Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
Krishnasraystotram
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BHAVAN'S LIBRARY
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र ..... Pimer : वर्ष-श्रीश्रीमदल्लभाचार्यचरणमादुर्भावित कृष्णाश्रयस्तोत्रम्। पमिाख्याभिः समुल्लसितम् । श्रीमदोस्वामिश्रीकल्याणरापचरणविरचित्ताकाशानुसारि- हिन्धनुवादयुतं च । १ श्रीरघुनायानाम् ... ४ श्रीद्वारिक पराणाम् २ श्रीकल्याणरायाणाम ५ भीत्रजराजानाम ३ विष्टइश्रीगोविन्दराममहानाम् । ६ फेपाधि ... तञ्च श्रीमदोस्वामिल ललामविद्यानुरागिश्रीरणाच्छोडला- लजीमहाराजपादैः अखण्डसौभाग्यवतीनित्यली. लास्थनिजात्मजाश्रीमतीव्रजभियावेटीजीनां स्मृत्पर्य दत्तसम्पूर्ण साहाय्येन विरजित्तनुजनुाद्धाद्वितविशारद- शास्त्रिहरिकृष्णशर्मणा Sally VAL RAG. संशोध्यानूध सम्मुद्यच श्रीजीवनेशाचार्यपुष्टिसिद्धान्तकार्यालयात प्रकाशितम् । मूल्यं सपादमुद्रिका सबद १९८३ सन् १९२७.
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मुम्बग्यां
मणिलाल इच्छाराम देसाई इत्यनेन स्वीये 'गुजराती' पत्रस्य
'न्यूस मुद्रणयन्त्रालये"
मुदायित्वा प्रवाशितम् । पो पाळाघोडा, बेर-हाउस लेन.
श्रीकृष्णाय नमः। BHAR S.N............ कृष्णाश्रयस्तोत्रम् LIBRARY सर्वमार्गेपु नयेषु कलौ च खलधर्मिणि । पापण्डपचुरे लोके कृष्ण एव गतिर्मम ॥१॥ म्लेच्छामान्तेपु देशेषु पापकनिलयेषु च । सत्पीडाव्यग्रलोकेषु कृष्ण एव गतिर्मम ॥२॥ गङ्गादिनीवर्येषु दुष्टैरेवावृतेविह। तिरोहिताधिदेवेषु कृष्ण एव गतिर्मम ॥३॥ अकारविमूढेषु सत्सु पापानुवर्तिपु। लाभपूजार्थयत्नेषु कृष्ण एव गतिर्मम ॥ ४ ॥ अपरिज्ञाननष्टेपु भन्नेष्वव्रतयोगिषु । तिरोहितार्थदेवेषु कृष्ण एव गतिर्मम ॥५॥ नानावादविनष्टेषु सर्वकर्मवतादिपु । पापण्डैकप्रयत्नेषु कृष्ण एवं गतिर्मम ॥६॥ अजामिलादिदोपाणां नाशकोनुभये स्थितः। ज्ञापिताखिलमाहात्म्पः कृष्ण एच गतिर्मम ॥ ७ ॥ प्राकृताः सकला देवा गणितानन्दकं बृहत् । पूर्णानन्दो हरिस्तस्मात् कृष्ण एच गतिर्मम ॥ ८॥ विवेकय भक्त्यादिरहितस्य विशेषतः । पापासक्तस्य दीनस्य कृष्ण एव गतिर्मम ॥९॥ सर्वसामर्थ्यसहितः सर्वत्रैवाखिलार्थकृत् । शारणस्थसमुहारं कृष्णं विज्ञापयाम्यहम् ।। १० ।। कृष्णाश्रयमिदं स्तोत्रं यः पठेत् कृष्णसन्निधौ । तस्याश्रयो भवेत् कृष्ण इति श्रीवल्लभोत्रवीत् ॥११॥ इति भीमालभाचार्यचरणप्रादुर्भावितं कृष्णाधयस्तोत्रं सम्पूर्णम् । १ 'खर्मिणि इतिपाठः। 'कृष्ण' इतिपाठः। ** अष्टमपत्रे चरमपक्तितोऽवशिष्टम् । उच्यते । सा च स्नेहरूपा । तदुक्तं नियन्ये 'माहात्म्यमाने' त्यस्य व्याख्याने रतिः स्नेह' इति । स्नेहस्तु मेमैव । न च शाब्दिकोक्तभावार्थविरोधादसङ्गतमिव प्रति- भातीति वाच्यं, निरक्तरपि प्रमाणत्वात् । इतरपा 'कृपेर्वर्ण' इत्यनुशासनसिद्धस्य कृष्ण- शब्दस्यानन्दवाचकत्वं गगनकुसुमायमानं स्यादिति भक्तिसरणिकुशलतमाः परिशीलयन्तु । अधुना देशादिसाधनानामसाधकत्वमिति । अधुना कलावित्पर्यः । आदिपदात् कालद्रव्यमन्त्रककर्मणां ग्रहणमितरत्स्पष्टम् । उक्तं च तत्वार्यदीपे 'पमिः संपद्यते धर्मस्ते । दुर्लभतराः कलाविति । सर्वसाधनरूप इति, पडिघसाधनरूप इत्ययः । सङ्घचातात्पर्या- • तुरोधेन सर्वपदस्पात्र सङ्कचितवृत्तित्वात् । दशलीलेति । 'अत्र सो विसर्गश्च स्थान पोपणमृतयः । मन्वन्तरेशानुकया निरोधो मुक्तिराश्रय' इत्येता दशलीला इत्यर्थः । सर्व- मेतच द्वितीयस्कन्धसुबोधिन्यामस्मदायविवेचितं विस्तरभयाल्लक्ष्यमात्रमेकोच्यते न कृत्स्लम् । सत्र वारदशरीरस्य विष्णोः पुरुषशरीरस्वीकार:
॥ श्रीकृष्णाय नमः॥ ॥ श्रीगोपीजनयल्लमाय नमः॥ ॥ श्रीमदाचार्यचरणकमलेभ्यो नमः ॥ श्रीमद्भगवन्दनवैश्वानरावतारश्रीवल्लभाचार्यमहाप्रभुपूज्यपादप्रणीत कृष्णाश्रयस्तोत्र । - यल्लीलालवसंस्पर्शान रोचन्तेन्पदाशिषः । तं राधाहृदयानन्ददायकं कृष्णमाश्रये ॥१॥ यत्कृपादृष्टितो जन्तुगोविन्दं विन्दते मुदा । भवत्याई तानिनाचार्यानभिवन्देऽर्थसिद्धये ॥२॥ जिसकी लीलाका लवमात्र (थोडा ) मी मलीभाँति सम्बन्ध हो जानेसे ( जीवको) अन्यआशिर्वाद रुचिकर नहीं होते, उस, श्रीराधाके हृदयको आनन्ददानकरनेवाले आनन्दरूप श्रीकृष्णका मै आश्रय करता हूँ ॥ १ ॥ जिसके कृपाकटाक्षसे पामर जीव भी विना किसी प्रकारके प्रयत्नसे ही श्रीगोविंदको प्राप्त करता है, उन निज श्रीमदाचार्यचरणोंको मै अर्थ (ग्रन्थसमाप्ति ) सिद्धिकेलिये भक्ति- पूर्वक अभिवादन करता हूँ। ग्रन्थावतरण। श्रीकृष्णका आश्रय प्राप्त होनेसे (ऐहिक पारलौकिक ) सर्वकार्य सिद्ध होते है। निजजनोंके सर्व कार्य सिद्ध हों, इसलिये मानों वरदान करते हों, उस तरह श्रीमदाचार्यचरण कृष्णाश्रयस्तोत्रका निरूपण करते है। कृष्णाश्रंप में दशश्लोक क्यों हैं? इस समय देश, काल, द्रव्य, कर्ता, मन्त्र, कर्म आदि साधनोंके दूषित होनाने के कारण कर्ममार्गादिसाधन सर्वसाधक नही है । भगवद्भक्तों के सर्वसाधनरूप एवं चतुर्विध पुरुषार्थरूप भगवान् ही है। अर्थात् देश, काल, द्रव्य, कर्ता, मन्त्र और कर्म ये छहों साधन एवं धर्म, अर्थ, काम और मोक्षरूप चारों पुरुषार्थीको मिलानेसे दश सहया की पूर्ति होती है, और साथ ही इस ग्रन्थका आशय यह भी है कि साधन और साध्य सत्र भगवद्रूप है, इसलिये दशश्लोकोसेही उनकी भगवद्रूपता सिद्ध कीगई है। दूसरा कारण यह है कि भगवान् की लोला सर्ग, विसर्ग, स्थान, पोषण, उति, मन्व- न्तर, ईशानुकथा, निरोध, मुक्ति और आश्रयरूप दशप्रकार की है, अतः भगवदाश्रयका निरपण मी दश श्लोकोंसेही करना उचित है।
कृष्णाश्रयस्तोत्र तीसरा हेतु यह बताया जाता है कि दशविध भक्तोंसे सेव्य श्रीकृष्ण हैं, यह दश श्लोकों से दर्शाया है । भक्तोंके मेद निम्नादित चक्र के अनुप्तार है: - भक्त सगुण निर्गुण सात्विक राजा तामस राजस राजस तामस तामस तामस सात्विक सात्विक सात्विक राजस तामत सास्विक राजस तामस सात्विक राजप्त तामस सात्विक राजस सगुण के नवप्रकार और एक निर्गुणको मिलाकर दशविषमतों से सेव्य श्रीकृष्ण हैं। चौथा प्रयोजन यह है कि- प्राण, अपान, ज्यान, समान, उदान, नाग, कूर्म, कल, देवदर और धनञ्जय इन दशविध प्राणों से ही सर कार्य सिद्ध होते हैं, अतः सर्वकार्यसाधक कृष्णाश्रयका भी निरूपण दश श्लोकोंसे प्रार्थनाके निमिचसे श्रीकृष्णकी स्तुति करते हुए किया है। उपर्युक्त देशादि साधनोंमें काल मुख्य होनेकेकारण सबसे पहिले काल पुरुषार्थ- को सिद्ध नहीं कर सकता यह बतानेकेलिये कालधर्मका निराकरण करते हुए श्रीकृष्णकी प्रार्थना करते हैं- सर्वमार्गेषु नष्टेषु कलौ च खलधर्मिणि । पाषण्डप्रचुरे लोके कृष्ण एव गतिर्मम ।। २ ।। अन्वय-कलौ खलधर्मिणि सति, लोके पापण्डप्रचुरे सति, सर्वमार्गेषु नष्टेषु सत्सु, कृष्ण एवं मम गतिरस्तु । कलिकालके खल (दुष्ट ) धर्मयुक्त होनेपर, लोकके विशेष कर पापण्डी होने पर तथा सर्वमार्गाके नष्ट होनेपर भगवान् श्रीकृष्ण ही मेरी गति-आश्रय होवै । कलिकाल खलधर्मी है। खल पुरुष अन्तर्दुष्ट होता है। जो व्यक्ति अन्तर्दुष्ट होता है, वह सत्कार्य में बाधक रहता है । कहीं कहीं "खरधर्मिणी' ऐसा भी पाठ है वहां जिसकी चेष्टा दुःसह हो ऐसा कलिकाल प्रवर्तमान होने पर-सदानन्द भगवान् ही मेरी गति-आश्रय- ऐहिक पारलौकिक अर्थ साधक-होवै । सारा संसार पापण्डप्रचुर बन गया है, अत एवं " २ " श्रीमद्भगवद्वदनवैश्वानरावतारश्रीवल्लभाचार्यमहाप्रभुपूज्यपादप्रणीत सब मार्ग-कर्म ज्ञान आदि पुरुषार्थ के साधन प्रायः ना होगये हैं। कर्मादि मार्ग नष्टप्राय होगये उसका प्रकार निम्नलिखित है- आध्यास्मिक यज्ञादि कर्म करनेवालेको नित्तशुद्धिद्वारा आत्मसुख-अन्तःकरणकी प्रसन्नता प्राप्त होना-ऐसा निसका अर्थ है वैसा स्वर्ग प्राप्त होवै, ऐसा वैदिक सिद्धान्त हैं। उसमें पापण्डने प्रवेश करके आत्मसुख वाचक 'स्वर्ग' शब्दका 'लोकरके रूपमें भ्रम उत्पन्न किया, उससे कर्ममार्गके द्वारा होने वाली चित्तशुद्धि अटक गई ( अर्थात् कर्ममार्ग जो कि आत्मसुखका साधन था, उसको संसार ही जिसका फल है ऐसे प्रवाहमार्गका साधन बना- दिया)। इसीतरह मायावादका आग्रह करके ज्ञानमार्गका, निरीश्वरवादका अङ्गीकार करके योग(खाङ्ख्यामार्गका और विभूतिपरक होनेसे उपासनामार्गका ‘मुख्यफलसावकत्व नष्ट करने पर सर्वमार्ग नष्ट हो गये। शङ्का-भक्तिमार्गीय जीवोंको भी कलिकाल वाध करेगा ही, क्योंकि वे भी तो गृहा- दिमें आसक्त रहते हैं, लौकिक किया करते है, अतः उनको भी पाप लगनेका सम्भव रहता है, तब फिर आप भक्तिमार्ग से उद्धार होना कहते हैं तथा मुख्यफल साधक कह कर सर्वोत्कृष्टताका समर्थन करते हैं वह असङ्गत प्रतीत होता है। भक्तिमार्ग भी कर्मादि मागोंके समान ही है, तब भक्तिमार्गीय आश्रय करनेसे भी क्या होगा ? समाधान- -आप कहते हैं वैसा दोष भक्तिमार्गमें नहीं है। अतः कलिकाल भक्ति- मार्गीय जीवोंकेलिये बाधक नहीं है। प्रत्युत कलिकालमें थोड़े ही समय में फलसिद्धि होने से वह साधकही है । इसके प्रमाण में श्रीमद्भागवतादिके वाक्य विद्यमान हैं। "हे राजन् ! कलिकाल दोष का निधि है, तथापि उसमें एक महान् गुण विद्यमान है, वह यह कि श्रीकृष्णके कीर्तनसे ही मनुष्य कर्मबन्धनसे मुक्त होकर मोक्ष प्राप्त करता है," "हे राजन् ! सत्ययुग निरन्तर विष्णुका ध्यान करनेसे, त्रेतायुगमें यज्ञोंसे विष्णुका यमन करने से, और द्वापर में उपासना करने से नो गति प्राप्त होती थी वह कलिकाल में भगवान् के नाम सङ्कीर्तनसे होती है" "गुणज्ञ और सारग्राही आर्यजन कलिकी प्रशंसा करते हैं, क्यों कि कलिकालमें केवल कृष्णसङ्कीर्तनसे ही सब काम सिद्ध होते हैं ।" इत्यादि । भक्तों को गृहादि पाधक नहीं है । श्रीमद्भागवतमें कहा है कि-"हे भगवन् ! जो मक्त आपके मङ्गलमय नाम तथा रूपका श्रवण करते हैं तथा दूसरोंको सुनाते हैं, स्वयं ध्यान करते हैं तथा समग्र क्रियाओं में भी आपके ही चरणकमलमें चित्त लगाकर रहते हैं, उनको पुनः संसारमें माना नहीं पडता है। और भी भागवतमें राजा प्राचीनहिके पुत्रोंको भगवान् उपदेश करते हैं कि "हे राजकुमारों । जो मनुष्य गृहस्थाश्रममें रह कर सत्कर्म करते हैं और मेरी चर्चामें ही - .
४ छष्णाश्रयस्तोना रात दिन बिताते हैं उनको यह संसार बन्धन कर्ता नहीं होता है।" इसी प्रकार ब्रह्माजीने भी स्तुति करते हुये कहा है कि "हे कृष्ण ! जब तक मनुष्य पूर्णतया आपके हुए नहीं है तब तक ही उनको रागादि चोरोंसे मय रहता है, घर कारागृहके समान प्रतीत होता है और मोह वेढियोंके समान " इत्यादि वाक्योंसे सिद्ध होता है कि भगवद्भक्तोंके गृह आदि भगवान्केलिये ही होनेके कारण वे भक्तोंको बन्धनकारक नहीं होते हैं। भगवद्भक्तोंकी लौकिक क्रियाएं देखेनेमें लौकिकवत् हैं, पर वे सब यास्तविक रूपसे अलौकिकके समान ही हैं । क्यों कि नारदजीने व्यासजीकेप्रति कहा है कि-"सब कर्म, जन्ममरणकी जालमें फँसादेनेवाले हैं, अर्थात् कर्म द्वारा कर्मबन्धनसे मुक्त होनेकी आशा व्यर्थ है, तथापि यदि वे कर्म श्रीकृष्णप्रीत्यर्थ किये जाँय तो अवश्य ,मोक्षदायक सिद्ध हो सकते इस प्रमाणके अनुसार भक्तोंके कर्म श्रीकृष्णप्रीत्यर्थ ही होनेके कारण लौकिक प्रतीत होनेपरभी उनको अलौकिकके समान ही मानना उचित है । असमय में भी वैदिक क्रिया कर सकते हैं । यदि भगवत्सेवाके समयमें वैदिक क्रिया न हो सके तो समयका अतिक्रमण हो जानेसे प्रत्यवाय नहीं होगा । क्यों कि स्वयं भगवान् ही श्रीमुखसे आज्ञा करते हैं कि " मेरी सेवा करते करते यदि वैदिक क्रियाका काल लोप होजाय, तो उस भगवत्सेवापरायण भक्तका लुप्त- काल कर्म तीन करोड महर्षि करलेते हैं। इस वाक्यसे ज्ञात होता है कि भगवत्सेवा करते हुए यदि वैदिक कर्म यथासमय न हो सके तो उससे प्रत्यवाय नहीं है । इसी प्रकार भगवान् हृदयमें प्रविष्ट होकर सब पापोंको घोते हैं" "वे मगवदीय मेरे दण्डके पात्र नहीं बनते" इत्यादि वाक्योंसे भी यही सिद्ध होता है कि कदाचित् पाप लग भी जाय तो पातकका फल जो नरकादि होना चाहिये वह भक्तों को भोगना नहीं पडता (किन्तु स्मरण रहे कि यदि कोई दम्भसे वैदिक क्रियाओंका त्याग करता है तो यह अवश्य नरक गामी होता है) भगवद्भक्त कीर्तनादिसे ही पापोंको नष्ट करदेते हैं । आचार शैथिल्य । प्रपत्ति-शरण-मार्गनिष्ठ जीवों से कदाचित् आचारादिका यथोचित पालन न हो तोभी फलसिद्धि होती है । इसविषयमें अर्जुनके प्रति भागवान् आज्ञा करते हैं कि "हे अर्जुन सब तरहसे अन्य सब धर्मोंका त्याग करके मेरे शरण जा" "अत्यन्त दुराचारी भी यदि अनन्यरूपसे मेरा भजन करता है तो उसको साधुपुरुप समझना चाहिये । क्यों कि उसका निश्चय उत्तम है" इन भगवद्वाक्यों से, तथा लोकमें मिथ्याचारी, अनाश्रमी होनेपर भी यदि भगवद्भक्त है, तो वह जिस प्रकार सूर्योदय होनेसे सम्पूर्ण जगत्को प्रकाशित करता है उसी तरह सारे संसारको पवित्र करता है। इसी प्रकार “हे राजन् ! मगवद्धर्ममें आस्था-श्रद्धा-रखनेवाला कभी " । .
श्रीमजावदनवैश्वानरावतार श्रीवल्लभाचार्यमझाप्रमुपूज्यपादप्रणीत प्रमादी होता नहीं है, इसनाही नहीं परन्तु यदि वह आँखें बन्दकर के दौडे तो भी उसको न कहीं ठोकर लगनेका भय रहता है न फिसलनेका ।" इत्यादि वाक्यों से ज्ञात होता है, कि प्रपत्ति मार्गमें आचारादि के अभावमें भी फल सिद्धि होती है। भक्ति समय सिद्धिओंका जीवन है। श्रीमद्भागवतमें कहा है कि "हे महर्षियो ! भलीभाँति किये हुए यज्ञादि कर्म मी यदि भगवान् में मक्ति उत्पन्न न कर सकें तो वह केवल श्रम ही है ऐसा समझना चाहिये ।। "सत्य और दया से युक्त धर्म तथा तप से प्राप्त की हुई विद्या भी मेरी भक्ति से विहीन मनुष्यको मलीप्रकार पवित्र नहीं बना सकती" | " अच्युत-भगवान् के भाव विना जो निर- जान ज्ञान प्राप्त होता है वह भी गलीप्रकार शोभायमान नहीं होता है, तब जो कर्म श्रीकृष्ण को अर्पण नहीं किया जाता वह कैसे सुशोभित होसकता है ? फिर चाहे वह कैसा ही निष्काम क्यों न हो?" "विविध कामनाओंसे परास्त पुरुपकी आत्मा जिस तरह श्रीमूकुन्दकी सेवा करके शान्ति प्राप्त करती है उस प्रकार यमनियमादि सम्पन्न योगमार्गसे शान्ति- लाम नहीं कर सकती।" ब्रह्मस्तुति में ब्रह्मानीने भी कहा है कि, "हे भगवन् सकल- कल्याणकारिणी आपकी भक्तिको छोड़कर जो लोग विना प्रेमके केवल शुष्क ज्ञानकेलिये लेश सहन करते हैं उनको परिणाममें भी क्लेश ही सहन करना पड़ता है, जैसे धान्यके विना छीलकों को कूटनेवालेको परिणाम में छीलकोंके चूर्णके अतिरिक्त और कुछ भी नहीं मिलता" इन विविध प्रमाणों से सिद्ध होता है कि भक्तिके विना कर्म, ज्ञान, कुछ भी सिद्ध नहीं कर सकते । परन्तु यदि वे मक्तिका सहयोग करें तो सिद्धि प्राप्त कर सकते हैं । अत एव भक्तिही सकल सिद्धिओंका जीवन है। निःसाधन भक्ति भी सर्व साधिका है। श्रीमद्भागवत दशमस्कन्ध, अध्याय बीत श्लोक बत्तीस और तैंतीसमें कहा है कि "हे उद्धव ! कर्मकाण्ड, तपस् , ज्ञान, वैराग्य, योग, दान, और इसी प्रकार अन्य भी कल्याणके साधनों द्वारा जो जो कार्य सिद्ध किये जाते हैं, वह सब मेरा भक्त अनायास ही भक्तियोगसे प्राप्त करता है ।" इसी तरह गोतामें भी कहा है कि "हे अर्जुन ! आर्त, निज्ञासु, अर्थार्थी और ज्ञानी यह चार प्रकारके पुरुष मेरा मनन करते हैं। श्रीमद्भागवतमें शुका- चार्य मी कहते हैं कि अकाम हो, सर्वकाम हों या मोक्षकी कामनावाला हो, चतुर पुरुष को सीब मक्तियोग से परपुरुप का भनन करना चाहिये ।" ब्रह्माजीने मी मककी प्रशंसा करते हुए कहा है कि "जो लोग ज्ञान प्राप्त करने की इच्छासे परिश्रम न करके भक्तोंके मुखसे निकली हुई भगवान्की पवित्र कथाओंका कानसे श्रवण करते हैं तथा देह, मन, वाणीसे उसका आदर करते हुए जीवन व्यतीत करते हैं वैसे मक्त, हे अनित । यद्यपि आप तीनों लोक में अनेय हैं तथापि आपको सहन ही में जीत लेते हैं।" "श्रीपति भगवान्के प्रसन्न । ६ कृष्णाश्रयस्तोन। होने पर क्या अप्राप्य रहता है ? तथापि हे राजन् ! भगवान के भक्त भगवान् की सेवाके विना अन्य कुठभी चाहते नहीं है।" "सर्वदुःसहर्ता प्रभु अपने भक्तको रूप, आरोग्य, और अर्थ भी प्रदान करते हैं।" ये सब वाक्य नि साधन भक्ति भी सर्व साधिका है ऐसा सिद्ध करते हैं, . भक्ति सर्व साधिका है, इतनाही नहीं, किन्तु स्वयं ही फलरूपा है । इसका समर्थन निम्नाङ्कित वाक्य करते हैं। श्रीमद्भागवत द्वितीयस्कन्ध प्रथमाध्याय नवम श्लोक में कहा है कि-"निर्गुण- तामें परिनिष्ठित रहने पर भी मुझे प्रभुकी लीरासे आकृष्ट होकर भागवतशास्त्रका अध्ययन करना पड़ा।" और प्रयमस्कन्ध सप्तमाध्यायके दशम लोकमें वर्णन किया है कि "श्रीहरि- के गुण ही ऐसे मनोमोहक हैं, कि आत्मामें रमण करने वाले जीवन्मुक्कों को भी प्रभुकी निष्काम भक्ति करने की इच्छा होती है ।" इसी तरह तृतीयस्कन्ध पंचविंशाध्यायके चौती- सवे श्लोकमें भगवान् कपिल ने मातृचरण देवहूतिको उत्तम भक्तिका लक्षण समझाते हुए कहा है, कि "मेरी चरण सेवामें तत्पर रहने वाले, मेरेलिये ही सब कर्म करनेवाले और सर्वदा एकत्रित होकर परस्पर प्रेमपूर्वक मेरी कया कहने में आनन्द प्राप्त करनेवाले ऐसे पिरल भक्त मेरे साथ एकात्ममावकी-मोक्षकी भी इच्छा करते नहीं हैं। इत्यादि वाक्य भक्ति स्वयं ही फलरूपा है, इस सिद्धान्त को दृढ करते हैं । आधुनिक समय में कर्मादि मागों के अधिकार नष्ट हो जाने के कारण अनधिकारी को कर्मफल प्राप्त नहीं होता है । अतः यदि कर्मादि मार्गोंके अनुसार भी भक्तिमार्ग में रहकर आचरण किया जाय तो अधिकार भेदसे उन मार्गामें कहा हुआ गौण अथवा मुख्य फल मिलनेका सम्भव रहता है । भक्तिमार्गमें मक्तको अनुग्रहसे ही अधिकार प्राप्त हो जाता है । यही उपदेश आचार्यचरणोंने निबन्ध किया है। आपकी आज्ञा इस प्रकार है "इस कलिकाल में सब अधिकार निवृत्त हो गये हैं, पर यदि प्रेम पूर्वक सेवा की जाय तो वह कलियुग भी श्रीकृष्णके भक्तको फलसाधक हो जाता है" । इस वाक्यसे यह भी ज्ञात होता है कि कर्मादिसाध्यफल भक्तिमार्गमें अनिच्छा से भी मक्तको प्राप्त होजाता है, जब कि भक्तिसाध्यफल अन्य मार्गों से सम्पन्न नही होता है । इससे सिद्ध होता है कि अन्यमागोंकी तुल्यताका गन्ध भी भक्तिमार्गमें नहीं है। अव यहां शङ्का होती है कि, कर्मादि मार्गाकी अपेक्षा उत्कृष्टता भक्तिमार्गमे यदि है भी तो रहने दीजिये, परन्तु उसमें अर्धकृत से तो कर्मादि तुल्यता होनी चाहिये । इस शङ्का- का समाधान करते हुए कहते हैं कि " विष्णु सतत स्मरणीय है, कभी विस्मरणीय नहीं है, इस प्रकार सदा विष्णुका स्मरण करनेवालेके सब विधि और निषेध किङ्कर हो जाते हैं।" "निस मार्गमें स्मृति मात्रसे सकल कल्याणके भाजन प्रभु होनाते हैं उस अजन्मा पुरुष श्रीहरिको मैं शरण हूँ।" "हे श्रीकृष्ण, कृष्ण, कृष्ण, इस प्रकार जो मेरा स्मरण करता है उस जीवका में, नलको भेद कर कमल जिसतरह ऊपर निकलता है उसीतरह नरकसे उद्धार करता हूं।"
श्रीगद्गबद्दनवैधामरावतारधीवक्षभाचार्यमहामनुपूज्यपादमणी.. - -- - "हे माधव, आपके नन अन्यकी तरह जन्म मरणके चकमें नहीं गिरते । । "संव शास्त्रोंका मथन करके और वारंवार उनका विनार भी करके एकवात निश्चित हुई है कि नारायण - ही सदा ध्यान करने योग्य है।" इत्यादि वाक्योंसे सिद्ध होता है कि यदि सोश, भक्ति न कीगई हो, योडी भी कीगई हो, तोभी वह भक्ति फलप्साधिका है, कर्मादिमागमें पैसा नहीं है। अतः प्रकृत विषयमें इतने ही प्रमाण पर्याप्त है ।॥ १ ॥ पवित्र देश में निवास करनेसे भी धर्मादि पुरुषार्थकी सिद्धि हो सकती है, और आप कहते हैं कि अन्य सब साधनोंका त्याग करके श्रीकृष्णका ही आश्रय करना चाहिये इसमें प्रमाण क्या है ? इस शङ्काका समाधान करते हुए कहते हैं कि पुण्यात्थान भी इस समय पुरुषार्थसाधक नहीं हैं; यही बात श्रीमदाचार्यचरण आज्ञा करते हैं- म्लेच्छामान्तेषु देशेषु पापैकनिलयेषु च । सत्पीडाव्यग्रलोकेषु कृष्ण एव गतिर्मम ॥ २ ॥ अन्वयः---देशेषु म्लेच्छाकान्तेषु सत्सु च पापैकनिलयेषु, सत्पीडाव्यमलोकेषु, कृष्ण एवं मम गतिः अस्तु । देश म्लेच्छोंके अधीन हैं। माना कि म्लेच्छोने देशपर आक्रमण किया है, पर यदि म्लेच्छ मी न्यायपरायण हों तो आपकी क्या हानी है ? इस आक्षेपका उत्तर देते हैं कि म्लेच्छ तो मूर्तिमान् पाप ही हैं, और पुण्यस्थान पापृरूप म्लेच्छोंके मुख्यस्थान (राजधानी) बने. हैं; दूसरा अर्थ किया जाय तो पापियोंका अथवा पापोंका घर हैं, तीसरा अर्थ यह है कि अन्न बल आदि देश म्लेच्छों के अधीन है और पाप के भी मुख्य स्थान बन गये हैं, कि जहां जानेसे ही पुनःसंस्कार प्राप्त होता है । यहां यह भी शङ्का हो सकती है कि पुण्य स्थलों में भी वणिक् आदि नातिके भले आदमी रहते होंगे, तो फिरे म्लेच्छोंसे क्या मतलब है ? इसका समाधान इस प्रकार करते हैं कि वणिक आदि लोक भी स्वधर्माचरण करनेवालों पर जो आफतें आती हैं उनको देखकर किङ्कर्तव्यविमूढ बन गये हैं, अर्थात् स्वधर्मनिष्ठपर जो आफतें आती है उनको देख कर वधर्माचरण न करना चाहिये या लौकिक कार्य न करना चाहिये इसका निर्णय वे लोग नहीं कर सकते । अर्थात् सद्धर्मसे अच्छा ही होगा ऐसा निश्चय उन लोगों से चले जानेके कारण धर्म विषयक श्रद्धादिके अभावमें धर्माचरण करनेवालोंको ये सहायक भी नहीं होते हैं। अतः श्रीकृष्णके आश्चयके, विना पवित्र देशोंपर अपने उद्धारका आधार रखना निरर्थक है । श्रीकृष्णका आश्रय करनेवालेको देश भी अनुकूल हो जाते हैं । अत एव श्रीमद्भागवतमें देवोनें “कृष्णसेवा, करनेकेलिये भारतवर्ष, मुकुन्दसेवोपयोगी देह प्रदान कीनिये, हम भी भूमिपर जन्म लेना चाहते हैं " ऐसा कहा । इस प्रकार पुण्यभूमिमें स्थिति करनेसे भी, पुरुषार्थकी सिद्धि नहीं होती है, अतः .
.. " , । + . " -- :: कृष्णाश्रयस्तोत्र। श्रीकृष्णका आश्रय ही करना उचित है, अतः मेरा आश्रय श्रीकृष्ण ही हो, ऐसी प्रार्थना श्रीमहाप्रभुनी करते हैं ॥२॥ गङ्गादि तीर्थ भी सर्व पुरुषार्थ सिद्ध करनेवाले माने गये हैं, तो फिर आश्रयकी प्रार्थना किसलिये करते हैं ? इस प्रश्न के उत्तर पूर्वोक्त देशादि छ: प्रकारके साधनों से तृतीय साधन द्रव्य भी फलसिद्धि नहीं करता है यह दर्शानेकेलिये तीर्थ भी साधक नहीं हैं ऐसा निरूपण करते हैं:- ' गङ्गादित्तीवर्यपु दुष्टैरेचावृतेप्विह । तिरोहिताधिदेवेषु कृष्ण एव गतिर्मम ॥३॥ अन्धयः-इह गङ्गादितीर्यवर्येषु दुष्टैरेवावृतेषु सत्सु तिरोहिताधूिदैवेषु कृष्ण एव मम गतिरस्तु। गङ्गा आदि मुख्य तीर्थ दुर्जनोंसे ही आवृत हैं । गङ्गादि तीर्थों में ब्राह्मणादि भी रहते हैं, तब आप यह कैसे कह सकते हैं कि सब तीर्थ दुष्टोंसे ही सेवित हैं ? ब्राह्मणादि की स्थिति वहां नित्य रहती है इस कारण अतिपरिचयसे उनकी तीर्थोकेप्रति आदर- बुद्धि कम हो जाती है, तथा वे दान दक्षिणादिसे निर्वाह करते हैं, इसलिये उनके पीछे भी उपा- धियाँ लगी ही रहती हैं, अतएव उन में भी दुष्टता रहती ही है। सर्वविध दोपोंको दूर करनेवाले तीर्थ वहां विद्यमान हैं तो फिर उनमें दोष किस प्रकार रह सकता है; ऐसी शङ्का भी नहीं हो सकती । उसका कारण यह है कि उनमें स्थित भगवानसे बहिर्मुखता तथा नास्तिकता आदि दोपोंका निवारण तीर्थ भी कर नहीं सकते । यह वात निम्नलिखित प्रमाणोंसे सिद्ध होती है । "सौ बार अच्छी तरह मिट्टी लगाकर जन्मसे आजतक प्रतिदिन स्नान करने- वाला भावदुष्ट मनुष्य, गङ्गाके सम्पूर्ण जलसे भी शुद्ध नहीं हो सकता । ऐसा हम निश्चित रूप से कह सकते हैं। मत्स्यादि जलमें रहनेवाले प्राणी रातदिन (गङ्गाआदिके) जलमें ही रहते हैं, परन्तु वे कभी स्नानके फलको प्राप्त नहीं कर सकते ॥ "मनुप्य जो कर्म श्रद्धा और विधिपूर्वक शुद्ध भावसे करते हैं, वही उसके अक्षय सुखकेलिये. कल्पित होते हैं; अर्थात् उन्हींसे उनको अक्षय सुखकी प्राप्ति होती है ।" "विधि और श्रद्धासे रहित और भावदुष्ट किये हुए कर्मका फल मनुष्यको प्राप्त नहीं होता है, इसका कारण यह है कि वैसे कर्मका फल असुर हरण करलेते हैं । अतः विधिहीन और भावदुष्ट कर्म करनेवाला अत्यन्त मृढ तथा अकृतार्थ समझना चाहिये । श्रद्धारहित, दुष्ट अन्तःकरणवाला, नास्तिक, संशयग्रस्त और कारणवादी ये पांचों तीर्यके फलको प्राप्त नहीं करते हैं ।" "जिस तरह गङ्गा आदि नदियां मदिरासे पूर्ण घटको पवित्र नहीं बनादेती है, उसी तरह नारायणसे विमुख मनुष्यको कोई भी प्रायश्चित पवित्र नहीं कर सकता।" ये सब आदित्य पुराण, योगिया- ज्ञवल्क्य, वायुपुराण तथा श्रीमद्भागवतके वचनों से सिद्ध होता है, कि तीयों में भगवान् से बहिर्मुख तथा नास्तिक मनुष्यको पवित्र बनानेकी सामर्थ्य नहीं होती है। . .
