमो अहारिहं तवोकम्मं पायछित्तं पडिद जामोतस्समिणमिदुक्कडं नमोतेसिंखमासमणाणंजेहिंइमंवाइयंदुवाल संगं गणिपिडगंभगवंतंसम्मकारण फासंति पालंति परति तीरतिकिटं ति सम्मआणाए आराहंति अहंचनाराहेमि तस्समिशामिदुक्कडं । सुय देवयाभगवई, नाणावरणीयकम्मसंघायं ॥ तेसिंखवेज्सययं, जोसं सुयसागरेभत्ती १ इति पाक्षिकसूत्रं समाप्तं ॥ --- ... ॥ अथ अपुहरी पोसह विधि लिरम्यते ।। ॥ रात्रिनी पाउली घमि निद्रा दूर करीने, पंचपरमेठिस्म- रण करी, गृहचिंता परिहरी, पर्व दिवसथकी प्रथम दिवसें पकि- लेही राख्यां, जे पोसहना नपगरण, ते लेई, पोसहशालायें थाप- नाचार्य समी, अथवा गुरुनो संयोग हुवे तो गुरुनी पासे आवी, नूमि प्रमार्जी एक खमासमण देई, शरियावहि पडिकमि पीनें ख- मासमण देई, ॥ श्चाका० ॥ सं० ॥ न० ॥ पोसह मुहपत्ती पमि- लहुँ ? गुरु कहे, पहिलेदेद. , कदी खमासमण देई, मुहपत्ती पहिलेदे. पी, उन्नो थई, खमासमरा देई चाका० ॥ सं० ॥ न. ॥ पोसह संदिस्सानं ? गुरु कहे, संदिस्सावेद, पी- चं कही, ख- मासमण देई. चाका० ॥ सं० [न ॥ पोसद गई ? गुरु कहे . , - (ए) गएद, पोटें ठं कही खमासमण देई नोर्थ, श्राघो.शरीर नमावी मुखें मुहपती देई, मधुरस्वरें तीन नवकार गुणी कहे. ई- सकार नगवन् पसान करी, पोसह दमक नचरावो ? गुरु कहे. न. चरावेमो ॥ पी करेमि ते पोसदं ॥ इहांसें ले के अप्पाणं वो- सिरामि ॥ तक कहे.अब पोसहका पञ्चवारा लीये, सो लिखते हैं, ॥ अथ पोसहका पच्चरकाण प्रारंभः॥ 1) करेमि नं ते पोसहं, आहार पोसई, देसन सबन वा, सरीरसकार पोसई, सवन बनचेर पोसदं, सबन अद्यावार पोसह, सबन चनविदे पोसहे, सावजं जोग पञ्चस्वामि, जावदिवसं अहो- रत्तिं वा पञ्जवासामि, ऽविहं तिविदेणं मलेणं वायाए कारण, न करेमि न कारवेमि, तस्तनं ते परिकमामि निंदामि, गरिदामि अप्पाणं वोसिरामि. ॥ ए पाठ तीन वार गुरुवचन अनुन्नापण करतो उच्चरे ।। पी एक खमासम ॥ श्चाका ॥ सं०॥न०॥ सामायिक मुहपत्ती पमिलेढुं! गुरु कहे, पमिलेदेह. वीजी खमासमण देई मुदपत्ती पमिलेदे. पो दोय खमासमणें सामायिक संदिस्सानं ? सामायिक गर्न?कही, खमासमण देई.अर्धावनतगात्र कन्नो थको तोन नवकार, गुनी तीन करेमि नंते बच्चरी दोय खमासमरें में. सणो संदिस्सा ? बेसणो ग? कहो, पी दोय खमासमणे सिं- याय संदिस्सा ? सिधाय करुं? कही स्वमातमण देई ऊनो को, आठ नवकारनो सिबाय करे. शीतादि परिस, दोय खमातमणे, पांगरणुं संदित्ता ? पागरणुं पमिग्या ? क. ए सर्व सामायिक- विधि पूर्व कहो . तिमदोज करवो, पण स्तनो विशेष. पहिली इरियावदी परिसमी ने तेमार्ट शहा सामायिक दंऊक ऊचरची पी रियावही नही पमिकमीजें ॥ पी चैत्यवंदन, जयवीयराय
(ए)
सूधी करी कुसुमिण उस्समिण कानस्सग करे; पी- परिक्कम
वेलासीम सिद्याय ध्यान करे. पी, पूर्वोक्त रीतें पमिकमण के
पण इतरो विशेष के चारे थुईथे देव बांद्या पी, खमासमण
कहे ।। श्छाका० ॥ सं० ॥ न० ॥ बहुदेवं संदिस्तानं ? गुरु के
संदिस्तावेह. पो छ कही खमासमण देश कहे. चाका
सं०॥ न० ॥ बहुवेलं करूं? गुरु कहे, करेह ॥ पीचं कई
तीन खमासमरों श्री प्राचार्यजी मिश्र, श्रीनपाध्यायजी मि
२, त्रीजे सर्वसाधु वांदी, कम्मनूमिदि कम्मनूमिहि इत्यादि ना
स्कार नणे, जो पहिलेहणवेला नाह हुवे, तो सीमंधरस्वामी
चैत्यवंदनादि करी, सिद्याय करे, हवे पमिलेइण वेला पहिलेदा
फरे, ते विधिपूर्वं आ यथना ३३ पृष्टमां लिख्यो वे तो पण संह
पें फेर लखीये में, दोय खमासमण,श्चाका० ॥ सं०॥
। पमिलेदण करूं ? कही मुहपत्ती पमिलैहे. पी, दोय खमा
समणे यंग पमिलेण संदिस्सा ? अंग पमिलेहण करूं
कहे: पी3 गुरुवचनें चं कही. धोतियो कणदोरो पमिलेई
वस्त्र पहेरी, खमासमण देई, वकार नगवन ! पसान करी,
मिलेहण करावो जी ॥ एम कही, स्थापनाचार्य पमिलेही स्थापे
अने जो गुर्वादिक स्थापनाचार्य पमिलेदे, तो पण खमासमण दे
उक्त रीते आग्या मागे, पी- खमासमण ई ॥ श्चाका० सं०
'" 'न ॥पधि मुदपत्ती पमिले? ? गुरु कहे, पहिलेदेद.
'पी3 इचं कही, मुहपत्नी पमिलेही दोय खमासमणे ॥ चाफा०
'सं०॥ ०॥ नदी पमिलेहण संदिस्सा ? गुरु कहे, संदिस्सा
वेद. नदी पहिलेदरा करूं? गुरु फदे. करेद.
॥ अथ २४ डिलां पडिलेहणपाठ लिरव्यते ॥ :..
|| आगादेपासनेनचारे पासवणे अगदियास ॥१॥ प्रा.
प
..
(ए३ ) गाढे मद्ये नचारे पासवणे अपहियासे ॥ २ ॥ आगाढे दूरे नचारे पासवणे अगादियाले ॥३॥ आगाढे आसन्ने पासवणे अपहियासे ॥ ४ ॥ अगाढे मझे पासवणे अगदियासे (॥ ५ ॥ श्रागाढे दूरे पा: सवणे अगदियासे ॥६॥ आगाढे आसन्ने नचारे पासवणे अहि. यासे॥ ॥ श्रागाढे मद्ये नच्चारे पासवणे अहियासे ॥७॥ श्रा- गाढे दूरे बच्चारे पासवणे अहियासे | ए | आगाढे अासन्ने पास वणे प्रदियाले ॥१०॥ आगाढे मथे पासवणे अहियाले ॥ ११ ॥ आगाढे दूरे पासवणे अहियासे ॥ १२॥ भवागाढे आसन्ने न. चारे पासवणे अपहियासे ॥ १३॥ अगागाढे मधे नच्चारे पास. वणे अपदियासे ॥ १५ ॥ अगागाढे दूरे नचारे पासवणे अहि. यासे ॥ १५॥ अगागाढे अासन्ने पासवणे अगाडियासे ॥१६॥ अगागाढे मद्ये पासवणे अपाहियासे ॥ १७ असागाढे दूरे पास. वणे अपहियासे ॥ १७ ॥ अशागाढे अासन्ने उच्चारे पासवणे अ. दियासे ॥ १५ ॥ असागाढे मचे नचारे पासवणे श्रदियाते ॥ २० ॥ प्रणागाढे दूरे उचारे पासवणे थहियाले ॥ २१ ॥ अगागाढे प्राप्तन्ने पासवणे अक्ष्यिासे ॥ १२॥ अागावे मधे पासवरोथ. दियाले ॥ २३ ॥ अशागाढे दूरे पासवणे अहियासे ॥ २४ ॥ए यमितपमिसेदण पाठ कह्या ॥ ॥ यह चोवीस थंडिलां कहां कहां करनां ? सो लिखते हैं. ॥ ६. श्रमिला शय्याके दोनुं तरफ दहिणे पासे ३, वाम पासे ३, पमिलेहे ॥ ६ श्रमिला दरवजेके भीतर पासें दहिणे ३, वामें ३ पमिलेदे॥ ६ मिला दरवओके बाहर दोनुं पासे पहिलेहे ॥ ६ मिला जिहां नञ्चार प्रस्त्रवणकी जगा होवे, ते दोनु तरफ 'पहिलेदे ॥ति २५ मिला पहिलेदराविधिः संपूर्णः ।। पी इच्च कदी, कंवल वस्त्रादि पमिलेदी पोसह शाला
-
.
(एच)
मार्जी काजो विधिY परग्यो, एक खमासमण देई शरियावही
पमिकमे यहां प्राचार दिनकरमें कहो . दोय खमासमणे हा
का ॥ सं0 10 | वसती संदिस्सा ? वसती पमिलेहूं ?
कदी वसती मात्रो प्रमुख प्रमानें, इत्यादि परा विधिप्रपा प्रमुखमें
न कह्यो ।
॥ हवे एक खमासमणे ॥श्चाका || सं० ॥ ॥ ति
याय संदिस्सावं ? गुरु कहे, संदिस्सावेद. बीजे खमासमरों ॥
शाका०॥ सं० न० ॥ सिद्याय करूं ? गुरु कहे करेह, पी. छ
कही नवकार एक कपन पूर्वक उपदेशमाला प्रमुख सिवाय करी,
नवकार एक कही धर्मध्यान करे, नणे, गुणे. वखाण सुणे.श्म क:
रता पूर्ण पहुर दिन चढया, नम्घाडा पोरिसी अथवा, बदुपमिपुन्ना
पोरिसी कदी, खमासमण देई, रियावद्दी पमिक्कमी दोय समास
मणें ॥ श्चाका० ॥ सं० न०॥ पमिलेहण करुं ? गुरु वचनें इच्छ
कही, मुहपत्नी पमिलेही पान नोजन पात्र पमिलेही रावे. पीठे
सिवाय ध्यान करे।।
1) हवे कालवेलायें आवस्सही पूर्वक देहरे जई पांचे शक
स्त देवांदण विधि दो प्रकारसे लिखते हैं।
॥ तीन प्रदक्षिणा देई. तीन वार नमस्कार करी, भूमिप्र
मार्जी, पुरुष हुवे तो प्रनुजीके दक्षिण पासें वेसे, स्त्री हुवे तो
वाम पासे वेतं. पी ॥श्चाका० सं० ॥ ज०॥ चैत्यवंदन करूं?
छ कहो, चैत्यवंदन कहे. पी नमोधुरा कहे. खमालमण देई
इरियावही पक्किमे. एफ लोगस्सनो कानस्सग्ग करे. मुखें खोगस्त
कहे. संमासा प्रमार्जी बेसे. तीन तथा चार तथा पांच आदि देई
नमस्कार कहे. "जं किंचि नाम ति" इत्यादि कहीं पी नमो
चुणं कहे. नो अई अरिहंत चेईयाणं करेमि कालस्सगं वंदरावनी
अन्न० कही, एक नवकारनो कानस्सग करे. पारी एक थुकी गाथा कहे। पीठे लोगस्त सव्वलोए अरि० वंदणक० अनबू कही एक नव० पारी दुरी घुईकी गाथा कदे. पी- पुरकरवरदी० सुअस्त जग वंदरा० अन्नबू कही एक नवकार० पारी तीसरी घुईकी गा पी सिक्षा बुझाणं. यावञ्चगराणं अन्नधू० स्यादि कथन पूर्वक चोधी शुश्की गाथा कह कर, बैठके नौजूर्ण कहे. फेर अरिहंतचेई० कदे. इसी तरें चार शुश्य देव वांदी से ॥ नमोचूर्ण कहे. नमोऽहरितक्षाचार्योपाध्याय इत्यादि कही पी स्तवन कहे, पी- जयवीयराय कही. नमोसं सब्बे तिविदेण वंदामि पर्यंत कहे ॥ एम पांचे शकस्त देववंदन विधि जाणवोn | ए विधि प्रवचनसारोबार प्रमुख ग्रंथमें कह्यो . तथा चैत्यवंदन वृहन्नाष्यमें एम कह्यो ते ॥ नमस्कार कथन पूर्वक शक स्तव कही, शरियावही प्रतिक्रमणादि करें; वली नमस्कार कथन- र्वक शकस्तव कही दोय वार चार युईसें देव वादे. फेर शकस्तव 'कदी जावंति चेश्याई" गाथा नणी खमासमण पूर्वक जा चंति के बीजो गाथा कही, स्तवन कहे. वली नमोचूणं कही जयवीयराय कहे ।। इति देववंदन विधिः ॥ ॥पी निस्सही पूर्वक पोसहशाला मांद यावी, शरियावही पमिकमे. पी सिवाय ध्यान करे, जो तिविहार नपवास कियो हुवे, तो पञ्चरखाण वेला पूर्ण हुवां जल पीणेकू पञ्चरकाश पारे । ॥ हवे पचरखाण पारणेका विधि लिखते हैं । ॥ खमासमण देई इरियावही पनिक्कमे. फिर एक खमास मरा ॥श्चा० ।। सं० ॥०॥ पञ्चस्वाण पारवा मुहपत्नी पनि लेहुं ? गुरु कद्दे, पमिलेदेह ॥ पीठे चं कदी खमासमरा देई, मुदपत्नी पहिलेदे. फेर एक खमासमा देई, श्चाका ॥ सं०॥ ?
ए । . , .. न० ॥ पाणहार अमुक पञ्चख्खाण पारुं ? गुरु-कदे, पुणोवि का यवो. पी- यथाशक्ति कह), खमासमण देई श्वाका० ॥सं०॥ न. पाणदार पारुं ? गुरु कहे, पायारो न मोनम्वो. पी तहति कही, अमुक पञ्चरखाण चनविहार कयों, एम एक नवकार गुणी पञ्चरूखाण फासियं, पालियं, सोहियं, तीरियं, किट्रियं, पाराहियं, नं च न आरादियं, तस्त मिछामि उक्कम, कही। चैत्यवंदन करे. क्षणमात्र सिकाय करी यथासंनवें अतिथिसंविन्नाग करी पाणीपीये॥ । तथा नपधानवाही दुवे, तो पोरिसी प्रमुख पञ्चवारा पारी पाहार करे, पीठे पासण वैगे थकोहीज दिवस चरिम पञ्चहरवे, पी रियावही पमिकमी चैत्यपंवन करे, ए चैत्यवंदन आहार संवरण निमित्तें ।। इति पञ्चरुवाण पारणेका विधि । । पीछे जो बहिर्नूमि जावणो हुवे, तो प्रायस्सही कही नपयोगी अको, निर्जीव मिल जई; अणुजाणह जस्सुग्गहो कही पूर्व, उत्तर, सूर्य, यामादिकने पूंनि अण देई, मलमूत्र परितये, प्राशुकजलें शुद्ध थई तीन चार बोसिरामि, एहवं कहिये करी मस मूत्र योसिरावी, पोसहशालायें निस्तही पूर्वक पेसी दरियावही प मिकमे. समासमण देई कहे ॥ चाका० ॥ सं०॥ न०॥ गमशा गमणं यालोयह ? गुरु कहे, पालोएह. पी चं कही गमशाग मग पालोवे || ते इम धायस्सही करी, प्राशुक देश जई, संमा सा पूंजी, मिलो पहिलेही, नचार प्रश्रवण वोतिरावी, निस्तही करी, पोसदशाला याव्यो ॥ यावंति जतेहिं जं खंझियं, जं विरा दियं, तस्स मिला मि उक, एम कही येसे. पीठे पमिलेदण वेला 'सीम सिङाप ध्यान करे ॥ ॥ हवे पारले पदुरे हरियायही पमिकमी समासमण देई कहे. श्चाका० ॥ सं०॥ ॥ पमिलेहण करूं? गुरु कहे करंद . .
(3) छ कही दूंजे खंमासमरो श्चाका० ॥ सं०॥ न ॥ पोसहशावा प्रमार्जु ? गुरु कहे, प्रमार्जह. पीश्छं कही, मुहपत्तो पमिलेही. दोय खमांसमणे अंग पमिलेहण संदिस्तानं ? अंग पमिलेहरा करूं? कहे. पी- गुरु वचने श्वं कही मुहपत्ती पहिलेही दमासणो पूंजणी प्रमुख प्रमार्जी पोप्सहशाला प्रमानें. पी काजो शुरू करी, नशी एकातें विखरतो परव्यो रियावही पमिकमी, खमासमण पूर्वक कहे ॥ छकार नगवन् पता करी प.महणां पमिलेहावोज।। पो स्थापनाचार्य पमिलेही स्थापे. गुरुसमी अवा यापनाचार्य समी एक खमासमण देई । इछाका० ॥ सं० ॥ ज०॥ मुहपत्ती पहिले हुँ ! गुरु कहे, पमिलेहेइ. पी , कही खमासमण देई, मुहपची पमिलेहे. पीठे दोय खमासमणें ॥ चाका० ॥ सं० ॥ नासिवाय संदिस्तान ? सिचाय करूं नक्तरीत करामात्र सि. खाय करी तिविहार नपवास कीधो हुवे तो गुरु साखें पाणिहार पञ्चरके ॥ उपधानवाही प्रमुख प्राहार कीधो हुचे, तो वांदशों दोष देई, पच्चरकाण करे. पी एक खमासमय देई । हाका०॥ सं० न॥ नपधि मिला पमिलेहण संहिस्तान? बोजे ख मासमणे ॥ श्छाका० ॥ सं.॥न नपधि थे मला पमिलेहे? गुरु वचने , कही, दोय खमासमखें । चाका० ।। सं०॥न. ॥ वेसणो संदिस्सान बेसो गर्ने ? कही वेसे. वस्त्र कंवलादिप मिलेहे. पुंजणी हुबे, तो ते पण मुहपनोशु पमिलेहे. जपवासी तो चे तेमाडे सर्व पागे कामपट्टो धोतीयो फणदोरो पमिलेहे, उपधा नवाही प्रमुख नोजन कीधो हुवे तो कझिपट्टादि पमिलेयां. पी वस्त्र कंबलादि पंमिलेहे. ए विशेष ते ॥ पोर्नु काल वेला सीम सिद्याय ध्यान करे, पी नचार प्रश्रवण २४ अंमेला पमिलेहे; जो चनदश हुई, तो पाखो चनमासी पक्किमयो करे, संवहरी -
(ए)
संबंधरी पमिकमशो करे. तिहां देवसी पक्किमणो पूर्व सिम्यो
ने, तिमहज करे, पण इतरो विशेष रे ॥श्चा०॥ देवसिय प्रासो
एमि इत्यादि देवसी आलोयां पी- “गणे कमरो चंकमणे"
त्यादि पाठ कहे. खुद्दोवद्दव कानस्सग कियां पीठे दोय खमासम
में ।। श्चाकां० ॥ सं०॥ सिचाय संदिस्सा ? सिवाय फलं!
कही वैगे घको तीन नवकार प्रमुख सिबाय करे ॥ इति ॥
॥ पाकिकादि तीन पक्षिमा विधि धागे एही पुस्तकमें
लिख गये हैं. वहासें नान लेना.
॥ हवे पमिकमणो हुवा पी साधुको व्यावच करी पोरसी
सीम सियाय ध्यान करे. जो लघुनीति प्रमुख करवी हुवे, आस
कहेतो थको, नूमि प्रमाणे मिल स्थानकें जई, देहशंका निवारे
प्रश्रवण वोसिरावी, स्वस्थानके आवे. जगवन् ! बहु पमिपुन्ना पो
रसी एम कही खमासमरा ई रियावही पमिकमे, पी राई
संथारा विधि करे ॥
॥ वे राई संथारा विधि' कहे छे ।।
|| खमासमरा देई। चाका०सं०॥ नारा संपारा
मुहपत्नी पमिलेहुं ? गुरु कहे, पहिलेहेह. पी- चं कही, खमास
मण देई मुदपत्ती पहिलेदे. एक समासमरों ॥ चाका० ॥ सं०॥
नारा संचारोसंदिस्सा? बीजे खमासमएँ । चाका.
॥न राई संथारो गर्बु ? पी गुरु वचनें चं कही, चमसाय
पमिमानुल्लूरण इत्यादि नमस्कार कथन पूर्वक नपचीयराय सूध।
चैत्यवंदन करे. नूमि प्रमार्जी, संचारो तर पट्टो पारे, पाठे
शरीर प्रमार्जी निस्सही निस्सही एम कदी संघारे घेसी, तीन
नवकार तीन करेमि ते सबरी ॥ पामो समासमधा, गोपमा
ईशं महामुणीगं, 'अणुजाणद जिझिा अणुनापाद परम गुरु'
,
(एए)
इत्पादि राइ संथारा गाया जणी, वाम हाथ सिराऐ देई सोवे.
निद्रा नावे जो सोम मुनिवर चरित्र चिंतवे, पसवामो फेरे तो
शरोर संथारो प्रमार्जी फेरे, जो देद शंकायें फळे, तो पूर्वोक्त विधे
देवशंका निवारी, इरियावदी पमिकमे ॥ पी जघन्य पण तीन
गायानी सियाय करी सोवे ।। इति रा संघारा विधि कह्यो ।
॥ हवे रात्रिने पाहिले पहोर की, नवकारादि गुणी, हरि
पावही पमिकमे. खमासमण देई कुसुमिण उस्तुमिश कानस्तग्ग
करी, पूर्वोक्त विधे सामायिक खेवे, हा इरियावही न परिक्कमे.
पी दोयखमालमणे सिद्याय संदिस्तावी पाठ नवकार गुणी, प
मिक्कमण वेला सीम तिचाय करे. पमिकमण वेला हुवां पमिक
मगो पूर्वली परें करे, पण इतरो विशेष के राइ आलोयां पी
संभारा नबस्यकी इत्यादि पाठ कहे. एम संपूर्ण पमिक्कमणो करी
पमिलेदश वेलायें पूर्वोक्त विधे पहिलेदश कर), धर्मशाला पूंजी
काजो हरी रियावही पमिकामे. दोय खमासमणे सिवाय सं.
दिस्तावी, उपदेशमाला प्रमुख सिद्याय करे. पी पोसह पारे ।।
॥ अथ पोसहपारणेका विधि लिखते हैं।
।। खमासमण देई मुदपत्ती पमिलेदे. फेर खमासमण देई
कहे ॥ श्चाका || सं० ॥ न० ॥ पोसद पारुं ? गुरु कहे,
पुणोवि कायचो. पी यथाशक्ति कही, खमासमण देई कहे ॥ श्छा
का० ॥ सं०॥०॥ पोसह पारयुं ? गुरु कहे, आयारो न मो.
नवो. पाठे तदत्ति कहे. खमासमण देई अर्धावनत गात्रे नन्नो
यको तीन नवकार गुणी, खमासमण देई, मुहपत्ती पमिलेहे, पी.
खमासमण देई कहे ।। चाका० ॥ सं
०० सामायिक पालं?
गुरु कदे पुणोवि फायब्वो, पी- यथाशक्ति कही, खमासमण दे
।। चाका० ॥ २०॥ ० - सामायिक पारयु ? गुरु. कई श्रा-
.
- . (100) पारो न मातब्बी. पी तहत्ति कही खमासमई प्रर्धावनत गा। मनो को हाथ जोध्या- मुहपत्ती मुखें दियां कां तीन न वकार गुणी संमासा पहिलेदे. गोमालो घेसी मस्तक नमावी, जयवं दसन्नन्नदो" इत्यादि नायनारूप गाया कहे. पी. पोत. हना नपगरण संवरी, देदरे जई देव जुहारे. घरे प्रावी आहार निष्पन्न दुवो देवी साधु समीपं श्रावे, अतिथि- संविनागवत सा. चवण निमितें साधु नगी निमंत्रणा करी, घरे ले जावे, साधु प ण शुद्ध पाहार लेई, स्वस्थानके श्रावे, तिबार पी साधुनें से प्रा हार दीधो, तेहनोहीज शेष आहार श्राप करे ॥ इति पान पुहरी पोसद ग्रहण पारण विधिः॥ । 'हवे दिन ऊग्या पीछे पोसह ले, तेहनो विधि कहे छे || . || घरकी निश्चित थई धर्मस्थानकें प्रावी, सर्व नपगररा पहिलेदी, कचरो विधिशुं परठवी रियावही पमिकमे. रखमास- मण पूर्वक आग्या मागी, पोसह मुदपत्नी पहिलेहे, आगे पोसद ग्रहणका विधि पूर्वे लिखा है. तिमहिज जाणवो. पण दिवस पो. सहदीज करणो दुवे, तो पोसद दमक नचरतां जावदिवसं पा बासामि, एहवो पाठ कहे. अने जो श्रध्पुहरी करचो हुवे, तो जाव अंहोरत्ति पवासामि एहयो पाउ कहे.पावें सामायिक विधि सर्व फरी चैत्यवंदन कुसुमिणऽस्समिण कानस्सग्ग करी पमिकमणो फरी दोय खमासमणे बदुवेलं संदिस्तावे २, अने जो पूर्वं प झिकमणो गुरु साय करयो दुवे, तो पमिकमणाने अंते पहिलेदी राख्यां में वस्त्र, ते पहेरी-पोसह सामायिक सई विधि करी दोय खमासमणे बहुवेसं संदिस्सा २, तथा जो गुरुसें जदो पमिक- मशो फरयो दुचे, तो गुरुपासे प्राची पोसह सामायिक सर्व विधि करी, पालोरण खामणादि निमितें मुदपनी पमिलेही ये वादा -- - (११) देई ॥ नाका० सं॥ न. रायं पायो ? गुरु कहे, 'प्रा. लोएह. पी राई पालोचे, फेर एक खमासमण देई । श्छाका० ॥ सं०० ॥ अनुन्चिमि अप्रिंतर, राईयं खामेमि ? गुरु कहे खामेह. पी सब पाठ कहे, राई खामे, पहिला पमिकमशामें न- वकारसी पचल्यो थो तेमाटें पी- गुरु सावं पञ्चरकाश उपवासनो करे. पी, दोय खमासमणे बहुवेलं संदिस्तावे ॥ए तीन प्रका- रका विकल्प जागना. हवे पमिलेदण तो पूर्व करी ने, तो पण आदेश मागवो. ते एम खमासमण दे॥श्चाका० ॥ सं०॥ ॥ पमिलेदण संदिस्सावं ? बीजे खमासमणे पहिलेहरा करूं ? कही मुहपत्ती पमिलेहे. पी. इमहीज दोय खमासमणे अंग पनि लेहण संदिस्तावी मुदपत्नी पमिलेहे. पीठे वली खमासमरा दे चकार नगवन् ! पसान करी पमिलेहरा पमिलेहावो जी. एम कहे, पी एक खमासमण देई । चाका० ॥ सं॥०॥ पधि मुद्दपनि पहिलेदुं ? कही कोई वस्त्र प्रणपमिलेरो रारण्यो हुये, तो पमिलेहे, नहीं तो वली प्रासण पहिलेदे. दोप खमास मग सिधाय संदिस्तावी उपदेशमाला प्रमुख सिचाय करे. आगे सर्व क्रिया पूर्व अठ पुहरी पोसहमें लिखी है. तिमदीज जाणवी, पण इहां अउ पुदरी पोसह तो पावली रातें वली सामायिक ने लवे. जिणे दिवस संबंधी चा पुहरी पोसह लोधो हुवे, ते पाउले पुहर पञ्चरकाण किया, पं. दोप खमासमणे नही पहिलेदण सं दिस्ता ? उही पहिलेहरा करूं ? कहे, पण अमिता पद न कहे. अने मिला नहीं पमिलेहै.यह निकेवल दिन संबंधी पोसह म हण करणेमें विशेष विधिही, सो यताई ॥ इति दिनसंबंधी पोसद प्राविधिः ॥
॥ अथ रात्रि संबंधि चउपुहरी पोसहनो विधि कहे हैं |
॥तिहा जिरो प्रथम चन पुहरी दिवस पोसो कच्चरयो ,
पी संध्यानी पहिलेदश फरतां रात्रि पोसदनो नाव भयो, तो
पच्चरकाण किया पी, दोय खमासमणे पोसह मुहपत्नी पहिलेदी
तीन नवकार गुणी तीन वार पोसह दंझक उच्चरे, तिहां नाव
रतिं पावासामि एम पाठ नमरे, पी. सामायिक विधि पूर्व
रिव्यो तिम करे पण सामायिक कच्चरयां पी दोय खमासमरों
सिधाय संदिस्सावी पाठ नवकार कही वेसणो संदिस्सावी, पांग
रपो संदिस्सावी, पी- दोय खमासमणें ॥श्चाका० ॥ सं० ॥
नहीं मिला पमिलेहण संदिस्सा नही मिला पहिले
हण करूं? गुरु कहे, करद. ३चं कही उपघि पहिलेदे. पागे सर्व
क्रिया पूर्व लिखी तिम जागवी. तथा जे श्रावक उपवासी तो
व्ययपणे दिवसें पोसह न करी शक्यो, ते रात्रि पोसदनो नावं
धये, पाउले पहुर धर्मस्थान प्रावे. जो वसती. प्रमार्जी हुवे, तो
सरयो, नही तो वसती प्रमार्जी, काजो परिग्वी सर्व उपगरण
पमिलेही इरियावही पमिकमे. पी चनविहार पञ्चरकाण करी
दोय खमासमरों पोसह मुहपत्ती पमिलेही दोय खमासमण देई
पोसद संदिस्सावे. फेर खमासमण देई, तीन नवकार गुणी, तीन
वार पोसह दमक ऊच्चरे. तिहां दिवसेसरति पहुंबासामि कहे. सं
स्या हुबे, तो रति पंजवासामि कहे. पी बिहुँ खमासमणे सामा
र मुंहपत्नी पहिलेदे. दोय खमासमंण देई, सामायिक संदि
राख्यां और खमासमण देई, तीन नवकार गुणी, तीन करेमि नंते
भरमासमण देई सिद्याय संदिस्सावी, प्रा नवकार
दुचे, मण देई, बेसणो संदिस्तावी सीतादिकें बे
"प खापरणुं संदिस्सावे. पी ये खमासमण देई, अंग
दई,
,
.
.
" (१०३) पहिलेदरा संदिस्सावी, मुदपत्नी पमिलेहे. केर घेखमासमय देई, नही धमिलो पमिलेदण संदिस्तावी जो अपडिलेडोनपगरण हुचे तो पहिलेदे. जो सर्व उपगरण पमिलेह्यां दुवे, तो पण या नक शून्यता टाला जशी वली पासण पहिलेदो, पडिक्कपण वे सासीम सिधाय ध्यान करे, पो नचार प्रप्रवणना २५ डिला पडिलेही पडिकमलो करे. तया पालो रातें वलो सामायिक न सेवे. इतना निकैघल रात्रिसंबंधि पोतह लेवाना विकल्प नाशवा ॥ इति रात्रि पोसदविधिः संपूर्णः ।। ॥ अथ ठाणेकमणे चंकमणे लिख्यते ॥ ॥ गणेशमणे धंकमणे थाउने धणानते ॥ दरियकायसंघट्टे बीयकायसंघटे पावरकापसंघट्टे उप्पश्यासंघठे सपस्तथि देवसिथ, उञ्चित्तिय नरसिय पुचि । चाकारेण संविस्सद, चं तस्स मिधा मि उझ ॥ १ ॥ संथारानवशकी, प्रानाकी, परिश्रट्टरा की, पसारणकी, उप्पश्यासंघट्टराकी, श्रञ्चरकुविसयकायकी, सबस्त विराश्य, उचिंतिम, प्रासिम, चियि, श्ाकारेण संदिस्तद, इधं तस्स मिधा मि उकळं ॥ १ ॥ इति ।। ॥ अथ देववांदणमें अथवा प्रातःकाल संध्याकालके प्रतिक्रमणमें कहनेकी स्तुति ।। ॥ तत्र प्रयम पीजकी स्तुति ।। ॥ महीममरी पुन्नसोवन्नदेई, जणासंदणं केवलन्नाणगे ।। मदानंद जी बहु बुद्धिराय, सुसेवामि सीमंधरं तिरायं ॥ १ ॥ पुरा तारगा जेद जीवाण जाया, नवरसंति से सर जसारा ताया: ॥ तदा संपर ने जिशा वट्टमाणा, सुदं स्तुि ते मे तिलोयापहा. पा॥२॥ रुनार संसार कुशार पोपं, कलंका वली - पंकपरकाल (१४) तोय ॥ मगोविंग्यिछे सुमंदारकप्पं, जिणंदागमं वंदिमो सुमहम ॥ ३॥ विकोसे जिणंदापागनोजलीणा, कलारुव लायम सोहग पीणा || वह तस्स चित्तं.मणि रिमाणं, सिरीजाई देदि मे सुनाणं ॥ ४ ॥ इति श्रीसीमंधरजीनी स्तुति ॥ १ ॥ ॥ अथ पंचमी स्तुतिः ॥ ॥ पंचानंतकसुप्रपंचपरमानंदप्रदानक्षम, पंचानुनरतीमदिव्य पदवीवश्याय मन्त्रोत्तमम् ॥ येन प्रोज्ज्वलपंचमीवरतपो व्याहार तत्कारिणा, श्रीपंचाननलाग्नः स तनुतां श्रीव ईमानः श्रियम् ॥१॥ ये पंचावरोधसाधनपराः पंचप्रमादीहराः, पंचाणुव्रतपंच मुंबत विधिप्रज्ञापनासादराः ॥ रुत्वा पंचपोकनिर्जयमयो प्राप्ता गति पंचमी, तेऽमी संतु सुपंचमोवतनृतां तीर्थकराः शंकराः ॥ पंचाचारधुरीपंचमगाशेन संसूत्रितं, पंचज्ञानविचारसारकलितं पंचेपुपंचत्वदम् || दीपानं गुरुपंचमारतिमिरेप्वेकादशी रोहिणी; पंचम्यादिफलप्रकाशनपटुं ध्यायामि जैनागमम् ॥ ३॥ पंचानां परमेष्ठिनां स्थिरतया श्रीपंचमेरुधियां, जक्तानां विनां गृहेषु ब- दुशो या पंचदिव्यं व्यधात् ॥ प्रहो पंचजने मनोमतरुती स्वारन पञ्चालिका, पंचम्यादितपोवतां नवतु सा सिदायिका प्रापिका ॥ ॥ इति श्रीज्ञानपंचमीस्तुतिः ॥ ॥ अथ अष्टमीस्तुतिः॥ ॥ वनवीसे जिनवर, प्रणम हुँ नितमेव ॥ आवम दिन करिये, चंद्रप्रजनी सेव ॥ मूरति मन मोहे, नाणे पूनिम चंद ॥ दीगं ख जाये, पामे परमानंद ॥ १ ॥ मलि चोत इंद्र, पूजें प्रनु जीना पाय | इंद्राणी अपधर, कर जोडी गुण गाय ॥ नंदीश्वर दी मिलि सुरवरनी कोड || श्रमा महोचव, करता दोडादोड ॥२॥ शेडुंजा शिखों, जागी लाल अपार ॥ चनमासे रहिया, - (१०५) गणधर मुनि परिवार ॥ नवियाने तारे, देई धरम उपदेश ॥ दूध साकरथी पण, वाशी अधिक विशेष ॥ ३ ॥ पोसो पडिकमगुं, के रिये व्रत पञ्चरकाण ॥ प्रारम तप करतां, पाठ करमनी हाण। पाठ मंगल पाये, दिन दिन कोडि फ़टयाण " जिनसूखसूरि कहे, इम जीवत जनम प्रमाण ॥ इति अष्टमी स्तुति ॥ ॥ अथ मौनकादशीस्तुतिः ॥ ॥ अरस्य प्रव्रज्या नमिजिनपतेनिमतुलं, तथा मलेर्जन्म मतमपमलं केवलमल ॥ वलक्षकादश्यां सदसि ससउद्दाममहसि, क्षिती कल्याणानां क्षपति विपदः पंचकमदः ॥ १॥ सुपर्वेदश्रेण्या गमनगमनै—मिवलयं, सदा स्वर्गत्येवाहमहमिकया पत्र सलयं ॥ निनानामप्यापुः क्षणमतिसुखं नारकसदः, क्षिती० ॥ २॥ जिना एवं यानि प्रशिजगारात्मीयसमये, फलं यत्कर्तगामिति प विदि तं शुद्धसमये ।। अनिष्टारियानां क्षितिरनुलवेयुर्वहुमुदः,कि० ॥३॥ सुराः सेंद्राः स सकलजिनचंद्रप्रमुदिता, स्तथा घ ज्योतिप्कारिख .सन्नवननायाः समुदिताः ॥ तपो यत्कर्तृणां विदधति सुखं विस्मि तहदः,किसी० ॥ ॥ इति मौनेकादशीस्तुतिः ।। ॥ अथ पार्थजिनस्तुति ॥ हरिगीत च्छंद ।। ॥ कि धपमप, धुमि घोंघों, प्रसकिधर, धपधोरवं ॥ दोदोंकि दो दो, वाडिदि दाडिदिकि, द्रमकि दश रण, देशवं ॥ मझिझंकि में, जशपरणरण, निजकि निमजन, रंजनं ॥ सुर शैल.शिखरे, नवतु सुखदं, पार्श्वजिनपतिमझनं ॥१॥ कटेरे गिनि योगिनि, किटति गिग्दाधुधुकिधुटन, पाटवं गुणगुणण गुणगण, रणकि गणे, गुणणगुणगण, गौरवं ॥ जमि कि कं, मगर पररण, निजकि निजनन, सजना ॥ कलयंत्ति कमला, फलितक समत. मुस्लमीश, महेजिनाः ॥ २॥ कि कि चें, मेहकर . .
(१०६) हिंक, नहिपट्टा, ताज्यते ॥ तसलोंकि लॉलॉ,पि विनि, ममिशि नि, पाद्यते ॥ई कि ", थुगि थुगिनि, धोंगिधोंगिनि, कल रखे ॥ जिनमतमनंतं, महिम तनुता, नमति सुरनर, मुच्छवे ॥ ३॥ पुंदाकि युवा, पुपुदि पुंदा पुपुदि दोंदों, अंधेरे॥ चाचपट चधपट, रणकि ऐणे मणण में, कंबरे ॥ तिहा सरगमपधुनि, निधपमगरस, सस ससस सुर, सेवता ॥ जिननाट्यरंगे, कुशलमुनि शं, दिशतु शासन, देवता || ४॥ इति श्रीजिनकुशलसूरिजीत पार्श्वजिन०॥ ॥ अथ आंबिलकी स्तुति ॥ ॥ निरुपम सुखदायक जगनायक लायक शिवगति गामी जी, करुणासागर निजगुण श्रागर शुन्न समता रस धामी जी॥ श्रीसिःश्चक्र शिरोमणि जिनवर ध्यावे जे मन रंगें जी, ते मानव श्रीपालतणी परें पामे सुख सुर संगेंजी ॥१॥अरिदंत सिद्ध आचारिज पाठक, साधु महा गुणवंता जी ॥ दरिसण नाण चरण तप उत्तम, नवपद जग जयवंता जी ॥ एहनुं ध्यान धरंतां सहिये, अविचल पद अविनाशी जी,ते सघला जिननायक नमिये, जिणें ए नीति प्रकाशी जी ॥२॥ श्रासूमास मनोहर तिम वलि, चैत्रक मार जगीशें जी ॥ उजवाली सातमथी करियें, नव दिल नव दिवरे जी ॥ तेर सहस बलि गुणियें गुणगुं, नवपद केरो सारो जी। शण परि निर्मल तप आदरय, धागम सारख नदारो जी ॥३॥ विमल कमलदललोयण सुंदर, श्रीचकेसरि देवी जी ॥ नवपद है वक नविजन केरा, विघ्न हरो सुर सेवी जी ॥ श्रीखरतर गध न यक सद्गुरू, श्रीजिनन्नक्ति मुनिंदा जी ॥ तासु पसायें ण पत्नरों, श्रीजिनसान सूरिंदा जी || ४ ॥ इति श्रीनवपद ॥ अथ पजूसणकी स्तुति ॥ ॥ चलि चलि हुं ध्यावं गावं निनवर वीर, जिनपर्व पर . ॥
. . (१०७) सण, दारपां धरमनी शीर ।। आषाढ चौमासें हूंती दिन पंचास, पमिलमण संवधर करिये त्रण नपवास ॥१॥ चळवीशे जिनवर पूजा सत्तर प्रकार, करियें जलें ना नरिये पुष्प नंमार ॥ वलि चैत्य प्रवामें फिरता लान अनंत, श्म परव पजूसण सहुमें मदि मावंत ॥ ५ ॥ पुस्तक पूजावी नव वाचनायें पंचाय, श्रीकल्प सूत्र जिहां सुणतां पाप पुलाय ॥ प्रतिदिन परतावना धूप अगर उरकेव, श्म नवियण प्राणी परव पजूसण सेव ॥ ३॥ वलि सा हम्मीवञ्चल करिये वारंवार, के नावना नावे के तपती शी. सपार ॥ अमदीद पजूसण एम सेवत प्राणंद, सुयदेवी सोनिय कहे जिनलान सूरिद ॥ ४ ॥ इति श्रीप!पणप० ॥ ॥ अथ नेमनाथजीकी स्तुति ।। ॥ सुर असुर बंदिय पाय पंकज मयणमलप्रकोनितं, धन सपनश्याम शरीर सुंदर शंख संग्न शोनितं ॥ शिवादेवि नंदन त्रिजग वंदन नविक कमल दिनेश्वरं, गिरनार गिरिवर शिखर वंद्र नेमिनाथ जिनेश्वरम् ॥ १ ॥ भ्रष्टापदें श्रीयादिजिनवर वीर जिन पावापुरे, वासुपूज्य चंपापुरिय सीधा नेम रेवय मिरिवरे ॥ समेतशिखरे वीस जिनवर मुगति पहुता मुनिवरू, घडवीस जिपवर तेह वंदू सयस संघे सुखकरू ॥ २ ॥ ग्यार भंग पांग बारे दश पपन्ना लागि, उ छेद ग्रंथ प्रसव प्रचा धार मूल वरपाणि ॥ अनुयोग झार उदार नंदीसूत्र लिन मत गायें, एद वृत्ति चूर्णी नाप्य तालीश पागम ध्यायें ॥३॥ इहुं दिसें बालक दोय जेदने सदा नवियण सुखकरू, उख हरें अंबा लुंब सुंदर रिय दोहग अपहरू गिरनार मंझरा नेमि जिनवर चरणपंकज सेवियें, श्रीसंघ सहुने सदा मंगल करो . भंवर देवियें ॥ इति गिरनारमश श्रीनेमिः ॥ . . --- । (106) ॥ अथ दीपमालिकांस्तुतिः॥ पापाय परि चारुपप्ठतपसा पर्यकपर्यासनः, क्षमापालप्र मुहस्तपाल विपुलश्रीशुलशालामनु ॥ गोसे कार्तिकदर्शनागकरणे रिकीते शुन्ने, स्वाती यः शिवमाप पापरहितं संस्तौमि वीरप्र नुम् ॥ १ ॥ यज गमनानंच तंवरज्ञानादराप्तिकरो, संन्याशु सुपर्वसंसतिरदो चक्रे महस्तत् कपात् ॥ श्रीमन्नानिन्नवादिवोरच रमास्ते श्रीजिनाधीश्वराः, संघायानंघचेतसे विदधतां श्रेयास्यने नांसि च ॥३॥ अर्थात्पर्वमिदं जगाद जिनपः श्री ईमानान्निध, स्तत्पश्चाज्ञणनायका विरच चकुंस्तरां स॒नंतः । श्रीमंतीर्घसमर्थने फसमये सम्यग्दृशा नूस्टशां, नूयान्नावुककारकप्रवचनं चेतश्चम "त्कारि यत् ॥ ३ ॥ प्रीतीर्थाधिप तीमन्नावनपरी सिहायिका देव ता, चंचच्चक्रधरा सुरासुरनता पायादपायादसौ ॥ अर्हन् श्रीनिन चंगीस्सुमंतिनी नव्यात्मनः प्राणिनो, या चक्रेऽवमकंष्टइस्तिनिधने शार्दूलविक्रीमितम् ॥ ३॥ इति दीपमालिकास्तुतिः ।। ॥ अथ थुइसंग्रह लिख्यते॥ ॥ अथ चीसंविहरमानकी स्तुति ॥ पंचविदेह विपे विदरता।वीस जिनेसर जग जयवंताचर कमलतसु नां सीस । भदनिस समलं ते जगदीस ॥१॥ च मेरुपांसे फलकता सोहे वीस मंदा गजदंता ॥ तिण कपर जिनदर वीस ते जिनवर प्रण निसदीस ॥शा गणहर कहि उवालस अंग ।यनिक वीस नया तिहां चंग ॥ लिए छपर याणे रंग । ते नर पामे सुरकं अन्नंग ॥ ३॥ जिनसासनदेवी बीस । पूरे मुझ मनतणी जंगीस। संघतणां ने विधन निवारे तिहुश्रण जामन वंठिय सारे ॥ ४ ॥ 147 ..
(१०) ॥ पार्थजिन स्तुतिः॥ समदमोनमवस्तुमहापणं । सकलफेवल निर्मलसद्गुणं । नः गरजेसलमेरविनूपणं । नजति पार्श्वजिनं गतदूषणं ॥ १ ॥ सुरनरे श्वरनम्रपदावुजाः स्मरमहीरुहन्नंगमतंगजाः॥ सकलतीर्थकराः सुख कारका । इह जयंतु जगजानतारकाः ॥ २ ॥ श्रयति यः सुरुती जि नशासनं । विपुलमंगलकेलिविनासनं ॥ प्रबलपुन्यरमोदयधारिका । फलति तस्य मनोरथ मालिका ॥३॥ विकटसंकटकोटिविनाशिनी। जिनमताश्रितसोख्यविकाशिनी ॥ नरनरेश्वर किन्नरसेविता । जयतु सा जिनसासरादेवता ॥४॥ ॥ अथ ऋपभदेवस्तुति प्रतिपदाको । ॥ वरमुनियहारसुतारगणं । वरचित्तकलत्तसुपत्तयणं ।। पंकय उप्पयदेवगणं । सिरियधुय बंदू श्रादिजिणं ॥ १ ॥ तियलोयनमंसि पंपापजुश्रा घणमोदमहीरुहमनगया। परिपालिअनिश्चलजीवदया। मम इंति जिनागमसुरकसया ॥ २ ॥ पणयंगिमहातमरोरहरं । क खाणपयोरुंदवुहिकरं ॥ सुहमग्गकुमग्गपयासकरं । पणमामि लि नागममन्दिकरं ॥३॥ सिरइंदसमुऊलगायलया। सुहकाणविणम्मि यएगलया ॥ अंसुरिंदतुरेंदंसुरप्पणया। मम वाणि सुहाणि कुणेसुस था ॥ ॥ इति रुपनदेवस्तुतिप्रतिपदाकी ।। ।। अथ आदिजिन प्रतिपदा स्तुति ।। ॥ प्रणाम परमं पुरुषपरमेसर, परमातमपद धारीजी । प्रथम जिनेसर प्रथम नरेंसर, प्रथम परम उपगारी नीयोगीतर जिन राज जगतगुरु, सहजानंद स्वरूपोजी । झपनजिनेसर लोकदिने 'सर, पातमसंपद नूपोजी ॥१॥ पांच नरत वलि पांचे एरवत, पंच विदेह महारोजी। काल यतीत अनंता जिनवर, पाम्या सिव 'पद सारोजी ॥ वलिय अनागत काल अनंता, पास्ये इलाही प्रका - रोजी संप्रति फाले वीत विदेदे, बंड बहु सुखकारोजी ॥ २ ॥ अरथे श्रीजिनराज वखाएपा, गूथ्पा श्रीगणधारोजी। अंग चालत अतिसे उत्तम, अरथ विविध विस्तारोजी ।। गुण परजय नय नंग प्रमाणे, जिहां पदश्य्य विचारोजी । ते यागम मन शुद माराघ्या, तूटे कर्मविकारोजी ॥ ३ ॥ सुंदर रूप अनूपम सोदे, श्री चक्केसरित वीजी। श्रीजिनसासन सानिध करणो यो, वंचित नित सेवीजी ॥ कल्याण कारण जेहनी सेवा, संघ सकल सुख कंदानी । श्रीजि नचंद मुणिंद पसाये, कहे जिनहर्ष सुरिंदाजी || || इति । ॥ अथ अजितनाथ स्तुति ।। विश्वनायक लायक जितशत्रु विजया नंद । पपजुग नित प्र में देव अने देविंद ॥ नवलहरी गहरी सव मन धरी अमंद । 'श्रीसूरतसहिरे वंदो अजितजिनंद ॥ १ ॥ श्राप प्रातीहारज प्रति शय बलि चोतीस । दिलरंजन देसन तेदना गुणतीस ॥ अगणि त ज्ञाधारी प्राचारीमा ईस । एह गुणना धारक बंछ जिन चोवी स ॥२॥ सुह अरथ अनोपम जिन नापित सिहांत । स्पाद्वादन यादिक हेतुयुक्ति नवि ब्रांत ॥ पापकरदमपाणी सदगतिनी सह नाणी । सुणिये नित नविका आगमकेरी वाणी ॥३॥ सासणनी साची देवी सानिधकारी। दुःखकष्ट निवारण सेवी सुखकारी ॥ साचे मन समरे ते सुख सान अपारी 1 जिनलान्न पर्यपे होज्यो जयश्कारी || ४ ॥ इति अजितनाथस्तुति ॥ ॥ अथ श्रीमहावीर स्तुति अणोझारी ॥ ॥ यदंहिनमतादेव । देहिनःसंति सुस्थिताः । तस्मै नमोस्तु वीराय ॥ सर्वविघ्नविघातिने ॥ १ ॥ सुरपतिनतचरणयुगान् । नाले गना पति नौमि यवनपालनपरा। जलांजलिंददतुअरके ॥२॥ वदंति सुंदारुगणायतो जिनाः । सदर्थतो. यश्चयंति सूत्रतः ॥ गणाधिपास्तीर्घसमर्थनक्षसे। तदंगिनामस्तुमतंनुमुक्तये ।। || शकः सुरासुरवरैस्सददेवतान्तिः । सर्वज्ञशासनसुखायसमुयता निः॥ श्रीवर्द्धमानजिनदत्तमतप्रकृत्तान् । नव्यान् जनान्नयतु नि ममगलेन्यः॥ ॥ इतिमहावीरस्तुति अशोकारी॥ || अथ लम्वी स्त्रोछंदसि वीर स्तुतिः ।। ॥ वीरं देवं नित्यं वंदे ? जेनाः पादा युप्मान् पातु र जैन वाक्यं नूपात्यै ३ सिझा देवी दद्यात्सौख्यं ॥ ४॥ इति सध्वी स्त्रीवंदसि वीर स्तुतिः॥ ॥ अथ श्री वीरजिन स्तुतिः ।। ॥ मूरति मनमोहन कंचन कोमल काय, सिदारथ नंदन विसलादेवी सुमाय ॥ मृगनायक लंग्न सात हाथ तनु मान, दि 'नए सुखदायक स्वामि श्रीवर्दमान ॥१॥ सुर नरवर किन्नर वं. दित पद अरविंद, कामित नरपूरण अन्निनव सुरतरुकंद ॥ नवि यणने तारे प्रवहणसम निसदीत, चोवीसे जिनवर प्रशमुं विसवा वीस ॥ २॥ अरथे करि पागम नारख्या श्रीलगवंत, गाधर ते गूंच्या गुणनिधि शान अनंत || सुरगुरु पिण महिमा कह न सके एकांत, समरु सुखदायक मन सुध सूत्र सिद्धांत ॥ ३॥ सिदायि का देवी वारे विधन विशेप, सहू संकट चूरे पूरे पास अशेष ॥ अदनिति कर नोकी सेवे सुरनर इंद, जपे गुणगण श्म श्रीजिन खान सूरिंद ॥ ४ ॥ इति वीर जिन स्तुति ।। ॥ अथ श्रीचतुर्विशति जिनानां पंचकल्याणक स्तुतिः ।। ॥ नानेयं सनवं तं, प्रजियसुविदयं, नंदणं सुण्यधा मु प्पासं पठमनाहं, सुविधशसिपहुं, सीयसं वासुपूज्यं ।। श्रेयांस ध भशाति, विमलपरिजिनं, मलिकुंथु प्रगतं, नेमि पासं च वीरं, नमिमविन मिसौ, पंच कल्याण एमु ॥ १ ॥ गम्ने दाणेसु नम्मे, .
रोजी । संप्रति फाले वीस विदेहे, बंड बहु सुखकारोजी ॥ ३॥ भरथे श्रीजिनराज वखाएपा, गूल्यां श्रीगणघारोजी1 अंग मालम अतिसे उत्तम, अरथ विविध विस्तारोजी ॥ गुण परजय नय संग प्रमाणे, जिदा पदश्य्य विचारोजी । ते थागम मन शुभ मारायां, तूटे कर्मविकारोजी ॥ ३ ॥ सुंदर रूप अनूपम सोहे, श्री चकेसरि वीजी । श्रीजिनसासन सानिध करणो यो, वंग्ति नित सेवीजी ॥ कल्याण कारण जेहनी सेवा, संघ सकल सुख कंदानी। श्रीजि नचंद मुणिंद पसाये, कहे जिनहर्ष सुरिंदाजी ।। || इति || ॥ अथ अजितनाय स्तुति ॥ विश्वनायक लायक जितशत्रु विजया नंद । पयजुग नित प्र में देव अने देविंद || नवलहरी गहरी सब मन धरी अमंद श्रीसूरतसहिरे वंदो अजितजिनंद ॥ १ ॥ पाठ प्रातीहारन प्रति शाय वलि घोतीस । दिलरंजन देसन तेदना गुरातीस ॥ अगशि त कधिारी प्राचारीमा ईस । एद गुणना धारक वंs जिन चोवी स ॥२॥ सुः अरथ अनोपम जिन नापित सिक्षांत । सादादन यादिक हेतुयुक्ति नवि ब्रांत ॥ पापकरदमपाणी सदगतिनी सद नाणी। सुणिये नित नविका आगमकेरी वाणी ॥३॥ सासणनी साची देवी सानिधकारी । सुःखकष्ट निवारण सेवी सुखकारी। साचे मन समरे ते सुख खान अपारी । जिनलान्न पर्यपे होज्यो जयश्कारी ॥५॥ इति अजितनाथस्तुति ॥ ॥ अथ श्रीमहावीर स्तुति अणोझारी ।। ॥ यदहिनमतादेव । देहिनःसंति सुस्थिताः ॥ तस्मै नमोस्तु वीराय ॥ सर्वविघ्नविधातिने ॥ १ ॥ सुरपतिमतचरणयुगान । नाले यजिनादिजिनपति नौमि यश्चनपालनपरा। जलांजलिंददतुपुरके न्यः ॥ ३ ॥ वदंति इंदारुगणायतो जिनाः । सदर्थतो यचयंति सूत्रतः ॥ गणाधिपास्तीर्थसमर्थनक्षले। तदंगिनामस्तुमतंनुमुक्तये ।। शा शक्रः सुरासुरवरेस्सहदेवतानिः । सर्वज्ञशासनसुखायसमुपता निः॥ श्रीवर्द्धमानजिनदत्तमतप्रवृत्तान् । नव्यान् जनान्नपातु नित्य ममन्यः ॥ ४ ॥ तिमहावीरस्तुति अशोकारी ॥ ॥ अथ लम्वी स्त्रोछंदसि वीर स्तुतिः ॥ ॥ वीरं देवं नित्यं वंदे । जैनाः पादा युप्मान् पातु जैन वाक्यं नूयानत्यै ३ सिश देवी दद्यात्सौख्यं ॥ ॥ इति लची स्त्रीचंदसि वीर स्तुतिः ॥ ॥ अथ श्री वीरजिन स्तुतिः ।। ॥ मूरति मनमोहन कंचन कोमल काय, सिद्धारथ नंदन त्रिसलादेवी सुमाय ॥ मृगनायक लंग्न सात हाथ तनु मान, दि 'नए सुखदायक स्वामि श्रोवर्दमान ॥१ || सुर नरवर किन्नर वं. दित पद अरविंद, फामित नरपूरण अनिनव सुरतरुकंद ॥ नवि यसने तारे प्रवहणसम निसदीस, चोवीसे जिनवर प्रामुं विसवा वीस ॥ ५॥ अरथे करि पागम जारप्या श्रीनगवंत, गणधर ते गूंथ्या गुणनिधि ज्ञान अनंत ॥ सुरगुरु पिण महिमा कद न सके 'एकांत, समरूं सुखदायक मन सुघ सूत्र सिद्धांत ॥ ३॥ सिद्धाय का देवी वारे विघन विशेप, सहू संकट चूरे पूरे आस अशेष ॥ अदनिति कर जोकी सेवे सुरनर इंद; जंपे गुणगण श्म श्रीजिन खान सूरिंद ॥ ४ ॥ इति वीरजिन स्तुति ॥ ॥ अथ श्रीचतुर्विशति जिनानां पंचकल्याणक स्तुतिः ।। । नालेयं संजय तं, प्रजियसुविदयं, नंदणं सुपयवा ॥ पासं परमनाहं, सुविपशसिपहुं, सीयलं वासुपूज्यं ।। श्रेयांस ध भशाति, विमलभरिजिनं, मलिकुंथु अणंतं, नेमि पासं च वीर, नमिमविनमिसी, पंच कल्याण एमु ॥ १ ॥ गने हारोसु नम्मे, .
. धर्य गदणखणे, केवले खोयकाले, पचाणियारागणे, पगवश समए, संधुभा नायसारं ।। देवेहिं दागवेदि, जवणयासए, वितरे किंन रतिमझं वितु मोरकं, सयसजिनवरा, पंच कल्लाण एसुशादे तित्यंकराणं, जमिदअणुवम, नायतित्यंकरतं । सपन्नूणं च पास अहम विनियमा, जायए सघकालं ॥श्रन्नुन्नप्पत्तिएहि, नियगममहणं बीयपंकररूवं । अबावादं जिणाणं, जयन पवयणं, पंच कल्लाण ए |गोरीगंधारकाली, नरवरमदिपी, इंससंगोरिदया। सचामार पा, वरकमलकरा, रोहिणीउत्तवा ॥ पन्नत्ती उत्तपनमा, धराश्स गई, खित्तगेहाश्वासा । संति संघे कुणंतु, गहगणसईया, पंच व जाण एसु ॥ इतिश्रीचतुर्विशतिजिनानांपंचकल्याण कस्तुति || ॥ अथ श्रीशत्रुजय स्तुतिः॥ ॥ श्रीसेजेंजमंझण आदिदेव । हूं अहनिस समरूं तास से रायगतल पगला प्रनूतणा । पूजि सफल फल सोहामणा ॥१॥ तेवीस तीर्थकर समवसरया। विमलाचल कपर गुण नरया) गिरि कमणे आया नेमनाथ । ते जिनवर मेलो मुगतिसाथ ॥शा सोहम -सामी नपदिस्या । जंबुगणधरने मन वस्या ॥ पुंगरगिरि मदिमा जे मांह। ते पागम समरू मनचाद || ३ || चक्केसरि गोमुख का वायद । मन वंग्ति पूरण कल्पवृक्ष ॥ सिद्धकेत्रसिहरे सहदेव -ताः। नणे नंदिसूरि तुम पाय सेवता ||३॥ इतिश्रीस→जयस्तुति ।। ॥ अथ नेमजिन स्तुतिः॥ ॥ गिरनार सिखरपर नेमनाथ सुपहाण । दीक्षा वर केवल ज्ञान अने. निरवाण || जसु तीन कल्याणक सुखकर सुरतरुकंद। तसु नवियण प्रणमो पाययुगलअरविंद ॥ १ ॥ अमवय चंपा पावापुर -जुन्न गण । आश्म बारम जिण चनवीसम जिगन्नाण ॥ अजिता दिक वीसे पुरता सिवपुर वास । समेतशिखरपर प्रणामुं अधिक
जल्हास ॥२॥ जिणवर मुख दूंती सुणि त्रिपदी ततकाल । ग
पधारक गूंथ्या हादश अंग विशाल | नयनंग पदारथ सत्तर
नव तत्त । नवियणने तारे सायर जिम वोहित्य ॥३॥ चक्रस
र अंभा पनमादेवि प्रत्यक । श्रीसंघ मनोरथ पूरे वासुरवृक्ष ।। ध्या
वे सुख पावे श्रीजिनलान सूरीत । जिनवर सुप्रप्तादे पास फले
सुजगीत ॥ ४॥ तिनेमजिनस्तुतिः ॥
।। अथ श्रीशितलजिन स्तुतिः ॥
॥ सुख समकितदायक कामित सुरतरुकंद । उढरथ नृपरा
णी नंदाकेरो नंद ॥ नदिलपुर स्वामी फेमे नवना फंद। चित चो
खे नमिये श्रीशीतलजिनचंद ॥१॥ अतीत अनागत हुश्रा होस्ये म
नंत । संप्रति काले जे क्षेत्र विदेद विचरंत || त्रिहुं नवणे ग्वणा
सासय असासय दुत । ते सगला त्रिकरण प्रणभु श्रीअरिहंत ॥ २
| कालिक वकालिक अंग अनंग पविठ । नयनंग निरकेपा स्या
झाद मितसिह ॥ लविजन उपगारी नारी जिन उपदेश । श्रुत
श्रवणे सुणता नासे कोमि कलेश ॥ ३॥ ब्रह्मजद असोका सा
सन सुरि सुविचार । संघ सानिधकारी निरमल समकित धार ।
चिंता उख चूरे पूरे मनह जगीस । ध्यान तेहनो धरिये कहे जिन
खानसूरिस || U ॥ इति श्रीशीतलजिनस्तुतिः ।।
॥ अथ समवसरणविचारगर्भित स्तुतिः ॥
॥मिल चोविद सुरवर विरचे निगमो सार । अढी गाउ
उंचो पिठुलो जोयण पार ॥ विच कनकसिंहासन पदमासन सुख
फार । श्रीतीरयनायक वैसे चोमुखधार ॥ १ ॥ तीन पत्र सिरो
वर चामर ढोले इंद। देवनि वाले नांजे कुमति फंद ॥ ना
मंगल पूंठे मलके जांश दिनंद । तिदुअरा जन नवि मन मोदे
सपल जिनंद ॥२॥ य नाव मुठरणा नाम निदेपा पार'
.
(११)
जिण गणहर नारच्या सूत्र सिहांत ममार ॥ जिनवरनी पमिमा
जिन सरखी सुखकार । शुन्न जावे वंदो पूजो जग जयकार ||२||
ऽख हरणी मंगल करणी जिनवर वाणी नवच्छेद रुपाणी मीकी
अमिय समापी | मन शुद्ध पाणी प्रतिवूमो नवि प्राणी । सुर्य
देवि पसायें पामे जयति सुनाणी ॥४॥इति ।
॥ अथ श्रीचैत्री पुनम स्तुति ॥
।। सेजगिरि नमिये रुपनदेव पुंमरीक । शुन्न तपनी म
हिमा सुण गुरुमुख निरनीक ॥ शुद्ध मन उपवासे विधिसु चैत्य
वंदनीक | करिये जिन आगल टालो वचन अलीक || || शक
स्तवनादिक प्रथम तिलक दस वीस । अक्षत गिरातीले चढता तिर
चालीस ॥ पंचासनी पूजा नापर श्म जगदीस । तेहिज नित !
पy स्वामी जिन चोवोत ॥ ३॥ सुदि पदनो पूनम
चेत्र मार
शुन्न वार । विघिसेती लहिये आगम साख विचार ॥ इन सोने
वरसलग घरिये ज्ञान नदार । करतां नर नारी पामे नवनो पार
॥ ३॥ सोवन तन चरणे नयने तिम अरविंद । चक्केसरीदेवी से
विय नर सुरवंद ॥ कामित सुखदायक पूरय मन आणंद । जंपे
गंणनायक श्रीजिनलानसूरिंद ॥ ४ ॥ इतिश्रीचैत्रीपूनमस्तुतिः ॥
॥ अथ नवपदस्तुति ॥
॥ समरूं सुखदायक मन सुध वीर जिनंद । जिण नवपद
महिमा नापी ज्ञान दिणंद | आसु मधु नऊल सातमधी नव
दीत । नव आंबिल करिये मन धरि अधिक जगीत ॥१॥ अरि
हंत बलि सिह आचारज नवझाय । मुनि दरसण तिम वलि नारा
चरण तव थाय ॥ प्रतिपदनो गुणनो गुलिये दोय इकार । सदु
जिननी
पुजा कीजे अष्ट प्रकार ।। २ ।। वारस अमरत्तीस परावी
स संग वीस सार । समसट इक्कावन सितर पञ्चास प्रकार || इश
.
1
(११५)
संख्या कानसग परदक्षा परिणाम ।आगमनापित विधि इम
कीजे अलिराम ॥ ३ ॥ चकेसरिदेवी तिम विमलेसर जरक । श्री
पालतणीपर पूरे वंगित सुरक || इस विधि आराधो सिद्धचक्र नवि
प्राणी। जिनहर्ष वदे नित श्रीजिनचंदनी वाणी ॥ ॥ इति ||
॥ अथ वीस स्थानक स्तुतिः ॥
॥ शिवसुख दाता जगत विख्याता
पूरण
अलिनय कामी
जी। ज्ञानादिक गुण चेतनरूपी चिदानंदघन धामीजी ॥थानक
वीसे आगम नणिया वीतराग गुण नुक्ताजी । जे नर अंतर आ
तम ध्यावे सिवरमणी वर युक्ताजी ॥ १ ॥ अरिहंत सिद्ध प्रवचन
सूरी भिवर पाठक मुनि सारोजी । ज्ञानी दरसन विनय चारित्र
ब्रह्मचारज कियधारोजो ॥ तपसी गणधर जिण चारित्री नाण श्रुत
तिच नूपोजी। ए पद निज नवि नावे सेवे तेहिज ब्रह्म सरूपो
जी॥ ॥ दोय सहस गुणनो प्रत्येकें व्यार सया नपवासोजी
। व्यन्नावसें विधि परकासे तीर्थंकर पद खालोजी ॥ तीजे नव
वर वीस यांनकनी सेव करे जव्य प्राणीजी । समकित बीजे ने
निज आतम आरोपे चित्त प्राणीजी ॥ ३ ॥ सुरतरुसम तप फल
दे मोटो श्रीसुरदेवि सदाईजी । खरतर गह जिन आज्ञाधारी पा
टोधर वरदाईजी । जिन सौन्नाग्यसूरिंद पसाएँ इंस सूरिद गुण
गावेजी । संघ सकलकं सानिधकारी मन वंचित फल पावेजी ।।
४॥ इतिश्रीवीसस्थानक स्तुति ।।
॥ अथ वीस स्थानक स्तुति ॥
॥ अरिहंत सिद्ध पवयरा प्राचारज थिवराश । नवकाय साहू
नारा सण विनय पहाण ॥ चारित्त ब्रह्म फिरिया तपि गोयम
जिनजाण । संयम नाणी श्रुत संघ सेवो वीसे गण 1. || न
रूटे जिनवर एकसो सित्तर धीर । बलि काल जघन्ये जिनवर
वीस गंजीर । जिन याय अनंत अतीत अनागत काल । एवीते
यानक पाराधी गुणमास ॥ ३ ॥ श्रावश्यक वे वेला जिनवंदन
त्रि काल । थानकपद गिणवो सहस दोय सुकमाल ॥ कानसर्ग
गुण स्तवना पूजा प्रनायना सार । श्म शासन वचल करतां न
वनो पार ॥ ३ ॥ समरीजे अहनिशि गुणरागी सुर साय । जस्क
जरकणी सुरपत्ती वेयावध कर नाथ ॥ थानकतप विधमुंजे सेवे
मन रंग । देवचं प्राणाये सानिध करे तसु चंग ॥ ४ ॥ इति ॥
॥ अथ नवपद स्तुति ॥
॥अनुपम गुण आगर सुरक सागर वंदित सुरनर वृंदाजी ।।
नवपदमाद मुख्य वखाएया झपन्नादिक जिनचंदाजी ॥ नाव धरी
नेनधि वंदे दे कर्म निकंदाजी। नृप श्रीपालतणीपर ध्यांवो
पाचो सुस्क अमंदाजी || १ || अरिहंत सिद्ध सूरिनवद्याया संकल
मुनि सुखकारीजी । दंसण नाण चरण तप नवपद धारे चित सं
भारीजी ॥नवनवनवि सिवपद पावे प्रवचन वाणी साखीजी।
वीरजिनंदे ज्ञानानंदे गौतम आगेनाखीजी ॥शा छावस पाउ उत्तीसे
गुण वलि पणवीस सगवीस सारोजी।समस कावन वसि जैती
सितर पञ्चास प्रकारोजी || आसू चैत्रक मास धवल पख सातम
श्री नव दिइसेंजी । तेरसहस नव पदनो गुणनो नव आंबिल नव
'विहौजी ॥ ३ ॥ विमलयद चक्केसरीदेवी रिघ सिध वंचित दाता
जी। ली नव विधि युक्त सेवे ते पामे सुखशाताजी । खरतर
मच जिन आज्ञाकारी पाटोधरपद नुक्ताजी. जिन सौन्नाग्यमूरिंद
पसाये ईससूरिद गुण वक्ताजी ॥ ४ ॥ इतिश्रीनवपदस्तुति ॥
॥ अथ शत्रुजय स्तुति ॥
॥विमलांचल ममन जिनवर आदिजिणंद । निरमम निरमोही
फेवज्ञान दिणंद ॥ जे पूर्व निवाणू वार धरी आनंद । सेजगि-
r (११) रिसिखरे समवसरया सुखकंद ॥ १ ॥ण चनबीसीमां झपन्नादिक, जिनराय । वलि काल अतीते अनंत चोवीसी थाय ॥ ते सविण गिरवर श्रावी फरसी जाय । श्म नावी काले प्रावस्ये सवि मुनि- राय ॥ २ ॥ श्रीज्ञपन्नना गणधर घूमरीक गुणवंत । क्षादस अंग रचना कीधी जेण महंत ॥ सव आगममाहे सेज महिम महंत नाखी जिन गणधर सेवो करि थिर चित्त ॥ ३ ॥ चक्केसरि गोमुह कंवम पमुह सुरसार । जसु सेवा कारण थापे २६ नदार ॥ देवचंद- गणि नावे नविजनने आधार । सब तीरथमहि सिहाचल सिरदार ॥ ॥ इतिसेजेजयस्तुति ॥ ॥ अथ श्रीशांतिनाथ स्तुति ॥ ॥ शांति जिनेसर जग अलवेसर आचरा नदर अवतरियाजी । विश्वसेन नृप नंदन जगगुरु हथणापुर सुखं करियाजी ॥ ईत नपश्व मारि विकारी शांति करी संचरियाजी । जे नवि मंगल कारण ध्यावे ते हुय गुणगण दरियाजी ॥ १ ॥ वर्तमान जिन सब सुखकारण अतीत अनागत वंदोजी । वारे चक्री नव नारायण नव प्रतिचक्री आनंदोजी ॥ रामादिक जे पुरप सलाका वंदत पाप निकं. दोजी । व्य निके जिनतम जाणो काटे नवनय वेदोजी ॥२ 'अंग नपांगे जिनवर प्रतिमा श्रीजिन सरखी नारखीजी। व्य 'नाव बिहुँ नेदे पूजा महानिसीधे साखीजी ॥ विश्य निवृत्ती सत् आरंने विनय तपी ते जाणोजी । शुन्नयोगे नदि आरंनकारी लग वर अंग प्रमाणोजी ॥ ३ ॥ पापना सत्ये देवी निर्वाणी श्रीसंघने 'सुखकारीजी। कारणयी सब कारज सीके जिनवर श्राझा धारीजी ॥ श्रीजिनकीर्ति सूरीश्वर गचपति पाठक श्रीशक्षिसारीजी । सम- कितधारी देव सदाई सुखसंपत्त दातारीजी..॥ इतिश्रीशांति- 'नायजनस्तुतिः ॥
.. ॥ अथ श्रीसीमंधरजिन दूज स्तुति ॥ || मन सुइ चंदो नावे नवियण श्रीसीमंधर रायाजी। पांचसे धनुप प्रमाण विराजित कंचनवरणी कायाजी ॥ श्रेयांस नरपति सत्यकि नंदन वपन्नलंन सुखदायाजी। विजय नली पुखलावर विचरे सेवे सुरनर पायाजी ॥ १ ॥ काल अतीत जे जिनवर हा दोस्ये वलिय अनंताजी। संप्रति काले पंच विदेदे वरते वीस वि- ख्याताजी॥ अतिशयवंत अनंत जिनेसर जगबंधव नगत्राताजी। ध्यायक ध्येय स्वरूप ने ध्यावे पाये शिवसुख साताजी ॥२॥ अरथे श्रीअरिहंत प्रकाशी सूत्रे गणधर आणोजी। मोद मिथ्यात तिमिरजर नासन अन्लिनव सूर समाणीजी ॥ नवोदधि तरणी मोक्ष निसरणी नय निक्षेप पहाणीजी । ए जिनवाणी अमिय समाणी प्राराघो नविप्राणीजी ॥ ३ ॥ शासणदेवी सुरनर. सेवी श्रीपंचागुली माईजी। विघन विमारण संपत्तिकारण सेवकजन सुखदाईजी ॥ विन्नुवनमोहनी अंतरजामनी जग जस ज्योति स: वाजी । सानिधकारी संघने होयज्यो श्रीजिनदर्प सहाईजी ॥ ४ ॥ इतिश्रीसीमंधरजिनदूजस्तुति ॥ ॥ अथ श्रीज्ञानपंचमी स्तुति || ॥ पंच अनंत महंत गुणाकर पंचम गति दातार । नत्तम पंचम तपविधि वायक ज्ञायक नाव अपार ॥ श्रीपंचानन लाग्न सांग्ति वंगित दान सुदक्ष । श्रीवईमान जिनंदसु बंदो ध्यावो नचिजन पद ॥ १ ॥ पृरण पंच महाश्रच रोधक बोधक जव्य उदार । पंच अनुव्रत पंच महाव्रत विधि विस्तारक सार । जे पंचेंश्यि दम सिव पटुता ते सगला जिनराय । पांचम तप धर नवियण नपर सुधिर करी सुपसाय ॥ २ ॥ पंचाचार धुरंधर जुगवर पंचम जाण । पंच ज्ञान विचार विराजित लाजत मद पंच वाण पंचम काल तिमरत्नरमांहे दीपंकतम सोनंतः। पांचम तपफल ल प्रकासक ध्यावो जिनसित ।। ३ ॥ पंच परम पुरुषोत्तम से. कारक जे नरनार । निरमल पांचम तपना धारक तेह नणी विचार ॥ श्रीसिहायिकादेवी अदनिशि श्रापो सुरक अमंद । श्री जनलान मुरिंद पसाये कहे जिनचंद मुणिंड ॥ ॥ इतिज्ञान- चमीस्तुति ॥ ॥ अथ श्रीमौन एकादशी स्तुति ॥ ॥अरनाथ जिनेश्वर दीक्षा नमिजिन झान । श्रीमल्लि जनम त केवलज्ञान प्रधान || ग्यारस मिगसर सुदि उत्तम अवधार । पंच कल्याणक समरीजे जयकार ॥ १ ॥ ग्यारे अनुपम एक -धिक गुण धार । ग्यारे बारे प्रतिमा देसक घार ॥ ग्यारे उगुणा य अधिक जिनराय । मन सूधे सेव्यां सब संकट मिट जाय ।। ॥ जिहां वरस ग्यारे कीजे व्रत उपवास । यति गुणनो गुलिये घिसेती सुविलास ॥ जिन भागमवाणी जाणी जगत प्रधान । कचित्त आराधो साधो सि. विधान || ३ ॥ सुर असुर नुवश स सम्यग् दरप्तणवंत । जिनचं सुसेवक बेयावच्च करत ॥ श्रीसंघ कलमें आराधक बहु जाण । जिनशासन देवी देव करो कल्याण ४॥ इतिश्रीमौनएकादसीस्तुति ॥ ॥ अथ रोहणी स्तुति ॥ ॥ जयकारी जिनवर वासुपूज्य अरिहंत । रोहिण तपनो फल परन्यो श्रीनगवंत ॥ नरनारी-नावे अाराधोतप एद।सुख संपत ली. लक्ष्मी पामे ते ॥१॥ रुपनादिक जिनवर रोइलो तप सुविचार। नमुख परकासे घेठी परखदा बार || रोहिण दिन कीजे रोहिरानो नवास । मन वंग्ति लीला सुंदर नोगविलास ॥शा श्रागममें एदनो ज्यो सान्न अनंत । विधसुं परमारथ साधे सुधो संत । उखदो ---
हग तेहनो नासि जाय सव दूर । वलि दिन अंगे वाधे अधिको
नूर ॥ ३ ॥ महिमा जग मोटो रोहिण तप फल जाण । सौभाग्य
सदा जे पामे चतुर सुजाण ॥ नित घरश् महोचव नित नवता
सिणगार । जिनशासनदेवी लब्धिरुची जयकार ||४॥ इति ॥
॥ अथ पख्खी चौदश स्तुति ।।
॥ प्रथम तीर्थंकर आदि जिनेश्वर जाकी कीजे सेव, गच
चोरासी जेहने थाप्या नाकी करणी एह ॥ तेहने पारखी चोदस
कीजे बीजे अंग कहाय, पाखी सूत्र प्रथम तुम देखो जिमश संशय
जाय ॥ १ ॥ चवीसे जिनपूजा कीजे मानो जिनकी प्राण, क
पसूत्रनी पाखी चोदस लोवो चतुर सुजाण [[ इण पर उगमए
तुम देखो चनदस परकी होय, नूला का नमो तुम प्राणी साचों
जिनधर्म जोय ॥ २ ॥ चवदसरे दिन पाखी कीजे सूत्रांकेरी साख,
नविक जीव श्म मन पाराधो टीका चूरणी नाख ॥ श्रावस्यक
सूत्र ऋण पर बोले चनदसरे दिन पारखी, चनद पुरवधर इसपर
योले ते निश्चल मन राखी ॥ ३ ॥ श्रुतदेवी इक मन धारापो
मन वंचित फल होय, जे जे श्राझा सूधी पाले ज्यानो विधन ह
रेय ॥ सेवक इणपर करे वीनती सूधो समफित पाय, खरतरगम
मंगण कुमति विहंमण माणिक्य सूरि गुरुराय ॥ ४॥ इति परको
चोदस थुर संपूर्ण ॥
॥ अथ सप्त स्मरणानि प्रारभ्यते ।
॥ तत्र प्रश्रमं ॥
॥ श्री बृहदजितशांतिस्मरणं लिख्यते ।।
॥ प्रजिअं जियसवनय, संति प पसंतसयगयपावं ॥ जय
संति गुणकरे, दोषि जिरायरे पणिययामि ॥ १ ॥ गादा ।।
ववगय मंगुल नावे, तेहं विनय तवनिम्मल सहावे॥निरुवम महप्प नावे, पोसामि सुदि समावे ॥ २॥ गाहा ।। सब उस्कप्पसंतीणं, सब पावप्पसंतिणं॥सया यजिय संतोणं,नमो अजिअ संतिणं ॥ ३|| सिलोगो । अजिय जिण सुहप्पवत्तणं, तव पुरिसुत्तम नामकित्तणं ॥ तह य धिर मर पवत्तणं, तवय जिणुनम संतिकित्तणं ॥ ४ ॥ मागहिया ॥ किरिाविदि संचित्र कम्म किलेसविमुकयरं, अ जिअं निचियं च गुणेहिं महामुगि सिगियं । अजियस्स य संति मदा मुणिणोवि य संतिकर, सययं मम निचुर कारणयं च नमं सरायं ॥ ५ ॥ आलिंगणयं || पुरिसा जइ उस्कवारणं, जश्न विम गह सुरककारणं ॥ अजिअं संतिं च नाव, अनयकरे सरणं पर ऊहा ॥ ६ ॥ मागहिया ॥ अर र तिमिर विरहिस, मुवरय रमरणं, सुर असुर गरुख नुयगवई, पयय पणिवानं ॥ अजिअ म हमविश्र, सुनय नय निनणमन्नयकर, सरणमुवसरिअनुवि दिवि ज,महिश्र सयय मुवणमे ॥ ॥ संगययं ॥ तं च जिगुत्तम मुत्तम नित्तम सत्तधरं, अजव मत्तव खंतिविमुत्ति समाहि निहिं ॥ संति अरं पणमामि दमुनम तिव्यरं, संति मुणी मम संति समाहिवरं दिसन ॥ ॥ सोवाणयं ॥ सावठिपवपचिवं च वरहचि मय प सत्त विछिन्न संश्रिय शिर सरिच बछं मयगल लोलायमाण वर गंध हदि पठाण पछियं संथवारिदं दविहन वाहुं धंतकणग रुगनि रुपदय पिंजरं पवर लस्कणो वचित्र सोम्म चारु रूवं सुश् सुहम सान्निराम परम रमणिक वरदेव उंदि निनाय महुरयर सुहागिरं ॥ए || वेहन ॥ अजिअं जिआरिगणं, जिन सबन्नयं नवो हरिनं ।। पणमामि अहं पयन, पावं पसमेन मे जयवं ॥ १०॥ रासालुद न ॥ कुरु जणवय दधिणानर नरीसरो पढमंतन महाचकव हिलोए महप्पनावो जो बाहत्तर पुरवर सहस्सवर नगर निगम , .
(१२२)
जगवय वई पत्तीसारायवर सहस्साणु धायमग्गो घनदस वररयण
नव महानिदि चनसहि सदस्स पवर अषण सुंदर वर
चुलसी हय गय रह सय सदस्स सामी उपवरगाम कोमि
सामी आसिङो नारदंमि जयवं ॥ ११ ॥ चेहन || ते
संति संतियरं, संतिनं सघ नया । संर्ति शुणामि जिणं, संति दि
हेन मे || १२॥ रासादिप्रयं । इस्कागु विदेह नरीतर, नरव
सहा मुखिवसदा ॥ नव सारयससि सकलाणण, विगय तमा बिहु
अरया ।। अजिनुत्तम तेष गुणेहिं महामुणि, अमिय बलाधिकल
कुला ॥ पणमामि ते नवनय मूरण, जग सरणा मम सरणं ।।
१३॥ चिनलेदा ॥ देव दापाविंद चंद सूरवंद हरु तु जिउ परम,
ख रूव धंत रुप्प पट्ट से सुद निद धवल || दंतपंति संति स
ति कित्ति मुत्ति जुत्ति गुत्ति पवर, दित्त तेअवंदधेन सबलोअ नावि
अप्पन्नावणे अ पश्समे समाहिं ॥ १४ ॥ नाराय॥ विमल स
सिकलारेअसोम्म, वितिमिरसूर कलारेन तेनं ॥ तियतवश्गणा
रेध रूवं, धरणिधर पवरारे सारं ॥ १५ ॥ कुसुमलया ॥ सत्ते
घ सया अजिरं, सारीरे अबले अजिअं ॥ तव संजेमश्र अजिय,
एस अहं गुणामि जिणं अजिअं ॥१६॥ नूप्रगपरिरिंगिलं
। सोम्मगुणेहिं पावर न तं नवसरय ससी, ते गुणेदिं पावर
न तं नवसरय रवी ॥ रूवगुणेहिं पावन तं तिअस गणव
सारगुणेहिं पावर न तं धरणिधरव ॥ १७ ॥ खिजिअयं ॥
तिम्वर पवत्तयं तमरयरहि, धीरजणथुप्रच्चियं चुन कलिकलुसं
। संतिसुद्दष्पवलयं तिगरण पयन, संतिमहं महा मुणिं सरण भु
वणमे ॥ १७॥ ललिअयं । विनय सिरिर अंजलि, रिति
गण संयुधे थिमिश्र । विवुहाहिव धणव नरवर, अमहियचिग्रं
बहुसो । अश् रुग्गय सरय दिवायर, समहिल सप्पनं तवसा ॥
. गयांगण वियरण समुश्य, चारण वंदिग्रंसिरसा ॥१॥ किसलय माला || असुर गरुल परिवंदिग्रं, किन्नरोरग मंसि ॥ देव कोमि सयसंयुयं, समयसंघ परिवंदिअं॥२०॥सुमुहं ॥अन्नयं अहं अरयं अरुयं ।। अजिअं प्रजिअं पयन पणमे ॥२१॥ विकुविलासिकं ॥प्राग यावर विमाण, दिवकणग रह तुरय पहकर सएदि हुलिभं ॥ स संतमो अरण कुन्निध सुलिन चल कुंभलंगय तिरी सोईत मक लिमाला ॥ २२ ॥ वेहन ॥ जं सुरसंघा सासुर संघा, वेर विनत्ता नति सुजुत्ता, प्रायर नूसिअ संन्नमर्पिमित्र, सुषु सुविह्मिा सघब लोधा || उत्तम कंचण रयण परूविध नासुर नूसण नासुरिअंगा, गाय समोणय नत्तिवसागय पंजलिपेसियसोस पणामा ॥ १३ ॥ रयणमाला || वंदिळण थोकणतो जिणं, तिगुणमेवय पुगोपया हिणं ॥ पणमिझणय निणं सुरासुरा, पमुश्मा सनवणाश्तो गया ॥ ॥ वित्तयं ॥ तं महामुणिमहपि पंजलि, राग दोस नय मोह वजिरं ॥ देवदागव नरिंद बंदिरं, संति मुत्तम महातवं नमे ॥ २५॥ खिनयं ॥ अंबरंतरविवारणियादि, ललिअइंस बहुगामि लियाहिं ॥पील सोणिया सालगिआदि, सकल कमल दललो पणियाहिं ॥२६॥ दीवयं ॥पीण निरंतर थगनरविणमिय गायत पाहि, मणिकंचश पति ढिलभेडल सोदिन सोणितमादि । वरचिं खिणि नेनर सतिलय वलय विनूसणियादि, रश्कर चनर मणो हर सुंदर दंसणियाहिं ॥ ॥ चित्तस्करा ॥ देवसुंदरीदिं पाय वंदियादि वंदियाय जस्ल ते सुविधमाकमा अप्पयो निमालएदि मंगोमुराप्पगारएदि केदि केहिं वीप्रवंग तिलय पत्तलेह नामएदि चिल्लएहिं संगयं गयादि नत्ति सन्निधिक चंदणागयादि दुति ते वंदि श्रा पुणो पुणो ॥ २७ ॥ नारायन ॥ तमहं जियचंद, अजिरं जिअमोहं ॥ धुप्रसवकिलेसं पयन पणमामि ॥ २ ॥ नंदिप्रयं.11.
. (१२५) धुप्रबंदिप्रस्तारिसिगण देवगणेहिं, तो देव बहूहिँ पय पण मित्र स्सा ॥ जस्त जगुत्तमतासणयस्ता, न्नत्तिवसागपिमिश्रादि । देव वरचरसा बहुआदि, सुरवर रश्गुण पमित्राहि ॥ ३० ॥ नासुरयं ॥ वंस तद तंति ताल मेलिए तिमरकरान्निराम सद्द मी 'सएकए अ, सुश्समागणेय सुइ सऊ गीय पाय जालघंटियहि ।। 'वलय मेहला कलावनेनरान्निराम सह मीसए कए अ देवनट्टिआदि ॥ हाव नाव विनमप्पगारएहिं नचिकण अंग हारएहिं बंदियाय जस्तते सुविकमाकमा ॥ तयं तिलोय सब सन संतिकारयं पसंत सध पाव दोस मेसहं नमामि संतिमुत्तमं जिणं ॥३१॥ नारायन । वन चामर पनागजब जव मंमिश्रा, ऊयवर मगर तुरय सिरिवछ सुसंग्णा ॥ दीव समुद्द मंदर दिसागयसोदिया, सचिन बसह सी इसिरिवसुलंगणा ॥ ३२ ॥ ललिअयं ॥ सदावहा समप्पाना, प्रदोस उहागुणेहिं जिन ॥ पसायसि तवेण पुन, सिरीही न रिसीदी जुहा || ३३ ॥ वाणवासिया ॥ ते तवेण धुप्तवरायया, 'सघलोहिय मूल पावया ॥ संथुप्रा प्रजिअ संति पापया, इंतु मे सिव सुदाणदायया ॥ ३४ ॥ अपरांतिया || एवं तव वस वि ननं, युथं मए अनिय संति जिजुयलं ॥ वयगय कम्म रपमसं, गई गयं सासयां विमला ॥ ३५ ॥.गादा ॥ तं बहुगुणप्पसायं, मु सुदेण परमेण अनिसायं ॥ नासे मे विसायं, कुणामय परि साविध पसायं ॥ ३६॥ गादा ॥ तं मोएन अनंदि, पावनय नं दिसणमनिन । परिसाइघि मुहनंदि, मम य सिन सं जमे मंदि॥ ३७॥ गादा ।। पस्किय चानम्मासिय, संबछरिए ययस्स नशियमो ॥ सोश्रो संदि, नवलग्ग निवारणो एमो ॥ ३० ॥ जो पढ जोअनिमुपार, उत्तम कालंपिजिय संतिग्रयं ।। न इति तस्स रोगा, पुष्पन्ना विनासंति ॥ ३५ ॥ जर यह परम , (१२५) “पर्य, अदवा किर्ति सुविचमा नुवणे ॥ ता तेलुमुखरणे, जिराव यो प्रायरं कुणह ॥ ४० ॥ गाहा ।। इति श्रीवृहद जितशांतिस्त चनं प्रथमस्मरणम् ॥ १ ॥ ॥ अथ द्वितीय लघुअजितशांतिस्मरणम् ॥ ॥ ननासिक मनरक निग्गयपहा दमछलेणंगिणं, चंदारूण दिसंत श्च पय निवासमग्गावलिं ॥ कुंदिउँकाल दंतकंति मिसन नीदंत नाणंकुरु, केरे दोविऽ ऊ सोलस जिणे योसामि खेमंकरे 1| १ || चरम जलहिनीरं जोमिणिऊं जलोहिं, खय समय समीर जो जणिका गईए ॥ सहल नहय संवा संघए जो पएहिं, अजिथ म हवं संति सो समच्छो रोनं ॥ २ ॥ तहविहु बहुमाणु बासन्नत्ति प्ररेण, गुणकपामिव कित्ती हामि चिंतामणि छ ॥ अलमहव अचिंता तसामनसिं, फलहर लहु सवं वंग्धि णि छेअं मे ॥ ३ ॥ सय सजयहियाणं नाममित्तेत जाणं, विहमर सदु 5 निदोघट्टराई ॥ नमिरसुर किरीडू गिह पायारविंदे, समय मजिल संती ते जि शिंदे निवंदे ॥ ४ ॥ पसर वर कित्ती वढए देहदित्ती, विलसा नुषि मिती जायए सुप्पविती ॥ फुर परमतिनी होर संसारचित्ती, जिणजु पयत्नत्ती ही चिंनोस्सनी ॥ ५ ॥ स.लयपयपयार नू रिदिवंगदारं, फुगणरसन्नावो दारसिंगारसारं ॥ प्रणमिसरमणीने इंसणछे अन्नीया, इव पुणमणि बंधा कास नहोवचारं ॥६॥ युगद अजिअसंती ते कया सेस संती, कणयरयपसंगा उऊए जा 'णिमुत्ती ॥ सरनस परिरंना रंलनिवागलछी, घरायणघुसि लिक पंपिंगीकयव ॥ ७ ॥ वदुविहनयनंगं ववणिचं अणिचं, सदसद रालिलप्पा लप्पमेगं अगं ॥ इय कुनय विरुद्ध मुप्पसिई तु जेसिं, चयण मवय शिकं ते जिणे संन्नरामि ॥ 6 ॥ पसर तिय लोए ताव मोहंचयार, नमश्जय मसहा ताव:मनवार्म ॥ फुरक्षा फुप .
, - संता पंतगाणं सुपूरो, पयफ मजिप्रसंती काण सूरो न जाव || परि करि दरि तिएदु एहंबु चोरा दिवाही, समर ममर मारी रुइ खुद्दो वसग्गा ॥ पलय मजिअसंती कित्तणे कतिजंती, निविमतरत मोहा नरकरालुं खिन च ॥ १०॥ निचिअपुरेअदारु दित्तमाणग्गि जाला, परिगय मिव गोरं, चिंति का रूवं ॥ कणय निहसरेदा कतिचोर करिडा, चिरथिर मिद लळि गाढसंथनिअव ॥११॥ अमविनिवमित्राएं पचिवुत्तासियाणं, जलहि लहरि हीरे तास गुत्ति घ्यिाणं ॥ जलिय जलण जाला लिंगिाणं च काणं, जणय सहु संति संतिनाहा जिआणं ॥ १५ ॥ हरि करि परिकिस्सं पक्क पाश्कपुलं, सयलपुदवि रङ मिश्र आण सज्जं ॥ तण मिव पनि लग्गं जेजिणामुत्तिमग्गं, चरण मणुपवरमा इंतु ते मे पसमा ॥१३|| ग्णससिवयणाहिं फुल्लनित्तुप्पलाहिं, अणन्नरनमिरीहिं मुनिगिङोद रीहिं ॥ ललिअ नुअलयाहिं पीण सोणिचणीहि, सयसुर रमणीहिं वंदिया जेसि पाया ॥१॥ अरिस किमि नकुछ गठि कासाश्सार, खय जर वण खूया सारसोसोदराणि ॥ नहमुह दसपछी कुछिक. साइरोगे, मह जिगजुअ पाया सुप्पसाया हरंतु ॥ १५ ॥श्य गुरु उहतासे परिकए चानमासे, जिपवर दुगश्रुत्तं वगरे वा पवितं ॥ पढ सुण सिद्या एह काए चित्ते, कुणह मुणह विग्धं जेण धा एद सिग्धं ॥ १६ ॥श्य विजयाजियसनुपुत्न सिरिअजिअ जिणे सर, तह घराविससेण तण पंचम चक्कासर ॥ तिवंकर सोल. सम संति जिणवल्लद संयुअ, कुरु मंगल मम दर सुरिअमखिलं पि श्रुतह ॥ १० ॥ इति श्रीलघुअजितशांतिस्तवनं क्षितीय० ॥ ॥ अथ नमिऊणनामकं तृतीयं स्मरणम् ॥ । नमिकण पणय सुरगण, चूमामणि किरणरंजिश्र मुणि ॥ चलणजुअलं महान्नय, पणास संथर्व वुधं ॥ १ ॥ सक्रिय .
(१७) कर चरण नह मुह, निवुझ नासा विवन्न लावन्ना ॥ कुरु महारों गानल, फुलिंग निद्द सबंगा ॥ २ ॥ ते तुह चलणा राहण, स लिलंजलिसेय वुद्विय छाया ॥ वण दवदवा गिरिपा यव व पत्ता पुणो सहिं ॥३॥ उवाय खुप्रिय जलनिहि, ननम कल्लोल नी सणारावे ॥ संनंत जय विसंतुल, निद्यामय मुकवावारे ॥ ४ ॥ अविदलिय जाणवत्ता, खणेण पावंति इछिअं कूलं ॥ पास जिरा चलण जुअलं, निचंचित्र जे नमंतिनरा ॥ ५॥ खर पवणुअं वणदव, जालावलि मिलिय सयल उम गहणे ॥ मनंत मुइमिय वहु, नीसरणरव नौसमि वणे ॥ ६ || जगगुरुणो कमजुअलं, निधाविध सयल तिहुअणानो ॥ जे संनरति मणुआ, न कुरा जलको नयं तेसि ॥ ॥ विससंत लोग नीसण, फुरिआरुण न यण तरस जीदालं ॥ नग्गनुअंगं नवजल य, सवहं नोसणायारं ॥ ७॥ मन्नत कीम सरिसं, दूर परिचुछ विसम विस वेगा ॥ तुह नामरकर फुमति छ, मंत गुरुआ नरा लोए | ए ॥ अमवीसु नि ख तकर, पुलिंद सद्दल सइनीमासु ॥ जयविहुर बुन्नकायर, नछु रिश्र पहिल सबासु ॥ १०॥ अविनुत्तविह वसारा, तुद नाद प णाम मत्तवावारा || ववगय विग्घा सिग्धं, पत्ता दिय इडियं गणं ।। ११ ॥ पङलिआनलनयणं, दूरवियारियमुहं महाकायं ॥ नद कुलिसघायविअलिअ, गइंदकुंनग्लानोरं ॥ १२ ॥ पणय ससंन्न म पचिव, नहमणिमाणिक पमित्र पमिमस्स ॥ तुह वयण पहरण धरा, सीहं कुइपि न गणंति ॥ १३ ॥ ससिधवल दंतमुसलं, दीद करुल्लाल वहिनलाई ।। महुपिंग नयाजुअलं, ससलिल नवजल हरारावं ॥ १४॥नीमं महागवं, अचासन्नपि ते नवि गिरांति ॥ जे तुम्ह चलण जुअलं, मुणियर तुंगं समलीया ॥ १५ ॥स मरम्मितिक खग्गा, जिग्घाय पविद्ध नाय कबंधे ।। कुंतविलिन्नि न करि फल, ६ मुक सकार पनरंमि ॥ १६ ॥ निशिय दप्पुदर स्नि, नरिंद निवदानमा जसं धयलं || पावंति पाच पतामपा, पासजिण तुद पत्नामेण || १७ || रोग जल जलप विसहर, चौरारि मईद गय रण नयाईपास जितनाम संकि, तणेण पसमंति समाई ॥१७॥ एवं मदा जयदरं, पास जिणिंदस्स संथ वमुयारं ॥ नविय लपाणंदयरं, कलाण परंपरनिदाणं ॥ १ ॥ राय जय जरक ररकम, कृसुमिण उस्सनण रिस्क पीमान ॥ सं मासु दोसु पंथे, नवसगे तदय रयणीसु ॥ २०॥ जो पढः जो थ निसुपार, ताणं कश्यो य माणतुंगस्स ॥ पासा पावं पसमिन, सयल नुवचित्र चलो ॥ २१ ॥ इति श्रीपार्थजिन स्तवनं तु तीयस्मरणं संपूर्णम् ॥ ३ ॥ ॥ अथ गणधर देवस्तुति चतुर्थ स्मरण प्रारंभः ॥ ॥ तं जयन जय तिचं, जमिन तिवादि वेण वीरेण ॥ सम्म पवनिन, घ सत्त संताणसुद जणयं ॥ १ ॥ नासिब सय सकिलेसा, निदय कुलेसा पसब सुहलेसा ॥ सिरिवद्धमाण तिय स्स मंगलं दितु ते अरिदा ॥२॥ निद्दद्वकम्म वीमा, वीपिर हियो गुणसमिझ ॥ सिद्धा तिजय पसिद्धा, दणंतु उचाणि तिज रस || ३ || आयार मायरंता, पंचपयारं सया पयासंता ॥ आय रिया तह तिचं, निदय कुतिचं पयासंतु ॥ ५ ॥ सम्मसुम वाय गावा, यगाय सिवाय वायगा वाए ॥ पवयग पहिणीय कए, वर्णितु सवस्त संघस्स ॥५॥ निधाणसाहुणिजिअ, साढूणं जणि सब साहला ॥ तिचप्पनायगाते, हवंतु परमिटियो जइयो । ६ ॥ जेणाणुगयं नाणं, निवाणफलं च चरणमविहवः ॥ तिवस्त दस तं, मंगलमुवणेन सिध्यिरं ॥ ७॥ मिचनमो सुमधम्मो, समग अगि वग्ग कय सम्मो । गुणमुन्धित संघस्स, मंगलं सम्ममि , . ६ दिसम | ॥रम्मो चरित्त धम्मो, संपाविश्र नवसन सिक्स म्मो॥नीसेस किलेसहरो, दवन सया सयस संघस्त ॥ ए ॥ गुणगण गुरुणो गुरुणो, शिवसुह मश्यो कुणंतु तिवस्त ॥ सिरिवद्धमाण पदुपय, मिअस्स कुलवं समग्गस्त ॥ १० ॥ जियपमिवरकाजरका, गोमुह मायंग गयमुद्द पमुस्का ॥सिरि. बंन संति सहिया, कय मयरस्का तिवं दितु ॥ ११ ॥ अंबा पमिहयर्मिया, सिदा सिहाया पवयणस्त ॥ चकेसरि वश्रुट्टा; संति सुरा दिसन सुस्काणि ॥ १२ ॥ सोलस विजा देवी, नर्दितु संघस्स मंगलं बिनलं ।। अनुत्ता सहियान, विस्सुअ सुयदेवयान समं ॥ १३ ॥ जिण सासण कय रस्का, जरका चनवीस सासण सुरावि ॥ सुहन्नावा संतावं, तिवस्त सया पणासंतु ॥ १४ ॥ जि रापवयमि निरया, विरहा कुपदान सब दासवे । वेयावञ्च गरा वित्र, तिस्स हवंतु संतिकरा ॥ १६ ॥ जिसमय सुब्समग, विहिब नवारा जमिश्र सादको ।। गीयरई गीयजसो, सपरिवारो सुहं दिसन ॥ १६ ॥ गिहगुत्त खित्त जलयल, वण पचय वासि देव देवी ॥ जिण सासण आिणं, उहाणि सवाणि निहणंतु ॥ १७ ॥ दसदिसिघालासरिक, नवालया नवग्गहा सनरकता ।। जोशशि राहुग्गहका, लपास कुलिश्रम पहरेहिं ॥ १७ ॥ सहका ल कंटएदि, सविडिवचेहि कालवेलाहिं ।। सवे सचच सुई, दिसंतु सघरस संघस्त ॥ १५ ॥ नवणव वाणमंतर, जोक्स वमोशिया य जे देवा ॥ घरमिंद सक सहिया, दलंतु पुरिआई तिस्स ॥५० ॥ चळं जस्स जलंत, गच पुरनपणासिन तमोहं ॥ तंतिवस्सल गवड, नमो नमो वक्ष्माणस्त ॥ २१ ॥ सो जयन जियो चीरो, जस्त चिसासणं जए जय ॥ सिद्धिपहतासणं कुप, ह नासणं सब जय महरां ॥ २२ ॥ सिरि सन्नसेण पमुहा, इयत्नय.नि . . बदा विसंतु तिचस्स ॥ सध जिणाणं गणिहा, रिणो पाइं चंत्रिमं सई ॥ २३॥ सिरि वक्ष्मा तिा, दिवेग तिचं.समप्पियं जस्स ॥ सम्म सुहम्म सामी, दिसन सुई सयल संघस्त ॥ २४॥ पय एनहिया जे, नहाण दिसंतु सयल संघस्त || इयरसुरा बिहु स मं, जिपागणहर कहिय कारिस्त || २५ ॥श्य जो पढा तिसंऊं, इस्सचं तस्स नजि किंपि जए ॥ जिणदत्ताणाएग्नि, सुनिधिमा मुदी होई ॥ २६ ॥ इति श्री गपाधरदेवस्तुतिनामकं चतुर्थ स्मरणं ॥ अथ गुरुपारतंत्र्यनामक पंचमं स्मरणम् ॥ ॥ मयरहिणं गुणगण रयण, सायरं सायरं पणमिळणं ॥ सुगुरुजण पारतंतं. नवदिय घुणामि तं चेव ॥ १ ॥ निम्महिय मोह जोदा, निहय विरोदा पण संदेवा || पणयंगि वग्ग दावित्र, सुह संदोहा सुगुरा गेहा ॥ २ ॥ पत्तसु जश्न सोहा, समन पर ति जणिय संखोहा ॥ पमिन्नग्ग मोह जोहा, दंसिथ सुमहल सोहा ॥ ३ ॥ परिदरिश्र सम्वाहा, हय उद दाहा सिवंष तरु साहा ॥ संपाविध सुहलाहा, खीरोदविणुध अग्गादा || || सु गुगजरा जणि पुका, सो निरुवा गहिअपघका ॥ सियसुद साहरा सका, नयगिरि गुरु चूरणे वडा ॥५|| अङसुहम्म प्पमुदा, गुणगण निवदा सुरिंद विदिय महा ॥ ताण तिसं नाम, नामं न पणास जिणाणं ॥६॥ पमिवशिय जिण देवो, देवायरिचरंत नवहारी । सिरि नेमचंद सूरि, नकोयण सूरिणो सुगुरु ॥ ७॥ सिरि वहमाण सूरी,पयमीकय सूरि मंत मादप्पो । पमिहय कसाय पसरो, सरय ससंकुब सुहजपा ॥ ॥ सुहसील चोर चप्पर, पञ्चलो निचलो जिणमयंमि || जुगपवर सिदसिंह, तकारा पाय सुगुणजन ॥ एपुरन उन्लद महिव, लदस्त थपदिल वामए 4॥ मुमाथि आरिकारां, सीदेशव दद्यलिगि गया ॥१०॥६ पय . -- (१३१) समंछेरय निसिवि, प्फुरंतु सध्द सूरिमय तिमिरं ।। सूरेणव सूरि जिणे, सरेण इयमदिय दोसेण ॥ ११ ॥ सुकश्त पत्त किती, मित्र गुत्ती पसंत सुदमुत्ती ॥ पदय परवाइ दिनो, जिणचंद जई सरो मंती ॥ १२ ॥ पयमिय नवंग सुत्तन, रयणुझोसो पणासिय पनसो । जवानी मविश्र जमण, कयसंतो सो धिगय दोसो॥ ॥ ११॥ जुग पचरागम सार, पावणा करणवंधु रोधणि ॥ सिरि अंजयदेव सूरि, मुणिपवरो परम पसमधरो ॥ १५ ॥ फय सावय संतासो, हरि घ सारंग नग्ग संदेदो ॥ गय समय दप्प व सो, थासाथ पवर कघरसो ॥ १५॥नीमन्नव कायमित्र, सिथगुरुययण रयण संदेदो ॥ नीतेस सत्त गुरुन, सूरी जिराव क्षदो जय ॥ १६ ॥ नवरहिन सहरणो, चउरणुनग पहाण सच्चरणो ॥ असममयराय महणो, नमुदो सह जस्स करो। ॥ १७ ॥ दंसिभ निम्मल निचल, दंतगणो गणिध सावतच नव || गुरुगिरि गरुन सरदिध, सूरि जिणवलदो होचा ॥ १७॥ जुग पवरागम पीक, सपालि पीपय मणाकया नवा ॥ जेजिरावलं देणं, गुरुया तं सबहा वंदे ॥ १५ ॥ विप्फुरिश्र पवर पदयण, सि रोमणी बूढ उपद खमोया ॥ जो सेसाणं सेसु, म सहर सत्ताणता करो ॥ २०॥ सच्चरित्राण महोणं, सुगुरूणं पारतंत मुबह ॥ जय जिया जिणदत्त सूरी, सिरि निल पराप मुखितिल ॥ २१॥ इति श्रीगुरुपारतंयनामक पंचमस्मरणम् ॥ ५ ॥ ॥ अथ श्रीपष्टमस्मरणम् ।। ॥सिग्यमयदरन विम्य, जिवीराणाणु गामि संघस्स ॥ सिरि पास जियो थंजण, पुरन्ति निहियोनिको ॥ ॥ गोयम सु दम्म पमुदा, गणवश्णो विदिश्रना सनसुहा । मि. जिपाति, सुरयंते कुशंतु सया। ।
. वेयावञ्च कारिणो संति ||अवहरिण विग्ध संघा, दवंतु ते संघ संति करा ॥ ३॥ सिरि भन्नणय अपा, सप्तामि पचपनम पराध पा जीणं ॥ निदलिय ऽरिय विदो, धरणिंदो हरन पुरिआई ॥४॥ गोमुहपमुरक जरका, पमिहय एमियरक पस्क लरका ते ॥ कयसुगु ए संघ ररका, हवंतु संपत्त सिवसुरका ॥ ५ ॥ अप्पमिचका पमुहा, जिण सासण देवयान जिल पणिश्रा॥ सिद्धाश्या समेया, हवंतु संघस्त विग्घहरा ॥ ६ ॥ सकाए सासञ्चनर, पुरनि वक्षमा जिप नतो ॥ सिरि बन्न संति जरको, रस्कन संघ पयत्तेण ॥ ७ ॥ वित्तगिद गुत्त संता, ए देस देवादि देवया ताज ॥ निघुर पुर प हियाणं, नवाग कुणंतु सुरकाणि ॥ ॥ चक्केसरि चक्कधरा, विहि पहरि नछिल कंधरा धणि ॥ सिवसरण लग्ग संघस्त, सबहा ह र विग्याणि || ए ॥ तिवा बद्धमाणो, जसरो संग सुसंघेण । जिणचंदो नयदेवो, ररकन जिणवलदो पदुमं ॥ १० ॥ सो जयन वक्ष्माणो, जिणेसरो देस रुव इयतिमिरो। जिएवंदा नय देवा, पहुणो जिणवल्लदा जेय ॥ ११ ॥ गुरु जिणवलद पाए, जयदेव पहुत्त दायगे वंदे । जिणचंद जिणेसरव, इमाण तिवस्त चुछिकए ॥१॥ जिणदत्ताणं सम्मं, मन्नंति कुणंति ओय कारंति ॥ मणसा वयसा वळसा, जयंतु साहम्मिया तेधि ॥ १३ जिरादत्त गणे नाणाणो, सया जे धरंति धारिंति ॥ दंसिसिय वायपए, नमामि साहम्मिा तेविः॥ १५ ॥ इति पठं स्मरणम् ॥६॥ ॥ अथ उवसग्गहर नामकं सप्तम स्मरणम् ॥ ॥ वसग्गदरं पास, पासं वंदामि कम्मघण मुकं ॥ विसह रविसनिसासं, मंगलकलाण थावासं ॥१॥ इत्यादि ।नवेनवे पासजियचंद पर्यंत संपूर्ण कहना ॥ ५ ॥ इति श्रीपार्यजिन स्त बनं सप्तम स्मरणम् ॥ ॥ इति सप्तस्मरणं समाप्तम् ।। .
, . ॥ अथ भक्तामरस्तोत्रं प्रारभ्यते ॥ ॥ नकामरप्रणतमोलिमणिप्रनाणा, मुद्योतकं दखितपापत मोवितानम् ।। सम्यक् प्रणम्य जिनपादयुगं युगादा, वालंबनं नवजले पतता जनानाम् ॥ १ ॥ यः संस्तुतः सकलवाङ्मयतत्तवोधा, 5 नबुझिपटुनिः सुरलोकनाथैः । स्तोत्रऊंगचितयचित्तरैरुदारैः स्तो प्ये किलादमपि तं प्रथमं जिनेन्शम् ॥ २ ॥ युग्मं ॥ बुद्धया विना पि विबुधार्चितपादपीठ, स्तोतुं समुद्यतमतिविगतत्रपोऽहम् ।। बा सं विदाय जलसंस्थितर्मिबिंब, मन्यः क श्चति जनः सहसा ग्रहीतुम् ॥ ३ ॥ वक्तुं गुणान् गुरासमु शशांककांतान्, कस्ते क मः'सुरगुरुप्रतिमोऽपि बुद्धया || कल्पांतकासपवनो इतनकचक्र, को वा तरीतुमलमंचुनिधि नुजाभ्याम् ॥ ४ ॥ सोऽहं तथापि तवं न क्तिवशान्मुनीश, कर्तुं स्तवं विगतशक्तिरपि प्रवृत्तः ॥ प्रोत्यात्मवी' र्यमविचार्य मृगोमृगेई, नान्येति किं निजशिशोः परिपालनार्थम् ॥ ५ ॥ अल्पश्रुतं श्रुतवतां परिदासधाम, वनक्तिरेव मुखरीकुरुते बलान्माम् || यत्कोकिलः किल मधौ मधुरं विरोति, तच्चारुचाम्रा लिकानिकरैकहेतुः ॥ ६ ॥ त्वत्संस्तवन नवसंततिसंनिबद्ध, पापं क्षणात्यमुपैति शरीरनाजाम् ॥ प्राकांतलोकमलिनी समशेपमाशु, सूर्याशुनिन्नमिव शार्वरमंधकारम् ॥ ७॥ मत्वेति नाय तव संस्तवनं मयेद, मारभ्यते तनुधियापि तव प्रनावात् ।। चेतो हरिष्यति सतां नलिनीदलेपु, मुक्ताफलद्युतिमुपैति ननूदर्षि ॥ श्रास्तां तवस्तवनमस्तसमस्तदोपं, त्वत्संकथापि जगतां उरितानि इंति ॥ दूरे सहस्त्रकिरणः कुरुते प्रनेव, पनाकोपुजल जानि विकाशनांजि ॥ ए ॥"नात्यनुतं नुवन नूपयनून नाच, नूनर्गुणैर्नुवि नवंतमन्निष्टुवंतः ॥ तुझ्या नवंति नवतो ननु तेन किं वा नूत्याश्रितं यह नात्मसमं करोति ॥ ॥ G . - . वेयावञ्च कारिणो संति [अवइरिथ विग्ध संघा, दवंतु ते संघ संति फरा ॥३॥ सिरि धनराय श्रिपा, ससामि पयपनम पराय पा पीएं । निद्दलिय रियविदो, धरणिंदो दरन रियाई ॥३॥ मोमुहपमुक जस्का, पमिदय पमिवरक पस्क लरका ते ।। कयसुगु पा संघ ररका, दवंतु संपत्त सिवसुरका ॥ ५ || अप्पमिचका पमुहा, जिण सासण देवयान जिल पलिया ॥ सिदाश्या समेया, हवंतु संघस्स विग्घदरा ॥ ६ ॥ सझाए सासच्चनर, पुरनि वक्ष्माण जिण नचो । सिरिन संति जरको, रस्कन संघ पयत्तेस ॥ ७ ॥ खित्तगिह गुत्त संता, ण देस देवादि देवया तान ॥ निघु पुर प हियाणं, नवाण कुणंतु सुस्काणि ॥ ७ ॥ चक्केसरि चक्कधरा, विहि पहरि हिम कंधरा धणिणं । सिवसरण लग्ग संघस्स, सबहा द रन विग्घाणि || ए ॥ तिववा वद्धमाणो, जसरो संग सुसंघेण. ॥ जिणचंदो जयदेवो, रस्कन जिणवलदो पहुमं ॥ १०॥ सो जयन वक्ष्माणो, जिरोसरो ऐस रुव दयतिमिरो ॥ जिएवंदा नय देवा, पहुणो जिणवलदा जेय ॥ ११ ॥ गुरु जिणवल्लद पाए,' नयदेय पदुत्त दायगे वंदे । जिणचंद जिणेसरव, इमाण तिवस्त बुद्धिकए ॥१॥ जिणदत्ताणं सम्मं, मन्नंति कुणंति जेय कारंति ॥ मणसा वयसा वनसा, जयंतु साहम्मिमा तेवि ॥ १३ जिदत्त गणे नाणाणो, सया जे धरंति धारिंति ॥ दंसिअसिय वायपए; नमामि साहम्मिा तेविः॥ १४ ॥ इति पठं स्मरणम् ॥ ६ ॥ ॥ अथ उवसग्गहर नामकं सप्तम स्मरणम् ।। ॥ वसग्गहरं पासं, पासं वदामि कम्मघण मुकं ॥ विसद रविसनिमासं, मंगलकल्लारा आवासं ॥१॥ इत्यादि निवेनवे पासजिणचंद पर्यंत संपूर्ण कहना ॥ ५ ॥ इति श्रीपार्थ जिन स्त चनं सप्तम स्मरणम् ॥ ॥ इति सप्तस्मरणं समाप्तम् ॥; . . ।
- (१३३) ॥ अथ भक्तामरस्तोत्रं प्रारभ्यते ।। ॥जक्तामरप्रणतमौलिमणिप्रन्नाणा, मुद्योतकं दलितपापत मोवितानम् ॥ सम्यक् प्रणम्य जिनपादयुगं युगादा, वालंबनं नवजले पतता जनानाम् ॥ १ ॥ यः संस्तुतः सकलवाङ्मयतत्तवोधा, 5 नबुदिपटुनिः सुरलोकनायैः ।। स्तोत्रैर्जगत्रितयचित्तरैरुदारैः, स्तो प्ये किलाहमपि तं प्रश्रमं जिनेन्शम् ।। २ ॥ युग्मं ॥ बुद्धया विना पि विबुधार्चितपादपीठ, स्तोतुं समुद्यतमतिविगतत्रपोऽहम् ॥ वा सं विहाय जलसंस्थितमिऽविंध, मन्यः क श्चति जनः सहसा महीनुम् ॥ ३॥ वक्तुं गुणान् गुणतमु शशांककांतान, कस्ते क मः सुरगुरुप्रतिमोऽपि बुद्धघा || कल्पांतकालपवनोइतनकचक्र, को वा तरोतुमलमंधुनिधि नुजाभ्याम् || ४ ॥ सोऽहं तथापि तवं न क्तिवशान्मुनीश, कर्तुं स्तवं विगतशक्तिरपि प्रवृत्तः ॥ प्रीत्यात्मवी' र्यमविचार्य मृगोमृगेंई, नान्येति किं निजशिशोः परिपालनार्थम् ॥ ५ ॥ अल्पश्रुतं श्रुतवता परिदासधाम, त्वभक्तिरेव मुखरीकुरुते वतान्माम् || यत्कोकिलः किल मधौ मधुरं विरौति, तच्चारुघाम्रा लिकानिकरैकहेतुः ॥ ६॥ त्वत्संस्तवन नवसंततिसंनिबद्ध, पापं क्षणात्यमुपैति शरीरनाजाम् ॥ माकांतलोकमलिनी समशेषमाशु, सूर्याशुनिन्नमिव शार्वरमंधकारम् ॥ ॥ मवेति नाथ तय संस्तवनं मयेद, मारच्यते तनुधियापि तव प्रनावात् ।। चेतो दरिष्यति सतां नलिनीदलेपु, मुक्ताफलद्युतिमुपैति ननूदर्षि ॥ श्रास्तां तवस्तवनमस्तसमस्तदोपं, त्वत्संकयापि जगतां उरितानि इंति ॥ दूरे सहस्त्रकिरणः कुरुते प्रनेव, पद्माकरेपु जसज्ञानि विकाशनांजि ॥ए ॥ नात्यनुतं नुवन नूपरानून नाय, नूनर्गुणैर्नुवि नवंतमन्निष्टुवंत: ॥ तुझ्या नवंति जवतो ननु तेन किं या, नूत्याश्रितं यद नामसमं करोति ॥ ॥ G , (१३४ ) ॥ १०॥ दृष्ट्वा नवंतमनिमेपविलोकनीयं, नान्यत्र तोपमुपयाति जनस्य चकुः ॥ पीया पयः शशिकरद्युति उग्धसिंधोः; कारं नलं नलनिधेशितुं क श्छेत् ॥ ११ ॥ यः शांतरागरुचिनिः परमाणु निस्त्वं, निर्मापितस्विन्नुवनैकललामभूत ॥ तावंत एव खलु तेप्य एवः पृथिव्यां, यत्ते समानमपरं नहि रूपमस्ति ॥ १२॥ वक्र क ते सुरनरोरगनेत्रहारि, निःशेपनिर्मितजगचितयोपमानम् || बिंब कलंकमलिनं व निशाकरस्य, यज्ञासरे जवति पांडुपलाशकरूपम ॥१३॥ संपूर्णमंझलशशांककलाकलाप, शुञा गुणात्रिन्नुवनं तव संघयंति ॥ ये संश्रितास्विजगदीश्वरनायमेकं, कस्तानिवारयति संचरतो यथेष्टम् ॥१४॥ चित्रं किमत्र यदि ते त्रिदशांगनानि, नीतं मनागपि मनो न विकारमार्गम् ॥ कल्पांतकालमरुता चलि ताचलेन, किं मंदराइिशिखरं चलितं कदाचित् ॥ १५ ॥ निघूमव तिरपाततैलपूरः, कृत्स्नं जगन्नयमिदं प्रकटीकरोपि ॥ गम्यो न जातु मरुतां चलिताचलाना, दीपोऽपरस्त्वमसि नाथ जगत्प्रकाशः ॥ १६ ॥ नास्तं कदाचिऽपयासि न राहुगम्यः, स्पष्टीकरोषि सहसा युगपऊगति ॥ नानोधरोदरनिरुद्धमहापनावः, सूर्यातिशायिमहि मासि मुनीं! लोके ॥ १७ ॥ नित्योदयं दलितमोहमहांधकार, गम्यं न राहुवदनस्य न वारिदानाम् ॥ विभ्राजते तव मुखानमन आपकांति, विद्योतयङगदपूर्वशशांकविवम् ॥ १७ ॥ किं शरीषु शशिनाहि विवस्वता वा, युष्मन्मुखेऽदक्षितेपु तमस्सु नाथ ॥ नि प्पन्नशालिवनशालिनि जीवलोके, कार्य कियजलधरेवन्नारनप्रैः ॥ १९ ॥ ज्ञानं यथा त्वयि विनाति कतावकाशं, नैवं तथा दरिद रादिषु नायकेषु ॥ तेजःस्फुरन्मणिपु याति यथा महत्व, नैवं तु किरणाकलेऽपि ॥ २०॥ मन्ये वरं हरिहरादय एव येपु हृदयं त्वपि तोपमेति ॥ किं वीक्षितेन जवतान (१३५) वियेन नान्यः, कश्चिन्मनो दरति नाथ नवांतरेपि ॥ १ ॥ स्त्री णां शतानि शतशो जनयंति पुत्रान्, नान्या सुतं स्वपमं जननी प्रसूता ॥ सर्वा दिशो दधति नानि सहसरहिंम, प्राच्येव दिग्जन यति स्फुरदंशुजालम् ॥ २२ ॥ त्वामामनंति मुनयः परमं पुमांस, मादित्यवर्णममलं तमसः परस्तात् ॥ त्वामेव सम्यगुपलभ्य जयंति मृत्यु, नान्यः शिवः शिवपदस्य मुनींऽपंथाः ॥२३॥ त्वामव्ययं वि नुमचित्यमसंरख्यमाय, ब्रह्माणमीश्वरमनंतमनंगकेतुम् ।। योगीश्वरं विदितयोगमनेकमेक, ज्ञानस्वरूपममलं प्रवदंति संतः ॥२४॥ बुद्धस्त्वमेव विबुधार्चितबुद्धिबोधात्, वं शंकरोऽसि नुवनत्रयशंक रत्वात् ॥ धातासि धीर शिवमार्गविधेर्विधानात्, व्यक्तं त्वमेव नग वन् पुरुषोत्तमोऽसि ॥ २५ ॥ तुभ्यं नमविन्नुवनार्तिहराय नाथ, तुभ्यं नमः वितितलामलनूपणाय ॥ तुभ्यं नमस्त्रिजगतः परमेश्व राय, तुन्यं नमोजिननवोदधिझोपणाय ॥ २६ ॥ को विस्मयो ऽत्र यदि नाम गुणैरशेपै, स्त्वं संश्रितो निरवकाशतया मुनीश॥ दोपैरुपातविविधाश्रयजातगर्वैः, स्वप्नांतरेऽपि न कदाचिदपीक्षितो ऽसि ॥ २७ ॥ नच्चैरशोकतरुसंश्रितमुन्मयूरख, मानाति रूपममलं जयतो नितांतम् || स्पष्टोजसकिरणमस्ततमोवितानं, बिच रवेरिव पयोधरपार्श्ववर्ति ।। २०॥ सिंहासने मणिमयूखशिखाविचित्रे, वि प्राजते तव वपुः कनकावदातम् ।। बिवं वियहिलसदंशुलताविता नं, तुंगोदयाशिशिरसोच सहस्त्ररश्मः ॥ ए| कुंदावदातचलधाम । रचारुशोन्नं, विवाजते तव वपुः कलधौतकांतम् ॥ नद्यच्चांकशु चिनिरिचारिधार, मुच्चैस्तटं सुरगिरेरिव शातकौंजम् ॥ ३० ॥ उत्रं त्रयं तव विनातिशशांककांत, मुचैः स्थितं स्थगितनानुकरप्रता पम् || मुक्ताफलप्रकरजालविवृद्धशोनं, प्रख्यापयविजगतः परमेश्वर स्वम् ॥ ३१ . ॥ नन्निध्देमनवपंकजपुंजकांती, . पर्युलसनखमयूख , शिखान्निरामो ॥ पादौ पदानि तव यत्र जिनेंद पत्तः, पानि त प्र विवुधा: परिकल्पयंति ॥ ३५ ॥ श्वं यथा तव विनूतिरनूजिने इ, धर्मोपदेशनविो न तथा परस्य ।। याहा प्रत्ना दिनरुतः प्रह तांधकारा, ताहातोयगणस्य विकाशिनोऽपि ॥ ३३ ॥ श्योत न्मदाविलविलोलकपोलमूल, मनभ्रमभ्रमरनादविवृदकोपम् ॥ ऐ रावतान्नमिन्नमुद्धतमापतंतं, दृष्ट्वा जयं नयति नो नवदाश्रिता 'नाम् ॥ ३५ ॥ निन्नेन्नकुंनगल उज्वलशोणितात, मुक्ताफलप्रकर भूपितनूमिन्नागः ।। बद्धक्रमः क्रमगतं. हरिणा धिपोऽपि, नाकामति कमयुगाचलसंश्रितं ते || ३५ ॥ कल्पांतकालपवनोइतवहिकल्पं, दावानलं ज्वलितमुज्ज्यलमुत्स्फुलिंगम् ॥ विश्वं जिघत्सुमिव संमु खमापतंतं, त्वन्नामकीर्तनजलं शमयत्यशेपम् ॥ ३६ ॥ रक्तकणं समदकोकिलकंपनीलं,क्रोधोद्धतं फणिनमुत्कणमापतंतम् ॥आक्राम तिक्रमयुगेन निरस्तशंक, स्त्वन्नामनागदमनी हृदि यस्य पुंसः ॥ ३॥ वद्धगत्तुरंगगजगर्जितनीमनाद, माजौ बलं वलवतामपि नू पतीनाम् ॥ नद्य देवाकरमयूखशिखापविद्धं, त्वत्कीर्तनात्तम इवाशु लिदामुपैति ॥ ३० ॥कुंताग्रन्निन्नगजशोणित वारिवाद, वेगावता रतरणातुरयोधनीमे ॥ युद्धे जयं विजितऽयजेयपदा, स्त्वत्पा पंकजवनायियो लन्ते ॥ ३॥ अंजोनिधौ कुनितन्नीपणन ऋचक्र, पानपीउन्नयदोब्वणवाळवाग्नौ ॥ रंगत्तरंगशिखरस्थितय नपात्रा, स्वासं विहाय नवतः स्मरणाद्रजंति ॥ ५० ॥ नबूतनं पराजलोदरनारनुमाः, शोज्यां दशामुपगताच्युतजीविताशाः । स्वत्पादपंकजरजोमृतदिग्धदेहा, मा नवंति मकरध्वजतुल्यरूपा ॥ ५१ ॥ थापादकंगमुरुशृंखलवेटितांगा, गाढं वृहनिगमकोटिनि टजंघाः ॥ त्वन्नाममंत्रमनिशं मनुजाः स्मरंतः, सद्यः स्वयं विर तबंधत्नया नवंति ॥ ४२ ॥ मनश्मृिगराजदवानलादि, संग्राम .
वारिधिमहोवरबंधनोचम् || तस्याशु नाशमुपयाति नयं नियेव, यस्तावक स्तवमिमं मतिमानधीते ॥५३॥ स्तोत्रस्न तव.जिनें गुणैर्निवहां, जल्या मया रुचिरवर्णविचित्रपुष्पाम् ॥ धत्ते जनो य इह कंउगतामजलं, तं.मानतुंगमवशा समुपैति लक्ष्मीः | ॥ इति नकामरस्तोत्रं संपूर्णम् ॥ ।। अथ वृद्धशांतिर्लिख्यते ॥ ॥ नो नो नव्याः शृणुत वचनं प्रस्तुतं सर्च मेतत्, ये या प्रायां विन्नुवनगुरोराईतां नक्तिनामः ॥ तेषां शांतिवतु नवताम ईदादिप्रनावा, दारोग्यश्रोतमतिकरी केशविध्वंसहेतुः ॥ १ ॥ नोलो नव्यलोका इह दिनरतैरावतविदेहसंजवानां, समस्तती र्थकता जन्मन्यासनप्रकंपानन्तरं अवधिना विज्ञाय सौधर्माधिपतिः सुंघोपाघण्टाचालनानन्तरं सालसुरासुरैः सह समागत्य सविन यमईनद्वारकं गृहीत्वा, गत्वा कनकाशृिंगे, विहितजन्मानिपेकः, शान्तिमुद्घोपयनि, ततोऽहंरुतानुकारमिति रुत्वा, महाजनो येन गतस्स 'पंयाः ॥ इति नव्यजनैः सह समागत्य, स्मात्रपीठे स्मा.वि धाय, शान्तिमुद्घोपयामि ॥ तत्पूजापात्रासात्रादि महोत्सवानन्तरं इति कृत्वा कर्ण दत्वा निशम्या स्वाहा ॥ * पुण्याई २, प्रीयं तां २, जगवन्तोऽन्तः, सर्वज्ञा सर्वदर्शिनः ॥ त्रैलोक्यनाथा, त्रै सोक्यमदिताः त्रैलोक्यपूज्याः त्रैलोक्पेश्वराः त्रैलोक्योयोतकराः ।। ने मोकेवलज्ञानी १, निर्वाणी २, सागर ३, महायश १, विम व ५, सर्वानुनूति'६, श्रीधर उ, दत्त , दामोदर ए, सुतेजा. १०, स्वामी ११, मुनिसुव्रत १२, सुमति १३, शिवगति १५, श्रस्ताग १५, नमीश्वर १६, अनिल १७, यशोधर १.७, लतार्थ १ए, जि नेश्वर २०, शुद्धमति २१ शिवकर १२, स्यन्दन २३, संप्रति २५, एते अतीत..
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॥ चतुर्विशतितिर्थकराः॥
॥ श्रीरुपन्न १, अजित २, संनव ३, अनिनंदन ४,
सुमति ५, पद्मपन्न ६, सुपार्य, चंप्रन , सुविधि ए, शीतल
१०, श्रेयांस ११, वासुपूज्य १२, विमल-१३, अनन्त १५,
धर्म
१५, शान्ति १६, कुंथु १७, अर १७,मलि १५, मुनिसुव्रत २०,
नमि २१, नेमि २२, पार्श्व २३, बईमान २५, एते वर्तमानजिनाः
॥ ने श्रीपद्मनान्न १, सुरदेव २. सुपार्श्व ३, स्वयंप्रन,
सर्वानुनूति ५, देवश्रुत ६, उदय ७, पेढाल , पोटिल ए, शत
कीर्ति १०, सुवत ११, अमम १२, निष्कपाय १३, निप्पुलाक
२४, निर्मम १५, चित्रगुप्ति १६, समाधि १७, संबर १७, यशो
घर १ए, विजय २०, मल्लि २१, देव २२, अनन्तवीर्य २३, न
इंकर २४.
॥ एते नावितीर्थकराः जिनाः ॥ शान्ताः शान्तिकरा ज
वंतु मुनयो मुनिप्रवरा, रिपुविजयपुर्मिक कान्तारेषु उर्गमार्गेपु र
कंतु वो नित्यं ॥ ने श्रीनान्नि !, जितशत्रु २, जितारि ३, संवर
, मेघ ५, घर ६, प्रतिष्ठ ७, महसेन नरेश्वर , सुग्रीव ए, हड
रथ १०, विष्णु ११, वासुपूज्य १२, रुतवर्म १३, सिंहसेन १५,
जानु १५, विश्वसेन १६, सूर १७, सुदर्शन १७, कुंन १ए, सु
मित्र २०, विजय २१, समुविजय २२, अश्वसेन २३, सिक्षार्थ
२४. ॥ इति वर्तमान चतुर्विशतिजिनजनकाः ।।
॥ श्रीमरुदेवा १, विजया २, सेना ३, सिक्षा ५,
सुमंगला ५. सुसीमा ६, पृथिवीमाता ७, लक्ष्मणा , रामा ए,
नंदा १०, विष्णु ११, जया १२, श्यामा १३, सुयशा १५, सु
१५, अचिरा १६, श्री १७, देवी १८, प्रनावती १ए, पना
--
तुं
(१३)
१०, वप्रा २१, शिवा २२, वामा २३, त्रिशला २४ ॥ इति व
नमान जिनजनन्यः॥
॥ गोमुख १, मदायक २, त्रिमुख ३, यक्षनायक,
धरु ५, कुसुम ६, मातंग ७, विजय ७, अजित ए, ब्रह्मा १०,
यक्षराज ११, कुमार १२, पएमुख १३, पाताल ११, किन्नर १५,
गरुम १६, गंधर्व १७, यक्षराज १७, कुबेर ए, वरुण २०, नृ
कुटि २१, गोमेघ २२, पार्थ २३, ब्रह्मशांति २१ ॥ इति वर्स
मानजिनयक्षाः॥
॥ चक्रेश्वरी १, अजितवसा २, हरितारि ३, काली,
महाकाली ५, श्यामा ६, शांता ७, नृकुटि , सुतारका ए, अ
शोका १०, मानवी ११, मा १२, विदिता १३, अंकुशा १५,
कंदर्पा १५, निर्वाणी १६, बला १७, धारिणी १७, धरणप्रिया
१५, नरदमा २०, गांधारी २१, अंधिका २२, पद्मावती २३, सि
दापिका २४. एते वर्तमानचतुर्विशतितीर्थकरशासनदेव्यः ।।
॥ है। श्री धृति, कानि, कांति, बुद्धि, लक्ष्मी, मेधा,
विद्या, साधन, प्रवेशनिवेशनेषु, सुगृहीतनामानो जयंति ते जिनेशः
॥ई रोहिणी , प्रज्ञप्ति २, वजशृंखला ३, वाकुशा ५,
श्वरी ५, पुरुषदना ६, कालो , महाकाली 6, गौर, ए, गांधारी
सर्वास्त्रमहाज्वाला
१५, मानसी १५, महामानसी १६. एताः पोशविद्यादेव्यो र
कंतु मे स्वाहा ॥ आचार्योपाप्यायप्रतृतेचातुर्वएपस्य श्रीश्रम
संयस्य शांतिनवतु, तुटिनवतु पुटिनवनु ई महामंसूर्या
गारकबुधवृदस्पतिशुक्रशनेभरराहु केतुसहिताःतलोकपालाः सोमयम
चरुणकुबेरवासवादित्यस्कन्दविनायक ये चान्येऽपि यामनगरक्षेत्र :
देवतादयस्ते सर्वे श्रीयंता ॥ २ ॥ अक्षोशकोशकोष्ठागारा नरपत
.
मानवी १२,
वैरोट्या १३, अधुप्ता
-
.
॥ चतुर्विंशतितिर्थकराः ॥.
॥ श्रीरुपन्न १, अजित २, संनव ३, अन्निनंदन ।
सुमति ५, पद्मप्रन्न ६, सुपार्श्व , चंप्रन , सुविधि ए, शीतल
१७, श्रेयांस ११, वासुपूज्य १२, विमल १३, अनन्त १४, धर्म
१५, शान्ति १६, कुंयु १७, अर १७,मलि १५, मुनिसुव्रत २०,
नमि २१, नेमि २२,
पार्श्व २३, वईमान २५, एते वर्तमान जिनाः
॥ श्रीपद्मनान १, सुरदेव २, सुपार्श्व ३, स्वयंपन्न ,
सर्वानुभूति ५, देवश्रुत ६, उदय , पेढाल , पोटिल ए, शत
कीर्ति १०. सुवत ११, अमम १२, निष्कपाय १३, निप्पुलाक
१५, निर्मम १५, चित्रगुप्ति १६, समाधि १७, संबर ?, यशो
घर ए, विजय २०, मलि २१, देव २२, अनन्तवीर्य २३, न
इंकर २४.
॥ एतेनावितीर्थकराः जिनाः ॥ शान्ताः शान्तिकराज
वंतु मुनयो मुनिप्रवरा, रिपुविजयपुर्भिक्षकान्तारेयु उर्गमार्गेषु र
कंतु वो नित्यं ॥ श्रीनानि १, जितशत्रु २, जितारि ३, संवर
५, मेघ ५, घर ६, प्रतिष्ठ , महसेन नरेश्वर , सुग्रीव ए, घट
रथ १०, विष्णु ११. वासुपूज्य १२, रुतवर्म १३, सिंदसेन १५,
जानु १५, विश्वसेन १६, सूर १७, सुदर्शन १७, कुंज १ए, मु
मित्र २०, विजय २१, समुविजय २२, अश्वसेन २३, सिहार्य
२४ ॥ इति वर्तमान चतुर्विशति जिनजनकाः ॥
॥ श्रीमरुदेवा १, विजया २, सेना ३, सिक्षा ४.
मुमंगला ५. मुसीमा ६, पृथिवीमाता, लक्ष्मगा , रामा ,
नंदा १०, विष्णु ११, नपा १२, दयामा १३, मुपदशा १४, मु
प्रता १५, मचिरा १६, श्री १२, देवी १०, प्रजापती ?,
,
तुं . काली, . (१३) २०, वप्रा २१, शिवा १२, वामा २३, त्रिशला २४ ॥ इति व तमान जिनजनन्यः॥ ॥ गोमुख १, मदायक्ष २, त्रिमुख ३, यक्षनायक , बरु ५, कुसुम ६, मातंग, विजय ७, अजित ए, ब्रह्मा १०, यक्षराज ११, कुमार १२, पएमुख १३, पाताल १४, किन्नर १५, गरुम १६, गंधर्व १७, यकराज १७, कुबेर ए, वरुण २०, कुटि २१, गोमेघ २२, पार्श्व २३, ब्रह्मशांति २४ ॥ इति वर्स मानजिनयदाः ॥ ॥ चक्रेश्वरी १, अजितबला २, रितारि ३, महाकाली ५, श्यामा ६, शांता ७, नृष्टि , सुतारका ए, अ शोका १०, मानवी ११, चमा ११, विदिता १३, अंकुशा १५, निर्वाणी १६, बला १७, धारिणी १७, धरणप्रिया १ए, नरदमा २०, गांधारी २१, अंबिका २२, सि दायिका २४. एते वर्तमानचतुर्विंशतितीर्थकरशासनदेव्यः । ॥ है। श्री ति, कीर्नि, कांति, बुद्धि, सदमी, मेधा, विद्या, साधन, प्रवेशनिवेशनेप. सुगृहीतनामानी जयंति ते जिनः 1 रोहिणी , प्रज्ञप्ति २, वजशृंखला ३, वाकुशा , चके- श्वरी ५, पुरुषदत्ता ६, कालो ७, महाकाली , गौर) गांधारी सर्वास्त्रमहाज्वाला 38, मानवी १२, वैरोट्या १३, अधुप्ता १४, मानसी १५, महामानसी १६. एताः पोमा विद्यादेव्यो र कंतु मे स्वाहा ॥ प्राचार्योपाध्यापप्रनृतिचातुर्वर्यस्य श्रीश्रम एसंघस्य शांतिनंवतु, तुहिवतु पुष्टिवतु ई ग्रहाश्वसूर्या गारकबुधवृहस्पतिशुकशनेश्वरराहु केतुसहिताःतलोकपालाः सोमयम वरुणकुबेरवालवादित्यस्कन्दविनायक ये चान्येऽपि यामनगरक्षेत्र : देवतादयस्ते सर्व श्रीपंता ॥ २ ॥ अशीशकोशकोशागारा नरपत कंदा १५, पद्मावती २३, ७) या नवं स्वाहा. ॥ पुत्रमित्रबाहकलत्रसुहृत्स्व जनसंबंधिबंधु वर्गसहिताः नित्यं चामोदप्रमोदकारिणो नवंतु ॥ अस्मिथ नूमं कले आयतननिवासिनां साधुसाध्वी श्रावकश्राविकाणां, रोगोपस Hध्यापिनुःखदमिनस्योपशमनाय शान्तिनवतु ॥ तुष्टिपुष्टिश द्विदिमाख्योत्सवाः नवंतु || सदाप्राउजूतानि रितानि पापा नि शाम्यंतु शत्रवः पराङ्मुखा नवंतु स्वाहा || श्रीमते शान्तिना पाय, नमः शान्तिविधायिने ॥ त्रैलोक्यस्यामराधीश, मुकुटाच्य र्चितांद्रये ॥ १ ॥ शान्तिः शान्तिकरः श्रीमान, शान्ति दिशतु मे गुरुः ॥ शान्तिरेव सदा तेपा, येषां शांतिइगृहे ॥ २ ॥ न्मृष्टरिष्टउट, ग्रहगतिःस्वप्ननिमित्नादि ॥ संपादितहितसंपत्, नामग्रहणं जयति शांतः ॥ ३ ॥ श्रोसंगपौरजनपद, राजाधिपरा जसंनिवेशानाम् ॥ गोष्ठीपुरमुरख्यानां, व्याहरणादरेचातिम् ॥३॥ श्रीश्रमणसंघस्य शांतिनवतु,श्रीपौरलोकस्य शांतिनवतु, श्रीराज संनिवेशानां शांतिनवतु, श्रीगोष्ठिकानां शान्तिनवतु, स्वाहा ॥२॥ हैं। श्री पार्श्वनाथाय स्वाहा || एपा शांतिः प्रतिष्ठा यात्रामात्रावसानेपु, शांतिकलशं गृहीत्वा कुंकुमचंदनकर्पूरागरुधू पवासकुसुमांजलिसमेतः, स्मात्रपाचे श्रीसंघतमतः, शुचिः शुचि वपुः पुष्पवस्त्रचंदनानरणावंरुतः, चंदनतिलकं विधाय पुष्पमाला कंठे रुस्वा, शांतिमुद्घोपयित्वा शान्तिपानीयं मस्तके दातव्यमिति ॥ नृत्यंति नृत्यं मणिपुष्पवर्ष, सृजति गायति च मंगलानि ॥ स्तो प्राशि गोत्राणि पति मंत्रान, कन्याशनाजोहि जिनानिरके! ॥ तिपयरमाया शिवा देवी, तुम्द नयर निवासिनी । अम्द शिवं नुम्द शिवं, अमुदोवसमं जयतु स्वाहा ॥ १ ॥शिवमस्तु मजगतः, परहितनिरता नबंतु नूतगणाः ॥ दोपाः प्रयान्तु ना, सत्र सुस्वी जयंतु सोकाः ॥ २॥ चपसर्गाः शष पान्ति, नियंते दि (१४१) प्रवल्लयः ॥ मनः प्रसन्नतामेति, पूज्यमाने जिनेश्वरे ॥ ३ ॥ इति श्रीवृद्धशान्तिः समाप्ता॥ ॥ अथ जिनपंजरस्तोत्रं लिख्यते ॥ ॥ है। श्री ई अईयो नमोनमः, " ही श्री भई सिद्धेन्यो नमोनमः ॥ है। श्री अर्द आचार्येभ्यो नमो नमः ॥ई है। श्री अई उपाध्यायेच्यो नमोनमः " है। श्री ६ श्री गौतमस्वामिप्रमुखसर्वसाधुन्यो नमोनमः ॥१॥ एप पंच नमस्कारः, सर्व पापक्षयंकरः। मंगलानां च सर्वेषां, प्रथमं भवति मंगलं ॥ २ ॥ है। श्री जयविजये, अँई परमात्मने नमः ।। क मलप्रनसूरीशे, नापते जिनपंजरम् ॥शा एकजतोपवासेन, विकास 'यः पठेदिदं ।। मनोनिलपितं सर्व, फलं स बनते ध्रुवं ॥ ४ ॥ नू शय्या ब्रह्मचर्येण, कोपलोनविवर्जितः ॥ देवताये पवित्रामा, 'एमासलेलते फलं ॥ ५ ॥ श्रदतं स्थापयेन्मूर्धि, सिद्धं चकुललाटके ॥ प्राचार्य श्रोत्रयोर्मध्ये, उपाध्यायं तु घाणके ॥ ६ ॥ साधुरन्द मुखस्याये, मनः शुद्धं विधाय च ।। सूर्यवंशनिरोधेन, सुधीः सर्वा सिद्धये ॥ ॥ दक्षिरो मदनक्षेत्री, बामपार्श्वे स्थितोजिनः ॥ अं. •गसंधिषु सर्वज्ञः, परमेष्ठी शिवकरः ।। ॥ पूर्वाशा श्रीजिनो रहे, दामेयी विजितेश्यिः ॥ दक्षिणाशां परं ब्रह्म, नईति च त्रिकालवि व ए पश्चिमाशां जगन्नायो, वायवीपरमेश्वरः ।। नुत्तरी तीर्थ रुत् सर्वा, मीशानी च निरंजनः ॥ १० ॥ पातालं लगवानई, नाकाशं पुरुषोत्तमः ।। रोहिणीप्रमुखा देच्यो, रहंतु सकलं कुलं ।। ११. ॥ रुपनो मस्तकं रहे, दजितोपि विलोचने ॥ संन यः कर्णयुगलं, नासिका चानिनंदनः ॥ १२ ॥ उठाश्रीसुमती र क्षेव, वंतापमानो वितुः ॥ निहां सुपार्श्वदेवीय, तालु चमनी वितुः ॥ १३॥ कंठं श्रीसुविधारक्षेद, हृदयं श्रीसुशोतसः श्रे . .
- (१२) यांसो वा९युगलं, वासुपूज्यः करध्यं ॥ १४ ॥ अंगुलीविमलो रहे, दनंतोऽसौ स्तनावपि ॥ सुधर्मोप्पुदरास्थीनि, श्रीशांति निममलं ॥ १५ ॥ श्रीकुंथुर्गुह्यकं रहे, दरो रोमकटीतट || मल्लिरूपृष्ठिवं श, जंघे च मुनिसुवतः ॥ १६ ॥ पादांगुलीनमी रक्षेत्, श्रीनेमि श्वरणयं ।। श्रीपार्श्वनाथः सर्वांगं, वईमानश्चिदात्मकं ॥ १७॥ पृथिवीजलतेजस्क, वाय्वाकाशमयं जगत् ॥ रक्षेदशषपापेभ्यो, वो तरागो निरंजनः ॥ १० ॥ राजदारे श्मशाने वा, संग्रामे शत्रुसंके टे ॥ व्याघचौरामिसर्पादि, नूनप्रेतनयाश्रिते ॥ १७ ॥ अकालमरणे प्राप्ते, दारिश्यापत्समाश्रिते ॥ अपुत्रत्वे महादोष, मूर्वित्वे रोगपी मिते ॥ २०॥ माकिनी शाकिनीयस्ते, महापदणाति ॥ नद्युत्ता रेऽध्वपम्ये, व्यसने चापदि स्मरेत् ॥ २७ ॥ प्रातरेव समुदाय, यः स्मरेजिनपंजरं || तस्य किंचिद्भयं नास्ति, सनते सुरपसंपदं ॥२२॥ जिनपंजरनामेदं, यः स्मरत्यनुवासरं || कमलप्रत्नराजेंद, भियं स सन्नते नरः ॥ २३ ॥ प्रातः समुचाय परेन रूतज्ञो, यः स्तोत्रमेत जिनपंजरारम्यं ॥ प्रासादयेत्सःकमलप्रनाम्या, लक्ष्मी मनोवांचित पूरणाप ॥ २१ ॥ श्रीरुपल्लीयवरेण्यगछे, देवप्रन्नाचार्यपदानदं सः ॥ वादीचूकामगिरेपजैनो, जीपाद् गुरुः श्रीकमलपन्नास्यः ॥ २५ ॥ इति श्रीजिनपंजरस्तोत्रं संपूर्णम् ॥ ॥ अथ स्तोत्रोमेस्तोत्रलिखणा॥ ॥जय वहानवकार लिग्ल्यते ॥ ॥कि कप्पनहरे श्रयाण चिंतन मणजितरि, किंचितामणि कामधेनु पारादो बहुपरि ॥ विनावेतो काज किसे देसांतर संपत, रमणरासि कारण किसे सायर उलंघन ॥ घवदे पूरव सार युग सदन 'ए नवसार, सपई काज मदिया सरे नर तरे संसार ॥१॥ .
(१५३ )
वलि नासिय रीत जिके नवकार पाराहै, नोगवि सुस्क अतः
अंत परम पयसाहै । इस काणे सुर रिद्धि पुत्त सुद विलसै बहु
परि, इण काणे देवलोक इंदपद पामे सुंदरि ॥ एह मंत्र सासतो
जपे अचिंत चिंतामणि एह, समरण पाप सबे टले रिद्धि सिदि
निमगेद ॥२॥निय सिर ऊपर काण मझ चिंतवै कमल नर,
कंचणमय अगदल सहित तिहां माहे कनकवर ॥ तिहां वेग-अ
रिहंतदेव पनमासण फिटकमणि, सेयवत्य पहरेवि पढम पय
चिंते नियमणि ॥ निवारय चन गइ गमण पामिय सासय सुस्क,
अरिहंत काणे तुम सदो जिम अजरामर मुस्क ॥ ३ ॥ पनर ने
न्य तिहां सिह वीय पद जे प्राराहे, राते विमतणे वन्ननिय सो
दग सादे ॥ राती धोती पहर जपे सिद्धदि पुवे दिसि,सयल लोय
तिह नरहि होइ ततख़िणवति ॥ मूलमंत्र वशीकरण प्रवर स
दू जगधंद, मणमूली उग्ध करे बुद्धि होणजाचंध ॥ ४ ॥ दक्षिण
दिसि पंखमी जपे नमो आयरित्राणं, सोवनवन्नद सीत सहित
उपए सहिनाणं । रिद्ध सिद्ध कारणे लान ऊपर जे ध्यावे, पहरे
नीलावत्य तेइ मन वंठिय पावै ॥ श्ण माणे नव निधि हुवेए
जोग कदे नवि होय, गज रथ इय वर पालखी चामर उत्त सिर
नोय ॥ ५ ॥ नीलवन्न नवमाय साप्त पाढंता पछिम, श्राराहिले
अंग धारंत मनोरम ॥ पछिम दिसि पंखमीय कमल ऊपर सु
इमाण, जोवो परमानंद तासु गय देवक्मिाण || गुरु लघु जे रके
वेउर तिहां नर बहु फल होर, मन सूधे विण जे जपे तिहां फल
सद्ध न हो ॥ ६ ॥ तर्घ साधु उत्तर विनाग सामला वश्य, जि
धर्म लोय पयासयंत चारित गुण- जिता ॥ मरा वयण काएदि
पे जे एके काणे, पंचवन्न तिहां नाण झारा गुण एद पमाणे ।।
अनंत चोवीसी जग हुश्ए दोसी अवर अनंत, आदि कोइ जाणे
नदी ण नवकारद मंत ॥ ॥ एसोपंय नमोकारो पद दिसिन गणेदि, सघ पावप्पणासणो पद जपनेरोहिं ।। वायव दिसि काएद मंगलाणं च सोसि, पढमं हवा मंगलं ईसाण पएसि ।। चिहुं दि सि चिर्दू विदिसे मिलिय अउ दल कमल ग्वेश, जो गुरु लघु जाणी ज़पै सो घण पाव खवे ॥ ७ ॥ इस प्रस्ताव धरणिंद हुन पायालइ सामी, समसकुप्रर उपन्न निल्ल सुर सोयह गामी ॥ संबल कंबल घे बलद पहुता देवा कप्पे, सूली दीयो चोर देव थयो नवकार दि जप्पे ॥ शिवकुमार मन वंग्यि करे जोगी लियो मता पा, सोनापुरसो सीधलो इण नवकार प्रमाण ।। ए ॥ ीके वेठी चोर एक आकासे गामी, यदि किहि दुई फूल माल नवकारह नामी । वावरू प्राचारंत वाल जल नदी प्रवाहे, पीयों कंटही नयर मंत्र जपियो मनमांदे ॥ चिंत्या काज सब सरे रत परत विमास, पालित सूरितणी परे विद्या सिइ आकास ॥ १.० ॥ चौर धाम संकट टले राजा वसि होवे, तिचंकर सो दो लाख गुण वि घिसुं जोवे ।। सारण डारण नूत प्रेत वेत्ताल न पोदवे, आधि व्याधि ग्रहतणी पीते किमहि न होवे । कुछ जलोदर रोग सवे नासे एणही मंत, मयणासुंदरितणी परे नव पय काश करत ॥ ११॥ एक जीह इस मंत्रतणा गुण किता वखार्पु, नागहीण उनम एद गुण पार न जाणुं | जिम सत्तुंजय तिचराउ महिमा उदयवंतो, सयस मंत्र धुरि एह मंत्र राना जयवंतो ॥ तिळकर गणहर पशिष चचदह पूरव सार, इस गुण अंत न को कहे गुण गिस्न नवकार || १२ ॥ अम संपय नव पय सहित यस सहु अस्कर, गुरु अरकर सव इह जागो परमरकर || गुरु जिस वजह सूरि नणे सिव सुरकह कारण, नरय तिरय गय रोग सोग बहु उस्क निवारण जल प्रल मदियन वनगहण समरण दुवैक चिन, पंच (१४५) परमेहि मंत्रद तयो सेवा देज्यो नित्त ॥ १३॥ इति पंच परमेष्टि महिमा गर्जित र नवकार मंत्र संपूर्ण ।। ॥ अथ शप्तति जिन स्तोत्र ॥ ॥ तिजय पहुत्त पयासं । श्रठ महापामिहेर जुसाणं ॥ सम य खित्त व्यिाणं। सरेमि चकं जिणं दाणं ॥१॥पणवीसाय असिया। पनरस पन्नास जिनवर समूहो । नासेन सयल रिया नवियाणं ननि जुत्ताणं ॥॥ वीसा पणयाला विय। तीसा पन्नत्तरी जिणवार दा ॥गहनून ररक साइणि । घोरुवसगं पणाले ॥३) सत्तरि पण तीसा विय सही पंचेव जिरा गणोएसोवाहि जल जला हरकरि 1 चौरारि महानयं हरन ॥४॥ पण पन्नाय दसेवय । पन्नही तहय चेव चालीसा || ररकंतु मे शरीरं । देवासुर पणमिया सिद्धा ।। ५ ॥ दरढुंहः सरसूंस । हरहुंहः तदय चेव सरसूंसः ॥आलिदिय नाम गम्नं । चक्र किर सघन नई ॥ ६॥ रोहिणी पन्नती। व ऊसंखला तहय वऊ अंकुसिया ॥ चक्केसरि नरदत्ता। कालि महाका लि तहय गौरी ॥ 3 || गंधारि महाज्वाला । माण विवाह तहय अधुप्ता माणसि महमारासिया। विजा देवीक रकंतु राजा पंचदस सम्मभूमिसु । वपन्नं सत्तरि जिणाण सयं । विविद रयणाणवन्नो। वसोहि हरन उरिया ॥ ए॥ चनतीस अश्सय जुया । अम महापामिहेर कयसोदा ॥ तियर गयमोहा । माए प्रथा पयत्तेत ॥ १० ॥ ३ वर कणय संख विहुम । मरगय घश सन्निदं विगय मोदं । सत्तार सयं जिशाशं । सघामर पूश्यं वंदे स्वादा ॥ ११ ॥ नुवरावर वाणमंतर । जोश्सवासी विमाणवासीय ॥ जे केवि रु देवा । ते सधे नवसमंतु मे स्वाहा ॥ १२॥ चंदण कापूरेणं । फल देखिदिकाखालिग्रंपीयं ॥ एगंतरगदमुग्गय । साइशि जयं पणासे॥ १३ ॥ श्य सत्तरि सयं जंतं । सम्मं मंतं : उवार पनि ।
,
(६ )
लिहियं ।। इरिमारि विजयतंतं । निनंतं निश्चमच्चेद ॥१५॥
॥ इति शप्तति जिन स्तोत्रं ॥
॥ अथ नवग्रह गर्भित पार्थजिन स्तुति ॥
॥ दोसावदार दरको, नालियायरवियासिगोपतरो॥ रयणत्तय
स्त जगन, पासजिलो जयन जय घरकू ॥ १ || कय कुवलय प
मियोदो, हरणं किय विग्गहो कला निसन ॥ विहियारविंद मह
पो, दीयरान जयन पासजिलो ||२॥ कंती निङ्गिणंतो, ति
दूरं पुदवि नंदणो कूरो ॥ जय जंतुअमअवको, सुमंगलो जयन
पहुपासो || ३ || चप्पलं दल नीलरुइ, हरिमंझल संयुन इलानंदो
॥रयलियरदारनमह, बुहोपसीज पास जियो ॥ ५॥ नादियवाय
वियटो, नायचो नागरायकय पून ॥ तिरि पासनाह देवो, देवाय
रित सुहं दिसन ॥ ५ ॥ राया वट्ट समुङलं, तणुप्पदा मंगलो म
हानू ॥ असुरोहिं नमितो, पासजिणंदो कवी जयन ॥६॥
तिमिरासि समारूढो, संतो ऽखावहो जयंम्मि थिरो || बहुलतमा
सरिस सिरी, जय चरकु सुन जयन पासो ॥ ॥ कवलीकय दो
सायर, मायमरदं अहो तणु विमुकं ॥ लोआ नरणी नूयं, पास
जिणं सत्तमं सरह ॥ ७॥ रियाई पासनाहो, सिंहावमालीनदो
नवणकेन || दूरंतम रासीन, सत्तम जाण नि हरन ॥ ए ॥ अ
नवगह घुइ गतं, जिणपदसूरीहिं गुंफियं श्रवणं ॥ तुह पास पढ
जोतं, असुदावि गहा न पामेति ॥ १० ॥ इति नवग्रह गर्मित
पार्श्वजिन स्तुति ॥
॥ अथ चतुर्विंशति जिन गर्भित नवग्रह शांति स्तोत्रम् ॥
॥ जगद्गुरुं नमस्कृत्य, श्रुत्वा सद्गुरुनापितं || गृहशांति प्र
वक्ष्यामि, लोकानां सुखहेतवे ॥ १ ॥ जिनेशः खेचराज्ञेयाः, पूज
नीया विधिकमात् ॥ पुष्पैविलेपनै पे, नैवेद्यैस्तुष्टिदेतवे ॥२॥
(१७) पद्मप्रनस्य माम, श्वेश्वानस्य च || वासुपूज्ये भूमिपूत्रो, बु घोऽप्यष्टजिनेषु च ॥ ३ ॥ विमलानंतधर्माराः, शांतिःकुंथुर्न मिस्त था ॥ वईमानो जिनेंशाणां, पादपद्मे बुधं न्यसेत् ॥ ४॥ पन्ना जितसुपार्धा, श्वानिनंदनशीतलौ॥ सुमतिः संन्नवः स्वामी, श्रेयांस व वृहस्पतिः ॥ ५ ॥ सुविधेः कथितः शुक्रः, सुव्रतस्य शनैश्चरः ॥ नेमिनाथे नवेज्ञदुः, केतुः श्रीमल्लिपार्श्वयोः ॥ ६ ॥ जनालने च राशौ च, पीमयंति यदा यदाः ॥ तदा संपूजयेहीमान्, खेचरैः हितान् जिनान् ॥ ७ ॥ पुष्पं गंधादिनिधूपैः, फलनैवद्यसंयुते ॥ सदृशदानश्च, वासोनिर्दकिशान्वितैः ॥ ७ ॥ आदित्यसोममंगल, बुधगुरुशुक्राः शनैश्चरो राहुः। केतुप्रमुखाः खेटाः, जिनपतिपुरतोव तिरंतु ॥ ५ ॥ जिननामरुतोच्चारा, देशनक्षत्रवर्णकः ॥ स्तुताश्च पू जिता नक्क्या, यहाः संतु सुखावहाः ॥ १०॥ जिनानामग्रतः स्थित्वा, ग्रहाणा सुखहेतवे ॥ नमस्कारशतं नत्या, जपेदष्टोनरं शतम् ॥ ११॥ नवाहुरुवाचेदं, पंचमः श्रुतकेवली ॥ विद्याप्रन्नाव तः पूर्वाद्, ग्रहशांतिविधिर्मतः || १२ ॥ इति चतुर्विशतिजिनग प्रिंत नवग्रहशांति स्तोत्रम् ॥ ॥ सूर्यग्रह क्रूर होय तो १ पद्मप्रनृजीकी माला फेरणी. चं। चंदाप्रनूजाकी ।मंगल । ३श्रीवासुपूज्पजी ||बुध । ४ श्री विमलनाथजी, अनंतनाथजी, श्रीधर्मनाथजी, श्रीअरनाथजी, श्री शांतिनाथजी, श्रीकुंथुनाथजी,श्रीनमीनाथजी, श्रीमहावीरस्वामी ॥ वृहस्पति । ५ श्रीज्ञानदेवजी, श्रीअजितनाथजी, श्रीसुपार्श्व नाथजी, श्रीअनिनंदनजी, श्रीशीतलनाथजी, श्रीसुमतिनाग्रजी, श्रीसंनवनाथजी, श्रीश्रेयांसजी ॥ शुक्र । ६ सुविधिनायजी ॥ शनीभर । ७ श्रीमुनिसुव्रतजी ॥ राहु । ज नेमनायजी | केतु ए मल्लिनाथजी, पार्श्वनामजी ॥ रंग मुजब दान गुरुमुपात्रत " . ।
). कि करणी माता पूर्वोक्त फेरणी पूजा जिनेश्वरकी द्रव्ये नर नावे करणी॥ ॥ अथ कल्याणमंदिर स्तोत्रं ॥ ॥ कल्याणमंदिरमुदारमवद्यन्नेदि, नीतानयप्रदमनिंदितमंहि पद्मम् ॥ संसारसागरनिमहादशेषजंतु, पोतायमानमन्जिनम्य जिने श्वरस्य || १ || यस्य स्वयं सुरगुरुर्गरिमाधुराशेः, स्तोत्रं मुविस्तृत मतिर्न विन्नुर्विधातुम् || तीर्घश्वरस्य कमठस्मयधूमकेतो, स्तस्या हमेप किस संस्तवनं करिष्ये ॥३॥ युग्मम् ॥ सामान्यतोऽपि तब वर्णयितुं स्वरूप, मस्मादृशाः कथमधीश नवंत्यधीशाः ॥ पृष्टोपि कौशिकशिशुर्यदिवा दिवांधो, रूपं प्ररूपयति किं किल धर्मरश्मः ॥ ३ ॥ मोहकयादनुन्नवन्नपि नाथ मयों, नूनं गुणान् गणयितुं न तंव क्षमेत ॥ कल्पांतवांतपयसः प्रकटोऽपि यस्मा, मीयेतकेन ज लघेर्ननु रत्नराशिः ॥ १ ॥ अन्युद्यतोस्मि तव नाथ जमाशयोऽपि, कत्तुं स्तवं लसदसंख्यगुणाकरस्य ॥ वालोऽपि किं न निजबाहुयुगं वितत्प, विस्तीर्णतां कथयति स्वधियांबुराशेः ॥ ५॥ ये योगिना मपि न यांति गुणास्तवेश, वक्तुं कथं नवति तेषु ममावकाशः। जातातदेवमसमीक्षितकारितेय, जल्पंत्ति वा निजगिरा ननु पक्षियो ऽपि ॥ ६ ॥ श्रास्तामचिंत्यमहिमा जिनसंस्तवस्ते, नामापि पाति नवतो नवतो जगंति ॥ तीव्रातपोपदतपांयजनान्निदाघे, प्रीणाति पासरसः सरसोऽनिलोऽपि ॥ ७ ॥ हर्तिनि त्वयि विनो शिथि सोनवति, जंतोः श्रोन निविमा अपि कर्मबंधाः ॥ सद्यो तुजंगम मया इव मध्यन्नाग, मन्यागते वनशिखंमिनि चंदनस्य ||॥ मु च्यंत एव मनुजाः सहसा जिनें, रोझैपश्वशतैस्त्वयिवीक्षितेपि ॥ गोस्वामिनि स्फुरिततेजसि दृष्टमाने, चौरैरिवाशुपशवः प्रपला यमानः ॥ त्वं तारकोलिन कथं नविना त एय, त्वामुदति ह .
. . ( १ ) दयेन यउत्तरंतः ।। या दृतिस्तरति यजलमेपनून, मंतर्गतस्य में रुतः स किलानुनावः ॥ १० ॥ यस्मिन् हरप्रनृतयोऽपि इतप्रनाय वाः, सोऽपि त्वयारतिपतिः कपित्तः कणेन ॥ विध्यापिता हुतनुजः पयसाथ येन, पीतं न किं तदपि उरिवामवेन ॥ ११ ॥ स्वामि अतुल्यगरिमाणमपि प्रपन्ना, स्त्वां जंतवः कथकहो हृदये दधानाः ॥ जन्मोदधि लघु तरंत्यतिलाघवेन, चिंत्यो न दंत महतां यदि वा प्रत्नावः ॥ १२॥ क्रोधस्त्वया यदि विन्नो प्रथमं निरस्तो, ध्वस्ता स्तदा वत कयं किल कर्मचौराः ॥ प्लोपत्यमुत्र यदि वा शिशिरा पिलोके, नीलमाणि विपिनानि न कि हिमानी ॥ १३॥ त्वां यो गिनो जिन सदा परमात्मरूप, मन्वेपयंतिहृदयात्रुजकोशदेशे ॥ पूतस्यनिर्मलरुचेर्य दिवाकिमन्य, दकस्य संनिवि पदं ननु कर्णिकायाः ॥१४॥ ध्यानाडिनेश नवतो नविनः क्षणेन, देहं विहाय परमा स्मदशां व्रजति ॥ तीवानलाउपलनावमपास्य लोके, चामीकरत्व मचिरादिव धातुनेदाः ॥ १५ ॥ अंतः सदैव जिन यस्य विनाव्यसे त्वं, नव्यैः कनं तदपि नाशयसे शरीरम् ।। एतत्स्वरूपमथ मध्यवि वर्तिनोहि, यदिग्रहं प्रशमयंति महानुनावाः ॥ १६ ॥ प्रात्मा म नीपिन्निरयं त्वदनेदबुद्धया, ध्यातोजिने जवतीह नवान्नावः ।। पानीयमप्यमृतमित्यनुचित्यमानं, किं नाम नो विपविकारमपाकरो ति ॥ १७ ॥ त्वामेव वीततमसं परवादिनोपि. नूनं विनो हरिहरा दिधिया प्रपन्नाः ॥ किं फाचकामलिनिरीश सितोपि शंखो, नो गृ ह्यते विविधवर्णविपर्ययेण ॥ १० ॥ धर्मोपदेशसमये सविधानुन्ना वा, दास्तां जनो नवति ते तरुरप्यशोकः ॥ अन्युजते दिनपतो स महोरुदोपि, किं वा विवोधमुपयाति न जीवलोकः ॥ १५ ॥ चित्रं विनो कथमवाड्मुखवृत्तमेव, विष्वक् पतत्यविरला सुरपुष्पवृ टिः ॥ त्वद्गोचरे सुमनसां यदिवा मुनीश, गचंति नूनमधएव दि (१५०) पंधनानि ॥ २०॥ स्थाने गन्नीरहृदयोदधिसंनवायाः, पीयूपतां तव गिरः समुदीरयंति ॥ पीत्वा यतः परमसंमदसंगनाजो, नव्या ब्रजति तरसाप्यजरामरत्वम् ॥ २१ ॥ स्वामिन् सुदूरमवनम्यसमु त्पतंतो, मन्ये वदंति शुचयः सुरचामरोषाः ॥ येऽस्मै नतिं विदधते मुनिपुंगवाय, ते नूनमूर्ध्वगतयः खलु शुक्लावाः ॥ ३२ ॥ श्याम गन्नीरगिरमुज्वलहेमरत्न, सिंहासनस्यमिह नव्यशिखंमिनस्त्वाम् ॥ आलोफयंति रत्नसेन नदंतमुच्चै, धामीकरा शिशिरसीव नवांबुदा हम ॥ २३ ॥ उद्गछता तव शितिद्युतिमंमलेन, लुप्तबदछविरशो कतरुवनूव ॥ सान्निध्यतोऽपि यदि वा तव वीतराग, नीरागतां बृजति कोन सचेतनोपि ॥ २४ ॥ नोनोः प्रमादवधूय नजध्वमे न, मागत्य निर्दतिपुरि प्रतिसार्थवाहम् ।। एतनिवेदयति देव जगत्र याय, मन्ये नदन्नन्निनन्नःसुरनिस्ते ॥ २५ ॥ नद्योतितेषु न वता नुवनेषु नाथ, तारान्वितो विधुरयं विहताधिकारः || मुक्ताक सापकलितोचसितातपत्र, व्याजाविधा धृततनुर्धवमन्युपेतः ॥ ॥ २६ ॥ स्वेन प्रपूरितजगत्रयपि मितेन, कांतिप्रतापयशतामिव सं चयेन ॥ माणिक्यहेमरजतप्रविनिर्मितेन, सालत्रयेण जगवन्नति तोविनासि ॥ २७ ॥ दिव्यसृजोजिन नमलिदशाधिपाना, मुत्सृज्य रत्नरचितानपि मौलिबंघान् ॥ पादौ श्रयंति नवतो यदि वा परत्र, त्वत्संगमे सुमनसो न रमंतएव ॥ २७ ॥ त्वं नाय जन्मजलधेर्विप राङ्मुखोपि, यत्तारयस्यसुमतो निजपृष्ठलमान ॥ युक्तं हि पार्थि' निपस्य सतस्तवैव, चित्रं विनो यदसि कर्मविपाकशून्यः ॥ २॥ विश्वेश्वरोऽपि जनपासक ऽर्गतस्त्वं, किं वाक्षरप्रकृतिरप्यसिपिरत मीश ॥ अज्ञानवत्यपि सदैव कथंचिदेव, ज्ञानं त्वयि स्फुरति ! श्वविकाशहेतुः ॥३०॥ प्राग्नारसंनृतननांसि रजांसि रोपा, उंच पितानि कमरेन शवेन यानि || गयापि तैस्तव न नाथ हतार , (१५१) ताशो, यस्तस्त्वमीनिरयमेव परं पुरात्मा ॥ ३१ ॥ यजऊर्जित घनौधमदनीम, वश्यचमिन्मुसलमांसलघोरघारम् ॥ दैत्येन मुक्त मथ स्तरवारि दधे, ते नैव तस्य जिन पुस्तरवारिकत्यम् ॥३२॥ ध्वस्तोर्ध्वकेशविकतारुतिमर्यमुंभ, प्रालंकनृत्यदयकविनिर्वदमिः ॥ प्रेतवजः प्रतिनवंतमपीरितोयः, सोऽस्याऽनवत्प्रतिनवं नवखहे तुः ॥ ३३ ॥ धन्यास्तएव नुवनाधिप ये त्रिसंध्य, माराधयंति वि धिवधिभुतान्यरुत्याः ||जत्योल्लसत्पुलकपदमलदेहदेशाः, पादच यं तव विनो नुवि जन्मन्नाजः ॥ ३५ ॥ अस्मिन्नपारनववारिनि धौ मुनीश, मन्ये न मे श्रवणगोचरतां गतोऽसि || आकर्णिते तु तव गोत्रपवित्रमंत्रे, किंचा विपक्षिधरी सविध समेति ॥ ३५ ॥ जन्मांतरेपि तव पादयुगं न देव, मन्ये मया महितमादितदानदद म् ।। तेनेद जन्मनि मुनीश परान्नवानां, जातो निकेतनमदं मथि ताशयानाम् ॥ ३६॥ नूनं न मोहतिमिरास्तलोचनेन, पूर्व वि जो सरुददि प्रक्लिोकितोऽति ॥ मर्माविधी विधुरयंति हि मामन ः, प्रोद्यत्प्रबंधगतयः कयमन्यौते ॥ ३० ॥ श्राकर्णितोऽपि महि तोऽपि निरीक्षितोऽपि, नूनं न चेतसि मया विकृतोऽसि लत्या ॥ जातोऽस्मि तेन जनयांधवजःखपात्रं, पस्माक्रियाः प्रतिफलंति न भावशून्याः ॥ ३० ॥ त्वं नाथ खिजनवत्सल दे शरण्य, कारु एयपुण्यवसते वशिनां वरेण्य जत्या नते मयि मदेश दयां विधाय, उखाकुरोदलनतत्परतां विदि ॥ ३॥ निःस्व्यसारशरण श रएप, माताय सादितरिपुप्रश्रितावदातम् ॥ त्वत्पादपंकजमपि प्र विधानवंध्यो, वध्योऽस्मि चे वनपावन दा दतोऽस्मि ॥४०॥ देवेश्वंद्य विदिताखिलवस्तुसार, संसारतारक विनो नुवनाधिनार्थ ॥ त्रायल देव करुणाहद मां पुनीदि, सोदंतमय नयदव्यसनात्रु राशेः ॥ ३१ ॥ पयस्तिनाथ जवर्दहिसरोरुहाणां, नक्तः फलं कि .
(१५२) मपि संततिसंचितायाः ॥ तन्मे त्यदेकशरणस्य शरएय भूयाः, स्वामी त्वमेव नुवनेऽत्र नवांतरेऽपि ॥ ५५॥ चं समाहितथियो विधिवकि, सांशेलसत्पुलककंचुकिांगन्नागाः । त्वविनिर्मल मुखांबुनबद्धलक्ष्या, ये संस्तवं तव विन्नो रययंति नव्याः ॥१३॥ जननयन कुमुदचंद, प्रनास्वराः स्वर्गसंपदो नुक्त्वा ॥ ते विग लितमलनिघया, अचिरान्मोदं प्रपद्यते ॥४४॥ इति श्रीक ल्याणमंदिरस्तोत्रं ॥ ॥ अथ शपिमंडल स्तोत्र लिख्यते ॥ ..॥ श्राद्यताक्षरसंसदयं, मदरं व्याप्य यत् स्थितं ॥ अग्निज्या सासमं नाद, विरेखासमन्वितं ॥ १ ॥ अग्निज्वालासमाक्रांतं, म नोमलविसोधकं ॥ देदीप्यमानं हृत्पद्म, तत्पदं नौमि निर्मतं ||शा अईमित्यकरं ब्रह्म, वाचकं परमेटिनः॥ सिद्धचक्रस्य सद्दीजं, स वतः प्रणिदध्महे ॥ ३ ॥ ॐ नमोहन्य ईशेन्य, , सिइन्यो न मोनमः ॥ ॐ नमः सर्वसूरिन्यः, नपाध्यायेच्य नम:शा नमः सर्वसाधून्यः ॥ * ज्ञानेन्यो नमोनमः ॥ नमःत्वदृष्टिन्यः । चा रित्रेभ्यो नमोनमः॥५॥ श्रेयसेस्तु श्रियेस्त्वेत, दईदाद्यष्टकं शुन्नं ॥ स्थानेष्वष्टसु विन्यस्तं, पृथग बीजसमन्वितं ॥६॥ आद्यं पदं शिखां रके, त्परं रकेत्तु मस्तकं ॥ तृतीयं रक्षेन्नेत्रेदे, तुर्थ रकेच्च नासिका ॥७॥ पंचमं तु मुखं रकेत् , पष्टं रक्षेच घंटिकां ॥ नान्यतं सप्त में रहे, इत्पादांतमष्टमं ॥ ॥ पूर्वप्रणवतः सांतः, सरेफोब्धि पंचपान् ॥ सप्ताप्टदशसर्याकान, श्रितोविंधुस्वरान् पृथक् ॥ ५ ॥ पूज्यनामाकरा याद्याः, पंचातोशानदर्शन ॥ चारिप्रेन्यो नमो मध्ये ॥ ही सांतहसमरुतः ॥ १० ॥ ॐ हाँ ही हः हं हैं हैं हौं हः असियानसा ज्ञानदर्शनचारित्रेभ्यो नमः। जंबुवृक्षधरो छोपा, क्षारोदधिसमावृतः ॥ अदायष्टकैरष्टः, काष्टाधिरसंकतः ॥११॥ .
. . " - . . मध्यसंगतो मेरुकूटलकैरसंकत्तः ॥ नच्चेरुच्चैस्तरस्तार, स्तारा खमंमित्तः ॥ १३ ॥ तस्योपरि सकारांत, बीजं मध्यास्य सर्वगं । गामि विधमाईत्यं, ललाटस्य निरंजनं ॥ १३॥ अक्षयं निर्मलं तं, बहुलं जाव्यतोझितं ॥ निरीहं निरहंकारं, सारं सारतर ॥ १३ ॥ अनुतं शुग्नं स्फीतं, सात्विक राजसंमतं | तामसं. संबुद, तेजसं शर्वरीतमं ॥ १५ ॥ साकारं च निराकारं, सरसं 'सं परंपरापरपरातीतं, परंपरपरापरं ॥१६॥ एकवर्ण विवर्ण च, पर्ण तूर्यवर्णकं ॥ पंचवर्ण महावर्ण, सपरं च परापरं ॥ १७ ॥ खं निष्कलं तुष्टं, निदृतं ब्रांतिवर्जितं ॥ निरंजनं निराकार, निलेपं . संश्रयं ॥ १७॥ ईश्वरं ब्रह्मसंवुई, वुई सिद्ध मतं गुरु ॥ तिरूपं मददिवं, लोकालोकप्रकाशकं ।। १५ । अदास्पस्तु. तिः, सरेफो विमितः ।। तुर्यस्वरसमायुक्तो, बहुधा नाद- उत्तः ॥ २० ॥ अस्मिन् पीजे स्थिताः सर्वे, वृपनाद्या जिनो- T: || वर्गेनिजैनियुक्ताः, ध्यातव्यास्तत्र संगताः ॥ ११ ॥ अंसमाकारो, वित्तीलसमपन्नः) कलारूपसमासांतः, स्वर्णान्ता तो मुखः 1) २२ ॥ शिरसंतीनई कारो, चिनीलोवर्णतः स्मृतः ।। 'नुसारसंतीनं, तीर्घकन्मलं स्तुमः ।। २३ ॥ चंद्रप्रनयुप्फदतो, स्थितिसमाश्रितौ ॥ विडमध्यगतोनमि, सुव्रत्तो जिनसत्तमी १॥ पद्मप्रजवासुपज्यो, कलापदमधिष्ठितौ ॥ तिरिस्थिति- नौ, पार्वमती जिनेश्वरी ॥ २५॥ शेषास्तीयकतः सर्व, दर- २ नियोजिताः ॥ मायावी जादरं प्राप्ता, प्रतुर्विशतिरईत२६॥' गिपमोहाः, सर्वपापविजिताः॥ सर्वदा सर्वकालेर, तेजवंतु तिमाः ।। २३ ।। देवदेवस्य यज्ञक, तस्य चकस्य या विना ।। छादितसर्वाङ्ग, मामांदिनस्तमाकिनी ॥ २० ॥ देवदेवस्य २० हिनस्तुराकिनी ॥ २५ ॥ देवदे० मामांदिनस्तुजाकिनी ॥३०॥ २० १५) देव मामांहिनस्तुकाकनी ॥ ३१॥ देवदेवस्या मामांदिनस्त शाकिनी ॥ ३२ ॥ देवदे० मामांदिनस्तुहाकिनी ॥ ३३ ॥ देव मामांहिनस्तुयाकिनी ॥ ३४ ॥ देवदेमामांदिसंतुपलागा ॥ ३५ देवदे. मामांहिनस्तुदस्तिनः ॥ ३० ॥ देवदे मामांहिसंतुराहत ॥ ३२ ॥ देवदे० मामांदिसतुवह्वयः ॥ ३० ॥ देवदे० मामांहित तुसिंहकाः ॥ ३० ॥ देवदे० मामांदिसंतुउर्जनाः ॥ १०॥ देवदेव मामांहिसंतुन्नूमिपा ॥ ४१ ॥ श्रीगौतमस्य या मुज्ञ, तस्या य नुविलब्धयः ॥ तानिरभ्युद्यतज्योति, रहं सर्वनिधीश्वरः ।। १२ । . पातालवासिनो देवा,देवानूपीग्यासिनः|| स्वर्वासिनोपिये देवाः,सर्वे रदंतु मामितः ॥ ४३॥ येऽवधिलब्धयो ये तु, परमावधिसब्धयः॥ ते सर्वे मुनयो देवाः, मां संरकंतु सर्वदा ॥ ४ ॥ उर्जनानूत- वेत्तालाः, पिशाचामुद्गलास्तथा ॥ ते सर्वेप्युपसाम्यंतु, देवदेवप्रना- चतः ।। १५ ॥ ही श्रीन तिर्लक्ष्मी, गोरी चमी सरस्वती, जयांवाविजया नित्या, किन्नाजितामदश्वा ॥१६॥ कामांगा काम- याणा च, सानंदानंदमालिनी । माया मायाविनी रोडी, कला कासी कलिप्रिया ॥ ७ ॥ एताः सर्वा महादेव्यो, वर्तते या जग. प्रये ॥ मां सर्वाः प्रयछंतु, कार्ति कीर्ति ति मति ॥ ४ ॥ विव्यो गोप्यः सुधः प्राप्यः, श्रीरुपिमंमलस्तव ॥ नापितस्तीर्थ, जगत- त्राणरुतेनघः || ४ || रणे राजकुले बन्दी, जसे उगे गजे दरी ॥ श्मशाने विपिने घोरे, स्मृतो रक्षति मान ॥५०॥ राज्य व. हा निजं राज्य, पदघ्रष्टानिज पदं ॥ सक्ष्मीनटा निजी सदमी, प्राप्नुवंति न संशयः ॥५१॥ नार्यार्थी सनते नायर्यो, पुत्राी सनते मुतं ॥ विना बनते वित्तं, नरःस्मरणमात्रतः॥ ५२ ॥ स्वर्ण रुप्पे पटे कास्ये, सि.खत्वा यस्तु पूजयेत् ॥ तस्पैयाटमहासिक्षिः रद यसति शाश्वती ॥ ५३॥ नृयपत्रे लिखित्वेई, गलके मुधिं या ( १५५ ) नुजं ॥धारितं सर्वदा दिव्यं, सर्वन्नीतिविनाशकं १५॥ नूतः प्रे दर्य कैः, पिशाचैर्मुगलैमलैः ।। वातपित्तकफोते, मुंज्यते नात्र संशयः ॥ ५५ ॥ नूर्नुवः स्वस्त्रयीपीठः, वर्तिनः शाश्वता जिनाः॥ तेःस्तुतैवदित है, यत्कलं तत्फलं श्रुतो ॥ ५६ ॥ एतत् गोप्पं महा स्तोत्रं, न देयं यस्य कस्यचित्, मिथ्यात्ववासिनेदत्ते, बालहत्या पदे पदे ॥ ५ ॥ आचाम्सादितपरुत्वा, पूजयित्वा जिनावलीं । अष्टसादस्त्रिको जापः, कार्यस्तत्तिदिहेतवे ॥ ५ ॥ शतमसोनर प्रात, ये पति दिने दिने ।तेपांन व्याघयो देदे,प्रनवंति न वापदः ।। ५५ ॥ अष्टमासावधिं यावत्, प्रातः प्रातस्तु यः पठेत् ।। स्तोत्रमे तन्मदातेजो, जिनबि स पश्यति ॥ ६ ॥ दृष्टे सत्याईते विवे, नवे सप्तमके ध्रुवं ॥ पदं प्राप्नोति शुद्धात्मा, परमानंदनंदितः ।। ६१ ॥ विश्वबंद्यो नवेध्याता, कल्याणानि च सोनुत्ते ॥ गत्वा स्थानं परं सोपि, नूयस्तु न निवर्तते ॥ ६५ ॥ इदं स्तोत्रं महा स्तोत्रं, स्तुतोनामुत्तमं परं ॥ पठनात्स्मरणाकापात्, खन्नते पदमु. नमं ॥६३ ॥शते शपि मंगल स्तोत्रं ॥ केपश्चोकनिरारुत्य मूलयंत्रकस्यानुसारेण लिखितं गणि । श्रोतमाकल्याणोपाध्यायै तदानुसारेण मयापि लिखितं ।। ॥ अथलघुजिनसहस्रनामलिख्यते ॥ नमस्त्रिलोकनाथाय । सर्वज्ञाय महात्मने । वह तस्यैव ना मानि। मोक्षसोशानिलापया || १ | निर्मलः साश्वतोशुः । निर्वि कल्पो निरामयः ॥ निःशरीरी निरातंकः। सिक्ष्सूक्ष्मो निरंजनः ।। २॥ निष्कलंकोनिरालंयो। निोदो निर्मलोनमः। निर्जयो निरदं कारो। निर्विकारोथ निष्क्रियः॥३॥ निदोपोनिरुजः शांतः । नि नयो निर्ममः शिवः । निस्तरंगो निराकारो। निष्कर्मों निष्फलम नुः ॥४॥ निर्वादो निरुपमझान निरागो निरयो जिनः।। निझाद 1 (१५६ ) प्रतिमश्लेष्ठ, । नरकष्टो ज्ञानगोचरः ॥५॥ नि:संगात् प्राप्तकैवल्य नैष्ठकःशब्दवर्जितः॥अनिंद्योमरपूतात्मा।जगत् 'शखरशेखरः।। निःशदो गुणसंपन्नाः । पापतापप्रणाशनः ॥ सोपि योगात ३ प्राप्तः । कर्मयोतिवलावहः॥७॥ यजरो अमरः सिद्ध । अर्चितः दयो विन्नुः | अमुर्तः अच्युतो ब्रह्म, विष्णुरीशः प्रजापतिः।। अनिंद्यो विश्वनाथश्च, अजो अनुपमो नवः । अप्रमेयो जगन्नार वोधरूपो जिनात्मकः || ए ॥ अव्ययसकलाराध्यो, निप्पन्नो ज्ञा लोचनः || अव्यो निर्मलो नित्यः । सर्वशल्य विवर्जितः।।१० अजेयसर्वतो नः । निष्कपायो जातकः॥ विश्वनायः स्वयंबुद्धः वीतरागो जिनेश्वरः ॥ ११ ॥ अंतको सहजानंद । प्रवामाना गोचरः॥ असाध्यशुद्धचैतन्यः । कर्मनोकर्मवर्जितः ॥ १२ ॥ अनंत विमलझानी । स्पृहीश्च निष्प्रकाशकः || कर्मार्जितो महात्मानः लोकत्रयशिरोमणिः ॥ १३ ॥ अव्यावाधो वरः शंनुः । विश्ववेद पितामदः । सर्वनूतहितो देव । सर्वलोकसरएयकः॥ १५॥ प्रान दरूपचैतन्यो । नगवास्विजगगुरुः ॥ अनंतानंतधीशक्तिः । सत्यव्य कव्ययात्मकः ॥ १५॥ अष्टकर्मविनिर्मुक्तः । सप्तधातुविवर्जितः ।। गौरवादित्रयाहूरः । सर्वज्ञानादि रुयुतः ॥ १६ ॥ अन्नयः प्राप्तकैच ल्पः । निर्माणो निरपेक्षकः ॥ निफलं केवलज्ञानी । मुक्तिसौख्यत्र दायकः ॥ १७ ॥ अनामयो महाराध्यो । वरदो झानपायकः ॥ स शः सतसुखावासः। जिनंज्ञे मुनिसंस्तुतः ॥ १७॥ अन्सूनपरम झानी । विश्वतत्यप्रकाशकः ॥ प्रबुदोजगवान्नाथः । प्रस्तुतः पुन्य फारकः ॥१॥ शंकरः मुगतो रौः । सर्वको मदनातकः ॥ ईयरा नुवनापोशः । सचिन: पुरुषोनमः ॥ २० ॥ सदोजातमहारमानं । विमुक्तो मुक्तिरसन्नः ॥ योगीशे नादिसंमिदः । निरोदोकानगोष ॥ १ ॥ सदाशिव चतुर्वकः । सरमास्यविपुरांतकः॥ प्रिनेत्रः ( १५७ ) त्रिजगत्पूज्यः । कल्याणकोष्टमूर्तिकः ॥ २२ ॥ सर्वसाधुजनैवैद्यः । सर्वपापविवर्जितः ॥ सर्वदेवाधिकोदेवः । सर्वभूतहितंकरः ॥ १३ ॥ स्वयंचिद्यो महात्मानं । प्रसिद्धः पापनाशनः ।। तनुमात्रचिदानंदः । चैतन्यश्चैत्यवैलवः ॥ २४ ।। सकलातिशयो देव । मुक्तिस्यो मह तामहः ॥ मुक्तिकार्याय संतुष्टो । निरागः परमेश्वरः ॥ २५ ॥ महा देवो महावीरा । महामोदविनाशकः ।। महान्नावो महादर्शः। म हामुक्तिप्रदायकः ॥ २६ ॥ महाज्ञानी महायोगी। महातपो महा रमकः ।। महर्दिको महावीर्यो । महांतिकपदस्थितः ।। २७ ॥ महा पूज्यो महावंद्यो । महाविघ्नविनाशकः ॥ महासौरयो महापुंसो । महामहिम अच्युतः ॥ २८ ॥ मुक्तामुक्तिजसं बोधः । एकानेकवि निचलः ॥ सर्वबंधविनिर्मुक्तो । सर्वलोकप्रधानकः ॥२५॥ महासून महाधीरो । महावविनाशकः ॥ महामुक्तिप्रदो धीरो । महाह यो महागुरुः ॥ ३० ॥ निर्मारो मारविदंतो । निष्कामो विपयाच्यु तः ॥ लगवंतामहानांतो। शांतिकल्याणकारकः ॥३२॥ परमात्मा परंज्योतिः । परमेष्टी परमेश्वरः ॥ परमात्मा गगनंद । परंपरमया मकः ।। ३२ ॥ प्रस्तुतानंतविज्ञानी । सरख्यानिर्वाणसंयुतः ॥ ना कृति नारो वर्णी । व्योमरूपो जितात्मकः ॥ ३३ ॥ व्यक्ताव्यक्त जसंबोधः । संसारदकारणः ॥ निरवद्यो महाराध्यः । कर्मजित् चर्मनायकः ॥३४॥ वोधसत्सु जगबंद्यो । विश्वात्मा नरकांतकः स्वपनूपापहृत्पूज्यः । पुनीतो विनवः स्तुतः ॥ ३५॥ वर्णातीतो मदातातः । रूपातीतो निरंजनः ॥ अनंतज्ञानसंपर्णी । देवदेवेश नायकः ॥ ३६ ॥ वरेयो नवविध्वंसी । योगिनी ज्ञानगोवरः ।। जन्ममृत्युजरातीतः । सर्वविघ्नहरो दरः ॥ ३२ ॥ विश्वदृक् नव्यसं यः। पवित्रो गुणसागरः ॥ प्रसन्नः परमाराध्यः ॥ लोकालोकप्र काशमः ॥ ३७॥ रत्नगनों जगत्स्वामी । ईश्वंद्यः मुरर्चितः ॥ नि (१५) प्रपंचो निरातङ्कने ॥ नि:शेरलेशनाशकः ॥ ३५ ॥ लोकेशोलो संसेव्यो । लोकालोकविलोकनः॥ लोकोत्तमो त्रिलोकेशो । लोका शिखर स्थितः ॥ ४०॥ नामाष्टकसहस्त्राणि । ये पति पुनः पुनः ते निर्वाणपदं यान्ति । मुच्यते नात्र संशयः ॥४१॥ इति श्री शाहुस्वामिना विरचितं लघुजिनसहस्रनाम संपूर्ण ॥ ॥ अथमहिम्नस्तोत्रलिख्यते । महिम्नः पारन्ते परमविपस्ते जिनपरं गणागीर्वाणाना पिगुणगुरौर्गतुमनलम् ॥ नवम्नं लम्नं त्वाधिपमिहनयस्सर्वकल । नुवनिः प्रापीनाप्रतिहतगतिर्वागमृतजित् ॥ १ ॥ जगत्रातः स्तो किल निरवकाशोप्यहमिहो । यतप्रझो यत्किंचिदचिदनघोचावर वचः । गृणीयां सह्यं तत्तनुन्नुव इवेष्टार्थप्रतिनूपदोपास्ते पाप्तिन यजनयित्र्याशिवमम ||२॥ त्वकांगमासूनोधुतनिधनमूनोयवर ना । सुनामन्नोऽनो स्मरमहमनूनोदयरमम् ॥ अजातानोनानोन वनन्नवने नो वृषन्नरं । व्यधांमोहादेनोरयमधनतेनोत्कटविपत् ॥३॥ सुवोध देया में घनघनघटामेचकतनु । ऊगवय्यारामेमरकुरुहवामे यजिनपाः ॥ हतोयाक्षयामे शितरसमकामेपुविजयो । त्वमर्काली लामे पुरमदजधामे तनमते ॥ ५ ॥ अपारे कुपारे चिरतरमपारे नुवनया । असारे संसारे गदशतविसारे वसमहम् ॥ ध्रुतारेकतारे क्वसि सततारे कितमति । स्तवारे हिड्वारे नवदहनवारे कुरुरूपा ॥५॥ निपीय व्याहारानरममृतधारासुमधुरा । समादेयान्सारान दिमिथुनमाराव्यय विनो॥ ज्वलद्यस्योदाराविषधरकुमाराधिपतिता मनुकोशागारावतुजिनमहाराजसन्नवान् ॥६॥ दिशश्रीमान्दे चव्रजविहितसेवः कुशलता, सताजातेदेवः प्रशमिवरदेवत्वमतमाः ।। तनालानोमेवः परिकरिदरेवत्सलसदा, सदानंदकेवळ्यचसपदमवस्तु तिरुते ॥ .3:॥ कजन्माकार्यकिरवगणकीर्निधवलं, कुत्ररेज्यं ( १५ए ) कूहावततिपरशुंकेतकगुणम् इतं कैवख्यंकोकिलकलरवंकौशलकर ददानं कंकहोपमसुरमराखनुततमम् ॥ ७॥ श्रियः पात्रंगात्रं जवकुशकदानंसुहृदयै रहोरात्रंचानंदधदतनुमानंतवप्रनो पवित्रं सच्चित्रंशुचितरचरित्रंखुतमसाममित्रंयैर्मिनस्तुतपुरुपवित्रंसरणकम् ॥ ए॥ वदान्यस्वछन्दगुदकन्नवैः पीतममलै रिहावन्योधन्याः स फलजनुपस्तेखलुमताः इमेवन्याः सत्वाश्वतुसदसव्यक्तिविकला न चारण्यटन्तकथमपिन्नवत्वनदहसुः॥१॥नजानेईनेतः कुमततिमर प्रावृत्तदृशां गतिम्मदाणादरहरनवित्रीवरदका यदेतेवस्यन्तोप्य निमतफलोत्सर्जनपरी त्वदारयांनोचिंतामणिमिवन्नजन्तेस्तविधयः ॥११॥ त्वमेवेशेदानीमयिचितनुतात्कामपिकपा जवास्ताघोदत्व जलनिपतितं प्रोद्धरतराम् मुहुःखिन्नस्त्वत्यकजशरणमीतोम्यशर पः शरण्योसिश्रेयान्प्रनुदलमकध्वंसन विधौ ॥ १२॥ जयवंधीरत्वा धरितकनकाहार्य्यमदिमा हिमालीप्रान्त्याब्धि प्रतिन्नटगन्नीरत्ववि दितः दितःप्रत्यूदालिः शुनमत जगत्यावनजिना जिनाशीनश्रीरः कुमतिवसुधातीरसततं ॥ १३ ॥ ततंविदोधपरमपुरुपः सिद्धिन गरी गरीयः साम्राज्यंगणधरमहामात्रमदितः हितः कर्तृकाष्टकर पुवलंनञ्जयमहा माहतीर्धेशश्रीनरमतुलमाप्तः एथुमहाः ॥ १४ ॥ महाराज स्तुत्योऽरिततरुसिन्डरतिलको खकोनः पालाकः सकलन विनामोदशमनः मनस्यश्रान्तं मेवरसरतिकादम्बश्वसन वसजी यात्पार्थप्रनुरनघपार्श्वप्रणुतपत् ॥ १५ ॥ तपः श्रीनोलोकोत्तरपद मुपेतःसकल वि । खवित्रंदोपाल यवसलवनप्राप्तचिन्नयः नवध्वस्त्यै नस्तादनुपममदानन्दकलितो लितोविश्वख्यातेरनिशमवदातेगुण गणैः ॥ १६ ॥ पद्यचतुष्कंसिंहावलोकवंधुरम् ।। जवन्तंसद्योग प्रथि तपदवीचारिनिवहा अजस्र विश्रामंप्रलिदधति विश्वेश्वरसमें संस्थाने यन्तिप्रसृमरसितोत्रंखलुखगाः कलावन्ततिश्रुतमतसदाचारनि रताः ॥ १७ ॥ अनन्ततोदोपान्तकनरूप्रकाशोधतमसंदरखो नमलकमलोल्लासमयकम् प्रबोधयातन्वनिततःकरतःपंकदल गञ्जकुः पार्यो दिशतुकुशलंमेसमयन्तः ॥ १७॥ नितान्तसन् मतनुमतांद्यन्नमृतगुःकलानिःसंपूर्णः कुचलयकलानन्दजनकः पेनोरम्यः समुपचितरत्नाकरश्दा बताक्षामापुत्रः सपदिविषद कंपतिः १५ स्फुरत्यासिंपुरं निजतनुरुषाचारुप्रति महौजन्म त्ययप्रनृतिःखानिजलदः बुधोवोधस्फीतिददद विरतराजतनयो यातोतोलोकतनुन्नवनमाप्नोतिबलवान् ॥ २० ॥ घरादित्येशान जनरुविनोगौरकरणः सदापायामासुरगुरुरपायाझिनपतिः । स्फारश्लोकस्तुतिसमुचितोनानुतनय स्तमो विघ्नध्वंसीनकुशल केतुरसितः ॥ २१ ॥ सुरज्येष्ठो-येन्यस्त्रिदसविसरेन्योवरतया लोकेशोनूनंत्रिजगदवनात्वंकमतन्नः सुयोगीश्स्वान्तामलकम न्माधिवसना चतुर्वक्त्र्याश्रेयोजिनपचतुरास्यास्युपदिशन् ॥ २ प्रतीतोदैत्यारिशकममानप्रदलनात्पराय॑श्रीयोगाकमल निल सिलगवन् ननाक वाहिन्या तिशयन्नर चित्तस्त्रिनुक्ने जवाहोग परमपुरुषोतोहरिहयैः ॥ २३ ॥ महेशानोसित्वं त्रिनुबनजनक पतया शिवाशश्वन्नृणांपरमपददानैकसुविधेः अस्तित्वसईझः स जगदौंधकल ना त्रशूलीनोचोयोनवपशुपतिन् विपमहक || २ अवाप्तःश्रेयः श्रीवितरणलोलाविदलिता दितेयायशासीरुदम मतारोतिशयवान् विमुक्तस्वीसनतकुमतनःसुमनसा हित शेपाषांसुरूतपदवंककश्यन् ॥ २५ ॥ जिशाहोरात्रंबहु विपन तमरं कलत्रंयेनात्रकसहरिहरादिःसुरगणः सकानाकए चरितताधूर्तनिवह प्रतारीसदोषः मित्तसततरोपःस्थितिहतः॥ २॥ समयामयामप्रनवन्नयदो बोधरहितः सरुगनव्यपी पुरुऽरित कर नकलितः पुरानोदान्नूतविरमिदस दादोनमहितः सदेवोश्राद्यत्वंय मपिसमासादिमयकाः॥ २७ ॥ प्रनोकिंवामेतैरजिमतविधानेलसतरै रपासोपास्यस्तखलुजिनवरेण्योनवरतम् मनोलिम्मत्वत्यहनजयुगले सम्प्रतिवसन् परामेतिप्रीतिप्रणयकरुणामिष्टसुदृशा ॥ २७॥ अदचंद मांसिन् विपनरमीसदृशं विदायेनाप्रलंधरसिकिलरत्नत्रयमहो दधत्सौवर्णानामुपरिनलिनानाक्रमयुगं पुननिलोनानांधुरिसमतिमदि स्त्वमुदितः ॥ २५॥ लसन्तिः सीमश्री परिकलितमग्नंसुवरण त्रयी मध्य मेघोदधिधरणवास्तोप्यतिनुतः सनादध्यासीनाखिलनृपतिल क्ष्माणिदधत कुतस्तैनैराग्यं शिवयुवतिसंगोत्कमनसः ॥ ३०॥ चलं प्राज्यराज्यविदितविन्नवापास्यलपतो महानंदानन्तामददधिपतेनश्व रतरम् कतेनियत्वंप्रशमरसवादेस्त्यमुमतांमद्दचित्रचित्तेजनयतित चेदंतुचरितं ॥३१॥निकामार्थोत्सृष्ट्या ततवनदष्ट्रयातिशयितं जगद्दा रट्याग्निं स्मकिल जिनविध्यापयसियः त्रिशुद्धयाध्यायन्तस्तवचरणयु मं सुझादया नत स्वेप्टाप्तसुरशिखरिणीशानदधते ॥ ३२ ॥ जग येकाधारादितनरककारानिलयतः समुद्धजिंतून्परिवृढसमंतूनपिकि न तवत्रातर्जन्माजनिजननमुख्याकगणहत् नवेवेशस्तोोपिचनिश मानन्दरसिकः ॥ ३३ ॥ अदीशस्तेशस्तक्रमणवरिवस्यस्यसुमना ननाक्यस्येद्भक्तोयदिवदनुगंमद्यसनितं नितम्विन्यान्वोतः सपदिकुश तस्वपसमं समाङ्गल्यंवाथप्रनवतिनकः स्वामिरुपया ॥ ३४ ॥म जापायाचुदास्तवगुणगणान्नान्तिविशदा स्त्रिलोकीनूजानेसुरपयमणे नानवश्व रसज्ञानांकोट्याप्यमसधिपणोनव्यधिपणो नतानीटेसरव्या मदरपराधतुसरदां ॥ ३५॥ नमस्तुभ्यंसंसृत्यतनुतटिनीतारणतरे मस्तुभ्यं नीमामयसमददन्तावलदरे नमस्तुभ्यसूक्तातिमधुरिमदासी तसुधा समुद्रायामुइयुदवसिततुन्यंजिननमः ॥ ३६ ॥ पादेयाद् हिमालयायसुमनः सन्दोहशुश्रूपितां हिद्वन्दायकलि देनगवते -व्यावतीदेतवे लोकेशेपुरुषोत्तमायमदनामित्रायविश्वत्रयो मित्राय (१६२) फणदोदयायसततंश्रीपार्श्वतुन्यनमः ॥ ३७ ॥ सार्दूलविक्रीनि उन्दः ॥ पवनाशनतारकवरमा नरनिर्जिततारकराजगणः कृत क्षणतारकनेत्रयुगो जिनमामवतारकलारबहे ॥ ३० ॥ तोटकचन्द नवदमलपदाम्मोजन्मसंलग्नचेतो मधुतिमितिजिनेन्द्राप्राञ्जलिःप्रार्थ हम् वितरविततवोधंयेनपश्यामिसाक्षा त्परमपुज्ञपरम्यंत्वामचिन्त स्वरूपम् ॥३ए। मालनीवृत्तम् ॥ श्रीसिद्धपूरितमहामुनिराजसिंहप दप्रसादसनृपंरघुनाथदासम् मांशुद्धशासनसहायकपार्श्वयक पद्मावत प्रणुतसंसृतितोवपार्श्व ॥ ४० ॥ स्तोत्रसद्गुरुनामग4वसंततिलक वृत्तम् ॥ इति पार्श्वप्रनुस्तवः ॥ अहार्ये पुस्तम्बरमशशिमितेहायन यरे नन्नोमासकृष्णेगजमुखतियौजीवदिवसे सुनामस्थानीयेसपदिरयु नाथाहामुनिना स्तवोवामासूनोरचितलिखितोमोदन्नरतः ॥ १ ॥ इतिश्री पार्श्वप्रनोमहिम्नस्तोत्र संपूर्णमगात् || ॥ अथ चैत्यवंदनस्तुति लिख्यते ॥ ॥ अथ सिदाचल चैत्यवंदन ॥ । सिद्धो विजाइ चकी नमि विनमि ॥ मुगी पुंमरी मु निंदो । वाली पकुन्न संबो नरहसग मुणी सेलगो पंथगोय ॥रामो कोमी पंच इविड नरवई नारदो पंडुपुत्ता । मुत्ता एवं अणेगे विम लगिरिमई तिवमयं नमामि ॥9॥इति सिक्षाचल चैत्यवंदनं ॥ तिव।। ॥ अथ श्रीथंभणापार्श्वनाथ चैत्यवंदन ॥ ॥ श्रीसेटी तट मेरु धाम, थंनणपुर गंम || सुरतरु सम सिरि पास सांम, राजे अन्निरांम ॥ १ ॥ विबुधेतर सिरि अन्य देव संतवियाणं दिय थु जलसिरिय नील वण, फण पल्लव मं मिय ॥ २ ॥ सुर नर सुद कुसुमावलीए, सिवफल दायक जाण ॥ श्राराहन जदि एग मा, पावो पद कल्याण ॥ ३॥ , - ॥ अथ श्रीसीमंधर स्तुति ॥ ॥ वंदू जिनवर विहरमाण, सीमंधर साम। ॥ केवल कमला कात दांत, करुणारस धामी ॥ १॥ कांचनगिरि सम देह, कांति रूप लांचन पाय ।। चौराप्ती लख पूर्व आय, सेवे सुरराय ॥२॥ पूर्व विदेद विराजता ए, पुंगरीकनी नांण | प्रन्तु द्यो दरसन सं पदा, कारण पद कल्याण ॥ ३॥ इति श्रीसीमंघर जिन स्तुति ॥ ॥ अथ समेतशिखर स्तुति ॥ ॥ पूरव दीसे दीपतो । गिरवो गिरवर नित्त । तीरथ सिस्त्र र समेतको । चाहूं दरसण चित्त ॥ 3 ॥ प्रयम चरम बारम प्रनु। बावीसम विण वीस ॥ अगसण कर श्ण गिरवरे । शिव पुहता सु जगीस ॥ २ ॥ सुणिये इसपर सूत्र में । जिनवर गणधर वाण ।। नविजन नेटो नगतसुं । तीरथ करण कल्याण ॥ ३ ॥ ॥ अथ पद्मनाभजिन चैत्यवंदन ॥ ॥प्रथम महेसर पदमनान । समरु सुखकारी ॥नावी जिनवर जरह खित्त । मंझण मणिधारी ॥१॥ लांठन वर्ष सुदेद मांन । थिति आयु प्रमाण ॥ परमेसर सिरि वईमान । जिनराज उमाण || २ || उत्तम अमृत धर्मनो ए । विरद निवारक जाण ॥ नावी जिनवर नेटिये । कारण पद कल्याण ॥ ३ ॥ ॥ अथ सरस्वति स्तुति ॥ || अवामा वामा सकलमुन्नयः कालघटना । यिा नूतं पं नगवदनिधेयं जवतिया, दंतर्मत्रं मे स्मरदरमयं सेंममलं नराकार शस्वकप नरपते सिव्द्यतु सते ॥१॥ अविरलशद्दधनोपा प्रक्षालितसकलनूतलककाः ॥ मुनिनिरूपासितचरणा । सर वत्ती दरतु मे ऽरितं ।। 31॥ इति सरस्वती स्तुतिः ॥
(१६४) || दर्शनं देवदेवस्य । दर्शनं पापनासनं । दर्शनं स्वर्गसोपानं दर्शनं मोक्षसाधनं ॥ १ ॥ दर्शनेन जिनेशणां । साधूनां वंदनेन च ॥नतिष्टति चिरं पापं । विहस्ते यशोदकं ॥ ॥ श्रय प्रशा लितं गात्रं । नेत्रे च सफल रुते । मुक्तोदं सर्वपापेभ्यो । जिन तव दर्शनात् ॥ ३ ॥ ॥ इत्या जेह सुलक्षणा, जे जिनवर पूजंत ॥ जे जिनवर पूज्या नहीं, ते परघर काम करत ॥ ॥ वारी चंपो मोगरो, सोवन कूपलियांह ॥ पास जिनेसर पूजसा, पांचू आंगलियांह ॥ ॥ ३ ॥ जीवमा जिनवर पजिये, पूज्याना फल होय ॥ राजा नमे परजा नमे, प्राण न लोपे कोय ॥ ३ ॥ फूलां केरे वागमें, वेवा श्रीजिनराज ॥ ज्यू तारामें चंमा, त्यूं सोने महाराज ॥४॥ जगमें तीरथ दो वमा, सेचूँजो गिरनार ॥ नण गिरि झपन्न समो सरचा, नण गिरि नेमकुमार ॥ ५ ॥ मोहनी मूरत पासकी, मो मन रही लोनाय ॥ ज्यूं मददीके पातमे, लाली सखी न जाय ॥ ६ ॥ राजमती गिरवर चढी, वंदन नेमकुमार ॥ स्वामी प्रज हुन वावमे, मो मन प्राण आधार ॥ ७ ॥ धन ते सांइ पंखियां, वसे जो गढ गिरनार ॥ चूंचं नरे फल फूलसुं, चाढे नेमकुमार ॥ ॥ श्री केशरियानाथङ, नमन करूं चित चाय || शहि बुद्धि मोहे दीजिये, दिन२ अधिक सवाय ॥ ॥ श्रीकेसरियानायके, केसर इंदा कीच ॥ मरुदेवाके लामले, वसे पदामा पीच ||१०॥ इस रागको नाम कल्याण हे, प्रनुजीको नाम कल्याण ॥ सकल, सन्ना कल्याण हे, जब प्रगटी राग कल्याण ॥ ११॥ सोरठ राग सुहामणी, मुखां न मेली जाय ॥ ज्यू ज्यू रात गलतमी, त्यू मीठी थाय ॥ १२ ॥ धंदो कर धन जोमियो, लाखां ऊपर कोमा मरतीला मानवी. लियो कंदोरो तोम ॥ १३॥. .
. .. : (१६५ ) दया गुणारी वेलमी, दया गुणारी खाण ॥ अनंत जीव मुगते गया, दयातणे परिमाण ||१॥ दया मुगतितरु वेलमी, रोपी - श्राद जिनंद ॥ श्रावक कुल मंगन नई, सींची सर्व जिनंद ॥२॥ ॥ अथ नवपद चैत्यवंदनलिख्यते ॥ श्रीअरिहंत नदार कांति अति सुंदर रूप, सेवो सिह अनंत । संत आतम गुण नूप ॥ आचारज नवनाय साधु समतारस धाम, जिन नाखित सिांत सुक्ष अनुन्नव अनिरांम ॥ १ ॥ बोधबीज गुण संपदा ए, नाण चरण तव शुद्ध ॥ ध्यावो परमानंद पद,ए नवपद अविरुद्ध ॥ २ ॥ इह परन्नव आणंद जगमांहि प्रसिद्धो, चिंतामणि सम जास जोग बहु पुन्ये लम्क्षे ॥ तिहुअण सार अपार एह महि मा मन धारो, परहर पर जंजाल जाल नित एइ संन्नारो ॥ ३॥ सिद्ध चक्र पद सेवता ए, सहजानंद सरूप ॥ अमृतमय कल्याणनिधि प्रगटे चेतन नूप || ४ ॥ इति ॥ ॥ अथ पञ्चतिथोंका स्तवन ॥ ॥ सुगुण सनेही साजण श्रीसीमंधरस्वाम, अरज सुणो एक जगगुरु मुझ आशाविशराम ॥ पूरव विदेहें विजय नली पुष्कला 'वई नाम, जिहां विचरे जिनवरजी धन ते नयरी गाम ॥ १ ॥ धन ते लोक सुणे जे जोजनगामिनी वाण, धन ते महियल चरण घरे जिहां जिनवर नाग ॥ धन ते नविजन जे रहे प्रनु तादरे परसंग, वंदनकमल निरखी नित्य माणे नत्सव अंग ॥ २॥ सुगुरु 'मुखें प्रनु सुजस तुम्ही सांजल कान, मिलवाने उससे मन मा हरु धरूं एक ध्यान | नगति जुगति करवानी ठे 'जोम, पण प्रनु लग पहूचीजें तेह नहि पग दो ॥ ३॥ श्रामा डूंगर अति घणा विचवहे नदियां पूर, किम मुझथी अवराये प्रनुजी एटली दूर ।। आँखमली उसको करे जोयवा मुख. जिनराज, पाख मुझ सघली
मली पाई नहि ते विन किम सरे काज ॥ ४॥ वाटमली बहन
कोई न मिले सेंगू साथ,कागलियो लिख प्रापूं हुं जिम तेहने हा
॥ जाणू शशहर सायें कई संदेशा जेद, पण अलगो घई का.
चामे निकले तेद ॥५॥ जो कोई रीते प्रन्नुजी तुमयी एथ अवाय,
तो इण नरतना वासी नविजन पावन श्राय || साहिबनी तो सुन
ज़र सघले सरिखी होय, पण पोतानी प्राप्ति सारू फल प्रति जोष
॥ ६ ॥ अलगो हुँ पण मादरे तुम शुं साची प्रीत, गुण गुणवंतना
आवे हियके खिण खिण चित्त ।। हुं दुं सेवक तुं वे माहरो प्रात
मराम, नदिय विसारूं जी, ज्यां लगि ताहरूं नाम ॥ ॥ साचे
दिलथी मुमशुं धरजो धरम सनेद, करुणाकर प्रनु करजो मोपरि
महिर अद || दूसम काल तणो फुःख टालो दीन दयाल, पालो
विरुद संजालो निज सेवकशुं रुपाल ॥ ॥ आशविलुदा अलग
यकी पण करे अरदास, पण महोटानी महिर उतां नवि थाय
निराश ।। केई वसे प्रन्नु पासे केई वसे ने दूर, राजमहिरनी रीत
सकलने जाणे हजूर । ए॥ शिव सुखदायक नायक लायक स्वा
मि सुरंग, ध्यायक ध्येय स्वरूप लहे निज आत्म उमंग ।। सदिजें
एक पलक जो थाये प्रभु तुझ संग, लान नदयजिन चं लदे नि
प्रेम अन्नंग ॥ १०॥ इति श्रीसीमंधर स्वामी स्तवनं ॥
॥ अथ बीजो स्तवन ।
॥ सफल संसार अवतार ए गगुं, सामि सीमंधरा तुह
नगते नपुं । नेटवा पायकमल नाव दियो घणो, फरिय सु
साय जे वोन ते सुणो ॥ १ ॥ तुह्मशुं कूम अरिहंत शुं राखिये
जिस्यो अरे तिस्यो कर.जोमि करि नांखियें ॥ अति सबल मुज
दिये मोह माया घणी, एक मन नगति किम कर प्रिनवन धणी
३ ॥ जीव प्रारति करे नव . नवी परिग, रीश चटको चढे
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(१६७) लोन वयरी नमे ॥ नयण रस वयण रस काम रस रसीयो, तेम अरिहंत तूं हीयमे नवि वसीयो ॥ ३ ॥ दिवस ने राति हियो अनेरो धरूं, मूढ मन रीझवा वलिय माया करूं ॥ तूंहि अरिहंत जाणे जिस्यो आचरूं, तेम कर जेम संसार सागर तरूं ॥ ४ ॥ कम्मवसि सुख ने उःख जे हुं सहुं, मन तणी वात अरिहंत कि गने कहूं || करि दया करि मया देव करुणा परा, उःख हरि सुरक करि सामि सीमंधरा ॥ ५॥ जाण संयोग आगम वयण पण सुटुं, धर्म न कराय प्रनु पाप पोते घणुं ॥ एक अरिहंत तूं देव बीजो नदि, एद आधार जग जाणजो ब्रह्म सही ॥६॥ धण कणय माय पिय पुन परियण सहू, इस्यो बोल्यो रम्यो रंग रातो बहू ॥ जयो जयो जगगुरु जीव जीवन धरा, वृह्म समोवम नहिं अवर वा ब्देसरा ॥ ७ ॥ अमिय सम वाणि जाणुं सदा सांनढुं, बारवर परपदामांदि प्रावी मिटुं । चित्त जाणुं सदा सामि पाय नलगुं, किम करुं गम पुंडरगिरि वेगखें ॥ ॥ जोलिमा नगति तूं चित्त हारे किस्ये, पुण्य संयोग प्रनु दृष्टिगोचर हुस्ये ॥ जेदने नामें मन वयण तन नखसे, दूरथी दूकमा जेम हियके वसे ॥ ए ॥ जल जलो एणि संसार सहु ए अने, सामि सीमंधरा ते सहू तुम पर्ने || ध्यान करतां सुपनमांहि श्रावी मिले, देखियें नयण तो चित्त आरति टले ॥ १७ || साम सोदामणा नाम मन गदगदे, तेदशु नेद जे वात तुह्म जो कहे ॥ तुह्म पय नेटवा अति छयो टलवलु, पंख जो होय तो सदिय प्रावी मिखं ॥ ११ ॥ मेरुगिरि लेखणी प्रान कागल करूं, क्षीरसागर तणां ध खमिया नरं ॥ तुह्म मि लवा तणा सामि संदेशमा, २६ पण लखियं न शके अछे एवमा॥ १२॥ श्रापणे रंग नरि वात मुख जेटली, उपजे सामिन कहाय मुख तेटली ॥ सुणो सीमंधरा राजराजेसरा, लाम ने कोम प्रर्नु .
. . (१६८) पूर सवि माहरा ॥ १३ ॥ पुत्र नवि मोह वश नेह हुवे जेदने, समरिये एणि संसार नित तेइने ॥ मेघने मोर जिम कमल नम रो रमे, तेम अरिहंत तूं चित्त मोरे गमे ॥ १४ ॥ खलं अरिहंतनुं ध्यान दियमे वस्युं, वापडं पाप दिव रहिय करशे किस्युं ॥ गम जिम गरुमवर पंखि आवे वही, ततखिण सर्पनी जाति न शके रही ॥ १५ ॥ पाप में कऊ सावऊ सदु परिहरी, सामि सीमंधरा तुम्ह पय अणुसर । शुः चारित्र कहिये प्रन्नु पालथु, उख मार संसार नय टालशुं ॥१६॥ तुम्ह हुं दास हूं तुम्ह सेवक सही, एह में वात अरिहंत आगल कह ॥ एवमो मारी जगति जाणी करी, प्रापजो बापजी सार केवल सही॥१७॥ कलश। एम शद्धि वृद्धि, समृद्धि कारण, उरित वारण, सुख करो ॥ नवझाय वर श्री, नक्ति लाग्नें, थुएयो श्री, सीमंधरो॥ जय जयो जगगुरु, जीव जीवन, करी सामि, मया घणी ॥ कर जोमि वलि वलि, वीनवु प्रनु, पूर आ शा, मन तणी ॥ १८ ॥ इति श्रीसीमंधरजीनी स्तुति संपूर्णा ॥ ॥ अथ पंजमी वृद्ध स्तवन प्रारंभः॥ ॥ प्रणमुं श्रीगुरु पाय, निर्मल न्यान नपाय ॥ पांचमि तप न[ ए, जन्म सफल गिर्यु ए || १॥ चव्वीसमो जिनचंद, केवल न्यान दिणंद ॥ त्रिगमे गहगहो ए, नवियराने कह्यो ए ॥२॥ न्यान वई संसार, न्यान मुगति दातार ॥ न्यान दीयो कह्यो ए; साचो सर्दह्यो ए॥३॥ नयन लोचन सुविलास, लोकालोक प्र काश ॥ न्यान विना पशु ए, नर.जाणे किश्यु ए ॥ ४ ॥ अधिक अाराधक जाण, नगवती सूत्र प्रमाण ॥ न्यानी सर्वतु ए, किरियां देशतु ए॥ न्यानी श्वासोच्छ्वास, करम करे जे नास || नारकीने सही ए, कोम बरस कही ए॥६॥ न्यान तपो अधिकार, पोल्या. .
