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Shiksha Ka Vikash-050805

Masruwala · 2006/06/25

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शिक्षाका विकास
[साबरमतीसे सेवाग्राम]
कि०
१० घ. मशरूवाला
CHOD
नवजीवन प्रकाशन मन्दिर
अहमदाबाद

शिक्षाका विकास
[साबरमतीसे सेवाग्राम]
लेखक
कि० घ० मशरूवाला
अनुवादक
रामनारायण चौधरी
CHUB
नवजीवन प्रकाशन मन्दिर
अहमदाबाद

मुद्रक और प्रकाशक
जीवणजी डाह्याभाजी देसाजी
नवजीवन मुद्रणालय, अहमदाबाद - १४
सर्वाधिकार नवजीवन प्रकाशन सस्थाके अधीन
पहली आवृत्ति, ३०००
27-5/27 No.1150805
fashian mstuute-Sunt
सवा रुपया
मार्च, १९५६

- प्रस्तावना शिक्षामे विवेक' की तरह अिस पुस्तकमें भी अधिकतर मेरे पुराने लेखोका ही संग्रह है। कॉलेजके दिनोसे ही प्राथमिक शिक्षाके प्रश्नने मेरे हृदयमे स्थान बना लिया था। जब मै अिटर या जूनियर बी० अ० मे था तब अिस विषय पर मैने अेक निबध पढा था, और असमे भी मुझे याद है कि मैने औद्योगिक शिक्षा, हिन्दी, ग्रामजीवन-सुधार, वगैराके बारेमे कुछ योजना पेश की थी। वह निबध तो मेरी अस समयकी बुद्धिके अनुसार ही लिखा गया होगा। परन्तु शिक्षाके क्षेत्रमे जीवनका अपयोग करनेकी अभिलाषा अस समयसे ही मनमे पोषित होती रही थी। सत्याग्रहाश्रमकी राष्ट्रीय शालामे शरीक हुआ, तब अस अभि- लाषाको मूर्तरूप मिला। राष्ट्रीय शालासे गूजरात विद्यापीठमे काम करनेका अवसर आया, तब विद्यापीठकी पाठशालाओके अस समयके निरीक्षक श्री कालिदास वसनजी दवेने 'नवजीवन' की पूर्तिके रूपमे 'विद्यापीठ शिक्षा-अक' के नामसे मासिक जारी किया। असमे मै कभी कभी अपने विचार पेश करने लगा। असके बाद अथवा साथ साथ 'नवजीवन' तथा दूसरे भी कुछ पत्रोमे या प्रसगो पर मै अपने ये विचार प्रकट करता रहा । अनमे से कुछका संग्रह 'तालीमकी बुनियादे'* मे हुआ। वह सग्रह अक विशेष दृष्टिसे किया गया . था। अिसलि असमे मेरे सभी लेख नहीं लिये गये थे। जिसके बाद कुछ वर्ष बीत गये । १९३० के बादके आन्दोलनके पश्चात् शिक्षाके क्षेत्रमे मेरा प्रत्यक्ष भाग लेना बद हो गया। १९३४ मे तो मै वर्धा आ गया। वर्धाने मुझे गाधी-सेवा-संघके क्षेत्रमे धकेल दिया। परन्तु अिसी बीच गाधीजीकी 'बुनियादी शिक्षा' की विचारसरणी आरभ हो गी। असकी पहली परिषद्मे मै अपस्थित तो नही रह सका, परन्तु जाकिरहुसेन कमेटीमे अपना नाम रखा हुआ देखा। यह पुस्तक हिन्दीमे सुविधानुसार जल्दी ही प्रकाशित होगी। ३ ४ अिस प्रकार मेरे लिखे फिर शिक्षाके विषयका ध्यान करने के अवसर आये; और कभी-कभी लिखने या बोलनेके प्रसग भी अपस्थित हुओ। ये लेख अधिकतर 'हरिजनबन्धु', हिन्दी ‘सर्वोदय' या गुजराती मासिक 'शिक्षण अने साहित्य' में और कभी-कभी दूसरे पत्रोमे भी प्रकाशित होते थे। १९४२ के आन्दोलनसे पहले 'रचनात्मक कार्यक्रम' पर अिन दोनो मासिकोमे मैने अक लेखमाला आरभ की थी। असमे शिक्षाके विषय पर प्रकरण लिखे जा रहे थे कि अितनेमे आन्दोलन शुरू हो गया और जेल चला जाना पड़ा। जेलसे छूटनेके बाद लेख- माला जारी रखनेकी सूचनाये मिली, मेरी अिच्छा भी थी, परन्तु अस विषयका ध्यान खडित हो गया और परिस्थिति भी बदल गी, अिसलिओ वह काम रह गया सो रह ही गया। अिन सब लेखोका संग्रह अव्यवस्थित रूपमे सुरक्षित पड़ा था। यह सभव नही था कि मै स्वय अन सबको व्यवस्थित करके छाटू और प्रकाशित करू। अिसलिओ मैने सारी सामग्री श्री रमणीकलालभाजी मोदीको सौप दी। अन्होने परिश्रम अठाकर अन सबको व्यवस्थित किया। लेखोको क्रमश. जमाया, अनके भाग किये। जो अब बेकार हो गये मालूम हु, अन्हे मुझे बताकर रद्द किया। सुधारने जैसे लगे अन्हे मुझसे सुधरवा लिया, अधूरे लगे झुन्हे पूरा करा लिया। और फिरसे व्यवस्थित रूपमे जमाकर मेरे देखनेके लि भेज दिये। असा प्रतीत हुआ कि झुनके 'शिक्षामे विवेक' और 'शिक्षाका विकास' जैसे दो स्वतत्र भाग हो सकते है। अिसलि तदनुसार व्यवस्था कर दी। जिस प्रकार श्री रमणीकलालभाजी मोदीके परिश्रमसे ही मेरे तमाम पुराने लेखोका सशोधन और सपादन हो रहा है। लेखोकी जाच करते-करते ही मैने देख लिया कि वर्धा-योजनाका बीज साबरमतीमे ही बोया जा चुका था। 'तालीमकी बुनियादे' पुस्तककी प्रस्तावनामे भी अिसका अल्लेख तो है ही। परन्तु जैसा कि श्री नर- हरिभाी परीखने लिखा है, अद्योग और 'साक्षरी' (पुस्तकीय) शिक्षाके . + ५ बीच तथा शिक्षाके विषयो और प्रत्यक्ष जीवनके बीचके मेलका विचार पूरी तरह विकसित नहीं हुआ था, अच्छी तरह सूझा भी नहीं था। वह धीरे-धीरे किस तरह सूझता गया और विकसित होता गया, यह अनायास अिस पुस्तकमे दिये गये लेखोको दुबारा पढने पर मेरे ध्यानमे आया। अिसलिओ अिस सग्रहको ‘शिक्षाका विकास' नाम दिया गया है। शिक्षाके कार्य और विचारोके आदान-प्रदानमे श्री नरहरिभाजी परीखका और मेरा साथ सबसे अधिक रहा है। वैसे तो काकासाहब और विनोबा भी अतने ही पुराने साथी है। परन्तु कोचरब (अहमदाबाद) की राष्ट्रीय पाठशालामे शरीक हुआ, तबसे श्री नरहरिभाीके और मेरे बीच अिस विषयमे जितनी चर्चा हुी अतनी शायद औरोके साथ नही हुी। साबरमती आश्रममे चोरोके झुपद्रवके कारण आश्रमवासियोको की बार जोडी बनाकर पहरा देना पडता था। असमे घटे दो घटेका समय हमारे हिस्सेमे आता था। भरसक हम दोनो अक ही जोडीमे रहनेकी व्यवस्था करते थे। हमारा रातका चारो ओर फैली हुी शान्तिका यह समय शिक्षा और अर्थशास्त्रके विविध सिद्धान्तो और समस्याओ आदिका सहचिन्तन करनेमे जाता था। मेरी और अनकी विचारसरणी क्वचित् ही भिन्न पडती होगी। सन् १९४७ मे अक दो मास मै अनके यहा साबरमतीमे रहा था। अस समय अिस सग्रहके कुछ लेखोकी फाअिल मैने अन्हे पढनेको दी थी। अस समय वे गुजरात बेसिक अज्युकेशन बोर्ड के अध्यक्ष थे। असी समय हमारे ध्यानमे आया कि यह संग्रह प्रकाशित हो तो 'नी तालीम' के शिक्षकोके लिओ अपयोगी होनेकी दृष्टिसे असमें पूर्तिरूप कुछ लिखनेकी जरूरत होगी। मुझसे यह काम हो नहीं सकता था। अत. मैने अस समय अनसे अनुरोध किया था कि यह काम अन्हीको करना पडेगा और अन्होने मेरा अनुरोध स्वीकार किया था। बादमे वे अितने बीमार हो गये कि यह अिच्छा पूरी होनेकी आशा ही नही रही । परन्तु मीश्वरेच्छासे यह सग्रह - ६ छपनेमे विलब हुआ। अिस बीच श्री नरहरिभाीका स्वास्थ्य काम करने लायक सुधर गया और किया हुआ सकल्प पूरा हुआ। जिस प्रकार अिस पुस्तकको श्री नरहरिभाभीकी पूर्ति प्राप्त हुी। परन्तु असे पूर्तिके रूपमे देनेकी अपेक्षा भूमिकाके रूपमे देना अधिक अपयुक्त होगा, वह पाठकको बादके लेखोके लिओ तैयार करती है। अिसलिओ मैने असे भूमिकाके रूपमे छापनेका निश्चय किया है। अिस भूमिकाका पहला प्रकरण ‘नी तालीम' के मुद्दो, असकी कठिनाअियो और अपायोकी चर्चा करता है। तथा दूसरे प्रकरणके विषयमे थोडा स्पष्टीकरण अन्होने किया ही है। असमे दो वाक्य और जोड दू। मैने जाकिरहुसेन कमेटी द्वारा तैयार किये हुआ अितिहासके पाठयक्रमसे भिन्न प्रकारका अपनी दृष्टिका पाठ्यक्रम तैयार किया था। अस पाठ्यक्रमकी कुछ नकले करवा ली थी। वह पाठयक्रम श्री नरहरिभाओका देखा हुआ था और बहुत सभव है गुजरात बेसिक अज्युकेशन बोर्डका पाठ्यक्रम तैयार करनेमे असका झुपयोग भी किया गया था। वह पाठ्यक्रम कुछ जल्दीमे तैयार किया गया था और अधूरा भी होगा। परन्तु मुख्य बात कालक्रमकी थी। मेरा मानना है कि भूगोलकी तरह अितिहासका ज्ञान भी समीपसे शुरू करके पीछेकी तरफ जाना चाहिये। छोटे बच्चोको प्राचीन मनुप्योकी बाते कहनेसे अनके मनमे गलत चित्र ही अत्पन्न होते है और वे बडी अम्रमें भी वैसे ही बने रहते है। जैसे पण्डितोकी नजरके सामने भी बचपनमे पढ़े या सुने हुअ गिरधर कवि* या शामल भट्टके* हनुमान और रावणके चित्र ही तैरते रहते है, वैसे बालकोके मनमे प्राचीन मनुष्योके बारेमे विकृत चित्र ही खडे होते है। और, चाहे दस लाख वर्ष कहिये या दस हजार वर्ष कहिये, दोनोके बीचके भेदकी या झुनकी प्राचीनताकी कोी स्पष्ट कल्पना तो अन्हे हो ही नही सकती। * गुजराती भाषाके प्राचीन कवि, जिन्होने रामायणको गुजरातीमें पद्यबद्ध किया है।

अिस प्रकार यह व्यवस्थित ढगसे गलत अितिहास सिखानेकी पद्धति बन जाती है। अिसलिओ अपने आसपासके और निकट समयके अिति- हाससे शुरू करके धीरे-धीरे दूरके देश और दूरके समयकी तरफ जाना चाहिये। दुर्भाग्यसे मै अपनी यह दृष्टि जाकिरहुसेन कमेटीके अधिकाश लोगोको समझा नही सका। केवल विनोबाने मेरी यह दृष्टि मान्य की, परन्तु वे असकी आखिरी बैठकमे अपस्थित नही थे और दूसरे सदस्योने या तो असे स्वीकार नही किया या असका आग्रह नही रखा। अिस पाठयक्रमकी नकले व्यक्तिगत रूपमे किसी किसीने मुझसे मगवाी थी। और मेरा खयाल था कि असकी अकाध नकल मेरे पास जरूर होगी। परन्तु मेरे सग्रहमे वह नही मिली। अिसलि मैने श्री नरहरिभाीको अिस विषयमे स्वतत्र चर्चा करनेका सुझाव दिया। पाठक देखेंगे कि वह चर्चा अन्होने सागोपाग रूपमे भूमिकाके दूसरे प्रकरणमे की है। असमे विनोबाके विचार भी गूथ लिये है। अनायास असमे अितिहास-सम्बन्धी मेरे तीनो मतव्योकी चर्चा भी आ जाती है। अक, जैसा अपर कहा गया है, अितिहासकी शिक्षाका देश और कालकी दृष्टिसे आरभस्थान; दूसरा, अितिहासके ज्ञानकी अपयोगिताके बारेमे 'जडमूलसे क्रान्ति " मे प्रगट किये गये विचार; और तीसरा, 'तालीमकी बुनियादे' पुस्तकमे 'अितिहासकी शिक्षाके विषयमे दृष्टि' २ मे बताया गया निम्न विचार : १. नवजीवन द्वारा प्रकाशित; कीमत १-८-०, डाकखर्च ०-६-०। २. यह लेख आज पढने पर देखता हू कि 'जडमूलसे क्रान्ति' में अिस विषय पर प्रकट किये गये विचार अिस लेखमे अधिक विस्तारसे आये है। फिर भी खूबी यह है कि 'जडमूलसे क्रान्ति' के अिस प्रकरणकी खूब चर्चा हुी और 'तालीमकी बुनियादे' वाले प्रकरण पर किसीने कोी आलोचना नहीं की।

८
--
"हमे भूतकालके अनुभवोके --- अितिहासके ब्योरोंकी
स्मृति नही है। परन्तु अन अनुभवोके द्वारा किये हुमे
परिवर्तनोको हमने अिस जीवनमे भी अनुभव किया है, और
हमारी वर्तमान स्थिति अन सस्कारोका ही फल है। अिति-
हासका ज्ञान हमे भले न हो, परन्तु अितिहासका परिणाम
क्या हुआ, यह हमसे अज्ञात नहीं है। वह हमारा आजका
जीवन है।
व्यक्ति और समाज दोनोको यह तत्त्व लागू होता है।"
अिस प्रकार श्री नरहरिभाीकी भूमिका ही अिम पुस्तकको नवीनता
प्रदान करती है। असे व्यवस्थित रूप श्री रमणीकलालभाभी मोदीके द्वारा
प्राप्त हुआ है। फिर भी पुस्तकका कर्ता मै माना जादूगा ! कर्ता कैसे
केवल निमित्त ही होता है, अिसका यह अदाहरण है।
वर्धा, २-६-५०
कि० घ० मशरूवाला

३ १३ ४० - ३ अनुक्रमणिका प्रस्तावना भूमिका नरहरि द्वा० परीख १. नी तालीम और स्वावलबन २ अितिहासकी शिक्षा कुछ सुझाव पहला भाग : साबरमती १ शिक्षाके लक्षण २ शिक्षित और अशिक्षित ३ ज्ञान या अज्ञान? ४ परिचारक भील ५ सभ्यताके आधार-स्तभ ६. धन्धेका निश्चय दूसरा भाग : सेवाग्राम १. शिक्षा और श्रम २ वर्धा-पद्धति ३. दो सस्कृतिया ४. शिक्षा-सबधी गाधीजीके विचार ५. 'द्वारा', 'और', 'की' ? ६ अद्योग द्वारा शिक्षा ७ जीवन-निर्वाहकी शिक्षा ८. नी तालीमका शिक्षक ९. वर्धा-शिक्षाका अक नमूना १०.. कमानेवाली शिक्षा ११. 'नी तालीम'का सन्देश १२. अितिहासका ज्ञान १२ १८ २१ २५ ३५ ५४ , ७५ ८० ८७ ९५ on

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भूमिका
लेखक
नरहरि द्वा० परीख

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नी तालीम और स्वावलंबन १ श्री किशोरलालभाभीकी अिस पुस्तकमे शिक्षा सम्बन्धी, विशेषत. 'नजी तालीम' अथवा नजी शिक्षा नी तालीमका बीज सबधी लेखोका संग्रह है। कुछ लेख तो 'नी तालीम' के नामसे परिचित शिक्षाकी क्रान्तिकारी प्रवृत्ति आरभ हुी अससे पहलेके लिखे हुओ है। परन्तु अिन लेखोकी विचारसरणी असी दिशामे ले जानेवाली है। गाधीजीने हम सबके द्वारा साबरमतीमे शिक्षाका जो प्रयोग शुरू किया, अससे अनका सेवाग्रामका प्रयोग किस तरह फलित हुआ, अिसकी अिन लेखोसे कुछ झाकी मिलती है। अिसलिओ अिस पुस्तकको अन्होने 'शिक्षाका विकास' जो नाम दिया है वह सर्वथा झुचित है। चूकि ये लेख भिन्न भिन्न समय और भिन्न भिन्न अवसरो पर लिखे गये थे, अिसलि अक निबधमे विषय-प्रतिपादनकी जो अकसूत्रता होती है वह अिनमे मही आ सकी। परन्तु अक या दूसरे स्थान पर सब मुद्दोकी चर्चा थोडी बहुत मात्रामे जिसमे आ जरूर जाती है। श्री किशोरलालभाीने मुझसे कहा कि 'नजी तालीम'-- -जो वर्धा शिक्षा योजनाके नामसे भी पहचानी जाती है -- की चर्चा करनेवाला अक पूरा लेख अथवा निबध अिस सग्रहकी पूर्तिरूपमें मै लिखू । अन्होने जो कुछ कहा है अससे नया अथवा अधिक मुझे कुछ कहना नही है। श्री किशोरलालभाीमे मौलिक रीतिसे विचार करनेकी और विषयके मूल तक पहुच कर असका सूक्ष्म पृथक्करण और विशद विवेचन करनेकी जो शक्ति है, वह भी मुझमे नही है। फिर भी कुछ न कुछ लिखना मैने स्वीकार किया। गाधीजीने अपनी शिक्षा योजनामे स्वावलबनको विशेष महत्त्वकी वस्तु मान कर अस पर जोर दिया है। परन्तु अस पर सफल रूपमे अमल हुआ १३ १४ कही दिखाी नहीं देता। जो स्वावलबनके अिस तत्त्वको मानते है, वे भी अिसमे सफलता प्राप्त नहीं कर सके । बहुतोने तो स्वावलबनके तत्त्वको छोड कर ही गाधीजीकी योजना स्वीकार की है। मैने अिस लेखमे अिस बातकी चर्चा की है कि गाधीजी अिस योजना पर कैसे पहुचे, स्वावलबनको वे क्यो महत्त्वपूर्ण मानते है और असे सिद्ध करनेके लिअ किस प्रकारके प्रयत्न होने चाहिये। जब गाधीजीने नी तालीमका विचार शिक्षाके क्षेत्रमे काम करनेवाले अपने साथियो और मित्रोके सामने सबसे मूल्यवान भेंट पहले-पहल सन् १९३७ मे रखा, तब अन्होने कहा था कि मै अिस देशके सामने और असके द्वारा ससारके सामने कुछ नये विचार रखनेका दावा कर सकता हूं। मैने अब तक जिन विचारोकी भेट जगत्के चरणोमे रखी है, अनमे यह विचार मुझे सबसे अधिक क्रान्तिकारी और अिसलिओ सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण लगता है। अिससे अधिक महत्त्वपूर्ण और अधिक मूल्यवान भेट मै दुनियाके सामने रख सकूगा, असा मुझे नही लगता। अिसमे मेरे सारे रचनात्मक कार्यक्रमको व्यावहारिक रूप देनेकी कुजी समाी हुी है। जिस नी दुनियाके लिओ मै छटपटा रहा हू, वह अिसमे से अत्पन्न की जा सकती है। यह मेरी आखिरी विरासत है। ये अक्षरश गाधीजीके शब्द नहीं है, परन्तु अस समय जो शब्द अन्होने कहे थे अनका भावार्थ अिनमे आ जाता है।* अब हम यह देखे कि गांधीजीके शिक्षा-सम्बन्धी विचारोमे जैसी क्या नजी बात है कि सदा अत्यन्त सयमसे बोलनेवाले गांधीजी जिनके बारेमे असा बड़ा दावा करते है। * अिस लेखमे आगे भी जहा यह लिखा है कि गाधीजीने फला बात कही, वहा अिसी प्रकार गाधीजीके अक्षरशः कहे हुओ शब्द नही, परन्तु अनके कथनका भावार्थ ही है।

मुख्य सिद्धान्त जिसे शिक्षा अर्थात् पाठशालाकी शिक्षा कहा जाता है, असका लाभ अब तक दुनियाके आठ-दस प्रतिशतसे वर्धा-योजनाके अधिक लोगोको मुश्किलसे ही मिला होगा। जो आगे बढे हुओ देश कहे जाते है, वहा शिक्षा- प्राप्त लोगोका प्रतिशत अधिक होगा। लेकिन पिछडे हुओ माने जानेवाले देशोमे, जिनकी आबादी बहुत बडी है, तो शिक्षितोका प्रतिशत आठ-दससे भी बहुत कम है। और आगे बढे हुले देशोमे भी जिसे अच्च शिक्षा कहा जाता है, असका लाभ बहुत थोडे प्रतिशतको मिल सकता है। अिग्लैण्ड और अमरीका जैसे देशोमे भी अच्च शिक्षा सबको सुलभ नही होती। अमीरोके लडके या अच्च शिक्षा प्राप्त करनेके लिओ छात्रवृत्ति प्राप्त करनेमें सौभाग्यशाली सिद्ध होनेवाले थोडेसे गरीब विद्यार्थी ही असे प्राप्त कर सकते है। सौभाग्य- शाली शब्द मै अिसलि काममे ले रहा है कि सभी गरीब विद्यार्थियोको छात्रवृत्तिया नहीं मिलती। अमीरोके लडके तो योग्य हो या न हो, अच्च शिक्षा प्राप्त करने जा सकते है। बडे साहित्यकार बननेकी, कलाकार बननेकी, वैज्ञानिक बननेकी, शिल्पी बननेकी या अिजीनियर बननेकी योग्यता जिनमे बीज रूपसे होती है, जैसे कितने ही बालकोकी शक्तिया अनुकूलताके अभावमे खिले बिना रह जाती होगी। गाधीजीने दुनियाके सामने शिक्षाकी जो योजना रखी है, उसके अनुसार गरीबीके कारण किसी भी मनुष्यको अच्चसे अच्च शिक्षासे वचित नहीं रहना पडता। सन् १९३७ मे अन्होने केवल सातसे चौदह वर्षके बच्चोके लिओ जिसे नी तालीम या बुनियादी शिक्षा (बेसिक अज्युकेशन) कहा जाता है, असीकी योजना पेश की थी। असमे मुख्य वस्तु यह थी कि बालकोकी शिक्षा सुनके आसपासकी कुदरती और सामाजिक स्थितिके अनुकूल किसी अत्पादक अद्योग द्वारा होनी चाहिये। अद्योग असा चुनना चाहिये, जिसमे बालकको शिक्षा देनेकी अधिकसे अधिक सभावना हो। अस अद्योगसे सबध रखनेवाली तमाम छोटीसे छोटी बाते और क्रियाओं . शास्त्रीय पद्धति और कुशलतासे सिखाी जाय और अद्योग भी साव- धानी और कुशलतापूर्वक चलाया जाय, तो असके द्वारा विद्यार्थीको ठोस शिक्षा दी जा सकती है। अितना ही नही, सातो कक्षाओके विद्यार्थियोके कुल अत्पादनकी रकम शिक्षकोके बेतनके बराबर हो सकती है, बशर्ते कि विद्यार्थियोका तैयार किया हुआ पक्का माल सरकार खरीद लेनेको तैयार हो। जैसा करनेमे अनका हेतु शालाको खर्चके बारेमे स्वावलबी बनानेका था। स्वावलबनको अन्होने अपनी योजनाकी खरी कसौटी (असिट टेस्ट) कहा है। सन् १९४२ मे अन्हे आगाखा महलमे नजरबन्द रखा गया। वहा झुन्हे अपनी अिस योजना पर खूब गहरा वर्धा-योजनासे पहले चिन्तन करनेका समय मिला। अन्हे लगा कि और पीछेको तालीम मैने जो सातसे चौदह वर्षके बालकोकी शिक्षाकी योजना दी है वह काफी नही है । मनुप्यकी शिक्षा तो गर्भाधानसे आरभ होती है और असका देहान्त होने तक जारी रहती है। अिसलिले आगाखा महलसे बाहर आनेके बाद अन्होने सात वर्षसे कमके बालकोके लिअ पूर्व-बुनियादी शिक्षा, चौदह वर्षसे अपरकी अम्रवालोके लिओ अत्तर-बुनियादी शिक्षा और विद्यार्थी अवस्थाकी अम्रको पार कर चुकनेवाले बडी अम्रके स्त्री-पुरुषोके लिओ प्रौढ-शिक्षाकी योजना पेश की। और अनकी तफसील निश्चित करनेका काम अन्होने अिस प्रकारकी शिक्षाको अमलमे लानेके लिजे स्थापित हिन्दुस्तानी तालीमी सघको सौपा। शिक्षाके अिन सब क्रमोमे अलग- अलग ढगसे स्वावलबनके तत्त्व पर जोर दिया गया था। अदाहरणार्थ, बुनियादी शिक्षाके सम्बन्धमे अन्होने कहा कि विद्यार्थियोका अत्पादन शिक्षकोके वेतनके बराबर होना चाहिये, अत्तर-बुनियादी शिक्षामे अिस बात पर जोर दिया कि विद्यार्थी अपने भोजन-वस्त्रके लायक अत्पन्न करके ही शिक्षा प्राप्त करे। अिस प्रकार विद्यार्थी चाहे जितने वर्ष पढे, परन्तु असके माता-पिता या समाज पर असके निर्वाहका भार जब कि ।

देनेसे, नही पडेगा। अिसी तरह प्रौढ-शिक्षाको भी प्रौढ अपनी आजीविकाके लिमे जो धधा करता हो असके आसपास अिस ढगसे गूथना चाहिये कि वह न केवल अपना जीवन अच्छी तरह बिताना सीखे, बल्कि जो धधा करता हो असमे भी असकी कुशलता बढे और धधेमे भरसक सुधार करके वह अपना अत्पादन बढा सके। यह तो अिस शिक्षा-योजनाका आर्थिक पहलू हुआ। अिस योजनाका विशेष दावा तो यह है कि अत्पादक अद्योगके सर्वांगीण विकास साथ ही सारी शिक्षाको गूथ अत्पादक अद्योगको शिक्षाका माध्यम बनानेमे, बालकका सर्वागीण विकास किया जा सकेगा और बालक समाजका अधिक अपयोगी अग बन सकेगा। अिस समय अधिकतर किताबी शिक्षा दी जाती है। जिनमे लिखने-पढनेका काम मुख्य हो जैसे मुशीगिरी या कारकुनीके कामके नये धधे अिस जमानेमे बहुत चल गये है। अनमे आजकलके पढ़े-लिखे लोग काम देते है। हमारे देशमे तो धधेकी शिक्षा देनेवाली शालाओ और विद्यालयोमें पढे हुओ विद्यार्थी भी वह धधा स्वतत्र रूपसे नही करते अथवा नही कर सकते। अनमे से अधिकाश अम धधेसे सम्बन्धित कारकुनीका काम करते है। व्यापारिक कॉलेजोसे हर साल सैकडो ग्रेज्युअट निकलते होगे। अनमे से बडे तो क्या परन्तु छोटे व्यापारी भी बहुत कम लोग होते हैं। अधिकाश व्यापारिक ग्रेज्युलेट व्यापारिक पेढियो या कपनियोमे कारकुनीका काम ही करते पाये जाते है। यही हाल विज्ञान और खेतीके ग्रेज्युअटोका है। वे अपने- अपने धधोका पुस्तकीय ज्ञान प्राप्त करते है, परन्तु अन धधोको चलानेके लिओ आवश्यक प्रत्यक्ष और व्यावहारिक कामोमे वे कच्चे साबित होते है। अिसलि अनके जीवन अन धधोके सम्बन्धमे भी परोपजीवी रहते है। अनके जीवनका भार अन धधोके मेहनत-मजदूरी करनेवाले वर्ग पर पड़ता है। अन्हे जितना वेतन मिलता है, असकी तुलनामें अन धधोंके सामूहिक अत्पादनमे अनका हाथ बहुत थोडा होता है। शि.

१८ - गाधीजीकी यह योजना असी है जिसमे मनुष्यकी कर्मेन्द्रियो और ज्ञानेन्द्रियोका समान विकास होनेके साथ असकी बुद्धि और सूझबूझका भी विकास होता है। वह जो भी ज्ञान प्राप्त करता है, वह निश्चित होता है और असे व्यवहारमे लानेकी कुशलता असमे होती है। शिक्षाकी अिस योजनामे गरीरश्रम, स्वाश्रय, दूसरोके साथ मिलजुल कर काम करनेकी वृत्ति, व्यवस्था शक्ति श्रमकी महिमा आदि गुणोका बालकमे छुटपनसे ही विकास होता है। किसी भी प्रकारका झुपयोगी कान करनेमे असे अरुचि नही होतो, घृणा नहीं आती या हीनता अनुभव नहीं होती। आजकल समाजमे पाये जानेवाले सूचनीचके भेदभावमे तथा दूसरोकी मेहनतसे लाभ झुठानेकी वृत्तिमे मूल कारण शरीरश्रमकी अरुचि ही है। अिस योजनामे बालककी शरीरश्रम करने तथा सबको समान माननेकी स्वाभाविक वृत्तियोको झुचित पोषण दिया जाता है। आजकल दुनियामे जिस प्रकारकी शिक्षा प्रचलित है, वह व्यवहारमे और परिणाममे आर्थिक और सामाजिक असमानता अत्पन्न करनेवाली, मेहनत-मजदूरी करनेवाले वर्गका शोषण करनेवाली और अिसलि रक्तपात और युद्धोको पोषण देनेवाली साबित हुी है। जब कि बुनियादी शिक्षा अिन चीजोकी जड पर आघात करनेवाली है, अहिसक समाज-रचनाको नजदीक लानेवाली है। २ सन् १९३७ मे जब देशके अधिकतर प्रान्तोमे काग्रेसी मत्रि- मडल बने तब गाधीजीने अन्हे आग्रहपूर्वक कहना संक्षिप्त अितिहास शुरू किया कि शराबबन्दीके कार्यक्रम पर हमें कितना ही अधिक नुकसान झुठाकर भी अमल करना चाहिये। मत्रीगण अिस विचारके अनुकूल ही थे। अनके सामने मुख्य कठिनाी पैसेकी थी। शराबकी आय छोड दी जाय तो सरकारके मौजूदा खर्चको पूरा करनेके लिओ दूसरे कर लगाने चाहिये १९ अथवा सरकारको मौजूदा खर्चमे कमी करनी चाहिये। गाधीजीने सोचा कि शिक्षाका सारा स्वरूप ही बदल दिया जाय तो शिक्षामे भी महत्त्वपूर्ण सुधार किये जा सकते है और असका खर्च भी घटाया जा सकता है। अिस प्रकार शराबबन्दी अिस योजनाका निमित्त बनी, परन्तु गाधीजीको दिमागमे तो और की कारणोमे यह योजना पक रही थी। गाधीजी दक्षिण अफ्रीकामे थे तव अन्होने देखा था कि भारतीय बालकोको वहाकी सार्वजनिक शालाओमे भरती नहीं किया जाता। वे शालाओ खायकर युरोपियनोके लिमे ही चलाजी जाती थी। गाधीजीके बच्चोको अपवादके रूपमे जैसी किसी भी शालामे प्रवेश मिल सकता था। परन्तु समाजके दूसरे बालकोको जो लाभ नहीं मिलता था, असे अपने बच्चोके लिओ लेना गाधीजीको ठीक नहीं लगा। अिसलिओ अन्होने घर पर और अधिकतर स्वय ही बच्चोको पढाना शुरू किया। बादमे अन्होने फिनिक्स आश्रम स्थापित किया और वहा सादा और शरीर-श्रमवाला जीवन व्यतीत करने लगे। फिनिक्स आश्रममे अनके बच्चोके अलावा साथियोके बच्चे भी थे। अन सबकी शिक्षाका कोी निश्चित प्रवध करनेकी जरूरत पैदा हुी। अिस नये जीवनके अनुरूप शिक्षा देनी हो तो असमे शरीर-श्रम और अद्योगका स्थान होना चाहिये, यह सिद्धान्त तय हुआ और साक्षरी विषयों के अलावा अद्योग सिखाना आरभ किया गया। परतु सत्याग्रहकी लडा- अिया ओर दूसरे की विक्षेप वहा आये, अिसलिओ गाधीजी शिक्षाके * 'अकेडेमिक सब्जेक्ट्स' के लिअ 'साक्षरी विपय' शब्द मैने बनाया है। आजकल अनके लि 'बौद्धिक विषय' शब्द काममे लिया जाता है। परतु वह ठीक नहीं है। असमे यह गलत मान्यता है कि किताबी ज्ञानवाले विषय ही बौद्धिक होते है और अद्योगका तथा जीवनके लिओ अपयोगी अन्य प्रवृत्तियोका बुद्धिके साथ कोी सबध नही होता ! अलटे, अद्योगमे और दूसरी प्रवृत्तियोमे बुद्धिका ज्यादा विकास होता है। किताबी विषयोमे तो रटामीकी तरफ चले जानेका भय रहता है।

२० -- प्रश्नमे अधिक बारीकीसे नहीं झुतर सके। हिन्दुस्तानमे आनेके बाद साबरमती आश्रममे गाधीजीने अपने शिक्षाके प्रयोग अधिक व्यवस्थित रूपमे और बड़े पैमाने पर आरभ किये। अनमे हम सब शरीक हुओ। गाधीजी स्वय भी अनसे अच्छी तरह भाग लेनेकी अिच्छा रखते थे। परतु अन पर अकके बाद अक असे काम आते गये कि प्रत्यक्ष शिक्षणका काम वे कर ही न सके। हमे भी अन्होने जितनी आशा रखी थी अतना समय वे नही दे सके। प्रवाससे आश्रममे आते तव हमारे और विद्यार्थियोके साथ चर्चा करते। क्या चल रहा है, यह जान लेते और कोजी सूचना देने लायक होती तो दे देते। परतु अद्योगकी कक्षाओ अलग और साक्षरी विषयोंकी कक्षाओ अलग, अिन दोनोके बीच कोभी मेल या सबंध नहीं शिक्षाका यही प्रकार चलता था। अद्योग-शिक्षणका काम आश्रमके कुछ भाी श्री मगनलालभाजी गाधीकी देखरेखमे करते थे । साधरी विषयोकी कक्षाओ हम शिक्षक कहलानेवाले लोग चलाते थे। परतु अद्योगके साथ साक्षरी विषयोका अनुबध करनेकी बात हमने से किसीको नहीं सूझी थी। शालाको शुरू हुओ ओक वर्ष भी पूरा नही हुआ कि गाधीजीको लगा कि शालाके शिक्षकोको जब तक अद्योग नहीं आता, तब तक वे राष्ट्रीय शिक्षक नही कहलायेगे। अिसलिओ अन्होने तय किया कि हम नये विद्यार्थी न ले और कमसे कम चार घटे सुद्योग सीखनेमे दे। जिस प्रकार शालाका काम रोक कर हमने अद्योग सीखना शुरू किया, तब भी यह स्पष्टता नहीं हुी थी कि अबोग-शिक्षक भी हमीको बनना है और साक्षरी विषयो तथा अद्योगके बीच कोसी सबध जोडना है। हममे से तो किसीको यह विचार ही नहीं सूझा था। गाधीजीके मनमे भी यह विचार बहुत अस्पष्ट दशामे रहा होगा। हा, हममे अंक बात बहुत बार होती थी कि हम अद्योग अिसीलिओ अनिवार्य रूपमे सिखाते है कि आज जो शिक्षित माने जाते है अन्हे कारीगरीका कोी काम करना नही आता और जो कारीगर है अनमे साक्षरी शिक्षाके सस्कार नही २१ होते। राष्ट्रीय शिक्षामे साक्षरी विषयोके साथ अद्योगकी शिक्षाको रखनेसे दोनो वर्गोंमे जो न्यूनता है वह पूरी हो जायगी। परतु हमे यह कल्पना नही थी कि हमारे विद्यार्थियोमे से कोसी अद्योग सीखकर किसान या जुलाहा बन जायगा। अस समयके विद्यार्थियो या शिक्षकोमे से कोजी किसान या जुलाहा बना भी नहीं था। आज विचार करने पर असा लगता है कि हम शिक्षक और विद्यार्थी अद्योग क्या सीखते थे अक खेल ही करते थे। हम शिक्षक तर्कसे अपने मनको मनाते थे कि यह अपयोगी काम है, अिससे हमारा जीवन-निर्माण होता है और कारीगर तथा मजदूर-वर्गके साथ हमारा सबध बधता है। परतु अधिकार विद्यार्थियोका तो यह निश्चित मत था कि अनके समयका बिगाड ही हो रहा है; शिक्षक तो साक्षरी विषयोमे निपुणता प्राप्त कर चुके है, परतु हमारा समय अद्योगोमे चला जाता है, अिसलि साक्षरी विषयोमे हम प्रगति नही कर सकते। अन्तमे अन्होने हमारे विरुद्ध विद्रोह किया और हमे छोडकर विश्वविद्यालयकी शिक्षा लेने चले गये। ये विद्यार्थी गाधीजीके अति निकट सवधर्म रहे हुड़े थे। अन्होने विशेष रूपसे गाधीजीका प्रेम सपादन किया था। अनके विषयमे गाधीजीने वडी बडी आगाजे बाधी थी। अिन विद्यार्थियोने विश्व- विद्यालयकी शिक्षा लेनेके लिओ आश्रम छोटनेकी अनुमति मागी, तब गाधीजीने खुशीसे अनुमति तो दे दी, परतु अनके हृदयको सख्त चोट भी लगी। अन्हे प्रतीति हो गी कि अनके प्रयोगमे कोजी न कोजी बडी त्रुटि है और अस त्रुटिकी वे खोज करने लगे। अन्हे असा दिखामी देने लगा कि विद्यार्थियोकी अद्योगमे दिलचस्पी न होनेका कारण यह था कि अद्योग ज्ञानपूर्वक नहीं सिखाया जा रहा था । अद्योगका दूसरी शिक्षाके साथ या विद्यार्थियोके जीवनके साथ कोजी संबंध नही जोडा जा सका था। जीवन-विकासके अंक मुख्य साधनके रूपमें हमने अद्योगका झुपयोग नही किया था। हम शिक्षकोको असा करना आया ही नही था। और अिसलिओ अद्योगको प्रामाणिक जीवनका २२ आधार मानने और असमे अक प्रकारको जीवनकी सार्थकता अथवा धन्यता अनुभव करनेकी बात विद्यार्थी समझ ही नहीं सके। विचारोका यह मथन गाधीजीके हृदयमे चल ही रहा था कि अितनेमे अिस प्रश्न पर अन्हें विचार करना पड़ा कि शराबबन्दी करनी हो तो पेसेकी कठिनाभी कैसे दूर की जाय। असमे से अन्हे यह नमी योजना सूझी। अन्होने तत्कालीन प्रान्तीय सरकारोके सामने यह बात रखी कि विद्यार्थियोके आसपासकी परिस्थितिके अनुकूल अत्पादक जुद्योग द्वारा अनकी सारी शिक्षा हो तो शिक्षा अधिक ठोस हो सकती है और विद्यार्थियोके अत्पादनसे शालाको स्वावलबी भी बनाया जा सकता है। प्रश्न तो अितना ही था कि शराबबन्दीके कारण जो आय छोडनी पड़ रही है, असे किस तरह पूरा किया जाय। परतु गाधीजीने केवल अितना ही विचार नहीं किया। झुनकी विचार करनेकी पद्धति किसी भी प्रश्नको समग्र दृष्टिसे जाचनेकी थी। अिसलिओ वे तो अिस विचारमे पड गये कि सारे देशके सातसे चौदह वर्षके बालकोके लिओ अचित शिक्षा कैसी हो और वह सबके लिजे कैसे मुलभ बनाी जाय? अिस अम्रके सारे बालकोको शिक्षा देनी हो तो सरकारको कितनी ही नही शाला खोलनी पडेगी। जितनी शाला आज है अन्हीको चलानेके लिओ जब सरकारको पैमेकी कठिनाजी होती है, तब नी शालाओ कैसे खोली जा सकती है? शालाओ चलानेमे मुख्य सर्च शिक्षकोके वेतनका होता है। असे मिटानेके लिओ अन्होने कहा कि सातो कक्षाओके विद्यार्थियोके अद्योगके कुल अत्पादनसे शालाके तमाम शिक्षकोके वेतनके लायक आय होनी चाहिये। जिसके विरुद्ध मित्रोने यह आपत्ति अठाभी कि अगर आप स्वावलबनका आग्रह रखेगे तो शिक्षक बालकोसे बच्चोंका शोषण? अनके बूतेके बाहर और अनकी मरजीके खिलाफ श्रम करायेगे। अिससे तो बालकोके शोषणका बडा प्रश्न खडा हो जायगा।