श्रीमद्गवद्वदनवैश्वानरावतारीवतमाचार्यमहाप्रभुपूज्यपादप्रणीत यहां इस तरह शङ्का होती है कि वस्तुमें शक्ति होनेपर कार्य अवश्य होता है, वह हुए विना रहता ही नहीं, जैसे दाहकत्व शक्ति अग्नि में विद्यमान है, और, यह जलाती नहीं ऐसा कभी नहीं हो सकता । इस नियम के अनुसार तीर्यमें पवित्र करने की शक्तिके विद्यमान रहते वे पवित्र नहीं कर सकते, ऐसा कदापि न होगा। इसका समाधान करते हुए आचार्यचरण आता करते हैं, कि तीर्थों में पवित्र करने. वाला जो आधिदैविक स्वरूप है वह तिरोहित हो गया है, अतः तीर्थ उनको पवित्र नहीं कर सकते । तीयोंका आधिदैविक स्वरूप सत्पुरुषोंके सम्पर्व से ही प्रादुर्भूत होता है, अत एवं निबन्ध में आपने कहा है कि " काशी आदि तीयामें किसी समय किसी एकाध की मुक्ति होती है । तत्र समझना चाहिये कि जीवके ऊपर प्रभुने अनुमह किया है।" प्रमुके अनुम- हके विना किसी की भी मुक्ति नहीं होती है । प्रभु तीयीका माहात्म्य बढ़ाने के लिये तीयोंके द्वारा भी किसीको मोक्ष प्रदान करदेते हैं। और श्रीमद्भागवत में भी कहा है कि भगवद्भक्त तीयो मान करते समय अपने हृदयकमल में विराजमान प्रमुके साथ तीयोंका सङ्ग करा कर तोर्यों को पवित्र बनाते हैं । अर्थात् तिरोहित आधिदैविक स्वरूप उनमें प्रकट कर देते हैं, इसको तीर्थीकरण कहते हैं । अन्य प्रकारसे तीयों को और क्या वीर्थ बनाना है ? जल में कुछ दोष तो दिखाई देते ही नहीं। इस प्रकार द्रव्यस्वरूप तीथों में भी स्वतन्त्ररूपसे पुरुषार्थ सिद्ध करने की सामर्य विद्यमान नहीं है अतः श्रीकृष्णका आश्रय ही क्षणीय है ॥३॥ यदि कर्म करनेवाला अच्छा हो तो सब फल प्राप्त हो सकता है। तो फिर अन्य का निषेध कर आश्रयकी ही प्रार्थना क्यों ? इस शङ्काका समाधान करके कर्मकरने वालोंका स्वरूप मी फल सिद्ध नहीं कर सकता, यही बात चतुर्थ श्लोक में निरूपण करते हैं:- अहङ्कारविमूढेपु सत्सु पापानुवर्तिषु । लाभपूजार्थयलेषु कृष्ण एव गतिर्मम ॥ ४ ॥ अन्वयः-सत्सु अहङ्कारविमूढेषु पापानुपतिषु लाभपूजार्थयत्नेषु कृष्णः एव मम गतिः अस्तु । महङ्कारके वशीभूत पण्डितगण-हम ही शास्त्रज्ञ है भन्य कोई नहीं-इत्यादि प्रकार के मिथ्याभिमानसे विभूट हो गये हैं। जिस तरह उनका ज्ञान अभिमानके हो जाने से दूपित हो गया है, वैसे ही उनकी कृति भी दूपित हो गई है। इसका कारण यह है कि वे लोग द्रव्यादि का लाम और पूजा के लिये ही यत्न करने वाले होते हैं। विष्णुयागादिक पारमार्थिक कर्म मी वे लोग ऐसा समझकर ही करते हैं कि इससे हमको द्वन्य प्राप्त होगा और लोकमें प्रतिष्ठा बढ़ेगी। साथ ही दुष्ट पुरुषोंका सङ्ग करनेसे सझनन्य दुष्टता और पापका अनुसरण करनेसे अनजन्य दुष्टता इसप्रकार दोनों प्रकारकी दुष्टता उनमें होनेसे वे पण्डित मी स्वतन्त्रतासे पुरुषार्थ सिद्ध नहीं कर सकते । परन्तु भगवदाश्रय करके भगवत्कृपासे वेदार्य और स्वदोष की स्फूर्ति होने ३ १२ कृष्णाश्रयस्तोत्र। . , होता हैं। क्योंकि इन पाक्यों में जीव को प्रवृत्त कराने वाला, सारे जगत् की उत्पपिका कारण, जीवमात्रके लिये सेन्य, सर्वविध कर्मोका फलदाता एकमात्र भगवान् ही है ऐसा कहा है। सब जैमिनिके मतके अनुसार उपपन्न नहीं हो सकता इसी तरह यनोंसे देवों की तृप्ति तथा देवोने यज्ञ किया ऐसा प्रतिपादन भी किया गया हैं । अतः यह भी स्वीकार करना चाहिये किं मन्त्रकी देवता मन्त्रसे पृथक् हैं और वह चेतन रूपा है । " हे अर्जुन ! उसके पश्चात् मुझे तत्त्वतः जानकर मेरेमें प्रवेश करते हैं।" " हे अर्जुन ! तू मुझे ही प्राप्त करेगा।" "ब्रह्मका आकार आनन्द है" इन वाक्योंमें भगव- सायुज्यको मोक्ष कहा है । तथा आनन्दाकार होनेके कारण भगवान्को ही फल कहा है। जिसमें आनन्दका अनुभव हो वही फल है अतः न्याय और साय मत मी श्रौतसिद्धान्तके अनुकूल नहीं है ऐसा सिद्ध होता है। इस तरह भिन्न भिन्न वादोंके द्वारा जो कर्म का विनाश हुआ है उसका , दिग्दर्शन कराके अव उन वादोंके द्वारा जो प्रतादिका विनाश किया गया है वह भी बताते हैं स्वमत के आग्रह से वे लोग एकादश्यादिवत भी दशमीके वेध से युक्त ही करते हैं, जिसका कि शास्त्रों में पूर्ण निषेध है । इस प्रकार प्रतोका भी विनाश हो चुका है । यद्यपि व्रत भी एक प्रकारका कर्म ही है तथापि वह ज्ञानादिका अङ्ग होने से यहां उसका कर्मसे पृथक् उपादान किया गया है। अब यहां शङ्का उपस्थित होती है कि एकादश्यादि व्रत करनेका वे लोग भी उपदेश करते हैं और स्वयं भी करते हैं, यदि वे लोग व्रतों को मिथ्या, फलरहित मानते होते तो वे क्यों आचरण करते हैं और उपदेश करते है ? साथ ही उन मतोंके प्रवर्तक शङ्कर जैमिनी गौतम आदि हैं । यह शङ्का भी अयुक्त है क्योंकि उनका प्रयास पाखण्डका प्रचारकरनेके लिये ही है । यह बात वाराह पुराण के “हे महाबाहु रुद्र तुम मोह शास्त्रों की रचना कराओ और सत्यको मिथ्या बताओ, अपने स्वरूप का प्रकाश करो और मुझे गुप्त रहनेदो" इह सार्ध श्लोकसे तथा पद्मपुराणके "खामाराध्य तथा शम्भो गृहीष्यामि वरं सदा । द्वापरादौ युगे भूत्वा कलया मानुपादिषु ॥ स्वागमैः कल्पितैस्त्वं च जनान् मद्विमुखान् कुरु । मां च गोपय येन स्यात्सृष्टिरेपोत्तरोत्तरा ॥" हे शम्भो ! द्वापरादियुगमें मैं कलात्मक अवतार लेकर मनुप्यादिकमें तुह्मारा अराधन करके वर ग्रहण करूंगा और आपको नवीन शास्त्रोंकी कल्पना. करके लीगोंको मेरेसे विमुख करना चाहिये, और मेरे स्वरूपको छिपा- १ त्वं च रद्ध महावाहो मोहशास्त्राणि कारय । अतध्यानि वितथ्यानि दर्शयस्व महाभुज ॥ प्रकाशं कुछ चात्मानमप्रकाशं च मारू ।।
श्रीमद्भगवदनवैश्वानरावतार भीवसमाचार्यमहामभुपूज्यपादप्रणीत कर अपना स्वरूप ही प्रगट करना चाहिये, ताकि यह सृष्टि उत्तरोत्तर चलती रहे । इस मगर- दाजाके अनुसार शाङ्करादिकी प्रवृत्ति है, वे लोग भी जो कर्म करते हैं वह भी अपनी महत्ता दर्शानेकेलिये ही करते हैं,साथ ही उनका यह भी उद्देश रहता है कि उनके अनुयायी भी वैसा ही कर्म करें । यदि ये लोग स्वयं वैसा न करके अनुयायियोंको ही उपदेश करें तो उनका कोई मानेगा भी नहीं । गीतामें भी कहाहै कि "यद्यदाचरति श्रेष्ठत्तचदेवेतरे जनाः!" अर्थात् जिप्त प्रकारका आचरण महत्पुरुषोंका रहता है, उसी प्रकारका आचरण अन्यलोग भी करते है इसी न्यायके अनुसार यदि वे स्वयं न करें तो उनके उपदेशके अनुसार अन्यलोग कैसे चल सकते हैं । शङ्करादि मतप्रवर्तकोके द्वारा आधुनिक लीगोंमें मोह उत्पन्न हो गया है। ये मतप्रवर्तक प्रायः सब देवता हैं तो फिर आप देवताओंसे प्रवर्तित मतोंको पासण्ड- मत क्यों कहते हैं ? ऐसी शङ्का भी उपस्थित नहीं हो सकती । क्यों कि मतप्रवर्तक देवता है इतना एकमात्र कारण रहने से ही वह मत सन्मत है ऐसा नहीं कह सकते । किन्तु जो मत वेदसे विरुद्ध न हो और वेदमूलक हो उसीको सन्मत कह सकते हैं। अन्यथा बृहस्पति प्रव- तित चार्वाक ( नास्तिक) मतको भी सन्मत कहनेकी आपत्ति उपस्थित होगी। इस तरह प्रस- काप्रसक्तसेही अटकना ठीक है । ये विविधवाद भी कर्मफलसाधक नहीं है; अतः मेरी गति- आश्रय-श्रीकृष्ण ही है ॥६॥ धर्मसे पाप दूर होता है" "धर्म सत्र प्रतिष्ठित है" यह श्रुति पहिले जीवको दोप निवृत्तिकैलिये धर्माचरण करनेकी अवश्यकता बताती है । यह ठीक भी है, कि धर्माचरणके द्वारा चित्तशुद्धि होनेसे भगवन्माहात्म्य तया भगवतस्वरूपको समझकर ही भागवदाश्रयादि करने चाहिये, नकि पूर्वकी दोपयुक्त अवस्थामें । कहां योगियों को भी अगम्य भगवत्स्वरूप और कहां यह दोषयुक्त जीव, वह उप्तको कैसे प्राप्त कर सकता है। इस तरह शङ्का करके "निसको यह भगवान् वरण करते हैं उसीको वह लभ्य है।" "हे रहूगण ! भगवान्के स्वरूपकाज्ञान, तपसे या वैदिक कर्मोसे, अन्नादिके दानसे परोपकारसे, वेदाध्ययनसे, जल, अग्नि और सूर्यादिकी उपासनासे प्राप्त नहीं होता है । परन्तु भगवद्भक्तोंके चरणकी रज शिरपर धारण करनेसे ही-- अर्थात् भक्तोंकी सेवा करनेसे ही प्राप्त होता है । " " हे अर्जुन ! मेरी अनन्य भक्तिसे ही मेरे स्वरूपका सम्पूर्ण ज्ञान, जैसा कि तुझे हुआ है, मनुष्य को हो सकता है । हे परन्तप । भक्तिसे ही मैं तत्त्वतः ज्ञात हो सकता हूं और वे जीव (जिहोंने मेरा स्वरूप तत्त्वतः नानलिया है। मेरे मीतर प्रवेश कर सकते हैं।" इत्यादि वाक्य स्पष्टतया यह सिद्धान्त देशति हैं कि भगव- दीयके अनुमहसे सदोपनीवको भी भगवत्यरूप गम्य हो सकता है, इसलिये, और भगवान्का माहात्म्य मी शास्त्रोंमें वैप्ता ही-अघमोद्धारक आदि-प्रप्तिद्ध है इसलिये भी सदोषजीवोंके लिये दोपनियतिके अर्थ प्रायश्चित्तादि नहीं, पर महापुरुष, श्रीमदाचार्यचरण एवं उनके वंशनके द्वारा शरण ग्रहण करना ही है। उसीसे सब कुछसिद्ध हो जायगा । अर्थात् भक्तोंके धर्मादि चतुर्विध पुरुषार्थरूप भगवान् ही होने के कारण भक्तोंको भगवान्कै आश्रयके अतिरिक्त कुछ कर्तव्य शेप नहीं रहनाता है।
१० कृष्णाश्रयस्तोत्र। -- पर फल सिद्धि कर सकते हैं, क्यों की वेदका तार्य भगवान् या भगवद्भक्त जानते हैं, ऐसा होनेसे भगवदीय होनसे ही वेदका तात्पर्य समज सकते हैं। इस तरह भगवदाश्रयके विना पण्डित भी कुछ सिद्ध नहीं कर सकते । अतः श्रीकृष्ण ही मेरा आश्रय होवे ॥ ४ ॥ सुनते है कि शास्त्रों में मन्नों से फल सिद्धि बताई है, तो फिर आश्रय ही करनेकी क्या आवश्यकता है ? मन्त्रों की शक्ति भी नष्ट होगई है, अतः मन्त्र भी कुछ नहीं कर सकते यह दर्शाते हैं:- अपरिज्ञाननप्टेपु मन्त्रेष्वव्रतयोगिपु। तिरोहितार्थदेवेषु कृष्ण एच गतिर्मम ॥५॥ अन्वया-मन्त्रेषु अपरिज्ञाननटेषु अवतयोगिषु तिरोहितार्थदेवेषु कृष्ण एवं मम ܚ गतिः अस्तु । वेदोक्त तथा नारदपंचरात्रादि आगमोक्त मन्त्र; तात्पर्य, फल तया देवताके स्वरूपज्ञानके अभावसे नष्ट हो गये है। वैदिमन्त्र नियमपूर्वक पढे नही जाते, अतः उनका सामर्थ्य नष्ट हो गया है । वेदाध्ययनके नियम गुरुकुलमें निवासकरना, ब्रह्मचर्यपालनकरना, शूद्रोंके सामने न पढना, अनध्यायके दिनोंमें न पढना इत्यादि है। तान्त्रिक मन्त्रोका तात्पर्यही समझमें नहीं आता है, अतः उसका अर्थ और फल समर्पक देवता उन मन्त्रोंसे तिरोहित हो गई हैं, इस तरेह तांत्रिक मन्त्रोंका भी सामर्थ्य नष्ट हो गया है । तथापि भगवान्का ही आश्रय रखनेवालेको मन्त्रोंसे भी फल प्राप्त होता है । इसके विषयमें "जिसके स्मरणसे और नामका उच्चारण करनेसे कर्म की त्रुटि पूरीकी जाती है, उस अच्युत भगवान् को मैं प्रणाम करता हूं।" इत्यादि वाक्य प्रमाण है। इस तरह मंत्र भी नष्ट सामर्थ्यवाले होनेसे मेरा आश्रय श्रीकृष्ण ही है ।। ५॥ मीमासा आदिसे मंत्रोके अर्थका निर्णय करके कर्मसे ही फल प्राप्त हो सकता है तो फिर आश्रय की क्या आवश्यकता है ? इस प्रकार शङ्का करके कर्म भी फल साधक नहीं है यह जतानेकेलिये नीचेके श्लोकसे आश्रयकी प्रार्थना करते है:- नानावाद्विनऐपु सर्वकर्मव्रतादिषु । पापण्डैकप्रयत्नेषु कृष्ण एव गतिर्मम ।। ६ ।। :-सर्वकर्मव्रतादिषु नानावादविनष्टेषु पापण्डैकप्रयत्नेषु कृष्ण एव मम गतिरस्तु । सोमयाग आदि सत्र कर्म और एकादशी आदि सब व्रत विविध वादोंसे नष्ट हो चुके है। वे वाद इस प्रकार है- (१) सारा प्रपञ्चमिथ्या है, अर्थात् वेदी प्रपञ्चमध्यपाती होनेके कारण मिथ्या हैं, मत जैसे प्रपञ्च व्यावहारीक होने के कारण व्यवहारमें ही प्रमाण है वैसेही वेद और वेद- अन्वयः- या ।' । श्रीमद्भगवद्वदनवैश्वानरावतारांवल्लभाचार्यमहाप्रभुपूज्यपादमीव १२१ विहित कर्मको भी व्यवहारमें ही प्रमाण मानना चाहिये । पास्तविकरीतिसें.कुछमी करनेका या प्राप्तकरनेका नहीं है। . (२) पूर्वमीमांसाकारका मत है कि "परमेष्ठिनो वा एष यज्ञोग्रे' इत्यादि वाक्योंसे नमा आदिका उत्कर्षभी यज्ञोंके द्वारा ही सुना जाता है । और उत्तरोत्तर कर्ममें प्रवृत्त होनेमें पूर्ववासना ही कारण होनेसे कर्म ही करना चाहिये । कर्मसे ही फलसिद्धि होगी। कर्मक अतिरिक्त अन्य कुछ भी उपास्य, फलदाता; किंवा प्रवर्तक नहीं है। इसी तरह मन्त्रकी देवता मी मन्त्रसे पृथक् चेतनरूपा कोई नहीं है, किन्तु मन्त्ररूपा ही है। अर्थात् किसी देवताकी कृपा सम्पादन करके किसी प्रकारके फल की प्राप्ति करने के लिये भी कर्मके अति- रिक्त कुछ भी करनेकी आवश्यकता नहीं है । किन्तु उपर्युक्त प्रकारसे उपास्य, फलदाता, प्रवर्तक सब कुछ कर्म ही है। . . (३) नैयायिकों का मत है कि शास्त्रसे प्रमाण प्रमेय आदि सोलह पदार्थों का यथार्थ ज्ञान प्राप्त करके उसका श्रवण मनन और निदिध्यासन करनेसे आत्माका साक्षात्कार होता है, तब दुःख की आत्यन्तिकी निवृत्ति होकर जाती है, यही फल है । ईश्वरोपासना करनेकी अथवा ईश्वरको ही फलरूप माननेकी कोई आवश्यकता नहीं है। (४.) निरीश्वर वादी सासयोंका मत है कि प्रकृति और उसके.विकारों की उपा- धिका विलय करके पुरुष अब अपनी स्थिति करता है वही फल है, मगवान् फल नहीं है।' इस तरह भिन्न भिन्न प्रकारके बाद प्रचलित है । इनसे विशेषकर कोका नाश किया गया है । अतः उलटा ही अर्थ ग्रहण कर लेनेसे कर्म भी फलोत्पादक नहीं रहे । संञ्चा वैदिक सिद्धान्त देखनेसे.ये सब बाद एक प्रकारके प्रलाप की तरह प्रतीत होते हैं। क्योंकि "यह सब पुरुष ही है। "यह सब ब्रह्मात्मक है" वह भगवान् सबको वशीभूत रखता है सबके उपर शासन करता है, इत्यादि वाक्य यह सव प्रपञ्च ब्रमरूप है, और अत एव सत्य है, इसलिये कर्म भी सफल है यह बताते हैं । अत एव शाङ्कर सिद्धान्त उपपन्न नहीं होता है। . भगवान् उसी से अच्छे कर्म कराता है जिसको उंची गति से लेजाना है और उसीसे निकृष्ट कर्म कराता है जिसको अधोगति से ले जाना है।" " हे अर्जुन मैं ही समप्र जगत् की उत्पत्तिका कारण हूँ" " मला ऐसा कौन देह धारी है जो मुकुन्द भगवान् का भजन न करेगा।" "देव हो, असुर हो, मनुष्य हो यक्ष या गन्धर्व हो, मुकुन्द मगवान् के चरणों की सेवा करके मोक्ष को प्राप्त करते हैं । " भगवान् ही सबके फल दाता हैं, क्योंकि जो सबको नियामक हो वहीं फलदाता सकता है । यह तृप्त हुए देवता यज्ञ करनेवाले को तृप्त करते हैं । " निश्चय ही देवोंने यज्ञ किया था।" इत्यादि प्रमाणों से जैमिनी का मत. मी श्रुति स्मृति और व्यास सूत्रों से विरुद्धसिद्ध - - . कृष्णाश्रयस्तोत्र। भगवान् भक्तोंके धर्मादिरूप किस प्रकार हैं यह निम्नलिखित पद्यसे ज्ञात होता है:- अजामिलादिदोपाणां नाशकोऽनुभवे स्थितः । ज्ञापिताखिलमाहात्म्यः कृष्ण एवं गतिर्मम ॥७॥ अन्वयः-अजामिलादिदोषाणां नाशकः, अनुभवे स्थितः ज्ञापिताखिलमाहात्म्यः कृष्ण एव मम गतिरस्तु ॥ अनामिल, गजेन्द्र, अहल्या आदिको अपने दोपके नाशकरने वाले भगवान् हैं ऐसा अनु- भव हुआथा। अथवा अजामिलके अतिरिक्त अन्यमक्तोंके अनुभवमें आप दोपनाशकरूपसे आये थे। अजामिलका उद्धार परम्परा सम्बन्धसे अपने नामके द्वारा किया था। इसमें अपना सम्पूर्ण माहात्म्य भी दर्शाया है। इन तीन विशेषणोंसे धर्मका कार्य-पापको दूर करके इष्टकी प्राप्तिकराना वह भी भगवान् स्वयं करते हैं । इसलिये दोपके उपस्थित होनेपर भी भक्तोंको दोषनिराकरणार्थ शरणकी भावना ही करनी चाहिये प्रायश्चित्तादि करने की आवश्यकता नहीं है । अथवा पर- म्परा सम्बन्ध से भी आप दोष निवारक हैं । ( साक्षात् सम्बन्ध होजाय तब क्या कहना है ? ) अजामिल का उद्धार आपने अपने नामके साम्यसे किया। भक्तों के अनुभवसे आप अनुभवमें आते हैं, इसी तरह लीलारूप निखिल माहात्म्य भी आप ही दर्शाते हैं; अतः श्रीकृष्ण ही मेरी गति-आश्रय-होवै ॥७॥ सदा अध्ययनकरना चाहिये" जिस जिस यज्ञका अध्ययन करते हैं उन उन मन्त्रों का फल अध्येता को प्राप्त होता है," अग्नि, वायु और सूर्यका सायुज्य प्राप्त होता है " इत्यादि श्रुतिसे कर्म मार्गमें स्थित रह कर भी ब्रह्मयज्ञ अध्ययनके द्वारा अग्नि आदिका सायुज्य प्राप्त कर सकता है, इसी तरह "जो लोग अव्यक्त, अवर्णनीय, सर्वव्यापी अक्षर की उपासना करते हैं वे मेरे अक्षर रूपको प्राप्त होते हैं" इत्यादि वाक्य ज्ञानसे भी अक्षर ब्रह्मकी प्राप्ति बताते हैं, तब फिर श्रीकृष्णका आश्रय करनेमें क्या विशेषता है ? और यदि विशेषता न हो तो उसकी प्रार्थना भी क्यों करें ? ऐसी शङ्का करके उन उन देवताओं और अक्षरके सायुज्यके बीचमें तथा अक्षर और श्रीकृष्णके सायुज्यके बीचमें क्या न्यूनाधिक्य रहा है यह समझानेकेलिये सब स्वरूपोंका निरूपण करके भगवान् भक्तोंके अर्थरूप किस प्रकार है वह बताते हैं :- प्राकृताः सकला देवा गणितानन्दकं बृहत् । पूर्णानन्दो हरिस्तस्मात् कृष्ण एव गतिर्मम ॥८॥ १ यहां पूर्णानन्दशब्दके तीन अर्थोका स्वीकार किया है। (१) पूर्ण आनन्दसे जो होता है (२) पूर्ण आनन्द जिसमें है (३) जिससे पूर्ण आनन्द होता है। प्रथम अर्थकी यह स्वारस्य है कि मर्यादा पुष्टिभक्तिको पूर्णानन्दका दान करने में आप साधन सापेक्ष है, द्वितीय अर्थसे आप पूर्ण आनन्द स्वरूप है, गणितानन्द नहीं। तीसरेका अर्थ पुष्टि भोंके पूर्णनन्दका दान करनेमें आप साधन निरपेक्ष हैं।
श्रीमद्भगवद्वदनवैश्वानराववार श्रीवल्लभाचार्यमहाप्रभुपूज्यपादप्रणीत १५ सकला देवाः प्राकृताः वृहत् गणितानन्दकम् , पूर्णानन्दः हरिः, तत्मात्. कृष्ण एवं मम गतिः अस्तु ॥ . सब देवोंकी उत्पति सत्त्वाहकारसे हुई है अतः ये सब देवगण अपनी उत्पादिका प्रकृति-त्रिगुणामिका माया के अधीन है । अक्षरब्रह्मा गणितानन्द है। अब "उस आनन्दका विचार यहां होता है। इस वाक्यसे प्रारम्भकरके "प्रजापति आदिके आनन्दसे शत गुणित सधिक आनन्द वह अक्षर ब्रह्मका आनन्द है" इस वाक्योक्त सम्पूर्ण प्रपाठकसे अक्षर ब्रह्मके आनन्दकी गणना की गई है। और यदि ब्रह्मादि देवोंका सायुज्य भी प्राप्त हो तो भी क्या हुआ ? वहांसे भी तो जीवको संसारमें आनेका सम्भव रहता ही है इसका कारण यह है कि भगव- दीताके नवमाध्यायका सोलहवाँ लोक "हे कुन्तीपुत्र ! मुझे प्राप्त होनेवाला जीव ही फिरसे इस संसारमें आता नहीं है।" इस वाक्यके अनुसार ब्रमा पर्यन्त सत्रदेवोंके साथ सायुज्य होने पर भी वह सायुज्य नहीं माना जाता, यह सायुज्य गुणातीतके साथ न होनेके कारण और संसारमें फिर उत्पन्न होना पडता है इसलिये तथा अल्पसुख वाला होनेसे 'पुण्यक्षीण होनेसे स्वर्गसे गिरता है। इस वायके अनुसार जैसे स्वर्ग में जानेका नाम मोक्ष नहीं है वैसे ही वह सायुन्य सावधिक होनेसे मोक्षरूप नहीं हो सकता । अब रही ज्ञान मागीय असर ब्रह्मके साथ सायुन्य की बात, सो तो यद्यपि अक्षर ब्रह्ममें लय होना निर्गुण मुक्ति हो सकती है, तथापि उसमें भी परिमित ही सुख होनेके कारण अत्यन्त क्षुधातको अतीत स्वल्पमोजन तृप्त नहीं कर सकता उसी तरह बहुत समयसे आनन्दकी गवेषणा करनेवाले जीवात्माको गणित तानन्द प्राप्त होने पर भी क्या होगा? उसको तो पूर्णानन्द प्राप्त होने पर ही तृप्ति होगी। यहां एक बात. विचार करने योग्य है , वह यह कि गणितानन्दका व्याकरणकी रीतिसे क्या अर्थ है-"गणितानन्द" में "क" प्रत्यय अज्ञातार्थ और वह स्वार्थमें हुआ है। उसका तात्पर्य यह है कि अक्षर ब्रमका आनन्द पुरुषोत्तमके आनन्दकी अपेक्षा अस्पष्ट एवं न्यून है । इससे सिद्ध होता है कि श्रीकृष्ण ही निर्गुण मुक्तिके दाता तथा पूर्णानन्द होने के कारण उनका ही आश्रय स्तणीय है। "वही यह यदुकुलश्रेष्ठ और कुरुकुलश्रेष्ठ नारायण और नर भगवान् हरिक अंशरूपसे पृथ्वीका भार उतारनेकेलिये अवतीर्ण हुए हैं।" "हरिके अंशरूप नर और नारायणसे पृथ्वी अतीव शोभाको प्राप्त होती है।" इत्यादि वाक्योंसे श्रीकृष्णको तो ' अंश- रूप कहते हैं, और आप यहां बताते हैं कि वे पूर्ण हैं यह कैसे सम्भव हो सकता है ? साथ ही भगवान्ने जन्मलिया' इत्यादि वाक्यसै भगवानका जन्म भी सुनानाता है, अर्थात् देवादिकके देह भी पांचभौतिक तथा उत्पत्तिशाली होनेसे भगवान्के श्रीअङ्गको भी पाञ्चभौतिक एवं जन्य १ तैत्तिरीयोपनिषद्को आनन्दवाली में आनन्दकी गणना इस प्रकारको गई है। . . - कृष्णाश्रयस्तोत्र। कहना चाहिये । इसी तरह यह आनन्द रूपत्वका प्रतिपादन करते हैं यहभी किस तरह माना- जाय ? और सुनिये, आनन्द अन्तःकरणका धर्म होनेको कारण भगवान्को आनन्दरूप एवं आनन्द जनक किस तरह कह सकते है ? इससे तात्पर्य यह निकलता है कि आपके कहनेके अनुरूप भगवान्का पूर्णत्व, आनन्दाकारत्व, आनन्दवत्त्व , अथवा आनन्दजनकत्व उपर बताये हुये प्रमाणोंसे सिद्ध नहीं हो सकता ? । अब इस लम्बे चौडे पूर्वपक्षोंका समाधान भी सुन लीनिये जो लोग उपर्युक्त प्रमाण उद्धृत करते हैं उनको उन प्रमाणोंका अर्थ ही ज्ञात नहीं है। भक्तोंकी आतिका नाश कर उनको आनन्दका दान करना यही भगवान्के अवतारका मुख्य प्रयोजन है। यही प्रयोजन यहां सिद्ध करना है इसीलिये भगवान मूल स्वरूपसे अवतीर्ण हुए। पृथ्वीका भार भी दूर करना था इसलिये भपने अंशभूत नर और नारायणभी यदुकुलोत्पन्न नारायण और कुरुकुलोत्पन्न अर्जुनमें आविर्भूत है । अर्थात् यदुकुलश्रेष्ठ एवं कुरुकुलश्रेष्ठमें उन अंशोंने प्रवेश किया है, अत एव वे दोनों यह और कुरूद्धह हुए हैं। जो मूलस्वरूप है। उसमें अंशत्वकी सम्भावना न होनेके कारण यदूद्वहत्व और कुरूद्वहत्व न था । तात्पर्य यह कि तत्तत्कार्योको सम्पादन करनेके हेतु भगवान्को व्यूहों में तत्तदंशों की अवश्यकता रहती है, अतः नर और नारायण भी सङ्कर्षणांश होने के कारण भूमार हरणार्थ अपेक्षितथे । भगवान् भक्तोंकी आर्तिनिवृति करते हुए आनन्द- दानार्थ पूर्णरूपसे तथा भूभारहरणार्थ सङ्कर्षणके अंशरूप नरनारायण को भी अपने में प्रविष्ट- कराकर प्रकट हुए । इससे सिद्ध होता हैं कि उपर्युक्त वाक्यों में उभय अंशो को ही अवतार माना जाय। अन्यथा पूर्णका अवतार न माननेसे "कृष्ण तो स्वयं भगवान् हैं " “वसुदेव के गृहों परपुरुष भगवान् प्रकट होंगे" इत्यादि वाक्यस्तोम विरुद्ध हो जायगा। अतएव तत्त्वार्थदीपके भगवतार्थ प्रकरणमें आप आज्ञा करते हैं कि "पुष्टिकार्य करनेकेलिये नारायणसे अतिरिक्त स्वरूपसे भगवान् आविर्भूत हुए हैं " नर तो स्वयं आवेशधारक है, भूमार हरण के अतिरिक्त कार्य, पूर्ण कृष्णसे ही किया जाता है, अन्यसे नहीं। "परित्राणाय साधूनां" यह वाक्य मर्यादा भक्तोंका रक्षण करनेकेलिये अंशाक्तारका द्योतक है, और भक्तोंकी आर्ति निवृचिपूर्वक आनन्ददानकरण यह पुष्टि है। इस उन प्रकारके मार्गीका स्थापन करनेकेलिये अवतीर्ण भगवान् भी यदि अंशरूपसे ही अवतीर्ण हों और पूर्णरूपसे न हों तो पुष्टिकार्य सिद्ध न होता । अतएव अपने दोनों अंशोसे पृथ्वीको सुशोभित की।" इस प्रकार विचार करनेसे मानना पडेगा कि भगवान् का अवतार श्रीकृष्णरूपसे पूर्णावतार ही है। परन्तु तत्तत्कार्योको सम्पादन करनेकेलिये उनके भीतर उभय अंश प्रविष्ट है। तथा देहके साथ रहनेवाला पांचभौतिकत्व वा जन्यत्व आदि नियम भी प्राकृत देहकेलिये ही समझना चाहिये। अमाकृतके विषय में तो वेदके अनुसार ही अर्थसिद्ध करना पड़ेगा। अर्थात् भगवान् श्री कृष्णका श्रीमङ्ग अप्राकृत होनेसे "आनन्दमात्र करपादमुखोदरादिः” इत्यादि श्रुत्युक्त आनन्द मात्र ही 1 श्रीमनगरदनवैश्वानराववारनीवाभाचार्यमहाप्रभुपूज्यपादप्रणीत १७ जानना उचित.होगा। अन्यथा प्राकृत और अप्राकृत पदार्थों का नियम समान होनानेसे अस्म- दादिके ज्ञान इच्छा आदिके समान ही भगवान्के ज्ञान इच्छा आदिको भी-अनित्यत्व प्राप्त होगा। "भगवान् का कर्तृत्व तो, ज्ञान इच्छा आदिसे भी उपपन्न, हो सकता है, उसी तरह देहका आनन्दमयत्व तथा नित्यत्व प्रत्यक्षसे भी बाधित है, तो फिर आनन्दमय तथा नित्य देहका स्वीकार करने की क्या आवश्यकता है ? यदि इस प्रकार शङ्का की जाय तो वह भी अनुपपन्न होगी। क्योंकि "जहां जहां कर्तृव रहता है वहां वहां देवता भी रहती है। मैप्से घटके प्रति कुम्हारका कर्तृत्व कहने से वह कुम्भकारभी देहधारी है ऐसा ज्ञान अवश्य ही होता है। इसी तरह "जहां जहां देहवता नहीं है वहां वहां कर्तृत्व भी नहीं है।" ऐसा भी नियम ही है। जैसे मोसको प्राप्त किये हुए जीवात्मामें देहवत्ता न होनेसे उसमें कर्तृ- त्व भी नहीं है ! इस अन्वय और व्यतिरेक व्याप्तिके वलसे कर्तृत्वका निर्वाह करनेके लिये ही जैसे नित्यज्ञानका स्वीकार करते हैं वैसे ही आनन्दमय एवं नित्यदेहका भी स्वीकार करना पडेगा। साथ ही प्रभुका जन्म भी शास्त्रोंमें सुनाजाता है। अतः प्रमुके देहका जन्म न माननेका कोई कारण नहीं है, क्योंकि नित्य और सर्वत्र व्याप्त ऐसे अपरिच्छिन्नवपुका परिच्छिन्नरूपसे प्रगट करना यही जन्म कहा जाता है । " आनन्दसे ही यह सब भूतमात्र उत्पन्न होते हैं : "ब्रह्म नित्यस्वरूप, विज्ञानस्वरूप तथा आनन्दरूप है" "वह सैंधवके तुकडेके समान भीतर बहार समग्र ही रसघन है, ऐसा निश्चय यह आत्मा भीतर और पहार समग्र ही प्रज्ञानवन है" " ब्रह्म का आकार आनन्द है" "वह आनन्दमय है, क्योंकि श्रुतिमें आनन्दमयस्वरूपकी बार बार उक्ति है।" "श्रुति ब्रह्मको आनन्दमात्र कहती है" "आप केवल आनन्दानुभव स्वरूप हैं।" " भगवान् के श्रीहस्त, चरणारविन्द, श्रीमुख, आदि अवयव आनन्द मात्र है" "गुण और लीलाके अनुसार आपके पुत्र के अनेक नाम तथा रूप हैं" "तीनों वेद, सत्र उप- निपर्दे, साठ्य, योग तथा इन्द्रादि भक्त 'परब्रह्म' 'भगवान् ' कहकर जिसके माहात्म्यका गान कर रहे हैं, उसको श्री यशोदानीने अपना आत्मन (पुत्र ) माना है" "जिसका भीतर या बहार, पूर्व या पर नहीं है; और जो स्वयं जगत्का पूर्व तथा पर एवं भीतर और बाहर है, वह जगा है" इत्यादि वेद, व्याससूत्र तथा पुराणों में अनेक वाक्य उपलब्ध होते हैं । इसी तरह प्रमाण प्रकरणीय बाललीलाओंसे ज्ञात होता है, कि भगवान् श्रीकृष्ण अंशावतार नहीं पर पूर्णावतार ही है । वैसे ही अस्मदादिक की तरह 'आनन्द' यह कुछ केवल आत्मा का गुण होकर ही भगवान में स्थित नहीं है, किन्तु प्रभुका श्रीअङ्ग, प्राण, इन्द्रिय, अन्तःकरण यह सत्र आनन्दरूप है । साथ ही ज्ञानस्वरूप है । और "ब्रह्म त्रिकालाबाधित तथा विज्ञान स्वरूप है " " ब्रह्माके आयुष्य की समाप्ति होनेपर महाप्रलय उपस्थित होता है जब चौदह- लोकके गहाभूतों में लीन हो जानेपर, महाभूत अपने कारणभूत अहङ्कार में लीन हो आता है,,और अहङ्कार अपने कारणभूत महत्तत्वमें लीन होता है, महत्त्व अपने कारण भूत प्रकृ. " -- ३ १८ कृष्णाश्रयस्तोत्र। " तिमें लीन होता है, अन्तमें प्रभु ही एकाकी शेष संज्ञा से स्थित होते हैं, इत्यादि वाक्यों से आपका " नित्यत्व" " यह प्रमु ही सबको आनन्द प्राप्त कराता है," इसश्रुति से "आनन्द जनकरता है" "इसतरह श्रीकृष्णचन्द्रने गोपालों के साथ आनन्द से आहावित होकर वृंदावनके समीप श्रीगोवर्धन एवं श्री यमुनानी के तट पर पशुओंको चराते हुए रमण किया, " "हे राजन् ! श्री वृंदावन, श्रीगिरिराज और यमुनानी के तटको देखकर श्रीकृष्ण और श्रीदाऊनी को अतीव आनन्द हुआ।" हे गोपीनन ! पुष्पों की माला से विरचित कर्णभूपण से निसके श्रीमुख की शोभा अपूर्व हो रही है ऐसा श्रीकृष्ण आनन्द में आकर जगत्को आनन्द मग्न बनाते हुए बलदाऊके साथ पर्वतके शिखरोंपर ठाठे रहकर बन्सी बनाते हैं तब नाद श्रवण करने वाले सारे संसारको तदाकार वनादेते हैं।" "हे सखि ! यदुपति श्रीकृष्ण बजकी गायोंके दुरन्त तापको दूर करते हुए, सायंकाल होनेके कारण प्रसन्न वदनसे गजराज की चाल चलते हुए, दिवसके अन्तमें जगत्के ताप कोशांत करनेवाले चन्द्र के समान अपने पार पधारते हैं" इत्यादि वाक्योंसे आनन्दवत्व भी उपपन्न होता है, तथापि आनन्दत्वका और देहत्वका विरोध तो वैसाही रहा, अपने अपने अधिकरण-आनन्द या देह-इस दोनोंमेंसे किसी भी एकमें प्रमाणोंसे. अगर आनन्दत्व या देहत्व की-सिद्धि हो सकती हो तो विरोध कहां रहा ? तथापि आनन्दको धर्मी रूप मानकर उसका धर्मत्व किस प्रकार रह सकेगा ऐसा भी नहीं कह सकते । कारण कि वह जैसे सैन्धवके तुकडेके समान भीतर और वहार समय रसवन है वैसे ही अरे यह आत्मा समग्र प्रज्ञानघन है। जो सर्वज्ञ है," इन श्रुतियोंमें भगवान्को ज्ञानरूप और ज्ञानके आधाररूप भी कहे हैं। वैसे ही आनन्द को ही धर्म और धर्मीस्वरूप मानने में किसी प्रकारका विरोध नहीं है। यह सत्र विस्तार पूर्वक हमारे श्रीप्रभुचरणोंने विद्वन्मण्डनमें प्रतिपादन किया है, अतः यहां विस्तार करने की आवश्यकता नहीं है॥ ८॥ विवेक और धैर्य को रक्षा करते रहने पर भी भगवान् भक्तके वशीभूत होते हैं, तो फिर दीनता पूर्वक आश्रय की क्या आवश्यकता है ? इस प्रकार शङ्का करके भगवान् सर्व मनोरथ पूरक हैं, अतः सर्वविध फलकेलिये कामना की पूर्तिरूप प्रभुके आश्रय की प्रार्थना है- विवेकधैर्यभक्त्यादिरहितस्य विशेषतः। पापासक्तस्य दीनस्य कृष्ण एव गतिर्मम ॥९॥ अन्वयः-विवेकधैर्यमत्यादिरहितस्य, विशेषतः पापासक्तस्य, दीनस्य मम गतिः कृष्ण एवं अस्तु । पहिले प्रभुके स्वरूपका विचारकर आश्रयका उपदेश किया, अब जीवके स्वरूपका विचार कर आश्रयःका उपदेश करते हैं । " भगवान् अपनी इच्छा से सब कार्य करते है, अतः प्रार्थना न करनी चाहिये" ऐसा निश्चय होना "विवेक" है, सेवामें प्रतिबन्ध करनेवाले श्रीमद्भगवदनवैश्वानरावचारधीवडभाचार्गमहाभुपूज्यपादप्रणीत - दुःखोंकी निवृत्तिका उपाय न परके आधिमौतिक, आध्यात्मिक और आधिदैविक तीनों प्रकारके दुःखोंको सहन करना "धैर्य है" है और फलरूपा एवं साधनरूपा भक्ति : आदि' शब्दसे पुण्य इन सबसे रहित, किंबहुना इनके साधनोंसे भी रहित-अथवा यदि साधन होंगे तो भी अल्प प्रमाणमें, फल उत्पन्न कर सकें वैसे नहीं, और में दीन हूं अर्थात् किसी प्रकारके साधनोंके सिद्ध करने में भी असमर्थ हूं । साथ ही पाप में आसक्तहूं-मूलसे नहीं, पर मानकर पाप करने वाला होने के कारण फल मिलता हो वह भी न मिले-ऐसी परिस्थिति में जीवका रक्षक कौन हो सकता है ? श्रीकृष्ण ही है । क्योंकि अन्य मागोमें यदि थोडा भी उलटा सीधा कर्म होमानेसे कर्मका फल नष्ट होजाता है और देवता भी नाराज होती है, तब साधकका अनिष्ट होता है, अथवा अल्पफल प्राप्त होता है, परन्तु यहां तो श्रीकृष्ण दयालु हैं, अतः मेरे समान अधमको मी सम्पूर्णफलदान करते हैं, अथवा विवेकादि सिखाकर योग्य बना कर फलदान करते हैं, अत:मुझे तो श्रीकृष्णका ही आश्रय करना चाहिये । यहां श्रीकृष्ण मेरा आश्रय हो" ऐसा कहनेवाले श्रीमदाचार्यचरण हैं और वे अपने को विवेकादिसे रहित आदि विशेषण लगाते हैं, यह अयुक्त है, अत; उन विशेषणों की क्या, संगति है, यह विचारना चाहिये । सुनिये, इस ग्रन्थको आचार्यचरणोंने जीपोंकेलिये रचा है, अतः भैसे वेदमें यजमान की ओरसे भगवान् आज्ञा करते हैं कि हाथ जोडकर में शरण, आया हूं इत्यादि उसी तरह आचार्य परण भी यहां नीवोंकेलिये जीवोंकी ओरसे इस प्रकार कहते हैं । अतः उपर्युक्त विशेषणों की सङ्गति जीवके प्रति ही होनी चाहिये ॥ ९॥ सरप्रकारसे निःसाधन जीवको शरण जानेके पश्चात् फलसिद्धि किस प्रकार होगी? क्योंकि भगवान् तो जीवको उसकी कृतिके अनुसार फलप्रदान करते हैं। साथ ही यह भी सम्भव है कि जो लोग एकमात्र भगवान् ही का आश्रय करते हैं, उनसे प्रमादवश अन्यदेवोंका अपमान भी हो सकता है, और वैता होनेसे अपमानित देवता फल सिद्धिमें बाधा भी उपस्थित कर सकते हैं । क्योंकि श्रेयके मार्गमें अनेक विनोंका होना प्राकृतिक नियम ही है। इस प्रकार शङ्का कर मोक्षके मार्गमें भगवान्के निजस्वरूपका लाभ होनेकेकारण निजस्वरूपका मोक्षरूपल आज्ञा करते हुए तथा जीवोकी ओर से आभयकी प्रार्थना करते हुए उपर्युक्त. शङ्काका समाधान करत है। सर्यसामर्थ्यसहितः सर्वत्रवाखिलार्थकृत् । शरणस्थसमुदारं कृष्णं विज्ञापयाम्यहम् ॥ १० ॥ अन्वयःसर्वसामर्थ्यसहितः सर्वत्र एवं अखिलार्थकृत, अहं शरणत्यसमुद्धारं कृष्णं विज्ञापयामि।
२० कृष्णाश्रयस्तोत्र। . सर्वसामर्थ्यशब्दका अर्थ सम्पूर्ण सामर्थ्य, सबका सामर्थ्य, सबके ऊपरे जिसका सामर्थ्य है, इत्यादि है । अर्थात् भगवान् अपनी इच्छा के अनुसार सब कुछ करते हैं। यदि मर्यादा की रक्षाकरनी हो तो आप स्वयं भगवान् होनेके कारण आपमें ज्ञान, ऐश्वर्य आदि धर्म तो सिद्ध ही हैं, अतः उसका दान कर जीवको फलपदान करते हैं। कमी कमी अक्षर ब्रह्ममें स्थित जीवको भी अपनेमें ले लेते हैं। क्योंकि सर्वत्र उनका ही सामर्थ्य है । "हे अर्जुन जो वस्तुएं विभूतिवाली होती है, शोभायुक्त होती है, बलिष्ठ होती है, वह सब मेरे तेनके अंशसे उत्पन्न हुई है ऐसा नान ।" "में समग्र जगत्का उपादान कारण हूं। मैं ही सत्रका प्रवर्तक हूं।" इत्यादि वाक्यानुसार जिप्समें समग्र सामर्थ्य विद्यमान है , ऐसे सुदर्शनादि आयुध भी आपके विद्यमान हैं । उनसे भी आप भक्तके अनिष्ट का निवारण करत है। "निसने विष्णुकी उपासना की है ऐसे भक्तों की, कदापि निष्फल न होनेवाले सुदर्शनादि आयुधोंसे सकल आपत्तियोंमें से, रक्षा करते हैं।" इस वाक्यसे भी ज्ञात होता है कि भक्तोंकी रक्षा भगवान् अपने आयुधोंसे करते हैं। सामर्थ्य होने पर भी कदाचित् आश्रित की रक्षा न करें, अथवा मर्यादामार्गसे ही फलदान करें, ऐसी स्थितिमें आश्रयकी क्या आवश्यकता है ? सब देशोंमें, वर्णीमें, आश्रमोंमें किंवा कर्मादिमार्गमें निखिल अर्थकी पूर्ति करना ऐसा आपका स्वभाव है। "एक वार भी शरण आकर मैं आपका हूं' ऐसा कहनेवालेको अभयका दान करना यह मेरा व्रत है । फिर शरणमें आनेवाला चाहे जो हो।" "जो भक्त स्त्री, घर, पुत्र, मित्र, प्राण, धन, इसलोक और परलोक की पर्वाह न करके मेरे शरणमें आये हैं, उनका त्याग किस प्रकार कर सकता हूं?" इत्यादि वाक्योंसे एक वार भी यदि शरणमें आनेवाले की आप रक्षा करते हैं, तो फिर शरणमें आकर भक्ति करनेवाले भक्तकी आप रक्षा करें इसमें कहना ही क्याहै ? मर्यादामार्गसे फलदान करनेमें भी अन्यकी अपेक्षाके विना ही-अनन्य होकर-भजन करनेवालेको भगवान् मर्यादाकी अपेक्षाके विना ही फलदान करते हैं । जब कि 'वेदमें कहा है इसलिये भजन करना चाहिये' इसप्रकार वेद मर्यादाकी रक्षा करनेकेलिये भनन करनेवालेको प्रभु मर्यादाके अनुसार फलदान करते हैं । जो मुझे निसप्रकार भजते हैं उनको मै भी उसी प्रकार भजता हूं। भगवद्गीताके इस वाक्यमें आपने अपनी मर्यादाका उपदेश किया है । अतएव किसी प्रकारकी क्षति नहीं है । " लोकमें में भक्तोंके अधीन हूं ऐसा बतानेकेलिए बाललीलाओंके द्वारा बनके आनन्दको बढाया "" उसके पश्चात् श्रीकृष्णने बलभद्रके सहित समान वयस्के व्रजवासियोंके साथ व्रजवनिताओंको आनन्द देनेवाली क्रीडाएं की" "श्रीकृष्णके दर्शनसे उत्पन्न हुए परमानन्दसे जिसके हृदयका ताप मिट गया है ऐसे गोपीजन मनोरथोंके अन्तको प्राप्त कर सके। अर्थात् उनको किसी प्रकारकी कामना न रही।" सबको मोक्षका दान देनेवाले मुकुन्द भगवान् मुक्तिप्रदान करते है, पर भक्ति नहीं ।" इत्यादि श्रीमद्भगवद्वदनवैश्वानरावतारश्रीवल्लभाचार्यमहाप्रभुपूज्यपादप्रणीत २१ वाक्योंसे मृत्यु और यम मी भगवान्का आश्रय रखनेवालेके पास नहीं जा सकते तो अन्यकी क्या बात ! अर्थात् अनन्य आश्रय रखनेवालेके ऊपर सब प्रकारके सामर्थ्यसे युक्त भगवान् विराजमान होनेसे उसका कोई कुछ विगाड नहीं सकता है । तथापि इतना तो विवेक अवश्य अनुसन्धेय है कि सर्वस्वनिवेदनपूर्वक शरण गमन करनेवालेका उद्धार आप अनायास ही करते हैं ॥ १० ॥ "जीवमात्रके दशप्राण और ग्यारहवां आमा रहता है," इस श्रुतिवाक्यसे निस तरह दश प्राणोंसे सब सिद्ध होता है, उसी तरह यह कृष्णाश्रय स्तोत्र ही भगवदीयोंका सब कार्य सिद्ध कर देता है। यह ज्ञान करानेके लिये श्रीमहाप्रमुजीने दशश्लोकोंसे कृष्णाश्रय स्तोत्रकी रच- नाकी। जैसे जात्मा क्षयरहित है वैसे ही इस स्तोत्रके पाठ करनेसे अक्षय फल प्राप्त होता है, यह बतानेकेलिए आत्मारूप ग्यारहवे श्लोकमें कृष्णाश्रयस्तोत्रके पाठका फल निरूपण करते हैं:- कृष्णाश्रयमिदं स्तोत्रं यः पठेत् कृष्णसन्निधौ। तस्याश्रयो भवेत्कृष्ण इति श्रीवल्लभोज्रवीत् ॥११॥ अन्वयः यः इदं कृष्णाश्रयं स्तोत्रं कृष्णसन्निधौ पठेत् , तस्य आश्रयः कृष्णः भवेत् इति श्रीवल्लभः अब्रवीत् । सब पदामिसे निष्ठाका त्याग करके जिससे कृष्णकी सेवा हो सके अथवा जिससे कृष्णका आश्रय सिद्ध हो, या जिससे कृष्ण आश्रय बने वह कृष्णाश्रय है। यही कृष्णाश्रय । कारण कि कृष्णाश्रय शब्दका यथार्थ अर्थ इसीमें समाविष्ट है । अतः इस कृष्णाश्रयका पाठ श्रीकृष्णके समीप हीनेसे ही कृष्णका आश्रय सिद्ध होता है अन्यथा नहीं । पाठमानसे कृष्णका आश्रय कैसे सिद्ध होगा ऐसी शङ्का भी न कननी चाहिये । कारण कि यह बात कहने वाला श्रीवलप है। यहां आचार्यनी अपना नाम निर्देश करके बताते हैं, कि मैं भग- वत्स्वरूपका ज्ञाता हूं, अतः मेरा वाक्य सत्य है इसमें अप्रामाण्यशङ्का न करनी चाहिये। आचार्यजीको सर्वोद्धारकैलिये भूतलपर अवतार लेना पड़ा है, जिसको सर्वोद्धारकेलिये अवतार लेनेकी भगवानकी आज्ञा है, वही भगवान्के यथार्थ स्वरूपको पहचान सकता है। अतः उनके वचनोंपर विश्वास रखना चाहिये । इसीसे भगवत्कृपा होकर सब सिद्ध होगा ॥११॥ श्रीमद्विलनाथपादकमले संवन्ध भत्या मुदा कृष्णैकामधियोष तातचरणान् तादृक् पितृव्यानपि । श्रीकृष्णाश्रयसनके स्तुतिकरे कल्याण रायाभिषः श्रीगोविन्दसुतः प्रकाशमकरोयान्मुदे सद्धियाम् । इति श्रीविठ्ठलवाथ चरणकतान श्रीकल्याणराय विरचित कृष्णाश्रयस्तोत्रप्रकाशः सम्पूर्णः । है થોડા વખતમાં છપાઈ બહાર પડનારાં પુસ્તક. નિત્યલીલાસ્થી સુદામાપુરીવાદીભમ્યાનનગોસ્વામીશ્રીનશાચાર્ય સદ્ધહીત- વેષ્ણવજિનિક. (મોટું, ગુજરાતી.) અર્થાત્ ઉપનયન સંસ્કાર પામેલા બ્રાહ્મણ, ક્ષત્રિય અને વૈશ્યનું નિત્ય કર્તવ્ય કર્મ.' દરેકને સહેલું પડે તે ખાતર આ આદિકમાં સમ્માદિ નિત્ય કર્મ કરવાની સંપૂર્ણ સમજણ ગુજરાતી ભાષામાં આપવાની સાથે મિત્રે પણ ગુજરાતી હરકમાં છાપવામાં આવ્યા છે, વૈષ્ણવજેને-બ્રાહ્મણ, ક્ષત્રિય, વૈષ્ણવી પદત્યનુસાર સમ્પાદિનિત્યકર્માનુદાન સમજવ- નારું માત્ર આ એક જ આદિક છે. ગુજરાતી ન્યુસ” પ્રેસની સફાઈદાર છપાઇ તે મુદ્રક મશરૂ છે એટલે તે બાબત કશું વકતવ્ય હોય જ નહિ, પખવાડીયામાં છપાઈને બહાર પડશે of-દિકવિ, (હિન્દી) हिन्दी भाषाभाषी सजनोंकी सास मुविधा के लिए अपर यतलाये गये आहिकका ही यह ठीक-ज्योंका त्यों हिन्दीमें अनुवाद है. एक समाहमें छपकर तैयार हो जायगा. वैष्णव संक्षिप्ताहिक. આ આહ્નિકમ દત્તબાવન વિધિ, તિલકવિધિ, મુદાવિધિ, ભગવસેવા, જપવિધિ, નિત્ય પાઠ કરવાને ક્રમ, અન્યાશ્રય વગેરે અનેક ખાસ બાબતો ઉપર સંક્ષેપમાં સારો પ્રકાશ પાડ- વામાં આવ્યું છે. વૈષ્ણએ ટુંકામાં ટુંકુ કેટલું નિત્યકર્મ કરવું આવસ્મક છે તે સમજવા આ આહ્નિક અવશ્ય ખરીદવું જોઇએ. उपदेशमीमांसा. તમારે તમારા શુદ્ધ સનાતન પુષ્ટિમાર્ગો ઉપર મુખમસ્તીતિ વકવ્યમના ન્યાયે શા- કરનારા આજકાલના વિતરડાવાદીઓને શાસ્ત્રના પ્રમાણે સાથે મુખડ જવાબ આપવો છે ? તે “મીમ સાવર ગ્રાહક, બને. તેમાં શું ? “ગાયત્રી મન્નનો ઉપદેશ લીધા પછી બીજો ઉપદેશ લેવાય કે નહિ? “અન્ય દેવના મ છેડીને શ્રીકૃષ્ણના માને ઉપદેશ લેવામાં વિશેષતા શી? “ મપદેશ કોઈ પણ ઉત્તમ બ્રાહ્મણ પાસેથી ન લેતાં શુદ્ધાત વૈષ્ણવ વેલ્લનાડીયા બ્રાહ્મણ શ્રીવલભકુલના આચાર્યો પાસેથી જ લેવાનું કારણ શું? બ્રહ્મસબધે જ લેવાનું તાત્પર્ય શું? દોષની નિવૃત્તિ તે પ્રાયશ્ચિતાદિકથી પણ શક્ય છે તો પછી બ્રહ્મસમ્બન્ધ જ લેવામાં વિશેષતા શી? “બ્રહ્મસમ્બન્ધમપદેશ લીધા પછી થતા દેની નિવૃત્તિ શી રીતે કરવી ? સ્ત્રીને તેનો પતિ જ ગુરૂ છે તો પછી મન્નાપદેશ લઈ બીજે ગુરૂ કરવાની આવશ્યકતા શી ? પતિ તથા સ્ત્રી એક ગુરૂ પાસેથી માપદેશ લઈ શકે કે કેમ? નાના બાળકને માપદેશ આપવાથી શું ફળ “રાશી તથા બસ્સો બાવન વૈષ્ણવની વાતમાં તમામને શ્રી ઠારજી- સાનુભાવ હતા તે આજના સમયમાં કેમ નથી ? આવા અનેક જટિલ પ્રશ્નોના જવાબ સચોટ રીતે તથા યુક્તિપૂર્વક આ ગ્રન્થમાં આપવામાં આવ્યા છે. દરેક વૈષ્ણવે આ પુસ્તક અવશ્ય વાંચવું જોઈએ. પંદર દિવસમાં બહાર પડાશે. મળવાનું ઠેકાણું – બુકસેલર, ગિરિધરલાલ, જિ. શાહ, C/o શ્રી જીવનશાચાર્યપુષ્ટિસિદ્ધાન્ત પુસ્તક ભંડાર, લાલબાવામન્દિર, મુંબઈ નં. ૨. નેટ–ઉપલા એડ્રેસને તમારી બુકમાં નોંધી લે; કારણ કે વૈષ્ણવ સંપ્રદાયનાં તમામ જાતનાં પુસ્તક તથા ચિત્રોને અચૂક રીતે તથા ટાઇમસર સપ્લાઈ કરનાર આ એક જ ઠેકાણું છે.