- सूत्र मकारं ॥ किरिया रे सही ए, पण पावे केही एsif- किरिया सहित जो न्यान, हुवे तो अति परधान ।। सोनो ने सूरों ए, शैखे दूधे जरयो ए ॥ ॥ मदानिशीथ ममार, पांचमि अंकर सार ॥ लगवंत लोखीयो ए, गणधर साखियो ए॥ ए॥ ॥ दाल दूजी ।। कालहरानी देशी ।। ॥ पाँचमि तप विधि सजिलो, जिम पामो नवपारो रे ॥ श्रीपरित इम उपदिशे, नवियणने हितकारो रे ॥१०॥१॥ मिगसर माद फागुण नला, लेठ प्रापाद वैशाखो रे ॥ण पट मासे लीजिये, शुनंदिन सद्गुरु साखो रे ॥ पा० ॥ २ ॥ देव जु दारी देहरे, गीतारं गुरु धंदी रे ॥ पोयी पूजो ग्याननी, सगति हुँचे तो नंदी रे ॥ पा० ॥ ३ ॥ ये कर जोमी भावशू, गुरु मुख फरो उपवासो रे ॥ पांचमि पनिझमणो करो, पदो पंमित गुरु पासो रे ॥io || १ | जिंग दिन पांचमि तप करो, तिण दिन भारत टालो रे ॥ पांचमि स्तवन थुई कहो, ब्रह्मचरिज पिणं पा लो रे ॥ ५० ॥ ५ ॥ पांच मास लघुपंचमी, जावजीव उत्कष्ठी रे पर बरस पांच मासनी, पांचमि करो शुनदृष्टि रे ॥10॥६] ।। दाल त्रीजी ॥ उहालानी देशी ।। ॥दिव नवियण रे पांचमी उजमणो सुणो, घर सारू रे धारू धन खरचो घणो । ए अवसर रे पावंतां वलि दोदिलो, पुष्प जोगेरे धन पामतां सोहिले ।। नहालो ।। सोदिलो बलियं धन पामतां पण धर्मकाज किहां वली, पांचमी दिन गुरु पास माची कीजोये फांनस्सग्गरलो रो ज्ञान ररिसण वरणं टीकी दे पुस्तक पूजिये, थापना पहिली पूज केसर सुगुरु सेवा किंजिये ॥ ॥ दास ॥ सिद्धांतनी रे पांच प्रति वोटांगणा, पांच गरे मखमले सूर्य ममुख तणां ॥ पांच मोरारे सेखश पाँच , (१७) मजीसणा, यासकूपा रे कांवी वारू. वतरणां ॥ मल्लालो : ॥ वतरणां वारू वलीद कमली पांच फिलमिल अति जली, स्थाप नाचारिज पांच ग्वणी मुहपत्ती पम्पाटली || पटसूत्र पाटी पंच कोथल पंच नवकरवालियां, इण परें श्रावक करे पांचम जमगुं नजवालियां ॥ २ ॥ ढाल ॥ वलि देहरे रे मात्र महोत्सव कीजि यें, घर सारू रे दान वली तिहा दीजियें ॥ प्रतिमानी रे पागल ढोवणुं ढोइये, पूजानां रे जे जे नपगरण जोयें ॥ नल्लालो । जोश्ये नपगरण देवपूजा काज कलश शृंगार ए, प्रारति मङ्गलया ल दीवो धूपधाणुं सार ए ॥ घनसार केशर अगर सूखम अंगलू इणुं दीस ए, पंच पंच संघली वस्तु ढोवो सगतिशुं पचवीश ए ॥ ३ ॥ ढाल || पांचमिना रे सहान्मी सर्व जिमानियें रात्रि जोगे रे गीत रसाल गवामीये ॥ण करणारे करता ज्ञान प्राराधिये, झान दरिसण रे उत्तम मारग साधि || उल्लालो ॥ साधिये मारग एह करणी शान सहि निरमलो, सुरलोक में नरलोक मांहे ज्ञान वंत ते आगलो ॥ अनुक्रमें केवलज्ञान पामी सासतां सुख जे लदे, जे करे पांचमी तप अखंमित वीर जिवर श्म कहे ॥ ४ ॥ कलश ॥ एम पंचमी तप फल प्ररूपक, वर्द्धमान जिणेसरो ॥ में थुएयो श्री अरिहंत नगवंत, अतुल वल अलबेसरो ॥ जयवंत श्री जिन चंद सूरिज, सकलचंद नर्मलियो ॥ वाचनाचारिज समय सुंदर, नगति नाव, प्रशंलियो ॥ २५ ॥ इति श्रीपंचमी वृद्धस्त वन संपूर्णम् ॥ 11 अथ पार्थजिन अथवा लघुपंचगी स्तवन । ॥ पंचमि तप तुमें करो रे प्राणी, निर्मल पामो शान रे ॥ पदिलु झान ने पठे किरिया, नदि कोई ज्ञान समान रे ।। पं० ॥ ॥ १ ॥ नंदिसूत्र में ज्ञान वखाण्यु, ज्ञानना. पंच प्रकार रे ॥ मति ( ;;; ; श्रुत अवधि अने मनःपर्यव, केवल ज्ञान श्रीकार रे ॥ ५ ॥ मति अगवीश श्रुत चवदे वीश, अवधि व असंख्य प्रकार रे॥ दोय नेद मनःपर्वय दारख्युं, केवल एक प्रकार रे ॥ ५० ॥ ३ ॥ चंड सूरज ग्रह नक्षत्र तारा, तेशुं तेज अाकाश रे ॥ केवलज्ञान समुं नहिं कोई, लोकालोक प्रकाश रे ॥५०॥ ५ ॥ पार्श्वनाथ प्रसाद करीने, महारी पूरो नमेव रे ॥ समयसुंदर कहे हुँ पण पामुं, ज्ञाननो पंचमो नेदरे ॥ ५० ॥ ५ ॥ इति श्रीपार्श्वजि० ॥ ॥ अथ पार्थजिनस्तवनम् ।। ॥ धमल कमल जिम धवल विराजे, गाजे गोमो पास ॥ सेवा सारे जेहनी सुर, नर मन धरिय नल्लाप्त ॥ १ ॥ सोनागी साहिब मेरा बे, अरिहा सुग्यानी पास जिणंदा बे ॥ ए आंकणी ॥ सुंदर सूरति मूरति सोहे, मो मन अधिक सुहाय ॥पलक पलकमें पेखता मानु, नव नवि नविय देखाय ॥ २॥ सोना० ॥ अ०॥ नव अख नंजन जनमनरंजन, खंजन नयनशुं रंग ॥ श्रवण सुणी गुण तादरा मादरा, विकस्यां अंगो अंग ॥३॥ सो०॥ अ०॥ दूरश्रकी हुँ आयो बहिने, देव सह्यो दीदार ॥ प्रारणियां पहिने नहिं साहित्रा, एह नत्तम याचार ॥॥ सो० ॥ १० ॥ प्रनु मुखचंद विलोकित हरपित, नाचत नयन चकोर ॥ कमल इसे रवि देखिने जिम, जलधर श्रागम मोर ॥ ५ ॥ सो० ॥०॥ किसके हरिहर किसके ब्रह्मा, किसके दिल में राम || मेरे मनमें तुं वसे साहिव, शिवसुरखनोही गम ॥ सो०॥ ॥ ६ ॥ मा ता वामा धन्य पिता जसु, श्रीअश्वसेन नरेश || जनमपुरी वणा रसी; धन धन काशीनो देश ।। सो० ॥ अ ॥ ॥ संवत सत रेशें बावीशें, यदि वैशाख वखाण ॥ आग्म दिन नले नांव, मारी जान्न चढी परिमाण ॥ सो० ॥ अ०॥5॥ सान्निध्यकारी . + H (१७) विनिवारी, परनपगारी पास ॥ श्रीजिनचंद जूहारता, मोरीत फल फली सहु आश || सो० ॥०॥ ए ॥ इति ।। ॥ अथ विमलजिनस्तवनम् ॥ ॥ घर अंगण सुरतरु फल्यो जी, कवण कनक फल खाय . रायवर बांध्यो वारणें जी, खर किम श्रावे दाय ॥ १ ॥ विमल. जिन मदारी तुम्हशुं प्रीति, सुर सकलंकितशुं मिख्या जी, दियॉ हीसे केम ॥ वि०॥ ॥ मन गमता मेवा लही जी, कुरा.स्वक खावा जाय ॥ आदर साहिबनो लही जी, कुरा ख्ये रांक मनाय ...वि० ॥ ३ ॥ रत्न ते कुण काचनें जी, अलवे पसारे हाब ॥ कुण सुरतरुथी कनिनें जी, बावल घाले वाय ॥ विए ॥ ५ ॥ देव अवर जो हुं करूं जी, तो प्रनु तुमची श्राण ॥ श्रीजिनराज नवो लवे जी, तुहिज देव प्रमाण ॥ वि०॥ ५॥ इति || ॥ अथ एकादशी वृद्ध स्तवनं ॥ .. ॥ समवसरण बेग नगवंत, धरम प्रकाशे श्रीअरिहंत घारे परषदा बैठी जुझी, मागशिर शुदि ग्यारश. वझी ॥ १ ॥ लिनायना तीन कल्याण, जनम दीका ने केवलज्ञान ॥ अ दीक्षा लीधी रूवझी ॥.मा० ॥ २॥ ननिने कपर्नु केवलज्ञान पांच कल्याणक अति परधान ॥ ए तिथिनी महिमा एवमी। मा ॥ ३ ॥ पांच जरत ऐवत श्मदीज, पांच कल्याणिक हुवे ति: होज, पंचासनी संख्या परगमी || मा० ॥ ४ ॥ अतीत, अनागर गणता एम, दोढशे कल्याणक थाये तेम ॥ कुण, तिय वे ए ति जेवमी । मा० ॥ ५॥ अनंत चोवीशी इण परें गिलो, सान नंत नपवासा तणो ॥ ए.तियि. सदु तिथि शिर राखमी ॥ मा०। मौनपणे रह्या श्रीमति नाथ, एक दिवस संपम व्रत साथ मौन तणी परि व्रत श्म पी ॥ मा० ॥ ७ ॥ अउ पुदरी पोसो ..
लीजिये, चोविहार विधि| कीजिये । परा परमाद न कीजे धमी ॥ मा० ॥ ॥ वरस ग्यार को उपवास, जावजीव पण अधिक दात । एतिथि मोद तणी पाचमी ॥ मा०॥ए। जमणुं की श्रीकार, ज्ञानन नपगरण ग्यार इग्यार || करो कासग गुरु पाये परो । मा० ॥ १० ॥ देहरे स्नान करीजें वली, पोथी पूजीजें मन रखी ॥ मुगतिपुरी की दूकमी ॥ मा० ॥ ११ ॥ मौन ग्यारस महोटुं पर्व, श्राराध्यां सुख ल हे सर्व ॥ ग्रत पच रकाश करो याखको ॥ मा० ॥ १२ ॥जेतात शोल इक्याश। समे, कोई स्तवन सहू मन गमे ॥ समयसुंदर कदे करो यादमी मा० ॥ १३ ॥ इति श्रीएकादशि वृद्ध स्तवन संपूर्णम् ॥ ॥श्रीशांतिनाथ स्तवनं ।। ॥ श्रीसारद मात नमूं सिरनामी, हुँ गानं त्रिनुवनके स्वामी ॥ संतहि संत जप सब कोइ, जां घर शांति सदा सुख होई ॥१॥ सांत जपीने कीजै कांमा, सोइ काम हुदै अनिरामा n शांति ज़ पी परदेश सिधावे, ते कुशले कमला ले आवे ॥ २॥ गर्नयकी मनु मारि निवाररी, शांतदि नाम दियो महतारी ॥ जे नर शांति तया गुण गावे, शाह अचिंती ते नर पावै || ३॥ जा नरकं प्रतु शांति सुहाई, ता नरकू कुठ भारति नाही ॥ जो क 3 सोही पूरै, दालिश दोप मिथ्यामत चूरे ॥ ४ ॥ अलख निरंजन ज्योति प्रकाली, घटर के नीतर प्रन्नु वासी ॥ स्वामि तरूप कह्या नवि जावे, कदितां मो मन अचरज थावै ॥ ५ ॥ मार दिया सबही ह थियारा, जीता मोदतणा दल सारा॥नारि तजी शिवसुं रंग राचे, : राज तज्या पिण सादिव साचै ॥ ६ ॥ मदा बलवंत कहोने देवा, कायर कुंथुन एक दणेवा ।। रुदि सडू प्रनु पास बहीजे, निका हारी नाम कीजे !! || निंदक पूजक हे सम नायक, पिरा .
(१४)
सेवग: सदा सुख दायक ॥ तजी परिग्रह नए नग नायक, नाम
अतीत सबै विध लायक || ७ ॥ सत्रु मित्र सम चित्त गिणोजे,
नाम देव अरिहंत नणी ॥ सयस जीव हितवंत कहीजै, सेवक
नांण महा पद दीजै [[ए॥ सायर जैसा होय गंन्नीरा, दूपण
नदिइक मांदि सरीरा || मेरु अचल जिम अंतरजानी ॥ पिस
न रदै प्रन्नु एकण ठांमी ॥ १० ॥ लोक कहे अनुजी सब देखे,
पिण सुपनो कबहु नवि पेबै ॥ रीस विना बावीस परीसह, सैन्या
जोती तें जगदीसह ॥ ११ ॥ मान विना जग थांरा मनावै, मा
या विना सबसु मन लावै ॥ लोन बिना गुणरास ग्रहोजे, निकु
नये त्रिगमो सेवीजै ॥ १२ ॥ निग्रंयपरी सिर उन धरावे, नाम
जती.पिण चमर ढलावै ॥ अन्नय दान दाता सुखकारण, आगे
चक्र चलै अरि दारण ॥ १३ ॥ श्रीजिनराज दयाल नणीज, कर्म
सबीको मूल खण जै ॥ चौबिद संघ जे तीरथ थापे, लच घणी
देखी नवि प्रापै ॥ ११ ॥ विनयवंत नगवंत कहावै, ना किसदी
कू सीस नमावै ॥ अकिंचनको बिरुद धरावे, पिण सोवन पंकज
पगहावै ।। १५ ।। तजि आरंन निज मातम ध्याच, शिवरमणीकू
साथ चलावै ॥ राग नही सेवग विण तारे, र नहीं निगुणा
संग वारै ॥ १६ ॥ तेरी महिमा अदनुत कहिये, तेरे गुणांको पार
न लहिये ॥ तुं प्रनु समरथ साहिब मोरा, हुं मनमोहन सेवक
तोरा ॥ १७ ॥ तूं त्रिहुँलोकगणो प्रतिपाला, मे हुँ अनाथ तूं दीन
दयाला ॥ तुं सरणागत राखण धीरा, तुं प्रनु तारक चै बमवीरा
॥ १८ ॥ तुम जेसे वमन्नागज पायो, तो मेरो कारज चढ्योस
वायो । कर जोमो. प्रनु चीन, तोसु, करो रुपा जिनवरजी मोतुं
॥१॥ जामण मरण निवारो-तारो, नवसायरयो पार तारो
श्रीदयणापुर ममण-सोदे,,तिहां जिन शांति · सदा मन मोहे
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, ( १७५ ) ॥ २० ॥ पद्मसूरि गुरुराज पसाय, श्री.गुणसागरके मन-नायै ।। जेनर नारीक चित गावै, मन वंचित फल निश्च पावै ॥२१॥ इति श्रीशांतिनाथ स्तवनं ।। ॥ अथ चोरासी आसातना जिनमंदिरकी स्तवनं ।। ॥ दाल ॥ विलसै ऋद्धि समृद्धि मिली ॥ ए देशी ।। ॥ जय२ जिस पास जगत्र धणी, सोना तादरी संसार सुणी ॥ श्रायो हुँ पिण धर पास घणी, करवा सेवा तुम चरण तणी॥१॥ धनर जे न पके जंजालै, उपयोगसुं वैसे जिन भाले ॥ श्रासातना चनरासी टाले, सावता सुख तेहिज संन्नाले ॥२॥ जे नाखे श्लेपम जिनदर में, कलह करै गाल) जूये रमै ॥ धनुपादि कला सीखरा दू, कुरलो तंबोल नसे यूकै ॥३॥ सुरेवाय वमो लघुनीत तणो, संझा कंगुलिया दोप सुणो ॥ नख केस समारण रु घिर क्रिया, चांदोनी नाच चांममियां ॥ ४॥ दातण ने वमन पिये कावो, खावे घांणी फूली खावो ॥ सूवे वेसामण विसरावे, अज गज पशु ने दामरा दावै ॥ ५ ॥ सिर नासा कान दशन श्राखे, नख गाल वपुपना मल नाखै ॥ मिलयो लेखो करे मंत्रशो, विह धन अपणो कर धन धरणो ॥६॥ वैसे पग कपर पग चढिया, यापै गया मै ढुंदगियां ॥ सुकवै कप्पा पप्पम मियां, नासीय ठिपै नृप जय पमियां 11 ॥ शोके रोवै विकथा न कहै, इहां संख्या वैतालीस सहे॥ हथियार के ने पश्रु बाँचे, तापै नांगो परखे रो ॥ || नांजो निस्सही जिनगृह पेसे, घरै ग्त्र ने मंमपमें वैसे । पहिरै वस्त्र भने पनदो, चामर वीम मन ठांम नही ।। तनु तैल सचित्त फल फूल लियै, भूपण तज थाप कुरूप श्रियै ।। दसणधी सिर अंजली न धरै, इगसाफ़ ननरासंग न करे ||१०|| . गोगो सिरपेच मोम जोम, दमिये रमने वेसे होम || सपणासु जुहार करे मुजरो, करे नंम घेटा कहै वचेन चुरौ ॥११॥ धेरै धं रणो जगमे नवंगी, सिर गंधे यांचे पालंगे। पसारे पंग पहरे चावमि यां, पग झटक दिरावै उखनियां ॥ १२ ॥ करदम लू है मैथुन ममें, जू श्रावलि अँठ तिहां ठंमै । नघामे गुम करे वयदा, कादे व्या. पार तणी कयदा ॥ १३॥ जिनहर परनालंनो नीर धरे, अंघोले पीवा नाम नरे || दूपण जिनन्नवनमें ए दाख्या, देववंदननाप्यमें जे नारख्या ॥ १४ ॥ सुज्ञानी श्रावग सगति उता, पासातन टाँसे बारसता, परमाद वसे कोई थाये, पालोयां पाप सह जाये ॥१५|| तंबोल ने नोजन पांन जूषा, मल मूत्र सयन स्वो नोग हुआ। पण पनह) ए जघन्य दसे, वरज्या जिनमंदिर मांहि बसे ॥१६॥ इच्यत मे लावत दोष पूजा, एदनादिजनेद कहा दूजी ।। सेवा अनुनी मन शुइ कर, वंचित सुख लोला तेह वर ॥१७॥ फैलश ॥ इम नव्य प्रांग नाव प्राणी, विवेकी शुन यातना ॥ जिनपिंत्र घरचे परी वरजै, चोराती पासातना ॥ गोत्र ती फर घरजे, नमें जेदने केवलो ॥ उवमाय श्री प्रसीद बी, जन शासन ते वसी॥ १०॥ इति श्री मोरासी पासातना स्तम्॥ ॥ अथ चोत्रीम जिन देप्रमाण स्तवन लिख्यते ।। ॥ प्रण, रुपन जिनेतर प.य, धनुष से की काय ॥ पी जो प्रजित जिन मुझ मन वर्ग, मां धनुष सादारले ॥ १ ॥ तीजो संनव मुख दातार, वी काय धनुष सो यार । अनि दन जिनमुं मन लीन, देद धनुर सो साहातीन ॥२॥ पंचम सुमतिनाय नगवान, धनुष तीनो देवी मांन ॥ पदम मन.पूरे मन प्रास, देव धनुर दोबसे पचास ॥ ३॥ सानिमुरत समन रोप, देव प्रमांरा अनुप सो दोप॥ मंदाग्नु जिन मुजमन यत, बेड . -- . ममाण धनुप दोढसै ॥ ४ ॥ सुविधनाथ नमिये सुविवेक, नव माण धनुष तो एक ॥ शोतलनाय नमें जंग सवे, देह प्रमाण ध नुप जसु निवै ॥ ५ ॥ श्री श्रेयांस नमूं उससी, नंच प्रमाण धनुष तनु असी ॥ वासपूज्य बारम जिन चंद, मान धनुप सित्तर सुख कंद ॥ ६ ॥ विमल गुणकर गंतोर, साठ धनुष जसु मान सरीर ॥ अनंत ज्ञान अनंत प्रकाश, देह प्रमाण धनुष पचास ॥ ७ ॥ पनरम धरमनाथ जगदीस, मान धनुष जस पेंतालीस ॥ शांति फरण शोलम जिन शांति, देह धनुष चालीस सोनंति ॥॥ सतरम कुंथु जिन जगदाधार, मान धनुप त्रीस नदार ॥ पर अ गरम दीनदयाल; त्रोस धनुप तन अति सुविशाल ॥ ए ॥ मलि नाय जिन नगणीसमो, मान पचीस धनुष पय नमो || वीतम मुनिसुव्रत श्ररिहंत, वीस धनुप तनु मान कहंत ॥ १० ॥ श्क। सम नमिजिन राजान, धनुप पनरे तसु रूप निधान ॥ वावीतम श्रीनेमजिनंद, दस धन दी जांण दिणंद ॥ ११ ॥ तेवीसम श्री पारसनाथ, नील वरण सोदे नव हाथ ॥ चोवीसमा जिनवर श्री चीर, सात हाथ जगनाथ सरीर || १३ ॥ण परि ए जिनवरं चो चीस, प्रणमें प्रद शम धरिय जगीत || तां पर शदि सिद्धि नव रंग, रंग विनय प्रणमें मुनि रंग ॥ १३ ॥ इति श्री चोवीस जिन देदमांन स्तवनं ॥ ।। अथ चोवीस जिन आयु प्रमाण स्तवनं लिख्यते ।। । रुपनदेव प्रण, जिनराय, लाख चोरासो पूरब श्राय ॥ वी जो अजित जसु सूत्रे सारख, पान बदुत्तर पूरब साख ॥ १॥ ती कर संनव तीसरो, पांच लाख पूरब साठरो ॥ अभिनंदन पूरै मन प्रास, पाउ लाख पूर्व पंचात ॥२॥ सुमतिनाथ पंचम जगदीत, आन लाख पूरब चालीस ॥ श्री पदममनूनी ए मितः ॥ . . २३
(१)
चाण, लाख. तीस पूरव परिमाण ॥ ३ ॥ श्री सुपार्श्व लाख पूरत्र
वीस, दस लख पूरव चंदप्रन्नु ईस ॥ सुविधनाय लख पूरव दोय,
इक लख पूरव शीतल थित होय ॥४॥ श्रायु वरस चोरासी
साख, श्री श्रेयांस तणी श्रुत साख ॥ लाख बहुत्तर वरसा तणो,
वासुपूज्य परमायुप गिलों ॥५॥ विमल आयु लख साठ. वरीस,
बरस अनंत तणो लख तीस ॥ लाख वरस दस घरम दिशंद,
साख वरस श्री शांतिजिणंद ॥ ६ ॥ वरस सहस प्रिति पयाणवे,
श्री कुंथुनाथ तणी संन्नवै ॥ सहस चोरासी अर जिनतणी, मल्लि
सहस पचावन नगी || ७ ॥ वरस संपूरण त्रीस हजार, मनिसु
व्रत. परमाउ नदार || वीस सहस ननिजिन थित नपणी, वरस स
इस नेमीसरतणी ॥ ॥ पास वरस एक सो सुखकंद, वरस
बहुत्तर
वीरजिणंद ॥ झपनतणा तेरे अवतार, सात चंद शंतो.
सर वार ॥ ए॥ सुव्रत नव नव नव नेमीस, पार्श्व वीर दत. सत्ता-
वीस ॥ निहुं नव सतरे जगदोस, सगला नव एकसो अमतीस
॥.१० ॥ सिह लही सहुने धन धन्न, गणधर चवदेसै बावन्न
सदुनें मुनि लख. अपवीस, सहस कपरै अमतालीत ॥ ११॥ ला
चमाल व्याल हजार, पमधिक सहु साधवो सो च्यार ।। श्राव
लाख पचावन धुरै, अमतालीस सहस ऊपरै ॥ १२ ॥ एक को
श्रावका सुजगीस, लाख पांच सहस अमतीस ॥ ए संघ चतुर्वि
सहु
जिनतो, रंग विनय प्रणमें हित घणो ॥ १३ ॥ इति
चोवीस जिन आयु प्रमाण स्तवनं ।।
॥ अथ तेसठ शलाका पुरुप स्तवन लिख्यते ॥
॥ ढाल १ ॥ धरम महारथ सास्य सारं ॥ ए देशी ॥
सद्गुरु चरण कमल मन धारं, त्रेसर उत्तम नर अधिकार
पनासु श्रुत अनुसारं ॥.जेहने नाम लियै निसतारं, आपण सफल
..
कामसम . नदार, (१७) दुवै अवतारं, पामीजै नव पारं ॥ १ ॥ रुपन्न अजित संनंब अ- निनंदन, सुमति पदमप्रनु नयनानंदन, सत्तम तेम सुपास || चंड- प्रन्नू ने सुविध शीतल जिन श्रेयांस, वासपूज्य जिन सुरमणि, विमल गुणेकर वास ॥ २ ॥ अनंत धर्म श्री शांति जिनेसर, धुनाथ श्रर मल्लि सुहंकर, मुनिसुव्रत नमि नेम | पार्श्व वीर ए जिन चोवीस ॥ जग वछल जगगुरु जगदीस्त, प्रहमीजैपर प्रेम ॥३॥ 1. दाल २ जी ॥ प्रथम सुपन गन निरख्यो । ए देशी । प्रश्रम नरत नरकंद, बीजो सगर सुरिंद ॥ मघवा तीजो चौथो सनतकुमार ॥ ४ ॥ पांचमो शांति चकोस, हो कुंधु गणीत ॥ सातमो अरि नरनाथ, भाग्मो संनूमि सनाथ ॥ ५॥ नवमो पदम नरेस, हरिषेण दसमो कहेस ॥ ग्यारम जय तांम, बारम ब्रह्मदन नाम ॥ ६ ॥ एह चक्कीसर वार, सिणगार | मघवा सनतकुमार, पोहता सरग मझार || ७ ॥ स- लूम अने ब्रह्मदन, सनम नयर निरत्त ॥ श्राउ थया सिवगामी, ते प्रामुं सिरनामी ॥७॥ ॥ दाल ३ जी ॥ मुनिवर आर्य सुहस्ति ॥ ए देशी ॥ ॥ पहिलो त्रिपृष्टि जाण, दिपृष्ट दूसरों, तीनो स्वयंप्रन्नु जा- लिये ए॥ पुरुषोत्तम ए चोश्रो, पंचम परगमो, पुरुषसिंद परमाणिये ए॥ ॥ हो पुरुष पुंगरीक, दत्त तिम सातमो, लक्ष्मण नामे प्रारमो ए ॥ नवमो कृष्ण नरेस, ए. नव केसवा, प्रद की ए पिरा नमूं ए ॥१॥तिहां पहिलो वासुदेव, नारकी सातमी, पांच गया ए ॥ सातमो पंवत्री नेर, चोयो प्रातमो, नवमो तीजी नारीपाए ॥ ११ ॥ अक्ष विजय में जम, सुन्नु सुदर्शन, श्रानंद नंदन शुन मता ॥ रामचंद बलन्नई, बलदेव ए नब, पाठ.धयो तिहां तिव गती ए॥ १२ ॥ वसनद ब्रह्म देवलोक, क्षेत्र जरत . . प्रगला . , (१००) काल उसप्पणी, जास्यै सिव रुपण सासने ए ॥ प्रयवा निपुलाक नाम, तीर्थकर दोस्ये, चवदमो इम बहुश्रुत जरो ए ॥ १३ ॥ ॥ दाल ४ ॥ कुमरपणे प्रभु रहतां काल मुखै गमेए । प देशी॥ अस्वग्रीव ने तारक मेरुकवलि मधु तिताए, निशुन्न वसय प्रहलाद, रावण जरासिंधु जिसा ए ॥ ए नव प्रतिवासुदेव नरक गति गामिया ए, ते पिण नावि जिनेस केई प्रणमुंमुदाए॥१४॥ । हाल ५ ॥ सफस संसारनी । ए देशी ॥ शाति में कुंयु परि पद नव एकदो, चक्रधर तीर्घकर दोप पदवी सदी ॥ वीर वासुदेव अरिदंत नव जूजूमा, देव सिणसाव पिश जीव गुणसठ श्रया ॥ १५ ॥ वासुदेव बलोय यलोय केरा पिता, एकदिज ग्राप नव एण सेखे पता || तीन पक्रपर राणा मिलिय चार टल्या, एम प्रेसग्ना तात कारन मिया ॥ १६ ॥ तीन नयनतणी टाल दीजे इसे, माय सहनी पसार लेखे इसे ॥ एद नररपणनो प्यान नित जे परे, तेद मुरपद सदी मोश पदवी घरे ॥१०॥ - मग॥ हम पुरपा तीर्थकर बदामर वासुदेव पातदेय ए, प्रशित. देव गुसेव जेदनी करे गुरनर सेय ए | प्रेसर गलाका पुरुष बन शान सपनो सदा, रामे तेदना गरण पंकन नम मुनि वा मुदा ।। १८ ॥ इति प्रेसन ससाका पुरुष स्तयनं ॥ ॥ अथ मेधुंजगिर्ग म्नानं ॥ मी दिमसाना सिर हितो, यादीगर प्रहरीईन || तुगत धर्मनिवारको, नप जलनगवंत ॥ श्री मुझ पानी पो, सो दिन माप निगम ग्वामीधी गगन नाम श्री गगनाहाना, सः . (११) तणे परिवार ॥ श्रादि जिनंद समोसरचा, पूरब निन्नायूँ : बार ।। श्री ॥ ३ ॥ अचिरा विजयानंदने, जगबंधव जगतात ।। पण शिरचनमासे रह्या, थिवर कहे ए वात ॥ श्री० ॥ ४ ॥ पामे शिव सुख साश्वता, गणधर श्री घुमरीक ॥ घुमरगिरि तिण कारणे, नगति करो निरजीक ॥ श्री }} ५॥ नमि ने विन मि सहोदरू, विद्याधर बलवंत । सेज शिखर समोसरया, जे गरुपा गुणवंत ।। श्री० ॥ ६ ॥ थावचा मुनिवर सुक, सहस परिवार || पंथग वयणे जागियो, सो सेलग अणगार ॥ श्री० ॥७॥ पांव पांव महावलो, सुणि जादव निरवाए ॥ ते सोधा सिद्धाचले, सुर नर करै वखाण ।। श्री० ॥ ७ ॥ इम सीधा इण मूंगरे, मुनिवर कोमा. कोमि || पाज चढंता सांभर, ते प्रणमूं करजोमि ॥ श्री० ॥ ७ ॥ जे वाघण प्रतिबूझवी,ते दरवाजे जोय॥ गोमुख यक्ष कवम मिली, सानिधकारी द्रोय ॥ श्री० ॥ १०॥ ने विधसुं यात्रा करै, सुर नर सेवक तास ॥ राजसमु गुण गावता, अविचल लोल विलास श्री० ॥ ११ ॥ इति ॥ स्तवन ॥ अथ श्री सिद्धाचल स्तवनं लिख्यते ॥ ॥ देसी गरवानी ॥ श्री सिदाचल मंमय स्वामी रे, जग जीवन अंतरजांमी रे, एतो मण हूं सिरनामी, यात्रीमा जात्रा निनायूं करिये सार। श्रीशपन्न जिनेसर राया रे, जिहां पूरब निनाणूं आया रे, मनु समवसरया सुख दाय ॥ या०॥ २॥ चेत्रो पूनम दिन वखायो रे, पांच कोमिसुं घूमरीक जांणोरे, जे पांम्या पद निरवाण, || या० ॥३॥.नमि विनमि राजा सुख संत रे, वे वे कोमिसु साधु संघाते रे, एतो पोहता पद लोकांत || या० ॥ ४ ॥ काती पूनम कर्मने तोकी रे, जिहां सीधा मुनि दस कोमीरे, ते बंदो चे. कर जोमी ,
(१२)
अतंरख्यात साथ
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॥ या ॥ ५॥ म जरतेसरने पाटे रे,
थाटे रे, पांम्या मुगति तस! ए वाट | जा० ॥ ६ ॥ दोप सदस
मुनी परवारे रे, श्रावच्चा सुत सुखकारे रे, सय पंच सेजग अणगार
॥ या० ॥ ७ || देवकी सुत सुजगीसे रे, सोधा बहु यादवयंसे रे,
ते नमो रे नमो मन हीसे || या० ॥ ॥ पांवे पांव इण गिर
आया रे, सोधा नव नारद झपिराया रे, बली संघ प्रजन कदाय
॥ या० ॥ ॥ ए तीरथ मदिमावते रे, जिहां सीधा साधु अनंने
रे, म जाप्यो श्रीजगवंत ॥ या० ॥ १० ॥ नऊत गिर सम नमी
कोई रे, तोरय सगलामे जो रे, जे फरस्यां पाचन दो ॥ या०
॥ ११ एकादारी ने सचिन पदार) रे, पदनार ने नूमि संधार।
रे, गुद्ध समकित ने ब्रह्मचारी ॥ या०॥ १२ ॥ म हरी जे नर
पारे, पदं दांन मुपाने पालेरे, ते जनम मरण जय टासे
॥ पा० ॥ १३ ॥ धन? ते नर ने नारोर, नंट शिमलायला
तारी, जय तेदनशी बलिमारी ॥ या०॥ १५ ॥ श्रीजिन
सरि मुरनाये रे, जिन दिपे हुलसाय रे, इम मिलाया गुण
॥ या 10 निप॥
(१७३)
वरस संख्याता बलि विकलें, वेष घरया उख धामी रे ।। ज०
॥ ४ ॥ मु०॥ सुर नर तिरि वली नरकतणी गति, पं.दीपणो
धारयो रे ।। ज०॥ चोवीसे दमक मांदि नमियो, अब तो हूं पिण
हारयो रे ।। ज० ॥५॥ मु०॥नव नाटक नित करतो नव नव,
हूं तुम पागल नाच्यो रे ॥ ज० समरथ सादिव सुरतरु सरियो,
निरखी तुझने यायो रे ॥ ज० ॥ ६ ॥ मु० ॥ जो मुझ नाटक
देखी रीच्या, तो मन वंचित दीजे रे ॥ ज०॥ जो नवि ज्या
तो मुझ नाखो, बाल नाटक नवि कीजे रे ॥ ज० ।। ७ ।। मु० ॥
लालच धरि हूं सेवा सारूं, तुं उखमा नवि कापे रे ।। ज० ॥ दाता
सेती सुंम नलेरो, वहिलो उत्तर प्रापे रे ॥ ज० ॥ ॥ मु०॥
बुझ सरिपा साहिब पिरा माहरो, जो नवि कारज सारो रे ॥ज०॥
तो मुझ करमतणी गति अवलो, दोत न को तुमारो रे।। ज० ए॥
नु० ॥ दीनदयाल दया कर दीजै, सुध समकित सह नाणी रे ॥
न०॥ सुगुण सेवकना बंचित पूरो, तेहिज गुणमणि खाणी रे॥
न० ॥१॥ मु०॥ वर्ष अढारै गुणतालीसे, ज्येष्ट सुदी सोमवारो रे ॥
10॥ लालचंद प्रतिपद दिन नेटया, बीकानेर मकारो रे || ज०
११ ॥ मु० ॥ इति श्री एकमदिन झपनदेव स्तवनं ॥
॥ अथ अमावस दिनका महावीर स्तवनं ॥
॥ वीर सुणो मोरी वीनती, करजोमी हो कहुं मननी वात
चालकनी पर वीन, मोरा स्वामी दो तूं त्रिनुबन तात ॥ बी.
१॥ तुम दरशरा विन हूं नम्यो, नव मांहे दो स्वामीसमुश्म'
हार | उस्क अनंता में सह्या, ते कदितां दो किम श्रावे पार ।।
10 ॥ २ ॥ पर उगारी तूं प्रन्न, उख जे दो जग दीनदयाल
तिण तोरे चरणेहूं यावियो,सामी मुझने हो निज नयण निहालं
वी०॥३॥ अपराधी पिण कपरया, तें कीधी हो करुणा. मो
(१४) रा स्वाम ॥ दुतो परम जत ताइरो, तिण तारो दो नहीं ढोलतो काम ॥ बी० ॥ ४ ॥ सूलपाण प्रतिवूझव्या, जिण कीधा हो तुम ने नपसर्ग ॥ मंक दियो चमकोसिये, ते दीपो हो तसु पाठमो सगी ॥ बो० ॥ ५ ॥ गोसालो गुनहोण घणो, जिरा बोल्या हो तोरा अवरणवाद ॥ ते बलतो ते राखीयो, सीतललेस्या हो मंकी सुप्र साद ॥ वी० ॥ ६ ॥ ए कुरा जालियो, म कहतों हो पा यो तुम तीर ॥ ते गोतमनें तें कियो, पोतानो हो प्रनुतानो बजी र || वा० ॥ || वचन नयाप्या ताहरा, ते जगज्यों हो तुम साथ जमाल । तेहनें पिरा पनरे नवे, शिवगांमी होते कीघो कपाल ॥ बी० ॥G || एमत्तो रिप जेरम्यो, जल मांहे हो बांधी मोटीनी पाल || तिरती मूकी काउलो ते तारयो हो तेहने ततकाल || वी० ॥ ॥ ॥ मेघकुमर ऋषि दूव्यो, चित चूको हो चारितयो अपार || एकावतारी तेहने, ते कीयो हो करुणा नंमार ॥ वी ॥ १० ॥ वार वरस वेस्या घरे, रह्यो मूंकी हो संजमनो नार ।। नंदिपेण पिश परयो, सुर पदवी हो दीधा अति सार॥ वी० ॥ ११॥ पंच महाव्रत परिहरी, ग्रहवासे हो वस्यो वरस चोवीस ॥ ते पिण आइकुमारने ॥ ते तारयो हो तोरी एद जगीस ॥ वी० ॥ १२॥ राय श्रेणक रांगी चेलणा, रूप देखी हो चित चूका जेह || समवसरण साधु साधवी, तें कीधा हो धाराधिक तेह । वी० ॥१३॥ विरत नही नही पारखमी, नही पोसो हो नही आदर दीख ॥ते पिण श्रेणिकरायनें, तें कीधो हो सामी श्राप सरीख ॥ वी || १४ || म अनेक ते घरया, कटुं तोरा हो केता अवदात ॥ सार करो हिव मादरी, मनमांहे दो प्राणो मोरमी वात 'वी ॥ १५ ॥ सूधो संजम नहि पले, नही तेहयो हो मुझ दरसण ज्ञान !| पिस प्राधार 3 एतलो, इक तोरो हो धरु निश्चल ध्यान .
(१५.) बी० ॥ १६ ॥ मेह महितल वरसतो, नवि-जोवे दो सम विखमी. गंम ॥ गिरुवा सहजे गुण करे, स्वामी सारो हो मोरा वंगित. काम । वी० ॥ १७ ॥ तुम नामे सुख संपदा, तुम नामे दो उख जाये दूर ॥ तुम नामे वंचित फलै, तुम नामे हो मुज आनंद पूर । वी० ॥ १७ ॥ कलस इम नगर जेसलमेरु मंगन, तीर्थकर चोवीसमो || सासनाधीश्वर सिंह लंग्न, सेवतां सुरतरु समो ॥ जिनचंद त्रिसलामात नंदन, सकलचंद कला निलो, वाचनाचारज समयसुंदर ॥ संयुएयो त्रिनुवन तिलो ॥ १५ ॥ इति श्री माहा चीर जिन स्तवनं ।। ॥ अथ चोवीस दंडक स्तवनं ॥ ॥ दाल १ ॥ आदर जीर क्षमा गुग आदर ।। ए देशी ॥ .॥पूर मनोरन पास जिनेसर, एह करूं अरदास जी ॥ ता रण.तरण विरुद तुम सोनलि, पायो हूं धर पास जीपू॥१॥ इण.संसार समु अथागै, नमियो नवजल मांहिजोगिलगिचिया 'जिम आयो गिमतो, सादिव दाथे सादि जी ॥ पू० ॥ २ ॥ तूं ज्ञानी तोपिण तुझ श्रागै, वीतक कहिये वात जी चोवीसे दम क हूं नमियो ।। वरणूं तेह विख्यात जी ।। पू० ॥ ३ ॥ साते न 'रकतखो इक दमक, असुरादिक दस जाण जी ॥ पांच थावर में तीन विकलें ॥ नगणीस गिणती प्राण जी ।। पू० ॥ ४ ॥ पंचें ही तिर्यच ने मानव, एद थया कवीत जी ॥ व्यंतर ज्योती में वैमाणिक, इम दमक चोवीस जी ॥ ५० ॥ ५ ॥ पं.दी.तिर्यच भने नर, परयाप्ता जे होय जी, ए चोविद देवांमें कप, इम देवां गति दोय जी ॥ पू० ॥ ६ ॥ असंरण्यात आनखै नर तिरि, निद देव ज थाय जी ॥ निज प्रामदै सम के उ, पिण अधिके नवि जाय जी ॥ पू० ॥ ३॥ नवनपती के व्यंतर ताई, समूर्छिम तिर्यंच २० . जी ॥ सरंग प्रोग्मां तां पोहचे, गरजज सुस्त संच जी॥ पू० inान संख्याते जे गरनज, नर तिरजंच विवेक जी ॥ बाद पृथवी ने वलि पाणी, वनस्पती प्रत्येक जी ॥ पू० ॥ए। पर्याप्त सूण पांचे गामे, श्रावी ऊपजै देव जी ॥ण पांचा मांदे पिट आगे, अधिकाई कहुं देव जी ॥ पू० ॥ १० ॥ तीजा सरगथर्क मांमी सुर, एकेंसी नवि थाय जी ।। अहमयी ऊपरला सगसां मानवमांडे जाय जी ॥ पू० ॥ ११ ॥ ॥ दाल || २ || आज निहेनोरे दीसै नाइलो ॥ ए दसी॥ नरकतणी गति आगति इण परे, जीवनमै संसाराादीय गति में दोय प्रागत जांगिये, वलिय विशेष विचार ॥०॥१२॥ सं- ख्याते आयु परजापता, पंचंही तिरपंच ।। तिमहीज मनुष्य एहि- ज वे नरकमें, जायै पाप प्रपंच ॥ न० ॥ १३॥ प्रथम नरक लग जाय असन्नियो, गोद नकुल तिम बीय ॥ गृद्ध प्रमुख पंखी ब्रीजी लगे, सींद प्रमुख चोथीय ॥ न० ॥१४॥ पंचमी नरकै सीमा सा पंजी, वह लग स्त्री जाय ॥ सातमिये माणस के माग्यो || कप जै गरनज प्राय ॥ न० ॥१५॥ नरकथकी श्रावे बिहुँ दम, तिरयंच के नर थाय ॥ ते पिण गरजज ने परयापता ॥ संरख्याती जसु प्राय ॥ न० ॥ १६ ॥ नारकियां ने नरकथी नासरघा, जे फल प्रांपति दोय ॥ मल्लष्टे नांगे करते कहूं, पिण निभे नही को य ॥ न० ॥ १७ ॥ प्रथम नरकथी चवि चक्रवर्ति हुवे, पीजी हरि बलदेव ॥ तीजी सग तीर्थकर पद लहै ।। चोथी केवल एच 1 न० ॥ ॥१॥ पंचम नरकनो सरवविरति सदे, देसविरत्न ॥ सातमी 'नरकनो समकितहीज सदे, न हुवै अधिक निमत्त । न० ॥१५॥ ॥ दाल ॥ ३ ॥ करम परीक्षा करण कुमर पल्पो रे॥ एदेशी ॥ ॥ मानव गति विन मुगति दुवे नदी रे, एदनो श्म अधिकार (१७) प्राउ संख्याते नर सहु दमके रे, प्राची लहै अवतारमा०||२०|| तेन वाक दमक बेतजीरे, वोजा जे बाबोस । तिहायो पाया प्रायै मानवी रे, सुख उख कर्म सरीत ! मा०॥२१॥ नर तिरयंच असं खी पापैरे, सातमी नरकना तेम ॥ तिहांथी मरनें मनुष्य हुचे नही रे, अरिहंत जाख्यो एम ॥ मा० ॥ २२ ॥ वासुदेव बलदेव तथा वली रे, चक्रवर्ती ने अरिहंत॥ सरग नरगना धाया ए दुवै रे, नर तिरिथी न दुवंत ॥ मा० ॥२३॥ चोविद देव थकी चवि कप जैरे, चक्रवर्ति बलदेव ॥ वासुदेव तीर्थकर ए दुवै रे, वैमानिकी वेव ।। मा० ॥२४॥ ॥ दाल ॥ ४ || नाभि अने मरुदेवा ॥ ए देशी ॥ दिव तिरयंच तणी गति धागति कहिये अशेप, जीव नमें शण पर नव मांहे करम विशेष | पान संरख्यातो जे नर तिर्यच विचार, ते सगला तिरयंचा मांदे लदे अवतार ॥ २५॥ जिणं तिरयंचा मांहे पावे नारक देव, ते कह्या पहली तिण कारण न कहूं देव ॥ पंचेंही तिथंच संरख्याते आकखै जेद, ते मरी बिहुँ गतिमा जावे यहां नही संदेद ॥ २६ ॥ यावर पांच तीने विकलेंही पाठ कहावे, तिहांयी आन संख्याता नर तिरयंचमें पाये॥ विकल चव) सद सरयविरति पिण मुगति न पावे, तेन वानथी प्रायो तेहने समकित नावै ॥ २७ ॥ नारक वरजीने सगलाही जीव संसार, पृयवी पान वनस्पतीमांहि सदै अवतार ॥ एतीने हांयी चवि आवै दसे गंमे, थावर विकल तिरो नरमाद नतपत पामै ॥२८॥ पृयची काय पाद देई दस दमके एह, तेन वाक मांदे श्रावो ऊपजे तेह ।। मनुष्य विना नव मांई नेन वाउ वे जावे, विकलेंशी ते दसमाहि जावै पूगदी प्रावै ॥ २५ ॥ एम अनादितणो मिथ्यावी जीव एकत, वनस्पती मादे तिहां रदियो काल अनंत || पुढवी (१०) पाणी अगनि अनै चोथो वलि वाय, कालचक्र असंख्याता त जीव रदाय ॥ ३० ॥ घेशी तेही अने चौरिद्री मकार, संख्या वरसा लगे नमियो करम प्रकार || सात पाउलव सगि ता. तिरयंचमें रहियो, हिव मानवनव बहिनें साधु, वेपमें रहिय ॥ ३१ ॥ राग देष बूटे नही किम दुवै वूटकबार, पिण वै माह मनसुध ताहरो एक श्राधार ॥ तारण तरण में त्रिकरण सुद्धे । रिहंत लाधो, दिव संसार घणो नमिवोतो पुदगल श्राधो ॥३२॥ तूं मन वंन्ति पूरण आपद चूरण सामी, ताहरी सेव लही तो नवनिध सिद्ध पांम। ॥ अवर न कांश चू इण नव तूंदिज- देव सूचै मन इक होज्यो नवर ताहरी सेव ॥ ३३ ॥ || कलश ॥ . . श्म सफल सुखकर नगर जेसल, मेर महिमा दिन दिने । संवत सतर नगरातीस, दिवस दीवाली तणे ॥ गुणविमल चंदा समान वाचक, विजय दरप सुसीस ए || श्री पासना गुण एम गावै, धरमसो सुजगीस ए॥३४॥ इति श्री चोवीस दमक स्तवनी ॥ अथ इरियावही मिधामिदुक्कड संख्या स्तवनं ॥ .. ॥ मम मणम रे पास जिनेसर यंभणो॥ ए देसी ॥ पद पंकज रे प्रणामी वीर जिनंदना, त्रिकरण सुदरे कार मुनिवर पय वंदणा ॥ एमने रे पमिछमी जिम इरियावही, શ્રી बीरनी रे वाणी तहत्त कर सरददी ॥ उल्लालो ॥ सरददी यांणो मन सुदाणी, चित्त यांणी ते वली मिछामिक तणी संरया, कहिसु जिम कद केवली ॥ नू दग जलण निम पार, वणता विगत पण इंशी तणी ॥ करतां विरादण करम यंध्या, तर ते क. रवा नणी ॥ १ ॥ चाल ॥ पुमचि दगरे वाट तेन वणसरा, पावर रे वादर मुहम दसे गई । प्रत्येकज रे यणसर पारद : (१ए ) थया, वाचीसे रे पजत्नग अपऊत्तया ॥ नखासो ॥ पङत्त अपनी- नग वखाएया, विगल तिय उह नाल ए । जल थल खचर यंग २, परा इंघिय तिरि अमयाल ए ॥ तस्मादि साते नरक पुमको, नारकी तिहां सात जे ॥ ते चवद नेदे करी जागो, पत्तय अ. पजत्त जे ॥ २ ॥ चाल ॥ पनरद विध रे सुरगण परमा दम्मिया, किलविपिया रे त्रिविध करम ते निम्मिया || जनिय दस रे नव लोगतिक जांणय, सोलह विधरे व्यंतर देव वखाणियै ।।मलालो। वखाणियै दस विध नुवनपतिना, तार रवि सशि रिसिगहा ॥ चर थिर. दस्तै विध जोइसी सुर, वखाएया जिनवर जिहां ।। वारद विमापद पण अनुत्तर, नवग्रीवेके नव मण्या || पङत्त अपजचग अगा, अधिक सत संरख्या गिण्यां ॥ ॥ दाल.॥ २ ॥ मेघ आगम सही ए॥ देशी ॥ पंचन्नरत वलि ऐरवत पंच पंच विदेदवर नूमिका ए॥ क्षेत्र एपनरद करम नूमि जाणायै अप्ति कसि मसिहि भाजीविकाए । देमवत खेत्र वलि तिम परिवर्ष रम्यक ऐरण्यवत सहीए।मेिरुपिश पारवती चारि ५ खेत्र दस कुरु अकरम नूमीकहीए ॥ हिम. गिर सिहरीय दाढ चीयारि लवण समुश्मादि विस्तरीए ॥ सात २ नंतर दोय पासे दीप उत्पन्न अन्तर धरीए 11 दोसे नेद 3 आगला जांणी मणुय पऊत थपङत्तयाए।। एक सो एक समुर्छिम नेद तीनसै तीनमणुप्रा थयाए ॥ ५ ॥ ॥ दाल ॥३॥ हिव जनम्या जगगुरु ॥ ए देशी ॥ . पणस्य त्रेसमिविध जीवसहूठे एद अनिय श्रादिक दस गुणित करीने तेद ॥ परासहस से वलि त्रीस अधिकते नाशि ॥ ते रागै दोसै उगुण करी वखाण ॥ ६ ॥ दुइ सहस ग्यारद रु. सय साति प्रमाण ॥ ए प्रवचनवाणी जाण दितर श्राश मन- - - (१०) वंच काया,करि त्रिगुणाकरि त्रिग्रंक || तेतीस सहस सत. सात असी निःसंक। ॥ वलि करण करावण अनुमति त्रिगुण किछ॥ इकलक्ख सदसग तिसय चालीस प्रसिद्ध ॥ अतीत अनागत वर्तमान वलिकाल जे घश्यविराधना तिणि त्रिगुण संन्नाल || G॥ तीन लाख सहस च्यार से अधिक तेयाय ॥ अरिहंत प्रमुख उह साख गुण नाय ॥ इम लाख प्रदारह वलि सहस चनवीस ।। कसो वोसोत्तर हु संख्या निसदीसं ॥ए । ॥ दाल ४ यी ॥ चोपड़नी ॥ ए देशी ॥ ॥ण परि मिठामि उमंदेई नविक तरया नवजल नि पिकेई । तरै प्रचै वलि श्रागलि तरिसी ॥ निरमल केवल जखमी वरिसी ॥ १० ॥ रियावही धरम गंगाजल ॥ न्हाण करै प्रातम करि निरमल ॥ से मुखन्नापै वीर जिणेसर ।। सूत्रकरि गूंथै ते श्रु तधर. ॥ ११ ॥ इम पमिक्कमी मुनिवर अश्मनो । वीरसीत केव ल.पदपत्तो ॥ त्रिकरण सुध तसु पय प्रणमी जै | मानव जनम सफल इम कीजै ॥ १॥ कलश। ॥ इम वीर जिवर ग्यान दियर सयललोय सुइंकरो॥ तियलोय सामि सिद्धिगामी सुद्ध धरम धुरंधरो || उवमाय लक्ष्मी किर्ति सीसे नवाणी मन घरी ।। गणि लचिवक्षन तवन करि इम संयुएयो नावै करी ॥ १३ ॥ इति दरियावही मिछामि धक्का संख्या स्तवनं । 1.अथ पंच समवाय स्तवन । ॥ोहा सिद्धारथ सुत वीए, जगदीपक जिनराजा वस्तु. तत्व सवि जाणीए, जस. बागमयी आज ॥१॥ स्याहादयी संपले, सकल वस्तु विख्यात ।। सप्त-नंग-रचना विना, बंधन.
. (१) चेसे वात ॥ २ ॥ वाद वदे नय जूजुश्रा, आप प्रापणे गम । पूरण वस्तु विचारतां, कोई न ाचे काम ॥ ३ ॥ अंध पुश्पे एद गज, ग्रही अवयव अकेक ॥ दृष्टिवंत सहे पूर्ण गज, अवयव मित अनेक ॥ ४ ॥ संगति सकल नयें करी, जुगति योग शुद्ध बाध ॥ धन्य जिनशासन जग जयो, जिहां नहीं किशो विरोध ॥ ५॥ । दाल ॥ ॥राण आशापरी। श्रीजिनशासन जग जयकारी स्याहाद शुभ रुपरे। नय एकांत मिथ्यात्व निवारण, अकल अन्नंग अनूपरे ॥ ६ ॥ ॥श्री.॥कोई कहे ए कालतणे वस, सकल जगत गत होयरे॥ काले ऊपजै घिणसे कालै, अवर न कारण को रे ॥ ७॥ श्री०॥ 'कालै गर्न धरै जग वनिता । कालै जनमे पूत रे ।। काले बोले काले चाले, काले काले घरसूत रे ॥७॥ कालै दूधयकी दही याय, कालै फल परपाक रे ॥ विविध पदारथ काल नपावै, अंत करें वाक रे ।। ॥ श्री०॥ जिन चमबीसै वार चकचै, वासुदेव बलवंत रे॥ काले कविलत कोइ न दीसे, जसु करता सुर सेव रे॥१०॥ ॥ श्री० ॥ उत्सर्पिणी अवसर्पणी पारा, छै वे जूजूये नाते रे, 'पट् शंतु काल विशेष विचारो॥ निन्नर दिन रात रे ॥११॥श्री०॥ 'कालै बाल विलास मनोहर, यौवन काला केशरे । बुढपणे चलिरल, सकत नही लवलेस रे ।। १२॥ श्री० ॥ पाढाल || २ री || गिरुवा गुण श्रीवीरजी । ए देशी । तव स्वन्नाववादी व जी, काल किसुं कर रंक ॥ वस्तु स्वन्नावे नीपजे जी, विणसे तिमज निस्संक ॥१३॥ सुविवेक विचारो जुयो र वस्तु स्वन्नाव ॥ ए प्रांकणी ॥ ते योग योवनवतीजी, वांमणि न जणै घाल ॥ मूत्र नही महिला मुखै जी, करतल जगै न वालं ॥ १३ ॥सु०॥ विश सनाव नवि संपजै जी, किमह पदारन कोय। -- --- (१एए) अंब न लागै नींबी जी, वाग वसंते जोय ॥१५॥ सु०॥ मोरपं. कुण चौतरे जी, कुण कर संध्यारंग ॥ अंग विविध सब जीवना जी सुंदर नयण कुरंग ॥१६॥ सु० ॥ काटा योर वंबूलनाजी, कुणे श्रणि- याला कीध ।। रूप रंग गुण जूजूश्रा जी ॥ तस फल फल प्रसिधा ॥ १७ ॥ सु० ॥ विसहर मस्तकै नित वसे जी, मणि हरै विप्त ततकाल, परवत थिर चल वायरो जी, करघ अगननी काल॥१८॥ ।सु०॥ मच तुंब जलमां तिरै जी, बूमै काग पाहाण || पंख जाति गयणे फिरे जी || ण परै सहिज विनाण ॥ १५ ॥ सु०॥ वाय सुंथी नपशमें जी, हरमे करै विरेचा सोकै नहीं करा कांगमो जी। सकल स्वन्नाव अनेक ॥ २० ॥ सु० ॥ देस विशेपै काठनो जी, भुंयमां थायै पाखाण 11 संख अस्थिनो नीपजे जी, केत्र स्वन्नाव प्रमाण ॥ २१ ॥ सु. || रवि तातो तशि सीयलो जी, नव्यादिक 'बहु नाव ॥ गए इव्य आपायशा जी, न तनै कोश सुनाव ॥ ॥ २२ ॥ सु०॥ ॥ दाल || ३ ॥ कपूर हुवै अति ऊजलो रे ॥ ए देसी । काल किसु करै बापमो रे, वस्तु स्वन्नाव अकऊ || जोन होय नवतव्यता जी, तो किम सीजे कड़ा रे ॥ २३ ॥ प्रांणी म करो मन जंजाल, ए तो नावी नाव निहाल रे ॥. प्रा० ॥ए पाकणी ॥ जलधि तरै जंगल किरै जी, कोमि यतन करै कोय । अगनावी. होये नही.जी, जावी होय ते होय रे ॥ २३ ॥ प्रा०11, प्रांपै मोर वसंतमा जी, मालै के लाख ॥ खरया के खांखटी जी, केश-श्रीवा के साखःरे। प्रा० ॥ २५ ॥ वानल..जिम जव 'तव्यता जी, जिण जिल दिसे नजाय ॥परवत मन मानसतलोजी, तुंग जिम पूठे धायरे ॥ प्रा० ॥ २६ ॥ नियत क्सै पिण चिंतव्यं "जी, श्रावी मिलै ततकाल । बरसा सोनुं वितव्यो जी, नियत कर . (१५३) विसराल रे ॥ प्रा० ॥ २७ ॥ प्रारमो चक्री सुंनूमिते जी, समुइ पचो विकराल | ब्रह्मदत्त चक्री तणाजी, नयण हरै गोवाल रे ।। प्रा० ॥ २८ ॥ कोकूदा कोयल करे जी, किम राखीसरे प्राण ॥ श्रादेमी सर ताकियो जी, ऊपर नमें सीधाण रे ॥प्रा० ॥२५॥ प्रादेमी नागे मस्यो जी, घाण लग्यो सौचाण ॥ कोकूदो कमी गयो जी, कोन नियत परमाणरे ॥ प्रा० ॥ ३०॥ सस्त्र हण्या संग्रामा जी, रात पमया जीवंत ॥ मंदिरमांद मानवी जो,, रोल्याही न रहंत रे ॥प्रा०॥३१॥ ॥ दल ४ थी ।। मारुणी मनोहरणी ॥ए देशी ॥ काल स्वनाव नियत मति रूमी, करम करे से थाय ॥ फरमें नरय तिरिय नर सुर गति, जीव नवंतरै जाय ।। ३२ ॥ वेतन चेतज्यो रे करम न वूटै कोय ॥ ए श्रांकणी ॥ करमैं राम. वस्या वनवास, सीता पामी पाल । कर्मे संकापति रावणर्नु, राज्य थयो वितराल ॥ ३३॥ चे० ॥ कर्मे कीमी कमें कुंजर ॥ फमें नर गुणवंत || कर्मे रोग सोग उस पीमित, जनम जायै विलसत ॥ ३४॥ चे० ॥ कर्मे वरस लगे रिसदेसर, नदक न पामे अन्न ॥ कर्मे जिननें जोन निमा रै, खोला रोप्या कन्न ॥ ३५ ॥ ॥०॥ कम एक सुखपाले वैसे, सेवक सेवे पाय ॥ एक इय गप चढया चतुरनर, एक पागल ऊजाय ॥ ३६॥ चे० ॥ उद्यम । मांनी अंधतशी पर, जग हा हाहूतो ॥ कर्म वली ते लदै संकल फल, सुखनर से सूनों ।। ३७ ॥ चे० ॥ कंदर एके कीधो नयम । करंमीयो करकोले ||मदि पणा विवसनो खो, मांग रह्यो मममोलै । चे० ३८ ॥ विवर करी भूपक ततु मुखमा, दीये मापy देह ॥ मार्ग सही यन नांग पथारपा, फर्म मर्म जोवो एह ॥ ॥ ३५ ॥.. . gl ใน नई २५
(१ए)
( ल ५ मी || तो घटियो घन मान गनै । एदेशी ।।
दिव उद्यमवादी नणे ए, ए च्यारे असमन तो| सकल
पदारथ साधवा ए, नद्यम एक समरत तो ॥ ४० ॥ उद्यम
करतां मानवी ए, स्युं नवि सीमै काज तो॥ रामें रयणायर तणी
ए, लीधो लंकाराज तो॥४१॥ करम नियत ते अणुसरै ए, जेहमां
सत्व न दोय तो ॥ देवल वायमुख पंखिया ए, पिन पैसंता जोय
तो ॥ ५५॥ विन नद्यम कीम नीकले ए, तिल माथी तेस तो ।
न्यमयी नंची चढै ए, जोवो एकेश्यि वेस तो ॥ ३ ॥ नद्यम
करतां इक समें ए. जेह न सीमै काज तो ॥ ते फिर उद्यमयी
हुवे ए, जो नवि आवे वाज तो ॥ १४ ॥ नद्यम करि करयां विना
ए, नवि रंधायै अन्न तो ॥ श्रावी न पमै कोलियो ए, मुखमां के
जतन्न तो ॥ ४५ ॥ कर्म पूत नद्यम पिता ए, नद्यम कीधा कर्म
तो॥ नद्यमथी दूरे टलै ए, जोन कर्मनो मर्म तो॥४६॥ दृढप
हार हत्या करी ए, कीधा पाप पारंन तो ॥ उद्यमयी खट मासमां
ए, श्राप या अरिहंत तो ॥ ७ ॥ टीपेश सरवर नरै ए, कां
करे २ पाल तो गिर जेहवा गढ नीपजे ए, नद्यम सकत निहाल
तो ॥ ४ ॥ न्यमयी जलविंडन ए, करे पाहाणमां गम तो।
उद्यमयी विद्या नगै ए, नद्यम जोमै दाम तो॥ ए॥
॥ दाल ६ ॥ ए छिंडी किहां राखी ।। ९ देसी ॥
ए पाचही वाद करतां, श्रीजिन चरणे आवै ॥ अमिय
जिन क्यण सुपणीने, पाणंद अंग न मावै रे ॥५०॥ प्राणी
समकित मति मन प्राणो ॥ नय एकांत म ताशो रे ।।
॥ माते मिथ्या मति जांणो रे । प्रा०॥ ए श्रांकणी ॥ ए
पाचे समवाय मिल्या विन, कोई काज न सी । अंगुल जोगे
(१) कवल तशी पर, जे यूझै ते मिरे। प्रा० ॥ ५१ ॥ प्रामहं प्राणी को एकनें, एदमा दियै कमाई ।। पिरा सेना मिल सकल रणंगण, जीते सुन्नट जमाई रे ॥ प्रा० ॥५५॥ तंतु स्वन्नावे पट उपजावै, कास में वाई ॥ नवितव्यता होय ते नीपजे, नही तो विधन घणाई रे ॥ प्रा० ॥५३॥ तंतुवाय नद्यम लोक्तादिक, लाग्य सबर सहकारी ॥ ए पांचे मिल सकल पदारथ, मतपत जोवो विचारी, रे। प्रा० ॥५३ ॥ नियत वसे हलु फर्म थईनें, निगोदयकी नीक- लियो । पुपये मनुज जवादिक पांमी, सद्गुरुनें जा मिलियो रे प्रा० ॥ ५५ ॥ नवथितनो परपाक थयो तब, पंमित वोर्य नल्लं. सियो । जव्य स्वन्नाव शिवगति गांमी, शिवपुर जश्ने वसियो रे ॥प्रा० ॥ ५६ ॥ वमान जिन इस पर वीन, सासन नायक गा वो|संघ सकल सुखदाईजेदयी,स्यावाद रस पावोरे॥मा० ॥५॥ 1 ॥ कलश ॥ ॥ श्म धर्म नायक मुगति दायक, वीर जिनवर संयुष्यो ॥ सप सतर संवत वद्वि लोचन, वर्ष हर्ष धरी घो॥ श्रीविजय देव सुरिंद पटधर, विजयप्रन मुणिंद ए ॥ कीर्तिविजय वाचक सीत पर, विनय कहे पाणंद ए ॥ ५८ ॥ इति श्री पञ्च त मवाय स्तवनं ॥ ॥ अथ ११ गुणठाणा स्तवनं ।। ॥वणपुर श्रीपास निणंदो । ए देशी ॥ ॥ सुमति जिसंद सुमति दातार, वंदू मन सुध वारंवार, माशी नाव अपार ॥ चवदे गुण थानक सुविचार, कहिस्युं सूत्र अरथ मन धार, पामे जिम नव पार ॥ १ ॥ प्रथम मिय्यात कहो गुणगाणो, बीजो सास्वादन मन घांगो, तीजो मिश्र वस्खा"|| चो पो.अविरत नाम कहाणो, देशविरति पंचम परमाणो, ग्ने प्रमत्त
-
(१६)
पिगणूं ॥ २ ॥ अप्रमन सत्तम सलहीजे, अहम: अपुरव करण
कहीजे, अनिवृत्ति नाम नवम्म ॥ सुखम लोन दसम सुविचार,
नपशांत मोह नाम इग्यार, . खीणमोह बारम्म || ३ ॥ तेरम
'सयोगी गुणधांम, चवदम थयो अजोगी नाम, वर" प्रग्रम
'विचार। कुगुरु कुदेव कुधर्म वखाणे, ए सक्षण मिथ्या गुणगशै,
तेहना पंच प्रकार ||४
दाल ॥ २॥ सफल संसारनी ॥ ए देशी।
॥ जेद एकांतनय पक्ष यापी रदै, प्रथम एकांत मिथ्यामती
ते कहै । जैन शिव देव गुरु सहु नमै सारखा, तृतीय ते विनय
'मिथ्यामती पारिखा || सूत्र नवि सरदहै रहै विकलपः घणे, संस
यी नाम मिश्यात चोयो नणे.॥ ६ ॥ समझ नही काय निज
धंद रातो रद, एह अज्ञान मिश्यात पंचम कहै ॥ एह अनादि अ
नंत अन्नव्यनें, करिय अनादि यति अंतसुनव्यनें ॥ ॥ जेम
नर खीर घृत खंम जिमने वमें, सरस रस पाय वलि स्वाद केहयो
गरें ।। चौथ पंचम गण चढने पके, किणहि कपाय वस आप
पहलै अझै ।। ७ ॥ रद विच एक समयादि पट आवली, सदोष
सासादने यित इसी सांगली ॥ हिव इहां मिश्र गुणगाण तीजो
फहै, जेद वत्कृष्ट अंतरमहुरत लहै ॥ ए॥
॥ दाल ॥३॥.बे कर जोडी तांम ॥ए देशी।।
॥ पहिला प्यार कपाय, सम कर समकिती, कैतो सादि
''मिथ्यामती ए॥ ए हिज लदे मिन, सत्य असत्य जिहां, सर
दहणां वेकं उती ए॥ १०॥ मिश्र गुणालय माहि, मरणा
सह
नदी, धान बंधनपमै नवो ए॥कै तो सहै मिथ्यातकै समकि.
तःसंदे, मति सरखी गति परत्नवैए ।। ११ ॥ध्यार अप्रत्याख्यान,
नदय करी सदै, मति विन किहां समकितपणो एते विरत
.
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पावै धरै ए॥ . मिथ्या ते नर • - (१) "गुणगण, तेत्रीस सागर, साधिक प्रिति एहनी नगी ए॥१०॥ ‘दया नपशम संवेग, निरवेद भासता, समकित्त गुण 'सहु जिन वचन प्रमाण, जिन शासन तणी, अधिक २ उन्नत करै 'ए ॥ १३ ॥ कोईक समकित पाय, पुदगल अरधता, उलटा नव में रहै ए ॥ केइएक नेदी गरि, अंतरमहुरते, चढते गुण शिवपद खदै ए ॥ १४ ॥ ज्यार कपाय प्रथम्म, त्रिण वलि मोहनी,. मिन सम्यक्तनी ए.साते प्रति जास, परदी उपशमें, ते नप शम समकित धणी ए. ॥ १५ ॥ जिरा साते कय कीध, "कायकी, तिरादिज जव शिव अनुसरै ए ॥ आगलि बांध्यो आक, तातें तिहां थकी, तीनै चोथे नव तिरै ए॥ १५ ॥ " दाल ॥ ४॥ण पुर कंवल कोइ न लेसी । ए देसी ॥ पंचम देतविरति गुणगण, मगटे चोकमी प्रत्याख्यान || जेश तजैवा वीस अन्नक, पान्यो श्रावकपणो प्रत्यक्ष ॥ १७॥ गुण इकवीस तिके पिण धारे, साचा बारे प्रत संतारै ॥ पूजादिक पट् कारज साथै, ग्यारे प्रतिमा आराधै ॥ १७ ॥ प्रार्च रोइ ध्यान है मंद, आयो मध्य धरम पाणंद ॥श्राव वरस कणी पुचकोम, पंचम ‘गुणपणे थित जोग ॥ १५ ॥ हिव भागे साते गुणयान, इकर अंतरमदुरत मांन ॥ पंच प्रमाद वसै जिस गम, तेरा प्रमत्त. उजे गुणधाम ॥२०॥ थिचरकलप जिनकसप याचार, साधै पट् श्राव- 'स्यक सार | उद्यत चोथा च्यार कपाय, तेल ममत्त गुरागंण कहाय ॥ २१॥ ब्यो राखै चिन समाधै, धरम ध्यान : एकांत आराधै ॥ जिहां प्रमाद क्रिया विध नासे, अपरमन सत्तम गुण जासे ।। २२॥ 'हाल ॥५॥ नदी यमुनाके तीर उदै, दोय पलिया । ए देशी 1. पहिले अंसे अध्म गुरागपातणे, धारने होय.श्रेण संरव्येपै ..
(१) ते गरें ।। नपशम श्रेणि चदै जे नर हुवै उपशमी, पकश्रेणि कायक प्रकृति दस क्षय गमी ।। २३ ॥ तिहां चंढता परिणाम अंपूरब गुण लदे, अधम नाम अपूरव करण तिणें कहै ॥ सुकल ध्यांननो पहिलो पायो आदरै, निरमल मन परिणाम अगि ध्याने धरै ।।२४॥ दिव अनिवृत्त करण नवमो गुण जाणियै, जिहां लाव थिररूप निवृत्ति न जांगियै ॥ क्रोध मान ने माया संजलणा हणे, न नही जिहां वेद अवेदपणो तिरों ॥ २५ ॥ जिहां रदै सुखम लोन कोइक शिव अनिलखे, ते सूखम संपराय दसम पंमित अवै । संत मोद इण नाम ग्यारम गुण कहै, मोद प्रति जिण गंम सडू उपशम लहै ॥ २६ ॥ श्रेशि चढयो जो काल करै किणदी परे, तो घायै प्रदमिद अवर गति नादरै ॥ ध्यार वार समशि करै संसारमें, एक नवे दोय श्रेण अधिक न हुवे किमें ।। २७ ॥ चटि ग्यारम सीम समीप पहिले पम, मोद नदय उलट भरप पुदगल रमै ॥ पकश्रेणि ग्यारम गुणगणो नदी, दशमयको बारम्म चदै ध्यान रही ॥ २७ ॥ ॥रास ॥ एक दिन कोई मागप मापो पुरंदर पास ।। ए देसी ॥ खीरामोद नामे गुणगणो बारम जाण, मोह खपायो मेमो पायो केवलज्ञान || प्रगटपणे जिहां चरित अमस यया पाण्यात, दिव मागे तेरम गुणयांन तणी कदे वात ||२||घातीय थोकी कंय गई रदीप प्रपातीय एम, प्रति पिव्यासी जेदने जूना कप्प जेम ॥ दरसश ज्ञान वीरज मुख चारित पंच अनंत, केवसतान प्रगट यो विचरे श्रीनगवंत ॥३०॥ देखे सोक प्रलोकनी गनी परगट वात, महिमावंत अटारे दोषण रहित विण्यात ||साठे बरसे गोकदो इक पूरवकोमि, उफट तेरम गुरागणे ए पिति जोदि ॥ ३१ ॥ हा मेसेसी करश निरूप्पा मन यम काय, तंग अयोगी (एए) अंत समय सहु प्रति खपाय !! पांचे लघु अक्षर कवरता जेहनो मांन, पंचम गति पांमें तिवपद चनदम गुणथान ॥ ३२ ॥ त्रोजे भारमें तेरमें मां न मरे कोय, पहिलो बोजो चोथो परन्नव साये होय ॥ नारक देवनी गति मांदे खानै पहिला व्यार, धुरला पांच तिरी माद मए ए सई विचार ॥३३॥ . ॥ कलश॥ श्म नगर वादन मेश मंगण, सुमति जिण सुपसासै ॥ गुणाण चवद विचार करण्यो, नेदश्रागमनें नलै ॥ संवत सतरैसे उत्तोले, श्रावण वदि एकादसी ॥ वाचक विजय श्री दरप सानिध, कहै मुनि श्म धर्मती ॥ ३४॥ इति श्री चवदै गुणगणा स्तवनं । ॥ अथ नव तत्व भाषा गर्मित स्तवनं ॥ ॥ दूहा | नमस्कार अरिहंतनें, सिह सुरि नवझाय ॥ साधु सकल प्ररामी करी, प्रणमी श्रीगुरु पाय ॥ १ ॥ करस्युं हूं नवं तस्वनी, गाया नासा रूप ॥ मंद बुद्धि गुरु सानिधे, कहिस्यु सुगम सरूप ॥२॥ ॥ दाल ॥ १ ॥ सूरती महीनानी ।। ए देसी । जीव अजीवें पुण्य पाप तिम प्राश्रव सोय, संबर निकर पंध मोक्ष ए नव तत होय ॥ चवद २ वायात वयासी वलि पायाल, सत्तावन बार चौ नव क्रम दनी माल ॥१॥ गति चौविह पणविद गघिद जीव कदाप, चेतन प्रप्स पावर वेदै गई करणे काय ॥ एगेंदो सुखम बादर ए दोय लिय गण, सन्नि प्रसन्न पणिंदी विति चौरिद्रीप्राण ॥२॥ ए सग पझमा अपाना चवदै होप, अनुक्रम जीव गण ए सूत्र प्ररूप्पा सोप ॥ नारा दसरा चारित वीरज तप तिम उपयोग, ए प संक्षण पक्षत जीव व्य इह सोग ॥३॥ ग आहार सरी दिय पानी तीन, सासोतात
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(२००)
जापा:मन पम ए अनुक्रम लीन || व्यार एगदी पंच पक्षनरी
विगलें जोय ॥ पंच असन्नि सन्नि ते पम पत्ती होय ॥४॥इंट्रिय
पांच नसास पाक बल ए दस प्राण, व्यार उ सात प्राउ - एगेिंदी
विगले जाण ॥असन्नि सन्नि पंचें में नव दस क्रम श्राय, प्राणाथी'
जेवि प्रयोग जिय मरण कहाय ॥ ५॥ धम्माधम्म आगास तोचूना
त्रिणश्नेद, काल दसम गागास पुग्गल च्यार विठेद ॥ खंधा देस
पएस परमाणू चवद अजीव, धम्माधम्म पुग्गल नन काल ए पांच
न जीव॥६॥चलरा सहाई धम्में घिर संगण अधम्म, अवगाहें पूरण
गलऐ नन्न पुग्गल धम्म ।। समयावलिय महुत दोहः पख मास में
साल पढ्योपम सागर जसप्पणी सप्पणी कालणापमग दो सग
सग सग पर ग अंक गिणाय, एग मुहुने प्रावति संख्या सूत्र
कहाय । तीन सात वलि सात तीन तासें माण, केवखनाणी
नगियो एह महुत्त प्रमाण ॥ ॥ साता नच गोय मणु सुर हुगे'
पंचिंदि जाय, पांच शरीर आदि प्रति सरीर नवंग कहायं ।। आदि
संघण संगण चौवर्ण अगुरु लहु होय, परघ नसास तेम वलिया
तप ने नकोय ॥ ५॥ सुनेखगइ निम्मांगत सादि दशु नीमाल,
सुर नर तिरि आऊ तिथंकर पुण्य वयाल ॥ तसं बादर पंडात प
नेय थिरं सुन सोयः। सुलग सुसर आइज जसे त्रस दसको होय
i. | नाणंतरायः दस कनय बोजा नाचअसाय, मित्य ‘प्रोवर
दशनादर्ग त्रिक पचवीस कसायं ॥ तिरियं च उग एही विति
चौरिंशी तेय, कूवगई उपधा अपसत्य वल चौ नेयं ॥ ११ पट
म संघयण विना संघेग तेम संगण, एम बयासी' प्रकृति पापं त
तनीए जाण ॥ थांवर सुहम अपऊ साहारस अधिरे गेय, असुन
उन्नग दूं सरणा इज अजस दसे लेय ॥ १॥ पण चौ पण तिंय.
इंदि कसाय अक्षय तिम जोग यायालीस से पचीस क्रिया संजो
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. ॥ काश्य अहिंगरणीया पावसिया परिताप, प्राणातिपात पारे नको. परिगहियानो ताप ॥ १३॥ माया प्रत्यय मिहादसण वसी नमः, अपच्चरवाणकी दिपु पाहुचिय जेम 1.सामंतो पनवणि य ने सत्यि सहत्थे जेह, प्राज्ञापनकी वेयारण अनोगा तेह ॥ २४॥ अणव कख पञ्चयना नवनगी समुदाय, प्रेम देवरिया हो किरिया ए कहिवाय || सुमति गुपति परिसहज धम्म नाव ए चारित्त, पणतिग बावीस दस बार पण संबर तत्त ॥ १५ ॥ पस्या नाशा एपणा सुमतीना नेद होय, आदान नंम नचार नि रकेवरा पांचे जोय { मनगुत्ती वयगुती कायगुती त्रिण जांणा, दि व आगे बावीस परिसद, कहूं हित प्राण ॥ १६ ॥ नूख पिपासा सीत.नसन मांसा निरवत्य, अरति जोपा चरिया ने विद्या सिझा सत्तः।-अकोसवदजायण अलान रोग त्रिण फास, मल सकार य नां अन्नाण समत्त समास ॥ १७॥ खंति महव अजय मुत्ती तव संजम सम्म, सत्यं सोच अकिंचन नरज धम्म || पढमश्र नित्य असरण संसार एग अनते, असुचि पाश्रव संबर निरन विनावो नित्त ॥ १७ ॥ लोक सुनाव बोध उरखनग्यारमगाम, धरम साधक अरिहंत ए.वारे नावना नाव ॥ सापायक दोप स्थापन बीजो सोय, परिदार विश्रुक्ष सूखम संपराय धनत्यो जोय ॥१७॥ तिम अहरकाय चरित्त सरव जिय लोग प्रसिद्ध, जेद सु विधि प्रावरणे. के.जिय पांन्या सिद्ध ॥ बार विध मिरि तत्व पंध ना ज्यार प्रकार, प्रकृति लिई अनुन्नाग नदेस ले निरधार ॥२०॥ अगसंग नजोदर वृत्ति संवेप रंसनो त्याग, काय कलेस सल्लीनता चाहिर तप पम लाग.पायचित्त.विनय देपावञ्च तेम सिकाय, ध्यान कानसग अभ्यंतर तप पम विध प्राय ॥ १ ॥ प्ररुतिसु नाव काल.अवधारण श्रित निरवंच, अनुन्नागै रस तेम मसेदे दस .
.. (२०) नो संच॥ पंट प्रतिहार धार तरवार मद्य वलि तेम, निगम Eि कर कुंलकार मारी जेम ॥ २२ ॥ अनुक्रम आठ नामना ना जे जे नाव, तिम ज्ञानावरणादिक अमना एद सन्नाव ॥ श्म संस चिचरण कीना था तन, प्रस्तावे पांम्यो वरण वस्युं दिव मो. तत्त ॥ २३ ॥ संत पदे परूपण व्य ने खेत्र प्रमाण, फरसन का पांचमो ठहो अंतर जाण ॥ नाग सातमो नाव श्राप तिम अर बहुत्त । ए नव ने नावन फस्युं नवमो तत्त ॥ २५॥ मोह ए पदवी .जे पदेअविनानाव, व्योम कुसुम तिमससिक शृंग जि नहीय अनाव ॥ एडवो जे पद मोक्ष तेदनो मग्गण धार, विवर कर वरणवस्युं सुपज्योसुदुम विचार ॥ २५ ॥ संमचे हायक सः प्रसन्नी येसन्नि, अणदारी आदारी अणदारी कपन हव्य प्रमाणे ति जीव ॥ इव्य होय अनंत, लोग असंखम नाग एग सिद्धहोय असंत २६॥ फरसन क्षेत्रणी अधिक काल ग सिद्ध प्रतीत, सादि अनंत थित जिन भागमयी सुविदीत ॥ प्रतिपातां नावै नहि सिद्धां तर जोय, सरब जीवथी नाग अनंतम सहू सिप होय ॥ १७ दंशण नाण जेदने वे ते दायक नाव, जीवत जेदने वलि परणा क नाव समाव ॥ सहुयी थोमा वेद नपुंसकश्री जे सिद्ध, तेद श्रीनर अनुक्रम संख गुणा सुप्रसिद्ध ॥ २७ ॥ जे जाणे जीवादि- नव तत्त तस सम्मत्तं, अजाणंताने हुय जे सरधा नेरन । सर जिनेसर मुखथी नाघ्या वयण जहत्य, ए बदी जेहने मन संम 'निश्चल तत्य ॥ २५ ॥ अंतरमहुरत एग मात्र फरस्यो सम्मन, ई पुगत परियट्ट नियम संसार निमिन । सप्पणिय अपते । पुग्गल परियट्ट, अनंत अतीत अनागत तद्गुण वयण प्रगट ॥ ३. . इनव तत्त नेद पमिन्ने विवरण कीध, पावक आग्रह की सहाय पूरण रस पीध | कोटिक गण सुन्न सदन प्रकास नदो उपमान .
. (२०३ ) श्रीजिनसानचंद कुल पूनमचंद समान ॥ ३१ ॥ अग्यानादिकः करिवर सिंहे वयरी साख, रत्नराजमुनि ते वमसाखानी पमिसाख ।। ग्यानसार ते पमिसाखानी सूखम माल, ए नव पद नव रयणे विनाणे गूंथी माल ॥ ३३ ॥ संवघर निश्चय नय विगई प्रवचन माय, परम तिद्धि पद वाम गते ए अंक गिरणाय ॥ माघ किसन ससि वार मेश तिथ परन कीध, व्यार कथा तजि तत्वकथा नज नर फल लीप ॥ ३३ ॥ इति नवतत्व लापागर्तित स्तवनं ।। ॥ अथ दंडक भाषागभित स्तवनं । 11 दहा ।। रुपनादिक चोवीस नमि, तेहनो सूत्र विचार ।। दमक रचनायें तवं, संखेपे निरधार || ॥ नरक सात दंझक प्रथम, असुरा नाग सुवन्न ॥ विजु श्रगन दीवो दही, दिसि पवणे थशियन्न ॥२॥ पुढवी पान तेन बलि, वान वयस्स काय ॥ घि ति चौरिंदी गानधर, तिरि नर तिहां मिलाय ॥ ३ ॥ व्यंतर जोइस वेमालिया, ए दंझक चोवीस 1 एहना हार कहूं हिवै, गणनायें ते वीस ॥४॥ 1 दाल 11 १॥ वीर जिणेसरनी ॥ ए देशी ॥ सरीर नगदण संघयणेसणा संगण, कोदाई लेसिदिय दो समुग्धाय प्रमाण ॥ दिछी दंतण नाण जोग तिम बलि नवयोग, उपपात बलि चवण लिई पत्ति प्रयोग ॥ १ ॥ केदिसिनोआहार सन्नि गई श्रागययेय, दार गादा उगनो ए अरय कंह्यो संदेव ।। हिव तेवीत दारनो रहिस समय अनुसार, प्रसप रुची हुँ तेदय' फदिसुं अलप विचार ॥२॥ • दास ॥ २ जी ॥ देसी सूरती महीनानी ॥ .. ... : चौ गनय तिरि वाक कायें धार सरीर, मनुष्य से पांव दमक इगवीस रह्या ति सरीर ॥ यावर च्यारने जघन्य नकोसे दे , ,
(२०)
'प्रमाण, नाग असंख्यातम ग अंगुलनो परिमाण ॥१॥ सरवन
जघन्य स्वन्नावक अंगुलनाग संरख्यात, नकोले परासै धनु सागर
विक्षात ।। सुरनो सात हाथ गप्रय तिरि पारसय काय, जोयर
सहस साधक इक सहस अनुक्रम थाय ॥ २ ॥ नर तेदि तिगा
वेदी जोयण पार, एग जोयण चनरेंडी देद नंचे आकार ॥ आरं-
काले वेकिय देहनो ए परिमाण, नाग एक इग आंगुलनो संख्या
तम जाण ॥ ३॥ सुर नरनें साधिक इक लाख जोयश इक लाख
नवसै जोयण सिरयंचने ए सूत्रे साख सान्नावकथी गणो नारय
वैक्रिय काय, एक मरत नारय नर तिरि. च्यार कहायः ॥ ४
सुरने पक्ष एक नकोसविनवरा काल, विगल संघयणी थावर सुन
नारकनी माल || गनय.नर तिरने पर विगलने वा एक, सरम
'जीवनें च्यार दसताये क्षेप ॥ ५ ॥ नर तिरने पर सुरने सम
चौरंत संवाण, हुमग इग. नारग विगले सूत्र प्रमाण, नाणाविक
भयसूईमरनी चं श्राकार, वणसर वाक कनू बुदबुद भप्पा
फार ॥ ६॥ सहुनें प्यार कसाय गनय पम नर तिरि दोय, पेमा
लिय नारग तेन.पाक विगत त्रिक दोय ॥ जोयसि तेक सेसा से
रह्या ने व्यार, दार इंडियनो सुग़म तेदनो स्युं विसतार ॥ ।
समुद्यात सग नरनें, पण गप्प तिरि देव, नरग वायुनें ज्यान
भेसने तीन नेव ॥ दिखी दोय विगतमें यावरने भिष्यात, सेसन
नीन दिति जिम प्रवचनमें विधात ॥ यावर यि ति में एक प्रम
स्कू दसण होय, चौरिको ते चाकू अयस्कू दसण होय ॥ मनुजने
चार सेस दंगमें दसण तीन, नारा घनाण तीन मुर ति
नारगने सीन ॥ यावर, दोय घनाण विगत दो नाश प्रमाण
गाय मणुने तीन अनासने पांच नाण ।। सुर नारग एकादर तिर्न
मेरे लोग, मनुजोंगरे यार विगलने जोग प्रयोग ॥ १० ॥
(३०५) वाककापने पाच तीन थावर संयोग, मनुजने वार नरग-तिर देवर्ने नव, उपयोग । विगल उगै पण पम चौरिही यावर तीन, नववाय इंग चवरा दार दोनुं सम कीन ॥११॥ एगसमै संरख्यात असंख्या बवण पपात, गप्रय तिरि विकलेंजी नारय सुरनी त्यात ॥ मणुश्रा अथावर वयस्सर संख संख थपंत, मणुज असत्री असंख चवंत म.नपजंत ॥१२ ॥ वावीस सात तीन दस वरत सदस, नक्किए, वणस्सई व्यारने तीन दिवस तेकने जि ॥ नर तिर तीन पल्य तुर. नारग अयर तेतीत, व्यंतर पख्या अधिक लख वरप पल्य नोइस ॥ १३ ॥ असुरादिक दसने शक सागर अधिको प्राय, कशा दोय पल्पनो नवेय निकाय ॥ विगलने वार वरस गुणवास देवस तम्मास. ॥ अंतमुहुनजान्ने पुढवाई दस रास ॥ १५॥ नुवनपती नारग व्यंतर दस बरस हजार, पख्य तेना. अस वेमा- राय जोइसा धार, सुर नर तिरिनारगर्ने पट थावरने प्यार विग- ने. पंच पहनी ए हारम दार ॥ १५ ॥ सरय जीवनें होय ए विसनो श्रादार ॥ दोय.न. दोय पंचादिक दिस ए सब मकार, । कालकी चौविद सुर नारग, तिरयंच ।। विगलने देन पएसा नि.रहित. घिर पंच ॥ १६ ॥ गनय मणुजने दोह कालकी सन्ना य, केक प्राचारज कहे. दिध्विायत्री दोय. निचय पत्ता पं. दितिरि नर जेद, चौविद देवां माहे प्राची ऊपजै सेद ॥१७॥ खानपळत पंचेंदी सिरि नर तेम, पढनानू दग. पत्तैय चशम्सई म ॥ ए सरवेमें निधे, सुरनी श्रागति हुँति, पहात संख गमय रि नर सग नरके जंत.. ॥१॥ नरक नद वरत्या. नर, तिर जै न हुवे सेस, न अप्प वस्सश्में नरग विण उपजे असेता। वाई दस पयमें नू प्राक.वति, पुढवाई दस पयमें तेज वाक जिंत. ॥ १..तेत. वाळनो गमण पुढवी पद नवमें दुन, पुर- . . वाई दस पदमें विगल जावंत श्रावंत ।। सहुमें तिर गति मागति मणुा सहुमें जाय, तेन वाळयी मरोने जीव मनुज नवि थाय ॥ २० ॥ घीपुरसै चोविद सुर तिरि नर तीन वेद, यावर विगत नारकनें एक नपुंसक नेद ।। पङत्ता मणु वादर अगन वेमाणिक तेमजवण नरग व्यंतर जोइस चौपण तिरि, एमा||बेशी तशी पृथवी ने अपकाय, वायु वणस्तर अधिक अनुक्रम करि कदिवाय ॥ हे जिन ए सदु नावमें पांम्या वार अनंत, तेहनो अनुक्रम गिणतां किमही न आवे अंत ॥ २२ ॥ नर सुर विन सदु दंमग ते गति संयोग, लाधो नही तुह दसण कोनो कम्म प्रयोग । सुरमें पिण दसण लहि विरत न पामी मूल, ते सुर जात सहावे देसविरत प्रतिकूल ॥२३॥ प्रारजदेस प्रारजकुल शुद्ध सुगुरु उपदेस, तेहथी तुह दरसरानो किंचित पांम्यो लेस ।। धारक तारक कारक वारक दंशण देव, श्रातम गुण संसार समत्त कम्म सयमेव ॥ २५ ॥ खरतर गवनवारक श्रीजिनलान सुरिंद, रत्नराजमुनि सीस तेदना पद अरविंद ॥ रज मकरंदे लोनो ग्यानसार तमु सीस, तेण तव्या तेवीस दार दंमंग चोवीस || २५ ॥ संवत ससि रस वारण तेम चंद निरधार, पोस मास पख उऊस सातमने सोमवार ॥ श्रावक घायहपी ए फीनो प्रलप विचार, अम्म चौमासो कर जेपुर नगर मकार || २६ ॥ इति श्री चोवीस दंग स्तवनं ।। ॥ अय जीवविचार भापागर्मित स्तवनं ॥ ॥ उहा । नुवन प्रदीपक वीर नमि, किंचित् नीव सरूप ॥ कहस्युं पूर्वाचार्य जिम, पासबोध गुरुरूप॥ १ ॥ ॥ १ठी ॥ देसी मुरती महीनानी ॥ ए देसी । एक मुगति पीजासंसारी जीवनेद, समानिने सिमनं. रूप प्रदासंसारी घार गतिमप्रस दोष प्रकार, उपवास .
( २०७ ) तेन यण सर श्रावर धार||१|| फिटक रयण मणि विश्म हिंगुस बलि इरियाल, मनसिल पारो सुवरण प्रीदि धातुनी माल ।। सेढी वन्नी अरणेटो पालेवो पाषाण ॥ नोमल तूरी तनूमि पाइण जे खाण ॥ २॥ सुरमो लूण जात ए पुढवी काय विवेद ॥ नूमि प्राकास उस हिम करग अाफना नेद, हरित घात जपर जे जलकण धूं पर तेम ॥ होय घणो दधि अप्पकाय पिण पाहण जेम ॥ ३॥ अंगारा काला नोजर तिम उसकापात, असणि कणग विद्युतादिक अगनि जीव विक्षात ॥ ननामगवकलिका मंगल वलि मुख वात, सुद्ध गंज तिम घण तणु पाक ने क्षात ॥ ४ ॥ साधारण पत्तेय वएस्सई जीव 5 नेय, एग सरीर अनंत जीव साधारणनेय ॥ के चा अंकुर कुंपल फूलण बलि जंबाल, इंफोमा अदत्तिय सरचे जे फ स. वाल ॥५॥ गाजर मोय वाथलोग पालेको साग, गुपत सिरा सांधा गांठग जांजे सम नाग ! काटी माल मिमें रोप्या पद्ध व थाय, लाल पान इत्यादिक साधारण वणकाय ॥६॥ एग सरीरें एक जीव जे ते प्रत्येक, फूल गस फल मूल काठ बीजै जिय एका चण पत्तेय विना जे पांचे पुढवीकाय, सयस लोगमें व्यापक अंतमु हुर्ते आय ॥ ७ ॥ सूखमथी ते नियमा दिजी निजर न होय, सोका खोक प्रकास धकी वलि अलप न कोयाकमी संख गंमोला सहिंगा सटनी जात, चंदन कालसीमेहरजोका विक्षात ॥॥माया हाक्रम पौरादिक वेडी होय, गोमी माकण जूश्रा कीमा कीमी दोय दीपक ईसी घीवेली गोगीमा नात, चरम जू कागाददिया गोवर कम नतपात ।। ए॥धनकीमा जिम चोरकीमा गोवालो तेह, ईसी कंथुक इंगोप तेश एह ।। वीवू ढंकरा नमरा नमरी इंशी व्यार, तीमा माखी मांस मार कंसारी धार ॥ १० ॥ कवरमोला मांक मिय पतंग इस्पादिक नेव, नारक तिरि मणु देव पंचेशी व्यार बिछेगा।
(२०६) वाई दस पद में विगल जावंत श्रावंत ॥ सहुमें तिर गति मागति मणुआ सडुमें जाय, तेन वाकयी मरोने जीव मनुज नवि थाय ॥ २० ॥ श्रीपुरसै चोविद सुर तिरि नर तीन वेद, यावर विगल नारकनें एक नपुंसक नेद ।। पङत्ता मा बादर अगन वेमाणिक तेम लवण नरग व्यंतर जोइस चौपण तिरि, एमाशावेशी तशी पृथवी ने अपकाय, वायु वणस्सर अधिक अनुक्रम करि कहिवाय ॥ है.जिन ए सदुनावमें पांम्या वार अनंत, तेहनो अनुक्रम गिसतां किमही न आवे अंत ॥ २२ ॥ नर सुर विन सहु दंमग ते गति संयोग, लायो नही तुह दंसण कोनो कम्म प्रयोग । सुरमें पिण दंसा लहि विरत न पांमी मूल, ते सुर जात सहावे देसविरत प्रतिकूल ॥ २३॥ प्रारजदेस प्रारजकुल शुद्ध सुगुरु उपदेस, तेहथ) तुह दरसनो किंचित पांम्यो लेस ॥ धारक तारक कारक वारक दंशण देव, श्रातम गुण संसार समन कम्म सयमेव ॥ २४ ॥ खरतर गच नद्यारक श्रीजिनलान सुरिंद, रत्नराजमुनि सीस तेदना पद अरविंद ॥ रज मकरंदे लोनो ग्यानसार तमु सीस, तेण तव्या तेवीस दार दंग चोवीस || २५ ।। संवत ससि रस वारण तेम चंद निरधार, पोस मास पख नऊल सातमने सोमवार ॥ श्रावक पायहयी एकीनो अलप विचार, अम्म चौमासो कर जेपुर नगा मकार ॥ २६ ॥ इति श्री चोवीस दंग स्तवनं ॥ ॥ अय जीव विचार भाषागर्तित स्तवनं ।। ॥ हा ।। नुवन प्रदीपक वीर नमि, किंचित् जीव सरूप ॥ कदस्यु पूर्वाचार्य जिम, वासबोध गुरुरूप॥ १ ॥ डाट १ ली ॥ देसी मुरती माीनानी ॥ ए देवी ॥ एक.मुगति वीज्ञा संसारी जीवनेद, सनालिन सिमभनं. ते रूप मजेदासतारी पार गतिमप्रस दोय प्रकार, सुअर बात सुद्ध गूंज ( २०७) सेउ व सइ थावर धारा१॥ फिटक रयण मणि विश्म हिंगुल बलि हरियाल, मनसिल पारो सुवरण प्रादि धातुनी माल | सेढी वन्नी अरण्टो पालेवो पाषाण ॥ नोमल तूरी उस भूमि पाइण जे खाण ॥ २॥ सुरमो खूण जात ए पुढवी काय विछेद ॥ भूमि प्राकारस उस दिम करग आकना नेद, दरित घास ऊपर जे जलकण धू श्रर तेम ॥ होय घणो दधि अप्पकाय पिण पाहण जेम ॥३॥ अंगारा काला नोलर तिम नबकापात, असणि कणग विद्युतादिक अगनि जीव विक्षात ॥ ननामगनक्कलिका मंगल वलि मुख वात, घण तणु पाक ने दात ॥ ॥ साधारण पत्तय चणसई जीव नेय, एग सरीर अनंत जीव साधारणनेय ॥ कं वा अंकुर कुंपल फूलए बलि जंबाल, नूंफोमा अदत्तिय सरबे जेफ स वाल ॥ ५ ॥ गाजर मोथ वाथलो थेग पालेको साग, गुफ्त सिरा सांधा गांग जांजे सम नाग ॥ काटी माल मिमें रोप्या पद्ध व थाय, जाल पान इत्यादिक साधारण वराकाय ॥६॥ एग सरीर एक जीव जे ते प्रत्येक, फूल गल फल मूल काठ बीजै जिय एक। चण पसेय विना जे पांचे पुढवीकाय, सयल लोगमें व्यापक अंतमु हुर्ते प्राय ॥ ७॥ सूखमथी ते नियमा दिजी निजर न दोय, लोका खोक प्रकास की वलि अलप न कोय|| कवमीसंरख गंमोला सहिगा सटनी जात, चंदन काप्रलसीमेहरजोका विक्षात ॥ ॥माय या हाक्रम पौरादिक बेदी होय, गोमी माकण जूश्रा कीमा कीमी दोय ॥ दीपक ईली घीवेली गोगीमा जात, चरम जू कागादहिया गोवर कम नतपात ॥ ॥ धनकीमा जिम चोरकीमा गोवालो तेहे, ईसी कंशुक इंगोप ते एह ॥ वी ढंकरा नमरा नमरी दी व्यार, तीमा माखी मांस मार कंसारी धार ॥ १० ॥ कवनमाला मांक झिय पतंग इत्यादिक नेद, नारक तिरि मणु देव पंचेशी धार, विच्छेद ।
(२०६)
धम्मा वसा सेला अंजन रिहा कात, मघा माधबई नारंग ए नामें
सात ॥१॥ जलचारी थलचार नलचारी तिरपंच, मच कच सुंस.
मार मगर गाहा जस अंच | चौपय चरपरि जुजपरि साप जुचार)
तेय, तिबिहा गाय सापतिम नकुल अनुक्रम लेय||१२स खेवर चरम
रोम पंखी चमचे कपोत, मनुजलोकयो बाहिर समुग विगयं पंखें
दोत ॥सरवे जल थल खचर समुचम गप्प्रय दोष, कम्म प्रकम्म भूमि
अंतर दोवा मणु जोय॥१३॥असुरादिक दस होय वाण व्यंत रियों पर
जोस पंच वेमाणिय उविहासु ने दिछ। पनरेनेदे सिद्ध कह्या ऐ
जीव प्रकार, तनु मानादिक दिव एइनो कहिसु अधिकार देई
आनखो एक सरीरे प्रितनो मान, प्रांग जेहने जेता तिम वलि योन
प्रमाणाअंगुल नाग असंख सदू एगिंदी काय, जोयण महंस साधिक
पत्नेय वस्सई काय॥१॥वि तिचउरेही अनुक्रम ननिदेव कंचास,
घार जोयण तीन गान ग जायण नास । सलमना नेरइयां घेणु
सय पंच प्रमाण, तेहधी अरघर कणा अनुक्रम रयणा ||१६|| जो
पण सहस गनधर मच नरगनो देइ, गान धणुश्र पुदत्त चोरोप
वी जेह खेचर नव घणु नरग यंग जोयण नव होय, नव गाऊं
परिमाण समुछम
चौपय सोय ॥ १७॥खम गान चास पनप्प
य.गप्रय माण, तीन कोस नकोस मनुजनो काय प्रमाण || नुक्न
व्यंतर जोस वैमाणिय ईसागत, सात दाध नक्कीस कंचपरी तस
हुँत ॥ १७ ॥ सनतकुमार मा३ यम ब्रह्म लांत पांच, श्रुक स
हवारे नकोस च्यार कर बीच ॥ श्राणत प्राणत भारत अच्युत दाने
तान, नववेक दोष पंचागुतरस लीन १ बावोस सात तीन
दत बरस सहस्से पाय नू धाक वाऊ वरातीदिन तेककाय ॥ बार
घरमा गुराचात दिवस तिम वलि उम्मास, अनुक्रम येही तेरे
पौरि मनातील भवानको प्राय, गोर
.
. . (२०), तिरिय मनुजनों तीन पल्पोपम पाय | जलचर उरपर भुजपर नकोसे पुक्षकोमि, पंखीने रंग नाग असंख्य पल्यनो जोम ॥२१॥ सरव सूखम साधारण समूहम मयुं जेह, जदन्न नकोसे अंतमुदुत्ता नियम निति तेह, म उगाहण भारव्यो संखेपे अधिकार, जे वलि इत्य विसेस विसेस सूत्रसुं धार ॥ २२ ॥ असंख्य उस प्पणो सदु एगिई। आपस काय, नपजै च अनंत साधारण वसस्सई काय संख्याता संवघर विगल आपणो देह, सात आठ नव पंचशे तिरि मणुआ जेद ॥ २३ ॥ नारकथी नदवरती जीव नरक नवि जाय, देव चवीने ते वलि देवपणे नवि थाय | इंश्य सासोसास आन: घस ए दस प्राण, च्यार उ सात प्राउ गति चौरिझोय जाण ॥ २४ ॥ सन्नि असन्नि पंचेशी दस नव अनुक्रम जोय, प्राणायक। जेवि प्रयोग जिय मरणे होय।।लोम सायर संसार अपार अनंती चार, नमियो जीव धरम विन जोग असीने व्यार॥२५॥सग सग सग सग दस चवदे दो दो दो लाख, ज्यार च्यार तिम ज्यार चवदः सख सूत्रे साख ॥ नू अप तेन वाक वणयत्तेय साधार, विति चौ. परा तिरि नारग सुर नर अनुक्रम धार ।। २६ ॥ काय न धाय न. पाण न जोपी कुल नही जात, सादि अनंत जंग जिन आगम यित विक्षात ॥ रोग न सोग न लोग जोग नदो नारी लिंग, नहोय नपु. सक पुरसतणा नदी अंग नपंग ॥२७॥ नाण दरस चारित वोरज ए ज्यार अनंत, सिद्ध श्रया तेहथी सिहत सि कहंत ॥ म ए. जीवविचार गाथायो नापारूप श्रावक, आग्रहथी में कीनो सुगम सुगम सरूप ॥ २७ ॥ खरतर गछ नहारक श्री जिनसान सूरीत, रलराज गणि ग्यानसार मुनि सोस जगीत ॥ संवत ससि रस वारण ससिहर घर निरधार, माघ चोथ दिन कीनो जैपुर नगर मझार ॥ श्ए ॥ इति श्री जीवविचार स्तवन संपूर्ण ॥ ।।
. (२१) ॥ अंध समवसरण विचारगर्पित भागा स्तवन लिस्यते ।। ॥ दूदा ॥ श्री जिनसासन सेहरो, जगगुरु पास जणंद प्रणामी जेदना पाय कमल, यावी चोस इंद ।।१॥तीर्थकर या तिहां, निगमो फरे तयार ॥ समकित करणी साचयै, एद के अधिकार ॥ २ ॥ कर प्रशंसा समकिती, मिथ्यात्वी होवे मूक सूर्य देव दरखे सहू, जिम अंधारे घूक ॥ ३ ॥ ॥ ढाल |॥ १॥ वीर पखाणी राणी चेलणा ।। ए देसी । आप अरिहंत नलै प्राविया जी, गावै अपग्रह गंधर्व । समवसरण रथै सुरवराजी, संखेपे ते कईं सर्व ॥ ५॥ प्राण | नुवनपति वीस ईई मिल्या जी, सोलद व्यंतर सार || जोक्स दस वेमाणिय जुमचा जी, चौसठ सुविचार ॥ ५ ॥ श्रा० ॥ पवन सुर पूंज परमारजे जी, नूमि योजन सम नान । मेधकुमर रचै मेघने जी, करिय सुगंध छिम्काव ॥ ६ ॥ प्रा० ।। अगर कपूर सुन्न धूपणा जी, करय श्री अगनकुमार ॥ वाणव्यंतर हिव वेगसू जी, रचय मणि प्रीका सार ॥ ७ ॥ श्रा० ॥ पुहप पंच वरण वरध मुखै जी, वरपए जाणु प्रमाण ॥ नवणव देव त्रिगमोनलो जो, करय ते सुशन सुजाण || श्रा० ॥ ७ ॥ रचय गढ प्रथम रूपा- तणो जी, सोवन कांगरै सार । रवि ससि रयण कोसीसको जी, कनकनो वीच प्राकार || आ०॥ए || रतनगढ रतनने कांगरे जी, रचय वेमाणि सुरराज निलो त्रीजो गढनीतरे जी, जिहां विराजै जिनराज || प्रा० ॥१०॥ लींत उंची घणुं पांचसै जो, तेतीस विसतार ॥ ॥ धनुष से तेर गढ प्रांतरो जी, प्रौल पचास घणु च्यार ॥ श्रा० ॥११॥ दस पंच २ त्रिहुं गढ तणो जी, पावनी वोस हजार ॥ थाकं श्रम नहिय चढतां श्रका जी, एक कर नछ विस्तार ॥ आ० ॥ १२॥ पंच घणु सहस एयवीयको जी, सवा- , (११) रहे त्रिगढ आकास ॥ तेह तल सहू यथास्थित वसै जी, नगर श्राराम आवास ।। प्रा० ॥ १३ ॥ तोरण चिहुँ २ दिस तिहां जी, नीलमणि मोर निरमाण || उसय घणु मध्य मणि पीठका जी, नच जिण देव परिमाण || आ.॥१४॥ व्यार आसरा तिहां चिहुं दिसे नी, मोतीये काकामाल ॥ सम विव कूरा ईसाणमें जी, देवछंदो सुविसाल || श्रा० ॥१५॥ देवनि नाद नपदिसे जो, जिन गुण गावती तेह ॥ अह्म जिम आइ सिर कपरे जी गाजसी तेह गुण गेद ॥ १६ ॥ आ० ।। 11 ढाल २॥ सफल संसारनी। पुव दिति प्रासणे आय वेते पहू, सुर कत चौमुख रूप देखें सहू ॥ दीपं असोक तस बारगुण देहथी, देखि हरवं सह मोर जिम मेहथी ॥ १७ ॥ मोतियां जालि त्रिण ठत्र सुविसाल ए, रूप चि हुँ २ दिसें चामर ढाल ए॥ योजनगामनी वांग श्री जिनतण!, नगवंत नपदित बार परपद नणी ॥ १०॥ प्रदक्षिणारूपयो अग निकूण करी, गणधर साधचो तिम वेमाणिय सुरी || ज्योतो नु वानी वितरी स्वीपणे, नैशतकूण जिनवाण ऊनो सुरो ॥ त्रिहूंत या पति वायवश जाण ए, सुर वैमागीय नर नारि ईसाण ए ॥ बारद परखदा मद मचर गेम ए, भूख त्रिस विसरै सुणै कर जोर नामंगल तेज प्रकास जोयण सदस ध्वज च आकास ए, सहलै तेज धुव चक गगने सही, महक सहु वारणे धूपधाणा सही ॥ २०॥ चाहण वहिल सहु घरिय पहिले गदै, दोय पगचार नर नार नंचा चढे । जिनतणी वाणि सुणि जीव तिरयंच.ए, वैर तजि वीय गढ रहे सुख संच ए॥ २१ ॥ पुन्यवंत पुरुष ते परपद वारमें, सुऐ ज़िनवाणि धन गणिय श्रव तारमें || चौविद देव जिनदेव सेवा रवै, मणिमयी मांदिलो प्रोत . - . (१२) माहे वसे ।।२२।। चिहुं दिसि वाटली बावि चौ जाणिय, विदिति कूण दोय २ वखाणिये ॥आठ जिहां वावि जंस अमृत जेम ए, स्नान पाने वपु निरमल हेम ए॥२३॥ जय विजय जयंत अप राजिया, मध्य कंचण गर्दै प्रोल वसतिया | तुंबरु पुरुष खटंग अ र्चि माल ए, रजतगढ प्रौलना एह रखवाल ए ॥ २४ ॥ पहिलो त्रिगमो नहुयपुर जिण ग्राम ए, देव महर्डिक रचै तिण गंम ए॥ करण वारवार नही कारण कोय ए, आठ प्रातीहारज ते सही होय ए ॥ २५ ॥ जिण समवसरणनी शाह दीगी जियै, तेह ध धन धन्न अवतार पायो तिये॥ पास अरदास सुणी वंन्ति पूरज्यो, हिव मुझ ताहरो शुद्ध दरसन हुज्यो ॥ १६ ॥ ॥ कलश" श्म समवसरणे शहि वरणै सहू जिनवर सारखी ॥ सर- देहे ते लदे शुद्ध समकित परम जिनधर्म पारखी ॥ प्रकरण सिंझांत गुरु परंपर सुणी सहु अधिकार ए, संस्तव्यो पास जिनंद पाठक धर्म वईन धार ए, ॥ २७ ॥ इति समवसरण विचार स्तवनं ।। ॥ अथ श्री शपभदेवजी सुण २ सैटुंज स्तवन लि० ॥ ॥ दाल || पाटोपरजी पाटियै पधारो ॥ ए देशी । ॥ सुण २ सैध्रुजगिर स्वामी, जग जीवण अंतरजांमी, तो अरज करूं सिरनामी। रूपानिध विनती अवधारो, नवसाय पार नतारो, निज सेवक वान वधारो ॥ ० ॥ १ ॥ प्रभू मूरा मोदनगा), निरस्यां हरखै नर नारी, जान वारी हुँ चार हजार रु०॥२॥ हिव किसिय विमासण कीजै, मुझ कपर मदिर-धरी रंजन दरसन दीजै ॥२०॥३॥आज सयल मनोरथ फलिया रना पातिक टलिया, प्रन्नु जो मुझसे मुख मिलिया || ०। ४॥ समरघा संकट टसि जाये, नव नव नित मंगल पाये, मुर , . . (१३) प्रांतम पुन्य नरावै ॥ १० ॥ ५॥ करजोमी वीनंती कीजे, केसर चंदन चरचीजै, दिन धन र तेह गिणोजै ॥ ० ॥ ६ ॥ प्रनु दरस रसं लदि तोरो, अति हरपित हुवो चित मोरो, जिम दीना चंद कोरो ! रु० ॥ ७॥ परतिख प्रनु पंचम पार, वीस माहा नय कटं वारै, सहु सेवक काज सुधारै ॥ रु०॥ ॥ सेवो स्वामि दा सुखदाई, कमणा न रहै घर काई, वाथै संपत शोन्न सवाई ।। रु०॥एनालिराय कुलंबर चंदा, जव जन मन नयण आनंदा, लगै सुर असुर सुरिंदा ॥ रु०॥ १० ॥ जयकारी रिपन्न जिनंदा, ह सम धर परम आणंदा, वंदे श्रीजिन नक्ति सूरिंदा रु०॥११॥ ते शत्रुजय स्तवन संपूर्ण ॥ ॥ अथ दसमीका वडा स्तवन पार्श्वनाथजीका लि०॥ ॥ दाल ॥१॥ 'पास जिनेसर जग तिलो ए, गवमीपुर मंझण गुण निलो तवन करिस प्रनु ताहरो ए, मन वंग्ति पूरो माहरो ए॥ १ ॥ घरी नाम वणारसी ए, सुरनयरी जिण शद्धे हसी ए ॥ तेण पूरी दीपतो ए, अश्वसेन राजा रिपु जीपतो ए॥ २॥ वामा तसु नार ए तसु गुणहि न लग्गै पार ए ॥ तास उयर अवतार ए, अतिशय रूप नदार ए ॥ ३॥ चवद सुपन तिण निसि सद्या ए, क्रम करि ते सहु मन ग्रह्या ए ॥ पूरी नूपतिनें कह्या ए, जोमि कह्या ते जिम लह्या ए॥ ॥ ॥ दाल २॥ प्रथम सुपन गज निररख्यो, 'मायतणो मन दररख्यो । वीजे न ऊदार, धरणी जिण धरयो भार ॥ ५॥ तीजै सिंह प्रधान, बल कोय न मान॥ चनुथै देखी श्रीदेवी, कमल वसै सुर सेवी E ॥ पांचमैं पुष्फनी.माला, पंच वरण सुविशाला ॥ दोगे . (२१) ए चंद, ग्रहगण केरो ए इंद ॥ ७ ॥ सातमें सूरज सार, कियो अंधकार ।। आदमें धन लहकती, वरण विचित्र सोहंती ॥ ७ ॥ नवमें पूरण कून्न, नरियो निरमल अंन्न ।। देखि सरोवर दसमें, मनह श्रयो अति विसमें || ए ॥ समु ग्यारमें गंमें, खीरजलाधि इण नामें ॥ वारम देव विमान, वाजिन धुन गीत गान ॥ १० ॥ तेरम रतननी रासि, दह दिसि ज्योति प्रकासी ।। सुपन चवदमें ए दो,पातिक धूमश्री नोगे ॥११॥ सुपन कह्या सुविचार, दरख्यो नूप कदार ॥ पुत्ररतन होस्यै ताहरै, श्रास्यै नदय हमारे ॥ १२ ॥ 1 दुहा ॥ चवद सुपन श्रवणे सुणी, हरख कियो सुविचार || सुंदर मुत तुमें जनमस्यो, कुलदीपक आधार ॥१३॥वामा प्रीतम वचन मुण, आवी मंदिर कत्ति ॥ देव सुगुरु कीरति करै, जनम कियो सुकपत्य ॥१४॥ण अनुक्रम कगो दिवस, कीधा सुपन विचार ॥ ते घर पहुता आपणै, दोधां दान अपार ॥ १५ ॥ ॥ दाल ३॥ हिव जनम्या जगगुरुजगत्र थयो जयकार, विणक नारकिये पायो सुस्क अपार || दिसिकुमरी मिलकर सूत्रकरम निसि कीध, कर थानक पोहती वंचित तेहनो सिद्ध ॥१६॥ तिणहीज निसि चोस इंश मिली तिहां आवै, से निज नक्त सुरगिरि मात्र करावै ॥ क री जनम महोचव जननी पासे गवै, तिहांधी सुर सब मिल ही प.नंदीश्वर जावै ॥ १७॥ श्म रयण विदाणी गो दिवस कदार, For गाईजै कीजै मंगलाचार || इग्यारमें दिवसे मिली सह परिबार, दियो श्री नत्तम पासकुमार ॥१७॥प्रनु बाधै दिनरकला म चंद, त्रिहुं ज्ञान विराजितरूप जिसो देविंद ॥ गुणकसा विद्यातणो निधान, जोवनवय आयो परणायो राजान १ (१५) ॥ढाल ४॥ कुमरपदै मन्नु रहतां काल सुवै गम ए, आयो मन वैराग संजम लेवा समै ए ॥ तय लोकांतिक देव जणांव अवसरू ए, देश संवकरी दान याचक जन सुखकरू ए ॥ २०॥ स्वामी संजम लेय इंद्रादिक सब मिल्या ए, देस विदेस विहार करी कर्म निरदल्या पांमीय फेवलज्ञान सुरै महिमा करी ए, थापीय चौविह संघ मुगति रमणी वरी ए ॥ २१ ।। दाल ५॥ इम श्री गौमीपासतणा गुण जे नर गावे, ते नर नारी ह परलोग सुवंचित पावै ॥ संघ करी संघपति जिके गवझोपुर जांचे, चोर घाम संकट टले विघन बुरा न श्रावै ।। २२ ॥ धरणराय पनमावइ जास वदे सिर प्राण, सांमल वरण सुसोनित नव कर काय प्रमाण ।। कस्पद चिंतामणि कामगवी सम तोलै, श्री गुण- शेखर सीस समयरंग इण पर बोले ।।२३ ॥ इति श्री गोमी पार्थ- जिन स्तवनं ॥ । अय अजित शांति जिन स्तवनं लि०॥ मंगल कमला कंद ए, सुख सागर पूनम चंद ए ॥ जगगुरु अजिथ जिणंद ए, शांतीसर नयशानंद ए॥ १॥ बिहुँ जिनवर प्रशमेव ए, बिहुँ गुण गाइस संखेव ए ॥ पुण्यनंमार नरेसुप, मानव जय सफल करेसु ए ॥२॥ कोमहि लाख पचास ए, सागर जिनसासण लास ए, रिसद जिनेसर वंस ए, उपझाय सरोवर हंस ए॥ ३॥ स वसर तिहां राजियो ए, राजा जितशत्रु तिहां गाजियो ए॥ विजपा तमु घरनार ए, बिटुं रमयति पासा सार ए ॥४॥ कूषदि जिन अवतार ए, तिण राय मनाव्यो हार ए ॥ नपर यस्यो दस मास ए, अनू पूरी जननी प्रास ए ॥ ५ ॥ बिटुं जरा
(१६)
मन मंदियो ए, सुत नाम अजिय जिण तो दियो ए॥ तिहुप्रण
सयल नचाह ए, कमर वा जगनाद ए॥६॥ हंस धवल सारिस
तणी ए, गति सुललित निज गति निरजणी ए | मलपति चालें
गैल जाणे नयण अमीरस रेस ए ॥ ७ ॥ अवर न समोसं
सार ए, वलि न्यान विवेक विचार ए॥गुण देखो गज गदगो ए,
लंग्न मिति पग लागी रह्यो ए ॥ ॥ जोवन वय जब प्राधियो
ए, तब वर रमणी परणावियो ए ॥ पीय साथै सब काज ए, अनु
पाले पुदवी राज ए ॥ ए॥ दिव हथणापुर गम ए, विश्व
सेन नरेश्वर नाम ए राणी अचिरा देव ए, मनहर सुख माणे येव
ए ॥ १० ॥ चवदद सुपर्ने परवरयो ए, अचिरा नपरे सुत अवत
रघो ए॥मांनय देव वखालियो ए, चकीसर जिणवर जांशियो
ए ॥ ११ ॥ देस नयर हुय संत ए, तिरा नाम दियो श्रीशांत ए
। जिन गुण कुण जारी कही ए, बिहुँ नुवणे तसु उपम नदी ए
॥ १२ ॥ नपण सखूणो हिरणलो ए, बन सिंदे घोदे एकलो ए॥
नपण समाधि निरोध ए, इण नयणे नारि विरोध ए ॥ १३॥ गी
तदि राग सु रंग ए, पिण पत्नणे लोक कुरंग ए | तो लग्यो स
ति संक ए । तिण पांम्यो नाम कलंक ए ॥ १४ ॥ इश पर !
प्रति खलनन्यो ए, नयनंजण सांमि सानथ्यो ए ॥ धादि
मन आपणो ए, पाय सेवे मिस संग्न तणोए ॥१५॥ पीलाप
परले घणी ए, नय नविय कुमर रायां तपी ए ॥ पल पल य
यण जोगवे ए, पीय राज जली पर लोगवे प॥ १६ ॥ कमर
ले मंगल समें ए, पंचास सदस बरसां गमे ए॥ तो तेने दिया
जिसो ए, कपनो चकरपण तितो ए॥१३॥ साधीभरद
वरतावी यारा प्रखंक ए॥ चवद यश नव निरिसर
सोड नो अदो ए॥१८॥ सदा पनर ए
(२१७) चरा ए, बत्तीप्त मौमबद्ध नरवरा ए ॥ पायक गांमै कोम ए, दिन चे नमें वे कर जोम ए ॥ १५ ॥ हय गय रहवर जुजुवा ए, लख चौरासी मंदिर हुआ ए ॥ लाख त्रि वाजिन घमघमें ए, बत्तीस सहस नाटिक रमें ए ॥ २०॥ रूप जिसी सुरसुंदरी ए, लक्षण ला वएर लाला नर ए । जंगम सोहग देहरी ए, एसी चौसठ सह स अंतेको ए ॥ २१ ॥ अवरज शद्धि प्रकार ए, मणि कंचा र यण नंमार ए ॥ ते कदिवा कुण जाण ए, वपुवपुरे पुण्य प्रमांरा ए॥२२॥इम चक्कीसर पंचमो ए, चोरोदूसम सूसम समो ए॥ वरस सहस पचवीस ए, सब पूरी मनद जगीस ए॥२३॥ इण पर विहुं तीर्थकरा ए, चिर पालिय राज विविद परा ॥ जागी अवसर ए सार ए, बिहुं लीधो संजम नार ए ॥ २५ ॥ बिहुँ खम दम धीर ज धरी ए, बिहुं मोद मयण मद परिहरी ए | बिहुँ जिन झाग समाण ए, विदं पांभ्या केवल नाण ए ॥ २५ ॥ विहुं देवदि कोम- हिमदि ए, बिहुँ चौतीसे अतिसय सहिए। समवसरण विदुं गए ए, बिहुँ योजनवाण वखाण ए ॥ २६ ॥ नाचे रणकत नेनरी ए, बिहुं भागलि अंतेनरी ए| टिगमिग जोवे जग सडू ए, रंगहि गुण गावै सुरबहू ए ॥ २७ ॥ बिहुं सिर व चमर विमल, बिहुँ पग तल नव सोवन कमल ।। विडं जिनतणे विहार ए, नवि रोग न सोग न मारि ए॥ २० ॥ विहुं उबयार नुवन नरी ए, बिहुँ सिद्ध रमणसुं परवरी ए, पिहुं नंजी नव फंद ए, बिहुँ नदयो परमाणंद ए॥२५॥इम बोजो ने सोलमो ए, जांणे चिंतामण सुर तरु समो ए ॥ श्रुणि अति संऊ विहाण ए, तिहां श्द परजव नवि हांग ए ॥ ३० ॥ बिहुँ उच्च मंगल करण, विडं संघ सयल ऽरिय हरण || बिडं वर कमल नयण वयण, चिटुं श्रीजिनराज नुवरा रयण ॥ ३१ ॥ श्म जगते नोलिमतणी ए. श्रीअजिय शांति २७ जिण शुय . (१८) नणि ए ॥ सरण बिहुँ जिण पाय ए ॥ श्रीमेसनंदन नवझाय ए ॥ ३३ ॥ इति अजित शांति वृद्ध स्तवनं ॥ ॥ अथ मुहपत्ती पडिलेहण स्तवनं ॥ ।। दाल ॥ १ ॥ कपूर हुवै अति ऊजलो रे ॥ ए देशी! वरधमान जिनवरतणा जी, चरण नमूं चित लाय ॥ ज्ञान किया जिण नपदिसी जी, सव सुख तणो नपाय नविक जन घर श्रीजिन नपदेस, छूटे कर्म कलेस नामांकणी॥ पमिलेहरा मुहपत्ती तणी जी, नाखी वै पचवीस ॥ तिहां ए नाव विचारिये जी, इम नारी जगदीस ॥०॥२॥ प्रथम के पास विलोकिये जी, सूत्र अरथनी दृष्टि ॥ ए पझिसेहण दृष्टिनी जी, करै धर्मनी पुष्टि ॥ न० ॥३॥ समकित मिथ्या मिश्रनी जी, मोहनी तीननो त्याग ॥ कामराग स्नेहरागर्ने जी, तज वलि तिम दृष्टिराग ॥ ४ ॥ न० ॥ सीप वधू टक गुरुथकी जी, वाम हाथ करनान ॥ नव अखोमा आदरो जी, नव पखोमा गमान || एन०॥ देवतत्व गुरुतत्वसं जी, धर्मतत्व ग्रह सार । कुगुरु कुदेव कुधर्मनो जी, तीनतलो परिहार ॥ ६ ॥ न० ॥ ग्यान दरसण चारित्रना जी, संग्रह तीन आचार ॥ तजो विराधन तीन ए जी, एह अरथ प्रव. धार ।। न्नः॥ ७ ॥ मन वच कायानी सदा जी, गुपति गृहीने शुः ॥ परिदरिये वलि जांगने जी, तीने दंग विशुः ॥१०॥७॥ पमिलेहण पचवीस ए जी, मुंदपतीनी सार ॥ दिव पमिलेहण अंगनी जी, ते पिण चतुर विचार ॥०॥ ए॥ हास्य अरति रति धोयनें जी, सुद करो वांम वाद ॥ तज नय शोक गंठना जी, दक्षिण पिण करै साह ॥ १०॥ न० ॥ धुरली सेस्या तीन एजी, ते सिरथी करि दूर ॥ रिद्धि रस साता गारवोजी, करि मुखथी चकचूर ॥ ११ ॥०॥ काढ सख्य तीन उरथी जी,मा . . .
(१ए )
या नियाण मिथ्यात || व्यार कपाय वेव गलथी जी, क्रोधादिक
घात || १|| न० तिज खटकाय विराधना जी, चरण विन्दर
होय ॥ ए पहिलेहण अंगनी नी, पचवीसे तूं जोय ॥ १३ ॥ न
इम पमिलेदण जे करै जी, धर मन ज्ञान विवेक || सकल करम
करै जी, पामें सुरक अनेक ॥ १४ ॥ न०॥ कलस ॥इम वीर जि
वरतणा मुखयो, अरथ गणधर सांजली ॥ कहै सूत्रवाणी मन सुः
यो, सुणो नवियण मन रली ॥ नवझाय वर श्रीलचिकीरत, मु
थकी ए संग्रही । मुंदपती पहिलेदण तणी विध, लछिकीरत ग
कदी । इति श्रीमुद्दपनी पहिलेहण स्तवनं ॥
॥ अथ.आलोयण स्तवन लिख्यते ।।
दाल । सफल संसारनी॥र देशी !
ए घन सासन वीर जिनवरतणो, जास परसाद नपा
थायै घणौ ॥ सूत्र सिद्धात गुरुमुखयकी सांजली, सहिय समा
अनें विरति लदिये वली ॥१॥ धर्मनो ध्यान धर तप जप र
करै, जिणयकी जीव संसारसागर तिरै ।। दोष लागा जिके गुरुर
श्रासोश्य, जीव निमल हुवै वस्त्र जिम घोश्यै ॥ २ ॥ दोष ८
तिके चार प्रकारना, धुरथको नाम ने अरथ ते धारणा ॥ किए।
कारण वसै पाप जे कीजिये, प्रथम ते नाम संकप्प कहीजिथै।
कीजीये जेह कंदर्प प्रमुखै करी, दोप तेवीय परमाद संज्ञा धरी
कूदतां गर्वती होय हिंसा जिहां, दर्प इण नाम करि दोप ती
तिहां ॥ ॥ विणलतां जीव जीवनेगिनर करे जिको, चोथौ
द्विया दोप कपजे तिको । अनुक्रमें ज्यार ए अधिक एक एक
दोप घर प्रायचित्त लेद विवेकयी ॥ ५ ॥
(२०) 1 दाल २॥ अन्य दिवस कोई मागध आयो पुरंदर पास || ए देशी ॥ पाटी पोथी कवली नवकरवाली जोय, ग्यानना उपगरण- तणी यासातन कीधी होय ॥ जघन्यथी पुरम एकातलो श्रांवित नपवास, अनुक्रम एह आलोयण सुगुरु वताई तास ॥ ६ ॥ ए जो खंमित श्रायै अथवा किहांई गमाय || तो वलि नवा करायां दोष सहू मिट जाय || थापना अणपमिलेह्यां पुरिमढनो तपधार, गिरता एकासपने गमता चोथ विचार ॥ ७ ॥ दर्शनना अतिचार तिहां पुरमट्ठ जघन्य, एकासण विल अध्म चिहुं नेद मन्न । प्राशातन गुरु देवनी सादमीसुं अप्रीति ॥ जघन्य एकासणनी आलोयण चढती रीत ॥ ७ ॥ अनंतकाय आरंन विणास्यां चोथ प्रसिंह, वि ति चनरेशी प्रसायां एकासणथो वृक्ष॥ बहु विति चौरें: यि हएयां विति चन नपवास, संकल्पादि चिहुं विधि गुणा उगुण प्रकास ॥॥ नद्देदो कुलियावमा कीमो नगरा नंग, बहुत जलोयां मुक्या दस नपवास प्रसंग ॥ वमन विरेचन कमि पातन यांविल इक एक, जीवांणी ढोलंता दोय उपवास विवेफ ।। १० ॥ संकप्पादिक एक पंवेदी उपव होय, दो त्रिण पाठ दसै नपवास श्रालोयण जोश, बहु पंचेही नपश्व अमें दस वीस 11 चिहुं प्रकारै चढती आलोयण सुण ले सीस ॥११॥ पंक्षीने सकमी प्रमुखै कीध प्रहार, एकास प्राबिल उपवास में उस विचार ।। साध सम- लोक सम राज समक, कुमा पाल दियां 3 चौधरु कर प्रत्यक्ष ॥१२॥ उपवास दस दमायां तेम मरायां वीत, इक लख असी सहस नवकार गुणो तजि रीस ॥ पख चौमास वरस लग इक त्रिण दस नपवास, अधिको क्रोध करे तो पालोयण नंदितास ॥ १३ ॥ सूश्रावमना दोष कियां गुरु कपर रोस, जीव विराधन फोघां बहु असताने स ॥ करीर उचालत चार हजार गुणो व .
.
(२१)
कार, मिजाक्कम दे पालोवो चारोवार १४॥
। दाल ।।३॥ वे कर जोडी ताम || ए चाल ।।
॥ विण कीधा पञ्चखाण, विण दीघा वांदणा, पमिकमा
विध पांतरे ए ॥ अशोझा में असिझाय, तिहा अविध नाया,
कर प्रांधिल आचरै ए ॥ १५ ॥ गंगतीने एकत्र, निबी श्रांधिल,
गै पालोयण में ए ॥ एक पांच पट आठ, नवकरवालीय ॥ गु
नवकार अनुक्रमे ए ॥ १६ ॥ उपवास नंग नपवास, आंबिल न
रां, अधिको दंक वखालिये ए ॥ पांचम आठम आदि, जंग कि
वतो, फिर ग्रही पातिक हासीय ए ॥ १७ ॥ करवल मूसल श्रा
चूलै घरटिय, दीधै अम्म तप करै ए 11 मांगी सूई दोध, कातर
दुरी, बिल चढता आदरै ए ॥ १७ ॥ जीव करावै युझ, रा.
भोजन, जल तिरको खेलण जूनो ए॥ पापतणा उपदेश, परक्षे
चीतव्या, नपवास एकर जूजूमा ए ॥ १५ ॥ पनरे करमांदा
नियम करीनंग, मद्य मांस मारवण जख्या ए॥ बालोयण
पचास, संकप्पादिक, चिहुं नेदे चढतां लिख्या ए॥ २० ॥ बोल
मिरखावाद, अदत्तां दान त्युं, जघन्य एकासरा जांगोये ए॥श्र
नत्रुष्टी एण, जाण पालोयण, उपवास दसर प्राणियै ए ॥ २१
॥ ढाल || ४ || सुगण सनेही मेरे लाल ।। ए चाल ||
बत जागे अतीचार, जघन्य 3 श्रालोयण धार
मध्ये दस उपवास विचार, उत्कृष्टा गुण लख नवकार ॥ १२
परिग्रह विरमण दोप प्रसंग, तीन गुणवतमाहे नंग ) च्यार तिः
व्रतने अतिचारे, प्रांधिल त्रिरा प्रत्येक धारे ॥ २३ ॥ शीलता
नववामि कहाय, तिहां जो लागो दोप जणाय ॥ त्रियनें फर
हुआं अविवेके, एकं आंबिल कीजे प्रत्येके ॥२४॥ साधु अने श्राव
पोसोध, एकं सचित्त संघटे कीध । वीतर नोले सञ्चित जल
॥
( २२३) ध, दंग एकासण अांवित दीध ॥ २५ ॥ विण धोयां विण खूह्या पात्र, एकासण तिम पुरिमठ्ठ मात्रे || गइ मुहपत्ता प्राविल सारो, तिम नपै अध्म अवधारो ॥ २६ || यार श्रागार गंझो राखे, व्रत पञ्चखांण करै पट् साखै ।। दोपे मिचामिउकम दाखे, आलोयण लेतां अनिलावै ॥ २७ ॥ आलोयनो अति विस्तार, पूरो कहिता नाच पार ।। तोपिण संक्षेप तंत सार || निरमल मन करतां वि स्तार २० ॥ श्म श्रीवोर जिनेतर स्वामी, जसु पागम वचने विधि पामीजीतकल्पाणांगे आदि, वली परंपर गुरु सुप्रसाद २ए ॥ कलश . ॥ श्म जेद धरमी चित्त विरमी, पाप सर्व पालोयनें । ए कांत पू गुरु वतावै, शक्ति वय तसु जोयनें ॥ विध एह करती तेह तिरसी, धरमवंततणे धुरै ॥ ए तबन श्रीधमसिंह कीधो, चौ पने फल वधी पुरै ॥ ३० ॥ इति श्री आलोयण स्तवन संपूर्ण ॥ ॥ अथ नंदीश्वर दोप स्तवनं ॥ नंदीसर बावन जिनालय, साश्वता चोमुख सोहे रे ॥ ष 'नानन चंज्ञनन वारिषेण, वर्द्धमान मनमोहे रे ॥ २० ॥१॥ श्राठमो होप नंदीसर अदनुत, वलयाकार विराजै रे । तेहने मध्य चिडं दिस सोनित, अंजन गिरिवर गजै रे || नं०॥ २ ॥ जोयण सहस चोरासी ऊंचा, कंचपणे अन्निरामा रे ॥ मूलै प्रथुल सहस दस जोयण, नवरि सहस कर ॥३॥ नं०॥ते ऊपर प्रासाद प्रभूना, प्रति उत्तंग नदारा रे ॥ साधू जंघा विद्याचारण, वांदे वि विध प्रकारा रे॥ नं० ॥ ४ ॥ चैत्यैश कसो चोवीस, वि संख्या 'सब दाखीरे ॥ ध्यावो सेवोनविजन नगते, सुध पागम कर सा रवी रे ॥ ५० ॥ ५ ॥ कंधपणे सहु जोयण बदुत्तर, सो जोयण ...:. रे ॥ पिडुलपणे पचास जोयणना, प्रनूप्रासाद सुगमा रे , (२२३) ni० ॥ ६ ॥ धनुप पांचसै श्रापत प्रनुनी, विविध रतनई काया रे ॥ जिन कल्याणक च करवा, सुरपति ने श्राया रे ।। नं० 11 3 | अंजन अंजनगिरि चहुं नबरे, चोमुख ज्यार विसाला रे ।। वावर विच कर पर्वत, राजत रंग रसाला रे ॥ २० ॥ ॥ चो सठ सहस जोयण उत्तंगे, दस सहस सत पिडुलारे ॥ चिहुं दि सि सोल सइस दधिमुखगिरि, तिहां प्रासाद सुविमला रे ॥२०॥ ए वावर ने अंतर विदसे, रतिकर परवत रूमारे ॥ दोयर संख्या जगदीसै, कह्या नही ए कूमा रेशानं०॥१०॥ जोयण सहसमान दस ऊंचा, दस२ सहस विस्तारारे । जलरिसम संगण जगत गुरु, श्चय ए निरधारया रे ॥ २० ॥११॥ तेह ऊपर प्रासाद सतोरण, अंजनगिरि परमाणे रे ॥ जिनपभिमानी संख्या तेदिज, श्रीजिन राज वखाणे रे ।। नं० १२ । म मासाद प्रभूना वावन, नंदीसर वर दीपे रे ।। व्य नाव विधि पूजा करतां, मोह मदाना जा रे ॥ नं0 ॥ १३ ॥ प्रवचन सार नदार प्रकरणे, जोहानिगमें जा पोरे ॥ श्म अधिकार के ग्रंथ अनेके, शहां संका मत आयो रे ॥ नं०.१५॥ जिम सुरपति विरचे तिहां पूजा, ते अनुनय श्दा ख्यायो रे । ध्याचो जिम पावो परमातम, जैनचंद गुण गावो रे।। नं०॥ १५॥ इति नंदीश्वर स्तवनं ।। ॥ अथ अढाइ द्वोपे वीस विहरमाण स्तवनं ।। - ॥ वं मनसुध विदरमाण जिरोसर वीस, दीप घढी में विचरे जयवंता जगदीस ॥ केवलग्यानने धारै तारै कर नपगार, किए २ ठामे कुण२ जिन कदस्यु सुविचार ॥१॥ पैंतालीस सद योजन मानुषक्षेत्र प्रमाण, वलयाकारे प्राधे पुष्कर तीमा जाण ॥ दोय समुझे सोहे दीप अढाई सार, तिसमें पनरे करमानूमीनो कहूं अधिकार ॥२॥ पहिलो जंबूदीप समै विच बाल आकार, सांबो पिडुलो इक लख () जोयसने विसतार ।। मोटो तेदने मध्य सुदरसन नामें मेर, तिसर्थ दिति विदसानी गिणती व्यारे फेर ॥३॥ मेरुथको दक्षण विति एद नरत सुन्न क्षेत्र, पांचले उबीस जोयण कला तेहनो क्षेत्र ! नचरखममें एडयो एरवत क्षेत्र कहाय॥ इण चिहु करमांतूमी उप अरा फिरता जाय॥ ॥ तेत्रीस सदस ग्ते चोरासी जोयण जाण, च्यार कला ए महाविदेह विखंन वरखाण ॥ बावीससै तेरे जोया एक विजय पडुलाण, एहवी वत्तीस विजय विराजे जेहने गण || ॥ ५ ॥ मेरु विच कर पूरव पश्चिम दोय विन्नाग, सोलै । विजय तिहां विचरै श्रीवीतराग || सासते चोथे पारे तारै श्रीअरिदंत, एडवे महाविदेद करमन्नूमि त्रीजी तंत ॥६॥ पूरब विदेह विजय पुष्कलावतो श्राग्मी गंम, पुंमरीकणी नगरी तिहां श्रीसीमंधर- स्वामि । वप्रविजय पचवीसमी विजयापुरनो नाम, पछिम विदेद चीजो युगमधिर कीजै प्रणाम ॥ ॥ तिमहिज नवमी विजय वति पूरय विदेह, नयर सुसीमा त्रीजो वाहु नमूं घरि नेद ।। नलिनावर्त चोवोसमी पछिम विदेह वखाण, योतसोका नगरी तिहां चोयो सुबाहु सुजारा ।। ७॥ ए च्यारे जिणवर जंबूहीप मकार, महाविदेद सुदरसण मेरुतणे परकार । एदवो जंबहीप मह गढ जेम गिरिंद, खाई रूपे दोय लख जोयण लवण समंदए । ॥ दाल ॥ २॥ दिवाली दिन पारियो । ए चाल || दीपे वीजो द्वीप ए, धनश् धातकी खंग ॥ पिडुलो चिटुं सख जोयणे, मंगल रूपे मंग ॥ १० ॥ दी० ॥ दोय नरत दोय परबत, दोप वलि मदाविदेद ।। करमन्नूमि खट जिदां, वण- हिज नामें एद ॥११॥ दी। पूरब पश्चिम घातकी, खेम गिणीने दोय, विजयमेरु प्ररय दिस, पछिम प्रचलमेर जोय ॥२॥दी। इक २ मेल्ने यंतरे, करमन्नृमि तीन २ ॥ निजर नेरुयो मस्ति,
.
(१२५)
खो चिहुं दिप्ति लीन ॥ १३ ॥ दी० ॥ श्रीसुजात जिन पोचमो,
को स्वयंप्रन्नु ईस || झपन्नानन जिन सातमो, समरीजै निस दीस
१४॥ दी || अनंतवीरज जिन आठमो, ए च्यारे जिनराय ||
व धातकी खंझमें, महाविदेह रहाय ॥ दी० ॥ १५ ॥ पहिली
हुँ जिननी परे, विजयनगर दिसि गण,॥ तिणहिज नामे अनुक्रमें,
जयमेरु अदिनांण ॥ दी० ॥ १६ ॥ नवमो सूर प्रनु नमू, दसमो
- विसाल ॥ इम वजधर ग्यारमो, त्रिकरण नमूं त्रिहुं काल ॥
० ॥ १७ ॥ वारमो चंशनन जिन, पछीम धातकी मांहि ॥ विवरै
रुं जिवरा, अचलमेरु नछाहि ॥ दी० ॥ १७॥ एहवोधातकी
कए, परदक्षणा परकार ॥ यह लख जोयण वीटीयो, समुश् कालो;
घ सार ॥१५॥ दी।
.॥ दाल ॥ ३ जी । पहिली प्रतिमा एकण मासनी | ए चाल ||
कालोदधिने पैलै पार ए, वींव्यो चूमी जेम विचाल ए ।
सद लख जोयण विसत्तार ए, दीप पूरवरवर अति सुखकार ए॥
बालो ० सुखकार पुप्फरदीप त्रीजो, तेहनें श्राधै पगै॥ विव पड्यो
चत मानुप्योत्तर, मनुष्यक्षेत्र तिहां सगै तिण प्राधिकर लाख
जन, अरध पुष्कर एम ए| तिहां करमन्नूमीठ ए कहीजे, धात.
खं जेम ए ॥ २० ॥ दाल || श्राधै पुष्करनें पूरब दिसे, मंदिर
मे मेरु तिहां वसे । पछिम विजमाली मेर ए, इहां किण इतरो
मे फेर एन०॥फेर ए इतरो श्हां नामे, श्रवर टामे को नही ।।
5२ मेरे तीन तीने, करमनूमि तिहां कहो । इम नरत एरवत
हाविदेदे, नाम सरखो देत ए॥ तिलहोज नामे विजय सगली,
सता धर्म खेत ए ॥ २१ ॥ ढाल || धातकी खमै तिम पुष्कर
E), शहां क्षेत्रानी रचनाविध कही। गर २ कहनां एविसतार ए,
इला पर लेज्यो सुविचार ए॥ १० ॥ सुविचार वाकी तेह सगलो,
२॥
(२२६ )
नगर तिमदिन मन गमें ॥ पुरवे पछिम जेहनी ते, तेह तिमही
अनुक्रमें॥श्रीचंवाहु नुजंगईसर नेम च्यार तीर्घकरा, पूर्व पुष्कर
थरथ मांदे, सर जीव सुखंकरा ॥२३ || ढाल ॥ वैरसेन वंदू जिन
सतरमो, श्रीमदान अधरम मिप्त नमो । वेवजता नगणीसम
देव ए, जसो रिद्ध वीसम जिरा देव ए॥ १०॥ जिप च्यार पुष्कर
अरंध माहे, कह्या पछिम नाग ए॥ तिहां मेरु विगुनमालि चिहुं
दिसि, विचरता वीतराग ए|| चौराप्ती पूरव साख बरसा, पाच इक
२ जिण तणो ॥ पांचसै धनुप सरीर तोदे सोवन वरण सुदामणो
॥ २३ ॥ ढाल । कास जघन्ये ए जिन वीत ॥ दिव इलट
नेद कहीस ए ॥ ॥ एकसो सत्तर तिहां जिनवर है, पांचे
जरते जिम पांचे लहै ॥३०॥ जिय लहै पांच सेम पांच
एरवत मिल दस हुवा ॥ इक ३ विदेदे बत्तीस विनया,
तिहा पिण 7 जूजूश्रा ॥ एकसो सत्तर एम जिनवर, कोमि
नवसय केवली, नव सहस कोमी अवर मुनिवर, बंदि नित ते
'चली २४ ॥ ढाल ॥ इहां जरते एरवतें आज ए, पंचम आरे
'नही जिनराज ए॥ धन २ पांचे महाविदेह ए, विचरे वीसे जिन
गुणगेह ए || ३०॥ गुणगेह दोष अढार वरजित, अतिसयां चोतीस
ए । चौसहि इंद नरिंद सेवित, नमुं ते निसदीस ए॥ तिहां मा
तारण तरण विचरै, केवली दोय कोम ए॥दाय सहस कोमी सुसा
बीजा, नमुंवे कर जोमए॥२५॥ कलश ॥इम अढी दीपे पनर करम
'नूमी क्षेत्र प्रमाण ए, सिद्धांत प्रकरण तेह नाख्या-वीस विहरमाए
ए॥ श्रीनगर जेसलमेर संवत सतर गुगतीसे समै, सुखविजय दर
जिनंद सानिध नेह धरि ध्रमसी नमें ॥ २६ ॥ इति अढी होप
संपूर्ण || १ जंबूद्वीप २ धातकी खंझ ३ आधोपुष्करदीप एवं
छोपमें ५ नरत ५ एरवत ५ महाविदेह १५ कर्मभूमीमें विध:
,
.
(२२७ )
रता साश्वता २० विहरमानको मेरा नमस्कार हुवो ॥
॥ अथ आवजी तीर्थ स्तवनं ॥
॥ नात्रीमान्लाई पाबूजीनी जान करेज्यो, जात्र जणी क
महेश्यो, तुम्हे नरन्नव लादो वीज्यो रे ॥ जात्री० ॥ पंच तीरथो
मांदे गजे, पावू मारूमै देत विराजे रे । जा० स्वरगथी वादे ला
गो, नंचो अंधरिये जर लागो रे ॥ मा० ॥ १ ॥ एतो देवानो वास
कहावे, निरखता प्रिपति न आवे रेजा० ॥ एतो मुंगरियानो राजा;
एदनी के बारह पाना रे ।। जा० ॥ २ ॥ व्ह ऋतु वास वसायो,
एतो चंपला अंबला गयो रे ॥ जा० सरवर करणा काका, जिहां
तिहां वनवेल्या भामा रे || जा०॥ ३ ॥ नार अढारे वणराई,
एतो दाहिज निजरे पाव रे || जा०॥दददिसि परिमल पावै, फू
समानो रंग सुदावे रे॥जा० ॥ ४ ॥ ऊपर नूमि विसाला, देवल
दीग रतियाला रे || जाप विमलमंत्री वरदाई, चकेसरि देवी सहा
३२॥ जा ॥ ५॥ पोरवाम बंस वदीतो, जिप दलपति सादि जी
तो ।। जाon देवल तेरा करायो, पाहणारास मंमायो रे।। जा०
॥६॥ कोणी कोरणी फेरघो, दल मारवणलेम नरयो रे जा०
॥ नवीर नांति वाई, जिदो तिहां कोरलिया फिगाई रे ॥जा०
॥ ७॥ उत्तरे पादश जेतो, जोखीने पाहस तेतो रे ॥ जा० ॥
आदि अनेसर सांमी, प्रतिमा धापी हितकामी रे ।। जा० ॥
नगणिस कोम सोनश्या, व्य लागत करि जस लीया रे ॥ जा०
। करजोमीने प्रागै, मंत्री जिनवर पाप लागे, रे । जा0 10 11
पुरी चढिया दाथी, ममाला पति साद साधोरे जा०॥ इण देवल
समय कोई, भूमंगल मादि न होई रे जा ॥ १०॥ पलि ति
वंस विगताला, वस्तुपाल अने तेजपाला रे ॥जा० ॥ देव नमो
कहि पाई, इहां तियां पिण सफल कराई है। जा० ॥ ११ ते
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--
गुणगेह एन०॥ गुणगेद दोष अढार वरजित,प्रतिसयां
'जिनंद सानिध नेद धरि ध्रमती नमें ॥ २६ ॥ इति प्रदी
(२२६)
नगर तिमदिन मन गमें || पुरवे पछिम जेदनी ते, ते
अनुक्रमे ।। श्रीचंवाहु नुजंगईसर नेम घ्यार तीर्थकरा,
अरथ मांहे, सरबजीव सुखंकरा ॥ २५ ॥ ढाल ॥ वैरसे-
सतरमो, श्रीमहान अधरम नित नमो देवजता
देव ए, जसो रिद्ध वीसम जिण देव ॥१०॥ जिगर
अरंध माहे, कह्या पछिम नाग ए॥ तिहां मेरु विणून
दिति, विचरता वीतराग ए॥ चौराप्ती पूरब साख वासी
२ जिण तणो ॥ पांचसे धनुप सरीर सोहे। सोवन वरण
॥ २३ ॥ ढाल ॥ काल जघन्ये ए जिय वीत ॥ दिन
नेद कहीस ए ॥ ॥ एकसो तत्तर तिहां जिनक्रम
जरते जिम पांचे लदे ॥३०॥ जिव लदै पांच तेज
एरवत मिल दस हुवा ॥ इक र विदेदे बनीत
तिहा पिण 7 जूजूश्रा ॥ एकसो सत्तर एम जिनक
नवसय केवली, नव सहस कोमी अवर मुनिवर,
'चली ॥ २५ ॥ ढाल ॥ हां नरते एरवते आज ए, पं.
'नही जिनराज ए॥ धन २ पांचे महाविदेद ए, विचरे ६
ए । चौसहि इंद नरिंद सेवित, नमुं ते निसदीस ए॥
तारण तरण विचरै, केवली दोय कोम ए॥दोय सहस कोकी
बीजा, नमुंबेकर जोमए॥२५॥ कलश ॥इम अढी हीपे
नूमी क्षेत्र प्रमाण ए, सिद्धांत प्रकरण तेह नाख्या वीत...
ए॥ श्रीनगर जेसलमेर संवत सतर गुणतीस समै, सुखपि
वंदिये
स्तवनःसंपूर्ण || १ जंबूद्वीप २ धातकी खेर ३ पो
-शा छोपमें एनरत प एरवत ए महाविदह १५ कर्मभूमनि
(२२) सो असी ए ॥ ३ ॥ तेरेसे निव्यासी कोमि, साठ लाख सुंदर, नुवनपती मांदि मन वसी ए॥ १ ॥ बारे देवलोक प्रासाद; चौरासी लाख, सहत दिन्नू ने सातसे ए॥ ५ ॥ ॥ ढाल || २ | आव्यो तिहां नरहर | ए चाल || हिवै नवमीवेक पंचानुत्तर सार, चेईहर त्रणसय त्रेवीसा सुविचार || प्रत्येके प्रतिमा वीसासो तिहां जाण, अमत्रीस सद स सत साठ अ गुण पाण ॥ ६ ॥ नंदीसर बावन कुंभल रुचक वखाण, चनश् चेईहर साठ सबै बिहुँ गंण ॥कसो चोवीस गुण प्रतिमा चिहुं नाम, व्यारसै चालिसा सात सदस प्रणमाम ॥७॥ नंदीसर विदिसै सोलस कुल गिरि तीस, मेरू वन अस्सी दस कु रु गजदंते वीस ॥ मानुपोत्तर परवत च्यार२ खुकार, प्रेसो अति सुंदर वद सकार मकार || G॥ ॥ दाल 1 ॥ || दिग्गजगिरि चालीस, असी इदं सुजगीत || कंचन गिर वरु ए, एक सहस धरु ए ॥ ए ॥ वृत दीरघ वैताढय, वीस सत रसो आढय || सतर महानदी ए, पंच चूला सदी जंबू प्रमुख दस रुक, इग्यारेस सत्तर सुस्क ॥ कुं त्रणसय असी ए, वीसजमगवसी ॥ दाल॥४॥ त्रिण सहस सो एक निवाणू रे, जिनवर प्रासाद वखाणूं, बीस सो ए अंक गुणिये रे, तीर्थकर प्रतिमा श्रुणिय।।१२॥त्रिस लाख सहस वलि पासी रे, प्रतिमा पासो ने असी । सरवाले सब मेलीजै रे, जिनवर प्रासाद नमीजे ॥ १३॥ ग्राउ कोमि सत्तावन लरका रे, दोपसे निव्यासी कयरूका 1 हिव प्रतिमा ग्यान कहीजे
पाए। तेइ तणा प्रासाद, त्रिन्नुवन सातता, प्रणमंदिर
॥ रिपन्नाननं बधमान, चंज्ञनन जिन, वारिपेण नामे /
मशा ए॥२॥ वेश्वर सग कोमि, लाख पहुगर, श्व
(२२८ )
हवो जिणहर पास, वार क्रोमनी सागति नासै रे ।। जा
पी जेगणी, आलानी अनब कहाणी रे ॥ जा० १२॥
ल सोद वधारी, नेमनाथजी वाल ब्रह्मचारी रे ॥ ला०
वट पाहण केरी, मूरत सुरमा रंग हेरी रे || जा० ॥ १३
वामो दीगे, ते तो लागै नयरी मीगेरे । जा० ॥ तिहां
पास, लोक जोवे घणो तमासै रे ॥ जा० ॥१४॥ त्रिण
गल जाश्य, देवल देखी सुख लहिये रे ॥ ना० चोमुख
ध्यारो, आदिनाथ देव जुहारो रे ॥ जा०॥ १५ ॥ सोवन
धातो, किंगमिग रही दिन ने रातो रे ॥जाण ॥मण चवदेते
लौ, जिण बिंबनो नाव निहालो रे ॥ जा० ॥ १६ ॥श्र
नोम सोजागी, जिणवरथी जसु लय लागी रे ॥ जा० ॥
। एहनी करणी वाहवाहो, यहां लीधो लखमी साहो रे ॥
।॥ १७ ॥ श्ण डुंगरियै श्रावी, जिण जात्र करै मन जावी
जा०॥ जिहां तहां पूज रचा. नाटकिया नाच करावै रे॥
॥ १७ ॥ रातीजोगो दियरावो, जिनवरना जस गुण गावो
जा० ॥ सादमी वचल कीज्यो, जातकलीनो जसलीजो रे ।
॥ १५ ॥ आगेयी श्रावी चाली, वातां के अचरज वाली
ला० ॥ सुणिये है जे कोई, अदिनांणे जोज्यो तेई रे ।।
॥ २०॥ ए तीरथना गुण गावे, जात्रानो फल ते पावे रे
जा० ॥ ए तीरथ समतोले, कुण पावै रूपचंद बोले रे ।। बार
२१ ॥ इति श्राबूजी स्तवनं ॥
॥ अथ सकल सास्वता चैत्य नमस्कार स्तवनं ।
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,
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(२३१) घदनी प्रमुख जे शेष रह्या हुतारे, ध्यार अघाती कर्म ॥ दूर निवारया रे अनुक्रम तेइने रे, पाम्युं शिवपद शर्म ॥ १॥०॥ संप्रति कालै रे श्रीजिनराजनो रे, पूजीजे प्रतिविष ॥ प्रतिदिन लहियैरे प्रनु सुप्रसादधीरे, मन वांन्ति अविलंब ॥ ५॥ न० ॥ श्रीजिनवरनो बिच बिलोकतां रे, कृत दूर पुलाप इंघिय निग्रह सुग्रह संपजे रे, समकित पिस घढ बाय ॥ ६ ॥०॥ श्रीस रुना मुखपी सांजम्मा रे, एदवा वचन विलास ॥ ते बहुमाने रे निज विनमें थरकारे, नेमी सुत जाईवास |॥ ७॥ ॥ चैत्य- कराव्यु रे सुंदर तोलतो रे,मनधर अधिक नसास ॥ शीतल अनुनो रेवि पराधियोरे, सदसफणा वलि पास ।। Gन० ॥ वरस अगरद सत्तावीतमे रे, माधव मात मकार ॥ नऊल द्वादशी दि. वसे मापियो रे, विंव अनेक मुवार ॥ए ॥०॥ एकसो इक्यासी ता मेले या रे, विवादिक सुविचार ॥ कीध प्रतिया ते दिन ते- दनी रे, विधि पूर्वक मन पार ॥ १०॥०॥ श्रीजिनलान सूरी- भ्वर दीपतारे, श्रीलरतर नट नाम || तास पसाय में शीतल जिन भुपारे, विप क्षमा कल्याण ॥ ११ ॥ ॥ इति शीतल जिन स्तवनं॥ ॥अप श्रीधरमनाप स्तवनं ॥ रे तो भरपा गापी तट नमुना के वीर भो ॥ ए पान । हारे मारे घरम जिनंदसं सागी पूरण प्रीत जो, जीवमलो सखचाणो जिनजीनी नलगे रे सो ॥ दारे मुंने थास्ये कोश्यक समें मन सुप्रसन्न जो, वातमली तव यास्य मदारी सपि वगेरे सो॥१॥ दारे कोई उर्जननो नेरपो मादरी नाथ जो, ड. वस्ये नदी स्यारे कीधी चासरी रे लो ।।दारे मारे स्वामी सरि- खो कुष धनियां माह जो, जश्ये रे जिम तेदने घर प्रास्या --- रे, जिनवरनी भाण वदीजै ॥१५॥ पनरेस वेतालीस श्रमवन लख अधिक जोमी ॥ उत्तीस सहस अधिक का प्रतिमा सगली सरददिये ॥ १५॥ गल || ५ मी॥ जोस बितर प्रतिमा सासती, असंख्यात वसि जेदो पायकमल तेदना नित प्रणमिथै, सोवन वरण सुदेदो जी। विनय करी जिन प्रतिमा वंदिर, सुंदर सकन सरूपो जी, तिमा.चोविद देवता, वलिय विद्याधर नपो जी॥२॥ जिनप्रतिमा बोली जिन सारपी, दित सुख मोह निवानो नवियराने नवसायर तारवा, प्रवहण लेम प्रधानो जी ॥३॥ जीवानिगम प्रमुख मांदि जाखीयो, ए सदू प्ररथ विचारो , सांन्नलता जातां सुख संपदा, दियमै ररख अपारो जीवि ॥ कलश ॥ श्म शासता प्रासाद प्रतिमा संथुएया जिनवर तणा, नाम जिनचंद तशा त्रिनुवन सकसचंद सुहावया ॥ वाचनाचार समयसुंदर गुण नणे अन्तिराम ए, निहुँ काल त्रिकरण सुद्ध दोपा सदा मुझ परणाम ए ॥ ५ ॥ इति साश्वता जिन चैत्य जिना संरख्या स्तवनं ।। ॥ अथ सूरत सहर सीतल जिन चैत्य प्रतिष्टा स्तवन ।। नविजन पूजो रे शीतल जिनपती रे, नयनानंदन था। प्रनूजी विराजै रे सूरत विंदरै रे, नंदादेवीना नंद ॥ १ ॥ जगदितकारी रे जिनजी अवतरघा रे, श्रीदृढरथ नृप गेद। सोदे रे सांग्न सूंदरू रे ॥ कनक वर्श प्रनु देद ॥ २ ॥ विषय निवारी रे संजम संमह्यो रे, साधू केवलनाण ॥ सपना पन जिम प्रम बरसता रे, विचरया त्रिनुयन जाण ॥ ॥ १॥ श्री - (२३३ ) खंता सुख श्राय ॥ म०॥ पांच प्रासाद बीजा वली रे लाल, जोतां पातिक जाय ॥ म० ॥५॥ रा०॥श्राज कतारथ हुँ अयो रे लाल, श्राज थयो आणंद ॥ म० ॥ यात्रा करी जिनवरतणी रे लाल, दूर गयूं उख बंद ॥ म०॥ ६ ॥ रा०॥ संवत सोल लियं. तरे रे लाल, मिगतिर मास मकार ॥म ॥ राणपुरै यात्रा करी रे लाल, समयसुंदर सुखकार ॥ म० ॥ ॥ १० ॥ इति श्री , राणपूरा स्तवनं ॥ ॥ अथ दर्शनद्वार श्रीआदिजिन स्तवनं ।। 'समकित झार गुनारे पैसता जी, पाप पमल गयां दूर रे ॥ मोहन मारूदेवीनो लामलो जी, दे. मीगे आनंद पूर रे॥स०॥ ॥ १ ॥ प्रायू वरजित साते कर्मनी जी, सागर कोमाकोमी दी। रे॥ स्थिती पढम करणे करी जीवन जी, बीरज अपूरबनो घर सीध रे ॥ २ ॥ स० ।। मुंगल नांगी श्रादि कपायनी जी, मिथ्यात मोहनी सांकल साथ रे॥ बार ऊघामा तम संबेगना जी, अनुन्तव जवनें 7 नाय रे ॥ ३ ॥ स० ॥ तोरण बांधू जीवदया ता जी, साथियो पूरो सरघा रूप रे ।। धुपघटी प्रनुगुण अनुमोदना 'जी, द्विगुण मंगल आठ अनूप रे ॥ ४ ॥ स० संवर पाणी अंग पखालने जी, केशर चंदन नत्तम ध्यान रे ॥ प्रातम गुण रुची 'मृगमद मदमहे जी, पंचाचार कुशम परधान रे ॥ ५ स० ॥ नावपूजानें पावत प्रातमा जी, पूजो परमेसर पून्य पवित्र रे ।। 'कारण जोगें कारज.नीपजै जी, क्षमा विजय जिन पागम रीत रे ॥६॥ स. ॥ इति श्री आदीसर जिन स्तवनं । ॥ अथ श्रीआदीसर जिन स्तवन ।। प्रादि जिनेसर अरज सुणीने, मोहन महिर घरीजै रे ॥ दिलरंजन प्रन्नु दरसरा दीजै, म्हारो मनमो रोझै रे ॥ श्रा०॥१॥ ३० (२३२) करीरे लो ॥२॥ हारे मारे जस सेव्यांची स्वारयनी नही सिक जो, वाली रेसी करवी तेदयी गोठमी रे लो॥हार कांड कूवं खा= ते मिठाईने माटे जो, क्यांही रे परमारधनी नही प्रीतमौ रे से ॥३॥ होरे प्रनु अंतरजांमी जीवत प्राणाधार जो, वायो रे नकि जाएयो कलियुग वायरो रे लो॥ दारे मोरा लायक नायक नगत वचल जगवंत जो, वारू रे गुण केरा सादिव सायरू रेलो॥४॥ हारे प्रनु लागी मुझने ताहरी माया जोर जो, अलगा रे रह्यांयी हो उनोगलो रे लो।।दारे कुण जारों अंतर गतिनी विण मादा- राज जो, देजे रे इसी वोलो ठंमी श्रामलो रे लो॥ ५॥ हारे तारे मुखने मटके घटक्यूं माइरो मन जो, साली अशियाली का- मणगारीयूरे लो । हारे मारे नयणा संपट जोवे खिण २ तुझ जो, राती रे प्रनु रागे न रहे वारीयां रे सो ॥६॥दार प्रनु अलगा ते पिण जाणज्यो करीने दजूर जो, तादरी रे वसिदारी हुँ जाचं वारणे रे लो || दारे कवि रूप विबुधनो मोदन कर प्रवास जो, गिरुआ थर मन यांणो कलट प्रति घणोरे सो ॥इति स्त०॥ ॥ अथ राणपुरा स्तवनं। राणपुरै रलियामणो रे लाल, श्रीयादीसर देव, मन मोर्यु रे॥ नतंग तोरण देहरु रे साल, निरसीजे नित्य मैच 16|| रा० ॥ १॥ चोवीस मंगप चिहुं विसे रे सास, चौमुस प्रतिमा च्यार ॥ म० ॥ त्रिनुवन दीपक देदरो रे मा०, समय नदी संसार ॥ R० ॥ २ ॥रा०॥ ददरी चोराप्ती दीपती रे सास, मांगयो अष्टापद मेर । म ॥ न जुहारपानोपरार साल, मृता म.टी छळ सवेर ॥ म० ॥३॥रा | देन जाणीनं देहर सास, देस मेवाम IIRef] खक नया सगाविया रे साल, धन धना पारयाम || Re || गमतर यगई बरसात, Eि (२३५) अमल अखंग अनूप ॥ अ० ॥ ता०॥ ६ ॥ आरोपित सुख नम टल्यो रे, नास्यो अव्यावाध ॥ समरचो अनिताखीपणो रे, कर्ता साधन साध्य ।। अ०॥ ता० ॥ ॥ ग्राहकता स्वामित्वता रे, व्यापक नोक्ता नाव । कारणता कारज इसारे, सकल ग्रह्यं निज़ नाव ॥०॥ता 100 श्रद्धा नासन रमाता रे, दानादिक परिणा म || सकल या सत्तारती रे, जिनवर दरसन पामि ॥१०॥ता .|| ए ॥ तिणें निर्यामक माहणोरे, वैद्य गोप आधार ॥ देवचं सुख सागरू रे, लावधरम दातार || अ० ॥ ता० ॥१०॥ इति श्री अजित जिन स्तवनं ॥ ॥ अथ आलोयण वृद्ध स्तवनं ॥ ॥ कर जोमी वीनवू जी, सुणि स्वामी सुविदीत ।। कूर कपट मूकी करी जी, वात कहूं आप वीत ॥ १ ॥ रूपानाथ मु ऊ विनती अवधार ।। आंकणी ॥ तू समरथ त्रिनुवन धणी जी, मुझने उत्तर तार || ऋ० ॥ २ ॥ जवसायर नमतां थकां जी, दीगं पुख अनंत ।। नागसंयोगे नेटियो जी, नयनंजण जगवंत ॥ रु०॥३॥ जे व नांजे आपणा जी, तेहनें कहिये फरकः।। परख नंजण तूं सुण्यो जी, सेवगने यो सुरक।। रु०॥४॥ आलोयण "सीधा पखै जी,जीव रुले संसार ।। रूपी लक्ष्मणामहासती जी, सुएपो अधिकार ॥०॥५॥ दूपमकालै दोहिलो जी, सूधो गुरु संयोग ॥ परमारथ पीछे नही जी, गारप्रवाही लोक ॥ रु० ॥ ६॥ तिण तुम पागल प्रापणा जी, पाप आलो आज माय बाप आगल बोलतां जी, बालक केही लाज || कृ० ॥ ७॥ ज़ि न भ्रमर सदूकदै जी, श्रापे अपणी जी वात सामाचार जुर जुर जी, शंसय प्रमयां मिथ्यात .॥ १०॥ || जाग अजाणपणे करी जी, बोल्या नुत्सूत्र बोल ॥ रतने काग . (२३४) मनु दरसन दिवो जंग रखन, विन दरसन नहीं किरिया रे ने दरसण विन किरिया पाले, ते नवि कहिये तरिया रे आधार नय एकांते दरसन थापै, पिम नरे ते पापे रे॥ आप आपणा मन आला, ते नूला नवं यापे रे । आ० ॥ ३ ॥ शुइ देरसन स्या द्वादने संगे, जे ग्रहे आत्म मंगे रे ॥ आनंदघन नपजे तसु अंगै सिरमणंने रंगे रे || ० ॥ || लव कोमाकोमी नमतां, तुम दरसन नहीं पायो रे ॥ सुरुत संयोगे तारे सनमुख, आज नसे हुँ आयो रे ॥ श्री० ॥५॥ ताहरी महिर लहिरनो लटकौ, जो जंगगुरु हुं पानं रे ॥ संहजे एक पलको प्रवनुत, आतम गुण नपजाचं रे ॥०॥ ६ ॥ मरुदेवानंदन जंग वंदन, श्वामी दर सण वीजै रे ॥ लानदय जिनचंद सहीने, सगला कारज सीके रे । प्रा० ॥ ॥ इति श्री आदिजिन स्तवनं ।। "il अथ श्रीअजितनाथ स्तवन।। ।। अनंत जिन आपज्योरे।। ए पाल । ज्ञानादिक गुण संपदा रे, तुम अनंत अपार ॥ ते सांगलता ऊपनी रे, रुचि तिण पार नतार ।। अजित जिन तारज्यो रे ।। तारज्यों दीनदयाल, Solaijo१॥ एकणी ॥ जे जे कारण ने. दनी रे, सामग्री संयोग ॥ मिलतां कार्यनीपजे रे, का तनम प्रयोग || अ० ॥ ता० १२॥ कार्य सिद्धि कर्ता वसु रे, सहि का. रणे संयोग ॥ निज पंदकारक प्रनु मिन्या रे, दोय निमित्तम लोग ॥०॥ता. ३॥ अज कुलगत केसरी सहे रे, निज पद सिंद नि. हाल ॥ तिम प्रनु नक्त नवि लदे रे, आतम शक्ति संजाय ।। ॥ अ० ता० ॥४॥ कारण पद कपिणे रे, करिमारोप अनेदा निज पद प्री प्रनयकी रे, करै अनेक उमेद म || ता० ॥ ५ ॥ 'अंदवा परमातम प्रन रे, परमानंद सरूप ॥ स्याहार समारसोरे, (३३७) तिरूप ॥ रु०॥ ३३॥ माया ममतामें पड्यो जी; कीधो अधिको लोन ॥ परियह मेल्यो कारमो जो, न चढी संजम सोन। रु०॥ ॥ २४ ॥ लाग्या मुझनें खालचे जी, रात्रीनोजन दोप ॥ में मन भूक्यो माहरो जी, न धरयो धरम संतोष ॥ रु०॥२५॥ इश.नव परन्जव दूहव्या जी, जीव चोरासी लाख ॥ ते मुळ मिछामिकम जी, नगवंत तोरी साख ॥ रु० ॥ २६ ॥ करमादान पनरे कह्या जी, प्रगट अहारे जी पाप ||जे में कीधा ते सहूजी, बगस२ मार वाप || रु०॥२७॥ मुझ आधार छै एतलो जी, सरदहणा छै शुद्ध । जिनधर्म मीगे जगतमें जी, जिम साकर ने दूध ।। क० ॥ २० ॥ रिपत्नदेव तूं राजियो जी, सैजगिर सिणगार ॥ पाप बालोया आपणा जी, कर प्रन्नु मोरी सार || रु० ॥ श्ए | मर्म एह जिन- धर्मनो जी, पाप पालोयां जाय ॥ मनसु मिचामिक जी, देतां दूर पुलाय ॥ रु० ॥३॥ तूं गति तूं मत्ति तूं धणी जी, तूं साहिब 'तूं देव ॥प्राण धरूं सिर ताहरीजी, नव २ ताहरी सेव ॥०॥३१॥ ॥कलश ॥श्म चढिय सेजेज चरण लेट्या नाजिनंदन जिन तणा, करजोमि आदिजिनंद. प्रागै पाप आलोयां आपणां ।। श्रीपूज्य जिनचंद सूरि सद्गुरु प्रथम शिष्य सुजत घणे, गणि सकलचंद सुसीस वाचक समयसुंदर गणिन॥३॥इति आलोयण वृद्ध स्त० ॥ अथ आनंदघनजी कृत स्तवन लिख्यते ॥ ॥ अथ श्री झपन्न देव जिन स्तवनं.॥ .. 1 करम परीक्षा करण कुमर चल्यो रे ॥ ए चाल । झपन जिनेसर प्रीतम माहरो रे, नर न. चाहूं रे कंत रीज्यो साहिब संग न परिहरे रे, नांगे सादि अनंत ॥ २०॥ १ ॥ प्रीत सगाई रे जगमा सहु करे रे, प्रीत सगाई न कोय ! प्रीत . ॥ A .
नमावता जी, हारयो जनम निटोल ॥ १० ॥ एन वंत नाप्यो ते किदा जी, किदां मुझ करणी एह ॥ गज पारस खर किम सहे जी, सबल विमासण तेह ॥ रु० ॥ १०॥ आम परूंपुं श्राकरो जी, जाणे लोक महंत ॥ पिण न करूं परमादिर जी, मासाहस दृष्टांत ॥ रु० ॥१॥ काल अनंते में सह्या जी तीन रतन श्रीकार ॥ पिण परमादे पामिया जी, किहां जा कर पुकार ॥ रु० ॥ १२ ॥ जाणूं उत्कृष्टी करूं जी, नद्यत करूं अ- विहार ॥धीरज जीव घरै नहीं जी, पोते बहु संसारक०॥१३॥ सहज पज्यो मुफ पाकरो जी, न गमें नमी वात ॥ परनिंद्या के रता थकांजी, जायै दिन में रात कृ०॥१४॥ किरिया करता "दोहिती जी, आलस श्राणे जीव ॥ धरम पखै धंदे पथ्यो जी, नरकै करसी रीव ॥ १० ॥१५॥ अणहूंता गुण को कहे जी, तो हरखू निसदीस || को हितसीख जली दिये जी, तो मन आणू रीत || रु० ॥१६॥ वादन्नणी विद्या नणी जी, पररंजण उपदेश मनं संवेग धरयो नही जी, किम संसार तरेस ॥ रु०॥ १७ ॥ सूत्र सिद्धांत वखाणतां जी, सुणतां करम विपाक || खिण मनमांदे कप जी, मुझ मरकट वैराग ॥ रु० ॥ १० ॥ त्रिवि २ कर नच्चरूं जी, नगवंत तुम्ह हजर ॥ वार २ नांजू बली जी चूटकवारो दूर ॥ रु० ॥१॥ आप काज सुख रावतां जी, कीघ आरंत कोमि ॥ जयणा न करी जीवनी जो, देवदया पर गेम रु०॥२०॥ वचन दोपव्यापक कह्या जी, दारव्या अनरथ दंग ।। कूम कपट बहु केलवी जी, व्रत काधा सत खंझ । रु० ॥ २१ ॥ अगदीपो सीजे तृणो जी, तोही अदनादान ॥ ते दूपण लागा घशा जी, गिणतां नावे ज्ञान ॥ रु० ॥ २२ ॥ चंचल जीव रहे नही जी, राचै रमणी रूप ॥ काम विटंबन सी कर्दू जी, ते तूं जाणे (२३७) सरूप ॥ १० ॥ २३ ॥ माया ममतामें पज्यो जी; कीथो अधिको लोन ॥ परिग्रह मेख्यो कारमो जी, न चढी संजम सोन॥ रु०॥ ॥ २४ ॥ लाग्या मुझने लाल जी, रात्रीनोजन दोष ।। में मन मूक्यो माहरो जी, न धरचो धरम संतोष ॥ रु०॥२५॥ इश नव परनव दूहव्या जी, जीव चोरासी लाख ॥ ते मुफ मिचामिक 'जी, नगवंत तोरी साख ॥ १० ॥ २६ ॥ करमादान पनरे' कह्या जी, प्रगट अठारे जी पाप ॥जे में कीधा ते सहूजी, वगस२ मार वाप | रु० ॥२७॥ मुझ प्राधार वै एतलो जी, सरददणा छै शुद्ध ॥ जिनधर्म मीगे जगतमें जी, जिम साकर ने दूध ॥ ७० ॥ २० ॥ रिपन्नदेव तूं राजियो जी, सैजगिर सिणगार ॥ पाप आलोया आपणा जी, कर अनु मोरी सार || रु०॥ श्ए । मर्म एद जिन- धर्मनो जो, पाप झालोयां जाय ॥ मनसुं मिलामिक जी, देतां दूर पुलाय ॥ रु० ॥३०॥ तूं गति तूं मति तूं धणी जी, तूं साहिब तूं देव ।। प्राण धरूं सिर तादरीजी, नव २ तादरी सेव ॥रु०॥३१॥ ।।कलश ॥श्म चदिय सेजेज चरण नेट्या नानिनंदन जिन तणा, फरजोमि धादिजिनंद आगे पाप पालोयां आपणां ॥ श्रीपूज्य जिनचंद सूरि सद्गुरु प्रथम शिप्य सुजस घरों, गणि सकलचंद सुसीस वाचक समयसुंदर गणिनग॥३शाति थालोयण वृद्ध स्त० ॥ अथ आनंदघनजी कृत स्तवन लिख्यते ।। ॥ अथ श्री रुपन्न देव जिन स्तवनं ॥ ५ करम परीक्षा करण कुमा चल्पोरे॥ए चाल || रुपन जिनेसर प्रीतम माहरो रे, नर न चाहूं रे कंत ।। रीज्यो साहिव संग न परिहरे रे, लांगे सादि अनंत ॥ ३० ॥१॥ प्रीत सगाई रे जगमा सहु करे रे, प्रीत सगाई न कोय ॥. प्रीत . .
(१३० ) सगाई रे निरुपाधिक कही रे, सोपाधिक धन खोय ॥ ०॥श को कंत कारण काष्ट लक्षण करे रे, मिलसुं कंतने घाय || ए मेलो नविकदियै संजवे रे, मेलो गम न य ॥२०॥३॥ कोर “पति रंजन अति घणो तप तप रे, पति रंजन तन ताप ॥ ए पति रंजन में नविचित घरयु रे, रंजन धातु मिलाप ॥ २० ॥ ४ ॥ कोई कहे खोला रे नलख अलख तशी रे, पख पूरै मन प्रात ॥ दोप रहितने लीला नवि घदे रे, सोला दोष विलास | ॥५॥ चित्त प्रसन्ने रे पूजन फल कह्योरे, पूज अखंमित एह । कपद रहित यई प्रातम अरपणा रे, यानंदघन पद रेह || श०॥६॥इति पदं ।। ॥श्री अथ अजित जिन स्तवनं ।। "मा मन मोड्यु रे श्री विमलारले रे " ए चाल ॥ पंथमो निहालूं रे-वीजा जिनतणोरे, अजित २ गुण धाम॥ जे ते जीत्या रे तेणे हुँ जीतियोरे, पुरुष किस्युं मुझ नाम ॥ पं०n 10 चरम नयख करी मारग जोवतो रे, नूलोसयल संसार ॥ जेणे नियणे करी मारग जोश्य-रे, नयरा ते दिव्य विचार ॥५०॥ २॥ पुरुष परंपर अनुन्नव जोवता रे, अंधोअंध पुलाय ॥ वस्तु . विचारे रेनो श्रागमे करी रे, तो चरण धरण नही गय ॥ ५० ॥ ३॥ तर्क विचारेरे वाद परंपरारे, पार न पहुंचे कोय।अनिमते यस्तु वस्तुगते कहे रे, ते विरला जग जोय ॥ पं०॥ ४॥ यस्तु विचारे रे दिव्य नयणतणेरे, विरद प्रध्यो निरधारतरतम जोगे रे तरतम वासनारे, वासित वोध:याधार|| पं०॥५-11 काल सयधि.सदी पंथ निदास रे, ए प्रास्या अविलंब ॥ ए जग जीवे रे जिनजी जाणज्यो.रे, आनंदघन मत अंध || पं०॥ ६ ॥ इति ॥..
... (२३० ) ॥ अथ श्री संभव जिन स्ववनं। रातडी रमिनें किहांयी आविया रे ॥ ए पाल ॥ .॥ संन्नव देव ते धुर सेवो सबे रे, सहि मनू नेद ॥ सेवन सेवन कारण पहली भूमिका रे, अनय अक्ष अखेद ॥ सं० ॥१॥ जय चंच लता दो जे परिणामनी रे, क्षेप अरोचक नाव ॥ खेद प्रवृति दो करता थाकिये रे, दोप अबोधि लखाव ॥ सं० ॥२॥ चरमावर्त हो चरम करण तथा रे, नव परति परिपाकादशेष टले चली दृष्टी खुले जली रे, प्रापति प्रवचन वाक|| सं०॥ ३॥ परिचय पातिक घातक साधतूं रे, अकुशल अपचय चेताग्रंथ अध्यातम श्रं वण मनन करी रे, परिशीलन नय देत ॥ सं०॥ || कारण जोगे दो कारज नीपजे रे, एमां कोई न बाद || पण कारण विय कारज साधिये रे, ए जिनमत जनमाद ॥ सं० ॥ ५॥ मुग्ध सु गम करी सेवन आदरे रे, सेवन अगम अनूप॥ देजो कदाचित से चक याचना रे, आनंदघन रसरूप ॥सं० ॥ ६ ॥ इति ॥ ॥ अथ श्रीअभिनंदन जिन स्तवनं ।। ॥ आज निहेज्यो रेदीसे नाहलो ॥ चाल ॥ । अजिनंदन जिन दरशन तरसिये, दरसण उर्लन देव ।। कीमतर नेदे रे जो जश् पूछिये ।-सहु पापै अहमेव ॥ अनि ॥१॥ सामान्ये करी दरिसण दोहलूं, निरणय सकल विशेष ॥ मदमें घेरयो रे अंघो किम करे, रवि शशि रूप विलेख | ०॥ '२ ॥ हेतु विवादे हो चित्त परि जोश्ये, अति उरगम नय वाद ॥ आगम वादे हो गुरुगम को नही, ए सबलो विपवाद ॥ ०. II. ३॥ पाती डूंगर अामा अतिघणा, तुम दरिरुप जगनाथ - धी गइ करी मारग संचरूं, सेंगु न को साथ || onा दरिस २ रटतो जो फिरूं, तो रणरोऊ समान ॥ जेहने पीपासा हो . '.
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(२०)
मृत पाननी, किम नाजे विप पान ॥ १० ॥ ५ ॥ तरस न आवे
हो मरण जीवन तणो, सीके जो दरसरा आज ॥ दरिसरा
न सुखन्न पायकी, आनंदघन मादाराज ॥ श्र० ॥ ६ ॥ इति ॥
॥ अथ श्रीमुमती जिन स्तवनं ।
II राग वसंत तथा केदारो॥
॥ सुमति चरण कज श्रातम अरपणा, दरपण जिम प्रति
कार सुग्यानी ।। मति तरपण बहु सम्मत जांणिये, परि सरपस सु
विचार | सुग्यानी सु०॥ १ ॥ त्रिविध सकल तनु धर गत पात
मा, बहिरातम धुरि नेद ॥ ॥ वीजो अंतर आतम तीसरो, पर
मातम अविछेद ॥ सु० सु० ॥ २ ॥ प्रातम बुद्धे हो कायादिक म
ह्यो, बहिरातम अघ रूप ॥सुग्यानी॥ कायादिकनो दो साखीधर र
हो, अंतर बातम रूपा सुग्यानी । सु० ॥ ३ ॥ ज्ञानानंदे हो पूरण
पावनो, वरजित सकल उपाधि सुग्यानी प्रतिक्ष्यि गुण गण मणि
घागरू, श्य परमातम साध मुग्यानी ॥ सुम० ४ ॥ यदिरा
तमतज अंतरातमा,रूपसुग्यान या पिर नावापरमातमनू दो
आतम नाव, श्रातम अरपण दाव सुग्यानी ॥ सुम०|| ५ || मा
तम अरपण वस्तु विचारतां, नरम टलै. मतिदोप || सु०॥ परम
पदारय संपति संपजे, आनंदघन रस पोप ॥सु० सुम ॥६॥ इति
॥ अथ श्रीशीतल जिन स्तवनं ॥
॥ गुणह विसाला मंगलीक माला ॥ ए पाल ।
॥शीतल जिनपति ललित त्रिनंगी, विविध नंगी मन मो
हेरे ॥ करुणा कोमलता तीकराता, उदासीनता सोदे रे । शी.
१॥ सर्व जंतु हितकरणो करुणा, कर्म विदारण तीक्षपारे।
.. रदित परणामी, नदासीनता शिक्षणारे ॥शी॥२
परस्य वेदन या करुणा, तीक्षारा परख रोके रे ।। उदायो
.
(११) नता ननय विलोणं, एक ठांमे केम सीजे.रे ॥ शी०॥ ३ ॥ नयदान ते मल क्षय करुणा, तीक्ष्णता गुण नावे रे ॥ प्रेरणं वियु कत नदासीनता, श्म विरोध मति नावे रे ॥ शी ॥४॥ शक्ति व्यक्ति विन्नुवन अनुता, नियंधता संयोगे योगी नोगी वक्ता मौनी, अनुपयोगि नपयोगे रे.॥ शी० ॥ ५॥ इत्यादिक बहु नं ग विनंगी, चमत्कार चित्त देती रे । अचरजकारी चित्र विचित्रा, यानंदघन पद लेती रे॥ शी.॥६॥ इति पदं ॥ ॥ अथश्री कुंथुजिन स्तवनं ।। । राग गुर्जरी ॥ ॥ मनमो किमदी न बाजे दो, कुंथु जिन म०॥ जिमरज तन करीने राखू, तिम२ अलगोनाजे हो। कुंथुजिन म० ॥१॥ रज नी वासर वसती ऊजम, गपण पाया जाय॥सांप खायने मुखहुँ याधु, एखाणो न्याय हो ॥ कुंछ जिन म० ॥२॥ मुगतितणा शनिलाषी तपिया, ज्ञान ने भ्यांन अभ्यासें ।। वयरी कांइ एदवू चिंते, नारखे अवले पासे हो ॥ कुं० म० ॥ ३ ॥ भागम भागम धरने हाथे, नावे किण विध आंपू॥किहां कणे जो हठ करी हटकू, तो व्यालतणी पर वांकू दो ।। कुं० ॥ म० ॥॥ जो उग कहूं तो उग तो न देवू, साहूकार पिण. नांदी ॥ सर्वमाद ने सहुयी अ सा, ए अचरिज मनमांही हो ॥ कुं०म० ॥ ५ ॥ जे जे कहूं ते कान न धारे, पाप मते रहे कालो ।। सुरनर पमित जन समझावै, सममै न मादारो सालो दो ।। कुं० ॥ म० ॥ ६. ॥ में जाण्यु ए लिंग नपुंसक, सकल मरदने ठेले ।। बीजी वाते समरय * नर, एहने कोई न केले हो ॥ फु० ॥ म० ॥ ॥ मन साध्यु तिण त ग सभयु, एद वात नही खोटी ॥ एम कदे साध्यु ते नवि मार्नु, एकहि वात वे मोटो दो ॥ कुं० म० ॥ ॥ मनहूं उराराध्य ते . , (२४२ चस आणु, ते आममी मति प्राणु ॥ आनंदघन प्रन्नु माहरो प्रांशी, तो साचूं कर जाणुं दो ॥ कुं० ॥ म ॥ ॥ इति पदं ॥" : ।। अथ पडिकमणेमें बोलणेमें आवे॥ ॥ पार्श्वनाथजीके छोटे स्तवन लिख्यते ॥ ॥ पद ॥ र हुँ॥ ॥ श्रीसंखेसर पास जिनेसर नेटिये, नवना संचित पाप परा सब मेटियै ।। मन पर नाव अनंत चरण युग सेवतां, अाईते एक कोमि चतुर विध देवता || १ || ध्यान धरूं प्रन्नू दूरथकी में तादरो, जल जिम लीनो मीन सदा मन मादरो ॥ लव २ तुमहीज देव चरण हूं तिर घरं, नवसायरथी तार अरज नाहीज करूं ॥२॥ नूख त्रिपा तप तीत आतप ए ना सहै, तप जप संजम नार त णी नवी निरवहै | पिश जिनवरजीना नामतणी आसत घणी, एदिज छै आधार जगतगुरु अम्हनणी॥३॥ तुम्ह दरिसण विए स्वाम नवोदधि हूं फिरचो, सदीया उस्क अनेक न कारज को सरपो मिलिया दिव प्रनु मुझ सदा सुख दीजिये, चौ गइ संकट चूर जग जस लीजिये ॥ ४ || याक्वपति श्रीकृष्णतणी भारति दरी, सैन्य कीध सचेत नरा दूरे करी ॥ परचा पूरण पास रयरा जिम दीपतो जयपंतो जिराचंद सपल रिपु जीपतो ॥ ५॥ इति पदं । ॥ पद १ मुं॥ मनमोहन माहाराज, तीन नुवन सिरताज | पाडेलाल नगर प्रहानपुर रानीपा जी ॥१॥ पास जिनंद प्रमान, निरमस सुगुण निधान ॥ पाठेलाल, वामासुत वमन्नागीयाजी ॥ २॥ सेवा कनी संन्नाल, करिय खरी ततकास || प्राग्लास, संकट सटु प्रतु जी.॥ ३॥ चिंता करी चय.घर, प्रयव्यो पानंद पर स, वाट विषमता पिरा टली नी॥2॥ अनुजीने पासाद, - (२५३) चीता सह विखवाद ॥ प्रासाल, मन वंग्ति मुझ सहु फच्या जी ॥५॥ध्यान-समाधिनी थाप, मिलिया ने प्रनु पाप ॥ मारेलाल, देज्यो परिसण वलि सवाजी॥६॥ अमृतधर्म मुजापा, सीसहमा- कल्पाय ||भासाल, वावक श्म वीनती करे जीजाति पई। ॥ पद ३ ॥ जयकारी जिनराज, पुरिसादाणी रे । वामासुत वरदाय, निरमल नाणी रे॥१॥ पांच कमल प्रनु अंग, निरुपम निरख्या रे। तीन कमल मुझ संग, प्रातम दरख्या रे॥२॥ वदन महोदय देख, पंव खजाणू रे ॥ गगन जमे निसवीस, इम मन माणू रे ॥ ३ ॥ मुरमणि ज्यु सुखकार, नयण विराजे रे॥ हदयकमल मुविसाप्त, बाल ज्यू गजे रे ॥ ४॥ प्रनु कर चरण विलोक, पंकज दारयो ।। ततखित निज संवास, जलमें धारयो रे ॥५॥इम सरवंग उदार, श्रीजिन रापारे॥साचे पुण्य संयोग, साहिय पाया रे॥६॥ अनु. गुण अनुभव नीर, सांग सुरंगे रे॥टाल्यो पातिक पंक, आतम संगेरे. ॥७॥ वरस प्रदार चोतीस, वदि वैसाखै रे। मनुदर पांवम दोस, सहु संघ सारव रे ।। नगर मदेवा मांदि, पास जुहारया रे ॥ श्री जिनचंद मुषिद, वाग्ति सारपा रे ॥ ए ॥ इति पदं ।। ॥ पद ४ यूं ॥ वालेतर मुफ वीनती गोमोबा, अबवेतर अवधार दो गोमी चाराय || मगट थई पातालवी गोमीचा, सेवक जिन साधार दो गो० ॥ दा० ॥१॥ प्रांख पई सतावली, गो० ॥ दरसरा देखरा काज दो गो०॥ पोशीनखमे पातली; गो० ॥ यो दरसरा मदा. राज हो गो० ॥ वा तातूं सादिव सुपनंतरे,गो। मिलियो नित मेव दो।गो । तोपिरा भायो कमदी, गो०॥ संप्रति क- रवा सेव हो, गो० ॥वा० ॥३॥जो पोतानो प्रेवमो, गोसगली , । -- . -- १ . (२५४) प्राति सदीव हो, गो०॥ चीनीची बातमें गो०॥ये मति घालों जीव दो ॥ गो० ॥ वा०॥४॥ देव घणांही देवले, गो० ॥ दीगते न सुहाय हो || गो० ॥ इक दीगं मन कलसे, गो॥ इक दीवां उन्हाय हो । गो० ॥ वा० ॥ ५ ॥ काले वान्दै माहरे, गो० ॥ फीधी स्वरी सन्नीम दो ॥ गो० ॥ दरसण देवानी नकी, गो० ॥ पाणीवलि पिण दील हो ॥ गो०॥ वा० ॥ ६ ॥ तें कीवी तिमतूं फरे, गो० ॥ राखी चिहुं मांद लाज हो ॥ गो० ॥ वलि अवसर संजारज्यो, गो०॥इम जंजिनराज हो || गोवा०॥७॥इति पद।। ॥पद ५ मुं॥ अरज सुगीजै अंतरजामी, पास जिनेसर स्वामी रे॥ यय. सेन वामाजीके नंदन, वित्नुवन जन विसरामी रे ॥ १० ॥१॥ गुस गिरवा गोमीचा स्वामी, नाथ निरंजन नामी रे॥०॥ लव अ- देवी वन घन विच नमता, पुण्ये सेवा पामी रे ॥ ७० ॥ २॥ दीनदयाल दया कर दीजै, अनुन्नव गुण अन्निरांमी रे॥चरणकमल सेवा चित चाहत, सुगण सदा हितकामी रे । अ०॥३॥इति पदं। ॥ पद ६ हुँ। प्यारी पासकी, देखी मूरत मो मन नाय ॥ प्या॥ अवशेन धामाजीके नंदन, देख्यां दिल हरखाय प्या०॥१॥ तीन लोकमें महिमा जाकी, सुर नर मुनि गुण गाय ॥ प्या० ॥ नील वरण मन मोहन निरख्यो, नाथ गोमीचा राय ॥ प्या० ॥ २ ॥ सुगण सेव- गकी येही अरज है; नवऽख ताप मिटाय॥ प्या॥३॥ इति पद। ॥ पद ७ मुं॥ ::.:::श्रीचिंतामण पासजी, अजय सुरंग अनूप ॥ सा प्रन्नू जी, यारी सांवली सूरत म्हांनु प्यारी लागे राज ॥वामाजी नंदन वदिवा, चितमामें लागी के चूप ॥ सवाइअनूजी ॥१॥ अणिया-
( २४५)
सी प्रतू रखमी, बदन सरोज विकास ॥ स० ॥ यां
' नयण सलूणे जी निरस्वतां, झपजे अधिक उल्हास ॥
॥ यां० ॥ २ ॥ अंगज नृप अवशेननो, करुणा
निधि करतार ॥ स० ॥ थां० ॥ पुण्य संयोगे जी पांमीयो, दिल
रंजन दीदार ।। स० थां० ॥३॥ तो दिन सफलो जाणिय, सो
य'घमी सुप्रमाण ॥ स० ॥ जगतवचल नल नेटियै, जिनवर चतुरसु.
जाण ॥ स० ॥ यां० ॥ ॥ जालम जेसलगढ जयो,
श्रीचिं
तामणि पास ॥ स०॥ जगपति श्रीजिनचंनी, अविचल पूरो जी
पास ॥ स० ॥ यां०॥ ५॥ इति पदं॥
॥ पद ८ मुं॥
॥ जीवन मारा तेवीसमा जिनराय रे, जिनवरजी । तुम
विन देख्यां एक धमी न रहाय, म्हारा जिनवरजी ॥१॥ तुमे
अमारा हीयमलाना हार रे, जि० ॥ अमे तुमारा दास म्यैि निर
पार ।। म्हारा जि०॥ लागी तुमसुं लगन हमारी जोर रे, जि.
। चंद चकोरा जलघर में. जिम मोर ॥ म्हारा जि० ॥२॥ नयण
तुमारा कामणगारा जोर रे, जि० ॥ चितमो लीधोजिम तिम करि
में चोर ॥ म्हारा जि. ॥ अरज हमारीमानो मोटा देव रे, जि०॥
'आपो नव२ चरणकमलनी सेव ॥ म्हारा जि० ॥३॥ आस धरी-
में आये जे तुम पास रे, जि० ॥ नवि मूकीजे स्वामी तेद निरास
म्हाराजि०।। मोटानी तो मोटी.यायै बुदि रे; जि०॥ श्म जांशि-
ने, करज्यो मादरी शुद्ध ॥ म्हारा जि० १॥ राखेज्यो मुफक
पर.निवम सनेह.रे, जि०॥ अवगुण लांशी निटक न देज्यो वेद ।।
म्हारा जि० ॥ खरतर गधपति श्रीजिनलान सूरिंदरे, जि० ॥ तासु
पसायें. पत्नणे अनोपमचंद ।। म्हारा जि० ॥ ५॥ इति पदं ॥
. (२६) ॥ पद ९ मुं॥ ॥ सुगण सनेही प्रनुजी प्ररज सुशीज्यो, अरज सुशीने मोसु मदिर धरीज्यो राज || सु० ॥ तुं ने प्रभूजी म्हारो अंतर जामी, पूरव पून्यै थारी सेवा में पांमी रान ॥ साहिब में तो तु. फनें जाएयो वे साचो, कदिय न दिलमांद पाणु ९ काचो राज ॥ सु० ॥ १ ॥ साचे तो दिलमुं राज करीय सगाई, सुगरा प्रन्नु जीस्यु वधज्यो प्रीन सवाई राज ॥ सु० ॥ दरसरा प्रनुजी ताद- रो दिलमांदे बसियो, रात दिवस थारा गुणनो यूँ रसियो राज ॥ सु० ॥ २॥ खिजमतगारो प्रनुजी चाकर दूं खासो, कदिय न मेर्ले प्रनुजी पलन्नर पासो राज ॥ सु०॥ मोटानी महरे राज मोटा क. हीजें, लाहो लाखीयो प्रनुजी संगे सहोजे राज ॥ सु० ॥३॥ पिंजर तो फिरसी राज केश परदेसे, राज सदार मारा दिलमांहे रहसी राज || सु० ॥ रंगै हूं चोल मजीठ रंगायो, नहिय विसरस्यु प्रतुंजी दरसण टाणो राज || सु० ॥ ४ ॥ खुलिर हूं तुम पाये जी. लागू, मोज मदिर तुम पासे हूं मांगू राज || सु० ॥ श्रीजि. नचं सदा साधारो, तारक प्रनुजी थे नवजल तारो राज || सु०. ॥ ५. इति पदं ॥ ॥ पद १. मुं॥ ॥ मोरा पास जिनराज, सूरत थारी सागे प्यारी. ॥ दीग: आचे दाय, मो० ॥ जिम२ सूरत देखियै प्रनु, तिमर वाधे प्रीत ।। तनमन मारा नलस कार, रूमी प्रीतनी रीत ॥ मो० ..||20. नयस कमलदल पांखमी मन्नु, मुखमोपूनमचंद ॥ दीपशीखासी नासिका कार, दीनं परमानंद ।। मो० ॥ २॥ कौने कुंल किगमिगे प्रता को नवसर हार ।। चंपकली सोदे नली कांई, मुखमै ज्योत अपार ॥ मो०॥ ३.) तूं मै जगनो वालदो प्रनु, पारे. सेवर्ग को दारे .
.
(२)
तूविज सादियो कांई, बंदू घे कर जोम, ॥ मो० ॥ ४ आज
मनोरथ सब फल्या, में दोग श्रीजिनराज ॥ सदानंद पाठक तणा
कांइ, सीधा समला फाज ॥ मो० ॥ इति पदं ॥
। पद ११ मुं॥
जिनजी महिर करीने राज, दरसण वहिलो दीजै ॥ दीजै
२ जी माहाराज, कारज सगला सीके ॥ एकरणी ॥ मुझ मन
जमरतणी पर मोह्यो, गेमायो नवि बूटै ॥ प्रेम राग बंधाणो पुरण,
ते तो कदेय न वटै जि०॥१॥ अलगयका पिरा दूं प्रनु तुमने,
नदिय विसालं दिलसुं ॥ रात दिवस एदवी मन वरते, जांY नर
मितुं तुमसुं ॥ जि० ॥ २ ॥ पूरव पुन्ययकी में पायो, ए अवसर
प्राजूणारे मिलियो तूं प्रन्नु पास चिंतामण, साहिव सहज सलूणो
जि. ॥ ३॥ थारे तो सेवग वै धर्सा, मो सरिपा सरख ग्याने,
मादरे तो क्षण जगमे जोता, थारे नही कोश टाणे | जि011211
थास दिये श्क ताहरी राखू, बीजो मुख नदी नाखू || अमृत जेम
सदी तुज गुणरस, लारो जल किम चाखू ॥ जि०॥ ५॥ मोदन
ए मुशनी महिमा, कहतां पार न पावे || सायर सहर मालाने
गिणतो, कहो कुरा मति नपजावे ॥ जि०॥६॥ जगतपणे किंचित
गुण नाखू, हूं म्हारी मति सारू । निरुपमा अनुपम तुझ गुण
सायक, विनुवन लीवन सारू । जि० ॥ ७॥ चरस अढार वली
इकताले, मिगसर परव उजवाले ॥ ग्यारस दिन अधिक सनेहे,
पात्र करी मुविशाले । जि०॥ ॥ जेसलगिरि श्रीसंघ जुगतसु,
मेलो तिही ममायो ॥ लान उदय जिनचंदने प्रनुजी, वांध्यो प्रेम
सवायो। जि०॥ ए॥ इति पदं ॥
॥ पद १२ मुं॥
- ॥ तूं मेरे मनमें प्रश्नुतूं मेरे दिल में, ध्यान धरू पखश्में ।।
, . .. () पांस जिनेसर अंतरंजामी, सेवा कर विनश्में 11 तं० || का हूको मन तरुणीसें राज्यो, काहूको चित्त धनमें ॥ मेरो मन मनु तुमहीसे राज्यो; ज्युं चात्रक चित्त घनमें ॥ तूं० ॥ २ ॥ जोगीतर तेरी गति जांग, अलख निरंजन उिनमें ॥ कनककीरत सुखसागर तूंही, साहिव तीन नुवनमें || तूं० ॥ ३ ॥ इति पदं । ॥ अथ निर्वाणकल्याणक स्तवन ।। || मारगदेशक मोनो रे, केवल ज्ञान निधान || नाव दयासागर प्रनु रे, पर उपगारी प्रधानो रे ॥ १ ॥ वीर मनु सिद्ध अया, संघ सकल प्राधारो रे, हिवरण नरतमा || कुश करशे उर. गारो रे । वीर० ॥२॥ नाथ विकूणू सैन्य ज्यु रे, वीर विहूणोरे संघ ॥ साधे कुरा प्राधारयी रे, परमानंद अनंगो रे॥ वीर०॥३॥ मात विहूणां वाल ज्यु रे, अरहां परहा अग्रमाय || वीर विहूणा जीवमा रे, आकुल व्याकुल पायो रे ॥ ॥ वीर० ॥ ४ ॥ संशय वेदक वीरनोरे, विरद ते केम खमाय || जे दी सुख कपजे रे, ते विण किम रहिवायो रे। वीर० ॥५॥ निर्यामक जवसमुनो रे, नव अटवो सचबाद ते परमेजरविरा मिल्योरे, किम वाये नत्सादी २ वोर० ॥६॥ वीर अकां पण श्रुन तो रे, हुंतो परम प्राधार !! हमणां श्रुत आधार के रे, ए जिन धागम सारो रे । वीर० ॥ ७॥ देश का सवि जीवने रे, श्रागमनी पानंद ॥ ध्याचो सेवोनधि जनारे, जिनपमिमा सुख कंदोरे । वीर० ॥5॥ गशधर पाया. रिज मुमिरे, सहुमें इस परसिद्ध ॥ जय जय प्रागम संगयी रे, देव. च पद लीघोरे वीर ||ति निर्वाशकल्पाराक सपन || ॥ अथ श्रीतीर्थमाला स्तवनम् ॥ ॥ शत्रुजय ज्ञान समोसरघा, जता गुण नरया रे ॥ सिद्धा साधु अनंत, तीरय ते नमरेनीन कल्याणक तिहां प्रयां, मगर्ने - , (२) गया रे नेमीसर गिरनार ।। ती ॥१॥प्रयापद एक देदरो, गिरिसहरो रे॥नरतें जराव्यां विंव ॥ ती० ॥ आत्रु चौमुख अति जजो, विनुवन तिलो रे । विमल वस वस्तुपाल ती० ॥ ५ ॥ समेतशिखर सोहामणो, रलियामणोरे ॥ सिमा तीर्थकर वीश । ती० ॥ नयर चंपा निरखी, हैये दरखीय रे ॥ सिद्धा श्रीवा- सुपूज्य । ती० ॥ ३ ॥ पूर्वदिशें पावापुर), श जरी रे ॥ मुक्ति गया महावोर ॥ तो० ॥ जेसलमेर जुहारीयें, :ख वारीय रे ।। अरिहंत विंव अनेक ॥ ती० ॥४॥ विकानेरज बंदोयें, चिर नंदीय रे । अरिहंत देदरां पाठ ॥ तो० ॥ सोरिसरो संखेसरो, पंचासरो रे । फलोधी अंन पास ॥ ती० ॥ ५ ॥ अंतरिक अंजावरो, अ मीझरो रे ॥ जीरावलो जगनाथ ती० ॥ त्रैलोक्य दीपक देदो, जात्रा करोरे॥राण पुरे रिसहेस ॥ ती०॥६॥श्रीनामुलाई जादवो गोमी स्तवो रे ॥ श्रोवरकाणो पास ॥ ती० ॥ नंदीश्वरना देहरा, पावन नलारे ॥ रुचक कुंमल चारू चार ॥ती6-11: ॥ शाश्वती अशाश्वती, प्रतिमा गती रे । स्वर्ग मृत्यु पाताल ॥ ती० ॥ तीरय जात्रा फल तिहां, होजो मुझ इदा |समयसुंदर कदे एम ॥ती०४ ॥ अथ सिद्धाचल स्तवनं ॥ ... ॥धाज श्राप चालोसहीयो, सिज्ञावल गिरि जायें ॥ सिक्षा. चिल जईएं बहे विमलाचलगिरि जईएं रे ॥ श्रा० ॥ सुप घदेनी. ए.गिरिनी महिमा, श्रादिजिनंद श्म नांवी । जरतादिक नरपतिने पागल, शदिक सहु सास्ती रे ॥ प्रा० ॥१॥ण गि- रिवरिये काल अनंते, साधु अनन्ता सीधा जन्म मरणनां उख 'गेमीने, अमल अखय गुण लीधा रे.|| प्रा० ॥ २॥ण गिरि.स. न्मुख पगला जरता, पातम शुद्ध सुनायें । कोमि जवांरा पातक कीयां, एक पल में जाये रे ॥ श्रा० ॥ ३॥ सासतो तीरत्र ए शेर्नु , :
, ( २५०) जो, नीता लागे मागे | तीन नुवनमें इश गिरि तोले, बीजों कोरे ने दीगे रे ॥ श्रा०॥४i नीरंजनशुं नेद धरीने, श्रागें उलग कर रस्यो । अनुत थादि जिनसर निरखी, प्रेम सुधारस पीस्यां रे ।। । आ० ॥ ५ ॥ पुहप सुगंधा लेश पचरंगा, हार सुगंधा गूंधी ॥ पं दिरावी प्रन्नु कंवें सदिस्यां, शिव मारगनी सूथी रे॥ पा०॥६॥ गदिर स्वरें जिनवर गुण गातां, जात्र नवाणूं करिये ॥ मन गमती नमती विच जमतां, नवप्त पर निततरिय रे॥ प्रा० ॥ ७॥ पूरव नवाणं वार प्रथम जिन, रायण रखे पाया ॥ एत.रथ शुज नावे फरसी, करिये निरमल काया रे || श्रा० ॥॥लान नवे एगिरि बर लहिये, कदे श्म केवल नाणी ॥ श्रीजिनचंद सदा हित वत्सस, प्रेम घणे चित्त पाणी रे ॥श्रा० ॥ए । इति सिद्धान्त स्तवनं । * . . |अय पारणा महावीर स्वामीका लिख्यते॥ ॥ दूदा ॥ श्रीअरिहंत अनंत गुण, अतिशय पूरण गात्र मुनि जे ज्ञानी संजमी, कहिये उत्तम पात्र || १ || पात्रतणीभ मोदना, करतो जीरणसेव ॥ श्रावक भच्युय गति सदे, नवमेयेर दे ॥ २॥ दस चनमासा वीरजी, विचरत संजम पास || वेश सापुर आविया, ग्यारमी चनमास ॥ ३ ॥ ढाल ॥ चौमासी ! ग्यारमी जी, विचरत साहसधीर ।। सालापुर यादिरे जी, श्राव्य श्रीमहावीर ॥१॥ जगतगुरु त्रिसलानंदन जी, जले में नेट्या जिनराय ।। सखीरी चौक पूरायो पाय, मेरे लाग्य अनोपम माय ॥ ज० ॥ २ ॥ बलदेवनो ने देहरो जी, तिहां प्रनु कानसग सं थ॥ पञ्चस्का चोमातनो जी, स्वामीए तप काय ॥ ज० ॥३॥ ५० तिहां वसे जी, पाले प्रावकधर्म ॥ माफारे तिण ॥ जाणे पोजिन मर्म जल ॥४॥माज मठे उपया जी, स्वामी श्रीवर्द्धमान ।। काले सदी मनु जीमस्ये जी, . (२५१ से दथ देस्यु दान ॥ ज० ॥ ५ ॥ सदा सेठ इम चिंतवे जी, दो सी सफल मुज पास ।। पद मास गिरातां थका जी, पूरी पर चो मास ॥ ज० ॥ ६ ॥ सामग्री प्राहारनी जी, जीरण कीधी त यार 11 अनुनो मारग देखतो जी, वो घरने वार ॥ ज० ॥ घर श्राचे ते पाहतो जी, निहुत्यो एकण वार ॥ अनुजी कां न पधारसी जी, में निहुत्या वारंवार ॥ ज० ॥ ॥ पीवे करस्यू. पारणो जी, हूं मनूने पमिलान ।। दोय मनोरथ एदवो जी, तोय विन बरसे श्रान्न ॥ ज०॥ ए अवतर ऊच्या गोचरी जी, श्री सिद्धारयपुन 11 वेसालापुर श्रावतां जी, पूरणघरे पहुत्त ॥ ज० ॥ १० ॥ मिथ्यावी जाणे नही जी, जंगम तीरथ एह ॥ चेमो प्रते. इम कहे जी, कांक निक्षा देह ॥ ज० ॥ ११ ॥ चाटू जरने वा कला जी, प्रनूने प्रांगी दीध | नीरगी तेही लिया जो, तिहां प्र नृ पारणो कीच ॥ ज० ॥ १२ ॥ देव वजावे जि जी, जै घो से कर जोमि ॥ देम दृष्टि दुर तिहां जो, साढोवारे कोमि ।। ज०॥ १३ ॥ कहाँ सेठ तु स्यूं दियो जी, कियो पारणो वीर ॥ लोकां प्रते इन कहे जी, में वहिरा की ज.॥ १४ ॥ राजा दिक सहूए कहे जी, धन पूरणते ॥ नंबी करणी ते करी जी, प्रवर सहू तुम देव ॥ ज० ॥ १५ ॥ जीरणसेठ सुणे तवे जी, वा जित इंडलिनाद ॥ अन्यत्र कियो प्रनु पारणो जी, मनमें भयो विरवाद ॥ ज० ॥ १६ ॥ हूं जगमें अन्नागियो जी, मेरे न आग साम ॥ कल्पवृक्ष किम पामोये जी, मारूमंगल वाम. || ज०.॥ १७ ॥ जेता मनोरथ में किया. जी, तेता रहा मनाहि ॥ निर धन जिम२ चिंतवे जी,,तिम२ निरफल थाय ॥ ज०॥ १७॥ स्वा मी तिहां कियो पारणो जी, कियो अन्यत्र विदार ॥ प्रापा पात संतानिया जी, तिदा मुनि केवलधार ॥ ज०॥ १५॥ वेशालापुर . . (५२२) राजियो जी, लोकास्यु पाणंद ॥ राय प्रश्न पूवे इस्यों जी, सुगुरु 'चरण अरविंद ॥ ज० ॥ २० ॥ मेरे नगरमें को अ जी, जीव पु 'न्य जसवंत ॥ कहे केवली आज तोजी, जीरणसेठमदत ॥ ज०॥ २९ ॥ राय कहे किण कारणे जी, जीरणसेठ महंत ।। दान दियो जिन वारने जी, पूरणसेठ महंत ॥ ज० ॥ २२ ॥ राय.प्रते कहे केवली जी; पूरण दीनो दांन । हेमवृष्टि फल तेदने जी, श्रवर न 'को प्रमाण || ज०॥ २३ ॥ देवलोक.तिण वारमें जी, जीरण घोल्यों बंध । विना दान दियां लह्मो की, नत्तम फल संबंध ज. ॥ २४ ॥ घमी एक सुर इंडन्नि जी, जो न सुरांतो कान ॥ सहि- तो जीरण तो सही जी, केवल अविचल गंम ॥ ज० ॥ २५ ॥ राजा जोरणने दियो जी, अधिक मान सनमान ॥ मुकनगरमें श्रा 'पियो जी, जोवो पुण्य प्रमाण ॥ ज० ॥ ॥ २६ ॥ दान दियो सु- पात्रने जी, ते निष्फल नवि जाय ॥ पात्रदान अनुमोदना जी, जीरण जिम फल थायं ॥ ज० ॥ २७ ॥ इम जागी अनुमोदना जी, दान सुपात्र रसालदांन देवे सुपात्रने जी, तेहने नमे. मु नि माल । ज० ॥ २७ ॥ इति श्रीवीर प्रभु पारणा संपूर्ण ॥ ॥ अथ आलोयण जीवरासि समावण पद्मावती लिख्यते ।। ... | हिवं राणी पद्मावती, जीवरास खमावे ।। जांसपोज ग दो हिलो, इण वेला प्रावे ॥ ते मुफ-मिशामिकम् ॥ १ ॥घ- 'रिहंतनीसाखः॥ जे में जीव विराधिया, चोरासी साख ॥ ते मु० ॥ २ ॥ सात लाख पृश्नवीतणा, साते अप्पकाय ॥ सात लाख ते 'छकायनी, साते वलि वाय|| ते ॥ ३॥ दस प्रत्येकवनस्पती, वव. 'दे लाख साधार । विति च नरेंदी जीवना, ये सारस विचार ॥ "ते ॥४॥ देवता तिर्थच नारकी, च्यार प्रकाशी ॥ चवदे लाख मनुष्यना, ए साख. चोरासी ॥ ४०॥ ५ ॥ जनव. परनव से
नवे,
(२५३ )
'चिया, जे पाय-अदार ॥ त्रिविध कर वोतलं,उरगति दातार ते
॥ ६ ॥ हिंसा कीधी जीवनी, बोल्या मृपावाद ॥ दोप अदत्तादों
नना, मैथुन उनमाद ॥ ते॥७॥ परिशद मेख्यो कारमो, की
धो क्रोध विशेप ! मांन माया लोन में कीया, बलि राग ने क्षेप
॥ ते० ॥ ॥ कलह करी जीव दूदव्या, दीधा कूमा कलंक ॥.नि
'धा कीधो पारकी, रति अरति निस्संक ॥ ते०॥ ए॥ चामी की
धी चोत्तरे, कीपो थांपणमोसो ॥. कुगुरु कुदेव कुधर्मनो, जलो ओं
'एयो.जरोसो॥०॥ १० ॥ खाटकोने लव जे किया, जोवना
वध घात ॥ चिमीमार नव चिमकला, मारचा दिन ने रात ॥ ले०
॥१.१1 मारीगर नव माग्ला,काल्या जलवासा धीवर जीत कोलो
मृग मारघा पास ॥ ते० ॥ १२॥ काजी मुखाने जवे, पदी
"मंत्र कोर ।। जीव अनेक जबे किया, कीधा पाप अघोर ।। ते॥
१३.।। कोटवालनवमें किया, प्राकाराकर दंग ॥बंदीवान मराविया,
कोरमा मी दंम । ते॥ १५ ॥ परमाधामीने नवे, दीधा नार
की उरक ।। ठेदन नेदन वेदना, तामना, अति तिरक ॥ ते ॥१५
॥ कुंभारने नव में किया, निवाद पचाया ॥ तेलीलय तिल ति
लिया, पापे पेट नराया || ते०॥ १६ ॥ हालीने लव हल ख
'.मया, फाज्या पृथवी पेट ॥ सूमाने दान किया घणा, दीधा बलध
चपेट ।। ते० ॥ १७॥ मालीने जव रोपिया, नानाविध वृद, मूल
पत्र फल फूलना, लागा पाप ते लक्ष ॥ ते॥१०॥ श्राधौवादी
'आगमी, नरया अधिका नार ।। पोती कंट कोमा पक्ष्या, दया ना
वी लिगार ॥ते ॥ १॥ पाने लव गेतरयो, कीधारांगणपास
अगनि प्रारंन.फिया घणा, धातुरवाद.अभ्यास ॥ ते ॥२०॥सूर
.पणे रणकुंफता, मारया माणस वृंद ॥ मदिरा मांस माखण नरया,
वाघा मूला
ने कंद ॥ ते ॥ २१.स्साए खिणा धातुनी, पाणी
(२५५) संच्या| आरंन कीधा अतिघणा, पोते पाप ते संध्या ते ॥२२॥ अंगारकर्म किया वली, धरमें दव दीधा || सूंस से वोतरागना, कूमा. कोसज पीधा ॥ ते०॥ २३ ॥ विल्ली नव ऊदर गिल्या, गि लोई इत्यारी।मूढ गिमारतरो नवे, में जूं सीख मारीते॥२४॥ नामनूजातणे नवे, एकेही जीव, ज्वार विणाग हुँसे किया, पाता रीव ॥ ते०॥ २५॥ खमण पीसण गारना, आरंत अनेक || रांधरा इंधरा अगनिना, कीया पाप नदेग ॥ ते० ॥ २६ ॥ विकथा व्यार कीधी वली, सेव्या पांच प्रमाव ॥ इष्ट वियोग पमाझिया, रोदनधि खवाद ॥ ते ॥ २७ ॥ साधु अने श्रावकतणा, व्रत लेश्ने नागा, मूल अने उत्तरतणा, मुझ दूरण लागा ॥ ते० ॥ २७ ॥ साप विद्यु सिंद.चौतरा, तिकरा ने समलो ।। हिंसक जीवतणे नवे, हिंसा कीधी सबली ॥ ते० ॥ २५ ॥ सूपायमे दूपण पणा, यति गरज गलाया ॥ जीवाणी ढोख्या घणा, शीलवत जाया ॥ ते०॥३०॥ जव अनंत नमतां यका, किया कुटुंब संबंध ॥ त्रिविध २ कर यो. सलं, तिणसुं प्रतिबंध ॥ ते० ॥ ३१ ॥ रानव परनय इस परे, कीधा पाप अखत्र ॥ त्रिविय २ कर वोसलं, करुं जनम पवित्र । ॥०॥ ३२ ॥ राग वेरामी जे सुणे, ए तीजी दास ॥ समयसुंदर कहे पापो, बूटे ततकाल ते॥३॥इति पालोयण सिमाप सं० ॥ अप गोडीपार्थनायजीका वृद्ध स्तवन लिख्यते ॥ ॥दा ॥ वाणी ब्रह्मा यादनी, जागे जग विक्षात ।। पासतशा गुण गावतां, मुझ मुस यमज्यो मात || १ || नारंगे प्रादिसपुरे, भद मदायारे पास || गोमीनो धणी जागतो, सदनी रेवास ॥ २ ॥ शुन्न वेशा गुन दिन पमी, महुरत एक मंझाश ॥ प्रतिमा सीने त, पई प्रतिश जांच ॥ ३ ॥ .
( ५ ) ॥ दाल 1॥ गुणहि विशाला मंगलीकमाला, वामानो सुत साचो जी। धण कम कंचण मणि माणक दे, गोमोनो धणी जाचो जीगु०॥ ॥ ४ ॥ प्रणदिलपुर पाटणमें प्रतिमा, तुरकतणे घर हूंती जो ॥ अश्वनी नूमे अश्वनी पीमा, अश्वनी वाल विगूनी जी॥ गु० ||५|| जागतो जक जेहने कहिये, सुहतो तुरकने आपे जी ॥ पास जि नेसर केरी प्रतिमा, सेवग तुझ संतापे जी ॥ ६॥ गु०॥ महक जीने परगट करजे, मेघागोठीने देजे जी। अधिको मले जे नगे मले जे, टक्का पांचसे लेजे जी ॥ी गु० ॥ नहि पापिस तो मा रीस मुरमिस, मोरबंध बंधास्ये जो ॥ पुत्र कलत्रधन हय गय हाथी, साठ घणी घर जास्ये जी ॥७॥ गु०॥ मारग पहिलो तुमने मिल स्ये, सारयवादो गोली जी निखवट टीलो चोखा चोढया, वस्तु वहे तस पोती नी ॥ ए॥ गु०॥ . .मनसे बिहत्तो तुरकमो, माने वचन प्रमाण । बीवीने सुद पातलो, संनसावे सहिनाण ॥ १० ॥ धीबी बोले तुरकने, वझा देव हे को। अब सताब परगट करो, नदितर मारे सोय ॥११॥ पाठलीरात परोमिये, पहली बांधे पाज ।। सुदणामांदे सेग्ने, संन सावे यक्षराज ॥ १२॥ "दालं २॥ एम कही यह आयो राते, सारथवाहूने सुइणे जी ॥ पास तणी प्रतिमा तूं लेजे, सेतो सिर मत धूले जी ॥ ए० ॥ १३ ॥ पांचसे टका तेदने प्रापे, अधिक मापिस वारू जीजतन करी- पहुंचाडे यांनक, प्रतिमा गुण संतारू जी ।। ए०॥ १४॥ तुमने होसी बहु फलदायक, ना गोगे सुणजे जी ।। पूजे प्रणमे तेहना पाया, मदतीने युराजे जी ए॥३५॥ सुइणो देश्ने सुर चान्यो, . श्रापणे बानक पहुतो जी || पाटणमांहे सारथवादू, ही तुरकने जोतो जो । ए॥ १६ ॥ तुरके जातो दीठो गोठी, चोखा तिल क निलामे जी ॥ संकेत पढ्तो साचो जाणी, बोलावे बहु लाने जी॥ ए० ॥१७ || मुझ घर प्रतिमा तुमने आएं, श्रीपास जिने सर केरी जी।पांचसे टक्का जो मुझ थापे, तो मोल न मांगू फेरी जी ॥ ए० ॥१७॥ नाणो देश प्रतिमा ले३, थानक पहुतों रंगे जी, केशर चंदन मृगमद घोली, विधतुं पूजा रंगे जी ॥ ए०१|| गादी रूमी रूनी कीधी, ते मांदि प्रतिमा राखे जी ॥ अनुक्रम आत्या पारकरमांदे, श्रीसंघने सुर साखे जी ॥ ए0. || २० || नव दिन 'अधिका बाये, सत्तर ने सनात्रो जी ॥ गंमरना दरसरा करवा, आवे लोक प्रजातो जी॥ ए. ॥ २१ ॥ ॥ दुहा ॥ इक दिन देखे अवधिसुं, पारकरपुरनो नंग || जतन करू प्रतिमातगो, तीरथ अ अन्नंग ॥२२॥ सुहगो प्रापे सेग्ने, घन, अटवी कजाम।।महिमा थास्ये प्रतिघणी, प्रतिमा तिहां पहुचामा) ॥ २३ ॥ कुशल केम तिहां अने, तुमने मुझने जाग, संका मी काम कर, करतो म करीत कांण ॥ २५ ॥ ॥ दास ॥ ॥ पास मनोरथ पूरा करे, वाहण एक वृपेन जोतरे पार करथी.परियाखो करे, इक प्रल चढ योजे कतरे ॥ २५॥धारे कोड श्रायां जेतले, प्रतिमा नविचाले तेतले गोली मनद विमासरा घर पास नवन ममावू सही ॥ २६ ॥ या अटकी किम कर प्रयाण, मुट को को न दीसे वदाण | देवल पास जिनेसर सरतणो, मंमा कि म घर विसो ॥ २७ ॥ जल बिन श्रीसंघ रहस्ये मिदा, सिलावटी किम प्रावे शहां ॥ चिंतातुर अयो निज सहे, यक्षराज पारी कम N ( १५७) कहे ॥२७॥ गूंहली ऊपर नाणो निहां, गरथ घणो जाणीज तिदा ॥ स्वस्तिक सोपारी सहिनाण, पाहणतणी नलटस्ये खाण॥ २५॥ श्रीकल सजल तिहां किण जुन, अमृत जल निसरिस्ये कून । खा राकूआनो इह सहनांण, नूमि पड्यो रे नीलो गण ॥ ३०॥सि सावटो सोरोही वसे, कोढ परान्नावियो किसमिसे ॥ तिहांयकी तूं इहा आणजे, सत्य वचन माहरो मानजे ॥ ३१ ॥ गोठीनो मन पिर थापियो, शिलाचटाने सुदणो दियो।रोग गमान ने पूरूं आस, पासतणो मंझे आवास ॥ ३२ ॥ सुपनमांदि मांन्यो ते वेण, हेम वरण देखाज्यो नेण ॥गोठी मनह मनोरथ हुआ, सिलावटेने गया तेमवा ॥ ३३ ॥ सिलावटो.आवे सूरमो, नीमे वीरखांम घृत चूरमो।। घमे घाट करे कोरणी, लगन लवे पाया रोपणी ॥ ३५ ॥ यंन । कीधी पूतली, नाटक कौतुक करती रती ॥ रंगमंस रलियामणो रसे, जोतां मानवनो मन वसे ॥ ३५ ॥ नीपायो पूरो प्राशाद, स्वर्ग 'समो मो श्रावास ॥ दिवस विचारी इंको घड्यो, ततखिण देवल ऊपर चढयो । ३६ ॥ शुन्न लगन शुन वेला वास, पचासण वेग श्रीपास.|| महिमा मोटी मेरु समांन, एकलमल वगमे रहे वान || ॥ ३७॥ वात पुराणी में सांजली, तवनमादि सूची सांकली ।। नोगीतणा गोतरिया अने, यात्र करीने परणे पठे ॥ ३८ ॥ ॥ दूहा ॥ .विधन विझारण जक जग, तेहनो अकल सरूप ॥ प्रीत करे नीसंघने, देखा निजरूप || ३ए। गिर गोमीपास जिन || प्रापे रथ मार. II. सानिध करे श्रीसंघने, प्रास्या पूरणहार ॥ १० ॥ ल पलाणे नील इय, नीलो थर असवार; मारग चूकां मानवी, दिखावणदार ॥ ११ ॥ .