२३ अिसके अत्तरमे गाधीजीने बताया कि स्वावलबनको आवश्यक माननेमे मेरी दृष्टि शुद्ध शिक्षाकी ही है। अद्योग द्वारा शिक्षा देनेकी पद्धतिको आप शिक्षाकी अत्तम पद्धतिके रूपमे स्वीकार करते हो, तो वह तभी अत्तम हो सकती है और असके द्वारा बालकोको ठोस शिक्षा तभी मिल सकती है, जब बालक सच्चा अद्योग करे, अद्योगके नाथ खिलवाड न करे, अद्योगमे अपना समय न बिगाडे और अद्योगमे जो कच्चा माल और औजार कामले लिये जाते हो अनका पूरी सावधानीसे झुपयोग करना जाने । समय, माल या औजारोका बिगाड होता हो तब तो यह माना जायगा कि हम बच्चोको गलत शिक्षा देते है। हम झुनका नुकसान करते हैं। हमारा दावा तो यह है कि अद्योग द्वारा शिक्षा देनेसे बालककी कर्मेन्द्रियो और ज्ञानेन्द्रियोके सच्चे विकासके साथ असकी बुद्धि और हृदयका विकास भी अधिक अच्छी तरह किया जा सकता है। यह दावा तभी सच्चा साबित होगा जब बालकको अपने शरीर और मन दोनोकी सारी शक्ति लगाकर काम करनेकी आदत पडे, अपने काममे आनेवाले औजारोको अच्छी तरह रखना आवे और वह किसी तरहका बिगाड न करना सीखे। स्वाभाविक रूपमे जिस बालकका पालन-पोपण हुआ हो, असे खुद काम करना पसन्द होता ही है। दूसरेसे सुनकर ज्ञान प्राप्त करनेकी अपेक्षा स्वय निरीक्षण करके और स्वय प्रयोग करके ज्ञान प्राप्त करना असे अधिक रुचिकर लगता है। शिक्षक स्वय अद्योगमे कुशल होगा, अद्योगकी सारी क्रियाओ कारण देकर समझाना असे आता होगा और अद्योगमे बालककी दिलचस्पी पैदा करनेकी कला असमे होगी, तो बालक बडे शौकसे अद्योग करेगा। यह तो हम अनुभवसे प्रत्यक्ष देख सकेगे कि असीसे असे अधिक अच्छी शिक्षा मिलती है। जिसमे बालकसे जबरन मेहनत करानेका प्रश्न ही पैदा नहीं होता। बालककी शक्तिके अनुसार अत्पादन न हो तब तो अलटा ही परिणाम आयेगा। बालकको संतोष नहीं होगा और उसमे निराशाकी भावना पैदा होगी।

२४ यह माननेकी जरूरत नही कि अिन दलीलोसे भी सब मित्रोको सतोष हुआ होगा, क्योकि आज भी अनमे से कुछ स्वावलबनके बारेमे अत्साह नहीं रखते। हा, अन्हे भी अितना विश्वास तो अवश्य हो गया है कि शिक्षाकी दृष्टिसे अद्योग चलाना हो तो असमे जरा भी बिगाड नही होना चाहिये। वैसे, अभी तक तो बहुतसे शिक्षक यही मानते थे कि शालामे शिक्षाकी दृष्टिसे अद्योग चलाना हो तो बिगाड होता ही है। शाला कोजी कारखाना नहीं है कि वहा अत्पादन और आयका हिसाब लगाया जाय। दूसरी बात शिक्षाशास्त्री मित्रोने गाधीजीको यह कही कि अद्योग द्वारा शिक्षा देनेकी आप जो बात करते है वह 'प्रोजेक्ट मेथड' कोजी नयी नहीं है। शिक्षाके क्षेत्रमे नयेसे नया से भेद विचार यह है कि बालकोको केवल पुस्तको द्वारा अथवा श्रवण, वाचन तथा लेखन द्वारा शिक्षा देनेकी पद्धति बडी दोषपूर्ण है। हेतुपूर्वक नियोजित किसी प्रवृत्ति द्वारा शिक्षा देनेकी पद्धति ही अत्तम है। यह कहकर अन्होने 'प्रोजेक्ट मेथड' की, * किसी वस्तुकी जानकारी देनी हो तो मुहसे असका वर्णन करनेके बजाय अससे सबध रखनेवाली सारी क्रियाओं और सारा व्यवहार बालकोसे योजनापूर्वक कराकर अस वस्तुका ज्ञान देनेकी पद्धति । अदाहरणार्थ, हमे अपने लिखे हुओ पत्रादि जिन्हे भेजने हो अन लोगो तक डाक-विभाग किस प्रकार पहुचाता है अिसका वर्णन करनेके बजाय डाक- विभागके सारे व्यवहारकी व्यवस्था शालामे कृत्रिम ढगसे करके असके सारे काम बालकोसे कराये जाय। कोजी बालक पोस्ट मास्टर बने, कोजी डाकिया बने और कोसी पत्रोको गाववार छाटनेवाला 'सॉर्टर' बने। शालामे कुछ डाकघर बनाये जाय। बालक अक-दूसरेको पत्र लिखकर जो डाकघर अपने गावका माना जाता हो असके डब्बेमे डाल आये। डाकिया बना हुआ लडका असमे से पत्र निकालकर अस पर मुहर लगावे और दूसरे गाव पहुचानेके लिअ नजदीकके स्टेशन २५ जो नभीसे नजी शिक्षा-पद्धति मानी जाती है, बात की और यह बताया कि आपकी शिक्षा योजना वैसी ही है। गाधीजीने कहा कि 'प्रोजेक्ट मेथड' क्या है, सो मैं नहीं जानता। मैने अपने विचार अिस विषयकी कोजी पुस्तके पढकर नही लिये है। यह योजना स्वतत्र रूपमे विचार करके निकाली हुी है। परतु आप अिस पद्धतिका जो वर्णन कर रहे है अससे मुझे लगता है कि मेरी योजना अससे बिलकुल भिन्न है। अिस पद्धतिमे तो जिस विषय या वस्तुकी शिक्षा देनी है अससे सबधित असकी योजना अथवा प्रवृत्ति कृत्रिम रूपमे पैदा की जाती है। वह जैसी सच्ची प्रवृत्ति या सच्ची वस्तु नही होती, जो मनुष्यके झुपयोगमे आये। अस पर किया गया खर्च और बालको द्वारा किया गया श्रम समाजमे किसीके काममे नही आता। यह हो सकता है कि अिस पद्धतिसे वस्तु अथवा विषयका ज्ञान बालकको अच्छी तरहसे कराया जा सके। परतु अिस पद्धतिमे शिक्षा अितनी खर्चीली बन जायेगी कि असका लाभ थोडेसे धनिक वर्गके बालक ही झुठा सकेगे । मुझे तो अत्तम शिक्षा गरीबसे गरीब वर्गके बालकोके लिओ भी सुलभ कर देनी है। अिसीलिओ स्वावलबनको मैं अपनी योजनाकी सच्ची कसौटी कहता हू। जिन अद्योगो द्वारा शिक्षा देनेके लिअ मै कहता हू वे केवल बालकोके मनोरजन, खेल, या शिक्षाके लिओ नियोजित कृत्रिम अद्योग अथवा प्रवृत्तिया नहीं है, परतु देशके लाखो अथवा करोडो लोगोके जीवन-निर्वाहके साधन बन सकनेवाले सच्चे अद्योग है। अिस प्रकार गाधीजीने अपनी योजना मित्रो तथा शिक्षा-विभागके मत्रियो और अधिकारियोके सामने रखी। फिर असे व्यवस्थित रूप पर दे आये। वहासे वे कृत्रिम ढगसे बनाी हुी रेल्वेके डाकके डब्बेमे जाय। वहा सॉर्टर अन्हे गाववार छाटे और प्रत्येक गावके पत्रोके थैले अन गावोके नजदीकके स्टेशन आने पर वहा दे दे, अित्यादि।

२६ देने तथा असका पाठ्यक्रम तैयार करनेके लिओ अंक कमेटी नियुक्त की गी। कमेटीने सुझाया कि अत्पादक अद्योगके अलावा जिस कुदरत और समाजके वीच बालक रहता है, असे भी शिक्षाका माध्यम अथवा केन्द्र बनाया जाय । अद्योगका चुनाव करनेमे आसपासकी कुदरत और समाजकी परिस्थितिका विचार तो करना ही पडेगा, अिसलिओ अनका परिचय भी आवश्यक है। शिक्षाका मुख्य माध्यम उत्पादक अद्योग हो और आसपासकी कुदरत और समाज अप-माध्यम बने । स्वावलवनके सवधमे कनेटीने यह आशा व्यक्त की कि शिक्षकोके वेतनके लायक खर्च बालकोके अद्योगसे धीरे धीरे निकल सकेगा। mr अनुसार प्रयोग हमारे अलग अलग प्रान्तो, जिन्हे अब राज्य कहा जाता है, की सरकारोने गाधीजीकी योजनाके स्वावलंबनका शुरू किये। थोडे ही समयमे झुनकी समझमें आ गया अथवा पहलेसे यह समझ कर ही अन्होने प्रयोग शुरू किये होगे कि हम स्वावलबनके ध्येय तक नहीं पहुच सकेगे। अनको शायद यह भी लगा होगा कि शुद्ध शिक्षाकी दृष्टिसे विचार किया जाय तो गाधीजी स्वावलम्बनको जो महत्त्व देते है वह देनेकी जरूरत नहीं। गाधीजीकी योजनामे अच्छी शिक्षाके जो दूसरे तत्त्व है, जैसे साक्षरी विषयोका बालकोकी अलग अलग प्रवृत्तियोके साथ अनुबंध करना वगैरा, वे अन्होने स्वीकार किये और अन पर अमल करनेका प्रयत्न किया। व्यक्तिगत और सामूहिक सफामी सबधी प्रवृत्तिया की जाय; राष्ट्रीय, धार्मिक और ऋतुओके अत्सव मनाये जाय; जिन घटनाओसे मनोरजनके साथ शिक्षा मिलनेकी सभावना हो अन्हे बालकोके नाट्यप्रयोगोमे बताया जाय; छोटे छोटे पर्यटनोकी व्यवस्था की जाय, शाला-सबधी तमाम कामकाजकी व्यवस्था लकोको सौप कर अन्हे स्वराज्यकी तालीम दी जाय; बच्चोसे हस्तलिखित २७ -- पत्र निकलवाये जाय जिस प्रकारकी प्रवृत्तियोको अन्होने बालकोकी शिक्षाके महत्त्वपूर्ण अग मानता स्वीकार किया। अिसके साथ साथ थोडा समय बालक अत्पादक अद्योगमे दे, अिसे भी अन्होने आवश्यक समझा। और अद्योग तथा अन्य प्रवृत्तियोका अनुवध करके साक्षरी विषय सिखाना शुरू किया। परतु अद्योग द्वारा शालाको स्वावलबी बनानेका विचार अन्हे असभव जान पड़ा। परिणान यह हुआ कि अद्योग और दूसरी प्रवृत्तिया जारी करनेके कारण जिन नी शालाजोका खर्च कम होनेके बजाय पुरानी पद्धतिकी पाठशालाओसे अल्टा बढ़ गया। अद्योग कुशलतापूर्वक न चला सकनेके कारण असमे जो बिगाड होता है वह अभी तक रोका नहीं जा सका है। जैसी आलोचना भी होने लगी है कि यह तो जनताके धनका अपव्यय हो रहा है और बालकोकी साक्षरी शिक्षाका स्तर गिरता जा रहा है। जैसी आलो- चनाओके अत्तरमे बम्बी सरकारने हालमे अक वक्तव्य प्रकाशित किया है। असमे शिक्षाकी दृष्टिसे अिस प्रयोगके क्या क्या अच्छे परिणाम हुसे है, यह बताकर कहा गया है कि अब तकके अनुभवसे जैसा लगता है कि अद्योगके सिलसिलेमे जो अतिरिक्त चालू खर्च होता है अतना तो अद्योगसे निकालना संभव है। कुछ शालाओमे बालकोके वस्त्रस्वावलबी मडल बने है, यह हकीकत भी असमे बताजी गी है। . अद्योग अच्छी तरह चला सकनेके लिओ तमाम शिक्षकोको अनकी दूसरी तालीमके साथ अद्योगका विषय साक्षरी विषयोंके सिखानेकी सरकारने योजना बनानी है। और जैसे बारेमे असंतोष जैसे शिक्षक तैयार होते जायगे, वैसे वैसे तमाम प्रारभिक शालाओमे अद्योग और अनुबद्ध शिक्षा जारी कर दी जायगी। परतु अिस नीति पर अमल करनेके साथ शिक्षा-विभागके अधिकारियोके मनमे यह चिन्ता बनी ही रही है कि साक्षरी विषयोके ज्ञानका स्तर जरा भी गिरना न चाहिये । नयी पद्धतिमे २८ साक्षरी विषयोके पुराने ढगके ज्ञानकी अपेक्षा रखी जाय तो असे पहले जितनी मात्रामे देना कठिन है। क्योकि जितना सनय दूसरी प्रवृत्तियोमे जायगा अतना साक्षरी विषयोका काम कम हो जाना स्वाभाविक है। यह बात सच है कि प्रवृत्तियोके साथ अनुवध साध कर सिखानेकी पद्धतिसे साक्षरी विषयोका ज्ञान अधिक अच्छी तरह दिया जा सकता है, परतु वाचन-लेखन द्वारा ही मिल सकनेवाले और जिसके लिओ रटाीका भी आसरा लेना पडे असे ज्ञानकी अपेक्षा पाठ्यक्रमो और परीक्षाओमे रखी जाय तो असके लिअ थोडा ही समय मिलेगा। जिसका सही अपाय तो यह है कि पाठ्यक्रममे जडमूलसे परितन करने चाहिये और परीक्षाओका स्वरूप भी जडसे ही बदलना चाहिये। परतु अभी तक जैसा किया नहीं जा सका। जैसे बुनियादी परिवर्तन करनेका या तो साहम नहीं हुआ या वे परिवर्तन करनेकी जरूरत ही महसूस नही हुी। अिसके लिअ सरकारी अधिकारियोके साथ गैर- सरकारी कार्यकर्ता भी जिम्मेदार है, क्योकि जिस प्रयोगके सबधर्मे सरकारको सलाह देनेके लिओ असके द्वारा नियुक्त 'बेसिक अज्युकेशन बोर्ड' मे सरकारी सदस्योमे गैर-सरकारी सदस्योकी सख्या अधिक है। अिस स्थितिके लिओ मै अपनेको भी जिम्मेदार मानता हूं, क्योकि अढामी वर्ष पहले बीमार होकर अपग जैसा बन जानेसे पहले मै अिस बोर्डका अध्यक्ष था। अिस बोर्डकी सलाहकी सरकारने अपेक्षा की हो, असी अक भी घटना मुझे याद नही । सरकारी विज्ञप्तिमे जितना कहा गया है अतना भी अभी तक तो अच्छी तरह अमलमे नही लाया जा सका है। शालाओंकी जिन प्रवृत्तियोकी बात सुपर बताश्री गी है, वे अद्योग-संबंधी सब शालाओमे अच्छी तरह होती नही देखी जाती त्रुटियां और अद्योगके सिलसिलेमे होनेवाला खर्च अद्योगसे मिल जानेकी जो आशा प्रगट की गी है वह भी शायद ही कही पूरी हुी है। अभी तक कच्चे माल और साधनोंका - २९ बिगाड होना रोका नही जा सका है।* कुछ शालाओका प्रबध सरकारने गैर-सरकारी कार्यकर्ताओको सौप दिया है। असमे भी अद्योगके मामलेमे जैसी चाहिये वैसी प्रगति अभी तक शायद ही कोजी गाला दिखा सकी है। मैने सुना है कि अकेली कराडीकी बुनियादी शालामे स्वादलबी दृष्टिसे आशाजनक परिणाम आये है। अिसका नुख्य कारण यह है कि अस गावकी आबादी कुशल कारीगर लोगोकी है, वे सन् १९२१ से खादीके बारेमे कुछ न कुछ परिश्रम करते आये है, वहाके शिक्षक अत्साही है और अहे लोगोका अच्छा सहयोग मिलता है। परतु दूसरी शालाओमे जैसे चाहिये वेसे परिणाम दिखाजी नही देते। अिसके की कारण है। सबसे बडा कारण तो यह है कि शिक्षकोको स्वय अभी तक अद्योग अच्छी तरह नहीं आता। अन्हे अधकचरा अद्योग सिखाकर अनके द्वारा शालाने अद्योग जारी करनेकी हम अटादली करते है। ट्रेनिग कॉलेजके, जहा अिस योजनाके अनुसार शिक्षणकी खास तालीम देनेका दावा किया जाता है, अध्यापक बहा चलनेवाले उद्योगोमे से कमसे कम अंक अद्योगमे तो अच्छे निष्णात होने ही चाहिये । तो ही अद्योगनी विविध क्रियाओमे बालकोकी कर्मेन्द्रियो तथा ज्ञानेन्द्रियोके विकासकी कितनी सभावना है तथा गुगके साथ साक्षरी विषयोकी कौन कौनसी और कितनी जानकारीका अनुपध हो सकता है, यह वे अपने अनुभवसे जान सकते और सिखा सकते है । साथ ही अन्हे आसपासकी कुदरत और समाजका केवल पुस्तकोसे प्राप्त किया हुआ ज्ञान नही, परतु प्रत्यक्ष ज्ञान होना चाहिये । यह भी सभव है कि कुछ अध्यापकोको अिस प्रयोग पर श्रद्धा ही न हो। ये सब न्यूनता तालीम देनेवाले अध्यापकोमे काफी मात्रामे होगी। अिन न्यूनताओको वे पुस्तकोसे प्राप्त शिक्षा द्वारा और तर्क दौडाकर किये गये अनुमानो द्वारा ही पूरी कर लेनेका प्रयत्न करते यह वर्णन बम्बी राज्यकी शालाओका और अनमे भी गुजरातकी शालाओका है।

० होगे। परतु जिसमे आनद नहीं आता। हमारा सब काम छिछला ही रहता है। जिनके सिर पर सारी योजनाका ब्योरा तय करके देने, योजनाको अमलमे लानेवाले शिक्षकोको तालीम देने और अन्हे रास्ता बतानेकी जिम्मेदारी है, अन्हीकी जैसी स्थिति हो तो अिसका अर्थ यह हुआ कि अिस योजनामे अद्योगको गिक्षाका अक महत्त्वपूर्ण साधन मानते हुझे भी उसकी पूरी साधना किये बिना अिस योजनाको अमलमे लानेकी जिम्मेदारी हमने झुठाली है । यह बात वैसी ही है जैसे कोी ककहरा और बारहखडी आये बिना भाषा सिखाने लगे अथवा अिस बातकी तालीम देने लगे कि भाषाकी शिक्षा कैसे दी जाय । ट्रेनिग कॉलेजोमे अद्योग सिखलानेके लिओ हम अलग अघोग-शिक्षक रखते है। यह अद्योग-शिक्षक शिक्षाकी दृष्टिसे अद्योगका महत्त्व नही समझता। अनुबधकी पद्धतिकी असे कोजी कल्पना नहीं होती। असे जिस प्रकारके शिक्षाशास्त्रका ज्ञान होना चाहिये, यह आवश्यक नहीं माना जाता। अिस अद्योग-शिक्षकके वेतनका ग्रेड और विभागमे असका दरजा साक्षरी विषयोके शिक्षकोकी अपेक्षा घटिया होता है। जो शिक्षाशास्त्री माने जाते है अनका यह खयाल है कि भले ही अद्योगमे हम निपुण न हो, लेकिन अद्योगके सचालनके सिद्धान्त तो हम समझते है। अिसलिओ असके साथ हम दूसरे विषयोका अनुबध कर सकते है और असे करनेकी पद्धति सिखा भी सकते है। यह स्थिति बुनियादी शालाके शिक्षकोके भी शिक्षकोको, जो ग्रेज्युअट होते है, तालीम देनेके लिओ खुले हुओ कॉलेजोके अध्यापकोकी तथा बुनियादी शालाके अध्यापकोको तालीम देनेवाले अध्यापकोकी है। अद्योग-निरीक्षको (क्राफ्ट सुपरवाअिजरो) की भी कमोवेश यही हालत होती है। अधिक कठिनाी तो शालाके शिक्षकोके मानसकी है । अन्हें अनेक कारणोसे अपनी नौकरीके बारेमे बडा असतोष है। शिक्षकों की कमियां अिसलि अनमे अिस कामके लिओ अत्साह या रस नही पाया जाता। अनकी जानकारी और योग्यता ३१ ३ भी बहुत कम होती है। शिक्षककी नौकरीमे भरती होनेके लिओ प्राथमिक शालान्त परीक्षा पास होनेका जो स्तर रखा गया है, वह बहुत नीचे दरजेका है। अिन शिक्षकोको सिखाये जानेवाले विषयोकी बहुत कम जानकारी होती है। व्यवस्थितता, निश्चितता, नियमितता और स्वच्छताकी तमाम आदतोके बारेमे अनमे बहुत कमिया पानी जाती है। जिन लोगोके विचार जीवन-सबधी साधारण बातोंमे भी अनुभवसे परिपक्व न हुआ हों, वे भी शिक्षक हो सकते हैं। जो मनुष्य होशियार और अत्साही होता है वह तो शिक्षकके धधेमे आता ही नहीं। जो आते है वे यह शिकायत करते रहते है कि जिस नौकरीमे निर्वाहके लायक पैसा भी नही मिलता। अिन शिक्षकोको अद्योगकी तालीम पानेके लिओ आश्रमोमे अथवा अन्यत्र खोले गये केन्द्रोमे भेजा जाता है। वहा जानेके लि और जाकर अकाग्र मनसे तालीम पानेके लिओ बहुत थोडे शिक्षक राजी होते है । अपि । अधिकाश शिक्षक तो यही सोचकर तालीम लेने जाते है कि नौकरीमे पड गये है और नौकरी करनी है, अिसलि अफसरोके हुक्मकी तामील करनी चाहिये, और वहा वे जैसे तैसे अपना समय पूरा करते है। जैसे शिक्षको द्वारा अितना बडा प्रयोग करके अससे अच्छे परिणामोकी आशा कैसे रखी जा सकती है ? थोड़ी बहुत कठिनाजी माता-पिताकी तरफसे भी होती है। वे अिस प्रयोगका महत्त्व नही समझते । झुनकी आंखोके माता-पिताका सामने तो पुराने ढगकी शालाओ ही होती है। वे कहते विरोध है, हम तो अपने बच्चोको पढनेके लिओ शालामे भेजते है, अद्योग सीखने और सफाजीके काम करनेके लिओ नही। नाटयप्रयोग, पर्यटन वगैरा अन्हे निरे खेल मालूम होते है। अिसलिओ वे लोग शिकायत करते है कि आप तो बालकोको खेलाते रहते है अथवा अनसे काम कराते है, पढाते कुछ नही। कामकी तो हमारे घर ही क्या कमी है ? गावोके अज्ञान माता-पिता असा कहे तो समझमें आ सकता है । परतु सुशिक्षित माने जानेवाले बहुतसे माता- .

३२ पिता भी अद्योगको निकम्मा मानते है। वे दलील देते है कि हमारे बच्चोको बादमे कहा यह अद्योग करना है जो आप सुनका समय बिगाड़ते है और अनकी असली पढाीमे कमी करते है। दूसरी बडी कठिनाजी देशकी गरीबीकी भी है। अधिकतर माता- पिताकी आर्थिक स्थिति अितनी तग होती है कि बच्चोको शालामे भेजना अन्हे पुसाता नही। अनके १०-१२ वर्षके बालक छोटे भाजी- बहनोको सभालनेमे माकी मदद करते है, ढोरोको चराने या पानी पिलाने ले जाते है, बापको खेत पर खाना पहुचाते है, और जिस तरहका दूसरा भी बहुतसा काम करते है, और वह काम माता-पिताके लिओ अितना अपयोगी बन जाता है कि असे छुडवाकर वे बालकोको असी पढाओके लिअ पाठशाला भेजनेको तैयार नहीं होते, जिसकी झुन्हे कोी अपयोगिता नहीं दिखामी देती। जैसे बच्चोके नाम पाठशालाके रजिस्टरमे दर्ज किये हुआ हो तो भी अनकी हाजिरी बहुत कम रहती है। अिन सव कठिनाअियोके कारण अिस प्रयोगको अनुकूल वाता- वरण नहीं मिलता। असे पैदा करनेके लिओ सब कठिनाअियोका तरफसे प्रयत्न करने पडेगे। समाज-शिक्षण अथवा लोकशिक्षण द्वारा माता-पिताकी गलतफहमी दूर करनी होगी। अिस नी तालीमका महत्त्व झुन्हे समझाना होगा और जिसमे उनकी दिलचस्पी पैदा करनी होगी। गरीबीके कारण जो कठिनाअिया आती है वे तो गरीबी दूर करनेके अपाय काममे लेकर ही दूर हो सकती है। देहातकी गरीबीका प्रश्न हल करनेका काम मुख्यत. रचनात्मक कार्यकर्ताओका है। अब तो अिसमें सरकारकी मदद भी मिल सकती है। दूसरी तरफ शिक्षकोकी कुशलता और योग्यताका स्तर भूचा झुठानेकी जरूरत है। अन्हे भरती करनेके लिओ जो योग्यता अिस समय निर्धारित की हुी है झुमे बढ़ाना ही पडेगा। भरती करनेके बाद अन्हे जो तालीम दी जाती है वह भी आजसे अधिक ठोस होनी चाहिये। सरकारी विज्ञप्तिमे बताये अनुसार अद्योगके सिलसिलेमे होनेवाले चालू खर्च जितना स्वावलबन सिद्ध करनेका सरकार द्वारा रखा गया लक्ष्य गाधीजीकी योजनामे विश्वास रखनेवालोको भले ही कम लगता हो, परतु यदि सारी बुनियादी मानी जानेवाली शालाओ अस लक्ष्य तक जल्दी पहुच जाय तो अभी तो हमे सतोष कर लेना चाहिये। अद्योग शुरू करनेके कारण जो अधिक खर्च और बिगाड होता है वह तो अक दम रुक ही जाना चाहिये। साथ ही विज्ञप्तिमे जिन वस्त्रस्वावलबी मडलोकी बात की गी है अनकी संख्या भी बढनी चाहिये । औसे मडल शालाओके लिओ अवश्य ही शोभास्पद है। जिन शालाओका प्रबध गैर-सरकारी कार्यकर्ताओके हाथमे है, अनसे अवश्य ही अधिक अपेक्षा रहेगी। माता-पिताके सहयोगके अभाव और अनकी गरीबीके कारण आनेवाली मुश्किले अनके काममें भी बाधक होती है। ये शिक्षक अधिक अत्साह और रसपूर्वक काम करनेवाले होते है, अिसलिले अनसे आशा रखी जाती है कि अद्योग वगैरा प्रवृत्तियोमे वे विद्यार्थियोकी अधिक दिलचस्पी पैदा करेगे और कुल मिलाकर अधिक अच्छे परिणाम ला सकेगे। ४ परतु अितनेसे ही गाधीजीका अद्देश्य पूरा नही हो जाता। अन्हे तो जनता पर करोका भार बढाये बिना शिक्षाको पाठशाला नहीं सार्वत्रिक बनाना था। अिस समय देशी राज्योके परंतु परिश्रमालय विशाल प्रदेश भारतीय सघमे मिल गये है। अनमे की प्रदेश असे है, जहा बालकोके लिओ शिक्षाकी बहुत कम या नहीके बराबर व्यवस्था है। शिक्षाके विषयमे अन्हे भारतीय सघके पुराने प्रदेशोंकी कतारमे लानेके लिअ वहा बहुतसी नी शाला खोलनेकी जरूरत है। परतु रुपयेकी कठिनाीके कारण सरकार शीघ्र वैसा नही कर सकती। रुपयेकी तगीके कारण शिक्षाके बजटमे शि-३ . . अिस वर्ष सरकारने कटौती कर दी है। गाधीजीकी योजनाको अमली रूप दिया जा सके तो असे प्रश्न आसानीसे हल हो जाय। भिम योजनाको कार्यान्वित करनेका रास्ता हमे खोजना ही होगा। यह भार सरकारी विभाग पर डालना मुनासिब नहीं । गैर-सरकारी कार्यकताओको ही योजना पर अमल करके दिखाना चाहिये और झुमके परिणाम समाज और सरकारके सामने रखने चाहिये। गुजरातमे स्कूल वोर्डकी शालाओकी व्यवस्था अससे मागकर गैर-सरकारी कार्यकर्ता चार-पाच स्थानोमे प्रयोग कर रहे है। असमे भी परीक्षाओ और पाठ्यक्रमके बधनोकी तथा माता-पिताके पर्याप्त सहयोगके अभावकी कठिनाअिया बाधक होती है। शालाका अर्थ है पढना, लिखना और साक्षरी विषयोका अध्ययन करना। ये सस्कार लोगोके मन पर हजारो वर्षोंसे पडे हुओं है। लोगोको कितना ही समझाअिये, परतु भाषा, गणित, अितिहास, भूगोल वगैरा साक्षरी विषयोने और अनमे भी अनकी अक खास तरहकी जानकारीने जो महत्त्व प्राप्त कर लिया है, असके पैमानेसे ही किसी भी शालाको नापा जाता है। हम यह सोचे कि जिस गावमे वाला हो ही नही वहां शाला खोलकर परीक्षा वगैराके साथ असका सबध जोडे बिना हम यह प्रयोग करे तो वहा भी थोडे ही दिनोमे माता-पिता आकर कहने लगेगे कि आप कुछ पढाते नहीं है, आप तो बालकोसे काम कराते है और अन्हे खेलाते है। अिसलिओ मुझे लगता है कि यह प्रयोग करना हो तो विद्यालय अथवा शालाका नाम छोडकर हमे काम करना पडेगा। विद्यालयमे अद्योगको लानेके बजाय अद्योगालयमे विद्याको ले जाना पड़ेगा। मुझे याद पडता है कि अक बार विनोबाने अंक प्रसग पर यह कहा था कि गाव गाव पाठशाला खोलनेके बजाय परि- श्रमालय खोलना ही अधिक अच्छा है। गावके बालक वहा यह समझ कर आये कि वे पढनेके लिअ नही, परतु अद्योग करनेके लिअ आते है। कार्यकर्ता तो सच्चे शिक्षक ही होगे। अनके मनमे बालकोकी शिक्षा और सर्वागीण विकासकी निश्चित कल्पना होगी। परतु बे अपने ३५ कार्यका आरंभ अद्योग-शिक्षणसे और बालकोमे व्यवस्थितता और स्वच्छताकी आदते डाल कर करेगे। असा प्रयोग करनेवाले कार्यकर्ता अथवा शिक्षककी अपनी तालीम और तैयारी बहुत पक्की होनी चाहिये। हमारे कार्यकर्ताको गावोमे सबसे बड़ा काम वहाकी गरीबी और गदगी योग्यता दूर करना है। आप दूसरी कितनी ही बाते करे, परतु जब तक लोगोको अनकी गरीबी मिटानेका प्रत्यक्ष और प्रयोगसिद्ध अपाय नही बतायेगे, तब तक लोग आपकी बात नहीं सुनेगे और आप गावोकी कोजी ठोस सेवा नहीं कर सकेगे। अिसके लिओ गाधीजीने खादीका काम बताया है। परतु खादीका अद्योग अक सहायक अद्योग है। वह फुरसतके समयका झुपयोग करके मनुष्यकी मुख्य आयमे थोडी-बहुत वृद्धि कर देनेवाला अद्योग है। अिस दृष्टिसे असका महत्त्व कम नही है, परतु अकेले असीसे हमारे गावोकी गरीवी दूर नहीं हो सकेगी। हमारे गावोके मुख्य अद्योग खेती और गोपालन है। अन पर ध्यान दिये विना अब काम चल ही नहीं सकता। खेती और आज हम जैसी स्थितिमे पहुच गये है कि गोपालन अिन दोनो धधोमे अत्पादन बढाये बिना हम जी नहीं सकते। नहरो द्वारा अधिक विस्तारमे पानी पहुचाने और पडती जमीनको खेतीके काममे लेनेकी योजनाओ पर सरकारकी तरफसे अमल हो रहा है। परतु अिसके साथ गावकी मौजूदा खेतीका अत्पादन भी बढाना जरूरी है। असमे अक बडी रुकावट यह है कि जो खेतीके काममे कोी भाग नहीं लेते या कोी मदद नही देते, असे गैरकाश्तकार जमीन-मालिकोका भार खेती पर पडता है। यह भार कुछ हद तक घटानेके लिअ सरकारने कानून बनाये है। परतु कानूनोसे पूरा लाभ झुठानेके लिओ किसानोमे जो साहस और योग्यता चाहिये वह अनमे पैदा करनेकी जरूरत है।

यह काम कार्यकर्ताओके स्थायी साथ और मददके बिना किसान नही कर सकेगे। जैसे कार्यकर्ताओको खेती-कामके सच्चे जानकार बनना पडेगा। तभी वे किसानोकी सच्ची मदद कर सकेगे। जो शिक्षक अथवा शिक्षकगण अपरोक्त परिश्रमालयकी योजना लेकर गावमे बैठेगे, अनका पहला काम तो गावकी गरीबीका प्रश्न हल करनेमे गाववालोके सहायक बनना होगा। अन्हे खेती और गोधन-सुधारका व्यावहारिक ज्ञान होगा तो ही वे अिसमे सहायक बन सकेगे। व्यावहारिक शब्द मैने जानबूझकर काममे लिया है, क्योकि कृषि-विज्ञानके ग्रेज्युअटको हम गावकी खेती दिखाये तो वह तुरत कह देगा कि यहा पानीकी सुविधा नहीं है, किसानोके पास अच्छे साधन नही है, जमीन सुधारनेको अनके पास पूजी नहीं है, अिसलिमे कुछ नही हो सकता। वह भला होगा तो सरकार नये कुओ खुदवानेके लिओ जो मदद देती है अथवा खाद बनानेके लिओ खड्डे खोदनेका जो प्रोत्साहन देती है, असके बारेमे लोगोको समझायेगा। हमे तो किसानको यह बताना है कि असे बाहरकी मदद न मिले तो भी अपने विशेष परिश्रमसे, विशेष सावधानीसे और आपसमे सहयोग साधकर वह अपनी आजकी स्थितिसे निकलकर अक कदम आगे कैसे बढ़ सकता है, अकके बजाय दो पौधे कैसे अगा सकता है। कोसी आलोचना करेगा कि आप तो शिक्षकको बहुत बडा काम बता रहे है, अससे आप अत्यधिक अथवा न रखने लायक आशा रखते है। परतु अिस समय मै साधारण शिक्षककी बात नही कर रहा हूं। सामने जो घना अधेरा दिखाी दे रहा है असमे दीपक बनकर दूसरोके लि पथ प्रकाशित करनेवाले अथवा जगलकी झाडिया काटकर दूसरोके लिओ रास्ता बनानेवाले वीर और साहसी शिक्षककी बात कर रहा हूं। असे शिक्षकको सारे गावको अपनी शाला बनाना होगा। तभी वह अपने परिश्रमालय अथवा ग्रामशालाके लिओ लोगोमे दिलचस्पी पैदा कर सकेगा।

