Prakrit Bharati Academy, Jaipur
Dirghjivan Aur Arogya Part-4
Front matter
प्रकाशक
मन श्रीपाद मातवलेकर, श्री. ए.,
स्वाध्याय-भण्डल,
पोस्ट-'स्वाध्याय मण्टल ( पाण्टी'
पारडी (जि. वनमाड)
मुद्रक
वर्मन श्रीपाद मातवलेकर, बी ए,
भारत मुद्रणान्य, स्वाध्याय-मण्टल,
पोस्ट-'स्वाध्याय मण्डल ( पारडी)',
पारडी । जि बलसाई)
अथर्ववेदका सुबोध अनुवाद [ भाग चौथा ] 'दीर्घजीवन और आरोग्य' विषयानुक्रमणिका पृष्ठ विषय प्राणकी मित्रता ९ से १६ १ समयकी अनुकूलता २० विषय भूमिका प्राणका संरक्षण (कां ११, सू ४) प्राणका संरक्षण प्राणका महत्त्व सत्यसे वलप्राप्ति प्राणकी वृष्टि प्राणसूक्तका सारांश ऋग्वेदमे प्राणविषयक उपदेश २० २० प्राणरक्षक ऋषि वृद्धत्वका धन वोध और प्रतिबोध उन्नति ही तेरा मार्ग है ७ यमके दूत असु-नीति २१ २१ ૨૨ २३ २३ ૨૨ २४ १३ १४ यजुर्वेदसे प्राणविषयक उपदेश गायन और प्राणशनि प्राणकी प्रतिष्ठा सत्कर्म और प्राण प्राणदाता अग्नि प्राणके साथ इंद्रियोंका विकास विश्वव्यापक प्राण लडनेवाला प्राण सरस्वतीसे प्राण भोजन और प्राण १५ १५ १५ १६ अथर्वाका गिर ब्रह्मलोककी प्राप्ति देवोका कोश ब्रह्मकी नगरी अयोध्या नगरी अयोध्याका राम उपनिपदोसे प्राणविधा प्राणकी श्रेष्ठता प्राण कहासे आता है ? देवोका घमंड प्राणस्तुति प्राणरूप अग्नि प्राणका प्रेरक अंगोंका रस प्राण और अन्य शक्तिया पतंग वसु-रुद्र-आदित्य तीन लोक २६ २६ २७ २८ २८ २८ १६ २९ सहस्राक्ष अग्नि - अथर्ववेदका प्राणविपयक उपदेश मै विजयी हूँ पंचमुखी महादेव प्राणका मीठा चाबुक अपनी स्वतंत्रता और पूर्णता १८ १८ १९ ३१ ३१ ૨૨ ३२ (४) अंथर्ववेदका सुवोध अनुवाद 'दीर्घजीवन और आरोग्य' -we-van-e-in. ------ दूसरा मार्ग ७० ७६ ७६ विपय पृष्ठ विपय पृष्ठ दीर्घायु प्राप्त करनेका उपाय (कां. ८, सू. १) ३३ दीर्घायुकी प्राप्ति (कां ", म. ३०) ६९ दीर्घायु प्राप्तिका मार्ग ३८ आरोग्ययुक्त दीर्घायु मा.मविश्वाससे दीर्घायु ६९ धर्मक्षेत्र लविचारले अनारोग्य ६९ माता पितामा पाप ६९ स्थी और रथ ૨૮ माननगक्ति ज्योतिकी प्राप्ति ३९ उन्नतिका मार्ग गोकसे मायुप्यनाश मार्गदर्शक दो अपि हिंसकोंसे बचना मृत्युको दूर करना अवनतिके पाश जीवनका लक्षण ज्ञान और विज्ञान ४१ घातक प्रयोगको दूर करना (कां. ५, मु. ३१) ७ स्कृति और स्थिरता दीर्घायु और तेजस्विता (कां. ५, स. २८) रक्षा और जाग्रति दीर्घायुप्य और तेजस्विता सामाजिक पाप यज्ञोपवीतका धारण सूर्यप्रकाशसे दीर्वायु तीन धागे UC तम और ज्योति ४४ सुवर्णका यज्ञोपवीत ७६ दो मार्गरक्षक ४५ इंद्रिय और प्राण ७६ उपदेशक मोकारकी तीन शक्तियां इस सूक्तके स्मरण करनेयोग्य उपदेश दीर्घायु (कां. ८ सू. २) ४६ न्याय, पुष्टि और ज्ञान ७८ दीर्वायु बननेका उपाय यज्ञोपवीतसे लाभ ७२ हवनसे दीर्घायुग्य (कां. ३, स. ११) सर्वाधिकार मृत्युका ७२ जीवनीय विद्याका उपदेश हवनसे दीर्घ आयु हवनसे दीर्घमायुप्यकी प्राप्ति ज्ञानका कवच औषधियोंके यज्ञ माणधारण ५५ जटर अग्नि हवनसे रोग दूर करना ५६ औषधि प्रयोग ५७ हवनका परिणाम उपदेगकका कार्य शतायु करनेवाला हवन ६० मरणका पाग समय विभाग ८३ सत्यसे सुरक्षितता दीर्घायु (का. ७ सू ५३) सत्यपालनसे दीर्घायुकी प्राप्ति ८३ दीर्घायु कैसे प्राप्त हो ? ६३ दीर्घायु पुष्टि और सुप्रजा ( का २, सू. २९) देवाक वैद्य रस और गति प्रजा धन और दीर्घायु (कां ७, सु. ३३) शतायु ८५ ६५ अन्न, घल, धन, सुसतान और अय दीर्घायुकी प्रार्थना (फां. ७, सू. ३२) ८६ ६५ हृदयकी तृप्ति ८७ ४५ देवॉक नगर ६० विषयानुक्रमाणिका . ليي , विषय पृष्ठ स्वधा ८७ . एस. ४५ ४५) दर्घाियुष्य प्राप्ति (कां. २ सू २८) दीर्घायुष्यकी मर्यादा साधन उनका कार्यक्षेत्र वध ईशप्रार्थना देवचरित्र श्रवण पापसे बचाव भोग और पराक्रम देवोंकी सहायता तेजस्विता, वल और दीर्घायुकी प्राप्ति (कां. १, सू. ३५) दाक्षायण हिरण्य दाक्षायणी विद्या सुवर्ण धारण राक्षस और पिशाच सुवर्णका गुण सुवर्णका सेवन काली कामधेनुका दूध आयुष्य-वर्धक-सूक्त (का. १ सू. ३०) विषय शापका दुष्परिणाम कां. ७, सू. ५९) 40 ०७ ८८ ईर्ष्यानिवारक औरध (को.. १०७ ८२ | अमृतशक्ति (कां. ७, १०८ ज्ञान और कर्म (का. ७, सू. ५४) १०८ प्रकाशका मार्ग (का. ७, सू ५५) १०९ ९० | मनुण्यकी शक्तियां (कां. ७, सू ५७) ११० जनसेवा ९१ वलदायी अन्न (का ७, सू. ५८) १११ कल्याण प्राप्त कर (कां. ७, सू. ८) ११२ ९२ उत्साह (कां, ४, सू ३१) ११२ ९२ यशका मूलमंत्र ११४ उत्साहका महत्त्व ११४ उत्साह (कां. ४, सू. ३२) ११५ ९३ उत्साहका धारण ११७ निर्भय जीवन (कां. २, सू १५) ११८ निर्भयतासे अमरपन ९५ ब्रह्म-क्षत्र ११८ सत्य और अनृत ११८ भूत और भविष्य ११९ ९७ | आत्मसंरक्षणका बल ( कां २, सू. १७) कष्टोंको दूर करनेका उपाय ( का. ६, सू. २५) १२० अद्रोहका मार्ग (कां. ६, सू ७) १२० प्रार्थना १२१ बलकी वृद्धि १२१ तीन उपदेश ૨૨૬ १०० सत्यकी विजय (कां ५ सू. १५) ૨૨૨ १०२ | समृद्धिकी प्राप्ति (का ४, सू ३९) ૨૨ १०२ उन्नतिका मार्ग १२५ परमात्माकी उपासना १०४ १२५ १०४ नमस्कारकी उपासना १२६ १०५ सप्त मुखी भनि १२६ १०५ स्वाहा १२६ १०६ / विपत्तियोंको हटानेका उपाय १०६ (कां २, सू. १५) १२७ आयुका संवर्धन सत्यका यश सामाजिक निर्भयता देवोके भाधीन आयुष्य हम क्या करते है ? आदित्य देवोंकी जाग्रति देवोके पिता और पुत्र देवोंके स्थान देवतामोके चार वर्ग स्वावलंबिनी प्रजा (कां. ७, सू ९४) वाणी (कां. ७, सू ४३) सुख (कां. ७, सू ६९) सुखप्राप्ति-सूक्त (कां १, सू. २६) देवोसे मित्रता विशेष सूचना (६) अथर्ववेदका सुबोध अनुवाद 'दीर्घजीवन और आरोग्य' विषय विपत्तियोका स्वरूप तीन भेट आत्मशुद्धि और गृहशुद्धि नीचतामें विपत्तिका उगम दुष्ट लोग राजाका कर्तव्य जीवनका युद्ध पापाचार और हवन भनि वर्चःप्राप्ति-सूक्त (का. १, सू. ९) देवताओका संबंध उन्नतिका मूलमंत्र विजयक लिये संयम ज्ञानसे जातिमें श्रेष्ठताकी प्राप्ति जनताकी भलाई करना उन्नतिकी चार सीढियां अपनी गनियोका विकास स्वयक्तियोका संयम ज्ञानवृद्धि द्वारा स्वजातिम संमान जनताकी उन्नतिके लिये प्रयत्न इन सूक्तोका स्मरणीय उपदेश शुद्धिकी विधि (कां. २, सू. १९-२३) पांच देव पृष्ठ विषय १२८ डाकुओकी असफलता (कां. २, मृ. २४) १२९ १२९ ) यक्ष्म-निवारण (कां. ९, सू. ८) १२९ सिरदर्द १२९ यक्ष्मरोगनाशन (कां १२, स. २) १३० यक्ष्मरोग-नाशन नीचेके मार्ग १३१ दुष्ट विचार १३२ कंजूसी, दारित्र्य और मृत्यु १३२ पितृयज्ञ १३३ सूर्यप्रकाशका महत्त्व शुद्धिका उपाय ૨૩૩ नृत्य और हास्य मनुष्यकी आयुष्य मर्यादा १३३ नदीका प्रचंड वेग सौ वाँकी पूर्ण आयु १३४ | यक्ष्मचिकित्सा (का ६, सू. ८५) वरुण वृक्ष १३६ यक्ष्मानाशन (कां २, सू. ३३) १३६ कफ-क्षयकी चिकित्सा (का. ६, सू १२७) १३६ क्षयरोग-निवारण (का, ६, सू. २०) ज्वरके लक्षण और परिणाम १३७ १३७ क्षयरोगका निवारण (कां. ६, सू. १४) पृष्ठ १४३ १४४. १४५ १४७ १४८ १५९ १५९ १५९ १५९ १६० १६० १६० १६० १६१ १६२ १६२ १६३ १६५ १६५ १६६ १६७ १६८ १६९ १ पचायतन पाच देवोंकी पांच शक्तियाँ मनुप्यकी शुद्धि देवता पचायतन शुहिकी रीति कफक्षय १६९ १७० १७० देय करना दुष्ट दमन (का. २, म १८) बलकी गणना १३८ खांसीको दूर करना (कां ६, सू १०५) १३९ श्वासादि-रोग-निवारण सूक्त (कां. १, सू. १२) १४० महत्त्वपूर्ण रूपक स्वाहा विधि आरोग्यका दाता मात्म-पर्वस्त्र-समर्पण चार-नाशन-सूक्त (कां. १, सृ १६) सीसेकी गोली गनु भायवीर सूर्यकिरणोसे चिकित्सा सर्वसाधारण उपाय १४२ विपचिकित्सा (कां. ७, सू ५६) १४२ / विपको दूर करना (का, ४, सू. ६) १७० १७१ १७२ १७२ १७३ १७३ १७५ - विषयानुक्रमणिका . २०० २०१ २०२ ૨૦૨ २०५ २०६ २०६ २०७ २०७ उपाय २०७ ज्वर रोग २०९ २०९ २१० २१० विषय पृष्ठ विपया विष दूर करनेका उपाय १७६ हवनसे नीरोगिता विषको दर करना (कां. ४, सू ७) १७७ गण्डमालाकी चिकित्सा (का. दो औषधियां १७८ गण्डमालाका निवारण (कां. ६, सू. ४३) सर्पविष दूर करना (कां १०, सू ४) १७८ गण्डमाला सर्पविष दूर करना (का. ५, सू. १३) १८२ रोग-कृमि-निवारण (कां. ५, सू. २९) सर्पविष १८४ रोगोके कृमि १८४ रोगजंतुभोंका शरीरमें प्रवेश सर्पका विप (का. ७, सू. ८८) १८५ भारोग्य प्राप्ति विष-निवारणका उपाय (कां, ६, सू. १००) १८६ सांसर्गिक रोग सर्पसे बचना (कां ६, सू ५६) १८७ रोग हटानेका लक्षण सर्प-विप निवारण (कां. ६, सू १२) १८७ रोगोत्पादक कृमि (का, २, सू ३१) ज्वर (कां. ७, सू. १९६) १८८ कृमियोंकी उत्पत्ति ज्यर-निवारण (का ५, सू. २२) दूर करनेका उपाय १८१, कृमि नाशन (कां. २, सू. ३२) ज्वरके भेद १९१ सूर्यकिरणका प्रभाव ज्वर निवृत्तिका उपाय १९२ कृमियोंके लक्षण शीत-चर-दूरीकरण-सूक्त (कां. १, सू २५) १९२ रोगवीजोंके नाशकी विद्या ज्वरकी उत्पत्ति १९३ विषस्थान ज्वरका परिणाम १९४ रोगकृमिका नाश (कां. ५, सू. २३) हिमज्वरके नाम १९४ रोगकृमियोका नाश नमः गव्द १९५ रोगकृमिका नाश (कां. ४, स. ३७) कुष्ठनाशन-सूक्त (कां. १, स्. २४) १९५ रोगकृमि वनस्पतिके मातापिता लक्षण सरूप-करण १९६ रोगकृमिनाशक हवन (का, ६, सू. ३२) वनस्पतिपर विजय रोगनाशक हवन सूर्यका प्रभाव १९६ रोगोंसे वचना (कां ६ सू. ९६) सूर्यसे वीर्य प्राप्ति पापसे रोगकी उत्पत्ति श्वेतकुष्ठ-नाशन-सूक्त (कां. १, सू. २३) १९७ संधिवातको दूर करना (कां २, सू. ९) श्वेतकुष्ठ संधिवात निदान दश-वृक्ष दो भेद मौर उनका उपाय प्रवीणताकी प्राप्ति औषधियोका पोषण १९८ क्षेत्रिय रोग दूर करना (कां. २, सू ८) गण्डमालाकी चिकित्सा (का ७, सू ७६) क्षेत्रिय रोग २०० दो औषधियां गण्डमाला २११ २१३ २१३ २१५ २१६ २१८ २१९ २१९ २२० २२१ २२१ उत्तम वैद्य रंग घुसना ૨૨ २२२ ૨૨૨ २२३ (८) अथर्ववेदका सुवोध अनुवाद - 'दीर्घजीवन और आरोग्य' पृष्ठ ૨૩૬ २३६ ૨૩૭ सूर्यदेवसे भारोग्य हदय रोग पृथ्वीमें जीवन २३७ २३८ २३८ २३९ रोगी पशु विषय पृष्ठ विषय आनुवंशिक रोग दूर करना (कां ३, म. ७) २२४ चन्द्र (सोम ) देवसे आरोग्य मातापितासे सन्तानमें लाये क्षेत्रिय रोग ૨૩ हरिणके सींगासे चिकित्सा २२५ पंचपाट पिता २२५ औषधि-चिकिन्सा मूत्र-दोष निवारण भगवती और तारका २२६ पूर्वापर सम्बन्ध गुलोक और मूलोकमें समान औषधियां २२६ गरीरशास्त्रका ज्ञान जल-चिकित्सा २२६ हस्तस्पर्शसे रोगनिवारण (कां. ४, सू. १३) पशुओकी स्वास्थ्य रक्षा (का ३ सू. २८) देवोकी सहायता २२६ पशुमोका स्वास्थ्य प्राणके दो देव २२८ देवाके पशुरोगकी उत्पत्ति ૨૨૮ दूत दुर्गतिसे बचना (कां ६, सू ८४ ) ૨૨૮ मलेश प्रतिबन्धक उपाय (का. ३, सू. ९) दुर्गतिसे बचनेका उपाय (कां. २, सू. १०) २२९ सबंक मातापिता दुर्गतिका स्वरुप २३० एकमात्र उपाय विश्ववन्धुत्व ज्ञानका फल पराक्रम उन्नतिका मार्ग परिश्रमसे सिन्हि २३१ अलंकारकी भाषा असुर-माया २३१ स्वकीय प्रयत्न सकही विघ्न ૨૩૨. प्रार्थनाका बल आरोग्य-सूक्त (का २,स. ३) २३३ मनको धीरज देना औषधि २३४ मृत्यु (कां. ६, सु. १३) यात्राका उपयोग मृत्युके प्रकार आरोग्य-सूक्त (कां. १, स. ३) २३४ मृत्युसे संरक्षण (कां. ४, सू. १६) मूत्र-दोष निवारण २३५ ब्रह्मौदन भारोग्यका साधन २३६ अमृतकी प्राप्ति पर्जन्यसे भारोग्य २३६ आत्मशुद्धि मित्र (प्राण) वायुसे मारोग्य २३६ बरग (जल) देवतासे भारोग्य २३६ सुभाषित २४० २४१ દર २४३ २४५ ૨૪૬ २६६ २४७ २४७ २४८ २४८ २४८ २५० २५० २५२ રપણે २५३ २५३ तप [ अथर्ववेदका सुबोध अनुवाद [ भाग चौथा दीर्घजीवन और आरोग्य भू मि का - ९ UO ३ २० २ ८ ७ ५७ २ ૨૨ १ १ ६ २५ २२ शाप १ इस विभागमे विभिन्न शीर्षकोंके अन्तर्गत ८८ सूक्त और १५ विपचिकित्सा ११७ मंत्र आए है, जो इस प्रकार है- १६ ज्वर मंत्र १७ कुष्टनाशन १ प्राणरक्षण २ ३३ १८ गण्डमाला २ दीवजीवन १२ ११७ १९ रोगकृमि ३ घातक प्रयोगोको दूर करना ૨૨ २० क्षेत्रियरोग ४ निर्मयता ५ भारोग्य २१ पशुओका मारोग्य ११ २ ६ शुद्धि ७ हस्तस्पर्शसे रोग निवारण ७ २३ ईर्ष्यानिवारण ८ स्वावलम्बन २ ३ २४ क्लेश-प्रतिबन्ध ९ वाणी १ २५ मृत्यु ૨ ५ २६ शक्ति ११ उत्साह १४ २७ सत्य १२ ज्ञान और कर्म १२ २८ कल्याण १३ प्रकाश २ ५ २९ ममृत १४ यक्ष्मनाशन १०३ २ (मथर्व. मा. ४ हिन्दी) १ १९ १८ १ २ १० सुख १ १ १ You are २ १ २ ६१७ ९
No text on this page.
भूमिका (११) कहा है- , प्राणायामके बहुतने प्रकार है, ये किसी एक योगी के माश्रम उमतिका मार्ग में रहकर नीसने पड़ते है। सर्व साधारण जिससे लाभ उठा सकते हैं, ऐसे तीन प्राणायाम उपर दिए गए है। इस प्राणा- मनुष्यका जन्म उन्नति करनेके लिए ही हुभा है, इसलिए यामसे अपने शरीरमें प्राणोको स्थिर किया जा सकता है। भस्रा भार पूर्ण प्राणायामको प्रथम वहुत समय तक नहीं उद्यानं ते पुरुप नावयानं । (अथर्व. ११६) करना चाहिए । भस्रा प्राणायाम फेफडोको स्वच्छ करनेके 'हे मनुष्य ! तू ऊपर उठ, नीचे मत गिर।' मनुष्यका लिए थोटा ही करें । उजायी प्राणायाम ज्यादा करें और पूर्ण यह कर्तव्य है कि कर्तव्याकर्तव्यका विचार कर वह हमेशा प्राणायाम अपनी गानिक अनुसार करें । ऐसे करनेसे साधक उन्नतिके मार्ग पर ही चलता रहे । वह सर्वत्र अपनी मनन- के शरीरमें प्राण स्थिर रह सकते है। शक्तिका सदुपयोग करे। उसे मनुष्य इसीलिए कहा गया है कि वह मननशक्तिसे युक्त है, 'मननात् मनुष्यः । प्राणायामका महत्त्व इसलिए उन्नतिका मनन ही एकमात्र उपाय है। इसलिए जैसा कि ऊपर बताया जा चुका है प्राणायामसे प्राणकी मनुष्य सदा सर्वदा अपनी बुद्धिका उपयोग करके उन्नति ही गनि बटती है, और उससे वायु दीर्ध होती है । इस शरीर करे, कभी भी अवनत न हो। वेदका यह पवित्र सन्देश में दो तरहकी नाडिया है । (१)जो शुद्ध रक्तको गरीरमें मानवमात्रके लिए है। जो भी इस सन्देशको ध्यानमे रखते सर्वत्र पहुंचाती हैं, (२) जो अशुद्ध रनको हृदयकी ओर हुए तदनुसार कार्य करेगा, वह निश्चित रूपसे उन्नत होगा। हे जाती है। इस शरीरमें प्रतिक्षण विपका प्रसार होता रहता बोध और प्रतियोध है और वह रक्कम मिलकर सारे गरीरको विषमय करता योव और प्रतिबोध मनुप्यकी सहायता करते है। इस रहता है। धमनियों द्वारा वह मशुद्ध या विपमय रक्त हृदय विपयमें कहा है- में पहुंचाया जाता है। वहां हृदयमें प्राणाग्निका निवास है। मनुष्य जो श्वास लेता है वह शुद्ध वायु होती है जो हृदयम बोधश्च त्वा प्रतिवोधश्च रक्षताम् । पहुंच कर प्राणाग्निको प्रेरित करती है और यह प्राणाग्नि धम अस्वप्नश्च त्वानवद्राणश्च रक्षताम् । नियों द्वारा हृदयमें लाए गए अशुद्ध रक्तक विषमय तत्त्यो- गोपायंश्च त्वा जागृविश्च रक्षताम् को जरा देती है, और यह रक्त फिर शुद्ध होकर शरीरम (मथर्व. ८1१।१३) परिश्रमण करने लगता है । इस प्रकार यह प्राण ही इस और विज्ञान तेरी रक्षा करें, मालस्य मत कर शरीरका मुग्न्य भाधार है । मनुजी भी अपनी स्मृतिमे और काम करना मत छोड, रक्षक और जाग्रत रहनेवाले तेरी लिसते है- रक्षा करें।' ये रक्षकके गुण है, इसलिए ये गुण मनुप्योको दह्यन्ते ध्मायमानानां धातूना हि यथा मलः । धारण करने चाहिए । इसलिए कहा है- तथेन्द्रियाणां दह्यन्ते दोपाः प्राणस्य निग्रहात् ।। आ इहि । तमसः ज्योतिः आरोह । (मथर्व. ८।११८) जिस प्रकार भागमें डाले गए धातुओंका मैल जल जाता इस अन्धकारको छोडकर प्रकाग पर चढ।' अंधकारका है, उसी प्रकार प्राणोंका निग्रह कर प्राणाग्निको प्रज्ज्वलित मार्ग छोडकर प्रकाशके मार्ग पर चलना प्रगति करनेके लिए करनेसे सारी इन्द्रियांका मल दूर हो जाता है । अत्यन्त आवश्यक है। ऐसे करनेसे हम- जितनी ज्यादा शुन्द वायु अन्दर ली जाएगी, उतनी ही सहस्रवीर्येण इमं मृत्योः उत्पारयामसि । यह प्राणानि ज्यादा भटकेगी, परिणामतः रक्तके अशुद्धतत्त्व (अथर्व. ८1१1१८) भी जलेंगे। 'हजारों वीर्यकी सहायतासे इस मनुष्यको मृत्युके भयले इस प्रकार प्राणसे प्रेरित प्राणाग्नि रक्तको शुद्ध करती है, दूर कर सकेंगे।' इस अनुष्ठानसे मनुष्य दीर्घायु होगा। शुद्ध रक्त इंद्रियोंको निर्मल बनाता है, निर्मल इंद्रियोको वगमे जीवतां ज्योतिः अभ्येयाङ् आ त्वा हरामि करनेसे आयु दीर्घ होती है। इस प्रकार प्राणायामसे दीर्घायु शतशारदाय । अवमुञ्चन् मृत्युपाशानशस्ति की प्राप्ति होती है। यह महत्त्व हे प्राणायामका । द्राधीय आयुः प्रतरं ते दधामि ॥ (अथर्व २२) । ज्ञान
No text on this page.
भूमिका (१३) १ औषधियोसे होनेवाला महायज्ञ है, इसलिए ऋतु- बताए है । रोगोके दूर होनेपर ही आरोग्य बढेगा और मनुष्य भोके संधिकालमें किया जाता है, क्योकि ऋतुसन्धियोने दीर्घजीवन प्राप्त कर सकेगा। रोगकृमियोके नाश करने के यज्ञ होता है। विषयमं कहा है। क्सि रोग पर किस औपवीका हवन करना चाहिए उद्यन्नादित्यः किमीन हन्तु निर्देोचन हन्तु रश्मिभिः इसका विचार उत्तम वैद्योको करना चाहिए। ऐसे हवनोके ये अन्तः क्रिमयो गवि । (अय. २१३२।१ ) करनेसे मनुष्य दोपमुक बनता है लौर दीर्घजीवी होता है । उदय और अस्त होनेवाला सूर्य अपनी किरणोसे रोग हवनसे साग वायुमण्डल शुद्ध और निर्मल होता है, इससे कृमियोका नाग करता है । ' सूर्य किरणोसे रोगोके कृमि हवा शुद्ध होती है, और उत्तम मेव बनते है उनसे फिर दूर होते है । घर खले हुए हो तंग न हो ताकि उन घरोमें निर्मल और विशुद्ध जल चरखता है, जिससे उत्तम भन्नकी सूर्य किरणोका मुक्त प्रवेश हो सके । ऐसे घरोमे रहनेसे सभी उत्पत्ति होती है । मनुस्मृतिमें कहा है- निरोगी रह सकते है। अग्नी प्रास्तातिः लम्यगादित्यमुपतिष्ठते । इस्तस्पर्शसे आरोग्य आदित्याजायते वृष्टिः वृष्टेरन्नं ततः प्रजाः ।। हायके हगारोम रोगचिकित्साकी पति आजकी चिकि- 'अग्निमें डाली गई माहुति सूर्यमें जाती है, सूर्यस पानी त्सा पद्धतिका एक आवश्यक अंग है । कुछ रोग शारीरिक होते हैं और कुछ मानसिक । ज्वर, घाव, चर्म रोग आदि बरसता है, और उस पानीसे प्रजायें बढती है। गारीरिक है, पर चिन्ता, दुःख, क्षय आदि मानसिक हैं । प्राचीनकालमे हर नगर चौराहोपर बटी बडी यज्ञशालाय चिन्ता अथवा कुण्ठाये अचेतन मनमे रहती हुई धीरे धीरे होती थीं, जिनमे वटे बडे यज्ञ रचाये जाते थे। इन यज्ञोमे अपना प्रभाव सारे शरीर पर जमा लेती है। फलत. शरीर स्वास्थ्यवर्धक पदार्थोफी माहुतियां दी जाती थी, और उन क्रमा क्षीण होता जाता है । चिन्तासे स्वस्थ मनुष्य भी पढायांका सूक्ष्मतत्त्व हवामे विलीन होकर प्राणियोंके अन्दर क्षीण होता जाता है यह क्षीण होना ही 'क्षय ' है । इस वाम द्वारा जाता था, जिससे सभीका स्वास्थ्य उत्तम रहता प्रकार क्षय रोगोमे मनका भाग अधिक होता है । मनमे या और वे दीर्घकाल्तक उत्तम स्वास्यका मानन्द लेने ये। अनेक तरहकी कुण्ठायें प्रसुप्त अवस्थामे रहती हैं । इनका अत इस प्रकार हवन भी दीर्घायुप्राप्तिका एक महत्वपूर्ण निराकरण स्थूल शरीरकी चिकित्सासे असम्भव है । इनकी सावन है। चिकित्सा रोगी मन पर प्रभाव डाल कर ही की जा सकती सुवर्ण-धारण । इमी पाढतिको आजकल 'मनो-विश्लेषणकी पद्धति शरीरपर मोनेको धारण करनेसे मनुष्य दीर्घजीवन ग्राप्त (Psycho-Analysis) कहते है। इस पद्धतिमे हिप्नो- कर सकता है । इसलिए कहा है- टिज्म और मेस्मरिज्मका प्राधान्य होता है । चिकित्सक इस पद्धतिके द्वारा रोगी पर अपनी मानसिकगक्ति फेकता है यो विभर्ति दाक्षायणं हिरण्यं स मनुप्येपु कृणुते और उस पर अपनी मानसिक किरणोको फेंक कर उसकी दीर्घमायुः । (वा. य ३४-५१) मानसिक कुंठालोको दूर करता है । शतानीकाय हिरण्यं अवघ्नन् । (अय. ११३५।१) यह पद्धति भावुनिक नहीं है अपितु वेदोंमे भी इस पद्ध- 'जो दाक्षायण हिरण्य गरीरपर बांधता है, वह मनुष्योम तिका अध्ययन किया जा सकता है। अथर्ववेदमे हायके मौ वर्षकी दीर्घायु प्राप्त करता है ।' दीर्वायु प्राप्त करनेका संकेतसे रोगोंको दूर करनेकी चिकित्सा बताई है- यह भी एक उपाय है। यह उपाय हरएक कर सकता है । आ त्वागमं शंतातिभिः अथो अरिष्टतातिभिः । गरीरक माय सोनेका म्पर्श होनेसे शरीरपर उत्तम परिणाम दक्ष त उग्रमाभारिप परा यक्ष्मं सुवामि ते ॥५॥ होता है। अयं मे हस्तो भगवान् अयं मे भगवत्तरः । इसके आलावा अनेक प्रकारके रोगोको कारके रोगोको दूर करने के उपाय अयं मे विश्वभपजोऽयं शिवाभिमर्शनः॥६॥ भी बताए है। यदमा, ज्वर, गंडमाला, क्षेत्रिय रोग, संवि हस्ताभ्यां दशशाखाभ्यां जिव्हा वाचः पुरोगवि । वात, मूत्ररोग श्वेतकुष्ट, रोगकृमियोका नाग इत्यादि अनेक अनामयित्नुभ्यां हस्ताभ्यां विषय इस भागमे आए है, साथ ही उनके निवारणोपाय भी ताभ्यां त्वाभिमृशामास ॥ ७॥ (अथर्व ११३) १ .
अथर्ववेदका सुबोध अनुवाद 'दीर्घजीवन और आरोग्य' 'गान्तिदायक गुणोंक साय और विनागको दूर करने- जिस प्रकार फुकनीसे फंककर भाग जलाई जाती है, उसी वाले शुभगुणांक माय में तेरे पाग्म आया है। मैं तुझम प्रकार प्राणायामसे शरीरकी नसनाडियोंकी शुद्धता होती है बल बढाता हूँ । यक्ष्मा भादि रोगोको दूर करता हूँ। यह और तेज बटता है, गरीरके दोष दूर होते हैं, प्रकाश वटता मेरा हाय माग्य बटानेवाला है और यह दूसरा हाय पहलेकी है, शरीरकी शुद्धि होती है और तेजस्त्रिता बढती है। भी अपेक्षा गक्तिगाली है । यह मेरा हाथ सभी गेगोको दूर इस मनुष्टानसे मनुष्य निर्दोष होता है । करनेवाल है और कवाण करनेवाला है। दस अंगुली ३ दृष्टिका तप- दुष्टभावनासे दुष्टभावनासे किसीकी ओर न रूपी गाग्वाय इस मेरे हायम है । जीभसे में उत्तम कल्याण देसना, मंगलभावनाले ही अपनी दृष्टिका उपयोग करना करनेवाली भाषा ही बोलना है और निरोगता प्रदान करने दृष्टिका तप कहाता है । अपनी दृष्टिको कुमार्गपरसे हटाकर वाले इस हायम तेरा स्पर्श भी करता है । इस मेरे हम्न- सुमार्गपर चलाना भी एक बटा भारी तप है । म्पर्गस त नि मंढह निरोगी बनेगा, मेरे हायमें ऐसा प्रभाव ४ मनका तप- मन सब इन्द्रियोंका स्वामी है। वही है।' इन्द्रियोंको चलानेवाला होनेसे इन्द्रियाधिपति है। इसलिए इस प्रकार प्राचीन कारम हस्तस्पर्थमे रोगियोको स्वस्थ सभी गास्नामें कहा है कि यदि मनुष्य इन्द्रियोका निग्रह किया जाता था। यह विद्या माज भी वृद्धि पर है और हस्त- करना चाहता है, तो उसे चाहिए कि वह प्रथम मनका निग्रह स्पीन्न स्वास्थ्य प्रदान करनेवाले डॉक्टर आजकल बहुतसे करे । मनके नित्रह करनेमे सभी इन्द्रियां स्वयं वामें आ हैं। इसलिए इन सम्बन्धमे अविक दिखनेकी आवश्यकता जाएगी। सत्यपालन मनका तप है । बुरे विचारोंको मनसे नही है । मन दृढसंकल्पवाला होना चाहिए, मानसिक दृट- दूर करना मानसिक तप है। इस प्रकारके तपसे मनके सल्यम उच्चार गए गन्दोस और हायक स्पर्शसे टॉक्टर दोष दूर होते है, मन पवित्र होता है और शुद्ध होकर अपनी मानसिक शक्ति गंगीक गरीरमे पहुंचाता हे और रोग तेजस्वी होता है। दूर करता है । इस प्रकार हायस रोग दूर करनेकी विद्या ५ वीर्यका तप-(ब्रह्मचर्य) जननेन्द्रियका, वीर्यका वेदोंमें बताई है। अथवा कामका तप ब्रह्मचर्य कहाता है। ब्रह्मचर्यसे सारी गरीरकी म्यस्यता दीर्घजीवनके लिए अन्यावश्यक है । पर अपमृत्युये दूर हो जाती है और अनन्त प्रकारके लाभ नपरहिन मनुष्य इस स्वम्यताको प्राप्त नहीं कर सकता। होते है। रोगादियोंका भय दूर होता है और नैसर्गिक नपस इन्द्रियां निर्मल होती है और निर्मल इन्द्रिया गति- आरोग्य प्राप्त होता है। ब्रह्मचर्यके बारेमें सब जानते है, गारी होकर मारे गरीरको स्वस्थ बनाये रखती है। इन्द्रि- इसलिए उसके विपयमे ज्यादा लिखने की जरूरत नहीं है । योको शुद्ध करने की गति भी इस भागमे बताई गई है। ब्रह्मचर्य हर प्रकारसे मनुष्य मात्रके उद्धारके लिए उप- शुद्धिकी रीति शुद्धिकी रीति पाच नाद की है। अर्थात पांच स्थानाम अग्नि (वाणी), वायु (प्राण), सूर्य ( दृष्टि-नेत्र), चन्द्रमा शुद्धता होनी चाहिए- (मन), आप. (वीर्य) इन देवोंका आश्रय लेकर मनुष्य १ वाणीमा तप- सर्व प्रथम वाणीक तपका आचरण शुद्ध हो सकता है । प्रत्येक देवताकी पांच गक्तियोंसे मनुष्यके दोप काना चाहिए । मत्यभाषण, मौन आदि वाणीक तप है। दूर होने है, उसके गुण बढ़ते हैं। इस प्रकार मनुष्य मनभायणन मनुन्यमी वाणी अप्रतिइन हो जाती है, अर्थात क्रमश. शुद्ध और उन्नत होता जाता है। मन्य भाषण करनेवाग जो कुछ बोलता है, वह अवश्यमेव दोस्र सना है। इसका वर्णन योगदर्शनम देखा जा सन्ता दुष्टोक दमनके लिए अपनी शक्ति बढानी चाहिए । मनु- है। यानी टोयोको दर र उममे प्रकार और प्रसन्नता प्यमें भरपूर शक्ति हो, तभी वह अपनी और दूसरोंकी गनी चादिप । जो कुछ भी बोला जाए, वह मावधानता और सुरक्षा कर सकता है । वे किया इस प्रकार है- परिहनाने ही बोला नाप । इस प्रकार वाणीको शुद्ध कर १ ओजः- स्थूलगरीरकी शक्ति । नरे वागत नेन और प्रभाव बहन बटना है। २ सहः- गीत, उष्ण और दृसंर द्वन्द्व विकारोंको २प्राणाका नप-प्राणायामले प्राणमा तप होता है। महन करनेकी शक्ति कर्तव्य करते हुए मार्गमें आनेवाले योगी है। दुष्टोंना दमन भूमिका (१५) श्य हैं। . १ कष्टोंको आनन्दसे सहन करनेकी शक्तिका नाम 'सह 'हे दुष्ट । यदि तू हमारी गाय, घोडे और मनुष्योंको शत्रुके आक्रमणके समय उससे न डरते हुए अपने स्थानपर मारेगा, तो तुझे हम सीसेकी गोलीसे मार देंगे ताकि तू ही खड़े रहना भी सहनशक्ति' है। हमारे वीरोका नाश नहीं कर सके।' ३ वलम्- आत्मिक, बौद्धिक, मानसिक और इन्द्रिय इस मंत्र केनल सीम शब्द है, गोलीका वाचक कोई विषयक मादि जितने पल मनुप्यकी उन्नतिके लिए माय- गव्द यहां नहीं है । तो भी 'सलिल विध्यामः' (सीसे से वीध दंगे) यहा 'विध्यामः' शब्द प्रयोग सीसेकी ४ आयुः- दीर्घायु, स्वास्थ्यपूर्ण दीर्घजीवन । गोलीका भाव बताता है। क्वल सीसेका उपयोग चोरोको मार- ५ भ्रातृव्यक्षयणं-- दो भाईयोके सन्तानोके आपसका नेमे सौर किसी दूसरी तरहसे नहीं हो सकता इसके अलावा नाता 'भ्रातृव्य' का होता है। ये एक ही घरके भ्रातृव्य है। उसी प्रकार दो राजा आपसमे भाई समझे जाते हैं, इस ऐसी चीज है, जो दूरसे ही लक्ष्य करके छोडी जाती है । ऐसी (विध्यामः ) बीधते है, यह शब्द बताता है कि यह कोई कारण उनकी प्रजाएं परस्पर श्राध्य समझी जाती है। उनमे ऐसी चीज है, जो दूरसे ही लक्ष्य करके छोडी जाती है। ऐसी बार बार युद्ध होते है । ऐसे राष्ट्रीय युद्धोमे शत्रुपक्षको हटा- शत्रुओके भी कई प्रकार इस भागमे वताये है । नेकी गति स्वयंमें बटानी चाहिए। तभी विजय मिल सकती है। १ विष्कम- प्रतिबंध करनेवाला, विघ्न डालनेवाला । ६ सपत्नक्षयणं- एक ही राज्यमे पक्ष-उपपक्ष-प्रतिम २ पिशाच, पिशाची- रक्त पीनेवाला, कच्चा मांस पक्ष होते हैं । इस पक्ष भेदका नाम सपत्न है । क्योकि वे सानेवाला क्रूर मनुष्य । एक ही पति अर्थात् पालकोंके अधिकारमे रहते है। उनमे ३ अनिन्-खाऊ, जो अपने स्वार्थके आगे दूसरोंको नही परस्पर स्पर्धाओंका होना स्वाभाविक ही है। इस स्पर्धाम गिनता । जिसे सानेके सिवा और और कुछ सूझता ही नहीं । सपनोंको दूर करके विजय प्राप्त करनेका नाम 'सपत्न- क्षयण' है। ४ यातुः-चोर। ये सभी समाजके क्षत्र हैं। इन्हे प्रथम उपदेश द्वारा सुधा- ७अरायक्षयणं- 'राय' धनका वाचक है और 'अराय रनेका प्रयत्न करना चाहिए । उपदेशके द्वारा भी जो नही शब्द निर्धनताका वाचक है । यह निर्धनता सब तरहसे दूर- सुधरते, उनको योग्य दण्ड देनेके लिए राजाके हाथोमें सौंप की जानी चाहिए । वैश्य और कारीगरोकी उन्नतिसे ही यह देना चाहिए । उपदेश और दण्टसे भी जो सुधरते नहीं साध्य हो सकता है। उन्हें सीसेकी गोलीसे मार देनेका विधान है। ८ पिशाचक्षयणं- रक मांसका शोपण करनेवालोका उन्नतिका मूलमंत्र नाम पिशाच है, (पिशिता-पिशाच ) रक्त पीने या सुखानेवाले रोगोंका अन्तर्भाव भी इसीमें हो जाता है मनुष्योमे अस्मिन्वसु वसवो धारयत्विन्द्रः पूपा वरुणो मित्रो अग्निः। मास सानेवाले और वह भी कच्चे मांस खानेवालेको पिशाच इममादित्या उत विश्वे च देवा कहते हैं। इनको समाजसे दूर ही रखना चाहिए। उत्तरस्मिन् ज्योतिषि धारयन्तु ॥ (अथर्व. १९११) ९ स-दान्वाक्षयण-(स-दानव-क्षयणं) असुर 'इस मनुप्यमे जो निवासक शक्ति, क्षात्र, बल, पुष्टि, शांति राक्षसोंको दूर करना अथवा उनका नाश करना चाहिए। मित्रता तथा वाणी इत्यादि शक्तिया है, वे शक्तियां इस मनुष्य पुराणोंमे देवासुर युद्धके नामसे प्रसिद्ध है । आज भी मनुष्य के अन्दर धन्यता स्थापित करें । उसके स्वतंत्र विचार और समाजमे देवासुर संग्राम जारी ही है। उसमें असुरोकी पराजय उसकी सव इन्द्रिय उसमें उत्तम तेज धारण कराये।' अवश्य होती है। मनुष्यों और जगके प्रत्येक पदार्थामे कई निवासक शक्तियां सीसेकी गोली रहती है, उनके कारण वे प्राणी और पदार्थ अपनी अवस्थामे समाजमे ऐसे भी दुष्ट मनुष्य होते है जो बिना कारण रहते है । जिस समय निवासक वसु शक्तिया वढती है, उस लोगोके जानमालकी हानि किया करते है। उनके बारेमे समय पोषण होता है और जब वे कम होती है, तब क्षीणता वेदमें कहा है। आती है। उसी प्रकार इन निवासक शक्तियोका सर्वथा नाश यदि नो गां हंसि यद्यश्वं यदि पूरुषम् । ही मृत्यु है। इसी प्रकार दूसरी शक्तियोके घटने बढनेसे तं त्वा सीसेन विध्यामो यथा नोऽसो अवीरहा। उनके गुण भी घटते बढते है । मनुष्यमे भाठ वसु शक्तियां (अथर्व. ॥१६॥४) इनके अलावा अन्य दैवी शक्तियां भी है। इन शक्तियोंके अथर्ववेदका सुबोध अनुवाद 'दीर्घजीवन और आरोग्य' (१६) । कम करना। विकसित होने पर ही मनुष्य वसु अर्थात् धन प्राप्त करता ज्ञानसे श्रेष्ठत्व प्राप्ति और स्वयंको धन्य कर सकता है। सारांगमें उन्नतिके निम्न- येनन्द्राय सममरः पयांनि मूलमंत्र है- उत्तमेन ब्रह्मणा जातवेदः। (१) अपनेसे निहित वसुशक्तिका विकास । तेन त्वमग्न इह वर्धयेम (२) स्वयमे क्षात्रतेजकी वृद्धि । स जातानां श्रेष्ठय आ घेवेनम ॥ (अर्य. १९३) (३) स्वयंका पोपण। 'जिस उत्तम ज्ञानने क्षत्रियोको उत्तमोत्तम यश प्राप्त (४) स्वयमे शांति और समताका स्थापन । होता है, हे धर्मापदेगा! उस उत्तम ज्ञानसे यहां इस (५) मनमें मित्रभावको बढाना और हिसकभावको मनुष्यकी बुन्द्रि कर, उसके कारण इसे अपनी जातिम अष्टत्व प्राप्त हो ।' (६) वाणीकी शक्तिको विकसित करना। क्षत्रिय, राजा और उन्द्रको इस ज्ञान के कारण ही भोग विजयके लिये संयम प्राप्त होते है और इसी ज्ञान के कारण वह सबन्ने जाता है । उस ज्ञानको प्राप्त कर सभी मनुष्य अपनी अपनी अस्य देवाः प्रदिशि ज्योतिरस्तु जातिया में श्रेष्ठ हो। सूर्यो अग्निरुत वा हिरण्यम् । जनताका कल्याण करना सपत्ना अस्मदधरे भवन्तु उत्तम नाकमधि रोहयेमम् ॥ (अथर्व. १।९।२) ऐपां यनसुत वर्ची ददेऽहं 'देवो इस मनुप्यकी आज्ञामें तेज, नेत्र, वाणी रह । रायस्पोपमुत चित्तान्यग्ने। सपत्ना अस्मदघरे भवन्तु हमारे शत्रु नीचे गिरे और इसे सुसकी उत्तम अवस्था उत्तमं नाकमधि रोहयेमम् । (अथर्य. १९६४) प्राप्त हो। इन सबोके चित्त में अपनी तरफ आकर्षित करता हूं अस्य प्रदिशि सूर्य. अस्तु- इसकी आज्ञामे सूर्य और उनके धनकी वृद्धि मै करूगा। उसी प्रकार उनके रहे । पर मनुष्य यह आसानीसे समझ सकता है कि सूर्य सत्कमका प्रचार में करुंगा। हमारे शत्रु नीचे दब जाग किसीकी भी आज्ञामे रह नहीं सकता। क्योकि यह वात मनु- और हमे सुस मिले।' प्यकी शक्तिके बाहर है। परन्तु नेत्रस्थानमे ढर्गनशक्तिके इस प्रकार उन्नतिकी ये चार मीटिया है- रूपमे रहनेवाला सूर्यका अग संयमीके भाधीन रह सकता है। यह ठीक है कि मनुष्य अग्नि, इन्द्र, वायु आदि वाय देवता- सभी शक्तियोका विकास, उसी प्रकार मन और विचार- (१) शरीरकी धारकशक्ति, इन्द्रियों और अवयवोकी मोपर अधिकार नहीं कर सकता, पर शरीरस्थानीय उन शक्तियोका विकास । देवतामोंके मंशोपर तो अधिकार कर ही सकता है। (२) अपनी इन्द्रियशक्तियोको अपने आधीन रखना मनुप्यमे सभी देवताओके अंग है। ये देवतामोके अंग और भात्मविजयी बनना । मनुष्यशरीरमें जगह-जगह पर है, इन्ही अंशोको इन्द्रिय- शक्ति कहा जाता है । मनुष्यकी स्फूर्ति दृष्टि और वाणी उसी जाति और सदमे सर्वश्रेष्ठ होना। (३) ज्ञानकी वृद्धिसे विविध रस प्राप्त करना और अपनी प्रकार दूसरी इन्द्रिये भी उसकी आज्ञामे रहती है । अर्थात् ४) लोगोंके मनोको अपनी ओर क्षाकर्पित करके उनकी इन्द्रियोको स्वैरविहार करने नहीं देना चाहिए । तात्पर्य यह सेवा कि मनुष्योंको चाहिए कि संयम और मनोनिग्रह द्वारा अपनी करना शक्तियां अपने अधीन रसे। इन्द्रियोको अपने आधीन श्यक है। ये चार सीटियां हर मनुष्य और हर राष्ट्रके लिए भाव- रखना ही आत्मविजय है। इस प्रकारका आत्मविजयी मनुष्य इस प्रकार इस चौथे भागमे अनेक उन्नतिके साधक ही गत्रुओको दबाकर उत्तम सुखको प्राप्त कर सकता है। उपायोका वर्णन है। इस भागमे बताये गए मार्गका भनु- अतः जगत्को जीतनेकी इच्छा करनेवालेके लिए यह माव- श्यक है कि वह प्रथम स्वयंको जीते। सरण कर मनुष्य 'दीर्घजीवन और आरोग्य' प्राप्त कर सकता है। . on- ।
अथर्ववेदका सुबोध अनुवाद [ भाग चौथा] दीर्घजीवन और आरोग्य माणका संरक्षण कां. ११, सू. ४ (ऋषि- भार्गवो वैदर्भि । देवता- प्राण. 1 ). प्राणाय नमो यस्य सर्वमिदं वशे । यो भूतः सर्वस्येश्वरो यस्मिन्त्सर्वं प्रतिष्ठितम् ॥१॥ नमस्ते प्राण क्रन्दाय नमस्ते स्तनयित्नवै । नमस्ते प्राण विद्युते नमस्ते प्राण वर्षते ॥२॥ याण स्तनयित्नुनाभिकन्दुत्योपंधीः । प्रवीयन्ते गर्भान्दधृतेऽथों बहीवि जायन्ते ॥३॥ यत्प्राण ऋतावागतेऽभिक्रन्दुत्योपंधीः । सर्वं तदा प्र मोदते यरिक च भूम्यामधि ॥४॥ अर्थ-(यस्य वशे) जिसके आधीन (इदं सर्वे) यह सब जगत् है उस (प्राणाय नमः ) प्राणके लिये मेरा नमस्कार हो । ( यः सर्वस्य ईश्वरः) वह प्राण सयका ईश्वर (भूतः ) है और (यस्मिन् सर्व प्रतिष्ठितं उनीमें सब जगत् स्थित है ॥ १ ॥ हे प्राण ' (क्रन्दाय ते नमः) गर्जना करनेवाले तुझको नमस्कार हो, (स्तनयित्नवे) मेघोंमे नाद करनेवाले तुझको नमस्कार हो । हे प्राण ! (विद्युते ) चमकनेवाले तुझको नमस्कार हो और हे प्राण ! (वर्षते) वृष्टि करनेवाले तुझको नमस्कार हो ॥२॥ हे प्राण' (यत् स्तनयित्नुना औषधी. क्रन्दति) जब तू मेघोके द्वारा औषधियोके सन्मुख गर्जना करता है, तब भौषधियां (प्रवीयन्ते) तेजस्वी होती है, (गर्भान् दधते) गर्भधारण करती हैं और (अथो वह्वीः विजायन्ते) बहुत प्रकारसे विस्तारको प्राप्त होती हैं ॥३॥ हे प्राण । (ऋतौ आगते ) वर्षा ऋतु आते ही जब तू (ओपधीः अभिनन्दति) औषधियोके सामने गर्जन करने लगता है, (तदा यत् किं च भूम्यां अधि तत् सर्व प्रमोदते) तब जो कुछ इस पृथ्वीपर है, वह सब भान- न्दित होता हे ॥४॥ १ [भव. भा ४ हिन्दी] -
(२)
अथर्ववेदका सुबोध अनुवाद
'दीर्घजीवन और आरोग्य'
॥७॥
॥८॥
यदा प्राणो अभ्यवर्षीद्वर्षणं पृथिवीं महीम् । पशबस्तत्व मौदन्ते महो वै नौ भविष्यति
अभिवृष्टा ओषधयः प्राणेन समवादिरन् । आयुर्वे नः प्रातीतरः सर्वो नः सुरभीरका |॥६॥
नमस्ते अस्त्वायते नमो अस्तु परायते । नमस्ते प्राण तिष्ठतु आसीनायोत ते नमः
नमस्त प्राण प्राणते नमो अस्त्वपानते ।
पराचीनाय ते नमः प्रतीचीनाय ते नमः सर्वस्मै व इदं नमः
या ते प्राण प्रिया तनूर्यो ते प्राण प्रेयसी । अथो यद्भपज तव तस्य॑ नो धेहि जीवसे
प्राणः प्र॒जा अर्नु वस्ते पिता पुत्रमिव प्रियम् । प्राणो ह सर्वस्येश्वरो यच प्राणति यच न ।। १० ।।
प्राणो मृत्युः प्राणस्तक्मा ग्राण देवा उपासते । प्राणो है सत्यवादिनमुत्तमे लोक आ दधत् ।।११॥
प्राणो बिराट् प्राणो देष्ट्री प्राणं सर्व उपासते । प्राणो ह सूर्यश्चन्द्राः प्राणमाहुः प्रजापनिम् ॥१२॥
॥९॥
!
1
अर्थ- (यदा प्राण. ) जर प्राण (वर्येण मही पृथिवी अभ्यवत् ) वृष्टि द्वारा इस बडी भूमिपर वर्षा करता
है, (नत् पशवः प्रमोदन्ते) तब पशु हर्षित होते हैं [ और समझने हैं कि ] निश्चयसे अघ (न:वै महः भविष्यति)
हम सबकी वृद्धि होगी ॥५॥
(अभिवृष्टाः ओपचयः ) वृष्टि होनेके पश्चात् औषधियां (प्राणेन समवादिरन् ) प्राणके साथ बात करती है
कि हे प्राण ! (नः आयुः वै प्रातीतरः) तूने हमारी आयु बढायी है - और हम सबको (सुरभी.) सुगधियुक्त
(अका) क्रिया है ॥ ६॥
(आयते ते नमः अस्तु ) आनेवाले तुझ प्राणके लिये नमस्कार हो और (परायते नमः अस्तु) जानेवाले
प्राणके रिये भी नमस्कार हो। हे प्राण ! (निष्टते) स्थिर रहनेवाले और (आसीनाय ते नमः) बैठनेवाले तुम
प्राणके लिये नमस्कार हो ॥ ७ ॥
हे प्राण ! (प्राणते) जीवनका कार्य करनवाले तुझे नमस्कार हो (अपानते) अपानका कार्य करनेवाले तेरे लिये
नमस्कार हो। (पराचीनाय) मागे बटनवाले और (प्रतीचीनाय ) पीछे हटनेवाले प्राण के लिये नमस्कार हो (सर्वस्मै
त इदं नमः) सम्र कार्य करनेवाले तेरे लिए मेरा नमस्कार हो ॥ ८ ॥
हे प्राग (या ने प्रिया तनू.) जो मेरा (प्राणमय) प्रिय गरीर है, (या ते प्रेयसी) और जो तेरे (प्राणा-
पानम्प) प्रिय भाग हैं, तथा (अथो यत् तव भेपज)जो तेरा मोषध है वह (जीवसे नः धेहि ) दीर्घजीवन के लिये
हमे दे ॥९॥
(पिता प्रियं पुत्रं झ्व) जिस प्रकार प्रिय पुनके साथ पिता रहता है, उसी प्रकार (प्राणः प्रजाः अनुवस्ते)
सन प्रनामोफे माथ यह प्राण रहता है । (यत् प्राणति) जो प्राण धारण करते हैं और (यत् च न)जो नहीं धारण
सतं, (प्राणः सर्वस्य ईश्वरः) टन सबका प्राण ही ईश्वर है ॥ १० ॥
(प्राण. मृत्युः) प्राण ही मृत्यु है और (प्राणः तक्मा) प्राण ही जीवनकी शक्ति है । इसलिये (प्राणं देवाः
उपालते) मब देव प्राणकी उपासना करते है । (प्राणः ह सत्यवादिनं) क्योंकि प्राण ही सत्यवादीको (उत्तमे लोके
उधत् ) उत्तम लोकमें पहुचाता है ॥ १५॥
प्राण (वि-राज ) विशेष नेजस्त्री है और प्राण ही (देष्ट्री) सवका प्रेरक है, इसलिये (प्राणं सर्व उपासते) प्राण-
को ही पत्र उपासना करते हैं । सूर्य, चद्रमा भौर प्रजापति मी (प्राणं आहुः) प्राण ही है ॥ १२ ॥
- प्राणका संरक्षण (३) । य प्राणापानौ व्रीहियुवाबनवान्प्राण उच्यते ह प्राण आहितोऽपानो व्रीहिरुच्यते ॥१३॥ अपानति प्राणति पुरुपो गर्भ अन्तरा । यदा त्वं प्राण जिन्वस्यय स जायते पुनः ॥ १४॥ प्राणाहुर्मातरिश्वानं वातौ ह प्राण उच्यते । प्राणे हे भूतं भव्यं च प्राणे सर्व प्रतिष्ठितम् ।। १५ ।। आथर्वणीरोगिगसीदेवीमनुष्यजा उत । ओषधयः प्रजायन्ते यदा त्वं प्राण जिन्यसि ॥१६॥ यदा प्राणो अभ्यर्वद्विषेण पृथिवीं महीम् । ओषधयः प्रजायन्तेऽथो याः काश्च वीरुधः ॥१७॥ यस्तै प्राणेदं वेदु यस्मिश्चासि प्रतिष्ठितः । सर्वे तस्मै बलि हरानमुष्मिल्लोक उत्तमे ॥१८॥ या प्राण बलिहृतस्तुभ्यं सर्वाः प्र॒जा इमाः । एवा तसै बलि हान्यस्त्वां शृणवत्सुश्रवः ।। १९॥ अन्तर्गमेश्वरति देवतास्थाभूतो भूतः स उ जायते पुनः । स भुतो भव्य भविष्यत्पिता पुत्र प्रविवेशा शचीभिः ॥२०॥ अर्थ- (प्राणा पानी ब्रीहियो ) प्राण और अपान ही चावल और जौ है। (अनड्वान् ) बैल ही (प्राणः उच्यते ) मुख्य प्राण है। (यवे ह प्राणः आहितः ) जी में प्राण भरा हुभा है भौर (बीहि अपानः उच्यते) चावलको भपान कहते है ॥३॥ (पुरुषः गर्भे अन्तरा) जीव गर्भके अंदर (प्राणति अपानति) प्राण और भयानके व्यापार करता है । हे प्राण जब तू (जिन्वसि) प्रेरणा करता है, तब वह (अथ सः पुनः जायते) जीव पुनः उत्पन्न होता है ॥ १४ ॥ (प्राणं मातरिश्वानं आहुः) प्राणको मातरिश्वा कहते है और ( वातः ह प्राणः उच्यते ) वायुका नाम ही प्राण है। (भूतं भव्यं च ह प्राणे) भूत, भविष्य और वर्तमान कालमें जो कुछ है (सर्व प्राणे प्रतिष्टितं ) वह सब प्राणमे ही प्रतिष्ठित है॥ १५॥ हे प्राण ! (यदा) जबतक तू (जिन्वसि) प्रेरणा करता है तयतक ही माथर्वणी, आंगिरसी, दैवी और मनुष्यकृत (ओषधयः) औषधियां (प्रजायते) लाभदायक होती हैं ॥ १६ ॥ (यदा प्राण. मही पृथिवी,अभ्यवत्) जब प्राण इस बडी पृथ्वीपर वृष्टि करता है तब (याः काः च ओषधयः प्रजायन्ते )जो कुछ औपधियां और वनस्पतियां होती हैं, वह सव बढ जाती हैं ॥ १७ ॥ हे प्राण (यः ते इदं वेद) जो मनुष्य तेरी इस शक्तिको जानता है और ( यस्मिन् प्रतिष्ठितः असि) जिस मनु'यमें तू प्रतिष्ठित होता है, (तस्मै सर्वे वलि हरान् ) उस मनुष्यका इस उत्तम लोकमें सव'ही सत्कार करते हैं॥ १८ ॥ हे प्राण ! ( यथा) जिस प्रकार ये (तुभ्यं सर्वाः इमाः प्रजाः बलिहतः) सय प्रजाजन तेरा सत्कार करते है उसी प्रकार (यः) जो (सुश्रवाः ) उत्तम यशस्वी है और (त्वा) तेरा सामर्थ्य (शुणवत्) सुनता है (तस्मै बलि हरान् ) उसके लिये भी बलि देते हैं ॥ १९ ॥ (देवतासु आभूतः ) इंद्रियादिकोंमें व्यापक प्राण ही (अंतःगर्भः चरति) गर्भके अंदर चलता है। जो (भूतः) पहिले हुआ था (सः उ.) वह ही ( पुनः जायते) फिर उत्पन्न होता है । जो (भूतः ) पहिले हुआ था (स) वह ही (भव्यं भविष्यत्) भय होता है आगे भी होगा। पिता (शचीभिः) अपनी सब शक्तियोके साथ (पुत्र प्रविवेश) पुत्रमे प्रविष्ट होता है ॥ २० ॥ -- - (१) अथर्ववेदका सुबोध अनुवाद --- दीर्घजीमन और आगंग्य' एक पादं नोखिदति सलिलाद्धंस उच्चरन् । यदङ्ग स तमुरिखदेन्नैवाद्य न श्वः स्यान्न रात्री नाहः स्यान्न व्यच्छेित्कदा धन अष्टाचक्र वर्तत एकनेमि सहस्राक्षरं प्र पुरो नि पृथा । अर्धेन विश्वं भुवनं जजान यदस्याध कंतमः स केतु: 1॥२२॥ यो अस्य विश्वजन्मन ईशे विश्वस्य चेप्टतः । अन्येपु क्षिप्रर्धन्वने तमे प्राण नमोऽस्तु ते ॥२३॥ यो अस्य सर्वजन्मन ईशे सर्वस्य चेटतः । अतेन्द्रो बाणा धीरः प्राणो मार्नु तिष्ठत ||२४॥ ऊर्ध्वः सुप्तेषु जागार ननु तिर्यङ् नि पद्यते । न गुप्तभस्य सुप्तेष्वनु शुश्राव कचन प्राण मा मत्पर्यावृतो न मदन्यो भविष्यसि । अपां गर्भमिव जीवसे प्राण बध्नामि त्वा मर्यि ॥ २६ ॥ अर्थ-(सलिलात् हंसः उच्चरन् )जलने इंस उपर उठता तुला (पकं पादं म उत्तिदनि) पर पाको नहीं उठाता। ( अंग ) हे प्रिय ( यत् स तं उत्खिदेत् ) यदि वह उस पावको भी उठा (न एव अरम्यान, न श्वः न रात्रिः न अहः स्यात्, न व्युच्छेत् कदाचन ) तो भाज, कल, रात्री, दिन, प्रकाश और भवराट भी न हो ॥२१॥ (अष्टाचक्रं ) आठ चक्रोसे युक्त (सहस्राक्षरं ) सहन अक्षरोसे युक्त (पकनेमि वर्तते) एक सुगवाला यह प्राण- चक्र (प्र पुरः नि पश्चा ) भागे और पीछे चलता । इसके (अधन विश्वं भुवनं जजान ) लाये भागने यय भुवन उत्पन्न होता है। (यत् अस्य अध) पर जो इसका थाधा भाग शेप है (कतमः सः केतु) वर किमका चिन्द ? ॥२०॥ हे प्राण ! ( अस्य विश्व-जन्मनः ) सयको उन्म देनेवाले और (चेष्टनः विश्वस्य ) एल ना करनेवाले हम विश्वका (यः ईगे ) जो ईग है, ऐसे सय (अन्येपु) अन्योंमें (क्षिप्र-धन्वने नमः) गीघ्र गनियाले. सेरे लिये नमन हो ॥ २३ ॥ ( यः अस्य सर्वजन्मनः ) जन्म धारण करनेवाले भोर (चेष्टत सर्वस्य ) हलचर करनेवाले सय जगनका जो (ईगे) स्वामी है, वह धैर्यमय प्राण (अतन्द्रः) मालत्यरहित होकर (ब्रह्मणा धीरः) भात्मगनिने युक होता हुमा सदा (मा) मेरे पास (अनुतिष्ठतु) सना रहे ॥ २४ ॥ ( सुप्तेपु ) सबके सो जानेपर भी यह प्राण (ऊर्ध्वः) वडा रहकर (जागार) जागता है और (ननु नियंद निप- द्यते) निस्सन्देह तिरछा गिरता है । (सुप्तेपु अस्य सुतं) मयके सो जानेपर सफा सोना (कश्चन न अनुशुश्राव ) किमीने भी नहीं सुना है ॥ २५ ॥ हे प्राण ! (मत् मा पर्यावृतः ) मुझमे पृथक न हो। (न मत् अन्यः भविष्यसि ) मुझसे दूर न हो। (जीवसे अपां गर्भ इव) पानीके गर्भके समान, हे.प्राण ! (जीवसे मयि त्वा वध्नामि ) जीवन के लिये अपने सदर तुझे बाधता हु ॥ २६ ॥ - प्राणका संरक्षण प्राणका महत्व परि है । सय मन्य शक्तियों के सो जानेपर भी इस शरीरमें प्राणकी विद्याको 'प्राण-विद्या' कहते है । मनुग्यो के लिये प्राणशक्ति कार्य करती रहती है। परंतु प्राण के अस्त हो जाने- सब अन्य विद्यामोंकी अपेक्षा प्राणविद्याकी अत्यत भावश्यकता पर कोई भी अन्य शक्ति कार्य करनेमे समर्थ नहीं होती। है। मनुष्य शरीरमे भौतिक और सभौतिक अनेक प्रकारकी इससे प्राणका महत्त्व स्वयं स्पष्ट हो सकता है। शक्तिया है। उन सन शक्तियोंमे प्राणशक्तिका महत्व सर्वो इस सूक्तके प्रथम मंत्रमें 'प्राण' शब्दसे परमेश्वरकी प्राणका संरक्षण (५) । । - विश्वव्यापक जीवन-गक्तिका ( Life energy ) वर्णन वर्षत् ' । ये सव मेव अंतरिक्षमे प्राणायुको धारण करते किया है । इस परमात्माकी जीवनगक्तिके आधीन यह सब है और वृष्टिद्वारा वह प्राण भूमंडल पर आता है। और संसार है, इसीके आधारसे यह चल रहा और इसीसे सब वृक्षवनस्पतियोंमें सचरित होता है। संसारका नियमन भी हो रहा है। समष्टि दृष्टिसे सर्वत्र तृतीय मंत्रमे कहा है कि अंतरिक्ष स्थानका प्राण वृष्टि प्राणका राज्य है। व्यष्टि दृष्टिसे प्रत्येक गरीरमें भी प्राणका द्वारा औषधि वनस्पतियोमे आकर वनस्पतियोंका विस्तार ही भाधिपत्य है । प्राणिमात्रके प्रत्येक शरीरमे जो जो इंद्रिया- करता है । प्राणकी यह शक्ति प्रत्यक्ष देखने योग्य है। दिक शक्तियां है, तथा विभिन्न अवयव और इंद्रियें हैं, सव वृष्टि द्वारा प्राप्त होनेवाले प्राणसे न केवल वृक्षवनस्पतिया ही प्राणके वासे हैं, क्योकि उसीके आधारसे सव शरीर ही प्रफुल्लित होती है, अपितु अन्य जीव जंतु और प्राणी भी प्रतिष्ठाको प्राप्त हुआ है । प्राणके बिना इस शररिकी स्थिति बडे हर्पित होते है । मनुष्य भी इसका स्वयं अनुमव करते ही नहीं हो सकती । अर्थात् प्राणके वशमे होनेसे मव शरीर है। यह तृतीय मंत्रका कथन है। सुदृढ और नीरोग हो सकता है और प्राणके निर्वल होनेसे सत्र अंतरिक्षस्थ प्राणका कार्य इसी प्रकार चतुर्य और पचम शरीर निर्बल होजाता है । इसलिये प्राणको स्वाधीन करनेकी मंत्रम भी बताया है । पहिले मंत्रमे प्राणके सामान्य स्व. आवश्यकता है। रूपका वर्णन किया है, उसकी संतरिक्षस्थानीय एक विभूति अपने शरीरम श्वास उच्छ्वास रूप प्राण चल रहा है और यहा बता दी है। अब इसीकी वैयक्तिक विभूति सप्तम जन्मसे मरणपर्यत यह कार्य करता रहता है। सव इंद्रियो और अष्टम मनोमें बतायी जाती है। और अवयवोके मर जानेके पश्चात् भी कुछ देरतक प्राण श्वासके साथ प्राण अन्दर जाता है और उच्छ्वासक कार्य करता रहता है, इसलिये सबमे प्राण ही मुख्य है साथ वाहर आता है । प्राणायाम के पूरक और रेचकका बोध और वह सबका आधार है। अपने प्राणको केवल साधारण आयत्, परायत्' इन दो शब्दोसे होता है। स्थिर श्वासरूप ही समझना नहीं चाहिये, अपितु उसको श्रेष्ट दिव्य- (तिष्ठत् ) रहनेवाले प्राणसे कुभकका बोध होता है । और शक्तिका संग समझना चाहिए है। मनको इच्छाशक्तिसे वाह्य कुंभकका ज्ञान 'आसीन' पदसे होता है । ' (१) प्ररित प्राण ही गरीरका आरोग्य सपादन करनेमें समर्थ होता पूरक, (२) अन्त कुभक, (३) रेचक और ( ४ ) बाह्य है, इस दृष्टिसे प्राणका महत्त्व सव शरीरमे अधिक है । इसके कुंभक ये प्राणायामके चार भाग हैं। इन चारोसे युक्त प्राणा. महत्वको समझना और सदा मनसे धारण करना याम ही परिपूर्ण प्राणायाम होता है। इनका वर्णन इस मंत्री चाहिये । 'प्राणके आधीन मेरा सव गरीर है, प्राणके कारण (१) आयत् , (२) तिष्ठत् , (३) परायत्, (४) वह स्थिर है और उसकी सब हलचल प्राणको प्रेरणासे ही आसीन ' इन चार गटोसे हुआ है । जो भदर भाने- होती है इस प्रकार के प्राणकी मैं उपासना करूंगा और उसको वाला प्राण होता है, ' उसको आयत् प्राण' कहा जाता अपने आधीन करूगा। प्राणायामसे उसको प्रसन्न करूंगा है, यही पूरक प्राणायाम है। माने जानेकी गतिका निरोध और वशीभूत प्राणसे अपनी इच्छानुरूप अपने शरीरमें कार्य करके जो प्राण अंदर स्थिर किया जाता है, उसको 'तिष्ठत् करूगा ।' यह भावना मनमे धारण करके अपने प्राणकी प्राण' कहते है, यही कुंभक अथवा अत.कुभक प्राणायाम होता है जो अंदरसे बाहर जाता है, उसको 'परायत् प्राण' शक्तिका चितन करना चाहिए। कहते है, यही रेचक प्राणायाम है। सब प्राण रेचक द्वारा यह प्राण जैसे गरीरम है वैसे ही बाहर भी है । इस विप- बाहर निकाल कर उसको बाहर ही रोके रखना 'आसीन यमें द्वितीय मंत्र देसने योग्य है। प्राण' द्वारा होता है, यही बाह्यकुंभक है। प्राणायामके इस द्वितीय मत्रमें बादलोंके अनेक प्रकार बताए है जो ये चार भाग है । इन चारोंके अभ्याससे प्राण वगमे होता इस तरह है- केवल गरजनेवाले मेघोंका नाम 'कंद' है, है । यही इस प्राणदेवताको प्रसन्न करनेका उपाय है । यही बडी गर्जनाके साथ विजली गिरानेवाले मेघोंका नाम प्राणोपासनाकी विधि है। 'स्तनयित्नु' है, जिनसे विजली बहुत चमकती है उनको प्राण नाम उसका है कि जो नासिका द्वारा हृदयमे पहुं. विद्युत् कहते है और वृष्टि करनेवाले मेघोंका नाम है चता है । अपान उसका नाम है कि जो नाभिके निम्र देशसे . , * (१) अथवेद का सुबोध अनुवाद दीर्घजीवन और धागग्य' P'म अपनी प्रागनिय अपने गंगागा निघतभाश्य गुदाक मारतक कार्य करता है। उन्ही दो अघ नाम प्राचीन' और 'प्रतीचीन 'प्राण है। प्राणको स्वाधीन तमगा', यह भावना मनन योग्ण परी या गम रसनका तात्पर्य प्राण और अपानको म्यादीन करना है। माना। भवानकी म्वाधीनता मलमन्त्रात्मग उनम प्रकार होते है दाम मत्रमें कहा कि प्रकार पुरा सरग करनेकी है और प्राणकी स्वाधीनताने भविरकी शुद्धि होती है । इस हमा पिता कसा मी प्रसार प्राग सारखा करना प्रकार दोनांक व गाभ्न होनस गरीरकी नीरोगता मिः होती चाहना।। मय प्रतानार भरीगमें, नमनापियाम जापर, है। इस प्रकार प्राण वामे दोनये प्राण के अधीनस्थ बहा रहरमा मरक्षण यह प्राण रकान गरीरका अनुभव होमकता है । मी उस मंत्र करना कवर प्राण धारण गंगा प्राणियोका माग धारण है कि नर्वस्मै त इदं नमः • अर्यात न मय सुट है, नही करंग, ऐन पावर पदाथाहा भी रक्षा प्रागनी करना इमलिये तेरा सत्कार करता ह' गरीरमा कोई भाग 7। यर्थान कोई यह न ममत किसानोरडवार परमार प्राणशक्ति बिना कार्य नहीं कर सकता, इसलिये मर प्राणियोनी माग है, अपितु भापति, पार भात अवयवाम सब प्रकारका कार्य करनेवाले प्राणका सदा ही पदायाम मी माग है और न सय दानाम नहर प्राण सकार करना चाहिये । हरएक मनुस्यको उचिन र कि, सत्रका संरक्षण करना। प्राणी नि ममान पन्य वह अपने प्राणको इस अक्तिका यान कर, विश्वासपूर्वक और मव पायाम व्यापक समाना चाहिए। इम शान्तिका न्मरण ग्रो, ज्योकि आरोग्यकी मिदि गरीब माणक चल जानेपर मृत्यु होती है । और तयतक हनीपर निर्भर है। इस प्राण मनिका इतना महत्व कि गरीरमं प्राण कार्य करना, नयानगम्म मामय भया इमकी विद्यमानतामें ही अन्य मोषध कार्य कर सकते है। महनगन्ति गाती है, ग्यारहं मनसायन है। हम प्रकार अन्यथा हस गति कमजोर होनेपर कोई औषध कार्य एक ही प्राण जीवन और मृत्युका का होता है। देव' नही कर सकता। प्राण ही मव भौषधियामी नापधि है, इस शब्दसे इन मत्रमें इगियोंका प्ररण होगा। सव इंद्रिया विषयम नवस मन्न देखने योग्य है। प्राणकी ही उपासना करती है लर्यात प्राण साथ रहकर भन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय और मानदमय अपने सदर वर प्राप्त करती है। जो इंटिय प्राण. साथ ये पाच कोग है। हनको पांच शरीर भी कह सकते है। इन रहकर घर प्राप्त करना है वह ही कार्यक्षम होता, परंतु पाच शरीरासे 'प्राणमय डागर' का वर्णन इस मत्रमे जो इंद्रिय प्रागमे पियुन होना है, द मर जाना है । यही किया है । 'प्रिया तनू' यह प्राणमय कोग ही है । मन प्राण उपासना और यही रह उपासना | सर देवोंमें ही इसपर प्रेम करते है, सब चाहते है कि यह गरीर सदा कार्य करने वाली महादेवको मनिका यहा अनुभव हो सकता प्राणमय रंई । प्राण और अपान ये हम गरीरके दो प्रेममय है । प्राण ही महादेव, न्द्र, शभु मादि नामोंसे योधिन कार्य है। प्राण शक्तिका संवर्धन होता है और अपारसे विष होता है। व्यक्ति के गरीन्मे प्राण ही उसकी विभूति है । सय दर होकर स्वास्थ्यका मरक्षण होता है। प्राणके मदर जगत में उसका स्वरूप विश्वव्यापक प्राणानि ही है। इस एक प्रकारका भिपज' अर्थात् औषध है, दोषोको दूर व्यापक प्राणशक्ति पाश्रयमे अनि, वायु, इद, मर्य क्षादि करनेकी शक्तिका नाम (टोप-ध) औपब अथवा भेषज देवतागण रहते हैं और अपना कार्य करते हैं। व्यष्टिमें और होता है । शरीरके मत्र दोप दूर करने और वहा गरीरमे समष्टिम एक ही नियम कार्य कर रहा है व्यष्टिम प्राण के भारोग्यकी स्थापना करनेका यह पवित्र कार्य करना, प्राणका माय इद्रिया रहती है और समष्टिमें व्यापक प्राणशक्ति के ही धर्म है । प्राणका दृसरा नाम 'रुद्र' हे और न्द्र गन्द- कार्य वैद्य भी होता है। साय अग्नि मादि देव रहते है। दोनों स्थानों में दोनों प्रकार- के देव प्राणकी उपासनासे ही अपनी शक्ति प्राप्त करते हैं। इस प्राणमें लापव है, वेदक हम कथन पर अवश्य तीसरे देव समाज और राष्ट्रम विहान् शूर भादि प्रकारके विश्वास रखना चाहिये, क्योंकि यह विश्वास अवास्तविक है, वे सत्यवादी, सत्यनिष्ट, सत्यपरायण और सत्याग्रही नहीं है, अपितु अपनी शक्तिपर विश्वास रसनेक ममान ही बनकर प्राणायाम द्वारा प्राणोपासना करते है। प्राण ही यह वास्तविक विश्वास है। मानस-चिकित्साका यह मृल इनको उत्तम लोकमें पहुंचाता है । अर्थात् इनको श्रेष्ट बनाता है । अपनी प्राणशक्तिम अपनी ही चिकिन्सा की जा सकती है। अर्थात् प्राणोपासनास सभी श्रेष्ट बनते है । - प्राणका संरक्षण (७) सत्यसे बलप्राप्ति जीवात्मा है। गरीर क्षेत्र है, जीवात्मा क्षेत्रज्ञ है, प्राण बैल है और जीवनव्यवहाररूपी खेती यहां चल रही है । वेदमें मन- यहां यह प्रश्न उठ सकता है कि ' सत्यवादिताका प्राण- उपासनाके साथ क्या सबंध है? उत्तरमे यही कहा जा सकता ने बडा अर्थका अनर्थ किया है । इवान् शब्दका प्राण अर्थ है, यह न समझने के कारण कईयो- है कि सत्यसे मन पवित्र होता है और उसकी शक्ति बढती है। प्राणकी शक्निके साथ मानसिक शक्तिके विकास होनेसे अनड्वान् दाधार पृथिवीमत द्याम ॥ बडा लाभ होता है । प्रणायामसे प्राणकी शक्ति बढती है और (अथर्व. ०।११११) सत्यनिष्ठासे मनकी शक्ति विकसित होती है इस प्रकार दोनो प्राणने पृथिवी और धुलोकको धारण किया हुआ है। शक्तियोका विकास होनेसे मनुष्यकी योग्यता भग्नाधारण यह वास्तविक अर्थ न लेकर, बैलने पृथिवी और धुलोकको हो जाती है। धारण किया हुआ है, ऐसा भाव कइयोने समझा है । यदि प्राण विशेष तेजस्वी होता है। जबतक शरीरम प्राण पाठक इस अनड्वान् सूक्तका अर्थ इस प्राणसूक्तके अर्थके साथ देखेंगे तो उनको स्पष्ट पता लग जायगा कि वहा रहता है, तभीतक शरीरमे तेज होता है। प्राण के चले जानेसे अनड्वान्का अर्थ केवल बैल ही नही है, प्रत्युत प्राण भी है। शरीरका तेज नष्ट होजाता है । सब गरीरमे प्राणसे ही प्रेरणा इसी कारण इस सूक्तमे प्राणको अनडवान् कहा है । यत्र प्राण होती है । बोलना, हिलना, चलना भादि सब प्राणकी प्रेर- और चावल अपान है, यह कथन आलंकारिक है । धान्यमे णासे ही होता है। अर्थात् शरीरमे तेज और प्रेरणा प्राणसे प्राण और अपान अर्थात् प्राणकी सपूर्ण शक्तियां व्याप्त है, ही होती है। इसलिये सब प्राणीमान प्राणकी ही उपासना धान्यका योग्य सेवन करनेसे हमारे शरीरमे प्राणादिक भाते करते है अथवा यो समझिए कि जबतक वे प्राणके साथ है और हमारे शरीर के अवयत्र बनकर कार्य करते है। रहते है तबतक ही उनकी स्थिति होती है । जब वे प्राणका गर्भके अदर रहनेवाला जीव भी वही गर्भमे प्राण और साहचर्य छोड देते है तब उनकी मृत्यु ही होती है। इच्छा न अपान के व्यापार करता है। और इसीलिये वहा उसका जीवन होनेपर भी सब प्राणी प्राणकी ही उपासना कर रहे है यदि मानसिक श्रद्धाके साथ प्राणोपासना की जायगी तो होता है । जब जन्मके समय प्राण जन्म होने योग्य प्रेरणा करता है, तब उसको जन्म प्राप्त होता है। अर्थात् जन्मके निःसंदेह बड़ा लाभ हो सकता है। क्योकि इस जीवनका जो वैभव है, वह प्राणसे ही प्राप्त हुआ है । इसलिये अधिक अनुकूल प्रेरणा करना प्राणके ही आधीन है । इस चतुर्दश वैभव प्राप्त करना हो तो प्रयत्नसे उसकी उपासना करनी मंत्रमे 'सः पुनः जायते' यह वाक्य पुनर्जन्मकी कल्पनाका ही चाहिये । प्राणायामका यही फल है। इस जगतमें सूर्य- करता है, वह सब प्राणकी प्रेरणासे ही होता है, यह भाव इस मृल वेदमे बता रहा है, जीवात्मा पुनः पुनः जन्म धारण चन्द्र ये प्राण ही हैं, सूर्यकिरणोके द्वारा वायुमे प्राण भरा मत्रमें स्पष्ट है। जाता है और चंद्र अपनी किरणोंसे औषधियोमे प्राण भरता १५ व मत्रमे “ मातरि-श्वा" शब्दका अर्थ 'माताके है । मेघ, विद्युन आदि अपने-अपने कार्य द्वारा जगत्को प्राण दे ही रहे है । अंतमे प्राणोका प्राण जो प्रजापति पर- अदर रहनेवाला, माताके गर्भमे रहनेवाला' है, माताके गर्भमे प्राणरूप अवस्थामें जीव रहता है , इसलिये जीवका नाम मात्मा है, वही सच्चा प्राण है, क्योकि जीवनकी सब प्राण- मातरिश्वा' है । गर्भमे इसकी स्थिति प्राणरूप होनेसे शक्तिका वह एकमात्र माधार है। यही कारण है कि वेदमे इसका नाम ही प्राण होता है। इस कारण प्राण और मात- प्रजापति परमात्माका नाम प्राण ही है । अन्य पदार्थों में भी प्राण है उसका वर्णन तेरहव मत्रमे इस प्रकार किया है- रिश्वा शब्द समान अर्थ बताते है। मातरिश्वा' का दूसरा अर्थ वायु । वायु, वात मुख्य प्राण एक ही है, उसके बलसे शरीरमे प्राण और आदि शब्द भी प्राणवाचक ही है । क्योकि वायुरूप प्राण ही अपान कार्य करते है । इसी प्रकार खेतीमे बैलकी शक्ति हम अंदर लेते है और प्राणधारण कर रहे है, प्राणका विचार मुख्य है, उसकी शक्तिसे ही चावल और जौ आदि धान्य करनेसे ऐसा पता लगता है कि उसके भाधारसे भूत, भवि- उत्पन्न होता है। वेदमे अनड्वान् ' यह बैलवाचक प्य और वर्तमानका सब जगत् रहता है। प्राणके आधारसे गन्द प्राणका ही वाचक है। समझो कि गरीररूपी खेतमे ही सब रहता है। प्राणके बिना जगत्मे किसीकी भी स्थिति यह प्राणरूपी बैल ही खेती करता है और यहाँका किसान नहीं हो सकती । पूर्वजन्म, यह जन्म और पुनर्जन्म ये सब , . है (८) अथर्ववेदका सुबोध अनुवाद 'दीर्घजीवन और भाग्य' - - पाणके कारण होने है । अर्थात भृन, भविष्य और वर्तमान विधिम मुग्य है । आरोग्य विष यान पानी निरपेन- कालम जो कर्मके संस्कार प्राणसे मंचित होते है, उसके कारण ता दममें होने उसको बागिरम-चिमिमा अर्थात अपने प्रयायोग्य रीतिसे पुनर्जन्मादि होने है। अंगांक, महाग होनेवाली चिरित्या । औषधियोका उपयोग तबतक ही होता है कि जरता (४) आथर्वणः आपत्रय.= 'अ-था' नाम है शाणकी गति गरी में है। जब प्राणको शनि, गरीरये अलग योगीका। मनमी विविध यत्तियांका निर्णय करनेवाला नि. होने लगती है, तब किसी औषधिका कोई उपयोग नहीं होना। वृनियोंको म्याधीन रखनेवाला योगी माया कहलानाम इसी सूनके मंत्र ९ में “ प्राण ही औषधि है कि जो जीवन- मनका भय (अन्य ) निश्चल, लय, स्थिर, गनिदान का हेतु है, "ऐसा कहा है, उसका अनुमधान हम १६ जे गया है। स्थितप्रज्ञ, पिरहि, रियरमति नादिन इसका मन्त्रक साथ करना उचित है। भार बनाते है। योगी सोग मंत्रमागर जी चिकिया इस मंत्रमें आए हुए '(१) आथर्वणीः, (२) आगि- करते हैं उसका नाम भाव-चिरिया ।। यिक प्रेममे, रसीः, (३ ) दैवी और (४) मनुष्यजाः ये नार नाम परमेश्वरभकिन, मानमकिन और आत्मविश्वास मंसिद्धि बार प्रकारकी चिकित्साओं के बोधक है। जो निम्न प्रकार है- रोती हैं। यह आवरंगी-चिरिया साने श्रेष्ठ है कि इनमे जो कार्य होता है, वह मारमा जन्मिय होगा। दम- (१) मनुष्यजाः ओषधयः- मनुष्योकी बनाई सीप धियाँ, अर्थान कपाय, चूर्ण, अवलेह, भस्म, करप, आदि लिये अन्य चिकित्माओकी अपेक्षा इसी श्रेष्ठता है। इसमें प्रकार जो वैद्यों, टास्टरों और हकीमोके बनाये होते हैं उनका कोई सदेव ही नहीं है। ये सय चिनिन्मा प्रसार तयाक समावे। इसमें होना है। ये मानवी औषधियों प्रकार है। कार्य करने है कि जग्गा प्राण शरीरमै रहना चाहता है। जब इससे भेट देवी विधि है। प्राण चला जाता है तब कोई चिक्तिमा दायक नहीं हो (२) दैवी औषधयः- आप, तेन, वायु आदि देयोले सकनी । इस प्रकार प्राणका महव विशेष है । द्वारा लो चिकित्मा की जाती है, वह देवी-चिकित्मा है। जल- चिकित्सा, सौरचिकित्सा, वायुचिकित्सा विचुचिकित्सा आदि ग्राणमी गतिका वर्णन हामे सुनना है,प्राग सब देवी चिकित्साक प्रकार है। सूर्य, चंद्र, वायु आदि देवता. के बल पर विधान करता है, वहीं प्राणका यश प्राप्त करने में जाँक साक्षात् सबधमे यह चिकित्मा होती है और आश्चर्य- यशस्वी होता है और जिस मनु'या में प्राण उत्तम रीतिसे फारक गुण प्राप्त होता है, इसलिये हमकी योग्यता वही है। प्रतिप्टिन और स्थिर रहना है, उसका ही मर सन्कार करते इसके अतिरिक्त देवयज्ञ अर्थात् हवन आदि द्वारा जो चिकि- हैं उसकी स्थिति उत्तम लोता होती है और उसीका या रसा होती है उसका भी समावेश इससे होता है। देवयज्ञ सर्वत्र फैरता है। प्राणायाम द्वारा जो अपने प्राणको प्रसजौर द्वारा देवताओको प्रसन्न करके, उन देवताओक जो वो मग स्वाधीन करता है, उसका या मय प्रकारसे बदता है । इस हमारे गरीग्में है, उनका आरोग्य सपादन करना कोई अस्वा- उन्नीसवें मंत्रमे 'वलि गब्दका अर्थ सत्कार, पुना, अपंण, भाविक प्रकार नहीं है। यह बात युक्तियुक्त और तर्कगम्य गनिप्रदान आदि है। मव अन्य देवों द्वारा प्राणकी ही पूजा- का अनुभत्र अपने शरीरमे भी किया जा सकता है। नेत्र, कर्ण, ३) आंगिरसीः औषधयः- अगो, अवयवो और नासिक आदि सब अन्य देव प्राणकी ही पूजा करते है, प्राण इंद्रियों में एक प्रकारका रस रहता है, जिसके कारण हमारे की उपासनासे ही प्राणकी शकि उनमें प्रकट होती है । इसी अथवा प्राणियोंके गरीरकी स्थिति होती है । उस रसके द्वारा प्रकार प्राणायामकी साधना करनेवाले योगीका सत्कार अन्य तो चिकि सा होती है वह आंगि-सचिकित्सा कहलाती है। सजन करके उनक उपदेशसे प्राणोपासनाका मार्ग मानसिक इच्छाशक्तिकी प्रबल प्रेरणासे इस रसका अंगप्रत्यगी- जानकर स्वयं बलवान बन सकते है। यही कारण है कि प्राण- में संचार करनेसे रोगोंकी निवृत्ति होती है । मानसिक चित- याम करनेवाले योगीकी सर्वत्र प्रशंसा होती है। काग्यका इसमें विशेष संवैध है। रग्ण अवयवको संबोधित बीसव मंत्रमे कहा है कि सूर्य, चंद्र, वायु आदि देवतामाक करके नीरोगताके भावकी सूचना देना, नया रोगीको निज संग मनुष्यादि प्राणियोके शरीरमे रहते है । वे ही मांस, मगरम-निको प्रेग्नि करनेके लिये उत्तेजित करना, दम नाक मादि अवयव किंवा इंद्रियोंके स्थानमे रहते है। इन प्राणकी वृष्टि जो मनुष्य भी है।