(१२) है || दाल ४॥ वरण अढारतणो लहे नोग, विघन निवारे. टाले रोग ।। वित्र.अ समरे जे जाप, टाले सगला पाप संताप ॥ १२ ॥ नित धनने घर धननो सूत, प्रापे अपुत्रियाने पूत ॥ कायरने सूरापणो घरे, पार नसारे सही बरे ॥४३॥ दोनागीने दे सोजाग || पग विहूणाने आपे पाग ॥ नाम नही तेदने ये गंम ॥ मन वंटित पूरे अन्निरांम ॥ ४४ ॥ निरधाराने ये आधार, जवसायर कतारे पार ॥ धारतियानी भारत नंग, धरे ध्यान ते लड़े सुरंग ॥ ४५ ॥ समरयां साद दिये जकराज, जेदना मोटा असे दिवाज । बुद्धिदीनने बुद्धि प्रकाश || गूंगाने ये वचन विलास ॥ ५६ || उखियाने सुखनी दा तार, नयनंजण रंजण अवतार ॥ बंधन लूटे बेमीतणा, श्रीपार्य नाम.अक्षर समरणा॥४७॥ "दूहा ॥ श्रीपार्श्व नाम अक्षर जपे, विश्वानर विकराल ॥ हस्तियुद्ध दूरे टले, उझर सींद सियाल || || चौरतणा जय चूकये, विप अमृत नमकार ॥ विषधरना विष कतरे, संग्रामे जय जयकारा रोग शोग दालिइ उख, दोदग दूर पूलाय || परमेसर श्रीपासनो, म. हिमा मंत्र जपाय ॥ ५० ॥ ॥ डाल ५॥ पाल कडसानी॥ उजततू २ज नपशम घरी, ही श्री श्रीपाच अक्षर पते ॥नूतने प्रेत कोटिंग वितर सुरा, नपशमे वार इकवीस गुर्णत ॥ १ ॥10॥ अक्षा रोग शोगा जरा जंतरा, ताय एकंतरा 5 नपते । गर्नबंधन प्रणं सर्प विव विष, चालिका यास मेवाकरखते ॥ ५२ ॥ १०॥ सारणी माणी रोदणी रंकणी, फोटका मोटका दोष दुते ।। दाद इंदरतली कोल नोखा ती श्वान सिपाल वि - (२५ए ) कराल देते ॥ ५३॥०॥ धरणें पद्मावती समर सोलावती, वा प्राघाट अटवी अटते ।। लखमी लोदो मिले सुजत वेला वले सयल आस्था फले मन इसते ॥ ५४॥३०॥ अष्ट महानय ई कानपीमा टले ॥ ऊतरे शूल शीसग नणंते ॥ वदत वर प्रीता प्रीतविमल प्रनु, श्रीपात जिण नाम अनिराम मंते ॥ ५५ ॥ श्रीगोमीपार्श्व जिन स्तवनं ।। ॥ अथ मंगलीक लिख्यते ॥ धम्मो मंगल मुक्कि अहिंसा संजमो तवो ॥ देवा वितं न संति, जस्त धम्मे सयामणो ॥१॥ जहा सुम्मस्स पुप्पेस, नमः आवि अस्तं ॥ नय पुप्फ किसामेश्, सो पीणे अप्पयं ।। २ एव मेए समस्या बुत्ता, जे सोए संति साहुणो॥ विहंगमाइ पुप्फेर दागनते सणेरया ॥ ३ ॥ वयं च वित्ति बनामो ॥ नहिं कोन हम्मद ॥ अहागमे सुरीयंते, पुप्फेसु नमरो जहा ॥ ४॥ महुक समा बुद्धा, जे नवंति अणिस्सिया If नाणामि रयादिता, लेण व ति साहुशोनियेमि ॥ ५॥ति ॥ सर्व मंगल मांगल्यं, सर्व कल्या कारणं । प्रधानं सर्वधर्माणांजैन,जयति साशनामंगलं जगवान रो, मंगलं गौतम प्रनु । मंगलं स्थलनद्या, जैनोधर्मोस्तु मंगला ।। अथ आत्मरक्षा स्तोत्र लिख्यते ॥ ॥ नमो परमेष्टि नमस्कार, सारं नवपदारमक || पार रक्षा करं वज, पंजरा नस्मराम्य ॥ १॥ नमो अरिहंताणं शिरस्त्र.शिर संस्थित, ७ नमो सब सिद्धाणं, मुखे मुखपटवरं ।। ॥ ॐ नमो भापरित्राणं, 'अंगरक्षाति शायिनी ॥ नमो में झायाणं, आयुध इस्तयोस् ॥ ३॥ नमो लोए सब साहू मोचके पादयो सुने । एप्तो पंच नमोकारो, शिवा वजई । 14॥ सब पावरणासपो, वो जमयोपहि. मंगला.
। (२६०) सि, खादिरंगार स्वातिका ॥५॥ स्वाहांतंच पदं यं, पढम; दवा मंगलं ॥ वप्रो परिवजमयं, विधान देहरक्षणे ॥ ६॥ मदा प्रनावात् रदेयं, कुशेषश्च नाशनी ॥ परमेष्टि पदोबूता, कविता पूर्वसूरिलिः ॥ ७॥ यश्चैवं कुरुते रक्षा, परमेष्टी पदे सदा ॥ तस्य नस्यानयं व्याधि, राधि वापि कदाचनः ॥ ॥ इति आत्मरक्षा स्तोत्रं संपूर्ण ॥ ॥ अथ नवकार स्तवनं ॥ (छंद) : सुखकारण नवियरा समरो नित नवकार, जिनशाशन आगम चवदे पूरब सार ॥ इण मंत्रनी महिमा कहितां न सहुं: पार, सुरतरु जिम चिंतित वंचितफल दातार ।। १ ॥ सुर दानव मानव सेव करे कर जोम, नूयमंझल विचरे तारे नवियण कोमि ।। सुरवंदे विलसे अतिशय जास अनंत, पहिले पद नमिये प्ररिंग जन अरिहंत ॥ २ ॥ जे पनरे नेदे सिद्ध या जगवंत, पंचमि गति पुहता अंष्ट कर्म करि अंत ॥ कल अकल सरूपी पंचानंतक जेह ॥ सिद्धना पाय प्रणमुं बीजे पद वंलि एद || ३ ॥ गन्नार धुरंधर सुंदरं शंशिहर शोम, कर शारणवारण गुण उत्तीले योम ॥ श्रुत जाण शिरोमण सागर जेम गंन्नीर, तीजे पद नमियें. चारज गुण धीर ॥ ४ ॥ श्रुतधर गुण थागम सूत्र जगावे सार तप विध संयोगे नाखे अरथ विचार ।। मुनिवर गुणयुत्ता ते ५ दिये नवझाय, चोये पद नमिये अदनिश तेहना पाय ॥ ५ ॥ चाव टाले पालें पंचाचार, तपती गुणधारी चारी विषय विकार ॥ स श्रावर पीहर लोकमांदिते साध, त्रिविधे ते प्रपा परमा रय जिण लाथ ॥ ६ ॥ अरि हरि करि साण माख नूत वेताल, सब पाप पणास दिलसे मंगलमाल ॥ण समरयां संकट दूर से ततकाल, जपे,जिरा गुण इम सुरवर सीस रसाल || . ट देवा, करो एक i अथ श्री संखेश्वरा पार्श्वनाथ स्तवनं ॥ (छंद)" : " ॥ शेवो पास संखेसरो मन सुद्धे, नमूं नाथ निचे करी एक बुधे ॥ देवी देवता अन्यने शुं नमो गे, अहो लव्य बोको नुला कांनमो गे ॥ १ ॥ त्रैलोक्यना नायने सुं तजो गे, पच्या पाश मे नूतमाने नजो हो । सुराधेनु मी धजाने श्रजो गे, महापंया मूंकी कुपंथे ब्रजो गे ॥ २ ॥ तजे कोण चिंतामणी काच माटे, ग्रहे कोण राशनने दस्ति साटे || सुरजुम कपामने आक वावे, महामूढ ते थाकुला अंत पाये ॥३॥ किहां काकरोने जे किहां मेरु शृंग, किहां केशरीने किहां ते कुरंग ॥किहां विश्वनाथं किहां अन्य चिने प्रन्नु पार्थ सेवा ॥ १ ॥ पूजो देव प्रत्नावती प्राणनाथ, सहू जीवने करे सह सनाथ ॥ महातत्व जागी सदा जेह ध्यावे, तेदना उरक दाखि दूरे गमावे ॥५॥ पामी मानुपोने वृथा क्यु गमो गे, कुशीले करी देहने का दमो गे, नहि मुक्ति वासं विना वितरागं ॥ नजो नगवंत तजो दृष्टिदरागं ॥ ६ ॥उदय रत्ननाखे सहा हेत पाणी, दयान्नाव कीजे मोदि दास जाणी ॥ मोरे प्रांज मोतीअमे मेह वूग, प्रनु पात संखेसरो आप तूग ॥ ॥ इति पदं ॥ ॥ अथ लघु गौतम रास लिख्यते ॥ : ॥ वीर जिनसर केरो शीश, गोतम नाम जपो निश दीश ॥जो कीजे. गौतमनो ध्यान, तो घर विलशे नवे निधान ॥ १॥ गौतम नामे गिरवर चढे, मन वंग्ति लीला संपजे ।। गौतम नामे नावे रोग, गौतम नामे सर्व संजोग |॥ २ ॥ जे वैरी विरुआ वंक मां, तसनांमे नावे ढुंकमा ॥ नूत प्रेत नवि मंझे प्राण, ते गौतम ना करूं वखाण ॥ ३ ॥ गौतम नामे निरमल काय, गौतम नामे वाधे आय || गौतम जिनशाशन सिणगार, गौतम नामे जयकार .
. (५२) ॥ ४ || शाल दाल सदा धृत घोल, मनमित कप्पा तंबोल ।। घरे सुघरणो निरमल चित्त, गौतम नामे पूत्र विनीत || ५ || गौ तम नदयो अविचल नारा, गौतम नाम जपो जगजांस ॥ मोटा मंदिर मेरु समान, गौतम नामे सफल विदा ॥ ६ ॥ घर मयगल घोमानी जोम. वारू विलसे वंचित कोकि । महियल माने मोटा राय जो तूचे गौतमना पाय ||| गौतम प्रणम्यां पातिक टले, उत्तम सरसी संगत मिले। गौतम नामे निर्मल झान, गौतम नामे वाधे वान' ॥७॥ पुण्यवंत अवधारो सहू, गुरु गोतमना गुण ये बहू ॥ कहे सा वएप समय कर जोमि, गौतम तूग संपत कोमि इति पदं ।। ॥ अथ शोल शती चंद ॥ आदिनाथ प्रादि देश जिनवर बांदी, सफल मनोरथ कीजिये एप्रिजात ऊठी मंगलीक काजे शोले शती नाम लीजियेए॥१॥ धालकुमारी जगदितकारी, ब्राझी जरतनी पहिनमी ए॥ पट २ व्यापक अक्षररूंपे शोल शती मांदि जे मी ए ॥२॥ पादुपस जगनी सतिय शिरोमणि, सुंदरी नामे झपन्न सुता ए ॥ अंग स्य रूपी विन्नुवनमांदे, जेद अनोपम गुणयुता ए॥३॥ चंदनवाला पासपणेथी शीलवती शुद्ध श्राविका ए, नझदना याफसा वीर प्रति सान्पा, केवल सदि व्रत नाविका ए॥ ५ ॥ नमशेन धूया धारणी नंदन राजेमती नेम बहना ए, योवन येशे कामने जीती, शेजम से देव उल्लना ए॥५॥पंच जरतारी पांमय नारी, दुपा नाम बरसाशिये ए, एकशो प्रावे चीर पुराणा, शील मदिमा तस जाशि ये ए॥ ६ ॥ दशरथ नृपनी नारि निरोपम कीदात्या फुलशिकाए, शीयस तसूणी राम जनीता पुण्यतणी प्रनातिका ए॥ ॥ कांदा धिक गमे शनानिक नामे, राम्य करे रंग रानियो ए, तग पर प रणी मृगावती नामे मुग्नुबने जा नाजियो ए ! मुखशा साची शील न काची राची नही विषयारसें ए, मुरखमो जोता। युलाये नाम लेतां मन नलसे ए॥ ए॥ राम रघुवंशी जेहनो भण जनकसुता शीता शती ए, जग सहू जाणे धीज करता श्र शीतल थयो शीलधी ए॥१०॥ काचे तांतण चालणी बांध चाणकी जल काढियो ए, कलंक कतारवा शत्तिय सुनश चंपा नवामियो ए ॥ ११॥ सुरनर वंदित शील अकंपित शिवा शिव गांमनी ए| जेहने नामे निरमल अश्ये बलिहारी तसु नामर्न ॥१२॥ इस्तिनागपुर पांवरायनी कूता नामे कामनी ए, पां माता दशे दशारनी, बहिन पतिव्रता पदमनी ए ॥१३॥ वती नामें शीलवत धारणी, त्रिविध तेहने बंदीय ए॥ नाम ता पातिक जाए, दरसन अस्ति निकंदि ए॥ १३ ॥ निपधान नल नरपतनी,दवदंती तसु गेदनी, ए संकट पमियांशीलज रार विन्नुवन कीर्ति जेहनी ए ॥ १५॥ अनंग अजीता जगजन.र्ज पुष्पचूला ने प्रत्नावती ए॥ विश्व विद्याता कामित दाता, शोर शती पद्मावती ए ॥ १६॥. वीरे दाखी शास्त्र ते साखी, नदय जापे मुदा ए॥प्रद ऊठीने जे नरजणसे, तेलहिस्ये सुख संपदाए ॥ अथ गौतम मंगल लिख्यते ।। जय २ मंगलनिधान गौतम जयकारी॥ ज०॥थ्वी रलहीर, विश्वनूति पितु सधीर ॥ ब्यार वेद चतुरवीर मन्मए वतारी ॥ ज० ॥ १ ॥ जा रंग विप्र संग, नृता सुरलोक गंग करत घरत गत्र पात्र, विरुद विबुधचारी ॥ ज० ॥ २ ॥ विन प्रनु पाये चंग, वाणी गुण सप्त.नंग ॥ वईमान जित अनंग, शं तम दारी ॥ ज०॥ ३ ॥ देवागम त्रिगढ़ देख, ज्ञान संकरे वीतराग वचन पेख, मिथ्यामत टारी ॥ ज० ॥ ४ ॥ त्रिपदी अंग.वार, स्वनो कृत प्रति अपार, बोधन लग जीव सार, नये (२६४) गणाधारी ॥ ज०॥ ५॥ केवल चिद सरस पीन, मुक्ति लक्ष्मी धरम सीन.। मुनिः मन जल चरण मीन, कुंदन युति सारी ।। ज० ॥६॥ सिदियोग नंद चंद, कार्तिक शित संघ बंद || फूलत घर कल्प कंद, दूज कुमति हारी ॥ ज० ॥ 3 ॥ गुणशीलपुर देवमणो इति ‘जगंधणी । कुशल निधान सुख नगी, पाठक झदिसारीज०॥७॥ ॥ अथ मुनिवेप संबंधे पद लिख्यते ॥ ॥म्हांने प्यारो लागे ते जी मुनिवर नेस ॥ म्हांने हाय लकहिया कांधे कंबलिया, शिर शोनित तनु केश म्हा०॥ १.॥ चोलपट्ट चादर पांगरणी, नऊल रहत हमेश ॥ म्हा० ॥ २ ॥ 'यणा कर मुखपत्ती धारक, रजोहरण सविसेस, म्हां०. ॥ ३॥ यि 'वरकलप जिनमुज्ञधार ॥ काटत कर्म कलेश ॥ म्हां० ॥१॥ दे उपदेश नविक जनतारक, तमहर प्रगट दिनेश || म्हां ॥५॥ करतरामशहिसार वंदना, निरखत एसोनेत॥म्हां०॥६॥इति पद।। .... ॥ अथ अरिहंत स्तवनं पद ॥ ॥ राग नाटक : :: ॥ जबसे सरधा श्रुद्ध नई, मन अरिहंतर ध्याते. हे ॥परि हंत ध्यावत गुणगण पायत कर्म रहित हो जाते हे ॥१॥ जय २ जयर श्रीजगदीश्वर, शंकर ब्रह्म कहाते हे ३ सहजानंदी जगत 'नधारण, सुरनर चरण सुनाते हे ॥ सब देव मिल त्रिगढ स्वाते, अपर मंगल धुनि गाते है ॥ देवनि नाद बजाते हैं, धर्म ते दे सुख देते हे । नविक जीव तिर जाते है, जो निभय मन लाते दे | रामन-हार कहे शद्धसार, तूं श्राधार प्रनु मोहे तार ॥ ॥ अथ श्री श्रावक करणीनी सझाय ।। ॥ चोपाई ॥ श्रावक तुं को परजान, चार घमी से पादर 'मा समरे श्री नवकार; जेम पामे नव सायापार ।। . .
-- (२६३), कवण देव कवण गुरुधर्म, कवण अमारुं कुल कर्म, कवण य: मारों के व्यवसाय, एवं चिनवजे मन माय ||२|| सामायिक लें जे मन शुद्ध, धर्मनी हे घरजे बुध ॥पमिकमणु करे रयणी सणु, पातक आलोई आपणुं ॥ ३॥ कायाशक्तं करे पञ्चरकाश सूधि पाले जिननी आग ॥ नणजे गणजे स्तवन सझाय, जिगहुँती निस्तारो पाय ॥ ४॥ चितारे नित्य वन्दे नीम, पाले दया जीवतां सीम ॥ देहरे जाइ जुहारे देव, इयत्नावधी करजे सेव ॥ ५॥ पोषालें गुरु वंदन जाय, सुशो वखाण सदा चित्त बाय ॥ निर्दूपण सूजतो आहार, साधुने देजे सुविचार ॥ ६ ॥ साइम्मिीवत्सल करजे घणां, सगपण महोटा साहम्मीतणां ।। वीया होगा दीना देखि, के रजे तास दया सुविशेष ॥ ७ ॥ घर अनुसार देने दान, महोटाशु म करे अजिमान ॥ गुरुने मुखे खेजे आवमी, धर्म न मूकीश ए के धमी.,.5 ॥ वारु शु.६ करे व्यापार, नग अधिकानो परिहार।। मलरिशकेनी कूमी साख, कूमा जनशु कथन मनांख ||। अनंतकाय कहिये वत्रीश, अलक्ष्य बाविशे विश्वावीश ते नक्षत नवि कीजे किमे, काचां कवला. फल मत जिमे ॥ १० ॥ रात्रिनों जनना बहु दोष, जाणीने करजे संतोप ॥ साजी सावू लोह ने गु ली, मधु धामी मत वेचो बली ॥ ११ ॥ वली म करावे रंगण पास, दूरण घणां कह्यां वे तास ॥ पाणी गलजे वे वार, अरागत पीता दोष अपार ।। १२॥ जीवाणीनां करने यत्न, पातक भी करजे पुण्य ॥ गणा इंघण चूले जोय, वावरजे जिम पाप न होय ॥ १३ ॥ धृतनी परें वायरजे नीर, प्रणगत नीर' म धोश्श चीर ।। ब्रह्मवत, सूधु पालजे, अतिचार सपला टालने ॥१५कयां पन्नरे कर्मादान, पापतणी परहरजे खा कि म लेहेमनरथ दंभ, मिथ्या मेल म नरजे पिकः॥ १५ ॥ समाहि ३४ , . .
,
(२६६)
जे ॥१५॥ वस्तु ॥ वीर जिणवर विर जिपवर नाव संपन्न पावापुरंसुर
मदिय, पत्तनाद संसारतारण ॥ तिहिं देवर निम्मदिय, समवसरण
पहु सुरक कारण ॥ जिणवर जग नोय करे, तेजहि कर दिन
कार सिंहासण सामी उव्यो, हु तो जयजयकार ।। १६ । नात
| तो चढियो घणमा गजे, इंदनूय नूयदेव तो । हुंकारो कर
चरिय, कवणसु जिणवर देव तो ।। जोजन नूमि समोसरण, पे
स्ववि प्रथमारंन्न । तो दददिस देखे विघुघवधू, भावंती सुरंज तो॥
२०॥मलिमय तोरणदंम प्वज, कोसीसे नवघाट तो ॥ परति
यर्जितजंगुगण, प्रातीदारिज थाव तो ॥ सुर नर किनार असुरयर,
क्षणी राय तो॥ चिन चमनिय चिंतय प. सेवंता प्रनु पाप
तो ।। १७॥ सदस किरण सामा चार जिण, पेखित रूप
'नो । एद घसंजय संजय ए, साचो ए ३ जाम तो तो गोमा
या प्रिजग गुरु, चिनू नामेणा तो ॥ श्रीमुख संसा सामि राय,
फै वेदपपण तो ॥ मान मेल मा रेल करे, नगरि ना
यो सीस तो ॥ पंच सासू व्रत लियो ए, गोयम पहिलो सास तो
। यंधव संजम गुणावि करे, अगनिन यायेय ते ॥ नाम से मानाम
कोरे,पण प्रतियोधिपना॥२०॥ण अनुक्रम गणदररपण, प्राध्यानीर
ग्यार तो नोनपदेसे नुवन गुरु,संपमाप्रत पार तो बि९ सपा
पारतो ए, पापण निईन तो मोषमसंयमग राया, जप जप
भार करत नो । २१ यग्नु । नाचना पर बहमान
९कारो करि पतो, मायराण पता नती || time
ये, परमना तितो दोपवजापाने, नायम सरि
शिरन दिन सेमिमा पट्टी, मदन मन
पज दुव मुविदाट, मादयविमा पुनय नग : मामय
मज निरन निका॥ ममदमत मा
.
, - (२६७) संसा ऊपजे ए ॥ ते ते पर नपगार, कारण पूढे मुनि पवरो ॥२३॥ जीह दीजें दीख, तिहां केवल नपजे ए॥ श्राप कनें अगहुँत, गं यम दीजें दान श्म । गुरु नपर गुरुन्नक्ति, सामी गोयम कपनिर ॥ श्राचल केवल नाण, रागज राखे रंग भरे ॥ २१ ॥ जो अए पद सेल, वंदे.चद चनवीस जिण ॥ आतम लब्धि वसेण, चर सरीरी सोज मुनिः ।. इय देसणा निसुद, गोयम गाद संचरिय ॥ तापस पररसए,जो मुनि दीगे पावतो ॥२५॥ पसोसि यनिय अंग, ब्रह्मां. सगति न ऊपजे ए ॥ किम चढसेह काय, गज जिम दीसे गाजतो ए ॥ गिरुळ ए अनिमान, तापर जो मन चिंतवे ए तो मुनि चढियो वेग, भावधि दिनकर रण ॥ २६ ॥ कंचरा मशिनिप्पन्न, दंग कलस ध्वज वम सहिय पेखवि परमाणंद, जिणदर लरतेसर महिय ॥ निय निय काय ! माण चिहुं दिसि संठिय जिपद विंव ॥ परामवि मन उल्लास, यम गणदर.तिहां वसिय ॥ २७ ॥ वयर सामीनो जीव, तिर्यकर जक देव तिहां ।। प्रति बोध्या घुमरीक, कमरीक अध्ययन नगी दक्षता गोयम सामि, सवि तापस प्रतिबोध करे। लेई श्रापण साट चाले जिम जूथाधिपति ॥ २७ ॥ खीर खाम घृत आग, श्रमी वर अंगूठ ग्वे ॥ गोयम एकण पात्र, करावे पारणो सवे ॥ पंचर यां.शुन्न नाव, नाव नरियो खीर मिसे । साचा गुरुसंयोग, , वल ते केवल रूप दुना ॥ २५ ॥ पंचसयां जिणनाद, समवसरण प्राकारत्रय..|| पेखवि केवल नाण, नप्पन्नो नजोय करे ॥ जारो शधि पीयूष, गाजंती धन मेष जिम ॥ जिनवाणी निसुवि,नाएं 'सुया पंचसया ।। ३० वस्तु 1.शश अनुक्रम इस अनुक्रम ना पन्नरेते, मपन्न परिवारय, हरिहरिय.जिशनाद बंदर, जारोवीजन शुरु यश, तिहिं. नाण अप्पारा निदइ, चरमजिनेसर इस नए .
. (२६० ) गोयम म करिस खेव, द जाय आपण सदी, दोस्यां तुला बेव ॥ ३१ ॥ नास ॥ सामियो ए वीर जिणंद, पूनमचंद जिम उल्ल सिय ॥ विहरियो ए जरहवासंमि, वरत वहुत्तर संवसिय ॥ व्व तो.ए कणय परमेण, पायकमल संघे सदिय ॥ प्राधियो ए नय पाणंद, नयर पावापुर सुरमदिय ॥ ३२ ॥ पेखयो ए गोयमसामि; देवसमा प्रतिबोध करे ॥ आपणो ए तिसलादेवि, नंदन. पुदतो पर मपए ॥ वलतो ए देव आकाश, पेखवि जाएपो जिण समे ए ॥ तो मुनि ए मनविखवाद, नादनेद.जिम ऊपनो ए॥.३३. ॥ श्ण समे ए सामिय देखि, आपकनातूं टालियो ए | जाण. तो ए तिह अण नाद, लोक विवहार न पालियो ए ॥ अतिन्जलो ए कीपलो सामि, जाएयो केवल मागसे ए ॥ चिंतव्यो ए बालक जेम, अहवा के लागसे ए॥ ३१ ॥ हूं किम ए वीर जिणंद, जगतदि नोखें नोलव्यो ए ॥ आपणो ए चंचलो नेद, नाद न संपे साचच्यो ए । साचो ए ए वीतराग, नेद न हेजें टालियो ए॥ तिणसमे ए गो यम चित्त, राग वैरागें वालियो ए॥ ३५॥ पावतो ए जो नबष्ट, रहितो रागें साहियो ए ॥ केवल ए नाण मुप्पन्न, गोपम सहिज नमाहियो ए ॥ तिहुअण ए जयजयकार, केवल महिमा सुर करे ए ॥ गणधरु ए करय वखाण, नविया लव जिम निस्तरे ए॥३६॥ ॥ वस्तु ॥ पढम गणदर पढम गणहर वरस पच्चास, गिदवासे सं वसिय तीसवरससंजम विनूसिय, तिरि केवलनागपुण, धार यरत ... नमंसिय, राजगृही नयरी व्यो, वाणया परसान, सामी गुणनिलो, दोसे सियपुर गम ॥३७॥ नास ॥ जिम सर यस टहुके, जिम कुसुमावन परिमल मदके, जिमचंदन सो अधि ॥ जिमगंगाजल सहिरपां सदके, जिम कशयावत ते जेंज पो,तिम गोयम सोनागनिधि ॥ ३० ॥ जिम मानसरोवर निवते . +4-ha.
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(६६ए )
ईसा, जिम सुरतरुवरे कणयय तंसा, जिम महुयर रोक
रयणायर रयणं विलसे, जिम अंबर तारामण विकसे, ति..
रु केल घने ॥ ३७॥ पूनमनिसि जिम ससियर सोहे, सुरत
मा जिम जगमांहे, पूरब दिसि जिम सहसकरो॥ पंचानन जिम
रिवर राजे, नर व घर जिम मेगल गाजे, तिम जिनशासन मुनि
वरो ॥ ४० ॥ जिम गुरु तरुवर सोहे सारखा, जिम
उत्तम मुख मधुरी नापा, जिम वन केतकि मदमहे ए | जिमनू
मीपती नुयबल चमके, जिम जिनमंदिर घंटा रणके, गोयमलबर्षे
गहगह्यो ए ॥४१॥ पितामणि कर चढीयो आज, सुरतरु सारे
वंग्यि काज, कामकुंल सदु वशि दुआ ए ॥ कामगवी पूरे मन,
कामी, अमहासिद्धि प्रावे धामी, सामी गोयम अणुसरी ए॥
॥५२॥ परावरकर पहिलो पनणी जें,माया धीजो श्रवण सुगीजें।
श्रीमिति सोना संलवो ए ॥ देवां धुर अरिहंत नमीजें, विनय पहू
नवझाय प्रणीजें, इस मंत्रे गोयम नमो ए ॥ ४३ ॥ परघर वसतां
काय करीजें, देस देसांतर काय नमी जें, कवण काज प्रायास क
रो। प्रह कवी गोयन समरीजें, काज समग्गल ततखिण सीमे,
नवनिधि विलले तिहां घरे ए ॥ ४५ ॥ चवदयसय बारोत्तर वरसे,
गोयम गणहर केवल दिवसें, कीयो कवित उपगारपरी ॥ आदहिं
भंगल ए पत्नणीजें, परव महोदव पहिलो दीजें, रिद्धि वृद्धि क
ल्याण करो ॥ ४५ ॥ धन माता जिण नयर परियो, धन्य
पिता जिण कुल अवतरियो, धन्य सुगुरु जिण दीस्कियो ए॥
विनयवंत विद्या नंमार, तसु गुरा पुदवी न सप्र पार, बंग जिम
साखा विस्तरोए ॥ गोयमस्वामीनो रास नणीजें, चनविह तंघ
रसियायत कीजें, रिद्विद्धि कल्याण करो ॥ ४६ ||कुंकुम चंदन
मो दिवराचो, माणक मोतीना चोक पुरावो, रयण सिंहासण बेस
.
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(५७)
गो
M॥ तिहाँ ठी गुरु देशना देशी, नविक जीवना काज सरसों,
नित नित मंगल उदय करो ॥ ॥ इति श्रीगौतम स्वामीनो
रास,संपूर्ण ॥
।। राग मनाती जे करे, प्रह गमते सूर ॥ नूरख्यां जोजन
संपजे, कुरला करे कपूर ।। १ । अंगूठे अमृत बसे, सचि तशा
मार ॥ जे गुरु गोतम समरियें, मनवंडित दातार |॥ २॥ पुं
मरीक गोयम पमुहा, गणधर गुण संपन्न । प्रह की प्रणमता,
चवदेसे वावन्न ॥ ३ ॥ खेतिखमंगुराकलियं, सुबिणिय सबलहिस
पणं । वीरस्स पढम सीस, गोयम सामो नमंसा ॥४॥सर्वा
रिष्टप्रवाशाय, सानिधार्यदायिने । सर्वल व्यिनिधानाय, गौतमस्या
मिने नमः ॥ ५ ॥इति ॥
॥ अथ सेबुज रास लिख्यते ॥
॥ दृहा॥
॥ श्रीरिसदेसर पाय नमी, यांगी मन यानंद. ॥ रासन
यूँ रलियामणो, सेबूंजनो सुखकैद ॥ १ ॥ संवत व्यार सतोतरे, हु,
आ धनेश्वर सूर ॥ तिण सत्रुज माहातम कियो, शिलदित्य हता
॥ ॥ वोर जिरांद तनव संरघा, सेबूंज कार जेम ॥ शादिक श्रा
गल कह्यो, सेर्बुज महातम एम || ३ || सेत्रुज तीरथ सारियो
नही तीरय कोय || स्वर्ग मृत्यु पातालमें, तारय सगला जोय
in ॥ नामे नव निध संपजे, दीया रित पुलाय ॥ नेटता मय
सेवंता सुख श्राय ||५|| जंबू नामेवीप ए,
दक्षिणं
। सोरठ देत मुहामणो, तिहां से तीरय सार ji ||
। दाल पहिली राग ग़मगिरी॥
भेजो ने श्रीमरीक, सिद्धक्षेत्र कहूं तदती | Fa
अनेक प्रशाम, ए सेजना इयोस नाम | PM मगर
--
i ने महागिरि पुन्यरास, श्रीपदपर्वत मकास ॥ मदातीरथ पूरखें सुखकाम !! ए॥ २ ॥ सासतो पर्वत ने दृढशक्ति, मुक्तिनिलों तिण कीजे नक्ति । पुष्पदंत महापद्म सुगम || ए० ॥ ३॥ स्वीपीय सुलह केलास, पातालमूल अकर्मक तात ॥ सर्व काम कीजे गुणग्राम ॥ ए० ॥३॥ श्रीसेन्जना इकवीत नाम, जपेज वे. ता अपने दोम || सेज जात्रानो फल ते लदे, महावीर नगवंत इम कदे ॥ ए.॥५॥ दुरा॥ ॥ सेजो पहिले अरे, असी जोपण परिमाण ॥ पिहलों मूल चपण, व्हीस जोयण जाण ॥१॥ सत्तर जोयण जाणवो, वीजे अरे विसाल ॥ वीस जोयण ईचो कहो, मुझ वंदना त्रिकाल । २॥ सार जोयण तीजे अरे, पिहलो तीरथराय || सोल जोय चंचो सही, ज्यांन धरूं चित साय॥ ३ ॥ पचास जोयण पिहुसपण, चोथे अरे मझार, उंचो दस जोयण अचल, नित प्रणमें नर नार ॥ ४॥ वार जोयण पंचम अरे, मूलतणे विसतार ।। दो जोयण उँचो अठे, सेजो तीरथ सार सात हाथ में अरे, पिहलो पर बत एद ॥ उंचो होस्ये सो धनुप, सासतो तीरथ एद ॥६॥ हाल बीनी॥ ॥ केवलनांणी प्रमुख तीकर, अनंत सीधा इण गंम रे॥ अनंत बसी सिमस्ये गं गमे, तिण करुं नित परणाम रे ॥१॥ से जसाधू अनंता सीधा, सीसी बलिय अनंत रे । जिण सेज ती रय नहीनेट्यो, ते गरजावास कदंत रे॥७॥२॥ फागुश सुदि भावमने दिवसे, रुपनदेव सुखकार रे.॥ रायणरुख समोसरया स्वामी, पूर्व निनाणूं चार रे । से॥ ३ ॥ जरतपुत्र चैत्री पुनम दिन, सेजगिरि आप रे ॥ पांच कोमी. पुमरीक सीधा, ति . ३५
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(१७५ हूं अंगज तुझ ॥ श्राण्या अक्तवास, अन्नु आप संघवीपद ता मा ५ ॥ इंतिण वेला ततकाल, लरत सुत्नश बिहुँने माल । पहिराची घर संप्रेमीया, सखर सोनाना रथ प्रापिया ॥.६ रिप जदेवनी प्रतिमा वली, रत्नतशी दोधी मन रली जरते गणघर पर तेमिया, शांतिक पौष्टिक सदु तिहां किया ॥ ॥ कंकोत्री मू की सहु देस, भरत तेमायो संप असेस आयो संघ. अयोध्यापुरी, प्रथमथकी रथजात्रा करी ॥ ७ ॥ संघ नगत कीधी अतियणों, सं घ चलायो सेठेजानशी ॥ गणधर बाइबल केवली, मुनिवर कोम साये लिया वती।। ए ॥ कवर्तनी सघल शाह, जस्ते साये सी धीसिद्ध । हय गय रय पायक परिवार, ते तो कहतां ना पार ।। १० । लरतेसर संघवी कदवाय, मारग चैत्य कयरतो जाय । संघ आयो सेजुंजा पास, सहुनी पूगी मननी प्रास १.११ । नयणे निरख्यो सत्रुजराय, मशि माणिक मोत्यांसुं वधाय ॥ तिण गमे रही महोचव कियो, भरते आणंद पुर वासियो॥ १२ ॥ संघ सेबूंजा ऊपर चढयो, फरसंता पातिक कर पख्यो ॥ केवलग्यानी पगला तिदा, मसम्यां रायणरूख ने जिहां ॥ १३ ॥ केवलज्ञानी रात्र निमित्त, ईशाने आणी सुपवित्त ॥ नदी सेजेजे सोहामणी, जरतें दीनी कौतुक क्षणी ॥ १५ ॥ गणवरदेव तणे उपदेश, बलि दीयो आदेश ॥ श्रीआदिनाथतणो देहरो, नरत करायी गुरि सेहरो ॥ १५॥ सोनानो प्रासाद उत्तंग, रतनतणी प्रतिमा मन रंग ॥ भरते श्रीवादीसरतमी प्रतिमा .यापी सोदामणी ॥१६॥ मरुदेवानी प्रतिमा वली, मादी पूनम यापी रखी । ब्राह्मी, सुंदर प्रमुख प्राशाव, सरते श्राप्पा नवला नाद ॥ ३.|| स . अनेक प्रतिमा प्राशाद, नरत कराया गुरु सुप्रशाद । जरततो पहिलो नदार, सगलोद्दी. जायो संसार ॥१७॥ --
unia - भागम,पाजयका राना
1
ततशी पर संप कियो, नेत्रुज संघवी कहायो बीn?
उमर लालसो, सोख मोटा श्रीकारो जी । प्रसस्या
नवी, तेन कर्दु अधिकारो नी । से० ॥ २॥ वैय करा
तो सोनानो वित्र सारो नी 11 मुखगोविंद मारीयो,
सितिश बारो जी से० ॥ ३ ॥ सेवुजैनी जात्रा सरी
कियो मंवतारो जी ॥ दंमवीरज राजातसो, ए बीजो नसा
से.॥ ४ ॥ सो सागरोपम व्यतिक्रम्मा, मवीरजयी जिन
शाने करावियोएं तीजो उदारो जो।। से॥ए
देवडोसनो घसी, मानाम उदारो जी । तिण सेजन
दियो, ए चोयो नदारोजी | से०॥६॥ पांचमा देवजोर,
प्रनं समकितधारों जी ॥ तिश सेठंजनो रुराविपो, ए
सद्वारो जी ॥ से० ॥ नुवनपती नो रियो, एको
सी चक्रवनि मगरतशो कियो, ए सातमो उदारो जी
अनिनंदन पामे मुप्पो, सेश्रृंजनो अधिकारी जी॥ व्यंत
विपी, ए माम्मो उदारो जी" मे ॥ मनु र
पोनरो, संसिर नाम मन्दारो जी चंपाराय कारि
मदमो मरीजी ॥ ॥१॥ शांतिनायनी मुनी।
निनायमुन मुविचारो जी ॥ पवाराप कवियों, ए
उदारो जी।से. 11|| दमग्यान जगदीपती, मुनि
वारी जी॥ श्रीरामचंद्र करात्रियों, पायामो र
॥ १२॥ पांच कर अमे पारिपा, किम वृद्धा प्रोग
करे कुंती मंजननी, जात्रा पार जायी श्री
१.१३ पांच पांगद मंघी, ग्रंजन मानी,
।
. .. (२७) स्य बिंध लेपना, ए चारमो उद्धारो जी ।। से० ॥ १५ ॥ मम्माणी पाखाणनी, प्रतिमा सुंदर सरूपो जी॥ श्रीसेव॒जनो संघ करो, थापी सकल सरूपो जी ।। से० ॥१५॥ अग्रेतर सो वरसां गया, विक्रम नृपधी जिवारो जी ।। पोरवार जाच करावियो, ए तेरमो नद्वारो जी॥१६॥on संवत वार तिमोतरे; श्रीमाली सुविचा रोजी, वाहमदे मुंहते करावियो, ए चवदमो उद्धारो जी ॥१॥ से) ॥ संवत तेरे कोतरे, देसलहर अधिकारो जी ॥ समरेसाद करावियो, ए पनरमो नद्धारो जी॥ १० ॥ से० ॥ संवत पनर स त्यासिये, चेसारख चदि शुन्न चारो जी | करमे मोसी करावियों, ए. सोलमो दारो जी॥ १५ ॥ से० ॥ संप्रति काले सोलमो, ए वरतेवेनद्वारोजीनितरकीजे वंदना,पामीजे नवपारो जी॥२०॥से। . ॥ वलि सेंचुंज महातम कहूं, सानुलो जिम ले तेम ।। सूरि धनेसर इम कदे, महावीर कह्यो एम ॥ १ ॥ जेहवो तेहवो दर्श- नी, सेर्बुजे पूजनीक || जगवंतनो नेप मानता, सान दुवे तद- तीक ॥ ३॥ श्रीसेर्बुजा ऊपरे, चैत्य करावे जेह ॥ दल परमांस समो खदे, पल्योपम सुख तेह ॥ ३॥ सेज ऊपर देहरो, नवो नीपावे कोय ॥ जीर्णोद्धार करावतां, पाप गुणो फल होय।। ५ ॥ सिर ऊपर गागर धरी, मात्र करावे नार ॥ चक्रवर्तनी स्त्री थई, शिवसुख पामें सार || ५ || फाती पूनम सेजेजे, चढने करें नप वास। नारकी सो सागर समो, करे करमनो नास ॥६॥ काती परब मोटो कह्यो, जिहां सीधा दश कोमि ब्रह्म वीं वासकह त्या, पापश्री नाखे योग ।।॥ सहस लाख श्रावक जणी, लो जन पून्य विशेष| सेंबुज साधु पमिसानता, अधिको तेहथी देखन (०६) हाल पोथी | राग सिंधूढो 'आसारी ॥रततणे पाट पाठमे, दमवीरज थयो रायो जी ॥ ततपी पर संघ कियो, सेबूंज संघवी कंदायो जी॥१॥ से नझर सनिलो, सोल मोटा श्रीकारो जी ॥ असरख्याती बसी, तेन कहुँ अधिकारो जी ॥ से० ॥ २॥ चैत्य करायो रूपा पो, सोनांनो विंब सारो जी || मूलगो विब नमारीयो, पत्रिम- सितिण बारो जी। से० ॥ ३ ॥ सेक्रुजैनी जात्रा करी, सम कियो अवतारो जी॥ दमवीरज राजातणो, एबीजो नदारों जी से।। || सो सागरोपम व्यतिक्रम्या, दमवीरजयी जिवारो ने शाने करावियो ।एं तीजो उदारो जी ॥ से ॥ ५॥ चो= देवलोकनो धणी, माहें नाम नदारोजी तिण सेजनो के वियो, ए चोथो नद्धारोजी ॥ से०॥६॥ पांचमा देवलोकनो घर्श ब्रो समकितधारो जी ॥ तिण सेयुजनो करावियो ए पांव द्वारो जी । से० ॥७॥ नुवनपती नो कियो, ए हो नद्धार जी ॥ चक्रवनि सगरतणो कियो, ए सातमो नद्धारोजी सिं०- प्रन्निनंदन पासे सुण्यो, सेक्रुजनो अधिकारो जी॥ व्यंतररंच कर वियो, ए आध्मो नद्धारो जी ॥ से ॥ ॥ चंप्रन्नु स्वामीनो पोतरो, चंदशेखर नाम मल्हारो जी ॥ यशराय करावियो । नवमो नहरो जी।से०॥ १०॥ शांतिनाथनी सुंणी देशना, शांतिनायसुत सुविचारों जी ॥ चक्रधरराय करावियो, ए दशमो उद्धारो जी । से० ॥११॥ दसरथसुत जगदीपतो, मुनिसुव्रतः। मी वारो जी॥ श्रीरामचं करावियो, ए ग्यारमो से ॥ २ ॥ पांव कहे श्रमे पापिया, किम वूट जी ॥ कहे कुती सेजतणी, जात्र कियां पाप ||१३॥ पांचे पांव संघ करी, मेज (२) स्य बिंव लेपना, ए बारमो नदारो जी । से० ॥ १५ ॥ मम्माणी पाखानी, प्रतिमा सुंदर सरूपो जी ॥ श्रीसेव॒जनो संघ करो, यापी सफल सरूपो जी ।। से० ॥१५॥ अगेतर सो वरसां गया, विक्रम नृपथी जिवारो जी ॥ पोरवार जाधम करावियो, ए तेरमो नद्वारो जी॥१६॥ से। संवत वार तिमोतरे; श्रीमाली सुविचा | रोजी, वाहमदे मुंहते करावियो, ए चवदमो नद्धारो जी॥१॥ । से: ।। संवत तेरे कोतरे, देललहर अधिकारो जी ॥ समरेसाद । करावियो, ए पनरमो उद्धारो नी ॥ १० ॥ से० ॥ संवत पनर स स्यासिये, चेसारख चदि शुन्न वारो जी। करमे मोसी कराचियो, ए.सोलमो उदारो जी॥१ए 1 से० ॥ संप्रति काले सोलमो. ए वरतेवेनद्वारोजीनितरकीजे वंदना,पामीजे नवपारो जी॥२०॥ ॥ वलि सेंधुंज महातम कई, सनिलो जिम ले तेम ।। सूरि घनेसर र इम कहे, महावीर कह्यो एम ॥१॥ जेदवो तेहवो दर्श. नी, सेव॒जे पूजनीक ( जगवंतनो नेप मानता, खान्न दुवे तह- तीक ॥२॥ श्रीसेवजा ऊपरे, चैत्य करावे जेह ॥ दलं परमाल समो खदे, पल्योपम सुख तेह ॥ ३॥ सेजेज कपर देहरो, नवो नीपावे कोय ॥ जीर्णोद्धार करावतां, पाठ गुणो फल होय ॥ ५ ॥ सिर ऊपर गांगर धरी, मात्र करावे नार । चक्रवर्तनी स्त्री थेई, शिवसुख पामे सार ॥ ५ ॥ काती पूनम सेजेजे, चढने करें उप वासे ।। नारकी सो सागर संमो, करे करमनो नास ॥ ६॥ काती परव मोटो कहो, जिहां सीधा दश कोमि ॥ ब्रह्म वी बायकह त्या, पापथी नाखे रोम ॥ सहस लाख श्रावक जन पून्य विशेष ।। सेंबुज साधु पमिलानना, अधिको (२७८) . ।।दाल पांचमी ॥ ... सेब्रुज गया पाप बूटिये, लीजे आलोयण एमो जी, जप कीजे तिहां रही, तीर्थकर कह्यो तेमो जी ॥ से० ॥ १ ॥ स सोनानी चोरी करी, ए आलोयण तासो जी ॥ चैत्रीदिन ज-चढी, एक करे उपनासो जी ॥ ० ॥२॥ वस्तुतणी : करी, एमालोयण तातो जी ॥ चैत्रीदित सैज़ चढी, एक उपवासो.जी ॥ ३॥ से०॥ कांसी पीतल तांबा रजतनी॥ कीधी जेगो जी ॥ सात दिवस पुरिमा करे, तो लूटे गिरि । जी ॥॥ से० ॥ मोती प्रवाला मूगिया, जिण चोरया नर । जी॥ आंधिल कर पूजा करे, त्रिरा टंक शुद्ध आचारो जी ॥ से. ॥धान पाणी रस चोरिया, ते बेटे सिद्धक्षेत्रो जी ॥ से तलदटी साधुने, पमिलाने सुध चित्तो जी ॥ से० ॥६॥ वस्त्रान जिणे दरया, ते चूटे इस मेलो जी ॥ आदिनाथनी पूजा करे, जयी बहू वेलो जी ॥ से० ॥ ७॥ देव गुरुनो-धन जेहरे, ते इ याये एमो जी ॥ अधिक्तो इव्य खरचे तिहां, पात्र पोमे बहू से जी।से0-10 गाय स घोमा मही, गज मृद चोरणद ली। ये ते वस्तु तीरथे, अरिहंत ध्यान प्रकारो नी ॥०॥ पुस्तक देहरा पारका, तिहां सिखे अपणो नामो जी ॥ वूटे सम्मा तप कियां, सामायक तिण गमो जी ॥ से० ॥१०॥ कुंवारी जाजमा, सधव अपव गुरुनारो जीवत नांजे तेदने करो, मासी तप सारो जो॥ ११॥ से०॥ गो विन सी पासका पदनो पातक लेदो जी प्रतिमा प्रागे प्रासोबतो, बूटे तप। तेदो जी॥१२॥से॥ मछली ॥ ॥ संप्रति काले मोलमो प, चरते नदार । मेरमा
७)
कर ए, सफल के अवतार ॥२॥ से ॥ उदरी पालता चाहिये।
'एं, सेज केरी वाट । से० ॥ पालीताणे पोहचिये ए, संघ मि'
ख्या
बहु पाट || से० ॥ २॥ लक्षित सरोवर पेखिये ए, बलि सत्ता
नी वावि ॥ तिहां विसरामो लीजिये ए, वमने चोंतरे आवि ||३||
से०॥ पालीताणे पाजमी ए, चहिये कर परजात । सेजनदियः
सीहामणी ए, दूरचकी देखंत । से० ॥धा चढिये हिंगलाजने दो।
एं; कलिकुं नमिये पास ।। बारीमांहे पैसीये ए, प्राणी अंग
उखास ॥ ७० ॥ ५॥ मरुदेवीदूं: मनोहरू ए, गज चढी मरुदेवी।
माय । शांतिनाथ जिण सोलमो ए; प्रणमीजे तसु पाय ॥ से०॥
॥६॥ वंस पोरवामे परगमो ए, सोमजी साद मलार ॥ रूपजी संघ
वी करावियो ए, चौमुख मूल उद्धार ॥ से० ॥ ७॥ चोमुख प्रतिमा
चरचिये ए, नमतीमांद जला किंवा पांचे पांव पूजिये ए, अदनुत
आदि प्रखंव ॥ ७॥ से० ॥ खरतरवसही खंतसू ए, बिंब जुदा
अनेक ॥ नेमनाथ चवरी नमूं ए, टालूं अलग नदेग ॥ से० ॥ एता
धरमवारमादि नीसरू ए, कुगति करूं अतिदूर ॥ प्रान यादिनाय
देहरे ए, करम करूं चकचूर ।। से० ॥ १०॥ मूलनायक प्रणमुं मुदा
एं, आदिनाथ नगवंत ।। देवं जुहाउँ देहरे एं, नमतीमांदे नमत
10 से॥ सेठंज ऊपर कीजिये ए, पांचे गम स्नात्र ॥ कलें
झं अगेतर सो करिये, निरंमत नीरसु गात्र | सेल
अधम आदीसर भागले ए, पुमरीक गणधार ॥रायण तस पंग
सा नमूं ए, चोमुख प्रतिमा व्यार ॥१॥ से ॥ रायण तेल
गला नमू ए, चोमुख प्रतिमा यार ॥ बीजी चूमि विं
बावली ए, घूमरीक गणधार ॥ १४ ॥ से० ॥ सूरजकुंछ नि
हालिये 'ए, प्रति जली उलकाकोल ॥ चेलणतला सिंद
शिखा ए, अंग फरसुं नजोल ॥ १५ ॥ से प्रादिपुर पा
।
(२००..
ज. नतरूं ए, सिवम— विसराम ॥ चैत्यप्रवामण पर करी ए, सी
धारित काम ॥ से० ॥ १६॥ जात्रा कर) सेजतणी ए, सफल
कियो अवतार ॥ कुसल क्षेमसुं प्रावियो ए, संघ सदू परवार ॥ से
॥ १७ ॥ सेज रास सोहामणो ए, सानलज्यो सहू कोय ।। घर
बेग, नणे नावसुं ए, तसु यात्रा फल होय ।। से० ॥ १७ ॥ संव.
त:सोल क्यासिये ए, श्रावस वदि सुखकार ॥ रास रज्यो सेजत
पो ए, नगर नागोर ममार, || से ॥ १ ॥ गिरुयो गढ खरतर
तणोः ए, श्रोजिनचंद सूरीस, प्रथम शिष्य श्रीपूजना ए, सकल
चंद सुजगीस ॥ से० ॥:२० ।। ताससीस जग जांगिये ए, सम
यसुंदर नवझाय ॥ रास रच्यो तिण रूवमो ए, सुणतां प्राणंद था
य.॥ से० ॥ २१ ॥ इति श्रीसेव॒जरास संपूर्ण ॥
॥ अथ शिखरगिरि रास लिख्यते ॥ ..
/-
-॥ वादी वीस जिनेसरू, रचस्युं रास रसाल । तीरय।
खरसमेतनी, महिमा वझी विशाल ॥१॥ मोटो तीरय महियर
प्रगट्यो शिखरसमेत ॥ कोमाकोंमी मुनिवरे, सिद्ध गए वह खेत
२॥ तीरथ शिखरसमेत ए, फरस्यां पाप पुलाय ॥ नविजन ।
टोनावसु, ज्यु.सुख संपद यायः ॥ ३॥ महिमा शिखरसमेतन
कहि न सके कवि कोय ॥ गुण अनंत नगवंतना, तिम एत
रंथ होय ॥
॥ दाल.१ ॥ चोपनी ॥
। गिरवर शिखर समो नहि. कोप, एहनी महिमा सर
जग होय ॥ वीस जिनेसर मुगले गया, मुनिजन ध्यान धर
ने, रह्यां॥ प्रथम अयोध्यानगरी नली, तिहां जिंतराष्ट्र
.
-:
(२१), भरेतर वली ॥ विजयाराणीने सुत जाण, अजितकुमर सष्टु गुण. मी खाण ॥२॥ जसु शिदिक सेवा करे, शिणी अति उच्च धरे।। तीर्थकरनी पदवी सदी, अंतर रि जिस साध्या सही ॥३॥ अनु क्रम इम जोगवतां नोग, पुन्य प्रसाद मिल्यो सहुँ जोग ॥ अवस र दे संवत्सर दान, संजम लीनो श्राप सुजाण ॥धा कर्म खपाव। पांम्यो ज्ञान, केवलदर्शन सह्यो प्रधान । विचरे पुहवीमंगलमांदि, अध्यजीव प्रतिबोधन ताहि [५] सिंहसेनादिक गाधर नया, पं चाणवे संरख्या सहु पया, एक लाख मुनिवर परिवरपा, श्रावक श्रावकणी. सहु करया ॥६॥ तीन सारख वलि तीस हजार, सापति यां जाणो सुविचार ॥ श्रावक सहस अगणुं सही, दोय साख संख्या गहगही ॥७॥ पांच लाख पेंतालीस हजार, श्रावकणी से या सुविचार ।। बहुत्तर लाख धवनो आय, फंचनवरण सरीर सुदाय ॥॥ सादीच्यारसे धनुष सरीर, मान बह्मो प्रनु गुणगं जोर ॥ गज लांउन प्रनुजीने जाग, अमृत सम जन्नु मीरी यांश गया अनुक्रम अनुजी शिखरसमेत, गिरवर पर प्राध्या निज देत सहस मुनिवरने परिवार, मासखमण अणसण कर सार ॥ १० ॥ चैत्री सुदि पूनमने दिने, मुक्ति गये प्रनु तीरथ श्णे ॥ तूचर खेच र किन्नर सुरी, इंज्ञदिकसहु नचव करी ॥११॥ याप्पो तीरय मोटो मदी, अगर महोचव कियो सही। ए तीरमनी जात्रा करे, ते नवियण अक्षयसुख वरे ॥१२॥ । ॥ श्रीसंजय जिनराज जी, गए इहां निर्वाण ) शिखरसमे त सुहामशो, प्रगट्यो तीरथ जाणं ॥१॥ 11 दाल पीनी । सुगण सनेही सामन श्रीसीमधर स्वाम ॥ ए देशी । ॥ सावत्रीनगरी जरी धन संपद बहु घोक, जैतारि नृप (२) राज करें मुखिया संघ लोक ॥ सेनाराणी मीठी वाणी गुगनी ख पण, जेदने सुते श्रीसंनव जनम्या सकल सुजाण ॥१॥ कंचनवरस सरीर मनोहर प्रनुनो जग्ग, लॅन अश्वतणो सोदे मनुनो परधा न । साउ लाख पूरबनों प्रन्नुनो आयु प्रमाण, धनुप च्यारसे उस पणै प्रन्नु देह वखाण ॥ २॥ एकसो वोय संख्याये प्रभुने गणधर होय, दोय लाख मुनि जेहनैं गुणवरता जग जोय ॥ तीन लाख अंमणी वली ऊपर सहस उत्तीस, भूमंगल विचरे प्रन्नु श्रीशनर जगदीस ॥३॥ तीन सारख वलि सहस त्रयाणुं श्रावकलोक, पट 'सख सहस उत्तीस श्रावकणी संरख्या थोक ॥ त्रिमुखयक्ष अरु रितादेवी सानिधकार, विचरंता मनु सकल संघमें जयश्कार ४|| सहस श्रमण परिवार प्रनुजी सिखरसमेत, एक मास संलेखण कीनी निजपद देत ॥ण गिरि ऊपर पायो प्रनुनी पद निराश, तीरध महिमा महियल मोटी थश्य सुजाण ॥५॥ ॥ दुहा ॥ ॥ अन्निनंदनं जिन बंदिये, पायो पद निराश || शिखरत- भेतं सोदामणो, नेटो तीर्थ सुजाण ॥१॥ ॥ दाल चीनी ॥ सहस श्रमणसं सुर संनमधरो ॥ ५ देवी । ॥ नगरी अयोध्या सुरपुरि सम नली, संघर राजा सोने मन रती ॥ सिझी राणी प्रनुतसु नंद ए, अनिनंदन जिन प्र ट्या चंद ए ॥ उहालो ।। चंद ए सोवन वरण सोदे, धनुष सा तीनसे ।। सुंदर शरीर प्रमाण युतिकरा, कपि संग्न ते नित बसे पूर्व लाख पचास प्रायु, गणघर एकसो सोल ए॥तीन साख मु। लाख आर्या, सहस त्रिसत् सोल ए, ॥१॥ चाल ||सहस प्रयाप्त दो संखपादनी, संरप्या शै सख सत्तावीसनी ॥ प्रावकण्यारी संख्य जाय ए, नाराक्ष काक्षिका गण ए॥ नमासो || ए शिसर .
. (२३) मत ऊपर मास-एक संलेषणा, इक सहस साधू,परवरया प्रनु मुक्ति पहुंचे पेपणा ॥ मही अयोध्या मेघ नरवर देवी मात तुम गला, श्रीसुमति जिनवर नए नंदन सदा होत सुमंगला ||३||चाल!! सोवन वर्ण धनुप तसु तीनसे, लंदन क्रोच सोहै सुन्नगे इस ॥ पूरब लाख पच्यासी पान ए, इकसौ गणघर गुणगण नान ए॥ उल्लालो ॥ नान ए मुनि त्रिण लाख सोहे सहस वीस प्रमणां ए, पण लक्ष तीस हजार साध्वी श्रावक दोय लक्ष जाण ए॥ संरख्या क्यासी सहस पर श्रावका .इम प्राणिये, पण लाख सोले सदस तुंबरु महाकाली मानिये ।। श्रीशिखर ऊपर सात संख्या सहस साधु सुरंग ए, कर मासको संलेखणा प्रनु मुक्ति पुदता चंग ए ॥३॥चाल॥इम कोसंबीनगरी तात ए, धरनृप तात सुसीमा मात ए, पदम प्रनु तसु अंगज नाथ ए. -णो सुन्न हाथ ए ॥ उल्लालो ॥ दाय ए धनुप.प्रमाण पूरा अढाई त.. कहो, तीन लाख पूरब पित कहावै एकसो गणधर सहो, 1. सख तीन तीस हजार साधू वीस.सहस लख च्यार ए, साधती दोय खल सहस छिहतर श्रावक संख्या.सार ए॥धा चाल ॥ पांच. लाख वलि पांच हजार ए, श्रावकण्यारी संख्या सार.ए ॥ कुसम देव श्यामादेवी कही, लालवरण तन प्रनु सोहै सही.. उल्लालो ॥ सोइए शिखरसमेत ऊपर, भाग्से त्रिण मुनिवरा ॥ कर मास.सं लेखन प्रनूनी, सेव करदे सुरवरा ॥ श्रीपदमप्रनुजी मुक्तिःपहुता,, गिर शिखर महिमा,नई, ॥ तसु.चरण पंकज वालवंदे हृदय आनं. द गहजही ॥ ५॥ .॥ दुहा ॥ -॥-श्रीसुपास जिनंदना,-पद-पंकज आराम ॥ लविजन प्रमः रसु सेक्तां, पामे वंबित काम ॥ १ ॥ संवन कमस्त
,
'(२६)
॥ दाल पोथी । श्रीसीमंधर साहिया ॥ ए चाल ।
॥ नगर वनारसी सोन्नता, राजा तात प्रतिष्ट लालरे ॥ दे
थी पृथवी मात जी, स्वस्तिक लंग्न सिष्ट लालरे ॥१॥ श्रीसुपार्य
जिनंद जी, वीस पूरय लख आयु सासरे ॥ धनुप दोयसै देहनो के
चनवरण सुदाय लालरे ||२|| श्री० ।। पचासवे गणधर कह्या,
धू त्रिण लाख होय सालरे ।। च्यार लाख तीस ऊपरे, सहस
धावियां जोय लालरे ॥३॥ श्री० ॥ सहस सतावन लदनी, श्रा
संख्या थाय लालरे ॥ च्यार लाख वली नेणवै, सइंस श्रावक
नाय लालरे ॥४] श्री० ॥ मातंगयच शांतासुर), पांवसे मुनि
वर लालरे ॥ करि अणसण मुगते गया, नाम लियां निस्तार
खरे ॥५॥ श्री० ॥ नगर चंपुर श्ण परे,राजा तात मदस सालरे
देवी माता लक्ष्मणा, सुत चंपनु वेस सासरे ॥६॥ श्रीचंशप
वैदिये, चंवरण तनु जेह लालरे ॥ लंग्न चंइतणो जलो, धनु
"दोढसे देद लालरे ॥७॥ श्रीचं० ॥ नविककमल प्रतिबोधना, से
सुर नर यह सासरे ॥ दस लाख पूरब पानखो, तेणवे गणय
दक्ष लालरे । श्रीचं० । दोय साख सहस पचाशवे, मुनि
मणी तीन लक्ष लालरे ।। असी सहस संक्षा कही, श्रावक वरि
'दोय लक्ष लालरे ॥या श्री० ॥ लाख पचास ऊपर वली, श्रा
'विका चन लक्ष धार खासरे || सहस इकाणवै ऊपर, प्रजुजी
नो परिवार लासरे ॥३०॥ श्रीचं० ॥ विजयदेव नृकुटीसुरी, 'स
इस साधु परिवार साखरे ॥ संलेखन श्क ‘मासनी, पुहता
मुक्ति मकार लालरे ॥११॥ श्री०॥
॥ दुहा॥
।। जय श्रीसुविद जिनेसरु, अगपति दीनदयाल ॥ सं
मुंगते गया, नविजनके प्रतिपाल ||१||
(२०५ ). ॥ल पांचमी ॥ श्रीविमलाचल सिरतिलो 1.ए देशी। ॥ नयर काकंदी नरपति, एम पिता सुयीव ॥ देवी रामा 'माता सुत, नए सुविध सुन्न जीव ॥ १ ॥ रजतवरण सम तनु सत, धनुप एक परिमाण ॥ दोय लाख पूरब कह्यो, अनुनो आयु 'सुजाण ॥२॥ अव्याप्ती संख्या नए, गणधर परम प्रधान ॥ स ख दो मुनि विंशति सदस, इक लख अमणी जाण ॥ ३ ॥ दोय लक्ष श्रावक करा, अरु गुणतीस हजार || एकनर चौ लख सहस, श्रावकणी सुविधार ॥ ५॥ सुरी सुतारा सुर अजित, श्रीसंघ सा निधकार ॥ सदस साधु परिवारसुं, पाए सिखर सुचार ॥ ६ ॥ मास संलेखण कर प्रनु, मुक्ति गए इद तोर ॥ तीरथ मदिमा म हियो, मगटी ज्यारु ना ॥ ७॥ महिज शीतलनाधनो, दिवस राज्यो अधिकार नदिलपुर दृढरथ पिता, मात नंदा सुखकार,।। ॥ संवन सुन्न श्रीवछनो, श्रीशीतल जिनचंद ॥ कंचनवरण नेट धनुष, मान सरीर अमंद या एक सारख पूरय कह्यो, मनुनो श्रायु प्रमाण । क्याप्ती गणधर कहा, मुनि क लाख सुजांग ॥१०॥ एक लाख चालीस सहस, श्रमणी संख्या र ॥ सदस तयासी दोय संख, श्रावक संख्या जोर ॥ ११ ॥ सहस श्रावन लक्ष चौ, श्रावकणो सुविचार ।। देवो असोफा ब्रह्म यक्ष, सहु संघ सानि धकार ॥ १२॥ तिखरसमेत सहस्त्र एक, साधूने परिवार ।। मुक्ति गए प्रनु मासकी, संवेखन कर सार ॥ १३॥ ॥हास रही ।। पनर संमति साचो राजा ॥ ९ देखी। ॥ सिंदपुरी नगरी तिहां राजा, विष्णु नरेसर तात जी के पनवरण श्रेयांत प्रनूजी, उपज्या विष्णु सुमात जी१ ॥ नमो रेनमो श्रीविनुरन राजा, समग संग्न भन्नु पायजी धनुप मसी - चरनो आयु, (२६) देहमान चौरासी, लाख वरसनो आयु जी ॥२॥ न०॥ गणए घदुत्तर सहस चोरोसी, मुनि श्रमणी तीन सक्ष जी ॥ तीन स स वसि सहस गुण्यासी, श्रावक पुण-दो लरक जी-11 ३1 न०- अमतालीस सहस वलि चौ लव, श्राविका जाणो सार जी ॥ क अमर सुरी मानवी जाणो, श्रीसंघ सानिधकार नी ॥ ४॥ न० ॥ सहस मुनीसरने परिवार, प्रन्नुजी सिखरसमेत जी ॥ मा ससंलेखण कर प्रनु पोहता, मुक्तिमदस मुख हेत जी ॥न ॥ '५ ॥ दिव कंपिलपुर तात नूपति, श्रीकृतवर्म सुमात जी :|| स्या 'मादेवी अंगज कपना, विमलनाथ जगतात जी.॥ न० ॥६॥ कर संवन सोवनकाया, साठ धनुप देदीमान जी ।। साठ सास शिप्य सतावन जान जी॥'न०n साठ सहा मुनि अम सय इक सस्व, श्रमसी श्रावक जाण जी माउसदा दोय लक्ष प्रायिका, ची लक्ष संख्या प्राण जी ॥१०॥6॥ एमुख सुरवर विदिता देवी, अनुजी शिखरसमेत जी॥ पट इजा साधू परिवारे, मुक्ति गए सुग्व देत जी न० ॥ ए | नगरी नाम अयोध्या नरवर, सिंहसेन जग सार जी । सुनसा मात तिणे सूत्र जापो, अनुजी अनंतकुमार जी ॥ न० ॥ १० ॥ संग्न पेन सो पन सम काया, धनुप पचास प्रमाण जी। तीस साल पारनी मायु, गणधर पच्चीस घांश जी ॥१०॥ ११॥ गसव सदस मुनीसर सोहे, यासठ प्रमणी हजार जी ॥ पार पास कोष श्रावक, श्रावकली इन धार जी ॥ न०॥ १२॥ यार साप जि चवद हजार ए, घंकृता देवी दोपजीपाताल यह श्री निघ, कारी:नित प्रति लोप जी न० ॥१३॥ आगरी मति परिवार, सिमरसमेत प्रयान जी ॥ मारा संसेवन कर पदता पर निरवांप जी न० ॥१४!!
}} दुहा॥ ॥ असे धर्म जिसरू, पुइता पद निर्वास ॥ सिखरसमेत रिद पर, नमो जगन्नास ॥१॥ । दाल सातमी जगतगुरु त्रिसलानंदन जी ॥ ए देशी ।। । रत्नपुरी नगरी पणी जी, नानुराम सुजाण । राणी सुव्रत मातने जी, धर्मनाथ गुणवाण ॥१॥ जगतपति धर्म जिने तर'सार ॥ पनुप पैतालीस तनु को जी, वज संग्न सुखकार २॥ ज० ॥ चोतीस गाधर मुनि कह्या जी, चौसठ सहस प्रमा या ॥ श्रमणी वासव सदसस्यू जी, श्रावक दोय सद मान ॥ ३॥ जा व्यार सहस बलि कपरां जी, चौख एक हजार ।। आवकणी संख्या कही जी, दस सह आयु विचार ||४|| ज०॥ किन्नर मुर यत्ना सुरी जी, एक सहस परिवार ॥ समेतसिखर में गते गया जी, वांदू वार इजार ५॥ ज० ॥ इथणापुर विश्वसेनना जी, अचिरा मात नदार ॥ शांति जिनेसर जनमिया जी, विन्नुवन 'जसरकारसजगतपति शांति जिनेसर सार ॥६॥मृग लाग्न सोवन समो जी, देवी धनुष चालीस ॥ भायु वरप इक लाखनो जी, तीस गणधर सीस ॥ ज०115॥ वास सहस मूनि उसै जी, इगसर अमणी दजार ॥ दोय लाख श्रावक कह्या जी, ऊपर नेक हजार ॥७॥ ज० ॥ सहस प्रमाणू श्राविका जी, तीन लाख परिवार । गरुरूपक देवीसुरी जी, श्रीसंघ सानिधकार 11 ज. ॥ ए॥ नवसै मु नि परवार स्युं जी, प्राया सिखरसमेत ॥ माससमण कर मुगति में जी, पुहता निजपद देत ॥ ज० ॥ १० ॥ श्रेसें इथयापुर लो 'जी, राजा सूर सुतात ॥ कुंथुनाथ जिन जनमियां जी, कंचन त 'नु श्रीमांत ॥ जगतपति कुंथु जिनेसर सार ॥ १२ ॥ गग संग्न तीसनो जी, अनुर देहनो मान : संहस पंच्यारावः बरस , (२००) 'मो जी, प्रायु प्रनुनो जान ॥१२ ॥ ज० पितीस गणधर दीपती जी; साठ सहस मुनि जांच से साठ सहस वली ली; मशी संरच्या मान ॥ ज०॥ १३॥ सहस गुणियासी सदनो जी, श्राव 'क संख्या होय ॥ सहस श्क्यासी तीन लाखनी नी, श्राविका सं रख्या जोय ।। ज० ॥ १५ ॥ सातसे साधू परवरचा नी, देवी व सा गंधर्वकुंघुनाथ मुगते गया जी, मास संलेखण सर्व ज०॥१५ ॥ दुहा ॥ ॥ श्रीअरिनाथ जिनंदनो, कहिस्यु अव अधिकार || श्रो ता सुणज्यो प्रेम धर, थास्यै लान्न अपार ॥ १ ॥ '..ढाल आठमी ।। देसी विछिपानी ॥ हारे लाला श्रीजिनकुशल सूरीससार देशी ॥ ॥ हारे लाला श्रीअरिनाथ जिनेसरू, तिहां नगर अयोध्या चंदरे, लाला. ॥ तात सुदर्शन मातजी, नंदादेवीना नंद रे साला ॥ १.॥ श्रीश्र० ॥ लंग्न नंद्यावर्तनो, तीस घनुप देहीनो मान रे लाला|कंचनवरण सुहामणो, आयु सहस चौरासो प्रमाण रे लाला ॥२॥श्रीअ०॥इक लाख श्रावककारे, वलि संख्या अधकी जांण लाला सहस बहुत्तर ताननी सदश्राविका संख्या आंगरे लाला। श्रीअ०॥३॥ देव देवी सानिध करे, इक सदस.. मुनि पवार रे. लाला. ॥ मुक्ति गए इस गिर प्रनु, कर मास संखेखरा सा ररे ॥ श्रीश्रण | मिथिलानगर प्रत्नावती, मात पिता,श्री कुंल. राय रे.लाला || लंग्न फलस पोतनो, वपु धनुष सोवन सम कायरे लाला J. श्रीमक्षिनाथ, जिनेसरू ॥५॥ सहस.पचा बन बर्पनी, श्रित गणधर अमाचीस रे लाला ॥ नविक कमल प्रति बोधता, जगनायक श्रीजगदीस रे लाला ॥ ॥ श्री म० ॥ चा ..सइंस मून.सरू, अंमली पचावन सहस रे लाला..|| सहस सदानी, श्रावकनी.संख्या सार रे साला ॥७॥ श्री.म०॥
(२)
श्राविका तिजर तहसनी,लदै तीन संख्या सुविचाररे लाला।। संहत
मुनि परवारस्यु, गये मुक्ति संखण धार रे.साला. श्रीमा।
जयही राजा पिता, सुवि पद्मावती मात रे वाला ॥ श्यामव
ण तनु शोलता, जे कपिलधन विख्यात रे,लाला॥श्रीमुनिसुव्रत
स्वामिजी ।। १०.धनुष वीस देहीतणो,.आयु वर तीस हजार
हे..लासा || अष्ठादश. गणधर घेया, तीस सहस मुनिसर सार रे
लाला. श्रीमु.।। ११ ॥ श्रमणी सहस पचचीसनी, संरग्या व
हुँतर हजार रे सांता के लक्ष परि श्राविका, तीन लक्ष
चास हजार रे लाला ॥ श्रीमु॥ १२ ॥ वशणयकं देवी नली,
नरदता सानिधकार रे लाला.. सहस मुनि परवारसे, गए मुक्ति
महल सुख सार रे लाला ॥ श्रीमु० ॥ १३ ॥ विजय पिता विप्रा
मातजी, सोवन सम श्रीनमिनाय रे वाला ॥ नीलकमल संगन
फ़रो, व धर्नुप पनर आयु साथ रे लाला ॥ श्रीनमिनाथ जिने
सरू॥ १.४ । दस इंकार वरसत्तणो, गणधर सित्तर परिमाण रे
खाला । वीस इकतालीस.सदस क्रम, साधु साधवी संख्या जाणा
रे. लाला श्रीन०॥ १५ ॥ इक जरख सित्तर सहसनी, तीन स
सहत वलि होय रे लाला ॥ श्रावक संख्या श्राविका, अनुक्रम
करि संख्या जोय रे लाला । श्रीन० ॥ १६ ॥ विचरंता नूममले,
आया सिखर समेत महार रे लाला ॥ नृकुटो यक्ष गंधारी सुरी,
'एक सहस मुनि परवार रे वाला ॥ १३ ॥ श्रीन ।
परमेसर, श्रीपासनी, महिमा जगत विण्यात ॥:शिखर ति
रोमणि सदसफण, जगजीवन जगतात :.:1.
दाल नवमी ॥ आदर जीव क्षमागुण भादर ।। ९ देशी ॥
॥ जयश् परम पुरुष पुरुषोत्तम, पारस पारसनाथ जी।
.
(३)
सावरिया सादिब जगनायक नाम अनेक चिगात जी
जय सिखर समेत सिरोमणि, श्रीसांवरिया पास,जीः॥, ध्यावे
सेवे.जे.नर तेहनी, पूरै गित,प्रास जी...॥ ज०॥ कासी दे
स: वणारसी नगरी, श्रीअश्वसेन नरिंद जी, वामामाता जगविख्या
ता, तेदना सुत सुखकंद जी ॥ ३ ॥ जय० ॥ पन्ना लंन नील
वरण रवि, देहि शुन्न नप. हाय, जी ॥ वायू शकतो. वरस प्रमाणे,
गणधर दस.प्रनु साथ जी ॥ ४ ॥ ज• ॥ सोख सहस मुनिवर
अरु श्रमणी, कदी प्रमतीस हजार जी ॥ नूमंगल विचरे सवि
जनकू, बोधवीजं दातार जी ॥५॥ ज०॥ चोसठ सदस लाख
क श्रावक, गुणचालीस हजार जी || तीन लाख श्रावकणी में
ख्या पार्श्वयक सुर सार जी ॥ ६॥ ज० ॥ बीत जिनेसर मुगते
पुंहता, महिमा अश्य अपार जी ॥ तिण ए तीरथ प्रगठ्यों ना
में मुक्तितणो दातार जी ॥७॥ ज० ॥ग्दरी पाने जे न
मावै, लेटे सिखर 'गिरिंद जी ॥ ते नर मनवंचित फल पावे, एक
रतनो कंद जी ॥ ॥ ज०॥वविध संघतणी कर नतिर
घपति नाम धराय जी ।। सफल करे संपद निज पांमी, जेदनो
सुजस सवाय जी ॥ ५॥ ज० ॥ परंनव सुरनर संपद पामे, जो
ना करे गहगाट जी ॥ साधर्मी वचल मुनिन्नक्ति, पूजा इञ्चय या
टं जी ॥ १० ॥ ज० ॥ दूंकर पर चरण प्रनूना, पूजो लविज
ने नाव जी ॥ ध्यान धरो जिनंवरनों मनमें, आनंद अधिक न
चाव जी ॥ ११ ॥ ज० ॥ रास रच्यो श्रोतिस्वरगिरीनो, सुणता
नवे निध. श्राय जीतिण एनविजन नाव धरीने, सुराज्यो म.
नं श्रिर लाय जी ॥१२॥ ज० ॥ खरतर गछपति मदिमाघारी,
कीरत जग विख्यात जी ॥ जय श्रीजिनसोजाग्य सूरीश्वर, अमृत
सुंगात जी ॥१३॥ ज० ॥ तासु पसायें रास रज्यो एभ
-
गये रात
(S
मृतसमुने तीत जी ॥ वालचंद निज मति अनुसारे, सोधो,विधु
भजगीत जी ॥ १४॥ ज०॥ संपत नगणोसे सितमोनर, सुदि
वैशाख सुढाल जी ॥ रास अजीमगंजमांहे कीनो, जगता मंगल.
माल जी ॥ १५ ॥ ज० ॥ इति श्रीसिखर गिरी रास संपूर्ण ।।
।। अय मुनि मालका लिख्यते ।। दाल १६
ज्ञान-प्रमुख .जिन पाययुग प्रणमू, सिवसुख दायक मनह'
उल्हास ॥ पुंमरीक श्रीगौतम आदिक, गणधर गुरु मन कमल वि.
कास ॥ १ ॥ मह सम सूधा साधु नमु नित, नावै श्रमण सुगुरू
जगवंत ॥ नाम यहण कर पाप पखालूं, परमानंद सुमति विकसं.
त ॥३॥०॥जरत महामुनि प्रथम चकोसर, बाहूबल उप
शम मार ॥.सूरयसादिक प्राव मुनिसर, पांम्यो विमलाचलन
वपार ॥ ३ ॥ ३० ॥ झपनवंस ने अनुकम हुवा, मुनिवर कोमो.
लाख असंव, श्रीसेबुजे.शिवपुर सीधा, कलमल कालक मूंकी के
ख no.॥ तगर प्रमुख निरुपम नव-चक्रवर्ति, साधु महा.
चल संजम सह ।। अचलादिक बलदेव अष्टमुनि, राम पोतर न:-
वन अबोह ॥ ५ ॥ १० ॥ श्रीप्रतिबुद्ध प्रमुख, उ वसुंदर, श्रीमति,
नाथ पूरबजय भित्र ॥ पहुंता परम भोसर शिवपुर, पाली श्रीजि-
नाग पवित्र ॥ ६॥ ७० ॥ विष्णुकुमार.लवधि निधि, सं.
दक सूरीना सीस सय पंच | कार्निकसेठ सुसाधु कीर्तिधर, श्रम
सुमोसल व्रत निरवंच ॥ ७ ॥ प्र०॥ श्रीयचंस प्रोनसु सा.
गर, प्रमुख आठ अरागार प्रधान ॥ श्रीरहनेमिः नेमजिन. बंधव,
निरमल गुरागरा रवण निधान ॥ ॥ श्री.॥ जालिमपालिने
उदयालो, पुरतसेण-वारितेन प्रजुन्न ॥ संघ अने अनिरुद्ध शपीसर,
सत्यनेमि दृढनेमि सुधन्य । ए|प्र० ॥ कुमर अनीकजसादिक..
पुट मुनि, गुणगिरुको श्रीगजसुकमाल: ॥ दंदण शपि. श्रीयावधा
.
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..
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(ए):
सुतै, सहस सीधु संजतसु कृपाल ।। १ ॥ प्र०॥
दाल बीजी रांग धन्याभी ।
॥ सहस श्रमणसुं मुक संजमधरों, पंचसयांसु सेलग मुनि
वरो | सिद्ध यया श्रीपुंगरगिरिवरों, करुणाकर प्रेराम्यां संपंदकरो।
उल्लालो ॥ संपद क्ररो समदम रिपीसर साधु सारण सोह ए,
तर प्रकासे.तिमर नासेजविकजन मन मोहए। प्रत्येकबुध प्रमुभ
नारद मुनि प्रमुख पेंताल ए, दमदंत महाकवि कुंजवारे साधु नहुँ
त्रिहुँ, कालं ए ॥ ११. || चाल ॥ रंग रिपन्नदत्त रतनत्रय मुणी, स.
मरुदेवानंदा साहुणी ॥ पांचे पांव प्रणमुं.मुनिपती, फेसपएकी
बोधक जिनमती ॥ उजालो ॥ जिनमती वाल पूत्र मेइल. भिवर
आणंद रस्कियो, अणगार कासव धर्म नास्यो सोनि ,सिवपुर में
स्कियो || कालासवेसी पूत्र यातम रथ साधक उपसमर,
मरीक महामुनीसरः प्रणमिये शुन्न संयमी.॥ २२॥.चास ;
वसकसची राफेवती, श्री अयमतो मुनियर मन रखी ॥ श्रीकर
उमद नमि निग्गया, निजर.देसे नरवर ग्रीजथा । नक्षालो !
जुवा ए सपत्नादि देखी अया यमरागिया, संजमहिर नजर
दनिश तजिन जोगे जागिया । प्रत्येकबुद्धाच्यार सिद्धा सिरा
एकण-समें, सुप्रसन्नचंद मुनिंद निरमम प्रेम प्रणामसमे ।
चाल || संत छुतकृमारसु ध्याश्ये, सोईचा मुनि चरसे सप
इये || काल दाई प्रमुख मदामुशी, संजम मुम्न जपती सापूर
॥ लाली ॥ साणी जापी जगवाणी, परमपद सुख पॉमिक
॥ श्रीसमरान सुनद सुंदर प्रसत मातमरामिया isोsalam
नीसमुद्रत,साधुमुश्त सेहरोचारित्र रिष गुणावंत गोनक गहरी
सागरो॥१४॥ चास सिरिसिवराय कपीसर बरिये, दसाय
५ नमुं उस रिप्रे.। मनिनाली : पुवं संत्रगरा, मुदा
(५३) सिवरमपी बरोनलालो। सिवरमप्णी बरोश्री करगमूकमावंत प्रसिद्धन, कोमिन्न दिन्न अनै सेवाली पनर सतक तिमोत्तर, ॥ गों तम प्रबोधत सिम्म पुहता नमुं चरण करणारा ॥ १५ ॥ चाल । गरुआ श्रीगुणसागर गाईये, प्रयवीचं प्रणम्यां सुख पाश्यै ॥ से इकुमार सदा शानिनंदिये, नमिह जरद मित्र मन प्रागंदिये ।। नहालो ।। प्राणं दिये मेतार्य मुनिवर नगतसुं समर) करी, रुप र सापुत्र चितापुत्र मृगापुत्र ही धरी ॥ श्री नाम निर्येय निर्मम धर्मचि धर्मागिरो॥ तेतलीपुत्र सुबुद्धि वोध तसु जितशत्रु मुनी सरो॥ १६॥ चाल.॥ नद्रय २ कर जगि २ जसतशो, श्रमण सु दसंण, सीस सुदामायो॥ श्रीअन्नयसुत भाइकुमार प, चित्त चतुर नर चित चमकार;ए ॥ बालो ॥ चमकार सार सुजात शपिवर, देवानिध. जत: धणी, गंगेप निरुवो गुणे गाजै सुजिन पालत हि. त धणी. श्रीधर्मघोष सुसास, धर्मरुचि, साधु श्रीजिनदेव ए ॥ श्रीकपिल कपि इरिकेशव बल मुनि, नित नमुं निरसेव ए ॥१७॥ चाल जत्ति जयघोष विजयघोपै जुन,सेव॒श्रुतधर श्रीदेवलंसुनाश्री खुकार नृपति कमलावती,राणी गुसुं प्रोदित सुलमती । नक्षा- सो सुन्नमती जेहनी जसानार्या पुत्र दोय वखाणिये, ए उहूं: ले चारु चारित्र मुगति पहुता जाणिये ॥ क्षत्रिय मुनिसर साधु. संजम धर्मरुचि महावती, नियंथनाय अनाथ वंदू समुपाल सुसं त्यती ॥१॥ चाल. कुम्मापुत्र नमुं केवल कल्पो, विषसं शीतल तिवकमला मिल्यो...धन, धन धन्यो सुरगिरी धीर-ए, वीरप्रशं. स्यो तप गुण वीर ए ॥30॥ श्रीवीर दीक्षित श्रीसुबाहुल ने दकुमार ए, श्रादिक दसे.रिप चरिय जेहना सुख विपाक उदार ए। श्रीरुद्र सुसीस खंदग कमानिधि कहिये, इण कतै, कुरुंदन सुत तीसग सरोरुह,रिप नम्यां प्रास्या फले ॥ १.६५ ।। चाल ।। अंगम . ( श) मुख रिप च्यारे पादरी, विधिसुं संजम तिदिवधू वरी ॥ भन्नेमा मुनि अन्नयंकरो, इस विदबसु प्रातन दितफरो ॥ नासो हितकरो दयाघर मेघ मुनिवर नंदिषेण माराधिप, सुना, नै सर्वानुभूति समर सिक्सुख साघिये || श्रीसिंद साधू इंदापन चरम राजरुपीसरो, श्रीसासन सुधन्न मुनिवर समक मंगलकरो॥२०॥ ल ३ ॥राग पम्पासिरी ।। वसवेरागी वर नमू, युगवर जंबूसामि ॥ प्रनय तियेना परगमो, सुजस जसोजद्र स्वामि ॥ मदामुनिसर नित नमू जी, नामे पर नवनिष्प वाधै रिद समुद ॥ महा० ॥२२॥ जग सं- तिविजय जयो, जदयाहु रुतनद्र, जग जोगीतर जागतो, मुनिः श्रीजना ॥ २३ ॥ म०॥ नद्रपाटु स्वामीतणा, प्यार शि मुंनीराप सीत परीपद जिणसह्या, मारपार मातम फाशाम ॥ २४ ॥'मामदागिरि जारिपे, प्रामुदाधि विसाल ॥ संप्रतिम पहिलोदिपी, श्रीमपवंतीमुकमाल ||म० ॥ २५ ॥ मारिनसा पसंसिपो, मानद मुनीत || अमंगु मदिमा निसो, fri रो समुनीस ॥ म० ॥ २६ ॥ पनगिरि गियर मदामनी, श्रीपण स्वामी मुनिराप मिति मुनि प्रपदरयो, नापति निरमा म. ॥ २७ ॥ वपरसेन विद्यावा, पौरक्षत गुरु पद पुन मित्र गुर गरगहो, अनु जयतका परम०॥ २०॥fire धु मदिवा नापी, श्रीवि मुविदा ।। मूत्रप्राय रतन भाषा, समायनर देव ॥ ॥ २१ ॥ पंचम का महामनी, श्री मे मूर दयाव । मुझिया सरना सहीनि rafree म पनर कर्मतमी त्रिमा सामान नान प्रोगवनी रात ! Ren ti . -- (२५) सुंदरि रायने, साहुणी चंदनवाल ..आदिक सीलवती सती, त्रिक रश सुद्ध त्रिकाल ।म० ॥ ३२ ॥ संवत सोल बत्तीस ए,.श्री विमलनाथ सुरसाल दिवा कल्याणक, दिने, गंथी श्रीमुनिमाल म०॥ ३३ ॥ रिणी पुरै रखिथामणो, श्रीशीतल जिनचंद ॥ पूरि विजय रानै सदा, संघ सकल. आणंद -॥ म01:३५ ॥ श्री. तिन सुगुरुतणें, सुपताये सुखकार || चारित्र सिंघ क्खापीये, दार जयकार || म० ॥ ३५ ॥ मनहर श्रीमनिमालका, गुणंग ज परिमलपूर ॥ कं ठचे उत्तम जिके, पामे सुख भरपूर | मoli । ३६॥ महा मुनिसर गावता, सुरतरु सफल समान ॥ अष्टम इससिद्ध घरे फले, सदार कल्याण ॥ म० ॥ ३७॥ इति मुनिमाला, का साधु वंदना संपूर्णम् ॥ 11 अथ छिन्नूं जिन स्तवन लि०॥ दोगावरतमान चौवीसी बंदू, मन सूधै नित मेव रीमा रुपन अजित संजव अभिनंदन, सुमति पदम प्रनु सेव री मा |व018 | श्रीसुपार्श्व चं प्रनु प्रामुं, सुविध शीतल श्रेयांतरी माई ।। वासपूज्य विमल अनंत धरम जिन, शांति कुंयु परसंसरी माई। व० ॥ २॥ अरिजिन मलि अने मुनिसुव्रत, नमि नेमी पास जिनंद री माई ॥ चोवीसमा श्रीवीर जिनेसर, प्रण परमा नंदरी माई ॥३०॥३॥ ॥ दाल २ मा सम सूपा साय न नित ॥ ए देशी 1. नित २ अतीत चोवीसी नमिये, जेहना नाम प्रगट ए नांश। केवलग्यानी ते निरवाणी, सागर महाजस विमल वरखाण ॥ 21, ॥ नि० ॥ सर्वानुनति श्रीधरदत्त जिनवर, दामोदर सुतजाश्रीस्वां मि ॥ मुनिसुव्रत सुमति शिवगति जिन, श्रीप्रस्ताग नेमीसर नाम ॥५॥नि० ॥ अनिल यशोधर तेम तारय, श्रीजिनेसर सुदम - .
ति सुजगीस, सिवर्कर स्पंदन-संपति नामे, बंदीजे जिनवर नौर
से ॥६॥.नि०॥...
दाल ३॥ सफल संसारनी।।
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. . जे विस्तंतिअणागए काल ए तेद चौवित प्रणामी
काल ए प्रथम माहाराज श्रेणिकतणो जीव ए. श्रीपदमनान प्रक
मीस सदीव ए॥१॥ वीरनो पितरियो नाम सुपास ए, हुती
जिन बाय सुरदेव सुप्रकास ए ॥ श्रेणिक सुत नवाइ नरिव १
तीसरो तेह सुपास जिणंद ए॥२॥ शिष्य श्रीवीरनो पोलो
साथ ए, चोथो स्वयंप्रनू, नाम आराधि. ए ॥ दृढायुप जीव सिम
तमें जाणिय, पंचम सर्वानुन ते प्रमाणिये ॥३॥ की इस नार.
• जीव कहीजिये; देवश्रुत ते गो स्वामि सलदीजिये । सं
शावक दुस्यै नदय जिन सातमो, श्रानंदनो जीव पेढांस जि
प्रारमो, ॥ ४॥ सुनंदनो जीव ते नवम पोहत जिणं; सतक श्राद
शतकीर्ति वसमो.जा ॥ देवकीजीव मुनिसुव्रत ग्यारमो, कर
कीजीव ते श्रमम जिन बारमो॥ ५ ॥ वासुदेवजीय निकषा:
जिन तेरमों, वलदेरजीव : निपुलाक चवदम नमो..पनरमो नि
मम देव सुलसा कही, रोहणीजीव चित्रगुप्त सोसम सदी ।।।
समापं जिन सतरमो पायका रेवती, यवारमो.शदासजीव संर
जिनपती । दीपायनजीव यशोधर नगणीसमो, कृपणकोजी
ते विजय जिन वीसमो॥ मल्लिकवीसमो जीव नारदलको
देव धावीसमो अंपन श्रापक नणं । तेवीमुमो अमरजीव अनं
दीरज नमो, स्वातबुबजी ते नमानीसनो ॥ ॥ पद.प्रामा
जिन जालिया, प्रवचन सारनदारथी श्रोणिया || केश पा.
: सास्त्र अनुसारथी साय करमरबहान
(ए),
॥ दाल ३॥ आमनिजी रे दीसे नहालो ए देशी ।।
विहरमान जिन पीसे वंदिय, महाविदेदविण्यात सीमंधर
युगमंघिर वाहुजी, श्रीसुबाहु सुजात ॥ वि०॥६॥ स्वयंप्रनु
शग्नानन अनंतवीरजी, सूरप्रतु तेम विशाल ॥ वजधर चंशनन
चंवाहुजी, तुजंग ईश्वर नेमि लाल ॥ वि०॥ ७ ॥ वैरसेन महा
जइ नमुं वली, देवयसा यसोरिद्ध अदीदीपमे विचरे माज ए, नाम
लियां नवनिद्ध ॥ वि०॥ 011
ल ४॥रे भीव जिन पर्म कीजिये । ए देशी ॥
सासता, इसहिज अनिधान । झपनानन चं.
शनन वारिपेण वर्द्धमान ॥ व्यार० ॥ ए || अ कोमि उप्पन्न
लाख ए सनाणू दजार || चनसे ग्यासी देहरा, निहुँ लोक मकार
॥ ज्यार: ॥ १०॥ नवसे पणवीस कोमिया, किं पन लाख ॥
सदस प्रवावीस व्यारसे, अग्यासी नाख । च्यार० ॥ ११ ॥ विनू
जिपवर नाम ए, समरघा सुखदाय।। प्रणम्यां पाप मिटेपरा, सम
कित सुद्ध थाय ।। व्यार० ।। १२॥
च्यार ती
"कलस॥
इन प्रिण चोवीसी वीस विहरमाण चल जिणवर सासता,
संयुल्या सतरैसे वाले अधिक प्राणी आसता ॥ जिन रसनचिंता
मशितणों पर प्रबल वंग्ति पूर ए, प्रहसमै विकरण शुद्ध प्रणमें
सवा जिनचं सूर ए॥२३॥ इति श्री विनूं जिन स्तवन संपूर्ण ।।
.. ॥ अथ उपदेशमाला पोसह सियाय लि॥
जग चूमामलिनूर, उसनो वीरो तिलोप सिरि तिल ॥
एगो लोगाश्च्चों, एगो चम्क तिहुप्रशस्त ॥१॥ संवचरमुसन्न जिणो,
नम्मा वदमा जियचंदो विदरिया निरसशा, जए आएन
माशेणं ॥ २ ॥ जश्ता तिलोपनादो, विसदई वहुचाई मसरिसब
(6) 'एस्स || इय जीयतकराई, एस रसमा सवसाहूर्ण ॥ ॥ ३॥न चालेनमदर महावदमाण जियचंदो ॥ उवसग सहसं वि,मेरु.जहा वायगुं जाहि ॥ ४ ॥ नदो विणीय विणन, प गणदरो समत्त सुयनाणी ॥ जाणंतो वि तमचं; विम्हिय हि सुगर सच ॥ ५॥ जं प्राणवेश राया, पयश्च तं सिरेण चंति श्य गुरुजण मुद नणिय, कयंजलिमेहि सोयचं ॥६॥ सुर गणाण इंदो, गहगणतारागणाण जह चंदो ॥ जहय पया नरिंदो, गणस्त वि गुरु तहाणंदो॥ ७ ॥ बालुति मदीपालो, पया परिदव ए स गुरु नवमा ।। जंवा पुरन कानं, विहरति मुए तदा सोधि ।।.। पमिरुवो तेहस्ति, जुगप्पदाणागमो महुरवक ॥ गन्नीरो धिश्मंतो, नवएसपरोय आयरिन || ए ॥ अपरिस्ताव सोमो, संगहसीलो अन्निग्गहमई य ॥ अविकचलो अचवलो, पर तहियन गुरू होई ॥ १० ॥ कश्यावि जिणवरिंदा, पत्ता अपरामर पदं दानं ॥ आयरिएदि पवयणं; धारिऊर, संपयं सयलं ॥ ११ ॥ अणुगम्मए नगवई, रायसुयका सहस्स वदेहि ॥ तहवि न.के माणं, परिय छ। तं तदा नूर्ण १२ ॥ दिण दिस्कियस्त दमग, अनिमुद्दा अचंदणा अजा ॥ ने पासणगइणं, सो विन अजाणं ।।१३ ॥ वरससय दिरिकयाए, अझाए अदिरिकन सा अनिगमरा बंदण नमं, 'सणेण विणएणसो पुजो ॥ १४ ॥ पुरिसप्पन्नयो, पुरिसव रदेसिन पुरिसजिये । लोएवि पदू पुरित किंपुरा लोगुत्तमे धम्मे ॥ १५॥ संवादणस्तसरणो; तश्या वाए 'रसीनियरीए ॥ कन्ना सहस्समदियं, पासी किरस्वतीयं ॥ १६ तदं वि यसोरायसिरी, नतीन ताश्या ताहिं । नयरहिए रा ताश्या, अंगवीरेण ॥ १७ ॥ महिलाणसु बहुयाण वि, इद समत्त घरसारो ॥ रायपुरिसेविं निडा, जरोवि पुरित (श जाहिं नहि ॥ १७॥ किं परजण बहुजाणा, वादि वरमप्प सस्किय सुकर्य । इदं नरहचकवट्टी, पतनचंदो यदिता ॥ १एं | वेसो वि अप्पमाणो, असंजम पएसु वट्टमास्स ॥ किं परियत्तियवेस, विसं. न मारेइ खऊतं ॥ २०॥ धम्मं रकर वेतो, संकर वेसेण दिस्किने मिश्रई ॥ नम्मग्गेण पर्मत, ररकर राया जवळ य॥ २१॥ अप्पा जाणार अप्पा, जहन्नि अप्पसरिकन धम्मो ॥ अप्पा करेइतं तह, जद अप्पसुहावई होई ॥१२॥ समय जीवो, श्राधिस्सा जेण जेए जावेण ॥ सो तमि तंमि समए, सुदासुहं बंधए कम्म। ॥ २३ ॥ धम्मो मएण हुतो, तोन वि. सीनन्द वायविद्यमित ॥ संव चरमणसीन, बाहुबली तह किलिस्संतो ॥ २४ ॥ नियगमा विंग पिप चिं, तिएण सचंदवुद्धिचरिएण || कत्तोपारनहियं, कौर गुरु अणुचएसेणं ॥ २५॥ अहो निरोवयारी, प्रविणोन गधिन:निरवशा भो। सादुजरास्त गरहिन, जरोवि वयणिकयं सदा ।। २६ ।। प्रोवा विसप्पुरिसा, सगंकुनारु बकेर बुझंति ॥ देहे खमपरिहाणी, फिर देवेदिसे कहियं ॥ २४॥ लश्ता लवसत्तम सुर, विमा वासीवि परिवति सुरा ॥ चिंनिहीत सेस, संसारे सासयं कयर ।। ॥ २८ ॥ कहतं जन्नर सुस्कं, सुचिरेण वि जस्त. उस्कमलिदियए। जं च मरणा वसाणे, नव संसाराणुबंधिं च ।। २ए । 'उवएस सद स्लेदि, बोदिऊतो न बुद्ध कोई ॥ जद बन्नदत्तराया, नदानिव मारत चेव ॥ ३॥ गयकन्न चंचलाए, अपरिबत्ताइ रायलबीए । जीवासकम्म कलिमल नरियनरातो पति अहे ।। ३.१ । वोन गावि जीवाणं, सकरा इंति पाववरिया ॥ जयवंजा सा सासा, पच्चाएसो हुलमो ते ॥ ३५ ॥ परिवतिकण दोसे, नियए सम्म च पायवेमियाए प तो फिर मिगायईए नप्पन्नं केवलं नाग ३३॥ शति पोसह. सिया , (ए) णस्त । इय जीयतकराई, एस रसमा सर्वसाणं ॥ ॥ ३॥ न झं चालेन, मद महावद्धमाण जिणचंदो । नवसग सहस वि,मेरु जहा वायगुं जाहि ॥ ४ ॥ नदो विणीय विन, . गणहरो समत्त सुयनाणी ॥ जाणतो वि तमचं, विम्हिय दिन सुगा सर्व ॥ ५ ॥ जं आगवे राया, पयानतं तिरेण चंति श्य गुरुजण मुह नणिये, कयंजलिनमेहि सोयचं ॥६॥ सुर गणारा इंदो, गदगणतारागणारा जद चंदो ॥ जदय पया नरिंदो, गणस्स वि गुरु तहाणंदो॥ ७ ॥ वालुनि मदीपालो, पया परिहवः ए स गुरु नवमा । जंचा पुरन का, विरंति मुए तदा सोवि ॥ ॥ पभिरूवो तेहस्ति, जुगप्पहाणागमो महुरवा ॥ गंजीरो विश्मंतो, नबएसपरोय प्रायरिन । ए॥ अपरिस्सा सोमो, संगहसीलो अनिग्गदमई य ॥ अविकचणो अपवलो, पर तहियन गुरू होई ॥ १०॥ कश्याधि जियवरिंदा, पता अपराम पदं दानं ।। आयरिएदि पवय, धारिऊर, संपयं सयस ॥११॥ अणुगम्मए नगई, रायसुयजा सहस्त चंदेहिं ॥ तदपि न करे। माणं, परिय घर तं तदा नूर्ण १२ ॥ विण दिरिकपस्स बमग, स मनिमुद्दा अडचंदला प्रजा ॥ ने पासणगहणं, सो पिणन सा अंजाणं ॥१३॥ वरससय दिरिकयाए, यजाए अदिक्किळ साहू ।। अनिगमश बंदण नमं, 'सणेश विएणसो पुको ॥१५॥धामी पुरिसप्पजयो, पुरिसन रदेसि पुरिसजिने । सोएवि पद पुलिस किंपुश लोगुतमे धम्मे || १५॥ संवादस्सप्तरणो. तश्या बाला रसी नयरोए। कन्ना सदस्समयिं, पासी किरकरती।" तद विय सारायतिरी, उलटतीन ताश्या तामिति झे, ताश्या अंगवरित ॥१३॥ डानश समन भरतारो स्या .
( ) हिं नचि ॥ १७ ॥ किं परजण बहुजाणा, वाहि'वरमप्प सस्कि कय॥ नरहचकवट्टी, पसन्नचंदो यदिता ॥ १0 वेसोवि पमाणो, असंजम पएस वट्टमास्स ।। किं परियनियवेस, विसं भारे खऊ ।। २० । घम्म ररकर वेसो, संका वेसेण दिस्किने अहं ॥ नम्मग्गेण पर्मत, रस्कर राया जावन य॥२१॥अप्पा पर अप्पा, जदन्नि अप्पसरिकन धम्मो । अप्पा करेइतं तह, अप्पसुहावहं होई ॥१२॥ जज समयं जीवो, आविस्सई जेण नावेण ॥ सो तमि मि समए, सुहासुहं बंधए कम्म । १३ ॥ धम्मो मएण हुँतो, तोन वि सीनन्द वायविद्यमित ॥ संव अणसीन, बाहुबली तह किलिस्तंतो ॥ २४ ॥ नियगम विंग चिं, तिएण संचंदबुद्धिचरिए । कत्तोपारत्नहियं, कोरइ गुरु वएतेणं ॥ २५ ॥ श्रद्धो निरोग्यारी, अविणो गधिन:निरवणा । साहुजणस्स गरहिन, जरोवि वयसिऊयं सदा ॥ २६ ॥ स वि.सप्पुरिसा, ससंकुनारु बकेर बुझंति ॥देदे खणपरिहाणी, र देवेहिसे कहियं ।। २8 । जस्तो सवसत्तम सुर, विमाण वि परिवति सुरा ॥ वितितं सेसें, संसारे सासयं कयर ।।. i॥ कहतं जना सुस्कं, सुचिरेण वि जस्स उस्कमलिहियए। मरणा वसाणे, नव संसाराणुबंधि च ॥ २५ ॥ नवएस सह बोदितो न बुद्ध कोई ॥ जई बंजदत्तराया, दानिय - (0) ॥ अथ राईसंथारा पोसह सिधाय || || निस्सिही निस्सिही नमो खमासमणाणं, गोयमाईणं महामुणीणं ॥ नवकार ३, करेमिन्नते ३, कहिये, अगुजाण । 'हिजा, अणुजाणद परमगुरु. गुणगणरयणे िमंसिरोरा ॥ व 'पझिपुन्ना पोरिति, राईसंथारए गमि ॥ १ ॥ अणुजाणद संघारं बाहुवंदाणेण वामपासेणं ॥ कुक्कुम पाय पसारण, अंतरं तु पमडए नूमि ॥ २ ॥ संकोश्य संमासं, नवष्टतेय काय पहिलेदा ॥ दवाई नवगं. ऊसासनिरुंनगालोयं ॥ ३ ॥ ज मे दुङ पमान, इमस्त 'देहस्सिमाश्रयणीए ॥श्रादार मुवदि देई, सवं तिविदेणं वोरिचि ॥ ४॥ पासव कसाय बंधश, कलहाजरकाण परपरीवान । प्रह रई पेसुन्नं, माया मोसं च मिछत्तं ॥ ५॥ वोसिरितु इमामु, स्कर ग्ग, संसग्ग बिग्घ नूआई। ग्गानिबंधणाई, अनारसः पावणाई ॥६॥ एगो ई नछिमे कोश, नाइमन्नस्स कस्सवि।। एवं प्रद मणसो; अप्पाण मणुसासए ॥ ७ ॥ एगो मे सासन अप्पा, न 'दसरासंजुन.सेसा मे वादिरा नावा, 'सव्वे संजोगळकणा ॥संजोग मूला जीवेण, पत्ता उस्कपरंपरा ।। तम्हा संज संबंध, सवं तिविदेश वोसिरे ॥॥ अरिहंतो मद देवो, जावई सुसादृशो गुरुयो।जिणपन्ननं तत्त, श्यसम्म मए गहियं ॥१॥ घसारि मंगलं, अरिदंता मंगलं, सिक्ष मंगलं, साडू मंगलं, केवा गन्नतो धम्मो मंगलं, चनारि लोगुत्तमाः परिदंता सोगुनमा, सि "सोगुनमा, साहू खोगुत्तमा, केवलि पन्नत्तो धम्मो सोगुनमो॥ मारिसरणं:पवकामि, मरिहते सरणं पवजामि, सिद्धे सरणं प 'पवामि, केवति पनि धम्म सरणं पकमि मनं, अरिहंता मद्य. देवया । प्ररिक्ता किनिधन पावगं ॥१॥ सिदाय मंगलं मन सिहाय मा . .- ( ३०१) देवया ॥ सिद्धा य कित्तिअनाणं, चोतिरामिति पावगं ॥ २॥ श्रा यरिया मंगलं मझ, पायरिया मझ देवया पायरिया कित्तिप्रताणं, वोतिरामिति पावगं ॥ ३॥ नवद्याया मंगलं मद्य, नवद्याया मध वया ॥ नवद्यायां कित्तिअत्ताणं, वोसिरामित्ति पावगं ॥ ५ ॥सा एणो मंगलं मय, साहूणो मद्य देवया साहूणो किनियताण, सिरामि नि पावगं ॥५॥ पुढवि दग अगणि मारुप, किके सत्त जोणि सरका॥ वणपत्तेय अपते, दस चनदस जोणि लरका। १॥विगलिंदिएसु दो दो, चतरो चतरो य नारय सुरेसु ॥ ति रिएसुति चनरो, चनदस लरका यमणुएसु॥ २॥ खामेमि सव्व जौबे, सब्बे जीवाखमंतु मे ॥ मित्नी मे सव्वनूएसु, वेरं मधं न केणधि ॥३॥ एवमई पालोइन, निदिध गरदिय गछि सम्म। तिविहेण पमिकंतो, वंदामि जिणे चनव्वीसं ॥ ४॥ खमिश्र खमा विश्न मा खमिश्र, सव्वद जीव निकाय, सिपहसाख आलोपपई, मखद वेर ननाय ॥ ५ ॥ सव्वे जीवा कम्मवसु, धनदह राज नमंतु॥ ते म सव्व खमाविया, मद्यवि तेह' खमंतु ॥ ६ ॥ इति संपारा गाथा स०॥ ॥ अथ निंदावारक सथाय॥ । निंदा म करजो. कोश्नी पारकी रे, निंदाना बोल्यो मदा पाप रे । वयर विरोध वाधे. घणो रे, निंदा करतां न गणे माय चाप रे ॥ निं० ॥ १ ॥ दूर वसंती को देखो तुम्हें रे, पगमा बलती देखो सङ कोय रे । परना. मेलमा योयां लूगमां रे, कहो केमा के जला होय रे ॥ निं०:॥ २॥ पाप संनासो सदुको आपणोरे, निदानी मूको परी टेव रे । योमे घणे, अवगुणे :सहु नरपां.रे, केहनां नसीयां चुए केदनों ने रे । नि०॥ ३ ॥ निंदा करे ते श्राये नारकी रे, तप जप कीधैं सटु जाय रे ॥ निंदा करो तो करजो (३०२) आपणी रे, जेम तुटकवारो श्राय रे, ॥ निं० || ४ || गुण प्रदजो सहुको तणों रे, जेदमां देखो एक विचार रे॥ कृष्णपरें मुख पामो रे, समयसुंदर सुखकार रे ॥निं०॥५॥ अथ सीता सिद्याय लिख्यते । ॥ जल जलती मिलती घणी रे, काली काव अपार रे।। जाण सीता ॥ जाणे केसू फूलियां रे वाल, राता खैरप्रकार रे ॥०॥ १ ॥धीज करे सीतासती से लात ॥ शीत तणे पर माग रे ॥ सु० ॥ लक्ष्मण राम खुशी थयारे लाल, निरखे राणो राण-रे ॥सु०.१.२॥ स्नान करी निरमल जलें रे लाल, पार पांसें प्राय रे।।मु०॥ कनो जाणे सुराङ्गना रे लाल, अनुपम र दिखाय.रेः ।। सु० ॥ ३ ॥ नर नारी मिलियां घणारे साल, के को दाय हाय रे ॥.सु० ॥ नस्म दुशी इण आगमेंरे लाल, को 'अन्याय रे ॥ सु० ॥ Urf] राघव बिन वांग्यो दुवे रे बाः सुपनेही नहिं कोय रे ॥.सु०॥ तो मुझ अगन प्रजालजो साल, नहिं तो पाणो होय रे ॥ सु०॥ ५ ॥ म कहि पेठी प्रार में रे लाल, तुरत अगन यो नोर रेसु ॥ जाणे इह जल जयो रे लाल, फीले धरम सुधीर रे ।। सु० ॥ ९॥ देव कुसुम 'वरपा करे रे बाल, एदसती सिरदार रे ।। मु०ः। सीता-धीजें है तरी रे लाल, साख नरे संसार रे । सु०॥ ७ ॥ रलियायत हुको ययां रे लाल, सघले थया नवरंग रे.॥ सु. लक्ष्मण राम खुशी-थया रे लाल, सीता शीला सुरंग रे गा मुं० ॥ ॥ जग जसजेदनो रे लाल, अविचल शील कहाय रे ॥ सु० ॥ हर्ष सती तो रे 'लाल, नितं प्रणमीले पाय रे ॥ ९० ॥ इति सीतासंती सिंद्यायं समाप्ता...' ।
. ॥ अथ अनाथी कृषि सियाय ॥ . ॥श्रेणिक रयवामी चढ्यो, पेखियो मुनी ए कत ॥ वर रू पकाते मोहियो, राय पूढे रे कदो विरतंत ॥ १ ॥ श्रेणिकराय हुँ रे अनाथी निथ ॥ तिणमें लीधो रे साधुजीनो पंय ॥ श्रे० ॥ ए श्रांकशी ॥ण कोसंबी नगर वसे, मुझ पिता परि गल धन्न । परवार परें परवरयो हुई तेहनो रे पुत्र रतन्न ॥ श्रे० ॥२॥ 'क दिवस मुझ वेदना, कपनी ते न खमाय ॥ मात पिता सदु जूरी रह्या; तोही परा रे समाधि न पाय ॥ ० ॥ ३ ॥ गोरमी गुण मन नरमी, नरमी अबला नार ॥ फोरमी पीमा में सही, नहिं कीधी रे मोरमी सार ॥ श्रेण ॥ ४ ॥ बहु राजवैद्य बुलाश्या, कापला कोमी उपाय ॥ बावना चंदन लेईया, पण तोही रे दाह नवि जाय । श्रे० ।।.५॥ वेदना जो मुझ नपामे, तो ले सं जमनार । इम चिंतवतां चेदन गई, व्रत सीधो रे हरप अपार ।। ॥श्रे॥ ६ ॥ जगमांद को केहनो नहिं ते भणी हुँ रे अनाथा वीतरागनो धरम बाहरो, कोई नहीं रे मुगतिनो साय ॥श्रे॥ ॥ ॥ कर जोमी राजा गुरा स्तवे, धन धन तुं अनगार ॥ श्रे शिक :समकित तिहां खदे, वांदी पहुंचे रे सरग मकार ।। श्रे०॥ G. मुनिवर अनाथी गावता, कर्मनी तूटे कोकी । गणि सनय सुंदर तेदना, पाय वांदे रे वे कर जोकी ॥०॥ए ॥ इति ।। ॥ अथ प्रतिक्रमणसिद्याय ॥ .::कर. पमिक्कमणो जावसुं, दोय धो शुन्न काण || लाल: । परनव जाता जोवनें, संबल साचं जाण ।। लाल रे ॥१॥ कर पमिक्रमणु नावY ॥.ए आकणी ॥ श्रीमुख चीर समुञ्चरे, श्रे णिकराप प्रतिबोध ॥ सा ॥ लाख खंमी सोना तणी, दीये दिन प्रति दान. ।। ला० ॥ २॥ र० ॥ लाख वरस लगु ते वली, ( ३०४) दीये इव्य अपार ॥ ला॥क सामायिकनी तुसा, नावे तेह सग सा० ॥ ३ ॥ कर० ॥ सामायिक चनक्सिको, नटुं बंदम व दोय वार ॥ लाल रे ॥ व्रत संचारो रे पापशां, ते नव कर्मा वार ।। लाल रे ।। ४ ।। कर० ॥ कर कानसग शुनध्यानथी, पर स्काण सू● विचार ।। लाल रे दोय सद्या ये ते वन), टासो टा अतिचार ।। लाल रे ॥५ ।। कर० ॥सामायिक परसादयी, सही अमर विमान ॥ ला० ॥ धरमसिंह मुनिवर कहे, मुगति तणुंप निदान । ला० ॥६॥ कर०॥ इति प्रतिक्रमणसियाय सं०॥ ॥ अथ मंगलिक सरणां लिख्यते ।। ॥ प्रहने समरिजें हो ॥ नवियण मंगतिक सरणा ॥आपदा टाले संपदा हो || न० ॥ दोलतनो दातार | हियो खिजें हो ॥ न० | १ || अरिहंत सि सापा तणी दो न केवति लांख्यो धर्म ॥ ए चारू जपतां थकां दो ॥०॥ भानु कर्म ।। दि०॥२॥ ए चार मुखकारि हो॥ ज० ॥ ए. मगलिक ॥ ए चारूं उत्तम कहां हो ॥ ॥ ए चार तहत हो । दि० ॥ ३ ॥ गेले पार्ट चालतां दोन० ॥ समरूं । वार ।। गामें नगरें चाल दो ॥ ॥ विधन निवारणहार ॥ दि० ॥ ४ ॥ माकण साकण नूतमा दो॥न०॥ सिंद वित्त वैरी हुसन चोरटा होनः ॥ रहे सदा दूर ॥ दि. ॥ ५॥ सुख शाता वरते घशी हो।न० ॥ जपाये नरनार || नव जातां जीवने दोन०॥सरणको श्राधार ॥६॥६॥ खोसरणाकी आसता दोन० ॥नेमो नदि पाय रोगावर आनंद मुख सही दो॥०॥ वासा तो संपांग ॥ दि०॥ दिन याकुं ध्यावतां होन०॥ जीव तो उदार ॥ । वस्तुनी दोन०॥ यादि जग सार। सर.॥
--- (३०५) मनाता मनोरथ फले हो ॥ जमवरते. कोम.कल्याण ॥ शुद्ध मने करी समरता हो, न०॥ निधे पद निर्वाण । हि० ॥॥ पसरणाने धावतां दो ॥ न नाम तयो आधार ॥ ए सर पाकी कीरति कही हो,ल यावो मनद मकार : हि ॥ ॥१०॥ संवत् अदारे बावने हो.॥ ल०॥ पालि सहेर सुखकार ॥ चोधमक्ष श्म वीनवे दो ॥ ल० ॥ सुनजो बाल गोपाल | हि०॥ ॥११॥ इति श्रीमांगलिक सरशां. ॥ अथ सिझाय संग्रह लिख्यते ॥ ॥ दंदण रुपीनी सझाय॥ ढंदण रुपिजीने बंदना हूं वारी, तरकष्टो अणगार रे दूवा लाल, अनियह लोधो एडवो हुँ ० । लेस्युं श्रुद्ध आहाररे। ई० १४२ ॥ ० ॥ नितपति को गोचरी, ९० ॥ न मिलै श्रुद्ध माहार रे ॥हुँदा०/मूल नलै अणसूझतो हुं०॥ पंजर कीयो गातरे हुँ 1.1.३ ॥०॥ हरि पूर्व श्रीनेमने ९०, मुनिवर सइस अढार-रे॥ हुँ, वा उत्कृष्टो कुण एहमें हुं० ॥ मुमने कहो विचार रे॥ वा० 111।।३.॥ ०.६ दंदण अधिको दाखियो ९० ।। श्रीमुख नेमजिणंद हारे दूंबा० ॥ कृष्ण कमाह्यो-वोदवा हुँ०॥ धन जादव कुलचंद-रेहूं वा.॥4॥०॥ गलियारे मुनिवर , मिख्या ९०, वांया रुपा नरेस रे डूंचा० ॥ किणदी मिथ्यात्वी देखने हुँ, आएयो जाब वि सेसरे ९०॥५॥ढं०॥ मुम,घर आवो साधनी हुँः, यो मोदक श्रुद्धरे हूं मुनिवर बिहरीने पांगुरपा ९०, आया मनुजीने पात रे हुं० ॥ ६ ॥ ० - मुझ सधै मोदक मिल्या ९०, कहोने तुम्हे है किरपाल रे ९०. ॥ अपनही बड ताहरी हूं: श्रीपति सबधि निपान रे ॥ ॥ ७ ॥ ॥ एसेवा जुगतो नदी हु०,च्याळ्या परत-
ज काजरे १० ॥ इंट निवा जायने हुँ० चूरे करम समाज
९० ॥ G.|| || प्रांशी चढती नावना ९०, पांग्यों केवल ना
हुँ० ।। दंदरा शपि मुगते गया ९०, रुहे जिनहर्प सुजारा रे हु
ए॥ ॥ इति ढंदश शपि सिझाय संपूर्ण ।
॥ अथ धन्नाशपी सिझाय।
श्रीजिनवाणी रे घना, अमिय समापी मोरा नंदन,
मनमै तो मांनी रे नंदन तारै ॥ १ ॥ तूं अतदि वैरागी रे पंत्री,
धरमनो रागी मोरा नंदन, माहरो तो मनमो रे किम परचाव
॥२॥ दस दिसी दीसे रे पन्ना, तो दिन सूनी मोरा नंदन, न
मति देतां रे जीन वदे नही ॥३॥ वतोस नारी हो पन्न,
प्रतहि पियारी मो० ॥ वाणी तो बोले रे मधुर सुहामणी ॥ !
'बालक तो कामणीरे धन्ना, क्य पिण तरुणी मोगजगति
रे चाल सुद्दावणी॥५॥ए घर मंदिर दो घना, ए सुख सज्या में
'कोम बत्तीसे धननो तूं धणी ॥६॥ए धन मांलो रे धन्ना,
पिण जाणो मो०॥नोगवि लेज्यो रे लोग सुदामलो ॥
अति दोदिलो रे घना, नहियं सुहेलो मो० ॥ सुगम नदी के रेसा
दावणो || G घरनिका दोधन्ना, गुरुतणी शिक्षा मोकिद
रे रदणी नही ते सारखी || एक वारे सुणीये हो धन्ना,
गम नणीये मो०॥ जिनवर जाणो हो उक्कर जोंग ॥
वनवाते रहणा हो धन्ना, परीसह सहलो मो० ॥ को
केसा रे खोंच करावणों ॥ ११ ॥ साचो ते नाख्यो मा
कून न दाख्यो मोरी अम्मा ।। 5कर मारग जननी दाखियो।
सुख अनिलापी अम्मा, कुंचन पाखी मोरी अम्मा॥कायर मा
जननी दाखियो॥३॥ए जंग स्वारथी हे अम्मी नहीं पर
घि मोरी अम्मा, वीर बखाण्यो परखदा सदु सुएयो ।
9-11
.
100
( ३०७ में इम जाएयो हें अम्मा, वीर वखाण्यो मोरी अम्मा, ए धन.जो वन आयुथिर नही ।।१५।। अनुमति दीजे हे अम्मा, ढोल न कीजै, -मोरी अम्मा, जो खिल जावे सु किर पाये नही ।। १६ ॥ अन; मंति पापी हो अम्मा, जीव सख पायो मोरी अम्मा, संजन सीधो. रे मनमां गदगदी ॥ १७॥ पारणे हे अम्मा, विगय निवा रण मोरी अम्मा, वीर वखाएयो सुरमर पागलै ॥ १७॥ सुख सं.. जम पाले दे अम्मा, दूपण टाले मोरी अम्मा, अंग ग्यारे अरथः रूमा नणे ॥ १९ ॥ संजम पाल्यो हे अम्मा, नव पखवा मोरी: अम्मा, मास संधारे तरबारसिद्ध लह्यो ।॥ २०॥ इति धना शषि सिझाय संपूर्ण ॥ ॥ अथ कर्मसिझाय लिख्यते ।। देव दाराव तीर्धकर गशधर, हरि हर नरवर सक्सा | करमः तणे वस सुख उख पाया, सबल हुआ महा निवला रे प्राणी, कर्म समो नदि कोई ॥ १ ॥ श्रादीसरजीने करम अटारया, वरस दिव' स रह्या नूखा । वीरने बारे वरत उरख दीधा, ऊपना ब्राह्मणी कूखै. रे प्राणी ॥ ॥ २॥ साठ सहस सुत मारया एकरा दिन, जोष जुवान नर जैसा सगर हुन मदा पूत्रनो ऽखियो, कर्मतशा फल एसा रे ।। प्रा०॥ १०॥ ३ ॥वत्रीस सदस देसारो सादिव, चकी: सनतकुमार | सोले रोग सरीरमे ऊपना, कम्र्मे कीयो तनु गर रे ॥ प्रा० ॥ ३॥ कर्म हवाल किया दरचंदने, वेची सुतारा रांगी। बारे वरस लग माथे आपयो, नीचतणे. घर पापणी | प्राकon: ॥ ५ ॥ दधिवादन राजारी. बेटी चावी - चंदनवाला चीपद ज्यूं: चदुटामें वेची, करमतशा ए बाला रे ॥प्राon०॥६॥ संजूम नामे आग्मो चक्री, कामें सायर नाख्यो.. सोले सदस जक्ष उन्ना देखे, - पण किरादी नदि राख्यो रे ।। प्रा० ॥ क० ॥ ॥ ब्रह्मदने नामे .
काजरे हूं० ।।इंट निवा हे जायने हुं० चूरे करम समाजरे
॥ G.11 दंगा प्रांणी. चढती नावना हुं०, पाभ्यो केवलं नारा रे
हुँ० ॥ ढंदश शपि मुगते गया ९०, कहे जिनदर्प 'सुजाग रे हुँ।
पाए ॥ ॥ इति दंदण ज्ञपि सिझाय संपूर्ण ॥
॥ अथ धन्नारुषी सिझाय॥
श्रीजिनवाणी रे धन्ना, अमिय समागी मोरा नंदन,
मनमै तो मांनी रे नंदन तादरै ॥ १ ॥ तूं अतदि वैरागीरे धन्ना,
धरमनो रागी मोरा नंदन, मादरो तो मममोरे किम परचांवसु
॥२॥ दस दिसी दीसे रे पन्ना, तो विन सूनी मोरा नंदन, अनु
मति देतां रे जीन वदे नही ॥ ३ ॥ बत्तोसे नारी हो पन्ना
अत्तदि पियारी मो० ॥ वाणी तो बोले रे मधुर सुदामणी ॥ 11
'वालक तो कामणीरे धन्ना, वय पिण तरुणी मो०॥गजगति चाले
रे चाल सुदावणी॥५ए घर मंदिर हो पन्ना, ए मुख सज्या मोग
को बत्तीसे धननो तूं धणी ॥६॥ए धन मांलोरे धन्ना, वय
'पिण जाणो मो०॥नोगवि लेज्यो रे लोग सुदामलो ॥ ॥ बत
प्रति दौहिलोरेधन्ना, नदिय सुहेलो मो० ॥ सुगम नदी रेसाधु क
दावतो || घरनिदादोधना, गुरुतणी शिक्षा मो०॥कहाणी
रे रदणी नदी रे सारखी || ए || क वारे सुपीये हो धन्ना, मा
गर्मजणीये मो०॥ जिनवर जांणो दो कर जोंग ॥१०॥
वनवासे रदगा दो धन्ना, परीसह सदसो मो० ॥ कोमल
केसारे खोंच करावणों ॥११॥ साचो ते नारयो अम्मा,
फूट न दारण्यो मोरी अम्मा । उक्कर मारग जननी दाखियो॥१२॥
सुख अनिलापी हेअम्मा, पूरन पाखीमोरी मम्मा|कायर मारग
जननी दाखियो॥१३॥ए जग स्वारथी. मम्मा नही परमार
नि मोरी अम्मा, वीर पंखाएयो परसदा संदु सुपो ॥ १४ ॥
( ३०७) में इम जाएयो में अम्मा, वीर वखाण्यो मोरी अम्मा, ए धन जो- वन आयु घिर नहीं ॥१५॥ अनुमति दीजे हे अम्मा, ढोल न कीज .मोरी अम्मा, जो खिल जावे सु किराये नही ॥ १६ ॥ अनम मति श्रापी हो अम्मा, जीव सख पायो मोरी अम्मा, संजन सीधी रे मनमां गदगदी ॥१७॥ ७२ पारणे हे अम्मा, विगय निवा रण मोरी अम्मा, वीर वखाएयो सुरनर अागले ॥ १७ ॥ सुख सं जम पाले दे अम्मा, दूपरा टाले मोरी अम्मा, अंग ग्यारे अरथ रुमा नणे.॥ १ए । संजम पाल्यो हे अम्मा, नव पखवामे मोरी अम्मा, मास संथारे सरबारथसिद्ध लह्यो । २० ।। इति धन्ना- शपि सिझाय संपूर्ण ॥ ॥ अथ कर्मसिझाय लिख्यते ।। देव दाराव तीर्थकर गणधर, हरि दर नरवर सवला ॥ करमः तणे वस सुख उख पाया, सवल हुमा महा निवला रे प्राणी, कर्म समो नदि कोई ॥ १ ॥ आदीसरजीने करम अटारया, वरस दिव' स रह्या नूखा । वीरने बारे वरस उख दीघा, ऊपना ब्राह्मणी कूच रे प्राणी ॥ कण || २॥ साठ सहस सुत मारया एक दिन, जोधः जुवान नर जैसा ॥सगर हुन महा पूत्रनो ऽखियो, कर्मता एसारे ॥ प्रा०॥ १० ॥ ३ ॥वत्रीस सहस देसारो साहिव, चक्री: सनतकुमार ॥.सोले रोग सरीरमे ऊपना, कम्मे कीयो तनु गर रे ॥प्रा० ॥ ३॥ कर्म हवाल. किया हरचंदने, वेची सुतारा रांशी बारे वरस लग माथे पाएयो, नीचतणे. घर पापी रे॥प्रा०क०॥ ॥ ५ ॥ दधिवादन राजारी.बेटी; चावी - चंदनवाला चौपदज्यूं चदुटामें वेची, करमतया ए बाला रे प्राolh०॥६॥ संजूम नामे आठमो चक्री, कम्में सायर नाख्यो । सोले सदस जानना देखे, पण किादी नदि राख्यो रे ॥ प्रा० ॥ ५० ॥ ७॥ ब्रह्मदन: नामे फर
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बारमो चक्री, कमें कीघों ांधो । म आशीने अंदों जावित्रार्ण
फर्म को मत बांधो रे ॥प्रा | 2010 | उपन्न कोमज
देवरो साहिब, रुप्य महाबल जाणी।। अवी मांदि मूंठ एकलको
विलं करतो पाणी रे॥प्रा०॥ क०॥ ए॥ पांमवं पांच मह
फूमारा, हारी शेपदा नारी । घारे यरस लग वन रमवझिया,
मिया नेम निस्यारी रे ॥ प्रा० ॥ ३० ॥१०॥ बीत नुजा दल
मस्तक हूंता, लखमण रावण मारयो । एकलमं जग सहु नर जीत्या,
ते. पिण कर्मसु हारयो रे ॥ प्रा०॥ क०॥ ११ ॥ लखमश राम
मदा बलवंता, अरु सतवंती सीताकर्म प्रमाणे सुख उख पाया,
चीतक बहु तत वीता रे ॥ प्रा० ॥०॥ १२॥ समकितैयारी
श्रेणिक राजा, बेटे बांध्यो मुसकै ॥ धरमी नरने कर्म धकाया ॥
करम, जोर न किसका रे प्रा०॥०॥१३॥ सतिय सिरोमणीशे
पदि कहिये जिन सम अवर न कोई। पांच पुरुपनी हर ते नारी;
पूष कर्म कमाई रे ॥ मा० ॥ क० ॥ १५ ॥ आनानगरीनो ने
स्वामी, साचो राजा चंद मां कीधो पंखी कूकमो, कमें नाम्यो
ते फंद रे। प्रा० ॥ ॥ १५॥ ईसर देव ने पारवती नारी, क
रता पुरुष कदावै ॥ अदनिस मदिल मतांशमे वासो, निकानो
जन खावे रे प्राक० ॥ १६ ॥ सहस किरण सूरज परतापी,
रात दिवस रहे अटतो, सोल कसा सतीपर जंग चाको, दिनर जाये
घटती र प्रानाक ॥१॥ईम अनेक. खंम्या नर करमें,
ग्याति पिरी सीजा शहिदप कर जोगीने विनवै, नमोर
कर्म महाराजा रे ।। मां ॥16॥ इति कर्म सिमाय संगो
॥ अथ सात विसनकी सिझाय लिख्यते ।।
सात विसनना रे संग मत करो, सुण तेदनो सुविचार किं
वेकी सात नरकनारे नाइ साते, आपैक अपार विवेंकी।
भ
. (३०ए) ॥ सा ॥ १॥ प्रथम जूवाने रे विसन, पमयाथको, पाव पां- प्रतिदं विवेकी-|| नलराजा पिणण विसने पव्यों, खोइ सहू जरि वि०सा०॥२॥ दूसरे मांस नरूण अवगुण घणा, के पर जीव संहार विवेकी ॥ महासतकनी नारी रेवती, 'नरके ग निरधार विवेकी वि०॥ सा० ॥३॥ तीजे मदिरा पान विसन तजी, चित घरी बलि चाद वि०॥ दीपायस रिपि दूहव्यो "जा के द्वारकानो थयो · दाद वि०॥ सा ॥ १ ॥ चोथे विसने दे स्याघर वसे, लोकमें न रहे खाज वि०॥ कयवन्नादिकनो गयो कायदो, कुविसने रे काज वि० ॥ सा० ॥ ५॥ पाप आहे कुविसन साचवे, प्राणी दणियें प्रदार वि०॥ मारी मगली श्रे शिक नृप गयो पहली नरक मकार, वि०॥ सा० ॥६॥ चौरीने विसने करी, जीव लदे उस्क जोर वि०॥ मुंजदेव रा जायें मारियो; चावो हुंदक चोर ॥ वि० || सा० ॥ 8 ॥ परस्त्रीय संगत कुविसन सातमें, दाणि कुजस बहु दोप वि० ॥राणों रावण सीता अपहरी, नास संकानो रे जोय वि०॥ सा० ॥ ॥ इम जाणीने नव्य तुमे आदरो, सीख सुगुरुनी रे तार वि०॥शं जव परनव प्राणंद अतिघणा, कई घमसी सुखकार ॥ वि०॥ ॥ सा० ॥ ए॥ इति सात विसनकी सिझाय संपूर्ण । ... ॥ अथ चेलणा संतीनी सिझाय लिख्यते । वीर वांदी वसतां धकां जी, चेलणा दीगो रे नियंयाराति वन मांहि कानसग रह्यो रे, साधतो मुगतितो पंथ ॥ १ ॥ वीर दखा णी राणी, चेखणाजी, सतिय सिरोमशि जांण | चेमाराजानी साते सुता जी, श्रेणिक सीयस परिमाण । वी० ॥२॥सीत रंगार संबंसो पसे जी, चेखणा प्रीतम साय् ॥ चारतियो चितमे वस्यो जी || सौमि बादर रह्यो दायं । वी० ॥ ३ ॥ 5वक नागी. . 1. .
'
(३१०)
फदे चेलणा जी, किम करतो दुस्यै तेद ।। कुसती मनमाहि एकुण
वस्यो नो॥श्रेणिक पख्यो रे संदेद ॥ वी018॥ अंतेनर परो
जालंन्यो जी, श्रेशिक वियो रे आदेस ॥ भगवंत सांसो नाजियो
जो, चमकियो चित्त तरेस ॥ वी०॥ ५ ॥ वीर वांदी वलतां या
जी, पैसतां नगर मझार ॥ धुंआनो घोर देखी करी जी, जा जा रे
अन्नयकुमार ।। वी. ॥३॥ तातनो वचन पाली करी जी, व्रत
लियो अन्नयकुमार || समयसुंदर कई चेलणा जी, पामियो भवत
पो पार ॥ वी० ॥ ७ ॥ ती चेलणा महासती सिझाय संपूर्ण ॥
॥ अथ वैराग्य सिझाय ।।
॥ नूलो मननमरा कां जमे, जमियो दिवस ते रात ।
मायारो लोनी प्राणियो, नमियो परमल जात ॥ १ ॥ ५० ॥ j
न काचो काया कारमी, जेदना करो रे जतन्न ॥ विणसतांवार लागे
नदी, निरमल राखो रे मन्न॥॥०॥ केहना गेरू केहना
वाबरू, केहना माय नै बाप || जीव जासी एकलो, साथे पुन्य
ने पाप ॥ ३ ॥ ५० ॥ प्रास्या तो मंगर जेवकी, मरवो पगला रे
देव ॥ धन संची संच कां करो, करवो देवनी वेठ ॥४॥ नू.
॥ लखपति उत्रपती सब गए, गए लाखो के लाख ॥ गरब करी
गोखै बैठता, नए जल बल राखे || ५ || नू० ॥ नवसायरजल
उख नरयो, तिरबो रे जेद ।। वीचमें बीद सबलो प्र, करमें
वाय ने.मेद ॥ ६ ॥ न० ।। नलट नही मारग चालवो, नायवो
ले रे पार ॥ आगल नदि हट वांगियो ।संबल खेज्यो रे सार
जू० मूरख कहे धन मादरो, धन केहतो इतो न पाय ||
जाय पोदवो, लखपति साकम माय ॥ ॥ नू०॥ मह
वस्त वोरीये, जे कुर आवे रे साय ॥ अपशो सान नवा
लेखो सादिष हाथ ॥ नू• ॥ ॥ इति ।
।
॥ अथ बाहूबल सिझाय.॥
n राजतणा अति लोनिया, नरत बाइबल जे रे॥
उपामी मारिवा, बाहूबल प्रतिबूझे रे ॥ १ ॥ वीरा म्हारा गज
की कतरो; ब्राह्मी सुंदरी नासै रे । झपन जिनेतर मोकली,
हूबलने पास रे ॥ वी० ॥ गज चढयां केवल न दोई.रे
ची.॥२॥ लोच करी चारित्र सियो, वलि प्रायो अनिमांनो
। लघु वांधव वांदू नही, कानसग्ग रह्यो शुन्न ध्यानो रे ॥ :
बी०॥ वरस दिवस काउसग्ग रह्यो, वेलमियां वींटागो रे ॥ पंख
माला मांमिया, सीत ताप सूकाणो रे ॥ वी० ॥ ४ ॥ साधवी
चन सुण्या इप्ता, चमक्यो चित्त महारो रे ॥ हय गय रथ में.
रिहरया, पिण नवि मूंक्यो अहंकारो रे ॥ वी०॥ ५ ॥ वैरागै मः
वालियो, मूंक्यो निज अन्निमांनो रे ॥ पांव नपामी वांदिवा, कम
नो केवलज्ञानो रे ।। वी० ॥ ६ ॥ पहुंतो केवली परखदा, वा
चल शपिराया रे || अजर अमर पदवी सही, समयसुंदर बंद
पाया रे ॥७॥ वी० ॥ इति ॥
॥ अथ अरणक मुनि सिज्ञाय ।।
॥ अरणक मुनिवर चाल्या गोचरी,तमके दामे सीसो जी।
पाय नवराणा रे वेतू परजले, तन सुकमाल मुनीसो जी ॥ अर०
१॥ मुख कमवाणो रे मालती फूल ज्यू, कन्नो गोखने देगे
जी ॥ खरे पहरे रे दीठो एकलो, मोही माननी मीगे जी ॥२
॥०॥ वयरा रंगीले रे नयरो वेथियो, शपियंन्यो तिण. वारो
जी॥ दासीने कहे जाय कतावली, न रिपि तेमी मांणो जी ॥
.३ ॥ ३० पावन कीजे झपि घर प्रांगणो, वहिरो मोदक सारो जी
। नवजोवन रस काया का दहो, सफल करो अवतारो जी।
४॥०॥ चंशवदनी रे चारित चूकव्यो, सुख दिलसे दिन रातो
इक दिन गोखे रमतो.तोग, तब दीगे निज मातो जी अरणकर करती माय किरे, गलियर मकारो जी॥ या दीगर मादरो प्ररणलो, पूढे लोक हजारो जो ॥ तर तिहाँधीरे जननीरे-पाय नमे, मनमें साज्यो :तिव विग पापी रे माहरा जीवने, एद में प्रकारंज धारयो .. ॥ अगन धुखंतीरे सिल्ला उपरै, अरणक अरास घो जी। समयसुंदर रूदे धन ते मुनिवरू, मन वंधित फल जी ।। II ० ॥ति अरणक मुनि सिझाय संपूर्णम् ॥ ॥ अथ इलापत्र सिज्ञाय लिख्यते ।। गम इलापुत्र जांलिये, धनदनसेग्नो पूतानटवी देखी रेमो जे राखे घरसूत ॥ १ ॥ करम न छूटे रे माणिया, पुरवन्दि । निज कुल उमीरे नट थयो, नाणी सरम सिगार ।। ॥ कपुर आयो रे नाचवा, चोवंत विवेक। तिहां वारे आवियो, मिलिया लोक अनेक ॥ क-1||३॥ वोय री रे पावमी, बस चढयोगजगेल ॥ निरधारा कपर नाचतौ; बनवा रखेल का ढोल बजावे रे नाटकी; गावे किन्नर पायाल' 'धूघर पाया, गाजै छांवर नाद || 'क० ॥५॥ या चितेरे जियोग्य नटनी रे साथ ॥ जो पनिट पवतो, तो नटी मुसहाय क० ॥६॥वान न प्रापै , नट जाणे नृप वात ह.धन चंदू रे. रायनो,राय त कातिमायो मुनिवर पेखियौ, धनश साधु धिग्र विषया रे जीवमा, मन आएको वैराग-क०॥ संबरनावरे केवली, ततखिश कर्म खसाय के लिमहि र करे, समय सुंदर गुण गायकए ॥ इति ॥
. ( ३१३ ). ॥ अथ मेघकुमार मुनि सिझाय लिख्यते ॥ वीरजिनंद समोसरया जी, वंदे मेघकुमार || सुरा देशन वै रागीयो जी, ए संसार असार रे मायमी॥अनुमति यो मुझ आज ।। संयम विषम अपार रे ॥ मा० || अण् ॥ १ ॥ व तूं केणे लोल व्यौ रे, श्रेणिक तात नरेस | कार को किण दूहव्यो रे, ९ नवि एं आदेश रे जाया ॥ संयम विप० ॥ किम निरवाहित नार रे जाया ॥ दूंन० ॥ २॥ आदि निगोदे हूं रुल्यो जी, सहिया उस्क अणंत । सासोश्वासें नव पूरीया जी, तेद न जाणू अंत दे ।। । मा० ॥ अ०॥३॥ दिवसा तूं बालक अ जी, जोवन नरयो कुमार || श्राप रमणि परणावियो रे, नोगवि सुरक अपार रे नाया || हूं नवि० ॥ ४ ॥ जनम मरण निरयातणो जी, उरक न सहो जाय ॥ वीरजिरांद वखाशियो जी, ते मै सुणियो कान हे मायमी ॥०॥ ५ ॥ व कांग्लीय जीमणो जी ॥ श्ररस विरस थाहार |मुंश पाला नित हीमणो जी, जागसि तुझ कुमाररे जाया।' हूं न०॥ ६ ॥ नमतां जीव अनंत नम्बो जी, धर्म उहेलो होय ॥ जरा व्यापे जोवन खिसे जी, तब किम करणो होय रे मायमा । ॥ अ॥ ७ ॥ मृगनयणी पाठे रमे जी, तो नवसर हार | जो वनन्नर ठोरू नही जी, कांश मूको निरधार कुमरजी ॥ हूं न० ॥ ॥ ॥ हंसतूलिका सेजमा जी, रूप रमणि रस लोग ॥ अतदि सुंदाली देहमी जी, किम हुय संजम जोग रे जाया ॥ हूं न० ॥ ॥ ए| स्वारथनो सडू सगो जो, अरथ पखे सहु कोय । विपन विपम महुरा कह्या जी, किम नोगविये सोय हे मायमी. अण्णा १०॥खंमिश् मान पंसाय करी जो, में दीधुं तुम उस्कादिन आदेस! जिम हुँ सुखो जी; चीर चरणे ब्युं दीरक हे ॥ मा० ॥०॥११॥ तन फाटे लोयण फरे जी, उख न सहणा जाइ || वच सुरवी दुनो..: ४०
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सुगुरु मुखै नविषण सरदही ॥ नगर प्रधान मरे जो कोश, श्राप पुदर प्रसिझाई होय ॥॥ वसतीयकी सातां घर मांदि, नर विही अहोरति प्रसिझाई ।। पुरुप पन्यो दोय मृतकअनाथ, ai असिकाय कही सो दाथ ॥ १०॥ पुत्रतगै प्रसवै दिन सात, बेटी श्राप दिवस विकात ) सो कर मांहि कही असिकाई, नारी शतु दिन तीन कदा ॥११॥ इंको फुटै प्रसवै गार, जांजर रुधिर पमै लिन गइ ।। असिझा सो कर मांदि, त्रिएड पोहर के ऊपर नह|||१२॥ श्रसादै चौमासे दिने, पमिकमणा गांधी गिरौ ॥ वार पोदर अतिकाई कही, काती चौमाले श्ण परि सही ।। १३ ॥ण पर असिमाई ने बहू, गीतारथ गुरु जाणै सहू ॥ सन्निलि ए में कही संखेवि, दरखै पय प्रनू कीजै देवि ॥ १३॥ अंतवर्ग अंतकर जेह, च्यार मावठवीजे तेह ।। सत्तम वर्ग बीअं अक्षरै, तब कवि नाम कहियो इण परै ॥ ॥ १५॥ इति प्रतिमा सिकाय संपूर्णम् ॥ ॥ अथ बावीस अभक्ष सिझाय लिख्यते ॥ जिनशासन रे सूची सरदहिया धरो, श्रीगुरुमुख रे नव तत्व ए निरता करो। मिथ्यामत रे कुमति कदायह परिहरी, सहि पालो रे ते नर समकित मन खरो ॥ १ ॥ तूटक || मन खरौ समकित शुः पालो, टालो दोष दया परो ॥ धुरि पंच अणुव्रत तोन गुरावत, च्यार सिहाव्रत धरौ ॥ इम देशविरती क्रिया निरती, सुणो नवि या मनरती॥ दाखविए गुण परंद केरा, दोप सम कादौ वली ॥ ॥ २ ॥ मम कादो रे लोनी नर कूमौ करो, जागी सावध रे अ नद बावीसे परिदरौ || वम पीपल रे पिलखण में कचुंबरो, ऊंबरफल रे रखे तुमें नक्षण करो ॥ ३ ॥ मसाला || रखे तुमें नदण करौ मांखरा, भय मधु आमिष तणो | विष हेम करदा मि परहा, दोष मूल नाटी घणो ॥ परिहरी सकार र नोजन, प्रथम उरगति वारणौ ॥ मम करौं व्यालू प्रति ।, रविनदय विन पारणो ॥ ४ ॥ अथाणो रे अनंतकाय स । ए, काचागोरस रे मांहि कठोल न जिमिये ॥ एद वेंगा तुछ फला सवि गंभ ए, आपण रे व्रत लीधो नविखं ॥ ५ ॥ तूटक ॥ नवि खंमए व्रत नियम लेश, वेफर नंगनो || अज्ञात फल बहुवीज नोजन, चलित रस दो नो || संपर प्राणी अन्नक्ष ग्यानी, तजो ए वावीस ए वयण विगते वली पूठयो, अनंतकाय बत्तीस ए || ६ । ती रे कंद जाति जाणो सदू, जसु नकण रे पातिक वोख्य बहू || कचूरौ रे दलदनीली पादं बली ॥ वजचूरण रे कंद कुंचलोफलातूटक ।। कुंवलीफली कुंबली वीज पावै,चाखें नर अविल । रतालू पिमालू थेग श्रोहर, सतावरी लसण । ॥ गाजर मूला गिलो रांगण विरदाली टुकवचुलो, पल्यंक प वाल वीली मौथ नीलो सांतलो ॥ ॥ वंसकारेलार न कवला तरुणा, अंकूरा रे सोटा ते जलपोयणा ॥ कुमारी मरवृक्षनी गलकी, जे कदिये रे लोके अमृतवेलमी ॥ ॥ त तानु ताजा खिलोमा ने खरसुश्रा, नूप इंफोमा उत्रा जाणो नीस फल सेवे जूया ॥ यत्नास योल प्रसिद्ध घोड वीरतन सूरि म कदे, परिदरे जे नर दोष जांणी प्रांगणी वि मुख सहे ॥ २० ॥ इति यावीस अन सिकाय सं०॥ ॥ अय गजलुकमाल सियाय ॥ ॥ संवेगरसमे मीलता, मनमुं करे यासोघ । देखीने दोदग तामु साध्यो रे में करि सोच ॥ १॥ यादवराय धनश् गजमुक 'हने कम्रे प्रशाम निकाल या॥ यांफी ॥ प्रन म आदरयो, नेदनो परिणाम मन वचन काया पास , ( ३१७) करी, जो हूं पा रे केवलज्ञान ॥ २ ॥ या || मुनि मुगति जा यवा अलजयो, पमपैन दिन दस वीत ॥ साहसीक श्म उच्चरतो पिण, दिन जावे रे तो ठेद दीस ।। या० ॥ ३॥ समसांग जार कानसग रह्यो, तिण सांझि प्रजुने पूछ । मुनिवर अवर श्म Eि तेवे, एहनें साची रे 7 मुंह मूळ ॥ या० ॥ ॥ मुझ सुता विन अवगुण तजी, सौमिल अगनि प्रनाल ॥ सिगमी रचि सिर ऊपरै चिहुं दिसि वांधी रे माटीनी पाल ।। या०॥ ५ ॥ वेदना जिम अ धिक वषै, तिम वयै मन परिणाम ॥ चवदमें गुणगएँ चढ्यो, मु निवर पामीरे केवलग्यांन ॥ या० ॥ ६ ॥ देवकी जामणने थई, ते रयण वरस हजार || वांदवा भावी प्रह समें, पिण नवि देखे रे माणाधार ॥ या० ॥ ७ ॥ पूतां प्रन्नु मांझी करी, रातिनी वी जग वात ॥ हरि देखी दियको फूटसी, तेरों कोयो रे शपिजीनो पात || या० ॥ ७ ॥ उपसम सुधारस सेवता, पांमियो अ.वेवलरा ज ॥ मनरंग साधु महंतना, गुण गावे रे श्रीजिनराज ||या०॥ए। ॥ अथ प्रष्णचंद्र सिद्याय ॥ || राज मी रलियामणोरे, जांणी अथिर संसार ॥ वैरागे नन वालियो, कांश लोधो संजम नार ॥ प्रप्णचंद प्रणमूं तुमारा जाय, तुमे मोटा मुनिराय ।। प्र०॥ १ ॥ वनमांदे कानसग रह्यो , पग पर पग जाय ॥ बांह बेचं नंची करी, सूरज सांमी इष्टी गाय ॥२॥प्र० ।। श्रेणिक वंदन नीसरयो रे, वीरजीने वंदन नाय ॥ दे.तीन प्रदक्षणा, त्रिविधर खमाय ॥ प्र० ॥ ३ ॥ उरमु व दृत वचन सुगी रे, कोप चदयो ततकाल | मनसु संग्राम मां यो, जोव पध्यो जंजाल ॥ प्र० ॥ ४ ॥ श्रेणिके प्रश्न पूठियो रे हनी सी गति पाय ॥नगवंत कहे हिवणां मरे तो, सातमी नर- -जाय॥4॥ ५ ॥ विण इक अंते पूठियो रे, सरवारथसिद्धि वि .
(३१) मान । वाजी देवनी उन्नी, मुनि पाम्या केवलझान ॥ प्र० ।। ॥६॥ प्रष्णचंद मुनि मुगते गया रे, श्रीमहावारना शिष्यारिदद रप कहे धन्य ते, जिप दीगरे परतत ॥ प्र०॥ ॥ इति) ॥ अथ उतपति सिद्याय ।। ॥ मतपत जोय जीव आपणी, मनमांहि विमास || गरना वासे जीवमो, वतियो नव मास ॥ ३०॥१॥ नारीतणे नानी तले, जिन वचने जोय ॥ फल तणी निम नालिका, तिम नामी है दोय ॥ १० ॥२॥ तसु तल योनि कहीजिये, वर फूल समान ॥ आवतणी मांजर जितो, तिहां मांस प्रधान ।। ३०॥ ३॥ रुधिर श्रवे तिण मांसथी, शतुकाल सदीय ॥ रुधिर शुक्र योगे करी, तिहां ऊपजे जीव ॥४॥३०॥ जे अपान पवने करी, वासित उरगंध ॥ तिण धानक तूं ऊपनो, हिब हून अंधमंध न०॥ ५ ॥ नामी वांसतणी नरियै घणी, रूघालताती लोद सलाकर्ते, जाले ततकाल|| न० ॥ ६ ॥ तिम महिलानी जोनिमें, 3 नव लख जीव ॥ पुरुष प्रसंगे ते सहू, मरि जाय सदीव ॥ ७॥पजे नर नारी मियां, पांचंही जेह || तेहतणी संख्या नही, तजो कारज एह ।। ३० ।। ।। नव लख जोव टिके तिहां, उलटी वार || जीव ज घन्यपणे टिके, एक दोय त्रि च्यार ॥ ० ॥ एजीव जघन्य तिहां रदे, महुरत परिमाण || धार बरसनी थिति निदां, नकरी जाण ॥ १० ॥ ३० ॥ तिहां गरने को जीवमो, जप नग दीस ॥ फिर नर पावंतो रदै, संवत्सर चोवीस ॥ ११ ॥३०॥ महिला वरस पिचावनें, कहिये नीरवीज ॥ पिचहत्तर बरसी पर, या पुरुष अबीज ॥ १२॥ १० ॥ जीमणी कूनि नर बसे, तिम वामे नारि ॥ बीच नपुंसक जांगिये, जिनवचन विचार । १३ ॥ ३० ॥ दिव सामान्यपणे हां, पायो गरनावास | सात , - दिना नपरि रहे, नर गत नव मास ॥ ३० ॥१४॥ पाठ व रस तिर्यंच रहे, उत्कृष्ट काल || गरमावासै नोगव्या, श्म बहु जंजाल ॥ ३० ॥१५॥ कार्मण काये कर लियो, पहिलो आहार ।। शुक्र अने स्रोणिततणो, नही कूछ लिगार ॥ नए ॥ १६ ॥ पर- जापत पूरी नही, तिहां विसवावीस ॥ तिण श्रादारै तूं थयो, उदा रिक मीस ॥ १०॥ १७ ॥ पवन अ नदरै तिको, उपजाये अंग ॥ अगनि करै थिर तेहने, जस सरस सुरङ्ग ॥ १७ ॥ १० ॥ कठन पणै एयवी रचे, अवगाह अकास ॥ पांचभूत सरीरमें, श्म करै प्र कास ॥ १५ ॥ ३० ॥ बारै महुरत तां पढ़, विलसै नर नारि ॥ पर नतणी नतपति तिहां, नहीं अवर प्रकार ॥ २०॥ न० ॥ कलल हु वै दिन सातमें, अरवुद दिन सात ॥ अवुदयो पेसी वधै, धन मांस कहात ॥ २१ ॥ ३० ॥ मांसतणी बोटी हुवै, धमतालीस टॉक ॥ प्रथम मास जिनवर कहे, मन धरो निसंक ॥ ५५ ॥ ३० ॥ तु घिर मास बीजे हुवै, हिच तीजे मात ॥ करमतणे वप्ति कपजै, मा- ता मन पास ॥ २३ ॥ ३० ॥ चौथै मासै मातना, प्रणमै ग॥ हाथ अने पग पांचौ, तिम सुतको संग ॥ २२॥10॥पि न रुधिर के पमै, सातमें इस संच ।। नव धमणी नस सातसै, पे सी सय पंच ॥ २५॥ १० ॥ रोमराय पिण सातमें, सादीतीन कोकि ।। कपजे कण केतले, इमागम जोकि ॥ २६ ॥ १० ॥ प्रारमें मा सें नोपनो, म सकल सरीर ।। उधै सिर वेदन सहे, जपे जिन वीर ।। ॥ १७॥ ३० ॥ सोणित शुक्र सलेपमा, लघु ने वमनीत || वात पित्त कफ गरनश्री, थायै नर नीत ॥ २८ ॥ 30||मात तणी सूटि लगे, वासकनो नाला रस आहार करे तिहां,श्रावे ततकाल ni०॥२॥जननी ल्ये श्रादारते, जाय नामोनाम ॥रोमशीनख वख वधे, तिम मीजी ने हाथ ॥30॥ ३० ॥ सब अंगे मत सदुध -- ऊपने आ ( ३३० ) स, सरचंग आहार ।। कघत आहार को नदी, गरने सुविचार ।। । न० ॥ ३१ ॥ मास धीजे किण जीवने, पाये ज्ञान विनं ग || अथवा अवधि कहीजिये, तिण ज्ञान प्रसंग ।।३० ॥ ३२ ॥ कटक करे वैक्रियपणे, मूमी नरके जाय ॥ को जिनवचन सुणी करी, मरी सुर पिण थाय ॥ ३० ॥ ३३ ॥ कंथै मुख गोमा हिये, सहितो बहु पीक ॥ दृष्ट धागलि वेहुं हाथसुं, रहे मुखी नीच ॥ ३० ॥ ३५ ॥ नर विण वस्त्र जलादिक, धांन ॥ अथवा विडं नारी मियां, कह्यो गरनविधान ॥ न०॥ ॥ ३५ ॥ को उत्तम विंतवै, देखी उखावात ॥ पुन्य करी तिम नीकलूं,ना गरनावास ॥१०॥ ३६ ॥ ऊंट कोमि चांपे सुई, कोर समकाल || तिपथी गरनै अठ गुणो, सहे वेदन वाल ॥30॥ ॥ ३७॥ माता दूखी दुखीयो, सुखणी सुख थाय ॥ माता सूती ते सुवै, परवत दिन जाय ॥ ३० ॥ ३७॥ गरनयकी उस लस गुणो, जांमें जिण वार ॥ जन्म थयां ऽख वीसरे, धिग मोद वि कार ॥ ३० ॥३णा ऊपज्यो अशुचिपणे जिहां, मल मूत्र कलेसः ।। पिंक अशुचि कर पूरियो, किहां शुचि लवलेस ॥ ३०॥ ५० ॥ तु रत रुदन करतो थको, जामें जिण वार ॥ मात पयोधर मुख ग्वै, पीयै दूध तिवार ॥ १०॥ १ ॥ दिन दीसे दोपतो, करै रंग अपा रंगलाम कोम माता पिता, पुरै सुविचार ॥ १० ॥ ५५ ॥ श्रोत्र ग्यारे नारिन, नव नरने जाण ॥ रात दिवस वहिता रहै, तो चतुर सुजाण || ४३ ॥ ३० ॥ सात धातु साते त्वचा, वे सातसैना मानवसे नामी पिममें, तिम तीनसे हार || ४ ||50 ॥ संधि एफसो साव , सतोत्तर सो सम ॥ तीन दोप पेती पांचसै; को है चरम ॥ ३० ॥ ४५ ॥ रुधिर सेर दस देहमें, पेसाय ॥सेर पांच चरवी तिहां, दोय सेर पुरीष ।। न० ॥ , ॥४६॥3॥ पित्त टांक चौसठ ठे, वीरज बत्तीस ॥ टांक बत्ती स सलेखमां, जाणै जगदीस || ७ ॥ १० ॥ण परिमाणयकी यदा, उगे अधिको थाय || व्यापै रोग सरीरमें, नवि वाजे काय॥ ॥ ४० ॥ ३० ॥ पोख्यो पहिले दाहके, इम वधियो अंग ॥ खान पान नूपण नला, करे नवनवा अंग ।। धर ॥ न० ॥ दिव बीजै दसके लण्यो, विद्या विविध प्रकार || तीजे दसकै तेहने, जाग्यो काम विकार |॥ ५० ॥ १० ॥ जिण श्रोनक तूं ऊपनो, तिलमें मन जाय ॥ चोथे दसके धनतणो, करे कोम ऊपाय ।। ५१ ॥ न० ॥ पहुंतो इसके पांचमें, मनमें ससनेह ॥ बेटा बेटी पोतरा, परणाचे तेह ॥ ५५ ॥३०॥ दसके प्राणियो, बले परवत थाय । जरा प्राश् जोवन गयो, तृप्या तोही न जाय ॥ ५३ ॥ न० ॥ श्रावै दसके सातमें, हिव प्राणी तेह ॥ बल नागो बूढो थयो, नारी न धरे सनेह ।। ५७ ॥ १० ॥ आतमें दसके मोसलो, खुलिया सई दांत ॥ कर कंपावै सिर धुणे, करे फोगट वात ।। ॥ ५५ ॥ १० ॥ नवमें दसके प्राणियो, तन सूकत जाय ।। साले वचन बहुप्रांतपो, दिन मुरता जाय ॥ ५६ ॥ ३० ॥ खाटपन्यो खू करे, सहू गाली देह ॥ हाल हुकम हाले नही, दीयो परिजन वेद ।। ५७ ॥ १० ॥ आंख गले वे पुरु मिले, पमै मुंद लाल ।। बेटा बेटी ने वहू, न करे सार संजाल ॥ ५ ॥ ३०॥ दस दृष्टा ते दोहिलो, लह्यो नरनव सार ॥ श्रीजिन धरम समाचरो, पामो जिम न पार ॥ पए ॥ न || चरणपणे जे तप तपे, पाले निर मल सील ॥ ते संसार तरी करी, लदे अविचल लील ॥ ६० ॥ ३०॥ कोमि रतन कवझो सटे, कांगमे रे गिवार | धरम पर विण जीवन, नहि कोश् प्राधार ।। ६१ ॥ १०॥ काया मापा कारमी, कारमो परिवार ।। तन धन जोवन कारमो, साचो परम धर (३२२) संन्नार || ६२ ॥३०॥ चदै राज प्रमाण ए. लोक महंत ।। जनम भरण कर फरसियो, ते यार अणंत ॥ ६३ ॥ ३० ॥ श्राप सवारणिया सहु, नही केहनो कोय || विण स्वारथ अणपहुंचते, सुत पिण वैरी होय ॥ ६५ ॥ ३० ॥ जरां न यावे जां लगे, जां लग सबल सरीर, धरम करो जीव तां लगे, होय साहसधीर ।। ।। ६५ ॥ ३० ॥ प्रारज देस लह्यो दिवे, साधो गुरु संयोग ।। अंगथकी पालस तजो, करो सुरुत संयोग ॥ ६६ ॥ न० श्रीनमि रायतणी परै, चेतो चितमांदि ॥ स्वारथना सहु को सगा, कोश किणरो नाहि ॥ ६७ ॥ ३० ॥ लोग संयोग तजी सहू, श्रया जे अगार ।। धनए तसु माता पिता, पनर अवतार ॥ ६॥ न० ॥ सुरतरु सुरमणि सारखो, सेवो जिनधरम || जिपथी सुख संपत्ति, वधे, कीजै तेहिज कर्म ॥ ६ए । न० || तंऽलबेयाली अछे, एह नो.अधिकार || तिणथी करनें कह्यो, नही जूट लिगार ॥30॥ न०॥ कलस || इह जैनधर्म विचार सांजलि लिये संजमन्नार ए; परि सिंह केरा सदा पालै नेम निरतीचार ए॥ संसारनाः सुख सकल लोगवि ते सहे नव पार ए, श्रीजिनदर्प सुसीस रंगै श्म कहै श्रीसार ए॥ ७१ ॥ ३० ॥ इति नतपति इकहत्तरी संपूर्ण ॥ ॥ अथ आत्मनिंद्या लिख्यते ।। हे प्रात्मा !हे चेतन! ए कुदृष्टियां, यह कुश्रद्धाया, यद अकार्यमें प्रवृत्ति, यह रसगृद्धीपणो, यह खोटे दृष्टांत, सामायक दोय धमी मात्र कालमें तूं मत चितवन कर, क्यारे तूं सम्यक्तमोहनीमें, कन्नो तूं मिश्रमोहनीमें, कन्नी तूं कामरागमें, कन्नी तो स्ले हरागमें, क्यारे तूं दृष्टिरागमें, कली तूं कुगुरुमें, कनी तूं कु देवमें, कनी तुं कुधर्ममें, कन्नी ज्ञान विराधनामें, कन्नी दर्शन 'विरोधनामें, केनी चारित्रविराधनामें, कन्नी मनोदममें, कन्नी व . - चनममें, कन्नी कायदममें, कंनी हास्यमें, कनी रंतिमें, कली अरतिमें, कली लयमें, कन्नी सोकमें, कन्नी गंगमें, कन्नो अध्यक्षस्थाम, कन्नी नीललेस्वामें, कन्नी कापोतलेस्या, केली तुं हदिगारबमें, कन्नी तुरंसगारव, कन्नी तुसातागारवमें, कन्नी तुं मां संख्यमें, कंनी तूं नियाणासख्यमें, कनी तूं मिथ्यादर्शनसंल्पमें, नी तेरे तेरेकाव्यिा प्राय फिरता है, कन्नी तेरे बाहिर कर अं "रे पापस्थानक आय फिरता है, रे तूं प्रात्मा महा उष्टो, महा राचारी, अरे तूं हीनतिथिका जाया, अरे तूं हीरापुनिया, अरे तुं गणदृष्टी, अरे तूं प्रयोझ कामका करणहार, रे तूं उष्ट पापिष्ट जीव, ये तो तेरे अनंतांनुवंधियाक्रोध, अनंतानुवंधियामांन, अनंतानु घिणीमाया, अनंतानुबंधीलोनरी चोकमो, विचारा तेरे स्वपी ही, गुणगणा तेरा पलटा नदी, धैर्यगुण तेरे प्राया नही, तृष्णा द तेरे मिटी नही, याकुल व्याकुलता तेरे मिटी नही, दरियाव सा कल्लोल तेरे नगल रहा है, तें जो धर्मक्रिया करता हे सो शून्य नसे करता है, धीरजगुणसें करेगा सो लेखे लगेगा, सने मनसे । जो किया सो राख पर वीपणे जेसा है, अरे चेतन ! सोगन ही वे सो पापी, नर लेकर नांगे सो महापापी, ते अनंतकाय, नक, शीलवत; जरदा, नांग, अमल, तमाखू, आदिकरा सोगन हर खोटा किया, तेरा कहां चूटकवारा होगा, रे चेतन ! तें पुजलरे स्ते कितनी आकुल व्याकुलता कर रहा है, मेरे पारस पत्थर, 'नवनिधान, मेरे रसपा, मेरे रसायण, मेरे चित्रावेल, मेरे अ. गुटको, वा देवताकू वसं करूं, बादस्याद दो लान, राजा हो नं, प्रधान दाकम सेनापती दो जावं, किसी तरे धन उपार्जन , ये बाते तेरे हमेसा ऊपजै, दप्तमे गुणगोवाले केही लोनका ग नहीं, तो तेरी गरंज तो फैसे सरें, हे तन ! तूं मनमें विचारतो 1 ।
( ३२५) मेरा घर मेरा पिता मेरी माता मेरा पुत्र मेरा कलत्र मेरा पुः स, अरे चेतन ! चोरासी फिरते चौरासी लाख घर करता फिरा संसारमें न किसीका तुं दे, नदि कोई तेरा दे, रे चेतन ! तेरा नत्पत्ति तो देख, केश बखत मापणे, के वखत पूत्र पणे, केइ वखत पुत्रीपणें, किसी वखत स्त्रीपरों, जेसें उगकी बेटी में अपणी मांसे पूग-माताजी में जो पाप करती, सो कोण नो गेगा? मा बोली-बेटो, करेगा सोनोगेगा, तबतो नसने कहा धिक् दे इस स्वारथियें संसारकू, कोई किसीका नही, यह मनुष्यजन्म, 'पार्यदेस, आर्यकुल, श्रावकके घर जन्म पाया, श्रीजिनेश्वरदेवका धर्म पुन्यानुबंधी पुन्यसे पाया, नर पायकरके तेने ब्राह्मण जेसे क नए• नमाणे चिंतामणिरत्न फेंककर खोया, तेसें तें चिंतामणि रल जेसा सत्य सनातन धर्म जैनका पायकर मंदबुद्धि क्रिया प्रा- अंबरी 'कुगुरुनके उपदेससे चिंतामणिरत्न जेसा शुद्ध जैनधर्म झिाप्रमाण जो था सो तेने खो दिया, अब तेरा निस्तारा केसें होय, विष्टामें रुमिपणे ते अनंती वार पेदा जया, मानरूपी गज 'पर बाहूबल चदा र संज्वलनमान था, जर बाह्मी सुंदरी बहिना जैसी समकारोवाली थी जब समकै, नर तेरे सो एसा मान, अरे चेतन तेरा कोन हवाल होगा, देख तूं नरतमाहाराजा जिलोके 'केसीक राजशद्धि सो केसीकन्नावनानावता, धि:कार राज्यनें, घिः कार पाटक, धिःकार चक्रवर्तिपदवीकू, धिःकार मेरे विषयसुखोकं धन्यं श्रीतार्थकर माहाराजका सो देसविरती धर्म पालते है, धन्य जो सर्वविरती धर्म पालते हैं. धन्य जो दांन देते दे, घन्न जो सील. पालते दें, धन्य जो तपस्या करते हैं, धन्य जो नावना नाते हैं, एसें नावना लावतें जरतादिकः केवलज्ञान केवल दर्शन पाया, इस तरें रे जीव तूं ननो ही वरावरी मतकर, वहतो तेसठ .
, - ( ३२५) 'सलाका पुरुप चौथै आरेका जीव ते पंचम कालका जरतक्षेत्र- का कीमा ननोके देखते तूं किस गिणतीमें, कर्म अजीववस्तु तें जी- ववस्तु, जीवसें जीवतो दमेसां परिचय करे लेकिन अजीवसे क्यों करै, कर्म सवलत निर्बल, रे चेतन कर्म तो चौदेपूर्वधारीयोकों गि राया; ग्यारमें गुसगरोका. जीव नुवनन्नानु केवलीजी, कमलप्र "नाचार्यजी, महाविदेहके मनुष्योकू भिगाय दिया तो तेरी तो विसायतही क्या, पाव करम अभवनही प्ररुती हे प्रनु केसे जोता जाय, मोदकर्म पीछे लगा सो केसे जीता जाय, हे चेतन चारित्र. की फोजमें रह सद्बोध मोदतेकी प्राज्ञामें रह सदागमसुं परि- चय रख, संतोपगुण धार, तृष्णारूप दाहळू पीठी मार, जेसेंतें तिर जाय, धन हे साधु मुनिराज पांचे सुमते सुमता, तीने गुप्तें गुप्ता, उकायका पीयर, सात महानयका टालसदार, आठ मदका ज.प. क, नवविध ब्रह्मचर्यको वामका रखणेवाला, दसविध जतीधर्मका नजवालक, ग्यारे अंगका नगणेवाला, बारे नपांगका जरासेवाला, कुरकीसंबल मसि, मलिनगात्र, चारित्र पात्र, धन्य हे वद मुने प्रकी आज्ञा मुजब धर्म पालै, रे चेतन तुम कब नदै आवेगा, रे चेतन तेरे उदय कहां श्राचे, तेरे संसाररी बहुलताइ, धन्य देसत्र- ती पाले जिके प्रन्नुजीकी आज्ञा पाले, जिके प्रलात नठ सामायक करे, पमिकमणो करे, देवदर्शन करे, प्रनुजीकी द्वादसांगी वाणी सुणे, देववंदन, देवपूजन, गुरुवंदन, दान, तपस्या, सील, पर्वतिथी पोसा, संध्याकू देवसी परिकमसा जिनाझा प्रमाणे पळावश्यक कर, मुफेनी कन्नी नदय आयगा, रे चेतन ! तूं बुरे कर्म करता दे बुरा दवाल होगा, चुरे परणांमोसे चुरीही गती नदय आयगी, सा- मायक मनसुदै करो, निंदा विकया मद परिहरो, पढण गुलना वां चनेकी खप कगे, जेसे नवसायर लीला तरो, सामायकवंत के यह . . ।
. . (३२६) सकण है, नर तेरी सामायक तो निंदा विकथारूप दे, तु पढएं गुणनेकी लगन नही, तेनें तो श्रुतझानका विनय बहुमान नई किया, जो श्रुतज्ञानकी नक्ति करते हे मनोकों ज्ञान दर्शन प्राप्ति होती है. केवलज्ञान नर केवलदर्शन पाता है वोही जीव मुक्तिरूप स्वीका जार होता दे. दिवस प्रते दें कोई सुजारा सोना खंझी लक प्रमाण, उसके पुन्य होय जेतलो, सामायक कीधा तेतलो ॥१॥ किन् तूं इस नरोसे मत नूल, यह तेरी सामायक वो नही, वद सामायक आणंद कामदेव संख पुष्कली श्रादि मत्तम पुरुषोंकी, चंज्ञवतंसकराजाकी, तेरी सामायक तो एसी हे काम काज घरका चिंतवै, निंदा विकथा कर खिज रदै, भारत रौश्ध्यांन मन धरै, तुं सामायक निष्फल करै ॥ १ ॥ सामायकके लक्षण एसे हे अपणा पराया सरपा गिणे, कंचन पत्यर समवम धरै, साचो प्रोमो आगम नणे, ते सामायक शुद्ध करै ॥ १ ॥ रे चेतन ते परायाधुरा चाहता, अपणा जला चाहता, वो पराया बुरा या नही चाह्या वो तेनें अपणे श्रात्माकाही बुरा चाहा, अरे चेतन तें कंचनकी चाह रस्के, पत्थरकू दूर करै, अाखिर एक दिन यही पत्थर तेरे गती पर धरा जायगा, रे चेतन तूं मृपावाद बोल रदा हे, तूं अपणे आत्माका गुण विचारे तो अवेदी हे, अफरसी है; श्रघाती है; अलेसी दे, अविनासी हे, ते दिलमें विचारता हे यह मेरा सऊन,, यह मेरा उस्मन है, कोण तेरा सज्जन नर कोण तेरा स्मन हे, पाठ कर्मरूपिया सत्र दे जिनोंकों तूं ज्ञानरूपिये इंधनसूं बाल नस्म कर जिस्से तेर) गरज -सरे, अहोहो में नव्य हूं अन्नव्यहूं अथवा उरनव्यहूं, मेरे संसार पोते बहोत दिखता हे, प्रायेतो में अन्नव्यही दिखत्ताहूँ पीठे तो ज्ञानीयोने नाय देखा सो सही, हे रे ना तें तो एसी सामायक करता है, खणे खाज़ मोमे .
-- . ( ३२७) करमका, उंघतसा लेवे सरमका, तेरी सामायक तो ज्ञानी सि. कारेगा जब लेखे लगेगा, उहा-आत्मनिया पापणी, ज्ञानसार मु. नि कीन; जो प्रात्मनिंद्या करे, सो नर सुगुण प्रवीण ॥१॥ इति प्रात्मनिंद्या संपूर्ण । ॥ अथ श्राद्धदिनकृत्य तथा देववंदनभाष्यादिकसें मंदिर जाणेकी पूजन दव्य भावसे करणेकी-विधि श्रीमहा- निसीय सूत्रकी आज्ञा मुजब लिखते हे ॥ महाकल्पसूत्र में एसा लिखा दे नती शक्ति साधु जिनमंदि रमें जाके दर्शन नही करे तो तेलेका मंगर श्रावककू बेलेका मंग॥ प्रथम श्रावक दो च्यार धमी रात रहे पिग्ली तब करके नवकारमंत्रका स्मरण करे, में कोण हूं, क्या मेरी जाति है, क्या मेरा सत्य है, क्या मेरा धर्म है, इस तरे धर्मजागरणासें !दिलको सावचेत करे, पीछे मल मूत्रकी वाधाकू दूर कर अंग शुचि करके सामायिक लेके राईप्रतिक्रमण करे, फेर घरदेशसरकी पूजा करे, पीले यथाशक्ति अच्छा वस्त्र प्रापण पहरके घोमा हाश्री रथ पाल- खी सिपा नोकर चाकर नाई बंधु परिवार समेत पूजाके लायक फल फूल प्रमुख संगमे लेकर नव्यजीवोंको मोक्षमार्ग दिखाता हुआ जिनशासनकी प्रस्तावना करता थका जिनमंदिर में जावे, जिन मंदिरमें प्रवेश करके ोपदीकी तरे ज्ञातासत्र में अधिकार १.त्रिक विधि साचवन करे तो दस त्रिक लिखते है- पहिला त्रिक-३ वेर निस्तही कहगेका, जिसमें निस्तही जिनमंदिरमें प्रवेश करतेही कहे पोते संसार घर संबंधी कुटनी कार्य विचारणा न करे १: दूसरी निस्तही प्रदक्षणा तीन दियां पीते. कदे, जिनमंदिरमें फूटा टूटा मरम्मत कराणकी जो सार शंनाल रकीश्री सोनी गे ; (इसमें श्यपूजा करणी मोकली रदी) ( ३२०) तीसरी निस्सही कहे पीछे निकेवल जावपूजाही करे, लेकिन व्य पूजा नही करे, यह प्रथम निस्सही त्रिक कहा.? दूसरा त्रिक-ज्ञान त्रिककी धाराधना करणेकों प्रन्नूके ददि पावसे तीन प्रदक्षिणा देवे. तीसरा त्रिक-मूलनायकजीके त्रिंबको पंचाग मिलाके तीन वेर नमस्कार करे. ३. चोथा त्रिक-प्रनूकी अंगर अय २ नर नाव ३ एसे त्रिविध प्रकारसे पजा करे.अब निस्सही किये पीठे कृत्य अकृत्य तथा पूजा विधि संके पसे लिखते दे, मनोगुप्ति, वचनगुप्ति, नर कायगुप्ति करके युक्त रहे, पांचो इंडियोकू वसमे रके, चलणे नेर फिरणेमें उपयोगी रहे, गीतादिक उसका सुपके चित्तमें व्याकुलता नहि ररके, कुरानी देवकार्यको गेमके, नर कार्यकी विचारणा न करे, संपूर्ण राजकया दिक ध हो सो विकथाको गेमे, जन्म नर कर्मके अनुगत वचन नदि बोले अर्थात् कोईके मातापितादिकका किया नया खोटे कार्य कों प्रगट नहि करे तथा कर्मानुगत वचन अधेिको अंधा, गोलेकू गोला, इत्यादि वचन नहि.बोले. निस्सही किये पीछे जिनमंदिरमें धर्मसंयुक्त आत्महितकारी प्रमाणोयेत वचन बोले, जिसमें मन वचन कायाके खोटे. व्यापारोका निषेध अपणी आत्मासें किया हे नस जीवके नावसे निस्सही होय, नर जिसने दूरणका त्यांग नहि किया हे नसके फकत शब्द उच्चारणे मात्र व्यनिस्सही दोय इत वास्ते पूजायोग्य. उत्तम वस्त्र पहरके आठ तहका नज्जल वस्त्रसे मुखकोस बांधे, धूपादिकसे अंग अपणा शुद्ध करे, नावसे उतर। निस्सही कहते मूलगुंगारेमें प्रवेश करे, जयणा संयुक्त पूजा करे, पूजा करते शरीरमें खाज नही खुणे, खेल खरसार नदि करे, नि केवल नगवानकी स्तवनामें चित्त रके. प्रश्रम सुगंध युक्त जल (३२) पंचामृतसे स्नान करावे, सुकमाल प्रजा कोमल सुगंधयुक्त वस्वसे नगवानका अंग लूहे, कपूर कस्तुरी मिश्रिन शुद्ध केशरवंदनसे विलेपन करे, शुजवर्ण शुजगंधयुक्त जीवादि रहित निदोस गुला- च चंपा चंपेली केवमा जाई जूई मोगरादिक पुष्फोसे पूजा करे, अष्टांगधूप अगरबत्ती खेचे, मंगलीक दीपक करे, श्रखंझ उज्वल प्रकतोसे प्रनूके सन्मुख प्रष्ट मंगलीक लोखे-दर्पण ? नासण ५ वईमानसरावसंपुट ३ श्रीवत्स ४ मकयुग ५ कलश ६ स्वस्ति क ७ नंघावर्त । एसे प्रष्ट मंगलकी रचना करे, पंचरंगे फूलोंसें अष्टमंगलीक पूजे, अछे केसर चंदनके इछा देवे, उत्तम नैक्य चढावे, अछे खायफल चढावे, इत्यादि पूजाकी विधी आरती पर्यंत रायपसेणी ज्ञाताधर्मकथा जीवानिगमाधि सिद्धांतो में लिखे मुजब करे. पीठे अंतरंग नक्तिसे अनूके सन्मुख नाटक करे, जैसे देवेइ पानवें। नारद उदाइराजाकी राणी अन्नावती द्रौपदी रावण प्रमुख के जीवोने जिनेश्वर तथा जिनेश्वरकी प्रतिमा श्रागे अष्टा- पदादि तीर्थीपर तीर्थकर गोत्र उपार्जन किया सें शंकारहित नव्यजीव नाटक करता उत्तम फल पावे, जल चंदनादि पुप्पोसे करीजावे सो अंगपूजा १ प्रनूके सन्मुख नेवद्यादिक चढायाजा सो श्रमपूजा २ मनूके सन्मुख शकस्तवादि गीत गान नाटकादिक करे सोनावपूजा ३. व्यपूजा गर्षित चोया त्रिक कहा. ५. 'अब पांचमा त्रिक-तीन अवस्था विचारणी. मिस्य १, पद स्थ २, रूपातीत ३, इसमें मिस्थ अवस्थाके तीन नेद दे. ज न्मावस्या १; राज्यावस्या २, श्रमणावस्था ३, नर केवल अवस्था फो विचारणा सो पदस्थअवस्था, निरंजन निराकार सिझवस्या सो रूपातीत कहीजे. ५: अब कहा त्रिक-तीन दिशा गेमके प्रभूके सामने नजर- ररके. ४२
.
( ३३० )
नई १,अघ २, तिरी ३, दहणी ३४ वांइ पिठामा निजर नहीं करे.६.
अब सातमा त्रिक-तीन वेर धरती प्रमार्जक नस ठिकाणे
चैत्यवंदन करे.
अब आठमा त्रिक-वर्णादिक तीन संपदाका अकर शुद्ध न.
चारण करे सो वर्णशुदि १, अक्षरोके अर्थपर आलंबन ररके तो अ.
र्थशुदि २, आसंवन एक जिनप्रतिमाका रके सो मन शुद्धि ३.७.
अब नवमा त्रिक-तीन मुज्ञ करणी.जोगमुश १, जिनमु
२,मुक्ताशुक्तिमुक्षा ३. कमलकोशाकार दोनुं दायोकी अंगुली मिला
पीसो योगमुज्ञ कहीजे,इस योगमुझसें शक्रस्तव कहे १, कानसग्गं
मुद्रा सोजिनमुद्रा २, नर दो सीपका जोमा तिस श्राकारसें हाथ रख
एगा सो मुक्तासुक्तिमुद्रा ३, इस मुद्रासें प्रणिधान जयवोयराय कहे.ए.
अब दशमा त्रिक-प्रणिधांन तोन. जिनवंदन प्रणिधान १,
मुनिवंदन प्रणिधान २, प्रार्थना प्रणिधान ३. इसमें जो जावंति चे
श्याई इह संतो तसंता तक तो जिनवंदन प्रणिधान है, जावं
ति केविसाहू तिविहेण तिदक विरियाणं तक मुनिवंदन प्रणिधान
२, जयवीयरायसे लेके आनवमवंमा तक प्रार्थनारूप प्रणिधांन.३.
एसें दश त्रिकका पहिला द्वार कहा. १०.
अब पांच अनिगमन साचवणेका दूसरा द्वार कहते हैं, स
चिनद्रव्य जो पुष्पादिक अपणे नोगमें होय नसकुँ दूर धरदेश,
नर राजचिन्द मुगट उत्र खमग चमर पाउका अचितवस्तुकानी
गेमणा आनूपण वगेरे पहरे रखणा २, मन एकाय करणा ३, ए.
कपट उत्तरासण करना , जिनपिंकू देखतेही नमोनुवणवंधुणारे
"एसे नमस्कार करणा ५. यह उसरा द्वार कहा.
• अब तीसरा बार-दोदिशीका पुरुप दहिनी तरफ बेके न
गचंतकू वांदे; स्त्री वाइ तरफ के जगवंतर्फे वांदे.
( ३३१) अब चोथा हार तीत अनिग्रहका, अनिग्रह देवांदगामे कदा दे. जघन्यसे तो नव हाय दूर बेठके देव वांदे १, मध्यम नव हाथसें नपरांत बठके देव वादे,श्, नकट६० दाय दूर पेटके देव वांदे ३. अब पांचमा द्वार चैत्यवंदनका. सोजघन्य १,मध्यम २,नलष्ट ३, एवं तीन नेद दे. णमो अरिहंताणं एसा कहके अथवा एक दोय गाथाका नमस्कार चैत्यवंदन कहके शकस्तव कहणा सो जघन्य चैत्यवंदन १, जिस देववंदनसे नमोबूरांसे लेके अरिहंतचेश्याएं इत्यादिक संपूर्ण कहके एक स्तुतिकी गाथा कहे सो मध्यम चैत्य वंदन तथा कोऽ प्राचार्य कहते हे पांचदंमक समेत थुईकी ब्यार गाया कहे सो मध्यम चैत्यवंदन कहीजे. पांच शस्तवसे आठ युईसे देवांदे सो नुकष्ट चैत्यवंदन कहजे. अब वह द्वार पंचाग प्रणिपात करे, दो गोमे. दो हाथ, नर मस्तक, यह पांच अंग मिलाके जमीनमें लगावे. अब सातमा हार. जघन्ये एक गाथासे लेकर नलप्ट एकतो थाउ श्लोक तथा काव्यसें प्रनुको स्तवना करे || इति ॥ ॥अथ चवदे नियम दिनप्रति प्रमाण श्रावक करे सो विचार लि०॥ सञ्चित्त १, दध २, विगई ३, पाणदि ४, तंबोल ५, वत्य ६, कुसुमेसु ७, वाहण , सयण ए, विलेवण १०, बंन ११ दिशि १२, न्हाण १३, उत्तेस १५ || अर्थ ॥ श्रावक नितप्रति नियम संलाले दिनमें जो चीज अपरो अंग खाते सगे उसका प्र माण रके, नपरांत त्याग करे. नसमें पहिले सञ्चित्त वस्तुका प्रमाण इस तरेसे करे मट्टी सर्व जाति, पाणी सर्व जाति, जस अग्नि वायु वनस्पतिका वेदन नेदन, तरकारी फल परबल नीमी तोरी केला मतीरा ककमी खरबूजा नींधु प्रांव नारंगी जामूरा इत्यादिक जो चाहे सो रके, वाकीका त्याग करे १.
दूसरा श्य प्रमाण, तहां धातु वस्तुकी शली तेसे अपर्ण
अंगली विगर जो चीज मुंमें मालरोमें आचे सो सब द्रव्यकी लिए
तीमे आता हे. नामांतर स्वादातर स्वरूपांतर परिणामांतर द्रव्यांतर
दोणेसे व्य जुदा गिणणेमे आता हे, जेसे गहूं एक व्य उसकी
पतली रोटी फीगारोटी वेढवारोटी वाटी यह सब जुदा द्रव्य कद
लाता है. इस तरे नात दाल रोटी कही मामिया कह तरकारी
सव जात पापम खीचिया तक सब तरेके फीणी घेवर खाजा
इत्यादिकमेंस सब जयमेसे जो चहिये सो रके बाकी नियम करे,
उलटपणे एक व्यका नाम लेकर रके सो एकही द्रव्य कहलावे.
जेसेके मेवेकी खीचमी तो वह अनेक इव्यसे वणी नई हे तोनी
एक इव्यही कहिये. इति इव्यप्रमाण सरा नियम २.
अब तीसरा विगय प्रमांपा नियम ॥ तहां दश विगयोंमेंसें
श्रावककूच्यार महाविगयका तो त्यागही होता है. मदिरा मांस
२ मस्कण ३ र सहतका ५ रहे. ६ विगय-वृत १ तैल २ मीग
४ दही ५ कढाईकी तली चीज ६, यह धारणा प्रमाण
रके. इति विगय नियम ॥ ३.
अथ चोया पादत्राण नियम ॥ तदां जूनी खमाठ मोजा
अपना इतना विराणा एसे नित्य धारणा प्रमाण मोकतारके.१.
॥ति पान हि नियम ॥
अन पांचमा तंबोल नियम । पानवीमा सुपारी लोग इसा
यची गटी र वमी जायफल जावंत्री प्रमुख सय खाविमवस्नु
किरियाणेकी चीज धारण प्रमाण रस्के. इति तंघोस निपम ।। ५.
प्रय वन वम्ब नियम, पोसाख २ तया ।
मोस्तारके, पोसाख? में पपमोर जामा कमावधा।
'४ रु पहा उनराप्तण ५ यद पांच वरखकी एक पोसामा
छूटा
वस्त्र
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(३३३)
कहीजे. एसें स्त्रीके स्त्रो मुजब, जो एसा नहीं कर सके
तो ४० तथा ५० कपमा दिनमे मोकला रके. पराया वस्त्र नूत
चूकमें आवे तो जयणा ॥ इति वस्त्र नियम | ६.
अब सातमा फूल नियम. गुलाब चंपेली बेला केवमा केव
की कुंद मुचकुंद सेवती चंपा मालती आदिक सब फूलका धा
या प्रमाण रस्के. ।। इति फूल नियम ॥ .
पाठमा वाहन नियम ॥ रथ गामी वहली का वग्धं
कोच पालखी घोमा दाश्री ऊंट तामजांम म्याना इत्यादिक सः
थलवाहन, पाणीमें चक्षणेवाले मोरपंखी क्तक घुम्दोम लचका
मगर पनसोइ पलवार वजरानाव इत्यादि सब जिहाज बोट वगे
तिरता फिरता चरता रेल वगेरे सब प्रकारके असवारीकी धारण
रस्के. इति वाहन नियम ॥ 5.
अथ शय्या नियम ॥ पलंग खाट तखत चोकी पट्टा गई
कुरसी वनात सूजनी सेबूंजी उलीचा चांदणी शोतलपट्टी चट
ई सफ दरखतकी बालका चमझेका कामला मुखमस अतला
कारचोपी इत्यादि धारशा प्रमाणे शय्याका
प्रमाग को
इति शय्या नियम ए.
अथ दशमा विलेपन नियम. सरसूंका राईका पाटेका ते
फुलेल सब जातिका केसर चंदन कपूर कस्तूरी कुंकू इत्यादि
शरीरके सुख वास्ते तथा रोगादि कारणे श्रौपधादिकका विलेपन
फोमे परमलम प्रमुख आंखोमें अंजन इत्यादि अंगोपांगमें सर
शासो विलेपन धारणाप्रमाणे परिमाण करे.इति विलेपन नियम
अथ ब्रह्मचर्य निमय, रातकों तथा दिनकों सूर मोरे
दृष्टांत नेगादिकका प्रमाण करे स्वप्नेकी मनकी वचनकी जयण
इति ब्रह्मचर्य नियम ११.
(३३५ )
अथ दिशि नियम. पूरब. १ पश्चिम १ दकिण ३ नत्तर
अग्निकूण ५ नैशतकूण ६ वायव्यकूरा ईशानकूल अधो
शिए नईदिशि १० यद दश दिशिका अपणे जाणे आणेक
प्रमाण करे, चिहि लिखणी आदमी जया देशांतरकी चि
वांचणी नसकी जयणा. ति दिशि नियम १२.
अथ तेरमा स्नान नियम, तहां श्राज दिनमें स्नान २ वर
अश्रवा ४ बेर मोकला लेकिन् पाणीका तोल ररके, धमे प्रमुख
का प्रमाण करे, एक स्नानमें इतना पाणी खरच करूं ज्यादा
नही गिरानं. इति स्नान नियम १३.
अथ चौदमा सात नियम. दिनमें नात २ सेर तथा १
वेर जीमूंगा अथवा च्यार वेर नपरांत विहार या चोविदार
धारणा प्रमाणे ररके. तथा दिनमें जल पीणेमें आवे उसका
प्रमाण रस्के तोलसे या मापसे. इति चवदे नियम विचार संपूर्ण १५.
॥ अथ श्रावकके सम्यक्त मूल पारे व्रत ग्रहण विधि लिख्यते ॥
प्रश्रम जिनमंदिरमें जिनप्रतिमाके सामने शुइ सपेद वस्त्र
पदरके चंदनकेशरका तिलक करके चावल चढावे, पीछे अखंग
तंकुल मु३ थालमें रके नस पर नारेल रुपया या मोदर
घरे, तीन प्रदक्षिणा देकर इरियावही पमिकमे इचाका० सम्य
त सामाश्यारोहणाथै चेश्याई वंदावेद गुरु केद वंदावेमो चैत्यवं
वण करे. वा पासे चावलांको साश्रियो करे श्रीफल धरे पोरे
गुरु व ईमान विद्यासें मंत्रफर श्रावकके मस्तक पर वासक्षेप
करे, वईमान स्तुतिसें देववंदन करयावे पीठे सतरे यु में नवकार ।
: एकेकका काउसग को पीछे शासनदेवता निमित्त पार लोगस
का कानसग करे,. पारके प्रगट लोगस्त कहे पीले ३ नवकार
गुणे शकस्तव कहे नमोर्दव० कदके यमा स्तवन कद्दे पीने जप
.
. (३३५ ) चीयराय कदे इति नंदी विधिः । पीछे खमासमण दे श्रुतसा मायक सम्यक्तसामायक आराहणार्थ कानसगं करावेद, गुरु कहे करावेमो सम्यक्तसामायक आरोपनार्थ करेमिसानसगं. ५ लोग स्तका कानसगा करे पारके प्रगट लोगस्स कदे पीछे ३ वेर नव कार गुणकर गुरूके पास तीन वेर सम्यक्तदमक नच्चरे गुरु पाठ घोल उसकी मनने धारणा ररके. सूत्रं अहन्ननंते तुह्माणं सम वे मिचताने पमिकमामि सम्मत्तं नवसंपळामि नोमेकप्पा अप्पनि अन्नतिविएवा अननिधिदेवयाणिवा अन्नतीचिपरिग्गहिय अरिहंत चेश्याणिवा दित्तएवा नमसित्तएवा पुर्विप्रणालित्तएवं श्रालवित एवा तेसिंअसणंवा पाणंवा खाश्मंवा साश्मंवा दावा अणप्पाच्या तेसिंगंधमलाई पेसिनचा नवरायाजियोगेणं गणानि योगेणं चला नियोगेणं देवात्नियोगेण गुरुनिग्गदेणं वित्तीकंतारेणं तंचन विहं तंजहा दधनखितन कालननाव तदधन दसण दवाई अदिगिच वित्तन जाव जरहमझिमखमे कालन जावजीवाए मावन जावग्लेशं नठ लिजामि जावसन्निवाएवं नन्नविज्ञामि जावकरार, नम्माश्वसणं एसो दसण पालण परिणामो नपरिवमा तावमे एसो दंसणान्निग्ग हो अन्नचगानोगेणं सहस्सागारेणं महत्तरागारणं सबसमादिवनि यागारेणं वोप्सिर, पीछे है। श्री अनमः एते अक्षर श्रीगुरुके पाससे हायमें लिखाके जिन प्रतिमाकू वासक्षेप चढावे, नवकार पढतोयको ३ प्रदक्षिणा देवे, देव गुरुकू वांदे, पीवे श्रुतलामायक थिरि करणार्थ सत्तावीस नत्तास प्रमाणे एक लोगस्तका कानस गग करे पीछे प्रगटलोगस्स कहे पीठे सम्यक्तरूप कल्परक पायके अति प्रानंदसें एसा वचन बोलें अरिहंतोमददेवो, जावजीवं सुसा हुणो गुरुणो, जिनपननंततं, इयतम्मनमएपहियं. १. पाछे गुरु धर्मदेशना देने, नियालरूप सम्यक्त के पांच प्रतीचार बजे, नित्य ..
- . (३३६) चैत्यवंदन इतनी वेर करूंगा, इतना नवकार नित्व गुणूंगा, फल केसगदिक वर्षप्रति इतना जिनमंदिरमें चढानंगा, झान दर्शन चा: रित्र नक्ति में इतना द्रव्य खरचूंगा, शीलवत इतने पर्वनियिमें पा लूंगा, नित्य पञ्चखारा इस मुजब करूंगा, दिनकी नवकारसी श्रा दिक रात्रिकों उविहार तिविदार चनविदार पर घावीत अन्नक्ष वतोस अनंतकाय विदल वगेरे गडूंगा इत्यादिक अपणी धारणा प्रमाण सब वस्तूका करे नियम, गुरुके सामने घारे व्रतकी टीप सुणे अतीचार नहि लगे एसे उपयोगसे सदा वर्ते ॥ अथ प्राणातिपात व्रत दंमक लि० ॥ अन्ननंते तुम्हाणं स मीधेवेथूलगपाणावायं संकप्पिन निरवराह पञ्चरकामि जावळीवाए एगविहं एगविदेणं अथवा विहं तिविदेणं मरोणं वायाए काएक नकरेमि नकारवेमि तस्सनंते पमिकमामि निंदा म गरिहामि अ प्पाणं वोसिरामि ॥ यह पदले व्रतका दंभक तीन वेर नचरावे॥१॥ यदन्नंनंते तुम्हारासमी धूलगं मुसाश्वायं जीहाचेयाइदेउ कन्नालीयं गवालीय नूमालीये थापरामोसा कूटसारखीय पंचविहं' पच्चरकामि दरिकन्नाए थविसए दवा खितन कासनाव सपनणं मुसावायं खिनन शं श्वा अपवा कालनणं जावळोवाए नाव नणं जावगहेरानगळामि जावरलेसनलिकामि अन्नणणाधि रोगाश्य एसोपरिणामो नपरिवार तावअजिग्गह ऽविदं तिविदेणं अन्नत्यगानोगेणं सदस्सागारेणं महत्नगागारेणं वोसिरई ॥२॥ अदन्नंनंते तुम्हारांसमीचे अदिन्नादाणं स्वनखणणाश्यं चौरंकारकर रापनिग्गदकास्यं सचिनाचिन विसय पच्चस्कामि व खितळ कालन नावन दानणं अदिनादाणं खिननशं श्च्चा यन्ना को सनशं जावन्जीव लावणं जावगहेणं नगदिकामि जायरलेणं नर खिलामि श्रलेसकेगवि रोगाश्यं एसोपरिणामो नपरियमई तारय (३३७ ) संग विद तिविदेश अन्नत्या तहस्ता महत्त० सब चोसि :॥ ३ ॥ अदन तुम्हाणंसमीवे दारिय वेकिय नेयं धूलमेहुणं बस्कीम प्रदोगहियानगए दिवंतिरिछ माणसियं एगविहं एग हेशं पचरकामि दान खित्त काललाव दधन मेहुणं खि नणं श्ववा अन्नत्यवा कालनणं जावजीवाए जावन जावगहेणं गदिजामि अन्न. सह. मह. सब० वोतिर ॥ ४ ॥ अंदन्नं ते तुम्हाणं समीवे परिग्मदं पमुच्च अपरिमिय परिग्गरं पञ्चस्कामि प्रपन्ना नवविहवहु विसयं श्वापरिमाणं उपसंपळामि अहाग पनंगए तंजहा दव खित्तन काल नाव दधनशं नवविह रंग्गदं खिलवणं श्ववा असत्यवा कालनणं जावजी नावणं वगदेणं नगहिजामि अन्न सह० मह सब वोतिर ॥ ५॥ इन्नलते तुम्हाणंसमीचे दिसिपरिमाणं पञ्चकामि तंजदा दब तन काल नाव दवनयं विसिपरिमाणं खित्तन धारणाप सं कासगं जावजीवाए लावणं जावगहेणं नगदेजामि जाव तावशजिग्गद अन्न सह० मद० वोसिरह ॥ ६ ॥ अहसनं तुम्हारा समीचे लोगोवनोगयेनोयण अनंतकायबदुवीया राइ पाइं परिहरामि कम्मळणं पन्नासकम्मदाणाई गालकम्माश्या (दुसावळाई खरकम्माश्य रायानियोगच परिदरामि तंजहा दधन नकालननाव दवनरांनोगावन्नोगवयं खित्तनशंश्वा अन्न कालनणं जावजीवाए लावन जावंगदेणं नगदेकामि अन्न. मह. सब० वोसिर ॥ ७ ॥ अंहसंनंते तुम्हारांसमीवे त्यद : पञ्चरकामि :अवकाश , पापोपदेश : हिंसोपकरण पमायचरितं चनधिहं अन्नत्यद जहासनीए परिदरामि तंज दवन खिनन काल नाव दधन अन्नत्यद .वित्तहणं व अन्नत्यवा कोलनशं जावजीवाए लावणं ..जावगहेतगदिः
(३३०)
अन्न सह० मह० वोसिर ॥ ७॥ अहन्नन् ते तुम्हारांसमीदे
सामाश्य पोसदोववासं देसावगासिय अतिथिसं विनागवयं जहा स
नीए पमिवामि इचयं सम्मत्तमूलं पंचागुण्यं सनसिस्कावयं वा
लस विहं सावगधम्म नवसंपज्जताणं विरामि अन्न० सह० महं०
सबस० वोसिरश || ए ॥ षट् साख कमी व्यार आगार संयुक्त
पालूं ॥ इति श्रावककू संक्षेप बारे व्रत नच्चरावण विधि ।
.. ॥ अथ वीसथांनकका छोटा स्तवन देववांदनेमे कहणेका ॥
श्रीजिनना रे चरण कमल प्रगमी करी, वीस यांनकरे
गण विधि कहउ चित्त घरी ॥ पहले थानक रे नमो अरिदताणं
गणन, सीमंधर रे जयवंत जिन पूजी युणन ॥ त्रूटकर ॥ युगान
वियां बीज थानकि, नमो सिद्धाणं सही ॥ सिद्धपूजा चनवी
स जिननी, पूंमरीक थादिकं कहीं ॥त्रीज थानक नमो पर्वयण
स्स, प्रत्नावना संघनी कर ॥ नमो पायरियाणं चनथ यांनकि,
थाचारज, जगती धरई ॥ १॥ नमो थेराणं रे पांचमइ. भिवर
पूजा करो, नमो नवझायाणं रे व थानक नचरउ ॥ वस्त्र कंपस
र बहुश्रुतन ते दीजिए, नमो तवस्ती रे सातमें तपिमा
पूजिए || ०॥ पूजिए याम्मे नमो नास्स ज्ञाननी जगति
करन, नमो दंसस्स नवमें थानक चैत्यसेवा यादरो ॥ दसमे ते
नमो विनयकारी विनय वमानो कीजिए, ग्यारमे नमो क्रिया
कारीगं पोसद.पूरी लीजिये ॥ २॥ पारमे थानक रे नमो मंज
धारी सदा, वृतधारी रे मन वच क्रम पूजन मुदा || मूल वय
भारी रे नमो तेरमे.अरचिये, समादिपरणं रे रावर गीत गान
चरचिये ॥ व ॥ वरचिये नमो मुपनदायगस्त परमाल दांन ने
नरमे, नमो वायगस्स विगयनच त्याग करो यांनक सोलमें।
सतरमे नमो. वेयावयकारी, उपध गुस्नर प्रापिये ॥ प्रसारमे
.
. . ( ३३ ) नमो नाण धराणं, नवू जणवू थापिये ॥ ३ ॥ नमो सुत्रनत्तीर्ण रे नगणीसमे लबिया मुणन, पुस्तकपूजा रे नवू. लखावीनई सुयो । वीसमे थानक रे. नमो पनावगाणं कही, संघनगती रे यथासक्ति कीजे सही ॥ ३०॥ सही कीजे वीस उली एक पर माप्ति कीजीये, उपवास करिये वे सहस्स गुणिये पमिकमणे सादो लीजिए ॥त्रणे काले देववंदन नाइण घोअप टालिये, प्रारंन वरजी. पुन्य गरजी सील सूधो पालिये ॥ ४ ॥ साधु साधवीरे श्रावक श्राविकाये सेवित्रा, तीर्थकर रे तेणे नामकर्म बांधियां | वीरशासन रे नव जणां ते जाणियां, गणांगे रे सौधर्मसामि वखाणिप्रा.॥ वृ०॥ वखाणिमा गणधर श्रेणिकराजा सुपांस नुदाई नृप वलि, पोहिष मुनिवर अने दायुप शंख शतक श्रावक रुलीः ॥ सुखसा रेवती श्राविकाये एद यांनक फरसिया, सेवकजन कल्याणकारी वयणला सफला किया ॥५॥ इति वीसथानक स्तवनं ॥ ॥ अथ पार्वजिन स्तवनं ॥ ॥ राग केरवो ॥ चालो देखो री मधुवनको राव || चा० ।। वामानंदन पास जिनेसर, शिर पर रे वाके चमर ढोलाय | चाon ॥ १॥ तारण तरण जिनेसर सरख के, जेटे सहु नवि चित्त पाय ॥ चा० ॥२॥ गंगादरत उमादो सागो; का फरसुं वाके मन वय काय || चा० ॥ ३॥ इति ॥ ॥ अथ पार्श्वजिन स्तवनं ॥ । राग घाटी । मेरो मन वश कर लीनो, जिनवर प्रन्नु पास ॥ मे० ॥ अखियां कमल पांखमिया, मुख सुंदर जास ॥ मे० ॥ १ ॥ कानें कुल दोप फलके, शशि सूरज सम नास ॥ मे० !! नील वरण तन सोदे, त्रिभुवन परकाशं । मे० ॥२॥ - '५ , . (३४०) मंतु तुम शरण रदीने, समलं सासोसास ॥ मे०॥ लालचंद अरज सुनीज, पुरो वांछित पास 11 मे० ॥ ३ ॥ इति ॥ - ॥ अथ नेमजिन पदं ॥ ॥ गुमरी ॥ राग जंगलो । सुणो सुजाण नेमजी, दारे में खमी पुकारुं नेम तुंही तुंही तुंहीं ॥.सु० ॥ अरन करत हुं में पईयां परत हुँ, इतनी अरन मेरी मानो ॥ सुजा० ॥ १. ॥ बिन अवगुण क्युं तजो मेरे साहेब, नेद नजर मोपें मारो । सुजा ॥ ॥ २ ॥ हरख चंद नेमी राजेसर,हुँनवनवकी चेरी ।सुजा० ॥३॥ ॥ अथ नेमजिन पदं । ॥राग नैरवी ॥ नेम जिणंदजीसें खासी, मोरी रेन दिवस.नित सग रहीर । ने० ॥ मो० ॥१॥पहेली प्राय जन दोस्ती कीनी, से पीवें विटकाय दई.रे । पसुअन पर प्रनु दया करीने, सिवरमणी ते वर खेर रे॥ ॥ मो० ॥२॥ नविक रसना कर दोस्ती, रत्नविमल पद पाय लईरे।नेक मो॥३॥ ॥ अथ पद ॥ राग भैरवी॥ !! आज प्रनु-तोरे चरण लागि, मिथ्यातनिंद में खोई रे ॥ श्रा० ॥१॥ दरसन कर परसन नयो मेरे, आनंद चित्त, अब जोई.रे-॥ आ० ॥ ३॥ तुम बिन जर न कोई मेरे, देख्यो त्रिनु वन जोई रे ॥ प्रा० ॥ ३ ॥ दास तुमारो करत. विनति, . तुम मन्तु जव जव होई रे ॥ प्रा.॥५॥ इति ।। ॥ अथ पदं ॥ || राग रवी ॥ रात गई अब प्रात होन जयो, क्या सोये जिया जोगरे । रा०॥ दोय धमी तमको अब रहियो, कंच धरममें लोग रे ॥रा॥१॥ जिनवाणी उरवीच धार से, नर नरम संब त्याग रे ॥रा ॥ २ ॥ श्रानंद सुगुरु वचन हित मानो, ए शिवमाग रे ।। रा० ॥ ३ ।। इति । . .
॥ अथ पदं ॥ ॥ राग नैरवी ॥ तुम बिन दीनानाथ दयानिधि, कोन खबर से मेरी रे ॥ तु०॥ १ || प्रमत्त फिरयो संसार जगतमें, मेटो जय दी फेरी रे ॥ तु० ॥ २ ॥ नव नवके प्रनु तुम जगनायक, राखो शरण तेरी रे ॥ तु०॥ ३ ॥ उदय आशरो पकध्यो तेरो, सरण यही में तेरी रे॥ तु॥४॥ इति ॥ ॥ अथ श्री सिद्धाचल स्तवनम् ।। ॥ कमरवानी देशी।लाच धरि धन्य दिन आज सफलो गणुं पाज में सजन आनंद पायो । दर्प धरि नजर नरि विमल गिरि-निरख करि, रनतमणि कनक सुरतरु कट्टायो | ना०॥१॥ पग पग: चमंग धर पंथ नित पूरतां, धन्य दोय चरण तिहां चलत पायो । आज धन दीद जागी सुस्तकी दिशा, श्राज धन दीद गिरि सुजस गायो । ना० ॥ २॥ दूर उर्गति टरी जात्र विधिशुं करी, पुण्यनंमार पोतें जरायो ॥ वंदत जिनराज मणिरंग सुरगिरि शिखर, शपलजिनचंद सुरतरु कहायो । ना० ॥ ३ ॥ ॥ अथ सीमंधर जिन स्तवनं ॥ ॥ श्री सीमंधर साहिबा, वीनतमी अवधार लाल रे ।। परमातम परमेसरू; अतिम परम आधार लाल रे ॥ श्री०॥2॥ केवलज्ञान दिवाकर, नांगे सादि अनंत लाल रे ॥नांसक लोकालो कको, कायिक ज्ञेय अनंत लाल रे ॥ श्री० ॥१॥ चं चक्र संरु, सुर नर रहे कर जोऊ लाल रे॥ पदपंकज सेव सदा, अणहूते “एक को साल रे॥ श्री०॥ ३॥ चरणकमल पिंजर वस्यो, मुफ मनहंस नित्यमेव खाल रे॥ चरण सरण मोहि श्रासरो, नवनव 'देवाधिदेव लाल रे ॥ श्री. || 3 || अघमःनुध्धारण गे 'तुमें, दूर 'हरो नवःख लाल रे ॥ कहे जिनदर्ष मया करो, देजो अविचल सुरक लाल रे ॥ श्री० ॥ ५ ॥ इति तीमंघर जिन स्तवनम् ॥; .
३०५) ॥ अथ अष्टापद गिरि स्तवनम् ॥ । मनमो अष्टापद मोह्यो माहरो जी, नाम जपू निशि दीस जी ॥ चत्वारी अह दस दोय वंदीया जी, चिहुं दिशि जिन चोवीश जी ॥ म० ॥१॥ जोजन जोजन अंतरें जी, पावक शाला आठ जी ॥ पाठ जोजन नंचुं देहरं जी, उख दोहरा जाये नाठ जी ॥ म०॥ ॥जरते नरायां जला देदरां जी; सोनोयरां थून जी॥ आपे मूरत सेवा करे जी, जाण जोईने छन नी । म ॥ ३॥ गौतमस्वामी तिहां चढ्या जी, वली नांगीरथ गंग जी || गोत्र तीर्थकर वांधीयां ली, जाणे जोई ने ऊन जी ॥म ॥ ४॥ देव न दीधी मुझनेपांखमी जी, आ, केम इजूर जी ।। समयसुंदर कहे वंदना जी,प्रद नगमते सूर जी म०५॥ ॥ अथ पार्थजिन स्तवनम् ॥ ॥ सुण अरदासा सुगुण निवासा, प्रमची पूरो प्रन्नु आशा ज ।। सु०॥ देखि नदासा अपणा दासा, दीजें राज || सु० ॥ १ || चामी चटकी नवमांहि नटकी, नाच्यो में वेध नटकी राज ॥ सु०. ॥ २॥ हवे मन इटकी आपशुं अटकी, आयु प्रनुपय सटकी राज || सु० ॥ ३ ॥ तें दम टाली मुगत नाली, प्रीत अमेहिन पाली राज ॥ सु० ॥ ४॥ एक हथाली. जे ताली, वात प्रचंता वाली राज ॥ सु०॥ ५॥ परनपगारी स तुमारी, सेवामें विध सारी राज ॥ सु० ॥ ६ ॥ तत्त्व विचारी न शुद्ध घारी, श्रीमती सुखकारी राज ॥ सु०॥ ७ ॥ इति... ' ॥ अथ शंखेश्वर स्तवनम् ॥ ॥ अंतरजामी सुण अलवेसर, महिमा त्रिजग तुमारों। लिलीने आव्यो तुम तीरे, जनम मरण लय वारो ॥ १ ॥ सेवक जाकरे राज, अमने शिवसुख, आलो...ए आंकणी ॥ सहु कवक दिलासा . . (६४३ ) कोना मनवादित पूरो, चिता सहुनी चूरो॥ एह विरुव ठे राज तु- मारूं, किम राखो से दूरोप सेवक०॥२॥ सेवकने वसवलतो देखी, मनमा मदेर न धरशो॥ करुणासागर केम कदेवाशो, जो नपगार न करशो ॥ सेवक० ॥ ३ ॥ सटपटनुं दवे काम नही वे, परतक्ष दरिसण दीजें ॥ धूंबामे धीजें नहीं साहिव, पेट पञ्या पतीजे ॥ सेक्का 1008 श्रीसंखेसर मंझण सादिव, वीनतमी अवधारो॥ कहे जिनदर्ष मया करी मुझने, नवसायरथी तारो ॥सेवकणगा। 11 अथ पार्थजिन स्तवनम् ॥ ॥प्राण पीयारा जी हो पास जी, किम मेलुं किरतार ।। जिनेसर । सादेव वसीया जीदो शिवपुरी, हुं श्ण 'नरत मकर जि० ॥ प्राण ॥ १ ॥ प्रामो अंतर जीदो प्रति घणो, सेंगु मिले साथ || जि०॥ लिख संदेशा जीहो मामला, कागल यं किरा हाय ।। जि० ॥ प्रा०॥ २ ॥ रमतां थे में जोहो एकग, दिनमें दश दश वार ॥ जि० ॥ केश्क दिन लग जीहो एकग, मिलता घणी मनुदार ॥ जि० ॥ प्राण ॥ ३ ॥ आवतो मिलणो जीदो अवसरे, मिलशे सुरुत संयोग ॥ जि० ॥ पण कण क्षण जीहो सांजरे, वाला तमोरे विजोग । जि०॥ प्राण ॥४॥ मिलस्यां जिण दिन.जीदो मन रखी, फलशे ते दिन श्राश ।। ॥ जि०॥ चंदमुनिंद कहे जीहो चित्तमें, वसजो प्रन्नु सुखवास ॥ " जि०॥ प्रा०॥ ५॥ इति ॥ ॥ अथ सुमतिजिन स्तवनम् ॥ ॥ महाराज वधाई वाजे ॥ जिनराज, वाई, वाजे वे ॥ नगर अयोध्यामांदे, मेघ घर प्राज वधाई वाजे | ए टेक ! मात सुमंगला जनमिया रे, सुमतिनाय सुखकार ॥ सुमति नई सहु देशमें रे, प्रगट नयो जयकार ॥ ३०॥ १॥ शादिक सहु .