धीरष्णाय नमः। किश्चित्त्रास्ताविकम् । कृष्णाष्टम्यां कृष्णाश्रयस्तोत्रं पहिवरणसमेत प्रकाशयितुं तत्मणेदनिःसीमानु- ग्रहेण पारयामीति महत्सौभाग्यं मे । अतीयाय फिल सार्थोदो मुद्रणयन्त्रमारोपि- तस्यास्प, किन्तु गोस्वामिश्रीरणछोटलालजीमहाराजैः साकं श्रीपुरुषोत्तमक्षेत्र-काशी- क्षेत्र-परणापडेलप्रभृतिष्यनेकस्थलेषु यात्रानिमित्तं गतं मयेति, तेषां कुमारश्रीवल्लभलाल- जीमहोदयानां वाराणसीयप्रथमापरीक्षादिसापि तदन्तर एव जातेत्ति तत्राप्युद्युक्तं, भूयोपि वाराणसी मति मस्थितं तैः सह परीक्षादापनार्थम् , अन्यैश्याप्येवंविधहेतुभिरेकर स्थिति- मलभमानेन प्रकटयितमेतत्स्तोत्रपतिकान्तायेला मया । ततश्च महमिरिवार पर्यन्वयोजिपि हितैपिभिः किमेवत् कृत एतत् कथमेतदित्यादि । किं पुनः प्रतिपद्यतां प्रतिवचनं, यत्रैकस्या व्यक्तेरधीनं कार्यवाहुल्यमय च स्थितेरनैयत्यं तत्र भवत्येवंविधो विलम्बः। अस्तु । अन्योयं श्रीपदाचार्यचरणमणीतपोटशमकरणमन्येषु नवर्मी सापामावति । विपयश्चास्य नाम्नैव सप्टो यत् कृष्णाश्रयणमन्तरा स्वभावदुष्टजीवानां निस्तारो नास्त्येव कलौ । 'मामेव ये प्रपद्यन्ते' 'सर्वधर्मान्परित्यज्य' 'अपि चेत्सुदुराचारः' 'मुमुक्षु शर- णामहं प्रपये' इत्यादिवाक्यपरसहरिदमेव दृढीक्रियते । 'फलिदावानलेनाथ साधनं भस्मतां गत'मित्यायुक्तिभिः प्रमाणवलं ममेयवलमन्तराऽकिश्चित्करमेवैत्यपि निर्विवादम् , अत एव 'कृष्णश्वेत्सेव्यते भक्त्या कलिस्तस्य फलाय हीति दैवोद्धारार्घटहीतावतारै- निबन्ध आक्षतम् । यद्यपि भक्त्यादिमाग जनोदारार्थ निवन्यादौ सपरिकरं निरू. पितास्तथापि प्रत्यहं कलेराधिक्येन तैपां दुःसाध्यत्वमाकलय्य आश्रयस्यैव च सर्वदि- तावहतं पालोच्य स्तोत्रमिदं व्यरीरचन्नाचार्याः । आश्रयभवने तु महदनुग्रहस्यैव हेतुता नान्यस्य । अन्यैव दशा प्रणीलोय ग्रन्थ इति प्रबन्धस्यास्यावलोकनेनावतात मरिष्यति श्रीमदाचार्यपादाम्भोरुहमकरन्दलिदो देवसर्गस्येत्पलं पल्लतितेन । ग्रन्यस्यास्य परिष्करणे पुस्तकमदानेन मर्शसनीयमुषकारमाचरितक्तां मे दीक्षा- गुरूणां गोस्वामिश्रीमदनिरुद्धलालजीमहाराजानां काम्यवनस्थगोस्वामिश्रीवल्लभलाल- जीमहाराजानां मुगृहीतं नामधेयं मत्पदं स्मरामि । तृतीयपीठाधीश्वरश्रीब्रजभूपणजी- नामध्यापकाः पं. कण्ठमणिशर्माणः, पुरुषोत्तमलालजिमन्दिरस्थदापोदरशास्त्रिणा, सद्गतभगवदीयाः 'मूलचन्द्र तुलसीदास तैलीपाला' एतेपामपि सर्वेषां पुस्तकमदानतो मदुपरि महत्त्युपतिः । गोस्वामिश्रीरणछोडलालजीमहाराजा अपि सांप्रदायिक ॥श्रीकृष्णाय नमः॥ मेरे चार शब्द -- पुष्टिमार्गीय हिन्दी भाषामापी वैष्णवों की समस्या गुर्जरमापाभापियों की अपेक्षा कम नहीं है, तथापि हिन्दी भाषामें साम्प्रदायिक ग्रन्थोंको अभाव पूर्ववत् विद्यमान ही है । इस महती त्रुटिको दूर करनेके अभिप्राय से "वैष्णव वैभव" मासिक पत्रका आविर्भाव हुआया । दुर्भाग्यसे वह आन तिरोहित दशाका अनुभव कर रहा है. इसके अनन्तर साम्प्रदायिक मौलिक ग्रन्थोंका अनुवाद करना प्रारम्भ किया, आज इन पड्डियोंका लेखक हिन्दी भाषामें साम्प्रदायिक ग्रन्थोंका अनुवाद कर रहा है, इस समय १०० फार्मसे अधिक होसके इतना साहित्य मौजूद है । पोडशग्रन्थों में " विवेक धैर्याश्रय" का अनुयाद गो० श्रीवनरत्न लालनी महारान की सहायता से छा चुका है। “बालबोध' का अनुवाद भी आपही छपायेंगे ऐसी आशा है । यह "कृष्णाश्रय स्तोत्र" का अनुवाद गो० श्रीरणछोहलालनी महारानकी कृपासे छपा है। ब्रह्मवाद सङ्ग्रह चौखम्बासिरिज के अध्यक्ष सेठ जयकृष्णदासजीने छपवाया है। यदि हिन्दी भाषाभांपी वैष्णव जनता इन ग्रन्थोंका उचित आदर करेगी तो शुद्धाद्वैत मार्तण्ड, प्रमेयरत्नार्णव, प्रस्थानरत्नाकर, निबन्ध और काशीस्य गो० श्रीगिरिधरनी महाराजकृत विवरणके अनुसार अणुभाष्यका अनुवाद आदि ग्रन्थ.शीघ्रही छपसकेंगे। यह कृष्णाश्रय ग्रन्थ श्रीमहाप्रभुनीके समयकी देशकालकी परिस्थितिका भलीप्रकार परिचय कराता है, जिस समय देश म्लेच्छाकान्त हो चुकाथा, उस समय पुष्टिमार्गका प्रचार हुआ है। ऐसे भयङ्कर समयमें धर्मका प्रचार करना कितना कठिनथा यह विचारशील पाठकों से छिपी हुई बात नहीं है । आज पुष्टिमार्गपर जो लोग आक्षेप करते हैं, उनको इस परम पुनीत सम्प्रादय का साहित्य देखना चाहिये । भाविक वैष्णवोंसे प्रार्थना है कि आप यदि अपने बालकों को अन्य धर्मोसे पराभूत देखना नहीं चाहते हैं, तो आप साम्प्रदायिक ग्रन्थोंका सरल हिन्दी भाषामें अनुवाद कराके छपवाईये, और हिन्दी में छपने वाले ग्रन्थों को सहायता प्रदान कीजिये। भवदीय ३ रा भोईवाडा, भुलेश्वर, वम्बई, रथयात्रा १९८५ हरिशङ्कर शास्त्री वेदान्त विशारद , शीघ ही छपकर प्रकाशित होनेवाली पुस्तकें . नित्यलीलास्थ गोस्वामीजीवनेशाचार्यजी महाराज (पोरवन्दर) सगृहीत .' वैष्णाव दिजाहिक अर्थात् उपनीत ब्राहाण, क्षत्रिय और वैश्योंका नित्यकर्म इस आह्निकमें सन्ध्यादि नित्यकर्म करनेका पूरा परिचय कराया गया है। साथ ही वर्णविभागके अनुसार पद्धति भी समनानेवाला यह एक मात्र ग्रन्थ वैष्णवोंके लिये उपयोगी है । उपदेश मीमांसा यदि आप शुद्धपुष्टि मार्गीय शरण मन्त्र और ब्रमसम्बन्धका रहस्य जानना चाहते है, विधर्मी वितण्डवादियोंका मुखमर्दन करना चाहते हैं । गायत्री मन्त्रका उपदेश होनेके पश्चात् अन्य मन्त्रों का उपदेश हो सकता है या नहीं ? अन्य देवोंकी उपासना छोड- कर श्रीकृष्ण ही की उपासना क्यों करनी चाहिये इत्यादि प्रश्नोंका सरल हिन्दी भाषामें उत्तर जानना चाहते हैं तो इस अन्यको अवश्य पढिये । श्रीमद्गोपाल पूर्वतापिन्युपनिषद सम्प्रति विराजमान गोस्वामिवालकोमें सर्वप्रथमग्रन्थकार विद्वान गोस्वामी श्रीमदनिरुद्धा- चार्यनी महारानने इस ग्रन्यपर ब्रह्मामृत भाष्य और पोयूपलहरी टीकाकी रचना की है। इसका हिन्दीअनुवाद भी किया गया है। इस ग्रन्थमें श्रीकृष्ण ही परात्पर पुरुषोचम हैं, शिववहादि देवता भी उनकी उपासना करते हैं, कर्म ज्ञानकी अपेक्षा भक्ति ही सर्वश्रेष्ठ है इत्यादि विषयोपर पूर्ण प्रकाश अलया है। अन्य कोटिका है। सप प्रकारकी पुस्तके मिलनेका एकमात्र ठिकाना. बुकसेलर गिरधरलाल, ज. शाह.. श्रीमीवनेशाचार्य पुष्टिसिद्धान्त पुस्तक भण्डार श्रीलालयावाका मन्दिर, मुलेश्वर, बम्बई पो.नं.२.
प्रास्ताविकम् साहित्योद्धृतिविपये स्वपितृपादाननुकुर्वन्तीति प्रत्यक्षमेव सर्वेपाम् । एतेषां समाश्रयेणा- के साम्मदायिकाः प्रबन्धा वहिरवतेरुः । पोडशग्रन्थानां सेवाफलादि ग्रन्याष्टकं नवमै कृष्णाश्रयस्तोत्रं चैतेपामेव प्रवन्धवलेन - लब्धावतारं श्रीपदाचार्यवासुधापिपासूनां भनोरथारकं भवतीति महान् प्रमोदावसरः । अपि चैताहक्सत्मवृत्तौ योग्यविधित्सया परमकरुणया दशवर्षाणि मे सर्वविघसाहाय्यं दत्तवद्भधो गोस्वामिश्रीगोकुलनाथज- देशिकवरेभ्यः साञ्जलि कार्तइयमावेदयामि । अस्मिन् सशोधने दृष्टिदोपतो मुद्राक्षरयोजकपमादतो वा 'जातानि स्खलितानि संशोध्य तास्ता अशुद्धीर्वोधयित्वानुगृह्णन्तु. दयालवो विद्वांसो मामिति प्रार्थयति- विद्वज्जनकृपाभिलापि- कृष्णाष्टमी हरिकृष्णः शास्त्री, संवत् १९८३ 'शुद्धाद्वैतविशारदः।
श्रीकृष्णाय नमः। श्रीगोपीजनवल्लभाय नमः। श्रीमदाचार्यचरणकमलेभ्यो नमः । कृष्णाश्रयस्तोत्रम् । श्रीमद्रधुनाथचरणविरचितविवरणविभूपितम् । य आविरासीद्धोरेस्मिन् फलो श्रीवल्लंमाभिधः । निजदास्यं स नो देयादव्यादपि दुराश्रयात् ।। १ ।। सर्वमार्गेषु नष्टेषु कलौ च खलर्मिणि । पापण्डप्रचुरे लोके कृष्ण एव गतिमम ॥ १ ॥ सर्वमार्गेप्यित्ति । सर्वे कर्मज्ञानोपासनादपस्ते मृग्यन्ते तत्तत्फलार्थिभिरिति मार्गा इसमाप्त्युपायास्तेषु सर्वेषु नष्टेपु तिरोहितेषु सत्सु । अनेन जीवानां सर्वथैवा- गतिकत्वं सूचितम् । एवंविधेऽप्यशक्ये मम सर्वस्वनिवेदिनी दासस्य कृष्ण एव गतिः शरणं, प्राप्तव्योर्थ आश्रयणं च । अत्रास्त्वितिपदं व्याख्यानेऽध्याहार्यम् । एक्कारेणान्यनिषेधः सूचितः । किं च, कालकृतोपद्रवेणाप्यगतिकत्वं कलौ चेत्यने. नाहुः कलाविति । वहिधर्मरूपाभासोन्तदोपयस्तो धर्मः खलो भवति, तादृशो धर्मों यस्मिन्कलौ । खलानां दांभिकहैतुकपापण्डिनामेव धर्मो यस्मिन्निति वा, कवि स्वर- धर्मिणी'त्यपि पाठः श्रूयते, तत्रापि खरो रौद्रो धर्मो यस्येति, अत्रैवं व्युत्पत्तिः- खरश्वासौ धर्मवेतिकर्मधारये कृते पश्चान्मत्वीय 'इनि'प्रत्ययः, नो चैबाबीही 'क'- प्रत्ययः प्रसज्येत । चकारात्कर्मज्ञानाद्यतिरोधानेषु कल्पतिरिक्तकालेप्वपि । किन, पापण्डो वेदवायो धर्मः, सप्रचुरः अधिको यस्मिन् , एवंविषे लोके व्यवहार्यजनतायां सत्या, सर्वप्रकारेण कृष्णाश्रयणं विना निस्तारो नास्त्येवेति सर्वस्यापि फलिताथों ज्ञेयः । अत एव नारदीयेप्युक्तं, 'हरेनवि नामेव नामैव मम जीवनम् । कलौ नास्त्येव नास्त्येव नास्त्येव गतिरन्यथेति । अत्र सर्वत्रापि कचिन्निमितप्तप्तमी, कचि दहाणां कर्तृत्व' इत्यनेन सप्तमी ज्ञेया ॥ १॥ धोत्पचौ बाह्याभ्यन्तरभेदेन घाघशुद्भावयन्तो निष्पत्यूई श्रीकृष्णाश्रयणं विदधति । १ भानयो वेति पाठः। " १ कृष्णाश्रयस्तोत्रम् । म्लेच्छाकान्तेपु देशेषु पापैकनिलयेषु च । सत्पीडाव्यग्रलोकेषु कृष्ण एवं गतिर्मम ।। २॥ म्लेच्छाक्रान्तेष्वित्ति । धर्मार्थिभिर्वासयोग्येषु देशेषु कुरुक्षेत्रगङ्गातटादिषु म्लेच्छैराकान्तेषु व्याप्लेषु सत्सु, अनोभयथा म्लेच्छा ज्ञेया जात्या कर्मणा च । नन्वेव- विधेप्यपि देशेषु पुण्यात्मानो भविष्यन्त्येव तैः सह धर्माद्याचरणं कुतो नेत्यत आहुः- पापैकेति । कलिना ग्रस्तत्वात्पापस्यैवैकस्य निलयाः स्थानभूता जाताः । चकारादनेवं- विधेप्वपि । एतेन धर्मादिपु वाह्यसाधननिवृत्तिरुक्ता । ताभ्यन्तरसाधनं स्मरणादि कुत्तो- नेत्यत आहुः--सत्पीडेति । सतां सत्पुरुपाणां धार्मिकाणां भगवत्परायणानामपि याह- शी पीडा नोचिता तादृश्या अपि दर्शनादन्येषां विश्वासशैथिल्येन व्यंग्रेपु विक्षिप्तचित्तेषु फर्तव्यतामृढेषु लोकेषु सत्सु । कृष्ण एवं गतिर्ममेति पूर्ववद्याख्येयम् ॥ २॥ - ननु गङ्गादिपूर्वोक्तपुण्यदेशानां वस्तुसामर्थेन साधनत्वं कुतो नेत्याशक्य वस्तु- सामर्थ्यतिरोधानान्न तथात्वमिति समाहितिपूर्वकं कृष्णाश्रयमाहुः- गङ्गादितीर्थवर्येषु दुष्टैरवाश्तेष्विह । तिरोहिताधिदैवेषु कृष्ण एव गतिर्मम ॥ ३ ॥ गढ़वादीति । आधिभौतिकाध्यात्मिकाधिदैविकादिभेदेन त्रैविध्यं तीर्थादावप्यस्ति, बत्र 'पुरुपश्चाधिदैवत'मितिवचनाद्भगवद्पमेव तीर्यादौ सामर्थ्यरूपेणास्तीति मन्तव्यं, तच भगवदिच्छयेदानी बहुधा तिरोहित, न तु सर्वथा, अत एवं विधेपु'गङ्गादितीर्थवयंपु तीर्थमुख्येपु म्लेच्छादिभिः केवलदुष्टैराटतेषु सत्सु, इह अस्मिन् भूलोके काले वा कृष्ण एव गतिर्ममेति पूर्ववत् ॥३॥ अहङ्कारविमूढेषु सत्सु पापानुवर्तिषु । लाभपूजार्थयत्नेषु कृष्ण एव गतिर्मम ॥ ४ ॥ अहङ्कारेति । किन्न, वयं सर्वज्ञाः के वास्मत्तोधिकवेत्तारो यान् वयं पृच्छाम इत्येवंविधाहकारेण विशेपतो मूढेपु आत्मोद्धारोपायज्ञानशून्ये', 'लोकप्रितिपदं पूर्व- स्माद्ध्याहार्यम् । किञ्च, सत्सु महापुरुषेषु पापं दुष्टाचरणमपकार इति यावत् , तमनुवर्त यन्यनुतिष्ठन्ति ये ते पापानुवर्तिनः, एवंविधेषु सत्सु, अथवा जीविकाद्यर्थ सत्सु सत्पुरुषेषु पापानुवति निपिद्धाचरणपरेपु । किंविशिष्टेषु तेपु लाभपूजेति । लाभो द्रव्यादेः पूजा १ राप्रयागेम्पिति पाठः । २ साधरयमिति पाटः । ३ उच्यते इति पाटः। . , श्रीमद्रनायचरणविरचितविवरणविभूपितम् । सोनतिपूर्वकं लोककृतसन्माननं, अर्थः स्वपयोजनं, एतन्नितयसिद्धयर्थमेव यान उद्यमो येषां तेषु सत्सु, कृष्ण एव गतिर्मम ।। ४ ॥ अपरिज्ञाननष्टेषु मन्त्रेवव्रतयोगिषु । तिरोहितार्थदेवेषु कृष्ण एवं गतिर्मम ।। ५॥ . अपरिज्ञानेति । वैद्धमनगुमानुपसत्यभायेन विद्योपशमात्याठार्थविनियोगादी- नामपरिज्ञानेन मन्त्रेषु नष्टेषु तिराहितपु सत्सु, पुनः किविशिष्टेषु अवतयोगिषु अग्रतेषु प्रतभ्रषु योगः स्थितिरस्ति एपामेतेनैविधेष्वतिरोहिवानामप्पकिञ्चित्करत्व मेव । यहा, स्वस्वाश्रमस्या योगिन उच्यन्ते तेवप्पवतेषु सत्सु । पुनः किविशिष्षु तिरोहितार्थदेवेषु । तिरोहितः गुप्तः अर्थो मन्त्रायः, देवोऽधिष्ठात्री देवता, एतद्वयं येषां मन्त्राणां न ज्ञायते तैः कियानः सेत्स्यतीति भावः ॥ ५॥ नानावादविनष्टेषु सर्वकर्मव्रतादिषु । पापण्डैकप्रयत्लेषु कृष्ण एवं गतिर्मम ॥ ६ ॥ मानावादेति । कुताकिबौद्धाद्यागमोक्ता ये वादा वाग्जालरूपाः 'यावजीये. सुखं जीवेदित्येवंरूपाः, तैः कृत्य वैदिकागमायुक्तसर्वकर्मत्रवादिषु विनटेप विशेषतो नापु नास्तिक्येन पराङ्मुखेषु सत्सु । किच, पापण्डेषु चैदादिविरुवाप्येव एकः असाधारणः प्रयत्नः पुनः पुनरुघमो येषां, एवंविधेषु लोकेषु सत्सु कृष्ण एवेति, पूर्ववत् ॥ ६ ॥ विश्वासार्थ सदृष्टान्तमाश्रयणमा अजामिलादिदोषाणां नाशकोऽनुभवे स्थितः । ज्ञापिताखिलमाहात्म्यः कृष्ण एवं गतिर्मम ।। ७ ।। अजामिलादिदोषाणामिति । भद्रीभ पन्धोरजामिलनान्नो दोपाणां महा- पातकानां नाममात्रेण नाशकोस्माकपनुपर्व स्थितः, शान्दानुभवे अन्तःसाक्षिमत्यो वा स्थितो विपपीकृत इति यावत् । 'आदि पदादजेन्द्रप्रभृतयः, यमलोकस्थिता नारकि- गश्च । इदं नृसिंहपुराणादौ मसिद्धम् । ज्ञापितं देवजीयेप्यखिलं समग्रं निजमाहात्म्य येन, एवंविधः कृष्ण एवेति पूर्ववत् ॥ ७ ॥ १ आचार्योपसत्यमामेति पादः। ।
-- श्रीकृष्णाश्रयस्तोत्रम् । प्राकृताः सकला देवा गणितानन्दकं बृहत् । पूर्णानन्दो हरिस्तस्मात्कृष्ण एव गतिर्मम् ॥ ८॥ प्राकृता इति। सकला ब्रह्मादयो ये देवास्ते प्राकृताः, प्रकृतिर्माया तन्निबन्ध- नोत्पत्तिस्थितिविलया, असस्तेपामाश्रयणं न कालादिभयनिवर्तकं प्रत्युत भयजनकमेव । अत एवोक्तं दशमे 'मयों मृत्युव्यालभीतः पलायनित्यादौ । तर्हि बृहदक्षरं सपास्त्विनि चेत्तदपि नेत्याह-गणितानन्दकमिति । ब्रह्मापेक्षया शतगुणितानन्दत्वेनापरिमिता नन्दवाभावात्पुरुषोत्तमापेक्षयाल्पत्वाद्धरेः सकलदुःखहारकस्य श्रीकृष्णस्य पूर्णानन्दत्वा- दखण्डितानन्दत्वात्सबरूपायैः सर्वात्मना, कृष्ण एवेति पूर्ववत् ॥ ८॥ विवेकधैर्यभक्त्यादिरहितस्य विशेषतः । पापासक्तस्य दीनस्य कृष्ण एवं गतिर्मम ॥ ९ ॥ विवेकेति । 'विवेकस्तु हरिः सबै निजेच्छातः करिष्यतीत्येवंरूपः, त्रिविध- दुःखसहनं धैर्यपदार्थः । भक्तिपदेन क्रमायातमाश्रयणमुच्यते । आदिपदेन तत्सायनान्यु- च्यन्ते । एतेषां विविच्य निरूपणं तु 'विवेकधैर्याश्रय'व्याख्याने कृतमस्ति तत,एवाव- गन्तव्यम् । विवेकादिभगवद्धर्मरहितस्य मम कृष्ण एव गतिः। किञ्च, न केवलमेत- द्राहित्यमपि तु विशेपतोऽतिशयेन पापासक्तस्य महापातकाचरणरतस्यापि । पापवर्ज- नेऽसमर्थत्वादम्लान्या दीनस्य । भगवताप्ये तादृशानां स्वाश्रयेणैव सिद्धिरुका 'मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येपि स्युः पापयोनय इति, 'अपि चेत्सुदुराचार' इत्यादौ ॥९॥ सर्वस्वनिवेदिनांसाधनं फलंच स्वमभुरेव संपादयिष्यतीति प्रार्थनामपि तथैवाहु:- सर्वसामर्थ्यसहितः सर्वत्रैवाखिलार्थकृत् । शरणस्थसमुद्धारं कृष्ण विज्ञापयाम्यहम् ॥ १० ॥ सर्वसामध्यति । फर्तुमकर्तुमन्ययाकर्तुं समर्थत्वात्सर्वसामर्थ्यसहितस्त्वं मम प्रभुः। किविशिष्टः सर्वत्रैव यत्र काप्यखिलान्सर्वान्चाञ्छितानान्करोतीत्यखिटार्थकृत् यतस्त्वमेवंविधः स्वामी अतः कारणात् कृष्ण हे परब्रह्म शरणस्थस्य शरणागतस्य सम्पगुद्धारं विज्ञापयामि अहं तत्पुरः स्थितः शरणार्थी॥ १०॥ एतत्पाउमात्रपरस्पाप्येतदुक्तफलमाहु:- . । १ अन्यषाकरणेवि स. ग.