प्राणका संरभण (९) कमल-आसन - देवताओंमे प्राणको शक्ति व्यास है। यही व्यापक प्राण पूर्व और उसका वाइन हस, इसकी मूल वैविक कल्पना इस प्रकार देहको छोडकर दूसरे गर्भमे प्रविष्ट होता है। अर्थात् एकवार यहा स्पष्ट होती है- जन्म लेने के पश्चान पुन जन्म लेता है । आत्माकी शक्तियों- ब्रह्मा, ब्रह्मदेव भारमा, जीवात्मा, मध्य का नाम शची है। इंद्रकी धर्मपत्नीका नाम शची है। इंस-चाहन प्राण-वाहन धर्मपत्नीका भाव यहाँ निनशक्ति ही है । इंद्र नाम जीवा- हृदय कमल स्माका है और उसकी नाक्तियां शची नामसे प्रसिद्ध है। मानस सरोवर अतःकरण (हृदय) पिताका अंग अपनी सब गाक्तियों के साथ पुत्र प्रविष्ट होता प्रेरक कर्तादेव प्रेरक आत्मा है। पिताके अंगो, अवयवो और इन्द्रियोंके समान ही पुग्नके कई अंग, अवयर और इंद्विय होते है । स्वभार तथा गुणधर्म वेटमे इसका वर्णन अनेक मंत्रों में पाया है उसका मूल भी कई मंगोमे मिलते हैं । इस बानको देखनेसे पता लग भाशय इस प्रकार देखना उचित है । वेदमे ' असौ अहं' मकता है कि पिता अपनी गक्तियों के साथ पुत्र में किस प्रकार (यजु ४०१७) कहा है 'असु अर्थात् प्राणशक्तिके अदर प्रविष्ट होता है । गृहस्थी लोगोको इस बात का विशेष विचार रहनेवाली मैं जात्मा हूं।' यह भाव उक्त मन्त्रका है । वही करना चाहिए, क्योंकि प्रजा निर्माण करना उनका ही विषय भाव उक्त स्थानमे है। प्राणके साथ मात्माका भवस्थान है। है। मातापिताके अच्छे और बुरे गुणदोप संतानमें आते हैं, यह प्राणही 'हंस' है। वह (सलिलं) हृदयके मानस सरो- वरसे क्रीडा करता है। श्वास लेनेके समय यह प्राण उस सरो- इसलिये मातापिताको स्वय निर्दोष होकर ही सतान उत्पन्न करनेका विचार करना चाहिए । अर्थात दोषी मातापिताको वरमें गोता लगता है और उच्छ्वास लेनेके समय ऊपर उडता सतान उत्पन्न करनेका अधिकार नहीं है। है। यहां प्रश्न उत्पन्न होता है, कि जब उच्छ्वास के समय प्राण बाहर निकल आता है, तव प्राणी मरता क्यों नहीं ? पूर्ण इक्कीसवें मंत्रमे प्राणको 'हंस' कहा है । श्वासके भदर उच्छवास लेकर श्वासको पूर्ण रूपसे याहर निकाल देनेपर भी जानेके समय 'स' की ध्वनि होती है और उच्छ्वासके बाहर मानेके ममय 'ह' की ध्वनि होती है । 'ह' और जिस प्रकार इस पक्षी एक पांव पानी में ही रखकर दूसरा पांच मनुष्य मरता नहीं। इसका कारण इस मंत्रमें बताया है। 'स' मिलकर प्राणवाचक 'हंस' शब्द यनता है । उसीके ऊपर उठाता है, उसी प्रकार प्राण ऊपर उठते समय अपना अ-हंसः; सोऽहं' आदि उपासनाके लिये एक पांव हृदयके रक्ताशयमें ही दृढतासे रखे रसता है और बनाये गये है। इसमें 'हंस' शब्द ही मुख्य है। उलटा दूसरे पांवको ही बाहर उठाता है । गद बनानेसे इसीका 'सोऽहं' बन जाता है, अथवा 'हंस' के साथ 'ओ' मिलानेसे 'सोऽहं' बन जाता है। तात्पर्य यह कि प्राण अपनी एक शक्तिको दारीरसें स्थिर रखता हुभा दूसरी शक्तिसे बाहर खाकर कार्य करता है। स-ह इसलिये मनुष्य मरता नहीं । यदि यह अपने दूसरे पानको भी ओ-म् म्-अओ (अ) पाहर निकाल ले तो भाज, कल, दिन, रात, प्रकाश आदि सोऽहं कुछ भी नही हो अर्थात् कोई प्राणी जीवित नही रह पाठक यहां दोनों प्रकारके रूप देख सकते है। साप्रदा- सकेगा। जीवन के पश्चात् ही कालका ज्ञान होता है । इस यिक झगढोंसे दूर रहकर मूल वैदिक कल्पनाको यदि पाठक प्रकारका यह प्राणका संबंध है। प्रत्येक मनुष्यको उत्तम देखेंगे तो उनको वढा आश्चर्य प्रतीत होगा। ‘ओं' शब्द विचार करके इस सबंधका ज्ञान ठीक प्रकारसे प्राप्त करना मात्माका वाचक है और 'हंस' शब्द प्राणका वाचक है। चाहिए । 'हंस' शब्द के साथ प्राण उपासनाका प्रकार भी भात्माका प्राणके साथ इस प्रकारका सबध है। भात्मा ब्रह्मा- इस मंत्रसे व्यक्त होता है। श्वासके 'स' कारका श्रवण का वाचक है और ब्रह्माका वाहन हस है इस पौराणिक रूप- और उच्छ्वास के साथ ' है ' कारका श्रवण करनेसे प्राण को भात्माका प्राणके साथ अखंड सबंधका ही वर्णन किया उपासना होती है । इससे चित्तकी एकाग्रता शीघ्र ही साध्य है। यह हंस मानस सरोवर में क्रीडा करता है। यहां प्राण भी होती है। यही 'सो' अक्षरका श्रवण श्वासके साथ और हृदयरूपी मानससरोवरमें क्रीडा कर रहा है। हृदयकमलमें हं' का श्रवण उच्छ्वासके साथ करनेसे 'हंस' का ही जीवात्माका निवास सुप्रसिद्ध है अर्थात् कमलासन ब्रह्मदेव जप बन जाता है। यह प्राण उपासनाका प्रकार है। साप्रदा. • [मधर्व भा ४ हिन्दी] अन्य रूप हंसः (१०) अथर्ववेवफा सुचोध अनुवाद 'दीर्घजीवन और आरोग्य' यिक लोगौने उनपर विलक्षण और पिभिल कल्पनाए रधी कभी भाराम नहीं करगा और अपने कार्यमे कभी पीछे नहीं हैं, परंतु मुलफी ओर ध्यान देकर प्रगटोंसे दूर रहना ही हटता । सय इंद्रियां मोती है परशु म प्राणका योना कभी हमको उचित है। इसीका और भी वर्णन आगे करते है- किसीने सुना ही नहीं । अर्थात विश्राम न लेता तुमा यह इस शरीरमें आठ चक्र है जिनमें प्राण जाता है और प्राण रातदिन गरीरमे कार्य करता है। विलक्षण कार्य करता है यह यात २२ व मंत्रमें कही है। इसीलिये प्राण उपासना निरंतर हो सकती है। किसी भालंयनपर दृष्टि रसफर ध्यान करना हो तो दृष्टि थक जाती मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपूरक, सूर्य, अनाहत, विशुद्धि, आजा और महनार ये माठ चक्र है, मगः गुदासे लेकर है। दृष्टि थकनेपर उसकी उपासना नेत्रों द्वारा नहीं हो सकती। निरके उपरले भागतक भाट स्थानोमें ये भाठ चक्र है। इसी प्रकार अन्य इंद्रियां थक जाती है और विश्राम चाहती पीठके मेरुदंडमें इनकी स्थिति है। इस प्रत्येक चक्रम प्राण हैं, इसलिये अन्य हंद्रियों के माथ उपासना निरंतर नहीं जाता है और अपने अपने नियत कार्य करता है। जो सजन हो सकती । परंतु यह प्राण कभी थक्ता नहीं और कभी प्राणायामका अभ्यास करते है उनको प्राणके इन चक्रोमें विश्राम नहीं चाहता । इसलिये इसके साथ जो प्राण उपा. पहुंचनेका अनुभव होता है और वहांकी स्थितिका भी सना की जाती है वह निरंतर हो सकती है। बिना रुकावट पता लगता है। ऊपर मस्तिष्कमें सहस्रार चक्रका स्थान प्राणोपासना हो सकती है, इसलिये इसका अत्यंत महत्व है। है। यही मस्तिष्कका मध्य और मुख्य भाग है। प्राणका अय हम सूक्तका अन्तिम मंन कहता है कि- एक केन्द्र हृदयमें है। इस प्रकार एक केन्द्र के साथ माठ चक्रोम 'हे प्राण | मेरेसे दूर न जामो, दीर्घ कालतक मेरे सहन्न आरोंक द्वारा भागे और पीछे चलनेवाला यह प्राण अंदर रहो, म दीर्घ जीवन व्यतीत करूं, मैं दीर्घ भायुष्य- चक्र है । वाम उच्छ्वास तथा प्राण अपान द्वारा प्राणचक्रकी से युक्त होकर मौ वर्षसे भी अधिक जीवन व्यतीत करूं। आगे और पीछे गति होती है । प्राणका एक भाग गरीरकी इसलिये मेरेसे पृथक् न होओ।' यह भारना उपासकको गक्तियों के साथ संबंध रखता है और दूसरा भाग आत्माकी मनमें धारण करनी चाहिए । अन्नमय मन है और आपो- शक्ति के साथ संबंध रखता है । शारीरिक शक्ति के साथ संबंध मय प्राण है। इसलिये प्राणको पानीका गर्भ कहा है। उपा- रखनेवाले प्राणके भागका ज्ञान प्राप्त करना बढा सुगम है, सकके मनमें यह भावना स्थिर रहनी चाहिए, कि मैंने परंतु भात्मिक शक्ति के साथ संबंध रखनेवाले प्राणके भागका प्राणायामादि द्वारा अपने शरीरमे प्राणको वाध दिया है । ज्ञान करना बढा कठिन है। भाधे भागसे सब भुवन- इसलिये यह प्राण कभी वियुक्त होकर दूर नहीं होगा । को बनाता है, जो इसका दूसरा अर्ध है वह किमका चिन्ह प्राणायामादि साधनोपर दृढ विश्वास रसकर, उन साधनाके है अर्थात उसका ज्ञान किससे हो सकता है ? आत्माके द्वारा गरीरमें प्राण स्थिर करनेके ढ भाव मनमे रखने ज्ञानके साथ ही उसका ज्ञान हो सकता है। चाहिए और कभी भी अकाल मृत्युका विचार मनमें नही प्राण सबका ही इंग है इस विषयमें पहिलेही भनमे लाना चाहिए । भात्मापर विश्वास रखनेसे उक्त भावना दृढ कहा है । सबमे गतिमान और सबमें मुख्य यह प्राण है। होती है । ब्रह्म भर्यात् यात्मशक्तिके साथ रहनेवाला यह प्राण आलस्य इस प्राण सूक्तम निम्न भाव है- रहिन होकर और धैर्य के साथ कार्य करनेमें समर्थ यनकर मेरे शरीरमें अनुकूलताके साथ रहे । यह इच्छा उपासकको प्राणसूक्तका सारांश मन धारण करनी चाहिए । अन्य इंद्रियोंमे मालम्य होता (१) प्राणके आधीन ही सब कुछ है, प्राण ही सबका ते, प्राणमें बालस्य कमी नहीं होता, इसलिये प्राणका वि मुखिया है । पण 'अतंद्र' अर्थात मालस्य रहित है । यही भाव पची- (२) प्राण पृथ्वीपर है, अंतरिक्षम है और धुलोकमें है। गर्व मंत्रमें कहा है। (३) घुलोकका प्राण सूर्य किरणों द्वारा पृथ्वीपर आता मत्र इद्रियां माराम लेती हैं, आलसी बनती है, सो है, अंतरिक्षका प्राण वृष्टिद्वारा पृथ्वीपर पहुचता है और जाती हैं और नीचे गिर जाती है, परतु प्राण ही रातदिन पृथ्वीपरका प्राण यहा सदा ही वायुरूपसे रहता है। पा रहकर जागता है, अथवा मानो इम मंदिरका संरक्षण करनेके लिये बहा रहकर पहरा देना है। कभी सोता नहीं, जीवन है। इस प्राणकी प्राप्ति सत्रको आनट होता है। (४) अंतरिक्षस्य और धुलोकस्थ प्राणसे ही सयका प्राणका संरक्षण (११) । - (५) एक ही प्राण न्यक्तिके गरीरमें प्राण अपान आदि इस प्रकार इस सूक्तका भाव देखनेके पश्चात् वेदोसे रूपमे परिणत होता है। गरीरके प्रत्येक भंग, अवयव और अन्यत्र प्राण विषयक जो जो उपदेश है उसका विचार इद्रियोंम अर्थात् सर्वत्र प्राण ही कार्य करता है । करते हैं। (६) प्राण ही सब औषधियोंकी औषधि है। प्राणके ऋग्वेद में प्राणविषयक उपदेश कारण ही सब गरीरके दोष दूर होते है। प्राणकी अनुकूलता ऋग्वेदमें प्राणविषयक निन्न मंत्र है, उनको देखनेले न होनेपर कोई भी औषध कार्य नहीं कर सकता और ऋग्वेदका इस विषयमें उपदेश ज्ञात होसकता है- प्राणको अनुकूलता होनेपर बिना भोपधके भी आरोग्य रह प्राणाद्वायुरजायत। (ऋ-१०१९०११३, अथ. १९४६१७) सकता है। 'परमेश्वरीय प्राण शक्तिसे इस वायुकी उत्पत्ति हुई है।' (७) प्राण ही दीर्घमायु देनेवाला है। यह वायु हमारा पृथ्वीस्थानीय प्राण है । वायुके बिना क्षण- (८) प्राण ही सबका पिता और पालक है। सर्वत्र मात्र भी जीवन रहना कठिन है। सभी प्राणी इस वायुको च्यापक भी है। चाहते है । परतु कोई यह न समझे कि यह वायु ही वास्त- (९) मृत्यु, रोग और बल ये सब प्राणके कारण ही विक प्राण है, क्योकि परमेश्वरको प्राणशक्तिसे इसकी उत्पत्ति होते है। सब इंद्विय प्राणके साथ रहनेपर ही बल प्राप्त कर है। यह वायु हमारे फेंफडोके अंदर जब जाता है, तब उसके सकते हैं । सत्यनिष्ट पुरुष प्राणकी प्रसन्नतासे उत्तम योग्यता साथ परमेश्वर की प्राणशक्ति हमारे अंदर जाती है और उससे प्राप्त करते है। हमारा जीवन धारण होता है । यह भाव प्राणायामके समय (१०) प्राणके साथ ही सब देवता है। सबको प्रेरणा मनमें धारण करना चाहिये । प्राण ही भायु है, इस विषयमे देनेवाला प्राण ही है। निम्न मत्र देखिये- (13) धान्यमें प्राण रहता है। वह भोजनके द्वारा गरीर में जाकर गरीरका बल बढाता है। आयुर्न प्राणः॥ (रु. ११६६१) (१२) गर्भमे भी प्राण कार्य करता है। प्राणकी प्रेरणा- 'प्राण ही आयु है।' जबतक प्राण रहता है, तभीतक से ही गर्भ बाहर भाता है और बढता है । जीवन रहता है। इसलिये जो दीर्घ आयु चाहते है उनको (१३) प्राणके द्वारा ही पिताके सप गुण चाहिए कि वे अपने प्राणको तथा प्राणके स्थानको बलवान् मौर शक्तियां पुत्रमें भाती हैं। बनावें । प्राणका स्थान फेंफडोमें होता है। फेफडोको वलवान् द्वारा दीर्घ मायु (१४) प्राण ही हंस है और यह हृदयके मानस सरो- बनानेसे प्राणमे बल भाता है और उसके पर क्रीडा करता है। जब यह चल जाता है, तब कुछ भी प्राप्त हो सकती है। नहीं रहता, सब नष्ट हो जाता है। (१५) शरीरके आठ चक्रोमे, मस्तिष्कमें तथा हृदयके राजनीति, समाजनीति, गृहनीति इन शब्दोंके समान केन्द्र में विभिन्न रूपसे प्राण रहता है । यह स्थूल शक्तिसे सय 'असुनीति' शब्द है। राज्य चलानेका प्रकार राजनीतिसे गरीरका धारण करता है और व्यक्त है, इसी प्रकार 'असु शक्तिसे आत्माके साथ ' अर्थात् प्राणका व्यवहार कर- सूक्ष्म गुप्त सबंध रखता है। नेकी रीति 'असुनीति' शब्दसे व्यक्त होती है Guide (१६ ) प्राणमें मालस्य और थकावट नहीं होती है। to life, way to life अर्थात् 'जीवनका मार्ग ' इस भीति और सकोच नहीं होता। क्योंकि इसका ब्रह्म अथवा भावको 'असु-नीति' शब्द व्यक्त कर रहा है, यह प्रो० भात्माके साथ संबंध है। मेक्समूलर, प्रो रॉय आदिका कथन सत्य है । देखिये- (१७) यह शरीरमे रहता हुआ सदा जागृत रहता है । असुनीते पुनरस्मासु चक्षुः अन्य इंद्रिय थकते, रुकते और सोते है, परतु यह कभी पुन प्राणमिह नो धेहि भोगं । थकता नहीं और कभी विश्राम नहीं लेता। इसके विश्राम ज्योक्पश्येम सूर्यमुच्चरंत- लेनेपर मृत्यु ही सममनी चाहिए। मनुमते मृळया नः स्वति ॥ (ऋ. १०५९।६ ) (१८) इसलिये सबको चाहिए कि प्राण वशमे करे 'हे असुनीते। यहां हमारे भदर पुनः चक्षु, प्राण और भौर उसकी शक्तिसे बलवान् हों। भोग स्थापित करो। सूर्यका उदय हम बहुत देरतक देख कर्म स्वभाव असु-नीति म्वास्थ्यसे (१२) अथर्ववेदफा सुग्रोध अनुवाद : 'वीर्घजीवन और आरोग्य' सकें। है अनुमते । हम मथको सुसी करो और हमको ही भावश्यकता है, क्योफि प्राणकी शक्तिक माथ ही सब अवयवोकी शक्ति संबंध रखती है, इसकी सूचना निम्न मंत्र करो।' युक्त दे रहा है- अमुकी नीति' अर्थात् 'प्राण धारण करनेकी रीति' पेंद्रः प्राणो अंगे अंगे निदिध्यदेंद्र उदानो अंगे जब ज्ञात होती है, तब चक्षुकी शक्ति हीन होनेपर भी पुन: अंगे निधीतः ॥ ( यजु. २१) उत्तम दृष्टि प्राप्त की जा सकती है, प्राणके निकलनेकी संभा- चना होनेपर भी पुनः प्राणको स्थिर किया जा सकता है, (पंद्रःप्राणः) आत्माकी शक्ति प्रेरित होकर प्राण भोग भोगनेकी असमर्थता होनेपर भी भोग भोगनेका प्रत्येक अंगमें पहुंचा हुआ है, आत्माकी शक्तिये प्रेरित होकर सामथ्र्य पैदा किया जा सकता है। मृत्युके पास मानेके उदान प्रत्येक अंगमें कार्य कर रहा है। ' इस प्रकार मांत- कारण सूर्य-दर्शन मशक्य होनेपर भी दीर्घ आयुष्यकी प्राप्ति रिक शक्तिका वर्णन वेटने किया है। होने के कारण पश्चात पुनः सूर्यकी उपासना हो सकती है। प्रत्येक अंगमें प्राण रहता है और वहां आत्माकी प्रेरणासे प्राण-नीतिक अनुकुल मति रसनेसे निःसंदेह यह सब कुछ कार्य करता है । इस मंत्र के उपदेगसे यह सूचना मिलती है हो सकता है, तथा-- कि जिम अंग, अवयव भयवा इंद्रियम प्राणकी शक्ति न्यून हो, वहां आत्माकी प्रबल इच्छागक्ति द्वारा प्राणकी शक्ति असुनीते मनो अस्मासु धारय भी बढाई जा सकती है। यही पूर्व सूक्तोक 'मागि-रस- जीवातवे सु प्रतिरा न आयुः। विद्या' है। अपने उस नंगमे प्राणको न्यूनता हो इसको रारंधि नः सूर्यस्य संदृशि जानना और वहा अपनी भात्मिक इच्छागक्ति द्वारा प्राणको घृतेन त्वं तन्वं वर्धयस्व ॥ (ऋ. १०५९।५) पहुंचाना ही अपने मारोग्य बढानेका उपाय है। वेदमें जो 'हे मसुनीते । हम मनायक्ति प्राप्त करें और हमारी 'आंगिरस विद्या' है वह यही है । प्राणका रक्षण करनेके मायु दीर्घ हो। सूर्यका हम दान करें। तू पीसे हमारे विषयमे निम्न लिसित मत्र देखिये- गरीर बढा।' प्राणं मे पाद्यपानं मे पाहि व्यानं मे पाहि ॥ आयुष्य बढानेकी रीतिका इस मंत्रम वर्णन है। पहली (य. १४१८, १७) धात मनकी धारणा की है । मनमें यह धारणा रद और 'मेरे प्राण, अपान, व्यानका संरक्षण करो ।' इनका पक्की करनी चाहिये कि 'मैं योगसाधनादि द्वारा अवश्य संरक्षण करनेसे ही ये प्राण सय शरीरका सरक्षण कर सकते ही दीर्घ भायु प्राप्त कस्गा, तथा किसी कारण भी मेरी आयु श्रीण नही होगी।' मनकी दृढ शाक्तिपर ही भोर मनके दृढ प्राणं ते सुधामि ॥ (यज ६।१४) विश्वासपर ही सिद्धि अवलंवित होती है। सूर्य प्रकाशका प्राणं मे तर्पयत । (यजु. ६३१) दीर्घ युके साथ संवध वेदमे सुप्रसिद्ध ही है। प्राणायाम 'प्राणकी पवित्रता करता हूँ। प्राणकी तृप्ति करो। आदि द्वारा जो मनुष्य प्राणका बल बढाना चाहते हैं उनको तृप्ति और पवित्रतासे ही प्राणका सरक्षण होता है । अतृप्त धी बहुत साकर अपना गरीर पुष्ट रखना चाहिये । प्राणायाम इद्रिय होनेसे मनुष्य भोगोकी मोर जाता है और पतित बहुत करनेपर घी न गानेसे गरीर कृग होता है । इसलिये होता है । इस प्रकार भोगों में फसे हुए मनुष्य अपनी प्राणकी प्राणायाम करनेवालोंको चाहिए कि वे अपने भोजनमें नीका शक्ति व्यर्थ सो वैठने है। इसलिये प्राणका संवर्धन करने- अधिक सेवन करें। वाले मनुष्योंको उचित है कि वे अपना जीवन पवित्रतासे यजुर्वेदमें प्राणविषयक उपदेश । और नित्यतृप्त वृत्तिसे व्यतीत करे । अपवित्रता और असंतु- टता ये दो दोष प्राणकी शक्ति घटानेवाले है। शक्ति घटाने- प्राणका सवर्धन करनेक विषयमे यजुर्वेदका उपदेश निम्न वाला कोई कार्य नहीं करना चाहिये, क्योकि- प्रकार है- प्राणं न वीर्य नसि । (य. २११४९) प्राणस्त आप्यायताम् ॥ ( यशु २।१५) 'नामे प्राणशक्ति और वीर्य बढानो।' प्राणशक्ति 'तेरा प्राण संबधित हो।' प्राणकी शक्ति बढानेकी घटी नासिकाके साथ संबंध रखती है और जब यह प्राणशक्ति है। तया- - - y PM प्राणका सरक्षण (१३) बलवान होती है, तब वीर्य भी बढ़ता है और स्थिर होता वातं प्राणेन अपानेन नासिके । (य २५/२) है। वीर्य और ग्राण ये दोनों शक्तियां साथ साथ रहती है। 'प्राणसे वायुकी प्रसन्नता और भपानसे नासिकाकी पूर्णता गरीरमें वीर्य रहनेले प्राण रहता है, सौर प्राणके साथ वीर्य करनी चाहिए । ' वाह्य शुद्धि और प्रसन्न वायुके साथ प्राण भी रहता है। एक दूसरेके माश्रयसे रहनेवाली ये शक्तियां हमारे शरीरोमे जाता है और नासिका ही उसका प्रवेश द्वार हैं। जो मनुष्य ब्रह्मचर्यकी रक्षा करके अर्ध्वरेता बनते है, है । वाह्य वायुकी प्रसन्नता और नासिकाकी शुद्धि अवश्य उनका प्राण भी बलवान हो जाता है, और उनको भासानीले करनी चाहिए । नाककी मलिनता और अपवित्रताके कारण प्राणायामकी सिद्धि भी होती है। तथा जो प्रारंभले प्राणायामका प्राणको गतिमें रुकावट होती है। प्राणकी प्रतिष्ठाके लिये ही अभ्यास नियमपूर्वक करते हैं उनका वीर्य स्थिर हो जाता है। हमारे सब प्रयत्न होने चाहिए, इसकी सूचना निम्न मंत्रोंसे यद्यपि किसीका कारणवश प्रथम आयुमें ब्रह्मचर्य न रहा हो, मिलती है- तो भी वह नियमपूर्वक अनुष्ठानसे उत्तर भायुमे प्राणसाधनसे प्राणकी प्रतिष्ठा भपने शरीरमें प्राणशक्तिका सवर्धन और वीर्यरक्षण कर सकता है। जिसका ब्रह्मचर्य आदि प्रारंभसे ही सिद्ध होता हे उसको विश्वस्मै प्राणायापानाय व्यानाय- शीघ्र भौर सहजसिद्धि होती है । परतु जिसको प्रारंभसे सिद्ध उदानाय प्रतिष्ठायै चरित्राय ॥ नहीं होता, उसको यह प्रयत्नसे सिद्ध होती है । प्राणशनि- (य १३।१९, १४११२ १५/६४) विश्वस्मै प्राणायापानाय व्यानाय संवधनके उपायोमे गायन भी एक उपाय है। विश्वं ज्योतिर्यच्छ॥ गायन और प्राणशक्ति ( य. १३।२४, १४१४, १५:२८) साम प्राणं प्रपद्ये । (य. ३६१) प्राणाय स्वाहापानाय स्वाहा व्यानाय स्वाहा । (य. २२।२३, २३।१८) प्राणको लेकर सामकी गरण लेता हूं।' सामवेट गायन और उपासनाका वेट है। ईश उपासना और ईशगुणोक प्राण, अपान, व्यान, उदान आदि सब प्राणोंकी प्रतिष्ठा गायनसे प्राणका वल बढता है। केवल गानरिया दी और उनका व्यवहार उत्तम रीतिसे होना चाहिए। सब प्राणो- आयु और आरोग्य प्राप्त कर सकते है। गायक लोग यदि को तेजस्वी करो । सब प्राणोके लिये त्याग करो।। दुर्व्यसनोमें न फंसे तो वे अन्योंकी अपेक्षा अधिक दीर्घमायु प्रत्येक मनुष्यको उचित है कि वह देखे कि अपने भाचर- और आरोग्य प्राप्त कर सकते हैं, गायनका भारोग्यके साथ णले अपने प्राणोको वढा रहा है या घटा रहा है, अपने प्राणो भत्यत संबध है। उपासनाके साथ भी गायनका अत्यंत की प्रतिष्ठा बढ रही है या घट रही है, अपने प्राणोके सभी सबंध है । मन गायनसे उपासनामे अत्यत तल्लीन होता है व्यवहार उत्तम चल रहे है अथवा किसीमे कोई त्रुटि है, और यही तल्लीनता प्राणशन्तिको प्रबल करनेवाली है। यह अपने प्राणोका तेज बढ रहा है या घट रहा है। इसका विचार बात और है कि गायनका धंदा करनेवाले भाजकल के स्त्रीपुरु- करना हरएकका कर्तव्य है। क्योकि इसका विचार करनेसे ही पौने अपने आचरण वहुत ही गिरा दिये है। परंतु यह दोष हरएक जान सकता है कि मैं प्राणविषयक अपना कर्तव्य ठीक गायनका नहीं है, वह उन मनुष्योका दोष है। प्रकार कर रहा हूं या नहीं। प्राणविषयक कर्तव्यका स्वरूप मयि प्राणापानौ। (य. ३६१) स्वाहा' शब्द द्वारा व्यक्त हो रहा है। सब अन्य इंद्रिय गौण है और प्राण मुख्य है, इसलिये अन्य इंद्रियोके भोगो- 'मेरे अंदर प्राण और अपान बलवान् रहे । ' यह इच्छा का स्वाहाकार प्राणके संवर्धनके लिये होना चाहिये । अर्थात् हरएक मनुष्य स्वभावत धारण करता ही है। परंतु कभी इद्रियोके भोग भोगनेके लिये जो शक्ति खर्च हो रही है उन्म- कभी व्यवहार उस इच्छासे विरुद्ध करता है। जब इच्छाक का बहुतसा हिस्सा प्राणकी गक्ति बढानेके लिये खर्च होना अनुसार व्यवहार हो जायगा, तव सिदिसे किसी प्रकारका चाहिए। मनुग्योके सामान्य व्यवहारमे देसा जाये तो विघ्न नहीं हो सकता। प्रस्तुत प्रकरण प्राणका है, इसका प्रतीत होगा कि इद्रियभोग भोगनेमे यदि शक्तिके १०० मेसे संबंध बाहरके शुद्ध वायुके साथ है, और अदरका संबंध ९९ भागका खर्च हो रहा है, तो प्राणसवर्धनमे एक भाग भी नासिका मादि स्थानके साथ है इसलिये कहा है खर्च नहीं होता है। मुख्य प्राणके लिये कुछ शक्ति भी नही खर्च , - यज्ञका अर्थ सत्कर्म . (१४) अथर्ववेदका सुवोध अनुवाद - 'दीर्घजीवन और आरोग्य' होती, परंतु गौण इंद्वियभागके लिये ही सब यतिका व्यय हो रहा प्राणश्च मेऽपानश्च मे व्यानश्च मे असुश्च मे यमन है।" क्या यह आश्चर्य नहीं है ? वास्तवमे मुख्यक लिये अधिक कल्पताम् ॥ (य १८२) और गौणके लिये कम व्यय होना चाहिए । यही वेढने कहा प्राणश्च मे यनेन करपताम् ॥ ( य. १८१२२) है कि प्राणसंवर्धनके लिये अपनी गक्तिका स्वाहा करो । अप 'मेरी आयु यज्ञसे बढे, मेरा प्राण यज्ञसे समर्थ हो । मेरा ना समय, अपना प्रयत्न, अपना बल और अपने अन्य साधन प्राण, अपान, व्यान और साधारण प्राण यज्ञ द्वारा बलवान् प्राणसवर्धन के लिये कितने सर्च किये जाते है और भोगोंके बने। मेरा प्राण यज्ञके लिये समर्पित हो। लिये कितने सर्च किये जाते है, इसका विचार मावश्यक । जिस कर्मस वडाका सस्कार मनुप्योका उलटा व्यवहार हो रहा है इसलिये इस विषयमे होता है सबमें विरोध हटकर एकताकी वृद्धि होती है और सावधानता रखनी चाहिए । प्रतिदिनका ऐसा विभाग करना परस्पर उपकार होता है उसे यज्ञ कहते है। यज्ञ अनेक प्रकार चाहिए कि जिसमे बहुतसा हिस्सा प्राणवर्धनके कार्यके लिये के है परंतु सूत्ररूपस सब यज्ञका तत्त्व उक्त प्रकारका ही है। समर्पित हो सके। इसलिये यज्ञके साथ प्राणका सबंध मानेसे प्राणमें बल बढने राजा मे प्राणः॥ (य. २०१५) लगता है। स्वार्य तथा सुदगर्जीक काम लगे रहनेसे प्राण- प्राण मेरा राजा हे 'सव गरीरका विचार करने पर आपको यक्तिका संकोच होता है और जनताके हितके व्यापक कर्म पता लग जायगा कि सबका राजा प्राण ही है। अपना प्राण करनेमे प्रवृत्त होनेसे प्राणकी गक्ति विकसित होती है । वेदम सचमुच राना है। जब आपके घरमै राजा ही अतिथि अग्नि आदि देवताओका जहां वर्णन आया है वहां उनका आता है, उस समय आप राजाका ही आदरातिथ्य करते है, प्राणरक्षक गुण भी वर्णन किया है । क्योकि जो देवता प्राण- और उनक नौकराकी तरफ ध्यान अवश्य देते है, परतु रक्षक हो उसकी ही उपासना करनी चाहिये । जितना राजाकी और 'यान दिया जाता है उतना अन्यो के विपयमें ध्यान नही दिया जाता। यही न्याय यहां है। इस शरीरमं प्राण नामक राजा अतिथि है और उसके अनुचर प्राणदा अपानदा व्यानदा वादा वरिवोदाः ॥ अन्य इद्रियगण है । इसलिये प्राणको सेवा शुश्रुपा अधिक ( य. १७.१५) करनी चाहिए क्योकि उसके ठीक रहने पर ही अन्य अनुचर प्राणपा मे अपानपाश्चक्षुप्पाः श्रोत्रपाश्च मे ॥ टीक रह सकते है। परंतु यदि राजा असतुष्ट होकर चला जाए वाचो मे विश्वभेपजो मनसोऽसि विलायकः ॥ तो अनुचर मापकी सहायता नहीं कर सकेगा। (य. २०३४) आजकल इद्रियोके भोग बटानेमें सब लोग लगे हुए है, 'त् प्राण, अपान, व्यान, तेज और स्वातंत्र्य देनेवाला प्राणको यक्ति वढानेका कोई ख्याल नहीं करता। इसलिये है। तू मेरे प्राण, अपान, चक्षु, श्रोत्र आदिका सरक्षक है, प्राण अप्रसन्न होकर शीघ्र ही इस शरीरको छोट देता है। मेरी वाणीके दोष दूर करनेवाला तथा मनको शुद्ध भौर जब प्राण टोटने लगता है, तब अन्य इंद्वियशक्तियां भी उस पवित्र करनेवाला है। के साथ इस गरीरको छोट देती हैं। । यही अल्पायुताका प्राणका सत्कर्ममें प्रदान करना, प्राणका सरक्षण करना, कारण है । परतु इसका विचार वहुत ही थोटे लोग प्रारभसे इद्रियोंका सयम करना, वाचाके दोष दूर करने और मनकी करते है । तात्पर्य यह कि इंद्रियभोग भोगनेके लिये शक्ति पवित्रता करना, यह कार्य सूक्ष्मरूपसे उक्त मंत्रमें कहा कम सर्च करनी चाहिए, इसका संयम ही करना चाहिए और है। इतना करनेसे ही मनुष्यका वेढा पार हो सकता है। जो पर हो उनको अर्पण करके प्राणकी शक्ति बढानेमे प्रयत्न मन और वाणीकी शुद्धता न होनेसे जगतमे कितने अनर्थ करना चाहिये । अपने प्राणको बुरे कार्योंमे लगानेसे बढी ही हो रहे है, इसकी कोई गिनती नहीं हो सकती। मन, वाणी, हानि होती है। कितने ही दुर्व्यसन और कुकर्म ऐसे है कि इंद्रियां और प्राण इनकी स्वाधीनता प्राप्त करनेके लिये ही जिनमे लोग अपने प्राण अर्पण करनेके लिये आनंदसे प्रवृत्त सब धर्म और कर्म होते है। इसलिये अपनी उन्नति चाहने- होते है." वास्तवमे सत्कर्मके साथ ही अपने प्राणोको जोसना चाहिये । वेट कहता है- वालोको इस कर्तव्यकी भोर अपना ख्याल सदा रखना चाहिये । अब प्राणकी विभूति यतानेवाला अगला मंत्र है, देखिये- आयुर्यक्षेन कल्पतां प्राणो यमेन कल्पतां ॥ अयं पुरो भुषः । तस्य प्राणो भौवायनो वसन्तः (म. ९२१, १८१२९, १२२३३) प्राणायनः॥ (य, १३५४) प्राणदाता आणि एक भी , सत्कर्म और प्राण - प्राणका संरक्षण (१५) - वह भागे भुवर्लोक है, उसमे रहनेले प्राणको भौत्रायन समय होती है । और उसी प्रकार महाप्रलयकै समयम भी कहते है । वसन्त प्राणायन है।' होती है। नियम सर्वत्र एक ही है। प्राणके साथ अन्य इंद्रियां भूलोक पृथ्वी है, और अंतरिक्ष लोक भुवर्लोक है । यह कैसी रहती है, प्राण कैसे जागता है और अन्य इंद्रियां कैसी प्राणका स्थान है, इस अवकाशमे प्राण व्यापक है, वायुका थककर लीन होती है, इसका विचार करनेसे अपनी आत्म- और प्राणका एक ही स्थान है। अंतरिक्षम ही दोनो रहत शक्तिका ज्ञान होता है और वह ज्ञान अपनी शक्तिका है। वसंत प्राणका ऋतु है। क्योंकि इस अनुमें सब जगत्मे विकास करनेके लिये सहायक होता है। अपने प्राणका विश्व- प्राणशनिका संचार होकर सब वृक्षोको नवजीवन प्राप्त होता व्यापक प्राणके साथ सबध देखना चाहिये । इसकी सूचना है। यह प्राणका अवतार हरएकको देखना चाहिये । प्राणके निम्न मंत्र देते है- सचारसे जगत्म कितना परिर्वतन होता है, इसका प्रत्यक्ष विश्वव्यापक प्राण अनुभव यहां दिखाई देता है । इस ऋतुम सब वृक्ष आदि सं प्राणः प्राणेन गच्छताम् । (य. ६।१८) नतन पल्लवोसे सुशोभित होते है, फलोसे युक्त होने के कारण सं ते प्राणो वातेन गच्छताम् । (य ६१०) पूर्णताको प्राप्त होते है। फल, फूल और पल्लव ही सव मृष्टि के नवजीवनकी साक्षी देते है। इसी प्रकार जिनका प्राण 'अपना प्राण विश्वव्यापक प्रागके साथ सगत हो । तेरा प्रसन्न होता है उनको भी स-फलता प्राप्त होती है। जिस प्राण वायुके साथ संगत हो ।' तात्पर्य अपना प्राण अलग नहीं है, वह सार्वभौमिक प्राणका ही एक हिस्सा है। इस प्रकार सब सृष्टि प्राणकी प्रसन्नतासे पुष्पवती और फलवती होती है, उसी प्रकार मनुष्य भी प्राणको वर्गम करनेसे अपने दृष्टिने अपने प्राणको जानना चाहिये। सब अंतरिक्षम प्राणका अभीपमें सफलता प्राप्त कर सकता है। समुद्र भरा हुआ है, उसमेसे थोडासा ही प्राण इस शरीरके अंदर भाकर इस शरीरको जीवन देता है, श्वास प्रश्वास द्वारा प्राणके साथ इंद्रियोंका विकास वह ही सार्वभौमिक प्राण अंदर जाता है । तात्पर्य यह सार्व- मोनेके समय अपने इंद्रिय कैसे लीन होते है, और भौमिक दृष्टि सदा धारण करनी चाहिए। सबकी उन्नतिम फिर जागृतिके समय कैसे व्यक्त होते हैं, इसका विचार एककी उन्नति है, समष्टिकी भलाई है यह वैदिक सिद्धात प्रत्येकको करना चाहिए । इससे अपने आत्मा और प्राण- है। इसलिये समष्टिकी व्यापक दृष्टि प्रत्येक उपासकके मंटर शक्तिके महत्वका पता लगता है। उत्पन्न होनी चाहिये । इस प्राणकी और यात निम्न मत्रमे पुनर्मनः पुनरायुर्म आगन्पुनः देखिये- प्राणः पुनरान्मा म आगन् । लडनेवाला प्राण पुनश्चक्षुः पुनः श्रोत्रं म आगन् अविर्न मेपो नसि वीर्याय वैश्वानरो अदब्धस्तनूपा प्राणस्य पंथा अमृतो ग्रहाभ्याम। अग्निर्नः पातु दुरितादवद्यात् ॥ (य ४१५) सरस्वत्युपवाकैयानं नस्यानि बहिर्वदरैजान ॥ 'मेरा मन, आयुप्य, प्राण, आत्मा, चक्षु, श्रोन भाटि (य. १९९०) पुन. मुझे प्राप्त हुए है । गरीरका रक्षक, सब जनोंका हित (मेपः न) मेंढेके समान लडनेवाला (अविः) सर- कारी मामा पापोसे हम सबको वचावे।' क्षक प्राणवायु वीर्यके लिये (नसि) नाकमें रखा हुआ है। सोनेके समय मन आदि सब इंद्रियां लीन हो गई थी, (ग्रहाभ्यां) श्वास उच्छ्वास रूप दोनो प्राणोसे प्राणका यद्यपि प्राण जागना था तथापि उसके कार्यका भी पता हमको अमृतमय मार्ग बना है। (वरैः उपवाकैः) स्थिर स्तुति- नहीं था। वह सब कल्के समान आज पुनः प्राप्त हुआ है। योके द्वारा (सरस्वती) सुपुम्ना नाडी (व्यानं) सर्व यह मात्माकी शक्तिका कितना आश्चर्यकारक प्रभाव है ? यह गरीर व्यापक व्यान प्राणको तथा (नस्यानि) नासिकाके भारमशक्ति हमको पापोंसे बचावे । प्राणशक्तिके साथ इन साथ संबंध रखनेवाले भग्य प्राणोंको (बहिः जजान) भक्तियोंका लीन होना और पुनः प्राप्त होना, प्रतिदिन हो प्रकट करती है। रहा है। इसका विचार करनेसे पुनर्जन्मका ज्ञान होता है। स्पर्धा करनेवाला, शत्रुके साथ युट करके उसका पराजय क्योंकि जो बात निहाके समय होती है वह ही वैसी ही मृत्युके करनेवाला मेंढा होता है । यही प्राणका कार्य अपने शरीरमे - (१६) अथर्ववेदका मुघोध अनुयाद.--'दीर्घजीवन और आरोग्य' हैं। मन व्याधियों और गरीरके सब शत्रुओं क साथ लडकर विचार करना चाहिए। इस मत्रमें जिय मरम्यगीका वर्णन शरीरका भारोग्य नित्य स्थिर रसनेका बटा कार्य करनेवाला माया , उमीका वर्णन निम्न मंत्रमे देखिए- महावीर अपने गरीरमे मुरय प्राण ही है । यह मेढे के समान अश्विना नेजसा चक्षुः प्राणन सरस्वती वीर्य । लटता है। इसका नाम 'अविः' है क्योंकि यह भवन वाचंद्रो बलमद्राय दधुरिंद्रियम् ॥ (य. २०८०) अर्थात सय शरीरका सरक्षण करता है। भवन अन्य 'अश्विदेव तेनके साथ चा देते हैं, सरस्वती प्राण महिने अर्थ भी यहां देखने योग्य हैं- रक्षण, गति, कांति, प्रीति, याथ वीर्य देती है, इंद्र (इंद्राय) जीवात्मा के लिये वाणी तृप्ति, ज्ञान, प्रवेश, श्रवण, म्वामित्र, प्रार्थना, कर्म, इन्ठा, और बल के साथ द्वियाक्ति अर्पण करना है।' तेज, प्राप्ति, मालिगन, हिमा, दान, भाग और वृद्धि इतने इसमें सरस्वती जीवनगरि गाय वीर्य देती है ऐसा अव धातुके मर्थ है। ये सब अर्थ प्राणवाचक 'अवि' कहा है । यह सरस्वती गन्द भी पूर्वायत मुगुम्ना नाश्रीका गव्दमें है । प्राण कार्य इन शब्दोग व्यक्त होते हैं । इन वाचक है। अश्विनी गन्द धन और मण गनियोका वारक अाँको लेकर अपने प्राणके धर्म और कर्म जाने जा सकते है। है। इस मंत्रम दो उंद्र शब्द है । पहिला परमात्माका वाचक इतने कार्य करनेवाला संरक्षण प्राण हमारी नासिकामें रह का वाचक है। कई लोग सरस्वती शब्दका नदी आदि और दूसरा जीवात्माका वाचक है। इद्रिय शन्ट मात्माकी रहा है। नासिका स्थानीय एक ही प्राण हमार गरीरमें उक्त कार्य करता है। यही इसका महत्त्व है। यह प्राणमा मार्ग अर्थ लेकर विलक्षण अर्थ करते हैं, उनको यह बात स्मरण रग्यनी चाहिए कि वैदिक शब्द मुर यत आध्यात्मिक शक्तियों 'अ-मृत' मय है। अर्थात इस मार्गमे मरण नहीं है। इस मार्गका रक्षण करनेवाले दो ग्रह है। श्वास और उच्छ्- प्राणक विषयमे और दो मत्र देखिए- वाचक है, पश्चात् अन्य पदाथा वाचक है। भस्तु । भब वास' ये दो ग्रह इस मार्गका संरक्षण कर रहे है। सबको स्वाधीन रखनेवाले, सबका ग्रहण करनेवाले ग्रह होते है। भोजन और प्राण श्वास और उच्छ्वासोंसे सब गरीरका उत्तम ग्रहण हो रहा धान्यमासि धिनुहि देवान् है इसलिये ये ग्रह है। इन दो ग्रहोके कार्यसे प्राणका मार्ग प्राणाय त्वोदानाय त्वा व्यानाय त्वा । मरणरहित हुआ है, जबतक श्वास और उच्छ्वास चलते दीर्घामनु प्रसितिमायुपे घां ॥ (य. १।२०) है, तयतक मरण होता ही नहीं, इसलिये श्वासोच्छ्वासके प्राणाय मे वादा वर्चसे पवस्व अस्तित्वतक गरीरम 'अमृत' ही रहता है। परंतु जब ये व्यानाय मे वादा वर्चसे पवस्वो- दो ग्रह दूर हो जाते है, तब मरण आता है। दानाय में वचीदा वर्चसे पवस्व ॥ (य. ७१२७) 'इटा, पिंगला और सुपुम्ना 'ये तीन नाडियां गरीरम 'तू धान्य है। देवीको धन्य कर । प्राण, उदान और है। इन्हींको क्रमसे 'गंगा', यमुना और सरस्वती' कहा ज्यानके लिये तुझे स्वीकार करता हूं। भायुष्यके लिये दीर्घ जाता है । अर्थात, सरस्वती सुपुम्ना है। इसमें प्राणकी प्रेरक मर्यादा धारण करता है। मेरे प्राण, ध्यान और उदानके भक्ति रहती है । स्थिर चित्तसे जो उपासना करते हैं, अर्थात तेजी वृद्धि के लिये शुद्ध बन ।' दृढ विश्वाससे जो परमात्मभक्ति करते है, उनके मटर मुयु सात्विक धान्यका माहार इंद्रियादिक देवोको शुद्ध, पवित्र म्ना द्वारा यह प्राण विशेष प्रभाव बढाता है । तात्पर्य यह कि और प्रसन्न करता है। सात्विक भोजनसे प्राणका यल बढता उपासनाके माथ ही प्राणका बल बढता है, और अन्य नस्य है और भायुप्य बढता है। शुद्धतासे प्राणकी शक्ति विकसित भर्थात् नासिकाके साथ संबंध रसनेवाले प्राण है । इन सब होती है । इत्यादि बहुत उत्तम भाव उक्त मंत्रोमे पाठक देख प्राणों की प्रेरणा उक्त सुपुम्ना करती है । परमेश्वर भक्तिका बल सकते हैं। तया और एक मंत्र देखिए- इस सुपुम्नामे यठता है और इसके द्वारा प्राणोंका सामर्थ्य भी प्रफट होता है। सहस्राक्ष अग्नि अग्ने सहस्राक्ष शतमूर्च छतं ते प्राणाः सहस्त्रं व्यानाः । इस मंत्रम प्राणायाम साधनकी बहुतसी गुहा बातें सरल गन्द्रों द्वारा लिसी है, इसलिये पाठकों को इस मंत्रका विशेष त्वं साहस्रस्य राय ईशिषे तस्मै ते विधेम याजाय स्वाहा ॥ (य. १७७१) सरस्वती में प्राण प्राणका संरक्षण (१७) । इस मंयका - हे सहस्र नेत्रवाले अने? तेरे सैकडी प्राण, सैकड़ों प्राण प्राणं प्रायस्वासो असवे मृड ॥ उदान और सहन व्यान हैं। सहस्रो धनोपर तेरा प्रभुत्व निर्ऋते नित्या नः पाशेभ्यो मुच ॥४॥ है । इसलिये शक्ति के लिये हम तेरी प्रासा करते है।' वातः प्राणः ॥५॥ (भ १९/४४) सहस्राक्ष अग्नि पक्षात्मा ही है। शतक्रतु, • हे प्राण हमारे प्राणका रक्षण कर । हे जीवन । हमारे इंट, सहस्राक्ष आदि शब्द आमावाचक ही है। सहस्र तेजोंका जीवनको सुखमय कर । हे मनियम ! अनियमके पागोंसे धारण करनेवाला मामा ही सहस्राक्ष मग्नि है। प्राण, उदान हमे यचा ।' ग्यान भादि लय प्राण सैकडो प्रकारके है। प्राणका स्थान शरी अपनी प्राणशक्तिका संरक्षण करना चाहिये, अपने जीव- रमें निश्चित है । हृदयमे प्राण है, गुदाके प्रांतमे अपान है। नको मंगलमय बनाना चाहिये । नितिके जालोसे बचना नाभिस्थानमे समान है, कंउमें उदान है और सर्व शरीरमें चाहिये । 'ऋति' का अर्थ है- प्रगति, उन्नति, ग्यान है, प्रत्येक स्थानमे ठोटे मोटे अनेक अवयव है भौर सन्मार्ग, उत्कर्ष, अभ्युदय, योग्यता, सत्य, सीधा मार्ग, प्रत्येक भवयवके सूक्ष्म भेद सहस्री हैं। प्रत्येक स्थानम और संरक्षण, पवित्रता।' और निर्ऋतिका अर्थ है अवनति, सूक्ष्मसे सुक्ष्म भेदमें उस उस प्राणकी अवस्थिति है। कुमार्ग, भपकर्ष, अयोग्य रीति, असम्मार्ग, टेढीचाल, घात- प्रत्येकके प्राण के मकडी और सहयों भेट हो सकते है। पातको रीति, अपवित्रता, निर्गतिके साथ जानेवाला नि.संदेह इस प्रकार यह प्राणशक्तिका विस्तार हजारी रूपोंसे गरीर अधोगतिको जाता है। इसलिये इस टेढमार्गके भ्रम- भरके सूक्ष्मसे सूक्ष्म अंगमें हुमा हुमा । यही कारण है, जालसे यचनेकी सूचना उक्त मंत्रमे दी है। हरएक मनुष्य कि प्राणशकिके वशमे होनेसे सत्र संग प्रत्यंग अपने भाधीन जो उन्नति चाहता है, सावधान रहता हुना अपने आपको हो जाते हैं और प्राणशक्तिके वशमे होनेसे सब शरीरकी इस अधोगतिके मार्गसे बचावे । निर्ऋतिके जाल प्रारंभमे नीरोगता भी सिद्ध हो सकती है। इस प्रकार यजुर्वेदकाप्राण बढे सुंदर दिखाई देते है। परंतु जो उनमे एकवार फंस विषयक उपदेश है। यजुर्वेदका उपदेश क्रिया-प्रधान जाता है, उसके लिए फिर उसमेसे निकलना बडा मुश्किल होता है। पढ जाता है । सब प्रकारके दुर्व्यसन, भ्रम, भालस्य, छल, सामवेद उपासनात्मक होनेसे प्राणके साथ उसका घनिष्ट कपट आदि सब ही इस निर्गतिके जालके रूप है। इसलिये सबंध है । इसीलिए कई उसको 'प्राण वेद' भी समझते उन्नति चाहनेवालेको चाहिए कि, वे इस बुरे रास्ते से अपने हैं । उपासना द्वारा जो प्राणका बल यढता है उतनी ही सहा- भापको बचायें। योगसाधन करनेवालोके लिए यह उपदेश यता सामवेदसे इस विषयमें होती है। अन्य बातोका उप- अमूल्य है। योगके यम नियम इसी उपदेशके अनुसार देग करना अन्य वेदोका ही कार्य है। इसलिये यहां इतना बने हैं। अपने विषयमें किस प्रकारकी भावना करनी चाहिए ही लिखते हैं कि जो परमात्मोपासनाका विषय है, उसको इसका उपदेश निम्न मत्रमे किया है- प्राणशक्तिका विकास करनेके लिये पाठक अत्यंत आवश्यक मैं विजयी हूँ सपा और मनुष्टान करनेके समय उसको किया करें । सूर्यों में चक्षुर्वातः प्राणः भव अथर्ववेदका प्राणविषयक उपदेश देखते है। अंतरिक्षमात्मा पृथिवी शरीरम् । अस्तृतो नामाहमयमस्मि स आत्मानं निदधे अथर्ववेदका प्राणविषयक उपदेश द्यावापृथिवीभ्यां गोपीथाय ॥ (अ ५९७) प्राणापानौ मृत्योर्मा पातं स्वाहा ॥ (अ ३।१६६१) सूर्य मेरा नेत्र है, वायु मेरा प्राण है, अंतरिक्षस्थ तत्त्व मेमं प्राणो हासीन्मो अपानः। (म २१२८१३) मेरी भात्मा है, पृथिवी मेरा स्थूल शरीर है इस प्रकारका प्राण अपान मुझे मृत्युसे वचावें ॥ प्राण अपान इसको मैं अपराजित हूं। मैं अपने आपको यु और पृथिवी लोकके न छोडे ।' इन मत्रोमे प्राणकी शक्तिका स्वरूप बताया है। अतर्गत जो कुछ है उस सबके सरक्षणके लिये अर्पित प्राणकी सहायतासे मृत्युसे सरक्षण होता है । प्राणके वशमें मा करता हू। जानेपर मृत्युका भय नहीं रहता। मृत्युका भय हटाने के आत्मशक्तिका विकास करनेके लिये समष्टिकी भलाई के लिये प्राणको प्रसन्न करना चाहिये। लिये अपने भापको समर्पित करना चाहिए और अपनी ३ [अर्व भा १ हिन्दी] - - (२८) अथर्ववेदका सुबोध अनुवाद - 'दीर्घजीवन और आरोग्य' भांतरिक शक्तियांक साप भाग्य देवताभोंका संबंध देखना भी विशेष प्रसंगी प्राणाया है। पंचप्राण, पच भग्नि, चाहिए । इतना ही नहीं प्रत्युत बाल देवतामों संग अपने प्रोणाग्निहोत, मादिगन्दो द्वारा माणसी ममिस्या सिद्ध है। मागरम रह रहे है और चाय देवतामाके सूक्ष्म अंगीका इस भावको देखनेमे पता रगता है कि, अनिदनाक मंत्रों में वना हुमा में एक छोटासा पुतला हूं, ऐसी भावना धारण भी प्राणका वर्णन गौणवृत्तिसे हैं, म यस्थानीय देवताओं में करके अपने भापको देवनामोंका अंगरूप, तथा अपने शरी- वायु और मंद ये दो देवताएं प्रमुग है । वायु देवनाकी रको देवताओंका संघ अथवा मंदिर समझना चाहिए । योग- प्राणरूपत्ता सुप्रसिद्ध ही है। म्यान मान्निध्य में भी माधनसे यही भावना मुरव्य है। अपने भापको निकृष्ट और प्राणर पत्त्व जा सकता है। इस दृष्टिनेन्द्र देवताक मंत्रोंसे भी हीनदीन समाना नहीं चाहिए, परंतु 'यह अस्तृतः वेदमें प्राणका वर्णन मिल सकता है । इस प्रकार अनेक देव- अस्मि' ( I am invincible ) मैं अपराजित है, मैं ताओं द्वारा बेदमे प्राणशक्तिका वर्णन है । किसी म्यानपर भक्तिगाली हू, इस प्रकारकी भावना धारण करनी चाहिए। व्यष्टि दृष्टिसे है और किसी न्यानपर समष्टि दृष्टिले हैं। प्रथ- निस जिसके विचार होगे वैमी ही उसकी अवस्या बनेगी। विस्तारके भयने यहां केवल उतना ही लिया गया है कि इसलिये अपने विषयमें कदापि तुच्छ बुद्धि धारण करना नि मंत्रोंमें स्पष्ट रूपले प्राणका वर्णन भाया। भव प्राणी उचित नहीं है। प्राणायाम करनेवालेको तो अत्यंत आवश्यक सना कितनी व्यापक है उसका वर्णन निम्न मत्रोम देखिये- है कि अपने गरीरको देवनाओंका मंदिर, ऋषियोका भाश्रम प्राणका मीठा चाबुक समझे और अपने आपको उसका भधिष्टाता तथा परमा- स्माका सहचारी समझे। अपनी भावना जैसी दृढ होगी वैसा महत्पयो विश्वरूपमस्या ही अनुभव मा सकता है। वेदमें- समुद्रस्य त्वात रेत आहुः । पंचमुखी महादेव यत ऐति मधुकशा रराणा प्राणापानी व्यानोदानी ॥ (अ. ११८१२६) तत् प्राणस्तदमृतं निविष्टम् ॥२॥ मातादित्यानां दुहिता वसूनां प्राण, अपान, व्यान, उदान आदि नाम आये हैं। उप- प्राणोंक नाम बेदम दिखाई नही दिये । किसी अन्य रूपसे प्राणः प्रजानाममृतस्य नाभिः । हिरण्यवर्णा मधुकशा घृताची उनका उस संभवत हो। पंच प्राण ही पचमुसी र है, महानार्भश्चरति म]पु॥८॥ (अथर्व. ९३१) रदके जितनं नाम हैं वे सब प्राणवाचक ही हैं। महादेव, गंभु आदि सब रुद्रक नाम प्राणवाचक हैं। महादेवके पांच (अस्याः) इस पृथिवीकी और समुद्रकी यढी (रेतः) मुस जो पुराणों में है, उनका इस प्रकार मूल विचार है। शक्ति तू है ऐसा कहते हैं। जहाने चमकता हुआ मीठा- महादेव मृत्युजयके स्वरूपका यहा निर्णय हो सकता है |शत- चाबुक चलता है वही प्राण और वही अमृत है। आदित्योंकी पथमें एकादश रुद्रांका वर्णन है। माता, वसुबोंकी दुहिता, प्रजाओंका प्राण और अमृतकी कतसे रुद्रा इति । दशेमे पुरुपे प्राणा आत्मैकादशः ॥ नाभि यह मीठा-चावुक है। यह तेजस्त्री, तेज उत्पन्न करने- (अत, प्रा. १४५) वाली और (म]पु गर्भः) मत्यकि अंदर संचार करने- कौनसे रद्र है ? पुरुषमें दा प्राण है और ग्यारहवां वाली है।' मात्मा है। ये ग्यारह रुद्र है।' भर्यात प्राण ही रुद्र है और इस मंत्रमे 'मधु-कशा' शब्द है । 'मधु' का अर्थ इमलिय भव, गर्व, पशुपति आदि देवताक सब सूक्त अपने मीठा, स्वादु है । और 'कशा' का अर्थ चाबुक है । चाबुक अनेक नाम एक ग्राणवाचक अर्थ भी व्यक्त करते हैं । पशु- घोडागाडी चलानेवालेके पास होता है। चाबुक मारनेसे पति अब्दको प्राणवाचक माननेपर पशु शब्दका अर्थ इंद्रिय गाढीके घोडे चलते है । उक्त मंत्रों में 'मधु-कगा' अर्थात् ऐसा ही होगा। इंद्रियोंका घोडे, गौव, पशु आदि अनेक प्रका- मीठा-चाबुकका वर्णन है । यह मीठा-चाबुक अश्विनीदेवीका ग्म वर्णन किया ही है । इस रीविसे वेढमें अनेक स्थानमें है। अश्विनीदेव प्राणरूपसे नासिका स्थानमे रहते है, प्राण, प्राणकी उपासना ढिसाई टेगी। इस लेसमें रुद्रवाचक मय अपान, श्वास उच्छ्वास, दांये और बोये नाकका श्वास यह मनोंका प्राणवाचक भाव वनाने लिये स्थान नहीं है, इस- अश्विनीदेवोंका प्राणमयरूप गरीरमं है। इस गरीरमे अश्विनी- लिये हम स्थानपर चल दिग्दर्शन ही किया है। अनिन्द रूप ग्राणोंका ' मीटा-चाबुक' कार्य कर रहा है और शरीर .
माणका संरक्षण (१९) अहं अयुतः । M । उक्त रूपी रभके इंद्रियरूप घोढोंको चला रहा है। इस चाबुकका प्रकट हो इसकी व्यवस्था हरएकको करनी चाहिये । उक्त यह स्वरूप देखनेसे इस अद्वितीय और विलक्षण अलंकारकी मंत्रमें कई शब्द अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं- करपना पाठकोके मनमें स्थिर होसकती है। यह प्राणोका मीठा चावुक हम सबको प्रेरणा दे रहा है, इसकी प्रेरणाके अहं सर्वः अयुतः। बिना इस शरीरमे कोई कार्य नहीं होता है। इतना ही नहीं मैं संपूर्ण रूपसे स्वतंत्र, दूसरे किसीकी सहायता भपितु सब जगत्में यह ' मीठा-चाबुक ' ही सबको गति दे बिना ही सब करनेमें समर्थ और किमी कष्टसे न डिगनेवाला रहा है । सब जगत्म प्राणका कार्य देखने योग्य है। मंत्र कहता है कि ' इस मीठे चाबुकमे पृथ्वी और जलकी सन मनुष्यकी अपार शक्ति बढ सकती है। मेरी इंद्रिया, मेरे तथा दृढ हूं।' यह भावना यदि मनमें स्थिर हो जायेगी तो शक्ति रहती है, जहांसे यह मीठा चाबुक चलाया जाता है तथा मेरे अन्य अवयव ऐसे दृढ और वलवान् होने चाहिये वही प्राण और ममृत रहता है। ' प्राण और अमृत एकत्र कि मुझे उनके कारण कभी क्लेश न हो सके, तथा किसी ही रहते है क्योंकि जबतक शरीरमे प्राण रहता है, तबतक दूसरेको शक्तिकी अपेक्षा न करता हुभा, मैं पूर्ण स्वतंत्रताके मरणकी भीति नहीं होती। और सभी जानते हैं कि प्राणि- योंके शरीरोंमें प्राण ही सबका प्रेरक है, इसलिये उसके साथ भानंदसे महान् पुरुषार्थ कर सकू। कोई यह न समझे कि यह केवल ख्याल ही ख्याल है। मैं यहा निश्चयपूर्वक कह चाबुक्की कल्पना उक्त मंत्रम कही है क्योंकि शरीररूपी रथके घोढोंको चलानेका कार्य यही चायुक कर रहा है। अपने आपको इस प्रकार पूर्ण स्वतंत्र बना सकते है और सकता हूं कि यदि मनुष्य निश्चय करेंगे तो नि.सदेह वे दुसरे मंत्रम कहा है कि 'यह चायक शरीरस्थ वसु भादि शक्तियोंका पूर्ण विकास वे अपने अंदर कर सकते है। देवतालोका सहायक है, यह प्रजाओका प्राण ही है, अमृत- का मध्य यही है। यह प्राण मयों में तेज और चेतना उत्पन्न प्राणकी मित्रता करता है और सब प्राणियोके बीच में यह चलता है। इहैव प्राणः सख्ये नो अस्तु तं त्वा परमेष्ठिन् वर्णन उत्तम अलंकारसे युक्त है, परंतु स्पष्ट होने के कारण पर्यग्निरायुपा वर्चसा द्धातु.॥ (म० १३।१।१७) हरएक इसका उपदेश जान सकता है । तथा- यही प्राण हमारा मित्र बने ' हे परमेष्ठिन् । हमे वह अपनी स्वतंत्रता और पूर्णता दीर्घ भायु और तेजके साथ प्राप्त हो ।' प्राणके साथ मित्रता- का तात्पर्य इतना ही है कि हमारे शरीरमें प्राण बलिष्ठ होकर नसोः प्राणः॥ (म १९६६०) रहे । कभी भल्प भायुमें प्राण दूर न हो। अपने मायुग्यमे श्रोत्रं चक्षुः प्राणोऽच्छिन्नो नो परमेष्ठी परमात्माकी ही सेवा और उपासना करनी चाहिये । अस्त्वच्छिना वयमायुपो वर्चसः॥५॥ परमात्मा सर्व श्रेष्ठ गुणोका केन्द्र होनेसे परमात्मचितन द्वारा (अ० १९५८) सभी श्रेष्ठ सदगुणोका ध्यान होता है और मनुष्य जिसका अयुतोऽहमयुतो मे आत्माऽयुतं मे चक्षु सदा ध्यान करता है उनके समान बन जाता है, इस नियम- रयुतं मे श्रोत्रमयुतो मे प्राणोऽयुतो मेऽपानो के अनुसार परमेश्वरके गुणोके चिंतनसे मनुष्य भी श्रेष्ठ वन ऽयुनो मे व्यानोऽयुनोऽहं सर्वः ॥ १॥ सकता है। यह उपासनाका और मानवी उन्नतिका सबध (अ० १९५१) है। इस प्रकार जो सत्पुरुष अपनी प्राणशक्तिको बढाता है 'मेरे नाकमे प्राण स्थिरतासे रहे । मेरे कान, नेत्र और उसकी प्राणशक्ति कितनी विस्तृत होती है, इसकी कल्पना प्राण छिन्नभिन्न न होते हुए मेरे गरीरमे कार्य करे । मेरी निम्न मंत्रोसे होसकती है- आयु और तेज अविच्छिन्न अर्थात् दीर्घ होवे ।.मै, भात्मा, तस्य व्रात्यस्य। सात प्राणाः सप्तापानाः सप्त व्यानाः॥ चक्षु, श्रोत्र, प्राण, अपान, व्यान आदि मेरी सब शक्तियां योऽस्य प्रथमः प्राण ऊो नामायं सो अग्निः ॥ पूर्ण स्वतंत्र और उन्नत होकर मेरे शरीरमें रहें । योऽस्य द्वितीयः प्राण प्रौढो नामासौ स आदित्यः ।। आयु और प्राणके अविच्छिन्न रूपसे इस शरीरमें रहनेकी योऽस्य तृतीयः प्राणोऽभ्यूढो नामासौ स चंद्रमाः॥ प्रबल इच्छा उक्त मंत्रमें है। सव इद्रियां तथा सब अन्य योऽस्य चतुर्थः प्राणो विभूर्नामायं स पवमानः ॥ शक्तियां भविपिन तथा पूर्ण उन्नत रूपसे भपने शारीरमें योऽस्य पंचमः प्राणो योनि म ता इमा आपः॥ ग्रह - । (२०) अथर्ववेदका सुबोध अनुवाद दीर्घजीवन और आरोग्य' योऽस्य पष्ठः प्राणः प्रियो नाम ॥ चेतना देता है। उत्साह और सावधानता ये दो सदगुण त इमे पशवः ॥ योऽस्य सप्तमः प्राणोऽपरिसितो जिस मनुप्यमे जितने होंगे, उतनी योग्यता उस मनुष्यकी हो सकती है। ये दो ऋपि प्राणक सरक्षणका कार्य करते है नाम ता इमाः प्रजाः ॥ (म० १५:१५/१-९) उस (वात्यस्य) सन्यासी सत्पुरुपके सात प्राण, और यदि ये दिनरात जागते रहे तो मनुष्यको मृत्युकी सात भपान, सात व्यान है। उसके सातो प्राणोंक नाम क्रमश. बाधा नहीं हो सकती। जबतक मनुष्यका मन उत्साहसे अर्व, प्रौढ, अम्यूड, विभू, योनि, प्रिय भौर अपरिमित है। परिपूर्ण रहेगा और जवतक सावधानताके साथ वह अपना और उनके सात स्वरूप क्रमश. अनि, आदित्य, चंद्रमा, मवहार करेगा, तबतक उसको मरणकी भीति नहीं होगी, पवमान, माप, पशु और प्रजा है।' इसी प्रकार इसक अपान यह सर्व साधारण नियम है। और व्यानका वर्णन उक्त स्थानमे ही वेदने किया है। मनुष्य जो लोग असावधानताक साथ अपना दैनिक व्यवहार अपनी गतिको इस प्रकार बढा सकता है। मनुष्य अपने करते है, तथा जो सदा हीनदीन और दुर्वलताक ही विचार साती प्राणोका अपरिमित रूपमे बढा सकता है । वही अपने मनमें धारण करते है, उनको इस मंत्रका भाव ध्यानमें आपको सब प्रजाजनोक हितके कार्यमे अर्पण कर सकता है, धरना उचित है । वेद कहता है कि मनमे उत्साहके विचार जो अपने प्राणको ऊर्ध्व अर्थात उच्च करता है और अग्निके धारण करो और प्रतिक्षण सावधान रहो। जो मनुष्य अपने समान तेजस्वी होता है । इस प्रकार उक्त कयनका भाव आपको वैदिक धर्मी समझता है उसको उचित है कि वह समझना चाहिए । तथा- अपने मनमे वेढके ही अनुकूल भाव धारण करे । वैदिक समयकी अनुकूलता . धर्मी मनुष्यको उचित नहीं कि वह वेदके विरुद्ध हीन भौर काले मनः काले प्राणः काले नाम समाहितम् । दीनताके विचार अपने मनसे धारण करके मृत्युके कामें कालेन सर्वानंदन्त्यागतेन प्रजा इमाः ॥ ७ ॥ होवे । वैदिक धर्मका विशेष उद्देश सर्वसाधारण जनताकी (म० १९५३) भायुप्यवृद्धि और आरोग्यवृद्धि करना ही है। इसीलिये स्थान 'कालको अनुकूलतासे ही मन, प्राण और नाम रहते है। स्थानके वैदिक सूक्तोमें दीर्घायुत्वकं अनेक उपदेश भाते है। कालको अनुकूलतासे ही सब प्रजाभोको भानंद होता है।' कारका नियम पालन करना चाहिये । पुरुषार्थ के साथ वृद्धताका धन काटकी अनुकूलता होनेसे उत्तम फल प्राप्त होता है । कालकी प्रविशतं प्राणापानावनवाहाविव प्रजम् । अवहेलनाकी उपेक्षा नहीं करनी चाहिये । कालको अनु- अयं जरिम्णः शेवधिररिष्ट इह वर्धताम् ॥ ५॥ कृरता प्राप्त होती है उसका उपयोग अवश्य करना चाहिए। आ ते प्राण सुवामसि परा यक्ष्मं सुवामि ते ॥ प्राणायामादि साधन करनेवाले को उचित है कि वह योग्य आयुनों विश्वतो दधदयमग्निर्वरेण्यः ॥ ६ ॥ काल्में नियमपूर्वक अपना अभ्यास किया करे, तथा जिस (अ० ७५३) समय जो करना योग्य है। उसको अवश्य ही उस समय 'जिस प्रकार चैल अपने स्थानपर वापस भाते हैं, उस करना चाहिए । अब प्राणके मरक्षक ऋषियोंका वर्णन निम्न- प्रकार प्राण और अपान अपने स्थानपर भा जावें । वृद्धा- लिन्वित मंत्रम देखिये- वस्थाका जो खजाना है वह यहा कम न होता हुआ बढता प्राणरक्षा झाषि रहे । तेरे अदर प्राणको प्रेरित करता हूँ और वीमारीको दूर ऋपी बोधप्रतीवोधावस्वप्नो यश्च जागृविः । फेंकता हूं। यह श्रेष्ठ अति हम सवको सब प्रकारसे दीर्घ तो ते प्राणस्य गोतारी दिवा नक्तं च जागृताम् ॥ मायु देवे ।' (भ० ५.३०१०) जिस प्रकार बैल गामके समय वेगसे अपने आपने स्थानपर 'योय और प्रतिबोध अर्थात स्फूर्ति और जागृति ये भा नाते है, उसी प्रकार बलयुक्त वेगसे प्राण और दो अपि है । ये दोनो तेरे प्राणको रक्षा करते हुए दिन- अपान अपने अपने स्थानमे रहे। जब प्राण और अपान रात जागते हैं।' प्रत्येक मनुष्यने ये दो ऋपि हैस्फूर्ति और जागृति।' नहीं होसकता और मनुष्य दीर्घ भायुप्यरूपी धन प्राप्त बलवान् घनकर अपना अपना कार्य करेंगे तब मृत्युका भय एक उन्माइको प्रेरित करता है और दूसरा सावधान रहनेकी कर सकता है । सब धनोंमें भायुप्यरूपी धन ही सबसे श्रेष्ठ 2 - माणका संरक्षण (२१) है, क्योकि सब अन्य धनोंका उपयोग इसके होनेपर ही हो कभी ऐसा कर्म नहीं करना चाहिये कि जिससे अवनति होनेकी सकता है। उक्त मंत्रमें- संभावना हो सके जीवन के लिये प्राणका बल फैलाना चाहिए। जरिम्णः शेवधिः इह वर्धताम् ॥ (अ. ७५३।५) प्राणका बल बढानेसे दीर्घ आयुग्य प्राप्त हो सकता है । यह ये गन्द मनन करने योग्य है । ' वृद्ध आयुका खजाना गरीररूपी उत्तम रथ है, जिसमे इंद्रियरूपी घोडे जुते हुए है। यहा बढता रहे । अर्थात् इस लोकमे आयु बढती रहे, ये गब्द इस रथमे प्राणरूपी अमृत है । इसलिये इसको सुखमय रथ स्पष्टतासे बता रहे है कि भायु निश्चित नही प्रत्युत वढने- कहा जाता है । इस सर्वोत्तम स्थपर मनुष्य चढे और अपनी वाली है । जो मनुष्य अपनी आयु बढाना चाहे वह उस प्रकार- उन्नतिके मार्गमे मागे वढे । जब मनुष्य वल और दीर्घ आयु के आयुष्यवर्धक सुनियमोंका पालन करके आयु बढा सकता प्राप्त कर लेगा तब उसको बडी बडी सभाओसे अवश्य ही है। इस प्रकार वेदका उपदेश अत्यंत स्पष्ट है । परतु कई सभाषण करना होगा, क्योकि तब दूसरोंका सुधार करना वैदिक धर्मी समझते है कि आयु निश्रित है और घट बढ उसका कर्तव्य ही होता है। जीवनार्थ युद्ध में सब जनताको उत्तम नहीं सकती। जो वेद सम्मत नहीं है। मार्ग बतानेका कार्य उसीका होता है। उसे स्थायी बनना नहीं चाहिए । प्रत्युत जनताकी उन्नतिमे ही उसे अपनी उन्नति वोध और प्रतिबोध समझनी चाहिए। इस मंत्रसे पता लगता है कि प्राणायामादि पूर्व स्थानमे वोध और प्रतिबोध ये दो ऋपि बताए हैं, साधनों द्वारा दीर्घ आयु, उत्तम आरोग्य, अद्वितीय बल, वही भाग थोडेस फरकसे निम्नलिखित मंत्रमें भी आया है- सूक्ष्म बुद्धि और विशाल मन प्राप्त करनेके पश्चात् मनुष्यको वोधश्च त्वा प्रतिवोधश्च रक्षतां- अपना जीवन सार्वजनिक हितसाधन करनेमें लगाना चाहिए। अस्वप्नश्च त्वाऽनन्नद्राणश्च रक्षताम् समाजसे अलग होकर अपनी ही गाति प्राप्त करनेमात्रसे गोपायंश्च त्वा जागृविश्च रक्षताम् ॥ (भ. ८1१।१३) मनुष्य कृतकार्य नहीं हो सकता, अपितु जब एक ' नर' अपने उत्साह और सावधानता तेरा रक्षण करे । स्कृति और भापको उन्नत करके वैश्वानर' के लिये भात्मसमर्पण जागृति तेरा संरक्षण करें। रक्षक और जागृत तेरा पालन करे।' करता है, तब ही वह उच्चतम अवस्थाको प्राप्त कर सकता है। इस मंत्रमे संरक्षक गुणोंका वर्णन है। उत्साह, सावधानता, यही सर्व-मेध-यज्ञ है। इस प्रकार उक्त मंत्रमे योगी स्फूर्ति, जागृति, रक्षण और खबरदारी ये गुण संरक्षण करने- मनुष्यों के सम्मुख अंतिम उच्च आदर्श रस दिया है। योगी- वाले हैं और इनके विरुद्ध गुण घातक है। इसलिये अपनी जनोंका प्रभाव कहां तक पहुंचता है, इसका पता निम्न मंत्रसे अभिवृद्धिकी इच्छा करनेवालेको उचित है कि वह उक्त लग सकता है- गुणोकी वृद्धि अपनेमे करे । इस मनके साथ पूर्व मंत्रकी जिसमे दो ऋषियोका वर्णन है, तुलना करके देखे । अव निम्नलिखित मंत्र देखिये- कृणोमि ते प्राणापानी जरां मृत्यु दीर्घमायुः स्वस्ति । उन्नति ही तेरा मार्ग है वैवस्वतेन प्रहितान् यमदूतां- उद्यानं ते पुरुप नावयानं श्चरतोप सेधामि सर्वान् ॥ ११ ॥ जीवातुं ते दक्षताति कृणोमि । आरादराति निति परो ग्राहिं आ हि रोहेमममृतं सुखं रथ- क्रव्यादः पिशाचान् । रश्नो यत्सर्व दुर्भूतं मथ जिर्विविदथमा वढासि ॥ (म ८।११६) तत्तम इवाप हन्मास ॥१२॥ 'हे मनुष्य । तेरी गति (उत् यानं ) उन्नतिकी ओर ही अग्नेष्टे प्राणममृतादायुष्मतो हो । कभी भी (अव यानं न) अवनतिकी ओर न हो । वन्वे जातवेदसः। यथा न तेरी दीर्घ मायुके लिये मै वलका विस्तार करता है। इस रिप्या अमृतः सजूरल- सुसमय गरीररूपी अमृतमय स्थपर (आरोह) चढ और स्तत्ते कृणोमि तदुते समृध्यताम् ॥१३॥ जब तू दीर्घ आयुसे युक्त हो जाएगा तब (विदथं) सभा- (भ ८२) भोंमे (आवदासि) संभाषण कर सकेगा। 'मै तेरे अंदर प्राण और भपानका बल, भपना भभ्युदय साधनेका हमेशा यत्न करना चाहिये, (स्वस्ति) स्वास्थ्य भादि सव मन्छे भाष, वृद्धास्थाके यमके दूत दीर्घ आयु,
-
(२२) हाथर्ववेदका सुबोध अनुवाद - 'दीर्घजीवन और आगंग्य'
पश्चात योग्य समयमं मृत्यु आदिकी ग्यापाग मना 71 गा। मा प्रकार रोगीक नीज अग्नेि हट जान हैं।
म्त अमके द्वारा भेजे यमदतोंको मैं हँट ट्रेड कर दूर करता जिस प्रकार मृर्य अपनी किरणो हाग अंधकारका निर्मूलन
है। (भराति) द्वेष (निति) नियमविस्ट व्यवहार, करना है, उस प्रकार योगी अपनी प्राणशान्ति प्रभावी मब
(प्राहि) जक्रटनेवाले रोग, (व्यादः ) मासको क्षीण गंगवीजाको कर सकता है।
करनेवाली बीमारी (पिशाचान ) रक्तको निर्वल कग्नवाले नो यब बने हुए पढायाको यथावत जानता है वह आत्मा
रक्तके कृमि (रक्षाक्षरः) सब भयक कारण (नव
'जात-वेदाग्नि' है । वह मात्मा अमृतस्प तथा आयुष्मान
दुर्भतं ) सब बुरा व्यवहार भादि जो कुछ विनायक है, उस है। इसलिय बही सवको अमर और आयुष्मान कर सकता
सबको अंधकारके समान मै दर करना है । तेरे लिये मै है। जो उसके साथ अपनी आत्माको योगसाधनद्वारा मयुक्त
नेजम्बी, अमर और आयुष्मान, जातवेदसे प्राण प्राप्त करता
कर सकते है वे अपने आपको दीर्घमायुसे युक्त और भमर-
हु । जिस प्रकार तेरी अकालमृत्यु न हो, तू अमर अर्थात् त्वमे पूर्ण बना सकते हैं। इस प्रकारसे साधनसंपन्न योगी
टीर्घजीवी बने, (मजूः) मित्रभावने मनुष्ट रहे और तुझे कष्ट अकाल मृत्युसे मरते नहीं, अमर बनते है, सदा संतुष्ट और
न हो उस प्रकार की समृद्धि तेरे लिये मैं अर्पण करता ह॥' प्रेमपूर्ण बनते हैं, इसलिये सत्र प्रकारको समृद्विसे युक्त होते
इन मंत्रोम प्राण मावनक द्वारा जो विलक्षण सिद्धि प्राप्त
है। यही सच्ची समृद्धि है। मनु'यका अधिकार है कि वह
होती है टमका उत्तम वर्णन है, प्राणका बल प्राप्त करनेसे
इम समृद्धिको प्राप्त करे।
मत्र प्रकारका स्वास्थ्य, दीर्घमायु, बल तथा योग्य कालमे
अथर्वाका सिर
मृत्यु हो सकती है । परंतु प्राणका बल न होने की अवन्याम
नाना प्रकारके रोग, अल्प आयु, भगकता और अकाल मृत्यु चित्तवृत्तियोका निरोध करना और सनकी सय वृत्तियोंको
होती है । इमस प्राणायामादि द्वारा प्राणकी गति बढानेकी स्वाधीन रसकर उनको अच्छे ही कम लगाना योग कह-
भावश्यकताम्पष्ट मिट होती है। जो विहान भायुको परिमित लाता है। इस प्रकारका पु-वार्य जो करता है उसको योगी
और निश्चित मानते है वे कहते है कि यमके दून सब जगत्- कहते है।
में मंचार करते है, ये आयुकी समातिके समय मनुष्यक योगीके अंदर चचरता नहीं रहती और दृट स्थिरता
प्राणोंका हरण करते हैं । इसलिये भायु बढ नहीं सकती। मनोवृत्नियों में शोभा बढाने लगती है । इस प्रकारके योगीका
इस भवैदिक मनका गहन करते हुए वेद कहता है कि जो नाम 'अथवी होता है। अचंचल' यह अथवी गब्दका
यमदत हम जगम्मे संचार करते होगे, उनको भी प्राणक
मात्र है। एकाग्रताकी लिढि उसको प्राप्त होती है। इस
मनुष्टानगे दूर किया जा सकता है । इसमे मनुष्य पराधीन भथर्वाका जो वेद है वह मथर्ववेद है। अथर्ववेद सर्वसामान्य
नहीं है। अनुष्ठानकी गैतिस प्राणका बल बढारेंगे, तो उग्नी मनुष्योक लिये नहीं है। योगसाधनका इसमें मुरय भाग
श्रण यमदन आपसे दूर हो सकते है । ग्राणोपासना करन- होनस तथा नि अवस्थाकी बात इसमें होनेसे यह अथर्य-
वालोंके ऊपर यमदृत अपना प्रभाव नहीं टाल सकते । इम वेदका योगियोंका बंद है। इसमें इसी कारण प्राणायामविष-
प्रकारका अभयदान वेद दे रहा है, हमती भोर हराएक वैटिक-
यक टपढेग सब अन्य वेदोकी अपेक्षा अधिक है । हम वेदमे
धर्माका "यान अवश्य जाना चाहिए । हम विचारका धारण अथर्वा मिरका वर्णन निम्न प्रकार किया है.