गावकी खेती और गावका गोधन सुधारनेकी दृष्टिसे वह खेती और गोपालन दोनोकी सहकारी समितिया बनाकर सयुक्त खेती और सयुक्त गोपालनकी योजना बनायेगा। अपने परिश्रमालयको भी वह सहकारी समितिका सदस्य बनायेगा। परिश्रमालयके विद्यार्थी भी खेतोंमे मजदूरी करने और ढोर चराने जायगे। शिक्षक स्वय भी मजदूरी करते-करते लोगोका पथप्रदर्शन करेगा। यदि दो शिक्षक अिस प्रयोगके लिओ गावमे गये होगे, और दो जनोका जाना ही ठीक है, तो यह जरूरी है पहले कदम कि दोनोको खेती और गोपालनके सिवाय वस्त्र- विद्या और बढीगिरीमे से अक अक अद्योग आता हो। साथ ही आठ वर्षके पाठ्यक्रमवाली बुनियादी शाला चलानेके लि) साक्षरी विषयोका जितना ज्ञान आवश्यक माना जाय अतना तो कमसे कम अन्हे होना ही चाहिये। अनकी दृष्टि वैज्ञानिक होनी चाहिये। वे परिश्रमालयमे विद्यार्थी बढानेकी अतावली न करे। प्रारभ वे अक अक विद्यार्थीसे ही करे तो सुविधाजनक होगा। ये विद्यार्थी स्वतत्र रूपमे अद्योगकी कुछ खास क्रिया करने लग जाय तब दूसरे विद्यार्थी भरती किये जाय । कोजी छ महीनेमे तो शुरूमे आये हुले विद्यार्थियोसे अद्योगकी कुछ विशेष क्रियाओं सिखानेके लिओ सहायकके रूपमे भी काम लिया जा सकेगा। अद्योग सिखाते-सिखाते ही असके स्वाभाविक अनुबधमे आनेवाली वैज्ञानिक, यात्रिक और सामाजिक विषयोकी जानकारी वे जबानी ही विद्यार्थीकी योग्यतानुसार देते रहे। फिर छ: महीने या बारह महीनेके बाद वे अक्षरज्ञान देना प्रारभ करे। अनके पास किस अम्रके बालक आते है, यह देखकर अन्हे अपने कामका समय-पत्रक बनाना होगा। संभव है बालवाडी, बुनियादी शिक्षा और प्रौढ-शिक्षा तीनों काम अन्हे शुरू करने पड़े। दो शिक्षक कितना काम सभाल सकते हैं और गावमे से कितने सहायक तैयार कर सकते है, अिस पर कामकी ३८ व्यवस्थाका आधार रहेगा। जिस कामकी व्यवस्था स्थानीय परिस्थितिके अनुसार अनुभवके आधार पर करनी है, झुमके अधिक ब्योरेमे हम नही जा सकते। अिस प्रयोगके आर्थिक पहलूका थोडासा विचार कर लेना चाहिये। अिस समय हमारे गाव अितनी गरीब शिक्षकोंकी हालतमे है कि अिन शिक्षकोको अपनी आजीविकाका आजीविका पाच-सात वर्षका प्रबध करके ही गावोमे जाना पडेगा। अितने समयमे अन्हे गाववालोको अपनी अपयोगिता अिस हद तक सिद्ध कर दिखानी चाहिये और गावकी आर्थिक स्थिति सुधारनेमे अितना हिस्सा ले चुकना चाहिये कि गाव- बाले अनके निर्वाहका भार खुशीसे झुठा ले। गाववाले यह भार न झुठा सके तो अपने शरीर-श्रमसे अपना निर्वाह कर लेनेकी शक्ति तो अनमें होनी ही चाहिये। अितने अर्सेमे अनका परिश्रमालय अथवा ग्रामशाला अितनी अच्छी तरह चलने लग गमी होगी कि असके अत्पादनसे शिक्षकोके निर्वाह जितना पैसा मिल जाय। परिश्रमालयके लिले छप्पर तथा शिक्षकोके रहनेकी झोपडिया गावमे मिल जाय तो अत्तम वात होगी। अनका किराया देना पड़े तो भी चिन्ता नही। वर्ना झुन्हे बनानेके लिओ गाववालोकी मेहनत और बाहरसे कुछ नकद रकम जुटानी पडेगी। अिन मकानों पर गावका ही सार्वजनिक स्वामित्व माना जायगा। थोडेसे बढीके औजार और बुनामीके लिओ अक दो करघे शुरूमे बाहरसे लाने पडेगे, फिर तो आवश्यक साधन धीरे धीरे गावमें ही बना लेने चाहिये। परिश्रमालयमे सीखने आनेवाले जो कुछ अत्पादन करे असका कुछ भाग अन्हे देना होगा। कुछ भाग व्यवस्थाके लि विद्यार्थियोंका सुरक्षित रखा जाय। कितना भाग दिया जाय, यह मेहनताना स्थानीय परिस्थितिया देखकर तय कर लिया जाय । सीखने आनेवालोको अमुक भाग देनेकी बात मै अिसलि कह रहा है कि लोगोकी गरीबी अितनी बढी हुी है कि अनकी मजदूरीके बदलेमे अन्हे झुचित रकम मिले तो ही अनमे काम करनेका अत्साह रह सकता है। चौदह वर्षके बालकोको घरका खिला कर शालामे पढने भेजने जैसी आर्थिक स्थिति जिन माता-पिताकी नही हो, अनके बच्चोको अन्होने जो कुछ अत्पादन किया हो वह दे देना ही ठीक मालूम होता है। नी तालीमके पूरे प्रयोगका प्रारभ किस ढगसे किया जा सकता है, असकी थोडीसी कल्पनाके रूपमे मैने यह कहा है। यद्यपि यह कल्पना है, फिर भी हमारे गरीब गावोकी स्थिति और हमारी वर्तमान बुनियादी शालाओके निरीक्षण पर असका आधार है। जिस प्रकारके प्रयोग तीन चार गावोमे करनेके लिओ पूरी योग्यतावाले साहसी वीर निकल आये तो हम अनके पाच सात वर्षके अनुभवसे गाधीजीकी योजनाके अनुसार शिक्षाका श्रीगणेश करनेकी स्थितिमे आ सकेगे। और वह श्रीगणेश कर सके तो असके आगेके कामके लिओ मौजूदा बुनियादी शालाओके प्रयोग झुपयोगी सिद्ध होगे। वे अपनी शक्ति और परिस्थितिके अनुसार कुछ न कुछ तो करती ही है। जैसे मौलिक प्रयोगोसे अिन शालाओको बहुत प्रेरणा और जानकारी मिल सकती है। जैसे मोलिक प्रयोगोसे ही अनुबधवाले शिक्षणकी सच्ची कला हाथ लगेगी। बुनियादी शालाओका पाठ्यक्रम कैसा हो, अिसकी कल्पना भी जैसे प्रयोगोसे मिल सकती है, यद्यपि गाधीजीकी शिक्षण-योजनामे तमाम शालाओके लिअ अकसा पाठयक्रम बनाना ठीक नही। स्थानीय परिस्थितिके अनुसार पाठयक्रममे फेरबदलके लिओ गुजाअिश होनी ही चाहिये। परतु योजनाको तत्रबद्ध करनेकी जिम्मेदारी जिस पर है असका काम तो निश्चित पाठ्यक्रमके बिना चलेगा नहीं। अिस हद तक योजनाके प्राण अवरुद्ध भी जरूर होगे। अिस प्रकार अिस योजनाको सदा जीती-जागती रखनेके लिओ और ४० तत्रबद्ध पद्धतिसे काम करनेवालोको प्रेरणा मिलती रहे अिसके लिओ स्वतत्र ढग पर काम करनेवाले प्रयोग-वीरोकी जरूरत हमेशा रहेगी। २० मी, १९५० २ - अितिहासकी शिक्षा कुछ सुझाव सन् १९३७ मे गाधीजीने बुनियादी शिक्षाकी योजना मित्रोके सामने रखी, असके बाद असका पाठ्यक्रम तैयार करनेके लिओ अंक कमेटी नियुक्त की। वह जाकिरहुसेन कमेटीके नामसे प्रसिद्ध है। श्री किशोरलालभाजी असके अक सदस्य थे। अस कमेटीके दिये हुओ पाठ्यक्रममे अितिहासका भी पाठ्यक्रम दिया गया है। असके साथ श्री किशोरलालभाीका मतभेद था। जाकिरहुसेन कमेटीके पाठ्यक्रममे ठेठ प्राचीन कालसे शुरू करके क्रमशः अर्वाचीन कालके अितिहास पर आना होता है । असमे पहली कक्षामे अर्थात् सात वर्षकी अम्रके बालकोको ठेठ प्रारभिक दशामे जीवन बितानेवाले आदिमनुष्य किस तरह शिकार करके अथवा जमीनके भीतरसे कंदमूल खोद कर अपना भोजन प्राप्त करते, पेडो पर या गुफाओमे रहते तथा पेडोकी छाल, पत्ते और चमडोका झुपयोग शरीर ढंकने के लिओ करते थे, और असमे से वे खुराकके लिअ पशुपालन तथा सादी खेती पर आये, रहनेके साधनोमे अन्होने कुछ सुधार किये और कपडोके लिओ शून, कपास और रेशमका अपयोग करने लगे वगैरा बाते कहनी होती है। अिसी प्रकार वे लकडी, पत्थर, कासे और लोहेके हथियार और औजार क्रमश काममे लेने लगे, घोडे, गाय, कुत्ते वगैरा पालकर अनका झुपयोग करने लगे अपनी आवश्यकताओ, भावनाओ तथा विचार प्रगट करनेके लि भाषाका - ४१ e- प्रयोग करने लगे, चित्र बनाने लगे और लिखना भी शुरू किया यह सब कहानीके रूपमे और नाटकके रूपमे जैसी प्रवृत्तिया करा कर सिखाना होता है। अिसके बादके काफी प्राचीन कालके मनुष्यका जीवन कैसा था, यह भी कहानियो द्वारा कहना होता है। असमे मिस्र देशमे गुलामोसे मजदूरी कराकर पिरामिड बनवाये गये, मोहन-जो-दडोमे बालक क्या क्या करते होगे, वेदोकी शुन शेपकी कहानी, वगैरा बाते कहना, चीनके पहले पाच बादशाहोकी कहानी कहना अथवा असका अभिनय कराना होता है। साथ ही अति. प्राचीन कालके प्रारभिक दशाके मनुष्यो जैसा जीवन बिताने- वाले जो लोग आज भी पृथ्वी पर कही कही है -जैसे अरबस्तानके बेदू लोग और अत्तरी ध्रुवके पासके प्रदेशके अस्किमो लोग -- अनकी बाते भी कहना और अनका अभिनय कराना होता है। शिक्षक बहुश्रुत और कलावाला हो तो जिसमे बालकोका रस पैदा कर सकता है और आनद भी अत्पन्न कर सकता है तथा आजकलके साधन-सपन्न जीवनके बजाय जैसा कम साधनोबाला जीवन भी मनुष्यका किसी समय था, जिसके थोड़े बहुत सस्कार बालकके दिमाग पर शायद डाल सकता है। अलबत्ता, अिसमे बालकोकी तर्कशक्ति और कल्पनाशक्ति पर जरूरतसे ज्यादा जोर पडनेका डर भी है। हकीकत तो यह है कि हमारे आजकलके थोडी ज्ञान-पूजीवाले शिक्षकोके लिअ ही यह पाठ्यक्रम बडा कठिन पडता है। चीज भले ही कठिन न हो, परतु असे पाये कहासे ? प्रान्तीय भाषाओमे जैसी जानकारी देनेवाली जैसी चाहिये वैसी पुस्तके नही है। अिस पाठ्य- क्रमके अनुसार प्रान्तीय भाषाओमें पाठ्यपुस्तके तैयार की जा सकती है। परतु जिससे हमारा दारिद्रय नही मिटेगा। शिक्षकके पास अिस पाठ्यक्रमके आसपासकी बहुतसी जानकारी हो तो ही वह अिन अति- हासिक कहानियोंको आकर्षक और प्रभावकारी बना सकता है । अग्रेजीमे जैसी जानकारी देनेवाली अनेक पुस्तके होनेके कारण अग्रेजी पढे पाठ्यक्रम तैयार करनेवालोंको जो चीज आसान लगती है, उसका प्रान्तीय ४२ भाषाके पूरे साहित्यसे भी अच्छी तरह परिचित न रहनेवाले हमारे शिक्षकोको बहुत कठिन प्रतीत होना स्वाभाविक है। श्री किशोरलालभाषीका मत यह है कि अितिहासकी शिक्षा निकटके कालसे शुरू होनी चाहिये और धीरे धीरे प्राचीन काल पर पहुचनी चाहिये । प्राचीन अितिहासका अध्ययन सुपरकी कक्षाओमे हो। अिसी प्रकार शालाके समीपवर्ती प्रदेशका अितिहास पहले पढाना चाहिये और क्रमश असके क्षेत्रका विस्तार करते जाना चाहिये। मुझे यह दूसरी वस्तु अधिक महत्त्वकी लगती है। क्योकि शहरके बालक जिन वस्तुओ और घटनाओमे रस ले सकते है और अन्हे आमानीसे समझ सकते है, अनमे गावके बालक रस नही ले सकते। न झुन्हे आसानीसे समझ सकते है। गावके बालकोका रस बिलकुल दूसरी बातो और घटनाओमे होगा और अन्हीको वे आसानीसे समझ भी सकते है। अिसी प्रकार जगलके पासके प्रदेशके, पहाडके पासके प्रदेशके और समुद्रके निकटवर्ती प्रदेशके अर्थात् भिन्न भिन्न प्रदेशोके बालकोकी दिलचस्पी और समझके विषय अलग अलग होगे। अधिक परिचितसे कम परिचित ओर अससे अपरिचितकी ओर अिस क्रमसे आगे बढनेका सिद्धान्त हम स्वीकार करते हो, तो भिन्न भिन्न प्रदेशोके बालकोके लिओ अितिहास और भूगोलका क्रम हमे भिन्न भिन्न रखना चाहिये। अिसलि अंक ही प्रकारकी पाठ्यपुस्तकोसे सब जगह काम नहीं चलेगा। हालमे ही श्री विनोबाने सेवाग्राममे अक भाषण दिया, जिसमे यह विचार प्रगट किया है कि नी तालीमको नित्य नी तालीम रहना पडेगा। यह भी कहा कि भिन्न भिन्न प्रदेशोके लिअ भिन्न भिन्न पाठ्यपुस्तकें होनी चाहिये। प्रत्येक गावकी परिस्थिति अलग-अलग होती है। असीके अनुसार शिक्षाका विचार करना पडेगा। जहा नदीतट होगा वहा अंक प्रकारकी, जहा पहाड होगा वहां दूसरे प्रकारकी, और जहा आसपास जगल होगा वहां तीसरे प्रकारकी शिक्षा होगी। -- ४३ प्रत्येक गावका वातावरण देखकर असकी रचना करनी होगी। अिसके लिओ खास अक ही तरहकी योजना अथवा निश्चित पुस्तके काम नही देगी। आजकल सब प्रान्तोके लिओ अंक ही प्रकारकी पुस्तके सारी शालाओमे चलती है। अिससे गावकी जो विशेषता और भिन्नता होती है असकी कोभी कल्पना नही होती, अक सर्वसामान्य पुस्तकमे बालकोको रस नही आता और अलग अलग प्रकारके गावोके लिओ वह कामकी नही रहती। हमारी पाठशालाओके लिओ पुस्तकोकी जरूरत रहेगी, परतु वे अलग अलग गावोकी स्थितिको ध्यानमे रखकर अलग अलग ढग पर लिखी ही होगी। जो अितिहास सेवाग्रामकी शालामे पढाना होगा असमे सेवाग्रामकी सब सस्थाओका अिति- हास होगा, असमे यह भी होगा कि सेवाग्राम गाव कैसे बना, असमे गावके वृद्ध जनोका अनुभव होगा और जिस प्रकार वह सजीव अितिहास होगा। भूगोलमे भी सेवाग्राम और असके आसपासकी स्थितिका विशेष वर्णन होगा। जिस गावमे हम रहते होगे असे दुनियाका मध्यबिन्दु मानकर असके आसपास दुनिया मौजूद है, यह समझकर भूगोलकी शिक्षा दी जायगी। अिस पुस्तकमे श्री किशोरलालभाभीकी 'जडमूलसे क्रान्ति' नामक पुस्तकसे झुनका ‘अितिहासका ज्ञान' नामक लेख लिया गया है। असमें अन्होने अक दूसरी ही और बड़े महत्त्वकी वस्तु पर जोर दिया है। अन्होंने कहा है कि अितिहासके ज्ञान और शिक्षणको आजकल बहुत महत्त्व दिया जाता है, परंतु वह अितने महत्त्वका पात्र नही है। क्योकि किसी भी घटनाका सोलह आने सच्चा अितिहास हमे शायद ही मिल पाता है। स्वय अपनी की हुी या कही हुी बातोकी भी मनुष्यकी स्मृति अितनी जल्दी मन्द पड जाती है कि थोडे समय बाद असमें सत्य और कल्पनाका मिश्रण हो जाता है। साथ ही, अितिहास पढकर हम भूत- कालके बारेमें जो कल्पना करते है वे अचितसे बहुत अधिक व्यापक ४४ होती है। लोकजीवनके वर्णनके रूपमे जो जानकारी दी हुी होती है, वह अधिकाशमे लोगोके बहुत थोडे भागके जीवनकी जानकारी होती है। फिर भी हम असे समस्त जनसमाजकी स्थितिके रूपमे समझते है। किसी राजा अथवा राजधानीके शहरकी समृद्धिके वर्णन परसे पाठकके मन पर जैसा असर पड़ जाता है मानो सारा देश समृद्ध होगा। नालदा जैसे विद्यापीठों अथवा गुरुकुलोके वर्णन पढकर जैसी छाप मन पर पडती है कि सारे देशमे विद्याका खूब प्रचार होगा और देशके सभी बालक अिन विद्यापीठो और गुरुकुलोमे पढने जाते होगे। गार्गी जैसी विदुषीके वर्णन परसे यह छाप मन पर पड़ती है कि प्राचीन कालमे सभी स्त्रिया खूब पढ़ी-लिखी होगी। किन्तु यह मानना वैसा ही होगा, जैसा आजकल सरोजिनी नायडू अथवा विजयालक्ष्मी पडितका वर्णन पढकर यह मान लिया जाय कि भारतमे सभी नही तो बहुत बडे भागकी स्त्रियां जैसी ही विद्वान और आगे बढी हुी होगी। अिसलि) अिति- हास पढकर न केवल व्यापक अनुमान ही नही लगाने चाहिये, बल्कि तुरन्त यह भी नहीं मान लेना चाहिये कि अितिहासमे आनेवाली सभी घटनाये ठीक असी तरह ही होगी। आश्रमकी पाठशाला और गूजरात विद्यापीठ दोनोमे अितिहास पढानेका काम मैने की बार किया है। अस अनुभवसे मै तो अिस परिणाम पर पहुचा है कि जब तक विद्यार्थी बडी झुम्रका न हो जाय तब तक असे व्यवस्थित अितिहासकी शिक्षा देना व्यर्थ है। आजका हमारा जीवन हमारे आदर्श, हमारी आकांक्षाओ, हमारी सामाजिक, धार्मिक, राजनैतिक और आर्थिक संस्थाले सब अब तकके हमारे अितिहासका परिणाम है। यह समझनेके लिओ पहले तो हमे आजके जीवनका अच्छी तरह निरीक्षण करना चाहिये। बादमें असके कारणोकी जाच करनी चाहिये। अपने देशका विचार करे तो हमारी वर्तमान स्थिति हमारे पूर्वजोके अच्छे कार्यों और भूलोका तथा विदेशोकी जिन जिन प्रजाओसे हमारे देशका संबंध हुआ असका परिणाम है। जिस प्रकार - हमारी वर्तमान स्थितिका भूतकालकी अनेक घटनाओके साथ कार्य- कारण सबध है। यह सब समझानेका अितिहासका दावा है। परतु जैसा श्री किशोरलालभाजी कहते है, हमे अपलब्ध अितिहास ही यदि दोषपूर्ण अथवा भूलभरा हो, तो अससे न केवल हमारी वर्तमान स्थितिका सही स्पष्टीकरण नही मिलेगा, प्रत्युत वह हमे गलत रास्ते पर भी ले जायगा। यह सब समझना प्राथमिक या माध्यमिक शालाके विद्यार्थीकी शक्तिसे बाहर माना जायगा। जिसे सामाजिक परिस्थितिका और समाजके प्रश्नोका कुछ न कुछ खयाल हो, वही अितिहासको अच्छी तरह समझ सकता है और अससे लाभ झुठा सकता है। मै मानता हूँ कि अिस समय प्राथमिक और माध्यमिक शालाओमे जिस प्रकारका और जिस ढगसे अितिहास पढाया जाता है, अससे विद्यार्थीको कोसी लाभ नहीं होता, बल्कि नुकसान ही होता है। मेरी राय यह है कि अितिहास पढाना हो तो भी कॉलेजो अथवा अत्तर-बुनियादी शालाओमे ही पढाना चाहिये। और, वह अितिहास भी अच्छी तरह परिमार्जन करके नी दृष्टिसे लिखा जाना चाहिये। यह नी दृष्टि कैसी हो? पहले तो हमे यह वस्तु मानकर चलना होगा कि भूतकालमे हुी सभी बाते कोी याद रखने लायक या अितिहासमे दर्ज करके रखने जैसी नही होती। कुछ बाते तो खास तौर पर भूल जाने योग्य होती है। जैसी भूल जाने लायक वस्तुओको हम अितिहासकी पुस्तकोमे दर्ज करते रहेगे, तो हम मनुष्य मनुष्यके बीच ीा-द्वेष और वैरभावको जीवित रखेगे और असे पोषण देगे । अदाहरणके लिओ, हिन्दुओका मुसलमानोके साथ आठ सौसे भी अधिक वर्षोंका सबध रहा है। असमे हिन्दू-मुसलमानोमे की बार लडाअिया हुी है, और दोनों जातियोने अक-दूसरेके साथ मेल भी साधा है। जिस हद तक मेल साधा है अस हद तक दोनोको लाभ हुआ है। मनुष्य मनुष्यके बीच भ्रातृप्रेम और समानताकी अिस्लामी ४६ भावनाने हिन्दुओकी अधिकार-भेद और झूचनीचकी भावना पर बनी हुश्री समाज-रचनाको सुधारनेमे कम असर नही डाला। जब भारतमे राज- सत्ता मुसलमानोके हाथोमे थी तब पद्रहवीसे अठारहवी सदीके बीच हिन्दुओमे जो अनेक साधु-सन्त हो गये, अन पर अिस्लामी अकेश्वरवाद और भ्रातृभावका बहुत असर पड़ा होना चाहिये। अिसी प्रकार मुस- लमान औलियो और सूफीपथके मस्त फकीरो पर वेदान्त और अप- निषदोके सिद्धान्तोका प्रभाव भी कम नही पडा। अिस प्रकार दोनोके अत्तम तत्त्वोके सुमेलसे नी भारतीय अथवा हिन्दुस्तानी संस्कृति निर्माण हुी है। भारतकी भाषाओ, लोगोके रीतरिवाज वगैरा अिसी सुमेलके परिणाम है। यह सब किस प्रकार हुआ, यह हिन्दू सतो तथा मुसलमान औलियोंके जीवन कैसे थे और अनका दोनो जातियोकी आम जनता पर कैसा असर पड़ा, अिसका वर्णन करके समझानेका काम मै अितिहासका मानता ह। अत्तर भारतका अितिहास जैसे मुमल- मानोके साथ हुले ससर्गसे रगा गया, वैसे दक्षिण भारतके अितिहासमे जीसाअियोके ससर्गका असर भी काफी पाया जाता है। अितिहासमें यह सब देखने और समझनेके बजाय राजाओके अितिहास परसे अन्होने अपनी राजनैतिक महत्त्वाकाक्षाओ तथा स्वार्थोको पूरा करनेके लिओ देशकी भिन्न भिन्न जातियोको अक-दूसरेसे लडाया हो, कभी अक जातिको तो कभी दूसरीको अपने पक्षमे लेकर अस पर मेहरवानी दिखाी हो अथवा अस पर नाराजी जाहिर की हो और अससे अलग अलग जातियोमे ीा-द्वेषके बीज बोनेका प्रयत्न किया हो अस परसे यह अनुमान लगाकर कि दोनो जातिया मेक-दूसरेके साथ द्वेष करती अथवा लडती रही है हम असे अितिहासमें दर्ज करे, तो यह बालकोको ीा-द्वेषका अितिहास पढाने और जिस प्रकार ीा- द्वेषको जिन्दा रखनेका ही काम होगा। आज मुसलमानोके सबधमे हिन्दुओके मनमे और हिन्दुओके सबधमे मुसलमानोके मनमे जो द्वेष और अविश्वास अथवा अरुचिकी भावना है, वह जिस बातका परिणाम -- ४७ , है कि दोनो जातियोके बीच हुी लडाअियोकी घटनाओको हम विस्मृतिके गर्तमे नही दफना सके, कुछ याद रखने जैसी हकीकतोको अच्छी तरह दर्ज करके नहीं रख सके, कुछ तथ्योका विकृत रूपमे अल्लेख किया गया है और कुछ घटनाओ जो कभी घटी ही नही सच्ची अतिहासिक घटनाओके रूपमे अितिहासमे प्रचार पा गी है। यो तो अितिहास-शोधक कहते है कि बौद्धो और ब्राह्मणोके बीच तथा गुजरातमे जैनो और ब्राह्मणोके बीच कम लडाअिया नही हुी। परतु साधारण अितिहासोमे यह चीज नही आती, अिसलि जनताको अिस विषयका कोमी खयाल नहीं है और अिसलिओ अिन धर्म- सप्रदायोके लोगोके बीच आज कोजी ीा-द्वेष नहीं है। जैसा ही हिन्दू-मुसलमानो और ीसाअियोके सबधमे करनेकी जरूरत है। पाकिस्तान अलग हो गया है, फिर भी हिन्दुओ और मुसलमानोको पाकिस्तान और भारत दोनोमे अिकठे रहे बिना कोी चारा नहीं है। अक देशके भीतर रहनेवाली अलग अलग जातियोके बारेमे जैसा विचार करना चाहिये, वैसा ही विचार अलग अलग देशोके बारेमे भी करना चाहिये । अक देशकी दूसरे देशके साथ लडामी होनेकी घटनाओ अितिहासमे दर्ज करके रखी जाती है। परतु ओक-दूसरेके बीचके जीवन-व्यवहारकी अनेक शान्तिपूर्ण घटनाओं झुत्पात मचानेवाली न होनेके कारण दर्ज नही की जाती। अिसलिओ बालकोके मन पर यह असर पडता है कि विदेशियोको तो शत्रु जैसे मानकर अनसे हमेशा होशियार ही रहना चाहिये। अिससे बालकोंके दिलमे गलत देशाभिमान अत्पन्न होता है, जिसके कारण जैसी भावनाको पोषण मिलता है कि अपने देशकी बात अचित हो या अनुचित, परतु हमे तो अपने देशका ही पक्ष लेना चाहिये। अितिहास-लेखकको भूतकालकी बाते दर्ज करनेमे बडे विवेकसे काम लेना चाहिये। असे अंक भी असत्य बातका कभी प्रचार नही करना चाहिये । तथ्योको विकृत रूप देना असत्य जैसा ही अथवा अससे ४८ भी बुरा है। परतु सच्ची घटनाओको, जिनकी तहमे मनुष्यकी मूर्खता अथवा रागद्वेष हो, भुला दिया जाना चाहिये। ीा-द्वेष पीढी दर पीढी बना न रहे परतु भुला दिया जाय ओर मानवकुलकी भिन्न भिन्न शाखाओं अक-दूसरेके नजदीक आये और आपसमे मिलजुल कर रहे, असा वातावरण पैदा करनेमे अितिहासकार काफी हाथ बटा सकता है। मैने अपर कहा है कि अितिहासकी शिक्षा जैसे विद्यार्थियोको दी जा सकती है, जिनके विचार और अम्र कुछ पक गये है और जो सामाजिक घटनाओकी तहमे रहनेवाले कार्यकारण सबंधको समझ सकते है । तो फिर क्या बुनियादी शालाओमे अितिहासके लिओ स्थान हो सकता है ? मेरे खयालसे अनमे कालानुक्रममे गूथा हुआ सारा अिति- हास पढानेकी जरूरत नहीं । कालानुक्रमका थोडा-बहुत खयाल भी बडी अम्रमे ही हो सकता है। अिसलि बुनियादी शालाओमे तो बच्चोको दिलचस्प लगनेवाले अतिहासिक व्यक्तियो और घटनाओकी बाते ही कही जा सकती है। जनकल्याणके लिओ, स्वाभिमान तथा शीलकी रक्षाके लि, अन्त.करणके विश्वासके लिअ अथवा जैसे ही किसी भूचे हेतुके लि कुर्बानी करनेवाले तथा कष्ट सहन करनेवाले व्यक्तियो, संतजनो, धर्मवीरो, साहसी प्रवासवीरो, वैज्ञानिक शोधको, विद्याके अपासको, और लोकनेताओ आदिकी बाते आ सकती है। अिनमे अच्छे राजाओकी बाते भी शामिल की जा सकती है। व्यक्तियो तथा समूहके सत्याग्रहकी घटनाओको स्थान दिया जा सकता है। ये बाते कक्षावार चढते क्रमसे रखी जानी चाहिये। जिससे पूरे अितिहासका ज्ञान तो नही मिलेगा, मगर अितिहासके विषयका कुछ परिचय हो जायगा। समाजको किस मार्ग पर ले जाना है, अिसका खयाल शिक्षकके मनमे सदा ही होना चाहिये और जैसी बातोके द्वारा अस दिशामे जानेकी वृत्तिको पोषण मिलना चाहिये। २२ मी, १९५०

शिक्षाका विकास
पहला भाग
साबरमती

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शिक्षाके लक्षण १ सामान - जीवामिया नामक अंक मुसलमान किसान है। पहले वह तेलीका धन्धा करता था, परन्तु कुछ वर्षो से खेती कर रहा है। मामूली लिखना- पढना जानता है। खेतीके कामसे फुरसत मिलती है तब वह बढीका काम करता है; बढीके रूपमे वह साप्ताहिक बाजारमे बिक सकनेवाला खाटे, पेटिया, चलनिया वगैरा बनाता है। साथ ही वह कली करने और झालनेका काम तथा सादा लुहारी काम भी जानता है। खाट भरनेकी सन बगैराकी डोरी वह अपने-आप बुन लेता है। असके अक्षर अच्छे नही है, (परन्तु सुलेखनकी परीक्षामे कितने अध्यापक पास होगे, यह शकास्पद ही है ) फिर भी वे पढे जा सकते है। वह अितना व्यवहार-कुशल है कि असे कोी आसानीसे धोखा नही दे सकता। गावका मुखिया या बाजारका दुकानदार असके 'भोलेपनका लाभ' नहीं झुठा सकता। मैने असे हमेशा अत्साहपूर्ण और आत्मविश्वासी देखा है। दो अढाजी महीनेसे वह नी जमीन लेनेके लिओ ओक आदमीसे बातचीत किया करता था। परन्तु बातका निपटारा न होनेसे घर बैठा था। फिर भी असके मुख पर चिन्ता नही थी, क्योकि वह घडी भर भी निकम्मा नहीं बैठता था। वह अपने बढीके और दूसरे फुटकर कामोसे गुजरके लायक कमा लेनेका विश्वास रखता था। वह अकेला नही है। असे अपने सिवाय और चार आदमियोंका पोषण करना पड़ता है। अनमे दो छोटे बच्चे है, अक लडका 'फेरी' में ३ ४ शिक्षाका विकास और सामान झुठाने व ले जानेमे मदद करने लायक ही है। मुसलमान होनेके कारण असकी स्त्री बाहर मजदूरीके लिअ नहीं जाती। असे समझ लेनेकी जितनी फुर्मत मिलती है असके हिसाबसे वह देशकी स्थिति काफी समझता है। खादी, चरखा, असहयोग, गांधीजी-- अिन सबके बारेमे वह बिलकुल अनजान नही है। अिनमे वह दिल- त्रस्पी भी लेता है, परन्तु असकी भावनाये जितनी चाहिये अतनी विकसित नहीं हुी है, अिसलिओ अिन कामोमे असका स्वाभाविक अत्साह तीन रूपमे प्रगट नही होता। फिर भी वह कहता था कि असने बुनाी सीखनेके लिो आश्रममे रहनेकी माग की थी। लगभग ओक महीने तक मुझे रात-दिन असके सहवासमे आनेका मौका मिला। अस अर्मेमे मैने असके या असके बच्चोके महसे अक भी अपशब्द नही सुना । असके बच्चोमे मुसलमान जातिका स्वाभाविक अद्धत तेज था और अस तेजके कारण अनका अधम माता-पिताको जब असह्य हो जाता तब वे बच्चोको मारते भी थे, परन्तु अनमे क्षण क्षणमे क्रोधसे या गाली देकर बच्चोको बुलानेकी आदत नहीं थी। जब गुस्सा करनेकी बात न होती तब प्रेमभरे 'बेटा' गब्दसे ही वे बच्चोको सबोधन करते। कभी कभी फारसी या अर्दू भजन गाते भी मैने अस कुटुम्बको सुना था। अिनके जीवनमे मुझे अक खामी मालूम हुी। ये लोग आठ- आठ दिन तक नहाते नहीं थे और कपडे तो न जाने कितने दिनमे धोते होगे। गदगीसे झुन्हे नफरत नही होती थी। अिस खामीको छोड दे तो मेरे खयालसे अिस मियाको हम पूर्ण कुमार-मदिरकी शिक्षा पाया हुआ मान सकते है। हमारे देशका अक-अेक मनुष्य जितना शिक्षित दिखामी देगा, तब हमारा प्राथमिक शिक्षाका प्रश्न हल हुआ माना जायगा। अिसमे से कितनी शिक्षा असे पाठशालामे मिली होगी? 'शिक्षा' का प्रचार करनेवाले अिस प्रश्नको किस दृष्टिबिन्दुसे देखे, ५ शिक्षाके लक्षण अिसका मेरे खयालमे यह भाजी अक अच्छा पदार्थपाठ हमारे समक्ष पेश करता है। २ अक बार मै थोडे दिनके लिओ आबू पर्वत पर गया था। मुझे गाडीके 'ठेकेदार' के कार्यालयमे जाना था। रास्तेका मुझे अच्छी तरह पता नहीं था। अिसलि मै रास्ते चलनेवाले आदमियोसे पूछता पूछता आगे बढ़ रहा था। दो गोरे विद्यार्थी सामनेसे आ रहे थे। अककी अम्र तेरह-चौदह वर्षकी और दूसरेकी ग्यारह-बारह वर्षकी होगी। मैने अिन लडकोसे ठेकेदारके कार्यालयका रास्ता पूछा ! बड़े लडकेने थोडी-मी सूचना दी, परन्तु वह छोटे लडकेको अधूरी लगी। वह जमीन पर घूटनोके बल बैठ गया और अगुलीसे रेतमे असने हम जहा खडे थे वहासे ठेकेदारकी दुकान तकका रास्ता नक्शा खीचकर बता दिया। फिर रास्तेमे आनेवाली सूचक दुकानो और जगहोके स्थान बताये और यह समझाया कि 'अस कुओके पास जरा टेढे सामनेकी ओर जो भूरा बगला आयेगा वही ठेकेदारका दफ्तर है।' यह समझाने और रास्तेमे नक्शा खीचनेका काम अस लडकेने अितनी चपलता और विवेकसे किया कि मुझे जैसा लगा कि सचमुच यह लडका 'शिक्षित' है। रास्ता सीधा नही था। दाजी बाजी तरफ वह की तरहसे सापकी तरह मुडता था, परन्तु असने मुझे लगभग ठीक रास्ता बता दिया। मै विद्यापीठ कार्यालयसे रोज साबरमती आश्रम जाता है, परन्तु आज भी मुझे असा नही लगता कि मै रास्तेके सारे मोड अच्छी तरह खीच कर बता सकता हूं। मुझे जैसा लगे बिना नही रहा कि वह लडका मुझसे अधिक अच्छी तरह ‘शिक्षित' हुआ है। फिर भी मैं अपने नामके आगे दो अपाधिया लिख सकता हूं और शिक्षाके विषयमे

शिक्षाका विकास
अनेक आचार्य मुझसे सलाह लेनेकी अपेक्षा रखते है। मुझे नहीं लगता
कि जबसे मै राष्ट्रीय मदिरमे रहा तबसे मैने विद्यार्थियोमे जितनी
'शिक्षा' ली है अतनी मैने अन्हे दी होगी।
परन्तु अिस दशामे मै लज्जित नहीं है, क्योकि छोटे बालकोसे
शिक्षा लेकर ही सच्चा गिक्षक बन सकनेकी मै आशा रखता हूँ।
३
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"
मैं आश्रमसे कार्यालयमे आ रहा था। सामनेसे बारह सालका
अक लडका तेज चालसे चला आ रहा था। लडका मुझे नही जानता
था, मै झुमे नही जानता था। उसने मुझे 'वन्देमातरम्' के स्वागतभरे
शब्दोसे नमस्कार किया। असकी चाल और आवाज दोनोंमे विनयके
साथ तेज दिखामी दिया।
आश्रम यहासे कितनी दूर है ?'
दो मील। वहा तुम्हे किससे काम है?
मेरे पिता आश्रममे काम करते है, अन्हे बुलाने जाना है।
अिस लडकेको ‘साहित्य, संगीत और कला' कितने आते होगे,
यह मै नही जानता। परंतु मुझे असकी चालमे, असकी आवाजमे और
असकी विनयमे 'शिक्षा' के लक्षण साफ दिखाी दिये।
फिर असने पूछा,
साबरमती', १९२३

२ शिक्षित और अशिक्षित पिछले साल आश्रमसे विद्यापीठके रास्ते जाते हुझे मुझे चने-मुरमुरे बेचनेवाला अक मुसलमान बूढा रोज मिलता था। धीरे धीरे सलामसे आगे बढकर हम बातचीत करने लगे। असकी बातो परसे मेने जाना कि कुछ वर्ष पहले वह मिलमे काम करता था और बहुत अच्छा कमाता था, बादमे बीमारीके कारण कमजोर हो जानेसे मिलमे काम करने लायक नहीं रहा। “सेठने मुझसे कहा कि 'मिया, अब तुम दफ्तरमे आकर चपरासीकी जगह बैठे रहना; तुम मरोगे तब तक मैं तुम्हे वेतन दूगा।' परतु अिस प्रकार सेठकी मेहरबानी पर जीना मुझे पसन्द नहीं आया। हम दो आदमी है और मेरी सासके साथ शामिलके शामिल और अलग अलग रहते है। मेरी सास कहती, 'बेटा, अब मै तुझे नौकरी करने नहीं जाने दूगी। तू शहरसे चने-मुरमुरे लाकर सामने वाडजके नाके पर बैठा कर । खुदा शाम तक जितना देगा अससे हम काम चला लेगे।' अिसलिओ मैं सुबह शहरसे यहा आता है और दोपहरको नदी पार करके सासके घर खाना खा आता हूं। शामको सासके घर टोकरी रख देता हू और घर चला जाता है। अिस प्रकार मेरा धधा चल रहा है। शाम तक चार-छ• आने मिल जाते है, और अितना मिल जाय तो क्यो किसीके गुलाम बनकर रहे ? मुझे जैसा नही लगता था कि अिस आदमीने लिखना-पढना सीखा होगा। शायद थोडा-बहुत आता भी होगा। परतु यह नही कहा जायगा कि वह और असकी सास शिक्षित नही थे। २ अिससे भिन्न प्रकारका अनुभव मुझे थोडे महीने पहले अक राष्ट्रीय शालाके विद्यार्थियोने कराया। वहाके विद्यार्थियोने अपनी परे- ८ शिक्षाका विकास शानियोकी कुछ बाते मुझसे कही। वे यदि सच हो (और शिक्षक कहते है कि वे सच है) तो वे हमारे कौटुम्बिक जीवनकी अधोगतिका करुणाजनक दर्शन कराती है। अिस शालामे अग्रेजीकी पाचवी कक्षा तक पढाी होती है। अधिकाश विद्यार्थी बारहसे पद्रह वर्षकी आयुके और खासे सुखी घरोके है। तुलसीदासजी कहते है कि रघुकुलकी कीर्ति 'प्राण जाय पर वचन न जानी' की टेक पर बनी थी, अिस गावके पाटीदार कुलोके बारेमे मुझे विद्यार्थियोने कहा कि वे अपनी कीर्ति बडी हवेली और विवाहमे किये जानेवाले भारी खर्च पर मानते है। पास रुपया हो और दूसरे सद्व्ययके मार्ग सूझने जितनी सस्कारिता न आजी हो तो असका अपयोग जैसे कामोमे करनेकी वृत्ति होना स्वाभाविक है। अमीरीके साथ जैसा बडप्पन प्राप्त करनेकी अिच्छा तो आम तौर पर रहेगी ही; अिसलिओ यह परिस्थिति कितनी ही अनिष्ट हो तो भी असे स्वीकार करना ही पडेगा। परतु विद्यार्थियोने कहा, “अिसलिओ हमारे माता-पिता हमसे कहते है कि 'अब पढना बन्द करो, अफ्रीका जाओ और रुपया कमाकर लाओ। पढना ही हो तो सरकारी स्कूलमे पढो जिससे अच्छी नौकरी मिले।' हमारे विवाह अभीसे कर डाले है। माता-पिता कहते है कि, 'अिस विवाहमे अितना खर्च हो गया, तुम्हारी पढाओ पर अितना खर्च होता है। यह पैसा ला दो नही तो घरसे बाहर निकलो। अपने पुत्रको कोमी माता-पिता असे वचन कह सकते है, अिस पर मुझे विश्वास नहीं हुआ। किसीने पिताके लिो ‘आशा रखनेवाला बाप' कहा है, परतु माताके लिओ तो वह भी ‘आशा न रखनेवाली मा' कहता है। परतु अिन विद्यार्थियोमे से कुछने अपनी माताओ पर भी जैसी भाषाका आक्षेप किया। मै अिसे न मान सका और अिसलिओ मैने यही समझ लिया कि अिन विद्यार्थियोमे जैसी कोजी अद्धतता रही होगी जिसे सहन न किया जा सके। और असा समझकर मैने शिक्षित और अशिक्षित ९ अनसे मातृ-भक्ति और पितृ-भक्तिके बारेमे बात की। मैने यह भी कहा कि कभी कभी क्रोधके आवेशमे असे शब्द माता-पिता बोल देते है, परतु ये अनके हृदयके स्थिर भाव नहीं होते। अिसलि असे शब्दोसे यह कल्पना न कर ली जाय कि 'मा-बाप पैसेके ही सगे है।' मैने अस समय विद्यार्थियोसे कहा था और अब भी मैं मानता हू कि यह सच नही हो सकता कि लडके माता-पिताको कमाी लाकर दे तो ही अन्हे प्यारे लगते है। यदि लडके राम या श्रवण जैसे माता- पिताकी सेवा करनेवाले, विनयी और आज्ञाकारी हो, तो वे निर्धन होने अथवा गरीबी और श्रीमानदारीसे गृहस्थी चलानेका आग्रह रखनेके कारण माता-पिताको बुरे लगे, यह हो ही नहीं सकता। मेरा तो पिताके बारेमे भी यही अनुभव है और माताके लिओ तो ससारके अधिकतर लोग अिसकी साक्षी देगे कि माताके लि) पुत्रका प्रेम अितना बधनकारक होता है कि वह तगी भुगतकर भी पुत्रसे दूर रहना नहीं चाहती। परतु अिन विद्यार्थियोने ब्योरेवार अपने घरकी जो स्थिति मेरे सामने रखी, अस परमे जैमा माननेके लिओ कुछ कारण जरूर है कि हमारे कुटुम्बोका वातावरण अितनी अधोगतिको पहुच गया है कि असमे माता-पिताके मनमे रुपया ही मुख्य बन जाता है -- पैसे मिलनेकी दृष्टिसे ही बालकोका पालन-पोषण किया जाता है, अनके विवाह किये जाते है, अन्हे पढाया जाता है। कोजी रम्य स्वप्न देखनेके बाद सत्य जागृतिमे आने पर मन बहुत बार यह माननेको तैयार नहीं होता कि वह स्वप्न झूठा ही था; अिसी तरह यह मानते हुआ हृदयको आघात लगता है कि माता-पिताके बारेमे मेरी कल्पना गलत और विद्यार्थियोकी बताी हुी अपरोक्त स्थिति सच्ची ही होगी। मैं मानता हूँ कि अिसका दूसरा पहलू भी जरूर होगा। फिर भी बालकोके प्रति माता-पिताकी शुद्ध बुद्धिके बारेमें दससे पद्रह वर्षके बच्चोके हृदयमे शका झुठ सकती है, यह चीज ही मुझे शिक्षाका विकास आघात पहुचानेवाली लगती है, और वह पढाओ कितनी ही हुश्री हो, परतु -- शिक्षाका अभाव सूचित करनेवाली लगती है। अिसके विपरीत पचास वर्षके बूढेको 'बेटा' कहनेवाली आर स्वतत्रता खोनेकी अपेक्षा थोडी कमाीसे सतोष माननेवाली सासकी भावना कितनी स्वाभिमानी और प्रेमपूर्ण जान पडती है । ३ तीसरा अनुभव भी आश्रम और विद्यापीठके वीचके रास्तेका ही है। जिस रास्तेसे आनेवाले अक गावके बालक वाडजकी राष्ट्रीय शालामे पढते थे। जाते आते दोनो समय रोज हमारा मिलाप होता था और अक बार में राष्ट्रीय शाला देख आया था अिसलि हमारे बीच काफी मित्रता हो गी थी। दूरसे मुझे सामने आता देखकर वे 'जय जय, किशोरलालभाओ, जय जय किशोरलालभाजी' कहकर दौडते हु आते, मुझसे घडी निकलवाकर कितने बजे है, यह जाननेका लगभग रोजका कार्यक्रम रहता; कभी कभी वे चनोकी माग करते। शालामे छुट्टी होती तब वे रास्तेके पेड पर चढ जाते। मुझे पेड परसे देखकर डालीके पीछे छिप जाते और पुकार कर ढढवानेकी कोशिश करते। हमारी यह मित्रता की महीनो तक चली। परतु बादमे असमे अक विघ्न आ गया। कुछ मास पूर्व वाडजमें अत्यज-प्रवेश होनेसे अिन लडकोने राष्ट्रीय शालाका त्याग कर दिया और वे मुझसे नाराज हो गये । सभव है अनका यह भी खयाल हो कि वाडजमे अंत्यजोको लानेमे मेरा हाथ है। अब वे सरकारी शालामे जाते है। अब भी हम आमने-सामने मिलते है । परतु अब मुझे 'जय जय' कैसे किया जा सकता है ? मैने अक बार अनसे कहा, “तुम सरकारी शालामें भले ही जाओ, परतु अिससे हमारे बाते करनेमे क्या हर्ज है परतु यह मित्रता अब अनके लिओ स्वप्नवत् हो गी। पहले तो वे ?"