५ श्रीमद्रधुनाथवरणविरचितविवरणविभूपितम् । कृष्णाश्रयमिदं स्तोत्रं यः पठेत्कृष्णसन्निधौ । तस्याश्रयो भवेत्कृष्ण इति श्रीवल्लभोऽब्रवीत् ॥ ११ ॥ कृष्णाश्रयमिति । कृष्ण यात्रीयते चेन स्तोत्रेण तस्कृष्णाभयं, कृष्ण आश्रयः प्रतिपाचोर्यो यस्येति वा । इदं यः कृष्णसन्निधौ समीपे 'सनिधि पदात्तदनन्यभक्त- समीपेपि पठनीयं सन्निस्तुल्पलाल पठेदधीयीत तस्याश्रयानभिज्ञस्यापि स्वयमेर कृष्ण आश्रयो भवेत् । कथमिदमतिदुर्लभमेतान्मात्रेण भवेदिति नाशङ्कनीय, यतः कारणात् इतिश्रीवल्लभोत्रवीत् । इति इममर्थ श्रीवल्लभ आचार्योनवीदुक्तानतः फिमार्यम् । अनाचार्यवचनानां वस्तुशक्तिरेव प्रयोजिका, यतस्तद्वचनैः मेरितो भग- चांसदाश्रयो भवति न तु तत्कृतमण्यपि साधनमपेक्षते ॥ ११ ॥ सुखेन श्रीयतां कृष्णः किमावेश्चिन्तया मुथा। आचार्यवाक्सुधासिक्ता माड्दं संशयं जनाः ॥२॥ आचार्यचरणाम्भोजे हुई विश्वस्य विस्तरात् । रघुनाथश्वकारेदं कृष्णाश्रयविचारणम् ॥ १ ॥ इति श्रीमहल्लभनन्दनचरणकशरणश्रीरघुनाथस्य कृतो कृष्णालयस्तोत्रवियरणं संपूर्णम् ।
1 me श्रीकृष्णाय नमः। श्रीगोपीजनवल्लभाय नमः। श्रीमदाचार्यचरणकमलेभ्यो नमः । कृष्णाश्रयस्तोत्रम्। -: श्रीमत्कल्याणरायचरणविरचितप्रकाशप्रकाशितम् । यल्लीलालवसस्पर्शान्न रोचन्तेऽन्यदाशिपः । ते राधाहृदयानन्ददायके कृष्णमाश्रये ॥१॥ यत्कृपादृष्टितो जन्तुगोविन्द विन्दते मुदा । भक्याई तानिजाचार्यानभिवन्देऽर्थसिद्धये ।। २॥ श्रीकृष्णाश्रयस्य सर्वसाधकत्वात्स्त्रीयानां तदर्थं वरमदानमिव कुर्वन्तः श्रीमदा- चार्यचरणाः कृष्णाश्रयस्तोत्रं निरूपयन्ति । तत्राधुना देशादिपैट्साधनानामसाधकत्वं वदन्तो भक्तानां भगवानेव सर्वसाधनरूपश्चतुर्विधपुरुषार्थरूप इति, दशलीलानिरूप्य इति, दविधभक्तसेव्य इति, प्राणानामिवास्य स्तोत्रस्य सर्वसाधकत्वमिति च दशभिः श्लोकः प्रार्थनान्याजेन तं स्तुवन्ति । तर प्रथम मुख्याङ्गत्वात्कालस्य तमासाधकत्वं वदन्तः कालधर्मनिराकरणपूर्वकमाश्रयं प्रार्थयन्ते - सर्वमार्गेषु नष्टेषु कलौ च खलधर्मिणि । पापण्डप्रचुरे लोके कृष्ण एव गतिर्मम ॥१॥ सर्वमार्गेप्चिति । कलौ खलर्मिणि खलोऽन्तर्दुष्टो धर्मस्तद्वति सति । 'खरध- मिणी तिपाठे दुःसहवेष्टिते कलौ सतीत्यर्थः । 'कृषिभूवाचके' तिवाक्यनिरूप्यः सदानन्दः पुरुषोत्तम एव मम गम्यत इति गतिराश्रय ऐहिकपारलौकिकार्थसाधकोस्विति शेपः । खलधर्ममाहुः-लोके जने पापण्डः प्रचुरः सर्वापेक्षयाधिको यस्मिंस्तादृशे सति । अत एव सर्वे मपन्त इति मार्गाः पुरुषार्थोपायाः कर्मज्ञानादयस्तेषु नप्टमायेषु सत्सु, पापण्डमवेशा- दात्मसुग्ववाचकवर्गपटस्य लोकभ्रमजननाचित्तशुदयजननातकर्ममार्गस्य, मायावादाभि- निवेशाज्ञानमार्गस्य, निरीश्वरवाहीकारायोगस्य, विभूतिपरत्वादुपासनामार्गस्य च मुरुप- फलासापकत्वेन नष्टमायत्वम् । चकारान्महादेवादिषु फलिकालानुगुणेषु सत्सु, एवका- १ फाल-देश-द्रप्प-कर्तृ-मन्त्र-यमणाम् । २३ कर्मादिभि पुस्पार्या मृग्पन्वे ।
श्रीमत्कल्याणरायचरणविरचितप्रकाशप्रकाशितम् । रस्प विशेष्यान्वितत्वेनान्ययोगव्यवच्छेदकत्वादशः कलादि मनिास्त्वित्पर्यः । अन्या- र्थकत्वादस्य सिद्धत्वेपि प्रार्थनं न दोपाय । ननु भक्तिमार्गीयाणामपि कलिकालाप वधिकलावृहायासक्तिमत्वालौकिकक्रियापरत्वात्पापसंभवाच भक्तिमार्गस्य कथमुद्धारकत्वं मुख्यफलसाधकत्वं चेति फर्मादितुल्यत्वारिकपाश्रयेणापीति चेत् , मैवं, भक्तिमार्गे वदुक्त- दुषणानामभावाद । तथाहि-'फलेदोपनिरिति 'कलौ नद्धरिकीर्तनादिति 'कलि सभा- जयन्ती त्यादिवाक्यधिकरवाभावादल्पकालेनैव फलसिद्धेः प्रत्युत साधकलान् । 'शृण्वन् गृणम् ' 'मद्वार्तायातयापानां न बन्याय गृहा यताः' 'तावागादयः स्तेना! इत्यादिवाक्यै- भगवत्परत्वे गृहादेवन्धहेतुत्वाभावात् । 'एवं नृणां क्रियायोगा' इत्यादिवापयैलौकिककि- पापा अप्पलौकिक तुल्यत्वात्। 'भत्कर्म शुर्वता'मित्यादिवाक्यमगवत्सेवादिना विहिताकर- णेपि प्रत्यवायामावात् , 'धुनोति सर्व हदि संनिविष्ट' 'ते मे न दण्डमहन्ती त्यादिवाक्यैः कदाचित्पातकसंभवेपि नरकावभावात्कीर्तनादिनैव पापनाशात् । 'सर्वधर्मान्परित्यज्य 'अपि चेसुदुराचारः यः कश्चिद्वैष्णवो लोके, 'यानास्याये' त्यादिवाक्यैराचाराद्या भावेपि फलसिद्धः। 'धर्मः सत्पदयोपेतः, धर्मः स्वनुष्ठितः । 'नैष्कर्म्यमप्यच्युत- पायजित "यमादिभियोगपथैः श्रेियःमति'यित्पादिवाक्यै यथा जलौकसां नित्य जीवनं सलिलं मतम् । तथा समस्तसिद्धीनां जीवनं भक्तिरिष्पत' इतिबृहन्नारदीय- वाक्याच भक्तिरहितानां कर्मादीनामसापकत्वात् , भक्तिसहितानामेव साधकत्वात् । 'यत्कर्मभिर्यत्तपसा' 'चतुर्विधाः 'अकामः "ज्ञाने प्रयासमुदपास्य' 'किमलभ्यं 'रूपमारोग्यमा नित्यादिवाक्यैः केवलभक्तेरपि सर्वसाधकत्वात् । 'परिनिष्ठितोपि नैर्गुण्ये' 'मआत्मारामाश्च नैकात्मता' 'महतां मधुद्विीडित्यादिपावयः स्वतोपि फलरूपत्वात् । अधुना कर्मादीनामधिकाराणां गतत्वाद्भक्तिमार्गे महदनुग्रहस्याधिकारत्वेनाधिकारिकृतस्यैव सफ- लत्वादत्राधिकारभेदेन गौणमुख्यफलसंभवात् । एतदुक्तं तच्चार्थदीपे'--'अधुना बधि- कारास्तु सर्व एव गताः कलौ । कृष्णवेत्सेव्यते भत्या कलिस्तस्य फलाय हीति भक्ति- साध्यफलस्यान्येनासंभवादन्यसाध्यस्य भक्तरानुपशिकत्वान्न कर्मादितुल्यत्वगन्धोपि । ननु पूर्णभक्तिमार्गस्याधिपयेपीइ सामिकृतस्य तत्तुल्यत्वमिति चेत्, न 'स्मर्तव्यः स्मृते" कृष्ण कृष्णेति न वै जनो नातु' 'कृष्णेति' 'मालोक्य त्यादिवाक्यैः सामिकतस्यापि फलसापकत्वादन्यस्य सदभावादलमुक्तिभिः ॥१॥ + . १ एषकारो हि निमारका अन्ययोगव्यवच्छेदकोऽयोगम्पयन्धेदकोत्यन्तायोगग्यपच्छेदकौति, विशेष्यान्वितः प्रथमो यया पार्थ एघ धनुः, विशेषणान्यिको द्वितीयो यथा शझा पाण्डुरेख, क्रियान्वित- स्तुतीयो यथा नीलं सरोज भवत्येति । २. क्षचिनास्ति ।
८ कृष्णाश्रयस्तोत्रम् । भश्रीगोविन्दराजकृतटिप्पणम् । मिलिन्दन्दोपमचारुकेशं सुमक्तशेपं मुखकारिदेशम् । 'पयोदनीकाशमनोवेश तं चेष्टेशं शरणं प्रपद्ये ॥ नत्वा श्रीवल्लभाचार्यचरणे गरणे सताम् । कृष्णाश्रयप्रकाशस्य व्याख्यानं मुनिरूप्यते ।। संस्पादिति । सम्यक सम्बन्धादित्यर्थः । सम्पन्चे सम्यक्त्वं चावान्यापरि- भूतत्वम् । अन्यदाशिप इति । न च अन्याश्च वा आशिपवेति विग्रहे मन्याशिप इति भाव्यमिति वाच्यम् , 'अपष्टयतृतीयास्थस्यै ति दुगागमात् । राधादयानन्ददायक- मिति । राधाहृदयायानन्दं ददातीति तथा । भगवत्मुखस्यानन्दरूपत्वान्नानुपपत्तिः काचित् , इतरथाऽव्याप्यत्तित्वेन सुखकयनस्यैवोचितत्वात् । अत एवोक्तं 'मेमामृत टी- कायाम् 'आनन्दोन्तःकरणदेहादिसर्वव्यापकः सुखमध्याप्यरत्तीति । ननु 'आनन्दा- दथेव खल्चिमानि भूतानि' 'सत्यं विज्ञानमानन्दं ब्रह्मेत्यादिभिः श्रुतिभिरान- न्दस्य भगवद्रूपत्वात्स्वदायक इत्यर्यः पर्यवसन्न इति चेत्, इष्टापत्तेः, स्वरूपदानस्यो- चित्त्वात् । एनेनानयोरभेदः सङ्गच्छते । तदुक्तमाथर्वणीयकृष्णोपनिषदि 'पूर्णप्रेमा- स्पदी राधा श्रीकृष्णमनसोद्भवा', तस्मान्न भिन्नति । यत्कृपादृष्टित इति । स्वीय- त्येन परिग्रहादित्यर्थः । अभिवन्द इति । भत्यार्थसिद्धये निजाचार्यानभिवन्द इति सम्बन्धः । तत्र सेवाविषयकोम्णा निर्विघ्नग्रन्यपरिसमाप्तिसिद्धयर्थं निजाचार्यनमस्कार- रूप मङ्गलं करोमीत्येतद्वाक्यार्थः । सेवा त्वा नमनादिरूपा । न च प्रेमविशिष्ट सेवयेति वक्तुमुचित, प्रत्ययार्थस्यैव प्राधान्यात् । तथा चोक्तमस्मदाचायनिवन्धे 'धात्वर्थः सेवा प्रत्ययार्थ: प्रेमेति । सत्यार्थदीपे तु 'प्रेमसेवाल' इति फलिलायनम् , अन्यथा प्रत्ययार्थः प्रधान प्रकृत्यर्थे विशेपणमितिन्यायविरोधः स्यात् । वस्तुतस्तु एतस्य सामान्यन्यायत्वेन विशेषन्यायस्यैव वलीयस्त्वात् । एतदुक्तं विवरणे 'प्रकृतिमत्यययोः प्रत्ययार्थस्य प्राधान्यमितिसामान्यन्यायादिच्छाविपयतया शब्दबोध्य एव शाब्दसाधनता. न्वय इति स्वर्गकामादिवाक्ये क्लप्तविशेषन्यायस्य बलीयस्त्वादपेन जिगमिषति असिना जिघांसतीत्यादिलौकिकमयोगेश्वादिरूपसाधनस्य 'तदनेष्टव्यं तद्विजिज्ञासितव्यं मन्त- व्यमित्यादिवैदिकायोगे तव्यार्थभूतविधेश्च 'सन्प्रत्ययाभिहितेच्छाविपय एव गमना- दावन्वयस्य व्युत्पन्नत्वाच प्रकृत्यभिहितायां विद्यायां यज्ञादीनां विनियोग इति । ननु भावे इत्यधिकारात्मत्ययार्थस्य भावत्वमुचितं न तु प्रेमत्वमिति चेत् , अत्रोच्यते, भावार्थ- कत्वं तु प्रत्ययस्य तावदुभयवादिसिद्धमेव, तत्र भावशब्देन देवादिविपयिणी रतिः प्रकृते , , प्रकाशवहिप्पणसदिनम्। टिप्पणम् । सर्गः। पुरुपानयादीनामुत्पत्तिर्विसर्गः । उत्पन्नानां तत्तन्मर्यादया पालनं स्थानम् । स्थितानामभिवृद्धिः पोपणम् । पुष्टानामाचार अतिः । तत्रापि सदाचारो पन्वन्तरम् । तत्रापि विष्णुभक्तिरीशानुकथा । भक्तानां प्रपञ्चाभावो निरोधः । निष्पपञ्चानां स्वरूप- लाभो मुक्तिः । मुक्तानां ब्रह्मस्वरूपेणावस्थानमाश्रय इति । दशविधभक्तसेव्य इति । साचिकसाचिकाः, साचिकरानसाः, सात्विकतामसा: । राजसराजसा, राजस- साचिका, राजसतामसा: । तामसतामसाः, तामसराजसा, तामससात्त्विका । एके निर्गुणा इत्येतेश विधर्मक्तः सेव्य इत्यर्थः । प्रार्थनाट्याजेन स्तुवन्तीति । 'फिपासनं ते गरुडासनाये स्पनेन प्रार्थनाव्याजेनैव स्तुतिनिरूपणस्यैवोचितत्वादिति भावः । गम्यते पाप्यत इत्यर्थः । ननु 'भावे' इत्यधिकारात्कथमन्त्र कर्मणि प्रत्यय इति चेत् , सत्यम् , 'कृत्यल्युटो बहुल'मित्यत्र 'बहुल मितियोगविभागात्तथा । अत एव एवं च बहुलग्रहणं योगविभागेन कन्मानस्वार्थव्यभिचारार्थ पादाभ्यां हियते पादहारकः कर्मणि पवुल्' इति वैयाकरणशिरोमणयः । पापण्ड इति । वेदविरुद्धवं पापण्डत्वम् । आत्मसुख- याचकेति । 'यन्न दुःखेन संभिन्नं न च प्रस्तमनन्तरम् । गमिलापोपनीतं च तल्लुखं स्वापदास्पद'मित्यनेन स्वर्गपदस्यात्मसुखवाचकवादित्पर्यः । लोकनमजननादिति । लोकत्येन भ्रमजननादित्ययः । मायावादाभिनिवेशादिति । विवाधिष्ठानत्वेन मायो- पहितब्रह्मणः कर्तृत्वायनादित्यर्थः । विवर्तस्तु अनाचिकोऽन्यथाभासः । यद्वा, यस्तु- नस्तदसमसत्ताको विवर्तः । अथवा कारणविलक्षणोऽन्यथाभावो विवर्तः । कारणभेदं विनैव तयतिरेकेण दुर्वचं कार्य विवर्त इति वा । निरीश्वरस्याङ्गीकाराद्योगस्येति । निर्वाजयोगाशीकारादित्यर्थः । योगस्तु चित्तचिनिरोधः स तु भगवद्धयानार्थमङ्गत्वे- नोपयुक्त एकः । ध्यानाभाषेप्यात्मबोधाभूतो द्वितीयः । उभावपि प्रामाणिकौ । यस्तु स्वतन्त्रतया फलसापकत्येन प्रोक्तस्तथासिद्धिहेतुज्ञानात्मा वा तथान्ये देहेन्द्रियादि- साधकास्तऽसामाणिकाः । सर्वमेतच निबन्धे स्पष्टम् । कलिकालानुगुणेष्विति । द्वाप- रादौ युगे भूत्वा कलया मानुपादिषु । वागमैः कत्यितैस्त्वं च अनामिद्विारमान् कुरु' मांच गोपय, येन स्यात्यष्टिरेपोत्तरोत्तरेत्यादिपमपुराणायुक्तवचनैर्महादेवादीनां कलि- कालानुगुणवस्य सिद्धवादित्यर्थः । अन्यायकत्वादिति । अत्र प्रमाणभूताः 'शुभिके शिर-आरोह शोभयन्ती मुखं मम ममाग्ने यो विवेष्वस्त्वित्यादय आगगा अनुसन्धेया इति भावः फलेदोरनिधेरित्यारभ्या भगोपि फल्गु रित्यन्तानां वचनानां सङ्कहा-'कले. दोपनिधे राजन्नस्ति होको महान् गुणः। कीर्तनादेव कृष्णस्य मुक्तबन्धः परं ब्रजेत् 'कवे यद्धयायतो विष्णुं त्रेतायां यजतो मखैः द्वापरे परिचर्यायां कलौ तद्धरिकीर्तनात्' 'कलि २ कृष्णाश्रयस्तोत्रम् । टिप्पणम् । सभाजयन्पार्या गुणझाः सारभागिनः । यत्र संकीर्तनादेव सर्वः स्वार्थोपि लभ्यते' 'शृण्वन् गृणन् संस्मरयंश्च चिन्तयन् नामानि रूपाणि च मङ्गलानि ते । क्रियासु यस्त्व- चरणारविन्दयोराविष्टचिचो न भवाय कल्पते 'गृहेवाविशतां वापि पुंसां कुशलकर्मगाम् । मद्वार्तायातयामानां न बन्धाय गृहा मता' 'ताबद्रागादयः स्तेनास्तावकारागृहं गृहम् । तावन्मोहोधिनिगडो यावत्कृष्ण न ते जनाः' 'एवं नृणां क्रियायोगाः सर्वे संमृतिहेतवः । त एवात्मविनाशाय कल्पन्ते कल्पिताः परे 'मत्कर्म कुर्वतां पुंसां काललोपो भवेधदि । तत्कर्म तस्य कुर्वन्ति तिस्रः कोट्यो महर्पयः' 'स्वपादमूलं भजतः प्रियस्य त्यक्तान्यभावस्य हरिः परेशः । विकर्म यचोत्पतितं कयश्चित् धुनोति सर्व हृदि सन्निविष्टः' 'एवं विमृश्य मुधियो भगवत्यनन्ते सर्वात्मना विदधते खलु भावयोगम् । ते मे न दण्डमहन्त्यथ यद्यमीपां स्यात्पातकं तदपि हन्त्युरुगायवाद' ते देव सिद्धपरिगीतपवित्रगाथा ये साधवः समदृशो भगवत्मपन्नाः । तान्नोपसीदत हरेर्गदयाभिगुप्तान्नैपां वयं न च वयः प्रभवाम दण्डे 'सर्व- धर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं बज । अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुच' 'अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभार । साधुरेव स मन्तव्यः सम्पग्व्यवहितो हि सः' 'य: कश्चिद्वैष्णवो लोके मिथ्याचारोप्यनाश्रमी । पुनाति सकलान् लोकान् सहस्रांशुरि- वोदितः' यानास्थाय नरो राजन्न प्रमायेत कहिचित् । धावन्निमील्य वा नेत्रे न स्खलेन्न पतेदिह' 'धर्मः सत्यदयोपेतः विद्या वा तपसान्विता । मद्भक्त्यापेतमात्मानं न सम्यक प्रपुनाति हि' 'धर्मः स्वनुष्ठितः पुंसां विष्वक्सेनकथासु यः । नोत्पादयेद्यदि रति श्रम एवं हि केवलम्' 'नैष्कर्म्यमप्यच्युतभाववर्जितं न शोभते ज्ञानमलं निरखनम् । कुतः पुनः शश्वदभद्रमीश्वरे न चार्पित कर्म यदप्यकारणम्' 'यमादिभिर्योगपथैः कामलोभहतो मुहुः । मुकुन्दसेवया यद्वत्तथात्माद्धा न शाम्यति' 'श्रेयःमुर्ति भक्तिमुदस्य ते विभो क्लिश्यन्ति ये केवलवोधलब्धये । तेपामसौ क्लेशल एव शिष्यते नान्यद्यथा स्थूलतुपाव- घातिनाम्। 'यत्कर्मभिर्यत्तपसा ज्ञानवैराग्यतश्च यत् । योगेन दानधर्मेण श्रेयोभिरि- तरैरपि 'सर्व मद्भक्तियोगेन मद्भक्तो लभतेजसा 'चतुर्विधा भजन्ते मां जनाः सुकृतिनोर्जुन । आतो जिज्ञासुरार्थी ज्ञानी च भरतर्पमा । अकामः सर्वकामो वा मोक्षकाम उदारधीः ।. तीत्रेण भक्तियोगेन यजेत पुरुपं परम्' 'ज्ञाने प्रयासमुदपास्य नमन्त एव जीवन्ति सन्मुखरितां भवदीयवार्ताम् । स्थाने स्थिताः श्रुतिगतां तनुवाङ्म- नोभिर्ये प्रायशोजित जितोप्यसि तैत्रिलोक्याम् 'किमलभ्यं भगवति प्रसन्ने श्रीनिके- तने । तथापि तत्परा राजन् नहि वाञ्छन्ति किञ्चन' 'रूपमारोग्यमांश्च भोगांश्चैवा- नुषझिकान् । ददाति ध्यायतो नित्यमपवर्गपदो हरिः परिनिष्ठितोपि नैर्गुण्ये उत्तमश्लोक- .
११ , प्रकाशनहिप्पणसहित। टिप्पणम् । लीलया । गृहीतचेता राज आरपान यदधीतवान् । 'आत्मारामाश्च मुनयो निग्रन्या अप्पुरुक्रमे । कुर्वन्त्यहेतुर्की भक्तिपित्यंभूतगुणो हरिः, 'कात्मता में स्पृहपन्ति केचिन्मत्पादसेवाभिरता मदीहाः । येन्योन्यतो भागवताः मसज्य सभाजयन्ते मम पौरु- पाणि 'मद्दता मधुद्विदसेवानुरक्तमनसापभयोपि फरगुरिति । भक्तिसाध्यफलस्पेति भगवत्स्वरूपारामेरित्यर्थः । तदुक्तमस्मत्यमुभिक्ति से भक्तौ च न स्वरूपातिरिक्त- फलकत्व मिति । स्मर्तव्य' इत्यारभ्य तदभावादित्यन्ते वचनानि तु स्मर्तव्यः सततं विष्णुविस्मर्तव्यो न जातुचिद । सर्वे विधिनिषेधाः स्युरेतस्यैव च किङ्कराः 'स्मृते: सकलकल्याणभाजनं यत्र जायते । पुरुषं तमजं नित्यं नमामि शरणं हरिम् । 'कृष्ण कृष्णेति कृष्णेति यो मां स्मरति नित्यशः । जलं भिवा यथा पई नरकादुद्धराम्यहम् । कृष्णेति मङ्गलं नाम यस्य वाचि प्रवर्तते । भस्मीभवन्ति राजेन्द्र महापातककोटया' 'न वै जनो जातु कथंचनावजेन्मुकुन्दसेव्यन्पबदङ्ग संघतिम् । स्मरन्मुकुन्दा धुपगृहनं पुनर्विहातुमिच्छेन्न रसग्रहो यतः' 'आलोच्य सर्वशास्त्राणि विचार्य च पुनः पुनः । इदमेक सुनिष्पन्नं ध्येयो नारायणः सदेति । तत्र नवविधा भक्तिनिदान, ततः प्रेम, तेन च विशिष्टरूपभगवमाप्तिः, सैव फलमिति फलसहितपूर्णभक्तिमार्गस्वरूपम् । अत एव सर्व- निर्णये 'स ज्ञानक्रियोभययुतः स एव फलं, तत्रापि साधनं प्रेमैव तत्साधनं नवविधा भक्ति'रिति श्रीमदाचार्यवाः । तथाच सामिकृतस्यापि स्मरणपर्यन्तं विहितस्यापि कायवाग्निनियोगस्नेहाभावेपि मनोमानस्थित्यैव तादृशपुरुपविहितस्य वा फलसायकत्व- मिति स्पष्ट एवेत्तरेभ्य उत्कर्षः । तपाचोक्तं निवन्धे-' कायवाग्विनियोगाभावेपि स्नेहा- भाषेपि मनोमायस्थितौ फलमेतदिति। कर्ममार्गस्य तु न तथा, साझावैदिकफर्मणः फला- वश्यंभावनियमादिति तत्वम् ।। १॥ ननु पुण्यदेशस्थितिमात्रेणापि पुरुषार्थसिद्धः किमितीतरव्यवच्छेदपूर्वकमाश्रयमा- धनमित्याशङ्काय देशानामसाधकत्वं वदन्त आश्रयं प्रार्थयन्तै- म्लेच्छाकान्तेषु देशेषु पापैकनिलयेपु च । सत्पीडाव्यग्रलोकेषु कृष्ण एव गतिर्मम ॥ २ ॥ म्लेल्लामान्तेष्विति । देशेषु होनेराकान्तेषु सत्सु । ननु म्लेच्छा अपि न्याय. वतिनथेत्तदा को दोपस्तत्राहुः-पापैकनिलयेष्विति । पापरूषा एव ते तदेकनिलयेषु, पापा ये मुख्यास्तनिलयेपु, पापस्य वा । अथवा पूर्वोक्तेषु पापैकनिलयेषु च अंबाला- दिपु, मन्त्र गमनमात्रेण पुनः संस्कारसंभवः । ननु लोका वणिजादयः समीचीनाश्त्यापैः १. अङ्गबङ्गकलिनेषु सौराष्ट्रमगधेषु च । तीर्थयाचा पिना गछन् पुनः संस्कारमतीति स्मृतेः प्रकाशः।
१४ कृष्णाश्रयस्तोत्रम् । प्रकाशः। देवतापि अपरिज्ञाननष्टेपियति । मन्त्रा वैदिका आगमोक्ताथ, तेपु अपरिज्ञाननष्टेषु अपरिज्ञानेन तात्पर्यफलदेवतास्वरूपाशानेन नष्टमायेषु सत्सु । वैदिकानां गुरुकुलवातत्रास घर्षशूद्रासानिध्यनध्यायराहित्यपूर्वकं पठितानां साधकत्येनावतयोगिनामसाधकत्वान् । आगमोक्तानां तात्पर्याशानेनार्यदेवयोस्तिरोभावादसाधकलात् । भगवदाश्रये तु 'यस स्मृलेत्यादिवाक्यैः 'सव संपूर्णता याती'वि मन्त्राणामपि सापकत्वात् ।। ५॥ ननु मीमांसादिना मन्त्रतासर्यनिर्धारारकर्मभिरेव फलसिद्धः किमाश्रयेणेत्याशङ्कष कर्मणामसाकवलं वदन्त आश्रयं मार्थयन्ते- नानावादविनष्टेषु सर्वकर्मत्रतादिषु । पापण्डैकप्रयत्नेषु कृष्ण एव गतिर्मम ॥ ६ ॥ नानावादविनष्टेविति । कर्माणि सोमयागादीनि, व्रतादीनि च, तेषु सर्वेषु प्रपञ्चः सर्वोपि मिथ्येति वेदानामपि तथात्वात्मपञ्चवत्स्वाज्ञानकल्पितत्वेन घेदानां तद्वो. चित्तानां च व्यवहारमात्रेण प्रामाण्यान्न किश्चित्कर्तव्यं प्राप्तव्यं वास्तीति केपाश्चिद्वाद, 'परमेष्टिनो वा एप यज्ञोय. इत्यादिवाक्यैर्ब्रह्मादीनामपि यज्ञैरेवोत्कर्षापूर्ववासनात एवोत्त- रोत्तरमवृत्तेः कव कर्तव्यं तेनैत्र फलं न कोप्युपास्यः फलदाता प्रवर्तको वा, चेतना नास्ति किन्तु मन्त्रमय्येवेति नदेवताप्रीतिव्यापारः फलं येति केपाश्चिद्वादः, शास्त्रेण पोडशपदार्थविवेकानन्तरं श्रवणमनननिदिध्यासनैः स्वात्मसाक्षात्कारे सति दुःखात्य- न्ताभाव एव फलं न भगवान्सेव्यः फलं वेति केपाश्चिद्वादः, प्रकृतितद्विकारोफ्धानविलये पुरुषस्य स्वरूपेणावस्थानं फलं, न भगवानिति केपाश्चिन्मतम् , एवंविधैर्नानापादेविशेषेण नष्टेषु सत्सु । विपरीतार्थनिश्चयेन फलाजनकत्वाद्विनाशः । वस्तुतः 'पुरुप एवेदं सर्वे' 'ऐतदात्म्पमिदं सधैं 'सर्वस्य वशी सर्वस्येशानः 'एप उ एव तं साधु फर्म कारयति' 'अहं सर्वस्य प्रभवः' को नु राजनिन्द्रियवान्' 'देवोसुरो मनुष्यो वा' 'फलमत उपपत्ते' 'त एवं तृप्तास्तर्पयन्त्येनमिति 'देवा चै सत्रमासत' 'विशते सदनन्तरम्' 'मामेवैष्यसि 'आनन्दं ब्रह्मणो रूप' मित्यादिश्रुतिस्मृतिपुराणन्यायैः प्रपश्चस्य ब्रह्मात्मकत्वात्सत्यत्वेन कर्तव्यस्य सफलत्वाद्भगवतः सर्वेश्वरत्वेन सेव्यत्वात्मवर्तकत्वात्फलदाढत्वात्तृप्तिसत्रकरणा- धनुपपत्या देवतानापपि चेतनवाद्भगवत्सायुज्यस्य मोक्षत्वादानन्दरूपत्वेन भगवत एवं फलरूपत्वात्पूर्वोक्तवादानां प्रलपितकल्पत्वात् । स्त्रमताग्रहेणैव निपिद्धदशम्यादिविद्धकाद- टिप्पणम् । प्रलपितकल्पत्वादिति । यत्तु, 'शाखदीपिकायां नवमाध्याये देवता वा मयोजयेत् अतिथिवद्भोजनस्य तदर्थवादि'त्यधिकरणे 'पद्यपि देवत्ता विग्रहवती प्रतिगृह्य भुवा वनति प्रसीदति च तथापि यागादेव फलं विग्रहवती वानित्या' स्यात् , ततश्च नित्य- - - - प्रकाशतटिप्पणसहितम् । মু। वेदविषयत्वं न स्यात्, सत्यपि विग्रहे प्रत्तस्य हमिपो देवतया भोगा प्रत्यक्षविरुदो- शययोभ्युपगन्तुम् , न चाभुझाना प्रसीदतीति युक्तम् , अत एत्रामतिपन्नापूनत्यागे देवतामसादे वा फलमित्येतदपि निरस्तं, न हि तस्याः प्रसादः संभवतीत्युक्त मिति पार्थसारथिमिश्राः तत्मौढिवादमानमेव । तथाहि-'यदुक्तं विनइयती चानित्या स्यात्ततश्च. नित्यवेदविषयत्न न स्यादिति, तदपेशलं, अनित्यानामपि यागादीनां वेदविषय- स्वात् , विग्रहवत्वेनैव फलजनकत्वस्य 'तृप्त एवैनमिन्द्रः प्रजया पशुभिस्तर्पयती'त्यादि- श्रुत्युक्तत्वाच । मुख्याधेिन न श्रुत्तेरुपचरितार्थत्वम् । अर्थवादानां स्वतः प्रामाण्पं न तु विध्येकवाक्यतया । एतेनास्मिन्नेवाधिकरणे यच्छायरमाप्ये सिद्धान्तितं तस्वमता- ग्रहमानमेव । प्रकृतिमनुसरामः । यदपि 'सत्यपि विग्रहे प्रत्तस्प इविपो देवतया भोगः प्रत्यक्षविरुद्धोशवयोग्युपगन्तुमिति, तदप्यविचाररमणीयम् । विश्वादीनामपि प्रत्यक्ष- भोगाभावत्वेन 'सर्वमनुष्या विष्णुनाऽशितमश्नन्ती'तिश्रुतौ 'पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो में भच्या प्रयच्छति । तदई भत्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मन' इति स्मृतौ 'विष्णोनिवेदिता- नेन यष्टव्यं देवतान्तरम् । पितृभ्यश्चापि तद्देयं तदानन्त्याय कल्पते 'पितृशेष तु यो दद्याद हरये परमात्मने । रेतोधाः पितरस्वस्प भवन्ति देशमागिन' इति स्कान्दे 'य श्राद्धकाले हरियुक्तशेष ददाति भक्त्या पितृदेवतानाम् । तेनैव पिण्डांस्तुलसीविमिश्रा- नाकल्पकोटि पितरस्तु तृप्ता' इति ब्राह्मे च प्रतिपादितस्य भोगस्य विरोधापत्तेः । यत्तु निर्णयसिन्धु:-'एतत्सर्वं निबन्धविरोधान्निर्मूल'मिति, तम्, श्रीधरस्वामित्रसिदपरिचर्या- दिमूलं वदता स्वस्यैत्र वदयाघातात् । एतेन 'न चाभुञ्जाने त्यारभ्य प्रसादः संभवती- युक्त'मित्यन्तं यदुक्तं तदेतेनैव निरस्तम् । वस्तुतस्तु विशिष्ट एव देवतेति न काप्यनुप- पत्तिः । एतेन तदुक्त कर्ममार्गस्य प्रलपितकल्पत्वं सिद्धमिति निगर्वः । यत्तु मुक्तावल्या- मात्मनिरूपणे 'सुतरामीश्वरभेद' इत्यारभ्य 'परमं साम्यमुपैतीति श्रूयते' इत्यन्तं पश्चानन- महाचार्या आङस्तत्मामादिकमेव । तथाहि यदुक्तं 'सुतरामीश्वरभेदोज्यथा वन्यमोक्षा नुपपने रिति, तत्तुच्छं, पन्धस्य सांसारिकजीवविश्यत्वेन सुतरां भेदाभावात् । यदर्षि 'योपीश्वराभेद' इत्यारभ्य समर्पिता' इत्पन्तं वदन्ति तदपि तथा । तथाहि अभेद- वोधिका किल 'ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवतीति श्रुतिः । नहि तदीयत्वमतिपादन- द्वारा स्तुतिस्तस्याः शक्योर्थोपि त्वौपचारिकः, न च श्रुतैरुपचरितार्थत्वं समाति मुख्यार्यावाधात् । अत एवांशो नानाव्यपदेशा'दित्यधिकरणे अद्वैतश्रुत्यस्तु जातिदेश- फालामेदेन निमित्तोपचारादि'त्युक्त्वा 'नच यसरास्तदौपचारिक युक्त'मित्युक्तं वाचस्प- तिमियः । न च सर्व एवात्मानः समर्पिता इति श्रुतिविरोधः, सर्वात्मनां तत्त्वेनैव भवन- - १२ कृष्णाश्रयस्तोत्रम् । प्रकाशः। किं कार्यमत आहुः-सदिति । साधूनां पीडया घ्यग्राः स्वधर्माचरणमेवानिष्टहेतुः प्रत्य- क्षत्यान्न कार्यमुत माकृतं कर्म वेति व्याला लोका येषु । सद्धर्मस्य शुभहेतुत्वानिथपेन श्रद्धाभावात्तेपि सहाया न भवन्तीत्यर्थः । अहो अमीपां किमकारि शोभनं प्रस्ताव एपां स्विदुत स्वयं हरिः । यर्जन्म लब्धं नृषु भारताजिरे मुकुन्दसेवौपयिक स्पृहा हि न' इत्यादिवाक्यैर्देशानां कृष्णाश्रितानुकूलत्वात् । शेष पूर्ववत् ॥ २ ॥ टिप्पणम् । पापा ये मुख्या इति । फलितार्थकथनगेतत् , इतरथा विशेपणसमासे 'पूर्वका.. लेके त्यनेनैकशब्दस्य पूर्वनिपातः स्यात् । विग्रहस्तु पापेषु ये मुख्या इति । यत्र गम- नमात्रेण पुनः संस्कारसंभव इति । 'अङ्गयङ्गकलिङ्गेषु सौराष्ट्रमगधेषु च । तीर्थयात्रा विना गच्छन् पुनः संस्कारपईत्ती त्यनेन तथेत्यर्थः ॥ २॥ प्रकाशः। . . . ननु गङ्गादितीधैरपि सर्वपुरुषार्थसिद्धेः किं केवलाश्रयेणेत्याशङ्कय द्रव्याणाम- साधकरवं वदन्तस्तीर्थानामाहुः- गङ्गादितीर्थवर्यपु दुष्टेरेवावृतेष्विह । तिरोहिताधिदेवेषु कृष्ण एवं गतिर्मम ॥ ३ ॥ गलादीति । गदादीनि यानि तीर्थश्रेष्ठानि तेषु-दुष्टैरेवाटतेपु सत्सु, अतो न तैः पुरुषार्थसिद्धिः । ननु कथं दुरैरैवास्तत्वं तत्र ब्राह्मणादीनामपि सत्त्वात् , न, अतिपरि- चयादनादरेण तत्र भक्त्यभावेन प्रतिग्रहाद्युपाधिभिरवस्थानाच तेपामपि दुष्टत्वमेव । ननु सर्वदोपनिवारकेषु तेषु सत्सु दुष्टत्वमसंभवीति चेत् , न, 'सर्वेण गाङ्गेन ,जलेन सम्य- मृत्स्नाशतेनाप्यथ भावदुष्टः । आजन्मतः स्नानपरोपि नित्यं न शुद्धचतीत्येव वयं बदाम' इत्यादित्यपुराणवचनात् , 'मत्स्यकच्छपमण्डूकास्तोये मना दिवानिशं । वसन्तोपि च ते स्नानात्फलं नाईन्ति कहिचित् 'श्रद्धाविधिसमायुक्तं यत्कर्म क्रियते नृभिः । शुचि- टिप्पणम् । द्रव्याणामसाधकत्वं वदन्तस्तीर्थानामिति । तीर्थस्य तदेशावच्छिन्नप्रवाहात्म- काभ्यात्मिकदेवतारूपत्वेन द्रव्यत्वमितिभावः । अत एवोक्तमस्मत्प्रभुमिनिबन्धे' 'द्वितीयस्य प्रवाहरूपतया तीर्थत्वमिति । यादवकोशेपि-'तीर्थ मन्त्राद्यपाध्यायशास्त्रेप्वम्भसि पावन' इति । उक्तं च दशमस्कन्धीयसुबोधिन्यां देवतारूपत्वं 'कालिन्दीति समाख्याते त्यस्य व्याख्याने 'आध्यात्मिकं देवत्तारूपमिति । 'प्रायश्चित्तानि वीर्णानी तिवचनत्रयाणि- १. कचिऍलिङ्गपाठः । २. असंभावितमिति पाठः । ३ .
" पकाशवहिणणसहितम् । प्रकाशा शुद्धेन भावेन तदानन्त्याय कल्पते । 'विधिहीनं भावदुष्टं कृतमश्रद्धया च यत् । तद्धर- न्त्यसुरास्तस्य सुमृदृस्याकृतात्मन' इति योगियाज्ञवल्लपवनोभिः, 'अश्रयानः पापात्मा नास्तिकोच्छिन्नसंशयः । हेतुनिष्ठय पश्चैते न तीर्थफलभागिन' इति वायुपुराणवचनाच, 'प्रायश्चित्तानि चीनी त्यादिभिक्ष तेषां भगवद्वाहिर्मुख्यनास्तिक्यादिदोपानिवार- कत्वात् । ननु वस्तुशक्त्यां सत्यां कथमेतत् , न खाग्निः कदाचिन दहतीत्याशयाधि- दैविकदेवतारूपतिरोधानाद्वस्तुन एवाभावादित्याहुः-तिरोहिताधिदेवेष्विति । दुष्टा- नत्याधिदैवतिरोधानात्सतः प्रत्यैव प्राकट्यात् , अन एव श्रीभागवतार्यतत्त्वदीपे ' तीर्या- दापोति । अत एव सता 'तीर्थीनुर्वन्ति तीर्थानी त्यनेन तीर्थीकरणमुच्यते । आधिदै- विकाभावे जले दृश्यमानदोपाभावारिक नीकिरणं स्यात् । शेपं प्राग्वत् ॥ ३ ॥ टिप्पणम् । प्रायश्चित्तानि चीर्णानि नारायणपराङ्मुखम् । न निष्पुनन्ति राजेन्द्र सुराकुम्भमिवा- पगा: 'तीर्यादावपि या मुक्तिः कदाचिरकस्यचिद्भवेत् । कृष्णप्रसादयुक्तस्य नान्यस्येति विनिश्चयः' भवद्विधा भागवतास्ती भूताः सयं प्रभो । तीयीकृर्वन्ति तीर्थानि स्वान्तः- स्थेन गदाभृतेति ॥ ३ ॥ ननु कैसमीचीनत्वे सर्वफलसिद्धेः किमाश्रयेऽन्यव्यवच्छेदेनेत्याशङ्काय फणाम- साधकलं वदन्त आश्रय पार्थयन्ते - अहङ्कारविमूढेपु सत्सु पापानुवर्तिपु लाभपूजार्थयत्नेषु कृष्ण एवं गतिर्मम ॥ ३॥ अहङ्कारविमूढेविति। सत्सु पण्डितेषु अहङ्कारेण वर्ष शारशा इतिगणान्य पृच्छन्त्यपि नेति मायावादायभिनिवेशाद्विशेषेण मूडेषु सल्लु । ज्ञानवकृतिरपि तेषां दुष्टे त्याहुः लाभपूजार्धपत्नेविति । लाभपूजार्थमेव यत्नो येषां, वे पारमार्थिकमपि कर्म लाभपूनाभ्यामेव कुर्वन्ति ! पापान पुंसः, पापं वानुवर्तन्तेऽवः सशानदोषाभ्यां दुष्टत्वान्न तेषा स्वतः फलसिद्धिराणये तु भगवत्कृपायां स्वत एव वेदार्थस्वदोपयोः स्फुरणास्कलसिद्धिः, भगवान् भगवदीयो वा वेदार्थ जानातीति भक्तानामेव येतात्पर्यज्ञानात् । शेपं सुगमम्।। पूर्ववदाशय मन्त्रागामसाधकाय वदन्त आश्रयं माधयन्ते - अपरिज्ञाननष्टेषु मन्त्रेष्वत्रतयोगिए । सिरोहितार्थदेवेषु कृष्ण एवं गतिर्मम ॥ ५॥ १ कर्तृसमीचीनत्वेनेति ख, ग, प्रकाशः। - . कृष्णाश्रयस्तोत्रम् । मिति तदर्थात् । यदपि 'मोसदशायामज्ञाननिटत्तावभेदो जापते इत्यपि न, मेदस्य नित्यत्वे नाशायोगात्' तदप्यसत्, भेदस्य 'भ्रममावविपयत्वेन- यस्तुन. एवाभावात् । यदपि 'भेदनाशपि व्यक्तिद्वयं स्थास्यत्येवेति तदपि न 'एप संमसादः अस्माच्छरीरा- समुत्थाय परं ज्योतिरुपसंपय स्वेन रूपेगाभिनिप्पद्यते' इत्यादिश्रुतिविरोधात् । एतेन 'नचद्वित्वमयी स्यारभ्य 'सर्वजनंसिद्धत्वा'दित्यन्तं यदुक्तं तत्सर्वमनेनैव परास्तम् । यदपि 'योपि तदानीमभेदमतिपादक आगम: सोपि निदुःखंत्वादिना साम्यं प्रतिपादयति संपदाधिक्ये पुरोहितोयं राजा संरत इतिपदिति, तदपि न लब्धवर्णमतीक्ष्यं दत्तोत्तर- त्वात् । निरञ्जनः परमं साम्यमुपैती'ति श्रुतिस्तु जीवन्मुक्तपरा तस्माचाफिकमतस्यापि प्रलपितकल्पत्वं सिद्धमिति निष्कर्षः। वचनसद्धहस्तु-'अहं 'सर्वस्य प्रभवो मचः सर्व मवर्तते । इति मत्वा भजन्ते मां बुया भावसमन्विताः' 'को नु राजनिन्द्रियवान् मुकुन्दचरणाम्बुजं । न भजेत्सर्वतोमृत्युरुषास्यममरोचमः । देवोसुरो मनुष्यो वा यक्षो गन्धर्व एव वा । भजन्मुकुन्दचरणं स्वस्तिमान् स्याद्यधा वयम्' 'भत्या मामभिजानाति यावान् यश्चास्मि तत्वतः । ततो मां तत्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम् मन्मना भव मद्भक्तो मद्यानी मां नमस्कुरु । मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिनाने मियोसि मे' इति । आचार्यचरणद्वन्द्ववन्दनानन्दितात्मना । शिष्येण वालकृष्णानां किश्चिदत्र विचारितम् ।। प्रकाशः। श्यादिवतकरणाच । कर्मत्वेपि प्रतादीनां पृथगुपादानं ज्ञानायङ्गत्वयोधनाय । ननु तेपि स्वयं कुर्वन्ति परानपि वोधयन्ति मिथ्यात्वनिःफलवाल्पफलत्वानन्दाभावज्ञाने कथं कुर्युः कथं वा बोधयेयुस्तैपामपि मतानां शङ्करजैमिनीगौतमादिमवर्तितत्वाचेत्यत आहुः-पा- पण्डेकप्रयत्लेष्विति । पापण्डनिमित्तमेव मुख्यः प्रयत्नो येषु त्वं च रुदेतिसार्दैन 'त्वामाराध्ये तिश्लोकद्वयेन च भगवता महादेवं प्रति तथैवाज्ञापनेन तथैव तेपां प्रवृत्तेः, स्वयं कर्मादिकरणेन स्वस्थ महत्वख्यापनेन मतप्रवर्तनात् , 'यघदाचरति श्रेष्ठ इतिन्या- यात् । आधुनिकानां तैरेव मोहितत्वात् । नहि देवादिपवर्तितशास्त्रत्वमावेग सन्मतत्वं किन्तु येदाविरोधित्ये सति चेदानुसारित्वात् । अन्यथा बृहस्पतिप्रवर्तितयौद्धशास्त्रस्यापि सन्मतत्वप्रसङ्ग इत्यलं प्रसक्तानुमसक्त्या । शेपंप्राग्वत् ॥६॥ .टिप्पणम् । 'वं चेत्यारभ्य भक्त्या त्वनन्ययेत्यन्तानां वचनानां सङ्गहा- 'त्वं च रुद्र महाबाहो मोहशास्राणि कारय । अतथ्यानि वितथ्यानि दर्शयस्त्र ..महाभुज । प्रकाशं कुरु चात्मानमप्रकाशं च मां कुरुः । त्वामाराध्य यथा शंभो ग्रही- .