कक निर्भय बनकर प्राणायामद्वारा अपनी आयु हरएको
दीर्य बनानी चाहिए तथा अन्य प्रकारका स्वास्थ्य भी प्राप्त
मूर्धानमस्य संसीव्याथर्वा हृदयं च यत्
करना चाहिए। प्राणायामके अनुष्ठानसे मनुष्य इतना बल
मस्तिप्कादृर्ध्वः प्रेरयत्पवमानोऽधि गीर्पतः ॥२६॥
प्राप्त कर सकता है कि जिससे वह यमदतांको भी दूर भगा
नहा अथर्वणः शिरो देवकोशः समुग्जितः
सकता है । इतना सामर्थ्य प्राप्त होता है इसलिये ही मब
तन्प्राणो अमि रक्षति शिरो अन्नमयो मनः ॥२७॥
अष्ट पुरुप प्राणायामका महत्व वर्णन करते है।
यो व तां ब्रह्मणो वेदामृतेनावृतां पुरम् ।
प्राणायामग्ने सबही प्रकार के व्याधि-दाप और गेगोक तस्मै ब्रह्म च ब्राह्माश्च चक्षुः प्राणं प्रजां ददुः ।
मल, कारण दूर हो सकते है । दृष्टमाव, बुरा माचार, विधि नवे तं चक्षुर्जहाति न प्राणो जरसः पुरा ।
नियमा विपद व्यवहार आदि मब दोपहन सम्याग्नसे दूर पुरं यो ब्रह्मणां वेद यस्याः पुरुष उच्यते ॥ ३० ॥
प्राणका संरक्षण (२३) । । । अष्टाचका नवद्वारा देवानां पूरयोध्या। समप्रमाणमे विकसित करें । यही भाव 'मुर्धा और हृदयको तस्यां हिरण्मयः कोशः स्वगा ज्योतिषावृतः ॥३१ सीने' के उपदेगम है । दोनोंको सीकर एक करना चाहिए तस्मिन् हिरण्मये कोशे व्यरे त्रिप्रतिष्ठिने। और दोनोको मिलाकर भात्मोन्नतिके कार्यमे लगाना चाहिए। तस्मिन् यद्यक्षमात्मन्यत् तद्वै ब्रह्मविदो विदुः ३२ ब्रह्मलोककी प्राप्ति प्रभ्राजमानां हरिणी यशसा संपरीवृताम् । 'मस्तिका ऊपरके स्थानमें प्राणको प्रेरित करना' यह पुरं हिरण्ययी ब्रह्मा विवेशापराजिताम् ॥३३॥ दूसरा उपदेश उक्त मंत्रोमे है । मस्तिष्कमें सहस्रार चक्र है (अ १०२) और इसके नीचे पृष्ठवंगके साथ कई चक्र है । प्राणायाम द्वारा ' (अ-थर्वा ) स्थिरचित योगी अपने (मूर्धानं) नीचेसे एक एक चक्रमे प्राण भरनेकी क्रिया साध्य होती है मस्तिष्कके साथ हृदयको सीता है, और सिरके मस्तिष्कके और सबसे अतमे इस मस्तिष्कके सहस्रार चक्रमें प्राण भेजा ऊपर अपने (पवमानः)प्राणको भेज देता है। वही अथर्वा जाता है, इस अवस्थास पूर्व पृष्ठवंशकी नाडियोमे प्राणका का सिर है कि जिसको देवोका कोश कहा जाता है। उसका उत्तम संचार होता है । तत्पश्चात् मस्तिष्कके सहस्रार चक्रमे रक्षण प्राण, अन्न और मन करते हैं । अमृतसे परिपूर्ण इस प्राण पहुचता है और ब्रह्मरध्रतक प्राणकी गति होती है। यह ब्रह्मकी नगरीको जो जानता है उसको ब्रह्म और इतर देव प्राणकी सर्वोत्तम गति है। यही ब्रह्मलोक होनेसे तथा इस चक्षु, प्राण और प्रजा देते है। ऐसी इस ब्रह्मपुरीको जो स्थानमें प्राणके साथ मामाकी गति होनेसे, इस अवस्थामें जानता है, जिसमे रहनेके कारण इस भात्माको पुरुष कहते मुमुक्षुको ब्रह्मलोक प्राप्त होता है। इसलिये इस अवस्थाको है उसे वृद्धावस्थाके पूर्व चक्षु क्षौर प्राण छोडते नहीं। आठ सबसे श्रेष्ट अवस्था कहते है । यह सबसे श्रेष्ठ अवस्था प्राणा- चक्र और नौ द्वारोंसे युक्त यह देवोकी अयोध्या नगरी है, यामके नियमपूर्वक अभ्याससे प्राप्त होती है, इस कारण यह इसमें तेजस्वी कोग है वही देदीप्यमान स्वर्ग है । तीन भारोंसे योगियोंको प्राप्त होनेवाली अवस्था है। युक्त और तीन स्थानोपर स्थित उस तेजस्वी कोगसे जो देवोंका कोश पूज्य आत्मा है उसको ब्रह्मज्ञानी लोग जानते है। इस देदी- प्यमान, मनोहर, यशस्वी और अपराजित नगरीमे ब्रह्मा भ-या अर्थात् योगीका उक्त प्रकारका सिर सचमुच प्रवेश करता है।' देवोका खजाना है । इस प्रकारके अथर्वा सिरमें सब दिव्य भावनाएं रहती है। सब दिव्य श्रेष्ठ दैवी गक्तियोंका निवास योगसाधन करनेवालोके लिये यह उपदेश अमूल्य उसके गरीरमे होता है इसलिये उसका देह देवताओंका सञ्चा इसमे सबसे पहली बात यह कही है कि हृदय और मस्ति- मंदिर है । इस देवोके मंदिरकी रक्षा करनेवाले जो वीर है प्कको एक रूप बनावे । हृदयका धर्म भक्ति है और मस्ति- एकका धर्म विचार है । भक्ति और विचारका विरोध नही रोगबीजों और शारीरिक दोपोको हटाता है, श्रेष्ठ सद्गुणी उनके नाम प्राण, मन और भन्न है। बलवान् प्राण सब होना चाहिये । दोनो एक ही कार्यमे सम अधिकारसे प्रवृत्त और सत्यनिष्ठ मन अपने सुविचारो द्वारा इसको सुरक्षित होने चाहिये । जहा ये दोनो केंद्र विभक्त होते हैं उसमे दोष उत्पन्न होते है। धर्ममे विशेपत मस्तिष्कक तर्क और हृदः स है और आदर्श अवस्था प्राप्त हो सकती है। सात्त्विक रखता है । मनकी प्रबल इच्छा शक्ति द्वारा भी दोष दूर यकी भक्तिको समान स्थान मिलना चाहिये । जिस धर्ममे अन्नके सेवन करनेसे शरीर निर्दीप बनना है, मन भी सात्त्विक इनका स्थान समान नहीं होता, उस वर्ममे बढे दोष उत्पन्न बनता है और प्राणका बल भी बढता है। इस प्रकार ये तीन होते है। शिक्षाविभागस भी मस्तिष्क और हृदयको समान रुपसे विकसित करनेवाली शिक्षा होनी चाहिए। जिस शिक्षामे वीर- 'प्राण, मन और अन्न'- परस्परोका संवर्धन करते केवल मस्तिष्ककी तर्कशक्ति बढती है उस शिक्षा प्रणालीसे हुए सब मिलकर योगीकी सहायता करते है। यही प्राणाया- मका महत्व है। नास्तिकता उत्पन्न होती है और जिससे केवल भक्ति बढती है उस प्रणालीसे अंधविश्वास बढता है। इसलिये तर्क और ब्रह्मकी नगरी भक्तिका समविकास होनेसे दोनो दोष दूर होते है और सब ब्रह्मकी नगरी हृदयमें है और उसमे अमृत है। यह अमृत प्रकारकी उन्नति होती है। योगसाधन करनेवालेको उचित है देव प्रागन करते है और पुष्ट होते है। अर्थात हृदय स्थानीय कि वह अपनेमे मस्तककी तर्कगक्ति और हृदयकी भकि तर धिर ही सब इद्रियाम जाकर वहाका आरोग्य स्थिर रहता है । - - - लग सकता। (२४) अथर्ववेदका सुबोध अनुवाद 'दीर्घजीवन और आरोग्य' व्यका अयं स्वकीय इच्छास प्राप्तथ्य है, अन्यथा वह स्थान है। इस अमृतपूर्ण ब्रह्मकी नगरीको जो ठीक प्रकार जानता है, इस पुरीके सब गुणधमासे जो परिचित होता है, अपने सभी प्राणिमानके पास है ही, परंतु बहुत ही थोडे लोग है इस हृदयकी शक्तियोको जो जानता है उसको ब्रह्म और कि जो अपनी इच्छासे उसम प्रबंग कर सकते है । मात्म- ब्रह्मकी गनिया चक्षु, प्राण और प्रजा देती है। चक्षु मदने यक्तिका प्रभाव जानते हुए उस स्थानको जानना और ज्ञानके सब इद्रिय और अवयवाकी मृचना होती है, प्रजा शब्द सुन- माय उसमें निवास करना योगसाधनमे साध्य है। जाका बोध कराता है । और प्राण गये सामयंयुक्त अयोध्याका राम जीवनका ज्ञान होता है । तात्पर्य यह कि इस अपने हृदयकी इस नगरीम जो पूजनीय देव हे वहां आत्माराम है, उसको शक्तियोका उत्तम ज्ञान प्राप्त करनेसे उक्त प्रकारके लाम हो सकते है । प्राणायामसे जो चित्तकी एकाग्रता होती है उससे ब्रह्मज्ञानी लोग ही जानते है । अन्योको उसका पता नहीं कई मज्ञान शक्तियों का विज्ञान होता है, उसी अवस्थाम इस यगम्बी नगरी विजयी ब्रह्मा प्रवेश करता है। आतरिक उपकरणोका भी विज्ञान होता है इसी रीतिस हृद. ग्रादि अतरगांका पूर्ण ज्ञान होनेके पश्चात् वहा अपने जीवात्मा जब आसुरीभावनाओंपर विजय प्राप्त करता है तब मात्माकी गतिक अदभुत कार्यका साक्षात्कार होता है। साक्षात्कार होता है। वह अपनी गजधानीम विजयोत्सव करता हुआ प्रवेश करता मुप्रजा निर्माण करनेकी यक्ति, दीर्घ आयु और बलवान है । यह राजधानी अयो या नगरी यगसे परिपूर्ण है, दुःयाँका हद्विय ये तीन फल अपने हृदयके तथा वहाकी आत्मगक्तिके हरण करनेवाली है और तेजस प्रकाशित है । इसका पराजय ज्ञान प्राप्त करनेवालेको मिलते है। भानुरीभावनाओके द्वारा कभी हो ही नहीं सकता । इस लिये इसका नाम ही 'अपराजित भयोध्या' है। अपने जो पुस्प ब्रह्मज्ञानी बनता है वह अकाल मृत्युस नही हृदयकी इस शक्तिको जानना चाहिये । मैं अपराजित हूं। मरना, पूर्ण आयुग्न्यकी समाप्तिके पश्चात् स्वकीय इच्छासे वह दुष्टभावोसे मैं कभी पराजित नहीं हो सकता। मैं सदा विजयी मरता है। आयुष्यकी समाप्तितक उसकी सपूर्ण इंद्रिये, ही रहूंगा। मेरा नाम ही 'विजय' है । इत्यादि भाव उपा- अवयव और अग बलवान और कार्यक्षम रहते है । यह ब्रह्म- सकको अपने अंदर धारण करने चाहिये । 'मैं हीन, दीन, ज्ञानका फल है । कई यहा शंका करेंगे कि ब्रह्मज्ञानका यह दुर्बल और अधम हूं' इस प्रकारकं भाव कदापि मनम फल कैसे प्राप्त होता है ? इस काके उत्तरमे निवेदन है कि धारण नहीं करने चाहिये । ये अवैदिक भाव है । इस मंत्रमे ब्रह्मज्ञानस मात्मिक गांति होती है और उस कारण उसको मात्माका विजयी स्वरूप बताया है। उक्त फल प्राप्त हो सकते हैं। तथा जो ब्रह्मज्ञानी होता है उसका आचार-विचार गक्ति लीण करनेवाला न होनेके भावसे पगजित होती है और किस भावनाके धारण करनेसे अपनी मात्माका ही यह वर्णन है । आत्मा किस प्रकारक कारण उसकी शक्ति कमी क्षीण होती ही नहीं, प्रत्युत उसकी विजयी होती है, इसका सूक्ष्म वर्णन इनमें किया है । मात्मा शक्ति विकसित ही होती जाती है । जिसकी शक्तिकी अभि- ही ब्रह्मा है, वह हृदयक्रमलमे निवास करती है, हंस अर्थात् वृद्धि होती है, उसकी उक्त चीजें प्राप्त करना सरल ही है । प्राण उसका वाहन है' मादि वर्णन पूर्व स्थलमे मा चुका अयोध्या नगरी है। यह ब्रह्माकी नगरी है, यही देवोंकी पुरी अमरावती है, आठ चक्र और नौ द्वारोने युक्त यद्द देवताओकी नगरी है, यही सब कुछ है । इसका नाम 'अयोध्या' है। जिमम देवभावना और मासु अब चारों वेदोमसे अनेक मत्रीद्वारा जो जो उपदेश ऊपर रीभावनाओं का संग्राम नहीं होता, अर्थान, जहां देवीवृत्ति ही दिया है उसका साराम नीचे दिया जाता है जिसको पढनेसे मदा यांतिके माथ निवास करती है । इसलिये उसका नाम पूर्वोक्त सब कयनका भाव हृदयमें प्रकाशित हो सकेगा- 'म-यो या नगरी है । जबतक यह नगरी देवांक भाचीन १) आंतरिक प्राणका बाल्य वायुके साथ नित्य होती है नबनक उससे शातिका रामराज्य हो जाता है। सबंध है। इदियो नी हार है और इसमें पृष्टवामे मूलाधार आदि भाट चर है। इस नगर्गम हृदयस्थानम प्रमागमय स्वर्ग है। है, इसलिये प्राणशक्तिकी वृद्धि करनेसे आयुन्यकी वृद्धि हो (२) जितनी प्राणशक्ति होती है उतनी ही यु होती वही प्राणायामादि मा नाम द्वारा प्राप्तव्य ज्यान है। प्राप्त- सकती है। । - प्राणका संरक्षण (२५) करता है , (३) प्राणरक्षणके नियमों में भनुकूल माचरण करनेसे न करना चाहिए कि जो आयुष्य, आरोग्य आदिकी वृद्धि कर केवल प्राणका बल बढ़ता है, प्रत्युत चक्षु आदि सभी इदियो, सके। भवयवों और अंगोको गक्ति बढती है और उत्तम आरोग्य (१८) सहस्रों सूक्ष्म रूपोसे शरीरमें प्राण कार्य करता प्राप्त हो सकता है। है। (४) प्राणायाम के साथ मनमें शुभ विचारोंको धारण (१९) प्राण संवर्धन के नियमोके विरुद्ध व्यवहार करनेसे करनेसे बढा लाभ होता है। सव शक्ति क्षीण होकर मनुस्यकी अकाल मृत्यु होती है। इस (५) सूर्य प्रकागका सेवन तथा भोजनमें घीका सेवन लिये इस प्रकारकी नियमविरुद्ध आचरण करनेकी प्रवृत्तिको करनेसे प्राणायामकी शीत्र सिद्धि होती है। रोकना चाहिये। (६) प्राणशक्तिका विकास करना हरएकका कर्तव्य है। (२०) भग्नि, वाय, रवि आदि बाल देवता, अपने क्योंकि आत्माकी शक्तिके साथ प्रेरित प्राण शरीरके प्रत्येक शरीरमें वाचा, प्राण, चक्षु भादि रूपसे रहते है। इस प्रकार अंगमें जाकर वहाक स्वास्थ्यकी रक्षा और बलको वृद्धिः मानव शरीर देवताओका मंदिर है और मनुष्य उन सब देवताओंका अधिष्ठाता है। यह भावना मनमें स्थिर करनी (७) एक ही प्राणके प्राण, अपान, व्यान, उदान और चाहिये । और अपने आपको उक्त भावनारूप ही समझना समान ये भेट है तथा अन्य उप प्राण भी उसीके प्रभेद है। चाहिये । (८) संतोषवृत्ति और पवित्रतासे प्राणका सामर्थ्य (२१) अपने आपको अपराजित, विजयी और शक्तिका बढता है। के मानना चाहिए। (९) प्राणका वीर्य के साथ सबध है। वीर्यरक्षणसे प्राण. (२२) प्राण ही रुद्र है। रुद्रवाचक सव गन्द प्राण- शक्तिकी वृद्धि होती है और प्राणायामसे वीर्यको स्थिरता वाचक है। होती है । इस प्रकार इनका परस्पर सबंध है (२३) प्राणके आधारसे ही मब विश्व चल रहा है । (१०) परमेश्वरकी उपासना और संगीतका अभ्यास इन प्राणियोके अंदर यह बडी विलक्षण शक्ति है। दोनोसे प्राणका बल वढता है। (२४) पुरुषार्थसे अवश्य ही अपनी सब शक्तियोंको (११) प्राणशक्तिकी रक्षा और अभिवृद्धि के लिये सब विकसित करनेका दृढ निश्चय करना चाहिए। भन्य इंद्रियोंके सुखोको त्यागना चाहिये अर्थात् अन्य इंद्रि (२५) अपने आपको कभी हीन, दीन, दुर्वल नहीं बोके सुख प्राप्त करनेके लिये प्राणकी हानि नही करनी सममना चाहिये, अपितु अपने प्रभावका गौरव ही सदा चाहिए। देसना चाहिए। (१२) सब शक्तियोंमे प्राणशक्ति ही मुख्य और प्रमुख (२६) जगत्मे ऐसी कोई शक्ति नहीं है कि जो मुझे शक्ति है। कष्ट दे सकेंगी मैं कप्टोको दूर करनेका सामर्थ्य रखता १३) सत्कर्म के साथ प्राणका पोषण करना चाहिए । हूँ। यह भाव मनमें रखना चाहिए । (१४) वाचा, मन और कर्ममें शुद्धता और पवित्रता (२७) सर्वशक्तिमान परमेश्वर मेरा मित्र है, इस बात रखनी चाहिए। इससे बल बढता है। पर पूर्ण विश्वास रखना, तथा उसको अपना पिता, माता, (१५) सोनेके समय अपनी सव इंद्रियशक्तियां किस भाई आदि समझना चाहिए। उसमें और मेरेमे स्थान काल प्रकार आत्मामें लीन हो जाती है, और उठने के समय पुनः भादिका भेद नहीं है। किस प्रकार व्यक्त रूपमे कार्य करने लगती है इसका विचार (२८) योग्य कालमे योग्य कार्य करना चाहिए । कालकी करना और इसमे प्राणके कार्यका अनुभव लेना चाहिए । इस अनुकूलता प्राप्त होनेपर उसको दूर नहीं करना चाहिए ।माजका भभ्याससे भात्माकी विलक्षण शक्ति जानी जा सकती है। कर्तव्य कलके लिये नही रखना चाहिए। (५६) सपूर्ण रोगवीजी और शारीरिक दोपोको प्राण ही (२९) स्फूर्ति और जागृति धारण करनेसे उन्नति दूर करता है । जबतक प्राण है तबतक शरीरमें अमृत है। (१७) भोजनके साथ, प्राणशक्ति, आयुष्य, आरोग्य आयु ही बड़ा धन है, उसको और भी भादिका सबध है। इसलिये ऐसा उत्तम सात्विक भोजन बढाना चाहिए । निर्दोष बननेसे उस धनकी वृद्धि होती है। ४ [भधर्व. भा ४ हिन्दी] सव है (३०) दीर्घ --- , मरता है। - (२६) अथर्ववेदका सुबोध अनुवाद - 'दीर्घजीवन और आरोग्य' (३१) उल्माइ, सावधानता, स्कृति, जागृति, स्वसंर- दोके मंत्रीमें भी है । इससे पूर्व वेदमंत्रोकी प्राणविद्या सारांग- अणकी भावना और योजनाले उद्धतिका माधन किया जा रूपमे बताई है, भय उपनिषदोंकी प्राणविया देगनी है। प्राण की श्रेष्ठता (३.) गदा ऊपर उठने के लिये प्रयत्न करना चाहिए, प्राण सब अस्तियोंम सयस श्रेष्ठ शक्ति है, इस विषय में ऐसा कोई कार्य करना नहीं चाहिए कि जिससे नीचे गिरनेकी निम्न वचन देखिये- भावना हो सके। प्राणीब्रह्मति व्यजानात् । (३३) हम अमृतमय गर्गम भामर व्यक्निकी उन्नति प्राणाद्धयेव खल्बिमानि भतानि जायन्ते । और मर जनताकी उन्नति करनेक लिय प्रयन्न करना चाहिए। प्राणेन जातानि जीवति । जीवनमा ग्रही उद्देश्य है। प्राण प्रयंत्यभि सं विहांतीति । (ते उ. ३३) (३४)मपूर्ण अनिष्टोके साथ युद्ध करके अपनी विजयका 'प्राण ही ब्रह्म है, क्योकि प्राणसे ये मब भुत उत्पा सवादन करना चाहिए। (३५) हृदयकी भक्ति और मस्तिष्कका तर्क इन दोनों होते हैं, प्राणमे ही जीवित रहते हैं और अनमें प्राणमें ही जाकर मिल जाते है। गस्तियों को एक ही सत्कार्यमें एगाना चाहिए तथा इन यह प्राणशक्तिका महत्व है। प्राण सबसे बढी शक्ति है, दोनांका समविकास करना चाहिये । सय अन्य शक्तिया प्राण पर ही अबलवित रहती है। जबतक (३६) योगीका सिर सचमुच देवोंका बमतिस्थान है। प्राण रहता है तभीतक अन्य शक्तिया काम करती (३७) अपने ही हृदयमें ब्रह्मनगरी है, वही स्वर्ग और और जब प्राण जाने लगता है तो अन्त्र शक्तियां प्रथम ही वही अमरावती है। यही देवोंकी अयोध्या है । ब्रह्मज्ञानी चली जाती है और पश्चात प्राण निम्लता है । न केवल इसको ठीक प्रकार नानते हैं। प्राणियोंको ही प्राणका आधार है, अपितु औषधि वनस्पति (३८) जो भामगतिका विकास करता है, वही स्वकीय तथा अन्य स्थिरचर पदार्थ इन सबका भी प्राणशक्तिका ही गौरव माय इम अपनी राजधानीमें प्रवेग करता आधार है । प्राणशक्ति सर्वत्र व्यापक है और सबके अंदर (३९) प्राणको अपने स्वाधीन करके मस्तिष्क ऊपर रहती हुई सबका धारण पोषण कर रही है । प्रजापति परमा- भेजना चाहिए। जहां विचारोंकी गति नहीं है वहां पहुंचना त्माने सबसे प्रथम जो दो पदार्थ उत्पन्न किये उनमेंसे एक शाहिए, बी भात्माका म्यान है। प्राण है और दूसरी रयि है । इस विषयमे देखिये- (20) निश्चय माय पुत्सार्थक प्रयत्नग्न उन्नतिक पथपर चलनेवाडा योगी अपनी सब प्रकारसे उन्नति कर सकता है। स मिथुनमुत्पादयते । रयिं च प्राणं च ॥४॥ हम लेग्रमें थोडेन वेदमत्र दिये हैं जिनमें प्राणविषयक आदित्यो ह वै प्राणो रयिरेव चंद्रमा । उपदेग विगेय रीतिसे स्पष्ट है । परतु इनके अतिरिक्त अन्य रथिवी एतत्सर्वं यन्मूर्त चामूर्त च देवतालोक मुस्ताम भी गुप्त रीतिसे जो प्रागविद्याका वर्णन तस्मान्मूर्तिरेव रयिः ॥ ५॥ (प्रश्न. उ १) है उसकी मी खोज होनी चाहिए। 'परमेश्वरने सबसे प्रथम स्त्रीपुरपका एक जोडा उत्पन्न म्बय अनुभव लेने के बिना टक्क प्रकारकी खोज नहीं हो किया उसमें एक प्राण है और दूसरी रयि है। जगतम मन्ती, इमलिये प्रथम प्राणायामका सावन स्वयं करना आदित्य ही प्राण है और चंद्रमा तया मृर्तिमान जगन् जिसमें चाहिए । जो सजन प्राणायामका साधन स्वय करने और दृश्य और अदृश्य पदार्थ मात्र रयि है। उ मिसाओमें जाकर वहाका प्रत्यक्ष अनुभव करेंगे उनको अर्थात एक प्राणशनि और दूसरी रयिशनि सबसे प्रथम ही वैदिक मंत्रताका उत्तम ज्ञान होना संभव है। उत्पन्न हुई। इमका भाव निम्न कोष्टफसे ज्ञात होगा, देग्गिये- उपनिषदाम प्राण-विद्या वेदमत्रोमा भाव्यान्मविद्या है, वही उपनिषदों में बत- रथि आदित्य । अन्यात्मविद्या अनेक गोम प्राणपिया नामक चंद्रमा पुरस पर मुरय अंगरे । वह मे वेटर मॉम है मे टपनिष- स्त्री, प्रकृति धनगति ( Positive) ऋणानि (Negative) - प्राण प्राणका संरक्षण (२७) . जगत्के ये मातापिता हैं, इनसे सृष्टिकी उत्पत्ति हुई है। स एप वैश्वानरो विश्वरूपः प्राणोऽनिरुदयते ॥ संपूर्ण जगत्म इनका कार्य है। सूर्यमालामे सूर्य प्राण है, नदेतद्दचाभ्युक्तम् ॥७॥ अन्य चंद आदि रयि है, गरीरमे मुख्य-प्राण प्राण है और मन्य स्थूल गरीर रयि है, देहमें सीधी बगल प्राण है भौर विश्वरूपं हरिणं जातवेदसं परायणं ज्योतिरेक बाई बगल रयि है। इस प्रकार एक दूसरेके अंदर रयि और तर्पतम् ॥ प्राणशक्तियां व्यापक है, कोई भी स्थान ऐसा नहीं है, जहां सहनरश्मिः शतधा वर्तमानः॥ ये दोनों शक्तियां नहीं है। सब स्थिरचरमे इनका कार्य हो रहा प्राणः प्रजानामुदयत्येष सूर्यः ॥ ८॥ है; इनको देखनेसे प्राणकी सर्वव्यापकताका पता लग सकता (प्रश्न उ, १६-८) है। इस प्रकार यह सब देवोंका देव है इसलिये कहा है कि- सूर्यका जब उदय होता है तब सभी दिशाओंमे सूर्य किरणोके द्वारा प्राण रखा जाता है । इस प्रकार सर्वत्र सूर्य- कतम एको देव इति प्राण इति ॥ (बृ ३।९।९) किरणोके द्वारा ही प्राण पहुंचता है। यह सूर्य ही प्राणरूप एक देव कौनसा है ? प्राण है।' अर्थात् सब देवोंमे वैश्वानर अग्नि है । यह सूर्य (विश्व-रूपं) सत्र रूपका मुख्य एक देव कौनसा है ? उनरमे निवेदन है कि प्राण ही प्रकाशक, (हरिणं) अंधकारका हरण करनेवाला, (जात- सबसे मुख्य और श्रेष्ठ देव है । और देखिये- वेदसं ) धनोका उत्पादक, एक, श्रेष्ट तेनसे युक्त, सैकडो प्राणो वाव ज्येष्ठश्च श्रेष्ठश्च ॥ प्रकारोंसे सहस्रों किरणों के साथ प्रकारानेवाला यह प्रजाओका (छां. ५.१११, वृ ६१) प्राण उदयको प्राप्त होता है।' प्राण ही सबसे मुख्य और श्रेष्ठ है।' सब अन्य देव इसके माधारसे रहते हैं । तथा- यह सूर्यका वर्णन बता रहा है कि सूर्यका प्राणके साथ क्या संबंध है । सूर्यकिरणोके विना प्राणको प्राप्ति नहीं हो (१) प्राणो वै वलं तत्प्राणे प्रतिष्ठितम् ।। सकती। इस सूर्य मालिकाका मूल प्राण यह सूर्य देव ही (बृ. ५/१४) है। इसी कारण वेदमंत्रमे आयु, आरोग्य, बल भादिके माय (२) प्राणो वा अमृतम् (वृ १६३) सूर्यका संबंध वर्णित है। सूर्यप्रकाशका हमारे आरोग्यके (३)प्राणो वै सत्यम् ॥ ( २११०२०) साथ कितना घनिष्ट संबंध है इसका यहां पता लग सकता (४)प्राणो वै यशो बलम् ॥ (वृ. १२१६) है। जो लोग सदा अंधेरे स्थानमें रहते हैं, सूर्यप्रकागमे (१) प्राण ही बल है, वह बल प्राणमे रहता है। क्रीडा नहीं करते, सूर्यके प्रकाशसे अपना भारोग्य संपादन (२) प्राण ही अमृत है, (३) प्राण ही सत्य है, (४) नहीं करते हैं और अपने आरोग्यके लिये वैद्यो, हकीमो और प्राण ही या और बल है।' इस प्रकार प्राणका महत्त्व है। डाक्टरोके घर भरते रहते हैं, विषरूप दवाइया पीते हैं प्राणकी श्रेष्ठता इतनी है कि उसका वर्णन शब्दोसे नहीं हो उनकी सज्ञानताकी सीमा कहां है ? परमात्माने अपार दयासे सूर्य और वायु उत्पन्न किया है और उनसे पूर्ण आरोग्य संपादन हो सकता है। योग्य रीतिसे प्राणायाम द्वारा उनका प्राण कहांसे आता है ? सेवन किया जाय तो स्वभावतः ही आरोग्य मिल सकता है। परमात्माने प्राणकी उत्पत्ति की है, इसका वर्णन पूर्व इतना सस्ता भारोग्य होनेपर भी मनुष्य ऐसी अवस्थातक खण्डमे हो चुका है। परतु इस प्राणशक्तिकी प्राप्ति प्राणियोंको मा पहुचे हैं कि भनत सपत्तिका व्यय करनेपर भी उनको कैसे होती है. इस विषयम निम्न मंत्र देसने योग्य है- भारोग्य नहीं प्राप्त होता। विश्वव्यापक प्राण प्राप्त होनेका मार्ग आदित्य उदयन् यत्प्राची दिशं प्रविशति तेन इस प्रकार है । वह प्राण सूर्य में केद्रित हुआ हुना है, वहासे प्राच्यां प्राणान् रश्मिषु संनिधत्ते ॥ सूर्य किरणों द्वारा वायुमे माता है और वायुके साथ हमारे यद्दक्षिणां यत्प्रतीची यदुदीची यधो यदृर्ध्व खूनमें जाकर हमारा जीवन बढाता है। जो प्राणायाम करना यदन्तरा दिगो यत्सर्व प्रकाशयति चाहते हैं उनको इस बातका ठीक ठीक पता होना चाहिये । तेन सर्वान् प्राणान् रश्मिपु संनिधत्ते ॥ ६ ॥ इसी प्राणका भौर वर्णन देखिये- । सकता। । ।
- -- (२८) अथर्ववंदना नुयाध अनुवाद 'मीजीवन और आगंन्य' देवौका घमंड यह प्राण अग्नि, वायु, मूर्य, पर्जन्य, इद्र, पृथिवी, रवि एक ममत्र बाग मृष्टिः पृथिवी, आप, तेज, वायु ये आदि सत्र है। जिस प्रकार ग्य नाभिमे मारे जुड़े हुई होते देव, तथा मगरके अन्दर बाचा, मन, चक्षु लौर श्रोत्र ये हैं, उसी प्रकार प्राणमे सब जुड़ा हुआ है। ऋचा, य, देव समझने लगे कि हम ही हम जगतको धारण करने है माम, यन, अन्न और ज्ञान सभी प्राण के आधारम हैं। है और हम कोई अष्ट गति नही है। इन देवीका यह गर्ने प्राण ! त प्रजापति है और गर्ममें तू ही नाता है। सब देवकर प्राण कहने लगा कि, हे देवो ! ऐसा घमंड न करो, प्रजायें तेरे लिये ही यली अर्पण करती है। तू देवाका श्रेष मैं ही अपने भापको पाच विभागोम विभन्न करके इसका संचालक और पिनरोकी स्वीय धारणा गन्ति है। मथ आंगिरस अपित्रीका सन्य तपाचरण भी तरा ही प्रभाष है धारण कर रहा ह। परनु इस कथनको टन देवाने माना नहीं, तो राज्य प्राण वहांने जाने लगा, यह देखकर मव हंद्र, न्द्र, सूर्य है, तू ही तेज तेजस्त्री हो रहा है जब दव कापने लगे। फिर जब प्राण अपने स्थानपर चापम त् वृष्टि करता है तब सब प्रजाय आनदिन होती है क्योंकि भागया तब देव प्रसन्न हुए। हमने देवीको पता लगा कि टनको बहुत अन्न हम वृष्टिम प्राप्त होता है । तू ही प्रास्य यह मब प्रागकी गति है कि जिसके कारण हम कार्य कर एक ऋषि और मत्र विश्वका स्वामी है। हम दाता है और गंह है, केवल अपनी शक्ति ही हम इस कार्यको चलाने में तू हम मत्रका पिता है । जो तंग गरीर बात्रा, चक्षु, श्रोत्र मया असमर्थ है। हम प्रज्ञार जब वोने प्राणकी महिमा- और मनमे है, उसको कन्याण म्प का और हमसे दूर न विदित की, तन वे प्राणकी स्तुति करने लगे । यह न्तुति हो । जो कुछ त्रिलोकीमें है वह सब प्राणके वगमें है। निम्न मन्त्रीम है- मातांक समान हमारा संरक्षण करो और गोभा तथा प्रज्ञा हम दो। प्राणम्तुति यह देवांना बनाया प्राणसून देखनेन्ने प्राणका महत्व प्रपोऽग्निम्नपत्येप मूर्य एप ध्यानमें पर्जन्यो मघवानेय वायुरेष मा सकता है । यह मृत कई दृष्टियासे विचार करने योग्य पृथिवी रयियः सदसच्चामृतं च यत् ॥५॥ । पहिली बात जो हममे कही है वह यह है कि चक्षु श्रोत्र, अग इव स्थनामी प्राणे सर्व प्रतिष्ठितम् ॥ आदि इद्रियां गरीरमे तथा सूर्य, चंद्र, वायु आदि जगत्में ऋचा यजुपि सामानि यनः क्षयं ब्रह्म च ॥ ६ ॥ देव है और ये मर प्राणके वशम है। प्राणकी यक्ति इनके प्रजापनिश्चगनि गर्भ त्वमेव प्रति जायसे ।। संदर जाती है और इनके द्वारा कार्य करती है। जिस प्रकार तुभ्यं प्राणः प्रजास्विमा बलि हरन्ति यक्ति भाव में जाकर आपको देखने में समर्थ बनाती है, य. प्राण. प्रति निष्ठसि ॥ ७ ॥ टमी प्रकार सूर्य भदर विश्वव्यापक प्राणशक्ति रहकर प्रकाश देवानामसि बहिनमः पितृणां प्रथमा स्वधा । दे रही है । इमठिये आंखकी दृष्टि और सूर्यको प्रकागगक्ति ऋषीणां चरितं सत्यमागिरसामलि॥ ८॥ भारत और सूर्यकी नहीं है प्रत्युक्त प्राणकी है, इसी प्रकार भन्य इंद्रस्त्वं प्राण तेजसा रुद्रोऽसि परिरक्षिता ॥ इंडिया और देवतामाके विषय में जानना उचित है। देव न्यमन्तरिले चरसि मयस्त्वं ज्योतिषां पतिः ॥ गद ला गरीरमें हैठिय वाचक है उसी प्रकार जगतमें यदा न्यममि वर्षस्यथेमाः प्राण ते प्रजाः अग्नि, वायु मादि देवनामोंका भी वाचक है। उक्त सूक्तम आनंदम्पास्तिष्टंनि कामायान्नं भविष्यतीनि॥१०॥ दूसरी बात यह है कि, अग्नि, सूर्य, इंद्र, वायु, पृथिवी, रट बान्य प्राणकरपिरत्ता विश्वस्य सत्पतिः ॥ आदि गन्द प्राणवाचक होनस इन देवताओंके सूक्तोंमें प्राण- वयमायस्य दानारः पिता त्वं मानरिश्वनः ॥१६॥ विद्या भी प्रकाशित हुई है । या ने ननर्वाचि प्रतिष्टिता गा धोने याच चक्षुपि । ग्राणरूप अग्नि या च मनमि मंतता शिवां तां कुरु मोक्रमी. अग्निना रयिमनवत् पोपमव टिव दिवे ॥ ॥ १२॥ यशसं चारवत्तमम् ॥ प्राणयेट को सर्व निटिवे यत्प्रतिष्ठितम् ।। (ऋ 1१1३) '(अग्निना) प्राणन (गयिं) गोमा और (पोपं) मानव पुवान रनव श्रीश्च प्रमांच विधेहि न नि पुष्टि (दिवे दिवे ) प्रतिदिन (अनवत्) प्राप्त होती है । ॥ १२ ॥ (प्रश्न ट, ३) और वीर्ययुक्त या भी मिलता 1" - प्राणका संरक्षण (२२) - - यह अत्यंत स्पष्ट ही है कि प्राणक चले जानपर न नो वाला, दिव्य, (९) अ-मृतः- अमरत्वस युक्त, (१०) गरीरकी शोभा बढ़ेगी और न गरीरकी पुष्टि ही होगी, फिर प्रजा-पतिः- चक्षुभादि सत्र प्रजाओका पालक, प्रज्ञा उत्पन्न यश मिलना तो असंभव ही है । इस प्रकार बहुत विचार करनेवाला, (११) वह्नितमः- अत्यत प्रेरक, (१०) इंद्र:- हो सकता है, यहां उतना स्थान नहीं है, इसलिये यहा ऐश्वर्यवान , भेदन करनेवाला, (१३) रुद्रः (रुत्-रः)- केवल दिग्दर्शन ही किया है । वेदके गूढ रहस्योंका इस प्रकार दुःखको दूर करके मारोग्य देनेवाला, (१४) व्रात्यः पता लग जाता है इसलिये पाठकोंको उचित हैं कि वे वेढका (व्रत) नियमके अनुसार आचरण करनेवाला । इस प्रकार स्वाध्याय प्रतिदिन किया करें । स्वाध्याय करते करते किसी गब्दोंके नर्थ देखनेसे पता लगेगा कि उक्त गन्दी द्वारा न किसी समय वैदिक दृष्टि प्राप्त होगी और पश्चात् कोई प्राणकी किस गक्तिका कैसा उत्तम वर्णन किया गया है। कठिनता नहीं होगी। वैदिक शब्दोंके गृट भाशय देखनेसे ही वेढकी गंभीरता व्यक्त उक्त सूक्तोम तीसरी बात यह है कि अग्नि आदि गन्दक होती है। गूढ भाँसे प्राणविद्याका महत्त्व उसमें वर्णन किया है। इस प्रकार प्राणकी मुख्यता और श्रेष्टता है और वह प्राण इसका थोडासा स्पष्टीकरण देखिए- सूर्य किरणोंक द्वारा प्राणियोतक पहुचता है। सूर्य किरणोंसे (१) देवानां वह्नितमः असि- प्राण · इंद्रियोको वायुमे भाता है। वायु श्वास के द्वारा अंदर जाता है, उस चलानेवाला है, सूर्यादिकोंको चलाता है, प्राणायाम द्वारा समय मनुष्यक गरीरमे पहुंचता है। प्राणायामके समय इम 'विद्वान् उन्नति प्राप्त करते हैं। प्रकार प्राणका महत्व ध्यानमें धरना चाहिए। (२) पितृणां प्रथमा स्वधा असि-संपूर्ण पालक शक्तियोंमे सबसे श्रेष्ठ भौर (प्रथमा) पहिले दर्जेकी पालक- प्राणका प्रेरक शक्ति प्राण है और वही (स्व-धा) आत्मतत्वको धारण आधीन संपूर्ण जगत् है, तथापि प्राणको प्रेरणा देनेवाला कौन केन उपनिषद में प्राणक प्रेरकका विचार किया है। प्राणक करती है। (३) ऋषीणां सत्यं चरितं असि- सप्त ऋषियोका है ? जिस प्रकार दीवानके आधीन सय राज्य होता है, उसी प्रकार प्राणके आधीन सब इद्रियादिकोका राज्य है। परंतु सत्य (चरितं) चालचलन अथवा भाचरण प्राण ही करता राजाकी प्रेरणासे दीवान कार्य करता है, उमी प्रकार यहाँ है । दो भांख, दो कान, दो नाक और एक मुख ये सप्त ऋषि है ऐसा वेद और उपनिषदोंमें कहा है प्राणका प्रेरक कौन है, यह प्रश्नका तात्पर्य है। (४) अथवागिरसां चरितं असि- (अ-थर्वा, केन प्राण. प्रथमः प्रैति युक्तः। (केन उ १५) अंगिरसां) स्थिर अंगोंके रसोंका (चरितं) चलन अथवा किससे नियुक्त होता हुमा प्राण चलता है ? ' अर्थात् भ्रमण प्राणके द्वारा ही होता है। प्राण के कारण पोपक रस प्राणकी प्रेरकशक्ति कौनसी है ? इसमें उत्तरमे उपनिषद सब मंगोमें भ्रमण करता है भौर सर्वत्र पहुच कर सर्वत्र कहनी है कि- पुष्टि करता है। स उ प्राणस्य प्राणः। (केन उ १२) यह भाव उक्त सूक्तके वाक्योंमे गुप्त रीतिसे है। प्रत्येक वह आत्मा ही प्राणका प्राण है' अर्थात प्राणका प्रेरक भन्दका भागय देखनेसे इसका पता लग सकता है। साधा- है। । इसका और वर्णन देखिए- रण सूचना देनेके लिये यहां उपयोगी गन्दार्थ नीचे दिए यत्प्राणेन न प्राणिति येन प्राणः प्रणीयते । जाते हैं । (१) अग्निः- गति देनेवाला, उष्णता और तेज तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते ॥ उत्पन्न करनेवाला, (२) सूर्य-प्रेरणा देनेवाला, प्रकाश (केन उ. १८) देनेवाला, (३) पर्जन्यः (पर-जन्य )- पूर्ण करनेवाला, जिसका जीवन प्राणने नहीं होता, परतु जिससे प्राणका (४) मघवान् - महत्त्वसे युक्त, (५) वायुः- हिलाने- जीवन होता है, वह (ब्रह्म) भात्मा है, ऐसा तू ममम । वाला और अनिष्टको दूर करनेवाला, (६) पृथिवी - जिसकी उपासना की जाती है वह आत्मा नहीं। विस्तृत, आधार देनेवाली, (७) रयिः- तेज, संपत्ति, अर्थात् मात्माको शक्तिसे प्राण अपना सब कारोवार गरीरसंपत्ति आदि, (८) देवः- क्रीडा, विजिगीषा, व्यव चला रहा है । इसलिये प्राणको प्रेरकानिः भात्मा ही है। हार, तेज, भानंद, हर्ष, निद्रा, उत्साह, स्फूर्ति आदि देने- इस विषयमें ईशोपनिषद्का मन देखने योग्य है- . आत्मा . - (३०) अथवंबदका सुबोध अनुवाद - 'बार्बजीवन और आरोग्य' - योऽसावमा पुम्पः मोहमस्मि ॥ (इंग १६) इसका चिरजीवर सिद्ध होता है। हम प्रकार यह हनुमान- योऽमावादिन्ये पुम्पः मोऽमावहम ॥ नीका रुपक है | हनुमानजीकी उपासना मृलम प्राणोपासना (वा यजु १७) ही है । यह 'दारयंक गम का सहायक है, दया इंद्रियांक 'जो यह (अना) अमु अर्थात प्राणक अदर रहनेवाला ग्यम जो मानद रुप भात्मा है उसका यह प्राण नित्य सहा. पुल्प है वह मैं ह ।' मैं भात्मा है, मेरे चारो ओर प्राण यक ही है, तथा 'दामुखकी लंका' को जलानेवाला है, दा विद्यमान है और में उसका प्रेरक है। मेरी प्रेरणासे प्राण इद्वियोले मुग्यतया भोगमें जो प्रवृत्तियां होती हैं, उन भोग- चल रहा है और सब इंद्रियोकी यक्नियाको उत्तेजित कर च्छामका प्राणायामके अभ्याग्नसे दहन होता है । इत्यादि रहा है । इस प्रकार विश्वास रखना चाहिए और अपने प्रभा- विचारसे पूर्वोक्त कल्पना अधिक स्पष्ट होगी। पूर्वोक्त उपनि- वका गौरव देखना चाहिए । इस विषयमे ऐतरेय टपनिप पढ़में 'प्राणका प्रेरक भात्मा' कहा है मौर उक्त इतिहासम दका वचन देविये- 'वायुपुत्रका प्रेरक दायरथी गम' कहा है, दोनोका तात्पर्य नासिक निरभिद्यता नासिकाभ्यां एक ही है। प्राणः प्राणाद्वायुः ।। (ऐ ट. 131) पूक्ति इंगोपनिपदक वचनमें 'असो अहं' शब्द भाये वायुः प्राण भन्वा नानिके प्राविशत् ॥ है, 'प्राणके अन्दर रहनेवाला में मात्मा' यही भाव बृह- (गे र १012) दारण्यक निम्न वचनमें है- 'नामिका रूपी इंद्रिय खुल गई नासिकाल प्राण और यः प्राणे तिष्ठन्प्राणादंतरो यं प्राणो न प्राण वायु उत्पन्न हुआ।' अर्थात प्राण वायु पैदा हुआ। वेद यस्य प्राणः शरीरं यः प्राणमंतरा यमयति. मामाकी प्रबल इच्छागक्ति थी कि में सुगवफा आस्वादल। एप त आत्मा अंतर्याम्यमृतः ॥ (वृ ३१७१६) हम इच्छामन्तिम नामिकाके स्थानमे दो छेद बन गये ये ही नामिका दो छठ है । इस प्रकार नाकके बनते ही प्राणको जिमको (प्राणः न वेद) प्राण जानता नहीं, जिसका शरीर 'जो प्राणके अन्दर रहता है, प्राणक अन्दर रहनेपर भी उत्पत्ति हुई और प्राणसे वायु बना है । आत्माकी इच्छाशक्ति प्राण है, जो अन्दरसे (प्राण यमयति) प्राणका नियमन कितनी प्रबल है टमकी कल्पना यहां स्पष्ट हो सकती है। करता है, (एपः) यह तेरा अतर्यामी अमर आत्मा है। हम प्रकार गरीरमं छेद करनेवाली गति जो गरीरक मंदर रहनी है वही आत्मा है, इसको इद्र कहते है क्योंकि यह प्राणके अन्दर रहनेवाला और प्राणका नियमन करनेवाला भा मा (इदं-द्र) इस गरीरमें सुराग्य करनेकी शक्ति रपती यह आत्मा कयनके अनुसार आत्माका प्राणके साथ है। इसकी प्रबल इच्छाशक्तिस विलक्षण घटनाय यहां निढ यह बात स्पष्ट होती है। मैं मात्मा हू, हो रही है, इसका अनुभव अपने गरीग्म ही देखा जा सकता प्राण मेरा अनुचर है और प्राणके आधीन संपूर्ण इंद्रियां भोर है।जो ऐसा समर्थ जीवात्मा है वही प्राणका प्रेरक है। गगैर है, यह मेरा वैभव और साम्राज्य है । इसका मैं सद्धा इसका सेवक प्राण यह प्राण वायुका पुत्र सम्राट् बनगा और विजयी तथा यशस्वी बनूंगा, यह वैदिक दिये मत्रमे कहा है कि 'वायु प्राण बनकर नासिकामे प्रविष्ट धर्मकी आदर्ग कन्पना । इस प्राणका वर्णन मन्य रीतिसे हुभा है।" ।' इमलिये बायुका यह प्राण पुत्र निम्न वचनमें । यही 'मारुती' है, मारनीमा अर्थ 'मारत' अर्थात वायुका प्राणो वैर प्राणे हीमानि सर्वाणि भूतानि रमते ॥ पुत्र । विश्वम व्यापनवाला पवन वायु है उसका एक भग गरीरस अवतार लेता है, इसलिये इसको 'पवनात्मज' (वृ ५।१२।१) कहते है। यही हनुमान , मारुती, राम-ससा है । भवतारकी प्राणो वा उक्थं प्राणो हीदं सर्वमुत्थापयति ॥ १॥ प्राणो वे यजुः प्राणे हीमानि मृर करपना यहा व्यक्त हो सकती है। विश्वव्यापक गनिया सर्वाणि भतानि युज्यंते ॥२॥ अवतार रुपमे कर्मभूमिम अर्थात हम देहम भाकर कार्य करती है । वायुके पुत्रोंकी जो कचना पौगणिक साहित्यम प्राणो वै साम प्राणे हीमानि है वह यही है । उसको चिरजीव कहा है, इसका कारण हम सर्वाणि भूतानि सम्यंचि ॥ ३ ॥ दिगम पूर्व न्यलम बताया दी है। प्राणसे अमरत्वक साथ प्राणो वै क्षत्रं प्राणो हि वै क्षत्रं त्रायते ॥४॥ (बृ . १३) है । इस नित्य सम्बन्ध है है है क्योकि ऊपर है हुमा है- ।
प्राणका संरक्षण (३१) । - प्राण 'र' है क्योंकि सब भूत प्राणमे रमने है। प्राण तात्पर्य यहा आत्मा है। प्राणविद्याकी परमसिहि इस प्रकारसे उक्थ है क्योंकि प्राण सबको उठाता है। प्राण 'यजु मिट्ट होती है। क्योकि प्राणमें सब भृत संयुक्त होते है। प्राण 'साम' प्राण और अन्य शक्तियां है क्योंकि सब भूत प्राणमे सम्यक रीतिसे रहते हैं। प्राण प्राणके आधीन अनेक शक्तिया है, उनका प्राणके साथ क्षत्र है क्योंकि प्राण ही क्षतों अर्थात कष्टोंसे बचाता है। सम्बन्ध देखनेके लिये निम्न मन्त्र देखिये- इसका प्रत्येक मुख्य गन्द प्राणकी शक्तिका वर्णन कर रहा है। 'साम. यजु आदि शब्द अन्यत्र वेदवाचक होते हुए प्राणो वाव संवर्ग: । स यदा स्वपिति, भी यहां केवल गुणवाचक है । इस शब्दप्रयोगसे स्पष्ट पता प्राणमेच वागप्येति, प्राणं चक्षुः, प्राणं श्रोत्रं, प्राणं मनः, लग जाता है कि वैदिक समयम शब्दोका विशेष रीतिसे भी उपयोग होता था और मामान्य रीतिसे भी होता था। यहा प्राणो ह्येवंतान संबंक्ते । (छा ४।३।३) सामान्य रीतिका प्रयोग है। जहां सामान्य रीतिसे प्रयोग 'जब यह सोता है तब बाक, चक्षु, श्रोत्र, मन भाटि सब होगा वहां उसका यौगिक अर्थ करना चाहिये और जहां प्राणमे ही लीन होती है क्योकि प्राण ही इनका सहारक है। विशेष रीतिसे प्रयोग होगा वहां योग-रुढीका अर्थ समझना जिस प्रकार सूर्य उगनेके समय उसकी किरणे फैलती है चाहिए । इस प्रकार एक ही शब्दके दोनों अर्थ होनेपर भी और अस्तके समय फिर अन्दर लीन होती है, इमी प्रकार अर्थविषयक ठीक व्यवस्था लगाई जा सकती है। प्राणरूपी सूर्यका जागृति के प्रारंभमे उदय होता है । उस समय उसकी किरणे इंद्रियादिकोमे फैलती है और निद्राके अङ्गोंका रस समय फिर उसीमे लीन होती है। इस प्रकार प्राणका सूर्य गरीरके अंगों में एक प्रकारका जीवनका भाधाररूप रम होना सिद्ध होता है । इसका सादृश्य एक अंगमे है, यह बात है। इसका वर्णन निम्न मन्त्रमे है- भूलनो नही चाहिये । सूर्य के समान प्राण भी कभी अस्त आंगिरसोऽगानां हि रसः, नहीं होता, परंतु अस्त और उदय ये शब्द हमारी अपेक्षाले प्राणो वा अंगानां रसः उसमे प्रयुक्त हो रहे है। इस विपयमे निम्न वचन और तस्माद्यस्मात्कस्माच्चांगात् देखिये- प्राण उत्क्रामति, तदेव तच्छुष्यति । (पृ ११३।१९) पतंग प्राण ही अगोंका रस है, इसलिये जिस अंगसे प्राण चला स यथा शकुनिः सूत्रेण प्रवद्धो. जाता है, वह अंग सूख जाता है। दिशं दिशं पतित्वा, अन्यत्रायतनमलब्ध्वा, वृक्षोंमें भी यही बात दिखाई देती है। यह अग-रसका बंधनमेवोपश्रयत, एवमेव खलु, सोम्य, महत्व है। जीवात्माको इच्छासे प्राणक द्वारा यह रस सब तन्मनो दिशं दिशं पतित्वाऽन्यत्रायतनमलब्ध्वा, शरीरमे घुमाया जाता है और प्रत्येक अंगमें आरोग्य और प्राणमेवोपश्रयते, प्राणबंधनं हि सोग मनः ॥ बल बढाया जाता है। प्रबल इच्छाशक्ति द्वारा आरोग्य सपा- (छा उ ६८२) दन करनेका उपाय इससे विदित होता है । इच्छाशक्ति और 'जिस प्रकार पक्षी डोरीसे वधा हुआ, अनेक दिशामोमे प्राणके बल बढानेसे उक्त सिद्धि होती है । आत्माकी प्रेरणा वूम कर, दूसरे स्थानपर आधार न मिलनेके कारण, अपने प्राणमे होती है, प्राणसे मन संलग्न रहता है, मनन इच्छा मृल स्थानपर ही आ जाता है, इसी प्रकार निश्चयसे, हे प्रिय गक्तिका नियमन होता है, इच्छासे रुधिग्मे परिणाम होकर गिप्य । वह मन अनेक दिशाभोमे घुमघाम कर, दुसरे इसके द्वारा सपूर्ण शरीरमे इष्ट कार्य होता है । देखिये स्थानपर आश्रय न मिलने के कारण, प्राणका ही आश्रय करता है पुरुषस्य प्रयतो वाड्मनसि संपद्यते, मनःप्राणे, क्योंकि है प्रिय शिष्य मन प्राणके साथ ही बचा हुआ है ।' प्राणस्तेजसि, तेजः परस्यां देवतायाम् । इस प्रकार प्राणका मनके साथ संबंध है, यही कारण है (छा. उ ६८६) कि प्राणायामसे प्राणके बलवान् होनेपर मन भी बलिष्ठ होता पुरुषकी वाणी मनमे, मन प्राणमे, प्राण तेजमे और तेज है, प्राणका निरोध होनेसे मनका सयम होता है। प्राणकी परदेवतामें सलम होता है। यही परंपरा है। परदेवताका चंचलतास मन चचल होता है और प्राणकी स्थिरतासे मन - अथर्ववेदका सुबोध अनुवाद -'दीर्घजीवन और आरोग्य' - भी स्थिर होता है । इमले प्राणायामका महत्त्व और उसका (सु असा)- उत्तम प्रकार रखनेवाला, (५) आचार्य- मनके सयमके माय सबंध विदित हो सकता आत्मिक गुरु है, क्योकि प्राण के मायामसे आत्माका साक्षा- प्राणमे मनन सयम होने कारण अन्य इंद्रिया भी प्राणक कार होता है इसलिये, (६) ब्राह्मण.- यह ब्रह्मके पास निगेधने स्वाधीन होती है, यह स्पष्ट ही है, क्योंकि प्राण ले जानेवाला है । ये शब्दोके मूलभाव यहा प्राणके गुण बता रहे है। यह मनका संयम और मन कामे होनस जन्य इंद्रियोका वशमे होना स्वाभाविक ही है। इस प्रकार प्राणायामसे संपूर्ण प्राणका वर्णन है, इतना प्राणका महत्त्व है इसलिये अपने गन्जिया बगीकृत होनी है। यही भाव निम्न वचनम गुप्त प्राणके विषयमे कोई भी उदासीन न रहे। सब लोग स्वर्ग गैनिम है- प्राप्त करने की इच्छा करते है वह स्वर्ग प्राण ही है। तीन लोक वसु, रुद्र, आदित्य बागेवायं लोक. मनो अन्तरिक्षलोकः प्राणा वाव वसव, एते हीदं सर्व वासयन्ति ॥१॥ प्राणोऽसौ लोकः ॥ ( 11५/४) प्राणा वाव रुद्रा एते ही सर्व रोठयन्ति ॥२॥ प्राणा वावादिन्याः एते हीदं सर्वमाढदते ॥३॥ 'यह वाणी पृथिवीलोक है, मन अन्तरिक्षलोक है और (छां. ३।१६) प्राण स्वर्गलोक है। इसीलिये प्राणायामके अभ्यासमे स्वर्गधामकी प्राप्ति होती. ' प्राण वन है क्योरि सयको बसाते है, प्राण रुद्र है ज्योकि इनके चले जानेसे सब रोते है, प्राण आदित्य है क्यो है । देखिये प्राणसी जितनी श्रेष्ठता है ।। इस प्रकार उपनि- पढोम प्राणविद्या है । विस्तार करनेकी कोई जरूरत नहीं है। कि ये सबको ग्रहण करते है।' सक्षेपसे आवश्यक बातोका उल्लेस ग्रहां किया है। इससे हम स्थान पर 'प्राणा वाव रुद्राः एते हीदं सर्व उपनिपटाकी प्राणविद्याकी कल्पना हो सकती है । जो इसकी रोदनं द्रावयन्ति अर्थात 'प्राण रुद्र है क्योंकि ये इस और अधिक गहराई देखना चाहें वे स्वयं उपनिपटोंमें इसको मव दु सको दूर करते हैं। ऐसा वाक्य होता तो प्राणका देख सकते है। दु ग्व निवारक कार्य व्यक्त हो सकता था। परंतु उपनिषदमें प्राणायामसे पते हीदं सर्व रोदयन्ति अर्थात् ये प्राण जब चले जाने प्राणके विविध शास्त्रोंम लिखा है। प्राणायामका अभ्यास किए बहुत प्रकारको गतिया प्राप्त होती है ऐसा है नव वे सबको रुलाते है, इतना प्राणापर प्राणियोका प्रेम बिना ही उक्त शक्तियों की प्राप्ति असंभव है। अभ्यासके विना है, ऐसा लिया है। शतपयादिस भी रुद्रका रोदन धर्म ही उन्नतिको पाप्ति सर्वथा ही असभव है। प्राणायामका अभ्यास वर्णन किया है, परंतु दुस निवारक धर्म भी उनमे उससे करनेक लिये प्राणकी शक्तिकी कल्पना प्रथम होनेकी भावश्यकता अधिक प्रबल है । इस प्रकार प्राणका महत्त्व कहा है- है। वह कार्य सिह होनेके लिये इस लेखका उपयोग हो सकता प्राणो ह पिना, प्राणो माता. प्राणो भ्राता, है । इस सूक्तको अच्छी प्रकार पढनेके पश्चात् मननद्वारा प्राणः स्वमा, प्राण आचार्यः, प्राणो ब्राह्मणः॥ अपनी प्राणमनिका माकलन करना चाहिये। अपने प्राणका (छा उ ७१६) यह स्वरूप है उसका यह महत्त्व है और इसकी उपासनासे 'प्राण ही माता, पिता, भाई, बहन, क्षाचार्य, ब्राह्मण भादि है' ये गद प्राणका महत्त्व बता रहे हैं। (१)माता इस प्रकार लाभ हो सकता है, इत्यादि विषयकी उत्तम कल्पना इस सूकके अभ्याससे होगी। इस कल्पनाके दृढ - मान्यरहित करनेवाला, (२) पिता- पालक, मरक्षक, होनेके पश्चात् प्राणायामका अभ्यास करनेसे बहुत लाम हो (३) भ्राना- भरण पोषण करनेवाला, (४) स्वसा- सकता है। है दीर्घायु प्राप्त करनेका उपाय (३३) प्राणा अपाना इह ते दीर्घायु प्राप्त करनेका उपाय कां. ८, सू. १ (ऋपिः- ब्रह्मा । देवता-आयुः) अन्तकाय मृत्य। नमः रमन्ताम् । हहायमस्तु पुरुषः सहासुना सूर्यस्य भागे अमृतस्य लोके उदैन भगौ अग्रभीदुदैनं सोमो अंशुमान् । उदैनं मरुतो देवा उदिन्द्राग्नी स्वस्तये हुह तेऽसुरिह प्राण इहायुरिह ते मनः । उत्तवा नित्याः पाशेभ्यो दैव्यो वाचा भरामसि उत्क्रामातः पुरुष मार्च पत्था मृत्योः पड्वीशमवमुञ्चमानः । मा च्छित्या अस्माल्लोकादुग्ने सूर्यस्य संदृशा ॥ १॥ ॥ २ ॥ ॥४॥ अर्थ- (मृत्यवे अन्तकाय नमः) मृत्युरूपसे सबका अन्त करनेवाले परमेश्वरको नमस्कार है । हे मनुष्य । (ते प्राणाः अपानाः इह रमन्ताम् ) तेरे प्राण भौर अपान यहां इस शरीरमें आनन्दसे रहें । (अयं पुरुषः असुना सह) यह मनुष्य प्राण के साथ (इह अमृतस्य लोके सूर्यस्य भागे अस्तु ) इस अमृतके स्थानरूपी सूर्य के प्रकाशके भागमे रहे ॥१॥ ! भगः एनं उत् अग्रभीत्) भग टेवने इस मनुष्यको उच्च स्थानपर बिठाया है, (अंशुमान् सोमः एनं उत्) तेजस्वी सोमने इसको उठाया है, (मरुतः देवाः एनं उत्) मरुतदेवोंने इसको उच्च बनाया है, (इन्द्र-अग्नी स्वस्तये उत्) इन्द्र और अग्निने इसके कल्याणके लिये इसको उच्च बनाया है ॥ २ ॥ (इह ते असु.) यहा तेरा जीवन, (इह प्राणाः, इह आयुः) यहां प्राण, यहां आयु और (इह ते मनः) यहा तेरा मन स्थिर रहे । (दैव्या वाचा निर्ऋत्याः पाशेभ्यः) दिव्य वाणोके द्वारा अधोगतिके पाशोसे हम (त्वा उत् भरामसि ) तुझे ऊपर उठाते है ॥३॥ हे (पुरुषः) मनुष्य ! (अतः उत् क्राम) यहांसे उपर चढ, (मा अवपत्थाः) नीचे मत गिर । (मृत्योः पड्यीशं अवमुञ्चमानः) मृत्युकी वेढीसे अपने आपको छुढाता हुभा (अस्मात् लोकात्) इस लोकसे तथा (अग्नेः सूर्यस्य संदृशः) अग्नि और सूर्य के दर्शनसे अपने आपको (मा छित्थाः) दूर मत रख ॥ ४ ॥ भावार्थ- संपूर्ण जगत्का नाश करनेवाले एक ईश्वरको हम प्रणाम करते है। मनुष्य के प्राण इस शरीरमे दीर्घकाल तक रहें। मनुष्य दीर्घ जीवनके साथ अमृतमय सूर्यप्रकाशमें यथेच्छ विचरता रहे ॥ १॥ भग भादि सब देव इसकी उन्नति करनेमे इसकी सहायता करे ॥२॥ हे मनुष्य ! इस गरीरमे तेरा प्राण, भायुष्य, मन और जीवन स्थिर रहे। अनारोग्यरूपी दुर्गतिके पाशोंसे हम सब तुझे उपर उठाते है ॥३॥ हे मनुष्य ! तू अपर चढ, गिर मत । मृत्युके पाशोसे अपने भापको छुडा । दीर्घायु प्राप्त कर और इस मनुष्य लोकसे तथा इस सूर्यके प्रकाशसे अपने आपको दूर कर ॥ ४ ॥ ५[मथर्व. भा ४ हिन्दी] . --
(३४)
अथर्ववेदका सुबोध अनुवाद
'दीर्घजीवन और आरोग्य'
॥६॥
तुभ्यं वातः पवता मातरिश्वा तुभ्य वर्षन्त्वतान्यापः ।
सूर्यस्ते तन्वेः शं तपाति त्वां मृत्युदयतां मा प्र श्रेष्ठाः
उद्यान ते पुरुष नात्यानं जीवातु ते दक्षतातिं कृणोमि ।
आ हि रोहेमममृत सुखं रथमथ जिविर्विदशमा वदासि
मा ते मनस्तत्रं गान्मा तिरो अन्मा जीवेभ्यः प्र मंदो मार्नु गाः पितॄन् ।
विश्वे देवा अभि रक्षन्तु त्वेह
मा गुतानामा दीधीथा ये नयन्ति परावतम् ।
आ रोह तमसो ज्योतिरेषा ते हस्तौ रभामहे
॥ ७॥
॥८॥
अर्थ-(मातरिश्वा वातः तुभ्यं पवतां) अन्तरिक्षमें रहनेवाली वायु तेरे लिये शुद्धता करती रहे । (आपः
तुभ्यं अमृतानि वर्षन्तु ) जल तेरे लिये अमृतकी वृष्टि करे। (सूर्यः ते तन्चे शं तपाति) सूर्य तेरे शरीरके लिये
सुसकर तपता रहे । (मृत्युः त्वां दयतां ) मृत्यु तुझपर दया करे अर्थात तू (मा प्रमेष्ठाः) मर मत ॥ ७ ॥
हे पुरुप' (ते उत्-यानं ) तेरी उन्नतिकी ओर गति हो । (न अव-यानं) अवनतिकी भोर कभी गति न हो । इस-
लिये मैं (ते जीवातुं दक्षतातिं कृणोमि) तुझे जीवन और बल देता हूं। (इमं अमृतं सुखं रथं आरोह) इस अम-
रत्व देनेवाले सुखकारक शरीररूपी रथपर चढ, (अथ जिविः) और जब तू वृष्ठ होगा, तब (विदथं आवदासि ) विज्ञा-
नका उपदेश करेगा ॥६॥
(ते मनः तत्र मा गात् ) तेरा मन उस निपिच मार्गमे न जाये। और वहां (मा तिरः भूत्) लीन न होवे ।
(जीवेभ्यः मा प्रमदः ) जीवो के संबंध प्रमाद न कर । (पितृ मा अनुगाः) पितरोके पीछे न जा अर्थात मर मत !
(इह विश्वे देवाः त्वा अभि रक्षन्तु) यहा सब देव तेरी रक्षा करें ॥ ७ ॥
(गतानां मा आदिघीथाः) मरे हुओके लिए विलाप न कर क्योंकि (ये परावत नयन्ति) वे तो दूर ले जाते
है । अत (आ इहि) यहां आ और (तमसः ज्योतिः आरोह) अंधकारको छोड प्रकामपर चढ, (ते हस्तौ रभामहे)
तेरे हायोको हम पकडते है ॥ ८ ॥
भावार्थ- वायु, जल और सूर्य तेरे लिये पवित्रता करे और तुझे शान्ति दे । मृत्यु तेरे ऊपर दया करे अर्थात् तू
दीर्घायु प्राप्त कर और गीत मत मर ॥ ५॥
हे मनुष्य तू उपर चढ, कभी नीचे मत गिर। इसी कार्य के लिये तुझे जीवन और बल दिया है। तेरा शरीर एक सुख
देनेवाला उत्तम रथ है, इससे अमरपन भी प्राप्त किया जा सकता है। इसमें रहता हुआ जब मनुष्य दीर्घजीवन प्राप्त करता
है और वृद्ध होता है तब उसको बहुत अनुभव प्राप्त होनेके कारण वह दूसरोको योग्य उपदेश देनेमे समर्थ होता है ॥ ६ ॥
तेरा मन कुमागमे न जावे और यदि जावे भी तो वहां स्थिर न रहे। अन्य जीवोके विपयमे जो तेरा कर्तव्य है उसमे
तू प्रमाद न कर । शीघ्र मरकर अपने पितरोके पीछे गीतासे मत जा। ये सब देवता तेरी रक्षा कर ॥ ७॥
गुजरे हुओका गोक न कर, उनसे तो मनुष्य दूर चला जाता है। यहां कार्यक्षेत्रमे आ, अन्धकार छोट भोर प्रकाशमें
पिचर । इस कार्य के लिये हम तेरा हाथ पकहते है ॥८॥
दीर्घायु प्राप्त करनेका उपाय
(३५)
श्याम त्वा मा शबलेश्च प्रेषितौ यमस्य यौ पथिरक्षी श्वानौ ।
अर्वाडेहि मा वि दीध्यो मात्र तिष्ठः पराङ्मना:
॥ ९॥
मैतं पन्थामर्नु गा भीम एष येन पूर्व नेयथ तं ब्रवीमि ।
तम एतत्पुरुष मा प्र पत्था भयं पुरस्तादर्भयं ते अर्वाक्
॥१०॥
रक्षन्तु त्वानयो ये अप्स्वन्ता रक्षतु त्या मनुष्याई यमिन्धते ।
वैश्वानरो रक्षतु जातवेदा दिव्यस्त्वा मा प्र धाग्विद्युता सह
॥११॥
मा त्वा व्यादभि मैस्तारात्संकसुकाचर ।
रक्षतु त्वा धौ रक्षतु पृथिवी सूर्यश्च त्वा रक्षतां चन्द्रमांश्च । अन्तरिक्षं रक्षतु देवहेत्याः ॥ १२ ॥
अर्थ-(श्यामः च शवलः च ) काले और श्वेत अर्थात् अंधकार और प्रकाशवाले (श्वा-नौ) कल न रहने-
वाले ये दिन रात ( यमस्य पथिरक्षी प्रेषितौ) नियामक देवके दो मार्गरक्षक है । (अर्वाङ् एहि) इधर आ। (मा
विदध्यिः) विलाप मत कर । (अत्र पराड्मनाः मा तिष्ठ ) यहां विरुद्ध दिशामे मन रखकर मत रह ॥९॥
(एतं पन्थां अनु मा गाः) इस बुरे मार्गका अनुसरण मत कर, (भीमः एषः) यह भयंकर मार्ग है। (येन
पूर्व न ईयथ) जिससे पहिले नहीं जाते हैं (तं ब्रवीमि) उस विषयमें मैं कहता हू। हे (पुरुप) मनुष्य ! (एतत्
तमः) यह अन्धकारका मार्ग है, उस मार्गमे (माप्र पत्थाः) मत जा । (ते परस्तात् भयं) तेरे लिये परे भय है
(अर्वाक् ते अभयं) और इधर अभय है ॥ १० ॥
(ये अप्सु अन्तः अग्नयः) जो जलोमे अग्नियां है वे (त्वा रक्षन्तु) तेरी रक्षा करें। (यं मनुष्याः इन्धते
त्वा रक्षतु) जिसको मनुष्य प्रदीप्त करते है वह अग्नि तेरी रक्षा करे। (जातवेदाः वैश्वानरः रक्षतु)ज्ञातवेद सब
मनुष्योंमें रहनेवाली अग्नि तेरी रक्षा करे । (विद्युता सह दिव्यः मा धार) बिजलीके साथ रहनेवाली धुलोककी अग्नि
तुझे न जलावे ॥११॥
(क्रव्यात् त्वा मा अभि मस्त) कच्चा मास खानेवाला तेरा वध न करे। (संकसुकात् आरात् चर) नाश
करनेवालेसे तू दूर होकर चल । (द्यौः त्वा रक्षतु) धुलोक तेरी रक्षा करे, (पृथिवी रक्षतु) पृथिवी रक्षा करे । (सूर्यः
च चन्द्रमाः च त्वा रक्षतां) सूर्य और चन्द्रमा तेरी रक्षा करें। (देवहेत्याः अन्तरिक्ष रक्षतु) दैवी भाघातसे अन्त-
रिक्ष तेरी रक्षा करे ॥ १२ ॥
!
भावार्थ-सबका नियमन करनेवाले ईश्वरके दिन (प्रकाश) और रात्री (अधकार) ये दो मार्गदर्शक है। ये दोनो
भशाश्वत है, परंतु ये तेरे मार्गकी रक्षा करेंगे । अतः तू आगे बढ, विलापमे समय न गवा, तथा विरुद्ध दिशामे अपना मन
कदापि न जाने दे ॥ ९ ॥
इस भयानक घोर बुरे मार्गसे न जा। जिससे जाना योग्य नही उस मार्गपरसे न जानेके विषयमे मै तुझे यह आदेश
दे रहा हूं। अर्थात् तू इस अन्धकारके मार्गमे कदापि न जा, इससे जानेमे भागे वढा भय है। मतः तू इस मोर रह, इस
मार्गपर यदि तू रहेगा तो तेरे लिये यहां अभय होगा ।। १० ॥
जलकी उष्णता, अग्नि, विद्युत् , सूर्य तथा मानवीसमाज इनमेसे किसीसे तेरा अकल्याण न हो, इनसे तेरी उत्तम
रक्षा होवे ॥११॥
घातपात करनेवाले दुष्टोसे तेरी रक्षा होवे । पृथ्वी, भन्तरिक्ष, धु, चन्द्रमा, सूर्य भादि सब तेरी रक्षा करे ॥ १०॥
(३६)
अथर्ववेदका सुबोध अनुवाद -'दीर्घजीवन और आरोग्य'
॥ १३॥
॥ १४ ॥
वोधश्च त्वा प्रतीवोधश्च रक्षतामस्वप्नच त्वानवाणश्च रक्षताम् ।
गोपायंश्च त्वा जागृविश्व रक्षताम्
ते त्वा
रक्षन्तु ते त्वा गोपायन्तु तेभ्यो नमस्तेभ्यः स्वाहा
जीवेभ्यस्त्वा समुद्र वायुरिन्द्रो धाता दधातु सविता त्रार्यमाणः ।
मा त्वा प्राणो वल हासीदसुं तेऽर्नु ह्वयामसि
मा त्वा जम्भः संहनुर्मा तमो विदुन्मा जिह्वा बर्हिः प्रेमयुः कथा स्याः ।
उवादित्या वसवो भरन्तूदिन्द्राग्नी स्वस्तये
उत्वा द्यौरुत्पृथिव्युत्प्र॒जाप॑तिरग्रभीत् । उत्वा मृत्योरोषधयः सोमराज्ञीरपीपरन्
।। १५॥
॥ १६॥
॥ १७॥
अर्थ-(बोधः च प्रतीवोधः च त्वा रक्षतां ) ज्ञान और विज्ञान तेरी रक्षा कर । (अस्वप्नः च अनवद्राणः
च त्वा रक्षतां) चैतन्यता और निर्भयता तेरी रक्षा करें । तथा (गोपायन् च जागृविः च त्वा रक्षतां) रक्षक और
जागनेवाला तेरी रक्षा करें ॥ १३ ॥
(ते त्वा रक्षन्तु) वे तेरी रक्षा करें। (ते त्वा गोपायन्तु) वे तेरा पालन कर। (तेभ्यः नमः) उनको
नमस्कार है । (तेभ्यः स्वा-हा) उनके लिये आत्म-समर्पण है ॥ १४ ॥
(त्रायमाणः धाता सविता वायुः इन्द्रः) रक्षक, पोषक, प्रेरक, जीवनसाधन प्रभु (जीवेभ्यः त्वा सं+उद्रे
दधातु) सब प्राणियोके लिये तथा तेरे लिये पूर्ण उत्कृष्टता धारण करे । (त्वा प्राणः बलं मा हासीत् ) तेरे लिये प्राण
वल न छोडे । (ते असुं अनु ह्वयामसि) तेरे प्राणको हम अनुकूलताके साथ बुलाते है ॥ १५॥
(जम्मः संहनुः त्वा मा विदत्) विनाशक भौर घातक तुझे कभी न प्राप्त करे। (तमः त्वा मा) अन्धकार
तेरे ऊपर कभी न छाये । (जिह्वा मा) जिह्वा अर्थात् किसीके बुरे शब्द तेरे श्रवणपथमे न भावें । भला (वर्हिः प्रमयुः
कथा स्याः) तू यज्ञकर्ता होकर घातक कैसे होगा ? (आदित्याः वसवः इन्द्र-अग्नी) आदित्य, वसु, इन्द्र भौर भनि
(स्त्रस्तये) कल्याणके लिये (त्वा उत् भरन्तु) तुझे उच्चताके प्रति ले जावें ॥ १६ ॥
(द्यौः उत् । धुलोक (पृथिवी उत्) पृथिवी भौर (प्रजापतिः त्वा उत् अग्रभीत् ) प्रजापालक देव तुझे उपर
उठावे । (सोमराज्ञी ओपधयः) सोम जिनका राजा है ऐसी मौषधियां (न्वा मृत्योः उद् अपीपरन्) तुझे मृत्युसे
ऊपर उठावें अर्थात तेरी रक्षा करें॥ १७ ॥
भावार्थ-ज्ञान और विज्ञान, चैतन्यता और निर्भयता रक्षक और जागनेवाला तेरी रक्षा करे ॥ १३ ॥
जो तेरी रक्षा और पालन करते हैं, उनको प्रणाम करना और उनके लिये अपनी मोरसे कुछ समर्पित करना
चाहिए |॥ १४॥
देव सब जीवोको और तुमको उन्नति के पथमे रखें । तेरे पास प्राण और बल पूर्ण मायुतक रहे ॥ १५॥
कोई नागक और घातक तेरे पास न पहुचे । अज्ञान और अन्धकार तेरे पास न भावे । बुरे शब्दोंका प्रयोग कोई न
करे । स्मरण रख कि जो यज्ञ करता है उसके पास नाम नहीं आता और सूर्यादि सब देव तेरा कल्याण करेंगे और तेरी
उन्नतिम सहायक होगे ॥१६॥
प्रजाका पालक देव, द्युलोकसे पृथ्वीपर्यतकी भौषधियां भादि सब पदार्थ मृत्युसे तेरा बचाव करें ॥ १७ ॥
दानाय प्राप्त करने का उपाय
(३७)
॥ १८ ॥
अयं देवा इहैवास्त्वयं मामु गादिताः । इमं सहस्रवीर्येण मृत्योरुत्पारयामसि
उक्त्वा मृत्योरपीपरं सं धमन्तु वयोधसः । मा त्यो व्यस्तकेश्योई मा त्वांघरुदौ रुदन् ॥ १९ ॥
आहोर्षमविदं त्व! पुनरागाः पुनर्णवः । सर्वाङ्गः सर्वं ते चक्षुः सर्वमायुश्च तेऽविदम् ॥ २० ॥
व्यवाचे ज्योतिरभूदप त्वत्तमौ अक्रमीत् । अप त्वन्मृत्युं नितिमप यक्ष्म नि दध्मसि ॥ २१ ॥
अर्थ- हे (देवाः) देवो । (अयं इह एव अस्तु) यह यहा इस लोकसे ही रहे, (अयं इतः अमुत्र मा गात्)
यह यहांसे वहां अर्थात् परलोकमें न जावे । (सहस्रवीर्यण इमं मृत्योः उत् पारयामसि) हजारों बलोसे युक्त उपायसे
इस मनुष्यको मृत्युसे हम रक्षा करते है ॥ १८ ॥
(मृत्योः त्वा उत् अपीपरं) मृत्युसे तुझको हम पार कराते है । (वयोधसः सं धमन्तु ) अन्न अथवा आयुको
धारण करनेवाले देव तुझे पुष्ट करें। (व्यस्तकेश्यः अघः-रुदः) वालोको खोल खोलकर बुरी तरहसे रोनेवाली स्त्रियां
(मा त्वा रुदन , मा त्वा ) तेरे लिये न रोय, अर्थात् तेरी मृत्यु के कारण उनपर रोनेका प्रसग न आवे ॥ १९ ॥
(त्वा आहार्प) मैं तुझे लाया हूँ। (त्वा अविदं) तुझे पुन. प्राप्त किया है। (पुनः नवः पुनः आगाः) पुन
नया होकर आया है । हे (सर्वाग) संपूर्ण संगोवाले मनुष्य । (ते सर्व चक्षुः) तेरी पूर्ण दृष्टि और (ने सर्व आयुः
च) तेरी पूर्ण आयु तुझे (अविदं ) प्राप्त करायी है ॥ २० ॥
भव (त्वत् तमः व्यवात् ) तेरे पाससे अन्धकार चला गया है । (अप अक्रमीत् ) तेरेसे दूर चला गया है।
(ते ज्योतिः अभूत् ) तेरा प्रकाश फैल गया है । (त्वत् निर्ऋतिं मृत्यु अप नि दध्मसि) तुझसे दुर्गति और मृत्युको
हम दूर हटाते है तथा तुझसे (यक्ष्म अप निदध्मसि) रोगको हम दूर करते है ॥ २१ ॥
।
-
भावार्थ-हे देवो इस मनुप्यको दीर्घायु प्राप्त होवे, इसके पाससे मृत्यु दूर होवे । सहन्न प्रकार के बलोंसे युक्त
भौषधियोंकी सहायतासे इसके मृत्युको हमने दूर किया है ॥ १८॥
अब यह मृत्युसे पार हो चुका है । मायु देनेवाले इसके लिये आयु दे। अब स्त्रिया या पुरुष इसके लिये न रोयें,
क्योंकि यह जीवित हो गया है ॥ १९ ॥
मै तुझे रुग्णस्थितिले आरोग्यस्थितिकी भोर लाया हू अर्थात् तुझे नवीन जैसा प्राप्त किया है। मानो, तू नया ही हो
गया है । तेरे सर्व भग पूर्ण हो गये है, तेरी चक्षु आदि इद्रिय और तेरी नायु तुझे प्राप्त हो गई है, अत तू अब दीर्घकाल
जीवित रहेगा ॥२०॥
अन्धकार तेरे पाससे भाग गया है । और तेरा प्रकाश चारों ओर फैल गया है। दुर्गति और मृत्यु दूर हट गये हैं
भौर रोग दूर भाग गये हैं। इस प्रकार तू नीरोग और दीर्घायु हो गया है ॥ २१ ॥
अथवचंद्रका सुबोध अनुबाट माघजीवन और आगग्य दीर्घायु प्राप्तिका मार्ग दूसरा मार्ग । । पहुच सकता 1 कटा है- - धर्मक्षत्र मनुन्या विंय यह गरीर बर्मका माधन है। यही हमका यहां मगरको 'ग्य' कहा है। इसको 'रथ' हमानिय अन्नेत्र अथवा 'क्रममत्र' किंवा 'धर्मक्षेत्र है। इसमें कहा है कि, उसमें बैठकर मनुष्य महाकमा रहता हुआ और पुम्पार्थ करता हुआ यह मनुष्य अमग्ध है। इतना लंबा मांग इसी मगरसे मनुष्य उत्तम रीतिसे प्राप्त कर सकता है. और पुन्पायन हीन होता हुआ यही पार कर सकता है । दर ग्रामको जाने के लिये जिस प्रकार नीव अधोगति भी प्राप्त कर सकता है। इसरिय इस गरीर उत्तम अम्बग्य, जलरय (नौका), अग्निग्य (रेलगाठी), रूपी मापनको सुरक्षित रखने और इसमें अधिक अधिक वायुरथ ( विमान) आदि विविध रय होने हैं, उसी प्रकार काम लेना लिय इसको दीर्घकाल तक जीविन गबना आत्र- मुक्तिधामतक पहुंचने के लिये हम गरीररूपी रथमें बैठकर, उयक है । इसी कारण दीर्घायु प्राप्त कन्ना माग धर्म- उसके अश्वस्थानीय इंद्रियांकी मुशिक्षित कर धर्मपथपग्में ग्रयों में बतलाया है। हम मुक्तम हनी गर्गक विषयमे जाना पटता है । उस विषयमं उपनिषदमि कटारे- रथी और रथ इमं अमृतं मुत्रं रथं आगह । (मं. ६) 'न मर हुए और मुग्यकारक हम (अग्रुपी ) रयपर आत्मानं रथिनं विद्धि गर्गरं रथमव तु । मारोहण कर इनमे 'मनुख शब्द 'मु' उत्तम बुद्धिं तु मावि विद्धि मनः प्रग्रहमंव च ॥३॥ अवस्थास 'ख' इंद्रियांवाले भारी- शरीररूपी रथ चपूर्ण सदृढ शरीरको प्राप्त कानकी सूचना दी है | 'मु+वं रथं' का भय उत्तम हंद्रियांवाला यह गैर- रूपी स्थ, यह मनुष्यको प्राप्त करना चाहिये । हमका दमग गुण + मृत' गन्न या मुंटे उसे दबंर और गेगी गरीर- को 'मृत कहते है, और जो मनुज, तेजस्वी, बरिष्ट, मुह, नीरोग और कार्यक्षम ठागर होता है टमो' अ- मृत' कहते हैं। जिम गरीरको देख- नन् जीवनका प्रत्यक्ष मानान्कार होता है, टमीको अमन लागेर कहते हैं। शरीर कमा होना चाहिये । हम प्रभा टनर हा मत्रने दिया, कि गरीर अमृत और मुम्नकारक होना चाहिये । ' बटुन रोगोंको दुग्गी मगर प्राप्त हुए हान है। वैसे गर्गगन मनुष्य के जीवनकी सफलता नहीं हो सकती। গাধা है । मेरे मृन और AL दीर्घायु प्राप्तिका मार्ग (३९) . , । । इन्द्रियाणि हयानाहुर्विषयांस्तेपु गोचरान् । (हे) पुरुप ! अतः उत्क्राम । मा अवपत्थाः। (म, ४) आत्मेन्द्रियमनोयुक्तं भोक्तेत्याहुर्मनीषिणः ॥ ४॥ (हे पुरुष) ते उत्-यानं । न अवयानम्। (म, ६) यस्त्वविज्ञानवान्भवत्ययुक्तेन मनसा सदा । हे मनुष्य तू यहांसे ऊपर चढ, नीचे न गिर । हे तस्येन्द्रियाण्यवग्यानि दुष्टाश्वा इव सारथेः ॥५॥ मनुष्य ! तेरी गति ऊपरकी ओर ही हो, नीचेकी ओर कभी यस्तु विज्ञानवान्भवति युक्तेन मनसा सढा। न हो।' मनुष्यको यह देह इसीलिये प्राप्त हुआ है कि वह तस्येन्द्रियाणि वश्यानि सदश्वा इव सारथेः॥६॥ सदा ऊपर ही चढे और नीचे कभी न गिरे । गिरना या चढना यस्त्वविज्ञानवान्भवत्यमनस्कः सदाऽशुचिः । इसके आधीन है । यदि यह चाहे तो उठ सकता है और न स तत्पदमाप्नोति सँसारं चाधिगच्छति ॥७॥ यदि यह चाहे तो गिर भी सकता है। यही भाव अन्य यस्तु विज्ञानवान्भवति समनस्कः सदा शुचिः। गब्दोमे इसी मक्कम कहा है- स तु तत्पदमाप्नोति यस्माद्भूयो न जायते ॥८॥ ज्योतिकी प्राप्ति विज्ञानसारथिर्यस्तु मनः प्रग्रहवान्नरः । आ इहि । तमसः ज्योतिः आरोह । सोऽध्वनः परमानोति तद्विष्णोः परमं पदम् ॥९॥ ते हस्तौ रभामहे । (म. ८) (कठ उ. ३) 'हे मनुष्य इस मार्गसे चल, अधकारके मार्गको छोड भात्मा रथका स्वामी है, शरीर उसका रथ है, बुद्धि और प्रकागके मार्गसे ऊपर चढ, यदि तुझे सहारा चाहिये उसका मारथी और मन लगाम है । इद्रियरूपी घोडे इस रथमे तो हम तेरा हाथ पकडकर सहायता देनेको तैयार है।' महा- जोते गए हैं, जो विषयोके क्षेत्रोम सचार करते हैं। भात्मा पुरुष, साधु, सन्त, महात्मा, योगी, ऋषि उन्नतिके पथमे इदियोंसे और मनसे युक्त होनेपर भोक्ता कहा जाता है। महायता देने के लिये सदा तैयार रहते है, उनकी सहायता जो विज्ञानसे हीन और सयमरहित मनसे युक्त है, उसके लेनेके लिये ही अन्य मनुष्योकी तैयारी चाहिये । जो निष्ठासे भाधीन इद्रियरूपी घोडे नही रहते, अर्थात वे रथके स्वामीको उन्नतिके पथपर चढना चाहता है, उसको सहायता मिलती जिधर चाहे उधर फेक देते है। परंतु जो विज्ञानवान् और जाती है । न पूछते हुए भी उच्च श्रेणीके पुरुष उन्नत होने- मनका संयम करनेवाला होता है, उसके आधीन उसकी वालोंकी सहायता सदा करते ही रहते है। इसी विषयमे सपूर्ण इंद्रियां रहती है। जो विज्ञानरहित, असंयमी मनवाला आगे कहा है- और सदा अपवित्र होता है, वह उस मुक्ति स्थानको प्राप्त नही अर्वाङ् एहि । अत्र पराड्मनाः मा तिष्ठ। (मं १) होता और वारंवार संसृतिमें गिरता है, परंतु जो विज्ञानी, 'इस ओर आ । यहा विरुद्ध विचार मनमे धारण करके मंयमी और पवित्र होता है, वह उस स्थानको प्राप्त करता मत ठहर ।' यहां धर्ममार्गपर मानेका आदेश है। इससे भी है, जहासे वारवार आना नही पडता। जिसका विज्ञान सारथी , विशेष महत्त्वका उपदेश यहां कहा है वह 'पराड्मनाः मा है और मनरूपी लगाम जिसके स्वाधीन है वही मार्गके परे तिष्ट' यह है, इसमे ‘पराड्मनाः (पर+अञ्च् +मनाः) जाता है वही व्यापक देवका परम स्थान है। यह शब्द हरएकको विशेष रीतिसे ध्यान रखने योग्य है। इसमे इस रथका उत्तम वर्णन है, इसके बोडे, सारथी, इसका अर्थ (पर) शत्रुकी ( अञ्च) अनुकूलतामे जिसका उत्तम शिक्षित घोडे, अशिक्षित घोडे, इसका जानेका मार्ग, मन लग गया है। शत्रुको ओर जिसका मन झुका हुमा कौन वहां जाता है और कौन नहीं पहुच सकता, यह सब जो मनसे शत्रुका हित चाहता है अथवा जो शत्रुके अनुकूल वर्णन इस स्थानपर है । यह रथ अमृतकी प्राप्ति करानेवाला होकर केवल अपना व्यक्तिगत लाभ चाहता है और अपनी है, इसलिये इसको दीर्घकालतक सुरक्षित रखना चाहिये जातिके हित-अहित नहीं देखता। इस प्रकारका हीन विचार- और इसको नीरोग भी रखना चाहिये । रोगी और अल्प वाला कोई मनुष्य न होवे । यह शत्रुसे भी अधिक घातक है, जीवी होनेसे यह रथ निकम्मा होता है और मनुष्यका ध्येय अत कहा है, कि (पराड्मनाः अत्र मा तिष्ठ) यहा विरो- प्राप्त नहीं होता। मनुष्य इसपर चढे, लगाम स्वाधीन रखे, धियोके आधीन अपने मनको मत कर अर्थात् स्वकीयोके अनु- और ज्ञान विज्ञान द्वारा योग्य मार्गस चले, अर्थात् सयमसे कल होकर ही यहां रह । राष्ट्रीय और जातीय दृष्टि से भी न्यवहार करे और अपनी उन्नतिका मार्ग भाक्रमण करे। इसका भाव अत्यत विचारणीय है। जो इस प्रकारके हीन यही भाव इस सूक्तद्वारा मूचित किया गया है- वृत्तिवाले लोग होते है, जो अपने स्वार्थ के लिये समाज और है । (३०) अथर्ववेदका सुबोध अनुवाद 'दीर्घजीवन और आरोग्य' राष्ट्रका घात करने के कारण पाप करते है, ये दीर्घजीवी नहीं किराये पर भी रोनेवाले रंगे जाते है, उनका धंदा ही रोनेका होते । इसलिये कोई मनुष्य एमी स्वार्थकी वृत्ति न धारण होता है। यह मय अयनतिकारक प्रथा और उसको एक- करे । सदा वीरवृत्तिवाले मनुष्य हो, जो अपना और ममा दम बन्द करना चाहिये । उप पनि मपुर्ण जातिकी भायु घटती है। जका हित साध। शोकसे आयुष्यनाश हिंसकसि वचना गोक करना भी भायुका घात करता है। कई मनुष्य दृष्ट मनुष्योकी मगतिमें रहनेमे भी भायु घटसी । । दुष्ट गुजरे हुए बुजुर्गों का नाम स्मरण करके दिनरात गोक करते मनुष्य मोर दुष्ट प्राणियोंक घातको सदा सभावना रहती है, है, उनकी ग्रहा अवनति तो होती ही है, परतु साथ साथ अत. इनसे दर रहने की भाशा यहादी- आयु भी क्षीण होती है, अत: इस सूक्तमे कहा है- कन्यात त्वा मा अभिमंस्त । गतानां मा आदिधीथाः, ये पगवतं नयन्ति । संकुस्सुकात् आगत् चर ।। (मं. १०) (मं..) जम्भः संहनुः त्वा मा विदन् । (म १६) 'गुजरे हुए मनुष्योका स्मरण करके शोक न करो, क्योंकि कच्चा माल गानेवाला प्राणी या मनुष्य नेरी हिमान ये शोक दूरतककी गहरी अवनतिको पहुंचा देते है ।' गोक करे । जो घातपात करनेवाला है उससे दूर हो और जो हिसा- करनेसे अपना मन ही गिरना है । जिसका शोक किया जाता शील है वह तुमे न जाने।' इसका तात्पर्य यह है कि हिमा- है वह तो मरा हुआ होता ही है, अतः उसको किसी प्रकार शील प्राणियोंके आधानमे किमीकी अपमृत्यु न होवे । वीर- लाभ नहीं पहुंच सकता, परतु जो जीवित रहते है उनका वृनिसे युद्धादिम जो मृत्यु होती है उसका यहां निषेध नहीं समय व्यर्थ जाता है और इसके अतिरिक्त मन उदास होता है। दीर्घायु प्राप्त करनेवाले. मनुष्य धर्मयुद्धमे न जाने हुए है, उसकी विचार करनेकी और श्रेष्टतम पुस्पार्थ करनेकी घरमे छिपकर मृत्युसे बच, यह इसका मागय नही । वह शक्ति सत्म हो जाती है, इस प्रकार सदा शोकमे मग्न रहने- मृत्यु तो अमरत्व प्राप्त करानेवाली है। यहा तो हिसक वाला पुरुष इहलोक व परलोकके लिये निकम्मा ही सिद्ध जानवरों के द्वारा होनेवाली मृत्यु सिंह, व्यान, सांप भाटिके होता है। कारण अथवा ऐसे जन्तुओंके कारण जो अपमृत्यु होती है बूढो और बुजुर्गों के मरनेपर गोक न करना ठीक है, परंतु उससे बचनेका तथा कुसगतिसे बचनेका उपदेश है । दीर्घायु जब नवजवान मर जाते है तब भी शोक करना योग्य है वा प्राप्त करने जो इच्छुक है उनको चाहिए कि वे इन मापत्ति. नहीं, इसका विषयमे वेदका कहना यह है कि- यांसे अपने आपका बचाव करे । व्यस्तकेश्यः अघरुदः त्वा मा रुदन् । (म १०) अवनतिके पाश 'वालोको अस्तव्यस्त करके सिर सोल सोल, छाती पीट कर धुरी प्रकार रोनेवाले लोग भी न रोये ।' क्योंकि मरणक जो मनुष्य दीर्घायु प्राप्त करना चाहते है वे अपने आपको पश्चात् रोने पीटनेसे कोई लाभ नहीं हो सकता है। दूसरी मृत्युक और अवनतिके पागोसे बचाये । दीर्घायु प्राप्त करनेके बात यह है कि, इस वेढके उपदेशके अनुसार आचरण करनेसे उपायका आगय ही यह है, इस विषय में देखिये- मनुष्यकी दीर्घायु होगी, अत उसके पश्चात् रोनेपीटनेका दैव्या वाचा नित्याः पाशेभ्यः त्वा उद्भरामसि । कोई कारण ही नहीं रहेगा, क्योंकि नि सन्देह दीर्घ भायु प्राप्त (मं. ३) करनेका उपदेश इस स्थानपर कहा है और उसके लिये एक मृत्योः पड़वीशं अवमुञ्चमानः । (म. ४) उपाय यह है 'मन शोकाकुल न करना।' अतः जो मनुष्य 'दिव्य वाणी अर्थात् जो शुद्ध वाणी है, उसकी सहायतासे दीर्घजीवी बनना चाहते है, कमसे कम वे लोग तो कभी नितिक पाश से तुझे हम ऊपर उठाते है। मृत्यु के पाशको अपना मन शोकमे व्याकुल न करें। यह उपदेश सर्वसाधा- हम सोलते है।' निर्मति अर्थात् अधोगतिके पाश बढे रण जनोक लिये भी बढा बोधप्रद है। कई प्रातो और जाति- कठिन होते है। जो उनमें अटक जाते है उनकी अवनति होती यामे स्यापा ( छाती पीट पीटकर रोना) करनेकी रीति है, है । निति क्या है ? और ऋति क्या है इसका विचार इम मरणाफे वाट सम्बन्धी रोवे पीटने रहते है, कई प्रांतामें तो प्रकार है- ।
दीर्घायु प्रात करनेका उपाय सत्य, योग्य नाग, विनाश सडावट, रोग अनुकूल परिस्थिति गाप चर निक्रति ऋतिः मार्गमें नहीं जाता और इस सत्यमार्गपर ही रहता है, तब एकाकी जीवन सैन्यसमूह, मघ तक तू निर्भय है। भय तो उस असत्यक मार्गपर ही है। भगति, विरुद्धगति गति, प्रगति उस गिरावट के मार्गमे जानेका मोह तुझे उत्पन्न न हो।' युद्धसे भागना, अधर्मयुद्ध वीरता, धर्मयुद्ध आदेश सर्व साधारण के लिये उपयोगी है, सत इनका अमार्ग मार्ग मनन सबको करना योग्य है। जिनस आयु श्रीण हो उन अवनति उन्नति बातोंको अपने आचरणमें लाना योग्य नहीं है। मनुष्यको असत्य, अयोग्यता प्रतिक्षणमें गिरावटक मार्गमे जानेका मोह होता है, उस रअण, भमरत्व मोहसे अपने आपका बचाव करना हरएकका कर्तव्य है। अपवित्रता, पवित्रता इसीसे दीर्घ आयु प्राप्त होनेमे सहायता होती है। मनुष्य तम, अन्धकार प्रकाग, स्वच्छता गिरावटके प्रलोभनसे न फंसे, इस बातकी सूचना देनेक लिये नीरोगता निम्नलिखित मंत्र कहा है- आपत्ति, विपत्ति संपत्ति ज्ञान और विज्ञान संकट अनुकूलता बोधश्च त्वा प्रतीवोधश्च रक्षता- विरुद्ध परिस्थिति मस्वप्तश्च त्वानवद्राणश्व रक्षताम् गोपायंश्च न्वा जागृविश्च रक्षताम् । (मं १३) मृत्यु मृत्यु दूर करना मसत्य, असत्यमे रमना 'ज्ञान और विज्ञान, फुती और चापल्य, तथा रक्षक सत्य, सत्याग्रह और जानत तेरी रक्षा करे।' यहा जो ये छः नाम हैं वे निक्रतिके और मृत्युके पाग कौनसे है और उनसे कैसे विशेष मनन करने योग्य है । विशेष कर जो बचाव करना चाहिये, इसकी कल्पना इस कोष्टकका विचार मनुष्य दीर्वायु करनेसे पाठकोंके मनमें सहज ही मे आ सकती है। नित प्राप्त करना चाहते है उनको तो ये छः शब्द बढे ही योध- इन पाशोंको वोढना चाहिये और ऋतिके साथ अपना संबंध प्रद हो सकते हैं- जोडना चाहिये । इसी विषयमे और देखिये- बोधउसको कहते है कि जो इद्रियोसे जगत्का ज्ञान प्राप्त होता है, जो भी पहिला भास है। मनः तत्र मा गात् । मा तिरः भूत् । (मं. एतं पन्थानं मा गाः! एप भीमः।(मं. १० (२) प्रतिबोध वह है कि जो विचार और मननके पश्चात १०) सत्यशाम होता है तथा जो अन्यान्य प्रमाणोकी कमोटीसे भी 'तेरा मन इस अधोगतिके, नितिके मार्गमे कभी न सत्य होता है। जावे, तथा उस मार्गमे जाकर वहीं छिप न लावे। इस अव- यह ज्ञान और विज्ञान मनुष्यको मोहसे गिरानेवाला ग नतिके मार्गसे मत जा, क्योंकि यह वढा भयानक मार्ग है। हो । सत्यज्ञान और सत्यविज्ञान कभी गिरानेवाला नयवा यह मार्ग बढा भयानक है, इससे जो जाते है वे दुर्गतिको मोह उत्पन्न करनेवाला नहीं होता, तथापि शत्रुके द्वारा जो पहुंचते हैं, अत. कोई मनुष्य इस मार्गसे न जावे । अर्थात फैलाया जाता है, उसीको ज्ञान विज्ञान मानकर कई भोरे जो दूसरा सत्यका मार्ग है उससे जाकर अभ्युदय और लोग उसको स्वीकार करते है और भ्रममें पढते है, मोहवश निःश्रेयसकी प्राप्ति करे । निर्ऋतिका मार्ग अंधकारका है, होते हैं और गिरते हैं। इसलिये इस मत्रमें कहा है कि मतः जाते समय ठोकरें लगती है और गिरावट भी भयानक 'झान विज्ञान मनुष्यकी रक्षा करनेवाले हो। जो मनुष्य होती है, अतः कहते हैं- ज्ञान विज्ञान प्राप्त करते है, वे विचार करे कि जो जान एतत् तमः, मा प्रपन्थाः, ते परस्तात् भयं । विज्ञान हम ले रहे है, वह सथा ज्ञान विज्ञान है या नहीं अर्वाक् अभयम् । (मं १०) और इससे हमारी सची रक्षा होगी या नहीं। शत्रुमे दिये तमः त्वा मा विदत् । (म. १६) हुए अमोत्पादक ज्ञानसे (वस्तुत: अज्ञानसे) आयु, आरोग्य 'यह अन्धकार है, इसमे तू मत गिर, क्योकि इस मार्गसे और बल क्षीण हो जाता है और मन्य ज्ञानले भातु, जानेसे तेरे लिये भागे भय उत्पन्न होगा। जबतक तू उम भारोग्य तथा चल वृद्धिको प्राप्त होता है। इससे पता लग ६ [भधर्व ना ४ हिन्दी] ते - -- (४२) अथर्ववेदका सुवोध अनुवाद दीवजीवन और आरोग्य' - - - सकता ह कि ज्ञान और विज्ञानका महत्व दीर्घायुकी प्राप्तिमें है, परंतु लोगोको इनसे अपने आपका याचार करना चाहिये। कितना है, भव भागे देखिये- क्योकि ये स्वार्थसाधका लांग विचार करे कि मजे रक्षक कौन है और जनहित करने गिये कौन जागते रहते फूर्ति और स्थिरता (३) अस्वप्न शब्दका अर्थ निद्रा न आना नहीं है, है । जो सचे रक्षाफ है. उनको ही रक्षक मानगा और जो म्वार्थसाधक है उनको दूर करना चाहिये । नभी मणी रक्षा वह तो रोगी अवस्था हे । निगा तो मनुष्य के लिये अत्यंत होगी, कल्याण होगा, जननामे शान्ति रहेगी और भन्तमें भावश्यक है। यहां ' अ-स्वप्न ' का अर्थ है 'सुस्तीका ऐसी सुस्थितिम आयु भी दीर्घ होगी और नीरोग अयम्या न होना' मनुष्यको सुस्त नहीं रहना चाहिये । मनुष्यके रहनेसे जनता सुखी होगी। दीयु प्राप्त करनेमे ये सब अन्दर फुर्ती अवश्य चाहिये । फुर्तीके विना मनुग्य विशेष बात सहायक है, उनक विना अनेक चयक्तित प्रयानमे पुरुषार्थ कर नहीं सकता। अतः यह गुण मनुष्यके लिये पर्याप्त दीर्घायु नहीं प्राप्त हो सकती । अर्थात् सामाजिक सहायक है। और राजकीय परिस्थितिक अनफल रहनेगे मनायकी आयु (४) अनवद्राण का अर्थ है न भागना, मंदगति न होना पीछे न हटना । जो स्थिति प्राप्तकी है, उसी पर दृढ लिये स्वतत्र देश के लोग दीर्घजीवी होनी और परतंग्न दीर्घ होती है और प्रतिकर होनेने वायु घटनी है। इसी रहना और सभव हो तो आगे बढनेकी तैयारी करना। देगमे भरपायु प्रजा होती है। वस्तुतः उन्नतिके पथमे जानेके लिये ये गुण बढे उपयोगी है, परतु कई मनुग्योमे ऐसे कुछ वेढगी फुर्ती होती है कि सामाजिक पाप उससे उनकी हानि ही होती है। इसलिये यहा यह मंत्र दीर्घजीवी मनुष्य के सामाजिक और राजकीय कर्तव्य भी पाठकोको सावध कर रहा है कि ऐसी फुर्ति और गतिसे यचो हे यह दर्शाने के उद्देश्यसे इस सूक्तमें स्वतंत्र आदेश विशेष और जिससे अपनी निःसंदेह उन्नति हो ऐसी फूर्ति अपनेमें रीतिसे कहा है- बढालो । पुरुषार्थी मनुग्यमें फूर्ति तो चाहिये परतु ऐसी जीवेभ्यः मा प्रमदः। (म० ७) चाहिये कि जो विघातक न हो । पहिले कहे गए ज्ञान और संपूर्ण जीवोंके लिये अपना कर्तव्य करने के समय तू विज्ञान गुरु आदिसे प्राप्त करने होते है, ये फूर्ति और गति प्रमाद न कर । ' इससे स्पष्ट होता है कि हरएक मनुष्यका अपने ही अन्दर होते हैं, परतु विशेष रीतिसे उनको ढालना भन्य प्राणियों के संबंधमे कुछ विशेप कर्नन्य है, अर्थात अन्य पढता है । इसके पश्चात् दो और गुण गेप है, उनका विचार मनुष्य और पशुपक्षी जीवजन्तु आदिके कुछ कच्य अव देखिये- है और उसमे प्रमाद नही होना चाहिये । प्रमाद होनेसे रक्षा और जाग्रति इस व्यक्तिका और समाजका भी नुकसान होगा भत. (५) गोपायन् नाम उसका है कि जो दूसरोका सरक्षण प्रमाद न करते हुए यह कर्तव्य करना चाहिये । इन कर्तव्यो करता है। इसका अर्थ रक्षा करनेवाला है। के ठीक प्रकार होनेने मनुष्य दीर्घायु हो सकता है । अर्थात (६)जागृवि जागता हुआ रक्षा कार्यमें दत्ताचित्त इस सामाजिक कर्तव्यको निदोष रीतिसे करनेवाले लोग होता है। अर्थात् ये दोनों रक्षा कार्य करनेवाले है। समाजमे जितने अधिक होगे, उतने ही उस समाजमे दोप यहां ' जागृविः गोपायन् च त्वा रक्षतां'। (म. १३) कम होगे और उस प्रमाणसे उस देशके मनु'योको मायु जागनेवाला और रक्षा करनेवाला तेरी रक्षा करें ऐसा कहा दीर्घ होगी। सामाजिक कार्यके विषयमें उदासीन नौर है । इससे स्पष्ट होता है कि कई जागनेवाले भी रक्षाका सामाजिक कार्यको प्रमादयुक्त करनेवाले लोग जिस समाजमे कार्य नहीं करते और कई रक्षक भी रक्षाका कार्य नहीं अधिक होगे उस समाजमे भरपाय लोगोंकी सरया अधिक करते । चोर रात्रीमे जागता है, परतु वह जनताकी रक्षा होगी। जबतक सपूर्ण समाज निर्दोष नहीं होता तयतक नहीं करता, इसी प्रकार कई रक्षणकार्यपर नियुक्त हुए मोह- मनुप्योकी दीर्घायु नहीं होगी। दूषित समाजमें एक व्यक्ति चाहे देदार भी प्रजाकी रक्षा नहीं करते, परतु रिश्वते भादि कितना भी निर्दोप हो तथापि सब समाजके दोषोका परि- सा-साकर प्रजाको सताते हैं। इस प्रकारके भनत लोग है णाम उस व्यक्ति पर होगा ही। इसलिये सांघिक जीवनको जो जागते हैं और रक्षाके कार्यमे अपने भापको रसते भी निर्दीप धनाना आवश्यक है। सबव - दीर्घायु प्राप्त करने का उपाय - पितन् मा अनुगाः। (मं०७) अन्य देव भी मनुष्यका जीवन दीर्घ करते है, इस विषयमें हे मनुन्य ' तू पितरोके पीछे न जा। अर्थात् शीघ्र निम्नलिखित मंत्र भाग देखिये- मत मर । यह आदेश मनुष्यको दीर्घायु प्राप्त करनेकी भगः अंशुमान्सोमः मरुतः देवाः इन्द्राग्नी प्रेरणा करनेके उद्देश्यले कहा गया है। यदि मनुन्य प्रयत्न स्वस्तये उत् । (म.२) करेगा, तो उसको दीर्घ जीवन प्राप्त होगा, अन्यथा उसकी मातरिश्वा वातः तुभ्यं पवताम् । (मं. ५) भायु मल्प ही होती जायेगी। आपः अमृतानि तुभ्यं वर्षन्ताम् । (मं. ५ सूर्यप्रकाशसे दीर्घायु इह विश्वे देवाः तुभ्यं रक्षन्तु । (मं. ७) अन्नयः जातवेदाः वैश्वानराः दिव्यः विद्युतः ते दी जीवन प्राप्त करनेके लिये सूर्यप्रकाश वडा सहायक रक्षन्तु । (म. ११) है । जो लोग अपनी आयु बटाना चाहते है वे इस समृतपूर्ण द्यौः पृथिवी सूर्यः चन्द्रमाः अन्तरिक्षं त्वा रक्षताम् । सूर्यप्रकारासे अवश्य लाभ उठाव- (मं. १२) सूर्यः ते तन्वे शं तपाति । (मं. ५) प्रायमाण इन्द्रः जीवभ्यः त्वा सं-उद्रे दधातु । अस्माल्लोकात् अन्नेः सूर्यस्य संशः मा छित्थाः। (मं. १५) (मं. ४) आदित्या वसव इन्द्राग्नी स्वस्तये त्वा उद्धरन्तु । इह अमृतस्य लोके सूर्यस्य भागे अस्तु । (मं. १ (म.१६) 'सूर्य तेरे शरीरको सुख देनेके लिये ही तपता है । अत. द्यौः पृथिवी प्रजापतिः सोमराज्ञी ओषधयः मूर्य के प्रकागले अपना संबंध न छोड । यहा अमृतपूर्ण स्थान त्वा मृत्योः उदपपिरन् । (मं. १७) भर्थात् सूर्य के प्रकाशित भागमें रह ।' इसीसे मायु दीर्घ 'पृथिवी, जल (आप), अग्नि, वायु, वसु, (लोम- होगी। जो लोग तग मकानके अंधेरे तग कमरेमे रहते है, रात्री ओपधयः) सोमादि सोपधियां, (प्रजापतिः) जहां सूर्यप्रकाग उनको नहीं मिलता वे अल्पजीवी होते है। प्रजापालक राजा, वैश्वानर, जातवेदा मादि पृथ्वीस्थानीय देवता शरीरके चमडीपर सूर्य प्रकाश लगना चाहिये । थोडेसे भी है, अन्तरिक्षस्थानमे रहनेवाले अन्तरिक्ष (आपः) मेघ- सूर्यप्रकाशके चमडीपर लगनेपर जिनको कष्ट होता है वे दीर्घ स्थानीय जल, मातरिश्वा वात., (मरुतः) वायु, चन्द्रमा, जीवन के अधिकारी नहीं है। मनुष्य सदा कपडोसे वेष्टित इन्द्र, विद्युत्, (प्रजापतिः) मेघ आदि देवता है और रहते हैं अत: वे सूर्य के जीवनसे वचित रहते है। यदि मनुष्य द्युलोकमे रहनेवाले द्यौ, सूर्य, मादित्य, भग, प्रजापति (परम सूर्यातपस्नान करेंगे तो उनके रक्तमें सूर्यकिरणोंसे जीवनविद्युत् भात्मा ) आदि देवता है, ये सब देवता मनुष्यको दीर्घ प्रविष्ट होगी और उनको अधिक लाभ होगा। सर्यके विषयमे भायुय्य देवें ।' पाठक जान सकते हैं कि इनमेसे प्रत्येक देव- प्रश्नोपनिपद में कहा है- ताका संबंध प्राणीकी दीर्घायुके साथ कैसे है। प्राणी तृपित होनेपर जलसे प्राण लेता है, भूख लगनेपर औषधिवनस्पतियां, आदित्यो ह वै प्राणो रयिरेव चन्द्रमा रयिर्वा फलोंफलो और कन्दोसे प्राणीको जीवन देती है, सूर्यप्रकाश एतत्सर्वं यत्मूर्त चासूनच तस्मान्मूर्तिरेव रायिः॥५॥ तो सभी पदाथों में जीवन रखता ही है इसी प्रकार अन्यान्य प्राणः प्रजानामुदयत्येप सूर्यः ॥ ८॥ (प्रश्न उ १) देवतासे जीवन लेकर मनुप्यादि प्राणी प्राण धारण करते है, 'सूर्य ही प्राण है और जो सब अन्य मृत अथवा अमूर्त इस विषयमे विस्तारसे कहनेकी आवश्यकता नहीं है । वह रयि है। यह सूर्य प्रजाओका प्राण है जो उदयको ये सब देव (वयो-धसः) आयुको धारण करनेवाले प्राप्त होता है।' इतनी सूर्यको महिमा है, मत इस सूक्तमे हैं, ये (संधमन्त) मनुष्यमे दीर्वजीवनकी स्थापना करे । कहाँ है कि, 'सर्य के प्रकाशसे अपना सबंध न छोड ।' क्यो इन देवोसे जीवनशक्ति प्राप्त करनेका ही नाम यज्ञ है, इसी- कि ग्रह सूर्यप्रकाश ऐसा है कि, जिससे आयुष्य. लिये मर्यादा वृद्धिंगत हो जाती है । जो जो प्राणी सूर्य प्रकाशसे देवान्भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः। अपना सबध छोडते हैं वे अल्पायु होते हैं। सूर्य ही जीवनका परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ ।। समुद्र है, इसलिये इससे दूर होना अयोग्य है। सूर्य के समान (भ गी. ३.११) . मनुग्यकी - कहा है कि- .