शिक्षित और अशिक्षित ११ मेरी आखोसे अपनी आखे न मिलने देते। मुझे दाी ओर चलता देखकर वे बाजी ओर हो जाते और मुह अल्टी दिशामे कर लेते। अक विद्यार्थी, जो पहले मुझे देखते ही हस देता था, अब हसी न आने देनेके लिअ मुह बन्द करके दूसरी दिशामे गरदन मोड़ कर चलने मित्रताके स्थान पर तिरस्कारकी वृत्ति अत्पन्न हो जाय तो वह कितनी तेजीसे बढती है, यह मुझे अब देखनेको मिलने लगा। धीरे धीरे अिन लडकोकी वृत्तिमे फर्क पडने लगा। अब वे रास्ते या आखोकी दिशा नही बदलते, परतु आखे बडी करके और छाती निकालकर सामने आते है और मेरे दोनो ओरसे पासमे होकर चले जाते है। अक दिन मुझे छोडकर बहुत आगे चले जानेके बाद मैने अन्हें 'केसला, केसला' चिल्लाते सुना । अस दिन अिमका मर्म मै न समझ सका; परतु बादमे अनुभव बढता गया। अब झुन्हे असा नहीं लगता कि अिस तरह चिल्लानेके लिो अन्हे बहुत दूर जाना चाहिये। अब मेरे मुह पर ही कभी-कभी अकाध गालीके साथ यह आवाज लगाी जाती है। मै जानता हु कि यह आदत लबे समय तक टिकेगी नही। थोडे दिन बाद अनको अिस चिल्लाहटमे आजका-सा रस नही मालूम होगा। और जब चित्तको खीचनेवाला कोमी और विषय मिल जायगा तब वे मुझे भूल जायगे। परतु यह वस्तु विचार करने जैसी है वे लडके सातसे दस वर्षके बीचके है। अनकी पढाी राष्ट्रीय शालामे या सरकारी शालामे नियमित रूपमे होती रही है। फिर भी अन्हे सच्ची शिक्षा देनेका घरमे या पाठशालाओमे प्रयत्न हुआ हो, असा मुझे नहीं लगता। अनकी स्वाभाविक मधुरताका भी हनन होने लगा है, यह स्थिति कितनी दयाजनक है? नवजीवन, केळवणी अक, २६-७-२५ ३ ज्ञान या अज्ञान? १ मैं जब छोटा था तब अक वृद्ध मारवाडी महिला मेरे घर पर हमेशा आती थी। मम्राट् जॉर्ज जब राज्याभिषेकके लिओ भारतमे आनेवाले थे, तब अस प्रसग पर अत्सव मनानेके लिओ जैसे स्थान स्थान पर धूमधाम मची हुी थी वैसे हमारे गावमे भी हो रही थी। अक दिन अस महिलाने मुझसे पूछा, "भाजी, यह क्या हो रहा है ? लोग कहते है कि राजा आनेवाला है, राजा आनेवाला है। कौनसा राजा आनेवाला है ?" मैने समझाया, “हमारे देशके बादशाह जॉर्जका राज्याभिषेक होनेवाला है?" महिलाने कहा, “परतु हमारे देशमे तो रानीका राज है न?" मै चकित हो गया। रानीकी मृत्यु हो गी, अंक दशक तक राज्य करके अडवर्डकी मृत्यु हो गी और अब उसके लडकेकी राज्य करनेकी बारी आ गी, यह सब अिस महिलाको आज भी जानना बाकी है। वॉशिग्टन अिविंगको अमरीकामे बीस वर्षमे हुओ फेरबदलकी विलक्षणता दिखानेके लिओ रिप वान विकलको बीस साल तक सुला देना पडा। परतु हमारे देशमे अिस महिलाको तो सारे गावके अक-अक देवालयके दर्शनोंका नियम पालन करनेके लिओ रोज सुबह छ मे बारह बजे तक घूमते रहना पडता है, तो भी असे बारह वर्षमे रानीके मरनेकी बात मालूम हुी। मैने रानी और अॅडवर्डके मरनेकी बात कही। असने कहा • “तो हमारे देशसे अब त्रियाराज चला गया और पुरुषका राज हो गया। " बेचारी अिस महिलाको जैसा लगता था कि अितने बडे मुल्क पर अक स्त्री राज करे, यह कैसी अद्भुत बात है! अस स्त्रीका कितना बल और पराक्रम होगा। - १२ ज्ञान या अज्ञान? - ब्रिटिश राज्यकी रचना अिस प्रकारकी है कि असमे राजगद्दी पर बैठनेवाला पुरुष हो या स्त्री दोनो अकसे ही नि सत्व है और अस गद्दी पर बैठने के लिों किसी बल-पराक्रमकी जरूरत नहीं होती, अक विशेष वशमे विशेष प्रकारसे होनेवाले जन्मकी ही जरूरत पड़ती है, राजगद्दी पर बैठनेवाला राज्य करनेवाला नहीं होता, परतु राज्य करनेवाला दूसग ही होता है -- यह सब अिस महिलाको किस तरह समझाया जा सकता है, अिस बारेमे में विचारमे पड़ गया। फिर भी, वह महिला कोसी अज्ञानमे सतोष माननेवाली नही थी। भरी जवानीमे वैधव्य प्राप्त हो जानेके बादसे लकडीके सहारे चलनेकी शक्ति रही तब तक बहूको बाधा होती तब लडकेको खाना बनाकर खिलाने और व्रत न हो अस दिन अक बार पेटको भाडा देनेके सिवाय बाकीका सारा समय असका साधुओकी खोजमे जाता। गावमे कोजी नये बैगगी आये है, यह सुनते ही वह सबसे पहले अनकी पूछताछ कर आती। मावाडी होने पर भी नियमित रूपमे 'वचनामृत' सुन-सुन कर झुमकी भाषा अमे आने लगी थी और 'भक्त-चिन्तामणि' तथा 'निर्गुणदासजीकी बाते' सुनकर श्री सहजानद स्वामीका चरित्र असकी दृष्टिके मामने स्पष्ट तैरता रहता था। भजन तो असे अनेक आते थे और वृद्धावरथामे भी नये नये सीख लेती थी। अक तरफ असे अपने पातिव्रत पर यह विश्वास था कि अस पर कुदृष्टि रखनेवालेका भला हो ही नहीं सकता और दूसरी तरफ रक्षा करनेवालेके रूपमे मीश्वर पर असकी दृढ श्रद्धा थी। और वह अिसका वर्णन भी करती थी कि जवानीके दिनोमे असे तग करने आनेवालोके क्या हाल हुमे थे। ये सब ज्ञान प्राप्त करनेकी जाग्रत पिपासाकी निशानिया थी, परतु काफी विवेक-शक्ति न होनेसे यह ज्ञान-पिपासा फलीभूत नही हो सकती थी और जिज्ञासा होते हुअ भी अज्ञान ही रहता था। क्योकि आप असके सामने चिढानेके लिओ भी ‘छी' करके खडे रहे या लबा बास लेकर असके सामने जाय तो वह वहीकी वही दस मिनट बैठ १४ शिक्षाका विकास जाती, कोसी अच्छा चिकना या रगीन पत्थर दे दे तो वह असके देवताओके सग्रहमे जुड जाता और फिर रोज असकी भावपूर्वक सेवा होती। अिस प्रकार ताम्रपात्र भरकर देवता असके पास जमा हो गये थे। गावके अक अक शिवालय और वैष्णव मदिरके सिवाय हमारे जैसोके यहा जो खानगी देवसेवा होती वहा भी असकी बारिया बधी हुी थी। गरज यह कि असमे श्रद्धा थी, पवित्रताका शौर्य था, परतु विवेकके अभावमे अनन्यता दृढ धारणा -नही आ पाती थी, और अिसलि व्यवहारज्ञान या अध्यात्मज्ञानमे से अक भी बढ नही -- -- पाता था। २ दूसरी बात ताजी ही है। दासबाबूकी मृत्युको दो चार दिन हुआ थे। मै आश्रमसे कार्यालय जा रहा था। रास्तेमे अक रबारी (अहीर) से भेट हुी। बहुत दूरसे अकेले ही चल कर आनेकी झुकताहटके कारण या बातूनी स्वभावका होनेके कारण, कोी निमित्त मिलते ही (जो मुझे याद नही) असने मुझसे बाते करना शुरू कर दिया। असने कही सुना था कि अहमदाबादके किसी मदिरके वैरागियों और मुसलमानोमे झगडा हो रहा है। वह मुझसे अिसके बारेमे पूछ- ताछ करने लगा। परतु अिस विषयमे मै अससे भी अधिक अज्ञानी निकला। मुझे अिस विपयकी कुछ भी जानकारी नहीं थी। अिसलिओ झगडेकी जड वगैरा अमीने मुझे समझाी और अब यह जाननेको अत्सुक था कि आगे मामला कहा तक पहुचा है। असे आश्चर्य हुआ कि मै शहरके अितने नजदीक रहते हुओ भी कुछ नहीं जानता, परतु जो सत्य था असे मै कैसे बदल सकता था। परतु असे तो किसी न किसी तरह बातें करके रास्ता काटना था, अिसलिओ विषय बदला और मुझसे परिचित विषय पर पूछना शुरू किया। "गाधी महात्मा यही है? ?"

ज्ञान या अज्ञान?
१५
?
नही, बगाल गये है।
" गाधी महात्मा क्या बगालके है ? वे बगालमे क्यो रहते है।
मैने कहा, “नही, भाजी, वे तो यहीके है। काठियावाडके है।
कामके लिओ बगाल गये है।
यहाके है ? किस गावके ? "
"पोरबदरके।
यह बगाल तो वही है न जो गोपीचद राजाका मुल्क
"
कहलाता है?"
“हा, वही।
गोपीचद राजाके कारण ही असे बगालका परिचय था। असने
गोपीचद राजपाट त्यागकर विरागी बने असका भजन गाना शुरू
किया। असका आरभ में भूल गया है। परतु बीच-बीचमे असकी
आलोचनाओ चलती रहती थी।
कितना बड़ा राजा था। देखिये न
'जीडा, पिगळा, सुखमणी नारी,
बारसे परणी ने तेरसे कुवारी |
अितना बडा वैभव ओर माया छोडते असे जरा भी देर लगी? और
हमने छोटासा अक गधा पाला हो तो असकी माया भी हम
नहीं छोड़ सकते
* अिस गुजराती लोकभजनका शब्दार्थ है --- (गोपीचन्द राजाकी)
भीडा, पिगळा और सुखमणी वगैरा सैकडो स्त्रिया थी; असके
रनवासमे १२ सौ विवाहित और १३ सौ कुवारी लडकिया थी ।
अिस भजनम हठयोग सम्बन्धी अिडा, पिगला, सुषुम्ना वगैरा नाडियोका
रूप बिगड कर अपर जैसा हो गया है और नाडीका नारी बनकर
अपरोक्त जीडा, पिगळा वगैरा राजाकी सैकडो स्त्रियोकी कल्पना
विचित्र ढगसे घुस गी है।

१६ शिक्षाका विकास मै सोचने लगा कि अिस जादमीको जानी कहू या अज्ञानी। ओक तरफ गोपीचद राजा और अस रबारीके बीच कितनी ही शता- ब्दिया बीत गी। अिस बीच बगालमे कितनी ही अथल-पुथल हो गजी, अिसकी असे जरा भी गध नहीं। असके मस्तिष्कमे तो गोपीचद राजाके साथ ही बगालका साहचर्य है ! दूसरी तरफ हमारे पढे-लिखोने गोपीचदका नाम सुना होगा, कदाचित् असका नाटक देखकर थोड़ी- बहुत असकी कथा जानी होगी, परतु बगाल या अज्जैनका अन्हे कुछ भी खयाल नही होगा। अिस रबारीके लिओ गोपीचद और बीसवी सदीके बीचका बगालका अितिहास नीदमे चला गया, हममे से बहुतोको जैसे नीदके बीच-बीचमे सपने आ जाते है, वैसे ही अितिहासमे पठानो या अकबर या शूजाके सबधमे बगालकी कुछ कुछ झाकी हो जाती है, परतु असा लगता है मानो बगालके अितिहागका प्रभात सिराजुद्दौला या क्लाअिवसे ही हुआ है। गोपीचदका धार्मिक जीवनके साथ कोी सबध न हुआ होता, तो अिस भाषीको गोपीचदका नाम सुननका प्रसग न आता। धार्मिक जीवनके साथ जुड जानेके कारण गोपीचद सबधी जानकारी भक्तो द्वारा भजनोके जरिये अनजानसे अनजान हिन्दू तक पहुच गी, परतु अन्य ज्ञानके अभावमे अस जानकारीका भी शुद्ध स्वरूपमे पहुचना कितना कठिन है यह ‘ीडा, पिगळा सुखमणी नारी, बारसे परणी ने तेरसे कुवारी' की विचित्र रूपमे भ्रष्ट हुी साखी दिखा देती है। यह भ्रष्टता केवल भाषाकी भ्रष्टता नही, परतु पदार्थकी पहचान सबंधी भ्रष्टता भी है। दूसरी ओर अिस रबारीको गोपीचन्द राजा जैसा लगता है मानो कलकी ही दुनियाका विषय हो, परन्तु हमारी आजकी दुनियाके विषय - दासबाबू-का असके जीवनमे क्या स्थान है ? दासबाबू मर गये, यह कहनेसे अस पर क्या असर होगा? जब वह यही नहीं जानता कि असा कोसी आदमी था तब असके मर जानेकी बात जानकर अस पर ज्ञान या अज्ञान ? १७ भला क्या असर होगा? और अनसे भी अधिक प्रसिद्ध महात्मा गाधी है, जिनका नाम तो असने किसी प्रकार सुन लिया है, परतु गोपीचदके बंगाली होनेका असे जितना पता है अतना गाधीके गुजराती या बगाली होनेका असे पता नहीं है । दासवाबूके स्मारकका चदा अिकट्ठा करनेके लिओ गाव-गाव जाकर हम किस मुहसे अस स्मारकके लिओ रुपया देनेको जैसे रबारीसे कह सकते है, यह विचार सहज ही मनमे अठता है। बडेसे बड़े नेताओ द्वारा निकलनेवाले सभी अखबारो, पुस्तको और भाषणोका यह ज्ञान देनेमे कितना हाथ है ? तमाम राजनैतिक हलचलोमे जनताका यह वर्ग किस प्रकार दिलचस्पी ले सकता है ? जनताका अधिकतर भाग क्या अिस रबारीकी कोटिका ही नही है ? और अिस जनताकी जागृतिके बिना क्या देशकी गाडी आगे बढेगी? तीसरी तरफ यह भी सोचने लायक बात है कि जिस रबारीके जीवनको अितना सस्कारी बनानेमे किसका हाथ रहा है। गोपीचद विरागीका अितिहास असने किसकी शालामे पढा? गधे जितनी माया भी हम नही छोड सकते, यह आत्म-परीक्षण असे कहासे मिला? हमारे देशके अज्ञानीसे अज्ञानी भागमे भी जो सस्कारिताके कुछ बीज है, अन्हे डालनेवाला कौनसा वर्ग है? यह कार्य करनेवालोकी जीवन-पद्धति कौनसी है ? हमारे देशकी परिस्थिति ही अिस प्रकारकी है कि अपने कल्याणके लिओ व्याकुल भक्त ही अस जनता तक पहुच सकते है; दूसरोका कल्याण करनेका भार लेकर बाहर निकले हु लोग असे स्पर्श नही कर सकते। यह सच है कि अन भक्तोमे भी सकुचित दृष्टि रह जाती है। जिसके कारणो पर स्वतत्र रूपमे विचार करना चाहिये। फिर भी देशको अनका जो बडा हाथ है और अनके जीवनमे देशको सस्कृत बनानेकी जो शक्ति है, असका झुचित मूल्य स्वीकार किये बिना काम नही चलेगा। शि-२ ? सस्कृत करनेमे १८ शिक्षाका विकास . असी है हमारी जनता। अक तरफ असमे कुछ सुसस्कारोके बीज है, दूसरी ओर अज्ञानकी गहरी पैठी हुी घास है। हमारी वर्तमान शिक्षा अस अज्ञानकी घासको खोद निकालनेका कुछ प्रयत्न कर रही है, परतु जिस प्रकार हमारे जैसे केवल पढे-लिखे आदमी खेतमे निदाजी करने लगे तो बाजरे और घासका भेद न जान सकनेके कारण घासके साथ बाजरा भी अखाड डालेगे, वैसे ही हमारी मौज्दा शिक्षा अक्सर अस अज्ञानके साथ सुसस्कारके बीजोको भी खोद डालती है। नीदनेवालेको झुपयोगी वनस्पति और जगली वनस्पतिके बीचका भेद जानना चाहिये, वैसे ही हमे भी अपनी जनताके अज्ञान और असके सुसस्कार दोनोको पहचानना चाहिये। नवजीवन, केलवणी अक, २७-९-२५ ४ परिचारक भील जेलके अस्पतालमे मुझे बार-बार जाना पड़ा था। अस्पतालके परिचारकोमे अक भील कैदी था। वह बिलकुल जड और स्मरण- शक्ति-हीन लगता था। अमर पचासके लगभग होगी। मुझ पर बहुत ममता रखता था। मुझे बार-बार यह विचार आता था कि मै असे क्या सिखा। दो चार बार मैने असे लिखना सीखनेको ललचाया, परतु अिस बारेमे वह निराश हो गया था। वह जवाब देता था, “मुझे बहुत लोगोने बार-बार पढनेके लिअ कहा, परतु अनकी बात मझे जची नहीं। अब आप कहते है अिसलिओ जैसा लगता है कि पढ लेता तो अच्छा होता, परतु अब बूढा हो गया, अब मुझे नहीं आयेगा।" मैने असे स्वय पढानेका वचन दिया और यह विश्वास दिलाया कि जरूर आ जायगा, परतु असे विश्वास नहीं हुआ।

परिचारक भील सारे जीवनमे असने दो भजन जितना साहित्य भी नही सीखा था। हिन्दू-धर्मके किसी देवी-देवता अथवा राम-कृष्णके नाम भी नहीं जानता था, तब अवतारोके चरित्र तो कहासे जानता? मैने सोचा कि पढ नही सकता तो कहानियो और भजनो द्वारा ही असे कुछ न कुछ ज्ञान दिया जाय । काल्पनिक कहानियोके लिओ अपना विरोध अलग रखकर मैने असे चिडा-चिडी और पशु-पक्षियोकी कहानिया सुनाना आरभ किया। वह अमगपूर्वक सुनने जरूर बैठता और अिस तरह हसता मानो असे बडा मजा आ रहा हो। परतु असकी आखोसे मुझे मालूम हो जाता कि कहानीका अक अक्षर भी वह नही समझता। मै असे पूछता "क्यो भाभी, मै किसकी बात कह गया, बता तो?" तब वह जवाब देता यह मुझे पता नही चलता। आप बात कहते है सो मै सुनता है। परतु याद रखना मुझे नहीं आता। म विचारमे पड गया। मुझे लगा कि अिस अम्रमे अिन तुच्छ बातोमे असे मजा नहीं आता होगा। फिर मैने रामकी कहानी कहना अेक दिन थोडीसी कही। दूसरे दिन पूछा कि कल शामको क्या बात कही थी। जवाबमे 'शून्य'। मैने फिर शुरूसे वह कहानी कही और तीसरी शामको फिर पूछा। फिर वही शून्य । असे यह भी याद न रहता कि मनुष्यकी बात कही थी या जानवरकी । मैं सोचने लगा कि अब क्या किया जाय। अक दिन मैने अससे "तुझे तीर-कमान चलाना आता है बस; प्रश्न पूछनेकी ही देर थी। जोरसे 'हा' कहकर वह अत्यत अत्साहमे आ गया। और मुझसे कहने लगा कि वह जैसा बढिया तीरदाज है कि अडते पक्षियोको भी नीचे गिरा सकता है। कहानियोका थोडासा मसाला मुझे मिल गया। नाम दिये बिना मै असे अब धनुर्विद्याकी विविध कहानिया कहने लगा। दशरथके शब्दवेधकी, अर्जुनके द्रौपदी-स्वयवरकी, द्रोण द्वारा तीरसे कुोंमें से बाहर शुरू किया। यो ही पूछा. ?"

२० शिक्षाका विकास निकाली हुी गिल्ली वगैराकी कहानिया सुनाी। अब असकी स्मृति जाग्रत हो गी। ये सब बाते वह अच्छी तरह याद रख सकने लगा। (नामोको छोडकर नाम तो वह किसीका भी याद नहीं रख सकता था । आठ नौ महीने वह हम सबके साथ रहा, परतु अत तक वह चार जनोको भी नामसे पहचानने नही लगा था । वे 'मोटे भाजी' और वे ‘गोरे भाजी' अिस प्रकारके वर्णनसे ही वह निर्देश कर सकता था।) दशरथकी अपेक्षा अर्जुनके बीधे हुओ यत्र-मत्स्य पर वह अधिक मुग्ध हुआ और द्रोण पर तो वह फिदा ही हो गया। 'सच्चा बामन, सच्चा बामन ! कुअमे गिरी हुी गिल्लीको तीरसे अछाल कर बाहर निकाल लिया ! वह सच्चा तीरदाज था अिस परसे मुझे अक सूचना मिल गी कि वह कौनसी बाते समझ सकता और याद रख सकता है। थोडे समय बाद यह कैसे सूझा ? ' नामक रूसी पुस्तक मेरे पास आजी। जिस भीलकी जोडमे अक दूसरा कैदी भी था । भील जितना जड था, अतना ही यह चालाक था। लगभग सारी जिन्दगी असने जेलमे ही गुजारी थी। मुझे जैसा लगा कि यह बात असके अधिक योग्य है, और वह असे कहनेका मैने विचार किया। साथमे भील भी बैठता था। मैने यह आशा नही रखी थी कि भील अिसे समझ सकेगा। परन्तु परिणाम मुझे अत्यंत आश्चर्यजनक मालूम हुआ। मै यथाशक्ति नाम छोड कर ही बाते करता था; कभी कोजी नाम देना ही पड़ता तो अक भील या दर्जी असा साधारण नाम दे देता अथवा रूसीके बजाय कोसी देशी नाम रख देता। कहानी कहा तक पहुची है, यह मुझे भील दूसरे दिन बारीक ब्योरेके साथ कह सुनाता। वह राम-लक्ष्मण अथवा बालकृष्णकी बातें नही समझ सकता था, परन्तु अिस रूसी कहानीके सब पात्रोके अटपटे पराक्रम बारीकीसे याद रख सकता था !

सभ्यताके आधार-स्तंभ २१ यह कहानी में पूरी नहीं कर सका, अिसलिओ असका महत्त्वका जो अतिम भाग था वहा तक नही पहुचा जा सका। परन्तु मैने देख लिया कि राम-लक्ष्मण जैसे पात्रोके साथ असका अपने जीवनमे कोजी सबध नही वधा था, अिसलि अनकी बातोमे असकी स्मृति मद थी, परन्तु झूठे नोट बनानेवाले, दीवारमे सेध लगानेवाले, घोडे चुरानेवाले लोगोको वह अच्छी तरह पहचानता था, अिसलिओ झुनकी कहानिया असे आसानीसे याद रहती थी। मैने यह सोचकर अिसका वर्णन किया है कि मानसशास्त्री और शिक्षक अिस अनुभवसे बहुत कुछ निष्कर्ष निकाल सकेगे। अिस पर अधिक विवेचन करनेका काम मै अन्हीको सौपता हूँ। 'श्री दक्षिणामूर्ति', अगस्त १९३१ ५ सभ्यताके आधार-स्तंभ पढे-लिखे लोगोको शारीरिक परिश्रम करने मे शर्म आती है। आठ-दस घटे दफ्तरमे बैठना, नकले करना, टाअिप करना, हिसाब मिलाना, प्रूफ देखना, पुस्तके लिखना वगैरा झूचे माने हुओ काम करनेमे वे अितने नहीं झुकताते, जितने खाना बनाना, कपडे अथवा बर्तन धोना, झाडू लगाना, पीसना, कूटना, कातना, नालिया धोना, पाखाने साफ करना वगैरा कामोसे झुकता जाते है। अिसी तरह यदि अन्हे कभी छोटासा भी बोझा झुठाकर चलना पडे तो बडी शर्म आती है। तब बढी, लुहार, राज वगैरा कारीगरोका काम तो वे थोड़ा भी कैसे सीख सकते है ? और यदि छोटासा भी असा काम निकल आये तो अन्हे हाथ जोडकर खडे रहना पडता है। कलम, स्याही और कागजसे चिपटे रहकर काम करनेमे कितने ही २२ शिक्षाका विकास काम, घटोका श्रम क्यो न करना पड़े और अससे अर्थप्राप्ति कितनी ही कम क्यो न हो, तो भी असमे प्रतिष्ठा मानी जाती है। परन्तु मेहनत-मजदूरीका भले असमे स्नायुओ पर जोर पडता हो, शरीरको लाभ होता हो और रुपया भी अधिक मिलता हो, अप्रतिष्ठित माना जाता है। अमुक काम भूचा अथवा प्रतिष्ठायुक्त है और अमुक नीचा अथवा प्रतिष्ठाहीन है, यह खयाल कभी कभी लोकसेवकोमे भी पाया जाता है। हरिजन वगैरा पिछडी हुभी जातियोमे विद्याप्रचारकी अपनी प्रवृत्तियोके साथ हम कभी कभी अिन विचारोका भी प्रचार कर देते है। 'विद्या पढो जिससे तुम अच्छी नौकरी पा सकोगे, पाठशालामे शिक्षक बन सकोगे और तुम्हे घरनौकर, मजदूर, कारीगर और भगीका काम नहीं करना पडेगा।' अिस प्रकारकी बाते कभी कभी दलितोके सेवक नासमझीमे कह डालते है। अिसी तरह स्त्रियोसे भी कहा जाता है कि 'आज तक तुमने खाना बनाया, बर्तन मले, बच्चोको सभाला; अब चूल्हा छोडो, चक्की बन्द कर दो, बच्चोको छात्रालयमे भेज दो, और बाहर निकलकर समाजके काममे लगो।' जिस प्रकारकी बातोसे यह मालूम हो जाता है कि जैसे कामोके बारेमे लोकसेवकोके कैसे खयाल है । मेरी समझसे असे विचार हम खुद अपने लिओ रखे यह भी दुर्भाग्य है। तब जिन लोगोकी हम सेवा करना चाहते है, अनके दिमागम जैसे विचार अत्पन्न करना अनकी सेवा नही परन्तु कुसेवा ही है। विचार करने पर मालूम होगा कि दफ्तरोके कामके बिना मानव समाजके लिअ सभ्य जीवन बिताना असभव नहीं है। परन्तु भोजन, बच्चोका पालन आदि गृहिणी-कर्म, झाडना, लीपना, माजना, धोना आदि भृत्यकर्म और अनाज अगाना, मकान बनाना, कपडे बुनना वगैरा किसान और कारीगरके कर्मके बिना सभ्य जीवन जीना असभव है। अितिहाससे भी जान पडता है कि अनेक जातिया जैसी सभ्यताके आधार-स्तंभ २३ हो गी है, जिनमे कारकुनी या लेखनवृत्ति न होते हुओ भी वे सस्कृत और समृद्ध थी। अितना ही नहीं, परन्तु यह भी कहा जा सकता है कि कारकुनी - कार्यालयविद्या - कायस्थविद्या तो हाल ही मे अत्पन्न हुी है। मनुष्य समाजका काम हजारो वर्ष तक असके बिना ही चलता रहा । और आज भी यह माननेका कोजी कारण नही कि यदि सारी कार्यालय-व्यवस्था अकदम बन्द कर दी जाय तो मनुष्य-समाज पर भूकम्प जैसी कोी बडी आफत टूट पडेगी। अिग्लैण्डमे वकील, डॉक्टर तथा अध्यापकके धंधोको माननीय धधे कहनेका रिवाज है। अिन धधोको साधारण लोगोने यह विशेषण नहीं दिया है, परन्तु अिन धधोवालोने स्वय ही अपने धधोके लि यह विशेषण लगा लिया है। अिसी प्रकार हम दफ्तरका काम करने- वालोने कारकुनीके कामको प्रतिष्ठित धधा मान लिया है। वास्तवमे देखा जाय तो मानव-सभ्यताकी स्थिति और वृद्धिके लिओ मुशीगिरीकी अितनी जरूरत नही, जितनी गृहिणी-कर्म, भृत्य-कर्म, कृषिकर्म तथा कारीगरके कामकी है। भले यह कर्म स्त्री करे या पुरुष, शिक्षित लोग करे अथवा अशिक्षित, हाथसे करे या यत्रसे, प्रेम और धर्मबुद्धिसे करे अथवा रुपयेके लिओ करे। जिस समाजमे धान्य पैदा करना, पीसना, कूटना, खाना बनाना, कपडे बुनना और सीना, घर, कपडे और बर्तन साफ रखना, मुहल्ला, नगर और स्मशान स्वच्छ रखना अित्यादि काम सुव्यवस्थित ढगसे होते रहनेका प्रबध न हो, अस समाजमे कितने ही विद्वान तर्कशास्त्री, प्रतिभावान कवि, प्रखर गणितशास्त्री, सूक्ष्म ज्योतिषशास्त्री, कुशल मत्री और कार्यालय-व्यवस्था करनेमे प्रवीण प्रबधक हो तो भी असकी सभ्यता टिक नहीं सकती। अिन कार्योंके लिअ यत्रका अधिकसे अधिक झुपयोग हो तो भी अिन यत्रोके लिओ किसी मनुष्यके हाथकी जरूरत रहेगी ही। और जिन हाथोसे जमीन जोतने, बीज बोने, . -

२४
शिक्षाका विकास
धान्य अिकट्ठा करने, असे कूटने, पीसने और पकाने, बच्चोको पालने,
मकान बनाने, कपडा बुनने, नालियां, पाखाने और मुहल्ले साफ करने
वगैराके यत्र चलेगे, वे हाथ सभ्यताके आधार-स्तभ होगे, न कि वे
हाथ जिनसे केवल कागज पर अक्षर लिखे जाते रहेगे। यह सच है
कि पढे-लिखे लोगोने मानव-सभ्यताको बढानेमे और सुशोभित करनेमे
काफी भाग लिया है और असकी ख्याति भी बढाी है। परन्तु
साथ ही यह न भूलना चाहिये कि दीवारकी शोभा रगसे बढती
तो भी दीवार ही रगका आश्रय है और दीवारके बिना रगको
स्थान ही नही मिल सकता। अिसी तरह सभ्यताके आधार-स्तभ
प्रतिष्ठित माने हु धधे नहीं, परन्तु पढी या बेपढी गृहिणियो, भृत्यो,
कृषको और कारीगरोके धधे है। अिन धधोको अप्रतिष्ठित कहना
अथवा समझना या अनके प्रति अनादर रखना, अन्हे करनेमे शर्म आना
और अन्हे अच्छी तरह
करनेके
अपाय
खोजनेमे रस न लेना विद्वत्ताका
लक्षण भले ही हो परन्तु सभ्यताका नही; और लोकसेवकोके अनेक
कर्तव्योमे अक यह भी समझना चाहिये कि वे स्वय अिन कामोमे
भाग लेकर जिनकी प्रतिष्ठा बढाये और अन्हे करनेकी पद्धतियोमे
सशोधन करे। गाधीजी जिसे शरीरश्रम (श्रमयज्ञ, ब्रेड लेबर) का
सिद्धान्त कहते है, वह यही है ।
हरिजनबन्धु, ३-२-'३५
.

६ धन्धेका निश्चय १ अपने गुजरातके दौरेमे सरकारी या राष्ट्रीय, हरिजन अथवा हरिजनेतर, जिन जिन शालाओ या छात्रालयोमे मुझे बोलनेका मौका मिला, वहा मै जो अक प्रश्न सबसे पूछता था वह यह है 'तुम बड़े होकर कौनसा धधा करके अपना गुजारा करोगे, यह तुमने तय कर लिया है ? ' बेशक, कोजी दर्जनभर तरुण या लडके मुश्किलसे पैसे मिले, जिन्होने अपना भावी धधा निश्चित कर रखा था। कॉलेजके विद्यार्थी भी अधिकतर यह नहीं जानते थे कि वे ग्रेज्युअट होनेके बाद निश्चित रूपसे कौनसा धधा करेगे। विनय-मदिरोके विद्यार्थियोमे से अधिकाशको यह सवाल सुनकर अलटा आश्चर्य हुआ। जैसा प्रश्न विनय-मदिरकी भूमिकामे पूछा ही कैसे जा सकता है ? कुमार-मदिरके विद्यार्थियोको जब मैने यह प्रश्न पूछा तब तो शिक्षकोको भी आश्चर्य हुआ। और जब मैने बाल-मन्दिरोके शिक्षकोके सामने यह बात रखी कि प्रत्येक बालकको बडा होकर जीविकाके लि क्या धन्धा करना है, अिसका निश्चय आपके बालकोसे बाल-मदिरमे ही करा लीजिये, तब अन्हे कैसा लगा होगा, यह मै नही जानता। प्रवाससे लौटनेके बाद अक शिक्षककी तरफसे मिले पत्रमे से नीचेका भाग अद्धृत करता हू आप छुटपनसे ही अिस बातका विचार करनेकी सलाह देते है कि बालकको बडा होकर किस धंधेमे जाना है। परन्तु क्या छोटी अम्रमे यह तय करने लायक समझ बालकोमे आ जाती है? जिस अम्रमे दुनिया देखी न हो, अपनी अभिरुचि . २५ शिक्षाका विकास या कुशलताका पता न हो, अस अम्रमे असा प्रश्न निश्चित ही कैसे हो सकता है? मुझे तो लगता है कि विनीत होने तक बालक साधारण शिक्षा ले, हाथ-पैर हिलाना सीखे, भिन्न भिन्न धधोके बारेमे जाने, और बादमे वे अपना मार्ग निश्चित करे। अद्योगोमे बढी, लुहार और दरजीका काम थोडा-थोडा सीखा हो तो अस परसे वे अपना मार्ग निश्चित कर सकते है। अिसमे विचारदोष या दृष्टिदोष हो तो बताअियेगा और अपनी दृष्टि अधिक समझाअियेगा। अिस मागको पूरा करनेका प्रयत्न करता हूँ। हमारे देशमे शिक्षाका अग्रेजी काल आरभ हुआ अससे पहले अिस बारेमे परेशानी पैदा नहीं होती थी कि लडका बडा होकर क्या धधा करेगा। जैसे हिन्दू हो तो चोटी रखनी ही चाहिये और मुसलमान हो तो सुन्नत करानी ही चाहिये, यह चीज शका झुठाये बिना बालक स्वीकार कर लेता था, वैसे ही वह नि शक होकर यह मान लेता था कि बडा होने पर असे माता-पिताका धधा ही करना है। वेदान्तका अध्ययन करे, भक्त बने, कविता रचे, बडी बडी हवेलिया बनवाये, पुल खडे करे, रास्ते बनाये, चित्र खीचे, अपने धर्मे कम प्रवीण हो या ज्यादा, थोडा यशस्वी हो या बहुत, फिर भी दरजीका लडका जियेगा तब तक सियेगा तो जरूर और बनियेका बेटा किसी प्रकारके पैतृक व्यापार-व्यवसायमे ही रहेगा। अिस प्रकार रोजगार-धन्धेके मामलेमे किसी प्रकारकी अनिश्चितता नहीं थी। गाधीजीकी भाषामे कहे तो 'वर्णव्यवस्था कायम थी। शिक्षाके अग्रेजी कालमे यह स्थिति बदल गी। अिसका कारण कुछ हद तक अग्रेजी राज्य द्वारा अत्पन्न की हुी शिक्षा प्रणाली है, कुछ हद तक अग्रेजी राज्य द्वारा निर्माण किये हुआ नये धधे है, और कुछ हद तक यत्रयुगके कारण जगत्के अद्योग-धधो और आर्थिक व्यवहारोमे हुी भारी क्रान्ति है। . ।