(३४५) सुर मब्यारे, मेरुशिखर पर प्राय || मऊन पूजन बहुविधे रे, दिर करि मन वच काय ॥३०॥५॥घर घर रंग वधामणारे, घर पर मंगल चार [ घालचंड प्रनु जनमिया रे, सकलं संप सुख कार || व. ॥ ३ ॥ ॥ अथ विरजिन स्तवनं ।। ॥ आज महोचव रंग रलो री ॥ ए टेक ॥ जायो सुत त्रिशलादे रानी, कामित पूरन काम कली रो॥ आ. . १ सजि शणगार सकल सुरवनिता, अपने अपने मेल चली री ॥ आवत सिझारथजीके प्रांगन, पूरत मोतियन चोक पूरी री॥ प्रा० ॥ २ ॥ इंशणी मिल मंगल गावत, नाटक नाचतं सुरकुमरी री ॥ पाजत ताल मृदंग सुरपधनी, बेना बीन मोचंग बलीरी। आ० ।। ३ । हुकुम कर घर पगयो, सब वसुधा धन, धान्य नरी री ॥ कनक रजत मनि पंच वरनके, कुसुम बिखेरत गलिय गली री॥श्रा० ॥ ४॥ जयजयकार नयो जिनशासना व्याधि व्यथा सवि विपत हरीरी॥ हरख चंद जनम्यो प्रनु मेरों, 'मनकी आशा सफलफलीरी॥०॥५॥ इति ॥ ॥ अथ देवचंद्रजी कृत स्नात्र पूजा। चनतीसय प्रतिसय जुन, वचनातिशय जुत्ते । सो परमेसर देख नवि, सिंदासण संपत्त ॥१॥ ढाल ॥ सिंहासण- बेग जग नाण, देखी नविजन गुणमणि खास ॥ जे दी तुझ निम्मल माण, लहिये परम महोदय गण ॥ १ ॥ कुसुमांजप्ति मेलो श्रा दिजिनंदा, तोरा चरणकमल चोवीस पूजो रे चोवीत सोजागी चो 'वीस वैरागी चोवीसजिनंदा, कुसुमांजलि मेलो आदिजनंदा ॥१॥ (इतना कद कुसुमांजलि चढाईजे चरणोके टीकी दाजे)॥ गाया। जोनिश्रगुण करम्यो, तसुअनुन्नवएगन । सुहपुग्गलारोवता, ज्यो . ( ३४५) 'तिसुरंगनिरत्त ॥ १ ॥ ढाल | जो निज श्रातमगुरा धानंदी, पु ग्गल संगेजे द अफंदी ॥ जे परमेसर निजपद सीन, पूजो प्ररामो जव्य श्रदीन ॥ १ ॥ कुसुमां० सांतिजिनंदा० तोरा० (एसा कह गोमेटीकी दीजे)॥२॥ गाथा ॥ निम्मलनाणपयासकर, निम्मलगु रासंपन्न || निम्मलधम्मवएसकर, सोपरमप्पदधन्न ।। १ ॥ ढाल ।। लोकालोक प्रकाशक नाणी, नविजन तारण जेहनी वाणी ॥ पर मानंदतणी नीसाणी, तसु जगते मुफ मति गहरांणी ॥ १ ॥ कु सुमांजली मेलो नेम जिनंदा तोरा०॥(एसा कह हाथे टीकी दीजे) ३ ॥ गाथा ॥ जेसिझासिझंतिजे, सिझस्संतिअणंत ॥ तसुश्रालंबन गवियमण, सोसेवोअरिहंत ।। ॥ ढाल । लिवतुख कारण जेह त्रिकाले, सम परिणामे जगत निहाले । नत्तम साधन मार्ग दिखा ले, इंद्रादिक जसु चरण पखाले ॥ १ ॥ कुसुमांज० पासजिनंदा तोरा च०॥(एसा कद खांधोके टीकी दीजे ) || गाथा ॥ सम्म दिब्देिसजय, सादूसाहुणीसार ॥ आचारजनवझायमण, जोनिम्मल थाधार. ॥ १ ॥ ढाल ॥ चौविह संधै जे मन धारयो, मोक्तणों कारण निरधारयो । विवह कुसमवर जात गहेवी; तसु चरणे प्रण मंत ग्वेयी ॥१॥ कुसुमांजलि• वीरजिनंदा तोराच०॥ (एसा कह मस्तक टीकी दीजे) ५॥ (पोठे स्नात्रिया चमर ले के अनुजीकू -दुलावे) .वस्तु ।। सयल जिनवरश् नमिय मनरंग, कल्लाणक वि :हि संगविय, कारत धम्म.सुपवित्त ॥ सुंदर सय श्क सित्तर तिथं के र, इक समय विहरंत महियल, चवण समय इंगवीस जिण । • जन्म समय गवीस, जनहि. नावे पूजिया, करो संघ सुज गीस ॥ ढाल...नव.तीजे समकित गुण रम्या, जिनन्नती प्रमुख गुण परिणम्या ।। तजि.शिय सुख प्रासंसना, कर यांनक बीतनी सेवना ॥ १ || अति राग प्रशस्त प्रजावता, मन लावना एहवी ४४ (३४६) जावता ॥ सब जीव करूं शासन रसी, एसी नावदया मन मल्ल सी ॥ २ ॥ सही परिणाम एहनूं जलं, निपजावी जिनपद निरम खू ॥ श्रानबंध विचे इक नव करी, श्रज्ञ संवेग ते यिर धरी ॥३॥ तिहाथी चवि लदे नरन्नव नदार, जरते तिम एरवतेज सार । म हाविदेह विजय प्रधान, मऊखंमे अवतरे जिन निधान ॥४॥ ॥ दास ॥ पुण्ये सुपना ए देखे, मनमें हरख विशेखे ॥ गजवर नऊल सुंदर, निरमल वृपन्न मनोहर || निरन्नय केसरिसिंह, लख मी अतिद श्रबीह ॥ अनूपम फूलनी माला, निरमल शक्ति सुकमा ला ॥ तेज तरणि अति दीपे, इंद्रध्वजा जग जीपे । पूरण कलश पमूर, पदम सरोवर पूर ॥ ग्यारमे रयणायर, देखे माताजी गुण सायर ॥ बारमें नुवन विमाण, अनुपम रलनिधान ॥ अगनशि खा निरधूम, देखे माताज़ी अनोपम ॥ हरखी रायने जासे, राजा अरम प्रकासे || जगपति जिनवर सुखकर, होस्ये पूत्र मनोहर । इंज्ञनिक जसु नमस्ये, सकल मनोरथ फलस्ये || १ || वस्तु ॥ पुन्य उदय २, कृपना जिणताह ॥ माता तब रयणी समे, देख सुपन हरखंत जागी ॥ सुपन कही निज कंतने, सुपन अर्थ सानले सो लागी ॥ त्रिनुवन तिलक महागुणी, निधान इंज्ञ दिक जसु पाय नमी, करस्ये सिद्ध विधान ॥ १ ॥ ढाल !! चंशनलाकी || सोहमपति आसन कंपियो, देश अवधे मन श्रा- दियो ॥ मुझ आतम निरमल करण काज, नवजल तारण प्रगट्यो जिहाज ॥ १ ॥ नवमविय पारग सम्वाह, केवलता गाश्य गुण अगाह ।।.सिव साधन गुण अंकूर जेह, कारण नल: आसाढ़ मेद ॥२॥ हरखे विकसे तय रोमराय, बलयादिकमां तनु नं माय 1 सिंहासणधी कट्यो सुरिंद, प्रणमतो जिन :, कंद ॥ ३ ॥ सग अम पय समुदा प्रावि तन, कर अंजलि होस्ये पूत्र ( ३ ) प्रगमिर्य मठ सत्य ॥ मुख लापे ए कर्ण श्राज सार; तिय लोपे पहू दोगे नदार ॥ ४ ॥ रे रे निंसुणो सुरखोय देव, विपयानल तापितं तर्नु सखेच ॥ ततु शांतिकरणं जलधर समान, मिथ्या विप चूरण गमवांन ॥ ५ ॥ ते देव जगत तारण समन, प्रगट्यो तसु प्रणमी हुन सनत्य ॥ श्म जंपी सकवेव करेवि, तब देव देवो हरखे सुणेवि ॥६॥ गावे तब रंजा गीत गांन, सुरलोक हुने मंग सनिधान ॥ नरक्षेत्रे आरज वंत गंम, जिनराज वधे सुरं वर्ष धांम ।। ॥७) पिता माता घरे उच्च श्रलेख, जिनशासन मंगल प्रति विशेष|| सुरपति देवादिक हरप संग, संयम अरथी जनने उमंग ॥ ॥ शुल वेला लगने तीर्थनाथ, जनम्या इंशदिक हर्प साय ॥ सुख पाया त्रिभुवन सर्व जोव, वधाइ थई अतीव ॥ ॥ (एसा पढ चैत्यवंदन करणा पीठे हाथमें साथिया करणा पीछे कलस पंचामृत का लेकर खमा रहे॥) श्रीतीर्थपतिनो कलस मकान गाईये सुख कार, नरखिन मंकण उह विहंमण नविक मन आधार ॥ तिहां राव राणा हरख नचच थयो जग जयकार, दिसिकुमर अबधि वि शेष जांगी लह्यो हरख अपार ॥१॥ निय अमर अमरी संग कु मरी गावती गुण वंद, जिनजननी पाते प्राय पहुती गहकती प्रा एद ॥ हे माय तें जिनराज जायो सचिव पायो रम्म, अम्ह जम्म निन्मल करणे कारण करिस सूयकम्म ॥२॥ तिहां नूमिसोधन दीप दर्पण याय वींकराधार, तिहां करिय कदली गेद जिनवरं ज मानि मझराकार || वर राखमी जिन पाण वांधी दिये इम पासी स, जुग कोमिकोको चिरंजीवो धर्मदायक ईस ॥ ३ ॥ ढील नसा लानी। जिन रयशीजी दस दिति उतिता घरे; मुन्न लगनेजी ज्योतिसवक ते संचरे ।। जिन जनम्यांजी तिण अवतर माताघरे, तिण अवसरजी शसण पिण घरहरे।। त्रूटक ॥ धरहरे पासन इंद्र , . ( ३ ) चिंते कोन अवसर ए बन्यो, जिन जन्म नछवकाल जांणी अतदि आणंद ऊपनो ॥ निज सिद्धि संपत देतु जिनवर जांश जगते क मझो, विकर्शत वदन प्रमोद वधते देवनायक गहगह्यो ॥१॥ ॥ ढाल ॥ तव सुरपतजी घंटानाद कराव ए, सुरलोकेजी घोषणा एद दिराव ए|| नरक्षेत्रेजी जिनवर जन्म हुन अवे, तसुन्नगतेजी सुरप ति मंदिरगिर गठे ॥यूट०॥ गठे मंदिर शिखर ऊपर नुबन जीवन जिनतणो, जिन जन्मनछव करण कारण आवज्यो सब सुरगयो । तुम शुद्ध समकित थास्ये निरमल देव देवी निहालना, पापणा पा तिक सर्व जास्ये नाथ चरण पखालतां ॥२॥ दाल || श्म सांन सजी सुरवर कोकि बहू मिली, जिन वंदनजी मंदिर गिर सांहमी चली ॥ सोदमपतिजी जिनजननीघर याचिया, जिनमाताजी बंदी स्वामि वधाविया ॥ ० ॥ वधाविया जिनवर हर्ष यहुले धन्य हूं क तपुन्य ए, त्रैलोक्य नायक देव दीगो मुझ समो कुण अन्य ए॥ हे जगत जननी पूत्र तुमचो मेरु मऊनवर करी, नचंग तुमचे वलिय थापिस आतमा पुन्ये नरी ॥ ३ ॥ ढाल ॥ सुरनायकजी जिन निज करकमले वव्या, पांच रूपेजी अतिशय महिमायें स्तव्या । नाटक विधिजी तब बत्तीस भागलि बहे, सुर कोझिजी जिन दरशणने क भदे ॥ त्रूट० ॥ सुर कोमकोमी नाचती वलि नाथ सचि गुण गा वती, अपरा कोमी हाथ जोमी हाव नाच दिखावती ॥ जय जयो २ तूं जिनराज जगगुरु एम ये आसीस ए, अमत्रांण सरण आ धार जीवन एक तूं जगदीस ए॥४॥ दाल ॥ सुरगिरवरजी पां मुकवनमें चिहुं दिसे, गिर शिल परजी सिंदासण सासय बसे। तिदां प्राणीजी शके निज खोले ग्रह्या, चोसजी तिहां सुरपति आवी रह्या ॥ बेट० प्राविया सुरपति सर्व लगते कलश श्रेणि व पाव ए, सिद्धार्थ पमुदा तीर्थ औषध सर्व वस्तु अशावए । अच्नु - , . ( ३४ ) यपति तिहाँ हुकम कीनो देव कोमाकोमने, जिन मऊनारथ नीर ल्याचो सवे सुर करजोमने ॥ ५॥ ढाल । आत्म साधन रसी देव कोमी दसी, नल्लसीने धसी खीरसागर दिसो ॥ पनमदह आदि दद गंग पमुहा नई, तीर्थजल अमल लेवान्नणी ते गई।॥ १ ॥ जाति श्रम कलश कर सदस अहोचरा, उत्त चामर सिंहासणे सुलतरा ।। उपगरण पुप्फ चंगेरी पमुहा सबै, श्रागमे नालिया तेम पाणी ग्वे ॥ २॥ तीर्थजल तरिय करि कलश कर देवता, गावता लावता धर्म नन्नति रता ॥ तिरिय नर अमरने दर्प उपजावता, धन्य अम सगति शुचि जगति इम नावता ॥ ३ ॥ समकित बीज निज आत्म आरोपता, कलश पाणी मिसे नतिजल सींचता ॥ मेरुसिहरोवरे सर्व श्राव्या वही, शक नचंग जिन देख मन गहगही ।। ॥ गाया।। इंदोदेवा अणाकालो अदिष्टपूछो, तिथलोयतारणो तियलोयबंधु ॥ मिछत्तमोदविद्धसणो आयातिन्नविणासयो, देवादिदेवोदिघोर दि यकामेहिं ॥ १ ॥ ढाल ॥ एम पत्नणंति वण लवण जोईसरा, देव वेमाणिया नत्ति धम्मायरा ॥ केविकप्पहिया केविमित्तामुगा, फेवि वररमणे वयरोण प्रश्नचगा ॥ १ ॥ वस्त || तत्यञ्चुयश २ श्रा देस, करजोकी सब देवगण ले। कलस आदेस पामिय ॥ अदतुत रूप सरूप जुय कवण एह पुठंति सामिय, इंछ कहे जगतारणो पा रग श्रम्ह परमेस ॥ नायक दायक धर्मनो करिये तसु अजिस ॥ ॥ २. ढाल ॥ पूर्ण कलश शुचि नदकनी धारा, जिनवर अंगे न्हामे ॥ प्रातम निरमत नाव करता, वधते सुन्न परिणामे ।। श्र च्युत्तादिक सुरपति मऊन, लोकपाल लोकांत || सामानिक इंशणी पमुद्दा, श्म अनिषेक करंति ॥ १ ॥ पूर्णक० ॥ गाहा || तबईसा णसुरिंदो, सकंपनरोश्करिसुपसान ॥ तुम्हअंकमहतान, विणमि संअम्दअप्पेह ॥ १ ॥ तासकिंदोपत्नपार, साहनीयवछतम्मिघहुला . , , (३५०) हैं। ॥ आणाएकोण निएहह होनकयत्यान्नो ॥ २ .(कंसस ढाले) सोदन सुरपति पत रूप करि, न्हवणं करे अंगे। करियादि लेपन पुष्पमाल वि, वरं प्रान्तरण अन्नंग ॥१॥तंब सुरवर बहुँ जयश् रंवं कर, न घरि आणंद ॥ मोक्षमारंग सारयपति पायो, नांज सु हिव नवफंद ॥ ॥ को बत्तीस सौवनं नवारी, वाजते वर नाद, सुरपति संघ अमर श्रीप्रन्नुने, जननीने सुप्रसाद ॥ ३ ॥ आणी थापें एम पयंपे, अह्म निसतरिया प्रांज ॥ पुत्र तुह्मारों धणी अह्मारों, तारण तरण जिहाज ॥मात जतन कर राख ज्यो एहने, तुम सुत अझ आधार || सुरपति नगते सहित नंदीस रे, करे जिन नंक्ति नदार ॥ ५॥ नियश कप्प गया सर्व निर्जर, कंदता प्रनु गुण सार ।। दीक्षा केवलज्ञान कल्याणक, छा चित्त मकार ॥ ६॥ खरतर गर्छ जिनआणा रंगी, राजसार नवझाय ।। झान धरम दीपचंद सुपाठक, मुगुरुतणे तुपसाय || ७ || देवचंद जिन जगते गायों, जनम महोचंच उंद ॥ बोधवीज अंकूरो नवं स्यो, संघ सर्कल पाणंद ॥ ७ ॥ ढाल | इम पूजा नंगते करो, श्रातम हित कार्ज || तजिय विलाव निज नावमा, रमता सिवं राज ॥ ३० ॥ १ ॥ काल अनंते जे दूया, दोस्ये जेद जिणंद ॥ संपर सीमंधर प्रनु, केवलनाण दिणंद ॥ ३० ॥२॥ जन्ममदोग्य इण परे, श्रावक रुचिवंत ॥ विरचे जिनप्रतिमांतणो । नुमोदन रखंत ॥ ३० ॥ ३ ॥ देवचंद जिन पूजना, करतां नवं पार ।। जिन प्रतिमा जिन सारखी, कही मुत्र महार॥०॥णातिमात्रजासं० ॥ अथ देवचंदजीकृत अष्टंकारी पूजा ।। प्रयम जसं पूजा विमल केयंलनासननांस्कर, जगत जंतु मही दय कारणं ॥ जिनवरं यहुमान जलीयतः, शुचिमनाः प्रपयामिति ५५ ॥ ही श्री परमात्मने, अनंतानंत ज्ञानशंकये जन्म जरा ( ३५१) मृत्यु निवारणाय, श्रीमनिंद्राय जलं यजामहे ॥ १ ॥जच. दन पूजा || सकल मोहतमिश्र विनाशनं, परम शीतल नाव युतं जिनं ॥ विनय कुंकुम दर्शन चंदनै, सहज तत्व विकास कतेचयः ॥ ॥२॥ न ही० केसरंचंदनं यजामहे ॥२॥त्रीजी पुप्प पूजा ।। विक च निर्मल शुद्ध मनोरमे, विशद चेतन नाव समुनवेः ॥ सुप.रणा म प्रसून धनैर्नवैः, परम तत्व मयं हिय जाम्यहं ॥ , ही १० पुष्प यजामहे ॥ ३ ॥ चोथी धूप पूजा || सकल कर्म मधन दादन, बिमल संवर जावसु धूपनं ॥ अशुन पु. जल संग विवर्जनं, जिनपते पुरतोस्तु मुहर्पतः ॥ ४ ॥ नहीप धूपं यजामहे ।। ४ ।। पांचमी दीपक पूजा || नाविक नि मल बोध विकासकं, जिनगृहे शुन्न दीपक दीपनं ।। सुगुण राग दि शुइ समन्वितं, धतु नाव विकास कृतेजनाः ॥ ५॥ ही ५० दीपं यजामहे ! ॥५॥ ही अकत पूजा ॥ सकल मंगल केल नि केतनं, परम मंगल जाव मयं जिन ॥ श्रयति नव्यजना इति दर्श यन, दधति नाथ पुरोक्षत स्वस्तिके ॥ ६ ॥ न ही ५० ॥ अक्षत यजामहे ।। सातमी नैवद्य पूजा ॥ सकल पुल संग विवर्जनं, स हज चेतन नाव विलासकं । सरसनोजन नव्य निवेदनात्, पर म निर्वृत्ति नाव मदं स्पदे ॥नही प० नैवेद्यं यजामदे॥ ७ ॥प्रामी फल पूजा। कटुक कर्म विपाक विनाशनं, सरस पक्कफल बज ढोकना विहत मोक्ष फलस्प प्रनो पुरः, कुरुत सिइफलाय महाजन Un उही प० फलं यजामहे । (अ) इति जिनवर वृंदनक्तितः पूजयं ति, सकल गुणनिधानं देवचं स्तुति ॥ प्रतिदिवस मनंत तत्व मुद्भावपंति, परम सहजरूपं मोकं सौदंश्रयति ॥ ॥ॐ ही प०अर्धे यजामहे ॥ (वस्त्र) शको यया जिनपतेः तुर शैल चूला, सिंहासनो परिमित स्नपनावसाने ॥ दध्यक्षते कुसुम चंदनं गंध ( ३५२) धूपैः, कृत्वार्चनंतु दधाति सुवस्त्र पूजां ॥ १ ॥ है। श्री १० वरू यजामहे ॥ इति श्रष्टकारी पूजा ।। ॥ अथ सतरह भेदी पूजाकी विधी ॥ प्रथम स्नात्र करावे पीछे अष्ट प्रकारी पूना करे फेर रकेवीमें कुंकम दया केसरका सायिया करै पीछे शुद्ध जलका कलस केसरमिश्रित रुपया १ कलम हालै मुखकोस यांघ उत्तरासण कर तीन नवकार गुगै तीन वेर नमस्कार कर हाय के धूप देकर रकेवी हायमें घरै मन सुद्धकर खडा रहे ॥ ॥ अथ साधुकीरती मुनो कृत सत्तरह भेदी पुजा प्रारंभ ।। ॥ दूहा ॥ नाव नले नगवंतनी, पूजा सतर प्रकार || पर सिइ कीधी शेपदी, अंग ठठे अधिकार ॥१॥ राग सरपदो ॥ ज्योति सकल जग जागती, हरि अश्यो जा० सरसति समरि सुनिंद । सतर सुविध पूजातणी, पत्नणि परमानंद॥१॥ गाहा॥ न्हवण १ विवेवणं २ वत्ययुगं ३, गंधारुहणंच ४ पुष्फरोहरायं ५॥ मालारोहण ६ व नयं ७ चुन्न , पभागय ए अानरणे १० ॥ २॥ मालकलासुप वसुधरं ११, पुप्फ पगरंच १२ अध्मंगलयं १३॥ धूव नखेवो १४ गीययं १५, नर्से १६ वजं १७ तहा जणियं ॥ ३ ॥ सतर सुविध पूजा पवर, ज्ञाताअंग मकार ॥ पदसुता शेपदि परे, करियै विधि 'विस्तार ॥४॥ ।। अय प्रथम न्हवण पूजा ।। राग देसाख ।। • पूर्वमुख सावनं, करि दसन पावनं, अहत धोती धरी चिं 'त मानी रे, अश्योठ० ॥ विहत मुखकोसके हार गंधोदकै, सुनृत मणिकलस कर विविध वांनो ॥ य० ॥१॥ नमवि जिन पुंगवं, सोम इस्तेनवं, मार्जनं करियवा यारिवारि ॥०॥ जणिय कुस मांजली, कलस विधि मन रली, नवति जिन इंव जिम तिम अ गारी ॥०॥५॥ उदा । परमानंद पीयूप रस, न्हवण मुगति 'सोपान ॥ धरमरुपतरू सींचवा, जलधर धार समान ॥ १ ॥ पद . (३५) सी पूजा साचवे, श्रावक शुल परिणाम ॥ शुचि पखाल जिनतर्नु तणे, कर सुकृत हितकांम ॥ २ ॥ राग सारंग ॥ पूजा सतर प्र कारी, सुण जैनकी पू०॥ परमानन्द तिण उल्योरी सुधारस, तप- त बुझिय मेरे तनकी । पू० ॥ १ ॥ प्रनुकुं विलोक नमि जतन प्रमारजित, करत पखाल सुचि धारविनको । पू० ॥ न्दवरा प्रथ- म निज वृजन पुलावत, पंककु वरप जिमघनकी। पू०॥२॥ तरुणि तरणि लवसिंधु तरणको, मंजरी संपद फल वर धनकी ॥ पू०॥ शिवपुर पंथ दिखावन दोपी, धूमरि श्रापदवेल मरदनकी ॥ १०॥ ॥ ३॥ सकल कुशलरंग मिच्योरी सुमनि संग, जागी सुदिसा शुन मेरे दिनकी । पू० ॥ कहे साधूकीरति सौरंगनर करतां, श्राप्त फलो मेरे दिनकी । पू० ॥ ४ ॥ इति प्रयम न्दयण पूजा ॥ १ ॥ एसा पद पंचामृतसु न्हवण कीन । डावे पांवके अंगुठे जलधार दी । ।। अथ द्वितीय विलेपन पूना ॥ (सुंदर अंगलूदणेसे अंग मिनत्रित्रकाममानकर केसर सुगंधद्रव्य मिश्रित लेके खडार) रामगिरों में राग !! गात्र खूद जिन मनरंगसुं रे देवा, सखर सु धूपित वाससुं ॥ वाससूं हारे देवा वा०, गंध कसापसु मेलिये. ॥गा० ॥१॥ नंदन चंदन चंद मेलिये, दारे देवा नं० [मांदे मृग- मन कुंकम नेलीये, कर सोयै हारे दे० क०, रयत पिंग्गशि कचो. लिये । गा॥२॥ पा जानु कर खवै सिरै रे देवा, नाल कंजर उदरंत रे। उख हरे हारे देवा सुख कर, तिलक नवे अंग कीजोये। गा०॥ ३ ॥ दूजी पूजा अनुसरे,श्रावक दूजी पू०॥हरि विरचै जिम सुरगिरे, तिम करै हारे देवा ति० जिरा पर जनमन जिये ॥ गा० ॥ ४ ॥ राग ललितमें दूदा ॥ करहु विलेपन सुखतदन, श्रोजिनचंद शरीर ॥ तिलक नवे अंग पूजता, सहे जबोदधि तीर ॥१॥ मिटे ताप तसु देहको, परम शसिरता संग ॥ वित्त खेद सम नपसमें, सुखमें समरसीरंग ॥ २ ॥राग वेला ॥ विलेपन कोने ४ए , .
C.
नन सुमन
जिन भानु
दमानदिन अब मेरो
- मिलनगरि कुल जनप्राविका २ सब अंग न
र
सनेलाई नायु तन शुक्र
गेस. र ति दितिय
निरूहानी नव पूजिये।
परम करेन।
ITTER SEE विन्द अधिन अंग।
ऊन पनि हो.ज्ञ र ? राम गोनी ॥
रूह सेन्ट इन इन नविन लंपन अविवानिया ए, दारे
का जरख पर गुति, वतन युग कंति
अहिरसिपहरेदाशिनर वनविषिशको
म करिस्मारी पार जूहयो दे-
रने रहर जन्म एका वैरामी ॥
रेखमपूजन्हे मनोमायु
९ हे स्वाद दिही है पति वन,
निरजी ।
परसेका देतातीपूजा मेरस नाश,
देशमा मिस हे हम सब एस अमृत
पर सरकस संशर पुनति तृति-
र रकम पूजा (दादा)
३. पर
एक
रत्ने दाब सी इस परै, सुमति वचारत
तिर हरै, इद मोहात पात ॥ १ राग
देशमानइनसतममा, पुरष विपि पिर
( ३५५ ) वासु ए ॥ हा हो रे देवा कुप्तम चूरण चंदन मृगमदा, कंकोलतो अधिवासू ए ॥ हा०॥१॥ वास दसोदिति वासतें, जिन अंग नवंगू ए | हा० लाठि जवन अधिवासिया, अनुगामिक सरम अन्नं गू ए॥ २ ॥ इति || राग पूर्वीगौमी । मेरै प्रनुजीको पूजा आ- नंदमेलै, पू० ॥ वासन्नवन मोह्यो सबलो ए, संपदा नेवै ॥ पू० ॥ ॥ १ ॥ सत्तर प्रकारी पूजा, विजय देवा तत्ता ॥ अप्रमित्तगुण तोरा, चरण सेवैकि ॥ पू० ॥२॥ कुंकुम चंदन वासे, पूजिथे जिनं राज तताये, चतुर गति उरक गोरी, चतुर्थी धनकि ॥ ३ ॥ ५० ॥ इति चतुर्थी वासदेप पूजा ॥ (एसा कह चूर्णवास चढावे) ॥ अथ पांचमी पुष्पारोहण पूजा {{ पंचरंगै पुष्प उत्तम ले के खडा रहे ! • ॥ दूहा ।। मन विकसै तिम विकसता, पुहप अनेक प्रकार ।। प्रनु पूजा ए पंचमी, पंचमि गति दातार ॥ १ ॥ राग कामोद || चंपक केतकी मालती ए, ब० ॥ कुंद किरण मचकुंद ॥ सोवन जाई जूहिका, वनलसिरी अरविंद ॥ १ ॥ जिनवर चरण नचरि धरै ए, अ०॥ मुकुलित कुशम अनेक ॥ सिवरमणीसे वर वरे, विधि जिन पूज विवेक ॥ २ ॥ वि० ॥इति!! राग कानमो॥ सोहे री माई व 'रणे, मन मोहे री माश् वरणे॥ अहो वरणे, विविध कुसम जिन रणे सो० ॥ विकसी इसीय जपै साहिवकुं, राख प्रत्तु हम सर णे । सो० ॥ १॥ पांचमी पूजा कुशम मुकलितकी, कु० ॥ पंच विपै हां० पं० सु:ख हरणे । सो०॥ कहे साधुकीरति नगति लग वंतकी, नविक नरां हारे न सुखं करणें ॥ सो० ॥ ॥ इति ।। ॥ अथ छही पुष्पमालारोहण पूजा । । दूहा || वो पूजाए उती, महा सुरनि पुष्पमाल । गुरां गूंथी पापे गले, जेम दलै सुख जाल १ ॥ राग रामगिरी गुज नाग पुन्नाग मंदार नवमालिक!, मालिकासोग पारिघ कली . ।
( ३५६) एनला पा० ॥ मरुक दमणक वकुल तिलक वासंतिका, सास गुलाल पामल लिली ए || नसां पा० ॥ १॥ जासु मणि मो. गरा बेनला मालती, पंचवरणे गूंथी मालती ए॥ नसां गु०॥ दे माल जिनकंठ पीठे ग्वी लहलहै, जाशि संताप सब पालती ए॥ जला सशतिराग आसानरी |देखी दामा कंठ जिन अधिक एधतिनंदै, चकोरकू देखि देखि जिम चंदै ॥ दे॥१॥ पंच विधि चरण रची कुसमांकी, जैसी रयणा हे जै० यसि सुदर्मवै ।। दे० ॥ ॥२॥ ही रे तोमरपूजा सब मार धूजे ॥ सय यरियण हरि सं० दो तिम दे ।। दे० ॥ ३॥ कदे साधकीरत सकल प्रास्या सुख, नविक जगत हार न जे जिन वंदे ॥ ३० ॥ ॥ इति ही तोमर पूजा ॥ ६ ॥ (एसा कह फूलमाला अनुकू पहिराये 1) ॥ मय सातमी मंगीरपन पूना ॥ पांच रंगे फूल कैसररों अंगी र ॥ ॥ दूदा ॥ केतकी चंपक केचमा, सोने तेम मुगात ॥ चादो जिम चढती दुवैसातमी सुख सात ||१|| राग फेदारो गी॥ कुंकुम चरचित विविध पंच वरणक कुसममुं ए, हारे अ०॥ कुंद गुलायमुं पंपको दमणको जासमुंए ॥ १ ॥ सातमी पूजामें मंगी प्रसंकीर्य, अंप आवंक मिस माननी मुगति प्रासंगिये ए॥ २ ॥ ॥ शनि | राग रवी ॥ पंचवरणी अंगी रथी कुशम जाती, पं०॥ धुंद मचकुंद्र गुलाब सिरोमणि, कर करणी सोवन नाती ॥ पं०॥ 13 | दमक मस्क पास परमिंदो, चंग जुई ये नतयाती ।। पारपि चरण कवार मंदारो, विण पटक्स बनी नांती ॥ ५० ॥ ॥ २ ॥ मुरना स्निर रमण माती, नवी फुगति प्रत तिवाती। ६॥३॥नि मातमी नंगीचन पूजा मानसी । अपनी श्रारा राम इहा ॥ प्रगर मेहतागामार, गुमती पूना ग्राम । . - .
(३५७)
गंधवटी घनसार, सावे जिन तनु जायसें ॥ १ ॥ राग सोरठ।।
कुंद किरण शशि कजलो जो देवा, पावन घस धनसारो जी॥
सुरन्ति सिखर मृग नानिनो जी देवा, चुनरोदण अधिकारो जी!
॥१॥ वस्तु सुगंध जव मोरीयो जी देवा, अशुज करम चूरीजै जो।
अंगण सुरतरु मोरीयो जी देवा, तब कुमतीजन खीजै जी । तब
सुमतीजन रीकै जी ॥ २ ॥ राग सामेरी ॥ पूजोरी
माई जिनवर अंग सुगंधे, जि० पू० ॥ गंधवटी धनसार ऊदार, गोत्र
तीर्थकर वांध ॥ नलाश गो०पू० ॥१॥ अाठमी पूजा अगर से-
व्हारस, लावै जिन तनु रागै॥धार कपूर नाव धन वरपत, सामेरी
मति जाने । ललां सा०पू० ॥ २ ॥ इति ॥
11 अथ नवमी ध्वज पूजा
॥हा॥ मोहन ध्वज धर मस्तकै,सूहव गीत समूल ॥ दीजे
तीन प्रदक्षिणा, परसिद नवमी पूज ॥१॥ राग मेघगौमो॥वस्तु॥
सहसोयगर, देममय दंग ।। युतपताक पंचे वरण, घुमघुमत
घुग्घरीय बाजै । मृऽ समीर सहके गयण, ल०॥ जाण कुमतिद
सं संपत नाजै ।। सुरपति जिम विरचे धजा ए, हां ए वि० ।। न
वमी पूज सुरंग ।। न० ॥ तिण पर श्रावक धज वदन,
'प्राप दांन अन्नंग ॥ श्रा० ॥१॥राग नट्टनारायण ।। जिनराज
को ध्वज मोदन, ध्वज मोदना रे ध्वज मोदना । जि०॥ मोहन
सुगुरु अधिवासीयो, कर पंच सबद त्रि प्रदक्षणा, क० ॥ सधववधू
सिर सोहना ॥ २॥ जि. नांति वसन पंचवरण बन्यो री,
विधि कर ध्वजको रोहणा ॥ साधू नरात नवमी पूजा नव, पाप
नियाणा खोदणा ॥ ज०॥२॥ इति नवमी पूजा ।
(एकही घना बहाईने । पाली वानित्र वाजतां मयवती चांदीके पारमें
घरकर गीन ग्यान संयुक्त तीन पदसणा देकर प्रभु सन्मुख गुंडली कर पना पर गुरु
पास वासक्षेप करा के अभ सन्मुस घना विस्तार ।)
ति०॥
. ( ३५० ) ॥ अथ दसमी आभरण पूजा ॥ (एक रुपया अश्वा मुगटादिक आभरण ले के खडा रहे ॥) ॥ दूहा राग केदारमै ।। दसमो पूजा अाजरण, रचना यथाश्र नेक।सुरपति जिम अंगे रचे,तिम श्रावक सुविवेक||१|| सिर सोदे जिनवरतणे, रयण मुगट फलकंततिलकनाल अंगद नुजा, श्रवण कुंमल अति नंति ॥ २॥ राग अधन्नास गुंममहार ॥श्रासावरी॥ पाच पीरोजा नीलू ससलिया, मोती माणेक लाल रसणिया, हीरा सोहे रे ॥ धूनी चनी मुल कर केतना, जातिरूप सुत्नग अंक अं- जना, मनमोहे रे ॥ १ ॥ मौलि मुगट रयणै जम्यो, काने कुंमल हारे अति जुगतै जुब्यो नर हारू रे, मन वारू रे ॥ नाल तिलक वाहे अंगदा, आजरण दशमी पूजा मुदा सुखकारू रे, उखहारु रे॥२॥ राग केदारो॥ मनु सिर सोहै मुगट मणि रयण जव्यो, रय० ॥ अंगद बाहु तिलक नालस्थल, यहुनीको कवण घड्यो । ॥प्र० ॥ १ ॥ श्रवण कुमल शशि तरुण मंगल जीपे, सुरतरुसे अलंकरयो । उखकेदार चमर सिंहासन, स्त्र तिर वरि धरघो, अखरुत नचित वस्यो ।प्र. ॥शाति ॥रोक च्यालरणादि चढाये।। ॥ अथ पारमी फूलपर पूजा । ॥ दूहा । फूलघरो अति सोनतो, फंदे सहके कुल ॥ महके परिमल फल महा, ग्यारमी पूज अमूल ॥१॥ राग रामगिरी। कोज अंकोल राय वेलि नवमालिका. कुंद मचकुंद वर विच कल ए॥ अयोतिलक दमराकदलं मोगरा परिमलं, कोमला पारिभ पामल ए। हां य० ॥ प्रमुख कुसमै रचै विजुवनकू रुथे, कुश मगेदे विच तोरणू ए ॥ दारे य० ॥ गुच चंद्रोदयं मुंबकानन्नयं, जालिका गोख चित्तचोरणुं ए॥ अ० ॥२॥ राम रामगिरी । मेरो मन मोह्यो माईरी क्षधर पाणंद मिल, छ०॥ असत नसत दाम अधरी मनोहर, देखत तबही सय अरित खिसे ॥१०॥2॥ .
( ३एए ) कुसम मंझप धन गुच चंशेदय, कोरणी चार विनाण सके।ग्या रमी पूजा वणी हे रामगिरी, विवुध विमान जैसें तिपुरिन । ॥शामे०॥ इति इग्यारमी फूलवर पूजा ॥ (फूलघर चढाजै ।) • ॥ अथ चारमी पुष्पवर्षा पूना ॥ पंचरंगे फूल अथवा गुलाबजल लेके खदा रहे ।। ॥ दूदा ॥ वरपै बारमी पूजमें, कुसम वादलिया फूल ।। दर रा ताप उख लोकको, लानु समा बहुमूल ॥ १॥ राग नीम मलदार कमखेकी जाति ॥ मेघ बरसै जरी पुप्फ वादल करी, जानु परिमाण कर कुसम पगरं ।। पंचधरणेवण्यो विकच अनुक्रम चिएयो, अधोईते नही पीक पसरं ॥ मे०॥ १॥ वास महके मिल जमर जमरी निलै, सरस रसरंग तिण दुख निवारी | जिराप आगे करे सुरप जिम सुख वरै, धारमी पूज तिश पर अगारी । मे० ॥२॥ राग नोममल्हार ॥ पुप्फ वादलीया वरतै सुसमां, पदो० ॥ यो- जन अशुचि दर वरस गंधोदक, मनुदर जान समां 1 पु॥१॥ गमन धागमनकी पीर नही तसु, ह जिनको अतिसय सुगुणें ।। गुंजतर मधुकर श्म पन्नरी,गुं०॥ मधुर वचन जिनगुण थुप॥ पु० ॥२॥ कुसमसुपरि सेवा जो करर, तसु पीक नही सुमणे, पु०॥ समवसरण पंच वरण अधोवृंत, विवुध रचै सुमना सुसमा पु॥ १३ ॥धारमी पूज नविक तिम करे, कुसम विकस इस नचरै ।। तसु नीमबंधन पंधरा हुवे, जे करहिंजे जिन नमें ॥ पु०॥४॥ इति चारमी पुष्पवृष्टि पूजा ।। अय तेरी अपमंगलीक पूजा न ल लेके खडा रहे। ॥ दूदा ॥ तेरमी पूजा अवसरे, मंगल थप्ट विधान ॥ युवति रचे तुमतै सही, परमानंद निधान ॥ १ ॥ राग वसंत ॥ श्रतुल विमल मिटया, अखंग गुणै निख्या, साल रजततया तंउला ए ॥ श्लपरा समाजक विध पंच वरणक, चंद्रकिरण जैसा कजला ए ॥ १ ॥ अ० ॥ मेल मंगल तिरबै सयल मंगल से, जिनप प्रागै सुधानक . - -
धेर ए ॥ तेरमी पूजा विधि तेरमी मन मेरे, अष्टमंगल अष्टसिंह
करे
ए'! अ०॥ २ ॥ राग कल्याण ॥ हां हो पूजा वी ते रसमें,
रंसमें ३ हा हो ते० ॥ दर्पण नशसन मंद्यावर्स पुर्ण कुन्न, मयुग
श्रीवछ तसुमें ॥ वईमान स्वस्तिक पूज मंगलकी, आनंद कल्याण
सुखरसमें ॥ १ ॥ पू० ॥ इति तेरमी पूजा ॥
॥ अथ चवदमी धूप पूजा धूप लेके खडा रहे ॥
॥ दहा ॥ गंधवटी मृगमद अगर, सेल्हारस धनसार । कर
प्रन पागल धूपणा, चवदमी अरचा चार ॥ १ ॥ रांग वेलाउन ।
रुणांगर कपूर चूर, सोगंध पैचेपूर ।। कुदरुक सेल्हारस सार, गंध
वटी पनसार ॥ १ ॥ गंधवटो घनसार चंदन, मृगमदारस लियै,
श्रीवास धूप दसांग अंबर, सुरनि बहु द्रव्य मेसियै ॥ वेरलिय दंग
कनकममित धूपांणो कर धरै, जयवृत्ति धूप करति जोग रोग
सांग अशुन दरे॥२॥ राग मालवी गोमो ।। सब अरति मयन
मुदार धूपं, करति गंध रसाल रे, देवाक० ॥ धामधूमावलिय धूसर,
कप पातक गाल रे, देवा क० ॥१॥ नवंगत मूर्चत नायिकुम
धमधे करनाल रे ॥ चवदमी वामांग पूजा, दीये रयण विसाल रेत
धारती मंगल माल रे, मालवीगोमी ताल रे ।। स० ॥ २॥ इति
चवदमी धूप पूजा ॥ (एसा पढके धूप खेय ॥
॥ अय पनरमी गीतवान पृना ॥
॥ दूहा ॥ कंठ नलै पालापकर, गावो जिनगुन गीत ॥
नायो अधकी नावना, पनरमी पूजा प्रीत ॥ १ ॥ श्रीरागमें
प्रार्या ॥ यदनंत फेवसमनंत, फलमस्ति नगुण गानं ।। गुण
वर्ण तान वाये, मात्रा नापासपयुक ॥ १ ॥ सप्त स्वर संगीत,
मा यतादि सास करणेश, चंबर चारोचारी गोतं गानं मुजीपूर
राग श्रीनाग | जिनगुग गान शुत अमृतं, सार मंज्ञादिय
..li, केस जिम नि फल अतं ॥ निः॥१॥नियुष
(३६१) कुमार कुमरी पालापै, मुरज पंग नाद जनित ॥ जि॥ पाउप्र घंध धूयो प्रतिमान, पायति बंद सुरति सुमतं ॥ जि०॥२॥ सबद समान रुच्यो त्रिनुवनकुं. सुरनर गावे जिन चरितं । सप्त स्वर मान शिव श्रीगीतं, पनरमी पूज हरै उरितं रे ॥ जि० ॥३॥इति पू॥ ॥ अथ सोलमी नाटिक पूजा || ( कुमार कुमरी नाटिक करै ।) ॥ दूहा ॥ करजोमी नाटिक कर, सम सुंदर सिणगार ।। नवनाटिक ते नहि जमे, सोलमी पूजा सार।। १ ॥ राग शुइनट्ट काव्यं ॥ नावादिपवणा सुचारु चरणा संपुन्न चंदानना, सपिम्मा तम रूव वेत वयसो मतेन कुंनत्यणा । लावमा सगुणा पिकस्स रवई रागाईया लावणा, कुम्भारी कुमरावी जैन पुरन नचंति सिं गारणा || १ ॥ गद्यं || तएणते अप्सयं कुमारिकुमरीन सूरयाने देवेणं संदिघा रंगमंझपविन जिणनमंता गायंता वायंता नचंतित्ति ॥२॥ राग नह त्रिगुण ।। नाचती कुमार कुमरी, शगमदि तत्ताये ॥ ॥ शगमदिरक.यौगिश्न, मुखेतत्ताय । अ०॥ ना० ॥ वे पु वीणा मुरज बाजे, सोलही सिणगार साजै ॥ तनन्नन्नन्नेय ।। अईयो० ॥ घणण ध्रगण घणणण घुग्घरु घमके, रणमसमश्य ॥ ॥ अश्यो० ॥२॥ ना०॥ कसंती कंचुकि तरुणी, मंजरी कार के रणी ॥ सोनंती कुमरीय ॥ अइयो० दस्तकं दावादि नावे, ददन्ती जमरीय ॥ ना० ॥ ३ ॥ सोलमा नाटिक्कतणी, रावन्न कीनी ॥ सुगंध तनत्तेश्य 11 अ० ॥ जिनप जगते नविक लोगा, आणंद तत्तेत्येश्य ।। अ० ॥ ना० ॥9॥ इति सोलमी पूजों। ॥ भय सतरमी वाजिन पूजा ! ॥ दूहा ।। ततवन सुखिरै पानधै, वाजिन चौविव वाय ।। जगत नली भगवंतनी, सत्तरमियै सुखदाय ॥ १ ॥ गाहा ।। सुर मद्दल कंसालो, महुयर मद्दल सुवऊए पणवो । सुरनारि नंद तूरो, पारा तूं नंद जिणनाद ॥ २ ॥ राग मधुमाधवी ॥ तूं नन्दिमा ५६ सूर/याने ब ( ३६३) न्द बोलत नंदी, चरणकमल जसु जगत्रय वैदी। तूं०॥ ज्ञान निर्म स वावन मुखवेदी, तिबल बोलै रंग अंतहि आन्दी । तूं० १.१ ॥ नेरी गयण वाजंती कुमति ताजंती, सेवे जैन जैणावंती ॥ जैन शासन जयवंत नंदती, उदयसिंघ प.रपरिय वदंती ॥ तूं० ॥ २ ॥ सेव नविक मधुमाधव फेरी, नवनी फेरी नप्पन्नणंती ॥ कहे साधु सतरमी पूज वाजिब सब, मंगल मधुर धुनि कर कदंती॥ तूं० ॥ ३ ॥ इति सतरमी पूजा ॥ ॥ अय कलश पूजा ।। राग धन्यासिरी ॥ ॥ नवि तूं नण गुण जिनके सब दिन, तेज तरण मुखराजै ॥ ते० ॥ कवित शतक श्राप थुपत शक्रस्तव, थुय रंगे हम वाजे ॥ नवि० ॥ १ ॥ अगदलपुर शांति शिवसुख दाइ, नवनिधि सि ६ आवाजै || सतर सुपूज सुविध श्रावककी, नणी में नगति हि त काजै ॥ नवि० ॥२॥ श्रीजिनचंद सूरि खरतर पति, धरम वचन तसु राजै ॥ संवत सोल अदार श्रावण धुर, पंचमि दिवस समाजै ॥०॥३॥ दयाकलश गुरु अमर माणिक्यवर, तासु पसायै सुविध हुय गाजै, कहै साधुकीरत करत जिन संस्तव, सब लीला सुख साजे | न०|| 4 || इति सतर नेदी पूजा संपूर्ण । ॥ अथ आरती करण विधि तथा आरती ।। पूजा भये पीछे वस्त्र पहरकर उत्तरासण करकै तिलक करके रकवीमें स्वस्तिक चावल सुपारी घरकर दक्षिणावर्चसे आरती करै। ॥ अथ श्रारती लि० ॥ जै जै प्रारति शांत तुमारी, तोरा चरणकमलकी में जावं बलिहारी जै जै०॥१॥विश्वसेन अचिराजी केनंदा, शांतिनाथ मुख पूनमचंदा ।। जै० ॥२ || चालीस धनुप सोवनमें काया, मृग संधन प्रनु चरण सुहाया ॥ १० ॥ ३ ॥ च क्रवर्ति मनु पंचम सोहे, सोलम जिनवर जग सहु मोहे ॥ जै० ४ ॥ मंगलं आरती लोरहिं कीजे, जन्म को लादो सीजे ॥ ॥ , .. ( ३६३ ) जै० ॥ ५ ॥ करजोमी सेवक गुण गावे, सो नर नारी अमरपदः पावै । जै० ।। ६ ।। इति श्रीधारती संपूर्ण ॥ ।। अथ नवपदको पूजामें जो अवस्य चीज चहिये उसकी याददास्ती ।। ॥ पंचामृत दूध दही घृत मिश्री जल केसर चंदन कपूर कस्तूरी कुंकुं भोली छूटेफूल फूलोकीमाला फूलोकाचंद्रुवा धूप चावल गहूं चोकीदाल मूंग उडद नव प्रकारका नैवद्य नवतरेका फल नव प्रकारकी पकान खनली मिश्री पतासा बोला वगैरे अंगलूहणो के वास्ते स्वेतवस्त्र वासक्षेप गुलाबजल अत्तर नारेल इग्यारे नवनालीकैकलस ॥९ रकेवी तसला पारसी मंगलदीपक घी अंगीसमोसरण थाप नामें रोकनाणा रु१) ज्ञानपूजा नारेल समेत । विशेष विधि गुरुमुखसें जाणनी । ।। अथ सिद्धचक्रजीकी वडी पूजा लिख्यते ॥ ॥ अथ प्रथम अरिहंतपद पूजा 1 । दूहा । परम मंत्र प्रशमी कर), तास घरी नर ध्यान ।। अरिहंतपद पूजा करो, निज शक्ति प्रमाण ११५ काव्य । पन्न सन्नाण महोमयाणं, सप्पामि देरा सरासंधियाणं ॥ सदसणाणं 'दिय तळागाणं, नमोश होउ सयाजिणाणं ॥ १ ॥ नमोनंत संत प्रमोद प्रदानं, प्रधानाय नव्यात्मने नास्वताय ॥ श्रया जेदना ध्यांनो सौख्यन्नाजा, सदा सिद्धचक्राय श्रोपालराजा ॥ २ ॥ क स्या कर्म डुममर्म चकचूर जेणे, जला नव्य नवपद ध्यानेन तेणें ॥ करी पूजना नव्य नावे त्रिकाले, सदा वालियो श्रातमा तेण कालै ॥ ३ ॥ जिके तीर्थकर कर्म उदये करीनै, दिये देसना नव्य ने हित धरीनै । सदा आठ महापानिहारे समेता, सुरेसे नरेसे स्त व्या ब्रह्मपूता ॥ ॥ कस्या धातिया कर्म व्यारे अलग्गा, नवोप ग्रही व्यार ठे जे विलग्गा ॥ जगत्पंचकल्याणके मुख पांमै, नमो तेह तीर्थकरा मोक्षकांमै ॥ ५ ॥ ढाल ॥ तीरश्रपति अरिहा नमुं, धरम धुरंधर धीरो जी ॥ देसना अमृत बरसता, निज वीरज वर्म वीरो जी ।। तो॥नलालो।बर अखय निर्मल झान नासन सर्व नाव प्रकासता, निज शुद्ध अक्ष आत्म नावे चरण दिरता वास - (३६४) ता| जिन नामकर्म प्रस्ताव अतिसय प्रातिहारज सोन्नता, जगजंतु फरुणावंत नगवंत अधिकजनने योलता ॥६॥ दाल ॥ श्रीसी मंधर साहिप आगे॥ ए देसी । तीजे नव वर थानक तप कर, जि न यांध्युं जिननाम || चनस इई पूजित जे जिन, कीजे तास प्र पाम रे जविका सिक्ष्चक पद वंदोरे ।। न० ॥ जिम चिरकाले में दो रे ॥०॥ नपशमरसनो कंदो रे॥१०॥रलत्रयीनो हुंदो रे ॥ न०॥ सेवे सुरनर इंदोरे ॥ न० सि० ॥७॥ए श्रांकणी ॥ जे हने होय कल्याणक दिवसे, नरके पिए नजवायूँ ॥ सकल अघि क गुण अतिशयधारी, ते जिन नमि अप टायूँ रे ॥ २० ॥सि०॥ ॥जे तिहुं नाण सम्मग्ग कपना, जोग करम खिरा जांगी। लेर दीक्षा सिक्षा दिये जगने, तेनमिये जिन नाणी रे॥०सि० ॥ ए । मदागोप महामादण कहिये, निर्यामिक सत्यवाद ॥ जप मा एहवी जेदने गजे, ते जिन नमिये नचाह रे ॥०॥ सि ।। ॥१०॥श्राव प्रातीदारज जसु गज, पेंत्रीस गुणयुत वाणी जे प्रतियो धे करे जगजनने, ते जिन नमिये नचाह रे । न० ॥ सि० ॥११॥ ॥ ढाल ॥ अरिहंतपद ध्यातो थको, दवह गुण पर्यायै रे ।नंद छेद फरी पातमा, अरिहंतरूपीथायै रे ॥१२॥वीर जिणेसर नपदिसे, सां नलज्यो चित लाई रे ॥ आतम ध्यांने आतमा, शदि मिसे सब पाईरे । वी० ॥ १३॥ न ही श्री परमात्मने, अनंतानंत ज्ञान शक्तये ॥ जन्म जरा मृत्यु निवारणाय, श्रीमत्तिश्चक्राय अटेश्व्यं यजामहे स्वाहा ।। इति प्रथम अरिहंतपद पूजा ॥ ॥ अथ द्वितीय श्रीसिद्धपद पूजा ॥ दूहा ॥ दूजी पूजा सिक्ष्की, कीजे विल खुसिया ॥ शुन्न करम दूरै टले, फलै मनोरथ माल ॥ १ ॥ काव्य [सिंहाण माणंद रमालयावं, नमोश्त चनकयारा ॥ सम्मग्ग कम्मरकयका .
. . रगाणं, जम्मंजरा उस्क निवारगाणं ॥ १४ ॥ करी आठ कर्म खंय पार पांम्घा, जरा जन्म मरणादि जय जेग वाम्या ।। निरावरण जे श्रात्मरूपें प्रसिक्षा, थया पार पामी सदा सिध्बुः॥ १५ ॥ त्रि लागोनदेवावगादास्मदेसा, रह्याज्ञानमयजातिवर्णादिलेसासदानंत सौख्याश्रिताज्योतिरूपा, अनावाघयपुनर्नवादिस्वरूपा ॥ १६ ॥ ॥ चाल ॥ सकल कर्ममल कय करी, पूरण शुइ स्वरूपो जी॥ व्यावाध अनुतामई, प्रातम संपत नूपो जी ॥ उल्लालो ॥ जे थातम सहज संपति, शक्ति व्यक्तिपणे करी ॥ स्वव्यक्षेत्र स्वका सन्नावै, गुण अनंता श्रादरी ।। स्वस्वन्नाव गुणपर्याय परणति, सि द्धसाधन परनणी, मुनिराज मानसरईस समवम, नमो सिह महा गुणी ॥ १७ ॥ ढाल । समयपएसंतर अणफरसी, चरम तिनाग विसेस ॥ अवगाहन सही जे शिव पुहता, सिह नमो ते असेसारे ॥ १७ ॥०॥ पूरब प्रयोगने गति परणामे, बंधन छेद असंग ॥ समय एक करगति जेहनी, ते सिह प्रणमो रंग रे ॥ न० ॥ ॥१७॥ सि. ॥ निरमल सिसिलाने ऊपर, जोयण एक लो कंत | सादि अनंत तिहां घिति जेहनी, ते सिक्षप्रणमो संत रे ।। ॥२०॥नासि०॥ जाणे पिण न सके कही पुर गुण, प्राकृत तिम गुण जास ।। नपमा विश नांगी नवमांहे, ते सिइ दिन नल्लास रे॥न० ॥ २० ॥ सि० ।। ज्योतिसुं ज्योति मिली जनु अनुपम, 'विरमी सकल उपाधि | आतमराम रमापति समरो, ते सिइ स हज समाधि रे ।। न० ॥२१॥ लि० ॥ दाल ॥ रूपातीत स्वन्नावं जे, केवलदसणनाणी रे ॥ ते ध्याता निज प्रातमा, होय लिइ गु ण खाणो रे । वी० ॥ २२ ॥ ॥ ही. इति श्रीसिद्धपद पूजा ।। ॥ अय वृतिय आचार्यपद पूजा ॥ दूदा ।। दिव प्राचारज पदतणी, पूजा करो विशेप ।। मो ॥
. इतिमर दूरै हरे, सूकै नाव असेष ॥ १ ॥ काव्य॥ सूरीशदूरीकय कुग्गहाणं, नमोरसरिसमप्पहाणं ।। सद्देससा दाणसमायराणं, अ स्कंमत्तीसगुणायराणं ।। नमूं सूरिराजा सदा तत्वताजा, जिनॅशग में प्रौढ साम्राज्यनाजापवर्गवर्गित गुणेशोत्नमाना,पंचाचारने पा सवेसावधाना॥२॥ नविप्राणिने देशना देशकाले,सदाअप्रमत्ता यथा सूत्र पालै । जिके सासनाधार दिग्दंतकल्पा, जगत्ते चिरंजीवज्यो शुइजम्पा ॥३॥ ढाल ॥ प्राचारज मुनिपति गणी, गुणवत्तीसे धामो जी ॥ चिदानंदरसस्वादता, परतावे निझामो जी उल्लालो ॥ निकाम निरमल शुद्ध चिदधन, साध्य निज निरधारथी ॥ वर झान दरसन चरण वोरज, साधना व्यापारथी ॥ नविजीववोधक तत्वसोधक, सयलगुण संपतिधरा ।। संवर समाधी गत ऊपाधी, बिंधत पगुण पादरा ॥ २५ ॥ ढाल ॥ पांच प्राचार जे सूघा पालै, मारग नावै साचौ ॥ ते प्राचारज नमिये तेहसुं, प्रेम करीने या चो रे ॥॥ २६ ॥ ति|| वर उत्तीसगुणेकरि सोने, युगप्रधान जगवोदै । जगमोहे न रहे खिण कोहे, सूर नमूं ते जोदे रे ॥ ज० ॥ २७ ॥ सि० ॥ नित अप्रमत्त धरम नवएसे, नहि विकथा न कपाय ॥ जेहने ते प्राचारज नमियै, अकलुस अमल श्रमाय रे न० ॥ २० ॥ सि० ॥ जे दिये सारण वारण चोयण, पमिचो वण वलि जनने ॥ पटयारी गच्चधुन आचारज, ते मान्या मुनिम नने रे ॥ ज० ॥ २ ॥ सिमा अत्यमिये जिन सूरज केवल, वंदी ने जगदीयो ॥ नुवन पदारथ प्रगटनपटुते, आचारज चिरंजीवो ॥न ॥ ३० ॥ लि०॥ ढाल ॥ ध्याता आवारज नला, महामं । शुन्न ध्यानी रे ॥ पंचप्रस्थाने आतमा, आचारज दुय प्राणी रे वी० ॥ ३१ ॥ में ही प्राचार्यपदे अष्ट व्यं यजामहे स्वाहा ३ ॥ अथ चोथी पाठरुपद पूजा ॥ ॥ दूहा ॥ गुण अनेक जग जेदना, सुंदर शोनित गात्र ।।
( ३६७) नवझायापद अरचिय, अनुन्नवरसनो पात्र ॥१॥ काव्य || सुतस्य वित्यारणतप्पराणं, नमोरवायगकुंजराणं ॥ गणस्ससंधारणसायरा ए, सधप्पणावङियमछराणं ॥ १ ॥ नदी मूरि पिश सूरिगुणने सु दाया, नमूं वाचकात्यक्त मदमोहमाया॥ वलि बादशांगादि सूत्रार्थदा में, जिके सावधान निरुज्ञान्निधाने ॥ २ ॥ धरै पंचनेवर्गवतिगु गौधा, प्रवादिपिोछेदनेतुल्यसिंघा ॥ गुणीगसंधारणेस्थजपूता, नपाध्यायतेबंदिये चित्प्रनता ॥ ३ ॥ दाल ।। खंतिजुश्रा मुत्तीजुश्रा, अनाव मध्वजुत्ताजीn सच्चंसोयअकिंचणा, तवसंयमगुणरनाजी ॥ उल्लालो ॥ जे रम्या ब्रह्मसुगुप्तगुप्ता, सुमति सुमता शुलधरा । स्या छादवाद तत्वसाधक, श्रात्मपरविनंजनकरा ॥ नवनीसाधनधी रसासन, बहनधोरीमुनिवरा ॥ सिहांतवायनदानसमरय, नमोपात कपदघरा ॥ ३३ ॥ ढाल ॥ हादशग्रंगसिझाय करे जे, पारगधारण तास ॥ सूत्र अर्थ विस्तार रलिक ते, नमो नवझाय नहास रे ॥ न० ॥३॥ सि. ॥ अर्थसूत्रने दानचिनागे, प्राचारज नवझाय ।। नवत्रिपदे लहै शिव पद, नमियते सुपसायरे॥०॥३५॥ ति. ॥ मुरखशिप्यनीपायेजेप्रनु, पाहणने पक्षवाणे ।। ते वझाय स कलजन पूजित, सूत्रअर्थ सविजांणे रे ॥ ज० ॥३६॥ सि० ॥रा जकुमर सरिखा गणाचिंतक, प्राचारजपद योग, ते उवझाय सदा ते नमतां, नावै जवनय सोग रे ॥ न० ॥ ३३ ॥ सि० ॥ बावनाचंद नरस समवयण, अदितताप सवि टाले ॥ ते नवझाय नमिजे जे चलि, जिनशासन नजवाले रे ॥न० ॥ ३० ॥ सि० ॥ ढाल ।। तपसिझायै रत सदा, हादस अंगनो ध्याता रे ॥ उपाध्याय ते प्रातमा, जगबंधव जगत्राता रे ॥ वी० ॥ ३ ॥ॐ ही. श्रीपा कपदे अष्ट व्यं यजामहेस्वाहा ॥ इति चतुर्थी पूजा । ॥ अथ पांचमी साधूपद पूजा ।। ॥ दूदा ॥ मोदमारग साधननणी, सावधान श्रया जेह ।। - . (३६७) ते मुनिवरपद वंदता, निरमल पाये देह ॥१॥ काव्य । साहूणे से साहियसंजमाणं,नमोरशुद्धदयादमाणं । तिगुनगुनाणसमाहियाणं, मुणीणमाणंदपयआिणं ॥ करेसेवनासूरिवायगगणीनी, करुंवर्णना तेहनीसीमुणीनी ॥ समेतासदापंचसमतेत्रिगुप्ता, त्रिगुतैनहाकाम लोगेपुलिप्ता ॥ १ ॥ वसोबाह्यअन्यतरैग्रंथटाली, दुश्मुक्तिनेयो गचारित्रपाली शुलष्टांगयोगैरमै चित्तवाली, नमुं साधुने तेह निज पा प टाली || ॥ ४२ ॥ ढाल ॥ सकल विपयविप वारिनें, निका मो निस्संगी जी ॥ नवदव ताप समावता, प्रातम साधन रंगी जी ॥ स० ॥ जे रम्या शुद्ध स्वरूप रमणे देह निर्मम निर्मदा, कानसग्गमुज्ञ धीर श्रासन ध्यांन श्रन्यासी सदा ॥ तप तेज दो कर्म जीप नैव वीपे परनणी ॥ मुनिराज करुणा सिंधु त्रिनुवन प्र णमो हितन्नो ॥ ५३॥ ढाल || जिम तरुछने जमरो वेस, पीमा तसु न उपाय ॥ लेई रस धातम संतोपे, तिम मुनि गोचरी जाय रे॥ ॥४॥ सि० ॥ पांचवीने जे नित जीपे, पकाया बंधु प्रतिपाल ।। संजम सतर प्रकार पाराधे, चंदु दीनदयाल रे॥ना ॥ ४५ ॥ सि० ॥ यढारसहस सीखंगना धोरी, अचल आचार च रित्र ।। मुनिमहंत जयणायुत वंदी, कीजै जनम पवित्र रे ॥१० सि० ॥ ४६॥ नवविध ब्रह्मगुप्त जे पाले, वारे विध तपसूग !! हवा मुनि नमियै जो प्रगटै, पूरव पुन्य अंकूरा रे ॥ ज० ॥ सिका सोनातणी पर परीक्षा दीसे, दिन२ पढते वान ॥ संजम खप करता मुनि नमिय, देसकाल अनुमाने रे ॥नसिक दाल ॥ श्रममन जे नित रहै, नापि दरपै नधि सोचे रे । साधु म था ते यातमा, स्यं मुंमै स्युं सोचे रे || वी० ॥ ४ ॥ है। साधुपंदं थष्ट व्यं यजामहे वादा । ॥ पय सही दर्शनाद पूना निष्पते ।। • || दूदा । जिनपर नाका बना, तवासी परतीन || ते सम्यग्दर्शन सदा, 'प्रादरियै शुन रीत ॥ १ ॥ काव्य । जिणु ततेरुश्वरकणस्त, नमोर निम्मसदसणस्स ॥ मिछचनासाइतमु ग्गमस्त, मूलस्ससम्ममदाउमस्त ॥ विपर्यासहोवासनारूपमिथ्या; टलेजेअनादी अजेकुपथ्या ॥ जिनोक्तदुसहजश्रीशुभ्यानं, कदि पैदर्शनंतेदपरमंनिधानं॥५०॥विनाजेहथीज्ञानमज्ञानरूपं, चरित्रवि चिनवारण्यकूपाप्रतिसातनेनपसमेहयतेहहोवे, तिहांआपरूपैस चापापजो॥५१॥ढालसम्यग् दरसण गुण नमो, तत्व प्रतीत सरू जी जीजसु निरधार स्वन्नाव चे, चेतन गुण जे अरूपी जी॥ चाल । ने अनूप श्रद्धा धर्म प्रगटै सयल पर ईहा टले, निज शुभसना नाव प्रग = अनुनय करूणानच्छलै बहुमान परणित वस्तुतत्वे अहव सुखकारण णे, निज साध्य दृष्टै सरव करणी तत्वता संपति गिणै॥५२॥ढाल॥शुः व गुरु धर्म परीक्षा, सद्दहणा परिणामाजेिद पांमी तेह नमीजै, म्यग्दर्शन नाम रे।। न० ॥ ५३॥ सि०|| मल उपशम कय न शम जेहश्री, जे हो त्रिविध अनंग || सम्यग्दर्शन तेह नमोजे, जनधरम दृढ रंग रे ॥ न० ॥ ५५ ॥ ति०॥ पांच वार नपश लहीजे, कयनपसमीय असंख / एक वार कायक ते सम्यक, शेन नमी असंख रे ॥ न० ॥ ५५ ॥ सि० ॥ जे विण नांण प्र ण.न.होवे, चारित्रतरु नवि फलियो ॥ सुख निरवाण न जे - लदिये, समकित दरसन बलिच रे || न० ॥ ५६ ॥ ति.॥ कसर बोले जे अलंकरियो, ज्ञान चारित्रनुं मूल ॥ समकिंतदर्श ते नित मणमू, शिवपंथन अनुकूल रे ॥३०॥ ५७ ॥ सि० ॥ ढाल ।। समसंवेगादिक गुण, खयनपसम जे प्रावै रे ॥ दर्शन ते. न आतमा, स्युं होय नाम धरावै रे ।। वी० ॥ ५० ॥ है। दर्शनपदे अष्ट व्यं यजामहे स्वाहा ॥ ६ ॥ - · || अथ ७ मी ज्ञानपद पूना ॥ ॥ दूहा ।। सप्तम पद श्रीज्ञाननो, तिश्चक तपमाद ॥ या ४७ . D. ( ३७०) राधीजै शुन मनें, दिन२ अधिक नचादं ॥१॥ काव्य || अन्नाण सम्मोहतमोहरस्स, नमो२ नांण दिवायरस्त ॥ पंचप्पयारस्सुवगा रगस्त, सत्ताणसचत्यपयासगस्त ।। होइंजेहथीज्ञानशुध्मबोधे, या वर्णनासै विचित्राविवोधै ॥ तिणेजाणीयेवस्तुपट्व्यन्नावा, नहीं विकच्चानिजेचास्वन्नावा || एए ॥ होइपंचमत्यादिसुग्यानन्नेदे, गुरु पासथीयोग्यतातेहवेद || वलीझेयदेयाउपादेयरुपै, लहैचिचमांजे मध्यांने प्रदीपै ॥ १० ॥ ढाल || लव्य नमो गुण ज्ञानने, स्वपरनं. काशक नाव जी ॥ परयाय धरम अनंतता, नेदानेद स्वजावै जी चाल । जे मोक परगति सकस झायक बोधवास विलासता, मति आदि पंच प्रकार निरमल सिद्धसाधन लंग्ना' स्याहावतं गी तत्वरंगी प्रथम नेद अनेवता, सवि कख्य ने अधिकल्प वस्तु सकल संसय छेदता ॥ ६१ ॥ दास ॥क्ष अनशन जे विण ल हिये, पेय अपेय विचार ॥ कृत्य अकृत्य न जे विन सहिये, ज्ञान ते सकल श्राधार रे॥न०॥६॥ सि ॥प्रथम ज्ञान में पीठे अहिंसा, श्रीसिद्धातैनारव्यु ॥ ज्ञानमें वंदो ज्ञानमनितो, ज्ञानीये सिवसुख पा ख्यु रे ॥०॥६३०सि० ||सकल क्रियानु मूल ते श्रध्या, तेदनु मूल जे कहिये । तेह ज्ञान नित वंदीजे, ते विन कहो किम रहिये रे||H० ॥६॥ सि० ॥ पांचज्ञानमांदे जेद सदागम, स्वपरप्रकाश क तेद ॥ दीपकपर विन्नुवन नपगारी, वलि जिम रवि शशि मेह रे॥ज० ॥६५॥ सि ॥ लोक करच यय तिर्यग् ज्योतिप, वैमानि क ने सिद्ध ॥ लोक प्रलोक प्रगट सब जेद्दयी, ते झाने मुग शुद्धी रे॥ न० ॥ ६६ ॥ ति० ॥ ढाल || ज्ञानावरणी जे कर्म , रूप उपशम तमु धाये रे । तो दो एदिज श्रातमा. ज्ञान प्रयोधता जाये रे ॥ वी० ॥ ६७ ॥ ही प० झानपदे अष्ट व्यं मजा मदे स्यादा ॥ इति ॥ .
१ (२७) ॥ अथ आठमी चारित्रपद पूजा ॥ ॥ दूहा ॥ अष्टम पद चारित्रनो, पूजो धरी जमेद ॥ पूजत अनुनबरस मिले, पातिक होय नछेद ॥ १ काव्यं ॥ प्रारराहिया वंमिश्रसक्रियस्स, नमोसंजमवीरअस्स ।। सप्रावणासंगविवट्टिय स्स, निशापादालासमुङयस्स ॥ यखिझानफलतेधरियेसुरंगे, निरा संसताधाररोधेप्रसंगै | नवांनोधिसंतारणेयानतुल्यं, धरूंतेहचारित्र अप्राप्तमन्यं ॥ १७ ॥ होईजासमहिमाघकोरंकराजा, बलिहादशा गोलणीदोइताजा ॥ वसिपापरूपोपिनिप्पापयाय, ईसितकर्मने पारजायै ॥ ६ए ॥ चाख ॥ चारित्रगुण वलिश् नमो, तत्वरमण जसु मूलोजी । पररमणीयपणो टले, सकल सिहिअनुकूलो जो॥ उसालो । प्रतिकूल प्राश्रय त्याग संजम तत्व घिरता दममयी, शुचि परम खंति मुनींद संपद पंच संघर नपचयी ॥ सामायकादिक ने धरययाख्यातै पूर्णता, अकाय अकुलस अमल नज्वल काम समल चूर्णता || 30 } ढाल ॥ देसविरत ने सर्वविरत जे,.ग्रही तिने प्रानराम ॥ ते चारित्र जगत जयवंतो, कीजे तास प्रणाम ॥ ॥ १ ॥ सि०॥ तृण पर जे पट्खं सुख बंझी, चक्र त पिण वरित, ते चारित्र अखय सुस्वकारण, ते में मनमांदिधरि रे॥०॥ २ ॥ सि०॥ हूवा रंकपणे जे श्रादर, पूजत इंद रिंद ॥ असरण सरण चरण ते वारू, वरिन ज्ञान श्रानंद रे।। 61७॥ तिवारमास पर्याय तेहनें, अनुत्तर सुख अतिक्रमिये ।। २ अजिजात्य ते ऊपर, ते चारित्रने नमिये रे ॥०॥ सि०॥ चप ते पाठ करमनो संचय, रिक्त करे जे तेह ॥ चारित्र न निरुक्ते नायू, ते बंदू गुणगेह रे । न ॥ ५ ॥ ति० ॥ ढाल । जांसि चारित्र ते आतमा, निजस्वनावमाहि. रमतो रे अस्या शुइ अलंकरचो, मोहवने नविनमतो रे । वी० ॥ ७६ उही पण चारित्रपदे अष्ट व्यं यजामहे साहाः।। ....
. . (३७२) -11 अथ नवमी तपपद पूजा ॥ ॥ दूहा ॥ करमकाष्ट प्रति जालवा, परतिख अगनि समान ॥ते. तपपद पूजो सदा, निर्मल परिये ध्यान ॥ १.|| काव्यं ॥ कम्म हुमोन्मूलमकुंजरस्त, नमोतिचतवोवरस्स 'J) अगलम्होणनिबंधण स्त, उसऊअत्यारायसाहणस्त ॥७॥श्यनवपयसिसिई,विकास मिई,पयमियसरवग्गही तरेहसमग्गं॥ दिसिवश्सुरसारंखोणिपीटाव यारं, तिजयविजयचकं सःश्चकंनमामि ॥ त्रिकालिंकपणे कर्म कपाय टाले, निकाचितपणे वाधिया तेह बाले ॥ कहो तेह तप बाह्य अन्न्यंतर 5 नेदे, कमायुक्ति निहेंत उर्ध्यान ठेदे ॥षणा होई जात महिमायकी सब्धि सिद्धि, अवांवकपणे कर्म आचरण शुद्धि ॥ तपो तेह तप जे महानंद देते, होई सिह सीमंतनी जिम संके ते ॥ ७० ॥इम नव पद ध्यावै परम आनंद पावै, नवनय सिय जावै देव नर नवज पावै ॥ ज्ञानविमल गुण गावे सिश्चक मन्ना थे, सवि ऽरित समावै विश्व जयकार पावै ॥ ७ ॥ ढाल ॥ घा रोधन तप नमो, बाह्य अत्यंतर नेदै जी ॥ श्रातम सत्ता एकत्व ना, पर परंणति नछेदे जी ॥ १ ॥ उल्लालो ॥ उछेद कर्म अनादि संतति जेद सिद्धपणो वरे, शुन योग संग धादार. टालो नाव अ क्रियता करै ॥ यंतरमुहूरत तत्व साधे सर्व संवरता करी, निजथा मसत्ता प्रगट नावै करो तपगुण यादरी ॥ २॥ दाल ॥ श्मन बपद गुणमंमलं, चन निशेप प्रमाणे जी॥सात नये जे पादरै,स म्यगाने जाणे जी ॥ Jल्लालो निरधारसेती गुणे गुणनो करजे पडुमान ए, जमुकरण ईदा तत्वरमलें घायै निरमस ध्यान ए॥ ऽम शुदसत्ता नसो चेतन सकल सि अनुसरे, अक्षय अनंत म दंत चिदपन परम श्रानंदता वरै ॥ कलश | श्म सयस मुख कर गुपपुरंदर सिद्धचक्रपदावधी सविसविवि सिविमंदिर न विस. जो मन रसी। वझार वर श्रीर.जसारद ज्ञानधर्म मु रा
(३७१)
जता, गुरु दीपचंद सुचरण सेवक देवचं सुशोलता nunाल |
जागंता त्रिहुँ ज्ञाने संयुत, ते नवमुगति जिनंद िजेहादरे कर्म
खपेवा, ते तप सुरतरु कंद रे॥०॥ ५ ॥ सि० ॥ करम नि
काचित पिण कय जायै, क्षमासहित जे करतो, ते तप नमिय ते
ह.दीपाचे, जिनशाशन उजमंता रे ॥०॥ सि०॥श्रामोसदी
पमुहा बहु लदि, दोवै नास प्रत्नावै ॥ अष्ट महासिद्ध नवनिध प्र
गटे, नमियै ते तप नावै रे ॥ न० ॥ सि० ॥ 5 ॥ फल शिव
सुख मोटु सुरनरवर, संपति जेहनूं फूल ॥ ते तप सुरतरु सरिखो
वंदू, शममकरंद अमूल रे || न. ॥ 6 ॥ ति ॥ सर्व मंगलमा
हि पहलो मंगल, वर्णवियो जे ग्रंथै ॥ ते तपपद त्रिकरण नित न
मियै, वरसहाय शिवपंथ रे ॥०॥ नए ॥ सि०॥म नवपद
थुणतो विदालीनो, हुन तनमय श्रीपाल ।। सुजस विलासै चो
खम, एह ग्यारमी ढाल रे ॥०॥ ए. ॥ सि० ॥ ढाल |
चारोधन संबरी, परणित समता योगे रे ॥ तप ते एहिज श्रातमा,
वरते निजगुण नोगे रे ॥ वी0 11 ए१ ॥ पागमनो भागमतयो,
लाव ते नाणो साचो रे ।। प्रातमन्नावै भिर दून, परनावै मत
राचो रे ॥ वी० ॥ ए॥ अष्ट सकल समृद्धिने, घटमांदे शहिदा
खीरे ॥ तिम नवपद शद्धि जाणज्यो, श्रातमराम वे साखी२॥
वी॥३॥ योग असंख्य है जिन कह्या, नवपद मुरव्य ते जांगो रे
॥ ए इतणे अविलंबने, प्रातमध्यांन प्रमाणो रे ॥ वी० ए दाल
वारमी एदवी, चोय खेमे पूरी रे ॥ वाणी वाधक असतणी,कोश्य
न रदी अधूरी रे || वी० ॥ एप ॥ ही प० तपपदे अष्ट व्यं
यजामहे ॥ इति नवपद ॥ पूजा || संपूर्ण ॥
॥ अथ नवपद पूजाको कलसढालण विधी ॥
। नव स्लाविया केसरसें तिलक करे, रायके कांकणडोरा बांधे, दाणे हायमें
.
. . (३७४) साथिया करै, अरिहंत पदमें चावल, नमो अरिहंताणं कहके पहली पंचामृतके नर कलस वाले फेर केसरकी टीकी देकर चरणो पर वासक्षेप चरावे ययाक्रम अष्टद्र व्य चसा ।। सिद्धपदमें गहूं लालरंगको घनागोटा चहावे, आचार्यपदमें चिणोकी दाल पीले रंगकी घजागोटा, उपाध्यायपदमें मूंग, साधूपदमें उडद, पाकी च्यारपद में चापल चंदनलेपित गोटा चढावे, श्वेतपना चेत्रीपूनम आसोजीपूनम वगरोंमें करे, नमो सिद्धाणं इत्यादि नवपदो के न्यारे२ कह के चढावे, गट्टे मुजब पट्टे पर नव सा थिपा कर वीचमें अरिहंत ऊपर सिद्व सिद्धचक्रयंत्र मुजय ययाक्रम चढावे ॥ || ओली करणेवाला वासक्षेप पूना करे तो एकेक पूनामें चालकी गाया तका उछाले तक गाय कर अरिहंतपदे वासक्षेपं यजामहे कहणा. एसें नवपदो की चाल और उल्लाला पह पासक्षेप चटवाणा ॥ . ॥ अथ दादागुरुमाहाराजकी लघु अष्टपकारी पूजा ॥ ॥अथ न्दवण पूजा ॥सुरनदीजल निर्मलधारया,प्रवल अप्रुत दाप निवारया॥ सकल महल वंचित दायकं, कुशल सूरि गुरोश्चरणां यजेशन ही श्री श्रीजिनकुशल सूरि गुरौ चरणकमलेय जलं यजामहे ॥१॥ अथ चंदनपूजा।।मलय चंदन केसरवारिण, निखल जाध्यरुजातं पहारिणा | सकला ही श्री श्रीजिनकु० ॥ ॥ श्रन पुप्पपूजा ॥ कमल केतकि चंपक पुप्पकैः, परिमला हृत् प ट्पद सुंदकै ।। सकल मं० ॥ में है। श्री पुष्पं यजामहे स्वाहा ।। ३ ॥ अथ अक्षत पूजा || सरज तंउल कैरित निर्मले, .प्रवर मौ तिक पूंज वधुवः । सकल मङ्गल० ॥ न ही ५० अक्षतं यजा मदे ॥ ४॥ अथ नैवद्य पूजा । बहुविधैयरुनिटकेपकैः, प्रवर मोदकपुंज सुखसके । सकल मं० ॥ न ही पीनेवयं यजामहे ॥ ५॥ अय वीपपूजा ॥ यति मुदीतमय खदीपके, विमल के चननाजन संस्यिते ॥ सकल मं०॥ ही या श्रीजि० दीपं य जामहे ॥ ६ ॥ अथ धूपपूजा ॥ अगर चंदन धूप दशांनजे, प्रसार तावित दिधुमधूम्रकः || सास मं० है है। श्री. धूपं यजामहे ॥ ॥ अथ फसत्रा । पना मोर सदाफल काटे, मुमुखर
( ३७५)
किल श्रीफलाच ॥ सफल में० ।। हो श्री० फलं यजामहे
स्वाहाः ॥ ॥ अर्थपूजा ॥ जल सुगंध प्रसून सुतंजुलै, रुप्रदीप
के धूप
फलादिन्तिः ॥ सकल मं० ॥ ही श्री श्रीजि. अर्धे यजा
महे स्वाहा ॥ इति श्रीदादाजीकी लघु अष्टप्रकारी पूजा संपूर्ण ।।
॥ अथ दादाजीकी आरती ।
॥ जै जै सदगुरु भारती कीजै, श्रीजिनकुशल सूरि समरी
जै ॥ जैजै० ।। पहली आरती दादाजीकी कीजै, उख वोदग सब
दूर दरीजोजे०॥9॥वीजी बीज पमंती धारा, नयवारण तूंही सुख
कारा ॥ जै॥२॥ तीजी परचा पूरक तेरी, दूर दरौं सब धर्म
ति मेरी ॥ जै० ॥ ३ ॥ चोयी मुगलपूत जियदायक, सुरवर हुक
म घरै ज्यु पायकल्पिापांचमी पांच नदी जिए तारी, संघ स
कसनो संकट वारी । जै०॥ ५ ॥ जी यांनोवज विदारी, विद्या
पोथी परगटकारी ॥ जै० ॥ ६ ॥ सातमी चोस योगा साधी,
सूरिमंत्र सुरने अाराधी । जै० ॥ ७॥ण विध सात भारती
कीजै, मनचंतित संपति फल लीजै । जै० ॥ ॥ जैनलाल वर
तर गणधारी, सदगुरु चरणकमल बलिहारी ॥ जै०nel
इति श्रीगुरुदेव भारती संपूर्णमं ।
' ॥ अथ सूतकविचार लिख्यते ॥
॥ पुत्र जन्म होनेसें दिन १० दत्त सूतक ॥ पुत्री जन्म हो
नेसें दिन १२ वार सूतक | उर जो स्त्रीके पुत्र होय, उस स्त्रोके
एक मासको सूतकापुत्र होके मरण पामे, तो दिन एक सूतक ।।
परदेशे मृत्यु होप तो दिन ? एक सूतक ॥ गाय, नेप, घोकी,
सांढ, घरमांदे वियावे, तो दिन १ एक सूतक ॥ मरण हूवां कले
घर घर बाहिर खर जाय, जहां तक सूतक ॥ दास दासी अपनी
नेश रहते पुत्र पौत्रादिकका जन्म मरण हो, तो दिन ३ तीन
( ३७६) सूतक || र जितना महिनाको गर्भ गिरे, तितने दिन सूतक । अंब जिनके जन्म मरणका सूतक . होवे . ये १२ बारः दिन देवपूजा न फरे. नर मृतकके सूतक में घरका जो मूल कांधिया होवे सो १० दस दिन देवपूजा न करें, तर अन्य घरका ३ तीन दिन देवपूजा न करे. नर जो मृत कको वा होवे, सो २४ घोवोस प्रहर पनिझमश न करे || जो सदाका अवंग नियम होवे, तो समतान्नाव रख के संवरपणामें रहे. परंतु मुखसे नवकार मंत्रकानी नच्चारण करे नहिं. स्थापना जीके दाय लगावे नहिं. नर जो मृतकको दुवा न हो तो मात्र आठ प्रदर पमिकमण न करे ॥ नेसके जब बच्चा होय, तब १५ पदर दिन पी दूध पीणों कल्पे. गायके वच्चा होय तो १७ सतरे दिन पीठे दूध पीणो कम्पेः षकरीको दूध आठ दिन पी पीयो कल्पे ॥ १ रुतुवती स्त्री, चार दिन नामादिकको न वे.श्चार दिन प्रतिक्रमण न करे, ३ पांच दिन देवपूजा न करे. ५ रोगादिक का रणे तिन दिवस उपरांत कोर स्त्रीको रक्त चलता दीसे, जिसका विशेप दोष नहिं । शुइ विवेकसें पवित्र हो कर दिन ५ पांच दी स्थापना पुस्तक तुबे, जिनदर्शन करे, अग्रपूजा करे, परंतु अंगपूजा न करे, साधुको पमिलाने. ऋतुवंती तपस्या करे, सो तो सफल होय. परंतु रुनु दिनमें जिनपूजा प्रतिक्रमण दिक किया सफल न होवे, ऐसा चर्चरीयंत्रमें कहा है. जिसके घरमें जन्म मरणका सू, तक होवे, नहां १२ चार दिन तक साधु याहार पाणी न वदोरे, सूतकवालेका घरका जससे तथा अमिसे १२ पारा दिन तक देव जा न करे. निशीथमत्रके झोसमा उद्देशामें जन्म मरणके सूत कपालेका घर गगनिक कहा दे. - .
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( ३७७)
- गायके मूत्रमें २५ चोवीस प्रहर पी, नॅपके मूत्रमे १६
सोल प्रहर पी, गामर, गधेमा, पोनीके मूत्रमें प्राउ प्रहर
पीवें, पर नारीके मूत्रमें चार प्रहर पी, संमूर्चित जीव नपने.
इत्यादि सूतकका संक्षेप विचार इहां लिखा हे. विशेप विचार
शास्तरसे जानमा ॥ इति सूतकविचारः संपूर्णः॥
॥ अल असद्यायकी विगत कहते हे ।।
१ धूंधारी पके, तासीम असहाय आणवी.
१ सर्वपिशामा राती गया तथा अरएप संबंधी रज के,
निरंतर पो तो दिन एसीम परांस प्रसधाप.
२ मेह परतते धुंदधुपालारी होय, तो दिन ३ तीन
उपरांत असजाय,
४ नाना टा निरंतर, पिन ७ सात नपरांत वरसे अमेन
रहे तो असचाप होय.
५ मांतवृष्टि, शिलावृष्टि, केशष्टि, धूलिवृष्टि, जांलगे होय,
मां सीम असाप, धाने जोरुधिरवृष्टि होय तो अहोरात्र असमाय.
'६ बुदबुदा रहित निरंतर वरसे तो ५ पांच दिन छपसंत
असद्याप होप.
७ चैत्र शुदि पांचमहती पमिया लगे प्रतक्षायतेरस,
चोदस, पूनम सीम समी सांजे. अचित्त रजनमावणाचं कारस
ग्ग करूं? छ. अचिन रस नसावण करेमि कानस्तग्गं. पठी
पोगस नोयगोना चार फाउत्तरग करवा.
माशोशुदि पांचमने दिने निदरया प्रारंजीन पहिया
संगें श्रसद्याय.
ए दश दिग्दा प्रदर १ एक असद्याय.
१० अकालें गाजत प्रदर २ वे सीम प्रसचाय,
UG
( ३७०)
११ अकालें वीज नल्कापात होय तो प्रहर १ असद्याय,
२२ अजवालीये पहें समी सांझ, पमयो, बीज, त्रीज,
श्यारी असचाय, परंतु दश वैकालिक गुणीजें.
१३ अकाले मेघ वरसे, तो प्रदर १ एक असहाय,
१५ नूमिकै प्रहर । श्रार असद्याय,
१५ चंश्यहरों प्रहर १५ बार नस्लटें, अने जघन्ये प्रदर
उपाठ असद्याय.
१६ सूर्यग्रहणे नत्लष्ट प्रदर १६ सोख, अने जघन्य प्रदर
१३वार असद्याय,
१७.प्रासाद चनमासा परिकमण गया ती प्रदर ११
बार असम्जाय.
१८ कार्तिक चनमासे पण प्रतिक्रन्या पी पमिया लगेंभ
हर बार घसम्माय.
१ए मांदोमांदे मल्लादिक युद्ध हुवे, तावत्काल असम्झाग.
२० कलह यु नां लगे हुये, तां लगें असम्झाय.
२१ नपाश्रय नजीक स्त्रीपुरुपने कलद हुवे त्यांपर्यंत असम्माय,
२२ फागण चनमासे रजपर्वी ज्यां लगे रज उमे, अने उप
शमें नदि, तां सगें असम्झाय.
२३ दंगको मार परते जांलगी अनेरो. न हुये, तां सगी
'घसम्माय.
२४ परचक्रादि नप उपजे, घने जां लगें उपशमे नदि, तो
सगे सूत्र जण न सूजे ॥ श्रयं परमार्थः ॥
२५ नगरमांदे प्रधान पुरुष विहमे, तो यहोरात्र असम्झाम:
२६ उपाययी सात घरमादे जो को पुरुष विदने, तो
--
मदोरात्र असम्झाप,
-
"
(३७).
५७ तो हाथमाहे अनाथं पुरुष मृतक पज्यो होय, तो ता
अशउरे एग्ले ज्या पर्यंत मृतककून नावे, त्यां सीम असद्याय.
'२० विर्यचना रुधिर पमवाथी हाय १००सो महि अहो-
रात्र असघाय.
२॥ मनुष्यना रुधिर पमवाथी हाथ १०० सो माहे अहो.
रात्र असहाय,
३० मनुष्यनां अस्थि, संत, दार पके हाथ १०० सो मांदे
सूत्र पढ़, सूजे नाई.
३१ स्त्रीने रुतु भावे के दिन ३ वश असमाय,
३२ आर्श नहत्र आव्यापीठे स्वाति नक्षत्र पर्यंत जो गाजे,
वीजे, मेह वरसे, तो असम्काय न होय.
३६ पुत्रने प्रसवे दिन ७ सात अतद्याप. अने दीफरीने प्रस
दिन आठ असम्माय.
३४ कालयहण विपकी नलको गुणवो नहिं. प्रहर १२ बार
असम्कायं.
३५ वैशाखवदि , श्रावणवदि , कार्तिकवदि १, मागशि
स्वदि १. ए चार दिवसे सदैव प्रतमकाय अने सूत्रनी असम्झाय
तो प्रहर १२ बार सूधी जाणवी.
॥ अथ साधु ओर श्रावककों कोनती वस्तु कितने प्रहर ।
॥ ओर दिनं पीछे न खावणी सो लिख्यते ॥
: ॥ चावल प्रहर , राब प्रहर १२, घीस प्रदर २०, गरी
प्रहर २५, दहिं प्रदर १६, दूध प्रहर ; . फांनीबमा प्रहर २५,
घोमवमा प्रदर ५, तथ्यां कमा प्रहर , पूमी प्रहर , रोटी प्रदर
४, तथा ६. बाजरा कण प्रदर १२, जवार ऊपण प्रहर १२, वां
जरीकी खीचमी प्रहर छ, जवारकी खीचको प्रहर , चावलकी
. (३०) खीचमी प्रदर ४, सीयाले श्राटो दिन १०, नन्दाले बाटो दिन वरसाले प्राटो दिन ५, पक्कान्न तियाले दिन ३०, नन्दाले पक्वान्न दिन १५, वरसाले पक्षान्न दिन ७, बन्दाले जूस फासू दिन, वरसाले खूण फासू दिन ३, सीयाले फासू खूण दिन ५, सीयाले फासु घी दिन , उन्हाले फासु घी दिन ५, वरसाले फासु घी दिन ३, तथा हमेसका सियाले फासु पाणी प्रहर ५, व रसाले फासु पाणी प्रहर ३, सर्व अनाजकी धूघरी पाणी नीजोर प्रहर ; पाणीकी नसे घूघरी प्रहर १८, घी तेलकी तली घूघरी प्रहर २०, तथा २५. वमी प्रहर , कढी प्रहर , सर्व दाल प्रहर , तथा ६. रायता प्रहर छ, घीकी तली प्रहर १६. एवं सर्व वस्तु ए कीये परिमाण नपरांत चलितरस होवे, सो साधु तथा श्रावकको खाये योग्य रहे नहिं ॥ : ॥ अथ नव ग्रह तथा दस दिग्पाल की स्थापन ओर पूजन विधि तथा आहान विसर्जन विधि लिख्यते॥ ' ॥पांच यसमात्रिया शुद्धहोकर गुरू के पास केसरका तिलक करै, केसर मंत्रायकै दाहिणा हायके मौली र कांकणमोरा मंत्रा- य के बांध ॥ ( नमो परमेष्टि नमस्कार)इत्यादि स्तोत्रसें गुरुपा- एक थालीमें १०, एक थाली में ए, फेर एक थालीमे फेर-ए, एसें २ नागरवेलका पनि रकै. जिसपर पुष्प प्रकत नैनेद्य फल रोकव्य ययाशक्ति धरै नरजी पंचामृत फूल पुष्पमाला प्रक्षत नेदय तरेर के गोले र सूकेफल अतर गुलाबजल केसर कपूर कुंकु शादि पूजाफेका सामान रके. फेर स्नात्रपूजा की था. पना ररके, मात्र करावे अष्ट प्रकारी पूजा करायै पीछे दसदिग्पाल के पट्टे ऊपर जलका गंटा देकर वासक्षेप करे ॥ एकेक दिग्पालके केसरकी टीकी देकर पुष्प चढाके फल नैवेद्यादि समेत नागरवेल: पान चढावै॥ स्मरक्षा करावे.
( ३०१ )
॥ अथ दस दिग्पालके पट्टकी पूजाविधि ॥
। ज्ञय सायुधाय सवाहनाय सपरिकराव हिअस्मिन्जं
द्वी एक्षिणरता क्षेत्रे अमुकनगरे अमुकचैत्यै अमुकपूजामदो
बवे आगर वलिंगृहाण नदयमन्युदयं कुरुरस्वाहाः शयन
मः इति प्राधानपूजा ॥ (पूर्वदिति जल चंदनादि अष्ट इव्य च
ढावै). १॥ अथ अग्नि दिग्पाल पूजा | अग्नये सायुधाय सवा
इनाय सपरिकराय अस्मिनजंबूढीपे दक्षिणन्नरताकेत्रे अमुकनगरे
अमुकचैत्यै अमुकपूजामहोचवे पागधर वालगृहाण२ उदयमन्यु
दयं कुरु स्वाहाः नअभयेनमः ॥२॥ अथ यम दिग्पाल पूजा निय
माय सायु० सवा तपरिछदा अस्मिनजंघु० दक्षिण अमुकना
अमुकचैत्यै० अमुकपूजा भाग० वलिंग उदयम० स्वाहा नय
मायनमः ॥ दक्षिा ॥ ३॥ अथ नैशत दिग्पाल पूजा नशताय
सायु० सवा सप० अस्मिन्जं० दकि० अमुक पूजामहोछवै
आग बलि० नदय० स्वाहा ननशतायनमः ||४॥ अथ वरुण दि
ग्पाल पूजा ॥ वरुणाय तायु०सवा० सप० अस्मिन्जं०अमुकपृ०
आ० वलिं०नदय० स्वाहा नवरुणाय नमः॥ पश्चिम०५|| अथवा
यव दिग्पाल पूजा || वायवे सायु० सवा० सप० अस्मिन० १०
अमुकचैत्यै अमुकपूजामहोछवे० प्रा० वलिं० नदयम० स्वाहा
उवायवैनमः।। वायव्य ॥ ६॥ अथ कुबेर दिग्पाल पूजा कुबेरा
य सायु० सवा० सप अस्मिन्जं० १० अमुकन० अमुक अमु
कपूजामहोचवे आ० वलिंग उदयः स्वाहा उकुवेरायनमः उत्तर
दिशि ॥ ७ ॥ श्रथ ईशान दिग्पाल पूजा ।। ईशानाय सायुक
सवा० सप० अस्मिण ६० अमुकपू०. श्रा० घर्लि० नद० स्वादा
नशानायनमः॥ ईशानकूरा ॥७॥ अथ ब्रह्म दिग्पाल पूजा
ब्रह्मणे सायु० सवा० सप० अस्मिन् द० अमुकन० अमुकचैत्यै
.
(३७२) अमुक पू० प्रा० वलिं० नदय० स्वाहा नब्रह्मणेनमः ॥ नदिशिक ॥ ए ॥ अथ नाग दिग्पाल पूजा ॥ नागाय सायु० सवा० सप० अस्मिन्० दक्षि० अमुकन० अमुकचेत्यै अमुकपू. श्रा० वसिं० नदय० स्वादा नागायनमः ॥१०॥ अघोदिशि अष्टश्य चढावे.॥ ऊपर कमल वस्त्र बांचे मौलीसे, पीके । दशदिग्पालायनमः ॥ एसा कहके यथाशक्ति रोकमव्य समेत नागरवेलका पान आदि सर्व इव्य चढावै, पट्टेके चोतरफ दप्स घृतके दीपक घरे अथवा एक दीपक आगै धरै ॥इति दस दिग्पाल पूजन विधिः॥ ॥ अथ मव बह पूननविपिः ॥ ॥ अथ सूर्य पूजा ॥ नमोआदित्याय सायुधाय सवादना य सपरिकराय अस्मिन्जंबुद्दीपे दक्षणनस्तक्षेत्रे अमुकनगरे अमुक चैत्यै अमुकपूजामहोउवे भागच २ वलिपूजागृहाणार नदयमन्युदयं कुरुश् अत्रपीछेतिष्टर स्वाहा नसूर्यायनमः ॥(एसापढकेजलचंदनादि अष्टव्यचढाबे ) ॥१॥ अथ चंद्रपूजा ॥ नवंज्ञाय सायु० सवास प० अस्मिनजं० द० अमुकन० अमुकचै० अमुकपू० प्रा० वलि ५० उदयः अष्टपोछेति० स्वाहा नचंशयनमः ॥२॥ अथ मंगल पूजा ! जनमोनोमाय सायु० सवा० सप० अस्मिनजं०.९० अमु० , अमुकपू० प्रा० बलि. अत्रपीठे नदय स्वाहाः मन्नोमायनमः३॥ : अथ बुधपूजा ॥ नमोबुधाय सायु० सवा० सपः अस्मिन्जं द० अ मुकनग० अमु० चै० अमुकपू० प्रा० वलि उदयमः अत्रपी. - - स्वाहा नबुधायनमः ॥३॥ अष्ट वृहस्पति पूजा ॥ नमोवृहस्पतये सायु० सवा सप० अस्मिन्जं० ० अमुकन० कमुकचै० अमुक पूजाम०प्रा० वलि० अत्रपी० नुदयः स्वाहाः न वृहस्पतयेनमः॥ अथ शुक्र पूजा ॥ नमोशुक्राय सायु० सवा० सप अस्मिन्जंबू छो० द० अमुकन अमुकचैत्ये० अमुक'० प्रा० बलिया प्रत्र + . ( ३७३) पी नदयम० शुक्रायनमः ॥.६ ॥ ॥ श्रथ शनि पूजा जनमोशनिश्चराय सायु० सवा० सप• अस्मिनजं० द. अमुकन अमुकचैत्ये० अमुकपू० प्रा० वलि० अत्रपीठे सिष्टर उदयमा स्वादा शनैश्चरायनमः ॥ ७॥ ॥ अथ राहु पूजा ॥ नन मोराइवे सायु सवा सप० अस्मिन्जं० द० अमुकन० अमुकचै त्ये अमुकपूजा० प्रा० वक्षि० अत्रपी० उदयम० राहवेनमः। अथ केतू पूजा ॥ ननमोकेतवे सायु० सवा० सप० अस्मि नजं० द० अमुकनग• अमुकचै० अमुकपू० प्रा० वलि० अबपीठे तिधरनवय० स्वाहा ए में केतवेनमः॥इति (इसी मुजब ऊपरलाल वस्त्र मोलीले बांधे पीठ नागरवेषपान आदि अष्टव्य रोका व्य समेत सामने नेट धरे फेर एसा कहे।नवग्रहायनमः ||च्यारों तरफ नवदीपक वा एक दीपक सामने धरेशति मवग्रह थापन पूजन विधिः . वाये तरफ मंगलके नवादको थापना करे दहिणे वाजू दस दिग्पाल की यापना करे ॥जिस महोचवमें इनोकी पूजा कराणी उस महो चवका नाम लेखा विशेष विधि गुरुमुखसे सीखणी ।। शुभ जल से पवित्रपणे बणायानया सधवस्त्रीके या पुरपके दायसें पांचरंग के धानके वाकलापांच रंगकी खजली गुलगुला खीर दहीका करवा मासपूवा पांचरंगकेस इत्यादिखाय उत्तम वस्तुमंगाकर एक परातमें सब व्याएको करै नर घृत खांझ अत्तर गुलापंजल पंचरंगेल यदन्नी वाकलोंमें मिलावे पीछे गुरु ३ तीन बार मंत्रके तीन वैर वाकुलो पर वासोप झाले.) अथ वासक्षेप मंत्र हाहीसवर्वोप चंबिंधस्यरक्षश्स्वादा समोअरिहंताणं समोसिद्धाणं समोप्रा यरिमाणं समोचवझापाणं असमोलोएसबसाइर्ण शमोधागात गामी नमोचारणसदी जेश्मे किन्नर किंपुरत महोरग गरूक गंधर्व जस्क रकम पिशान भूत्र माश्यप्पलश्च जिणपरनिवासि ( ३७४) णा सन्निहियाय तेसविलेवल ध्रुवपुष्फफलवश्वसणादिं बलिपनि छंता तुहिकरानवंतु पुहिकरा संतिकरानवंतु सर्वजणंकुवतु सबजि गाणं संदणप्पन्नावन पसन्ननायतणेसवत्थरकंतुकुतु सबरियाणी नासंतु सदाशिवमुवसमंतु संतितुपुनिसिवसत्ययणकारिणोनवंतु स्वाहाः ॥ इत्त मंत्र तीन वेर वासोपळू मंत्रके बसबाकुलोमें मालके सुइ करे ॥ पी आधा बलबाकुल दूसरी परातमें विसर्जनके वास्ते वस्र से ढककर रखगेमे. प्राधा लेकर घरके तथा चैत्यके ऊपर इग्यारे स्लाभिया शुद्ध होकर पहला एक श्रावक चोटीके याल खो सकर बलबाफुल लेके पूर्वकी तरफ खमा रहे, २ दूसरा केसरकी कटोरी, २ तीसरा पुष्पकी चंगेरी, ध चोथा शेता, ५ पाँचमा धूप धाणा, ६ उम दीपक, ७ सातमा चमर, आठमा घंटा, नवमा जलका कलश, १० दसमा बस्यालको पाली, ११ ग्यारमा मंग लवाजिन. इस तरे सब मानिये एकेक दिसाफी तरफ सना रदे. जब पुरु शुइमंत्र नचारण करचूफै तब क्रमसें जब चंदन फूल वा दुसादिक चढावे, चामरकरे, शारीसा दिखावे, वाजिब रजाये ।। ॥ अथ दस दिग्पाल जाहानमंत्र। ॥ ऐरावतःतमारूढः शर्वविशिप्स्यितः संघरपशांतपेसो स्तु वसिपूजांप्रयचतु ॥ १ ॥ (एता कदके पूर्व दिशाकी तरफ वलयाकुल चढावै) (यमिकूपके सामने) ॥ सदावद्विदिशो नेता पावकोमेपवादनः संघस्यशांतयेसोस्तु बलिपूजांप्रयचतु ।।२।। (एसा कद याकुलादिश्श्य चढावे) (दक्षिणदिशकी तरफ.)। दक्षिणस्यांदिशःस्वामी यमोमविश्वादनः संवस्य० वसि० ॥३॥ (यसवाकुब चटादै दाजित वजावे) (नेरुतकृशकी तरफ.) ॥ यमापरांतरालोगो नेतः शियवादनः संघस्य० वति ॥ ४॥ (अथ पमिमदिशि) ! पः प्रतीची.देशोनायः वरुणामकरस्थितः (३५). संघस्य वस०॥ ५ ॥ (श्रथ वायव्यकूण ) ॥ हरिणोयाहनंयस्य चायव्याधिपतिर्मरुत् संघस्य० वलिः ॥ ६ ॥ (अथ उत्तर दिशि) ॥ निधाननवकारूढ उत्तरस्यादिशिमन्नुः संघस्य० वलि ॥ ७ ॥ (ईशान कूप )। सितेपेधिरुढश्च ईशानांचदिसोविन्नुः संघस्य० चलि० ॥ ॥ (अश्र अघोदिशि ) पातालाधिपतियोस्तु सर्वदापन चाहनः संघस्प० वलि० ॥ ए॥ (अथ नईदिसि) ब्रह्मलोकवि नोयस्तु राजहंससमाश्रित संघस्य० वलि० ॥ १० ॥ इति दश दि ग्पाल याद्वानविधिः॥ ।। अय पूना प्रतिष्टादि हुयां पीछे दिगपाल विसर्जन विपि । ॥ थोर बलबाकलादि द्रव्यपूना पूर्ववत् ।। ॥नमोइंशय पूर्व दिग्अधिष्टायकाय ऐरावरावाहनाय सहस्त्र नेत्राय बजायुधाय सपरिकराप थस्मिन्जंबुदीपे दक्षिणाई अमुरुन गरे अमुकचैत्ये अमुरुमहोच्वे सपिश्वालिरक्षर गर म्वाद । पूर्वदिशाकी तरफ शयनमः ॥ १॥ (अग्निकूण ) ॥ नमोन ग्निमूर्तये शक्तिहस्ताय सायुधाय सवा० सप० अस्मिन० अमुक० सर्वोपद्रवाहालिरक्षर गच२ स्वादा || इति ॥ (दक्षिण दिशि)जन मोयमाय दक्षिणदिधिष्टायकाय महिपवादनाय दमायुधाय रुष्ण मुनये सायु० सवा० सप० अस्मि० सर्वोपवाद्दतिरक्षर गर स्वा हा ॥ ३॥ इति ॥ (नेस्तकूणे) ॥ नमोनेरुताप खमंगहस्ताय नायु० सवा० सप० अस्मिन् प्रमु० सर्वोपवादतिरक्ष२ गहर वादा || ४ ॥ इति ॥ (पश्चिमदिशि)। उनमोवरुणाय पत्रिम देगधिष्टायकाय मकरवादनाय सायु० सवा० सप० अस्मि० धमु० वर्वोपवादतिरक्षर गछर स्वादा ॥ ५ ॥ इति ॥ (गयवकूरो)। नमोवायवे वायवाधिपतये ध्वजदस्ताय दरिणवादनाय सायु वा० सप० यस्मि० अमु० सर्वोपद्रवाजव० स्वादा॥ ६॥इति ।।
( ३८४) णा तन्निहियाय तेसविलेवलं धूवपुप्फफलवश्वसपाहि बलिपनि चंता तुध्किरानवंतु पुष्किरा संतिकरानवंतु सर्वजणंकुवैतु सबजि गाणं संदणप्पन्नावन पसन्नन्नावतणेसहत्यरकंतुकुर्वतु सबरियाणी नासंतु सदाशिवमुवसमंतु संतितु पुनिसिवसत्ययणकारियोजवंतु स्वाहाः ॥ इस मंत्रसे तीन वेर वासोपळू मंत्रके बलवाकुलोमें मालके सुइ करे ॥ पी आधा बलबाकुल दूसरी परातमें विसर्जनके वास्ते वस्त्रसे ढककर रखकेने. प्राधा लेकर घरके तथा चैत्यके ऊपर श्यारे साथिया शुद्ध होकर पहला एक श्रावक चोटीके बाल खो सकर बलवाकुल लेके पूर्वकी तरफ खमा रहे, ३ दूसरा केसरकी कटोरी, ३ तीसरा पुष्पकी चंगेरी, ४ चोथा ओता, ५ पांचमा धूप धाणा, ६ मा दीपक, ७ सातमा चमर, आठमा घंटा, नवमा जलका कलश, १० दसमा बलवालकी पाली, ११ ग्यारमा मंग लवाजिन. इस तरे सब स्मानिये एकेक दिसाकी तरफ समा रहे. जब शुरु शुश्मंत्र नम्चारण करचूफै तब क्रमसे जब चंदन फूल का कुलादिक चढावै, चामरकरे, आरीसा दिखावे, वाजित रजावै ॥ ॥ अथ दस दिग्पाल आहानमंत्र ।। ॥ ऐरावतःतमारूढः शापूर्वविशिस्थितः संवत्यशांतयेतो स्तु बलिपूजांप्रयवतु ॥ १ ॥ (एता करके पूर्व दिशाकी तरफ बलवाकुल चढावै) (अग्निकूपके सामने) ॥ सावद्विदिशो नेता पावकोमेपवाहनः संघस्यशांतयेसोस्तु बलिपूजांप्रयचतु ॥२॥ (एसा कद वाकुलादिश्व्य चढावे) ( दक्षिण दिशकी तरफ)" दक्षिणस्यांदिशःस्वामी ,मदि संवस्य० चलि० ॥३॥ बलवाकर :) (नरुतकूराकी तरफ) ॥ संघस्य० वसि ॥४॥ . : वरुणोमकरस्थितः (३५). संघस्य० वलि० ॥ ५ ॥ (अथ.वायव्यकूण)॥ हरिगोयाहनंयस्य वायव्याधिपतिर्मरुत् संघस्य० वलिः ॥ ६ ॥ (अथ नुत्तर दिशि) ॥ निधाननवकारूढ उत्तरस्यादिशिप्रन्नुः संघस्य० वलि ॥ ७ ॥ (ईशान कूण ) | सितेपेधिरूढश्च ईशानांचदिसोविन्नुः संघस्य० चलि० ॥ ॥ (अन अधोदिशि) पातालाधिपतियोस्तु सर्वदापन चाहनः संघस्य० वलिः ॥ ए॥ (अथ नईदिसि ) ब्रह्मलोकवि नोयस्तु राजहंससमाश्रित संघस्य० वलि० ॥ १० ॥ इति दश दि ग्पाल आह्वानविधिः ॥ ॥ अथ पूना प्रतिष्टादि हुयां पीछे दिग्पाल विसर्जनविधि । ॥ भोर बलबाकुलादि द्रव्यपूजा पूर्ववत् ।। ॥नमोइंशय पूर्व दिग्अधिष्टायकाय ऐरावणवादनाय सदर नेत्राय बजायुधाय सपरिकराय अस्मिन्जंबुदीपे दक्षिणाई अमुकन गरे अमुकचैत्ये अमुझमहोचवे सर्वोपश्चाद्दतिरक्षर गम स्वाहा ।। पूर्वदिशाकी तरफ ज्ञयनमः ॥ १ ॥ (अग्निकूण )॥ नमोय ग्निमूनये शक्तिहस्ताय सायुधाय सवा० सप० अस्मिन्० अमुक० सर्वोपद्रवाहालिरक्षर गच२ स्वाहा || इति ॥ (दक्षिणदिशि) न मोयमाय दक्षिणदिधिष्ठायकाय मदिपवाहनाय दंकायुधाय कृष्ण मुनये सायु० सवा० सप० अस्मि० सर्वोपवालिरकर गवर स्वा हा ॥ ३ ॥ इति ॥ (नेरुतकूणे)॥ नमोनेरुताप खमंगहस्ताय लायु० सवा० सप० अस्मिन्० अमु० सर्वोपश्वाद्दतिरकर गहर वादा ॥ ४ ॥ इति ॥ (पश्चिमदिशि)॥ नमोवरुणाय पश्चिम दंगधिष्टायकाय मकरवादनाय सायु० सवा० सप० अस्मि अमु. वोपवाइसिरदश् गछस्वाहा ॥ ५ ॥ इति ॥ (वायवकूणे)। नमोवायवे वायवाधिपतये ध्वजहस्ताय इरिणवादनाय सायु वा० सप० अस्मि० अमु० सर्वोपद्रवाजक० स्वादापति ४ । (३८६) (उत्तरदिशि) नमोधनदाय नत्तरदिधिष्टायकाय नरवादनाय गदाहस्ताय सर्प. अस्मि० अमुकनगरे सर्वोपदवालि. गवस्था हा ॥ ७ ॥ इति ॥ (ईशाणकूणे) नमोईशानाय विसूलहस्ताय शानाधिपतये पत्नवाहनाय सप० अस्मि० अमु० सर्वोपवाह लि० गछर स्वाहाः ॥ ॥ इति ॥ (नईलोके) नमोब्रह्मणे रा जहंसवाहनाय नwलोकाधिष्टायकाय सायु०सवा० सप० अस्मिन अमु० सर्वोपक्ष्वाइलि० गछ० स्वाहा ।। ए ॥ इति ॥ (अधोलोके) उनमोनागाय पाताल निवासाय पद्मवादनाय० सायु० सवा० सप० अस्मि० श्रमु० सर्वोपदवाइलिश् गच२ स्वाहा ॥ १०॥ (इस तरे पढे वाद सर्व देवतोंके विसर्जनका श्लोक पढ़े || यथा ॥ शनाया लोकपालादिशिविदिप्तिगताशुद्धसर्मशताः, पायातामात्रकाले क लुपहतिकते तीर्घनाथस्यन्नक्त्या; न्यस्ताशेपापदाद्याविहितशिवसु खाः स्वास्पदंसांप्रतंते, मात्रेपूजामवाप्यस्वमतिरुतमुदोयांतुकल्याण जाजः॥ १ ॥धाग्यादीनं कियादीनं, मंत्रहीनंचयत्रतं; तत्सर्वक्षम तंदेवः, प्रशीदपरमेश्वरः ।। २ ॥ श्राद्वाननवजानामि, नैवजानामि पूजन; विसर्जननैवजानामि, त्वमेवशरणंमम ॥ ३ ॥ पीछे यथाश क्ति ज्ञानपूजा गुरुपूजा साधर्मीवात्सल्य करै ॥ इति नवग्रह दश दिग्पाल स्थापन श्राद्वान विसर्जन विधि संपूर्ण ॥ ॥ अथ नवपद मंडल पूजाविधि ।। प्रथम सुंदर अंगोपांगवाले नव नात्रिया मंत्रितजससे मान करे (जलमंत्र) ही अमृतेश्रमतोमवे अमृतवर्पणी अमृतं श्राप यर स्वाहा ( इस मंत्रसें जलमंत्रे, पीठे ) हैं। श्रमसे विमले वि मसोनचे सर्वतीर्थजलोपमे पापावावायशुचिशुचिनवामिस्वाहा (इस मंत्रकों सातवेर पढता दुवा स्नान करे.पी ॥ ही याँ क्रा(सा 'न Sम मंत्र व शकर पहिरेपो तयाँ ही क्रॉ अईते .
(३७) नमः.) इस मंत्र सात वेर गुरू पाससें केसर मंत्रायके तिलक करे. (पी) ही अवतर२ सोमेर कुरुर वल्गु२ सुमणसे सो मणसे महुमहुरे कवलीकः कः स्वाहा ।। (इस मंत्रसे मोली मेंढल मरोमाफली मंत्रायके हायके बांधै नर जय मंगलजीके व्यालं तरफ मौलीमेंढस बांधे सोनी इसी मंत्रसें मंत्रायके बांधे. इस तरे अपणा अंग शुद्ध करके नात्रिया गुरूके सामने हाथ जोमके पेठे तब गुरु श्रात्मरक्षा स्तोत्र जो पहिली लिखा है उससे तीन वेर पढके गुरु आत्मरक्षा करवावे. पीठे तीन वेर नवकारमंत्रसें में के चोटीके गांठ देवे तथा तीन नवकार गुणके सब ना त्रियाक कानामें फूंक देवे. इतनी विधी तो हरको पूजा प्रतिष्टा मंझलादिकमें मात्रियोंकों प्रथम अवस्य कराणी चाहियें. पीठ में दिरजीमें अधिष्टायक जो देव देवी दोय उसकी पूजा करावै अष्टश्व्य चढावे. पी चंपेलोके तेलमें हिंगलू वा सिंदूर मिलाके क्षेत्रपालजी की पूजा करे, चांदीके वरक या मालीपाना चढावे, अतर चढावे, फूल धूप नैवद्य फल जल रोकव्य इत्यादि सर्वश्य (क्षेत्रपाला यनमः ) एसा बोलता हुवा चढावे. पीठ मंझलजोके दहणे तरफ़ १० दिग्पालके पट्टेकी थापना करे. अकेक दिग्पालको पूजा पढके जल चंदनादि सर्व व्य चढावै. नागरवेलके पांन समेत दसोंकी पूजा पढके ऊपर लालवस्त्र मोलीसें बांधे. आगे फेर सर्व द्रव्य चढाके दीपक करै, पीठे वायें तरफ नवग्रहके पट्टेकी थापना कर पूर्वोक्त काव्य पढके इसी मुजब पूजा कर.) पीने सर्व सात्रिया कुं १० स्तुतीसें देववंदावै. भदारे स्तुतिका देववंदाणेकी विधी लिखते हैं। पहली रियावदी मिक ब्यारनयकारका काउसग्ग कर लोगस्त कहे. नीचे बैठकेद हेणागोमारतीपर रख के मावागोमानमीभूत करके चैत्यवंदन करे, ( ३10) नमोबुणं० कहके अरिदतचेश्या० यंदणवत्ति० अन्नन्नु० एक नवकारका कानसग्ग करै, नमोईत् सिक्षकहके यहि मनादेव श्रुश्की पहली गाथा कदे ॥ लोगस्सा वदण अन्ननु० ए= नवकारका कानसग्ग इस शुश्की उसरी गाथा कहे. पुस्त रवरदी० बंदणवत्ति० एक नवकारका कामसग्ग० युश्की तीस गाथा कहे. तिझावुःशा० यावच्चगरा० बंदणव० एक नवकारक कानसम्ग युश्की धनी गाया कहे. पी वेठके नमोचुणं कहके खम दो के श्रीशांतिनाथ देवाधिदेव आराधनार्थ करेमिकानसग्गं वंदर व० अन्नहु० १ नवकारका कानसग कर०॥ रोगशोगादिन्निदोप जितायजितारये नमः श्रीशांतयेतस्मै विहितानतशांतये ५ (ततः श्रीशांतिदेवतानिमित्तंकरेमिकानसरगं० १ नवकारका कानसग्ग) श्रीशांतिजिनन्नक्ताय नव्यायसुखसंपदं श्रीशांतिदेवतादेया दशांति मपनीयते ६ (ततः श्रीशुतदेवतानिमित्त०) सुवर्णशालनीदेवाव 'झार्दशांगीजिनोमवा श्रुतदेवीसदामा मशेपश्रुतसंपदाजा(ततः श्री नुवनदेवतायआराधनार्थक) चतुर्वर्णायकीस्तुति १ गाया कहे । (सतः क्षेत्रदेवतानिमित्तं०) यातादेत्रगतास्तंति ? गाथा कहे ॥ ए॥ (ततः श्रीविकादेवतानिमित्तं० ) अंबानिहितमियामे सिध्बुसम न्विता सितेसिंस्थितागौरी वितनोतुसमीहितं ॥ १०॥ (ततः श्री पद्मावतीदेवतानिमित्तं०)धराधिपतिपत्नीया देवीपद्मावतीसदा झुक्षे पश्वतःसामां पातुफुल्लत्फणावली ॥ ११ ॥ (ततः श्रीचकेवरीदे वतानि०) चंचचक्रधराचारु प्रवालदलसन्निन्ना चिरंचकेश्वरीदेवी मंदतानिवन्नाचमा ॥ १२॥ (ततः श्रीअचुप्तादेवतानि०) खखे : टककोदंग वाणपाणिस्तमित्युतिः तुरंगगमनाचुप्ता कल्याणानिकरो नुमे ॥ १३॥ (ततः श्रीकुवरदेवतानि०) मथुरापुरीसुपार्य श्री पास्तपरकका श्रीकवेरागरारूदा सतांकावतयोलयान॥
( इजए ) (ततः श्रीब्रह्मदेवतानिमित्तं करेमि ) ब्रह्मशांतिसमांपाया दपाय वीरसेवकः श्रीमत्सत्यपुरसत्या पेनकीर्तिःकतानिजः ॥१५॥ (ततः श्रीगोत्रदेवतानिमि०) यागोत्रपालयत्येव सकलापायतःस. दा श्रीगोत्रदेवतारक्षां शंकरोतुनांगिरां ॥ १६ ॥ (ततः श्रीशक दिसमस्तदेवतानिमि०) श्रीशक्रप्रमुखापका जिनशासनसंस्थिता देवादेव्यस्तदन्येति संघरदंत्वपायत्तः ॥ १७॥ (ततः श्रीसिद्धार का श्रीशासनदेवतानि० च्यारलोगस्सको कानस्सग्गकर स्तुति कहे ) श्रीमहिमानमारूदा यक्षमातंगसेविता सामांसिद्धायिकापात् चकेचापेपुधारणी ॥ १७॥ लोगस्त कहके घेरे चैत्यवं. नमोक्षु जयवीयराय पर्यंत कहै । इस तरै १७ स्तुतिसे देववांदण विधि ॥ अथ मंडल प्रतिष्ठा विधिः। ॥ प्रथम दोनों तरफ मौली सूत्रकी बत्ती जगाके घृतका द पक करे. इन दोनों दीपकको चार प्रहर अखक रकै (पी) से ने चांदी वगेरे के कलसमें अबोटजल नरके सोनवाणी करे, हाथों कलस लेके सात नवकार गुणै.नही जीरावलापार्श्वनायरकांकुरुः स्वाहा। इस मंत्रसें सात वेर जलको मंत्र मंगलजीके ध्यारों तः फ धारा देवे, ऊपर जरा ठीटा देकर पवि करै, धूपखेवै (पीठे नवतारी मोलीसूत्रका साढातीन आंटा मंगलजीके बाहर करदेवे पूर्वोक्त मंत्र मंत्रके मोली तथा मेंढल मरोमाफली चालं तरस वांचे (पी) केसरकी कटोरी हायमें लेके नयाँ ही श्रीअईतेनमः इस मंत्र मंत्रके मंगलके ऊपर केसरका जिंटा देवे (ऊपर ) वलोंकों साथियो करे, टोकीदेवे, मंझलके अगामी साश्रिया चा लोंका वा नंद्यावर्त करके नालेर रुपिया ऊपर लेट , धरै. (पीठे केशरचंदन लेकर मंमलजीके चारों तरफ तीन रेखा पालेखन ॥ (पी) वासकेप पुष्प हाथमे लेके अगसीनूतधात्री विश्व ( ० ) धानमः ॥ इस मंत्रसे सात बेर मंत्रके मंझलनूम तथा पीठ पूजा करै, फेर आचार्यगुरु वासक्षेप दायमें लेके ही श्री श्रम त्पीठायनमः ॥ इस मंत्रसे सात वेर मंत्रके मंगलपीठकी पूज करे (पी) सात्रिया हायमें पुष्प चावल से लेके तीन बेर मंच कों वधावे. नीचे चावलोंका साथिया करके रुपिया नालेर यापन कों धरे (.पी) मात्रिया मंदरके नीतरसें प्रतिमाजी सायके में गमेके सिंहासण पर मंत्र पढके श्रापन करे. (स्थापनमंत्र)।- मोअर्हत्परमेश्वराय चतुर्मुखायपरमेष्टिने दिग्कुमरीपरिपूजिताय ३ तुपष्टिसुरासुरेंइसेविताय देवाधिदेवाय त्रैलोक्यमहिताय अत्रपीति र स्वादाः ॥ इस मंत्रको वेर पढके नव प्रतिमा वा एक प्रतिमा स्थापन करै इस तरे मंगलप्रतिया करके पीछे सिश्चक्रपूजा सरू करै । ॥ अय सिद्धचक पूजा ॥ ॥ प्रथम एक रकेबी में सपेद गोटा, सपेद वस्त्र, सपेद धजा, कर्केतनरत्न, ३४ होरा, पुप्प अक्षत फल नैवद्य दीप धप हाथ- में ले के अरिहंतपदकी पूना (यथा) अयाप्टदलमध्याब्ज.क- र्णिकायांजिनेश्वरान् आविनोल्लसद्दोधा नावतःस्थापयाम्यहं ।। ॥१॥ निःशेषदोधनधूमकेतुः नपारसंसारसमुद्रसेतून यजैतमस्ता तिशयैकहेतून श्रीमशिनानांवुजकर्णिकायां ॥ २॥* है। श्री अई योनमः स्वाहा (इस मंत्रकू बोलके अईत्पदकी पुजा कर. अपने जगे सर्वः द्रव्य चढावे. पीठे रकेवीमें लालगोटा, लालघजा-सालव स्त्र, ७ माणकरत्न, ३१ मूंगा, अष्ट द्रव्य लेके सिहपूजा प? (यथा) तस्यपुर्वदले तिझान सम्यक्तादिगुणात्मकान निःश्रेयसंपदंप्राप्तान नि दधेनक्तिनिर्नरः ॥ ३ ॥ तत्पूर्वपत्रेपतितःप्रणयः उराष्टकर्मामधिग भ्यशुक्षिप्राप्तानरान्सिद्धिमनतबोधान् सिद्धानयजेशांतिकरानराणां mony टेटनसनाटा (निमकीनरसिद्धपदकी " ( ३ ) पूजा करै, सर्व द्रव्य घढावै इति ॥ (पी) रकेशीमें पीला गोटा पोली पजा, पीलावस्त्र, ५ गोमेदकरत्न, ३६ सोनेकाफूल, जलादि सर्व द्रव्य ले के पूजा पढे ( यथा) स्थापयामिततःसूरीन् दक्षिण स्मिनालेमले चरतःपंचधाधारान पत्रिंसत्गुणैर्युतान् ॥ ५ ॥ सू रीसदाचारविचारसारा नाचारयंतः स्वपरान्यथेष्टं नग्रोपसमकानवा रंणार्थ मन्ययाम्यक्षतगंधधूपैया॥ न ही श्री सूरीन्यानमःस्वा हा (दकिणदिसकी तरफ आचार्य प्रापना पूजा करै इति ॥ पीठे) हरागोटा, हरीधजा, इरवस्त्र, मुंगकाल, ५ इंद्रनीत, २५ मरकतप ना, सर्व द्रव्य लेके खमा रहे. उपाध्याय पद पूजा पढे (यथा) हादशोगश्रुत्ताधारान् शास्त्राध्ययनतत्परान् निवेशयान्युपाध्यायान् पवित्रेपश्चिमेदले ॥ ७॥ श्रीधर्मशास्त्राएयनिशंप्रशांत्यै पतियेन्या न्यपिपाग्यति अध्यापकस्तांनपराजपत्रे स्थितापवित्रान्परिपूज थामि ॥ ॥ है। श्री उपाध्यायेभ्योनमः स्वाहा ( पश्चिमदि शाकी तरफ नपाध्यायपदकी थापना पूजा करै इति ॥ पीछे) स्थामगोटा, स्यामवस्त्र, स्यामघजा, नमदकाल, ५ राजपट्ट, २७ अरिष्टरल, जलादि सर्व द्रव्य से के साधूपदकी पूजा पढे ( यथा) व्याख्यादिकर्मकुर्वाणान् शुञ्जध्यानकमानसान नदकपत्रगतानवारान् साधुवासीससुव्रतान् ॥ ए ॥ वैराग्यमंतर्वचसिप्रसिद्धं सत्यंतपोधा दशधाशरीरे येपामुदक्यवगतानसुकतान्पवित्रान् साधून्सदातान्प रिपूजयामि ॥ १०॥ हा श्री सर्वसाधुन्योनमः स्वाहा ॥५॥ (उत्तर दिसाकी तरफ साधूपदकी श्रापना पूजा करै इति ॥ पीठे ) सपेदगोटा, सपेदधजा, सपेदवत्र, ६७ मोती, सर्व व्य हाथमे ले के खमा रहे काव्य प? ( यथा ) जिनोतमनःक्षा, क्षणेदर्शनेयजे । मिथ्यात्वमथनंशुई, न्यस्तमीशानसद्दले ॥ ११ ॥ न ही श्री सम्यग्दर्शनापनमः स्वाहाः (ईशानकूपमें दर्शन पदको ( ३ए) थापनापूजा करै इति ॥ पाचै) ५१ मोती, श्वेतगोटा, श्वेतधजा, श्वेतवस्त्र, चावलोकाला, आदि सर्व य ले खमा रहै || काव्य पढे ( या ) मशेपव्यपर्याय, रूपमेवावनासकं । ज्ञानमाग्नेयप वस्त्रं पूजयामिहितावहं ॥ १२ ॥ में हैं। श्री सम्यग्झानायनमः स्वाहा || ७॥ (अभिकूणकी तरफ ज्ञानपदकी थापना पूजा करे: इति ॥) फेर ) रकेवीमें ७० मोती, स्वेतगोटा, स्वेतधजा, स्वे तवस्त्रादि सर्व द्रव्य ले के खमा रहे. काव्य पढे ( यथा ) सामायि- कादिनिर्नेदै, श्वारित्रंचारुपंचधा || संस्थापयामिपूजार्थ, पत्रहनेश तेक्रमात् ॥ १३॥ ही श्री सम्यग्चारित्रायनमः स्वाहा (नेश तकूणकी तरफ चारित्रपदकी थापना पूजा करै इति ॥ ॥) पी) रकेवीमें ५० मोती, श्वेतगोटा, श्वेतधजा वस्त्रादि सर्व द्रव्य सेके काव्य पढे ( यथा) विधाज्ञादशधानिन्नं, पूतेपत्रतपस्व. यं ॥ निधाययामिन्नत्यात्र, वायव्यांदिशिशर्मदं ॥१५॥ ही श्री सम्यगतपसेनमः स्वाहाः (वायव्यकूणकी तरफ तपपदकी था पनापूजा करै इति ॥ अथअर्धे ) निःस्वेदत्वादिदिव्यातिशपम यतननश्रीजिनेंद्रान्सुसिहान्, सम्यक्तादिप्रष्टाप्टकगुणनृदाचार साराचसूरीन || शास्त्राणिप्रागिरक्षाप्रवचनरचनासुंदराण्यादिसंज्ञ, स्तत्सियपाठकानांयतिपतिसहिता नर्चयाम्यर्घदानै ॥ १५ ॥ इत्य अष्टदलंपा, पूरयेदर्हदादिनिः ॥ स्वाहांतप्रणवाद्यश्च, पदैविघ्ननिवृत्त ये ॥ १६॥ ही श्री यह अप्तिानसा सम्यग्दर्शन ज्ञान वा रित्र तपसेन्यो ही श्री अई परमेष्टिन परमनाथ परमदेवाधिदेव परमाईन् परमानंतचतुष्टय परमात्मनेतुन्धनमः (इति मूलामंत्र) इति सिश्चक प्रथम वलय पूजा ॥ ॥ अथ द्वितीय वलय पूजा ।। पहिले वलयमें एक तो वीचमें च्यार दिशिम च्यार विदि न (३३) लामे एते अटदल कमलके प्राकार नव कोठे मंगल के मध्य नाग मैं दोय ननोकी पूर्वोक्त प्रकार पूजा करावै .(पीछे ) दूसरे वलयमें चूमौके थाकार १६ कोठा होय (जिसमें ) एकेक कोठाके अनं तर पाठ कोठो प्रवर्गादि पाठ वर्ग स्थापन को (ोर ) एकेक कोम वीचमें खाली रहा हे नप्तमें अनाहतपद है। लमो गरि दंताणं) एसा पद स्थापन करे (पो ) एक रकेयोमें मिश्री ल. वंग (तथा ) एक रकेवी में मोटी दाखांले के खमा रहे. अनाहत. पदमें मिश्री लवंग चढावे और प्राव वर्गमें दाखां चढावै (यथा) (ॐ है। मो अरिहंताणं ) मिश्री लोंग चढाणा ॥ श्राई कशक ऋ ऋ ए ऐ ने श्री अं अः (ते हैं। स्वर वर्गायनमः ) (इहां ) १६ दाख चढावै ३ (ही बमोअरिहंताणं) मिश्रो लोंग ३ क ख ग घ ङ (न ही व्यंजनकवर्गायनमः) १६ दाख चढाथै ४ ( है। पमोअरिहंताणं ) ५ च छ ज झ ञ (केही चवर्गायनमः ॥ ६ (नही णमोअरिदताणं ) 3 ट म ढ ( ही टवर्गायनमः ) (ॐ है। मोअरिहंताणं ) त थ द धन (न है। तवर्गायनमः ) १० (नेही णमोयरिदताणं) ११. प फ बनम ( है। पवर्गायनमः) १२ ( हैं। मोअरिहंता, णं) १३ य र ल व ( ही यवर्गायनमः ) १४ (न है। पमो. अरिहंताएं ) १५ श प स ह ( हो शवयनमः ) १६ पहिले श्रवर्गसे प वर्ग तक वर्ग प्रति सोलेश दाख चढावे सब ए६९. (3र ) य र ल व श प स द २ दो वर्गामें ६५ चौसठ । दाख चढावे इति ॥ दूसरा वलय पूजा ॥ २ ॥ ॥ (श्रव तीसरा वलय ) चार दिश चार विदिशिमें श्रार परमेष्टिपद स्थापन निमिन श्राप कोठग कर इस आग कोठाके बीचश्मे वलाका तीन२ देचे तीनुं क्लाकामे २४ खाना होय एके -- ( ३ ) क खानेमें दोय २ दोय लब्धिपद स्थापन करणेस चौबीस घरी में सब्धिपद दोय स्थापन कर पूजन करपा || ॥ अय लब्धिपद पूजन विधि ॥ आठ परमेष्टीपदमें (* ही परमेष्टिनेनमः स्वादा ) एसा Gवेर कड़के बीजोरा चढावे. नर लब्धिपदका नाम बोल के खा रंका चढावै ( यथा) ही पदणमोजिणाणं ॥१॥ अंदणमोचदिजियाणं ॥२॥दी अर्दणमोपरमोहिजिणाणं ॥ ॥३॥दी अर्दणमोसबोदिजिणाणं || ४ नहीअहणमो पांतोदिजिणाणं ॥ ५ ॥ न हीअणमोकुम्बुहीणं ॥ ६ ॥ अईलमोवायबुद्धीणं ॥ ७ ॥ हैं व्हीग्रहणमोपयाणुसारी जो तुम्हीग्रहणमोआसीविसाणं ॥ ए॥ॐन्हीग्रहणमोदिहिविसाणं ।। ॥ १०॥ दीपदणमोसंन्निन्नसोयाणं ॥११॥ नहीअईणमोस यसंवृक्षारां ॥ १२ ॥ उन्हीअईणमोपत्तेयबुदाणं ॥ १३ ।। नन्ही- हणमोबोहिहीणं ॥ १४॥ नन्दीअहणमोनकुमईणं ॥ १५ ॥ सन्दीग्रहणमोविनलमई ॥ १६॥ नन्दीअणमोदसपूची॥१७॥ नन्हीअईणमोचनहसपूर्वी ॥ १७ ॥ नन्दीअणमोअगनिमतकु संलाणं ॥ १ए । नन्हीअहणमोविनवणशद्विपत्ताणं ॥ २० ॥ नन्दी' अंदणमोविजाहराणं ॥ २१ ॥ नन्हीअहणमोचारणलहीणं ॥२२॥ नन्हीअहणमोपलासमणाणं ॥ २३ ॥ नन्हीहैणमोआगासगामी णं ॥ २४ ॥ नन्दीमणमोखीरासवेणं ॥ २५॥ मन्दीअणमोस- प्णियासवाएं ॥२६॥ नन्दीबईणमोमहुआसवाणं ॥२७॥उँन्दी- ईणमोअमियासवाणं ॥२॥ नदीप्रणमोसिद्धायणा ॥रणा नन्हीदणमोन्नयवयामदाश्महावीरबदमाणबुद्धरितीणं ॥ ३० ॥ नन्हीअणमोठगातवाणं ॥ ३१ ॥ नन्दीअईसमोअरकीपमहाण. सिया || ३२ ॥ नन्दीपदणमोवढमाणाणं ॥ ३३ ॥ नन्दीग्रहण (३५) मोदिततवाणं ॥ ३४ ॥न्ही पदणमोतत्ततवाणं ॥ ३५ नन्ही हैणमोमहातवाणं ॥ ३६ ॥ नन्दीअणमोघोरतवाणं ॥ ३७॥ ने ही अहणमोगोरगुणाणं ॥३मानन्हीअईसमोघोरपरिकमाणं ॥३णा उन्होअर्दशमोधोरबंज्नयारीणं ॥ ४०॥ नन्हीपणमोग्रामोसदि पत्ताणं ॥४१॥ उन्होअहलमोखेलोसहिपताणं ॥ ४२ ॥ उन्हीप णमोजल्लोसहिपत्ता ॥ १३ ॥ नन्दी अर्दणमोविप्पोसहिपत्ताणं ।। ॥ ४५ ॥ नन्हीपणमोसबोसहिपत्ताणं ॥ ४५ ॥ नन्हीमणमोम पवलीणं ॥ ४६॥ उन्हीअहणमोवयणवलीणं ॥ १७ ॥ नन्हीअई मोकायवली ॥४॥ उन्होमपाललब्धिप्रेन्योनमः।इस तरे लब्धिपदका नाम बोलर के तीजे चोथे पांच वलयमें ४० खारका चढावै ॥ (पोठे ) मलजीके गलेमें हीकारजी स्थापन किया हे ( जहांसे) साढातीन नवलाका मंझलजीके चौतरफ देके नीचे (क्रों) एसा अक्षर लिखा है (जिसके ) प्रथम वलयमें श्रादि- शायें आठ गुरुपादका स्थापन करके भाव दामिमफल चढाव (यथा) नन्हीथईत्पाकान्योनमः ॥१॥ अनारचढावै ॥ नन्दति पाउकान्योनमः ॥ २ ॥ नहीप्राचार्यपाउकान्योनमः ॥ ३॥ व्हीगृहपाठकान्योनमः ॥ ४ ॥ उन्हीपरमगुरुपाकाभ्योनमः ॥ ॥ ५ ॥ नन्दीअदृष्टगुरुपाकान्योनमः ॥ ६ ॥ नन्दीअनंतगुरुपा कान्योनमः ॥ ७॥ नन्दीअनंतानंतगुरुपाकान्योनमः ॥ ८ ॥ हीअष्टगुरुपाका योनमः स्वाहाः ॥त तरे के वलयमें ज्दा मम चढावै (पोवे ) सातमा वलयमें श्रागे दिसामें जयादिक । देवीको स्थापन करके नारंगी चढावे (यथा) नन्हीजयायैनमः स्वाहा ॥ १ ॥ उन्होजनायैनमः स्वाहा ॥ २] उन्दोविजयायैनमः स्वाहा ॥ ३ ॥ नन्दनायैनमः स्वाहा ।। १ ॥ नन्हीजयंत्यैनमः स्वाहा ॥ ५॥ नन्हीमोदायैनमः स्वाहा ।। ६ ॥ न्दीअपराजिता ( ३९६) यैनमः स्वाहा ॥ ॥ नन्ही अंधायैनमः स्वाहा || (सी तर) सातमें वलयमें नारंगी चढावे (पी) थामें वलयमें १६ विद्यादेवीयोकी स्थापना करके चांदीके वर्ग लपेटी १६ सुपा री चढावै ( यथा ) नन्दीरोहएयैनमः ॥ १॥ नन्दीप्रासैनमः॥२॥ नन्दीवजशृंखलायैनमः ॥ ३ ॥ नन्हीवजांकुशायनमः॥ ४ ॥ में म्हीचकेश्वर्यै नमः ॥ ५॥ नन्दीपुरुपदचायनमः ॥ ६॥ मन्दी काल्पेनमः ॥ ७ ॥ नन्हीमाहाकाल्यैनमः ॥ ८॥ नही गोर्थनमः ॥ ए ॥ नहीगंधानमः ॥ १० ॥ नन्दीसर्वास्त्र महाज्वालायैनमः ॥ ॥ नन्दीमानव्यैनमः ॥ १२ ॥ मन्दीरोट्यायनमः ॥ १३ ॥ नहीअनुप्तायैनमः ।। १५ ।। उन्दी मानस्थैनमः ॥ १५॥ नन्हीमाहामानस्वैनमः ॥ १६ ॥ इस तरे पाठमा वलयकी वोलके वरक समेत सुपारी चढा के पूजा करैपी ठे नवमें वलयके वायें तरफ शासनदेवीयां ॥ २४ की थापना कर पूजा करै ।। २५ पुंगीफल चढाव (यथा) नचक्रेश्वर्थनमः॥ अजितवतायैनमः ॥ २॥ नरितायनमः ॥ ३ ॥ काख्येनमः || महाकाल्यैनमः ॥५॥ श्यामायैनमः ॥६॥ शांतायैनमः ॥७॥ ननुकुटियनमः ॥॥ सुतारकायैनमः ||णाचप्रशोकायनमः ॥१०॥ मानव्यैनमः ॥ ११॥ नमानमः॥ १२ ॥ विधि नायनमः ॥ १३ ॥ अंकुशायनमः | १४|| बैंकंदप्पाययिनमः ॥ १५ ॥ नमिएनमः ॥ १६ ॥ जयसापनमः ॥ १७ ॥धार एपनमः॥१८॥धरणप्रियायैनमः ॥ ॥ नरदनाय नमः ॥२०॥गांपायनमः ॥ १ ॥ विकायनमः ॥ २२॥ पद्माव त्यैनमः ॥ २३ ॥ सिज्ञापिकायनमः ॥ २४ ॥ इति । दक्षिणेत रंफ २५ यदराजकी स्थापना करे वरकसपेटी २५ मुपारी नदारे । (गया) ग्रह्मशांतममः ॥ २४ ॥ गायनमः || २: गो ( ३ ) मेयायनमः ॥ २२ ॥ तृकुटयैनम ॥ २१ ॥ वरुणायनमः ।। २०॥ नकुबेरायनमः ॥ १५ ॥ यदराजायनमः ।। १७ ॥ अँगंध वायनमः ॥ १७ ॥ नगरुमायनमः ||१६॥ किन्नरायनमः ॥१५॥ उपातालायनमः ॥ १४ ॥ उपएमुखायनमः ॥ १३ ॥ कुमाराय नमः॥ १२ ॥ यदराजायनमः ॥ ११ ॥ ब्रह्मणेनमः ॥१०॥ अजितायमः ॥ ए ॥ नविजयायैनमः ॥ ॥ मातंगायनमः ॥७॥ कुसुमायनमः ॥ ६ ॥ तुंबुरुयैनमः ॥ ५॥ नयनाय कायनमः ॥ ४ ॥ त्रिमुखायनमः ॥३॥ महायकायनमः ॥२॥ नँगोमुखायनमः ॥ १ ॥ इति ॥ पी चार दिशाम ४ धारपालको थापना कर के पीला वलवाकुल चढावे ( यथा ) कुमुदायनमः ॥१॥ पूर्वदिशि ॥ अंजनायनमः ॥२॥ दक्षिणदिशि ॥ वामनाय नमः ॥ ३ ॥ पश्चिमदिशि ॥ नपुष्पदंतायनमः ॥था उत्तरदिशि ।। पी चार विदिसकी तरफ च्यार वीरपदमें काले बलवाकुल चढावै '(यथा) उमाणलशयनमः ॥ १ ॥ उपूर्ण नायनमः ॥ ५॥ नक पिलायनमः ॥ ३ ॥ नैपिंगलायनमः ॥ ५ ॥ (इस तरे दसमें वल यमें आधु दिशामें ४ झारपाल ४ वीर स्थापन कर पी पूर्ण कल सके आकार ऊपरसें कियानया सिइचक्रजीके गलेके ठिकाणे काणे नवनिधान पढे. तब सोने चांदी के कलसादिकोमें यथाशक्ति रोकनाणा मालके स्थापन करै ) ( यथा ) नैनैसर्पकायनमः॥१ । नेपांडुफापनमः ॥२॥ नैपिंगलायनमः ॥३॥ सर्वरत्नाथनमः ॥३॥ महापमायनमः ॥ ५ ॥कालायनमः ॥६॥ महां कालायनमः ॥ ७॥ उमाणवायनमः ॥॥ नशंखायनमः ॥ ए ॥ (इस तरे मुखस्थानकपदे ए कलस स्थापन करै । पीठे कोदलेका फल हायमें ले के दक्षिणनेत्रके घरावर पासमें वंगली का आकार किया है (जहां:) उन्हीविमलस्वामिनेनमः १॥ एसा
( ३)
कहकेचढावै ॥ फेर कोदलाफल हायमें ले के वायेनेत्रके पास बंग
सीमें (नक्षेत्रपालायनमः) एसा वोलके चढावै॥पीठे तीसरा
कोदलाफल ) हायमें ले के नीचे पीदिके दक्षिणे तरफ बंगलीमें)
चक्रेश्वयनमः ( एसा वोसके चढावे ॥ ३॥ (पी) चौया को
इलाफल हाथमें ले के नीचे पीदेके वांये तरफ वंगली में (नयम
सिमसिचक्राधिष्टायकायनमः ) एसा बोलके चढावै ॥४॥ (पीवे
दसूं दिशामें इंसादिक दस दिग्पालकी स्थापन करै, घणसकेतो अ
पणार वर्ण मुनव वस्त्र नैवद्य पुष्पादि व्य चढावै अथवा सर्वको
एक इव्य सर्व समान चढाव ( यथा) शयनमः॥१॥ कनक
वर्ण चंदन केसर चंपो द्राख पीलावस्त्र पान सुपारी रोकश्व्य श्रा
दि सर्व इव्य चढावै १।। (अग्निकूणे) अग्नयनमः ॥२॥ रक्तवर्ण
का वस्त्रादिक द्रव्य चढावै ॥ २ ॥ (दक्षिणदिसि ) यमायनमः
॥ ३ ॥ काले वर्णका वस्त्रादि इव्य चढावे ॥ ३ ॥ (नैशतकूणे.)
अनशतायनमः॥४॥ धूसरवर्णका वस्त्रादिक इव्य चढावै (पश्चि
मदिश) वरुणायनमः ॥ धूसरवर्णका सर्व इव्य चढावै ५ (वा
यव्यकूण) वायवनमः || ६॥ नीलवर्णका वस्त्रादिक द्रव्य च
ढावै॥ ६ ॥ (नचरदिसि ) कुबेरायनमः ॥ ७ ॥ सपेदव
का वस्त्रादिक च्य चढावै ॥ ७ ॥ (ईशानकूण) नशाना
यनमः ॥ 0 || सपेदवर्णका वस्त्रादिक इव्य चढावै ॥.॥
(अघोदिति) नागायनमः ॥ए ॥ सपेदवर्गका वस्त्रादिक इव्प
चडावे ।। ए॥ (नईदिशि) ब्रह्मणनमः ||१० ॥ तपेदवर्णका
वस्त्रादि सर्व द्रव्य चढावै ॥१०॥ इस तरे दस दिग्पालका स्या
पन पूजन करे ॥ (पी यंत्रके पोंदीके स्थानक नव कोग किया
'नया हे जहां नवग्रहकी स्थापन पूजन करें (यथा) सूर्यायनमः
सियाका वस्त्रादिक द्रव्य चढाव ॥१॥ सोमायनमः ॥२॥
( ३0) सपेदवर्णवस्त्रादिक द्रव्य चढावे ॥२॥ जोमायनमः ॥ ३॥ खरंगवस्त्रादिक द्रव्य चढावे ॥ ३ ॥ नबुधायनमः ॥ ५ ॥ मुंगेरंग का वस्त्राद्रि द्रव्य चढावै ॥an वृहस्पतयेनमः ॥ ५ ॥ पविवर्ण वस्त्रादिक व्य चढावै ॥ ५ ॥ शुकायममः ॥६॥ सपेदवर्णनंदोत. वस्त्रादिक द्रव्य चढावै ॥ ६ ॥ नैशनेश्वरायनमः ॥७॥नीलेरंग का वस्त्रादिक द्रव्य चढावै ॥ ७॥ राहवेनमः ॥ 5 ॥ कालेरंग का वस्त्रादि द्रव्य चदाच ॥ ॥केतवेनमः ॥ ए॥ गैटरंग व स्त्रादि द्रव्य चढावै ।) ए || इस तरे नीचे नवग्रहकी स्थापनपूजा करै.' पीवै मात्र नवपदजीकी पूजा पढावै चैत्यवंदन कर थुइक दकर नवपद स्तवन कहे ॥ पी गुरु पास आकर ज्ञानपूजा कर चासक्षेप लेवे ।। गुरुपूजा वस्त्रपात्रसे करे पीछे यथाशक्ति साथ ौं वात्सल्य करे ॥ इति मंगल पूजन विधि । जागना चाहिये (जब ) को श्रीमंत लीकी तपस्या करै तर तो गए महीने में मल पूजा विस्तार विधीसे करता रहै ॥ ४ ॥ वरसे तप पुरण नये बाद उधव के साथ मंगलपूजा कराके नव२ उपगरणोसें उ द्यापन करै. जलजात्रादि श्राईमदोछव कर धर्मशालासिरागार (फेर ) देवका देवखाते, ज्ञानका ज्ञानखाते, गुरुका गुरुखाते च दाचे, शारिदित जावसे यथाशक्ति रोकद्रव्य चढा (र) पंचा यती संघकी तरफसें मंगलीकके वास्ते मंगलपूजादिक नवपदपूजा अवश्य विधिसंयुक्त करता रहै । तिनद्यापन विधि || ।। अथ सर्व तपस्याविधि लिख्यते ।। ॥ अय सचर सो को गुणनो लिस्पते ।। ॥ अथ जबपिमें मपम महाविदो जिननामकी प्रथम पंक्ती ॥१॥ जपदेवस्वामीसर्वज्ञापनमः॥१॥ करणजस्वामीसर्वज्ञाय नमः ॥ २ ॥ श्रीलक्ष्मीनाथसर्वा० ॥ ३॥ श्रीधनंतनाथसर्वज्ञा (100) गनमः॥४॥ श्रीगंगाधरसर्वझायनमः || ५ || श्रीविशालचसर्व झा०॥ ६ ॥ प्रियंकरनाथसर्वज्ञा० ॥ ॥ अमारिदत्तप्तर्वज्ञा० ॥ || || श्रीरुप्यनाथसर्वज्ञा०॥ ए॥ श्रीगुणगुप्तसर्वज्ञा० ॥१॥ श्रीपद्मनानसर्वज्ञा०॥१॥श्रीजलंधरस्वामिसर्वज्ञा० ॥१२॥ श्रीयुगादित्यसर्वज्ञायनमः ॥ १३ ॥ श्रीवरदत्तसर्वा० ॥ १४ ॥ श्रीचंकेतुसर्वज्ञायण ॥ १५ ॥ श्रीमहाकायसर्वज्ञा० ॥ १६॥ श्री अमरकेतुसर्वज्ञा० ॥ १७ ॥ श्रीअरण्यवाससर्वज्ञायनमः ॥ १७ ॥ श्रीहरिहरसर्वज्ञायनमः ॥ १५ ॥ स्तमेंद्रनाथसर्वज्ञा० ॥ २० ॥ श्रीशांतिकतसर्वज्ञा० ॥ २१ ॥ अनंतरुतसर्वज्ञा० ॥ २२ ॥ गजेंद्र. अन्नसर्वज्ञाय ॥ २३ ॥ सागरचंद्रसर्वज्ञा०॥ २४ ॥ महेश्वरदत्त सर्वज्ञा० ॥ २५ ॥ सदमीचंद्रसर्वज्ञा० ॥२६॥ रुपननाथप्तर्वाण ।।२७ ॥ सोमकांतसर्वज्ञाय० ॥ २० ॥ नेमिन्नद्रसर्वज्ञा० ॥२॥ अजितन्नद्रसर्वज्ञा०॥ ३०॥ महीधरसर्वज्ञा०॥ ३१ ॥ श्रीराजे श्वरसायनमः ॥ ३२ ॥ ॥ अथ घातकीखंडे प्रथम महाविदेहे जिननामानि || २ पंक्ती ॥ वीरचंद्रसर्वज्ञा० ॥ १ ॥ वचसेनसर्वज्ञा० ॥२॥ नीलकांति सर्वज्ञा० ॥३॥ पुंजकेसीसर्वज्ञा० ॥ ॥ रुग्मिकसर्वज्ञायनमः ।। 1.५ ॥ खेमकरसर्वज्ञा० ॥ ६ ॥ मृगांकनाथसर्व०॥ ७ ॥ मुनिमू निसर्वज्ञा०॥ ॥ विमलनाथसर्वज्ञा० ॥ ए | आगमिकसर्वा० ॥१०॥ उक्तितनाथसर्वज्ञा०॥ ११ ॥ वसुधाधिपसर्वज्ञा० ॥१२॥ महल्लनायसर्वज्ञाय० ॥१३॥ वनदेवत्सर्वज्ञाय०॥ १४॥ वसंमृत सर्वज्ञाय० ॥ १५ ॥ अमृतवाहनसर्वज्ञा० ॥ १६ ॥ पूर्णमेंद्रसर्व झाय० ॥ १७॥ श्रीरेवांतिसर्वज्ञा० ॥१७॥ श्रीकल्पशाकसर्वज्ञा ए || श्रीनलनीदत्तसर्वज्ञा ॥ २० ॥ श्रीविद्यापतिसर्वशा || पानामतर्पज्ञा ॥ १२ ॥ श्रीनानुनाथसर्वज्ञाय० .
११) ॥ २३ ॥ श्रीमनंजरासर्वज्ञा ॥ २४ ॥ श्रीविशिष्टता० ३५ श्रीजलप्रनसर्वज्ञा० ॥ २६ ॥ श्रीमुनिचंद्रसर्वज्ञायनमः ॥ २४ ॥ श्रीज्ञपिपालसर्वज्ञा० ० ॥ २७ ॥ श्रीकुमंगंदत्तसर्व० ॥ २५ ॥ श्री घजधरसर्वज्ञा० ॥ ३०॥ श्रीनूतानंदसर्वज्ञा०॥ ३१ ॥श्रीती थेश्वरसायनमः ।। ३२॥ भोली ३ पातकीखंडे महाविदो जिननामानि । ॥ धरमदत्तसर्वज्ञा० ॥ १ ॥ श्रीनूमिपनीसर्वज्ञा० ॥३॥ श्रीमरुदत्ततर्वज्ञा०॥३॥ श्रीसुमित्रनायसर्वज्ञा०॥४॥श्रीपेरा नाथसर्वज्ञा० ॥ ५॥ श्रीप्रनानंदसर्वज्ञा० ॥ ६ ॥ श्रीपद्माकरसर्व ज्ञा० ॥ ७ ॥ श्रीमहाघोपसर्वज्ञा०॥ ॥ श्रीचंद्रप्रननायतर्वज्ञा० || ए | श्रीनूमिपालसर्वज्ञा०॥ १० ॥ श्रीसुमतिपेणसर्वज्ञा० ॥१ ॥ प्रतिघ्युतसर्थज्ञाय० ॥ १२ ॥ श्रीललितांगसर्वज्ञा० ॥ १३ ॥ श्रीतीर्थनूतिसर्वज्ञा० ॥ १४ ॥ श्रीअरचंडसर्वज्ञा० ॥१५॥ श्रीसमा धिसर्वज्ञा० ॥१६॥ श्रीमुनिचंइसर्वज्ञायनमः ॥१७॥ श्रीमहेंशनाथ सर्वज्ञा० ॥ १८ ॥ श्रीशशांकनाथसर्वज्ञा० ॥ १५ ॥ श्रीजगदीश्वर सर्व०॥ २०॥ श्रीदेवेंद्रनाथसर्वज्ञा० ॥ २१॥ श्रीगुणनाथसर्चना. ॥ १२ ॥ श्रीमद्योतनाग्रसर्वज्ञा० ॥ २३ ॥ श्रीनारायणनाथसर्वज्ञा० ॥ २१॥ श्रीकपिणनाथसर्वज्ञा० ॥ २५ ॥ श्रीमन्नाकरसर्वज्ञा० ॥ २६ ॥ श्रीजिनदीक्षितसर्वज्ञा० ॥ २७ ॥ श्रीसकतनापसर्वज्ञा० ॥ ॥ २८ ॥ श्रीशिलारनाथसर्वज्ञा० ॥ २५ ॥ श्रीवजयरसर्वज्ञा० ॥ ॥३०॥ श्रीतदस्रानसर्वज्ञा० ॥११॥श्रीअशोकनाथसर्वज्ञा० ॥३२॥ ॥ ओली ४ ॥ पुष्कराईप्रयममाविदेो निननामानि ॥ ॥ श्रीमेघवादनतर्वज्ञा० ॥१॥ श्रीजीविज्ञपिकसर्वज्ञा०॥ ॥ २॥ श्रीमहापुरुषतर्वज्ञा० ॥ ३ ॥ श्री पापदरसर्वज्ञा० ॥१॥ श्रीमृगांकनायसर्वज्ञा० ॥ ५ ॥ श्रीसूरसिंहसर्वज्ञा० ॥६॥ श्रीज गत्पूज्यतर्वज्ञा० ॥ ७ ॥ श्रीसुमतिनायसर्वज्ञा० ॥ ॥ श्रीमहाम . (४०२) हद्रनाथसर्वज्ञा० ॥ ॥ श्रीअमरन्नूतिसर्वज्ञा० ॥ १० ॥ श्रीकुमा चंद्रसर्वज्ञा०॥११॥ श्रीवीरपेणसर्वझायनमः॥१२॥श्रीरमणनार सर्वज्ञा० ॥ १३ ॥ श्रीस्वयंप्रनसर्वज्ञा०॥ १५ ॥ श्रीप्रचलनद्रप्त ज्ञा० ॥ १५ ॥ श्रीअमरकेतुसर्व०॥ १६ ॥ श्रीसिक्षार्थसर्वज्ञायः ॥ १७ ॥ श्रीसफलस्वामिसर्वज्ञा० ॥ १७ ॥ श्रीविजयदेवसर्वज्ञाय नमः ॥ १७ ॥ श्रीनरसिंहसर्वज्ञाप० २०॥ श्रीशीतानंदसर्वज्ञाव ॥ २१ ॥ श्रीलंदारिकसर्वज्ञा० ॥ २२ ॥श्रीचंशतपसर्वज्ञा० ॥२३॥ श्रीचंद्रगुप्तसर्वज्ञा० ॥ २३ ॥ श्रीहढरथसर्वज्ञा० ॥ २४ ॥ श्रीमहा यशसर्वज्ञा० ॥ २५ ॥ श्रीनमोकनाथसर्वज्ञा०॥ २६ ॥ श्रीप्रद्युम्नना यसर्वज्ञा०॥ २७॥ श्रीमहातेजप्तर्वज्ञायनमः ॥ २० ॥ श्रोपुष्पकेतु सर्वज्ञायनमः॥ ए॥ श्रीकामदेवसर्वज्ञा०|| ३०॥ श्रीसमतकेतुस वैज्ञायनमः ॥ ३१॥ || ओली ५॥ पुष्करार्द्ध द्वितियेमहाविदेहे जिननामानि ।। ॥ प्रसन्नचंदसर्वज्ञा०॥ १ ॥ महासेनसर्वज्ञा० ॥२॥ वन 'नालसर्वज्ञाण ॥ ३ ।। सुवर्णवाहुसर्वज्ञा० ॥ ४ ॥ श्रीकूरचंद्रसर्व ज्ञा०॥५॥श्री वयवीर्यसर्वज्ञा०॥६॥ श्रीविमलचंदसर्वज्ञा०।। ॥श्रीयसोधरसर्वज्ञा० ॥ ॥ श्रीमहावलसर्वज्ञा० ॥ ए॥ श्री वनसेनसर्वज्ञा० ॥ १० ॥ श्रीविमलवोधसर्वज्ञा० ॥ ११ ॥ श्रीजी मनायर्वज्ञा० ॥ १२ ॥ श्रीमेरुनश्सर्वज्ञा० ॥ १३ ॥ श्रीनगुप्तसर्व ज्ञा० ॥ १४ ॥ श्रीमुढधसदस्रसर्वज्ञा०॥ १५ ॥ श्रीसुव्रतनाथसर्व 'ज्ञा० ॥ १६ ॥ श्रीहरिचंद्रसर्वज्ञा० ॥ १७ ॥ श्रीप्रतिमाघरसर्वज्ञा० '॥ १७ ॥ श्रीअतिश्रेयतर्वज्ञा ॥ १५ ॥ श्रीकनककेतुसर्वज्ञा० ॥ २०॥ श्रीयजित्नवीर्य सर्वज्ञा०॥ २१ ॥ श्रीफल गुप्तनाथतज्ञा २॥ श्रीब्रह्मन्नुतसर्वज्ञा० ॥ २३ ॥ श्रीहितकरसर्यज्ञा० ॥ ॥ श्रीवरुणदत्तसर्वज्ञा० ॥ २५ ॥ श्रीयशकीर्तिसर्वज्ञा० ॥२६॥ .
(४०३ ) नागेनाथसर्वज्ञा० ॥ २७॥ श्रीमहीधरसर्वज्ञा०॥ २७ ॥ रुतत्र 'मनाथसर्वज्ञा० ॥ २५ ॥ श्रीमहेंनाथसर्वज्ञा० ॥ ३०॥ श्रीवई मानसर्व० ।। ३१ ॥ श्रीसुरेंद्रनाथ सर्वज्ञा० ॥ ३२ ॥ || ओली ६॥ पांच भरत पांच एरवत जिननामानि । (जंबुझीपेनस्तक्षेत्रे जिननामानि) श्रीअजिनायसर्वज्ञा० ॥ १ ॥ (धातकीखमप्रथमतरते०) सितनाथसर्वज्ञायनमः ॥२॥ (घातकीखेमे दितियनरतेजिननांम ) करणनाथसर्वज्ञायनमः ॥ '॥ ३ ॥ (पुष्कराईप्रयमन्नरतेजिननांम) प्रशासनाथसर्वजा०॥2 ॥ (पुष्करावितियनरतेोजननांमः) प्रन्नावफनायसर्व०॥५॥(जं. बूहीपेएरक्तक्षेत्रेजिननाम ) चंदनापसर्वज्ञापनमः ॥ ६॥ (धात कीखप्रथमएरवतेजि०)जयनाथसर्वज्ञायनमः ॥७॥ (धातकीखेमे दितियएरवते ) पुप्पदंतसर्वज्ञायनमः 1100 (पुष्कराहे प्रयमएरव तेजिनना०) यामादिकसर्वज्ञायपा(पुष्कराहितियएरवतेजि०) 'श्रीवखिलनाथसर्वज्ञायनमः॥१०॥इति सत्तर सय तीकर तपका गुणना संपूर्ण ॥३६ स्यांम, ३० लाल, ३८ नीला, ३६ पीला, ५० श्वेत. सर्व संख्या १७०॥ ॥ अथ सत्तर सो जिन को स्तवन लिख्यते ॥ ॥ दूहा ॥ स्वस्ति श्री दायक सदा, त्रेसलेप जिनचंद ॥ त- स्पद नामी कंधरा, कारण तिव सुखकर 10 वार्थकासरदातलो, नर धरि समरण शक्ति 11 सप्त्युत्तर सत जिनतसी, रचस्युं नुति सु चिनक्ति ॥ २॥ ते जे द्वीप समस्तने, मध्यमेरु कनकान ।। पूर्वापर वि तेहनें, विजय नामको लान ॥ ३ ॥ मूलविजय वसु प्रतिदिशा, कयनामें युगतीस ॥ शीतोदा तरणोत्तयो, कारण वि श्वावीस ॥ १ ॥ खेम धातकी दूसरो, द्वीप मनोहर तेद ।। कंचन गिरि युग ते तिहां, मन पारो घर नेह ॥ ५॥ त्रपतम पुष्कर जां - . (10) :णिये, दीप सकल गुणखांस ॥ अर्ध नाग जसु नत्नमें, मिरि यु- जलद समांन ॥ ६॥ नोन्नवि संख्या विजयनी, प्रति मेरो वतार | धारो गणित अनुक्रमें, पटयुत्तर शत हीस |॥ ७॥ एह अंढा- द्वीपनी, विजयतो परिमाण ॥ काल चतुर्थ तिहां सदा, जाय श्रीजिननाए ॥ ७ ॥ जिण तीर्थंकर वारके, विचरया जे जिनर य । ते प्रति बिजये नणूं, अागमसुं चित लाय ॥ 2 ॥ (ढार पारणेकी) ॥ तिण काले ने तिण समे जी, तीर्थंकर महाराज || जित जिनेसर राजता जी, तारण तरण जिहाज ॥ नविकजन रज्यो धर्म सनेह ॥टेर ॥ १ ॥ अतिशय चौतीस संजुआ जी, वां णी गुण पैंतीस॥ लोकालोक प्रकाशता जी, प्रणमत नर सुर ईस।। ० ॥२॥ एहवा श्रीजिन वारके जी, एकसो साठ जिनंद ॥वि चरया महियल वोधता जी, विजय महार सन्नंद ॥ न० ॥ ३ ॥ पंचर जरतैरवत जी, दशमित श्रीजिनराय ॥ विवरै जगजन ता रताःजी, समरयां संपति पाय ॥ न० 118 || ए सत्तर सो जिन वरू जी, अतुल सकल गुणखांन || श्यामवरण सोले कह्या जी, अकल कला युतिवांन ॥ ज०॥ ५॥ रक्तारूति त्रिंशत कह्या जी, नीलवरण वसु तीस || रवि जिम जललह नाधरू जी, कनकवर । उनीस.॥०॥ ६ ॥ रजत मुक्त पय जलकणा जी, सम सित विमल प्रकाश पनविक चकोर प्रमोदता जी, शशि जिम जिन पचा स ॥०॥ ॥ प्रति जिन व्रत उपवासयी जी, वीस प्रमित जपमाल । त्यक्त कपाय शुन्नातमां जी, परिये नाव विशाल । ०॥ ॥ श्म ए तप पूरण हुयां जी, नजमणे निज शक्ति । कीजे श्रीजिनशासने जी, संघ सर्नी नक्ति || न. ॥ ॥ एत पविधि,नवि जे करे जी, प्रेम सहित जिनधर्म ॥ साधन गुण श्र नुमोदता जी, ते लदे दिव शिव शर्म ॥ न० ॥१०॥ कलश ,
,
(४०५)
संवत मूनि सर लोक नारद चं ज्येष्ट पर ए, वदि सप्तमी रवि
दिने हितवजन कथनधर नूर ए ॥ गुरु खरतरांवर तरणि सन्नि.
न जैनचं सनूर ए, ए तपन कीधो जीमगंजे श्रमचंद कपूर ए
॥११॥ इति श्रीसत्तर सय जिन स्तवनं ॥
॥ अथ कम्मपयडी को गुणनो लिख्यते ॥
॥ जानावरणीकर्मकी५प्रकती-मतिज्ञानावरणीरहितायश्री
तिक्षायनमः १, श्रुतझानावरणीरहितायश्रीसिशायनमः २, अवधि
ज्ञानावरणीरहिताय श्रीसि० ३, मनपर्यवज्ञानावरणरहितायश्रीसि
झा० १, केवल ज्ञानावरणरहितायप्ति० ५, (दर्शनावणकर्मकी नव
प्रकृती ए)-चकुदर्शनावरणरहितापसि० ६, प्रचक्षुदर्शनावरण
२०७,अयधिदर्शनावरणर०८, केबलदर्शनावरणर.ए, निज्ञकर्म
रहितायसिक १०, निद्रानिद्रारहि० ११, प्रच लार० १२, प्रचलाप्रच
ला० १३, घीणदी०१४॥ ( वेदनीकर्म की प्रकति २) सातावे
दनीरहितायश्री. १५, अशातायेदनीरहिताय. १६, (मोदनी
कर्म की प्रस्ती १८)-सम्यक्तमोदनीर० १७, मियमोहनीरहिताय
14, मिथ्यात्वमोदनीर० १९, अनंतानुबंधीकोघर०२०, अनंतानु
बंधीमानर० २०, अनंतानुबंधीमायार०२२, अनंतानुबंधिलोजर०
:२३, अप्रत्याख्यानीकोघर०२६,थमत्यारव्यानीमानर ०२५, अप्रत्या
ख्यानीमायार० २६, अप्रत्याख्यानीलोनर० २७, प्रत्याख्यानीको
धर० ३८, प्रत्याख्यानीमानर० २९, प्रत्याख्यानीमायार० ३०,
प्रत्यारुपानीलोनर ३१, संज्वलनमोधर० ३२, संज्वलमांनर०
३३, संज्वसनमापार० ३१, संध्यलनलोनर० ३५, दास्यमोह
नीर० ३६, रतिमोहनीर० ३७, परतिमोहनीर० ३८, नयमोह
नीर० ३९, सोकमोहनीर० १०, गंगमोहनीर० ११, स्त्रीवेदर०
:४२, पुरुरवेदर० १३, नसकचेदर० ४१. }(श्रायुकीप्रस्त।
,
1 (108) लिये, द्वीप सकल गुणखांस ॥ अर्ध नाग जसु नत्तमें, जलद समान ॥६॥जोन्नति संख्या विजयनी, प्रति मेरो ॥ धारो गणित अनुक्रमें, पष्टयुत्तर शत हींस || ७॥ एद द्वीपनी, विजयतणो परिमाण ॥ कास चतुर्ग तिहां सदा, श्रीजिनन्नाग ॥ ७॥ जिण तीर्थकर वारके, विचरचा जे । य ॥ ते ९ प्रति विजये न, श्रागमसुं चित लाय ॥ ए. पारणेकी)॥ तिण काले ने तिण समे जी, तीर्थंकर महाराज जित जिनेसर राजता जी, तारण तरण जिहाज । नविकज रज्यो धर्म सनेह ॥ टेर ॥ १ ॥ अतिशय चौतीस संजुआ जी णी गुण पैंतीस॥ लोकालोक प्रकाशता जी, प्रणमत नर सुरई ० ॥२॥ एहवा श्रीजिन वारके जी, एकसो साठ जिनंद ।- चरया महियल वोधता जी, विजय मकार सन्नंद ॥०॥ पंचर जरतैरवतें जी, दशमित श्रीजिनराय ॥ विचरै जगजन रता जी, समरयां संपति धाय ॥०॥ १ ॥ ए सत्तर सो जि वरू जी, अतुस सकल गुणखांन || श्यामवरण सोले कहा - अकल कला द्युतिवान ॥ न० ५॥ रक्तारुति त्रिंशत कह्याज नीलवरण वसु तीस || रवि जिम मललह नाधरू जी, कनाव ण उत्तीस. ॥ ज० ॥ ६ ॥ रजत मुक्त पय जलकणा जी, सम सिक विमल प्रकाश नविक चकोर प्रमोदता जी, शशि जिम जिन पञ्चा स ॥०॥ ॥ प्रति जिन व्रत उपवासथी जी, वीस प्रमित जपमाल । त्यक्त कपाय शुन्नातमा जी, परिये नाव विशाल । न०॥ ॥ श्म ए तप पूरण हुयां जी, उजमणे निज शकि। कीजे श्रीजिनशासने जी, संघ सदूनी नक्कि -: पविधिनधि जे करे.जी, प्रेम नुमोदता जी, ते लदे दिव , , (४०५) संवत मूनि सर लोक नारद चंड ज्येष्ट पर ए, वदि सप्तमी रवि दिने हितवद्धन कथनधर नूर ए ॥ गुरु खरतरांबर तरणि सन्नि. न जैनचं सनूर ए, ए तपन कीघो जीमगंजे श्रमणचंद कपूर ए ॥११॥ इति श्रीसत्तर सय जिन स्तवनं ॥ ॥ अथ कम्मपयडी को गुणनो लिख्यते । ॥ जानावरणीकर्मकी५प्रस्ती-मतिज्ञानावरणीरहितायश्री सिझयनमः १, श्रुतज्ञानावरणीरहितायश्रीसिशायनमः २, अवधि झानावरणीरहितायश्रीसि० ३, मनपर्यवज्ञानावरणरहितायश्रीसि हा० १, केवल ज्ञानावरणरहितायप्ति० ५, (दर्शनावणकर्मकी नव प्रकृती ए) चकुदर्शनावरणरहितायतिः ६, अचकुदर्शनावरण २०७,अवधिदर्शनावरणर० ७, केवलदर्शनावरार० ए, निज्ञकर्म रहितायसि०१०, निद्रानिद्रारदि० ११, अचलार० १२, प्रचलाप्रच ला० १३, थीणदी०१४ ॥ ( वेदनीकर्म की प्रकति २) सातावे दनीरहितायश्री. १५, अशातावेदनीरहिताय. १६, (मोहनी कर्म की प्ररुती १८)-सम्यक्तमोहनीर० १७, मिश्रमोहनीरहिताय १८, मिथ्यात्वमोहनीर० १९, अनंतानुबंधीकोघर० २०, अनंतानु बंधीमानर० २०, अनंतानुबंधीमायार०२२, अनंतानुवंश्लिोजर २३, अप्रत्यारव्यानीकोधर०२१,अमत्यारख्यानीमानर ०२५, अप्रत्या ख्यानीमायार० २६, अप्रत्याख्यानीलोनर० २७, प्रत्याख्यानीको धर० २८, प्रत्याख्यानीमानर० २९, प्रत्याख्यानीमायार० ३०, प्रत्याख्यानीलोनर ३१, संज्वलनकोघर० ३२, संज्वलमांनर० ,३३, संज्वसनमापार ३१, संज्वसनसोलर० ३५, हास्यमोह नीर० ३६, रतिमोहनीर० ३७, श्ररतिमोदनी० ३८, नयमोद नीर०३९, सोकमोहनीर० १०, मंगमोहनीर०११, खीवेदर० १२, पुरुरवेदर० १३, नपुंसकवेटर० ४१. ॥ (श्रायुकर्मकीप्रस्ता
.
(४०६ )
१)-देवायुरदि० ४५, नरामुर० ४६, तिर्यंचायुरदि० ४७, नरका
युरहि० ४८॥ (नामकर्मकी प्रति १०३)-देवगति ४९, नरक
गति० ५१, तिर्यंचगति ५२, नरगतीरहिता ५०, एकेंद्रीजातिर
५३, वेशीजातिर० ५४, तेशीजातिर० ५५, चौरेंशीजातिर० ५६;
पंचेंद्रीजातिर० ९७, प्रौदारिकशरीरर० ५८, वैक्रियशरीरर० ५९,
थाहारकशरीरर० ६०, तेजससरीरर०६१, कार्मराशरीरर०.६२,
औदारिकांगोपांगर० ६३, वैक्रियअंगोपांगर०६४, आहारकअंगो
पांगरण ६५, औदारिकऔदास्किवंधनर० ६६, औदारिकतेजस
बंधनर० ६७, औदारिककार्मबंधनर० ६८, वैक्रियरबंधनर०
६९, वैक्रियतेजसबंधनर० ७०, वैक्रियकार्मणवंधनर० ७०, श्रा
दारक बंधनर० ७२, आहारकतेजसबंधनर० ७३, आदारकका
मणबंधनर० ७१, औदारिकतेजसफार्मणबंधनर० ७५, वैकि-
येतजसकोमणंबधनर. ७६. थाहारकतेजसकार्पणपंधनर० ७,
तेजसतेजसबंधनर० , कार्मणकार्मणबंधनर० ए, तेजसकार्म
पबंधनर० ७०, औदारिकसंघातन० ८१, वैक्रियसंघातनर० ८२,
श्रादारकसंघातनर० ८३, तेजससंघातनर०८१, कार्मपासंघातनर०
०५, वजरुपत्ननाराचसंघयार०८६,रुपननाराचसंघ०७, नाराय
'८८, अर्धनाराचसंघयार० ८ए, कोलकासंघयणर. ए., सेवार्न
संघयणर० ए१, समचतुरस्त्रसंस्थानर० ए२, न्ययोधसंस्थानर
ए३, सादिसंस्थानर०ए, वामनसंस्थानर० (एए, कुनसंस्थानर०
ए६, ९मसंस्थानर० ९७, कृष्णवर्णरहि०९८, तीलवर्णर०९९,
सोदितवर्णर० १००, पीतवर्सर. १०१, स्वेतवर्णर०१०२, सु
रनिपर• १.३, रनिगंवर १०१, तिकरसर १०५, कटुक
रसर० १०६, ग्राम्सरसर० १०७, कपायरसर० १०८, मधुर
सर० १०९, शीतफरसर०.११०, उमफरसर० १११, नारीकर
र ३०७) सर० ११२, हलकाफरसर० ११३, परखराफरसर० १११, सुक सालफरसर० ११५, सूखाफरसर० ११६, चीकणाफरसरहितया० २१७, नरकानुपूर्वीर० ११८, तिचानुपूर्वीर० ११९, नरानुपूर्वी र० १२०, देवानुपूर्वार० १२१, शुन्नविहायोगति १२२, अशुन- विदायोगतिर० १२३, पराघातनामकर्मर० १२४, ऊसासनांमकर्म २०.१२५, पातपनांमकर्मर० १२६, नद्योतनांमकर्मर० १२७, अ गुरुवघुनांमकर्मर १२०, तीर्थकरनांमकर्मर० १० १२९, निर्माणनांम कर्म १३०, उपधातनामकर्मर० १३१, असनामकर्मर० १३२, बाद रनामकर्मर० १३३, पसिनांमकर्मर० १३४, प्रत्येकनामकर्म १३५, पिरनामकर्म १३६, शुजनांमकर्म १३७, सोनाग्यनाम कर्म १३८, सुस्वरनामकर्मर० १३९, प्रादेयनांमकर्म ११०, यशनांमकर्म १४१, पावरनामकर्म १४२, सूक्ष्मनांमकर्म १४३, अपर्याप्तिनांमकर्मर० १४४, साधारण नामकर्मर० ११५, अथिर नामकर्मर० ११६, अशुह्मनांमकर्मर० ११७, दौग्यिनामकर्मर० १४८, स्वरनामकर्मर० १४९, अनादेयनामकर्मर० १५०, अयश नामकर्मर० १५१, (गोत्रकर्मकी प्ररुती २) उच्चैगोत्र १५२, नी वैर्गोत्र १५३, ॥ (अंतरायकर्मकी प्रकृति ५) दानांतरायकर्मरः १५४, लानांतरायकर्मर० १५५, भोगांतरायकर्मर० १५६, उप जोगांतरायक० १५७, वीर्यातरायकर्मरहितायश्रीसिहायनमः ।। ॥ १५ ॥ इति श्रीकम्मपयमीरो गुणनो संपूर्ण ॥ ॥ अथ कम्मपयडी स्तवन लिख्यते ॥ ॥ दोहा । सेनामात जितारि सुत, श्रीसंनव जिनराज ॥ मूलकरम उत्तर पगर, हणी चढे सिवपाज ॥ १ ॥ अष्ट करमळू क्षय करी, गुण अष्टक निष्पन्न ।। सादि अनंत स्थिति लही, चिदा नंद विदघन ॥ २ ॥ तासु चरण प्रानी करी, कम्मपनि विस्ता स
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, (४०). ज०॥श्रममत्त गुण अंत सवीमें, करमबंध व सत्त न०क ॥५॥ अपूरब अनिवृत्ति गुणमें, आयु वरज सप्त बंध, न० ॥ सुम संपराय ददशम गएँ, विन मोहायु पट खंध ॥ नवि० क०॥६॥ उपशम खीण सजोगमें, वेदनी बंध उदार, न० ॥ अयोगो मुख चवदमें, नदी बंधत कर्म द्वार ॥नः ॥ २० ॥ ७ ॥ कर्मबंध देतु कह्या, मिख्यात अविरत जोय, न० ॥ क्रोध प्रमुख कयाययो, यो म युगत उयार होय ॥०॥ क० ॥ 0 पन्नवणा नांगमें, कर्म स्थिति पद सेय; न०॥ कर्म वेद पणवीसमें, कर्म प्रति वेद शेष नवि० क० ॥ एकम्मपयको कर्भग्रंथमें, कर्मतो निरधार, न० ॥ बंध सत्ता नहीरणा, उदय प्रमुख परकार ॥ नवि० ॥ क.. ॥ १०॥ कसो अधवन थया, चनत्यन्जत तप सार, नवि० त प नद्यापन इम फरो, पूजा श्रष्ट प्रकार ॥ नवि० ॥ ॥ ११ ॥ अट ज्ञानोपगरण नला, अष्टगंगल १ थाल, अवि० ॥ वात्सल्य चनविद संघनी, यथाशक्ति सुविशाल । न० ॥ क० ॥१०॥ श्या रोपन तप करे, कर्म प्रतिनो सार, न० ॥ सुरनर मुख अनुक्रम सही, शिवरमणी जरतार ॥ न क० ॥ १३ ॥ कलश ॥ जिन- चंद सूरि मुलिंद खरतर गण रस शशि सम युगवरा, तासु बचने स्तवन कीधो नयर श्रीवाखूचरा ।। चंद्रानुयोग निष्येक वरपे विशार फाल्गुन हादशी, नवसाय तत्व प्रधान गणिनें अमृत गति चित नित वशी॥१४॥ इति श्री कम्मपयमी स्तवनं । ।। अप नवकार तप स्तवन । ॥ दूदा ॥ चोवीसे जिनवर नमी, पंच परमेटि सार । परम मंत्र नवसारनी, महिमा न` उदार ॥॥ दाल १ ॥ मुनिवर थार्य मुदस्त ॥ ए देशी ॥ समरो श्री नवकार, सार प्रमतो, नव निधि सिधि श्रापे सदा ए | मदिमा मोटी जास, ५२ . संकट सब ( रले, मिलें मनोरथं संपदा ए॥ ) असम वरण विरव्यात, सात गुरु प्रकर, नव पद प्राठे संपदा ए || सात सागरनां पाप, जाये अरकरे, संपूरण पांचवें मुदा ए ॥ २ ॥ पुष्करवर होपाई, सिहावट गांम, पासे परवत कंदरा ए || चोमासी पच्चरकांण, करने तिहां रह्या, दमसार नामे मुनीसरा ए ॥ ३ ॥ नील नीलपी ग्र, मन सुध नावसुं, नवकार मुनि पासे नणी ए, वीजे नव राज. सिंह, रतनवती रांणी, शिवसुख पाम्या कर्म दणी ए ॥ ४ ॥ रत नपुरी यसोन्न, सेवतणो सुत, शिव नामा विसनी घ" ए । प्रति आदरसुंतात, नवकार सीखव्यो, महामंत्र गुण बहु नणं ए॥५॥ एकदा योगी एक, समसाने ले गयो, शिवकुमार मनमें धरयो ए॥ नवकारने परनाव, सवल संकट टल्यो, सोनापुरसो तिण करयो ए॥ ॥ ६ ॥ ढाल २॥ चरणकरणधर मुनिवर बंदिये ॥ ए देशी ॥ श्री नवकार तणी महिमा सुणो, पोतनपुर सुन्न गमो जी ॥ सेठ सु. नंद्र तणी सुता श्रीमती, श्राविका धर्मनोकामो जी॥ श्री०॥१॥ मिथ्यामते किण एक विवहारिये, परणी मनधर रागो जी ॥धरम ने मुके हणिये मन धरी, कलसमें मूंक्यों नागो जी॥श्री॥२॥ साप फीटीने फूलमाला थई, महियल महिना एदो जी॥ पिनने कुटंब सहू प्रतिबूझव्यो, साचो धर्म सनेहो जी ॥ श्री० ॥३॥ कितिप्रतिष्टित बलराजा निदां, इक दिन वूगे मेहो नी ) नदीपूर बीजोरो प्रावियो, नृपने दीधो तेहो जी ॥ श्री० ॥ ४॥ स्वाद सदी चिठी राजा करी, पीजोराने कामो जी ॥ व्यंतर जद करे नरने तिहां, ये बीजोरो तामो जी॥ श्री० ॥ ५॥ चिठी आधी जिनदाससेग्नी, श्रावक शुभ विवेको जी॥ नमस्कार नवीनोरो ग्रह्यो, वळव्यो व्यंतर चेको जी॥ श्री०॥६॥ ढाल ३॥ नमणी खमणी ने मन गमणी ॥ ए देशी ॥ श्री वसंतपुर जितशत्र राया, .
नज्ञ,नांमे नारि सुदाया ॥ चंपिंगल बोस्यो नृप दारा, गणिका । दोधो मनुहारा ॥ १ ॥ गशिका पइत्यो हार ते जाणी, सूली घो चार ते पाणी ॥ निज. प्रमाद गणिका पत्तावे, चोर समीपे "नी आवे ॥ २ ॥ नमस्कार पिंगलने दोघो, तास प्रनावे बंबित घो, नृपने घर सुत घर अवतरियो, पापी चोर एणे ऊधरियो । ३ ॥ मधुरानगरी जियदाससेठ, तिहां किण हुँझक पापनी इव ।। कदा चोरी करता काल्यो, राजा हुकमें सूली घाल्यो ॥४॥ कक चोर ते प्यासे गाढो, सेट कने जल माग्यो टाढो ॥ नौकार घो नपगार प्रांणी, सुर थयो ततलिण धर्म सहिनासो ॥ ५ ॥ 'पानगरी में जे कीचूं, सुन्नश सती निकलंक प्रतीधु । श्रीनवकार साद ते जागो, मनमें एदनी यासति भयो ॥ ६ ॥ ढाल ४ ॥ रतनृप जायसं ॥ ए देशी || प्रमावति पूनिम करीए, वीजस। घी आकास, नमुं नवकारने ए ॥१॥ एक उपामी चलावियो ए, नुपम महिमा जास ॥ न० ॥ २ ॥ वावरूया एक चारतो ए, देय प्रवाह्यो बाल, न०॥ नमस्कार मन चिंतव्यो ए, जल फादो काल । न० ॥ ३ ॥ हत्या चार करी हवे ए, वली करया पाए क, न० ॥ चुटकरबारो एदथी ए, आवे चित्त विवेक ॥ २० ॥ ४॥ मंत्र माहे मोटो कह्यो ए, साख गुणे मनरंग, न०॥ ती र पद ते लहे ए, श्रीनवकारने संग ॥ २० ॥ ५ ॥ दिनर घकी संपदा ए, मनवंचित तुख धाय, न० ॥ दयाकुसल वाचक ए, धर्ममंदिर गुण गाय ॥ न० ॥ ६ ॥ इति श्रीनवकारका हालिया स्तवन संपूर्ण ॥ ।। अथ नवकार तपविधि लिख्यते ॥ शुनदिन गुरूके पास नवकारतप ग्रहण करे. जिस पदका जना अक्षर होय उतनादी उपवास करे ।। उस पदका १२०००। .
॥
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(१२)
गुणना करे सो लिखते है ॥ १ ॥ णमोअरिहंताणं ।। उपवास ॥
। नमो सिक्षा ॥ नपवास ५ ॥ ३ । नमो श्रायरियाणं । उपवा
वास ॥४। मोनवझायाणं ॥ नपवास ७ ॥५। मोलोए
सबसाइणं ॥ उपवास ए ॥६। एसोपंचनमोकारो ॥ उपवास 0 ||
७ सधपावप्पणासणो ॥ उपवास ॥ । मंगलाणंचसोर्सि
उपवास ॥ए। पढमहवश्मंगलं ॥ नपवास ए । एसे नवकार
मंत्रका ६० नपवास करे ॥ किंकप्पत्तरु॥वमानवकार अथवा ऊपर
लिखा सो स्तवन सुणे. तप पूर्ण होणेसे यथाशक्ति नवपदका
जमव करे. चवदे पूर्वका सार इस नवकारके तप प्रतावसे अनेक
सुख संपदाकी प्राप्ति होय ॥ इति ।।
॥ अथ पंच कल्याणक स्तवन लिख्यते ।।
नमिय पयकमल सुन्नन्नाव सवि जिनतणा, पंच कल्याण
दिव नणिसु जिनवरतणा ॥ कसिण कत्तीतणे परिक पंचमि दिणे,
नाण संजवतणौ खयकरम चिहुं तणैः ॥ १ ॥ नेमि जिण चवण
सुरनवणथी बारसे, पनमपद जम्म वलि दिरक तसु तेरसै ॥ वीर
सिवमा वसे परिक हिव छजलै, नासिरि सुविधि अर तीज बार
'सि मिले ॥ २॥ नास ॥ मिगसर वदि रे सुविधि पंचमी जनमि
यो, सो रे संयमधर सुर पणमियो || दसमी दिन रे धीरे सं-
यम आदस्यो, ग्यारसिं रे नपमप्पह सिवसिरि वरचौ । सिर वरयौ
'मिगसर सुदि दशमी दिण त्यणि अरजिन जामीयो, यति मुगति
पिण तिण दिवस पत्तो व्रत इग्यारति पांमीयो ॥ ग्यारसैं वलि
मक्षिजिणने जन्म दिस्क सुनाणीया, चति मनि दिरका नाम के
अंग पोसि वखालिया -1॥ ३ ॥ इहां कारण रे लिखित दोप संजा
विथै, कर कोरे अवर हेतु पिण नाविय ॥ ते परि सशिरे गीता.
‘रय सदगुरु-सदे, श्रुतकेवलि रे यचन सह सम , सहदे ।। सदै
.
(१३) सहये ते प्रमाणजि बलि ग्यारसि नमितणौ, श्रीनाण कल्याणक चनदसि जनम संभवनों श्रुणौ ॥ पूनिमें संलव दिरक पांमी दया धरि जगजीवनी, दिव पोस वदि दसमी ग्यारस जनम दिरका पासनी ॥ ४ ॥ वारस तिथि रे चंदप्पह लिए जाश्यौ, वलि तेर सिरे संजम रंग सुणाश्यौ ॥ चवदस दिन रे श्रोशोतल थयो के. वली, पोसह सुदिरे व विमल नाणी वली ॥ नाणी वलि धयों नवमि संती अजितनाथ इग्यारसें, चवदसें अभिनंदन केवल पूनि मैं धम्मै वसें । मादा के परम चवियो बारसे शीतल घयौ, वलि तासु संजम कसिए तेरसि रिसद जिण शिवपुर गयो ॥ ५॥ अम्मावति रे दिवसे नाण ग्यारमें, जिन पांम। रे माहमुदें दिव अनुक्रमे । सित बीजे रे अनिनंदन वासुपूजनों, कल्याणकरे ज नम गंण अनुक्रम मनों ॥ अनुक्रमें मानों बिहू बीजे विमल धरम सुजामिया, श्रीविमल दिरका चना अमि.अजित नतपति पामि या.॥ नवमिये दिस्का अजित पांमी घारते अनिनंदने, श्रोधर्मना| सार संयमसिर वरि तेरसिदिनें ॥६॥ नास ॥ फागुण वदि सुपास केवलसिरि पत्तो, सत्तम वलि तसु मुगति चंप्रनु नाणे जुत्तो ॥ नवमि सुविद जिण चवरा रिसद ग्यारसि केवल,पारस सुख्य नाया जम्म सेयंसह निम्मल ॥ ७॥ तेरसि व्रत सिहंस तयो चवदस वसु पुङ, जम्म हुन धम्मावसे ए तसु संजम रऊ सुकल बीज चनगि अमिय पर मल्लि संजय, चवण सुबारति मति मुगति सुवय वय ववव ॥ ॥ (दाल फागनी ) चैत्र पढम पस्कि चनधि नाण व वणं पासस्त, पंचमि ससिपह चवण जम्म अामि रिसहस्स ।। बति संजम पिण रिसदसामि प्रमि श्रादरियो, धवल तीज दिव कुंथुनापने केवल फुरियो । ए ॥ पंचमि अजित अनंत श्रने सं नवने मुगति, नवमि ग्यारस मुगति नांण वलि पा-यो सुमनि ।।
(११) ॥ त्रिशलादेवें वीरनाह तेरसमिति जायो, पूनिम दिन श्रीपदमना ६ केवलसिरि पायो ॥१०॥नास हिव वैसाख व पमिवादिन, कुंथु सिइ शीतल बीजे दिन, पंचमी कुंथु चरित्र ॥ उठे, श्रीशी तल अवतरियो, दशमैं नमिजिरा सिवसिरि वरियो, तेरति जनम अर्णत ॥ ११ ॥ चवदस दिरका नाण प्रशंतद, जनम हुन श्रीकुंयु जिणंदद, बंदद सिवपुर सत्य । सेत चनय अभिनंदन उत्तम रमनाथ चवियो वलि सत्तमि, श्रमि सिह चनन ॥१२॥ सुम तिनाथ अमिये जायो, नवमें संयम सांमे पायो, गायो धरि श्रा पंद || दशमें नाग वीर जिरा पामी, बार सि चव्यो विमल जगस्या मी, तेरसि अनिय जिणंद ॥ १३ ॥ ढाल ॥ जेठ कसिण परिक उ, चवियो सेयंस, अहमी सुइय जनमियो ए॥ नवमि मुगति सोपत्त, तेरस चवदास, संति जम्म सिव वय हुन ए ॥ धरमनाथ सिव पत्त, धवली पंचमें, नवमें वसुपुङ अवतस्यो ए ॥ श्रीसुपात जिण जम्म, बारसि तेरसि, जगगुरु संयमतिरि वरपो ए ॥१४॥ लास । हिवै प्रसाद यदि चनथि रिसदेस, चवश सत्तमिहि सिरि विमल ।। मुस्क नवमि नमि वय गहरा, सेप के चषण || वीरनी अमि नेमि मुक चवदसें श्रीवसुपुङ जिणंद, सप वर साधु कर परवरयो ए ॥ यदुतर वरस सख पुरि चंपापुरे, करमहाणि मुग ति रमणी वरयो ए ॥ १५ ॥ दाल || पावश यदि हिव तीज मु गति सेयंसद पामिय, सत्तमि चवित अशंतनाद ममि नमि जा मिप || नवमि कुंयुजिण धवश दु यह निम्मस पीजै, मुमति चवरा पंचमिद नेमिजिरा जम्म नशीजे ॥१६॥ मुनियर ने. मि हुप, ममि सीयो पास ॥ मुनिमुधप पूनिमरयशि, विनय वास ॥१॥नाच वदि सनमें संति ससि धरण नय प्रमि नविय मुल नामि मुदि सुविय तिरंगप ॥ दिय ( प्रोसं वदि तेरसी ॥ श्रीवर जिनेसर गन ॥ दरंण अम्मावतो ए, नांणी नेमीसर ॥ १७॥ निम नमि जिणवर चविय, पर धारह मासि ॥ श्रीआवस्यक दाखवी, जिस कल्याणक राति ॥ १॥ जिण चवण जम्म चरित्त केवल नांग शिव प्रापति दि में, अरिहंत नत्ते सुइ चित्ते तप करे जे श्क मनें ॥ काल्यांस नीते कोमि पांमी अनुक्रमें सिवसुख लहे, ए हेतु जांणी सुगुरु नाणी 'एह कल्याणक कहे ॥१॥श्म पांच जरते ऐरचत करि एक दिन जिनवरतणा, दस कल्याणक हुवे इण दिन सुर करे नवं घणा ॥ जिम इया ते तिम वली होस्पे पंच कल्याणक सदा, श्री पुन्यसागर कहे खरतर एइ धाराहो मुदा ॥ २१ ॥ इति श्रीपंच कल्याणक स्तवनं ॥ ॥ अथ शपिमंडल सुणणेकी चा पूजणेकी विधि ॥ ॥ मश्रम आयंताक्षर संलक० यद शपिमंगल स्तोत्र धूप दीपादि विधि संयुक्त आठ महीने तक प्रनात समय सुरों. शपिन मलमें जो मूल मंत्र हे सो शुन दिन शुन्न घेझी हायमें फलं फूल नेट शक्ति माफक लेकर गुरुके पास जावे. नेट धरके वि. नय संयुक्त मूलमंत्र गृहण करें. उसका ८००० आठ हजार जाप प्राउ महीनेमें करे. प्रांबिलकी शक्ति होय तो हमेस करै, नहीतो आठम चौदस दो आंबिल जरूर करे. आप महीने बाद मजमणां करे. कजमणेके दिन एकसो पाठ वेर सुणै. पीकै शक्ति होप तो विधि संयुक्त रूपिमंडल स्थापन करायके पूजा करै, विशेष अक्ति करे तो २५ प्रकार पूजा करावै, गुरुनक्ती करे, सादमीवघल करै. विशेष विधि गुरुगमसें जाशनी ॥ ज्ञपिमंगल सुणणेवाले पूजसेवा ले नव्यजीवके घरमें कन्नी उपद्रव नहि होय, सदाभानंद उछाद रहे। ।। अथ भगवंतके नव अंग पूजन.।। ॥ दूहा || जन जरी संपुट यंत्रमा, युगलिक नर पूजंत ॥ .
. (१६) सपन्न चरण अंगूठमो, दायक नवजल अंत ॥ १ ॥ जानु बसेका नसग रहा, विचरया देस विदेस ॥ खमार केवल सह्यो, पूजो जानु नरेस ॥ २॥ लोकांतिक वचने करी, वरस्या वरसी दान ।। कर कंमे प्रनु पूजना, पूजो नवि बहुमान ॥ ३॥ मान गयो दोय अंसथी, देखी वीर्य अनन्त, नुजावले नवजल तस्या, पूजो खंघम हंत ॥ ४ ॥ रत्न त्रय गुण ऊजली, सकल सुगुण विसरांम ॥ ना निकमलनी पूजना, करतां अविचल धांम ॥५॥ हृदयकमल नपशम चले, वाल्यो राग ने पि ॥ हेम दहे वनखंझनें, हृदयक मल संतोप ॥ ६॥ सोल पदर देश देसना, कंठ विवर वरतुल, मधुर ध्वनी सुर नर सुणे,तिम गले तिलक अमूल ॥ तकर पद मन्यथी, विन्नुवन जन सेवंत, विन्नुवन तिलक समा प्रनु, जाल तिलक जयवंत ||जा सिइशिला गुण ऊजली,लोकांतिक नगवंत व सिया तिण कारण विनू, शिरशिखा पूजंत ॥ ए॥ उपदेशक नव तत्वना, तिम नव अंग जिणंद, पूजो बहु विध नावथी, कद्दे शुन वीर मुणिंद !! १० ।। इति नव अंगपूजन उहा ॥ ॥ शिक्षा दोहा॥ जीवमा जिनवर पूजिये, पूज्याना फल होय ॥ राजा नमें परजा नमें, प्राण न लोपे कोय |॥ १ ॥ कुंने बांध्यो जल रहे, जल विन कुंन न होय | ज्ञाने बांध्यो मन रहे, गुरु विन शान न होय ॥ २ ॥ गुरु दीपक गुरु देवता, गुरु विन घोर अंधार ॥ जे गुरुवाणी वेगला, रमवमिया संसार ॥ ३॥ नावे जिनवर पूजिये, नावे दीजे दांन ॥ जावें नावना नाविये, नावें केवलज्ञान ॥४॥ पांच कोमीने फूलमे; पाम्या देश अढार ॥ राजा कुमारपालने, व रत्या जैजैकार ॥ ५ ॥ इति । .. 1 (४१७). ॥ अथ नव पदो के नव चैत्यवंदन, नव स्तवन तथा नव थुइ ।। ॥ अय अरिहंतपद पैत्यवंदन ॥ जय श्रीअरिहंत नानु, नविकमल विकासी ॥ लोकालोक अरूपि रूपि, सम वस्तु प्रकासी ॥१॥ समुद्घात शुन्न केवले, क्षय रुत मल रासी, शुक् चरम शुचि पादसें, जयो वर अविन्यासी ।। ॥ २ ॥ अंतरंग रिपुगण दणी ए, हुय अप्पा अरिहंत ॥ तसु पद पंकजमें रमत, हीरधरम नित संत ॥३॥ इति ॥ किंचिंनाम. तित्यं नमोई॥ ॥ अय अरिहंतपद स्तवनं ॥ पूजो मनरती हां हो दादा कुशल सूरिंद | ए चाल ॥ श्री तेरम गुण सिके कंत, कर्मकुं नंजे श्रीअरिहंत ।। मन मानले ॥ अष्ट समयमें समय तीन, सर्व आहारथी होवे हीन ॥ म०॥१॥ बादरकायें मन वच लोग, तनुरसे फुन दृढ तनुयोग। म०॥ सुद मकायतें मन वच रोक, निज वीर्य ताकु कर फोक || म० ॥ २ ॥ संझी मात्रके मन व्यापार, बेद्रीने वाक्य प्रचार || म० ॥ श्रादि समय रह्यो पनकसु जीव, सुषम सह्यो तिण योग अतीव ॥म० ।। ॥ ३॥ एपां योगथी समय एक, होना संख गुणो कर ठेकाम०।। समयासंखे जोग निरोथ, कृत्वा जो लह्यो जोगी सोध ।। म०॥४॥ वेदसमेनादारता पाय, कुशल कहे ते श्रीजिनराय ॥ म० ॥ तेरमें गुणमें गुण समै देव, आपो ता जगईं नितमेव ॥ म 1 ५ ॥ इति अरिहंतपद स्तवनं ॥ । भय अरिहंत पद युई। सकल द्रव्य पर्याय प्ररूपक लोकालोक सरूपो जी, केवल ग्यानकी ज्योति प्रकाशक अनंत गुणे करि पूरी जी । ती नव प्रानक पाराधी गोत्र तीर्थकर नूरो जो, वारे गुणां करि एडवा में रिहंत धाराधो गुण नूरो जी ॥ इति अरिहंत पद थुई । .
(४१६) रुपन चरण अंगूठमो, दायक नवजल अंत ॥ १॥ जानु बले क नसग्ग रहा, विचरया देस विदेस खमार केवल लो, पूजे जानु नरेस ॥ २ ॥ लोकांतिक वचने करी, वरस्या वरसी दान कर केमे प्रनु पूजना, पूजो नवि बहुमान ॥ ३ ॥ मान गयो दोर अंसश्री, देखी वीर्य अनन्त, नुजावले जवजल तस्या, पूजो खंथ : हंत ॥४॥ रत्न त्रय गुण मजली, सकल सुगुरा विसरांम ॥ न निकमलनी पूजना, करतां अविचल घांम ॥५॥ हृदयकमल उपशम बले, वाल्यो राग ने क्षेप ॥ हेम दहे वनखमने, हृदयस्क मल संतोष ॥६॥ सोल पदर देश देसना, कंठ विवर वरतुल, मधुर ध्वनी सुर नर सुरो, तिम गले तिलक अमूल ॥७॥ तथैकर पर पून्यथी, त्रिन्जवन जन सेवंत, विन्नुवन तिलक समा प्रनु, नाव तिखक जयवंत ॥॥ सिहशिला गुण ऊजली, लोकांतिक नगवंत ॥ सिया तिण कारण विन्नू, शिरशिखा पूजंत [[ए। उपदेशक नव तत्वना, तिम नव अंग जिणंद, पूजो बहु विध नावधी, कद्दे शुन वीर मुणिंद ॥ १० ॥ इति नव अंगपूजन उहा ॥ । शिक्षा दोहा॥ जीवमा जिनवर पूजिये, पूज्याना फल होय ॥ राजा नमें परजा नमें, श्राण न लोपे कोय ॥ १ ॥ कुंने बांध्यो जब रहे, जल विन कुंल न होय || शांने यांध्यो मन रहे, गुरु विन ज्ञान न होय ॥ २ ॥ गुरु दीपक गुरु देवता, गुरु विन घोर अंधार ॥ जे गुरुवाणी वेगला, रमवमिया संसार ॥३॥नांवे जिनवर पूजिये, नावे दीजे दांन । लावें नावना नादिये, नावें केवलज्ञान ॥४॥ पांच कोमीने फूलमे, पाम्या देश अढार ॥ राजा कुमार पालने, व रत्या जैजैकार ॥ ५॥ इति । . .
(१७). ॥ अथ नव पदो के नव चैत्यवंदन, नव स्तवन तथा नव थुइ ॥ ॥ अथ अरिहंतपद चैत्यवंदन ॥ जय श्रीशरिहंत जानु, नविकमल विकासी लोकालोक अरूपि रूपि, सम वस्तु प्रकासी ॥१॥ समुद्घात शुन्न केवलै, कय कृत मल रासी, शुक्ल चरम शुचि पादसें, नयो वर अविन्यासी ॥ ॥ २ ॥ अंतरंग रिपुगण दणी ए, हुय अप्पा अरिहंत ॥ ससु पद पंकजमें रमत, हीरधरम नित संत ॥३॥ इति ॥ जैकिंचिनाम. तित्थं० नमोह॥ ॥ अय अरिहंतपद स्तवनं । पूजो मनरली हां हो दादा कुशल सूरिंद ।। ए चाल ।। श्री तेरम गुण वसिके कंत, कर्मकुं नंजे श्रीअरिहंत || मन मानले । अष्ट समयमें समय तीन, सर्व आहारथी होवे हीन ॥ म011 १ || चादरकायें मन वचनोग, तनु२से फुन दृढ तनुयोग । म० ॥ सुद मकायतें मन वच रोक, निज वीर्य ताकुं कर फोक || म० ॥२॥ संझी मात्रके मन व्यापार, बेइंद्रीने वाक्य प्रचार ॥ म० ॥ आदि समय रह्यो पनकसु जीव, सुषम लह्यो तिण योग अतीव ॥ म०॥ ॥३॥ एषां योगथी समये एक, होना संख गुणो कर ठेका म०॥ समयासंखे जोग निरोध, कृत्वा जो लह्यो जोगी सोध ।। म०॥४॥ वेदसमेनाहारता पाय, कुशल कहे ते श्रीजिनराय म०॥ तेरमें गुणमें गुण समै देव, आपो सा जगईं नितमेव ।। म ॥ ५ ॥ इति अरिहंतपद स्तवनं ॥ 1) अथ अरिहंत पद युई॥ सकल द्रव्य पर्याय प्ररूपक लोकालोक सरूपो नी, केवल ग्यानकी ज्योति प्रकाशक अनंत गुणे करि पूरी जी ती जव यानक आराधी गोत्र तीर्थंकर नूरो जो, वारे गुणां करि एदवाभ रिदंत श्राराधो गुण नूरो जी ॥ इति अरिहंत पद धुई।
. म्दा० दले. . (४१) ॥ अथ सिद्धपद पैत्यवंदन ॥ श्रीशैलेशी पूर्व प्रांत, तनुहिनत नागी ॥ पुत्र पनयपसंग से, करध गत जागी ॥१॥ समय एकमें लोकप्रांत, गयो निगुण निरागी ॥ चेतननूपें आत्मरुप, सुदिशा सही सागी ॥२॥ केवल दंशशनाणधी ए, रूपातीत स्वन्नाव | सिद्ध नये तमु हीरधर्म, चंदे घरि शुन्न नाव ॥ ३ ॥ इति सिइपद चैत्यवं० ।। ।। अय सिद्धपद स्तवनं ॥ यारे महिलां ऊपर मेह झरोखै चीनली ।। ए चाल ।। अट वरस नग मास हीना कामी पूर्वमें, म्हारा लाल ही० ।। नत्रुटो करै वास सयोगी धाममे, म्हा०स०॥अजोगीके थंत तजे जवतव्यता, म्हा० त० ॥ शैलेसी लहै कर्म दलै गुण श्रेणिता; ॥ १ ॥ हस्वाकर पंच काल रहे ते योगमें, २० ॥ तेरस प्ररूतिनो अंत करीने अंतमें, म्हा० क० ॥ गमन करे नगरसे अक्रिय दोयनें, म्हा० ० ॥ पुत्र पयोग असंग स्वन्नाव प्रयंचने, म्हा० स्व० ॥ २ ॥ श्छु गुण नव परमाण योजन सद कही, म्हा० यो० ॥ वर्जुन विशदानास निरालंबन सही, म्हा० नि० मध्ये योजन घट घनारुति अंतमें, म्हा० घ० ॥ मही। कथी दीन जणी सिांतमें, म्हा० न० ॥ ३ ॥ तनुपधारा ना सिलासें जोयने, म्दा० सि० ॥ जुग सोचनमें नाग असोफा र्शनें, म्हा० ० ॥ सघु अंगुल पत्नीस प्रमाणऽवगादणा, म्हा म ॥ धनु शत पंच गुणासें दीनता, म्हा० गु०॥४। मिसिया एकमेनंत श्रयाया ना सही, म्दा० ५० ॥ अष्ट प्राण धा रम्प सिरिदो जो सद्दी, दा०सि० ॥ पीनो पद श्रीसिक धरो नगदमें, म्दा०प० । कुशल नये जगजीव मिनोगा तेहमें, म्हार मि०॥५॥इति सिसद स्तवनं ।। ॥ यप मिदाद ई॥ अर करम धमन करीने गमन किया शिवानी जी, प्र.
(.५१) व्याबाधे सादि अनादि चिदानंद चिदराती जी ॥ परमातमपद पूर- गविलासी अघ घन दाघ विनासी जी, अनंत चतुष्टमय शिव ‘पद ध्यावो केवलज्ञानी नाती जी ॥ १ ॥ इति तिइपद युई ॥ ॥ अथ तृतिय आचार्य पद पैत्यवंदन ।। जिनपद कुल मुख रस अनिल, मित रस गुण धारी ।। प्रबल सवल धन मोहकी, जिराते चमुहारी ॥१॥ ऋज्वादिक जि नराज गीत, नव तन विस्तारी ॥ लवकूपें पा पमत, जगजन निस्तारी ॥ २॥ पंचाचारी जीवके, प्राचारजपद सार । तिनकुं वंदे हीरधर्म, अगेतर सो वार ॥ ३ ॥ इति । । अय आचार्य पद स्तवन । नणदल वींदली ये ॥ ए चाल || खंती खमंगयी जेणे, इण्यो क्रोध सुन्नट सम देणे हो, गण पति गुणपेखी।टेर॥मान महा गिरिचयरे, अति शोन्नन मद्दव वयरे हो । ग० ॥१॥ दंनरूप विसवेली, वर अऊवकील ठेलो हो।ग०॥ मुळवेलथी नरियो, लोहसागर मुने तरियो दो॥ ग० ॥२|| मदन नाग मद दीनो, जिरा दमसम जत्रे कोनो दो॥ ग०॥ मोह माहा .मल्ल ताज्यो, पुण वैराग मुगरें पाध्यो हो || ग0 ||३॥ दोस गयंद वस कीनो, घर नपशम अंकुस लीनो दो। ग०॥ अंतरंग रिपु नेद्या, सुरवर पिण जिण शिपया हो। ग018 रस कति गुराथी लीयो, सूत्र श्ररथे आगम पीनो दो ॥ ग०॥आचारजपद एहयो, धरी जी व कुशलता सेवो हो । ग० ॥ ५॥ इति श्राचार्यपद स्तवनं ॥ ॥ अय आचार्यपद युइ॥ ॥ पंचाचारकुं पासै उजवा.दोष रहित गुणधारी जी, गु प बत्तीसे आगमधारी द्वादस अंगविवारी जी ॥ प्रबल सबल घन मोह हरणकू अनिल समो गुण वाणी जी, क्षमा सहित जे संज म पालै प्राचारज गुण ध्यानी जी ॥ १ ॥ इति धुर ॥ .
(४०) || अथ उपाध्यायपद चैत्यवंदन ॥ ॥ धन धन श्री नवकाय राय । सग्ता धन लंजन । जिन वर दिसत ऽवाल संग । कर कृत जन रंजन ॥ १ ॥ गुणवण नं जण मण गयंद । सुय शणि कियगंजण । कुशालंघ लोय लोयणें । जस्थय सुय मंजणाशा महा प्राणमें जिन लह्यो ए।यागमसे पद तुर्य । तिन अहनिश हीर धर्म । वंदे पाठक वर्य ॥ ३॥ इति ॥ ॥ अय उपाध्यायपद स्तननं ॥ सांवलिया अलगा रहोनें । ए देशी ।। ॥ हुयने३ दूरी हुयने, चेतन नाप सबने, दूरी हुयने ।। तुं मुक पास क्यूं आये, दू० ॥ तुमने कुरा वतलावे, दू० ॥ एकणी ॥ तो संगै निज पंचेंशेनो, रचना चरम नुलाणो ॥ नासावरणो खयनपसमतें, नावेही मंमाणो दू० ॥ १ ॥ व्य ते परजाप्ते कीना, जातिनाम व्यपदेश ॥ एवंतो गो तुरग गजादिक, किण क मैं नपदेश ॥ दू० ॥२॥ इत्यादिक बहु मुमकुं संका, तेरे संगे ला गी। नीलवर्णकी समता सेती, में नयो तोसुं रागी॥ दू०॥३॥ नप कहिये हणियोलवियानो, अधियां सानताय॥ प्राधीनांमन पीमानामें, मायोयेनविलाय ॥ दू० ॥ ४॥ आधिक्ये स्मरीयै वर भागम, सूत्रसे ते नवझाय ॥ तत् सेवात हमि समताळू, चेतन कुशलता पाय ॥ दू० ॥ ५ ॥ इति उपाध्याय स्तवनं ॥ ॥ अथ उपाध्यायपद थुइ ।। ॥ अंग ग्यारै चवदै पूरय गुण पचवीसना घारी जी, सूत्र अरथधर पाठक कहियै योग समाधि विचारी जी ॥ तपगुण सूरा भागम पूरा नय निक्षेपै तारी जी, मुनिगुण घारी बुध विस्तारी 'पाठक पूजो अविकारी जी ॥ १ ॥ इति उपाध्यायपद शुइ ॥ ४ ॥ ॥ अय पंचमसाधुपद चैत्यवंदनं ।। ॥ दसण नाण चरित्त करी, वर शिवपद गामी ॥ धर्म शुरु शुचि धक्रसें, आदिम खय कामी॥ १ ॥ गुरापमन अपमचते, . --
पूरब को दो
(४१)
नये अंतरजामी ॥ मानस इंडिय दमननूत, समदम अनिरामी
॥ २॥ चारुति घन गुणगश नरयो ए, पंचम पद मुनिराज ॥
तत्पदपंकज नमत हे, हीरधर्मके काज ॥ इति ॥
।। अथ साधुपद स्तवनं । मालन२ मति कहो ॥ ए देशी ॥
॥ निकपाया जगजन कहे, धारे चनगति वसनसें रोत हो,
मुनिंदजी ॥ राग हीण जय तूं करै, सादिया शिवरमणीसे देत हो
मुणिंदजी ॥ १॥ सर्व प्रमाद तजी रदै, सा०
है
मु० ॥ शत सोगम भागम कर, सा लघु कालै गुण आदि हो
मु० ॥२॥स्त्यानहीनिद्रा नदै, सा० पामे कर्म निकंद हो मु०॥प्रच
लानिशमें रही, सा० बारम गुणनो वास हो । मु ॥ ३ ॥ स्थि
ति रस घात प्रमुख धरै, सा० जो गुण संख्यातीत हो मु०॥ तो
पिण तिण जगमें लदी, सा० त्रिक धन गुगनी ख्यात हो मु० ।।
॥४॥ रयण त्रयसें शिवपथे, सा० साधन पर वर जीव हो मु०
11 साधु हुव तसु धर्ममें, सा० कुशलु नवतु जगतीव दो मु०
॥५॥ इति साधुपद स्तवनं ।।
॥ अय साधुपद यह ॥
॥ सुमति गुपत्ति कर संजम पालै दोष बयालीस टाल जी,
पद काया गोकुल रखवाले नव विध ब्रह्मव्रत पालै जी ॥ पंच म
हाव्रत सूधा पालै धर्म शुक्ल उजवाले जो, रुपक श्रेणि कर कर्म
खपावै दमपद गुण उपजावै जी ॥ १ ॥ इति साधुपद स्तुति ।।
।। अथ दर्शनपद चैत्यवंदन ॥
॥ हुय पुग्गल परिय, अट्ठ परमित संसार ॥ गन्नेिद
तव करि लदै, सब गुण प्राधार ॥ १ ॥ कायक वेदक शशि श्रतं
ख, उवसम पण वार । विना जेण चारित्र नाण, नही हुवे शिव
दातार |॥ २ ॥ श्री सुदेव गुरु धर्मनी ए, रुचि लचन अलिराम ॥
दरसन्नकुं गणि दीरधर्म, अनिस करत प्रणाम !! ३ ॥
. (१२५) १. ॥ अय दर्शनपद स्तवनं । रामचंदके बाग आंवो मोहि रह्यो री ।। ए चाल ॥ ॥ देव श्री जिनराज, गुरु ते साध नएयो री || धर्म जिने श्वर प्रोक्त, सछण बोधितणो री॥१॥ वोधि लानके काज सप्तम नरक नलो री ॥ तेण विना सुरलोक, तातें अधिक बुरो री ॥२॥ मिथ्या तापे तप्त, बोधही वह लहेरी ॥ नपशम कायक वेद,ई श्वर तीन कहे रो॥ ३ ॥ नवसायर हे अपार, फुण अस्ताप क 'होरी ।। जसु लाने ते होय, गोसपद मात्र खरोरो ॥४॥ यद नावे प्रमाण, नाण चारित्र नलारी || वोघधर्ममें जीव; लाने कुशल कला-री ॥ ५ ॥ इति दर्शन पदं ।। ॥ अथ दर्शनपद युई॥ ॥ जिनपरमत्ततत्त सूधा सरधै समकित गुण नजवाले जी, नेद द करि आतम निरखो पशु टाली सुर पावै जी ॥ प्रत्या- ख्याने सम तुल्प लाख्यो गाधर अरिहंत सूरा जी, ए दरशनपद नितर वंदो नवसागरको तीरा जी ॥१॥ति ॥ ६॥ . ॥ अथ ज्ञानपद चैत्यवंदन ॥ ॥ क्षिप्रादिक रस राम वह्नि, मित आदम नाग नाव मि सापसें जिन जनित, सुय वस प्रमाण ॥१॥लव गुण पवि नहि दोय, मण लोचन नांण ॥ लोकालोक स्वरुप जाण, शक के बल मांग ॥ २॥नाणावरणी नासपी ए, चेतन नाण प्रकाश सप्त पदमें हीरधर्म, नित चाहत अवकास ॥३॥ इति ज्ञानपद चैत्यवंदन । अय ज्ञानपद स्तवनं ।। म्हारे अति उछरंगे । ए चाल || जिनवर नापित आगम नणिया, तत्व यथास्थित गमिर जी॥ म्हारे जगजन तारूते उत्तम वर नाण कहाय, प्रदनिश चाहै जी ॥ म्हा० ॥१॥ लक्षानक कुपंथ सुपंथा, यापेय अग्रंया जी ॥ म्हा० ॥ देव कुदेव अदित हितधारी, जा विचार जी ।। म्हा० ॥ २॥ श्रुति मति दोय है इंशी तारु . नविजा .. { ४२३) तेरा परोक विचारू जी म्हा० ॥ नही मय केवल दे वारू, जीव प्रत्यक्ष सुधारू जी || म्हा० ॥ ३ ॥ अयविजस्त बलें जग जाणे, लोकादिक अनुमाने जी ॥ म्हा ॥ विन्नुवन पूजे जासु पसाय, धारी शुज अध्यवसायें जी ॥ म्हा० ॥ ४ || नाणावरणी उपशम क्यथी, चेतन नाणकुं विलसै जी ॥ म्हा० ॥ सप्तम पदमें नवि जन हरखे, निसदिन कुशलता निरखै जी ॥ म्हां ॥ ५॥ इति । {" अय झानपद शुई ॥ मति श्रुति इंश जनित कहियै लहियै गुण गंभीरो जी, आतमधारी गणधर विचारी द्वादस अंग विस्तारो जी || अवधि म नपर्यच केवल वलि प्रत्यक्ष रूप अवधारो जी, ए पांच ज्ञानकू बंदो पूजो लविजनने सुखकारो जी ॥ १ ॥ इति थुई ।। ॥ अय चारित्रपद चैत्यवंदन ॥ जस्स पसायें साहु पाय, जुगर समितेंद ।। नमन करे शुज जाव लाय, फुन नरपति बूंद ॥ १ ॥ जप धरि अरिहंतराय; कार कर्म निकंद॥ सुमति पंच तीन गुप्ति युत, दै सुरक अमंद ॥ २॥ कृति मान कसायथो ए, रहित लेस सुचिवंत ।।जीव चरित्नकू हीर धर्म, नमन करत नित संत ॥ ३ ॥ इति चारित्रपद चैत्यवंदनं ।। ॥ अथ चारित्रपद स्वरनं ॥ ॥ निर्विकल्प प्रज निर्गुणी, चिदानास निस्संग || सुग्यानी सानलो ॥ टेर ॥ मूर्ति दीन चेतन करे, रूपी पुदगल रंग ॥ सु० ॥ स्पर्धक कारण वर्गणा, कायें कारण जाव ।। सु० ।। रुत्वा जो गसुधामता, सधा संख स्वन्नाव । सु०॥२॥ पर्याता सयु जो गमें, हि लदे जगमान ॥ सु०॥ मध्ये वसु समय लदे, अंते होते जाण । सु० ॥ ३ ॥ सहकारी मानसमुखा, कारण रम्य वलेश । सु० ॥ प्राप्ता पत्र प्रकारता, सत एनृतका तेन । सुधा तसे धन रुपीनलो; चेतन मंजम धाम || सु० ॥ कर धन मिस पद - (४२५.). धर्ममें, कुशल नवतु अनिराम ।। सु॥५॥ इति चारित्रपद स्तवनं ॥ ॥ अथ चारित्रपद युई॥ ॥ कर्म अपचय दूर खपावै श्रातम ध्यान लगावे नी, बारे नावना सूधी नावै सागर पार कतारे जी ॥ खट खंग राजकू दूर तजीनें चको संजम धारै जी, एडवो चारित्रपद नित वंदो आतम गुण हितकार जो ॥१॥ इति ॥ ॥ अय तपपद चैत्यवंदन ॥ ॥ श्रीरुपन्नादिक तीर्थनाथ, तनव सिव जाण । विहि अं तेरपि वाह्य, मध्य द्वादस परिमाण ॥ ॥ वसुकर मित आमो स ही, श्रादिक लब्धि निदान || ने समता युत खिणे, घग्घन कर्म विमान ||२|| नवमो श्रीतपपद नलोए, छारोध सरूप ॥ वंदनसे नित हीरधर्म, दूर नवतु नवकूप ॥ ३ ॥ इति ।। ॥ अय तपपद स्तवन ।। ॥ वारस नेद नएया जिनराजे, वाह्य मध्यतणा जग काजे २ ॥ म्हारे शिवपदश्रेणि ॥ ए प्रांकणी ॥ तिण नव सिद्धितणा वर ग्याता, जिनवर पिण तपना कर्ता रे॥ म्हारे शि०॥ १॥ स मता सहित जिनतें नारी, जली कर्मचमु पिण दारी रे ॥ म्हारे शिवपदश्रे० ॥ जीव कनकसे कर्म कचोरा, दहे तप पावकका जोरा रे ।। म्दारे शिव०॥ तप तरुवरना कुसम दे ऋद्धि, देव नरनी फल ते सिविरे ॥ म्हारे शि० ॥ पाप सकल हे तमनी रासी, तप नानुसे जायें नासी रे ॥ म्हारे शि० ॥ ३ ॥ जस्त पसायें बहिये वारू, लब्धा सगली जगदितकारू रे ।। म्हा०॥ अति उमर फुन साध्यता हीना, काम तातें वारू कीना रे ॥म्दा० ॥ ४॥ चा रोधन रूपी कहिये, तपपदही चैतन पहिये रे ॥ म्हा० ॥ पाठक ५. रुपासे, नवपद कुससाईं नासेरेम्हारे शिकालिम , , (.४२५) }} अथ तप पद थुई ॥ इचारोधन तप ते जारस्यो आगम तेहनो साखी जी, व्य जावते दादश दाखी जोग समाधी राखी जी ॥ चेतन निजगुण परणित पेरखी तेहिम तपगुण दाखी जी, सबधि सकलनो कारण देखी ईश्वर से मुख नाखी जी ॥ १ ॥ इति तपपद स्तुति ॥ 1 अथ चतुर्विशति जिन स्तुति ।। श्रीमदपन्न तर्धा, वृषनांक सुवर्णरुक् ॥ जय देवाधि देवादा, नानिराजेंद्र नंदनः ।। १ ।। मुगस्यादौ वषायेन, ज्ञानत्रय युते न ग्त् ॥ जनन्या मरुदेवावाः, पावनं जगरं कृतं ॥ २॥ इति शपन्न स्तुति ॥ अर्हताजितनाथेन, गज लाग्न शालिना । जितसत्रु रहीपाल, पुत्रेण कनकस्विफा ॥ ३ ॥ विजयाकुक्षि रत्नेन, नगवं. त्वयका जिनः ॥ जिता रागादयोयेन, यंदेला सर्व मुदा ॥ ४ ॥ त्यजित स्तुति ॥ जितारिनृपतेर्यात्, संनवः संभवानिधः ॥ नाया नंदनो हेम, वर्णो गंधर्व लाग्नः ॥ ५॥ सर्वसौख्यप्रदो मुख्य तान दर्शन संयुतः ॥ मुनीनां पूंगवो देवो, नित्यं दिसतुमाजिनः ।। ६॥ इति शंन्नव स्तुतिः॥ सिदार्या नंदनं साध, वीतराग जग- ति । श्रीसंवर समुत्पन्नं, प्लवगांके दिरण्यन्नं ॥ ७ ॥ अन्निनंदन 'मानं, विशुरु हृदयं सदा ॥ यस्तौति परया नत्या, सनालोकेनि पते.॥ ॥ इत्यतिनंबन स्तुति ॥ मेघानिय धरि बोस, तन मंगलप्रदः॥कोंघ सदरा नृझेम, मरीचिमंगलांगजः ॥ ॥ सत्वं पतिनाथेश ।। सुमतिं तनु सत्तमां ॥ नविनां पुण्य कर्तृगां, स्वर्ग ख्या वलि प्रदं ॥ १० ॥ इति सुमति स्तुतिः ॥ सुसीमापुत्र कोक, नवाति धराधर ॥ पराजिव नृपोनुनः, पद्म लक्षण कः ।। ११ ॥ जवाब्धौ नव संकीरों, उस्तरे पततां नृणां ॥ पाय. सततं देव, पद्मपन्न जिनेश्वर ॥ १२॥ इति पद्मान ५४ - (४२६) स्तुति ॥ श्रीसुपार्शनिधोदेवः, ' पृथ्वीजः स्वस्तिकांकनृत् ॥ प्रतिष्ट नृप संजात, श्वामीकर करो जिनः ॥ १३ ॥ समुह श्व गंजीरः, कर्माणां छेदने परः ॥ यः सार्चः परमब्रह्मा, रतं नौमि सदा विनूं ॥ १५ ॥ इति सुपार्श्व स्तुतिः ॥ चंप्रन प्र लोकांत, चं लकण संयुतः । तमापति विज्ञान, तमोव्यूह घि नाशनः ॥ १५ ॥ संसार जलधेर्नाथ, महसेन नृपोनव ॥ लक्ष्मता पुत्रमा स्वामि, नव केवल बोपन्नृत् ॥१६॥ इति चंप्रनु स्तुति ।। (अत्राद्यश्वत्रबंधः श्लोकः ) ॥ संस्तुतोबोवदत्वाश्रु, सुरासुरनरेश्वरैः ॥ सुविधि स्तिशर्म, सुग्रीवनृपनंदनः ॥१७॥ यस्यासीऊननीरा मा, माननीयादिवोकसां ॥ मानमुक्तोवदातोयो, मायोमकरलांदिनः ॥ १७ ॥ इति सुविधनाय स्तुतिः॥ (चामरबंधाविमो )|| श्री मचीतलनायेश, नन्दादृढरथात्मजः||नास्वत्सुवर्णवदेह, श्रीवत्सांहां कधारक ॥ १ ॥ त्वदीयचरणांनोज, सेवकानांवपुर्बतां । प्राक्त तंतूंजनव्यूई ।। उष्टंशन्नोद्यदेविनी ॥ २०॥ इति शीतलनाप्य स्तु तिः ॥ विष्णुशार्कवदेवो, विष्णुपुत्रोहिरणयनः॥श्रेयोरफिरोज वं, खड्गसांग्निन्नृजिनः ॥ २१ ॥ दित्वाकर्मरिपुनसार्थ, श्रेयांसने यसैः सेद । परज्ञानमयेनत्वं, महानन्दपदंपरं ॥ २२ ॥ इति श्रेयां स स्तुतिः ॥ ११ ॥ वरोवर्जितरामीदा, जवतारयदि ममितिले दितुंचिने, नोनव्याः प्राप्तुमक्षरं ॥ २३ ॥ तदानजध्यमेनहि, वासु पूज्यजयासुतं ॥ वसुपूज्यकुवोन्सं, महिपकंचरक्तनं ॥ २४ ॥ नि वासपूज्य स्तुतिः॥१२॥ श्रीमहिमलनायें, कृतवर्मसमुत्रनः ॥ शूकरांकवरस्यामा, पूनकल्याणदीधिते ॥२५॥ चंचहिमसझान, त्वदापस्मरणं विना कुर्वनप्पेतिनोब्रह्म, प्रक्रियांनातिविस्तर ॥ ३६ ॥ इति विमल स्तुतिः ॥ १॥ देमवर्णस्यपुत्रस्य, मुशासिंद सेनयोः ॥ देवस्ययन चिहस्य, चर्यानन्तगुणोदधेः ॥ २४ ॥धाद , . . , (४२७ ) योपियस्यांत, गुणानांलेनिरेनहि ॥ अनन्तस्यगुणान्तस्य, कमोवक्तुं नरः कयं ॥ २० ॥ इत्यनंत स्तुतिः ।। १४॥ सुव्रतापूत्रवत्रांक, भानुवंशार्कसन्निन्नः ॥ कनकप्रनसर्वज्ञ, धर्मनाभान्निधेश्वरः ॥२५॥ तवागोपिपुरचारी, नृतलेयात्यशोकतां ॥ अनुत्तरफलाः संति, सता संगतयोपिहि ॥ ३० ॥ इति धर्मनाथ स्तुतिः॥ विश्वसेनधराधी सं, नन्दनमृगलक्षणं ॥ आचिरेयसुवर्णानां, कलायामिजिनेश्वरं ।। ॥ ३१ ॥ तंश्रीमचांतिनामानं, यस्यायेकुर्वतेमुदा ॥ प्राज्यांसुमनसा वृष्टिं, विबुझाविबुधप्रियां ॥ ३२॥ इति शांतिनाथ स्तुतिः ॥ શ્રી युतायाः श्रियपुत्र, श्रेयरकरदिरएयत्न ॥ सूरिनूपतिसंजात, चागल रुपधारकः ॥३३॥ कुंथुनायजिनेशस्य, तीर्थकरजगत्पते ॥ मदीयं पापसंदोहं, नवांतरकृतघनं ॥ ३४ ॥ इति कुंथुनाथ स्तुतिः सुदर्शननृपोचूतं, नंदावकितंयुतं ।। अंनोजवनिरालेप, देवोपुत्रसु वर्णनं ॥ ३५ ॥ अगन्मुरख्यागुणाः सर्वे, धुर्म्यप्रनुतयाजिनं' । चरी कर्मिनमस्तमा, अरायपरमात्मने । ३६ ॥ इत्यरनाथस्तुति ॥१७ ॥ कुंजपनावतीपूत्री, नीलवर्ण घटांकनृत् ॥ जगन्मित्रश्वध्वान्त, नासनाविदितःसदा ॥ ३७ ॥ उत्रत्रययुतोनाति, देवयो विष्टपत्त्रये ॥ सस्पश्रीमल्लिनाथस्य, स्मरसेनमुदासखे ।। ३७ || इति मलिना घ स्तुतिः ॥ सुमित्रनृपतेःसूनो, पद्माकुक्षिपवित्रकत् ॥ कुर्मल क्षणम, दायकस्यामलञ्चये ॥ ३५ ॥ मुनिसुव्रतदेवेन, कोणक आरिमंगल । देहित्वंमेव्ययीलावं, पदंतत्पुरुषोत्तमः ॥ ४० ॥ ति मुनिसुव्रत स्तुति ॥ २०॥ श्रीमधिजयनूपाल, कुलोतंसदिर एयरुक् ॥ चपासुतनमिनाय, नीलोत्पलसर्दकनृत् ॥ ४१॥ यस्ते पंचजनोदेव, निन्दाचकुरुतेश्वयं ॥सएतिपरमज्ञानं, कोपिनपत्र संशयः॥४२॥ इति नमिनाय स्तुतिः ॥२१॥ शिवायास्तनव रये, समुविजयोनवे ॥ हरिवंसहरीशंजौ, शंखांककमलप्रन्ने ॥४३ .