- ? (२४) अथर्ववेदका सुबोध अनुवाद 'दीर्घजीवन और आरोग्य' यज्ञग्न देवाको संतुष्ट करो और देव तुम सयको संतुष्ट है । हजारों बीमाली औषधियार प्रयोग द्वारा न करेंगे, इस प्रकार परस्परको मानन्द प्रसन्न करते हुए तुम मृत्युगे बचाया है।' मन परमय प्राप्त करो।' इस प्रकार यह यशका संबंध हर प्रकार दीर्घ जीवन प्राप्त करने में मणिमंत्र भोपथिक है, अतः इस सूकमें कहा है कि- विविध प्रयोग करके यह निदि प्राप्त करनी होती है। इसके बर्हिः प्रमयुः कथा स्यात् ? (मं. १६) दीर्घजीवनीय उपाय मायुर्वेद, योगसाधन भाटिमें विकार- पूर्वक देखने योग्य है । अतः इनका विनार यहां करनेकी 'मला यज्ञ विघातक कैसे हो सकता है ?' सघा यन आवश्यकता नहीं। विधिपूर्वक किया जाय तो कमी घातक नहीं होगा, प्रत्युत पोषक ही होगा। हम रीनिसे सूर्यादि देवलि शक्ति प्राप्त तम और ज्योति करके मनुष्य अपनी शक्तिका विकास कर सकता त्यत् तमः व्यवात् , अप अनमीत् । यहा आनन्दरने रहकर दीर्घ जीवन प्राप्त कर सकता है । इमी ते ज्योनिः अमृत । (मं. २१) प्राणवारणक विषयमें इस सूनम कहा है- 'तुमने अन्धकार दूर दो चुका है और नेग प्रकार दुभा ने प्राणा अपाना इह रमन्तां । है।' हम मत्र द्वारा जीवनके एक महासिद्धान्तका वर्णन अयं पुरुषः असुना सह । (मं.) किया है । मनुष्यका जीवन सचमुच प्रकासका जीवन है। इह ते असुः, इह प्राणः, इह आयुः, इह ते मनः । बहुत थोडे लोग इसका अनुभव करते है। प्रत्येक मनुष्यका (मे. २) एक एक प्रकारका वर्तुळ स्वतंत्र है, जया जिसका मामर्थ्य त्वा प्राणः चलं मा हासीन् । अधिक उतना उसमा वर्तुळ बटा प्रभावशाली होता है। ते अखं अनु हयामसि । (मं. १५) जिसका आत्मिक बल कम होगा उसका प्रकागवत भी इस रीतिसे यज्ञ द्वारा देवनामोंकी प्रसन्नता करके 'तेरे छोटा होता है । यह छोटा या कमजोर भी हुआ तभी भाका- मन्दर प्राण, अपान, भायु, मन, वल भादि स्थिर रहे।' तक, नक्षत्रोतक फैलने योग्य विस्तृत होता है। मनुष्य नर्यात मनुष्यको दीर्घनीवन प्राप्त हो । जब मरने लगता है, तब यह प्रभागवर्नुल छोटा छोटा होता ते जीवातुं दक्षतातिं कृणोमि । (म.) जाता है, जो मरनेतक अपने अन्तिम अनुभव बोल सकता 'मनाम जो जीवन और बल है' वह मत्र शुभकर्म है, वह इस बातको प्रत्यक्ष रूपले कह सकता है। मन्तिम करने के लिये ही है, यज्ञके लिये ही है । मनुष्यको जो दीर्घायु समय क्षणक्षणमे जिसका प्रभागवर्नुन छोटा होता है वह वैमा प्राप्त करनी है, बहुत बल प्राप्त करना है वह इसी कार्यकै कहना भी है । मनुष्यको आत्मापर (तमः) अन्धकार या लिये है, वह सब श्रेष्टनम यज्ञस्प कर्मक लिये ही है- अविद्याका आवरण पढना ही मृत्यु है । मन्त समयमें जब यह अयं इह अस्तु, अयं इतः अमुत्र मा गान् । (मे १८) है। यह अनुभव इस मंत्र द्वारा व्यक्त किया है। हे मनुष्य ! वर्तुळप्रकार केवल अंगुष्टमान रह जाता है तब मृत्यु होती मृत्यो. त्या उदपीपरम् । (म. १९) न्या आहाप, त्वा अविद, पुन नवः आगाः। (म.२०) है और पूर्ववत वेरी ज्योति जगतमें फैल गयी है। तेरे ऊपर अन्धेरेका भावरण सा रहा था, वह अब दूर हो गया हे सर्वाग ने सर्व चक्षुः ते सर्व आयुः च अविदम्। २१ वे मंत्रमागका आशय है । यह भान्मप्रकागका अनुभव ग्रह (म. २०) है। यह कोई काल्पनिक बात नहीं है। जितने जगतका मनु- त्वत् निक्रनि मृत्यु अपनिमसि । यम अपनिदमसि । (मं. २१) 'यको ज्ञान होता है, वहांतक इसका यह प्रकायवर्तुळ फेला महनवीर्यण इमं मृत्योः उन्पारयामसि। (म १४) अत: यह बिचारा कुछ कह नहीं सकता। बेहोशीका अर्थ हुमा है, बेहोग मनुष्य इस प्रकागका अनुभव नही कर सकता 'यह मनुष्य इसी लोकम रहे, परलोकमे न जावे, अर्थात ही प्रकागवर्तुळका संकोच होना है। बेहोश होनेवाला मनुष्य न म । मृत्युसे नुझे बचाया है। मृत्युसे तुझे राया है, कहता ही है कि मेरे मासके सामने अंधेरा छा गया। इसका माना तू नया बन कर भागया है, तेरा नया ही जीवन बन सष्ट अर्थ यह है कि इसका जो प्रकाश फैला था वह गया है। हे सर्वागसपूर्ण मनुन्य । चक्षु, मायु भादि सब चित हो गया, इसलिये इसकी जीवनगक्ति कम हुई और वह संकु. तुझे शाम हुए हैं। तुमसे दुर्गति, मृयु और रोग दूर हुए मूञ्छित हो गया । - ' -- - ।
दीर्घायु प्राप्त करनेका उपाय (४५) (मं ९) समिलित है। । - दो मार्गरक्षक होना चाहिये । यही यज्ञ है । जो यज्ञके विषयमे इससे पूर्व श्यामश्च शवलश्च यमस्य पथिरक्षी श्वानौ । लिखा है वह पाठक यहा देखे । यज्ञ और (स्वाहा-स्वा- हा) समर्पण एक ही बात है और नमन भी उसीमें काला और श्वेत ऐसे दो यमके मार्गरक्षक श्वान है। यहां ' श्वान' शब्द का अर्थ कई रोगोने । इस प्रकार विचारवान् सुविज्ञ मनुष्य वृद्ध अवस्थामे सत्य कुत्ता किया है मौर इसका अर्थ ऐसा माना है कि ' यमके दो इत्ते यम- ज्ञानका उपदेश देनेमे समर्थ होता है- लोकके मार्गमे रहते है । ' परंतु यह अर्थ ठीक नहीं है । उपदंशक श्वान गन्दका अर्थ यहां ' (श्वा-न, श्वः+न)जो जिर्विः विदथं आवदासि । (म० ६ कल नहीं रहता यह है । यम नाम मूर्य अर्थात् कालका है, इस प्रकारका वृद्ध मनुष्य अपने ज्ञानका उपदेश कर इसके श्वेत दिन और कृष्णवर्ण रात्रीका समय ये दो भाग सकता है।' तबतक किसीको उपदेश देनेका वह अधिकारी 'कलतक न रहनेवाले ' क्वल भाज ही रहनेवाले है। इस नहीं है । इससे पूर्व कहे हुए उपदेशोके अनुसार आचरण विषयमें वेदमे भन्यत्र कहा भी है- करके जो मनुष्य सदाचाररत होकर वृद्ध होता है, वही योग्य अहश्च कृष्णमहरर्जुनं च विवर्तते रजसी वेद्यामिः। उपदेश देनेमे समर्थ होता है। (ऋ० ६।९।१) इस सूक्तके स्मरण करने योग्य उपदेश एक (अहः ) दिन काला होता है और दूसरा श्वेत (१) इहायमस्तु पुरुषः सहासुना होता है । ' येही दिन और रात है। येही यमके दो-श्वेत सूर्यस्य भागे अमृतस्य लोके । (भ० ८1१1१) भौर काले मार्गरक्षक है । हरएक मनुष्य मार्गकी रक्षा ये 'जो मनुष्य दीर्वायु प्राप्त करना चाहता है, वह सूर्य के दोनों करते हैं। इनमेसे प्रत्येक भान है परतु कल तो नि सन्देह प्रकाशके प्रदेशम रहे क्योकि वहां अमृत रहता है।' नहीं रहेगा। ये दोनो यमके रक्षक है ऐसा जानकर और (२) उत्क्रामातः पुरुष, माव पत्थाः हरएकके पीछे ये लगे हैं, कोई इनसे हटा नहीं है, यह जान मृत्योः पवीशमवमुञ्चमानः ॥ ( अ० ८1११४) कर इन रक्षकोके सामने कोई पापकर्म न करे और सदा 'हे मनुष्य अपर चढ, नीचे मत गिर और मृत्युके अच्छा सत्कर्म ही किया करे। पाप कर्म करनेसे ये यमके पास तोड दे। मार्गरक्षक किसीको छोडते नहीं। अर्थात् पापीको अवश्य (३)सूर्यस्ते शं तपाति । ( अ० ८.१५) उण्ट मिरेगा। यह दण्ट आयुकी क्षीणता ही है। अन्य सूर्य तेरा कल्याण करनेके लिये तपता है।' रोगादि भी हैं । यह यम बढा प्रवल है किसीको छोडता (४) उद्यानं ते पुरुप नावयानम् (अ० ८1१६) नही, मत उम्मको नम्र होकर रहना चाहिये हे मनुष्य । तेरी उन्नति हो, अवनति न हो।' यह मृत्यवे अन्तकाय नमः । (म० १) वाक्य भगवद्गीता ( ६१५) के 'उद्धरेदात्मनात्मानं मृत्युः दद्यताम् । ( म० ५) नात्मानमवसादयेत् ' ( अपना उद्धार करना चाहिये, मृत्युको नमस्कार हो, मृत्यु दया करे' इत्यादि प्रकार कभी अपनी अवनति नहीं करनी चाहिये) इस वाक्य के मृत्यु के सामर्थ्यकी जाग्रति मनमे रखना चाहिये और उसका समान है। दर मनमे रखना चाहिये । उसले दयाकी याचना करना (५) मा जीवेभ्यः प्रमदः। (१० ११७) चाहिये । इतनी नम्रता मनमें हो तो मनुष्य सहसा पाप 'प्राणियोके संबंधमे जो कर्तव्य है उसमे प्रमाद न नहीं कर सकता । कमसे कम इसले पापप्रवृत्ति न्यून तो कर ।' अवश्य होगी। इसी प्रकार-- (६)मा गतानामादीधीथा ये नयन्ति परावतम् । गोपायन्ति रक्षन्ति, तेभ्यः नमः स्वाहा च । (अ० ८1१1८) (म० १४) गत वातोका शोक न कर, वे अधोगतिमे दूरतक ले 'जो पालन भौर रक्षा करते है, उनको नमस्कार और जाते है।' समर्पण हो ।' इससे पूर्व पालकों भौर रक्षकोकी गिनती की ७) मात्र तिष्ट पराड्मनाः । (म० ८1१६९) है, उन सबके लिये अपनी भोरसे यथायोग्य समर्पण अवश्य यहा विरुद्ध दिगामे मन करके खदा न रह।' । - ' (४६) अथर्ववेदका मुबोध अनुवाद -डीजीवन और आरोग्य दीर्घायु कां. ८, सू. २ (अपि - ब्रह्मा । देवता- मायुः ।) आ रमस्वेमाममृतस्य इनुष्टिमच्छिधमाना जरदष्टिरस्तु ते । ॥१॥ असं त आयुः पुनरा भैरामि रजस्तमो मोप गा मा प्र मष्ठाः जीवता ज्योतिरम्येार्वाङा त्यो हरामि शतगारदाय । अवमुञ्चन्मृत्युपाशानशस्ति द्रापीय आयुः प्रतरं ते दधामि ॥२॥ वातात्ते प्राणमविद् सूर्याचक्षुरहं त । यत्ते मनस्त्वयि तद्धारयामि सं वित्स्वाद जिह्वयालपन् ॥३॥ प्राणेन त्वा द्विपदां चतुष्पदामग्निमिव जातममि सं धमामि । नमस्ते मृत्यो चक्षुपे नमः प्राणार्य तेऽकरम् ॥४॥ अर्थ-(इमां अमृतस्य नुष्टि आरमस्व) इस अमृत रसके पानको प्रारभ कर (ते जरत्-अप्टिः अच्छि. द्यमाना अस्तु ) वृद्धावस्थातक तेरा जीवन भोग अविच्छिन्न रीतिसे होवे । (ने असु आयुः पुनः आभरामि) तेरे प्राण और जीवनको मै तेरे अन्दर पुन भग्ताह । (रजः तमःमा उपगाः) भोग और समान पाम न जा। (मा प्र मेष्टाः) मत मर ॥ १॥ (जीवतां ज्योतिः अर्वाड अभि-पहि) जीवित मनुष्योंकी ज्योतिको इस ओरसे प्राप्त हो । (त्वा शत-शार- दाय आ हरामि) तुझे सौ वर्षकी आयुके लिये लाता हूं । (मृत्युपाशान् अशस्ति अवमुञ्चन्) मृत्युके पाशो भौर अकीर्तिको हटाता हुआ (ते प्रतरं द्राधीयः आयुः दधामि ) मैं तेरे लिये उत्कृष्ट दीर्घ नायु देता हूं ॥२॥ (वातात् ते प्राणं अविदं) वायुमे तेरे प्राणको प्राप्त करता हूं। (अहं सूर्यात् तव चढं) मैंने सूर्यमे तेरे नेत्रको प्राप्त किया है । (यत् ते मनः त्वयि धारयामि ) जो तेरा मन है उसको मैं तेरे अन्दर न्यापित करता (अंगैः संवित्स्व ) अपने सब अवयवोको प्राप्त हो । (जिह्वया लपन वद) जिह्वाले गब्दोच्चार करता हुआ बोल ॥३॥ (जातं अग्नि इव ) अभी उ-पन्न हुए अग्नि के समान (त्वा द्विपढां चतुष्पदां प्राणेन संधमामि ) नुमे हिपाद और चतुष्पादोंके प्राणसे संयुन करता ह । हे मृत्यो ' (ते चक्षुपे नमः) तेरी नेत्र इद्रिय लिये नमन और (ते प्राणाय नमः अकरं ) तेरे प्राण लिय में नमन करता ह॥ ४ ॥ . - भावार्थ- हे रोगी मनुग्य ! तू इस अमृतरमरुपी औषधिरसका पान कर और दीर्घायुसे युक्त वन । तेरे अन्दर प्राण पुन स्थिर रसना ह । तू भोगमय जीवन और मज्ञान के पास न जा । और शीघ्र न मर |॥ १॥ दीवित मनुष्योमें जो एक विलक्षण नेज होता है उस प्राप्त कर और सौ वर्ष जीवित रह । मृत्युके पागको तोट । तेरी भायु बढाता हूं।॥॥ वायुग्ने प्राण सूर्यसे नेत्र तुग्ने देता ह । तेरे अन्दर मन स्थिर रहे । तेरे सब अवयवोकी पुष्टि होवे और तेरी जिहासे उत्तम गन्द निक्ले ॥३॥ निम्न प्रकार अग्निकी छोटी ज्वालाको धमनीम थोटी योटी वायु देकर प्रदीप्त करते हैं, ठीक उसी प्रकार तेरे अन्दर म्थिन थोडेम प्राणको हम अनेक उपायोंम प्रदीप्त करते हैं । मृत्युको हम नमस्कार करते हैं ॥ ४ ॥ । -- दीचीयु (४७) अयं जीवतु मा मृतेमं समीरयामसि । कृणोम्यस्मै मेज मा पुरुपं वधीः जीवलां नघारिपां जीवन्तीमोषधीमहम् । त्रायमाणां सहमानां सहस्वतीमिह हुवेऽसा अरिष्टतातये अधि ब्रूहि मा रंभथाः सृजेमं तवैव सन्त्सर्वहाया इहास्तु । भवाशवौँ मृडतं शर्म यच्छतमपसिध्य दुरितं धत्तमायुः ॥७॥ अम्मै मृत्यो अधिं वहीमं दयखोदितोऽयमैतु । अरष्टः सर्वाङ्गः सुश्रुज्जरसां गतायन आत्मना भुजमश्नुताम् ॥८॥ देवाना हेतिः परि त्वा वृणक्तु पारयामि त्वा रजस उत्त्या मृत्योरपीपरम् । आराग्निं अव्याद निरूह जीवातवे ते परिधि दधामि |॥९॥ अर्थ-(अय जीवतु) यह पुरुष जीवित रहे, (मा मृत) न मरे । (इमं सं ईरयामसि ) इसको हम संचत करते हैं। (अस्मै भेषजं कृणोमि) इसके लिये मै औषध बनाता ह। हे मृन्यो । (पुरुपं मा वधीः) इस पुरुषका वध न -- कर॥५॥ । अहं अस्मै अरिष्ट-तातये) मै हमको सुसका विस्तार करनेके लिये (जीवलां) जीवन देनेवाली (नघा- रिपां) हानि न करनेवाली (बायमाणां सहमानां सहस्वती) रक्षा करनेवाली, रोग हटानेवाली और बल बढाने- वाली, (जीवन्ती हुवे) जीवनीय मौषधिको देता हूं ॥ ६ ॥ (अधि हि) तू उपदेश कर, (मा आरभथाः) बुरा वर्ताव न कर, (इमं सृज) इस पुरुषको जगत्मे चला, (तव एवं सन् ) तेरा ही होकर यह (सर्वहायाः इह अस्तु ) पूर्ण मायुतक यहा रहे । (भवा-शर्वो) हे भव मौर शर्व । तुम दोनो (मृडतं ) सुखी करो, (गर्म यच्छतं ) सुस दो। (दुरितं अपसिध्य ) पापको दूर करके (आयुः धत्तं) दीर्व भायु प्रदान करो ॥ ७ ॥ हे मृत्यो (अस्मै अधि बृहि) इमको उपदेश कर, (इम दयस्व) इसपर दया कर । (अयं इतः उत् एतु) यह इस विपत्तिसे ऊपर उठे और (अ-रिटः सर्वाङ्गः) पीढारहित सर्व अंगोसे पूर्ण एवं (सु-श्रुत्) उत्तम ज्ञान या श्रवण शक्तिमे युक्त होकर (जरसा शतहायनः) वृद्धावस्या सौ वर्षसे युक्त होकर (आत्मना भुजं अश्नुतां) भपनी गानिसे भोगोको प्राप्त करे ॥ ८॥ (देवानां हेतिः त्वा परिवृणक्तु ) देवोका शस्त्र तुझे दूर रखे । मै (न्वा रजसः पारयामि) तुझे रजस्से पार करता हूं। (त्वा मृत्योः उत् अपीपरं) तुझे मृत्युसे ऊपर उठाया है, तू मृत्युसे दूर होचुका है। (क्रव्यादं अग्निं आरात् निरुहं ) मांसभक्षक अग्मिको दूर रसता हू और (ते जीवातवे परिधि दधामि) तेरे जीवनके लिये यह मर्यादा निश्चित करता है ॥९॥ भावार्थ- यह मनुष्य दीर्घजीवी होवे, गीध न मरे । ऐसी शक्ति इसमें संचालित करते है। इस रोगीको हम औषध देते हैं । इसकी मृत्यु न हो ॥४॥ इसके दीर्घजीवनके लिये जीवन्ती औषधिके रसको देता है । यह भायुष्य वढानेवाली, वल देनेवाली, दोय हटाने- वाली भौर रोग दूर करनेवाली है ॥ ६ ॥ इस दीर्वजीवनके उपायका जनताको उपदेश कर, कोई बुरा माचरण न करे, यह पुरुष इससे निदोष होकर जगतमे संचार करे । इसको दीर्वजीवन प्राप्त हो। इसको सुखमय शरीर मिले, रोग और दोष दूर हो और पूर्ण भायु प्राप्त हो ॥७॥ उसको मारोग्य प्राप्तिका उपदेश कर, मृत्यु इसपर इस समय उया करे, यह सब प्रकार अभ्युदयको प्राप्त होवे, इसके सब भवयव पूर्ण रीतिसे वढे, निर्दीप हो । यह शामवान होकर पूर्णायु होवे और अन्ततक अपने प्रयत्गमे अपने लिये आव- उयक भोग प्राप्त करे ॥ ८॥ - -
(२८)
अथर्ववेदका सुबोध अनुवाद --- 'दीर्घजीवन और आरोग्य'
यत्तै नियानं रजसं मृत्यौ अनवयम् । पृथ इमं तस्माद्रक्षन्तो ब्रह्मास्म वर्म कृण्मसि ॥१०॥
कृणोमि ते प्राणापानो जरां मृत्यु दीर्घमायुः स्वस्ति ।
वैवस्वतेन प्रहितान्यमदृतांवरतोऽपं सेधामि सर्वान्
॥११॥
आरादरातिं निति परो ग्राहि अव्यादः पिशाचान ।
रक्षो यत्सवै दुर्भूतं तत्तम इवाप हन्मसि
॥१२॥
अग्नेष्टै प्राणममतादायुष्मतो बन्दै जातवेदसः ।
यथा न रिष्या अमृतः सजूरसस्तत्तै कृणोमि तदु ते समृध्यताम् ।
॥१३॥
शिवे ते स्तां द्यावापृथिवी असंतापे अमिश्रियौ । शं ते सूर्य आ तेपतु शं वातौ वातु से हृदे ।
शिवा अभि क्षरन्तु त्वापो दिव्याः पयस्वतीः
॥१४॥
दीर्घ मायु
..
अर्थ- हे मृत्या ! (यत् ते अनवधर्म्य रजस नियानं )जो तेरा न जीतने योग्य रजोमय मार्ग है ( तस्मात्
पथः इमं रक्षन्तः) उस मार्गये इस पुरुपकी रक्षा करते हुए हम ( अस्मै ब्रह्म वर्स कृण्मसि ) इसके लिये ज्ञानका
कवच प्रदान करते है॥ १० ॥
और
(ते प्राणापानौ जरां मृत्यु दीर्घ आयुः स्वस्ति कृणोमि ) तेरे लिये प्राण अपान, बुटापा,
अन्तमें मृत्यु भी कल्याणमय करता हू । (वैवस्वतेन प्रहितान् चरतः सर्वान् यमदूतान् ) विवस्वान सूर्यसे उत्पन
कालके भेजे हुए सर्वत्र संचार करनेवाले सब यमदतोको (अपसेधामि ) मै दूर करता हु ॥ ११ ॥
(अराति ) शत्रु, (निति) दुर्गति, (ग्राहिं) रोग, (व्याठः) मांसभक्षक जन्तु, (पिशाचान्) मांस
खानेवाले (रक्षः) विनाशक और ( यत् सर्व दुर्भूतं) जो सब अहितकारी है, (तत् तमः इव) उसको अन्धकारके
समान अपने पाससे (परः आरात् अपहन्मसि) दर हटाते है ॥ १२ ॥
(अमृतात् आयुष्मतः जातवेदसः अग्नेः) अमर युवाली जातवेद अग्निसे मैं (ते प्राणं वन्ये) तेरे प्राणको
प्राप्त करता हूं। (यथा अमृतः न रिष्याः) जिससे अमर होकर तू विनष्ट न हो । (सजू: असः) उसके साथ रह,
(तत् ते समृध्यतां) वह तेरा कार्य समृद्धियुक्त होवे ॥ १३ ॥
(द्यावापृथिवी ते असन्तापे ) छौ और पृथ्वी लोक तेरे लिये सन्ताप न देनेवाले, (शिवे अभिश्रियौ) शुभ
और श्रीसे युक्त (स्ता ) हो। (सूर्यः ते शं आतपतु) सूर्य तेरे रिय सुस देता हुआ प्रकाशित होवे । (ते हदे वातः
शं वातु) तेरे हृदयके लिये वायु सुखदायी होकर बहे । (दिव्याः पयस्वतीः आपः) आकाशके मेघमंडलसे
प्राप्त होनेवाले और पृथ्वीपर वहनेवाले जलप्रवाह (त्वा शिवाः अभिक्षरन्तु ) तेरे लिये शान्ति देते हुए वहते रहे ॥ १४॥
भााथ- देवोके शस्त्र तुझपर न गिरे । तुझे भोगवृत्तिसे परे ले जाता हूं। मृत्युको हटाता हूं । मुदीको जलानेवाली
अग्नि तेरे पाससे दूर होवे और तू पूर्णायुकी अन्तिम मर्यादातक जीवित रह ॥ ९ ॥
मृत्युका मार्ग जीता नहीं जा सकता, तथापि उससे हम इसकी रक्षा करते है और इसको ज्ञानका कवच देते है
जिसमे हमकी रक्षा हो ॥ १० ॥
प्राण अपान, वृद्धावस्था, दीर्घ भायु आदिके कारण तुझे सुख प्राप्त हो । तुझे कष्ट देनेवालोको मै दूर करता हूं ॥११॥
गत्र विपत्ति, रोग, विनागक, घातक और क्षीणता करनेवालोको दूर हटाता हूं ॥ १२ ॥
अमर और भायु देनेवाले अग्नि देवसे मैं तेरे लिये प्राण लाता हूं। इससे तेरी मृत्यु नहीं होगी। तू यहा जीवित
रहेगा और समृद्धिसे युक्त होगा ॥ १३ ॥
लोक, अन्तरिक्षलोक, भूलोकमे रहनेवाले सब पढार्थ अर्थात सूर्य, वायु, जल आदि सब तेरे लिये सुख देनेवाले
हो ॥१४॥
दीर्घायु (४९) शिवास्तै सन्त्वोषधय उत्वाहार्पमधरस्या उत्तरां पृथिवीममि । तत्र स्वादित्यौ रक्षता सूर्याचन्द्रमसावुभा ॥१५॥ यत्ते वासः परिधान यां नीविं कृणुषे त्वम् । शिवं ते तन्वेई तकृण्मः संस्पर्शद्रूक्ष्णमस्तु ते ॥१६॥ यत्क्षुरेणं मर्चर्यता सुतेजसा वप्ता वसि केशश्मश्रु। शुभं मुखं मा न आयुः प्र मोपीः ॥ १७ ॥ शिवी ते स्तां व्रीहियवावबलासावदोमधौ । एतौ यक्ष्म वि बांधेते एतौ मुंश्चतो अंहसः ॥ १८ ॥ यदृश्नासि यत्पिसि धान्यं कृष्याः पर्यः । यदायी यदनाचं सर्वं ते अन्नमविष कृणोमि ॥ १९ ॥ अहे च त्वा रात्रये चोभाभ्यां परि दद्मसि । अरायेभ्यो जिघृत्सुभ्य हुमं मे पर रक्षत ॥२०॥ अर्थ-(ते ओपधयः शिवाः सन्तु) तेरे लिये सोपधियां शुभ गुण युक्त हो । (अधरस्याः उत्तरां पृथिवी) नोचली भूमिसे ऊपरकी ऊंची भूमिपर (त्वा आभि उत् आहार्प) मैं तुझे लाया हूँ। (तत्र सूर्याचन्द्रमसौ उभी आदित्यौ त्वा रक्षतां) वहां सूर्य और चन्द्र ये दोनो मादित्य तरी रक्षा करे ॥ १५॥ (यत् ते परिधानं वासः) जो तेरा ओढनेका वस्म है, (यां त्वं नोविं कृणुषे ) जिस यनको तू कमरपर गांधता है, (तत् ते तन्ये शिवं कृण्मः) उसे तेरे शरीरके लिये हम सुखदायक बनाते है । वह वस्त्र (ते संरपर्श अद्रक्ष्णं अस्तु) तेरे स्पर्शके लिये खुरदरा न होवे अर्थात् मुलायम होवे ॥ १६॥ (वप्ता मर्चयता सुतेजसा क्षुरेण) तूनाई स्वच्छता करनेवाले तेज धारयाले उस्तरेसे (यत् केशश्मश्रु वपसि) जो बालों और मूंछोका मुंढन करता है उससे (शुभं मुखं) सुंदर मुख बना और (नः आयुः मा प्रमोपीः) हमारी मायुका नाश न कर ॥ १७॥ (व्रीहियवौ ते शिवा) चावल और जो तेरे लिये कल्याणकारी (अ-वलासौ अदो-मधौस्तां) कफ न करने- वाले और सानेपर सुखदायक हो । (एतौ यक्ष्मं वि वाधेते) ये दोनों रोगका नाग करते है और (एतौ अंहसः मुञ्चतः) ये दोनों पापसे मुक्त करते हैं ॥ १८ ॥ (यत् कृप्या धान्यं अश्नासि) जो कृषिसे उत्पन्न होनेवाला भान्य तू खाता है और ( यत् पयः पिवसि ) जो दूध त् पीता है, तथा तेरे लिए, (यत् आधं यद् अनाद्यं) जो खाने योग्य भऔर जो न खाने योग्य है (तत् सर्व ते भविष कृणोमि) वह सब मैं तेरे लिये विपरहित करता हूं ॥१९॥ (त्वा अहे च रात्रये च उभाभ्यां परिदमसि) तुझे मै दिन और रात्री इन दोनो समयोंके लिये सौप देता हूं। (मे इम) मेरे इस मनुष्यकी (अरायेभ्यः जिघत्सुभ्यः परि रक्षत) दान न देनेवाले भूखोंसे रक्षा कर ॥ २० ॥ भावार्थ- औषधियां तुझे अपने शुभगुणोसे सुख दे । इसको मृत्युकी हीन अवस्थासे मारोग्यकी उच्च अवस्थामे मैं लाया हूँ। यहां सूर्यचन्द्रादि तेरी रक्षा करें । जो तेरा मोठने और पहननेका वम है वह तेरे लिये मृदु और सुखकारक हो ॥१५-१६॥ उत्तम तेज छुरेसे जो नाई हजामत यनाता है उससे मुखकी सुंदरता बढ़ती है । यह नाई किसीको भायुका नाश न करे॥१७॥ चावल, जौ भादि धान्य तेरे लिये सुखदायी, खानेके लिये स्वादु, कफ भादि दोष न उत्पन्न करनेवाला, नीरोगता बडानेवाला और पापवृत्ति हटानेवाला हो ॥१८॥ जो कृषिका धान्य और गौका दूध खाया पीया जाता है वह सब विपरहित हो ॥१९॥ दिन और रानीके समय शत्रुभोंसे तेरी रक्षा हो ॥ २० ॥ ७ [भन. मा ४ हिन्दी] ।
(५०)
अथर्ववेदका सुवोध अनुवाद
'दीर्घजीवन और आरोग्य'
॥ २२ ॥
शतं तऽयुत हायनान्वे युगे त्रीणि चत्वारि कुण्मः ।
इन्द्राग्नी विश्वे देवास्तेऽर्नु मन्यन्तामहणीयमानाः
॥ २१॥
गरदै त्वा हेमन्ताय वसन्ताय ग्रीष्माय परि दद्मसि ।
वर्षाणि तुभ्यं स्योनानि येषु वर्धन्त ओपंधी:
मृत्युरीशे द्विपदा मृत्युरीशे चतुष्पदाम् । तस्मात्यां मृत्योर्गोपतेरुद्भरामि स मा विभः ॥ २३ ॥
सोऽरिष्ट न मरिष्यसि न मरिष्यसि मा विभेः । न वै तत्र नियन्ते नो यन्त्यधर्म तमः ।। २४ ॥
सर्यो वै तत्रे जीवति गौरवः पुरुषः पृशुः । यत्रेदं ब्रह्म क्रियते परिधि बनाय कम् ॥ २५ ॥
अर्थ- (द्वे युगे) दिन रात्रीरूपी दो संधिवाली (त्रीणि) सर्दी गर्मी और वृष्टि इन तीन कालोंवाली और
(चत्वारि ) बाल्य, तारुण्य, मध्यम और वृद्ध इन चार अवस्थाओवाली (ते शतं हायनान्) तरी मी वर्षको आयुको
हम (अ-युतं कृण्मः) अटूट अथवा असदित करते हैं । (इन्द्राग्नी विश्वेदेवाः अहणीयमानाः) इन्द्र, अग्नि और
सब देव संकोच न करते हुए ( ते अनुमन्यन्तां) तेरी आयुका अनुमोदन करे ॥ २१ ॥
(गरदे हेमन्ताय बसन्ताय ग्रीष्माय) शरत् , हेमन्त, वसन्त, ग्रीष्म इन ऋतुओके लिये (त्वा परि दद्मसि)
तुझे हम सौंप देते है । (येपु औषधीः वर्धन्ते) जिस ऋतुमें औषधियां बढती है, वह (वर्षाणि तुभ्यं स्यानानि)
वृष्टिका ऋतु भी तेरे लिये सुसकारी हो ॥ २२ ॥
(मृत्युः द्विपदां ईशे) मृत्यु द्विपादोंपर प्रभुत्व करती है, (मृत्युः चतुष्पदा ईशे) मृत्यु चार पाववालोपर
अधिकार चलाती है । (तस्मात् गोपतेः मृत्योः) उस जगत् के स्वामी मृत्युसे ( त्वां उद्धरामि) तुझे ऊपर उठाता
है। (सः मा विमेः) वह तू अब मृत्युसे मत डर ॥ २३ ॥
हे (अ-रिट) अहिंसित मनुष्य ! (सः न मरिप्यसि ) वह तू नही मरेगा। (न मरिप्यसि, मा विभेः)
निश्चयस नहीं मरेगा, अत: डर मत । (तत्र न वै नियन्ते ) वहा नही मरते है तथा (अधमं तमःनयन्ति) हीन अन्ध-
कारके प्रति भी नही जाते है ॥२४॥
(यत्र जीवनाय इदं ब्रह्म) जहां जीवनक लिये यह ज्ञान और (कं परिधिः क्रियते) सुसमयी मर्यादाकी
स्थापना की जाती है (तत्र) वहा (गौः अश्वः पशुः पुरुषः) गाय, घोडा, पशु और मनुष्य (सर्वः वै जीवति)
सन कोई जीवित रहता है ॥ २५ ॥
.
भावार्थ- यो वर्षकी दीर्घ आयु तुझे प्राप्त हो और इस बायुमे दोनों सधिकाल, सर्दी, गर्मी और वृष्टि के तीनो
समय सुखकारक हो । तेरी मायुकी बाल्यादि चारो अवस्थाएं एकके पीछे ययारुम तुझे प्राप्त हो ॥२१॥
गरत, हेमन्त, वसन्त और ग्रीष्म ये सर ऋनु तुझे सुसदायी हो और वृष्टिसे वनस्पतियोका उत्पन्न करनेवाला वर्पा-
काल भी तेरे रिय नुसतायी हो ॥ २२ ॥
ममी द्विपाद, चतु पाद प्राणियोंपर मृत्यु अधिकार चलाती है, उस मृत्यु के बंधनसे तुझे छुड़ा लिया है, अत• अब तू
दर मत ॥ २३ ॥
अब नू नहीं मरेगा। मत मन ढरनेका कोई कारण नहीं है। जहां कोई मरते नहीं और जहां अधेरा नहीं, ऐसे
म्यानम तुझे गया हूँ ॥२॥
जहां यह शान और दीर्घजीवनकी विद्या है वहा गाय, घोडा, मनुष्य भादि सब दीर्घायु होते है ॥ २५ ॥
दीर्घायु (५१) परि त्वा पातु समानेभ्योऽभिचारात्सबन्धुभ्यः। अर्मनिभवामृतोऽतिजीवो मा ते हासिपुरसवः शरीरम्२६ मृत्यव एकशतं या नाष्ट्रा अंतितार्या । मुञ्चन्तु तस्मात्यां देवा अ॒ग्नेर्वैश्वानरादधि ॥ २७॥ अमेः शरीरमसि पाराविष्णु रक्षोहासि सपत्नहा । अथौ अमीवचातनः पूतुद्रुर्नाम भेषजम् ।। २८ ।। अर्थ-- (समानेभ्यः सबन्धुभ्यः) समान बान्धवोसे होनेवाले (अभिचारात् त्वा पारपातु) हमलेसे तेरी रक्षा होये । (अ-मनिः अमृतः वा अतिजीवः) अक्षीण, अमर और दीर्घजीवी हो । (असवः ते शरीरं मा हासिपुः) प्राण तेरे गरीरको न छोडें ॥ २६ ॥ (ये एकगतं मृतवः ) जो एक सौ एक मृत्यु है, (या अतितार्याः नाष्ट्राः ) जो पार करने योग्य तथा नाग करनेवाली है ( तस्मात् ) उसले (देवाः वैश्वानरात् अग्नेः) सब देव वैश्वानर अग्निकी शक्तिसे (त्वां) तुझे (अधिमुञ्चन्तु) मुक्त कर ॥ २७ ॥ (अग्नेः पारयिष्णु शरीरं असि) अनिके लिए पार करने योग्य शरीरवाला तू है ( रक्षोहा लपत्नहा अलि) घातकों और शत्रुओका तू नाशक है । ( अथो अविचातनः ) और रोग दूर करनेवाला है । (पू-तु-द्रुः नाम भेषजं) पवित्रता, वृद्धि और गति देनेवाली यह औषध है ॥ २८ ॥ भावार्थ- अपने अन्धुबान्धवोंके आक्रमणसे तेरी रक्षा करते है। तू नीरोग होकर दीर्घायु हुआ है । तेरे प्राण तुझे भव नहीं छोटंगे ॥ २६ ॥ जो सैकडों प्रकारसे मानेवाली मृत्युएं है और नागके जो अन्य साधन है वे परमेश्वरकी कृपासे दूर हो ॥ २७ ॥ तंजस तत्वका गरीर ही तेरा है । अतः तू स्वयं घातकोका नाश करनेवाला है । तू स्वयं रोगोको दूर करनेवाला है। तेरे ही मन्दर पवित्रता, वृद्धि और गति करनेकी शक्ति है । अतः उससे तू दीर्घायु हो ॥ २८ ॥ मृत्युका सर्वाधिकार दीर्घायु बननेका उपाय। है । मृत्युके अधिकारके बाहर इनमेंसे कोई नहीं है । सवकी अन्तिमगति मृत्युके आधीन है । मृत्यु जबतक इस लोकसे दीर्घायु बननेकी इच्छा हरएक प्राणीके भन्तःकरणमे रहती इन प्राणियोको रहने देगी तबतक ही वे रहेगे और जिस है । परंतु मृत्युका अधिकार सबके ऊपर एकसा है, इस विपयम इस सूक्तमे कहा है- दिन मृत्यु प्राणीको ले जाना चाहेगी, उसी दिन प्राणी यहांसे चल बसेंगे। इसलिये मृत्युमे दयाको याचना करते है-- मृत्युरीशे द्विपदां मृत्युरीशे चतुष्पदाम् । मृत्यो! इमं दयस्व । ( मं०८) (म० २३) 'हे मृत्यु ' इसपर दया कर।' सर्वाधिकारी ही यदि द्विपाद और चतुष्पाद इन सब प्राणियोंपर मृत्युका दया करेगा तभी अपना कुछ कार्य बनेगा। और यदि उसने अधिकार है।' हिपाद प्राणी नो पाववाले होते है जैसे प्राणियोपर क्रोध किया, तो फिर उनकी रक्षा कौन करेगा । मनुष्य, पक्षी आदि। चतुष्पाद प्राणी चार पांववाले पशु परतु वैसे देखा जाय तो मृत्युके हाथमे सर्वाधिकार रहते भादि होते है। इनसे अन्य भी जो प्राणी है जिनको बहुपाद हुए भी वह नियमोके आधीन है । वह भी विशेष नियमसे अपाद भी कहा जासकता है, इन सब प्राणियोपर चलता है। उन नियमोके अनुसार चलनेवालोको ही लाभ मृत्युका प्रभुत्व है। अर्थात् मृत्युके आधीन ये सव प्राणी हो सकता है मत. इन नियमोका ज्ञान प्राप्त करना चाहिये, । और - (५२) अथर्ववेदफा सुबोध अनुवाद दीर्घजीवन और आरोग्य' हसी ज्ञानका उपदेश करना चाहिये । यही उपदेश करने मृत्युके पागोको और अवनतिक बन्धनोंको तोट दो। योग्य विषय है । इस कारण कहा है- देवोके मन तुझे बन्धनसे रहित फरें।' अर्थात् देवोंके नाम तेरे ऊपर न गिर । यह भवस्था तब बनती है जब मनुष्य जीवनीय विद्याका उपदेश झानका कवच पहनता है । ज्ञानका कवच पहिने हुए मनु- अधि चूहि । (मं. ७) 'यको मृत्यु के पाश वाध नहीं सकते, दुर्गति उसके पास मा अस्म अधि हि । (म.८) नहीं सकती और देवकि गन उसको काट नहीं सकते। अस्मै ब्रह्म वर्म कृण्मसि । (मं. १०) इतना सामर्थ्य इसमें है, मत. इस जीवनीय विद्याका ज्ञान सर्वो वै तत्र जीवति गौरश्वः पुरुषः पशुः । मनुष्यको प्राप्त करना चाहिये । इसी ज्ञानके बलसे ज्ञानी यत्रेदं ब्रह्म क्रियते परिधि वनाय कम् ।। (मं २५) मनुप्य मृत्युको भी आदेश देनेम समर्थ होता है, देखिये- 'मनुप्योको इस जीवनीय विद्याका उपदेश कर । मनु- मृत्यो ! मा पुरुषं वधीः । ( में ") प्योंको दीर्घायु प्राप्त करनेके नियमोका उपदेश दे । जिसमें देवानां हेतिः परि त्वा वृणक्तु । जीवनकी अवधितक सुसपूर्वक रहनेका और दीर्घजीवनके पारयामि त्वा मृत्योरपीपरम् नियमोका ज्ञान सवको उपदेश द्वारा दिया जाता है, वहाँ आरादग्निं क्रव्यादं निरहम् ।। (मं. ९) मनुप्य तो दीर्घजीवी होते ही हैं, उस देगके गाय, घोटे यत्ते नियानं रजसं मृत्यो अनवधर्म्यम् । भाटि पशु भी दीर्घजीवी हो जाते है।' पथ इमं तस्माद्रक्षन्तों ब्रह्मास्मै वर्म कृण्मसि । दीर्घजीवनकी विद्या है, उससे दीर्घजीवन प्राप्त करनेके (मं १०) कुछ विशेष नियम है । उन जीवनीय नियमोका ज्ञान जन- वैवस्वतेन प्रहितान्यमदूतांश्चरतोऽपसेधामि सर्वान् । ताको टेनके लिये उपदेशक नियुक्त करना चाहिये । इनका (मं. ११) यही कार्य हो कि ग्रामग्राममे जाय, वहाकी जनताका जीवन- तस्मात्त्वां मृत्योर्गोपतेरुद्रामि स मा विभेः॥ क्रम देखें, उनका व्यवहार देखें और उनके रहने सहनेके (मं. २३) अनुसार उनको दीर्घजीवनके लिये योग्य उपदेश दें। इस प्रकार हरएक ग्रामके लोगोको उपदेश दिया जाय । उनसे शस्त्रोसे इसका वध न हो । मैं इस ज्ञानसे इसको रज तम- हे मृत्यो भव तू इस पुरपका वध न कर । देवोंके जो भूलें होती हो, उनके विषयमें उनको समझाया जाय और रूपी मृत्युसे पार करता है। प्रेतदाहक अग्निसे भी इसको उनक जीवन में ऐसा परिवर्तन लाया जाय कि, जिससे दीर्घायु दूर रखता हू । हे मृत्यो । जो तेग रज और प्राप्त होने योग्म दैनिक व्यवहार वे कर सकें। तमयुक्त मार्ग है और जो अजेय है, उस मार्गसे हम इसका बचाव करते ज्ञानका कवच हैं। क्योकि हमने ज्ञानरूपी कवच इसके लिये बनाया है। इस सूक्तके दसवें मंत्रमें 'ब्रह्म वर्म' अर्थात् 'ज्ञानरूपी इसी ज्ञानसे हम सब यमदूतोंको भी दूर हटा सकते हैं। कवच' वनानेके विषयमे कहा है । ज्ञान एक यहा भारी मृत्युसे हम इसको ऊपर उठाते हैं, अब डरनेका कोई कारण कवच है । अन्य कवच तो क्षुद्र कवच हैं । इस कारण जिसने नहीं है।' ज्ञानका कवच पहन लिया वह सबसे अधिक सुरक्षित हो यह ज्ञानरूपी कवचकी महिमा है। ज्ञानी मनुष्य मृत्यु- जाता है। यहा तो यहांतक लिसा है कि जिसने ज्ञानका से भी कहता है कि इस समय मरनेके लिये फुरसत नहीं करच पहन लिया उसको तो मृत्युका भी डर नहीं रहता। है, जब समय मिलेगा, तब देखा जायगा। ज्ञानीको मृत्यु इतना ज्ञानक इस कवचका सामय है। मृत्युका सामर्थ्य के पाश वाध नही सकते । देवोंक शस्त्र उसपर कार्य नहीं सवन अधिक है, परतु जो मनुष्य ज्ञानका कवच पहनता है करते । मार्गमें मृत्युके भयसे रक्षा करनेवाला एकमात्र ज्ञान उमपर मृत्युक शस्त्र भी कार्य नहीं कर सकते । ज्ञानका ही है । यमदतोका भय दूर करनेवाला शुद्ध ज्ञान ही है। क्वच जिग्मने पहन लिया है वह मृत्युके पागोको तोह सकता इस प्रकार यह ज्ञानका ही चमत्कार है। हदेविये- जहां जहा वेदमंत्रोम अवमुञ्चन्मृत्युपाशानशस्ति । (म. २) मृत्युका भय हटानेकी बात कही है, देवानां हेति त्वा परि वृणक्तु । (म. ९) वहा इस ज्ञानस ही मृत्युभय दूर होता है ऐसा समझना चाहिये । मृत्युका भय दूर करनेवाला ज्ञान बहुत विस्तृत ।
दीर्घायु (५३) के है। मायुर्वेद इसी जीवनीय ज्ञानको प्रकाशित करता है। देहीको असावधानी, आलस्य और निद्राक पाशमे बाधता इसका सारांशरूपसे वर्णन वेदमत्रोंमे स्थानम्यानपर है। है। तम ज्ञानको ढक कर मनुष्य प्रमाद उत्पन्न करता है । इस सूक्तमे भी थोडा थोडा वह ज्ञान दिया है देखिये जब तमोगुणकी वृद्धि होती है, तव अज्ञान, मन्दता, असाव रजस्तमः मा उपगाः ।मा प्रमेष्ठाः ॥ (म० ) धानी लौर मोह पैदा होते है । रजोगुणमे मृत्यु होनेसे देह- रज अर्थात् भोगजीवन और तम अर्थात ज्ञानहीन जीवन धारी कर्मसंगियों में जन्म लेता है और तमोगुणमे मरनेसे इन दो हीन जीवनोको प्राप्त न हो । इनसे दूर रहने पर तू मूढयोनिमें पैदा होता है । रजोगुणका फल दुःख और तमो- नहीं मरेगा।' यह मंत्र जीवनीय विद्याका एक प्रधान मन गुणका फल अज्ञान है । सत्वगुणसे ज्ञान, रजोगुणसे लोभ है। रजोगुणी जीवन और तमोगुणो जीवन नायुप्यका नाग और तमोगुणसे अमावधानी, मोह और अज्ञान उत्पन्न होता है। सात्विक मनुष्य ऊचे चढते है, राजसिक बीचमे रहते करता है । रजो और तमोगुणी जीवनका लक्षण और फर भगवडीतामें कहा है- है और हीनगुण के कारण तमोगुणी अधोगतिको पाते है। इस प्रकार रजोगुण और तमोगुणसे अवनति होती है, कट्यम्ललवणात्युष्णतीक्ष्णरुक्षविटाहिनः । माहारा राजसस्येष्टा दुःखशोकामगप्रटाः ॥९॥ इसलिये इस सूक्तम कहा है कि (रज. तमामा उपगाः) यातयामं गतरसं पूति पर्युपितं च यत् । रजोगुण और तमोगुणके पास न जा । क्योकि उनसे गिरा- उच्छियमपि चामेध्यं भोजनं नामसप्रियम् ॥ १० ॥ वट नि.सन्देह होगी। रजोगुण और तमोगुणसे रोग भी (भ.गी भ. १७) बढते हैं और अकालमै मृत्यु भी होती है, इसलिये रजो- रजो रागात्मकं विद्धि तृष्णासड्गसमुद्भवम् गुण और तमोगुणके पास न जानेके लिये जो इस सूक्तम तभिवध्नाति कौन्तेय कर्मसड़गेन देहिनम् ॥ ७ ॥ कहा है, वह अत्यंत महत्त्वका उपदेश है। दीर्वायु प्राप्त करने इच्छुक इस उपदेगकी ओर विशेष ध्यान दे। इसी उप- तमस्त्वज्ञान विद्धि मोहनं सर्वदेहिनाम् । देशको दुहराते हुए कहा है- प्रमादालस्यनिद्राभिस्तन्निबध्नाति भारत ॥८॥ मानमावृत्य तु तमः प्रमादे संजयत्युत ॥९॥ न वै तत्र नियन्ते नो यन्त्यधर्म तमः । अप्रकाशोऽप्रवृत्तिश्च प्रमादो मोह एव च । नोऽरिट न मरिष्यसि न मरिष्यसि,मा विभेः॥ नमस्येतानि जायन्ते विवृद्धे कुरुनन्दन ॥ १३ ॥ ( मं० २४) रजसि प्रलयं गत्वा कर्मसगिषु जायते । 'जो हीन तमोगुणको नहीं अपनाते वे मरते नहीं । वह तथा प्रलीनस्तमसि मूढयोनिपु जायते ॥१५॥ हिसित नही होता, निश्चयसे नही मरता, अतः तू मत टर। रजसस्तु फलं दुःखमशानं तमस फलम् ॥१६॥ यहाँ कितना जोर देकर कहा है कि जो तमोगुणके पास नहीं सत्त्वात्संजायते नानं रजसो लोभ एव च । जाता वह मरता नहीं, क्योकि मरनेका अर्थ ही यह है कि प्रमादमोही तमसो भवतोऽज्ञानमेव च ॥१७ ।। तमस्प अधकारसे घेरा जाना । जो तमोगुणको अपने भदर ऊर्ध्व गच्छन्ति सत्त्वस्था मध्ये तिष्ठन्ति राजसाः। नही बढने देगा वह अधकारसे कैसे घेरा जायगा जधन्यगुणवृत्तिस्था अधो गच्छन्ति तामसाः ॥ १८ ॥ अन्धकारका प्रकाशवर्तुल को घेरनाा, प्रकाशवर्तुलका छोटा ( भ० गी० १४) होना मृत्यु है, इस विषयमे प्रथम सूक्तमे जो लिखा है वह कडवे, खट्टे, सारे, बहुत गरम, तीसे, रूखे और जलन पाठक इस स्थानपर पुन पढ़ें। उसको इस मन्त्रके साथ पैदा करनेवाले आहार राजम लोगोको भाने हैं और वे पढनेसे ही इस मंत्रका आगय ठीक प्रकार ध्यानम आ सकता दुःख, शोक और रोग उत्पन्न करनेवाले होते हैं ॥ प्रहरतक है। तमोगुणके वढनेसे मृत्युकी सभावना भी बढती है, इसी पदा हुभा, रसरहित, बदबूवाला, रातभरका वासी, जूठा लिये शास्त्रकारोने कहा है कि तमोगुणसे दूर रहना चाहिये। और भपविग्न भोजन तामस लोगोको प्रिय होता है । जो वाह्य कारणोसे मृत्यु होती है उसको भी हटाना चाहिये । ' रजोगुण रागरूप होनेसे तृष्णा और भासक्तिका मूल वे कारण निम्न लिखित मंत्रोमें गिनाये गए है- है । वह देहधारीको कर्मपाशमे बांधता है । तमोगुण अज्ञान- आरादराति निति परो ग्राहिं क्रव्यादः पिशाचान् । भूटक है । वह सब देहधारियोंको मोहमे ढालता है मौर रक्षो यत्सर्व दुर्भूतं तत्तम इवाप हन्मसि ( म० १२) , ?
(५४) अथवढका मुबोध अनुवाद 'दीर्घजीवन और आरोग्य' परि न्या पातु समानेभ्योऽभिचागतमबन्धुभ्यः । है, टन उमल होने है। हमले भी विघातक होते है अमानिर्भवामृतोऽनिजीवो मा ने हामिपुरग्सवः और इनके कारण विपत्ति और मृत्यु भी होती है। अतः गरीरम् ॥ (म० २६) अपने बन्यवांवोम एक विचार दाना चाहिये जिसन आयु बढ़ने में सहायता होगी ।। ये एक प्रकारक हमले हैं, इनसे ये मृत्यव एकगतं या नाष्ट्रा अतितार्याः । मुञ्चन्तु तस्मान्यां देवा अग्नेश्वानरादधि ॥ भिन्न दसरे प्रकारक भी हमले होते है वे (विषमेभ्यः (म० २७) अबन्धुभ्यः अभिचारः) अपनी सभ्यता विपरीत सभ्य- इन लोकांम मृत्युक विविध कारण बताये है, उनका तावाले गाने जो हमले होते है वे भी अकाल मृत्यु लाने- क्रमपूर्वक विवरण देखिये- वाले होते है, अतः इस प्रकारक गनु सदाके लिये दूर करने १. अराति-जो (राति ) परोपकार नहीं करना, चाहिये । कोई किसी ऊपर हमला न करे और सब मानन्द स्वार्थी जीवन व्यतीत करता है, उसको अराति कहने हैं । प्रसन्न रहते हुए मुससे रहें। कजग्न ही सराति है । जो सब भोग अपने लिये भोगता है १० शरीरं असवः मा हासिपुः- किमी अन्य वह मराति है, इस वृत्तिम माय क्षीण होती है। प्रकारसे होनेवाली अकाल मृत्यु भी न हो । कोई भी (अ- २ निर्जनि- [निर्जनिक विषयमे प्रथम सूतक विवरण मनिः) मरियल न हो, (अ-मृतः ) अकालम न मरे, में विनारम लिखा है ] इम दुर्गतिसे मायुप्यका अय और मब (अतिजीवः) अतिदी कालतक जीवित रहें। होता है। मनुप्यको मरियल न रहना, अकालम न मरना और अति- दीर्व ३ ग्राहि- ग्राही उन रोगोका नाम है जो दीर्घकाल- इसके नितीन विघ्न है जो ये है, एक मरियल होना, आयु प्राप्त करना ये तीन बाते साध्य करनी होती है। तक रोगीको पकडे रखते है । जो शीघ्र दूर नहीं होते । इन रोगाडिकोने क्षीण होना, दूसरा अकालसे तथा व्रणादिसे रांगांसे बचना चाहिये, क्योंकि इससे आय क्षीण होती है । ? ऋव्याद्-मांस खानेवाले । ये भी रोगकृमि होते पीडित होना और तीसरा अल्प आयु होना। मनुष्यका प्रयत्न इन विपत्तियोको हटाने के लिये होना चाहिये। हैलो गरीरका मांस खा जाते है और मनुष्यको कृा करने है । सिद्ध व्याघ्रादि पशु भी ऋव्याद कहे जाते हैं। नग्मांस- ११ एकगतं मृत्यवः- एक मी एक मृत्यु हैं। मृत्यु इतने भनक मनुष्य भी कन्याद कहे जाते हैं। इस प्रकार ऋव्याद अनेक प्रकारक है । इन सबको हटाना मनुष्यका कर्तव्य है । बहुत प्रकारक है। इन सबसे बचना चाहिये । दीर्घजीवन जीवनविद्या के नियमोक अनुकूल व्यवहार न करनेसे ये सब प्राप्त करनेवाले इनके काबू में न जाय । अपमृत्युएं होती है । जो महामृत्यु है वह दूर होगी परंतु ५ पिनाच-गरीरके रधिर और मामको खानेवाले रोग- हटेगी नहीं, अपमृत्युएं सौ हो, या अधिक हो, वे सब दर की जा सकती हैं। क्रिमी और पूर्वोक्त हिंसक प्राणी पिशाच है। इनसे भी बचना चाहिये। १२ नाष्ट्राः~जो अन्य नागक साधन है वे भी (अति- तार्याः) दूर करने योग्य है । जिस जिस कारणसे मनु- ६ रक्ष:- रक्षा करनेके वहानसे पास आत है और क्पटम मईच अपहरण करते हैं । ये गंगकमि भी है और प्यादि प्राणीका नाग होता है, बात होता है, ओणता होती क्पटम मबस्त्र अपहरण करते है । ये गेगकृमि भी है और है, अवनति होती है, उन्नति रुक जाती है वे सब कारण सामाजिक और राजकीय क्षेत्रमे अत्याचारी भत्रु भी इनमे हटाने अत्यत आवश्यक है। मंमिलित है। राजस गन्दसे इन सबका बोध होता है। ७ दुर्भूत- जो भी बुरा है वह सब दर करना चाहिये, करनेका नाम मुक्ति है । यह मुक्ति मनुष्य इसी लोकमे प्राप्त १३ तस्मात् मुञ्चतु- पूर्वान विपत्तियोसे बचाव रएक प्रकारकी बुराईको हाना चाहिंय । कर सक्ता है और यह प्राप्त करना मनुष्यका लावश्यक ८ तमः-- सनान, हीनना आदि सब तमोगुणके प्रकार कर्तन्य है । 'बश्वानर' की कृपासे यह मुक्ति प्राप्त हो सकती करने चाहिये । इमसे हरएक प्रकारको अवनति होती है है। वैश्वानर उसको कहते है कि, जो (विश्व) सब (नर) और अन्याय भी होनी है। मनुष्योंका एक अभेद्य संघ होता है। मानव संवको अपना २ अभिचार-(समानेभ्यः सबन्धुभ्य. अभि- ऐसा व्यवहार करना चाहिये कि जिससे सबका सुख बटे, चार.)भपने समान जो अपनी सभ्यतावाले अपने भाई सबकी उन्नति हो भौर कोई पीछे न रहे । संघटित प्रयत्नसे । - -- दीर्घायु (५५) -- सबका भला हो सकता है। संघटना माननी उत्सतिका मूल मर्यादाका निश्चय उन लोगो के लिये हो सकता है कि जिन्हो- मंत्र है। ने अपना जीवन पवित्र किया है, पापरहित किया है और इस प्रकार इन मंत्रोम मानवी विपत्तिके कारण बताये है पुण्य सचयसे युक्त किया है। इस प्रकार दीर्घजीवनके साथ भौर उनको दूर करनेके उपाय भी को है। पाठक इनका मनुष्यक पापपुण्यका सबध है । विठोष विचार करें। प्राणधारण इससे पूर्व बता दिया है कि वेदको तीन बांत लभीष्ट दीर्घायु प्राप्त करनेक लिये गरीरमे प्राण स्थिर रहने चाहिये। है- (1) एक (अ-मम्रिः) लोग मरियल न हों, हृष्टपुष्ट प्राण जबतक अशक्त अवस्थामें शरीरमे रहेगे तबतक दीर्घाय- नीरोग और सुदृट बनें, (२) दूसरे लोग (अ-मृतः) भमर की प्राप्ति असभव ही है, यह बात स्पष्ट करने के लिये कहते हैं- जीवनसे युक्त, अर्थात् अमृतरूपी सुखमय जीवनवाले बनें ते अखं आयुः पुनः आभरामि । (मं १) मौर (३) तीसरे मनुष्य (अतिजीवः) दीर्घजीवी वनें । वेदको अभीष्ट है कि मनुष्य समाज ऐसा बने, यही बात 'तेरी भायु और प्राणोको तेरे अन्दर में पुनः भर देता अन्य शब्दोसे निम्नलिखित मन्त्र भागामे कही है- है।' यह इसलिये कहा है कि पाठको के अन्दर यह विश्वास जमा रहे कि यदि किमीके प्राण अत्यन्त निर्बल हो गए हो, ते अच्छिद्यमाना जरदष्टि अस्तु । (मं. १) तो भी उनमे पुन बल भरा जा सकता है। इस कारण निर्बल द्राधीयः आयुः प्रतरं ते दधामि । (मं. २) बना हुमा मनुष्य हताश न होवे निरुत्साहित न हो, अपितु अयं जीवतु, मा मृत, इमं समीरयामि, उत्साह धारण करे कि मैं वेदको आज्ञाके अनुसार चलकर सर्वहाया इहास्तु । (७) फिर नवीन बल प्राप्त कर सकता है और अपने अन्दर प्राण 'तेरी अविच्छिन्न वृद्धावस्था होवे । दीर्घ आयु उत्कृष्टरूप- का जीवन पुनः संचारित कर सकता हूं। यह किस प्रकार से तेरे लिये धारण करता है। यह मनुष्य जीवित रहे, न मरे, माध्य किया जा सकता है, इसकी विधि यह है- इसको सचेत करता हु. यह पूर्ण आयुबाला होकर यहा रहे ।' वातात्ते प्राणमाविदं सूर्याचक्षुरहं तव । ये सब मंत्र भाग मनुग्यकी दीर्घ आयुके लिये सुयोग्य यत्ते मनस्त्वयि तद्धारयामि समाजकी रचना करने के सूचक है । दीर्घ आयु प्राप्त करनेके संवित्स्वाङ्गैर्वद जिहयालपन् । (म ३) लिये ब्यक्तिक संदरका तथा समाजके अन्दरका पाप कम होना चाहिये, इसकी सूचना देने के लिये कहा है- वायुसे प्राण, सूर्यसे चक्षु तेरे लिये प्राप्त करता हू, इस प्रकार तू सव मंगोंसे युक्त हो, मन भी तेरे अदर स्थापित अपसेध्य दुरितं धत्तमायुः । (म ७) करता हूं। तू जिह्वासे भाषण कर।' यहां जीवनका साधन 'पापको दूर करके दीर्घ भायुको धारण करो ।' यही बताया है। वायुसे प्राण प्राप्त होता है, सूर्यसे आंख प्राप्त दीर्घायु प्राप्त करनेका उपाय है । जबतक अदर पाप होगा, होती है । सूर्यदर्शन करनेमे नेत्रके बहुत दोष दूर होते हैं, नबतक भायु क्षीण ही होती जायगी । व्यक्तिका पाप व्यक्ति- सुबह-गाम प्रतिदिन टकटकी लगाकर सूर्यदर्शन करनेसे में होता है और संघका पाप सघमें होता है, इस पापसे जैसे कईयोके मांस सुधर गये हैं, और जिनके लिए ऐनकके विना व्यक्तिकी वैसे संघकी आयु क्षीण होती है । अत पापको पढना असंभव था वे उक्त उपायसे विना ऐनक पढने लगे दूर करना दीर्घायु प्राप्ति के लिये अत्यत आवश्यक है। जब है। इसी प्रकार जिनमे प्राण स्थानके रोग होते है, क्षय राज- पाप दूर होगा, तब मनुष्य सौ वर्षकी भायुके लिये योग्य यक्ष्मा आदि तथा रक्त स्थानके पाण्डुरोग आदि रोग हैं, होगा- उनको भी शुद्ध वायुके सेवनसे और योग्य प्राणायामादि जीवतां ज्योतिः अर्वाड अभ्येहि त्वा यौगिक उपायोले पुन आरोग्य प्राप्त हो सकता है । इसी शतशारदाय आहरामि । (म, २) प्रकार मृत्तिका, जल, अग्नि, सूर्यप्रकाश, वनस्पति, भौयधि, ते जीवातवे परिधि धामि । (म ९) चन्द्रप्रकाश, विद्युत आदिके योग्य सेवनसे और उत्तम प्रयो- 'जीवित लोगोकी ज्योतिके पास आ, तुझे सौ वर्षकी गसे पुनः उत्तम जीवनकी और दीर्घमायुकी प्राप्ति हो सकती दीर्घ आयुके लिये में धारण करता ह । तेरे लिये सौ वर्षकी है। दीर्घजीवन और आरोग्य प्राप्तिका अति संक्षेपसे यह आयुग्यकी अवधि निश्चित करता हूं।' यह सौ वर्षकी आयुष्य माधन है । मनुप्यके सव अंग, अवयव इद्रिया आदि मवका - ।
अथर्ववेदका सुबोध अनुवाद (५६) -- 'दीर्घजीवन और आरोग्य' . - सुधार इससे हो सकता है। यह उपाय विना मूल्य बहुत 'तेरे प्राण आयुष्य बढानेवाले जातवेद अग्निसे प्राप्त मंगाम मकता है और युक्तिपूर्वक करनेसे लाभ भी करता हू, जिसस तू अमर करता हू, जिसस तू अमर हो कर नहीं मरेगा, यह तेरा निश्चयन हो सकता है । यह 'निसर्गचिकि-सा' का मूलमंत्र अमरत्व प्राप्तिका कार्य सफल होवे।' जातवेद भप्निस दीर्घायु- है । यह उपाय किस रीतिसे करना चाहिये, इस विधयम की प्राप्तिका सभव इस मंत्रमें बताया है। अग्नि आयु देनेवाली निम्नलिग्नित मंत्र विशेष मननपूर्वक देसने योग्य है है, ज्ञान और धन देनेवाली है, जीवन देनेवाली है, भमरत्व अग्नि जातमिव प्राणेन त्वा संधमामि । (म ४) देनेवाली है । वेदमे अग्निदेवके ये कार्य है। भग्निसे ये गुण 'नवीन उत्पन्न हुए अग्निक समान प्राणसे तुझे बल देता किस रीतिसे प्राप्त करने होते है, इसका विचार पाठकोंको ह!' हवन कुण्टमे, चव्हमे या किसी अन्य स्थानपर अग्नि करना चाहिये । हमारे विचारसे भाग्नेयधर्म विशिष्ट सुवर्ण प्रदीप्त करनेके समय प्रारभम वहुत सावधानीसे अग्निको पारद आदि पदार्थों के प्रयोगोस तथा भल्लातक, केगर, चित्रक आदि वनस्पति भागोंसे मनुष्य नीरोगता और दीर्घायु प्राप्त बहुत वीरें हवा करनी पड़ती है और सहज जलने योग्य मुसी लकढी अग्निक साथ लगानी पड़ती है। अन्यथा अनिके कर सकता है । इसके अतिरिक्त 'भग्नि' शब्दका अर्थ जाठर बुझ जानेका भय रहता है । इसी प्रकार वीमार मनुष्यको अग्नि भी है और जिसके देहमे यह अग्नि उत्तम अवस्थामे भी सहज हजम होने योग्य अन्न देना चाहिये, प्राणायामादि रहती है उसको नीरोगता और दीर्घायुके प्राप्त होनेमें शंका योगसाधन भी थोटा थोटा करना चाहिये, औषध और ही नहीं है । तथा जिन औषधिप्रयोगोंसे जाठर अग्नि उत्तम पव्यका सेवन भी योग्य प्रमाणसे करना चाहिये। ऐसा न किया कार्य करनेवाली होती है वे सब चिकित्साके प्रयोग इसमें तो लाभक स्थानपर हानि होगी। इसलिये कहा है कि अग्नि संमिलित होते है। मुलगानेके समान प्राणकी गति गनैः शनैः बढानी चाहिये। जाठर अग्नि योगमावन, मोपधिग्मेवन तथा अन्य उपायोंसे भारोग्यवर्धन या दीर्घजीवन प्राप्त हो सकता है, परंतु सुयोग्य प्रमाणसे यह और सम ये इस जाठर अग्निके चार भेट है। इसका वैवक जाठर अग्नि चार प्रकारकी होती है। मन्ट, तीक्ष्ण, विषम मव करना चाहिये । शरीरमें भी यह जीवनाग्नि ही है । हव- ग्रन्थों में इस प्रकार वर्णन आता है- नकी अग्निके समान ही इसको गन. गन बढाना पटता है। क्योकि अन्य संपूर्ण साधनाके उपस्थित होनेपर भी इस मन्दस्तीक्ष्णोऽथ विषमः समश्चेति चतुर्विधः। नियम पालन न करनेपर लाभकी आशा करना व्यर्थ है। कफपित्तानिलाधिक्यात्तत्साम्याजाठरोऽनलः॥ परंतु इस रीतिसे जो लोग अपना लाम सिद्ध करने के लिये विपमो वातजारोगान्तीक्ष्णः पित्तनिमित्तकान् । सावन करेंगे, उनका निःसन्देह भला हो सकता है, मत. करोत्यग्निस्तथा मन्दो विकारान्कफसंभवान् । कहा है- समा समाग्नेरशिता मात्रा सम्यग्विपच्यते । कृणोमि ते प्राणापानी जरां मृत्यु दीर्घमायुः स्वल्पापि नैव मन्दाग्नेर्विपमाग्नेस्तु देहिनः ।। स्वस्ति । (मं ११) 'मैं तेरे प्राण और अपान सुदृढ करता हू, तेरा बुढापा, कदाचित्पच्यते सम्यकदाचिच्च न पच्यते । तेरी मृत्यु और तेरी दीर्घ भायुके विषयमे तेरा कल्याण हो तीदणाग्निरिति तं विद्यात्समाग्नि श्रेष्ठ उच्यते ॥ ऐसा प्रयंध करता ह ।' यदि कोई मनुष्य अपनी दीर्व भायु (मा० नि०) और उत्तम मारोग्यके लिये पूर्वोक्त प्रकार यत्न करेगा, तो 'विपम जोठर अन्नि वातरोगोकी निर्माण करती है, तीक्ष्ण नियमपूर्वक चलनेपर उसका अवश्य ही लाभ होगा। इस अग्नि पित्त रोग बढाती है, मन्दाग्नि कफविकार उत्पन्न करती मत्रमे यह विश्वास हरएकके मनमें उत्पन्न हो सकता है। है। समाग्नि उत्तम प्रमाणमे भक्षण किया हुभा भन्न योग्य नियमपूर्वक चलनेवाले की कभी अयोगति नहीं होगी । जात- रीतिसे पचन करती है। मन्दाग्नि, तीक्ष्णाग्नि अथवा विष- टस अग्नि दीर्घजीवन प्राप्त करनेके विषयमे निम्नलिखित माग्नि ये जाठर भग्निया ठीक नहीं। इनके कारण कभी पचन मन्नम कहा- होता है कभी नहीं अतः जो समाग्नि है वह सबसे श्रेष्ठ है। अग्नंटे प्राणममृतादायुप्मतो वन्वे जातवेदसः। अर्थात मारोग्य और दीर्घायु प्राप्त करनेके इच्छुक लोगोंको यह यथा न रिया अमृत. मजूरमस्तले कृणोमि समाग्नि भपनेमे स्थिर करनी चाहिये। इस भमिका स्थान तदुन समृध्यताम ॥ (मं १३) अपने देहसे देखिये- दीर्घायु (५७) तथा- - वामपा श्रितं नाभेः किञ्चित्सोमस्य मण्डलम् । ४पाचनः पचन करनेवाला। तन्मध्ये मण्डलं सौर्य तन्मध्येऽनिर्व्यवस्थितः॥ ५ आश्रयाशः, आशयाशा- पेटमें गये हुए भन्नको जरायुमात्रग्रच्छन्नः काचकोशस्थदीपवत् ॥ ( भा०) खानेवाला। ये जाठर अग्निके नाम कितने सार्थक है यह भी पाठक सूर्यो दिवि यथा तिष्ठन् तजोयुक्तर्गभस्तिभिः । यहाँ देख सकते हैं । यहाँ तक जाठर अग्निके गुणोंका वर्णन विशोषयति सर्वाणि पल्वलानि सरांसि च ॥ वैद्यक ग्रंथोमें है । अब अनिके गुण वैद्यशास्त्रसे क्या लिखे तद्वच्छरीरिणां भुक्तं ज्वलनेनाभिमाश्रितः। है सो देखते हैं- मयूखैः पच्यते क्षिप्रं नानाव्यञ्जनसंस्कृतम् ॥ (अग्नितापः) वातकफस्तब्धताशीतकम्पनः । स्थूलकायेपु सत्त्वेपु यवमात्रः प्रमाणतः । आमाशयकरः रक्तपित्तकोपनश्च॥ (राज. भा०) कृमिकीटपनङ्गेपु बालमानोऽवतिष्ठते ॥ ( रस० प्र०) 'मनिका ताप वात, कफ, स्तब्धता, शीत और कम्पको 'नाभिके वाम भागमे सोमका मण्डल है, मध्यमे सूर्य दूर करता है, रक्त और पित्तका प्रकोप करता है । आमाशय मण्डल है, उसके अन्दर मनि व्यवस्थासे रह रही है । जसे अर्थात् पेटको ठीक करता है।' यदि अग्नितापसे भी वात, गीगेमे दीप होता है ' इस अग्निको सम रसना मनुष्यका कफ और शीत सबधके रोगोमें लाभ होते है तो प्रतिदिन कार्य है, सब वैद्योंको भी यही कार्य करना चाहिये । इसी हवन करनेवाले लोग और हवनकी अग्निसे- शरीरको तपाने- प्रकार- 'जैन सूर्य भाकाशमे रहता हुमा अपनी किरणोसे वाले लोग कमसे कम इन रोगोसे तो बच सकते है । हव- सब स्थानोके जरको सुखाता है, उसीप्रकार यह जाठर अग्नि नसे यह एक लाभ वैद्यक ग्रंथोके प्रतिपादन द्वारा सिद्ध प्राणियोका भक्षण किया अन्न अपनी फिरणोसे पकाती है, हुमा है। अब औषधि उपायका विचार करते है- स्थूल देहवाले प्राणियोंमे यह जौके समान होती है और छोटे कृमियोंसे यह वालके समान सूक्ष्म प्रमाणमे रहती औषधिप्रयोग है।' इमीले सव अन्न पचता है, मारोग्य स्थिर रहता है दीर्व भायु प्राप्त करने के अनेक उपाय है, उनमे औष- और दीर्घजीवन प्राप्त होता है। जैसे सूर्य के सामने घने बादल धिका सेवन भी एक उपाय है। योग्य औषधिका सेवन भानेसे और मेघाच्छादित दिनोमें सौर शक्तिके न प्राप्त होनेके योग्य रीतिसे करनेसे रोग दूर होते हैं, नीरोगता बटती है कारण प्राणियोकी पाचनशक्ति कम होती है, बरसातमे इसी और दीर्घ आयु भी प्राप्त हो जाती है । इसलिये इस मूक्तमें कारण पाचनक्ति क्षीण होती है, इसी प्रकार प्राणियोके कहा है- अन्दरकी नाटर अग्निके प्रदीप्त स्थितिसे न रहनेपर पाचन इमां अमृतस्य श्नुष्टिं आरभस्व । (म. १) भक्ति कम होती है, अपचन होता है, रोग बढते है और हे मनुष्य तू इस अमृत रसका पान कर ।' अर्थात् जीवनकी मर्यादा क्षीण होजाती है । इस प्रकार जाठर मग्निके जो जीवनवर्धक हो उस औषधीका रस योग्य रीतिसे सेवन सम होने और विषम होनेसे प्राणियोकी जीवन मर्यादा कर । 'अमृत-श्नुष्टि' का अर्थ अमरत्व देनेवाला रसपान संबधित है। इसी कारण (मत्र १३ उमे) अग्निक लिए अर्थात् । ऐसे रसपानका सेवन करना चाहिये कि जो अमरपनको जाठर भग्निके लिए (आयुप्मत्) आयुवाला अर्थात् वायु बढानेवाला हो । अमरपनका अर्थ दीर्घ आरोग्य और रोगोसे बढानेवाला, (अमृनः) अमर, रोगादि कम करनेवाला, पूर्णतया दूर रहना है । जो औषधिरस इन गुणोकी वृद्धि करते (प्राणं) प्राणशक्ति-जीवनशक्ति बढानेवाला इत्यादि विशे- हैं उनका सेवन करना योग्य है । अतः कहा है- पण प्रयुक्त हुए है। इसके निम्नलिसित संस्कृत नाम भी शरीरस्थ जाठराग्निके विषयमे कैसे सगत होते हैं यह कृणोम्यस्मै भेषजं मृत्यो मा पुरुषं वधीः॥ (म ") देखिये इस मनुष्यके लिये रोगनिवृत्तिके उद्देश्यसे मै औषध १ तनू-न-पात्- गरीरको न गिरानेवाला, शरीरका बनाता हूं, हे मृत्यु ' अब इस पुरुपका वध न कर।' इस पतन न होने देनेवाला। मनसे स्पष्ट है कि पूर्वोक्त प्रकार विविध चिकित्साए करनेस २ पावकः-- पवित्रता करनेवाला। मनुष्य पूर्ण रोगमुक्त हो सकता है और उसका मृत्युभय दूर ३ हुतभुक, हव्यभुक्-~~ भन्न खानेवाला । हो जाता है। इसी विषयमें निम्नलिखित मन देखिये ८ [मभवं. भा ४ हिन्दी] - -- (५८) अथर्ववेदका सुयोध अनुवाद - 'पीजीयन और आरोग्य' जीवलां नधारिपां जीवन्लीमोषधीमहम् । इमक गुण ये:- 'म पुर, गीत, रग, पिन, पात, भय, वायमाणां सहमानां सहस्वतीमिह दार, घरका नाम करनेवाली, कप, यवानवानी, धाय मान- हुवे स्मा अरिएतातये ॥ (मं. ६) वाली, रमायनधर्मवाली और भूनगंग गर करनेवारी।। में इस रोगीको सुखका विस्तार करने के लिये जीयन जीवन्ती जानला स्वादः स्निग्धा दोपत्रयापहा । देनेवाली भौर कभी हानि न करनेवाली, रक्षा करनेवाली, रोग रसायना वलकरी चतुप्या प्राविणी लघुः। (भा. हटानेवाली भीर बल बढानेवाली जीवन्ती नामक औषधिको चक्षुप्या सर्वदोपनी जीवनी मधुग हिमा । ( अति स. १६) देता है।' इस मत्रमें जीवन्ती औषधिका उपयोग करने का विधान है। इस भोपधिका नाम जीवन्ती इसलिये है कि यह इस प्रकार इन जीवनी शॉपधिक गुण वैद्यकप्रथोम औपधि मनुष्यको दीर्घजीवन देती है। (प्रायमाणा) इसके विविध प्रयोग लिख भार मुयोग्य नराम द्वारा हम- रोगोसे बचाती है, आरोग्य देती है, (सहस्वती) यल देने- के सेवनविधिका ज्ञान हो साता। यह उत्तम भौषधिरे वाली है, मनुष्यको बलशाली करती है इतना ही नहीं, अपितु और भारोग्य, यर मार नायु नेपाली । इसी प्रकार (सहमाना ) विविध रोगोको परास्त करती है, अपने बल- निम्नलिखित मंत्र या देखने योग्य :- से क्षीणता आदिको हटाती है, इस प्रकार भनेक रीतियोसे शिवे ते स्तां धावापृथिवी अन्ननापे अभिश्रियो । (त्रायमाणा) मनुग्यकी रक्षा करती है। यह भौषधि गं ते सूर्य आतपतु शं वातो वातु ते हदे ॥ कभी फिग्मीकी हानि नही (न घारिपा) करती, सदा किसी न किसी रूपसे लाभ ही पहुचाती है । इस प्रकार इस जीव- शिवा अभि रक्षन्तु त्वापो दिव्याः पयस्वती ॥ (म १४) न्ती औषधिका वर्णन इस वेदमंत्रमें है। इस जीवन्ती औप- धिक विषयमें वैद्यक ग्रथोमें निम्नलिखित वात मिलती है- शिवास्ते सन्त्वोषधय उ स्याहार्यमधरस्या उत्तरां पृथिवीमाभ। इसके फूल अत्यंत मीठे होते है भत इसको 'जीवशाक' तत्र त्वादित्यौ रमतां सर्याचन्द्रमसावुभा ॥ कहते है । इसके मधुर भौर समधुर ये दो भेद है । मधुर (म. १") जीवन्तीसे त्रिदोष हटना है और अमधुर जीवन्तीसे पित्त दूर 'युलोक और पृथ्वीलोकके सय पदार्थ मेरा संताप न होता हे । मधुर जीवन्तीका रस मीठा, शीत वीर्य और परि- बढावे, इतना ही नहीं, ये तेरे लिये शोभा और ऐश्वर्य पाक भी मधुर होता है। इससे दृष्टिदोष दूर होते है और भी देवें । सूर्य तेरे लिये सुस देवे, वायु तुझे सुख देबे, प्राय सभी रोग दूर होते है । वा. सू अ. १५ मे (वरा जलसे तुझे भानन्द प्राप्त होगे, श्रीपधिया तेरा सुस अठा। ये शाकेपु जीवन्ती) शाकमे जीवन्ती श्रेष्ठ शाफ है ऐसा कहा औपधिया भूमिसे लायी गई है। सूर्य और चन्द्र नेरी रक्षा है । वैद्य शास्त्रमें 'जीवन्ती' के अर्थ गुळवेल (गुडूची) कर ।' इन मत्रोंमे कहा है कि जगन सय पदार्थ अर्थात हरीतकी, मेदा, काकोली, हरिणी, मधुवृक्ष, शमी, इतने हैं। सूर्य, चन्द्र, वायु, जल, भूमि, औषधि, तेज आदि अनन्त इसके नाम ‘जीवनी, जीवनीया, जीवा, जीवना, मंगल्य नाम- पदार्थ मनुष्यका सुस वहा । मनुष्यको शान्ति दें। मनुष्यका धेया, जीव्या, जीवदा, जीवदात्री, जीवभद्रा, भद्रा, मगल्या, सन्ताप बढानेवाले न हो । इसका तात्पर्य यह है कि ये सब यशस्या, जीवदृष्टा, पुत्रभद्रा, जीववृपा, सुसकरी, जीवपत्री, पदार्थ योग्य रीतिसे बर्ते जानेपर मनुष्यका सुस यढानेवाले जीवपुप्पी, ' संस्कृतमे और वैद्यक प्रयोमे है । इन नामोसे होते है। पदार्थों का उपयोग करनेको विधि वैद्यग्रथोमे भर्थात स्पष्ट हो जाता है कि यह वनस्पति जीवन देनेवाली है । अतः भायुर्वेदमे लिखी है। इसी सबधमे निम्नलिखित मन्त्र देखने इस विषयमे कहा है- योग्य है- जीवन्ती स्वर्णवर्णाभा सुराष्ट्रजा च । जीवनोद्योगाजीवन्ती नाम ॥ (मद. व १) अग्नेः शरीरमसि पारयिष्णु रक्षोहासि सपत्नहा। अथो अमीवचातन पुतुट्टर्नाम भेषजम् ।। ' इस जीवन्ती औपधीका सुवर्णके समान वर्ण है, यह (म. २८) (सौराष्ट्र) काठियावाडमें होती है । इससे दीर्घजीवन प्राप्त 'भग्निका शरीर रोगोंसे पार करनेवाला है, वह भग्निका होता है, इस कारण इसका नाम जीवन्ती है। गरीर राक्षसों (रोगजन्तुओं) का नाश करता है तथा भन्यान्य । - .