धन्धका निश्चय २७ , अग्रेजी कालसे पहलेकी शिक्षामे परम्परागत धधोकी शिक्षाकी व्यवस्था जरूर होगी, परन्तु सभव है व्यवस्थित ढगसे साधारण शिक्षा देनेकी कोमी ठीक योजना न हो। यह अक दोष था। यह दोष अग्रेजी राज्यको खटका। असे राज्यके अलग-अलग विभाग चलानेके लिओ जिन जिन लोगोकी जरूरत थी थी--नौकरीमे नौकरीमे या स्वतत्र धधेवालोके रूपमे अन्हे साधारण शिक्षाके अभावमे जुटानेमे कठिना- अिया मालूम हुी । अिसलि असने जो शिक्षा प्रणाली तैयार की, वह पहले केवल साधारण शिक्षा देनेवाली और बादमे विभागोका धधा सिखानेवाली ही तैयार की। साधारण शिक्षाका अभाव हमारे प्राचीन जीवनका दोष था, और यह दोष अग्रेजो द्वारा खडी की गमी शिक्षा- सस्थाओमे पढे हुओ और अनमे न पढे हुओके बीचका भेद दिखाजी देने पर लोगोके ध्यानमे आ गया। अिसलि अिस शिक्षाके प्रति लोगोमे दिनोदिन आकर्षण बढता गया। यहा तक कि अिस शिक्षाके अन्य दोषोकी ओर जब लोकनायकोका ध्यान आकर्षित हुआ और वे राष्ट्रीय शिक्षाकी योजनाओं सोचने लगे, तब भी अिसकी चिन्ता कभी दूर नहीं हुी कि सामान्य शिक्षामे कोी कमी न आने पाये। अल्टे, जैसी योजनाये सोची गी कि सरकारी शिक्षाकी कमी विशेष प्रकारकी सामान्य शिक्षासे ही पूरी की जाय। अग्रेजीके बजाय मातृभाषाको शिक्षाका माध्यम बनाना, हिन्दीकी राष्ट्रभाषाके रूपमे स्थापना करना, अितिहासका सशोधन करके असे अिस ढगसे सिखाना कि वह राष्ट्रीय भावनाका पोषक बने, मातृभाषाका विकास करना, और थोडे वर्षोमे अधिक पढाी कराना - आदि आदि राष्ट्रीय शिक्षाके ध्येय बने। अिस सरकारी और गैरसरकारी शिक्षाका सादा नाम 'साधारण शिक्षा' है । अिसका रोचक नाम है 'सस्कारिताकी शिक्षा'। परन्तु जितने समय तक बालक या किशोर साधारण शिक्षा पाता हो अतने समयमे असे अपने पैतृक धधे या जीविका देनेवाले किसी २८ शिक्षाका विकास अन्य धधेकी शिक्षा किस तरह मिले, अिसका विचार करना किसीको नही सूझा था। दोष तो धधोकी शिक्षामे भी आ गया था। अक या अनेक कारणोसे धधे नष्ट होते जा रहे थे, कलाओ नाशको प्राप्त हो रही थी, और जनतामे अज्ञान बढता जा रहा था। असमे भी प्रवाह सामान्य शिक्षाकी ओर ही मुडा। अिसलि धधोका जो थोडा- बहुत ज्ञान परम्परासे चला आ रहा था, असे भी लोग भूलने लगे, और कुछ तो बिलकुल स्मृतिका विषय ही बनकर रह गया। परिणाम यह हुआ कि आज हम यह मानने लगे है कि बीस वर्षकी अम्रसे पहले धधा तय करना सभव ही नहीं है। जीवनमे बीस वर्ष-- कमसे कम पद्रह वर्ष तो जरूर -- सामान्य शिक्षा पानेके लिओ होने चाहिये । नतीजा यह हुआ कि बाप किसान होगा और झुमके लडकोमे से अक वकील, अक डॉक्टर, अक अिजीनियर, अक व्यापारी, अंक आबकारीका दारोगा, अक रसायनशास्त्री, अंक पाठशालाका शिक्षक और अक सम्पादक या लेखक होगा, और अनके लडकोमे भी जैसी ही विविधता हो सकती है। अिस परिणामको लानेमे सरकारी शिक्षा और राष्ट्रीय शिक्षा, सनातनी और सुधारक, हिन्दू तथा मुसलमान सभीने समान रूपमे हाथ बटाया। किसीने रुकावट तो डाली ही नही। वर्ण अर्थात् धधा --गाधीजीका यह अर्थ स्वीकार कर लिया जाय, तो सबने मिलकर समाजमे पूरी तरह वर्ण-सकरता और अव्यवस्था स्थापित कर दी। जन्मसे किसीका वर्ण तय नही होता; अितना ही नहीं, आदमी बीस- बाीस वर्षका हो जाय, कदाचित् अक-दो बच्चोका बाप हो जाय तो भी वह नही जानता कि असका वर्ण क्या है अथवा क्या होगा। जिसे अपना ही वर्ण जाननेकी कठिनाजी हो, वह बालकको भला कौनसे धधेके आनुवशिक संस्कार देगा? यह है हमारी आजकी स्थिति। अिससे बाहर निकलनेकी जरूरत है। केवल आर्थिक दुर्दशाका हल ढूढनेके लिओ ही नहीं, यद्यपि यह धन्धेका निश्चय २९ कारण भी कोी तुच्छ या गौण समझने जैसा नही है, परन्तु लोगोके बौद्धिक और चारित्रिक विकासके लिअ भी। मनुष्य बी० ओ० और अम० अ० तक पढाी करे, पूर्ण तारुण्यमे आ चुका हो, तो भी यह न जान सके कि वह जीवनमे कौनसा धधा कर सकता है, किस धधेके अनुकूल असका शरीर और मन है, तो यह कैसी विषम और दया- जनक स्थिति है | यह भी सभव है कि वह कोजी धधा जानता हो, परन्तु आर्थिक परिस्थिति असे बेकार रखती हो । परन्तु वह कुछ भी करनेके लिओ तैयार ही न हुआ हो और किसकी तैयारी करनी चाहिये -- यह परेशानी असे बीसवे वर्षमे भी रहे, तो यह केवल आर्थिक दुर्भाग्य ही नहीं, परन्तु मानसिक और नैतिक दुर्भाग्य भी है। जिसका अक ही अपाय है। गाधीजीके शब्दोमे वह यह है कि वर्णव्यवस्थाको हम फिर असके शुद्ध स्वरूपमे स्थापित करे। व्यवहारकी भाषामे जिसका अर्थ यह है कि कमसे कम अम्रमे हम प्रत्येक बालकको यह निश्चय करा दे कि 'तुझे बड़ा होकर अमुक प्रकारके धधेमे लगना है। तू कुटुम्बकी या अपनी शक्ति, अमग, परिश्रम और बुद्धिके अनुसार कितनी ही साधारण अर्थात् सस्कारिताकी शिक्षा प्राप्त कर, तुझसे हो सके जितने कला-कौशल संपादन कर, परन्तु यह न भूलना कि तुझे अमुक धधा करना है और असके लिओ तुझे छुट- पनसे तैयारी करनी चाहिये। अिस धधेमे तुझे अपना पुरुषार्थ और भाग्य साथ दे तो तू झूचीसे झूची श्रेणी पर चढना; वे साथ न दे तो सामान्य कक्षामे रहना। परन्तु यह निश्चय रखना कि तुझे धधा तो यही करना है।' यह निश्चय करनेमे माता-पिता तथा शिक्षक बालकके आनुवशिक संस्कार, स्वभाव, जन्मजात सिद्धिया, श्रमप्राप्त सिद्धियां, माता-पिताकी आथिक शक्ति वगैराका जरूर विचार कर ले । परन्तु यह विचार करनेमे वर्षोका समय न लगना चाहिये । जितना जल्दी - ३० शिक्षाका विकास निश्चय कराया जा सके अतना अच्छा। और, अिसमे आम तौर पर कौटुम्बिक धधेको पसद करनेका रुख होना चाहिये। अपवादरूपमे ही बालकको माता-पितासे भिन्न प्रकारके धधेमे पडनेका अवसर पैदा होना चाहिये। २ आजके समयमे भले ही अठारह नहीं, अठारह सौ प्रकारके धधे हो गये है और अनमे दिनोदिन वृद्धि होती ही जा रही है। फिर भी अिन सब धधोकी जाच करे तो सभव है सारे धधोको आठ- दस गोत्रोमे बाटा जा सकता है। अदाहरणार्थ, यह कहा जा सकता है कि बढी, लुहार, राज, टर्नर, फिटर, रिपेरर, सिविल अिजीनियर, मेकेनिकल अिजीनियर, बिजलीका अिजीनियर, विमानका अिजीनियर, अजिन बनानेवाला वगैरा लोगोका गोत्र अंक ही है। हम अिन्हे मिस्त्री अथवा कारीगरके रूपमे जानते है। अिनमे से भले ही कोजी आठ आने रोज कमानेवाला हो, और कोी अस्सी रुपये लानेवाला हो। यहा हम जिसमे जो कुछ अन्याय हो असे मिटानेका विचार नहीं कर रहे है। धधेका प्रारभिक निश्चय करानेका अर्थ है कमसे कम बालकके धंधेके गोत्रका निश्चय कराना। फिर वह ज्यो-ज्यो बडा होता जाय त्यो-त्यो असकी शाखाओ और अपशाखाओका निर्णय होता जायगा । अिस प्रकार यदि बालक अपने भावी धधेके बारेमे निश्चित हो जाय तो अिससे केवल असीको सीधा मार्ग ढूढनेमे सहायता नही होगी, परन्तु हमारी शिक्षा-प्रवृतिया भी अधिक निश्चित मार्ग ग्रहण करेगी। साधारण शिक्षा भी सब मनुष्योके लिओ साधारण सस्कारोकी ही शिक्षा नही होती। अक खास मर्यादाके बाद वकीलके धधेके लिओ तैयार होनेवालेकी सामान्य शिक्षा अेक प्रकारकी होगी, डॉक्टरके लि दूसरी तरहकी होगी, किसानोकी शालामे सामान्य शिक्षाकी अक दृष्टि होगी और मजदूरोंकी शालामे दूसरी होगी। जिस प्रकार जिस गोत्रके धन्धका निश्चय my १ -- -- धधेके लिओ शाला होगी, असकी सामान्य शिक्षामे भी बिलकुल आरभसे ही कुछ न कुछ विशेषता होगी। अर्थात्, अिसमे यह सूचना भी है कि केवल सामान्य शिक्षा सस्कारिता की शाला त्रुटिपूर्ण सस्था है। जिसका परिणाम यह हुआ है कि जैसे-जैसे विद्यार्थी बड़ा होता है वैसे-वैसे कौनसा धधा किया जाय अिसके विषयमे वह केवल सशयात्मा ही नहीं बनता, बल्कि बाप- दादेका धधा भी बिलकुल भूल जाता है और असकी व्यापक शिक्षा असके पैतृक धधेके विकासके लिओ झुपयोगी सिद्ध होनेके बजाय अल्टे अस धधेके लिओ झुमे अयोग्य ही बनाती है। धधेका निश्चय और असकी गिक्षाकी बचपनसे ही व्यवस्था होनेके सिवाय प्रत्येक बालकके लिअ अक अितर अद्योग -- अतिरिक्त धधे -- की भी जरूरत मानी जायगी। अितर अद्योगमे दो लक्षण होने चाहिये मुख्य धधेके साथ आरामके समय रुपयेके लिअ नही, परन्तु केवल शौकके तौर पर भी वह प्रिय लगे। आवश्यकता पड़ने पर, अथवा अमी अनुकूलता मिल जाने पर, असे रोजी देनेवाला भी बनाया जा सके। अिसके अलावा, कभी कभी अक तीसरा लक्षण भी असका हो सकता है। वह यह कि असका ज्ञान मुख्य धधेको अलकृत -- कलामय -- बनानेमे अपयोगी हो। अिस अितर अद्योगके चुनावमे बालकके व्यक्तित्वको -- असके मनको अनुकूल लगनेवाली प्रवृत्ति ढूढनेका पूरा अवकाश रहता है। (अर्थात् मै यहा अितर अद्योगके तौर पर सहायक अद्योग अर्थात् कातने-पीजने जैसे अक धर्के साथ चलनेवाले दूसरे धधेका विचार नही कर रहा हू। असका समावेश तो मुख्य अद्योगमे ही होगा।) प्रत्येक मनुष्य अपने मनके अनुकूल प्रवृत्तिमे ही रातदिन लगा रह सके और असके द्वारा अपनी आजीविका भी कमा सके तो कितना अच्छा हो । परन्तु जिस प्रकारके ससारमे हम रहते है, असमे जैसी शिक्षाका विकास अनुकूलता सबको प्राप्त नहीं होती, बहुत कम लोगोको प्राप्त होती है। अिसलिओ अदास होने, निराश होने, बडबडाहट करनेसे कुछ नही होगा। अिसीलिओ धर्म मनोनुकल प्रवृत्तियोका मार्ग नही माना गया, परन्तु कर्तव्यका मार्ग माना गया है। अत मनोनुकूलताकी अपेक्षा कर्तव्यको हम पहला आदर देना सीखे - यह पहला धर्म है। और मनो- नुकूल प्रवृत्तियोको आजीविकाके लिअ नहीं परन्तु शौकके लिओ, निवृत्तिके लिअ, वैयक्तिक विकासके लिअ रखे --- यह दूसरा धर्म है। हरिजनबन्धु, १२-१-३६

शिक्षाका विकास
दूसरा भाग
सेवाग्राम

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om शिक्षा और श्रम . शिक्षामे अद्योगका स्थान अवश्य होना चाहिये, अिस बारेमे अब शिक्षाशास्त्रियोमे शायद ही कोजी मतभेद है। परन्तु अस दिशामे आगे कैसे बढा जाय, यह अभी तक बहुत स्पष्ट नहीं हुआ है। 'अद्योग द्वारा शिक्षा' का अक अर्थ मै यहा पेश करता हूँ। में मानता हूँ कि प्रत्येक शालाके साथ अद्योग-विभाग होना चाहिये , और अिसके विपरीत प्रत्येक अद्योग-सस्थाके साथ असमे काम करनेवालोके लिओ शालाकी योजना होनी चाहिये। बालक शालामे पढे और असके अद्योग-विभागमे काम करे और अद्योग भी सीखे। बड़े लोग अद्योग करे और साथ ही अद्योग-सस्थाओकी शालाओमे पढे । अिस प्रकार अकके साथ दूसरी सस्था होनी ही चाहिये। दुनियामे मनुष्य – जातिके बडे भागको मेहनत-मशक्कतका कठिन जीवन बिताना पडता है, किसी न किसी प्रकारका स्नायु- श्रमवाला अद्योग करके ही निर्वाह करना पडता है। और जिन्हे जैसा नहीं करना पडता अनके भी विकासके लिओ झुनकी स्नायुश्रमवाले अर्थात् मेहनतके काम करनेकी शक्तिका विकास करनेकी जरूरत है। अिसलि शालाओकी योजना अिस ढगसे होनी चाहिये कि अनका पाठयक्रम पूरा करनेवाला युवक अथवा युवती मजदूरी (स्नायुश्रम) करनेकी शारीरिक, मानसिक और बौद्धिक योग्यता रखे। बडी झुम्रमे जैसा श्रमपूर्ण अद्योग न करना पडे और अिसलिओ वह न करे तो कोजी हर्ज नही। परन्तु यह नहीं होना चाहिये कि जरूरत पड़ने पर भी अपनी शिक्षाके कारण (बल्कि शिक्षाकी न्यूनताके कारण) वह जैसा अद्योग करनेके लिअ शरीरसे, मनसे या बुद्धिसे अयोग्य साबित हो। ३५ शिक्षाका विकास स्नायुश्रम करानेवाली मजदूरीके तीन वर्ग किये जा सकते है : १ जिन कामोमे यत्रवत् अक ही तरहका (monotonous) स्नायुश्रम करना हो, जैसे जड मजदूरीवाले। २ जिन कामोमे ध्यानपूर्वक, थोडी बहुत तालीमके साथ तथा विविध प्रकारका स्नायुश्रम करना हो, जैसे कारीगरी अथवा कुशल मजदूरीवाले। ३. जिन कामोमे हिसाबके साथ, शास्त्रज्ञानपूर्वक स्नायु- श्रम करना हो, असे मिस्त्रीगिरी या अिजीनियरीके। मनुष्योमे मेहनत-मजदूरीके लिओ जो अरुचि बढ गी है, असके फलस्वरूप जैसे मजदूरीके कामोकी अपेक्षा बैठकके अथवा बुद्धिके कामोके लिमे अधिक मोह होता है, वैसे ही मजदूरीके धधोमे भी अपरके विभागोमे अकसे दूसरेकी कीमत ज्यादा समझी जाती है। परन्तु मानव-जीवनका विचार करने पर जान पडता है कि केवल जड परिश्रमके काम किये बिना जीवन-निर्वाह हो ही नहीं सकता । अरुचिसे करो, अमगके साथ करो या कर्तव्यबुद्धिसे हर्ष-शोक-रहित होकर करो, वे करने तो पडते ही है। अल्टे जैसे-जैसे यत्रोमे सुधार होते जा रहे है वैसे-वैसे कुशलतावाले कामोके लिओ भी यत्र बनाये जा रहे है और अन्हे केवल जड मजदूरीके काम बना डाला जाता है। मतलब यह है कि अद्योगोकी क्रियाले यत्रोसे हो या हाथमे, परन्तु जड स्नायुश्रमसे सबको मुक्ति मिलना सभव नही। अिसलि) असे कामोके प्रति मनमे अरुचि बढाना, अन्हे करनेकी आदत छोड देना तथा अन्हे करनेमे असमर्थ होना मानव-जीवनको टिकाये रखनेकी अक अनिवार्य शर्त न पालनेके बराबर है। अिससे मानव-जीवनको सजा मिले बिना रही नही सकती। जो अिससे भागते है अनका स्नायुविकास कम होता है और अनमे पीढी दर पीढी अपगता आती जाती है। अिसमे दोनो तरहसे हानि ही होती है। जिस बातका प्रमाण हमारे पीढी दर पीढी बैठकके काम करनेवालो और ‘पढे-लिखो' के शरीर देते है।

शिक्षा और श्रम ३७ अिसलिओ मेरी दृष्टिमे अद्योग द्वारा शिक्षाका अर्थ यह है कि केवल मजदूरीके अक ही तरहके और श्रमपूर्ण कामोके लिअ शरीरकी शक्ति बढामी जाय और कायम रखी जाय तथा असे कामोके प्रति अरचि अत्पन्न करनेवाले सस्कारो और परिस्थितियोको मिटाया जाय । अिसके लिओ विद्यार्थियोको जैसे कामोमे भी लगाना चाहिये, जिनसे अन्हे जड श्रम करनेकी आदत रहे। अिसका अर्थ यह नही कि कारीगरी और अिजीनियरीकी शिक्षाको गौण स्थान देना है। जैसा किया जाय तो स्नायुश्रमवाले अद्योग करनेकी बौद्धिक योग्यता नही बढ़ेगी। और यह भी समाजके लिओ हानिकारक ही होगा। जिस प्रकार शालाओकी योजना जैसी होनी चाहिये जिसमे विद्यार्थी काफी जड मजदूरी करते हो, कारीगरी सीखते हो और साथ ही पाठ भी पढते हो। अिन सस्थाओके अच्च पाठयक्रममे अिजीनियरीकी शिक्षा आ जायगी। असे अच्च पाठयक्रमके लिओ विशेष शालाओकी अपेक्षा अद्योग- सस्थायें भिन्न-भिन्न धधोके अधिक सुविधापूर्ण स्थान हो सकती है । यह सिद्धान्तकी अपेक्षा सुविधा और किफायतका विषय है। परन्तु औद्योगिक शिक्षाके मेक दो आवश्यक लक्षणोके प्रति ध्यान खीचनेकी जरूरत है। अक तो ‘अद्योग' को बिलकुल शुरूसे असके शुद्ध अर्थमे ही समझना चाहिये। अर्थात् छोटी या बडी जो भी वस्तु बालक बनाये, वह जीवनमे किसी न किसी अपयोगमे आनेवाली वस्तु हो या असका कोजी भाग हो। खिलौना हो तो भी सच्चा खिलौना हो, केवल बनानेवाले बालकके विनोदके लिअ बनाया हुआ न हो। वह जो कुछ बना रहा है असका कुछ न कुछ अपयोग होगा, जिस ज्ञानके साथ बालककी असमे प्रवृत्ति और योजना होनी चाहिये। तभी यह कहा जा सकता है कि बालक 'अद्योग' करता है।

३८ शिक्षाका विकास दूसरे, व्यायाम वगैरा शारीरिक शिक्षाको अद्योगके अवजमे रखनेसे काम नही चलेगा। व्यायाम, खेलकुद, कवायद वगैराका क्षेत्र और प्रयोजन स्वतत्र है। वे आवश्यक है, परन्तु वे औद्योगिक शरीरश्रमकी जगह नही ले सकते। गाधीजीका सुझाव है कि अिन शालाओका खर्च अनके विद्यार्थियोके अद्योगसे ही निकलना चाहिये । औसा न हो सके तो अन्य दो सूचनाये ये है कि विद्यार्थियोका अपना खर्च अनकी मेहनतसे निकलना चाहिये अथवा कमसे कम शालाओका अद्योग-विभाग स्वावलबी होना चाहिये । मुझे स्वीकार करना चाहिये कि जैसी अकाध शर्तका पालन करके ही शालाकी योजना करनेका मार्ग मुझे अभी तक स्पष्ट दिखाी नही देता। अितना कहा जा सकता है कि वर्तमान जनमानस और गरीबीकी दृष्टिसे विद्यार्थीके श्रमका मेहनताना फीसके खातेमे जमा होनेकी अपेक्षा कमाीके रूपमे मिलनेकी व्यवस्था करना अिन तीनोमे अधिक सतोषजनक और परिणामकारक होगा। परन्तु साथ ही जिस विद्याकी कीमत न चुकानी पडती हो वह बहुत सफल नही होती । अिसलिओ मै बीचका मार्ग सुझाता हू विद्यार्थियोकी मजदूरीका अंक हिस्सा फीस माना जाय और बाकीका अनकी कमानी। अद्योगसे शालाका सारा खर्च निकले या न निकले, यह मुख्य प्रश्न नहीं है। क्योकि किसी भी हालतमे हमे शिक्षाका प्रचार तो करना ही चाहिये। अिसके लिओ दूसरे विभागोसे अक अंक पानी बचानेको हम तैयार होगे। शिक्षाके खर्चके प्रति हमे भविष्यमे आय देनेवाली पूजीकी दृष्टिसे ही देखना चाहिये। अब तक तो केवल पुस्तकीय शिक्षाके खर्चको भी हम अच्छी पूजी समझते आये है। तो फिर औद्योगिक शिक्षाकी तो हमे अधिक झूची कीमत समझनी चाहिये । असल प्रश्न खर्चका नही, परन्तु कुशल शिक्षाका है। गाधीजी कहते है कि कुशलता सिर्फ शिक्षाशास्त्रकी दृष्टिसे ही नहीं, बल्कि अर्थशास्त्रकी और शरीरशास्त्रकी दृष्टिसे भी होनी चाहिये। अिसमे ।

शिक्षा और श्रम दोष निकालने जैसी कोसी बात दिखामी नही देती। कुछ व्यक्तिगत शालाओको हम आर्थिक दृष्टिसे कुशल न बना सके । फिरभी यदि अिस बात पर हमारा ध्यान रहेगा तो हम कमसे कम नुकसानको कम करनेमे तथा अमुक प्रकारकी शालाओको स्वावलबी बनानेमे भी सफल हो सकेगे। और यह भी न हो तो भी जिससे हमारे साधन बढेगे, घटेगे नही। शिक्षाशास्त्रकी दृष्टिसे निकम्मी शिक्षासे सन्तोष मान लेना गाधीजीके स्वभावमे नही है, और यदि यह मान लिया जाय कि आर्थिक लाभ पर बहुत नजर रखनेसे शिक्षामे निकम्मापन आ रहा है, तो वे असे लाभको छोडनेमे डरनेवाले नहीं है। यह तो हम जानते है कि कत्तिनोकी मजदूरीकी दरोसे असतुष्ट होकर असे बढानेमे और अिस तरह महगी खादीको और महगी करके चरखा-सघको जोखिममे डालनेमे अन्हे कोजी सकोच नही हुआ अिसलिओ, अिस मामलेमे हल ढूढनेका मार्ग यह बतानेकी दिशामे हमारी विचारशक्तिको मोडना नही है कि किस प्रकार गाधीजीकी दलीलोका खडन किया जाय और गाधीजी जो चाहते है वह असभव है, परन्तु यह बतानेकी दिशामे असे मोडना है कि हम अनकी कल्पनाको किस प्रकार अधिकसे अधिक सफल कर सकते है। हरिजनबन्धु, २४-१०-'३७ २ वर्धा-पद्धति १. पूज्य गाधीजी द्वारा प्रतिपादित शिक्षाकी योजनाको अिस लेखमे 'वर्धा-पद्धति' कहा गया है। २ यह योजना बताती है कि अक बालकको आगे चलकर मनुष्य-परिवारमे अक जिम्मेवार कुटुम्बीजनका स्थान लेने लायक बनानेके लिओ हम किस प्रकार अहिसाका प्रयोग कर सकते है। ३ अिस योजनाके सबधमे व्यापक रूपसे यह दावा किया गया कि यदि हमे मानव-समाजमे खूनी और लडाकू वृत्तिके स्थान पर शान्ति-स्थापक वृत्ति निर्माण करनी है, तो आवश्यक फेरफारोके साथ यह तमाम देशोमे और सभी जातियोमे काम दे सकती । हिन्दु- स्तानके लिओ तो आज यही अक योग्य पद्धति है। ४ अिस पद्धतिका ध्येय यह है कि बच्चेके अन्दर भले-बुरेका खयाल पैदा होते ही असे सामाजिक जीवनके कर्तव्योमे भाग लेना शुरू करा देना चाहिये। ५. अिस पद्धतिका मध्यबिन्दु होगा कोी अत्पादक पेशा। आम तौर पर हर किस्मकी शिक्षा अिस अद्योगके जरिये और अिसके साथ गूथ दी जानी चाहिये । अदाहरणार्थ, अितिहास, भूगोल, गणित, भौतिक तथा सामाजिक शास्त्र अव साहित्य आदि सब विषयोकी शिक्षा अिस अद्योगके साथ ग्रथित करके अिसके साथ-साथ दी जाय । अिन विषयोकी अन्य बाते छोडी नही जायगी। पर ग्रथित शिक्षा पर अधिक जोर दिया जायगा। * अिस लेखको पहले 'सेगाव-पद्धति' शीर्षक दिया गया था, परन्तु अब ‘वर्धा-पद्धति' नाम रूढ हो जानेसे शीर्षक बदल दिया है। ४० वर्धा-पद्धति ४१ ६. अद्योग भी शिक्षाका केवल साधन या वाहन नही होगा। बल्कि जिस हद तक वह मानव-जीवनमे अनिवार्यत आवश्यक है, अस हद तक वह हमारी शिक्षाका साध्य भी होगा। अर्थात् अिस शिक्षाका यह भी अक ध्येय होगा कि अिसके द्वारा हर तरहके शरीरश्रमके प्रति, चाहे वह भगीका भी काम क्यो न हो, बालकमे आदर-भाव अत्पन्न हो; और अंक जैसी कर्तव्य-निष्ठा अत्पन्न हो कि असे अपनी रोजी भी श्रीमानदारीके साथ शरीरश्रम द्वारा ही प्राप्त करनी चाहिये। ७ अिस पद्धतिके अनुसार पढानेवाले शिक्षकका लक्ष्य यह होगा कि विद्यार्थी जो भी अद्योग सीखे असीके जरिये असकी तमाम शारीरिक, बौद्धिक, नैतिक तथा आध्यात्मिक शक्तिया प्रकट हो। ८ अिसमे समाज-शास्त्र तथा आरोग्य-शास्त्र केवल शिक्षणवर्गके विषयोके रूपमे ही न पढाये जाय, बल्कि मूक प्राणियो सहित सारे गावकी भिन्न-भिन्न रीतिसे सेवा करनेके लिओ सामाजिक तथा व्यक्ति- गत कार्यक्रम बनाकर अनके द्वारा अिन विषयोकी प्रत्यक्ष शिक्षा दी जाय। अिस नवीन विद्यालयकी हस्ती अंक दीप-स्तभकी तरह हो, जो समाज पर चारो तरफसे सस्कृतिका प्रकाश फैलाता रहे। ९ सक्षेपमे कहे तो “हाथ और ज्ञानेद्रियो द्वारा यह पद्धति व्यक्तिकी बुद्धि और हृदयको सुसस्कृत करे और विद्यालयके जरिये असे समाज तथा परमात्मा तक पहुचावे।" १० शालाके सामुदायिक जीवनमे रहकर रोज तीन या चार घटे तक सह-परिश्रम करना लडके-लडकियोके लिओ आरोग्यदायक और अत्तम रीतिसे शिक्षाप्रद भी है। “ मनुष्य चाहे किसी भी श्रेणीका हो, विज्ञान तथा अद्योगके विकासके लिओ और सारे समाजके सामूहिक लाभकी दृष्टिसे भी असे जैसी शिक्षा मिलनी चाहिये कि वह विज्ञानकी पूरी शिक्षाके साथ-साथ दस्तकारीकी शिक्षाको जोड सके। (कोपाटकिन) ४२ शिक्षाका विकास ११ मौजूदा शिक्षा-पद्धतिमे तो अधिकाश विद्यार्थी अपनी कॉलेजकी पढामी खतम कर लेने पर भी यह निश्चय नहीं कर पाते कि अब आगे वे क्या काम करेगे? हम अक्सर देखते है कि जैसे बहुतसे लडके और लडकिया, जिनके घरकी स्थिति बहुत ज्यादा खराब नहीं होती, प्राथमिक शालाओसे माध्यमिक शालाओमे और वहासे कॉलेजोमे भारी खर्च अठाकर जाते रहते है। अिसका कारण यह नहीं बताया जा सकता कि वे अिन शाला-कॉलेजोमे सिर्फ अन शुभ सस्कारोको पाने जाते है, जिनका कि ये सस्थाओ दावा करती है। वास्तवमे तो वे अिसलिओ पढते चले जाते है कि अन्हे कुछ सूझता ही नही कि अिसके अलावा वे और क्या कर सकते है। आजीविका कमानेके लिओ अपयुक्त धधेके चुनावकी घडीको जहा तक बन पडता है वे आगे ढकेलते जाते है और अकके बाद अक अिम्तिहानोमे बैठते चले जाते है। जिस स्त्री अथवा पुरुषको अपने जीवनके प्रारभिक बीस-पचीस साल जिस तरह निरुद्देश्य बिताने पडते है, असके अन्दर दीर्घसूत्रता, सशय- वृत्ति, अनिश्चितता और अपने आप किसी निर्णय पर पहुचनेकी अक्षमता आये बगैर रही नहीं सकती। वर्धा-पद्धतिका अद्देश्य यह है कि प्रत्येक बालक या बालिकाको वह जल्दी-से-जल्दी अिस बातका निर्णय करा दे कि असे अपने भावी जीवनमे कौनसा व्यवसाय करना होगा, और असे किसी अक धधेकी कम-से-कम अितनी तालीम भी जरूर दे दे, जिससे वह जीवनके योग्य धारण-पोषणके लिओ आवश्यक न्यूनतम कमानी जरूर कर सके। १२. साक्षरता-यानी लेखन-वाचन द्वारा अनेक विषयोकी जानकारी तथा तार्किक अथवा जैसी ही अन्य चर्चाओको समझनेकी शक्ति-को वर्धा-पद्धतिमे न तो ज्ञान माना गया है और न ज्ञानका साधन ही। बल्कि, असमे तो अिसे ज्ञान अथवा अलकृत अज्ञानको प्रकट करनेकी साकेतिक पद्धतिमात्र माना है। अिन सकेतोका ज्ञान तो तब अपयोगी और जरूरी हो सकता है, जब ज्ञानकी जडे हरी हो। वर्धा- वर्धा-पद्धति -- पद्धतिका अद्देश्य यह है कि अिन जडोको हरा-भरा रखा जाय। अिसके साधन है प्रत्यक्ष कार्य, अवलोकन, अनुभव, प्रयोग और सेवा । अिनके बगैर कोरी किताबी पढाी विद्यार्थीके हृदय और वुद्धिके विकासमे विघ्नरूप सिद्ध होती है और असके शरीरको भी बिगाडती है। १३ वर्धा-पद्धतिके अनुसार जो पढाी होगी असमे विद्यार्थीको पढाीकी बुनियादके रूपमे जो सिखाया जायगा असमे नीचे लिखे विषयोका समावेश होना जरूरी है मातृभापाका अच्छा ज्ञान, मातृ- भाषाके साहित्यका साधारण परिचय, देशकी राष्ट्रभाषाका व्यावहारिक ज्ञान, गणित, अितिहास, भूगोल, भौतिक तथा सामाजिक शास्त्र, आलेखन, सगीत, कवायद, खेल-व्यायाम वगैरा। अिन विषयोका साधारण ज्ञान और किसी अक धधेमे जितनी कुशलता जो साधारण शक्तिवाले विद्यार्थीको मामूली कमाी करनेकी शक्ति दे सके और अगर वह होशियार तथा परिश्रमी भी हो तो असे अिस लायक बना दे कि वह साहित्यिक अथवा औद्योगिक क्षेत्रमे अधिक शिक्षा पानेका पात्र बन जाय। अिस 'बुनियादी तालीम' मे नीचे लिखे विषयोका समावेश आवश्यक नही है --- अग्रेजी अथवा असे तमाम विषय जिनकी साधारणतया व्यवहारमे जरूरत नहीं होती, अथवा बुद्धिके विकासके लि जो अनिवार्यत आवश्यक नहीं होते या खुद-ब-खुद अपनी शिक्षाको आगे बढानेकी पूर्व तैयारीके रूपमे जिनकी जरूरत नहीं होती। १४ 'बुनियादी तालीम' का अध्ययन-क्रम सात वर्षसे कमका नही होना चाहिये। हा, अगर जरूरत हो तो समय बढाया जरूर जा सकता है। अगर आगे लिखे अनुसार शालाओं स्वावलबी हो सकी, और विद्यार्थियोके पालकोको भी अिनसे कुछ लाभ मिल सका, तो बच्चोंको अधिक समय तक पढानेमे अनके पालकोको कोी कठिनाजी नही होगी।

४४ शिक्षाका विकास १५ वर्धा-पद्धतिके सबधमे राज्यके कुछ कर्तव्य तथा जीवन- वेतनकी कम-से-कम मर्यादाके विषयमे कुछ सिद्धात निश्चित कर लिये गये है। वे नीचे दिये जा रहे है। १६ जो स्त्री या पुरुष मेहनत करनेके लिओ तैयार हो और जिन्हे सरकार पढनेके लिओ मजबूर करे, सरकारका कर्तव्य है कि अन्हे वह काम दे और अिस कामके बदलेमे कम-से-कम अितना वेतन तो जरूर दे जिससे कि अनका ठीक तरहसे निर्वाह हो जाय। जिस सरकारमे अितना करनेकी शक्ति नही है, वह राज्य' कहलानेकी पात्रता नही रखती। १७ जैसा अनुमान लगाया गया है कि आजकलके बाजार भावोके अनुसार हिन्दुस्तानमे योग्य निर्वाहके लिअ पूरा काम करनेवाले आदमीका मेहनताना फी घटा अंक आनेसे कम नहीं पड़ना चाहिये। पूरा काम' यहा अतना काम समझा जाय, जितना कि (तालीम पाया हुआ) अक साधारण आदमी घटे भरमे कर सके। १८ हमारे देशकी वर्तमान शासन-पद्धति तथा समाजकी रचना भी अिस कसौटी पर खरी नही अतरती। अिसलिओ हमारे देशकी सरकारे ‘राज्य' कहलानेकी पात्रता नहीं रखती। अिस खामीका कारण चाहे विदेशी सत्ता हो या खुद हम ही हो, असे दूर करना ही पडेगा। वर्धा-पद्धतिका दावा है कि अगर अस पर साहसपूर्वक और सच्चे दिलसे अमल किया जाय, तो राज्यमे तथा समाजमे आवश्यक फेरफार करनेके साधन और शक्ति वह हमे देगी। १९ अिसके लिओ राज्यको कम-से-कम अंक अद्योगको अपना लेना होगा; वह अद्योग असा हो कि जिसमे वह लगभग असख्य आदमियोंको काम दे सके और फिर भी असे खुद घाटा न झुठाना - पडे। २०. हिन्दुस्तानके लिओ तो हाथ-कताी और हाथ-बुनामी ही अक असा धधा है। अिसमे कच्चा माल, थोड़ी पूजीसे काम चल वर्धा-पद्धति निकलना और अपार मनुप्य-बल आदि वे सारी स्वाभाविक अनुकूलता है, जो असे देशका खास अद्योग बना देनेके लिओ आवश्यक है। फिर अिसके पीछे लबी परपरा भी तो है। क्योकि सैकडो वर्ष तक हिन्दुस्तानने ही ससारको सूतसे ढका है। २१ यो तो पहले ही कातनेकी मजदूरी असतोषकारक थी। पर आगे चलकर वह कलोके बने मालकी प्रतिस्पर्धामे और भी अधिक घट गी। राज्य तथा जनताको चाहिये कि वे अिस प्रतिस्पर्धाको मिटा दे। और जब तक वे असा नहीं कर सकते, खादी-अद्योगको जिलानेके लिओ प्रतिस्पर्धाकी किसी प्रकारकी परवाह किये बगैर वे कातनेवालेको अितनी मजदूरी देना शुरू कर दे जिससे असका अच्छी तरह निर्वाह हो सके। २२ अिसी तरह सभी प्रकारकी मजदूरीके दर बढानेकी जरूरत है, जिससे कि मजदूरोका धारण-पोषण पूरी तरहसे हो सके। सरकारको चाहिये कि यह करनेकी शक्ति वह प्राप्त करे। जनताका भी यह कर्तव्य है कि सरकारकी अिसमे मदद करे, जिससे कि वह अिस लायक बन जाय। २३ अपर बताी हुी अल्पतम मजदूरी वडी झुम्रके आदमीके लिओ है । वर्धा-पद्धतिकी शालाके विद्यार्थीके लिओ असका दर फी घटा आध आना पडता है। २४ हम रोजाना कामके तीन घटे मान ले और यह मान ले कि सालमे नौ महीने शाला लगेगी, तो वर्धा-पद्धतिकी शालाकी कुशलताकी कसौटी यह होगी कि सात दर्जे (हर दर्जेमे २५ विद्यार्थी) और लगभग आठ-नौ शिक्षकोवाली शालाकी आय अितनी हो जानी चाहिये कि अपर्युक्त हिसाबसे अगर मजदूरी आकी जाय, तो असमे से शिक्षकोका वेतन निकल आये। शिक्षकका वेतन कम-से-कम २५ रु० मासिक मान लिया गया है। (वह २० रु० मासिकसे कम तो किसी हालतमे न हो।) - शिक्षाका विकास . २५ विद्यार्थियोकी कार्यशक्ति, साधनो तथा शिक्षा-पद्धतिमे अितने सुधार हो जाने चाहिये कि कुशलताकी अपर्युक्त कसौटी पर तो कम-से-कम प्रत्येक शाला खरी अतर जाय। २६ अपर्युक्त दरसे शालाके विद्यार्थीकी मजदूरी आकते हुओ तथा गावोमे खानगी कारीगरोको आज जो मजदूरी मिलती है असका विचार करते हुओ यह तो भय नही रहता कि खानगी कारीगरोके मालके साथ शालाओके मालकी प्रतिस्पर्धा होगी। गावोके कारीगरोकी मजदूरीके दरोको अिस सीमा तक आनेमे जरा समय लगेगा और तब तक तो गावोके कारीगरोकी कार्यशक्ति और साधनोमे भी अितने ही सुधार हो चुके होगे। अिसलिओ यहा प्रतिस्पर्धाका भय रखनेकी कोमी जरूरत ही नहीं है। २७ फिलहाल तो शालाको अपर्युक्त मजदूरी चुकानेका आश्वासन सरकारको दे ही देना चाहिये। कम-से-कम चरखा-संघ तथा ग्रामोद्योग-सघ द्वारा मजूर किये गये दर तो जरूर देने चाहिये । और जब तक विद्यार्थीको फी घटा आध आना मजदूरी नही पड जाती, ये सस्था ज्यो-ज्यो अपने यहा मजदूरीके दर बढाती जाय त्यो-त्यो शालाओकी मजदूरीके दर भी बढते जाने चाहिये। अिस पर शायद यह आक्षेप किया जायगा कि यह तो शालाको प्रत्यक्ष रूपसे सहायता करनेकी बात हुी। और ससे मौजूदा बाजार-भावोको देखते हुआ सरकार पर बहुत अधिक आर्थिक बोझ पडेगा। मगर कारीगरोकी कार्यशक्ति और साधनोमे भी सुधारके लिअ अितनी गुजाअिश है कि हम यह आशा रख सकते है कि पदार्थोकी कीमते अधिक बढ़ाये बगैर भी पाच वर्षके अदर शाला तथा खानगी (तालीम पाया हुआ) प्रत्येक कारीगर हकके साथ जीवन-वेतनकी न्यूनतम मर्यादा तक पहुचनेकी शक्ति प्राप्त कर लेगे। २८. यह जो सिद्धान्त कहा गया है कि अपर बताये अर्थमे प्रत्येक शालाको स्वाश्रयी हो जाना चाहिये, असमे केवल आर्थिक दो संस्कृतियां दृष्टि नही है। बल्कि अिसे शालाके औद्योगिक विभागकी कुशलताकी व्यावहारिक कसौटीके रूपमे रखा गया है। २९ अभी तो खादी-अद्योग द्वारा 'बुनियादी-तालीम' देनेकी दृष्टिसे वर्धा-पद्धतिका सागोपाग विचार किया गया है। अिससे कोसी यह न समझ ले कि अिसमे हम अन्य अद्योगोको प्रोत्साहन नही देना चाहते, बल्कि बात यह है कि दूसरे अद्योगोके सबधमे योजना बनाने और अनुमान निकालनेके लिओ अभी हमारे पास आवश्यक सामग्री नहीं है। ३० वर्धा-पद्धतिके सिद्धात आवश्यक फेरफारोके साथ असके बादकी शिक्षामे भी लागू करने चाहिये । हर प्रकारकी शिक्षामे स्वाश्रयका तो स्थान होना ही चाहिये। अच्च शिज्ञामे सस्थाका खर्च या तो विद्यार्थियोकी मेहनतसे निकल आना चाहिये या अनकी फीससे। और अगर फीस न देनी पडती हो, तो विद्यार्थी अपना खर्च शालामे या बाहर की गी मजदूरीसे निकाल ले हरिजनसेवक, ४-१२-'३७ 3 दो संस्कृतियां जो विचार मै पेश कर रहा हू, अन्हे आप मेरे ही विचार माने। यह न मान ले कि ये विचार तालीमी सघ या गांधीजीका मत भी अपस्थित करते ही है। जो शिक्षा-पद्धति हमारे देशमे प्रचलित है, अस पर अनेक प्रकारके आक्षेप किये जाते है। ये आक्षेप आजसे नही, परतु वर्षोसे होते रहे है। तो भी वह पद्धति अभी तक कायम है और समझने लायक बात * वर्धामे हिन्दुस्तानी तालीमी सघके तत्त्वावधानमे दिया गया ओक भाषण।

४८ शिक्षाका विकास तो यह है कि आक्षेप करनेवाले हम लोगोमे से अधिकतर अस पद्धतिका संचालन करनेवालोमे से ही पैदा हुआ है तथा आक्षेप करने पर भी असी पद्धतिको चलाते रहते है। अिसलिओ हमे विचार करना चाहिये कि हम अिस शिक्षा पर आक्षेप क्यो करते है और जिसके बावजूद असीको क्यो चला रहे है। हम अिस शिक्षा पर आक्षेप करते है, अिसका अर्थ यह है कि जिसके द्वारा हमारी आवश्यकताये अथवा हमारी आकाक्षाओं अथवा दोनो अच्छी तरह पूरी नहीं होती। हम अिसी शिक्षाको कायम रखते है, अिसका अर्थ यह होता है कि कुछ भी कहे तो भी अिसके द्वारा हमारी कुछ आवश्यकताओं अथवा आकाक्षाओं अथवा दोनो पूरी होती है। अिन दोनो बातोका हमे ध्यान रखना चाहिये और अनका रहस्य समझना चाहिये। तो हमे अितना याद रखना चाहिये कि वर्तमान शिक्षा-पद्धति भी अक विशेष प्रकारकी संस्कृतिकी प्रतिनिधि है। वह सर्वथा विदेशी है, यह कहना ठीक नही । मेरे मतानुसार जिस प्रकारकी शिक्षा-प्रणाली प्राचीन काशी (अथवा आजकी भी सनातनी काशी) और मुसलमान समयमे हमारे देशमे प्रचलित थी, अससे आजकी शिक्षाका प्रकार भिन्न नहीं है। यह सही है कि अिन तीनो युगोमे अलग अलग भाषाओको प्रतिष्ठा मिली है। अक कालमे सस्कृत भाषाकी प्रतिष्ठा सबसे अधिक थी; बादमे फारसीकी, फिर हिन्दुस्तानीकी और फिर अग्रेजी भाषाकी -- जिस प्रकार अकके पश्चात् दूसरीकी प्रतिष्ठा बढी। परतु अनके द्वारा जिस सस्कृतिको पोषण मिला, वह तो अक ही रही है। वह सस्कृति अनकी है, जिन्हे हम भद्र लोग अथवा सफेदपोश लोग मानते है। मेरा तो यह खयाल है कि कमसे कम पिछले अक हजार वर्षोमे राज्यकी तरफसे बालको और बडोको शिक्षा और सस्कार देनेका जो काम हुआ है, वह केवल सफेदपोश लोगोंमें ही हुआ है।