.. (४) । त्यतराजीमतीनेदे, नेमनाथेजितेस्मरे । सिप्रिमदयामाला, त्यो पिजिनेश्वरे ||४|| इति नेमनाथ स्तुतिः॥२२॥ अश्वसेना कंजूपाल, सुतेनपरमेष्टिना ॥ बामेयेन दितायेन, कमठस्यानिमान ता॥ ४५ ॥ तस्मैश्रीपार्श्वनाथाय, नमोस्तुमामकंसदा ॥ पवनास नचिन्हाय, नीलवर्णायसंनये ॥४६॥ इति श्रीपार्थनाय स्तुतिः॥ श्रीमत्सिहार्थवंशर्क, त्रिशलेयजगत्मणे ॥ महानादध्वजाईत, क ल्याणकरसर्वदा ॥ ४७ || चरमस्तीर्थकदीर, मोहेनहननेमृगात् ॥ त्वन्नक्तिदत्तचित्ताय, कमलादेहिमे जिन ॥ ४ ॥इति वीरप्रस्तुतिः |२|| इति श्रीकमाकल्याणोपाध्याय कृत चतुर्विशति जिन स्तुतिः।। अथ नवपदजीके नलीके देववंदन में कहणेका चैत्यवंदन प हली लिखा दे ॥ ॥ अथ नवपद वृद्ध स्तवन लिख्यते ॥ सुरमणी सम सहु मंत्रमां, नवपद अन्निरामीरे लोय ।। अहो न० ॥ करुणासागर गुणनिधी, जग अंतरजामी रे लोय ॥ घहो ज०॥ १ ॥ त्रिन्नुवनजन पूजित सदा, लोकालोक प्रकासी रे लोय || अहो लो० ॥ एदवा श्रीअरिहंतजी, नमुं चित्त नल्लासी रेलोय ॥ अहो न० ॥२॥ अष्ट करमदल क्षय करी, श्रया सिंह मरूपी रे लोय || अहो अ०॥ सिद्ध नमो नवि नावथी, जे श्रागम श्ररूपी रे खोय ॥ अहो जे०॥३॥ गुण उत्तीसे सोन्नता, सुंदर सुखकारी रे लोय॥ अहो सु०॥ श्राचारन तीजै पदै, वंदू अविकारी रेलोय ॥ श्रदो वं०॥ ४ ॥ आगमधारी नपशमी, तप 5 विध भाराधीरे लोय || अहो त० || चोथे पद पाठक नमो, संवेग समाधी रे लोय ॥ अ० सं० ॥ ५॥ पंचाचार पालण परा, पंचाश्रव त्यागी रे लोय || अ०६०॥ गुणरागी मुनि पांचमें, प्रण चमत्नागीरे लोय ॥ ०प्र०॥६॥ निज पर गुणने नुसखे, श्रुत अक्ष श्रावैरे लोय ॥ अ० श्रु० ॥ठे गुण दरसल नमो, प्रा. .
(ए) तम शुन नावे रे लोय ।। अ० प्रा० ॥ ॥ ग्यान नमो गुण सातमे, जे पंच प्रकारे रे लोय | अ० जे० ॥ स्व पर प्रकाशक दिनमणी, अज्ञान निवारे रे लोय ॥५० अ०॥ ॥ श्रावमें चा रित्रपद नमो, परजाव निवारी रे लोय ॥ अण् प० ॥ खंत्यादिक दस धर्मनो, जेह ठे अधिकारी रे लोय ॥ अ० जे० ॥ ए || नवमे वलि तपपद नमो, बाह्यान्यंतर नेदे रे लोय ॥ १० वा० ॥ बांध्या काल अनंतना, जे कर्म उछेदे रे लोय ॥ अ० जे० ॥१०॥ ए नवपद बहुमानथी, ध्यावै शुन्न लावै रे लोय ॥ अ० घ्या० ॥ नृप श्रीपालतणी परे, मन गित पावै रे लोय ॥ अम० ॥ ११ ॥ आसू चैत्रुक मासमा, नव प्रांबिल करिये रे लोय || अ० न०॥ नव नली विधि युत करी, शिवकमला वरिये रे लोय ॥ ०शि०।। ॥ १२ ॥ सिइचकनी बहु परे, वर महिमा कीजे रे लोय ॥ प्रणा व०॥ श्रीजिनलान कहे सदा, अनुपम जप्त लोजे रे लोय अ०॥ श्र०॥ १३॥ इति नवपद स्तवनं ॥ ॥ अथ नवपद स्तवन २ जुं ॥ राग मारू । तीरयनायक जिनवरू जी, अतिसय जास अनूप ॥ सिह अनंत महागुणी जी, परमानंद सरूप ॥ नविक मन धारज्यो रे धारज्यो नवपद ध्यान ॥ ज०॥ १ ॥ ए टेर ॥ श्री थाचारज गण धरू रे, गुण उत्तीत निवास ।। पाठक पदघर मुनिवरू जी, श्रुत दा यक सुविलास ॥ न० ॥ २॥ सुमति गुपति धर शोन्नता जी, साधू समतावंत ॥ सम्यग्दर्शन सुंदरू जी, ज्ञान प्रकाश अनंत ॥ न० ॥ ३ ।। संवर साधना चरण है रे, तप उत्तम विधि दोय ॥ ए नवपदना ध्यानश्री रे, निरुपाधिक सुख होय ॥ ज० ॥3॥ अमृत सम जिनधर्मनो रे, मूल ए नवपद जाण ॥ अविचल अनु जव कारले जी, नितप्रति नमत कल्याण ज०॥५॥इति पदं । ॥
(४३०) ॥ अथ नवपद स्तवन ३ जुं । राग प्रभाती ।। नवाद ध्यान धरो रे, नविका न० ॥ मन वच काया कर एकंते, विकला दूर हरो रे ॥ न०॥१॥ मंत्र जमी अरु तंत्र घणे रा, इन सबकू विसरो रे ।। अरिहंतादिक नवपद जपनें, पुएप नं मार जरो रे । न० ॥२॥ अमसिद नवनिधि मंगलमाला, संपत्ति सहज वरोरेलालचंद याकीबलिहारी, सुरतरुबीज खरो रेन०॥३॥ ॥ अथ नवपद स्तवन १ धुं ॥ जीया चतुरसुजाण नवपदके गुण गाय रे, जी० ॥ नवपद महिमा जगमें मोटी, गणधर पार न पाय रे || जी० ॥ १ ॥ जो अपणे आतमसुख चाहे, तो शक ध्यान लगाय रे । जी० ॥ करम निकाचित दूर करणकू, सुंदर शुद्ध पाय रे || जी० ॥ २॥ इन को पुष्ट आलंबन करतां, अजर अमर पद धाय रे ॥ जी० ॥ श्य जिन लए आगामी होंयगे, नवपद संग पसाय रे॥जी॥३॥इति । ।। अथ नवपद स्तवन ५ मुं॥ जिन नित नमो, नित नमो नमो नमो, जि० ॥ अरिदंत सिईनेर आचारज, नवकाया मन गमो२॥ जि.॥१॥ सर्व साधू मंगल ए पांचू, याहीसे दिल रमोर ॥ जि० ॥ दरशन ज्ञान चरण तप उत्तम, याहीसे दिल दमो२ ॥ जि०॥ सर्व पाप तज जज नवपदळू, सर्व पाप उपशमो२॥ जि०॥ बाल कहे यही सार जगतमे, र दार मत जमोर ॥ जि० ॥ ३ ॥ इति पदं ॥ ॥ अथ नवपद थुई॥ नितमति हूं प्रणमुं सिचक्र सुन्न नाव, दिव कारज सि 'हिनो लाधो एह पाय ॥ तुझ नाम पसायें प्रारति व्याधि पुलाय, ग तुझ अनुग्रहश्री सुख संपति मुझ पाय ॥ १ ॥ श्रीअरिहंत न मिथै सिंद सूरी नवझाग, मुनिघर त्रिक करने सण नाण सुहाय ।। , उग विधि चारित्ते वुध विष तप मन जाय, ये नवपद ध्यावता नि रुपम शिवसुख याय ॥२॥ विद्यापरवादे जाणो ए अधिकार,श्री गुरु उपदेशे सिद्धचक्र नदार ॥ प्रवचन अनुसारे नाप्यो एह विचा र, नविजन नित ध्यावो सुरतरु गुणनंमार ॥३॥ जिनधरम अ नुरागी चक्केसरि सुखकार, सेवकनें आपे सुख संपति परिवार ।। दिव निहि नव्य करि चारित्रनंदी मम नाय, जिनचंद सूरीसर खरतरपति मुपसाय ॥४॥ इति युई ॥ ॥ अप जैतीसंयुक्त नवपद ग्लो करण विधि लिख्यते ।। ॥ तत्र प्रथम दिवस विधि लिख्यते ।। (प्रथम ) पासो सुदि ७ अथवा चैत्र सुदि ७ से जली सरू करे, कनी तिथि घटी होय तो ६ सें सरू करे, वढी होय तो सें सरू करे, लेकिन प्रांधिल ए पूनम तक करे, प्रथम जमीन शु.६ करके मांझणादिकसें चित्रित करे, पीठे पट्टे पर सिचक थापके त्रि काल पूजा करै, प्रन्नातसमें राईपमिक्षमणा करके पी वखोंकी पमिलेहणा करै, जहां सिद्धचक्रकी थापना हे नहां प्रायकें पांचे शक्रस्तवे देव वांदे, पीठे नव चैत्योंमें श्रथवा नव प्रतिमा आगे नव चैत्यवंदन करे, वासकेप पूजा करे, पी केसरचंदनसे पूजा कर, गुरु पास आयके अनुन्निमिके पासें राई पालोवे, यांविलका प चरकाण करै. प्रथम अरिहंतपदका श्वेत रंग दे इस वास्ते चावलोंसें नर गरमपाणी आविसका नियम करे. पीठे अरिदंतके वारे गु पोकों विचार कर नमस्कार करे, सो लिखते हैं. सब गुणोमेश्या मिसमासमणो वं० पाठ कादिक नमस्कार करै ।। ॥ अथ द्वादश अरिहंत गुणाः ॥ १ असोकवृक्ष प्रातिहार्य संयुताय श्रीअरिहंताय नमः॥ २ पुष्पवृष्टि प्रातिहार्य संयुताय श्रीम०॥
(४३२)
३. दिव्यध्वनि प्रातिहार्य संयुताय श्री॥
४ चामरयुग प्रातिहार्य संयुताय श्रीअ० ॥
ए स्वर्णसिंदासण प्रातिहार्य संयुताय श्रीम०॥
६ नामंगल प्रातिदार्य संयुताय श्री० ॥
७ ईन्ति प्रातिहार्य संयुताय श्रीम०॥
त्रय प्रातिहार्य संयुताय श्रीअ० ॥
ए ज्ञानातिशय संयुताय श्रीप्र०॥
१० पूजातिशय संयुताय श्रीश्र० ॥
११ वचनातिशय संयुताय श्रीअ० ॥
१२ अपायापगमातिशय संयुताय श्री०॥इतिहादस० गु०
॥ इत्यादि नमस्कार करके अन्नसलियेणं कहिके १२ लो.
गस्सका कानसग करै. एक लोगस्त प्रगट कहे, पोठे स्वस्थानक
जा के चेत्यवंदन करे, पञ्चखाण पार के आंबिल करै. पहले वखत
जल पीये तब चैत्यवंदन कर के पोवे, पो मध्याह्न समय पांचे श
स्तवे देव बांदे. गुणनो (२०००)11 है मो अरिहंताणं ।।
इस पद का करे, श्रीपालचरित्र सुणे. पूरा पहर दिन रहऐसें तीसरी
वेर पांवे शकस्त देव वांदे. पीठे फेर चैत्यवंदन कर के तिविहार
पच्चरकाण करे पाणहारका । फेर सामायक ले के दिन रहते प्रति
क्रमश करे. भारती के वरखत दीप धूप पुष्प पूजा करै प्रयया पद
से प्रारती वगेरे करके पीने पनिकमणा कर. (सोणे के वखत)
पहले रियायही परकमके चैत्यवंदन कर, फेर र.5 संयारा गाया
मुणे ॥ निज्ञ नदी पावे जहां तक नव गुल स्मरण करे ।। इति ।।
"अप द्विनिय दिवग विधि निम्म्यते ॥
॥ श्रय इसी मुजर दूसरे दिन प्रनात समे की सय करना
पहले मुजब करके सिक्षपदका साल रंग दे इस वास्ते गेहूं की ।
(३३)
प्राविल करै । है। मो सिद्धाणं ॥ इस पदको दो हजार
ना कर, सिद्धपदका गुण है. नमस्कार गुरु करावे सो लि०॥
॥ अथ सिद्ध अष्ट गुणोः॥
१ अनंत ज्ञान संयुताय श्री सिद्धाय नमः ॥
२ अनंत दर्शन संयुताय श्रीसि० ॥
३ अव्यावाध गुण संयुताय श्रीसि० ॥
४ अनंत सम्यक्त चारित्र गुण संयुताय श्रीति ॥
५ थक्ष्यस्थिति गुण संयुताय श्रीसि०॥
६ अरूपी निरंजन गुण संयुताय श्रोसि० ॥
७ अगुरु लघु गुण संयुताय श्रीसि० ।
७ अनंतवीर्यगुण संयुताय श्रीसि०॥ इति सिद्धाप्टोगुणाः ।।
यह था नमस्कार करके अन्नवसति कहके आठ लोगस्सका
उसग्ग करे, एक लोगस्त प्रगट कहे. फेर पूर्वोक्त करणी करै ।
{! अय कृतीय दिवस विधि लिख्यते ।।
पूर्वोक्त विधिसे प्रजात कर्त्तव्य करे, प्राचार्यपद पीले वर्ण दे
। वास्ते चणाको दालका श्रांधिल करै ।। हीमो थायरि
ए । इस पदका दो हजार जाप करे, प्राचार्यके ३६ गुण दे,
स नमस्कार गुरु करावे सो लिखते है।
॥ अप आचार्य छत्रीस गुणाः ।।
१ प्रतिरूपगुण संयुताय श्रीग्राचार्याय नमः॥
२ सूर्यवचेजस्वी गुण संयुताय श्रीग्रा०॥
३ युगप्रधानागम संयुताय श्रीग्रा०॥
४ मधुर वाक्यगुण संयुताय श्रीमा०॥
५ गांनीगुण संयुताय श्रीश्रा० ॥
६ धैर्यगुण संयुताय श्रीया० ॥
---
-..-
।
(४३४)
७ उपदेशगुण संयुताय श्रीपा०॥
अपरिश्रावी गुण संयुताय श्रीया०॥
ए सौम्यप्रतिगुण संयुताय श्रीग्रा०॥
१० शीलगुण संयुताय श्रीमान् ॥
२१ अविग्रहगुण संयुताय श्रीया०॥
१२ अविकथकगुण संयुताय श्रीया०॥
१३ अचपलगुण संयुताय श्रीश्रा०॥
१५ प्रसंतवदनगुण संयुताय श्रीया०॥
१५ कमागुण संयुताय श्रीया०॥
१६ मृगुण संयुताय श्रीमा०॥
९ .:१७ सर्वसंगमुक्तिगुण संयुताय श्रीआ०॥
१० झजुगुण संयुताय श्रीश्रा०॥
रए हादस विध तपगुण संयुताय श्रीश्रा०॥
२० सप्तदश विध संयमगुणसंयुताय श्रीआ०॥
२१ सत्यव्रतगुण संयुताय श्रीआ० ॥
२२ तौचगुण संयुताय श्रीमा०॥
२३ अकिंचनगुण संयुताय श्रीया०॥
२४ ब्रह्मचर्यगुण संयुताय श्रीश्रा० ॥
२५ अनित्य नावना नावकाय श्रीश्रा०॥
२६ असरण नावना नावकाय श्रीया० ।।
२७ संसार स्वरूपानावनानायकाय श्रीमा०
२० एकत्व स्वरूपानावनानावकाय श्रीया०॥
शए अन्यत्व नावना नावकाय श्री० ॥
३० अशुचि नावना नावकाय श्रीमा० ॥
११ पाश्रव नावना नायकाय श्रीप्रा०॥
(४३५ )
३२ संबर नावना नावकाय श्रीश्रा०॥
३३ निर्जरा नावना नायकाय श्रीश्रा0
३४ लोकस्वरूप नावना नावकाय श्रीप्रा०॥
३५ बोधर्लन नावना नावकाय श्रीआ०॥
३६ धर्मर्सन नावनाजावकाय श्रीश्रा०॥इतिषत्रिंसत् प्रा०
॥ यह उत्तीस नमस्कार करके अन्नससि० कहके उत्तीस
६ लोगस्सका कानसग्ग करे, प्रगट लोगस्स कहे. पूर्वोक्त करणी
मसे करै, इति तृतिय दिवस विधि ।
11 अथ चतुर्थ दिवस विधि लिख्यते ॥
॥ हैं। णमो नवझायाणं || इस पदका २ हजार जाप
२. हरेमूंगका बिल करे. उपाध्याय पदके २५ गुण याद करके
मस्कार करें।
- 11 अथ उपाध्यायजी के २५ गुण लिख्यते ॥
१ श्रीपाचारांगसूत्र पवनगुण युक्ताय श्रीनपाध्याय नमः ।।
२ श्रीसुयगमांगसूत्र पवनगुण युक्ताय श्रीन० ॥
३ श्रीगणांगसूत्र पतनगुण युक्ताय श्रीन०
४ श्रीतमवायांगसूत्र पठनगुण युक्ताय श्रीन०॥
५ श्रीनगवतीसूत्र पग्नगुण युक्ताय श्रीन०॥
६ श्रीज्ञातासूत्र पठनगुण युक्ताय श्रीन० ॥
७ श्रीनपासगदसासूत्र पवनगुण युक्ताय श्री० ॥
श्रीअंतगमदसासूत्र पग्नगुरा युक्ताय श्रीन० ॥
ए श्रीअणुनरोववाश्सूत्र पठनगुण युक्ताय श्रीन ।
१० श्रीप्रभव्याकरणसूत्र पठनगुण युक्ताय श्रीम० ॥
११ श्रीविपाकसूत्र पवनगुण युक्ताय श्रीन० ।।
१२ उत्पादपूर्व पनिगुण यु०॥
.
(४३६)
१३ श्राग्रायणीपूर्व पग्न गुण यु०॥
११ वीर्यप्रवाद पनिगुण यु० ॥
१५ अस्तिप्रवादपूर्व पग्नगुण यु० ॥
१६ ज्ञानप्रवादपूर्व पठनगुण यु०॥
१७ सत्यप्रवादपूर्व पनिगुण यु०॥
१० श्रारमप्रवादपूर्व पठनगुण यु०॥
१५ कर्मप्रवादपूर्व पउनगुण यु०॥
२० प्रत्याख्यानप्रवादपूर्व पनिगुण यु०
२१ विद्याप्रवादपूर्व पठनगुण यु०॥
२२ अविध्यप्रवादपूर्व पनिगुण यु०॥
२३ प्राणायामप्रवादपुर्व पग्नगुण यु०॥
२४ कियाविसालपूर्व पउनगुण यु० ॥
२५ लोकविंडसार पनिगुण युगाइति पंचविंशत्योपाध्यायगुण
इस तरे २५ नमस्कार कर, खमा हो के
अन्न ru कहके
लोगस्सका कानसग करे, प्रगट लोगस्त कहके पारे. पी पूर्व
करणी करै ॥ इति चतुर्थ दिवस विधि ॥
॥ अथ पंचम दिवस विधि लिख्यते ॥
है ही णमो लोए सच साहूणं । इस पदका २ हजार गुरु
ना करे. साधुपद काले वर्ण हे इस वास्ते नमद के बाकलोसे अ
विलकर. सर्व साधूपदके सत्ताईस गुण विचारता हुवा नमस्कार करै
॥ अय साधुपदके २७ गुण लिख्यते ।
१ प्राणातिपातविरमणव्रत युक्ताय श्रीसाधवे नमः ॥
२ मृपावादविरमणव्रत युक्ताय श्रीता०॥
३ अदत्तादानविरमणव्रत युक्ताय श्रीसा० ॥
१ मेश्रुनविरमरावत युताय श्रीसा० ॥
..
(४३७ )
५ परिग्रदविरमणबत युक्ताय श्रीसा० ॥
६ रात्रिनोजनविरमणबत युक्ताय श्रीसा०॥
७ पृथ्वीकाय रक्षकाय श्रीता० ॥
6 अप्पकाय रक्षकाय श्रीसा० ॥
ए तेनकाय रक्षकाय श्रीसा० ॥
१० वानकाय रक्षकाय श्रीला०॥
११ वनस्पतिकाय रक्षकाय श्रीता०॥
१२ त्रसकाय रक्षकाय श्रीसा०॥
१३ एकजीव रक्षकाय श्रीप्ता०॥
१४ वेशीजीव रक्षकाय श्रीसा० ॥
१५ तेइंशीजीव रक्षकाय श्रीसा॥
१६ चोइंशीजीव रक्षकाय श्रीसा० ॥
१७ पंचेशजीव रक्षकाय श्रीसा० ॥
१० लोन नियदकाय श्रीसा० ।।
१ए कमागुण युक्ताय श्रीसा० ॥
३० शुजन्नावनानावकाय श्रीसा० ।।
२१ प्रतिलेखनादि क्रिया शुश्कारकाय श्रीसा० ॥
२२ संजमयोग युक्ताप श्रीता० ॥
२३ मनोगुप्त युक्ताय श्रीसा० ॥
२४ वचनगुत युक्ताय श्रीता०॥
२५ कायगुप्त युक्ताय श्रीसा० ॥
२६ सीतादि द्वाविंशति परीसद सहरा तत्पराय श्रीसा०॥
२७ मरणांतनपसर्ग सहण तत्पराय श्रीसा० ॥ इति साधुगुला
इस बजे २७ नमस्कार करे, २७ सोगत्तका कानसग करे,
प्रगट लोगस्स कहिके पारे. पोरे पूर्वोक्त करगी कर. यह पंच पर
( ४६०)
मेष्टि पदके सब गुण मिलाणे १०० होता है, इस वास्ते माल
एकसो आव मणिये होते दे॥ इति पंचम दिवस विधिः।।
॥ अय पष्ट दिवस विधि लिख्यते ।।
॥ ही णमो सणस्त || इस पदका २ हजार जापक
दर्शनपद सपेद वर्ण दे इस वास्ते चावलोंका प्रांबिल करै. सम्यक्त
समसठ गुण
चिंतवकर नमस्कार
करे
॥
॥ अय सम्यक्तके सडसठ भेद लिख्यते ।।
१ परमार्थ संस्तवनारूप श्रीसद्दर्शनाय नमः
२ परमार्थ ज्ञानृसेवनारूप सद० ।।
३ व्यापन्न दर्शन वर्जनरूप सद०॥
४ कुदर्शन वर्जनरूप सद्द० ॥
५ शुश्रूपारुप सद०॥
६ धर्मरागरूप सब० ॥
बेयावृत्तरूप स६० ॥
श्रईहिनयरूप सद्द०॥
ए सिविनयरूप सद्द० ॥
१० चैत्यविनयरूप स६० ।।
११ श्रुतविनयरूप सद्द०॥
१२ धर्मविनयरूप सद्द० ॥
१३ साधूवर्ग विनयरूप सद्द० ॥
१४ प्राचार्य विनयरूप सद्द० ॥
१५ उपाध्याय विनयाप सद्द० ॥
१६ प्रवचन विनयरूप सद्द०॥
१७ दर्शन विनयरूप मद० ॥
१८ संमारे जिनसारमिति चितवनरूपसरला
१५ मंसारे जिनमति सारमिति चितवनरूपराइ ।
(४३)
२० संसारे जिनमत स्थित साध्यादि सारमिति चिं०॥
२१ शंकादूपण रहिताय सद्द० ॥
२२ कांदादूपण रहिताय सद्द० ॥
२३ विचिकित्सारूप दूपण रहिताय सद्द० ॥
२५ कुदृटिप्रशंसादूपण रहिताय सद्द० ॥
२५ तत्परिचय दूपण रहिताय सद्द० ॥
२६ प्रवचनप्रजावकरूप सद्द० ॥
२७ धर्मकयामनावकरूप सद० ।।
२० वादीप्रनावकरुप सद्द० ।।
शए नमत्तिकमनावकरूप सद्द०॥
३० तपस्वीप्रन्नावकरूप सद्द० ॥
३१ प्रज्ञापादिक विद्यानृत्यनाबक सद्द ॥
३२ चूर्णअंजनादि तिमन्नावक सह० ॥
३३ कविप्रनावकरूप सद्द० ॥
३३ जिनसासने कौसलता नूपण सद्द० ॥
३५ प्रनावनाळूपणरूप सद्द० ॥
३६ तीर्थसेवानूपणरूप स६० ॥
३७ स्थैर्यतानूपणरूप सद०॥
३० जिनसासने नक्तिनूपणरूप सद० ।।
३ए नपशम गुणरूप सह०॥
४० संवेग गुणरूप श्रीस० ।
४१ निर्वेद गुणरूप श्रीस० ॥
४२ अनुकंपा गुरारूप श्रीस०॥
४३ श्रास्तिका गुणरुप सह० ।।
११ परतीर्थकादि वंदनवर्जना सद० ॥
(१०)
१५ परतीर्यकादि नमस्कार वर्जनरूप सद० ॥
१६ परतीर्थकादि पालाप वर्जनरूप. सद्द० ॥
४३ परतीर्थकादि संताप वर्जनरूप स०॥
४० परतीर्थकादि असनादि दानवर्जन श्रीस.॥
१ए परतीर्थकादि गंधपुष्पादि प्रेपणवर्जन श्रीस० ॥
५० राजान्नियोगाकारयुक्त श्रोसद्द० ॥
५१ गणान्नियोगाकारयुक्त श्रीस.॥
५२ बलान्नियोगाकारयुक्त श्रीसद्द० ॥
५३ सुरानियोगाकारयुक्त श्रीसद्द० ॥
५४ कांतारवृत्याकारयुक्त श्रीस० ॥
५५ गुरुनिग्रहकारयुक्त श्रीस०॥
५६ सम्यक्तचारित्रधर्मस्व मूलमिति चिंतनरूप सद्द० ।।
५७ चारित्रधर्मस्य पुरस्यहारमिति चिंतन श्रीसद्द० ।।
५७ चारित्रधर्मस्य प्रतिष्टानमिति चिंतनरूप सद्द० ॥
५७ चारित्रधर्मस्य प्रतिष्टानमिति चिंतनरूप सह० ।।
पए चारित्रधर्मस्याधारमिति चिंतनरूप सद० ।।
६० चारित्रधर्मस्य नाजनमिति चिंतनरूप स०॥
६१ चारित्रधर्मस्य सन्निन्नमिति चितवनरूप स० ।।
६२ अस्तिजीवेति श्रदानस्यानयु० श्रीसद० ॥
६३ सचजीव नित्येति श्रज्ञानस्थानयु० सद्द० ॥
६४ सचजीव कर्माणि करोतीति श्रद्धानस्यानयु० स० ॥
६५ सचजीव कतकर्माणि वेदयतीति श्रदानस्यान यु० स० ।
६६ जीवस्यास्ति निर्माण मिति श्रदानस्वानयु० श्रीस०
६७ अस्तिपुनमोक्षोपायेति श्रद्धानस्थानयुकोस०॥इति सणा
॥ इस वजे समसठ नमस्कार कर खमा होके
अन्न
7.
कदके
( १ ) ६७ लोगस्तका काउसग करै. एक लोगस्स प्रगट कहके पारे. पी पूर्वोक्त करणी कर. इति षष्ट दिवस विधिः।। ॥ जय सप्तम दिवस विधि लिख्यते । ॥ हो नमो नाणस्स ॥ इस पदका २ हजार जाप करे, ज्ञानपद सम्वल वर्ण, तेलका अांदिल करै, कावन नेद ज्ञानपद के चितव के मकार करें। अप ज्ञानपदके ५१ भेद लिप्यते ।। १ स्पर्शनेही व्यंजनावग्रह मतिज्ञानाव नमः॥ २ रसने जनावग्रह मतिज्ञानाय नमः॥ ३ घ्राणेही व्यंजनावद मतिझानाय नमः ।। ४ श्रोही व्यंजनावग्रह मति.. ५ पर्शनंद्री पर्यापत्रह मति.n ६ रसनेंद्री अर्थावत्र मति । . प्रादी अर्भावग्रह मतिः 6 चकुरित अर्भावह मति ॥ ए श्रोत्रंत्री अर्थावग्रह मति १. मन अर्थावयह मतिज्ञाना० ॥ ११ स्पर्शनेंद्रीईदा मति०॥ १२ रसनेंद्रीईदा मति १३ प्राणेशोदा मतिः॥ ११ चक्षुरिंद्रीईदा मति० ॥ १५ श्रोत्रंदीदा मति०॥ १६ मनेकरीईहामतिः॥ १७ स्पर्शनशअपाय मतिः॥ . १० रसनेंद्रीअपाय मति ॥ रए प्राण्द्रीयपाय मतिः॥ . । । सम्म
--
०
(४४)
२० चरिंद्रीअपाय मति०॥
२१ श्रोतेंद्रीअपाय मति०॥
२२ मनैनापाय मतिः॥
२३ स्पर्शनहीधारणा मति०॥
२१ रसनेंद्रीधारणा मति०॥
२५ घ्राणेंद्रीधारणा मतिः ॥
२६ चतुरिंद्रीधारणा मतिः॥
२७ श्रोतेंडीधारणा मतिः॥
२८ मनोधारणा मति
शए अक्षर श्रुतझानाय नमः।
३० अनकर श्रुतज्ञानाय नमः।
३१ संझी श्रुतज्ञानाय नमः ॥
३२ असंझी श्रुत०॥
३३ सम्यक् श्रुत० ॥
३४ मिथ्या श्रुत०॥
३५ सादि श्रुतज्ञानाय नमः ॥
३६ अनादि श्रुतज्ञानाय ममः ॥
३७ सपर्यवत्सति श्रुत०॥
३७ अपर्यवसति श्रुत०॥
३ए गमिक श्रुतझान०॥
१० अगमिक श्रुत०॥
४१ अंगप्रविष्ट श्रुत०॥
४२ अनंगप्रविष्ट श्रुत०॥
४३ अणुगामि अवधिज्ञानाय नमः।। .
११ अणूणगामि अवधि ॥
(४५३
४५ वमान अवधि।
४६ हीयमान अवधिज्ञा०॥
४७ प्रतिपाती अवधि ॥
6 अप्रतिपाती अवधि०॥
Yए जुमति मनःपर्यवज्ञानाय नमः
५० विपुलमति मनःपर्यवज्ञा०॥
५१ लोकालोक प्रकाशक श्रीकेवलज्ञानाय नमः।इति पंज्ञाor
इस तरे ५१ नमस्कार करे, खमा होके अन्नबू० कहके एका
वन लोगस्तका कानसग्ग करै, एक लोगस्स प्रगट कदके पारे. पीठे
पूर्वोक्त करणी करे. इति सप्तम दिवस विधि ॥
।। अथ अष्टम दिवस विधि लिल्पते ।।
॥ न ही नमो चारित्नस्स ॥ इस पदका २ हजार जाप करे.
चारित्र पदका नवल वर्ण हे, सोसे तंजका चिल करे.
नेद चारित्रपदके चिंतवके नमस्कार करे,
॥ अय चारित्रपद के ७० भेद लिस्यते ।।
१ मायातिपातविरमारूप चारित्राय नमः ।।
२ मृपावादविरमरारूप चारित्रा० ॥
३ अदत्तादानविरमयरूप चारि० ।।
। मैथुनविरमणरूप चारि०॥
५ परिग्रहविरमणरूप चारि० ॥
६ क्षमाधर्मरूप चारित्रेभ्यो नम:L
थार्यवधर्मरूप चारित्रे॥
० मृताधर्मरूप चारित्रे॥
ए मुक्तधर्मरुप चारित्रे॥
१० तपोधर्मरूप चारित्रे॥
(४४)
११ संयमधर्धरूप चारि ॥
१२ सत्यधर्मरूप चारि०॥
१३ सौचधर्मरूप चारि०॥
१४ अकिंचनधर्मरूप चाण
१५ वनधर्मरूप चारि०॥
१६ प्रथ्वीरदासंयम चारि०॥
१७ नगरक्षासंयम चारि०
२७ तेकरक्षासंयम चा०।।
रए वामरक्षासंयम चारि०॥
२० वनस्पतिरक्षासंयम चारि०॥
२१ इंदोरकासंयम चारिक
२२ तेशीर झासंयम चारि०॥
२३ चौद्रीरक्षासंयमचारि॥
२५ पंचेंरक्षासंयम चारि० ॥
२५ अजीवरक्षासंयम चारि०॥
२६ प्रेक्षासंयम चारि० ॥
२७ उपेक्षासंयम चारि०॥
२० यतिरक्तवस्त्रजतादि परग्न त्यागरूप संयम चारि०
र प्रमार्जनरूप संयम चारि०॥
३० मनसंयम चारि० ।।
३१ यासंयम चारि०॥
३२ कायासंयम चारिक
३. याचार्य वेपाट्यरूप संयम पारि० ।।
२४ उपाध्याय यावृत्यम्प संयम पारि०॥
१५ तपस्वी पावृत्यरूप संगम घर ॥
(४५)
३६ लघुशिष्यादि वेयावृत्यरूप संयम चा०॥
३४ मिलाणसाधु वेयावृत्यरूप संयम चा०॥
३० साधु वेयावृत्यरूप संयम चा०॥
३ए श्रमणोपासक वेयाश्त्यरूप संयम चा०॥
४० संघवेयावृत्यरुप चारि०॥
४१ कुलवेयावृत्यरुप चारि०॥
४२ गणवैयावृत्यरुप चारि०॥
४३ पशुपंगादिरहित वसति वसण ब्रह्मगुप्त चारि० ॥
४४ स्त्रोहास्यादि विकयावर्जन ब्रह्मगुप्त चारि० ॥
१५ स्त्रीश्रासनवर्जन ब्रह्मगुप्त चारि० ॥
४६ स्वीअंगोपांग निरीक्षण वर्जनरुप चारि०॥
४७ कुमयंतरसहित स्त्रीदावन्नाव सुशन वर्जन
४७ पूर्वस्वीसंमोग चिंतन वर्जन ब्रह्मगुप्त चा०
१ए अतितरस आहारवर्जन ब्रह्मगुप्त चा० ॥
५० प्रतिभाहार करणवर्जन ब्रह्मगुप्त चा० ॥
५१ अंगविभूपावर्जन ब्रह्मगुप्त चा० ॥
५२ अणसा तपोरुप चाप
५३ उपोदरी तपोरुप चा०॥
५४ वित्तसंवेवरुप चा०॥
५५ रसत्याग तपोरुप चा०॥
५६ कायकिलेस तपोरुप चा०॥
५७ संखेखणा तोरुप चा०॥
५० प्रायश्चित्त तपोरुप चा०॥
५ए विनय तपारुप चा०॥
६० वेपावत्र तपोरुप चा०॥
..
(४६)
६१ सिज्माय तपोरुप चा०॥
६२ ध्यान तपोरुप चारि०॥
६३ नपसर्ग तपोरुप चा०॥
६४ अनंत ज्ञान संयुक्त चा०॥
६५ अनंत दर्शनसंयुक्त चा०॥
६६ अनंत चारित्रसंयुक्त चा०॥
६७ कोध नियदकरण चारि०॥
६० मान निग्रहकरण चारि० ॥
६ए माया निग्रहकरण चा०॥
७० लोन निग्रहकरण चा० ॥ तिसित्तचारित्रनेदाः।
॥ इस तरै ७० नमस्कार करे. खमा हो के अन्नबूसहि
७० सोगस्सका कानसग करे. एक लोगस्स प्रगट कहे. पूर्वोक्त
रणी करे ॥ इति अष्टम वियस विधिः ॥
॥ अय नरम दिवस विधि लिख्यते ।।
॥ हैं। णमो तवस्स ॥ इस पदका २ हजार गुणना कर
तपपदका उच्चस वर्ण इस वास्ते चावलोंका यांवित करेपवार
नेद तपपदके चिंतय के नमस्कार करे ।
॥ थप ताद के ५० मंद यिने ।।
१ यावन् कयक तपसे नमः।
२ इस्वर तपन्नेद तपसे नमः॥
३ वाहनामोदरी तपनेद तपसे नमः॥
४ अन्यतरनणोदरी तपनेद त०॥
५ व्यतपती संविष तपनंद त० ॥
देवतप विनी सविर तपनंद त०॥
कासना विनी संम्बर तपनंद त॥
बनर चिनी संत तपनेह न० ॥
(४)
कायकिलेस तपन्नेद तप० ॥
२० रसत्याग तपनेद तप०॥
११ इंद्रीकपाय योग विषयक संलोणता तपसे नमः ॥
१२ स्त्री पशु पंकादि वर्जित स्थान अवस्थित संखीयता त०॥
१३ थालोयण प्रायचित्त तप०॥
११ पमिक्कम प्रायश्चित्त तप०॥
१५ मिश्र प्रायचित्त तपते ॥
१६ विवेक प्रायचित्त तप० ॥
२७ नपसर्ग प्रायचित्त त.॥
२७ तप प्रायचित्त तक॥
१ए लेद प्रायश्चित्त त०॥
२० मूल प्रायश्चित्त त०॥
२१ श्रावस्थित प्रायचित्त त०॥
२२ पारंचिय प्रायश्चित्त त०॥
२३ ग्यान विनयरूप तप० ॥
२४ दर्शन विनपरूप ता॥
• २५ चारित्र विनषरूप त०॥
२६ गुर्वादिक मन विनवरूप त०॥
२७ वचन विनयरूप त०॥
२० काय विनयरूप त०॥
२ए उपचारक विनयरुप तप
३० आचार्य वेयाचच त.}
३१ उपाध्याय यावच्च त०॥
३२ साधू वेवावच त०॥
३३ तपस्वी वेयावञ्च त०॥..
(१०)
३४ सधुशिष्यादि वेयावञ्च त० ॥
३५ गिलाणसाधू वेयावञ्च त० ॥
३६ श्रमणोपासक चेयावञ्च त०॥
३७ संघ वेयावञ्च तप० ॥
३० कुल वेयावञ्च तक॥
३ए गण वेयावञ्च तप० ॥
१० वायदा तपसेनमः॥
४१ पृचना तपसे नमः॥
१२ परावर्चना तपसे नमः ।।
४३ अनुप्रेका तपसे नमः॥
४१ धर्मकथा तपसे नमः ॥
४५ आध्याननिवृत तपः ॥
४६ रौद्रध्याननिवृत्त तप० ॥
४७ धर्मध्यान चिंतन त० ॥
४० शुक्लध्यान चिंतन तप० ॥
४ए बाह्य उपसर्ग तपसे नमः ॥
५० अन्यंतर उपसर्ग तपसे नमः॥इति पंचाश तपपद जेदाः
इस तरे ५० नमस्कार कर. खमा होके अन्नचूससि० इत्य
दे कहके ५० लोगस्सका कानसग्ग करे. एक लोगस्स प्रगट कहे
ये पूर्वोक्त करणी करै ॥ इति नवम दिवस विधिः ।।
॥ अथ तपस्या ग्रहण करणेकों गुरु पास जाणेकी विधिः ॥
प्रथम शुज घमी देखके अला वस्त्र भानूपण पहरके तिलक
रकै दोवसरK मस्तकमें धारण करके हायके मौली बांधके अक्षत
श्रीफल नैवद्य यथाशक्ति रोकश्व्य लेके नवकार गुणता
१५ गुरुके पास जावै. द्वादशावर्त बंदना करके ग्यानपूजा करें
,
(ए)
के प्रमोदयत होके तप ग्रहण करे, ग्रहरा करणेकी विधि आगे
खी हे ॥ इति तपस्या ग्रहणार्थ गुरु पास जाणेको विधिः ॥
॥ अथ संक्षेप उजमणाविधि नलीको लिख्यते ।।
पंचवर्ण के अनाजसें सिचक्रका मंगल कर. सिहचकजी
चौ तरफ तीन गढ चूमीके श्राकार बनावे. पहिले गदमें अष्टदल
चलके प्राकार नवपद स्थापन कर. पद के रंग मुजब गुण
माणसे रन चढावे नर पंचवर्णके फूल, पंच वर्णके धान्य, नव
नरका गोटा रंगके अपणे रंग मुजब घीवुरेसे नरके चढावै
रंगी ए धमा चढावे, दूसरे वलयमें सोले श्रीफल अयवा सु-
१ चढायै. तीसरे वलयमें चूहारा चढावे, नव निधानोंकी
नव वझे फल चढा, नवग्रह दसदिग्पाल पदमें पक्कान्न रंगरं
चढाये. इत्यादिक विधि संयुक्त सिचक्र स्थापना घरदेरासरमें
नर जिनमंदिरमें पादिरले मंझपमें ५ ॥ ७ ॥ हाय प्रमाणे
च रचना करै. विस्तारसं सब विधि गुरुके हायसे करे, नवपद
की पूजा पढाय फलस ढाले, धवलमंगल गीतग्यान गावे, वाजि
जावै, महा महोचर उदार चितसे करै, मंगलदीप भारती प्र
करे. दूसरे दिन विसर्जन फरै, इति संक्षेप तिचक्र मंगल वि
॥ अब यसमें दिन गुरु पास श्रायके नलीके तपकों पार. तप
को विधो आगे लिखी है तथा नद्यापनमें ग्यानन्नक्तिके कार
- पूग ए वोटांगणा ए पुस्तक ए लेखण ए ग्वणी नव किल
ए रुमाल ए मोरा ए मिजासणा ए थापना ए चंद्रा एपू
ए भारती ए कलश ए जपमाला ए मंदिर करवावे, ए प्रति
तिलक ए मुगट इत्यादिक नव२ चीज बसवावे, शक्ति नही
तो यथाशक्ति रोकनाणो चढाव. देवपदका देवमें देवे, गुरुप
गुरुकू देवे, झानपदका शानखाते लगावै, इत्यादिक यथायोग्य
चेत्रमें खरचं करे.इति सिचक संक्षेप न जमणाविधिः ॥
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. स नाम जगवानने अनुमोगदारसूत्र में सूत्रका लिखा है, एकार्थ चिक दे इस वास्ते नवाह नमास्वातिवाचकादिकोके बनाये पर्युक्त ठेद प्रशमरति आदि पांचसो ग्रंथ सूत्रवत् मानने चाहिये, क कोम पुस्तक श्रुतकेवलीयोके बनाये अन्ननिमारोमे मोजूददे ॥ ॥ अथ अष्टापद नली करण विधि लिख्यते ॥ । इसी चैत्र मासमें सुदि (७) से लेकर पूर्णमासी तक केश्यक नव्यजीव) अष्टापदजीकी उसी करते हैं (जिसमें) किमणा, देववंदन, देवपूजा, इत्यादिक सब विधि नवपदजीकी ती तुल्य करे. (इतना विशेष हे ) श्री अष्टापद तीर्थाय नमः इस पदका) २००० गुणना (वा) वीस जाप करे. अरिहंतप । १२ गुणका नमस्कार करै, ११ लोगस्सका कानसग करै, व (वा ) एकासणेका पच्चरकाण करे, पीठे पूर्णमासीके दिन श्र- पदपर्वतकी प्रापना करे, मंझल रचै, तो विधि लिख्यते दें। पूर्व (चत्तारिदरिकमाए, पछिमन अन्नत्तरा ॥दस पुवाए दो श्रा, वंयमि वंदे चनबीसं ॥१॥ पुवा त्रिवेदिकमध्य उसन्नमजियं ।। दरिकपन से असोकवृक्ष जवाइ चत्तारि, पछिम सुपासमा नईः श, धम्मा दसननरन ॥२॥) इति प्रथम परिपाटी। प्रथम यथाक्रमसें चोवीस कोठे मंगल में बणाणा. हां कांकणमोरे मो सी आत्मरक्षापूर्वक नवपदजीके मंगलवत् जागना. नवयह दश नाण०११११२११३३१४ दग्पाल थापना करे, पीठे पश्चिम काव्य पढ२ के एकेक कोठेमें एकर १५१६१७१र२०॥२१॥२२॥२३॥२४॥ ३।४।५।६। दक्षिण (४५) जिनेश्वरके नामके चिनी नत पर वरक चढा सुपारी एवं ॥ २४ ॥ थत्र काव्य ॥ श्रीननियजिनेशलं, नं सितांशुकः ।। ययाकुमुश्तीनेता, नंद्यायतसितांशुकः ॥ १ ॥ श्री श्रई ऐं श्रीझपनदेवस्वामी वेदिकापोठे तिष्ट२ स्वाहा ।। नपाध्यमजितंतत्या, कंदधानामनेरूपं ।। प्रणतोहोधितंझान, धानामनेकपं ॥ २॥ न ही श्री यह ऐं श्रीअजितस्वामो। 'श्रीशंजवप्रपन्नाये, समयंतेसदादरात् || तेसंसारबनान्मुक्ति, तसदादरात् ॥ ३ ॥ न ही श्री श्रई ऐं श्रीसंन्नवस्वामी०॥ येन्निनंदनतेतीर्थ, राजपादसनाजनाः ॥ विलसंतिचिरंतेत्र, रा दसन्नाजनाः॥१॥ही श्री अह ऐं श्रीअनि० ॥ ४ ॥ तांहीक्ष्यीमुक्त्ये, कांताराजीवमालया ॥ सुमतेतवलीनाहः, कां जीवमालया ॥ ५ ॥ हैं। श्री ऐं श्रीसुमति० ॥ ५ ॥ पद्म सुदृष्टीनां, नूरिशोन्नातपोदयाः ॥ हन्यात्तमांसिपेव, भूरिशो पोदयाः ॥६॥ न ही श्री श्रह ऐं श्रीपद्मपन्न ॥ ६ ॥ सु तत्श्रुतंश्रुत्वा, दर्पकोपक्रमानला । मुंचंतिजंतवःशांता, दर्प कमानलां ॥ हैं हैं। श्री अर्ह ऐं श्रीसुपार्श्व०॥ ७॥ नवां प्रदेण, यैरना जिसमुन्नतः ।। यैरना जिसमुन्नतः॥ न ही श्री श्रई ऐ श्रीचंद्र० ॥ ॥ सुविधेत्वक्षिधमाप्य, प्रमा समाहितः॥ येतेश्रेयःश्रियं श्रस्त, प्रमाद्यतसमाहितः || ही श्रीअई ऐं श्रीसुविधि०॥ एसेवतेशीतलत्वांये, देवसं केवलं ।। अपिमुक्तिनवेत्तेपा, देवसंपन्न केवलं ॥१०॥ हैं। अहै ऐं श्रीशीत० ॥ १०॥ श्रीश्रेयांसतननाजा, परमोक्षगतिर्न न ॥ अनंतानसत्व विश्रांतं, परमोक्षगतिवान ॥ ११॥ न हैं। श्रई ऐं श्रेयांस० ॥११॥ वासुपूज्यनवस्वर्ण, नीरजारुढसक्रमः ॥ त्वंदिरहमोई, नीरजारूढसकाः ॥ १२ ॥ न ही श्री भई ऐं - . (४५३) वासुपूज्य० ॥१२॥ विमलत्वांप्रतिस्वंये, रंजयंतिमनोजवं ॥ श्री पुर्जयमुच्चैस्ते, रंजयंतिमनोन्नवं ॥ १३॥ है। श्री श्रई ऐं श्री। मल० ॥१३॥ जग्मियांसमनंतत्वां, नमस्यंतिमहापदं ॥ येतेविश्व योलक्ष्मी, नमस्पंतिमहापदं ॥ १४॥ ही श्री अई ऐं श्रीय त०॥ १४ ॥ नाशुतस्तवसिद्धांतो, येनावीतनयस्ततः ॥ वरंधः नर्मा, येनावरीतनयस्ततः ॥ १५ ॥ न ही श्री अहै ऐं श्रीधर्मः ॥ १५ ॥ श्रीशांतेदेहिनादेहि, सारंगविधेकृति ॥ शर्मकर्मततेरंव सारंगविधेति ॥ १६॥ही श्री अई ऐं श्रीशांति० ॥१६ कुंथुनाथस्तुपंथानं, विधुतारोपाहतः ॥ पुंसांतन्यापिनाकोच, । धुतारोवृपादृतः ॥ १७ ॥ है। श्री अई ऐं श्रीकुंयु० ॥ १७ येनत्वनाचितःकर्म, वनवैश्वानरोपमः । सोअरनायकुधीनव्या, नवैश्वानरोपमः ॥ १७ ॥ है। श्री अई ऐं श्री अर०॥ १७ ॥ हिपद्मसुतःसिदि, पतिपन्नसुदारुणः॥ येनतेनिद्यतेमले, प्रतिप सुदारुणः ॥ १९ ॥ । श्री अहं ऐं श्रीमजिस्वामी० ॥ १॥ श्रीसुव्रतजिनाधीश, मक्षमालोपलक्षितं ॥ विरंचिमिवसेवइ, म मालोपतक्षितं ॥ २०॥ ही श्री अर्द ऐ श्रीमुनि० ॥ देव्योपित्वद्गुणोजाना, सहामंदरसानुगाः ॥ गायतित्वांनमेजय सहामांदरतानुगाः ॥ २१ ॥ में ही श्री अहै ऐं श्रीनमि० ॥ २१ ॥ तृष्णातापात्वयावर्षे, शमितादानवारणा ॥ श्री मेजनतांराध्य, शमितादानवारणा ॥ २२ ॥ 3 ही थे। अ ऐ श्रीनेम० ॥ २२ ॥ पार्श्वदेवसदारूप्त, महाहारतरंगित्ताः नाट्यंतिचरित्रते, महादारतरंगिता ||२३. ॐ ही श्री श्रई ऐं। •पार्थ० ॥ २३ ॥ वीरोजिनपतिःपातुः, तत्वान:कांचनश्रियं ।। अन्नमेषनिस्सीमां, तत्वांन:कांचनश्रियं ॥ २४ ॥ दी श्री श्र •ऐं श्रीवीरस्वामी अत्र वेदिकापीठे तिर२ स्वाहाः ॥ २१ ॥ पी २० (५४) चोचीत माहाराजकी पूजा करावै, पी वलवाकुल देके दिग्पालां को विसर्जन करै ।। इति अष्टापदपूजा ।। दूसरापर्व २ ॥ ॥ शासनाधिपति जन्मकल्याणक पर्वाधिकारः ॥ ३॥ चेत्र सुदि १३ के दिन श्रीमहावीरस्वामीका जन्मकल्याणक नया दे, इस वास्ते सब जगेधर्मरागीपुरप गुरुमुख समझके जल जात्रादिक संपूर्ण जन्मकल्याणकका महोछव करे. एसेंही झावंत श्रावककू धर्मके नबोत वास्ते सब जगवंतके कल्याणक जो जो होय नलका नछय करणा. एसी शक्ति नहीं होय तो सासनाधी- श्वर देवाधिदेव श्रीमहावीरस्वामीके व्यवनकल्याणकसे लेकर नि- र्वाणकल्याणक पर्यंत जिस दिन जो कल्याणक होय नसीका महो छव पूजन करणा चाहिये. इससे धर्मका नद्योत दोय, श्रीसंघमें परम आनंद होय ॥ इति तीसरा पर्व ३ ॥ ॥ अथ चेत्रोपूनम पर्वाधिकार सामाचारी सतकानुसारसे लिखते है।। प्रथम चावलके पूंजसे सेजयपर्वतको स्थापन करै (तिस पर ) पट्टा रखके श्रीपुंगरीक गणधर (वा) श्रीरुपनदेवस्वामीका विच स्थापन करें. अक्षत मोतियोसें पर्वतको वधावे, केसरचंदनसे पर्वतको पूजे. सब श्रीसंघ एक दोफर पर्वतके चो फेर तीन प्रद क्षिणा देवे (पी) पूजन सरु करे (पया) दश (१०) बीस (२०) तीस (३०)चना (20),पन्ना (५०) पुप्फदामेणलशाचनमाध्यम, दसमदुवालत कलाच ॥ १ ॥ अव प्रथम १० प्रकारसे पूजनका अधिकार लिखते हैं. एकाम चित्तसें अष्टमंगलीक पागे रखके सुद्धोदकसें मूलप्रतिमाको न्हवण करावे, पीछे श्रीसंघ खफा होके (१०) दस नमस्कार चारपूर्वक १० छत तया १० फूलमाला चढोक प्रतिमाके १ तिलक करें. ययाशक्ति सपारी नारेल इत्यादि सप चीज उल्टो दस जघन्य नारेल । मुपारी १०वर फल .
पूजा विधि । (४५५) कल यशासनव चढावै, धूप वेवै, कपूरकी प्रारती करै: पी सिम गिरी गुणगर्मित चैत्यवंदन करके पांचे शक्रस्तवे देव वांदै, १० व मासमण देके (श्रीसिझक्षेत्र घुमरीक गशवराय नमः) इस पदका २० वेर नमस्कार करे. पाचै (श्रीसत्रुजय पूंमरीक अाराधनार्थ करें 'मि कानसर्ग:अन्नबूसति०) कहके १० लोगस्सका कानसग्ग करे (इहां के श्रावार्यने कहे ते कि बहुत नचव होय वखत कमरहे तव एक लोगस्सका कानसग करै १० जेतीके ठिकाणे १० गाथाका स्तवन कहे ) पी7 अनेक प्रकारका वाजिन वजावै ॥ इति प्रश्रम अब इसी तरै (वीत । तीस । चालीस । पञ्चास । यह चारों पूजाके नेद जाण लेणा ( इतनाही विशेष हे ) दूसरी "पूजामें १० के विकाणे २० की विधि करै । तीसरी पूजामे १० की जगे ३० की विधि करै, चोथी पूजामे १० की जगे ४० की विधि करै. पांचमी पूजामें सब विधी ५० की करै. तथा ( सिम क्षेत्र श्रीमरीकाय नमः) इस पद का दो हजार गुणनो करै. स्कृष्टसें पांचं पूजामें जुदी धजा चढावै. जघन्यसे पावू पूजा किये पीछे १ धजा चढावै । यह तप गुरूके मुखसे लेके जघन्य १ वर स, ज्यादा हो सके तो ७ वरस, नत्रुष्ट १२ वरस विधि संयुक्त तपस्या करै. गुरूके मुखसे अपदेस सुरी, संपूर्ण तप हुयां पीठे सिगिरीको जात्रा करे, ग्यानपूजा कर, गुरुनक्की करै, सा- हमीवचल करै (यह ) यैत्रीपूनमके दिन श्रीरुपनदेवस्वामी के प्रथम गणधर श्रीमरीकजी पांच कोमी साधू साथ अक्षय सुखको प्राप्तजये. (इसबातो) नरत प्रथम चक्रवर्तीने चैत्री पूनमको प्राराधन करके ( यह ) चैत्रीपूनम पर्व प्रसिद्ध. कि था. यह चैत्रीपूनम पर्व आराधन करणेसे इस नवमें अनेक सुख संपदा प्राप्त होय, स्त्रियोके पूत्र पूत्रादिकळी वांचा पूरा होय, नर १ (५६) आधिव्याधि सोग संताप सब दूर दोय, परनवमें देवादिक यदि प्राप्त होय, कोणकर्मी होणेसे अक्षयसुखकों प्राप्त होय ॥ इति चै त्र मास पर्वाधिकारः ॥ ॥ अथ चैत्रीपूनम स्तवन लिख्यते ॥ ( ढाल ) पय प्रणमी रे जिनवरना सुपसानले, पुंगरगिर गाईस हूं सुन्न नानलै || मति सुरगिर रे सहस जीन जो मुख हु वै. किम ते नर रे विमलाचलना गुण तवै ॥ (नहालो) किम तवे गुणगए एह गिरिना जिहां मुनि सीधा बहू, गिरिरायना गुण के अनंता कहे जिनवर मुख सन् ॥निय जनम सफलो करण कारण केतला गुण नापियै, तिरयंच नारकतणी गतिनाउःख दूरैराखियै ॥ १॥ ( चाल ) जिनराजारे पहियो श्राद जिनेसरू, तसु नंदनरे चक्रवर्ति नरतसरू । तसु अंगज रेघुमरीक गुणगण निलो,समदम रस रे विनय विवेक गुणै नलो ॥ (उबालो ) गुण जलों अनु मम श्रादि जिनवर पास संजन शियपुर।, पुमरीक गणधर प्रथम विदरे सुमति गुपते संबरी ! पण कोमि साने विमलगिरिवर मुग ति पदवी पाच ए, सुदिपेत्रपूनम तेण प गिरि घूमरीक कदाय ए ॥२॥ (चाल) दिव चैत्री रे पूनम पर्व सुदामणो, सेजे रे भाग ध्यां फल हुये घशो ॥ मनमुद्दे रे पापणप घानक रदी, पाराध्या रे यात्र पुन्य पामे सही ॥ (उबालो) ते पुन्य पामे दान तप जप धर्म ध्यान मने धौ, बहु नाथ ननै त्रिविध पूजा प्रादि जिनवरनी कानावना नावे तेण दिवसे पंचकोमि गुणो फले, अनुक्रमे ते ना मुगति पामी सिझमुंदरने मिले ॥३॥ (चाल) दस बीसारे नीरा चासीस पूजा कही, पन्नासारे श्रावक रिती सदाच म दसन मासे, पूजा पाल रे माम पनऊ मन 4) मन बसे पूजापूर मासखमरा फसे वसी, सामान - का (५७) , = धूपै पस्कनो फल जे करे मननी रली ॥ हिव पूजनी विधि जेम गुरुमुख सुणी परंपरा, ते मोद माया कपट ठगी सुणो नवि पण सादरा ॥ ४ ॥ (दाल) तंजलराति विमलगिरि पापी, तसु ऊपर पट्टादिक आपी ॥ प्रतिमा प्राविजिनेसर केरी, पुंमरीकनी थापी निवेरी ॥ ५॥ सेजगिरिने मन चिंतीजै, करमतणा मल करीजै ॥ मोती तंजुल करीय वधावो, तीन प्रदकरा पुज रचा ॥ ६ ॥ मंगलीक पहिला तिहां प्रार, करमबंध दूरै करि भाग। प्रतिमा मूल सनात्र करेवा, जिनवरना गुण हियो धरेवा ।। ७ ॥ कत्ता भई नवकार गुणंता, वसर जैती तिलक करता ॥ माला पुप्फ पूंगीफल ढोवो, मेरु नरण वर धूप नरकेवो ॥ ७॥ (ढाल) शकस्तव पांचे देव वांदे, जघन्यना बंदण पाप वैदे । दसे नमस्का र करंत जैती, राखी करी दृष्टि जिनेंसेती ॥ ए ॥ आराधिवा काजे कानसग्ग, जिणे किये नांजै कर्मवग्ग ॥ लोगस्सनकोय दसे वखाणु, वेला प्रमाणे अहिएग आणूं ॥१०॥णे प्रकार धूपपूज एह, इसी पर बीज। च्यार तेह || दसांतणी हि तिहां गिणीजै; एक चित्त सूधै शुन पून्य कीजै ॥११॥ धजातणी रोप तिहां करी जै, एकेक पूर्व अघवा गिगिजै ।। महुत्तरे आरति मंगलेवो, पठी प्रन्नु पागल ते करेवो ॥ १२ ॥ (कलश) इम करिय पूजा यथा योगै संघपूजा पादरो, सादमोवछल करो नविका नवसमु ल। सावरो।। संपदा सोहग तेह मानव शद्धि वृद्धि बहू लहै, श्राश्रमर माणिक सीस सुपरै साधुकोरति इम कहै|१३||इति श्री चै०स्त०॥ ॥ अथ नंदीश्वर तपस्या करग विवि लिख्यते ।। स्तवन पहली वमे स्तवनोमें लिखा है सो सुरगाणा. अथ शुन घमीशुनदिन गुरूके पास नंदीश्वरतपदण करे,नंदीश्वरद्दीपकेच्या दिसि तरफ ५२ चैत्यकी अपेक्षायें अमावसर (५२) बावन उपवास ५० (४५) करै, जिस दिन जो माहाराज के नामका नपवास होय नसही नामका २००० गुराना करै, सो लिखते है ॥ १ श्रीरुपनाननजी सर्वज्ञा य नमः । २ श्रीचंद्राननजी सर्वज्ञाय नमः ॥ ३ श्रीवारिपेयजो सर्वज्ञाय नमः ॥ श्रीवईमानजी सर्वज्ञाय नमः ॥ (यह ) च्यार नामकू । बेर नलटा, ४ वेर सुलटा गिणे ॥ अनुक्रमे १३ उपवा स करणेसें एक नली होय. ५ नली करणेसें यह तप संपूर्ण होय ॥पीछे शक्ति मुजब ऊजमणा करें. नंदीश्वरद्वीपका मंगल वणाये, पूजा करावे. इत्यादि महोचव करके ग्यानपूजा, गुरु पूजा करै,साह मीवछल करे, मंझलकी विधि एकेक दिसीमें (१३) तेरे२पदामकी रचना करै चार दिसामें ५२ करे, वीचमें अंजनगिरी, च्या दिसा में च्यार श्वेतपर्वत, दोयर दधिमुखपर्वतके वीचमें दोयर रतिकर पर्वत, एवं ७ रतिकर, एवं सन एक दीप्तीमे १३, ज्यारुं दिप्तिके ५२, सब पर जिनथिंब थापे. इनको पूजामें ५२ थापना, ५२ ना रेल, ५२ पान नागरवेलके, ५२ अंगसूहणा, इत्यादि सब चीज ५२ वाचन लेवे. कमतें एकेक काव्य पढके जल चंदनादि अष्ट व्यसें अंगपूजा तथा अयपूजा करे॥इति नंदीश्वर तपस्याधिकारः।। ॥ अथ वैसाख मास मध्ये पर्वाधिकार लिख्यते ॥ ॥ वैशाखके महीने में मिती साख सुदि ३ दे सो अक्षय तृतिया नामसे पर्व प्रसिद्ध दे. इस दिन श्रीरुपनदेव स्वामी के चा रित्र ग्रहण कियां पीठे वारे मासीका पारणा सोमयशराजाके पुत्र श्रीश्रेयांसकुमरजीके दायसें हरससेती नया. उस वखत उगम : दान के प्रत्नावसे सब देवगण प्रमोदयंत दोके सुगंधजतकी वर्षा, मुगंधपुपाकी वर्या २, साढीचारे कोमि सोनश्योकी वर्षा , यामा समें अहोदानर एसी नदघोषणा १, देवउंनी वाजिन , एरो पांच इव्य प्रगट किये. श्रेयांसकुमरका जस तीन नुयन में विस्तरपा Fir . बनने काउक मुखसे एकासणादिकेक पञ्चरकाण करके पर्वकी महिमा सुणे. कुंजी २ (अर्थ)नोनयाएतानि सामायकादि धर्मकल्यानि चतुर्मासकत्यं (एए ) Tamiआ. उस दिनसे आहारदानकी विधी सबको मालम नई. इस । मानके प्रनावसे श्रेयांसकुमार अक्षयसुखकों प्राप्त नया. इस वास्ते पक्षयतृतिया पर्व श्रीसंघमें परम मंगलकारी हे. इस पर्वके आरोसें स्त्र प्रापण पहरके नगवंतके मंदिर जाके अष्ट द्रव्यसें पूजन रे, स्नात्र, अष्ट प्रकारी, सतरह बेदी, आदि पूजा करावे. पोवे अपने घर गुरुको वहिरायके सब कुटंब समेत जीमें, तर जो मंग लीक कार्य करणा होय सो इस दिन करे, इस माफक इस पर्वको जोजव्यजीव सेवन करते रहेंगे नसोका तफ्तेज हमेसां बढता र दमीन देगा ॥ इति अक्षयतृतिया पर्वाधिकारः ।। ॥ अथ तृतिय ज्येष्ट मासाभ्यंतर पर्वाधिकारः ।। ॥ जेष्ट रुष्णत्रयोदशीके दिन सोलमें श्रीशांतिनाथ स्वामीका नीने १३, निर्माण कल्याणकका दिन दे इस वास्ते इस नचम दिनमें सब जगे जाने ५३, श्रीसंघ एकता होके विधिसंयुक्त शांतिपूजाका महोछय करावै. शां दमा तिजल लेजाके अपने२ घरमें गंटे. इस शांतिपूजाके कराणेसें मा के मरी, हेजा, इत्यादिक समुदायिक रोग फनी श्रीसंघमें प्राप्त न होय (अथवा ) किती श्रावकके घरमें रोग चाला रहता दोय तो (वा) बहुत चिंता रहती होय तो इसी दिन शांतिपूजाका उच्छव कराणा समति चाहिये. ( इससे ) आधि व्याधि ग्रहादिककी पीमा सब दूर होय, प्र अनेक मंगलश्रेणी प्रवर्तन होय ।। इति ज्येष्ट मास पर्वाधिकारः ।। ॥ अथ आषाढ मास मध्ये पर्वाधिकार लिख्यते ॥ |आपाढसुदि १५के दिन चौमासी इस नाम पर्व प्रसिददे सो लि० हे.॥ यथा॥ सामायकावस्यकपोपवानि, देवार्चनमात्रविलेपना नि ॥ ब्रह्मक्रियादानतपोमुखानि, नव्याश्चतुर्मासकमंझनानि ॥१॥ नदीमा Here जर, Tagi सानो तीन र (४६० ) मंगलानि अलंकारनूतानि विद्यते || अहो नव्य प्राणी जीवो यह सामायककों श्राद लेके जो धर्मकृत्य दे सोचोमासके ममण है, प्र यीत् अलंकार समान है. यथाशक्ति यह चोमासेपर्व में कोइ जीव सामायक पमिकमणा पोसा करे, कोइ नगवानके मंदिरमें नाना- प्रकारकी पूजा करे, के सीलवत पाले, कोई सुपात्रदान देवे, कोर नानाप्रकारकी तपस्या करे, जेसा धर्मकाम अपणी शक्तिसे वण श्रावै तो करे, इसमें विरोध नही, लेकिन कोईली प्रकारसें धर्मका नद्योत करणा चाहिये. जिससे सब श्रीसंघमें कल्याणमाला प्रगट होय, नर चोमासी (१५) के दिन सब मंदिरों में दरशन करणेको जाणा, पांच शकस्तवसे देवांदै, पीछे गुरुके पास जाके चोमासे पर्वका व्याख्यान सुणे, सब चीजका प्रमाण करके नपरांतका सोगन लेवै, सांऊकू चोमासी पकिमणा करे. इस मुजय काती चोमास फागुण चोमासे कोनी सेवन करें। इति चतुर्मासपर्याधिकार. ॥ अथ श्रावणमास मध्ये तपस्याधिकार कथ्यते ॥ श्रावणमासमें केर नव्यजीव मम्माई आदि क्षेत्रों में तरेर को पूजा साखीणी भंगिया कराय के चौमासेपछिका न्योत करते दें, इस माफक सब जगे तरे२ की पूजा कराणी चाहिये. उर देस देसमें श्रावकापां इस महीने के तरेकी तपस्यायें करती दे. जिसमें उनमफलको देणेवाली केश्यक तपस्या विधिप्रपाकघसे नरण करके संक्षेपविधि इहां सिरवते हैं। ॥अथ वुटकर तपस्याविधि लिख्यते ॥ पुरिम ?, एकातण ?, नंबी १, यांवित १, उपवास , ( पद १ जी)स तरे पांच बजी कर. तपोदिन २५. ३५साडू नदावे ।। इति इंट्रीजयतप ॥१॥ पकासश ?, नीती, सापित !, उपवास !, सतर, रजम (४६१) नवी च्यार कर. तपोदिन १६. ऊजमरों १६ बहू चढावै ॥ इति कपायजयतपः ॥ ३॥ नीवी १, आंधित ।, उपवास १, इसी तरे नसो ३ कर. तपो दिन ए. जमणे ए साडू चढावै ॥ इति योगशुद्वितपः॥ ३ ॥ श्कलग नपवास ३ अथवा एकंदर उपवास ३. ऊजमणे झा नपूजा करै ।। इति नाणतपः ॥ ४ ॥ श्कसार उपवास ३ अथवा एकांतर उपवास ३, ऊजमणे मात्र पूजा करावै ।। इति दर्शनतप ॥ ५ ॥ श्कलग उपवास ३ अथवा एकांतर नपवास ३. ऊजमणे गौतमस्वामीकी पूजा करै ।। इति चारित्रतपः॥ ६ ॥ अहम १, १, उपवात १, एकातण , एकलगो १, दनि २, नीवी १, आविस १, यह एक नवी. इसी तरे नी पाठ करै. ऊजमणे रूपेका वृक, सोनेका कुहामा करायके म्यान खात देवे ॥ इति पाठ कर्मसूमणतपः ॥ 311 नाश्वा वदि चनयतें लेके पनरे दिन पर्यंत श्कतार एकास सा अयवा निवासणा करै, घरदेरासर आगे अथवा अछे ठिकाणे कलप्त स्थापन करै, एक मुही चावल सदा कलसमेनर, संवत्तरीके दिन कलस कपर नारेख रख के महोत्सवपूर्वक मंदरमें जाके देव आगे रस्कै, मात्रपूजा कर, ज्ञानपूजा कति अक्षयनिधि तपः ॥ श्रीवासुपूज्य पूजापूर्वक रोहिणी नक्षत्र के दिन उपवास वा मीवी, यांबिल सात वरस सात मात करै ( श्रीवासुपूज्यस्वामी सर्वशायनमः ) इस पदका २००० गुणना करे, गुरू के पास स्त वन सुणे. (सो स्तवन आगे लिखेगें) कजमणे झानके उपगरणसे झानन्नक्ति गुरुतक्ति करे. इति रोदणीतपः ॥ ए. सुटिपरके पांचमके दिन श्रीनेमि अंधिका पूजापूर्वक पात्र तपोदिन ७. .
(४६३) एकाससादिक तप करे. अंधिकादेवीकू वेस चढाये।इति अंधिकातपः। सुदिपरके इग्यारसके दिन सिद्धांतपूजापूर्वक मौनसंयुक्त नपवास करै, इति श्रुतदेवतातपः ॥ ११ ॥ सुदि पक्षमें एकांतर उपवास । पारणे आंघिल , एवं दिन १६. ऊजमणे झानपूजा कर. इति सर्वांगसुंदरतपः ॥ १२॥ चैत्रमासे एकांतर नपवास १५, एवं दिन ३०. ऊजम सोनेका अथवा रुपेका वृद अनेक फल सहित चढावै ॥ इति सौ. नाग्यकल्पवृक्षतपः ॥ १३ ॥ पमिचा, बीज, तीज, १ अनुक्रमसें पूनम पर्यंत (१५) उप वास करे. जो तिथि नूले सो तिथि नर करै. कजमणे एकतो बीत ला मंदिर चढावे, मात्र करावै ॥ इति सर्वसुखसंपतितपः॥११॥ वरसातका ज्यार मास र पोप, चैत्र, यह पट मास टा लके वोटो पांचमतप सरू करे. अंधारी नजवाली पांचम मास ५ लग एकासणादि तप करै. कजमणे ज्ञानपूजा करै पांचमतप ॥१५॥ सुद पांचमकू पांच वरस पांच मास नपवास करै, नपवास के दिन देव वांदणादिक क्रिया करें. ऊजमणे पुस्तकादिक ज्ञानोप गरण पकान फल कलशादिक पांच ५ चदांचे, सत्तरत्नेदी पूजा करावे, साहमी बछल करै ।। इति ज्ञानपंचमीतपः ॥ १६ ॥ ॥ श्रापाढ सुदि पहिवा, बीज, तीज, चोथ, पांचम, एकाश शादि तप करे. अशोगत पूजापूर्वक देव आगे नेवेद्य चढावै. इस तरै वरस १ तप कर. जमरों चावलोंसें असोगवृक्ष लिखके पूजा करै ॥ इति अशोगवृक्षतपः ॥ १७ ॥ आपाढ वदि उ श्रीविमलनाथ पूजापूर्वक नपवास ॥ श्रावण वदि 3 श्रीयनंतनाथ पूजापूर्वक उपवास ॥ काती यदि उ श्रीमा ॥इति गेटी .
(४६३ ) दिनाथ पूजापूर्वक उपवास ॥ पोपवदि । श्रीपार्श्वनाथ पूजापूर्वक उपवास करै, मात्र करै, कजमणे चावलोंसे लोकनाल चणालो ते राज सात पावमी करके नसपर सिहक्षेत्र (नप्तकों) सोनेरत्न का मुगद चढावै ॥ इति मुगसप्तमीतपः ॥ १० ॥ आसोज सुदि तक एकाशणादि तपकरे, श्राप प्रकारकी पूजा कर, नैवेद्य चढावे, पहिले वरस अष्टापदकी एक पावमी, स तरे आठे वरसे श्राप पावमी अष्टमकारी पूजापूर्वक श्राराधिय, उजमणे अष्टापदपूजा करावे, पकवान फल सर्व चौवीस चढावै ॥ इति अष्टापदपावमीतपः १ए । सुदि परके आठमके दिन नपवास अथवा आंबिल करै. जमणे दूधको कटोरा नरके श्राप ला देव आगे चढावै ॥ इति अमृतआठमितपः २० ॥ ॥ वदपक अथवा सुदपद के दशम के दिन दस नपवास 'अथवा वीस एकासमा कर. जमणे अखंमित घी धारपूर्वक ती 'ए प्रदरता देवे ।। इति अवमितदशमीतप ॥ २१ ॥ वदिपक अथवा सुदिपकमें ११ के दिन सिद्धांतपूजापूर्वक एकाशश, नीवी, यांविल, वा उपवास ११ करै, कजमणे ११ अं गको पूजा करै ॥ इति श्रीग्यारअंगतपः ॥ २२ ॥ सुदिपक्षके १४ के दिन एकाससादि तप करे, कजमणे ज्ञानपूजा करै, चवद प्रकारके पकवान प्रमुख चढावै ।। इति ११ पूर्वतपः ॥ २३ ॥ पांच अमृततेला मात ६ में करै (प्रथम तेले ) सिरवरणसें पारणा (दूसरे तेले ) सारेका पारणा तीसरे तेले)लापशीका पारणा (चौधे तेले ) सरतें पारणा (पांच में तेले ) खीरसे पार पारणे प्रथम साधों वहिरा के पारणा करै ॥ इति पंचामृतते सातपः॥ २४॥ - णा.
व६४ अध्म १, एकासगो १, अम्म १, एकासको १, अध्म ! एकासपो १ ॥ यद मोटारत्नोत्तरतपः ॥ २५॥ प्रांधिल १२ करके जमण रूपाका चक्र मंदर चढावे तो सदा जय होय, विराज व्यापार में लान होय जगमें जीत दोया इति धर्मचक्रतपः॥ २६॥ नपवास ५, व्यासणा ५ एकांतरै कति पंचमहाव्रततपः२६ उपवास १, एकसयो १, नीवी १,प्रांधिल १,न्यासयो, नपवा १, एकासगो १, नीवीर, आंबिल १, व्यासयो १. एवं दिन १० पूनमसे सरू करै. पारणे साधु पमिलाने, ग्यानपूज करै । इति दालिश्हरणतपः॥ २८ ॥ एकश्येि नपवास १, वेश्ये उठ १, तेंश्येि घाम !, चौरिंजिये दसम १,पंचेंद्रिये द्वादशम १, उकायें चतुर्दसम र, तप करे. जमणें सुखमीसें ६ स्त्रीजीमावे।।इति उक्कायआलोयणतपः॥२॥ नीवी आठ निरंतर करै ॥ इति सासूसुखतपः ॥ ३० ॥ . मांबिल आठ निरंतर करै ॥ इति सुसरसुखतपः ।। ३१ ॥ उह पांच करै ॥ इति पूत्रीसुखतपः ॥ ३२॥ ॥ अहम पांच करै ।। इति पूत्रसुखतपः ॥ ३३ ॥ ॥ उपवास आठ एकांतर करौ॥ इति नारसुखतपः ||३४|| ॥ निवी पांच निरंतर करै ॥इति जेग्मुखतपः ॥ ३५ ॥ ॥ एकासणा पांच निरंतर करै ॥ इति देवरसुखतपः ॥ ३६॥ ॥ एकासमा पांच एकांतर कति पितामातासुखतपः ३३ ॥ इत्यादिक के तरीके तपस्या बहुत ठिकाणेकी श्रावक एयो कियाकरती है. इस वास्ते बहुतोके नपगारार्थ शालोंसें ना र करके संक्षेपविधिसे इहां लिखी है, ज्यादा शक्ति होय तो पूजा सादमीवचल तीर्थयात्रा इत्यादिक सातुं शुनक्षेत्रोमें अपणा धन.
(६५) स्वरच करै, धर्मका नद्योत करै । इस तपस्या के प्रत्नावसे इसन बमें संसारसंबंधी सुःखदालिइ दूर होके सर्व कुटुंबमें सुख संपदा होय, परजयमें देवादिक शुद्धी प्राप्त होय. (किंबहुना ) इति तु कर तपस्याविधिः ॥ ॥ अथ भाद्रपद मासे पर्वाधिकार लिख्यते ।। ॥ नाश्व महिनेमें मिति नाश्वा सुद ४ तथा केश मतकी नपेक्षासे ५ तित्रिकों संवधरी नामसे पर्व प्रसिद्ध है (प्रथम इस विचरी पर्वकी महिमा कहते है ) जेसें जगत्रमें अनेक मंत्र हे र नवकार समाभ को मंत्र नही १,तीयोंमें सेधुंजय समान को धिनही २, पाँचदानमें अन्नयदान सुपात्रदान समान को दान नही . गुलमहि विभयपुस ४, प्रतमाहे ब्रह्मवत ५, नियममे संतोष यम ६, सपमें उपशमतप उ, दर्शनमें जैनदर्शन जलमांहे गंगा स, अलंकारमादि चूमामणी १०, ज्योतषोंमें चंद्रमा ११,ते तमांहि सुर्थ १२, गजमें एरावण १३, दैत्यमांहे रावण १४, तु में पंचपक्षलकिशोर १५, नृस्वकलावंतमांद मोर १६, बनमाहे न १७, काष्टमांहे चंदन १७, साहसीकमें विक्रमादित्य १ए, वतमें श्रीराम २०, रूपवंतमें काम ५१, सतीमाहेशीता २२, स्वमारे शाता २३, सुगंधमें कस्तूरी २१, वस्तुमें तेजनतूरी २५, अत्रमें मंना २५, स्त्रीमाहे रंजा २७, धातुमें स्वर्ण २८, दाता फर्ण गौमें कामधेनु ३०, वृक्ष में कल्पवृक्ष ३१, जलमें त ३२, स्नेहमांदे घृत ३३, इत्यादिक सर्य चीजोंमें एकश् चीज म होती है. इस तरे सर्व पर्यों में उत्कृष्ट राजाधिराज पर्व श्री चरी (दूसरा नाम ) श्रीप—पण पर्वको नगवंत श्रीमाहावीर मीजीने नत्तम वर्णन किया. अब श्रीप!पणपर्वके आपसे प्रथ नीताधुके करणे योग्य धर्मकृत्य कहते है। संवत्सरी प्रतिक्रमण .
(५६६) कर १, लोच करावे २, सेलेका तप करें ३, सर्व मंदिरोमें जगर की जावस्तवना करै ४, सर्व श्रीसंघसें खमावै ५. यह पांच कारस के वास्ते श्रीतीर्थकर गणधरोंने पपणापर्व प्रवर्तन किया | अब शुद्धश्रावक संवबरी पर्व आराधन करणे• आप दिन अगा महो छव करै सो कल्पलता शालोंसें लिखते हे ॥ प्रअम श्रुतज्ञानकी नक्ति करै, कल्पसूत्रजीकू विधिसंयुक्त अपने घर खेजाके रात्रीजागर ण करावे, प्रत्नातसमय नगरके सर्व श्रीसंघकू निमंत्रण कर यथा योग्य सत्कार सन्मान करै, पीठ पुस्तकमाहरु पुरुप सर्वसें उत्तम भानूपण पहरकै मुगट उत्र चामर इत्यादिक समेत साहाल हाराजका रूप बगाकर हाथी पर अथवा पालखी पर बैठ पर गलीकरचित घालमें पुस्तकधरके अपणेदोनुं हाथमें थाल धरके द तरफ पुरुप अधा वस्त्र भानूषण पहरके चमर ढाले, अनेक प्रकारके जिन वाजते नये, दान देतेनये, नानाप्रकारके श्रुतज्ञानके गुण वर्ष करतेनये, नगरमें प्रवकणा तुल्य फिरके गुरुके पास पावै. गुरु पि खमा होके विनयसंयुक्त पुस्तकको नमस्कार करके आगे रस्कै. श्रीर पके पाझासे याचनापूर्वक यांचे १, नगरमें सब जगे अमारिपकर वजावे, दूसरा वचनसें तया द्रव्यसें कसा धोधी नमनूंजा इस दिक सबका प्रारंज गेमाचे २, सुपात्रदान देवे ३, विदाम सुपारी नालेरादिक की प्रजायना करे , श्रीवीतरागदेवकी उदार चकित पूजा को, चौदसके दिन संवरी के दिन चतुर्विध श्रीसंघ इको कर सर्व मंदिर दरसण करणेसो जाये ५, सचित्तका परिदार करे ६, ब्रह्मचर्य पाले ७, चञ्च, 35, अम्मादिक तप करे ८. अपनेर बिनके अनुसारे जन्मकल्याणकका उच्च कर ए, अपहरी पोमा कर १०, संवधरी प्रनित्र.मग कर ११, निसल्य होके सर्व प्रोमर सखमाने १२, पारणेके दिन पीसद किरणेवाले साधीशार: - ( ५६७) योंकी नक्ति करै १३, गुरुन्नक्ति करै १२, संबंचरी दान देवे, सोहमी वछल करे १५. इस विधिसंयुक्त यह केटपसूत्र एक चित्त सुपनेते याराधन करणेसे आत जवसे मोक्षस्थानळू प्राप्त होता हे (नर) केश्यक जव्यजीव अत्यंत शुज नाव भरतेनये अहमादि तप कर के युक्त कल्पसूत्रजीकों वांचते हे नर सुरानेवाले प्रमाद निज्ञ वि कथा गेमके अहमादि तप करके एक चिनसे शुद्धनाव रखके इक वीस वेर सुणते हे, सो जव्य देवगतीको प्राप्त होके तीसरे नव सिं द्विस्थानकों प्राप्त होते दे । इप्त पर्यवरापर्वका महोचव जो नव्य जीव करते दे सो धन्य दे, धर्मके प्रनावीक है, अपणी लक्ष्मीलें धर्मका द्योत करते दे. उस पुष्पात्माकों देव सहायता करते हे तर नमस्कार करते है।। (अब कल्पसूत्रजोका महात्म कहते है। यह कल्पसूत्र नवमेपूर्वसे नहरण कियानया दशाश्रुतस्कंधका आग्मा अध्ययम है. सर्व श्रीसंघके मंगलके कारण श्रुनकेवली श्रीनद्रवादु स्वामी प्रसिद्ध किया है. यह श्रीकल्पसूत्रके अनंते विषय हे. जेसे सर्व नदीके बालू के करा होय नससे नो एक सूत्र के अनंते विषय हे. इस कटपसूत्रका महात्म जो देवाचार्य हजार जीन करके कहे तोजी महात्मका एक अंस जी कह सकता नही.एला इस पर्वका महात्म जाण जो नव्यजीव शुरू नावसे सेवन करेंगें सो अनेक तरे से शहिदी सुख सौलाग्य को प्राप्त होंगे. नर परलवमें देवादिक शहि पावकै मुक्तिसुखको प्राप्त होंगे । इति पर्युपसपर्वाधिकारः६॥ ॥ अथ आश्विन मास भध्ये पर्वाधिकारः ॥ ।। आसोज महीनेमें मित्ती आसोज सुदि से लेके आसो ज सुदि १५ तक नवपदजी की नसी तथा अष्टापदजीकी नली विधिसंयुक्त करै, सो सब विधि पहली लिखो हे नसी माफ करै।। ॥ अथ कार्तिक मास मध्ये पर्वाधिकार लिख्यते ।। ॥ कार्तिक महीने में मिती कार्तिक वदि अमावस हे सो. दी। .
(४६) पमालिका नामसें पर्व प्रसिद्ध है. यह दीपमालिकापर्व कबसें। सो लिखते हे. चोवीसमें तीर्थकर श्रीमहावीरस्वामी समस्त र साध्वी साथ विचरते अके अंतकी चोमासी मध्यमपावापुरी में । यके रहे, नहां आगामीकालकी सर्व वात नव्यजीवोंके सामने नि पण किया, फेर अपणा अंत समय जाण के हस्तिपालराजाके क्लशालामें श्रायके रहे. अपणे पर गौतमस्वामीका बहुत स्नेह दे के निजीक गाममें देवशर्मा ब्राह्मणको प्रतिबोध देणेतनेजा, गमी पद्मासन धारण करके शोले पहर तक अखंड देतना नये बहुत्तर वरसका यू पूरण पालके इसी अमावासके दिन उली दो घमी रात रहणेसे सिद्धिस्थानको प्राप्त नये.जिस सम नगवंतका निर्वाणकल्याणक नया उस समय चोस इंद्र देवता पके प्राणे जाणेसे वमा उद्योत जया, नर जो राजा पोपथमें वे नयेथे सोनावनयोतका अस्तपणा देखके सब जगेरत्न धरके व्य नद्योत किया. एकमके प्रत्नात समें देवतोका आणा जाणा नर चन सुणके श्रीगौतमस्वामीकू केवलझान उत्पन्न नया. दूजके दिन सुदर्शना वहिन अपणे नाई नंदिवर्द्धनराजाळू घरमें बुलाके जीम या, शोक दूर कराया जिससें नाईचीज प्रवर्तन हुई. इससे यह दीवाली पर्व कमा उत्तम है. इस दिवालीकी रातएं जो गुराना करते हे सो लिखते हे ।। ॥ श्रीमहावीस्वामी सर्वज्ञायनमः ।। श्रीमहावीरस्वामी पारंगतायनमः॥ श्रीगौतमत्वामी सर्वज्ञायनमः ॥ इस एकर पदको २००० गुणनो करे, उपचास करे, रात्रीजागर ण करे, निर्वाणकल्याणककी भारती करै । स्तवन बोले । निर्माण कल्याणकका अधिकार सुणे । गोतमरास सुणे. इत्यादिक नदार ५. सर्व विकाणे दीवाली पर्वका उचव करणा चाहियै ॥ दिया • स्तवन पूर्वे लिखा दे तो पढे ।
। दूसरा . (५६) ॥ अथ ग्यानपंचमी पर्वाधिकार लिख्यते ॥ काती महीने में कार्तिक सुदि पंचमी सो ज्ञानपंच मी नामसे पर्व प्रसिद्ध दे. इस दिन सर्व नव्यजीवोंको ज्ञानका विशेष आराधन करणा चाहिये. ज्ञानके समान संसारमें उत्तम प दार्थ कुछ नी नदी हे. सर्व तत्यमें ज्ञानके समान को तत्व नही. मोकमार्ग साधन• ज्ञान समान को नपाय नही. इस ज्ञानपंच- मोके आराधनसे अनेक इएफर्म नाश होय. गंगापणा, मूर्खपणा, व ऋपणा, ओर काढादिक रोग सर्व दूर होय. अनुक्रमें ज्ञानावरणो कर्म के क्षय होणेसे पांचो ज्ञान प्रगट होय. जेसे वरदत्त गुणमंजरी के रोगादिकके सर्व उपद्रव दूर होके मनोरण पूर्ण नये, इस तरे जो ज्ञानपंचमीका अाराधन करेगा उसका मनोरथ पूर्ण होगा ॥ ।। अथ ज्ञानपंचमी देववंदन विधि । ॥ प्रथम पवित्र स्थानक चोकीपट्टे पर ग्यानको स्थापन करें, नसके आगे पांच साथिया करे, फल फूल प्रमुख चढावे, पांच वत्ती का दीपक चढावै, अगर कपूरका धूप खेवै, पूजा पढके वासक्षेप कपूरसें ज्ञानपूजा करै, यथाशक्ती रोकद्रव्य चढावै तथा पूग विटां. गणादि चढावै. (ज्ञानपूजा लिखते है ) नमंतिसामंतमहीवनाई, देवायपूर्यसुवियपूर्विाननीयचिमणिदामएदि,मंदारपुप्फंपसवेदि नाणं ॥ १ ॥ तदेवसहामणिमुतिएहिं, सुगंधपुप्फेहिबरसएहि ॥ यंतिवदंतिनमंतिनाणं, नाणस्तलानायनयरकथाय ॥२॥ यह गाया पढके ज्ञानपूजा करे. (इस तरे द्रव्यपूजा करके पीछे लाचपूजा करे सो लिखते हैं) खमातमा दे के । शरियावही पक्षिमें। लोगस्त कहे। वेके। मुंदपत्नी पमिलेहे । अणूजापद मेमिनग्गरं (इत्यादिक) दो वांदशा देवै, पीते पांच खमासमण दे के शानका नमस्कार कहै ॥ ॥ अथ शाननमस्कार सिरम्यने । सकल वस्तु प्रतिन्नास नान (४३०) निरमल सुखकारण, सम्यग्दर्शन पुष्टदेतु नवजलनिधि तारण ॥ सं यमप आनंदकंद अन्नाण निवारण, मार विकार प्रचार ताप तापि त जिन गरण । १ || स्यावाद परिणाम धर्म परणति पमिवोदणे, साहु साहुणो संघ सर्व पाराधन सोहण ॥ मोह तिमर विध्वंतसूर मिथ्यात्व पणासण, आतमशक्ति अनंत शुइ प्रनुता परगासण ॥ ॥ २ ॥ मनि श्रुति अवधि विशुः नाण मणपऊव केवल, नेद प. चास हायोपत्तमिक एक कायिक निरमल || दोय परोक्ष प्रश्रम तिहां उग परतक दीसत, सकस प्रतक्ष प्रकाश नास ध्रुव केवल अपर मित ॥ ३ ॥ धर्म सकलनो मूल शुइ त्रिपदी जिन नाशै, बाहिर अंग प्रधान खंघ गणघर सुप्रकाशै ॥ शाखाश्रीनियुक्ति नाप्य पनि शाखा दोपै, चूरण टीका पत्र पुष्प संशय सब जीपै ॥ ५ ॥ पंचां गो सार बोध को जिन पंचम अंग, नंदी अनुयोगद्दार शाख मा. नो मनरंगे । वीर परंपर जीत अनुलव नपगारी, अन्यातो पाग- म अगम निरुपम सुखकारी ॥५॥ मोहपंक हर नीर सम सिद्धांत अवधेि, देवचं आणा सहित नयनंग पाराधै ।। ए श्रुतज्ञान सोहा मणो सकल मोक्ष सुखकंद, नगते सेवो नविकजन पामो परमा नंद ॥ ६ ॥ इति ज्ञानस्तुति || इत्यादि नमस्कार कहके । णमो , त्युणं० जावंतिचेश्या३० जावंतिकेविताहू० नमोर्हत् सिज्ञ०। कह- के प्रण श्रीगुरुपाय० ॥ इत्यादि शानका स्तवन बोले, जयवी थरायण कहै, वंदराव अन्नबू० कहके एक नवकारका कांसग्ग करै, थुई कहै ॥ ॥ अथ दुई लिख्यते ॥ देविंदचंदियपएपिरवि थाणि, नामाणिकवलमणोहिमईसुयाणि ॥ पंचाविपंचमगईसियर्प : चमोए, पूयातवोगुणरयाणजियाणदितु ॥ १ ॥ यह स्तुति कहो ! ज्ञान श्राराधवा निमित्तं करेमि कासगं ) तस्युत्तरी० अन्न १ लोगस्सका कानुमग करै, (पारके ) बोधागाय० (इत्या- - (७१) दिगामापटके ) पी ॥ यानशिबोहियनाणं । सुपनाचेव हना रणंच ॥ तहमापऊवनाणं । केवलनाणवपंचमयं ॥ २ ॥ यह गाथा कहके । श्छामिखमालमणो श्रीमतिझानायनमः , श्रीश्रुतिज्ञा नायनमः २, श्रीअवधिज्ञानायनमः३, श्रीमनपर्यवज्ञानायनमः ४, समस्त लोकालोकानाकर श्रीकेवलज्ञानायनमः ५. इस तरै पांच नमस्कार करै, घिरता होय तो (५१) ज्ञानके गुणोंकों नमस्कार करे, सोपूर्व नवपदजीके गुणने में लिख्या है। उस माफक करें ॥ पीवै ( ही गमेमाणस्स) इस पदका २००० गुणना करै. फम घिरता होय तोश्यारे अंगकी सिझायों पढे वा सुरों, सो लिखते है।। ॥ प्रथम आचारांग सिझाय लिख्यते ।। ॥ ढाल हठीलानी ॥ पहिलो अंग सुहामणो रे, अनुपम आ चरांग रे॥ सुगणनर॥ वीर जिनंदे नापियो रे लाल, नववाई जात नवंग रे ॥ सु०१॥ वलिहारी ए अंगनीरे, हुं जावं वारंवार रे॥सु०॥ विनये गोचरी आदरे रे लाल, जिहां साधुतणो प्राचार रे ॥ सु० ब०॥॥सुयखंध दोष कै जेइना रे,प्रवर अध्ययन पचचीसरे। सु. उद्देशादिक जालिये रे लाल, पिच्यासी सुजगोस २॥ सु० २०३॥ हेतु जुगत कर सोलतारे, पद अदार हजार रे । सु० ॥ अक्षरप दने हमें रेलाल, संख्याता श्रीकार रे॥ सुब० ॥ गमा अनंता जेदमा रे, वलिलि अनंत पर्याय रे । सु० ॥ स परित्तो है हां लाल, थावर अनंत कदाय ॥स०व०५॥ निव निकाचित सासता रे, जिनप्रणीत ए नाच रे ।। सु० ॥ सुरातां प्रातम उससे रेसाल, प्रगटे सहज स्वन्नाव रे ।। मु०१० ६ ॥ सुगुण श्रावक वारू श्राविका रे, अंगे धरिय नल्लाप्त रे ॥सु०॥ विधिपूर्वक तुमे सां जलो रे लाल, गीतारथ गुरु पास रे.॥ सु०प०३ ॥ ए सिद्धांत महिमा निलो रे, उतारे नव पार रे।। सु०॥ विनयचंद्र कहे माहरे . چ (७२) रेलाल, एहिजअंग आधार रे ॥सुब० ॥इति आचाराग सि०॥ ॥ अथ २ सुयगडांगसूत्र सिहाय लिख्यते ॥ ॥ ढाल रसियानी ॥ वोजो रे अंग तुमे सनिलो, मनोहर श्रीसुगमांग ॥मोरासाजना त्रिणसे तेसठ पाखंगीतणो, मत संख्यो धर रंग ॥ मो०१ ॥ मीठी रे सारे वाणी जिनतणी, जागे जे दथी रे ग्यान || मो०॥ ए वापी मन माली मादरै, मानु सुधारे समान ॥ मो० मी०२॥ रायपसेणी उपांग चे जेहनो, ए तो सूत्र गंजीर ॥ मो० ॥ बहुश्रुत अरय जाणे सदू, कीर नीर धनु तीर ॥ मो० मी० ३॥ एहना रे सुरखंध दोय , वलि अध्ययन तेवीस ॥ मो०॥ न देता समुदेसा जिहां जला, संख्याये रे तेत्रीस ॥ मो. मी० ॥ नय निक्षेप प्रमाण जरया, पद उसीस हजार मो०॥ संख्याता अक्षर पदमाहे, कुण लदे तेहमो रे पार ||मो०मी०५|| ग मा अनंता पर्याय वली, नेद अनंत जिण माहि। मो० ॥ दुग अनंत त्रस परित्त कह्या, पावर अनंत जे माहि || मो० मी० ६॥ निवड निकाचित्त जे सासय कमा, जिम पणता रे जाव । मो०॥ नापी रे सुंदर एह प्ररूपणा, चरण करणनो रे जाय || मो० मी. ०७॥ करिये जगत जुगत ए सूत्रनी, निचे सदिये रे मुक्तिः ॥ मो० ॥ विनयचंद्र कदे प्रगटे एहनी, यातमगुणनीरे शक्ति ।। मो० मो० ॥ ॥ इति सूपगमांग सिझाय ॥२॥ ॥ अय ३ हाणांगमूत्रसिझाय लिख्यते ।। ॥ ढाल ॥ थाउ टके कंकस लियोरी। ए चाल || श्रीजो यंग नलो कहोरे जनजी, नामे श्रीगणांग ॥ मोरो मन मगन प्रयो। दारे देखी जाय, दोरे जीवाजीय स्वन्नाव मो०॥ सपल जगत करी गजतो रे जि०, जीवानिगम उपांग ॥ मो० ॥१॥ एद यंग मुझ मन यस्यो रे जिनजी, जिम कोकिल दल यंत्र ॥ मोटा (७३) गुहिर नाव कर जागतो रे जि०, आज तो एह आलंब ।। मो०२ । कूट शैल तिखरी शिला रे जि०, काननमें बलि कुंम ॥ मो० ॥ पर श्रागर इह नदी रे जि०, जेह रे नदंग । मो० ॥३॥ स गया पति दीपता रे जि०, गुगपर्याय प्रयोग || मो० ॥ परित मेहनी वाचना रे जि०, संख्शता अनुयोग ॥ मो० ॥१॥ वेष्ट सि कि निजुनपुंरे जि, संगहसो पमिवित्त ।। मो० ॥ ए सहु सं- यातां जिहां रे जि०, सुशता उलसे चित्त ॥ मो० ॥ ५ ॥ सुय ध इक राजनोरे जि०, दश अध्ययन नदार ॥ मो० ॥ नदेशादिक स है रे जि०, पद बहुनर हजार || मो० ॥ ६ ॥रागी जिनशा न तो रे जि०, सुरो सिखंत वखाण ॥ मो० ॥ विनयचं कहै हुवे रे जि०, परमारबरा जाण ||मो०||७॥ इति श्री०म० सं०॥ ॥ अथ ४ ॥ समवायांगसूत्र सिझाय ॥ ॥ ढाल ॥ श्रारा महिला कपर मेद जरोखे वोजलो। एचाला। यो समवायांग सुलो श्रोता गुशी, हो लाज सुशो श्रो०, पनवणा गि करो सोना वणी, हो लाल करो तो०॥ अरध मागधोनापा वा सुरतणी, हो लाल साखा सु०, समकित नाव कुसुम परि- - व्यापी घयो, हो लाल परि० ॥ १॥ जोव अजोवने जीवाजीव सिमी, हो लाल जो०, बहोयै एहयो नाव विरोध कांइ नयी, बाल वि० ॥ नांगा तीन स्व समयादिकना जागीये, हो लाल १०, लोक अलोक ने लोकालोक वखाणीये, दोलाल लो०॥२॥ यकी सत समवाय परूपणा, हो लाल सम, कोमाकोमिप्र क जीव निरूपणा, दो साल जो. ॥ वारसविद गणी पिटकत संख्या कही, दो साल तण, सातता अरथ अनंत कि वे एहना दो साल छै०॥ ३ ॥ सुवखंव अध्ययन नदेसादिक नला, हो न०, संख्यायें एक एक प्रत्येके गुरा निला, दो प्रत्ये० ॥ .पद .
, (७४) एक लाख चौमाल सहत तेनत्तरा, दो० सण, पदनें अयनदन सं. ख्याता अकरा, हो संगा नाप्य चूर्णि नियुक्ती करी सोदे सदा, हो० करी०, सुणतां नेद गंजीर त्रिपत न होय कदा, होत्रि० ॥ जेह नमावै अंगकि अन्तरगत इसी, हो अन्तण, जल वरसते जोर 'कुण न हुवे खुसो, हो० कु०॥५॥जाग्यो धरम सनेह जिमंदसुं माहरो, हो जि०, तजिया शास्त्रमिथ्यात सुत्र जाण्यो खरो, हो० सू० ॥ जिम मालती लहे मुंग करीनेनविरहे, दो० क०, इश्वर शिर सुरगंग तनी परि नवि वहे, हो० त० ॥ ६ ॥ ए प्रवचन नि- ग्रंथतणो जुगते वमो, हो० त०, साकर सेलमी शख धकी पिस मीठमो, हो. य० ॥ स्युं कहिये वहु वात विनयचंद्र श्म कहै, हो, वि०, एहना सुणने नाव श्रोता अति गहगहै, हो० श्रो० ॥ ७ ॥ ॥ अथ ५॥ भगवतीसूत्र सिझाय लिख्यते ॥ ॥ढाल पंथोमानी॥पंचम अंग नगवती जालियेरे, जिदा जिन वरना वचन अथाह रे॥ हिमवंत परवत सेती निकल्या रे, मान पर तिख गंग प्रवाह रे॥ पं० १॥ सूरपन्नती नामे परगमी रे, जेहनी 3 नद्दाम नवांग रे ॥ सूत्रतणी रचना दरिया जिसी रे, मांदिला अरथ ते सजल तरंग रे ॥ पं०२॥ इहां तो सुपखंय एक प्रति नलो रे, एकसो एक अध्ययन नदार रे ।। दश हजार नहेसा जेद ना रे, जिहां किण प्रश्न उत्तीस हजार रे ॥ पं०३॥ पद तो दोय साख अरथे नरया रे, ऊपर सदस अध्यासी जाण रे || लोकालो क स्वरूपनी वर्णना रे, विवादपन्नत्ती अधिक प्रमाण रे ॥ पं० ४ ॥ करिये पूजा अने परतावना रे, धरिये सदगुरु कपर राग रे । मुशिये सुत्र जगवती रागरे, तो दोष नवसागरमो त्यागरे। ५० ५॥ गोतम नामे च्य चढाश्य रे, सम्यक् धान उदय दोय जेम २॥ कीजे साय.तथा सादमीतणी रे, नगति युगति मन प्रासो .
(५) प्रेम रे ॥ पं. ६ ॥ ३ण विधमुंए सूत्र पारायतां रे, इण जव सोफे वंचित काज रे ॥ परनव विनयचं कहे ते सहे रे, मोहन मुगतिपूरीनो राज रे॥पंच० ॥इति श्रीजगवतीसूत्र सिझाय सं०॥ ॥ अथ ६ ॥ ज्ञातासूत्र सिझाय लिख्यते । ॥ ढाल ॥ कितलख लागा राजाजीरै मालियै ॥ए देशी॥ छो अंग ते ज्ञातासूत्र वखाणियै जी, जेहना अरय अनेक नई म हो । म्दारा सुणज्यो धरि नेद तिज्ञतनी वातमी जी ॥ श्रवणे सुशतां गाढो रस कपजे जी, मधुरता तर्जित जिम मधुरखंभ हो । म्हा० १ ॥ जंबुद्दीवपन्नत्ती उपांग चै जेहनो जी, इण माहे जिन पूजानी विधि जोरदो ॥ म्हा० ॥ अर्चिक सुण परम शांतिरस अ नुनवे जी, चर्चिक मुश करै सम सोर हो ॥ म्हा० ३ ॥ नगर न यान चैत्य वनखं सोहामणो जो, समवसरण राजानो मात ने तात हो ॥ म्हा०॥ धरमाचारज धर्मकया तिहां दाखवी जी, इह लोक परलोक हि विशेष सुहात हो ॥ म्हा० ३ ॥ जोग परि त्याग प्रव्रज्या पर्यवा जो, सूत्र परिग्रह बारू तप नपधान दो ॥ म्हा० ॥ संलेदरा पञ्चरकाश पादपोपगमनता जी, स्वर्गगमन शुज कुल नतपत्तान हो || म्हा० ४ ॥ बोधिलान वलि तंत ते अंतक त्या कदी जी, धर्मकथाना दोय वै खंध दो ॥ म्हा० । पहिलाना उगणीत अध्ययन ते आज के जी, वोजाना दस वर्ग महा अनुवं ध हो ॥ म्हा०५ नंकोमि तिहां सफल कथानक नापिया जी, नाप्या वलि नगणीस नदेस हो । म्हा०॥ संख्याता हज़ार नला पद एहना ली, एद थकी जाये कुमति कलेश हो । म्दा० ६॥ विनय करे जे गुरुनो बहु परै जी, तेहने श्रुत सुणतां बहु. फल दोय हो म्हा॥ ते रसिया मन बसिया विनयचंने जी, सोमांदे मिले जोया एककै दोय हो।न्दा० ॥इति शांताधर्मकांग सिगा (४७६) , . . . ॥ अथ ७ ॥ उपासकदशा सूत्र सिझायं लिख्यते ॥ ॥ ढाल विठियानी ॥ हिवै सातमो थंग ते सांजलो, नपा सगदशा नामे चंग रे || श्रमणोपासकनी वर्णना, जल चंदपन्नत्ती नपाग रे ॥ १ ॥ मन लागो मोरो सूत्रधी, एतो नव वैराग तरंग रे ॥ रस राता ज्ञाता गुण लहै, परमारथ सुविहित संग रे ॥ म० २॥ण अंगे सुयखंध एक , अध्ययन नदेस विचार रे ॥ दसर संरख्यायें दाखव्या; पद पिण संख्यात हजार रे ॥ म० ३ ॥ आ दादिक श्रावकतणो, सुणतां अधिकार रसाल रे ॥ रस लागे जा मोहनी, श्रोताजनने ततकाल रे ।।म० ४ ॥ श्रोता आगल तो 'चतां, गीतारथ पामे रीक रे॥ जे अर्द्धदग्ध समऊ नही, तेदमुं करवी धीज रे॥ म० ५ ॥ दस श्रावक तो हां नापिया, दिए सूत्र नएपो नही कोय रे ॥ ते माटे शुभ श्रावक नगी, एक पर नी धारणा होय रे ॥म०६॥ साचो होय ते प्ररूपिथ, निस्सं पणे सुजगीस रे ॥ कवि विनयचं कहै स्युं थयो, जो कुमती रस्यै रीस रे ॥ म० ७ ॥ इति उपाशकदशांग लिझायः ॥ ॥ अथ ८॥ अंतगडदशांग सिझाय लिख्यते ॥ ॥ ढाल ॥ वीर वखाणी राणीचलणा ज॥ ए देशी ॥ श्रा चमो अंग अंतगमदशा जी, सुणी करो कान पवित्र ॥ अंतगम के चली जे थया जी, तेहना रे शहां चरित्र ॥ आ30 ॥ १॥ कर्म के ठिन दल चूरतां जी, पूरता जगतनी श्रास || जिनवरदेव इहां जा सता जी, सासता अर्थ सुविलास ॥ श्राठ० २ ॥ सकल निक्षेप न य नंगथी जी, अंगना नाव अन्नंग ॥ सहिज मुख रंगनी ताप का जी, कल्पिका जास नवाग ॥ श्रा० ३ ॥ एक सुयबंध इश अंगनो जी, वर्ग से आठ अलिराम ॥ श्राप नदेसा ठे वली नी, संख्याता सदस पद गम ॥ श्रा० १॥ प्रामा .
(४७) 'अंगना पाठमें जी, एडवोम तेरे मीगस 11 सरस अनुन्नव रसे कप जी, संपजै पुण्यनी रास ॥ श्रा० ५॥ विषयलंपट नर जे हुचे जी, निरविषयी सुण्यां थाय, जिम मादा विप विपधरतको जी, नागमंत्रे सुण्या जाय ॥ श्रा० ६ ॥ अमृतवचन मुख वरतती जी, सरस्वती करो रे पसाय ॥ जिम विनय श्ण सुचना जी, पुरत लदै अभिप्राय । प्रा० ॥इतिश्रीअंतगमदशा सूत्र सि० ॥ ॥ अथ ए|| अणुत्तरोवाई अंग सिक्षाय लिख्यते ॥ ॥ ढाल ॥ नणदल विंदली लै ॥ ए चाल ॥ नवमो अंग प्रणुत्तरोचाई, एहनी रुच मुमने आई हो ॥ श्रायफ सूत्र सुशो । सूत्र सृणो हित प्राणी, एतो वीरागनी वाणी हो । प्रा० १ ॥ जसु कल्याणवतंसिका नाम, सोहे नपांग प्रकाने हो। प्रा० ॥ ए तो आगमने अनुकूला, मानु मेसिखरनी बूला हो ।। प्रा० २॥ ए तो सूत्रनो नाम सुगीजै, तिम२ अंतरगति नीजे हो ॥ श्रा० ॥ प्रगटै नवल सनेहा, एहबी नलसे मोरी देहा हो ।। ॥ श्रा० ३॥ अणुत्तर सुरपद पाया, तेहना गुण इसमें गाया हो ॥ श्रा० ॥ नगरादिक नाव वरवाएया, ते तो उकै अंगे पाएमा हो । श्रा० ४ ॥ इहां एक सुयबंध वारू, त्रिण वर्ग वली मनोहारू रे॥ श्रा० ॥ उद्देसा त्रिण सनूरा, संख्यात सहस पद पूरा हो । श्रा० ५ ॥ सूत्र सुणावू अमे तेहनें, साची श्रद्धा हुय श्रा०॥श्रोताथी प्रीत लगावं, निंदकने मुंह न सगाई हो। श्रा०॥ ६ ॥ जे सुणतां करै वकोर, ते तो माणस नदी पिण ढोर हो । श्रा० ॥ कवि विनयचं कहे साचो, श्रुत रंगै सहुको राचो हो । श्रा० ॥ ॥ इति श्रीअगुजरोवाई सिझायः ।। ।। जय १० ।। प्राव्याकरण सिझाय लिख्यते ॥ ॥ दाल ।। प्राधा श्राम पधारो पूज॥ए देसी ॥ दशमो अंग जेदने हो ।
( 36 ) सुरंग सुहावे, प्रप्णव्याकरण 'नामें, सूत्र कल्पतरू सेवे ते तो, चि दानंद फल पामे ।। श्रावोश् गुणना जारा तुमने सूत्र सुणाचें ॥ पुप्फकली ज्यूं परिमल महकै, गुरु परागने रागै ॥ तिम नपांग युष्पिका एदनो, जोर जुगति करि जागै ॥ प्रायो० २ ॥ अंर सादिक जिहां प्रकास्या, प्रप्यादिक अति रूमा ॥ ते अष्टोत्तर सा ए तो, सूत्र मध्य मणिचूमा ॥ श्रा० ३॥ आश्रव वार पांच इह श्राएया, पांचे संवर धारा | माहामंत्र वाणोमा लहिये, लबधि ने सुखकारा ॥ प्राण ५ ॥ सुयखंघ एक के दसमे अंगै, पणयाली अझयणा ॥ पणयालीस नद्देस वली पद, सहस संख्यातनी रयणा ॥ प्रा० ५ ॥ जे नर सूत्र मुणे नही काने, केवल पोपे काया । माया मांहि रहै लपटाणा, ते नर इमदिज आया ॥ श्रा० ६ ॥ सूत्र मांहि तो मारग दोय, निश्चय नय व्यवहारा ॥ विनयचंद्र कहे ते आदरियै, तज मन मदन विकारा॥ आवो०७॥ इति ॥ ॥ अथ ११ ॥ विपाकसूत्र सिझाय लिख्यते ॥ • ॥ ढाल कमखानी ॥ सुणो रै विपाकश्रुत अंग ग्यारमो, तजो विकया वृथा जे अनेरी ।ललित नपांग का, मूलिका पाप आतंक केरी ॥ सु० १ ॥ अशुन किंपाक सम उरुतफल नोगवी, नरकमें गरक यया जेह प्राणी ॥ सुरुतफल नो गवी स्वर्गमांजे गया, तास वक्तव्यता इहां प्राणी।। सु०२॥ दोयश्रुत खंधने वीश अध्ययन वलि, वीस नदेस हां जिन प्रयुंजे ॥ सहस संख्यात पद कुंद मचकुंद जिम, बहुल परिमल भ्रमर चित्त गुंने सु०॥३॥ सरस चंपकलता सुरनि सहुने रुचे, अन्य नपगारनी बुद्धि 'माटे ॥ सूत्र नपगार तेहथी सबल जाणिय, नेहथी पुरुप.सुख अ. चल खाटे || सु. ' ॥बंध ने मोकना बेर्ने कारण अने, उतने जोयो विचारी ॥ उरुतने परिहरी सुकतने पादरी, जिनव जसु प्रवर पुप्फचूति , . ( 4 ) चन धारियै गुण संन्नारी । सु०५॥ म कर रे म कर निंद्या नि- पण पारकी, नारकी तणी गति को बांधे ॥ नारकी. प्रत तज हज संतोष नज, लाग श्रुत सांजली घरमधे । सु०६ ॥ सुरक 'पुःख विपाक फल दाखव्या, अंग ग्यारमें वीतरागै ॥ चिरजयो रशासन जिहां सूत्रथी, कवि विनयचंगुण ज्योति जागे ।।सु०॥ ॥ अथ इग्यारे अंगकी वर्णना लिख्यते ॥ ॥ ढाल वधावाकी ॥ अंग इग्यारे में युण्या, सहेली ए॥ जि धपा रंगरोल कि । स० ॥ नंदीसूत्र मांहि एहनो, स० ॥ प्यो सर्व कि ॥१॥ सहेली ए आज वधामणा ॥ श्रांक- 11 पसरी अंग ग्यारनी, स०॥ मुझ मन मंझप वेल कि ॥ सींचू हरखे करी, स०॥ अनुनय रसनी रेल कि । स० २॥ हेज धरी तानसे, स० ॥ कुरा बूढा कुण वाल कि॥ तो ते फल लहे फू 1, स० ।। स्वादें अतहि रसाल कि ॥ स० ३॥ हरख अपार धरी , स० ।। अहम्मदाबाद मझार कि ॥ नास करी ए अंगनी, ॥ वरत्या जयरकार कि । स० ॥ संवत सतर पचावनें, ॥ वरपाशतु नननास कि ॥ दसमी दिन सुदि पक्षमां, स० ॥ थई मन आस कि । स०५ ॥ श्रीजिनधर्म सूरी पाटवी, ॥ श्रीजिनचं सूरीस कि ॥ खरतरगहना राजिया, स० ॥ राजै सुजगीस किस०६॥ पाठक रहखनिधान जो, स०॥ तिलक सुपसाय फि ॥ विनयचंद्र कहे में करी, स. ॥ अंग र सिझाय कि । स० ॥इति श्रीग्यारे अंग सिझाय । ॥ अथ ज्ञानका पुनः स्तवन लिख्यते ॥ ॥ राग तुमरी ॥ मेरे रे मन मानी ज्ञान जरी, मेण ॥ पर उप सुगुरु वताई, पांच ने करी ॥ मति श्रुति अवधि अवर मन केवल वोध वरी ।। मे०१॥ तप करि अनि मंस दंसनकी, - . (160). करमॅधनल करी ॥ सक्रिय संजम करतासु मिल, सिहि रसान. धरी । मे०२॥ पूरण पुन्य मिली मोहि सजनी, सकलानन्द दरी, वाल कहै श्रव विसरत नाही, पल विन एक धरी ॥में०३|| इति पद! ।। पुनः आगम स्तवन ॥२॥ श्रुत अतहि जलो, संघ सकस आधार नमूं श्रीनुवन तिलो ॥ प्रांकणो || अरयें श्रीवीरजिनंद प्राख्यो, सूत्रे श्रीगणधरगुरु जाप्यो, तउन्नययी जे मुनिवर राख्पो ॥ श्रु० ॥ जेहयी जग नाव सकल जाणे, नय एकांत मुनिजन नवि तारो, निश्चय विवहार ते मन आणे ।। श्रु० ॥ जिहां अंग नपांग वै अति रूमा, आवेद पयन्ना नहि कूमा, मूलसुत्र नंदी अनुयोग चूमा ॥ श्रु० ३ ॥ जिहां निरयुक्ती सूत्रे संगी, बलि नाप्य चूरण टीका चंगी, पंचम अंगे कही पंचांगी ॥ श्रु० ॥ जिहां साधु श्रावक मारग लहिये, संवेगपखो वलि सरदहिये, ए त्रिश विन लवमारग कहियै || श्रु० ५ ॥ जेहनी अनुपेहा नित करिये, नपचारे परिह रये, आराध्यां निज अनुभव तरियै ॥ श्रुत०६ ॥ जिन आगमना जे गुण गावे, शुज्ञाशय जे मनमें ध्यावे, ते कमाकल्याण सदा पावै॥. श्रु० ७॥ इति ज्ञान स्तवनं ॥ ॥ अथ कार्तिक चोमासाधिकार लिरव्यते ॥ ॥ कार्निक महीने में मिति कार्तिक सुदि १४ के दिन सब मंदरमें दर्शन करण्को जाणा, व्याख्यान सुराना, सामायकादिक धर्मकृत्य करणा । इत्यादिक सब अधिकार प्रासाद चोमासे मुजर, जाणना ॥ इति कार्तिकचोमासा सेवन विधिः ।। ॥ अथ कार्तिक पूर्णमासीका अधिकार लिख्यते ॥ प्रश्रम कार्तिक वदि १ से सेव॒जरास सुणे, निवी वा एकासणा व्यासणादि तप कर, दोनुं टंक पझिकमणा कर, देवबंद; दूपण.
सा (१) कर. ( है। श्रीसिक्षेत्र अनंतसिद्धायनमः ॥) इस मंत्रका प करे १०० वेर ॥ शक्ति होय तो सिझगिरी जात्रा करणेंको वे. कातिपूनमके दिन विस्तारसंयुक्त सिगिरीकी पूजा करावे, गई महोचव करे, विस्तारसें देवबंदनादिक विधि कर, (२१) सेत्रुजरात सुसे (ते हैं। श्रीसिद्धक्षेत्र अनन्तसिद्धाय नमः) पदसें २१ जेती देवै. (कदास ) सिद्धिगिरी जागेकी शक्ति । दोय तो जहां सिद्धगिरीका पट्ट मंमा होय नहां महोचव क्त दर्शन करणेकू जावै, पूजादिक सव विधि करै, उन्नत्त कर वा चनत्यनत्त करके इस पर्वकू श्राराधन करे, गुरुनक्ति करे, वचन करे. इत्यादिक विधि संयुक्त सिद्धगिरीकी सेवना करणेसें अशुन्नकर्म विध्वंस दोय, मंगलमाला प्रवर्तन होय ॥ इस दिन नीद्रावर वारखिल प्रमुख दस कोमि साधु सिस्थिानक प्राप्त जिससे इस दिन जो धर्मरुत्य करणेमें श्राता हे नसका नि- शकोकि गुणा फल होता है । इस चरतक्षेत्र में सिद्धगिरीके न उसरा तीर्थ नही. संवत १३२ की साल में मेरा चतु- मुंबई में था. नहांसें कार्तिकमें यात्रा गया, तब सर्व बियोके श करके गिणती देखरोमें आई सो बारे हजार तीनसें अब संख्या मिली, नर बहुत जगे चरणोकी स्थापना हे, अन- धू असण लेके परमपद पाए है, इस वास्ते जो तुरत न नीव होंगे सो शुनावसे इस तीर्थकों सेवेंगें, जो सेवते हे न्य है. गुर्जरदेस वासियोंकी बहुलता तार्थासातनाकारी चनका जतीसाधू जो संवेगपक्षी गीतार्थोके पी एसी वक जीर्णोद्धार तथा नोकारसी प्रमुखके वाहनेसे अन्य देसांतरी नव्यजीवोंका धन उगणेकी वृत्ति तीर्थ सेवन अनंत सं- -जवनमण समझके वर्जना, एसे उबुधियोकी पूजाव्रतपञ्च- - (४०) खाणादि द्रव्यकरणी श्रावकाचारवृत्तिरूप जाणके ननोका संगतीन करणा. शुद्धनावसें तिगरी सेवे ताकू नमस्कार हे ।। ॥ अथ सिद्धगिरी स्तवनं ॥१॥ ॥ देशी गरवानी॥ते दिन क्यारे श्रावसी हे. जो रे बहिन ॥ जासु सिद्धाचलनी जात्र, मोरी सहियां दे ॥ पाजै चढतां प्रेम है, जो रे वहिनी ॥ गाश्य गुण अखियात, मोरी सहियां हे ॥ दि०१ ॥ अदनुत ऊंचो देहरो ए, जो रे वहिनी । मूलनायक प्र दिनाथ, मोरी सहियां है ॥ नोली नगत नली परे है, जो रे व ॥ निरख्यां होय सनाय ॥ मो० ते २॥ नाही निरमल नीर हे, जो रे०॥ पहिर खीरोदक चीर, मो० ॥ केसर नरिय को समी है, जो रे० ॥ पूजसुं सुगुण सुधीर ॥ मो० ते. ३ ॥ रूमी रायणगहमी है, जो रे ॥ आदिजनंद कदार, मो० ॥ तिहां जगनाथ समोसरया हे, जो ॥ पूरव निनाणू वार ॥ मो०१॥ शण गिरवरिये कपरा हे, जोरे० ॥ सीधा साधु अनंत, मो० ॥ चोमासे रह्या दोय जिनवरा हे, जो रे । अजित जिनेसर शांती ॥ मो० ५॥ चेलणातलाइ सिद्धसिला , जो रे० ॥ अदभुत चलकामोल, मो० ॥ सिद्धव सेव॒जैनदी वदे हे, जो रे०॥ करिये नित रंगरोल ॥ मो० ६ । इण मुंगर दीठा पका है, जो रे० ॥ ऊपजे परमानंद, मो० ॥गहिरी गिरवर गहमी हे, जो रे० ॥ कदे नित जिणचंद || मो० ते०॥ ॥ इति सिद्धाचलजी स्तवनं ॥ ॥ पुनः सिद्धगिरी स्तवन ॥२॥ श्रीचंज्ञानुप्राहुलो रे । ए देशी ॥ धुंजगिरी रे, त्रिकरण श्रुक्ष त्रिकाल रे । पापपाल दूरै टलै रे, स्टै करमजंजाल रे ॥ नमो० १ ॥ पूरब निनाणू समोसस्या रे, प्रगम जिनंद जगदीस रे ॥ बावीसम जिनवर बिना रे,. समवसरचा नमो रे नमो से.
(७३) तेवीस रे ॥ नमो० ॥ साधु अनंत अनसण ग्रही रे, र्स हिज गेम रे । काल अनंत वलि सीकस्यै रे, साधू अनंती कोम २॥ नमो० ३ ॥ अनंत कल्याणक नूमिका रे, महिमावंत महंत रे। सास्वतो तीरथ ए सही रे, अतिशय जास अनंत रे।। नमो० ४॥ कोमिनवांतर जे किया रे, पातिक विविध उपाय रे।। से- बुजै सनमुख चालतां रे, पग२ ते सहू जाय रे ॥ नमो० ५ ॥ धन दिन तेदिज जागसू रे, वदिस्यु सेजे केरी वाट रे । उहरी ययाविध पालस्यु रे, संघ सहित गहगाट रे ॥ नमो० ६ ॥ पगर नचव अतिघणारे॥ पगर याचकदान रे ॥ प्रेम जगत साहमीतणी रे, जीर्णोधार प्रधान रे ॥ न० ७॥ धन ते गिरिराय निरखसुं रे, व. ढती मंगलमाल रे ॥ मणि मोतीयमे वधावस्युं रे, रजत सोवन जर थाल रे ॥ नमो०७॥ धन दिन ते गिर फरसस्युं रे, करस्यु पाव- न मोरी काय रे, नगति जुगति जुहारस्युं रे, नाजिनंदन जिनराय रे । नमो० ॥ ॥ द्रव्य नाव करसुं मुदा रे, पूजा विविध प्रकार रे ।। जावै नावना नावसुं रे, करसुं सफल अवतार रे ॥ नमो० १०॥ रत्नत्रयी नमती नली रे, देसुं ते धर बुद्धि रे ।। नवनव भ्रमण निवारसुं रे, लदिप्सुं प्रातमसुहिरे ॥ नमो० ११ ॥ विध फरसन मन माहरो रे, मोहि रह्यो दिनरात रे ॥ पुन्य प्रवरथी पामियो रे; उऊलगिरि केरी जात रे ॥ नमो० १५॥ नाय धूलेचा सुपता- यथी रे, कारज सगला सिद्ध रे ।। कहै जिनदरप सूरीसरू रे, दो- यजो मंगल बुद्ध रे ।। नमो० १३॥ इति सिहाचल स्त० ॥ ॥ पुनः सिद्धगिरि स्तवन ॥ ३॥ ॥ देशी पंधीमानी ॥ अंग कमाहो मोने अतिघयो, नेटवा विमलगिरिंदरे पंथीमा नाजिराया कुत्र चंदलो, जिहां वसै मरु- देवानंद रे पंथीमा ॥ वदितुं वाले रे पंथी म्हारा वहिडं बोले रे . (४४) सेजो वे कितनी दूर रे पंश्रीमा । वहि० १ ॥ पालीताणो नगर सोहामणो, रुमी लसताप्तरनी पाल रे पंथीमा | जिहां अंबला रे वमला घणा, कुक रही चंपलारी माल रे पंयीमा ॥ वहि० २॥ धनं ते पंखी पारेवमा, सेज वसिया जे मोर रे पंश्रीमा ॥ कर हो करीने जे घर रहे, माणस नदी ते ढोर रे पंयीमा ।। वहिक ३ ॥ सेर्जेज वाटे जी चालतां, कोणीर को खेहरे पंथीमा मैला थावे संघना कापमा, निरमल थाय देह रे पंथीमा ॥ वहि ४ ॥ नंचो देहरो आदिनाथनो, आगल चोक विसाल रे पंयीमा । जिहां मिल२ घणा मानवी, गावै प्रनुगुण माल रे पंथीमा ॥ वहि ५ ॥ घस केसर नर वाटका, पूजेवा जिनवर अंग रे पंथीमा । फूलाइंदो सोहे मनु सिर सेहरो, दिवसारी ज्योति अनंग रे पंधी मा ॥ वहि० ६ ॥ ए गिरवर दीगं मादरै, ऊपजै परम आनंद रे पंथीमा ॥ मोने नेटगरो जी कोम है, प्रेम घणे जिनचंद रे पंश्री. मा || वदि०७॥ इति श्रीसिहाचलजी स्तवनं ॥ ॥ पुनः सिद्धगिरी स्तवन ॥ ४ ॥ ॥ जात्रा निनाणूं करिये विमलगिर, जात्रा० ॥ पूरब निना Y वार सेचुंज गिर, रुपन्न जिनंद समोसरिये, सेजगिर यात्रा०॥ कोमिसहस नव पातक तूटै, सैज सामे मग नरिये ॥ विम० जात्रा० ॥ चोथ क दोय अध्म तपस्या, कर चढियै गिरवरिये ॥ विम० जा० ॥ पूरीक पद जपियै हरप, अध्यवसाय शुन धरिये ॥ वि० जा० ॥ पापी अन्नधी निजर न देखे, हिंसक पिरा. परि यै ॥ वि० जा० ॥ नूमिसंधारी ने नारितणो संग, दूरथकी परह- रियै ॥ वि० जा०३ ॥ एकल आहारी ने सचिन परिहारी, गुरु साथे पद वरिये ॥ विण जा०॥ पमिक्कमणा दोय विधसुं कीजै, स विप दरियै वि० जा० ॥ कलिकाले ए तीरय मोटो, प्रवास पापपमा आज (४५) सम नवदरिये ॥ वि० जा० ॥ नत्तम ए गिरवर सेवंता, पदम कदै नवतरियै ।। वि० ला० ५॥ इति पदं ।। ॥ पुनः सिद्धगिरो स्तवन ॥ ५॥ राग मनातीनाव घर धन्य दिन आज सफतो गिएयो, प्राज में सजन आनंदपायो । ना० ॥ हर्ष घर निजर जर विम. जगिरि निरख कर, रजत मणि कनक मोतियन क्यायो । ना० 1१ ॥ पगर उमंग धर पंथ नित पूतां, धन्य दोय चरण जिहां वक्षत पायो।ना०॥आज धन दोह जागी सुरुतको दिशा, पन दीह में सुजस गायो ॥ ना० २ ॥ उर रगत टरी जात्र विघसुं करी, पुन्यन्नंमार पोते नरायो । वदत जिनराज मनरंग सु. (गिरसिखर, झपन जिनचंद सुरतरु कदायो ना०३ ॥ इति पदं। 11 अय मार्गशीर्ष मास मध्ये पर्वाधिकार लिख्यते ॥ ॥ मिगसर महीनेमें मिती मिगसर सुद ११ सो मोनश्ग्या- रस नामसे पर्व प्रसिद्ध है. इस दिन मेढसें कल्याणक नये हे सो लिखते है. जन्म, दीका, केवलज्ञान, यह तीन कल्याणक श्रीमल्लि- नाथस्वामी के नये, श्रीअरयनाथ स्वामीनें दीक्षा अंगीकार करी. श्री नमिनाथस्वामीकों केवलज्ञान नया. एते इस नरतक्षेत्रमें वर्तमान चोवीसीके पांचकल्याणक जये. इस तरे पांच जरत, पांच एरवत में, चोवीसीके पांचर कल्याणक मिलाणेसे पचास कल्याणक नये. अतीत, अनागत, वर्तमानकालकी अपेक्षासें मेढसे कल्याणक नये. इस वास्ते यह दिन वमा उत्तम है. इस दिन मौन संयुक्त नपवास करें, अठ पदरी पोसा करकै मौनग्यारसका गुणना करै. पोसह की शक्ति नही होय तो देसावगासि लेके गुणना करे, एसे ग्यारे वरसमें ग्यारे नपवास करे, 'अगर जो इग्यारस करणे की श्छा होय तो महीने में दोनों पक्षकी दो एकादतीकों :
(७६) ग्यारे वरस इग्यारे महीना करै, यह तपस्या करतां ग्यारे अंग ना. वसे सुणे, ग्यारै अंग लिखायक देवे, पढणेवालोंकों सहाय देवै, तपस्या ग्रहण करणेकी तथा पारकी विधि करे, सो गुरुमुखसे (समवसरण बैग नगवंत ) इत्यादि ग्यारसका स्तवन पूर्वे सिख्या हे सो पढे वा सुगै. पी नद्यापनमें पेंतालीत आगमकी पूजा करें. यथाशक्ति साहमीवच्छल करे, गुरुपूजा करे ॥इति विधि ॥ अथ मोनएकादशीको गुणनो लिख्यते ॥ ॥ जंबुद्वीपेभरतक्षेत्रे अतीत ॥ धातकीखंडेपूर्वभरते अती २१ जिन पंच क. २४ जिन पंच कल्या ल्याणक नमः॥ णक नमः ॥ ४॥ || प्रथम ॥ ॥ दितीयः ॥ श्रीमहायशसर्वज्ञायनमः ४ श्रीश्रकलंकसर्वज्ञायनमः ६ श्रीसनुन्नुतियईतेनमः ६ श्रीशुभंकरअर्हतेनमः ६ श्रीसर्वानुनूतिनाथायनमः ६ श्रीशुभंकरनाथायनमः ६ श्रीसर्वानुन्नतिसर्वज्ञायनमः ६ श्रीशु फरसर्वज्ञायनमः ७ श्रीश्रीधरनायायनमः ७ श्रीसप्तनाथायनमः जंबुद्वीपे भरतक्षेत्रे वर्तमान २४ धातकीखंडेपूर्वभरतेवर्तमान २१ चिन पंच कल्याणक ॥२॥ जिन पंच कल्याणकनाम ।।१।। २१ श्रीनमिसर्वज्ञायनमः २१ श्रीवांद्रसर्वशायनमः १ए श्रीमलियईतेनमः १५ श्रोगुणनायपदनमः १ए श्रमल्लिनायायनमः १ए श्रीगुणनायनाथायनमः रए श्रीमतिसर्यज्ञापनमः १ए श्रोगुणनायासर्वज्ञापनमः १० श्रीपरिनायायनमः १० श्रीगांगीलनायापनमः जंबुद्धीपेभरतनेत्रेअनागत २१ घातकोखंडेपूर्वभरतेअनागत२१ जिनपंचकल्याणक० ॥३॥ जिनपंचकानामा ४ श्रीस्वपंप्रनुमापनमः ४ श्रीसांप्रतिसशापनमः () ६ श्रीदेवश्रुतग्रहत्तेनमः ६ श्रीमुनिनायबईतेनमः ६ श्रीदेवश्रुतनाथायनमः ६ श्रीमुनिनाथनाथायनमः ६ श्रीदेवश्रुतसर्वज्ञायनमः ६ श्रीमुनिनायसर्वज्ञायनमः ७ श्रीनदयनाथायनमः ७ श्रीविशिष्टनाथायनमः पुष्कराद्धपूर्वभरतेअतोते २४ जि धातकीखंडेपधिमभरतेअतीत नपंचकल्याणक प्रथा॥७॥ २जिनपं०ना दितिय॥१०॥ ४ श्रीमृडसर्वज्ञायनमः ४ श्रीसर्वार्थसर्वज्ञायनमः ६ श्रीव्यक्तअर्हतेनमः ६ श्रीहरिनअईतेनमः ६ श्रीव्यकनाथायनमः ६ श्रीहरिजश्नाथायनमः ६ श्रीव्यक्तसर्वशायनमः ६ श्रीहरिनासर्वशायनमः ७ श्रीकलाशतनाथायनमः ७ श्रीमगधाधिनाथायनमः पुष्करार्द्धपूर्वभरतेवर्तमानर ४जिन धातकीखंडेपश्चिमभरतेवर्तमान पंचकल्याणक । । २४पंचकल्यालकना० ॥११॥ २१ श्रीअरण्यवाससर्वज्ञायनमः २१ श्रीप्रयचसर्वज्ञायनमः १ए श्रीयोगनायबईतेनमः १ए श्रीप्रकोनईतेनमः १ए श्रीयोगनाथनाथायनमः १५ श्रीप्रक्षोजनाथायनमः १ए श्रीयोगनाथसर्वशायनमः १ए श्रीअोनसर्वझायनमः १० श्रीअयोगनाथायनमः १७ श्रीमल्लिसिंदनाथायनमः पुष्करार्द्धपूर्वभरतेअनागत२४जिन धातकीखंडेपश्चिमभरतेअनाग- पंचकल्याणकनामः ९ त २४ जिपं०क. १२ ४.श्रीपरमसर्वझायनमः श्रीयादिकरसर्वशायनमः ६ श्रीशुद्धानियईतेनमः ६ श्रोधनदाईतेनमः ६ श्रीशुदान्निाथायनमः ६ श्रीधनदनाथायनमः ६ श्रीशुदार्तिसर्वज्ञायनमः ६ श्रीधनदसर्वशायनमः श्रीनिकेशनाथायनमः ३ श्रीपोपनायायनमः - (UG) पुष्कराईपश्चिमभरतेअतीव२जिन जंबद्रोपेएरक्तक्षेत्रेअतीत २१ पंचकल्याणक ॥१३॥ जिपंचक०१६ श्रीमलंबसर्वज्ञायनमः श्रीदयात सर्वज्ञापनमः ६ श्रीचारित्रनिधिहतेनमः ६ श्रीअन्निनंदनअईतेनमः ६ श्रीचारित्रनिधिनाथायनमः ६ श्रीअन्निनंदननाथायनमः ६ श्रीचारित्रनिधिसर्वज्ञायनमः ६ श्रीमतिनंदनसर्वज्ञायनमः श्रीप्रशमजितनायायनमः श्रीरत्नेशनाथायनमः पुष्करार्द्धपश्चिमभरतेवर्तमान २४ जंबूरोपेएरवतक्षेत्रेवत०२४ जिनपंचकल्याणक ॥१४॥ जिनपंचक नामा१७ २१ श्रीस्वामिसर्वज्ञायनमः २१ श्रीशामकाप्टसर्वज्ञायना रए श्रीविपरीतहितेनमः १ए श्रोमरुदेवाईतेनमः १ए श्रीवीपरीतनाधायनमः रए श्रीमरुदेवनाथायनमः रए श्रीवीपरीतसर्वशायनमः रए श्रीमरुदेवसर्वज्ञापनमः २०श्रीप्रसादनाथायनमः १८ श्रीअतिपार्श्वनाथायनमः ॥पुष्कराईपश्चिमभरतेजनागत जयदीपेएरवतक्षेत्रेअना०२ २४जिनपंचकल्याणक।१५।। नपंचकल्याणकनामा2010 १ श्रीअघटितसर्वज्ञायनमः 2 श्रीनदिपेणसर्वज्ञायनमः ६ श्रीनमश्रितेनमः ६ श्रीयतथरमर्दनमः ६ श्रीब्रमणेदनायायनमः ६ श्रीवतधरनायागनमः ६ श्रीजमणेश्मायनमः ६ श्रीवतधरसशायनमः · श्रीरिपनचंद्रनायायनमः श्रीनिर्यापानाशायनमः घातकीसंहपूर्वपरवते अतीतरजिन ॥पुष्कराई पूर्वपरवते अतीत२१ पंचकल्याणकनाम॥१६॥ : जिनपंचकना॥२२॥ १ श्रीधादिकसमापनमः "५ मत ६ मीनिकमसनमः (ए.) ६ श्रीत्रिविक्रमनाथाय नमः ६ श्रीवणिक्नायायनमः ६ श्रीत्रिविक्रमसर्वशायनमः ६ श्रीवणिक्सर्वज्ञायनमः श्रीनारसिंदनाथायनमः ७ श्रीनदयज्ञाननाथायना तकीखंडेपूर्वएरवतेवर्तमान२४ पुष्कराद्धपूर्वएरवतेवर्तमान जिनपंचकल्याणकनाम॥२०॥ जिनपंचक नाम ॥ २३ ॥ २१ श्रोखेमंतसर्वज्ञायनमः २१ श्रीतमोकंदनसर्वज्ञायना आए श्रोसंतोपितहतेनमः १ए श्रीसायकाअर्हतेनमः रए श्रीसंतोपितनाथायनमः १ए श्रीसायकाक्षनाथायनम ए श्रीसंतोपितसर्वज्ञायनमः १ए श्रीसायकाक्षसर्वज्ञायन १० श्रीकामनाथायनमः १० श्रीखमंतसर्वज्ञायनमः तकीखंडेपूर्वएखतेअनागत२४ पुष्करार्द्धपूर्वएरवतेअना० २. जनपंचकल्याणकनाम॥२१॥ जिनपंचक नाम ॥ २४ ॥ : श्रीमुनिनायसझायनमः ४ श्रीनिर्वाणासर्वझायनमः श्रीचंदाइयईतनमः ६ श्रीरविराजतेनमः श्रीचंद्रदाहनाथायनमः ६ श्रीरविराजनाथायनमः श्रीचंदादसर्वज्ञायनमः ६ श्रीरविराजसर्वज्ञायनमः श्रीदिलादित्यनायायनमः ७ श्रीप्रथमनाथायनमः बकोखंडे पश्चिमएरवतेअतोत२४ पुष्कराईपश्चिमए०अतीत२४ जिनपं०क० नाम ॥ २५ ॥ जिनपंकना॥२८॥ श्रीपुरुरवसर्वज्ञायनमः १ श्रीअश्वबंदसर्वज्ञापनमः श्रीअवोधादनमः ६ श्रीकुटिलअाईतेनमः श्रीअवबोधनायायनमः ६ श्रीकुटिलनायायनमः श्रीअवरोधसर्वज्ञायनमः ६ श्रीकुटिलतर्वज्ञायनमः श्रीविक्रनाथायनमः ७ श्रीव माननापायनमः . (४०) घातकीखंडेपश्चिमएरवतेवर्तमान२४ पुष्कराईपश्चिमएरवतेवर्तः जिनपंचकल्याणकनाम॥२६॥ २१जिनपंचकराना०२९ २१ श्रीसुशान्तसर्वझायनमः २१ श्रीनंदिकसर्वज्ञायनमः १७ श्रीहरअईतेनमः १ए श्रीधर्मचंबईतेनमः १ए श्रीहरनाथायनमः १ए श्रीधर्मनायायनमः रए श्रीहरसर्वज्ञायनमः १ए श्रीधर्मचंदसर्वज्ञापनमः १० श्रीनंदिकेशनाथायनमः १७ श्रीविवेकनाधायनमः धातकीखंडेपश्चिमएरवतेअना०२४ पुष्कराटेंपश्चिमएर अना जिनपंचकल्याणकनाम ॥२७॥ २४जिनपंक०॥३०॥ ४ श्रीमहामृगेंड्सर्वज्ञायनमः ४ श्रीकलापसर्वज्ञायनमः ६ श्रीअसौचितअईतेनमः ६ श्रीविसोमबहतेनमः ६ श्रीथसौचितनाथायनमः ६ श्रीविसोमनाथायनमः ६ श्रीअसौचितसर्वज्ञायनमः ६ श्रीविसोमसर्वज्ञायनमः ७ श्रीधर्मेंद्रनाथायनमः श्रीपारसनाथायनमः इति मौनएकादशी गुगना संपूर्ण ।। ।। अथ विधि ॥ ॥ एकेक कल्याणककी एकेक माला : पनेसे मेढसें माला होती है. जो नव्यजीव शुचित्तसें गुणेंगें सो योमे नवों में अनंतसुखको प्राप्त होंगे॥इति मार्गशोर्प मास मध्ये ५०॥ ॥ अथ पोप मास मध्ये पर्वाधिकार लिख्यते ॥ ॥ पोप महीने में मिती पोप वद १० सो पोपदसमी नामसे पर्व प्रसिद्ध हे. इस दिन श्रीपार्श्वनाथस्वामीका जन्मकल्याणक है, इसीसे यह दिन श्रीसंघमें परम आनंदकारी है, इस दिन श्रीपार्श्व नाथस्वामीका अधिकार सुणे, एकासणादिकका पञ्चरकाण करे, ज. हां श्रीपार्श्वनाथस्वामीका नामसे तीर्थ प्रसिद्ध होय नहां जात्रा करणेको जावै, जो कन्नी यात्रा करणको नहीं जा सके तो जहां N (ए? ) श्रीपार्श्वनाथस्वामीका मंदिर होय नहा महोचव संयुक्त दरसण करणेकों जावै, जलयात्रादि महोच्य फरकै अष्टोत्तरीमात्र करावे अथवा पंचकल्याणकजीकी वा सत्तरत्नेदी पूजा करावै, तोरण बां , गीतगान नाटकादिकसे अनेक तरके नछव करे, और (पास जि सर जगतिलो ए) वा (वाणी ब्रह्मा वादिनी०आदिक) पार्श्व नायस्वामिके गुणगर्मित स्तवन पढे वा सुणे. इस पर्वका सेवन करणेसे आधिव्याधि सोग संताप सर्व दूर होंगे, अनेक तरेसें शद्धि वृद्धि सुख सौनाग्यको प्राप्त होंगे॥ (स्तवन पासजिनेसर जग तिलो) सुणे वा पढे सो नर (वाणी ब्रह्मा०) पहली लिखादे॥इति) ॥ अथ माघ मास पर्वाधिकार लिख्यते ॥ || माघ महीनेमें मिती माघ वदि १३, सो मेरुतेरस नाम से पर्व प्रसिद्ध है. इस दिन श्रोशपनदेवस्वामीका निर्वाणकल्याण- क दे, इस वास्ते जगवंतमहाराज इस दिनको उत्तम कहा है. दिन चोविहार नपवास करै, रत्नमई पांच मेरु नगवानके आगे चढावे, वोचमें १ वमा मेरु, च्यादिस गेटा च्यार मेरु, एसें पांच मेरु चढावै. एसी शक्ति नही होय तो सोनेके, चांदीके, वा घृतके मेरु करके चढावै । आगे च्या दिश तरफ च्यार नंद्यावर्त करे, अष्टप्रकार, सत्तरहनेदी पूजा पढायके अष्ट द्रव्य चढावै. पी श्री रुपनदेवस्वामी (पारंगतायनमः ) इस पदका दो हजार गुणना करै, नर जो कोई तेरसके दिन पोसह करे तो पूजादिक सब वि- धि पारणेके दिन कर, अतिथिसंविनाग करकै पारणा करें. इस तरै १३ वरस अथवा तेरे मदीना तप करै, पीछे शक्ति मुजब नच- वसे ऊजमा करे, तीयोंकी यात्रा करे, साधीवछल करै । इहां दृष्टांत कहते हैं। जेसे अयोध्यानगरीमें अनंतवीर्यराजाका पूत्र पिंगलरायकुमर गांगिलमुनीके पास इस पर्वका अधिकार सुणकै इस , ।
को नहीं जा सके तो जहां (ए) धातकीखंडेपश्चिमएरवतेवर्तमान२४ पुष्कराष्ट्रंपश्चिमएरवतेवर्च जिनपंचकल्याणकनाम॥२६॥ २जिनपंचकन्ना०२९ २१ श्रीसुशान्तसर्वज्ञायनमः २१ श्रीनदिकलझायनमः १ए श्रीहरअईतेनमः रए श्रीधर्मचंबईतनमः १ए श्रीहरनाथायनमः १ए श्रीधर्मचंदनापायनमः १५ श्रीहरसर्वशायनमः रए श्रीधर्मचंऽसर्वज्ञायनमः १० श्रीनंदिकेशनाथायनमः १७ श्रीविवेकनाथायनमः धातकीखंडेपश्चिमएरवतेअना०२४ पुष्कराटेंपश्चिमएर अर जिनपंचकल्याणकनाम ॥२७॥ २जिनपंक० ॥३॥ ४ श्रीमहामगेंइसर्वज्ञायनमः ४ श्रीकलापसर्वज्ञायनमः ६ श्रीप्रसौचितअहतेनमः श्रीविसोमबईतनमः ६ श्रीअसौचितनाथायनमः ६ श्रीचिसोमनायायनमः ६ श्रीअसौचितसर्वज्ञायनमः ६ श्रीविसोमसर्वज्ञायनम ७ श्रीधर्मेंद्रनाथायनमः ७ श्रीपारणनाथायनमः इति मौनएकादशी गुणना संपूर्ण ॥ ॥ अथ विधि ॥ || एकेक कल्याणककी एकेक माला पनेसे मेढसे माला होती हे. जो नव्यजीव शुक्षचित्तसें गुणेंगे। थोमेजवों में अनंतसुखकों प्राप्त होंगे।तिमार्गशोर्प मास मध्ये पर ॥ अथ पोप मास मध्ये पर्वाधिकार लिख्यते ।। ॥ पोप महीनेमें मिती पोप वद १०, सो पोपदसमी नाम पर्व प्रसिद्ध है. इस दिन श्रीपार्थनाथस्वामीका जन्मकल्याणकदै इसीसें यह दिन श्रीसंघमें परम आनंदकारी है, इस दिन श्रीपाः नाथस्वामीका अधिकार सुणे, एकासकादिकका पञ्चरकाण करे, हां श्रीपार्थनाथस्वामीका नाममें तीर्थ प्रसिद्ध होय नहीं जाना जो . ज ( ४ ) . श्रीपार्श्वनायस्वामीका मंदिर होय नहां महोचव संयुक्त दरसण करणेकों जावै, जलयात्रादि महोछव करकै अष्टोचरीमात्र करावे अथवा पंचकल्याणकनीकी वा सत्तरनेदी पूजा करावै, तोरण वां धै, गीतगान नाटकादिकसें अनेक तरके नच्चय करे, और (पास जि णेतर जगतिलो ए) वा (वाणी ब्रह्मा वादिनी आदिक) पार्श्व नाथस्वामिके गुणगर्नित स्तवन पढे वा सुणे. इस पर्वका सेवन करलेसें आधिव्याधि सोग संताप सर्व दूर होंगे, अनेक तरेसें शद्धि वृद्धि सुख सौलाग्यको प्राप्त होंगे॥ (स्तवन पासजिनेसर जग तिलो) सुणे वा पढे सो नर (वाणी ब्रह्मा०) पहली खिरवाहे॥इति] ॥ अथ माघ मास पर्वाधिकार लिख्यते ॥ || माघ महीनेमें मिती माघ वदि १३, सो मेरुतेरस नाम से पर्व प्रसिद्ध है. इस दिन योरुपनदेवस्वामीका निर्वाणकल्पाण- क दे, इस वास्ते नगवंतमहाराज इस दिनको उत्तम कहा है. दिन चोविदार नपवास करे, रत्नमई पांच मेरु लगवानके आगे चढावे, वोचमें १ वमा मेरु, च्यारुंदिस गेटा च्यार मेरु, एसें पांच मेरु चढावे. एसी शक्ति नही होय तो सोनेके, चांदोके, वा घृतके मेरु करके चढावै । आगे ज्या दिश तरफ च्यार नंद्यावन करे, अष्टप्रकारी, सत्तरइन्नेदी पूजा पढायके प्रष्ट द्रव्य चढावे. पी श्री शपजदेवस्वामी (पारंगतायनमः ) इस पदका दो हजार गुणना करै, नर जो कोइ तेरसके दिन पोसह करे तो पूजादिक सव वि. घि पारणेके दिन कर, अतिथिसंविनाग करकै पारणा करे, इस तरै १३ वरस अथवा तेरे मदीना तप करै. पीठ शक्ति मुजब उच्च- वसें जमा करे, तीयोंकी यात्रा करे, साध वचल करै ।। यहां दृष्टांत कहते हैं। जैसे अयोध्यानगरी में अनंतवीर्यराजाका पुत्र पिंगलरायकुमर गांगिलमुनीके पास इस पर्वका अधिकार सुणकै । -- - (ए) तपस्या करी. तपस्याके करणेसे पांगलापका रोग मिटा, तबत. पस्या पूर्ण नयां पी तेरे मंदिर बनवाया, १३ रनमई, १३ स एमई, १३ रूपेमई प्रतिमा स्थापन करी.१३ वेर संघसमेत नी. घाँकी यात्रा करी. तेरे वेर साधर्मी वात्सल्य किया, वहोत तरेते झान नक्ति करी, अंतमें महसेनकुमरकों राज्य देके श्रीसुव्रताचार्य- जीके पास दीक्षा ग्रहण करी, अनुक्रमें चवदे पूर्वको पढके सर्व क. ोका क्षय करके अनंतसुखकों प्राप्त नया. जो नव्यजीव इस पर्वको विधी संयुक्त सेवन करेगा सो इस नव नर पर नवमें अनेक सुखकों प्राप्त होगा. इति माघ मास पर्वाधिकारः ।। ॥ अथ काल्गुणमास मध्ये पर्वाधिकारः लिख्यते ।। ॥ फाल्गुनमानेमें मिती फाल्गुन सुद १४, सोतीसरे चो. मासेकी चौदश नामसे पर्व प्रसिद्ध है । इस दिनको सर्व कर्त्तव्य पापाढचोमासे तुल्य करै, सो पहली लिखा हे ॥ श्रव श्दा विशेष होलीका अधिकार लिखते हैं। श्रमणनगवंत श्रीमहावीरस्वामी वारे महीनों में ६ मे पर्व कहा हे. ३ तीन चोमासे, २ नली, १ पर्युषण. जिसमें नली २ का नर पऍपण का एवं ३ अगाईका महोचव तो प्रायें सर्वत्र होता है. जिसमेंनी जैसा बीकानेर में खरतर गचवालोका पोधा अर्थात् पुस्तकका नन- च हाथीके होदे वझे याबरतें होता हे वा वरघोका पुस्तकका मुंब- इमें भी होता है. लेकिन इस्त्यारूढ नही. नर कार्तिक महोछव अ. न्यत्र त्नी वहोत जगे होतादे लेकिन कलकत्तेजेसा महोचवस्वमतमेत या पर मतमें कदाइ नीनारतवर्ष में हमने देखा नही, दक्षणमें मल्ले- चार तक हम गयें, पूरबमें दिल्ली लखनेन थागरा कासी पटणा तक में नही देखा. नगणीसें वायनके वर्षमें हमने यह नचय कलकनेमें देखा था, नर फागुणमहोय मकसूदाबादका बहोत अचा होता - . (५३) हे, नगणीस से सुमतालीसमें देखा था. उसरी जगे नही कहांनी देखा, लेकिन किसीनो धर्ममहोचवमें आज्ञा विरुइ जो काम होय सो अछा नही. एक तो नगवंतके समवसरण संग आजकलके जाग्यवानलोक धपके फरसे रेतीक मरसें आप तो जाते नहीं फफ. त बेसमऊ अदम्योंको नेजदेतेहें, वो लोक कूदत्ते नाचते जागते समवसरणको उच्चालादेत्ते लेजातेहें नसमें कितनी आसतना होती हे, कितना कर्म बंधतादे, नसकू सम्यक्तोजीच विचारके आप विवे- क विनय संयुक्त शुक्लावसे धर्मकाममें नद्योग करतेहैं उनका दोर्नु जब सफल है. वोही महोचव लायकतारीफके हे इस वास्ते आ- स्मार्थी धर्मज्ञ पुरुप हे सो शेसका चोमासाप नागके सर्व जगें नगवंतके धर्मका उद्योत करतेजये शुलध्यानरूप अनिसें अष्ट कर्म- रूपी काटको जलाके होली करते हैं, पीठे सुबोधजल से स्नान क- रके अत्यंत सुंदरताकू प्राप्त होते हैं. अब यह होलीपर्व दो प्रकारसे हैं. इत्ये नर नावै. सो प्रयम इव्य दोलीका अधिकार लिखते हैं। ॥ इस फाल्गुनमहीने में चौदश पूर्णमाशी के दिन केश्यक अज्ञा- नीजीव विवेक विकल नयेयके नीचजातिक परंपराको प्राप्त नये थके सका गणे जलायके द्रव्यमई होलिका करते हैं, नत्तम चोमा- सा धर्मपर्वका विराधना करते हैं. दूसरे दिन मलमूत्र रेतीस क्रीमा फरते हैं, खोटे वचन बोलते हैं, गधे पर चढते हे, अनेक जीवोंकों ऊख देते हैं, एसे जीव वीतरागकी प्राझा गेमके नाम नरोकी कुलमर्याद करते हैं, मिष्टान त्याग विष्टा खाते हैं, दूध गेम पेसाय पीते हैं. एसे पुरुष निकेवल कर्मका सघन बंधन करकै उर्गतिकों नपार्जन करते हें, अनर्थदंमसें अनंत नव संसारको स्थिती वांवते हैं. इसवास्ते प्रात्मा नव्यजीवोकों नावहोली करणा चाहिये, सो इस मुजव-मनुके गुणग्राम बसंतके स्तवन बोले, रात्री जागर- (ए) ण करावै, मंदिरों में पूजा करावे, महोछव निकाले, नानाप्रकारका नाटिक करै, सादमीवच्छल करै, साधमनाई आपसमें नाना- तरेकी क्रीमा करै ।। श्रागे राजालोक जी वसंतऋतु प्राणेसे मदन महोचव करणेंकों जाते थे, नानातरेके जल चंदन केसर अबीर गु- लालसे सहरके लोक बगीचोमें क्रोमा करते थे, इत्यादि लेख तो शास्त्रोमें वहोत जगे वाचणेमें आया दे, लेकिन मलमूत्र राख धुमसे खेलणा, होली जलाणा, पादत्राण खाणा, नंग चेष्टा करणी, कुल मर्याद गेमणा, वमेरोको लज्या गेमणी, एसा कृत्य उत्तम पुरु: पोंके करणे लायक नही. यह क्रीमा वाममार्गीयोकी चलाई है. इसको प्रवृत्त नये प्राये दो हजार वर्ष करीव नया. पोकै स्वामी शंकराचार्यकू यह वात सम्मत नई तबसें धीरे अज्ञानी जीव ए- ककी देखादेख बहोत लोक करणे लगगये, लेकिन एसी कर्त्तव्यता किसी नी शास्त्रमें नहीं देखणेमें आई. देखो केसी आश्चर्यकी बात हे, जब मंदिरजी में पूजादिक महोछवका काम होता हे उस वख- त तो जाणे को फुरसत नही मिलती है, नर होलीके दिनोंमें मा. तापिता नाई वहिन सबोंकी लज्या गेमके बहोत दिलमें खुसब- खती मानतानया पागलके माफक नामोंकी तरे वकते फिरता है. कोई वैस्यानका नाच होता होय नहां तो हजारूं रुपे खरच कर देतेदे. मनमें फूलते हें हमने कमा नाम किया. तत्व नजरसे देखे नर विचारे तो नाम क्या निकला, बलके अशुनगतीके पाये पूरे- मजबूत वंध करणेमें आये. एसी लङयागेमके जिनमंदिरका महो. छ करो, रात्रीजागरण, नाटकादिक धर्मका न्योत करो, एसी होली खेलो सो तुमारा दोनोंदी जन्म सुधरे. यह द्रव्ये जर जाये होलीका स्वरूप वांचके प्रात्मार्थी धर्मा पुरुष तो प्रसन्न दोपगें, -उर जो महामर्ष अज्ञानीजीव होंगे तो तो रोप धारण करेंगे जर .
. (ए ) सच्ची वात· कुयुक्तियोंसें कूगरी उहरावेगें, जर मध्यस्थ विचारवंत तो एंसा कहेंगे यह वात सच हे. कितका पर्व किसका खेल, निकेवल इसमें अनर्थ दम लगता है, लेकिन हम इकेला क्या करें, नावं घोंकों एसा करते देख हमनी करते हैं, हमसें रहा जाता नही. परंतु यह प्रया बंध हो जाय तो अछी है. इस वास्ते हे नव्यजी. वो इसमें समुदायो कर्म बंधता हे. गे सो धन्य हे. नरकके जाते का संग नदी करणा, जेसे सरकारकी एनके जाणकार चोरो करणेवालेका तथा खूनी केदीकी संगत नर वात तक नही करते नस मुजब एकका अनर्थ खेल देख उसरेको बचना चाहिये, काम वो करणा जिस्में दोनों नवमें लान होय. इस इव्यहोली के खेल में वमोर समाश्यां होजाती है. मेमता सहर हालीके ख्या- ससे पुष्फरणे नर नोजकोंकी समाश्में तमाम नजाम होगया. नर परनवमें श्रेरगैर बोलणेके फल सब धर्मों में चुरा लिखा हे. इस बावत जो जो कोर लवज लिखा हे नसळू यांच विवेकी मेरे पर गुस्सा नही लावेगें. जो कुछ लिखा हे सो पूर्वीचार्योंके वचना- नुसार लिखा है. हितोपदेस समझके टोमणेका प्रयत्न करेंगें. मेरे तो नवकारमंत्रके श्रमसन अकर शुद्ध गुणनेवाले धर्मबंधु है. जि- समें नी सर्व जीवायोनिसे मित्रता है. कम या ज्यादा जो कुछ अपशब्द लिखा होय तो मिचामिक ॥१॥ इति फा०॥५०॥ ॥ अथ भावहोरो खेलनेके स्तवन लिख्यते ।। ॥ राग धमाल ॥ होरी खेलीये नर बहुरन एसो दाव ॥ दो० ॥ दयामिगई अति नली रे, तप मेवा पकवान ॥ सील श्र- 'धागो अति नलो, वारी संजम नागरपान || दो० ॥ लेत्या मा. दल नाव म्फरे,क्रोध मान दोय ताल॥पांच सुमतिको अरगजो, वारी नवतत्व सेहुँ गुलाल || हो. शा सुमताकेसर घोलिये रे, दमवाको (५६) विमकार | ग्यान पिचरको पकरके, वारी मुगतिवधू चित लाव ॥ हो० ३ || एसा साज वणायकै रे, रुपनदेव गुण गाय ॥ श्रीजि. नचं श्म खेलतां, वारीजवर पातिफ जाय||हो० भाइति पदं ।। ॥ राग वसंत होरी तालयत् ।। जय बोलो रे पास जिने सरकी, जण ॥ मस्तक मुगट सोहे मनमोहन, अंगिया सोहे केस- रकी ॥ ज०१ ॥ विन्नुवन ज्योति अखंमित तनकी, स्यामवटा जैसी जलधरकी ॥ ज०२ ॥ वालपणे प्रन्नु अदनुत ज्ञानी, करुणा कीधी विषधरकी ॥ ज० ३ ॥ कमठ नमाय वाय ज्युं वादल, जीत करी अपणे घरकी ॥ ज०१ ॥ मातवामा उदरे जिन जाया, राणी अश्वसेन नरेसरकी ॥ ज० ५ ।। अष्ट करमदल सबल खपा- ये, श्रेणि चढ्या जे शिवपुरकी ॥ ज० ६ ॥ कहै जिनचंद्र मेरे प्रन्नु पारस, जैसी छाया सुरतरुको ॥ज ७॥ इतिपदं ॥ ॥ पुन: वसंतहोरी । मधुवनमें जाय मची होरी, म०॥ ग्यान गुलाल अबीर नझावो, सुमताकेसर रंग घोरी || म०१ ॥ अमृत रूप धरम जिनवरको, शुध क्षमा कहै करजोरी॥०॥ इति पद। .!! पुनः वसंतहोरी॥ यादव मन मेरो हर लियो रे, या०॥ संजमदूती कान लगी जब, शिवनारी पर चित्त दियो रे ॥ या०२॥ मोह योग गिरनार लिधाए, नव नव नेद अलग कियो रे ॥ या० ३॥ तुम हो तीन नुवनके साहिब, सुरनर कहै तुमे चिरंजीयो रे। या० ॥ ४॥ वारश् मेर। वंदना दोयज्यो, चंद कहे मन हरखियो रे ॥ या० ५ ॥ इति पदं ॥ श्क सुण लै नाथ अरज मेरी, ०॥ .इद संसार गदर तरु.सिंधु, नमर पमत जिहां नव फेरी ॥३०॥ काधादिक बहु मगरमच.दे, ग्रहत जंतु न करत देरी ।। ३०२॥ एसें जल घिसें पार करो तो, तारण.तरण विरुद तेरी ।। ३० ३ ॥ - ॥ पुनः वसंतहोरी ॥
(ए) घरमजिनेसर जगपरमेसर, दूर करो उखको धेरै कमागुण दायक लायक, अनुपम कोरत जगो ॥पुनःहोरी। सांवरो सुखदाई, जाकी विव सा० ॥ श्री। अश्वसेन वामा नंदकी, कीरत विन्नुवन गई। तसिखरगिरि मंझरा प्रनुको, देख दरस हरवाई-हृदय मेरो हुलसाइ || सां०१॥आज हमारे सुरतरु प्रगट्यो, आज आनं ई ॥ तोन नुवनको नायफ निरख्यो, प्रगटी पूर्व पुन्याई- मेरो जनम कहाई ॥ सां० २ ।। प्रचुके दरस सरस विन पारं वर लटक्यो में नाई। अब प्रनु चरण सरण चित चाहत, कदै गुण गाई ॥ प्र० सा ३ ॥ इति पदं ॥ ॥ पुनः वसंतहोरी । नेना हरखाई, आज तेरी सूरत खी ॥ ने० ॥ लवर संचित पाप करम सब, देखत दूर पुला मति वधारण कुमति विमारण, ज्ञान विमल नलसा ॥ श्रा ॥ वामानंदन प्रति उवि सुंदर, महिमा वरणी न जाई || ई याल दयाकर डीजै, आनंद दरख सवार ॥ आ० २ ॥ इति प ।। राग काफीमें होरी॥ एसे फागुण मस्त मही सोरी, देखो स्याम सखी मोपै गेरी ॥ एतें० ॥ व्रजकी सखी वन निकस, खेलत मिलश होरी ॥ मारे गुलाल अवीरमुधोनर, ने प्रीतम रंगरोरी ॥ च० ए० १ ॥ फूलत फूल सन्नी वनः मधुर२ रस जोरी ॥ कलि कोयल कल करत मरत विन, प्रियत गौर। || च०ए०२॥ रस अनरस रात रसे रस, सरस द अन्नु मोरी ॥प्रतजी सुमता ममता मन, बाल कहै कर जोर च० ऐ० ३ ॥ इति पदं ॥ ॥ राग काफी होरी ॥ नेम स्यामसें कहियो मोरी, ने नमुविज शिवादेवीको नंदन, यादवकुल नदयो री | तेजज.
.
(ए.)
विमावलो रूमो, कित गयो मो चित चोरी-अरज नहीं लीनी मोरी
होने १ ॥ व्याहन पाए मेरे मन जाए, लाये वल दल जोरी ॥
तोरणसें रण फेर चले दो, चढ गए गिरकी नरी-मदन महा रिषु
तोरी ॥ ने० २ ॥ व्याकुल नईई दरस दिन देखे, रहि हे मुख
कुं मोरी ।। कमलनयन राजमतीसखियनत, विनती करे करजा-
लगी है मुक्तिकी मोरी ॥ ने०२॥ इति पदं ॥
॥ पुनःहोरी ॥ होरी खेलो रे नायिका मन थिर करकै, हो.
॥ सुमति सुरंग गुलाल मंगावो, अवीर उमावो कोली नरश
हो० १॥ ग्यान ध्यान मफ ताल वजावो, गुण गावो फ्रनु हित
॥ हो० २ ॥ अनुन्नव अतर फुलेल मंगायो, वास दिसोदित म
हकै ॥ दो० ३ ॥ क्रोध मान रजधूम नमावो, ज्यू तेरा पापर
ल थरकै ॥ हो०१॥ इति पदं ॥
॥ राग वसंत ॥ दोरीले खेलईया, तूं तो मनू जज वि
बन कर रे ॥ हो० १ ॥ विनय संन्ना नर पिचकारी, हारे
तो शिवरामा वर वर रे ॥ हो ॥ आगम लाल गुलाल ।
कोरी, हारे तूं तो खेल वसंत घर रे ॥ हो २ ॥ सील सुर
आनूपण अंगै, हारे तूं तो नावना वामा पहिर रे॥ हो० ॥ न
रंजन अनुना गुण गावो, हारे तूं तो प्रातम अनुन्नव वर रे
दो० ॥ ॥ ग्यान विज्ञान फूली फुलवारी, हारे तूं तो गूंजत म
मधुकर रे ॥ हो०६ ॥ वामानंदन पास जिनेसर, होरे तूं तोड़
गनायक जगगुरु रे ।। हो० ॥ श्रोजिनलान कहै प्रन्नु
हारे तूं तो अनुपम नव निसतर रे ।। दो० ॥ इति पदं ॥
पुनः होरी ॥ वाके ममतानें धूम मचाई,अाज सुमतासंग
खेलेंगे दोरी ॥ वा जिन शासन व्रतरंगमहिलमें दीपकयोध बनाई
वा०॥ सरपासखी क्षमा मृना मिल,शजतामुक्तिसुदाई ॥
संग
॥
(ए)
नर अनेक मुमति सखी ब्रजमें, अनुन्नव रंग रंगाई ॥प्रा० वा०शा
नाव सौच तप दान शोलसव, निज गुरा बंधु सहाई ॥ जिन गुण
गान संगीत निरत धुनि, नक्ति जिणंद वढाई ।। आ वा० ३ ॥
खेलत संजम फाग मिलै तब, बास पाणंद बधाई । अब कुमता
संग रंग करे तो, मेरे चित न सुदाई ॥ प्रा० वा० ४ ॥ इति पदं ।।
।पुनः॥ समकित विन जीव जगत नटक्यो, स०॥चनरा
सी नव नमतां२, नरनव पायो सो दिल खटक्यो । स०१॥ गर
नावास नव मासे नीको, प्रोककी संगत तूं लटक्यो । स० २ ॥
पुन्य संजोग मिख्यौ कुल श्रावक, ग्यान प्रकाश नयो घटको
स० ३॥ विषय विकार रम्यो तरुणी संग, मायासें तेरो मन अट
क्यो । स०४ ॥ सुरत संजाल तूं जाग रे मानवी, सूधो शिवपु
रकुं सटको || स०५॥ रूपचंद कदै प्रनु गुण गाची, स्वर्गपुरीमें
नहि अटको ॥ स०६ ॥ इति पदं ।
||पुनः॥ विसरे मत नाम प्रलूजीको, वि० ॥ प्रनुजीको ना
म चिंतामणि सरिखो, निरमल नीर सदा निको । वि० १॥ ना-
न कुमर मरुदेवीको नंदन, तीन नुवन सिर दे टीको ॥ वि०२
॥ चतुर कुशल चित घोलसु राख्यो, कुण सदै रंग पतंग फीको
वि० ३॥ इति पदं ।।
॥पुनः|| नेम निरंजन ध्यावो रे, वनमें तप कीनो । ने०॥
बहुत दासु व्याह रचायो, जीव देख दया श्राणी रे ॥व० ने०१॥
सब यादव मिल व्याद रचायो, पहिर जराव जरीनो रे ॥व० ने.
२ ॥ कंकण मुगट हायसुं तोमे, पसुवन पर चित दीनो रे ॥ ३०
ने 10 ३ ॥ जनधरनूपण कहे लविजननें,
जस लीनो रे
च० ने०॥४॥इति पदं॥
॥ पुनः फाग | गढ गिरनारकी तलहटी, फाग खेले खेले ने-
सहु जगमें
..
(५००),
मकुमार ॥ ग० ॥ इक दिशि सायर जल जरयौ, दिशि दूनी गिर
वर गिरनार || विच सहसावन सोनतो, तिण माहे खेले नेमकु
मार ॥ ग० १|| फूख्या केवमा केतकी, विच फूटया मरुया मचकुंद
॥ वासै मोगरा मालती, तिण मांद खैले नेमजिद ॥ ग०२॥
नांबा मोरया वागमें, तिण ऊपर कोयल करे हुकार || बाजे
पवन दक्षिणतणी, स्यामन्नमरा कर रह्या रे गुंजार || ग० ३॥ आं
व पके नींबू पके, नारंगी पके तूत अनार ॥ काचै नेमकुमर अनं
नहीं, नारी ऊपर जसु प्यार ॥ ग० ॥ हरि हलधर गोपि मिल
विच घेरयो श्रीनेमकुमार ॥ सोवन सीसी जलनरी, मुख ऊपर
टे.यजुनार ॥ ग० || नेम हठी हठ ना तजै, समझायो जोरें य
पुनाथ ॥ रिइहरप वाचक कहै, वात सोनलो शिवादेवी माताग!
धन राजुल तेरो नाग री, नेमनाय वर
पायो री सजनी ॥ ३० ॥ पहिली में पूजू पत्नजिणंदा, जिण
मोहि दियो सुहाग री ॥ ने० १॥ सोनेको पत्र धरयो सिर कार,
गल मोतियनकी माल री ॥ ने० २ ॥ चंपा चंपेली दो मरुत्रा,
फूल चढानं गुलाब री ॥ ने० ३ ॥ धूप दीप नैवद्य भारती, मुख
बोलो जयकार री ॥ ने० ४ ॥'ग्यानमंदिरकी एहि बीनती, जवर
दीज्यो दीदार री॥ ने०५॥ इति पदं ।
'.. .॥ राग वसंत ॥ ऐसी होरी तो हो रही चंपानगरमें,
गएके दिन आये ॥ ऐ० ॥ वासुपूजजीके नवल मंझपमें, दोय रही
हो सुखदाए ॥ ऐ० १ ॥ केसर घोरी नरिय कचोरी, अनुजीके अं.
गियां रचाए ॥ ऐ० २॥ चोथा चंदन अवर अरगजा, लाल गुलाल
नमाए ॥ ऐ० ३ ॥ विविध मांतिकी पूजा रचाए, रत्नसुंदर चित्त
साए ॥ ऐ०४॥ इति पदं ॥
|| रागवसंत ॥ बलिहारी हुँ विमलाचल गिरकी, ब० ॥
॥ पुनः होरी॥
..
. . (५१) निनिम चरित नर शिखर नि पुरकी, नवसागर तारण तरकी ॥ व० १॥ तीन नुवन तीरथ तारागण, सोना लहिय निशाकरकी ॥ ब० ॥ सुंदर अनुपम अतिसय करिक, महिमा जीती सुरगिरकी ॥३०२ ॥ परमातम पद प्रतिषित्र तनको, बंठित पूरण सुरतरु- की॥०॥ वर सोरठ मंगल मंझनकी, सकल करम रज जल- घरकी ॥ब० ॥ बलि बलिहारी वारंवारी, श्रीमान्नेय जिनेसर- की ॥ ३० ३ ॥ ए गिरि नदयाचल परि जिनकी, उनि दीप जेम दिनेसरकी ।। ब० ॥ असरण सरण प्रश्रम जिनवरकी, अगणित क. रुणासागरकी ब० ॥ युगलाधरम निवारण की सहु, तीन नु- वन जनहितकरकी । ब० ॥ सोवन वरण सरीर विराजित, पन्न लंग्न सोनाधरकी ॥ ३० ५ ॥ सुंदर प्रनुकी मोहनमूरति, देखत परमानंद नरकी ॥ २० ॥ केवलकमला प्रन्नुको निरंतर, पदतल नमत सुरासुरकी ॥ ३० ॥ चरण सरण होयजो शिवचंदकै, नवश् एहिज जिनवरकी ॥ब० ॥ ७ ॥ इति पदं । 11 रागवसंत ॥ ऐसे प्रनु नेमनान, मेरे दिल वसिया॥ ऐ०॥ त्रिगढमें विराजमान, अनि सुणत कान || अपर मिल करत गान, तान मान रसिया ॥ ऐ०१॥ सिंघासण विराजै साम, जीत लिए रूप काम ॥ देख्या दिल हर्प धाम, स्वाम नाम लसिया ।। ऐ० २ ॥ तीन वत्र चमर सार, पंच वर्ष पुप्फ धार । गहिर अ. सोक सार, नामंगल हसिया ॥ ऐ० ३॥ दिव्यधुनी मिली चंग, दश वरखाणे अंग। अष्ट प्रतीहार संग, कुसल चित्त वसिया॥ऐ०४॥ ॥ रागवसंत ॥ संन्नवजिन सुखकारी, हो लाला, सं०॥ हारे होरे लाला ॥ सं०॥ एक अरज अवधारो हमारी दो लाला ॥सं० ॥ त्राता तीन नुवनके जगगुरु, दाता विरुद विचारो॥ साता दीजै साहिब मोकू, तक अायो सरण तिहारी हो लाला ॥ सं०१॥
(५०३)
सेनामात मयर अवतारी, जययंत तात जितारी प्रनु पदकज
संग्न अधिकारी, अश्वरतन अनुदारी दो लाला ॥ सं० २॥ साठ
पूरव लख थायु अवगाहन, अनुप च्यारसे धारी ॥ सोवन वरण
सेवे ऽरितारी, सायची नगरी सारी दो लाला ॥ सं० ३१ समेत
सिखर पर मुगत सिधाए, सहस साधु परिवारी ॥ इंद्रादिक मिल
मंगल गावत, नाचत नाग कुमासी दो साला ॥ सं०१॥ त्रिकररा
सुद्धसे विन्नुवन पतिकुं, वंदना होज्यो हमारी ॥ चरणकमल सेवा
चित चाहत; सुगुण सदा हितकारी होलाला॥सं०५॥ इति पर्दा
॥ रागवसंत होरी॥ सारो सोरठ देस दिखावो रसिया,
सा०॥ सोरठ देसमें नीकै दोय तीरय, गढगिरनार सैबुजगिरिया॥
सा० १ ॥ रेवतगिर पर जपति केरा, दिख्मा ग्यानकेवल रप्ति
या ॥ सा० २|| राजुलनारी नेमोसर दाये, संजम लेइ नवोदधि
तरिया ॥ सा० ३ ।। सैजमिर पर श्रीरिसदेसर, पूरब मिनाएं
समोसरिया ॥ सा० ॥ इहां अरागार धनंत अपारा, अगसण कर
सिवपुर वरिया ॥ सा० ५ ॥ नाननंदनकू करूं जुहारा,
सा०६॥ दीण अमारने होत लगारा, ज्ञानविमल प्रन्नु सिर घरिया
॥ सा०॥ ७ ॥ इति पदं ॥
॥ राग वसंत ॥ जिनराज जुहारो, क्या वैठे जब दारो रे||
जि० ॥ रथ पानधारे चंदाप्रनुजी, नयणे आय निहारो ॥ शुचित
न कर दियरा हरख नरे, प्रनु पूजो प्राण पियारो ॥ जि० क्या
१॥ पूरण पुन्य नदयश्री पायो, नरनव सफल जमारो ॥ नदि
'जन मन नमरा रंग नरे, प्रनु चरणकमल चित धारो ॥जि०२॥
नवउखनंजन नाय निरंजन, नाम लीये निसतारो॥ ममता तज सम
तासंग नेली, निज श्रातम काज सुधारो॥ जिण ३॥ श्राज नगरमें
: वधाई, घर मंगलाचारो॥ रय मदोचव रचना रची इद,मुख
।
.
.
(५०३)
जयर सबद नचारो ॥ जि० १ ॥ पतित नधारण विरुद विचारी;
सेवक सुगुण संन्नारो || प्रन्नु पंकजकी दिव सरणा ग्रही, नवता
यर पार उतारो । जि० क्या० ५ ॥ इति पदं ।।
॥पुनः होरी मनमोहन गज गतकी गामनी, आज चली
गिरनार कामनी ॥ मन० ॥ सुंदर रूप वणाय सखी सब, शिखर
सैल जेसे चमके दामनी ॥ श्रा० १ ॥ नेमप्रन्नुको व्याह मनायो;
मोसें प्रीत लगाइ सामनी ॥ श्रा० ॥ तोरल आय चले मोहि गोमी,
कोन
चूक
मोपै काटी जाममी ॥ श्राध ॥ ३ ॥ में न तनूंगी
नव नव केरी, प्रात वणी जेसी 8 यामिमी ।। श्रा० (रा-
जुल पहली प्रीतमसेती, बाल कहै नई मुमति गामिनी । श्रा०
म० ॥ ॥ इति पदं ।
॥ पुनः होरी ॥ रंग लग्यो गुरु झाम, दोरी चेतन खेले ।
रं० ॥ शील सुरंगी चीर मंगाये, पदिरे पाप सुजान ॥ दो० २० १॥
पर मंदिर तज अविचल सीने, धर्म दया पर ध्यान ॥ हो० २०२॥
दिल मिल श्राप परम रस पाखे, सुमत सखी पहिचान ॥ दो०
रं० ३ ।। ज्ञान गुलाल लाल रंग लागे, सौदे अदभुत वान ॥ हो०
९०४ ॥ सुमति अमीर नमाय जगतम, वैवै शिवपुर थान ॥ हो०
रं० ५ ॥ अनुन्नव राग मगन गुण गावै, तप जप सुंदर थान ॥
हो० रं० ६ ॥ एसा खेल नविकजन वार, वंन्ति पावैदान || हो.
२०७॥इति पदं ॥
॥ पुनः होरी चिदानंद खेले फाग, हो हो होरी पाई।
मनमृदंग बजे तन मांदी, गावत श्रागम राग ॥ दो० १ ॥ ज्ञान
गुलाल सदा रंग लागै, खेलत सुमत सुहाग ॥ हो० ॥ समकित
केसर चीर रंगान, पहिरो मनवैरागा दो० शा लाख चोरासी रा-
मत गंमी, च्याउं गतिसें नाग !! हो० ॥ अविचल सुख पंचमगति
, (५०) पावै, योग जतन कर जाग ॥ हो० ३ ॥ एता खेल विकजन धारे, पावै नवजल थाग ॥ दो० ॥ चेतनता सुरु होय जगतमें, समकितके रंग लाग || हो. ४ ॥ इति पदम् ।। पुनः होर। ॥ होरी खेलो नेमसें धाय२, रजनकी साज मेरी करे रे वलाय ॥ हो || ज्ञानगुलाल अबीर नमावो, कमा करो रंग लाय २॥ ७० हो०१॥ शोल संजम व्रत पान मिगाई, ध्यान धरूंगी में गाय गाय२ ॥ 5० हो०॥ अष्ट कर्मकी खेह नमावो, ज्ञान हियामें लाय २ ॥ ० हो०३ ॥ जगतचंदकी अ. रज वीनती, सरण गही में तेरी नाय२ ॥ ७० हो० ॥ इति पदं ।। [पुन: होर। मेरी घटकी गागरिया रंगसे नरी, शिवपुरी वात पूकवकी खरी ॥ मे० ॥ परमजोत प्रनु सिद्ध शिला पर, परमातम निज ध्यान धरी ॥ मे० १॥ मोहन रंग जरयो रंग शी. चपुर, अजर अमर पद सुख करी || मे० २ ॥ इति पदं॥ ॥ पुनः होरी ॥ वावो झपन वे श्रलयेसर,मारो गुलाम मुगी नरके । बावो० ॥ मुगे जरकै पसली नरके, बायो॥ चू. पार चंदन नर अगरजा, केसरका मटका नरके यायो० ॥ रतनजमित शिर पत्र धिराज, भंगी जमाव जमी जरके ॥ यात्रो० ३ ॥ बांदै वाजूबंध बदिरखा विराजे, फूलनके गजरे सरके !! या ३॥ नाजिराया मरुदेवीको नंदन, रमिये नवि यादीसरसे || या या यादिखान हे दास तुमारो,तार लीयो अपणे करके बारे ॥ पुनः होरी राग टप्पो ॥ गिरिराजकुं दमारी यंदना रे, जिनराजकुं हमारी वंदना रे ॥ नयाउस वारण शियमुख कारस, देवत नवनही फंदना रे ॥ निनान्निराय महदेवीको ना. न, प्रणमुंझपन जिनंदना रे ।। गि०२॥ निशि यासर प्रनु ध्यान हमारो, जिम घातक दिल चंदना रे ॥ जि० ३ ॥ चतुर कुशल करे . . .
, (५०५) शरण तुमारो, सिगिरि कर्म निकंदना रे ॥ गि० ॥ इति पदं ॥ ॥पुनः होरी॥ दरशन कीयो आज शिखरगिरिको, द० ॥ देख्यो मधुवन शीतानालो, नीर वहे , अति नीको ॥ द०१॥ बी- स कोसथी। दरसन दीगे, नागो नरम सकल जियको li द० २ ॥ चीसे ढूंके यीस गोमटमी, तामे चरण जिनेसरको ॥ द० ३ ॥ अब जिनवरके शरणे आयो, रसतो पावो मुगतिपदको ॥ द० ४ ॥३० || पुनःहोरी ॥ सिगिरिजीको दरसण करलै, संघयात्रा-सं- घयात्रा करणसे पाप कटत हे, सिइ । कोटि धनंता श्ण गिरि सीधा, ताकू शोस नमाय ले ॥ संघ० १ ॥ झपन्न जिनेश्वरजीको दरशन, शुद्ध प्रातम पावन करलै || संघ० २ ॥ रूपचंद कदै नाम निरंजन, नवरका उख हरलै ॥ संघ० ॥ इति पदं ॥ ॥ पुनः दोरी ॥ मोहे अपने रंगमें रंगदे, मेरे सादिव आदि जिनंद चंद ॥ मोदे० ॥ रंग तूंही रंग रे ज तूंही है, संजम रंग मोहि रंगदै n मेरे सा० मो० १ ॥ रंग मिथ्यात लग्यो हे अना. दिको, सो अब इनकू खिनः ।। मेरे सा० मो० ॥ रत्नत्रयी झ- हि तेरी में देखी, सो अब मुझकुं सझदे ॥ मेरे सा० मो० ३ ॥ झान दर्शन चारित्र रंग दे, वा विच केवल धरदे ।। मेरे० मो०॥ नूवरदास करे समफित दे, आप समान मोहि करदे ।मेरे० मो०५॥ ॥ पुनःहोरी ॥ मेरे पारसप्रनुजीके रंगमंझपमें,खेलत संत वसंत ॥ ज्ञान गुलाल विवेक अरगजा, विनय अवीर विलसंत ।। । मे० १ ॥ प्रजुगुण प्रेम पिचरकी बूटत, समता सखिय मिलंत - अागम लहर फूली फुलवामी, मुनिवर भ्रमर गुंजत ॥ मे २ मंग श्रानूपण पंचेंश्यि यस, गुरुसेवास लहंत, चार नावना. ग- ईर कसूत्रा, पीवत मन दरखंत ॥ मे० ३ ॥ अदभूत पंच माहा त वागा, पहिरे तन सोहंत ॥ कदै जिनचं प्रनुको रूपासे, जी. ६४ (५०६) रखे नवल वसंत ॥ मेरे० ४ ॥ इति पदं ॥ ॥ पुनाहोरी ॥ रंग मञ्यो जिनक्षार चालो खेलिये दोरी ९० ॥ पास प्रन्नु दरवार रे ॥ चा० ॥ फागणके दिन च्यार रे, चा कनक कचोरी केसर घोरी, पूजो विविध प्रकार रे ॥ चा० ।। रुप्मागरकी धूप घटत , परिमल महके अपार रे । चा० २१ लाल गुलाल अवीर उमावत, पासजीकै दरवार रे ॥ चा० ३॥ नर पिचकारी गुलावको विरको, वामादेवी कुमार रे ॥ चा० ४ ॥ ताल मृदंग वीण कफ बाजै, नेरी लुंगल रणकार रे !! चा० ५ ॥ सब सखियन मिल नाटक करके, गावत मंगल सार रे । चा०६ ॥ रत्नसागर प्रनु नावना नावै, मुख वोले जयकार रे।।चा० । ॥ पुनःहोरी ॥ नेमजीसें कहियो मोरी, सामरेसें कहिये 'मोरी । तोरण आए किण भरमाए, गेम चलै अन्निमानी ॥ है रे लाला गे० ।। पशुवनके शिर दोष चढायो, तोमी प्रीत पुरानी दया दिल में नहि श्राणी ॥ सा० १॥ चूक पीसो मुंहसे कहियो, ना करिये सौधाणी ॥ पाठ नवोकी प्रीत बंधाणी, नवमे चले क्यु ज्यानी-श्याम तेरी सूरत पिगणी ॥ सा० २ ॥ या जोरी जुगमें मेह लागी, राजुल गुलकी वामी ॥ वीनती सुणकै अमर पद बीजे, रंग विजय सुख दानी-आवा नर गमन ग्दिानी ॥ सा० ३॥३०॥ ॥ पुनःदोरी॥ महाराजा तोरे मंदिरमें वरसै रंग, जिन ॥ श्रीचिंतामणि पासजी, तोरे० ॥ ज्ञान गुवाल अबीर अरगजा, सुमता चीर सुचंग ॥ श्रीचिं० तोरे० १ ॥ अनुभव लहर फुली पु सवामी, दिनर वढते रंग ॥ श्रीचिं० तोरे०२ ॥ उपशम वागा घंग यनोपम, शुक्ल ध्यानके संग ।। श्रीचिं० तो० ३ ॥ चिंतामलि चित घर, तुमसुं अविदम रंग ॥ श्रीचि तो. १३०० ॥ पुनः होरी ॥ तोरो अंगिया वणी दे सुरंग, श्रीचिंतामति अमरचंड ( ५०७) पास प्रनूजी, तोरी० ॥ मुविवेकी श्रावक मिल पाये, प्राणी लाव अन्नंग ॥ श्रीचिं० तोरी० १॥ ग्रहबंधीकी नांत जली हे, चुटिया नवर रंग ॥ श्री० ॥ जरस जामो खूब बन्यो हे, कोर केवमा संग || श्रीपिं० २॥ मस्तक मुगट काने दोय कुंमल, बाजूबंध सुचंग ॥ श्रीवि०॥ फूलनकी गल माल सोलत है, सौरंग वास सुगंध ॥श्रीचिं० ॥ विन्नुवन साहव तखत विराजै,मदिरवानमनरंग ॥ श्रीचिं० ॥ सुरनर याकी सेवा करत है, रात दिवस धर रंग ।। श्रीचिं० । । सुनिजर है साहिबकी सब पर, संघ हे सकल सुरंग ॥ श्रीचिं० ॥ नावना लायो जिनगुण गावो, अमर घणै नवरंग ॥ श्रीचिं० ५ ॥ इति पदं ॥ ॥ पुनः दोरी ॥ चिंतामणि चित ध्यावो रे, वंग्ति फल पा. वो ॥ किं. ६ सकल मधिक जन मिल कर श्रावो, राग फाग गुण गावो रे ॥ वंठित० १ ॥ अबीर गुलाल लाल संग लावो, नर२ मु. नियां नमायो रे ॥ नित० वि०॥ कुंकुम केसरकुं विझकावो, ना- व शुक्ल नल नावो रे ।। वंठि चिं० २ ॥ अंगी चंगी पुहप व. नावो, दीपक ज्योति दोपावो रे ॥ वंचित० चिं० ।। दरस सरस करके सुख पावो, पुण्य मार लरावो रे॥ वंगित. चिं. ३ ॥ वा. जिन वाजा विविध वजावो, नृत्य संगीत नचायो रे ॥ ति० चिं. ॥अमरसिंधुर आनंद वधावो, जिनजोस लपलायो रे ॥ पिं०४॥ ॥ पुन हो। ॥ मत मारो पिचकारी रे, में तो सगरीनीज गई ।। म० ॥ ताल मृदंग वजत मनमादि, गावत श्रागम राग । साल में तो स० १ ॥झान गुलाल सदा रंग लागे, खेलत सुमति सोहाग ॥ साल में० २॥ समकितकेसर चीर रंगानं, पदिलं मन वैराग ॥ लाल में० ३॥ लख चौरासी रामत गेलं, च्यारों गति सोहाग ॥ पिया में तो० ॥ एता खेल खेले सब.प्यारी, शिव- .
(५०) सुंदरी वर मांग ॥ साल में ५ ॥ ज्ञानसागर प्रन्नु विविध प्रकारे, इण विष खेले फाग ॥ पिया में०६ ॥इति पदं ॥ पुनः होरी। नेम मिले तो बातां कीजिये, दो प्यारे जिन- जी, नेमः ॥ मे हूं तुमारी खिजमतगारी, प्रेमका प्याला पीजीये। हो. ने०१॥ दम हे केतकी तुमहोर जमरा, फिर वासनालीजीये ॥ हो० ने० २ ॥ में हूं धरती तुम हो मेहला, कबहु तो मिलना कोजीयै । दो० ने० ३॥ नेम राजुल मिस मुगति सिधाए, रूपचंद पद दीजीयै ॥ हो० ने०४ ॥ इति पदं ॥ ॥पुन: होरीयातम तत्व विचारो झानसे, करम कटे ज्युशुक्ल ध्यानसें ॥ श्रा०॥ पुदगल जीव स्वरूप पिगण्यो, ममता मिट गई सारी जानसें ॥ कर्म क. श्रा० १ || क्रोधादिक अरि अंधकार सम, नास नयो सब ज्ञानन्नानसें || कर्म क० प्रा० शा परमातम पद पावत सोई, विनय नजत पद अचल धानसे॥ कर्म० प्रा० ३॥ ॥ पुनः होरी। लाल तेरे नयनोकी गति न्यारी, एतो नपस. मरसकी क्यारी । लाल ते०॥ काम क्रोधादिक दोप रहित दे, नयन नये अविकारी ॥ निज्ञ सुपनदशा नहिं यामें, दर्शनावरण निवारी ।। साल ते०१॥ थोर नयनमें काम क्रोध दे, यहोत नरी खुमारी ॥ पर धन देख हरणकी श्या, यामें दे दुसिपा. रो। साल ते०२॥एसा सछन हे नयनों में, क्यु पामे नय पारी, योदी विचार करो दिल अपनें, दोत कर्मसें नारी लाल ते." धर्म विना कोई सरणा नही दें, एसो निधै धारी ॥ विनय कई अनुजजन करो नित, योही तारनदारी साल ते० ४॥इति पदं ॥ ॥ पुनः दोरी ॥ दर्शन विन जीनसंसार नम्यो, १०॥ ची. गरामी सख योनिमें नटकत, सदिमानवनय युंदी गयो ॥ १० १ ॥ पुन्य उदय पावक कुल पायो, यटमें शान पोत नयो । १६
(५०५ )
शामाया ममतामें निश दिन तूं, विषय विकारसुं नदि विरम्यो ।
द० ३ ॥ सार विवेक धार रे चेतन, नटकत जवमें क्यु नरम्यो
॥ द०४ ॥ कहत कमाकल्याण निरंतर, जज जगवंत तेरो पाप
शम्यो । द. ५ ॥ इति पदं ॥
॥ पुनः दोरी ॥ मत बोमो मोने यूंदी रे, कोई चूक बतायो
॥म० । अबीर गुलाल लावलें रमतां, हमसुं कदिय न खेलो रे
॥ को३० म० १॥ रथ फेरी प्रनुजी घर आये, चढिया गद गिरनारी
रे॥ को० म० २ ॥ वहुत हगसुं व्याह मनायो, जीव देख दया
पाणी रे ॥ को० म० ३ ॥ राजुल कली अरज करत है, एक बार
फिर जोवो रे 11 कोइ० म०४ ॥ नेमराजुल दो, मुगत सिधाए,
पदली राजुल नारी रे । कोइ० म०५ ॥ इति पदं ।।
॥ पुनःहोरो अटक्यो चित्त दमारो री, जिन चरण कमलमें
|| अट० ॥ शीतलनाथ जिनेसर साहिब, जिनवर प्राण आधारो
री ॥ जि० अ० १॥ माता नंदादेवीकोनंदन, दृढरथ नृपको प्या.
रोरी, जि० अ० २ ॥ श्रीवच संछन जनम नदिलपुर, कुल
इक्ष्वाग नदारो री॥ जि० ० ३ ॥ नेन धनुप शरीर सुत्तोनित,
कनक वरण अनुकारो री ॥ जि० अ० ४ ॥ एक लद पूरव आयु
कहिये, नाम लिआं निसतारोरी॥जि० अ०५॥ दीनदयाल जगत
प्रतिपालक, अव मोहे पार उतारो रो ॥ जि.०६ ॥ हरखचंदके
साहिब सच्चे, हुं तो दास तुमारो री 1 जि० अ० ७॥ इति पदं ।
मंगल स्तवनं । मंगल राज गिरनार, नेमपद मंगल है
देवा ॥ म०॥ मंगल राजेमती पद मंगल, मंगल रहनेमि धार ।।
ने० १ ॥ मंगल गणपति मंगल पाठक, सब तपसी विच सार ।
मे २॥ मंगल धन धनामुनिनायक, मंगल सब अणगार ।। ने० ३
॥जयर खेमकुसल गुरु जपे,आनंदघन अवतार ॥ने०४॥इति पद।
,
(५०० ) सुंदरी वर मांग ॥ साल में० ५ ॥ ज्ञानसागर प्रनु विविध प्रकार, इस विध खेले फाग ॥ पिया में०६॥इति पदं ॥ [पुनः होरी1 नेम मिले तो वातां कीजिये, दो प्यारे जिन- जी, नेमः ॥ मे हुँ तुमारी खिजमतगारी, प्रेमका प्याला पीजीये। होने०१॥ दम हे केतकी तुमहो २ नमरा, फिर वासना लीजीचे ॥ दो० ने० २ ॥ में दूं धरती तुम हो मेहला, कबहु तो मिलना कीजीयै ॥ हो० ने० ३॥ नेम राजुल मिल मुगति सिधाए, रूपचंद पद दीजीयै ॥ हो० ने० ४ ॥ इति पदं ॥ ॥पुन: होरी॥ आतम तत्व विचारो ज्ञानतें, करम कटेज्युशुक्ल ध्यानसें ॥ प्रा० ॥ पुदगल जीव स्वरूप पिठाण्यो, ममतां मिट गई सारी जानसें ॥ कर्म क० प्रा० १ || क्रोधादिक अरि अंधकार सम, नास नयो सब झानन्नानसे || कर्म क० आ० ॥ परमातम पद पावत सोई, विनय नजत पद अचल धानसें॥ कर्म० प्रा० ३|| ॥ पुनः दोरी॥ लाल तेरे नयनोकी गति न्यारी, एतो नपस. मरसकी क्यारी ।। लाल ते०॥ काम क्रोधादिक दोष रहित हे, नयन नये अविकारी ॥ निज्ञ सुपनदशा नहिं यामें, दर्शनावरण निवारी ॥ लाल ते० १ ॥ ओर नयनमें काम क्रोध हे, बहोत नरी हे खुमारी ।। पर धन देख हरणकी श्चा, या हे हुलिया. रो, लाल ते० ३ ॥एसा लघन हे नयनोंमें, क्यु पामे नव पारी, योही विचार करो दिल अपनें, होत कर्मसें नारी। लाल ते० ३ ॥ धर्म विना कोई सरणा नदी में, एसो निश्चै धारी 11 विनय कहै प्रनुलजन करो नित, योदी तारनहारी लाल ते.. ॥इति पदं । । पुनः होरी ॥ दर्शन विन जीव संसार जम्यो, द० ॥ चो. सी लख योनिमें लटकत, लहि मानवन्नव युंही गम्यो ॥ द० ॥ पुन्य उदय श्रावक कुल पायो, यटमें ज्ञान जयोत नयो । द. 7
.
(५०ए )
श॥ माया ममतामें निश दिन तूं, विषय विकारसुं नहिं विरम्यो।
९०३ सार विवेक धार र चेतन, नटकत नवमें क्युं नरम्यो
॥ द०४॥ कहत कमाकल्याण निरंतर, जज जगवंत तेरो पाप
शम्यो । द. ५ ।। इति पदं ॥
॥ पुनः होरी । मत गेमो मोने यूंही रे, कोई चूक वतावो
॥म०। अबीर गुलाल नावसे रमतां, हमसुं कदिय न खेलो रे
। को२० म० १॥ रथ फेरी प्रनुजी घर आये, चढिया गढ गिरनारी
रे ॥ को० म० ३॥ बहुत हगसुं व्याह मनायो, जीव देख दया
श्राणी रे ॥ को० म. ३ ॥राजुल कन्नी अरज करत हे, एक बार
फिर नोवो रे || को३० म० ४ ॥ नेमराजुल दो, मुगत सिधाए,
पहली राजुल नारी रे 11 को३० म०५ ॥ इति पदं ॥
! पुनःहोरो । अटक्यो चित्त दमारो री, जिन चरण कमलमें
॥ अट० । शीतलनाथ जिनेसर साहिब, जिनवर प्राण प्राधारो
री ॥ जि. अ० १॥ माता नंदादेवीको नंदन, दृढरय नृपको प्या-
रो। जि० श्रण २ ॥ श्रीवच संचन जनम नदिलपुर, कुल
दिवाग उदारो री ॥ जि० ० ३ ॥ नेन धनुप शरीर सुप्तोनित,
कनक वरण अनुकारो री ॥ जि० अ० ॥ एक लक्ष पूरव श्रायु
कहिये, नाम लियां निसतारो रीजि श्र०५॥ दीनदयाल जगत
प्रतिपालक, अब मोहे पार उतारो रो ॥ जि० अ०६ ॥ हरखचंदके
सादिव सच्चे, हुं तो दास तुमारोरी । जि० अ०७॥ इति पदं ।
॥ मंगल स्तवनं ।। मंगल राजे गिरनार, नेमपद मंगल है
देवा ॥ म०॥ मंगल राजेमती पद मंगल, मंगल रहनेमि घार ।।
ने०१ ॥ मंगल गणपति मंगल पाठक, सर तपसी विच सार ।
मे०२ मंगलथन धन्नामुनि नायक, मंगल तब अरागार ॥ ने० ३
॥जयर खेमकुसल गुरु जपे,प्रानंदघन अवतार ॥ने०१॥ति पद।
.
, (५०) ॥ श्म मास द्वादश तप सुसंग्रह विविप्रपासें संग्रही, प्रति सुगम नाप प्रकाश करता नव्यजनं मन गहगही ॥ निधि वाण नंद सुवं विक्रम माघ सुदि पूनम सही, श्रीवृहत्खरतर गह पा. ठक रामगणि विधि श्म कही ॥ १ ॥ अथ पंच कल्याणक टिपनिका स्वरूप मुच्यते ॥ ॥जिस महीनेमें जितने दिननगवंत के कल्याणकडे सो सर्व जव्यजीवोंके सेवन करणे योग्य दे, लेकिन कोण तिथिकू कापसा कल्याणक सेवन करणा सो जाणे विगर सेवन कर सकते नहीं (ओर विशेपमें ) पंच कल्याणककी तपस्या करणेवाले नव्यजी. वोंके अवस्य पंचकल्याणककी टीप गुणे विगर काम चलता नही, इस वास्ते गुणने मुजब विधिप्रपासें पंच कल्याणककी टोप लि. ॥ अथ पंच कल्याणककी टीप लिख्यते ॥ कार्तिककृष्णपक्षे ॥५ कार्तिकशुक्लपक्षे ॥२॥ ५ श्रीसंन्नवनाथजीसर्वज्ञायः ३ श्रीसुविधनाथजीसर्वज्ञाया १२ श्रीपद्मप्रनुजीअर्हतेनमः १२ श्रीअरनायजोसर्वज्ञायनमः १२ श्रीनेमनाथजीपरमेष्ठिनेनः मार्गशीर्षशुक्लपक्षे ।। २३ श्रीपद्मप्रन्नुजीनाथायनमः १० श्रीअरनाथजीअईतेनमः ३० श्रीवईमानजीपारंगतायन० १० श्रीअरनाथजीपारंगताय मार्गशीर्पकृष्णपक्षे ॥2 ११ श्रीअरनाथजीनाथायनमः ५ श्रीसुविधनायजीअईतेनमः ११ श्रीमल्लिनाथजीयईतेनमः ६ श्रीसुविधनाथजीनामायन० ११ श्रीमल्लिनायजीनामायनमः १० श्रीवर्दमानजीनानापनमः ११ श्रीमल्लिनायजीसर्वज्ञापन ११ श्रीपद्मप्रनुजीपारंगतायनमः ११ श्रीनमिनाथजीसर्वज्ञापन पोपकृष्णपक्षे ॥५॥ १.१ श्रीसंजयनाथजीमईतेनमः १० श्रीपार्श्वनाथजीअईतेनमः १५ श्रीसंनवनाथजीनाथायन .
१ श्रीपार्श्वनायजीनाथायनमः पोपशुक्लपक्षे ॥ ५॥ २ श्रीचंद्राप्रनुजीअईतेनमः ६ श्रीविमलनायजीसर्वज्ञाय० '३ श्रीचंज्ञामनुजीनाथायनमः ए श्रीशांतिनाथजीसर्वज्ञा० श्रीशीतलनाथजीसर्वज्ञाय० ११ श्रीअजितनाथजीसर्व० माघकृष्णपक्षे ॥५॥ १४ श्रीअनिनंदनजीसर्वज्ञा० ६ श्रीपद्मप्रन्नूजीपरमेटिने १५ श्रीधर्मनाथजीसर्वज्ञा० १ श्रीशीतलनाथजीयई० माघशुक्लपक्षे ॥ए २ श्रीशीतलनाथजीमानमः २ श्रीअनिनंदनजीपण श्रीझपनदेवजीपारंगता० २ श्रीवासुपूज्यजीसर्वज्ञा० • श्रीश्रेयांसजीसर्वज्ञायमण ३ श्रीविमलनाथजीआई० फाल्गुनकृष्णपक्षे ॥१० ३ श्रीधर्मनायजीअईतेनमः ६ श्रीसुपार्श्वनाथजीसर्वज्ञाय० ४ श्रीधिमसनाथजीनानक 3 श्रीसुपार्श्वनाथजीपारंगता. ७ श्रीप्रजितनाजीयई० 3 श्री चंक्षप्रनूजीसर्वज्ञायन० ए श्रीमजितनाथजीनाया. श्रीसुविधनाथजीपरमेटिने० १२ श्रीअनिर्मदनजीनाया। - श्रीरुपनदेवजीसर्वशायनमः १३ श्रीधर्मनाथजीनाथाप० - श्रीश्रेयांसजीप्रर्दशनमः काल्गुणशुक्लपक्षे । ५ - श्रीमुमिसुनतसर्वज्ञायनमः २ श्रीअरमाग्रजीपरमेष्टिने - श्रीश्रेयोसजीनाथायनमः ४ श्रीमल्लिनाथजीपरमेष्टि श्रीवासुपूज्यजीतेनमः ७ श्रीसंजवनाथजीपरमेष्टि श्रीवासुपूज्यजीनायायनमः १२ श्रीमल्लिनाघजीपारंग. चैत्र कृष्णपक्षे ॥ ५ १२ श्रीमुनिसुव्रतजीनाथाय० . श्रीसुपार्श्वनाथजीपरमेटिने चेत्रशुक्लपक्षे। श्रीपार्श्वनाथजीसर्वज्ञाय० ३ श्रीकुंथुनाथजीसर्वज्ञा० श्रीचंक्षप्रनूजीपरमेटिने ५ श्रीअजितनाथजीपारं० . . .
. (१२) ८ श्रीश्रादिनानप्रदतनमः ५ श्रीसंन्नवनायजीपारंग० श्रीयादिनाथजीनाधाय०. ५ श्रीयनंतनायजीपारंग. वैशाखकृष्णपक्षे ॥ ९ ए श्रीसुमतिनायजीपारं० १ श्रीकुंथुनाथपारंगतायनमः ११ श्रीमुमतिनायजीस० २ श्रीशीतलनाथजीपारंगता० १३ श्रीवर्द्धमानजीबईतेनमः ५ श्रीकुंथुनाथजीनामायनमः १५ श्रीपमानूजीसर्वज्ञाय ६ श्रीशीतलनाथजीपरमेष्टि वैशासशुक्लपक्षे १० श्रीनमिनायजीपारंगताय. ४ श्रीअनिनंदनजीपरमे० १३ श्रीअनंतनाथजोअईतेन. ७ श्रीधर्मनायजीपरमे० १७ श्रीअनंतनाथजीनाथायन. श्रीअन्निनंदनजीपारंग० १५ श्रीअनंतनाथजीसर्वज्ञा० श्रीमुमतिनाथजीअर्हते. १५ श्री कुंथुनाथजीअर्हतेन० १. श्रीवईमानजीसर्वशाय ज्येष्टकृष्णपक्षे ॥ ८॥ १२ श्रीविमलनाथजीपारंग. श्रीमुनिसुव्रतजीअर्हते. ज्येष्टशुक्लपक्षे ए श्रीमुनिसुव्रतजीपारंग० ५ श्रीधर्मनाथजीपारंगता० १३ श्रीशांतिनाथजीबई० ए श्रीवासुपूज्यजीपरमेष्टि १३ श्रीशांतिनाथजीपारंग. १२ श्रीसुपार्श्वनाथजी ११ श्रीशांतिनाथजीनाथा० १३ श्रोसुपार्श्वनाथजीनामा आषाढकृष्णपक्षे ॥ ३॥ आपाढशुक्लपक्षे १ श्रीआदिनायजीपरमे० ६ श्रीवर्धमानजीपरमेटिक उ श्रीविमलनायजीपार० ७ श्रीनेमनाथजीपारंगता. ए श्रीन मिनाथजीनामा० १५ श्रीवासुपूज्यजीपारंग श्रावणकृष्णपक्षे ।। श्रावणशुक्लपक्षे ५ ३ श्रीश्रेयांसजीपारंग २ श्रीसुमतिनाथजीपरमे० श्री अनंतनाग्रजीपर ५ श्रीनमनाथजीबईते ॥४॥ +
०
श्रीनमिनाथजीमई० ६ श्रीनेमिनाथजीनाथाय ।
ए श्रीकुंथुनाथजीपरमे० श्रीपार्श्वनाथजीपारंग
भाद्रपदकृष्णपक्षे ॥ ३॥ १५ श्रीमुनिसुव्रतपरमेष्टि०
श्रीचंतामन्नूजोपारंग
भास्पदशुक्लपक्षे १
श्रीशांतिनाथजीपरमे० ए श्रीसुविधनाथजीपारं०
श्रीसुपार्श्वनाथजीपरमे०
आश्विनशुक्लपक्षे"
आश्विनकृष्णपक्षे ॥ २ १५ श्रीसुविधिनाथपरमेष्टि
३ श्रीमहावीरजीगायक
श्रीनेमनाथजीसर्वज्ञा०
ते श्रीपंचकल्याणक टीप संपूर्ण । गलपिहार पाटमपस्ति ।
॥ अथ पंच कल्याणक विधि ।।
॥ प्रथम शुन दिन शुज धमी गुरुके पास पंच कल्याणक
ग्रहण करै. उपवास (वा) यांवील एकासणादिकका पञ्चरकाश
तीन टंक देववंदन करे, पक्षिमणा करै. जिस दिन जो मा.
जिका कल्याणक होय उसका २००० गुणना कर, नर पहली
वा जो पंच कल्याणकका स्तवन सो सुणे या पदै. जहां न.
की कल्याणक नूमि होय नहां के महोचवसे संघ समेत
॥ करणेगो जाये. नहां विधी संयुक्त सर्व नगवंतोके पंच क.
पाकका नन्छव करै. लो शक्ति नहिं दोय तो शासनपति श्रीम.
रस्वामी के पट् कल्याणका उच्व करै ।। श्रव २३ जगतकी
कायें पांच, श्रीवारप्रनके अपेका पट् कल्याणक संक्षेप उच्च
जिल्पते । च्यवन कल्याणककों (परमेष्टिनेनमः) कहिये, इस
चवदे स्वप्नादिककी पूजा करायके व्यवन कल्याणादिकका
'कर, हीरा चढावै ॥ १ ॥ जन्म कल्याणककू (अहतेनमः)
. इस दिन जलजात्रादिकका महोचव करके अष्टो.
N (१६) जगतगुरु नयनंजण नगवंत, निराकार निरंजन निरूपम अज मर अरिहंत ॥ श्रीजिनचंद विनय शिरोमणि सकलचंद गणिसी वाचक समयसुंदर इम पत्नरी पूरो मनह जगीस ॥१॥ ॥ अथ पखवासा तप विधि लिख्यते ॥ प्रथम शुन्नदिन गुरूके पास-तप ग्रहण करके सुद (।) मिवासे पूर्णमासी तक इकसार १५ नपवास करै. जो शकिन होयतो प्रथम सुदि पक्षकी पमियार, दूमरे सुदि पक्षकी दूज, अनुकमसे पनरे सुद पढ़में तपस्या पूर्ण कर, श्रीमुनिसुवतस्पन के पांच कल्याणक नावगनित स्तवन पदैः गुरूमा संयोग तो गुरूके पास सुणै.. (श्रीमुनिसुव्रतस्थामी सर्वज्ञायनमः) पदका २००० दो हजार गुणना करै. और तप ग्रहण तथा देववंदनादिककी विधि.पहले लिखी हे उस मजय nिe जीव सब तपस्याकी विधि करे, विधि संयुक्त करणेसे ननम मिलता है ।। इति पखवासाविधि । ॥अय दश पचरकाण स्तवन लिख्यते । दूदा सिदारय नंदन नमूं, महावीर जगवंत ॥ त्रि धैग जिनवरू, परपद यार मिसंत ॥ १ ॥ गणधर गौतम समे, पूर्व प्रीजिनराय ।। दस पगकाण किसा कहा, कीय फल पाय॥ २ ॥ (हाल १ ॥ सीमंधर करज्या मयाng. श्रीजिनवर इम उपदिम, मानल गोयम ताम || दस पनका पा, सदिये अविरत गम ॥ श्री. ३॥ नवकारमी बाजी २.मादपोरसी पुरिमा पकामण नीय कदी ६,एकसान भी० ४॥ दान प्रति प्रयास १० दिन दम ॥ एहना फार गुण गोपमा ॥ रतनाना ममता , मातुनीनी जाग.. . जता 1 (५१) तिम धूमप्रना ५, तमप्रना ६ तमतम ७ गम || श्री० ६ ॥ नरक सात कही ए सही, करम कठिन कर जोर ॥ जोव करम वस ते सही, ऊपजै तिराहीज गेर ॥ श्री. ७ ॥ दन नेदन तामना, नूख तृपा वलि त्रास, रोमर पीमा करे, परमाहम्मो तास ॥ श्री० ॥ रात दिवस केत्रदेवता, तिल नर नहीं जिहां सुरक ॥ किया करम जे जोगवे, पामे जीव बहु उरक ॥ श्री०या इक दिनरी नवकारसी, जे करै नाव विशुः ॥ सो वरस नरकनो पानखो, दूर करे ज्ञानबुहि || श्री० १०॥ नित्य करै नवकारसो, ते नर नरक न जाय ॥ न रहै पाप वलि पावला, निरमल होवे जी काय ॥ श्री०११ ॥ (ढाल २॥ श्रीविमलाचल सिर तिलो ॥ ए चाल)। सुग. गोतम पोरसी कियां, महा मोटो फल होय ।। जावसुं जे पोरसी करे, उरगति छेदै सोय ।। सु०१२ ॥ नरक-मांहि जै नारकी, वरसें एक हजार || करम खपावै नरकमें, करता बहु- त पुकार । सु०१३|| एक दिवसनी पोरसी, जीव करै कतार । करम दरों सहस एकना, निहचेसुं गणधार ॥ सु० १४॥ उरगति मांदे नारकी, दस हजार प्रमाण || नरक आयु खिरा एकमें, सा. ढपोरसी करै हाण ॥ सु० १५ ॥ पुरिमट्ट करै नित जीव जे, नरके ते नवि जाय ॥ लाख वरस करमनें दहै, पुरिमह करम खपाय ॥ ।। सु१६॥ लाख वरस दस नारकी, पामें उरक अनंत ॥ इतरा करम एकासणें, दूर करै मन खंत ॥ सु०१७ ॥ एक कोमि वरसां लगे; करम.खपावै जीव ॥ नीवीय करतां नावसुं, उरगति दणे सदीव ।। सुप १० ॥ दप्त कोमि जीवनरकमें, जितरो करै करम दूर. 1॥ तीतरो एकलगणही, करै सही चकचूर ॥ सु०.१५ ।। दात करता प्राणियो, सो कोमी परिमाण ॥ इतरा वरस उरगति तणा, उदै चतुरसुजाण ॥ सु०.२.० ॥ प्रांनिसनो फलं. बहु कह्यो, कोमो
(५१)
एक हजार ॥ करम खपाचे इण परै, नाव प्रांधिल अधिकार ॥ सुरू
२१॥ को म सहस दस वरसही, सहे दुःख नरक मझार ॥ उपवास
करे इक नावसुं, तो पामे मुगति मझार || सु० २२ ॥ (दास ॥
केके वर साधो । ए देशी) ॥ साख कोमि वरतां लगे, नरके क.
रता रीव रे ॥ गोतम गणधारी । म तप करतां अकां, सही
नरक निवारे जीव रे ॥ गो० २३ ॥ नरके वरस कोमि साखही,
जीव सदै तिहां उरक रे ॥ ते ऽख अध्म तपहुंती, दूर फरी पामे
सुरक रे ॥ गो० २१ ॥ वेदन नेदन नारकी, कोमाकोमि परसोर
रे। कुगति कुमतिने परिदरो, दसमें एतो फल होररेगो
२५॥ नित फासू जल पीवता कोमाकोनि वरसनो पाप रे । दूर
फरे खिण एकमें, निश्चै दोय नि:पाप रे ॥ गो० २६ ।। बलिय नि.
शेष फल कहो, पांचम करे नपवास रे ॥ पामे ग्यान पाये जाता,
करता विनुवन परकास रे ॥ गो० २७ ॥ चयदस तप विधि
फरे, पवदद पूरय दोय धार रे ॥ इम अनेक फल तपतणा, करतो
यलि नाये पार रे ॥ गो० २७ ॥ मन वचने काया करी, तप कर
जे नर नार रे ॥ ग्यारे वरस एकादशी, करतांसद नव पारो ।
गो० २|| आग्म तप पाराधता, जीव न फिर संसार रे ॥ अनं
त नयाना पापयो, टे जीव निस्वार रे ॥ गो०३० ॥ तपईती
पापी तरया, निसनरियो अरजुनमास रे ॥ तपटुंती दिन में
शिव पाम्पो गजमुकमाल रे || गो० ३१॥ तपना फल गो का
पक्षकाणतणा दस नेदरे || प्रवर नेद विण वेधणा, करतां ।
प्रप वेदरे ॥ गो० ॥ ३२ ॥ (कलादा) ॥ पसम्मान दर विच फा
पाप्पा महावीर जिणदेवा, ज करे नविया तप प्रान्ति तान
मेव ॥ गंवत्त निधि गुण या नाशि यति पाग गु
दन, पदमांग वापर नीम गलिया गया
.