१७ प्रकाशः। प्रकाशलट्टिप्पणसहितम् । टिप्पणम् । प्यामि वरं सदा । द्वापरादौ युगे भूत्वा कलया मानुपादिषु । वागमैः कल्पितैस्त्वं च ‘जनान्मद्विमुखान् कुरु। मां च गोपय येन स्यात् सृष्टिरेपोत्तरोतरा । 'यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तचदेवेतरो जनः । स यत्नपाणं कुरुते लोकस्तदनु वर्तते ॥ ६ ॥ ननु 'धर्मेण पापमपनुदति' 'धर्षे सर्व प्रतिसित'मितिश्रुतेः पूर्व दोषाभावाय धर्मः कार्यस्तेन चित्तशुद्धौ माहात्म्ये स्वरूपे च झाते नदाश्रयादिकं कार्य न त्वाशु दोपव- वैवान्यया क योगिध्येयो भगवान् क दुष्टो जीव इत्याशङ्कय 'यमेवैप पृणुते' 'रहुगणैनन् । 'भरपा बनन्यये ' त्यादीनाङ्गीकृत्या महदनुग्रहेण च भक्पा दोपवतापि गम्यत इति तन्माहात्म्यमपि तथेति महापुरुषद्वारा शरणागतौ सर्वं तत एव भविष्यतीत्यभिमेत्य भक्तानां भगवानेव चतुर्विधपुरुषार्थरूप इति प्रथमं धर्मरूपत्वं वदन्तस्तं मार्थयन्ते-- अजामिलादिदोपाणां नाशकोऽनुभवे स्थितः । जापिताखिलमाहास्यः कृष्ण एवं गतिर्मम ॥ ७॥ अजामिलादीति । अनुभवविषयीभूतोऽमामिलादीनां ये दोपास्तेषां नाशकः । शापित अखिलं माहात्म्यं येन तादृशः, तेन पापनिवर्तकत्वमिष्टभापकत्वं च धर्मकार्ययुक्त- मतो दोपोपस्थितावपि तदाश्रयणमेव कार्य भगवदीयानां न तु तं विहाय प्रापचित्ता- दीति सूचितम् । यता, परम्परासंबन्धेनापि पूर्वोक्ता, स्वनामसाम्येनाप्यजामिलोद्धारात अनुभवे स्थितो महदनुग्रहेण । ज्ञापितमखिलं लीलादिरूपं तयेन । शेपं माग्वत् ।। ७ ।। टिप्पणम् । रहुगणैतत्तपसा न याति न देव्यया निर्वपणादृहावा । न बन्दनान्नैव जलागि- सूर्यविना महत्पादरजोभिषेकम् ? 'भक्त्या त्वनन्यया शक्य अहमेवंविधोर्जुन । ज्ञातुं द्रष्टुं च तत्त्वेन प्रयेष्टुं च परन्तपेति । अनुभवविषयीभूत इति । अजामिलादीनामिति शेपः । पक्षान्तरे स्वजामिलेतरभक्तविषयीभूतः सन्निति तदर्थः । अामिलस्य तु पार परासम्बन्धेन स्वनाम्नैवोद्धारात् । दोपोपस्थितापित्यारभ्य सूचित्तमित्यन्ते-नहुँ 'श्रुतिस्मृती ममैवाने यस्तै उल्लङ्गन्य वर्तते । आगोल्छेदी मम द्रोही पद्धकोपि न में मियः' इत्यनेन भक्तिमार्गीयस्यापि वेदविहितकरणत्वेन दोपोपस्थितावपि प्रायश्चित्तादेः माप्तत्वादित्य फयमुच्यते इति चेत् , सत्य, महादोपोपस्थितौ भगवदिच्छां ज्ञात्वा माप- श्चित्तादिकरणम् । तदुक्तं सर्वनिर्णये प्रायश्चिसं पातकादीनामिति । अस्पदोपोपस्थिती तु तदाश्रयणमेव कार्य न प्रायश्चित्वादि । एतदुक्तं सर्वनिर्णये-'अनेनाल्पबहिर्मुखताया- मपि भागवतमनुसन्येयमित्युपायः कथित ' इति सर्व समासम् ।। ७ ।। - ३ १८ कृष्णाश्रयस्तोत्रम् । प्रकाशः। ननु 'तस्मात्स्वाध्यायोऽध्येतव्यः' 'यं यं ऋतुमधीते तेन तेनास्येप्ट भवत्यग्नेयो- रादित्यस्य सायुज्यं गच्छत्ती'त्यादिश्रुतेः फर्ममार्गेपि ब्रह्मयज्ञाध्ययनादिनाम्न्यादिसापू. ज्यसिद्धे ये वक्षर'मित्यादिना ज्ञानेनाप्यक्षरसायुज्यसिद्धेः को विशेषः कृष्णाश्रय इति किमिति तस्यैव प्रार्थनमित्याशक्य तारतम्यज्ञानार्थ सर्वस्वरूपनिरूपणपूर्वकमर्थरूपत्वं बदन्तस्तं मार्थयन्ते- प्राकृताः सकला देवा गणितानन्दकं वृहत् | पूर्णानन्दो हरिस्तस्मात् कृष्ण एव गतिर्मम ॥ ८॥ प्राकृता इति । यस्मात्सकला देवाः प्राकृताः सत्त्वाहकारमभवत्वात् । बृहदक्षरं गणितानन्दकं 'सैपानन्दस्य मीमांसा भवती' त्यारभ्य 'ते ये शतं प्रजापतेरानन्दाः स एको ब्रह्मण आनन्द' इत्यन्तेन ब्रह्मानन्दस्य गणितत्वात् कृष्ण एव हरिः सर्वदुःखहर्ता टिप्पणम् । ये त्वक्षरमित्यादिनेति । 'ये त्वक्षरमनिर्देश्यमव्यक्तं पर्युपासते । सर्वत्रगमचिन्त्य च कूटस्थमचलं ध्रुवम् । 'संनियम्येन्द्रियग्रामं सर्वत्र समबुद्धयः । ते प्रामुवन्ति मामेव सर्वभूतहिते रताः' 'क्लेशोधिकतरस्तेपामव्यक्तासक्तचेतसाम् । अव्यक्ता हि गतिर्दुःखं देहवद्भिवाप्यते' इत्येतेन तथेत्यर्थः । सैपानन्दस्येति । 'सैपानन्दस्य मीमांसा भवति । युवा स्यात्साधु युवाध्यायकः । आशिष्ठो द्रविष्ठो बलिष्ठः । तस्येयं पृथिवी सर्वा वित्तस्य पूर्णा स्यात् स एको मानुप आनन्दः । ते ये शतं मानुपा आनन्दाः स एको मनुष्यगन्धर्वाणामानन्दः श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य । ते ये शतं मनुष्यगन्धर्वाणामा- नन्दाः स एको देवगन्धर्वाणामानन्दः श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य । ते ये शतं देवगन्धर्वाणा- मानन्दाः स एकः पितॄणां चिरलोकलोकानामानन्दः श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य । ते ये शतं पितॄणां चिरलोकलोकानामानन्दाः स एक आजाननानां देवानामानन्दः श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य । ते ये शतमाजानजानां देवानामानन्दाः स एकः कर्मदेवानां देवानामानन्दः, ये कर्मणा देवानपियन्ति श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य । ते ये शतं कर्मदेवानां देवानामानन्दाः स एको देवानामानन्दः श्रोत्रियस्य चाकामह- तस्य । ते ये शतं देवानामानन्दाः स एक इन्द्रस्यानन्दः श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य । ते ये शतमिन्द्रस्यानन्दाः स एको बृहस्पतेरानन्दः श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य । ते ये शतं बृहस्पतेरानन्दाः स एकः प्रजापतेरानन्दः श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य । ते ये शतं मनापतेरानन्दाः स एको ब्रह्मण आनन्दः श्रोत्रियस्य चाकामहतस्ये त्यनेन प्रपाठकेन प्रकाशतटिप्पणसहितम् । पूर्णानन्दछ। पूर्णवासानन्दथ, पूर्ण आनन्दो येन यत्र यस्मादिति वा, तस्मात्कृष्ण एवं गतिमास्त्वित्यः । देवादिसायुज्येपि तेषां प्रकृत्युपधानेन तन्मुक्तेः सगुणत्येन ' आवह्म- भुवनाल्लोकाः पुनरावर्तिनोऽर्जुने निभगवदास्यात्पुनः संसारसंभपेनाल्यानन्दत्वेन स्वर्ग- दमुक्तित्वात् । कानमार्गक्षरमुक्तनिर्गुणत्वेप्पक्षास्य गणितानन्दत्वेनाल्पत्यात क्षुषितस्पात्प- सभोजनमभोजनमेवेतिपदभयोजकत्वात् । अज्ञातार्थद्रस्वार्थक प्रत्ययेनाव्यक्तित्वं पुरुषो- तमापेक्षयापलं च मूचितम् । पूर्णानन्दत्वेन निर्गुणमुक्तिदायकत्वेन कृष्ण एवं शरणं भाव- नीय इति सिद्धम् । तदुक्तं श्रीमदाचार्यचरणैः 'निर्गुणा मुक्तिरस्माद्रि सगुणा सान्यसे- येति । ननु ताविमो भगवतो डरेशाविहागतौ । भारव्ययाय च भुवः कृष्णौ यदुकुरू- द्व 'कलाभ्यां नितरां हरेः' इत्यादिनांश्चत्वायनादेहस्य च त्रिदिवेशादावपि पाश्चमी- तिकलजन्यत्वनियमेन जन्मश्रवणान् सुखस्यात्मगुगत्वेन भेदाय कयं पूर्णत्वं, कथं चानन्द- रूपत्मानन्दवर तजनकर या परं वक्तुं शक्पपिति चेत् , मैवम् , 'ताविमादित्यादीना. मानवगयात् । तथाहि भगवान् भक्तानापार्तिनाशाय सुखदानार्थं च प्रकटः भुवो भार- व्ययायेहानयोः कृष्णार्जुनयोस्ताविमौ भगवतो हरेशौ चागतौ कृष्णयोयदुकुरुद्वयोः पवि- तृत्त्वाद्यदुकुरूदही कृष्णौ च नातौ, यत आगतौ तत्र यदुकुरुगादत्वाभावात् । तत्सत्कार्यकर- णार्थ गृहेषु भगवनस्तत्तदनापेक्षणादनयोरपि सङ्कर्षणांशत्वेन भूभारहरणार्थमपेक्षणात् । अंशयोरेवावतारत्ये पूर्णवायाये कृष्णस्तु भगवान् स्वयम् 'वसुदेवगृहे साक्षागवान् पुरुषः पर: 'विदितोसि भवान् साक्षात्पुरुषः प्रकृतेः पर इत्यादिकं विरुध्येतात्र चकारश्च व्यर्थः टिप्पणम् । ब्रह्मानन्दस्य गणितत्वादित्यर्थः । पूर्ण आनन्दो येनेति । मर्यादापुष्टिस्यस्पति शेषः । येनेति करणे तृतीया । ननु करणस्य व्यापारवचनियमात्कयषस्य फलोपथानासाधारण- कारणत्वमिति चेत् , अत्रोच्यते, पत्र भगवान् साधनं कारपिय फलं प्रयच्छति तत्र भगवतः करण, प्रयोज्यमटत्युपहितप्रयोक्तृधर्मस्य साधनकारयितृत्त्वस्य तजन्यत्वेन व्यापारवादिति । पूर्ण आनन्दो यस्मादिति । पुष्टिस्थस्यैत्ययः । हेलोनियापार- साधारणत्वात् । ननूभयोरपि मुख्यफलपासिवत्वेन को वा विशेषः पुष्टिस्यस्येति चेत साधनानपेशत्वस्यैव विशेपादित्यलं बहुना । तापिमावि'यारम्य 'प्रकृतेः परः। इस तानि वचनानि-ताविमौ वै भगवतो हरेशामिहागतौ । भारव्ययाय व भुवः कृष्ण यदुकुहौ' 'भौ भूः पकमस्याच्या कलाभ्यां नितरां हरेः' ' अन्ये चांशकलाः पुंसः कृष्णस्तु भगवान् स्वयम्' 'वसुदेवगृहे साक्षात् भगवान् पुरुषः परः । जनिष्यते तत्मिय संभवन्तु सुरखिय' 'विदितोसि भशन साक्षात पुरुषः प्रकृतेः परः । केवलानुभवानर स्वरूपः सर्वबुद्धिमिति । चकारश्च व्यर्थः स्यादिति । 'भारम्ययाय च भुवः' इन २० कृष्णाश्रयस्तोत्रम् । प्रकाशः। स्यात् । तथाचोक्तं श्रीभागवत तत्वार्थदीपेः 'सर्वातिरिक्तरूपेण नरः स्वायेशधारकः । तपोऽतिरिक्तकार्य तु पूर्णे कृष्णे न चान्यथेति। 'सर्वे'ति । व्याख्या तु 'सर्वकार्यकर्तृत्वास- वरूपो नारायणः । पुष्टिकार्यकर्तृत्वादतिरिक्तोवतारः । तत्राधिकारमाशय परि- हरति 'स्वावेशे'ति । नरस्तु तादृशमशं विभर्ति न त्ववतार इत्यर्थः । 'ताविमौ वै भगवत' इति मूलवाक्यं 'कृष्णस्तु स्वयं भगवाने तेन विरुध्यते इति सपारने 'तपोतिरिक्तेति । मार्गद्वयस्थापनार्थमवतीर्णोपि पूर्णमाकटयाभावे कार्य न सेत्स्यतीति पूर्ण कृष्ण एव प्रविष्टावंशाविति मूलार्थ' इति । 'वभावि'त्यत्र कलाभ्यामंशाभ्यां भूर्वभौ हरेः सम्ब- न्धिनी भू: पदैरनुभावैर्लीलाभिश्च नितरां वभावित्यर्थ इति । अन्यथोक्तवचनविरोधात् । देहस्य पाञ्चभौतिकत्वजन्यत्वनियमस्य माकृतविपयत्वादमाकृते यथावेदमेवार्थसिद्धे, अन्यथा ज्ञानेच्छादीनामनित्यत्वनियमानित्यं ज्ञानादिकमपि तत्र न सिद्धयेत् । ननु ज्ञानादिभिरेव जगत्कर्तृत्वोपपत्तौ प्रत्यक्षवाधाच किमित्यानन्दमयो नित्यो देहोङ्गीकार्य इति चेत, न, कर्तृवनिर्वाहार्थमेव व्याप्तिवलेन नित्यज्ञानवत्तथाविधदेहस्वीकारात् । नित्यापरिच्छिन्नतनोः प्राकट्यस्यैव जन्मत्वेन जन्यत्वाभावात् । आनन्दादयेव' 'नित्य विज्ञानमानन्दं ब्रह्म 'स यथा सैन्धवधन:' 'आनन्दं ब्रह्मणो रूपम् ' 'आनन्दमयोभ्या- टिप्पणम् । भक्तातिनाशसुखदानादिकं चकारेण गृह्यते । तच पुष्टिपुरुषोत्तमकार्यमेवेति तदतिरिक्त- कल्पनायां चकारो व्यर्थः स्यादित्यर्थः । व्याशिवलेनेति । अन्वयव्यतिरेकव्याप्तिबलेने- त्यर्थः। तथाहि यत्र यत्र कर्तृत्वं तत्र तत्र देहवत्त्वं यथा कुलालादावित्पन्वयव्याप्तिः। यत्र यत्र देहवचाभावस्तत्र तत्र कर्तृत्वाभावः, यथा मुक्तात्मनीति व्यतिरेकव्याप्तिरिति । न चापयोजकत्वम्, देहवत एव कर्तृत्वात् , न ह्यशरीरी कुलालः शक्नोति कार्य कर्तुम् । वस्तुतस्तु आनन्दमात्रकरपादसुखोदरादिः' 'सर्वतः पाणिपादान्त'मित्यादिविरोधः । 'अशरीर शरीरेत्रित्यादयस्तु पाञ्चभौतिकशरीरनिषेधपराः । न च ब्रीहियववत् विकल्पसंभवः रमेयापहारनिवन्धनाभावात् । ननु गीतायां चतुर्दशाध्याये 'नान्यं गुणेभ्यः कर्तार 'दा द्रष्टानुपश्यति' इत्युपादाय 'गुणेभ्यो नान्यं कर्तारमनुपश्यत्यपि तु गुणा एवं पाणि कुर्वन्तीति' श्रीधरस्वामिव्याख्यानाद्धेतुनिरूपितव्याप्तावप्यतिव्याप्तिरिति चेत् , अत्र वदामः-गुणानामपि देवत्वेनैव तथाकथनं न तु केवलतया । अत एवाग्रे 'गुणा- 'तीत्ये' त्यस्य व्याख्याने 'देहायांकारः समुद्भवः परिणामो येषां ते देहसमुद्भवास्ताने- स्त्रीनपि गुणानतीत्याविक्रम्य'त्युक्तं श्रीधरस्वामिभिरिति विद्वांस एव विदाकर्वन्तु । आनन्दमात्रे'त्यारभ्य 'मुदितवक्त्र' इत्यन्तानि वचनानि । 'निर्दोषपूर्णगुणविग्रह आत्म- .
अफाशतट्टियणसहितम् । साद'माद च तन्मात्रम् केवलानुभवानन्दसरूपः' 'आनन्दमात्रकरपामुखोदरादि 'चहनि सन्ति नामानि 'थ्या चोपनिषद्भिव न चान्तर्न पहिर्यस्येत्यादिश्रुति- न्यायपुराणवाक्यसहसः प्रमाणामकरणीयलीलाभिश्व पूर्ण एव देडमाणेन्द्रियान्तःकरणा- त्यरूप एवानन्दरूपो ज्ञानरूपः पुरुषोत्तमो न त्यात्ममात्रमिति निर्वाधमयोधि । नित्य विज्ञान मिति 'पूर्णमेवावशिष्यते' 'भवानेकः शिप्पये शेपसंज्ञ' इत्यादिना नित्पल, 'एर होवानन्दयाती तिश्रुतेरानन्दजनकत्वम् । 'कृष्णः प्रीतमनाः ।। 'वीक्ष्यासीदु- त्तमा मोतिः' 'जातही 'मुदितक्त्र उपयाती'त्यादिनानन्दवचं चैति नानुपपन्नं किश्चित् । तथाप्यानन्दत्वदेहत्वयोर्विरोध इति चेत्, न, स्वस्वाधिकरणे प्रमाणैरेकयो- भयोः सिद्धयसिद्धियां च विरोधाभावात् । तथाप्यानन्दस्प धर्मिरूपत्वे कथं धर्मरूपत्व- मिति चेत् स यया सैन्धवयनः ' ' यः सर्वज्ञः' इतिश्रुतिभ्यां ज्ञानरूपत्वज्ञानाधार- ववदानन्दरूपलतदाधारवयोरविरोधात् । श्रीमदस्मत्प्रभुचरणैः सर्वमेतथवा तथा विद्ध मण्डने अपश्चिवमिति नात्र अपञ्च्यते ॥ ८॥ टिप्पणम् । तन्नो निश्चेतनात्मकशरीरगुणैश्च हीनः । आनन्दमात्रकरपादमुखोदरादिः सर्वत्र च स्वग- तभेदविवर्जितात्मा' 'बहूनि सन्ति नामानि रूपाणि च सुतस्य ते । गुणकर्मानुरूपाणि वान्यहं घेद नो जनाः 'त्रय्या चोपनिषद्भिश्व सांख्ययोगैश्च सात्वतैः । उपगीयमा. नमाहात्म्य हरि सामन्यतात्मजम् ' 'न चान्तर्न पहिर्यस्प न पूर्व नापि चापरम् । पूर्वापर वहिवान्तर्जगतो यो जगच यः' 'नटे लोके द्विपराधावसाने महाभूतेष्वादिभूतं गतेषु । व्यक्तेऽव्यक्तं कालवेगेन यात भवानेका शिष्यते शेषसंज्ञः' एवं वृन्दावन श्रीमान् कृष्णः, प्रीतमनाः पशून । रेमे संवारयन्नद्रेः सरिद्रोधस्सु सानुगः' 'वृन्दावन गोवर्धन यमुनाः लिनानि च । वीक्ष्यासीदुत्तमा मीती राममाधवयोर्चप' 'सहवलः सगवतसविलासः सानुष क्षितिभृतो प्रजदेव्यः । हर्षयन् यहि पेशुषेण जातहर्ष उपरम्भति विश्वम्' 'यदुपतिरिद राजविहारो यामिनीपतिरिक्षेप दिनान्ते । मुदितवक्र दपयाति दुरन्तं मोचक बनगवां दिनतापमिति ॥ ८॥ . मकाश: ननु विवेकधैर्याभ्यां स्थित्वा भक्तिकरणे मगवानपि यसो भवतीति किरि देन्येनाश्रयः प्रार्थ्यते इत्याशङ्कय सर्वमनोरयपूरकत्वात्सर्वफलाथै काम्यत्वात्कार बदन्ती भार्ययन्ते विवेकेति ।
૨૨ कृष्णाश्रयस्तोत्रम्। विवेकधैर्यभत्त्यादिरहितस्य विशेषतः। पापासक्तस्य दीनस्य कृष्ण एवं गतिर्मम ॥९॥ पूर्व प्रमुस्वरूपविचारणाथयमुक्या जीवसरूपतिनारेणाधुनोच्यते । भगवान् स्वेच्छया सर्व फरिप्यति न मार्थनीय इतिनिधपो विवेकः । भक्तिविरोधिदुःखनि- वृत्युपायाकरणेन त्रिदुःखसहनं धैर्यम् । भक्तिः साधनरूपापि । आदिपदात्पुष्पम् । विशेषत इति । तत्साधनैरपि रहितस्य । यदा, यत्किञ्चित्सन्थेपि विशेषतो नास्तीति न फलसिद्धिः । किञ्च, दीनस्य दरिद्रस्यातः सर्वसापनरहितस्य । पापे आसक्त- स्येति विपरीतसाधनवतो न तु मामादिकपापस्य । कृष्ण एवेति पूर्ववत् । अन्यत्र यत्किनिद्वगुण्येपि वैफल्यादेवताकोपादनिष्टजननादल्पदत्वाचेशस्य विकादिफ दत्या स्वतो वा सर्वफलदायकः परमकृपालुः कृष्ण एवेति स एवाश्रयणीय इति हृदयम् । ननरमच्छब्दस्योचारयित्वाचकत्वादनाचार्यचरणानां तयावाद्विशेषणान्यसङ्गतानीति चेत्, ने, अस्यान्यार्थत्वेनान्याधिकारेण कर्थनाद्भगवता वेदेषु 'प्रयतपाणिः शरणं प्रपद्ये भूयिष्ठान्ते नम उक्ति विधेम' 'स्वस्ति मेस्तु वनस्पते' इत्यादौ यजमानाधिकारेण कयन इवादोपत्वादिति सर्वमनवयम् ॥ ९॥ ननु सर्वथा निःसाधनस्य शरणागतावपि कथं सीहितसिद्धिः, भगवाँस्तु तत्त- स्कृतिसापेक्षस्तस्मै तस्मै फलं ददाति, प्रत्युत भगवदेकशरणस्य तदेकमनसो देवान्त- रानादरेण तत्कृता अपि विघ्नाः स्युः ‘श्रेयांसि बहुविनानी तिवाक्यादित्याशय मोक्षप्राप्यत्वान्नोक्षरूपत्वं विज्ञापनं च बदन्तः समादधते सर्वसामर्थ्यसहित इति । सर्वसामर्थ्यसहितः सर्वत्रैवाखिलार्थकृत् । शरणस्थसमुद्धार कृष्णं विज्ञापयाम्यहम् ॥ १० ॥ टिप्पणम् ।
मकाशनट्टिप्पणसहितम् । ૨૨ प्रकाशन , सर्व पूर्ण सामर्थ्य संगां सर्वेषु वा, तत्सहित इतीच्छपा तोपि सर्व फरोति । यदि मर्यादा रक्षेत्तदा भगवत्वेन ज्ञानेश्वर्यधर्मादीनां सिद्धसातत्तलापि तत्त- फलं दद्यात् । कदाचित्पूर्वस्थितमपि स्वस्मिन्नयेत्, सर्वत्र स्वस्यैव सामान १. 'पद- विभूतिमत् । " पत्त: सर्व प्रवर्तत ' इत्यादिवाक्यैः सर्व सामर्थ्य येषां सुदर्शनादीनां ते: सहित इति वा, तैरपि भक्तानिष्टनिवारणात, 'अव्याहतानि कृष्णस्येत्तिवाक्यात् । ननु सामथ्र्य सत्यपि कदाचिदानितं न रखेव , मर्यादयैव वा यदि फलं दधाचदा किमाथयेणेस्थत आहुः सर्वत्रैव देशेषु वर्णेषु आश्रमेषु कर्मादिषु पाखिलान्किरोती- सखिलार्धकृत ताछील्पादौ किए ' सकृदेव' 'वेदारगारपुत्राने त्यादिवाक्यः सकृदपि शरणागतं भगवान् रक्षति किं पुनर्भजनः । मर्यादयापि फलदानन्यनरपेक्ष्येण भजतो भगवान्मर्यादानपेक्षा फलं प्रयच्छति, विहिलादिना भजतो मर्यादासापेक्षो 'ये यथा मां मपद्यन्त' इति तन्मादाया एव तादृशीस्वान्न क्षतिः । अत एव 'ग्रज- स्योवाह वै हर्पम् ' ' विक्रीटे जनयन्मुदम् ' 'मनोरयान्वं श्रुतयो यया ययुः' 'मुकुन्दो. मुक्तिं ददाती त्यादि तथा न ते माव' 'पयों मृत्युपालभीतः ,पलायन्' 'पतति मनसि यस्य त्यादिवाक्यैः कालयमादयोपि चेद्भगवदीयान्निवर्तन्ते कुतस्तरां पुनरन्ये विघ्नकर्तार इति न किश्चिदूपणम् । पूर्वोक्तं शरणे स्थित सम्पगनायासेनोहरति, सकृदागतं तु ययाकश्चित् । ईदृशं श्रीकृष्णमहमाश्रयं विज्ञापयामि । 'कृष्णेतिसम्बोधनपाठे शरण- स्थसमुद्रारं विज्ञापयामीत्यन्वयः । अनेनेश्वरे दीनभावः कर्तव्य इति सूचितम्, दीनभा- चेन कृतस्यैवेश्वरतोपहेतुत्वात् ॥ १० ॥ टिप्पणम् । 'ययदारभ्य 'अव्याहतानी'त्यन्तानि वचनानि 'यद्यहिभूतिमत् सच्चे श्रीमर्जि- तमेव वा । तत्तदेशवमच्छ त्वं मम तेणेशसंभवम्' 'अई. सर्वस्य भभवो पत्तः सर्व भव, तते । इति मत्वा भजन्ते मां बुधा भावसमन्विताः' 'अव्याहवानि कृष्णस्य चमादी पायुधानि तम् । रक्षन्ति सकलापद्भ्यो पेन विष्णुरुषासित' इति । ताच्छील्या झिविति । 'आकेरलच्छोलतद्धर्मतत्साधुकारिष्वितिस्मरणान् । 'सकृदेवे त्यार तत्तया साधयिष्यामी'त्यन्तानां वचनानां सङ्कहा- सकृदेव प्रपन्नाय तवास्मीति याचते । अभयं सर्वभूतेभ्यो ददाम्पतहतं मम' 'ये दारागारपुत्रासपाणान् विचार, - परम् । हित्वा मां शरणं याताः कथं वांस्यकुमुत्सहै ','ये यथा मां अपयन्ते सांस्त, भजाम्यहम् । मम वर्मानुवर्तन्त मनुष्याः पार्थ सर्वशः' दर्शयंस्तहिदां लोके आर भृत्यवश्यताम् । अजस्योवाह थे हर्प भगवान् वालचेष्टितः ' ' ततस्तु भगवान् को, . ।
२४ कृष्णाश्रयस्तोत्रम् ।. टिप्पणम् । वयस्यत्रजवालकैः । सहरामो वनस्त्रीणां चिक्रीडे जनयन्मुदम् । तदर्शनाहादविधूत- हुद्रुनो मनोरथान्तं श्रुत्यो यथा यपुः । स्वैरुत्तरीपैः कुचकुडमाङ्कितैरचीवलपन्नासनमात्म- वन्धवे । 'राजन् पतिप्रुरलं भवतां यदूनां देवप्रियः कुलपतिः फच किकरो कः। अस्त्येवमङ्ग भजतां भगवान् मुकुन्दो मुक्तिं ददाति कहिचित स्म न भक्तियोगम्' 'तथा न ते माधव तावकाः क्वचिद् भ्रश्यन्ति मार्गाचयि यद्धसौदाः । त्वयाभिगुप्ता विचरन्ति निर्भया विनायकानीकपमूर्धसु प्रभो' 'मो मृत्युव्यालभीतः पलायन सर्वान् लोकान् निर्भयानाध्यगच्छत् । त्वत्पादाब्ज भाप्य यदृच्छयाय स्वस्यः शेते मृत्युरस्मादपैति " वसति मनसि यस्य सोन्ययात्मा पुरुषवरस्य न तस्य दृष्टिपातः । गतिरथ मम वा क्वास्ति चक्रमतिहतवीर्यवलस्य सोन्यलोकः॥१०॥ प्रकाशः। . 'दश वै पशोः प्राणा आत्मैकादश' इतिश्रुतेः माणानामिव सर्वसाधकत्वं ज्ञाप- यितुं दशभिः श्लोकः स्तोत्रं निरूप्य फलस्यात्मवदक्षयत्वं ज्ञापयितुमेकादशेनात्मरूपेण- तत्स्तोत्रपाठफलमाहु:- कृष्णाश्रयमिदं स्तोत्रं यः पठेत्कृष्णसन्निधौ । तस्याश्रयो भवेत्कृष्ण इति श्रीवल्लभोऽब्रवीत् ॥ ११ ॥ कृष्ण आ समन्तात् श्रीयते सेव्यतेनेन, कृष्ण आश्रयो येन यस्मादिति पति कृष्णाश्रयम्, इदमेव कृष्णाश्रयं यथार्थनिरूपकत्वान्नान्यत् । कृष्णसन्निधौ तनिमित्त चा, इदं यः पठेत् तस्य कृष्ण आश्रयो भवेत् । अत्र 'हेतुहेतुमतोर्लिङ्' इद- मिति नान्यपाठेनेदं फलं, स्वरूपाज्ञानात् । नन्वल्पायासादेतस्तोत्रपाठमात्रेण कथमेत- :.त्फलं स्यादित्याशङ्कयाह:-श्रीवल्लभ इति । इदमब्रवीत् अवदत् । स्वस्य भगवत्स्व- रूपाभिज्ञत्वाद्भगवता सर्वोद्धारार्थ प्रकटितत्वादुद्धारकस्वरूपत्वाच नावाप्रामाण्यशङ्का, नहि भगवान् सत्यवाक् स्ववाचमन्यथाकरोति । यत्र प्रसङ्गान्नारदकृतं 'तत्तथा साधयि- यिष्यामि यद्गीतं तन्महान्मने ति सदनुग्रहो भगवान् स्वकृतमिव मन्यमानः पुरुषोत्तमः स्वयं व गत्वा नलकूबरमणीग्रीवोद्धारं कृतवान्, तत्र स्वयं सर्वार्थ प्रकटितस्य स्वस्वरूपस्य तौ वचने वा किं किं न करिष्यतीति तत्कृपायां सर्वं भवतीति सर्वमनवद्यम् ॥ ११ ॥ टिप्पणम्। 'देवपि प्रियतमो यदिमौ धनदात्मजौ । तत्तथा साधयिष्यामि यदीतं तन्महात्मनेति' ॥११॥ १ श्रुतिपदं कचिन्नास्ति । २ स्ववच इति पाठः कचित् ।
प्रकाशवट्टिपणाहितम् । २५ प्रकाशा श्रीमदिलनाथपादकमले संवन्ध भत्त्या मुदा कृष्णकाधियोय नातवरणान् तादृपितृव्यानपि । श्रीकृष्णाश्रयसंज्ञके स्तुतिवरे कल्याणरायाभिषः श्रीगोचिन्दसुतः प्रकाशमकरो यान्मुदे सद्धियाम् ।। १.॥ इति श्रीविठ्ठलनाथचरणकमलैकतानश्रीकल्याणरायविरचितः कृष्णाश्रयस्तोत्रप्रकाशः समासः । टिप्पणम् । दुरीकरोति विकटं किल सङ्कटानां सर्दु विशंकटतरं वरसेवकानाम् । यत्रामरागमणिपर्यविराजमानं तदेकटेशमुकुटं प्रकटं स्टामः ॥ १ ॥ निखिलपण्डिसमण्डलमण्डितं हरिमुखानसरोरुहमारकरम् । अतुलमङ्गलनामविराजितं जनमनोहररूपमहं भजे ॥२॥ श्रीमत्कल्याणरापाणां नमस्कृत्य पदद्वयम् । कृष्णाश्रयमकाशस्य तत्मणीतस्य टिप्पणम् ।। ३ ।। गुरुश्रीवालकृष्णानामात्मजेन सतां मतम् । "कृत गोविन्दराजेन नाम्ना तत्वनिरूपणम् ॥ ४ ॥ इति श्रीमत्कल्याणरायचरणकोकनदमधुपायमानान्तःकरणतिरो. पनामकबालकृष्णभदात्मजगोविन्दराजकृतं तत्त्वनिरूपणाभिधं कृष्णाश्रयप्रकाशटिप्पणं समाप्तिमगमत् ।
श्रीकृष्णाय नमः। श्रीगोपीजनवलभाय नमः। श्रीमदाचार्यचरणकमलेभ्यो नमः । कृष्णाश्रयस्तोत्रम् । श्रीमद्वारिकेश्वरचरणप्रणीतविवृतियुतम् । पशुपतिकृतिभिर्ये भ्रंशिता मुग्धचित्ता- स्तदनुस्तकृतीन स्वाज्ञानतः पातुमिच्छन् । अवददविकृतं यः स्वागर्म सर्वभद्रम् तमहमतिदयालु वल्लभाख्यं नतोस्मि ॥१॥ विरश्चिकृष्णनारदैनिरूपितभृशं सदा चिरन्तनीयसाधनैर्विसम्मतं कलिं विभुः । विलोक्य सर्वतोधिकं निजागम ततान यः सदा सुसंमतं सतां विशेपतः कलौ युगे ॥२॥ ननु साक्षात्परम्परया च भगवत्माप्तिसाधनानां यहूनां विद्यमानत्वात्तानि विहाय किमित्याश्रय एव योध्यते, किच, क्रमेण नवविधलीलाप्रवेशज्ञानानन्तरं ह्याश्रयस्तज्ज्ञानं चा स्वत एव भविष्यतीति किमिति तत्प्रतिपादकं स्तोत्रमुच्यते तत्राह-सर्वमार्गेप्यिति । सर्वमार्गेपु नष्टेषु कलौ च खलधर्मिणि । पापण्डप्रचुरे लोके कृष्ण एव गतिर्मम ॥ १ ॥ तथापि निरोधस्य सर्वापेक्षया वरीयस्त्यान्मुक्तेरपि लोके तथात्वात्तिकमिति तौ विहाया- श्रय एव निरूप्यते अत्रोच्यते 'आभासश्च निरोधश्च यतश्वाध्यवसीयते । स आश्रयः परं 'झ परमात्मेति शब्यते 'या या साधनसंपत्तिः पुरुषार्थचतुष्टये । तया विना तदामोति श्री नारायणाश्रय!' 'सर्वमाश्रयतो भवेदित्यादिवाक्यैराश्रयस्यैव सर्वसाधकत्वेनोक्तवा- "सर्वसाधनफलरूपाभ्यां स एव परिणत इति तमेवाह-कृष्ण एव गतिर्ममेति । गतिशब्दः क्रियावाचका, वैन गतिरित्युपलक्षणं किन्तु स एव भक्तिमार्गनिर्वाह तिबन्धनिवर्तकतया परमभक्तिप्रतिपादकसाधनीभूततनुवित्तजादिमतिपादकशरीरतन्नि- कक्रियारूपो भवतित्यध्याहारः। कयश्चित्पूर्वमाश्रयोन्मुखं ज्ञात्वा पश्चाजीवैस्तदा-.