दो संस्कृतियां ४९ -- भद्र -- . आर्य सम्मानित जातिया हमारे देशमें आरंभसे ही रही है। वे अग्रेजोकी पैदा की हुमी नही है। सभव है कि अग्रेजोने अनका क्षेत्र कुछ बढा दिया हो, परतु अग्रेजोने अन्हे पैदा नहीं किया। भद्र सस्कृतिका लक्षण मनुष्यको तर्क और कल्पना-शक्तिका विकास है। सस्कारिताके क्षेत्रमे शास्त्री, पडित, झुलेमा, कवि, ललित कलाकार (जैसे चित्रकार, गायक अित्यादि) लोग असके प्रतिनिधि है। दुनिया- दारीके क्षेत्रमे असके प्रतिनिधि वकील, वैद्य, डॉक्टर, हकीम, अध्यापक, अस्ताद और मुशी है। अग्रेजी शिक्षा-पद्धतिका सस्कृतिके विकासकी ओर दुर्लक्ष नही था, हा, अस पद्धतिने असे अपने विचारोका वेश जरूर पहना दिया है। परतु यह तो अिस्लामने भी किया था। दुनियादारीके क्षेत्रमे अग्रेजोने असे भी कुछ भद्र धधे निर्माण कर दिये है, जिनमे बुद्धि और परिश्रम दोनोकी आवश्यकता पड़ती है। जिनमे बुद्धि और परिश्रम दोनोके कामोको अलग करके अनके बौद्धिक विभागोके भद्र धधे बना दिये गये है। अदाहरणार्थ, अिजीनियरी, खेती वगैरा। अग्रेजोने अपनी सूक्ष्म शास्त्रीय नियम-पालनकी आदतोके जरिये अिन दुनियवी धधोका अधिक विकास भी किया है। अग्रेजी शिक्षाके विरुद्ध आक्षेप करनेके बावजूद हमारा भद्र वर्ग असे छोड नही सकता, अिसके कारण अपर बताये गये है। भद्र सस्कृति मनुष्योकी समानताके सिद्धान्त पर खडी नही हुी है। तात्त्विक दृष्टिसे वह केवल मनुष्योकी नही परतु भूतमात्रकी समानता बतायेगी, परतु दुनियादारीके कामोमें वह केवल अितना ही नही कहती कि मनुष्य मनुष्यके बीच भेद होते है, परंतु यह भी कहती है कि ये भेद रहने ही चाहिये । अिसलिमे वह समाज-व्यवस्थाके लिओ हिसा पशुबल को अपरिहार्य मानती है और कहती है कि प्रत्येक व्यक्तिको अपनी-अपनी मर्यादामे रखनेके लिअ समाजके राजदण्डको सदा घूमते रहना चाहिये । शि-४ ५० शिक्षाका विकास यह कहा जा सकता है कि व्यवहारमे भद्र सस्कृति अतने ही मानव-विभागको मनुष्य-जातिमे गिनती है, जिसे वह भद्र जीवनमे निभाये रखना योग्य अथवा सभव मानती हो। बाकीके लोग सस्कृतिके क्षेत्रसे बाहर और अिसलि असकी सभ्यताकी व्याख्याके भी बाहर है। वे शूद्र, दास, गुलाम, गिरमिटिया अथवा और कुछ भी हो सकते है, परतु असके समाजके नहीं हो सकते और समाजके सारे अधिकार या सुविधाओ भोगनेके पात्र नही हो सकते। भद्र सस्कृतिसे भूचे दर्जेकी अक और संस्कृति भी प्राचीन कालसे जगत्मे चली आजी है। असे मै सत अथवा औलिया सस्कृति कहूगा। कभी कभी अिसे पूर्वकी सस्कृति और भद्र सस्कृतिको पश्चिमकी सस्कृति कहा जाता है। परतु मुझे यह परिभाषा अचित नही जान पडती। फिर यह भी नही है कि भद्र सस्कृति आसुरी है और भद्र सस्कृतिसे बाहर रहनेवाले लोग दैवी सस्कृतिके ही है। दोनो सस्कृतिया दुनियाभरमे प्रचलित है और जैसे भद्र सस्कृतिमे कुछ दैवी अश भी है, वैसे ही झुमके बाहर रहनेवाले लोगोमे आसुरी भाव भी है। फिर भी सारी दुनियाके देशोमे औलियो और सतोकी भी अंक परपरा सदासे चली आजी है। अिन मतोका काम जितना और लोगोमे हुआ है अतना भद्र लोगोमे नही हुआ । वे या तो भद्रेतरोमे पैदा हुओं है अथवा भद्र वर्गमे जन्म लेने पर भी अन्होने भद्रेतरोके साथ तादात्म्य साध लिया है। प्राय भद्र लोगोने अनका विरोध किया है और अन्हे कष्ट भी दिये है। परतु अन्तमे, कमसे कम, जबानसे अन्हे स्वीकार किया है और अनकी स्थूल वन्दना की है। गाधीजी असी परपराके अक पुरुष है। भारतकी हो या बाहरकी, सत सभ्यताके तीन सिद्धान्त है: मानवमात्रकी समानता, अहिसा और परिश्रम । भद्र लोग मानते है कि सभ्यताके विकासके लिओ फुरसतका होना बहुत आवश्यक है। सतोका यह मत नहीं । अनका कहना यह नहीं है कि फुरसत अथवा आराम दो संस्कृतियां बिलकुल नही चाहिये । परतु अनका मत यह है कि संस्कृतिके विकासके लि) परिश्रम अनिवार्य है और फुरसतमे कुछ न कुछ खराबीका डर भी है। जिसका कारण समझना कठिन नही। यह सही है कि मनुष्य केवल अन्न पर नहीं जीता, परतु साथ ही यह भी मानना पडेगा कि मनुष्य अन्नके विषयमे बेपरवाह भी नहीं रह सकता। असे अन्न पैदा करना ही पड़ता है, फिर भले वह केवल मनुष्यके ही बलसे करे अथवा मनुष्यबलके साथ पशुबल अथवा यत्रबलका भी अपयोग करे। साथ ही यह भी है कि दूसरे बलोकी मदद ली जाय, तो भी मनुष्यबलको बिलकुल अनावश्यक नही बनाया जा सकता और मनुष्योके बहुत बड़े भागको तो अन्न पैदा करनेके लिओ अपना ही बल काममे लेना अनिवार्य होता है। अब हमारा राज्यतत्र पूजीवादी सिद्धान्तो पर बना हुआ हो या साम्यवादके सिद्धान्तो पर, जब तक मनुष्योमे यह सस्कार वढाया जाता है कि परिश्रम अक महान कष्ट है, असकी अनिवार्यता मानव-जातिके लिओ अंक घोर शाप है, तब तक अक ओर तो मनुष्यसे परिश्रम करानेके लिओ कानून-कायदे अर्थात् जबर- दस्ती -- अनिवार्य हो जायगे और दूसरी ओर मनुष्य हमेशा अससे बचनेका प्रयत्न करता रहेगा। जब साम्यवादकी यह आदर्श स्थिति आ जाय कि केवल दो ही घटे काम करनेकी जरूरत रहे, तब भी जब तक परिश्रमको आफत समझनेकी हमारी मनोवृत्ति बनी रहेगी तब तक अतना काम भी टालनेका मनुष्य प्रयत्न करता रहेगा। दूसरे शब्दोमे कहे तो तब तक अस सस्कृतिको कायम रखनेके लिओ हिसाका आश्रय लेना ही पडेगा। मतलब यह है कि परिश्रम यत्रवत् अथवा बुद्धियुक्त दोनो - और अहिसा सगे भाजी-बहन है। परिश्रमके प्रति अरुचि पैदा करेगे तो साथ साथ असमानता और असे टिकाये रखनेवाली हिसाकी मनोवृत्ति बढाये बिना काम नही चलेगा। बेशक, मनुष्यको आरामकी -- ५२ शिक्षाका विकास . आवश्यकता रहती है। परतु आरामका स्थान असके जीवनमे वैसा ही होना चाहिये जैसा हृदयकी क्रियामे होता है। हृदय हर बार जब फूलता और सकुचित होता है, तब असके बीचमे असे कुछ देर आराम लेना पडता है। परतु विचार कीजिये कि कोमी हृदय अपने आरामके क्षणोका ही आदर करे, फूलने और सकुचित होनेकी क्रियाका तिरस्कार करने लग जाय, तो असके मालिककी क्या दशा होगी? अिसी प्रकार जो समाज आरामको जीवनका ध्येय बना ले और परिश्रमकी तरफ अरुचिकी दृष्टिसे ही देखे, असे तो अन्तमे मरना ही होगा। वर्धा-पद्धति' केवल पढानेका अक नया ढग ही नही, परतु जीवनकी नसी रचना और नया तत्त्वज्ञान है। यह तत्त्वज्ञान स्वीकार हो तो असके अनुसार समाजकी रचना करनेका बुद्धिपूर्वक प्रयत्न करना चाहिये । अिस तत्त्वज्ञान पर निर्मित शालाओ भद्र शालाओसे भिन्न प्रकारकी हो, यह अनिवार्य है । मै कह चुका हू कि भद्र जीवनमे हिसाका स्वीकार किया गया है, अर्थात् युद्धको भी वह जीवनकी अक आवश्यकता मानता है। अिसलि बचपनसे ही वह बालकमे युद्धके लिओ आदर पैदा करता है। वह युद्धके और रणवीरोके यशोगान करता है और अन्य देशोमे तो मनुष्यको मारनेकी शिक्षा सबको अनिवार्य रूपमे प्राप्त करनी पड़ती है। हमारी दंतकथाओं और अतिहासिक कथाले अधिकतर मनुष्यके हाथो हुभी हुभी मनुष्यो अथवा पशुओकी हत्याओका वृत्तात ही होती है। धार्मिक कथा भी अिससे मुक्त नहीं होती। और रूपकात्मक कथा भी लड़ाओ और मारकाटकी मनोवृत्तिका आश्रय लेती है। अिस प्रकार, हमे यह भी अक बात ध्यानमे रखनी पडेगी और अपने साहित्यमे से अत्यत सावधानीपूर्वक जैसी कथाले निकाल देनी पड़ेगी, भले वे कितनी ही धार्मिक और आकर्षक क्यो न हों। और बाल-मानसके बारेमें हमने जो पूर्वग्रह बना लिये है वे भी छोड देने होंगे। जैसे, यह मान्यता है कि अमुक आयुका बालक अमुक युगके दो संस्कृतियां ५३ . मनुष्यका प्रतिनिधि है, अिसलिओ असे अस दशाकी पोषक कहानिया कहनी ही चाहिये। सच पूछा जाय तो मनुष्य भले और बुरे भाव तथा सच्चे या झूठे तर्कको प्रगट करनेके तरीकोमे हजारो कदम आगे बढा होगा, फिर भी हजारो वर्षोमे अन भावो और तोंके प्रकार या मात्रामे शायद ही कोजी फर्क पड़ा है। यह नहीं कहा जा सकता कि मनुष्योके हृदय और बुद्धिका आगे विकास हुआ है। जिसका अक कारण कदाचित् यह हो कि मनुष्यने प्राचीन कालसे आज तक हिसाकी कलाका विकास करनेके लिओ बुद्धिपूर्वक अत्यत परिश्रम किया है। परतु अहिसाकी कलाका विकास करनेके लिओ शायद ही कोजी परिश्रम झुठाया है। बेशक, प्रत्यक्ष जीवनमे तो अहिसाका झुपयोग वह शुरूसे ही करता रहा है । परतु यह झुपयोग असने वैसे ही किया है, जैसे कोी अपढ मजदूर ‘लीवर या 'गुरुत्वाकर्षण' के बलोका सहज अपयोग करता है, वह असका गणित अथवा वैज्ञानिक स्पष्टीकरण नही जानता। जब विज्ञान-शोधकोने अिसके गणित और स्पष्टीकरण समझ लिये, तब अन्होने जिसके अपयोगकी सैकडो नी तरकीबे निकाली। अक जमाना औसा था जब वैज्ञानिक मलिन विद्याके अपासक माने जाते थे। परतु अिन शोधोने विज्ञान सवधी हमारी वृत्ति ही बदल डाली है। अिसी तरह जब अहिसा-शक्तिका बुद्धि और मानसशास्त्रके साथ सगोधन होगा और तदनुसार मानवजातिके पालन-पोषणकी पद्धतिया ढूढी जायगी, तब कदाचित् हमे यह भी अनुभव होगा कि बाल-मानस जैसा हम मानते है अससे भिन्न प्रकारका हो सकता है। हरिजनबंध, २४, ३१-७-३८ ४ * शिक्षा-संबंधी गांधीजीके विचार मुझसे आपके सामने गाधीजीके कुछ महत्त्वके विचार प्रगट करनेको कहा गया है। यह काम कठिन तो है, फिर भी अपनी मर्यादा ध्यानमे रखकर मैने अिसे स्वीकार कर लिया है। पहली बात तो यह है कि मै गाधीजीके जो विचार प्रगट करूगा झुनकी जिम्मे- दारी मेरी है, अनकी नहीं। और अनके विचारोको मै अपनी समझके अनुसार आपके सम्मुख रखूगा। मेरी अिस समझमे अनकी दृष्टिमे भूल भी हो तो ये विचार अनके नही, परतु मेरे मान लिये जाय । दूसरी बात यह है कि अनके सब विचारोका विवेचन करना कठिन है। केवल शिक्षा-सबधी कुछ विचार यहा पेश करूगा। गाधीजीने अनेक बार कहा है कि अनका कोसी नया तत्त्व- ज्ञान नहीं है। अन्होने जो नी चीज बताती है वह है दुनियादारीमे पैदा होनेवाली कठिनाजिया और झगडे मिटानेमे मूल सिद्धान्तोका अपयोग करनेका व्यावहारिक मार्ग। झुनकी मगा भिन्न भिन्न महान सनातन धर्मोका वैयक्तिक नही, परतु सामाजिक जीवनमे मामूहिक रूपमे अपयोग करनेकी है। तत्त्वज्ञान तो वह है जो प्रत्येक धर्मके महात्माओने बताया है और जिसके तीन मुख्य अगोका पिछली बार मैने विवेचन किया था। वे अग है अहिसा, समानता और परिश्रम । जिन्हे अस तत्त्वज्ञानमे श्रद्धा नही, झुनकी गाधीजीके अन्य विचारो पर भी श्रद्धा नहीं बैठेगी। अिसलि अिन तीनोकी जइमे रहे सिद्धान्तोका विचार करना चाहिये। * वर्धामे हिन्दुस्तानी तालीमी सघके तत्त्वावधानमे दिया हुआ दूसरा भाषण।

शिक्षा-संबंधी गांधीजीके विचार कुछ लोग पूछते है कि समानता और परिश्रम तो ठीक है, परन्तु अहिसा किसलिओ? हिसा भी क्यो नही? अिसका अत्तर गाधीजीके पास अितना ही है कि ीश्वर पर विश्वास। हालमे ही (१८-६-३८ के) 'हरिजन' मे गाधीजीने अिस विषयके लेख लिखे है। अनमे वे बताते है "शान्ति-सेनाके सदस्यका -- वह स्त्री हो या पुरुष - अहिसामे अटल विश्वास होना चाहिये । और यह तभी हो सकता है जब औश्वरमे असका सच्चा विश्वास हो । अहिसाको माननेवाला मनुष्य मीश्वरकी कृपा और शान्तिके बिना कुछ नही कर सकता। परन्तु प्रश्नकर्ताओको अितनेसे सन्तोष नही होता। वे कहते है कि औश्वरका अस्तित्व आज शकास्पद है। बडे बडे मनुष्योकी बुद्धिने यह सिद्ध किया है कि अीश्वर नहीं है, अिसलिओ असके साथ यह भी सिद्ध हो जायगा कि अहिसा भी नहीं है। यहा फिरसे भद्र सस्कृति और सत सस्कृतिके वीचका अन्तर समझनेकी जरूरत है। पिछली बार मैने कहा था कि भद्र सस्कृतिमे तर्क और कल्पना-शक्तिका (जिसे हम वुद्धि कहते है) बहुत विकास हुआ है। परन्तु मीश्वरको खोजनेमे अथवा यह निश्चित करनेमे कि असका अस्तित्व है या नही, बुद्धि काम नहीं आती। हमारी पद्धति ही गलत है। जैसे कानसे देख नही सकते और आखसे सुन नही सकते, वैसे ही मीश्वर-सबधी ज्ञान हम केवल बुद्धिसे प्राप्त नहीं कर सकते। क्योकि यदि असे विषय मान लिया जाय तो भी वह हृदयका विषय है। हृदयकी शिक्षा पर आजकल अितना कम ध्यान दिया जाता है कि अधिकाश बुद्धिमान लोग असे समझ भी नहीं सकते। जैसे कान और आख सुनने और देखनेकी आवश्यक और प्रत्यक्ष अिन्द्रिया है, वैसे मन भी हमारी प्रत्यक्ष अिद्रिय है। हम अपनी भूख-प्यास अपने- आप अनुभव कर सकते है। हममे अत्पन्न होनेवाले दया, क्रोध, प्रेम आदि भाव हम स्वय अनुभव कर सकते है। अिसमे आख, कान आदि शिक्षाका विकास पचेन्द्रियोकी जरूरत नही पडती। तर्क और कल्पनासे वे समझे नही जा सकते और यदि किसीको अनका अनुभव कभी हुआ ही न हो तो वर्णन द्वारा असे मनकी कल्पना नही कराी जा सकती। अिसी प्रकार ीश्वर भी अिस सीधे ज्ञानसे समझनेका विषय है। 'सा' और 'रे' अथवा लाल और पीलेका अिन्द्रियोको अनुभव हो जानेके बाद अस पर कुछ तर्क अथवा वाणीका प्रयोग हो सकता है और जिसे अिस भेदका पता न हो असे यह भेद समझानेका तरीका ढूढा जा सकता है। जितनी शर्त जरूर है कि सुननेवालेके आख-कान पूर्ण स्वस्थ होने चाहिये। जिस प्रकार पहले हृदय यदि तैयार हो तो तर्कयुक्त वाणी द्वारा अमे थोडा-बहुत समझाया जा सकता है । अिसलि सत-सस्कृतिमे बुद्धि और ज्ञानकी अपेक्षा हृदयकी शिक्षा पर अधिक भार दिया जाता है। हमारे बालकोमे प्रेम, आदर, दया, करुणा आदि भाव उत्पन्न होनेकी और अन्हे विवेकसे काबूमे रखनेकी शक्ति आनी चाहिये। यह हृदयकी शिक्षा है। जब वह हृदयके अिस साधनको पहचानने लगेगा और असका विकाम करेगा तव वह ीश्वरके अस्तित्व अथवा नास्तित्व सबधी विचार सुनने या करनेके योग्य बन सकेगा। अनुभवी मनुष्योका कहना है कि श्रीश्वरकी खोज करनेका स्थान बुद्धि नही परन्तु हृदय है। फिर भी हम तर्क और कल्पनासे असे खोजनेका प्रयत्न करते है और न मिलने पर निराश होते है। प्राचीन सतोने औश्वरके बारेमे जो शब्द काममे लिया है, वही गाधीजी लेते है और वह है 'सत्' या 'हक'। जिसका अर्थ यह है कि सारे जगत्के मूलमे अक महान सत्य -- हकताला-निहित है, और जहासे हमारे तरह तरहके अनुभव और अहवृत्ति -खुदनुमाजी अत्पन्न होते है वह हमारा हृदय ही असे ढूढनेका स्थान है। जिस हकका सबसे बड़ा प्रमाण ससारमे चल रहा नियमपालन -हुक्म--का राज्य है। ससारमे दिखाी देनेवाली सारी भलामी-बुराी नियम हुक्म - से होती है। भलामी भलाीके नियमसे और बुरामी बुराीके .

शिक्षा-संबंधी गांधीजीके विचार नियमसे। भलाीके लिओ भलाीके नियम ढूढने चाहिये और यही औश्वरको जाननेका रास्ता है। असमे से अहिंसा, अपरिग्रह, अस्पृश्यता- निवारण, सेवा आदिसे सम्बन्ध रखनेवाले गाधीजीके सारे व्रत- विचार मिल जाते है। जिनमे वर्धा-योजनाकी दृष्टिसे अक महत्त्वका सिद्धान्त है और वह है 'सर्व-धर्म-समभाव' का। अस योजनामे धार्मिक शिक्षाकी क्या प्रणाली होनी चाहिये? मुझे भय है कि अिस मामलमे हमारे विचार पूरी तरह स्पष्ट नहीं है। अिसमे यह कहा जाता है कि सब धर्म समान है, सब सत्यकी ओर ले जानेवाले है और अिसलिओ सबके प्रति समान आदर रखो। अिम बातको बुद्धि और हृदयसे समझनेमे बडा अन्तर है। दो भाअियोमे झगा हो और यदि असके निपटारेके लिअ वे कचहरीमे जाय, तो न्यायाधीश अपनी न्यायबुद्धिमे जो निर्णय देता है वह अकपक्षी होता है। परन्तु यदि वही झगडा वे अपनी माके पास ले जाय तो वह हृदयसे जो न्याय प्रदान करेगी वह दूसरी तरहका होगा। सिमी तरह हम यदि बुद्धिसे सब धर्मोकी समानताका सिद्धान्त समझने जाय, तो अक ओर वेद या गीता, दूसरी ओर बाअिबल और तीसरी ओर कुरानको रखते है। और सब शास्त्रोको समझने बैठ जाते है तथा प्रत्येकका पृथक्करण करने लग जाते है। अक ओर हम कृष्ण, बुद्ध, जीसा, मुहम्मद आदिकी अक-दूसरेके साथ तुलना करने लग जाते हैं और फिर आश्चर्य प्रगट करते है कि अिन सबको पूरी तरह कैसे समझा जा सकता है; अथवा कोणी बुद्धिशाली मनुष्य कहता है : हा, ठीक है, क्योकि अिनमे से किसीमे भी सार नही है । अथवा समभाव साधनेवाला मनुष्य अक दिन कृष्णका भजन, दूसरे दिन पैगम्बर मुहम्मदका और तीसरे दिन भीसाका गुणगान करेगा और अिस प्रकार प्रत्येकको प्रसन्न रखनेका प्रयत्न करेगा। अिससे भले ही सर्व-धर्म-समानता सधती हो, परन्तु असा करनेसे भक्तिका फल शिक्षाका विकास नही मिलता। सर्व-धर्म-समानताको समझनेका सच्चा मार्ग हृदयका है। प्रत्येक धर्ममे जो सत या ओलिया हो गये है, अनकी तरफ देखे तो अनके जीवनकी बाहरी तफमीलोको न देखते हुझे अनके हृदयकी गहरासीको देखना चाहिये। असा करनेसे मालूम पडेगा कि अन सबका 'हक' और हुक्म (सत्य और नियम) मे समान विश्वास है। सभीके सद्गुणोके विकासमे लगभग समानता है। मानो सब अक ही मा-बापके बेटे है। अकका जन्म हिन्दुस्तानमे हुआ हो, दूसरेका अरबस्तानमे और तीसरेका युरोपमे तथा चौथेका चीनमे हुआ हो, तब भी सब ीश्वरका अकसा अनुभव और वर्णन करते है और हृदयके सद्गुणो और भलामीके बारेमे अक ही प्रकारके नियम बनाते है। मूर्ति, काबा, क्रॉस, स्तूप अथवा लिगकी पूजा की जाय अथवा अक स्त्रीसे विवाह किया जाय या चारमे, ये बाते तो देशकाल --परिस्थिति --- के भेद है। जो सत जिन लोगोमे पैदा हुआ, वहा जिन साधनोका झुमे पता था अनका असने भीश्वर-प्राप्तिक लि अपयोग किया। परन्तु ये तो मानवीय नियम है। श्रीश्वरीय नियम अिनसे अधिक गहरे है और अिनके विपयमे सब धर्म और मव औलियो और साधु-सतोका अक ही मत है। 'सर्व-धर्म-समभाव' को समझनेकी यही कुजी है। अिसलि बालकोको सब धर्मोके शास्त्र पढानेकी अितनी जरूरत नही, जितनी सब देशोके भीश्वरीय पुरुषोके हृदयोकी गहराी प्रगट करनेवाले जीवन-चरित्र पढानेकी है। और सब विद्यार्थी अक दिन हिन्दू पद्धतिसे अपासना करे, दूसरे दिन अिस्लामी पद्धतिसे और तीसरे दिन भीसाी पद्धतिसे प्रार्थना करे, यह भी जरूरी नही है। जो विद्यार्थी जिस धर्ममे पला हो वह असी धर्मके ढग पर प्रार्थना करे। सब धर्मोके चिह्नोका गालामे प्रदर्शन होना चाहिये, अिसे भी मैं आवश्यक नहीं मानता। शिक्षासे सम्बन्ध रखनेवाला गाधीजीका ओक और विचार वर्ण- व्यवस्थाके बारेमे है। वर्णव्यवस्थाका जो अर्थ सनातनी हिन्दू मानते शिक्षा-संबंधी गांधीजीके विचार " है असमे और गाधीजीकी कल्पनामे भेद है। 'सनातनी वर्णव्यवस्था शब्द जाति-व्यवस्था और झूची-नीची श्रेणियोका दूसरा नाम है। गाधीजी वर्णव्यवस्थाका जो अर्थ करते है, वह अलग-अलग धधे करनेवाले लोगोकी सगठित व्यवस्था है। परन्तु दोनो वर्णव्यवस्थाओमे अक अश समान है। पुरानी वर्णव्यवस्थामे भी यह आवश्यक माना जाता था कि प्रत्येक मनुष्य अपने ही वर्णका धधा करे। गाधीजी भी यही ठीक मानते है कि जहा तक हो सके हरओक बालक अपने माता-पिताका ही धधा करे। अिससे बचपनसे ही धधेके मामलेमे अक निश्चित धारणा बन जाती है। हमारी आधुनिक शिक्षामे धधेकी दृष्टिसे वर्ण- व्यवस्था टूट गी है। जिससे मनुष्य बीस-पचीस वर्षका हो जाता है, तब भी यह निर्णय नहीं कर पाता कि वह किस धधे द्वारा अपना जीवन-निर्वाह करेगा। वह अकके बाद अक परीक्षा पास करता जाता है, परन्तु असे यह पता नही होता कि वह किसलिओ जिस प्रकारकी शिक्षा ले रहा है और अपनी परीक्षा पास करने के बाद कौनमे धधेसे अपना निर्वाह करेगा । अद्योग द्वारा शिक्षा देनेकी योजनामे अक विचार यह भी होना चाहिये कि जहा तक हो सके वालकको अपने जीवनके धधेके बारेमे स्थिर बुद्धिवाला बनाया जाय । अन्तमे, शिक्षा-सबधी गाधीजीके कुछ मुख्य विचार सलेपमे कह दू. (१) शिक्षाका ध्येय ‘सा विद्या या विमुक्तये' है । अर्थात् विद्या द्वारा बालकको अपनी मुक्ति प्राप्त करनी चाहिये । मुक्ति शब्दके आध्यात्मिक और भौतिक दोनो अर्थ किये जा सकते है। (२) जब तक उसकी आजीविकाका प्रश्न हल न हो, तब तक यह ध्येय सिद्ध नहीं हो सकता। अर्थात् अिस हेतुसे भी बालककी शिक्षा अक्षरज्ञान द्वारा नहीं परन्तु अद्योग द्वारा होनी चाहिये। + ६० शिक्षाका विकास ) अद्योग और शिक्षा-पद्धतिका निश्चय करनेमे हम दस प्रतिशत लोगोको भी नब्बे प्रतिशत लोगोका खयाल रखना चाहिये। (४) बहुत छोटे बालकोकी शिक्षाका आरभ स्वच्छताकी शिक्षासे होना चाहिये। और अक्षर लिखानेसे पहले चित्रकला (ड्राअिग) सिखाना चाहिये। बालकके हाथमे कलम या पेन रखनेमे देर लगे तो जिसमे बुरामी नही है। परन्तु तब तक असका अज्ञान रहना जरूरी नही है । अनेक प्रश्नोका ज्ञान असे जबानी देना चाहिये। (५) शिक्षाका माध्यम स्वभाषा ही होनी चाहिये। (६) अितिहासमे हमे अधिकतर राजवशोकी अथल- पुथल, लडालिया वगैरा ही पढामी जाती है। मानव-जीवनमे ये चीजे प्लेग या हैजेकी तरह कभी कभी फूट निकलनेवाली बीमारिया है। वे कोी मनुष्योका नित्य जीवन नहीं है। अनका नित्य जीवन तो अहिसात्मक समाज-सगठन द्वारा चलता है और असीके द्वारा मनुष्य-जातिने अपना अब तकका विकास किया है। अितिहास द्वारा अिस विकासक्रमका ज्ञान होना चाहिये। (७) अिसके सिवाय सगीत और कवायद पर गाधीजी बहुत जोर देते है। हरिजन बन्धु, ३०-१०-'३८ 'द्वारा', 'और', 'की' ? अद्योग और शिक्षा' तथा 'अद्योगकी शिक्षा' यह भाषा और अिसका अर्थ हम जानते है। परन्तु अव 'अद्योग द्वारा शिक्षा' यह नी भाषा निकाली गयी है। अिस लेखमे मै अिन तीनोके बीचका भेद बतानेका प्रयत्न करूगा। जहा साधारण लिखने-पढनेके साथ दो तीन भाषाओं, अितिहास, भूगोल, गणित, विज्ञान आदि पढाया जाता है और अिसके सिवाय कारीगरोके धधोकी भी कुछ न कुछ शिक्षा दी जाती है, असे 'अद्योग और शिक्षा' कहते है। यह चीज सबकी परिचित होनेसे अिसका विस्तार करनेकी आवश्यकता नही। जहा भाषाओ, अितिहास, भूगोल आदि कुछ नही पढाया जाता, केवल कारीगरोके या किसी और अकाध धधेकी शिक्षा दी जाती है और अस धधेके लिओ गणित, विज्ञान आदिका जितनी आवश्यकता हो अतना ही ज्ञान दिया जाता है, वह 'अद्योगको शिक्षा' है । जिसमे भाषा, अितिहास, भूगोल आदि विषयोकी शिक्षाकी या तो आवश्यकता ही नहीं मानी जाती अथवा असा नियम होता है कि ये सब जो पढ चुके हो वे ही अिन अद्योगोकी शिक्षा ले। डॉक्टरी, वकालत, अिजीनियरी, हिसाब-किताब, शॉर्टहैण्ड, टाअिप-राअिटिग आदि सब मुशीगिरीके धधोकी शिक्षा अधिकतर अिसी ढगसे होती है। जिसमे जिस अद्योगके साथ जितने विषयोका सबध हो अतनोकी ही शिक्षा दी जाती है। यह अद्योगको शिक्षा है। परन्तु वह अिस धंधे द्वारा ही नहीं दी जाती। फिर भी जीवन-निर्वाहकी दृष्टिसे अद्योग और धंधेके बीच कुछ समानता होनेसे 'अद्योग द्वारा शिक्षा' का जिसमें कुछ अश होता है।