1. , (५१) नये ॥ ३३ ॥ इति दस पचकारा वृद्ध स्तवनं ।। ॥ अथ दस पच्चस्काण तप विधिः ॥ ॥ यद दस पञ्चखाणके स्तवनमें खुलासा दस पञ्चरकाणके नेद न बेला तेला पांचम पाठम ग्यारस चौदश इत्यादिक त- पस्या करणेके फल जगवंत श्रीमहावीरस्वामीके वचन मुजब उत्तम पुरुषोने रचना करीहै. इस वास्ते धर्मरागी पुरुप इत स्तव नको पढके तपस्या करणेमें आदरवंत होता है, नर किसीके दश पञ्चकाण तप करणेकी श्चा होय तो पहिले दिन नवकारसी, 3. सरे दिन पोरसी, इस तरै स्तवन मुजब १० पञ्चरकाण दस दिवसे सेवन करे, सदा स्तवन सुणे पढे, अंतमें पूजा करावे, शक्ति माफक नद्यापन करै. इस तपस्याके प्रनावसे उरगतिबंध दूर करके प्रको गती पावे, महा एश्वर्यवंत होय, नाग्यवंत दोय ॥ इति ॥ ॥ अथ वीश स्थानक स्तवन लिख्यते । श्री सिज्ञाचल नाटयै । ए देशी ॥ वीस थानक तप सेवि- ये, घर कर शुन्न परिणाम लाल रे ॥ तीजै नव सेव्यो यको, वां- धे तीर्थकर नाम लाल रे ॥ वी० १ ॥ तप रचना अधिकी कही, झाताअंग मझार लालरे। सुणजोन्नवि तुमे नावसुं, चित्तसें करिय नचार.लाल रे ॥ वी० २ ।। सुविहित गुरु पासे ग्रहै, वीस थानक तप एह लाल रे । निरदूषण शुन्न महुरते, नचरीजै ससनेह लाल रे।। वी०३॥ अरिहंत र सिह २ प्रवचन नमूं ३, सूरिथिवर ५ नव- झाय ६ लाल रे साधु नाण दसरा ए अरु, विनय १० नमू उससाप सासरे। पी. ४॥ चारित्र ११ बंन १२ क्रियापदे १३, तप १४ गोयम १५ जिण १६ ईस लाख रे ॥ चारित्र १७ झातने १८.श्रुत जणी १ए; नमूं तीर्थ २० पद वीश लाल रे ।। वी०५॥ बीस दिवसमें ए. कही; पद गुणनो कर मेव सासरे ॥ . . ..
, . (५३०) अथवा दिन विता लगे, वीसे पद गुण मेव लाल रे || वी०६ ॥ एक नली पट मातमें, पूरी जो नवि होय लाल रे॥ फेर नवी करणी पमै, पिपली निष्फल जोय लाल रे ॥ वी० ७ ॥ अध्म नपवाससुं, अथवा देखो शक्ति लाल रे । पोसह कर श्राराधिय, देव वांदे निज नक्ति लाल रे । वी० ॥ संपू. रण पद सेवतां, पोसहनो नहि जोग लाल रे ॥ तोही सात परे सही, पोसद करिये संजोग लाल रे ॥वी०ए॥ सूरी विवर पाठक पदै, साधु चारित्र सुजाण लाल रे ॥ गौतम तीर्थपदे सदी, सात यानक मन मान साल रे । वी० १०॥ पदर दीड करै स. दा, दोयर नाप हजार लाल रे ॥ पकिमणो दोय टंकही, करिये पूजा सार लाल रे || शक्ति मुजव तप कीजिय, एक नली करो वीस लाल रे ॥ वीसावीसी च्यारस, तप संख्या कही एम सास रे॥ वी० १२॥ जिस दिन जो पद तप करे, तिसके गुण चित धार लाल रे 1 कानप्तग्गने परदकणा, मुख नशिये नवकारसाल रे॥ वी०१३ ॥ जिस पदकी स्तवना सुणे, कीजे जिनपद जति लाल रे ॥ पूजन शुन्न मन साचौ, दिनरं बढती शक्ति सासरे ॥ वी० १४ा मृतक जनम शतुकाल में, कविधारयो उपवास साउ रे॥ सो लेखे नदि लेखयो । निकेवल तप जास साल रे ॥ बी० १५ ॥ सावक त्यागपणो करे, सोक न धारे चित्त लाल रे ॥ शीर प्रानूपण पादरे, मुखमुं बोल सत्य लाल रे ॥ वी०१६ ॥ जेठ यासाट देशाखमें, मिगसर फागुण मांद लाल रे ॥ ए पद मांदिन, व्रत प्रहिये वमनाग साल रे ॥ वी०१७ ॥ तप पूरश हुवां अकां, मजमतो निरचार साल रे ॥ की शक्ति विधारीन, उच्च विविध प्रकार लास रे ॥वी0१0 वीतर गिरती तमा, पुस्ता पूग आदि सासरे। ग्यानतपी पूजा करे, कोन वर मास
एक ली दो
(५२१.)
लाल रे ॥वी. १ए | फलवधी नगरनी श्राविका, कीधी विष चिता
लाय लाल रे ॥ जनम सफल करवा नणी, हिज मोक्ष उपाय.
लाल रे ॥वी. २०॥ कलश ॥श्म धीर जिनवरतणी आझा पार.
चित्त मकार ए, सह देख आगमतणी रचना रची तप विध सार
ए॥ वसु नंद सिद्धि चं वरसै चैत्र मास सुइकरू, मुनि केशरी
शशि गब खरतर नणी स्तवना मनहरू ॥ २१ ॥ इति ।।
॥ अथ वीस स्थानक तप करण विधि लिख्यते ॥
॥ तिहां प्रथम शुन्न महुनके दिन नंदी स्थापनापूर्वक सुवि
हित गुरुके पास वीस स्थानकतप विधिपूर्वक नच्चरै.
महीनेसे लेकर 3 महीने पूरी करै. कदास उ महीने में पूरी नही कर
सके तो वो नली गिणतीमें नही. नर फेर न करणी पमसी है.
एक लीके वीत पद दे (तहां ) को चीस दिनमें वीस पद
नदार गिराते है, कोईयक वीसों दिन में एकही पद गिणते हैं, दूसरे
शों दिन में दूसरा पद, एसें चीशों पदकी वीश नती करै, तिहां
दाराधनके दिन प्रबल शक्तिवंत अध्म तप करिके आराधे, वीश
हमसे एक नली होय ( एसें ) वीस नली १०० से अहमसे श्रा
वै. और उससे कम शक्ति होय तो उसे आराधै. उससे कम
क्ति दोय तो चोविदार उपवास करके आराधै. उससे होन शक्ति
प तो तिविदार उपवास करकै पाराधै, उससे होणशक्ति प्रांधिल
तया) तिविहार एकाशणा करकै आरावै. नसमें जो शक्तिवान
यसो तो सर्व तपस्याके दिन अठ पहरी पोसह करै. दीनशक्ति
नपोसद करै. वीसों पद पोसहसेती आराधै, जो पोसह शक्ति
में पदमें नहीं होय तो आचार्यपदमें १, नपाध्यायपदमें २, यिबर
में ३, साधूपदमें ४, चारित्रपदमें ५, गौतमपदमें ६, न तीर्थपद.
s, यह सात धानक पद तो पोसद करकेही पारावै. जो इतनी
.
. (५२२) जी शक्ति नदि होय तो उस दिन देसावंगांसी करें, सांवा व्यापा गेम, सो शक्ति नी नही होय तो यथाशक्ति तप करकै आराधे- अपणी होणता नावे तथा मृतक जन्म के सूतक उपवासादि तप नदी गिणे जावै, स्त्रियांनी तुसमयका तप नही गिणे, तथा नपक दिन पोसह सहित करें तो बहोत श्रेयकारी है. वो अगर नहीं हो सके तो तपके दिन नन्नय टंक पमिकमण करे तीन टंक देववंदन करै, दो हजार एक पदका जाप करै, ब्रह्मचर्य पाले, नूमि शयन करे, तपके दिन अति सावध व्यापार नही करै, असत्य नहि बोले, सब दिन तप पदके गुण कीर्तनमें रहै, तथा तपके दिन पोसह करें तो पारणेके दिन जिनन्नक्ति करकै पारणा करै, जो तपके दिन पो. सह नही होय तो नसी दिन श्रीजिनन्नक्ति करै करावे, लायना नावै तथा तपके दिन तप पदके गुण नेदं प्रमाण संख्या कान- सग्ग करै. इतनाही तण स्मरणपूर्वक खमासमण देबंदणा करे. उस पदका गुण याद करकै उदात्त स्वरसें स्तवना करे, हर्पित रहै। ॥ अथ वीस स्थानक गुणना और काउसग्गका प्रमाण लिखते हैं। (मो अरिहंताण) २००० गुणना लोगस्त १२ का कान सांग || १ ॥ (णमोसिद्धाणं) २००० गुणना लोगस्त १५ का का 'उसग्ग || २॥ (णमो पवयणस्स ) २००० गुणना लोगस्त, का कासग्ग ॥ ३ ॥ (मो आयरित्राणं) दो हजार गुणना 'लोगस्स ३६ का कानसग (णमो थेराणं) दो हजार गुणना, लोगस्स १५ का कानसग ॥ ५॥ (णमो उवझायाणं ) दो इ. 'झार गुणना लोगस्त २५ का कानसग ॥ ६ ॥ (णमो सोए सा साडूंणं ) दो इकार गुणना लोगस्स २७ का कानसग ॥ ७ ॥ (णमो नास्स) दो हजार गुणना लोगस्स ५ का कानसग । ॥ ॥ ( णमो दंसबस्स ) दो हजार गुणना लोगस्त १७ ( ५२३) कानसग्गए ॥ (णमो विषयसंपलाणं ) दो हजार गुणना लोगस्स १० का कानसग्ग ॥ १० ॥ (णमो चारित्तस्त ) दो हः झार गुणना लोगस्स ६ का कानुसग्ग ॥ ११ ॥ (रामो बंजय धारीणं ) दो हजार गुणना लोगस्स ए का कानसग्ग ॥ १२ ॥ (णमो किरियाणं ) दो हजार गुणना लोगस्स २५ का कानसग्ग ॥ १३ ॥ (णमो तवस्तीणं ) दो हजार गुणना लोगस्स १५ का कानसग्ग ॥ १४ ॥ (णमो गोयमस्त) दो हजार गुणना लोगस्त १७ का कानसग्ग ॥ १५ ॥ (मो जिलाणं ) दो हजार गुणना लोगस्त १० का कानसम्ग ॥ १६ ।। (णमो चरणस्त ) दो हजार गुणना लोगस्त १२ का कानसग्ग ॥ १७॥ (णमो नागस्त) दो हजार गुलना लोगस्त ५ का कानसग ॥ १७ ॥ (एमो सुप्रना- गस्स) दो इकार गुणना लोगस्त १० का कानसग्ग ॥ १ ॥ प्रमो तिवस्स ) दो हजार गुना लोगस्त ५ का कानुसग करे ॥ २० ॥ इति वीस स्थानक गुणना संपूर्णम् ॥ इत्यादि विधि संयुक्त वीशों नती में सर्व पदके नचव महो- उव प्रतावना ऊजमणापूर्वक करै. जिनशासनके उन्नतीके वास्ते तनी शक्ति नहीं होय तो एक नली तो विशेष नववादिक संयुक्त रणी चाहिये. इहां विधिप्रपाक ग्रंथसे वीश स्थानक सेवन विधि केप मात्रसे लिखी है. जो गुरुका संयोग होय तव तो विस्तारसे शों पदकी जुदी२ विधि गुरुके मुखसे समझके करै. जो गुरूका योग नहि होय तो विवेक संयुक्त इस विधिकों देखकै वीस स्था- क तपकों सेवन करे, वीस स्यानकका स्तवन सुऐ वा पटै, वीस नानकजीको पूजा करावै, अपणी शक्ति माफक वीस२ ज्ञानोप- रण. करावे, देवपदका देवखाते लगावै, ज्ञानपदका ज्ञानखाते गाचे, गुरुपदका गुरुखाते लगावे, सब तीयोंकी यात्रा करे, .
अथ तृतीय पद॥ . ( ५२४) सादमी वच्छल कैर, इत्यादिक ऋये नर नावे विधि संयुक्त शु. नावसे जो जव्यजीव यह वीस स्थानक पदकों सेवन करेंगे में जिन नाम कमीफों नपार्जन करके तीसरे जव अनंत सुखकों प्रार होंगे..इत्यलं विस्तरेण !! इति वीस स्थानक तप नली विधि सं० । ।। अथ वीस स्थानक मंडल पूजन लिख्यते ॥ णमोणंतविन्नाणसईसणाणं, सहाणंदियासेसजंतूगणाणं ॥ नवालोजबिच्छयणेवारणाणं, मोवोहियावराणंजिणाणं ॥१॥ ही श्रीहन्योनमः ॥१॥ इति प्रथमपदे जिनें पूजा अग सिहाजा ॥ लोगग्गलागोपरिसंठियाणं, वृक्षाणसिक्षणमंशि- दियाणं ॥ निस्सेसकम्मरकयकारगाणं, णमोसयामंगलधारगारां |२|| जह। श्री सिन्योनमः ॥ २ ॥ प्रगतसंसुद्धगुणाकरस्स, दुकंधयारुग्गदिवाकरस्स || अवंतजीवा. पदयागिहस्स, समोर संघचनधिहस्स ।। , हैं। श्री प्रवचनापनमः • ॥ ३ ॥ अथ चतुर्थ पद ॥ कुवादिकेलीतरूसिंधुराणं, सुरीसरा मुसिबंधुराणं ।। धीरत्तसंतक्रियमंदराणं, समोसयामंगलमंदिराण '४ ॥ न ही श्री आचार्येभ्योनमः ॥ ५ ॥ अथ पंचम पद || सम्म 'संयमपतितजविजन अतिदधिरकरतानला ॥ अवगुणप्रऽपिः गुणविनूपित चंइकिरणसमोऊला ॥ अष्टाधिकाइससहससीधापर 'रुचिरधाराधरा, जवसिंधुतारणप्रवरकारणनमोधिवरमुनीवरा॥ ५॥ सेही श्री स्थविरायनमः ॥ अथ ग्ग पद ॥ सघोदिबाजकुमार णा, एमोश्वायगावारणायं ॥ कुचोहिदतीहरिणेसराणं ॥ पसंतावपयोइराणं ॥६॥ ही श्री उपाध्यायेन्यो नमः ॥६॥ 'सातमा पद ॥ संतजियसेसपरीसहाणं, । ॥ सन्नाण पळायतरूबसाण, णमोरदोननयोधणाणं ॥ ७ ॥ है ही श्री सम्मम्साधुन्योनमः ॥ ॥ अथ अष्टम पद || उदापा विग्यो निस्सेसजीवाणदयागिहा (५२५) यगुणाकरस्स, सयापयासीकरणोधुरस्स ॥ मिचअन्नासतमोहरस्स णमोर नाणदिवायरस्त ॥ ७॥ ही श्री सम्यग्ज्ञानाथ नमः ॥ 5॥ अथ नवम पद ॥ असंतविनाणसुकारणस्स, अगंतसंसारवि दारणस्स ।। अणंतकम्मावलिधंसणस्त, समोरनिम्मलदसणास्स ॥ (ए || 3 है। श्री सम्यग्दर्शनाय नमः ॥ ए ।। अथ दशम विनय- पद ।। आमंदियालेसजगऊणस्स, कुंऽिपादामलताचणस्स ॥ सुध. मजुनस्सदयासयस्त, शमोश्रीविषयालयस्त ॥ १०॥ ॐ ही श्री सम्पविनयैनमः ॥ १० ॥ अथ इग्यारम चारित्र पद ॥ क. म्भोधकतारदवानलस्स, महोदयानंदलयाजलस्स ॥ विनारापंकेरुद कारणस्त, णमोचरित्तस्तगुणापरास्स ॥११॥ ही श्री सम्यगचा- रित्राय नमः ॥ ११॥ अथ क्षादशम चारित्र पद॥सग्गापवगाग्ग- सुहप्पयस्त, सुनिम्मलागंतगुशालयस्त ) सबयानूपणनूपरास्स, नमोहिशीलस्सअदूसणस्त ॥ है। श्री सम्यग्ब्रह्मचैनमः ॥१२॥ अथ तेरमें किया पद ॥ विशुद्धसरा विनूपरास्स, सुसहिसंपचिसु पोपणस्त || एमोसदाणंतगुणप्पदस्स, नमोरसुवक्रियापदस्स ॥ १३ ॥ ज हैंश्री सम्यग् क्रियायै नमः ।। अथ चवदमा तप पद ॥ लद्दीसरोजावलितावणस्त, सुरूवसंलग्गसुपावणस्त ॥ अमंगलानो कुहउहवस्स, नमोनिम्मलसत्त्वस्त ॥१॥ ॐ ही श्री सम्यगतव. से नमः ॥१४॥ अथ पनरमा गौतम पद ॥ अपंतविनाविनाकर रस, उवालसंगोकमलाकरस्त ॥ सुलश्वासाजयगोयमस्स, नमोग णाधीस्सरगोयमस्त ॥ १५ ॥ हैं। श्री गौतमायनमः ॥.प्रयं सोलम पदे जिमपूजा ॥ मणुससमातिसयासयाणं, सुरारघी सर- बंदियाणं ॥ रवींविधामलसरगुशाणं, दयाधसाणं हिनमोजिशा ॥ १६ ॥ है। श्री जिनेन्योनमः ॥श्रय सतरमें चारितवारीपद ा.सचिंदियापार विकारदारी, अकारणाससजगोवगारी ॥ महान- (५२६ ) वातकरणापहारी, जयोसदाशुद्धचरित्तधारी ॥ १७ ॥ ही घा सम्यग्चारित्रधारीभ्यो नमः ॥ १७ ॥ अथ अगरमें ज्ञानपदपूजा ॥ शुक्रियामंमलममणस्स, संदेहसंदोहविखंणस्त ॥ मुत्तीनपादा नसुकारणस्त, नमोहिनाणस्सजसोधणस्स || १७ ॥ हैं। सम्यग्ज्ञानाय नमः || १७ ॥ अथ नगणीसमें श्रुतपद ॥ अन्नाणव लीवनवारणस्स, सुबोहिबीजांकुरकारणस्त ॥ श्रयंतसंसुद्धगुणाल यस्त, नमोदयामंदिरसमयस्स ॥ १७ ॥ हैं। श्री सम्पग्श्रुतये नमः ॥ १५ ॥ अथ वीसमें तीर्थपद ॥ तुन्यनमःसकलविश्वशं कराय, तुन्यनमःस्त्रिजगतीजनशंकराय ॥ तुन्यनमान्नुवनमंस मंझनाय, तुन्यनमोस्तुजिनकविखंडनाय ॥ २०॥ है। श्री स म्यगतीर्थपदेन्योनमः ॥२०॥ ध्वजासमेत अष्ट श्च्य चढ़ावै (पी) ६५ पूजा अखरोट चढ़ावै ॥ नसौधर्मेशयनमः १ ॥ शाणे शयनमः ॥ उसनत्कुमारज्ञयनमः ३ ॥ माहेंशयनमः ४ ॥ ब्राँज्ञापनमः ॥ ५ ॥ नसांतकेंशयनमः ६ ॥ शुक्रंशयनमः ॥ ॥सदमारेंशयनमः ॥ ७॥ प्राणतेंशयनमः ॥ ॥ *प्र. च्युतेंशयनमः ॥१०॥ चंद्रेद्रायनमः ।।११॥ सूर्यैद्रायनमः॥ १.२॥ चमेरशयनमः ॥ १३ ॥ नवलींद्रायनमः ॥ ११॥ धरेंगद्राप 'नमः॥१५॥ जूतानंद्रायनमः ॥१६॥ वेशुदेवेंद्रायनमः।। १७ ॥ वेणुदालीद्रायनमः ॥१७॥ हरिकांतेंद्रायनमः॥१॥ हरिरस हेंद्रायनमः ॥ २० ॥ अग्निशिखेंद्रायनमः ॥ २१॥ यनिमा चंद्रायनमः ॥ २२ ॥ पूर्णेद्रायनमः ॥ २३ ॥ नविशिष्टेंद्रायनमः ॥ २४ ॥ उजलकांतेंद्रायनमः ॥ २५॥ जसपनेंद्रायनमः ॥२६ ।यमितगतीद्रायनमः ॥ २० ॥ मितवाहनंद्रायनमः ॥ २० ॥ वेसवेंद्रायनमः ॥ २५ ॥ प्रनजनेशायनमः ॥ ३० ॥ यो शायनमः॥ ३१॥ महापोत्रायनमः ॥ ३२ ॥ फासेंद्रायनमः - (५२) ॥ ३३॥ महाकालेंद्रायनमः ॥ ३५ ॥ सरूपेंद्रायनमः ॥ ३५॥ प्रतिरूपेंद्रायनमः॥३६॥ पूर्णनशियनमः ३॥ मापनदेंशय नमः ॥ ३० ॥ नैनो शयनमः ॥ ३५ ॥ महान्नीमेशयनमः ॥ ४०॥ किन्नरेंद्रायनमः||१॥नाकघुरुद्रायनमः ||३२|| तत्पुरु द्रायनमः॥४३॥नमहापुरुशयनमः॥४४॥ नंयमितकायेंद्रायनमः ॥ महाकार्यशायनमः ॥४ागीतरतींशयनमः॥जागीत- यशेज्ञयनमः ॥ ४ ॥ नसन्निहितेंद्रायनमः || | तामानि. केशायनमः ॥ ५० ॥ धात्रंद्रायनमः ॥ ५१ ॥ विधायेंद्रायनमः ॥५॥ज्ञपिंद्रायनमः ॥ ५३ ॥ शपिपालतेंद्रायनमः ॥५४॥ श्वरेंशयनमः ॥ ५५ ॥ महेश्वरेंद्रायनमः ॥५६॥ वसेंद्रा- पनमः ॥ ५७ ॥ उचिसालेंद्रायनमः ॥ ५७ ॥ हास्यद्रायनमः ॥ ५५ ॥ श्रेयद्रायनमः ॥ ६०॥ हास्यस्तेंद्रायनमः ॥ ११ ॥ उपदर्गेज्ञयनमः ॥ ६२ ॥ उपदगपत्तेंद्रायनमः ॥ ६३ ॥ महाश्रे- शायनमः । ६४ ॥ इतिचीसग्इंद्रनामपूजा ॥ अथ १६ विद्या. वीपदे १६ सुपारी चढावै ॥ रोहिण्यैनमः ॥ १॥ है. पझतैनमः ॥ ३॥ वजश्रृंपलायनमः ॥ ३ ॥ वज्जापुर्शनमः । ४ ॥ नचक्रेश्वर्यैनमः ॥ ५॥ पुरुपदत्रायैनमः ॥ ६॥ नका. यैनमः ॥ ७ ॥ ननदाकालपनमः ॥ ॥ गोयनमः ॥ ॥3 वायनमः ॥ १० ॥ नमहाज्वालायैनमः ॥ ११ ॥ मानव्य. मिः ॥ १५ ॥ वैरोव्यायनमः ॥ १३ ॥ नअवुप्तानमः || १४ नमानस्यैनमः ॥ १५ ॥ महामानस्यनमः ॥ १६॥ इति पो- श विद्यादेवी नाम पूजाः॥ ॥ अथ २४ यक्षपदे सो. परी चढावे॥ ॥ ब्रह्मशांतियनमः ॥ २४ ॥ नपा- यक्षायनमः ॥ २३ ॥ गोमेधायनमः ॥ २२ ॥ अनुकुटनमः २१॥ वरुणायनमः ॥ २० ॥ कुचरायनमः । १ए । य.
.
(५२)
शयनमः ||१|गंधर्वायनमः || १|| गमायनमः ।
१६ ॥ नकिन्नरायनमः ॥ १५॥ तुपातालायनमः ॥ ११॥ उप-
एमुखायनमः ॥ १३ ॥ सुमारायनमः ॥ १२॥ पराजाय-
नमः ॥ ११॥ ब्रह्मपनमः॥१०॥ अजितायनमः ॥ ५ ॥
विजयायनमः || 0 || मातंगायनमः ॥ ७॥ उकुसमायनमः ॥
६ ॥ तुंबुरनमः ॥ ५ ॥ रक्षनायकायनमः ॥ १ ॥ त्रिमुखा.
यनमः ॥ ३ ॥ महायशायनमः ॥ २॥ गोमुखायनमः ॥ १॥
इति.२४ यद नाम पूजा ॥
॥ श्रथ २४ यक्षसी नाम लि०॥
नचक्रेश्वयनमः॥१॥अजितबलायनमः॥२॥डरितायै नमः
॥३॥ कालिकायैनमः ॥ ॥ महाकाल्पैनमः॥५॥ नॅश्या-
मायनमः ॥ ६ ॥ *शांतायैनमः ॥ ७॥ नन्नूकुटयैनमः ॥ ७ ॥
सुतारकार्यैनमः ॥ ए ॥ प्रशोकायनमः॥ १०॥ मानव्यै नमः
॥ ११ ॥ नचंझायनमः ॥ १२॥ *विदितायैनमः ॥१३॥ अंकु.
शायनमः ॥ १४ ॥ कंदपार्यनमः ॥ १५ ॥ ननिर्वाएनमः ।।
१६॥ नवलायनमः१॥ धारिण्यैनमः॥१॥ धरणप्रियायैनमः
॥ १५ ॥ नरदत्तायैनमः ॥२०॥ गांधावनमः ॥ २१ ॥ ग्रं.
विकायैनमः ॥ २२ ॥ पदमावत्यैनमः॥ २३ ॥ सिशयकायै-
नमः ॥ २४॥ इति ॥अथ नव निधान नाम ।। ननसर्पका-
यनमः॥ पांडुकायनमः २॥ नैपिंगलायनमः॥ सर्वरलायनमः
॥ महापद्मापनमः॥५॥कालायनमः॥६॥ महाकालायनमः
.॥ ७ ॥ नमाणवायनमः॥ ॥ शंखायनमः ॥ ए॥ इति नव
निधान पदे ए कलश चढावै ।। अथ दश दिग्पालादि नाम ।
विजयस्वामिनेनमः ॥१॥ क्षेत्रपालायनमः ॥२॥ चक्रेश्व-
नमः ॥ ३॥ धरणेंद्रायनमः ॥१॥ पद्मावत्यैनमः ॥ १॥
उद्रायनमः ॥ १ ॥ अग्नयनमः ।। २.॥ यमाय नमः ॥ ३ ॥
.. . 4- (पशएं निशतायनमः || ४ || नवरुणायनमः ॥ ५॥ वायव्यैनमः ॥६॥ कुबेरायनमः ॥ ७॥ नईशानायनमः ॥ ८॥ नागायनमः || ब्रह्मणेनमः ॥ १० ॥ इति दशदिग्पालः ॥ सूर्यायनमः ॥ १॥ चंद्रायनमः ॥ २ ॥ ननोमायनमः ॥ ३ ॥ बुधायनमः ॥ ४ ॥ वृहस्पतयेनमः ॥ ५ ॥ शुकायनमः ॥ ६ ॥ शनैश्चरायनमः ॥राहवैनमः ॥ ८॥ तवैनमः ॥ ए ॥ इति नवग्रह म ॥ इहां वीस स्थानक मंस पूजनकी विधि विशेप लिखी. । सोनाममात्र स्थापन पूजनकी है, इस नपरांत मंगल प्रतिष्ठा बाकुलादिककी संपूर्ण विधी नवपद मंगल पूजामें लिखयाए उस मुजबही करणो । फेर विशेष विधा कराणी होय तो वि. जन गुरूकों पूर्व के करणी ॥ इति वीशस्थानक मंगल पूजा वि०॥ ॥ अथ रोहणीतप स्तवन लिख्यते ।। ॥ शाशण देवत सामणी ए मुफ सानिध कीजै, र नगति जणी समझाई दीजै ॥ मोटो तप रोहरा तो ए रा गुण गानं, जिम सुख सोहग संपदा ए वंचित फल पानं ॥ दक्षिण नरते अंगदेस है चंपानयरी, मघवा राजा राज्य करै नीता धयरी || पाटतणी राणी रूवमी ए लखमी रा नाम, 'पून जाया जिणें ए मनमें सुख पामे ॥ २ ॥ रोहिणी नामे का ए सबकुं सुखकारी, प्रागं पूत्रांकपरां ए तिण लागे प्यारी धै चंइतणी कला ए जिम पख ऊजवाले,तिम ते कुमरी धाय पांचे प्रतिपाले || ३ ॥ कुमरी रूपे रूवमी एघर अंगण वैरी; राजा खेलती एतिण चिंता पैठ ॥ तीन नुवन विच एदवा ही दूजी नारी; रंजा पनमा गवर गंग इस पागल हारी ॥४ न दीपै कोई इसो जिगने परणा-; प्रांख्या पागल साल! नेण चपन न.पाचं ॥ देशमा राजबी ए ततखिश तेमाया नुलो :
. (४३०) सपल सजाई सार्थ करी नरपति पिण श्राया ॥ ५॥ वीतशो राजातो ए कुमर सोनागी, कन्याकैरी आंखमी ए तिणसेत. लागी ॥ कन्ना देखे सकल लोक चढिया के पाला, चित्रसेनरे कंत्र ग्वी कुमरी वरमाला ॥ ६॥ देव श्रने देवांगना ए जपै जैजैकार रलियायत थयो देखने ए सारो संसार ॥ कर जोमी कदै लोक व खत कन्यारो जामो, वीतशोकनो कुमर थयो सिर ऊपर लामो ।। ७ ।। श्म विवाह थयो जलो ए दीया दान अपार ॥ घर पाया परणी करी ए हरख्यो परिवार || वीतशोक निज पूत्र नणी अपणो पाट दीधो, श्रापण संजम श्रादरी ए जगमें जस लीधो ॥ ॥ ( ढाल-प्रनु प्रणमुं रे पास जिणेसर अंजणो ॥ ए देशी)॥ तिण नगरी रे चित्रशेन राजा थयो, सुख माही रे केतलो काल वही गयो ॥ण अवसर रे आठ पूत्र दूवा जला, चढते पख रे चंद्र जिसी चढती कला ॥ (नलालो) चढ़ती कला हिव राय बैगे पास बैठी रोहणी, सातमी नूमी कंतसेती करै की मा. अतिघणी । आठमो बालक गोद ऊपर रंगझू राणी लियो, पूत्रने प्रीतम श्राख पागल देखता दरखे .हियो । ए॥ (चाल) इक कामण रे गोख चढी इष्टे पछी, शिर पीटेरे दीन स्वरे रोवे खमी ॥ बूढापण रे मन गमतो वालक मूओ, हुँ एकज रे तिण अधिकेरो उख हुन ॥ (नहालो ) उख हुयो देखी रोहिणी दिव कदै श्म प्रीतम नणी, ए नार नाचे अनै कदै कहो किम मोटा धणी ॥ एहवो नाटक आज तांई में कदे देख्यो नही, मुझने त मासो अने हासो देखतां श्रावै सही ॥ १० ॥ (चाल) ण वचने रे रीसाणो राजा कहै, तूं पापण रे परतणी पीमा नवि सहै । ए उखणी रे पूत्र मुटे तमपम करै, जब वीतरे वेदना जाणीजै तरे । (नखालो) जाण तरे न वात उखनी गरबगहली कामनी, इम
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( ५३१ )
कही राजा हाथ काल्यो वेदना बालकजणी ॥ सातमा मूंयमी
तलै नारख्यो तिसै दाहारव भयो, रोहणी हसती कहै प्रीतम पुत्र
नीचे किम गयो ॥ ११ ॥ ( चाल ) हिव राजा रे पूत्रतणे शोकै
करी, थयो मुरठित रे रोवै अति प्रांख्या नरी ॥ पम्तो सुत रे
सासणदेवत कालियो, कंचनमयरे सिंहासरा वैसारियो ।। (नबालो।
वैसारियो कर जो प्रागै करै नाटक देवता, गोदे खिलाचै के
हसावै पायपंकज सेवता । अपनो नूपत्तने अचंन्नो देख ए कारए
किसो, जो कोई ग्यानी गुरु पधारै पूधियै सांसो इसो ॥ १३ ।
(चाल) चिंतवतां रे चारनिया आया जिसै, राजा पिण रे पुदत
वंदाने तिसे ॥ सुण देशना रे पूरे प्रश्न सोहामणो, कहो स्वार्म
रे पूरवन्नव बालकतणो ॥ (नक्षालो ) बालकतणो नव नूप पूर्व
कहै ण पर केवली, रोहणी राणीनो जवांतर अने राजानो वर्स
॥ श्रीगुरु पासे पालै नव रोहणी तप आदरयो, तपतणे सगर
साधुलगते तुम्म नवसायर तरयो ॥ १३ ॥ (चाल) कहे राजा
रोदणितप किम कीजिथै, विधि नाखो रे जिम तुम पाते लीजी
॥ तब मुनिवर रे विधि रोहणीरा तपतपी, श्म जपेरे चित्रसेन
राजानगी ॥ (उल्लालो) राजाजणी विधि एह पै चं रोहणता
श्राविप, उपवास कीजै लान लीजै नली नावना नावियै ॥वा
रमा जिनवरतणी प्रतिमा पूजियै मनरंगसुं, इम सात वरसा सं
कीजै तजी पालस अंगसुं ॥१॥ (ढाल-वीर सुणो मोरी वीनतं
॥ ए देशी) ॥ तप करियै रोणितणो, चलि करिये दो कजमणं
एम ॥ तप करतां पातिक टले, तिण कीजे हो तपसेती प्रेम
'त० १५॥ देव जुहारी देहरे, तिण आगे हो कीजै वृक्ष अशोक
गुरानो बारम जिनतसो, नसा नेवज दो धरिये सहु थोक ॥ त
॥ १६॥ केशर चंदन चरत्रिय, कीने आगे दो श्राठे मंगलीक
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(४३२) विधसुं पुस्तक पूजिये, ते पामे हो शिवपुर तहतीक ॥ त०१७ सेवा कीजे साधूनी, वलि दीजे दो मुंह माग्या दान ॥ संतोषी साहमी, मनरंगे हो कर पकवान । त०१७॥ पाटी पोरी धना, मिस लेखण हो झिलमिल सुजगीस, नवकरवाली वीटशा गुरु आगे हो धरो सत्ताईस || त०१ए || चोयो व्रत पिण तिस दिने, इम पाले दो मन आण विवेक ॥ण विध रोहलि श्रादौ, ते पामे हो पानंद अनेक || त० २० ॥ (दाल-धरम करो जिनवर तणो । ए देशी) ॥श्म महिमा रोहणतणी, श्रीग्यानी गुरु परकाते रे॥चित्रसेन ने रोहणी, वासुपूज्य तीर्थकर पाते रे ॥ ३० ॥ इण परि रोहण श्रादरी, कपर कजमयो कीयो रे ॥ चित्रसेन में रोहणी, मन सूधै संजम लीयो रे ॥३० २२ ॥प्राचै पन्ने पादरी, दिख्या बारम जिन आगे रे ॥ वलि नानाविध तप तपे. धरमतणी मति जागे रे ॥ ३० २३ ॥ करि अणसण आराधना, लहि केवल शिवपद पाया रे ॥ जिन वाणी आणी दिये, प्रनु चरणां बित साया रे ।। ३० २४ ॥ मनमोहन महिमा नीलो, में तबियो शिव- पुरगामी रे ॥ मन मान्या साहिबतणी, दिव पुन्ये सेवा पाम :॥३० २५ (कलश)॥ इम गगन उगमुनि चंद्र वरसे ( १७२ खोय श्रावण सुदि नली ॥ में कही रोदणसणी महिमा सुगुरु ख जिम सांजली ॥ वासुपूज्य टली, .श्रीसार जिनगुण गावतां हिव सकल मन आस्या फली २७.॥ इति रोदणीतप स्तवन संपुर्ण ॥ ॥ अथ रोहणीतप विधिः ॥ ॥ शुन्न दिन गुरुके पास रोहणीतप ग्रहण कर, रोहणी दिन उपवास करै, पारमा श्रीवासुपूज्य स्वामीका पूज प्रागै अष्ट मंगलीक रचना करै, अष्ट द्रव्य चढाये, देव थंडना अमने थया सुप्रशन चित्तनीधि १ - बुध दिक करके धर्मोपदेश सुसे (श्रीवासुपूज्य स्वामी सर्वज्ञापनमः) इसका दो हजार गुणना करे. एसें सात वरस तप करऐंसें सुख शोनाग्य वघेगा, पूत्रादकका शोक संताप न होगा, विशेष अधिः कार स्तवनसें जागना ॥इति रोदय तप वि.धः ।। ॥ अथ छम्माशी तप स्तवन लिख्यते ॥ ॥ गौतमस्वामी रे दो निरमसी, श्रापो करिय पसाय ॥ महावीरस्वामी जै जै तप किया, तेहनो कहिसुं विचर ॥ वलिश वांड वीरजी सुदामणा ॥ १ ॥ नाव जण सेव्यां सुख करे, गातां नव निधि थाय ॥ वारे वरसां वीरजी तप कियो, दूर । सहु पाप ॥ ३० २१ वे कर जोमी ए हूं बीनवू, श्रीजिनशासन राय || नाम लियांयी नव निधि संपले, दरिशण इरित पुलाय ॥ व० ३॥ नव चोमासा जिनजीरा जागिये, एक कीयो उम्माश ॥ पांवे जसा उ बलि जाणिय, बारकेकोजीमाश | N०४ ॥ बहुनर माशवमण जग जीपता, उ दो मासी रे जाण ॥ तीन अढाई दो दो कीया, दो दोढ माशी वखाण ॥व० ५॥न महान शि वगति जाणियें, उत्तम एहना प्रकार | विचमें पारणो स्वामी नहि कियो, नदि कीयो चोश्रो श्राहार ॥ व०६ ॥ तिहुँ नपवासे प्रति मा वारमी, कीधा बारे जी माश ॥ दोयसे वेला जिनजीरा जा सिये, इस गुणतीस विलास ॥ ३० ॥ तीनसे पारणा जिन जीरा जाणिय, तीन गुणतोस पचास ॥ एदमें स्वामी केवल पा मिया, पाम्या मुगति आवास ॥ ३० ॥ कलश । इम वीर जि नवर सयस सुखकर अतहि उक्कर तप करी, संयम पाली कर्म टाली स्वामी शिव रमणी वरी। सेवक पनरों वीर जिनवर चरण विदित तुमतणा, संसार कूए पत राखो पापो स्वामी सुख घसा ॥ ७॥ इति उम्मासी स्तवन ।। - - - . M - सरे काज रे ॥ त्रि०६ ॥ तीनसे सार उपवास ते, ते ण पंचम (४३५ ) ॥ अथ छम्मासी तप विधिः ॥ ॥ शासनके अधिपती श्रीमहावीरस्वामी सर्वसे नलष्ट । म्मासी तप किया. इस वास्ते इस वखतमें संघयण बल पराक्रम के दीनपणे कसार उम्मासी तपनदि कर सकते तोनी सम्मा सीके १७० नपवास करणेसें जघन्य उम्मासी तपकै फलको जीव प्राप्त होता दे. जर देव वंदनादि किया करे, स्तवन उम्मासीतपा सुणै, इस स्तवनमें वीरप्रनूके सर्व तपस्याको संख्या कही है. (श्रीमहावीरस्वामीनाथायनमः ) इसका २००० गुणना कर. वीर प्रन्नूके नामका तीर्थ होय नहां यात्रा करको जावै, शुद्ध जावना नावै, शक्ति मुजब नद्यापन करै. इस तपस्याके प्रस्ताव लघुकर्मी जीव होकर अनंतसुखकों प्राप्त होय ॥ इति सम्मासी तप विधि॥ ॥ अथ बारेमाशो तप स्तवन लिख्यते ॥ ॥ दान नझट धरी दीजीय ॥ ए देशो ॥ विन्नुवन नाय कहूं धणी, आदि जिनेसर देव रे ॥ चौसठ इंद्र करै सदा, तुझ पदपंकज सेव रे ॥ त्रिनु० १ ॥ प्रश्रम नूगाल प्रनु तूं घयो, इस अवसरपणी काल रे॥तुम सम अवर न को प्रनु, तूं प्रनु दीनदयाल र ॥ त्रि०२ ॥ प्रश्रम तथैकर तूं सही, केवलज्ञान दिणंद रे ॥ धर्म प्रज्ञापक प्रथमतूं, तूंही हे प्रथम जिनंद रे ॥ त्रि० ३॥ अंतर अरि जे प्रातमतणा, काल अनादि प्रिति जेह रे॥ ते तपशक्तिये ते दण्या, पात्म वीरज गुण गेह रे ॥ त्रि० ४ ॥ तारी शक्ति कुण कंद सके, जेहनो अंत न पार रे ॥ हादश माशनो तप कर्यो, तेह अपानक सार रे ॥ त्रि० ५ ॥ एह उलट तप वरणग्यो, प्रागममें जिनराज रे || ते करवू अति आकरूं, तप विना किम कास रे ॥ श्रयसर श्रादरै कम विना, ते पिण जवि सुधितास रे॥
. (५३५) त्रि० ॥ ए तप गुरुमुख पादरै, शास्त्र अनुसार रे ॥ पनिक मणादिक नावथी, शुभ क्रिया मन धार रे ॥ त्रि०॥ चित्त स माधि शुन्ज नायश्री, धरे ताहरो ध्यान रे ॥ ते नर उत्तम फल लदै, कवि लदै उत्तम ग्यान रे ॥ त्रि० ए | काल अनादि संसारमें, ज न्म मरणतणा व रे ॥ ते लहे धर्म पाया विना, तप विना किम हुवै सुख रे ॥ त्रि० १०॥ दिव लह्यो नरजव पुन्यथी, वलि ल हो श्रीजिन धर्म रे । तखनी रुचि थर दे मुझै, दिव मिव्यो म नतो नर्म रे ॥ त्रि० ११ ॥नवर एक जिनराजनो, सरण दो ज्यो मुखकार रे ॥ कुगुरु कुदेव कुधर्मनो, में कियो हिवै परिहार रे ॥ त्रि० १२) दर्शन ज्ञान चारित्र ए, मोकमारग सुविशाल रे ॥जवर ने मुझ संपजै, तो फलै मंगलमाल रे ॥ त्रि. १३ ॥ श्रीजिनशाशन तप कह्यो, ते तप सुरतरू कंद रे । धन२ जे नर श्रादरै, काटे ते करमनो फंदरे ॥ वि०१४ ॥ कलश ! म ना जिनंदन जगत वंदन सकल जन प्रानंदनो, में थुएयो धन दिन पाजनो मुझ मात मरुदेवी नंदनो। संवत सुनेत्राकास निधि शशि नयर श्रीवाखूचरे, श्रीजिनसौलाग्य सुरिंद के सुपशाय विजय वि. मल वरै ॥ १५ ॥ इति श्री बारे माशी तप स्तवन संपूर्ण ।। ॥ अथ वार माशी तप विधिः ॥ ॥प्रथम तीर्थकर श्रीरुपनदेवस्वामी उत्स्ट वारैमासी तप स्था करी. इस वास्तै जव्यजीव बारेमाशी तपस्याका लावलायकै (३६०) तीनतेसा नपवास करें, जिस दिन व्रत दोय नस दिन देववंदनादि क्रिया करै, वारे माशी तपका स्तवन सुलै ॥ (श्री शंपनदेवस्वामीनाथायनमः॥) इसका २००० गुराना करे. तपस्या पूर्ण होनेसें सिद्धगिरी यात्रा करणेकों जावे, शक्ति माफक नद्यापन नहर करे, इस तपस्याके प्रशाद नव्यजीचोके कन्नी सुख .
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दोनाग्यकी प्राप्ति न दोय, सदा.तपतेज यदना रहे ॥ इति वारेम
शी तपस्या विधिः ॥
॥ अथ अठाईस लब्धि स्तवन लिख्यते ।।
|| उहा ॥ परामुं प्रथम जिनेसरू, श्रुइ मने सुखकार ।
सबधि अभावीस जिन कही, आगमने अधिकार ॥ १ ॥ प्रश्नयाक
रणे प्रगट, लगवतीसूत्र मझार || पन्नवणा श्रावस्यके, वारू सबधि
विचार ॥ २॥ प्रांधिल तप कर ऊपजे, लवधां अधावीत || ए
दिव परगट थरथसुं, सांजलज्यो सुजगीस ॥ ३ ॥.(ढाल || सफल
संसारनी ॥) अनुक्रमें देव अधिकार गाथातणे, लवधिना नाम,
परिणाम सरिपा नणे ॥ गेग सहु जाय जसु अंग फरस्यां सही,
प्रथम ते लवधि के नाम आमोसदी ॥ ४ ॥ जासु मल मूत्र पथ
समा जाणिय, वीय वप्पोसही लवधि वखाणियै ॥ श्लेष्म जपथ
सारिखो जेहनो, तीजी खेल्लोसह नाम तेहनो ॥ ५ ॥ देहना
मैलथी कोढ दूरे हुये, चोत्री जल्लोसही नाम तेहनो ग्वै || केश
नख रोम सडू अंग फरस्यां सही, रहै नही रोग सम्वोतही ते कही
१.६ ॥. एक इंश्य करी पांच इंघियतणा, नेद जाणे तिका नाम
संनिणना ॥ वस्तु रूपी सडू जाणियै जिण करी, सातमी लवधि
ते अबधिग्याने करी॥.॥ ( ढाल .॥ आव्यो तिहां नरहर ॥ ए
चालः॥) हिव आंगुल अढिय कणो मानुषकेत्र, संज्ञा पंचेहि तिहां
जे वसय विचित्र ॥ तसु.मननो चिंतित जाणे धूल प्रकार, ते झजू
मति नामे अहम सबधि विचार. ! ॥ संपूरण मानुपक्षेत्रे संज्ञा
वंत, पंचेंशिय जे .तसु मन वातां तंत ॥ सूखम परजायें . जाणे ।
संदू परिणाम, ए नवमी कहिये विपुलमती सुत्न नाम || ||
जिए लवधि.प्रनावें कमी जाय अाफाश ॥ ते जंघाविकाचारण
लवधि प्रकाश । जसु वचन. सरापै खियमें खेले प्राय, ए सबधि,
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(५३) ग्यारमी आसीविस कहिवाय ॥ १० ॥ सहु सूखम वादर देखे. लोकालोक, ते केवल सबधो बारमिय सदू धाक ॥ गणधर पद वं हिये तेरम सबधि प्रमाण, चवदम लवये करी चदै पूव जाण ॥११॥ तीर्थकर पदवी पामे पनरमी लवधि, सोलम सुखदाई चक वर्तिपद रिद्ध॥बलदेवतलो पद सहियै सतरमी सार,अहारमी श्राखा वासुदेव विस्तार ।।१२|| मिसरी घृत कारै मेव्याजेहसवाद, एहवी लहै वाणो नगणोशम परसाद । लणियोनविनूलै सूत्ररथ सुविचा र, ते कुट कबुद्दो वीसम लवधि विचार॥१३॥ एके पद नणियां आ वै पद लख कोम, इकबीसमी लवधी पयाणुसारणी जोम ॥ एके अरथे करी ऊपजै अरथ अनेक, बावीसम कहियै वीजबुद्धि सुविवेक. ॥१४॥ (दाल || कपुर हुवै अति कजलो रे ॥ ए चाल ॥ ) सो लह देशतणी सही रे, दादक सगति वखाण । तेह लवधि तेवीस- मी रे, तेजोलेस्या जाण ॥ चतुर नर सुपज्यो ए सुविचार ॥ आगमने अधिकार, च०॥ वारू लबधि विचार || च०॥एआंकणी ॥१५॥ चवद पूरबधर मुनिवरू रे, नपजंता संदेह ॥ रूप नवो रचि मोकले रे, लबध आहारक एह ॥ च० १६ ॥ तेजोलेश्या अगननी रे, उपशमवा जलधार ॥ मोटी लवधि पचवीसमी रे, शीतोले श्या सार ।। च० १७ ॥ जेरा सगतिसुं विकुरवै रे, विविध प्रकारे रूप ॥ सदगुरु कहै गवीसमी रे, वैक्रिय लवधि अनूप ।। च०१७ ॥ एकरा पात्रे आदमी रे, जीजाम के लाख ॥ तेद अस्कीम हानती रे, सत्तावीतमी साख ॥ १० १॥ चूरै सेन चकोसनी रे, संघादिकने काम || तेह पुलाक लवधी कही रे, अमवीशमी नाम ॥ च० २० ॥ तेज शीत लेश्या बिहुं रे, तेम पलाक विचार ॥ जगवतीसूत्रमें नापियो रे, ए त्रिदुनो अधिकार || च० २१ ॥ सन्नवणा श्रादारनी रे, कलपसूत्र गणधार ॥ तीनर ३२ मिली रे, ६ , . - चारु घाउ विचार || च० २२ ।। प्रश्नव्याकरणे सही रे. बाकी है वयां घीश ॥ साललतां सुख ऊपजे रे, दोलत हुवै निशदीत । च०२३ ॥ (कलश) संवत सत्तरेसे ग्चीसे मेरुतेरस दिन नसे, श्रीनगर सुखकर लूणकरणसर ग्रादिजिन सुपसानलै ॥ वाचना चारज सुगुरु सानिध विजय दरख विलासए, श्रीधर्मवर्द्धन स्तवन नयतां प्रगट ग्यान प्रकास ए॥ २९ ॥ इति ५० लब्धि स्तवनं ।। ॥ अथ अहाईस लब्धि तप विधिः॥ ॥ शुन्न दिन गुरुके पास २७ लन्धि तप ग्रहण करे. अन क्रमसें २७ नपवास करै, स्तवन सुणे. जिस दिन जो लंब्धिका रे पवास होय नसही नामका गुणना कर. तप पूर्ण होणेसें शक्ति मुजब नद्यापन कर, इस तपस्यासें निर्मल बुद्धि उत्पन्न होय, सदा आनंद रदै. इति २८ लब्धितप विधि संपूर्ण ।। ॥ अथ १४ पूर्व स्तवन लिख्यते ॥ ॥ ढाल || ये कर जोमी ताम ॥ ए देशो ॥ वईमान, चरम तीर्थकर, प्रह ऊठी प्रणमुं मुदा ए ॥ श्रुतधर गणधार, सूरि शिरोमणी,नमतां नव निधि संपदा ए ॥१॥ चवदै पुर व नाम, सूत्रै जूजूबा, वीरजिनंदे नापिया ए॥ ते दिव सुगुरु पर य, वरणविस्युं हां, आगममें जिम नपदिस्याए ॥२॥ पहिला ५ उत्पाद १, दूजो अयायणी २, वीर्यवाद ३ तीजो नमूं ए ॥ असि नास्तिप्रवाद ४, सत्ता जाणिय, नारग रयण पंचम ५ गिगुंए। ॥३॥ वो सत्यप्रवाद ६, सत्तम आतम , कर्मप्रवाद अहम गिरा ए । प्रत्याख्यानप्रवाद ए, नामे नवम, विद्याप्रवाद दाम को ए १०॥४॥ ग्यारम नाम कल्याण ११, प्राणायु बारमो क्रियाविशाल तेरम नणो ए १३ ॥ विंसार १४ इस ए कह्या, सास्त्र की में संग्रह्या ए॥ ५ ॥ ( ढाल २ ॥ श्री " जिनवर श्री श्री . . , नाम,
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( ५३ए )
विमलाचल शिर तिलो ॥ ए देशी ॥ ) नत्पाद पूर्व सोहामणो,
कोटी पद परिमाण ॥ पट नाव प्रगट वे ते जिहां, त्रिपदी नाव
विनाण ॥ १ ॥ सर्व व्यपर्ययतणो, जीव विशेष प्रमाण li दूनो
पूर्व अग्रायणी, नि→ लख पद जाण ॥ २ ॥ पद लख सत्तर जेदनी,
संख्या परगट एह || वीर्य प्रबलता जीवनी, नापी तीज तेद॥शा
चोथे पूर्व जे कह्यो, अस्ति नास्ति प्रवाद ।। पद संख्या सात लाख-
नी, सप्तनंगी स्यावाद ॥ ४॥ ग्यान प्रवाद पद पंचमो, सूत्रे श्रागयो
जोम ॥ मत्यादिक पण नेदसुं, पद संख्या श्क कोहि ॥५॥ सत्य-
प्रवाद उमो कहूं, नायुं सत्य स्वरूप ॥ संख्या पद श्क कोमनी,
नापी अगम अनूप ॥ ६ ॥ नित्यानित्यपयो इहां, प्रातम व्य
सुनाव ॥ व्यास पद कोम जेहना, सूत्रै पाएया नाव ॥ ७॥ कर्म
प्रवादतणो दिवै, प्रगटपणे अधिकार ॥ लाख असी पद जेदना,
कोमी ग निरधार ॥ ७॥ नवमो पूर्व कहुं हिवे, नामे प्रत्याख्या-
न ॥ लाख चोरासी जेदना, पद संरख्या चित थान | ए || अति-
शय गुण संयुत मणी, साधन साध्य निदान ॥ विद्या अनुपम
सातसै, कोमी वरस लख जान ॥ १०॥ कल्याण नाम ग्यारमो,
बीस कोम प्रमाण || ज्योतिषशास्त्र विचारणा, चोविद देव क-
ख्याण ॥ ११ ॥ प्राणायु पद वारमो, उप्पन्न लख इग कोमि, प्राण
निरोधन जे किया, शास्त्रे श्राएयो जोम ॥ १२॥ ख्यायिक्यादिक
जे क्रिया, बंद क्रिया सुविसाल ॥ पद संख्या नव कोमनी, तेरमी
किया विशाल ॥ १३ ॥ लोकतारविंड चवदमो, नामे अरथ नि.
.हाल ॥ पद संख्या इग कोमनी, लाख पचवीस संजाल ||१४ ॥
लोकप्रत्यय देखरा लणी, संख्या गज परिमाण ।। सोले सहस यरु
तीनसे, नर तयासी जाश ॥ १५ ॥ पूरव संख्या ए कही, गुण-
मालाची देख ॥ भागे बुधजन सोपज्यो, बाकी देश विशेष ॥१६॥
सोलाग्यसूरि मुणिंद इण पर को पूर्व वृतंत ए॥ संयत अनो। (५४०) (ढाल ॥ वीर जिनेसर नपदिसे ॥ ए चाल ) सूत्रे गुंथे गावर घरयै अरिहंत नाच रे ॥ ते श्रुतज्ञान नमू सदा, पाप तिमर जि- नासैरे ॥१॥ वाणी रे जिणंदनी,सुगज्यो चित दित प्राणी रे, तर रमणता अनुसरै, संपूरण गुण खाणी रे ॥ वा० २ ॥ विषय कपा तजी करी, ग्यान जगत नर धारी रे ॥ विधि संयुत जिनमति प्रनु मुख पाश जुहारी रे ॥ वा० ३ ॥ तप जप तंजम पादरी, श्री श्रुतज्ञान निधानो रे ॥ सद्गुरु चरण नमी करी, संवरजेन प्रधानो रे ॥वा० ॥ अक्षत से कजला, गुंहली सुंदर कीजैरे। नाण दसण चारित्रनी, दिगली तीन धरीज रे ॥ या०५॥ पूर्व व्रत इस परै, सुगुरु संजोगे सेई रे ॥ विधिसुं पुस्तक पूजीये, 'चित अति आदर देई रे ॥ वा० ६ ॥ इम तप संपूरण श्रयां, मन मणो दिव कीजै रे ।। घर सारू धन खरचने, नरजय खादो सी २ ॥ वा० ॥ पूग परत विटांगणा, पूरब नाम प्रमाणो रे । म करवाली कोसी, सेखण व्वसी जाणो रे ॥ वा० ॥ देहरै देव जुहारने, पारती मंगल कीजै रे ॥ सनात्रपूजा बलि साचयी, करा सुधारस पीजे रे || वा० ए ॥ण पर तप पाराधता, उरगति है। रण दे रे ॥ चवदद रङ सिरोमणी, जीव अक्षयगति बेदे रे ॥ ॥ वा० १०॥ तप पाराधन विधि नगी, पागम वचने जोइरे । जषियण पिण तुमे श्रादरो, ज्युं नवनमश न होई रे ॥वा०११॥ (कलश) श्म सपल सुखकर गच खरतर तपै रवि जिम क्रांत वरस दिनूं नयर श्रीवासून, ए स्तवन नणतां श्रवण मुचता है, :: मनवरित फलें ॥ १२ ॥ इति चयद पूर्व स्तवन संपूर्ण ।। ॥ जय १? पूरव तप विपि लिख्यने ।। ॥ पवदै पूर्वको तपस्याके पास को, जिस दिन की - (पुर ) र्वका नपवास होय उसी पूर्वका नामसे (२०००) गुणना करे, तवन सुणे, इस स्तवनमें १४ पूर्वके नाम और विधि सर्व लिखी इस मुजब विवेकी जीव गुरूलें समझ करै. यह तपस्याके कर- से ज्ञानावरणादि कर्मका कयोपशम होय, शुन ज्ञानका उदय होय ॥ इति १४ पूर्व तप विधिः ॥ ॥ अथ तिलक तपस्या स्तवन लिख्यते ।। ॥ दूहा || सासरा देवी सारदा, वाणी सुधारस वेल ॥ बाल- क हित जपो बगस्तिथै, सुधि सुरंगी रेप ॥ १॥ नवम अंग जिन पूजतां, मन लहि शुन्न परिणाम ॥ तप तिलके फल पामिये, दवदंती गुणधाम ॥ ३ ॥ (ढाल || वीर जिणेसर उपदिस ।। ए देशी ) कमला जिम कुंणपुरे, नुजवल नरपति नीमो रे ॥ पदमनी पदम सुवासना, श्वेतगज स्वप्ने नीमो रे ॥ पदमः १ ॥ परतख्य फल ए पुन्यना, प्रसवी सुता पूरै माशै रे ॥ दवदंती नाम दीपतो, गुणमणि बुद्धि प्रकाशै रे ॥ पद० २ ॥ चौसठ कला विचक्षणा, रूप गुणे करी रंना रे ॥देवगुरु धर्म दीपावती, व्रतधारी दृढ बना रे ॥ ५० ३॥ प्रतिमा पूजे शांतनी, देवे दीधी त्रिकालो रे ॥ मात पिता प्रमोदसुं, स्वयंवर वरमालो रे || १०४॥ उवमायाधिप श्रीनिपदनो, नल लिखियो निलामै रे ॥ श्रानंदसु पंथ श्रावता, पूरब पून्य उघामै रे ॥ ५० ५ ॥ मझा लरी, मधुरवकुंत दां वनमें रे ॥ मणि नाले तेज दिनमणी, जा यत देखी अदो मनमें रे ।। १०६ ॥ ग्यानधारी .गुरु को मिलै, पूनिय एद प्रसन्नो रे ॥ कर्म रलै मनि प्राविया, परीसह जीत मदन्नो रे ॥५०॥ पंच जीत पंच पालता, टालता उस्सद स. वला रे ।। संजम शुद संभालता, नद्यम शिवसुख कमला रे ॥१० ॥ हा ॥ मणि तेजें मुनि तस्ये, रथ की स्त्री भरतार ।। an रयणी तम (५४२) देवै तीन प्ररक्षणा, विधिसुं चरण जुहार | ए देशना सुण पा वन घया, ज्ञान सुधारस पाय ।। को तप परनय तिलक है, का यै श्रीमुनिराय ॥ १० (दाल-भरत नृप जावसुंए । ए देश )। मधुर स्वर मुनिवर कहे ए, नाणी गुरु सुपसाय, दीपक सदू लोकन ए ॥ कर्म शुनाशुन परनवै ए, इह नव फल निपजाय, करम गति वंकमी ए॥ ११ ॥ नदिनारा लव प्रागनो ए, नृप सुरो निर मल नाव, समकित साहीयो ए ॥ धर्मवती को नृपवधू ए, जा एयो दे तत्व प्रस्ताव, साची जिन वाचना ए॥ १शा चोथ प्रमुख नृप चूंपसूं ए, किरिया शुद्ध करी एह, नलै चित नावसुंए । ॥ नवांग पूजै तिलकसु ए, चाटै जिन चोवोस, रयरा कंवण में च्या ए॥ १३॥ तिलकरसें पामियो ए, समकित एद सतीप्त, जनम सफलो गिणे ए॥ नगवन तप विधि नापिदै ए, नल कहै बोध वरीत, पीहर पकायना ए॥ १४ ॥ आदिनाथ अरिहंतना ए, पट् उपवास कहीस, त्री चोवीदारस्युं ए॥चोथ दोय जिन वीरना ए, अजितादिक बावीस, प्राणा गुरु शिर वही ए॥ १५॥ पोषध श्रीस तीने श्रया ए, पूजन तिलक चढाय, तारक जगदीसने ए॥ उद्यापन संघ नक्तिसुं ए, जन्म सफल नरराय, सूधै मन साधिय ए।। १६॥ सुण वाणी समकित ग्रहै ए, पय प्रणमी गुरु वीर, चित कमाहीयो ए। इस पर जे नवि आदरे ए, थायै चरम शरीर, मूत सुख शासतोए ॥१७॥ (कलश) श्रीशांति दाता त्रिजगन्नातालविक ध्याता सुखकरा, इम सतीय साध्यो तप आराध्यो सुजस वाघ्यो शिवधरां ॥ प्रागमे श्राखै सरीय सापे सुगुरु ना सुण थया, शुरु ध्या नविक नावै विजय विमल जिनवर कया ॥ १०॥ इति । ॥ अथ तिलकतपस्या विधि । Hशुन दित गुरूके पास तिलकतपस्या ग्रहण करके तीस . .
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(५४३)
नेपवास करै. प्रथम श्रीज्ञपनदेवस्वामीके 7 उपवास करै, जब
(श्री रुपनदेव स्वामी सर्वज्ञायनमः ) इस पदका १० गुणना
करै. फेर श्री महावीरस्वामोके २ उपवास करें, तब ( श्रीमहावी-
रस्वामी सर्वज्ञायनमः ) इस पदका २००० गुणना करै, और श्री
अजितनाथस्वामीको श्राद लेकै ( २२) बाईस जगवंतोका बाईस
नपवास करे. जब नन२ नगवंतोंके नामसे दो दो हजार गुणना
करे, तर सर्व विधि स्तवन मुजब करे ।।इति तिलकतपस्या विधिः ।।
॥ अथ शोलिये तपका स्तवन ।।
वीर जिनेसर नापियो रे लाल, सहु व्रतमें सिरताज, नदि
प्राणी रे || कपायगंजन तप प्रादरो रे लाल, इणयी पातिक जा-
यनको. १॥ कोम वरप तप प्रादरे रे लाल, कोध गमावे
फल तास ॥ ॥ मान करे जे प्राणिया रे लाल, ते जगमें
न सुहाय || न० वी० २॥ व्रतमें माया श्रादरी रे लाल, स्त्रीपयो
पायो मल्लिनाथ ॥ ॥ रूप परावत कीया घणारे लाल, प्रा.
पाढनूति गणिका साथ || न० वी० ३ ॥ च्यार कपाय मूलगा
२ लाल, उत्तम सोले नेद ॥ न० ॥ श्म नव२ नमतो श्रको रे
जीव पामे खेद ॥ १० वी० ४ ॥ एकासण व्रत जे करे
रे लाल, लाख वरस उख हाण ॥०॥ नीवी व्रत दूजो कह्योरे
साल, ए धारो जिनवर वाण ॥न० वी० ५॥ यांविलनो फल बहु
कह्यो रे साल, उपजै सबधि अपार ॥०॥ नपवास करतांना
वसुं रे साल, पामे जयनो पार ॥ न० वी० ६ ॥ श्म दिन शोले
तप करो रे लाल, पूरण व्रत ए थाय ॥ ० ॥ देव गुरु पूजा करे
रेखाल, मन वंचित फल थाय ॥ न० ॥ नर सुर रिवि पिणजो-
गवे रे लाल, निश्चै मुगति जाय ॥ न० वी० ॥इति ॥
॥ अथ शोलिये तपकी विधि लिख्यते ।।
॥ क्रोध १, मान २, माया ३, लोन , यह च्यार.कपायमें
साल,
७ : (५४४) अनंतानबंधी १, अप्रत्याख्यानी२,प्रत्याख्यानी ,संज्वलन १, FREE मुजब एकेक कपायके च्यारनेदकरणेसें १६ होते दे,श्नोंकों दूरकर गेकों प्रथम एकासमा १, निधि २, प्रांवित ३, उपवास ५, इस अनुक्रमले १६ दिन तप करै, स्तवन सुगे, तप पूर्ण होरोसें यग्रा शक्ति नद्यापन करै ।। इति शोलिया तप विधिः ॥ अथ पैतालीस आगम तप विधि ॥ गुरुके पास शुन्न दिन पैंतालीत श्रागमतप ग्रहण करै, २ दूज, ५ पांचम, ११ ग्यारस, इत्यादिक ज्ञानतिथिके दिन अनुक्र- मसें नपवास वा एकाशणा करै, जिस दिन जो भागमका तर हाय नसी भागमका गुणना करै, सिद्धांत लिखावै, सिहांत सुशै, पढनेवालोंकों साहाय करै, अपणो शक्ति मुजव सर्व ठिकाणे ज्ञा- नकी वृद्धि कर (प्रणमुं श्रीगुरु पाय ) इत्यादि ज्ञान के स्तवन सुणे, सो आगे लिखा है, एसे तपस्याके ५५ दिन पूर्ण होणेते पैतालीस श्रागमकी पूजा करावे, मंदिर नपाश्रयमें ज्ञानोपगरण चढावै. इस तपस्या करणे मुर्खपणा दूर हो के नकी प्राप्ती होय ॥ 'अब ४५ आगमका गुणना लिख्यते ॥ ॥ प्रथम इग्यारे अंग॥ १ श्रीपाचारामजीसूत्रायनमः २ श्रीसुयगमांगजीसत्रायनमः ३ श्रीगणांगजीसूत्रायनमः ४ श्रीसमवायांगजीसूत्रायः ५ श्रीनगवतीजीसूत्रायनमः ६ श्रोझाताधर्मकथाजीसूत्रा० श्रीनपासगदशाजीसूत्रा० श्रीअंतगमदशाजीसूत्रा. .ए श्रीअणुत्तरोववाइजीसूत्रा. १० श्रीप्रश्नयाकरणजीसूत्रा' ११ श्रीविपाकजीमूत्रायनमः।। . ॥ अय पारै उपांग नाम १.श्रीनयवाईजीसूत्रायनमः २ श्रीरायपणीजीसुगमन श्रुइ आत्मा . - 0 (५५) * গালিগালা ४ श्रीपन्नवणाजीसूत्रापनमः । श्रीजंबुद्दीपपन्नत्तीसूत्राय ६ श्रीचंवपन्नत्तीसूत्रायनमः 3 श्रीसूरपन्नतीजीमूत्राय. छोकप्पियाजीसत्रायनमः ५ श्रीप्यवमिसियाजीसूत्रा० १० श्रीपुफियाजीसूत्रायनमः । श्रीपूप्फनूलियाजोसूत्राय० १२ श्रीवन्हिदसाजीसूत्रायनमः। ॥ अथ छ छेदका नाम गुगना ।। श्रीव्यवहारच्छेदसूत्रायनमः २ श्रीवृहत्कल्पजीसूत्रायनमः श्रीदसाश्रुतस्कंघजीसूत्राय० । श्रीनिशीग्रजीसूत्रायनमः श्रीमहानिशीग्रजीसूत्राय० ६ श्रीजीतकम्पजीसूत्रायनमः ॥ अथ दस पयमा नाम गुणनो ।। चोसरणपयन्नाजीसूत्रायन २ संधारपयन्नाजीसूत्रायनमः श्रीतफुलपयन्नाजीसूत्रायन 4 श्रीवंदाविझियासूत्रायनमः श्रीगा विडियासूत्रायनम० ६ श्रीदेवविक्कियासूत्रापनमः" श्रीधारभुवोजीसूत्रायनमः ८ श्रीगधाचारजीसूत्रायनमः श्रीज्योतिप्करंजीसूत्रायः १० श्रीमहापच्चरकाजीसूत्रा 1 मूल सूत्रके नामका गुणना । श्रीमावस्यकजीसूत्रोयनमः २ श्रीउत्तराध्ययनजीसूत्रायः श्रीधनियुक्तीजीसूत्रायन ४ श्रीदशमीकालिकजीसूत्रा० श्रीअनुयोगदारजीसूत्राय० २ श्रीनंदीमूत्रजीसूत्रायनमः ॥ अप पैतालीस आगम स्तवन लिख्यते ॥ । दूदा । चोवीसे श्रीतीर्थपति, नमूं देव प्ररिदंत ।। अर्थ हो गणपपुर, हादश अंग महंत.॥१॥ त्रिपदी नदि गणपति सूत्र अर्थ संजोग । अक्षररूपै सारदा, प्रा त्रिकरण योग । । टीका कर्ता जगतगुरु, सूत्र करै गणधार ॥ पंचागी युत वित नय निक्षेप विचार ॥ ३॥ उपम काल उनिहतें, नूने या 'ग ॥ पारसे लिखत कर, रचना रची अन्नंग ||m b. -- जागीय जो, वन्दिदंशा शश नाम ॥ नामयी अर्घ पिगरानो (५४१) खंदित अरु देवाई गणि, प्राचारज सय पंच ॥.चोरासी भाग लिखै, कोटि गंध तज खंच ॥ ५ ॥ काल दोपसे अब मिले, प्राग पैंतालीस ॥ ताको मुनि विवरण करै, माने विसवावीत ॥ ६ (ढाल ॥ जगतगुरु त्रिसला नंदनजी॥ ए देशी)॥ श्राचारांग परि सो कह्यो जी, मुनि प्राचार विचार || सुयगमांग दूजोप्रो जी पापंमी निरधार ॥ जंगतगुरु नाखै वीर जिनंद ॥१॥ दस मारा गंणांगमे जी, समवायांग संख्यात ॥ सहस उत्तीत जल प्रश्नना जी, नगवई अंग विकात || ज०२॥ धर्मकया जाता जी की दंस श्रावक व्रतधार ॥ दसानपासक तातमो जी, अंग को निर धार |॥ ज० ३॥ अंतगम केवली जे यया जी, वरणन अष्टम अंग ॥ पंचानुत्तर जे गया जी, अणुत्तरोवाई चंग ॥ ज०.५ ॥ अंगुष्टादिक प्रभनो जी, प्रश्नव्याकरण नाम ॥.सुख उखना. फल नापिया जी, सूत्र विपाके ताम ॥ ज० ५ ॥ अढार सहसभा चारांगमें जी, पद संख्या परिमाण ॥ वर्ण संख्याते पद हुवे जी, गण उगुण सब जाण ॥ ज०६ ॥ नववाई उपांगमे जी, कोशिक अंबम रूप ॥ वर्णन नगरी आदि दे जी, सांजले नविजन चूप ।। ज० ॥ सरिर्यान्न पूजा करी जी, जिन प्रतिमा नवरंग ॥ श्य नाव बिहुँ नेदसूं जो, रायप्रश्नी चित चंग || ज. ॥ जीवतो अनिगम सही जो, विजयदेव प्रस्ताव ॥ जीवानिगम तीजो कह्यो जी, सुर रुत बहु विध नाव ॥ ज० ए॥ पन्नवणा जाणज्यो जी, जीवानीव विचार || जंबूहीपनी-वर्णना जी, नाम यकी गुरु धारजि०१०॥ सूर चंद्र वियह गतीजी, पन्नती बिहुँ जाणकप्पिया कंप्पवमिसियाजी, पुफिया नाम वखाण ॥ ज० १.१ ॥ पुष्पचूसिया . सांजलता सुग्य धाम ॥ ज० १२.॥ (दाल २॥ रूपाली साड
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(५४० )
द्वाद गंगनी बूंद रे ॥ ज० श्रा० ५ ॥ अंग नपांगनी टीका, कर्त्ताने
नम निरनीका रे ॥ न० या० ॥ प्रथम शीलांगाचारी, श्रीअजय
देव वलिदारी रे ॥३० प्रा० ५ ||मलयगिरी गुरुस्वामी, इत्यादि
कने सिर नामी रे ॥न पा०॥ सामान्य विशेषे नाखी, निश्श्य वि
वहार कै साखी रे ॥ ज०मा०.६॥ उत्सर्ग वचन केश, अपवाद
बचनने ले रे ॥ न था० ॥ मनसु धारावो, मन वंटित स
गला साधो रे ॥ न०या० ॥ (दाल | मंगल कमला कर.ए
॥.ए देशी ) ॥ पैंतालीस प्रागमती ए, दिव तप विधः सुराज्यो
हित जणी ए ॥ दूज पांचम एकादसी ए, ज्ञानतिथि तपनी कम
जाय खसी ए ॥ १ ॥ शक्ति उते नपवास ए, प्राविल निविश्री ३
सास ए ॥ एकातण अथवा करै ए, इम पैंतालीस दिन पाचरे. ए
॥ ५ ॥ जाप करै दो हजार ए, देववंदन पूजन सार.ए । प्रतिक
मण करै दोनु टंक ए, पागम सुणै अर्थ निसंक ए ॥ ३॥ नजमो
हित चित्त करे ए,गुरुन्नक्ति चित्तसुं पादरे ए ॥ लक्ति करै सादमीतमी
एं, जे पढय पढावै ते नंगी ए ||॥ अन्न वस्त्र पुस्तक कर दान ए
तिण मनुष्य जनम परिमाण ए॥ ते पामे श्रुतज्ञान. ए, क्रमा
सदै पद निरवाण ए ॥ ५ ॥ (कलश ) शुल नंद सर निधि चंद्र
वरपै मांघ सुदि पंचमी दिने, वर नयर बीकानेर सुंदर वृदखरतर
पघणे ॥ गणधार कीर्ति सुरिंद पाठक रामणि शद्धिसार ए,
करिय स्तवना सुयःमहोदय सदा जयश्कार ए॥१॥ इति ।
॥ अथ. ११ गणधर तपस्या विधिः।
... || शुभ दिन गुरुके पास ११ गणधर तप ग्रहण कर."
न.पवास वा एकासणा करें, जिस दिन जो गणधर मादार
जका तप दोय नसी नामका..२००० गुणना करै ।।
::.;॥ अथ इग्यारे गणधरोंका. नाम गुणनो ॥
श्रीलतिगाधरायनमः
२, श्रीअमिन्नतीगएरापनमः
(५४)
• ३ श्रीवायुनूतिगाधरायनमः ४ श्रीव्यक्तनूतिगणधर्म
५ श्रीसुधर्मास्वामीगणधराय० ६ श्रीमंतिस्वामीगण
७ श्रीमोर्यपूत्रजीगणधरायन नः श्रीअपितजीगणधर
•ए श्रोअचलजीगराधरायनमः १० श्रीमतार्यजीगणधरार
११ श्रीप्रनवजीगराधरायनमः
॥ यह ११ गणधर लगवंत श्री महावीरस्वामीके
जातिके ब्राह्मण थे, विद्यमान हादसांगीके रचना कर
नये, इस वास्ते मंगल जाणके यह तपस्या करे. गा
की धाराधना करै, गोतमरास सुणे, पूर्ण होणेसे गणधरोकी
करावे, आवार्य उपाध्यायादिककी जक्ति करै, यथाशक्ति ।
नोजनसे सादमी चल करै ॥ति एकादश गणाधर तपति
॥ अथ सर्व तपस्या प्रथम गुरुके पास ग्रहण करै सो विष
प्रथम ५ साथिया कर (नमंतसामंत) यह गाया पढने
मुजय ज्ञान पूजा करे, हरियावदो पमिकमे, एक लोगस्तका
सग करे, पार के प्रगट लोगस्त केद, नीचा वैठकै मुंहपत्ती
है, दो वांदणा देवे, स्थापनाजी को खमासमण देई (जगवा
मुक तप गहलत्यं घेश्यं वंदावेदं) एसा कह चैत्यवंदन करे,
तुणं इत्यादि अरिहंतवेश्याणं अन्नचु० कद ५ थुई कहै,
गाथा कहके नीचा वैवके णमोचणं कदै, फेर खमा होके (
तिनाथस्वामी श्राराधना कोकिन ग्राम
(५५) येयांशांतिगृहे २ ॥१॥) पोठे श्रुतदेवताकी क्षेत्रदेवताकी नुवनदेवता- की स्तुति कानसग एकेक नवकारका करके अनुक्रमसें कहै. पीछे शासनदेवताका कानसग्ग एक न सकारका कर (पांपातिशासनंजे, सपप्रत्यूदनाशनी ॥ सानिप्रेतसमृध्यर्थ, नूयाचासनदेवता ॥३॥) पीछे समस्त वैयावृत्ति कर आराधनार्य करेमि कानसर्ग. अन्ननु एक नवकारका कानसग करे, पार के (श्रीशक्रप्रमुखायका, जिन- शासनसंस्थिताः ॥ देवानोव्यस्तदन्येपि, संघरदत्वपायतः) पर युई कदके नीचा बैठके नमोत्युणं कदै, जयविराय पर्यंत चैत्यवान करे. फेर खमासमण देके. (जगवन् अमुक तप गहरा करेमि कासगं) एक लेगस्तका कानसग कर, पार के प्रगट सोगरत- कद, खमासमण देके ३ नवकार गुणे. फेर खमासमान है। (इधकार नगवन अमुक तप ग्रहण कक उच्चरायो.जी). गुरु.कहे (उचरावेमो) पीठे (अहसंनंतेतुह्माणंसमीचे अमुकतवंउपसंपन्जा नाणंविदामि ॥ तंजदा दवन काल जावन दबनणं प्रमुरुतः सितम्भवा मनवा कासरा जावपरिमानावरी जान गदेशनगदिळामि जावग्लेरांनगालक्कानि सन्निवाएननविज्ञामि नावमलेणया केशरोगायंकादिपरिणामयसेण एसोमेपरिणामीनप- रिवातावमेएसतको अन्नमरापानियोगपां गणानियोगेपा बतात योगेशं देवालियोगेशं गुरुनिग्गदेशं विनोकतारेणं मन्नत्यणाजोगे सदस्सागार मदनरागारेशं सवसमादियनियागारेगा वोतिरानिमा) जो तप ग्रहण कर उसी तपका नाम सेके गुरुके पास दो प पाठ मुखे, गुरु नदी दोष तो यापनाचार्यजी समके तीन बार पर पार पदे, पीने गुरु कदे (दत्येणं मुने प्रत्येकं तनपेशं साम- . * गुरुगु तेहिंदुवादि नित्यारगपारगादोदि) एसो गुरु हो
(५१)
तो भाप मुखे करै. इति सर्व तपस्या ग्रहण विधिः सं
॥ अथ सर्व तप पारणविधिः लिख्यते ॥
प्रया ज्ञानपूजा करकै इरियावदी पमिकमे, अ
मुहपत्तो पहिलेदै २ वदिशा देवे (श्चाकारेण संदिर
तुनेअम्हं अमुक तप पारावेह) गुरु कहे (पारावेमो
मासमो० श्चाकारेण संदिस्सह नगवन् अमुक तप
करेमि कानुसगं अन्नबू० कहके १ नवकारका काउस
तिकी गाथा कहै, पौठे मोबूगं कहै, वेठकै नगवन
करतां प्रविधि पाशातनायें करी जो को दूपण. सा
मन वचन कायायें कर मिठामिठकमं. और ज्ञानन्न
नावसें किया दोय तो प्रमाण फल दायक होगा. गुरु
बारगपारगादोह) पीछे पच्चस्काण करै, अमुक तप श्रा
मिनं करेमि कानसर्ग अन्ननू० कदके ४ लोगस्लका क
प्रगट लोगस्त कहै, पीठ उपगरण पात्र नक्त पानादिक
क्ति करै, अपनी शक्ति मुजब जैनशास्त्र के पढणेवाले
पोवाले विद्यागुरुको नक्कि करै, साहमी वचल करे, पद
पो याचकोंका दान सन्मान करे।।इति सर्व तपस्या पा
॥ अथ उपधान तप स्तवन लिख्यते ॥
॥ श्रीमहावीर धरम पग्गामै rrrr
उपधान वह्या नर नारी, तेहनो जनम प्रमाण जी ॥ सु० ॥ ४॥ तप उपधान कहो सिद्धांते, जो नवि माने जेद जी॥ अरिहंतदेवा नी आण विराधे, नमस्यै नवर तेद जी ।। सु० ॥ ५॥ अघज्य घाट समा नर नारी, विन नपधाने होय जी ॥ किरिया करता प्रादेश निरदेश, काम सरै नदि कोय जी ।। सु०६ ॥ इक घेवरने खां नरियो, अतिघणो मीगे थाय जी ॥ एक श्रावक नपधान वदे तो, धन ते कहिवाय जी ॥ सु० ॥ (ढाल २) ॥ नवकारतको तप पहिलो वीसम जाण, शरियावदोनो तप वीजो बीत म प्राण ॥ण विहुँ उपधाने निश्चै नाण मंमाण, वारे नपवात गुरु मुख बेबे वाण ॥ ॥ पैंत्रीसम त्रीजो णमोचणं : उपधान, त्रिण वायण नगणीस तप उपवास प्रधान ॥ अरिहंतचेई. तप चो थो चोकम एद, नपवास अढाई वाण एक गुण गेह ॥ ए॥ पांचमो लोगस्त तप अपवीसम नाम ॥ साढापनरद पवात वायण त्रि रा गम ॥ पुरकरवरदी तप को उका सार, साढात्रण पवाते वारा एक सुविचार ।। १०॥ तिहाणंबुद्धाणं सातमो उपधान म ज, नपवास करै इक चोविहार ततकाल । एक वाणि करै वल गुरुमुख सरस रसाल, गवनायक पासै पहरै माल विशाल ॥११॥ माल पहरण अवसर प्राणी मन नरंग, घर सारू वारू खरचै धन बहु नंग ॥ अति नछव कीजै रातीजोगो दिल खोल, गीत गान गवा वै पावे अति रंगरोल ॥ १२ ॥ ( ढाल ३ ॥).ए साते. उपधान: विधिसों जे.वहै, ते:सूचो किरिया करै ए॥ खिरा न.करै परमार, जीव : जतन. फ़र, जि२ पगलां नरै ए ॥१३॥न करे कोष कपाय, इमर दसै नही, मरम केहनो नवि. कदै ए॥ नाणे घरनो मोह, नरूष्टी करे, साधुतणी रहणी रदै ए ॥ १॥ भीम सिझाय, करि पोरसि नगी, चंचे स्वर यो नदी ए॥
aur - । मन मोहे नाव एम, धनर ए दिन, नरजव मादि सफल सदी एं ॥१५॥ जे साते नपधान, विध सेती बहै, पहिरै माल सोहामणी ए॥ तेहनी किरिया शुद्ध, बहु फल दायक, करम निर्जरा अति- घणी ए ॥ १६ ॥ परनव पामे शाहि, देवतणां सुख, बत्तीसबद्ध नाटक में ए॥ लाल लील विलास, अनुक्रम शिवसुख, चढती पदवी जे चदै ए ॥ १७ ॥ (कलश) इम वीर जिनवर नुवन दिनयर माता त्रिसला नंबणो, उपधानना फल कहै उत्तम वि. य जन आनंदयो । जिनचंद युगपरधान सदगुरु सकलचंद मुनी सरो, तसु सोस वाचक समयसुंदर नौं वगित सुखकरो ॥१८॥ इति सात उपधान गर्मित स्तवन संपूर्ण । ॥ अथ संघ मालारोपण विधि लिख्यते ॥ प्रथम मालारोपणके मुहुर्नके पहिले दिन मध्यान समें सु. हागणस्त्री चांदी आदिके यालके अंदर कुंकुमका साथिया करके कार चावलोंका कर, पांच सुपारी १ नालेर घरकै माला फ्धराके सुहागरात्री अपणे हाथ सिर पर घरै, पीछे सव संघ समेत गीत गाते वाजिन वाजते गुरु पात प्राधे, सपवस्त्र) गुंहली करे, तर लियां गहुँलो गाने, पी गुरु नर्व सातसे वर्दमान विद्यासे मंत्रार वासोपसे माला प्रतिटित करे. यथा ।। होशमोगरिहंताएं । नहोलमोसिद्धाणं । नहीणमोप्रायश्चिाएं । उहीमोनवझाया । हीरानोलोएसबताइणं । नहोरामोधरह जगवन वदमाणसा- मिस्त || जएपिजये जयंते अपराजिए सबसिदिए नही ... स्वाहाः ॥ इति वर्द्धमानविद्याः॥ पी.वाजिन वाजते स्वस्थानके आये, बाजोट पर बाल रकै, धूप दीप संयुक्त , रात्रीजागररा. करें, श्रीफलादिककी नाचना करे, पीछे मालामाहक प्रजात समें प्रति कमण करकै पहिलेदय देववंदनादि करकै जिनपूजा कर. पी ...
मुदुलेकी वखत वाजिबादि चव संघ समेत गुरु पाप्त पावै,' श्रीफल रोक च्य हाथ में लेके पहले जो नांदकी धापना कर नांद, कहीये समोसरणका चित्रपट सो वमी ववसी पर मोक लपेटके थापे सो बस नांदके च्यारों खूणो पर ज्यार साथिया र चावलोका करके नारेल चर रोक मोदर वगेरे नेट कर. सा यों पर अच्छे विदामादि फल चढावे. पीवे मालाग्राहक चरव मुहपत्ती हायमें लेके गुरूके संग इरियावदी पमिकमे. पं श्रावक खमासमण देके श्रावकमुहपनी पमिलेहै, फेर खमातम देके चकारनगवन तुझे अम्मं संघपति मालाबारोहावलि देदवं मणि वासनिकेप करो. तब गुरु वासक्षेप करै, पीले फेर खमा मण देई तुझे अझं संघपति माला प्रारोहावणी देववंदावो, गु कहे वंदेह, श्रावक चं कड़ी गुरुके साथ देववंदन करै ॥ ॥ अथ देववंदन विधिः॥ '. ॥प्रथम खमासण देकेश्या नगवन् चैत्यवंदन करूं. गुरु कहे करेद पी गुरु चैत्यवंदन बोले. श्रावक एमोक्षुणं कदै अरिहंत चेन्याका कहके एक नवकारका कानसग्गकरै, नमोईसिद्धा०कदके गुरुस्तुति कहै.यथा ॥ अहंतनोतुसश्रेया श्रियंयध्याननोनरैः ।.. अप्पेंडीसकदा वेदि । रईसासहसोच्यते ||१|| पी लोगस्सनको सबजाए वंदणव० अन्नचु० कहके ? नवकारका स्तुति कहै. नामितिमंताय । शासनस्यनतासदायदहीच । श्राश्रियंते श्रियांते । जवतोजिनापातु ॥ २ 11. पीछे पुस्करवर० वंदन कहके १ नवकारका स्तुति कदै. नवंतत्वयुतात्रिपदी । मितारुविज्ञानपुण्यशक्तिमता, वरधर्मकी तिविद्या । नद्यास्यानगीझीयात् ॥ ३ ॥ पौने सिद्धाणंबुद्धात तः श्रीशांतिनाथ आराधनार्थ करेमि फाउसगं वंदपाव० अन्नई के एक लोगस्सका कानसग करे, नमोईत स्तुति कदै ॥श्री शातिश्रुतशति । प्रशांतिकोवशांतिमुपशांति । नयतुसदायस्यपदा । सुशांतिदाःशांतिजिने ॥ १ ॥ ततः शादशांगीपाराधनार्थ का वं० एक नवकारका० पारके नमोर्दवसि॥सकलार्थसिद्धिसाधन बीजो पांगासदास्फुरपांगा। नवतादनुपदतमहा। नमोपदाक्षादसांगीव ॥ ५॥ ततः सुयदेवयाए अाराधनार्थ करेमि कानसग्गं अन्नबु० कहके १ नवकारका० नमोई रिस०॥ ववदतीवागवादनी ।जगवतिकश्रु तगमेछु । रंगप्तरंगमितिवर । तरपीस्तुच्यनमइतिहः ॥ ६ ॥ ततः शासनदेवता निमित्तं करेमि का० अन्नबु०१ नवकारका. स्तुति। उपसर्गविलयवियना निरनीजिनशासनावनैकरता। हृतमिदस मिदी. तत्रूते । स्युशासनेदेवतालवतु ॥ ७॥ पी समस्त वेयावचकरा. वंशतिकरावं सम्मदिसिमाहिकराणं धनवू० १ नवकारका का. नसग्ग स्तुति०॥ संघवयेगुरुगुणोपनि।सुवैया । वत्यादिरुत्यकरणक निवाका । तैशांतयेसहनवंतुसुरासुरीनिः । सदृष्टयोनिखिल विघ्नं विघातदका ॥ ॥ प्रगटपणे एक नवकार नमोरा जावंतिचे० 'नमोईत्ति कहकै स्तवन कदै । मितिनमो नगव । अरिहंत सिद्धाचारियनवमाए । वरसवसामुणिसंघ । धम्मतिचयपवयणं स्स .१ ॥ सप्पणवनमोतहनगवा । सुयदेवयाइसुहयाए । तिवं संतिदेवयाय । सिपवयवदेशयाच ॥ २॥ इंदागीयमनेरश्या।. वरुणोवायुकुवेरईसाणा । वनोनागुत्तिदशन । मवियसुदिसाणपाला ३॥ सोमयमवरुणवेतमण। वासवाणंतत्यपंचएवं तहलोगपा- लयाणं। सुराई गायनवन्दं ||धा साइंतस्तसमरकं । मझमिपंचवः धम्मणुगणं लिक्ष्मिविग्धंगाजियागंनवकारउन्नणियं ॥५॥इति स्तवनं ॥ जयवीराय कहै पावै नगवान प्रागे पमदा करकेमालायाद क गुरुकू द्वादशावर्न वंदनायें वांदे, पीछे खमा होके कहे चकार . न० तुझे अझं संघपति मालामारोदावणी उद्देसावणी नंदीसूत्र ( ५५६) संजलावसी कानसम्ग करावो, गुरु कदे करेद. छ. संघपतिमासा शारो० नद्दे० करेमि कानसग्गं अन्ननु कहके १ लोगस्सका का० प्रगद लोगस्त कहे, गुरुजी कानसम्ग करे, पीवे मालामादक खमा समण दे श्चाकार लगवन् नंदीसूत्र संचलावो, तब गुरु. खमा होकर दायमें वासदेप लेके तीन नवकार सुणावै, नित्यागार गाहोद कहके मस्तक पर वासक्षेप करै, पीठ श्रावक खमासनस देके छा० संघपति माला उद्देसन, गुरु कद्दे उदेसनं, फेर श्रावन चामि० श्चाका०किन्नणामी, गुरु कहे वंदित्तापवेद, खमासमा देके श्चं तुझे श्री संघपति मालानदिन घामो अणुस नविहिर मासमणाणं इत्येणं सुत्नेशं प्रत्येणं तउलयेणं जोगरीजादि गुरु गुणावुढीजाहि नित्यारगपारगाहोद. फेर खमासमण देई तुझाच पवेरए तंदिसद साहुणंपवेमी, गुरु कदे पवेद, पीठे खमासमत देके तीन नवकार गुणता नया नांदकू तीन प्रदक्षिणा देवे वासदेर बढ़ावै. गुरु १ प्रदक्षिणा देवे. पावै मालामादक मूदपत्नी पमिरे समासमण देके श्चाका तुह्माणंपवेश्यं संविसदलगवन् कानसम् करेमी श्वामी चाका लगवन् तुझे श्री संघपति माला रे सामणी प्रारोदावणी करेमिकासगं अन्ननु० करके १ सोगरती काउसग्ग प्रगट लोगस्स कदै पीछे खमासमण देके वेसपो सरिसाद, दूने खमासणे घेतणो वावं, पीवे खमासमण देके जो विपि काता प्रविधि यासातना सागी दोय ते सहु मन वचन कापाय कनि. इति नांदकी क्रियापी मालाबादक नगवान के नय धंग नगर पिया मोदर वगेरे चदाके नमस्कार करे, मुकुनही यवत माजी धादिर जमीन सुनी होप तो नगवानके सनमु.२ ससंप मार समारदे, पीछे मालामादक गुरुके पास मानव अंग पूना कोना पिपा मोरर प्राविज्ञान निमित्त नेटपरेप गुम्बा माता - - (५५७) हाथमें लेके नवकार गुण, पीवैजो माला पहिरावे जिसको माला पहिरणेवाला यथाशक्ति पहरामणो करें.माला पहिराणेवाला नर्व- वासें करी संघपतिको माला पहिरावै, दोर्नु जणे ७ दिन तक सचिन कुशीवादिकका गुरु पासे पञ्चखाण करे, पीछे मंदरजी पर चढाणे- की धजा सो संघपति थालमें लेके मंदिरजीक बाहिरकर तीन प्र. दक्षसा देकर गुरु पास वासकेप पूजन कराके मंदिरजीके ऊपर चढ़ावै, पी सर्व संघके सामने गुरु धर्मोपदेस देबै, साधर्मी वात- ख्य करे ।। इति संघपति मालारोपण विधिः ॥ अप उपधान तप विधि लि०॥ नित्यकर्त्तव्यता यथा ।। ॥ नित्यकर्तव्यता कुछ तो शास्त्रोके लिखतलें कुछएक दे- देखणेमें आई जो परंपरा सो लिखते हैं । उपधानवाला श्रावक विगयोमेसें एक घोहीज लेता हे जर विकृती नहीं लेता १, उप. धानमें तीस वियोंकी नीवोतोंमेंसें एकही नीवीता लेणा का- रणयोगसे खांग वगैरे लेरोकी जयणा २, उत्कट च्यादिक नदी लेणा ३, घी तेलका वधारया साग नी नहीं लेगा धुंगारया हुवा लेणा-४, इरासाग नीलोती नदि लेणा ५, तलाढुवा पापम सीरा बमे वगेरे नहि लेणा ६, अन्न पुरपरोवाली रात्री प्रायश्चित्त करणेसें स्त्री शुरू होती है अन्यया नही , अन्न पुरपणेवालो स्त्री फटावस्त्र अथवा कारीलगावस नहि पहरे ७, नोजन कररोकी जगा मू बगेरे देणेवाली व्रत प्रायश्चित करे अखंमित वस्त्र रखे तो शुए, जितने वखादि नपकरण तप प्रवेशके प्रथम दिन पासमें. ररके दें वोसरनोगालोगको दोनों वखत पहिलेदसा फरशी १०,जीमराके विकागजोजो थाली कटोरा वगेरे रस्के.वो सब लोजन करे जिस दिन पादोनपोरतीम पहिलेदशाकी वखतही पमिखेडया तरी बखत अन्यदा नहो.११, कदाचित् दार कुंगल.दिक गदया अपरो, (५५) जारीरसें. तारके अपणे घरादिकमें रखा होय तब- विना नपधान बाली जो स्त्री अपहरी पोसा लिया हुवा होय तिसके दायरे तका दिनका नदी वह नपधानवादाकू देवै नर वोदी स्त्री प्रजात नमें ननके कहे मुजय विकाणे घरदेवै १२, उपधानमें सर्व वस पाप अथवा मालकणके हाथसें पमिलेह्यां शुद्ध होय १३, सब कैया अनुष्टानादिक यादेस निसादिक मालकणके आदेससे शुद्ध होय १४, क्रिया अनुष्टानकी करावाली मालकरा जी दोनुं बखत किमण करै रात्री प्रायश्चित्त करै सात वेर देव वांद तब शुद्ध होया अन्यथा नही १५, रजस्वलाके तीन दिन तपमें नहीं गिसे ताय १६, महास्वध्याय संबंधी प्रासोज सुविकी तथा चैत्र सुविकी तम आठम नवम दिन तीन तपस्या में नहीं गिरो-जाय १७, तिक्रमणमें प्रन्नात समें नवकारसीकाही पञ्चरकाश करे पीछे फया करती वखत गुरुके पात उपवास र अथवा प्रांति नीवी ३ अथवा एकासका ५ करै १७, पचरकाश पारती खत पड़ली नवकारसी पार पी3 रवासादिक पार १५, पदने उपपान तप ग्रहण करके दोनों दिन नंदी के आधारी वाती दे इस वास्ते अपहरी पोसा वरा नहि आता इस स्तेि तीसरे पदरकी पहिलेदण किये वाद सर्वोपगरपाोफू पkि. दके रात निभै पोसा लेगा २०, प्रतातसमें उपधानवाही गुरु: पास आपके हरियावदी पहिलेह के पोषय वपुन सामापक सेके र पहिलेदणा र अंग पहिलेदणा करे, पीवे मुदपनी पहिले. के (नदीपमिलेदरासंदिस्सा नहीपहिलेदणकरूं) एसे खमातय य, देवे पीके ग्व वंदन दिये वादः समासमा दश देवे उसका म एसे में वहुवेखसंदिस्साउं १ पहुवेखकर वेसमोसंदि० वैसयो सिझायसं० मिनायक० पांगरयोसं० पांगरमोमिनु .
' (५५)
कहासपोस० कासयोपमिग्ग९) एवं१०॥ २१, पीते वंदन दिया
बाद सुख तप पृचा २२, सांझकूनी यही क्रिया करणी लेकिन
इतना विशेष हे पट पहिलेहणा ने अंग पमिलेहणा तो करै परंतु
नपधि पहिलेद्रण नही करै, पीछे गुरुवंदन व दिये वाद खमासमण
दस देव (दीपमिलेइणसंदिस्ता नहीपहिलेदणकरू सिझायसं०
सिझायक वैसण संदिस्सा वैसोचा) वाकी पदवीकी तरै २२,
न्यारा पमिकमणा दोणेसें पालीवंदना सुखतपपूना पर्यंत क्रिया
सब करदेना २३, माला पहरणेमें सांझकू माला मंत्रायके अपने
घर रात्रीजागरण करके प्रनातसमें आचार्य पास माला पहरणी
तिसके बाद दिन दश तक दशाहिका करणी उदां पोसा नही
लिया हुआ जी हे तो जी तिविहार एकासणा करतानया निरा-
रंली दोकर रदै २४. सन्नी नपधान नत्कृष्ट विधिसे वदना, नसके
अन्नावमें श्रावक एकांतर उपवास नर साधुषोंने नपवास आमल
निवी एकासणा करके नतनेही नपवासकी संख्या पूर देशी लेकिन
दिन संख्याका नियम नहीं दे ॥ इति नित्यकर्त्तव्यता समयसुंदरो-
पाध्याय कृत संस्कृतोपरिअस्मद् कत्त लापा संपूर्ण ।
॥ अथ उपधान तप विधि लिख्यते ॥
पंच मंगल श्रुत नवकार जिसका उपधान वहणेवाला बारे
उपवाश अथवा चोवीस बिल ३५ नीवी अमतालीस एकासणा
करके १२ उपवातकी पैठ पूर कर पी पांच अध्ययनकी वाचना
नमो अरिहंतागंसें लेके नमो लोएसबसाइणं तककी १ वाचना
एक दिनमें सेवे,तिसके बाद तीन अध्ययनकी वाचना एसोपंचनमो.
कारो १,सबपावप्पणासमोर,मंगलावससि पढमंहवमंगल एवं
३, अध्ययनकी दूसरे दिन एक वाचना करै, फेर इस नवकारके आठ
अध्ययनों की एकही वाचना एक दिन में लेवे तो उवतो यांविल करे,
केर तेला करे, तेलेके पारणे आंपिल करै, फेर तेला कर, फेर आदि
न करे,फेर तेला कर पारणा करके आठ अन्ययनोकी एकही दिनमें
चनालेवे. पाठांधिल ३तोन तेला मिलापले नपवास १२जये,
'द पंच मंगल नवकारका पहिला नपधान प्रविधिसे करे तो पो.
२० वीस करै उपवास १२ करे, विधितुं वहे तो १६ पोसा
पवास १२॥ यह पहिला वीसमतप २०॥
अब दूसरा शरि
विदीका नपधानमें आठ अध्ययन तीन अंतकी चूला उसमें नी.
गलेकी तरेदी १२ उपवासादिक पीठे चाकारेणसंदिस्तहसु .
र जेमे नीवाविरादिया तक एक वाचना लेगी, एगेंदियासे खे-
र गमिकानसग्गं तक दूसरी वाचना देणी, नर एकही. वाचना
सी होय तो पहली तरे आठ प्रांविल ३ तेला करके लेवै ॥३.
पावहिया श्रुतस्कंधका तप वीसम.नामका अविधिसे पोसा २०
वास १२, विधिसुं वहे तो पोसा १६ नपवास १२॥
तीसरा नावारिहंतका तीसरा नपधान नगणीस नपवासकी पै.
रकर वाचना ३ लेवे सो इस मुजब. पहली १ तेला कर पीछे
तुएंसे लेकर गंधहवी तक पहिलो वाचना लेवे, फेर १६
दिल करे, लोगुत्तमाणंसें लेकर धम्मवरचानरंतचकवट्टीण तक :
। वाचना सेवै २, पीने लोले प्रांधिल करके अप्पमिहयवरणाश
लेकर सतिविदेणवंदामि तक तीसरी वाचना लेवै ३. यह ती.
'. उपधान नमोधुराका पेंत्रीतम नामका जिसमें उपवास
विधिसुं वहे तो पोसा ३५, अधिधिसुं करता पोसा
॥ अथ चोथा स्थापना अरिहंत श्रुतस्कंधका
गन अध्ययन तीन जिसमें पहली १ नपवास करांविल तीन
अरिहंतचेश्याणं हांसे लेकर वंदरावत्तियाए अन्नवनप्तसी.
अप्पाणयोतिरामि तक र वाचना लैणी, यह पापनारिदतका :
१
गस ॥
घोथा नपधान चनकम नामका जिसमें पोसा ४ नपवास शा भदाई॥ ॥ नामारिहंत चनवीसत्येका पहले तेजा करे, पी. लोगस्तनकोयगरे दांते लेके चनवीसंपिफेवली तक पहली वाचना. सेवै, फेर वारे प्राविल करके उसनमजियंचवंदे शहांसे लेकर पास. सदवाइमाणंच तक दूसरी वाचना देशी, फेर तेरे दिल करके एवम- एअनित्युबासे लेकर सिद्धासिद्धिममविसंतु तक तीसरी वाधना. वै. ए नामारिहंत चवोसत्येका प्रभावीसमनाम तप विधिसु व. दतां दिन २० पोसा २० उपवास सादापनर एकांतर कर, अवि. धि करता दिनप्राईस पोसा२० उपवास सादासतरै ॥५॥ मुत्रार्यश्रुतस्कंध पदली . उपवास पीठ ५ श्रांवित पीठ वरदीवसे लेकर सुयस्सन्नगवळकरेमिकानसग्गं तक एक वाचना देशी. यह उमा नपधान श्रुवार्थक नाम उक्कम पोसा ६ नपवास सादातीन ॥६॥ ॥ अथ तिसर्थकश्रुतस्कंध सातमा नपधान पोसह समेत चौविहार उपवास १ करे, पीठे सिक्षणवुशणसे ले. के तारेश्नरिवनारिवा तक एक वाचना देगी. यह सातमा उपधान मालाका तप ।। ३ ।। . ॥ अब उपधान तप प्रवेश विधि लिख्यते ।। । ॥ जब वहोत श्रावक प्रयवा वदोत श्रावकपया उपधान बहे तब तो संघके नामसे चंद्रमा अचा देखणा, संघकी कुंजरासा है. अगर एक श्रावक अयवा एकही भावकसी उपधान वहे, तो अपसे नामसे चंद्रबल लेवे तथा नपधानवादी सांज वाचनाचार्य पास आयके इरियायही पनिझमके खमासमण देके कहे (अमुक उपधान तपे पवेतह) गुरु कदे (पवेसामो, नवकारती करणा अंग मिलेदण. संविस्साणा)तब नपधानवादी कहे (तदत्ति) दामा नमण दिवे वाद चोवीदार करें, चाहेपाणी पीवे वा अश्रवा नोजन (५५) करो व्यवस्था नही है, अथ किसी भी कारण करके समकू खना- सणं नही दिया होय तो तब पमिकमरोके वखतसे पहली पिसी रातकूनी खमासण देशा काल वखत पमिक्कमणा करणा नवकार रसीका पञ्चकाण मालकण पास करणा पीठे सूर्य उदय नये बाद वाचनाचार्य पास आणा. तहां पहले दो नपधानमें (नवकारके ar शरियावदीके) तो प्रारंनमें अवस्य नंदीकी स्थापना करणी ar नत्पनी इन दोनों नपधानोंका नंदीमही करणा. इस नपरांत बाकी उपधानोंमें नंदीका नियम नही हे. तिसके बाद प्रजातात पहले उत्क्षेप करणा, तिसके बाद पोसा सामायक सेणा, पी को वादगा देके पञ्चरकाण करणा, फेर मुहपत्तीपूर्वक सुखता पूछा वांदगा दोय देवै ॥ इति नपधान तप प्रवेश विधि । ॥ अय उपधान तप उन्ोर विधिः लिख्यते ।। . .... || पहले रियावदी पमिकमके मूदपनी पहिलेदके दो बार णा देवे, खमासण देके उपधानवादी कद्दे (पदले नुपधानमें पत्र मंगल महासुपस्कंध तवं नरिकवद).गुरु कदै (नस्किवामो),पदवे पंच मंगलनपधान महाश्रुतकंध नखेवावशियं नंदीपवेसावशियं कानसम् करावेद, गुरु कहै करावेमो. पहले उपधान पंच मंगल महासुपर उस्केवावशियं नंदिपेवसावणियं करेमिकासगं अन्नचनसासिएर त्यादि काउतागचंदेमुनिम्मसयरा तक चिंतये, पार के प्रगट सोगत कहे,पीठे खमासण देके पहले उपधान पंच मंगल महा श्रुतसंप उस बांबशियं वेश्यावंदावेह, गुरु कहे वंदायेमो, वासक्षेपंकराचा रु. कदे करेमो. पोवे. वासकेपपूर्वक संपूर्ण चैत्यवंदन करे. इसे स का इन्क्षेप नंदीमंदी करणा बाकी उपधानोके विप सोजाका झेप जब तो नंदी में करे जो नंदी नदी यापे तो प्रातसमें प्रवेश उपयानों में उत्केप नाशना . इतना विशेष हे पदखे दो उपाय . ( ५६३) के दिन तक्षेप करणा, लेकिन जो जो उपधान बहे उसर का ना मोच्चारण करणा ।। इति जुत्केप,विधिः ॥ ॥ अथ वाचना विधिः । ॥ सांझकू पहिले चोविहारका पञ्चस्का कर रियविहीं पमिकमके मुहपत्नी पमिलेहके दो वांदया देवै पहले उपधान पंच मंगल महा श्रुतस्कंधका प्रथम वाचना प्रतियस निमिनं करेमिका उसग्गं श्रन्न०कहके कानसग सागरंवरगंनोरा तक लोगस्स विचारे, पार के प्रगट सोगस्स कहे, दोषखमासमण देकेश्चाकारेणसंविस्तह प हिलै उपधान पंचमंगल० प्रथम वाचना प्रतिग्रहणार्थ चेश्या वं; दावेद, गुरु कहे वंदावेमो. वासदेपकरावेद, करावेमो. पी गुरु वासकेप करे, पीकै चैत्यवंदन करे, पीवै खमासण देके उपधानवा; ही दोनुं हाथों में मुदपत्ती लेके मुखकू ढांककर मार्शवनतगात्री दोयके वार तीन पांचों अध्ययनोंकी वाचना देवे, वाचनामें मिशामिक एसे सब जगे वाचनानिसाप जाणना॥१॥इति वाचना विधिः।। ॥ अय तपः संपूर्ग क्रिया निक्षेप विधिः ।। ॥ अथ तपस्या पूर्ण दोप उस पाखरी दिनको सांझकू चौविहार करके अथवा प्रजातसमें रियावही पमिकमके मुइंपनी पहिलेदके दो वांदणा देके उपयानतपवादी कहै-श्नाकारण तुर्को अंन्दं अमुक तवंनिस्किवद, गुरु कहे निस्किामो. फेर खमासण देके कदे-चाकारेण संदिस्सद नगवन् अमुक तप निस्किवणवं का उसगं करावेद,गुरुकडे करावेमो. श्वामि० अमुक तप निस्किवण करेमि कानप्लग्गं अन्नत्यू, कहके एक नवकारका काउलग करके खमाता देवे, अमुक तप निस्किवण वेश्या वदावेद, वंदावेमो गुरु कहै. पी संपूर्ण चैत्यवंदन करै ॥ इति निक्षेप विधि । • !! अय परिक्षा विषय पारण विधि लिस्बटे . मन्नातसमें गुरुके पास आयके न्यारा प्रतिक्रमण किया इस (५६५ ) धास्ते मुदपत्ती पमिलेदके वंदन व्व देवे (दो वांदणा देवे इस • वय वंदन कदतै दे) गुरुके साथ पमिकमणा कीया होय तो वा. विशा दोयही देवै, पीते गुरु कहे पवेयणंपवेद एसा कहके कप झपुरसोविगयपारणयंकरेदनि, पोलै भपणी श्वानुसार पञ्चरकाश- फरे पी गुरूके सामने कद्दे उपधानमें धन्नक्ति प्रासातना का पोय तस्त मिहामित्रमं ॥ इति ॥ ॥ अप समाश्रमण विधि लिख्यते ॥ । उपधान वहणेवाला प्रन्नातसमें गुरु पास मायके गुरुकी प्राज्ञासें शरियावदी पमिकमके आगमन झालोचकर पोसासोमायक के दोय खनासणपूर्वक पहिलेदणा र अंगपमिलेदणा की, पीले मुदपत्नी पमिलेहके पहिले खमासरासें नदीपहिलेदणसंदिस्साएम, दूसरी खमासण देके नहीपहिलेदणकरूं, पौठे मुदपनी पहिलेदके गु रूवव वंदन देवै पीछे गुरु कहे-पवेयणं पवेयदा उपचानवादीकहै. चा० अमुक उपधान निमि निद्वयातयंकरावेद. गुरु कदे उप मासे. यांवले निरुक्षेति एकाशणे, एसा कहे. पीचै दश खमासणत अनुकमसे कहै-यहुयेलंसंदिस्सायेमि , पहुवेकरेमि २, वसन मंदिसावेमि, वरस ठाएमि ४, सझायंसंविस्तापमि ५, सभा यंकरेमि ६, पांगरणोसंदिसा , पांगरणोपभिग्गज, कासगो. मंदिस्सा ए, कमसोपमिग्गहू १०. पीछे मुद्दपनी परिसेदो ।। यांदणा देवे. गुरु कदे मुखतप, उपधानवादो कदे, तुमारे प्रसार । इति मनात विधि ॥ अव तीसरे पदरकी पहिलेदणा जपे का स्थापनाके आगे मावशी दुकमसें रियायदी परिझमके पर ग्वमासणसे पनिवेदश करूं ।, दूसरी खमासरासे पोसहसास माई २, एसा कदके मुदपत्नी पम्ति, एसे दो समास र मंग पम्सेिदया र मुझपनी परिरेशां मंग शम ( ५६५), कटिपष्ट (अर्थात् करादोरा जागना) एसा गीतार्थ कहते हैं. पी वसति प्रमार्जकर तहां जो उत्सही दिन लोजन कीया होय तब तो पहरे वस्त्र पहिलेहे, वाकीके अवशेष वस्त्र नहीं पमिलेहे, जो उस दिन नपवास होय तव तो एकत्ती वस्ख नहीं पमिलेहे. पीछे गुरु पास पायके इरियावही पमिकमके पमिलेहणा १, अंगपहिले हणा २, फेर गुरूके सामने करे. पी सिझायसंदिस्साएमि सिज्ञा यंकरेमि आठ नवकार गुणे. पी मुहपत्तो पमिलेहके उव वांदणा देवै. पी त्रिविहार अथवा चोविहारका पञ्चरकाण कर इस खमा सण अनुकमसे इस मुजब देवे-नहीपमिलेहणसंदिस्सा १, ही पमिलेहणकरुं २, सिझायसंदिस्साई ३, सिझायकलं , वश्सयों संविस्ता ५, वैसशोग, ६, कहातमोसंविम्सावं, कासयोप मिग्गहुँ , पांगरणोसंदिस्सा, ए, पांगरणोपमिगहुँ १०. पीठे मुह पत्नी पहिलेदके दो वांदणा देकर सुखतप पूर्वे, पोलै सर्वोपगरण पहिलेदे, मातृका (पालसिया) प्रमुख पहिलेहै, तथा जिस दिन भोजन करै उस दिन पूण पहरकी पमिलेहणकी वखत थाली के टोरादिक सर्व सपनोगके पात्रादिक पमिलेहै, उपवासके दिन नहीं पहिलेहे ॥ इति तीसरे प्रहर क्रिया विधि ॥ तथा. पाखीपनिकम वाम असिझाशका कानसम्ग नही करे तो पावती परकी तक सर्व सिघातकी असिझाई होय, इरियावहीका पाठ जी गुण्या नही सूझै. इस वास्ते प्रतिझाईमें नो असिझाईका काउसग्ग करणा. युगप्रधान श्रीजिनचंद्रसूरजी महाराजने महोपाध्याय श्रीतागर बंगशिकू.पूग तव एसाही जवाब दिया योगारंनकी यह विधी है। हां चनमासीमें योगारंनमें वर्षकी महीने की शुद्धिका मुहूं से नहि देखणा, दिन शुरू देखणा । मृधुवचरक्षिपः। वारेनोमं शनिविना ॥ आघाटनंतपोनंया । लोचनादिसुन्नर ॥१॥ इति - -- -- - .
भाचार दिन करे । || अय उपचान तप विवरन गाया ! . ॥ श्रीमुहपत्नीगन्नासं । अचारसयासम्मिपमिजेदा ॥ दंगे पनेसोलत । कप्पेपणवीसगोधमा ॥ १ || पणवीसचोलपट्टे । गुरु कंबलतदयचेवसंथारे.॥ कासणेप्रभारसाजदयपंवेव ॥२॥इति। प्रतिलेखणा विचारः ॥ पणनववासायामः । अध्यकुणादयध्मयते ॥ नवकारनवहाणं । इत्तियमित्तरियाए ॥।॥ सकळयमितदएगे। मधमविलाणवत्तीतं ॥ अरिहंतचेश्यचए । चनत्यमायामतिय व ॥ २॥ चनवीसचएमम । मेगंपरावीतदंतियायामा .. ॥ नार अयंमिच आयामापंचनवहाणं .॥ ३ ॥.चवीसंदववाता ।। गातीअंधिलाणसवंग ॥ पंचोत्तरंचपोसहसप । मुवहाणेसुजाणेसु । ... बारसबारसएगो, पणवीसपद्वापारा उन्नरस ॥ अध्यनववा । सबंगसचनसही ॥५|| नवकारसहयपोरसी । पुरमयवहए। नंतेहिं ॥ गाणयनिविगई । रिलेहिंअखं वलेणंच...६ ॥ पण साचनवीसं । सोलसचनशहिग्राहिकमेणं ॥ चनहियएगेणय मायरणादोश्चयवासे ॥॥ इति नपधान तपोगायाविधि संपूर्ण ॥ अथ कृषिमंडल. मंडल पूजा लिख्यते॥ ॥ प्रथम २४ तीर्थंकरों के नामकी चिहियां लिखके कैच में मलमें २४ कोनोमें धरे. इति चतुर्विंशति तीर्थकराः हीनमः १ को नमः बनववववववववववव., वववववववववववववव २, बनवा बबबबबबबबवव ३, अबवववववववववव , में है। अर्दयोनम ॐ सिद्धेच्योनमः है।आचार्येन्योनमः उपिाध्यायन्योनमः नहेंसर्वसाधुन्योनमः न ज्ञानेन्योनमः नहौदर्शनेन्योनमः । चारित्रेन्योनमः ॥ इति प्रथम वलय ॥ दूसरी वलयमें दश दिग- पालोके नामकी वसचिठी दश कोनों में धरे॥इति दितिय वय २४ - (५६७ ) तीसरी वसयमें नव ग्रहाके नामकीनव कोठेमें नव चिड़ियांति तृतिय वलय | इसके नपरांत अकारादिक सोले स्वर नकारादिक तेतीत वर्ण नुति आदि ग्यारे गणवरोके नाम नही युक्त लि- खे. पीछे श्रमतालोश लब्धिपद नहीई एसा श्रादिमें देकर लिखें ॥ अमतालीश लब्धिपदोंके नाम नवपद मंगलपूजामें लिखे हे नसस मुजब लिखे. पी चोवीस तीर्थकरोके पिता नान्नयनमः ? त्पादि लिखे. पी मरुदेवायनमः इत्यादि चोवीस तीर्थंकरोके माताका नाम लिखे ॥पी हिनमः १, श्रियैनमः २,त्ये नमः३, लक्ष्म्यै नमः ४, 3गे.नमः ५, मधै नमः६, सरस्व सैनमः 3, जयायैनमः ७, नयायनमः ए, विजयापैनमः १०, महिलायनमः ११,नजितायैनमः १२, नैनित्यायैनमः १३; मदद्रवायैनमः १५, कामागायनमः १५, कामबाणायैनमः १६. सानंदायनमः १७, नंदमालियनमः १७, मायात्यैनमः रए, नमायावित्यैनमः २०, रोयैनमः २१, कालायैनमः २२, उकाल्यैनमः २३, नहालप्रियायैनमः २४. एसें श्रीदेव्यादि चोवी सोके २४ कोठेमें नाम लिखे. इसके बाद २४ यह डर २४ यक्ष- णीका नाम लिखे. १६ विद्यादेवीका नामकी स्थापना लिखें, पीले नव निधानोके नाम लिखे,फेर चौसठ शेके नाम लिखे. पहली वीशस्थानक मंगलपूजामें लिखा हे नस मुजव. इस मुजब लिखके अष्ट सिक्षिका नाम लिखे अणिमसिद्धयेनमः १, गरिमसिये नमः २, अधिमसिहयैनमः ३, प्राकाम्यसिद्धपेनमः, नमाई. मंसिनिमः ५, तित्वसियेनमः ६, विसित्वसियेनमः छ, प्राप्तसिद्धयैनमः ७, इति अष्ट सिद्धिः नामानि || श्रीधरणे होरकतुः ।, श्रीपद्मावतीरकतु २, श्रीगोतमस्वामिमेनमः ३, श्रीवे रोव्यारकतु ।। इति श्रीज्ञापनमल पूजन विधि संपूर्ण. ३ण पदोंमें
(५६०)
द्रव्य नवपदममल वीस स्यानक मंगलपूजा मुजब चढ़ावै ।।
॥ अथ शांतिक पूजाविधि सर्व उपद्रव शांत्यर्थ लिख्यते ।
... ॥ शुक्न दिन शुन्न मुहुर्समें जिनमंदिरमें समवसरण
जिनप्रतिमा स्थापन करावे, आगे पंचपरमेष्टीपट्ट स्थापन करे
जगवनाके ददिरो पासे दश दिग्पालपट्ट र वांये पासे नव
का पट्ट स्थापन करै, पीछे एक वमा एक वोटा मट्टीप्रादिकका ।
कपर खमी सपेदमट्टी पोतके चार२ केतर कुंकूका साथिया
पीची नीची दोय टिवची काठकी धरावे, नीची टिवची
मोटा हंमा धरै, नंची पर गेटा मा धरै, गेटे हमके तले एक
इकर, दोनु मटकाके अंदर साथिया करे, वझे मटकेकी टिद
नीचे चावलका साथिया करै, ऊपर नालेर रुपिया थापनाका
बोर्नु मटका ऊपर मोलीसूत्र वटके पंचरंगी खजली एकेक र
२१. इक्कीस२ पोकर व्यारों कोगोंमें ४ खजली पोके तण)
थे, नालेरके आकार मोलीसूत्रको दमो नीचला मोटा हंगामें लटक
रखके कपरकी मोली गेटा इंमाके छिद्रमें पोकर ऊपर जो ।
खूणी तणी वांधीहे. जिसके बीचमें गांठ देवे, पी.
संघ समुदायकी तरफतें शांतिक पूजा होय तो मंदिरजीका कल
सेवै र एक जरोकी तरफतें होय तो शांति कराणेवाले के घर
ती सधवस्त्री जिसका माता पिता सासू सासरा चारों मावि
जीता होय, जिस स्त्रीकुं अचा वस्त्र आनूपण पहिरायके फलस
अंदर कुंकूमकेसरका साथिया करके चावल सुपारी पंचर
की पोटली धरके मुख पर नारेल ढकणे माफक खमा घर
ऊपर साल कसुमल वस्त्र मोलीसे बांधे, कपर कलशके व्यारों त
फ च्यार साथिया कर स्त्रीके मस्तक पर रखके गीत गानपूर्वक व
-जित्रादि अनेक नचव समेत जिनमंदिरमें सावे, समवसरणके स
(५६५) न्मुख चावलोंका साथिया करके कपर कलश स्थापन पी: पाच दश जसा इये मर जावे अपणा अंग श्रुद करै, गुरुके पास से केसर मंत्रायके तिलक करे. इत्यादिसर्व विधी हसि आगे नव ग्रह वश दिग्पालका श्राद्वान अगरे स्तुतिसे देववंदन वगेरे करे सो सब विधि पूर्व लिखी हे, सो सव करके बलवाकुल सब देके पीछे सुंदर अंगोपांगवाले सुशील स्त्रीपूत्रादि संयुक्त विवेकगुणधारक आठ मात्रिया मुखकोश वांधके तीन नवकार गुरो, जिसमें दो नात्रिया दो नालीवाला कलश हायमें लेके मटकाके दोनुं तरफ खमा रहै, एक मात्रिया धूप खेवता रहै, १ नात्रिया फूल चंदन वासकेप चढाता रहै, दो नात्रिया लोटोंमें जल नरके दोनुं तरफ धारा देणेवाले कलशोको पूरता रहै, दो जणे दोनुं तरफ चमर टु लता रहै. प्रथम गुरु आदि सकल संघ सात२ नवकार गुणे, स्ना- त्रिया एकेक नवकार गुराके एकेक धारा देव, एसें सात धारा दे चूके तव गुरु मधुरस्वरें स्पष्ट अक्षरोंसे नमोर्दसिद्धाचा कदके अजितशांति प्रमुख साते स्मरण गुणे. पीठे नक्तामर वमीशांति गेटोशांति गुणे, तया सकल संघमें जिसको साते स्मरण वृशाः ती पाती, दोय तब तो गुरुके संग अपणे मनमे गुणता रहै, नर नदि आवे तो संघ सर्व नवकारमंत्र गुराता रहै, जहां तक साते स्मरण शांति गुणे तहां तक अखंग कारले गेटे कलश धारा देता रदै, कि कोई नदी करे, पापसमे पुसरी संसारी विकमा न करे, साते स्मरणादि सर्व गुणे पीठ तीन नवकार गुणके कलस धरे, पीछे नीचेके ईमेमेसे जितप्रतिमाकू निकालके अची तरे अंगसूदया करकै केशर पुष्पादिकसें पूजा करे, नगवान की अबी तरे अंगी रचना करे, नानाप्रकारका नैवद्य फल चंदांक भारती कतारे, संगलदीपक करे. पीठे शांतिजल सर्व संघ लगायें,
(५७)
अपणे घरों में गटे, शांतिपूजाकी मोली गुरूके पाससे ले
राखमी वांधे. इससे संपूर्ण संघमें नगरमें देशमें मरी श्रादिक त
रोग दोष दूर होके शांतिक दोय, अनेक प्रकारसे शहिदि सुर
सौन्नाग्यकी प्राप्ति होय. पीछे श्राधा वलवाकुल परातमें ररका ३
सो लेके गुरु पूर्वोक्त नात्रियोंसें दश दिग्पाल विसर्जन विधि पू
लिखी हे नस मंत्रोंसे विसर्जन करे।इति शांतिक पूजा विधि सं
॥ अथ पंच तीर्थ आरती लिख्यते ॥ .
|| पहली आरती प्रथम जिणंदा, सर्बुजय मंझण रुपन्न जि
एणंदा ॥ जयर आरती आदि जिनंदकी ।। उसरी प्रारती मरुदेवी-
नंदा, जुगला धरम निवार करंदा ॥ ज०१॥ तीसरी पारती त्रि.
नुवन मोहे, रत्नसिंघासण म्हारा प्रनुजीने सोहे || ज०॥ चोयी
आरती नित्य नई पूजा, देव रुपनदेव अवर न दूजा ।। ज०२॥
पंचमी आरती प्रभुजीने नाचे, प्रनुजीना गुण सेवक इम गावै ॥
॥ ज० ३ ॥आरति कीजै प्रनु शांतिजिनंदकी, मृग उनकी में
जावं बलिहारी ॥ जयश् प्रारति शांति तुमारी ॥ विश्वशेन अधि.
राजीको नंदा, शांतिजिनंद मुख पूनमचंदा ॥ ज० ४ ॥ प्रारति
कीने प्रनु नेमजिनंदकी, शंख लंग्नकी में जानें बलिहारी ॥ प्रा०
समुविजय शिवादेवीकों नंदा, नेमिजिणंद मुख पूनमचंदा ॥ प्रा.
५॥आरति कीजै प्रनु पाशजिणंदकी, फणिंद उनकी में जानें
बलिहारी || आ ॥ अश्वशेन वामाजीके नंदा, पाशजिनंद मुख
पूनमचंदा ॥ प्रा०६॥आरति कीजै महावीर जिनंदकी, सिंद
'संवनकी में जानं बलिहारी । आ । सिद्धारथ त्रिसलाकों नंदा,
वीरजिणंद मुख पूनमचंदा || आ० ॥ प्रारति कीजे चोवीश जिन-
दकी, चोवीस जिणंदकीमें जावं वलिहारी ॥ श्रा० ॥ चरण कम .
'स नित सेवित इंदा, चोवीश जिणंद मुख पूनमचंदा ॥ ८॥
( ५७१.),
करजोमी सेवक श्म बोले, नदि को माहरा प्रनुजीने तोले ॥इति॥
॥ अथ चक्रेश्वरीदेवी आरती लिख्यते ॥
॥ जयश् आरती देवी तुमारी, नित्य पणमुं हुं तुम चरणारी
॥ ज० १॥ श्रीसिद्धाचल गिरि रखवाली, नाम चक्लेस जग सौ.
ख्याल ॥ ज० २ ॥ सुविहित गचनी शासनदेवी, सकल संघने
सुख करेवी ॥ ज० ३ ॥ निलवट टोलमी रन बिराजै, काने कुंभ
ल दोय रवि शसि गजै ॥ ज०५॥ वांदे बाजूबंध वोरखा सोहे,
नीलवर्ण सहु जनमन मोदे ॥ ज० ५ । सोवनमय नित्य चूमी
खलके, पाये
घूघरमा घमघमघमके ॥ ज०६॥ वाहन गरुक चढ्या
बहु प्रेमे, तुझ गुण पार न पामु केमे ॥ ज०७ ।। चूनमी जमामां
देह अति दीपे, नवसरा हारे जग सहू जीपे ॥ ज० ॥ नित
मानी आरती कतारे, रोग सोग नय दूर निवारे ॥ ज० ए॥ तसु
घर पूत्र पुत्रादिक गजै, मन वंठित सुख संपद राजे ॥ज० १०॥
देवचं मुनि आरति गावे, जय मंगल नित्य वधावै।।ज०११॥इति।
॥ अथ चोपड खेलण विचार स्तवन ।
॥राग सोरठी ॥ अरे माहरा प्राणीया, चतुरनर, चोपम इश
विध खेल रे ।। अशुन्न करम मल करकै च० ॥ जाजम कर वैराग
रे, कमीय विगयत वैत जो च०॥ जहां नहीं कुमतिको लाग रे॥
अरे०१॥ दान शील तप नाचना च०, चोपम एद पसार रे।।
श्राप दाच श्क बोलमें च०, आ करम निवार रे ।। अरे०२॥
देव गुरु धर्म तीनूं जला च०, पाशा एही जाण रे || अवसर कर
दाय लिया च०, उकात लेश्या धारा रे ।। अ०३॥ दरसण ज्ञान
चारित्र जला च०, तीनू गुपती विचार रे॥ नव तत्व सात हिरदे
धरो च०, ए सब सोला सार रे ॥ अरे. ४ ॥ पमया अवारे रहा
दे च०, पोवारा व्रत धार रे॥ दश सकण दश धरम दे च०, हित
। ( ५७२) फर दियै विचार रे ॥ ०५॥ पट् काया ठकमी पी च०, हिर दे दया विचार रे॥ पुन्य उदय पंजमी पमी च०, पंच महावन धार रे । अ० ६ ॥ ज्यार तीन काला पड्या च०, सातुं विसन निवार ॥ जे उरगति दायक सदी च०, बाधे अनंत संसार रे || ७० ॥ चिहुं गति बाजी लग रही च०, उख सह्या नरपूर रे॥ करम कतै सुख ऊपजै च०, रतनसागर कहे सूर रे ॥ ०नाति ॥ अथ से@ज खेलन विचार स्तवन लिख्यते ।। ॥ सेज खेल खिलारी, सब समझ देख सेव॒जकी घात, सख दो दल प्रपणे परायैकी जात || कान विध कर मोह बाद. स्याको मात, जव जाणु तोय चतुर खेल खिलार ॥ दे से०१॥ आषु कर्म पियादे आगे कुकतेही आवै, काम क्रोध गज चलत अंज त नहीं थन । लोन कंब चारुं खूटकी मरोम चल ध्यादै, मान माया के तुरंग चाल चपल दिखावै ॥ मिथ्यामत सो वजीर वीर बाके ढंग गमो, वाके मारवैको दल अपणो संसार ॥ हे से० २ ॥ तेरे ग्यान सो वजीर वीर तेरे ढंग ठामो, आठों अंग समकित के पियादे हलकारो ॥ त्याग सांदिया सवार पर सांढियाको मारो, सत्य वचन तुरंगसुं तुरंग निवारो ॥ कमा शील दोय फील राखो दलकै अगामी, पर दल कर मारो उिनमें संहार ।। हे से० ३॥ जप तप सत व्रत याके घेरे चिहुं नर, जव वाकै चर नेकी कार रदै नही वोर ॥ जव तेरी दोगी जीत दूजो दारेगो खिलारी, जव सुजशको तेरै शिर बंधेगो मोक, गमे इंद्र धरणेंद्र तेरे ढोलेंगे चवर, तेरो नजन नजेगो गुण अंगाद ॥ दे से० ५ ॥ रति सेकुंज खेलन ज्ञान संपूर्ण । ॥अथ प्राचीन राग रागणी स्तवन लिख्यते ॥ ॥ राग कल्याण॥ टुक निजर महरवी करणा दो, दु०॥ में - (५७३) हुं अधम पापकी मूरत, मेरा दोस न धरणा हो ॥ टु० १॥ श्र जवनको प्रीत इमारी, नवमे नव निरवाहना हो । टु० ॥२॥ रूपचंद जगतनकी वोनती, श्रावागमन निवारणा हो । टु० ३ ।। इति पदम् ।। पुनः ॥ लोक चवदके पार किनारे, पूरण ब्रह्म- का वासा दे ॥ लो० ॥ पंतालीस लाख जोजनकी शिला, फिटक रतन नजासा हे ॥ लो० ॥ निरमल जोत विराजे सादिव, ग्यान ध्यान परकासा दे n लो० १ पंच वरकी घजा फरूके, क्या कहूं अजब तमासा है ॥ नाथ निरंजन नाम तुमारो, नरनकी क्या प्रासा दे ॥ लो०२ ॥ चौसठ इंश ख- में वाके द्वारे, खिजमत वंदा खाता दे । रूपचंद कहे नाथ निरं जन, चरणकमलका दासा हे। लो० ॥ इति पदम् ॥ पुनः॥ सखि सघ बनग्न, सखी० गढे नानि नृपतजूके हारे धागे॥ स०॥ रिपजकुमरको जनम नयो , मंगल मुस्क उच्चारै री। स० १.१॥ ताल मृदंग रखाव मधुरी धुनि, वीणा वाजे सुर तारे ॥ नाचत हा व. नाच करी राजत, तान लेत सुर तारे 18 स०॥ सुरवनिता मिल गाई वधाई, मोतियन चोक सवारे॥ जगबंधव जगपतिकुं निर खत, आनंद इर्व पारे री॥ स. ३॥ इति पदम् ॥ पुनः हो जिन मे दरस पर वारीया, हो नि ॥ तुम विन अवरमें नाटकंदा, अब ममी तर निहारिया ॥ दो १॥ अष्ट करम मेंमे लार लगे है, उनकू वेग विमारियां ॥ चरण सरण गहे पाणा तु सादे, रूपचंद गुणगारियां ॥ दो० २॥इति पदम् ॥ पुनः ॥ म्हारा रिपन्न जिनंदने गजरो चढाऊं रे, म्हा० ॥ चंवेली चंपा गु लाव लानं रे ॥ जाइ जूई मोगरो मालती, विध गुंथालं रे॥ म्हा० १. ॥ अगर, चंदन अदत नैवेद्य साऊं रे ॥ धूप दीप फल सुगंध पु एय पानं रे । म्हा०२॥ श्ट दरव आदिनाथ नाव लावु रे ॥
पुनः ॥
(५७४)
कंपनदास पूरो आस गुण गाउं रे || म्हा० ३ ॥ इति पदं ॥ ..
मन सीमो हमारो जिनचरणारे, पोत जलधि अवतर
पा रे ॥ म०॥ आदि पुरुष जगतारण निसुण्यो, कर्म विकट धन
हरणा रे || म०१॥ नानि तात मरुदेवी माता, नंद झपन सु
खकरणारे ॥ म०२॥ सिल्पादिक प्रगटन जग तत्पर, कुमतांगन
दल टरनां रे ।। म० ३ ॥ सारंग हग शशि वदन मनोहर, अंग
कनक सम वरणा रे ॥ म० ४ ॥श्रोजिनहंस सूरीश्वर जंपै, जिन
समरण दिल धरणा रे ॥ म० ५ ॥ इति पदं ॥
॥राग किंमोटी ॥२॥ ॥अजित अजित जिन ध्या
न, म्हारे मन रे अ०॥ जितशत्रु विजयाको नंदन रे,वंदन त्रय युत
झान ।। म्हारे०१॥त्रिहुं जगतारन टारन अघको रे, वारुं तन धन
ज्यान ॥ म्हा० अ०२॥ जिन वचनामृत पान करीजै रे, केवल
निरमल ग्यान ।। म्दा० अ० ३॥ श्रीजिनदंत सूरि प्रनु पाए रे, नित
नि पुरंदर म्यान ॥ म्हा० अ० ५॥ इति पदं ॥ पुनः॥ यद
अरजी मोरी सदियां, मोदे तारलो गद्दवदिया ।। य० ॥ में नादि
जाणू सदियां, य० ॥ में तारण तरण सुएयो ,में यातें शस्योग
दियां, श्नतें मवार सदियां ॥ य० मो० ॥ इन करमन के घर
हुपकै, में नटक्यो चिटुंगति मदियां ।। य० मो०२ ॥ दित का?
दाश निहारे, करजोमि पनि हुं पश्या, शिव देति क्युं न सदिया
॥ २० मो०३॥ इति पदं ॥
। रागकाफी ॥ मुजरो मानी लीज, दो गोमोराय परज
गीने, म्हारो मु० ॥ किरपा काज करी सेवगने, दिसलर दान
दो गो० १ ॥ गुणनिध गवकी दरसण दोने, सकस काम
॥ दो गो०२।। रूपवित्रुपको मोदन पनरो, प्रदीप
॥ हो गो० ॥इति पदं ॥ पुनः ॥ तु मानु पनि
पुनः॥ ( ५७५) वसणावे, तेंमा तो गुण सुर गावंदा हो ॥ प्र. १ ॥ संतके सागर गुणके श्रागर, जोही ध्यावे सो पावंदा हो । प्र० २॥ तुमहो त त्वज्ञानके दाता, नविजन ताप मिटावंदा हो॥३० ३ ॥ कहै जि नचंद एसे प्रन्नु मेरे, चरणकमल चित्त ल्यावंदा हो ॥ प्र० ५ ॥ इति पदं ॥ दम जाणतहें तुम तारोगे, हम० ॥ ना- निराय मरुदेवीकों नंदन, मेरी नर निहारोगे ॥ हम० १॥ आदि जिनेसर अंतरजामी,खामी कवुन विचारोगे॥दम० २॥ जगजीवन जगतारक तुमहो, एही विरुद संजारोगे ॥ हम०३ ॥श्रीजिनसौना ग्य सूरिंदके सादिव, नवजल पार कतारोगे || द. ४ ॥इति पद।। पुनः ॥ पंथीमा पंथ चलेगो, प्रनु नजले दिन चार ॥५०॥ी कायाकूरी माया, गे सब परवार पं०१॥ वालपमें खेल गमायो, जोवन मायाजाल || पं० २॥ वृढापण पायो धरम न पायो, पीठे करत पुकार ॥ पं० ३ ॥ क्या ले आयो क्या ले जायगो, पाप पु एय दोय लार ॥ पं0 ४ ॥ दया मया कर पास एवंती, अव तरोही आधार ॥ पं० ५ ॥ इति पदं ॥ पुनः॥ तेवीशमा जिनराज, जो थारे कोण जुझेगो । ते० ॥ अश्वशेन तात वामादेवी माता, तूं तारण संसार ॥ जो १ ॥ कमठ विमारण नागकू तारण, सं जलायो नवकार ॥ जो० ॥ विबुद्ध कुशल करजोमीने वीनवै, नवर देज्यो दीदार ॥ जो० ३ ॥ इति पदं । ॥ राग खंनायची ॥ कैसें काज सरै, महाराजा विन, केसे. ॥ ब्रमतर लख चौरासीमें, सुख उखतें जोया रुलत फिरै । म० केसें० १. ॥ ए.रिपु कर्म वैरी ज़टकावत, जाहीसे मेरो प्राण मरे .॥ म० केसें० २ ॥ जो जीव. सुखकी . वांग चाहे, प्रनु सेव्यांसें काज सरै ॥ म. केसें० ३ ॥ इति पदं ॥ पुनः ..राजरी वाई वाजे है, महा० ॥ सरणाई सिरै नोवत वाजे, धन ज्यूं अंबर गाजे (५७६) मै ॥ महा० १ ॥ इंशणी मिल मंगल गावे, मोतियन चोक पुरावे छै॥ महा० २ ॥ सेवग प्रनुजीसें अरज़ करे , चरणारी सेवा प्यारी लागे || महा ३ ॥ इति पदं ।। ॥राग श्रमायो १॥ मोतनकी माला जिन मल सोहे, मोति० ॥ मस्तक मुगट सोहे मनमोहन, कुंमल लागत वाला ॥ ॥ जि० १ ॥ नजोरी नजो तुम लोक सहरके, नहिय नजै सो काला, माणक पर अनु मदिर करो तो, अपणा विरुद.संन्नावा । जि०-२॥ इति पदं ॥ ॥ राग सोरव ॥ रहे तुम श्राज क्यू जीवन उराय, रहेछ ॥जीय जीवन सखियन में प्यारी, हारी हा. हा खायः॥ २० ॥ अविरत बूंघट पट नघारी,. अनुन्नव मुख निरखाय ॥ १०२ ॥ मन परणित परिपाक इतै पर, आई धाई माय ॥२० ३. ॥ अति श्राग्रह सब ग्यानसारकू, जीवन कंठ लगाय ॥र० ४. इति पदं । पुनः हे माय वांकमी करमगति जाय ना कही, चिंतत और वनताकतु औरे,होनहार सो होय रही॥हे माय वां...१ ॥ सकल साज सझियो व्याहनकू, राजुलकों तब चाद नई ॥ सुनी नेम गिरनार सिधाए, वदन विलख मुरफ़ाय रही। हे. माय वां०.२ ॥. सीता सती याही पतिनगता, जानत सरुख मही ॥ उगे दोस दियो जब रुघपति, पावक कुंममें धीज दही । हे माय वां० ३॥ हायक सुदृष्टि श्रेणिकराजा, निज सुत बंध गई ॥ सुध बुधः विसर गई नरपतकी, आपराकी अपवात सही ।.हे. वां० ४.॥ ठितमें रंक गितकमें राजा, अकल कया किम मारा कही । नसट पसटवाजी, नटसीकी; नवल सरवन व्याप रही ।। हे० वां० ५॥ इति पदं. ॥.पुनः ॥ म्हांनु प्यारो लागे , जी पारो नपदेस, म्हांनु० ॥ ग्यान जमावरा गुरु कोणक mom । पुना॥ , (५७) मेटण, संशयन रहे न लेस ॥ म्हा०१ ॥ मोद ति। दूर करणकू, जगत बढावत हेत ॥ चंद फतै नित एदा चाही समकित सुखको खेत ॥ म्हां० २॥ इति पदं ।। मेरो पिया पर संग रमत , में केसे मनाकै री।मे ॥ सोतन संग रैन दिन रमतां, मोहि न बुलावैरी । मे० १ ॥ हाहा करत सखी पश्या परत कोइ पिया मिलावै ॥ विरहान अति सद पिया बिन, कोन घुमावै री ॥ मे० २ ॥ सुमता संगले अ. नुन्नव प्रायो, सब परत सुगावै री ॥ ग्यानसार प्यारी दो हिल- मिल, सोरठ गावै री । मे० ३ ॥ इति पदं ॥ || राग तोरग्मतार। वरपित वचन मरी, हो सुगुरु मेरो, २०॥ श्रीश्रुतज्ञान गगनतैकमटी,पानघटागहरी | हो सुगु० ३॥ स्याहादनय विजुरी चमकित, देखत कुमति मरी। हो सुगु० ॥ अरथ विचार गुदर धुनि गरजित, रहत न एक घरी ॥ दो सु. गु०॥ २॥ श्रद्धा नदी चढी अति जोरे, शुद्ध सुन्नाव धरी । सु. जरजस्यो सुमतारससागर, समकित नूनि हरी । हो मुगु० ३ ॥ प्रगटे पुन्य अंकुरे चिहुं दिस, पाप जवास जरी चातक मोर पप. श्या नविजन, बोलत लक्तिनरी ॥ दो सुगु० ४ ॥ दया दान व्रत संजम खेती, नविक कसान करी, हरखचंद सुरनर शिवसुखकी, सहज सजाय फली ॥ दो सुगु० ५।। इति पदं ॥ पुनः॥ या घरीमें रंग, वन्यो दे म्हारे ॥ या०॥ तत्वारयकी चरचा पाई, सा धरमीको संग ।। २० या० १ ॥ श्रीजिनराज दयानिध लेटे, दरख जयो अंग अंग ॥ २० या एसी विध जवर मांद मिलियो, धर्मप्रसाद अन्नंग ॥ २०या०३ इति पदं ।। • रागमसार चिहुं नर दरिया वरसे, अब वरर घर धन गरजै ॥ चि० ॥ नेमप्रन्नु गिरनार सिवाए, देखराकू जिया त () रसे ॥ चि १ ॥ दाउर मोर सोर सुण श्रवणें, नयन नए घन जरसे ॥ चि०२॥ ढूंढत ढुंढ सकल वनश्में, कबहुं पिया ना दर सै ॥ चि०३॥ सो दिन सफल जाणेमें सजनी, दिवस घरी जिन फरसे ॥चि. ॥ इति पदं ॥ पुनः ॥ मोरवा पपश्या बोले पीन२ घनमें, नेमपिया रदे सहसावनमें, मो० ॥ निशि अंधियारी कारी विजुरी करावै, दूजी विरह व्याकुल नई तनमें || मो० १॥ मिरमिर वरपित गरजत दाउर, सोर करत रहे नदियां रनमें । मो० २ || आणंद यह सम देखण चाद, राजुल नई विरागण कि नमें । मो० ३ ॥ इति पदं ।। ॥राग विहाग।। समझ नर जीवन थोरो, थोरो थोरो घोरे ॥स०॥ पलश् आयुघटत विनरही, गलत जातजेसें नरो।।स० । या तनको कदो कोन नरोसो, दिन मासो ठिन तोरो ॥ जो कद करै सो अवही करलै, पुनपरहो जिम मोरो ॥ स २॥ तन धन आदि सकल सामग्री, गरजश घनघोरो ॥ रूपचंद त्रसनाको बांध्यो 'जानबूझ नयो नोरों॥स०३॥ इति पदं ॥ पुनः॥ मत कर मा न गुमान, योवन धनं ठगहे ॥ म०॥ वेलूकी जीत उसको मोती, को धमी को पलदे ॥ यो० म० १॥ नदियां गहरी नाव. पुरा गी, तारणहारा जिनहे । रूपचंद कहै नाथ निरंजन, पाखर जंगल घर दे ।। यो० म०२॥ इति पदं । ॥ राग मारू ॥ निसदिन जो थारी वाटमी, घर प्रावोनी ढोला ॥ नि० ॥ मुझ सरिखा तुझ लाख है, मेरे तूंदी अमोखा ॥.नि.१ ॥ जोहरी मोल करै लालनका, मेरा लाल अमोला । जिसके पटतर को नदी, सका क्या मोला नि० २॥ कोन सुन किस कहूं, किस मांडू खोला ॥ तेरे मुख दी टलै; मेरे मनका कोला ॥ निं ०३ ॥ मिन वियेक कदै हितकर तुं , सुमंतासु नको
( ५७ए)
लाभाशंदघन प्रनु आवसी, सेजमी रंगरोला नि धाति पदम्।।
॥ राग जैवंती॥
आज तो हमारे नाग, वीरप्रन्नु आए
हैं। श्रा०॥ चंदना खमी आर, चित्तते करे विचार । देखत दी
दार दीया, दरख नराये ।। प्रा० १ ॥ प्राज मेरी पास फली,
अली मेरी रंगरलो । विकसी भातम कसी, प्रनु पात्र पाए हे ।।
प्रा० २ ॥ धन दिन आज मेरो, गयो सत्र कर्म केरो।। सुरुत बहु
तेरो, नगवान दिल नाए दे ॥ श्रा० ३|| सिद्धारथराय नंद, सोहत
सरदचंद ॥ कहै जिनचंद चित, श्रानंद वधाये हे आ. इति ।
॥ राग परज ॥ वावरो रे आज मनवो मारो ॥ वा० ॥
आप रंगीला वाकी रंगीली, तर रंगीलो वाको सांवरो रे । प्रा०,
१ ॥ आपन आवै वारी न लिखनेजे, प्रीत करणळू नतावरो रे।।
प्रा० २॥ मानंदघन पिया निज़घर प्रावै, मिट गयो मोह संतावरो
रेपा० ३ ॥ इति पदं ।
॥ राग जंगलो ॥ रुपन्न विदारी, यारी तो गघि न्यारी हो
॥ २०॥ प्रथम तीर्घकर प्रयम जिनेसर, प्रथम यतो व्रतधारी हो।
क. १॥ धनुष पांचसैं मान मनोहर, काया कंचन वानी हो
॥ २०२॥ नाजिराय मरुदेवीको नंदन, वा पर.जिया कुरवानी
(हो..॥३० ३॥ जुगलाधरम निवारण स्वामी,मनु गे पर ऊपगारी
हो। २०४॥ केवल पाय प्रनु मुगति सिधाए, आवागमन निवारी
हो।।। ० ५ || प्रानंदधन प्रन्नु एती वीनती, तुम पर जावं वलि
हारी हो. ३०.६ ॥ इति पदं । पुनः ।। सुगमन होनहार
न टरै रे, सु०॥ चित कर विचारत है नर, नदी, नर बने
रे। सु०१ ॥ पर बाज पारधी नीचे, चिमिया केसे बचे रे॥
सु० शा होगदार वश मस्यो देपारधी, सर सींचाण:मरे रे॥ सु०
..३ ॥ होत पदारप नावी नश्या, क्यूं जग चाद धेरै रे । सु० ॥
(५०)
॥वदय.करम गतदेख जगतकी, जिनवर क्युननऊ रे । सु० यति
पदं ॥ . पुनः ।। सदियो री मिल चालो प्रनु पूजन काज, स.
॥ समवसरण विच आप विराजै, वीरनाथ महाराज ॥ स० ॥१
घेणक नूप चेलणाराणी, नक्ति करत दे आज ॥ स. २॥ निजर
द्ववय लिये पुर के जन, उमंग२ शुन्न साज ॥ स. ३ ॥ वे प्रनु
दोन दयाल जगतके, हितकर धर्म जिहाज ॥ स० ॥ इति पदं ।
॥ राग कहरवो॥ मनवा जिनंद गुण गाय रे, म. ॥या
जिनजीके दरस सरसते, उखदोहग मिद जाय रे । म० १॥ सद
गुरु वचन परतीत मानले, आतमसुं लय लाय रे || म० २॥ जब
श्में तो• सुखदाई, आनंद वंचित पाय रे । म० ३ ॥ इति पदं"
पुनः ॥ चलो देखो री मधुवनको राव, च० ॥ वामानंद
पास जिनेसर, सिर पर रे वाके चमर धुराय ॥ च० १ ॥ तारा
सरया जिनेसर लखके, नेटै सहु नवि चित सुख पाय ॥ च०.२
गंगा दरस कमादो सागो, कव फरसुं वाके मन वच काय ॥ च
३ ॥ इति पदं ॥ पुनः॥ राखुं रे दमारा घटमें, जिनराज
माम तेरा, हो राखू रे ६०॥जाके प्रनाव. मेरा, अज्ञानका अंधेरा
नागा नया उजेरा ॥ हो रा० १ ॥ सूरत तेरी रागै, पेल्या विना
स्याग, अध्यात्मरूप जागै ॥ हो१ २ ॥ मुद्रा. प्रमोदकारी, रुपन
सजू तिहारी, लागत मोहि प्यारी । दो० ३ ॥ त्रैलोक्यनाथ तुम
ही, हम हे थनाथ गुनही, करिये सनाय दमदी॥ हो.५ ॥
तुजी तिहारी सारखै, जिनहर्प सूरि नाखै, दिल मांझ यादी राख
दो१.५.॥ इति पदं ॥.
॥ रांग वुमरी जंगलो ।। तेरे दरसको चाह.. लग्यो, सखी
स्पाववरण दिखलाजा रे ॥ ते० ॥ वनमें जाय प्रनु दीक्षा सीना
इमर्के सार सगाजा रे ॥ ते२ १ ॥ जाय चढे प्रनु गिरनार कप,
:
(५१) अव केसे विसराजा रे ॥ ते० २ ॥ चैन विजे कद धन२ राजुल प्रन्नु चरणां चित लाजा रे ॥ ते० ३ ॥ इति पदं ॥ पुनः थारे मुखमारी हो वारी राज, प्यारी ठवी वरणी न जाय ॥ था.॥ शीस मुगट सोहै सिर टोको, काने थारे कुंमल सोदाय ॥ था० १ ॥ मोहनगारी सूरत थारी, देख्या म्हारो मनको लोनाय ॥ यां० २ || नरमत नेण नए दोनं निरखत, यांसु प्रन्नु प्रीतमी लगाय ॥ था० ३ ॥ नव२ पाशजिनंदजी की सेवा, एसी म्हारे दिलमेमें चाव ॥. यां० ५॥ बाल कहे तुमही प्रन्नु मेरे, मेरे तुम्हही सुहाय ॥ यां०५ ।। शति पदं॥ राग काफी कानको ॥ एसी विध तेने पाश् रे, कढ कर- नी करजा 11 ए० ॥ उत्तम नरनव जैनधर्म रुचि, सुगुरु सेवा सु. खदाई रे, जसु पातिक गरजा ॥ ए० १॥ हिंसा जूमा झूठ पर तिरिया, परियह मद फल चोरी रे, घट जायगा दरजा ||ए० २॥ तप जप शंजम शील दान कर, आनंद सुमति सुदाई रे, नवजल निधि तरजा ॥ ए. ३ ॥ इति पदं ॥ रांगकालिंगमो ॥ मोदि अपणो कर जाणो, प्रनुजी मो० ॥ में मतिहीण महा हग्वादी, सो तुमसे नहि गनो ॥ राग र अरु मोइ महा मद, वाध्यो खोट खजानो ॥ प्र. मो०१॥ ए रिपु कर्म पमयो मुफ केमे, किस विध वूटे पानो । कुमति क. दायह मांहि असूझ्यो, ज्युं मदपान वयानो ॥ प्र० मो० २ ॥ हुँ नववाशी तूं सिववासी, जाने सकल जहानो, विरुद साखीयो साम संन्नारो, तो दिव किम चित ताणो ॥ प्र० मो० ३.॥ नक्ति सदाई शिवसुख दाता, संजवनाथ कहाणो ॥ श्रीजिनसौलाग्य सूरिने निज वर, दीजै सुख प्रधानो ॥ प्र० मो० ॥ ॥ इति पदं ।। रागतैरवी । वीर प्रत्तु तेरी दोस्तीमें, मेरी सुमता सखी
(५)
मेहरवान नई रे।। वी० ॥ आप नही आवे बोधा पगदै, तेरी
सूरत कुरवान नई रे ॥ वी० १ ॥ साशनायक एही अरज है,
दाजै दरस वमो वैर नई रे ॥ वी० ॥ आस दासको पूरा
कीजै, चरण सरण लपटाय रही रे ॥ वी० ३ ॥ इति पदं ॥
V राग विनासः॥ नोर नयो अब जाग वावरे, मो०॥ कोड
पुन्य तें नरनव पायो, क्यूं सूतो अब पाय दावरे॥ नो०.१. पन
वनिता सुत तात जातकों, मोह मगन ए विकत लावो ॥ तो.
१२... कोइ न तेरो तूं नही का को, इह संजोग अनाद सुन्नाव रे ।।
नो० ॥ प्रारज देस उत्तम गुरु संगत, पातें बडु पुन्य प्रनावरे
॥जो० ॥ ग्यानसार जिन मारग पायो, क्यूं झू अब पायनाव
रेनो०५॥ इति पदं ॥
राग खदा। जाग रेसवरैन विहाणी, जा०॥ उदयो नवयाच
ल रविमंगल, पुन्यकाल क्यूं सोये प्राणा:।। जा०.१ ॥ कमलसंग
वन२:विकसानी, अजुन तेरी ग.उपराणी ॥ जा०२ ॥ चेत.
न धर्म अनादि तुमारो, जम संगतसे सुध विसराणी ॥ जा० ३॥
तुम फुल दोय अवस्या पश्ये, नीद सुपत ए.जमनीसाणी || जा०३
मातम रूप संन्नार आपणो, कय तुमरे घर कुमतिघरापी | मार
५ || सुघ बुध नूली निरुपम रूपकी, तातें घट वध होत कहाणी
॥ जा०६ ॥ नि ग्यान स्वरूप तुमारो, ग्यानसार पद निजरजस
नी.11.जा० ॥ इति पदं ॥
- राग देखाउन ॥ सांवरो सलूशो सखी मेरे मन लावतो,
रूप देखाप मेरो मन बचावणो, सां० ॥ तोरपा र फेर..
जे पिया, ना जानु ए काइको सावनो. ॥ सां०॥ नव जना
निनादो नेम तुम, यादीते कहा बदन पुरावणो || साना राव
पाकी चौत कपटकी, नपोपीया मुगनतसीको पावनी | Hit
-- (५७३) राग संलित || आज रुपन्न घर आवै, देखो माई आ० रूपमनोहर जगदानंदन, सबहीके मन नावै ॥ दे० साकेर मुगता फल माल विसाला, के मणि माणक लावै ॥ दे०२॥ दय गय रथ पायक के कन्या, ले प्रनु वेग वधावै ।। दे० ३ ॥ श्रीश्रेयांस- कुंमर दानेसर, कुरस वहिरावै ॥ उत्तमदान अधिक अमृतफल, साधुकीरत गुण गावै ।। दे० ४ ॥ इति पदं ॥ रागरामकली। अंगण कलप फल्यो री, हमारे माई अं० ।। रुहिदि सिहि सुख संपति दायक, श्रीशांतिनाथ मिल्यो री॥ह० अं०१॥ केशर चंदन मृगमद घोली, मांदे वरास मिल्यो री ॥ पूजतः श्रीशांतिनाथजीकी प्रतिमा, अलग नदेग ट- ख्यो री ॥ ६० अं० २ ॥ शरणे राख कृपा कर साहिब, ज्यु पारे वो पढ्यो री ॥ समयसुंदर कदै तुमारी रूपासे, दुरदिसुं सुहलोरी ॥६० अं०.३ ॥ इति पदं ॥ पुनः॥ ऊगेने मोरा प्रातमराम, जिनमुख जोवा जश्ये रे, क० ॥ जिनजीनो दरसण है अति दोहलो, थे किम सोहीलो जागो रे ॥ वार२ मानवनव एडवो, जुम्वो मुसकस टाणो रे ॥ ० १ ॥ च्यार दिवशनो चटको म. टको, देखीने मत राची रे ॥ विनसी नाता वार न लागे, कायाघ- काचो रे ॥ ऊ०.२ ॥ अनंत गुणें नारियो जिनवर, पूर्व पुन्ये पायो रे. ॥ एहने देखी दिल में आणंद, कर तूं सदा सवायो ३॥ ० ३ । हीरो हाथ अमोसख पायो, मूढपणे मत गमजो रे, सहज सलूणा पाशजिणंदजीसुं, राजी हुय चित स्मज्यो रे ॥ क०४॥ मन मानीता मारा चेतन, करजे सुरुत कमाई रे ।। - लालकदै जिनचंद लदीने, कर तूं सिद्ध वधाई रे.॥ ज० ॥इति राग केदारो ॥ नज मन नानिनंदन देव, न०॥ ध्यान मुनिजन अमग धारे, सुरनर करत हे सेव ॥ न० १ ॥ चकी..नू- । ।
(५०४)
पति व सुरपति, वासुदेव बलदेव ॥ नमत ब्रह्मा रु नारद, शेष
मणिधर सेव ।। न० २॥ असरण शरण हे विरुद जाको, कि
वघल नेच ॥ राजसिंह प्रनु रुपन्न सिर पर, नाय हे नितमेव
॥ न० ३॥ इति पदं ।।
. . ताल बुमरी ॥ श्रावो नेम रदजावो सदन, हमको न त
तावो रे ।। प्रा० ॥व्याहन आये समके सजन, पशुवनको सुन देख
रुदन ॥ गिरनारी चने निज गंमी वतन, तकसीर वतावो रे।
आ० १ ॥ पूनम जसे चंदवदन, मनमोहन मूरत स्यामवरण ।।
मेरी नीकी लगी नव नवकी लगन, मत वेह दिखावो रे ॥ श्रा०
१.॥ संयमदूती लागी श्रवण, प्रनुकुं सिखाये नीके ब्रमन / सब
पझेगें कोलवचन, रथ फेरी न जावो रे ॥ श्रा०, ३ ।। कपूर
कहै.प्रनुजीके चरण, राजुल मन वैराग धरण ॥ लेट दो नेम
जिनजीकी शरण, शिवपुर तो वतावो रे ॥ श्रा० ॥ इति पदं।
पुनः कीरतीयाग मन प्रेम लाग, जिन सूरत प्यारी रे ।।
की० ॥ अश्वसेन वामाजीके नंदन, सुरपति करत अहोनिशिवंदन
॥ दरसणसे नयणानंद रे, गुण केसरक्यारी रे || की०१॥ अं:
व कदंव मालती निरमल, चंपक वेल सघन तरु परिमल ॥ वीच
नुवन हिय हरख धेरै, पारश सुखकारी रे ॥ की०.२॥ सांबली
सूरत अधिक विराजै, वासुपूज्यकी महिमा गजै ॥ मनु अतिशय
तन मकरंद .मरे, पदकज वलिहारी रे ॥ की० ३ ॥ सुंदर सुन्नग
दरसकू आवै, निरखर प्रनु सहज स्वन्नावै ॥ जीव जमी मन प्रे-
म धरै, जगपति रुइसारी रे ॥ की० ॥ इति पदं ।
खेमटा ताल दादरा
अधम जग काम नये अगीवान,
है ना निकला. मुखलें कन्नी लगवान ॥ यार नही देखा समोसरणा,
किया नवदधिमें कदर नरणा ॥ दोम जो लेते प्रनु. सरणा, दूर
(५५) 5ख होते जनम मरणां ॥ बैठ नववरमें लगाया नही ध्यान, रोज शिवपुरमें हुवा अपमान; मरो अब देखें काल खंगवाने, नो नि० १ i नाम जो जिनके दान देते, आयु मंद तुमसे दूर रेते ।। यार जों तिनके चरण सेते,शंपी सुमताको तुमें देते॥रदे तप जपमें सदी जों सूर, वरे वो जवजवं सुख नरपूर । करै कपूर करम चकचूर, देख्या जिन नूर हुवै उखदूर, करोनवपार सुंगो महरवान ॥ ना० ३ इति । । खेमटा ॥ प्रत्तुं तेरी सूरतिया लागे नली, नेणोदमारी प्रन्नु तुमसे मिली ॥ 4 ॥ अनुनय रंग मंगन तेरी अखियां, खं ख रही सहजानंद कती ।। ने प्र०१ निरमल शांति पदम प्रनु आनन; मुख देखेत श्राफत दूर टली ॥ ने० प्र० २ ।। अंगम अगोचर तेरी महिमा, आप विसंतर अंतुल वली ॥ ने० प्र० ३॥ मुरुषं आश दीनपति तेरी, नर न चाहूं देवं ग्ली। ने०प्र० Ji खग रदी लगन सुधारस कारण, खटक सटके अंध दूर चलो। कर सुनिजर प्रतिपाल सुखाकर, श्रीधर नृपके नंद बली ॥ ने० ३० ५ ॥ गंज अजीम सुवंतपुर जिनवर, कुशवं जमी शहसार फली ने ०६॥ इति पदं ॥ ii रांग पीसू । आयों सही अंव जानें कहां, शरणागतको शरणागतं तेरी ।। प्रा० ॥ तोदूं समान मिल्यो नही कोई, हूँ? फिरयो धरतो सब हैरी ॥ आ०१॥ होय दयाल महामनुजी | व, भान नई तुमसे नट नेरी jj प्रा० २॥ वात कल्याण करें वीनंती सुणं, पारसनाथ सुपारस मेरी ॥ आ० ३ ॥ इति पदं ।। । राग खांबाज ॥ घोर पल विनय निशदिन, प्रेतु को समरण करचे रे ॥ ॥ समरण सब पाप कटत है, अं. शुन करम सर्व दरले रे ॥ १०॥ मन वचं कायलगी चरान नित ज्ञान हियेमें धरले रे ।। ५० २॥ दोलतराम प्रतु गुण गावें, म १४
(५६)
वंत्रित फल वरलै रे || घ ३ ॥ इति पदं ॥
॥ राग सोरठ ॥ सुमतानें क्या कर मारा रे, जिन मोहा
स्यामहमारा ॥जि० सु०॥ शखी दोसनही सुमतामें हे,आली अपना
नेम एसा ।जि० सु०॥सुमता शोकण नई देइमारी,बस किया प्राय
पियारा रे ॥ जि. सु १ ॥ प्रीतकी रीत करी नहीं वालम, तो
चले निरधारा रे ॥ जिन मो० सु० २ ।। जादव जात कठिन कि
मोही, दिल करवतकी धारा रे ॥ जिन मो० सु० ३॥ तुम तो
म तजे हो हमळू, में न तजू पद थांरा रे ॥ जि० सु० ॥ -
न हमारी तोरी नही तूटै, कर वांधी शक तारा रे॥ जि० सु०५
सब जग जो तुमसे हो जश्य, तो क्यूं चलत संसारा रे ॥ जि
सु०६॥ रुसार राजुल प्रनुजीसें, पोहची मुमति मकारा रे
जि० सु० ७ ॥ इति पदं ॥
॥ अथ शिखरगिरि स्तवनं ॥
॥ तुम तो जले विराजो जी, सांवलिया महाराज -
पर नले विराजो जी ॥ तेरे घाटे चोकी लागे, श्रावक
पावै ॥ हुकम कियो श्रीपाशजिनेसर, वांह पका ले जावै ॥
१ ॥ चा नीचा परवत सोदे; तलै नीलनका वासा ॥ मर
सीद दमूकै, जिहां लीया तुम वाता ॥ तु० ॥ढूंकर पर,
विराजे, कालररे झणकारै । कासररेऊणकार सेती, वाजा
प वाजे || तु० ३ ॥ दूर देशके जात्री थावे, पूजा श्राण रचा
श्रष्ट द्रव्य पूजामें लावै, मन वंछित फल पावे ॥ तु०५॥ ५
मुनिवर वंदन श्रावै, महा परम सुख पावै ॥ चंद खुसाल ।'
सेवक, दरखर गुण गावे तु० ॥ ५ ॥ इति पदं ॥
॥ पुनः ॥ शिखर गिरिंद्र जुहारी, निज पातिक दूर
गोरे नवियां शि० ॥ ३ण सम तीर्य न कोई, में देखा
.
.
(५०७)
जग जोई रे॥ १॥ वीश जिनेसर प्राया, शहां मुक्तिपुरी सुख
पाया रे ॥ २०॥ कोमाकोमी मुनि सीधा, जिहां अजर अमर पद
सीधा रे ॥ ज० २॥ वीश चरण जिन सोहै, नविजन चात्रक मन
मोहे रे ॥ ज० ॥ ध्रुवमठ मंदिर गजै, जिहां पाशमनु महाराज
रे ॥ ज०३ ॥ पावन तीरय एडवो, इहां शंसय घरवो न केहवो
रे ॥ न० ॥ तीर्थ श्रासातन टालो, नविजन उदरी व्रत पालो रे।।
न०४ ॥ नरन्नव लादो लीजै, इण तीरथ महिमा कीजै रे ॥
सय नगणीस तेतील, अगहन सुदि पंचमी दीसे रे ॥न०५॥
दूगम गोत्र सुदावे, नवि चंदगोविंद गुण गावे रे ॥ न० ॥ जात्रा
करी मन रंगे, चंद शिखर नगै अति चंगे रे ॥ न०६ इति पदं।
पुनः ।। ( सांवरियां जेसे वणे जेसे तारो, सां०॥ इस चालमें) सां
वरिया में दीगे दरस तिहारो, मेरी जय जय वाधा टारो।। सां०॥
अश्वननंदन जगवंदन, जगबंधव जग प्यारो।। नीलवरण युति श्री
जिनवरकी, वामा नदर अवतारो ॥सां० १॥ कमठ विमारण शिव
सुख कारण, तारण तरण निदारो ॥ अलख अगोचर अगम अरूपी,
निर्यामक सत्यवारो ॥ सां० २॥ शिखर गिरी मंगण जिनवरजी,
अदभुत महिमावारो ॥ कर जोमी दोन वीनती करतदे, बुधसिंद
अरजी धारो || सां०३॥ इति पदं ।
॥ अथ पावापुरी स्तवनं ॥
(श्रीचिंतामणि पासजी । ए चाल )|| विन्नुवन नायक
वीरजी, दरशण प्रतहि सुरंग ॥ वधाई प्रनुजी ॥ पारी मोहनी मू
रती म्हारो मन लागो राज । मुख उवि चंदने निरखवा, लगन
चकोर अनंग ॥ वा० १॥ सिद्धारथ कुल सेहरो, तेज अलामल
जाण । व०॥ हृदयकमल विकसायवा, तूं जगजीवन प्राय 140
या०.२ ॥ आस धरी जिनचरणनी, आयो हुं त्रीनुवन नाथ, म.
(५) हिर लहिर कर वगसीये, आनंद निज गुण सान ॥ व या धत्तर वेला जी श्राजनी, सेंमुख मिलिया गे आप ॥ २० ॥ स घणी कदिवा तणी, बीतक उस्क संताप ॥ व० या० ४ ॥ नही सुणसो नायजी, तो तुम विरुद न याय ॥ ३० ॥ जगन- घल जग सहु कहै, ते निरफल किम जाय॥ वक्ष्या ५ किरि जोगे जे तार, तेहमा स्यो जपगार ॥ ३० ॥ तो बलिदार, माथजी, विन मायास नधार ॥ व० श्रा०६॥ गुनदी तारया जी छ विथे, विबुध कहे तुम नाम ॥३०॥ दूं तो जी अनुचर .. किम नवि सारो जी काम ॥ व० था० ॥ अतिशय ज्ञानी जी अरे, नदि को लब्धि निधान ॥ ३० ॥ मोहन मुशखं मन के तुम वचन प्रमाण ॥ व९ शा०६॥ मुझ तन मन मंजूसमें नत करूं जगनाथ ।। व०॥ तुम गुणरतननीमूंघमी, प्रेम जमा। दाय ॥ व थाए ॥ आस फली जात्रा करी; कंचन वरण स- ॥ २०॥ सस्वर वीच सुदामणो, सुवन रमण केलास मा० १०॥ पावापुर नगणीशमें, अमतालीश उदार ॥ 40 तिक दिन निरवाणानो, कुशल निधि शहिसार॥३० था 16 ॥ अथ चंपापुरी स्तवनं ।।. (नेणा सफल नये, प्रन्नु दरसण पायो आजः॥ ए: निरख दिया दरख नरे, मन्नू वासपूज्य महाराज पनि सापा.दरशणती रे, परम, पदारय काज || कारण कारज है, आप नारीवनिवाज. ॥ नि.१ ॥ मेरु महीतल तोलवा' सद को नलि हाल ।। अतुल गुणाकर नपमा रे, नक्त । ज:11नि २॥ इखनंजत दातासुण्यो रे, जस कीरत, मुख अंतर राख्यो नवि वनेरे, तार२. लगवंत ॥ नि० ३ ॥ नारयोदय अब मादो
( एनए)
वपुर दायक सास-II, नि० ॥ कमल नयण रतना- जमीरे, अनु
लव आतम तेज ॥ दीजै निजपद दासळू 'रे, पलक न कीजे जेज़
॥ नि०५॥ नगणिसे अमतालमें रे, कार्तिक सुदि निधि सार ।।
चंपापुर अधिपति मिल्यो रे, सकल संघ जयकार ॥ नि० ॥
कुशल निधान विबुधतयो रे, कली अली ज़िम लीन ॥शासार ज़िन
ध्यातमें रे, अंतरंग गुण चित ॥ नि० ॥ इति पदं ।
॥ अथ गोडी पार्श्वनाथ स्तवनं ।।
॥ राग केरवो ॥ में मुख देख्यो गोमी पारसको, मेरो ज
नम सफल नयो आज ॥ में० ॥ अन्य देवकू बहुत में ध्यायो, तो
य न सरयोज़ी मेरो काज । आजरे में १॥ नव नटकत शरणे
दु: प्रायो, अबतो रखोजी मेरी साज ॥ आजरे में० २॥कम दरा
वा तागडूं तारण, संललाव्यो नवकार ।। आज़रे में. ३ ॥ रूप
चंद कट्टै नाथ निरंजन, तारण तरण जिहाज ॥ आज़रे में।
“१॥
ति पदं ॥ पुनः ॥ किरपा करो रे गोमी पाश जिनेसर, तुम
स्वामी अंतरजामी।कि०॥चेर गद पर पाश विराजे, चारो तरफ
ज्ञानी ध्यानी ॥ कि०॥ नीलवरण तेरा अंग विराजे, बदनोंकी जा
वृविहार । कि० २॥ वांदे वाजुबंध वेरखा विराजै, कुंभलकी वधि
देन्यारी ॥ कि० ३|| ढूंढतश् में प्रत्तु पापो, पूरण पदयो अब पाई।
कि ॥ नाथ निरंजन नाम तुमारो, रूपचंद पदवी पाई।कि० इति।
मुजरा सादिव मुजरा सादिव, सादिव मुजरा मेरा रे ॥
मु०॥ सादिव सुविध जिनेतर स्वामी, चरण पखावू तेरा रे ॥
मु११ ॥ केशर चंदन चरचूं अंगे, फूल चढ़ाने सेहरा रे ॥ घंट
वज़ानं अगर नखेईं; करुं प्रदक्षणा फेरा ॥ मु०२ ॥ पंचशब्द
वाजितवजा । नृत्य करु. अधिकेरा रे ॥ रूपचंद गुण गावत
हरखित, दास निरंजन तेरा रे ॥ मु३ ॥ इति पदं ।:::
.
(एए)
घंट वाजे घननननन, शोक हरख नयो ॥ जनमे वर्दमानकुंवर,
वीतराग तननननन || घं०१॥ मृदंग ताल गुण विसाल, ऊसरी
नाद अननननन ॥ घं० २॥ रूपचंद राग रंग, होत ध्यान
मगनननन || पं० ३॥ इति पदं ।। निरंजन सांआं रे, सां
मेरा टुकसा मुजरा लै ॥ तुम तीरयके देवता जो, हम केशरदा
गेल ॥ कनककचोली हायमें जी, पूजा करूं रंगरोल || नि १ ॥
तुम अंबरदा मेहला प्रन्नु, हम गिरवरदा मोर ॥ रुमकुमर मेहला
वरसे, उमर नाचै मोर ॥ नि० २ ॥ दमगुण काली कोयली जी,
प्रनुगुण आंबा मोर ॥ माजरके परतापसे कार, करवा लागी सोर
॥ नी०३-॥ तुम हो मोतीयनकी बरी रे, दमगुण ऊमा जोर ॥
रूपचंद दिलदार मयाकर, तुम विन देव न नर ॥ नि० ४ ॥ इति!
राग कल्याण ॥ एते सदर विच कोनसा दिवान है ॥ पा.
नीके कोट पवनके कांगरे, दस दरवाजै ममान है ॥ एसे० १ ॥
पांचशीके तेवीस तस्कर,नगरकूकरत हेरान हे ॥एसे० २॥ प्रजा
पुकार सुणी जब जाग्यो, चेतनराय सुजाण हे ॥ एसे० ३ ॥ ज्ञान
को धाण वचनरस नेदे, हायमें लाल कवाण है। एसे० ॥
रूपचंद कहे तेने वारो, उस्मन मान गुमान हे ॥ एते. ५॥
इति पदं । प्राय रहो दिल वागमें, सुरा प्यारे जिनजी,आ०॥ चुनर
कलिया तोरे चरण चढाउँ, गुण अनंता तोरा रागमें || सु० १ ।।
मरुदेवी नंदन आद जिनेश्वर ।। खेल अनंता तोरा वागमें ॥ सु०
२॥ रूपचंद कहै नाथ निरंजन, जानें विकसित वन फागमें ।
सु०३ ॥ इति पदं रहोर रे यादव वोय घमियां, दोय घमियां
रे अब व्यार घमियां ॥ १०॥ प्रेमका प्याला वदोत मसाला,
पीवत मधुरी सेलमियां ॥ २०१॥ दायसुं हाथ मिलाय दियो
सांर, फुलमा विगढ़ सेजमियां ॥ २० २ ॥ राजुल ठोमि बसे
---- - (५१). गिरनारी, दीपत मोहन वेलमियां ॥ २० ३॥ रूपचंद कहै माथ नि: रंजन, मुक्तिवध गुण वेलमियां ॥ २० ॥ इति पदं । विराजों वंगलामें, विराजो मंदिर में, प्रनु गोमीचा पारसनाय || वि०॥ चुवाश चंदन ओर अरगजा, केशरमें गरकाब ॥ वी०१॥ शिर सोनेको उन विराजै, मोतियो तपे रे निलाम ।। वी० २ ॥ जव सागरमें प्राण पमाहुं, वांद पकर मुझ तार ॥ वी० ३॥ रूपचंद कहै नाथ निरंजन, आवागमन निवार ॥ वी० ४ इति पदं ॥ किण देखा हमारा स्वामी, स्वामी अंतरजामी रे॥ कि०॥ या नवकी प्रीत प्रकाशी, नवमें गया शिवगामी रे || कि०१॥ सहसावनकी कुंजगलीनमें, मिले मोदे अंतरजामी रे ॥ कि० २१: आप चलै गिरनारके ऊपर, नारी तारी केवल पामी रे ॥ कि० ३॥ कदे नयू प्रनु नेमनगीनो, कहुं श्राज शिरनामी रे ॥ कि० ४ ॥ राग श्रासानरी ।। अबधू सो जोगी गुरु मेरा, नस पदका करे रे निवेमा । अ० ॥ तरुवर एक मूल बिन गया, विन फूलै फस लागा ॥ शाखा पत्र नहो कर उनकू, अमृत गगने लागा ॥ श्र. १ ॥ तरुवर एक पंछी दोठं वैठे, एक गुरु एक चेला । चेलेने जुग चुगर खाया, गुरु निरंतर खेला ॥ अ० २॥ गगनमंझलमें अधविच कूत्रा, उहां हे अमीका वासा ॥ सुगरा होय सो नरर पीय, निगुरा जात पियासा ॥ ० ३ ॥ गगनमंमलमें गनया वि पाणी, धरती दूध जमाया ॥ माखण था सो विरला पाया, गठ जगत नरमाया ॥ अ.भा यम विन पत्र पत्र विन तूंबा, विनजी ज्या गुण गाया ॥ गावनवालेका रूप न रेखा, सुगुरु सोही वताया 11 ०५॥ प्रातम अनुनय विन नही जाणे, अंतर ज्योति जगा वै ॥ घट अंतर परखै सोही मूरत, श्रानंघन पद पावै ॥ अ०६॥ इति पदं ॥ पुनः ॥ अवधू एसो ज्ञान विचारी, वामें कोण.
(५२)
पुरुप कोण नारी ॥ अं० ॥ ब्रह्मनके घर नाती धोती, जोगीके
घर चेली ।। कलमा पढ२ नई रे तुरकमी, पापही पापं केली ॥
अं० १ ।। सुसरो हमारो बालोनोलो, सासू बालकुंवारी । पिळजी
हमारो पोढे पालणे, मेंहुँ फुलावनहारी ॥ ०२॥ नहि हुँ पर
एगी नही हूं कुंवारी, पूत्र जणावंणहार। ॥ कालोदाढीको में कोर
नहीं गेभ्यो, अंजुए हूं बालकुंवारी ॥ अं० ॥ अढीहीप खाट
खुटली, गगन नलीकू तलाई ।। धरतीको ठेमो आजकी पिगेनी,
तोय न सोमनराणी ॥ ॥ गंगनममलमें गाय बियाणी,
वसुधी दूध जमाई ॥ सकरे सुणों नाई विलोवणा विलोवै, कोई
यक अमृत पाई ॥ ५ ॥ नहिं जावं सासरीये नहिं जा
पीहरियै, पीयुजीकी सेज विगई ॥ आनंदघन कहै सुणो नाईस
घो, ज्योतसे ज्योत मिलाई रे । अ०६॥ इति पदं। पुनः॥ ६
सा तूं मानसरोवरं वासी, वामे नूलो रंग विलासी रे ।। ई० ।
नीर अंगाध जरयो यो करदम, पसर वेल जरासी ॥ आंकी वांक
कंवर न सीधी, सब जगकी हे मासी रे ॥ ०१ आयो चं
माले नूंपके घरमें, रतन गयो ले नासी ॥ नृप पत्तावै पर प्रांग
में, लटके गया तर काशी रे || हं० २॥ हायी मूठों फैल म
चौवे, नागो माहावत जासी, उनियां चढ२ नीचे गिरती; परते
ही माले फासी रे ॥ ६०.३ ॥ वाप प्राप बेटाके प्यारी, परणाव
श्क दासी ॥ ज्ञद्धसार इनकू जब देखै, तबही प्यासी२ रे ॥ ई० ।।
४॥ इति पदं ॥ पुनः || वेर वेर नहीं था, अक्सर बेरर नदी
पावै ॥ ज्युं जाणे त्यु करले जलाई, जनम सुख पावै ।। ।
॥ तने धन जोवन सबही मूठगे, प्राण पलको जावे ॥
२॥ तन चूटे धन कोण कामकों, काहें रुपण कहावै ।। ०३५
जाके दिसमै साच वसंत हे, नाईं मन न जाये || ॥ ५ ॥
श्रवधू निर ( एए३.) प्रानंदधन प्रन्नु चलत पंयमे, समर समर गुण गावे. ॥ ५ ॥ इति पदं। पुनः।। ये जिनजी के पाये लाग रे, तोने कहिये केतो ॥ ये० ॥ आगे जाम फिरै मदमातो, मोह निंदरियासु जाग रे।। तोने० ये० १ ॥ अनुजी प्रीतम विन कोइ नही प्रीतम, प्रनुजीनी पूजा घणी माग रे । तो ये० २ ॥ नवका फेरा वारी करो जि. नचंदा, आनंदघन पाये लाग रे ।। तो० ये०३ ॥ इति पदं ॥ पुनः ॥ चिनमें धरो रे प्यारे चित्तमें धरो, एती शोख हमारी प्यारे चित्तमें धरो ॥ श्रोमासा जीवन काज अरे नर, काहेदूं उस परपंच फरौ ।। एती. १ ॥ कूम कपट' पर द्रोह करो तुम, अरे नर परनवा थीन मरों ॥ एती. २॥ चिदानंद जो ए नही मानो तो, जनम मरणके दुःखमें परो ॥ एती. ३ ॥ इति पदं ॥ पक्षविरला कोई,देख्या जग सब जोई ॥१०॥ समरस नाव नला चित्त जाके, थाप नत्याप न हो ॥ अविनाशीके घरकी वा तां, जाणेगे नर सो ॥ अ० १ ॥ राव रंकमें नेद न जाणे, कन क पल सम लेखे, नारी नागराको नहिं परिचय, तो शिवमंदिर देखे || अ० २ ॥ निंदा स्तुति श्रवणे सुराने, दर्प शोक नविधाएँ ॥ ते जगमे जोगीतर पूरा, नित चढने गुरागणे । अ० ३॥ चं समान सौम्यता जाकी, सायर जेम गंजोरा ।। अप्रमत नारंग परे नित्या, सुरगिरि सम शुचि धीरा ॥ अ० ॥ पंकज नाम घराय पं कतुं, रहत कमल जिम न्यारा, चिदानंद एता जन ननम, सो साहब का प्यारा ॥०॥ ५ ॥ इति पदं ॥ राग प्रनांती ॥ चवणा जरूर जाकू ताकू केसा सोचमा ।। च०॥ नया जब प्रातकाल, माता धवरावे वाल || जगजन करत, सकल मुख धोवणा ।। च० १ ॥ सुरत्तीके बंध बुटै, घूघर अपूठे ।। ग्वालवाल मिलके, विसोवत विलोवया ॥ च० २॥ तज ३५ जपे
1
(एए)
परमाद जाग, तूं नी तेरे काज लाग ।।.चिदानंद साय पाय, समा
नही खोवणा ॥ च० ३ ॥ इति पदं ॥
कैरवा रागं| समझ परी,मोहे समझ परी, जगमाया अब जुनी
॥ मोहे समझ० ॥ कालर तूं क्या करे मूरख, नही नरोसा पड़
एक घरी ॥ ज० स०१॥ गाफिल विनतर नाही रहो तुम, शिर पर धूमें
तेर काल अरो ॥ ज०स० ॥ चिदानंद एवात हमारी प्यारे, जाखो
तुम चित मांहे खरी ॥ ज० स० ३ ॥ इति पदं ॥ पुनः॥
जलांजी मेरो नेम चल्यो गिरनार, केली जानसे मेरो ने० || रा
जुल कली अरज करे , नलांजी मेरी अरंज सुणो. महाराज ।।
श्के० १ ॥ तोरण प्राय चलै रय फेरी, जलांजी वांतो पशुवनकी
सुए। वे पुकार ॥ ३० २ ॥ सहसावनकी कुंजगलनमें, नसरंजी
वांतो महाव्रत धार ॥ ३० ३ ॥ इरखचंद प्रनु राजुल विनवै, ज
सांजी मेरो होजो मुक्तिमें वास ॥३० ३॥ इति पदं ॥ पुनः
रसना सफल नई, मेतो गुण गाये महाराज ॥ रसना० ॥ परम
आनंद प्रगट नयो मेरो, जब देखे जिनराज ॥र० १॥ अति उ
ज्वल जस सुरा जिनजीको, संध्यो सुरूत समाज ॥र० ३॥ ना
क नमन करतां प्रनुजीकू, सारया प्रांतमकाज || २०३ ॥ पदप
कज प्रन्नुके फरसंतही, दूर गई उख दाऊ ॥ कहत क्षमाकल्याण
सुपाठक, अब मोहि अविचल राज || २० ४ ॥ इति पदं ॥
॥ राग गजल ॥ राजुल पुकारे नेम पिया, एसी क्या करी
मुझे गेमके चले हो चूक, हमसे क्या परी ॥ रा. १ ॥
अाशकी निराश, नदाशीनता घमी ॥ प्यारा वश नही दमारा,
છી
तमें पीरंमें पमीरा २ ॥ हमसे रह्यो न जाय, प्रीतम तुम ।
विना धमी, संयम लीजिये दयाल, दयाधर्म यादरी रा० ३ ॥ नि
शदिन तुमारा नाम, देते ज्ञानकी करी। मुनि चंद विजय चरश
. ( ५५ ) कमल, चित्तमें धरी ॥ रा०॥ इति पदं ॥ । राग धन्याश्री ॥ कोन किसीको मित्त, सीको मिन ॥ ज०॥ मात तात नर जात सजन निर्चित ॥ ज० १ ॥ सपही अपणे स्वारयके है, प्रीत ॥ स्वारथ विणसे सगो न होसी, मिना मनमें चिंत ॥ ज० २॥क चलेगो पाप केलो, तुंहीतुं सुविदीत ||ज०॥ को नहीं तेरो तूं नही किसको, एह अनादी रीत ॥ ज० ३ ॥ ताते एक न, गवान नजनकी, राखो मनमें नीत ॥ ज० ॥ ग्यानसार कहै एद धन्याश्री, गायो प्रातमगीत ॥ ज० ४ ॥ इति पदं ॥ श्रादी- सर जिनराज, त्रिभुवनके महाराज, आज हो पायो रे, में शरणे अनुजी तुम तणे जो ॥ १ ॥ नबस्यो ज्ञान अंकूर, प्रगट्यो पुण्य पर ॥ आज दो जागीरे, मुझ मनमें तुम सेवना जी ॥२॥ लगन लगी जरपूर, दोष गये सब दूर ॥ आज हो गेहूं रे, नहीं तुम पद सेवा सुखकरू जी ॥ ३ ॥ नानिराय कुलचंद, मरुदेवीके नंद । आज हो राखो रे, प्रनु मुझकू निज चरणे सदा जो॥ ४ अमृत धर्म सुजाण ॥ शीश दमाकल्याण ॥ पाज दो रागे रे, अनु धागे या विनती करे जी ॥ ५ ॥ इति पदं ॥ ॥ राग केदारो ॥ गोलीगाश्यै मन रंग, गो० ॥एक ध्याने एक ताने, कर केदारो संग ॥ गो० १ जात्र कीजे अमृत पीजै, नीर वदेरी गंग ॥ रोग शोग कलेश नासै, आलस नावै अंग॥ गो २॥ पोढतां प्रन्तु नाम लीजै, पाणी मन, नवरंग ॥ अजय तेहने गंध मांदे, कदिय न होवे चिन भंग ॥ गो० ३ ॥ इति पदं ॥ पुनः ॥ हारे हूं तो मोह्यो रे साल, जिन मुखझाने मटकै न यण रसाला ने वयण सुखाला, चिनहुँ लोधु चटकै ॥ मनुजी केरी जक्ति करता, करमतयो कस तटके। हां हूं० १॥ मुज : मन 1. - (एए६) सोनी नमरतणी पर, जिनगुण कमले अंटके ॥ रत्नचिंतामसि । को राचै कहो कुरा काचतणे कटके । हारे हूं० २॥ ए जिन ग्रु- तां क्रोधादिक सहु, श्रासपासश्री दटके ॥ केवलनाणी वह सुरक दाणी ॥ कुमति कुगतिने पटके ॥ हारे हूं० ३ || ए जिनने में दिलमां न आणे, ते तो नूला नटके || नाव जतिसुं जलग करता वंचित सुखमे सटके ॥ हारे हूं० ४ ॥ मूरत संजय जिनेश्वर केरी, जोतां हियर्छ हटके, नित्यवान कहै प्रन्नु ए मोटो, गुण गाळ हूँ लटके ॥ हारे हूं०५ ॥ इति पदं ॥ राग काफी ॥ प्रनुजीसे लागो मेरो नेह सखीरी, अब कैसे कर बूदे री ॥ प्र० ॥ धिग२ जगमें वाको जीयो, अपणा प्रतुजीत रूसे री॥प्र० १ ॥ जो कोई प्रनुजीसें नेह करेगो, शिवपुरना सु- ख सहस्ये री॥ प्र० २॥ सेवाराम प्रन्नु गांव रेसमकी, लगोपीन नही तूटे री ॥०३ ॥ इति पदं । .फरना, ७०॥ एक ध्यान प्रनुका धरणा, खतरादूर करना० दू०॥ जय संग पांचो निर्मल करणा, तब लग जिन अणुसरणा ॥ खतरा० ॥ १ ॥ क्रोध मान माया परिहरना, सुमति गुपति चित्त धरना । खत०२ ॥ संवर नाव सदा मन धरना, आतम उरगति हरना ॥ ख० ३ ॥ धरा कण कंचनकुं क्या करणा, आखिर इक दिन मर• सा | खत० ४ ॥ ज्ञाननद्योत प्रनु पाये परना, शिवसुंदर) सुर घरता ॥ खत०५॥ इति पदं ॥ राग रामयी ॥रे जीव जिनधर्म कीजीये, धर्मनाचार : कार ॥ दान शीयल तप नावना, जगमे ए त सार ॥ २० ॥ । घरस दिवसने पारणे, प्रादीशर सुखकार ॥ कुरत दान बहरापि यो, श्रीश्रेयांस कुमार || रे० २ ॥ चंपा यार नयामिया, पतली नीर ॥ शतीय सत्ता जस ययो. शीले सरगिर धीर।। पुनः॥ 'खतरा र ++ कादय .T व ( एए) २०३ ॥ तप कर काया सोपवी, अरस निरस आहार । वीरजि- नंद वखाणियो, धन धन्नो अणगार ।। रे ४॥ अनित्य नावना जावतो, धरतो निरमल ध्यान ॥ जरत प्रारीता नुवनमें, पाम्यो केवलज्ञान ।। रे ५ ॥ ए जिनधर्म सुरतरु शमो, जेहनी शीतल गंह ॥ समयसुंदर कई सेवता, मुगतितका फल त्यांह ॥ २० ॥ ६॥ इति पदं॥ पुनः॥ सो३२ सारी रैन गमाई, वैरन निद्रा तूं कहांसें आई ॥ सा०॥ निद्रा कहे मेतो वाली रेनोली, वझेर मुनिजनकू नाखू रे ढोली ॥ सो० १ ॥ निश कहे मेंतो ज नमकी दासी, एक हाथमें मूंकी उसरे हायमें फासी ॥ सो० २॥ समयमुंदर कहे सुनो नार वनिया, पाप मूत्रै सारी गई इनि या ॥ सो० ३ ॥ इति पदं ॥ पुनः ॥ चंदाप्रभुजीसें ध्यान रे, मोरी लागी खगनवा ।। चं० । लागी लगनवा गेमी नहि वूटै, 'जब लग घटमें प्राण रे । मो० १ ॥ दान शीयल तप नावना नायो, जैनधर्म प्रतिपाल रे। मो० ॥ हाथ जोमके अरज कर- त है, वंदत सेठ खुस्याल रे । मो० ३ ॥ इति पदं ॥ पुनः ते शिवपुर गये रदै रे, वारी सकल करम दस स्वयकर 1 शि. ॥ अविनाशी अविकार विराजित, परमातम शिवधाम रे ॥ समा- धान सरवंग सरूपी, मेरे मन वसे२ रे ॥ शि० १ ॥ शुद्ध बुद्ध अविरुप है, वहे अनादि अनंत रे ॥ वीरप्रन्नुके आगे गौतम, अमृ: त पद लहे लदे रे ॥ वा०शि०२॥ति पदं ॥ गरवाकी चाल ॥म्हारेलले रेकगो छैद्यामो पाजनो रे, मेतो मुखको दीगे जिनराजनोरे ॥ म्हारे न ॥ म्होर सुत सिहारण 'महाराजनो रे ॥ जिन संग्न सोहे मृगराजनो.रे || म्हा० १ ॥ म्हाने पागी मिख्यो शिवपाजनो रे; मोने साधन मिल्यो' शुन काजनो रे ॥ म्हा०.३॥ मारे कल्पवृक्ष फल्यो काजनो रे, म्हारो (ए) महीयल वाध्यो मोटो माजना रे ॥ म्हा० ३ ॥ जिनसान सूरि महाराजनो रे, फल्यो वंरित अनुपम राजनोरे ॥ म्हा० इति पदं ॥ पुनः॥ धनर ते दिवाली म्हारे आजनीरे, मेतो वर्ग निरखी जिनराजनीर ॥धन०॥ पदरी अंगी अलोकिक जातन रे, मांहे बूटी दीसे नांतश्नी रे ॥ धन०१ || मशि दीरा मुगट मा जनया बहु रे, काने कुंमलनी शोना शो कहुं रे ॥ धन०२॥ मुने किरपा करी ते कईं कसी रे, मारे वाहले मुझ सामो जो इसी रे ॥ ५० ३ ॥ प्रन्नु शांति जिनंद हृदये वस्पा रे, यई सूर शशोनी चढती दशा रे ॥ ५० ॥ ॥ इति पदं ।। धनर आजनो दिन रलियामणो रे, सूरज सोनानो कग्यो सो. हामणो रे। धन० ॥ वाहणुं यातां प्रनुने चरणे नम्यो रे, जिनराम ते म्हारे मन गम्पो रे ॥ धन० १ ॥ नवमह समा थया म्हारे मा जयी रे, वली दशा ते श्री जिनराजयी रे ।। ५० २ ॥ मुख जोता ते ऽख सरये गयु रे, बालानुं ध्यान सदा चित्तमा र रे॥ ५० ॥ मापी सेवा ते शुः मनयो खररी रे, सूरशशी करे करूणा करी रे॥ध०४॥इति पदं। पुनः।। म्हारे पाज यानंद वधाम पारे, हुंतो लेउ रे वादलाजीना लामणा रे । म्दा० ॥ मुंने रास पोतानो जातियोरे, थायमता कारो याशियो रे ॥ म्हारे । प्राप्यु दरशन ते उर्सन देवने रे ॥ मुंने कोई तुं रहने मारी सेर मेंरे || म्हा० २ ॥ एडयो वीपी नरोसो साचा गुरू रे, मनु विना जगत मिथ्या सह रे ॥ दा०३ ॥ मदेर करीने म्हारा म नमा रम्या रे, सूराशीने जिनराजनी गम्या रे ॥म्दा॥' इति पदं । पुनः॥ सवालाख टकानो जाप ए० धमी,स.॥ ए संसार जेसा सोनेला, पापण यापा पोमे यदी। मांगीतुंगीन रत्र परायो, केहना कंदोरो केंदनी कमी । स१ । सापो मार ....
-- (एएए) जिनने संनारो, जन्मदशा जिम प्रावी चढी ॥ कहे जीबो न तूं जगवंतने, मोक्ष जवानी यह वात खरी । स० २ ॥ इति पदं ॥ पुनः ॥ प्रावोश्नी प्यारा नेम श्रम घर आवो रे, तुम जगत वचल जगवंत नाय स्ये नावो रे ॥ प्रनु केहवी या तकसीर कही ने सुणावो रे, इम विन गुनहे दीनानाय मूंकी न जावो रे || आ. १॥ सखी दलघर गिरधर वीर चतुर कहावो रे, मारो रुगे ग्वी लो कंत को तो मनावो रे ॥ प्रा० ॥ केतो मोती चुगता इस के लंघन राचे रे, सपी प्रांवातणी जे रुहाम, प्रांवलिये न माचे रे, प्रा० ३ ॥ हूं तो मोही तुम दीदार नहीं तुझ जो रे, श्ण जग में जीता कंत कहूं यूँ थोमे रे ।। प्रा० ४॥ जगमें गलरिया मि त ते प्रीत निकामी रे, जे रेसम रंगे गांठ ते मांदे न खामी रे ॥ आ०५ वीजा जादव केश लाल मनमें न नावे रे, जो माहरो साजन होय तो नेम मिलावे रे ॥ श्रा०६॥म करतां बांधीप्रीत राजुल साची रे, जे नेहनो नावै वेद इक चित राची रे || प्रा०७ ॥श्म शद्धसारनी वाण चित्तमें धरजो रे, मनु नेम राजुल सी भी त मुगति पद वरज्यो रे । प्रा० ७॥ इति पदं । ॥ राग माम ॥ कन्नो जमुनाके तीर || ए चाल ॥ मनमो हन पारस प्यारा रे, चित चाहे रे दीदार ॥ तन मन इंदा वागमें रे, नेश अनोपम फूल ॥ चंचल चित पल ठिन घमीरे, मत मन प्रनुकू भूल रे, चिम० १ ॥ स्याम घटा तन शोन्नता दमक दामनी रंग । जुगवाला इक तूं धणी रे, लागी लगन अन्नंग रे ॥ चि० २॥ अश्वसेन कुल दिनमणी रे, पुरुपोत्तम जयदेव ॥ वेपरवाही वालमा रे, सारं तुमारी सेवरे ॥ चि० ३ ।। श्रीफलवधीपुर तिलक ज्यूं रे ॥ श्राप विराजो नाथ || निगुठ दा स पर सादिवा रे ॥ हित कर दीजै हाय रे ॥ चि० ५ ॥ श्रीजि .
नचं शुद्धातमा रे, नंद योग मधुमाश॥ निधि उशित सप्तमी
शद्धिसार सुख रास रे ॥ चि० ॥ ॥ इति पदं ॥ मेरे मन जा
नकी, रवि नीकी जी ।। मेरे०॥ चरण कमल चित हितकर चाई
लागी लगन गुण गावकी। उ०१॥ सामली सूरत सटक चरम
पर, वरसे घटा जेसें सावणकी। उ०२॥ वालपरो. प्रत्नु हम सं-
रखेले, अव तो न विसरावणकी ॥ 30 ३॥ याद करो जिन
रख प्रीती, वखत वनी हे दिल. लावणकी । 102 मोहे जरो
सो. हे बहुतेरो, आप कहो ललचावनकी ॥ ०५॥ सहजानंदी
एक लहरमें, दीजै सुख सुख जावनकी ॥ २०६॥ पारस नेट रहे
जो लोदा, होवै लोक हसावणको ॥ ० 3 || राम निवास श्राश
मनुजोसे, कसार पद पावनकी ॥ ३० ॥ इति पर।
॥ नेम जिनंदजीतें, आंखमली ॥ ए चाल ॥ साहिव. सुगुण
सुपारससें, मेरी अजव अनोपम प्रीत नवरे || सा० ॥ जिन मुख
चंड चंद्रिका :निरमल, चंचल नैण चकोरमई रे || सा० १ र न
कीजै निज चरसनतें, सुरतरुकी गह गही रे ॥ सा० ॥ दिवनर
प्रजुसें अरस परस अव, वतिया उखको प्राण कही रे ॥ ता०॥
विक्रमधारी जग पगारो, मेरी सूध क्युं विसार दई रे ॥ सा०
॥ शांति सुधारश नाथ दयानिध, सक्ष्सार लय लाग रही
सा० ४ ॥ इति पदं ॥
::" रूपानिध वीनती, अवधारो || ए चाल || सावरिया पार
जी सुख दीजै, प्रन्नु अरजी दिलन्नर ली ॥ सां० ॥ मनमोहन
मूरति थांरी, यातम अनुन्नव उपगारी, सुध लीज्यो नाय इमारी।
सां० १॥ करुणारस अमृत कूपी,लयलोन सुधानंद रूपी ॥ तन मन
पद पंकज खूपी ॥ सां०२॥ जब पारस नाम नचास्यो, रघुपति
को कारज सारयो, मन्नु-धरणीधर निसतारयो । सा० ३॥ शिव
2
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(६१)
शकर रेमण विहारी, अनु महिमा अगणित धारी, श्रीपतिकी चिंता
वारी || सां० ४॥ मुंगर सिंघ विक्रमराजा, उपदेश सुमति दिये
ताजा, जिननुवन करावण फाजा ॥ सां० ॥ शिववामी सुंदर at
जे, जिनमंदिर शरसं विराज, दरिदर मंदिर विच गाजे, सां०६
॥ नरनारी वरशन पावै, शुज पूजन युगति रचावे, प्रनुजीसे प्रे
मसय लावै ॥ सां०७ अजिनव श्रीनवल जिनंदा, जगजीवन
वामानंदा, प्रन्नु कोज्यो परम आनंदा । सां०७॥ नगणीसे नग
पापचासे, सुदि पांचम यतन विलासे, मन्नु माधव माश हुलास
Mai. ॥ हितवक्षन प्रतु गुण संगी, निधि कुशल अमृत
रंगी, शवसार कहे नवरंगी ॥ तां० १०॥ इति शिववामी सुम
तेश्वरपार्श्वनाथ स्तवनं ।। श्रथ रुपनदेव स्तवनं ॥
॥ मोदे गेम चखा विणकरा || ए चाल ।। तुम जो शप
प्रनु प्यारा, जगजीवन नाथ हमारा ॥ नहीं करूं पलकत्तर
न्यारा, लग रदीवगन कतारा०॥मनू मोदन सूरतिधारी, कंद
रपदर्प विषयारी ॥ सयलीन योग आधारी, सुर असुर नमत नरनारी,
मनु नए जगतसे न्यारा ॥ ज०१॥ केवलकमला संग सीने, पी
यूप सहज सुखलोने । माया गया तज दीने, घागम गम अंतर
घोने, नया.तीन लोक उजियारा ॥ ज० २॥ क्या बाह्य विनूपा
त्यायी, अध्यातम रटना जागी । प्रनु उपादान शिवपागी, पर
ध्यान धरे अनुरागी ॥ शेती करणईं धारा ॥ ज० ३॥ वीक्रम
घर नयर जिरांदा, पत्नु मानन सुरतठ कंदा ॥ तुम जगत उजागर
चंदा, दीव रंजनमें तुम चंदा, मनु मुखसंपति दातारा जि. तु०॥
॥ चिंतामणि कप समाना, जिन रूपं कुशल निधाना ॥ संसार
करत गुण गाना, अनु कोनमाप समाना अवभिगमिग ज्योतित
तारा ॥ ज० तु० ५.॥ इति पदं ॥
(६००) नचं शुद्धातमा रे, नंद योग मधुमाश निधि इंऽशित सप्त- शद्धिसार सुख रास रे ।। चि०५ ॥ इति पदं। मेरे मन नकी, रवि नीकी जी ॥ मेरे० ॥ चरण कमल चित हितकर लागी लगन गुण गावकी। ०१॥ सामली सूरत सटक पर, वरसे घटा जेसें सावणकी। ०२॥ बालपरी प्रन्नु इम. खेले, अब तो नर विसरावणकी ॥ ० ३॥ याद करो जि रख प्रीती, वखत वनी.हे दिल. लावणको ।। ३० ॥ मोहे । सो. हे बहुतेरो, आप कहो ललचावनकी - ॥ ७०५ ॥ सहजार एक लहरमें, दीजै सुख सुख जावनकी ॥ ३०६॥ पारस नेट जो लोदा, होवै लोक हसावणकी ।। ३० उ.|| राम निवास अ प्रन्नुजोते, कसार पद पावनकी ॥ ०.७ ॥ इति पर। ॥ नेम जिनंदजीतें, आंखमली ॥ ए चाल । साहिब सुगु सुपारससे, मेरी अजव अनोपम प्रीत, ना रे ॥सा०॥ जिन.मु चंचंद्रिका निरमल, चंचल नैण चकोरमई रे || सा० १ र कीजैः निज, चरसनतें, सुरतरुको गंह गही रे ॥ सा० ॥ दिखन प्रजुसें अरस परस अब, वतिया मुखको प्राण कही रे ॥ ता०२ विक्रमधारी जग पगार, मेरी सूध क्युं विसार दई रे । सा० ॥ शांति सुधारश, नाय दयानिध, शसार लय लाग रही रे (६१) शंकर रमणविहारी, अनु महिमा अगणित धारी, श्रीपतिकी चिंता चारी || सां० ॥ डंगर सिंघ विकमराजा, उपदेश सुमति दिये ताजा, जिननुवन करावण फाजा ॥ सा० ५॥ शिववामी सुंदर ग जै, जिनमंदिर शरसं विराजै, हरिहर मंदिर विच गाजै, सां०६ ॥ नरनारी दरशन आवै, शुज पूजन युगति रचावै, प्रनुजीसें प्रे म लय लावै ॥ सां०७ ॥ अभिनव श्रीनवल जिनंदा, जगजीवन वामानंदा; प्रन्नु दीज्यो परम आनंदा || सां०७॥ नगणीसे नग प्रापचासे, सुदि पांचम यतन विलास, प्रनु माधव माश हुलास सां० ए ॥ हितवद्धन प्रनु गुण संगी; निधि कुशलतु अमृत रंगी, द्धसार कहे नवरंगी ॥ सां० १०॥ इति शिववामी सुम तेश्वरपार्श्वनाथ स्तवनं ॥ अर्थ रुपनदेव स्तवने ॥ : ॥ मोहे गेम चला विणकरा || ए चाल || तुम जो रुप प्रनु प्यारा, जगजीवन नाथ हमारा ॥ नहीं करूं पलकन्नर' न्यारा, लग रदीलगन इकतारा ||ज०॥प्रनू मोहन सूरतिधारी, कंद रपदर्प विषयारी ॥ जयलीन योग आधारी, सुर असुर नमत नरनारी, मनु नए जगतसे न्यारा ॥ ज० १ ॥ केवलकमला संग लीने, पी यूप सहज सुखनीने ॥ माया गया तज दीने, आगम गम अंतर चीने, नया तीन लोक नजियारा ॥ ज० २ ॥ क्या वाह्य विनूया त्यापी, अध्यातम रटना जागी ॥ मन्नु नपादान शिवपागी, वर ध्यान..धेरै अनुरागी ॥ शेलेती करण• धारा ॥ ज ३ ॥ वीक्रम घर नयर जिणंदा, प्रन्नु आनन सुरतरुं कंदा ॥ तुम जगत उजागर चंदा, दील रंजनमें तुम वंदा, प्रनु सुखसंपति वातारा जि. तु०४ .|| चिंतामणि कलप समाना, जिन रूपें कुशलनिधाना !! अवतार करत गुण गाना, प्रनु कीयाप समाना। अब मिगमिगज्योतित तारा ।। ज० तु०५.।। इति पदं ॥ -
(६०२)
॥ अथ लावणी संग्रह लिख्यते ॥
वीसनगर कल्याण पाचवनायकी लावणी.
॥ अगमउंवाजे चोघमा, सवा मंका सादेवका ।।
अवाज होता, मदेल वनाया गगनोका || कल्यापारसना
मका, नित२ वाजे चोधमा । तीन लोकमें सच्चा सादिव,
'नाथ अवतार वमा ॥ १ ॥ वशारसीनगरीमें तेरा जनम दे,
वामाके नंदा || अश्वशेनके कुलमें शोने, जैसा सरद पूनमचं
'स्वर्गलोकमें हुवा आनंदा,इंद्राणी मंगल गावै ॥ तेत्रीस कोन दे-
'मिलकर, प्रोग्य करणेकु प्रावै॥२॥ कोइावताको गावता,
नाम लेता. देवा। चोसठ इंद्र अरज करता,चं.सूरज करता है
॥ केश्सुरनर सादेवके आगे, अरज करताखमाखमा जिनके सरूप
'पार न पावें, जिनका गुण हे सबसे वमा ॥ ३ ॥ दूर देसते अ
'जोगी, वझे जोर तपस्या करता, नीचे लगाता ज्वाला जोगी, वर
मोके खाता, बारे वरसकी उमर प्रन्नुकी, गेटेपनमें बहोत क
॥ बरोबरीके लिये सोवती, तपशोकू देखण चला ॥३॥ ज्ञान में
''के बोले जोगीसें, एसी तपस्या कू करता, 3 जोगी तेरे वके सा
मेमें, वमा नाग इक अधजलता ॥ पारसनाथ जोगीसुं कहत
तोवी जोगी नहिं सुणता, लकमे दिये फेंक जंगलमें, लोक. तम
• सा देखता ॥ ५ ॥ क्या कीया वे जोगी तुमने, वमा नागकुँ जल
• • दिया, दिया सार नवकार नागळू, धरणीधर.पदवी पाया ॥ व
'चमेदसें आया साहिब, संवत्सरीका दान दिया। मातापिता
'आझा लेकर, महाराजने योग लिया ॥ ६ ॥ रान,गेमके चले
गलमें, जुगतीसें.कानसम्म किया ॥ वो धीर गंभीर प्रनूने, तीन
'लोकमें नाम किया, ॥ उष्णकालकी वही धूपमें, नीरंजन निराका
र खमा, कमगसुरने किया काका, नन्तममल बादल चा ॥"
- -~- (६०३) । उसी दिनको कमठासुरने, पिसा दावा जगवाया ॥ मेघमालीकी सेना लेकर, जसकू जलदीवुलवाया ।। वमा किया घनघोर जोरसे, पवन चलाया मतवासा | कममकर हुआ कमाका, चमक बी जका नजवाला ॥ ॥ मूसलधारा मेघ वरसता, गगन गाजता चौताला ।। सात खूट की वझी ममीमें, प्रन्नु खमा दे मतवाला ॥ नाक बरोबर आया पाणी, नाथ निरंजन धीर वमा, पराजय नदि होय जिनूंका, एसा प्रनुका ध्यान चढा ॥ ए॥ संकटसे सिंहासण- मोला, हुवा घंटका आधाजा, अवधिज्ञानसें इंदर देखा ॥ धानर धरणीराजा ॥ धरणीधर जलदीसें पाया, पदमावतीडूं संग लिया, पदमावतीने लिये शीत पर ॥ शेषनागने व किया ॥१०॥ कोम कपाय तो किया कमग्नें, कुवबी इलाज नही चलता । तर सेवावा सादिव उनकू, ग्लणेवालाक्या करता॥जीते श्रीजिनराज हारके, कमठ हाय दो जोमखमा।धरणीधरसाहिबके आगे,अरजीक रता खमार ॥ ११ ॥ केवल पाय शिवपदकू पहुंचे, पार्श्वनाथ शुन मतवाला ॥ लगी ज्योतमें ज्योति दीपकी, तपे तेजका अजुवाला । वीसनगरमें पार्श्वनायका, देवल बनाया तेताला ।। वझे देवलमें इंदर सोदे, धंट वाजता चोतावा ॥ १३ ॥ वमी जुगतसें सिंदा संण कर, कोट बनाया देवलका । जगोर पर शिखर चढाया, दरवाजा शुभ केवलका ॥ नाममलके आगे शोजता, मूल गुना- रा पारसका ॥ पीछे पच्चीस देरिया सोलित, तिरे काम सिंघा- सपका ॥ १३ ॥ मूलनायक के ऊपर सोद, सहसफणा प्रतु पार संका॥ चौमुखकी चतुराई वणी है, बहू काम दै सारतका ॥ अढारसे पैसठ साई, मुदुर्न फागण मास नवा ।। सुदी तीजकू तखते वैठे, जगोर पर नाम चला ॥ १४ ॥ देशर के संघ बहु मिलकर, तेरे दर्शनकुं आया ॥ जगतगुरु जिनराज जगतमें, वो ३ (६०४ ) तेरी अकलमाया ॥ धर्मचंद जोमता सवाश्ने, वमा सादमी वा- सत्यं किया ॥ सकले संघकी धाज्ञा लेकर, वमा शिखर निशान दीया ॥ १५ ॥ करमचंद ने देवचंद ने, खेमचंदने खुब किया । पारसनायकू तखत वैवाकर, जगोर पर नाम किया | कीर्तिवि: जय गुरुराजकुं प्रणम, पाय गुरुका राज वमा ॥ गुलाबचंद सादेव में आगे, जिनसासनको काम वमा ॥ १६ ॥ तेजा गाता चंग रंग २: ग्यान ध्यानसे खमार, हाथ जोमकै अरजी करता, पारसनाय, नीतूंदी वा ॥ कमा काम तेरे है साहिब, मुखसें नदि कहणे. पाता. ॥ शिवरमशीकुं वरी है जिनजी, नविजनकुं सुखके पता || १७ ॥ इति पदं । ॥ अथ आखातीजकी लावणी ।। रुपन्न तेरी सूरतका प्यासा, लगी मोहे दरशनकी प्रासा॥ श इक्ष्वाकू नन्नचंदा, नूमिपति नानीके नंदा ॥ मात मरुदेवा, खकंदा, प्रगट नये जगजन आनंदा ॥(उदा-साखी) रेणु.पूंज पर पके, गये मिथुन जस सैन | श्रासन कंप जयो सचिपतिको, यो तिखक पद दैन ॥ नाथ नये वसुधर सुखरासा ॥ ल० १॥ लि पर कनक मुगट राजै, मालगल मोतियनकी गजै ॥ श्रवण ग कुंकल अति साजै, निरख बघि कोदिनान साजै ।। (उदा-साखी) र वीर सोनावणी, श्राप ताप कलकत॥ युगल अलंकत देख. तूंकू, चरण नीर वरसंत । विनीता धनदपुरी वासा ॥ १० ॥ तंदा सुमंगला राणी, लोगसे योग प्रीत गनी ॥ नये शत पूत्र गुण खाणी, मनूने दिया राजधानी ॥ (उहा-साखी) चौसम विद्या रकी, पुरुष वदोत्तर ग्यान ॥ जग विवहार चलाया मनूनें, मजा- । अनिधान ।। मुनि हुय तजे जगत फासा ॥ ल० ३॥ लान, राय कदै प्राया॥ वरसदिन जोजन नदि पाया, नेद मणिकंचन (६०५) सब लाया॥प्रनु निरममती गतमाया || (उहा-साखी) दस्तिना, गपुर नगरमें, श्रीश्रेयांशकुमार ॥ कुरस अनुकुं वहिराया, देव कर- त जयकार ।। अक्षयतृतिया नई परकासा ॥ ०१॥ करम इन. केवल चिदरासी, नाथ नये अविचल अविनासो । शिखर केलाश श्राप वाशी, नाम शिव ब्रह्मा विष्णु नासी ॥ (उहा-साखो)।. कुंदण काया सोहनी, परम घरम जिनचंद ॥ जमी, घी मनमोहन मुरति, सखमी परत आनंद ॥ फूल रही. मीना उजियासा ॥ ०५॥ रुन घनस्याम मूरति नोकी, सजल. पन घटा प्रनुजीकी ॥ नयण अरिविंद नमरकीकी, भक्तिरस कुं, स पुर सीखी ॥ (उहा-साखी)॥नगणीशय अमतासमें, ज्ञानपंच मीरंग ।। कूम कपटतज नेट नई जिन, सुंदर कमलासंग ।।कुशल. शहतार चरण दासा ॥ ०६॥ इति पदं । ॥ अय दीवाली लावणी॥ प्रन्नु वीर धीर मणि दीर दरस बखिदारी, प्रनु पावापुर निर्वाण संघ सुखकारी ॥ प्रतु केवल जान प्रकाश तत्व दरसाये, मन चनद सहस मुनिराज संघ सुखदाये ॥ प्रन्नु चरम समय. निज देख पावापुर आये, तब सुरवर सुखकर समवसरण विरचाये. ॥ क्या सघन तरुगत शोक रमरा वि गये, नामंगल धजवर इंउनि नाद सुशाये, मणि कनक रतनका वीच सिंहासरा नारी । प्रतु पावा० ॥ तव दस्तपाल नरपति मुरपतिके प्रागै, प्रन्नु शोले पहर भुनि अमृत पम लागे ॥ पंचम पारेके नाव प्रगट ग. त रागे ॥ नाप सिद्धारयनंद सुरात ब्रमन्नागे ॥ तिहां नरपति मु रपति खगपति सेवा मागे, जयर श्रीजगपति नाय सरत रस जागे ॥गौतमकूनेजा प्रतिबोधन नपगारी अनुपा०२॥ अम्मायश पिठली रैन मुगतिपद सीने, इंद्रादिक मिलकर अधिक महोदव कीने ॥ गो.
तमने
सुखकर वीतरागपद चीने, तब जगत प्रकाशन ग्यान सुधा-
रस पीने ॥ मेरी धन्य धमी दिन आज दरश मोहि दीने, मेरे दि
परा हरप न माय फरकता सोने | नई दीवाली जग वीच तनीसे
जारी॥प्र०३॥ तहां देवादिकने रदन सदनमें धार, कोटाकोटी रजक
गलिया नरानरी ॥तहां नया सरोवर महिमा अपरंपारी, नंदीवरधनः
कियान्नुवन विस्तारी॥प्रनुजलमंदिर गरदाव कमलकी क्यारी, प्रन्नु
हो मंदरमें मूरति मोहनगारी। जिन चरणकमल विनविकू लागत
यारी ॥ प्रनु० ५ ॥ प्रनु धरमचंद हो श्राप आप जत राजा IF
या कांति अनोपम फूल महकते ताजा ॥ मीनाकुंदनसे जमाव
गिया साजा, प्रनु मुन्नी चुन्नी अविचल वाजत वाजा ॥ सन
गणीसे अमताल कृष्ण पख गाजा, नये कार्तिक दिन निर्वाण
ट माहाराजा ॥ प्रनु लखमी प्रेमसे कुशल निधी रुइसारी ॥
नु पा०५ इति पदं॥
|| अथ श्रीमंधरजिन लावणी ॥
श्री सीमंधर जिनराज अरज सुण लीजे, प्रनु रहम नजर
र दिलन्नर दरसरा दीजै ॥ मोहे लगन तुमारे बदन दरसको
गी, मेरे जिगर ज्यानमें रीत प्रीतकी जागो || क्या करूं नाय
म दूर वसे वमन्नागी ॥ नदि पोंदचत पतिया पात तुमारे पागी
नदि इस डनिया दरम्यान पंयका थागी । मेरे रात दिवस इक
जान जया अनुरागी ॥ जो पल तर पाई संग अमृतरस पोजे ।।
दुरद० १ ॥ में नररयसीके वीच सुपन पनु पाया, पनु पर
परस जिनराज दरस दिखलाया, मेरे रोमर मानंद दरखर
या ॥ क्या प्यारी सूरत मूरति कंचन काया ॥ जो परतिस
ई नाय चरणकी गया, मेरा जनम सफल हो जाय कसं दिस
या | तम जाणत दो घट वान दील नदि कीजै । पन २०२५
(६०७) 'धनर वो सदर मुकाम जिहां जिनराजे, धन२ वो नर नर नार सुण- त धुन साजै ॥ जो पर पाउं इक वार मिलणके काजै ॥ तो पानं जिन तुम पाश देख उख नाजै ॥ ये सुण जिन मेर स्वाल कुटि लता लाजै, प्रनु मतकर देरी तुरत चढा शिव पाजै ॥ तुम वचनं मालती फूल लमर मन री । प्रनु र० ३ ॥ क्या समवसरण सोनापद पदम नजाला, नरपति श्रेयांशकुमार सुतन सुकमाला ॥ प्रन्नु प्राणपियारी रुकमणि मोहनमाला, प्रनु सत्यकी जननी नीर मीन खुसियाला ॥ अब दोने कुशल निधान सदा सुविशाला, में घाई संग अनंग प्रेमरस प्याला ॥ जिन नक्ति जमी रुद्धसार नाथ वगसीजै ।। प्र०४॥इति पदं ॥ ॥ अथ अजीमंगजमें रामवाग लावणी।। जिनचंद करण आनंद दरख धन वरसण, श्रीसांवरिया म. हाराज तीहारे दरशन ॥ श्रीकाशी सुंदर देश बनारस गजे, जहां अवशेन वरील सुदर्शन राजै॥ वामोदर कंदर प्रनु पंचानन गाजै, प्रन्नु नरदरि दीनदयाल मदन मद लाजै ॥ प्रनु कम दीन नप देश दयाके काजै, प्रनु धरे जोग तज लोग अचलपद साजै ॥ पा. रसके संगत लोद कनक नयो करशन ॥ श्री सां० १ ॥ क्या वर- ' ' साहिब तुम गुण गणकी रासी ॥ जोगी नागार्जुन सुवरण सिद्धि प्रकाशी ॥ श्रीअन्नयदेव सूरी गण खरतर वाशी, तुम शांतिक जल 'सें गये अरुज सब नाशी ॥ श्रीरामचंइ सेतु वर पाज सराशी, • श्रीयादवकुलकी जरा पिशाची नाशी ॥ तुम मूरत निरखण लग रदी अंखियां तरसन ॥ श्री-सां० २॥ श्रीग्रजीमगंजमें संघ सुथिर सुविलासी, नित यानंद नचव होत धर्म नजियासी ॥ प्रन्नु रामवाग 'विच. भुवन वएयो केलासी, क्या श्रदन्नुत महिमा चंदकिरण परकासी, जिन ध्यान सरूपी लगी लगन अविनासी, प्रन्तु रजन
:
(६००)
फंदा तोम मोदकी फासी । जिनचं सूरीश्वर विजयराज के
सन ॥ श्रीसां० ३ ॥ पावक हितवल्लन चैत्य प्रतिया कोनी,
संघ सवा कल्याण नक्ति बुध दीनी ॥ सन् नगणो सय अमत
माघ सुद लीनी, सुन्न वस्तपंचमी कुशल निधान नवीनी ॥
क्ष्मी वरदायक श्रीपारस पद चीनी, शदसार कई सुखकार नक्तिर
पीनी। नर कंचन काया प्रन्नु चरणनके फरसन ।।श्रीसांइति
अय लावणी नेमनायजीकी।।
नेमनाथ मोरी अरज सुणीजे, मेहुं दासी चरणोकी, तोर
आये फेर मत जान, तुमकू सोगन जादवकी ॥ ने० १ ॥ जान
ले तुम व्याइन आए, सारे सेना माधवकी-॥ उप्पन्न कोर जादव
मिल आए, ए अवसर नही फिरणेकी । ने० २॥ रय फेरी गिर
वरकुं सिघाए, हमकुं बांझी नव नवकी ॥ मेरे सामरै स्याम सलू
णे, में यहां नही अब रहणको ॥ ने० ३ ॥ सुरा जिनजी में तो-
कुं कहतहुं, देखू शोना गिरवरकी ॥ मातापिता वाधव सब मी./-
जामु संगे यादवकी ॥ ने० १ ॥ हाथ जोरके वीनवै राजुल,
बात सुशो पियु मुझ घरकी, हमकुं गेम चले निरधारी,
अब हे पीतम सरणेक़ी ॥ ने० ५ ॥ नेम कहे तुम सु-
ण हो राजुल, विषयारस हे विप सरपी ।। यह संसार असार निरं-
तर, कर करणी ,यह तरणेकी ॥ ने० ६॥ पियुजी पासे संयम
लीयो, जिनसें कारज सरणेकी ॥ तपस्या करीने उनम कीनी, यह
नव पार कतरणेकी ने ॥ पियुजी पहला राजुल नारी, पो-
दता सेज परमपदकी ॥ केवल पामी नेम सिधाए, येही शोना
है जिनकी ॥ ने० ७॥ चतुर कुशल या कही लावणी,..जिनमें
काया उद्धरणकी.॥ अरिहंत ध्यान धरे दिल माहै, फिर फेरा नाई
फिरनेकी...ने०.ए.॥ इति पदं ।
..