२७ " श्रीमहारिक घरचरणमणीतवित्तियुतम् । श्रयः कर्तव्य इति नार्थः, सर्वतः सर्वाशेन कार्यसिद्धयभावं निश्चित्य स्वस्मिथ तयात्र- निश्चये सत्यस्माकं सर्वया लौकिकालौफिकफलसाधकोऽस्मत्कृतिनिरपेक्षः स भवतु । तयाभवनं तु तदिच्छामाध्यम् । भगवानाश्रयो भवतु मा वा, अस्माभिस्तदानयः सर्वधा भाव्यमेवेति निधित्याध्यः सर्वथा कार्यः । एवंअपनानामाश्रया सर्वथा भवत्येव, अन्यथा 'अनन्या' इति न मे भक्तः प्रणश्यति इनिभगवद्वदं भज्येत । एवं सति सर्वेफलरूपरत्व- याऽऽश्रयणोक्या साधनीभूतः क्रियते ततोधिकस्य फलस्याभावात, मत्युत पश्चिकमिये- तिन्यायेन स्वरूपहानिमसनाः स्यादन घूमः-कृष्ण एव गतिर्ममेति । एवंच परमभक्तिस्तु कृष्णकालिका तदनुरदकलभ्या च, तथासति तसिद्धिप्रतिवन्ध निवृत्तिपूर्वक तसिद्धी तत्साधनादिनिर्वाहकसायनतामापन्नो न हीनतामापयते । यथा--'योगमायामुपाश्रित' इत्पन्न रसमार्गऽन्तरङ्गाश्रयणं न दोपाधायक तन्मार्गस्यैव तयात्वात् । एवं भक्तिमार्गीयसशिसाधने भगरत्तो न साधनरूपत्वमापयत इति सिद्धान्तः । यथा 'भा सन् भ्रियमाणो विभती स्या भगवतस्तत्सम्बन्धिनां च परस्परमाधारायेषभावे पोप्यपोपकभावे च नोभपोर्मध्ये कस्यापि हीनत्वं किन्तु तदेकपोपकत्वं तदेकपोप्यत्वं च भावत उत्कांधायक, एवं तन्मार्गपक्षपाताभक्तिमार्गे सर्वांशेन फलत्वमापनस्य स्वस्य साधनतास्वीकारो न हीन- त्वसंपादक इत्येवमभिसंधापाचार्यरक्तमितिभावः । धर्मादीनां व स्वसाधनसहितानामेद फलसायकत्वं, तत्र देशकालाइयो धर्मसाधनं तैपामिदानीमतथात्वं सर्वया निरूपयन् पूर्व कालस्यातयात्माह-सर्वमार्गेषु नटेष्विति । कलौ सर्वेषु मार्गेषु नयेषु सत्सु देवैः कृष्ण एव गतिमित्येवरूप आश्रयः कर्तव्य इति भावः । मार्गोत्च्या तेषां साङ्गानां स्वस्था- धिकारानुसारेण फलमापकत्वं निरूप्यते । नाशस्तु तेषां सर्वथा फलासाधकस्वरूपः । फलो उत्तन्माणे किञ्चिदुत्तमानां तद्विध्याचरणेपि तत्फलाभाचं दृष्ट्वान्येपामनुपलब्धिप्रमाणेन । ततो विश्वासापगपाद्वारातोपि तदाचरणपरम्पराया नाशः स्यादितिभावः । ननु सत्य- युगादीनां यथा धर्मसापकत्वं तथतस्यापि तयावे को दोपः कालत्वस्याविशेषादित्यत' आह खलधर्मिणीति । खलाः सर्वथा वाह्याभ्यन्तरमेदेन धर्मादिकृत्यनुसन्धानरहिताच. अनुसंधानेपि द्वेषायमेव तदनुसन्धानं, न च स्वस्थान्येषां वा चिकीर्पाबुद्धिजनकत्येन अत एव 'नन्तं गोमिथुनं पदेति तस्यासाधारणो धर्मो निरूपितः । ननु सर्वया धर्मा स्यक्तारः केचन भविष्यन्ति न तु सर्वे तेन तदुाया सर्वे कथं तादृशा भविष्यन्नीत्य- आह पापण्डप्रचुर इति । येपि लोके सन्मार्गायावरणं कुर्वन्ति महान्तोपि तेषि मयार मनुसृत्यैव कुर्वन्ति, अन्यया तदा लोके पूज्यत्वं न स्यात् । पूर्वपत्पमाधुर्ये तत्र र भाषेप्यन्यानुरोधेनाप्यन्यथाचरणे स्वबुद्धिरपि तथैव जातेति तन्त्र स्वयं श्रद्धालको भूल न्येषामपि तथात्वं संपादयन्तः पश्यात्यक्तहियो भूत्वा सुखेन तथाकुर्वन्तीति भावः " २८ कृष्णाश्रयस्तोत्रम् । एतेनान्यानुरोधेनापि सन्मार्गत्यागः योन्यया सन्तमात्मानमन्यथा पतिपद्यते । किं तेन म कृतं पापं चौरेणास्मापहारिणे तिन्यायेन सर्वथा स्वनाशक इति ज्ञापितं भवति । तेन पावाहिकभक्तिमार्गोपि नष्ट इति ज्ञापितम् । चकारः समुच्चयार्थः । तथाहि-माधि सर्वे नष्टास्तादृग्या कलियाविर्भूतः, लोके पापण्डश्च प्रचुरः । एवं सर्वथा सर्वनाशोप- स्थितौ विविधशङ्कास्पदीभूतान्तःकरणान् स्वानुपदिशन्ति श्रीकृष्ण एव गतिर्ममेति । अवतारान्तरं तु मर्यादाल्पमित्येवं निःसाधनानां धर्मादिप्रतिकूलसाधनवता वा सर्व प्रतिबन्धनित्तिपूर्वक तवास्मी'त्युक्तिमात्रेण भक्त्यैकलभ्यः पुद्धिपुरुषोत्तम एवोद्धारं कर्तु शक्त इत्येवकारेणांशकलावतारव्यवच्छेदपूर्वकं कृष्ण एव गतिर्ममेत्युक्तमेवमपि ज्ञेयम् । एवं कालस्य धर्मादिविरोधित्वमुक्त्वा देशस्यापि तयात्वमाद-म्लेच्छाका- न्तेष्विति । म्लेच्छाकान्तेषु देशेषु पापैकनिलयेषु च । सत्पीडाव्यग्रलोकेपु कृष्ण एव गतिर्मम ॥२॥ यथा कालत्वस्याविशेषेपि सत्यादिरूप एव कालो धर्मसापको भवति तथा देशत्वस्याविशेषेपि तीर्यादिरूप एवं देशो धर्मादिकरणे साधनीभूतः । तीर्थमपि जल- स्पलभेदेन द्विविध, तत्र पूर्व पुण्यक्षेत्रादिरूपस्य देशस्य पूर्ववदतथास्वमाइ-म्लेच्छा क्रान्तेष्विति । साक्षात्परम्परया च देशाः सर्वे म्लेच्छ आ-समन्तात्-क्रान्ताःतत्तत्पु- ण्यक्षेत्रादिधर्मस्थानेषु तद्धर्मापगमार्थ द्वेपेण विपरीतकृतिपूर्वक स्थितिराक्रपणम् । कुत्र- चित्पुण्यादिभूमौ साक्षात्तत्रोत्पन्नविषयभोक्तारो भूत्वा तत्रैव तिष्ठन्ति कुत्रचित्तत्सन्नि- हितेषु । एवं तेषां साक्षास्थित्या स्त्रोत्पन्नविषयाणां तदेकभोग्यत्वेन च सर्वदेशानामधर्म- साधनलं जातम् । सर्वथा म्लेच्छीयत्वाचेपाम् । म्लेच्छा अनाविष्टाः सन्तः सर्वथा धर्मा- दिविरोधिनः कलहप्रियाश्च 'मनसा वचसा कृत्या सद्धर्मपरिपन्थिनः । म्लेच्छदेशेषु संजाता भक्ष्याभक्ष्यविचारकाः' । ननु तत्रोत्पन्नाः सर्वे न तथाभूतास्तद्विपरीतानां बहूनां श्यमानत्वात् , यथा म्लेच्छसंसर्गात्सर्वोपि देशोऽधर्मजनकता यात एवं तद्विपरीतधर्मपतां जातीयानामपि संसर्गात्संयोगपृथक्त्वन्यायेन देशव्यवच्छेदेन कियदेशेषु धर्मसाधनता- स्त्विति चेचत्राह-पापैकनिलयेष्विति । सर्व एव देशाः पापैकनिलया जाता: जापानामेको निलयः स्थानं तादृशा जाताः । तेन कुत्रापि धर्मवार्ता न श्रूयते । यद्वा भास्त एव महीभोक्तारस्तदेकनिलयत्वात्तथा । येपि वद्विपरीतधर्मास्ते तु पूर्वजन्मनि गवा भूत्वा वेदनिन्दा कृतवन्त इति तादृशेषु जन्म प्राप्तवन्तोपि सत्स्येव पविष्टा तेषु । तेन सतामिव तेषामपि धर्मादिनियन्तृत्वाभावः सूचितः । ननु तदाक्रा- श्रीमद्वारिकवरचरणमणीववित्तियुतम् । २९ न्लेवपि देशेषु चातुर्वर्ण्यस्पापि विद्यमानत्वान्दोक्तृत्वप्रतियोगित्वेन त एव सतां धर्मादि- प्रवर्तने सहायाः कथं न भवन्तीति चेत्तत्राह-सत्पीडेति । चित्तस्थैये हि सर्वेषां स्वध- मानुसन्धान भवति । सतां चकारातदनुवर्तिनां च पीडया सर्व एव लोका व्ययाः । सतां मसले पीडासंभवात्तदभावे धर्मादि सिद्धधमागधग्रता । तयासति किं कर्तव्यमित्या- काक्षायामाह-कृष्ण एवेति । सर्वथा साधनाभावादमीभाषेपि भक्तिवत्कल्पतरुत्वमा- चलेन सर्वधर्ममार्गीयफलतोप्यधिकफलपापकत्वेन श्रीकृष्ण एवं गतिर्ममेत्येवल आश्रय एव सर्वथा कार्य इस्पाचार्याणां परमोक्तिरिति भावः ॥ २ ॥ एवं स्थलादिरूपनीर्याणामतथात्वमुक्तया जलादिरूपाणामपि नेपामतयात्वमाह- गङ्गादितीर्थवर्यपु दुष्टेरेवावृतेष्विह । तिरोहिताधिदेवेषु कृष्ण एवं गतिर्मम् ॥ ३ ॥ गङ्गादितीर्थवर्येष्विति । ननु 'गङ्गागडेती'त्यादिनोक्तमाहात्म्यवतां गङ्गादीनां विद्यमानत्वात् कथं संसर्गदोपा बाधन्ते तत्राह दुष्टैरिति । नहि गङ्गासमं तीर्थम्' 'या वे लसदित्यादिना न सर्वेभ्यस्तीर्थेभ्यो गङ्गाया एव वरीयस्त्वस्योक्तत्वादतीर्थानपि तीर्थी- कुर्वन्ती गक्षेत्र गच्छति । एवंविधान्यतथानातानि । किञ्च, अस्ति गङ्गायां विरूपत्वमा- घिदेविकादिभेदेन । तत्र तीर्थरूप तु दुष्टसम्बन्धादेव नष्ट, तथाहि-भगवता त्वं च रुदै'स्या- दिवाक्यगन्मोइनार्थ पशुपतेः प्रवर्तितत्वात्तत्र यया सर्व जीवन्तो मुमूवश्व मुग्धा भवन्ति तदर्थ सर्वथा चित्तशुद्धयभावसाधनीभूततीर्थसम्बन्धाभावार्थ शिवेन स्वगणा गङ्गादिषु स्थापितास्ते तु गणशस्तिष्ठन्ति तत्रत्यानां प्राणापगमे यथा तीर्थसम्बन्धो न भवति तथा ते यतन्ते । तत्सम्बन्धात्तीर्थरूपमेव नष्टं, तथाचोक्तं तैत्तिरीयके 'ये' तीर्थानि प्रचरन्ती त्यादिना । अत एव तत्र मतानामपि न तीर्यपरणफलमन एव तत्र मृतास पिशाचं ते प्राप्नुवन्ति न दोपादिनिवृत्तिः काश्यादिषु गुम्र्पूणां मनुष्या मारभ्य निरक्षामपि । ननु तत्र सतानामपि तारकब्रह्मोपदेशं शिव करोतीति तथा सति कथं जलस्थलरूपाणां तेषां न शुद्धिसाधकत्वं, सत्य, तत्तु पूर्वोक्त वकालाभावे न तु तद्वति । यद्वा 'वं चेतिभगवदुक्तः पूर्व शिवस्तथाऽकरोत्तदन तयाकरणे आताभङ्ग एव स्यादिति न तथा कृतवान् । तथापि निदर्शनस्पेदानी दृश्यमानत्वात्कथं न करोतीति तत्र शियोपि वैष्णवलाद्भगवत्सम्प्रतमेव सर्व करोति किच, तयोपदेश कुर्वन्नपि पूर्व वैष्णवस्थेभ्यसत्सङ्गेनापराधाद्वा दैत्यापेशे नाते स्वस्था माहात्म्यार्थपागन्तुकदोपपरिदारपूर्वक पूर्वरूपवासपादकत्येन भगवद्धाभिहत्यार र ये तीर्थानि प्रचरन्ति सृकापन्तो निषझिणः । य एतापन्नश्च भूयासच दिशो रुद्रा वितरित ३० कृष्णाश्रयस्तोत्रम् । एव तारकब्रह्मोपदेशं करोतीत्यर्थः । अत एव 'प्रायश्चित्तानि चीर्णानि नारायणपरा- मुखम् । न निप्पुनन्ती'त्यादिना भगवहिर्मुखस्य पवित्रीकरणसामथ्र्य तीर्थादिप्वपि नास्तीति जातेपि तत्सम्बन्धे न कृतार्या भवन्तीत्यर्थः । तथा चोक्तं निवन्धे 'तीर्थादायपि या मुक्तिः कदाचित्कस्यचिद्भवेत् । कृष्णप्रसादयुक्तस्य नान्यस्येति विनिश्चय' इत्यादि सर्वमनवद्यम् । ननु गङ्गादेराधिदैविकरूपस्य विद्यमानत्वात् कथं तादृशैरावरणं तीर्थ- रूपनाशो वा भवेत्तबाहुः तिरोहितेति । जलस्थलरूपेभ्य आधिदैविकं तिरोहित तस्माद्दष्टसंसर्गे अक्षरात्मकमपि तथैव जातम् । एवं सर्वेपी सर्वसाधनापगमे आश्रय एव साधीयानिति तमेवाहुः-कृष्ण एवेति ॥३॥ तथाप्यन्तरङ्गबहिरङ्गभेदेन सर्वधर्मप्रवर्तकानां सतां विद्यमानत्वात्कथं धर्मादि- नाश: स्यात्तत्राह- अहङ्कारविमूढेपु सत्सु पापानुवर्तिपु । लाभपूजार्थयत्नेषु कृष्ण एव गतिर्मम ॥ ४॥ अहङ्कारविमूढेष्विति । यदि तेपि तथाभूता भवेयुस्तदा कार्य सिद्धचेदेव तेषां स्वरूपमाह-परीक्षिति यस्मिन् विद्यमाने तच्छरणागतौ कलेरध्यवसायो जातः स एवाहङ्कार इदानीं सत्सु प्रविष्टः । यथैतत्सम्बन्धात्परमधार्मिकस्यापि विष्णुरातस्य कले: स्थानदानेन त्रिदोपोत्पत्तौ मौव्याद्राह्मणातिकमे बुद्धिर्जातै सतामपि तत्सम्बन्धात्स्त्र- धर्मपरित्यागे बुद्धिर्जातेत्यहङ्कारेण सर्व एव मुग्धा जाताः। एतेन कर्तणामप्यसाधकत्वमुक्तं भवति । यदि कर्तार एवाहङ्कारेण विमुग्धा जातास्तदा तत्कृतौ धर्माद्यसाधकत्वं किमाश्चर्य- मिति कैमुतिकन्याय उक्तो भवति । अल्पपौढथे प्रकारान्तरेणापि तदपगमः स्यात्तद- भावार्थ विशेपेण मूढत्वम् । तत्र निदर्शनं पापानुवर्तिष्विति । पापा निपिद्धकृतिभि- नर्मफलरूपतां प्राप्तास्तदत्तविषयभोक्तृत्वेनानुवर्तित्वम् । ननु तेपि स्वोपजीव्यान् परम- संजदिकं वोधयन्त इव दृश्यन्ते कथं ते तादृशास्तत्राह लाभेति । लाभार्थं या पूजा त्यामेव कृतप्रयत्ना न तु भगवत्कीर्तनादौ सन्तुष्टाः सन्तः परस्परं पूजयन्ति, तादृशी नापेक्षिता । यद्वा, स्वलाभाथै स्वपूजार्थं च यत्नो येपामेतेनैतादृशकतणां मन्त्रादीना- सत्त्वाद्रव्याणामप्यसाधकत्वमुक्तम् । अत्र कर्तृणां तदनुवर्तिनामेव द्रव्यादीनामसाधक- भारपूर्व कर्तृणामसाधकत्वमुक्त्वा पश्चाद्रव्याणामुक्तं, निमित्तोक्तौ नैमित्तिकोक्तिरपि सङ्ग- । तेन 'स्वयं नष्टः परान्नाशयती तिन्यायेन सतां परम्पराप्येवंरूपैव जाता। यदि तेन त्य परस्य वामुष्मिकं सिद्धयेत्तदा ते सन्त एव भवेयुः । वृत्यर्थं तेषां तत्करणात् भाशया च गृह्णन्ति मम नामानि चार्जुन । अमुख्यास्ते जनाः पार्थ दूरतः परिवर्जयेत्' + श्रीमहारिक चरचरणमणीतविकृतियुतम् । ३१ इत्यादिवाक्यैस्तेपामतयात्रपतिपादनार्मध्वजिवत्तकृतं सर्वपकृतमायं भवतीत्येवंरूप- सर्वनाश उपस्थिते सर्वेषां सर्व कार्यसाधक आश्रय एवाचायरुपदिष्ट इति तयाह कृष्ण एवेति ॥४॥ ननु गोपालादितान्त्रिक्वैदिकमन्त्रहरिदिनवतादीनां विद्यमानत्वाचेपांच राधा शोधकलाकथं न तैस्तेषां पूर्वरूपत्वं तबाह- अपरिज्ञाननप्टेषु मन्त्रेष्वव्रतयोगि। तिरोहितार्थदेवेषु कृष्ण एव गतिर्मम ॥ ५ ॥ अपरिज्ञाननटेष्विति । तेषां परितो ज्ञानमङ्गान्युररीकृत्य फलपर्यन्तं स्वरूपनि- र्धारः। किञ्च, गोपालादिमन्त्राणामपि वाराङ्गनावशीकरणादिकं फलत्वेन श्रूयत इस्पिन- योपशम साताशक्तियोगमधोक्षजे' इतिवचनाद्भगवन्मन्त्राणां विषयादिषयोगोऽपरि- ज्ञानादेव भवति तेनानर्थोपशमस्य भक्तियोगस्य विषयाशुपयोगे जात नटत्वम् । गुरु- कुलाबासब्रह्मचर्यशूद्राश्रवणानध्यायरादित्यपूर्वकपटिताना वेदमन्त्राणां 'अनिच्छयापि संस्पृष्टो दहत्येव हि पाचक' इतिन्यायेन सम्यक्तात्पर्याज्ञानेप्यध्ययनमात्रेणैव सर्व- साधकलाकथं नटत्वं तबाह-अवतयोगिध्विति । व्रतेप्वपोगो येषां, बतानामयोगो येष्विति वा । 'अधुना ह्यधिकारान्तु सर्व एवं गताः कलौ' इतिवचनात्कृतानामपि पामग्रतयोगित्वम् । ननु किमित्यायासपूर्वक कर्मवनादीनामसाधकत्वं साध्यते, किञ्च, 'दानवततपोहोम' 'जन्मान्तरसहस्त्रेष्वि त्यादिवाक्यैः कर्मवतादीनां भक्तावपि साप- कत्वं मन्तव्यं, तेन 'प्रक्षालनादि पङ्कस्य दूरादस्पर्शनं वरमितिन्यायेन पूर्वमेव तेपाम.. सांधकत्वं न वक्तुं शक्पमिति चेचत्राह-सत्यं, तानि चाक्यानि भावाहिकभक्तिपराणि नो न रोधयत्ति मां योगो न साङ्कथं धर्म उदय । न स्वाध्यायस्तपस्त्यागो नेष्टापू न दक्षिणा' 'मां हि पार्य व्यपाश्रित्य येपि स्युः पापयोनयः । स्त्रियो वैश्यास्त शूद्रास्तेपि यान्ति पर गतिम्' 'नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेघया न बटु श्रुतेने त्यादिश्रुतिस्मृतयश्च न सङ्गच्छेयुः । भक्तौ भगवदिच्छैकसाध्यत्वं धर्मामध्य श्रीमत्स्वामिचरणैभक्तिहेतुनिर्णये प्रपञ्चितमस्तीति नात्रोच्यते । तेन पुष्टिभक्तौ तु रोधयति मा योगो न सायं धर्म एव च । न स्वाध्यायस्तपस्त्यागो यया भक्तिर्ममोर्जिता मदान न तपो नेव्या न शौचं न प्रतानि च ' प्रीयतेमलया भत्त्या हरिरन्यदिडम्बना, 'सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं नजर 'नाई येदैर्न तपसे यादिवाक्यसहभगवदाई कुतानामैव तत्माप्तिः । तस्माद्भगवदाश्रये फर्मादीन्पमयोनकानि । ननु तावत्कर्माणि कुर्व नियेत यावते त्यादियचनैर्भगवदीयानामपि नित्यनैमिचिकत्रतादिकरणयावर, N . ३२ कृष्णाश्रयस्तोत्रम् । तत्र वेदसायकत्वं वदनि भगवान् तदा भगवदीयानामपि नित्यनैमित्तिककर्मादिकरण, मेकादशीजन्माष्टमीयतादिकरणं.च व्यर्थमिति चेत् , न । तत्र पूर्व भगवदीयानां कर्मत्र- तादीनां स्वरूपं वक्तव्य तदेवाहुः-'यक्ष्ये विभूतीभवतस्तत्संपादय मः प्रभो' 'यत्करोषि यदनासि यजुहोपि ददासि यत्' इति । तेन भगवदीयकृतकर्मणां 'यस्य स्मृत्ये. त्यादिवाक्यैः पूर्णत्वमन्येपामपूर्णत्वादसाधकत्वम् । तेन स्यमार्गीयाणां तेषां तेभ्यो भेदः श्चितः । वस्तुतस्तु पत्र विवेकधैर्यभक्पादिरहितानामपि तत्माप्तिस्तत्राकामतयापि कृतानां फर्मग्रवादीनामसाधकत्वं किमाथर्पम् । एतेन सर्वसाधनरहितानामेव भगवदाश्रये मुख्याधिकार इति ज्ञेयम् । तेन तेषां सपरिकराणां ज्ञानाभाये त एव नष्टा जाता इत्याह नष्टेप्विति । ननु तदधिष्ठातृदेवतानां तद्रूपसाधनकलभ्यासादानां विद्यमानत्वात्कथमप- रिक्षानं नाशो वा भवेत्तत्राह-तिरोहितेति । अर्थरूपा देवास्तेभ्यस्तिरोहिता जातास्तेन गतसाराः सन्तस्तेपि तथैव जाता इति भावः ॥ ५॥ ननु तान्त्रिकमन्त्रायभायेप्यग्निहोत्रचान्द्रायगकृच्छ्रादिनां विद्यमानत्वात्कथं न कार्यसिद्धिस्तत्राह- श्रीमद्वारिकेश्वरचरणप्रणीतवितियुतम् । ३३ पत्नस्तद्रूपत्वगेष स्यात् । एवमखिलकर्मवतानां पापण्डैकमयत्नरुपये जाते ब्रमलाणा- मप्याश्रय एव साधीयानित्याह-कृष्ण इति ॥ ६॥ नन्धेवं सर्वथा सदोषाणां तृतीयकमार्गप्रवेशयोग्यानां गतिमे त्यधरूपोक्ति- पात्रेण कयं भगवान् सर्वनिरपेक्ष आश्रयो भवेत्तत्राह- अजामिलादिदोषाणां नाशकोऽनुभवे स्थितः । ज्ञापिताखिलमाहात्म्यः कृष्ण एव गतिमम् ॥ ७॥ अजामिलादिदोपाणां नाशक इति । ब्रह्मवादे भगवतः सर्वाश्रयत्वेपि साये भक्तिमार्गीयानयस्य जीवानां सर्वथा कर्तव्यत्वादाश्रयभवने महानुत्साहो भवति । यथा स्वनाममाहात्म्यख्यापनार्थ नामोक्तिमात्रेणैवाजामिलादीनां सर्वदोपनाशको जाना स्वधर्म- पक्षपातादेवं भक्तिमार्गे पक्षपावातन्मागीयाश्रयमाहात्म्यख्यापनार्थ तागुक्तिमात्रेणैव. भगवाँस्तथाविधो भवतीति भावः। तथापि क जीयाः क्षुद्रतमाः क वा ब्रह्मादिदुर्लभकयो भगवानित्याश्रयमवननिश्वयाभावे कथं या तमुद्दिश्य तथोक्तौ प्रतिरपि भवेतबाह- अनुभवे इति । अनारमच्छब्दोध्याहर्तव्यः । एवमाश्रयभवनोन्मुखो भगवान पदनुभवे स्थित इति निणीतार्थोहं बदामीत्यज्ञानान्यथाज्ञानमतिकूलतकै न्यया शङ्कनीयमिति भावः । चित्तस्यातथास्वेपि निरन्तरं तदनुसन्धानपूर्वकमेतदुक्तौ सत्यां मदनुभूतो भग- वानप्यनुभशरूढो भवतीति मदीयैरेतदेव सर्वथा कार्यमित्यलं विस्तरेण । ननु यथा कलो श्रुत्यादिभितिमाहात्म्या अपि धर्मादयो नष्टाः तथा 'कलौ दशसहस्राणि विष्णुरत्यक्ष्यति मेदिनीम् । तददै जादचीतोय तदर्दू ग्राम्यदेवता' इत्यादिना बाह्यतो भगवत्सान्निध्या- भारे तन्माहात्म्यमपि तिरोभूतं भविष्यतीति कयमज्ञातयाहात्म्यास्तदाश्रयोक्तो मस्ती भविष्यन्तीति चेत्तत्राह ज्ञापितेति । ज्ञापितमखिलमखिलेभ्यो भक्तेभ्यो वा श्रुतिपुराण भागवतादिना साक्षात्परम्परया वा माहात्म्य यस्य येनेति वा । तथाहि 'तस्माद्वा एतस- दात्मनः' इत्यादिनाऽखिलेभ्यः सृष्टिकर्तृत्ववोधिकया श्रुत्या माहात्म्यख्यापन प्रतिपराणां कर्ममाहात्म्यरूपमेव भगवन्माहाल्यज्ञापनं तत्रैव पर्यवसितमतित्वाते; मेव मानिनामुपासकानां च । भक्तानां तु साक्षादेव यथा 'जम्भतो ददृशे इदम् ' यथा गरिमाणं शिशोवोढुं न सेहे गिरिकूटवत् ' एवमूयमुरुधा सर्वत्र ॥ ७ ॥ ननु 'आकाशात्पत्तितं तोयं ययेत्यादिनोक्तप्रकारेण देवनान्तरं भजतामपि स मुक्तौ भगवरसम्बन्धो भविष्यतीति किमित्येवं निर्बन्धनाश्रय एवोच्यते तबाह- प्राकृताः सकला देवा गणितानन्दकं बृहत् । पूर्णानन्दो हरिस्तस्मात् कृष्ण एव गतिर्मम ॥ ८॥ - - ३४ कृष्णाश्रेयस्तोत्रम् । माकृता इति । ब्रह्माणमारभ्य सर्व एव देवाः माकृता आधिभौतिकान्तपा- नित्वात् । वृहदसरं गणितानन्दक स्वार्थे 'क' प्रत्ययः । तेन जी' निरानन्दहननाम- गणितानां विद्यमानत्वायन गणितानन्देपि न नेपामानन्दपूर्णता तत्र माकृतः कः पुरपार्थः सिद्धयेत् । तथापि विराडक्षरयोरपि तदात्मकत्वाविशेपेण कार्यसिद्धपभाये कथं मूलाथप- णेन सर्वथा तद्भवत्येवेत्येवं निश्चीयते तबाहः-पूर्णति नदि पृोक्तः करप्यानन्दः पूर्यते । तत्र दुःखापनमाभाये पूरितोप्यपूरित एवं स्गाचचार-हरिरिति । यद्यप्यस्यैवानन्दस्या- न्यानि भूतानि मात्रामुपजीयन्तीत्यादिना देवेष्यपि तद्वत्वमस्ति तथापि न तथा तेपा. मन्यपूरकत्वं तदल्पीयस्त्वात । निरवधिदारिद्यस्य सावधिश्नेनापगमस्याशक्यतादेवम- पूर्णानपि प्रतिबन्धनितिपूर्वक कृष्ण एवं पूर्णान् करोति । 'सं सत्यमानन्दनिधि भजेते तिन्यायेन स एव तथाकर्तव्य इति दिक् ॥ ८॥ ननु भवद्भिरेव भक्त्युत्पत्यर्थं तदात्यधि वा विवेकधैर्याश्रयाणां निरूपितत्वात्कथमि- तरनिरपेक्षः स एवोच्यते, किश्श, आश्रयरक्षायाथ तदुभयरक्षानन्तरं च भवद्भिरेवोक्त स्वात्कथं श्रीमतामेव वाक्यं विसंवादि भवतीति चेत्तबाद- विवेकधैर्यभत्त्यादिरहितस्य विशेषतः । पापासक्तस्य दीनस्य कृष्ण एव गतिर्मम ॥९॥ - -- ~ श्रीपहारिकेचरचरणमणीतवित्तियुतम् । णामप्यकारणं तत्र तत्करणे तदाश्रयस्य विद्यमानत्वादन्याश्रये - जाते भगवदाभयानु- त्पत्तिः स्यादतो यथा धर्मादित्यागस्तथाऽधर्मस्यापीति भावः । तहि पूर्वकाक्यमनुपपन्न मिति चेत्, न, अनववोधात् । तथाहि 'एवं सति धर्मादिमतियोगिलं कलौ सुलभ- मित्यापाधिकारस्य - बहुधा विद्यमानत्वा देवस्यायमर्थः-विवेकभायादिसहितास्तु कलौ दुर्लमा पापकर्तारस्तु सुलमा इति तदधिकारस्प बहुधा विद्यमानत्यम् । ननु धर्मकारस्तु सर्वथा सवानधिकारिणः परमधर्माकार एवाधिकारिण इत्यायातपिति चेत् । तत्रोच्यो । धर्मादिमतां विकधैर्यमक्तिमतां चेत्तरगागपूषफै केवलाश्रयकरण सहसा न भवति तेषु समीचीनत्वयुद्धः । यथा प्रभुणा सर्वधर्मत्याग उपदिष्टे पार्थस्य करणे शोकोत्तौ पुनः प्रभुणैव 'पापेभ्यो मोक्षयिष्यामी'त्युक्तं, नोचेच्छरणधर्मे तद- संभवात्तन्मोचनकपनमनुपपन्नं भवति तथैवैतपामपि शोकसंभवः । परं तद्विपरीताता तु नेप्यसबुद्धया निस्साधनेष्येव श्रीगोकुलेशाङ्गीकारप्राचुर्याचद्रलाच तत्यागः सुलभ इति सुष्मृतं 'धर्मादिमतियोगित्वमित्यनेनेति सर्वमनवयम् ॥ ९॥ ननु 'पांसि बहुविनानी निन्यायेन प्रतिवन्धकानां दृष्टादृष्टभेदाभ्यासुरुषा विद्यमानत्वात्तयमुक्तिमात्रेण चालिएकर्मा भगवानाभयो भवेत्तवाद- सर्वसामर्थ्यसहितः सर्वत्रैवाखिलार्थकृत् । शरणस्थसमुद्धारं कृष्णं विज्ञापयाम्यहम् ॥ १० ॥ सर्वसामर्थ्यसहित इति । कर्तुमकर्तुमन्यथाकर्तुसामर्थ्यादिरूपैः सहितः । ननु तत्र दृष्टान्तनिदर्शनस्यादृश्यमानत्वात्कथं ज्ञायते तबाह सर्वत्रेति । सर्वत्र योग्या- योग्यविचारेगाखिलानामखिलान् वार्यान् करोति करिष्यत्यकापादित्यादिधर्मस्पादिना" शित्वेन भावति सर्वदा विधमानवादाश्रयकरणे कोनध्यवसाय इत्यर्थः । तथापि भगवर सर्वसमत्वात्सर्वमुल्यनवसरेऽमार्णितः कथमुरिष्यतीत्यत आह शरणस्थेति । ये, शरणं गत्वा तस्मिन्नेव धर्मे स्थितास्तेपामुद्धरणे अप्रार्थितोपि भूकृतमयत्नः सर्वदेव किं पुनर्मलार्थितः । यथा भूम्युद्धारचिकीर्षायामपि ब्रह्मणा भूम्या दुःखनिवेदनरी, प्रार्थनानन्तरमेव समायौ तद्विरः श्रवणानन्तरमेव साक्षाभगवानश्तीर्यास्मानदरिप्यतीत्ये निधयो जात एवं मत्मार्थितो मदीयानामाश्रयो भवत्येवेति निश्चित्य मदीयः सर्वथा परित्यज्याश्रय एव कर्तव्यः । एतदेवाभिसंघायाचार्यैरुक्तं कृष्णं विज्ञापयाम्यहमि यद्वा, मदीयैरेय स्तुतिरेव कार्या, मत्यार्थितः स्वयमेवाश्रयो भविष्यति मात्र युष्मत्कृतिमपेक्षा नवनिय स्तुतिः पूर्व कर्तव्याश्रयणेप्मुभिः । दशमे स्वस्य धर्मस्य साधकं ज्ञापयेदुधः ॥ १० ॥ १ कार्यस्येतिपाटः।
३६ कृष्णाश्रयस्तोत्रम् । पाठफलमाह- कृष्णाश्रयमिदं स्तोत्रं यः पठेत्कृष्णसन्निधौ । तस्याश्रयो भवेत्कृष्ण इति श्रीवल्लभोऽब्रवीत् ॥ ११ ॥ कृष्णाश्रयमिदं स्तोत्रमिति । कृष्ण आश्रयो भवत्यस्मादिति कृष्णाश्रप इति स्तोत्रस्य नाम । फलाधिकारिणां पाठविधि चाह-सन्निधौ सेव्यस्य गुरोर्वा । उभयोरभाये स्मरणीयस्य था । धर्मादिषु सर्वेषु असाधनतानिश्चयः कृतार्यताविपयिपुत्कटेच्छा च पूर्वा- वधिः। अल्पे वहुच साध्ये भगवान् स्वतः सर्वसाधको भवतीत्येवंरूप आश्रयसिद्धिरुत्तरावधिः। तापदिदं पठनीयमिति सिद्धम् । यः पठेत् कृष्णसन्निधौ । य एव पठेत्तत्तद्धर्माविष्टान्तः- करणः अतथाभूतो वा। ततः किं स्यादत आह तस्याश्रयो भवेत् । क इत्याकाङ्क्षायां कृष्ण इति । कृष्णः सदानन्दः । तेन तदाश्रितानांग्रजस्थानामिव सर्वथा दुःखात्यन्ताभावः परमानन्दसम्बन्धयोक्तौ भवतः । नन्वत्र किं प्रमाणमेतत्स्तोत्रपाठमात्रेणैव स तथा भवेद श्रीवल्लभ इति । यथा श्रिया वल्लभो भगवाँस्तथायमपीति भगवद्वाक्यमिवास्यापि वाक्यं वेदात्मकमिति मूर्ध्नि धृत्वा तथैव कर्तव्यमित्यर्थः । किञ्च, भगवद्धर्माणां स्वरूपं तद्धर्मनिरता एव जानन्तीति तदुक्तौ न विप्रतिपन्नैः कैरपि भाव्यमिति दिक् ।। ११॥ ब्रजपतिरतिमित्यं यः प्रदातुं कृपातः सकलनिगमसारं तत्त्वतः संजगाद । स्वजनपरिढो ध्रुक संततेः संशयानाम् स भवतु मम सर्व विट्ठलेशः सुकेशः॥१॥ रुचिरचरणयुग्मं हृत्प्रवेशेतितिग्मम् निजमनसि विहारं ध्वस्तगाढान्धकारम् । व्रजिनवनकुठारं प्राप्तलोकोपहारम् सकलनिगमसारं भावयेद्विदलेशम् ॥ २॥ आश्रयस्तोत्रविशति द्वारिकेश्वरशुद्धधीः । आश्रितानां चकारेमामाश्रयज्ञापनेच्छया ॥३॥ इति श्रीमद्गोपीजनवल्लभचरणैकतानद्वारिकेश्वरेण विरचिता कृष्णाश्रयविवृतिः सम्पूर्णा । N RATIMa BHA SN......... श्रीमणाय नमः। श्रीगोपीजनवल्लभाय नमः। श्रीमदाचार्यचरणकमलेभ्यो नमः । कृष्णाश्रयस्तोत्रम् । श्रीमद्रजराजचरणविरचितविवरणविभूषितम् । पदापपमात्रकयनात् स्वीयत्वं मनुते हरिः । ते कृपावल्लभावार्याः प्रसीदन्तु सदा मयि ॥१॥ तदनुग्रहतः कृष्णाश्रयस्य विकृतिर्मया। विधीयते यतः कृष्णाश्रयः फलति सर्वथा ॥ २ ॥ अथ श्रीमदाचार्यचरणा भगवदातानुसारेग जनानुदत निबन्धादौ सपरिकर भज्यादिमार्गानुपदिश्य प्रत्यहं कलेराधिक्येन तेषां दुःसाध्यत्वमाफलम्य विवेकधैर्याश्रय- ग्रन्थे विकधैर्याभ्यां सहितमाश्रयमुपदिष्टवान्ता, सत्स्वरूपं च तत्र सर्वया सर्वदा भगव- स्छरणगमनात्मकं सिद, तयाच तत् कायिकादिभेदेन निधा भवति, तन प्रयमं मानस शरणं भावनात्मकं भवति, पश्चात् कायिक तयण सिद्धयति, वाचनिक तु 'प्रपन्नं पाहि मां मभो' इत्यादिभार्थनारूपम् । एतादृशस्य भवनेपि कारण भगवदनुग्रह एवेति 'सोहं तबाधी'त्यङ्करस्तुतौ 'असतां दुरापं तचाप्यहं भवदनुग्रहमीश मन्य' इति स्वानुभवेन- प्रतिपादितम् । शरणागतिलक्षणं च तवैवोक्तं यदि सङ्घातमनुगुणं कुर्याइ स्याजयेहा तदा शरणागतिः सिद्धति ज्ञातव्यमित्यारभ्य 'सत्सेवाचिर्भगवत्स्वरूपक्षानेच्छा भगई ज्छालपरत्वं चान्तिमजन्मज्ञापक मित्पन्तेन । 'अनुगुणपक्षस्तु सुगम' इति च । एवं सत्यै तादृशी शरणागतिविवेकफ्र्याश्रयोक्तरीत्यापि साम्भतं कटिनेति भक्त्यादिमार्गाणां दास ध्यत्वे हेतुरपि तत्र नोक्त इति निबन्धादायुक्तोपि दुर्जेय इति तदुक्तिपूर्वक साङ्गो वार निर्जी तां सांप्रत साधनत्वेन विवक्षन्तः कृष्णाश्रयस्तोत्ररूपेणाहुः सर्वेत्यादि । अत्र टीकारम्भ श्रीरघुनाथचरणैर्घन्धावतरणिका कापि नोक्ता परन्तु आविरासीहोरेस्मिन् कलौ श्रीवल्लभाभिधः । निजदास्यं स नो देयादव्यादपि दुराधया दितिमङ्गलवाक्ये कलिस्वरूपस्य श्रीमदाचार्येषु प्रार्थनस्य च कयनेन सूचितेति। विरोधः । एवं कल्याणरायैरपि कृष्णाश्रयस्य सर्वसाधकत्वं सर्वसाधनानामसाधक चोक्तमिति सेपामध्ययमेवाशयः । श्लोकसङ्ख्यातारपर्प वैवमुक्त 'मक्तानां भगपाने १८ कृष्णाश्रयस्तोत्रम् । देशादिपट्साधनरूपश्चतुर्विधपुमर्यरूपथेति, दशलीलानिरूप्य इति, दशविधभक्तसेव्य इति', स्तोत्रार्थरूपे भगवति दशविधाः 'दश वै पशुपु प्राणा'इतिश्रुतेः माणानां दशत्वं ते यथा साधकास्तथा स्तोत्रमपीति शब्देपि दशविधाः । अतोऽर्थमनुकूलयन् शब्द एवार्य साधक इतिबोधनाय प्रार्थनाव्याजेन स्तुवन्तीति । द्वारिकेश्वरैस्तु 'आभासथ निरोधश्चेति वाक्यलिखनेन 'नच लक्षणलक्षितया यजमानपञ्चमा इडां भक्षयन्ती तिवदन दशसहया- पूरकसर्वफलरूपोत्र विवक्षित इत्याशय उद्घाटितः। तथा च 'या या साधनसंपत्तिः पुरुषा- घेचतुष्टये । तया विना दामोति नरो नारायणाश्रय' इतिवाक्यलिग्वनेनाश्रयशब्दः कृष्णाश्रय इति स्तोत्रनामेति तेपामाशयः । मम त्वन्यदपि प्रतिभाति-यथाक्रूरेण प्रसन्न- प्रत्यक्षो भगवान् स्वाधिकारानुसारेण शरणतया मार्थितस्तथाऽऽचारपि स्वप्रकटितभक्ति- मार्गफलदानानुकूलः प्रसन्नः स्वोक्तिपठनमात्रेणाश्रयदानं क समयविशेपे प्रार्थितस्तदों कृतवानिति तज्ज्ञापकमिदं प्रार्थनाघटितं स्तोत्रमिति । अत्र च भगवान् गतित्वेन प्राय॑ते अस्त्विति क्रियाध्याहारेण । तत्र गतिशब्दः फले रूढः, 'सा काष्टा सा परा गतिः' 'अन्ते या मतिः सा गतिः' 'नान्या भवेद्गतिररिन्दमे ति श्रुतिपुराणादौ तथाप्रसिद्धः । समाप्तौ तु 'तस्याश्रयो भवेत्कृष्ण' इत्याश्रयत्वं पाठफलत्वेनोक्तम् । आश्रयशब्दश्च सहाये खा, 'सिद्धाखिला मधुसूदनाथया: 'भवद्भिरमृतं प्राप्त नारायणभुजाश्रयै रित्यादौ तथाप्रसिद्धेः । कृष्णशब्दश्च परब्रह्मवाचकः 'कृपिभूवाचकः शन्दो णश्च निर्वृत्तिवाचकः । तयोरैक्यं परं ब्रह्म कृष्ण इत्यभिधीयते' इतितापनीयश्रुतेः, 'पापकर्पणो ह वेति च । ब्रह्मवै. वर्ते श्रीकृष्णजन्मखण्डे श्रीरुक्मिण्युदाहोत्तरं श्रीयशोदा प्रति भगवद्वाक्येपि 'कृपिरत्कृष्टव- नो णश्च सद्भक्तिवाचकः । अश्चापि दातृवचनस्तेन कृष्णं विदुर्बुधाः' 'कृपिच परमानन्दे पश्च तदास्यकर्मणि । तयोर्दाता च यो देवस्तेन कृष्णः प्रकीर्तितः' 'कोटिजन्माणिते पापे सापिः क्लेशे च वर्तते । भक्तानां गश्च निर्वाणे तेन कृष्णः प्रकीर्तितः' इति त्रिधा निरुक्तः। मे नृतीयेन 'पापकर्षण' इतितापनीयश्रुतिरुपवेदिता । गौतमीयतन्त्रे अष्टादशार्णव्या- संभायां च 'कृपिशब्दश्च सत्तार्थो णश्चानन्दस्वरूपकः । सुखरूपो भवेदात्मा भावानन्दमय- '' इति ।
- श्रीमद्रजराजवरंगविरचितविवरणविभूपितम् । संदानन्दयोरन्तपिचं निपश्यं सचिदानन्दतया परब्रह्मत्वेन कृष्णत्वं विटतमितिभेदाः । अन्पा अपि निरुक्तयो ब्रह्मवैवर्ते नामकरणप्रसङ्गे गर्गेणोक्ताः पञ्च सन्ति तास्ततो ज्ञातव्याः । मानन्दे च निरवधित्वमेव परमफालतावच्छेदकमित्यानन्दमयाधिकरणे स्थितम् । 'पो वै भूमा तत्सुखं नाल्पे सुखमस्ति भूमैव सुखं भूमा त्येव निभिक्षासितव्य इति उन्दोगश्रुत- 'यतो चाची निवर्तन्ते' इतितैत्तिरीयश्रुतेथ । फलं द्रिविधं, साध्यमभिव्यङ्गयं च । तत्राचं यथा परशोभिदा । द्वितीयं यथा योगादात्मसुखम् । तत्र परे ब्रह्मण्यावरूपत्वस्याभावा- द्वितीयरूपतेव याच्या तत्र हेत्वपेक्षायां 'यमेवैप मृणुते तेन लभ्य इतिश्रुत्या स्वीयत्वेन वरणे यत्साक्षादर्शनं तदेव हेतुः । तया सत्ति 'नायमात्मा भवचनेने त्यादिपूर्वार्द्ध उपलक्ष- गंविधया साधनान्तरनिषेधश्रावणेन वरणद्वारकं सत्यैन साधनत्यमुक्तं भवति । तदेव च ग्रामवतोपबृंहणेष्वपि सिद्धम् । तदेतत् सर्वं हृदि कृत्वा मूढानां सन्देहनिवारणायादृष्ट- शाऽनुरुद्धयमार्गाणां कालादीनां सन्निपत्याराधोपकारकाणामसाधकत्वं दोपांच बदन्त उक्तरीत्या स्वस्मिन् फलरूपत्वातिरोभावयित्वा तत्र साधनरूपोस्त्विति प्रार्थयन्ति- सर्वमार्गेषु नष्टेयु कलौ च खलधर्मणि । पापण्डप्रचुरे लोके कृष्ण एवं गतिर्मम ॥ १ ॥ सर्वे च ते मार्गाश्च ! 'सृजूप् शुद्धौ पृज्यन्ते शोध्यन्त इति । 'मृग अन्येपणे, मृत्यन्ते तत्तत्फलार्थिभिरन्विष्यन्त इति मुगाः, स्वाथैण् त एव मार्गाः 'योगासयो मया प्रोक्ता नृणां श्रेयोविधित्सया । ज्ञानं कर्म च भक्तिय नोपायोन्योस्ति कयने त्येकादशे भगवतोक्ताः स्थमाप्त्युपायाः तेषु नष्टेषु अनुश्शास्तृदोलभ्यादिना तिरोहितेषु कृष्णो व्याख्यातरीतिको भगवानेच मम गतिःसावनफलरूपोस्त्विति सम्बन्धः । अत्र यस्य च भावेन भावलक्षणमित्यनेन भावलक्षणा सप्तमी । अनुशास्तुदौल यादौ हेतुः--खली मणि कलौ लोके पापण्डप्रचुर सतीति । चोवधारणे । खलोन्तर्दयो धो यस्मिन्नम खलधर्षा धर्मादनिच् केवलादि'त्यनेनानिच् । खलधर्मत्वे हेतुर्लोकानां पापण्डप्राचुर्यम्। पापण्ड उपयों जैनदयादिसदृशस्तस्प प्राचुर्य वाहुरपम् । कलावित्यधिकरणे सप्तमी आधारत्वं चाशभिव्यापकतया कालिकसम्बन्धेन गौणौपश्लेपिकतया वा' । तथाचता कलावीसे लोक सत्रमार्गेषु नष्टेषु सत्सु तथेत्यर्थः । 'पष्टी चानादरे ' इत्यनेनानादरे कलाविति सप्तमी । हेतुहेतुमद्रावस्तु समभिव्याहारादेव लभ्यः । तथाचैतादृशे लोक एवं मार्गेपु सत्सु कलिमनास्त्य तन्द्रयं त्यक्त्वा तथेत्यर्थः । 'कलेदोपनिधे राजन्! "का सभाजयन्याया' इत्यादिपाक्येषु कलिस्तुतस्तत्र सापकत्वभ्रमवारगाथ कीर्तनस्या यथाकयश्चित्कृतस्य न फलसायकत्वमितिबोधनाय पात्र कलिलोकयोर्दोषफयनम् ।
४० , . कृष्णाश्रयस्तोत्रम् । 'कृष्ण'पदासंम्पदाच्च नैतद्वाक्यविरोध इति बोध्यम् । तथाच जलभेदोक्तरीत्या कीर्तपितृ- निश्चित्य भगवानाश्रयणीय इति भावः । यद्वा, तादृशे लोके मार्गेषु नष्टेषु 'वादवादांस्त्य. जेत्तान् पक्षं कंच न संश्रयेदितिसप्तमस्कन्धीयनारदवाक्यानुसन्धानेन विवक्षित. मार्गस्यैव दृढग्रहणात् कलौ तत्तन्मार्गाणां साधकत्यतरतमभावादिकलहे नष्टे । चका- रोत्र तन्नाशसमुच्चायकः । तथा सति तथेत्यर्थः । एवमपि बोध्यम् , प्रथमव्याख्यानरीती कलौ सर्वमार्गेपु नष्टेप्षितिपदानां, कलावित्यस्यैव वाग्रिमश्लोकपञ्चकेनुपङ्गो बोध्यः । एतद्रीत्या व्याकुर्वन्तः प्राञ्चः सर्वेपि विशेष्यान्वितस्यैवकारस्यान्ययोगव्यवच्छेदकतयां- शकलावतारव्यवच्छेदं तेनाहुः, तदस्माकमप्यभिमेतम् । श्रीरघुनाथास्तु 'खरधर्मिणीति पाठान्तरपप्पुपन्यस्य खरश्चासौ धर्मश्चेति कर्मधारयान्मत्वर्थीयेन्प्रत्ययं बहुव्रीहिविग्रहे 'क'प्रत्ययापतिभियाहुः, चकारं च कलिव्यतिरिक्तकालसमुच्चायकमाहुः, मायातरणे अपत्यतिरिक्तसाधनाभावस्य सर्वकालेषु तौल्यादिति तेपामाशयः । मार्थना तु सर्वमते- प्यन्यार्था ॥१॥ एवं कालदोपेण सङ्गदोपं मार्गनाशं चोपपाद्य कालस्य साधारणत्वेन देशानाम- साधारणत्वेन तदपेक्षयान्तरङ्गत्वात्तत्र च 'काश्यादिपुर्यो यदि सन्ति लोके तासांतु मध्ये मथुरैव धन्या । या जन्ममौञ्जीवतमृत्युदाहैर्नृणां चतुर्धा विदधाति मुक्तिमि'स्यादिभिर्दे- शस्तावकवाक्यैः साक्षात्साधकत्वस्य देशान् पुण्यानाश्रयेत मद्भक्तैः साधुभिः श्रितानि'- त्यादिभिर्वाक्यर्मार्गानुकूलतायाश्च प्रतीतेः प्राप्त तथात्वभ्रमं वारयितुं कालेन देशदोपा- दिकं वदन्त आहुः-म्लेच्छेत्यादि । म्लेच्छाकान्तेषु देशेषु पापैकनिलयेषु च । सत्पीडाव्यग्रलोकेषु कृष्ण एव गतिर्मम ॥२॥ अत्रापि भावलक्षणा सप्तमी । चोवधारणे । कलावित्यनुपज्यते । देशेषु म्लेच्छै. सपने उपलक्षणमेतत् अतितामसैरिति यावत् , तैराकान्तेषु व्याप्तेषु । च्याप्तिरव तदा- धनुरूपस्थितिकत्वम् । तदाज्ञानुरूपस्थितौ को दोष इत्यत आहुः पापेत्यादि । 'एके ख्यान्यकेवला:' तत्पुरुषगर्भः कर्मधारयः। पापानां व्यभिचारचौर्यदौर्जन्यादीनामेक- मलयेपु मुख्यस्थानेषु । ते हि लुब्धाः कामिनो हिंस्राश्च, ततस्तत्र व्यभिचारादिकं वन्ति चौर्यादिकं कारयन्ति च । तदवलोकलोका अपि पैशुन्यशाम्भल्यादिना तथा विदधतीत्येप दोष इत्ययः । ननु न स तादृशा इति नैष दोप इत्यतो दोपान्तरमाहु:- त्पीडेत्यादि । सतां स्वधर्मवनिनां पीडया मिथ्याभिशापदण्डादिरूपलेशेन व्यग्रा द्विमा लोकाः सम्यञ्चो जना येप्चिति । एवं च कलिकृतास्तेषु चत्वारो दोपा उक्ताः ।
HATA + श्रीमदनराजचरणविरचित विवरणविभूषितम् । नामसमभुकला, पापबाहुल्पम् , सत्पीडा, सदुद्वेगश्वेत्येतैरुपद्रवेण सम्यक पशज्या, सर्व- मार्गेषु नष्टेषु सत्सु कृष्ण एवेति पूर्ववत् ।। २ ।। एवं कालेन देशदोपादिकमुपपाच तेषां चाहत्येन जलस्य चान्त प्रवेशवहि:- सम्बन्धाभ्यां शोधकतया देशापेक्षयाप्यन्तरसातत्र च सद्यः पुनाति गाङ्गेयं दर्शनादेव नार्मदम्' 'कावेरी च महापुण्या गतीची च महानदी । ये पिवन्ति जलं तासां मनुजा पनुजेश्वर । 'पायो भक्ता भगवति वासुदेवेपलाशयाः' इत्यादिवाक्यैः साधकत्वमार्गा- मुलस्वमतीतेस्तेषु तथात्वभ्रमं वारयितुं कालेन तत्रापि दोष वदन्त आहुः गङ्गादि- तीर्धवर्ये विति। पङ्गादितीर्थवर्येषु दुष्टैरेवावृत्तेष्विह। विरोहिताधिदैवेपु कृष्ण एवं गतिर्मम ॥ ३ ॥ इह भारतवर्षे गङ्गादीनि यानि नीर्थश्रेष्ठानि तेषु दुष्टैः कर्मणा भावभेदेन च ये पितास्तैरेव वेष्टितेषु । अन्नापि भावलसणैव सप्तमी । तथाच 'किंचाई न भुवं यास्ये नरामयाजन्त्ययम् । मृजामि तदवं कुत्र राजस्तत्र विचिन्त्यतामितिनवमस्कन्चे भगी- रयं पति गङ्गावरायादृष्टावरणेन तेष्वपि शक्तिकौण्ड्यदोप इत्यर्थः । ननु 'सायो न्यासिनः शान्ता ब्रह्मिष्ठा लोकपावना: । हरन्त्यपं तेङ्गसमातेप्यास्ते ह्याघभिरिरिति तत्रैव गङ्गां मति भगीरथवाक्यातादृशां समादिना निवृत्तेस्तस्य मायिकत्तामायं दोष इत्यत आहुः तिरोहिताधिदेवेष्यिति । देवानां समूहो दैवम् , देथे इत्यधिदैव, देव समूहे विद्यमानं गङ्गादेवनारूपम्। तिरोहित अधिदेवं यस्मिंस्तचिरोहिताधिदैवम् तयाच देवसंसदि विद्यमानं यहादेराधिदैविक रूपं ततिरोधानाच्छक्तिको व्यता वस्थ्यमित्यर्थः । यद्वा, तिरोहित आधिर्यस्य तत्तिरोहिताधि, तादृशं देवं देवसमा येष्विति । 'ततेपां न प्रियं यन्मनुप्या विद्युरिति 'विमस्य वै संन्यसतो देवा दारादि पिणः । विघ्नं कुर्वन्त्वयं ह्यस्मानाक्रम्य समियात्परमिति श्रुतिस्मृत्युक्तदिशा मनुष्य तिस्तेषां न मियेति तनिष्टयर्थ वाराहपामादौ मुत्यभावाय भगवत्मार्थनावदा तीयाँ दुष्टेवाविश्य प्रतिवनन्तस्तिरोहिताययो भवन्त्यतः शक्तिसद्भावैपि दोषतावस्थ्यम, कृष्ण एयेति पूर्ववदित्यर्थः । एतेन 'तीर्थादावपि या मुक्तिः कदाचिरकस्यचिद् भये कृष्णप्रसादयुक्तस्य नान्यस्येति विनिश्रय' इतिनियन्योक्तौ युक्तिरपि प्रत्यक्ष रूपा दर्शिता ।। ३ ॥ A पन ह्यम्मयानि तीर्थानि न देवा मृच्छिलामयाः । ते पुनन्युरुकार दर्शनादेव साधय इतिवाक्यातदपेक्षयान्तरङ्गत्वेन तेषां च सशस्य 'मसङ्गमजरे पाशमा. ६ ४२ कृष्णाश्रयस्तोत्रम् । कवयो विदुः । स एव साधुपु कृतो मोक्षद्वारमपातम्' 'सतां प्रसङ्गात्' 'सन्त एतस्प छिन्दन्ति' 'सत्सङ्गेन हि दैतेया' इत्यादिवाक्यैः साधकत्वमार्गानुकूलत्वातीतेस्तत्र तथा स्वभ्रमं वारयितुं कालकृतं सत्सु दोपं वदन्त आहुः अहङ्कारेत्यादि । अहङ्कारविमूढेषु सत्सु पापानुवर्तिपु । लाभपूजार्थयत्नेषु कृष्ण एव गतिर्मम ॥ ४ ॥ अन्ना होणां कर्तृत इत्यनेन तद्वैपरीत्ये सप्तमी । कलौ सत्सु मार्गप्रचारकेषु पुरु- पेष्वहङ्कारेण स्वपाण्डित्याभिमानेन विशेपतो मूढेपु सत्सु । तथात्वे गमकद्वयमाहुः पापेत्यादि । पापाः पापकर्तारो राजसास्तामसाश्च म्लेच्छादयस्तदनुवर्तिषु तदुपजीवि- केषु । अक्रूरादेः कंसाधनुत्तिवदनुवर्तित्वेप्यदोप इति तयावृत्यर्थं विशेषणान्तरं लाभे- त्यादि । लामो द्रव्यादेः, पूजा उन्नतिः, अर्थशब्दो द्वन्द्वान्ते श्रुतः प्रत्येकं सम्बध्यते, तेन तदर्थ यत्नो वाह्याभ्यन्तर उद्यमो येपामिति । एतद्वयं विमूढत्वज्ञापकम् । तथाच मार्गप्रचारकेष्वेतादृशेषु जातेपु सतामभावात्सङ्गो दुरापास्त इति सर्वमार्गेपु नप्टेषु कृष्ण एवेति पूर्ववत् ॥ ४॥ अतः परं सतां दुर्मिलतया तदपेक्षया मन्त्रसाधनजपादेः स्वमानसाध्यतयान्तर- गावातत्र च 'परिहाय्यापि वेदांस्त्रीन् कर्माणि विहितानि च । गायत्रीमायमाश्रित्य द्विजो भवति निर्भयः' 'गायत्रीहीनवेदास्तु साझा अपि च निष्फला' 'सर्वेषु वर्णपु तथाश्रमेपु 'नारीपु नानाद्वयजन्मभेषु । दाता फलानामभिवाञ्छित्तानां द्रागेव गोपालकमन्त्र एप' त्यादिवाक्यैस्तत्तन्मन्त्राणां तथात्वप्रतीतेस्तेषु तथात्वभ्रमं वारयितुं तत्रापि कालेन दोपं दन्त आहुः-अपरीत्यादि । अपरिज्ञाननष्टेषु मन्त्रेवव्रतयोगिषु । तिरोहितार्थदेवेषु कृष्ण एव गतिर्मम ॥ ५॥ अपरिज्ञाननष्टेविति । अत्रापि पूर्ववदनुपङ्गो भावलक्षणा सप्तमी च । 'मन्त्रस्य च रेशानमित्येकादशे भगवद्वाक्यात्परिज्ञानेन मन्त्रशुद्धिः । परिज्ञानं नाम गुरुपसत्यादिना भानन्यासपाठार्थतात्पर्यविनियोगादीनां निर्धारस्तदभावोऽपरिज्ञानं, तेन नष्टेषु । स्वरू- स्य श्रावणत्वेपि शुद्धयमावेन 'उत त्वः पश्यन्न ददर्श वाचमितिवददृश्यमानेषु । कचि. स्यचित्परिज्ञानदर्शनादोपान्तरमाहुः-अवतयोगिप्विति । 'अवता वटयोऽशौचा। तेद्वादशस्कन्थे कलिधपृक्तमन्त्रोपाकरणदशायामेव गुरुकुलावासब्रह्मचर्याध्ययमधर्म- रिपालनाभावादवतेपु योगः सम्बन्धो येषां तादृशेषु । तेन दोपान्तरमप्याहुः तिरो-
श्रीमह जराजचाणरिचिवचिवरणविभूषितम् । ४३.