६ २ शिक्षाका विकास - अब अक और अदाहरण ले सॉलीसिटरका पेशा लीजिये। सॉलीसिटर बननेके लिअ अम्मीद- वारको किसी अन्य सॉलीसिटरके मातहत कुछ वर्ष तक काम करना पडता है । असमे सॉलीसिटर अस तरुणको अपने पास बिठाकर शिक्षककी भाति पाठ नही पढाता, और न अिस पेशेकी शिक्षा देनेवाली कोजी शाला ही होती है । वह तो केवल अम्मीदवारको दूसरे कारकुनोके साथ अपने दफ्तरके काममे लगा देता है। धीरे धीरे अम्मीदवार अस कामको समझने लगता है। जो कानून असे मीखना है, वह असे स्वय ही पढ लेना होता है । अिस प्रकार काम करते-करते वह दो तीन वर्षमे सॉलीसिटरके धधेके सब रगढग जान लेता है । जिस धधेके लिओ लगभग बी० ओ० के बराबर साधारण शिक्षा आवश्यक मानी जाती है। अिसलिओ सॉलीसिटर असोको ही अम्मीदवारके रूपमे ले सकता है। पहले ही दिनसे अम्मीदवारसे जो काम कराये जाते है, अनमे शायद ही कोसी जैसा काम होता है, जो केवल असे सिखानेके लिओ ही शुरू किया गया हो। दफ्तरके किसी आवश्यक काममे ही असे लगाया जाता है। वह भूल करे तो भले ही असका काम रद्द कर दिया जाय, परन्तु असके लिजे असा काम नही ढूढा जाता जो दफ्तरके लिओ आवश्यक न हो, और केवल असे सिखानेके लिओ ही किया जाय । वह फुरसतके समय पुरानी फाअिले ढूढ ढूढ कर देखता अवश्य है, परन्तु यह तो असकी सीखनेकी तीव्र अिच्छाकी ही निशानी है। अिसमे (मोटे अर्थमे) अद्योगको शिक्षा है । और वह अद्योग द्वारा शिक्षा भी है। परन्तु असमे साधारण शिक्षा नहीं है । अिसी तरह वह शिक्षाकी आधारस्वरूप भी नही है। जिसकी साधारण शिक्षा हो चुकी हो वही अिसका विद्यार्थी हो सकता है। अिस प्रकारकी अद्योग द्वारा शिक्षा बहुत पुराने समयसे तरह तरहके धधोमे दी जाती रही है। जब आजकी तरह सार्वजनिक शालाओ 'द्वारा', 'और', 'की' ? नहीं थी, तब बनियोके लडके हिसाब और बहीखाता किस तरह सीखते थे? कायस्थोके लडके चिट्ठीपत्री और दस्तावेज लिखनेका ज्ञान किस प्रकार प्राप्त करते थे? गावके पडितजीके पास आठ या नौ वर्षकी अम्र तक कुछ न कुछ लिखना-पढना और गणित सीख लेनेके बाद किसी सराफकी दुकान पर या बड़े कायस्थके पास बैठकर असके काममे सहायता करते-करते वे यह ज्ञान प्राप्त कर लेते थे। मुझे स्वय बहीखातेकी शिक्षा शालामे बहुत कम मिली है। व्यापारी जिस चतुर्थाश या पानी पद्धतिसे (जैसे ५०=|| x ३८१ रु०) हिसाब करते है, वह बम्बीकी जिस शालामे मै पढता था असमे नही सिखाजी जाती थी। बहीखाता भी नहीं सिखाया जाता था। ये चीजे मैने बचपनमे अपने पिता और भाअियोकी दुकान पर फुरसतके समय अनके काममे मदद करते-करते सीखी थी। अिसके लिओ मुझे कोजी खास हिसाब नहीं लिखवाये जाते थे; पैसेके लेनदेनमे तथा बहीखाता देखते और लिखते-लिखते असके नियम समझमे आ गये थे। जहा नही समझमे आता या भूल हो जाती वहा पिताजी बता देते थे। अिसकी पाठ्यपुस्तके तो जब ये विषय सिखानेका भार मुझ पर राष्ट्रीय पाठशालामे आया तब देखी। आज भी खेतीका जो ज्ञान परपरासे हमारे लोगोमे है, असे करोडो किसान बालक किस तरह सीखते है ? गावका जुलाहा, वढी, लुहार, कुम्हार, मोची, तेली आदि अपने-अपने धधेका ज्ञान किस प्रकार प्राप्त करते है? यह सच है कि हमारी जनता बहुत अज्ञान है और पीछे रह गी है। फिर भी यह तो हरगिज नहीं कहा जायगा कि वह बिलकुल बिलकुल मूर्ख है मूर्ख है अथवा निरी जगली दशामे है, न असमे खेतीका ज्ञान है, न किसी कलाका। अल्टे अितिहाससे तो यह मालूम होता है कि सार्वजनिक पाठशालाओ द्वारा देगके अिन सब अद्योगोको सिखानेकी सगठित व्यवस्था न होने पर भी अिन कलाओमे ६४ शिक्षाका विकास लोग आजकी अपेक्षा बहुत आगे बढे हुओ थे। अब तो वे अपनी कलाओ अल्टे भूलने लगे है। बात यह है कि शालाओ न होने पर भी जीवनरूपी पाठशाला तो हमारे देशमे सदा बनी ही रही है, और वह शाला असगठित रूपमे प्रत्येक धन्धेदारके घरमे ही चलती है। छोटे बच्चे बडोकी नहायता करते है और सहायता करते-करते धधा सीख लेते है। कभी-कभी वे अम्मीदवार भी रखते है। कभी अन धधोवालोकी पचायतो या मरोकी तरफसे भी अपने धधेकी शिक्षा देनेका कुछ प्रबन्ध होता है। ये सब अद्योग द्वारा शिक्षाके दृष्टान्त है। जैसे और भी की दिये जा सकते है। सामान्यत शालामे न गी हुी लडकिया जिस तरह खाना बनाना, शृगार करना, सीना, लीपना वगैरा घरके काम सीखती है, जिस प्रकार बालक स्वभाषा सीखते है, अथवा घरमे बोले जानेवाले नित्यपाठके स्तोत्र आदि सीखते है, वे शास्त्रीय पद्धतिसे विकसित न होने पर भी अद्योग (अथवा काम) द्वारा शिक्षाके दृष्टान्त है। परन्तु अिन सबमे दोष यह है कि अनमे केवल अन-अन अद्योगोकी ही शिक्षा मिलती है। बालकको सब तरहकी शिक्षा नहीं मिलती। जिसे हम विद्या-सस्कारकी शिक्षा कहते है, वह असमे नहीं मिलती है। मेरा आशय यह कहनेका नही कि विद्या-सस्कार या लिखने- पढनेकी शिक्षाके लिओ हमारे देशमे कोजी प्रबध ही नहीं था। परन्तु असे देनेवाला अक स्वतंत्र वर्ग था। वह पुराणिक, व्यास, कथाकार, अपदेशक और साधु आदिका था। कथाओ और अपदेशो द्वारा साहित्य, अितिहास, भूगोल, विज्ञान, धर्म, नीति, सदाचार, तत्त्वज्ञान आदिका जो कुछ ज्ञान अस जमानेके पडितोको प्राप्त था, असे वे लोगोंमे फैलाते थे। अिससे पढाी न होने पर भी लोगोमे साधारण ज्ञानका प्रचार होता था। बेशक, अिन पडितो, साधुओं, मुल्लाओ और फकीरोंका अपना ही ज्ञान प्राचीन ग्रंथोंमे 'द्वारा', 'और', 'की' ? ६५ मर्यादित था और वे स्वय भी वर्तमान युगके ज्ञानसे अपरिचित थे। अिसलिओ प्राचीन साहित्य, धर्म, नीति, सदाचार, तत्त्वज्ञान आदि विषयोमे अनके ज्ञानका कुछ महत्त्व था; परन्तु अितिहास, भूगोल और विज्ञानकी विविध शाखाओमे वह अधिकतर बेकार होने लगा था। अिस प्रकार अद्योगका और साधारण शिक्षाका, भले वह अशास्त्रीय ही हो, स्वतत्र रूपमे प्रबन्ध था। अद्योगको शिक्षाके लिओ पिछली कमसे कम पाच-सात शताब्दियोमे तो शायद ही सार्वजनिक सस्थाले रही होगी। वह अद्योगके जरिये ही दी जाती थी। साधारण शिक्षाके लिओ अपरोक्त पडित और पडितोकी शालाओं तथा कथा-कीर्तनकी सस्थाले थी। शालाओमे केवल ब्राह्मण-बनिये आदि झूची मानी जानेवाली जातियोके लड़के ही पढते थे। अनमे से भी कुछ बिलकुल नही पढते थे। परन्तु कथा-कीर्तनका लाभ सभी लोग झुठाते थे; अथवा अलग- अलग जातियोमे अनके स्वतत्र भक्त पैदा होते थे। अब हम अिस योजना और वर्धा-योजनाके बीचका फर्क देखे । अद्योग द्वारा शिक्षाका पुराना ढग व्यक्तिगत और खानगी पद्धतिका है। वह या तो पिता-पुत्र-पद्धति होती है अथवा अम्मीदवार- पद्धति होती है। जहा अम्मीदवार-पद्धति है, वहा कभी-कभी कानूनके बधन भी होते है । जिस हद तक वह व्यवस्थित (organised) होती है। परन्तु बडे पैमाने पर देशके सब बालकोके लिले सार्वजनिक शालाओके रूपमे असी कोी व्यवस्था नही है। वर्धा-योजनाका हेतु जीवनकी अिस स्वाभाविक पद्धतिको बडे पैमाने पर, सार्वजनिक शालाओके रूपमे, सभी बालकोके लिओ लागू करना है। जिसका अर्थ यह है कि जैसे किसान खेती, बढी बढीगिरी, लुहार लुहारी, बनिया दुकानदारी, गृहिणी घर-काम आदि धधोकी शिक्षा अपना धंधा करते-करते अपने बच्चोंको देते है, असी प्रकार परन्तु शास्त्रीय पद्धतिसे हमारी सारी आवश्यक शिक्षा देशके समस्त बालकोको सार्वजनिक शालाओ द्वारा देनेका प्रबंध सरकारी तत्रके शि-५ शिक्षाका विकास + जरिये किया जाय। अिसका दूसरा अर्थ यह है कि सरकार दो-चार असे अत्पादक धधे शुरू करे (१) जो बडे पैमाने पर सीधे सरकारकी तरफसे चलाये जा सके, (२) जो बालकोके लायक हो, (३) जिनमे अितनी सामग्री भरनेकी गुजाअिश हो कि वे अद्योग कराते- कराते अनके द्वारा साहित्य, अितिहास, भूगोल, विज्ञान आदिकी पर्याप्त जानकारी बालकोको दी जा सके, और (४) जो केवल बालकोके मनोरजन, खेलकूद या शिक्षाके लिओ ही नियोजित कृत्रिम अद्योग न हो, परन्तु लाखो लोगोके जीवन-निर्वाहके भी साधन माने जा सकनेवाले सच्चे अद्योग हो। अिससे अनमे राज्य-व्यवस्था, समाज-व्यवस्था, सपत्ति- व्यवस्था आदि सारी समाज-विद्याओका भी व्यावहारिक ज्ञान देनेकी कुदरती सुविधा मिल जायगी। अिनमे पहली दो शर्ते सबसे महत्त्वकी है। पहली यह कि सरकारकी सीधी देखरेखमे बडे पैमाने पर चलाये जा सकनेवाले कुछ अत्पादक धधे ढूढ लिये जाय। अर्थशास्त्रकी भाषामे कहे तो वे अिस देशके जीवन-अद्योग (kcy-industries) होने चाहिये। दूसरी शर्त यह है कि वे धन्धे बालकोके लायक होने चाहिये। कितने ही धधे जैसे है जो देशके लिओ जीवनरूप है, परन्तु बालकोके लायक नही है। दूसरी ओर, कुछ धधे जैसे है जो बच्चोके लायक तो है, परन्तु देशके जीवन-धधे नही है। अिन पिछले धधोकी अद्योग द्वारा शिक्षाकी शालाये हो सकती है, शर्त यह है कि अन्हे खानगी सस्थाले सरकारकी देखरेखमे चलाये। बेशक, अिनकी संख्या बहुत थोडी होगी। परन्तु अद्योग द्वारा शिक्षाके सिद्धान्तकी दृष्टिसे अिनके लिओ गुजाअिश है। परन्तु सरकारकी दृष्टिसे प्रश्न यह है कि बालकोके लायक राष्ट्रके जीवन-अद्योग क्या है ? स्पष्ट है कि अिनमे पहले नम्बर पर कताी-बुनामी ही आती है। सपत्ति- शास्त्रियोके सभी सम्प्रदाय कपडेके धधेको हमारे देशका जीवन-अद्योग स्वीकार करते है, और असे सरकार-नियत्रित (राष्ट्रीय-Nationalized) 'द्वारा', 'और', 'की' ? ६७ बनानेमे भी विश्वास रखते है। बड़े और बालक, दोनोंके लिओ वह पूरा धधा हो सकता है। हाथ-कताभी और हाथ-बुनाीके रूपमे अिसमे बडो और बालकोके बीच स्पर्धाका कोी प्रश्न पैदा नही होता। साथ ही, कपास अक जैसी चीज है, जिसने अितिहासमे पहले दर्जेका भाग लिया है। असके आसपास खेती, बढीगिरी, लुहारी, रगामी, धुलामी, छपाश्री आदि स्वतत्र धधोके अनेक भागोकी योजना की जा सकती है। अिस प्रकार, अद्योग द्वारा शिक्षाका अर्थ यह है कि सरकार देशके हितके कुछ धधे अिस ढगसे चलाये कि अनसे देशके लिअ माल भी पैदा हो और बाल-शिक्षाकी व्यवस्था भी हो जाय । बहुत बडे पैमाने पर प्रबध किया जा सके, जैसा दूसरा कोजी धधा अभी तक ध्यानमे नही आता। खेती, गोपालन आदि देशके जीवन- अद्योग तो है। परतु अनमे बालकोका झुपयोग करना असभव नही तो भी कठिन अवश्य है। अिनमे बडे-छोटोकी बराबरी भी नही हो सकती। अिसलिओ यद्यपि जैसी कुछ शालाले सरकार चला तो सकती है, परतु अनकी संख्या थोडी ही रहेगी। अद्योग द्वारा शिक्षाके लिओ अलग अलग धधोकी खोजमे बहुतसे शिक्षाशास्त्री लगे हु. है। यदि हम समझ ले कि वही धधे शालाओके लिओ अच्छा काम दे सकते है, जिन्हे सरकार-नियत्रित बनाना सभव हो तो खोज आसान होगी। जो असे नही बनाये जा सकते, अनमे स्पर्धाके कारण बालकोकी बेगार, महगामी और महगाीके कारण नुकसान वगैराकी की अलझने पैदा होगी। जिन धधोको सरकारी बनाया जा सकता हो, अनमे मालकी कीमत ठहराना सरकारके हाथमे रहेगा। जो धंधे सबके लिओ खुले हो, अनमें न्याय और स्पर्धाके प्रश्नोको हल करना कठिन है। अद्योग द्वारा शिक्षाकी पुरानी पद्धतिमे और अिस नी योजनामे जो दूसरा भेद है, वह अपरोक्त बातोसे ध्यानमे आ सकता है। वह ६ शिक्षाका विकास यह है कि हानिका धधा न तो किया जा सकता है और न बालकोसे कराया जा सकता है। यह तत्त्व दोनो पद्धतियोमे समान है। परंतु पुरानी पद्धतिमे धधेका अद्देश्य लाभ झुठाने (profit-making) का होता है, जब कि वर्धा-योजनामे लाभ झुठानेका हेतु नही हो सकता। यह हेतु छोड कर धधा करनेका अर्थ ही तो धंधेको सरकारी बनाना है। दोनो पद्धतियोमे अक और भी भेद है। पुरानी पद्धतिमे गुरु और शिष्य दोनोका यह अद्देश्य होता है कि अम्मीदवारको अिस ढगसे तैयार किया जाय (बल्कि वह तैयार हो जाय) कि अस धधेसे वह अपनी जीविका चला सके। और केवल अितना ही असका अद्देश्य होता है। नी योजनामे असा अद्देश्य और अितना ही अद्देश्य नहीं होता कि विद्यार्थी असे सिखाये जानेवाले धधेसे ही अपनी जीविका चलाये । असमे कातने-बुनने पर अिस हेतुसे जोर नही दिया जाता कि हिन्दुस्तानको कातने-बुननेवाले लोगोका 'राष्ट्र बना दिया जाय। परतु असका अद्देश्य यह है कि असके द्वारा बालकोके शरीर, अिन्द्रियो, मन और बुद्धिको पूरी तालीम मिले और लंडका या लडकी मनचाहा धंधा सीखनेके योग्य बने। परतु साथ ही विद्यार्थीको यह आश्वासन भी दिया जाता है कि यदि वह किसी और धंधेमे सफल न हो सके तो भी कमसे कम कातने-बुननेका धंधा करके तो अपना गुजर चला ही सकेगा। अिसके अलावा यह बात भी है कि किसी अपढकी अपेक्षा ही नही परंतु केवल आजकलकी पाठशालाओमें पढे हुओं विद्यार्थीकी अपेक्षा भी वह किसी कामको ज्यादा अच्छी तरह कर सकेगा, और जिससे दोनो अपरिचित हो असे सीख लेनेमे यह अधिक होशियार साबित होगा। यदि यह परिणाम न निकले तो समझना चाहिये कि शिक्षामे कही न कहीं दोष है। अिस प्रकार, यह केवल साधारण शिक्षा + अद्योगकी शिक्षा ही नही है और न (अद्योगके मारफत या स्वतत्र रूपमें) केवल अद्योगकी शिक्षा है, परंतु अद्योग द्वारा पूरी शिक्षा देनेकी कल्पना है। जैसा हो , 'द्वारा', 'और', 'की'? सकता है कि अविवेकसे हम अिस कल्पनाको बिगाड दे या हास्यास्पद दिखाी देनेवाला स्वरूप दे दे। वह अनुभवहीनता अथवा नासमझीका परिणाम होगा। परतु अिससे डरनेकी जरूरत नही। अनुभव असे सुधार देगा। मूल वस्तु यह है कि जीवनमे चल रही कुदरती पद्धतिको शास्त्रीय रूप देनेका यह प्रयत्न है और अिस रूपमे यह योजना पहली ही बार शिक्षाशास्त्रियोके सामने रखी गी है। यह भी याद रखना चाहिये कि अद्योगके सिवाय जिस कुदरत और समाजके बीच बालक रहता है, असे भी शिक्षाका साधन बनाने पर जिसमें जोर दिया गया है। चरखा-सघने हाथ-कताी और हाथ-बुनाीके धधेको देशमे फैलाया है। अिसमे चरखा-सघका हेतु किसी कपनीकी तरह अिस अद्योगसे नफाखोरी करना नही है, परतु देशमे धन पैदा करनेके साथ असे पैदा करनेवालोकी स्थिति सुधारना है। अिसलिओ चरखा-संघको कातने-बुननेवालोका शोषण करनेकी नीति स्वीकार नही है। जो चीज चरखा-सघ बडी अम्रके लोगोमे कर रहा है वही तालीमी संघको देशके बालकोमे करनी है। बालक छोटे जरूर है, परतु अिसलिओ यह जरूरी नहीं कि वे घरमे या शालामे बेकमा और बेअपजादू (unproductive) बन कर बैठे रहे। देशका धन बढानेमे वे भी हाथ बटा सकते है। परतु अिस काममे अन्हे लगानेमे हमारी दृष्टि स्पष्ट होनी चाहिये। वह यह कि जिस काममे अन्हे लगाया जाय असमे अन्हे लाभ होना चाहिये। अिसलिओ यह काम धधा चलाने- वाली, सस्थाओका नही है। अिसे स्वय सरकारको या तालीमी संघ और विद्यापीठ जैसी सस्थाओको करना चाहिये। भूमि', अक्तूबर १९३८ . - ६ अद्योग द्वारा शिक्षा [गूजरात विद्यापीठके शिक्षक-प्रशिक्षण वर्गके सामने दिये हुओ सशोधित भाषण।] गाधीजीने अद्योग द्वारा शिक्षाका अक नया विचार देशके सामने रखा है। असे पेश करते समय अन्होने कहा था कि यह मेरी आखिरी विरासत है और मुझे लगता है कि अिससे अधिक महत्त्वकी भेट मै देशको नही दे सकता। स्पष्ट है कि जैसी प्रस्तावनाके साथ पेश की गी योजनाका हमे भी गभीरतासे अध्ययन करना चाहिये । हम देखे कि अनके विचारोमे नया क्या है। हम दो प्रकारकी शिक्षासे परिचित है। पुस्तकोकी शिक्षा और अद्योगकी शिक्षा। हम कहते है कि बढी, लुहार, कुम्हार, रंगरेज, अिजीनियर वगैराके काम सीखनेवाले अद्योगकी शिक्षा ले रहे है। आप सब औद्योगिक शिक्षाके शिक्षक नहीं है। आपके विद्यार्थीसे कोसी पूछे कि तुम क्या जानते हो, अथवा आपसे पूछे कि आप क्या पढाते अत्तर मिलेगा कि दूसरी, चौथी या छठी किताब, फला भूगोल, अमुक अितिहास, गणितका अमुक भाग आदि । अर्थात् कुछ पुस्तकीय विद्याओं वे जानते है और आप अन्हे पढाते है। कुछ जगह्मे पर पुस्तको और अद्योग दोनोकी शिक्षा दी जाती है । असी शालाका विद्यार्थी (अदाहरणके लिओ) कहेगा कि मै पाचवी किताब पढता हू और अिसके सिवाय बढीका काम सीखता है। यह नही कहा जा सकता कि असकी पुस्तक-शिक्षाके विषयो और झुद्योगके विषयोके बीच कही संबध आता ही होगा। अदाहरणार्थ, यह हो सकता है कि असे गणितमे अितनी शक्करमे अितनी रेत अथवा जितनी है, तो ७० अद्योग द्वारा शिक्षा गैलन शराबमे अितना गैलन पानी मिलानेसे मिश्रणका या नफे-नुकसानका क्या अनुपात आयेगा यह जाच करनी हो। भूगोलमे वह अमरीका महा- द्वीपके विषयमे सीखता हो और अितिहासमे बाबरके विषयमे पढ रहा हो; और विज्ञानमे आवाज या बिजलीका विषय सीखता हो। अिन सबका बढीके कामसे कोमी सबध नही हो सकता। f स प्रकार पुस्तकोके विषयको पुस्तकशालामे और अद्योगके विषयको अद्योगशालामे अलग करके रखा जाता है। पुस्तकशालाका शिक्षक अद्योगशालाके शिक्षकके और अद्योग-शिक्षक पुस्तक-शिक्षकके विषय नही समझ सकता। यह ढग अशास्त्रीय है, यह ममनानेकी शायद ही जरूरत होनी चाहिये। बालक जो जो विषय सीखे अनका परस्पर काफी सवध होना चाहिये। जो अनेक वस्तुओं वह सीखता हो, अनमे से महत्त्वकी वस्तुओके आसपास दूसरे विषय गुथे होने चाहिये। अक विषयमे से दूसरा विषय जुडकर निकलना चाहिये। क्या यह सभव है ? यह सभव है और जैसा ही होना चाहिये, यही बतानेका वर्धा-योजनाका प्रयत्न है। अद्योग द्वारा शिक्षा असका मुख्य बिन्दु है। मुख्य बिन्दु कहा है, अिसलिओ यह समझ लेना चाहिये कि असमे कुछ अपबिन्दु भी है। जाकिरहुसेन कमेटीने तीन बिन्दुओ पर जोर दिया है। अद्योग, समाज और कुदरत । प्रत्येक मनुष्य त्रिविध वातावरणसे घिरा रहता है। अपनी जलवायुके वातावरणसे, अपने सामाजिक वातावरणसे और अपने औद्योगिक वातावरणसे। जलवायु और समाज मिलकर असके अद्योग पर असर डालते है। परतु अक बार असके स्थिर हो जानेके बाद असके जीवनका अधिकतर भाग असके औद्योगिक वातावरणसे घिरा रहता है। वही असके जीवनका सबसे बडा आधार बनता है। जिस प्रकार व्यवहारमे अद्योग मनुष्यके बाह्य जीवनका मुख्य बिन्दु है और समाज तथा कुदरत दूसरे दो अपबिन्दु है, यह वर्धा- योजनामे कहा गया है। अिस मुख्य बिन्दुकी तरफ ध्यान खीचकर, ७२ शिक्षाका विकास असके आसपास शिक्षाको गूथना चाहिये, जैसा पहली बार गाधीजीने बताया है। परतु अद्योग तो अनेक है। अनमे से शिक्षाके लिओ कौनसा चुना जाय? और शिक्षा भी किसकी? बडी आयुके स्त्री-पुरुषोकी नही, परतु सातसे चौदह वर्षके छोटे बालकोकी। अदाहरणार्थ, जिसमे मोटर बनाने या छत पर डालनेके टीन बनानेका अद्योग नहीं सोचा जा सकता। साथ ही जिसमे थोडेसे शहरी बालकोका ही विचार नही करना है, परतु दूर दूरके गावोमे बसनेवाले करोडो गरीब और पिछडे हुधे बालकोका विचार करना है। अिस प्रकार हमे असे अद्योगोका विचार करना है, जो करोडो बालकके लिओ सोचे जा सके और जिनके आसपास अनकी सारी शिक्षा गूथी जा सके। जैसे अद्योगोमे पहले नम्बर पर और अधिकसे अधिक व्यापक खादीका अद्योग ही नजर आता है। यह सच है कि खेती हमारे देशका पहले नबरका और सबसे अधिक व्यापक व्यवसाय है, परतु यह व्यवसाय बालकोका नही है। जिसमे बहुतसे बड़ोके साथ थोड़ेसे बालक सहायकके तौर पर काम कर सकते है, परतु अनकी बराबरी नहीं कर सकते। बारह वर्षकी अम्रसे कमके बालक अिसमे महत्त्वपूर्ण भाग नहीं ले सकते। अिसे बारहो महीने चलानेके लिओ जो प्राकृतिक अनुकूलताओं और जमीनका साधन चाहिये, वे सब जगह नहीं मिल सकते। अिस प्रकार महत्त्वका व्यवसाय होने पर भी शिक्षाके माध्यमके रूपमे असका झुपयोग मर्यादित क्षेत्रमे ही हो सकता है। दूसरे व्यवसाय अितने व्यापक भी नहीं है और अनमे भी बालकोकी अम्र तो बाधक होती ही है। अिसलिओ खादीका अद्योग ही अधिकसे अधिक व्यापक और अनुकूल मालूम हुआ है। परतु अिसके साथ अद्योग द्वारा शिक्षाके माध्यमके रूपमे भी खादी-अद्योगमे आश्चर्यजनक सुविधाओं है । अत्यन्त प्राचीन कालसे लेकर आज तक कपासने हमारे देशका अितिहास निर्माण करनेसे बड़ा भाग । अधोग द्वारा शिक्षा ७३ अदा किया है। जैसा मालूम होता है कि कपासकी खेती और असे कातने, बुननेकी खोज हमारे ही देशने पहले की होगी।। 'पेड पर अगने- वाली शून' और असके महीन और मुलायम कपडे देखकर विदेशी आश्चर्यचकित हो गये और अससे भारतका कपडेका आन्तर-राष्ट्रीय व्यापार जमा। असने विदेशियोको भारतकी ओर आकर्षित किया और असके कारण जो अनेक राजनैतिक परिवर्तन हुअ अनका परिणाम आजका हमारा भारत है। अिस प्रकार खादीके साथ हमारे देशका अितिहास गुथा हुआ है। अिसी प्रकार भारतके बाद जिन जिन देशोने कपासकी खेती या कपासके कपडेके अद्योगका विकास किया, अन देशोका विचार करे तो लगभग सारे जगत्के अितिहास, भूगोल, अर्थशास्त्र, समाज-रचना तथा राजनीतिके अनेक प्रश्नोमे हमे जाना पडेगा। कपासने मानव-जीवनमे अितना अधिक महत्त्वका भाग अदा किया है। कपासकी खेतीसे लेकर विविध रगोसे छपी हुी खादी तकका सारा ज्ञान देने लगे तो असमे विज्ञान और गणितके कितने विषयोंका अध्ययन करना पडेगा, यह विचार करना कठिन नही। यत्रशास्त्र, पदार्थविज्ञान, रसायनशास्त्र, कृषिविद्या, वनस्पति-विद्या, जतु- शास्त्र, अकगणित, भूमिति आदिके विविध प्रकरण अिसमे से अनिवार्य रूपमे पैदा होगे। खादी द्वारा यह शिक्षा किस हद तक दी जा सकती है, यह परेशानी होनेके बजाय किस हद तक शिक्षा देकर संतोष माना जाय, यही परेशानी हो सकती है। अिसके सिवाय अिसकी आध्यात्मिक संभावना भी कम नहीं है। जिसमे अहिसाप्रधान सस्कृतिकी बुनियाद है। जोर-जबरदस्ती नही, परंतु परिश्रम ही अिसका मूल मत्र है। कबीर जैसे जुलाहेने अिसमे से केवल खादीके थान नहीं निकाले, परतु धर्म और तत्त्वज्ञानके सिद्धात भी बुनकर बताये है। हमारी भाषाकी कितनी ही कहावतो और रूढ प्रयोगो तथा हमारे जीवनकी कितनी ही रूढ़ियोके आसपास चरखा, पीजन, करघा, रगामी-काम वगैरा गुथे हुओं है।

७४ शिक्षाका विकास हू मै यहा केवल दिग्दर्शन ही करा रहा हू। व्यवहारमे यह कैसे आयेगा, अिसका आधार शिक्षको पर है। यह अभी तक व्यवहारमे सागोपाग व्यवस्थित करके दिखाया नही गया है। अिसीलिओ मै मानता कि अिसका प्रारभ करनेके लिअ शिक्षा-विभागके अनुभवी, अत्साही और भावनावाले शिक्षक पहले चुने गये है। अिसलि अिस शिक्षाकी सफलताका बहुत कुछ आधार आप लोगो पर है। आपको अपनी कल्पना- शक्तिका पूरी तरह झुपयोग करके अद्योग और अलग अलग विषयोका भरसक कुदरती मेल साधना है। साथ ही दूसरे दो अपबिन्दुओको भी भूलना नही है। अिन दो अपबिन्दुओ पर मै बोल नही रहा हू, क्योकि ये नवीन नही है। अिसका अर्थ यह नही कि झुन्हे मै भुलाना चाहता हूँ। अिसके लिओ आपको स्वय अद्योगमे पूरी प्रवीणता प्राप्त करनी होगी। केवल पुस्तक-शिक्षकोसे यह काम नही होगा। यह असभव नही कि कोसी बालक आपसे भी अद्योगमे बढ जाय, क्योकि आप देरसे प्रारभ कर रहे है। परतु आप अद्योगमे काफी कुशलता प्राप्त नही करेगे तो काम नहीं चलेगा। तकली पर आपको दाये बाये दोनो हाथोकी पूरी गति प्राप्त कर लेनी चाहिये। अिसी तरह रूजी पीजने और चरखा चलानेमे। अिन सबके लिओ जिसे अरुचि होगी वह यह प्रयोग सफल नही कर सकता। मैं मानता हू कि आप तो अत्साह और श्रद्धासे आये है, अिसलिमे आपको अिस बारेमे बहुत कहनेकी जरूरत नही। हरिजनबधु, २६-३-३९ ७ . जीवन-निर्वाहको शिक्षा हम सब जानते है कि हमारा देश शिक्षामे बहुत ही पिछडा हुआ है। अिसलिओ कितने ही वर्षासे हम यह माग कर रहे है कि शिक्षाका प्रसार करो, शिक्षाका प्रसार करो। काग्रेस सरकार बननेके बाद स्वा- भाविक रूपमे हम अिसके लिओ अधिक अधीर हो गये है। परन्तु दूसरी ओर जो लोग शिक्षा पाये हुओ है, अनमे से बहुतोकी स्थितिकी जाच करे तो हमे निराशा अत्पन्न होती है। शिक्षा पढाती अधिक है या भुलाती अधिक है, यह अंक प्रश्न ही है। हम जानते है कि जो पढते है वे बापदादोका धधा भूल ही जाते है, और असके बदलेमे बहुत ही थोडे लोग कोजी नया धधा सीखते है। किसानका पढा-लिखा लडका खेतीके बारेमे कुछ नही समझ सकता। कुम्हारका अपढ लडका मिट्टीके घडे अतार सकता है, परन्तु असके पढे-लिखे लडकेको मिट्टी गूदना भी नहीं आता। दरजीका शिक्षित लडका न सी सकता है, न नाप ले सकता है। पढनेके बाद अिन सबकी दृष्टि कोजी क्लर्कीकी नौकरी प्राप्त करने पर ही जाती है। हमारी भाषा (गुजराती) मे कारकुन और शिक्षक दोनो 'महेता' (मुशी) कहलाते है, क्योकि दोनोका कागज-कलमके साथ सम्बन्ध रहता है। बहुतसे अपढ़ माता-पिता यह परिणाम समझते है, अिसीलिओ झुन्हे अपने बालकोको पढानेका अत्साह नही रहता। हमारे देशमे शिक्षाका परिणाम अल्टा यह आया है कि की प्रकारका परम्परासे चला आया ज्ञान भी खतम होता जा रहा है। बुढियाका घरेलू वैद्यक बुढियाके साथ मर जाता है, क्योकि असकी पढी-लिखी लडकी असमे रस नही लेती। अिसी प्रकार कितने ही प्रकारके कला और कारीगरीके काम किस प्रकार होते थे, यह जाननेवाले अब नहीं रहे। ७५ ७६ शिक्षाका विकास परन्तु शिक्षितोकी दशा कुछ सतोषजनक हो तो हम कहेगे कि भले यह पुराना ज्ञान गया तो गया। परन्तु जैसी बात भी नही। लडका चार किताब पढ लेता है और प्रश्न खडा हो जाता है कि अब क्या किया जाय ? चार वर्षमे पिताके धधेसे अरुचि हो जाय, अितना ही वह पढता है । अब कोअी मार्ग सूझता नहीं, अिसलिमे आगे पढनेका निश्चय होता है। अिस प्रकार वह मैट्रिक तक चला जाता है और फिर वहीका वही प्रश्न पैदा होता है। लेकिन फिर भी कुछ नहीं सूझता। और आशा तो अमर है । अिसलिओ वह कॉलेजमे जाता है। अिस प्रकार जीवनके बीस-बाजीस वर्ष बिना किसी ध्येयके चले जाते है। जीवनके बीस अमूल्य वर्ष अनिश्चितताका सस्कार मजबूत करनेमे ही बीते, तो सारे जीवन पर असका कैसा परिणाम होगा? अिसके सिवाय हमारी शिक्षा अंक और दृष्टिसे भी पगु सिद्ध हुी है। हमने जो कुछ पढ़ा है, वह अपने अपढ़ माता-पिता, भाजी-बहन या पत्नीको हम नही दे सकते। बालक पाठशालामे जो कुछ सीखता है असकी बात वह घर जाकर नहीं कर सकता। अल्टे, यदि असकी मा पूछे कि 'क्यो बेटा, तू क्या पढ़ता है, मुझे समझा तो', तो बालक कहेगा, वह कठिन है, तेरी समझमे नही आयेगा।' शालामे हम गरमीका विज्ञान जानते और प्रयोगशालामे असका प्रयोग करते है, परन्तु घर पर असका कोी अपयोग नहीं कर सकते। ज्ञान सक्रामक होना चाहिये। अिसके बजाय वह प्राप्त करनेवालेमे ही कैद, रहता है। अिसका परिणाम यहा तक होता है कि आजकलका ग्रेज्युअट बीस वर्ष पहलेके ग्रेज्युअॅटको भी अपढ़-जैसा ही समझता है। शिक्षाकी यह स्थिति है। अब अशिक्षितोको देखे तो अपढ़ बालक सात-आठ वर्षकी अम्रसे ही अपने माता-पिताकी कुछ न कुछ सहायता करने लगता है। पाच-छ वर्षका होने पर ही जब मा काम पर जाती है, तब वह छोटे भाजी-बहनोको सभालता है। जरा बड़ा होते ही ढोरोंको सभालने लगता है और घरके छोटे-छोटे काम कर डालता 4 जीवन-निर्वाहको शिक्षा है। बारह वर्षका होने पर बापके साथ काम करने जाता है, और सोलहवे वर्षमे तो घरका भार झुठाने लायक माना जाता है । अिस तरह पाच-छ. वर्षमे ही वह कुटुम्बका बोझा हल्का करनेमे सहायक होता है। भले ही प्रत्यक्ष मजदूरीके रूपमे असके हाथमे कुछ भी न रखा जाता हो, परन्तु असके कामका आर्थिक मूल्य तो है। हमारा देश अितना गरीब है कि कुटुम्ब यह लाभ छोड नहीं सकता। माता-पिता कोसी अपने बालकोके शत्रु नही। साथ ही अपढ़ होने पर भी वे बिलकुल मूढ़ है, यह समझनेका भी कारण नही है; परन्तु आर्थिक परिस्थितिसे विवश हो जानेके कारण ही वे बालकोंको आसानीसे शालामे नही भेज सकते। फिर भी, हम अनिवार्य शिक्षाका विचार करते है, क्योकि देशको शिक्षा दिये बिना भी काम नही चल सकता। वर्तमान शिक्षाके बारेमे असतोष हो तो असे सुधारे, नी शिक्षाके विषयमे सोचें, परन्तु शिक्षाहीन स्थिति कायम नहीं रखी जा सकती। । अब अनिवार्य शिक्षाके अर्थका विचार करे। अिसका अर्थ यह है कि लगभग चौदह वर्षका हो तब तक बालक कमसे कम छ. घटे रोज सरकारके अधिकारमे रहे। माता-पिताको असे सरकारको सौपना ही पडेगा। जिस प्रकार जो सरकार लोगो पर बन्धन लगाती है, अस पर दो जिम्मेदारियां सहज ही आ पडती है। सरकार जनताकी है, अिसलिओ ये दो जिम्मेदारिया झुठानेकी तैयारी हो तो ही वह शिक्षाको अनिवार्य करके अपना अस्तित्व बनाये रख सकती है। अक जिम्मेदारी यह है कि माता-पितासे बालकको ले लेनेके फलस्वरूप झुन्हे जो आर्थिक असुविधा अत्पन्न हो, उसका बदला वह बालकके द्वारा ही किसी ने किसी तरह चुका दे; और दूसरी यह कि सरकार माता-पिताको यह आश्वासन दे कि अिस प्रकार शिक्षा पाया हुआ बालक शिक्षाके परिणामस्वरूप बेकार नही बनेगा। मतलब यह कि वह बालक यदि ७८ शिक्षाका विकास सरकारको अपना परिश्रम देनेको तैयार हो तो अससे काम लेकर असे जीवन-निर्वाह होने लायक मजदूरी देनेकी सरकार तैयारी रखे। देशकी परिस्थिति, गरीबी, बेकारी, अब तककी शिक्षाकी त्रुटिया और ये दो जिम्मेदारिया, अिन सबका अक साथ विचार करने पर जिसका अपाय ‘अद्योग द्वारा शिक्षा' ही सूझ सकता है। अद्योग द्वारा शिक्षाका अर्थ किसी धधेकी पूरी तालीम नही है। अिसका अर्थ यह भी नहीं है कि बालक जो अद्योग करता हो, वही धधा असे जीवनमे करना है। बालकको हम कक्का घुटवाते है और पहाडे रटवाते है, अिसका अर्थ यह थोडे ही है कि वह बाल- पोथी और पहाडोकी पुस्तक पढकर ही रह जायगा? जो पहली, दूसरी या अन्य पुस्तके वह वर्गमे पढता है या सवाल करता है, असीमे असकी पुस्तकीय शिक्षा समाप्त नही हो जाती। यह कक्का और पहाडे असे लेखन-वाचन और गणितकी कुजिया जरूर देते है। परन्तु यह शिक्षा असे किसी तरह अद्योगमे लगनेकी कुजी नही देती, क्योकि सारी शिक्षामे अससे किसी अद्योगके मूलाक्षर अथवा पहाडे रटवाये ही नहीं जाते। अल्टे, असका मन अिस ढगसे तैयार होता है कि अद्योगके प्रति असे अरुचि हो जाय। अतः अद्योग द्वारा शिक्षा अिस त्रुटिको सुधारनेके लिओ है। जड और कुशल दोनो प्रकारकी मजदूरी करनेकी बालकको आदत पडे और बनी रहे, असे करनेकी जानकारी हो, असमे असे रस आये, किसी भी अद्योगमे लगने और असे सीख लेनेमे असे प्रतिष्ठा मालूम हो, यह अद्योग द्वारा शिक्षाका अक अग है। परन्तु यह भी की तरहसे किया जा सकता है । असी-असी युक्तिया ढूढी जा सकती है, जिनसे बालक सुबहसे शाम तक तोड-फोड करता रहे, कठिन परिश्रम करे, असके द्वारा कुछ हद तक असका शरीर और अिन्द्रिया भी कसे, और फिर भी असे अद्योगका अर्थात् जीवनके लिओ जीवन-निर्वाहको शिक्षा आवश्यक किसी वस्तुके अत्पादनका वातावरण न मिले। यह सब अक प्रकारके खेलकी तरह ही किया जाय । तब अद्योग द्वारा शिक्षामे अद्योगका अर्थ जीवनमे महत्त्वका भाग अदा करनेवाला कोी अद्योग समझना चाहिये। और जैसे अद्योग द्वारा शिक्षाकी योजना करनी है। दूसरे शब्दोमे यह अत्पादक अद्योगकी अथवा जीवन-निर्वाहकी शिक्षा कही जा सकती है। अिसलि बालक शालामे आकर किसी न किसी अद्योगमे लग जाय। अिस अद्योगका असके और जिस समाज या गावमे वह रहता है असके जीवनमे महत्त्वका स्थान होना चाहिये । शालामे आकर असे असा कुछ करना और सीखना चाहिये, जिससे असके माता-पिता भी थोडे ही समयमे जान ले कि असका शाला जाना स्वागतयोग्य है, वह घरमे कुछ न कुछ लानेकी शक्ति प्राप्त कर रहा है, वह कुछ असा पढ रहा है जिसकी छूत घरमे लगे तो घरको भी लाभ होगा। आजके ग्रामजीवन पर दृष्टि डाले तो चारो ओर निराशा फैली हुी दिखामी देती है। अपनी आर्थिक चिन्ताओ कैसे मिटे, जिसका किसीको कोी मार्ग नही सूझता। अिस निराशाकी ग्लानिको मिटानेके लिओ लोग गलत मार्ग पर लग जाते है। निराशाको भूलनेके लिओ वे सट्टा, जुआ, नशा आदिके व्यसनोमे फसते है । जीवनकी आवश्यकता पूरी करनेवाला अद्योग ही अिस निराशाको मिटानेका अकमात्र अपाय है। माता-पिता देखेगे कि बालक शाला जाकर आलसी नहीं, परन्तु काम करनेवाला बनता है। अपने कपडोके लायक सूत तो वह थोडे ही समयमे कातने लगता है; फुरसतके समयमे तकली चलाता है, पीजन चलाता है या कोी न कोी सफाी-काम करता है, फुलवाडी लगाता है या जैसा ही कुछ करनेमे मशगूल रहता है। अिसके अलावा, मै तो यह भी चाहूगा कि बालककी मजदूरीका कुछ हिस्सा असे खुराकके तौर पर मिले। मुझे निश्चित ही असा लगता है कि अधिकाश बालकोकी सुस्ती, शारीरिक या मानसिक अचपलता और मद बुद्धिका .

८० शिक्षाका विकास कारण अचित पौष्टिक खुराककी कमी है। वैसे भी सरकारने गाधीजीका स्वावलबी शिक्षाका आग्रह स्वीकार नहीं किया है। अिसका अर्थ यह है कि वह शिक्षाका खर्च दूसरी तरह भी निकालनेकी हिम्मत करेगी। तो पैदावारका अक अश बालकको देनेकी बात गभीरतासे विचारने जैसी है। असा हो तो माता-पिताको बालकका व्यर्थ घरसे गैरहाजिर रहना नही खटकेगा । अन्हे मवेशी सभालनेकी परेशानी होगी। अिसके लिओ वे दूसरा रास्ता खोजेगे। परन्तु वे बालकको शाला जानेसे रोकना नहीं चाहेगे। जिसके सिवाय यदि अन्हे यह विश्वास हो जाय कि बालक और कुछ चाहे न कर सके लेकिन कातने-बुननेकी मजदूरी करके तो पेट जरूर भर सकेगा, तो झुन्हे असके भविष्यकी चिन्ता नही रहेगी। जिस प्रकार अद्योग द्वारा शिक्षा अनके लिओ आशाका स्थान बन जायगी। हरिजनबन्धु, २-४-'३९ नीः तालीमका शिक्षक चरखा-संघके नामसे आप सब परिचित हैं। आप असे खादी अत्पन्न करनेवाली सस्थाके रूपमे जानते है। अिसका अग्रेजी नाम अधिक सूचक है। असका अर्थ होता है कातनेवालोका सघ। यह सस्था साधारण अर्थमें व्यापारिक संस्था नहीं है। मजदूरीसे हाथ-कतामी और बुनामी करवा कर तथा लोगोकी देशभक्तिकी भावनासे लाभ झुठाकर अक प्रकारके कपडेका व्यापार हथिया लेना और नफा कमाना असका अद्देश्य नही है। जिसके कार्यकर्ताओको जितनी खादी वे अत्पन्न कराये या बेचे असके हिसाबसे दलाली या नफेमें हिस्सा नहीं दिया जाता। अन्हें तो अपना निश्चित वेतन ही मिलता है। अिसका कारण यह नी तालीमका शिक्षक ८१ है कि चरखा-सघ खादीका व्यापार करनेके लिओ खादीके काममे नही पडा है, परन्तु कतासी द्वारा गरीब ग्रामीणोकी आर्थिक और सामा- जिक सेवा करनेके लिओ अिसमे पडा है। उसके कार्यकर्ताओका कर्तव्य सस्तेसे सस्ते मजदूर ढूढकर खादीके ढेर पैदा कराना और अन्हे महगीसे महगी कीमत पर बेचना नहीं है, न निश्चित मजदूरी भीमानदारीके साथ चुका देनेसे ही अनका कर्तव्य पूरा हो जाता है। परन्तु कार्यकर्ताओसे यह अपेक्षा रखी जाती है कि वे कातनेवालो और बुननेवालोके जीवनमे प्रवेश करे, अनके जीवनको सुधारे और अनमे जागृति पैदा करे । नजी तालीमके शिक्षकोका कर्तव्य भी अिससे मिलता-जुलता है। अनका भी सपत्ति अत्पन्न करनेवाले कार्यकर्ताओका अक समूह है। अनका अद्देश्य व्यापार करना नही, परन्तु अिस सपत्तिको पैदा करने- वालोका हित साधना और झुनकी सेवा करना है । यहा जिनके द्वारा सपत्ति पैदा करनी है, वे बडी अम्रके स्त्री-पुरुष नही है, परन्तु छ -सातसे चौदह-पद्रह वर्षके लडके-लडकिया है। अिनके लिअ शिक्षाकी दृष्टिसे, गावोकी दृष्टिसे और समाजकी दृष्टिसे अनुकूल कुछ धधे ढूढे गये है या ढूढे जायगे । अिन कार्यकर्ताओ या शिक्षकोसे यह अपेक्षा रखी जायगी कि वे ये धधे अत्तम ढगसे सिखाये, कराये और अिस निमित्तसे बालकोके जीवनमे प्रवेश करके अन्हे जीवनोपयोगी शिक्षा दे तथा दूसरे प्रकारसे झुनका जीवन सुधारे। जहा खादीको असे धधेके रूपमे चुना गया होगा, वहा असा मानिये कि वह चरखा- संघकी अक स्वतत्र और विशिष्ट शाखा है। अक अक शाला अक ओक अत्पत्ति-केन्द्र है। असमे सात-आठ सस्कारी, सुशिक्षित और खास तालीम पाये हुओ कार्यकर्ता -- खादीसेवक -- रखे गये है। चरखा-सघकी तरह ही अिनके वेतन निश्चित है और अन्हे स्वतत्र रूपमे मिलते है। फिर भी, जैसे चरखा-सघ अपने कार्यकर्ताओसे यह अपेक्षा रखता है कि वे कत्तिनोके हितोकी रक्षा करे और अनके हितार्थ ही अिस ढगसे काम करे कि कत्तिनोकी कुशलता बढे, मालका बिगाड न - ८२ . शिक्षाका विकास हो और कमसे कम अस केन्द्रका खर्च वहासे निकल आये, असी तरह शिक्षा विभाग भी अपने कार्यकर्ताओसे जैसी ही अपेक्षा रखेगा। अिसमे कुशलता, बिगाड वगैराके मामलेमे यह बात अवश्य ध्यानमे रखी जाय कि अन्हे बालकोके द्वारा काम लेना है। तब असा समझिये कि अक शालाका अर्थ सात-आठ बड़े कार्य- कर्ताओ और कोली दो सौ बालकोका अक बडा कुटुम्ब है। अन्हे पूजीके सिवाय दूसरा खर्च खादी पैदा करके निकालना है। और पासमे जो दो-चार बीघा जमीन है, असमे थोडे-बहुत फलफूल, शाकभाजी भी पैदा करे, अिसकी कीमत शिक्षा और मनोरजनकी दृष्टिसे तो बडी होगी, परन्तु आयके खयालसे तुच्छ मानी जायगी। कपास ओटनेसे लगाकर अक खास प्रकारकी बुनाजी तकका धधा करनेकी जिसमे छूट है। बालक अलग-अलग अम्रके होगे। अनकी झुम्रका खयाल रखकर ही अनसे काम लिया जा सकता है । जो काम कराया जाय असमे अिन बालकोके हित और शिक्षाकी जाच करनेकी जिम्मेदारी भी है। अिन मर्यादाओके बीच काम करना है। अिसमे अम्रके कुछ स्वाभाविक विभाग जरूर होगे। प्रत्येक कार्यकर्ता अंक-अक समूहको मभालेगा। जिस समूहसे जो काम कराना हो अस कामकी वह देखरेख रखे और बालकोके साथ अस काममें शरीक हो। अदाहरणार्थ, कभी कभी वह छोटे बालकोके साथ कपास साफ करने बैठे । अस समय वह अन्हे कपास साफ करनेका तरीका बताये, साथ साथ बिना कचरेकी कपास अिकट्ठी करनेकी बात करे। कपासमे आनेवाले कचरेके प्रकार समझाये। अपने पास जो कपास हो असकी किस्म वगैराके बारेमे बालकोसे कहे । शालामे और किसी किस्मकी कपास हो तो असके साथ अपनी कपासकी तुलना कराये। अिसी तरह अलग-अलग समूहोमे खादी-सम्बन्धी अलग-अलग क्रियायें होती रहे; और अनके सम्बन्धमे विविध जानकारी बालकोंके शिक्षक झुन्हे दे । अनमे काम आनेवाले औजारो, साधनो और यत्रो .