दीर्घायु (५१) हैं उनका मन है- शत्रुभोंको दूर करनेवाला है। इसी प्रकार यह आमाशय के करता है, वही उत्तम यश प्राप्त करता है। शरीरशुद्धि, सब दोपोको हटाता है। यह पुतुबु नामक भोपध है।' गरीरबलवर्धन और व्याधिप्रतिकार ये तीन भाग है जिन अग्निका यह वर्णन हरएकको ध्यानमे धारण करने योग्य है। भागोका विचार करनेसे पूर्ण चिकित्सा हो जाती है । 'पु- अग्नि रोगोसे पार करानेवाली है, जहां विविध रोग बढते है तु-द्रु' इस एक ही शब्दने वेदकी चिकित्साशैलीको उत्तम वहां अग्नि प्रदीप्त करनेसे रोगकी हवा वहांसे हट जाती है रीतिसे दर्शाया है। यह सर्वागपूर्ण चिकित्साकी पद्धति है। भौर वहां नीरोगता हो जाती है। इसलिये जिस ग्रामसे वेदने इस एक शब्दमें चिकित्साकी रीति कैसी उत्तम सांसर्गिक रोग बहुत फैलते है उस ग्राममे नाके नाके पर शैलीसे वतायी है यह देखिये । इस रीतिका अवलंबन करने- और गलीगलीमें वृहत् हवन किये जाय तो लाभकारी होगा। वाले वैद्य सुखका विस्तार करते हैं- भाजकल दूषित ग्रामो और स्थानोमे इसीलिये भाग जलाते हैं। मृडतं शर्म यच्छतम् । (मं. ७) अग्निको ‘रो-हा' अर्थात् राक्षस सहारक कहा है, 'सुखी करो और शान्ति प्रदान करो' पूर्वोक्त प्रकार यहां राक्षस, रक्षस् तथा रक्ष. गब्दका अर्थ रोगबीज है। । 'पवित्रता, वृद्धि और प्रगति' करनेसे सब लोग सुखी होगे रोगबीजोका नाग अग्नि करती है। भारोग्यके जो अन्यान्य और सबको शान्ति प्राप्त होगी इसमें संशय नहीं है । सुख, गत्रु भी नाग भग्निसे होता है। रोगकृमि भादि शान्ति और दीर्घ आयुष्य यही मनुष्यका प्राप्तव्य इस सब रोगबीजोका नाम राक्षस है। ये राक्षस- जगत्में है। इसीका स्पष्टीकरण करनेके लिये निम्नलिखित ये अनेपु विविध्यन्ति पात्रेपु पिवतो जनान् । (वा. यजु, १६६२) अरिष्टः सर्वाड्गः सुश्रुज्जरसा शतहायनः । 'जो अन्नो और पानपात्रो अर्थात् खानपानके पदार्थों से आत्मना भुजमश्नुताम् । (म.८) पेटमे जाकर विविध रोग उत्पन्न करते है।' यह वर्णन रोग इस रीतिसे सब भगो और अवयवोसे पूर्ण, अक्षीण बीजोंका है । रोगबीज अन्न और जल द्वारा पेटमें जाते है और अवयववाला, उत्तम ज्ञानी, वृद्धावस्थामे सौ वर्षतक जीवित रोग उत्पन्न करते है। इनके नाम रुद्र और रक्षस् आदि रहनेवाला होकर अपनी शक्तिसे सब भोग प्राप्त करनेवाला भनेक है । यहा भग्नि इन रोगबीजरूपी राक्षसोका नाश बने ।' अर्थात् यह मनुष्य अतिवृद्ध अवस्थातक जीवित रहे करनेवाला कहा है । इसी प्रकार अग्नि आमाशयके रोगोंको और उस वृद्ध अवस्थामे भी अपनी शक्तिसे और अपने प्रय- दूर करनेवाला (अमीवचातनः) है। इसका वर्णन इसी त्नसे अपने लिये भोग प्राप्त करे । परावलम्बी न बने, अन्त सूक्तकी व्याख्यामे इससे पूर्व बताया है । तक स्वावलम्बनशील रहे। इस स्थानपर वेदका भादर्श बताया है। केवल अतिवृद्ध होना वेदको अभीष्ट नहीं है, अग्नि यह एक 'पु-तु-द्रु' नामक औषध है। यह पुतुगु क्या है इसका विचार करना चाहिये। 'पु' का अर्थ परन्तु अतिवृद्ध होते हुए भी नीरोग और बलवान् बनना वेदका (पवने) 'पवित्र करना, मल दूर करना, शुद्ध करना' साध्य है। प्रत्येक अवयव सुदृढ बने, सब अवयत्र और इन्द्रिय ठीक अवस्थामे रहे, बल स्थिर रहे और यह सब होते है । 'तु' का अर्थ ' (वृद्धौ) वृद्धि, बढाना, सवर्धन होना' का अर्थ (गतौ) 'गति, प्रगति' आदि है। हुए मनुष्य वृद्ध बने यह वेदका आदर्श है। वेद कहता है कि अन्यान्य उपभोग भी मनुष्य लेते रहें, उत्तम कपडे पहने और जिससे 'पवित्रता, वृद्धि और प्रगति होती है ' उसको सुखसे रहें, इस विषयमे निम्नलिखित मत्र देखिये- पुतद्रु औषधि कहते हैं। चिकित्सामे क्या करना चाहिये इसका विधान इस शब्दमे हुमा है। वैद्य रोगीके शरीरसे यत्ते वासः परिधानं यां नीवि कृणुषे त्वम् । रोगको दूर करने के लिये तीन बाते करे- (१) पु-रोगीका शिवं ते तन्वे तत्कृण्मः संस्पर्शेऽदृक्षणमस्तु ते॥ शरीर पवित्र, शुद्ध और दोषरहित करे, (२) तु= शरीरकी (म० १६) वृद्धि करे, शरीरको पुष्ट करे, शरीर बलवान् करे और (३) 'जो तेरा भोढनेका वन तू कमरपर बाधता है वह द्रु शरीरकी नीरोग अवस्थामे प्रगति करे । ये तीन बातें कपडा तेरे शरीरको सुखदायक हो भौर वह स्पर्शके लिये मृद प्रत्येक चिकित्सकको करनी चाहिये तभी रोगोका प्रतिकार हो । ' खुरदरा न हो। इस मन्त्रका भाशय स्पष्ट तो यह होगा। चिकित्सा के ये तीन मुख्य कार्य है। जो इन कार्योंको दोसता है कि सुखस्पर्शवाले, सुदर मौर उत्तम कपडे मनुष्य है और 'द्र (६०) अथर्ववेदका सुवोध अनुवाद दीर्घजीवन और आगंग्य' काफी भादि अनेकानक पहनें और दारीरका सुस ले | इसी प्रकार हजामत बनवा- गांजा, भांग, अफीम, तमा, चा, कर मुसकी सुदरता बढाने विषयमें निम्नलिखित मन्त्र पदार्थ विषमय है, इनका परिपाक भी विपरूप है। ऐसे पदार्थ मनन करने योग्य है- खानेसे मनुष्यका स्वास्थ्य बिगड जाता है और मनुष्य यन्झुरण मर्चयता सुतेजसा चप्ता चपमि केशश्मश्रु। अल्पायु हो जाता है । अत मनुष्य विचार करे कि जो शुभं मुखं मा न आयुः प्रमोणः ॥ (म० १७) पदार्य में पाता और पीता हू, वे कैसे है, वे निर्विप हैं वा 'त नापित स्वच्छता करनेवाले तेजधारवाले छुरेसे जो बालो नहीं ? वे आरोग्यवर्धक और दीर्घायुकारक है वा नहीं ? ऐसा विचार करके मनुष्य अपने खानपानका प्रबन्ध करे। और मृछोका मुण्टन करता है, उससे मुस सुन्दर दीसता सुयोग्य पदार्य ही खानेपीनेम माने चाहिये परंतु मनुष्यको ह, परन्तु यह सुन्दरना किसीझी मायुका नाग न करे ।' उत्तम कभी उचित नहीं कि वह विनमय पदायाकी लालचम फंसे उन्नन हजामत बनाकर मुसकी सुन्दरता बढानेका उपदेश वेदमें इस प्रकार दिया है । हजामत बढनेसे मुख शोभाहीन और अपनी हानि करे । अतः मनुष्यको सदा उत्तम उपदेश होता है और हजामत बनानेसे वही मुस सुन्दर होता है, श्रवण करना चाहिये, अत. कहा है- यह कहनेका उद्देश यह है कि मनुष्य हजामत बनाव और उपदेशका कार्य अपने मुखकी सुन्दरता बढावें । कोई मनुष्य अपना गोमा अधि बृहि, मा रमथाः, सृजेमं तवैव सन्मर्च- हीन मुस न रखे। सब लोग सुन्दर, नीरोग, बलवान् , हाया इहास्तु । (मं ७) पूर्णायु और कर्तव्यतत्पर बने, यह वेढका उपदेश है। इसी उत्तम उपदेश कर, बुरा काम न कर, इस मनुष्यको प्रकार उत्तम भोःनक विषयमें भी बेदका उपदेश देखने जगन्में भेज, तेरे नियमानुकूल चलता हुआ यह मनुष्य योग्य है- पूर्णायु होकर यहा रहे ।' उपदेशक इस प्रकारका उपदेश शिवा ते वीडिवाववलासावदोमधी। जनताको दे और जनताको ऐसे मार्गसे चलावे कि सारे लोग एतो यमं वि बावते एतौ मुञ्चतो अंहसः ॥ उपदेश सुनकर बुरे कार्यसे हटे, जगत्मे जाते हुए धर्मनिय- (मं० १८) मानुकूल चल और नीरोग बलबान और पूर्णायु बने । तथा सय प्रकारकी उन्नति प्राप्त करें- चावल और जी कल्याणकारी हैं, कफ दोपको दूर करनेवाले और स्त्राहमें मधुर हैं। ये यक्ष्म रोगको दूर करें अस्मै अधिहि, इमं दयस्व, अयं इनः उत् पतु । (मं.८) और दोपान मुन् भोजनके विषयमें अनेक मंत्र इस मनुष्यको उत्तम उपदेश कर, इस पर दया कर बैटमे है, उनका इस समय विचार करनेकी सावश्यकना और इसको ऐसा मार्ग बता कि यह यहासे उन्नति करे, नहीं है । यहा स्वल यही बताना है कि, भोजनक विविध पदार्य मी घेटने दिये हैं अर्थात् जिस प्रकार वेद बल, वेही राष्टक लोगोपर उत्तम शुभ संस्कार डालें, उनको शुभ उच्च अवस्था प्राप्त करे।' यह उपदेगकोकी जिम्मेवारी है कि भागेग्य और दीप मायु देना चाहता है, उसी प्रकार सुंदर मार्ग बताव और उन्हें सीधे उन्नतिक पथपर ले भावे । बम लौर उनम भोजन देकर भी मनुन्यकी सुससमृद्धि जिस देगक और राष्टके उपदेशक इस रीतिले अपना ज्ञान बनाना चाहता है । यह मोलन निर्विष होनकी मृचना भी समय पर बेद देता है, पाठक इसको यहा देखें- कर्तव्य उत्तम रीतिसे करते हैं, वहाके लोग नीरोग, सुदृढ, दीर्वायु तथा परम पुरुषार्थी होते है। परमपुरुषार्थी यदनानि यन्पिवासि धान्यं कृप्याः पयः। मनुन्य अपनी मायुका योग्य उपयोग करे । मनुप्यकी भायुका यदायं यदनायं सर्व ने अन्नमविपं कृणामि ॥ उत्तरदातृत्व उसीके उपर है यह बात कोई न भूले । (म १९ १९) 'जो कृषिसे उत्पन्न होनेवाला धान्य त खाता है जो शतं ते युतं हायनान्द्वे युतं त्रीणि चन्वारि कृण्मः ॥ समयविभाग दुग्धादि पेय पदार्थ पीता है, याने योग्य और जो न खानेकी बीसको मैं निर्बिध बनाता ह' अर्थात् वह सय शरदे त्या हेमन्ताय बसन्ताय ग्रीष्माय परि दद्मसि । (मं. २१) खानगा पिप रदित हो । यहा विपने पचनेकी सावधानी चपाणि तुभ्यं स्योनानि येषु वर्धन्त ओपधीः । भारणबश उपदेश दिया है। ममुप्यन खानपानसे सघ, (मं. २२) करें। प्रचारका । ।
दौघायु (६१) अहे त्वा रात्रये चोभाभ्यां परि दद्मसि ॥(मे २०) है। इन समयविभागोक लिये मनुष्य सोपा हुभा होना 'मैं तेरी मौ वर्षकी आयु अखण्डित करता है, उसमे दो चाहिये । समयविभागके लिये मनुष्यका सोपा हुआ होना सधिकालके जोडे, सर्दी, गमी, वर्षा ये तीन काल और वाल्य, अर्थात् समयविभागके अनुसार मनुष्यको अपना व्यवहार तरुण, मध्यम और वार्धक्य ये चार अवस्थाए है। वसन्त, करना चाहिये । जो समयविभाग बनाया हो उसके अनुसार प्रीम और वर्षा, शरत्, हेमन्त आदि ऋतु तेरे लिये शुभ ही मनुष्यको अपना कामकाज करना चाहिये । इसीसे कारक हो । दिन और रात्री के समय के लिये मैं तुझे समर्पित बहुत कार्य होता है और उन्नतिका निश्चय भी हो जाता है। करता हूं।' अत. इन मत्रोक उपदेशसे मनुष्य यह बोध लेवे कि मनु- दीर्घ जीवनकी भायुप्यमर्यादा सौ वर्षकी है, उसमे सौ वर्ष, प्यको समयविभागके अनुसार कार्य करना चाहिये, व्यर्थ वर्षमें दो अयन, छः ऋतु और तीन काल अर्थात् सर्दी, गर्मी बेकारमें समय गंवाना उचित नहीं । अपने पास जो समय हो और वर्षा ये तीन समय होते है। प्रत्येक दिनमें दो संधि- उसका योग्य उपयोग करना चाहिये । समयका व्यय व्यर्थ काल और दिन तथा रात्रीका समय इतने समयविभाग होते नहीं होना चाहिये । - दीर्घायु कां. ७, सू. ५३ (ऋषि'- ब्रह्मा । देवता- भायु., वृहस्पतिः, अश्विनी च) अमुत्रभ्यादधि यद्यमस्य वृहस्पतेरभिशस्तेरमुञ्चः । प्रत्यौहतामश्विना मृत्युमस्मद्देवानामग्ने भिषजा शचीभिः सं कामतं मा जहीतं शरीरं प्राणापानौ ते सयुजाविह स्ताम् । शतं जीव शरदो वर्धमानोऽग्निष्ट गोषा अधिपा वसिष्ठः ॥ २॥ ) अर्थ- हे वृहस्पते । हे अग्ने । तू (यत् अमुत्र-भूयात् ) परलोकमे होनेवाले ( यमस्य अभिशस्तेः अमुञ्चः) यमकी यातनामोसे मुक्त करता है । हे (देवानां भिषजौ अश्विनौ ) देवोके वैद्य अश्विनी देवो । (शचीभिः मृत्यु अस्मत् प्रति औहतां ) शक्तियासे मृत्युको यमसे दूर करो ॥ १॥ हे प्राण और अपानो । (सं कामतां ) शरीरमे उत्तम प्रकार सचार करो। (शरीरं मा जहीतं) शरीरको मत छोडो । वे दोनो ( इह ते सयुजौ स्ताम् ) यहा तेरे सहचारी होकर रहें (वर्धमानः शारदः शतं जीव) बढता हुमा तू सौ वर्ष जीवित रह । (ते अधिपाः वसिष्ठः गोपाः अग्निः) तेरे अधिपति निवासक और रक्षक तेजस्वी देव हैं ॥२॥ - - भावार्थ- परलोकमे देहपातके पश्चात् जो दुःख होते है उनसे मनुष्यका बचाव होवे भौर मनुष्यकी शक्तियोकी उन्नति होकर उसका मृत्युले बचाव होवे ॥ १ ॥ मनुष्य के शरीरमे प्राण और सपान ठीक प्रकार सचार करते रहें। वे शरीरको शीघ्र न छोड दें। ये ही जीवके सहचारी दो मित्र है । मनुष्य बढता हुआ सौ वर्षतक जीवित रहे, मनुव्यका रक्षक, पालक, संवर्धक भौर यहाँका जीवन सुखमय करनेवाला एकमात्र परमेश्वर है ॥२॥ --
(२)
अथर्ववद्या सुबोध अनुवाद
'दीर्घजीपन और आरोग्य
आयुर्यत्त अनिहितं पराचैरानः प्राणः पुनरा तार्यिताम् ।
अग्निष्टदाहानिरुपस्थात्तदात्मनि पुनरा वैशयामि ते
मेमं प्राणो हासीन्मो अपानाविहाय पर्रा गात् ।
सप्तर्षिभ्य एनं परि ददामि त एनं स्वस्ति जरसै वहन्तु
॥४॥
प्रविशतं प्राणापानावनड़वाहाविव व्रजम् । अयं रिम्णः शेवधिररिष्ट इह वर्धताम्
आ ते प्राणं सुवामसि परा यक्ष्म सुवामि ते । आयुनों विश्वतों दधद्यमग्निवरेण्यः ॥६॥
उद्वय जर्मसस्परि रोहन्तो नाकमुत्तमम् । देवं देवत्रा सूर्यमर्गन्म ज्योतिरुत्तमम्
॥७॥
अर्थ-(ने यत् आयुः पराः अतिहितं) तेरी जो आयु विरुद्ध गतियोंसे घट गयी है, उस स्थानपर (नौ प्राणः
अपानः पुनः आ इतां) वे प्राण और अपान पुनः आवे । ( अग्निः निर्ऋतेः उपस्थात् तत् पुनः आहाः) वह तेज-
स्त्री देव दुर्गतिक समीपने पुन वापस लाना है ( ने आत्मनि तत् पुनः आवेशयामि ) तेरे अन्दर प्राणको पुन स्थापित
करता है॥३॥
(इमं प्राणः मा हासीत् ) इसको प्राण न छोडे और (अपानः अवहाय परा मा गात् उ ) भपान भी इसको
छोट कर दूर न जावे । (सप्तर्पिभ्यः एनं परिददामि ) सात ऋषियोंके हाथमे इसको देता हू, (ते एनं जरसे
स्वस्ति वहन्तु) वे इसको वृद्धावस्थातक सुखपूर्वक ले जावें ॥ ४ ॥
हे प्राण और अपान (बजं अनइवाही इव प्रविशतं ) जैसे गोशालामें बैल घुसते हैं, उस प्रकार तुम दोनों
गरीग्में प्रविष्ट होबो । (अयं जरिम्णः शेवधिः) यह वार्धक्यतककी पूर्ण भायुका खजाना है, यह (इह अरिष्टः
वर्षतां) यहां न घटता हुमा बढे ॥ ५॥
(ते प्राणं आ मुवामसि) तेरे प्राणको मैं प्रेरित करता । (ते यक्ष्मं परा सुवामि) तेरे अयरोगको मैं दूर
करता है । (अयं वरेण्यः अग्निः ) यह श्रेष्ट अग्नि (नः आयुः विश्वतः दधत्) हमारे अन्दर आयु सब प्रकारसे
धारण करे ॥१॥
(वयं तमसः परि उत्) हम अन्धकारक ऊपर चढ, वहांसे ( उत्तरं नाकं रोहन्तः) श्रेष्ट स्वर्गमें आरोहण
करते हुए (देवत्रा उत्तम ज्योतिः मूर्य अगन्म) मब देवोके रक्षक उत्तम तेजम्बी सर्य-सबके उत्पादक-देवको प्राप्त
-
हो ॥ ७ ॥
भावार्थ- जो आयु विरद्ध आचरणाके कारण घट जाती है, उसको प्राण और अपान पुन ले आवें और यहां स्थापित
करें। वही तेजस्त्री देव दुर्गतिरसे मायको वापस ले माने और हम मनुप्यक मन्दर सुरक्षित रखे ॥ ३ ॥
धम मनुष्यको प्राण और अपान न छोटें । सप्तर्पिन यने जो सप्त ज्ञानेद्रिये है, उनके हाथोंम डम जीवको सौप देते
है। वे इमको माँ वर्षको पूर्ण आयु प्रदान कर ॥
गरीरमें प्राण और अपान वेंगसे मचार करें और इस शरीरमें रसा हुक्षा दीर्घायुका सजाना वढावे ॥५॥
तेरे प्राणोंको प्रेरित करनेन तेरे रोग दूर होग और तेरी आयु वृद्धिगत होगी ॥ ६ ॥
हम अन्धकारको छोटकर प्रकागकी प्राप्तिके लिय ऊपर चढते है, ऊपर स्वर्गमें भारोहण करते हुए सबके रक्षक
जवी देवताको प्राप्त करते हैं ॥ ७ ॥
दीर्घायु (६३) । अश्विनी कुमार । दीर्घायु दीर्घ आयु कैसे प्राप्त हो? 'हे देवोके वैद्य ग्राण और सपानो । अपनी विविध इस मूनम दीर्घ आयु प्राप्त करनेका उपाय बताया है । शक्तियोगे मृत्युको हमसे दूर करो।' अर्थात् प्राण और अपान दीर्घ करानेवाले दो देव है, वे अपनी शक्तियोले ही इस देहस्थानीय सब अवयवो और अगोको चिकित्सा करते आयु मनुष्य- की मृत्युसे रक्षा करते हैं, ये दो देव अश्विनी देव है। चिनी है और उनको पूर्ण निर्दोष बनाते हुए मनुष्यको मृत्युसे बचाते देव कौन है और कहां रहते हैं, इसका विचार करके है। अतः मृत्युको दूर करने के लिये उनकी प्रार्थना यहा को निश्रय करना चाहिये। गई है। जो देव जिम वस्तुको देनेवाले है उनकी प्रार्थना उस वस्तुकी प्राप्तिके लिये करना योग्य ही है । इसी अर्थको देवोंके वैद्य मनमे धारण करके निम्नलिखित मन देखिये- ये देवों के दो वैद्य है, इस मंत्रमें भी (हे) प्राणापानौ ! सं कामत, शरीरं मा जहीतम् । इनको- (म. २) देवानां भिपजौ। ( म १) 'हे प्राण और अपानो शरीरमे उत्तम रीतिसे सचार करो देवोके दो वैद्य ये है ' ऐसा कहा है । यहा देव कौनमे और गरीरको मत छोडो ।' यहा अश्विनौ देवताके बदले है और उनकी चिकित्सा करनेवाले ये वैद्य कौनसे है, यह प्राणापानौ' गव्द ही है, और यह बताता है कि हमने जो एक विचारणीय प्रश्न है । इनके नामोंका मनन करनेसे एक अश्विनौका अर्थ 'प्राण और अपान' किया है वह ठीक ही नाम हमारे सन्मुख विशेष प्रामुख्यसे आता है, जो 'नास । ये प्राण और सपान शरीरमें उनम प्रकार संचार करे । त्यौ ' है । (नाल-त्यौ नासा-स्थौ ) नासिकामे रहने- शरीरको इनके उत्तम संचार के लिये योग्य बनाना नीरोग वाले । नासिका यह प्राणका स्थान है। प्राणके स्थानपर रहनेके लिये अत्यत आवश्यक है। शरीरको प्राणसंचारके रहनेवाले ये दो ' श्वास उच्छ्वास ' अथवा ' प्राण अपान योग्य बनानेके लिये योगशास्त्रमें कहे धौती, बस्ति, नेति ही है । प्राण और अपान ये दो देव इस शरीरमें रहकर आदि क्रियाए है। इनसे शरीर शुद्ध होता है, दोपरहित इस गरीरमे जो इद्रियस्थानों में अनेक देवगण है उनकी बनता है और प्राणसंचार द्वारा सर्वत्र आरोग्य स्थिर होता है। चिकित्सा करते हैं । प्राणसे पुष्टि प्राप्त होती है और अपानसे गरीरमे प्राणापानका यह महत्त्व है। इसीलिये कहा है कि- दोष दूर होते है । इस प्रकार दोष दूर करके पुष्टि देकर ये इह प्राणापानौ ते सयुजो स्ताम् । (म २) दो देव इन सब इंद्रियोंकी चिकित्सा करते है। यहा यह यहा प्राण और अपान ये दोनों तेरे सहचारी मित्र बन- अर्थ देसनेसे इनका 'नास-त्य नाम विलम्ल सार्थक कर रहे ।' तेरे विरोध करनेवाले न बने । सहचारी मित्र प्रतीत होता है। प्राण और अपानके भगक्त होनेपर अथवा सदा साथ रहते है और सदा हित करनेवाले होते है इस इनमेंसे किसीके भी अपने कार्य करनेमे असमर्थ होनेपर प्रकार ये प्राणापान मनुष्यक सहचारी मित्र हैं। मनुष्य इंद्रियगण भी अपना अपना कार्य करने में असमर्थ हो जाते इनको ऐसा समझे और उनकी मित्रता न छोडे । ऐसा कर- हैं। इतना इद्रियोके आरोग्यके साथ प्राणाके स्वास्थ्यका नेसे क्या होगा सो इसी मंत्रमे लिखा है- संबध है। अर्थात् वेटोंमें और पुराणोंमे 'देवोके वैन मश्विनी वर्धमानः शतं शरदः जीव । (मं २) कुमार' के नामसे जो प्रसिद्ध वैद्य है, वे मध्यात्मपक्षमे अपने 'वृद्धि और पुष्टिको प्राप्त होता हुआ तू सौ वर्ष जीवित देहमें प्राण और अपान है और येही इंद्रियरुपी देवोंकी रहेगा ' अर्थात् प्राण और अपानको अपने अन्दर उत्तम चिकित्सा करते हुए इस मनुष्यको दीर्घायु देते है। यदि अवस्थामे रखेगा तो त् पुष्ट और बलिष्ठ होकर सौ वर्षकी प्राणोंको कृपा न हुई तो कोई दूसरा उपाय ही नहीं है कि दीर्घायु प्राप्त कर सकेगा । दीर्घायु प्राप्त करनेका यह उपाय जिससे मनुष्य दीर्घायु प्राप्त कर सके। यह विचार ध्यानमे है, कि मनुष्य योगशास्त्रमे कहे गए उपायोका अवलंबन करके रखकर यदि पाठक निम्नलिखित मंत्र देखेंगे तो उनको उसका तथा प्राणायामका भभ्यास करके अपने शरीरमे प्राणापानीको ठीक भर्थ भ्यानमे भा सकता है, देखिये- बलवान् करके कार्यक्षम बनावे, जिससे मनुष्य दीर्घायु पा (हे) देवानां भिपजी भश्विनी ! सकता है । प्राण भपान ये ऐसे सहायक है कि ने दोपोसे शचीभि. मृत्यु अस्मत् प्रत्यौहताम् । (म १) घटी हुई भायुको भी पुन प्राप्त करा देते है, देखिये- - (३४) अथर्ववेदका सुबोध अनुबाट दीर्घजीवन और आरोग्य' -- यन ते आयुः पराचैः अनिहितं । 'यह दीर्घमायुका राजाना, न्यून न होता हुआ यहां बढे । प्राणः अपानः तो पुनः आ इनाम् ॥ (म.३) अर्थान यूक्ति प्रकार प्राणापान अपने अपने कार्य करनेमे 'जो नेरी मायु हीन दोषाक कारण वट गई है, वे प्राण समर्थ हो तो दीर्घायुका खजाना बढता जाता है । दीर्घायु और अपान, गुन उम म्यानपर आये और वे उस आयुको प्राप्त करनेका उपाय प्राणापानको बलवान् बनाना ही है । वहां पुन स्थापित । यह है प्राणापानका अधिकार, इसी विषयम और देखिये- मार नथवा नरण अबस्थामें कुछ अनियमक कारण यदि ने प्राणं आसुवामि, ते यदम परा सुवामि । (म.) कोई ऐस अयवहार हो गये हो और उस कारण यदि आयु 'प्राण तेरा जीवन बढाता हूं और अपानसे वेरा भय श्रीण हो गई हो नो युक्तिसे प्राण और अपान उस ढोघांको दूर करता हूं। दूर करता हूं।' प्राण अपने साथ जीवनी शक्ति लाता है घटा दने है और दीर्घ आयु प्राणोपासना करनेवाले मनुष्यको तथा गरीर जीवनमय करता है और अपान अपने साथ अर्पण करने है। इसलिये कहा है- गरीरंक अयको बाहर निकालता है, जिससे गरीर निर्दोष होता है । इस प्रकार ये दोनो गरीरको जीवनपूर्ण और निर्दोष इमं प्राणः मा हालीत बनाते हुए इसको दीवजीवन देते है । यही बात निम्नलिखित अपानः अवहाय मा पग गात ॥ (मं 2 मंत्रभागमें कही है- 'हमको प्राण न छोटे और अपान भी इसको छोटकर दुर वरेण्यः अग्निः नः आयुः विश्वतः दधत् । (मै ६) न जावं ।' क्योंकि यदि प्राण और अपान हम मनुष्यक 'प्राणसे उत्पन्न होनेवाली श्रेष्ठ अग्नि हमारी आयुको देदको लोटने लग जाए तो कोई भी दसरी शक्ति मनुष्यको सब प्रकारने धारण करे । यहा प्राणक साथ रहनेवाली आयु देनेम समर्थ नहीं हो सकती । इनके रहनेपर ही अन्य जीवनाग्नि अपेक्षित है। हम प्राणायाम करनेसे विशेष कर गनिया सहायक होती है। अन्य शक्तिया इस मंत्रमें सप्तर्षि भम्रा करनेसे शरीरमें अग्नि बढनेका अनुभव तत्काल आता नाममे दी गई है, जो इस देदमें रहकर मनुष्न्यकी सहायता है । इस मुम कही गई अनि इसी गरीरस्थानकी उष्णता करनी है- है । यहां बाह्य अग्नि अपेक्षित नहीं है- सप्तर्षिय पनं परिददामि अगले सप्तम मत्रमें कहा है कि हम अधकारसे दूर होकर त पनं स्वस्ति जग्से वहन्तु ।। (म. ४) उत्तम प्रकागमें आवें और मूर्यकी ज्योतिको प्राप्त हों । इस 'मैं हम मनुग्यको सप्त ऋषियोंको सौपता हूं, वे इसको मत्रमे जो यह बात कही है, मायुप्य बढानेकी दृष्टिसे इसकी बुढापेतक उत्तम कल्याणके मार्गस ले चले ।' ये सप्त ऋषि बडी आवश्यकता है । इससे निम्नलिखित बोध मिलता है- सप्त जानदिया, पच ज्ञानदिया और मन तथा बुद्धि है, १ वयं तमसः परि उत् रोहन्तः- हम अंधकारक इनर पियमें पूर्व स्थल में कई बार लिया जा चुका है। जब ऊपर चढें । अर्थात् अन्धकारके स्थानमें निवास करना मायुको माग और मपान उत्तम अवस्थाम रहते है, तब ये सातो घटानेवाला है, अतः हम अधकारके स्थानको छोडकर प्रकागमें इंद्रियां टनम अवस्थामें रहती है और मनुष्य दीर्घजीवन रहे सौर- प्राप्त करता है। ये प्राणापान शरीरमें यलबान रहने चाहिये। २ उत्तम नाक रोहन्तः- उत्तम सुसदायक प्रकाशपूर्ण इनर बन विषयमें निम्न मत्र देखिये- स्थानको प्राप्त करें क्योंकि प्रकाग ही जीवन देनेवाला और अनरवाही यज इव प्राणापानी प्रविगतम् । (मं ५) रोगादि टोयोंको दूर करनेवाला है इसलिये- मेयर गोगालाम येगमे प्रवेश करते हैं, वये प्राण देवोंक रक्षक उत्तम तेजस्वी सूर्यदेवको प्राप्त करें । सूर्यही सब ३ देवत्रा देव उत्तम ज्योतिः सूर्य अगन्म- सब अरान बैंगमे वर्गग्में प्रवेश कर ।' प्रागका अन्दर प्रवेश स्थावर जंगमका प्राप्य है अन प्राणरूपी सूर्यको प्राप्त वामे हो और मानना याहर निसरण भी देग माय करने के हो। उनमे नियंन्ता न रहे, यही तात्पर्य यहा है। अवास्न- कारण अवश्य दीवजीवी बने । रिग उनपर वायद इसका मतलब नहीं है। इस प्रकार दीर्घायु प्राप्त करनेकी इच्छा करनेवाले लोग सूर्य प्रकाग- मनमा धेग योग्य प्रमागम हो, तो यह वार्धक्यता मायुका दीर्घायु बनने दो टपाय इस सूक्तमें कहे हैं । एक प्राण वाले घरमें रहें और कमी अंधेरे कमरोमे न रहे । इस प्रकार मगना दी भरम्यान रदंगा हम विषय में मंत्र देनिय- और अपानको बलवान बनाना और सूर्य प्रकागको प्राप्त अप रिमाशंवधि. इह अरिष्टः पर्वनाम । (मं .) करना और भन्धेरे कमरोमें न रहना।
- नीर्घायुकी प्रार्थना (६५) मजा, धन और दीर्घायु कां. ७, सु. ३३ (अपिः- ब्रह्मा । देवता:- मरुत , पूषा, वृहस्पति., मतिः ।) मा सिञ्चन्तु मरुतः सं सं वृहस्पतिः। सं मायममिः सिंञ्चतु प्रजया च धनेन च दीर्घमायुः कृणोतु मे सं पूषा ॥ १॥ अर्थ- (मरुतः मा सं सिञ्चन्तु) मरुत मेरे ऊपर प्रजा और धनका सिचन करे । (पूपा बृहस्पतिः सं सं) पूषा और ब्रह्मणस्पति मेरे ऊपर उसीका उत्तम रीतिसे सिंचन करे। (अयं अग्निः प्रजया च धनेन च मा स सिञ्चतु) यह अग्नि मेरे ऊपर प्रजा और धनका उत्तम सिंचन करे और (मे आयुः दीर्घ कृणोतु) मेरी मायु दीर्घ करे ॥ १ ॥ देवताओकी सहायतासे मुझे उत्तम संतान, विपुल धन और दीर्घ भायु प्राप्त होवे । जिस प्रकार मेघसे पानी बरसता है, उस प्रकार मेरे ऊपर इनकी वृष्टि हो अर्थात् पर्याप्त प्रमाणमें ये मुझे प्राप्त हो । 'मरुत् ' वायु किवा प्राण है । शुद्ध वायुसे प्राण बलवान होता है और उससे नीरोगता और दीर्घायु प्राप्त हो सकती है। 'ब्रह्मणस्पति' को सहायतासे ज्ञान और 'पूषा' की सहायतासे पुष्टि प्राप्त होगी। इसी प्रकार अग्नि शुद्धता करती है इसलिये इससे पवित्रता प्राप्त होगी मौर इन सबसे प्रजा, धन और दीर्घ मायुकी वृद्धि होगी। . दीर्घायुकी प्रार्थना कां. ७, सू. ३२ (ऋषिः- ब्रह्मा । देवता- मायु.।) उप प्रियं पनिप्नतं युवानमाहुतीवृधम् । अर्गन्म विभ्रंतो नमो दीर्घमायुः कृणोतु मे ॥ १ ॥ अर्थ-(प्रियं पनिप्पतं) प्रिय, स्तुतिके योग्य, (युवानं आहुतीवृधं) तरुण और आहुतियोसे बढनेवाले भग्निके समीप (नमः विभ्रतः उप अगन्म) अन्न धारण करते हुए हम पहुचते है । वह (मे आयुः दीर्घ कृणोतु) मेरी भायु दीर्घ करे ॥१॥ प्रतिदिन घर घरमे प्रज्ज्वलित भग्निमें हवन करनेसे भौर उसमे हवनीय पदार्थोंको डालनेसे घरवालोकी भाय लम्बी होती है। ९ [अथर्व. भा. ४ हिन्दी] (६६) अथर्ववेदका सुबोध अगुपाद -वीर्घजीयन और आरोग्य दीर्घायुकी प्राप्ति का. ५, सू. ३० (प्रापिः- उम्मोचनः (भायुप्फामः) । देवराा- भायुतम् ।) आवतस्त आवतः परावतस्त आवतः । इहैव भव मा नु गा मा पूर्वान गाः पितॄनसँ वनामि ते दृढम् ॥ १ ॥ चत्वाभिचेरुः पुरुषः स्वो यदरणो जनः । उन्मोचनप्रमोचने उभे वाचा वदामि ते ॥ २॥ यहुद्रोहिथ शेपिपे स्त्रियै घुमे अचिंत्या | उन्मोचनप्रमोचने उभे वाचा वदामि ते ॥३॥ यदेनसो मातृकृताच्छेपे पितृछताच्च यत् । उन्मोचनप्रमोचने उभे वाचा वदामि ते ॥४॥ यत्त माता यत्तै पिता जामिर्धाता च सर्जतः । प्रत्यक्सैवस्त्र भेषजं जरदष्टिं कृणोमि त्वा ॥५॥ इहैधि पुरुप सर्वेण मनसा सह । दूतौ यमस्य मार्नु गा अधि जीवपुरा इहि ॥६॥ अर्थ-(ते आवतः आवतः) तेरे समीपसे समीप और (ते परावतः यावतः) नेरे दूरमे दूर गए हुए (ते असु दृढं वनामि) तेरे प्राणको मैं तेरे अन्दर दृढ यांधता हूं। ( इह एव भव ) यहीं रह । (पूर्वान मा नु गाः ) पूर्वजोके पीछे न जा, (मा पितॄन् अनु गाः) पितरोके पीछे न जा अर्थान शीघ्र न मर ॥ १ ॥ (यत् स्वः पुरुपः) यदि तेरा अपना संबंधी पुरुष अथवा ( यत् अरणः जनः) यदि कोई हीन मनुष्य (त्या अभिचेरुः ) तेरे ऊपर कुछ घातक प्रयोग करता है, तो उससे मैं (वाचा ते) अपनी वाणीमे तुझे (उन्मोचन-प्रमो- चने उभे वदामि ) छूटने और दूर रहनेकी विद्या कहता हूं ॥२॥ (यत् स्त्रियै पुंसे अचित्या दुद्रोहिथ) यदि स्त्रीसे अथवा पुरुषसे गिना जाने द्रोह किया है किंया (ोपिष) पाप दिया है, तो (वाचा०) वाणीसे छूटने और दूर रहनेकी दोनो विद्याएं मै तुझे कहता है ॥ ३ ॥ (यत् मातृकृतात् एनसः) यदि माताके किये हुए पापसे अथवा ( यत् पितृकृतात् च ) यदि पिताके किये पापसे (शेपे)तू सोया है ( वाचा० ) तो वाणीसे छूटने और दूर रहनेकी दोनो तरहकी विद्याएं तुझे कहता हू ॥ ४ ॥ ( यत् ते माता ) जो तेरी माता व (यत् ते पिता) जो तेरे पिताने तथा (जामिः भ्राना च सर्जतः ) जो तेरी बहिन और भाईने तैयार किया है; (भेपज प्रत्यक् सेवस्व ) उस भोपधको ठीक प्रकार सेवन कर, (त्वा जरदर्षि कृणोमि ) वृद्ध मै तुझको अवस्थातक रहनेवाला करता हू॥५॥ हे (पुरुप) मनुष्य ! (सर्वेण मनसा सह इह एधि ) संपूर्ण मनके साथ यहां रह । ( यमस्य दुतौ मा अनु गाः) यमके दूतोके पीछे मत जा । (जीवपुराः अधि इहि ) जीवकी पुरीमे निवास कर ॥ ६ ॥ भावार्थ- हे रोगी । तेरे प्राणको मैं दृरके अथवा समीपके उपायसे तेरे अन्दर स्थिर करता हू । त् इस मनुष्य लोकम दीर्घकाल तक रह । मरे हुए पूर्वजोके पीछे शीघ्र न जा ॥१॥ तेरा अपना सबंधी अथवा कोई पराया मनुष्य जो कुछ भी घातक प्रयोग करता है, उससे बचने के दो उपाय एक उन्मोचन और दूसरा प्रमोचन ॥२॥ स्त्रीका अथवा पुरुषका द्रोह, माताका पाप और पिताका पाप भादिके कारण जो घात होता है उससे बचने के लिये भी वे ही दो उपाय है ॥३-४ ॥ माता, पिता, भाई, बहिन भादिकों द्वारा तैयार किया हुभा औपध रोगी सेवन करे और दीर्घजीवी बने ॥५॥ अपने मनकी संपूर्णशक्ति रोगनिवृत्तिमें ही विश्वाससे लगाई जावे । कोई मनुष्य यमदूतोके वशमें न जावे भौर इस शरीरमें- अर्थात् जीवास्माकी नगरीमें-दीर्घकाल तक रहे ॥ ६ ॥ ह दीर्घायुको प्राति (६७) अस्तु मृत्यवे नमः अनुहूतः पुनरेहि विद्वानुदयनं पृथः । आरोहणमाक्रमणं जीवतोजीवतोऽयनम् |॥ ७॥ मा बिभेन मरिष्यसि जरदष्टिं कृणोमि त्वा । निरवोचमुहं यक्ष्ममङ्गेभ्यो अङ्गज्वरं तव ॥८॥ अगभेदो अङ्गज्वरो यश्च ते हृदयामयः । यक्ष्मः श्येन ईव प्राप्तद्वाचा साढः परस्तराम् ॥ ९ ॥ ऋषी बोधप्रतीवोधावस्वमो यश्च जाविः। तौ ते प्राणस्य गोप्तारौ दिवा नक्तं च जागृताम् ॥१०॥ अयमग्निरुपसर्च इह सूर्य उदैतु ते । उदैहि मृत्योर्गम्भीरात्कृष्णाच्चित्तम॑सस्परि ॥११॥ नमो यमाय नौ । पितृभ्य उत ये नयन्ति उत्पारणस्य यो वेद तमग्निं परो दधेऽस्मा अरिष्टतातये ॥ १२ ॥ अर्थ-( उदयनं पथः विद्वान् ) ऊपर चढनेके मार्गको जानता हुभा (अनुहतः पुनः आ इहि ) बुलाया हुभा फिर यहा आ। (जीवतः जीवतः आरोहणं आक्रमणं अयनं) प्रत्येक जीवित मनुष्यकी चढना और आक्रमण करना ये दो गतियां है ।। ७ ।। (मा विभेः न मरिष्यसि ) मत सर, तू कभी नहीं मरेगा (जरदष्टिं त्वा कृणोमि ) वृद्धावस्थातक रहनेवाला तुझे मैं बनाता हूं। (तव अहेभ्यः अहज्वरं यक्ष्म अहं निरवोचं) तेरे भगोंसे शरीरके ज्वरको भौर क्षयरोगको मैं बाहर निकाल देता हूं ॥ ८ ॥ (अङ्गभेदः अङ्गज्वरः) अवयवोकी पीडा, भगोंका ज्वर ( यः च ते हृदयामयः) और जो तेरा हृदयरोग है (वाचा साढः यक्ष्मः) वचासे पराजित हुआ यक्ष्मरोग ( श्येन इव परस्तरां प्रापत्तत् ) श्येनपक्षीकी तरह परे भाग जावे ॥९॥ - (योधप्रतियोघो ऋपी) पोध और प्रतिबोध ये दो ऋपि है। (अस्वप्नः य च जागृविः) एक निद्रारहित है भौर दूसरा जागता है । (तो ते प्राणस्य गोतारौ) वे दोनों तेरे प्राणके रक्षक है, वे तेरे मन्दर (दिवा नक्तं च जागृतां) दिन रात जागते रहें ॥ १० ॥ (अयं अग्निः उपसद्यः) यह अग्नि उपासनाके योग्य है । (इह ते सूर्यः उदेतु) यहां तेरे लिये सूर्य उदय होवे । (गंभीरात् कृष्णात् तमसः मृत्योः चित् ) गहरे काले भन्भकाररूपी मृत्युसे भी (परि उदेहि ) परे उदय- को प्राप्त हो ॥ ११ ॥ (यमाय नमः ) यमके लिये नमस्कार है । (मृत्यवे नमः अस्तु) मृत्युके लिये नमस्कार होवे । (उत ये नयन्ति, पितृभ्यः नमः ) जो हमे ले जाते हैं, उन पितरोंके लिये नमस्कार है। (यः उत्पारणस्य वेद ) जो पार कराना जानता है (तं आग्निं अस्मै अरिष्ट- तातये पुरः दघे ) उस भग्निको इस कल्याणवृष्टिके लिये भागे धर देते है॥१२॥ भावार्थ- उन्नतिका मार्ग जानना चाहिये । अर्थात् मनुष्य भारोग्यकी उमति करनेके उपाय जाने और रोगोंपर भाक्रमण करके उनको परास्त करे ॥ ७ ॥ हे रोगी! तू मत डर, तू मरेगा नहीं । तेरी पूर्ण भायु करता हूं। तेरे संपूर्ण अवयवोंसे ज्वर और क्षय दूर करता हूं॥८॥ शरीरका दुखना, भगोका ज्वर, हृदयरोग और क्षयरोग ये सब तेरे शरीरसे दूर हो ॥ ९ ॥ तेरे अन्दर बोध और प्रतिवोध ये दो ऋषि है । एक सुस्ती भाने नहीं देता और दूसरा हमेशा जागता रहता है। ये तेरे पाणके रक्षक है, ये दिनरात जागते रहें ॥ १० ॥ यहा प्राणाग्निकी तुझे उपासना करनी चाहिये । इससे तेरे मन्दर भास्मारूपी सूर्य-प्रकाशित होगा। ऐसा करनेसे गृढ भन्धकाररूपी मृत्युसे तू दूर होगा और अपने प्रकाशसे प्रकाशित होगा ।। ११ ॥ यम और मृत्यु के लिये नमस्कार है, तथा जो मृत्युके पश्चात् ले जाते हैं उन पितरोके लिये भी नमस्कार है। मृत्युसे पार होनेकी विद्या जो जानता है उस भग्निसे कल्याण प्राप्त करते हैं ॥ १२ ॥ .
(६८)
अथर्ववेदशा सुबोध अनुबाद -
'दीर्घर्जापन और आरोग्य
एतुं प्राण एतु मन ऐतु चक्षुरथो बलम् । शरीरमस्य सं विदा तत्पया प्रति तिष्ठतु |॥ १३॥
प्राणेनान चक्षुषा सं जेमं सीरय तन्त्राई सं चलेन ।
बेन्थामृतस्य मा नु गान्मा नु शूमिगृहो वत्
1॥१४॥
मा ते प्राण उप दसन्मो अपानोऽपि धायि ते । सूर्यस्त्वाधिपतिभृत्योदायच्छतु रश्मिमिः ॥१५॥
इयमन्तर्वदति जिह्वा बद्धा पनिष्पदा । त्वया यक्ष्म निरवाचं शतं रोपीश्च तक्मनः ॥ १६॥
अयं लोका प्रियतमा देवानामपराजितः । यस्मै त्वमिह मृत्यवे दिष्टः पुरुष जन्निपे ।
स च त्या हयामसि मा पुरा जरसौ मृथाः
॥ १७॥
-
-
अर्थ- (प्राणः आ पतु ) प्राण भावे, (मनः आ एतु) मन भावे, (चक्षः अथो बलं ) भास और बल
माये । (अस्य शरीरं विदां सं पेतु) इसका गरीर बुद्धिके अनुसार चले । (तत् पद्यां प्रति तिष्टतु) वह
पावान प्रतिष्ठाको प्राप्त होवे ॥१३॥
हे अनं । (प्राणेन चक्षुपा संसृज) प्राण और चक्षुसे संयुक्त कर । ( नन्वा बलेन इमं सं सं ईरय ) शरीर
और बलप उनको प्रेरिन कर । (अमृतस्य चेन्थ) तू अमृतको जानता है । ( मा नु गात्) तेरा प्राण न जाधे ।
(भूमिगृहः मा नु भुवत् ) भूमिको घर करनेवाला न हो लर्यात् मरकर मिट्टी न मिल ॥ १४ ॥
(ने प्राणः मा उपदसत् ) तेरा प्राण नष्ट न होवे । (ते अपानः मो अपि धायि) तेरा अपान माच्छादित न
हो। ( अधिपतिः सूर्यः रश्मिभिः त्वा उदायच्छतु ) अधिपति सूर्य किरणास नुमे ऊपर उठावे ॥ १५ ॥
(पनिप्पदा इयं अन्तः बद्धा जिता) गन्ध बोलनेवाली यह अंदर बंधी हुई जिला (वदति) बोलती है । (त्वया
यम) ने साथ रहनेवाला क्षयरोग और (नक्मनः च शतं रोपीः) ज्वरकी मौ प्रकारकी पीढा (निः अवोचं)
दर करता ॥१६॥
( अयं अपगजितः लोक देवानां प्रियनमः ) यह पराजित न हुभा हुमा लोक देवीका प्यारा है । ( यस्मै
मृत्य दिष्टः पुम्पः त्वं इह जछिये ) जिम लोकको मृत्युको निश्चित प्राप्त होनेवाला तू पुस्प यहा उत्पन्न होता है। (सः
च न्या अनुयामसि) उसे और तुझे हम बुलाते है और कहते हैं कि (जरसः पुरा मा मृथाः ) बुढापेसे पूर्व मत
भावार्थ- प्राण, मन, चक्षु, बल ये मत्र अक्तियां गरीरमें फिरसे निवास कर लौर यह शरीर अपने पांवसे वडा रह
मर ॥१३॥
यह ग्राण और बलुकी शक्तियोसे युक्त हो । शरीरक वलसे यह प्रेरित होवे । अमृत प्राप्तिका उपाय जान और उससे
तंग ग्राण जीवन चल जावे ॥१८॥
नेग प्राण और अपान ने गरीरमं दृढतासे रहे । सूर्य अपनी किरणोंसे तुझे उपर उठावे अर्थात् जीवन देवे । १५ ।
अपनी बारात्रि में कहना कि अय, ज्वर तथा अन्य पीढाए इस प्रकार दर की जाती हैं ।। १६ ॥
न देवोगा गिय है, यद्यपि तु इस मृत्युलोकमे जन्म लेनेके कारण मरनेवाला है, तथापि हम यह ही- कहते हैं कि, ६
वृद्धानन्यारे पूर्व न मर ॥ १७ ॥
दीवायुषी प्राप्ति (६९) १ पडा दीर्घायुकी प्राति आरोग्य युक्त दीर्घ आयु बीज प्रविष्ट होते है और वे रोगवीज उसी कारण वहां स्थिर होते है। इस सूक्तमे भारोग्यपूर्ण दीर्घ आयु प्राप्त करनेके बहुतसे निर्देश हैं । यहां दीर्घायुके विषयमें आत्मविश्वासका विशेष मातापिताका पाप महत्व है, इस विषयमें प्रथम मंत्रका निर्देश देखने योग्य है- माता पिताके पापाचरणसे भी रोग होते है यह बात चतुर्थ मंत्र में कही है- आत्मविश्वाससे दीर्घायु मातृकृतात् पितृकृतात् च एनसः शेपे ।। (मं. ४) इह एव भव, पूर्वान् पितृन् मा अनुगाः । माता भौर पिताक किये पापाचरणसे तू बीमार होकर ते असु दृढं वनामि । (म १) इस मन्त्र भागमें स्पष्ट कहा है कि बीमारीका यहां अर्थात् इस शरीरमे रह, प्राचीन पूर्वजोके पीछे एक हेतु मातापिताके पापाचरण भी है । मातापिताके पापी मत जा अर्थात् शीघ्र न मर । तेरे शरीरमे प्राणोको दृढताले आचारव्यवहारके कारण जन्मतः ही लडकेका गरीर निर्वल बांधता हूं।' ये मंत्र स्पष्ट शब्दो द्वारा बता रहे है कि होता है और बालक जन्मसे ही बीमारियोका घर बन जाता आत्मविश्वाससे दीर्घायु प्राप्त करनेमे सहायता होती है । 'तू है। गृहस्थधर्ममे रहनेवाले लोग इस मत्रका अवश्य विचार मत मर' यह उसीको कहा जा सकता है, कि शीघ्र या देरी- करें, क्योकि यदि वे कुछ भी पाप करेंगे, तो वे अपने वंशको से मरना जिसके आधीन हो । यदि मनुष्यके आधीन यह दुःखमे डालनेके दोषी हो सकते है। इससे पता चलता है बात न हो, तो ' इस समय न मर, वृद्धावस्थाके पश्चात् मर' कि, व्यभिचार, मद्यपान आदि दुष्ट व्यसनोमे फंसे हुए लोग इत्यादि माज्ञाय व्यर्थ होंगी। ये भाज्ञाएं कंठरवसे कह रही है, न केवल स्वय दुःख भोगते है, प्रत्युत अपने वशंजोको भी कि मृत्युका शीघ्र या देरीसे प्राप्त होना मनुष्यकी इच्छा शक्ति- बीमारियोके महासागरम डाल देते है । वेदने यह मन कह पर अवलंबित है। मैं शीघ्र नहीं मरूंगा, मै दीर्घायु होऊगा, कर जनताके रतास्थ्यके विषयमे वडा उत्तम उपदेश दिया है। मैं अपनी भायु धर्म कार्यमे समर्पित करूंगा' इस प्रकारकी मन, पंचम मनसे कहा है कि- की सुदृढ भावनाके रहनेपर सहसा अल्प आयुमे मृत्यु न होगी, भेपज सेवस्व । त्वा जरदष्टिं कृणोमि । (म. ७) परंतु यदि कोई विश्वकी क्षणभगुरताका ही ध्यान करेगा, तो 'योग्य औषधिका सेवन कर, इतना पथ्य करेगा तो मैं वह स्वय क्षणभंगुर बनेगा । आत्मविश्वास यह अन्य दीर्घायु- तुझे दीर्घायुवाला बनाऊगा।' सदेह मत कर, तू पथ्य पालन प्राप्तिके अनुष्ठानकी बुनियाद है। अन्य अनुष्ठान तब सिद्ध हो करनेसे अवश्य दीर्घायुवाला हो जायगा । सकते है, जब कि यह बुनियाद ठीक सुदृढ हुई हो । मानसशक्ति द्वितीय मंत्रमे कहा है कि उन्मोचन और प्रमोचन पष्ट मत्रमे मनकी शक्तिका वर्णन किया है जो विशेष ये दो उपाय है जिनसे नीरोगता और दीर्घायु सिद्ध हो सकती महत्त्वका है- है। ये विधि क्या है, खोज करनी चाहिये । इनमेसे एक पुरुप ' सर्वेण मनसा सह इह पधि । विधि भारोग्य बढानेवाला और दूसरा अकालमृत्यु हरण यमस्य दूतो मा अनुगाः । जीवपुरा अघि इहि ।। (म ६) 'हे मनुष्य अपनी सब मानसिक शक्ति के साथ तू ग्रहा ऋविचारसे अनारोग्य रह । यमके दूतोके पीछे न जा । जीवोकी पुरियो में अर्थात तृतीय मंत्रमें स्त्री पुरुषोको शाप देना, गालिया देना, शरीरमे यहां स्थिर रह । भथवा दुरे गब्द प्रयुक्त करना बुरा है ऐसा कहा है । किसीके इस मंत्रका सबध पहिले मनके कथनके साथ बहुत ही साथ द्रोह करना भी घातक है। बुरे शब्द बोलनेसे प्रथम पनिष्ट है। अपनी सब मानसिक शक्ति के साथ इच्छापूर्वक अपना मन बुरे विचारोंसे भर जाता है और जो वैसे हीन 'मै दीर्घायु बन्गा' ऐसा मनमे निश्चय करना चाहिये। विचारके शब्द सुनते है उनमें वैसे ही हीन भाव जम जाते मनकी शक्ति विलक्षण है, मनकी शक्ति जितनी प्रयल होगी हैं। इस प्रकार मनका स्वास्थ्य बिगढने के लिये ये बुरे शब्द उतनी निश्चयसे सिद्धि हो सकती है। मनकी कल्पनासे रोगी कारण होते है । मनका स्वास्थ्य बिगडनेसे ही शरीरमे रोग मनुष्य नीरोग भौर नीरोग मनुष्य रोगी बनता है। बलयान् करनेवाला है। ।
प्राप्त (७०) अथर्ववेदफा सुबोध अनुवाद -'दीर्घजीवन और आरोग्य' निर्बल होता है और निर्बल भी सवलंक समान कार्य करनेमें रहनेने ही मनुष्य नीरोग, स्वस्थ और दीर्घायु हो सकता है । समर्थ हो जाता है। मनकी यह विलक्षण गति हानेक कारण ज्ञान विज्ञानग उसको यहांका व्यवहार किस प्रकार करना हरएक मनुष्यको उचित है कि वह अपने मनमें सुविचारो- चाहिये इसका ज्ञान हो सकता है। ठीक व्यवहार करके यह को वारण करता हुआ नीरोगता पूर्वक दीर्घायु प्राप्त करे। मनन्य अपना स्वास्थ्य उत्तम ग्ग्य कर दीर्वायु हो सकता है। हीन विचार मनमें न आने दे। क्योंकि हीन विचाने मनुष्य व्यक्ति और समाजमें ये बोध और प्रतियोध अथवा ज्ञान और क्षीणायु हो जाता है। मरनेके विचार कमी मनम न आने दे। विज्ञान जागते रहे । जब तक ये दोनो जागत रहेंगे तभीतक पूर्ण स्वास्थ्यक विचार ही मन में स्थिर किये जायें। राष्ट्रकी उन्नति होगी । इमलिये कहा है- उन्नतिका मागे गम्भीरात् कृष्णात् तमसः परि उदहि ॥ (मं. ११) अपनी उन्नतिका मार्ग कौनसा है, इसका ज्ञान श्रेष्ट मनुप्यो 'गहरे काले अन्धकाररूपी मृत्युसे ऊपर उठ' भर्थात से करें और तदनुसार आचरण करें। आरोग्य प्राप्तिके मृत्युक अधकारमें न फंस, सदा जीवन के प्रकागमें ही रह । मार्गका नाम 'उदयनं पथः ' है, अर्थात उच्चतर अवस्था यहां पूर्वोत दो ऋपियोकी सहायतास मृत्युसे बचनेका टप- प्राप्त करनेका यह राजमार्ग है । इस परसे ‘आरोहणं देश है, क्योंकि वे ही मृत्युको दूर कर दीर्घ जीवन देनेवाले है। आक्रमणं' अर्थात्, इस आरोग्य मार्ग पर माना और उस- मृत्युको दूर करना परसे चलना मनुष्यक लिये लाभदायक है- यहा एक बात लध्यमें रसने योग्य कही है वह यह है कि उदयनं पथ. विद्वान ऐहि । आरोहण आक्रमण जीवतः अयनम् ॥ (म ७) मृत्यु अन्धकार है' और 'जीवन प्रकाशमय है।' यह 'उन्नतिके मार्गको जान कर ही हम ससारमें रह । हम अनुभव सत्य है। जीवित मनुष्यका प्रकारावर्तुल आकागभरमें मार्गपर माना और इसी मार्गपरस चलना जीवित मनुष्यके छोटा छोटा होता जाता है। जब यह प्रकाश वर्नुल अंगुष्ट मात्र व्यापक होता है, यह प्रकागवर्तुल मरनेके समय शनै.गनैः लिय हितकारक है।' इमलिये हरएक मनुष्यको उचित है कि वह अपने आरोग्य बढानेके टपार्योको जाने और उन- रह जाता है उस समय मनुष्य मर जाता है। मरनेवाले का आचरण करके अपनी और मारोग्य बढावे । इस मायु मनुष्यको मरने के कुछ वण्टे पूर्व ऐसा अनुभव होता है कि प्रकार करनेम क्तिने लाम हो सकते है, इसका वर्णन अष्टम और बाहर अन्धकार है । मृत्युका छाया रूपमें वर्णन किया जगतके अंदर व्यापनेवाला प्रकार अब घरमें ही रह गया है मंत्रमें किया है। मा विभेः । न मरिप्यसि । त्वा जग्दष्टिं कृणोमि ॥ है इसका कारण यह है । यह कविकल्पना नहीं है अपितु सत्य (मं.) बात है । अपने आपको अन्धेरेसे वेष्टित होने न देना भाव- यदि तू पूर्वोक्त मंत्रोम कह मार्गके अनुसार आचरण करेगा, उयक है, यही मृत्युको दूर करनेका तात्पर्य है । प्रकाशका ना 'तू शीघ्र नहीं मांगा, तू मत टर, मैं तुझे दीर्वायुवाला महत्त्व इतना है, यह प्रकाश अपनी आत्माका ही है, बाहर- करता है। जो मनुष्य पूर्वान्त प्रकार आचरण करेगा, उसकं का नहीं। लिये यह भागीर्वाद अवश्य मिलेगा। मनुष्य प्रलोभनमें जीवनका लक्षण पढता है और फसता है। बारहव मंत्रमे उन पितरोंको नमन किया है कि जो जीव- मार्गदर्शक दो ऋषि को इम लोकसे यमलोकमें ले जाते हैं। वे कृपा करें और अपने ही अटर मार्ग बनानेवारे दो ऋपि बैठे है ये अपि हमारे (उत्पारण ) मृत्युमे पार होनेक मनुष्टानमें सहायता दाम मंत्रम टेग्निये- करें। इसके पश्चात तेरहवें मंत्रमें जीवनोंका लक्षण बताया है। बोधप्रतिवाधी ऋषी । अस्वप्नः जागृविः । मनुन्यक दशरीरमें प्राण, मन, चक्षु और बल स्थिर रहें और तो प्राणम्य गातारा दिवानक्तं च जागृताम् ॥ यह अपने पांवके वलसे खढा रहे।' (मं १३) यह जीवनका (मै १०) लक्षण है, मृत्युका लक्षण भी इसीसे ज्ञात हो सकता है, वह मनुष्य के अन्दर वोध और प्रतिबोय अर्थात ज्ञान और इस प्रकार है- 'गरीग्में प्राण, मन, मांस और बौंका न विमान ये दो अपि हैं। इनमे सच्चा ज्ञान प्राप्त होता है। इन- रहना और गरीरका अपने पावपर सदा न रह सकना।' इन ममे एक (अ-म्यतः) सुम्त नहीं है और दूसरा मढा नागता शक्तियोंका यहा होना और न होना ही जीवन और मृत्यु है । रहता है। ये ही दो ऋषि मनुष्यक प्रागोंकि रक्षक हैं । अत ये पूर्वोक्न प्रकार इन मृत्युको दूर और जीवनको पास किया दिन रात यहां जागने रई ।' इन दो ऋपियोंकि यहां जागते जा सकता है। -- - Hindi
घातक प्रयोगको दूर कराना
(७१)
घातक प्रयोगको
दूर करना
कां. ५, सू. ३१
(ऋषि.-- शक्र. । देवता- कृत्यादूषणम् ।)
यां ते चक्ररामे पात्रे यां चक्रुर्मिश्रधान्ये । आमे मांसे कृत्यां यां चक्रुः पुनः प्रति हरामि ताम् ॥१॥
यां ते चक्रुः कृयाकावजे वा यां कुरीरिणि । अव्यां ते कृत्यां यां चक्रुः पुनः प्रति हरामि ताम् ।।२।।
यां ते चक्रुरेकैशफे पशूनामुमयादति । गर्दभे कृत्यां यां चक्रुः पुनः प्रति हरामि ताम् ॥३॥
यां ते चक्रुरमुलायाँ वलगं वा नराच्याम् । क्षेत्रे ते कृत्यां यां चक्रुः पुनः प्रति हरामि ताम् ॥४॥
यां ते चक्रुर्गार्हपत्ये पूर्वानाबुत दुश्चितः । शालायां कृत्यां यां चक्रुः पुनः प्रति हरामि ताम् ॥५॥
यां ते चक्रुः सभायां यां चक्रुरधिदेवने । अक्षेषु कृत्यां यां चक्रुः पुनः प्रति हरामि ताम् ॥६॥
यां ते चक्रुः सेनायां यां चक्रुरिष्वायुधे । दुन्दुभौ कृत्यां यां चक्रुः पुनः प्रति हरामि ताम् ॥७॥
अर्थ- (या कृत्यां ते आमे पात्रे चक्रुः) जिस हिंसाको वे कच्चे वर्तनमे करते हैं, (यां मिश्रधान्ये चक्रुः)
जिसको मिश्रधान्यमे करते है और (आमे मांसे यां चक्रुः ) कच्चे मांसमे जिस हिंसा प्रयोगको करते है (तां पुनः
प्रति हरामि ) उसको मैं हटा देता हू॥ १ ॥
(यां कृत्यां ते कृकवाको चक्रुः ) जिस हिंसाका प्रयोग वे पक्षीविशेषमे करते है, (यां ते कुरीरिणि अजे)
अधया जिसको सींगवाले मेढेमे अथवा बकरोमे करते है (यां ते अव्यां चक्रुः) जिस घातक प्रयोगको वे भेटीमें करते है
(तां०) उसको मैं दूर करता हूं ॥ २ ॥
(यां कृत्यां ते एकशफे चक्रुः ) जिस कृत्याको वे एक खुरवाले पशुमे प्रयुक्त करते है, (पशूनां उभयादति)
दोनों ओरके दांतवाले पशुओं में जो प्रयोग करते है, (यां गर्दभे चक्रुः ) जिस घातक प्रयोगको गधेमे करते है (तां०)
उसको मैं दूर करता हूं ॥ ३ ॥
(यां कृत्यां ते अमूलायां चक्रुः ) जिस कृत्याको वे अमूला औषधिमे करते है और (नराच्यां वा बलगं)
नराची औषधिमें वल घटानेका जो प्रयोग करते है (यां ते क्षेत्रे चक्रुः ) जिस घातक प्रयोगको वे खेतमें करते है ( तां०)
उसको मै हटाता हूं ॥ ४ ॥
(यां कृत्यां गार्हपत्ये चक्रुः ) जिस कृत्याको गाईपत्य अग्निमें करते है, (उत दुश्चितः पूर्वाग्नौ ) और जिसको
बुरी तरहसे प्रज्वलित पूर्वको अग्निमें करते है तथा (यां शालायां चक्रुः ) जिस घातक प्रयोगको गालामे करते है (तां० )
उसको मैं दूर करता हूं ॥५॥
(यां कृत्यां ते सभायां चक्रुः ) जिस कृत्याको वे सभामे करते है, (यां अधि देवने चक्रुः ) जिसको खेलमे
करते हैं, (यां अभेपु चक्रुः ) जिस घातक प्रयोगको पासोमे करते है, (तां० ) उसको मैं दूर करता हूं ॥ ६ ॥
(यां कृत्यां ते सेनायां चक्रुः) जिस कृत्याको वे सेनामे करते है ( यां इषु-आयुधे चक्रुः ) जिसको बाण मौर
बनु'यमें करते है (यां दुन्दुभौ चक्रुः ) जिस घातक प्रयोगको दुन्दुभि पर करते हैं (ता० ) उपको मै हटाता हूँ ॥ ७ ॥
(७२)
अथवदशा मुश्रीध अनुवाद - 'दीर्घजीयन और आरोग्य'
या ते कृत्या कृपेऽवधुः संगाले चर्चा निचतुः । सनि कृत्यां यां चक्रः पुनः प्रति हरामि ताम् ॥८॥
यां ते चक्रुः पुरुषास्थे अग्नी मकसुके च याम् । सोकं निहिं अव्यादं पुनः प्रति हरामि ताम् ।।९।।
अपंथुना जमारणां तां पृथेतः प्र हिण्मसि । अधीग मर्याधीरेन्यः सं जभाराचित्त्या ॥१०॥
यश्चकार न शशाक कर्तुं शुथ पार्दमारिम् । चकार भद्रमस्मभ्यमभगो मर्गवण्या ॥११॥
कृत्याकुनै बलगिनं मृलिनं गप!व्यम् । इन्द्रस्तं हन्तु महता धनाग्निविध्यत्वस्तयां ॥१२॥
अर्थ- (यां कृत्यां न कृप अवदधुः
जिस घातक प्रयोगको वे कुंएमें करते है, (स्मशाने श्रा
निचरनु. ) अथवा जिग्मको उमगानमें गाट देन है, (यां समनि चक्रुः) अथवा निम घातक प्रयोगको घरमें ही करते
है, ( तां० ) टयको में हटाता है ॥ ८ ॥
( यांत पुरुषास्थे चक्रुः ) जिस धानक प्रयोगको वे मनुष्यकी हड्डीमें करते है, (संकलुके अग्नी चक्रुः) प्रज्ज्त्र-
लिस अग्निमें जो करने हैं, (म्रोकं निहिं ऋव्याद प्रति) चौगये प्रज्ज्वलित क्यि गए माम सानेवाले भग्निके प्रति किए
गए (पुनः तां प्रति हरामि ) उस बातक प्रयोगको मैं हटा देना इं॥९॥
(अपधेन पनां आजभार) कुमार्गमे इस हिंसाको लाया गया है (नां पथा इनः प्रहिण्मसि) उसको सुमार्गसे
यहाँम हटान है । (अधीरः मर्या धीरेभ्यः ) मृढ मनुष्य मर्यादा धारण करनेवाले पुरवासे ( अचित्या संजभार) बिना
पांच उपाय प्राप्त कर सकता है ॥ १० ॥
(य. कर्नु चकार) जिसने हिंसा करनेका यन किया, बह (न शशाक) वह समर्थ नहीं हुआ । इसके विपरीत
(पाद अंगुरिं गधे ) उसने अपने ही पांव और अगुलियोंको तोड दिया है । (अभगः ) उस अभागेने तो (अस्मभ्यं
भगवन्द्रयः भद्रं चकार) हम सौभाग्यवानोंक लिये कल्याण ही किया है ॥ ११ ॥
(इन्द्रः बलगिनं) इन्द्र हग्य नीच (मूलिनं शपथेय्यं) जटम दुःख देनेवाले और गालियां देनेवालेको (महता
वधन हन्तु ) बढे अनमें मारे और (अग्निः अस्तया विध्यतु ) अग्नि मनसे वेध डाले ॥ १२ ॥
भावार्थ -~~कया बर्तन, मिश्रधान्य, कच्चा मांस, ककवाक पक्षी, मेट बकरी, भेड, एक सुरवाले पशु, दोनो भोर
दांववाले पशु, गधा, अमृला औपवि, नराची वनस्पति, रोत, गार्हपत्य अग्नि, पूर्वाग्नि, घर या कमरा, सभा, खेलका स्थान
पारे, मेना, बाण और धनु'य, दुन्दुभि, कुवा, म्यगान, घर, पुरषकी हड्डी, प्रज्ज्वलित अग्नि, मांस जलानेवाली अग्नि मादि
म्यानाम दुष्ट रोक वातक प्रयोग करते हैं । उनसे बचनेका उपाय करना चाहिये ॥ १-९ ॥
कुमार्गमे ही यह हिंसक और वातक प्रयोग हुआ करने हैं । भले ही दूसरे कुमार्गसे ऐसे प्रयोग करे, तो भी उनको ठीक
प्रकार दर करने का उपाय हमें करना ही चाहिये । मनुष्य स्वय उपाय न जानता हो, तो ज्ञानी पुरुषोंसे उपायको जान सकता
जो दुमरेकी हिंसा करनेका यत्न करता है वह दूसरेकी हिंसा करनेके पूर्व अपनी ही हिंसा कर डालता है । जो दूसरेकी
हिमा करना चाहता है वह अभागा है, उसग ईश्वरमनी और भाग्यवानोंका कल्याण ही होता है ॥ ११ ॥
वरही नीच मनुग्न्याको दण्ट देवे ॥ १२ ॥
दीर्घायुष्य और तेजस्विता
(७३)
दीर्घायुष्य
और तेजस्विता
• कां. ५, सू. २८
(ऋपि.- अथर्या । देवता:- त्रिवृत् , अग्न्यादयः।)
नव प्राणान्नवाभिः सं मिमीते दीर्घायुत्वाय शतारदाय ।
हरिते त्रीणि रजते त्रीण्यय॑सि त्रीणि तपसाविष्ठितानि
॥ १ ॥
अमिः सूर्यश्चन्द्रमा भूमिरापो द्यौरन्तरिक्षं प्रदिशो दिशश्च ।
आर्तवा ऋतुर्भिः संविदाना अनेने मा त्रिवृता पारयन्तु
॥ २ ॥
अयः पोषास्त्रिवृति श्रयन्तामनक्तुं पूषा पय॑सा घृतेन ।
अनस्य भूमा पुरुषस्य भुमा भुमा पशूनां त इह श्रेयन्ताम्
॥३॥
इममादित्या वसुना सर्मुक्षममग्ने वर्धय वावृधानः ।
इममिन्द्र सं सृज वीर्ये णासिन्त्रिवृच्छ्रयतां पोषयिष्णुः
।।४॥
अर्थ-(शतशारदाय दीर्घायुत्वाय) सौ वर्षवाले दीर्घजीवनके लिये (नव प्राणान् नवभिसं मिमीते)
नो प्राणोंको नौ इंद्रियोंके साथ समानतासे मिलाता है । (हरिते त्रीणि, रजते त्रीणि, अयसि त्रीणि) सुवर्णमे तीन,
चांदीमें तीन भौर लोहमें तीन सूत्र (तपसा आविष्ठितानि) उग्णतासे विशेष प्रकार स्थित हैं ॥ १ ॥
भग्नि, सूर्य चन्द्रमा, भूमि, जल, द्यौ, अन्तरिक्ष, (प्रदिशः दिशः) उपदिशाए और दिशाएं (ऋतुभिः संवि-
दाना यार्तवः ) ऋतुओके साथ मिले हुए ऋतुविभाग (अनेन त्रिवृता मा पारयन्तु ) इस तीनोंके योगसे मुझे पार ले
(त्रिवृति त्रयः पोषाः श्रयन्तां) इस तिहरे उपवीतमें तीन प्रकारकी पुष्टियां बनी रहें। (पूपा पयसा घृतेन
अनक्तु ) पूषा दूध और घीसे हमे भरपूर करे। (अन्नस्य भूमा) अन्नकी विपुलता, (पुरुषस्य भूमा ) पुरुषोकी
भधिकता, तथा ( पशूनां भूमा) पशुओको समृद्धि ये सब (ते इह श्रयन्तां ) तेरे यहां स्थिर रहें ॥ ३ ॥
हे (आदित्याः) आदित्यो ! (इमं वसुना सं उक्षत ) इसको तुम वसुओसे सीचो । हे अग्ने । ( वावृधानः
इमं वर्धय) द स्वयं बढता हुमा इसको बटा । हे इन्द्र ! ( इमं वीर्येण सं सृज) इसको वीर्यसे युक्त कर । (आस्मिन्
पोषयिष्णुः त्रिवृत् श्रयन्तां) इसमें पोषण करनेवाला तिहरा उपवीत रहे ।। ४ ।।
भावार्थ- दीर्घ आयुकी प्राप्तिके लिये नौ प्राणोको नौ इद्रियोमे सम प्रमाणमे स्थिर करना चाहिए । सुवर्णके तीन,
चादीके तीन और लोहेके तीन मिलकर नौ धागे उष्णतासे इकटे जुड़े हुए है । यह सुवर्णका यज्ञोपवीत होता है ॥ ३ ॥
जिसके तीनो धागोंमें क्रमश भूमि, जल अग्नि, चन्द्र, अन्तरिक्ष, सूर्य, धुलोक, दिशा उपदिशाएं और ऋतु आदि
कालविभाग ये नौ दिव्य तत्त्व रहते हैं, वह तीन धागोवाला यज्ञोपवीत मुझे दुःखोसे पार कराके दीर्घ जीवन देवे ॥ २ ॥
इस तिहरे उपवीतसे तीन पुष्टियाँ मिलती है। पोषण कर्ता परमेश्वर हमे दूध और घी भरपूर देवे । भन्नकी पुष्टि,
मनुष्योंकी सहायता, पशुओंकी विपुलता ये तीन पुष्टियां हमें यहां मिलें ॥३॥
भादित्य हमें सब वसुओंकी शक्ति प्रदान करे । अग्नि हमारी वृद्धि करे । इन्द्र वीर्य बढावे । इस प्रकार यह तिहरा
यज्ञोपवीत सब दुःखोंसे पार करानेवाला हमारे ऊपर स्थिर रहे ॥ ४ ॥
१० [भव. मा ४ हिन्दी]
जावें ॥२॥
(७)
अथर्ववेदका सुवोध अनुवाद -'दीर्घजीयन और आरोग्य'
भूमिष्ट्वा पातु हरितेन विश्वग्निः पिपत्र्वयसा सजोपाः ।
वीरुद्दिष्टे अर्जुनं संविदानं दक्ष दधातु सुमनस्यमानम्
अंधा जात जन्मनेदं हिरण्यमग्नेरेकै ग्रियसमं बभूव सोमस्यैकं हिंसितस्य परापतत् ।
अपामे वेधसां रेत आहुस्तत्ते हिरण्यं त्रिवृदस्त्वायुपे
॥६॥
व्यायपं जमदग्नेः कश्यप॑स्य व्यायुपम् । त्रेधामृतस्य॒ चक्षणं त्रीण्याऍषि तेऽकरम्
त्रयः सुपर्णास्त्रियता यदायन्नेकाक्षरमभिसंभूय शक्राः ।
प्रत्यौहन्मृत्युममृतेन साक्रमन्तर्दधाना दुरितानि विश्वा
॥८॥
विचम्या पातु हरित मध्यात्वा पात्वर्जुनम् । भूम्या अयस्मयं पातु प्रागदेिवपुरा अयम् ॥९॥
अर्थ- (सृमिः हरितेन त्वा पातु ) भूमि सुवर्णके द्वारा तेरी रक्षा करे । (विश्वभृत् सजापाः अग्निः अयसा
पिपर्तु) ग्लवका पोषण करनेवाली प्रेममय अग्नि लोहे के द्वारा तुझे पूर्ण करे । (वीरुद्भिःसंविदानं अर्जुन सुमनस्यमानं
दक्ष ) सोपवियों द्वारा प्राप्त होनेवाला कलंकरहित शुभसकल्पमय बल (ते दधातु) तुझे धारण करे ॥५॥
{ इदं हिरण्यं जन्मना त्रेधा जातं) यह सुवर्ण जन्मसे ही तीन प्रकारसे उत्पन्न हुआ है। उनमेंसे ( एकं अग्नेः
अत्यन्त प्रिय
हुआ है (एकं हिंसितस्य सोमस्य परापतत्) दूसरा निचोडे सोमसे
बाहर निकलता है । ( एक वेधसां अपां रेतः आहुः ) तीसरा सारभूत जलका वीर्य है ऐसा कहते हैं । ऐसा (तद
भिवृत हिरण्य ) वह तिहरा सुवर्ण (ते आयुपे अस्तु) वेरी भायुके लिये होवे ॥ ६ ॥
(जमदग्नेः न्यायुपं) जमदग्निकी तिगुनी आयु (कश्यपस्य व्यायुपं) कश्यपकी तिगुनी भायु, यह (अमृ.
तस्य त्रेधा चक्षण) अमृतका तीन प्रकारका दर्शन है । इससे (ते त्रीणि आयूपि अकर) तेरे लिये तीन भायुभोंको
में करता हु ॥ ७ ॥
( यत् गक्रः त्रयाः सुपर्णाः ) जय समर्थ तीन सुपर्ण (निवृता एकाक्षरं अभि संभूय आयन्) विगुने होकर
एक अक्षरमे सब प्रकारसे मिलकर आए । वे (अमृतेन साकं विश्वा दुरितानि अन्तर्दधानाः) अमृतके साथ सब
अनिष्टोको मिटाकर (मृत्यं प्रति औहन् ) मौतको दूर करते है ॥ ८ ॥
(हरितं त्वा दिवः पातु) सुवर्ण तेरी झुलोकसे रक्षा करे, (थर्जुनं त्वा मध्यात् पातु) श्वेत अर्थात् चादी तेरी
अन्तरिक्षस रक्षा करे और (अयस्मयं भूम्याः पातु) लोहा भूमिके स्थानसे वेरी रक्षा करे। (अयं देव-पुरा प्रागात्)
यह देवोकी पुरियोम प्राप्त हुआ है ।। ९ ।।
प्रियतमं बभूव)
एक अग्निको
गए
भावार्थ-- सुवर्ण के धागेम भूमि रक्षा करे। लोहे के धागेसे सबका पोषक भग्नि हमारी पूर्णता करे । क्या चांदीके
धागेर भापचियाक शक्तियाक साथ हम उत्तम मनयुक्त बल प्राप्त होवे ॥ ५ ॥
स्वभावत सुवर्ण तीन प्रकारका है । एक अनिके लिये प्रिय है, दूसरा सोमके रसके रूपसे प्राप्त होता है भौर तीसरा
सारभृत जल को वीर्य रूपने गरीरमें रहता है । यह तिहरा सुवर्ण है, यह मेरी मायु बढानेवाला होवे ॥ ६ ॥
जमदनि और कश्यपकी वाल, तरण और वृद्ध अवस्था में व्यापनेवाली विहरी आयु, मानो, अमृतका साक्षात्कार करने-
वा। यह तीन प्रकारकी आयु हमे प्राप्त होये ॥ ७ ॥
तीन बटी प्रक्रिया है जो एक ही नक्षरम रहती है । उस अमृतसे सब अनिष्ट दूर होते हैं और उससे मृत्युको दूर
रिया गाना || ८ ॥
मुवर्ण गुलगेकसे, चादी अन्तरिक्षमे और लोहा भूमिसे तेरी रक्षा करे । ये देवोंकी नगरियां ही प्राप्त हुई है ॥९॥
दीर्घायुष्य और तेजस्विता (७५) इमास्तिस्रो देवपुरास्तास्त्वा रक्षन्तु सर्वतः । तास्त्वं वि_वर्चम्व्युत्तरो द्विषतां भव ॥ १०॥ पुरे देवानाममतं हिरण्यं य अधेि प्रथमो देवो अz। तस्मै नमो दश प्राचीः कोम्पर्नु मन्यतां त्रिवृदावधै मे ॥११॥ आ वा घृतत्वर्यमा पुपा बृहस्पतिः । अहर्जातस्य यन्नाम तेन त्वाति चूनामसि ॥ १२ ॥ अभिष्टार्तवैरायुषे वर्चसे त्वा । संवत्सरस्य तेजसा तेन सहनु कृण्मसि धृतादुलप्तं मधुना समक्तं भूमिहमच्युतं पारयिष्णु । मिन्दसपत्नानधरांश्च कृण्वदा मा रोह महुते सौभंगाय ॥१४॥ अर्थ- (इमाः तिन्नः देव-पुराः) ये तीन देव नगरियां है, (ताः सर्वतः त्वा रक्षन्तु ) वे सब प्रकारले तेरी रक्षा करें। (त्वं ताः विभ्रत् वर्चस्वी) तू उनको धारण करके तेजस्वी होकर (द्विपतां उत्तरः भव) वैरियोफी अपेक्षा अधिक श्रेष्ट हो ॥ १० ॥ (यः प्रथमः देवः अग्रे आवेधे ) जिस पहिले देवने सबसे पूर्व इनको बांधा था। (देवानां हिरण्ययं पुरं ममृतं) वह देवोंकी सुवर्णमय नगरी अमृत रूप है । (तस्मै दश प्राचीः नमः कृणोमि) उसको अपनी दसो संगु- लियां जोडकर नमस्कार करता हूं। (त्रिवृत् मे आवेधे, अनुमन्यतां ) यह तिहरा उपवीत अपने शरीरपर बांधता हूं, देवगण इसके लिये अनुमति दें॥ ११ ॥ मर्यमा, पूषा, वृहस्पति (त्वा आ वृततु ) तुझे बांधे । (अहः जातस्य यत् नाम) प्रतिदिन उत्पन्न होनेवाले- का जो नाम है (तेन त्वा अति घृतामलि ) उससे तुझको कसकर बांधते है ॥ १२ ॥ (आयुपे वर्चसे )भायुष्य और तेजके लिये (ऋतुभिः आर्तवैः ) ऋतुओ और ऋतुविभागोले और ( संवत्ल- रस्य तेन तेजसा) संवत्सरके उस तेजसे हम तुझे (स-हनु कृण्मसि) संयुक्त करते हैं ॥ १३ ॥ (घृतात् उल्लुप्तं) घीसे भरा हुआ (मधुना समक्तं ) शहदसे सींचा हुआ (सूमिहं अच्युतं पारयिष्णु) भूमिके समान स्थिर और पार ले जानेवाला (सपत्नान् भिन्दत् ) वैरियोको छिन्नभिन्न करनेवाला और उनको ( अध- रान् कृण्वत् च ) नीचे करनेवाला तू (महते सौभगाय मा आरोह) बडे सौभाग्यके लिये मेरे ऊपर चढ ॥ १४ ॥ भावार्थ- ये तीन देवनगरियां हैं । ये तीनो सबकी रक्षा करें, इनको धारण करनेवाला तेजस्वी होकर शत्रुओको नीचे कर देता है ॥ १०॥ जोन- देवोंकी सुवर्णमय नगरी अमृतसे परिपूर्ण है । जो पहिला देव इसको सबसे पहिले स्थिर करता है, उसको नमस्कार करते हैं। यह तिहरा उपवीत मैं अपने गरीरपर बाधता हूं, मुझे अनुमति दीजिये ॥ ११ ॥ भर्यमा, पूपा, बृहस्पति और दिनमें प्रकाशनेवाला सूर्य ये सब देव यज्ञोपवीत धारण करनेके लिये तुझे अनुमति देखें ॥१२॥ संवत्सर, ऋतु और उत्तम कालविभागोके तेजसे तुझे सयुक्त करके हम तुझे दीर्घ आयु और उत्तम तेज देते है ।। १३ ।। यह घृतादि पौष्टिक पदार्थोंसे युक्त, मधु भादि मधुर पदार्थोसे परिपूर्ण, भूमिके समान सुदृढ, न गिरानेवाला और सब दुःखोंसे पार करनेवाला है । यह शत्रुओंको छिन्नभिन्न करता और उनको नीचे करता है। यह उपवीन मुझे महान् सौभाग्य देकर मेरे ऊपर रहे ॥ १४ ॥ हाय - , (७६) अथर्ववेदका सुबोध अनुवाद 'दीर्घजीवन और आरोग्य दीर्घायुष्य और तेजस्विता यज्ञोपवीतका धारण यह वान प्राणायामसे उत्पन्न होनेवाली भनिसे होती है। जो इस सूक्तमं यज्ञोपवीतक महत्वका वर्णन किया है। यशो- प्राणायामस अपना घल नहीं बढाते उनके किसी भवयवमें प्राण- गक्ति नही कार्य करती। ऐसा होनेसे वह अवयव भपना पीतक वर्णनक विषयमें अत्यत थोडेसे मंत्रभाग वेदमे हैं। कार्य करनेमे असमर्थ होता है । कई मनुष्योंके कई भवयव परंतु यह सपूर्ण सूक्तका सूक्त दीर्घ आयु और नेजस्त्रिताका उपदेश करते करते यज्ञोपवीतके महत्वका वर्णन कर रहा है कमजोर होते है, इसका कारण यही है। यही कमजोरी भायु- को क्षीण करती है। इसलिये इस सूक्तका महत्व विशेष है। इसी प्रकार तीन धातुओंके ये उष्णतासे इकट्ठे हुए नौ तीन धागे धागे गरीरका मारोग्य, बल और दीर्घ भायु बढाते हुए सब जानते हैं कि यज्ञोपवीतमे तीन सूत्र होते है और शरीरम उत्साह कायम रखते हैं । इस यज्ञोपवीतके नौ भागों में प्रत्येक सूत्रमे फिर तीन तीन धागे होते है, अर्थात सब निम्नलिखित नौ देवता रहते हैं- मिलकर नी सूत्र होते हैं । ये तीन धागे इस प्रकार बने है । आग्निः सूर्यश्चन्द्रमा भूमिरापो हरिते त्रीणि, रजते त्रीणि, अयसि त्रीणि। (मं. १) धोरन्तरिक्ष प्रदिशो दिशश्च ॥ सुवर्णक तीन, चांदीफ तीन और लोहेक तीन' अर्थात् यार्तवा ऋतुभिः संविदाना प्रत्येक मूत्रके अंदर सोना, चांदी और लोहेके तार हों । इस अनेन मा त्रिवृता पारयन्तु ॥ (मं. २) प्रकार तीन वातुमास बना हुआ यह यज्ञोपवीत होना चाहिये। भूमि-अग्नि-आप, अन्तरिक्ष-चन्द्रमा-दिशा, धौ-सूर्य अयस्' शब्दका प्रसिद्ध अर्थ 'लाहा' परंतु इसका और ऋतु ये नौ देवता इस तिहरे यज्ञोपवीतमें रहकर मुझे दुसरा अर्थ 'कवल धातुमात्र ऐसा भी है। इस प्रकार तांबा दुःखोसे पार करांव ।' भी इसका अर्थ हो सकता है। पृथ्वीस्थानीय तीन देव, अन्तरिक्ष स्थानीय तीन देव मौर सुवर्णका यज्ञोपवीत स्थानीय तीन देव, ये सब नौ देव यज्ञोपवीत नौ धागों में यह यज्ञोपवीन मोना, चांदी और तांबेका बने अथवा रहकर मुझे दुःसोसं पार करावें । यह इच्छा इस मत्रमें प्रकट ग्योना, चादी और लोहेका बने, इस विषय में अधिक खोज हुई है । यज्ञोपवीत धारण करनेका आषय इतने देवताओंका करना चाहिये । ये तीनो धातु इस प्रकार गरीरपर धारण तेज और वीर्य अपने अंदर धारण करना तथा इनके विषयमे करनेसे गरीरम कुछ मंद सा विद्युत्प्रवाह शुरू होता है, जिससे अपने कर्तव्य करना है। यज्ञोपवीत कंवल भूषणके लिये नहीं शरीरस्वास्थ्य, बल और दीर्घायुका प्राप्त होना सभव है। ये धारण किया जाता है, यह तो बढी भारी जिम्मेवारीका कार्य तीनो वानुओके वार (तपसा आविष्ठितानि ) उष्णतास है । तीन लोको और उनमें स्थित सब दैवी शक्तियोके साथ परस्पर जाट हुए हो अर्थात् एक दूसरेके साथ जुड़ी हुई अपना सबध व्यक्त करने के लिये यह त्रिवृत सूत्र धारण किया अवस्थाम रहे, तभी ये तार कार्य करनेमें समर्थ होगे । जिस उनसे दिव्य तेज प्राप्त करना चाहिये । जो यह न करेगा, जाता है । इस संबंधसे उनक विषयक कर्तव्य जानना और इन्द्रिय और प्राण उसके लिये यज्ञोपवीत नहीं रहता । यज्ञोपवीत धारण करने- वालोंको इस मत्रका उपदेश अपने मनमें अवश्य धारण करना गतगारदाय दीर्घायुत्वाय नव प्राणान् चाहिए। इस यज्ञोपवीतमे तीन प्रकारकी पोषण शक्तियां नवभिः संमिमीन । (म १) है, इस विषयमे निम्नलिखित मंत्र देखिये- 'मी वर्षकी दीर्घायुके लिये जिस प्रकार नौ प्राणोंको नौ त्रय. पोपाः त्रिवृति श्रयन्ताम् । हहियाम मिलाना चाहिये' अर्थात दीर्वायु प्राप्त करना हो अन्नस्य भूमा । पुरुपस्य भूमा । पशूनां भूमा । तो प्रागीका मागग्ग, हद्वियोस और अवयवोंसे वियोग शीत्र न हो मरे ऐसा प्रबव करना चाहिये । अर्थात् प्राणको भपने (म...2 भरी सब मवयवों में कार्य करने योग्य चमाना चाहिये । 'तीन पुष्टिया इस तिहरे यज्ञोपवीतके भाश्रयसे रहें । भन्नकी विपुलता, भनुयायी मनुष्योंकी विपुकता भौर पर- प्रकार- - - - दीर्घायुष्य और तेजस्विता (७७) - । भोंकी विपुलता, ये तीनो विपुलतायें इस यज्ञोपचीनके तीनों सुवर्णांका उपार्जन कर । ब्रह्मचर्य पालन द्वारा वीर्य भाश्रमसे रहें। स्थिर कर, गरीरमें वीर्य बढावें और ऊर्ध्वरेता बने । शरीर. यज्ञोपवीत धारण करनेवाले यज्ञ करते हैं, उस यज्ञम पोषणके लिये सोमादि औषधियोका रस, कदमूल, फलका ही गहुन मनुष्य संमिलित होते है और संगठन होकर मनुप्पो- सेवन करें और उसके साथ दूध घृन आदि हविग्य पदार्थों की संवशक्ति बढती है, यज्ञके कारण पन्यादि ठीक रीतिमे का ही सेवन करे, अर्थात् मद्यमांसादिका सेवन न करें। और होते हैं इस कारण विपुल भन्न प्राप्त होता है और यज्ञम तीसरा सोना अर्थात् धन भादि प्राप्त करें। ये तीनो पदार्थ दूध और घीके हवनके लिए गौ मादि बहुत पशु लाये जाते इस मन्त्रमे उपलक्षण स्प हैं और इनसे 'वीर्य, भन्न और है, पशुमोकी गक्तियां यढाई जाती हैं, इस कारण पशुओकी धन' का बोध मुख्यतया होता है। यज्ञोपवीत धारण करने भी उमति होती है। ये तीनो लाभ यज्ञमे होते हैं और यज्ञ वालोंको उचित है कि वे इन तीनोका उचित प्रमाणमें उपा- का भधिकार इस यज्ञोपवीतसे प्राप्त होता है, इसलिये यज्ञो र्जन करें । यज्ञोपवीत धारण करनेवालोके ऊपर इतने कार्यका पवीतसे उक्त लाभ होते हैं ऐसा इस मंत्रमे कहा है। भार रहता है। चतुर्थ मंत्रमें कहा है कि भादित्यसे मक्ति, अग्निसे वृद्धि मनुष्यमे बाल, तरुण और वृट्ट ये तीन अवस्थाए है, इन्द्रसे वीर्य प्राप्त हो और इम त्रिवृत् सूत्रसे हमारा उत्तम यज्ञोपवीत के तीन धागोसे इन तीन अवस्थाओका बोध होता प्रकारसे पोषण होवे । इस यज्ञोपवीतके एक एक धागेमें एक है । तीन अवस्थामओमे ब्रह्मचर्य पालनपूर्वक धर्मानुष्ठान कर- एक देवताकी शक्ति विद्यमान है, इसलिये जो मनुष्य इस नेमे यज्ञोपवीत धारण करना सार्थक होता है। यह बात 'सप्तम भावनासे यज्ञोपवीतका धारण करता है उसको बहुत लाभ मंत्रके' व्यायुपं त्रीणि, आयूपि ते अकर । (म ७) हो सकता है । इस विषयमें निम्नलिखित मंत्र देखिये इन शब्दोसे व्यक्त होती है। वाल्य, तारुण्य और वार्धक्य भूमिः हरितेन पातु। ये तीन आयुकी अवस्थाएं तीन प्रकारकी नायुके नामसे इस अग्निः अयसा पिपर्तु। मन्त्रमें कही है। जिस प्रकार मारे यज्ञोपवीतम एक ही धागा अर्जुनं वीरुद्भिः दक्षं दधातु ॥ (मं. ५) तीनों सूत्रोमे परिणत हुआ है, उसी प्रकार मनुष्य के धर्मा- चरणका एक ही धागा पूर्वोक्त तीनो आयुओमें मायुरूप होकर भूमि सुवर्णके धागेसे रक्षा करे, लोहे या तावेके धागे- परिणत होता है। मे मग्नि पूर्णता करे, तथा चांदीके धागे औषधियोकी सहा- यतासे बल धारण होवे' इस प्रकार ये तीन देव यज्ञोपवीत ओंकारकी तीन शक्तियां के तीन धागों में रहकर मनुप्यकी उन्नति करते है । अर्थात् एक ही 'भों' रूपी अक्षरमें 'अ-उ-म्' ये तीन महाशक्तियां यज्ञोपवीत केवल सूत्रका ही बना हुआ नहीं है, प्रत्युत वह इन रहती है, 'त्रयः एका क्षरं आयन् ' (मं ८) तीन देवतामोंकी शक्तियोंसे बना हुआ है, यह भाव यहां बताया शक्तिया एकही अक्षरमै बसती है । ये तीनो शक्तियां मृत्यु- है । जो यज्ञोपवीतको क्वल धागा ही समझते हैं वे उसके को दूर करती है और अनिष्ट दुःखादिकोको हटाती है। महत्वको नहीं जानते.! जो सुवर्ण, चादी और ताबेसे अथवा ओकारनामक एक ही अक्षरमे अकार-उकार- मकार नामक लोहेसे बने हुए भाभूषण रूप यज्ञोपवीतको धारण करेंगे, तीन शक्तियां है । ये तीन अक्षर यज्ञोपवीतके तीन सूत्र हैं। निःसन्देह उनके शरीरमें विद्युत्संचार होनेके कारण उनको जिस प्रकार इन तीनों अक्षरोके एकरूप सयोगसे मोकार रूप गंडा लाभ होगा ही, परंतु जो सुवर्ण यज्ञोपवीत धारण कर महानाद उत्पन्न होता है, उसी प्रकार तीनो सूत्रोसे मिलकर नेमें मममय हों, वे सूत्रका यज्ञोपवीत ही धारण कर, परंतु एक यज्ञोपवीत होता है । इसलिये यह यज्ञोपवीत पूर्वोक्त इसे धारण करनेके समय इस भावनासे धारण करें, जिससे तीनों महाशक्तियोका बोध करता है । अ-उ-म् इन तीन इस मनोबल द्वाराभाकर्षित हुए हुए उक्त देवता इसकी अवश्य अक्षरोसे क्रमशः 'जाग्रत्-स्वप्न-सुपुप्ति' ये तीनो अवस्थाएं सहायता करें। बोधित होती है। मनुष्यका संपूर्ण जीवन इन तीन अवस्था- पष्ट मंत्रमें सुवर्णके तीन भेद बताए है, एक सुवर्ण अर्थात् भोमे व्याप्त है, मानो मनुप्यका जीवनरूपी जो एक महा- सोना, दूसरा सोमादि भौषधीका रस और तीसरा वीर्य जो यज्ञोपवीत है उसके तीन धागे जाग्रत्-स्वप्न-सुपुत्ति है। गरीरमें होता है । यज्ञोपवीत धारियोंको उचित है कि वे इन इनको यशरूप बनानेका कार्य यज्ञोपवीत धारण करनेवालोको - । - - (८) अथर्ववेदफा सुबोध अनुवाद ---'वीर्घजीवन और आरोग्य' भवश्यमव करना चाहिये । अ-उ-म् के अनेक अर्थ है, अमृतं आवेधे ) जो इस देवोंके भमृतको अपने शरीर पर उनका विचार यहां पाठक करेंगे तो उनको पता लग जायगा धारण करना है ( तस्मै नमः कृणोमि । मं. 1) उसको कि हम यज्ञोपवीत द्वारा कितने शुम कम को करनेका भार नमस्कार करता हूँ। अर्थान नो यज्ञोपवीत धारण करते है यज्ञोपवीत धारियोंपर स्पा गया है। विस्तार होनेके भयसे नमस्कार करने योग्य हैं । इस सूत्रको धारण करनेसे देवस्त हम अक्षरोंके तत्वज्ञानका विचार यहां करके लेखका विस्तार प्राप्त होता है । इतने महत्वका यह यज्ञोपवीत होनेके कारण रवाना नहीं चाहते। ओंकारके टपर बहुतसे अंथ रचे जा चुके इसके धारण करनेका अधिकार तब प्राप्त हो सकता है, जब है, उनके भाशयको यही विचारार्थ ध्यान में लानेसे पता लग कि श्रेष्ठ लोग धारण करनेकी अनुमति देवें । जायगा कि इस मंत्रने कितना महत्वपूर्ण उपदेश किया है। त्रिवृत् मे आवेधे । मनुमन्यताम् । (म. 1) देवोंके नगर यह (विवृत् ) विदरा यज्ञोपवीत अपने शरीरपर मैं हरितं दिवः पातु । अर्जुनं मध्यात् पातु । बांधता हूं अथवा धारण करता हूं, इसलिये विद्वान् मेरा अयस्मयं भूम्याः पातु ॥ (मं. ९) अनुमोदन करें ।' श्रेष्ठ लोगोंकी अनुमति प्राप्त करके ही मैं 'सुवर्णका धागा द्यलोकसे, चादीका धागा मध्य भागमे यह यज्ञोपवीत धारण कर सकता हूं, इसलिये भाप मनु- और लोहेका धागा भूमि स्थानसे रक्षा करे।' इस मंत्रमें कहा मोदन देकर मुझे कृतार्य कीजिये । इस प्रकारकी प्रार्थना पहिले है कि गरीरके तीनों भागोंका रक्षण करनेका कार्य तीन धातु- की जाय, तत्पश्चात् महाजनोंकी मानाके मिलनेके मनन्तर ही सॉसे निर्मित तीन धागे करें । शरीरमे द्युलोक सिरमें, मध्य- वह मनुष्य यज्ञोपवीतको अपने शरीरपर धारण करें । जो भाग अथवा अन्तरिक्ष लोक नाभिमें और भूलोक पांवमें है। चाहे वह मनुग्न्य इस यज्ञोपवीतको धारण नहीं कर सकता, इसलिये सिंग्पर मुवर्ण, मध्यभागमे चादी और पांवमें लोह- महाजन, महात्मा श्रेष्ट लोग जिसको आज्ञा देवें, अर्थात् को रखनेके समान यह एक ही (निवृत्) तिहरा यज्ञोप- पूर्वोक्त मंत्रों द्वारा सूचित हुए कर्तव्य करनेमें जो पुरुष समर्थ वीत धारण करनेवालेकी रक्षा करे । 'अयस्' शब्दका अर्थ हो उसीको वे आज्ञा देवें और वही पुरुष यज्ञोपवीत धारण यद्यपि यहां हमने लोहा ऐसा किया है तथापि सुवर्ण और करे । ऐसा करनेसे यज्ञोपवीतका महत्व स्थिर रह सकता है। चांदीसे कुछ भिन्न अन्य धातुका बोधक भी यह गब्द हो विना योग्यताके यदि मनुष्य धारण करेगा, तो उसका वह सकता है । यह कौनसी धातु है इस विषयमें सोज भाव- केवल सूत्र ही होगा, परंतु पूर्वोक प्रकार जिसने अपना जीवन श्यक है। लोहा, तांबा या अन्य कुछ ऐसी धातु ही यहां अपे- यज्ञमय बनाया है, उसके शरीर पर सुशोभित होनेवाला क्षित है कि जिसके आभूषण बन सकते हैं। यह यज्ञोपवीत देवोंके नगगेके समान अनंत दिव्य शक्तियोंसे तिनः देवपुराः त्वा सर्वतः रक्षन्तु । युक्त हो जाता है । यज्ञोपवीतको केवल सूतका धागा बनाना त्वं नाः विभ्रत् वर्चस्वी द्विपतां उत्तरः भव ।। अथवा उसको दिव्य शक्तियोंका केन्द्र बनाना मनुष्य समाजके (मं. १०) आधीन है। यज्ञोपवीवके ये तीन धागे (देव-पुरा.) देवोंक, मानो नगर ही है, इनमें देवो शक्ति भरी हुई है, इसलिये ये सब न्याय, पुष्टि और धान प्रकार तेरी रक्षा करे। तू उन तीनोंको धारण करके (वर्चस्वी) इम त्रिवृत् यज्ञोपवीतके तीन सूत्र 'अर्यमा, पूपा और मंजम्बी बन और अनुमोकी अपेक्षा अधिक ऊंचे म्यानपर वृहस्पति' (मं. १२) इन तीन देवताओंके साथ संबंध भाम्द हो। 'अर्यमा' = (अर्य मिमीते ) श्रेष्ठ कौन है और हीन यज्ञोपवीत के तीन धागे ये केवल धागे नहीं है, ये देवाके कौन है इसका निश्चय जो करता है, उसको भर्यमा कहते नगर ही है, अर्थान इनमें अनेव देवी शक्तिया मरी हुई हैं। जो हैं। पुष्टि करनेवालेका नाम 'पूपा' होता है और ज्ञानीका इम श्रद्धासे इस विन यज्ञोपवीतको धारण करेगा बद नाम 'वृहस्पति' है । अर्थात् इन तीन धागोंसे ज्ञान, तेजन्वी होगा और उसके तेजके प्रभावके कारण उसके मत्र पोषण और न्यायकारिता इन तीन दैवी गुणोंकी सूचना मिलती शत्रु नीच हो जायंगे। यह देवोंकी पाकियोंसे परिपूर्ण त्रिवृत्, यज्ञोपवीतको जो तीन गुणोंको अपने जीवन में उतारनेके उत्तरदाता बनते हैं। है । लो यज्ञोपवीत धारण करना चाहते हैं, वे मानो, इन मनुष्य अपने शरीरपर भारण करता है, (यः देवानां यज्ञोपवीतने इतनी भारी कन्य दक्षता मनुष्य पर रखी है। -
दीर्घायुष्य और तेजस्विता
(७९)
वाला1
जो ये कर्तव्य पालन करेंगे वे ही यज्ञोपवीत्तको धारण करनेके
यहोपवीतसे लाम
अधिकारी होते हैं।
१ पारयिष्णु- दुःसोसे पार करानेवाला, फष्टोंसे बचाने-
जिस प्रकार एक वर्ष में छः ऋतु होती है, उसी प्रकार
मनुष्यकी संपूर्ण भायुमें 7. ऋतुएं होती है। मनुप्यकी आयु २ अ-च्युतं न गिरनेवाला अथवा न गिरानेवाला, इसके
१२० वर्षोंकी मानी गई है, उनमें प्रायः बीस बीस वाँकी पहननेसे मनुष्य गिरावटसे बच सकता है।
एक एक जनु होती है । मायुको कम माननेपर कम वर्षोंकी ३ भूमि-दृह मातृभूमिको बलवान् बनानेवाला।
भी ऋतु हो सकती है। इन ऋतुओ द्वारा भायु, यल और ४ सपत्लान् भिन्द- शत्रुओंका नाश करनेवाला ।
तेजकी प्राप्ति करनेके कर्तव्य यज्ञोपवीत द्वारा सूचित होते हैं;
५अधरान् कृण्वत् वैरियोंको नीचे करनेवाला, दुष्टोंको
यह कयन तेरहवें मंत्रका है।
हीनयल करनेवाला,
मनुष्यकी भायुमें जो छः ऋतुएं होती हैं, उन सभी ऋतुमोमें
६ मधुना समक्तं- सब प्रकारकी मधुरतासे युक्त, मधुर-
ताको देनेवाला।
अर्थात् मनुष्य अपनी मायुभर ऐसा यत्न करे कि जिससे
ससे तेज और बल प्राप्त होकर दीर्घजीवन भी प्राप्त हो।
७ घृतात् उल्लुप्त- घृत आदि पुष्टिकारक पदार्थ देने-
वाला और पोषण करनेवाला, इस प्रकारका सामर्थ्यशाली
प्राचाँदि सुनियमोके पालन करनेसे ही यह सब कुछ हो
सकता है। यज्ञोपवीतके तीन सूत्र तेज, बल और दीर्घ आयु
यह यज्ञोपवीत है इसलिये हे यज्ञोपवीत । तू-
प्राप्त करनेकी सूचना देते हैं, यह बात तेरहवें मत्रमे मिलती है। मेरे शरीरपर आरोहण कर, अर्थात् मेरे शरीर पर चढ कर
८ महते सौभगाय मा आरोह- वढे सौभाग्यके लिये
अन्तिम चौदहवें मंत्रम इस विवृत् यज्ञोपवीतके कौनसे विराजमान हो।
विशेष गुण है, इसके धारण करनेसे कौनसे लाभ हो सकते हर एक द्विजको उचित है कि वह इस प्रकारकी भावना-
इसका वर्णन किया है। वे गुण बोधक शब्द विशेष मनन से और पूज्यभावसे यज्ञोपवीत पहने और अपने कर्तव्यकर्म
करने योग्य हैं।
करके अपनी उन्नति करे।
हक्नसे दीर्घ आयुष्य
कां. ३, सू. ११
(ऋषि:- ब्रह्मा, भृग्वगिराः । देवता- इन्द्राग्नी, भायुप्यं, यक्ष्मनाशनम् ।)
मुशामि त्वा हविषा जीवनाय कमज्ञातयक्ष्मादुत राजयक्ष्मात् ।
पाहिजब्राह यद्येतदनं तस्यां इन्द्रानी प्र मुमुक्तमेनम्
॥१॥
अर्थ-(कं जीवनाय) सुखपूर्वक दीर्घ जीवनके लिये मैं (हविपा त्वा) तुझे हवनके द्वारा (अज्ञात-
यस्मात् उत राजयक्ष्मात् ) अज्ञात रोगसे और राजयक्ष्मा नामक क्षय रोगसे (मुञ्चामि ) छुडाता हूं। (यदि
प्राहिः एतत् एनं जग्राह) यदि जकढनेवाले रोगने इसको जकड रखा हो तो (तस्याः इन्द्राग्नी एनं प्रमुमुक्तं) उस
पीडासे इन्द्र और मग्नि इसको छुटावें ॥ १ ॥
भावार्थ- तुने सुखमय दीर्घ भायुष्य प्राप्त हो इसलिये तुझे ज्ञात और अज्ञात रोगोसे हवनके द्वारा छुडाता हूं।
करनेवाले रोगोंने मके ही तुमे पकर रखा हो, तथापि त् इन्द्र और भग्निकी सहायतासे उन कष्टोंसे मुक्त हो सकता है ॥१॥
(८०)
अथर्ववेदना सुबोध अनुवाद
--'दीर्घजीयम और आरोग्य'
यदि क्षितायुर्यदि वा परतो यदि मृत्योरन्तिकं नीत एव ।
तमा हरामि निरुपस्थादस्पार्शमेनं शतशारदाय
॥२॥
सहस्राक्षेणं गतवीर्येण शतायुपा हविषाहार्पमेनम् ।
इन्द्रो यथैनं शरदो नात्यति विश्वस्य दुरितस्य पारम्
॥३॥
शतं जीव शरदो वर्धमानः शतं हेमन्तान्छुतमु वसन्तान् ।
गतं त इन्द्रौ अग्निः सविता बृहस्पतिः शतायुषा इविषाहार्पमेनम्
॥४॥
प्र विंशतं प्राणापानावनड़वाहाविव ब्रजम् । व्यन्ये यन्तु मृत्यवो यानाहुरितराञ्छृतम् ॥५॥
इहेब स्तै प्राणापानो मापं गातमितो युवम् । शरीरमस्याङ्गानि जरसे वहतं पुन: ॥ ६ ॥
अर्थ-(यदि क्षितायुः) कोई समाप्त आयुवाला होगया हो अथवा (यदि वा परेतः) यटि मरनेके करीब पहुंच
गया हो किंवा (यदि मृत्योः अन्तिकं नीतः एव ) मृत्युकं समीप भी वह पहुचा हुआ क्यों न हो, (तं नितेः
उपस्थात् आहरामि) उसको मै विनागके पाससे वापस लाता हूं और (एनं शतशारदाय अस्पार्शम् ) इसको
सौवर्षके दीर्घायुप्यकं लिये सुरक्षित करता हूं ॥ २ ॥
(सहन्नाक्षेण शतवीर्येण शतायुपा हविषा एनं आहार्प ) सौ तरहकी शक्तियोंसे युक्त, सौ तरहके वीयाँसे
युक्त और शतायु देनेवाले हवनके द्वारा इसको में लाया हूँ। ( यथा विश्वस्य दुरितस्य पारं) जिससे संपूर्ण दुःखोसे
पार होकर (एनं इन्द्रः शरदः अति नयति) इसको इन्द्र सौ वर्षकी पूर्णायुके भी परे पहुंचावे ॥३॥
(वर्षमानः शतं शरदः जीव ) बढता हुआ सौ शरद ऋतुओतक जीता रह (शतं हेमन्तान् : शतं उ
वसन्तान् ) सौ हेमन्त ऋतुओतक तथा सौ वसन्त ऋतुओतक जीवित रह । (इन्द्रः अग्निः सविता वृहस्पतिः ते
शतं ) इन्द्र, अग्नि, वृहस्पति और सविता, तेरे लिये सौ वर्षकी आयु देवें। (एनं शतायुपा हविषा आहार्ष) मैं
इसे सौ वर्षकी आयु देनेवाली हविक द्वारा यहां लाया हूं ॥ ४ ॥
हे (प्राणापानौ) प्राण और अपान ! तुम दोनो ( अनड्वाही बज इव ) जैसे बैल गोशालामे प्रवेश करते है
(प्रविशतं) उसी प्रकार इस शरीरमें प्रवेश करो (अन्ये मृत्यवः वि यन्तु) दूसरी अनेक भपमृत्युएं दूर हो जावे,
(यान् इतरान् शतं आहुः) जिनको इतर सौ प्रकारका कहा जाता है ॥ ५ ॥
है (प्राणापानौ ! ) प्राण और अपान । (युचं इह एव स्तं ) तुम दोनों यही रहो, ( इत. मा अप गातं)
यहासे दूर मत जाओ । (अस्य शरीरं । इसके गरीर और ( अंगानि ) सब अवयवोंको (जरसे पुनः वहतं ) वृद्धा-
वस्थाके लिये फिर ले चलो ॥ ६॥
.