हितार्थदेवेष्विति । तिरोहिनावमीयमानौ अर्थः प्रयोजनं तात्पर्य च देवोधिष्टानी
देवता तो येषाम् । 'य एनं शुष्के स्याणौ निषिञ्चजायेरञ्छाखाः प्ररोहेपुः पलाशा-
नी'त्पादिश्रुनिभृत्युक्तनिदर्शनव्यभिचारेण तदुभयतिरोभावस्य स्फुटत्यान्न पामिदानी
। साधकत्वं न या मार्गानुकूलयमतः कृष्ण एवेति पूर्ववत् ॥ ५ ॥
अतः परं मन्त्रापेक्षयापि स्वधर्माणां मनानामाचारस्य च पूर्वोक्तदोपाभावेन
सुकरत्वेन चान्तरङ्गत्वाचन च स्वधर्मस्थो यजन्यज्ञैरनाशीः काम उदय । न याति स्वर्गनरको
यद्यन्पन्न समाचरेत् इह लोके वर्तमानः स्वधर्मस्थोनघः शुचि ज्ञान विशुद्धमामोति मनक्ति
च यहच्छत्येकादशस्कन्धीयः 'केदारे उदकं पीत्वा पुनर्जन्म न विद्यते' 'तथा चैकादशी
धेका गर्भवासक्षयङ्करी । एकादशीसमें पुण्यं न भूतं न भविष्यती'त्यादिभिः पुराणान्वरी-
यभंगवद्वाक्य'राचारसमको धर्मो धर्मस्य प्रभुरत्युत' इत्यादिभिारतीयैश्च वाक्यैर्धव्रता-
दीनां साधकलादिमतीतेस्तेषु तथात्वनय वारयितुं तेष्वपि कालेन दोपं वदन्त आहुः
नानेत्यादि ।
.
.
नानावादविनष्टेषु सर्वकर्मत्रतादिषु ।
पापण्डैकप्रयत्नेषु कृष्ण एव गतिर्मम ।। ६ ॥
नानाप्रकारका ये वादा: स्वरूपफलादिविषयकास्तविशेषेण स्वरूपेण फला.'
दिना च नष्टेषु तिरोहितेषु । तत्र स्वरूपतो नाशो येदवरद्यानां वादात् । 'यावन्नीय
त्सुखं जीवेत्' 'अग्निहोत्रं त्रयीतन्त्र विदण्डं भस्मपुण्डूकम् । प्रज्ञापौरुपनिास्वानां
जीवो जल्पति जीविका' इत्यादिरूपात् । फलतो नाशस्तु पधैकादशीव्रतादौ 'शुळे,
मोहिता विप्रा दैत्यानां कारये भुवि । तुष्टयर्थं दशमीविद्धं कुर्वन्ति मम वासरमि
माझे 'पुरा देव पिगणैः स्वपदच्युतिशङ्कया । सप्तमीवैधनालेन गोपितं चाष्टमीव्रतामि
स्कान्देऽन्यत्र च निषेत्रनिन्दादेव॒धस्वरूपनिर्णयप च विद्यमानत्येपि तदना,
स्वस्वाग्रहेण वाक्पाभासान्यायाभासांथ समुदाहृत्य निर्णयन्ति, तादृशस्थले घोध्या ।'
स्वधर्माचारयोरपि विपतिपत्या फलतो नाशो बोध्यः । वादे मयोजकमाहुः पापण्डेति,
पापण्डेन दम्भेन एकोन्या प्रयत्न उद्यमो येपामिति । स च 'वेश्यावेमसु सीधुगन्धि
लनावनातवामोदितैनीत्वा निर्भरभन्मयोत्सवरसैनिद्रचन्द्रक्षयाः । सर्वज्ञा इति दीक्षि
इति चिरात्माप्ताग्निहोत्रा इति ब्रह्मज्ञा इति तापसा इति दिवा धूनिंगद्रव्यों
इतिवद्धोध्या । अत एवं भूयोदर्शनात्स्वधर्मत्रतादीनामपि न स्वतः साधकत्वं न
मार्गानुकूलत्वमतः कृष्ण एवेति पूर्ववत् ॥ ६ ॥
४४ कृष्णाश्रयस्तोत्रम् । एवं पद्धिर्भक्त्यादिमार्गाणां दुःसाध्यताज्ञापनाय कालकृतसर्वसन्मार्गनाशयोधन- मुखेनाश्रयणस्योपायत्वं साधितम् , तदिदं तदा दृढीभवति यदा भगवानाश्रिते स्वमा- हात्म्यमनुभावयति तदर्थमाहुः अजामिलादीति | अजामिलादिदोपाणां नाशकोऽनुभवे स्थितः । ज्ञापिताखिलमाहात्म्यः कृष्ण एव गतिर्मम ।। ७॥ अजामिलादीति। अजामिलः पष्ठस्कन्धे प्रसिद्धो दासीपतिर्ब्रह्मवन्धुः । आदि- पदेन गजेन्द्राहल्याद्या, नृसिंहपुराणे नवमाध्याये मार्कण्डेयमृत्युप्रसङ्गे उक्ता नारकिणश्च, तेपां ये दोपा इइजन्मनि पूर्वजन्मनि च कृतानि पापानि तेषां नाशकः । एतेन तादृश- माहात्म्ये तदनुभावने च शब्दः प्रमाणमुक्तम् । प्रत्यक्षमाहुः अनुभव इत्यादि । अनु- भवेऽस्माकं स्थितो विषयीभूतो ज्ञापितसमग्रमाहात्म्यः, एतेन प्रपन्नस्य मायातरणे सति प्रतिबन्धकाभावात्स्वयमेवाग्रे माहात्म्यं गोचरीभवतीति ज्ञापितम् । ततश्च पूर्वमा · शब्दे श्रीमदाचार्यचरणोक्तौ बोभयत्र वा विश्वस्य भगवदाश्रयणे भगवानेव साधनान्तरापेक्षा विना सर्व ज्ञापयंस्तवोचरो भवतीति सूचितम् । कृष्ण एवेति पूर्ववत् ॥७॥ एवमत्र शब्दप्रत्यक्षाभ्यां पूर्वोक्तश्रुतिब्रह्मवैवर्तादिरीत्या भगवानेव पुष्टिमार्गी- याणां साधनमिति साधितमतः परं पूर्वोक्तश्रुतिगौतमीयतन्त्रोक्तरीतिकं भगवतः फलतं साधयन्ति प्राकृता इत्यादि। प्राकृताः सकला देवा गणितानन्दकं बृहत् । पूर्णानन्दो हरिस्तस्मात् कृष्ण एव गतिर्मम ॥ ८॥ देवा-अष्टौ वसव, एकादश रुद्रा, द्वादशादित्या, इन्द्रः, प्रजापतिश्चेति त्रयस्त्रिंशत्- 'अग्निस्वमो देवानां विष्णुः परपस्तदन्तरेणान्या देवता इत्पपादपो विष्ण्वताः। Aणुः कालः, 'स विष्ण्वाख्योधियज्ञोसौ काल: कलयतां वर' इतिवाक्यातदन्ताया। सारं ब्रह्माणं नाभावुकार विष्णु हृदये मकारं रुद्रं भ्रूमध्य इति प्रणवमानाधिष्ठातारो चादयो वा प्रजापत्यन्ताः, शतानन्दिनो वा । ते सकलाः कला अंशस्तत्सहिताः, सर्वे किताः, प्रकृतिर्माया 'मायां तु प्रकृति विद्यादितिश्रुतेस्तदधीनाः । कालस्य क्षोभ- पा गुणानुरोधिरवेन गुमाधिष्ठातृ गामभिमानित्येन च प्राकृनत्वम् । वृहदक्षरं गणिता- दक, गणितः स एको मानुप आनन्द' इत्यारभ्य शतानन्दिनां गणने 'स एको सण आनन्द' इत्युत्तरावधौ ब्रह्म गणितम् , अत एवंसङ्ख्यात मानन्दो यत्र, स्वार्थे तादृशम् । तेन तुरीयकोटिनिविष्टा ओंकारं सर्वेश्वर द्वादशान्त इत्यायुक्ता गुणारतारा पि तत्रैव मविशन्तीनियोषितम् । हरिः पुरुपोचमोऽक्षरात्परनः परः स उत्तमः पुरुषः ।
-- श्रीमदजरामचरणविरचितविशणविभूपितम् । 'अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तम' इत्यादिश्रुतिस्मृतिपतिपायः । पूर्णानन्दः शतानन्दसहयाने ब्रह्मानन्दस्य सर्वपरत्वेन गणनया मनोवाग्गोचरतामेव प्रतिपाय तदुसरानुवाके 'यतो वाचो निवर्तन्तेऽप्राप्य मनसा सह । आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान विभेति कृतभने तीतिश्रुतावानन्दस्य मनोवागगोचरस्वकथनेन तदपेक्षयाधिवपस्पानवधित्वस्थ च बोधगात्तथा । तस्मादानन्दे निरवधित्वस्यैव परमफलतावच्छेदकत्वेन तस्य चात्रय विश्राः कृष्णः पूर्वोत्तरीतिक मम पदमफलरूपोस्त्विति पूर्ववत् ॥ ८॥ एवमष्टभिर्भगवत्स्वरूपविचारणाश्रय एव सर्वधा साधको न वन्यः फोपि मार्ग: सायक इति साधितम् । अतः परमाश्रयस्थापि साङ्गस्यैव साधकता विवेकश्रिये सिद्धेति तदङ्गाभावेऽपि यथा स फलं साधयति तमुपायं वदन्त आहुः विवेकत्यादि । विवेकधैर्यभत्यादिरहितस्य विशेषतः । पापासक्तस्य दीनस्य कृष्ण एवं गतिर्मम ॥ ९ ॥ सर्वदुःखहर्ता भगवान् स्वेच्छगतः सर्व करिष्यतीत्येतद्विचारपूर्वकमनुसन्धान विवेकः। साचिकादीनां कायिकादीनां भौतिकादीनां विविधदुःखाना प्रतीकारानावरणेनोपेक्षणं धैर्यम् । माहात्म्यानपूर्वकः सुदृढ स्नेहो भक्तिर्नवविधा च । आदिपदेन तदङ्गानि । साङ्गे ज्ञानकर्मणो च । तै रहितस्यैतेन यावत्साधनराहित्य सूचितम् । वाधकसत्तामाहुः विशेषत: पापासक्तस्येति । आसक्तिः सङ्गातिशयोपरिहार्यसङ्ग इति यावत् । एता- वत्ता'नराणां क्षीणपापानां कृष्णे भक्तिः प्रमायत' इतिवाक्यस्मारणाप्रत्युत्पत्तौ प्रति वन्धकमपि भूचितम् । एवं बाधकट्यसद्भावेऽपि येनाङ्गेनाभयस्य सिद्धिस्तदाहुः दीन स्येति । एवं साधकामावराधकप्तद्भावाभ्यां जातया ग्लान्या दीनस्य । दोर्गत्यादेरन, जस्त्वं दैन्यम् । अनोजस एतादृशस्य कृष्ण एवेति पूर्ववत् । एवंसकारिकाया म्लान सवां दुरापत्वात् सतां मार्यादिकाना ग्लानौ साधनान्तरेषु महत्तेरव तु तादृशम्ला प्रपतिभ्यां तदुभयविलक्षणतया 'मोई तवाडी यत्रोक्तानुग्रहस्य स्वस्मिन्कारणत्वेनस ज्ञाप्यते । एतादृशस्यापि फलसिद्धिगीतायां मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य' 'अपि चेत्गुदाः चार इत्यन्न भगवतानता ! नव पूर्ववाक्ये पापयोनीनां गतिस्ता न तु पापकर्मणा द्वितीये चानन्यभजनेन पापकर्मणां साधुत्वमुक्त, न त्वाश्रयेणेति नैतद्वपमाश्रयेण सिद्ध कामिति शङ्कयं, 'समृदेव मपन्नो यस्तवास्मीति च यो वदेत् । अभयं सर्वभूतेभ्यो दई त्येतद्रत हरेरितिगारुडाद, सकृदेव प्रपन्नो यस्तयास्मीति च यो वदेत् । अभयं । भूतेभ्यो ददाम्पतद्रतं ममे विपुराणान्तरीयभगवद्वाक्याच भगवतस्तादृशे बते नि. जतो भगवदनुग्रहेणैव गन्त्र भलत्तावपि माहारम्यज्ञानपूर्वकस्लेइस्पा द्वारस्वनिधपादन - .
.
कृष्णाश्रयस्तोत्रम् ।
भास्वसिद्धया, द्वितीयस्या नित्यमसुखं लोकमिमं प्राप्य भनस्व मामिति भजनशेषतया
निरूपितत्वेन प्रथमस्य चाञ्जस्यात् । अतो नात्र कोऽपि चोद्यावसरः ॥९॥
एवं नवनिर्विवेकथैर्याश्रयग्रन्थोक्ताङ्गाभावेप्येतदुक्तरीतिकदैन्येनाप्याश्रयसिद्धिरिति
बोधितम् । अतःपरमेतस्याप्यङ्गस्याभावे द्वाभ्यां साधनान्तरमाहुः सर्वसामयेत्यादि ।
सर्वसामर्थ्य सहितः सर्वत्रैवाखिलार्थकृत् ।
शरणस्थसमुद्धारं कृष्णं विज्ञापयाम्यहम् ॥ १० ॥
'परास्य शक्तिर्विविधैव श्रूयत' इत्यादिश्रुतिभिः कर्तुमकर्तुमन्यथाकर्तुं च यावन्ति
सापानि सत्सहितस्तदुपपादित मजामिलादीतिपद्येन । एतस्यैवानन्दस्यान्यानि
भूतानि मात्रामुपजीवन्ति' 'एप ह्येवानन्दयाती त्यादिश्रुतिभिः सर्वत्र देशेषु जीवे'
चाखिलार्थानां कृत् 'आकेस्तच्छीलतद्धर्मतत्साधुकारिष्वि'त्यनेन ताच्छील्ये किप् कर्ता ।
एतादृशं कृष्णमहं जगदुद्धारार्थमाज्ञप्तो वैश्वानर आचार्यवर्यः शरणस्थानां शरणमार्गव-
तिनां समुद्धारं सम्यक् आज्ञप्तमार्गमाप्यपरमफलपर्यंतमुद्धारं विज्ञापयामि । सामानाधि-
करण्यादध्याहारानाक्रमाच 'प्रथमान्तद्वयमइंपदस्यैव विशेपणं वा । तथाच तादृशदैन्या-
भायेपि मयि विश्वासेनेतच्छरणमार्गस्थितौ श्रीमदाचार्यचरणकृपयैवास्माकमुद्धार इति
निश्चयदाढयपि तत्कृतं साधनान्तरमनपेक्ष्य मद्विज्ञापनादेवोद्धरिष्यतीत्यर्थः ॥ १०॥
अतः परमेतन्निश्चयदाढर्थगमकं वदन्तो विज्ञापनप्रकारं स्वरूपं चाहुः कृष्णा-
अयमित्यादि ।
कृष्णाश्रयमिदं स्तोत्रं यः पठेत् कृष्णसन्निधौ ।
तस्याश्रयो भवेत् कृष्ण इति श्रीवल्लभोत्रवीत् ॥ ११ ॥
कृष्ण आश्रीयतेनेनेति, कृष्ण आश्रयो विपयो यस्येति वा कृष्णाश्रयम् ।
समयपदस्य विपयवाचकत्वं प्रल्हादचरित्रे 'यत्तत्र गुरुणा प्रोक्तं अश्रुवेनुपपाठ च । न
साधु मनसा मेने स्वपरासगृहाथपमिति सप्तमेऽन्यत्र च प्रसिद्धम् । एतदन्वर्थनामक-
दमुक्तं स्तोत्रं यः कृष्णसन्निधौ भगवन्निकटे पठेत् तस्य कृष्ण आश्रयः सहायो
' । इतीममर्थ श्रीवल्लभोऽत्रयोदुक्तवानिति । तथाचवमेतत्पाठ एवं पूर्वोक्तनिश्चय-
गमक इत्यर्थः । एवं च विवेकधैर्याश्रयोक्तरीतिकविवेकादेरभावे दैन्यपूर्वकमेवैतत्स्तो-
नुसन्धानपूर्वकं भगवत्सन्निवायेतत्स्तोत्रपाठः । तत्राप्पनधिफारे श्रीपदाचार्यचरण-
ॐवासपूर्वकं भगवरसन्नियों पाठ इवि साधनद्वयं मानसवाचनिक-केवलवाचनिक-शरणा-
Vतरूपं निर्दिष्टम् ॥११॥
- श्रीमद् नरामचरणविरचित विवरणविभूषितम् । ७ इदै माचां रीतिमनुसृत्य व्याख्यात, मग स्वन्पोप्यर्थः स्तोत्रस्य प्रतिभाति । तथाहि-अयं मार्गोऽविहितभक्तिरूपः, अत्र भगवान् रसात्मक प्रतिपन्नः । एवं सति तदधिकारिप्येव मन्दमध्यमविचारेणात्र साधनोपदेशो वक्तव्यः । अत एव विवेक- धैर्याश्रयसमासौ 'भक्पादिमागा' इत्युक्तम् । अन्यथैकादशे 'योगात्रयो मये स्पन्न 'ज्ञानं कर्म च भक्तिति त्रितयान्ते निवेशिताया भक्तरादित्वकथनं विरुद्धं स्यात् । अतोऽत्र भक्तिपदेन तत्परामर्शः किं त्वयैतपरमं गुह्यामि त्यत्रोक्तायाः तथासति सा मक्तिरादियेंपों तादशा ये मार्गा अविहितभक्तेरेव प्रकारभेदा पालादिमावेन भजनरूपास्ते यतो दुःसाध्या इत्यर्थो भवति । एवं सति तत्र तत्रानधिकारे विवेकथैर्याश्रयोक्तरीतिक आश्रयः, अत एव 'स्वाम्पभिमायसंशयात्' 'गोपभार्यवत्' इति स्वामिपदं तदृष्टान्तब्य सङ्गतौ भवतः । अतः परं तनाप्यनधिकार इदं स्तोमपटनमपि तस्यैवानुकल्परूपम् । एतन्मार्गमविष्टाना- मतिमयन्यतपाधिकारिणागेतन्मार्गफलसम्बन्धो यया प्रणाड्या भवति तामनुसन्धायास्यो. कत्वात् । तदर्थ स्वस्वरूपं भगवत्स्वरूपं च वक्तव्यम् । तत्र भगवत्स्वरूपं तूतमेव । किश्चाभेदवादानुरोधेन रसस्वरूपविचारे रसालम्बनपाभिन्नरसारमा स्वयं भवति । उपवृहित चेदं ब्रह्मवैवर्तीयश्रीकृष्णजन्मखण्डे गर्गवाक्येषु-'वर्धते सा बजे राधा शुक्ले चन्द्रकला यथा ! श्रीकृष्णतेजसोपेन सा च मूर्तिभती सती' 'एका मूर्तिद्विधा भूना भेदो वैदे निरूपितः । इयं खी स पुमान् किं वा सा वश कान्ता पुमानयमिति ।.'पिताहमस्य जगतो पातेति गीतायां च । तयासत्याचार्याणामपि 'वैश्वानराद्वाक्पतेः' 'वस्तुतः कृष्ण एवेति च वाक्यद्वयविचारे पूर्वोक्तरीत्योभयाखारचिन्दात्मकत्वमुभयात्मकत्वं । सिद्धयति । किञ्च, सप्तश्लोक्यां सर्वोचमे च श्रीभागवतप्रतिपदे'त्यादि 'तसारभू रासखीभावपूरितविग्रह' इति चोक्तम् । एवं स्वरूपे निश्चिते यदा यदावेन यान् प्रति या पदन्ति तदा तदधिकारिणः प्रति तानि साधनानीति पुंस्तोत्रमप्येवं व्याख्यायते तदा न दोषः । तयासत्यस्यार्थस्य गुप्ततया भगवतः परोक्षप्रियस्पेन चात्र परोक्षवादाला प्यदुष्टैव । ततस्थायमर्थः । तथाहि सर्वमार्गेषु सख्यादिमोक्तेषु भगवत्मात्युपायेषु ना तदमापकल्या स्वान्तःकरणेऽनुपायतया भातेषु । खलोन्तर्दुष्ट हारूपो धर्मो यस्मिता कलौ कलहे स्वसमानेपु स्वस्मिन् कुपातिशपख्यातिविषयके नष्टे हृदयादपयाते । चर, रेण फलहादेरपि नष्टत्वं ज्ञाप्यते । पापण्डा फलइजननकारणरूपो धर्मः प्रचुरो यस्मि' यो लोके सख्यादौ चादृश्यमाने । विरहेग तैपु दोषारोपस्तस्याधमस्यान्तिकमित्या वत्, अतो न दोपः । एवं सति दुःखितस्य मम कृष्णः सदानन्दस्तादृशतापे हृदि वि व्यमान एव गतिहिाप्राप्तौ साधनरूपो भवलित्यध्याहृता प्रार्थना । अत्रैव सर्वसा १ अत; परं श्रीवजराजपादाः प्रमेयमनुर विश्वन्ति स्तोत्रमिदम् । - . - कृष्णाश्रयस्तोत्रम् । वैफल्यबोधनेन स्वस्यातिखेदः । एवकारेण तादृशसमये 'हरुदुः सुस्वरं राजनिवा फलप्रकरण इव भगवतः माकव्यावश्यकत्वं च द्योत्यते । एवमग्रेपि बोध्यम् ॥ १ ॥ अतः परं भगवन्मिलनस्थानभूतानां देशानामप्यनुपायत्वमाहुः-म्लेच्छाकान्ते- त्यादि । म्लाना रसमार्गविरोधिनीच्छा येषां ते म्लेच्छा एतद्रसानभिज्ञास्तैर्देशेषु वृन्दाव- नादिप्वाक्रान्तेषु । किञ्च, पापैकनिलयेषु । पातीति पः स्थायिभावः सः अपः अक्षरको यत्रासौ पापो विरहः सन्तापातिशयजनकत्वात् , तदेकनलियेषु 'सोयं वसन्तसमयो विपिनं तदेतत् सोय निकुञ्जविटपी निखिलं तदास्त । हा हन्त इन्त नवनीरदकोमलाङ्गो नालोकि पुष्पधनुपः प्रयमावतार' इत्तिवत्तदुवोधकत्वेन तदेवस्थानेषु | चोवधारणे । तेन पूर्वमतथात्वमनभिज्ञसम्बन्धेन तधात्वमिति ज्ञाप्यते । किञ्च, सतः शरीरस्य या पीडा तया व्यग्रा लोकाः स्वीयैकान्तभक्ता येपु । एतादृशेऽवसरे कृष्ण एवेति पूर्ववत् ॥ २॥ अतः पर तादृशां तीर्थानामप्यसाधकत्वमाहुः गङ्गेत्यादि । इह वृन्दावनादिदेशे गङ्गा 'सितासिते सरिते यत्र सङ्गत' इति श्रुतौ तस्याः पूर्व पठितवात्सादिर्यस्याः सा गङ्गादिः, यमुनातत्मभृतीनि तीर्थवर्याणि घट्टविशेपाचन्द्रसरोवरश्रीकुण्डाद्या, 'नद्यस्तदे' त्यत्रोक्ता नद्यश्व, तेषु दुष्टैरेतद्भावराहित्येन दुटैरेवावृतेषु व्याप्तेषु । किञ्च, तिरोहि- ताधिवेपु । तिरोहितममोचरमधि उपरि देवं 'दैवं दिष्ट भागधेय भान्यमिति कोशादस्मद्भाग्य, त्रैलोकलक्ष्म्येकपदं चपुर्द यत्र । यदुपरि भगवानिदानी न दृश्यते चिह्नानि सन्तीति 'श्रीनिकेतैस्तत्पदकैविस्मर्तुं नैव शक्नुम' इतिवदधिकतापजनके- वति भावः । तथाचैतादृशावस्थायां कृष्ण एवेति पूर्ववत् ॥ ३॥ अतः परं सत्सङ्गस्याप्यसाधकत्वमाहुः-अहङ्कारेत्यादि । निन्दायां सर्वत्र पाधिक्यमेव वीजं नतु तेषु दोपो वीजम् । अहङ्कारेणास्पदशो भगवानस्मत्मार्थित मान्यत्र फलिप्यतीत्येवंरूपेण विमूढेपु स्तब्धेषु । किञ्च, पापानुवर्तिपु पापः पूर्वोक्त- संगतिको विरहस्तमनु लक्षीकृत्य वर्तन्त इति तथा । तथाच पूर्व यवश इदानीं तैरपि सह समिलतीति । तद्गमकं लाभपूजार्थयत्लेषु । लाभो भगवरमाप्तिस्तदा पूजा लाभपूजा दुर्थ यत्न उद्यमो येषाम् । पूर्व भगवत्प्राप्तये कात्यायन्यर्चिता पुनरिदानीमपि यत्कु- स्त तेन ज्ञायते न मिलतीति । लीलानां नित्यत्वात्तापेनासक्तिभ्रमवचदाविर्भावात्ते- यमिलननिश्चयः । सत्सु एतन्मार्गगुरुष्येतादृशेषु सत्सु कि नत्सङ्गेनेति कृष्ण ति पूर्ववत् ॥ ४॥ अनः परं ततोप्यतितापेन गुरूणां हार्द विचारयन्तो मन्त्राणामसाधकत्यमाहुः- शारीति । अः भगवान् तस्य परिज्ञानं स्वभावज्ञानं 'न नन्दनु'रितिषस्थानसाम- - 'विस्मरणातिमियत्वरूपो येन तादृशः। कृष्ण एवेति पूर्ववत् । एतेन, योग्यतमानाम . " - श्रीमद्वजरानचरंणविरचितविवरणविभूपितम् । पिकविलापस्यश्लोफोक्तं, तेन नष्टेवसाधकतया नैतिषु । अत एव अवतयोगिपु ज्ञान- गोचरत्वेपि जपादिनियमायोगिषु । तत्रापि हेतुः-तिरोहितार्थदेवेषुः तिरोहितः अविषयः अर्थोभिधेयो देवोधिष्ठाता च येषां तादृशेषु मन्त्रेषु वतचर्यामास शिक-मुख्य- महिषीपासनिक-समर्पणादिनासनिकेषु सत्सु। कृष्ण एवेति पूर्ववत् ॥ ५॥ अतः परं तसोप्यतितापाधिक्येन स्वस्याशक्तिं द्योतयन्तः कर्मादिनाशमाहु:- नानेत्यादि । नानाप्रकारका वादा नानावादाः । भगवान् मथुरायामेवं पुरवनितादीनां कामं वर्धयति, जरामुतादिभिर्युध्यति, द्वारकायामुज्जयिन्यां प्राग्ज्योतिपपुरे इन्दमस्या- दावेवमेव करोतीत्यादिलोकोक्तिरूपाः, श्रीमदुद्धवानीतसन्देशादिवत्संवादादिरूपा या, विनष्टेषु अक्रियमाणेषु सर्वेषु गृहादिकर्मभगवद्रतादिषु । किश्च, पापण्डः कापटपं, तेनैको मुख्या प्रयत्नो वहिरुघमो येषां यत्सम्बन्धी। तथाच तादृशेष्वेतद्गोपनाय लोकिकवैदिकविहितमार्यादिककर्मभगवद्रतादीनामुद्यम एव न तु मनस्तस्तस्कृतिरपीति तादृशेषु तेषु सत्सु, 'धारयन्त्यतिकृच्छ्रेण प्रायः प्राणान् कथञ्चनेत्येतादृशावस्थायां कृष्ण एवेति पूर्ववत् ॥ ६॥ एवमतिशयिततापे भगवानन्तामादुरभूचतस्तयावस्थयाहुः-अजामिलादीति. । जामि आलस्य जामि वैतद्यतस्य क्रियते यदन्वञ्चौ पुरोडाशावित्यादिश्रुतौ. तथा- 'सिद्धत्वात् 'आत्मा यात्मपन्नोभूदिस्यत्रेवात्र परोक्षवादे वैदिकमयोगस्यादोपाच्च । न जामि अजामि अनालस्यं तेन लान्ति गृह्णत इत्यजामिलाः, आदिपदेन जामिलाश्च । तणसंविज्ञानः । ॐध्येण विलम्बेन च भगवद्विषयोजका इति यावत् । तयाच तादृशा दोपा मानादय आज्ञाधकरणादयश्च तेषां नाशकः । अनुभवे मानसे साक्षिप्रत्यक्षे । स्थितों गोचरीभवन् । ज्ञापिताखिलमाहात्म्यः ज्ञापितमखिलं समीक्षाभावा • मधुराद्वारकास्थित्यादि तत्तलीलादितात्पर्यविषयक सर्व माहात्म्यमुत्कर्षः परोक्षभज तादृशताप एव प्रादुर्भाव ईदृशो न त्वन्ययेति । अन्यथा त्वन्ययेत्यपि सूचितम् ।।.. माहात्म्यं यज्ज्ञापितं तन्मध्ये यदनोपयुज्यते तत्प्रकटीकुर्वन्त आहुः-प्राकृ इत्यादि । प्रकृते रसमार्गे भवा विद्यमानाः प्राकृताः । सकला, कला भगवदनुररर चातुर्य तया सह वर्तमानाः । देवा भगवता सह क्रीडापराः । किञ्च, बृहदतरं गुह परमे व्योमन्याविर्भूतं ब्रह्म गणितानन्दकं, गणितः श्रुतौ सङ्घयात आनन्दो! प्रजापत्यन्तानां यतीनां वा, तेपामैव के सुखं यस्मादिति तादृशं, न तु स्वस्मिन् रि, मात्रेण सकलदेवानां सुखदम् । तथा पूर्णानन्दः कर्मधारयेण बहुव्रीहिणाच ५० कृष्णाश्रेयस्तोत्रम् । देवानन्दतिरोभावहर्वा कृष्ण एव तस्मान्मम तथेत्यर्थः । तथाचैतन्मार्गीय फलं केवन- परमानुग्नहैकलभ्यमेवेति सपरिकरभगवन्माहात्म्यं यद्भगवज्ञापितं तत्सूचितम् ॥ ८॥ एवमनुग्रहस्य तत्फलस्य स्वकृतसाधनासाध्यत्वेनुसंहिते यावस्था तयाहुः-विवेके- त्यादि । विवेकः साधनतारतम्यानुसन्धानं, दुःखसहनसामर्थ्य, भक्तिः स्वशरीर- सेवा । आदिपदेन तत्तत्साधनानि, तै रहिवस्य | विशेपतोत्यन्तं पापेन पूर्वोक्तविरहा- स्मकेन असक्तस्य मुक्तसमस्तसङ्गस्य, अत एव दीनस्य तत एवानोजसः कृष्ण एवेति पूर्ववत् ॥ ९॥ एवमतितापेन परमदैन्ये भगवान् वहिःमादुर्भूतस्तदातिसन्तुष्टा जीवेषु मन्दमध्य- मेष्वेवं विलम्बाभावाय विज्ञापयन्ति सर्वेत्यादि । अयोग्येष्वपि योग्यतासम्पादनं कर्तुमकर्तुमन्ययाकर्तुं समर्थस्यैव शक्यमिति तादृशः सन् । तादृशत्वस्य गमकमौदार्यमिति सर्वत्रैवाङ्गीकृतमात्रे अखिलार्थानां पुष्टिपुष्टिमोक्षरूपाणां कृत् ! करणशील ! कृष्ण! पूर्वोक्तश्रुतिपुराणव्याख्यातरूप ! । श्रीरघुनाथचरणैः कृष्णपदं सम्बुद्धचन्तत्वेन व्याख्या- तमित्यस्माभिरपि तथोक्तम् । द्वितीयान्तपक्षेपि किवन्तमेव । शरणस्थानामेतन्मार्ग- रीत्या शरणागतानां फलपर्यन्तमुद्धारं अहं भवदनुभावप्रकटनाशयावतीणः विज्ञाप- यामि । एतेन स्वस्य विज्ञापने भगवतश्च तथोद्धार आवश्यकता सूचिता ॥१०॥ विज्ञापनां वदन्ति-कृष्णाश्रयमित्यादि । कृष्णाश्रयं स्तोत्रं श्रीरूपः स्वामि- लीभावपूरितत्वात् वल्लभो भगवतः प्रिय आचार्यवर्योव्रवीदिति, य: पठेत् एवम सन्द- मानो योस्मद्विपयोगावस्यां ज्ञापयन् कृष्णसन्निधौ व्यक्तं कययेत्तस्य कृष्ण आश्रयो वेदिदं विज्ञापनमित्यर्थः । स्तोत्रस्य प्रत्यक्षत्येनेदमा विनाप्यर्थसिद्धरिति, शब्दान्तरान- समाहाराच्च, अत्र दुरान्वयोप्यदुष्ट एव । 'विमुश्चात्मतनु घोरामित्युक्तो विससर्ज है। रचेससर्ज तनुं तां वै ज्योत्स्खा कान्तिमति मिया मित्यादौ भाव एव तनुत्पेन व्यवहाराच मीरूपत्वोक्तावपि न दोष इति न कोपि शङ्कालेश इति । यथाधिकारं सर्वा एव टीका युज्यन्त इति न कापि शकालेश इति । दिक् ॥११॥ इति श्रीवल्लभाचार्यप्रकटीकृतमद्भुतम् । स्तोत्रं कृष्णाश्रयकर विकृतं तत्मसादतः ॥१॥ इति श्रीमदल्लभाचार्यचरणकमलचञ्चरीकनीश्यामलात्मजश्रीव्रज- राजविरंचितं कृष्णाश्रयस्लोनविवरणं समाप्तम् । ।