नी तालीमका शिक्षक ८३ आदिका ज्ञान, गणित और अितिहास भी बताया जाय। अिस प्रकार खादीको केन्द्रमे रखकर बालकको विविध प्रकारसे पढा-गुना और विविध जानकारीसे पूर्ण बनाया जाय । अिसीमे से खादीकी और गावोकी आर्थिक, सामाजिक और राजनैतिक समस्याये भी अत्पन्न होगी। अिसलि अिसमे देशकी वर्तमान राजनैतिक, सामाजिक और आर्थिक सस्थाओके प्रश्नोकी चर्चा करनी पडेगी। विद्यार्थीका अनके कामोके साथ प्रत्यक्ष सम्बन्ध होनेसे वह केवल पुस्तकीय जानकारी रखनेवाला या 'नागरिक-धर्म' की पुस्तक पढा हुआ नागरिक नही बनेगा, परन्तु व्यवहारमे पडा हुआ नागरिक बनेगा। यह तो केवल अद्योगका विचार करके चित्र खीचा गया है। परन्तु अिसके सिवाय जिस कुदरत और समाजके बीच बालक रहता है, असका विचार करके भी असे विविध प्रकारसे कुशल बनाना पडेगा। जैसा भी अक वर्ग है जो अद्योग द्वारा शिक्षाकी हिमायत करता है, परन्तु असमे अद्योगसे बननेवाली वस्तुको महत्त्व नही देता। वह बिलकुल निरुपयोगी और बनाकर फेक देने जैसी भी हो सकती है, शायद थोडे समय शोभा बढानेके लिअ या कुतूहलसे आलमारीमे दिखानेकी भी हो सकती है। वे यह मानते है कि जिस शिक्षासे बालकके हाथ- रोको तालीम मिले और असे मनोरजनके साथ शिक्षा मिले तो काफी है। अिसलिओ वे मानो सिद्धान्तके तौर पर यह मानते है कि अद्योग द्वारा शिक्षामे बिगाड तो होता ही है। वर्धा-योजना जिस शिक्षाकी हिमायत करती है, असमे बिगाडका अनिवार्य स्थान नही है। अनिवार्य रूपमें कुछ न कुछ बिगाड हो और असे हिसाबमे लेना पडे, यह अलग बात है, परन्तु बिगाड ध्येयके रूपमें नही होना चाहिये । अिसी तरह केवल शोभा या कुतूहलको महत्त्वका स्थान नही मिलना चाहिये। आप अपनेको अक अत्पत्ति-केन्द्रके कार्यकर्ताके रूपमे समझने लगे, तो यह बात तुरंत ध्यानमे आ सकती है। अथवा, यो सोचिये कि कोसी ८४ शिक्षाका विकास बढी या दर्जी अपने वालकको अपना धधा करते-करते सिखाये तो वह बिगाडके लिओ लकडी या कपडेकी कितनी सुविधा असे देगा? जलानेके टुकडे या कतरनो पर वह थोडे दिन बालकको खेल करने देगा, परन्तु बादमे वह असे छोटे-छोटे किन्तु जैसे काम सौपेगा जिनके लिओ असे मजदूरी मिलनेवाली हो। आज बनाया और कल जला दिया, जैसी पद्धतिसे सिखाना झुमे कभी पुमायेगा नही । अिमलिओ यह समझकर चलना चाहिये कि सिखानेके लिओ कच्चा माल खरीदना और असका अधिकतर भाग बिगाड खाते लिख डालना पुसायेगा नहीं। शालामे चलाया जानेवाला धधा भले ही आसान हो, परन्तु यह ध्यानमे रखना चाहिये कि वह धधा है, मजाक नही । अक पद्धतिके रूपमे ही कुछ बेकार नही फेका जा सकता या नहीं बिगाडा जा सकता। यदि आप मेरी बात अच्छी तरह समझ गये हो तो अब आपको यह सोचने लगना चाहिये कि आप शिक्षक न रहकर अद्योगके कार्य- कर्ता बन गये है। अब आप बुनामीके धधेमे लग गये है। और फिर आपके स्त्री-बच्चे भी होगे ही। वे भी अिसमे मदद दे। जिससे शालाके बालक, आप, आपका परिवार सबकी मानो अक बडी सहकारी समिति बन जायगी। परन्तु आप तो बुनामीका धधा करनेवालेके अपरान्त शिक्षक --- अर्थात् ब्राह्मण --- भी है। आपको अपना यह धर्म छोड थोडे ही देना है ? अिस प्रकार आपकी केवल अक धधा करनेकी ही जिम्मेदारी नही, बल्कि असे सिखाने और असका शास्त्र निर्माण करनेकी भी जिम्मेदारी है। जैसा नहीं लगता कि पहलेके ब्राह्मण केवल साहित्य, व्याकरण, तत्त्वज्ञान या कर्मकाण्डके ही शास्त्र रचते या सिखाते होगे। द्रोण कौन थे? वे शस्त्रविद्याके शिक्षक थे। यही हाल परशुरामका था । अिसी प्रकार अनेक धन्धोके शास्त्र भी ब्राह्मण ही रचते थे।

नी तालीमका शिक्षक ८५ परन्तु द्रोण स्वय अत्तम योद्धा न होते तो वे शस्त्रविद्या कैसे सिखा सकते थे? धधे जैसी चीज नहीं है, जिन्हे अक आदमी सिखाये और दूसरा न जाननेवाला आदमी अनका शास्त्र बना सके। अिसका अर्थ यह है कि नी तालीममे यह भेद नही रखा जा सकेगा कि अद्योगके शिक्षक अलग और पुस्तकके शिक्षक अलग है। प्रत्येक शिक्षकको धधेकी क्रियामे कुशल होना ही चाहिये। आज हमारी स्थिति यह है कि हमारी शालामे अगर कोसी धन्धा चलता होगा तो असमे काम आनेवाले औजारो या यत्रोके भागोके नाम तक पुस्तक- शिक्षकको मालूम न होगे । दूसरी अनेक देश-विदेशकी बाते वह कर सकेगा, कमलके दस पर्याय बता सकेगा, विज्ञानकी सूक्ष्म परिभाषा दे सकेगा, परन्तु चरखेके अलग-अलग भागोके नाम असके विद्यार्थी पूछे तो वह नहीं बता सकेगा। अनमे से प्रत्येकके अलग-अलग नाम खोजने ओर न हों तो रखनेका भी हम परिश्रम नहीं करते। नजी तालीममे यह स्थिति नही रहनी चाहिये । जो शिक्षक अिस प्रकार बारीकीमे जायगा, असे पता चलेगा कि अद्योग द्वारा कितना भाषा- ज्ञान, विज्ञान, गणित वगैरा बढ सकता है, कितना नया साहित्य निर्माण हो सकता है, कितना बुद्धिका विकास और अिन्द्रियोकी सूक्ष्मता साधी जा सकती है और किस तरह समाजकी नवरचनाकी बुनियाद डाली जा सकती है । अिसका क्रान्तिकारी असर पहले हमारे अपने ही जीवनमे मालूम होने लगेगा। हरिजनबन्धु, ९-४-'३९ ,

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वर्धा-शिक्षाका अक नमूना
मेरे घरकी खिडकीके सामने अंक सूखे हुओं पेडका तना खडा
था। कल सुबह मकान-मालिकके नौकरने अक साथीकी मददसे असे
गिरा दिया और दोपहरके बारह बजे तक करवतसे काटकर असके
बडे-बडे टुकडे कर दिये। असके साथ असकी पत्नी और पाचेक वर्षका
अक लडका भी आया था । पत्नीने लकडिया अठा ले जानेमे माथ
दिया, बारह बजे काम पूरा हुआ तब लम्बा करवत भी वही झुठा
कर ले गी। जो तीन-चार घंटे अिस काममे लगे, अतने समय तक
वह लडका भी साथ रह कर कुछ न कुछ करता रहा। छोटे टुकडे
अडते अन्हे अठाकर वह अक जगह रखता, साथ ही करवत चलता
असका मजा भी देखता। बारह बजे नौकरने करवत हाथमे छोडा
कि लडकेने तुरत असे दोनो हाथोसे घसीटकर लकडीके अक टुकड़े पर
चढाकर टिका दिया। करवतके दाते पहले अपरकी ओर रखे। फिर
कुछ विचार आया, अिसलि पलट कर नीचेकी ओर कर दिये। फिर
कुछ विचार आया, अिसलिओ टुकडे परसे अतारकर व्यवस्थित रूपमे
करवतको जमीन पर लिटा दिया । फिर पासमे पडी हुी रस्सी
हाथमे ले ली। यह सब असने खुद ही किया, किसीके कह से नहीं।
अल्टे, अिस क्रियाके साथ वह कुछ बोलता जा रहा था।
वह यह कर रहा था, अितनेमे नौकरने करवत पत्नीके मिर
पर रखा और अक बडा लकडा साथीके सिर पर रखा। और सब
अपने घरकी ओर बिदा हुआ।
नौकर और असकी पत्नी अपढ थे। बालकको अपने कामके
साथ कुछ न कुछ शिक्षा देना झुनके लिओ सभव नहीं था। वह कुछ
सीखेगा, अिस दृष्टिसे वे असे साथ लाये ही न होगे। वह तो माके
पीछे-पीछे चला आया होगा । परन्तु असे माता-पिताके काममे रस
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कमानेवाली शिक्षा ८७ आया। यह काम अनके जीवनके साथ सम्बध रखता है और किसी न किसी तरह आवश्यक है, यह भी असे जरूर पता चल गया होगा। अिसलिओ असने माता-पिताके कामका ध्यानपूर्वक निरीक्षण किया, और अपनी बालबुद्धिके अनुसार असमे रसपूर्वक भाग भी लिया । जिस कारणसे वह तीन-चार घटे माता-पिताको तग किये बिना वहा मौजूद ही नहीं रहा, बल्कि अपनी छोटी छोटी क्रियाओ और मीठी बोलीसे असने माता-पिताका श्रम भी मिटाया। अिसी वस्तुको शास्त्रीय पद्धतिसे व्यवस्थित रूप दे दिया जाय तो वह विद्या बन जाय और अससे वर्धा-शिक्षाका शास्त्र निर्माण हो जाय। शिक्षण अने साहित्य', अप्रैल १९४० कमानेवाली शिक्षा [सेवाग्राम राष्ट्रीय शिक्षा सम्मेलनमे पेश किया गया प्रस्ताव और अस पर किया गया विवेचन ।] प्रस्ताव "अिस सम्मेलनकी यह राय है कि गावोमे गिक्षाकी असी व्यवस्था करनी चाहिये, जिससे किसी भी साधारण प्रौढ विद्यार्थीको वह शिक्षा पा रहा हो असी कालमे शिक्षाका खर्च निकाल सकने लायक मजदूरी मिल सके । यदि गावोकी शिक्षा-सस्थाये जैसी चीजे बनाने लगे जो झुपयोगी भी हों और शिक्षाकी दृष्टिसे कीमती भी हो तो ही यह हो सकता है। यह हो सके जिसके लिओ देशकी आर्थिक व्यवस्थामे भी साथ ही साथ क्रान्ति करनी पडेगी। अर्थ-व्यवस्था और शिक्षाके क्षेत्रमे जैसी दोहरी क्रान्तिके फल-स्वरूप साधारण और बुद्धि- ८८ शिक्षाका विकास हीन कही जानेवाली मजदूरी और कुगल कारीगरी दोनोकी दरोमे सब तरफसे और खासी अच्छी वृद्धि होनी चाहिये; अन्न-वस्त्र, मकान और जीवनकी दूसरी जरूरी चीजोकी पैदावारमे भी काफी वृद्धि होनी चाहिये। अिसके लिओ ‘नी तालीम' के औद्योगिक मशोधनका अद्देश्य छोटे पैमानेके और अलग-अलग बिखरे हुओ झुत्पादक धधोको आर्थिक दृष्टिसे सफल बनाना होना चाहिये । 'नी तालीम' को ग्रामवासियोके श्रममे वृद्धि किये बिना गावोका आर्थिक स्तर भूचा झुठाना चाहिये। अत्पादनका मुख्य अद्देश्य व्यापार और अद्योगमे नफा और ब्याज कमाना नही, परन्तु देशकी आतरिक स्वयपूर्णता और असके सबसे ज्यादा पिछडे हुअ वर्गोके लिजे सुखके साधन मुहैया करना होना चाहिये।" दोहरी क्रान्तिकी आवश्यकता सत्याग्रह आश्रम स्थापित हुआ तबसे गाधीजी अिस बात का आग्रह करते आये है कि शालामे पढनेवाले विद्यार्थी कोभी न कोजी अपयोगी वस्तुओ निर्माण करे। बुनियादी शिक्षाके आरभमे भी अन्होने हमसे कहा था कि विद्यार्थियोके कामसे शिक्षकोका वेतन निकलना चाहिये। अिस मुद्दे पर अन्होने 'हरिजन' पत्रोमे भी की वार लिखा है। बुनियादी शिक्षाकी योजना तैयार करनेके लिअ जब जाकिर- हुसेन कमेटी बैठी थी अस समय हमने गाधीजीका यह मुद्दा अशत. स्वीकार किया था। अब गाधीजी कहते है कि सारी शिक्षा पूरी तरह स्वावलंबी होनी चाहिये। गोसेवा-सघमे तालीम पानेके लिअ आया हुआ कार्यकर्ता स्वाश्रयी बनकर किस तरह तालीम पा सकता है, यह प्रश्न अठने पर अन्होने अपना यह स्पष्ट मत दिया कि अनिवार्य रूपमे स्वाश्रयका ही सिद्धान्त स्वीकार किया जाना चाहिये । स्वावलबनसे कॉलेजका अध्ययन- क्रम पूरा करनेवाले लोग हमारे यहा है। ये लोग अधिकतर ट्यूशन आदिकी सहायतासे असा करते है। परन्तु ट्यूशन सबको कमानेवाली शिक्षा ८९ कहासे मिले ? वह तो बम्बी जैसी जगहोमे ही मिल सकती है। परन्तु अमरीकामे हमारे यहाके विद्यार्थियोने बेशक अिस ढगसे शिक्षा प्राप्त की है। रूसमे वहाकी सरकार अिसके लिअ जबर्दस्त कोशिश करती है कि कोसी भी प्रजाजन अपढ न रहे । परन्तु वहाका तरीका दूसरा ही है। हमारे यहा मजदूरी करनेवालेके लिओ प्रगतिकी कोजी दिशा ही नहीं होती। अक बार मनुष्य रसोअिया बना कि सदाके लिओ रमोजिया ही रहता है। असके जीवनमे प्रगतिके लिअ स्थान ही नही होता। मनुष्य जो काम करता हो वह भी प्रगतिशील होना चाहिये। अमरीकामे जैसा नही है। कार्नेगी, फोर्ड और अडिसन जैसोके अदाहरण जानने लायक है। वे मेहनत-मजदूरी करके आगे बढे और समाजमे प्रमुख स्थान पर पहुचे। यह मार्ग हमारे यहा खुला नही है, अिसके लिओ हम ब्रिटिश सरकारको दोप नही दे सकते। यदि हम चाहते हो कि हमारे यहा भी अमा हो तो जिसके लिअ अनुकूल वातावरण पैदा करना चाहिये । अमरीकामे यह कैसे सभव हुआ है ? अिसलिओ कि वहा मजदूरीका स्तर भूचा है। मजदूरीका स्तर सूचा हो जिसके लिो आर्थिक स्थितिमे क्रान्ति करनेकी जरूरत है। मजदूरीका स्तर झूचा झुठायेगे तो ही मजदूरी करनेवालेके जीवनमे अत्साह आ सकता है। दस-ग्यारह घटे कड़ी मेहनत करनेके बाद वह रात्रिशालामे कैसे आ सकता है ? अिसलिओ मजदूरी देकर पढाया जा सके, जैसी स्थिति अत्पन्न करनी चाहिये। यह हाथके अद्योगकी विद्या द्वारा ही सभव हो सकता है। अन्न-वस्त्र आदिकी कमी नहीं होनी चाहिये। हवा और पानीकी तरह ये चीजे पूरी मात्रामे मिल सकनी चाहिये। अन्न और वस्त्र पूरी मात्रामे मिलनेके लिअ कोजी हमे अमरीका और रूसकी अत्पादन- पद्धति बताये तो वह हमारे कामकी नही । क्योकि बेकार आदमी असे कैसे प्राप्त कर सकते है? अिसलि छोटे पैमाने पर और अलग- ९० शिक्षाका विकास अलग बिखरे हुओ केन्द्रोमे अत्पादन करनेकी पद्धति हमे स्वीकार करनी चाहिये । अिस काममे हमे विज्ञानका अपयोग करना पडेगा। यह देखना होगा कि ये धधे आर्थिक दृष्टिसे कैसे सफल बनाये जा सकेंगे। यह मै कोजी अवैज्ञानिक बात आपसे नही कह रहा है। यह सच है कि अिस प्रकारके औद्योगिक 'टेकनिकल' सशोधनकी जिम्मेदारी तालीमी सघके सिर पर आती है। सभव है कि यह सब करनेके बाद भी हमारी स्थितिमे सुधार न हो। अिसलिओ अंक और वस्तुका विचार करना होगा। यह सब करनेका प्रयोजन क्या है ? नफा, ब्याज आदि कमाना? नही। अिस्लाममे ब्याज लेना हराम है। यही बात हमे करनी होगी। सोनेवाले हिस्सेदार, अनुपस्थित जमीदार अथवा साहूकार जैसी कमानी करते है, वैसी नहीं हो सकनी चाहिये। रुपया लेनेवाला आदमी यह कह सकता है कि भाजी, मै तुम्हारा मुद्दलका मुद्दल चुकाअगा, बल्कि पाच सौके चारमो निन्यानबे दूगा, क्योकि मै तुम्हारी पूजीकी रक्षा करूगा ! ये सब धधे नफेके लिअ नही चलने चाहिये। हमे देशके चालीस करोड लोगोकी आवश्यकता पूरी करनी है। देशको स्वयपूर्ण बनानेका प्रयत्न करना है। जीवनके साधनोका अभाव किसीको कही भी बाधक नही होना चाहिये। आज तो किसानोमे जीनेका भी अत्माह नही रहा। मोक्षका हमारा तत्त्वज्ञान थोडेसे लोगोके लिझे भले ही बना हो, परन्तु वह करोडोका ध्येय नही हो सकता। किसलिओ जिये, यही प्रश्न है। बिनमागा जन्म मिलनेके बाद मृत्यु भी वैसी ही मिलती है। जीवनके हेतुका सर्वथा अभाव दिखाी देता है। लोगोका किसी काममे अत्साह नही रहा। अन्हे यह डर रहता है कि यदि ज्यादा मेहनत करेगे तो सेठ, साहूकार या सरकार छीन लेगी। असी प्रजाको जीवनका ध्येय मिलना चाहिये - असे असका भान कराना चाहिये। असे यह सिखाना होगा कि पराधीनताका नाश करना है। अज्ञानकी दशामे से ज्ञान, दरिद्रतामे से समृद्धि, रोगमे से आरोग्य और विषमतामे से 'नी तालीम' का संदेश ? ? समानता ---अकताकी तरफ असे प्रगति करनी है। नौकर मालिकका काम भले ही करे, परन्तु अिस कारणसे असका स्थान मालिककी बराबरीमे क्यो न हो? वह भी मालिकका अक प्रकारका मत्री या सेक्रेटरी ही तो है ? मालिकके लिखे पत्रादि लिखनेवाला असका सेक्रेटरी कहलाता है, तो मालिकके लिओ रसोजी बनानेवाला भी सेक्रेटरी क्यो नही माना जाना चाहिये? यह सच है कि मैने यह वस्तु सिद्ध नही की है, परन्तु मुझे जिसका भान हुआ है कि यह दोष है। हममे यह भावना जाग्रत होनी चाहिये कि मैले कपडेवाला प्रतिष्ठाका पात्र है। कामके कारण मनुष्यको प्रतिष्ठा मिलनी चाहिये, न कि स्वच्छ अजले कपडोके कारण या आरामसे बैठे रहनेके कारण। 'शिक्षण अने साहित्य', फरवरी १९४५ नी तालीम' का संदेश पिछले कुछ वर्षोसे गाधीजी अपने पहलेके प्रिय विषय चरखेके बनिस्बत ‘नी तालीम' के बारेमे अधिक बोलते थे। अिसका कारण यह नही था कि झुनकी दृष्टिमे चरखा पहलेसे कम महत्त्वका हो गया था। अल्टे, हाथ-कताी और हाथ-बुनाीके बिना अनकी कल्पनाकी ‘नी तालीम' का अमल करना ही असभव है। नी तालीम और चरखके बीचके सबधकी गाधीजीकी कल्पना सत्य और अहिंसाके बीचके सबधसे लगभग मिलती-जुलती है। गाधीजीकी रायमे सत्य ही ीश्वर और ध्येय है, और अहिसा असे प्राप्त करनेका साधन -- अकमात्र सच्चा और सबल साधन है। अिसी प्रकार नी तालीम ध्येय है और चरखा असे प्राप्त करनेका साधन है। और जिस प्रकार अहिसा शब्दसे केवल अहिसा ही न ९२ शिक्षाका विकास समझकर असमे सयम, अपरिग्रह आदि दूसरे यमोका समावेश करना होता है, असी प्रकार चरखेमे भी विश्वशातिकी पक्की बुनियाद डालनेके लिअ आवश्यक धधे-सबधी, सामाजिक, धार्मिक, सास्कृतिक, राजनैतिक और आर्थिक आदि सारी मानव-प्रवृत्तियोका समावेश कर लेना है। नजी तालीमको जिस तरह मै समझता हू, असके अनुसार यह शब्द किसी बुनियादी अद्योग अथवा जिसे 'अत्पादक प्रवृत्ति' कहा जाता है असके द्वारा दी जानेवाली शिक्षाका पर्यायरूप ही नही है। असी तरह, जैसा की बार कहा जाता है, अिसका अितना ही भावार्थ नहीं है कि बुनियादी अद्योगके साथ पाठयक्रमके सब विषयोका सबध जोड दिया जाय अथवा आयोजन कर दिया जाय। शिक्षाकी अक नी कला अथवा पद्धति कहने मात्रसे जो कुछ सूचित होता है, झुमसे कही गहरा रहस्य जिसमे छिपा हुआ है। विचार करने लायक प्रश्न तो यह है कि हमे आजकल कौनसा ध्येय सिद्ध करने के लिओ तालीम दी जाती है ? हम अपनी शिक्षा-सबधी सारी प्रवृत्तियोगे --- फिर भले ही वे प्राथमिक, माध्य- मिक, अच्च अथवा निष्णातोकी शिक्षाकी हो -किस प्रकारका समाज पैदा कर रहे है या करना चाहते है ? आधुनिक शिक्षाकी सारी सीढिया पार कराकर अक महत्त्वाकाक्षी, बुद्धिशाली युवक (अथवा युवती ) को हम किस प्रकारके जीवनके लिओ तैयार करना चाहते है ? विद्यार्थीको युद्धकी तत्परताके साथ मेल खानेवाले जीवनके लि तैयार करना चाहते है या शातिस्थापनके साथ मेल खानेवाले जीवनके लिओ ? आज असे अनिवार्य फौजी शिक्षा पानेके लिओ और फौजी नौकरी, मुल्की नौकरी, बडी मात्रामे अत्पादन, विराट अद्योग, पूर्ण शस्त्र- सज्जता, राजनैतिक दलोका सगठन आदि ‘करियरो' के लिओ तैयार किया जाता है। वह अक समर्थ राजनीतिज्ञ, अंक सफल पत्रकार, अक प्रभावकारी प्रचारक अित्यादि बनना चाहता है। असे जैसा जीवन जीनेकी तालीम दी जाती है, जिसमे असे सतत विमानोमे घूमनेको मिले -- ?

'नी तालीम' का संदेश , तथा जो अद्यतन विपुल साधन-सम्पत्तिवाला हो। असका बस चले तो वह देहातमे व्यतीत करनेका, जन्मसे लेकर मृत्यु तक खेतोमे पशुओके साथ रहनेका अथवा हाथ-करघे पर बुनाीके काममे लगे रहनेका तथा गावोके प्रश्नो पर ध्यान देकर गावोका जीवन-स्तर झूचा झुठानेके काममे व्यतीत करनेका जीवन पसद नहीं करेगा। आज हम अपनी प्रजाको जिस प्रकारकी शिक्षा देते है, वह अक बुद्धिशाली और महत्त्वाकाक्षी युवक अथवा युवतीको अिस प्रकारके जीवनसे सतुष्ट रहनेवाला हरगिज नहीं बनाती। फिर भले ही अिस जीवनके साथ यह आश्वासन दिया जाय कि वह काम करेगा तो असे अक अच्छासा घर, पेटभर पौष्टिक भोजन, पर्याप्त वस्त्र, अच्छी सगति और निर्दोष आनद लेने लायक सस्कारी प्रवृत्तिया मिल जायगी। अिससे असे सतोष नही होगा, क्योकि असे बचपनसे अंक और चीजको अिससे अधिक चाहनेकी तालीम मिली है, अर्थात् हमेशा आगे आनेकी और चकाचौध पैदा करनेवाली परिस्थितिमे रहनेकी। असे धाधली चाहिये, शाति नही, फिर भले वह धाधली आग बरसानेवाले बॉम्बर हवामी जहाजकी और मानवजातिके सर्वनाशकी ही क्यो न हो। किसी प्राणीके जीवनके लिओ, सादगीके लिओ और सदाचरणके लिओ असके मनमे आदर नही रहा। स्वतत्रताका भी बलिदान कर दिया जाता है। मौजूदा शिक्षा प्रणालीका --पुरानी तालीमका केन्द्रबिन्दु भौतिक शास्त्रो द्वारा सामर्थ्य बढाते जाना है। नी तालीमका सन्देश अिससे अल्टा है। वह भलामीका विकास करना चाहती है, सामर्थ्यका नही, अपने विद्यार्थियोमे फिर वे बालक हों या बडे वह लडाभी और झगडेके बजाय शाति और सुमेलका, सादे आनदोका, सादी सुख-सुविधाओका, सचाीका तथा नीतिमत्ताका प्रेम, काम करनेका आनन्द और स्वतत्रताका जोश पैदा करना चाहती है। वह जीवित प्राणियोको अक बड़े यत्रके दातोकी तरह नही मानना चाहती, ताकि वे असके साथ मेल खाय तो ही किसी महत्त्वके रहे, .

शिक्षाका विकास अन्यथा जरासी भी आनाकानीके बिना ‘खतम' कर देने योग्य माने जाय। चरखा अिस प्रकारकी संस्कृतिके विकामके लिओ सबसे अधिक महत्त्वके स्थूल साधनोमे से अक है। वह केवल पुराने जमानेका सूत पैदा करनेवाला यत्र नहीं है। वह तो अक असा केन्द्र है, जिसके चारो ओर शान्तिकी सस्कृति खडी की जा सकती है। अिसलि असे शिक्षाकी सारी मजिलोमे केन्द्रीय स्थान दिया जाना जाना चाहिये । बचपनसे ही चरखा बालकके जीवनका अक अग न बने और असके जीवनके अन्त तक वैसा न रहे, तो खादी स्वय ही जड नहीं जमा सकती। चरखा गाधीजीके सारे रचनात्मक कार्यक्रमका प्रतीक है। अिसका जब हम विचार करते है, तो अन्होने 'लोकसेवक-सघ' नामक अपनी अन्तिम टिप्पणीमे (देखिये 'हरिजन', १५-२-'४८) जो यह जोर दिया है कि लोकसेवकको “ग्रामीण लोगोकी जन्मसे लगाकर मृत्यु तककी शिक्षाकी व्यवस्था नी तालीम' के मार्ग पर, हिन्दुस्तानी तालीमी सघकी निश्चित की हुी नीतिके अनुसार करनी चाहिये", अससे कोसी आश्चर्य नहीं होता। 'शिक्षण अने साहित्य', मार्च १९४८ , १२ अितिहासका ज्ञान पिछले पचास वर्षोसे विद्वानोने अितिहासके ज्ञानकी बडी महिमा गाी है, और अनेक दिशाओमे अतिहासिक शोध करने तथा अनेक विषयोका अितिहास लिखनेकी काफी कोशिश हुी है। अपने देश, जगत् तथा जीवनकी अनेक बातोका पिछला अितिहास जानना मनुष्यकी सर्वागीण और सामान्य तालीमका आवश्यक अग माना गया है। अर्थ- शास्त्रियोमे अितिहासवादियोका अक सम्प्रदाय ही है। कम्युनिस्ट अपनी विचारसरणीको अतिहासिक सत्यो पर ही आधारित मानते है और अस परसे मानव-जीवनके भविष्यके सम्बन्धमे निश्चित मत प्रतिपादित करते है। अतिहासिक ज्ञानकी महिमामे से अितिहासको ‘सुरक्षित रखनेका' भी अक आग्रह पैदा हुआ है और वह अिस हद तक बढा है कि मानवके आदियुगके नमूने लुप्त न हो जाय, अिसलि कुछ पुरातत्त्व- वादियोका विचार है कि जगली व पिछडी हुी जातियोको अनकी आदिदशामे ही रहने दिया जाय। असे लोग भी है, जो अनेक रूढियो तथा सस्थाओको आजके जीवनमे अर्थहीन और असुविधाजनक होते हुओ भी अितिहासको सुरक्षित रखनेके लिओ बनाये रखना चाहते है। जब अितिहासका अितना ज्यादा महत्त्व माना जाता हो, तब मेरे यह कहनेमे धृष्टता मालूम होगी कि यह मान्यता लगभग वहमकी कोटिकी है। मगर बडी नम्रतासे मै कहना चाहता हू कि अितिहासके ज्ञानका जितना महत्त्व माना जाता है, अतने महत्त्वका पात्र वह नही है। अिसमे पीतलके गहनेको सोनेका गहना मान लेने जैसी ही भूल की जाती है। ९५ शिक्षाका विकास मच बात तो यह है कि किसी भी घटनाका सोलह आने मच्चा अितिहास हम भाग्यसे ही मिलता है। खुद ही की हुी और कही हुभी बातोकी भी याददाश्त अितनी तेजीसे धुधली पड जाती है कि थोड़े समय बाद असमे सत्य और कल्पनाका मिश्रण हो जाता है। किसी मानसशास्त्रीने अंक प्रयोगका वर्णन किया है। विद्वानोकी सभामे अक नाट्यप्रयोग किया गया। असमे अक दुर्घटनाका प्रदर्शन किया गया। प्रयोगके साथ ही असकी फिल्म भी अतार ली गी। प्रयोग कुछ मिनटोका ही था। प्रयोग होनेके आधे घटे बाद श्रोताओसे कहा गया कि अन्होने जो देखा असका ठीक ठीक वर्णन लिखे। नतीजा यह आया कि तीस साक्षियोमे से अक दोके वर्णन तो फिल्मके साथ ८० फीसदी मिलते थे, शेष सबके वर्णनोमे ४० फीसदीमे ६० फीसदी तककी भूले निकली। जिसमे आश्चर्य करने जैसी कोी बात नहीं है। जब तटस्थ और सावधान साक्षी भी घटनाओको यो तेजीमे भूल जाते है, तब फिर जिनमे घटनाओको जन्म देनेवाले तथा अन्हे लिख रखनेवाले लोगोका कोजी रागद्वेष ---- पक्षपात वगैरा हो, अनके वर्णनोमे अगर सचाीका हिस्सा कम हो और जैसे जैसे समय बीतता जाय, वैसे वैसे ज्यादा कम होता जाय, तो जिसमे आश्चर्यकी क्या बात है ? वर्तमान घटनाओं भी अक ही दिनमे जैसी संशयास्पद बन सकती है कि सच सच घटना क्या घटी, यह कभी भी निश्चयपूर्वक नहीं कहा जा सकता। कल तक कलकत्तेकी ‘काल कोठरी' की बातको सभी विद्यार्थी और शिक्षक सच्ची घटना समझते थे। वही अब गप साबित हुी है। अभी हाल ही में पडित सुन्दरलालजीने यह बतलाकर हमे आश्चर्यचकित कर दिया है कि सोमनाथको लूटनेकी बात भी सच नहीं है। अगस्त १९४६ के बाद देशभरमे होनेवाले हिन्दू-मुस्लिम अत्याचारो और दगोका सोलह आने सच्चा अितिहास कभी भी नही मिल सकेगा। कृष्णका सच्चा जीवनचरित्र कौन जान सकता है ? रामका ही नहीं अितिहासका ज्ञान ९७ श्रीसामसीहका भी कभी जन्म हुआ था या नहीं, और अन्हे क्रॉस पर चढाया गया था या नहीं, जिस पर भी शका की गमी है। शेक्सपीयरके नाटकोके सम्बन्धमे प्रेमानन्दके नाटको जैसा ही विवाद है। अिधर विद्वानोमे अिस सम्बन्धमे चर्चा चली है कि कालिदास कितने हो गये है। जिस तरह जिस अितिहासके ज्ञानकी हम महिमा गाते है, वह भले ही अितिहासके नामसे और सेक्रेटरियेटके दफ्तरो तथा प्रत्यक्ष भाग लेनेवालोके मुहसे सुनकर लिखा गया हो, फिर भी वह अपन्यास या सम्भाव्य घटनासे ज्यादा कीमती नहीं होता। अिसका वाचन और पिछली कडियोको खोजने और जोडनेकी बौद्धिक कसरत मनोरजक अवश्य है, मगर शेक्सपीयर, कालिदास, बर्नार्ड शॉके अत्तम नाटको, या पौराणिक वार्ताओ तथा परपरागत दतकथाओसे ज्यादा कीमत न तो अिसकी करनी चाहिये, और न अनसे ज्यादा जिसके ज्ञानका मोह रखना चाहिये। अितिहास पढकर भूतकालके सम्बन्धमे हम जो कल्पना करते है, वे योग्य मात्रासे बहुत ज्यादा व्यापक रूप लिये होती है। और अन परसे हम जो अभिमान या द्वेष अपने दिलोमे पालते है, वे तो बेहद अनुचित होते है। प्रजाजीवनके वर्णनोमे प्रजाके बहुत ही थोडे भागके जीवनकी जानकारी असमे दी ही रहती है, मगर हम समझ लेते है कि वह पूरी प्रजाकी हालतका वर्णन है। भूतकालमे भी समृद्धि थी। बड़े बड़े नगर थे, नालदा जैसे विद्यापीठ थे; अिस जमानेमे भी है। मगर हमे जैसा नहीं लगता कि आजकी तरह अस समय भी थोडे ही लोग अस समृद्धिका अपभोग करते होगे, ज्यादातर लोग गरीब ही होगे, गुरुकुलोका लाभ गिनेचुने लोग ही लेते होगे; गार्गी जैसी विदुषी कोजी हर ब्राह्मणके घरमे नही होगी; अनेक ब्राह्मणिया तो आज जैसी ही निरक्षर होगी, और दूसरे वर्णोके स्त्री-पुरुष भी आज जैसे ही होगे। मगर हम समझते है कि अस समय तो सभीकी हालत ९८ शिक्षाका विकास अच्छी ही थी, बादमे बदल गी। लेकिन बहुत बड़े प्रजा-समूहके लिमे जैसा कहा तक कहा जा सकता है, अिसमे शका ही है। शिवाजीने अस जमानेके मुसलमान राज्योके खिलाफ मोर्चा लिया और स्वतत्र हिन्दू राज्यकी स्थापना की, अिस परसे मराठा मात्रको लगता है कि मुसलमानोसे द्वेष करना झुनका कुलधर्म है, अिसी न्यायसे शिवाजीने सूरतको लूटा था, अिसे पढकर मेरे अक बचपनके साथीको, जिसके पूर्वज सूरतमे रहते थे, असा लगता था कि शिवाजी और मराठे सब लुटेरे ही थे और महाराष्ट्रीयोके प्रति घृणा रखनेमे असे कुलाभिमान मालूम होता था । अगर अितिहास जैसी कोी चीज न हो, मनुष्यको भूतकालकी कोी स्मृति ही न रहती हो, तो देश-देश और प्रजा-प्रजाके बीचकी दुश्मनियोको पोषण न मिले । अभी तक असी कोी प्रजा या व्यक्ति नहीं हुआ, जिन्होने अितिहास पढकर कोजी शिक्षा ली हो और समझदार बने हो। सच पूछा जाय तो अितिहास स्मृति या याददाश्तका ही दूसरा नाम है। क्योकि ज्यादातर अितिहास लिखनेकी प्रवृत्ति अस समय नही होती जब कि स्मृति ताजी होती है, बल्कि अस समय होती है जब वह धुधली पड जाती है और सच्ची घटनाये जाननेके साधन भी लुप्त होने लगते है। मगर ताजी और सच्ची स्मृति भी मनुष्यको मिला हुआ वरदान ही नहीं, बल्कि शाप भी है। दो गायोके बीच सहानु- भूति -प्रेम सदा रहता है। अनके बीच हुआ झगडा क्षणिक होता है, क्योकि अनकी याददाश्त बहुत कमजोर होती है। और जब झगडा न हो, असकी याद भी न हो, तब अनकी आपसकी सहानुभूति स्वभाव- सिद्ध होती है । मगर मनुष्य स्मृतिको ताजी रखकर ज्यादातर द्वेषको ही जीवित रखते है, यानी सहानुभूतिको प्रेमको घटाते है। स्वभावसिद्ध सहानुभूति -प्रेम अगर किसी खास कर्म द्वारा व्यक्त किया गया हो, तो वह याद रहता और पुष्ट होता है, मगर असके अभावमें अितिहासका ज्ञान या असे भुला सकनेवाला झगडा कही अक बार भी हो जाय, तो वह स्मृति द्वारा लम्बे अरसे तक टिकता है। यह सब देखते हुझे मुझे नहीं लगता कि अितिहासका शिक्षण काव्य-नाटक-पुराण-अपन्यास वगैरा साहित्यके शिक्षणसे ज्यादा महत्त्व रखता है। अितिहासका अज्ञान अकाध प्रसिद्ध नाटक या काव्यके अज्ञानसे ज्यादा बडी खामी नहीं है। अिसे मनोरजक साहित्यका ही अक विभाग समझना चाहिये। आजका मानव-जीवन अितिहासका ही परिणाम है। हमे वर्तमान मानव-जीवनका अच्छी तरहसे निरीक्षण करना चाहिये और अितिहासकी कैदमे पडे बगैर असकी समस्याओका हल खोजना चाहिये। जैसा भय रखनेका कोसी कारण नहीं है कि अितिहास टूट जायगा या असकी परम्परा कायम नहीं रहेगी । क्योकि असके सस्कार तो पहलेसे ही हमारे जीवनमे दृढ हो चुके है । अिसलि चाहे जितना प्रयत्न कीजिये, असकी कारण-कार्य शृखला टूट ही नहीं सकती। जो अपाय हम सोचेंगे, वे हमे भूतकालके किसी सस्कारमे से ही सूझेगे, यानी बिना पढ़े हुओ अितिहासमे से ही सूझेगे। पढ़े हुझे अितिहासका अलटे जिसमे विघ्न- रूप होना ही ज्यादा सभव रहता है। अगर अितिहास न होता, तो झडेके चक्रकी अशोकके धर्म- चक्रसे या कृष्णके सुदर्शन चक्रसे तुलना करनेकी अिच्छा न होती, और चाद-तारेके झडेको भी महत्त्व न मिलता। अितिहासका ज्ञान क्षीण होनेके कारण जिस तरह मध्यकालमे हिन्दुस्तानमे आये हुआ शक, हूण, यवन, बर्बर, असुर वगैरा लोगो तथा अनके धर्मो और आर्योंके बीच आज कोजी स्वदेशी परदेशीका भेद नही करता या हिन्दूकी 'सावरकरी' व्याख्या पढने नही बैठता, असी तरह आज मुसलमान, जीसामी, पारसी वगैराके सम्बन्धमे भी हुआ होता । पौराणिक चतुःसीमाके अनुसार अरबस्तान, तुर्कस्तान, मिस्र, बरमा वगैरा सब देश भरतखंडके ही देश माने जाते । जस तरह अिति- . , शिक्षाका विकास हासके अज्ञानके कारण कुछ लोग मानते है कि सारे पुराण मेक ही कालमे और अक ही व्यक्ति द्वारा लिखे गये है, असी तरह सारे धर्म सनातन धर्मके ही भेद समझे जाते । अितिहास पढनेके परिणाम- स्वरूप हम दूसरोसे अलग होना सीखे है, मिलना नही। शिक्षणमे अितिहासको गौण स्थान देनेकी जरूरत है। असकी कीमत भूतकाल सम्बन्धी कल्पनाओ अथवा दन्तकथाओके बरावर ही समझनी चाहिये। जडमूलसे क्रान्ति', ३०-१-'४८ 050805 Net:n, . . .int INPUTED SLIM

Shiksha Ka Vikash-050805

Author
Masruwala
Title
Shiksha Ka Vikash-050805
File name
Shiksha Ka Vikash-050805
Text
OCR done
Citation
1956
Published
2006/06/25
Publisher
Navjeewan Prakashan Mandir Ahmedabad
Language
Sanskrit
Pages
149
Classification
Literature
DLI number
448285
Barcode
5990010124697.00
Scanning centre
IIIT, Allahabad
Rights
In Public Domain
VMLT id
SG4qFox5fjE
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