अरे तुम
(६०)
}} जिनदासजी कृत १० धन तथा लावणीओ।
॥ जो मंत्र नवकार, जीनोसें उतरोगे नव पार
॥ दोय तेरी कायाको आधार, सफल कर वे अपनो अव.
तार | ध्यान तुम मनमें धरो नर नार, खाण उख की ए है संसार
॥ करो प्रन्नु निहाल श्रन्नो जिनदास, रखो प्रनु मुम चरणोके पा
सातरकजा कुमति नार काली, तेरी संगतसें गई लाली सोबत
समताकी में टाली,श्रातमा तपमें नहिं धालीअनंत जय वीतगया
खाली,वेदना निगोदकी काली॥अमरपद जिनदास मांगे, सदा पदप्र
गुजीकू लागे ॥ २॥ शीश नित नमुं नानिनंदन, चरण पर चढ़े
शिर चंदन ॥ करत सब इंद्रादिक बंदन, कटत हे. कर्मोका फंदन
| साध्यो ते शिवपुरको साधन, सर्व जीवनकू सुख कंदन ।। जिनंद
पण जिनवास गावे, शोश चरसोंसे नमाचे ॥ ३ ॥ बोलत हे हि
र मेरा दसकर, चदा चंदन चूया घसकर ॥ पेगमें धर्मों में ध
'कर, पाप दल दूर गया खतकर, चेतन हुवा खमा कमर कसकर,
दाया काँका लसकराश्रिीजिनराज जिदाज खासा,शरण जिनदास
या वासा | समझ मन मेरा मतवाला, तुझं नदि को दट
सवाला ॥ वस्या तेरे हिये कुगुरु काला, दिया ते सुरमत्तिकुंता
· । फेर तो ममताको माला, वाल तो जगवंत पर नाला ।। दृ
में दे दिया ताला, देखो जिनदासका चाला ॥ ५ ॥ कीया में
घिर प्रेमपती, मुझे वरदायक हे सरसती ॥ करी निर्मल निमें
ती ॥ पूछ पर खमे जागता जती।मुझे बलवंत नई शोल सती;
मिटी मेरी अर्गतिकी सब गती, एता धन जिन दास गावे, अचलः
पद नक्तिसें पावै ॥ ६॥ . विकट घट पुरगतिका नारी; नीर
ज्यां जरती कुमति नारी ॥ वरती नन नेणोंकी मारी, मुन्या के.
कामी संसरी ॥ श्नोकी हो रहियै खुमारी, जीता को सक्ष्य
33
(६१०.)
घरमधारी ॥ प्रन्नु तुम परमारय पाया, शरण अब जिनदास
या ॥ ७॥ चैत नर निगोदका वासी, कराई जगमें तें हांस
कुमतिकी पमी गले फांसी, सुमतिसुं रखी हे उदासी । कुमति
वसी सेज खासी, मान रह्यो ममताकू मासी ॥
खोल अरिहंतकू परखो, करो जिनदास आप सरखो ॥
अफल नर तेरी जिंदगानी, शीख सूत्रोंकी नदि मानी ॥ कि
नदी गुरु नियंघज्ञानी, कानसें लगी कुमति रानी ॥ जगतमें ।
रं गया पानी, गती तेरी उरगतिकी गनी ॥ सेवक तोरा जिनदा
वाजै, सुधारोगे तुमदी काजै || ए || सफल नर तेरी जिंदगान
शीख सूत्रोंकी तें मानी ॥ किया निज गुरु नियंयज्ञानी, कान
लगी सुमति राणी ॥ जगतमें अधिक चढ्यो पाणी, गती ते
सुरगतिकी गनी । सेवक तेरा जिनदास वाजे, सुधारोगे तुम
काजै ॥ १० ॥ इति ।
पुनः लावणी॥चल चेतन अब उठकर अपणें, जिन मंदिर जश्ये
कीसीकी नूंमी ना कदिय रे, किसी० चल० ॥ चरण जिनवरज
का नेटोरे च०, नवर संचित पाप करम सब तन मनका मेटे
॥ सुरुत कीजै-महाराज सु०॥ जिनवरका गुण जज लीजै, सम
कित अमृतरस पीजे ॥ सान जिनन्नतीका लदिये रे-सान्न ।
चल०१॥ करो मत मुखले बाई, करो०, तज तामस तन मनका
सुमति कर घर रदणा नाई ॥ रीतसे बोलो-मेरी जान री०॥
पातम समतामें तोलो, मत नरम पारका खोलो || मौनकर तन
मनसे रहियेरे-मो० ॥ ०२॥ जोबन दिन च्यारतणा संगीरे,
जो०॥ अंत समें चेतन उठ चाख्यो, कापा पमी नंगीप्रीत सर
तूटी-मेरी श्या०त्री० ॥ माउखेकी सरची खूटी, चेतनसे कापा
रूगी । मुख स पाप किया सदियरे-मुख च०
(1)
जगतमें रहता उदासीरे ज०, पररख्या में जिनराज कटी मेरी र
गतिकी फाती ॥ तजो सब धंदा-मेरी ज्पा० त०॥ जिनपर मुख
पूनमचंदा, जिनदास तुमारा बंदा || मेरे एक जिन दर्शन चहिये
२-
मेच०४॥ इति पदं ।।
पुनः॥ तुम नजो जिनेसर देव, मुगतिपद पाईरे-मु०॥
अब अचल अखंमित ज्योति सदा सुखदाईरे ॥ में रुल्यो चोरासी
मांदि नूल्यो में नरम, नूल्यो०॥ महारे नदय अनंता उख बांध्या
जब कर्म ॥ में कदियक हून रंक फिरयो तज शरम, फिका अरु
कदियक राजाजयो गस्यको गरम | जब गरव प्राशकर बोल्पो
पारका मर्म, परा निर्मल जगमें जैन कियो नही धर्म । अब मनु
प्य जनममें चेत घमी शुन आई रे, घ० ॥ अव० १॥ में सुरनर
का सुख वार अनंती पाया, अनं० ॥ मारे शिव समताका सुख
दाथ नदिं पाया ॥ में कुयुरु अने कुदेव जला कर ध्याया, नला
॥ में उलयो अनादि प्रज्ञान विषय नोग लाया। में पमया
लोनके फंद जोमतो माया, जो० ॥ पण लग्यो अंत जब आप
कालने खाया । अब परहर सब परमाद धर्म कर लाई रे, धर्मक
अ० २ ॥ अब वन्न अवसर बही तुं सुरूत कर रे, तुं सु०॥
अब दानशील तप नाव दीयामें धर रे, तुं करमकी माला काट
पाप परिदर रे, पा०पर वार २ कहुं तोय जगतसे तर रे॥ तुं
निर्मत नयणे देख जगत मर रे, ज० ॥ तुं सीख सुगुरुको मान
अज्ञानी नर रे ॥ यब पर तिरिया कर जान बैन घर जाई रे।
वे०॥ ०३॥ अव जिनवर मुझ मन जापो सदा गुरा गाउं,
सदा० ।। अब इतनी किरपा करो नरफ नही जा ।अब नवर
मांदी देव जिनेसर पानं ॥ जि०॥ में मन वर काया करी चरण
चित ब्याउं । ए दयाधरम हितकार, सदा में चायं ॥ २० ॥
(६१२) चोरासी के मादि फेर नदी पानं ।। यूं घरज करे जिनदास, कीरत एगाईरे॥की० अब० ॥ इति । ॥ अथ सुमति कुमतिकी लावणी ॥ हारेतूं कुमति कसेतरा नार, लगी क्यूं केमे, स० ॥ चल सरक खमी रद दूर तुझं कुण मे।हारे तुंसुमतीको नरमायो, मुझे क्युं गेमी, मुझे०॥मेरी सदा शाश्वतीप्रीतग्नि कमें तोमी॥तुम विनमूनी मेरी सेज,कहुं करजोमी, फ० ॥ न चलो हमारी संग सुखे रहो पोटी । ई कुर२ कुमति प्रांसु प्रांखसे रेमे, प्रां० च०१॥ दारे तेरी नरकनिगोदको सेज, सेति में रूगे, सेति ॥पकमया साचो जिनराज, संग तेरो ठूटो । तेरो मूरख माने वात, दियाको फूटो, दिया० ॥ में सहज हुवो हुँ दूर तार तेरो टूटो ॥ तुम करो दूरसे वात प्राव मत नेमे, श्रा० च० २ ॥ मेरी अनंतकालकी श्रीत पलक नहिं पाली, पल० ॥ सुमती के लागो संग मुळें क्यों दासी ॥ तुं सुमतीको सिरदार, सुणावे गाली, सु० ॥ तेरी दम दोनूं दे नार गोरो नर काली ॥ तूं हम फू वेले दूर सुमतिकुं तेमे, सु० च० ॥ ३ ॥ अब कुमतीको बल घायो, रती नदि मिगियो, र०॥ सुणकर सूत्रनकी शीख, साच होय सगियो । चेतन कुमतीकी सेज, दूरसं लगियो, दू० ॥ जिनराज बचनको ग्यान, हिये में जगियो । जिनदास कुमति तुं वात खोटी मन खेमे, खो०॥ च०४ ॥ इति पदं । ॥ पुनः ॥ तुम तजो जगतका ख्याल, इसकका गाना,इस० तेरी अक्षय ऊमर खूट जाय, नरक न जाणा ॥ तें दिना चार वीच लिया दे वासा, लि० ॥ तेरे सिर पर वैग काल, करे हासा ॥ में वो साची वात, कुठ नहीं मासा, फू० ॥ तूं सूता के कुरा निंद, किसी कर पासा ॥ अव सेव देव जिनराज खलक खासा, खल ॥ तेरे. जोवन पतंगका रंग, - मूठ सब (६१३) पाता। अब हिये धरो मेरी सीख, समझ रे दिवाना, स. तु०॥ १ ॥ अब बुरी नलो सम वात, मोन कर रोजे, मो० ॥ ए मुख मी ग संसार लेद नहीं दीजै ॥ कर वीतराग विसवास, हिये धर ली जै, दिये॥ पण नीच नारका संग माहे मत नीजै। अब सात विसनको संग, प्रीत मत कीजै, प्री० ।। तोदे उरगति दे पोहचाय तेरो तन ठीजे ॥ तुं सुख उखका सिरदार, रंक नह राना, २० तुं०२ ॥ तुं विसरगया जुग वीच, नाम जिनवरका, ना० । पच रह्या कु टंबके काज, किया फंद घरका ॥ तें दया धरम विन खोया, जनम सब नरका, ज० ॥ तेरे पल्ले बांध्या पाप, कसाई सरखा, अब लि या नहीं तें लान, वखत पर करका, व०॥तेरी वीती वात सब जा य जनम युं खरका । अब सुणो शीख सूतरकी सुलट रे स्याना, सु० ॥ तुम० ॥ ३ ॥ तेरी चरण सेज पर पोढ्या, आनंद दिल अाया, आ० 11 मेरी जगी नूख सब प्यास सुधारस पाया ॥ मेरे सिर पर तुम शिरदार, जिनसर राया, जि०॥ में चाहुं चर पकी सेव सफल कर काया । अब यो दोलत दरसराकी, मेरे ए हि माया, मे०॥ ५ अरज करै जिनदास अलख गुण गाया। अब धुरा कुगुरु उपदेश सुणो मत काना, सु. तुम• ॥इति पदं ॥ ॥ पुनः नेमनाथजी की लावणी ॥ दे गया दगा दिलदार, सुणो मेरी माई, सु० ॥ जग रही नेम दरसनकी, सरस श्रसना ॥ अव अजव श्रवो जो नेम, मेरे शिर वगजे ॥ । मे० ॥ जादवकी देखी ज्यान, जगत सब लाजै ।। एसो नेम नवल इक वींद, अनोखो बाजे, अ०॥ सुरनर सब गावै गीत, गनन में गाजै ॥ अव दोमर सब ऽनियां, देखणे पाई, दे० ॥ दे० १ ॥ अब चढा नेम तोरणकू, आनंद दिल धरकर, श्रा० ॥ सज भायै सुरंगा साज, किलोखां करकर ॥ में पायो परमानंद, दरख
(६१४)
हिया नरकर, इ० ॥ ले गयो पती नेमनाय, मेरो मन इरकर ।।
सखी सुख संपत अंगरामें, आज चल आई, प्रा० दे० २ ॥ अब
इस अवसरमें सूरत, स्यामकी लागी, श्या० ॥ पशुअनकी मुशी
पुकार, दया दिल जागी । जिन ली परवतकी वाट, तृप्याकू त्या-
गी, शिवरमणीके शिर वींद, वण्यो वैरागी ॥ अव महल चढ़ी रा-
जुलकू, खमी टिकाई, ख० दे० ३॥ अब रेतीके सरवरमें, टिके
नदी पाणी, दि०॥ जिनगुण गाया नहीं जाय, अलप जिंदगानी॥
अब कठन जीव उरगतको, वन्यो मेंदानी, ३०॥ जिनदास करो
जव पार, दया दिख आणी || अव शरण सतीके वैठ लावणी
गाई। ला०॥ दे०४॥इति पदं ॥
॥ अथ मगसी पार्श्वनाथकी लावणी ।।
मुलक वीच मगसी पारसका बाज रह्या मंका, मुगति गढ
जीत लिया वंका रे, मुना मुल०॥ करमदल बलकू कय काया रे,
क० ॥मुगतिमदलमें केलि करे, अनुन्नव अमृत पीया ॥ शाशता
जीया, माहाराज शा० || कल्याणक कारज कीया, अमरापुर पद
वी लीया, कमठ जसका करगये फका रे, क० ॥मुल० १ ॥ प्रनु
पारसमजले नाईरे,प्रनुपा०॥नाव जमरकामेट जोत तेरी जगमें
सवाई। टेककूटालो, महाराज टे॥चंचल चितसे मत चालो, गुमान
गरबकू गालो, गरबसे धूम मिली लंका रे, ग०॥ मु० २॥ मेरे
शुन्न नाग्य नदय आया रे, मेरे० ॥ण पंचम पारा मांहि मनु
पापते मरता, महाराज पाप० ॥जवि जीव ध्यान
दिल धरता, श्रावक नित समरण करता, मरण उख मिट्या मेरे ।
रे, म० ॥ मु० ३ ॥ महिमा मगसीकी. अब जागी रे,
॥ नहि ऊघमी मेरी अांख विलोया परव विना पाणी ॥
में
१. जाच्या, महाराज में जि०॥ जिनदास जिनंदतें राज्या, म:
मगसी पाया,
( ६१५) गसीपारका हे साचा, करो मत मनमें कोई संका रेक मु०.४ ॥ |नपदेश लावणी-॥ सुरुतकी वात तेरे हाय रती ना रही रे, पुदगल में मान्यो सुरक कलपना कही रे ।। सु० ॥ जग मादे जैन निज सार संघाते आवै, संघा० ॥ इसकुं तजकर क्युं वेगे, विषय गुण गावै ॥ अमृतकू अलगो ढोल, विसन विष खावै, वि०॥ मुगतीको मारग मेट,नवटमें जावे॥धारी तुडजिंदगानी मांदि, विक- ल बुध नई रे। पु०१॥बारे धन दोलत नंमार लरयादे मोती,नः रया० ॥ सत्रु सजन सब बने, जगत हुप गोती॥ कोइ मसले तेल फुलेल, धोवे कोइ धोती, धो० ॥ सन्मुख न पावै, अबला तेरो मुख जोती । एसी संपत लिन मांहि सरव कप नई रे, स०॥ पुद०॥ २॥ तें खटरस खाया खूब, खजाना खोया, ख० ॥ निसदिन सु. बलर सुंदरकी, सेजमें सोया ॥ सझिया शोले सरागार, नारिलें गोह्या, ना० ॥ तें अंतरघटका मैल रती ना धोया॥ या नरक नि- दकी. वाट, पका कर सही रे, प० । पु० ३ ॥ मन मातो गाठ मद मांदि, गरबसें बोले, ग011 में सुख संपत्तको नाथ, रे. कुण तोले । उर्बल करता पोकार, पलक नही खोलै, १०॥ कर: हुय रह्या इजूर चमर सिर ढोले, अब अवसर हाथ, चेत तूं सही रे, चे० ॥पु०१ || कायासे कीयो लाम वना चंगी, व० ॥ पलनर परवारयो पुन्यतयो तिहां नंगी॥पकमी स्लवकी वाट, दोय कुरा संगी, दो० ॥ तेरो इंत गयो आकाश या पमी नंगी।जिनदास कहे करमोंसें जोर तेरा नही २, जो पु०.५॥इति पदं॥ ॥ पुनः॥ नेमजिन लावणी॥ तुम तजकर राजुल नार, तजा सब घर रे, तजा ॥ नमुं नेमके पाय गया गिरवर रे ॥ में प्रीत पियाकी कर कर वे लागी, तुम त्याग चलै वनखंग.नये वैरागी ॥ अब राजुलसी - सत्तवंती नावसे त्यागी, ना० ॥ थारे अंतरघटमें ज्योत ज्ञानकी जागी ॥ यूं रोती राजुल नार नेशनररे, नेणामें०१॥ में अरज करूं करजोक, करो मन परसन, करो०॥ मेरे सिर पर तुम तिरदार, देजो मोहे दरसन ॥अब सुख सखियनका देख, लग्यो मन तरसन, स०॥ मेरे पावै नयणमें नोर लग्यो नित वरसन|मेरे नेम मिल- नकी श्रास, मिलूं क्यूं कर रे, मि०॥ में०२॥ में नहि. कीनी त. कसीर, चले क्यूं रुचै, च०॥ मेरे घरमें कुटुंब परिवार चार दिस चूंटे || में रहूं जो घरके मांहि, जोवन जम लूंटे, जो० ॥ में चखें. पियाके संग, प्रोत क्यूं तूटे ।। मेरे नेम बिना नहीं नर, जगतमें वर रे, ज०॥ में० ३॥ तुम तारी.राजुल नार, मुगतमें मेली, मु.॥ पीवे नेम गये निरवाण, करम सब सी ॥ में नित कठे परनात, नमुं. पद-पदेली, न० ॥ मेरे नेम विना नहिं नर जगतमें बेली। युं अरज करे जिनदास सुशो जिनवर रे, सु०॥ में० ॥ इति पदं ।। पुनः ॥ उपदेशकी। पाप समझका घर नहिं पाया, दूजेकुक्या समझावै ।। वंका फिरे जिनदास जगतमें, होयो दायमें नहि पावे।। दरस सवाद चादनकी चितमें, चानक अधिकी आय लगे, इंद्रीका नरवसमें पझियो, ग्यानकला कहो केसें जो ॥ तृप्णाने जग लूंट लेयो , कपट करी परचनकुं ठगे. ॥ खायर लोही मांस वधायो, पाणी किस विध चले पणे ॥ विषय विपतकी करे चूंयणी, चारचातें चत नदी लावै ॥ ५० ही. या०१॥ अपने अवगुणवू नदो देखे, जाका अवगुण लाखै ।। हिंसादीमे डओ दजूरी, दया दूर दिससे से ।। गुणवंतका गुण लोप मेरो मन, अवगुपाके रसहूं चारी॥ नूंही प्रथमें राग धराम, सरो जिनयर किम राखे । उग पा. गर चोर एन्पाई, धनके मिस इनकुं. प्याये । . दी० ग्रा०॥ ॥ अवगुणको मेरी खान प्रातमा, मजान होय सो मोहिजे. .
(१७) नही माममे रुख अंबको, एरंग अंब सरिखो सुकै ॥-पारख नदी हे दीये ग्यानकी, गुण-अवगुण • कुरा बुझे, गामर देख कहै मुक्त घरमें, कामधेनु इतनी दूगै । एसी मेरी अविनीत सातमा, प्रव. गुण किम गाया जावै ॥ वं0 दीआप० ३॥ोध मान मायामें मातो, लोन मांदे खपटयो रहतो ।। गरथ गुमानी गमको गरजी, पीक पारकी नहिं सहतो ॥ नगति नहीं गुरु देव घरमकी, फवन पचन मुखसे कहतो, अंतर आंट न खुलै हियाकी, पूर्व परमपदकू देतो ॥ स्वांग सजी जिनदास जैनको, माल मुलकको ग खावे ॥ वं० दी. पाप ४ ॥ इति पदं ॥ अथ सुगुरुकी लावणी ॥ नमूर में गुरु नियंया, वे जिन मुशधारी दे || पुल पर प्रेम न करता, मनकी ममता मारी दे ॥न १॥ गस्व गालकर गुपति गोपवे, गत नियंत्रकी न्यारी ।। कनक कामनीके नही लोगी, वे पूरा ब्रह्मचारी दे ॥ न०२॥ कायके जीव अनापी, उनके वे हितकारी दे ॥ करम काटकर के. चल पावै, ज्ञानगरय गुण-नारी दे ॥न० ३ ॥ शुध्ध श्रमास सुम- ती सेवी, निज आतमळू तारी दे ॥ जिनवरकू जिनदास बीनचे, उनके चरण बलिहारी हे ॥ न०४ ॥ इति पदं ॥ पुनः।। करूं२ में एसे सदगुरु, थिवर कप जिन धारी है। सरपाःशुः सदा उपदेशी, नविजनके नपगारी है ॥ करूं२ में० १ !! च्यार निदेपे सप्त नंग नय, देश काल आचारी दे ।। विरताधिरती सर्व विरतके, धार धरावणदारी दे ॥ करूंर में०.२|| सत्य सनातन कुल अरु गएके, परंपराके धारी दे !! निन्नव अरु पाखक खमते, जैनधर्म जपकारी दे ॥ करूंर में० ३ ॥ संवेगी अरु संवेगपती, मुनी जती गुणकारी हे । ग्यान ध्यानसें शिवपद साथै, कद्दे पावक रुद्धसारी दे॥ करूंर में० ॥ इति पदं ॥ 3G (३१०) ॥ अप गुरुकी लावणी ॥ तजुर में उन कुगुरुकुं, कनक मनी पारी दे॥ ज्ञान प्यानकी वात न जापो, मट करमसें। दे 8 तजूं० १॥ करी कपाल बनूत लपेटी, शिर पर जटा व रीदे || कान फाफकर मुद्रा पदरे, उसके घरमें नारी दे ॥ त २॥ जोग जग जीव विणात, वे मद मांस पादारी दे कूका पंय जगतकू करतां, मुख कहे याचारी दे ॥ तजूं०३ कई गुण कुगुरुका कय सग, साप नदी संसारी दे ॥ माप नरन• बाव, उर्गतिका अधिकारी दे ॥ तजूं० ५॥ समकि श्रद्धा जैनधर्मकी, नहीं कुगुरुकूँ प्यारीरे, जिनवरकुंनिनदास वीर वै, कुगुरू संग खुमारी है ॥ तजूं०५ ॥ इति ॥ मात्मलघुता लिख्यते ॥ यो जिनदास कुगे रे गे, ये से लाकमी कूटो । यो०॥ सुरुत सामो पग नहीं जरतो, ग्यान दियाको खूटो ॥ सुधारयो सुघरे नदी धमतां, जैसो लकमको दो ॥ यो १ ॥ नरावा गुणवाका गुण नहिं प्राया, कोरोही पक- मयों पूगे ॥ गपोमा सुणकर लोक पूजता, ए अलग मासको तो ॥ यो २॥ पंमित गुरुकी सोबत पाई, चेत्यो ना दीयाको फूटो, साचा नरको संग न करतो, कूम कपट नहीं बूटो ॥ यो० ३ मूगेही बोले गेही चाल, कपट करे एक मूगे ॥ साचो एद ! सार देखके, जिनवास सबसु हो । यो० ४ ॥ इति पदं ॥ ॥ श्रथ वैराग्य लावणी लि० ॥ जब तन दास्ती है हमें स्ती, काया मंगलकी । सासोस्वास समर वे सादिव, प्रान घर तनकी ॥ खबर नदी. हे जुगमें पलकी, सुरूत करणा होय सो के कुरा जाणे कलकी ॥ ख०१ | तारामंगल रवी चश्मा, सन्नी' चलाचलकी ॥ दिवस च्यारका चमत्कारहे, वीजलियां स्तकी । ख० ॥ सु०॥ २ ॥ यो जग दे सुपरोकी माया; नस - . (६१ए) बूंद जलती ॥ विणस जावता वार न लागे, उनिया जाय खलकी ॥ ख० ३ ॥ इंसा या देहीमें जब खग, खुसी हे मंगल. की। ईसा नाम चले जब देहो, मिटिया जंगलकी । ख० ४ ॥ मनमावत तन चंचलदस्ती, मस्ती हे बलको ॥ सदगुरु अंकुश दीया मानके, वातान्नई बसकी ॥ ख० ५॥ मात पिता सुत ब- धव नाई, सब अन मुतलबकी । काया माया सबे कारमी ॥ ए तेरे कवकी ॥ ख०६ ॥ फूठ कपट कर माया जोमी, कर वार्ता उसकी ॥ बोझकी गांव बंधी सिर सेरे, केसे दोय दलकी ७॥ देव धरम सादिवका समरण, ऐ वाता सलकी ॥ राग द्वेष क पजै नही निनकू, वीनती अखैमलकी ॥ ख० ॥ ॥ इति पदं ॥ पुनः। अरज हमारी सुशो, दोनपति, कोन मांत तिरणा।। हम उखी फिरत संसार चतुर गति, सो तुमते निरणा, दीनपति को० ह० १ ॥ घोरापोर तरकके नीतर, नानाऽख नरना ॥ मा. रन तामन वेदन लेवन, जर देव धरणा ।। दीनप० २ ५ कबहुक तिरयंच जोनि पायकै, गलै फात परना । कुधा तृषा अरु शीत नष्णता, मार मार करना ।। दी०३ ॥ देव विनूति पायके सुंदर, देखर फूरना । जब माला मुरझावण जागी, सोच किये मरणा॥ दीनप०१॥ मनुष्या जनम पायके नक्यो, कहुं नांही थिरना ।। सादिव तुम सरणागत राख, जनम मरण हरना ॥ दीनप० ५॥ ॥ मुक्ति जाणेकी डिगरी।। दूहा ॥ तीर्थंकर महावीरने, कौशल गणधर साज ॥ कानून प्ररुप्पा दे दया, सब जीवन हित काज ॥ १ ॥ दान शील तप लावना, असल खुलाप्ता सार, जिण पुरपां धारण किया, पोदच्या मुगति मकार ॥ २ ॥ चवदै सदस साधु हुश्रा, आर्या उनीस . कार, वाखाश्रावक श्राविका, पाया नवजल पार ||३|| (चाल-दीर
.
(६०)
रंजक स्यालकी) मेरी अदालत प्रनुजी कीजीये | जिनसासन
पंक, मुगती जाणेकी झिगरी दीलिये ॥ जिन० ॥ खुद चेतन म
ई वनाहे, आई करम मुदाला ॥ दावा रसता मुगति मारगर
धोखा दे जाय टाला जी। जि०१॥ तप कागद इटांन लिया;
समाया कंमा विचारी || सिझाय ध्यान मजवून वणाकर, घर
धान गुजारी जी ॥ जि०२ ॥ में जाता था मुक्तिमारगमें, करम
माघेरा ॥ धोखा देकर राद नुलाया, लूट लिया सब मेरा जी ॥ जि
॥ बहोत खराब किया करमोने, चौरासीके मांही । उस्क उ
मंता पाया मेने, अंत पार कबु नांही जी ॥ जि ॥ सच्चे मि
घकील कानूनी, पंच महाव्रतधारी ॥ सूत्र देख मसोदा कोना, त
में अरजी मारी जी ॥ जि० ५॥पांचे सुमती तीन गुति ए, श्रा
गवा बुलावो । शील असेसर वमा चौधरी, नसकू पर मंगावं
जी। जि०६ ॥ अरजी गुजरी चेतन तेरी, दूया सफीना जारी।
हाजर आवो जुझाब लिखावो, लावो साबूती सार। जी ।
जि० ॥ आ मुदा ले हाजर आये, मोह : मुगत्यार
घुसाये || च्यार कपायरु आवे मदकू, साथ गवाहीमें लाये
| जि०८ ॥ (टेर मुदायलेकी ) ॥ जिनशासन ना-
यक वा दावा दे चेतन जीवका; जि०॥ हमनें नही वहकाया
सकू, ए ईमरे घर आया ॥ करजा लेकर हमसे खाया, एसा फरेव
मचाया जी॥ जि० एपियनोगमें रमियां चेतन, घाटा नप
न जाणा ॥ करजदार जब लारे लागा, तवं लागा पिस्ताना जी
जि०१०॥ दाजर खमें गंवाद हमारे, पूठिय दाल जु सारा
विना खियां करंजा चेतनसें, कैसे करे किनारा जी ॥ जि० ११
(टेर मुद्दीकी ) ॥ चेतन कहै सतावी . मांदी, सुण शास्त
म तिरदार ॥ इमानदार है गवाद मारे, जाणे सब संसार जी।
1.
.
जि० मे० १२॥ में चेतन अनाथ प्रनूजी, करम फरेवी नारी॥
जीव अनंते राह चलतकू, लूट चोरासीमें मारी जी । जि० मे
१३.॥ वझेर पंमित इन खूटे, एसा दम बतलाया || धरम कहा
जर पाप कराया, एसा करज चढाया जी ॥ जि० मे०१४ ॥
सल एन सरकारी सूत्रमें, मन मत अर्थ धसाया ॥ धर्म. एनमें
हिंसा कहकर; नवटा जीव फसाया जी ॥ जि० मे० १५॥ नेद
अर्थसें वेद पढाया, हिंसक यज्ञ वताया। इसके फलसें स्वर्ग दि
खाकर, एसा-मुझे सतायाजी, जि० मे०१६ ।। हिंसा माहे धर्म
वताया, तपस्या सेती मिगाया, इंडिय सुखमें मगन करीनै, मूग
जाल फेलाया जी। जि० मे १७॥ एसा करो इनसाफ प्रनूजी;
अपील होण न पावे ॥ इकरती चेतनकी दोवे, जन्म मरण मिट
जाव जी ॥ जि० मे०१७ ॥ ग्यान दर्शन करी मुनसफी, दोनो.
को समझाया ॥ चेतनकी मिगरी कर दीनी, करमूंका करज वती-
या जी। जि० मे० १ए । असल करज जो था कर्मोका, चेतन
सेती दिलाया, जि०॥ सुध संजम जब करी जमानत,चेतन मिगरी
पाई ॥ फागुण सुदि दशमी दिन मंगल, सन् नगणीस अगई जी,
जि० मे० २०.॥ इति ॥
:- ॥ अथ अनुभव पद डिगरी ।।
साहव अदालत पर बैठ, श्रीपारस प्रवीण एन उत्तम वः
लाए है ।।.शील दे सिरदार और दान हे दरोगा जाके, दयारूपी
वारण सन श्रावगण पर आए है ॥ ग्यान हे चपरासी ताको ल.
ग्यो हे. मोदोसल ताकी, माल जामनीमें श्रीजिनवरजी सिखाए
है। रोसकी रसूम उर.कमीसन लगे कर्मनकुं, मोहको म्याद ३.
सत्यार लटकाये है ॥ १ ॥ वैठके लिखेगा जब जीवकी जुवानवं.
थी, तबके कुछ स्वाल जवाब-सतगुरुने वताए है. ।। नोमकार सा-
(६२२) जी पायो पकम्यो अरिहंतजीको, अनुनय पद पायवेकी मिगरी कराय लाये है ॥ अवतो दरकात मेने करी दे तुमारे पास, साइन जिनराज अरज मेरी सुण लीजीये । अष्ट करम पाई जाम करत हे. कार साजी, साहिब वुलाय इसे पिसेमान कीजीयै ॥२॥ मेंतो हूं गरीब मेरी करेगा नकीली कोन, पारस प्रवीण मेरी मि: सल आज कीजीयै ।। दारूं तो हाजर इजूरी में रह्या करूं, जीनूं तो खगाय जुगल चरणनमें लीजीये ॥ अब.तो फरियाद नाय करी दे तुमारे पास, मेरी दाद दीजीये तो रावरी वाई दे ॥ मु: नसबकी वात और मामलत अदालतकी, अब तो अफील मान प्र रजी लगाई दे ॥ मूठमूठकार साजी करत हे पांच तीन, साचो मत. जैन जाकी अन अधिकाश्दे ।। मेरेही पांच लोक मोदीकों - गवत दे, जाते ग्वादी श्रीजिनराजकी लिखाई है। गोमकार सा- जी पायो पकज्यो अरिहंतजीको, अनुन्नव पद पायवैकी किंगरी कराय लाए है ॥ ५ ॥ इति मिगरी संपूर्ण ॥ ॥ नेमनाथजीकी लावणी ॥ नेमकी जान बणी नारी, देखनकू पावै नर नारी ॥ अनं. ता घोमा नर हाथी, मिनखकी गिणती नहीं पाती। उन पर वजा जो फरराती,धमकसे धरती परराती (उहा-साखी) समुधि- जयजीका लामला, नेम ननोंका नाम ॥ राजुलदेकू आया.परणवा, उग्रसेन घर गत ॥ प्रसन नई नगरी जब सारी नेमकी १॥ कसुंबल वागा अति नारी, काने कुंडल वि है न्यारी ॥ किलंगी नुररासुखकारी, माल गल मोतियनकीमारी॥ (उदा-साखौ) कानें मल झगमगे, शीश मुगट झलकार ॥ कोमिलानुकी करुं नपः शोना अधिक अपार ॥ वाज रह्या वाजा टंकसारी | नेम० ना, २.।। बूट रही. उनकी उरराई, व्यादमें पाये वझे नाई ॥.मरोखे राजुलदे आई, जानकुं देखी सुखपाई ॥ (उदा-साखी) नयसेनजी देखके, मनमें करे विचार ॥ बहोत जीव करि एकग, वामो . रयो अपार ॥ करी सव भोजनकी त्यारी । नेम० ३ ॥ नेमजी तोरण पर पाये, पशुजीव सवही कुरलाए । नेमजी वचन फुर- माये, पशुजीव काइकू लाये ॥(उदा-साखौ)याको नोजक होवती, जान वासते एह ॥ एद वचन सुणी नेमजी, परदर कांपे देह ।। नावसें चढ गये गिरनारी || नेम० ॥ पीठेसें राजुलदे आई, हाथ जव पकमयो दिन मांदी || कहां तूं जावै मेरी जाई, नरवर देर मुकताई ॥ (उहा-साखी) मेरे तो वर एकही, हो गया नेमकुमार ।। और नुवनमें वर नदी, कोटी करो विचार ॥ दीक्षा जद राजुलने धारी । नेम • ५॥ सहेल्पां सवही समझावै, हियै राजुलके न. दि प्रावै ॥ जगत सब उगे दरसावै, मेरे मन नेमकुमर नावै । (उहा-साखी) तोमया कांकण दोरमा, तोमया नवतर हार ॥ काजल टीकी पान सुपारी, त्याग्यो सब सिणगार ॥ सदेल्या सवही विल- खाणी ॥ नेम०६॥ तज्या सब शोले तिरागारा, भानूपण रत्न- जमित सारा ॥ लगे मोदे सवही सुख खारा, मकर चाली निर धारा ॥ (उहा-साखी)मात पिता परवारकू, तजतां न लागी वार । वियोग करके चली आपसुं, जाय चहि गिरनार । रति गेमिमा प्पारी नेम० ॥ दया दिल पशुवनकि भाई, त्याग जब किनो दिन मांदि । नेमि जिन गिरनारे जाई, पशुवनके बंधन दुमवाई (उहा-साखि) नेम राजुल गिरनार; लिनो संजमदान नवलराम यह करि बावणी, कपन्यो केवलग्यान ॥ जिनोकि किरिया बुध 'सारी नेम० ॥ इति पदं । ॥ नेमनाथजीका चोमासा लिख्यते ।। गई पटा गगनमें कारि, राजुषकुं विरह - सुख नारि
(६२५)
ग० ॥ चोमासा सग्या. रस लिना, अलि अपाद-रंग
हिना. ॥ च्यारुं तरफसे वादल पिना, विजलिने चमकणा
कना
॥ विल दोत धमकता . सिना, में अबला सख)
ति हीना . ( नमाना ) सररररर चलत समीर, पररररर
रत सरीर ।। मररररर मरत समीर ॥ अलि केसी करूं तदवीर,
रीतकदीर, पीया विन प्यारी ॥ राजुलकू वि०१ ॥ आवयमें
गम घनघोर; नरज़ोर बोलते मोर | दाउर मिल करते दोर,
न२,पपश्या सोर;॥ कम लग्यो वृंद ऊमकोर; विच चमके दा
ती कोर || (निझावनी) खममममम रवधनमाला, तमामक
लं. परनाला, अमममम नालाखाला,में उखी हुईवेहाल हीयेमें
ल, हुई जलधारी ॥ राजु० २॥ जाद्रयमें पवन प्राचीना, बाद
नधनुप रंगीना ॥ जंगल में नदी स्वर कीया, ज्यु बाजे मनोहर
पा ॥ अव एसे कहो क्या जीना, प्रीतमनें मुझे उख दीना ॥
उमाना ) युं विलपत मुख मुरझाई, सखियन मिल दौम.जगाई,
विलखत वचन सुनाई ।। संखी देखो पीयाकी रीत, तोकेपी
गये। गिरनारी ॥ रा ३ ॥ आश्वित में जरा नही धीर,याऽचंद
पवे पीर॥ कवचली नेमके तीर, काटनकू कर्म,जंजीर प्रोतमसे
यो. अकसीर, व्रत संज़म समकित.हीर ॥ (नमाना) शिव.राजुख
सिधाए, शदिक जसु गुण गाये,न्नविजन मिल शीश नमाए।
ने कद्दे कपूरचंद, प्रेमसे बंद, जाळं बलिहारि ॥ राजु० १."
...::सुमति कुमतिका विवादरूप लावणी ।। :
.. चिदानंद महाराज.राज,दे, प्रितम दो प्यारीका ॥ जगमा
धिरकर सुण लेपा, सुमति कुमति दोन नारका..॥वि०॥
ति सुमताः सुपरी शोकन मोद लिया प्रितम प्यारा, अविरत -
पास इस्तमें भूल गया. सुधबुध सारा, तूं वैरण दे जनमकी
+-
१
(६५५ तेरा संग लगे खारा, तेरे वसमें हो गया प्रीतम पटक नहीं होता। न्यारा ॥ कहुँ खरावी कर लग तेरी तेरा चरतं वंदगारीका ।। जगमा दि० १ ॥ कहती कुमता सुपरी सुमता मेरा संग अंनादीका, वो मेरा प्रीतम स्कि नमर है, इंद्री पांच सवादीका । कर सिणगार कसाय सोलेके राग रंग ननमादीका, मेंहुँ मोह- रायको ललनी वो प्रीतम सहजादीका ॥ तेरे पाश नही आवेगा' चालम वो हे फूल बजारीका ।। 5० २ ॥ सुण रे बैरन वात मारी तेरे संग उख पावेगा, तेरा महल पाताललोकमें जहां वो चास वातावेगा ।। संगतके फल उसकू लगेगा फिर पी पम्तावेगा, आखिर वेद देवेगी वैरण केसें प्रीत निनावेगा ॥ में समझानंगी प्रीतम मेरा जो माने दिलदारीका ।। 5. ३ ॥ कुमता बोली वात' सुमतसें तेरे संग क्या होता है, नही जहां वस्ती सूना मंदिर सुख उंख दोनं खोगा दे ॥ खाणा पीणा नदी जहां पर राग रंग नहीं: सोपा दे, नहीं कजाला नही अंधेरा शिक्षा सहज विगेना है -11. एसा मेरा लोगोमके सदे न दुख अणगारीका ॥ ज०४॥'. कंदती सुमता सुण मेरे प्रीतम इतकी संगत नही करणा, टुक इंक सोच करो दिल जीतर मेरी अरज दिसमें धरना निगोद इस्की बोत कचिन दे समझके बूम नदि पमना, पहली सुखसे फिर ऽख नाजै वो सुखसें चातुर मरसा | रतन तीनका तूं-हें जोगी मुगति महल सिरागारीका || 5०५ ॥ एते बोलणे सुमताके चिदानंद नठके चला, नेणों में प्रांतु जर रोती प्रीतमझा पंकमया पक्षा । मत ना छेद दिखावो साजन सोकणकी सुंगके. सक्षा, में अबलासें दगा करोगे केसे दोय तुमरा नला । मेंहूँ. दासी जनमकी मानो वचन करारीका || 5०६॥ तजके संग कुमतनारीका सुमता प्रेम जगाया दे, संजमसे. सिणगार वणाकर
१६२६ ).
ल सुगंध लगाया, दे || प्रीत रीतसे सदा मगन हुय मुगतिम
न जब पाया दे, सीख सुरंगी मानो नविजन अपणां दिल सम
या दे || कहे रामशक्ष्सिार प्यारतें तजो ख्याल संसारीका ॥
॥ इति पदं॥ नेमप्रनूकी लावणी॥ सज शोले
पगार हुई हुसीयार सदेल्या सारी, चली राजुल गिरनारी रे०॥
- केसरिया बेस विटक रह्या केश, अजव नखराली, खुली तो
ले केसर क्यारी रे ॥ गल मोतियनको हार, वणी तो दिलदारः
जेसी चाली, मधुर मुख वैण नचारी रे॥ (नमावणी) नेण..
कजरा इद नीका, सिर सोहे रतनोका टीका ।। चंदवदन सा:
न परीका, लगी पियासें लगन, मगन दिख सक्न घटा जेसें:
11॥चलीतो रा० १ ॥ करे पियास अरज गरज मेरी सुराः
उम- दिल वाते, गुने विन क्युं विटकाते रे ॥ में घरगनकी
प रहो मेरे पाश जोवन मदमाते, जोम कर शीश नमाते रे ।।
मावणी) आठ नवनकी प्रीत इमारी, आप पिया में प्रीतम
री || साजन प्रीत निन्ना इकतारी, तेरे विना नहीं चैन, नींद
रिन, सन्नी तो लगे खारी ॥ च०२ ॥ सजके खुव वरात साथ,
-राम कृष्णसे नाई, पहली तो क्यों लगन लगाई रे॥ अत्र
देखी खोट लगा दिल चोट चला मुरझाई, कहो मुझकू सम
रे॥ (उमावणी) तुमसे प्रीतम नहीं कोई स्याणा, दिलमें
ज हमरी लाणा; सुखसें रंगनर चैन उमाणा ॥ नेणा बरसे
लग्या तुमसे नेद, विरहकी मार ॥.च० ३ ॥ नेम प्रनु दे
न एक घर ध्यान सदा निन्न जागी, प्रीतका अंत न आवे रे॥
ली जेसी चमक दमक जेसे नत बूंदका पाणी, अंत मोती
जावे रे॥(नमावणी) ज्योतिरुपका अज ले सरणा, नितर
नसीसे करणा, तर किसीके.फंव नदी पाणा, मेरा वचन
ले
। ) मान, ज्यान धोखेको समझले सारी ॥ च०४ ॥ गुणवतका संग रहे नित रंग समझले स्याणी, जगत प्रोमी जिंदगानी रे || चलीं जाय सब खलक पलकका नदी नरोसा जागी, करो सुरुतकी निसाबारे ॥ (उमावणी)इतना कह्या जब दिल समझाया,अविचल राजुल नेद लगाया, सदा मुगतिमें वास वसाया, कहै राम शद्धसार; करो तो एसा प्यार, नाम रहे जारी ॥ चली० ॥ इति पर्द पुनः॥ चंदावदनी मुखसे केती गिरनारीकू जावोगे, रा- जुल कन्नी अरज करत दे प्रोतम कर धर आवोगे । उपलर गः ती मनमें चिंता नेशामें पासुं करते, हाथ जोमके राजुल ऊनी वार वार विनती करते ॥ ज्यान वणाई व्पादन श्राए घर में यानंद वरते, किस विध गंम चलै गिरनारी मेरी दया नदि दिल धरते ।। में वरणाकी खासी जो दासी तुम दिन मेरे नही सरते, सागरमें जल विन मग्नी प्राण धमी पलमें हरते ॥ (नमावणी ) दे तुं महिर निजर कर आव फेर रमलारे, तूंचं: दवदन दीदार मुकें दिखला रे ॥ दे तूं दिलकी बूंमी खोल चूक वतला रे, हे तुं मोदनगारा प्यारे हे जी मुझकू साथ निनावोगे ।। रा०१ ।। उखसुं नरो वातां मत वोलो राजुल मन धीरज-धा. रो, एकर थांसु मिलणे कारण मुगतीमहल में मन मारो नर नार नही दाय हमारे शिवनारीसुं मन प्यारो, पांच सखी ले साथ सि- घावो मुगतिमहलंकू शिणगारो ।। कवल वचन यांमें कीनो रां. खो मनमें पतियारो, मुगतिमइसमें प्रासां दे सुंदर सोच फिकरतूं विस्तारो ॥ (कावणी) दे तुं चंपकली सी नार जोवन मतवाली, हे तुं मिरगानेसी मुख चंद मधुरधुनिवासी ॥ दे तूं शील सलूणी नग्रशेनकी लाली, दे तूं लागे सबको प्यारी दे जी मुकू कदिन नुलावोगे ॥ रा०.२ ॥ कपटी साजन इसकर बोले मनकी गुंगी पुनः॥ कोई (१२७.), महि खोसे, या जूनिया मुतलबकी गरजी विन मुतलब मुख नहिं घोले ॥ सहज प्रीतकी रात सगाणी फिर निन्नणी मुसफल होले, धन मानव जो प्रीत निनावै तर२ अधकी रंगरोले । अरज वीनतो फरकै राजुल वचन रसीला अणमोले, जसदी प्रायजो नेमकुमरजी मुग़तिमहलमें रमकोले ॥ (नमावणी) देवाः चंदकपूर अपूरब ख्याल वावै, हेवा नरनारी मन रंग रागसुं गावै ।। हेवा कांफ ताल मफ दोस मृदंग वजावै, देवा श्रानंद हर्ष वावै है जो मन वंचितफल पानगे ॥ रा. ३ ॥ इति पदं ॥ देख्या रे हो सांवलिया सादिव प्यारा लागे रे० ॥ अश्वशेन घर जनम लियो अवतारी रे, वामानंदन नीलवरण सुखकारी रे; चंद बदन मनमोहन मूरति प्यारी रे॥ हारे मु० कोइ० १ ॥ बालपणे प्रत्तु अदत्त म्यान सवाई रे, कम महा शव मान हरयो पुखदाई रे, मंत्र दियो हितकारी नाग सहाईरे। हां नाग० को०२॥ सिर पर मुगट श्रवण कुंरुल हद जारी रे, कर श्रीफल भुजबंध फलक विव न्यारी रे, गल मोतियनको दार वएयो गुलमारी रे ॥ हारे गुः फो०.३ ॥ पतित नधारण तारण विरुद कमाई रे, पारस२ नाम जपो वरदाई रे, चंद कपूरा प्रणमें प्रेम वधाई रे॥दारे मे० को०४॥ ॥ अथ केसरियानाथ लावणी 11 सुराजो वाता राव, सदाशिव, मत चढ़ जाणा धूखेवा ।। गढ़पति उनका वमा अमंगा, मत रेमो तुम नन देवा ॥ सु०१॥ सकतावत चमावत बोले, दमही नोकर ननदीका ॥ दीपति वाळू हाय जोमे, तीन नुवन शिर हे टीका || मु०२ ॥ स्वर्ग मृत्यु पाताल सवेदी, सुरनर, वाइँ यावत दे ॥ इंद्र चंद्र मुनि दर्शन भावे, निर्धनियाकुं धन देव ॥ बांझ खिलावै मुंदर समका, सदा : रावे , मनकी मोजां पावत दे ।। सुप ३॥ गया राज उनदीस :. ( ६ ) सुखी जो प्रन्नु सेवे ॥ सु० . ।। तारे जिहाज समुश्में जाके, रोग निवारे नवश्का ॥ नूप नुजंग महर करि नदियां, चोरन बंधत अरिदवका ॥ सु० ५ ॥ धौ धौ धौ धौं घोसा वाज, दशो दिशामें दे मंका ।। नान तातिया नहीं ललाइ मत वतलायो.गढ वंका | ।। सु० ६ ॥ राणाजीके कमरावकी, मानत नादि है. ये वातां । पारा कीया हीज पावो, म्हे नहिं प्रावां श्रां सायां । सु० ७॥ मूंब मरोम चढा अनिमाने, जहर जरा हें निजरूं में ॥ रुपनदेव हे सादिव सच्चा, देख तमासा फजरूंमें || सु०७ ॥ मयाराम सुत जणे मूलचंद, वझे सितंबर तुम देवा । फोज विखरगई घर२ घोमा, सजा राखो तुम देवा ॥ सु० ॥ ॥ इति पदं ॥ ॥ पुनः ।। केसरियानाथ महात्म लावणी ॥ ॥ दूहा ॥ आदि करण आदिम जगत, अादि जिनंद जिन- राज ॥ धूलेवनाथ जाचो धणी, वरणुं श्रीमहाराज ॥१॥(चाल लावणी) कास्यपगोत इक्ष्वाकु वंशमें, मरुदेवा जननी जायो । नानि नरेसर वंश उजालन, यादि धर्म जल प्रगटायो ॥ १ ॥ चोसव सुरपत्ति देव देवी मिल, मंदिर गिर न्दवरायो । सो रूपन निधि प्रगट कल्पतरु, सुरनर मुनिजन नित ध्यायो॥२॥ खमंगदेशमें नगर धुलेवे, जास दामा धुरता हे ।। जाकी महिमा अपरंपारा, कविज़न कीरत करता है ॥ ३॥ आदौ मुरत काल असंख्यकी, पूजी सुरगण असुरिंदा ॥ सुरपति नरपति वंदित पद युग, बलि पूजत:सूरज़ चंदा ॥ ४॥ लाख ग्यार हजार पंचासी, बरस पांचसे पचासा ॥ इतने वरस पर लंकागढ़में, पूजित रावण गुणरासा ॥ ५॥ रामचं शीता अरु सम्मन, ए मुरत पूजन लाए । नयरी अयोध्या जाते अवित्र, नयर नओसी उईराए ॥ ६ ॥ प्रजापाल नरपतिको तनया, मुंदरि मयमा धरमनकी, वा:
(६३०) पकरम अशः आपकरमकी, नई समाई मरमनकी ॥ ७ ॥ आपका रमके ऊपर नृपर्ने कुष्टी वर परणाई ॥ मयणा चिंते काई नवाई, करम लिखी सो बन आई ॥ ॥ इक दिन जिनपूजन गुरुवंदन, आई श्रीजिनमंदिर ॥ वंदन पूजन करके इक चित, ध्यान धरै मनकंदर ॥ ए ॥ (मोतीदाम छंद) तूंहि परिहंत नहि नगवंत, तूंहि जिनराज तूंही जग संतः।। तूंदि जगनाथ तूं प्रतिपाल, तूंही मनमोहन तूंही दयाल || १ | तुंहि जवनंजन नाव सरूप, तूंहि अरिंगंजन रंजन नूप, तुंदी अविनासी तूंदी वीतराग, तूंही माहाराज तूंदी वमनाग ॥ २॥ तूंदी गुण धाम हि विसराम, तूंदि नवनिद्ध तूंहि वम नाम ॥ तूंदी अध नाश तंदि अविनाश, तूंही मतिवंत तूंही मतिवास ॥ ३ ॥ तंही गुण केवल रूप.अनंत, तूंही जगतारन तारण संत ॥तूंहो जग ध्येय जग खान, तूंदी चिदरूप तूंदी नगवान ॥ ४ ॥ नूंदी मम तात तूंही मम मात, नूंदी मम ब्रात तूंदी मम गत ॥ तूंदी संरणागत राखरादार, नूंही उख दोदग टालणदार || ५ ॥ (चाल लावणी) ॥ करूं अरज एक तोपें जिनपति, कंत कुष्टसे नही मरते पूर करमके लिखत लेख जे, किसके टारे नहीं टरते ॥१॥ पण तुऊ शासन जगत देखना, जगत दंढेरा वाजत दे। भापकर्म प्र जैनधर्मी, फल पाई यो लाजत दे॥ २ ॥ यो उस मोतें सो जात नदी, प्रादिनाय जग रखपाला || करुणाकरके रोग निवारण, गुण कीजे जग प्रतिपाला ॥ ३ ॥ या प्रसन्न हुय का बोजोरो, दायतपो फल तब दोनो || मपणा तब उखास नई मन चिते सर कारज सीनो ॥ ४ ॥ नौ दिन नमरा नीर तनु कुष्टरोग सब नासत दे॥ कामदेव अझ अमर समोवा, पल सदानत दे॥५॥ या कीरत प्रत तिवारीता, (६३१) प्रगट प्रवस दे जस सेरो ॥ प्रासू चैत्र मासमें महिमा, देशम प्रनु तेरो ॥ ६ ॥ फिर वागमदेश वमोद नगरमें, जग पर प्रन्नु क: शणा कीनी ॥ कितने वरस लग महीमें महिमा, अविचल नूतल शद्धि दीनी ॥ ७ ॥ दिल्ली पर तुरकान नयो तब, पातस्याह ख. मवा आयो || चूत नृत पत्यरको मूरत, जम्मुल्लासें नखरायो। ॥ ॥ बहुत दीनां लग की विलराश, थाको यों वाचा बोले। देव हिंदको वमो जागतो, यूं बोलत फिरमोले । ए || सुनो वातः काजी मुल्लां तुम, एक वातसे त्रासेगा ॥ गौ ब्राह्मण प्रतिपाल कन: दाई, गो वधसे ये नातेगा ॥१०॥ गो वध करण लगे जब निज. रे, देख सके क्यों प्रतिपाला ॥ करण युद्ध जव नये महाबल, शस्त्र ऊमोफम विकराला ॥ ११ ॥ (दूदा ) महा युःइ करणे लगे, घाव चौरासी अंग || करी मलोखा गामली, आये धुलेव सुरंग ॥१॥ ( चाल लावणी ॥) गांव धूलेवा वंशजालमें, गुप्त रहे हे प्रत्तु. भरती ।। गाय एक कोमी वनियनकी, या वाहां चरती२॥ सवे तिहां पयधारा शिर पर, सांऊ समें फिर नही दूजै ॥ रीत करी तब गोपोलन पर, गोपाल थरदर धुजै ॥ दूजे दिन गौ लारे प्रायो; लह्यो नेद कह्यो वनियन ॥ शेठ पाय जब नजरे देख्यो, चकित नयो रे तन मन ॥ ३ ॥ मध्यरातमें सुपनो दोनो, रुपननायकी मूरत । बहिर निकासो करो लापसी, जीतर मूरत परत दे॥४ । नव दिनमें सब घाव मिलासी, मत काढे तूं नव दिन । कियो सेग्ने हुकम प्रमाणे, आये संघ बहुउ दिनमें ॥ ५ ॥ के उपवासी को प्रतधारी, के भलुआणे पांव चसै || फेइ लोककू : कर वाया, कब प्रनुको दरशन मिले ॥ ६ ॥ यूं सब लोकांदरतः तरसकी, कदे लोक मूरति काढो । लामो२ महाराजको मूरत; संघ सबे लीनो आमो ॥ ॥ जबरदस्त दिवस सातमें, लापसी ( ६३२) बाहिर तब कीने, अंतर नर प्रण रहाए, संघ लोक दर्शन दीने ॥ 10 || फिर सुपने में इत्य दिखायो, संघे मिल देवल. कीनो। मध्य विराजे झपन तखतपर, कलियुगमें यो जस लीनो । ए॥ (दुहा) संवत अदारे तेसरे, नान सदाशिव राय ॥ कियो धंगानो उष्टने, नाखू वरण वनाय ॥ १ ॥ (मोतीदाम ॥) सदा. शिव राय.चिंते मन एद, खूटे बहु घाम जमी पर जेह ॥ जिला पति नाथ धूलेव कहाय, लखो लग इव्य नंमार सुशाय ॥१॥ जावां अब लूटण गाम धुलेव, ग्रहुं सब माल जई ततखेद ॥ आयो निज फोज लेई वल गाज, तोपां दोय साय लियां बहु साज ॥२॥ कंपु. दोय लार लिये. फिरंगाण, उंग जर साथ लिया. कोकवाणं ॥ तवां. लोक कहे माहाराज, नही इह कारण कृत्य अकाज ॥ ॥ ३ ॥. एतो वह जाजल देव कहाय, रद नहीं लाज ति हारिय काय ।। तब फिर बोले शदाशिव नूप, यहां सब माल अवां चढी चूप ॥ ५ ॥ इसो कदि आवत पुष्ट करूर, कीयो नज राणद नाथ हजूर ॥ राख्यो नदी नाय तवे नजराण, जयो मन चकितमान गिलाण ॥ ५ ॥ तवा मन चिंत नंमारी वुलाय, मीठे वच बोल सबै ललचाय ॥ लई संग प्रायः मुकाम मझार, कियो तंब कूच लई सवं लार ॥.६ ॥ करे तब गाम पुकार२,मारी सवे पुकारश.॥ करो अब बाहर नाथ दयाल ॥ गयो किहां आज गरीव निवाज चढों अब बाहर राखण लाज ॥5॥ (दुदा). नगसमें कोन..सेठको, वादण तारण काजः ॥ गये अधिष्टायक नाग्रजी, नेशं गये वदागाज ॥ १ ॥ सुगो अरज पृथ्वीनाथजी सदेर धुलेव महारं ॥ कियो प्रकारज उटने, शीघ्र चलो जन तार ॥ २ ॥ पाए तुरत महाराजजी, करवा जन संजाल । दो घोके टोनं चदे.ने.रु. प्रतिपाल,॥ ३.॥.निल कोप.आपे. कियो, दं (६३३ ) शदिशि फौज इजार ॥ मार२ चो तरफतें, नई समाई त्यार ।' ४ ॥ (नुजंग प्रयात उंद) कूकू कुकू कुकू वदे कोकवाणं, सरा- एवं सणणं तीर तरकस्त वाणं ॥ धुवाके धमाके वदे नाल गोला, जिता कर्कसा जम्मरा नयनमोला ॥ १ ॥ किते यंग शस्त्रा घाव लागे, फिते मारते कंपते दूर नागे ।। किते दंत तिरण संव चराका, कितें अरथरे प्राप्त होवे तिराका ॥२॥ किते रसुल्ला- लल्ला पुकारे, किते दीन दोके खुदा संन्नारे ॥ कितें नाय केत रा खून माणे, किते नाळू जागती ज्योत जाणे ॥ ३ ॥ सदाशि वनें घाव लागो अटारो, पुनी नान जसवंत दोनुं संहारो ॥ वमो कोप जागी सबै फोज नाजी, दुई केशरीनायकी जोत वाजी सदाशिवने श्रावकी घटक लानो, सवासंचसे रकमरो खून दोनो। श्तो नाथ धूलेवरो मईगाजी, सदा केशरानाथरी जोत वाजी ॥५॥ (दूदा) या विध कलियुग जग जणा, तारया केई जिनराज IE दोपविजय कविराजळू, मदेर करो महाराज ॥ १ ॥ ( मोतीदाम उंद) तूंदी नवनिद्ध तूंदो ग्रसिद्ध, तूंदी मनवंठित बंठित शहा। तूंदी सिरदार तूंही किरतार, दो सरणागत दीनदयाल ॥२॥ तूंदी कामकुंज तूंदी कामधेन, तूंदी सुरवृक्ष तूंदी मम शेन ॥ तूंदी दक्षिणावर्न दायक देव, तूंद। विसराम नूंही वस सेव ॥ ३ ॥ तूंदो मम प्राण प्राधार जहर, तूंही मम चित दायक तूंहो मम नूप तूंदी पतताद, तूंदी मम ६ नंमार अगाद ॥ ५॥तूंदि मम मंत्र तूंदि मम यंत्र, तूंदी मम सत्य तूंदी मम संत्र॥ तूंही गवनापरु तूंही श्रीपूज्य, तूंदी मम पूज्पतूंदो जग. पूज्य ॥ ५ ॥ (सावषी चाल ) नाय धुढेवा कीरत मुशझे, देशर पथावत है, केशरमें गरार रहते, फेशरनाय कहावत दे ॥ १ ॥ सहर परगरोदेश दिशादर, फिर उहाई नायनी ॥ हिंद G0 मूसल व राणा दाजर, पूरै उचित सब मनकी ॥ २ || जलवट थलवट वाटघाटमें, रण रावल उस दूर हरे, इक वित्त ध्यान जे नित समरे, श्रखय खजाना अन्नर नरे ॥ ३॥ घिधिमप घिधिमप धपमपधपमप,ताल पखावत राजतदे॥गमगर दो गमग दोगम गम,धो धो नोवत वाजत दे॥४॥हिंदूपति पतशाह करेपुर, जीम. सिंहके राजनमें । एद लावणी खूब वाई, सकल संघके सागनमें ॥ ५ ॥ संवत अदार पच्चोत्तर वरपै, फागुण सुदि तेरश दिवसे ।। मंगलके दिन दीपविजयकू, दरशन परशन दो उससे ॥ ६॥ (क- खश-उप्पय छंद) समवशरण जग शरन, तीन लोक कलिमल हरन ॥ धुनि वरसत जलधरन, भरण पोप पावन करन| जुगलधर्म नीती हरन, सब करम नघ धनजरन || मोहमल अरि दरन, सुन कनु वरन शुद्ध चरन, २६ चं पदजुगल सेवन, जगत विरुद तार- नतरन । दीपविजय कविराज वहाउर, रुपननाय असरनशरन ॥ १ ॥ शपत्ननाथ महाराज, सबे उख दालिश नंजन ॥ ऋपननाथ महाराज, सवे नूप मनरंजन ॥ ऋपननाथ पृथ्वीनाथ, समरयो बाहर धाये, ऋयन्ननाथ पृथ्वीनाथ, मंगल नाम गवाये॥ दीपविजय कविराज वहाउर ।। खलक मुलक हाजर रहै, कलिजुग जयो देव तुं, सुरनर सब कीरत कहै ॥ २ ॥ इति पदं ।। ॥ अथ आरती लावणी ।। आरति करुं श्रीपार्श्वप्रन्नूकी, जन्म वनारशी जिनका, घ- ननं धननं वाजै घंटयण, एसा ध्यान धरूं जिनवरका ॥ प्रा० १ ॥ जब कमगसुर कोप कियो तब, स्यामघटा विजुरी चमका ॥ गिरु : आ गाज जल मूसलधारा, धरम धरम काजन शंका ॥ श्रा० २॥ थररर श्राशन कंपे सुरको, तव धरणीधर चित्त चमका ॥ फण विस्तार हजार किया तब, ऊमक जाय प्रनु तन ढंका ॥ आ० ३॥
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( ६३५ )
नव पदमावती सब सिणगारे, ताये नाचत ले फिरका | धमकर
माँ मादल वाजत, धननं घुग्घरके घरका | प्रा० ४॥ धीधी धी
ट नौवत बाजे, धौ धौंकट इंडलि धौंका या विध गीत संगीत
जिन सब, गंधर्व गान करै जिनका || श्रा०५ ॥ तननं तररर तंत
आल सब, मफ नौं मौं करते मंका, नेरण फेरणके फनकारे,
कागदी कालरके ऊका ॥ आ० ६॥ सुरनर इंश सब जै जै करते,
जीवत सफल नया जिनका ॥ अमृत उदय तिण र यो
उख, को विस्तार कहै तिनका ॥ आ० ॥ इति पदं ।
॥ आदि जिनेशर पारणो॥
आदि जिनेशर कियो पारणो, पा रस सेलमी आ.॥
धमा एकतो आठ शेखमी, रस नरिया के नीका ॥ नलटन्नाव
श्रेयांश वहिराचे, मांग दिवीप्राकारे ।। प्रा० ॥ १ ॥ देव कुन्नी
वाज रही है, सोनश्यारी वरखा ॥ बारे माससू कियो पारणा,
गई नूप सब तिरखा रे || आ. २ ॥ हि सिदि कारज मनोका-
मना ॥ घर२ मंगलाचार || उनिया दरख वधामणा सिरे, पाखा
श्रीज तिवार रे ॥ प्रा० ३ ॥ श्रीसेबूंजा सिहदेव दे, मोटो कहिये
धाम ॥ श्रीसंघका मनोरथ पूरे, पूरे मोटा स्वामि रे ।। मा० ४ ॥
संकट.काटो विधन निवारो, राखो मेरी लाज ॥ वे करजोमी
नानु कहता, रुपनदेव महाराज रे ॥ श्रा०॥ ५॥ इति पदं ।
॥ अजितनाथजीकी.लावणी॥
श्रीअजीतनाथ महाराज, गरीब निवान, जरूर जिनवर
ली। सेवक शिरनामे, तने उचारे अरजी ॥ कर. माफी. मारा
वांक, रजलियो रांक, अनंता जव । अ० ॥ श्राव्यो दु.तारा
शरण, वली उख दचमें । कोषाधिक धुकता चार, खरेखर खार,
लग्या मुऊ केमे ॥ ज० ॥ वली पापी दारो नाथ, वेक ठेके
(६३६ ) ॥ आ मुजरो मुझ नगवान, करुं गुणगान, ध्यानमा घरंजी ॥धा० । सेवक० १ ॥ में पूर्ण कर्या , पाप, सुणजो श्राप, कई करजोगी। क०॥ मुझ मामां नगवान, जूल नही प्रोमी ॥ जो घहिंसा अपरंपार, करी किरतार, हवे सुं करवू ॥ ह ॥ । बहु घोली, साचने सुं हरतुं ॥ तुझ खोलामां मुझ शीश, जाग जगद। श, गमे ते करजी ॥ ग० | सेवक० २॥ में किया वहुत कुकर्म, धरी नहि धर्म, पूर्ण हुँ पापी ॥ पू० ॥ अवलो घर यारो ग्राण में ज नत्यापी॥में मुरख निंदा घणी, मुनि पर तणी, करी हरखायो ॥ क० ॥ परदारा देखी लबाम, हुं ललचायो । किंकर कहे केश लात, आणीने व्हाल, दुःख तुं हरजी॥ ३० सेवक ३ इति पदं ॥ अथ नेमनायजीको लावणो । पिया मेरा दो गिरनार सिधाए, दम संग मोह निवारयों ॥ समुद्रविजै सुत नेमजी रे, सब जाच सिरताज || नायक ती नों लोकके रे, गुणनिध गरीय निवाज ॥ मो० १ ॥ वदोत हगंड व्याह मनायो, दवघर कृष्ण मुरार ॥ पट्पंचाश कुल कोटि माणे, जादव उनके बार || मो० २ ॥ खूब वरात वणायके रे, उग्रशेन दरबार ॥ पाए प्रनुजी दरखसूरे, चडगये गिरनार || मो. ३॥ पशुवन पर कीनी दया रे, मो पर कीनो रोस ॥ दिन पर गुण मेमो.मती रे, को नदी दोस ॥ मो० ॥ सावण सुर परी दिने रे, इंच चं परिवार || दीक्षा लीधी शुन मने रे, करन दिया सहु जार ॥ मो० ५ ॥ नेत्र हुताशन नंदूक रे, चैत्र शुज शुन वार. ॥ श्रीजिनदंत सूरीसरू रे, श्रीखरतर गाधार ॥ मार ६॥ राजुल पहली नेमनुं रे, मुगतिमहलने जाय ॥ त्रीत निमार जुगतसुंरे, रुदसार गुण गाय ॥ मो० ॥ इति पदं ।। हा । पोनी ग्रह पदमनी, नहि दीजे पर दस्य, ना (६३०) विगमै पमित विना, वा विगो पर सच ॥ १ ॥ ॥ अथ दिवालो स्तवनं ॥ धनर मंगल एह सकत दिन, पूजा प्रनाते चाली रे ॥ याज म्हारे दीवाली अजुवाली ॥ १ ॥ गावो गीत वधावो गुरुने, मोतोमे थाल पूरावो ॥ चार२ अाग चतुर सुहागरा, चरण कमल चिन सारी रे || श्रा० ॥ २॥ धन धून धनतेरत दिवसे, काले चव दश काली ॥ पाप हरणने पोसो कीजै, कर्म मेलो सब टाली रे ॥ पा० ३ ॥ अमावसकी परव दिवाली, फरती काफमाली, घर तो दीवलिया फलके, रात दोसै अजुयाली रे ॥ प्रा० ४ ॥ अम्मा वशकी पिठली राते, अाठ करम सब टाली, श्रीमहावीर निरवाणे पोहता, अजरामर सुखकारी रे ॥ आ० ५॥ पमिवाने दिन जुदा रपटोला, ए रत रूमी सारी ॥ गुरु गौतमना चरण पखाली, रोक पामी रदियाली रे ॥ या० ६॥ वीजे तो वली नावमवीजम, वे नमल अति वादाली ॥ ए पांचे दिन होया रे पनोता,, एवेर ह रखे गाई रे ॥ श्रा० ७ ॥ हरस चिजप पंमित श्म बोलें, करो स हु सेव सुहाली ॥ रूपविजय पंमित गुरा गाये, जय२ वाजे ताली रे।। प्रा० ॥ इति पदं ॥ पुनः ॥ म्हारे दीवाली रे थई अाज, प्रन्नुमुख जोवाने, सरयार रे सेवकना काज, नवपुःख खो वाने १ ॥ महाबोरस्वामी मुगते, पुहता, गौतम केवलज्ञान रे ॥ धन अमावस्या धन दीवार। म्हारे, वीरपतु निरवाण । जिन.मु. २॥ चारित्र पाल्या निर्मलाने, टाल्या ते विषय कपाय रे ॥ एद वा प्रनुने वांदियेतो, उतारे जव पार ॥ जिन मु. ३ ॥ वाकुता पदोस्या वीरजोने, तारी चंदनवाल रे ॥ केवल पर मनु मुक्त पो दता, पाम्या जवनो पार ॥ जिन मु०४ ॥ एका मुनिने वांदिये जे, पंनम ज्ञानने धरतारे ॥ समवसरण देश देशना रे, मनु ता
.
५२७ )
नरने नार ॥ जि. ५ ॥ चोवीशमा जिनेसरू रे, मुकतितसा
१.तार रे ।। करजोमी कवियण एम नये, मारो नवनो फेरो टाल
। जिन मु०६ ॥ इति पदं ॥
॥ अथ शपभदेव स्तवनं ॥
॥ पोढोर जी रुपन्न विहारी, निद्रा वश नयण तिहारे ।
पो० ॥ प्रन्नु आलस अंग हुक्ताई, पू मरूदेवा माई ॥ पो० १॥
प्रन्नु नंदा सुमंगला राणी, उन रुचर सेज विगणी॥ पो०.२ ॥ प्र.
नु नवलसु नेह सनेहा, प्रन्नु मनवंचित फल देहा ॥ पो ३ ॥
प्यारे सेवक हितकर गावै, मनवंचित फल पावै ॥ पो०' ४ ॥
जर अमर पद पावै, करजोमी शीश नमावै ॥ पो० ॥ ॥ इति ॥
॥ मंगल स्तवन || राग सामेरी ।।
॥ कीजै मंगल व्यार, आज घरे नाथ पधारया ॥ कीजै०॥
दिले मंगल प्रनुजीकू पूजूं, घसी केसर घनसार ॥ आ० १ ॥
nj मंगल अगर नखे, कंठ बुबु छलहार ।। आ० २॥ बीजे
बंगल. भारती कतारूं, घंट वजाचं रणकार || प्रा० ३॥ चोथे मं
लि मनुगुण गाचं, नाचू थे थेकार ॥ आ० १ ॥ रूपचंद कहै ना;
निरंजन, चरण कमल जावं वार ॥ ० ५ इति पदं ॥ :
॥ अथ सिद्धाचल स्तवनं ।
॥ सिज्ञाचल गिरि नेटो रे, नविजन सुखकारा | ति० ॥
यम जिनंदे ए गिरिना गुण, नारख्या विविध प्रकारा। इस गिरि
घु अनंता सीधा, एहनी हुँ वलिदारा रे ॥न सि० १ ॥
न जिनेश्वर पूर्व निनाणूं, तमवसरया सुखकारा || रायण ता.
गला अनु.नेव्या, पाप पंक मल दारा रे॥न०, सि० २ ॥
प्रमुख विध मनोहर यानुत, दरशश अतको उबारा ।। मूडना
• श्रीपादजिनेश्वर, पूजत इख सहु वारा रे !! न० त० ३॥
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. ( ६३५ ) मात चकेसरी गिरवर कपर, चक्र दस्त विच धारा ॥ अष्टः निवारण मुमति वधारण, राजत संघ रखवाला रे ।। न्नति०॥ ४॥ खरतर गछ नायक सुख दायक, कोरत जग विसतारा ।। गु एा आगर राजत अति सुंदर, इंस सूरि गुणधारा रे । सि०५ । संवत उगण वतीसे कार्तिक, शुक्ल पक्ष मनुदारा ॥ पंचमी दिन मन दर्प धरीने, जात्र करी जयकारा रे॥नति०६॥धर्मशील दपंकज सेवक, कुशल निधान उदारा ॥ तास पशाये गिरवरना गुण, पत्नणे मुनि रुश्तारा रे ॥ न० ति० ७॥ इति पदं ॥ ॥ अथ नवपदजीकी लावणी ॥ जगतमें नवपद जयकारी, पूजता रोग टले नारी ॥ प्रथम पद तीर्थपती राजे, दोप अष्टादशकू त्याजै ॥ आठ प्रातीदारज गज, जगत प्रनु गुण वारै साजै ॥ (दोहा-साखी ) अष्ट करम- दल जीतके, सकल सिहते थाय सह अनंता जो बीजे पद, एक समय शिव जाय ॥ प्रगट जपो निज स्वरूप नारी ॥ ज. १ ॥ सूस्पिदमें गौतम केशी, उपमा चं सूरज जेशी ॥ उमारयो राजा परदेशी, एक जब मांद शिव खेशी ॥ (दोहा-साखी) चोथे पद पाठक नमू, श्रुतधारी नवझाय 11 सब साहु पंचम पदे, धन धन्नो मुनिराय ॥ वखाएयो वीरजिणंद भारी ॥ ज०॥द्र स पट्की श्रद्धा भावे, सम संवेगादिक पावै ॥ विना यह ग्यान नदी किरिया, जैनदरशनसे सब तिरिया ॥ (उदा-सास्त्री ) ज्ञा न पदारथ सातमें, पदमें आतमराम ॥ रमता रम्य अध्यातमें, निजपद साधे काम || देखता वस्तु जगत सारी ॥ ज०३ ॥ जो गकी महिमा बहु जागी, चक्रधर गेमी सव राणी ॥ यत्ती दश घ रम करी सोदे, मुनि श्रावक सब मन मोहे ॥ (उहा-साखी) करम निकाचित कापवा, तप कुगर कर ध्याय ।। कमा युत नकः (६५) मा पद धरै, कर्म मूल कट जाय ॥ जो तुम नवपद सुखकारी ।। ज०४॥ श्रीसिश्चक नजोलाई, अचामल तप विधिसे प्राई ।। पाप निहुं जोगे परिहरजो, नाव श्रोपाल परे करजो ॥ (दूहा- साखी) संवत नगणीस ततरा समें, जेपुर श्रोजिन पाश ॥ चैत्र धवल पूनम दिने, सफल फली मुझ प्राश ॥ बाल कहै नवपद रवि प्यारी ॥ ज० ५ ॥ इति पिदं ॥ पुनः ॥ चाल श्सनाकlll ध्यान धरो नवपदका चेतन, दूर करो-मद मान ॥ नवपद जे सा जगसे तारण, मिलणा नही 'सान |॥ १ ॥ हृदयकमलमें जिसने ध्याया, सो पाया निर्वाय ॥ रुदि हिरमणो सुत संपत, इनका कौनकमान ॥ २ ॥ कुष्ट जगंदर राजरोग सब, नूत प्रेत ग्ल नाश ।। नवपद जैसा निरनय शरणा, फेर करो क्या प्राश ॥ ३ ॥ अष्ट कमलदल रचना सोहं, अई पद अरिहंता सिइ सूरे नवझाय मुनीश्वर; दर्शन ज्ञान महंत ॥ ५ ॥ चारित्र तप इस नव पदके विच, सब जगका अवतार ॥ जिन अनंत हो गये. फिर होंगे; कोश्य न पाया. पार || ५ ||श्नको महिमा कहां लग बस्Y, मेंतो अधम अज्ञान ॥ महिर नजर कर दीजिये, परमानंद सुयान ॥ ६ ॥ चैत्र माश पाश्विन सुदि सातम, आंधिल व्रत नजमाल ॥ सुरनर नूपति सेव करत हे, महिमा सुण श्रीपाल ॥ ७ ॥ श्रीवि- मलेश्वर यक सहा, वरचकेतरि मात ॥ नम्व विविध कर मन शुद्धसे, विन्नुवन होत विख्यात II-॥ कर्म दसनः अब मिसन जिनंदसें, में पाया आधार ।। कुशल निधान कपासें आनंद, जयर श्रीदतार ॥ इति पदं॥ 'पुनः॥.. (रय चढ-जनंदन श्रावतं हे ॥ ए चाल) ॥. चलो शखी जिनमंदिरमें; जंग नवपद महिमा गाजत.हे रेः॥ २०॥ रूप अनूप तमिकांति प्रन, मदन 'उवि लाजत दे रे ॥ ०.१. ॥ सिपचा धुर तीन तरसें, व:
- । - (६१) सुधा पीउ विराजत दे, तीरथनाथ सिद्धं पद सूरी, पाठक मुनि कर वाजत दे रे । च०२ ॥ श्रद्धा शुद्ध प्रकाशंक चिघन, चरण निरजरा साजत दे ॥ परम करण मन वंचित दायक, अतुलं सु. जश जग वाजत हे रे । च० ३ ॥ नरवर रमापाल तुम गुणरश, नोति अरुज सब जाजत दे || ध्यान रंग मन संग एकसें, जग दानंद निवाजत हे रे ॥ च०४ || शंभव नुवन पुरी वांबूचर, अंतरंग अरि दाऊत हे ॥ शंकर बृह्मदेव तुम ध्यावे, गोविंद चरणा माजत दे रे । च०५॥ शिखर हरख माणक अरु तारा, तनं द्युति उपम काजत दे । मंत्र मणी तुम जमी नामकी, लखमी लोल- पराजत. हे रे ॥ च० ६॥ दीजै कुशल निधान नक्तिनर, रुद्धसार' सुख राजत दे रे ॥ च०७॥ इति पदं । ॥ अथ पार्श्वनाथकी होरी ॥ सांवरो लागे प्यारो, प्रनु मनमोहनगारो॥ सां०॥अश्वशेन | गज कुल दिनमणि, अधम उधारणहारो ॥ प्रनु सूरत निरखणते. प्रगट्यो, आनंद हरख अपारो, दयानिधि नकळू तारो || सां० १॥ चंद चकोर प्रेमरंश आतुर, ज्युं जिनराज दीदारो ॥ लगन तिहारे. दरश शरसको, केसे नाथ विसारो, तुंही प्रनु प्राणं आधारो ।। सां० २ ॥ सुंदर रूप चंद वदनामृत, नयणकमल नजियारों।। धनर आज दिवशकी महिमा, जोवन नाथ जुहारो, बन्यों रंग, सरस हजारो || सां० ३ ॥ गंज अजीम सुवस पिर श्रीसंघ, करत सदा जयकारो॥ रामवाग विच द्वन्नुवन ज्यं मंदिर सरस तिहारों, बन्यो- अति सुख दातारो ॥ सां० ४ ॥ नगणीसे अमतालीशशुन दिन, वस्तपंचमी धारो ॥ पाठक - हितवद्धन्न बहु विधसे, चैत्य मतिय सारो, कुशल निधी कदै संसारो ॥ सां० ॥ इति पई। ..पुनः॥. (दमकू गंग चले || इस चालमें दोरी) । आज. ७१ (६२) सुरंग धन वरसत होरी; पारसमनुजीके पाश रे ॥ श्रा० ॥ कीरत घाग गगन जिनमंदिर, सजल घटा सुविलास.रे ।। श्याम मनोहर तन वि दमकत, चमकत दामनी नात रे॥ प्रा० १ ॥.. आनन अमृतरश धारा, ऊमी लगी श्क राशरे 1. चात्रक रटत वचन मन मेरो, प्राण प्रनूकी आश रे ॥ श्रा० २ ॥ खेंच कवाण इंघनुपनकी, हिलमिल नमर उजास रे ॥ अपर गान करत सुर वनिता, कोयल वचन नलाश रे ॥ आ० ३ ॥ घिर चित्त लाल गुलाल कुमकुमा, प्रेम अविर सुवाश रे ॥ तन मन प्रीत. नरी पिचकारी, पेठू प्रनूसे कर हास रे ॥ प्रा० ५ || सहज गु- लाब फूल चुन चौसर, गुंभ मणी गुणवास रे॥कुशल निधान धरो बतियन, रुद्धसार प्रनु दास रे ॥ श्रा० ५ ॥ इति पदं ॥. ॥ अथ रुषभदेवका वारेमासो लिख्यते मरुदेवाजी सोच करत हे मनमें, मेरा पन्न. गया क्युं व. नमें, प्रथम महीना जी लग्या आशाद चोमाशा, इंदर वरपणकी आशा ॥ मरुदेवाजी-मनमें नई नदासा, प्रनु रुपन गये वनवासा. ॥(दूहा-साखी ) रूपन्न प्रनु, वनकू गये, जगत सुधारण काज ।। जरतादिक सो, पूत्रकू, वांट दिया सब. राज ॥ पुत्र तुम सवही जी. मगन होय रहे धनमें | मे०१॥ सावण महीना जी फिरमिर मेहला वरसे, मेरे पुत्र विना जी, तरसे ॥.नरतादिक जी तो पूत्र नके मरतें, मेरा नंद निकल गया घरसे ॥ (दूदा-साखी.) नगर अयोध्या, यु.मुरै, गये कहां. महाराज ॥ दे. उलंना भरतकू, मेरा पूत्र मिलावो आज़ , अजीतो.मेरे सुत विन. जी प्राण निकलसी जिनमें | मे०२ ॥ जादू महिना जी, तजः धन, दोलत. माया, वो गया केली काया ॥ जरतादिक रे तुम मनमें दरखाया, राज, ये विना कमाये पाया || दूहा-साखी) नित नव नाटक होत है, (६४३) कर रदैलोगविलाश ॥ सब माया या झपन्नकी, गेम गया वन वास ॥ देजी जगतारण जी उखी होयगा तनमें ॥ मे० ३शा आ र मदाने जी सूरतकी विव लागी, वो होयगया वैरागी ॥ धनके सब सोनी जो पूत्र नये नीरागी, कनी खबर न लो वमन्नागी । (दूदा-साखी) नरत कहे सुश मात जी, मत कर वृथा विलाप ॥ तीन लोक तारण तरण, आवेगें मन्नु आप ॥ पद सेवे जी नहीं दे रती विधनमें । मे०१॥ काती महिना जी का वो श- पन्न घर पावै, मोहे नेणा प्राण वताचे ॥ नही कागद जी मुमडूं पुत्र पगवे, मेरा जीव बहोत ऽख पावै ॥ (दूहा-साली) मुरती निशदिन पूत्रकों, रो रो खोइ अांख ।। उमकर मिलती रुपनसे; जो देत विधाता पांख मोर पपश्या जी मगन ज्युं रहते धनमे ।। मे० ५ ॥ मिगसर महीना जी नरत बाहुबल नाई, आपसमें करे खमा । जरत यूं कहता जी मानो मेरी दुहाई, सब सैन्या चढ- कर आई ।। (दूहा-साखी) बारा वरस खमते जये, इंद्र दिये सम काय ॥ चक्रवर्ति वनता गये, नये चंदयश राय. हे जी तो तप कारण जी खमे बाहुबल रनमें ॥ मे० ६॥ पोसका महीना जी पमे टमका पाला, रुत आया कग्नि सियाला ॥ कहां होगा जी झपन्न जगत प्रतिपाला, में रटुं रुपनकी माला (दूदा-साखी) कोई परवतकी उपमें, होगा मेरा नंद || म तापकी विपतमें, सदै वहोत उख.धंद । जरत मेरे सुतका जी नही फिकर तेरे मनमें। मे०७॥ माइका महीना.जी किसे कहूंख मेरा, सब पूत्र विना अंधेरा.॥ पूत्र घर आवो जी देवूगी मुख तेरा, कोर देवे रुपनका वेरा, (दूदा-साखी) इंद्रादिक जाकू.नमें, रहे सदा करजोर ॥ राज रमणकी संपदा, वो गया बिनकमें गे॥ एसा निरमोदी जी पटका विरह दहन में । मे० ७॥ फागण महीना जी नीर नयणमें
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जरत), सूने मन घरमें फिरती ॥नरत यूं केता जी सोच फिकर
फ्यूं करती, रदे निशदिन मुझसें खरती॥ (दूहा-साखी)नरत विविध
सरनांतसो, कहता वात वनाय । वनपालक नद्यानक, दीवी बघार
प्राय ॥ प्रनू पधारे जी सेवित हे मुनिजनमें । मे०ए। चैतका
मदीना जी हय गय रथ सब त्यारी, सिणगारी सेन्या सारी ॥
नरत कर जोसे जी मरुदेवा मनुदारी, चल' देख पूत्र सुखकारी ।
(दोहा-साखी) इंद्रध्वज आगे चले, जामंगल दे लार ॥' चोसन
चमर सुरपति करै, उन्नी गगन मकार ॥ एसो सुत तेरो जी
विलसे सुख सुरगामें ॥ मे० १०॥ माश वैशाखां जी , मख्वा
मन हरखै, जब अपनपन मुख निरखै। नेशपट नया जी बीत
राग पद सरखें, चढ शुक्ल धानकू परखै ।। (दूहा-ताखौ) गज कपर
भुगती गई, श्रीमरुदेवी मात ॥ पहली शिव जननी वई, एसें .
पत्न सुजात ॥ जगत सुख कारण जी विचरै
प्रन्नु
मगनमें ॥ मे०
११. ॥ जेठका महीना जी रुत गरमीकी, आई, में झपन्न वरण
पई लाई, दरस नित तेरो जी मुझकू हे सुखदाई ॥ शिवा प्रेम
सदा मन नाई ॥ (दूहा-साखी) धरम शील. आधारसें, कुशल
सदा आनंद ॥ रुद्धसार जिन नामसे, हरे धरित मुख धंद ।। हे
जी तो मन सुधकर जी राखौ जिन चरणनमें । मे० १२ ॥
॥ अथ नेमनाथजीका वारे मासा ।।
(मोद लियो माहाराज कूवरी वोमयुरावाली एचाल) ॥ सावण
महीने नेम पिया मोहे व्याहनकू आये, नयशेन घर वटत वधाई
सब मंगल गाये ॥ संग दे. राम रुपा नाई, तोरणसें रथ फेर सि
धाए,.सरम नहीं पाई ॥ जगतमें लोक करे दासी-मोद लियो
शिवरमणी शोकन प्रीतम अविनाशी ॥ १ ॥ नादू महीने गगन
घीच पीया इंदर चढ़ पायो, वैरण वीज खीज रहो.मा जोगन
( ६५५ ) गरणायो । सखी मोकू विरहा संतायो, मोर पपश्या बोले पापी, मदन सदन ठायो । तीज विन प्रीतम यं जासी॥ मोह लि०२॥ प्रासू महीने पाश पीयाको मिलणेको लागी, तेल चढी मोर्चे ठि टकाई दया नहीं जागी ॥ कंत तुम निरमोही सागी, विना गुने तकशीर कंत मोहे, केसे तुम त्यागी ॥ प्रीतकी मारी गले फाती- मोह लि० ३॥ काती कंत गयो सहसावन खवर नहीं लीनी, उत्तम प्रीत रीत नदी साजन ये तुम क्या कीनी॥ पशुनकी दया चित दीनी, रूस चले माहाराज गुने विन, अंतरंग नीनीस्याम तोकुं मति ये क्या नाती-मोह लि०४मिगसर मोहन तीन लोक पति नार और धारी, शिवरमपीके मिलणे वावत करी कंत त्यारी ॥ पिया तुम चढगये गिरनारी, अनंत लोग नोगी सो काम- , लगी तुमें प्यारी॥पीया में चरणनकी दासी-मोह लि०५॥पोश पीया संन्ना देती हिये नहीं धारो, नहीं गेहूंगी संग नाथ अव चाहे सो कर मारो वचन जो लगे तुम खारो, एक चेरघर अंगण आयो फेर तजूं खारो ॥ शखी सब मिलकर समझासी-मो० ६ ॥ माद महीने रुत सरदीकी ठग वहोत वाजै, सेज लगे नांगण सी मु. ककों नेम नदी लाजै । मदनको कदक कोण नांज, नहीं वमन • गैरत किसकी, तुमकू यह ठगजै ॥ पिया विन करूं में गति काशी-मो० ॥ फागण फाग घरोघर खेले दंपति सुख माणे, में अवला तरसुं विन प्रीतम जियकी जिय जाने कौन संग में खेलूं होरी, एक विना यो सब जग सूनो, नहीं वाला जोरी ।। कंत में दरशनकी प्यासी-मो० ॥ चेत मात फूली वनराई कोयल सोर करे, एसे निरमोहीसे करके कहो कुश फंद. पमे । प्रीत जिन नव लवकी तोरी, राजुल तज सिणगार हार • मदनः मान मोमी ॥ नेम विन हो रही कदाप्ती-मो० ए॥ माश (६५६) वैशाख प्रांख यूं नसके प्रीतमकी मनमें, उग्रशेन महाराज पुला- री गर सदसाचनमें । देखा शिवादेवीके नंदा, चं शेवित पदपंकज मुख पूनमचंदा ।। आज शखी मौतम घर माप्ती-मो० १० ॥ जेठ माश गरमी रुत खूमां बाजे कंत पुरी, नही रैण मुख चैन शखोरी चल रही प्रेमरी ॥ पाप को पूरख उदे आया, ग्रोम घले घनस्याम आज में दरशण सुख पाया ॥ तजी. में सब घरकी फासी-मो०११॥माश असाढ सखी संग राजुल नेम चरण नेव्या, पर करणी नव तिरणी होकर धंद सन्नी मेव्या ।। प्रीत तुम अजर अमर राखी, शसार आधार तुमारो प्रेमः शिवा शाखी ॥ जगत जन गुण तेरा गासी-मो० १२..॥ इति पदं ।। ॥ अथ छुटकर स्तोत्र लिख्यते ॥ "अय भी पीतलजिन स्तोत्र ॥ सकल मंगल केलि निवेशिनं, सहृदयं हृदयं गम देशनं ॥ अग्नि तोत्तम नक्ति सुरेश्वरं, नमत शीतलनाथ जिनेश्वरं ॥ १..॥ सदर सुंदर समुशमंदिरं, विमल केवल वोध विकश्वरः ।। अति सुवर्ष सुवर्ण समद्युतं, प्रवर बंधुर बक्षण संयुतं ॥ २ ॥ युग्मं । यदि नतिर्नविना नवेनवे, नवेदनीमार्थ निदानमतं ॥ सएव नंदा स्म समुन्नवो जिनः, समर्थनीयः खलु शीतलः प्रन्नु ॥ ३ ॥ कर्मा नितप्तान नवितः सुशीतलान्, कुर्वन्मुदा वाक् सुधया दयापरः ।। सदेव देवो नवतात् सदैवमे, सदिष्ट सिद्धयै जिनराज शीतलः॥ अधिगतः शिवशर्मा वीत मोहादि कर्मा, दृढरथः तनुं जन्मा सर्वतः साध धर्माः॥ त्रिदश महित मूर्तिः स्फुर्तिमत् पुण्यकीर्तिः, जयतु गत जवार्तिःशीतलः सौम्यमूर्तिः ।। ५.॥ इति ॥ अथ श्री पार्वजिन स्तोत्र ॥ ... ..विशदगुण विचित्रं सच्चरित्रं दधानो, दसित उरित राशि (६७) विश्व विश्वापदातः ॥ प्रकट महिमरम्पो ऽर्मती नाम गम्पो, जय तु जिनपतिः श्रीपार्श्वचिंतामणीशः ॥१॥ कम कुमतिवल्ली मूल मुन्मूल यन्ती, पदम कत पदाप्जेयस्य मुंगीव पहा ॥ अकि कृतमात कायोत्सर्ग मुज्ञान्वितोसो, जगति बहुमतास्मान् पातुः पामांग जन्मा ॥२॥ अविचल मणि विनत् सत्फणानां सहस्त्रं, बहुल विमल नास्वपशोनाति गात्रः ॥ गुरुतर वर नया सक्त चित्तागनाजां, भवतु शिव समृदय चावसे निर्जिनः ॥ ३ ॥ कुपित करि मृरोश व्याख दावानलाधि, प्रदरणगदगुस्यातंक शंका। पदा विकशिन मुख पद्मः सत्पुरेसूरताख्ये, जयतु जग सक्ष्मी भ्राजमानो जिनेंद्रः ॥४॥ 11 अथ समस्यामयी शंखेश्वर पार्थ जिन स्तुतिः ।। यस्य ज्ञान दया तिघो, दर्शनं श्रेय से ध्रुवं । सश्रीमान्या व तीर्थेशो, निपेव्यः सततं ततां ॥१॥ वामा सूनोर्यशः पुंजे, रघाघस्या नघा गुणः॥ स्मते येन सस्मायों, भवेत् प्राचीन वर्दि पां ॥ २॥ विदाय विषयाशक्तान, संसारिक सुरासुरान् । सेव्यता मकयो धीराः, पार्श्वदेवो परः अनुः ।। ३ . जिनाः सवार्थ दानेन, येन कल्पद्रुमा अपि ॥ नवेदन्यर्वितो लोके, स श्रिये चामृतागच ॥ ४ ॥.संस्तुतो मधुर श्लोक, जैन खान प्रदायकः ॥ कल्याण. कारको नूयात, श्रीमान् शंखेश्वरः अनुः ॥ ५ ॥ इति ॥ अथ विविध यमक युक्त श्रीपार्थ जिन ,स्तुतिः ।। लक्ष्मी निदानं गुरु कर्मदानं, समं दानं जगते ददानं. ॥ यकेश पाच शित पाद:पार्थ नुवामीपाच नवन्नेद पा ॥१॥ स्मेरातसी सून सम प्रनावा, सम प्रनावा नवदीय मूर्तिः। वि. जाति वामां अन्नव त्रिलोके, जव त्रिलोकेन समर्चनीयः ॥ २ ॥ तवेश पत्पंकज.मादरेण, हृद्यादधाना जनतादरेण ।। मुक्ता नवेदेका (६४) पदे पराया, निवेश वनसौख्य परंपरायाः ॥ ३ ॥ निःशेर बर्षित दान वारि, यन्मानसेत्वं ध्रियसे सदैव ॥ सएव गव्युत्तम दानवारो, प्रोचारितोदाम यशाः सदेवः ॥ ४ ॥ देवाधिदेवाधि इरस्त्वमे सुझान सुझाननियुःक्ष रूपः ॥ सारांग सारांग वितीर्णनूयः, कल्या कल्याण रुदं गन्नाजां ।। ५ ॥ यैरय॑सेत्वं वर वैद्यराज,मनोजिर मैः सुमनोनिरामै ॥ कान्निधै रुझित नूघनास्ते, विसारि लोके विसारि लोके ॥ ६ ।। इत्यंते जिन पुंगवस्य नगवन प्रोदाम घाम वितं, पादाप्नं परनाग नृत् विजुवन स्तुत्यस्तुवन्तोनिशं ॥. दह कर्म विपक पक दलने नव्या नवंतु कमाः, कल्याणाश्रय मुक्ति माप्नु मखिवंती िनवानोनिधिं ॥ ७ ॥ इति ॥ अथ शंखेश्वर जिन स्तवन । • शालिनी चंदः । गौमोग्रामे स्तनने चारु तीर्थे, जीराव स्या पचने लोश्वारव्ये वाणारस्यां चापि विख्यात कोर्ति, श्रीपा. वेशं नौमि शंखेश्वरस्यं ॥ १ ॥ इटार्धानां स्पर्शने पारिजातं, वामा देव्या नंदनं देव वंद्य (| स्वर्गे नूमौ नागलोके प्रशिदं ।। श्री पा० ॥ ॥ नित्वानेचं कर्म जालं विशालं, प्राप्यानन्तं ज्ञान रलं चिरत्नं ॥ लब्धा मंदानंद निर्वाण शौख्यं ॥ श्रीपार्श्व०३॥विश्वाधी शं विश्वलोके पवित्रं, पापागम्यं मोक लक्ष्मी कात्रं ॥ अंजोजाद सर्वदा सुप्रसन्नं ॥ श्रीपाबें० १॥ व रम्यं खंग दो ग चंद, संख्ये मासे माधवे कृष्ण पके ॥ प्राप्तं पुण्यैर्दर्शन यस्य तंच, श्रीपाद ५॥शति ॥ अथ पार्थ जिन सो॥ 'विशद सद्गुण राजि विराजितं, घनवना घननाद विनाजिर तं ॥ लजत नक्ति नरेण रमेश्वर, जगति पार्थ जिनेश मनेश्वर १॥ विविध वर्ण विनूपित विग्रहाः, विहित उईम दर्पक निप्रदा।। ।
(६) वसु युगार्क मिताः सुरुताकराः, जिनवराः प्रनवंतु शिवकरा॥ रू.चरवर्ण निव मनिन्दितं; सुमनसा प्रकरै रनिवंदितं ॥ निखिल साधुजनाः खलुनिर्मिदं, जिनमतं नमतां चितशर्मदं ॥ ३॥ सकल नव्य सरोज विकाशिका, कुमति संतमसोञ्चय नाशिका || जिन- वरानन पद्म गतोन्मुदा, नवतु वाग्जिनलाल शुन्नार्थदा ॥ ५ ॥ अथ श्री गोडीपार्श्व नाय जिन स्तोत्रः ॥ श्रीमत्पार्थ जिनेश्वरस्य विलसद्ज्ञानामृतांनोनिधेः, सद्भा- वेन परस्वरूप विरते र्मुक्त्यास्पदेतस्थुपः ॥ सजुत प्रतिबिंब तस्तु: सुतरां गोमीपुरोद्भासिनः, सोलासंप्रणिपत्य सत्यमनतां तत्रैवनित्यं स्मरे ॥ १ ॥ यत्पादांबुज दर्शनोत्सुकधियो नव्यावतोध्वनि, स्पृश्यतेनदि अष्टजंतुनिवहे वन्यैर्नवातस्करैः ॥ नैवोज्वालदवानले जलचराकीलैजलैजातुनो, तःश्रीपार्थविनुचिन्त्यमहिमा दृश्यो- नकेपानवेत् ॥ २॥ दित्वान्तःकरण तं कुटिलता मोहादिनोद्रा- वितां, धृत्वानिर्मलनावनांच विधिनायद्भक्तिमातन्विता ॥ बन्यन्ते नरराज निर्जरवरश्रेणीसुखानिक्रमा, न्मुक्तिश्रीरपिसैवशुद्धमनसा संसेव्यतांविश्वयाः ।। ३॥ ॥ अथ चतुर्विशती जिनस्तवनं ।। ॥ श्राद्यः श्रीश्पन्नस्ततोजितजिनः, श्रीनिवस्तीर्थकत् ।। सुश्रीमानन्निनंदनवसुमतिः, श्रीसद्मपद्मप्रनः । पृथ्वीकुदिन्नवसुपा थे, जिनपस्तीर्थेशचंशनः ॥ सर्वशःसुविपिर्जिनोमुनिमतः, श्री शीतलसौम्यहक् ॥ १॥ श्रेयांशप्रनुवासुपूज्यविमलानंतेशचर्मेश्वराः, शांतिकुंथुररस्ततोजितरिपुमल्लिर्जिनःसुव्रतः॥ यतोनमिनेमिशुद्ध मुनिपौविश्वत्रेयेविश्रुतो, श्रीमत्पार्वजिन प्रतिक्ष्मदिमा श्रीवईमान मनुः ॥ २ ॥ एतेश्रीजिनपुद्याःपरमश्विपाश्चतुर्विशति, नि:शेषो. चमलव्यजंतुहृदयालोजप्रबोपोद्यताः ॥ वंद्यन्तेसुरवृंदवंद्यविशवश्लो (६५० ) कवजानिय, श्रीसंपत्तिनिवासविक्रमपुरेसद्भक्तितःप्रत्यई ॥३॥ ॥ अय मंगलाष्टकलिख्यते ॥ श्रीमन्नम्रसुरासुरंद्रमुकुटप्रद्योतिरत्नप्रन्ना, नास्वत्पादनखें। प्रवचनांनोधोव्यवस्थायिनः ॥ येसर्वेजिनसिसूरिसुगतास्तेपाळ साधवः, स्तुत्यायोगिजनवपंचगुरवःकुवैत्तुमेमङ्गलं ॥ १ ॥ सम्य शन बोधवृत्तममलं रलत्रयंपावनं, मुक्तिश्रीनगरायनं जिनपते ग्गीपवर्गप्रदः ॥ धर्मःसूक्तिसुधाश्वचैत्यमखिलं जैनालयंश्यार प्रोकंतत्रिविधंचतुर्विधममीकुर्वतुमेमंगलं ॥५॥ नानेयादिजि घिपा स्विन्नुवनेरव्याताश्चतुर्विंशतिः, श्रीमन्तोन्नरतेश्वरप्रनृतयोय किणो द्वादश ॥ येविष्णुमतिविष्णुलांगलधराः सप्ताधिकाशित त्रैलोक्येन्नयदा त्रिपष्टिपुरुपाः कुतुभेमङ्गलं ॥ ३ ॥ कैलाशेवृपन्न निर्वृतिमदीवीरस्यपावापुरी, चंपायां वसुपूज्यसङिनपतेः सम्मेद लेईतां ॥ शेपाणामपिचोङयन्तशिखरे नेमीश्वरस्याईतो, निर्वाए बिनयःप्रतिइविन्नवाः कुतुमेमङ्गलं ॥ ॥ ज्योतिव्यतरजावना रगृहे मेंरीकुलाहौस्थिता, जंशाल्मलिचैत्यशाखिपुतथावकाररूप दिपु ॥ इक्ष्वाकारगिरौचकुंमलनगेछीपेचनंदीश्वरे, शैलेयेमनुजोन जिनदाः कुर्वतुमेमङ्गलं ॥ ५ ॥ योगन्नवितरोजयत्यईतांजन्मानि पेकोत्सवे, योजातः परिनिकमेवचन्नवो यःकेवलझानन्नाक् ॥ याक वख्यपुरप्रवेशमहिमा संजावितः स्वर्गिनिः, कल्याणानिचतानिपर सततंकुवैतुमेमङ्गलं ||६ ॥ येपंचोपधिशद्धयः श्रुततपोरुद्धिंगतापंचये येचाष्टांगमहानिमित्तकुगलायेटौविधाचारणा ॥ पंचज्ञानधराश्चयेवि धलिनोयेवुद्धीकदीश्वरा, सप्ततेसकलावतेगणनृताकुर्वतुममंगल । देव्याचारजयादिकाद्विगुणिताविद्यादिकादेवता, श्रीतीर्थकरमातृका- भजनकायकाश्चयक्षीश्वराः द्वात्रिंशविदशाग्रहानिधिसुरा विकन्यका श्वाटया, दिकूपालादाश्त्यमीसुरगणाः कुतुमेमङ्गलं ॥ ॥ इत्यं .
( ६५१) श्रीजिनमङ्गलाएकमिदंकल्याणकालेईता, पूर्वापदेपिमहोत्सवेपिस- ततं श्रीसौख्यसंपत्करं ॥ येशृपवंतिपतितैश्चमनुजै ईर्मार्थकामा चिता, लक्ष्मीराश्रयतेविपायरहिताः कुवैतुमेमङ्गलं ॥ ॥ इति मंगलाष्टकं संपूर्ण ॥ ॥ अथ परमात्मा स्तोत्रः॥ शिवं शुद्ध बुद्धं परं विश्वनायं, नदेवं नबंधु नकर्म नकर्ता ॥ न अंगं नसंगं नश्छा नकामं, चिदानन्दरूपं नमो वीतरागं ॥१॥ नबंधो नमोदो नरागादि लोकं, नजोगं नन्नोगं नव्याधि नोकं ॥ नको, नमानं नमाया नलोनं ॥ चिदा० ॥२॥ नदस्तौ नपादो नघ्राणं नजिह्वा, नचकुर्नकणे नवकं ननिश, ॥ नस्वाद नखेदं नवर्ण नमुद्रा, चि० ॥ ३ ॥ नजन्म नमृत्यु नमोदं नचिंता, नकुतृट् ननीतं नकृष्यं नतुंदा ॥ नस्वामी ननृत्यं नदेवो नमा, चि०१॥ त्रिद त्रिख दरे विश्वव्यापं, रुपीकेश विदस कारिजालं ॥ नपुण्यं नपापं नअदानप्राणं, चि० ॥ ५ ॥ नवाल्यं नवृ नविधि नमूढा, नवेद्य नन्नेद्यं नमूर्तिनमीदा नरूप्यं नशुझं नमोदं नतंश, चि० ॥ ६ ॥ नश्राद्यं नमध्यं नमंत्यं नमन्या, नव्यं नक्षेत्र नहष्टो नन्नव्या ।। नगुवों नशिष्यो नायो नदीनं, चि०॥७॥ इदं ज्ञानरूपं स्वयं तत्ववेदी, नपूर्णा नशून्यं सचैतन्यरूपं || अन्यों निनिमं नपरमार्यमेकं, चि०॥ ७ ॥ प्रात्मारामगुणाकरं गुणनि विबैतन्यरत्नाकर, सर्वेनूतगतागते सुख उख कातात्वया सर्वगं ॥ त्रैलोक्याधिपति स्वयं स्वमनसा ध्यायति योगश्वराः, वैदेतं हरिवं. श दर्प हायं श्रीमाननूदर्युतः ॥ ए ॥ इति श्रीपरमारमा स्तोत्र। अय नमस्कार स्तोत्र दर्शनं देव देवस्य, दर्शनं पाप नाशनं ॥ दर्शनं स्वर्ग सोपानं, दर्शनं मोक्षसाधनं ॥ १॥ दर्शनेन जिज्ञणां, साधूनां वंदनेनच 4 ( ६५२) नतिष्टति.चिरंपापं, गि हस्ते यथोदकं ॥ २ ॥ दर्शनं जिनसूर्य स्थ, संसार ध्वांतनाशनं ।। वोधनं चित्त पद्मस्य, समस्तार्थ प्रकाश कं ॥ ३ ॥ दर्शनं जिनचंस्य, सौमृत वर्षणं ॥ जन्मदाय दि. नाशाय, वृंदणं सुखवारिधः॥ ५॥ जिनेन्नक्तिर, जिनेन्नक्ति दिनेर ॥ सदामेस्तुर, सदामेस्तु नवे ॥ ५ ॥ नहित्रातार, नहित्रा ता जगत्रये ॥ वीतराग समोदेवो, ननूतो नन्नविष्यति ॥ ६ ॥ शान्यथा शरणं नास्ति, त्वमेव शरणं मम ॥ तस्मात्सर्व प्रयत्लेन, रकर जिनेश्वर ॥ ७ ॥ वीतराग मुखंदृष्ट्वा, पद्मराग समं प्रनंः ।। नैजन्म रुतं पापं, दर्शनेन विनश्यति ॥ ७ ॥ अर्हतो मंगलं नि- स्य, सिहा जगति मंगलं ॥ मंगलं साधयो मुकं, धर्मः सर्वत्र मंगलं ॥ ॥ लोकोत्तमा इहाईतः, सिमालोकोनमाः सदा ॥ लो कोत्तमो यतीशाना, धर्मोलोकोतमोईता.॥ १० ॥ शरणं तदाद ता, शिद्धा शरण मंगलं.॥ साधवः शरणं लोके, धर्म शरण मर्द तां ॥ १.१. ॥ इति नमस्कार स्तोत्र संपुर्ण ॥ ॥ अथ तपग समाचारी विशेप विधि-संग्रह ॥ ॥ तत्र पुन्यप्रकाश आलोयण ॥ दूहा ॥ सकल सिद्धिदायक सदा, चोवीशे जिनराय ॥ स गुरु सामिनी सरसती, प्रेमे प्रणमुं पाय ॥ १ ॥ त्रिनुपनपति नि ससातणो, नंदन गुण गन्नीर | शासननायक जगज़यो, वईमान यमवीर ॥ २॥क दिन वीर जिनंदने, चरण करी परिणाम ॥ नविक जीवना हित जणी, पूर्व गोयमस्यामि ॥ ३ ॥ मुगति मा रग आराधिये, कहो किरा पर परिदंत ॥ सुधा सरस तय वचन. रस, नाखे श्रीनंगवंत ॥ ? ॥ अतीचार पालोश्ये, प्रत परीपे गु रूसारख ॥ जीव समायो सपत जे,,योनि चौरासी सारस ॥५॥ विधिसुं वलि वोसराविये, पाप स्यान मार ॥ प्यार भरा नित :: स्तवन लिख्यते॥
(६५३ ) अनुसरे, निंदो ऽरित प्राचार ॥ ६ ॥ शुज करणी अनुमोदियै, नो व जलो मन आणि ॥ अणशण अवसर पादरी, नवपद जपो सु जाण ॥ ७ ॥ शुलगति आराधनतणा, एकै दश अधिकार ॥ चि न आणीने श्रादरो, जिम पामो नव पार ॥ G10 (ढाल ॥ १ ॥ एठिमी किदां राखी । इस चाल में) ज्ञान दरिशण चारित्र तप वीरज, ए पांचे प्राचार ॥ एहतमा इद नव पर नवना, आलोश्ये अतीचार रे ॥ प्राणी ज्ञान नयो गुणखाणी, वीर वदे इम वाणी रे ॥ प्रा० शा० १॥ गुरु नलविये नही गुरु विनये, काले धरी बहु मान ॥ सूत्र अर्थ तउत्तय करी सूधा, नाणिये वदी नपधान रे ॥ प्रा० झा० ॥ ज्ञानोपगरण पाटी पोथी, ग्वणी नोकरवाली एड तपी कीधी आशातना, ज्ञान नक्ति न संन्नाली रे ॥ प्रा० शा०॥ ३॥ इत्यादिक विपरीतपणाथी, ज्ञान विराध्यु जेद ।। आ जव प र नव वलिय नवोनव, मिचाउका तेहरे ॥ प्राण समकिता यो शुः६ जाणी ॥ ४ ॥ जिनवचने शंका नवि कीजै, नवि परमतः अन्निलाप ॥ साधुनणी निंदा परदरजो, फल संदेह म राखी रे ॥ प्रा० स० ५॥ मूढपणूं ठंमो परसंसा, गुणवंतने प्रादरिये ॥ सा दमीने धमें करि थिरता, जगति प्रनावना करिये रे ॥ प्रा० स० ६ ॥ संघ चैत्य प्राशादतणो जे, अवर्णवाद मन लेख्यो । द्रव्य दे वको ने विणसाड्यो, विणसंतां नवेख्यो रे ॥ प्रा० स० ॥३- त्यादिक विपरीतपणाथी, समकित खंमधु जेद ॥ आ जय प०, मि० प्रा० चारित्र ल्यो चित श्राणी ॥ ७॥ पांच सुमति त्रिण गुप्ति विराधी, आठे प्रवचनमाय ॥ साधुतणे घरमे प्रमादे, अशुभ वचन मन काय रे ॥ प्रा० चा० ए॥ श्रावकने धर्म सामायक, पो सहमा मन वाली ॥ जे जयशापूर्वकं जेआठे, प्रवचनमायन पाली रे || प्रा० चा० १०॥ इत्यादिक विपरीतपणाग्री, चारित्र महोब्यु.
जेद ॥ आनव०, मिचा० ॥ प्रा० चा० ११॥ वारे नेदे तप नदि कीघो, उते योगे निज शकते ॥ धर्म मन वच काया वीरज, नदि फोरविन लगते रे ।। प्रा० चा०१२॥ तप वीरज आचारे श्य। विविध विराध्या जेह ॥ आलवण, मिचामि० ॥ प्रा० चा०१३ वसिय विशेपे चारित्र केरा, अत्तीचार भालोश्ये || चोरजिनेसर चन सुणीने, पाप मैल सवि घोश्ये रे ॥ प्रा० चा०१५॥ (ढाल पृथ्वी पाणी तेन, वान वनस्पती, ए पांचे पावर कह्या ए ॥ का करसरा पारंन, क्षेत्र जे खेमीया, कूआ तलाव खणाविया ए||१ घर आरंत अनेक, टांका नोयरा, मेमी माल चिणाविया ए। सीपण गूंपरा काज, ऋण पर परपरे, पृथ्वीकाय विराधिया ए। २॥ धोयण नादण पाणी, जीलण अप्पकाय, गेती धोती कर हव्याए||नानीगर कुंनार, लोह सोवनगरा, नामपूँजा खिहालागरा ए॥शा तापससेका काजे,वस्त्र निखारण, रंगण रांधण रसवतो ए॥ णि परेकादान, परिपरे केलवी, तेल वान विराधियाएवामी बन आराम, वावी वनस्पती, पान फूल फल चूंटीया ए ॥ पदक पापनि शाक, सेक्या सूकव्या, उद्या द्या प्राधिया ए ॥५॥ अल शीने एरंग, पाणी घालीने,घणा तिलादिक पीलीयाए।घाली कोलू मांदि, पीली सेलमी, कंद मूल फल वेचीया ए ॥ ६ ॥ श्म एके- की जीव, दण्या दणाविया, इणतां जे अनुमोदीया ए॥ प्राजव परनव जेद, वलिय नवोनव, ते मुफ मिलामिछक्कम ए ॥७॥ क्रमी सरमिया कीमा, गामर गंमोला, श्यल पूरा असशीआ ए॥ वाला जलो चूमेल, विचलितरसतणा; वलि अयाणा प्रमुखना ए॥ GIf श्म बेज्ञ जीव, जे में दूहव्या, ते मुझ मि० ॥ नदेही जू. मांकम मंकोमा, चांचम कीमी कंथुआ ए ॥ ॥ गद्दहिया कानखजुरमा, गीझोला धनेरीयां ए ॥ श्म तेशी जीव, (६५५) जे में दूदव्या, ते मुळ मिळा० ॥ १० ॥ माखी महर मास, मसा पतंगिया, कंसारी कोलियावमा ए ॥ दीकण विदु ताम, जमरा जमरीय, कौंता वग खममांकमी ए ॥ ११ ॥ श्म चोरेंद्री जीव, जे में दूदव्या, ते मुझ० ॥ जलमा नांखी जाल, जलचर दूहव्या, वनमां मग संतापीया ए ॥ १२॥ पीच्या पंखी जीव, पामो पा. समां, पोपट घाल्या पजिरे ए ॥ इम पंचेशी जीव, जे में दू०, तें मुझ० ॥ १३ ॥ (दास ३ ॥ प्राणी वाणी हितकरी जी॥ए चाल) कोघ लोन जय हासथी जी, बोला वचन असत्य ।। कूर करी धन पारका जी, बोधा जेद अदत्त रे ॥ जिनजी मिछामि कम आज, तुम्ह ताखे महाराज रे ॥ जिनजी मि०॥ देई सारू काजरे ॥ जिनजी मि०॥१॥ देव मनुज तिर्यंचना जी, मैथुन सेव्या जेद ॥ विपयारस संपटपणे जी, घणुं विटंव्यो देह रे॥ जि० २ ॥ परिग्रहनी ममता करी जी, जवर मेली प्राथि जेद जिहां ते तिहां रही जी, कोश्य न आवै साय रे ॥ जि० ३. ॥ रयणी नोजन जे कर्या जी, कीधा नक अनद ॥ रसना र. सनी लालचें जी, पाप कर्या परतह रे ॥ जि. ४ ॥ व्रत बेई वीसारीया जी, वसि नांग्या पञ्चस्काण ॥ कपट हेतु किरिया करी जी, कीधा श्राप वखाण रे ॥ जि० ५॥ त्रिश दाले पाठे दुहे जी, आलोया प्रतीचार | शिवगति श्राराधनतणो जी, ए पहिलो अ- धिकार रे ॥ जि. ६ ॥ (ढाल ५ ॥ साहेखमीनी देशी॥) पंच मदाबत आदरो, सादेवमो रे ॥ अथवा स्पो व्रत वार तो || यथाः शक्ति व्रत पादरी, सा०॥ पालो निरतीचार तो ॥१॥ व्रत लिया संजारीये, सा० ॥ दीपमै धरिय विचार तो ॥ शिवगति धाराधन-: तो, सा० ॥ ए बीजो अधिकार तो॥ २ ॥ जीव सबै खमाविय' सा०॥ योनि चौरासी लाख तो ॥ मनशुई करो खामणा, सा!.
(६५६) कोईसुं रोप न राख तो ॥ ३ ॥ सर्व मित्र करी चिंतवो, सा० कोश्य न जाणो शत्रु तो॥ राग द्वेष श्म परिहरो, सा० ॥ के जन्म पवित्र तो ॥ ४ || सादमी संघ खमाविये, सा० ॥ जे : नी अनीत तो ।। सञ्जान कुटंब करी खामणा, सा० ॥ ए जिनः सत रीत तो ॥ ५ ॥ खमिये अने खमाविय, सा० ॥ एहोज नो सार तो || शिवगति अाराधनतणो, सा० ॥ एत्रीजो अब कार तो || ६ || मृपावाद हिंसा चोरी, सा० ॥ धन मुर्गा मैथुः तो ॥ क्रोध मान माया तृष्णा, सा० ॥ प्रेम देप पैशुन्य तो ॥७. निंदा कलह न कीजीये, सा० ॥ कूमा न दीजै आल तो ॥ रत अरती मिथ्या तजो, सा० ॥ माया मोस जंजाल तो ॥ ॥ त्रि विधर वोसरा विय, सा० ॥ पाप स्थान अहार तो || शिवगति । राधनतयो, सा० ॥ ए चोथो अधिकार तो॥ ॥ (दाल ५ मी || हवै निसुणो इहां आवीया ए ॥ ए चाल ॥) जनम जरा मर. णे कर। ए, ए संसार असार तो ॥ करया कर्म सहु अनुन्नवे ए; कोश्य न राखणदार तो ॥ १ ॥ शरण एक अरिहंतनुं ए; शरण सिनगवंत तो॥ शरण धर्म श्रीजैननो ए, साधु शरण गुणवंत तो ॥ २ ॥ अवर मोह सवि परिहरी ए ॥ चार शरण चित्त धार तो ॥ शिवगति आराधनतयो ए, ए पांचमो अधिकार तो ॥ ३ ॥ मानव परत्नव जे करचा ए, पाप कर्म के लाख तो ॥ यात्म साखे निंदिये ए, पर्मिकमियें गुरु साख तो ॥ ४ ॥ मिथ्यामत व विया ए, जे नाख्या नत्सूत्र तो ॥ कुमति कदाग्रहने वते ए, वलि नत्याप्या सूत्र तो ।। ५।। घमया घमाव्या जे पणा ए, इल हथियार तो || लवर मेली मूंकीया ए, करतां जीव संहार तो ॥ ६ ॥ पाप करीने पोपीया ए, जनमर परिवार तो ॥ जन- मांतर पोहतां पी ए, कोश्य न कोधी सार तो॥ ॥ मानव घरटी (६५७) परत्नव जे करया ए, इमं अधिकरण अनेक तो || त्रिविध चोसि राविये ए, प्राण) हृदय विवेक तो ॥ ॥ कृत निंदा श्म करी ए, पाप करया परिदार तो ॥ शिवगंति धाराधनतणों ए, ए उछो अधिकार तो ॥ ए ॥ (ढाल ॥ आदि तुं जोश्ने आपण ॥ ए चाल ॥) धन२ ते दिन माहरो, जिहां कीधो धर्म ॥ दान शीयस तप आदरी, टाल्या ऽष्कर्म ॥५० १ ॥ शेजाविक तीर्थ नी, जे कीधी यात्र ॥ युगते जिनवर पूजिया, वलि पोप्या पात्र । घ० २ ॥ पुस्तक ज्ञान लिखाविया, जिणंदर चिनं चैत्य ॥ संघ चतु विध साचव्या, ए साते क्षेत्र ।। ध० ३॥ पक्किमया सुपरै करया; अनुकंपा दान | साधू सूरि उवझायनें, दीधा बहुमान ॥ ५० ॥ धर्मकारज अनुमोदिये, श्म वारोवार ॥ शिवगति आराधनतणो, सातमो अधिकार ॥ ५० ५॥ नाव नलो मन आणीय, चित्त प्रा. पी गम | समता नावे नाविये, ए आसमराम || ध० ६ ॥ सुख उख कारण जीवने, को अवर न दोश् । कर्म पाप जे प्रावरचा जोगविये सोय ॥ध० ७॥ समता विण जे अनुसरे, प्राणी पुन्य काम || नगरि ऊपर ते लीप', साखर चित्राम || ध० ॥ नोव नली परे नाविये, ए धर्मनो सार ॥ शिवगति आराधनतयो, आठमो अधिकार ॥ ५० ए॥ ( ढाल उमी ॥ रैवत गिरि पर ॥ ए चाल ) हवै अवसर जाणी करीय संलेखरा सार, असा प्रादरियें परस्की ज्यार आहार | सखुता सवि मूंकी गंमी ममता अंग, ए आतम खेले समता ज्ञान तरंग॥१॥ गति ज्यारे कीधा आ हार अनंत निःशंक, पण तृपति न पाम्यो जीव लालचीन रंक।सदो ए वली२ अराशरानो परिणाम, एदयो पामीजे शिवपद सुरपद गन, ॥धन धना शालिनई खयो मेघकुमार, अराशण आराधी पाम्या जवनो पार ॥ शिवमंदिर जास्य करी एक अवतार, अाराधन केरी । --- ॥ (६५७) ए नवमो. अधिकार ॥ ३ ॥ दशमें अधिकार महा मंत्र नवकार, मनथी नवि को शिवसुख, फल सहकार ॥ ए जपतां जाये उर्ग ति दोप विकार, सुपरे ए समरो चनद पूरबनो सार ॥ ५ ॥ ज. न्मांतरे जाता जो पामे नवकार, तो पातिक गाली पामे सुर अव- तार॥ए नवपद सरखो मंत्र न कोई सार,ह नव ने परन्जव सुख संपति दातार॥५॥ जुन्नील जीलणी राजा राणी पाय, नवपद म हिमाश्री राजसिंद महाराय ॥ राणी रतनवती हुँ पाम्या चै सुर नोग, श्क जवयी लेस्ये सिद्धवधू संजोग |॥ ६ ॥ श्रीमतीने ए व ली मंत्र फल्यो ततकाल, फराधर फीटीने प्रगट थई छलमाल शिवकुमरे योगी सोवनपुरतो कोध, श्म एणे मंत्रे काज घशाना: सिंह ॥ ए दश अधिकारे वीर जिनेसरनाख्यो, पाराधनकेरो विधि जिणे चित्तमा राख्यो । तिणे पाप पखाली नवनय दूरे. नांख्यो जिन विनय करंता सुमति अमृतरस चाख्यो । ७. ॥ ( ढाल मी ॥ नमो नवि नावसुंए । ए चाल ) सि-क्षरथराय कुल तितो ए, त्रिशला मात मल्हार तो ॥ अवनी तलै तुमे, अवतरया ए, करवा अम्ह उपगार ॥ जयो जिन वीरजी ए ॥ १ ॥ में अपराध करया घणा ए, कहता न लहुं पार तो ॥ तुम्द-चरणे प्रा: व्या नणी ए, जो तारे तो तार ॥ ज०॥ आश करीने पावियो, .ए, तुम चरणे महाराज तो ॥ श्राव्याने नवेखस्यो ए, तो किम रहस्यै लाज ॥ ज० ३॥ करम अलूझण आकरा ए, जनम मरण, जंजाल तो ॥ हुंदु एहथी उन्नग्यो ए, गेमव देवदयाल ॥ ज०. ४ ॥ आज मनोरथ मुझ फल्या ए, नाग उःख वंदोल तो, तूगे. जिन चोवीशमो ए ॥ प्रगट्या पुन्य कलोल ॥ ज० ५ ॥ जयर, विनय तुम्हारमो ए, नाव जगत तुम्ह पाय तो ॥ देव दया कर दीजीये ए, बोधवीज सुपसाय ॥ ज० ॥ ६॥ (कलश) श्य ... ।
N (६५) तरण तारण सुगति कारण, उःख निवारण जग जयो ॥ श्रीवार जिरावर चरण युगता, अधिक मन नल्लट थयो॥१॥ श्रीविजयदेव मूरिंद पटघर, तीरथ जंगम इस जगे ॥ तपगपति श्रीविजय नसूरि, सूरि तेजे जगमगे ॥ २॥ श्रीहरिविजय सूरी शिष्य वा वक, कीर्तिविजय सुरगुरु शमो ॥ तश शिष्य वाचक विनय वि. नये, थुएयो जिन चोवोशमो ॥ ३ ॥ सय सत्तर संवत उगरातीसे, दही रनेर घोमाश ए ॥ विजयदशमी विजय कारण, कियो गुण यन्यास ए॥४॥ नरनव अाराधन लिक्षिसाधन, सुकृत लील वि तास ए ॥ निर्जरा देते स्तवन रचियुं, नामे पुण्य प्रकाश ए ॥५॥ रति श्रीवीरजिन पुण्य प्रकाश पाराधना स्तवन संपूर्ण । ॥ अथ भरहेसरनी सिझाय लिख्यते ।। जरहेतर बाहुबली, अन्नयकुमारोग ढंढणकुमारो ॥ सिरित अणियानतो । अयमत्तो नागदत्तोय ॥ १ ॥ मे अक्षयूलिन्नदो, वरय रिसि नंदिसेण सीदगिरी ॥ कयवन्नो सुकोसल, पुमरिनो केति करकंमू २॥ दल विदल तुदंसण, सालि महासालि सालिन होत्र ॥ नहोय दसन्ननदो, पसन्नचंदोष जसनहो ॥ ३ ॥ जंबूपडू पंकचूलो, गपसुकमालो अवंतीसुकमालो || धन्नो इलापुत्तो, चि- साइपुत्तोय बाहुमुणी ॥ ४ ॥ ग्रागिरि अरस्किय, अङसुहत्या उदाय गोमणगो ॥ कालयसूरि संबो, पज्जुन्नो मूलदेवोय ॥ ५॥ पनवो विन्दुकुमारो, अइकुमारो इढपहारोध । सिद्धांत कूरगडुश्र, सिङनव मेहकुमारोथ ॥ ६॥ एमाश महासत्ता, दितु सुहं गुण- गणेहि संयुत्ता । जेसि नामग्गहरो, पावपबंधा विलयति ।। सुलसा चंदणयाला, मोरमा मयणरेदा दमयंती ॥ नमयासुंदार सीया, नंदा नहा. सुनहाय ।। 5 || राईमई रितिदना, पनमाई अंजणा सिरीदेवी । जिन् सुजित मिगाव, पन्नाव चिलणादेवी -- "- , ॥-ए-॥ पंनी सुंदरी रुपिणी, रेवई कुंती शिवा जयंतीय ॥ देवी दोवर धारणी, कलावई पुप्फचूलाय ॥१०॥ उपमावश्य गोरी, गंधारी लखमणा सुसीमाय ॥ जंबुवई सञ्चन्नामा, रुप्पिणी कन्दा महितीच ॥ ११ ॥ जरकाय जरकदिन्ना, नूयातह चव नूअ दि. नाय । सेणा वेणा रेणा, नपणीयो यूवनदास ॥१२॥श्चाई महा- सईयो, जयंती अकलंक शोख कलियान ॥ अङ बिवकर जासि, जस पमहो तिहुणे सयले. ॥ १३ ॥ इति सत्तासतीनो सिझाय ॥ अथ मन्ह जिणाणं सिझाय । मन्दजियाणंयाणं, मिचंपरिदरहघरसम्मतं ॥ उघियाव- स्सयंमि, वज्जुत्तोहाइपयदिवसं ॥ १ ॥ पवेतुपोसहवयं; दाणंशोल तवीअन्नावोन ॥ सझायनमुकारो, परोवयारोअजयणा ॥ र II - जिणाजिणथुगिणं, गुरुथुप्रसादम्मिगारावबलं ॥ घवहारस्सयसुद्धी, रइयत्तातित्थय नाय ॥ ३ ॥ वशमविवेकसंबर, नासासमिईवड़ीवकरुणाय ॥ घम्मियजासंसरगो. करपदमो रणपरिणामो ॥ ५ ॥ संघोवरिवहुमायो, पुत्ययलिइणपजावण तित्थे ॥ सहाराकिच्चमेथे, निञ्चसुगुरुवएसेणं ॥ ५ ॥ इति ॥ ॥ अथ सकल तीर्थवंदना ॥ सकल तीर्थ वेदू करजोम, जिनवर नामे मंगल कोम।। पहले स्वर्ग लाख बत्तीस, जिनवर चैत्य नमुं निशदीश ॥१॥ वीजै लाख अछातीश कह्या, त्री बार लाख सरदह्या. ॥ चोथे स्वर्ग अरु खख धार, पांच, वांदूं लाखज पार ॥ ॥ स्व सहस पचास, सातौ चालीत सहस प्राशादः ॥ श्रावमे स्वर्ग व हजार, नव द: में बंदू शाता चार ॥ ३ ॥ अग्यार वार में जरासे सार, नव ग्रेवे यके व्रणसे, श्रद्धार ।। पांच अनुत्तर सर्वे मली, लाख चोरासी अधि का वली ॥ ४॥ . सहस सत्ताणु त्रेवीत सम्र, जिनगर जुवनतो । धिकार || लांबासो योजना विस्तार, पचास नवा वदोतर धार ।।५।। कसो असो किंवपरिमाण, सन्ना सहितश्क चैत्ये जाण ॥ सो कोम पवन कोम संन्नाल,लाख चोराणुं सहत चौपाल ॥ ६ ॥सातसे उपर 3 विसाल, सवी विं प्रणमुं त्रिण काल ) सात कोमने वहो. र लाख, नुवनपतीमा देवस जारव ।। 3 ।। एकशो अशी - विव माए, इकर चैत्ये संख्या जाण || तेरसे कोमि निव्याशी कोमि, बाग लाख वंदू करजोम ॥ ॥ वत्रीशे ने ओगणसाग, तिर्ग- कमां चैत्यनो पार ॥ त्रय लाख एकाएं हजार, अग वीश ते बेंच जुहार । ए| व्यंतर ज्योतपीमा वलि जेद्द, शाश्वता जिनवर दू तेद ॥ रुपना चंद्रानन वारिखेण, वर्षमान नामे गुण- ण ॥ १०॥ समेतशिखर वंदू जिन वीश, अष्टापद बंदू चोवीश ॥ मलाचल ने गढगिरनार, पावू ऊपर जिनवर जुहार 11 ११.। खेश्वर केशरियो सार, सारंगे श्रीअजित जुहार ।। अंतरीक वर- कागो पाया, जीरावलो ने धनगपाश ॥ १२॥ गाम नगर पुर टस जेह, जिनवर चैत्य नमुं गुणगेद ॥ विहरमान वंदू जिन वीश, ति: अनंत नमुं निशदीश ॥ १३ ॥ भदी हीपमा जे अण- गार, अढार सदस शोलांगना धार || पंच महावत सुमती सार, नाले पलावै पंचाचार ॥१५॥ वाह्य अभ्यंतर तप नजमाल, ते मुनि वंदू गुणमणि माल ॥ नितर की कीर्ति करूं, जीव कदे नव- सायर तरूं॥1॥इति ।। ॥ अथ सकलार्हत स्तोत्र सकलाईवमतिष्टान, मधिष्टानंशिवश्रियः ॥ जर्नुवःस्वस्खयी. शान; माईत्यप्रसिदध्मदे ॥१॥ नामारुतिद्रव्यन्नावः, पुनतःखिज. गड़ानं ।। केत्रेकालेचसर्वस्मिन्, नईतःसमुपास्महे ॥ २॥ आदि. मंपृथरीनाथ, मादिमंनिःपरिग्रह । मादिमतीर्थनाथंच, ज्ञानस्वा- ..
क (६६२) मिनस्तुमः ॥ ३॥ अहतमजितविश्व, कमलाकरनास्करं । अम्लान केवलादर्श, संक्रांतजगतंस्तुवे ॥ ४ ॥ विवनव्यजनाराम, कुख्या तुल्याजयतुताः ॥ देशनासमयेवाचः, श्रीशनवजगत्पतेः ॥ ५। अनेकांतमतांनोधि, समुल्लाशनचंमाः ॥ दद्यादमंदमानंद, जगवान निनंदनः॥६॥ शत्कीरीटशाणामो, तेजितांतिनखावलिः ।। नगवान्सुमतिस्वामी, तनोत्वनिमतानिवः॥ ॥ पद्मपनमन्नोर्देइ, नासःपुष्णंतुवः श्रियं ॥ अंतरंगारिमयने, कोपाटोपादिवारुणा श्रीसुपार्श्वजिनेंशय, महेंद्रमहितांइये || नमश्चतुर्वर्णसंघ, गगना- जोगन्नास्वते ॥ ॥ चंद्रप्रनप्रनोश्चंद्र, मरीचिनिचयोज्वला || मुर्चि- र्मुर्ति सितध्यान, निर्मितेवश्रियेस्तुवः॥१०॥करामलकर विश्व, कल- यन्केवल श्रियां. ॥ अचिंत्यमहात्म्यनिधिः, सुविधिवाधयेस्तुवः॥११॥ सरवानांपरमानंद, कंदोद्भेदनवांबुदः ॥ स्याहादामृतनिस्पंदी, शीतलः पातुवोजिन ॥ १२ ॥ नवरोगा”जंतूना, मगर्दकारदर्शनः ॥ निः- श्रेयसश्रीरमण, श्रेयांसः श्रेयलेस्तुवः॥ १३ ॥ विश्वोपकारकीनूत, तीर्थसत्कर्मनिर्मितिः॥सुरासुरनरैः पूज्यो, वासुपूज्यापुनातुवः॥१४॥ विमलस्वामिनोवाचः, . कृतकक्षोदतोदराः ॥ जयंतित्रिजगञ्चेतो, जलनैर्मब्यदेतवः ॥ १५ ॥ स्वयंनूरमणस्पईि, करुणारसवारिणा ॥ अनंतजिदनंताव, प्रयचतुसुखश्रियां ॥ १६ ॥ कल्पन्नुमसधाण मिष्टप्राप्तौशरीरिणांचातुधीधर्मदेष्टार, धर्मनाथमुपास्मदे ॥ १७ सुधासोदरवाग्ज्योत्स्ना, निर्मलीकृतदिग्मुखः। मृगलक्ष्म्यातमःशांत्य शांतिनाथजिनोस्तुवः||१७|श्रीकुंथुनायोन्नगवान, सनायोतिशयर्वि- निः॥सुरासुरन्नानाना, मेकनायोऽस्तुवःश्रिये ॥१ए। अरनाथस्तुन्न गवां,श्चतुरिननोरविवाश्चतुर्थपुरुषार्थी, विलासंवितनोतुवः ।। २०॥ सुरासुरनराधीश,मयूरनववारिदकनंदून्मूलनेहस्ति, मखमल्लिमान टुमः२१॥जगन्महामोदनिश, प्रत्यूपममयोपम।मुनिसुव्रतनाग्रस्य, (६६३) शनावचनंस्तुमः ॥२२॥ तुम्तोनमतामूनि, निर्मसीकारकारिणं ॥ रिप्लवाश्वनमेः, पातुंपादनखांशवः ॥ २३ ॥ यवंशसमु, र्मककहुताशनः ॥ अरिष्टनेमिर्जगवान्, भूपाोऽस्टिनाशनः ।। २४ ॥ कमरेधरणेंद्रेच, स्वोचितंकर्मकुईति ॥ अनुस्तुपमनो तिः, पार्श्वनाथःश्रियेऽस्तुवः ।। २५ ।। श्रीमतेवीरनायाय, सनाया डतश्रिया ॥ महानंदसरोराज, मराजायाईतेनमः ॥ २६ ॥ रुता राधेपिज़ने, रूपामंथरतारयोः ॥ पदाप्पार्दयोर्नद्र, श्रीवीर जिनने योः ॥ २७ ॥ जयतिविजितान्यतेजाः; सुरासुराधीशसेवितःश्री नि ॥ विमलस्वासविरहित, खिन्नुवनचूमामशिनगवान् ॥ २८॥ रः सर्वसुरासुरेश्महितो, वीरंबुधाःसंश्रिता ।। वीरेणानिहतःस्वक निचयो, वीरायनित्यनमः ॥ वीरानीर्थमिदंप्रवृत्तमतुलं, वी स्यघोरतपो । वीरश्रीधृतिकीर्ति कांतिनिचयः, श्रीवीरलदिशः ॥ । २ए ॥ अवनितलगतानांकत्रिमारूत्रिमानां, वरनुवनगतानांदिव्य मानिकानां ॥ इहमनुजकतानादेवराजार्चितानां, जिनवरनुवनानां जावतोदनमामि ॥ ३०॥ इति ॥ 11 अथ शांतिकर स्तोत्र लिख्यते ॥ संतिकरं संतिजिणं, जगसरणं जयतिरीश्दायारं ॥ समरा मिलत- पालग, निवाणीगरुककयते ॥ १ ॥ नसनमो विप्पोसहिपत्ता, संतितामि पाया ॥ बौंस्वाहा मंतेणं, सदाशिवऽरिअदरमा ॥ २॥ तिनमुक्षारो, खेलोसदि मालविताएं । सॉईनमो सबोसदि, पनाराचंदेसिरिं ॥ ३ ॥ वाणीतिअणसामिणी, सिरि- देवीजस्करायगणिपिमगा ।। गइदितिपालसुरिंदा, सयाविरस्कंतुजिक पन्नते ॥ १ ॥ रखातुममरोहिणी, पन्नत्तीवजासिंखखासया ॥ वं- ऊंकुसिचक्केसरी, नरदना काली महाकाली ॥ ५ ॥ गोरोतहगं- धारी, महजाला माणकीय यशदा । अधुनामाणतिया, माहा (६६५) माणसियान देवी | ६ || जरकागोमुहमहाजरका, तिमुद्दजस्के सुबरुकुसुमो ॥ मायंगविजयजिन, बनोमागुनसुरकुमारो बम्मुहपायालकिन्नर, गरुलोगंधवतदयजस्किंदो।। कुबेरवरुणोनिवमी गोमेदोपासमायंगो ॥ ७ ॥ देवीनचक्केसरी, अजिमारिपारि कालीमहाकाली ।। अचुअसंताजाला, सुतारयासोयसिरिवछा राणा संभाविजयकुसिपन्नति, . . निवाणिप्रञ्चुअाघरणी. ॥ . वरुद्वार शगंधारी,. अंबपनमावसिध्धा ॥ १० ॥ इयतित्यरस्कणस्या, अन्नेविसुरासुरीचकहावि ॥ व्यंतरजोइसिपमुहा, कुपांतुरखंसपास म्हं ॥ १.१ ॥ एवंसुदिधिसुरगण, सहिओसंघस्ससंतिजियचंदो. मझविकरेनरस्कं, मुणिसुंदरसूरिथुप्रमदिमा ३.१५ ॥ असंतिना इसम्मदिछी, ररकंसरतिकालंजो ॥ सबोवांवरदिओ, सलहश्सुह संपयंपरमं ॥ १३॥ तवगधगयणदिणयर, जुगवरसिरिसोमसुंदरगुरू' ॥ सुपसायबद्धगणहर, चिकासिद्धिंनाइसीसों ॥ १४ ॥ इति। ॥अथ श्रीसीमंघरजिन चैत्यवंदन लिख्यते ॥. सीमघर परमातमा, शिवसुखना दाता ॥ पुस्कलवर कि ये जयो, सर्व जीवना त्राता.॥ १ ॥ पूर्व विदेह पुमरीगणी, नयर ये. सोहे || श्रीश्रेयांश राजा.तिहां, नवियना मन मोहे ।।३। चनद सुपन निर्मल लही, सत्यकीराणी. मात. .॥ कुंथु अर जिन अंतरे, श्रीसीमंधर:जात ॥. ३ ॥ अनुक्रमें. प्रनु जनमिया, वली योवन पावै ॥ मात. पिता दरखे करी, रुकमणी परणा ॥ ४ ॥ जोगवी.सुख संसारना, संजम मन लाच, मुनिसुव्रत नमी अंतो; दीका प्रन्तु पावे ॥ ५॥ पाती.कर्मनो कय करी, पाम्या. केवल नांग ॥ वृपन्न संग्ने, शोन्नता, सर्वनावना जाण॥६॥चौराशी जस गणाधरा, मुनिवर एकसो कोमी ।। त्रश वनमा जोमतां, नदि कोई एहनी जोमी ॥ ७॥ दश लाख कह्या केवली, प्रलजीनो 1..
(६६५). परिवार ॥ एक समय त्रण कालना, जाणे सर्व विचार .. उदय पेढाल जिनांतरे ए, थाशै जिनवर सिद्ध ॥ जशविजय गुरु प्रणमतां, शुन्न वंठित फल लीध ॥ ए|| इति चैत्यवंदने । पुनः ॥ श्रसामंधर जगधणी, आ नरते श्रावो । करुणावंत करुंगा करी, अमने वंदावो ॥ १ ॥ सफल नक्त तुमे घणो ए, जो होवे अम नाथ || लवोन्जव हूं ५ ताहरो, नहीं मेयूँ हवे साथ ॥ २ ॥ सयल संग टमी करी ए, चारित्र वेश्शुं ॥ पाय तुमारा सेविने, शिवरमणी वरिसुं ॥ ३ ॥ ए अलजो मुझने घणो ए, पूरो सोम: धरदेव । हांयको हूं वीन, अवधारो मुझ सेव ॥ ॥ इति ॥ ॥ अथ सिद्धगिरो चैत्यवंदन लिख्यते । विमल केवल ज्ञान कमला, कलित विन्नुवन दिनकरं ॥ सुरराज संस्तुत चरण पंकज, नमो ग्रादि जिनेश्वरं ।। १ ॥ विमल गिरिवर शृंग मंमण, प्रवर गुणगण नूधरं || सुर असुर किन्नर कोमि सेवित, नमो० ॥ २ ॥ करती नाटक किनरीगपा, गाय नि, नगुण मनहरं । निर्जरावलि नमें अहनिशि, नमो० ॥ ३ ॥ पुंग. रीक गणपति सिहि साधी, कोमि पण मुनि मनहरं ॥ श्रीविमल गिरिवर शृंग सीधा, नमो० ॥ ४ ॥ निज साध्य साधन सुरिंद मुनिवर, कोमिनंत ए गिरिवरं । मुक्तिरमसी वस्था रंग, नमो।। ॥ ५ ॥ पातालनर सुरलोक मांदी, विमल गिरिवर ते परं ॥ नहि अधिक तीरघ तीर्थपति कदे, नमो० ॥ ६ ॥ श्म विमल गिरिवर शिखर मंगण, ख विहंस ध्याईयै ॥ निज शुक्ष सत्ता साध- नार्थे, परम ज्योति पाइए ॥ ७॥ जित मोद कोई विगेह निश; परम पद स्थिति जयकरं ॥ गिरिराज सेवा करण तत्पर, पद्मवि. जयसु हितकरं ।। ० ॥ इति पदं ॥ पुनः ॥ श्रीशचुंजय सिद्धक्षेत्र, दी दुर्गति वारे ॥ नाव घरीने जे चढे, नेने नव पार 64 कतार ॥१॥ अनंत सिद्धनो एह गम, सकल तीरयनो राय ॥ पूर्व नवाणूं रुपनदेव, ज्यां नदिया प्रनु पाय ॥ २ ॥ सूरजकुं सोदामणो, कवायद अनिराम ॥ नाजिराया कुलमणो, जिन- वर करुं प्रणाम ॥ ३॥ इति दितिय चेत्यचंदन ॥ ।। अथ श्रीपरमात्मा चैत्यवंदन लिख्यते ॥ परमेसर परमातमा, पावन परमिट ॥ जय जगगुरु देवाधि देव, नयरों में दिल ॥१॥ अचल अकल अधिकार सार, करुणा रंश सिंधु ॥ जगती जन आधार एक, निःकारण बंधु ॥२॥ गुण अनंत प्रन्नु तादरा ए, किमही कख्या न जाय ॥ राम प्रनु जिन ध्यानथी, चिदानंद सुख थाय ॥ ३ ॥ इति ॥ ॥ अथ श्रीसोमंधर जिन स्तवन । 'सुलो चंदाजी, सीमंधर परमातम पासे जावजो || मुझ वीनतमी, प्रेम धरीने इण पर तुमे संनलावजो ॥ जे त्रएय नुवन ना नायक , जस चौसठ इंदर पायक है, नाण दरशण जेहना दायक है। सुणो० ॥१॥ जेनी कंचनवरी काया , जश धोरी संचन पाया बै, पुमरीगणी नगरीनो राया ॥ सुणो० ॥ २॥ बार पर्पदा मांहि विराजै ने, जश चोत्रीश अतिशय गजे है, गुण त्रीस वापीयें गाजे ॥ सुणो०॥३॥ नविजनने ते पमिबोहे है, तुम अधिक शीतलगुण सोदे , रूप देखी नविजन मोहे हैं। सुणो०॥४॥ तुम सेवा करवा रसियो ५, पण जरतमां दूरै वप्ति ओढूं, महा मोहराय कर फासियो ५ ॥ सुणो० ॥ ५ ॥ पण साहिब चित्तमां धरियो , तुम आणा खमंग कर यहियो , तव कांक मुझथी मरियो वै ॥ सुणो० ॥ ६ ॥ जिन उत्तम पूठ हवे पुरो, कहै पद्मविजय याकं शूरो, तो वाघे मुझ मन अति नूरो। सु०॥७॥ इति पदं॥
(६६७ ) ॥ अथ श्रीसिद्धगिरी स्तवन लिख्यते ।। खिमिये रे में आज तेजो दीगे रे, तवालाख टकानो हामो रे, लागे मुंने मीठो रे ।। सफल थयो म्हारा मननो कमा वालामारा, नवनो संशय नाग्यो रे । नरक तिर्यंच गति दूर वारी, वरणे अनुजीने लाग्यो रे ॥ शेव॒० १॥ मानवनवनो हो सीधो, वाला० देहमो पावन कीधी रे ॥ सोना रूपाने फू- के वधावी, प्रेमें प्रदक्षणा दीधी रे ॥ शेg०२॥ दूधमे पखाली. शिर घोली, पा० श्रीआदीश्वर पूज्या रै ।। श्रोसिद्धाचल नयणे ता, पापमेवासी ध्रुज्या रे ॥ शेव॒० ३ ॥ स्वयमुख सुधर्मा सु- पति पागे, वा. वीरजिनंद म बोले रे ।। त्रण नुक्नमा तीस्थ टुं, नहिं को सेजा तोले रे । शेयु० ॥ ३ सरीखा ए स्थिनी, वा० चाकरी चितमां चाहे रे । कायानी तो कासस ल, सूरजकुंरुमा नाहे रे ॥ शे० ५ ॥ कांकरे२ श्रीसिद्धक्षेत्रे, साधु अनंता सीधा रे ॥ ते माटे ए तीरथ मोटुं, उभार अiता कीधारे ।। शेर्नु०६॥ नाभिराया सुत नयणे जोता, वा० पद अमीरश वूयारे । नदयरतन कदै भाज म्हारे पोते, श्री मादीश्वर तूचा रे ॥ शेत्रु० ॥ इति ।। पुनः।। विमताचल नित बंदिय, कोज एदनी सेवा॥मानू हाथ ए धर्मनो, शिवतरु फल लेवा। वि०१॥ उऊल जिन गृहमंती, तेहां दीपे उत्नंगा, मानुं हिमगिरि विमें।। आई अंबर गंगा॥ वि० २ ॥ को अने जग नदी, ए.तीरथ तोले ॥ श्म श्रीमुख दरि आगलै, श्रीसीमधर बोलै ॥ वि० ३ ॥ जे सगला तीरय करया, जात्राफस लहिये, तेहयी ए गिरि नेटतां, शतगणुं फल दिये ।। २०५॥ जनम सफल दोय तेदनो, जे ए गिरि वंदे ।। सुजश विजय संपद खदे, ते नर चिरनंदे ॥ वि०५॥ इति पदं ।।
(६६७ ) ॥ अथ श्रीपचंतीर्थ स्तवन ॥ श्लोक ॥ श्रीशत्रुजयमुख्यतीर्थतिलकं श्रीनान्निराजांगजं बंदरेवतशेखमालिमुकुट श्रीनेमिनार्थयथा || तारंगेअजितंजिनं नृ पुरे श्रीसुव्रतस्थनने; श्रीपाचप्रणमामिसत्यनगरे श्रीवईमानंत्रिधा ॥१॥ वदेऽनुत्तरकल्पतप नुवनेग्रैवैयकेव्यंतरे, ज्योतिष्कामरमंदर। विसंतो स्तीथैकरांनादरांत् || जंबूपुष्करधातकीपुरुचके नंदीश्वरे फुले, येचान्येपिजिनानमामिसततं तान्कत्रिमारुत्रिमान् ॥२॥ श्रीमहीरजिनास्यपद्महदतो निर्गम्यतेगौतम, गंगावर्तनमेत्ययाप्रवि- नवे मिथ्यात्ववैतादयकं ।। नत्पत्ति स्थितिसंहति त्रिपथगा झाना- युधीहिंगा, सामेकर्ममवंहरत्व विकलं श्रीद्वादशांगीनदी ॥ ३॥ शक चंद्ररविमदाश्चधरण 'ब्रौद्रशांत्यंविका; दिग्पालाः . सकपदिगो मुख गणं चक्रेश्वरीनारती ॥ येन्यज्ञानतपक्रियाव्रतविधिः श्रीतीर्थयात्रा 'दिषु, श्रीसंघस्यतुराचतुर्विधसुरा स्तेसंतुनकराः ॥ इति श्रीपंच तीर्थ स्तवनं ।। ॥ अथ नेम राजुल सिझाय ॥ (नदी यमुनाके तीर मे दोय पंखोया ॥ए देशी) पिनजी पिनजीरे नाम जपु दिन रातियां, पिजी चख्या परदेश तपे मो री वातियां, ॥ पगपग जोती वाट वालेसर कब मिले, नीर विजन ह्या मीन के ते जु टलवले ॥ १ ॥ सुंदर मंदिर सेज सादिय दिए नवि गमे, जिंदा रे वासेंसर नेम तिदा मारूं मन नम || जो दोद सजन दूर तोदी पासे वसे, किदां सायर किदा चंद देखी मन म खस ॥ २ ॥ निस्नेदीसुं प्रीत म करजो को सदी, पतंग जमाव "देद दीपक मन में नहीं । माणसतणो विजोग म होजो केरने, .सारे साल समान हियामां तेदने ॥ ३॥विद व्ययानी पी. 'जोपनवयं प्रति दहे, जेदनो पिर परदेश ते माणस उस सदै ।।
(६६) मुरी२ पंजर कीध काया कमला जिसी, हजुन न श्राव्यो नेम मि ली नयों इसी ॥ ३ ॥ जेहने जेहसु रंग टाल्यो ते नवि दलै, चकवा रयणी विजोग ते तो नयणे मिसै ॥ श्रांवा केरो स्वाद निंबू ते नवि करे, जे नाह्या गंगा नीर ते ठीलर किम-तरे ॥५॥जे रम्या मालतीछले धतुरे किंम रमे, जेहने घीसुं प्रेम ते तेले किम जमे ।। जेहेने चतुरसु नेह ते अवरने मुं करे, नवजोवन तजी नेम वैरागी थे फेरै ॥ ६॥ राजुल रूंपनिधान के पोहती सहसावने, जर वां नेम संजम लेई एक मर्ने । पाम्या केवलज्ञान के पोदती मनरली, रूपविजय प्रन्नु नेम बेटे धाशा फली ॥७॥ इति । ॥ अथ'आउखा सिझाय लिख्यते॥ आनखो तूटाने सांधो को नही रे, तिण कारण म करो जीव प्रमाद रे ॥ जरा श्राव्याने शरणुं को नहीं रे, हिंसा गेझाने दया पाव रे ॥ श्रा० १ ॥ कुटंव कवीला नार) कारणे रे, मूरख संख्या बहुला पाप रे । चोरतणी परे ठमी उरसे रे, सहीसे ह लोक परलोक संताप रे ॥ ग्रा० २ ॥ वंचा विणाव्या मंदिर मालि या रे, दे दे धरतीमें कंफो नीव रे । एक दिन अपनाएयुं मती चालवू रे, सुख दुख सहसे श्रापणो जोव रे । प्रा० ३ ॥ चक वार्म दर वल राणो केशवो रे, जोजो वलो इंद्र सुरानो नाथ रे॥ ऊगीरने उवेही प्राधा रे, जोजो कोई अचरजवाली वात रे॥ श्रा० ॥ ४ ॥ अविर संसार तजी मुनि नोसरचा रे, करता मुनि नवला तेंद विहार रे ॥ नारंमपंखीनी दीधी नपमा रे, न घरे मम- तो नेह खंगार रे । या० ५ ॥ चारित्र पाच रूमी रीतसुरे, देवे मुनि अपणो उपदेश रे, तिको मुनिवर सिधासी मोक्षने. रे, जश लेई इहलोक परलोकरे ॥ मा ६॥ शब्द रूप देखी समता धरो रे, म करो मुनि जएगानुं अजिमान रे, कसी चोयमल.. सूत्र
वीजै
देखीन रे, जोम करी जालोर मकार रे ।। पान० ॥ इति ।
॥ अथ पंचत्तो: चैत्यवंदन लिख्यते ।
प्रादिदेव अरिहंत नमू, समरूं नारूं नाम ॥ ज्या ज्या प्रति
मा जिनतपी, त्या त्यां करूं प्रणाम ॥ १ ॥ शेजूंजय श्रीआदिदेव,
नेम नम गिरनार ॥ तारंगे श्रीअजितनाथ । आबू रूपन्न. जूदार
॥ २ ॥ श्रष्टापदगिरि कपर, जिन चोवीशी जोय ॥ मसिमय
'मूरति मानसं, नरत नरावी सोय ॥ ३ ॥ समेतशिखर तीरय
वढूं, ज्यां वोगे जिन पाय ॥ वैनारकगिरि कपरे, श्रीवीर जिने
श्वरराय ॥ ४ || मांझवगढनो राजियो, नामे देव सुपाश .. रुपन
कहै जिन समरतां, पोहचै मननी श्राश ॥ ४ ॥ इति पदं ॥
॥ अथ दुज तिथीको चैत्यवंदन ॥
विध धर्म जिन उपदिस्यो, चोथा प्रजिनंदन ।।
जम्या ते प्रनु, नवपुःख निकंदन ॥ १ ॥ 5 विध ध्यान तुम्हे
परिहरो, आदरो दोष ध्यान ॥ एम प्रकाश्युं सुमतिजिन, ते चविया
वीज दिन ॥ २ ॥ दोय बंधन राग द्वेष, तेहने जवि तजिये |
मुझ परे शीतल जिन कहै, वीज दिन शिव नजिये ॥ ३॥ ज
वाजीव पदार्थन, करो नाण सुजाण || वीज दिने वासुपूज्य परे
लहो केवलनाण ॥४॥ निश्चय नय व्यवहार दोप, एकांत
ग्रहिये । प्ररजिन बीज दिने चची, एम जिन आगति कहिये ।
॥ ५ वर्तमान चोवीशोये, एम जिनकल्याण || वीज दिने के
पामिया, मनु नाण निर्वाण ॥६॥ एम अनंत चोवीशीयें, हुआ
बहुत कल्याण ॥ जिन उत्तम पद पद्मने, नमतां होय सुख
खाण ॥ ७ ॥ इति ॥
॥ अथ ग्यानपंचमीको. चैत्यवंदन ॥
निगमै वैग वीरनिन, नाखै नविजन श्रा। जिकरणातुं त्रिदु.
क जन, निसुलो मनरागे ॥ १ ॥ धाराहो नतिजावतें, पांचम जुवाली ॥ ज्ञान आराधन कारणे, येहज तित्यि निहाली ॥ २ ॥ जान विना पशु सारिखा, जागो इस संसार ॥ ज्ञान आराधनश्री रघु, शिवपद सुख श्रीकार ॥ ३ ॥ ज्ञान रहित क्रिया कह।, काशकुशम नपमान ॥ लोकालोक प्रकाशकर, ज्ञान एक प्रधान ।। ज्ञानी ताप्तोतासमें, करै कर्मनो खेद ॥ पूर्व कामी वरसा गै, अज्ञाने करे तेह ॥ ५ ॥ देश आराधक क्रिया कही, सर्व पाराधक ज्ञान झानतणो महिमा घणो, अंग पांचमे नगवान ॥६॥ च माश सघु पंचमी, जावजीव उत्कृष्टी ॥ पंच वरस पंच शनी, पंचमी करो शुन दृष्टी ॥ ७॥ एकावनही पंचनो ए, कानसग्ग लोगस्त केरो, कजमधूं करो लावणुं ए, टाले नव फेरो 10॥रा परे पंचम आराहिये ए, पाणी नाच अपार ।। वरदान गुणमंजरी बरे, रंगविजय लहो सार ।। ए ॥ इति पंचमी चैत्य- चंदन सपूर्णम् ॥ ॥ अथ अष्टमी चैत्यवंदन लिख्यते ।। महा सुदि आतुमने दिने, विजया सुत जागो, तेम फागुण वदि प्राग्में, संजव चव आयो ।। १ ॥ चश्तर वदनी आग्में, जनम्या रुपनजिणंद ॥ दीक्षा पिण ए दिन लही, हुआ प्रथम मुनिचंद ॥ २ ॥ माधव सुदि आपम दिने, पाप कर्म करया दूर ।। अभिनंदन चोथा प्रन्नू, पाम्या सुख लरपूर ॥ ३ ॥ एदीज.अाउम कजली, जनम्या सुमतिजिएवंद ॥ श्राप जाति कलशे करी, न्हव- गावै सुर इंद ।। ५ ।। जन्म्या जेठ यदि बाग्में, मुनिसुव्रतस्वामी ॥ नेम आपाद सुदि आपमें, पंचमी गति पामी ॥ ५ ॥ श्रावण चदिनी आठमें, नमि जन्या जगन्नाण ॥तिम श्रावण सुदि बाग्में, पासजीनो निर्वाण ॥ ६ ॥ नाश्वा. वदि प्राधम दिने, चविया -- (६०२) स्वामी सुपास ॥ जिन नत्तम पद पद्मने, सेव्यायी शिववास || : ॥ अथ एकादशी- चैत्यवंदन लिख्यते ।। शासननायक वीरजी, प्रनु केवल पायो, संघ चतुर्विधपापत्र महसेन वन प्रायो॥ १ ॥ माधव सित एकादशी, सोसवाहिक यज्ञः॥ चन्नुति याद मिळ्या, एकादश विज्ञ ॥ २ ॥ एकादश चतु गुणा, तेदनो परिवार || वेद अर्थ अवलो करै, मन अजिमान अपार ॥ ३॥ जीवादिक शंसय हरी ए, एकादश गणधार - वीरें थाप्या बंदिये, जिनशासन जयकार ॥४॥ मल्लि जन्म अर मल्लि पास, वर चरण विलागी ॥ यत्न अजित सुमती नमी, मल्लि घनघाति विनाशी ॥५॥ पद्मप्रन शिव वाश पास, लवजवना तोकी ॥ एकादशी दिन आपणी, कहि सगली जोमी... || दशा के त्रिहु कालनां, देढसे कल्याण ॥वरशघ्यार एकादशी, पाराधों वर नाण ॥ ७ ॥ अग्यार अंग लखाविये, एकादश पाग ॥ पूंजणी ग्वणी विटंगी। मसी कागल काग ।। अग्यार अव्रत गंवा ए. वदो पमिमा अग्यार ॥ खिमाविजयं जिनशासनें, सफल करो अव: तार 11 ए॥ इति ॥ ॥ अथ श्रीमंधर जिन स्तुति लिख्यते ॥ 7॥ सीमंधर जिनवर सुखकर सादिव देव, अरिहंत सकतनी नाव घरी करूं सेव ।। सकलागम पारग गणधर जापित वाणी, जयवंतो आशा ज्ञानविमल गुणखाणी ॥१॥( यह थुई ज्यार वखते पण कदवाय ठे) !! श्रीसीमधर देव सुईकर, मुनिः मन पंकज़ ईसाजी ॥ कुछ अरजिन अंतर जनम्या, तिहुअा जश परसंसा जो ॥ सुव्रत नमि प्रनु जासे विववदु पासे जी ॥ १ ॥ वत्रीस चनस अंतर वर दीक्षा , शिक्षा जगतनिरासें ज़ीनदय पेढाल जिनांत (६७३) चठसहि मलिया, गसय सहि नक्किम जी ॥ चन अम अम मिली मध्यम काले, वीश जिनेसर दिघा जी ॥ दो चन च्यार जधन्य दश जंबू, धायई पुस्कर मझारे जो ॥ पूजो प्रथमो आचारांगे, प्रवचनसार नदारेजी ॥२॥सीमंधर वर केवल पामी, जिनपद खवण निमिते जी ॥ अर्थनी देशन वस्तु निवेशन, देतां सुणत विनीते जी ॥ द्वादश अंग पूरव युत्त रचिया, गणधर लब्धि विक. सिया जी || अपऊवसिय जिनागम वंदो, अकर पदना रसिया जी॥३॥ प्राणा रंगी समकित संगो, विविध नंग व्रतधारी जी ॥ चनविद संघ तीरथ रखवाली, सहु नपश्व हरनारीजी ॥ पंचां- गुली सुरी शासनदेवी, देती तस जश शद्धा जी ॥ श्रोशुन वीर कद शिवसाधन, कार्य सकलमां सिझी जी ॥ ॥ इति ।। ॥ अथ बीजतिथीकी स्तुति ॥ दिन सकल मनोहर वीज दिवस सुविशेप, राय राणा प्र- में चंद्रतणी जिहां रेख ॥ तिहां चंद विमाने शाश्वत जिनवर जेद, जे बोजतणे दिन प्रणमुं प्राणी नेद ॥१॥ अभिनंदन चंदन शीतल शीतलनाथ, अरनाथ सुमतिजिन वासुपूज्य शिव साथ ॥ इत्यादिक जिनवर जन्म ज्ञान निरवाण, हुँ बीजतरों दिन प्रणमुं ते सुविदाण ॥ २॥ परकास्यो वीजै विविध धर्मनग. वंत, जेम विमला कमला विनल नयण विकसंत ॥ आगम अति अनुपम जिहां निश्चय व्यवहार, वीजे सवि को पातिकनो परि- दार ॥ ३ ॥ गजगामिनी कामिनी कमल सुकोमल चीर, चक्के. सरी केसरी सरस सुगंध सरीर ॥ करजोमीबीजे हुं प्रणमुंतत पाय, इम लब्धिविजय कहे पूर मनोरथ माय ॥ ४ ॥ इति दूज थुई ।। ॥ अथ पंचमी स्तुति ॥ श्रावणा सुदि दिन पंचमी ए, जनम्या नेमजिनंदतो || स्यामक ७५ (६७४) रंग तनु शोलतो ए, मुख शारदको चंद तो ॥ सहस वरस पर श्रानखो ए, ब्रह्मचारी लगवंत तो ॥ श्रष्ट करम देले दणी ए पोहता मुक्ति मझार तो ॥ १ ॥ अष्टापद आदिजन ए, पहोत्या मुक्ति मझार तो । वासुपूज्य चंपापुरी ए, नेम मुक्ति, गिरनार तो॥ पावापुरी नगरीमा वली ए, श्रीवीरतणुं निर्वाण तो ॥ समेत. शिखर वीश सिइ हुआ ए, शिरवहुं तेहनी आण तो ॥२॥ नेमनाथ ज्ञानी हुवा ए, नाखे सार वचन तो ॥ जीवदया गुण वेलनी ए, कीजै तास जतन तो || मृपा न बोलो . मानवी, ए, चोरी चित्त निवार तो ॥ अनंत तीर्थकर इम कहे ए, परहरियै परनार तो॥ ३ ॥ गोमेद नामे यह नलो ए, देवी श्रीविका नाम तो || शाशन सानिद ले करे ए. करै वलि धर्मना काम तो।। तपगच नायक गुण निलो ए, श्रीविजयशेन सूरिराय तो ॥ रिप- नदास पाय सेवतां ए, सफल करे अवतार.तो॥ ४ ॥ इति ॥ ॥ अथ अष्टमी स्तुति ॥ मंगल आठ करी जस आगल, नाव धरी सुरराजाजी । आउ जातिना कलश करीने, न्दवरावै जिनराजा जी ॥ चीरजिरे श्वर जन्म महोत्वस, करतां शिवसुख साधे जी || आठमर्नु त करतां अम घर, मंगलकमला वाधे जी ॥ १ ॥ अष्ट करम वयररी गजगंजन, अष्टापद परें वलीया जी ॥ आपमें आठ सुरूप विचार), मद श्रावे तस गलिया जी ॥ अष्टमी गति परे पहुंता जिनकर, फरस पाठ नदि अंग जी ॥आरमनुतप करतां अम घर, नित्यर वाथै रंग जी ॥ २॥ प्रातीहारज पान, विराजे, समवसरण जिन राजे जी ॥ पाठमे आठ सोयागम जाखी, नविमन संशर नांजे जी || आठे जे प्रवचननी माता, पाले निरतीचारो जी। आग्मने दिन प्रष्ट प्रकारे, जीव दया चित घारो जी ॥ ३.१ मर ..
( ६७५ ) प्रकारी पूजा कराने, मानवनव फल लीजै जी ॥ सिमा देवी जिनवर सेवी, अष्ट महासिद्धि दीजैजी ।। आठमनुं तप करतांलीजे, निर्मल केवलज्ञान जी ॥ धीरविमल कवि सेवक नय कदै, तपथी, कोम कख्या जी॥ ॥ इति ॥ ॥ अथ एकादशीनी स्तुति ।। एकादशी अति रूवमी, गोविंद पू नेम | कोण कारण ए पर्व मोटुं, कहो मुमतुं तेम ॥ १ ॥ जिनवर कल्याणक पति- घणा, एकशो ने पचास ॥ तेणे कारणे ए पर्व मोहोटुं, करो मौन नपवाश ।। १ । अगिार श्रावकतणी प्रतिमा, कहे ते जिनयर देव ॥ एकादशी एम अधिक तेवो, वनगजा जिम रेव ॥ चौवीश जिनवर सयल सुखकर, जैसा सुरतरु चंग | जेम गंग निर्मा नीर जेदवू, करो जिनसुं रंग ॥२॥ अगियार अंग सखाविये, अगियार पाठ सार । अगियार कवलो विंटणा, ज्वरो जसी सार ॥ चावखी चंगी विविध रंगी, शास्वतणे अनुसार । एकादशी इम जमो, जेम पामिये लव पार ॥ ३ ॥ वर कमल नयणो कमल वयणी, कमल मुकोमल काय ॥ जुजर चंझ घख जेदने, समरतां सुख थाय ।। एकादशी एम मन वशी, गलि हर्प पंमित शीश, शासनदेवो विधन निवारो, संघतणा निश दीश ॥ ४॥ इति ॥ ॥ अथ चवदशनी स्तुतिः ॥ स्नात्तस्याप्रतिमस्यमेरुशिखरे, शच्या विनोः शैशवै ॥ रूपा. लोकन विस्मया, हृतरसत्रांत्या प्रमञ्चदुपा | उन्मृष्टंनंपनप्रना धवलितं, कीरोदकाशंकया । वयस्यपुनःपुनःतजयति, श्रीवई. मानोजिनः ॥ १ ॥ ईसांसाइतपद्मरेणुकपिश, कोरार्णवालोनृतः।। कुनैरप्सरतापपोपरनर, प्रस्पर्धिनिकांचनैः ॥ चेपमिंदररत्नशैल- १ (६७६) शिखरे जन्मानिपके कृतः ॥ सर्वैः सर्वसुरासुरेश्वरगणे, स्तेपांनतोहं कमान् ॥ २॥ अईहप्रसूतंगणधररचितं, बादशांगविशाखें । चित्रंबव्दर्ययुक्तंमुनिगणवृपने, र्धारितंयुद्धिमानः ॥ मोकामदारज- तंबलचरणफलं, शेयत्नावप्रदीपं || नक्तयानित्यंप्रपद्येश्रुतमहमखिलं; सर्वलोकैकसारं ॥ ३ ॥ निप्पंकव्योमनीलयुतिमलसा, बाल- पानदंष्ट्रं ॥ मनघंटारवेशप्रसृतमदजलं, पूरयंतंसमंतात् ।। प्रारूढो. दिव्यनागंविचरतिगगने, कामदःकामरूपी ॥ यकःसर्वानुभूति दिश- तुममसदा, सर्वकार्येपुसिहि ॥ ४ ॥ इति ॥ ॥ अथ कल्ल्याणकंद सर्वदिन स्तुति ॥ कल्लाणकंदं पढमं जिणंद, संतित नेमजिणं मुर्णिदं ॥ पास पयासं सुगणिकहाणं, अनीश्चंदे सिरिवःइमाणं ॥१॥ अपार संसार समुद्दपारं, पनाशिवं दितु सुश्कसारं ॥ सवे जिणंदा सुरः विंद विंदा, कल्लाणवल्लीण विसालकंदा ॥ २ ॥ निवाणमग्गे वरजा ण कप्पं, पणातियासेस कुवाश्दप्पं ॥ मयंजिणाणं सरणं वुहार्य ॥ नमामि निचंतिजगप्पहाणं ॥ ३ ॥ कुंदी गोखीर तुसारवन्ना, सरोज दबा कमलेनिसन्ना ॥ वाए सिरी पुचयवग्ग हवा ॥ सुहा असा अम्द सयापसबा॥४॥इति ॥ ॥ अथ शत्रुजय स्तुति ॥ ॥श्रीशचुंजयगिरि तीरथ सार, गिरवरमांद जिम मेरु नदार, गकुर राम अपार ।। मंत्रमाद नवकारज जाएं, तारामांहे जिम चंड वखाणू, जलघर माद जल जा" ॥.पंखीमद जिम उत्तम दंश, कुलमांहे जिम शपन्ननो वंश, नान्नितशो जे अंश ॥, क्षमा चंतमाहे जेम अरिहंता, तपसूरा मुनिवर महंता, शत्रुजयगिरि गु पणवंता ॥ १ ॥ शपन्न अजित संनव अनिनंदा, सुमतिनाथ मुख , पद्मपन्न सखकंदा ॥ श्रीसुपार्श्व चंद्रप्रन सुविधी, शीतल 1 .
(६) श्रेयास सेवो बहु वृद्धी, वासुपूज्य मति शुद्धी ॥ विमल अनंत जिन धर्म ए शांती, कुंथु अर मल्ति नमुं एकांती, मुनिसुव्रत सुद्ध पंथी ।। नमी पास ने वीर चौवीश, नेम विना ए जिन वीश, सिगिरि अाव्या ईश ॥२॥जरतराय जिन सायै बोले, स्वामी शQजयगिरि तोले, जिन, वचन अमोले ॥ शपन्न कदै सुमो नर तराय, नहरी पालंता जे नर जाय, पातिक नूको धाय ॥ पशु पं खीजे ण गिरि आवै,, नक्वीजे ते सिहज थावै, अजरामर पद पावै । जिनमतमें सेबंजो वखाएयो, ते में प्रागम दिलमांदे प्राण्यो, सुणता सुख नर आएयो ॥ ३ ॥ संघपति नरत नरेसर श्रावे, सोवनतणां प्रासाद करावे, मणिमय मूरति गदै, नाजिरा- य मरुदेवी माता, ब्राह्मी सुंदरी वहिन विख्याता, मूर्नि नवा' जाता है। गोमुख ने चकेसरीदेवी, शेर्बुजय सार करै नित्यमेवी, तपग कपर हेची ॥ श्रीविजयसेन सूरीश्वरराया, श्रीविजयदेव सूरी प्रणामी पाया, रुपनदास गुण गाया || ४ इति ॥ ॥ अथ सीमंधरजिन स्तुतिः ॥ महाविदेह क्षेत्र सीमंधरस्वामी, सोनाना सिंहासश जी, रूपाना कोशीसा विराजै रत्नना दीवा दीये जी ॥ कुंकुंमवर्णी गहती विराजै मोतीना अक्षत सार जी, त्यां वैग सीमंधरस्वामी बोले मधुरी वाणी जी ॥१॥ केसरवंदन नरी रे कचोली क स्तूरी पराश जी,पदलोरे पूजा थमारी रे दोजोकगमतें परन्नात जी ॥ अव पंचिदिय संवरणो 1. ॥ पंचं दिय संवरणो, तद नव विद बनचेर गुचियरो॥ च नविद कसाय मुमो, इय अमरस गुरोदि संजुनो ॥ १ ॥ पंचम हवय जुत्तो, पंच विहायारपालण समत्यो ॥ पंच समईतिगुनों, वनीत गुणेहिं गुरुमझ ॥२॥ -- (६७) ॥ अथ सामायक पारवानी गाथा ॥ ॥ सामाश्यवयजुत्तो, जावमणेहोशनियमसंजुत्तो ।। छिन्नझ्य सुईकम्म, सामाश्यजचियावारा ॥ १ ॥ सामाश्यमिकए, समणों श्वसावन्दवरजहा ॥ एएणकारणेणं, बहुसोसामाश्यंकुला ॥५॥ सामायक विघं सीधु विधं पारिनं विधि करतां जे अविधि हुयो होइ ते सधे हुँ मन वचन कायायें करी मिठामि 55 ।। दश म नना दश वचनना वारै कायाना एवं वत्तीस दूपणामांहे जे को दूपण लागो होय ते सहू मन वचन कायायें करी मिठामि उक्कम। ॥ अथ पोसह पारवानो गाथा ॥ ॥ सागरचंदोकामो, चंदवमिसोसुदंसोधन्नो || जेसिपीसद पमिमा, अखंमिश्राजीवियतेवि ।। १ ।। धन्नासलाइलिजा, सुलता आणंदकामदेवाय ॥ जेसिंपसंसश्नयवं, दव्ययंतमहावीरो ॥२॥ पोसह विधे लोधुं विधे पारियुं विधि करतां जो कोई अविधि हु होय ते सवि हुँ मन वचन कायायें करी मिछामि अक्क ॥ ॥ अथ जगचिंतामणि चैत्यंवदन ॥ ॥ इछाकारेण संदिस्सद नगवन् चैत्यवंदन करूं, छं । ज चिंतामणि जगनाद जगगुरु जगरस्करा ॥ जगबंधव जगसत्यवाद जगन्नाव वियरकण ॥ अवय संगविअरूव, कम्मा विणासल चनवीसं पि जिपवर जयंतु, अप्पमिहय शाशण || १ | कम्मन्नू मिहिं२ पढम संघयणं ॥ नकोसन सत्तरितन, जिरावराण विद त सप्पई ॥ नवकोझिहिं केवलिणा, कोमि सदस्स मद साहू गम्मई ॥ संपर जिपवर वीस मुणि, विदुं कोमिदि वरनाथ || समपदकोमी सहस दोय, युणि बध निञ्च विहाणि ॥२॥ जयनसामी२ रिसइसंजि नझिंत पडू नेमजिण ॥ जयः वीर सच्च- नरममण, नरुअचहि मुणिसुक्य ॥ महरिपसा --
(६७)
खुद ऽरिय खंगण, अवर विदेहिं तित्ययरा ॥ चिहुं दिति विदिसि
लंकेवि, तीयाणागय संपश्श्र, वं5 जिण सधेवि ॥ ३॥ सत्ताणवश
सहस्सा, लरका उपन्न अठ कोमोन, वत्तीमय वासीप्राइ, तिय
लोए चेए वंदे ॥ १॥ पन्नास कोमि सयाई, कोमी वायाल लस्क
अमवन्ना ॥ उत्तीस सहस असिया, सासय किंवार परामा-
मि ॥ ५॥ इति ।
॥ अथ अतीचारनी ८ गाथा ॥
नामि दसणंमिश्र, चरणंमि तवेअ तदय विरियमि ॥
थायरणं आयारो, अ एसो पंचदा नपिन ॥१॥ काले विणए
वहुमाणे, नवदाणे तय निन्दपणे ॥ वंजण अत्य तउन्नय,
अविहो नाण मायारो ॥ २ ।। निस्संकि निखिश्र, निधि नि
गिधा अमूढ दिछीन । उपवूह थिरी करणे, वचल पन्नावणे श्रम
॥ ३ ॥ पणिहारा जोगजुत्तो, पंचदिसमईदि तिदिं गुत्तीदि । एस
चरित्ता यारो, अविदो दोश्नाययो ॥मा वारसविदंमिवि तवे, अ
प्रिंतर वाहिरे कुशल दिछे ।। यगिलाइ अशाजीवी, नायवा सो त
वायारो ॥ ५ ॥ अणसरा मुणो यरिया, विनी संखेवणं रसचान
काय किलेसो संली याय, वो तवो होश ॥ ६ ॥ पायचितं वि
पन, वेयावचं तदेव सझान ॥ काणं नस्सगोविय, अग्निंतर न त
वो दोर ॥ ७ ॥ अणमूहिय वल विरियो, परिकम जो जहुन मा
कचो । जुंजइअ जहाथाम, नायबो वीरियायारो ॥ ॥ इति ॥
॥ अथ विशाललोचन॥
॥ विशासखोचनदलं, प्रोद्यतांशुकेशरं ॥ प्रातरि जितेंद्रस्र,
पुखपापुनातुयः ॥ १ ॥ पामनिपेककर्म तत्वा, मना हर्षनरात्
(खं सुरेशः । तृणमपि गणयंति नैव नाकं, प्रातः संतु शिवाय ते
ननः ॥२॥ कलंकनिर्मुक्तममुक्तपूर्णतं, कुतर्क राहुग्रप्तनं सरोदय।।
. r (६८) अपूर्वचंद्र जिनचंदनापित, विनागने नोमिनुवैनमस्तन ॥३॥ ॥ अथ सुयदेवताना स्तुतिः ॥ . सुअ देवयाए करेमि कानसागं० सुत्र देवया लगवई, गावरणीअकम्म संघायं ॥तेसिं खवेळ सययं,जेसिं सुअंसायरे जी ॥ अथ खेत्रदेवतानी स्तुति ॥ खिचे सादू, सण नाणेहिं चरण सएदि । सा ति मुरकमग्गं, सा देवी हरनं धरियां ॥१॥ इति ॥ अथ सामायकलेवानो विधि ॥ ।। प्रथम उंचे प्रासणे पुस्तक प्रमुखनी पापना मूकीने श्र वक श्राविका कटासणुं मुहपत्नी चरवलो बई शुद्ध वस्त्र पहरी उ ग्या पूंजी कटासण ऊपर बैशी मुंहपत्ती मावा हाथमा मुख पाहे राखी, जमणो हाथ थापनाजी सन्मुख राखी एक नवतार. गण (पंचिंदिन) कही श्छामि खमासमण देई रियायहिया तस्सुत। अन्ननसंसिएणं कदै, १ लोगस्सको अथवा ज्यार नवकारनो काठ संग्ग करें (पारी) प्रगट लोगस्त कहै, खमासमा देई. इचाका रेग संदिस्सह नगवन सामायक मुंहपत्ती पमिलेहुं छ । इम कही मुंहपत्ती तथा अंगनी पमिलेहराना पचास बोल कही मुंहपत्नी प मिलेहीए पठी खमासमण देई चाफारेण संदिसह नंगवन सामा यक संदिस्ता छं । वली खमातमण देई श्चा०. सामायकगळ छ । एम कही वे हाथ जोमी एक नवकार गणी श्वाकार नग वन् पसाय करी सामायंकदमक नचरावोजी, परी गुरु प्रमुख व झेल करेमिन्नते कहे, पठी खमाप्तमण देई श्वा० वैसगो संदिसा नं। खमा०श्चा० वैतगोगन, खमा० श्चा० सिझाय, संदिस्सा खमा० श्चालिझाय करूंछ, एम कही त्रण नवकार गणवा । परी वे यमी सझाय धर्मध्यान करवु ॥ इति सामापक सेवानी विधि।
(६१)
॥ अथ सामायकपारखानो विधिः ।।
॥ खमासमण देश इरियावही पमिकम्याथी ( यावत् ) लो
गस्त सूची कहो खमा० श्चा० मुंदपत्ती पमिले हुँ एम कही मुंद
पत्ती पमिलेही खमासमण देई श्चा० सामायकपालं यथाशक्ति,
वली खमासमरा देई श्चा० सामायकपार/ तहत्ती कही पगे ज
मणो दाथ चरवला ऊपर अश्रवा कटासणा ऊपर यापी एक नव
कार गणी सामाश्यवयजुत्तो० कहिए, पो जमणो दाय थापना
सामो सवलो सखीने एक नवकार गणिए ॥ इति सामायक पार
वानो विधि ॥
॥ अथ देवशिक अतिक्रमण विधि ।।
प्रथम सामायक लोजे, पठी पाणी वावस्थू होय तो मुइपनो
पमिलेहवी अने पाहार वावरयो होय तो वांदणा वे देवा, तिहा
वीजा वांदणामां आवस्तियाए एपाठ नही कहियो. पठी यथाशक्ति
पञ्चरकाण करवं, पनी खमासमण देई चा० कही वमेरायें अथवा
पोने चैत्यवंदन कहवं, पठी अंकिंचि० नमोनु० कही ऊना अर्शने
अरिहंतचेश्याणं० कही एक नवकारनो कानप्तग्ग करी नमोर्दत्।
होने प्रथम यु कहवी, पठी सोगस्सा सवलोए अरिहंतचेश्याएं
दी एक नवकारनो कानसग्ग पारोने वीजी ग्रुई कहवी, पन।
स्करवरदी कह) सुग्रस्सनगवन करेमिकानतग्मं वंदण कही
क नयकारनो कानुसम्स पारीत्रीजा चुकदवी पी सिहारांयुक्षणं
ही यावच्चगराणं० करेमि काउसगं.अन कही एक नवका.
नो कानसम्ग पारी नमोई कहो चोयी थुई कहवी पी वैतान
मोत्युशं कहै, पगरी चार खमातनरा देवापूर्वक नगवान् श्राचार्य
पाध्याय सर्वसाधुन्यः प्रते योनवंदन करोयै. पी चाकारण
सिक प्रतिक्रमगगन एम कही जनगोहाय नववा अयवा कटा;
(६२) सणा ऊपर थापीने श्चं सबस्सवि देवसिय कहे, पनी कला करेमिन्नते.श्चामिकामिकासरगं जोमेदेवसिन तस्सवत्तरी की अतीचारनी पाठ गायानो कानसग्ग करवो, आठ गाथा न श्राव तो आप नवकारनो कानसग्ग करवो. ते कानसग्ग पारीने लोग कहे, पठी वैसीनै त्रीजा आवश्यकनी मुंदपत्नी पमिलेहोने वांदण बे देवा, पछी, कन्ना थईने श्चाकारेण देवलियं यालोनं चं.पाल पमि-जोमेदेवसिन कहीने सातलाख कहवा. पछी अढार पा- स्थानक यालोश्ये, सवस्सविदेवसिय कदीने वेस, बेसीने एक नव कार गणी करेमिन्नते चामिगमिपमिकमिनं कहीने बंदित्तु कहे। पठी वांदणा बे देवा, पढ़ी अानिमिअप्निंतर देवसिग्रं खामीने बांदणा वे देवा, पठी कन्ना थई पायरियनवद्याए कहीने करेमि- ते श्वामिगमि जोमेदेवसिनर तस्तनसरी. कही वे लोगस्त अथवा आर. नवकारनो कानसग्ग करवो, ते.पारीने लोगस्स कंही सबलोए अरिहंतचेझ्याणं वंदणवतिः कही एक लोगस्स अथवा च्यार नवकारनो कानसग्ग पारीने पुरस्करवरदी० सुअस्सन. गव करेमिकासगं० वंदणा, कहीने एक लोगस्स अथवा ज्यार नवकारनो कानसग्ग करवो, ते पारीने सिझाबुदाणं० कही सुय" देवयाए करेमिकानसग्गं अनबु. कही एक नवकारनो कानसम्म करतो, ते पारी नमोऽईत्कही पुरुपे सुयदेवयानी पदेखी थुई कहवं! अने स्त्रिये कमलदलनी पहली युई कहवी. पठी खेत्रदेवतान घोजी युई स्त्रिये तथा पुरुष बन्नेए एकज कहवी. पगे। नवका प्रगट गुणी. वैसीने म आवश्यकनी मुंदपत्ती पमिलेही । वांदणा दीजै, पठी सामायक चनवासबो वंदनक पमिकमां का सग्ग अने पञ्चस्करण करूंमुजी एम ए गए यावश्यक संन्नारवा. श्वासो अणुसहि नमोखमासमणाणं. कही नमोई कदी पुरुष पनी (६३) नमोस्तुबर्द्धमानाय कहे अने स्त्रिया संसारदायानी त्र शुई कहें पठो नमोत्युणं कही स्तवन कहवं, पठी वरकनक कही नगवान श्रादे वांदवा, पवै जमणो हाथ नपधो ऊपर थापी अहारसु क. हेर्नु, पठी देवसिअपायचित्तनो कानुसग्ग यार लोगस्स अथवा शोलनवकारनो करवो, कानसग्ग पारी प्रगट लोगस्त कही सोने खमासमण देई श्वा० सिद्यायसंदिस्ताने, वीजें खमासमण देई चा० लिद्यायनY एम तिचायनो आदेश मांगी एक नवकार गणो सिबाय कहवी, पठी एक नवकार गगी खमासमरा देई काका उम्मकतनो कानसग ज्यार लोगस्तनो संपूर्ण अथवा शोल नवकारनो करवो, ते एक वगैरे अथवा पोत पारोने नमोऽईकही लघुशांति कदीने प्रगट लोगस्त कदै, पनो ऽरियावही तस्सन- तरी कही एक लोगस्त अग्रवा पार नवकारनो कामसम्म करी प्रगट लोगस्त कहेवो, पठी चनकसाय० नमोणं० कहो जावंति बेकहीने उवसग्गरं० जयवोयराय कही मुंहपत्ती पमिजेदवो पठी श्वामि० श्चाका. सामायकरारं यथाशक्ति श्चामि० श्चांकी सामायकपारयं तहति कही परी जमणो हाथ नपधि कार थापी एक नवकार मणीने सामाश्यवपजुनो० कहे, पठी थापेली पा. पना होयतो एक नवकार गणी उठे. ए देवसि प्रतिक्रमण विधि कह्यो, याकी अंतरविधि मोहटायो समझयो । इति देवशो प्रति- कमण विधिः॥ ॥ अथ राई प्रतिक्रमण विधिः।। प्रथम पूवली रीते. सामायक लेबु पनी श्वामि० श्चाका कहीं कुसमिणनो समिणनो च्यार लोगस्सनो अथवा शोलं नवकारनो कानसागकरी पारी प्रगटलोगस्त कड़वो, पगे खमास मा देई जगचिंतामणी, चैत्यचंदन जयवीयराय संधी कहे, प.
(६५) व्यार खमासमणपूर्वक नगवान प्राचार्य नपाध्याय अने सर्वसाधु त्येके वांदवा, परी खमातमण वे देई सयायनो प्रादेश मांगी। नवकार नगीने नरदेसरनी सद्याय कहीने फरी १ नवकार ग वो, पठी श्चकारसुदराईनो पाठ कदयो, पठी श्याका० राईपनि कर्मयोगनं कहीने जमणो हाथ ऊपधी कपर थापोने पगे इ सबस्सविराईय उचिंतियः कही नमोत्युणं तथा करेमिन्नते का श्वामिमिकानसग्गं० तस्सनत्तरी. कही एक लोगस्स अथक च्यार नवकारनो कानसम्म पारोने प्रगट लोगस्त कही सबलोएम रिहंत कही एक लोगस्स अथवा च्यार नवकारनो कानसग करवो, पठी पुस्करवरदी० सुअस्स० वंदणव० कही अतीचारनी आठ गा- मानो अथवा न श्रावमे तो आठ नवकारनो काउसम्म पारी. सि- हाणंबुद्धाण कहीने त्रीजा आवश्यकनी मुंहपनी पमिलेही वांदला वे देवा तिहांयी लेने अनुनिमिवामी यांदणा बेदीजै तिहां सूची देवशीनी रीते जाएगवं, पण जे ठिकाणे देवतियं आवै ते . ठिकाणे राईयं कदेवू, परी पायरियनवद्याए० करेमिजते. श्वामिगमि. तस्सननरी कदी तपचिंतामणी करतां न श्रावके तो व्यार लोगस्त अथवा शोल नवकारनो कानसग्ग करवो, ते पारी प्रगट बोगस्स कही ना आवश्यकनी मुंदपत्नी पमिलेही बांदगा वे देवा, पनी स- कल तीर्थवंदन करीने यथाशक्ति पन्चरकाण करवं, परी २८ कारेण संदिस्सह नगवन सामायकचनवी सत्यो वंदनक पमिकम कानसग पञ्चरकाण करघु ठेजी, एम आवश्यक संन्नारवा, पर पञ्चरकाण करवू दोयतो करतुं जो अने धार होयतो धारचुं वेजी एम कद, परी चामोअणुसहि नमोखमासमणाम् नमोईवर कहीने विशाललोचन: नमोवुणं० · अरिदंतचेश्याएं० कदी एक नयकारनो कानसम्म पारी नमोईत्कही कल्याणकंदनी प्रथम श्रोय (६७५ ) कहवी, पठी लोगस्स० पुरकरवरदी० सिद्धाणंबुाणं कही अनु अमे. च्यार योयो कहवी, पठी नमोवुणं कही जगवान् श्रादि चारने ध्यार खमासणे वांदवा, पठी जमलो हाथ उपधि ऊपर थापी अ. हारसु कहे, पनी सीमंधरस्वामीनू चैत्यवंदन स्तवन० जयवी. राय० कानसग्ग० पोय पर्यंत कहीये तिहांसुधी करवू, पो खमा. सणपूर्वक श्रीसिद्धाचसनीनु चैत्यवंदन स्तवन जयवीराय कान- सग्गअने थोय कहवी, पठी सामायक पारवानी विधियें सामा- यक पारदुं शति ॥ ॥ अथ परको प्रतिक्रमण विधिः प्रथम देवसिक प्रतिकमरामा वंदित्तु कही रहिये तिहामूध सर्व कहे, पण चैत्यवंदन सकलाईतर्नु कद्देअने थोयो स्लात- स्थानी कहेवी, पठी खमासमण देश्ने श्याकारेण संदिस्सह नग- वान देवसिपं पालोऽयंपमिकता श्चा० पस्कियमुंहपत्ती पमिले टुं एम कही मुंदपत्ती पहिलेदीये, पगे बांदणावे दीजै, पठी इंचा- कारेण संवृद्धाखामणेणं अनुनिहं अकिंतर पस्कियंखामेवं चं खामेमिपस्कियं पन्नरसदिवसाणं पन्नरसराश्याणं किंचिअप्पत्निय. कही श्वाकारेणसं० परिकालोएमि छ प्रालोएमि जोमेपरिक- अश्यारोकन कही चा० परकी अतीचार धालोळं. एम कही वृक्ष अतीचार कहीये, पठी एवंकारे श्रावकतणे धर्म श्रीसमकितमृ. लवारव्रत एकसो चोवीस अतीचारमांदे जे कोई अतीचारं पक्षदि- पसमांदे सूक्ष्म वादर जाणतां अजाणता हुन होय ते सो हुँ मनकर वचनकर कायायेंकरी मिवामिऽकर्म ।। सवस्सविपरिका इचिंतिथ मासिय चियि श्छाकारेण संदिस्सह जगवन् तस्स मिहामिडम ॥ शाकास्निगवन् पसान · करी पस्की तपप्रशाद करावजी, एम'नबार करीने आवी रीते कदीये, चनत्येक एक (६६) पवाश यांधिल रानीवि च्यारएकाशणा ग्राम्येयासणा वेदना सझाय करी यथाशक्ति तप प्रवेश काचो होचतो पक्की कहीए. करयो होयतो तदत्ति कहीये, न करवो होयतो अवोख्या रही पठी वांदणा वे दीजै, परी चाकारे० पनेयखामणेणं अधुनिई अप्रिंन्तर परिकां खामेन चं खामेमिपरिकथं पन्नरसदिवसाणं पन्नरसराश्याप जमिचिअप्पनियं० परी वांदणा वेदीजे पी देव- सियालोश्यपमिकता श्चाका० नगवन् पस्कियंपनिकमुं समपकि कमामि छ एम कही करेमिन्नतेलामाश्यं० कही चामिपमिक्क मि जोमेपस्किन० कदवो पठी खमासमरा देई छाका० प रकीसूत्र पढे, एम कही त्रण नवकार गगी साधु न होयतो त्रण नवकार गणीने श्रावक वंदित्तु कहै, पर सुयदेवयानी योय कहती पड़ी.हेग वैसी जमणोढींचश कनो राखो एक नवकार गरा। क रेमिन्नते. श्वामिपमि०, कहो वंदित्तु कहे०, पढ़ी करेमिन्नते ३ जामिनामिकानसग जोमेपस्किन तस्सनत्तरीअन्ननू० कदाने (१२) कार लोगस्सनो कानसग करवो, ते लोगस्त चंदेसुनिम्मब यरा सूधी कहवा अथवा श्रमतालोत नकारनो कानलम्ग करी पारवो, पारीने प्रगट लोगस्त कही मुंहपत्ती पहिलेहीने बांदपा वे. दीजै, पठी श्चाका० समाप्तिखामणेणं अनुध्निई अप्रिंतर? परिकखामेळ चं खामेमिपस्कियं पन्नरसदि०. कहो पी खमा सण देई श्चाका० कही परकोखामणाखा{ एम कदी खामगा ध्यार खामवा परी दैवसीप्रतिक्रमणामां वंदितु कह्या पंगवे वां देईने तिहांधी ते सामायक पारीये तिहासूधी. सर्व देवसोनी पेठे जाणवु, पण सुयदेवयानी युईने विकाणे झानादि थोयो कहवी स्तवनं अजितशांतिनुं कहवं, सझायने ठिकाणे नवसागरं तया संसारदावानी यु यार कहेवी अने लघुशांतिने विकाणे मोइटी (६७) शांति कदेवी ॥ इति परको प्रतिक्रमण विधी ॥ ॥ अथ चउमासी प्रतिक्रमण विधि || ये ऊपरना कह्या प्रमाणे सर्व विधी करवी पण एटलो वि शेप, वार लोगस्सना कानसग्गने ठिकाणे वीस लोगस्सनो कान सग्ग करको अने परकीना प्रागारने ठिकाणे चनमाशीना कहवा, ययातपने ठेकाणे णं ये नपवास च्यार थांधिल उनीवी आठ ए- काशणा शोल वेवासणा च्यारहजारसमाय, ए रीते कदीये । इति । ॥ अथ संवत्सरी प्रतिक्रमण विधिः॥ ए पण ऊपर लख्या मुजव एटलो विशेष पण परकीना चार लोगस्सने ठिकाणे चालीश लोगस्सनो कानसग्ग अथवा एक शो शान नवकारनो कानसग करवो, अने तपने ठिकाणे अध्मन्नत एटले वनपवाश उमाविल नवनीवी धारएकाशण चोवीश वेत्रा- सणा अने उहकार सिझाय ए रीते कदq अने परकीना आगारने ठिकाणे संवत्सरीना यागार कदवा ॥इति पंचप्रतिकमण विधिः सं. ॥ अथ पडिलेहण करवानो विधो ॥ नवकार पंचिंदिय कही इरियावही पनिझमवी. थापना हो- य.तो नवकार पंचिंदिय न कहq, परी नस्सनत्तरी कही एक लो गस्त अथवा चार नवकारनो कानसग्ग करी प्रगट लोगस्स कही चन्ने पगे वैसी मुंहपत्नी चरवलो कटासणुं उत्तराखण धोती, कंदारो शादिनु पमिलेदण करई, पढ़ी काजो काढी जीव कलेवर सचित्त श्रादि जोवू, पनी काजो काढनार थापनाजी सम्मुख उन्लो. रही इरियावही पतिकमे पनी काजो परग्ववा जग्या सोधी पवार अणुजाणहजस्सुग्गो कही काजो. परव्ये, पनी त्रण बार वोसिरे कहे ।। इति पमिलेइश करवानो विधी ॥
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(६०)
॥ अथ पचरकाण पारखानो विधि |
प्रथम इरियावही पमिकमिये, पी जगचिंतामसीन चैत्य
वंदन जयवीयराय सूधी करवू पठी मन्दजिणाणंनी सिझाय कह
वी, मुहपत्नी पहिलेही श्वामि० श्चाका० पञ्चस्कारापारूं यथाश
क्ति० श्चामि० श्चाका० पञ्चस्कारापारयुं तदति एम कही जमणो
हाथ चरवला अथवा कटासणा ऊपर थापी एक नवकार गणी प
चस्काण करयुं होय ते कहे, ते लखिये ठिये | नग्गए सूरे नमोका
रसहियं पोरसिं साढपोरसिं गठिसहियं मुन्सिहियं पञ्चरकाणकरयु
चनविहार प्रांधिल नीवी एकासगुं वेग्रासणुं करघु तिविहार पच्च
कोण फालियं पालियं सोहियं तारिश्र कीहियं आराहि जंचन
आराहियं तस्समिछामिजकम।एम कही १ नवकार गलवो ॥इति॥
॥ अथ श्री सीमंधरजिन स्तवन ।।
पुरस्कलवा विजयें जयो रे, नयर पुमरीगणी सार ॥ श्री
सीमंधर साहिवा रे, राय श्रेयांसकुमार ॥ जिणंदराय धरज्यो धर्म
सनेद ॥ (आंकणी)। मोहोटा नाना अंतरो रे, गिरुआ नवि दाखंत ।।
शशि दरिशण सायर वधै रे, कैरव वन विकसंत ॥ जि. २॥ गम
कुगम न लेखवे रे, जग वरसत जलधार ॥ कर दोय कुसुमें वा
सियो रे, गया सवि आधार ॥ जि० ॥ ३ ॥ रायने रंक. सरिखा
गणे रे, नद्योतें शशि सूर ॥ गंगाजल ते विहुँ तणा रे, ताप करे
सवि. दूर ॥ जि० ॥ ॥ सरिखा सहुने तारवारे, तिम तुमे गे
माहारान ।। मुझसुं अंतर किम करो रे, वांह ग्रह्यांनी लाज ॥.जि.
॥ ५॥ मुख देखी टीतुं करे रे, ते नवि होय प्रमाण ॥ मुजरो.
सवितणो रे, साहिव तेह सुजाण ॥ जि० ॥ ६॥ पत्नसंचन
सत्यको रे, नंदन शकमणी कंत ॥ वाचक जश श्म वीनये
नयत्नंजरा नगवंत ॥ जि०॥ ७ ॥ इति पदं ॥
(६७ए ) ॥ अथ बीजनुं स्तवन । (1 फतमल पाणीमाने जाय ए देशी।।) । प्रणमी शारदमाय, शासन वीर सुइकरूं जी ॥ वीज तिमी गुणगेह, आ दरोन्नवियण सुंदरू जी ॥ १ ॥एद जिन पंच कल्याण, विवरीने कहूं ते सुणो जी ॥ माहा सुदि बीजे जास, जन्म अनिनंदनतो जी ॥ ॥ श्रावण सुदिनी दो वीज, सुमति चव्या सुरलोकयी जी | तारण नवोदधि तेद, तस पद सेवे सुर थोकथी जी ॥३॥ समेतशिखर शुन गण, दशमा शीतल जिन गणुं जी ॥ चैत्र व. दिनी दो बीज, वरया मुक्ति तस सुख घणुं जी ॥ ४ ॥ फाल्गुन मासनी बोज, उत्तम नवल मासनी जी ॥ धरनाथ तस व्यवन, कर्मक तव पासनी जी ॥ ५॥ उत्तम माघ ज मास, शुदि वीजें वासुपूज्यनो जी ॥ एडिज दिन केवलनाण, शरण करो जिनराज नो जी॥ ६ ॥ करणीरूप करो खेत, समकित वीज रोपो तिहा जो ॥ खातर किरिया हो जाण, खेम समता करी जिहां जी ॥७॥ नपशम तद्रूप नोर, समकित गेम प्रगट होवे जी ॥ संतोष करी अहो वाम, पञ्चरकाण व्रत चोकी सोवे जी ॥ ७॥ नासे कर्म रिपु चोर, समकित वृक्ष फल्यो तिहां जी ॥ मांजर यनुन्नवरूप, नतरे चारित्र फल जिहां जी॥ए । शांति सुधारश वारी, पान करी सुख लोजीये जी ॥ तंबोल सम यो स्वाद, जीवने संतोप रस किजीये जी ॥१०॥ वीज करो वावीश मास, उलटी वावीस मासनी जो ॥ चोविदार नपवास, पालिये शोल वसुधासती जो ॥ ११॥ आवश्यक दोय वार, पहिलेइरा दोय लीजीये जी ॥ दे ववंदन त्रिश काल, मन वच कायायें कीजीये जी ॥१२॥ कज मणुं शुक्न चिन, करी परी संजोगयी जी ॥ जिनवाणी रस एम, पीजीये श्रुत नपयोगथी जो १३ ॥ एशि मिथ करिये हो योज; ច (६ए ) राग ने ईप दूरे करे जी ॥ केवलपद सहि तास, वरे मुक्ति नक्ष: घरे जी ॥ १४॥ जिनपूजा गुरुत्नक्ति, विनय करी सेवो सदा जी ॥ पद्मविजयनो शिष्य, नक्ति पामें सुख संपदा जी ॥ १.५ इति चीजतिथीनुं स्तवनं ॥ : ॥ अथ पंचमी, वृद्ध स्तवन ।। (॥ पुण्य प्रशंसीये ॥ ए देशी॥) सुत सिद्धारय नूपनो रे, सिद्धारथ नगवान ॥ बारह परखदा यागले रे, लाखे श्रीवर्द्धमानो रे ॥ १ ॥ नवियण चित्त घरो ॥ मन वच, काय अमायो रे, झान नक्ति करो॥ एयांकणी ॥ गुण अनंत आतमत: णारे, मुख्यपणे तिहां दोय ॥ तेमां पण ज्ञानज वॉरे, जिराथी 'दसण होय रे ॥ न. २॥ ज्ञाने चारित्र गुण वधे रे, झाने 'नयोत सहाय || ज्ञाने थिवरपणुं लदे रे, प्राचारज नवझाय रे ॥ न०३ ॥ ज्ञानी श्वासोवासमा रे, कठिण करम करे नाश ॥ वति जेम इंधन दहे रे, क्षणमा ज्योति प्रकाशो रे || ०४॥ प्रथम ज्ञान पवे दया रे, संवर मोह विमाश ॥ गुणगणांग पगंधालीये रे, जेम चढे मोह आवासोरे ॥ न०.५ ॥ नइ सुग्र नादि मणपऊवा. रे, पंचम केवलज्ञान ॥ चन मुंगा श्रुत , एक रे, स्व पर प्रकाश निदान रे ॥६॥ तेदना साधन जे कह्यार, पाटी पुस्तक आदि ॥ सखे लखावै साचवरे, धर्मी धरी 'अप्रमादोरे, ॥ ॥ त्रिविधः पाशातना जे करे रे, नाता करे अंतराय ॥ अंधा 'बहेरा वोवमा रे, मुंगा.. पांगुल न्याय रे ॥ ॥जयतां गुणतां न यायमेरे, न मले वक्षन्न चीज ॥ गुणमंजरी वरदत्त परे रे, ज्ञान विराधन वीज है। नए ॥ प्रेमें पूर्व परखदा रे, प्रणमी. जगगुरु पाय ।। गुणमंजरी वरदननो रे, करों अधिकार पसायो रे ।। १० ।। इति ॥ .. .
(६१) (॥ ढाल २ ॥ कपूर होये अति ऊजलो रे ।। ए देशी ) : जंबुइपना लरतमा रे, नयर पदमपुर खास ! अजित. सेन राजा तिहां रे, राणी यशोमती तास रे ।। १ ॥ प्राणी या. राधो वर ज्ञान, एहिज मुक्ति निदान रे ॥ प्रा० प्रा०॥ए पाकणी ॥ वरदत्त कुंवर तेदनो रे, विनयादिक गुणवंत ॥ पितरे जवा मूफिन रे, पाठ वरस जब इंतरे ॥ प्रा० २॥ पंमित्त यत्न करे घणो रे, गत्र जणावश हेत ॥ अक्षर एक न श्रावके रे, ग्रंथतणी शी चेत रे ॥ प्रा०३ ॥ कोटें व्यापी देहमी रे, राजा राणो सचिंत ॥ श्रेष्टी तेहीज नयरमा रे, सिंहदास धनवंत रे ॥ प्रा० ४ ॥ कपूरतिलका गेहनी रे, शीले शोजित अंग । गुण मंजरी तस वेटमी रे, मुंगी रोगे व्यंग रे ॥ प्रा० ५ ॥ शोल वरसनो साई रे, पामो यौवनवेश ॥ उर्नग पण परणे नही रे, मात पिता धरे खेद रे ॥ प्रा०६॥ तेणे अवसरे उद्यानमा रे, विजयशेन गणधार ॥ ज्ञानरयण स्पशायरू रे, चरण करण व्रत- धार रे ।। मा० ७॥ वनपाखक नूपालने रे, दीघ वधाइ जाम || चतुरंगी सेना सजी रे, वंदन जाने ताम रे ॥ प्रा० । धर्म- देशना. सांजले रे, पुरजन सहित नरेश । विकशत गपन वदन मुदा रे, नहिं प्रमाद प्रवेश रे ॥ प्रा० ॥ज्ञान विराधन परजवे रे, मूरख पर श्राधीन ॥ रोगे पीया टलवले रे, दीसे खोया दीन रे । प्रा० १०॥ ज्ञान सार संसारमे रे, ज्ञान परम सुख देत } झान विना. जगजीवमा रे, न सहे तत्व संकेत रे. प्रा० ११ ॥ श्रेष्टी पूर्व मुणिंदने रे, लाखो करुणावंत If गुणमंजरी मुझ अंग जा. रे, कवण कर्म.विरतंत रे । प्रा०.१२॥ इति । (दाल ३ ॥ सूरतो महिनानी देशीमां) घातकीखाना नरतमां, खेटक नयर सुठाम ॥ व्यवहारी (६२) जिनदेव चै, घरणी सुंदरी नाम ॥१॥ अंगज पांच सोदामय पुत्री चतुरा चार ॥ पंमित पाते सीखवा, तातें मुंक्या कुमार ॥२ बालस्वन्नावें रामतें, करतां ददामा जाये ॥ पंमित मारे जादरे मा पागल कहे आय [॥ ३ ॥ सुंदरी सुखिपी सीखवै, जणवाद नदी काम पांमयो आवे तेमवा, तो तस इणजो ताम ॥ ५। पाटी खमिया लेखणा, वाली कीधा राख ॥ शग्ने विद्या ना रुचे, जेम करहाने शख ॥ ५ ॥ पामा परे मोहोटा थया, कन्य न दीये कोय ॥ सेठ कहे सुण सुंदरी, ए तुम करणी जोय ॥ ६ ॥ ब्रटकी जाखे नामिनी, बेटा बापना होय ॥ पुत्री होये मातनी, जाणे वे सह कोय ॥ ७ ॥ रे रे पापणि सापणी, सामा बोल म बोल ॥ रीताली कहे तादरो, पापी वाप निटोल ॥ ७ ॥ शेजें मारी सुंदरी, काल करी ततखेव ॥ ए तुम बेटी उपनी, ज्ञान विराधन देव || ए ॥ मु गत गुणमंजरी, जातीसमरण पामि ।। ज्ञान दिवाकर साचो, गुरुने कहे शिर नामि ॥ १० ॥ शेष कदे मुणो स्वामी, केम जाये ए रोग, गुरु कहे ज्ञान धाराधो, साथी वंगित योग ॥ ११ ॥ उज्वल पंचमी सेवो, पंच बरस पंच मास नमो नाणस्स गाणं गुणो, चोविदार उपवास ॥ १२॥ पूरः उनर सन्मुख, जपिये दोय दजार ।। पुस्तकं पागल ढोइये, धान फलादि नदार ॥१३॥ दीयो पंच दीवटतणो, साथियो मंगल गेद। पोसदमान करी सके, तेरा विधि पारा एह ॥ १५ ॥ प्रथम सौनाग्यपंचमी, उज्वल कार्तिक मास | जापकीय लगे संघिये, कजमशा विधि खास ॥ १५ इति ॥ (॥ दाल चौथी । एकवीसानी देशीमां ॥) पांच पोयो रे, ग्वणी पाग विटांगणा ॥ चावखी दोरा, पाटी पाटला वर तथा मसी कागल रे, कांची समिया सेमण।
(६७३ ) कवली मावली रे, चंद्रुपा करमा पूंजणी ॥ १ ॥ (बेटक) प्रा. साद प्रतिमा तास नूपण, केप्तर चंदन मावली ॥ वासकूपी वाला कुंची, अंगनूहगा गवझी ॥ कलश थाली मंगलदीवो, भारती ने धूपणा || चरवला मुंहपत्ती साहमी वचल, नोकरवाली थापना । ॥ २ ॥ (ढाल ) ज्ञान दरिसण रे, चरणना साधन जे करा, तप संयुत रे, गुणमंजरी सद्दह्या ॥ नृप पूर्व रे, वरदत्त कुंवरने अंग रे॥ रोग उपनो रे, कवण करमना नंग रे ॥ ३ ॥ (बेटक) मु निराज नासे जंबुद्दी, भरत सिंदपुर गाम ए ॥ व्यवदारी वसु तास नंदन, वसुसार वसुदेव नाम ए || वन माहे रमतां दोय चंधव, पुष्य योगें गुरु मख्या ॥ वैराग्य पामी नोग वामी, धर्म धामी संवरया ॥ ४ ॥ (दाल) लघु बांधव रे, गुणवंत गुरु पदवी खहै, पणसय मुनिने रे, सारण वारण नितु दिये ॥ कर्म योगे रे, अशुन्न उदय थयो अन्यदा, संथारे रे, पोरसी नणी पोढ्यो यदा ॥ ५ ॥ (बेटक) सर्वघाति निंद व्यापी, साधु मांगे वायणा ॥ कंघमां अंतराय यातां, सूरि या दूमणा ॥ ज्ञान ऊपर टेप जा- ग्यो, लाग्यो मिथ्या नूतमो ॥ पुण्य यमृत ढोली नांख्यो, जस्यो पापतणो घमो ६ (ढाल) मन चिंतवे रे, कां मुफ लागुं पाप रे ।। श्रुत धन्यासो रे, तो एवमो संताप रे ॥ मुझ वांधव रे, नोयण खायण सुखें करे ।। मूरखना रे, आठ गुणो मुख उच्चरे ॥ ७॥ (टक ) वार वासर कोई मुनिने, वायणा दीधी नदी ॥ यशुन्न प्याने श्रायु पूरी, नूप तुझ नंदन सही ॥ ज्ञान विराधन मुढ जम पणुं, कोदनी वेदन लदी ॥ वृक्ष बांधव मानसरवर, हंसगति पान्यो सदी 10 (दाल) वरदत्तने रे, जातिस्मरण ऊपनो ॥ नव दीगे रे, गुरु प्रशमी कदे शुन्न मनो || धन्य गुरुजी रे, ज्ञान जगत्रय दी सको ॥ गुण अवगुरा रे, नाप्तन जे जग परयमो॥ ए(यूटक) .पाट (४) झान पावन सिद्धि साधन, ज्ञान कहो किम श्रावमे ॥ गुरु कडे तपयी पाप नास, टाढ जेम धन तावमे॥ नूप पन्नरों पूत्रने प्रनु, तपनी शक्ति न एचमी । गुरु कहे पंचमी तप श्राराधी, संपदा ख्यो बेवमी ।।१०॥ इति ॥ (दाल पांचमी || मेंदी रंग लागो॥ ए देशी ॥) सरु वयरा सुधारसे रे, नेदीसाते धात। तपसुं रंग लागो, गुणमंजरी वरदत्तनो रे, नागे रोग मिथ्यात्व ॥त० १॥ पंचमी तप महिमा घणो रे, पसस्यो महियत मांदी ॥.त०॥ कन्या सहप्त सयंवरा रे, वरदत्त परण्यो त्यांदी ॥ त० ॥ २॥ नूपें कोधो वी रे, आप थयो मुनि नूप ॥ त० || नीम कांत. गुणें करी रे, वर दस रवि शशिरूप ॥ त०॥ ३ ॥ राज रमा रमणीतणारे, नोग लोग अखंग ।। त० ॥ वरसें। ऊजवे रे, पंचमी तेज प्रचंक 11.0 ॥ १ ॥ नुक्तलोगी श्रयो संजमी रे, पाले व्रत खटकाय || त० ॥ गुणमंजरी जिनचंद्रने रे, परणावै निज ताय ॥ त०॥ ५॥ सुख विलसी थई साधवी रे, वैजयंते दोय देव ॥ त०॥ वरदन पय कपनो रे, जिहां सीमंधर देव ॥ त०॥ ६ ॥ अमरसेन राजा घरे रे गुणवंत नारी पेट ॥ तप० । सकरा लक्षित रापने रे, पुष्य कीयो नेट । तप० ॥ ७॥ शूरसेन राजा ययो रे, सो कन्या न रतार ॥ त सीमंधर सामी कने रे, मुणि पंचमी अधिकार ।। त०॥ ८॥ जहां पण ते तप प्रादरघु रे, लोक सहित भूपाल ।। त०॥ दश हजार वरतां लगे रे, पाले राज्य कदार ॥ त०॥ ए॥ चार महावत चुंपमुं रे, श्रीजिनवरनी पास ॥ त..॥ केवल परि मुक्त गयो रे, सादिअनंत निवास ।। त० ॥१०॥ रमणी विजय शु मापुरी रे, जंयुविदेद मकार ॥ त०॥ अमरसिंह महीपासने रे, अमरावती परनार ॥ त०॥ ११॥ वैजयंत प्रकी धनी रे, गुलम:
(६एए) जरीनो जीव ॥ १० ॥ मानससर जेम हंसलो रे, नाम घरघु सु ग्रीव ॥ त० ॥ १२ ॥ वीसे वरसे राजवी रे, सहस चोरासी पूत्र ।। त० ॥ लाखं पूरव समता धरे रे, केवलज्ञान पवित्र ।।त० ॥१३॥ पंचमी तप महिमा विपे रे, नापै निज अधिकार ॥ त०॥ जेणे जेहथी शिवपद सा रे, तेहनो तस उपकार ।। त० ॥१॥ इति ।। .(ढाल छठो ॥ करकंडुने करुं वंदना ॥ ए देशी) चोवीश दमक वारवा, दूं वारी ॥ चोवीशमो जिनचंद रे, हूं वारी साल ॥ प्रगट्यो प्राणतस्वर्गयी, हु०॥ त्रिसला तर सुखकंद रे ॥ ९० १ ॥ माहावीरनें करुं वंदना, हुँ० ॥ ए श्रा; कणी ॥ पंचमी गतिने साधवा, हुं० ॥ पंचम नाण विलाश रे, हुं० ॥ मादमिशीय सिद्धांतमां, ९० ॥ पंचमी तप प्रकाश रे, ९० मा० २ ॥ अपराधी पण उघस्यो, हुं० ॥ चंझकोसियो साप रे, हुं० ॥ यज्ञ करंता बानणा, इं० ।। सरखा कीधा प्रापरे हुं० मा० ॥ ३ ॥ देवानंदा ब्राह्मणी, हुं० ॥ रिपत्नवत्त वली विप्ररे, इं० ।। व्यासी दिवश संबंधथी, हुं० ॥ कामित पूरयो विष रे ॥ ९० मा० ४.॥ कर्मरोगने टालवा, हुं० ॥ सवि प्रौपचनो जाग हुं० ॥ आदरयो में आता धर), १० ॥ मुझ पर हित प्राशि रे, ॥ ९० मा ५॥ श्रीविजयसिंह सुरीप्सनो, हुं०, सत्यविजय पन्यास रे, हुं० ॥ शिष्य कपूर विजय कवि, हुं० ॥ चंद किरण जस जास । ९० मा० ६ ॥ पाप्त पंचासरा सानिद्धे, हुं० ॥ खिमाविजय गुरु नाम रे, ई० ॥ जिनविजय कदे मुझ इजो, ९० ॥ पंचमी तप परिणाम रे ॥ १० मा ॥ ( कलश ) इस वीर सायक विश्व नायक सिदिदायक संस्तव्यो, पंचमी तप संस्तवन टोमर गुंथी निज के उव्यो। पुन्य पाटरा क्षेत्र मांदे सनर प्राणुं संवत्सरे, श्रीपार्श्व जन्मकल्याण दिवसे सकस नवि मंगल करे ॥ ॥इति (६५६) • - - || अथ अष्टमीन स्तवन लिख्यते ॥:: ii. ॥ दारे मारे गम धरमना सादापचवीश देश जो, दोपरे त्या देस मगध सहुमा शिरे रे लो ॥ हरि मारे नगरी तेदमा राज- गृही सुविशेष जो, राजे रे त्यां श्रेणिक माजे गज परे रे लो 119 हरि मारे गाम नगर पुर पावन करता नाथ जो, विचरंता .ति आवी वीर समोसरचा रे लो॥हां० चन्दसहसमुनिवरना सायेसा जो,सूधा रेतप संयम शियले अलंकरचारेखो ॥ २॥हां० फूटय रसन्नर फूल्या अंब कदंव. जो, जाणुं रे. गुएः शीववन हा रोमंचियो रे लो ॥ हां० वाया वाय सुवाय तिहां अविलंब जो वाते रे परिमल चिहुं पासे संचियो रे लो || ३. ॥ दांव देव चतु विध आवै कोमाकोम जो, त्रिग रे मणि हेम रजतनुं ते 'रवे खो॥ दां० चोस सुरपति सेवे होमाहोम जो, आगेरे रस लागे इंशणीनचे रे लो॥४॥ हां मणिमय हेम सिंहासण : वेवा आप:जो, ढाले रे सुर चामर मणिरतने जमया रे लो। हांक सुगतो इंजनि नाद टले सविताप जो, वरसे रे सुर फूल . सरस जानू अमया रे लो॥ ५॥ हां० ताजे तेजे गाजे धन जेम खूब जो, राजे रे जिनराज समाजे धर्मने रे.. लो.॥ दा० निरखी हरखी आवै जन मन खूब जो, प्रोपे रे रस न पके घोपै नर्ममा रेलो ॥ ६॥ हां आगम जाणी, जिननो श्रेणिक : राय जो, पायो रे परवरियो इय गय रथ पायगे रे लो॥ दां० दर. प्रद- क्षिणा वंदी वैवो.गय जो, सुरणवा. रे जिनवाणी मोटे लायगे रे सो ||-3 ॥ दां०. विनूवननायक खायक तब नगवंत जो, प्राणी रेजन करूणा.धर्मकथा कहे रेलो. ॥ हांण सदज विरोध विसारी जगना जंत-जो, सुणतां.रे.जिनवाणी मनमा; गहगहे रे सो Ga इति । ( दाल बीजी।बालम बहेला रे.आवजो॥ए देशी ॥) -- (दए ) वीर जिनवर एम उपविसे, सांजलो चतुरसुजाण रे ।। मोदनी नीदमां का प्रमो, उसखो धर्मनां गा रे ॥१॥ विरति ए सुमति घरी आदरो, (ए आंकी) परिहरो विपय कपाय रे ।। वापमा पंच परमादयी, 'कां पमो कुगतमा धाय रे ॥ वि० २ ॥ फरी सको धर्म करणी सदा, तो करो ए उपदेश रे॥ सर्व काले करी नवि सको, तो करो पर्व सुविशेप रे ।। वि०॥ ३ ॥ जूजूमा पर्व खटना कह्या, फ़ल घणा मागमें जोय रे ॥ वचन अनुसार श्रा राधतां, सर्वया सिद्धि फल होय रे ॥ वि०॥४॥ जीवने आयु परनवतणुं, तिथिदिने बंध होय प्राय रे ॥ तेद नशी एह पाराध तां, प्राणि सद्गति जाय रे ॥ वि० ॥ ५ ॥ तेहये अटमी फल तिहां; पूर्व गौतमस्वामि रे ॥ नविक जीव जाणवा कारणे, कदे वीरप्रनु तामरे ॥ वि०॥ ६ ॥ अष्ट महासिद्धि होय एहथी, सं. पदा आग्नी वृदिरे । बुद्धिना पाठ गुण संपजै, एहश्री आठ गुण सिदिरे ॥ वि० ७॥ सान होय पाठ पमिहारनो, 'ठ पवयरा फल होय रे ॥ नाश अठ कर्मनो मूलथी, अष्टमार्नु फल जोय रे वि०॥७॥ यादि जिन जन्म दीक्षातलो, अजितनो जन्म क. .ल्याण रे ।। व्यवन संभवतणो एह तिथे, अजिनंदन निर्धारा रे ॥ .. वि०॥ ए ॥ सुमति सुव्रत नमि जनमोया, नेमनो मुक्ति दिन जाग रे। पासजिन एद तिथे तिःला, सातमा जिन च्यवन मारा रे ॥ वि०॥ १० ॥ एद तिथि साधतो राजिन, दमवीरज सह्यो मुक्ति रे ॥ कर्म हवा नगी अष्टमी, कहे सूत्र नियुक्त रे ॥वि० ॥ ११ ॥ प्रतीत अनागत कासना, जिनता केश केश कल्याण रे । एद तियें यति घणा संजमी, पामते पद निर्वाणरे ॥ वि० ॥ १२ ॥ धर्म वाशित पशु-पंखिया, एद तियें करे कावासरे।। व्रतधारी जीव पोसो करे, जेहने धर्म अन्यास-रे । नि० ॥१३॥ ច - (६) नांखियो वीरे प्रारमतो, नविक, हित एह अधिकार रे ।। जिन मुखें नचरी प्राणिया, पामसे नवतणो पार रे ॥ वि०॥.१४ ॥ एइथी संपदा सवि.लहै, टले काटनी कोम रे.॥ सेवजो शिष्य बुध प्रेमनो; कहे कांति. कर जोम रे । वि० ॥ १५.. (कलश) एम त्रिजग नासन अचल शासन वर्द्धमान जिनेश्वरू, बुध प्रेम गुरु सु. पसाय पामी संधुण्यो अलवेसरू || जिन गुण.प्रसंगे लण्यो रंगे स्तयन. ए आठमतगो, जे नविक नावे सुणे गावै. कांति. सुख पावे घणो ॥ १ ॥ इति अष्टमी वृक्ष स्तवन संपूर्ण ॥ ॥ अथ एकादशी स्तवन लिख्यते ॥ .॥ जगपति नायक नेमजिनंद, द्वारिकानगरी समोसरया ॥ जग़पति वंदवा. कृष्णनरिंद, जादव कोमिसुं परिवरचा ॥ १ ॥ जग पत्ति घोगुण फूल अमूल, नक्तिगुणें माला रची.॥ जगपति पूजी पूवै कृष्ण, कायिक समकित शिव रुचि ॥२॥ जगपति चारित्र 'धर्म.अशक्त, रक्त प्रारंन परिग्रहे ॥ जगपति मुझ आतम न-हार, कारण तुम विन कोण कहै.॥३.॥ जगपति तुम सरिखो मुफ नाथ, . माथे गाजे गुणनिलो ॥ जगपति कोय नपाय बताय, जेम करे शिववधू कंतलो ॥ ४॥ नरपति: नऊल मागशिर, मास, आराधो एकादशी ॥ नरपति एकशो ने पञ्चाश, कल्याणक तिथि उनसी. ॥ ५॥ नरपति दश क्षेत्रे. त्रिण काल, चोवीशी त्रीशे:म ली ॥ नरपति नेन. जिनना कल्याण, विवरी कहूं.आग़लि वली ॥ ॥ ६ ॥ नरपति अर दीक्षा नमि नाग, मची जन्म व्रत केवली ।। 'नरपती वर्तमान. चोवीशी, माहे. कल्याणकावली. ॥ ७ || नरप. ति मौनपणे: नपवास, दोढसो जपमाला गणो || नरपति मन वन 'काय पवित्र, चरित्र सुणो सुव्रततणो ॥॥ नरपति दाक्षिण था तकीखंग, पश्चिम दिशि कुकारश्री नरपतिः विजय पाटण.अ.