10880 श्रीकृष्णाय नमः। श्रीगोपीजनक्लभाय नमः। श्रीमदाचार्यचरणकमलेभ्यो नमः कृष्णाश्रयस्तोत्रम् । विवरपासमेतम् । यकृपादृष्टियेकविन्दुस्पर्शे रसाता । कृष्णलीलाधिना जन्तोन कदापि निवर्तते ॥१॥ तानेर श्रीमदाचार्यचरणानाश्रये मुदा । तेनैव मम तदाक्योघो योध्यो हि जायते ॥ २॥ पुष्टिमार्गादिकीलाभिः स्वानन्दं पूरयनिनम् । स्वाथयं कुरुते यश्च तमहं कृष्णमाश्रये ॥ ३॥ अथात्राश्रयो द्वेषा निरूप्यते मर्यादापुष्टिभेदेन । तत्र मर्यादया य आश्रयः स तु स्फुट एव सर्वत्र व्याख्यातः । पुष्टिमार्गीयस्तु गृढः, स च परोक्षवादेन साधनफलस्वरूप निरूपणपूर्वकं निरूप्यते । तत्रापि कालादिपदसाधनानां फलासाधफवं वदन्त आश्रयं संभावयन्ति । एवं सदि यादृशः पुष्टिमाग पाणामाश्रयस्तादृशोर निरूप्यते मकारसहित इत्पवगम्पते । तथाहि मथमं परमपाल: साक्षात् भगवान् स्वयं निस्पधिकरणावर पुष्टिफलदानेच्छया यं वृणुते तस्य तदारभ्य स्वत एवोद्धतसहनानुरागतो भगवत्सेवा प्रवृत्तिर्भवति न तु तद्व्यतिरिक्तधर्मेषु । ततस्तादृशानुरागपूर्वकसेवादिकरणोलसिला प्रेमासक्तिजनितपुष्टिमार्गीयभावादकुराणां भगवता सद्द संलाप' इत्यायुक्तमकारका बनाया अवश्यसंभवानि तद्धर्मपाकव्ये विजातीयसङ्गानुरोधादन्तास्वरूपानुभवातिय सति तदपेक्षाजनिताा भगवघ्यतिरिक्तस्य तन्नित्तेरशक्यत्वाच्छरणगतिरुत्पधत । श्रीमदाचार्यचरणास्तत्स्वरूपनिरूपणपूर्वक श्रीकृष्णाश्रयस्तोत्रं निरूपयन्ति सर्वेति । सर्वमार्गेषु नष्टेषु कलौ च खलधर्मिणि । पाषण्डमचुरे लोके कृष्ण एव गतिर्मम ॥ १ ॥ तादृशपुष्टिमार्गीयस्प सर्वे मार्गाः प्रमाणरूपाः कर्मादयो नष्टा, एक एव ममेय, स्तिष्ठति, यतस्तेषु फलत्वासाधकत्वबुद्धयाऽचिरेयेति तत्त्यागकरणान्नष्टा एवेत्य अथवा 'अदर्शने' इति धारवर्थविचारेण नष्टा अज्ञाता था। तेषां दर्शनशानयोरप्येत - कृष्णाश्रयस्तोत्रम् । प्रतिबन्धकत्वादितिभावः । ननु भक्तानां कलिकाल साधको भवतीति तनिष्ठमार्गाणां कथं तथात्वमिति पुष्टिमार्गीयाणां. तस्य चाधकत्वमाहुः खलधमिणीति । कालस्तु प्रमाणभूतः, प्रमाणं साक्षात्स्वरूपं न कथयतीति तद्व्यतिरिक्तस्य सर्वस्य सदोपत्वमेवेति तनष्टत्वात् खलो दुष्टो धर्मो धर्मकर्तापि यत्रेति । यद्यपि 'कलेदोपनिधे राजन् । 'कलि सभाजयन्ती'त्यादिवचनैः कलेभगवद्भजनानुकूलत्वमुक्तं, तथाप्यधुनानवतारसामयिकत्वे- नाधिदैविकरूपत्वाभावात् पुष्टिमार्गीयान् प्रत्यानुकूल्यस्य नटत्वमेवेति तथोक्तम् । भौतिककालस्य प्रमाणरूपत्वेन मर्यादोक्तविधिना पां भजनं न पुष्टिरीत्या । फलमपि मुक्तिरेव न ततोनिमकक्षापना। अत एव पापण्डप्रचुरे लोके इत्युक्तम् धर्मिव्यतिरेकेण केवलधर्मस्य सोपाधिकत्वात्तथोक्तमितिमावः। तानेव धर्ममार्गानुत्तरश्लोकेष्वसापकत्वेन वक्ष्यन्ति । एवं सति तत्तकाले तत्तद्धर्मानाचरणे तेपां दोपवुद्धिरेवोपद्यत इति तत्समक्ष तत्तत्काले प्रमाणातिरिक्तं न कर्तुं शक्यत इति कालस्य भावोद्रोधे प्रतिबन्धकत्वादसाप. कत्वं निरूपितम् । चकारागृहेपि तथा । 'गृहे स्थिता स्वधर्मत' इतिवचनात्तत्रापि सेवा- करणे क्रमेण स्नेहासक्तिजनितभावनाया जातत्वात्तत्रत्यानां तदभावात्तत्सकोस्य वाधको विजातीयभाववत्त्वादित्यर्थः । अथवा, एवं पुष्टिमार्गीयस्य कालतदुक्तमार्गाणां प्रतिवन्धकत्वं निरूप्य तस्य स्वधर्माचरणप्रकारमाहुः-पापण्डेति | लोके पुष्टिमार्गीये पापण्डप्रचुरे सति तत्संसर्गेण भावापेक्षया दोपवाहुल्ये सतीत्यर्थः । यदा, पापण्डो नाम स्वान्तनिष्ठधर्म- गोपनेन पहिरन्यधर्मकरणं तदेव प्रचुरो यस्मिंस्तादृशे सति । यथा न कोपि जानाति या कर्तव्यमापन्नमितिभावः । एवं सत्येतावत्पतिवन्धके विद्यमाने तत्संसर्गेण पूर्वोक्त- वानामुच्छलितत्वाभाशत्फलाभाव इति तादृशस्प प्रतिवन्धनिवर्तकः साक्षाद्भगवानेव न्य इति कृष्ण एव गतिर्ममेतिशरणमुपदिष्टम् । शरणं गते कृपया स एव सर्व रिष्यतीतिभावः ॥१॥ ननु तहि भगवल्लीलाप्रदेशेषु गत्वा स्वधर्मनिर्वाहः कर्तव्य इति चेत्तत्रापि प्रतिबन्ध- जाहुल्येन देशानामसाधकत्वेन शरणमेव निरूपयति म्लेच्छेति । म्लेच्छाकान्तेषु देशेषु पापैकनिलयेषु च । -सत्पीडाव्यग्रलोकेषु कृष्ण एव गतिर्मम ॥२॥ मलिनपदार्थमेवेच्छन्तीति म्लेच्छा विपयिणो, मन्त्रायुपासंकाः, कर्ममागीयाय । विपि सेऽनिपिदं विहितमेव कुर्वन्ति तयापि स्वार्थपराः 'क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ती- वेधक्या फर्मफलं मलिनमेवेति तत्पराणां तयात्वेन निर्देशः कृतः । तादृशस्तै- आन्ता: सर्वे प्रदेशा, अत एव तचल्लीलादीनां तिरोभावान्न ते साधका इतिभावः । तु भगवदीयत्वादनुकूलमेव किन्तु भावे वैनात्पमात्रेण तस्य वाधकत्वम् । तावतापि विवरणसमेतम् । ५३ यन प्रतिवन्यकत्वं न केवल विषयाविष्टसम्बन्धिदेशसंसर्गग भावनाशे किमु वक्तव्य मिति फैमुतिकन्यायेनापि देशस्यासाधक निरूपितम् । फिस, न केवलमाक्रान्तिमान किन्तु तन्दमय एव जाता इत्याहुः पापैकमिलयेष्विपि । कर्मणां हिंसामचुरत्वात्तयोक्तम् । एतेन तत्र गमनमात्रेण तत्सम्यन्यात्स्वधर्मनाशो भवतीतिभावः । एवं सति भगवतो पन्योपासनायस्पष्टत्वेनास्मिञ्च लोक मन्त्रोपासनवैदिकतान्त्रिकदीक्षानानां सङ्घदेणा- साधकत्वं निरूपितम् । आदिपदेन विहितमक्यादीनामपि तथेत्यर्थः । ननु तत्रापि केचन निवृत्तिपरा भविष्यन्तीवि चेत्तत्राः सत्पीडेति । निटचिपरत्वेन सदूपाणि तवत्यानां देहेन्द्रियादीनि तेषां पीडा सत्पीडा, तदेशसम्बन्य तानि विषयाविष्टान्येव भवन्तीति सन्निग्रहाशययत्वान्निष्टचिपराणां खेदो जायत इति तद्रूपैव स्वधर्मनाशजनिता पीडा, तया व्यग्राः कयमस्माकं परलोकः सेत्स्यतीति व्यग्रा लोका धर्मशीला येपु ! यत्र स्थूलदृष्टी- नामपि न धर्मनिर्वाहस्तवातिममेक्षिकाणां तादृशानां भावौधिल्ये किमु वाच्यम् । ताशानामपि स्यातुमशक्तेरितिभावः । तथाचोक्तं 'अस्साम तत्संभृति नान्यसमक्षामि'- खुत्र विवरणे 'यथा व्याघ्रा देहाभिमानी'ति फलप्रकरणे । अतस्तनावपोपणे प्रति- पन्यनिवृत्त्यर्थं शरणमेव भावनीपमिति कृष्ण एव गतिर्ममेयुक्तम् । अत ए पालीकि कमनःसिद्धाविति विवेकधैर्याश्रयेप्युक्तम् ॥ २॥ एवं दुःसंसर्गेण देशानामसायकत्वं निरूप्य तत्र भगवद्धता . अपि सन्ति ते समीचीनास्तै सह सङ्गो न वाधक इत्याशङ्कय द्रव्याणामशुद्धया पुष्टस्य तेपामपि सङ्गों वापक इतीतरमार्गीपाणामसापकत्वमाहुः गङ्गादीति । गङ्गादितीर्थवर्येषु दुष्टैरवायतेविह। तिरोहिताधिदेवेषु कृष्ण एवं गतिर्मम ॥३॥ गङ्गादितीर्थवर्या भक्ताः । अयं भावः अस्ति गङ्गायां विरूपमिति सिद्धान्, मुक्तावल्या स्फुटीकृतं, तविविधत्वममापि शेपम् । तेन जलरूपाधिभौतिकादि में प्रवाहभक्तिमार्गीपज्ञानमार्गीयमर्यादाभक्तिमार्गीया भक्का निरूपितास्तत्र प्रथमं वा भक्तिमार्गीयाणामसापकत्वं निरूपयन्ति । यद्यपि गङ्गापदस्यादौ निरूपणाद्गङ्गाया पर्याद भक्तिमागीयभक्तत्वातन्मागीयभक्तानामेवादौ निरूपणं संभवति तथाप्याधिभौतिका क्रमेण परिदृश्यमानप्रवाहजलस्यैव प्रयमनिरूपणादनाप्यादौ भवाहभक्तिमार्गीया ज्ञेयाः । अग्रिमाणामुत्रश्लोकेषु निरूपणम् । तयाच पदसम्बन्धः, गङ्गा देवी आदि तानि गङ्गादीनि, तस्या एवाधिदैविकादिरूपाणि, वद्रूपा एव तीर्थभूता आदिसाधक, नाद्भक्ताः, परन्तु दृश्यमानजलादिरूपाक्रमेण प्रवाहमागीया एव । कर्मपागीयापेक्षयोत्तम .
। ५४ कृष्णाश्रयस्तोत्रम् । ज्ञापनाय 'वर्य'पदम् । तादृशेष्यपि दुटेरेव स्वरूपापेक्षया तदोपैरित्यर्थः । तादृशैर्धमत्रते- पाच्छादितैषु ससु, धर्मा एव तेपां धर्मिस्वरूपज्ञाने आवरका जाताः । ननु भावद्ध- मनिष्ठेषु कथं तद्धर्माणामावरकत्वं बाहुः-तिरोहिताधिदेवेष्विति। तिरोहितमधिदै- वस्वरूपं येषु । यथा जलप्रवाहे मूर्तिमत्या गङ्गायास्तिरोधानं तथा प्रवाहमार्गेपि साक्षा- पुरुषोत्तमस्वरूपतिरोधानम् । विभूतिरूपस्यैव तेषां भजन तद्रूपमेव फलं, न तत्राधिदैवि- कभजन फलं चेति द्रव्याशुद्धया पुष्टिमार्गीयाणां तत्सङ्गो न साधक इति शरणाविमे- वोपदिशन्ति कृष्ण एवेति । अत एवायफलाभावे भगवतो दातृत्वं नास्ति सा सेवानाधिदैविकी'त्युक्तं सेवाफले । प्रकृते तु आधिदैविकस्वरूपस्यैव सर्वस्य साधक- वादाधिदैविकरसात्मकसदानन्दस्वरूपशापककृष्णपदमेवोक्तं सर्वत्र शरणागतौ । एतेन यतिरिक्तस्वरूपस्य शरणमपि न साधकमित्यपि मूच्यत इति सुष्टूक्तम् ॥३॥ ननु ज्ञानिनो निर्दोपाः समबुद्धय एकान्तस्थितयः तत्सद्गः साधको भविष्य- तीति तेपामपि मायामोहितत्वात्साक्षात्पुरुषोत्तमसम्बन्धाभावेनासाधकत्वं निरूपयन्तः फर्तृणां तनिरूपयन्ति-अहवारविमूढेविति। अहङ्कारविमूढेषु सत्तु पापानुवर्तिषु । लाभपूजार्थयत्नेषु कृष्ण एव गतिर्मम ॥ ४ ॥ ते तु 'अहं ब्रह्मास्मी'त्यहङ्कारेण विशेषेण मूढा, नहि तत्र साक्षात्पुरुषोत्तमस- उन्धः, फिन्त्वक्षरमात्रसम्बन्धेन तन्मात्रस्यैव परमफलत्वं मन्यन्त इति सेव्यसेवकमाव- Kापि गतत्वाविशेषेण मूढास्तादृशेषु सत्सु । ननु अविद्यानिवृत्ती अनुभवरूपे विज्ञाने एम्पन्ने ब्रह्मणि लयो भवतीति कथं तेपां मोहः संभवतीति तत्राहुः पापानुवर्ति- सावति । स्वर्गापवर्गनरकेप्वपि तुल्यार्थदर्शिन' इतिवाक्यात्पुष्टिमार्गीयाणा फले प्रति- रायकत्वात्साक्षात्पुरुपोचमनानाभावरूपस्य तादृशक्षानस्य पापत्वाचदनुवर्तिनां पापा- संजयतित्वमेयेति तयोक्तम् । किञ्च, ताशस्य पुनरक्षरलयानन्तरं पुष्टिफलसंभावनैव सम्पपिज्ञापनाय पापरूपत्वं विशेषेण मूढत्वं चोक्तम् । ननु वयाप्यानन्दानुभयो भविष्य- ति तत्राहुः-लाभपूजार्थयत्नेविति । तन्मार्गे न साधनदशापां न च फळदशायां अनुभवः, यतो लाभः आत्मलाभः पूजा तत्साधनाथै मनस्यैव कल्पितमूर्तेरुपासनारूपा, यमेव यत्नो येषां वादृशेषु । नहात्मन ऐक्ये सर्वेन्द्रियाणां सार्थकता, नाप्यानन्दानु- शानं च, यया जले निमग्नस्य जलपानम् ।बहिरेव पाने तदनुभव इति न तेपामानन्दा. वोपि । प्रकृते तु पृष्टभावापन्नस्य 'भगवता सहे'त्यादिरूपभावनायामपि सर्वेन्द्रियाणां सास्वरूपानुभवो, पहिमाकटये तदनुभने कि त्राच्यमितिभावः । तदुक्तं निरोधवर्णने विवरणसमेतम् । सङ्कल्यादपि तत्र हि दर्शन स्पर्शनं स्पष्टमित्यादिना । एवं सति पुष्टिमागीयस्प न सत्सङ्ग साधक इति शरणमेव निर्दिशन्ति कृष्ण एव गतिः॥४॥ ननु हानिष्वपि केचन भक्ता भवन्ति, संत्रापि प्रेमयुक्ताः, ते पुनदिविषाः कंचन नामनिष्ठा केचन सेवैकनिष्ठास्तेपी सङ्गः सायको भविष्यति, नयाचोक्तं 'सशस्तप्पय ते मार्य सतां प्रसङ्गादित्यादिनेत्याशङ्कय तयोरपि सापकत्वाभावात्प्रथम नामनिष्ठा- नामसापकत्वं वदन्तो मन्त्राणां सन्निरूपपन्ति अपरिज्ञानेति । अपरिखाननष्टेषु मन्त्रेचंत्रतयोगिषु । तिरोहितार्थदेवेषु कृष्ण एवं गतिर्मम ॥ ५॥ यद्यपि 'ए शास्त्र देवकीपुत्रगीत'मित्या 'मन्त्रोप्येफस्तस्य नामानि यानी'- युक्त्या भक्तानां नामैव परो मन्त्रः तत्कीर्तनपराः समीचीना एव तेषां तत्कीर्तने तदा- नन्दानुभवजनिताचपुलकादयोपि भवन्ति तथापि तेषां मर्यादामार्गीपस्वारस्वरूपतोऽए- रिज्ञानमेवेति तेषु मन्त्रेषु नामरूपेष्यपरिज्ञानेन नष्टेषु अलक्षितेषु सत्सु । यादृशः कृष्णपदस्य रसात्मकभावरूपोथस्तदपरिज्ञानादलक्षितत्वमुक्तम् । ननु कथं सोों न लक्षि. तस्तमाहुः अवतयोगिध्विति । नत अनन्यत्वं पतिव्रतावसतिविषयकपरमानुराग- नितरसात्मकभावेन तदेकनिष्ठारूपं, तदभावतोऽवता: पूर्वोक्ताः, नांदृशेषु योग संयोगो पामिति तथात्वमुक्तम् । मनु तेष्वपि नामधर्माणां दृश्यमानत्वात्कथमेवमुच्यते तत्राहुः। तिरोहितेति । तिरोहितः अर्थो रसात्मकस्वरूपेण य: मकट; स यन्न तादृशेषु सत्सु अत एव मुकुन्द ! नारायण । यज्ञेश्वर ! ज्ञाननिधे वासुदेयेत्यादीनि मोक्षेन्छुभिरुच्या नहि पुष्टिमार्गीयरिव 'बजजनार्तिहन् वीरयोपिताम्' 'मुस्तनात्यादीनि रसात्मका जानि। तेषां मर्यादामार्गानुसारेणैव तदनुभवो भवति न पुष्टयनुसारेणेति न तत्सङ्गस्ता साधक इति शरणमेवोपदिशन्ति कृष्णा एवेति ॥५॥ ननु ये सेवापरास्ते तत्सर्वविनियोगेनानन्ययतेन सेवां कुर्वन्तीति न तेष व्रतत्वमिति साधका भविष्यन्तीत्याशङ्कय तेषायसाधकत्वं वदन्तः कर्मणां तदाहु नानापादेति । नानावादविनष्टेषु. सर्वकर्मत्रतादिषु । पापण्डेकप्रयत्नेषु कृष्ण एव गतिर्मम ॥ ६ ॥ ययपि ते पूर्वोक्तापेक्षया सर्वोचमारवषापि तेषां मर्यादामिश्रलात्सर्वकर्म दिए सबै पुष्टिमागीय यावपमेयं कर्म तन्मागीया सेवा 'भगवता सद्देत्यादिरुमा 4 कृष्णाश्रयस्तोत्रम् । लोकवेदनैरपेक्ष्येण केवलस्वरूपमात्रैकनिष्ठत्वं, आदिपदेन तन्मार्गीयेश्रवणकीर्तनादीनि ज्ञेयानि, तेषु नानावादविनष्टेषु सत्सु । नानावादा अनेकविधप्रमाणवचनानि मर्यादा- मार्गीयाणि आवरणरूपाणि, तैः कृता विशेपेण नष्टा अललितास्तादृशेषुः सत्सु। तेषां मर्यादामिश्रत्वेन विहितैकदृष्टित्वात् , न तज्ज्ञानमितिभावः । अत एव 'मर्यादया गुणशास्ते' इति निरूपितं पुष्टिमवाहमर्यादायाम् । ननु तेपि भक्तिमार्गनिष्ठया सेवादिकं कुर्वन्तीति कथं तदज्ञानं तबाहुः-पापण्डैकमयत्नेविति । पापण्डो नामोपाधिस्तद्वप एवैकः प्रयत्न स्तदनुकूलसाधनरूपो येषां तादृशेषु । तेपामपि मिश्रीत्वेन पुरुषोत्तमसायुज्यैकफलत्वा. तत्मयत्नादीनां पुष्टापेक्षयोपाधिरूपत्वमेवेति तथा निरूपितम् । अत एव मध्यमफलत्वं सायुज्यस्य निरूपितं सेवाफले 'सेवायां फलत्रयमित्यनेन । किञ्च, सायुज्यस्य मर्यादाम- क्तिमार्गकफलत्वं तत्वार्थदीपे निरूपितं 'सर्वत्यागेनन्यभावे' इत्यनेन । पुष्टिफलं तु केवलं तादृशानुग्रहभरेण सर्वात्मना निरुपधिभावैकसाध्यमिति तादृशस्यापि सङ्गो न साधक इति धारणमेव निरूपयन्ति कृष्ण एवं गतिर्ममेति ॥ ६ ॥ नन्वेवं सकलपागीयसाधनफलानां बाधकस्वेन पुरुषार्थरूपत्वाभावात्पुष्टिमार्गीयस्य के पुरुषार्थाः ? कीदृशया वा कथं वा सिद्धा भविष्यन्तीति प्रश्ने तादृशस्य भगवानेव चतुर्विधपुरुषार्थरूपः, तत्सिद्धौ शरणमेव साधनं नान्यदिति भगवतस्तद्रूपनिरूपणपूर्वक चतुर्भिः: श्लोकैः शरणं निरूपयन्ति । तत्र प्रथम धर्मरूपत्वेन निरूपयन्ति अजामिला- दिदोपणामिति । अजामिलादिदोषाणां नाशकोनुभवे स्थितः । ज्ञापिताखिलमाहात्म्यः कृष्ण एवं गतिर्मम ॥७॥ 'पुष्टिमार्गे हरेदास्य धर्मोों हरिरेच हि । कामो हरेर्दिव मोक्षः कृष्णस्य मद्धवमित्यत्रोक्ताः पुरुषार्या मर्यादामार्गीयेभ्यो भिन्ना उपाधिरहिता इति। तत्र हरेर्दास्य म उक्तः। तय 'पुरुषभूषण देहि दास्यमित्यत्र स्वरूपात्मकत्वेन निरूपितमित्ति भग. तो धर्मरूपत्वं सिद्धम् । एवं सति धर्मेण यथा दोपनिवृत्तिनिदोपतासिद्धिश्च भवति या:भगवान् स्वरूपेणैव दोपनिवर्तक इष्टपापकोपि भवतीति धर्मनिरूपणपूर्वक शरणं तरूपयन्ति । तथाहि-अजामिलादयः प्रबलदोपदुष्टास्तद्रूपा अत्र सफलेन्द्रियसडा- आस्तेपां दोपाणां नाशकः स्वरूपेणैव न साधनैः । अयं भावः, पुष्टिमार्गीयस्य स्लेहोत्पत्य- अन्तरं स्वव्यसनतः स्वतन्त्रपुरुषार्थत्वेन क्रियपाणायां 'भगवता सह-संलाप' इत्याधुक्त- झारफभावनायामन्तीलासहितसाक्षारस्वरूपप्राकटये सति या सेवोत्तमपुष्टिरूपा तन्द्रि- गाणां पाकृतपदार्यसंसर्गदर्शनस्मरणादिना यः प्रतिबन्धः सोत्र दोपस्तन्नाशकः । पानामिलस्प नाममात्रेण दोपा दूरीकृतास्तथा प्रकृते 'तादृशस्य मिथो गुणगान. .
- विवरणसमेतम् । लक्षणनामात्मकलीलया तत्तदिन्द्रियाणां दोष नाशयतीति तथोक्तम् । अनेनं दोपनियत्तिधर्मकार्यमुक्तम् । इष्टमाप्ति निरूपयन्ति अनुभवे स्थित इति । दोष दूरीकृत्य तत्तदिन्द्रियादिषु स्वयं स्थितो भूत्वा स्वरूपानन्दमनुभावयत्तीतिभावः अनेनेष्टमाप्तिरूपं धर्मकार्पमुक्तम् । एतत्सर्व निरोधवर्णने 'संसारावेशदुष्टानामि स्थारंप 'इरियन्सुखमि- उपन्तेन स्फुटीकृतम् । ततोपि विशेषमाहुः ज्ञापिताखिलमाहात्म्य इति । ज्ञापितम- खिलं पुटिलीलारुप माहात्म्यं येन । अत एव मस्थितानामपि च लीलानुभवः ।पुष्टिन- बाहमर्यादायामपि 'पुष्पा विमित्राः सर्वज्ञा' इत्युक्तम् । भगवति सासादन्त मकटे वल्ली- लाधर्माणामप्याविभावातज्ज्ञानमप्याविर्भवतीति न किञ्चिदंनुपपन्नम् । एवं सति ताशस्य तादग्भावपोपणादौ ईग्धर्मरूपो भगवानेव शरणमिति कृष्णं एवं गतिर्ममेत्युक्तम् ।। ननु तपामिन्द्रियादीनां भाकृतत्वातदधिष्ठातृणां च तयात्वात्कथं दोपनिटत्तिरित स्पाशय तेषां सर्वसहगतरूप: कृष्ण एव भवतीति तस्यैवार्थरूपत्वं निरूपयन्तः शरणगतिमाहु: प्राकृता इति । प्राकृताः सकला देवा गणितानन्दकं वृहत् । पूर्णानन्दो हरिस्तस्मात्कृष्ण एवं गतिर्मम ॥ ८ ॥ प्रपञ्चनिरूपणप्रस्ताये 'जडे सदंशः प्रकट इसरावाच्छन्नौ, जीये आयौ भकटौ; आनन्दांशस्तिरोहित' इत्तिनिरूपितम् । पुष्टिमार्गीयस्य तु साधनदशायां सेवाण, गानादिपरस्य स्वत एवानन्दांशः प्रकटो भवति । तथाचोक्तं सिद्धान्तमुक्तावल 'ततः संसारदुःखस्येति । तत्रैव पुनः विवरणे यद्यष्यनभिलपिते ते तयापि वस्तुस्वभा वाभवत' इत्युक्तम् । सिद्धान्तरहस्येपि सर्वेषां बहाता तत' इत्युक्तम् । 'सचिदानन्दत स्वत' इति निरोधविवरणेप्युक्तम् । एवं सति ये पूर्व प्राकृता देवा इन्द्रियाधिष्ठाता रस्ते सचिदानन्दरूपात्यात्मकत्यै सम्पन्ने पुरुषोत्तमाविवात्सकला जाताः । कर रसात्मकब्रह्मविद्यारुमा तत्सहिता जाताः । गणितानन्दरूपमक्षरं ब्रह्मा, कि प्रत्यये ततोपि म्हस्वोतितुच्छो जीवः स घृहज्जातस्तदपेक्षयापि महान् जातः । उभयन्न हेर, पूर्णानन्दो हरिरिति । यवः सर्वेषां सचिदानन्दत्वे सम्पन्ने पुरुषोत्तमविर्भावाचत्सम घिरसारमका भाषा उत्पधन्त इति तजनितमयुराशिान्त्यर्थमन्तस्तत्तदिन्द्रियादि तत्तत्स्वरूपः स्वयमेव भूत्वा सर्वेषु तेषु पूर्णस्वरूपानन्ददानेन दुःख हरतीति तथोक्ता एवं सत्यरात्मत्वेनामाकृतत्वे किं वाच्यम् । किन्तु तस्य समस्तसञ्जातः सोमादसात्मकली लारूपपूर्णानन्दभावद्रूप एवं भवतीति पुतस्तत्र दोपावकाश इतिभावः । तदेवं 'श्रीम ८ .. कृष्णाश्रयस्तोत्रम् । कुलजीवात्मा श्रीमगोकुलमानसमित्याधुक्तम् । यत एवं भगवत एवार्थरूपत्वं तस्मात्तस्य तथास्वसिद्धय शरणमेव साधनमिति तन्निरूपयन्ति कृष्ण एवेति ॥८॥ एवमर्थरूपं निरूप्यतादृशस्य प्रचुरार्तिशान्त्यर्थं वहिलकदस्य कोटिकन्दर्पलाव- ण्यसाक्षाद्भगवतः सङ्गस्यैवापेक्षितत्वात्कामरूपत्वं निरूपयन्तः शरणं प्रार्थयन्ति विवेकेति। विवेकधैर्यभत्त्यादिरहितस्य विशेषतः । पापासक्तस्य दीनस्य कृष्ण एव गतिर्मम ॥ ९ ॥ अत्रेदमाकूतम् । पुष्टिमार्गीयभावाविर्भावानन्तरं विरहानुभवार्थे त्यागस्यावश्यक- स्वात्यामानन्तरं पुनः क्रमेण मिथो गुणानुवादजनितप्रचुरभावानामुच्छलितत्वाचादृशस्य देहभाणेन्द्रियान्तःकरणादीनि स्वरूपात्मकानि भवन्तीति पूर्वश्लोकद्वयेन निरूपितम् । एकावर्यन्तं विरहानुभये. चक्षुरागादिनपानाशान्ताः सप्तावस्याः संपन्नाः । अस्थि- उच्छलोके उन्मादायवस्थात्रय निरूप्यते । तथाहि-विवेकः, धैर्य, भक्पादयस्तै रहितस्य । विवेकराहित्ये विकलत्वं भवति यतो वैकल्ये विवेको न तिष्ठति । तच्चोन्मादावस्थायां भवतीति सा निरूपिता । धैर्यराहित्येनाइनिश साक्षात्सङ्गाभावजमचुरातिजनितम- स्वास्थ्यं तिष्ठति। ननु पूर्व गुणगानेऽन्तः साक्षादनुभवस्योक्तत्वात्कयं धैर्याभावेनास्वास्थ्य तत्राहुः-भक्त्यादिरहितस्येति । गुणगानदशायां पूर्वमन्तःप्राकटये साक्षाद्भक्ति- रूपमुखारविन्दसुधारवादात् । आदिपदेन साक्षान्दोगः । साक्षाद्भोगस्वाप्यनुभवात्स्वास्थ्य थतमिदानी प्रलापावस्थायां फलप्रतिबन्धकत्येन साक्षात्सुघादानतदुपयोगिवाक्याय- रणादस्वास्थ्यमेव तिष्ठतीति तद्रहितस्येत्युक्तम् । तत्रापि यत्किञ्चित्स्वास्थ्येपि फलम- बन्धकत्येन विशेपतो रहितस्येत्युक्तम् । तथाचोक्तं संन्यासनिर्णये ' भगवान फलरूप- आ' 'स्वास्थ्यवाक्यं न कर्तव्य'मित्यादि । एवमस्वास्थ्येपि स्वास्थ्यवाक्यायकरणे प्रचु- या मूर्नामापतति सा दशा निरूपिता । ततः पुनर्जामदवस्थायां स्वरूपस्थितौ सङ्गा- वेन स्थातुमशक्तं गुणावलम्बितचित्तं पुनर्भवति तेन च यत्किञ्चित्स्वास्थ्ये तदेव फले तिबन्धकं भवतीति तस्य पापरूपत्वमिति तत्रासक्तस्येत्युक्तम् । अत एवोक्तं 'ज्ञानं रणाश्च तस्यैव वर्तमानस्य वाधका' इति संन्यासनिर्णये। ततः पुनःक्षणानन्तरं स्थितिरेवन हातीति दशम्यवस्या निरूपिता । एतत्सर्वं फलपकरणीयतृतीयाध्यायान्दै फुटीकृतम्। एवं गुणगानानम्वरमनाविर्भावे मूछान्नापस्थानिरूपणपूर्वक लीलाप्रवेशमलापः स्वरूप- तौ गुणगानमिति निरूपितम् । अये पुनातिदैन्ये जाते 'रुहदुः सुस्वर 'तन्यः माण- वागत'मित्यादिनानिमा सा भूचितेति सर्वमुपपन्नम् । एतादृशस्य पुनः बीघ्रमाविभावार्य संगमेव भावनीयमिति कृष्ण एव गतिर्ममेत्युक्तम् । एतदनन्तरं सर्वयाऽऽविर्भूय परमा- : विवरणसमेतम् । नन्दं ददातीति ज्ञापनाय कृष्णपदं, शरणं निरूपितम्। तयाचोक्तं 'ब्रह्मा विष्णू स्पश्च भूला पुनः कृष्ण एक जात र इति 'तासामाविरभूत्कृष्ण इत्यस्याभासे ॥९॥ एवं दशावस्याभिः पूर्णविपयोगानुभवे जाते प्रतिबन्धकदेहनिटची तस्या- लौकिकं रसात्मकं लीलोपयोगिदेहादिकं संपाय स्वयं साक्षात्मकटीभूय बहिः स्वरू- पानन्द ददातीति मोहरूपत्वं निरूपयन्ति सर्वसामर्थ्यसहितः सर्वत्रैवा- खिलार्थकृदिति । सर्वसामर्थ्यसहितः सर्वत्रैवाखिलार्थकृत् । शरणस्थसमुद्धारं कृष्णं विज्ञापयाम्यहम् ॥ १० ॥ कृष्णाश्रयमिदं स्तोत्रं यः पठेत् कृष्णसन्निधौ । तस्याश्रयो भवेत् कृष्ण इति श्रीवल्लभोचवीत् ॥ ११ ॥ सर्व यावदलौकिकैचर्यवीर्यादिगुणानां कर्तुमकर्तुपन्पयाकर्तुं यत्सामर्थ्य तत्स- हितासन् तं पति स्वरूपानन्दंदातुं स्थितो भवतीत्यर्थः । एतदेवोक्तं भगवानपिता रानी'- रित्यत्र 'भगवत्सदेन स्वतन्त्रलिखने । ननु मभोः सर्वं संभवति परं तादृशेन प्रभुणा सह साम्येन स्वरूपानुभवः कथं सुवचो जीवस्य तत्राः सर्वत्रैवाखिलादिति । 'पुष्टि कार्य- नेतिवाक्यातादृशं तं भक्तं साक्षासात्मकस्वचरणारविन्दपकरन्दरजसाऽलौकिकदेहादि- सम्पत्तिपूर्वकं लीलासमाजे प्रकटीकृत्य सर्वत्रैव देहनाणेन्द्रियादिष्यखिलार्थान रसाम, कालौकिकवयोगुणादिरूपानलौकिकैश्चर्यगुणादिसामर्थ्यरूपान् करोतीति तयोक्तम एवालौकिकसामर्थ्य पुष्टिफलं निरूपितं सेवाफले। एतत्सव'यथार्भका स्वप्रतिविम्वविधा इत्यस्य विवरणे स्फुटीकृत 'स्वसामादियोजने'त्यादि। एवं स्वरूपात्मकतां संपाच स्वर, पानन्दं ददातीति मोक्षरूपत्वं निरूपितम् । अत एव 'मोक्षः कृष्णस्य चेद्धव'मित्युक्तम् ननु मोक्ष आनन्दममता तिष्ठति प्रकृतपि वयैव चेत्स्यात्तदा कर्य लीलानुभव इत्याहुः शर जस्थसमुद्धारमिति । अत्र शरणपदं सर्वात्मभावपरम् । अलौकिकसृष्टिः सर्वतारमा वत्येवेति शरणस्थस्य सर्वात्ममावस्यस्य-पूर्वोक्तभक्ततचल्लीलानन्दसमुद्रममस्य-तत उद्ध करोतीति शेषः। अन्यथैकस्यां लीलायां मनस्य द्वितीया साननुभूतैव तिष्ठेन् । एतत्सर्व एतद्विमुच्यत' इत्यत्र स्फुटीकृतम् । यदा, लीलानुभवदशायामपि नत्मभावादेव दैन्या उत्पद्यत इत्यपि ज्ञापनाय शरणस्थेतिपदम् । अयवा, अतःपरं सर्वोशेन शरणस्या जा इति वा ज्ञापनायै शरणे स्थित्यर्थ इक्का तयासति शरणसमाप्तिन्नौषिता । किञ्च, एवं स्वरूपानन्दानुभवानन्तरं श्रीमदुद्दवोपदिष्टज्ञानेन यादृशो निरोधः सिन्दस्तादृशो नि पित्त इति ज्ञापनायोद्धारे सम्यक्त्वमुक्तम् । एवं सति सदा फलरूपपूर्णनिरोधस्थित्यन . 1 । विवरणसमेवम् । ६१ ता: स्वरहस्य सर्व कथयन्तीति तासां गुरुत्वं निरूपित संन्यासनिर्णये । अविपियाप गुरु स्वरहस्यं कथयतीत्युक्तत्वात् । एवं सति बदल्लमत्वेन प्रमोरपि परमप्रेमासदीभूत इति सदुक्तं सर्वमङ्गीकृतं भगवतेति ज्ञापितम् । अत एव यतोङ्गीकृतमिति देतोरत्रवी- दित्याइ, फलमित्यर्थः। किञ्च तद्वलभत्वेन भगवदुक्तानीकारः स्वतः सिद्ध एवेति न पुनस्तदुक्तिः कण्डोक्ता । अनेन फले सर्वयापि निःसन्दिग्यत्वं निरूपितमिति सर्वमव- दातम् ॥१०-११॥ अतिमलिनतराशये मदीये किमयमपूर्वतरोदयो विलासः । निरुपधिकरणैकविभ्रमोपि वितरणशीलविभोरतोद्भुतं नः॥१॥ प्रतवतो महती किल ते कृपा पदपराधगणा अपि तादृशाः । उभयतौल्यविचारणया विभो विजयते तव सैव गरीयसी ॥२॥ अदेयदानैकपरान् महौदार्यगुणैः स्वके । श्रीमदाचार्यचरणान् आश्रये करुणानिधीन् ॥ ३॥ प्रणतालोकसंभातकरुणादृष्टिभिः क्षणात् । संताप हरति श्रीमद्विलेशं तमाश्रये ॥ ४ ॥ इति श्रीकृष्णाश्रयस्तोत्रविवरणं समाप्तम् । -- समासश्वायं ग्रन्थः।
OL:17
BHAVAN'S LIBRARY, BOMBAY-7
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Date
7AUG 1974
- 27 JAN 1981
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Bharatiya-Vidya Bhayan's Grantbågtr
Callao Sa,
T'itle koshnasaya Stotram.
with
Six commentarius.
Author Valla thá charya
776 1975
Shri RT vjas
27 JAN 1981
Date of
19 stie
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Date of
Issue
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No
113
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