भावार्थ-किसीकी भायु समाप्त हो गई हो, उसकी मरनेकी अवस्था प्राप्त हुई हो, करीव मृत्युके समीप भी पहुंचा
हुमा हो, तो भी उसको उस विनागकी अवस्थासे में वापस लाता हूं और सौ वर्षकी दीर्घ सायु प्राप्त कराता हूं ॥२॥
हवनमें हजारों किया है और सैकडों वीर्य है, ऐसे हवनके द्वारा इसको मैं वापस लाया हूं। यह मनुष्य भब
सम्पूर्ण कष्टोसे पार हुभा है, मत इसको इन्द्र सौ वर्षके भी परे ले जायेगा ॥ ३ ॥
नुझे सौ वर्षको मायु प्रदान करनेवाले हवनके द्वारा मृत्युसे मैं वापस लाया हूं । इन्द्र, अग्नि, मविता भऔर बृहस्पति
मौ वर्षकी नायु देवें । अब तू सब प्रकारसे बढता हुना सौ वर्षतक जीवित रह ॥ ४ ॥
हे प्राण और क्षपान ! तुम दोनों इस मनुष्यमें ऐसे प्रवेश करो जैसे बैल गोगालामें प्रवेश करते है। अन्य सैकडों
अपमृयु हमने दूर भाग जावें ॥५॥
हे प्राण और अपान ! तुम दोनों इसके गरीरमें निवास करो, यहासे दूर मव जामो। इसके शरीरको भौर संपूर्ण
भरयोंको पूर्ण वृट भवन्यातक भष्ठी प्रकार चलाभो ॥ ६ ॥
(८१) हवनसे दीर्घ आयुष्य जरायै त्वा परि ददामि जरायै नि धुवामि त्वा । जरा त्वां भद्रा नेष्ट व्यन्ये यन्तु मृत्ययो यानाहुरितरान्कृतम् ॥ ७॥ अभि त्वा जरिमाहित गामुक्षणमिव रज्ज्यो । यस्त्वा मृत्यूरभ्यर्धत्त जायमानं सुपाशा । तं ते सत्यस्य हस्ताभ्यामुर्दमुञ्चद्वहस्पतिः ॥८॥ अर्थ- (त्वा जरायै परि ददामि ) तुझे वृद्धावस्थाके लिये अर्पित करता हूं। (त्वा जरायै निधुवामि) तुझको वृद्धावस्थाके लिये पहुंचाता हूं। (त्वा जरा भद्रा नेष्ट) तुझे वृद्धावस्था सुख देवे । ( यान् इतरान् शतं आहुः) जिनको इतर सौ प्रकारके कहा जाता है (अन्ये मृत्यवः वि यन्तु ) वे अन्य अपमृत्यु दूर हो जावें ॥ ७ ॥ (उक्षणं गां इव रज्ज्वा) जैसे बलको अथवा गौको रस्सीसे बांधा जाता है, उसी प्रकार (जरिमा त्वा अभि माहित ) बुढापेने तुझको बाधा है। (यः मृत्युः जायमानं त्वा सुपाशया अभ्यधत्त) जिस मृत्युने उत्पन्न होते ही उसको उत्तम पाशसे बाध रखा है (ते तं ) तेरे उस मृत्यु पाशको (सत्यस्य हस्ताभ्यां वृहस्पतिः उद- मुञ्चत् ) सत्यके दोनों हाथोसे बृहस्पति छुढा देता है ।। ८ ।। भावार्थ- हे मनुष्य ! मैं मम तुझको वृद्धावस्थाके लिये समर्पित करता हूं। वृद्धावस्थातक मै तुझको भायु देता है। तुझे मारोग्यपूर्ण बुढापा प्राप्त हो भार सय भन्य अपमृत्यु तुझसे भय दूर हो ॥ ७ ॥ जैसे गाय या बैलको एक स्थानपर रस्सीसे बांध देते हैं, वैसे भव तेरे साथ वृद्धावस्थाकी पूर्ण मायु बाध दी गई है। जो अपमृत्यु जन्मते ही तेरे साथ लगा हुआ था उस अपमृत्युसे तुझको सत्यके हाथोसे बृहस्पतिने दूर कर दिया है ॥८॥ हवनसे दीर्घ आयु हवनसे दीर्घायुज्यकी प्राप्ति बलवर्धक औषधियोका इनमें हवन किया जाता है । जो यज्ञ हवनकी बडी भारी शक्ति है, इससे आरोग्य, बल, दीर्घ रोगनाशक, आरोग्यवर्धक, पुष्टिकारक और बलवर्धक होगे वे मायुष्य मादि प्राप्त हो सकता है । यज्ञ यागोमें हवन होता दीर्घ आयु देनेवाले निःसंदेह होगे इसमें किसीको भी संदेह है, ये यज्ञयाग ऋतुओकी संधियोंमे किये जाते है और इनसे नहीं हो सकता। इसलिये इस सूक्तमें जो हवनसे दीर्घ तुपरिवर्तनके कारण होनेवाले रोगादि दूर हो जाते हैं, इस भायुष्य प्राप्त करनेका संदेश दिया है वह अवश्य विचार विषयमें कहा है- करने योग्य है। औषधियोंके यज्ञ हवनसे रोग दूर करना भैषज्ययक्षा वा पते । तस्मादृतुसन्धिषु प्रयुज्यन्ते । हवनसे रोग दूर करनेके विषयमें इस सूक्तका कथन ऋतुसन्धिषु व्याधिर्जायते ॥ (गो. या उ.प्र. ११९) मनन करने योग्य है- 'ये औषधियोंके बढे बढे यज्ञ हैं, इसलिये ऋतुसंधियो में ये यज्ञ किये जाते हैं इसका कारण यह है कि ऋतुसंधियोमें अज्ञातयक्ष्मात् उत राजयक्ष्मात् त्वा मुञ्चामि। (मं १) ग्याधियां उत्पन्न होती है।' तस्याः (ग्राह्याः ) इन्द्राशी पनं प्रमुमुक्तम्। (मे १) अतुपरिवर्तनके कारण हवा बिगडती है, इससे रोग होते 'अज्ञात रोग और ज्ञात रोग, या राजयक्ष्मा रोग इन हैं। इन रोगोंका प्रतिबंध करने के लिये ये भौषधियाग किये रोगोसे मुक्त कर देते हैं। पकडनेवाले रोगसे इन्द्र और अग्नि जाते हैं। रोगनाशक, भारोग्यवर्धक भौर पुष्टिकारक तथा इस रोगीको मुक्त कर देते हैं।' ११ [मपर्व मा. ४ हिन्दी] (८२) अथर्ववेदका सुबोध अनुवाद - 'दीर्घजीवन और आरोग्य' । चतुर्थ मत्रमें विश्वासपूर्वक कहा है कि अब तो 'हवन इस मंत्रम हवनसे ज्ञात और अज्ञात रोगोंके दूर हो जानेकी संभावना दर्शायी है। ज्ञात रोग वे होते है कि किया गया है, इन्द्र, अग्नि, सविता, बृहस्पति आदि देवता- जिनकी पहचान सपूर्ण लक्षणोंसे आसानीसे होती है । तथा मोसे शक्तिया प्राप्त की गई है, अब तू विश्वास पूर्वक अपनी अज्ञात रोग उनको कहते है कि जो ठीक प्रकार पहचाने नहीं सब शक्तियां बढाता हुमा सौ वर्पतक जीता रह । अब तो जाते अथवा जिनके विषयमे वैद्योकी परीक्षामें मतभेद हुआ मृत्युका भय नही है । (मं. ४)' हवनका ऐमा सुपरिणाम करता है। कोई वैद्य एक रोग बताता है, तो दूसरा वैद्य होता है और इतना विश्वास उत्पन्न हो जाता है । यह हवनका परिणाम मननपूर्वक देसने योग्य है। दूसरा ही रोग बताता है । इस प्रकार रोग ज्ञात हो अथवा अज्ञात हो, उसको हवन द्वारा दूर किया जा सकता है, पंचम और पष्ठ मंत्रोम प्राण और अपानको आदेश दिया अर्थात अग्निमे योग्य औषधियोंका हवन करनेसे रोगी रोग- है कि- 'हे प्राण और अपान ! तुम अब इसी पुरुषके मुक्त हो जाता है । विविध रोगोंकी निवृत्तिके लिये उन उन देहमें घुसो, यही अपने कार्य करो और इसके शरीरके तथा रोगोको नष्ट करनेवाले औपधिोंके हवन करनेकी भाव- संपूर्ण इन्द्रियोको पूर्ण आयुकी समाप्तितफ अपने अपने कार्य श्यकता है और कुछ पदार्थ ऐसे भी हवनमें होते है कि करनेके योग्य रखो । तथा इस गरीरसे पृथक न होमो । जिनसे सामान्यतया आरोग्य प्राप्त हो सकता है। ऐसे योग्य तुम्हार कार्यसे इसके संपूर्ण अपमृत्यु दूर हो जावें । (मं. ५-६) औपधियोके संमिलित हवनसे मनुष्य पूर्ण नीरोग और जब पूर्ण आरोग्य प्राप्त होता है और हवनसे गरीरमें नव दीर्घायुसे युक्त हो जाता है। जीवन सचारित होता है, तब शरीरमें स्थिर रुपसे प्राणापान रहेंगे ही। यह इवनका परिणाम है। हवनका परिणाम सप्तम मंत्रमें कहा है कि- 'हे मनुष्य ! अय में तुझको हवनका परिणाम यहांतक होता है कि भासन मरण रोगी भी रोग मुक्त होकर आरोग्य प्राप्त करता है । इस विषय अवस्था प्राप्त होवे और सब अपमृत्यु तुझसे दूर हो जावें ।' वृद्ध अवस्थाके लिये समर्पित करता हूं तुझे सुखमयी वृद्ध में द्वितीय मंत्र स्पष्ट शब्दोमें कहता है कि, 'यदि यह रोगी (म. ७) वृद्ध अवस्थाको गोदमें समर्पण करनेका तात्पर्य है मरनेकी अवस्थाके करीब पहुंच चुका हो अथवा मृत्युके पास कि पूर्ण वृद्धावस्थातक अर्थात् सौ वर्षकी पूर्ण मायुतक जीवित भी गया हो, इसकी आयु भी समाप्त हो चुकी हो, तो भी रहना ही है। हवनसे इसकी सब आपत्ति दूर हो सकती है और इसको सौ वर्षकी पूर्ण आयु प्राप्त हो सकती है । ' (म. २) मरणका पाश अष्टम मंत्रमें एक बड़ा भारी सिद्धांत बताया है कि हर शतायु करनेवाला हवन एक मनुष्य जन्मते ही मृत्युके पाशसे यांधा जाता है- इस वर्णनसे हवनका अपूर्व भारोग्यवर्धक परिणाम ज्ञात यस्त्वा मृत्युरभ्याधत्त जायमानं सुपाशया। हो सकता है। तृतीय मंत्रमे हवनका नाम ही 'शतायु हवि' कहा है अर्थात् इस हवनसे सौ वर्षकी पूर्ण आयु प्राप्त हो (म. ८) सकती है । इस 'शतायु हवि' के अंदर शतवीर्य अर्थात् पाशसे बांधकर रखता है । ' कोई मनुष्य अथवा कोई प्राणी 'मृत्यु तुझको अर्थात् हरएक प्राणिमात्रको जन्मते ही उत्तम सौ प्रकारके बल होते हैं और (सहस्त्र-अक्ष) हजार प्रकारकी मृत्युके इस पाशसे छूटा हुआ नहीं होता । जो जन्मको प्राप्त शक्रिया होती हैं। इससे- हुमा है वह अवश्य किसी न किसी समय मरेगा ही। सब नयात्यति विश्वस्य दुरितस्य पारम् । (मं. ३) उत्पन्न हुए प्राणिमात्रोंको मृत्युने अपने पाशोंसे ऐसा जकड 'सब दुरितको दूर किया जा सकता है।' दुरित नाम कर बांधा है कि वे इधर उधर जा नहीं सकते भौर सत्र पापका है । यह 'दुरित ' (दुः-इत) वह है कि जो शरीर मृत्युके वशमें होते है। में घुस केर दु स उत्पन्न करनेवाला होता है; यह शरीरमे घुस सब जन्म लेनेवाले प्राणियोंको एकयार अवश्य मरना कर नाना प्रकारकी पीढाएं उत्पन्न करता है । हवनके द्वारा है' यह इस मंत्रका कथन हरएकको अवश्य विचार करने दुरित अर्थात रोगोत्पादक द्रव्य शरीरसे दूर किया जा सकता योग्य है। हरएकको स्मरण रखना चाहिये कि अपने सिरपर मृत्युका पांव रसा हुआ है। इस विचारसे मनुष्यको सत्य- ' है दु
हवनसे दीर्घ आयुष्य
(८३)
-
धर्मका पालन करना चाहिये । सत्य ही इस मृत्युसे बचाने- क्षात्रबलले ब्राह्मबल अधिक श्रेष्ठ है इसमें किसीको संदेह
वाला है।
ही नहीं है।
सत्यसे सुरक्षितता
सत्यपालनसे दीर्घायुकी प्राप्ति
मत्युके पागसे बचानेवाला एक मात्र उपाय 'सत्य' है यह
अष्टम मंत्रमें बताया है-
दीर्घायुकी प्राप्ति करनेकी इच्छा करनेवालेको सत्यका
पालन करना अत्यंत आवश्यक है। सत्यके संरक्षक हाथोसे
तं ते सत्यस्य हस्ताभ्यामुदमुञ्चद् बृहस्पतिः ।
सुरक्षित हुआ मनुष्य ही दीर्वजीवी हो सकता है ।
(म.८)
'वृहस्पति तुझे सत्यके संरक्षक हायोसे उस मृत्युसे
इस मंत्रमें जो हवनका महत्व वर्णन किया है वह यज्ञ
बचाता है ।' अर्थात जो मनुष्य सत्यका पालन करता है गास्त्र में प्रसिद्ध है । यज्ञसे जनताकी भलाई, आरोग्य प्राप्ति
उसका बचाव परमेश्वर करता है। वस्तुतः सत्यसे ही उसका भादि होनेका वर्णन सब यज्ञशास्त्र कर रहे है । इस दृष्टिसे
बचाव होता है । सत्यका रक्षण साधन ऐसा है कि जिससे यह सूक्त एक भारोग्य प्राप्तिका नवीन साधन बता रहा है।
दूसरे किसी रक्षण साधनकी तुलना नहीं हो सकती, अर्थात् किस रोगके दूर करनेके लिये किस हवन सामग्रीका
यदि एक मनुष्य अपना बचाव सत्यके हाथोसे करता है हवन होना चाहिये इस विषयमे यहा कुछ भी नहीं कहा है
और दूसरा मनुष्य अपना बचाव नसाखोसे करता है तो परन्तु हवनका सर्व सामान्य परिणाम ही यहां बताया है।
सत्यसे अपना बचाव करनेवाला मनुष्य अधिक सुरक्षित हरएक रोगके दूर करने के विशेष प्रकार के हवनोंका ज्ञान
होता है, अपेक्षाकृत उसके कि जो अपने आपको शस्रोसे अन्यान्य सूक्तोसे प्राप्त करना चाहिये । वैदिक विद्याओको
रक्षित समझता है । सत्याग्रहसे अपनी रक्षा करना ब्राह्म- खोज करनेवालोके लिये यह एक बडा महत्वपूर्ण खोजका
बल है भोर शनानोमे अपनी रक्षा करना क्षात्रवल है। विषय है।
दीर्घायु, पुष्टि और सुमजा
कां. २, सू. २९
ऋषि.- अथर्वा । देवता- नानादेवताः।)
पार्थिवस्य रसें देवा भर्गस्य तन्वाई चले ।
आयुष्यामस्मा अग्निः सूर्यो वर्च आ धाबृहस्पतिः
॥१॥
आयुरस्मै घेहि जातवेदः प्र॒जां त्वष्टरधिनिघेह्यस्मै ।
रायस्पोष सविता सुवास्मै शतं जीवाति शरदस्तवायम्
॥ २॥
अर्थ- हे (देवाः) देवो । अग्नि सूर्य और वृहस्पति (अस्यै) इस मनुष्यके लिये (पार्थिवस्य तन्वः
भगस्य) पार्थिव शरीरके ऐश्वर्यके (रसे वले) रस और बलके अंदरसे प्राप्त होनेवाला (आयुष्यं वर्चः) दीर्घ
भायुष्य और तेज ( आ धात् ) देवे ॥१॥
हे (जातवेदः) ज्ञान देनेवाले देव । ( अस्मै आयुः धेहि ) इसको दीर्घ आयु दे । हे (त्वष्टः) रचना करने-
वाले देव (अस्मै प्रजा आधि निधेहि ) इसके लिये प्रजा दे। हे (सवित ) प्रेरक देव ' (अस्मै रायः पोपं
आ सुव ) इसके लिये धन और पुष्टि दे । (अयं तव शतं शरदः जविाति) यह तेरा बनकर सौ वर्ष तक जीवित
-
रहे।॥ २॥
भावार्थ- हे देवो इस मनुष्यको अग्नि, सूर्य, बृहस्पति आदि देवताओकी कृपासे ऐसा दीर्घ आयुष्य प्राप्त हो, कि
जिसके साथ पार्थिव ऐश्वर्य युक्त अन्न, रस, बल, तेज और नीरोग जीवन होते हैं ॥१॥
हे देवो ! इसको उत्तम सन्तान, ऐश्वर्य युक्त उत्तम पुष्टि भौर दीर्घ भायुष्य दो ॥२॥
(८१)
अथर्ववेदका सुबोध अनुवाद
दीर्घजीवन और आरोग्य'
॥४॥
आशीर्ण ऊर्जमुत सौप्रजास्त्वं दक्ष धत्तं द्रावण सचेतसौ ।
जयं क्षत्राणि सहसायमिन्द्र कृण्वानो अन्यानधरान्सपत्नान्
इन्द्रेण दत्तो वरुणेन शिष्टो मरुद्भिरुनः प्रहितो न आर्गन् ।
एप चौ द्यावापृथिवी उपस्थे मा झुधन्मा तृपत्
ऊमरमा ऊर्जस्वती धत्तं पयो अस्मै पयस्वती धत्तम् ।
ऊर्जमस्मै धानापृथिवी अंधातां विश्व दुवा मरुतु उर्जमापः
शिवार्भिटे हृदयं तर्पयाम्यनमीत्रो मौदिपीष्ठाः सुवीः ।
सवासिनी पिवतो मन्थमेतमश्विनी रूपं परिधार्य मायाम्
॥५॥
॥६॥
अर्थ- (न आशीः ) हम बागीर्वाद मिले तथा हे (सचेतसो) उत्तम मनवालो। (ऊर्ज उन सौप्रजास्त्वं)
वल तथा उत्तम सन्तान, (दर्श द्रविणं) दक्षता और धन हमें (धत्तं) दो। इन्द्र ! (अयं सहसा) यह भपने बळसे
(क्षेत्राणि जयं कृण्वानः) विविध क्षेत्रों और विजयको प्राप्त करता हुमा (अन्यान् सपत्नान अधरान् ) मम्म
गलोंको नीचे दबा दे ॥ ३ ॥
ग्रह (इन्द्रण दत्तः) प्रभु द्वारा दिया गया है, (वरुणेन शिष्टः) गासकके द्वारा शासित हुमा है, (मरुद्भिः
प्रहितः ) उन्माही बीरों द्वारा प्रेरित हुआ है और इस कारण (उग्रः नः आगन् ) उग्र बनकर हमारे पास आया है । हे
(द्यावापृथिवी) गुलोक और पृथिवी । (वां उपस्थे) भापके पास रहनेवाला (पपः) यह (मा धुक्षत् , मा
तृपत्) सुधा और नृपाने पीढिन न हो ॥ ४ ॥
है (ऊर्जस्वती) हे अन्नबाली ! (अस्मै ऊर्ज धत्तं ) इसके लिये अन्न दो, ( पयस्वती अस्मै पयः धत्तं)
है दूधवाली ! इमं लिय दूध दो। धुलोक और 'पृथ्वीलोक (अस्मै ऊज अधत्तां) इसके लिये बल देवें । तथा
(विश्वे देवाः मरुतः आपः) सब देव, मल्ल , जल ये सब इसके लिये (ऊर्ज) शक्ति प्रदान करें ॥ ५ ॥
(गिवाभिः ते हृदयं नर्पयामि ) कल्याणमयी विद्याओं द्वारा तेरे हृदयको मैं नृप्त करता हूं। तू (अनमविः)
नीगंग और (ग्नुवर्चा.) उत्तम नेजम्बी होकर (मोदिपीटाः) आनन्दित हो । (सवासिनो) मिलकर निवास
परनेवाले तुम दोनो (अश्विनोन्य ) अश्विदेवों रूपको और (मायां परिधाय) बुद्धि तथा कर्म गक्तिको प्रास हो
कर (पतं मन्य पिवतां) इस रसका पान करो ॥ ६ ॥
--
भावार्थ-हे देव आगीर्वाद दो ताकि हमें बल, सुप्रजा, दक्षता और धन प्राप्त हो । मनुष्य अपने निजवलसे विविध
कार्य अत्राम विजय प्राप्त करे और गलाको नीचे मुखवासा करके भगा देवे ॥३॥
यह मनुन्य परमामा द्वारा बनाया, गुरुके द्वारा मिश्रित और वीरों द्वारा उत्साहित हुमा है, इसलिये यह शूरवीर
बनकर हमारे अन्दर आया है और कार्य करता है । मातृभूमिकी उपासना करनेवाला यह वीर भूख भौर प्याससे कभी कष्ट-
को प्राप्त न हो।
मयं पिता और भूमि माता इसको अन्न, रस, बल और भोज देखें । जल आदि सब देव इसकी सहायता करे ॥ ५॥
शुभ विद्याओं द्वारा तेरे हृदयको तृप्त करता हूँ। तू नींगेग और तेजस्वी बन कर सढा भानंदित हो। मिलकर रहो
भार अपना मोदय, अपनी बुद्धि और कर्मकी गनि बढाकर हम रसको पी ॥ ६ ॥
दीर्घायु, पुष्टि और सुप्रजा इन्द्र एतो ससृजे विद्धो अन ऊजा स्वधामजरा सा त एषा । तया त्वं जीव शरदः सुवर्चा मा त आ सुस्रोद्भिपजस्ते अक्रन् ॥ ७ ॥ अर्थ-(विद्धः इन्द्रः) पूजित हुआ हुआ प्रभु (एतां अजरां ऊर्जा स्वधांअग्रे ससृजे) इस पक्षीण अन्न युक्त सुधाको उत्पन्न करता है । ( सा पपा ते) वह यह सब तेरे लिये ही है। (तया त्वं सुवर्चाः शरदः जीव) उसके द्वारा उत्तम तेजस्वी बनकर बहुत वर्ष जीवित रह । (ते मा आसुन्नोत् ) तेरा ऐश्वर्य न घटे (ते भिपजः अक्रन्) तेरे लिये वैोंने उत्तम रसयोग बनाये है ॥ ७ ॥ भावार्थ- प्रभुने ही यह बलवर्धक अमृतरस प्रारंभमें उत्पन्न किया है, इसका सेवन करके तेजस्वी और बलिष्ठ बनकर तू दीर्व भायुकी समातितक जीवित रह । तेरी भायुमे ऐश्वर्यकी न्यूनता कभी न हो और नेरे लिये वैद्य लोग उत्तम रसादि योग तैयार करें, जिससे तू नीरोग और स्वस्थ रहकर उन्नतिको प्राप्त हो ॥ ७ ॥ दीर्घायु, पुष्टि और सुप्रजा रस और बल सब देव मनुष्य मात्रके लिये अन्नादि भोग तैयार करने में दत्तचित्त होकर कार्य कर रहे है । । यही इन देवोकी पालक गरीर पार्थिव शरीर कहलाता है, क्योकि हमारा स्थूल गक्ति है, जो प्राणिमात्रका पालन कर रही है। यह पार्थिव परमाणुओका बना हुला है । पृथ्वीसे उत्पन्न होनेवाले विविध रसोंके सेवनसे इसकी पुष्टि होती है और 'अग्नि, सूर्य, वृहस्पति मादि सब देव पार्थिव ऐश्वर्यके रस- रसोके न मिलनेसे इसकी क्षीणता होती है अर्थात् गरीरका से और शारीरिक बलसे उक्त आयुष्य और तेज देते हैं। बल बढाना हो तो पार्थिव रसोंका सेवन करना अत्यंत भाव- यह प्रथम मंत्रका कथन उक्त तात्पर्य बताता है। इसलिये श्यक है । गरीरका ऐश्वर्य, बल, आयुष्य और तेज इस रस- दीर्घायु, आरोग्य और वलयुक्त तेज चाहनेवाले लोग सूर्यादि सेवनपर निर्भर है। देवोसे मिलनेवाले लाभ प्राप्त करे और उक्त गुणोंसे मन्नादि पार्थिव रसका पार्थिव शरीरके संवर्धन के साथ घनिष्ट संबंध रस लेकर अपना वल बढावें । यह प्रथम मत्रका बोध है है अतः उस पार्थिव रसको देनेवाले अग्नि, सूर्य आदि देवता- (मं १) भोंका संबंध भी गरीरसे होगा ही, क्योंकि अग्निकी उष्णता, सतायु सूर्य किरणोंका रसायनगुण और जलका रस इन सबका द्वितीय मन्त्र कहता है कि 'जातवेदसे सुप्रजा, सवितासे संमिश्रण हो कर ही पृथ्वीसे रस उत्पन्न होता है । इन सम्पूर्ण पुष्टि और धन प्राप्त करके यह मनुष्य सौ वर्ष जीवित रहता देवताओंके अंग इम रसमें होनेसे वह रस मानो देवतांगोंका ।' (म, २) इस मन्त्रमें दीर्घायु प्राप्त करनेकी युक्ति ही रस है । इसलिये उसके सेवनसे देवतामोके सत्वांशका ही बताई है । जातवेद, त्वष्टा और सविता ये तीन देव है कि सेवन होता है । जिस प्रकार गौ घास खाकर दूधरूपी जीवन जिनकी कृपासे दीर्घायु प्राप्त होती है । इसलिये इनका विशेष रस देती है, इसी प्रकार यह भूमि अपने योग्य पदार्थ सेवन विचार करना आवश्यक है- करके धान्य, फल, शाक, कंद, मूल भादि रूपसे रस देती १जातवेदः-(जात वेदस) जिससे वेद अर्थात् ज्ञान है । यपि यह रस भूमिसे उत्पन्न होता है, तथापि उसके यना है। जिससे ज्ञानका प्रवाह चला है । जिसके पास ज्ञान है साथ भाप, अग्नि, वायु, सूर्य, चंद्र आदि सब देवोका घनिष्ट और जिससे वह ज्ञान चारो ओर फैलता है। (जातं वेत्ति) जो संबंध है । यदि कोई वनस्पति सूर्य प्रकाशसे वंचित रखी बने हुए पदार्थ मात्रको जानता है अर्थात् पदार्थ मात्रके गुण- जाय भर्थात् ऐसे स्थानपर रखी जाय कि जहां सूर्य प्रकाश उसे धर्मोको जाननेवाला ज्ञानी । (जातस्य वेदः) उत्पन्न हुए न मिले तो वह दुर्बल हो जायेगी। अत. पृथ्वीसे रस उत्पन्न वस्तु मात्रका ज्ञान । इस भर्थमें यह शब्द पदार्थविद्याका करनेके साथ सूर्यादि देवोंका भी बडा भारी संबध है। ये वाचक है । किसी भी प्रकार विचार किया जाय तो यह शब्द - (८६) अथर्ववेदका सुबोध अनुवाद 'दीर्घजीवन और आरोग्य' ज्ञानवाचक स्पष्ट है। मंत्रमें कहा है कि यह मायु देता है, इससे पूर्व दो मन्त्रामें कहा है । उससे यह सय प्राप्त हो सकता है। स्पष्ट सिन्ह होता है कि 'ज्ञानी अथवा ज्ञानकी सहायताले इनके साथ साथ ध्यान रखने योग्य विशेष महत्वकी बात इस मायु बढाई जा सकती है । ' यदि आयु बहाना अभीष्ट हो मन्त्रमें कही है; उसको बतानेवाला मन्त्रमाग यह है । तो वस्तुमात्रका ज्ञान अर्थात विद्या प्राप्त करनी चाहिये और अयं सहसा जयं कृण्वानः क्षेत्राणि । (मं. ३) उस विद्याले अन्नरसादिकांका योग्य सेवन करके अपनी आयु यह अपने बलमे विजय प्राप्त करता हुमा क्षेत्रोंको प्राप्त बढानी चाहिये। करे ।' इस मंत्र भागमें (सहा) अपने अंदरके बलका उल्लेख २ त्वष्टा- बारीक करना, बारिकाईसे कार्य करना, कुश- है । 'सहः' नाम है 'निजबल' का, जिम बलसे गनुका लतासे कार्य करना, कारीगरीका कार्य करना इत्यादि कार्य हमला सहा जाता है, जिस बलंक कारण शत्रुके हमले होने करनेवाले का स्वष्टा नाम है । परमेश्वर एक बदा भारी कारी- पर भी वीरका नुकसान कुछ भी नहीं होता है उसका नाम गर है, इसलिये उसको त्वष्टा कहते है। अन्य कारीगर भी मह है। मनुप्यको यह महः' संज्ञक बल अपने अंदर छोटे त्वष्टा है। त्वष्टा इस मनुष्य के लिये प्रजा देवे ' यह बढाना चाहिये । यह बल जितना बढेगा उतनी ही विजय इस मन्त्रमागका कथन है योग्य सन्तति बनाना इसी प्राप्त होगी और विविध कार्य क्षेत्रों में उन्नति हो सकेगी। माधीन है, परमात्माफी कृपासे इसे योग्य और उत्तम मन्तति और इसीके प्रभावसे शत्रु परास्त होंगे। यदि बीरमें यह सह प्राप्त हो । जो मनुष्य कारीगरीके काया काल होता है, उस- हो, तो चाहे अन्य साधनोपमावन कितने भी पास में हो तो में सुन्दरताका ज्ञान अन्योन अधिक होता है, इसलिये ऐसे भी उनका कोई प्रभाव नहीं होता। इसलिये इस मंत्र भागने मनुस्यको सन्तान अन्योंकी अपेक्षा अधिक मुडौल होती है। जो 'सहः' सनक बल अपने अंदर बटानेकी सूचना दी है मातापिताके अन्दर सुन्दरताकी कल्पना जितनी अधिक होगी उसको ध्यानमे धारण करके, वह बल अपने अंदर बढावे और उतनी ही सुन्दरता अथवा सुढीलपन सन्ततिमें आता है। उसके माधारसे अन्न, वल, धन, सुसन्तान भादिके साय स्वष्टाले प्रजाका सम्बन्ध ग्रह है। विजय कमाव। ३ सविता-प्रेरणा देनेवाला और रसका प्रदान करने चतुर्थ मंत्रमें कहा है कि यह मनुष्य द्यावापृथिवीके अंदर जो वाला । सूर्य सबको जगाता है और वनस्पतियों में ग्सका सञ्चार आया है वह 'इन्द्रकी आज्ञाम, वरण द्वारा गासित होकर और झरता है, इसलिये उसका नाम सविता है । यह भूमिकं मरतों द्वारा प्रेरित होकर आया है, इसलिये यह यहां आकर ऊपर वनस्पति आदिको रस उत्पन्न करके प्राणियोकी (पोप) भूख और ग्याससे दुसी न बने ।' (मं. ४) प्रत्येक मनुष्य पुष्टि करता है और उनकी (रायः) गोमा या ऐश्वर्य भी अपने आपको इन देवों द्वारा प्रेरित हुआ समझे। इतने देव बढाता है। मनुप्यको प्रेरणा देने और उसकी रक्षा करनेवाले हैं, यह बात इस रीतिसे ये देव मनुष्यकी सहायता करते हैं और इसको मनमें धारण करनेस मनको शनि बढी प्रभावशाली बन जाती दीर्घजीवन देते है। मनुष्यों को चाहिये कि वह इससे यह लाम है। मेरे सहायकारी इतने देव है यह विश्वास बढा बल बढा- प्राप्त करें। नेवाला है। जिस मनुष्यकी उन्नति करनेके लिये इतने देव अन्न, बल, धन, सुसन्तान और जय कार्य करते हैं, भूमि, आप, अग्नि, सूर्य मादि देव इसके लिये अन्न तैयार करते हैं, बृहस्पति इसे ज्ञान देता है, जातवेदा नागे तृतीय मन्त्रमें मनु"यकी सम्पूर्ण भागांमाओका इसको विद्या देता है, सूर्य तेज देता है, अन्यान्यदेव इसकी वर्गन संक्षेपग्ने किया है। हम अन्न, बल, धन, सुसन्तान अन्य प्रकारकी सहायता करते है और रक्षा भी करते हैं, क्या और जय प्राप्त हो और गत्र नीचे दब जाय ।' यही सब ऐसा मनुन्य अपनी गनिसे चारों ओर विजय प्राप्त करके मनु'योगी मनोकामना होनी चाहिये । अन्दी मगरकी भूख अपने शत्रुओंको दूर नही कर सकता ? अवश्य कर सकता भान्त हानी है, उससे बन बढता है, धन हर एक व्यवहारका है, परंतु इसको कटिबद्ध होकर अपने पांवपर खंदा होना साधक दोनेने उसे मय चाहते ही हैं, इससे पश्चात् वंगविस्तार चाहिये। के लिये सुमन्तानकी अभिलापा मनुष्य करना है, इसके अन 'अन्नबाली भूमि इसे अन्न अर्पण करती है दूधवाली गौवें नर भपने विजया इच्छुक होता है । यह प्रोय. हरएक इमक लिये दूध देती है, द्यावा-पृथिवी इसके लिये बल बढाती मनुष्यको सप्टा है, परन्तु यह मिट्ट ने हो, इसका उपाय हैं और भाप देववा इसे वीर्य प्रदान करता है। (मं. ५) ।
दीर्घायु, पुष्टि और सुप्रजा (८७) सत्र - इसने देवता मनुष्यकी सहायता कर रहे है, कुछ न मागते और शुभ मगल कामनामोसे परिपूर्ण रखे। यह तो मंत सहायता देते हैं । इतनी सहायता परमात्माकी मंगलमयी करणके विशालचके विषयमें उपदेश हुआ । वाहरका व्य- योजनासे हो रही है ! इसके याद भी यदि मनुन्य अपना वहार कैसे करना चाहिये इस विषयमें इसी मन्त्रका उत्तरार्ध बहन बगावे भौर विजय न संपादन करे, तो फिर दोष देखिये- किसका? मनुन्यकी अपनी उन्नति के लिये कटिबद्ध ये सब देव सवासिनौ मायां परिधाय मन्थं पिवताम् । (म.६) उसके सहायक होते है और उसकी असंढ उन्नति हो सकती है। मिलकर एक स्थानपर रहते हुए कौशल्यको धारण करके रसका पान करो' इसमें निन्नलिखित उपदेशबोधक हृदयकी तृप्ति शब्द महत्वपूर्ण हैं- भन्न प्राप्त हो जाए, गरीरका बल भी बढ जाए, सतति भी १ स-वासिनौ- एकत्र निवास करनेवाले, समान बहुत हो जाए तथा अन्यान्य भोग और ऐश्वर्य भी मिल जाए. अधिकारसे एक स्थानपर रहनेवाले । उच्चनीच भेदको न तो भी हृदयकी तृप्ति नहीं हो सकती । जबतक हृदयकी तृप्ति नहीं होती तबतक भान्ति भी नहीं मिल सकती । इसलिये आचार व्यवहारसे रहनेवाले । बढाते हुए समान विचारसे इकट्ठे रहनेवाले । एक प्रकारके पूर्वोक्त मंत्री द्वारा अभ्युदयका मार्ग बताकर पष्ठम-मंत्रमे निःश्रेयसका मार्ग बताया जाता है । हृदयकी तृप्तिका मार्ग यह शब्द एकताका बल अपने समाजमें बढानेका उप- यह है। देश दे रहा है। परस्पर विप न बढे, अपितु एकताका बल बढे; यह भाव यहां स्मरण रखने योग्य है। ते हृदयं-शिवाभिः तर्पयामि । (मं ६) २ मायां परिचाय-मायाका अर्थ कुशलता, हुनर, 'तेरा हृदय मंगल वृत्तियोंसे नृप्त करता हूं।' गिवा कर्म करनेकी प्रवीणता, कौगल आदि है। शब्द बुद्धिशक्ति शब्द शुमताका वाचक है । जो मंगलमय है, वह शिव है, और कर्मगक्तिके लिए समानतया प्रयुक्त होता है । कुशल- फिर चाहे यह भावना हो, कामना हो या विद्या हो । जो तासे कार्य करनेकी बुद्धि और शक्ति धारण करनेकी सूचना शिव है उसीसे हृदयकी सन्तुष्टि होती है, किसी अन्य इस शब्द द्वारा मिलती है । जगत्का व्यवहार करनेके लिये भातसे नहीं । जब कभी बुरा विचार मनुष्य मनमें भाता यह कुशलता अत्यन्त आवश्यक है। कुशलताके बिना कार्य है, तब मन अशांत होजाता है और जब कभी शुभ भावना करनेवाला यशका भागी नहीं हो सकता। माती है, तय मन प्रसन्न हो जाता है। शुभ विचार, शुभ एकताके साथ, समताभावके साथ रहनेवाले और कुशल- उच्चार और शुभ आचार ही मनुप्यके हृदयको संतोप टे तासे कार्य व्यवहार करनेवाले लोगही भोगरूपी रसपान करके सकता है। शुभ विचार मादियोके मनमे स्थिर होनेसे मनु- ज्यका हृदय तृप्त, शांत भौर मगलमय हो जाता है । इस आनन्द प्राप्त कर सकते है। हृदयकी शोभन अवस्थासे मनुष्य दीर्घायु, नीरोग, तेजस्वी, स्वधा वर्चस्त्री तथा बलवान होता है और ऐसे शांतिपूर्ण मनुष्य- मत्र ७ मे कहा है कि " स्वधा, मजर और बलवती है, को ही सुसंतान प्राप्त होती है । हृदयको शांतिका इतना यह इन्द्र के द्वारा बनाई गई है, इसका सेवन करके तेजस्वी महत्व दिया है और हृदयकी भशातिसे बहुत हानि होती है। वनकर सौ वर्ष जीओ।" यह स्वधा क्या चीज है, इसका यही बात मागेके मंत्र भागमें कही है- विचार करना चाहिये- अनमीवाः सुवर्चाः मोदिपीष्ठाः । (मं. ६) स्व+धा" अपनी धारण शक्तिका नाम स्वधा है। 'नीरोग और उत्तम तेजस्वी होकर मानन्दित हो' जिस गक्तिसे अपने शरीरके विविध मणु इकट्ठे रहते हैं उसको अर्थात् पूर्वोक रीतिसे हृदयकी शान्ति स्थिर होनेसे मनुष्य स्वधा शक्ति कहते हैं। यह स्ववा शक्ति जितनी मनुष्यमें नीरोग और उत्तम तेजस्वी होकर आनन्दित हो सकता है, होती है उतनी ही उसकी आयु होती है। शरीरकी स्वधा- इसलिये मनुष्यको चाहिए कि वह अपने अंत करणको शक्ति कम होनेपर कोई भौषधि सहायक नहीं होती। जब- शान्त और मङ्गलमय बनावे और अशान्तिसे दूर रहे। तक यह स्वधागक्ति गरीरमे कार्य करती है तबतक ही मनुष्य मपित मशान्त भवस्थामें भी वह अपना अंतःकरण वान्त जीवित रह सकता, वढ सकता और विजय पा सकता है।
(८८)
अथर्ववेदका सुबोध अनुवाद
-'दीर्घजीयन और आरोग्य'
।
यह स्वधागक्तिका महत्त्व है। इसके बिना मृत्यु निश्चित है। प्यगणके सूनोमें कहे गए उपदेगोंके अनुकूस भाचरण करके
इसीलिये सप्तम मन्त्रमें कहा है कि “ यह स्वधागक्ति अजर मनुष्य अपनी स्वधागक्तिको बढावे और मनुष्यको प्राप्त
है" अर्थात् यह जरावाली नहीं है, इससे (जरा) बुटापा होनेवाले अनेक कार्यक्षेत्रोमें विजय कमावे तथा इस सूक्तके
जल्दी नहीं माता, वृद्ध आयुमें भी जवानी रहती है । यह पष्टम मन्त्रमे कहे गए उपदेशानुसार अपने अन्तःकरणको
स्वधा (उर्जा) बल बढानेवाली है, इमीकी सहायतासे शुभ भावसि गान्त और गंभीर बनावे भौर इहलोक तया
मनुष्य (सुवर्चाः) उत्तम कान्तिवाला तेजस्वी और प्रभाव- परलोकमे कृतकृत्य बने । यही-
शाली होता है और (शतं जीव ) सौ वर्षकी पूर्ण निरोग
मायु प्राप्त कर सकता है।
'हमारे लिये भागीर्वाद मिले'मौर निवरता भौर शान्ति-
इसलिये ब्रह्मचर्यादि सुनियमोंका पालन करके तथा आयु- का साम्राज्य हो ।
नः आशीः"
ही मुख्य छाति
कां. २, सू. २८
(ऋपि.- गम्भु । देवता.- जरिमा, आयु , मित्रावरुणी, द्यावापृथिव्यादयो देवाः ।)
तुभ्यमेव जरिमन्दर्धतामय मेममन्ये मृत्यवो हिंसिपुः शतं ये ।
मातेचे पुत्रं प्रमंना उपस्थे मित्र एनं मित्रियोत्पात्वहसः
मित्र एनं वरुणो वा रिशादा जरामृत्युं कृणुतां संविदानी
तग्निहोतो वयुनानि विद्वान् विश्वा देवानां जनिमा विवक्ति
॥ १॥
॥२॥
।
(इमं ये
-
अर्थ- है (जरिमन् ) वृद्धावस्था ! (तुभ्यं एव अयं वर्घताम् ) तेरे लिये ही यह मनुष्य
बढे
अन्ये शतं मृत्यवः) इसकी जो ये सौ अपमृत्युएं हैं वे इसकी (मा हिंसिपुः) हिंसा न करें । (प्र-मानाः माता पुत्र
उपस्थे इच) प्रसन्नमनवाली माता पुत्रको जैसे गोदमे लेती है उसी प्रकार (मित्रः मित्रियात् एनसः एनं पातु) मित्र
मित्र सम्बन्धी पापसे इसको बचावे ॥१॥
(मित्रः रिशादसः वरुणः वा) मित्र और शत्रुनाशक वरुण (संविदानी एनं जरामृत्युं कृणुतां) दोनों
मिर कर इसको वृद्धावस्थाके पश्चात् मरनेवाला करें। (होता वयुनानि विद्वान् अग्निः) दाता और सब कौंको ययावत्
जाननेवालरा अग्नि (तत् विश्वा देवानां जनिमा विवक्ति) उसको सब देवोंके जन्मोको कहता है ॥२॥
भावार्थ- मनुष्य पूर्ण वृद्धावस्यातक दीर्वायुषी होवे। बीचमें सेंकडों अपमृत्यु प्रयत्न करनेपर भी इसे न मार सकें।
जिस प्रकार अपने प्रियपुत्रको माता गोढमें लेकर प्रेमसे पालती है, उसी प्रकार सयका मिन देव इस पुरुषको मित्र संबंधी
पापने बचावे ॥१॥
गग्रुनागक मित्र और वरुण ये मिलकर इसको दीर्व भायुवाला करें। सव चारित्र्य जाननेवाला तेजस्वी देव इसको सब
देवताभोंकि जीवनचरित्र फहे ॥ २ ॥
दीर्घायुष्य प्राप्ति (८५) त्वमाशिषे पशूनां पार्थिवानां ये जाता उत वा ये जनित्राः । मेमं प्राणो होसीन्मो अानो मेमं मित्रा बधिपुर्मो अमित्रा: ॥३॥ चौष्टी पिता पृथिवी माता जरामृत्युं कृणुतां संविदाने । यथा जीवा अदितेरुपस्थे प्राणापानाभ्यां गुपितः शतं हिमाः ॥४॥ हुममम आयुपे वर्चसे नय प्रियं रेतौ वरुण मित्रराजन् । मावास्मा अदिते शमै यच्छ विश्वे देवा जरदष्टियथासत् अर्थ- (ये जाताः उत वा ये जनित्राः) जो जन्मे हैं और जो जन्मनेवाले हैं उन (पार्थिवानां पशूनां त्वं ईशिपे) सभी पृथ्वीके ऊपर के रहनेवाले प्राणियोंका तू स्वामी है। (इमं प्राणः मा, अपानः च मा हासीत्) इसको प्राण भौर भपान न छोडे। तथा (मित्राः इमं मा वधिपुः) मित्र इसे न मार और (मा अमित्राः) गत्रु भी न मारें ॥३॥ (योः पिता पृथिवी माता संविदाने) घोप्पिता और पृथ्वी माता मिलकर (त्वा जरामृत्युं कृणुतां) तुझको वृद्धावस्था पश्चात् मग्नेवाला करें। (यथा अदितेः उपस्थे) जिससे तू भी मातृभूमिको गोदमे (प्राणापानाभ्यां गुपितः) प्राण और अपानसे सुरक्षित होकर (शत हिमाः जीवाः) सौ वर्षतक जीवित रह सके ॥ ४ ॥ हे (अग्ने मित्र वरुण राजन् ) अग्ने और मित्र तथा वरुण राजा ! (प्रियं रेतः) प्रिय भोग और वीर्यका बल देकर (इमं आयुपे वर्चसे नय ) इसको दीर्घ आयुष्य और तेज प्राप्तिके लिये ले जा । हे (अदिते) आदिशक्ति ' तू (माता इव अस्मै शर्म यच्छ) माताके समान इसे सुख दे । हे विश्वे देवो ! (यथा जरदष्टिः असत्) यह मनुष्य जिससे वृद्धावस्थातक जीवित रहे वैसी सहायता करो ॥५॥ भावार्थ- हे ईश्वर ! तू पृथ्वीपरके संपूर्ण जन्मे हुए और जन्मनेवाले सब प्राणियोंका स्वामी है, तेरी कृपासे प्राण गौर नपान इसे बीचमें ही न छोड़ें तथा मित्रोसे या शत्रुओसे इसका वध न होवे ॥३॥ युपिता सूर्य और मातृभूमि ये दोनो मिलकर इसको दीर्घ आयुतक जीवित रखें और यह मनुष्य अपनी मातृभूमिकी और अपानोंसे सुरक्षित होता हुमा सौ वर्षकी दीर्घ आयुतक जीवित रहे ॥ ४ ॥ हे अग्ने वरुण मित्र राजन् । इसको प्रिय भोग और वीर्यका यल देकर दीर्घ मायुसे युक्त तेजस्वी जीवन प्राप्त कराभो । मादिशक्ति माताके समान इसे सुख देवे । और अन्यान्य सब देव इसकी ऐसी सहायता करें कि यह सुखसे दीर्व भायु प्राप्त कर सके ॥ ५॥ गोदमें प्राण । । दीर्घायुष्य प्राप्ति दीर्घ आयुष्यकी मर्यादा 'जो सैंकडो अपमृत्यु है वे इसको बीचमें ही न मार सकें। 'मर्थात् सौ वर्षके पूर्व कोई अपमृत्यु इसका नाश 'शतायु' शब्द दीर्घ आयुप्यकी मर्यादा यता रहा है। इस सूक्तके ( म. ४) मे भी (शतं हिमाः जीवाः) न कर सके । बीचमे किसी किसी समय कोई अपमृत्यु इसके 'सी वर्षतक जीवो' कहा है इससे सौ वर्षकी दीर्घायु प्राप्त पास आ भी जाए तो भी वह इसके पास सफल मनोरथवाली करना, इस सूक्तका उद्देश्य है। छोटी भायुके बालकको यह न हो सके, यह यहां कहना है । लोग दीर्घ आयु प्राप्त करने भागीर्वाद दिया जाता है और सब दिलसे चाहते है कि वह के लिये ऐसे दृढ व्रती हो और खान पान भोग व्यवहारादिके सौ वर्षतक जीवित रहे । तथा नियम ऐसी दक्षतासे पालन करें कि वे बीच हीमे मृत्युके ये अपेग मृगाः ते इमं मा हिंसिपुः । (म.) वशमें न चले जाय । १२ [भथर्व. भा. ४ हिन्दी] अथर्ववेदका सुबोध अनुवाद 'दीर्घजीवन और आरोग्य' कहा है- . इनका कार्यक्षेत्र उनका विचार यहां करनेफी मावश्यकता नहीं है। प्राण साधन दीर्घजीयन प्राप्त करनेका साभन चतुर्थ मनमें संक्षपसे अपानके बलने अपने आपको सुरक्षित करना यह एक मात्र मनुष्ठान यहां इस कार्यके लिये इस सूक्तने बताया है मौर वह योग्य ही है। प्राणापानाभ्यां गुपितः शतं हिमा क्षीधाः (मं. ४ ४) ये दोनों कार्य ठीक प्रकार होने कगे, तो गौचशुद्धिक और अपानसे रक्षित होता हुमा सौ वर्ष जी।' संबंधमें कोई क्लेश नहीं होंगे, भूस भी उत्तम लगेगी, इस मंत्र भागमें दीर्घनीवनका साधन कहा है। यदि छातीमें भी कोई कफादिकी बाधा नहीं होगी। इस प्रकार उसका विचार मनुष्य करेगा, तो प्रायः वह दीर्घायु प्राप्त शरीरक सय व्यवहार विना कष्ट होने लगें, तो सममना कर सकेगा । प्राण और क्षपानसे सुरक्षितता प्राप्त करनी चाहिए कि दीर्घायुकी प्राप्तिकं मार्गपर अपने पग पढ रहे चाहिये । अर्थात् प्राणका और अपानका चल अपनेमें बढाना है। परंतु यदि इनके कष्ट होने लगे तो समप्रना योग्य है, चाहिये । नाभिके ऊपर प्राणका राज्य है और नीचे भपा- कि अपने पग दूसरे मार्गपर पर रहे है। यही तृतीय नका राज्य है। ये ही गरीरमें मित्र और वरण हैं। इनका मंत्रमें कहा है- उल्लेस इसी सूक्तमें अन्यत्र (मं. २, ५ में) पाठक देख सकते हैं । इसी एक सामनासे मनुष्य दीर्घ भायु प्राप्त कर इमं प्राणः मा हासीत्, मा अपानः। (मं. ३) सकता है। 'प्राण अथवा पान इसे धीचमें ही न छोड दें। 'भर्थात् यह मनुष्य सौ वर्षकी पूर्ण मायुतक उत्तम प्रकार जीवित रहे और इसके गरीरमें अन्ततक प्राण और अपना अपना श्वास और उच्छ्वास रूप प्राणका कार्य हमें प्रत्यक्ष कार्य ठीक रीतिसे करते रहें। जो पाठक अपने स्वास्थ्यके संबंध दिखाई देता है । प्राणायामसे इस प्राणका घल यढता है में विचार करते है उनको अपने अंदरके प्राण और अपानके और इनकी सब क्रियाएं भी ठीक प्रकार चल सकती हैं। कार्यमा विचार करना चाहिये, क्योंकि इन कार्यों ठीक तरह साधारण भस्रा और उज्जायी प्राणायाम इस अनुष्टानके चलते रहने पर ही गरीरका स्वास्थ्य ठीक रह सकता है। लिये पर्याप्त है। मना प्राणायाम धोकनीकी गतिके समान वेगसे श्वास उच्छ्वास करनेसे होता है। यह थोड़े समय स्वास्थ्यकी तथा दीर्घ आयु प्राप्त होनेकी यह कुंजी है। तक ही होता है । अधिक होनेवाला सुगम प्राणायाम उज्जायी (प्राणापानाभ्यां गुपितः) प्राण और अपान द्वारा जो है । जो स्वरयुक्त और शांत वेगसे श्वासोच्छ्वास नाकसे कर- सुरक्षित होता है, वह निश्चयसे सौ वर्ष जीवित रहेगा। इस नेसे होता है । श्वासका भी गब्द हो और उच्छ्वासका भी लिये दीर्घायुष्यके इच्छुक लोग अपने शरीरके अंदर इन दोनो हो । कुम्भकका करना न करना इच्छा पर है । यह अति- बलोको पढावें । सुगम और सुसाध्य प्राणायाम है और विना मायास जिस वध ममय चाहे हो सकता है। यह सौम्य होता हुआ भी प्राण भपान भी चलवान् रहें भौर दारीर स्वास्थ्य भी कार्यके लिये अति उपयोगी है। उत्तम रहे तो भी वध, कतल, अपघात आदि भापत्तिया है इस प्रकार प्राणके यल बढानेका अनुष्ठान होनेसे इसीका जिनसे मनुष्यकी मृत्यु हो सकती है। धर्मयुद्धादि प्रसंग परिणाम अपान क्षेत्र पर भी होता है। और अपानके कार्य छोड दिये जाय, क्योकि वहां जाकर मरना तो धर्म ही होता भी उत्तम रीतिसे होने लग जाते हैं। मपानके कार्य मल- है, तो भी अन्य वध कम नहीं हैं। परंतु इनको हटाना मनुप्यके मत्रोन्सर्ग और कोष्टगत वायुका नीचे भागसे गमन आदि साधीन नहीं होता। कई प्रसंगोमें अपने अंदर अहिंसा है, वे इसमे होते है। अन्यान्य योगसाधन भी सुविज्ञ साध भाव बढाने और सार्वत्रिक प्रेमदृष्टिकी वृद्धि करनेसे वातक पले जान जा सकते हैं। लोगोंके मनका भी सुधार होता है, परंतु यह सिद्धि योगा- इस योजनासे प्राण और भपानका पल बढानेसे दीर्घ- नुष्टानसे और दीर्घ लात्मसंयमसे साध्य है। इसलिये सबको आयु प्राप्त करनेका हेतु सिद्ध हो सकता है। हित मित पथ्य यह प्राप्त होना कठिन है । मत. सर्वसाधारणके लाभार्थ ईग- भोजन, मयमति, ब्रह्मचर्य भादि जो धर्ममार्गके साधन प्रार्थना ही एक सुगम साधन है, इसीलिये मंत्र ३ मे कहा हैं, हरएक मवस्मामे मावश्यक है ये सर्व साधारण होनेसे है कि- वीर्घायुष्य प्राप्ति (९१) इंशप्रार्थना पहिले उपदेशकके गुण कहे हैं, उपदेशक दाता उदार मन- इमं मित्रामा बधिपुः मा अमित्राः । (मं. ३) वाला होवे, अपने सर्वस्वका (होता) हवन करनेवाला हो, ' हे ईश्वर । तेरी कृपाले मित्र इसका वध न करें और विद्वान्) कर्तव्याकर्तव्यको यथावत् जाननेवाला हो। इसी (अग्निः) अग्निक समान तेजस्वी हो और (वयुनानि भमिय भी वध न करें ।' तृतीय मत्र परमेश्वर प्रार्थना विष- प्रकारका प्रबुद्ध उपदेशक लोगोका मार्गदर्शक बने, लोगोको यक ही है, 'भूत भविष्य कालंक सन प्राणियोंका एक ईश्वर धर्म मार्गका उपदेश करे और लोगोको (देवानां जनि- है, सबका पालन वहीं करता है, उसीकी कृपासे इस मनु- मानि) देवताओके जीवन चरित्र सुनावे । देवोंने अपने म्यका वध न होवे भऔर इसका स्वास्थ्य भी उत्तम रहे । जीवनमे कैसे शुभ कर्म किये, किस रीतिसे परोपकार किया, यह तृतीय मंत्रका भाव ईग प्रार्थनाका यल प्राप्त करनेकी जनताका उदार कैसे किया इत्यादि सभी बातें लोगोको सूचना देता है । सब चराचर जगत्का पाइनहारा परमात्मा समझा देवे । राक्षसों और पिशाचोके जीवन चरित्र पढने है, उसकी भकि करनेने जो श्रद्धाका बल बढता है, वह नहीं चाहिये अपितु देवोके दिव्य चरित्र ही अपने सामने भपूर्व है । अढावान् लोग ही उस बलका अनुभव करते है। रखने चाहिये । भादर्श जीवन देवोका हुआ करता है। राक्षस मौर प्रायः यह अनुभूत है कि श्रद्धा भक्तिसे परमात्म-भक्ति भौर पिशाचो, यूतों और दाभोका जीवन तो न सुनने करनेवाले उपायक उत्तम स्वास्थ्यसे संपन्न होते हैं। इसलिये योग्य होता है। यही उच्च जीवन मनुष्य अपने सामने आदर्श- इस दीर्घायुष्य प्राप्तिके सूकमे (त्वं ईशिये) इस तृतीय के लिये रखेंगे तो उनके जीवनोका भी सुधार होगा और मंत्र द्वारा जो ईन भक्तिका पाठ दिया है वह दीर्घ भायु प्राप्त उनकी भायु भी वढेगी । आयु बढानेके लिये भी यह एक करनेके लिये अत्यन्त आवश्यक है। इस नलंक प्राप्त होनेपर उत्तम साधन है कि लोग श्रीरामचंद्रका जीवन अपने आदर्श ही अन्य साधन लाभकारी हो सकते है और इस बलंक न के लिये लें और रावणका जीवन न लें । आजकलकी उपन्या- होनेकी अवस्थामे पासमें अन्य साधन कितने भी हो तो भी सादि पुस्तकोसे, जो मानवी अंत.करणका ही बिगाड कर रही वे इतना लाभ नहीं पहुंचा सकने । हैं, बचनेकी सूचना यहा वेदने दी है। इसका पालन जितना देवचरित्र श्रवण हो सकता है उतना लाभकारी होगा। दीर्घ भायु प्राप्त करनेके लिये श्रवण भयया पठन देवता- आजकल जो चरित्र मिलते हैं वे मनके विकार वढानेवाले ओंके चरित्रोंका ही करना चाहिये । देवो अर्थात् देवताके मिलते है। सयमशीलता यदानेवाले चरित्र कम है। इस समान सत्पुरुषोंके जीवन चरित्र श्रवण करने चाहिये। लिये सद्ग्रंथ पठन यह एक आजकल दुःसाध्य बात हो रही है। तथापि ऋषियोंकी कृपासे रामायण महाभारत ग्रंथ तथा आजकल उपन्यास मादि पुस्तकें ऐसे घृणित कथा कला- अन्यान्य ऋषिप्रणीत चरित्र है, उनका मनन करनेसे बहुत पोसे युक्त प्रकाशित हो रही है कि जिनके पठन पाठनसे पढ- लाभ हो सकता है। जो लोग इस बातको आवश्यक समझते नेवालोंमें रागद्वेप बढते है, वीर्य भ्रष्ट होता है, ब्रह्मचर्य टूट है उनको उचित है कि वे ऐसे सच्चरित्र अथवा श्रेष्ठ ग्रंथ जाता है और नाना प्रकारकी आपत्तियां बढ जाती है । परंतु निर्माण करें और करावे कि जिनके पठन पाठनसे आगामी ये पुस्तकें आज कल बढ रही है, अपने देशमें क्या और इतर संतान सुधारके पथपर सुगमतासे चल सके। अस्तु । इस देशोंमें क्या हीन दर्जेक लोगोके लेखन व्यवसायमे आनेके मंत्र भागने 'दिव्यचरित्रीका श्रवण और मनन' यह एक कारण साहित्य भी हीन होता जा रहा है, इससे सब प्रका- साधन दीर्घायुष्य प्राप्तिके लिये कहा है वह अत्यंत आवश्यक रकी हानि ही हानि हो रही है, इससे वचनेके उद्देश्यसे इस है, इसलिये जो दीर्घायु प्राप्त करना चाहते है वे ऐसे चरि- सुनने सावधानीकी सूचना द्वितीय मंत्रमे दी है, देखिये- ब्रोका ही मनन करें। वयुनानि विद्वान् होता अग्निः पापसे बचाव तत् विश्वा देवानां जनिमा विवक्ति । (मं.२) दीर्घ भायुष्य प्राप्त करनेके लिये पापसे अपना बचाव कर- 'सब काँको यथावत् जाननेयाला दाता भग्निके समान नेकी मावश्यकता है। पापसे पतन होता है और रोगादि तेजस्वी उपदेशक सब देवोके जीवन चरित्र उसे सुनावे । पढ जानेके कारण आयु क्षीण ही होती है, इसलिये इस सूक्त यह मंत्र कई दृधियोसे मनन करने योग्य है। इसमे सबसे के पहिले ही मंबने पापले पबनेकी सूचना दी है, देखिये- , - ।
(९२) अथर्ववेदका सुबोध अनुवाद -- 'दीर्घजीवन और आरोग्य' मित्र एनं मित्रियात् अंहसः पातु । (मं. १) हो और वीर्य के सब कार्य भी बन नाय और यह सब दीर्घायु 'मित्र हम मनुष्यको मित्र संबंधी पापसे बचाव ।' शत्रु- और तजेकी प्राप्तिमें याधा न डाल सकें । अपने कार्य इस के संबंध होनेवाले पापसे तो बचना ही चाहिये । कई लोग सूचना अनुसार करने चाहिये । रेनके योग्य उपयोगसे मनमे ऐसा मानते हैं कि मित्रके हित साधनके लिये कुछ संतानोत्पत्ति भी होती है, बल भी बढ़ता है, परंतु उसके अतिरेकसे ब्रह्मचर्य नाग द्वारा नाना प्रकारके कष्ट उत्पन्न होते भी बुरामला किया जाय तो भी वह हानिकारक नहीं है। परंतु पाप नो हमेगा पाप ही होता है चाहे वह किसी के लिये भी है। इसी प्रकार अन्यान्य भोगकी बातोंक विषयमें समझना किया जावे, जब पापाचरण होगा तब उसका गिरावटका परि- योग्य है । इस आशयको ध्यानमें धारण करके यदि मनुष्य णाम अवश्य ही भोगना होगा । इसलिये जो मनुष्य दीर्घ अपना व्यवहार करेंगे तो उनको भोग भी प्राप्त होंगे और दी भायुष्य प्राप्त करने के इच्छुक है उनको अपने आपको पापसे मायु भी मिलेगी। बचाना चाहिये । मित्र अपने मित्रको पापकर्म करनेसे रोने देवांकी सहायता और उसका सीधे धर्म मार्गपर चलानेकी सलाह देवे । मनुष्य स्वय भी विचार करके जाने कि पाप कर्मसे पतन अवश्य १ मित्रः रिशादसो वरुणः संविदानी होगा, इसलिये हरएक मनुष्य अपना स्वयं मित्र बने और जरामृत्युं कृणताम् । (मं. २) अपने आपको बुरे मार्गसे बचाये। मनुष्य स्वय ही अपना २ द्यौष्पिता पृथिवी माता संविदाने मित्र और अपना शत्रु होता है इसलिये कभी ऐसा कार्य न त्वा जरामुत्युं कृणुताम् (मं. ४) करे कि जिमसे स्वयं अपना यात्रु बन जाय । तात्पर्य यह है ३ अदिते ! माता इव शर्म यच्छ । (मं. ५ ५) कि यदि दीर्व भायुष्य प्राप्त करना हो तो अपने आपको ४ विश्वे देवाः । जरदष्टिः यथा असत् । (मं. ५) बचाना चाहिये । पाप कर्म करते हुए दीर्घ भायुप्य प्राप्त करना सम्भव है। 'मित्र और शत्रुनाशक बरण ये दोनों मिलकर इमकी मायु दीर्घ करें ॥ धुलोक और मातृभूमि मिलकर इसकी माय दीर्य करें ॥ हे अविनागी आदि शक्ति। व मनुष्यको भोग भी चाहिये और पराक्रम भी करना चाहिये। समान सुस दे ॥ हे सय देवो । इसको पूर्ण भायुवाला भति- परंतु भोग बहुत भोगनेसे रोग वढते हैं और वीर्यका मंयम करनेने ही मारोग्य पूर्ण दीर्व भायु प्राप्त हो सकती है । मनु- प्यका भोग प्रिय लगते हैं और भोगोम अपने वीर्यका नाश देव इसकी आयु दीर्घ करने में सहायक हो, यह प्रार्थना की है। यहा मित्र, वरुण, सूर्य, पृथिवी, अदिति भौर सब भन्य करना साधारण मनुष्य के लिये एक सहज ही सी बात है, इससे स्पष्ट होता है कि दीर्घ आय चाहनेवाले मनुष्यको इन इसलिये इसका योग्य प्रमाण होना चाहिये यह बात पंचम साय विरोधी बर्ताव करना चाहिये । यदि इनकी मत्रमं स्पष्ट की गई है, देखिये- अनुकूलतासे आयुग्यकी वृद्धि होनी है तो उनके साथ विरोध इमं प्रियं रेतः आयुपे वर्चले नय । (मं. ५) करना योग्य नहीं । सूर्यदेव अपन प्रकागसे सर्वत्र शुद्धता इस मनुष्यको प्रिय भोग ढेकर, तथा वीर्य पराक्रम भी करता है और हम दीर्घ श्रायु देता है, सूर्य प्रकाशसे वंचित देकर दीर्घ आयुग्य साथ प्राप्त होनेवाले तेजके लिये ले नहीं रहना चाहिये, अन्यथा वह हमें सहायता कैसे पहुंचा- चलो ।' अर्थात यह मनुन्य अपने लिये प्रिय भोग भी येगा' वरणढव समुद्रका देव है, समुद्रगजल, वृष्टिजल, सामा योग्य प्रमाण मागे और बीय रक्षण द्वारा पराक्रम भी करे, परंतु यह पत्र ऐग सुयोग्य प्रमाणमें हो कि जिससे उसका अपनी निर्मलता करे अथवा अन्य रीतिसे लाभ उठावे तभी न्य जल उसीके जीवन सागर हैं। यदि मनुष्य इन जलोंसे आयु और नेज बढ़ता जाय । परतु भोग भोगने और वीर्य जलदेव बरणसे लाभ प्राप्त हो सकता है। मातृभूमिकी कार्यमें प्रमाणमा अतिरेक कभी न हो, जिपये वीच हीमें अकाल योग्य उपासना करनेखे जो राष्ट्रीय स्वातंत्र्य प्राप्त होता है, मृत्यु हमर प्राणीको ले जाय । अपना समय भोग और परा- उससे मनुष्य कार्यक्षम और दीर्घजीवी हो सकता है, इसी स्मक कार्योक दिय ऐसा बाटना चाहिये कि भोग भी प्राप्त प्रकार अन्यान्य देवोका सबध है। भोग और पराक्रम माताक - -
तेजस्विता, मन और दीर्घायुष्यफी प्राति
तेजस्विता, बल और दीर्घायुकी प्राप्ति
कां. १, सु. ३५
(ऋषि:- अथर्वा आयुःकाम । देवना- हिरण्य, इन्द्राप्नी, विश्वेदेवाः ।)
यदानन्दाक्षायणा हिरण्यं शतानीकाय सुमनस्यमानाः ।
तत्तै बनाम्यायपे वर्चसे बलाय दीर्घायुत्वार्य शतशारदाय
नैनं रथामि न पिशाचाः संइन्ते देवानामोजः प्रथमजं होईतत् ।
यो विभर्ति दाक्षायणं हिरण्यं स जीवेषु कृणुते दीर्घमायुः
अपां तेजो ज्योतिरोजो बलं च वनस्पतीनामुत वीर्याणि ।
इन्द्र इवेन्द्रियाण्यधि धारयामा अस्मिन्तद्दक्षमाणो विभरद्धिरण्यम्
॥ १ ॥
॥ २॥
॥३॥
अर्थ-(सुमनस्यमाना' दाक्षायणाः) शुभ मनवाले और बल्की वृद्धि करनेवाले श्रेष्ठ पुरुष (शत अनी-
काय ) बलके मौ विभागोंके संचालक पर ( यत् हिरण्यं अवघ्नन् ) जो सुवर्ण वाधते रहे (तत्) वह सुवर्ण (आयुपे
वर्चसे ) जीवन, तेज, (वलाय) बल और ( शतशारदाय दीर्घायुत्वाय ) मी वर्षकी दीर्घ आयुके लिये (ते
वनामि ) तेरे ऊपर बांधता हूं ॥ १ ॥
(न रक्षांसि न पिशाचाः) न राक्षस ही और न पिगाच ही (एनं सहन्ते) इस पुरुषका हमला सह सकते
हैं (हि) क्योकि ( पतत् देवानां प्रथमजं ओजः ) यह देवोंसे प्रथम उत्पन्न हुभा सामर्थ्य है । (यः दाक्षायणं
हिरण्यं विभर्ति ) जो मनुष्य दाक्षायण सुवर्ण धारण करता है (सः जीवेषु आयुः दीर्घ कृणुते) वह जीवोमें भपनी
भायु दीर्घ करता है ॥२॥
(इन्द्रे इन्द्रियाणि इव) जैसे आत्मामे इन्द्रिय रहती है। (अपां तेजः ज्योतिः ओजः वलं च) उसी प्रकार
जलके तेज, कान्ति, पराक्रम और बल (उत) तथा ( वनस्पतीनां वीर्याणि) औपधियों के सब वीर्य (अस्मिन् अधि
धारयामः) इस पुरुषमे धारण कराते हैं। इस प्रकार (दक्षमाणः हिरण्यं विभ्रत्) बल बढानकी इच्छा करनेवाला
सुवर्णको धारण करे ॥३॥
-
भावार्थ-बल बढानेवाले और मनमें शुभ विचारोंकी धारणा करनेवाले श्रेष्ठ महात्मा पुरुष सेना-सञ्चालकके देहपर
बलवृद्धि के लिये जिस सुवर्णके भाभूपणको लटका देते हैं, वही भाभूषण मैं तेरे शरीरपर इसलिये लटकाता हूं कि इससे तेरा
जीवन सुधरे, तेज बढे, बल तथा सामर्थ्य वृद्धिंगत हो और तुझे सौ वर्षकी पूर्ण आयु प्राप्त हो ॥ १ ॥
यह भाभूपण धारण करनेवाले वीर पुरुषके हमलेको राक्षस और पिशाच नहीं सह सकते । वे इसके हमलेसे घपरा
कर दूर भाग जाते है, क्योकि यह देवासे निकला हुमा सबसे प्रथम दर्जेका बल ही है। इसका नाम दाक्षायण अर्थात् बल
बढानेवाला सुवर्णका भाभूपण है । जो इसको धारण करना है वह मनुव्योमे सबसे अधिक दीर्घ भायु प्राप्त करता है ॥ २ ॥
हम सब इस पुरुषमे जीवनका तेज, पराक्रम, सामर्थ्य और बल धारण कराते हैं । और साथ साथ औषधियोसे नाना
प्रकारके वीर्यगाली बल भी धारण कराते हैं। जिस प्रकार इन्द्रमे अर्थात् भात्मामे इद्रिय शक्तिया रहती है, उसी प्रकार इस
सुवर्णका भाभूषण धारण करनेवाले मनुष्यके अन्दर सब प्रकारके बल रहे ॥३॥
(५१) अथर्ववेटका सुबोध अनुवाद दीर्घजीवन और आरोग्य' मानां मामामृनुभिष्ट्वा वयं संवत्सरस्य पर्यसा पिपर्मि । इन्द्रामी विश्वे देवास्तेऽर्नु मन्यन्तामहणीयमानाः ॥४॥ अर्य- (समाना माना जानुभिः ) सम महिनाकी ऋनुओंके द्वारा (संवत्सरस्य पयसा) यर्परूपी गौके दूधसे (या वयं पिपमि ) नुहम सर पूर्ण करते हैं । (इन्द्रानी) इन्द्र और भग्नि (विश्वे देवाः) तया सब देव (भ- रणीयमानाः) संकोच न करते हुए (ने अनु मन्यन्तां) वेरा अनुमोदन करें ॥ ४ ॥ भावार्थ- दो दो मरिनोका एक एक ऋतु होता है। प्रत्येक ऋतुकी गक्ति भलग अलग होती है, मानो संवन्सररूपी गंका दुभती ग्यमानी है अनुहोम निचुदा हुभा है। यह दृध मनुष्य पीवे और बलवान बने । इसकी भनुकूलता इंद्र, भनिनमा सय देव ॥ ४ ॥ R . तेजस्विता, बल और दीर्घायुष्यकी प्राप्ति दाक्षायण हिरण्य रहता है और मृत्युके समयतक साथ देता है। इस प्रकारकी सुवर्णने अनेक रोगोंसे मुक्तता होती है। इस रीतिसे धारण हिरण्य मा भयं सुवर्ण अथवा मोना है, यह परिशुद्ध किया हुआ सुवर्ण मरनेपर उसके जलानेके बाद शरीरकी friबयर होना। यह पेटम भी लिया राससे सबका सब मिलता है। अर्थात् यदि किसी पुरुषने और वारसा भी धारण स्थिा जाता 7 श्री. साराचा रिय अदा दो अर्थ देने - हितरमणीय एक तोला सुवर्ण वैद्यकीय रीनिसे सेवन किया तो वह तोला भर सुवर्ण मृत शरीरक दाह होनेके पश्चात् उसके सम्बन्धि- एयरमणायं' गर्वान या नुवर्ण दिनकारक नीर रमणीय योको प्राप्त हो सकता है। हम प्रकार कोई हानि न करता यसी रमणायना यदानधागा तुवर्ण पलवर्धक मा मगर मयि भागम्य घाग्नेगाले, इसका उप- हुमा यद्द सुवर्ण बल और भारोग्य देता है। पर arti जो वैद्य इस सुवर्ण धारण विधिको जानते हैं उनका नाम १२ मा 'दाक्षायण'म ( दक्ष अयन ) अर्थात दामायण' प्रथम मन्चने कहा है। इस प्रकारका परिशुद्ध सुवर्ण बलवर्धक होनेसे उसका नाम भी 'दाक्षायण' है यह न मन में प्रयुक्त हुना HER मग स: मनुप्यांका पण और द्वितीय यात द्वितीय मन्त्रमे बतायी है । जो मनुष्य इस प्रकार सुवर्ण माननगम !ीय मन्त्री हमी भयंका धारणरी विधिमे अपना आयुष्य बढाना चाहता है उसका •-माता मिान्या वाचर पाटर भी नाम वदनं तृतीय मन्त्रमें 'दक्ष-माण fram. xritisोगा कि 'दाक्षायण और हर प्रकार यह मूक्त बलबधंनझी बात प्रारभने सततक पता मा':शरीय विमादरीराचर है। रहा है। पित ।म प्रसार हम दाक्षायणी विद्या 7 मार्ग पाया है, टममें मय बर बहानेकी विद्यामा नाम दाक्षायणी विद्या है। (दक्ष Mirria । वियर दो प्रयागं होता अयनः ) या प्राप्त करनेके मार्गका उपदेश इस विग्रामें MAT -inारा हरना और मग होता है। एग्य विधा मन माय विशेष सम्बन्ध रहता है। :: : १७६१) मग ती गनि वैद्य (मु+मनम्यमान.) उत्तम मनग युक्त अर्थात् मनकी "... ! - ru बाद का नापभिया रेप पिनिने सम्पन्न । कमजोरीकी भावनाये मम अशक्त ६.३२1 गुदा firm और मामध्यकी भायना याशाली होता है। मन. * Air NR हर बीमाभि पटामेसी विधारे भनुमार ममको मुनियमोंमे पुनः sta बताया है। 47 . .
तेलस्थिता, पल और दीर्घायुष्यको प्राप्ति , ह बनानेवारे श्रेष्ठ लोग 'सुमनस्यमानाः दाक्षायणाः आयुपे । वर्चसे । बलाय । दीर्घायुत्थाय । गम्तो पारा वेदमें बताये गए है। शतशारदाया सुवर्ण धारण आयु, नेज, बल, दीर्घ आयु, सौ वर्षी आयु' इत्यादि यद्यपि प्रथम मन्त्री केपल शरीरपर सुवर्ण यांभनेका ही गन्द जीवनशक्तियोके ही सूचक है। उनका थोडासा परि- विधान किया है तथापि वीर्यवर्धक नाना रस पीनेका भी उप- गणन ग्रहा किया है। इसी प्रकार और भी अनेक जीवन- देश इसी सूकमें आगे बताया है । सुवर्ण तथा अन्य कई रत्न शक्तियां ' है, उनकी प्राप्ति करना और उनकी वृद्धि भी हैं कि जो शरीर पर धारण करनेसे भी बलवर्धन तथा आरोग्य करना वैदिकधर्मका उद्देश्य है। इस विचारले ज्ञात हो सकता वर्धन कर सकते हैं। यह यात सूर्यकिरण चिकित्सा तथा है कि यहा 'शतानीक' गब्दका अर्थ 'जीवनके सौ वीर्य, वर्णचिकित्साके साय सम्बन्ध रखनेवाली मर्थात् सुवर्ण जीवनकी संकडो गनियां' अभीष्ट है। रत्नादिका धारण करना भी गरीरके लिये भारोग्यप्रद है। इसी प्रकारका एक मन्त्र यजुर्वेदमे थोडेसे पाठभेदसे माता भौषधियोंकी नढोंकी मणिये शरीग्पर धारण करनेस भी है उसको पाठकोक विचार के लिये यहां देते हैं- भारोग्यको दृष्टिसे बड़ा लाभ हो सकता है। ससर्गजन्य गेगोम यढावनन्दाक्षायणा हिरण्यं वचा-मणिके धारणसे अनेक लाभ होते हैं । यही बात सुवर्ण शतानीकाय सुमनस्यमानाः। रत्नादि धारणसे होती है। परन्तु इसके लिये शुद्ध सुवर्ण तन्म आवध्नामि शतशारदायायुप्माजर- चाहिये। दष्टियथासम् ॥ (वा यजु. ३४।५२) इस विषयमे प्रथम मन्त्रमे कहा है कि-'दल बढानेकी उत्तम मनवाले दाक्षायण लोग शतानीकके लिये जिस विद्या जाननेवाले और उत्तम मनःगक्तिसे युक्त श्रेष्ठ पुरुषोंके सुवर्ण भूपणको बाधते रहे, (तत्) वह सुवर्ण भूषण (मे द्वारा शरीरपर लटकाया हुआ सुवर्ण जीवन, तेज, बल तथा आवध्नामि) मैं अपने शरीरपर इसलिये बाधता हूं कि मैं दीर्घ आयुष्य देता है।' इसमें शरीरपर सुवर्ण लटकानेवाले (आयुष्मान्) उत्तम आयुसे युक्त और (जरदष्टिः) वृद्ध मनुप्योकी उत्तम मनोभावना भी लाभदायक होती है यह अवस्थाका अनुभव करनेवाला होकर (यथा शतगारदाय सूचित किया है वह मनन करने योग्य है। आसं) सौ वर्षको पूर्ण आयुको प्राप्त होऊ।' इस मन्त्रमे 'शतानीकाय हिरण्यं यध्नामि'का अर्थ इसका अधिक विवरण करनेकी कोई आवश्यकता नहीं 'सैन्य विभागोंके सन्चालकके गरीरपर सुवर्ण लटकाता हूं' है, क्योकि पूर्वोक्त भाव ही इस मत्रमे अन्य रीतिसे और ऐसा जो किया है वह तो इसका स्थूलार्थ हुआ परन्तु इसमें भिन्न शब्दोस व्यक्त हुआ है । इस मंत्रका द्वितीय अर्थ ही मौर भी एक गूढता है वह यह है कि अनीक' शब्द यल- भिन्न है । प्रथमार्थ वैसाका वैसा ही है। यहांतक प्रथम का वाचक है । बल शब्द सैन्यवाचक और यलवाचक भी मंत्रका विवेचन करनेके वाद अव द्वितीय मंत्रका विचार है । विशेषतः 'अनीक' शब्दमे 'अन्-प्राणने' धातु है करते हैं । जो जीवनशक्तिका वाचक प्रसिद्ध है । इसलिये जीवनगक्तिका राक्षस और पिशाच अर्थ भी अनीक शब्दमें है । इस भर्थके लेनेसे 'शतानीक' नरमांस खानेवाले राक्षस होते है और रक्त पीनेवाले गब्दका अर्थ ' सौ प्रकारकी जीवनशक्तियां अथवा सौ प्रकार- पिशाच होते हैं । ये सबसे क्रूर होनेके कारण सय लोग इनसे की जीवनगक्तियोंसे युक्त' होता है। यह भाव लेनेसे उक्त डरते रहते है। परंतु जो पूर्वोक्त प्रकार 'सुवर्णका प्रयोग मन्त्र भागका मर्थ ऐसा होता है कि- करता है उसके हमलेको राक्षस और पिगाच भी सह नही शतानीकाय हिरण्यं वध्नामि । (म. १) सकते।' इतनी शक्ति इस सुवर्ण के प्रयोगसे मनुष्यको प्राप्त 'सौ प्रकारको जीवनशक्तियोकी प्राप्तिके लिये मैं सुवर्णको होती है । सुवर्णमे इतनी शक्ति है । क्योंकि 'यह देवोंका धारण करता हूं।' सुवर्णके अन्दर सैंकडो वीर्य है, उन सय- पहिला मोज है।' अर्थात् सपूर्ण देवोंकी अनेक शक्तियां की प्राप्तिके लिये मैं उसको धारण करता हूं। यह भागय इसमे सग्रहित हुई है । इसलिये द्वितीय मंत्रके उत्तरार्धमे प्रथम मन्त्र भागका है । इस प्रथम मन्यमे इनमसे कुछ गुण कहा है कि- 'जो यह वल वर्धक सुवर्ण गरीरमे धारण करता कहे भी है- है वह सब प्राणियोंसे भी अधिक दीर्घ भायु प्राप्त करता है। । ।
(९६) अथर्ववेदका सुबोध अनुवाद 'दीजीयम और आगेग्य' - - . मर्थात् इस मुवर्णके प्रयोग गरीरका पल भी या जाता है नाम होते, हमका चशमानमें नाम रस प्रयोग है। और वीर्घ आयु भी प्राप्त होती है। यह वित्तीय मंत्रका भार ग्रह रस प्रयोग सुयोग्य वैद्य हाक उपदेशानुमार करना पहिले मंत्रका ही एक प्रकारका स्पष्टीकरण है, इसलिये इसका चाहिये । यजुर्वेद में भी हमी प्रकारका एक मंत्र है। इतना ही मनन पर्याप्त है। यही मन्त्र यजुर्वेद में निम्नलिखित सुवर्णके गुण । प्रकार है- आयुष्य वर्चस्यं गयस्पोपमान्दिदम् । न तद्राक्षांसि न पिगाचास्तरन्ति देवानामोजः इदं हिरण्यं वर्चस्वजयायाविशनादु माम् ॥ प्रथमजं होतत् । यो विभर्ति दाक्षायणं हिरण्यं (वा. यजु ३४१५०) स देवेषु कृणुते दीर्घमायुः स मनुप्येषु कृणुने दीर्घमायुः ॥ (यजु ३४५१) (आयुष्यं ) दीर्घ आयु करनेवाग, (वर्चस्य ) कान्ति बढानेवाला, (गयम्पापं) गोभा और पुष्टि बढानेवाला यह दवाग उत्पन्न हुमा पहिला तेज है, इसलिय राक्षस (औद्भिदं) ग्यान उत्पर दोनयाग अथग ऊपर उठाने- और पिशाच भी इससे पार नहीं हो सकते । जो दाक्षायण बाला, (वर्चस्वत्) नेत्र घटानेवाला (जत्राय) विजयके सुवर्ण वारण करता है वह देवमि दीर्घ और मनुष्यमि लिये । इदं हिरण्यं) यह सुवर्ण (मां उ आविगतान ) दीर्घ आयु प्राप्त करता है।' मुझमे मथना मेरे शरीर में प्रविष्ट हो।' इस मत्रके द्वितीयामें थोडा भेद है और भय के पाटम 'जीवेषु कृणुते दीर्घमायुः' इतना ही था, और इसमें सुवर्णका सेवन 'देवेषु भोर मनुप्येषु' ये शब्द अधिक है । अथर्ववेदक यह मत्र मवर्ण के अनेक गुण बता रहा है। इतने गुणांकी 'जीवेपु' शब्दका ही भाव 'देवेपु, मनुष्यपु' आदि वृद्धि करनेक लिये यह सुवर्ण मनुष्य के शरीरमें प्रविष्ट हो, शब्दो द्वारा यहां व्यक्त हुआ है। इस प्रकार अन्य मापासहि- यह इच्छा इम मत्रमें स्पष्ट है। अर्थात परिशुद्ध सुवर्णके ताओंक पाठभेद देसनेने अर्थ निश्चय करनेमें बढी सहायता मेवनसे इन गुणोकी गरीग्में वृद्धि हो सकती है। इस मत्रमे 'हिरण्यं आविगत् ' ये गब्द 'मुवर्णका गरीरमें घुम यहांतक दो मौका मनन हुआ। इन दो मत्रांमे शरीर जाने' का भाव बताते हैं अर्थात यह कंबल गरीरपर धारण पर मुवर्ण धारण करनेकी यातका उपदेश किया है. अब अगले करना ही नहीं प्रन्युत अन्यान्य औषधियों के रमोके समान मत्रांस जल बनस्पति तथा ऋनुकालानुसार उत्पन्न होने- इसका सेवन भी करना चाहिये। गरीरपर मोनेका धारण वाले अन्य बलवर्धक पदार्योंका अंतर्बाध सेवन करनेकी करना और सुवर्णका सेवन करना, इन दोनों रीतियोंसे महत्वपूर्ण विद्या दी जाती है। मनुग्न्य पूर्णक गुण यढाफर दीर्घ आयुष्य प्राप्त कर सकता तृतीय मंत्रमें कहा है-'जल और औषधियोंकि तेज, कांति, है। भय चतुर्थ मंत्र देखिये- गकि, यल और वीर्यवर्धक रमाको हम उसी प्रकार धारण काली कामधेनुका दूध करते है कि जैसे मात्मामें हद्रियां स्थिर हुई हैं । इसी प्रकार बल बढानेकी इच्छा करनेवाला मनुष्य सुवर्णको भी धारण काम धेनुका ) ध जो ऋतुओके द्वारा मिलता है, उससे इम चतुर्थ मंग्रमे कहा है- कालरूपी संवत्सरका (काली करे।" मनुप्यकी पूर्णता होती है। इस कार्य में इन्द्र भनि विश्वेदेव जलमें नाना भोपधियोंके गुण हैं यह बात इसके पूर्व माय आदि सब पूर्णतासे अनुकूल रहें ।' हुये जल सूक्तामें वर्णित हो चुकी है । औषधियोंके मदर वीय संवत्सर-वर्ष अथवा काल- यह एक कामधेनु है । काल वर्धक रस होते हैं, इसीलिये वैद्य औषविका प्रयोग करते है। सबधी यह धेनु होनेमे हमको काली धेनु कहते है, यह इस जिग्न प्रकार जळ अंतर्बाह्य पवित्रता करके बल आदि गुणोकी लिये कामधेनु कही गई है कि मनुष्यादिकोक इच्छित फल वृद्धि करता है, उसी प्रकार नाना प्रकारकी वीर्यवर्धक औप- धान्य आदि पदार्थ ऋतुओंक अनुकूल देकर यह मनुष्यादि थियोक पथ्य हित मिन अन्न भक्षणपूर्वक सेवनसे मनुष्य प्राणियोकी पुष्टि करती है। प्रत्येक ऋतुके अनुकूल नाना बल प्राप्त करके दीर्घ जीवन भी प्राप्त करता है । सुवर्ण मेव- प्रकार के फल और फूल संवत्सर देता है, इसलिये वेदमे नसे भी भथवा सुवर्णादि बातोंक मेवनसे मी या प्रकार यवत्सरको पिता भी कहा है और यहां मधुर ध वेनेवाली होती है। - - तेजस्थिता, पल और दीर्घायुष्यकी प्राप्ति (९७) A HAIL सूर्य दिशा अधिनी कुमार अप्ति वायु माज FOL F इद्र मा लेज Lik सरली कामधेनु कहा है। हरएक अतुमे कुछ नदीम फल, फूल, धान्य मादि मिलता है, यही इस धेनुका दूध है। यह दूध हरएक ऋतु इस सवत्सररूपी गौसे निचोडकर मनुग्यादि प्राणियोंको देती है, यह अद्भुत अल्कार इस मन्यमें बताया है। प्रत्येक माममें, प्रत्येक नुमें नया प्रत्येक काल्में जो जो फल, फूल उत्पन्न होते है उनका योग्य उपयोग करनेसे मनुन्यक बल, तेज, वीर्य, बायुप्प नादि बढ सकते हैं। इस मंत्रका यह भागय हरएक मनुप्यके मनन करने योग्य है। मनुष्य अपने पुरुषार्थ व प्रयत्नले ऋतु के अनुसार फल, फूल धान्य आदिकी अधिक उत्पत्ति करे और उनके उपयोगसे मनुप्योको लाभ पहुंचावे । पूर्व मंत्रमें ' (अपां वनस्पतीनां च वीर्याणि) जल तथा वनस्पतियोके वीर्य' धारण करनेका जो उपदेश हुआ है उसीका स्पष्टीकरण इस चतुर्थ मंत्रने किया है । जिस मनुमें जिस जल और जिस वनस्पतिक प्राप्त होनेकी संभावना हो, उस ऋतुमे उसका संग्रह करके उसका सेवन करना चाहिये और इस प्रकार आयु, बल, तेज, काति, शक्ति, वीर्य आदि गुण अपनेमें बढाने पुत्री पृथ्वी -~-भूलोक- । मनुष्य के शरीरमें देवोंके अंश जगत्में जो अग्नि भादि देव हैं उनके अंश शरीरमें है। उनके स्थान इस चित्र में बताये गए है। इसके मननसे ज्ञात हो सकता है कि बाह्य जगतकं अग्नि मादि देवोकी सहकारिताके साथ शरीरके स्वास्थ्यका कितना घनिष्ट संबंध है। चाहिये। निर्वीर्य, यह वेदका उपदेश मनन करने और माचरणमे लाने करके हमारा सहायक यनता है, इसी प्रकार अन्यान्य देव योग्य है। इतना उपदेश करनेपर भी यदि लोग हमारे सहायक हो रहे हैं। इनके प्रतिनिधि हमारे शरीरमे नि.सत्त्व, निस्तेज, निबल रहेंगे और वीर्यवान् बननेका यत्न रहते है और उनके द्वारा ये सब देव अपने अपने जीवनाग नहीं करेंगे तो वह मनुष्योका ही दोष है । हमतक पहुचा रहे हैं । इस विषयमें इसके पूर्व यहुत कुछ इस मंत्रक उत्तरार्धका भाव मनन करने योग्य है । ' इन्द्र, लिखा गया है, इसलिये यहां अधिक विचार करनेकी कोई अग्नि आदि सब देव इसकी अनुकूलताले सहायता करें आवश्यकता नहीं है। अग्नि आदि देवताओंकी सहायताके विना मनुष्य कैसे उग्म- इतने विवरणसे यह बात पाठकोके मनमे आगई होगी निको प्राप्त हो सकता है ? अग्नि ही हमारा भन्न पकाती है, जल ही हमारी तृषा गात करता है, पृथ्वी हमें आधार देती कि अग्नि भादि देवतामोकी सहायता किस रीतिसे हमे हो है, विजली सयको चेतना देती है, वायु सबका प्राण वनकर रही है और यदि इनकी सहायता अधिकसे अधिक प्राप्त प्राणियोको धारण करता है, सूर्यदेव सबको जीवनशक्ति करने और उससे अधिकसे अधिक लाभ उठानेकी विधि देता है, चंद्रमा अपनी किरणों द्वारा वनस्पतियोका पोषण ज्ञात हो गई, तो मनुष्योका बहुत ही लाभ हो सकता है। १३ [भर्व. भा. ४ हिन्दी] (९८) अथर्ववेदका सुयोध अनुवाद 'दीर्घजीवन और आरोग्य' आयुष्य-अधक-सूक्त कां. १,सु. ३० (अपिः- मथर्वा (भायुप्कामः)। देवता:- विश्व देवाः।) विश्वे देवा वसवो रक्षतेममुतादित्या जागृत यूयमस्मिन् । समं सनाभिरुत वान्यनाभिर्ममं प्रापत् पौरुषेयो वृधो य: ये वो देवाः पितरो ये च पुत्राः सचेतसो मे शृणुतेदमुक्तम् । सर्वेभ्यो वा परि ददाम्यतं स्वस्त्येनि जरसे वहाथ |॥ २॥ ये देवा दिवि ष्ठ ये पृथिव्यां ये अन्तरिक्ष ओषधीपु पशुप्पप्वन्तः । ते कणुत जरसमायुरस्मै शतमन्यान्परिं वृणक्तु मृत्यून् |॥ २॥ यंपा प्रयाजा त बानुयाजा हुतागा अहुतार्दश्च देवाः । यो वः पञ्च प्रदिशो विभक्तास्तान्वौ अस्मै संसदः कृणोमि ॥४॥ अर्थ- हे (विश्व देवाः) सब देवो ! हे ( वसवः) वसुदेवो ! ( इमं रक्षत) हमकी रक्षा करो। (उत) सौर है (आदित्याः) मादित्य देवो! (यूयं अस्मिन् जागृत) तुम इसमें जागते रहो। ( इमं) इस पुरुषको (सनाभिः) अपने बंधुका (उत वा अन्य-नाभिः) अथवा किसी दूसरेका ( वधः मा प्रापत् ) वधकारक गमन प्राप्त हो, इस पर प्रहार न करे तथा (यः पौरुषेयः वधः) जो पुरस प्रयत्नसे होनेवाला घातपात है वह भी ( इमं मा प्रापत् ) इसको प्राप्त न हो ॥१॥ हे (देवाः) देवो (ये वः पितरः) जो आपके पिता है तथा ( च ये पुया. ) जो पुन हैं वे सब (स-चेतसः) मावधान होकर (मे इदं उक्तं शृणुत) मेरा यह कथन श्रवण करें (सर्वेभ्यो व. एतं परिददामि ) आप सबकी निगरानीमें इसको मैं देता हूं (एनं जरसे स्वस्ति बहाथ ) इसको वृद्ध थायुतक सुसपूर्वक पहुचा दो ॥ २ ॥ (य देवाः दिवि स्थ) नो देव द्युलोकमें हैं, (ये पृथिव्यां ये अन्तरिक्ष)जो पृथ्वीम मौर अतरिक्षमें हैं और तो (ओपधीषु पशुपु अप्सु अन्तः) औषधि, पशु और जलोंके अंदर हैं (ते अस्मै जरसं आयुः कृणुत) वे इसके लिये वृद्धावस्थावाली दीर्घ आयु प्रदान करें। यह पुरुष (शतं अन्यान् मृत्यून् परिवृणक्तु ) संकदो अन्य अपमृत्युको इटा देवे ॥३॥ (येषां) जिन तुम्हारे अंदर (प्रयाजाः) विशेष यजन करनेवाले, (उत वा अनुयाजाः) अथवा अनुकूल यजन करनेवाले तथा (हुत-भागा अहुतादः च देवाः ) हवन में भाग रखनेवाले और हवन किया हुआ न सानेवाले जो देव है, (येपां वः पञ्च प्रदिशः विभक्ताः) जिन आपकी ही पांच दिशाय विभक्तकी गई है, (तान् वः ) उन तुमको (अस्मै) इम पुरुपकी दीव मायुक लिय (सत्र-सदः कृणोमि) सहायक बनाता हूं ॥ ४ ॥ मावार्थ-हे सब देवो, हे वसुदेवो ! मनुष्यको रक्षा करो ! हे आदित्य देवो । तुम मनुष्यमें जाग्रत रहो । मनु- प्यका उसीके क्रिमी बघुसे अथवा किसी अन्य मनुष्यसे वध न हो ॥१॥ हे देवो ! जो तुम्हारे पिता है और नो तुम्हारे पुत्र हैं वे सब मेरा कथन सुनें । मनुष्यको पूर्ण दीवं आयुतक ले जाना तुम्हार आधीन है, अत मनुप्न्यकी मायु दीर्घ करो ॥ २ ॥ जो देव द्युलोक, अंतरिक्षलोक, भूलोक, औषध, पशु, जल आदिमें हैं वे सब मिलकर मनुष्की मायु दीर्व करें। तुम्हारी महायताने मनुष्य संकरों भपमृत्युक्षसि वचें ॥३॥ विशेष यजन करनेवाले, मनुकुल यजन करनेवाले हवनका भाग लेनेवाले तथा हवन किया हुआ न सानेवाले जो देव हैं. और न्हिोंने पांच दिशाएं विभक्त की है, वे सब भाप देव मनुष्यकी भायुष्यवर्धक समाके सदस्य वन भौर मनुष्यकी भाय दीर्य करने में सहायता करें ॥ १ ॥ .