(६एए ) जिधान, साचो नृप प्रजापालथी । ए ॥ नरपति नारी चंज्ञवंती तास, चंमुखी गजगामिनी ॥ नरपति श्रेष्टी शुर विख्यात, शोयल सलीला कामिनी ॥ १०॥ नरपति पुत्रादिक परिवार, सार नूपण चीवर धरी ॥ नरपति जाये नित्य जिनगेह, नमन स्तवन पूजा करै॥११॥ नरपति पापै पात्र सुपात्र, सामायक पोपध करै ।। नरपति देववंदन आवश्यक, काल वेलाये अणुसरे ॥ १२ ॥ इति 'ढाल वीजी) एक दिन प्रणमी पाय, सुव्रत साधुतणारी ॥ वि ये वीनवे सेठ, मुनिवर करि करुणारी ॥ १ ॥ दाखो मुझ दिन एक, थोमो पुण्य कियो री ॥ वाघे जिम वमयीज, शुन्न अनुबंधी यो री ॥ ॥ मुनि नापै महानाग्य, पावन पर्व घणा री ॥ ए दशी सुविशेप, तेहमां सुण सुमना री ॥ ३ ॥ सित एकादशी व, मास ग्यार लगेरी अथवा वरस इग्यार, उजवी तपशु गे ॥ ४ ॥ सांजलि सजु वैण, आनंद अति नबस्यो री ॥ प सेवी नजवीय, आरणस्वर्ग वस्यो री ॥ ५ ॥ एकवीश. सागर य, पाली पुन्यवसे रो ॥ सांजल केशवराय, श्रागलि जेह थसे ॥ ६ ॥ सोरीपुरमा सेठ, समृध्दत्त कमो री ॥ प्रीतिमती प्रियां स, पुपयें जोग जल्यो । ॥ ७ ॥ तस कूखें. अवतार, सूचित न स्वप्ने री ॥ जनम्यो पूत्र पवित्र, नत्तम ग्रह शुकने री ॥ ल निक्षेप निधान, नूमिथी प्रगट इवो री ॥ गर्न दोहद अनु व, सुव्रत नाम उव्यो री ॥ ए ॥ बुद्धि नद्यम गुरु जोग, शास्त्र कि नएयो री ॥ योवन वय अगियार, रूपवती परण्योरी ॥ १० ॥ जिनपूजन मुनिदान, सुव्रत पञ्चस्कारा धरे रो. ॥ अगियार न कोक, नायक पुण्य नरेरी ॥ ११॥ धर्मघोप अरागार; ये अधिकार कहे री ॥ सांत्नलि सुव्रतसेन, जाती स्मरण- लदे ॥ १२॥ जिन प्रत्यय मुनि साख, न तप नच्चरे री।। एक . (100) वशी दिन माठ, पदारो पोसो घरे री ॥ १३ ॥ इति ॥ (दालत्री जी) पनी संयुतें पोसह लीवो, सुवतशेने अन्यदा जी !J अबसर जाणी तस्कर याव्या, घरमां धन लूंटे तदा जी ॥ १ ॥ शासनन्न के देवीशक्ते, यंत्राणा ते बापमा जी ॥ कोलाहल मुणि कोटवास श्राव्यो, नूप पागल धरचा रांकमा जी ||पोसदपारी देव जुहारी, दयावंत खेर नेटणा जी ॥ रायने प्रणमी चोर मूंकाची, शेठे की था पारणा जी ॥ ३ ॥ अन्य दिवस.विश्वानल लागो, सोरीपुरम आकरो जी ॥ सेम्जी पोसद समरस बैग ॥ लोक कहें हठ कां करो जी || ४ || पुण्यें हाट वखारो शेग्नी, नगरी सहू प्रशंसा करे जी ॥ दरखे सेम्जी तप ऊजमगुं, प्रेमदा साये श्रादरे जी ॥ ॥ ५ ॥ पूत्रने घरनो नार नलावी, संवेगी शिर सेहरो जी ॥ च. उ नाणी विजय शेखर सूरी, पासे तपव्रत श्रादरे जी ।। ६ । एक खटमासी व्यार चौमाशी, दासय वसो अध्म करे जी॥वीजा तप पिण बहुश्रुत सुव्रत, मौनएकादशी व्रत घरें जी॥ ॥ एक अध- मसुर मिथ्याष्टि, देवतासुव्रतसाधुने जी॥ पूर्वोपार्जित कर्म नदेरी, अंगे वधारे व्याधिने जी.॥ा कमै नमियो पापे जमियो, सुर क- है. जान औपधन्नणी जी. साधु न जाये. रोप.नराये, पाटु प्रहार हएयो मुनि जी ॥णा मुनि मन वचन काय त्रियोगे, ध्यान अनल दहे कर्मने जी.|| केवलं पामी: नितपदरामी, :सुबव नेम कहे श्याम जी ॥ १०॥ (ढालं चोथी) कान पयंपै नेमने ए, धन्यर यादव वंश, जिहां प्रनु अवतरचा ए ॥ मुझ मन मानस हंस, ज यो. जिन नेमने ए || .:॥ धन्य शिवादेवी मावमी ए, समुविज य...धन्य तात, सुजात :जगतगुरु ए.॥ रत्नत्रयी अवदात. ॥ ज २॥ चरण विराधी कपनो ए, हुं नवमो वासुदेव ॥ जयो० : तिणे मन नवि उससे ए चरण धरमनी सेवः ॥ जयोः ॥ ३ ॥ .
•- हाथी जेम कादव गल्यो ए, जाणुं नपादेय देय ॥ ज० तोपण हुं न करी सकुँ ए, 35 कर्मना नेय ॥ ज०॥ ४॥ पण सरणो बलियात ए, कीजै सो काज ॥ ज० ॥ एडवा वचनने सांस बी ए, बांद, ग्रह्यानी लाज ॥ जयो० ५ ॥ नेम कहे एकादशी ए; समकित युत आराध ॥ ज० ॥ पास जिनवर बारमो ए, नावी चोवीशीयें लाध ॥ जयो० ६॥ (कलश) श्य नेम जिनवर नित्य पुरंदर रेवताचस' मंगलो, वाण नंद मुनि चंद वरसे रा जनगरे संथुएयो । संवेग रंग तरंग जलनिधि सत्यविजय गुरु अनुसरी, कपूर विजय कवि कमाविजय गणि, जिनविजय ज यसिरी वरी॥१शक्ति । अथ माहावीरस्वामीनु हालरिऊं प्रारंभ ।। माता त्रिशला मुलावै पुत्र पालणे, गावे दालो हालो हाल रुवानां गीत, सोना रूपाने वली रत्ने जमिथु पालj, रेसम. दोरी घूघरी वागे तुमवुम रीत ।। हालो दालो हालो दालो मारा नंदते ॥१॥ जिनजी पार्श्वप्रन्नुयो वरस अढीशे अंतरे, होसे चोवीशमो तीर्थकर जिन परमाण ॥ केशीस्वामी मुखथी एवी वाणी सांजली, साची साची हु ते मारे अमृतवाण || दा० ॥ २ ॥ चौदे स्वने होवै चकी के जिनराज, चीता बारे चक्री नहि हुवै चकीराज । जिननी पास प्रभुना श्रीकेशी गणधार, तेहने वचनें जाण्या चो; वीशमा जिनराज ॥. मारी ,कूखे प्राव्या तारण तरण जिहाज, मारी कूखे पाव्या त्रएय भुवन सिरताज ॥ मारी कूखें याव्या संघ तीरधनी लाज, हुंतो पुण्यपनोती इंद्राणी पर घाज ॥ दा० ॥ ॥ ३ ॥ मुझने मोदलो उपन्पो जे वेसुं गजवामी, सिंहासण पर वेसुं चामर स्त्र धराप । ए तहु लक्षण मुझने नंदन तादरा ते. जना, ते दिन संचारुनें ग्रानंद अंग न माय । दा० ॥ ४ ॥ कर:
(०२) तस पगतल लक्षण एक हजार में आठ , तेहमी निश्रय जाण्या जिनवर श्री जगदीश ॥ नंदन जमणो जंगै संउन सिंह विराजतो, में पहले सुपनें दी। विसवावीश ॥ दा०॥ ५ ॥ नंदन नवला बंधव नंदीवर्दनना तमें, नंदन नोजाश्योना देवर गे सुकमाल, द ससे नोजाश्यो कदी देवर माहरा लामका, इसशे रमशे ने वली चूंटो खणशे गाल । इसशे रमशे में वली सा देसे गाल ॥ हाण ॥ ६ ॥ नंदन नवला चेझाराजाना जाणेज गे, नंदन नवला पां. चसे मामीनानारोज गे, नंदन मामलियाना नारोजा सुकमाल । इंशशे दाथे नचाली कहीने नाइना नाणेजा, प्रांख्युं श्रांजीने वली टवकुं करसे गाल ॥ हा० ॥ ७॥ नंदन मामा मामी सावशे टोपी आंगला, रतने जमिया कालर मोती कशबीकोर ॥ नीला पीला ने वलि राता सरवे जातिना, पहेरावशे मामी मारा नंदकि शोर ॥ दा० ॥ ॥ नंदन मामा मामी सुखमलों सहु लावशे नंदन गजुबे नरसे लाडू मोतीचूर ॥ नंदन मुखमा जोईने देशे मामी नामशा, नंदन मामी कद्देशे जीवो सुख नरपूर ॥ हा० । ॥ ए ॥ नंदन नवला चेमा मामानी साते सती, मारी मत्रीजी ने वैन तमारी नंद ॥ ते पण गूंजे नरवो खाखरासाई लावशे, तुमने जो जो दोशे अधिको परमानंद ॥ हा० ॥ १०॥ रमवा काजे खावशे लाखटकानो घूघरो, वली शूमा मेंना पोपट में गजराज ॥ सारस हंस कोयल तीत्तर में वलि मोरजी, मामी लावशें रमवा नंद तमारे काज ॥ हा ॥ ११ ॥ उप्पन कुमरी अमरी जलकमर्श नवरावीया, नंदन तुमनें अमने केली घरनी मांहि ॥ फूलनी वृष्टि कीधी योजन एकने ममले, बहु चिरंजीवो प्राशीप तुमने त्यादि । हा० १२|| तमनें भेरुगिरिवर सुरपतिये नव- निरखी दरखी सुरुत लान कमाय || मुखमा कारवाई (उ०३) कोटी कोटी चमा, वली तन पर वारं ग्रहगणनो समुदाय ॥ हा० १३ ॥ नंदन नवला जणवा नीशाले पण मूकशु, गज पर अंघाती घेसामी मोहोटे साज ॥ पसलो नरशुं श्रीफल फोफल नागरवेलझुं, सूखमलो लेगुं नोशावाने काज ॥ हा० १५ ॥ नंदन नवला मोहोटा थाशोने परणावशुं, वहु वर सरखी जोमो लावशुं राजकुमार ॥ सरखा वेवाई वेवाणूंने पधरावशें, वर बहू पोखी, लेशुं जो जोईने दीदार ॥ हा० १५॥ पीयर सासर मा- रा वे पक जला, मादरी कूखे आव्या तात पनोता नंद, मा- हरे प्रांगण दूग अमृत उधे मेळला ॥ मादरे प्रांगण फलिया सुरतरु सुखना कंद ॥ हा० १६ ॥ इणिपरे गायुं माता त्रिशला सुतनुं पासणु, जे कोइ गाशे देशे पूत्रतणा साम्राज ॥ पिलीमोरा नगरें : वरणव्युं वीरनु हाललं, जय२ मंगल होजो दीपविजय .कविराज । हा० १७॥ इति पदं ।। ॥ अथ निंदावारक सिझाय॥ निंदा म करजो कोश्नी पारकी रे, निंदाना बोल्या महा • पाप रे ॥. वयर विरोध वाधे घणो रे, निंदा करतां न गणे मायबाप रे ॥ निं १ ॥ र बसंती कां देखो तुम्हे रे, पगमां व खती देखो सह कोय रे ।। परना मेलामें धोया लूगमा रे, कहो केम कजला होय रे ॥ नि० ॥ २ ॥ आप संन्नालो सहुको आपणो रे, नींदानी मूको परी टेव रे, ॥ यो घणे अवगुणे सदु जरचा रे, के. हना नलिया. चूए केहना नेव रे ॥ नि० ॥ ३ ॥ निंदा करे ते याये नारकी रे, तप.जप कीधुं सहु जाय रे ॥ निंदा करो तो कर- जो आपणी रे, जेम चूटकवारो थाय रे ॥ नि:॥ ॥ गुण ग्रह- जो सहुको तयो रे, जेदमां देखो एक विचार रे॥ कृष्ण परे सुख शो समयसुंदर सुखकार रे॥ निः ॥ ५॥ इति ।।
(.००४) अथ देवचांदवानो विधिः || प्रश्रम शरियावदी पमिकमयाथी मामीने. यावत् लोगर कही पठी उसरासण करी चैत्यवंदन नमोत्युसं कही अमधु जय राय धान्नवमखका सूधी हाय जोमी कहै, वली चैत्यवंदन कही नमोल्गुणं कही यावत् चार थोयो कहीये गये तिहां सूधी वधू हे, परी नमोत्युगं कही बली च्यार थोयो कहीये त्यांसूची व कहे, पनी नमोत्युशं तथा घे जावंती कही स्तवन कहीं धमधुं: यवीधराय पानवमखंमा सूधी कही पठी चैत्यवंदन कदी नमोल्यु कदी पाखो जयवीमराय कदेवो. इहां सवारे देवांदवा तेमां मन जिणारांनी सझायं कदेवी, अने मध्यान्हें तथा सा देववादवाम समाय न कहेवी इतिःदेववांदवानो विधिः॥ ... ॥ अथ ज्ञानविमलजी कृत चउमाशो देववंदन विधिः॥ ॥प्रश्रम शरियावदी पकिमी. कानसम्ग करी लोगस्त.. ही एक खमासमरा देश श्चाका० श्रीज्ञपत्नजिन आराधनार्थ चैत्य बंदन करूं, एम कही चैत्यवंदन करे ।। (श्री आदिजिन चैत्यवंदन लिख्यते) ॥ प्रश्रम-जिनेसर रुपनदेव, संवष्यी चविया ॥ वाद चनथे, आपाढनी, शके संस्तविया ॥ अध्मी चैत्रह वदितणी, दि बसे प्रनु जाया || दीक्षा पिण तिणहिज दिने, चन नाणी पाया ॥ फागुण वदि ग्यारसी ए, ज्ञान लहे शुन्न ध्यान ॥ महा वदि ते रो. शिव वह्या, परमानंद निधान ॥१॥ हां नमो० अरिहंत चेश्या वंदणवतिया कहो एक नवकारनो कानसग पारी थुर क्रमयी कहियेते सखिये तीये।। (अय योय जोको प्रारंन्न |) पत्नजिन सुदाया श्रीमरुदेवी माया, कनक वरण काया, मंगला जास जाया-|| वृपन्न बंधन पाया देव नर नारी गाया, पणासय घणु नाया ते मनु'ध्यान गाया- १ ॥ ए जीरथ जाणी: जिन . ०५) त्रैवीश नदार, एक नेम विना सवि समवसरया निरधार ॥ गि कमणे पाया पोहता गढ गिरनार, चैत्रीपूनम दिने ते बंदू जयका ॥ ॥ ज्ञाताधर्मकांगे अंतगम. सूत्र मकार, सिद्धाचले सीधा वोल्या बहु अणगार.॥ ते माटे ए गिरि सवि तीरथ सिरदार जिन नेट. यावे सुख संपत्ति विस्तार !॥ ३ ॥ गौमुख चक्केसरी शा; सननी रखवाल, ए तीरथ केरी सांनिध करै संन्नाल ॥ गिरुओं जस महिमा संप्रति फाले. जास ॥ श्री ज्ञानविमल सूरी नामें लील विलास ॥ ४ ॥ इति ॥ इहां नमोत्थुणं जावंती ये कही नमोऽईकही स्तवन कहे, ॥ ॥ अथ आदिजिन स्तवन प्रारंभ ॥ ललनानी देशो। श्रादिकरन अरिहंत जी, नवगमो अवधार ललना ॥ प्रथम जिनेसर प्ररामीयें, वंग्ति फल दातार ललना ॥ आदि करण अ० ॥१॥ नपगारी अवनीतले, गुण अनंत नगवान ललना || वि- नाशी अक्षय कला, वरते अतिशय धाम ललना ॥ श्रा० ॥२॥ गृहवासे पण.जेहनें, अमृतफलनो आहार खलना ।। ते अमृतफलने. सहै, ए जुगतुं निरधार खलना ॥ श्रा० ॥ ३ ॥ वंश इदाग के जे. हनो, चढतो रश सुबिशेप खलना ॥ जरतादिक या केवली, अ नुन्नव फल रस देख सलना ॥ आ० ॥४॥ नानिराय कुलमणो, मरुदेवी सर दंत ललना ॥ रुपनदेव नित बंदिये, ज्ञानविमल अवतंस ललना ॥.या० ॥ ५॥ इति श्री पत्नजिन स्तवनं ॥ पी जयवीराय अओं कदेवू, एक खमासमण देई. श्या० श्री अजितनाथजी आराधनार्थ चैत्यवंदन करु.॥ ॥ अथ श्री.अजितनाय चैत्यवंदनः। शुदि वैशाखनो तेरशें, चविया विजयंत ॥ माह सुदि श्रा में जनमिया, वीजा श्री अजित ॥ माइ शुदि नयमें मुनि घया, नए (०६) पोपी ग्यारस ॥ नज्वल उज्वल केवली, थया अक्षय रूपारस || वैशाख शुक्ल पंचमी दिने ए, पंचम गति लह्या जेह ॥ धीर विमल कविरायनो, नय प्रणमें धरी नेहः ॥ २ ॥ इति ॥ पठी नमोत्युणं थरिहंतचे॥ कही एक नवकारको कानसग्ग करके धुनी गाथा कहै. इसी तरै सर्वत्र विधि करवी ॥ ॥ श्रथ थोय प्रार ते ॥ अजित जिनपतीनो, देह कंचन जरीनो ॥ नविक नगीनो, जेदयी मोद लीनो ॥ हुँ तुऊ पद खीनो, जेम जल हे मीनो ॥ नवि होय ते दीनो, ताहरे ध्यान पीनो ॥ १ ॥ अजित थोय ॥ ॥ अथ श्री शंन्नवनाथ चैत्यवंदन ॥ सत्तम अवेयक यकी, चविया श्री.शंन्नव ॥ फागुण सुदि आ दिने, शुदि चवदशी अनिनव . ॥ १ ॥ मृगशिरमा जनमी तणी. पूनम संजम । कार्तिक वदी पंचमी दिने, लहे केवल नि पम-॥ २ ॥ पंचमी चैत्रनी कजली ए, शिव. पोहता जिनराज ज्ञानविमल मन्नु प्रणमता, सीमै सगला काज || ३ ॥ इति चैत वंदन 1. ॥ अथयोयप्रारभ्यते ॥ जिन शंनव वारू, वने अश्व धारू ॥.नवजलनिधि तारू, कामगद तीनं दारू ॥ F 'तरुपरी. वारू, उसमाकाल :मारू ॥ शिवसुख किरतारू, तेहन ध्यान. सारू॥१॥इति योय समाप्त ॥ ॥ अथ श्री प्रति नंदन चैत्यवंदन ॥ जयंतविमानयकी चव्या, अन्निनंदनराय ॥ वैशाख सुदि चोधे माघ, सुदि वीजे.जाया ॥ माहा शुदि वार पदिय दिरक, पोप सुदि चनदश || केवल शुदि वैशाखनी, ग्राम शिवसुख रश ॥ चनथा.जिनवरनें नमी ए, चनगति भ्रमण निवार ॥ ज्ञानविमल गणपति कहै, जिनगुणनो नदी पार ॥ २॥ ॥ अथ स्तुति. प्रारभ्यते ॥ .॥ अनिनदन वंदो, साम्यमाकंद फंदो ॥ नृप संवरनंदो, घर्पिताशेष दो ॥ तमतिमिरदिशंदो, खंचने । थोय।। रश कजली (303) वानरिंदो । जस अागल मंदो, सौम्य गुण सारविंदो ॥ १ ॥ इति ॥ अथ श्रीसुमतिनाथ चैत्यवंदन ।। श्रावण सुदि वीज चव्या, मेहलीने जयंत ॥ पंचमीगति दायक नमुं, पंचम जिन सुमति ॥ शुदि वैशाखनो आपमें, जनम्या तिम संज म || शुदि नवमी वैशाखनी, निरुपम जस शमदम । चैत्रं ग्या- केवल पामे देव ॥ शिव पाम्या तिणे नवमियें, नय कहे करो तत सेव ॥ १ ॥ इति चैत्यवंदन ॥ ॥ अथन थोय प्रारभ्यते ॥ सुमति सुमति आपे, सुखनी कोमि काप ॥ सुमति सुजन व्यापे, वोधिनुं वीज व्यापै ॥ अविचलपद थापे, जाप दीप प्रतापे । कुमति कदही नावें, जो प्रनुध्यान व्यापे । १॥ इति घोय ॥ ॥ अथ श्रीपद्मग्रन्नु चैत्यवंदन ॥ नवम वेयकथी चव्या, मादा वदि उपदिवसें ॥ कातो. वदि वारसे जनम, सुरनर सवि दरखै ॥ वदि तेरस संज- म ग्रहे, पद्मपत्नस्वामी ॥ चैत्रीपूनम केवली, वलि शिवगति पामी ॥ मृगशिर वदि ग्यारसे, रक्तकमल सम वान || नयविमल जिन राज, धरियै निरमल ध्यान || १ || ॥ अथ योय प्रारन्य पद्मप्रनु सोहावे, चित्तमां नित्य आवे ॥ मुगति वधू म वे, रक्त तनुं कांति फावे ॥ पुःख निकट नावे, संतती सौख्य वे ॥ प्रनु गुणगण ध्यावे,अष्ट महासिदि थावे ||१॥ पार्श्वजिन चैत्यवंदन ॥ वा ग्रेवेयकयोचवी, जिनराज सुपाप्त। नादरवा वदि आपमें, अवतरिया खास | जेठ शुक्ल वारतो जण्या, स तेरसे संजम ॥ फागुण वदि न केवली, शिव लहे तस स 'मि || सत्तम जिनवर नामश्री ए, साते इति समंत ॥ ज्ञानविम ख सूरि नितु लहै, तेज प्रताप महंत ॥ १ ॥ ॥ श्रय योय प्रारभ्यते॥ फले कामित आशे, नामयी जुःख नाशे || म अथ श्री (106) दिम मदि प्रकाशे, सातमा श्रीसुपासें || सुरनर जस दास, है दानो निवाश || गायनवि गुणरास, जेहना धरी उखास !!! इति ॥ ॥ अथ श्रीचंयन्न जिनचैत्यवंदन।। चमन जिन ग्मा, चंशन शम देव ॥ अवतरीया विजयंतथी, वदि पंचमी त्रेह ॥ पोप वदि बारसें जनमिया, तस तेरसे साध ॥ फागुण दिनी सातमें, केवल निरावाध ॥ नाद्रव सातम शिव लह्याए, पूर पूरा ध्यान ॥ श्रम महासिहि संपजै, नय कहै जिननिधान॥ ॥अथ थोय प्रारभ्यते ॥ ॥ शुन्न नरगति पामी, नद्या धर्म धामी॥ जिन नमो शिरनामी, चंद्रप्रन नाम स्वामी ॥ मु अंतरजामी, जेहमां नहिय खामी ॥ शिवगति बरामी पुण्ये पामी ॥१॥ इति ॥ ॥ श्रथ सुविधनाथ चैत्य वंदन । गोरा सुविधि जिणंद नाम, बीजुं पुप्फदंत ॥ फागुण वदि. वमें चव्या, महेसी सुर आनंत ॥ मृगशिर वदि पंचमे जंएया, तस ई दिक्षा ॥ काती शुदि त्रीजें केवली, दिये बहु परें शिक्षा ॥ शु 'दि नवमीनाक्ष्वा तणी ए, अजर अमर पद दोय ॥ धीर विमल सेवक कहे, ए नमतां सुख होय ॥ १ ॥ इति ॥ य प्रारभ्यते ॥ सुविधि जिन नहतं, नाम वलि पुष्फ ‘दंत ॥ सुमति तरुणि कंत, संतश्री जेद संत ॥ कीयो कर्म पुरंत, लधि लीला वरंत ॥ 'नव जलधि तरंत, ते नमीजे मदत ॥ इति ॥ ॥अथ श्रीशीतलनाथ चैत्यवंदन ।। प्राणतकल्पपकी चव्या, शीतल जिन दशमा । वदि वैशाखनी है, जाणि दाघ ज्वर प्रशम्या ॥ मादा वदि.वारस जनम विरल्या, तस वारसें लीध ॥ यदि पोप चवदश दिने, केवली परसि ॥ व वि वीजै वैशाखनी ए, मोक गया जिनराज ॥ ज्ञानविमल जिन राजश्री, सीमे संगला काज ॥ १॥ इति ॥ ॥ अथोप ॥ अथ धो . ।
इति ॥ ( ७०० ) प्रारभ्यते ॥ ॥ सुण शीतल देवा, वासही तुझ सेवा ॥ जे- गज मन रेवा, तूही देवाधिदेवा ॥ पर याणव देवा, शम चै निर मेवा ॥ सुख सुगति सहेवा, हेतु एक खपेवा ॥ १ ॥ इति ॥ ॥ अथ श्रीश्रेयांश जिनचैत्यवंदन ।। || अच्युतकल्पथक चव्या, श्रेयांश जिनंद ॥ जेठ अंधारी दिवस के, करत बहु अ नंद ॥ फागुण वदि वारसे, जनम दीक्षा तस तेरस ।। केवलीमा अमावशि, देशन चंदनरस ॥ वदि आवरा त्रीजै लह्या ए, शिवसु ख अक्षय अनंत सकल समीहित पूरणो, नय कदै एनगवंत ॥१॥ ॥ अथ थोय प्रारज्यते ॥ सवि जिन अवतंस, जास श्क्षागवंश ॥ विजित मदन कंश, शुश्चारित्र इंग॥ कतलय विध्वंश, तीर्थनाथ श्रेयांश ॥ सपन ककुद अंश, ते नमुं पुन्य वंश ॥ १ ॥ अथ श्रीवासुपूज्य चैत्यवंदन ॥ प्राणतथी हां आविया, ज्येष्ट सुदी नवम ॥ जनम्या फागुण चौदशी, अमावजी संजमः। माह शुदि बीजे केवली, चौदशि बापाढी || शुदि शिव पाम्याक म. कष्ट, सवि दूरे काढी ॥ वासुपूज्य जिन बारमा . ए, विद्रुमरंगे काय ॥ श्रीनयविमल कदे सुं, जिन नमतां सुख श्राय ॥ ३॥ || अथ योय प्रारच्यते ॥ वासुदेव नृप तात, श्रीज यादेवी मात ॥ अरुणकमल गात, महिप लंग्न विख्यात ॥ जस गुण अवदात, गीत जाणे निवात ।। होय नित सुख शांत, ध्याव नां दिवस रात ॥१॥ इति ॥ ॥ अथ विमलनाथ चैत्यवं ॥ अहम कल्पथकी चव्या, माधव सुदि बारस...शु दे.महा. त्रीजें जण्या, तस. चोथे व्रत.रस, शुदि पोप में सह्या, र निर्मल केवल ॥ वदि सातमि प्रापाटनी, पाम्या पद अविचल । विमल, जिणेतर.बंदिये ए, ज्ञानविमल करी चित्त... तेरसमो जन नितु दिये, पुण्य परिपल विन ॥ १ ॥ इति . ..! :श्रय (१०) थोयं प्रारज्यते ॥ विमलर नावे, वंदतां उख जावै । न निधि घर आवे, विश्वमा मान पावै ॥ सुघर संवन कावै, नोकि नरस्वेद यावै।। मनु विनति जणाव, स्वामिनुं ध्यान ध्यावे ॥१ इति ॥ अथ श्रीअनंतनाथ चैत्यवंदन ॥ प्रातघकी चविचा इहां श्रावण वदि सातम । वैशाख वदि तेरसी, जनम्या चवदसे व्रत । वदि वैशाखे चवदति, केवल पुण्य पाम्या ॥ चैत्र शुदि पंचर्म दिने, शिववनिता काम्या ।। अनंत जिनेश्वर चनुदमाए, कीधा मन अंत ॥झान विमल कहे नामयी, तेज प्रताप अनंत ||१४ ।। अथ थोय प्रारभ्यते॥अनंत जिन नमीजै, कर्मनी कोटि वीजे ।। शिवसुख फल लीजै, सिद्धि लीला वरीजै ॥ बोधिवीज मोह दाजै, एटलुं काज कीजै । मुझ मन अति रीमे, स्वामिन कार्य सी ॥ ॥ अथ धर्मनाथ जितचैत्यवंदन ॥ ॥ वैशाख सुदि सातमें, चविया श्रीधर्म | विजयथकी माहमाशती, शुदि त्रीजें जनम ॥ तेरसमाही कजली, लिये संजमनार ॥ पोपिपूनमें के वली, गुंगना नंगार | नेगी पांचम कजलीए; शिवपद पाम्या जेद ॥ नय कहे ए जिन प्रणमतां, वाघे धर्म सनेह ॥ १५ ॥ ॥ अथ धोय प्रारज्यते ।। धर्म जिनपतीनो, ध्यानरसमांर नीनो ॥ वररमण सचीनो, जेहने वर्ण लीनो ॥ त्रिनुवन सुख कीनो, संग्ने वज दीनो, नवि' दोय ते दीनो, जेदने तूं. वसीनो ॥ * ॥ अथ श्री शांतिनाथ चैत्यचंदन ॥: वदि सातम दिने, सवयी चविया || वदि तेरत जे जए या, ॐ खदोदग शमीया || जेठि चवदस वंदि दिने, लीये संजम वेम " केवल नऊल पोसनी; नवमी दिन खेम ॥ पंचम की परवमा ए शोलमा श्री जिनराज॥जे वपि तेरशें शिव सह्या, नय कदे सारो काज ॥ १६ ॥ . ॥ अथ योय प्रारच्यते ॥ , नादवा जिनपति (७१२) जयकारी, पंचमो चक्रधारी । विन्नुवन सुखकारी, सप्त नय इति वार। ॥ सहस चनसहि नारी, चन्द रत्नाधिकारी ॥ जिन शांति जीतारी, मोदे दस्ति मृगारी ॥ १॥ शुन्न केशर घोसी, मांद क- पर चोली ॥ पेहरी शीत पटोली, वालिये गंध धूती ॥ नरी पुष्प पटोली, टालीयें सुख होली ॥ सवि जिनवर टोली, पूजीये नाव सोली ॥ २ ॥ शुन अंग ग्यार, तेम नपांग वार ॥ वलि मूल सूत्र चार, नंदी अनुयोगदार ॥ दश पयन्न उदार, वेद खट वृत्ति सार ॥ प्रवचन विस्तार, नाप्य नियुक्ति सार ॥३॥ जय जय जय नंदा, जैन दृष्टी सुरिंदा ॥ करै परमानंदा, टालता ख धंदा॥ ज्ञानविमल सूरिंदा, ताम्य माकंदकंदा ॥ वर विमल गिरिंदा, ध्या नयी नित्य नदा ४ ॥ इति ॥ ॥ अथ ,स्तवन प्रारंन ।। मोतीमानी देशी॥ सफल समीहित सुरतस्कंदा, शांतिकरण श्री शांतिजिशंदा ॥ सादिवा जिनराज दमारा, मोहना जिनराज हमारा ॥ सा०॥ त्रिकरण शुद्ध चरण तुक विखगो, पलक मात्र न रहुं दिव अलगो || सा० ॥ १ ॥ विलगो ते अलगो केम जाशे, यो पण तुम्हें नवि टमाशे ॥ सा० ॥ मनु तुम्हे कोश्शुं नेह न वो, वीतराग कही सवि समझावो । सा० ॥२॥ वीजा अवर हो एम समझे, पश गैरू दीघाथी रोके.॥ सा० ॥ बालकना यी नवि चाले, जे मांगे ते मावित्र पाले ॥.सा० ॥ ३ ॥ नक्ति ची मनमांहे पाण्यो, सहज स्वन्नावें पण में जाएयो ॥ सा ॥ दरे एक प्रतिज्ञा साची, तुम पद सेवा अंके, जाची ॥ सा ॥ ४ ॥ करजे श्राव्या तो बूटीजे, जेह मुंद मागे तेहिज दीजै । 10 ॥ अन्नेदपणे जो. मनमां मलशो, करजेश्री प्रन्नु तो नीकल- | ॥ सा० ॥ ५ ॥ अस्कयन्नाव निधी.तुम पाश, आपी.दासमें प्राश ॥ ज्ञानविमल समति प्रजुताई, दोधी साहव एद व (१२) माई । सा० ॥.६ ॥ इति पदं ॥ . . . . अश्य श्रीकुंथुनाय वैत्य- वंदनं ॥ श्रावण वदि नवमी दिने, सवयी चविया ॥ यदि चवदश वैशाखनी,,जिन कुंयुःजाणिया । यदि पंचमी वैशाखन); लीये संजमन्नार ॥ शुदि त्रोजे चैत्रहतणी, सहे केवल सार । प शिवा दिन वैशाखनी ए, पाम्या अविचल गण.॥ उमा चक्री जप करू, ज्ञानविमल सुखंखाण ॥१॥ ॥ अथ योय प्रारम्यते ॥ जिन कुंघु दयाला, गग लंपन सुदाला ॥जश गुण शुलमाला, कंठे पैदरो विशाला ॥ नमति नवि त्रिकाला, मंगल श्रेणी माला ॥विन्नुवन तेजाला, तोहरे तेज माला ॥ १७ ॥ इति-योय ॥ .. ॥ अंय श्रीधरनाय चैत्यवरन । ॥ सरवारययीभाविया, 'फागुण शुदि. वीजे | मृगशिर शुदि दशमी जएया, अरव नमी जे ।। मृगशिर सुदि एकादशी, संजम भादरियो । काती उन वारसें, केवलगुण वरिट || शुदि दशमो मृगशिरतणी., शिवपद सद्दे जिननाय । सातमचकाने नमू, नप कहे जोमी दायर ॥ श्रय योय पारन्यते॥ ॥ अरजिन ए जुदाई, क मनो केस वारूं । अदनिश संना, ताइरो नाम धारूं। कृत ज यजयकार, प्राप्त संसार सारूं । नवि होय ते सारूं, प्रापणो आप तारूं ॥१८॥ इति.॥ । थंय श्रीमलिनाथ चैत्यवंधन ।। चव्या जयंतविमानधी, फागुरा शुदि चन॥ मृगशिर सुदि ग्या रसें, जनम्पा निये ॥ शान सह्या एकण.दिने, कन्याराफ तीन ! फागुश शुदि बारसें, खहे . शिव सदन अदोन ॥ मति निसर नीसमा ए, नगलीशमा जिनराज || अपापरण्या अणनूप जा जस तरण जिदाज॥१॥ ॥ अथ योय प्रारत्यत ।। जिन मद्धी महिला, बान में जेद नीता, प ययाज सोसा, खा पो नाम नीबानमन सपि पीच्या, लामि जो रे #lal .
. . (७१३) अविचल सुखलीला, दीजिये सुरा रंगोला ॥ १ ॥ इति मंजि स्तुति ॥ ॥ अथ मुनिसुव्रत जिनचैत्यवंदन ।। अपरा जितथी श्राविया, श्रावण सुदि पूनम ॥ श्रापम जेठ अंधारमी, भयो सुव्रत जनम ॥ फागुण सुदि वारसें व्रत, वदि बारसें ज्ञान । फागुणनी नेम जेठ नवमी, कृष्णे निर्वाण ॥ वर्ण श्याम गुण न. जसा, तिहुयण करे प्रकाश ॥ ज्ञानविमल जिनराजना, सुरनरना यक दास || २॥ ।। अथ थोय प्रारभ्यते ॥ मुनिसुन, तस्वामी हुँ नमूं शीश नामी, मुझ अंतरजामी कामदाता अंका- मी ॥ :खदोहग वामी पुण्यथी शेव पामी, शम्या सर्वदारामी राज्यता पूर्ण पामी ॥ १ ॥ इति ॥ ॥ अथ श्रीन मिनायचे त्यवंदन ॥ धाशो सुदि पूनम दिने, प्राणतथी आया ॥ श्रा वण वदि थाम दिने, नमीअिनवर जायां ॥ वदि नवमी पापाढ नी, यंया तिहां अणगार || मृगशिर सुदि इग्यारसे, वर केवल धार ।। वदि दशमी वैशाखनी ए, अरकर घेनंता सुरक । नय कहे श्रीजिन नामथी, नाशे दोहगःस्क ॥२॥ ॥ अथ थोय प्रा रयते॥ नमो जिनवर मानो, जेदनही विश्वगनो सुत वा मानों, पुण्यकेरो खजानो ॥ कुनकम्मल वानो, कुंल जे रुपानो ॥ स वि नुवन प्रमानो, तेह| एक तानो ॥ १॥ ॥ अथ श्रीने मीनाथ चैत्यवंदन ।। ॥ अपराजितश्री आधिया, काती वदि पारस || श्रावण शुदि पंचमी जएया, यादव अवतंस || श्रावण सुदि उठे संजमी, आसोज अमावत नाथ ॥ शुदि आपाढनी श्री में, शिवसुख लहे प्रमाण । रिम्नेमो अपरणीया ए, राजी' पतीना कंत ।। ज्ञानविमल गुण एदना, लोकोत्तर वृत्तंत ॥२२॥ इनि' ॥अथ थोय प्रारच्यते ॥ गया शवागारे, शंख ने दाथ धारे || कियो शब्द प्रचार, विश्व कंप्यो तिवारे दार . ए०
संशय धारे, एदनी कोर तारे ॥ जयो नेमकुमारे, बालश्री ब्रह्मा
रे॥१॥ चार जंबुद्वीपे, विचरंतर जिनदेव, । अझ धातकी,
मुरनर सारे सेव ॥ अम पुष्करमरधे, इणि परें वीश जिनेश । से
प्रति ए सोदे, पंच विदेह निवेश ॥ २॥ प्रवचन प्रवहण समाज
बजलनिधिने तारे कोद्दादिक मोटा, मछतणा जय घारे ॥ जिस
जीवदयारस, सरस सुधारस दाख्यो। नविन्नाव धरीने चित करीने
चाख्यो ।।३।। जिनशाशन सानिध्य, कारी विधन विझारे ।समफित
दृष्टी मुर, महिमा जास यधारे ॥ शेर्बुजगिरि सेवो, जिम पामोन
व पार || कवि धीरविमलको, शिष्य कदे सुखकार ॥ ॥ ॥ इति।।
॥ अय स्तवन प्रारंन ।
॥ रदो रहो रे पावन पो।
मीप, दो धमीयां यो चार पी 11 रो रदो० ॥ मोज मदिरा
शिवादेवी जापा, तुमेको प्राधार यमयमियां रहो ना.
दविवाद घाइ करी आए, गुंजावत फिर स्थनमा मो.
२॥ पशुप पुकार सुपगीय काय करुणा, गेमनीपासोनिया
॥रदो० ३॥ गोद शिग में पती जान, कर बीती चोप
मियां रही. ५॥ पी पिन दीवात वरिस समोर, नगमे
सपनमें संजभियां रहो.५॥ विद दिवानी विपतिजीवन
वाली बन पर किया परदो०६॥ अयनांतर नेमिनार
ज, नासते वीमीपारी ३॥ सहसानमांसा
मान, रायतामा नरिया ॥
Raigatiri
तिरं दाये बाबत चासे चावरियो ।
राना
इंसानिय नेमजी, गजुद्ध मीठी नदियां रही. १०
मोनी नियन, दात दोन मिरी बनीiafar
प्रयातामनायवदन ।
पात्रातील प्रारी
( ७१५)
नम, विनुवन सुख पाया॥पोष वदि ग्यारसे, लहै मुनिवर पंथ ॥
कमगर नपानो, टाल्यो पलीमंथ ॥ चैत्र कृष्ण चोद दिने
T, ज्ञानविमल गुण नूर ।। श्रावण शुदि आपमें ब्रह्मा, अविचल
मुख नरपूर ॥२३॥इति ॥ ॥अथ धोय प्रारभ्यते || जलघर'
अनुकारे, पुण्यवल्ली चधारे || रुत सुरूत संचारे, विधनने जे विमा
रे । नवनिधि प्रागारे, कटनी कोमि वारे ॥ मुझ प्राणाधारे, मात
वामा मल्हारे ॥ १ ॥ अर जनम सुहावे, वीर चारित्र पावै ॥ S
नुन्नव सय लावै, केवलज्ञान पावै ॥ पट् जे कल्याण, संप्रति जे
प्रमाणे ॥ सवि जिनवर नाण, श्रीनिवासाहि गण ॥२॥ दशवि
धि श्राचार, झानना जिहां विचार ॥ दरा सप्त प्रकार, पच्चरका
पादि विचार ।। मुनि दश गुणधार, जे नया जिदा नदार ॥ ते
प्रवचन सार, ज्ञानना जे आगार ॥ ३ ॥ दश दिशी दिशिपाला,
जेमदा लोगपाला ॥ सुरनर मदिमाला, शुद्धदृष्टी रूपाला, नयवि
मत विशाला, ज्ञान सही मयाला ॥ जय मंगलमाला, पास नामे
॥ श्रथ स्तवन प्रारंन्न ॥ ॥धारे मा
थे पंचरंगी पाग सोनानो गेगलो मारूजी ॥ मनु पास जिनेसर
नुवन दिनेसर संकरो, सादिवजो ॥ लीला अलवसर धीरममंदिर
नूधरो ॥ साहिवजी ॥ तुं अगम अगोचर कृत शुचि सुंदर संवरो,
सा० ॥ पद नमित पुरंदर तनुववि निरमल जलघरो ॥ सा० १ ।।
तूं अक्षय अरूपी ब्रह्म सरूपी ध्यानमां, सा ॥ ध्याये. जे जोगी
तुम गुण नोगी ज्ञानमा ॥ सा० ॥ व्यवहार प्रकाशी निश्रय वासी
निजमते, सा० ॥ जिन आतम दरसी अमल अजेसी नयमतें।
सा० २ ॥ पट् दर्शन मासे युक्ति निरासे शासने, सा० ॥ स्पाद-
वाद विशालें सहज समाजे भावने । सा० ॥ तूं झानने झाने
प्रातमध्याने पातमा, सा०॥ परमागम वेदी नेद अजेद नही त-
सुखाला ॥३॥
(१६). मा.॥ सा ३ ॥. एक अनेके बढ़त विवेके देखिय, सा० ॥ आत म ततकामी अगुपण अकामी लेखिये ॥ सा०॥ सवि गुण धारा मी गे वहुनामी घ्यानमां, सा०॥ आपे गतनामी अतरजामी झा, नमा ॥ सा० ४॥ तूं अनियतचारी नियत विचारी योगमा, सा. ॥अध्यातम सेली एम बहु फेली आगमें ॥ सा० ॥ तूं धर्म सन्या सी सहज विलासी समगुणे, सा० मोहारि विनाशी तूं . जितका शी कवि नणे | सा० ५ ॥ ज्ञानदर्शनदायक गुणमणी लायक नाथ है, सा० ॥ उर्गति सुखधायक गुणनिधि दायक हाथ वै ।। सा ॥ जित मनमथ सायक विन्नुवन नायक रंजगो, सा० ॥ नेकांती एकांती तूं वेदांती प्रगंजणो ॥ सा ६ [[ ध्यानानल योगें पुदगल नोगे ते दह्या, सा०॥ अंतररिपु दणिया मूलयी खणिया न 'वि रह्या ॥ सा० ॥ तूं हेतू समीयो सुरवर नमीयो सहु सा० ॥ए जगयी न्यारो चरित्र तुमारो कुरा लहे । सा० '॥ श्म तुम गुण युणियें फर्मने दणिये पलकमां, सा० ॥ पण नवि अवगणिये सेवक गणिये सलकमां ॥ सा०॥ वामाचे नंदा विन्नुवन इंदा संथुणे, सा० ॥ झानविमल सूरिंदा तुम पर वंदा गुण नणे ॥ सा० ॥ ॥ इति ॥ ॥अथ श्रीवर्द्धमान जिनचैत्यवंदन ॥ शुदि आपाढ कह दिवसें, प्राणतथी चवि या.॥ तेरस चैत्रद शुदि दिने, त्रिसलायें जणिया ॥ मृगशिर वदि 'दशमी दिने, पापे संजम पाराधै ॥ शुदि दशमी वैशाखनी,. वर केवल साथै ॥ काती रुप्य प्रमावशी ए, शिवगति करै नुद्योत.। झान विमल गौतम खद, पर्व दीपोत्सव होत ॥ २४॥ इति, ॥ अथ योय प्रारनाते॥ बह्यो नवजल तीर, धर्म कोटी हीर । उरति रज समीर, मोह.मूतार सीर ॥ उरित दहन नीर माग || कप्पें सरगं कर पथसय.. घणु मा. सासय प्रसास . ..
(७१)
रुथी अधिक धीर । चरम श्रीजिनवीर, : चरण कल्पह कीर॥
।१॥ म जिनवर माला, पुण्य नीर प्रवाला । जगजंतु दयाला;
जर्मनी शास्त्रशाला ।। रुत सुरूत सुगाला, ज्ञानलीला विशाला ||
तुरनर महिपाला, वंदता चै त्रिकाला ॥ ॥ श्रीजिनवर वाणी,
बादशांगी रचाणी ॥ सुगुण रयणखाणी, पुण्य पीयूप पाणी ॥ न.
म रस रंगाणी, सिाद सुखनी नीसाणी ॥ इद पीलण घाणी,
सनिलो नाव जाणी ॥ ३ ॥ जिनमत रखवाला, जे वली. लोगपा
ला ॥ समकित गुणवाला, देव देवी रुपाला || करो मंगलमाला,
दालीने मोहहाला । सहज सुख रसाला, वोध दीजै विशाला ||
मथ स्तवन प्रारंज॥
आज गइ थी हुँ समव
तरणमें । ए चाल॥ वंदो वीर जिनेसरराया, त्रिशलामाता
जाया जी ॥ हरि उन कंचन सम काया, मुज मनमंदिर आया
जी ॥ वंदो बी० ॥ १ ॥ दूपम समय शासन जेदना, शीतलचं
दन बाया जी ॥ जे सेवंता नविजन मधुकर, दिनर दोत सवाया
जी ॥ वंदो०.२ ॥ ते धन्य प्राणी सदगति जागी, जस-- मनमा
जिन पाया जो ॥ वंदन पूजन सेवन कीपी, ते काजननी माया
जी।। वंदो० ३ ॥ कर्म कग्नि, जेदन बलवत्तर, वीर विरुद जिन
पाया जी । एकलमल, अतुलीवल अरिहा, उसमन उर गमाया
जी वंदो० ॥ ॥ वंडित पूरण, संकट चूरण, मातपिना तूं सहा
या जी ॥ सिंहपरे,चारित्र पाराधी, सुजत निशान बजाया जी.॥
वंदो०५ ॥ गुण अनंत जगवंत विराजे, व ईमान जिनराया- जी
॥धीरविमल कवि. सेवक नय कद, शु समकित, गुणदाया जी
॥ वंदो०.६॥ इति ॥ हां पूरण जयवीयरायः कदेवो ॥
i... ॥अथ श्री शाश्वता अशाश्वता जिन चैत्यवंदन।।
सकर
मंगलकार एदी, सिद्ध सकल पय धाए । स्यादाद साधन पद एदी,
(१८) अध्यातम गुरगाण ॥१॥ (सही ए नमो जिणाणं)२ (ए पाकणी) विहुंतेर लरक सग्गकोमि नवणवई, सासय जिग हर माणं ॥ तेरशें नव्याशी कोमी, तग्गस विवह परिमाणं । सही० ॥३॥ मेरु वैताढ्य वरकारा कंचन, यमक कुंम इह जाणु। एकत्रीश ओगण्यासी जिनवर, मानवलोके वखाणु ॥ स० ॥ ४ ॥ त्रिलख श्क्याशी सहस चारतो, ज्यासी अधिक विंव जाणुं । रुच क कुंकल नंदीसर प्रमुखें, सुंदर अशी चेश्या' ॥ स० ॥५॥ अमः शत सय तहस चालीसा, वित्रतणुं परिमाणं । सरवाले बत्तोससे गुणसघी, तिर्यक्लोके चेश्याणं ।। स० ॥ ६ ॥ प्रतिमा त्रण लख सहस एकाj, चन सय तेवीस. परिमाणं ॥ साठ चौवारा अवर त्रिवारा, रुवक कुंग नंदी गणं ॥ स० ॥ ७ ॥ वार देवलोकें नव वेयके, अनुत्तर पंच विमाणं ।। लाख चोराशी सहस सत्ताएं, त्रे वीश चे जाणुं ॥ स० ॥ ॥ एकसो बावन कोमि लख चोराj, सहस चमालीस आणुं । सातशें साठ ऊपर नईलोकें, जिन प मिमा मन श्राणुं । स० ॥ ॥ विन्नुवनमांहे सासय जिनहर, सगवन्न सस्क बसें व्यासी ॥ आप कोमि अथ प्रतिमा संख्या, सु जो समकितवासी ॥ स० ॥ १०॥ पन्नरों कोमी बैंतालीश कोमी, सेम अभवन्न लरका ॥ त्रीश सहस अशी वलि साधिक सासयविनी संख्या ॥ स० ॥११॥ एकसो वीश त्रिवारे प्रति मा, चोमुखें शत चौवीश ॥ पांच सन्ना तिहां साठ वधारो, एकरा त अशी नगीश ॥ स०॥ १२ ॥ रुपन चंशनन में वर्षमान, वा रिवेण चन नामें || व्यंतर ज्योतिषी मांदे असंख्या, जिनघर पकि मा माने ॥ स० ॥ १३॥ सकल सुरासुर नावना जावे, समकि। तगुण दीपावै ॥ परित्न संसार करी शिव जावै । कुमति ते मन जावे ॥ स० ॥ १५ ॥ पाताले ने तिर्यकलाके, पयसप धणु परि ur ( ७१) जाण ॥ स० ॥ १५ ॥ तीर्थ विशेष वली शासय विणु, सेनादि क बहुला || ते सविहूनें त्रिविधे नमतां, पातक जाये सगला । स०॥ १६ ॥ ज्ञानविमल प्रनु नाम जपंता, लहिये कोमि कल्या पण || मनह मनोरथ सगला सीम, जनम सफल सुविदाण ॥स० ॥ १७ ॥ जयदर नगवंताणं जयत्तुर, नमो जिणाणं सही ए॥ नमो अविचल आदिगगणं, सही ए नमो अरिहंताणं ॥ सही०॥ ॥ १७॥ इति श्री सर्व जिन नमस्कारः ।। यहां एक लोग स्सको कानसग चंदेसुनिम्मलयरा सूधी एक जण करे, ते कानस ग्ग पारी पठी चार थोयो कहेवी ते लखिये दिये ॥ ॥ अथ थोय प्रारच्यते ।। रुपनवे नमुं गुण निर्मला, उध- मांहे जिम नेली सीतोपला || विमल शीलतणा सिणगार है, नवरं मुझने चिशे रुचै ॥ १ ॥ जेद अनंत श्रया जिन केवली, जेह इसे विचरंता जे वली ॥ जेद असासय सासय त्रिहुँ जगे, जिन पमिमा प्रामुं नित जगमगे ।। २ ॥ सरस श्रागम कोर महोदधी, त्रिपदी गंग तरंग करी वधी ॥ नविक देव सदा पावन करे, उरित तापर जोमल अपरे ॥ ३ ॥ जिनपशासन नासन कारिका, सुर सुरी जिनाणा धारिका ॥ ज्ञान विमल प्रनुताये दीपता, उरित उष्टतया नय जीपता ॥ ॥ इति शाश्वत अशा- श्वत जिनस्तुति ॥ ॥ श्रथ विधिः॥ हा एक जरा मोटो शांति कहे (अने) वीजा सर्व कानसग्गमा सांजले ।। पठी सर्व जणा कानसंग्ग पारीने प्रगट एक लोगस्स पूरो कहै, ॥ पठी वैतीने एकवीश नवकार प्रगटपणे सर्व जण गणे, पठी सवें जप मुखयकी आयी रोते कहे- श्रीशेजूंजायनमः । श्री पुरीका पनमः २ श्रीसि-केत्रायनमः ३ श्रीविमलाचसायनमः । श्री सुरगिरयेनमः ५ श्रीमहानिरपेनमः ६ श्रीपुएयराशयेनमः . श्री - (७२०) पर्वतायनमः श्रीपर्वतेशायनमः ए श्रीमहातीर्यावनमः १० श्री शाश्वतायनमः ११. श्रीदशक्तयेनमः १२ श्रीमुक्तिनिलायनमः १३ श्रीपुष्पदंतायनमः १४ श्रीमहापद्मायनमः. १५. श्रीष्टथ्वोपीठाय नमः १६ श्रीसूरन गिरयेनमः १७ श्रीकेलाशगिरयेनमः १७ श्री पातासमूलायनमः १५ श्रीयकर्मकत्रेयनमः २० श्रीसर्वकामपूरणा यनमः २१. ॥.ए सिइगिरीना २१ नाम सर्वने मुखे प्रगट कहीने पवे. पांचतीर्घना पांच स्तवन कदवा ते लखिये ठिये ॥.. ...] प्रथम सिद्धगिरी स्तवन ॥ ॥ साहेलडीयानी देशी॥ नीलमी रायणतरूतले, साहेलमियां ॥ पीलमा प्रनुजीनी पाय, गुणमंजरीया ।। ऊजले ध्याने घ्याइये, सा० ।। एडीज मुग ति नपाय ॥ गु० १ ॥ शीतमी गयाये वैसीये, सा० ॥ रातमा करी मनरंग || गु० ॥ नाही धोई निर्मल थई, सा०॥ पहेरी व स्वादिक चंग || गु० ॥ २॥ पूजीये सोवन फूलमे, सा॥' नेद धरीने एद। गु० ॥ ते वीजे नवे शिंच सदे, सा०॥ थाये निर्म स देव ।। गु० ॥ ३॥ प्रीत घरी पदकणा, सा०॥ दीए एदने में सार । गु०॥ अनंग प्रीति होए जेहनें, सा० ॥वर तुम या धार ।। गु० ॥ ४ ॥ कुसुम पत्र फल मंजरे, सा० ॥ शाखा श्रम ने मूल || गु० ॥ देवतणा वासाने, सा० ।। तीरयनें अनुकूल ।। ॥ गु० ॥ ५ ॥ तीरथ ध्यान धरी मनें, सा० ॥ सेवो एहने नचाई ॥ गु॥ ज्ञान विमल गुरु नाखियो, सा० ॥ राजा महातम मादि ॥ गु० ॥ ६ ॥ इति श्रीतर्बुजा स्तवनं ।। ॥ अथ श्रीगिरनारतीय स्तवनं ॥ देखी कामनी दोय के कामे व्यापियो, होला काम।ए चाल ।नेम निरंजन देव के सेव सदा कर दो साल के । सेय.!! ..
'(१ ) अहानिश ताहरू ध्यान के दिल मांहे धरूं हो लाल, दि०॥ शंखें लंग्न गुणखाण के अंजन वान चै हो लाल के अं० ॥ राजिम: तीना कंत के परण्या विणुअ चै हो० ५० ॥ १ ॥ तूंदीज जीवन प्राण के प्रातमराम के दो० प्रा० ॥ मादरे परम थाधार के ताहरु नाम के हो० ता० ॥ समुविजक्ना नंदन नितु नितु बंदता हो. निकीजीये करूणावंत के कर्मनिकंदना हो० क० ॥२॥ जोत्या मनमय राज रदी गढ कपरै दो० २०॥ पहरी शील सन्नाद नदास एसी धरै दो० कदा० ॥ सवि जिनवरमा स्वामि तुझे अधिकुं करयुं हो. तु० ॥ कुमरपणे धरी धार महावन नवरघु दो० मा० ॥ ३ ॥ प्रात नवांतर नेह जे तेद देखोने हो० ते ॥ करुणा कीधी केवल पशुवां देखोने हो० पशु०॥ पूरण पाली प्रीत वली निज नारने दो० ३०॥ापी संजमनार पदोचामो पारमें दो० पो० ॥ ४ ॥ जण जराशुं जे प्रीत करे ते जन घणा हो० करे० ॥ निरवाहे घर। नेह के ते विरला सुएवा हो. ते वि०॥ राजामतीनो कंत. वखाणे कविजना हो २० ॥ तुझे तो दीधा व्ह के तेहना घिर मना हो ते० ॥ ५ ॥ जा बनाय सनाय करो मुझने सदा हो० ० ॥ दिन मुझ शिर हाथ होवे जम संपदा दो० हो०.॥ जलि२ मरे पतंग दीवाने मन नदी दो० दो० ॥ नाणे मन असवार धोमो दोसे सही दो० घो० ॥६॥ सबला साये प्रीत निक्लने नवि कदी दो०नि०॥ विण लागो जे थोमी किदां जाये वही हो० कि० ॥ जे सज्जनसुं होय तेजीकः ननंजोये हो० जी० ॥ तुमचा मुनि ज्यारे होए तो कर्मन मंजीये दो० क० ॥3॥ तो उत्तमन दोय दूर कोणे नवि गंजीये हो को०॥ प्राणाधार पवित्र के दरशन दीनी हो। द०॥ ज्ञानविमल मुख पुरः मलीने कीजोये होबा मः। ए?
जिमणे पास खूणग
(०२२)
|| G || इति पदं ॥
॥ अथ श्रीआवतीर्य स्तवन ॥
। चालो चासोने राज गिरधर रमवा जश्यै ॥ ए चाल ॥
॥ श्रायो प्रावोने राज श्रीपद गिरिवर जश्यै ॥ श्रीजिनवरनी
नक्ति करीने, यातम निर्मल यश्ये ॥ यावो० ॥ विमलवसीना
प्रथम जिनेसर, मुख निरखे सुख पश्यं ॥ चंपक केतको प्रमुख
कुसमवर, कंठे टोमर रविये ॥ प्रा०॥
वसही, श्रीनेमीसर नमिये ॥ राजीमतीवर नयणे निरखो, सुख दो
हग सवि गमिये ॥ श्रा० ॥ ॥ सिक्षाचल श्रीरुपन्न जिनेसर, रैवत
नेम समरिये। दो वसीनो यात्रा करता, बिहुँ तीरथ चित्तधरिये ||
था० ३ ॥ मंम्प मंझप विविधि कोरणी, निरख दियमै गरये ॥
श्रीजिनवरना बिंव निदाली, नरनव सफलो करिये ॥ आ० ४ ॥
अविचलगढ यादीश्वर प्रणामी, अशुनकरम सब हरिये ॥ पाश शां
ति निरखी जब नयण, मन मोहो हुंगरोयें || प्रा० ५ ॥ पाजे
चढतां नजम वाफ, जेम घोमे पाखरी ॥ सकल जिनेसर पूजी के
शर, पापपल सवि हरिये ॥ श्रा० ६ ॥ एकरा ध्याने प्रनुनें ध्या
तां, मनमांहे नवि मरिये, ज्ञानविमल कहै प्रनु सुपशायें, सकल
संघ सुख करियें ।। प्रा० ॥ इति ॥
॥ अथ श्रीअष्टापद गिरि स्तवनं ॥
॥ अष्टापद गिरि यात्रा करणकुं, रावण प्रतिहरी आया ।। पु
८पक नामें विमाने वैशी, मंदोदरी सुहाया ॥ १॥ श्रोजिन पूजिर्षे
लाल, समकित निर्मल कीजै ॥ नयणे निरखी हो लाल, नरनव
सफलो कीजै ॥ हीयमै हरखी लाल, समता संग करीजै ॥ (ग्री
कणी ) चन्मुख चनगत्ति हरण प्रशादें, चनुवाशे जिन वैठा ॥ च
नदिशि सिंहासन, सम नाशा, पूरब दिशि दोय जिन || श्री०२
-
(३२३ ) ॥ संनव आदे दक्षिण चारे, पधिमे पाठ सुपासा ॥ धर्म आदि । त्तरदिशि जाणो, एवं जिन चनवीशा ॥ श्री० ३ ॥ वैग सिंदतणे श्राकार, जिनदर लरते कीधा | रयणविंव मूरत यापीने, जग ज शवाद प्रसिदा ॥ श्री०४॥ करे मंदोदरी राणी नाटक, रावण तांत वजावै ॥ मादल बीणा ताल तंबूरो, पगरव उमठमकावै ।। श्री० ५॥ नक्तिनाचे एम ना.टक करतां, तूट) तंत विचाले ॥ सांधी थाप नसा निजकरनी, लघुकलासुं ततकालें ॥ श्री. ६ ॥ द्रव्य नावशुं नक्त न खंमी, तो अक्षयपद साध्यु ॥ समकित सुर- तरु फल पामीनें, तायकर पद लाव्यु ॥ श्री. ७ ॥ इणि परेन विजन जे जिन प्रागें, बहुपरे नावनानावें । झानविमल गुण ते इना अहनिश, सुरनर नायक गावै ॥ श्री. ७ ॥ इति पदं ।। ॥ अथ श्रीसमेतसिखर स्तवनं ॥ ॥ समेतसिखरगिरि नेटीये रे, मेटवा नवना पास ॥ श्रात मसुख वरवा नगी रे, ए तीरथ गुण निवास रे ॥ नवियां सेवो तीरथ एह, समेतशिखर गुणगेह रे।नवि० से०१॥ (आंक पी) समेतसिखर कल कह्यो रे, वीश टुंफ अधिकार (। वीश ती फर शिव वस्या रे, बहु मुनिने परिवार रे ।। न० से० २॥ सि क्षेत्र मांहे वस्या रे, नाखे नय व्यवहार ॥ निश्श्रय निज स्वरूप: मारे रे, दोय नय प्रनुजीना साररे॥न० से० ३।। आगमवचन वि चारतो रे, अति दुर्गम नय वाद.॥ वस्तु तत्व जिणे जाणिये रे, ते आगम स्याहाद रे ॥ न० से. ४॥ जयरयरायतणी परे, जात्रा करो मनरंग ॥ नवखने देश अंजली रे, यायें सिदवधूनो संग रे ॥ न० से. ५ ६ समकित्तयुत यात्रा करे रे, तो. शिव देतु. श्राय ॥ नवहेतु किरिया त्यागश्री रे, प्रातमगुण प्रगटाय रे । न० से. ६ ॥ जेह समें समकित थयो रे, तेद समये.दोय नाण ॥ ज्ञान -- -- (२५) विमल गुरु नाखियो रे, आवश्यकन्नाप्यनी वाण रे॥० से. Its jj इति चौमाशी देववंदन विधि । ॥ अथ श्रीपर्युषणयर्व स्तुति ॥ ॥ सत्तरन्नेदी जिन पूजा रचीने, स्नात्र महोचव कीजै जी ॥ ढोल दमामा नेरी नफेरी, मक्षरि नाद सुणीजैजी ॥ वीरजिन पागल नावना जावी, मानवनव फल लीजै जी। परव पजूसरा पूरव पुन्ये, पाव्या श्म जाणीजै जी ॥ १॥ मास पास वन। द. शम वालश, चत्तारी कीजै जी ॥ ऊपर वति दश दोय क रोने, जिन चौवीश पूजीजै जी ॥ वमाकपनो का करीने, वीर- वखाण सुगीज जी ॥ परवाने दिन जन्म महोचव, धवल मंगल वरती जी ॥ २॥ आठ दिवस लगे 'अमार पलावो, अधमर्नु तप कीजै जो ॥ नागकेतुनी परै केवल लहिये, जो शुन्न नावै र ये जी ॥ तेलाघर दिन त्रएय कल्याणक, गणधरवाद वदीजै "जी ॥ पाप्त नेमीसर अंतर त्रीजै, झपन्न चरित्र सुणीजैज) ||३|| वारशे सूत्र में समाचारी; संवत्सरी पमिकमियें जी ॥ चेत्यप्र- 'वामी विधिसुं कीजै, सकल जंतुनें खामीजै जो ॥ पारणाने दिन सामीवचल, कीजै अधिक कमाई जी॥ मान.वैजय' कहे सकल मनोरथ, पूरो देवी सिहाई जी ॥४॥ इति । ॥ अथ श्री नेमनाथजीको पारामासो । ॥ सीयाले खाटू लली रे लाल ॥ ए चाल ॥ पंथी रय फेरीयो रे लाल, नीर नेमकुमार ॥ प्रेम विलूधी पद मणी रे लाल, वीनवै राजुलनार || हों रंगीला नेम सुण मादरी श्रदाश ॥ १ ॥ सहीबांसुं राजुल कदे दो लाल, मगसिर नायो पी३ ॥ प्रीतम बिन दिवा मादरी हो लाल, धीरज न घरे जीच ॥ दो०२॥ पोस महीनो यावियो दो लाश, थायो मो मुख देवा ।। ॥तोर (७२५ ) तो सूरतने सांवला दो साल, देखण तरसै नैण ॥ हो. ३ ॥ माहमहीने सो पके हो लाल, प्रीन संग पोहे नारी ॥ प्रीतम वि ण • एकली रे लाल, केम रहूं निरधार ॥ हो० ॥ होली खेले देतसुं दो साल, फागुणमें नर नारी , हुं किणसुं खेलूं हिये हो लाल, पाश नही जरतार ॥ हो० ५॥ चेतमहाने चावणी रेला ल, संजोगण सुख देण ॥ विरहणने वालम बिना रे लाल, रोवत जावै रेण ॥ हो०६॥ वनदरिया वैशाखमें साल, मांजर रही महकाय ॥ अरज सुणो अवला तणी दो लाल, तपत मिटावो प्राय || हो० ॥ जेठ तपे लू आकरो हो लाल, दाकै कोम खगात ॥ ससनेदी सादिव विना दो लाल, कुण पूर्व मुक वात ।। दो० ॥ ॥ श्रासादे काली घटा दो लाल, ऊनमि आयो मेद ।। कंत मिल्या निज नारसुं रे लाल, धरती मिलिया मेद ॥ हो। ॥ श्रावण चमके दामनी हो लासधन बरसे कमसा. ३ ॥ श रुत सूनां एकली दो लाल, क्यूं कर रेण विलाई ॥ हो. ।। १० । काली कालाइस मिली दो लाल, नाश्चमै चर खंत ।। अरज सुणीने सादिया हो लाल, पूरो मो मन खंत ॥ दो० ॥११॥ यासोजे आंसू करै हो लाल, नाद विना निसदीश !! सार न पूठो साहिवे हो लाल, राखि रह्यो मन रीश ॥ दो० ॥ १२ ॥ काती दृढ गती करी हो लाल, जाय मिली गिरनार ॥ देखी मुख निज नादनो हो लाल, सफल गिणे. अवतार ॥ दो० ॥ १३ ॥ संयम ले पिन सेंदथे दो लास, पामे लवनो पार ॥ण पर पाले प्रीतमी दो साल, धन २ ते नर नारि ॥ दो० ॥१५. जे कीधी पशु कारे हो लाल, मो पर करज्यो देव ॥ चंदनगी यो कारे “दया दो लाल, प्रनु वरणारी सेव ॥ हो ॥ १५ ॥ इति श्रीनेम राजुप वारेमासो संपूर्ण ॥
प्रजा- (२६ ) ॥ अथ आदिजिन आरती ॥ अपनरा करतो पारतो जिन आगे, हारे जिन आगे रे जिन प्रागै, हारे ए तो अविचल सुखमा मागे, हारे नान्नीनंदन पाश । ॥ अप० ॥ १ ॥ ताई नाटक नाचती पाय म्मकै, दारे दोय च. रणे झांझर ऊमकै ॥ हारे सोवनना घूघरी घमके, हारे लेती फूद- मो वाल ।। अप० ॥ २ ॥ ताल मृदंग ने वांशलो.कफ वीणा, हारे रूमा गावंती स्वर कोणा ॥ हारे मधुर सुरासुर नयणां, हारे जो- ती मुखहुं निदाल ॥ अप० ॥ ३ ॥ धन्य मरुदेवी मातने या, हारे तोरी कंचनवरणी काया॥ हारे मे तो पूरव पून्ये पाया, हारे तोरो देख्यो दीदार ॥ १०॥ ४ ॥ प्राणजीवन परमेश्वर प्रन्नु प्यारो, हारे प्रन्नु सेवक हूं तुं तारो, हारे नवोन्नवना उखमा वारो, दारे तुमे दीनदयाल || अ० ॥ ५ ॥ सेवक जाणी आपणो चित्त धरजो, हारे मोरी आपदा सघली दरजो ॥ हारे मुनि मा- एक सुखिन करजो, हारे जाणी पोतानुं बाल ॥ अ० ॥६॥ इति ॥ ।। अथ नेम राजोमती सिझाय ॥ देशो उमादे भटीयाणोरी ॥ पहली तो समरूं हो सिद्ध युःहरी दाता सारदा, लागु गुरां रे पाय || प्रनुगुण गास्यां हो नेमीसर साहिब जिनतणा, सुन्नमत पापो मोरी माय ॥ १ ॥ सोरोपुरहुंतो दो . नेमोसर साहिब ग्रे चढ़या, जान करी याशय ॥ हसतो तो सिणगास्या दो नेमासर साहिव थे लला, घोमलारी गिणती न काय.॥ २ ॥ वाजा तो अ.. धिका हो नेमीसर सादिव वाजता, पाया तोरण वार || महिल चढीने हो राजुल जोवे हरखसुं, मनमांद दरख अपार ॥ ३॥ श्रांख फरूके हो सहेलो मारी जीमणी, फिरता दीसे चै नरता. र ॥ वामो तो नरीयो हो नेमीसर साहिब जीवनो, पशुवाणी रे पुकार ॥ ४ ॥ ऊनो तो रर्थनें दो नेीसर साहिब राखी.
यो, ए पशु बांध्या के किस काज गोरो तो होसी हो नेमीसर साहिब तुमतणो, सारथी कहे 7 महाराज ॥ ५॥ योका तो सुखने हो इण राजुल नारीरे कारणे, होसी हो जीवानो संहार । जीव बंध्याने हो नेमीतर साहिव गेमिया, जीव सवे तिण वार ॥ ६ ॥ अणपरण) राजुल हो नेमोसर सादिव गेमने, जाय चढ्या गिरनार ॥ आवे तो करमांसुं दो नेमीसर साहिब जीतवा, लीधो संजमन्नार ॥ ७ ॥ राजुल तो पूरे हो नेमीसर सादिव एकती, जल विन मवली जेम ॥ नव नवारो हो नेमीसर साहि: ब गेमने, नेम विन जी, केम ।। ७ ॥ सहियां तो समझावै हो राजुल अख मत करो, एलो कालो वे जरतार ॥ पायो तो राजुल जाप हो सहेली मारी थे सुणो, ण लव ए जरतार ॥ ए ॥ रा- जुल तो चाली हो नेमीतर साहिब वांदवा, साधे तो घणुं रे परि: वार ॥ गिरनारे चढतां हो सघ आगे पावै नीकल्या, एकली रही है राजुल नार ॥ १०॥ मेहा तो वरस्या हो नेमीसर साहिब अ. तिवणा, नोज्या कै सधि सिणगार ।। गुफा तो देखी दो राजल नारी अति नली, चीर निचोवै राजुल नार ॥ ११॥ गदया तो वाज्या दो राजुलनारीरे अंगना, घूधरना जणकार ॥ कपका तो सुणिया हो रहनेनी बैठे ध्यान में, खोली कै पल तिणवार ॥१२॥ रूपे तो मोह्यो हो रहनेमी वैगे ध्यानमें, कदै सुंदर करो मोसुं प्यार || बोली तो सुणकर दो राजुल अंग ढांकियो, मानै तोकीले नेमन्नरतार ॥ १३ ॥ नोजन तो जीम्यो हो रहनेमी खीरखांकनों, नलटी करे नाखै तेम ॥ वेने तो माणस हो रहनेम पाठो नही नखे, लखसी काग कुत्ता जेम ॥ १५ ॥ हूं तो माता हो रहनेम थारे सारखी, हुं वमा नाईनी नार । पाय तो घरस्यो हो रहनेम माहरे ऊपर, तो पस्यो थे नरक मकार ॥ १५ ॥ एहया तो व. - . (२०) चने दो रहनेम राजुस पाए.नम्यो, पाप समात्र वारंवार ॥ कपमा तो.पहस्या हो राजुलनार प्रापणा, पुहती कै प्रनु दरबार ॥१६॥ राजुल तो दरखे हो नेमोसर साडिव वांदिया, वांदीने सीधों सं. जमन्नार । केवल तो पाली हो नेमीसर साहिब निरमलो, पुहती चै मुगति मझार ॥ १७ ॥ केवल पाली हो नेमीसर साहिब प्राग- सै, मिलिया ने मुगति मझार ॥ माणिक्य रंगे हो नेमोसर सादिव गाईयो, म्हारा आवागमण निवार ॥ १७ ॥ इति सिझाय संपूर्ण । ॥ अथ सिद्धपद वर्णन सिझाय || श्रोगौतमस्वामी पूजा करे, विनय करी शीतं नमाय प्रनूजी अविचल पानक में सुष्यो, रुपा करी मोय वताय प्रनूजी 1) शिव- पुरनगर सोहामणुं ॥ १ ॥ आठ करम अलगा कर), सारया आतम काज प्रभूजी || बूटा संसारना उख अकी, रहवानों किहां ग्राम प्रनुजी ।। शि ॥ २ ॥वीर कहे नई लोकमां, सिद्धशिलातो घाम. हो गोतम ॥ स्वरगपुरीने नपरे, तेदना बारे नाम हो गोतम ॥ शि० ३ ॥ लाख, पिस्तावीस जोजना, लांबी पोहली जाण दो गोतम ॥ पाठ जोजन जामी विचै, वेमे माखीपंख माण हो गोतम ॥ शि०४॥ कला हार मोतीतणा, गोजुग्ध संख प्रमाण दो गोतम ॥ तं की कजली अतिघणी, उलटो उत्र संगण हो गोतम ॥ शि. ५ ॥ अरजन- स्वर्ण शम दापती, पठारी मारी जाण हो गोतम, फटकरतन थकी निरमसी, सुंधाली अत्यंत वखारा हो गोतम ।। शि०६॥ सिद्धशिला उलंघी गया, अधर रह्या सिहाज हो गोतम ।। श्रलोकसुं जाई अझया, सारया यातकाज दो गोतम । श० ॥७॥ जनम नही मरणो नहीं, नही जरा नही रोग हों गोतम॥ वैरी नहीं मित्रो नही, नंदी संजोग विजोग हो गोतम । शिश, (ए) ॥ ॥ नूख नहीं तिरखा नही, हरख नहीं नहीं सोक हो गो. तम ॥ करम नहीं काया नहीं, विषयारस नहीं योग हो गोतम ॥' शि० ए ॥ शब्द रूप रस गंध नही, फरस नहीं नही वेद हो गोतम ॥ बोले नही चाले नहीं, मोनपणूं नही खेद हो गोतम । ॥शि०१०॥गाम नगर ए को नहीं, वसतीनही ऊजाम हो गोतम ।। काल तिहां वरते नहीं, नहीं रात दिवस तिथि वार हो गोतम॥ शि० ११.॥ राजा नहीं परजा नहीं, नही गकुर नहीं दास हो गोतम ॥ मुक्तिमें गुरु चेलो नहीं, नहीं लघु वमाई वास दो गोतम । शि० १२ ॥ अनंता सुखमें फिलरह्मा, अरूपी ज्योत प्रकाश हो गोतम || सहुकोईनें सुख सारिखा, सगलाने अविचल राज हो गोतम || शि०१३ ॥ अनंता सिद्ध मुगते गया, वली अनंता जाय दो गोतम || अवर जग्या रूंधे नही, जोतमां जोत समाय दो गो तम ॥ शि० १५ । केवलज्ञाने सहित , केवलदर्शन खास हो गोतम, कायकसमकित दीपता, कदय न होवे कदाश हो गोतम | शि०१५॥ सिद्धस्वरूप जे नलखे, आणी मन वैराग दो गोतम ।। शिवरमणी वेगे वली, नवि कहे सुख अश्राग हो गोतम ॥ शि० १६ ।। इति सिक्षिपद वर्णन सिझाय संपूर्ण ॥ ॥ अथ नेमनाथजीरो सिलोको ।। समरु सारदने गुणपते राणी, विधन टालो यो अविरत सी ॥ कहुँ तिखोको नेमिनायकेरो, जादववंस मांद मेरो। गरी सोरीपुर पृथ्वी में दीपे, रिदैसमृद्ध अलकाने जीपे । राजासमुश वैजै शिवादे राणी ॥ सीले रूपै कर अधिकी वखाणी ॥२॥ दनोजी अंगज नेमजीनायो,नुगतरमणसुंघाले वैवायो॥ आणंद घणे वसंत यायो, कुली उत्तीसें. फाग जगायो ।॥ ३ ॥ रमवाजा सारू चलिया गोपालो ॥ म्फ चंग वाज.रमे गुलालो ।। रुखमण (३०) राणी राधा सतनामा, वीजादी गोपी मिलर रामा || ४ || नेम. नाथजीरो व्याह मंगायो, कुमरी राजुलनो सगपण करायो । राजाने परजा यति सुख पायो ॥ ५ ॥ नमसेनराजा घरे बधाई, जादवरायरी जानज आई ॥ ढोलने वर सखरी सरणाई, मुंगलने नेरी सखरी समाई ॥ ६ ॥ ताल कंसाल कुहके करनाला, गोर। जी गावे गीत रसाला । रय वदलै वाजै घूघरमाला, मदमरता मंगल काफममाला ॥ ७ ॥ण विधसुं कुंवरी परणन प्रायो, ला को राजीमती वेस वणायो | मसतक मोती मांग तराई। सीस झलारी ज्योत सवाई ॥ ७ ॥ सुविसाले नाले टीकोजी सोहै, अ लियाली आंप्यां काजल मोहै। काने इंकोटा जमावकेरा, नकवे. सर मोती जलके जलेरा गए दामिमकुलियां दांत बत्तासे, बदनी बोलै सार उत्तीस ॥ उसमीतिलमी गल मोत्यांरी माला, कुच नपर कसिया कुंच रसाला ॥१०॥ चूमेने गहणे जा न वखाणी, रू: पेकर गोरी जीपेशणी॥झांझरने नेवर घुघर घमझती, हंसा तो जीप सुंदर हालंती ॥११॥ हायेजी पगे पोथीजी दोघी, सुधामे देदी गर काव कीधी । फावते कपमै सखियां वणाई, राजूल राखी नार न काई ॥ १२ ॥ मृगानेणी सोहै जोवनवालो, सारीखी सखियां ति ण विचालो ॥ण विधसुं पदमण परणन प्रायो, मदसिरी रूपे मदन हरायो ॥ १३ ॥ मदमाता राता करता गहगाटो, कोमेजी ग्याने जादव थाटो॥घणु मगराला महा अनिमानी। केसरिये वागै मिलिया वै जानी ॥ १४ ॥ रदंत कुंवर हरिवंस केरा, वीजाही जानी नूपति नलेरा ॥ धको मारे तो मेरु धूजाम, जातां कालने माल पठ.मै॥ १५ ॥ तिहां माहे नेमजी महावसवंतो ॥ अनंता सुरपतिसुं नर अनंतो। तारागणमांहे शोने जु चंदो, तिण विध, माहे नेमजिणंदो ॥ १६ ॥ तिय वेला देखो पसुअ वुमाया, अण: ...- ( ७३१ ) परण्या नेमजी पागजी पाया ॥ धिग्र संसार मायाजंजालो, जामणने मरण महा विकरालो ।। १७ ॥ण अनुक्रम नेमजी चारत लीधो, आपरो नाम अविचल कीधो || नेमजी राजुल वाल ब्रह्मचार), जिरो शिलोको गावै नरनारी ॥ १७॥ इति श्रीनेम नाथजीरो सिलोको संपूर्ण ॥ ॥ अथ चोढालिया प्रारंभ ॥ ॥ विजयसेठ विजयासेगणीका चोढालिया लिख्यते ॥ प्रद की रे पंच परमेष्टि सदा नमू, मनसूबे रे तेहने चरणे नित नमूं ॥ धुर तेहने रे अरिहंत सिद्ध वखाणिथै, प्राचारज रे नपा- ध्याय मन प्राणियै ।। ( नल्लालो ) प्राणियै निज मन नाव सुदै, नपाध्याय नमूं वली ॥ जे पनरद करमनूमिमांदे, साधु प्रणमुं ते वली ॥ जिम कृप्रापक ने शुक्ल पक्ष वलि शील पाल्यो ते सुणो, जरतारने खो विन्दे तेदनो चरित जावेसुं नको ॥१॥ ( ढाल ) जरतक्षेत्रे रे समुश्तीर दक्षिण दिसे, कचदेतै रे विजय- सेठ श्रावक वसे, शीलव्रत रे अंधारापकनो लियो, बालारणे रे ए. दवो निश्चै मन कियो || (नलालो) मन कियो एदवो तेण निभै परक अंधारे पालस्यु, हुं शोल निश्चै एद विरुन विषय शेवा टाल- स्युं ॥ कयौ सुंदर रूप विजया नाम कन्या ते वली, पिण शुक्र पहनो शील लीधो सुगुरु जोगे मनरसी ॥ २॥ (दाल ) कर्म. जोगे रे मांदोमांदे बिहुंतणो, शुन्न दिवसे रे हुन विवाह मुदाम- यो । तब विजया रे सोले शृंगार जला करी,पिन मंदररे पोहती मन उलट धरी । (नहालो) मन धरी उलट अधिक पहुत! पिया पासे सुंदरो, ते देखि हरखे सेठ बोले शील निधो संनरी || मुफ शोल निधो पखग्रंधारे तेदना दिन तीन वे, ते नेम . पालो शुक्ल पके हुं लोग लोगविम्युं पवै ॥ ३ ॥ (चाव ) ३. नांजल रे वि.
(७३२ ) जया:मन विलखी थई, पिन पूरे किम चिंता तुमने नई। तब विजया रे कहे शुक्लपक्ष व्रतमें लियो, व्रत- चोथे रे वालापए निश्चो कियो ॥ (नवालो ) बालपणे में कियो निश्चो शुक्लपक्ष बन पालस्यु, तो उन्नय पद हिच शील पाली नियम दूषण टालस्युं । तुझे अवर नारी परणने हिव शुक्लपक्ष सुख नोगयो, कृप्यपद निज निमय पाली अनियह श्म जोगवो ॥४॥ (ढाल )त बसतो रे तसु नरतार कहै इसो, विषयारस रे कालकुटवि ढे तिसो ॥ ते ठझी रे शीलवत दोनुं पालस्यां, एद वातीरे मात पिता'न जणावस्यां ॥ ( नल्लालो) मातपिता जब जागस्ये तक दिख्य लेस्यां-घर दया, श्म अन्निग्रह खेने ते नावचारत्रिया यया ॥ एकत्र सय्या सयन करतां खमंगधारा व्रत घरे, मन वचन कायां करी. सूधो शील वेनं आचरै ॥ ५ ॥ (ढाल २) विमल केवली एक, चंपा नयरीए, ततखिण याची समोसरया ए ।। आणी अधिक विवेक, श्रावक जिणदास, कहै. विनयगुण परि- वस्यो ए ॥६|| सहस चोराती साधु, मुझ घर पारणो, करै मनो- रथ तो फलै ए ॥ केवल ज्ञान अगाध, कहे श्रावक सुणो, एह · वात तो नवि मिलै ए ॥ ७॥ किहां एतला थपगार, किहां बलि 'सूऊतो, नातपाणी नदि एतलो ए | तो दिव तेद विचार, करो तुम्हें जिम तिम, फल अम्द हुवे तेतलो ए ॥ ॥ अहिये कच- - देश, सेउ विजय वली, विजया नार्या तमु घरै ए॥ नाक्यतो ग्रहवास, तेहनें नोजन, दीधां फल दुवे तेतलो ए ॥ ए. जिप, दास कदै नगवंत, ते माहे एतला, कुण गुण कुण व्रत वै घणा ए । केवली कहै अनंत, गुण तसु शोलना, कृष्ण शुरूपक प्रता या ए ॥१०॥ · || ढाल ३॥ दान कहै जग हूं यमो ए॥ देशी। केवली ने मुख तांजली; श्रावक ते जिनदास रे । कारदेस ।
प्राधियो, पूरे निज मन ग्रास रे ॥ ११ ॥ बनर शील सुहामणो, शील शमो नही कोय रे ॥शीले देव सानिध करै, शीलया शिव सुख होई रे ॥ ३० ॥१२|| सेठ विजय विजयानगो, जगतसुंनो. जन देई रे ॥ सहस चोरासी साधुना, पारसानो फल लेई रे ॥ ॥ १० ॥ १३ ॥ मातपिता पूढे तेहनें, एहनो शोल वखारारे ॥ केवलीने मुख जिम लुण्यो, तिम कहै तेह गुणजाग रे ॥ ४ ॥ ॥ १५ ॥ सहस चोरासी साधुनें, पारणो दीये को नाय रे ।। रुपण शुक्लपक दंपती, नोजननो फल थाप रे ॥३०॥ १५ ॥ मातपिता जब जाणियो, प्रगट हून संबंध रे ॥ से विजय विज- या लियो, चारित्र अप्रतिबंधो रे ॥ ५० ॥ १६ ॥ ॥ द्वाद केवलीने पाते, चारित्र ले नदार ।। मनममता मूंकी, पालै निर. तीचार ।। १७ ॥ पाठ करम खपावी, पाम्यो केवल ज्ञान ॥ ते मु गते पहुंता, दंपत्ती सुगुण सुजाण ॥ १७ ॥ तेहना गुण गावे, नावे जे नर नार ॥ से वंचित सुख लहै, पहुंचे जवनें पार ॥१॥ श्म कृष्णपक्ष में शुक्रपके शील पाल्यो निरमलो, ते दंपतीना जाव शुबै सदा शुनगुण सोनलो ॥ जिम रिय दो. जायै सुरक याचे परे, वलि साल मंगल मनह पंवत कुशल नित घर अवतरै ॥ २० ॥ इति शील चोदालिया संपूर्ण ।। ॥ अथ इखुकारराजा मृगुमोदित चोदालिया लिख्यते ।। महिलांमे वेगे राखी कमलावती, कोणी तो नमे मारग खेद ॥ जोवै तमासो खुसार नगरमें, कौनक नपनो मनमें एह ।। सांजल रे दासी पाल नगरमें बड्दो किम घलो || १॥ कांतो परधान सखी मंमीया, कां के खूट्या राजा गांव ॥ कां को गा- मयो धन नीतरचो, गामा रह्या गमो गन ॥ सां० ॥ श्रा०॥ • 1 २ ॥ नातो परधान बाईजी ममिया, ना कोई.राजा सूंट्या • कक्षश॥ 'हग दूर बहु
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गांव || नगपुरोहित धन तज नीसरयो, राजारे धन सेवा
चाव ।। सजिल हे राणी हुकम करो तो कोई गामो इहां धरी ।।
३॥बेटा तो तिणारा संजम लियो, वरज्यो घोही पितामात ॥
ते पिण चारित्र लेवा मह्या, नग्गू जसा तिरों मोह ललचात ।।
सांनल हे रा० ॥ ४॥ न सुण कमलावतोराणी श्म कहै, वहां
तो कमी नहीं काय ॥ सांजलने राणी मायो धूणोयो, राजारी म
मता नही गय ॥ सां० दासी राजाने ए वातां जुगती नही ॥ ५
। महिलांसूं राणी कमलावती, आई चै राजारे हजूर ॥ वचन कहे
राजाने आकरा, जाणे पोरस चढियो बोले सूर ॥ सां० हो राजा
ब्राह्मण गेमी शद्धि क्यूं पादरो॥ ६॥ करजोमी कमला कहै, सा
नल कंत सुजान ॥ ब्राह्मण जे शद्धि परिहरि, ते तो घर माहे म
त प्राण ॥ सांत्नल हो राजा० ॥ ए शहिसुंअपणे कांश घणो हुसी,
राजारा मोटा के नाग ।।वमिये ग्राहाररी वांचा कुण करे, के कुरा
कै काग || सोनल हो रा० ॥ वमियो आहार पोगे नर नखे,
नही परसंसवा जोग ॥ नग्गूप्रोहित शद्धि तन नोसरचो, थे
जाएयो , असी म्हारे लोग ॥ सां० राजाए ॥ संक.
लपियोमो पागे किम लिये, सांगल दो महाराज ॥ दान दि.
यो थे पहिला दायसुं, ते पूगे लेतां नावै ग्रांने लाज ॥ सांस
रा० १० ॥ निदच्चे तो मरणो राजाक दिने, गेमीने काम विशेष
चीजो तो जगमें तरणो को नही, तारे जिनजीरो धर्म एक ।।
सांननदो रा० ११॥ सगलै जगतरो धन नेलो करी, रेघालो
मारारे मांहि ॥ तोपिण सना राजा पापणी, निपत न मनको
थाय । सानल हो राजा० १२ ॥ सांजलने सुकारराजा पोलीयो,
तूं नापनी वचन संजाल || का तने राणी कोलो वाजियो, का
कीधी मतवाल || सान्नल हो राणी राजाने करमा वचन
( ७३५ ) न बोलीयै ॥ १३॥ नातो राजाजी सोलो वाजीयो, ना कोश कोधी मतवाल ॥ ब्राह्मारो वमियो धन थे आदरो, वरजल प्राई हो नूपाल || सानल हो रा० १४॥ वलतो राजा राणीने हम कहै, इसमी चैरागण थाय || अजूं तो निजरां आवे नहीं, तूं बैठोठे घर माय । सप्निल हे राणी. १५॥ नत्तरवाली तो दीसे नही, इसमी आई वै मतवाल ॥ हुँतो घर गेमीने नीसरी, थे पिए बोमो हो नूपाल ॥ सोनल हो राजा पाग्या देवो तो संजम आदरुं॥१६॥ रतन जमतरो राजा पिंजरो, तिणमें सुवटियो पमियो फंद ॥ श्ण रातै हूं धारे राज में, रहिने पांमु प्राणंद । सनिल हो राजा श्राग्या० १७॥ सनेहरूपीया तांतण तोमर्ने, प्रारंज धनतुं रहस्यां दूर ॥ विरकत थई मैनपणे रह्या, थे पिण होयज्यो सूर । सां० रा० प्रा० १७॥ दध तो लागी हो राजा बन मम, हिरण ससा बले मांय ॥ गिरधपंखी ज्युं यामिप देखने, मनमां. हे हरखित पाय ॥ सां० रा० राग परा नांगा लग रहा १ए। माहोमांहि खेधोईसको, दश प्राण रहित कीयो काल || उस्मन तो मनमें हरख पाम्यो घलो, जाणे ते माहरो मिटियो साल ॥ सां० राजा राग द्वे० २० ॥ इण दृष्टांते लोनी मूरख थका, मुरा रह्या जोगमांहि ॥ पहिलांने पुखियो देखी चेते नही, लागी राग देपरी साय ॥ सांजल हो राजा रा० २१ ।। मांसरी बोटी पंखीरी चांच में, नर पासै पंखी पमियो आय ॥ श्रामिप सम जोग बोमनें, चारित्र लेस्यां वित खाय । सानल रे प्राणी संप मश्री सुख पामियै २२ ॥ महल पिलंगादिक अथिर ठे, ते पाम्या धापणे हाथ ॥ कामनोगमें रकत होय रह्या, ते तजदोय सानाथ ।। सांनतरे प्रा० २३ ॥ पांचे इंद्रीयारा लोग गेमने, झ्य नावे दलक थाय ॥ सहज वायु पंखीनी परें, विचास्यां प्रापणी दाय ..
(३३) सनिल रे प्रा० २४ । निरपंखो ज्यु लोग जाणज्यो, ए काम बधार संसार || साप ज्यु मोर को मरतो रदै, ज्यु. पापमुं संक- स्यां इस बार ॥ सांजल रे मा० २५॥ शोक तनी संतोपसुं, लेस्यां संयमन्नार ।। ममता तजीसमता ग्रहो, करस्यांजय विहार॥ तानल रे प्रा० २६॥ तन धन जोवन कारमो, चंचल वीज समान ॥ खिणार खूटे आनखो, मूरख करे रे गुमान || सोनल रे प्रा० २३ ॥ हस्ती ज्यु बंधण तोमने, श्रापे वन सुखे जाय || करमवंय तूटे संयम लियां, सुलो कहुं महाराय | सोनल हो रा० सं० २७ ॥ इम सुणने खुकारराजा चेतियो, गेमोंने मोटको राज || कायरने तो ए तजतां दोहिलो, विप्र सहित सास्यां काज ॥ सोनल हो राण) सं० ॥ २ए मोह न राख्यो परिग्रह गेमकै, पायो जिनध. रम सुजाण तपस्या सगलांही श्रादरी, उलटो पराक्रम ग्राण || ॥ सां० प्रा० सं० ॥ ३०॥ सुध संयम पालै सदा, सुमति गुपति दयास ॥नमरानी परै करै गोचरी, रिपि टाले दोप वयाल ॥ सां०. प्रा० सं०. ॥ ३१ ॥ तारण तरण जिहाज , नव्यजीवनें नतारै पार ।। केवलज्ञान नपायनें, सुख पाम्या श्रीकार ॥ सां० प्रा० सं० ॥३२॥ मोह निवारी प्राणी समझने, निरमल नावना न्नाव || एजणा श्रोमा कालमें, मुगति विराज्या जाय ॥ सां० प्रा० सं० ॥ ॥ ३३ ॥ राजा सहित राणी कमलावती, गुपुरोहित जसा नार॥ नृगुप्रोहितना दोय दीकरा, शिवंसुख पाम्यो सार॥ सां० प्रा० स० ॥ ३५ ॥ इति श्खुकार राजा नृगुमोहित अधिकार संपूर्ण ॥ : : . ॥ अथ दान शील तपभाव चोढालियो लिख्यते ॥ '.. ६. ॥उहा।। प्रथमः जिनेसर पाय नमी, पामी सुगुरु प्रशाद ॥ दान शीलतप नावना, वोलिस बहु संवाद ॥१॥ वीरजिनंद समोसरया' राजगृही उद्यान || समवसरण देवें रच्यो, बैठा श्रीवईमान ॥ २॥ -- (७३७) धेठी वारे परखदा, सुणवा जिणवर वाण, दान कहे प्रन्नु हुं वकों मुझने प्रथम वखाण ॥ ३ ॥ सांजलजो सहुको तुमें, कुण है मुझ समान || अरिहंत दीक्षा अवसरे, आपे पहिचु दान ॥४॥ प्रथम पहुर दातारनो, से सङ कोई नाम ॥ दीपांरी देवल चदै सीधै वंचित काम ॥ ५ ॥ तीर्थकरने पारणे, कुरा करस्यै मुज होम ॥ वृष्टि करूं सोनातणी, साढीबारै कोमि ॥६॥' हुँ जग सगलो वस करूं, मुझ मोटी है वात ॥ कुण२ दानथकी तिरया, ते सुराज्यो अवदात ॥ ७ ॥ ॥ दाल ॥१॥ खलनाकी.देशी।। धनसारथवाद साधुनें, दी, घृतनो दान ललना ॥ तीर्थंकर पद में दियो, तिणें मुख्ने अन्तिमान ललना ॥ १ ॥ दान कहै जग हूं मो, मुझ सरिखं नहि कोप सलना ।। ऋद्धि समृद्धि सुख संपदा, दाने दोलत होय लखना ॥ दा० ॥ २ ॥ सुमुख नाम गाथापती, पमिलान्यो अणगार खलना ॥ कुमर सुबाडू सुख लहै, ते तो मुज उपगार ललना ॥ दा०॥ ३ ॥ मासखमराने पारणे, पमिलायो ज्ञपिराय ललना ॥ शासिन्नर सुख जोगवे, दानतणे सुपसाय स. खना ॥ दा० ॥ ४॥ पांचसे मुनिने पारयो, देतो वोहरी आग खलना ॥ जरत थयो चक्रवर्चि नसो; ते परा मुझ फल जाण ल. खना.॥ दा० ॥ ५ ॥ प्राप्या उमदना वाकला, उत्तम पात्र विशेष सलना ।। मूलदेव राजा थयो, दानतया फल देख ललना ॥दा०॥ ॥ ६ ॥ प्रथम जिनेश्वर पारणे, श्रीश्रेयांशकुमार लसना | सेली. रस वदराचियो, पाम्यो नवनो पार ललना || दा० ॥ ७॥ चंद- नबाला वाकुला, पमिवाच्या महावीर सलना ॥ पंचदिव्य परगट थया, सुंदर. . रूप शरीर खलना: ॥ दा० ॥ ७॥ पूव नव पारेवडूं, शरणे . : राख्यू. सूर ललना तीर्थकर चकर र्तिपणे, प्रगटयो पुन्य पमूर लसनाः ॥ दाए । गजन्नव शिशतो (३०) राखीयो, . करुणा. कीधी सार सखना ॥ श्रेणिकने घर में वतरयो, अंगज मेधकुमार ललना ॥ दा० १०॥इम अनेक में घरया, कहतां नावे पार ललना ।। समयसुंदर प्रनु वीरजी, मुज पहिलो अधिकार सलना ॥... ॥ दोहा ॥ शील कद्दे सुण दा- न तुं, किस्यो करें अइंकार ॥ श्रामबर आठ पहुर, याचकंसुं विव- हार ॥ १ ॥ अंतराय वलि तारे, नोगकरम संसार | जिन कर नीचो. करै; तुमने पमो धिक्कार ॥ २ ॥ गर्व म कर रे द तूं, मुझ पूढ़ सक कोय ॥ चाकर चालै पागले, तो स्युं रा: होय ॥३॥जिनमंदिर सोनातलो,नवो निपावे कोय ॥ सोवन को दान दिये, शीयल समो नदि कोय ॥ ४ ॥ शीले संकट सकट शीले जश शोनागशीले सुर सानिध कर, शीख को वेराग 4 शीले सर्प न आन्नम,शीले शीतल भाग॥ शीले अरिकरी केसर जय जावे सब नाग ॥ ६ ॥ जनम मरणना नय थकी, में गे व्या.अनेक ॥ नाम कहूं हिव तेहना, सांसजो सुविवेक ॥ ७ ॥ ढाल २.॥ पासजिनंद जुहारिये ॥ ए देशी ॥ शील के वमो, मुझ वात, सुणो अति मीठी रे. 1) लालच लाच वं दानतपो वात दोली रे ॥ शी०१॥ कलह कारण जा जाएगी, बलि, विरती नही पण काई रे ॥ ते नारंद में सीजव्या मुझ जुन ए अधिकाई रे ॥ शी. २ ॥ बाद पदिरचा वैरखा, ई खराजा दूपण:दीधो रे ॥ काप्यो हाथ कलावती, ते में नवपलद कीयो रे ।। शी० ३॥ रावणघर शीता रही, तो रामचं घर प्राण रे॥ शीतानो कलंक नतारीयो, में पावक कीबूं पाणी रे ॥ शी० ४. चंपावार नधामिया, वली चलणिये काढ्यु नीरो रे ।। सतीय सुन्नद्रा जस ययो, 'मैं तसुकीधी नीरो रे ॥ शी० ॥ राजा मा. रथ मांझीयों, राणी अन्नयायें दूषण दाख्या रे ॥ शुलो सिंहासंघ - .. ॥ ( 30 ) में कियो, में शेठ सुदर्शन राख्यो रे ॥ शी०६॥ शील सन्नाद मंत्रीसरें, अवतां अरिदल अंन्यो रे ॥ तिहां पिण तानिय में करी, वल धरम काज आरंज्यो रे ॥ शी० ॥ पदिरण चोर प्रगट किया, में ओनरसो वारो रे || पांझवनारी पदी, में राखी मा. म नारो रे ॥ शी० ॥ ब्राह्मी चंदनवालिका, वलि शीलवती दवदंती रे || चेमानी साते सुत, राजोमती सुंदर कुंती रे ॥ शी. ए ॥ इत्यादिक में ऊधरया, नर नारीना वृंदो रे ।। समयसुंदर प्र नु वीरजी, पहिले मुझ आनंदो रे ॥ शी० १०॥ तप. बोल्यो त्रटकी करी, दानने तूं अवहील, पिण मुझ आगल तुं कितुं, सानल रे तूं शील || १ || सरसा लोजन ते तज्या; जगमें मीठा नाद ॥ देहतणी शोना तजी, तुझमां किस्यो सवाद ॥२॥ नारी यकी मरतो रहे, कायर कित्युं चखाण, कू, कपट बहु के लवी, जिम तिम राखै प्राण ॥ ३ ॥ को विरलो तुझ आदरै, ठंमो सहु संसार ॥ आप एक तूं नांजतो, बोजा नांजे चार ॥ ४ ॥ के रम निकाचित तोमवा, नांजु नवनय नीम ॥ अरिहंत मुमने आदरै, वरस उम्मासी सीम || ५ || रुचक नंदोसर ऊपरै, मुझ लवधै मुनि जाय ॥ चैत्य जुहारै शाश्वता, श्रानंद अंग न माय ॥ ६ ॥ मोटा जोयण लाखना, लघु कुंथु श्राकार ॥ दय गय रथ पा यकतणा, रूप.करै अणगार ॥ 3 ॥. मुझ कर फरसे नुपशमें, कु धादिकना रोग । लब्धि अहवास ऊपजै, उत्तम तप संजोग ||| जे में तारया ते कडूं, सुजो मन उल्लास ॥ चमत्कार चित पाम सो, देशो मुझ सावास ।। ' ॥ ढाल ३ ॥ नगदसरी दे शी॥ दृढप्रहार अति पापीयो, हत्या कांधी चार हो सुंदर ॥ ते पिण तिण नर कंधरयो, मूक्यो मुगति मझार दो सुंदर ॥ १ ॥ तप सरखो जग को नही, तप करे. कर्म सूम हो सुंदर ॥ तप -- (380) करवू प्रति दोदिखू, तपा नही को कूल हो सुंदर ॥ त०:३ ।। सात माणस नित मारतो, करतो पाप अघोर हो सुंदर ॥ अर्जुन माली में ऊधस्यो, उद्या कर्म कगेर हो मुंदर ॥ त० ३ ॥ नंदिपे पने में कियो, स्त्रीवल्लनवसुदेव हो सुंदर ॥ बहुत्तर सहस अतेनरी, सुख जोगवे नित्यमेव हो सुंदर ॥ त०.४ ॥ रूप कुरूप कालो घ शो, इरिकेशी चंकाल हो सुंदर ॥ सुरनर कोकी सेवा कर, ते में कीधी चाल दो सुंदर ॥ तप०.५ ॥ विष्णुकुमर खबधे कियुं, ला ख योजननो रूप हो सुंदर ।। श्रीसंघ केरे कारणे, ए मुझ शक्ति 'अनूप हो सुंदर ॥ त०६॥ अष्टापद गौतम चढ्या, वांद्या जिन चोवीस से सुंदर ॥ तापस पिण प्रतिवूमव्यो, तिण मुझ अधिक जगीस हो सुंदर ॥त०७॥ चौद सहस अणगारमां, श्रीधन्नो अ 'पगार हो सुंदर ॥ वीर जिणंद वखाणीयो, ए पण मुझ अधिकार हो सुंदर ॥ त० मा कृष्ण नरेसर पागले, उक्करकारक. एह दो सुं दर ॥ ढंढण नेम प्रसंसीयो, मुफ़ महिमा सवि तेद हो सुंदर॥ त० पानंदिपेण विदरण गयो, गणिका कीती दासदो सुंदररावृष्टिकरीसोव नतणी, में तस पूरी पास दो सुंदर ॥ त०१०॥ श्म बसनद्रप्रमुख बहू, तारया तपसी जीव हो सुंदर ॥ समयसुंदर प्रनु वीरजी, पहिलो मुझ प्रस्ताव दो सुंदर || त० ११॥ दूदा । नाव कद संप तूं किसुं, मधु करै कपाय ॥ पूर्वकामको जो तप तपै, कणमा खैरु थाय ॥ १ ॥ खंधक आचारज प्रेते, ते वाल्यो सवि देश । अशुन नियागो तूं करे, कमा नदी लवलेश - ॥ २ ॥ द्वीपायन दूहव्या, सांत्र प्रद्युम्न सनाह ॥ तें तब क्रोध करो तिहां, कियो क्षारिका दाद ॥३॥ दान शील तप सांजलो, म करो न गुमान।। लोक सइको साख दे, धर्मे नाव प्रधान ॥ ४ ॥ पाप नपूंसक त्रिपहें, ये व्याकरणी साख ॥ काम सरै नदि कोर्नु, नाव नशे में . शषि गे (७१) पारख ॥५॥ रस दिन कनक न नीपजै, जल विन तस्यर वृद्ध ॥रसं. वति रस नदी लवण [वण,तिम मुजविण नहीसि॥६॥ मंत्र यंत्र मणि औषधी, देवधर्मगुरु सेव॥ नाव विना ते सवि तथा, नाव फलै नितमेव ॥णादान शिल तपजे तुमें, विधरकह्या वृत्तांत ॥ तिहां जो नाव न हुंततो, कोई तिही नव दुत ॥ ७॥ नान कहे में एकले, तारया बहु नर नार॥ सावधान अश्सनिलो,नाम कहूं निरधारणा (दाल चौथी। कपूर हुवै प्रति नजलो रे, एदेशी) ॥ काननमें का उसग्ग रह्यो रे, प्रमचंद शपिराय ॥ ते में कीधो केवली रे, तत. खिश करम खपाय || १ || सोनागी सुंदर, नाव वमो. संसार ॥ एतो बीजो मुझ परिवार, सौ० ॥ दानाविक विण एकलो रे, पोहचाडूं नवपार ।। सो० २ ॥ वंश ऊपर चढ खेलतो रे,, एला- पूत्र अपार || केवलज्ञानी में कियो रे, प्रतियोध्यो परिवार । सो .३ ॥ नूख तृपा खमें प्रतिघणी रे, करतो कूर पादार ॥ केवल महिमा करै रे, कूरगडू अणगार ॥ सो० ४ ॥ लानथी लोन वाधे घणो रे, पाण्यो मन वैराग ॥ कपिल-थयो मुनि केवली रे, ते मुझनें सोनाग ॥ सो० ५ ॥ अर्शिकासुत गठनो धसी रे, खीणजंघा वलि जाण, कीधो अंतगम केवली रे, गंगाजल गुण खाण ॥ सो०६ || पनरेसें तापसन्नणी रे, दीपी गौतम विस्क। ततखिण कीधा केवली रे, : जो मुझ मांनी ..सीख । सो०७॥ पालक पापीये पीलीया रे, खंघकसूरीना शिप ॥ जनममरगयी गेमव्या रे, प्रापे मुझ प्राशीप ॥ सो०७ ॥ चंझरुने चालतारे, दीधो दंग प्रहार.॥ नवदीक्षित थपो केवली रे, ते गुरु पिरा तेणी वार ॥ सो० ए॥ धनरयकारक साधुनें रे, पमिलान्यो. उलास ॥ मृगलो नायना भावतो रे,, पोदतो स्वर्ग प्रावास ॥ सो० १०॥ निज अपराध खमावती रे, मूक्यो , मनयो मान || मृगावतीने (४२) में दियुं रे, निर्मल केववज्ञान || सो०११॥ मन्देवी गज कपरे रे, देखी, पूननो श६ ॥ मुऊनें मनमाहे धरयोरे, ततखिण पामी सिम । सो०१२॥ वीर वंदन चाल्यो मारगे रे, चाप्यो चपल तुरंग ॥ दर्घर नामे देवता रे, तेह अवो मुझ संग || सो० ॥ १३॥ मन्नु पाय पूजन नीसरी रे, उर्गला नामे नार | कालधर्म विचमां कररी रे, पोहती. स्वर्ग मझार ॥ सो० ॥१४॥ सायानी शोना कारमी रे, रूप किसु अनिमान ॥ जरतः प्रारीसानुवनमा रे ।। पाम्यो केवलज्ञान.. सो० ॥ १.५. ॥ श्राषाढनूति फलानिलो.रे, प्र गट्यो नरतसरूप ॥ नाटकं करतां पामियो रे, केवल ज्ञान अनूप ॥ सो०॥ १६॥ दीकादिन कानसग रह्यो रे, गजसुकमाल म. साण ॥ सोमल.शीस प्रजालीयो रे, सिहि गयो शुन काणसो० ॥१७ 11. गुणसागर ययो- केवली रे, सांजल पृथवीचंद ॥ पोते केवल पामियो रे, सेव करै सुर इंद. ॥ सो० ॥ १७॥ श्म अनेक में कवरया रे, मुक्या शिवपुरवात || समयसुंदर मनु वीरजी रे, मुझने प्रथम प्रकास । सो०॥ १ ॥.. ॥ दूहा ।। वीर कहै तुमें सांजलो, दान-शील तप नार ॥.निंदा. अति पापणी, धर्म कर्म प्रस्तावः ।।.१.॥ परनिंदा करतां थकां, पापे पिंक जरा. यं ॥ घेढ राम वाधै घणी, उर्गति प्राणी. जाय ॥ २ ॥ निंदक स. रिखो.पापीयो, नूंमो: कोश्य न दिछ । वलि चंकाल समो कह्यो, निंदक वदन अदि. ॥३॥ आदि प्रशंप्ता आपणी,. करतो इंद नरिंद ।। लघुता पामे लोकमां, नासै निजगुण बंद ॥ ५॥. को फेहनी म करो तुम्हे, निंदाने अहंकार... आप प्रापणे वामे रहो, सडुको नलो संसार . ५ ॥ तोपण अधको नाव ,, एकाकी समरत्य ॥ दान शील तप त्रिणे जला,.पण नाव बिना . अकयच ॥ ६.॥ अंजन आँखै.प्रांजता, अधिको. आपणो रेख ॥ रजमांदे ( ७४३) तज काढतां, अधिको नाव विशेष ॥ ७॥ नगवंत हठ नंजणं नशी, चारे समान गणंत || चार करी मुख आपणा, 'चन विध धर्मजणंत ॥ ७॥ || दाल ५ मी ॥ वीर जिणेसर इम नणे रे, वैरी परखदा वार, धर्म करो तुमें प्राणिया रे, जिम' पामो जव पार रे ॥ धर्म हीये धरों ॥१॥ धर्मना चार प्रकारो रे, नवियण सोनलो ॥ धर्म मुक्ति सुखकारो रे ॥ धर्मः ॥ धर्मयकी धन संपजै रे, धर्मयकी सुख होय, धर्मयकी आरति टखे रे, धर्म समो नहि कोय रे ॥ ५० ॥ २ ॥ ऽगति पमतां प्राणिया रे; राखे श्रीजिनधर्म ॥ कुटंव सहुको कारमो रे, मति नूलो नविनर्म रे॥ ॥०॥ ३ ॥ जीव जिके सुखिया दूधारे, वलि होसे हैं जेद ॥ ते जिनवरना धर्मथी रे, मत कोई करो संदेह रे ॥ धर्मः ॥ ४ ॥ सोलेसे गसठ समे रे, सांगानेर मझार, प्रमप्रनु सुपसानले रे; एद लण्यो अधिकारो रे ॥ ५० ॥ ५॥ सोहमसामी परंपरा रे; खरतरं गच कुलचंद ॥ युगप्रधान जग परगमो रे, श्रीजिनचंद मु. नींद रे ॥ ५० ॥ ६ ॥ तास शिप्य अति दीपतो रे, विनयवंत ज. सवंत ॥ प्राचारज चढती कला रे, जिनसिंह सूरि महंत रे ॥१०॥ ॥ ७॥ प्रथम शिप्य श्रीपूज्यना रे, सकलचंद तस शीत ॥ स. मयसुंदर वाचक नणे रे, संघ सदा सुजगीत रे ॥ ३० ॥ ॥ दान शीयल तप नावना रे, सरस रच्यो संवाद | नसतां गुणतां नावसुं रे, झाई समृद्धि सुप्रसाद रे ॥ ५० ॥ ॥ इति दानशील तप नाव चोढालिया संपूर्ण ।। ।। अथ महावीरस्वामीको छंद लिख्यते ।। सेवो वीरने चित्तमा नित्य धारो, अरि क्रोध, मन्नत्री दूर वारो ॥ संतोपवृत्ती घरो चित्तमाही, राग देपयी दूर या नाही। ॥ | पख्या मोहना पासमां जेह प्राणी, शुश्तलनी वात तेणे-न है ( ७४४) जाणी ॥ मनुजन्म पामी वृथा कां गमो गे, जैनमार्गठमी जुलां कां नमो वो ॥.२॥ अलोनी अमानी निरागी तजोगे, सलोनी समानी सरागी नजोगे । हरि दरादि अन्यथी सुस्मो मे, नदीगंग मुकी गलीमा: पमो गे ॥ ३॥ के. देव दाये प्रति चक्रधारा, के देव.पाले. गले संक्रमाला ॥ केश देव नत्संगे राखेने वामा, केश देव साये रमे वृंद रामा ।। UI केइ. देव जपे पे जपमाला, केर मांस अक्षी.मादा विकराला, के योगणी जोगिणी जोग मांगे, केश रुद्रणी नगगनो नोग मागे ॥५॥ सा देव देवी तणी आश रा खे, सदा मुक्तिने सुखने केम चाखे॥६॥जवा लोनना-योकनो पार नायो, तदा मधनो विउन मन लाग्यो ॥ ६ ॥ जे देवलां प्रापए भास राखे, तेद मिने मनसुं लेष चाखे ॥ दीन दीननी जी ते केम नाजे, झूटो ढोल. दोवे कहो केम बाजे ॥ ७ ॥ अरे मू भ्राता जो मोक्षदाता, प्रलोनी प्रभुने नजो. विश्वख्याता ॥ नचिंतामणी सारिखो एद साचो, कलंकी कायना मिसुं म राचोद.॥ मंदबुद्धिजेद प्राणी कदेवे, सवि धर्म एकरव नूनं चमेवे ।। (कदा सर्पवाने किदां मेरुधीरं, फिदा कायराने किदां शू रवीरं ॥ ॥ किदां स्वरयास किहां कुंलखं ।। किदां कोवान विहां कारमं । किहा कीरसिंधु किहां कारनारं, किहां कामधेनु किदां गगखीरं ॥ १०॥ कहां सत्यवाचा किदां कुरुवाणी, कहां कनारी किदां रायराणी ॥ किहां नारकीने किदां वनोगी, किहां देदी किदां कुष्टरोगी ॥ ११ ॥ विदा कर्म घाती किदां कर्म भार, नमो वीरस्वामी नजो अन्य वारी । जिसी सेजमा स्वप्न. बी राग्य पामो, राचे मंयुको घरी जेद सामी ॥ १२ ॥ Aft मुम्क संसारमा मन मात्र, जना मुदनां श्रेष्ट इट गर्ने । तत्री मोह माया दरोईन रोसो, सनो पुण्य पोसी जनी ने मरीमो
(४५)
| १३ ॥ गति चार संसार अपार पामी, श्राव्या यास धारी:
प्रिनु
य स्वामी ॥ तूंही तुंदी प्रनु पर्मरागी, जवफेरनी शृंखला मोद
मागी ॥ १४॥ मानीये वीरजो एक अर्ज मोरी, दीजै दासकू
विना चरण तोरी ॥ पुन्य नदय हुओ गुरु अाज मेरो, विवेक
ह्यो में प्रनु दर्श तेरो ॥ १५ ॥ इति ॥
॥ अथ नवकारका छंद लिख्यते ॥
। दूहा ।। बंबित पुरे विविधपर, श्रीजिनसासन -सार ।।
नचे श्रीनवकार नित, जपतां जैजैकार ॥ १ ॥ अझसव अक्षर
अधिक फल, नवपद नवेनिधान । वीतराग सेंमुख वदे, पंच
परमेष्टि प्रधान ॥२॥ एकज अक्षर एक चित्त, समरयां संपति
प्राय ॥ संचित सागर सातनां, पातक दूर पुलाय ॥ ३ ॥ सकल
मंत्र सिर मुकटमणि, सदगुरु नापित सार, सोनवियां मन शुदमें,
नित्त जपिये नवकार ॥ ४॥ (वंद दाटकी) नवकार श्रको
श्रीपाल नरेसर पाम्यो राज्य प्रसिद्ध, समसान विपे शिव नाम कु
मरने सोवनपुरुपो सिद्ध । नवलाख जस्ता नरक निवार, पामेन
चनो पार ॥ सो नवियां नत्ते चोखे चित्ते नित जपियै नवकार ।।
॥ बांधी वाताखा के चैती देवल कुंभहुताश, तस्करने बलि में
व समप्यों श्रावक नध्यो तेह अाकाश ॥ विधि रोते जप्यां विष
घर विष टाढाले अमृतधार || तो०६॥ बीजोरा कारण राय महा
चत व्यंतर उष्ट विरोध, जेणे नवकारें हत्या टाली पायो यह
तिबोध ॥ नवलाख जपंता श्रायै जिनवर एडवो के अधिकार ॥
सो० ॥ पल्लीपति सोख्यो मुनिवर पासें महामंत्र मन शुरु
परजव ते राजसिंह पृथ्वीपति पाम्यो परघल रिद्ध 11 ए मंत्रयका
अमरापुर पुहुतो चारुदन सुविचार | तो0 5 11 सन्मासी काती
तप साधंतो पनाभि परजाले, दीयो श्रीपासकुमारे पन्नग अश्वतो
ए५
(8) ते टाले । संन्नलायो श्रीनवकार स्वयंमुख नुवन अवतार । सो० ए ॥ मनशुद्धे जपतां मयणासुंदरि पानी प्रिय संजोग, इस ध्याने कुट टब्यु नंबरठे रगतपित्तनो रोग ॥ निश्चेसु जपतां नव- निधि यायै धर्मतणो श्राधार ॥ सो०१० ॥ घटमांहे कृष्णनुजंगम घाल्यो घरणी करवा पात, परमेष्टि पन्नावे दारफूलनो, वसुधा- मांहि विदात । कमलावतियें पिंगल कीघो पापतणो परिहार ।। सो०११ ॥ गयणांगण जाती राखी गिहणी पामी बाण प्रहार, पद पंच सुता पपितघर ते थइ कुंता नार ।। ए मंत्र अमोलख 'महिमा मंदिर नवखनंजणहार ।। सो० १२ ॥ कंबल ने संवल कादव काढ्या संकट पांचसे माल, दीधे नवकारे गया देवलोके विलसे अमरविमान || ए मंत्रथकी संपति वसुधामा लही विलसै जैनविहार, सो० १३॥ आगे चोवीसी हुइ अनंती होसे वार । 'अनंत, नवकारतणी कोई आद न जाणे, श्म नाखै जगवंत ॥ । 'पूरबदिसि चारै आदि प्रपंचे समरयां संपति सार ॥ सो० १५ ॥ परमेटी सुरपद ते पिण पामे जे रुत कर्म कगेर, पुंगरगिरि ऊपर प्रत्यक्ष पेख्यो मणिधर ने शक मोर ॥ सदगुरु सन्मुख विधिये समता सफल जनम संसार || सो १५॥ सूली आरोपेण तस्कर कीयो लोहखरो परसिद्ध, तिहां सेठे नवकार सुणाव्यो पाम्यो अ. 'मरनी शद्धि । सेठने घर"श्रावी विघ्न निवारयो सुरें करी-मनुहार । सो० १६॥ पंच परमेष्टी ज्ञानज पंचह पंच दान चारित्र, पंच सिझाय महाव्रत पंचहुं पंचसमति समकिन, पंच प्रमाद विषय तजो पंचद पालो पंचाचार ॥ सो० १७॥ (कलश ॥ उप्पय) नित्य जात्य नवकार सार संपनि सुखदायक | सिद्ध मंत्र ए शाश्वतो एम जय जगनायक ॥ श्रीअरिहंत सुसिद्ध सुइ प्राचार्य जणी, श्रीउवझाय सुसाधु पंच परमेष्टि धुणीजे । नवकार सार संसार (७) कुशल लान वाचक कहै, एक चिनै आराधता झदिसिद्धिवन्ति लहै ॥ ॥ इति ।। ॥ अथ घग्घर नीसाणो लिख्यते ।। सुख संपति दायक सुरनरनायक, परतिख पास ज़िनंदा हे। जाकी उवि कांति अनोपम नपित, दीपत जाण दिनंदा हे। मुखः ज्योति जिगामिग झिगमगर, पूरण पूनमचंदा हे ॥ तव रूप सरूप वखाणाहि पत, तूंदी विनुवन नंदा दे ॥ १ ॥ करुणासागर लोक सवे मिल, जाका जस्त धुणंदा है | तेरी खिजमन करे श्कचित्ततुं तो सेवक धरणिंदा दे॥तें जलता यागनिकाल्या नाग, किया वमन्नाग सुरिंदा दे ॥ तो चरणां प्राय रह्या सपटाय, कला अति केलि करंदा हे ॥ २ ॥ इक दिन महा रन वन पंचागनि, ताप सताप तपंडा दे || फल फूल श्राहारी उदाधारी, श्रदप पदार लियंदा हे || सव नेप सन्यासी रहे नदासी, अविनासी ध्यावंदा हे ॥ दिसि च्यारां दिछी बले अंगीठी, सूरज ताप तपंदा दे ॥३॥ महिमा वद्धारी सब नर नारी, जाकू श्राय नमंदा हे ॥ एसी सुग वत्तां धरिय नुकत्ता, पुत्तां पास जिनंदा दे ॥ वामाढ़े अरकै कुरा तो परके, मेरा दूंस पूरंदा । तिहां चालो पुतां जिहां अवधुना, जो गारंन जगंदा दे ॥॥ जननी मन श्रासा पुरण पासा, रापनि सऊंदा हे ॥ गल घुग्घरमाला जाण देमाला, दंताला पंदा हे । वर वीर घंटाला मद मतवाला, जोलाली जलकंदा दे ॥ ५ ॥ पंचरंगी परकर सको तरकर, ढालांसु ढल कंदादे॥धतकारे धत्तामत्ता अंकुस, मावत शीत दियंदा हे ॥ गंगातट या खमे रहाए, प्रनु ज्ञानी आस्कंदा हे ॥ ६ ॥रे रे अनिमानो तप अज्ञानो, पावक जीव जलंदा दे । तिहां फार उफाम दिखाले लकम, वम फराधर नागदा दे ॥ नवकार सुणाया मुरपद पाया, तापस जस घटंदा हे ।।
(110) तिण किया नियाणा तप खजाणा, कोमी सट्टे वेचिंदा दे ॥ ७ ॥ हुयके क्रोधातुर थातुर सो कमगसुर धुर उपजंदा हे ।। अश्वसेन सुतन महाराज विषय उख, जाणत आप तजंदा हे ॥ पंचमुखी लोच किया आलोच, मनासु सोच अफंदा हे || प्रनु अप्रतिबंध वि- हार कियो तब, रनबन वास वसंदा हे ॥ ७॥ नपशम अणगारे कानसग्ग मझारे, कमगर दाव लहंदा दे || कमा असुराणा बली हेराणा, पिगण विलोक धुखंदा हे ॥ करि यातस क्रोध विचार विरोध, महा अनिमान धरंदा हे ॥ वानल मतवाली नीली काली; वायु महा वाजिंदा हे ॥ ए ॥ रवि किरणा कोट रही रज श्रोट, दिवाकर तेज विपंदा हे ॥ कर घोर घटा चिकटा नमटी, अरु बाजू गाजंदा हे || गरमाटा वाटा सुणिया थाटा, ऐरापति लाजंदा है ॥ हुधा अकाला धुर वरसाला, वीजलिया पोवंदा हे ॥ १०॥ मोटी धारांसुं धारावांसु, यों अंबू वरसंदा हे ॥ चल्ले जलः खाला नदियां नाला, हेमाला हालंदा हे । दरियाव नलट्टां केतो फुटां, पाणी नहि मावंदा हे | दिगपाल दहलां धरिय नत्यवां, खोणीपत्ति खितंद्रा हे ॥ ११॥ वझे पाहामां ऊंगी कामां, सकामां ढाहंदा हे || सम दाहंदी रेल वहंदी, जाणक जग रेवंदा दे ॥ बहु वासर बूटा जाए कि रुना, फूग मन असुरेंदा हे ।। तेवीशम राया वनमें पाया, काठ सग्ग कहा करंदा हे ॥ १.२ || नवसग्गाहंदी केल करंदी, पाग नादि मुमंदा हे ।। धरि-मनमें ध्याना कोध न माना, निश्चल ध्यान चरंदा हे । प्रन्नु नासा तांश नद्दी थाई, तोही नांहि खुनंदा दे ।। देवारज जेसा धीर पएसा; पावत पीम सइंदा हे ॥१३॥ तिण अवसर वरदां धरणी धरदां, पासण धेग चलंदा हे । तिण यद्यपि अयुंजी दी। प्रनुजी, तन मन अति नलसंदा दे ॥ तिहां पदमा- बत्ती देव सकती, सुं मिल वेग वहंदा हे ।। दुयके देराना वैवि ..
--- -- (0) माना, पांवां याय सगंदा हे ॥ १५ ॥ फररानाग हजारी कर विस तारा. उत्तर ज्यूं गवंदा हे ॥ ले अापण खंधे प्रेम निबंधे, पूरब प्रीत सुखंदा हे ॥ इंशाणीनार) सब सिणगारी, जोवन अंग मिल कंदा हे ॥ १५ ॥ राकापति वयणी मिरगानयणो, सूंदर रूप सो हंदा हे । अणियाला कळाल ऊलके विकल, खूब वणाव वगंदा है ॥ नकसर नत्यां लाल सुकत्यां, विच मोती मलकंदा हेनदा पाटंबर कोणी अंबर, आनूपण अलकंदा हे १६ ॥ नर कंचुक सिया तन नलसिया, कामघटा गहरंदा हे । पहिरण तन खूवा हरिया दूवा, सोलेही सोहंदा हे ।। कटिमेखल कमियां सोने जाम यां, दीरा वीच हलकंदा हे ॥ १७ ॥ घमके घूधरियां पाए धरियां पग नेवर रणकंदा ॥ ले कांकर ताला ताल कंसाला, पस्कावज वाजंदा ॥ कुहके करनाला वीच रसाला, जंगी ढोल घुरंदा है॥ वाजे सरणाई सखरी घाई, नगारा रोजंदा दे ॥ १७ ॥ पनमा वै रुद्वा पाय लहां, नाटिक मिल नाचंदा दे ॥ तनायेर तान त झमा, रस नेद रमंदा हे । दिन तीन वितीता तोदि न बीता, पा वस जल पतरंदा दे ॥ १५ ॥ धरणीधर जाण्या ग्यान पिगण्या, कमासुर कोपंदा हे । नागादी पनी अांख्या रतो, कित्ती रीत थावंदा हे ॥रे मुह घिन चित्त विणा, क्यूं नांदी समझदा दे। सादिव बलवंता जोर अनंता, तूं तो नहि जाणंदा ॥ २०॥ . ए क्षमासागर गुणके आगर, तीनूं लोक नमंदा. दे।। असमांन खमाई रीस राई, हिकार बजरंदा दे । किती बदु गलां पमै दहला, धहम देद धूजंदा दे ॥ धरणेंद्र मराया तब ते पाया, पावां थाय लगंदा दे ॥ २१ ॥ कर जोकि खमाया सीस नमाया, जगनायक जिनचंदा दे । तूं साहिब सवा तो गुण रचा, मेरा दिल खुवंदा दे ॥ तें रीस न धरियां क्षिणदो विरियां, तूंही अचल गिरंदा हे || ( 34 ) कमासुर कित्ती बहु विनती, निज अपराध खमंदा हे ॥ २२ ॥ सुरपती सिधाये निजघर आये, प्रनुके गुण समरंदा हे ॥ सुध सं जम पाले. दोप, निहाले, तव केवल नपजंदा हे|| सम्मेतशिखर पर चढकै कपर, सिद्धपुरी पोहचंदा हे॥ तेरी कोरती जग करनी, पार न को पावंदा हे ॥१३॥ तूं सच्चा रके नेद परके, गुमानी मो मंदा हे ॥ तूं अंतरजामी तूं बहुनामी, सुरनर सेव करंदा हे ॥ तूं दीवाणा तूं खूमाणा, तूं मोजी.मकरंदा हे ॥ तूं अक्षा पीर फकीर मुसाफर, तूं जोगी तूं जिंदा हे ॥ २४ ॥ तूं काजी मुलां मरद अ टलां, तूंही शेप फरीदा हे ॥ तेही कपाया.धंदे लाया, मायामें मु लकंदा दे.॥ तूं बूढा बाला मद मतवाला, पक्का वाजंदा दे ॥तूं कच्चा कवला सवत सवला,, सच्चा मक रहंदा.हे ॥ २५ ॥ यावागो सांई नेद न पाई, नीम पड्यां पावंदा दे ॥ तूं नारायण जोगपरा. यण, माधव तूंदी मुकंदा दे॥ तूं कवलाधारी तूं अवतारी, तूं देवा देवंदा दे ।। तूं एका अप्पे एक नथप्पे, थिति निज सुध थापंदा हे ॥ २६ ॥ तो देवल मझां लोकति संझा, सीरलिया वाटा हो ॥ गुण गीत पपासे कीरत नाते, कोणे सुर गावंदा. दे ॥ कालागरु अगरK मलयागर, धूपेमा धुर्खदा हे ॥ कुंकुंम कसरी केसर पूरी, चंदनसु चरचंदा हे ॥ २३. || मरुया मचकुंदा. फुला हंदा, टोकर कंठ ग्चंदा हे ॥ चंपा गुलायां नरीया गवां, परमल तिहां वासंदा हे ॥ कसाबोई चंगी रचिय.अंग), फलां वीच फार्य दा दे ॥ यानूपण धरियां तन. कररियां, कुंभल कान झिगंदा हे ॥ २८ ॥ सूरत सोहंदी मूरत हंदी, दीगं नेश रंदा हे ॥ तेरी यति जा मोजा. पाचं, वीनती हि सुशंदा दे ॥ २५ ॥ क्या. कल्यूं ग लाहुकम यदलां, समफित मन नलसंदा. हेसिद्धांदा वासा तिदा रद्दामा, तुझ सेवक विलसंदा हे ॥ घग्घर नीसांगी पास नपाणी ( ७५१ ) गुण जिनहर्प कहंदा हे ॥ ३० ॥ इति श्रीघग्घर नीसाणी संपूर्ण । ॥ अथ दादा गुरुदेव स्तवन प्रारंभ ।। ॥ विसशे झाइ समृद्धि मिली, शुन्न योगै पुण्यदशा सफली ॥ जिन कुशल सूरि गुरु अतुलवली, मनवंचित आपै दादो रंग रखी ॥१॥ मंगल लीलसमें विपुला, नवनवा महोचव राजेला।।सुप- सायें गुरु चढती कला, सुकलीणी पुत्रवती महिला || २॥ सवही दिन यायै सबला, सद वासकपूरतणा कुरखा ॥ हय गय रथ पायक बहुला, किल्लोल कर मंदिर कमला ॥ ३॥ वी चमर नि साण धुरै, नर वे दरवार खमा पुहरै || जयर करजोमी उचरे, सा निद्ध गुरु सव काज सरै ॥ ४॥ सरसा जोजन पान सदा, उख रोग उकाल न होय कदा || अविचल ऊलट अंग मुदा, गुरु कूरम दृष्टि प्रशन्न सदा ॥ ५ ॥ घमघम माइल नाद घुमें, बत्तीसे नाटक रङ्गरमै ॥ प्रगट्यो पुण्य प्रताप हमें, सवला अरियण ते श्राय नमें ॥ ६ ॥ तनसुख मनसुख चीरतणे, पहिरे वेलानल होयरने || या विो कुशल गुरु एक मनें, नॅनक सुर मंदिर नरै धनें ॥ ७॥ तत खरा घरा खंब्यो आवे, करि स्यामवटा मेह वरसावै॥ तिसीयां तोय तुरत पावे, जलदाता त्रिजग सुजश गावै ॥ ७ ॥ लहिरयां जल कल्लोल करै, प्रवहण नवसायर मझ मरै ।। वूमंता वाहणजे समरे, ते प्रापद निश्चेतुं नवरै ॥ ए ॥ खमखम खमंग प्रहार वहै, सो दामनि जिम समसेल' सहै । कुशल २ गुरु नाम ! कहै, ते खे. मकुशल रिण मझ लहैं ॥ १० ॥ धुन सकल परचा पूरै, श्रीनाग 'पुरै संकट चूरै || मंगलोर अधिके नूरै, देरावर जय टालै दूरै ॥११॥ चीरमपुर वान सुधरै, खंजायतपुर विक्रमनयरै ॥ जियचंद सूर पा टै पवरे, जनु कीरति महीममल पसरै ॥ १२॥ पूरब पश्चिम द कण आगे, उत्तर गुरु दी शेलागै ॥ दहदिशि जन सेवा मागे, है (५२) श्रीखरतरगच्चनी महिमा जागे ॥१३॥ पुर पहरा जनपद गमे, गा जै कुशल नवर गामै || पूजे जे नर हितकामे, ते चक्रवर्ति पद वी पामे ॥ १॥ श्रीजिनकुशल सूरि साखे, सेवकजनने सुखिया राखे ॥ समरयां गुरु दरशण दाखै, श्रीसाधुकीरति पाठक नाखे ॥१५॥इति पदं ॥ • ॥ अथ श्रीजिनदत्त सूरि सशुरु उत्पत्ति स्तवन ।। . | वर लाठ विलाश सुवाश मिले, गुरु नामें मनरी थाश फलै ॥ दोपी उस्मन दूर टलै, सहसा बहु संपति प्राश फलै ॥१ 11.जय२ जिनदत्त सूरिंद यती, शुतधार रुपालक शीलवती ।। ज- सु न रहै पाप रती, जेहनी महिमा जगमाहे अती ॥२॥ शुन्न मंगल लोल. विलाश सदा, उख रोर उकाल न होय कदा ।। आराध्यां आवै सुगुरु मुद्रा, सुप्रशन हाजर होय जदा तदा ॥३॥ जिण जीती. चोसठ जोगणियां, वश बावन, खेतखंवार कियां । जसु नामे न प वीजलियां, नूत प्रेत न कर सके उसवलियां ... जिरा सिंध सवालंख दिस सावा, पंच पीर नदी जिए पुल वांधी.।। नपगार कीयां कीरत' लाधी, वरसांत लीयां गुरु सिद्ध वाधी ॥ ५.! सुत मुगल कियो सरजीत बहु, पाये लागा नरनार सदू.॥ जि. साधी विद्या वेशबहू । प्रतियाधी श्रावक कीध सहू ॥ ६ ॥ वमनगरे ब्राह्मरा द्वेष धरो, मृत गाय सङ्ग जिएण चैत्य धरी । गुरु मंत्रबलें जीवत उधरी, विप्रवेप सह गुरु पाप परी॥ || वनमय यंनो दाये खंभ कियो, पोयो परगट परना व थियो । विद्या सोवनवरणे सझियो, वर नयर, नळोणी सुजश लियो । - ॥ गुरु हुंवम वंसे जीवदया, मंत्री वावग परसिद्ध श्रया ॥ बाहदे कूखे जनम जणू, ते चचदे विद्या जाण घरों ए ॥ ग्यार वत्तीसे जनम जणू, ग्यार गताले दिक्ष युगुं ॥
( ७५३)
उगवर ग्यारे गुणहतरे, स्वर्गे धारेते ग्यारै ॥ १०॥ जिनवखन
नूरी पटोधरणं, परन्नाव नदेसर नयहरणं ॥ नवनिधि लग्मी
संपति करणं, वलि विकट संकट आरती हरणं ॥ ११ ॥ धुन
सकल श्रीअजमेरे, गढममो वर वीकानेरे। सुखदायक श्रीजेशल:
नरे, दीपे गुरु गाजीखान मेरे ॥१२॥ मुलतान नगर महिमा
नागे, नावट दाखि दूरे नागे॥ मेरे असमालखानके सोनागे,
गुरु पुरमें कीरति जागे ॥१३॥ धनर जे सद्गुरु ध्यान धरे,
रनवन पूजा जेह करे ॥ गच खरतरनी महिमा पसरै, कवि
मूरि उदय जिनकीरति करे ॥ १४ ॥ इति पदं ॥
। अप सद्गुरु श्रीजिनकुशल सूरजी उत्पत्ती स्तवन ।।
रिसद जिनेसर सो जयो, मंगल केलि निवास ॥ वासुव.
चंदिय पायकमल, जग सहू पूरै आस ॥ १ ॥ (चोपाई) चंद
कुलांवर पूनमचंद, वंडो ओजिनकुशल मुर्णिद ॥ नाम मंत्र जसु
महिम निवास, जो समरे तसु पूरै पास ॥ २ ॥ मरुमंगल सवि-
याणो गाम, धण करा कंवन अति अनिराम || जिहां वसे जि:
दहागर मंत्र, जैतसिरी जसु घरणी कलत्र ॥ ३ ॥ जसु तेरेसे
तीसे जम्म, सेताले सिरिजम रम्म
पाटण सतहत्तरे जसु पाट,
निव्यासियै तमु सुरगे वाट ॥ ४ ॥ नूमंगल सरगें पायाल, अचिः
राचिर युग इण कलिकाल ॥ प्रनु प्रताप नवि माने सोय, में नदि
नयणे दागे जाय ॥ ५ ॥ निरधन लदे धन धन्न सुवन, पुन्नहीए
पामें यहु पुन || असुखी पामे सुख शंतान, एक मना करतां गुरु
ध्यान ॥६॥ गुरु समरण मापद सवि टलै, सपल संति सुख संप;
ति मिलै । प्रांधी:व्याधी चिंता संताप, ते मि नवि मंझे व्याप.॥
॥ ॥ पाप दोष नवि लागै तिहां, गुरु समरण उतंग जिहां !!
सेवंता सरतरुनी वांद, निभै दालिद्र मेटे वांदि॥ ॥ विसदर
ए५
-
. (५) विसनरै विस नरनाद जूत प्रेत ग्रह व्यंतर राह ॥ अनु नामें ते न कर पीम, लाजै नाव नवनय नीम || रोग सोग सवि नास दूर, अंधकार जिम कगै सूर || मूरख फीटी पंमित याय, प्रतु पसाय 5ख ऽरिय पुंलाय ॥ १७॥ दिन२ जिनसासन न. योत, जिहांअ नवसायर पोत ॥ सो सदगुरुं में नेव्यो आज, रलियरंग सब सीधा काज ॥११॥ ।।दाल ॥ आज घरयं. मण सुरतरु फलियो, चिंतामणि करकमबै मिलियो, उदयो पर- मानंद घरै ॥ १२ ॥श्राज दीह में धन्ने गिणियो, जुगपवरागम जो में शुणियो, चंद्रगध महिमा निलो ए ॥ १३ ॥ कां करो पृथ्वी पति सेवा, कांश मनावो देवी देवा, चिंता वाणो कोई मने ॥१॥ वार एक चित्त नणीजै, श्रीजिनकुशल सूरि समरीजै, सरै काज आयास विन ॥ १५ ॥ संवतं चवद इक्यासी वरसे, मुलक वाहण पुरमें मन दरसे, अजिंय जिणेसर पर नुवणे ॥ १६ ॥ कीयो क वित्त ए मंगल कारण, विधन हरण बहु पाप निवारण, कोश मत संसो धरो मनें ॥ १७॥ जिम सेवे सुरनरराया, श्रीजिनकुशल मुनीसर पाया जयसागर नवझाय धुणे ॥ १७ ॥ श्म.जो सदगुरु गुण अभिनंदै, झदि समृद्ध सो चिरनंदै, मनवंग्ति फल मुरू हुवो ए ॥ १५॥ इति पदं ॥ • ॥ पुनः ॥ आयो सदु श्रीसंघ श्रांश घरे, गुरु मोन ग्रह्या कहो केम सरे ।। दरशन वहिलो सद गुरु दाखो, निज सेवक जाण महिर राखो ॥१॥ श्य विखमी विरियां प्रायवणी, केहवी करिये तुझ अरज घशी.॥ दिव अलगा गे तो वेगा श्रावो, दिवं ढील घमीनर म करावो ॥ २॥ 'गुरु खरतर गळ साचों, कोइय न जाणे तुमने काचो ॥ण संक टमें पालश म करो, दादा उसमननें दूर करो ॥ ३॥ को चूक मी सदगुरु इमसुं, तो जणूकदसो तिषण पर खमसुं। दिवणा दर : सद ॥ प्राया. सपा (५५) थे,मत ताणो, निचे पोतानो कर जाणो ॥ ४ श्रीसंघ अग लगै, पाग किम जावा इणे पगे ॥ण, पर करिये. गुरु अरज इसी, हिव सगला मेलो करो खुसी ॥ ५॥ जिनकुशः ल सूरीसर जग चावो, अपणायत वेगा श्रावो ॥ अगला विरुद से नजवालो, परपल निज गेरू प्रतिपालो ॥ ६ ॥ गुण गाम गमाये. ए गायो, सुणतां सदगुरु वेगो प्रायो॥ राजी दुय सगला रंगरली; जिनचंदनी प्रास्या सफल फली ॥ ॥ इति पदं ॥ पुनः ॥ सदगुरुजी थे सांजलो, श्रीजिनदत्त सूरीस हो । सेवकने सांनिधः करो, पूरो मनद जगीस दो ॥ १ ॥ दोलति दो दो दादाजी संप ति दो | आंकणी । दोलत दो गुरु माहरा, यांदरा विरुव अने क हो ॥ यां समरयां संकट टलै, एदीज दादाजी तादरी टेक हो ॥ दो० २ ॥ जीती चोसठ जोगणी, वस कियां बावन वीर हो । सिंधमांदे ते साधीया, पंचनदी पंच पीर हो । दो० ॥ ३ ॥ पमिकमणामांदे बीजली, - बली२ बकाय दो ॥ ये मंत्री राखी तिका, तूठी वर दे जाय हो ॥ दो० ॥ ४ ॥ उच्छव क उच्चमें, मूंन मुगखरो पूत हो । जाप करीने जीवामियो, संत्र मांद राख्यो दादै सूत हो । दो० ५ ॥ वमनगररे ब्राह्मरों, देहरे धरी मृतगाय दो ॥ परप्रवेश विद्या वतै, पिशुन लगाया दादे पर य दो ॥ दो०६ ॥ विक्रमपुर व्यापी मरी, दूरकोयातें सहू स्क दो ॥ परवार पिरा पोते कीयो, सहुनें दियो दादे सुरक दो ॥ दो? ७|| अंब हाथे अक्षरै, घे प्रगट्या ततखेव दो । जुगप्रधान जग तूं जयो, पाखै अंबिकादेव हो । दो० ॥ ॥ यांनो वन विवारने, पोथी परगट कीप दो । विद्या सोचनप्रकरे, उसीमाहि.. लोप हो ॥ दो० ॥ ए ॥ इम विरुद घशा तादरा, कदतां नपे पार हो । जागतंजोगे-दादो नेटियो, अमरमियां प्राधार दो ॥ दो० ॥ रतां (५६) ॥१०॥९. सेवक ताहरो, थे पापो धन.शः दो.|| कनककीरत सुपसानले, लाजउदय सुख सिम हो । दो० ११.. ॥ इति पदं । ॥ पुनः॥ दादा चिरंजीवो, सेवकजन सुखदाई, दरशण सदा देशो॥ दादो दीनदयाल सदा दाता, दादो समस्यां यापे सुखशाता, दादो जगवंधव जगगुरु वाता ||दा० ॥१॥ दादो परचा जग सगले पूरै, दादो सेवकना संकट चूरै, दादो उरित हरै सडूनी दूरै ।। दा० ॥२॥ दादो अलगांधी जात्री आवै, दादो देखीने ते सुख पावे, म्हारा दादाजीनी जोम को नावै ॥ दा० ॥ ३ ॥ दादो राजनगरमांहे राजे, जिहां सुजशनगारा नित वाजे, दादो गोगासां सेहर ठाजे, दा०॥ ४॥ दादा घस केसर सूकर घोली, हाये लेर सोवन क चोली, पूजो दादाजी मिलश् टोली ।। दा०॥५॥ दादो प्रारति- यां आरति टाले, दादो सेवगजनने प्रतिपालै, दादो जिन सासन नित उजवाले ॥ दा० ॥ ६ ॥ दादो महिमावत माहाराजा, दादो राजै खरतर गव राजा, दादो समरयां सफर करै काजा || दा० ॥ दादो कुशलसूरिंद बहु गुणवान दादो परतिख सुरतरु अवतारी, जावं दादाजीनी हूं वलिहारी दा० ॥ ७॥ दादो श्रीजिनचंदसूरिंद पाटे, दादो गाजै गुलियन हगाट, जसु यांन सोहे जग थिरयाटै ॥ दा० ॥ ५ ॥ दादा महि निजर मुझ पर करियै, दादा धारति पीमा उख दरिये, दादा जि जग जयकमला वरिये ॥ दा० १०॥ दादा सेक्गर्ने सानिध ज्यो, दादा उस्मराने दूरे हरज्यो, जिनवंदना मनपंधित फलज्यो दा० ॥११॥ इति पदं ॥ . 'पुनः · गानै जिनकुशल गमा सेवकनां संकट टाले हो । गा०॥१॥ परतिख गुरु परचा पूरे सेवकनी चिंता चूरे दो ॥ गा०॥२॥ उतरी नितरी रवि गजे विध थिरथुन विराजैः दो 11.गा० ॥ ३ ॥ मूलरे यात्री मित ( ७५७ ) यावे, दादोजी दीनां सुख पावे हो ! गा० ॥ ॥ केशरं घप्त नरिय कचोली, मांहे वलि मृगमद घोली हो ॥ गा०॥५॥ पूजो पग नीर पखाली, गावो. गुण गीत रसाली हो - 11 गा०॥६॥ दादोजी पुखियां सुख देवे, निरधनियां नित धन देवे हो ॥ गा. 1.७ ॥ हय हाथी रथपति बहुला, गुरु नामे पामे कमला दो ॥ ॥ गा० ॥ ॥ सकजा सुत सुंदर नारी, पामे परिकरः सुखकारी हो ॥ गा० ॥ ए. ॥ अलगायी रोग गमावै, गुरु पूज्यां वंचित पावै हो ॥ गा० ॥ १० ॥ पावै गुरु तिसियां पाणी, तिण वेला जलधर थाणी हो ॥ गा० ॥ ११॥ ग्रह गोचर चोर जंजालै, पोमा हुवे पालेमाले दो ॥ गा० ॥१२॥ बाजे जग जशना वाजा, राजै खरतर गव राजा हो ।। गा० ॥१३॥ जसु जैततिरी वर माता, जिल्हा गरमंत्र विख्याता हो । गा० ॥ १५ ॥ संवत सतरेसे श्क्यासी, कातीपूनम परकासी हो । 'गा०.१५. ॥ सहु संघ सहित सुविलासै, अधिक दर देत उल्लाते हो । गा० १६ ॥ श्म यात्रा करी आणंदे, जिनन्नक्ति जतीसर वंदे हो । गा०॥१७.॥ इति पदं ॥ पुनः सहाइ मेरे श्रीजि- नकुशल गुरू ॥ कुशल करण कलिमादे प्रगटयो, खरतर ग वरू ॥ स० ॥ वावनोचंदन मृगमद मेलो, पूजो.प्रेम नरू ॥ स.०.१ ॥ चिंता चूरण विघ्न विमारण, दालिइ दूरहरू ॥ .स २ ॥ दिन साहिव चढते वाने, ध्यावो ग्यानधरू || सः॥ वाजै जेदना जशना वाजा, गवी गमे जरू । स० ॥ ३॥ संवत प्रदारसमें श्रमस, मिगसरमाश थिरू.।।.स० ॥ संघ सहित.श्रीसद्गुरु नेटे, श्री जिनहर्प सरू |. स० ॥ ४ ॥.गाम गमाले चरण नमंता, तूगे कटपतरू || स० ॥ पाठक श्रीविद्याहेम.गणिने, उदयरत्न करू ॥ सः ॥५॥ इति पदं ॥. पुनः प्रायो प्रायो.जी, समरंता दादोजी ( ७५७ ) आयो । संकट देख सेवककू सदगुरू, देरानरतें ध्यायोजी ॥सः ॥१॥ दादा चरसे मेहनें रात अंधेरी; वाय पिण सबलो वायो॥ पंचनदी हम वैठे वेकी, दरीय चित्त करायो,जी॥ स० ॥२॥ दादा नचन्नणी पोहचावण, आयो, खरतर संघ सवायो। समयसुंदर कहे कुशल कुशलगुरु, परमानंद सुख पायो जी ॥ स. ॥ ३ ॥ इति.पदं ॥. राग लदुरी॥ नाया नक्तिसूं पूर रदो रे, जरिजन सब उर दरो रे ॥ना ॥ मेरे मनमें नक्ति वैरागी, चित्त परणित लगनसु लागी:॥ मेरी नाग्यदशा अब जागी, जीया हो जा..॥१॥ सब सझन मिलकर श्रावो, गुरुचरणे चोक पूरावो ।। वलि अक्षत थाल वधावो, जीहा होनाः ॥ २ ॥ गुरु महिमावत: सवाई, गुरुनाम सदा सुखदाई.॥ गुरु सेव्यां पाप पुलाई, जीया हो जा० ॥३॥ घस केसर नरके.कचोली, माहे मृगमद कुंकुम घोली .. गुरु.पूज.रचो. नर कोली, जीया हो ना० ॥ ४॥ श्री जिनदर्ष सूरीसरराजा, वाजे .जग जशना, वाजा ॥. सत्यरत्न करै सुन्न काजा, जीया हो जा० ॥ ५॥ इति पदं ॥ .. पुनः ॥.राग कैरवो ॥ ॥ कुशल सूरिंद. गुरु पूजो नवि हितसुं, कु० ।। कार चंदन कपूर अरगजा, नाव घरी करो पूजा चितसुं । कु० १. ॥ मोगरा लाल गुलाब मालती, मन सुध माल कर नवि कच. सुं । कु० २॥अशरण सरण परम गुरु सेवो, धरम ध्यान धरो आतम रुचिसु ॥ कु०,३ ॥ सेवक जन: प्रतिपाल जगतगुरु, मासा पूरै गुरु घणु दत्नसुं ॥ कु०:४ ॥ ध्यान सुधारे ज्ञान वधारे,रूप रंग. देव चित हित.मतिसुं॥.कु०॥५॥ कुशल सुरिंद गुरु सानिधका री, परतिख परचा पूरै.सतसुं... कुछ ॥ ६॥ श्रीजिनदर्प सदा सुविधाशी, सत्यरत्न.सुख.एदी उततुं ॥ कु० ॥ ॥ इति पदं.॥ ॥राग. देवश्रीचसत ॥ आज करो रे नजाद, श्रीजिनकुशन ( 3 ) मरिंद प्रागै ॥ श्रा० ॥ श्रा प्राची वेला ने आगे दाव, ण पाठी वेला क्यूं करो साज । प्रा० ॥ १ ॥ विविध प्रकार पूजो मनरंग, हिलमिल गावो साजन संग ॥ श्रा० ॥ धूप दीप करो नै बघ सार, फुलवारीनो नहीं जिहां पार ॥ था० ॥२॥ अक्षत श्रीफल दोवै जेह, पुत्र कलत्र पामे संपदा तेद || प्रा० ॥ ३|| सुर नर नारी कन्ना करजोग, कोण करै म्हारा दादाजोनी दोम श्रा०॥ ४ श्रीखरतर गपति सिरदार, राजा राणा सेवै कतार ॥ श्रा० ५ ॥ मदिर निजर करो श्रीगुरुराज, कुशलसूरिंद गुरु गरीव निवाज ॥ श्रा०६॥ श्रीजिनदर्प करै उग्रंग, सत्यरत्न मन ग्यान नमंग ॥ प्रा० ७॥ इति पदं ॥ ॥राग बंगालोघाटो में निरख्या गुरु माहाराज, वतियां दर्पनरी ॥ में ॥ अमल अनंत गुण आगरु रे, समतारसनो धाम ॥.परम परम परमातमा रे, वं गित दायक स्वाम ॥ ३० ॥ करुणानिध गुरु दोलती रे, सेवक जन प्रतिपाल ॥ नविजन नक्त नावसुं रे, ज्यावै नर थाल ||०२॥ केशरचंदन कुमकुमारे, नरिय कचोली हाथ ॥ पदमण पावै मलपती रे, पूजै सहियर साथ ।। ३० ३॥ कुसल सूरीसर साहिबारे, श्रीजिन चंद सूररी पाट । बलिहारी जिनकुशलनी रे, गाजै घणुं गदगाट । ३०४ ॥ अष्टसिह सानिध करे रे, सुख संपूरण सार ॥ श्रीजिन दर्प सूरीसरू रे, सत्यरत्न सुखकार ॥ ३० ॥ ॥ इति पदं ।। ॥राग प्रत्नाती ॥ चरणकी चरणको चरणकी, वारी जाउं गुरुरा य चरणकी ॥ वा० ॥ श्रीजिनदत्त सूरीसर सदगुरुं, सफल घमी सेवा चरणकी ॥ वा० १ ।। प्रथम मंगल गुरुरायकी सेवा, अशुन्न करम सब दरणकी ॥वा०.२॥ दासिनंजन अरि सव गंजण ॥. गर सानिध करणकी.॥ वा० ३ ॥ मोद नहीं परवाह अनेरी, सर ण मही इन चरणकी । वा०४. ॥ श्रीजिनदर्ष तुम चरणको डा ..
॥ चाल. शा, आशा पूरो सुख करणकी। वा० ५ ॥ इति पदं ॥ पुनः : अब . मोहि. दरसण. दीजै, कुशलगुरु अ०॥ एती नात क. रो मेरे सद्गुरु, ज्यूं मनः मूढ पतीजे ॥.अ. जलदातार :विरुद अमृतरस, श्रवण, अंजसन्नर पीजै ।। सुरतरुः शम. दुरिसण विन देख्यो, कहो नयण किम सें ॥कुछ ॥ २॥ परमदयाल रूपाल कपानिधि, इतनी अरज सुणीजै ॥ परमनगत जिनराज तुमारो, अपणो कर जाणीजै ।। कु० ॥ ३॥ इति पदं । पुनः कुशलगुरु छुशल करो कुशलगुरु छुशल करो नरपूर, सेवकजन मन वंछित पूरण, समरयां होत हजूर ।।.कु० ॥१॥ परम दयाल ने मरस पूरण, प्रशुन हरण नये दूर ॥ संघ नदोकर सदगुरु मेरा, वीन श्री जिनचंद सूर ।। कु० ॥ २ ॥ इति पदं ॥ सूबरको... सद्गुरु पूजण जावस्या, म्देतो कुशल सूरिंद गुण गावत्या. हे माय । स० ॥श्रीफल नेट चढावस्थां, म्हैतो चरणारी पूज रचावस्यां हे माय । स० ॥१॥मारूदेशमें सोन्नता, नगरवी काणे.राजे दे माय ॥ गाम गमाले दीपता, ज्यारी महिपाल मदि मा गजे हे माय ॥ स० ॥२॥ समस्यां संकट चूरता, कुशल करणा अवतारो.हे माय.॥ सुखदायक श्रीसंघने, खरतर ग अधिकारी दे माय.ता०३|| दूर देशांतरयो घणा, हिलमिल यात्री यावे दे माय || सुखर शीत नमावता, संत सुजा मिल गाये दे माय ।। त०४॥ सफ सिरागार मनोदरू, उम२ पाय उमकायेदे माय ।। तन मन प्राण सोनावती, गोरी मंगल गाये दे माय । स०॥५॥ विचव्या साजन मेलवे, अनमी पाय नमावे द माय । मनरा मनो थ पूरने, परपल समीयाये दे माप || स०६॥ विषमी नाबाटमें, समस्यां सानिय याने दे माय ॥ तुषां नोजन मेत्री, तमियां नोरपिसावे दे माप || स.30 पानी मानिस नां, . ...
(७६१) धान पागल घिर घाट हे माय !! तीरगीयां नित सामर्ग, गावै गुण गहगाट हे माय ॥ स० ॥ ७॥ कुशलसूरिंद गुरु पागले, नवि निल नावना नावे हे माय ॥ चंद फते मुनि नित नमें, पर मानंद सुख पावे हे माय || स० ॥ ए ॥ इति पदं ॥ ॥ पुनः ।। श्रीसदगुरुजीसें चीनती रे, आयो सरण तुमारी ॥ दादासाहिब अ रज सुखोज्यो मारी ॥ दीनदयाल विरुद सुण प्रायो, तन मन सु- धकर ध्यान लगायो || महिर निजर श्रव कीजीये जी, चरणक मल बलिहारी ।। दादा० ॥ १ ॥ श्राधि व्याधि संकट उख मेटो, सोमवार पूनम दिन नेटो ॥ अन धन लक्ष्मी चोगुणी रे, वधती संपद सार) | दादो० ॥ २॥ नर नारी अपर मिल श्रावे, अतर गुलाब केवमो ब्यावे ॥ पूजै मृगमद पुष्पसे रे, खुल रही केसर क्यारी ॥ दादा० ॥ ३ ॥ कलयुगमें परचा तूं पूरे, चिंता दोखी 5 स्मन चूरै ॥ धनश् सदगुरु जगजयो रे, सहत किरण अवतारी ॥ दा० ॥ ५॥ नगणोसे यावन वरसे, कातीपूनम दिन जलते ।। गछपति कीर्ति सूरीसरू रे, वंदै वार हजारी ।। दा० ॥ ५ ॥ अरस परस दरशरा पत्र दाजै, अपणो दास मुझे समझीजे || जगमें सु रतरु सारखो रे, कीरति वारही भारी॥ दा० ॥ ६ ॥ प्रगटरणे व रदाता देख्यो, आज तफल दिन में कर लेख्यो ॥ श्रीजिनकुशल सूरिद धणी रे, कहे रामशद्धिसारी ॥ दा || 3 || इति पदं । ॥ पुनः॥ ॥ चाख लरतरोकी ॥ सदगुरु दीनदयाल, गचपति दिनकर तुम धणी ॥ सेवकजन प्रतिपाल, पुखतमहारण दिनम पी॥१॥ गढ़ सवियाणे जी देश, गजेम कुल उदयाचले ॥ जिल्लासाह पितेश, जैततिरी अंबर नलै ॥ २ ॥ गचपति चंदमु दि, पाट तिलक किरगावली ॥ खरतर कमल ग्राणंद, तेज प्र काशन मनरती ॥ ३ ॥ पुर पनन सर देश, झिगमिग ज्योतीजी ए ॥ राग, सो जोगी (७३२) किंगमिगे, पूनम सोमवार ॥ नर नारी गुरु नलगे ॥ ४ ॥ अरचे अतर फूलेख, परिमल फूली जी मालती ॥ महके चंपक वेल, तुं दर आवत मलपति ॥ ५ ॥ शुज भिर थुन वीकाण, बालूचर म हिमा घणी ॥ कीरतवाग प्रधान, उखन्नंजन चिंतामणी ॥ ६ ॥ पूरो वंचित आश, गया तुम सुनिफरतणी ॥ दाता सुख कैलाश, चरण शरण किंकर नणी || JJ पूजै पद गोविंद, चंशिखर जय राशमें ॥ कोटिक गश कुलचंद, कुशलसूरिंद परकाशमें । ॥ ॥ गणीले अमताल, मिगसर वदि दशमी करी ॥ दरशण प्रतहि विशाल, कुशल निधान हरख धरी || ए | गुरुगुण शरिता नीर, मीन मगन हुलाशमें ।। लखमी लील समीर, शद्धिसार जस वासमें ॥ १०॥ इति पदं ॥ ॥ पुनः ॥ गुरु मेरा ॥ यह चाल ॥ सुगुरु मेरी वेमिया पार नतारो, नूं. वण अब मांझी हमारो ॥ सु० ॥ सरिता नाइव नीर जलधि ज्युं, यो । संसार अपारो ॥ ता तट पारंपार अमरपद, ताको वण दातारो॥ सु०॥१॥ राग रंग क जीरण नौका, तिररही नर मऊ धारो।। वेगे परमारथ खातर, मोह मगरने नगरो ॥ सु० ॥ २ ॥ नक्त नधारण श्रीसदगुरुजी, जलदी कष्ट निवारो ॥ जाण वास ग शपतिं करुणानिध, याविपतितसे वारो ॥ सु० ॥३॥ नकापात गगन ज्यूं विपपरश, दीशै थतदि करारो ॥ विरह व्ययादिक निशि अंधियारो, कोण करै निशतारो || सु० ॥ ४ ॥ ब्रह्मा विष्णु टे को ईसा, 'अक्षा 'नमया प्यारो 11 में ध्यान जिनदेव कुशलगुरु, अरिगण गंजराहारो || सु० ॥ ॥ सुरा अरजी बाये ग तमदर, तुरतही विधन विमारो ॥ रामयाग पुर गंज नजीम, कुशसनियान जुहारो ॥ सु० ६॥ केश्यक गुरुसे लखमी बत, हुकम घरै बसुधारो। में इक सेवा चरणकमल की, मां;
गुरु दातारो || सु ॥ संवत नगणीसे अमतालाश, मेस्त्रयो.
दशी सारो ।। नयशा सफल किये गुरु दरशण, हे ऋद्धसार ति
हारो ॥ सु०७॥ इति पदं ॥ राग घाटो । मेरो मन वस
कर लीनो ॥ ए चाल || देख्या में दरश तिहारा, द०॥ श्रीसद
गुरु महाराज ॥ दे० ॥ सफली फली मेरी श्राशा, पाया सुरतरु
श्राज ॥ दे० १ ॥ तुमहो चिंतामणी जैसा, दायक सब सुख
ताज ॥ दे०॥ गंगा अंगणमें प्रगटी, मुझ मन निरमल काज ॥ दे०
१॥ गुण शद्धि संपत काजै, कामधेनु गुरुराज ॥ दे० ॥ सब
लहिलीला प्रगटी, उख दोहग गये नाज ॥ दे० ३ ॥ गुरु
म परनपगारी रे, १० ॥ सुरपद शिवपद पाज ॥ दे० ॥ सुन्न
यांन पुर२ सादे, मुलक बोकाणे राज || दे० ४ ॥ वर गठ खरतर
राजा रे, ख० ॥ धर्मशील रहे गाज ।। दे० ॥ तुम नाम रामशः
सारी, रा० ॥ जपे पाठक सिरताज ॥ दे० ५ ॥ इति पदं ।।
ताल तुमरी ॥ सदा सहाई कुशल सूरिद गुरु, यो दोलत गुरु
रायजी ॥ सदा० ॥ खाई न खूटै खरची न तुटे, दिन २ वये
सवायजो ॥ सदा० १ ॥ सकजा सुत यरु सुंदर नारी, सुन
परिकर सुखदाय जी || सदा० ॥ मित्र समागम सुजश वधा
रण, नितप्रति हरख नचाह जो॥ स २॥ राजा परजा पाय नमें सट्ट,
गुरु समरण सुपसायजी ।। स ॥दोखी उत्तमन नृपत्नय पमियां,
सदगुरु करय सहायजी ॥ स० ३।। विखमो विरियां संकट पमियां,
समरया यावै धापजी ।। स० ॥ नूखां नोजन तिसियां पाणी,
निरनियां धन दायजी ॥ स०४ ॥ संघ सम्लने यो मुखसाता,
जम कीरत जग थाप जी ॥ स०॥ थानक पिरता परगल नोजन,
गर कुशल सहाय जी । स० ५॥ अनय महा मुम्वदाई सदगुरु,
-वनिधि वंचित प्रायजी ॥ स० ॥ सुमति सवाई मित पर मपदं
(३२) किंगमिगे, पूनमनें सोमवार ॥ नर नारी गुरु नलगे ॥ ४ ॥ अरचे अतर फूलेल, परिमल फूली जी मालती ॥ महके चंपक बेल, मुं दर आवत मलपति ॥ ५ ॥ शुल थिर युंन वीकाण, बालूचर म हिमा घणी ॥ कीरतवाग प्रधान, उखनंजन चिंतामणी ॥ ६ ॥ पूरो वरित आश, गया तुम सुनिफरतणी ॥ दाता सुख कैलाश, चरण शरण किंकर नणी || || पूजै पद गोविंद, चंशिखर जय राशर्मे । कोटिक गण कुलचंद, कुशवसूरिंद परकाशमें || 10 ॥ जगणीसे अमंताल, मिगसर वदि दशमी करी ॥ दरशण प्रतहि विशाल, कुशलनिधान हरख धरी || ए ॥ गुरुगुण शरिता । नीर, मीन मगन हुलाशमें । लखमी लील समीर, शद्धिसार जस वासमें ॥ १०॥ इति पदं ॥ ॥ पुनः॥ ॥ राग, सो जोगी गुरु मेरा ।। यह चाल ॥ सुगुरु मेरी वेमिया पार नतारो, तूं वश अब मांगी हमारो ॥'सु० ॥ सरिता नाइच नीर जलधि ज्युं, यो संसार अपारो ।। ता तट पारंपार अमरपद, ताको वण दातारो॥ ।। १ ।। राग रंग इक जीरण नौका, तिररही जर मऊ धारो॥ में वेगे परमारथ खातर, मोह मगरने नगरो ॥ सु० ॥ २ ॥ नक्त नधारण श्रीसदगुरुजी, जलदी कष्ट निवारो ॥ जाण वाल ग लपति करुणानिध, याविपतितसे वारो ॥ सु० ॥३॥ नकापात गगन ज्यूं विपयरश, दीशै' अतदि करारो।। विरह व्ययादिक निशि पंधियारो, कोण करै निशतारो || सु०॥ ५ ॥ ब्रह्मा, विष्णु रटे को ईसा, अल्ला ‘नमया प्यारो [ में ध्यानं जिनंदव कुशलगुरु, अरिगण गंजणहारो ॥ सु० ॥ ४ ॥ सुरा अरजी प्राय ग तमहर, तुरतही विधन विमारो ॥ रामबाग पुर. गंज; अंजीम, कुशलनियान जुहारो॥ सु०६॥ केश्यक गुरुसे लखमा पावत, हुकम धरै वसुधारो ॥ में इक सेवा चरणकमती,. मां
गुरु दातारो || सु ॥ संवत नगणीसे अमतालोश, मेरुत्रयो-
दशी सारो || नयणा सफल किये गुरु दरशण, हे ऋद्धसार ति
हारो ।। सु०॥ इति पदं ॥ राग घाटो । मेरो मन .वस
कर लीनो ॥ ए चाल || देख्या में दरश तिहारा, द०॥ श्रीसद
गुरु महाराज ॥ दे० ॥ सफली फली मेरी श्राशा, पाया सुरतरु
अाज ॥ दे० १ ॥ तुमहो चिंतामणी जैसा, दायक सब सुख
साज ॥ दे०॥ गंगा अंगणमें प्रगटी, मुझ मन निरमल काज ॥ दे०
२॥ गुण शद्धि संपत काजै, कामधेनु गुरुराज ॥ दे० ॥ सय
सिदि.लीला प्रगटी, उख दोहग गये नाज ॥ दे० ३ ॥ गुरु
तुझ परनपगारी रे, प० ॥ सुरपद शिवपद पाज | दे० ॥ सुन्न
थांन पुर२ सोदे, मुलक वोकाणे राज ॥ दे०४ ॥ वर गठ खरतर
राजा रे, ख० ॥ धर्मशील रहे गाज ।। दे० ॥ तुम नाम रामशः
सारी, रा० ॥ जपे पाठक सिरताज ॥ दे० ५ ॥ इति पदं ।।
ताल तुमरी ॥ सदा सहाई कुशल सूरिंद गुरु, यो दोलत गुरु
रायजी ॥ सदा० ॥ खाई न खूटै खरची न तुटे, दिन२ क्षे
सवायजो ॥ सदा० १॥ सफजा सुत यरु सुंदर नारी, सुन्न
परिकर सुखदाय जी ॥ सदा० ॥ मित्र समागम सुजश वधा
रण, नितप्रति हरख उचाह जो॥ स २॥ राजा परजा पाय नमेंसहू,
गुरु समरण सुपसायजी ।। स ॥दोखी उसमन नृप लय पमियां,
सदगुरु करय सहायजी ॥ स० ३॥ विखमो विरियां संकट पमियां,
समरघा या धापजी ॥ स० ॥ नूखा नोजन तिप्तियां पाणी,
निरपनियां धन दायजी ॥ स०४ ॥ संघ सम्लने यो मुखसाता,
जिम कीरत जग थाप जी ॥ स०॥ यानक थिरता परगल नोजन,
पगर कुशल सहाय जी । स० ५॥ अनय महा मुत्वदाई सदगुरू,
नवनिधि बंधित प्रायजी ॥ स० ॥ नुमति सवाई नित पर सपद
(६५) दान. विशाल लदायजी ॥ स० ६ ॥ इति पदं ॥ पुनः ॥ जिनकुश लसूरिंद गुरु सदा नमो, जी० ॥ सुख संपति रिद्धि सिद्धि सब हाजर, देश देशांतर. कांर नमो ॥ जी०१॥ वाट घाट अरु विखमी विरिया, विधन तुराई दूर गमो ॥ जि. २ ॥ अहनिशि नाम मंत्र नर धारो, सुगुरु चरण चित रमो. रमो ॥ जि० ३ ।। श्क मन घ्यावो वंचित पावो, विपत व्यथा सब दमोदमो ॥ जि० ४ ॥ अन्नय महा सुख संपत्ति पामो, सुधिर यांनक थित जमोजमो. | जि० ५॥ इति पदं ॥ पुनः ॥ उत्रपती पारे पाय नमें जी, सुरनर सारे सेव ॥ ज्योत धारी जग जागती जी, अनि यामे परतिख देव ॥ १ ॥ हुँतो मोदि रह्यो जी, द्वारा राज दादरे दरवार ।। केतर अंबर केवमो जी कस्तूरी कपूर ।। चंपो चर्दन राय चंपेली, नक्ति करूं नरपूर ॥ १० ॥ पांगलिपांने पांच समायै, अधिलियांने अांख ॥ रूपहीणांने रूप देवे दादा, पाखदीणाने पांख ir ९० ३ ॥ चंद पाटोधर, साहिवा जी, . श्रीजिनकुशल सूरिद ॥ आज पहर घांने नलगे जी, रंग बरसे राजिंद ॥ हुं० ५ ॥ इति पदं ।। पुनः तदगुरुजी सुणो मोरी अरजी, सः ॥ पदली काम किये बहुतेरे, अपणा विरुद विचारी ॥ पदर चूक ,परी सदगुरुजी, में मुतलबका गरजी ॥ स० १ ॥ ध्यान तुमारो कबहुं. न ध्यायो, पूजा करी नही तेरी ॥ तोही सेवक वंगित पूरथा, याही धारी मरजी ।। स०३ ॥ निश्चेसेती तुमगुण ,गादै, तुरत कटत उख मी:नक्त उधार. कहावत जगमें, ताहे.करत १ अरजी ।। स०.३॥ और देवकू में नही ध्याणं, शरण यही में तेरी, दूरयक में नेटण भायो, विपतदशा सब तरजी ।। स० ॥ ॥ कुशल गुरुका में हुँ सेवक, लोक नाणे सवकोई ॥ क्षमारनकी वीनती सुगक, दरशण दियो सदगुरुजी ॥ ५ ॥ इति पदं ।।
( ७६५ ) पुनः । होरीकी चाल सदगुरुफे चरस चित लापर, जिनदत्त सुरिदै गुरु करो रे पसाय } सद०॥ वा वन वीर अने वलि चौसर, जोगय वस कीनी हर्प लाय ॥ विद्या पुस्तक सोवनअकर, थांजो वन विमार पाय ॥ सद० १ ।। मुलतानमें पंच पीर महाबल, पंचनदी साधी चिन : लाय ।। इत्यादिक बहु परचा पूरक, गुरु समस्या सब सुख जाय |HORI गुरुके नामसे अमसिद्ध नवनिक्ष, गुरुगुण गावो सबही धाय । श्रीजिनसौनाग्य सूरि सुयुझ पर, महिर करो गुरु सुखदाय ॥ सद० ॥ ३ ॥ इति पद ॥ पुनः।। होरी खेलो नविक सदगुरुके संग, नित आनंद चव होत रंग ॥ हो० ॥ मस्त मदीना फागुरा आया, श्रीसंघस हितमिलके संग ॥ हो० ॥ कोयल सबद करत स्वर कोणा, अली कलीके संग जंग ॥ हो० ॥१॥ रुत वसंत यानंद पिया संग, गोरी गावत बजत चंग ॥ दो० ॥ एसें साज समाज नक्तितें, गुण गुलाल लिये गुरुके अनंग ॥ हो० ॥२॥ निरमल मन मरंद सुधाकर, अतर पुष्पसे चरचो अंग ॥ हो । ध्यान पिचकारी अजर सुधारी, विरको मदकत सुरनिगंग ॥ हो० ॥ ३ ॥ करत चैन दरसणसे नेला, रामगद्धीसार के चित्त नमंग ॥ दो०५ इति पदं ॥ पुनः . समस्यामसे कहियो मोरी। इस चालमें । गुरु पूज रचो रे सुझानी, जली हियेनकि जराणी {{. गु० ॥ श्रीजिनकुसल. .सूरीसर साहिब, खरतरगबरा जानी । देशदेशमें थानक गुरुका,..सोना जग पहिचानी, सदा.रवि तेज समानी ॥ गु०॥ १ ॥ केशर चंदन. मृगमद. नेली; चरणारी पूज रचानी। धूप दीपावलिःयागतः दोवी, बहु विषं पुष्प चढानी, जला फल नेट धरानी..गु.. वाट घाटमें परचा पूरक, हाजर होत .सहानी ॥ श्रीजिनसौजाय सूरिके सादिक, उत . M काज करानी, सदा गुरु महिर लखानी । गु०॥ ३ ॥ इति पदं ।। पुनः । ॥ होरी ॥ सदगुरुजीक द्वार मची होरी । स० ॥ अाये श्रीसंघ सब, हितमिलके, संग लिये वालाजोरी ॥ स० ॥ दीनद यालकेसनमुख गम,पग्त मधुरधुन गुण गोरी ।। स०.॥१॥ केशर घोली.नरी रे कचोली, पूजत हे वारीनोरी ॥ स० ॥ रंग गुलाल मच्यो सदगुरुके, अबीर नुमावत नरजोरी ॥ स ॥२॥धन नाग्य हमारे प्रगटे, सदगुरुने पकमी. मोरी | स. ॥ अती मनर जरा.समन गंजन, बलिहारी चरणा तोरी। स० ॥ ३ ॥ कामि. तदाता जगके त्राता, अरजी.हय सुनले मोरी ॥ स०॥ कहत. रामरुद्धिसार सुपाठक, वंदत हे ऽय करजोरी .॥स० ॥ ४ ॥ इति पदं ॥राग प्रनाती ॥ केसेर अवतरमें गुरु रस्की लाज हमारी के०॥ माकू सबल नरोसा तेरा, चंद सूर 'पटधारी | के० १ ॥ तुम विन अवर न कोई मेरे, या जगमें हितकारी ॥ मेरा जीवन हाथ तुमारे, देखो आप. विचारी ॥ के० २॥ आगे तो केई वेर हमार); चिंता दूर निवार ।। अंबकी विरिया नूल मत जावो, सदगुरु परनपगारी | के० ३ ॥ अबके आप लाज गुजरकी, रखिये गुरु जशधारी ॥ मेरे कुशल सृरिद गुरु तेरा, वमा जरोसा नारी ॥ के० ४ ॥ इति पदं ॥ पुनः॥श्रीजिनकुशल सूरीसर साहिब, तुम हो परनपगारी॥श्री०॥ खरतर गठ नायक गुणलायक, जिनचंद सूरि. पटवारी ॥.श्री. १.॥ संत नधारण सुजश वधारण, नीमनंजण अति नारी ।। नाम तुमारो कुशल करण जग, वारीजान वार हजारी | श्री० ॥ जगवचन तुमही हो जगतगुरु, करुणानिय करतारी ॥ कहे जिन मेरे दो सदगुरु, दम हे सर तिहारी श्री०३ ॥ इति .1 पु॥ श्रीगणधर गुरु कुशल सूरिंदके, चरणकमल पर कुशलगुरु देखके ( ७६७) वारी ।। श्री० ॥ केशर चंदन अक्षत कुंकुम, जलन्नर कंचनकारी॥ देवके आगे मंगलदीपक, फूल धरूं फूलवारी ॥ श्री०.१ ॥ एशी नांति कळं विध पूजा, प्राणके चित श्कतारी ॥ राज कहत मेरे परमगुरूकी, वेर२ वलिहारी ।। श्री. २|| इति पदं ॥ राग रेखता। दरशण, मेरा दिल होत हे परशन ॥ जगतमें या शमो कोई, न देख्या नर, जोई ॥१॥ विरुद नूमंझले गाजै, फरशतां पाप सब नाजै ॥ पूजतां संपदा पावै, अचिंती लच घर आवै ॥ २ ॥ श्के मुख गुण कहूं केता, मुझे हिये ग्यान नही एता ॥ लालचंदकी अरज सुण लाजे, चरणको सेव मोहि दीजे ॥ ३ ॥ इति पदं ।। राग कदरवो ॥ कुशल गुरु दरशण दीजै हो । कु० ॥ खरतर गम्पति कुशल सुरिंद गुरु, मुझ पर महिर धरीजे हो ॥ कु०१॥ पतित नधारण विरुद तुह्मारो, इतनी अरज सुणीजै हो।।कु०॥ श्राधि व्याधी अरु दोखी उसमन, ए सब दूर दरीजै हो ।कु. ३॥ खेमरतन सेवगकं निशदिन, सदगुरु सानिध कीजै हो । कु० ॥ इति पदं ॥ ॥ पुनः॥ पूजो जो रे नाई, गुरु महिमा ज्योत सवाई ॥ पू० ॥ १ ॥ मृगमद केशर चंदन अरचो, सुंदर पुष्प चढाई ॥ पू० ॥ २ ॥ नविक.जीव मिल गुरुगुण गावै, वाके सदगुरु होत सहाई ॥ ३ ॥ श्रीजिनसौजाग्य सूरि सुगुरु मेरे, नि शदिन दर्प.बधाई । पू० ॥ ४ ॥ इति पदं ॥ .पुनः ॥ ९तो अरज करूं करजोमनेःजी, म्हारी अरज सुणो गुरुराय ॥.सदगुरु ॥ विरुद घणा चै राजरा जी काई, सूरि सकल सिरताज ॥ स॥ सुनिजर जोयजो साहिवा.॥ १ ॥ बारे रावल राणा राजवी-जी, थारा पूनम पूज, पाय । सु० ॥ केशर अगर . कुमकुमा जी, ..काई; मृगमद रही महकाय.॥ स० सु० २ ॥ श्रारै. घुमलां रे पागल - ।
(७६७ )
घूमरा.जी, कोइ. दूलत चमरं गजढाल.॥ स० ॥ कारण लेवे काम
नी.जी, काई निरख करे जी निहाल । स० सु० ३ ॥ बारी गावी
गझे थापना जी, काई नदयापूर आवेर । स० महिमा नली
गुरु मेमते जो, कांय सालझेबाली सांगानेर || स ० ]} यारी
ज्योति. घणी गुरु मिगमिगे.जी, कांश वधती गढ वोकाण।। स०॥
आसा पूरण आवजो जी, श्रेतो. देरावररा दीवाण ॥ स०५ ॥
म्हारी वीनतमी ले मानज्यो जी, कांई दादाजी दीनदयाल ॥
स०॥ कुशल सदा कविराजने जी, काइ पाटोधर प्रतिपाल ।। स०
सु०॥ ६॥ इति.पदं ॥ ... पुनः॥ सांगानेर विराजै, गुरु परतिख
तिहां राजे रे ।। म्हारा सदगुरुजीनी वतिहारो॥ मनचंत्रित पूरो
म्हारा, म्हेतो चरण पखाला यारा रे ॥ म्हा० ॥ १ ॥' सोवन नरिय
कचोलो, माहे बाल मृगमद घोली रे ॥ म्हा० ॥ पूजू सदगुरु
माया,, पूज्यां सब पाप पुलायारे । म्हा० ॥२॥ पूनमनें सोमवारा,
यांरे जात्रो श्रावै अपारा रे ॥ म्हा० । सुध मन पूजा कीजै, उख
दोदग दूर हरीजे: रे . ॥ म्हा०. ॥ ३ ॥ इस कलयुगमा
हे तारी, कोरत चिहुं दिशिमाहे सारी रे || म्हा० ॥ तुम्ह समय
वर न कोई, दीगो में परतिख जोई रे ॥ म्हा० ॥ ४ ॥ साझेवा
तो. सांगानेरे, जिहां राज करै नितमेव रे || म्हा० ॥ श्रीसंघ मिल
तहां आवै, जिहां बूणियां गोठ रचावे रे ॥ म्हा० ॥ ५ ॥ ग्यान
तार गुरुराजा, ज्यांरा वाजै सदाश्ना बाजारे ॥ म्हा० ॥ कमानंद-
गुण गावे, करजोमी शीस नमावै रे ॥ म्हा०॥ ६ ॥ इति पदं ।।
॥ अथ दादाजोको लावणी संग्रह ।
, सदगुरुजी म्हारा, दरहाण दीज्यो जी गपति साहिया ।।
स० ॥ कुशल सूरि वंचित दाता, देवो बुद्धि विख्याता || सद
मदर करीग्यो मुझपर, ज्युं मिननळूमाता हो । स०॥१॥
. (६ए) खरतर राजचंद पटवारी, सेवकजन श्राधार ॥ विपमवाटमें सं कट काटे, संव सकल सुखकार हो ॥ स० ॥ २ ॥ जगमांदे परचा अधिकाई, जाये सब संसार | नरदरियांमे ज्याज नगारी, जिन गुः . रुको वलिदार हो । स०॥ ३ ॥ गुरु चरणांबुज दरशणसेती, पा. पतिमर हट जाय !! गुरु परमातम सुगुण शोलागी, गुरुगुण केम फदाय हो । स०॥ ॥ मृगनेणी नेनर उपकाती, लिये अली वह लार ॥ नृत्य नक्ति गुरु अन विचक्षण, मृ3 समीर अणकार हो ॥ स०॥ ५ ॥ मदमस्ती हस्ती वर राजत, श्रीसदगुरु दरबा: र | इंद नरिंद नमे पदपंकज, हरखित चित्त नदार दो ॥ स०॥ ॥.६ ॥ शह लिद्धके आगर सदगुरु, जो ध्यावे सो पावै ।। जात्री पावै जात्र करणकू, केशर रंग मचावै दो ॥ स०॥७॥ पेम पीन अर्चन सदगुरुको, पूनम पुन सोमवार । वाद्यनि नाद तूर पुन म घर, करे सुविध सुविचार दो ॥ स ॥ ॥ कर अग्नि वर संवत सुखकर, नंद चंद शशि वार ॥ स्तेप माश प्रतिपत् दिन नेव्या, शुक्ल पक्ष शुन वार हो ॥ स० ॥ए ॥ सुरगिरमें नंदनवन सोहै, तारको दिन कार ॥ शरदचंद जिम हंस सूरीसर, . खरतर इंद्र उ धार हो स० ॥१०॥ सदगुरु धर्मशील परनावै, कुशल होत नित साय ॥ शद्धिसार महिर करीने; अविचल लील वताय हो॥स० ॥ ११ ॥इति ॥ ॥ पुनः ।। मोरी सखी सहेल्या प्राज चालोती गुरु वंदवा ।। मो० ॥ श्रीजिनचंद पाट अधिकारी, श्रीजि नकुशलः सूरिद ॥ परचा जगमें निरमलासरे, दीपत -पूनमचंद हे ॥ मो० ॥१॥ खरतरगचना राजवीसरे, सेवकजन प्रतिपाल ॥ उट कष्ट नव दूर करीने, देवो सुरक · विशाल है . । मो० ॥२॥ पूनम नक्ति धरीने, आवै संघ अपार ॥ केशर, चंदन मृगमद घोली, पूजे विविध प्रकार है:|| मो० ॥ ३ ॥ सुंदर सदगुरु पागले (७७०) :, सफ शोले सिणगार || नाटक करती बहु गुणवंती, पग ने राकार दें ॥ मो०॥ ॥ दूर देशथी संघ चतुर्विध, आये चिर शाय ।। श्रीसदगुरुना दरशणसेती, प्रानंद ग्रंग न माय है। ...५ ॥ रसना एके किम कर्दवाये, गुरुगुण अधिक अपार । जदारी गुरुनामनीसरे, वारीजान चार हजार । मो०॥६॥ त गण वत्तीसे कार्तिक, पूनम दिन सुखकार ॥ सदगुरु गाम लामांद, जात्र करी जयकार ।। मो० ॥ ७ ॥ खरतरगत कर सोनागी, कीरत जग विस्तार ॥ गुण यागर दीपत्त शशि जनवं, इससूरि गणधार हे । मो० ॥ ॥ धर्मशील चरणांबुज के, कुशल सदा सुखकार ॥ इसार गुरु गुरागरा ऊपर, नित ।हुं बलिदार हैं। मो० ॥ ॥ इति पई ।। । पुनः ।। मेत कामगवी, सुगुरु मेरो कामित कामगवी ॥ मनसुध साइ वर दोनी, युगप्रधान पदवी । सु० ॥१॥ सकल निशाकर ससम सूरी, दीपत वदन उवी ॥ सु० ॥ २ ॥ महिमंगल महिमा जाकी, दिनप्रति नवी नवी ॥ सु०॥ ३ ॥ जिनर्मा स्य सूरी पाट नदयगिरि, श्रीजिनचं रवी ।। सु० ॥ ४॥ ही हरखित यो मन मेरो, रत्ननिधान कवी ॥ सु०।। पदं॥ ॥ चाल पणिहारीकी॥ श्रीलौनाग्य सूरी गपति हो, खरतर गंच सुखकार ।। सादिवजी ॥ कोट दीपता, गुरु गंधपति हो, तात करमचंद सार । सा० ।। गादेवीकूख में, गु० गुणनिधि लियो अवतार ॥ सा ॥ सं बांस, गु० जन्म समय वर घार | सा० ॥ २ ॥ अग चिरे, गु०पंच मदाबत जाणं ॥ सा० ॥ वरस अगरे वाण पद प्रनाकर जाण ॥ सा० ॥ ३ ॥ क्षात्यादिक गुण सोना करता जग नपगार | सा० ॥ परचा जगमें नवनवा, गु० ..
( 33 ) हता नावै पार ॥ सा० ॥ ४ ॥ श्रीजिनहर्ष पटोधरू, गु० दीपत गुणामणी खाण ॥ सा० ॥ नगणीसे सतरे समें, गु० पायो देववि मान || सा० ॥ ५ ॥ वेद वन्दि निधि नमुपती, गु० माघमाश सुखदाय || सा० ॥ स्वेत पद तूर्या तिथि, गु० प्रेम घणे दरवाय ॥ सा० ॥ ६ ॥ श्रीजिनहंस सूरीतरू, गु० वंदे वारंवार || सा० ।। कुशल कला नित नेहसे, गु० प्रणमें श्म शुद्धसार ॥ सा० ॥ ७॥ इति सौलाग्यसूरी स्तवनं ॥ ॥ अथ देशना वधावा संग्रह ॥ वीरजी दिये वे देशना रे, विन्नुवन जन हितकारज || पर खद बारने आगले रे, जगजीवन हित काज ॥ वी० ॥ १ ॥ प्रनु मुख पद्म मनोहरू रे, जिहां वाणी मकरंद ॥ नव्य मधु तो नावयो रे, पान करै. आनंद ॥ वी० ॥ २.॥ अज रपणुं जग संपजे रे, अमृत ध्यान पसाय ॥ प्रनु वचनामृत. पान पी रे, अजर अमर पद थाय ॥ वो० ३ ॥ मधुरपणे मनमोहनी २, अनुपम वाणि उदार ॥ सानले नव्य लहे सही रे, जिन पर नाव विचार ॥ वी०५ ॥ जिहां पट् द्रव्य विचारणारे, नय निक्षेप अनंग ॥ चोविद धर्मपरूपणा रे, सतनंगी अति चंग ॥ वी०५ ॥ शासननायक जिनवरू रे, अनुपम अमृतधार ॥ जलधरनी पर वरसतारे, नवि चातिक हितकार ॥ वो० ६ ॥ श्रोजिनलान पसा यथो रे, जिन प्रातम हित जाण ॥ वाचक अमृतधर्मनो रे, शीश नरों कल्याण । वी०.३॥ इति देशना । पुनः .गुण निधि श्रीजिनचंद मुखिंदा, मुख सोहे पूनमचंदा ॥ मोह्या सब सुरनर बृदा, सुगुरु म्हारा देशना हिव दीजै ॥ प्रारी देशना सुण मन रौ ॥ सु० ॥१॥ दिनकर परकाश सवायो, मंगल, कार बायो ॥ कमलादि सकल मन जायो, सु० ॥ २ ॥ वेलावन देव- . (७०२) धार, वलि नैरव राग ममार ॥ गायन गावे सुखकार, सु० ॥३॥ च सबद गहिर ध्वनि गाजै, जिनवर घर कालर. वाजे ॥ सहु उज यया धर्म काजे, सु० ॥ ४॥ हिव वहिला पाट पधारो, प्रीसंधना कारज सारो ॥ मधुरै स्वर वचन उचारो, सु० ॥ ५ ॥ तुण विनंती वचनविशेप, गुरु आपे धर्म नपदेश ॥ टालो. नाव कोम कवेश, सु० ।। ६ ।। सदगुरुनो मीठी वाणी, उपदेश सुशो तविप्राणी ॥ सुगतां मन अतहि सुहाणी, सु० ॥ ॥ गुरु प्रत रे ज्युं शशि सूर, दिन रमति बंधते नूर । हरो संघ साल उस र, सु ॥ गोरी मिल मंगल गावे, नर मोतियां पाल वधावै॥ गावण्यकमल सुख पावै, सु० ॥ इति पदं । ।। अथ वधावो॥ मृगापूत्र गोखे रतन जमाव हो । ए चाल ॥ श्रीजिनचंद रीसंरू, सुगुण म्हारा श्रीखरतर गडराय हो ॥ श्रीजिनलाल पा धिरू, सुगुरु म्हारा दिन सान्न सवाय हो || म्हारा सहिज सो गी, म्हारा शुन गुण रागी, म्हारा हितधरूं ॥ १॥ सुगुरु म्हारा शना यो मनरंग हो ॥ संघ सहू नछक थयो, सु० सुशवा अम. वाण हो । वदिला वंचित पूर हो । सु० ग्रेगे अवसर जाग 1॥ म्हा२ ॥ सूरं किरण धर संचरया, सु० विकस्या कमल लाप हो । राग विन्नास प्रमुखतणा, सु० होय रह्या पालाप ॥ म्हा० ३ || पंचसवद झालरतणा, सु० मंगल नाद उचार ri श्म वहुँ विध नूंमंगले, सु० वरत्या जयरकार हो । म्हा० ॥ संघ सकत नगत करी, सु० जोवै. थारी वाट हो । नाचे । धारो गठपती; सु० यो दरिशण गहगाट हो । म्हा० ४ ॥ तिण वसर सिंघासणे, सुं० पावधारै नलसंत हो । जलपर ज्यु गरे सु० वा सूत्र तिर्शत हो।।म्हा०.६॥ बनवियण प्रति: .. 4 -- (३) 'वूम, सु० वयण तुधारस योग हो ॥ उत्तम धरम प्रकाशता, सु. टाले जयऽख नोग हो । न्हा० ७॥ तेज तरणी जिम दिनमणी, सु० गुण उत्तीस निवास हो । मोहन मुद्रा तुमतणी, सु० निर ख्यां मन उल्लास हो ॥ म्हा० ॥ थे चिरजीवो गठपती, सुण राज करो इक प्राण हो, इम बोलै मुनि सुध सदा, सु० वाणी क्षमाकल्याण हो ॥ म्हा० एति पदं ॥ पुनः !॥ यात्रा निनायूँ करियै ॥ ए चाल ॥ एहवा सदगुरु वांदियै, नविकजन ॥ एडया० ॥ श्राप तरै नरनकू तार, शरण तिहारी महियै..।। न० १ ॥ जिम सारथपति साथीजनकू, वंचित देशे वहिये । न०॥ तिम सदगुरु अमृतळपदेशे, खदै नविक सुख कहियै ।।. २ ॥ गोप समा गुरु गुण नित धारे, राखै गोजन महियै॥०॥ वलि निर्यामक उपमा धारै, जिम नाविक नौ तरियै ॥ ३ ॥ एकं असंजम दोय विधि वंधन, त्रिविध दंम परिदरियै न॥ चार कपाय निवारक तारक, पंच महाव्रत धरिये ॥ ०४:11. पट् काय रक्षक महाजय जीपक, अशरण शरण कहीजियैः ॥ ॥ एदवा सदगुरुनो बलिहारी, शरण ग्रही निशतरियै ॥ १०.५॥ गोतमस्वामि समा मुनि नत्तम, सर्व जीव शम धरियेनः॥ " रिदयकमल नितप्रति राखोजे, आनंद शिवपद . लदिय ॥ल. ६॥ इति पदं ।। . पुनः नवि तुह्म वंदो रे शीतल जिनपती रे॥ ए चाल ॥ , सुखकर स्वामी श्री तीर्थकरू.रे,. वरचमानः जिनरा जा दरशण जेहनो रे दरपण ज्यु.दिप रे, शोलत तेज समाज,॥ नविजन.वंदोरे लावै गठपती रे.॥ १ ॥ तसु पट राजे, रे.सुधः रम गणधरू रे,शाता द्वादश अंग.॥; जंबूस्वासी रे शिष्य सोहा मणो..रे, चवद पूरःधर चंग ॥.न: २ ।। प्रन्नव सज्यंनव जगमें परगमा. रे, श्रीयशोन मुणिंद ।। श्रीसंनूतविजय नन्न दुजी रे, श्रीथूलन दिणंद ॥ न०.३ ॥एम अनुक्रम दश धबधरू रे हुए वयर मुणोश॥ श्रीजिनमत दीपायो नूनले रे, सुरनर नामत शित ज०४॥ तास परंपर चंद्रकले नलारे, श्रीकोटिक गराधार || श्री नद्योतन सूरि सोहामणा रे, वयी साख मझार ॥ ज०५॥ वस्धमा परमुख शिष्य जेहनारे, चार अशी परिमाण ॥ गछ चोराशी प्रगत तिदायकी रे, जाणे चतुरसुजाण II,न ६ ॥ तास शीस जि श्वर सूरिजी रे, उर्लनराय. समक्ष ।। खरतर विरुद लहोते. रुवर्म रे, गजपति.जीत प्रत्यक । न० ७॥ नव अंग वृत्तिकारक दीपत रे, श्रीअन्नयदेव सूरिराय ॥ श्रीजिनवञ्जन जिनदत्त गडपती रे श्रीजिनकुशल श्रमाय । ल. ७॥ परम प्रस्तावक श्ण गछमें : पारे, आचारज, गुणवंत ॥ शुरू सामाचारी जग तेहनी रे, सुपि हरखंत.होय संत...न. ए ॥ शुक्ष परंपरमां श्रया अनुक्रमे रे, श्री जिनलान्न सूरीश ॥ तास पटोधर जगमां परगमा रे, श्रीजिनचंद पुणीश.॥ ज०.१०॥ तेज प्रतापे जोत्यो दिनमणी रे, सौम्पपणे देजपत्ति ॥ गन्नारगुण सागरने जीतियो रे, सुर सेवे दिन रनि ।। न०.११॥ स्याहाद जिनधर्म वखाणता रे, नय निक्षेप विचार ॥ ग.पवारथ अति विस्तारसे रे, नाखे नवि हितकार, ॥ ०.१२ 1. ग्यान पूरब क्रिया साधे जली. रे, जिनवाणो अनुसार ॥ एहने वो रे क्यूं नूला जमो रे, याय सफल अवतार । न०, १३ ॥ तुरतर मी वांवल.आदर रे, कार नर. मूढ गिमार || ए नखाणो साचो मत करो.रे, लदि एहयो गराधार नं०१४ ॥ नाम धार- प्राचारज वे घणारे, पंचम काल मझार ॥ पिण इश.. सरिखो गमां को नही रे, स्व पर तारणहार ॥ल०, १५ ॥ वाचक लाव ' ' : पसायत्री रे, कमलसुंदरनी वाणि ॥ जे मानसी ते सुख रे, पातिकनी करि हाग ॥ ज० १६. 5. पति: बधावा ।
(७५) पुनः ॥ श्रावण पावस कलस्यो । ए चाल || मोतियो मेह, वरसीयो, सवि प्राज हुन आणंद ॥ पूज पधारया विदरता, नामें सौजाग्यसूरिंद रे ॥ जिनदर्ष सूरिंदनी नंद रे, सदगुरु सरतरुनो कंदं रे । मुख सोदे पूनमचंद रे, सखी मोती० ॥ १ ॥ कांतिगुणें करी शोलता, सखि पंच महाव्रतधार ॥ वर उत्तीस गुणे सदा, विचरे जे निरतीचार रे ॥ रसिया जे पर उपगार रे, उपशमरशना मार रे || पाले पंचाचार रे, सखी० २ ॥ मेघतणी पर गाजता, सखि मीठी जेहनी वाण ॥ श्राप तरे पर तारता, गुण रतनारी खाण रे ।। सहु यागमना जे जाण रे, प्रतपै जिम जलहल नारा रे । जेहनो अतिशय विनाण रे, सखि० ॥ ३ ॥ परतिख सुरतरु सारिखा, सखि इण पंचम काल । साथै जेदने शोलता, मुनिवर जिम मोतीमाव रे ॥ कोई थिवर ने कोई बाल रे, वंदीजै तह त्रि काल रे, सखि० ४ ॥ सूरि सकल सिर सेहरो, सखि खरतर गछ सिणगार ॥ जैनधरम दीपावता, महिमा जेहनी अपार रे ॥ त हु संघतणा सिरदार रे, सखि सुमतितणा जरतार रे । जेहने प्र में नरनार रे, सखि० ॥ ५ ॥ सूत्र अरथ सितारता, सखि दें ता धर्मोपदेश ।। दान शीयल तप नावना, वारे नावन मुविशेष ॥ द्रव्यादिक अर्थ निशेप रे, गुण अरु पर्याय प्रदेश र सखि० ॥६॥ सुणतां श्राजिनराजना, सखि अमृतवचन विलाश ॥ क्षण में कर्म समूदनो, सखि निश्चै होवे नाश रे ॥ श्राय निज ज्ञान प्र काश रे ॥ कदे बाल सुगरु सहवास रे, करतां निज रूप सुन्नाप रे । सखि०७॥ इति वधावो ॥ ॥ अथ गुंहली लिख्यते ॥ ॥ नणदल विंदली दे ॥ ए चाल || जिनशासन जयकारी, जगंगुरु गोतम. गणधारी रे ॥ सदियां गुंहली करो। गुहला करो . --
.
(६)
गुरु संगे, जंगतितणे नवरंगे रेः॥सदी०॥ विचरंता, मुनिराया
जयनगरीः श्राचा रे ।। सही ॥१॥ पंचेशी विषय निवारी
अवविध ब्रह्मव्रतधारी रे ॥ सही० ॥ व्यार कपायकुं टाले,
च महाव्रत सूधा पाले रे ॥ सही० २॥ सेवे पंचाचार, धरै पंच
मति मनुहार रे ॥ सही ॥ त्रिण गुप्ती वलि बाजे, म त्रीश
एवं गुरु राजे रे ॥ सही० ॥ ३ ॥ चरण करण गुणसंगी, शुद्धातम
नुन्नत रंगी रे ॥ सदी० ॥ उत्सर्गने अपवादी, बहु नयगन नंग
वादी रे॥सही ४॥ मोक्षमार्ग उपदेशी, धरे घरमपान शुन
शीरे स० रत्नत्रय अन्यासी, नविजन चितकमल. विकासी
। स०५॥ श्रेणिक नरपति श्रावै, गणधर वंदन शन्न नावरे ।।
ही। चेलशास्वस्तिक रैः मोह तिमिर नरमने चूरे रे सही
.६ ॥ निसुणी गुरुमुख वाणी, समाकत निरमल करै शाशो रे॥
॥ श्रुत सेवा जे करस्यै; ते कीर्तितागर पद वरस्यै रे.॥ स.
.३॥ इति पदं ॥
' ... पुनः देशना ॥ नणदलबाई चुमले जोवन मिल रह्यो । ए
खि ॥ सुपीये सदगुरु देशना ए सदियां, मधुर सुधारश वाण ॥
दगुरू म्हारा, यो मनमोहन देशना ॥१॥ चीरजिनंद जिम उ
स्या ए सहियां, नय निक्षेप सरूप ॥ स० ॥ तुम मुखवाणी
ग्लो ए सहियां, ज्यासे घ.२ चूं ॥ सद० ॥ २॥ तखत विराज
निता ए.सहियां, नदयाचल ज्युं दिणंद । सा तेज फलामल सुः
ए सहियां, मुखगवि पूनमचंद ।। स० ३॥ जीवदया तरू सींच
ए सदियां, तुम वाणी जलधार ॥ सद०॥ श्रुतसागर धीरजपर।
सहियां, नाखो नव तत्व सा ॥ सद०॥ ४॥ संघ जगति
तसाचवै ए सहियां, पूरय पुन्यसुश्रान ॥ सद० ।। तारण तरण
हाज ज्यू ए.सहियां, सुध समक्ति सुध ज्ञान । सब० ॥ ५॥
(3) खरतरग महिमा निलो ए सहियां, सदगुरु कुशलनिधान । सव।। शद्धसारनी नावना; मंगल पर प्रधान ॥ १० ॥ ६ ॥ इतिदे वाना ॥ पुनः॥ सुगुरु म्हारा ज्याजनी पर तारों, गुरु म. नमो थे मोहो म्हारो। सवाईगुरु ज्याजनी० ॥ अमृत । पम जिनवाणी, स्याक्षाद सुधारश खाणी, अति नय निक्षेप प्रमा पी | सवाई० ॥ १ ॥ जगगुरु श्रीजिनवर झाखी, गणधर मुनि सूत्रे साखी, प्रागमनिधि हृदयें राखी ॥ सवा० ॥२॥ सदगुरु' ज्ञानी गुणवंता, नवि हृदयकमल बोधता, गुरु सहस किरण क सकता । सवा० ॥ ३॥ नविजीव श्रवण गुण रसिया, चात्रक ज्यूं जसपर इप्तिपा, उपदेशे पुरित सब नतिया ॥ सु० ॥ ४॥ गुरु धर्म शील सोलागी, तसु चरणों श्रुतमति जागी, ससार व चन धुन लागी॥ सवाई गु० ५ इति वधावो ।
(300) '. . ॥ अथ श्रीखरतर वृहद्गठकी. सिद्धांत शुद्ध " "सामाचारी लिख्यते॥ जो एकमतिथि कम होय तो प्रतिपदाका पञ्चस्काण व्रत पिठली अमावास्या ३० तिथिकों करे, अष्टमी कम होय तो श्रष्टमीका व्रत सप्तमीकों करे, नर जो चनदस कम दोय तो १४ का नपवास अमावस या पूनमको करे, इसका कारण यह हे की यह दोनों तिथि बरावर पर्व दे, चौदश पर्वदिन हे तेसेंप्रमावस पूनम नी चिरंतन पक्षीका दिन हैं, यह दोनों दिन धर्मरुत्य के रणेके हैं, पारणे उत्तरपारणे धर्मका द्योत करे। इस वखत जैन पंचांगको प्रवर्ति नही, अन्य धर्मियोंके पंचांग परसे तिथियां. गिणनेमें आती है, जैन पंचांगमें संवत्तरी प्रादिक पर्वोका कय वृद्धि नहि होता, जंबूदीपपन्ननीमें पांच संवत्सर कहे हैं, उसमें स अनि वर्द्धन संवत्सर मिथ्यात्वियोने प्रचलित कर ररका दे, लेकि न सूर्यसंवत्सर तीनसे सवासन दिनका होता है, इस वास्ते जै नागमसे यह पत्रा यथार्थ नदी एकांत नयवाद देतुसें. इस वास्ते को चोदश कम हो तो नपवास तया परकी प्रतिक्रमण निस्संदे पूनम तथा अमावसके दिन करे, लेकिन तेरस तथा चौदस क तिथिक वितत्येको न करे, तर जो बेला करे तोहरी गोमतो दो दिन त्यागपक्षमें याह्य दे॥ अब को वखत संवचरीकी चो कम हो तो पांचमके दिन संवधरी प्रतिक्रमण करे, लेकिन तीज दिन कदापि काले जी नहि करे, नर-जो चोय दो होप तो पदर चोयको संवत्सरी करे, मोर कोइ नी तिथि दो होयतो यह तिथि. माननीय है, दूसरी लोमतिथि दे. उसरा यह प्रमाण साउ धमाको तिथि गेमके उसरी घमी अधधमीकी तिथि मानद . (30) बुद्धिमानोका काम नही, इस पर कोई एता कहे की अपणे तो नदयतिथि मान्य हे, सूर्य उदय होय जहां तक कोई मोतिथि होयतो उस दिन वोह। तिथि मानते दे, इस वास्ते जो दुसरी तिथि अधधमी नदयके वखत दोय तो माननेमें क्या दोष दे? इस प्रश्नका उत्तर-हे नव्य, जो पहले दिन तिज मानी दे, जर ती. जके दिन चोय बहुत घमी नुगतेगा, लेकिन वद तिथि तीजह। मानीजेगा, इसी तरे चोयके दिन सूर्य उदयकी वखत घमअ धधमी चोय होणेसें चोय मानीजेगा, लेकिन जो तिथी दो होगी उसमें पहली तिथि सूर्य उदय नर अस्त दोनों में रहेगी, तबतो एसी संपूर्ण तिथिको गोरके उसरी योमोसो तिथिकू व्रत करणा लाजम नहो. कार्तिक माश बढे तो पहले कार्तिक चोमासो करे. फाल्गुण तो बढताही नहीं, अगर बढेतो उसरे फाल्गुणमें चोमा सा करे. असाढ दो होयतो दुसरे यसाढमें चोमासा करे. प्रसाद चोमासेकी चौदससे पच्चास गुणपञ्चासमे दिन चोथकू संवत्सरी करे, चोथ कम होयतो पांचमके दिन संवत्सरी करे, श्रावण ना- वा आसोज वढेतो पंचमासी चोमासा करे. श्रावणमास दो हो। तो उसरे सावण सुद ५ कू संवछरी करे, चोमासेको चौदससे चास दिन लांघके संवचरी पर्व कदापिकाले न करे, यह श्रीक ग्सूनजीके पहिलो समाचारीमें पाठ हे, नर जो दो महीना होय नसमें पहिले महीने का वदिपक उत्सरे वढे महानाफा शुक्ल पक्ष एलें कल्याणकतिथिका व्रत एक महीने में करणा, पहिलेका सुदपद उत्तरेका वदिपक एवं ३० दिन खंग जानना, इन ३० दिनोंमें कल्याणकतिथिका व्रत पचरकाश नहि करे, यह तिथियो का प्रमाण श्रीहस्लिस्सूरजी फत तत्सतरंगणी ग्रंयमें प्रसिद्ध है, सोहित्यिमाण गाथा लिखो दे ॥ निहियापुत्रनिही, क.या (७०) '. . ॥ अथ श्रीखरतर वृहद्गवकी सिद्धांत शुद्ध "सामाचारी लिख्यते ॥ . जो एकमतिथि १ कम होय तो प्रतिपदाका पञ्चरकाण: पिवती अमावास्या ३० तिथिकों करे, अष्टमी कम होय थष्टमीका व्रत सप्तमीकों करे, जर जो चनदस कम दोय तो? का उपवास अमावस या पुनमको करे, इसका कारण यह है । यह दोनों तिथि बरावर पर्व हे, चौदश पर्वदिन में तेप्रमाव पूनम जी चिरंतन पक्षीका दिन है, यह दोनों दिन धर्मकत्य रणेक ,.पारणे उत्तरपारणे धर्मका नद्योत करेः ॥ श्त वख जैन) पंचांगको प्रवर्ति नही, अन्य धर्मियोंके पंचांग परसे तिथिर गिणनेमें आती है, जैन पंचांगमें संवत्सरी आदिक. पोंका क वृद्धि नदि होता, जंबूदीपपन्नत्नी में पांच संवत्सर कदे दें, नस स अनि वर्द्धन संवत्सर मिथ्यास्वियोने प्रचालित कर रस्का है, ले न् सूर्यसंवत्सर तीनसे सवासन दिनका होता है, इस वास्ते नागमसे यह पत्रा यथार्थ नदी एकांत नयवाद देतुसें. इस बार को चोदश कम हो तो उपवास तया परकी प्रतिक्रमण निस्संदेर पूनम तथा अमावसके दिन करे, लेकिन तेरस तथा चौदस कर तिथिके वितत्येको न करे, तर जो बेला करे तोहरीगेमेतो दोन दिन त्यागपत में ग्राह्य हे । अब कोई वखत संवचरीकी चोध कम हो तो पांचमके दिन संवधरी प्रतिक्रमण करे, लेकिन तीजके दिन कदापि, काले नी नहि करे, नर जो चोय दो दोष तो पहली चाणको संवत्सरी करे, मोर कोइ नी तिथि को होयतो पह तिथि. माननीय है, दूसरी . साव धोकी तिथि गेमके दर प्रमा (१) हातमें नी नही है, पसणमें कल्पसूत्रको नव वाचनाही के । एसा बंधाण नही, अघकी जी करे । तथा अविलमें एक च्य उसरा नष्णजलद्रव्य यह दो द्रव्यही ग्रहण करणेका का हे इस वास्ते जोव्हाका लोलपीपणे करके अधिक द्रव्य यहः करणा नदि चाहिये । तथा तरुण स्त्रोकुं मूलनायकजीको डा करणी प्रमाणीक आचार्योंने मना किया दे, कारणं इस का प्रायें स्त्रियों में अविवेकपणा तथा अकस्मात् स्त्रीधर्म प्रगट. ना दीखरदा दे, तथा श्रावककू पञ्चरकाणमें पाणस्तलेरावाका 3 कहणा युक्त नही, यह पाठ साधूका हे, तथा दिनप्रति एक वाश पचरकावे, जो अधिक तपकी श्चा होय तो अपने दिल में. रणा ररके, लेकिन पञ्चरस्काण नित्य सूर्योदयकी वखतही करे। या जिस धान्यकी दो फाम होय सो सब विदलको गिणतामे इस विदखधान्यकू गोरस दही गाउके साथ नकण नहि करे, या मरण जन्मका सूतक जिस घरमें होय नस घरकाः आहार णी साधू वर्जन करे, लेकिन संपूर्ण कुल गोत्रका सूतक नहीं ने, इत्यादि इदां संक्षेप मात्र खरतरकी सामाचार लिखी है. नेक ग्रंथ खरतर सामाचारीके दे जिसमे सरल शुोपयोगी स-: यसुंदरोपाध्याय विरचित समाचारोशतक पंचांगी प्रमाण सू कि पाठ संयुक्त दे सो अनेकांती बुद्धिवानोने गुरुगमसे देखके. रणा || यह खरतरगचमेसें चोरास। गछ नया हे,. जिस वास्ते परतरगबमें चोरासी नंदि हे, उद्योतन मूरजी, नेमचंद्रसूरजी के नजशिष्य थे, इस नद्योतनसूरजीने ७३ विद्यार्थी शिष्य नर ८४: निजशिष्य श्रीवर्द्धमानसूति एवं ७४ को प्राचार्यपद दिया, वे मानसूरि के शिष्य जिनेश्वरसूरजीने सं० १०७० को शाल में अ. उहिलपुरपत्तनमें चैत्यवाशी रोशी गण वालोवू.ज्ञानर किग (२) करके जीता, तब उसनराजाने स्वस्तर विरुद दिया, तबते कोटिक गध नंपुल बजगाखावाले खरतरगच कहलाणे लंग, लेकिन बनी स्वमतालिमानो खरतरगडूं संवत् वारेसे ५ की सालमें जिनदनमूरजोसें नया एसा धर्मसागर निन्हचकी तरे स्वयित मंपोंमें लिखा दे, लेकिन मपणे पूर्वाचार्योंके वशाये सभ्यकततति मादि गंध तो देखे, इन जिनेवरसूरिश्के दो शिष्य नये, के जिनसूरि, जिनोने संवेगरंगशालादि मंग बसाये नर श्रीमान गोत्र यापा, अप्सरे श्रीमन्नपदेवसूरिः, जिनौने नवांगकी वृत्ति शाश नदेवताकी वीनतीसे रची, जिनके शिष्य श्रीजिनवडलसूरिः, जि नोने दजारों राजपूतोंको श्रावक यणाये, जिनोके शिष्य श्रीजिन दनसूरजो एक लाख तीस हजार राजन्यवंसो माहेश्वरी तया ब्रा छनोकों श्रावक वगाये, राखेचा लूंगीया पारख, सांवसुखा मालू कोठारी, बोथरा नादटा, वमेर गोलग मायक चम्म उगम सेठिया ब्रह्मेचा, इत्यादिक तीनसें गोत्र स्थापक जणशाली प्रमुखगोत्रोंढूं तवंशमें श्रावक यणापा, सब गोत्रोके नाम लिखणेसे ग्रंथ बढ़ जायगा इस वास्ते इतने पर समझ लेखा, एक अगरे जाति रत्न' अनसूरिजीने नसियामे उसवाल वणाये , वाकी प्रायें सर्व जप्त वास कुल श्रीवर्द्धमानमूरजीसे लेकर श्रोजिनदत्तसूरिः माहाराज तक खरतरगचके प्रतियोधक है, पीछे नसवालवंशी हुये पीछे से चत १५ सें से लेकर आज दिन तक नर२ गछियोने तथा मताव इनोपर अपणा सिक्का जमाया हे, मूल वंशावली देखो F दोलत खरतर वृहातकी है, यह वात हमने वहोतो । तपासले लिखी दे, जिनोके पट्ट परंपरामें दादा श्री नरे, मनोके शिष्य उपाध्याय श्रीक्षेमकीर्तित यो सश्विाणगढमें पांचसे. राजन्यवंशीयोकू दीकर देखें ..
(७८.३ ) से प्रसिद्ध नई, उस शारवामें जगत्पुज्य श्रीसाधूगुणसें विराजमान वर्मशोवाणिः परमगुरू नये, जिनके शिष्य पंमित श्रीकुशालनि धानमुनिः नये, उन परमपुरषसाधूजी माहाराजका चरणानचं वरीक न० श्रीरामलावगणिः ने शिष्यमझली पं । क्षेमचमुनिः चि। पेमचंद अमरचंदादि शिष्योके तथा पारशालाश्रीवीकानेर वास्तव्य अनेक विद्यार्थियोके लिये पंच प्रतिक्रमणादि नित्यकर्तव्य सर्व जी वोके. नपगारार्थ उपायके प्रति करा हे. विकापार पुस्तक मिलणे का बीकानेरे बमा नपासरा विद्या- शाबा श्री। परमोपगारी युक्तिवारिधिः। रामलालजा गशिः ॥
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