आयुष्य-वर्धक-सूक्त (९९) आयुष्य--वर्धक--सूक्त आयुका संवर्धन . करनेकी वृत्ति, क्रोधकी लहर, दूसरेके खून करनेकी वासना, मनुष्यका भायुष्य न केवल पूर्ण होना चाहिये प्रत्युत दुसरेको दबाकर अपनी धनसंपत्ति बढानेकी अभिलाषा जब- भतिदीर्घ भी होना चाहिये। पूर्ण आयुज्यकी मर्यादा तो १२० तक रहेगी, तबतक मनुन्यकी आयु क्षीण ही होती जायगी। वर्षोंकी है, इससे कम १०८ वर्षकी और इससे कम १०० सौ इसलिये वध करनेकी वृत्ति अपने समाजमेसे दूर करनेका यत्न वर्षकी है । सौ वर्षकी मर्यादा तो हरएकको प्राप्त होनी ही मनुष्य प्रथम करे। चाहिये, परंतु उसके प्रयत्न इससे अधिक भायुष्य प्राप्त कर- देवोंके आधीन आयुष्य नेकी भोर होने चाहिये, इसका सूचक मंत्र यह है- मनुष्यका समाज जितना अहिंसावृत्तिवाला होगा। उतनी भूयश्च शरदः शतात् । ( यजुर्वेद ३६।२४) उसकी आयुष्यमर्यादा दीर्घ हो सकती है । इसी अहिंसा. सौ वर्षोंसे भी अधिक आयु प्राप्त हो। १२० वाँसे अधिक वृत्तिको अपनाकर आगे बढना चाहिए। भागेका मार्ग यह मायु जितनी भी होगी वह दीर्घ या अतिदीर्घ सज्ञाको प्राप्त है कि- 'अपना आयुण्य देवोके माधीन है, देव हमारी रक्षा होगी। अर्थात् अति दीर्घ आयु प्राप्त करनेका पुरुषार्थ करना कर रहे हैं ' यह भाव मनमे धारण करना । इसकी सूचना वैदिक धर्मके अनुकूल है। इस दीर्घ भायुप्यकी प्राप्तिकी प्रथम मंत्रके पूर्वार्धने दी है, उसका आशय यह है-- वैदिक रीति इस सूक्तम दर्गाई है। 'हे सब वसुदेवो! मनुष्यकी रक्षा करो।हे सव आदित्यो! मनुष्यमें जागते रहो ।' (मंत्र १) सामाजिक निर्भयता इस मंत्रमें भी दो भाग हैं। पहिले भागमें वसु देवोकी दीर्घ मायुप्यकी प्राप्तिके लिये समाजमें सामाजिक तथा रक्षक शक्ति के साथ संबंध बताया है और दूसरे भागमे राष्ट्रीय दृष्टि से, तथा धार्मिक और अन्यान्य दृष्टियोसे भी निर्भ- मादित्य देवोको मनुष्यके अंदर, मनुष्यके देहमें, जाग्रत रह- यता रहनी अत्यंत आवश्यक है। निर्भयता-सुरक्षितताके नेकी सूचना दी है। ये दोनो बातें दीर्घ भायुके लिये अत्यंत न रहने पर मनुष्य दीर्घायुवाले हो नहीं सकते। समाजमें आवश्यक है । भब इनका संबंध देखिये- कोई एक दूसरे पर हमला करनेवाला न हो, इस प्रकारका सबसे पहिले मनुष्य यह विचार मनमें धारण करे कि समाज बनना चाहिये । राजनैतिक कारणसे हो, धर्मके नाम- संपूर्ण देव मेरी रक्षा कर रहे हैं, परब्रह्म परमात्मा सर्वेश्वर पर हो, अथवा किसी दूसरे निमित्तसे हो, कानून अपने सर्व समर्थ प्रभु मेरी रक्षा कर रहा है और उसकी आधी- हाथमें लेकर एक दूसरेपर हमला करना किसीको भी उचित नतामें सूर्यादि सब देव सदा मेरी रक्षा कर रहे हैं। मै नहीं है, यह दर्शानेके लिये प्रथम मंत्रका उत्तरार्ध है, इसका परमात्माका अमृतपुत्र हूं इसलिये मेरा परमपिता परमात्मा भाशय यह है- मेरी रक्षा करता था, करता है और भागे भी करता रहेगा। 'इस मनुप्यका वध कोई सजातीय, अन्य जातीय या परमात्माके भाधीन अन्य सब देव होनेके कारण वे भी उस किसी साधनसे न करे । ' (मंत्र १) परमात्माके पुत्रको रक्षा अवश्य करेंगे ही। यह वेदका उपदेश मनुष्य मात्रके लिये है, हरएक मनुष्य इस प्रकार संपूर्ण देव मेरा संरक्षण करते हैं इसलिये मैं यह ध्यानमें रखे और अपने भाचरणमे ढालनेका प्रयत्न करे। निर्भय हूं यह विचार मनमे दृढ करके मनके अंदर जो जो 'मैं किसीका वध नहीं करूंगा, किसी दूसरेकी हिसा मैं नहीं चिन्ताके विचार भायें उनको हटाना चाहिये और विश्वाससे करूंगा। मैं अहिंसा वृत्तिसे आचरण करूंगा।' यह प्रतिज्ञा मनकी ऐसी रढ अवस्था बनानी चाहिये कि जिसमे चिंताका हरएक मनुष्य करे और तदनुकूल भाचरण करे । विचार ही न उठे और चिंतारदित निर्भय होनेके भाव मानंद इस मंत्रमे जो शांतिका वर्णन है वह मनुष्य मात्रमें स्थिर वृत्तिके साथ मनमें रहें । दीर्घायुष्य के लिये इस प्रकार परमा. रहनी चाहिये, यह बुनियाद है और इसी अहिंसावृत्तिपर स्मापर तथा अन्यान्य देवोको संरक्षक शक्तिपर अपना पूर्ण दीर्घायुका मन्दिर खडा होना है । जबतक मनुष्यमें हिंसक विश्वास रखना चाहिये, अन्यथा दीर्घ भायुष्य प्राप्त होना त्ति रहेगी तबतक मह दीर्घायु बन नहीं सकता । घातपात भसंभव है। कोई अन्य मनुष्य -- . बसु 'देवोंका (१००) अथर्ववेदफा सुबोध अनुवाद दीर्घजीपन और आरोग्य कई पाठक शंका करेंगे किमन्यान्य देव हमारी रक्षा किस प्राप्ति के लिये हमी कारण मनम परमात्मविषयक व विश्वाम प्रकार कर रहे है ? इस विषयमे इससे पूर्व कई स्थानोपर होना चाहिये । सूर्य अपने प्रकाराम मयको जीवनामृत देकर सबकी रक्षा उल्लेख आगया है। तथापि संक्षेपसे यहा भी इसका विचार करते है । पाठक जानते ही है कि प्रथम मत्रमें' कर ही रहा है, परतु मनुष्य सूर्य प्रकाराने दर रहते है, तंग उल्लेस है, ये सब जगत्के निवासक देव होनेके कारण ही गलियोंके नंग मकानोंमें रहने है, दिनभर कमरों में मरने इनको 'वसु' कहते हैं। सबके जो निवामक होते हैं वे आपको बंद रखते हैं और इस प्रकार सूर्यदेवी मंरक्षक सबकी रक्षा अवश्य ही करेंगे। गन्तिम अपने आपको दूर रखते है। उसमे भगवान सहन. सब वसुओका भी परम वसु परमात्मा है क्योंकि वह रश्मी सूर्यदेव क्या कर सकते है ? इसी प्रकार वायु और इस जैसे सब जगतको बसाता है, उसी प्रकार जगतके संरक्षण आदि देवों के विषयमे समझना उचित है । ये देव तो सबकी करनेवाले सब देवोंको भी वसाता है । पृथ्वी, आप, अग्नि, रक्षा कर ही रहे हैं परनु मनुष्योंको भी चाहिये शिवे इनकी वायु, आकाश, सूर्य, चन्द्र, नक्षत्र वे अष्टवन है, भूमि, उत्तम रक्षासे अपने आपको दुर नग्य और जहानक हो सके उतना प्रयत्न करके उनकी रक्षाम अपने नापको अधिक रस। जल, अग्नि, वायु, आकाग, सूर्य आदिके साथ हमारे क्षण- अणके आयुग्न्यका संबंध है, इनमेंले एकका भी संबंध हमसे आदित्य देवोंकी जाग्रति दृट गया तो हमारा नाम निश्चित है। इतना महत्त्व इनका हम प्रथम मंत्रमे दीयं आयुन्य वर्वक एक महत्त्वपूर्ण है और इसी कारण इनके रक्षणमे सदा मनुष्य रहता है ऐसा बात कही है वह यह है- 'हे आदित्य देयो । इस मनु न्यमें उपरवाले मंत्रमें कहा है। इससे स्पष्ट हुआ कि मनुष्यकी जाग्रत रहो ।' मनुन्यके अदर आदित्यने ही सब जीवनयक्ति रक्षा इन देवोके कारण हो रही है और अति नि:पक्षपातसे आम्ही है। यह जीवनशक्ति जैसे मनुष्यम कार्य करती है हो रही है । ये देव कभी किसीका पक्षपात नहीं करते । सूर्य उसी प्रकार सब जगतम कार्य कर रही है। इसी शक्तिले सब सबपर एकसा प्रकाम करता है, वायु सबके लिये एकसी बह जगत् चल रहा है। परंतु यहा मनुष्यका ही हमें विचार रही है, जल सबके लिये भाकागसे गिरता है, पृथ्वी सबको करना है । मनुन्यमं यह भादित्य शक्ति उसके मस्तिष्कम, समानतया आधार दे रही है, इस प्रकार ये सब देव न नेत्रमें और पेट में रहती है । मस्तिष्कम मजाकेंद्र चलाती है, केवल मवकी रक्षा कर रहे है प्रत्युत सवक माय नि:पक्ष- पेटमें पाचक केंद्रको चेतना देती है और नेत्रमें देखनेका पातका भी वर्ताव कर रहे है। व्यापार कगती है । इनमेने किसी भी भादिन्य गतिके कम हमारे जीवन के साथ इनका संबंध इतना घनिष्ट है कि होनेपर भी मनुष्यकी आयु घटती जायेगी। मस्तिष्कका हनक विना हमारा जीवन ही भगक्य है । वायुकं विना प्राण मज्जाकेंद्र आदित्य मनिसे हीन हो जाए तो सपूर्ण गरीर धारण कैन्ने होगा ? सूर्यके विना जीवन ही असभव होगा चेतना रहित हो जाता है, पेटका पाचक केंद्र आदित्य शक्तिले मत इस प्रकार परमात्माक नियमके भाधीन रहते ये तो हाजमा है, नत्रकी मादिन्य- मय देव हमारी रक्षा कर रहे हैं। गक्ति खत्म हो जाए तो मनुष्य अंधा हो जाता है और उसके सब व्यवहार ही बद हो जाते हैं। इतना महत्त्व इम हम क्या करते है ? सब देव तो हमारी रक्षा कर ही रहे हैं, परंतु हम क्या लिये वेदमें कहा है कि- मादित्य गतिका मनुय्यक भयवा प्राणीसे शरीरमे है । इस कर रहे हैं, हम टनकी रक्षामें रहनेका यत्न कर रहे हैं या उनकी रक्षाने बाहर होने के यत्नमें हैं ? इसका विचार पाठ- सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुपश्च । (ऋ. १,११५.१) कोको करना चाहिये । परमात्मामी और देवोकी रक्षासे हम है।' सूर्यभेदन व्यायाम और सूर्यभेदी प्राणायाम द्वारा 'यह आदित्य सूर्य ही स्थावर और जंगम जगत्की आत्मा कसे बाहर जाते हैं- परमात्मापर जो विश्वास ही नही रसते पेटके स्थान में रहनेवाली आदित्य शक्ति जाग्रत हो जाती है, वे परमात्माकी रक्षासे बाहर हो जाते है। दयामय परमात्मा तब भी उनकी रक्षा करता ही रहता है यह उसकी ही अपार त्राटक मादि अभ्यास द्वारा नेत्रकी आदित्य मक्ति जाग्रत हो न्यान द्वारा मस्तिष्ककी मादित्य भक्ति जाग्रत होती है, तथा दया है, परतु ये अविश्वासी लोग उसकी अपार दयाम लाभ जाती है। इस प्रकार योगाभ्यास द्वारा अपने संदरकी नहीं उठाते । अविश्वासके कारण जितनी हानि होनी है, उतनी भादित्य शक्ति जाग्रत और यलयुक्त करनेसे मनुष्य दीर्घ- धानि किन्नी भन्य कारणसे नहीं हो सकती। दीर्म भायुकी जीची हो सकता है । हीन हो जाए विगड जाता आयुष्य-उधंक-सूक्त (१०) माग है। कौनसे है इसका इस प्रथम मंना ये उपदेग यदि पाठक न्यानो धारण मन ये दस देव नेरे (आकृति आवहन ) संकल्पको उठाते करेंगे और इन उपदेनका गाग्य अनुष्ठान करेंगे तो उनकी है॥ ४ ॥ मायु बन गयनी समे कोई संदेक नदी है । समान्म कहांस इन्द्र, सोम और भन्नि उत्पन्न हो गये ? कहांसे निर्भयता, परनेचरपर इदनिटा, पाउ, जल, सूर्य आदि देवता- त्वष्टा हुमा और धाता भी कहांसे हुआ ? ॥ ८ ॥ भोले अधिक संबंध करना और अपने वंदर लादित्य गाष्टि इन्द्रसे इन्द्र, सोमसे सोम, अग्निसे अग्नि, त्वष्टास त्वष्टा योंका गति करना' या संक्षेपले दीर्वाद प्राप्त करनेका और धाताले धाता हुआ है ॥ ९ ॥ (ये पुरा देवेभ्यः दश देवाः ) जो पहिले देवोंसे दम इसी मार्गका भोगमा सष्टीकरण आगे मंत्रोमें भी है, देव हुए है, (पुत्रेभ्यो लोकं दत्वा ) पुत्रोको स्थान देकर यह भव देखिये-- वे स्वयं (कन्मिन् लोके आसते) किस लोकमें बैठे हैं ? देवोंके पिता और पुत्र इन मंत्री देव, देवोंके पिता और पुत्र इम आयुवर्धन सुन हिताय मत्रमं कहा है, कि 'हे वर्णन है । प्राण अपानादि दश देव इन्द्रादि देवोंसे बने हैं देवो । जो तुम्हारे पिता है और तुम्हारे पुत्र हैं वे मेरी बात और वे पुत्र रुप देव इस गरीरमे रहते है, इन पुत्रदेवोंक मुनें, मैं तुम्हारे ही ना पीन इस मनुष्यो करता हूं, तुम पिता देव इस जगत्मे हैं और उनके भी पिता परमात्मामे इसको दीर्घ आयतक सबसे पहुंचाओ ।' (मं २ ) रहते हैं, इसका स्पष्टीकरण यह है-प्राणरूप देव मनुष्य इस द्वितीय मंत्रने देर, देवार सब पिना भार देवोक गरीरमें है, वह जगतमें संचार करनेवाले वायुका पुत्र है और सर पुत्र ये सब मनुस्यको सुनने दीर्थ माय य क पहुचाने- हम वायुका भी पिता-वायुका भी वायु-परमपिता परमात्मा वाले हैं. ऐसा कहा है, यह मनन करने योग्य है। हम मंत्रको है। इसी प्रकार चक्षुरूपी पुत्रदेव शरीरमें रहता है, उसका टीक्से सामने के लिये देव कौन है, उनके पिता कौन है और पिता सूर्यदेव युलोकर्म है और सूर्यका पिता-सूर्यका भी सूर्य उनके पुत्र कौन है, इसका विचार करना यहाँ भन्यंत आर- परमपिता परमात्मा है। इसी प्रकार अन्यान्य देवोंके विषयमें श्यक है। भयर्ववेद में इन रिता पुत्रोंका वर्णन इस प्रकार जानना योग्य है । यह विषय इससे पूर्व भाचुका है, इसलिये भाया है यहां इस अधिक विवरणको आवश्यकता नहीं है। दश साकमजायन्त देवा देवेभ्यः पुरा । सबका साराश यह है कि पुत्र रूपी देव प्राणियोके इन्द्रियो यो वै नान्विद्यान्प्रत्यक्षं स वा अद्य महद्वदेत् ॥३॥ और अवयवोमें अर्थात् शरीरमे रहते हैं। इनके पितादेव भूः- प्राणापानौ चक्षुःश्रोत्रमक्षितिश्च लितिश्च या । भुवः स्वः इस त्रिलोकीमे रहते हैं और इन सूर्यादि देवोके व्यानोदानी वाड्मनन्ते वा आकृतिमावहन् ॥४॥ भी पिता विशेष शक्तिके रुपसे परमात्मामे निवास करते हैं। कुत इन्द्रः कुतः सोमः कुनो अग्निरजायत । हमारी मांख सूर्य के विना कार्य करनेमें असमर्थ है और कुतस्त्वष्टा समभवन्तो धाताऽजायत ॥८॥ सूर्य परमात्माकी सौर महाशक्तिके विना अपना कार्य करनेमे इन्द्रादिन्द्रः सोमात्सोमा अनेरग्निरजायत । असमर्थ है । इसी प्रकार सपूर्ण देवो और पिता पुत्रोके विषय- वटा ह जने त्वष्टुर्धानुर्वाताऽजायत ॥९॥ मे जानना योग्य है । मनुष्यकी दीर्घायु इन सबके भाधीन ये त आसन्दा जाता देवा देवेभ्यः पुरा । बनती है। पुत्रेभ्यो लोकं दत्वा कस्सिस्ते लोक आसते ॥१०॥ इसलिये जो दीर्घ आयुष्यके इच्छुक हैं, वे भक्तियुक्त मंत (अथर्व, १३८१०) करणसे अपना संबध परम पिता परमात्मासे दृढ करें। परम (पुरा) सबसे प्रथम (देवेभ्यः दा देवाः) देवोले पिता परमात्मा सूर्यका भी सूर्य, वायुका भी वायु, प्राणका दय देव (साकं अजायन्त) साथ माय उत्पन्न हुए । जो भी प्राण, अर्थात् देवोंका भी देव है और वही हम सबका इनको प्रत्यक्ष जानेगा, (सः अद्य महद वदेत्) वह बडे पिता है । इसकी भक्तिके अतःकरणमे दृढ होने पर मनकी ब्रह्मक विषयमें बोलेगा । वही ब्रह्मका ज्ञान कहेगा ॥३॥ समता स्थिर रह सकती है और उससे दीर्घ आयु प्राप्त हो प्राण, अपान, चक्षु, श्रोत्र, (अ-क्षितिः) अविनागी माती है। इस प्रकार देवोके पितासे मनुष्यका संबंध होता है बुद्धि और (क्षिति ) नागवान् चित्त, व्यान, याचा और और यह संबंध अत्यत लाभकारी है। । । - है (२०२) अथर्ववेदफा मुबोध अनुवाद दीर्घजीवन और आरोन्य' वायु, सूर्य आदि देवांग्मे हमाग संबंध किस प्रकार है और देवोमे नाना प्रकारकी चिकित्माएं घनी है, घुलोकके देवोंस उमका हमारे आगेग्य और दीव भायुग्मे फिनना घनिष्ट संबंध गौरचिक्मिा, वर्णचिकित्सा, प्रकाशकिरण-चिकित्सा, त- है, यद्द हमने प्रथम मंत्रक व्याख्यानक प्रमंगमें वर्णन किया रिक्ष स्थानीय देवोसे वायुचिकि मा, विद्युधिकि मा, मानस- ही है इमलिये टनको दुहरानेकी यहां आवश्यकता नहीं है। चिकित्सा अथवा चादृचिक्रिन्मा; पृथ्वीस्थानीय देवोंमे मग्नि प्राण, चक्षु, कर्ण आदि देवपुत्र हमारे शरीरमे ही रहते हैं। चिकिल्मा, गनिजपदायास रमचिकित्मा गनचिकित्मा, भोप- योगादि साधनांस इनका बल बढ़ सकता है। इसलिये इनके धियोग तथा वनस्पनियोंसे भपज्यचिकित्सा, पशुओक दूधसे व्यायामक मनुष्टानने पाटक इनकी गनि विकसित करें और दुग्धचिकिसा भर्थात पशुओंको विविध औषधियां खिलाकर अपना शरीर नीगंग और बलवान बनाकर दीर्घायु अधि- तथा विविध रंगोकी गौमा दूधमा उपयोग करनेमे, तथा कारी बने। पशुके मृत्रादिक उपयोगी विविध चिकित्माएं सिद्ध होती हैं, हम प्रकार मनुष्यका दी आयुग्यके साथ देवां, देवोंके जलमे जलचिकितया हम प्रकार अनेकानेक चिक्तिमाएं पितगे और देवों के पुत्रोका मंबध है। यह जानकर योग्य- होती हैं। अनुष्टान द्वारा मायुग्न्यवर्धनका प्रयत्न करें। इन सब चिकितमाओका अर्थ ही यह है कि विविध रीतिसे परमपिता परमात्मा यद्यपि एक ही है तथापि बद्द मपूर्ण इन सब देवोंकी दिव्य शक्तियोंसे गम उठाना । प्राचीन चन्द्र, वायु, न्द्र आदि अनेक देवताओंकी विविध शक्तियोंने कालके ऋषिमुनियोंने इन सब देवोंसे लाभ उठानेके जो जो युक्त है, हमलिये संपूर्ण देवतालोका सामुदायिक पितृव प्रयत्न किये, टनका फल ही ये सब चिकित्माएं हैं। भाजकल उममें है, ऐमा काव्यमय वर्णन मंत्रमें किया है वह उत्रिन ही भी हम दिशाम विविध प्रयत्न रहे हैं। इन देवताओंमें । इस प्रकार इस मंत्रमें मनुष्यक दीर्य आयुप्यके अनुष्ठान- विविध और अनंत शक्तियां है, इमलिये मनुप्योको विविध का मार्ग हम मनमे उत्तम और स्पष्ट गन्दों द्वारा बताया है। रीतिसे यन करके इन देवताओसे विशेष लाभ उठाने के लिये देवोंके स्थान यत्न करना चाहिये । प्राचीन कालम ऋषिलोग यह उद्योग तृनीय मंत्री देवोंक स्थान कहे है । यह तृतीत्र मंत्र यह करते थे और लाभ उठाते थे और दीर्वजीवी भी बने थे। भागय प्रकट करता है, कि 'द्युलोक, अंतरिक्ष पृथिवी, औषधि, आज यह सिलसिला टूट गया है, तथापि आजकल प्रयत्न कर- पशु, जल, इन स्थानोम देव रहने हैं, वे मनुप्यकी आयु दीर्घ नेपर उसी मार्गसे बहुत खोज होना संभव है। इस प्रकार करते हैं और जिनकी महायताने मंकटों अपमृत्ययं दृर हो इन देवताओंकी शक्ति अपने अंदर लेने और उम शनिको जाती है।' (मंत्र ३) यह मंत्र बहुत विचार करने योग्य है। अंदर स्थिर करनेमे मनुष्य दीर्घ आयुष्य प्राप्त कर सकता है । युलोम्मे सूर्यादि देव, अंतरिक्षम वाय, रद, इन्द्र, चन्द्र माधारणले साधारण प्रयत्नसे भी बड़ा लाभ हो सकता आदि देव, पृथ्वीम अग्नि आदि देव, औषधियोम रसात्मक है। जन सूर्य किरणोमे अपना नंगा शरीर तपानेसे, वायुमे नगे मोमदेव, पशुओमे दुग्धादिरूपने अमृत देव, जलमे वरुण शरीर घूमनेने, जलमें तरनेसे, उत्तम औषधियोका रस पीनेसे आदि देव निवास करते है । ये सब देव मनुप्यकी आयु और गोदुग्ध आदिके सेवनसे साधारण परिस्थितिमें रहनेवाले बढानेक कार्यमें सहायक होते हैं । सूर्य देव जीवन देना है, मनुष्य भी बहुत लाभ उठा सकते हैं । फिर जो विविध यंत्र वायु प्राण देता है, इन्द्र और चन्द्र फ्रमा सुषुप्ति और जाग्र- निर्माण द्वारा इन दैवी शक्तियोंसे अधिक लाभ उठानेका तिक व्यापक और अव्यापक मनक संचालक देव है, रद पुरुषार्थ करेंगे उनके विषयमें कहना ही क्या है । इस प्रकार म्वयं प्राणांका चालक है, अग्नि वाणीम सबध रखती है, औप- जिवनम्पतियाँस बनी हुई अन्न तया दवाइयां मनुष्यकी महा- ये देवता गौक ममान हैं, इससे जितना दूध दोहना चाहो गता करनी है, पशुआने दुग्धस्पी अमृत मिलता है, जल जो जितना पुरुषार्थ करेगा, उसको उतना ही अमृत मिलेगा उतना दुइ सकते हो । इनमे असंढ अमृत रस भर पढा है । देवसे वीर्य बनता है, इस प्रकार अन्यान्य देव मनुष्यक सहा- और वह उतना अमर होगा। यफ है। परंतु प्रयन्न द्वारा मनु न्यको टनस लाम उठानेका पुण्यार्य करना आवश्यक है। देवताओंके चार वर्ग इन मव देवांम अपना मंबंध सुरक्षित करके, उनसे यया इस प्रकार तीन मंत्रों में देवतामोंसे अमृतरस प्राप्त करके योग्य नाम लेनेका याम करनेने भायुष्य बन सकता है । उन भमरत्व प्राप्त करके अर्थात् दीर्घायु बननेके भनुष्ठानका स्वरूप - । । . .
आयुष्य-पर्धक-सूक्त (१०३) - बतानेके पश्चात चतुर्थ मंत्रमें देवताभोरे चार वगीका वर्णन व जानते ही है कि इच्छा शक्तिकी नियंत्रणसे चलनेवाले किया है और इन देवताभोको अपने सहकारी सदस्य बनाने- हम्नपादादि अवयवोंको अपेक्षा अनिच्छासे कार्य करनेवाले का उपदेश किया है । इस चतुर्थ मंत्रका भाशय यह है हृदयादि अतरवयव अधिक महत्त्वके है। तथा बहुताद 'देवोंमें प्रयाज, अनुयाज, हुतभाग क्षौर बहुताद ये चार अर्थात् कुछ भी भोग न लेते हुए जन्मसे मरनेतक अविश्रान्त वर्गके देव हैं। इन टेवासे ये पांचों दिशाएं विभक्त हुई है। कार्य करनेवाले प्राणादिक अधिक श्रेष्ठ है और नेन्न, कर्ण ये सब देव मनुप्यके सहकारी सभ्य बन । ' ( मंत्र ४) आदि अवयव जो श्रमसे थकते है, विश्राम करते है और इन चार वर्गाके देवोंके लक्षण इनके वाचक शब्दोसे ही भोग भी भोगते है ये उनसे गौण है । ग्यक्त होते हैं। ये रक्षण देखिये- यह मुख्य गौणका भेद देखकर दीर्घायु प्राप्तिका अनुष्ठान १प्रयाजा:-विशेष यजन करनेवाले । करनेवालेको उचित है, कि वह अपने अन्दरके मुख्य देवो २ अनुयाजा:-अनमूल यजन करनेवाले। मर्थात् इंद्रियाक्तियोको अधिक बलवान् करे और भन्योको ३ हुतभागाः- हवनका भाग लेनेवाले । भी बलवान् करे, परन्तु वह स्याल रहे कि गौण अवयवोकी अहुताद:- :-हवनका भाग सानेवाले। शनि वटानेके कार्य करते हुए मुख्य अवयवोकी क्षीणता न पाठक इन देवोंको अपने शरीरमे सबसे प्रथम देखें-(१) होने दें। उदाहरणके लिये पहलवानोके व्यायाम ही लीजिये । जिनपर इच्छागक्तिका परिणाम नहीं होता, ऐसे अवयव अपनी पहलवान लोग अपने शरीरके पुठोको बलवान् बनानेके यत्न ही गतिसे कार्य करते है उन अवयवोका नाम प्रयाज है, बहुत करते हैं, परतु हृदय आदि भतरवयवोका ख्याल नही जैसे हदय भादि अवयव । (२ ) जो अवयव अपनी इच्छा करते इससे ऐसा होता है कि उनका स्थूल शरीर बढा शक्तिसे अनुकूल कार्यमें लगाये जा सकते है उनको अनुयाज बलशाली होता है, परंतु हृदयादि विशेष महत्त्वके अवयव कहते हैं, जैसे हाथ, पांव, मांस आदि । ३) हुतभाग वे कमजोर हो जाते है। इसका परिणाम यह होता है कि इन्द्रियां है जो भोगकी इच्छुक है और कार्य करनेसे थकती अल्पायुमे ही उनकी मृत्यु हो जाती है । है और विश्रामसे तथा भाराम मिलनेमे पुष्ट होती है। (४) यदि ये लोग साथ-साथ हृदयको भी बलवान् बनानेका शरीरमें बहुनाट केवल ग्यारह प्राण ही है, क्योकि वे प्राण यत्न करे तो ऐसा नही होगा। इसलिये यहां कहना यह है गरीरमे सदा कार्य करते है और स्वयं कुछ भी भोग नही कि अपने अदर जो देवताओके अंश रहते है उनमें मुख्य रेते, जन्मसे लेकर मरनेतक यरायर कार्य करते है। अवयवोका विशेष ख्याल करना, उनकी शक्ति बढानेका इस प्राणका वर्णन तथा अन्य इन्द्रियोका वर्णन इसी प्रकार और उनकी कमजोरी न बढे इसका विशेष विचार करना उपनिषदोंमे किया है। प्राणाग्निहोत्र उपनिपमें शरीर यज्ञके चाहिये । इसके पश्चात् गौण अवयवोका विचार करना उचित प्रयाज और अनुयाजका वर्णन इस प्रकार है- है । श्वाससंस्थान, मज्जासंस्थान और हृदयसस्थान आदि शरीरयनस्य.. के प्रयाजाः केऽनुयाजाः। महत्त्वपूर्ण संस्थानोका बल बढाना चाहिये और स्नायु आदि महाभूतानि प्रयाजाः भूतान्यनुयाजाः ॥ उनके अनुकूल रहनेयोग्य शक्तिशाली बनने चाहिये । (प्राणाग्निहोन० ३-४) मत्रका प्रयाज शब्द मुख्यका भाव और अनुयाज शब्द गरीरमें चलनेवाले यज्ञके प्रयाज और अनुयाज कौन है ? गौणका भाव बताता है । ये सब देव हमारे चारो ओर सय महाभूत प्रयाज और भूत अनुयाज हैं। इसी प्रकार हुतभाग दिशाओमे विभक्त हुए हैं और उन्होने सपूर्ण स्थानको और महुताद विषयक वर्णन उपनिषदोमें तथा ब्राह्मणोमे विभक्त किया है। ये सब देव हमारे शरीरमे चलनेवाले लिखा है जिसका तात्पर्य अपर दिया ही है । गतसावत्सरिक सत्रके भागी बने, अर्थात् ये इस सौ वर्ष इसी भाभ्यंतर यज्ञका नक्शा बाह्ययज्ञमे किया जाता है, चलनेवाले जीवनरूपी महायज्ञके हिस्सेदार हैं ही, परतु ये उसका वर्णन वहां करनेकी आवश्यकता नहीं है । अनुयाजो- अपना कार्य करनेमे समर्थ बनकर अपना यज्ञका भाग उत्तम से प्रयाज अधिक महत्त्वके हैं तथा हुतभागोसे बहुताद रीतिसे पूर्ण करनेमें समर्थ हो, अपना यज्ञका भाग उत्तम विशेष महत्त्व रसते है। जो शरीरशास्त्र जानते हैं उनके लिए रीतिसे पूर्ण करें मौर निर्विघ्नतासे यह शतसावत्सरिक यज्ञ इसका भधिक विस्तार करनेकी भावळ्यकता नहीं है क्योंकि चलानेमे हमारे सहकारी बनें। , (१०४) अथर्ववेदका सुधोध अनुवाद 'दीर्घजीगन और आरोग्य' हसावलविती सजा कां. ७, सू. ९४ (ऋषि:- अथर्वा । देवता- मोम |) ध्रुवं ध्रुत्रेण हविषाव सोम नयामसि । ग्रथा न इन्द्रः कवलीबिशः समनमस्करत अर्थ-(ध्रुवेण हविपा) स्थिर हविगे (ध्रुवं सोम अव नयामसि ) स्थिर मामको प्राप्त करते है। (यथा इन्द्रः ) जिससे इन्द्र (नः विगः केवलीः संमनसः करत् ) हमारी प्रजाओंको दृसंग र उपर अवलंबन न करनेवाली और उत्तम मनवाली करे ॥१॥ स्थिर कर प्रदान करनेसे राजा स्थिर रहता है बार वह अपनी प्रजाको (केवली) म्बतन्त्र, स्वावलंबिनी अर्थात् दूसरे पर अबलबन न करनेवाली और (सं-मनसः) उत्तम मनवादी करना है । स्वल अपनी ही अनिये रहनेवाठी, दुसरेकी शनिकी सहायता न लेनेवाली जो प्रजा होता है, उसका नाम बंदमें 'क्वली प्रजा'। यह गन्द प्रजाकी श्रेष्टतम उन्नतिका सूचक है। जिस राष्ट्रकी प्रजा केवल अपनी भक्तिसे ही रहती है और किसी प्रकार दूसरे पर निर्भर नही होती, उस राष्ट्रको पूर्ण मानना चाहिए। बाणी कां. ७, सु. ४३ (ऋषि:- प्रस्कण्व. । देवता-बारू।) शिवास्तु एका अशिवास्न एकाः सर्वी विमर्पि सुमनस्यमानः । तिम्रो चाची निर्हिता अन्तस्मिन्तासामेका वि पातानु घोर्षम् ॥१॥ अर्थ- (ते एकाः शिवाः) तेरे एक प्रकारके गन्द्र कल्याणकारक होते है, तथा (ते एकाः अशिवाः) तेरे दूसरे प्रकारके गब्द अशुभ भी होते हैं । (मुमनस्यमानः सर्वाः विभर्पि) उत्तम मनवाला तू उन सबको धारण करता है । (तिनः वाचः अस्मिन् अन्तः निहिता.) तीन प्रकारकी बाणियां इस मनुन्यक मन्दर गुप्त रहती अनु विपपात) उनसे बडे स्वरमें विशेष गतिसे बाहर व्यक्त होती है ।। ५ ॥ परा, पश्यन्ती, मयमा और वैसरी ये वाणीके चार नाम है, परा नाभिस्थानमें, पश्यन्ती हृदयस्थान, मध्यमा छातीके ऊपरके भागमें और वैखरी मुसमें होती है। जो शब्द उच्चारा जाता है वह इन चार स्थानासे गुजरता है। पहिली तीन वाणिया गुप्त है और चतुर्य वाणी प्रकट है जो सब लोग बोलते हैं। यह चतुर्थ बैसरी वाणी मनुष्य शुभ और अशुभ दोनों प्रकारसे बोलते हैं । अतः मनुग्यको योग्य है कि वह उत्तम शुम संस्कार युन मनवाझा होकर शुभ गब्दोंका ही प्रयोग करे। यही शुम उचारी वाणी सबका कल्याण कर सकती है। एका घोपं । (तासां एक - D सुखप्राप्ति-सूक्त (१०५) । सुरत कां. ७, सू. ६९ अपि - शन्तातिः । देवता- सुखम् ।) शं नो वातो वातु शं नस्तपतु सूर्यः । अहानि शं भवन्तु नः शं रात्री प्रति धीयतां शमुषा नी व्युच्छितु ॥ १ ॥ अर्थ- (नः बातः शं वातु) हमारे लिये वायु सुसकर रीतिसे बहे । (नः सूर्यः शं तपतु) हमारे लिये सूर्य सम्बकारी होकर तपे । (नः अहानिशं भवन्तु) हमारे दिन सुखदायक हों । (रात्री शं प्रतिधीयता) रात्री सुखकारी हो । (उपा नः शं व्युच्छत) उप काल हमे सुन्य देवे ॥ १ ॥ वायु, मूर्य, दिन, रान और उपा ये तथा अन्य सब पदार्थ हमें सुखदायक हो । हमारी आन्तरिक अवस्था ऐसो रहे कि हमें बाध जगन् सदा सुखकारी होवे और कभी दुःखदायी न हो । सुरककाहि सूक्त कां. १, सू. २६ (ऋपिः- ग्रझा । देवताः- इन्द्रादयः ।) आरे सावस्मदस्तु हेतिर्देवासो असद । आरे अश्मा यमस्यथ ॥ १ ॥ सखासावस्मभ्यमस्तु रातिः सखेन्द्रो भगः सविता चित्रराधाः यूयं नः प्रवतो नपान्मरुतः सूर्यत्वचसः । शर्म यच्छाथ सप्रथाः ॥३॥ सुपुदत मृडत मृडया नस्तनूभ्यो मयस्तोकेभ्य॑स्कृधि ॥ ४ ॥ अर्थ- हे (देवासः) देवो । (असो हेति: ) यह शस्त्र (अस्मत् आरे अस्तु) हमसे दूर रहे और (यं अस्यथ) जिसे तुम फेंकते हो वह (अश्मा आरे असत्) पत्थर भी हमसे दूर रहे ॥१॥ (असौ रातिः) यह दानशील, (भगः) धनयुक्त सविता, (चित्रराधाः इन्द्रः) विशेष ऐश्वर्यसे युक्त इन्द्र हमारा (सखा अस्तु) मित्र होवे ॥२॥ (प्रवतः नपात् ) स्वयं के रक्षण करनेवालको न गिरानेवाले हे (सूर्यत्वचसः मरुतः) सूर्यके समान तेजस्वी मरुत् देवो! (यूयं ) तुम (नः) हमारे लिये (सप्रथः शर्म) विस्तृत सुख (यच्छाथ) दो ॥३॥ (सुपुदत) तुम हमें आश्रय दो, (मृडत) हमे सुखी करो, (नः तनूभ्यः मृडय) हमारे शरीरोंको आरोग्य दो तया (तोकेभ्यः मयः कृधि) वालबच्चो के लिये मानन्द दो ॥ ४ ॥ भावार्थ-दे देवो भापके दंढरूप शस्त्रको हमारे ऊपर प्रयुक्त होनेका भवसर न भावे, अर्थात् हमसे ऐसा कोई कार्य न हो कि जिसके कारण हम दण्डके भागी बनें ॥१॥ इन्द्र, सविता, भग भादि देवगण हमारे सहायक हों ॥२॥ मरुन् देव हमारा सुख वढावें ॥३॥ सब देव हमें उत्तम आधार दें, हमारे शरीरका भारोग्य बढावे, हमारे मनकी शाति वृद्धिंगत कर, हमारे बालबयोको कुशल रखें और सब प्रकारसे हमारा आनंद बढावें ॥ ४ ॥ १ १४ (अथर्व. भा. ४ हिन्दी) (१०६) अथर्ववेदका सुबोध अनुवाद दीर्घजीवन और आरोग्य' सुखप्राप्ति-सूक्त देवास मित्रता मारोग्य रह सकता है, इस विषयमे भय थोडासा विवरण देखिये- इन्द्र, सविता, भग, मरुत् आदि देवोंसे मित्रता करनेसे मिलता है और उनके प्रतिकुल आचरण करनेसे दुःख १ सविता सूर्य देव आकागसे है, उसीका प्रतिनिधि प्राप्त होता है । इसलिये प्रथम मंत्रमें प्रार्थना है कि उन अंगरूप देव हमारी आंखमे तथा नाभिस्थानके सूर्यचक्रमें रह देवोका दंड हमपर न चले और दूसरे मंत्रमें प्रार्थना है कि रहा है । क्रमगः इनके काम दर्शनशक्ति और पाचनशक्तिके ये सब देव हमारे मित्र, हमारे सहायक बनकर हमारा सुख साथ संबंधित है। ये देव यदि हमारे मित्र बनकर रहें तो बढाव, अथवा हमारा ऐसा माचरण बने कि ये हमारे सहा. स्वास्थ्य और आरोग्य रह सकता है। यदि आंत्र क्सिी यक बने और विरोधी न हों। इसका माशय यह समय धोखा देवे, अथवा रूपके विषयमे मोहित होकर हीन है कि- मार्गसे इस गरीरको ले चले, तो उससे प्राप्त होनेवाली १ सविता- सूर्यदेव है, यह स्त्रय मित्रता करने के लिये शरीरको कष्टमय दगाकी कल्पना पाठक ही कर सकते हैं। हमारे पास नहीं आता, अपितु सवेरे उदय होने के समयसे इसी प्रकार पेटकी पाचनशक्तिके ठीक न रहनेसे कितने रोग अपना हाथ हमारे पास भेजता है और हमसे मिलना चाहता उत्पन्न हो सकते हैं, इसका ज्ञान पाठकोसे छिपा नहीं है। है, परंतु यदि हम अपने आपको तंग मकानों में बंद रखते हैं अर्थात् गरीरस्थानीय सूर्य-सविताक अंग रूप देवके सखा और सविता देवके पवित्र हायके पास जाते ही नहीं तो इसमें बनकर न रहनेसे मनुष्यको आपत्तियोंकी संख्या कितनी बढ सविता देवका क्या दोष है ? सूर्य ही आरोग्यका देवता है, सकती है इसका पाठक ही विचार करे । उसके साथ इस प्रकार विरोध करनेसे उसका वत्र हमपर २ इसी प्रकार मरुत् वायु-देव फेफडोमे तथा शरीरके गिरता है जिससे नाना रोगके दुःसोंमें गिरना पडता है। नाना स्थानोमे रहते हैं। यदि उनका कभी प्रकोप हो जाय तो नाना विकारोंकी उत्पत्ति हो सकती है। २ मरुत्- नाम वायु देवताका है । यह वायुदेव भी हमारी सहायता करने के लिये हरएक स्थानमें हमसे पहिलेसे इसी प्रकार इन्द्रदेव अंतःकरणके स्थान तथा भन्यान्य ही उपस्थित हैं, परन्तु हम खुली हवाका सेवन ही नहीं करते, देव शरीरके अन्यान्य स्थानोमे रहते है । पाठक विचार करके परिशुद्ध वायु हमारे घरों और कमरोमें मावे ऐसी व्यवस्था जान सकते है कि उनके सखा' बनकर रहनेसे ही मनुष्य ही नहीं करते, इसके विपरीत वायुको विगाढनेके अनंत मात्रको स्वास्थ्य और आनंद प्राप्त हो सकता है। इनके साधन निर्माण करते हैं। इत्यादि कारणोंसे विरोधी बननेले दुःखका पारावार नहीं रहेगा। वायु देवताका कोच हमपर होता है और उनका वज्रधात हमें सहन करना चतुर्थ मंत्रमें जो कहा है कि 'ये ही देव हमें सहारा देते है, पढता है। जिससे विविध बीमारियां वायुके क्रोधसे हमें हमें सुखी रसते है, हमारे शरीरका लारोग्य चढाते हैं और सता रही है। वालबच्चाको भी लानंदित रखते हैं, 'यह कथन भी दिनके इसी प्रकार अन्यान्य देवोका संबंध जानना उचित है। प्रकाशके समान प्रत्यक्ष है । इसलिये स्वास्थ्य और सुखकी इस विषयमें अथर्ववेद स्वाध्याय का १ सूक्त ३,९ देखिये, प्राप्तिके इस सच्चे मार्गका अवलंबन सवको करना चाहिए । इन सूनों सष्टीकरणरे प्रमद्गमें देवताओंसे हमारे संबंधका वर्णन दिया है। इसलिये इस सूक्तके साथ उन सूस्तोका संबंध मवर देखना चाहिये । विशेष कर पाठक इस बातका अधिक ख्याल रखें, कि जिस प्रकार इन बाह्य देवताओंके हमारे मित्र बनकर साधन नहीं बताता है, प्रत्युत 'जल, वायु, सूर्य आदिके वेद सुख, स्वास्थ्य और मानद प्राप्त करनेके लिये धनादि रहनेमे हमारा स्वास्थ्य और सुस बढता है, उसी प्रकार साथ सस्य करो' यही साधन बता रहा है। यह हरएक कर टन प्रतिनिधि- जो हमारे शरीरमें स्थान स्थानमें रह रहे सकता है। चाहे धन किसीको मिले या न भी मिले, परंतु टनको मित्र बनाकर रसनेसे भी हमारा स्वास्थ्य और 'जल वायु 'जल वायु और सूर्य प्रकाग' तो इरएकको मिल सकता है। विशेष सूचना ईयानिवारक औषध (१०७) शाफ्का दुष्परिणाम कां. ७, सू. ५९ (अपिः- बादरायणिः । देवता- भरिनाशनम् ।) यो नः शादर्शपतः शर्पतो यश्च नः शात् । वृक्ष ईव विद्युतो हृत आ मूलाद शुध्यतु ॥ १ ॥ अर्थ- (यः अशपत नःपात्) जो गार न देने पर भी हमे गाप देता है और (यःच शपतः नः शपात्) जो शाप देने पर भी इमें माप देता है वह उसी तरह (आ मूलात् अनु शुष्यतु) जढसे सूख जावे, जैसे (विद्युता आहत. वृक्षः इव ) बिजलीसे माहत हुमा वृक्ष सूख जाता है ॥ १ ॥ किसीको शाप देना, गाली देना या चुराभला कहना या निन्दा करना बहुत ही बुरा है। उससे गाली देनेवालेका ही नुकसान होता है। - ईष्यानिकारक और कां. ७ सू. ४५ (ऋषिः- प्रस्कण्वः, अथर्वा । देवता- ईपिनयनं भेषजम् ।) जनाद्विश्वजनीना सिन्धुतस्पर्याभृतम् । दूगत्वा मन्य उद्धृतमीाया नाम भेषजम् ॥ १॥ अमेर्रिवास्य दहतो दावस्य दहतः पृथक् । एतामे॒तस्येामुद्नाग्निमिव शमय ॥ २॥ अर्थ-(विश्वजनीनात् जनात् ) संपूर्ण जनोके हितकारी जनपदसे तथा (सिन्धुतः परि आभृतं ) समुद्रसे जो लाया गया है, वह ( ईर्ष्यायाः नाम भेपज ) ईर्ष्याको दूर करनेवाला औषध है, हे औषध । (दूरात् त्वा उद्धृतं मन्ये ) दूरसे तुझको यहां लाया गया है, यह मैं जानता हूं ॥ १ ॥ हे औषध ! तू (अस्य दहतः अग्नेः इव ) इस जलानेवाले अग्नि के समान, (पृथक् दहतः दावस्य) अलग नला नेवाले दावानलको अर्थात् ( एतस्य एतां ईर्ष्या ) इस मनुष्यकी इस ईर्ष्याको ( उना अग्निं इव शमय ) पानीसे ममिको शान्त करने के समान शान्त कर ॥२॥ मनमे स्थित ईर्ष्या, स्पर्धा और द्वेषभाव इस औपधके प्रयोगसे दूर हो सकता है। सुविद्य वैद्योको उचित है कि वे इन मनके ऊपर प्रभाव करनेवाली ओपधियोकी सोज करें। इस समय मानसिक रोगोकी चिकित्सा वैद्य करनेमे असमर्थ समझे जाते हैं । यदि ये औषधिया प्राप्त हो जाए तो मनके रोग भी दूर हो सकते है। इस सूक्तमें ओषधिका नामतक नहीं है । यही इसकी खोजमे यदी कठिनता है
-
अथर्ववेदका मुषोध अनुवाद
(१०८)
दीर्घजीवन और आरोग्य'
अमृतवाक्ति
कां. ७, सू. ४७
(पि:- अथर्वा । देवला-फुहूः।)
कुहूं देवीं सुकृतं विनापंसमस्मिन्यज्ञे सुहा जोहवीमि ।
सा नौ रयिं विश्ववार नि यच्छाद्ददातु चीरं शतदायमुक्थ्यम
॥१॥
कुहूर्दैवानाममृतस्य पन्नी हन्यां नो अस्य हविषौ जुपेत ।
शृणोतु यज्ञमुंशती नौ अध गयस्पो चिकितुपी दधातु
॥ २॥
अर्थ- (सुकृतं विद्मनापसं सुहवा) उत्तम कर्म करनेवाली, ज्ञानपूर्वक कर्म करनेवाली, स्तुतिके योग्य और
( कु-हं देवीं) पृथ्वीपर जिसका हवन होता है ऐसी दिव्य शक्तिमयी देवीको मै (अस्मिन् यो जोहवीमि) इस यज्ञमें
बुलाता हूं । (सा विश्ववारं रयिं नः नियच्छात् ) वह सबके द्वारा वरण करने योग्य धन हमें देवे । तथा ( उक्थ्यं
शतदायं वीरं ददातु ) प्रशंसनीय और सैकडो दान करनेवाले वीरको प्रदान करे ॥ १ ॥
(देवानां अमृतस्य पत्नी कु-ह) सव देवोंके बीचमें जो पूर्णतया अमर है, उस ईश्वरकी पत्नी यह कुहू,
[जिसका हवन इम पृथ्वीपर सब करते हैं ] (नः हव्या) हमारी प्रशंसाके योग्य है । वह (अस्य हविषः जुषेत)
इस हविका सेवन करे । (उशती यझं शृणोतु ) इच्छा करती हुई वह देवी यज्ञका वृत्तान्त सुने और (चिकितुषी अध
रायस्पोप नः दधातु) ज्ञानवाली वह देवी आज धनसमृद्धि हमें देवे ॥ २ ॥
इस पृथ्वीपर जिसका सत्कार होता है उसको 'कु-हू' कहते हैं । यह (अमृतस्य पत्नी) भमर ईश्वरकी आदि शक्ति
है। और यह ईश्वर (देवानां अ-मृतः ) सपूर्ण देवोमें अमर है। इसकी अमर शक्तिस ही सव अन्य देव भमर बने हैं।
इस परमेश्वरी गक्तिकी हम उपासना करते हैं । वह देवी हम धन और वीरता देवे ।
-
m
ज्ञान और कम्
कां. ७, सू. ५४
(ऋपिः- ब्रह्मा, भृगुः । देवता- ऋक्साम, इद् ।)
ऋचं सामं यजामहे याभ्यां कर्माणि कुर्वते । एते सद॑सि राजतो य॒ज्ञं देवेषु यच्छतः
अर्थ- (याभ्यां कर्माणि कुर्वते ) जिनके द्वारा कर्म करते हैं उन (ऋचं साम यजामहे ) ऋचाओ भौर
सामोसे हम सगतिकरणका काम करत है (पते सदसि राजतः ) ये दोनो इस यज्ञस्थलमें प्रकाशमान हो । और ये
देवपु यहा यच्छतः) देवोंमे श्रेष्ठ कर्मका अर्पण करे ॥ १ ॥
भावार्थ- ऋचा भार साम इन मन्त्रांसे मानवी उन्नति सय कर्म होते हैं, इसलिये हम इन वेदोका अध्ययन करते
है। ये ही वेट इस जगतकी कर्म भूमिमें प्रकाश देनेवाले मार्गदर्शक है । क्योंकि ये ही देवा में सत्कर्मकी स्थापना करते है ॥३॥
॥ १॥
प्रकाशका मार्ग (१०९) - ऋचं साम यदक्षिं हविरोजो यजुर्वलम् । एप मा तस्मान्मा हिंसीद्वेद पृष्टः शंचीपते ॥ २॥ अर्थ-(यत् ऋचं साम, यजुः) जिन ऋचा, साम और यजु तथा (हविः ओजः वलं अप्राक्षं) हवन, भोज मौर बलके विषयमें मैने पूछा, हे (शचीपते ) बुद्धिमान । (तस्मात् एषः पृष्टः वेदः ) उस कारण यह पूछा हुमा घेट (मा मा हिंसीत् ) मेरी हिंसा न करे ॥ २ ॥ भावार्थ-मै गुरुमे ऋचा, साम और यजुके विषयमे पृछता हूं और हवनकी विधि, शारीरिक यल कमानेका उपाय भौर मानसिक बल प्राप्त करनेका उपाय भी पूलता है। यह सय प्राप्त किया हुआ शान मेरी उमतिका सहायक होवे मौर बाधक न यने ॥२॥ इस सूक्तमें कहा है कि मचा, यजु और साम ये ज्ञान देनेवाले मंत्र हैं और इनसे श्रेष्ठतम कर्म किया जाता है। इन कोको करके मनुष्य उन्नतिको प्राप्त करता है और ओज तथा वलको बढाता है । उक्त मन्त्रोंसे मनुष्य ज्ञान प्राप्त करता है और उस ज्ञानसे कर्म करके उन्नत होता है । परन्तु किमी किसी समय मनुष्य मोहवश होकर ज्ञानका दुरुपयोग भी करता है और अपना नाश कर लेता है। उदाहरणार्थ कोई मनुष्य बल प्राप्तिके उपायका ज्ञान प्राप्त करता है और उसका अनुष्टान करक बहुत बल कमाता है । शरीरमें बल बढनेसे उसमें घमण्ड पैदा होता है और वही मनुष्य निर्वलोंको सताने लगाता है और गिरता है। अतः इस सूक्तके अन्तिम मन्त्रमें प्रार्थना की है कि वह प्राप्त हुआ हुआ ज्ञान हमारा धात न करे, ज्ञान एक शक्ति है जो उपयोगकर्ताके भले बुरे प्रयोग के अनुसार भला बुरा परिणाम करनेवाली होती है । इसीलिये परमेश्वरसे प्रार्थना की जाती है कि वह हमारी सत्प्रवृत्ति रखे और हमें घातपातके मार्गमें जाने ही न दे। . प्रकाशका मार्ग कां. ७, सू. ५५ (ऋषिः- भृगुः । देवता- इन्द्रः।) ये ते पन्थानोऽव दिवो येभिर्विश्वमैरैयः । तेमिः सुम्नया घेहि नो वसो ॥१॥ अर्थ- हे (वसो) सवके निवासक प्रभो (ये ते दिवः पन्थानः) जो तेरे प्रकाशके मार्ग हैं, (येभिः विश्वं अव ऐरयः ) जिनसे तू सब जगत्को चलाता है, (तोभिः नः सुम्नया धेहि ) उनसे हम सबको सुखसे - - भावार्थ-हे प्रभो । जो तेरे प्रकाशके मार्ग है मौर जिनसे दूसब जगत्को चलाता है, हमें उन सुखके मार्गोंसे हैं चक और हमे सुख दे ॥ १ ॥ मार्ग दो हैं । एक प्रकाशका और दूसरा अन्धेरेका । ईश्वर प्रकाशका मार्ग सबको बताता है और सबको सुखी करता । परन्तु जो इस प्रभुको छोडकर अन्धेरेके मार्गसे जाते हैं वे दुःख भोगते हैं। इसीलिये इस प्रभुकी ही प्रार्थना करनी चाहिये कि वह अपना प्रकागका मार्ग हमें दर्शावे भौर हमें ठीक मार्गसे ले चले।
(११०) अथर्ववेदका सुवोध अनुवाद - 'दीर्घजीवन और आरोग्य' मनुष्याकी शक्तियाँ कां. ७, सू. ५७ (ऋषिः- वामदेवः देवता- सरस्वती।) यदाशसा बदतो मे विचुर्भे यद्याचमानस्य चरतो जनाँ अनु । यदात्मनि तन्वो मे विरिष्टं सरस्वती तदा घृणघृतेन | ॥१॥ सप्त क्षरन्ति शिर्शवे मरुत्वते पित्रे पुत्रासो अयवीवृतन्नृतानि । उभे इदग्योभे अम्य राजत उभे यतेते उभे अस्य पुष्यतः ॥ २॥ अर्थ- (यत् आशसा वदतः ये विचुक्षुभे) जो हिंसासे बोलनेवाले मेरा मन क्षुभित हो गया है, ( यत् जनान् अनुचरतः याचमानस्य ) जो लोगोकी सेवा करते हुए याचना करनेवाला व्याकुल हो गया है, (तत् आत्मनि मे तन्वः विरिष्टं) तथा मेरी भात्मामे और शरीरमें जो हीनता हो गई है, (तत् सरस्वती घृतेन आ पृणत्) उसको सरस्वती धृतसे भर देवे ॥ १ ॥ जिस प्रकार (पित्र पुत्रासः ऋतानि अपि अवीवृतन् ) पिताके लिये पुत्र सत्य कोको करते हैं। उसी प्रकार (मरुत्वने शिशवे सप्त क्षरन्ति ) प्राणवाले बालकके लिये सात प्राण अथवा सात इन्द्रियशक्तिया जीवनरस देती हैं । (अस्य उभे इत् ) इसके पास दो गक्तियां है और ( अस्य उभे राजतः) इसकी वे दोनो शक्तियां प्रकाशित होती हैं, (उभे यतेने ) दोनो प्रयत्न करती है और ( अस्य उभे पुण्यतः ) इसका दोनो पोषण करती हैं ॥ २ ॥ भावार्थ- वक्तृत्व करने के समय अथवा जनसेवा करनेके समय किंवा सेवाके लिये प्रार्थना करनेके समय करनेके योग्य हलचलमे जो भी गरीरमे अथवा मनमे या आत्मामें दु.ख हुमा हो, वह सरस्वती दूर करे ॥ १ ॥ चैतन्यपूर्ण वालकमें सात दैवी शक्तियां कार्य करती हैं। ये शक्तियां उसका कार्य ऐसे ही करती है कि जैसे बालक अपने पिताका कार्य करते है । उसके पास दो शक्तिया होती है जो उसका तेज बढाती, कार्य कराती और पोषण करती है ॥२॥ जनसेवा जनसेवा करनेके समय जो कष्ट होते है (जनान् अनुचरतः यद् विचुक्षुभे। मं. १ ) जनताकी सेवा करनेके समय जो क्षोभ होता है, जो मानसिक क्लेश होते है अथवा जो शारीरिक क्लेश भोगने पढते हैं, वे सरस्वती अर्थात् विद्या देवीकी सहायताले दूर हो । अर्थात् मनुष्यको जनताको सेवा करनी चाहिये और उस पवित्र कार्यके करनेके समय जो कष्ट हो, ठनको आनदसे सहना चाहिये । विद्याके उत्तम प्रकार प्राप्त होनेके पश्चात ही ग्रह सहनशक्ति प्राप्त होती है । ज्ञानी मनुष्य ऐसे कष्टोकी पर्वाह नहीं करता। मानवी बालकके तथा बढे मनुष्यक गरीरमें सात शक्तिया रहती है। बुद्धि, मन और पाच ज्ञानेंद्रिया, ये सात शनिया है जो हरएक मानवी बालकमे जन्मसे रहती है। मानो ये सातो इसके पुत्र ही हैं। पुत्रवत् ये इसकी सहायता करती है । जिस प्रकार पुत्र अपने पिताके कार्य सद्भावनासे करते है और कोई कपट नहीं करते, उसी प्रकार ये शक्तियां इसके कार्य अपनी शक्ति के अनुसार निष्कपट भावसे करती है। इसके पास प्राण और भपान ये दो और विशेप प्रकारके वल हैं, इन दोनो बलोंसे इसका तेज बढता है, इन दोनोंके कारण यह प्रयन्न कर सकता है और इन दोनोकी सहायतासे इसकी पुष्टि होती है। इन सब मतियोंसे मनुष्यकी उन्नति होती है। इनके साथ सरस्वती अर्थात् सारवाली विद्यादेवी है जो मनुष्यकी महायक देवता है। मानवी उन्नति इनसे होती है यह जानकर मनुष्य इन शक्तियोंकी रक्षा और वृद्धि करे भौर अपनी उसति भपने प्रयत्नसे सिन्द करे ।
बलदायी अन्न क्लदानी अन कां. ७, सू. ५८ (ऋपि - कौम्पथि । देवता- इन्द्रावरणी। ) इन्द्रावरुणा सुतपाविम सुतं सोमै पिवत भय॑ धृतवती । युवो रथो अध्वरो देवीतये प्रति स्वसंमुप॑ यातु पीतये इन्द्रावरुणा मधुमत्तमस्य वृष्णः सोमस्य इदं वामन्धः परिषिक्तमासद्यास्मिन्यहिपि मादयेथाम् ॥ १ ॥ वृषणा वृपेथाम् । ॥२॥ अर्थ- हे (सुतपी, धृतवृतौ इन्द्रावरुणा) उत्तम तप करनेवाले, नियमके अनुसार चलनेवाले इन्द्र और वस्णो! (इमं मुतं मद्यं सोमं पिवतं) इस निचोठे हुए मानद बढानेवाले सोमरसका पान करो । (युवोः अध्वरः रथः) तुम दोनोंका अहिंसास युक्त रथ (देववीतये, पीतये प्रतिस्त्रसरं उपयातु) देवप्राप्ति और रक्षा करनेके लिये प्रतिध्वनि करता हुमा जावे ॥१॥ - है (वृपणा इन्द्रावरुणा) बलवान् इन्द्र और वरुण । (मधुमत्तमस्य वृष्णः सोमस्य वृपेथां) अत्यन्त मधुर बलकारी सोमरसको वर्षा क्रो अथवा इसमे बल प्राप्त करो। (इदं वा अन्धः परिपिक्तं) यह तुम दोनोका अन्न मच्छी तरह पाया गया है। (अस्मिन् वहिपि आसद्य मादयेथां) इस आसनपर बैठकर इस भन्नका मानन्द लो ॥२॥ इस सूक्तमें मनुष्य किस प्रकार रहें और क्या साएं वीर अर्थात् जहा गमन करना हो वहा अहिंसा और अकुटिल- किस प्रकार भानंद प्राप्त करें इस विषयमे लिखा है देखिये- ताका संदेश स्थापन करनेका यत्न किया जावे । १ सुतपो- मनुष्य उत्तम तप करनेवाले हो, गीत ६ देववीतये- देवत्वकी प्राप्तिके लिये प्रयत्न होता उष्ण आदि द्वोको सहन करनेकी शक्ति अपने सदर बढावें। रहे। राक्षसत्वसे निवृत्ति होवे और दिव्य गुणोका धारण हो । २ धृतवती- नियमोका पालन करें। नियमके विरुद्ध ७ पीतये- रक्षा करनेका प्रयत्न हो। भात्मरक्षा, भाचरण कदापि न करें । सब अपना भाचरण उत्तम नियमा- समाजरक्षा, राष्ट्ररक्षा, जनरक्षाके लिये प्रयत्न हो । ८ इदं वां अन्धः- यह तुम्हारा अन्न है। हे मनुष्यो। ३ वृपणी- मनुष्य बलवान् बनें, मशक्त न रहे । यही भन्न तुम खाओ। तथा (मद्यं सुतं सोम) हर्ष ४ इन्द्रावरुणौ- मनुष्य इन्द्र के समान शूरवीर ऐश्व- उत्पन्न करनेवाले सोम आदि औषधि वनस्पतियोसे संपा- र्यवान् , धीर, गंभीर, शत्रुओंको दवाने और परास्त करने- दित रस आदि तथा (वृष्णः मधुमत्तमस्य सोमस्य वाला बने । वरण के समान वरिष्ठ और श्रेष्ठ बने । जो जो वृपेथां) बलवर्धक तथा मधुर सोमादि औषधियोके रससे इन्द्रके और वरुणके गुण वेदमे अन्यत्र वर्णित हैं, मनुष्य तुम सब लोग बलवान् वनो । उन गुणोंको अपने अंदर धारण करें और इंद्र के समान तथा इस प्रकार देवोका वर्णन अपने जीवनमें ढालनेका प्रयत्न वरुणके समान बननेका यत्न करे । करनेसे वेदका ज्ञान अपने जीवनमें उतरता है और जो श्रेष्ठ ५ अध्वरः रथ:-हिंसारहित, कुटिलतारहित स्थ हो। अवस्था मनुप्यको प्राप्त करनी होती है वह प्राप्त हो सकती है। नुकूल रख ।
(११२)
अथर्ववेदका सुबोध अनुवाद - 'दीर्घजीवन और आरोग्य'
कल्या घाई कर
कां. ७, सू. ८
।
(अपिः- उपरियभ्रवः । देवता- गृहस्पतिः।)
भद्रादधि श्रेयः प्रेहि वृहस्पतिः पुरएता ते अस्तु ।
अथेममस्या वर आ पृथिव्या आरेशत्रु कृणुहि सवैवीरम्
|| १॥
अर्थ- (भद्रात् अधि) सुससे भी परे जाकर (श्रेयः प्रेहि ) परम कल्याणको प्राप्त हो (वृहस्पतिः ते पुर-
एता अस्तु) ज्ञानी तेरा मार्गदर्शक बने । (अथ) और (अस्याः पृथिव्याः वरे ) इस पृथ्वीके श्रेष्ठ स्थानमें ( इम
सर्ववीरं ) इस सव वीर समुदायको (आरे-शत्रु कृणुहि ) गत्रुसे दूर कर ॥ १ ॥
भावार्थ- हे मनुष्य । तू सुख प्राप्त कर, परंतु सुसकी अपेक्षा भी जिससे तेरा परम कल्याण हो उस मार्गका भवल-
और
वह परम कल्याणकी अवस्था प्राप्त कर । पृथ्वीके ऊपर जो जो श्रेष्ठ राष्ट्र हैं, उनमे सय प्रकारके वीर पुरुष
उत्पन्न हो उनके शत्रु दूर हो जाय । अर्थात् सय राष्ट्रोमें उत्तम गान्ति स्थापित होवे ॥ १ ॥
यहा 'भद्र' शब्द साधारण सुखके लिये प्रयुक्त हुआ है । अभ्युदयका वाचक यह शब्द यहां है । जगत्मे भौतिक
माधनोसे जो सुख मिलता है यह साधारण सुख है । आहार, निद्रा, निर्भयता और मैथुन सम्बन्धी जो सुख है वह साधारण
है। इससे जो श्रेष्ठसुस है उसको 'श्रेयः' कहते है मनुष्यको यह परम कल्याण प्राप्त करनेका यत्न करना चाहिये; इसके
लिये ज्ञानी (बृहस्पति) पुरुषको गुरु बना कर उसकी आज्ञाके अनुसार चलना चाहिये । ज्ञान भी वही है कि जो (मोक्षे
धीः) यन्धनसे छुटकारा पानेके कार्यमें सहायक हो । ज्ञानीका उद्देश्य यह है कि इस पृथ्वीपर जो जो राष्ट्र हैं, वे श्रेष्ठ राष्ट्र
बनें और सब स्त्रीपुरुष तेजस्वी वीरवृत्तिवाले निर्भय बनें और किसी स्थानपर भी उनके लिये शत्रु न रहें ।
ग्यन कर
उत्साह
कां. ४, सू. ३१
(ऋषि - ब्रह्मा, स्कन्द । देवता- मन्युः।)
त्वयां मन्यो सरथमारुजन्तो हर्षमाणा हृषितासों मरुत्वन् ।
तिग्मेव आयुधा संशिशाना उप प्र य॑न्तु नरौ अग्निरूपाः
॥१॥
अर्थ- हे (मरुत्वन् मन्यो ) मरनेकी अवस्थामें भी उठनेकी प्रेरणा करनेवाले उत्साह । (त्वया स-रथं आरु-
जन्तः) तेरी सहायतासे रथ सहित शत्रुको विनष्ट करते हुए और स्वयं (हर्पमाणाः हपितासः) आनन्दित और प्रसन्न-
चित्त होकर (आयुधाः सं-शिशानाः) अपने मायुधोंको तीक्ष्ण करते हुए (तिग्म-इपवः अग्निरूपाः नरः) तीक्ष्ण
शस्त्रास्त्रवाले अग्निके समान तेजस्वी नेतागण (उप प्र यन्तु) चढाई करें ॥ १॥
भावार्थ- मनुष्यको उत्साह हताश होने नहीं देता । जिनके मनमें उत्साह रहता है वे शत्रुओको नष्ट करते है
मौर प्रसन्न चित्तसे अपने शमानोको सदा सज करके अपने तेजको बढाते हुए शत्रुपर चढाई करते हैं ॥ १ ॥
उत्साह (१३) M अगिरिव मन्यो विपितः सहस्व सेनानीनः सहुरे हत एवि । हत्त्वाय शत्रुन्धि भजस्व वेद ओजो मिर्मानो वि मुधों तुदस्व ॥२॥ सहस्व मन्यो अभिमातिमस्मे जन्मृणन्प्रमृणन्प्रेहि शत्रून् । उग्रं ते पाजो नन्वा ररुधे वशी वर्श नयासा एकज त्वम् ।। ३ ॥ एको बहुनाममि मन्य ईडिना विर्शविशं युद्धाय सं शिंशाधि । अकृत्तक्त्वया युजा ययं घुमन्तं घोष विजयाय कृण्मसि ॥४॥ विजेपकदिन्द्र इवानववयोइसाक मन्यो अधिपा भवेह । प्रियं ते नाम सहुरे गृणीमसि विद्मा तमुत्सं यत आवभूथ ॥ ५॥ अर्थ- हे (मन्यो) उन्नाह ! (आग्निः इव) तू अग्निके समान (त्विपितः सहस्व) तेजस्वी होकर शत्रुको परान कर । ई (सहुरे) समर्थ (हतः नः सेनानी एधि) पुकारा हुमा त् हमारी सेनाको चलानेवाला हो । (शत्रून् हन्वाय) शत्रुओंको मारकर (वेट. विभजस्व) धनको बांट दे और (ओजः मिमानः) अपने बलको मापता हुआ (मृचः वि नुदस्व) शत्रुओंको हटा दे ॥ २ ॥ हे (मन्यो) उत्साइ (अस्मे अभिमाति सहस्व) इसके लिये अभिमान करनेवाले शत्रुको पराजित कर (शत्रून रुजन् मृणन् प्रमृणन् प्रेहि) गको तोडता हुमा, मारता हुआ और कुचलता हुमा चढाई कर । (ते उग्रं पाजः ननु आ ररुधे ) वेरा प्रभावशाली वल निश्चयसे शत्रुको रोक सकता है । हे (एकज) अद्वितीय (त्वं वशी वशं नयासै) त् स्वयं संयमी होने के कारण शत्रुको अपने वशमे कर सकता है ॥३॥ है (मन्यो) उत्साह । तू (एकः वहनां ईडिता असि) भला ही बहुतोंमें सत्कार पानेवाला है। तू (विशं विशं युद्धाय सं शिशाधि) प्रत्येक प्रजाजनको युद्ध के लिये उत्तम प्रकार शिक्षित कर । हे (अ-कृत्त-रुक् ) अटूट प्रका- शबाले ! (विजयाय त्वया युजा वयं ) विजय के लिये तरी मित्रता के साथ साथ हम (धुमन्तं घोपं कृण्मसि) हर्ष युक्त गन्द भी करते है॥४॥ हे (मन्यो) उत्साह । (इन्द्रः इव विजेपकृत् ) इन्द्रके समान विजय करनेवाला और (अनव-नवः) उत्तम वचन बोलनेवाला होकर (इह अस्माकं अधिपा भव) यहां हमारा स्वामी हो । हे (सहुरे) समर्थ (ते प्रियं नाम गृणीमसि ) तेरा प्रिय नाम हम लेते हैं । (तं उत्सं विम) और उस स्रोतको जानते हैं कि (यतः आवभूथ) जहासे द प्रकट होता है।॥५॥ भावार्थ- उत्साइसे तेज बहता है, उत्साहसे ही शत्रु परास्त होते हैं । उत्साही सेनाचालक ही शत्रुका नाश करके धन प्राप्त करता है । फिर अपने घरको बहाता हुक्षा दुष्टोंको दूर कर देता है ॥२॥ उत्साहसे शत्रुकी पराजय कर और शत्रुओका नाश उत्साहसे कर । उत्साहसे तेरा यल यठेगा और तू शत्रुको रोक सकेगा । हे शूर तू पहिले अपना संयम कर भौर जब तू अपना संयम करेगा तय तू शत्रुको भी वशमें कर सकेगा ॥३॥ स्वभावतः उत्साही पुरुष बहुतोंसे एकाध होता है और इसलिये सय उसका सत्कार करते हैं। शिक्षा द्वारा ऐसा प्रयध करना चाहिये कि राष्ट्रका हरएक मनुष्य उत्साही हो और जीवनयुद्धमे अपना कार्य करनेमें समर्थ हो । उत्साहसे ही प्रकाश बढता है और विजयकी घोषणा करनेका सामर्थ्य प्राप्त होता है ॥ ४ ॥ उत्साह ही इन्द्र के समान विनय करनेवाला है। उत्साह कभी निराशाके शब्द नहीं बुलवाता । इसलिये हमारे मन्त.. करणमें उत्साहका अधिकार स्थिर होवे । हम उन समर्थ महापुरुषोंका नाम लेते हैं कि जिनके मन्तःकरणमें उत्साहका स्रोत बहता रहता है॥५॥ १५ [मयर्व. मा. ४ हिन्दी] ।
TONE i जोध अनुवार वीर्यजीयन और आरोग्य " . - जामा गायक महा विभर्पि महभृत उत्तरम् । को यो मेयोधि महाधनम्य पूरहून संसृजि प समाईनमम्मभ्य भनां वरेण मन्युः । मना या शर्यतः पर्गजिनामो अप नि लेयन्ताम् ॥ ७॥ ? सावरमाभन ) याग, पाणधागे और माथ रहनेवाले । तू (आभूत्या सहजाः ) ऐश्वर्यके .... ( नावित्रि ) या उनम पर धारण करता है । इ (पुरुहत मन्यो) बहुत बार 2. मा.)यार (मेटी) मित्र यन फर (महाधनस्य संसृजि) बडा धन - Trt (4) मे प्रास हो। ५ ॥ { ..7 : ?) मा भोर श्रेष्टय भारी (मंदृष्ट) उत्सम किया हुआ भौर (सं- (सय घन पत्ता) को प्रकारका धन ( अन्मभ्यं ) मे दें। (हदयेपु भियः यानाः माय पगजितायः अप निलयन्तां) परानिा होयर दूर भाग जायें ॥ ७ ॥ Fire हो । टल्गही माय मद ऐनयं रहते है और उत्साह ही अधिक बएको kar. parगार मानी गने और उनी साथ रहने जीवनयुद्धमे हमागे पितय हो ॥६॥ :-:-गो, जार ये मय वन प्रात । मयं उत्पन्न किया शुभा . . . . . रा टल्याही पुरा मनमें इनरी हुए परान होकर भाग + * ३ " . ** R M 3 उत्साह मा मूलमंत्र मदर अपने प्रामे प्रारंभ होता है, इसलिये ग. बार्य भी गिने रायसे ही प्रारंग होना rwt For TI erial" र शाम प्रोपादि भनेर शत्रु जिनको TRI कारन ही मनुष्यका ।', gram:'' पर RATो यमगे करनेमें मगध होता ki marite राव तुम नानुको नगर Re-n. ' TREET 1 1 है . -A + N 4+ . . . . ६ ४ 3 + . मग ' मा therम For Trean in मकाते मा':', -१६ : - * (7-Ti) in HIT ... TETA RE fre Tirrr. Raft Ex ** " :h rm or tran, - ॐ - । , 4 G है det ३ उत्साह (११५) उत्पाद (म+उ+वन ) मरनेकी अवस्थामे भी उठ- आनंद ध्वनि ही मनुष्य करें और कभी निराशाके कीचडमें नेकी भागा बनी रहती है, कैसी भी कठोर भापत्ति न फंमें । यह उत्साह (विजेष-कृत्) विजय प्राप्त करा- क्यों न मा जाय, मन सदा उल्लसित रहता है। नेवाला है। इस समय इन्द्रादिकोंने जो विजय प्राप्त की है उस्माइसे मनुष्य (अग्निरूपाः नरः) अग्निके समान यह इसी उत्साहके बलपर ही की है। एक बार मनमें जो तेजस्वी बनते हैं । (गघून हत्वा) लोको मारनेका मनुन्य पूर्ण निरुसाही बनता है वह आगे जीवित भी नहीं सामर्थ्य उत्पा होता है। जिस मनुष्य में यह उत्साह मन्त. रहता । अर्थात् जीवन भी इस उत्साहपर ही निर्भर रहता है। भक्तियोंका (सेनानी ) संचालक सेनापति जैस इसलिये हमारे मनका (अस्माकं अधिपाः ) स्वामी यह बनता है वहा (ओजः मिमानः ) यल बटता है और उत्साह बने और कभी हमारे मनमें उत्साहहीनता न आवे । (मृधः विनुदस्व ) शत्रुनोको दूर करनेकी शक्ति उत्पन्न यह उत्साह ऐसा है कि जिसके ( सह-भूत) साथ वल होती है। उत्साहसे (उग्रं पाजः) विलक्षण उन यल बसता है जिसके सामने ( ननु आररुधे ) कोई गन्नु ठहर निसदेह वल उत्पन्न होगा ही। इसीलिये हरएक मनुष्यको उत्पन्न हुआ है । अर्थात् जहां उत्साह उत्पन्न होगा वहां नहीं सकता भान् यह उत्साही पुग्य सय शत्रुमोको रोक रखता है भौर पास माने नहीं देता। राष्ट्रमे (विज्ञविशं चाहिये कि वह अपने मनमें उत्साह सदा स्थिर रखनेका प्रयत्न करे और कभी निराशाके विचार मनमें भाने न दे । युद्धाय सं शिशाधि) हरएक मनुन्यको ऐसी शिक्षा देनी चाहिये कि जिस शिक्षाको प्राप्त करनेसे हरएक मनुष्य इसी उत्साहसे सब प्रकारके धन मनुष्य प्राप्त कर सकता है। अपने जीवनयुद्धर्म निश्चयपूर्वक विजय प्राप्त करने के लिये शत्रुको परास्त करता है और विजयी होता हुआ इहलोक समर्थ हो जावे । (विजयाय घोपं कृण्मास) विजयकी और परलोकमें भानंदसे विचारता है। - उत्साह को. ४, सू. ३२ (ऋपि.- ब्रह्मास्कन्दः । देवता- मन्यु. यस्तै मन्योऽविधद्वज सायक सह ओजः पुष्यति विश्वमानुपक् । साह्याम दासमार्य त्वया युजा वयं सहस्कृतेन सहसा सहस्वता ॥१॥ मन्युरिन्द्रो मन्युरेवास देवो मन्युहर्होता वरुणो जातवेदाः । मन्युर्विश ईडते मार्नुपीर्याः पाहि नो मन्यो तपसा सजोषाः ॥२॥ अर्थ- हे ( वज्र सायक मन्यो ) शस्त्रास्त्रयुक्त उत्साह । ( यः ते अविधत् ) तो तेरा सेवन करता है वह (विश्वं सहः ओजः) सब बल और सामर्थ्यको (आनुपक् पुण्यति) निरन्तर पुष्ट करता है। (सहस्कृतेन सह- स्वता) बलको बढानेवाले और विजयी ( त्वया युजा) तुझ सहायकके साथ (वयं दासं आर्य साह्याम ) हम दासो और मायाको अपने वशमे करें ॥ १ ॥ (मन्युः इन्द्रः) उत्साह ही इन्द्र है, (मन्युः एव देव. आस) उत्साह ही देव है, (मन्युः होता वरुण जातवेदाः) उत्साहही हवनकर्ता, वरुण और जातवेद अग्नि है । वह (मन्युः) उत्साह है कि जिसकी (याः मानुपीः विशः ईडते ) सव मानवी प्रजाएं प्रशंसा करती है । हे ( मन्यो) उत्साह ! (सजोषाः तपसा नः पाहि ) प्रीतिसे युक्त होकर तू तपसे हमारी रक्षा कर ॥ २ ॥ भावार्थ- जिसके पास उत्साह होता है, उसको सब प्रकारका बल और शस्त्रास्त्रोका सामर्थ्य प्राप्त होता है और वह हरएक प्रकारके शत्रुको वशमें कर सकता है ॥ १ ॥ इन्द्र, वरुण, भग्नि मादि सब देव इस उत्साहके कारण ही पढे गतिवाले हुए है। मनुष्य भी इसी उत्साहकी प्रशसा करते हैं क्योंकि यह उत्साह अपने सामर्थ्यसे सबको बचाता है ॥ २ ॥ ! *
(११६)
अथर्ववेदका सुबोध अनुवाद
दीर्घजीयन और आरोग्य'
अभी हि मन्यो तवसस्तीयान्तप॑सा युजा वि जहि शत्रून् ।
अमित्रहा वहा दस्युहा च विश्वा वसून्या भरा त्वं नः
॥३॥
त्वं हि मन्यो अभिभूत्योजाः स्वयंभूर्भामौ अभिमातिपाहः ।
विश्वचर्षणिः सहुरिः संहीयानुस्मास्वोजः पृतनासु धेहि
॥४॥
अभागः सन्नप परतो अस्मि तब त्यो तविपस्य प्रचेतः ।
तं त्वां मन्यो अक्रतुर्जिहीडाहं स्वा तनूलदावा न एहि
अयं ते अस्म्युपं न एयुर्वाङ् प्रतीचीनः सहुरे विश्वदावन् ।
मन्यों बचिन्नभि न आ व॑वृत्स्त्र हनांव दस्यूस्त बौध्यापेः
अर्थ- हे ( मन्यो) उत्साह । (तवसः तवीयान् अभीहि) महानसे महान शक्तिवाला तू यहां भा। (तपसा
युजा शत्रून विजहि ) अपने तपके सामर्थ्यसे युक्त होकर शत्रुओका नारा कर । (अमित्रहा, वृत्रहा, दस्युहा त्वं)
शत्रुओंका नागक, भावरण करनेवालोका नाशक और आकुमोका नागक तू (नः विश्वा वननि आभर) हमारे लिये
सब धनोको भर दे॥ ३ ॥
हे (मन्यो) उत्साह । (त्वं हि अभिभूति-ओजः) ही विजयी बलमे युक्त, ( स्वयं-भू. भामः ) अपनी
ही शक्तिसे बढनेवाला, तेजस्वी, (अभिमाति-पाहः ) शत्रुओका पराभव करनेवाला, (विश्वचणिः सहुरिः) सबका
निरीक्षक, समर्थ (सहीयान् ) और बलिष्ठ हो । तू (पृतनासु अस्मानु ओजः धेहि) युद्धोम हमारे अन्दर भक्ति
स्थापित कर ॥४॥
हे (प्रचेतः मन्यो ) ज्ञानवान् उत्साह । मैं (तव तविषस्य अभागः सन् ) तेरे बलका भाग न प्राप्त करनेके
कारण (क्रत्वा अप परेतः अस्मि ) कर्मशक्तिसे दूर हुला हू । इसलिये (अक्रतुः अहं तं त्वा जिहीड) कर्म हीन
सा होकर मैं तेरे पास प्राप्त हुआ हूं । अतः तू (नः स्वा तनूः वलदावा आ इहि ) हमको अपने शरीरसे बळका दान
करता हुमा प्राप्त हो ॥ ५॥
हे (सहुरे) समर्थ । हे (विश्वदावन् ) सर्वस्त्रदाता ! (अयं ते अस्मि ) यह मैं तेरा ही है । (प्रतीचीनः नः
अर्वाड् उप पहि) प्रत्यक्षतासे हमारे पास आ । हे (मन्यो) उत्साह । हे (जिन् ) शस्त्रधर । (नः अभि आय-
वृत्स्व ) हमारे पाम प्राप्त हो । (आपेः बोधि) मित्रको पहचान (उत दस्यून हनाय) और हम शत्रुओंको
-
मारें ॥६॥
भावार्थ- उत्साहसे बल बढता है और शत्रु परास्त होते है । दाकु चोर और दुष्ट दूर किये जा सकते हैं और सब
प्रकारका धन प्राप्त किया जा सकता है ॥ ३ ॥
उत्माहसे विजयी बल प्राप्त होता है, शत्रुओका पराभव होता है, अपना सामर्थ्य बढ जाता है, तेजस्विता फैलती है
और हरएक प्रकारका बल बढता है । वह उत्साहका बल युद्ध के समय हमें प्राप्त हो ॥ ४ ॥
जिसके पास यह उत्साह नही होता वह कमकी शक्तिमे हीन हो जाता है। इसलिये हरएक मनुष्यको चाहिए कि
वह अपने मनमे टत्माह धारण करे और बलवान् बने ॥ ५॥
उत्साहमे सब प्रकारका बल प्राप्त होता है। यह उत्साह हमारे मनमे भाकर स्थिर रहे और उसकी सहायतासे हम
मित्रोको यढावें भौर शत्रुओंको दूर करें ॥ ६ ॥
7 उत्साह (११७) अभि प्रेहि दक्षिणतो भवा नोऽर्धा वृत्राणि जसनाव भूरि । जुहोमि ते धरुणं मध्वो अप्रेमुभावुपांशु प्रथमा पिवाव ॥ ७॥ अर्थ-(अभि प्र इहि ) भागे बद । (नः दक्षिणतः भव) हमारे दाहिनी भोर हो। (अध नः भूरि वृत्राणि अंघनाव) दमे दोनों अपने सब प्रतिवन्धकोको मिटा देवें। (ते मध्वः अग्रं धरुणं) तेरे मधुर रसको मुख्य धारण करनेवालेको (जुहोमि) मैं स्वीकार करता हूं। (उभौ उपांशु प्रथमा पिवाव) हम दोनो एकान्तमे सबसे पहिले उस रसका पान करें ॥७॥ भावार्थ- उत्माइ धारण करके भागे बढ । शत्रुओको परास्त कर और भोगोको प्राप्त कर ॥ ७ ॥ उत्साह उत्साहका धारण कि जो अभ्युदय और निःश्रेयस प्राप्त करना चाहता है, वह पूर्वके सूकमें कहा हुआ उत्साहका वर्णन ही इस सूक्तमे उत्साह अवश्य धारण करे । उत्साह हीन मनुष्य के लिये इस मन्य रीतिसे कहा है । जिस पुरुषमें उत्साह नहीं होता, वह जगत्में कोई स्थान नहीं है और उत्साही पुरुषके लिये कोई मभागा होता है। ऐसा इस सूक्तके पञ्चम मंत्रमे कहा है। बात असंभव नहीं है। यह मंत्र यहां देखने योग्य है- उत्साह मनमें रहता है, यह इन्द्रका स्वभाव-धर्म है। अभागः सन्नप परेतो अस्मि तव कन्वा तविपस्य। वेदके इन्द्र सूक्तोमें उत्साह बढानेवाला वर्णन है । जो मनुष्य (मं. ५) अपने मनमे उत्साह वढाना चाहते हैं वे वेदके इन्द्र सूक्त 'उत्साहके बलका भाग प्राप्त न होनेके कारण मैं कर्म पढें और उनका मनन करें । इन्द्र न थकता हुआ शत्रुका शकिसे दूर हुमा हू और अभागा बना हूं।' उत्साह हीन पराभव करता है, यह उसके उत्साहके कारण है। इन होनेसे जो बढी भारी हानि होती है वह यह है । उत्साह हट सूक्तोमें भी इसी अर्थका एक मत्र है जिसमें कहा है कि जाते ही बल कम हो जाता है, बल कम होते ही पुरुषार्थ 'इस उत्साहके कारण ही इन्द्र प्रभावशाली वना है।' इस शक्ति कम होती है, पुरुषार्थ प्रयत्न कम होते ही भाग्य नष्ट लिये पाठक इन्द्रके सूक्त मननपूर्वक देखेंगे तो उनको पता हो जाता है, हम रीतिसे उत्साहहीन मनुष्य नष्ट हो जाता है। लग जायगा कि उत्साह क्या चीज है और वह क्या कर परंतु जिस समय मनमें उत्साह बढ जाता है उस समय सकता है। उत्साह बढाने के लिये उत्साही पुरुषोके साथ यह उत्साही मनुष्य (स्वयंभूः) स्वयं ही अपना अभ्युदय संगति करनी चाहिये । उत्साही ग्रंथ पढने चाहिये और निरु- करने लगता है, स्वयं प्रयत्न करनेक कारण (भामः) त्साहका विचार मनसे हटाकर उसके स्थानमे उत्साहका तेजस्वी बनता है, (अभिमाति-साहः) शत्रुओंको दवाता विचार स्थिर करना चाहिये । थोडासा भी निरुत्साह मनमे है और (अभिभूति-ओजाः) विशेष सामर्थ्यसे युक्त उत्पन्न होकर अल्प समयमें ही बढ जाता है और मनको होता है। इससे भी अधिक सामर्थ्य उसकी हो जाती है मलिन कर देता है। इसलिये उन्नति चाहनेवाले पुरुषोको जिसका वर्णन इस सूक्तमें किया है । इसका आशय यह है उचित है कि वे इस रीतिसे अपने मनकी रक्षा करें। - - अथर्ववेदका सुवोध अनुवाद दीर्घजीवन और आरोग्य' निर्णय जीवन को. २, सू. १५ ऋषिः- ब्रह्मा । देवता'- प्राण', अपान., भायु.।) यथा योश्च पृथिवी च न बिभीतो न रिष्यतः । एषा में प्राण मा बिम: ॥ १॥ यथाहश्च रात्री च न विभीतो न रिष्यत: । एवा में प्राण मा विभः ॥ २॥ यथा सूर्यश्च चन्द्रश्च न विभीतो न रिष्यतः । एवा में प्राण मा विमेः ॥३॥ यथा ब्रह्म च क्षत्रं च न विभीतो न रिष्यतः । एवा में प्राण मा विमेः ॥४॥ या सत्यं चानृतं च न विभीतो न रिष्यतः । एवा में प्राण मा विमे ॥ ५॥ यथा भूतं च भव्य च न विभीतो न रिष्यतः । एवा मै प्राण मा विभे अर्थ- (यथा द्यौः च पृथिवी च) जिस प्रकार द्यौ और पृथिवी (न विभीतः) नहीं डरते इसलिये (न रिप्यतः ) नही नष्ट होते, (एवा) ऐसे ही (मे प्राण) हे मेरे प्राण ! (मा विभेः) तू मत दर ॥ १ ॥ जिस प्रकार (अहः च रात्री च) दिन और रात्री नहीं बरते इसलिये विनाशको प्राप्त नहीं होते० ॥२॥ • जिस प्रकार सूर्य और चन्द्र० ॥३॥ • ब्रह्म और अत्रः॥४॥ और भूत और भविष्य नहीं डरते इसलिये विनाशको प्राप्त नहीं होते, इसी प्रकार हे मेरे प्राण तू मत उर॥ ६ ॥ भावार्थ- धुलोक पृथ्वी, दिन रात्री, सूर्य चन्द्र, ब्रह्म अत्र, ज्ञानी शर, सत्य अनृत, भूत भविष्य भादि सब किसीसे भी कभी डरते नहीं, इसीलिये विनागको प्राप्त नहीं होते । इससे वोध मिलता है कि निर्भयवृत्तिसे रहनेसे विनागसे बच- नेकी संभावना है । अत हे प्राण ! तू इस गरीरमें निर्भयवृत्तिके साथ रह भोर अपमृत्युके भयको दूर कर ॥ १-६ ॥ ० सत्य अनृत० ॥७॥ . निर्भय जीवन निर्मयतासे अमरपन ब्रह्म-क्षत्र इस मूक्तका मुरय उपदेश यह है कि 'जो नहीं डरते, मागे चतुर्थ मंत्र में 'ब्रह्म और क्षत्र' का उल्लेख है । जो निर्भयतासे अपना कार्य करते हैं वे नागको प्राप्त नहीं इनका अर्थ 'ज्ञान और शौर्य है किंवा ज्ञानी और शर होते । ' उदाहरण के लिये द्यौः पृथ्वी, दिन रात, सूर्य चन्द्र, अर्थात् ब्राह्मण और क्षत्रिय भी है । सूर्यचन्द्रादिकोका उदा- इनका नाम इस सूक्तमें लिया है। दिन रात या सूर्य चन्द्र हरण सन्मुख रखकर ब्राह्मण क्षत्रियोंको चाहिये कि वे किसी किसीका भय न करते हुए निष्पक्षपातसे अपना कार्य करते मनुष्यसे न डरते हुए अपना कर्तव्यकर्म योग्य रीतिसे करते है। समय होते ही उदय होना या मस्तको जाना आदि इनके जायें। जिन ब्राह्मण क्षत्रियोंने ऐसे निदर भावसे अपने कर्तव्य मय कार्य यथाक्रम चलते रहते हैं। किसीकी परवाह नहीं कर्म किये हैं वे अपने यशसे इस समयतक जीवित रहे हैं फरते, किमीकी सिफारिश नहीं सुनते, किमीपर दया नहीं और भागे भी वे मार्गदर्शक बनेंगे। ऐसे भादर्श ब्राह्मणो करते अथवा किसीपर क्रोध भी नहीं करते । अपना निश्चित और क्षत्रियोका, उदाहरण सन्मुख रखकर अन्य लोग भी कार्य करते जाते हैं । इसलिये ये किसीसे डरते नहीं, अतः भय छोढकर अभयवृत्तिसे अपने कर्तव्यकर्म करते रहेंगे तो ये विनाशको भी प्राप्त नहीं होते। इसलिये जो मनुष्य निडर वे भी अमर बनेंगे । होकर अपना कर्तव्यकर्म करेगा, वह मी विनागको प्राप्त नहीं सत्य और अनृत होगा। (मं. १-३) सत्य मौर अनृत भी इसी प्रकार किसीकी अपेक्षा नहीं
निर्भय जीवन
(११९)
करते । जो सत्य होता है वही सत्य होता है और जो असत्य जानेके पश्चात् एक साधारण मनुष्यके महग असहाय हो जात
होता है वही भसत्य होता है। कई प्रसंगोंमे सत्ताधारी मनुष्य है। इतना भूत कालका प्रभाव है। समर्थसे समर्थ भी इस
अपने भधिकारके बरसे सत्यको असत्य और असत्यको सत्य भूत कालमें जब दव जाता है, तब उसका सामयं कुछ भी
कर देते हैं; परंतु वह बात थोटे समय बाद प्रकट हो जाती नहीं रहता। परंतु जो धर्मात्मा सत्यनिष्ठ सत्पुरुष होते हैं,
है और अधिकारियोंकी पोल भी उसके साथ खुल जाती है। उनकी शक्ति इसी भूत कालसे बढती जाती है। रावणका पशु-
इमरिये क्षण मात्र किसीफे दवावसे कुछ का कुछ बन जाय
वल उसी समय हरएकको भी दया सकता था, परंतु भगवान्
यह बात अलग है; परंतु अंतमे जाकर सत्य और अनृत अपने रामचंद्रजीका आत्मिक बल उस समय ही विजयी हुआ,
मसलीरूपमें प्रकट हुए बिना नहीं रहते। इसलिये सदा सत्य इतना ही नहीं प्रत्युत भाज भी अनंत लोगोके लिए मार्ग
पक्षका ही अवलंबन करना चाहिये, जिससे मनुष्य निर्भय दर्शक हो रहा है ।। यह भृत कालकी महिमा देखिये । भूत-
बनकर शाश्वतपदका अधिकारी होता है ।
काल निडर है, किसीकी परवाह नहीं करता और सयको
असली रूपमें सबके सामने कर देता है।
भृत और भविष्य
भविष्य काल भी इसी प्रकार है। अशक्तोको भविष्य
पष्ठ मत्रम भूत और भविष्य इन दो मालोके विषयमे कहा कालमे भी अपने सत्पक्षक विजय होनेकी आशा रहती है।
है, कि ये किसीसे डरने नहीं। यह बिलकुल सत्य है । सबका अधर्मक गासनके मदर दवे लोग भविष्य कालकी ओर
र वर्तमान कालमे ही होता है । जो डरानेवाले बादशाह थे,
देखकर ही जीवित रहते है। क्योकि वर्तमान कालका डर
जिन्होंने अपनी तलवारके डरसे लोगोको सताया, वे भय भविष्यमे नहीं रहता जैसा भूत कालका डर भाज नहीं
भूतकालमें हो गये हैं। उनका दर अव नहीं रहा है और वे रहा है ।
अपने असली रूपमे जनता सन्मुख सढे हो गये हे! साधा इस यातको देखकर मनुष्य मात्र यह बात सममें कि
रणसे साधारण इतिहासतत्वका विचार करनेवाला भी सत्यकी ही जय होती है, इसलिये सत्यके माधारसे ही मनुष्य
उनको अपने मतसे दोषी ठहराता है और वे भय उसका अपना व्यवहार करें और निडर होकर अपना कर्तव्य पालन
कुछ भी बिगार नहीं कर सकते । क्योकि वे भूत कालमें दय करें।
गये हैं। इसलिये बडे प्रतापी राजा भी
भूत
कालमे दय अभयवृत्तिसे ही भमरपन प्राप्त हो सकता है ।
आत्मसंरक्षणका कल
कां. २, सू. १७
(ऋपि:- ब्रह्मा । देवता- प्राण., भपान., आयु ।)
ओजोऽस्योजों मे दाः स्वाहा
॥१॥ सोऽसि सहो मे दाः स्वाहा
चलमसि बल मे दाः स्वाहा ॥३॥ आयुरस्यायुर्मे दाः स्वाहा
॥२॥
॥४॥
अर्थ-(ओजः आसि) शारीरिक सामर्थ्य है (मे ओजः दाः) मुझे गरीर सामर्थ्य दे ॥१॥
द् (सहः असि) सहन शक्तिसे युक्त है, (मे सहः दाः) मुझे सहनशक्ति दे ॥ २ ॥
द् (बलं असि) चल स्वरूप है, (मे बलं दाः) मुझे बल दे ॥ ३ ॥
द् (आयुः असि) भायु अर्थात् जीवनशक्ति है (मे आयुः दाः) मुझे वह जीवनशक्ति दे ॥ ४ ॥
अथर्ववेदका सुबोध अनुवाद (१२०) दीर्घजीवन और आरोग्य' - -------- श्रोत्रमसि श्रोत्रं मे दाः स्वाहा ॥५॥ चक्षुरसि चक्षुर्मे दाः स्वाहा ॥६॥ परिपाणशसि परिपाण मे दाः स्वाहा ॥७॥ अर्थ-तू (श्रोत्रं ) श्रवणगन्ति है, मुझे वह श्रवणशक्ति दे ॥ ५॥ द (चक्षुः) दर्शन गति है, मुझे दर्शन गति दे॥६॥ तु ( परिपाणं आस ) सब प्रकारसे आत्मरक्षा करनेकी शक्ति है, मुझे भात्मसंरक्षण करनेकी शक्ति दे। (स्था-हा) मै मात्मसमर्पण करता हूं ॥ ७ ॥ भावार्थ-ई ईश्वर । तू सामर्थ्य, पराक्रम, बल, जीवन, श्रवण, दर्शन और परिपालन हन शक्तियोंसे युक्त है, इस- यि मुझे इन गनियोको प्रदान कर ॥ १-७ ॥ कष्टों को दूर करने का उपाय कां. ६, सू. २५ (ऋपि.- शुन.शेपः । देवता- मन्याविनागनम् ।) पञ्च च याः पश्चाशच संयन्ति मन्या अभि । इतस्ताः सर्वां नश्यन्तु चाका अपचितामिव ॥१॥ सप्त च याः सप्ततिश्च संयन्ति व्या अमि । इत्तस्ताः सर्वा नश्यन्तु वाका अपचितामिव ।।२।। नव च या नवतिश्च संयन्ति स्कन्ध्या अभि । इतस्ताः सर्वां नश्यन्त वाका अपचितामिव ।। ३ ।। अर्थ-(याः पंच च पञ्चाशत् च ) जो पांच और पचास पीढाएं (मन्याः अभि संयन्ति) गलेके भागमें होती है, (या. सप्त च सप्ततिः च ) जो सात और सत्तर पीठाएं (ग्रेव्याः अभि संयन्ति । कण्ठके भागमें होती है तथा (या. नव च नवतिः च) जो नौ और नब्बे पीठाएं (स्कंध्याः अभि संयन्ति ) कन्धेके उपर होती हैं ( इतः ताः सर्वाः) यहामे वे सब उसी प्रकार पीडाएं (नश्यन्तु) नष्ट हो जावें (अपचितां वाकाः इव) जिस प्रकार पूजनीय मज्जनांक मन्मुस साधारण लोकोके वचन नष्ट होते हैं ॥ १-३॥ मनुष्य शुद्ध यने और अपनी शुद्धतासे अपने कष्टों, आपत्तियों और दुःखोंको दूर करें। जिस प्रकार ज्ञानीके सन्मुस मूर्यकी वक्तृता नहीं ठहरती, टसी प्रकार पवित्र मनुष्य के पास रोग और दुःख नहीं ठहरते । अद्रोहका मार्ग को. ६, सू. ७ (ऋषि:- अथर्वा । देवता- सोमः, अदिति., विश्वेदेवा.।) यनं मोमादितिः पृथा मित्रा वा यन्त्यद्रुहः । तेना नोऽवसा गहि अर्थ- (सोम ) शान्तदेव (येन पथा अदितिः) जिस मार्गसे यह पृथिवी (वा मित्राः अहः यन्ति) अपना मूर्य धादि देव परस्पर द्रोद न करते हुए चलते हैं, (तेन अवसा नः आगहि) उसी मार्गसे अपनी रक्षाके साथ दर्भ प्रास । ॥१॥ - सत्यशी विजय (१२१) येने सोम साहन्त्यासुराबन्धयासि नः येने देवा असुराणामांजांस्यवृणीध्वस् ॥ २॥ । तेना नो अधि वोचत तेना ना शर्म यच्छत !॥३॥ अर्थ- है (साहन्त्य सोम) विजयी शक्तिसे युक्त सोम । (येन असुरान् नः रन्धयालि) जिससे मसुरोको हमारे लिये त् नष्ट करता है. (तेन नः आधि वोचत) उस शक्ति के साथ हमे भाशीर्वाद दे ॥ २ ॥ हे (देवाः ) देवो! तुम (येन असुराणा ओजांसि अवृणीध्वं) जिससे भसुरोके यलोंफा निवारण करते हो, (तेन नः शर्म यच्छत ) उस बलसे हमे सुख दो ॥ ३ ॥ अद्रोहका मार्ग प्रार्थना! हे ईश्वर | जिस बलसे शत्रुभोके बलोंको रोका जाता है, हे गाम्त और सुखदायक ईश्वर ! जिस तेरे सुनियमके वह बल हमें प्राप्त हो और उसके द्वारा हमे सुख प्राप्त हो । कारण सूर्य चन्द्रादि विविधलोक लोकान्तर एक दूसरेके साथ तीन उपदेश न टकराते हुए अपने मार्गसे भ्रमण करके कार्य कर रहे है, वह बल हमें दे । इस बलसे इस सूझमे ' (१) मापसमें भद्रोहका व्यवहार करना, युक्त, उस विचारसे युक्त होते हुए हम एक दुसरेके साथ, आपसमे विरोध और लटाई न (२) अपना वल बढाना (३) और शत्रुओके बलोंको करते हुए और अपना संघवल बढाते हुए हम अपनी उत्तम रोकना अथवा अपना बल उनसे अधिक प्रभावशाली बनाना रक्षा कर सकें । इसलिये 'मद्रोहका विचार ' हमारेमे स्थिर ये तीन उपदेश है। इससे निःसन्देह सुख प्राप्त हो सकता है । इस सूक्तमे इन पलोंकी प्रार्थना ईश्वरसे की है, इस कारण चलकी वृद्धि यह उत्तम प्रार्थनासूक्त है। इसमे बलवाचक दो शब्द है, है ईश्वर । जिस वलसे तू असुरों, राक्षसो और दस्युओंको सहः' और 'ओजः' । इनमे सहः' शब्द मानसिक और नष्ट करता है उस बरको दान करनेका आशीर्वाद हमे दो। आत्मिक बलका योधक और 'ओजः' शब्द शारीरिक अथवा भर्थात् वह बल हमें प्राप्त हो और इस यलके प्राप्त होनेसे पाशवी बलका वाचक है । अर्थात् अपना सब प्रकारका वल हम पूर्वोक्त गओको दूर कर सकें । बढे, यह इस प्रार्थनाका भाव है। हो जावे। - सत्यकी विजय कां. ५, सू. १५ (ऋपि:- विश्वामित्र । देवता- मधुला बनस्पतिः।) एका च मे दर्श च मेऽपयुक्तार ओपधे । ऋतजात ऋतावरि मधु मे मधुला कर: ॥१॥ द्वे च मे विंशतिश्च मेऽपवक्तार ओपधे । प्रजात ऋविरि मधु मे मधुला कर ॥२॥ अर्थ- हे (ऋतावरि ऋतजाते ओपधे) सत्यपालक और सत्यसे उत्पन्न औषधि ' तू (मधुला) मधुरता उत्पन्न करनेवाली होकर (मे मधु करः) मेरे लिये सर्वत्र मधुरता कर। (मे पका ध दश च अपवफ्तारः) मेरे सामने १६ (भथर्व. भा. ४ हिन्दी) -- है . -
(१२२)
अथर्ववेदका सुबोध अनुवाद -'दीर्घजीवन और आरोग्य'
करः
तिश्च मे त्रिंशच मेऽपयुक्तार ओपधे । ऋतजात ऋतावरि मधु मे मधुला कर
चतस्रश्च मे चत्वारिंशच मेऽपवक्तार ओषधे । ऋजात प्रस्तावरि मधु मे मधुला
॥४॥
पश्च च मे पञ्चाशच्च मेऽपयुक्तार ओपधे । ऋतजात ऋतावरि मधु में
मधुला
करः
पट् च मे पृष्टिश्च मेऽपवक्ता ओपधे । ऋतजात ऋतविरि मधु मे मधुला करः
॥६॥
सप्त च मे सप्ततिश्च मेऽपवतार ओपधे । ऋतजात ऋतावरि मधु मे मधुला
करः
||७||
अष्ट च मेऽशीतिर्थ मेऽपवक्तारं ओपधे । ऋतजात ऋविरि मधु मे मधुला करः
॥८॥
नव च मे लवतिर्थ मेऽपवक्तारं ओपधे । ऋजात ऋतावरि मधु मे
मधुला
करः
॥९॥
दर्श च मे शुवं च मेऽपवतार ओपछे । ऋतजात ऋतावरि मधु मे
मधुला
करः |॥१०॥
शतं च मे सहस्रं चापवक्तार ओपधे । ऋतजात ऋतावरि मधु मे
मधुला
|॥११॥
भले ही एक या दस । (द्वे विंशतिः च ) दो और वीस, (तिस्रः त्रिंशत् च) तीन और तीम, (चतस्रः चत्वारिं-
शत् च) चार और चालीस, (पञ्च पञ्चाशत् ) पांच और पचास, (पट् पष्टिः च ) छ: और साठ, (सप्त सप्ततिः
च) सात और सत्तर, ( अष्ट अशीतिः च ) माठ और अस्सी, (नव नवतिः च) नी और नब्बे, (दश शतं च )
दस और सौ, (शतं सहस्र च) सौ और हजार (अपवक्तारः) निदक क्यो न सटे हो और मुझे प्रतिबंध करनेका
यत्न क्यों न करें, मैं सत्यमार्गसे ही उनका प्रतिकार करूंगा। इसलिये सर्वत्र मेरे लिये मधुरता फैले ॥ १-११ ॥
कर
सत्यसे यश
इस सूक्तमें ऋतावरी ऋतजाता भीपधिका नाम है । यह कौनसी औषधि है, इसका पता नहीं लगता। परंतु इस
सूक्तमे हमें ऐसा प्रतीत होता है कि यहां कोई औषधि प्रयोग नहीं यताया है। अपितु जो निंदक शत्रु है उनको सत्यपालन
और सत्य व्यवहारसे ही ठीक करना और सत्यका महत्त्व सिद्ध करना ही बताया है। सत्यपालन करनेवालेके लिये सब
दिगाएं मधुरतायुक्त हो जाती हैं, अर्थात् उसके लिये कोई विरोधी नहीं रहता । सत्यपालन करनेवाला मनुष्य शत्रुरहित हो
जाता है । मानो 'सत्यपालनका व्रत' ही सब दोपोको धोनेवाली दोपधी अथवा औपधि है । इस सूक्तमे यताई गई संरया-
ओका क्या भाव है वह समझमें नहीं आता।
-
समृद्धिको
छाप्ति
कां. ४ सू. ३९
(अपि:--अंगिराः । देवता- नाना देवता., संनतिः।)
पृथिव्यामग्नये सम॑नमन्त्स आर्नोत् । या पृथिव्यामुग्नये समनमन्नेवा मा सनमः सं नमन्तु ॥१॥
अर्थ-(पृथिव्यां अग्नये समनमन्) पृथिवीपर अग्निके सन्मुख नत्र होते है, क्योकि (सः आभॊत् ) वह
समृद्ध हुआ है । (यथा पृथिव्यां अग्नये समनमन् ) जिस प्रकार पृथिवीमें अग्निके सन्मुस नम्र होते है, (एव मह्यं
संनमः सं नमन्तु) इस प्रकार मेरे मागे सन्मान देने के लिये उपस्थित हुए लोग नम्र हो ॥ १ ॥
भावार्थ- पृथ्वीपर अग्निको मन्मान मिलता है क्योंकि वह तेजस्वी है, जिस प्रकार पृथ्वीपर अग्नि समानित होती
है, उस प्रकार मैं तेजस्वी बन कर यहां समानित होऊ ॥१॥
समृद्धिकी प्राप्ति (१२३) पृथिवी धेनुस्तस्या अग्निव॒त्सः । सा मेऽग्मिनो वत्सेने मूज काम दुहाम् । आयुः प्रथमं प्रजा पोप रयिं स्वाहा ॥२॥ अन्तरिक्ष वायवे समनमन्त्स आर्नोत् । यथान्तरिक्षे वायवे समनमन्नेवा मह्यं सनमः सं नमन्तु ॥३॥ अन्तरिक्षं धेनुस्तम्या वायुर्वत्सः । सा में वायुना वृत्सेने मूर्ज़ कामै दुहाम् । आयुः प्रथमं प्रजा पोपै रयिं स्वाहाँ ॥४॥ दिव्यादित्याय समनमन्त्स आर्नोत् । या दिव्या दित्याय समन मन्नेवा मद्यं सनमः सं नमन्तु ॥५॥ चौर्धेनुस्तस्या आदित्यो वत्सः । सा में आदित्येन वत्सेनेषमूर्ज काम दुहाम् । आयुः प्रथमं प्रजा पोपै रयिं स्वाहा अर्थ-(पृथिवी धेनुः) भूमि धेनु है (तस्याः अग्निः वत्सः) उसका लग्नि बछडा है। (सा अग्निना वत्सेन) वह भूमि अग्निरूपी बछडे के साथ (इपं ऊर्ज कामं दुहां) भन्न और बल इच्छाके अनुसार देवे और (प्रथम आयुः) उत्तम आयु तथा (प्रजां पोपं राय) सन्तान, पुष्टि और धन प्रदान करे । (स्वाहा) मैं समर्पण करता हूं ॥२॥ (अन्तरिक्षे वायवे समनमन्) अन्तरिक्षमे वायुके सन्मुख सब नन्न होते है क्योकि (स आर्नोद ) वह समृद्ध है । (यथा अन्तरिक्ष वायवे समनमन् ) जिस प्रकार अन्तरिक्षम वायुके सन्मुख सब नन्न होते हैं, (एव मह्यं संनमः सं नमन्तु) उस प्रकार मेरे सन्मुस सन्मान देनेके लिये उपस्थित हुए मनुष्य नम्र हो ॥ ३ ॥ (अन्तरिक्षं धेनुः ) अन्तरिक्ष येनु है (तस्याः वत्सः वायुः) उसका बछडा वायु है। (सा वायुना वत्सेन) वह अन्तरिक्षरूपी धेनु वायुरूपी बछडेके साथ (इपं ऊर्ज कामं दुहां) भन्न और वल पर्याप्त देवे भौर (प्रथमं आयुः) उत्तम दीर्घ आयु (प्रजा पोपं रयिं) सन्तान, पुष्टि और वन प्रदान करे, (स्वाहा) मै आत्मसमर्पण करता हूं ॥ ४ ॥ (दिवि आदित्याय समनमन्) धुलोकमे मादित्यके सन्मुख सब नम्र होते है क्योकि (स आध्नोत् ) वह समृद्ध हुआ है । (यथा दिवि आदित्याय समनमन्) जिस प्रकार द्युलोकमे आदित्यके सन्मुख नन्न होते है, (एव मह्यं संनमः सं नमन्तु ) इस प्रकार मेरे मागे समान देने के लिये उपस्थित हुए लोग नम्र हो ॥५॥ (द्यौः धेनुः ) धुलोक धेनु है (तस्याः आदित्यो वत्सः) उसका सूर्य बछडा है। (सा मे आदित्येव वत्सेन ) वह मुझे सूर्यरूपी यछडेके साथ (इपं ऊर्ज कामं दुहां) अन्न और वल पर्याप्त देवे और (प्रथमं आयुः) उत्तम दीर्घ आयु तथा (प्रजां पोपं रयिं) सन्तति, पुष्टि और धन अर्पण करे । (स्वाहा ) मैं समर्पण करता हूं ॥ ६ ॥ भावार्थ-पृथ्वीरूपी गौका अग्नि बछडा है, उसकी शक्तिसे मुझे अन्न, यल, दीर्घ मायु, संतति, पुष्टि और धन प्राप्त हो॥२॥ अन्तरिक्षमें वायुका समान होता है क्योकि उसमे बल है । पलके घढनेसे जैसे वायुका समान होता है, उसी प्रकार । बलके कारण मेरा भी समान बढे ॥३॥ अन्तरिक्षरूपी धेनुका वायु वछडा है, उसकी शक्तिसे मुझे अन्न, बल, दीर्घमायु, संतान, पुष्टि और धन प्राप्त हो ॥ ४ ॥ द्युलोकमे सूर्यका समान होता है क्योकि वह वडा प्रकाशमान है। प्रकाशित होनेसे जैसे सूर्यका सम्मान होता है, उसी प्रकार तेजस्विताके कारण मेरा सम्मान बढे ॥५॥ युलोकरूपी धेनुका सूर्य बछडा है उसकी शक्तिसे मुझे भन्न, बल, दीर्घ भायु, संतान, पुष्टि, भौर धन प्राप्त हो ॥ ६ ॥ । 1
(१२४)
अथर्ववेदका लुबोध अनुवाद
'दीर्घजीयन और आगेग्य'
दिक्षु चन्द्राय समनमन्त्स आनोत् ।
या दिक्षु चन्द्राय समनमोवा मह्यं संनमः सं नमन्तु
॥७॥
दिगो धेनवस्तासां चन्द्रो वत्सः । ता मै चन्द्रेण वत्सेनेपमूज काम दुद्दाम् ।
आयुः प्रथमं प्रजा पो रयिं स्वाहा
॥८॥
अग्नावग्निश्चरति प्रविष्ट ऋीणां पुत्रो अभिशस्तिपा उ ।
नमस्कारेण नमसा ते जुहोमि मा देवाना मिथुया कर्म भागम्
॥९॥
हृदा पृतं मनमा जातवेदा विश्वानि देव चयुनानि विद्वान् ।
सप्तास्यानि तव जातवेदस्तेश्यो जुहोमि स जुषस्व हव्यम्
॥१०॥
अथ-- (दिक्षु चन्द्राय समनमन) दिशाओम चन्द्र के सन्मुस नत्र होते हैं। क्योंकि (स आनोत्) वह
समृद्ध हुआ है । ( यथा दिक्षु चन्द्राय समनमन् ) जैसे दिगामोमें चन्द्र के सन्मुस नम्र होते हैं, (एव मां संनमः सं
नमन्तु) इसी प्रकार मेरे मन्मुख सन्मान देनेके लिये उपस्थित हुए लोग नम्र हो ।
(दिशः धेनवः) दिशाएं गाएं है (तासां चन्द्रो वत्सः ) उनका बछडा चन्द्र है। (ताःमे चन्द्रेण वत्सेन)
वे मुझे चन्द्ररूपी बछडेसे ( इपं ऊर्ज कामं दुहां) अन्न और बल जितना चाहिये उतना दे, और (प्रथमं आयुः)
उत्तम दीर्घ आयु तथा (प्रजा पोपं रयिं) सन्तान, पुष्टि और धन अर्पण करे । (स्वाहा) मैं समर्पण करता हूं ॥ ८ ॥
(अग्नौ अग्निः प्रविष्टः चरति) विशाल परमात्माग्निम जीवात्मारूपी अग्नि प्रविष्ट होकर चलती है। वह (ऋपणिां
पुत्रः) इंद्रियोको पवित्र करनेवाला है और (अभिशस्ति-पा उ) विनागसे बचानेवाला भी है । (ते नमसा नम-
स्कारेण जुहोमि) नुझे मैं नम्र नमस्कारोंसे भात्मार्पण करता हूं। (देवानां मागं मिथुया मा कर्म ) देवोंक सेवनीय
मागको मिथ्याचारसे कोई न बनाये ॥ ९९ ॥
है ( जातवेदः) जन्मे हुए पदार्थीको जाननेवाले देव । त् (विश्वानि वयुनानि विद्वान् ) सब कमाको जानने-
वाला है । हे (जातवेदः) जाननेवाले ' (मनसा हृद्रा पूतं ) हृदयसे और मनसे पवित्र किये हुए हव्यको (तव सप्त
आस्यानि) जो तेरे मात मुस है (तेभ्यः जुहोमि) उनक लिये समर्पित करता हूं (सः हव्यं जुपस्व ) उम हविको
तू स्वीकार कर ॥ १०॥
-
भावार्थ-दिगालोमे चन्द्रमाका समान होता है क्योकि उसमे शान्ति है। जिस शान्ति के कारण चन्द्रमाकी प्रशंसा
यत्र दिगामोमें होती है, उस शान्तिके कारण मेरा भी समान होवे ॥ ७ ॥
दिगारूपी गौमोंका चन्द्रमा बछडा है, उसकी शक्तिसे मुझे अन्न, वल, दीर्घायु, संतति, पुष्टि और धन प्राप्त हो॥ ८॥
परमात्मारूपी विशाल अग्निमें जीवात्मारूप छोटी अग्नि प्रविष्ट होकर चलती है । यह जीवात्माकी अग्नि इंद्रियोंकी
पवित्रता करनेवाली और गिरावटसे बचानेवाली है । इद्रियरूपी देवोका जो कार्यभाग है, वह मिथ्या व्यवहारसे दृषित न हो
इसलिये मैं उन अग्नियोंकी नमस्कार द्वारा उपासना करता हूं ॥ ९॥
हे सर्वज्ञ ईश्वर तू हमारे सब काको जानता है । इस आत्माके मात मुसोम मन और हृदयस पवित्र किये हुए
पदायाँका हवन करता ह, यह हमारा हवन तु स्वीकार कर और हमारा उद्धार कर ॥ १० ॥
समृद्धिकी प्राप्ति (१२५) - गटद जल, जीवन प्राण -- गु प्रकाश दिवा -- समृद्धिकी प्राप्ति उन्नतिका मार्ग प्रतिष्ठा बढती है । इस प्रकार हैन देवताओस मनुष्य उपदेग मनुप्यकी उन्नति उममें सद्गुणोंकी वृद्धि होनेसे ही हो प्राप्त कर सकता है और अपनी उन्नति कर सकता है । उन्न- सकती है। इन सद्गुणोकी वृद्धि करने अनेक प्रकारक तिका मार्ग अपने बदर इन गुणोकी वृद्धि करना ही है । इन उपाय वेदने कहे हैं, इस सूक्तमे इसी उद्देश्यस्से चार देवता- सदगुणोकी वृद्धिसे ही अन्न, बल, दीर्घायुष्य, सन्तति, पुष्टि ओंके द्वारा सद्गुण बहानेका उपदेश दिया है । देवताओं से सबसे पहिले उन्नति चाहनेवाले मनुष्यको उचित है कि वह और धन जितना चाहिये उतना प्राप्त हो सकता है, परन्तु जिन गुणोंकी प्रधानता होती है ये गण मनन्यमं बढ़ने चाहिये । इन देवतालोके गुण देखिये- अपने अन्दर इन गुणोकी वृद्धि करे, तत्पश्चात् धनादिकी प्राप्ति तो स्वय होती रहेगी। लोक देवता गुण मनुष्यमे स्प पृथिवी इस सूक्तक आठ मन्त्रोमे यह उपदेश दिया है । आगेक अप्ति तेज, उष्णता अन्तरिक्ष नवम और दगम मन्नामे भात्मशुद्धि करनेका उपदेश है, वायु उसका अब विचार किया जाता है- सूर्य दृष्टि परमात्माकी उपासना गान्ति लोक, देवता और गुण ये है । देवतालोके गुण अथवा वर भात्मशुद्धिके लिये परमात्माकी उपासना अत्यन्त सहायक मनुष्य के अंदर किन रूपमें दिखाई देते हैं इसका भी पता है, इसलिये नवम मंत्रमे वह उपासना बतायी है- इमसे ज्ञात हो सस्ता है। मनुष्यको यदि अपना प्रभाव अग्नौ अग्निश्चरति प्रविष्टः । (म. ९) बढाना हो तो इन गुणों के सन्चको बटाना चाहिए, दूसरा कोई 'बडे विश्वव्यापक अग्निमे एक दूसरी छोटी अग्नि प्रविष्ट उपाय नहीं है । पृथिवी लोकमे अग्नि प्रतिष्ठाको इसलिये प्राप्त होकर चलती है अर्थात् अपने व्यवहार करती है।' यह बात हुई है कि उसमें उष्णता और तेजस्विता बढी हुई है, वह उपासकको अपने मनमे सबसे प्रथम धारण करनी चाहिये । भपनी दाहक शक्तिसे सबको जरा सकती है, इसलिये उसका परमात्माकी विशाल अग्नि सपूर्ण जगत्मे जल रही है और प्रभाव सब पर जमा हुआ है । यदि मनुष्यको अपना प्रभाव उसके अंदर अपनी एक चिनगारी है, वह भी उसके साथ ही बढाना हो तो उसको भी अपने अन्दर तेजस्विता बढानी चमक रही है। अपने अन्दर और चारा भोर बाहर भी उस चाहिये । तेजस्विताके वटनेसे उसका सम्मान अवश्य बढेगा। परमात्माग्निका तेज भरा पड़ा है । जिस प्रकार अग्निमे तपता इसी प्रकार अन्तरिक्षमें वायुका महत्व विशेष है क्योकि हुआ सुवर्ण शुद्ध होता है उसी प्रकार परमात्मामें तपनेवाला वह सबको जीवन, बल और गति देता है। मनुष्यको उचित जीवात्मा शुद्ध हो रहा है । परमात्माके पूर्ण आधारमे मै है कि वह अपने अन्दर वल वटावे और अपना जीवन उत्तम विराजता हू, इसलिये मै निर्भय हूं, मुझे डरानेवाला कोई नहीं करे । दूसरों में चेतना उत्पन्न करे और सब हलचलोंका प्राण है, यह विश्वास इस मन्त्रने उपासकके मनमे स्थिर करनेका बनकर रहे । जो मनुष्य अपनी शक्ति इस प्रकार चढावेगा यत्न किया है । यह आत्मा कैसी है और उसके गुण धर्म वह सम्मानित हो जायगा। क्या है इसका वर्णन भी यहां देखने योग्य है-- ऋषीणां धुलोकमें सूर्यका सम्मान बहुत वहा है क्योकि उसका पुत्रः अभिशास्तिपा । (म. ९) प्रकाश सबसे अधिक होता है। इसके सन्मुख सव अन्य ऋषियोंका पुत्र है और विनाशसे वचाने- तेजस्वी पदार्थ निस्तेज हो जाते हैं। ऐसा प्रकाशमान होनेसे वाला है।' यह अनेक ऋषियोका पुत्र है अर्थात अनेक सूर्यका सम्मान सब करते हैं। जो मनुष्य अपना महत्व बढाना ऋषियोने मिलकर इसकी खोज की और इसका आविष्कार चाहता है उसको उचित है कि वह अपने दिव्य प्रकाश वढावे किया इसलिये ऋपियोका यह पुत्र है, ऐसा माना जाता है। भौर सूर्यके समान ग्रहोपग्रहोमे मुख्य यह इसका एक अर्थ है । इसका दूसरा भी एक अर्थ है और इसी प्रकार चन्द्रमाकी प्रतिष्ठा उसकी शान्तिके कारण वह विशेष विचारणीय है । ऋषि शब्दका दूसरा अर्थ 'इंद्रिय' है । जिस मनुप्यमें शांति स्थिर होती है उसकी भी सर्वत्र है। सप्त ऋषिका अर्थ 'सात इडिया ' है । इन इंद्रियरूपी -- यह आत्मा । - बने। ।
१२६) अथर्ववेदका सुवोध अनुवाद दीर्घजीवन और आरोग्य' प्त ऋपियोको (पुत्रः) नरकन बचानेवाली यही आन्मा हृदा मनसा प्रतं जुहोमि । (मं १०) , क्योकि आत्मा ही सबको उच्च भूमिकामे रे जाती है और 'हृदयस और मनसे जितनी पविग्रता की जा सकती है, न अवस्थाम गिग्नस बचाती है । इसलिये उनकी उपासना उतनी पवित्रतासे पवित्र पदायाँका ही सत्कर्ममें समर्पण एकको करनी चाहिये। करना चाहिये।' पवित्रतासे उन्नति और मलिनतासे भव- नमस्कारसे उपासना नति होती है, यह उन्नति अवनतिका नियम हरएक मनुष्यको इस आत्माकी उपासना नमस्कारस ही की जाती है । नम्र स्मरणमें अवश्य रखना चाहिये । कर, अपने मनको नन करके, नमस्कार द्वारा अपना सिर सप्त सुखी अग्नि क्राकर मर्यात अपने आपको उसक लिये पूर्णतासे समर्पित पूर्वोक्त स्थानमे परमात्मा और जीवात्मा इन दोनोको एक ही अपने अन्तर्यामी आत्माकी उपासना करनी चाहिये- अग्नि कहा है । अनि 'सप्तास्य ' अर्थात् मात मुरववाला नमना नमस्कारेण जुहोमि । (म. ९) होता है । यहा भी उसके साथ मुसोका वर्णन किया ही है। 'नम्र नमस्कारसे आत्मसमर्पण करता हूं।' यहां यह आत्मा सप्तमुखी है, यह सात मुखोंसे साता है, पञ्च जुहोमि' शब्द समर्पण अर्थमें है । यज्ञमे हवनका भी ज्ञानेंद्रिय और मन तथा बुद्धि ये इसके सात मुख है। वहीं भर्य है। अपने पदार्थोका दूसरोंकी भलाई के लिये सम- बुद्धिसे ज्ञान, मन मनन और अन्य पञ्च ज्ञानेंद्रियोंसे पञ्च र्पत करनेका नाम हवन है । यहां नमस्कारसे हवन करना विषयोका ग्रहण यह करता है, मानो, इस आत्माग्निमें ये है, नमन द्वारा अपना सिर झुकाकर आत्मसमर्पण करनेका पांच ऋत्विज हवन कर रहे हैं, अथवा इन सात मुसोसे यह भाव यहां है। इस प्रकारके श्रेष्ठ कर्ममे मिथ्याव्यवहार होना आमा अपना भक्ष्य सा रहा है, अथवा अपना भोग्य भोग नही चाहिये । क्योकि मिथ्या व्यवहार ही सब प्रकारकी रहा है। इस विविध प्रकारके कथनका एक ही तात्पर्य है। हानि होती है, इसलिये कहा है- इसके सातो मुखोम हृदयसे और मनसे पवित्र पदार्थीको देवानां भाग मिथुया मा कर्म । (म. ९) अर्पण करना चाहिये। 'देवोक प्रीति करनेक कार्य भागको मिव्याचारस दूषित तव सप्त आस्यानि तत्र हृदा मनसा पूतं जुहोमि मत करना ।' ग्रह आदेश हरएक देवयज्ञके विषयसे मनमे (म १०) धारण करने योग्य है। कई लोग दभसे सध्या करने बैठते 'तेरे सात मुस हैं, उनमें हृदय और मनसे पवित्र है, तथा अन्य प्रकारकं मिथ्या व्यवहार ढोगसे रचते हैं। पदायाँको ही समर्पण करता हूं।' यह बढा भारी महत्वपूर्ण अपने टोगसे ये फिसको ठगनेका विचार करते है ? परमा- उपदेश है, आत्मशुद्धि के लिये इसकी अत्यन्त आवश्यकता त्माको ठगना तो असभव है, क्योकि वह सब जानता ही है, है । मातो मुसों में पवित्र हव्यका ही बन करना चाहिये । वह सर्वज्ञ है । इसलिये ऐसे धर्म काम जो दूसरोको ठग- अर्थात् बुढिमें पवित्र ज्ञान, मनमें पवित्र विचार, नेत्रमे नेका यत्न करते है. वे अन्तमे अपने आपको ही ठगते है पवित्र रूप, कानमे पवित्र शब्द, मुसमे पवित्र भन्न और और अपनी ही हानि करते हैं । इसलिये किसीको मी मिथ्या वाणी, नाक्रमे पवित्र सुगन्ध और चर्मसे स्पर्शविपयका व्यवहार करना उचित नहीं है। ईश्वर सर्वज्ञ है, वह हरएकंक हवन होना चाहिये । इस प्रकार सभी पदार्थ अत्यन्त पवित्र मनोगतको तत्काल ही जानता है, उससे छिपकर कोई कुछ रूपमे हमारे अन्दर जाने लग जाएं तो अन्दरका संपूर्ण वायु- कर नहीं सकता, इसलिय कहा है- मण्डल परिशुद्ध हो जायगा और आत्मशुद्धि होती रहेगी। विश्वानि वयुनानि विद्वान् । (मं १०) इस प्रकार यदि मनुष्यकी शुद्धि होती रही तो अपने परि- मत्र कमाको ययावत जाननेवाला ईश्वर है।' शुद्ध आत्माके ऐश्वर्यका वर्णन ही क्या करना है । वह इससे मनुष्य जो भी कम करता है वह उसी समय परमेश्वर जानता है । शुद्ध बुद्ध और मुक्त होकर पूर्ण यशस्वी होगा और इसको मनुष्यका कर्म बुढिमे, मनमे या जगत्में कहीं भी होवे, इस सूक्तमे कहे गए ऐश्वर्य निःसन्देह प्राप्त होगे। ईश्वर उनी क्षण टम्मको जानता है। इसलिये ऐसी अवस्थाम स्वाहा मनुन्यको मिथ्याध्यवहार करना सर्वथा अनुचित है। मनुष्यको इम सूकमें 'स्वाहा' शब्द कई बार भाया है। उन्नति प्राप्त करनकी इच्छा हो तो हृदय और मनसे जितने पवित्र कर्म हो सकते हैं, उतने करने चाहिये. स्वाहा' का अर्थ है (स्व+आहा) दूसरोकी भलाई अथवा उन्नतिके लिये अपनी शक्तिका समर्पण करना । इस ?
विपत्तियोको हटानेका उपाय (१२७) त्याग भावसे उन्नति होती है। अपनी शक्तिका जनताकी जो भी उन्नति होनी है वह इस त्यागभावके बढनेसे ही होगी। भलाई के लिये समर्पण करनेका भाव यहां है। सब प्रकारकी उन्नतिका दूसरा कोई मार्ग नहीं है । वेदमे 'स्वाहा' शब्द उन्नतिके लिये इस त्याग भावकी अत्यंत आवश्यकता है। अनेक बार इसीलिये आया है कि वैदिकधर्मियों के मनपर पूर्वोक्त पविग्रीकरणके साथ रहनेवाला यह त्याग भाव बडा इस त्यागभावका पक्का प्रभाव पढे और इसके द्वारा वे इह ही उमति साधक होता है । वैयक्तिक क्या और राष्ट्रीय क्या, लोक व परलोकमे अपना पूर्ण कल्याण प्राप्त कर सके । . विपत्तियों को हटाने का उपाय कां. २, सू. १४ (ऋषि.-- चातन. । देवताः- शालाग्निदेवत्यम् ।) निःसाला धृष्णु धिषर्णमेकवाद्यां जिंपत्स्वम् । सर्वाश्चण्डस्य नुप्त्यो नाशयामः सदान्याः ॥ १॥ निवौं गोष्ठादजामसि निरक्षान्निरुपानसात् । निर्वा मगुन्द्या दुहितरो गृहेभ्यश्चातयामहे ||२॥ असौ यो अंधराद् गृहस्तत्र सन्त्वग़य्यः । तत्र सेदियुच्यतु सर्वाश्च यातुधान्य ॥३॥ अर्थ- (निःसालां) घरवार न होना, (धृष्णु) भयभीत रहना, अथवा दूसरोको डराना, (एकवाद्यां धिपणं जिधत्स्वं) निश्चयपूर्ण एक भाषण करनेवाली निश्चयात्मक बुद्धिका नाश करनेवाली, तथा (चण्डस्य सर्वा नप्त्यः) क्रोधकी सबकी सब सन्ताने और (स-दानवाः) दानवोकी राक्षसवृत्ति आदि सब दरिद्रताका हम (नाश- यामः) नाश करते है ॥१॥ (वः गोष्टात् निः अजामसि ) तुमको हम अपनी गोगालासे निकाल देते है, (अक्षात् नि.) अपनी दृष्टिके बाहर तुमको करते है, ( उपानसात् निः) अन्नपानके गड्डेके स्थानसे तुमको हटाते है, (मगुन्द्याः वः निः) मनके मोहसे तुमको हटाते है । हे (दुहितरः) दूर रहने योग्य ' तुम्हें (गृहेभ्यः चातयामहे) घरोसे हटाते है ॥ २ ॥ (असौ यः अधरात् गृहः ) यह जो नीच घराना है (तत्र अराय्यः सन्तु ) वहां विपत्तिया रहें (तम सेदिः) यहां ही क्लेश (नि उच्यतु ) निवास करे (सर्वाः यातुधान्यः) मव दुष्ट वही जाय ॥ ३ ॥ A भावार्थ- आसुरी भावनाओसे प्राप्त होनेवाली कई विपत्तियां है उनमे कुछ ये है- (१) घरवार कुछ भी न होना, ( २ ) सदा औरोका भय प्रतीत होना या दूसरोको डराना, (३) निश्चयात्मक एक बुद्धि कभी न होना अर्थात सदा संदेह रहना, (४) मन सदा क्रोधवृत्तिसे युक्त होना, ये सब विपत्तियां है, इनको पुल्यार्थसे हटाना चाहिये ।। १ । जिस प्रकार पुत्रियोको विवाहादि करके घरसे दूर करते है, उसी प्रकार इन विपत्तियोको भी अपने पास दूर हटाना चाहिये । गोगालासे, घरोसे, अपनी इप्टिसे, अन्नपान ग्रा गाडी रथ भादिके स्थानसे तथा मनकी वृत्तिले विपत्तियोको हटानेका पुरुषार्थ करना चाहिये ॥२॥ जो नीच वृत्तिवालोके घर है वहीं विपत्ति, नाग तथा दुष्ट दुराधारी भी रहे ।। ३ ।।
(१२८) अथर्ववेदका सुबोध अनुवाद दीर्घजीवन और आरोग्य' भूतपतिनिरजत्विन्द्रश्चतः सदान्याः । गृहस्य बुध्न आसीनास्ता इन्द्रो वनेणाधि तिष्ठतु |॥४॥ यदि स्थ क्षेत्रियाणां यदि वा पुरुपेषिताः । यदि स्थ दस्युस्यो जाना नश्यतेतः सदान्वाः परि धान्यासामाशुर्गाष्टोमिवासरन् । अजै सर्वानाजीन्यो नश्यतेतः सदान्याः ॥६॥ अर्थ-(भूतपतिः इन्द्रः) प्रजापालक राजा ( सदान्याः इत. निरजतु ) राक्षसी वृत्तियोको यहासे दूर करे ! (गृहस्य बुध्न आसीना.) घरकी जटमें निवास करनेवाली दुष्टताए (इन्द्रः वज्रेण अधितिष्ठतु) इन्द्र अपने वज्रसे हटा देवे ॥४॥ हे (स-दान्चाः) भासुरी वृत्तिसे होनेवाली पीढाओ ! (यदि क्षत्रियाणां स्थ) यदि तुम बंग संबंधी रोगसे उत्पन्न हुई हो, (यदि वा पुरुपेपिताः ) यदि मनुप्यकी प्रेरणासे उत्पन्न हुई हो, (यदि दस्युभ्यः जाताः ) यदि तुम डाकुओंस हुई हो, तुम सब (इतः नश्यत) यहांसे हट जालो ।। ५ ॥ (आशु. गाष्टां इच ) जैस घोडा अपने स्थानको पहुंचता है उसी प्रकार (आसां धामानि परि सरन् ) इन विपत्तियोके मूल कारणको दृढ कर निकाल दो। (वः सर्वान आजीन् अपं) तुम्हारे सब संग्रामोंको जीत लिया है जिसम्म (स-दावाः) पीढाओ' (इतः नश्यत) यहासे हट जाओ ॥ ६ ॥ भावार्थ-प्रजापालक राजाको चाहिये कि ऐसे दुष्टोको अपने सुयोग्य शासन द्वारा दूर करे किसी भी घरके अंदर दुष्टभाव माश्रय लेने न पावे ॥ ४ ॥ इन पीटाओमें कह तो आनुवंगिक रोगमे होनेवाली पीढाएं होती है, कई तो मनुग्यके अपने व्यवहारसे उत्पन्न होती है, कई तो टाकुओसे होती है इन सबको दूर करना चाहिये ॥ ५ ॥ जिग्न प्रकार घोडा अपना पांव उठा कर प्राप्तव्य स्थानपर पहुंचता है, उसी प्रकार इन सब विपत्तियोक मूल कारण देसकर, उन मूल कारणोंको अपनेमेंसे हटाना चाहिये। सब जीवनकलहोंमें अपनी विजय नि.सन्देह हो, ऐसी अपनी तैयारी करनेसे और हरएक जीवनयुद्धम जाग्रत रहने हुए विजय प्राप्त करनेसे ही सब पीडाए हट सकती है ॥ ६ ॥ विपत्तियोंको हटानेका उपाय विपत्तियोंका स्वरूप ३ एकवाद्यां धिपणं जिधत्स्वं- एक निश्चय करने वाली बुद्धिका नाग करनेवाला घातपातका स्वभाव । बुद्धिसे इस सूफमें अनेक विपत्तियोका वर्णन किया है, वह क्रमशः कार्याकार्यका निश्चय होता है, इस निश्चयात्मक बुद्धिका देखिये-- नाम करनेवाला स्वभाव । जिसकी निश्चयात्मक बुद्धि' ही १ निः साला- शाला अर्थात् घरयार न होना, नहीं होती, जो सदा संदेहमे रहता है । (मं. १) निवास स्थान न होना, विश्रामके लिये कोई स्थान न होना। (मं) ४ चण्डस्य सर्वा नपत्य:-क्रोधकी सब संवाने । अर्थात्, क्रोधसे उत्पन्न होनेवाली भापत्तियां। (म १) २ष्णु-मदा भयभीत रहना, दूसरेसे टरने रहना, अधिकारियोग या धर्मात्मामास टरना, एस कुछ कुकर्म ५ स-दानवाः (स-दानवाः)- असुरोंका नाम दानव करना कि नियस मनमें सटा टर रहे कि कोई जाकर मुझे है। दानवका अर्थ है घातपात करनेवाले, गीतामे आसुरी पारंगा हमरा दसरा प्रसिद्ध अर्थदृमगेको टराना भी है। सपत्तिका वर्णन विस्तारपूर्वक है, उस प्रकारके लोक जो सराको भय दिसाना, डराना, दमरोको भयभीत करके घातपात करते है उनका यह नाम है। दानव भावसे युक्त पना म्वार्थ साधन फरना । इत्यादि ( म १) होना यह भी बटी भारी आपत्ति ही है। (मं. १) विपत्तियोंको हटानेका उपाय (१२९) ६ अ-राय्यः- कसीका भाव, निर्धनता, ऐश्वर्यका ३ अक्षात् निः अजामास-अपनी दृष्टिके दोषसे जो भभाव । (मं. ३) जो बुरे भाव पैदा होते है, उनकी शुद्धि करके मैं अपने ७ सेदिः- क्लेश, महाक्लेश । शारीरिक कृशता, दुर्व. अदरके दोवोको दूर करता हू । इस प्रकार सपूर्ण इद्रियोंके लता। कुछ भी कार्य करनेका सामर्थ्य न होना । (मं. ३) शुद्धिकरण द्वारा बहुतसी मापत्तियोको दूर किया जा सकता ८ यातुधान्यः- धन्यता न होना । चोर डकेंनी करने- है । आमशुद्धिकी सूचना यहा मिलती है । (म. २) वाले लोग और उनके वैसे घृणित भाव । ( मं ३) ४ मगुन्द्याःनिःअजामसि-(म-गुन्द्याः = मन+ ये सब भापत्तियां है । इनका विशेष विचार करनेकी भी गुन्द्रयाः) मनको मोहित करनेवाली वृत्तिसे तुमको हटाता कोई आवश्यकता नही है क्योंकि प्रायः सबका परिचय इनके हू । मनकी मोहनिद्रा दूर करता है । यह मनकी शुद्धि है। साय है, अंशतः सब इनके क्लेगोसे परिचित है । इसलिये (म २) सभी चाहते होगे कि ये सब केश दूर हों । इनके तीन भेट इस द्वितीय मत्रमे अपने नेन आदि इद्रियोंकी शुद्धि, होते है- मनकी शुद्धि, गोगालाकी शुद्धि, घरकी शुद्धि, गाडी सादि तीन भेद वाइन जहां रखे जाते है उन स्थानोकी शुद्धि करने के द्वारा १ क्षेत्रियाः- अर्थात् कई आपत्तिया ऐसी होती है कि बातका उल्लेख है उनसे जो जो शुद्धि स्थान अवशिष्ट रहे आपत्तियोंको दूर करनेका उपदेश है । इस मंत्र के अंदर जिन जो मनुष्य के स्वभाव में क्षेत्रसे आयीं होती हैं, वंशपरपरासे होगे, उन सबका ग्रहण यहां करना उचित है । इसका प्राप्त होती है, जन्म स्वभावसे होती हैं । (म ५) तात्पर्य यही है कि जहांसे आपत्तियां उठती हैं और मनु- २ पुरुषेपिताः- दूसरी भापत्तियां ऐसी होती हैं, कि प्योंको सताती हैं, उन स्थानोंकी शुद्धता करनी चाहिये । जो (पुरुप-इपिताः) अन्य मनुष्योकी कुटिल प्रेरणाओके पवित्रता करनेसे ही सब स्थानोसे आपत्तियां हट जाती है। कारण होती हैं । (म. ५) मलिनता आपत्तियोको उत्पन्न करनेवाली और पवित्रता माप- ३ दस्युभ्यः जाताः- तीसरी आपत्तियां ऐसी हैं कि त्तियोंको दूर करनेवाली है। जो चोर डाकु भादि दुष्टोंसे उत्पन्न होती है । (म.५) नीचतामें विपत्तिका उगम आपत्तियोंके तीन भेद हैं- (१) अपने जन्म स्वभावसे विपत्तियोका उगम नीचतामें है इस यातको अधिक होनेवाली, (२) दूसरे पुरुषोकी कुटिल प्रेरणासे होनेवाली मौर (३) दुष्टोंके कारण होनेवाली । इन सय आपत्तियोंको स्पष्ट करनेके लिये तृतीय मत्रका उपदेश है । इसमें कहा है कि 'जो यह (अधरात् गृहः) नीच घराना है वही अवश्य दूर करना चाहिये । सब कंजूसियाँ, विपत्तियाँ, नाश, क्लेश, कृशता और चोरी कई आपत्तियां खानपान मादिके स्थानसे ही उत्पन्न होती आदि दुष्ट भाव रहते है।' नीच घरमे इनकी उत्पत्ति है । हैं, जैसे रोगादि आपत्तियां है, उनको दूर करनेके लिये उनके 'अधर' शब्द यहां नीचताका द्योतक है । जहा हीनता होगी उद्गम स्थानमे ही उन्हें रोकना चाहिये, इस विषयमे द्वितीय वहीं भापत्तियोका उगम होगा, इसमें कोई संदेह ही नहीं है। मंत्रका कयन देखिये- आत्मशुद्धि और गृहशुद्धि चतुर्थ मंगमे कहा है कि ' (भूतपति. इन्द्रः) प्राणि- १ गोष्ठात् निः अजामसि- गोशालासे हटाता हूं मात्रोका पालन कर्ता राजा अपने वज्रसे (सदान्वाः) सब अर्थात् गोशालाके कुप्रबंधमें जिन रोगादि भापत्तियोकी ढाकुभोको और (गृहस्य युध्न आसीनाः) घरके मदर उत्पत्ति हो सकती है उसको दूर करता हूं। गोशालाकी छिपे हुए सब दुष्टोंको हटा देवे।' अर्थात् राजा अपने सुन्य- पवित्रता करनेसे इन भापत्तियोका नाश हो सकता है। वस्थित राजप्रयधसे दुष्टोंको दूर करे और अपने राज्यको (म. २) सज्जनोंके घर जैसा यनावे। इस प्रकार उत्तम रानगासन २ उपानसानिः अजामसि-अमपानके गड्ढे अथवा द्वारा दुष्टोका प्रतिबंध होनेसे सज्जनोका मार्ग खुल जाता वाहनादिके स्थानमें जो कुछ दोष होनेसे भापत्तियां आसकती है। सुराज्य होना भी एक यडा साधन है कि जिससे भाप- हैं उनको शुद्धतासे इन आपत्तियोंको मैं हटाता है । (२) सिया कम होती हैं, या दूर हो जाती है। १७ [भयर्व भा. ४ हिन्दी] राजाका कर्तव्य
(१३०)
अथर्ववेदका सुबोध अनुवाद
'दीर्घजीवन और आरोग्य'
जीवनका युद्ध
-
चाहिये । । मन्यया विजय असम्भव है । गगक्तिमे अपनी
आपत्तियोके साथ अगढा करना विपत्तियोंसे लढना और भक्ति अधिक ही रहनी चाहिये तभी विजय प्राप्त हो सकती है
मन्यया पराजय होगी। पराजय होनेसे विपत्तिया बढ़ेगी।
उनका पराभव करके अपनी विजय संपादन करना, यह एक इसलिये शत्रुगक्तिकी अपेक्षा अपनी शक्ति यढानी चाहिये ।
मात्र उपाय है, जिससे मापत्तियां दूर हो सकती हैं। यह
युन्द्व हरएक स्थानपर करना पड़ता है । शरीरमें व्याधियोंसे और अपनी विजय संपादन करनी चाहिये।
अगटना है, समाजमें डाकू तथा दुष्टोंसे लडना होता है, राष्ट्रमें पहिले जितनी भी आपत्तिया गिनाई गई है उन सबके
विदेगी शत्रुओंसे युद्ध करना होता है और विश्वमें अतिवृष्टि, निवारण करने के लिये यही एक मात्र उपाय है। इससे पहिले
अनादृष्टि, अकाल मादिने युद्ध करना पडता है। इस छोटे कई उपाय बताये हैं । राज गायनका सुप्रयध, आत्मशुद्धि,
मोटे कार्यक्षेत्रों मे छोटे मोटे युद्ध करने ही होते हैं । इन युट्ठों- बायशुद्धि' आदि सभी उपाय उत्तम ही हैं, परंतु सर्वत्र इस
को किये विना और वहां अपनी विजय प्राप्त किये विना सुस- आत्मशुद्धिक उपायकी विगंपता है, यह बात भूलनी नहीं
मय जीवनमा प्राप्त होना असंभव है। यही बात इस सूक्तके चाहिये ।
पष्ट मंत्रमें कही है-
जिस प्रकार घोडा चलकर अपने प्राप्तव्य स्थानपर पहुंचता
वः सर्वान् आजीन अजैपम् । (मं. ६) है, उसी प्रकार मनुष्य भी प्रयत्न करके ही प्रत्येक शुभ स्थान-
सब युद्धों में मैं विजय पाता हूं।' इस प्रकार सब पर पहुंचता है । इसलिये मनुष्य प्रयत्न करके ही पुरुषार्थसे
युमि विजय पानेसे ही मनुष्य के पाससे सब विपत्तियां दूर सिद्धिको प्राप्त करे । प्रत्येक सुखस्थान मनुष्यको पुरुषार्थमे
हो जाती है और मनुष्य ऐश्वर्यसंपन्न हो जाता है। प्रत्येक ही प्राप्त हो सकता है। पुरुषार्थ प्रयत्नक विना विपत्तियों
युन्हमें अपनी विजय होने योग्य शक्ति अपने अंदर बढानी का दूर होना असभव है ।
।
छायाधिसूक्त
को. १, सू. ९
.
(ऋषि:- अथर्वा । देवता- वस्वादयो नानादेवताः1).
अस्मिन्वसु वसवो धारयन्त्विन्द्र
पूषा
वरुणो मित्रो अग्निः ।
इमोदित्या उत विश्वे च देवा उत्तरस्मिन् ज्योतिपि धारयन्तु
अस्य देवाः प्रदिशि ज्योतिरस्तु सूर्यों अग्निरुत वा हिरण्यम् ।
सपना अस्मदर्धरे भवन्तृत्तमं नाकमधि रोहयेमम्
॥ २॥
अर्थ- (अस्मिन् ) इस पुरपमें (वसवः ) वसु देवता तथा इन्द्र, पूपा, वरुण, मिग्र, अग्नि ये देव (वसु)
वनको (धारयन्तु ) धारण करायें । आदित्य और विश्व देव ( इमं ) इस पुरुषको (उत्तरस्मिन् ज्योतिपि) अति उत्तम
वेजमें स्थापित करें ||
हे (देवाः) देवो ! (मस्य) इम पुरुषके (प्रदिशि) अधिकारमें ज्योति, सूर्य, अग्नि और हिरण्य (अस्तु)
हो । ( सपन्नाः) शत्रु (अस्मत् अघरे) हमारे नीचे (भवन्तु) हो। और (इमं) इसको ( उत्तमं नाकं )
उसम मुसमें (आधि रोहय) तुम चढामो ॥२॥
वर्चःप्राप्ति-सूक्त (१३१) येनेन्द्रीय समभरः पयाँस्यूत्तमेन ब्रह्मणा जातवेदः । तेन त्वमन इह वधयेमं मंजाताना श्रेष्ठय आ धेह्येनम् ॥३॥ एषौ यज्ञमुत वर्षों ददेऽहं रायस्पोमुत चित्तान्यग्ने । सपत्ना अस्मदर्धरे भवन्तृत्तमं नाकमधि रोहयेमम् ॥४॥ अर्थ- हे ( जातवेदः ) ज्ञानी उपदेशक ! (येन उत्तमेन ब्रह्मणा) जिस उत्तम ज्ञानसे इन्द्र के लिये ( पयांसि समभरः) दुग्धादि रस दिये जाते है (तेन ) उस उत्तम ज्ञानसे, हे (अग्ने) तेजस्वी पुरुष! (इमं) इसको (इह) यहां (वर्धय ) यढा भौर ( एनं ) इसको (सजातानां श्रेष्ठयै) अपनी जाति में श्रेष्ठ स्थानमें (आ धेहि ) स्थापित कर ॥३॥ हे (अग्ने) तेजस्वी पुरुष । (एपां) इनके यज्ञ, (वर्चः) तेज, (राय. पोपं) धनकी वृद्धि और (चित्तानि) मादिको (अहं आ ददे ) मैं प्राप्त करता हूं। ( सपत्नाः ) शत्रु हमसे नीचे के स्थानमें रहें और (इमं) इस मनुष्यको उत्तम सुखमें (अधि रोहय) पहुचा ॥ ४ ॥ ! - वर्चःप्राप्ति-सूक्त प्रकाश 2 इस सूक्तका भावार्थ देखने के पूर्व कई बातोंका स्पष्टी- प्रकाश मह' करण करनेकी आवश्यकता है, अन्यथा सूक्तका भावार्थ इन्द्रिय गण साधारण जनता नक्षत्राणि, देवाः समझमे ही नही आवेगा। सबसे प्रथम वर्णित देवताओका ज्ञान ब्राह्मण, ज्ञानी मनुष्य ब्रह्म मनुष्यसे क्या संबंध है इसका ठीक ठीक ज्ञान होना आव- क्षात्रतेज क्षत्रिय वीर इन्द्र श्यक है, इसलिये उसका विचार सबसे प्रथम करेंगे पुष्टि राष्ट्रपोषक अधिकारी पूषा शांतभाव देवताओंका सम्बन्ध जलाधिकारी वरुणः मित्रभाव मित्र जन मित्र जो ब्रह्माण्ड में है, वह पिण्डमे है, तथा जो पिण्डमें है वह वाणी ज्ञानी उपदेशक अग्नि ब्रह्माण्डमें है अर्थात् जो विश्वमे है, उसका सब सत्त्व एक व्यक्ति है और जो व्यक्तिमें है उसका विस्तार सव विश्वमें स्वातंत्र्य स्वतंत्र विचार के लोग मादित्याः हैं, इसका विशेष ज्ञान निम्नलिखित कोष्टकसे हो सकता है- नेत्र, दर्शनशक्ति दार्शनिक विद्वान् सूर्य. सब दिव्य गुण सव विद्वान् , कारीगर विश्वे देवाः व्यक्तिमें देवतांश समाजमें देवता विश्वमें देवता तेज हिरण्य निवासक दाक्तियां समाजस्थितिकी वसव. (अष्ट) शत्रु आनद स्वाधीनता नाक (स्वर्ग) स्थूलशरीर मातृभूमि पृथ्वी तेजी उत्तम ज्योति जल नदी नद आदि भाप: शरीरका तेज सुख भग्नि, विद्युत् आदि तेजः, ज्योति शुद्ध वायु वायु कान ब्रह्मचर्य' पुस्तकमें भंशावतारका वैदिक भाव वर्णन भाकाश. स्थान भद्रपान औषधि, वनस्पति सोमः किया है इस प्रसगको और अधिक समझनेके लिए उसे धाग्यादि भवश्य पहिए। (स्वाध्याय मडल द्वारा प्रकाशित मूल्य 1) धन सपत्ना. दुष्ट विचार आठ शक्तियां मध्यम रक्तादि धातु "" अधर्म , प्राण (१३२) अथर्ववेदका सुवोध अनुवाद 'दीर्घजीवन और आरोग्य' ? इस कोष्टकसे पाठकों को पता लग जायगा कि सूक्तोक्त जिस समय घटती जाती है, उस समय भीणता होती है देवता गरीरमे किस किस रूपमे है, राष्ट्रमे किस किम रूपमें तथा नियामक शक्तियों के नाम होनेपर मृत्यु निश्रित हैं। है और जगत् में किस किस रूपमे है। सूर्यदेव जगत्में कहीं इसी प्रकार मन्यान्य यक्तियों के बढने घटनेसे ये वे गुण बरते हे यह सब जानते है, वही अंगस्पसे शरीरमे है जिसको नेत्र या घटते हैं। मनुय्यम वमुशक्तियां आठ हैं और भन्य देवता- या दर्शनमन्ति कहते हैं, राष्टमे भी जो पुस्प विशेप विचारसे सोने प्राप्त भन्य गतियां भी है। इन शक्यिोंके विकसित राष्ट्रको अवस्थाका विचार करते हैं वे दार्शनिक पुरुष राष्ट्रके रुपमें प्रकाशित होनेसे ही मनुष्य वसु अर्थात् धन प्राप्त सूर्य है क्योकि उनके दर्शाये मार्ग पर चलता हुमा राष्ट्र उत्तम करता है और अपने भापको धन्य कर सकता है। सारांश अवस्थामें पहुच सकता है। इसी प्रकार भन्यान्य देवताभोके रूपसे उन्नतिका मूल मंत्र है। (१) अपनी निवासक वसु- विषयमे जानना चाहिए। शक्तियोंका विकास करना, तया (२) अपने अंदर क्षान- इस सूक्तमे प्रारंभमें ही 'अस्मिन् ' पद है इसका अर्थ तेजको वृद्धि करना, (३ ) अपनी पुष्टि करना, (४)भपने 'इस मनुप्यमें ' ऐसा है। यहा यह प्रश्न उपस्थित होता अंदर समता और शाति रसना, (५) मनमें मिग्रमाव है कि यहां किस मनुष्यके उद्देश्यसे यह गन्द माया वढाना और हिंसकभाव कम करना, तथा ( ६ ) वाणीकी है ? पूर्व सूक्तके साथ इस सूक्तका संबंध देसनेसे स्पष्टता- शक्ति विकसित करना। इन छ. यक्तियोंके यह जानेसे पूर्वक पता लगता है कि इस शब्दका संबंध पूर्व वर्णित मनुष्य हरएक प्रकारका धन प्राप्त कर सकता है और उससे नवप्रविष्ट शुद्ध हुए' मनुष्य के साथ ही है । जो मनुष्य अपने आपको धन्य बना सकता है । यहांका 'वसु' शब्द मनकी वृत्ति बदलनेक कारण अपने धर्ममे प्रविष्ट हुआ है, धनवाचक है परतु यह धन केवल पैसाही नहीं, अपितु यह उसकी सबसे अधिक उन्नति करनेकी इच्छा करना प्रत्येक वह धन है, कि जिससे मनुन्य अपने भापको श्रेष्ठ पुरुषोमें मनुप्यका आवश्यक कर्तव्य ही है। अपने धर्ममें जो श्रेष्ठसे धन्य मान सकता है । इस वसुमे सब निवासक शक्तियोंके श्रेष्ठ प्राप्तव्य है, वह उसको शीघ्र प्राप्त हो, इस विषयकी विकाससे प्राप्त होनेवाली धन्यता मा जाती है । (१) इन्छा मनमे धारण करनी चाहिये, अर्थात् उसको विशेष 'निवासक शक्ति, (२) क्षात्रतेज, (३) पुष्टि, (४) तेज प्राप्त हो ऐसी इच्छा करनी चाहिये यद्यपि इस सूक्तका समता, (५) मित्रभाव, ( ६ ) वक्तृत्त्व ' इन छः गुणों- पूर्वापर संबंध देखनेसे यह सूक्त नव प्रविष्टकी तेजवृद्धि के को वृद्धि करने की सूचना इस प्रकार प्रथम मत्रके प्रथमार्धमे लिये है ऐसा प्रतीत होता है, तथापि हरएक मनुष्यके तेज दी है और दूसरे अर्धमें कहा है कि ( ७ ) इसके स्वतंत्र वृद्धि के सामान्य निर्देश भी इसमें है और इस दृष्टिसे यह विचार और (८) इसकी इंद्रिया इसको उत्तमोत्तम तेजस्त्री सामान्य सूक्त सब मनुष्योक लिए उपयोगी भी है। स्थानमें पहुंचाये । मनुष्यके स्वतंत्र विचार ही मनुष्यको उठाते या गिरात है, उसी प्रकार इंद्रियां स्वाधीन हो तभी अब यहा पूर्वोक्त मंत्रोंका भावार्य दिया जाता है और वह संयमी मनुन्य है अन्यथा इंद्रियोंके आधीन वह भावार्थ व्यक्तिमें जो देवतांग है उनको लेकर ही दिया बनकर दुर्व्यसनी बना हुआ मनुष्य प्रतिदिन हीन होता जाता है। जाता है। मनुग्यकी नि.सदेह उन्नतिका यह अरविध साधन प्रथम मत्रने दिया है । वह हरएक मनुष्यको देखने- योग्य है । अव दूसरा मंत्र देखिये- प्रथम मंत्र- ' इस मनुष्यमे जो निवासक शक्तियां है नया मात्र बल, पुष्टि, गांति, मित्रता तथा वाणी मादिकी विजयके लिये संयम गक्तियां हैं, ये सब शक्तिया इसम धन्यता स्थापित करें। द्वितीय मत्र- 'हे देवो इस मनुष्यकी भाशामें तेज, इसके स्वतंत्र विचार और इसकी मव इद्रियां इसको उत्तम नेत्र, वाणी और धन रहे । हमारे शत्रु नीचे हो जाय भौर तेजमें स्थापित कर ॥ १ ॥ इसको सुखकी उत्तम अवस्था प्राप्त हो ॥२॥' मनुप्यम अथवा जगत्के हरएक पदार्यमे कुछ निवासक इस मंत्रमें '(अस्य प्रदिशि सूर्यः (वसु) गनियां है जिनके कारण वह पदार्य या प्राणी आज्ञामे सूर्य रहे' यह वाक्य है। पाठक जान सकते हैं कि अपनी अवस्थामें रहते हैं। जिस समय निवासक वसु किसी भी मनुष्यकी भाज्ञामे सूर्य रह ही नहीं सकता, क्योकि गन्हियां बढती रहती हैं, उस समय पोषण होता है और वह मनुप्यकी शक्तिसे बाहर है, परन्तु सूर्यका अंग जो श्रेष्ठ बनता उन्नतिका मूलमन्त्र . अस्तु) इसकी ।
वर्चःप्राति सूक्तं (१३३) है वह । गरीरमें नेत्र स्थानमें रहता है और जिसको नेत्र इन्द्रिय कहते १) पहिले मंत्र के उपदेगानुसार भाचरण करनेसे अपनी तो संयमी पुरुष के आधीन रह सकता है। इससे पूर्व शक्तियोकी उन्नति की, (२) दूसरे मत्रके उपदेशानुसार कोटककी बात सिद्ध होती है कि व्यक्तिक विषयमे विचार अपने इन्द्रिय सयम द्वारा आत्मविजय प्राप्त किया, (३) करने के समय देवतामोके शरीरस्थानीय अश ही लेने चाहिये तीसरे मंत्रक उपदेशानुसार अपनी ज्ञानवृद्धि द्वारा प्रशस्त जैसा कि पहले मंत्रमे किया है और इस मंत्रमें भी करना है। कर्म करके अपनी जातिमे बहुमान प्राप्त किया, तब (४) मनुपके अंदर बाह्य ज्योतिका अश तेजी, सूर्यका अंश इस चतुर्थ मत्रमें वर्णित जनताकी भलाई करनेक उत्तमोत्तम नेत्र, भमिका भंग वाणीने रूपमें रहता है। इसी प्रकार कर्म करने और करानेका योग्य अवसर प्राप्त होता है । पाठक भन्यान्य देवोंक अंग यहीं रहते है, वे ही इन्द्रिय गतिया यहां चार मंत्रों में वणित यह चार सीढिया देख और विचार है । मनुष्यकी स्फूर्ति, भास और वाणी तथा उपलक्षणसे तो पता लग जायगा कि यहां इस सूक्तमे वेदने थोटे आन्दों में अन्य इन्द्रियां भी उसकी नाज्ञामे रहें, अर्थात् इन्द्रिया मानवी उन्नतिका अत्यत उत्तम उपदेश किया है। स्वतत्र न बन । तात्पर्य यह कि मनुष्य इन्द्रिय-सयम भौर मनोनिग्रह करके अपनी शक्तियोंको अपने माधीन रखे । उन्नतिकी चार मीढियां अपनी इन्द्रियोंको अपने माधीन रखना आत्मविजय प्राप्त अपनी शक्तियों का विकास करना है। इस प्रकारका आत्मविजयी मनुष्य ही शत्रुओको प्रथम मत्र- शरीरकी धारक शक्तियों, इन्द्रियों और दबा सकता और उत्तम सुख प्राप्त कर सकता है। यदि अवयवोकी सब शक्तियों, तथा मनकी विचार-क्तियोका जगत् में विजय पाना है, शत्रुओंको दबाना है, तथा उत्तम उत्तम विकास करो। सुम्ब कमाना है, तो अपनी गान्तियोको सबसे प्रथम स्वाधीन खशक्तियोंका सयम करना चाहिये, यह महत्त्वपूर्ण उपदेश यहां मिलता है। द्वितीय मन्त्र- अपने माधीन अपनी सब गक्तिया रखो, ज्ञानसे जातिमें श्रेष्ठताकी प्राप्ति संयम द्वारा आत्मविजय प्राप्त करके शत्रुको दूर करो और तृतीय मत्र- 'जिस उत्तम ज्ञानमे क्षत्रियको उत्तमोत्तम सुखी हो जाओ। रस प्राप्त होते हैं, हे धर्मोपदेशक | उसी उत्तम ज्ञानसे यहा ज्ञानवृद्धि द्वारा स्वजाति में समान इस मनुष्यको वृद्धि कर और अपनी जातिमे इसे श्रेष्ठता प्राप्त हो ॥३॥ तृतीय मन्त्र-ज्ञानकी वृद्धि द्वारा विविध रस प्राप्त करो क्षत्रियको, इन्द्रको अथवा राजाको जिस ज्ञानने उत्तम और अपनी वृद्धि द्वारा स्वजातिम श्रेष्ठ वनो। भोग प्राप्त होते है और जिस ज्ञानसे वह सबसे श्रेष्ठ समझा जनताकी उन्नति के लिये प्रयत्न जाता है, वह ज्ञान इस मनुष्यको प्राप्त हो और यह मनुष्य चतुर्थ मन्त्र- लोगोके चित्त अपनी ओर आकर्षित करो, भी वैसा ही अपनी जातिम अथवा अपने राष्ट्रमे श्रेष्ठ बने। लोगोंक धनोकी वृद्धि करो और उनके प्रशस्त कौको फैला राष्ट्रके हरएक पुरुषको श्रेष्ठ ज्ञान प्राप्त करनेके सब साधन दो। इससे शत्रुओको दूर करके सुखके स्थानमे विराजो। खुले रहने चाहिये । वह मनुष्य नृतन प्रविष्ट हो वा उसी ये चार मन्त्र महत्त्वपूर्ण चार आदेश दे रहे है (१) जातिमें उत्पन्न हुभा हो । तथा हरएक मनुष्यमे यह महत्वा- स्वगक्ति-सवर्धन, ( 7 ) भामसयम, (३) ज्ञानके कारण कांक्षा होनी चाहिये कि मैं भी उस ज्ञानको प्राप्त करके वैसा स्वजातिम श्रेष्ठत्व और (४)जनताकी भलाई के लिये प्रयत्न । ही श्रेष्ठ यनूंगा, मैं अपनी जातिका नेता बनूगा और अपने इन चार मन्त्रोपर चार विस्तृत व्याख्यान हो सकते है, इतना देशमें श्रेष्ठता प्राप्त करूगा। यह मत्रका आशय हरएकको इनके उपदेशोका विस्तार ओर महत्त्व है । नित्य स्मरणमे रखना उचित है। चतुर्थ मन्त्रमे 'एपा' शब्द है, यह 'इन सब लोगोका' जनताकी मलाई करना यह भाव बता रहा है। इन सब लोगोक चित्त में अपनी चतुर्थ मत्र- 'इन सबके चित्त में अपनी ओर सोंचता मोर खींचता हु, इनके धनोको वृद्धि करनेके उपाय मैं करना हूं और इनके धनको वृद्धि मैं करूंगा, तथा इनके सत्कर्म हूं, इनके प्रशस्त काँको बढाता हूं और इन सब शत्रु- मैं फैलाऊगा । हमारे बढानेका प्रयत्न करता शत्रु नीचे दब जांय भौर इसको उत्तम ओको नोचे दबाकर इन सबका सुस्व सुखका स्थान प्राप्त हो ।। ४ ।। हूं। यह इस चतुर्थ मन्त्रका भाव अति स्पष्ट भौर सुगम है।
(१३४)
अथर्ववेदफा सुबोध अनुयाद
'दीर्घजीयन और आरोग्य'
इन सूक्ताका स्मरणीय उपदेश और कमी मनुन्य उनकी भाज्ञामें जाकर पराधीन न बने ।
१ उत्तरस्मिन् ज्योतिषि धारयन्तु- अधिक श्रेष्ट ३ सपत्ना अस्मदधरे भवन्तु-शा हमारे नीचे रहे।
तेजमें ( इसकी) धारणा करें ।
४ उत्तम नाकमाधि रोयैनम्- इसे उत्तम म्यानमें
२ अस्य प्रदिशि ज्योतिः सूर्यः अग्निः उत हिरण्य
अस्तु- इसकी भाज्ञामें तेज, सूर्य, भनि और धन रहे, ५ सजातानां श्रेष्ठय आ घेघेनम्- इसको अपनी
(मर्थात) इस (मनुन्य) की भाज्ञाम जगन पदार्थ रहे जातिमें श्रेष्ट यनाभो ।
चटामा।
(१९)
॥१॥
॥ २॥
॥३॥
शुद्धिकी विधि
कां. २, सू. १९-२३
(ऋषि:- अथर्वा । देवता- अग्निः, वायुः सूर्य , चन्द्रः, भाप ।)
अग्ने यत्ते तपस्तेन तं प्रति तप यो३म्मान्द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः
अग्ने यत्ते हस्तेन तं प्रति हर योऽस्मान्द्वेष्टि
अग्ने यत्तेऽचिस्तेन तं प्रत्यंच यो.
अग्ने यत्तै शोचिस्तेन तं प्रति शोच यो०
अग्ने यत्ते तेजस्तेन तमतेजसै कृणु यो०
वायो यत्ते तपस्तेन तं प्रति तप योऽस्मान्द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः
वायो यत्ते हरस्तेन तं प्रति हर यो.
वायो यत्तेऽर्चिम्तेन तं प्रत्यर्च यो.
वायो यत्ते शोचिस्तन तं प्रति शोच यो.
वायो यत्ते तेजस्तेन तमतेजस कृणु यो०
॥४॥
॥५॥
(२०)
॥१॥
॥ २॥
॥३॥
॥४॥
--
अर्थ- हे अग्नि, वायु, सूर्य, चन्द्र और आप देवतामो ! आपके अदर जो (तपः) तपानेकी शक्ति है उससे (तं
प्रति तप) उसको तप्त करो (यः अस्मान् द्वेष्टि)जो अकेला हम सबसे द्वेष करता है और (यं वयं द्विष्मः) जिससे
हम सब द्वेष करते हैं॥१॥
हे देवो । जो आपके अंदर (हरः) हरण करनेकी शक्ति है उससे उसका (प्रतिहर) दोष हरण करो जो हमसे
द्वेष करता भौर जिससे हम हेप करते हैं ॥२॥
वर्चपाति-सूक्त (१३५) (२३) (२१) सूर्य यत्ते तपुस्तेन तं प्रति तप यो मान्द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः ॥१॥ सूर्य यत्ते हस्तेन तं प्रति हर यो. || - 11 सूर्य यत्तेऽर्चिस्तेन तं प्रत्यर्च यो० ||३|| सूर्य यत्तै शोचिस्तेन तं प्रति शोच यो. ॥४॥ सूर्य यत्ते तेजस्तेन तमतेजस कृणु यो. ॥५॥ (२२) चन्द्र यत्ते तपस्तेन तं प्रति तप यो सान्द्वेष्टि यं यं द्विष्मः |॥१॥ चन्द्र यत्ते हस्तेन र प्रति हर यो० ||२|| चन्द्र यत्तेऽर्चिस्तेन तं प्रत्यर्च यो. ||३|| चन्द्र यत्तै शोचिस्तेन तं प्रति शोच यो. ॥४॥ चन्द्र यत्ते तेजस्तेन समतेजसै कृणु यो आपो यस्तपस्तेन तं प्रति तपत यो मान्द्वेष्टि यं यं द्विष्मा ॥१॥ आपो यद्वो हरस्तेन तं प्रति हरत यो० ॥२॥ आपो यद्वोऽचिस्तेन तं प्रत्यर्चत यो. ॥३॥ आपो यद्वः शोचिस्तेन तं प्रति शोचत यो० ॥४॥ आपो यहस्तेजस्तेन तमतेजसै कृणुत यो. अर्थ-हे देवो ! जो आपके अंदर (अर्चिः) दीपन शक्ति है उससे उसका (प्रत्यर्च) सदीपन करो जो हमसे द्वेष करता है और जिससे हम द्वेष करते हैं ॥३॥ हे देवो । जो आपके अंदर (शोचिः) शुद्ध करनेकी शक्ति है उससे उसको (प्रति शोच) शुद्ध करो जो हमसे द्वेष करता है और जिससे हम द्वेष करते हैं ॥ ४ ॥ हे देवो । जो आपके अंदर (तेजः) तेज है उससे उसको (अतेजसं ) तेजरहित करो जो हमसे द्वेष करता है और जिससे हम द्वेष करते हैं ॥५॥ भावार्थ- हे अग्नि, वायु, सूर्य, चन्द्र और आप देवो । मापके प्रत्येकके मंदर तप, हर, अर्चि, शोचि और तेज ये पांच किया है, इसलिये कृपा करके हमारे द्वेषकोंको इन शक्तियोसे परिशुद्ध करो, अर्थात् उनको तपाकर, उनके दोपोको हरकर उनमें आंतरिक प्रकाश उत्पन्न करके, उनकी शुद्धि करके और उनको अपने दिव्य तेजसे प्रभावित करके शुद्ध करो। जिससे वे कभी किसीसे द्वेष न करें और मिलजुल कर भानंदसे रहें ।
(१३१) अथर्ववेदका मुबोध अनुवाद 'दीर्घजीवन और आगेग्य' . 1 - A (सौम्य प्रकाम) शुद्धिकी विधि पांच देव गानिक विषयम देविय। हर का भय हरण करना घर लेना । यदा हम एक ही शनिका उपयोग पांच देव किम इन पांच मुनीम पात्र देवतामाकी प्रार्थना की गई। प्रकार करते है, देविय- अथवा दृष्टीक सुपारक कार्यमें टन गनियोती याचना की १ अग्नि- गीतनामा हरण करना , नपाता है । गई है। ये पाच देखना यह.-- २ वायु- आद्रतारा हरण करता है, सुखाना है। अग्नि, वायु, मयं, चन्द्र, आपः । । सूर्य- समयमा हरण करना है, आयु घटाना है। अग्निम तपानकी गति, बायुम हिगनेकी गानि, सूर्यमे द चन्द्र-मनस्तापका हरण करता, मनकी प्रमाता प्रभाग गति, चन्द्र में सौम्यता और भाप (जल) मे पूर्ण देता है। शाति है । अर्थात ये देवता इस व्यवस्था क्रमग माय है ५ जल-शारीरिक मलका हरण करना है, शुदटा कि पहिल तपनिम्न प्रारभ होकर सत्रको अन्तम गाति मिल- करता है। नाव । अंतिम दो देव चंद्र और भाप पृण गांति देनेवाल, प्रत्यक देव हरण करना है, परन्तु उसमें हरण करने के है । अग्नि और सूर्य नपानवाल हैं और वायु प्राणगति या पदार्थ भिन्न है, इसी प्रकार तपन, हरण, अर्चन, गौचन जीवन गनिमा दाता है। और नजन' क द्वारा इन दवास मनुग्यमा सुधार होता है। प्रत्येक देवनाक ये पांच गुण है और पांच देवता है, इस पंचायतन लिये सुधार होने के लिये पीस छाननियाँस छाना जानकी मर्य भावश्यक्ता है, यह बात पाठक विचार करनेसे सहज हीम (व्या प्रकार) जान जायेंगे। वायु यह शुदिनी विधि देखने लिये हमें यहां इन पांच गुण (गति) गतियांका अवश्य विचार करना प्राहिये- अग्नि १ तपः- तपाना, तपना । इसका महत्त्व बढा भारी (गांति) है । मुवर्णादि धातु अग्निमें तपनेने ही शुद्ध होते हैं। कायिक, पहिले अग्नि तपाता है, वायु उसमे गति करता है और वाचिक, मानसिक तपसे ही मनुप्यकी शुद्धि होती है । तपन' ये दोनों मृयक उग्र प्रमागमे टम रख देते है। उसके पश्चात अनेक प्रकार होता है । तप बहुन प्रकार के हैं उन सबका चंद्रमाका सौम्य प्रकाम आता है और पश्चात जल तत्त्वकी उद्देश्य शुट्टि करना ही है । पूर्ण यान्ति या मांतिमय जीवन उसे प्राप्त होता है। शुन्द्र २ हरः-हरण करना, हर रेना। दोपोको हरण करना, होनेका यह मार्ग है। यह क्रम विशेष महत्त्व पूर्ण है । और दोषोको दूर करना । सुवर्णादि धातुओंको अग्निम तपानेसे हमीडिय इन पाची मूकोका विचार यहां इकट्ठा किया है। दोष दूर होते है और उनकी शुद्धता होती है। इसी प्रकार पांच देवांकी पांच शक्तियाँ अन्यान्य तप करनेसे दोष दूर होते है और शुद्धि होती है। पांच देवोंकी पांच यक्तियोंका इन सूक्तमि वर्णन किया पूर्वान दो विधियों द्वारा शुद्धता होनेके पश्चात् यह पूजा या ३ अचि: मर्च धातुका अर्थ पूजा और प्रकाग' है। है। उनके नाम ये है। टपासनाका प्रकाश उस मनुग्यके अदर ढाला जाता है। नपः, हरः, अचिः, गोचिः, नेजः ' ग्रे पाय शक्तियां दोष दूर होनेके पश्चात् ही यह होना है इससे पूर्व नहीं । है। ये पांचो गतिया प्रत्येक देयक पास है। हरएककी ये ४ोचिः- शुच् धातुका अर्थ शोधन करना है। अन्तिया भिन्न है । अग्निका तेज, सूर्यका तंज और जलका शुद्धता करना । तप, दोपहरण और अर्चन के पश्चात् शोधन नेज मिन्न होनेमे किमीको भी शंका नहीं हो सकी। इस हुआ करता है । गोधनका भर्थ बारीकसे बारीक दोषोंको लिये प्रत्येक देवता पाम ये पाच शक्तियां है, परंतु उनका म्नम्प और कार्य मिट भित ही है। जैग्मा 'हरः' नामक हटाना | स्थूल दोपोका हरण होता है और सूक्ष्म टोपोंका योधन हुभा करता है इस प्रकार योधन होने के पश्चाद- - माप (सप) शुद्धिकी विधि (१३७) । ५ तेज-तेजन करना है। निज धातुका अर्थ तेज करना आपः (आपोरेतो भूत्वा शिस्नं प्राविशत् )= जल और पालन करना है । गस्खकी धारा तेज की जाती है इस रेत बनकर शिनके स्थानपर बसा है। प्रकारका तेजन यहा सभीष्ट है। तीसा करना, तेज करना ये पांच देव इन पांच रूपोमें अपने आपको ढाल कर मनु- बुढिकी तीव्रताका संपादन करना। प्यके देहमे भाकर इन स्थानोमें बसे हैं। यह बात विशेष उदाहरण के लिये लोहा लीजिये । पहिले (तपः)तपाकर विस्तारपूर्वक ऐतरेय उपनिषदें लिखी है, वहां ही पाठक उमको गर्म किया जाता है, पश्चात् उसके दोष (हरः) दूर देखें । यहा नो वाक्य ऊपर लिये हैं वे ऐतरेय उपनिषद् किये जाते हैं, पश्चात् उसको किसी आकारमें टाला (अर्चिः) (ऐ. उ. ११२ ) मेंसे ही लिये हैं । इन वाक्योंके मननसे पता जाता है, नंतर ( शोचिः ) पानीमें बुझाकर नल पिलाया लगेगा कि इन देवोंका शरीरमें निवास कहां है । भव ये अर्थ जाता है भौर तत्पश्चात् (तेजः) उस शस्त्रको तेज किया लेकर पूर्वोक्त मंत्रोके अर्थ देखिये- जाता है । यह एक चक्कू छुरी नादि बनानेकी साधारण बात सूक्त १९ -(अग्नि-वाणी)= हे वाणी ! जो तेरे अदर है, इसमें भी न्यूनाधिक प्रमाणसे इन विधियोंकी उपयोगिता तप है उस तपसे उसको तप्त कर जो हमसे द्वेष करता है। होती है। फिर मनुष्य से श्रेष्ट जीवकी शुद्धताके लिये इन तथा जो तेरे अंदर हरणशक्ति है उससे उसीके दोष हरण की उपयोगिता अन्यान्य रीतियाने होगी ही इसमें कहनेकी कर, जो तेरे अंदर दीपन गक्ति है उससे उसीका अंतःकरण क्या भावश्यकता है ? तात्पर्य ' तपन, हरण, अर्चन, शोधन प्रकाशित कर, जो तेरे अंदर शोधक गुण है उससे उसीकी और तेजन ' यह पांच प्रकारको शुद्धिकी विधि है, जिससे शुद्धि कर और जो तेरे अंदर तेज है उससे उसीको तेजस्वी टोपी मनुप्यकी शुद्धता हो सकती है । दुष्ट मनुष्यका सुधार बना ॥ १-५ ॥ करके उसको पवित्र महात्मा बनानेकी यह वैदिक रीति है। सूक्त २०-[वायु-प्राण] - हे प्राण' जो तेरे अंदर तप मनुध्यकी शुद्धि दोष-हरण-शक्ति, दीपन शक्ति, गोधन शक्ति और तेजन- भय यह विधि मनुष्यमें किस प्रकार प्रयुक्त होती है इस सबसे द्वेष करता है ॥ १-५ ॥ शक्ति है, उन शक्तियोंसे उसके दोष दूर कर कि जो हम का विचार करना चाहिये । इस कार्यके लिये पूर्वोक्त देव मनुव्यमें कहां और किस रूपमें रहते है इसका विचार करना इसी प्रकार अन्यान्य सूक्तोंके विषयमे जानना योग्य है । चाहिये । इसका निश्चय होनेसे इस शुद्धिकरण विधिका पता प्रत्येककी पाच शक्तियां हैं और उनसे जो शुद्धता होनी है, स्वयं लग सकता है। इसलिये पूर्वोक्त पाच देव मनुप्यकं उसका मार्ग निश्चित है, वह इस अर्थसे अब स्पष्ट हो चुका अंदर कहा और किस रूपमें विराजमान है, यह देखिये- है। जो वाह्य देवता है उनके अंश हमारे अंदर विद्यमान है; उन अंगोकी भनुकूलता प्रतिकूलतासे ही मनुष्यका सुधार देवतापंचायतन या मसुधार होता है । यह जानकर इस रीतिसे अपनी शुद्धता मनुष्यमें अग्नि, वायु, सूर्य, चन्द्र और भाप ये पांच देवताए करनेका यत्न करना चाहिये, तथा जो द्वेष करनेवाले दुर्जन निम्नलिखित रूपसे रहती हैं- हो उनके सुधारका भी इसी रीतिसे यत्न करना योग्य है। १ अग्निः (अग्निर्वाक् भूत्वा मुखं प्राविशत् ) अग्नि शुद्धिकी रीति वाणीका रूप धारण करके मनुप्यके मुखमे प्रविष्ट हुई है। अर्थात् मनुष्य के अंदर भग्निका रूप वाक् है । शुद्धिकी रीति पचविध है अर्थात् पाच स्थानोम शुद्धि २ वायुः (वायुः प्राणो भूत्वा नासिके प्राविशत् )= होनी चाहिये । तब दोषयुक्त मनुष्यकी शुद्धता हो सकती है। वायु प्राणका रूप धारण करके नासिका द्वारा अंदर प्रविष्ट इसका सक्षेपसे वर्णन देखिये- हुआ है । और यह प्राण एकादश विध होकर सब गरीरमे १ वाणीका तप-सबसे पहिले वाणीका तप करना चाहिये व्यापक है। जो शुद्ध होना चाहता है या जिसके दोष दूर करने है, उस- ३ सूर्यः (सूर्यः चक्षुर्भूत्वा अक्षिणी प्राविशत् ) को सबसे प्रथम वाणीका तप करना चाहिये । सत्य भाषण, सूर्य नेत्रेन्द्रिय बनकर भाखोमें प्रविष्ट हुना है । मौन भादि वाणीका तप प्रसिद्ध है। वाणीके मदर जो दोप ४ चन्द्रः (चन्द्रमा मनो भूत्वा हृदयं प्राविशत् ) हो उनको भी दूर करना चाहिये । वाणीमें प्रकाश या प्रस- घट्ट देय मनका रूप धारण करके हृदयमें मा वसा है। शता लानी चाहिये, जो बोलना है वह सावधानीसे परिशुद्ध १८ (मथर्व. भा. ४ हिन्दी) - (१३८) अथर्ववेदका सुबोध अनुवाद -'दीर्घजीयन और आरोग्य' विचारोंसे युक्त ही बोलना चाहिये । इस प्रकार वाणीको गाने हैं । इस प्रकार क्रमग मनुष्य शुन्द्र होता हुआ उत्पा शुद्धता करनेका यत्न करनेसे वाणीका तेज अर्थात प्रभाव होता जाता है। बहुत बढ जाता है और हरएक मनुष्य उमसे गन्न सुनने के द्वष करना लिये उत्सुक हो जाता । (सू. १९) इन मूरतोंके प्रत्येक मंगमं कहा है कि, जो (द्वेष्टि) देय २ प्राणका तप- प्राणायामसे प्राणका तप होता है करता है, उसकी शुहना नप आदि द्वारा करनी चाहिये। जिस प्रकार धोकनीसे वायु टेनेसे अग्निका दीपन होता है, दूसरोन द्वेष करना इतना बुरा है । इससे अधिक बुरा और उसी प्रकार प्राणायामसे गरीरके नसनाडियोकी शुद्धता होकर कोई कार्य नहीं है । यह सबसे बटा भारी पतनका साधन है। तेज बढता है, गरीरक दोष दूर हो जाते है, प्रकाश बटता दो चार मित्र इकटे बेटे या मिले तो उनसरी जो बान है, गोधन होता है और तेजस्विता भी बढ जाती है । इस चीत शुरू होती है, वह भी किसी भामोजनिक विषयपर मनुष्टानसे मनुष्य निर्दोष होता है। (सू. २०) नही होती, अपितु किसी न किसीकी निन्दा ही होती है। ३ आंखका नप- मांस द्वारा दुष्ट भावसे किसी भोर मनुप्योक भवनतिका यह प्रधान कारण है । यदि मनुष्य न देखना और मंगलभावनासे ही अपनी दृष्टिका उपयोग यह देप करना छोट दे, नो उसका बहुत कल्याण हो सकता करना नेत्रका तप है। अपनी मांखसे हर प्रकार पाप होते । परंतु दूसरेग्ने हेप करना बडा प्रिय और गेचा लगता रहते है और इस प्रकार पतन होता है। इससे बचनेका है, इसलिये मनुष्य द्वेष ही करता जाता है भोर गिरता यत्न हरएक्को करना चाहिये। इसी तरह अन्यान्य इंद्रियोका जाता है। मंयम करना भी तप है जो मनुष्यकी शुद्धता कर सकता है । इसलिये इन पाच सूरतोके प्रत्येक मत्र द्वारा उपदेग अपने इंद्रियोंको बुरे पथसे हटाना और अच्छे पथ पर चलाना दिया है कि 'जो (द्वेष्टि) हेप करता है, उसकी शुद्धि तप वटा महत्वपूर्ण तप है। इसीसे दोप हटते हैं, शोधन होता आदिसे होनी चाहिये ।' क्योंकि सबसे अशुद्ध यदि कोई है और तेज भी बढता है । (सू. २१) मनुप्य होगा तो दूसरोसे द्वेष करनेवाला ही है। यह स्वयं ४ मनका तप- सत्य पालन करना मनका तप है। भी गिरता है और दूसरोंको भी गिराता है। बुरे विचारोको मनसे हटाना भी तप है । इस प्रकार के मनके मन जैसा चिंतन करता है वैसा बनता है। यह मनका तप करनेसे मनके दोष दूर हो जाते हैं, मन पवित्र होता है धर्म है। जो लोग दूसरोमे द्वेष करते है. दूसरोके दुर्गुणोंका और शुद्ध होकर तेजस्वी होता है। (स. २२) निरंतर मनन करते है, इस कारण प्रतिदिन उनके मनमें ५ वीर्यका तप-(ब्रह्मचर्य)शिस्न इंद्रियका, वीर्यका दुर्गुणोकी संग्या बढती रहती है, किसी कारण भी वह कम अथवा कामका तप ब्रह्मचर्य नामसे प्रसिद्ध है। ब्रह्मचर्यसे नहीं होती । मन ही मनुष्यकी अवस्था निश्चित करता है। सब अपमृत्युएँ दूर होती हैं और अनन्त प्रकारके लाभ होते जैसा मन वैसा मानव । यह नियम अटल है । जो मनुप्य है गेगाटि भय दूर होते हैं और निसर्गका मारोग्य मिलता दुसरंके दुर्गुणोंका निरतर मनन करता है उसका मन दुर्गुण- है। ब्रह्मचर्यके विपयमें सव लोग जानते ही है इसलिये मय बनता जाता है । अत निन्दक मनुष्य दिन व दिन इसके संबंध अधिक लिसनेकी आवश्यकता नहीं है । ब्रह्म- गिरता जाता है। चर्य मव प्रकारसे मनुष्यमात्रके उद्वारका हेतु हैं । (सू. २३) इसीलिये हेप करनेवालेको पश्चात्ताप आदि तप अवश्य अग्नि (वाणी), वायु (प्राण) सूर्य (नेत्र आदि करना चाहिये । अपनी शुद्धि करनी चाहिये । तथा भागेके इंद्रिय), चन्द्रमा (मन), आपः (वीर्य) इन देवोके लिये निन्दावृत्ति छोड देनी चाहिये । अन्यथा धोये आश्रयसे मनुष्यकी शुद्धि होनेका मार्ग यह है। प्रत्येक देव- कपडोंको फिर कीचढमें फेंकनेक समान दुरवस्थाका सुधार हो ताकी पांच शक्तियोंले मनुष्यके दोष हटकर टसमें गुण बढते ही नहीं सकता। - - दुष्ट-चमन (१३९) दुध दमन कां. २, सू. १० (ऋषिः- चातनः । देवता- भग्निः।) भ्रातृव्यक्षयणमसि भ्रातृव्यचातनं मे दाः स्वाहा ॥१॥ सपत्नक्षयणमसि सपत्नचातनं मे दाः स्वाहा ॥२॥ अरायक्षयणमस्यरायचातनं मे दाः स्वाहा ||३|| पिशाचक्षयणमसि पिशाचचातनं मे दाः स्वाहा ॥४॥ सदान्वाक्षयणमसि सदान्वाचातनं मे दाः स्वाहां ॥५ अर्थ-त् (भ्रातृव्य-क्षयणं) चरियोका नाश करनेकी शक्तिसे युक्त है, मुझे वह बल दे ॥ १ ॥ द् (सपत्नक्षयणं) सपत्नीका नाग करनेको शक्तिसे युक्त है, मुझे वह बल दे ।। २ ।। द् (अ-राय-क्षयणं) निर्धनताका नाग करनेका वल रखता है, मुझे वह बल दे॥३॥ दू (पिशाच-क्षयणं) मांस चूसनेवालोके नाश करनेकी शक्ति रखता है, मुझे वह बल दे ॥ ४ ॥ द् (स-दान्या-क्षयणं) मासुरी वृत्तियोको दूर करनकी शक्ति रखता है, मुझे वह वल दे, मैं (स्वा-हा) आत्म- ममर्पण करता हूं ॥५॥ भावार्थ- वैरी, गनु, कंजूस, खूनचूस और मासुरीवृत्तिवाले इनसे बचनेको शक्ति तेरे भदर है, यह शक्ति मुझमें मैं भपने भापको तेरे लिये भर्पित करता हू ।। १-५ ॥ स्थिर कर, दुष्ट-दमन बलकी गणना ३ वलं- सय प्रकारके बल । आत्मिक, बौद्धिक, मान- सिक, इंद्विय विषयक मादि जितने भी बल मनुप्यकी उन्न- इन दो सूनामे आत्मसंरक्षणके लिये आवश्यक बलोंकी गणना की है, वह बल ये हैं- तिक लिये आवश्यक होते हैं वे सब बल । १ ओजः- स्थूल शरीरको शक्ति, पुठोका बल । ४ आयुः- दीर्घ आयु, आरोग्य पूर्ण दीर्घायु । ५ श्रोत्रं- कान आदि इंद्रियोंकी शक्तिया । श्रवणसे २ सहः- शीत, उग्ण अथवा अन्यान्य द्वन्द्व सहन करनेकी शक्ति । कर्तव्य करनेके समय जो भी कष्ट सहन प्राप्त होनेवाली अप्रत्यक्ष शब्दविद्या । करना पढे उन कष्टोको भानन्दसे सहन करना सह है। शत्रुके ६ चक्षुः-चक्षु मादि इन्द्रियोको शक्तिया । प्रत्यक्ष हमले होने पर उससे न डरना तथा अपना स्थान न छोडना, प्रयोगजन्य विज्ञान । भर्थात् अपने स्थानमे ठहरना यह भी एक सहनशक्ति ही ७ परिपाणं-परित्राणको शक्ति । अपनी (पूर्ण) है। सहज हीमे शत्रुसे पराभूत न होना, इतना ही नहीं सरक्षण करनेकी शक्ति । (परि) सब प्रकारसे अपना अपितु शत्रुसे कभी पराजित ही न होना । शत्रुके हमले सहन (पाणं) सरक्षण करनेकी शक्ति । करके स्वस्थानमे स्थिर रहना और शत्रुको परास्त करना या ८ भ्रातृव्य-क्षयणं- भ्रातृन्य शब्दका अर्थ यहां शत्रुके ऊपर भाक्रमण करना, यह सब सह है । विशेष मननसे देखना चाहिये । दो भाईयोके पुत्र भापसमे (१४०) अथर्ववेदका सुबोध अनुवाद 'दीर्घजीवन और आरोग्य' । भ्रातृव्य कहलाते है । यह घरमै भ्रातृव्यपन है । इसी प्रकार करने कार्यमे अपने यल्का उपयोग करना तो सब जानते दो राजा मापसमें भाई होते है और उनकी प्रजा आपसमे ही है, परंतु इन दो मूक्ताम इन बलोका उपयोग 'स्वाहा (भ्रातृव्य ) कहलाती है । इनमें वारंवार युद्ध प्रसग होते विधिने करनेको कहा है। स्वाहा' विधिका तात्पर्य है। ऐसे राष्ट्रीय युद्धोमे गन्नु पक्षका निराकरण करनेकी शक्ति आत्मसर्वस्वका समर्पण' करना है पूर्णकी भलाईक अपनेमे बढानी चाहिये तभी विजय होगी। अन्यथा पराभव लिये संगका यज्ञ करना स्वाहाका तात्पर्य है। होगा। राष्ट्रीय चतुरंग बलको सजानेकी बात इस गन्द द्वारा इस स्वाहा यज्ञ द्वारा उक्त टाक्तियां अपने अंदर बट बताई है । राष्ट्रके बाहरके गत्रुसे युद्ध है। जांय और इसी स्वाहा विधि द्वारा उनका उपयोग किया ९ सपलक्षयणं-एक राज्यके अंदर पक्ष प्रतिपक्ष जाय, यह उपदेश इन सूक्तोंमे विशेष महत्व रखता है। हुआ करते है। इन पक्ष भेदोका नाम 'सपत्न' है स्व: अपना क्योकि ये एक ही पतिक शासनमें हैं । इनमे विविध = आत्म-सर्वस्व-समर्पण । हा-त्याग प्रकारकी स्पर्धा स्वाभाविक है। इस स्पर्धामें अन्य मपत्नोको यह विधि भात्मयज्ञका ही दूसरा नाम है । विधि हटाकर अपनी विजय प्राप्त करनी चाहिए। यह राष्ट्रके शक्तियों के उपयोग करनेकी ब्राह्मपति बता रहा है । अंतर्गत युन्ह है। क्षात्रादि पद्धतिमें तो दूसरोका विनाग मुरय बात है और १० अरायक्षयणं- राय शब्द धनका वाचक है और ब्राह्मपद्धतिम स्वाहा अर्थात् आत्मसमर्पण मुरय बात है। मराय गब्द निर्धनताका वाचक है। इस निर्धनताको मत्र यह स्वाहाविधि यज्ञका मुख्य अंग है। दोनो सूक्तों में बारह प्रकारले दूर करना आवश्यक है। चश्यों और कारीगरोके मंत्र है। प्रत्येक मंत्रमे जो शक्ति मागी है, उसके साथ उत्कर्पसे यह बात साध्य हो सकती है। स्वाहा ' का उल्लेख हुआ है। यह एक प्रचंड शक्ति है। ११ पिशाचक्षयणं- रक्तमांस चूसनेवालोंका नाम यदि ये गक्तिया मनुष्यमे विकसित हो जाए और साथ पिगाच है । (पिशिताच् =पिशाच) रक्त पीनेवाले रोग साय उसमे स्वार्थ भी बढता जाए तो कितनी हानिकी भी है जिनमें रक्त क्षीण होता है। मनुष्योमे रक्तमांस संभावना है। एक ही शारीरिक गनिकी बात देखिये । कोई भाजी पिगाच क्षयण होते हैं। इनमे भी कच्चा मास साने- बढा मल है, वढा बलवान् है, यदि वह स्वार्थी खुदगर्ज वाले विशेषकर पिगाच कहलाते हैं। समाजसे इनको दूर हुआ तो वह बहुत कुछ हानि कर सकता है । परंतु यदि वह रचना योग्य है। मल्ल मपनी विशाल गतिका उपयोग परोपकारके कर्ममें १२ स-दान्वाक्षयणं (स-दानव-क्षयणं) करेगा, अथवा अपने शारीरिक बलको परमात्मसमर्पणमें असर राक्षसोका नाग करना, या उनको दूर करना । यह लगावेगा, तो कितना लाभ हो सकता है। इसी प्रकार अन्या- पुराणामें 'देवासुर युट्ट' नामन प्रसिद्ध है । आज भी न्य शक्तियोंक विषयमे जानना चाहिये । आत्मसमर्पणसे अपने समाजमे क्या तथा अन्य समाजोमे क्या देवासुरोंक ही शक्तिका सच्चा उपयोग हो सकता है । और सच्चा हित झगडे चल ही रहे है और उनमे असुरोका पराभव होना ही भी हो सकता है। आवश्यक है। यह मब बात स्पष्ट होनेक कारण इसका अधिक इसलिये इन दो सूक्तोमे बारह बार विचार यहा करनकी आवश्यकता नही है। उच्चारण करके आत्मसमर्पणका सबसे अधिक उपदेश किया है। जो जो शक्ति अपनेसे बढ़ेगी, उस उस शक्तिका उप- योग मैं आत्मसमर्पणकी विधिसे ही करूंगा ऐसा निश्चय ये बारह बल अपने भदर लाने चाहिये। इन बलोक मनुष्यको करना चाहिये । तभी उसकी उन्नति होगी और उपयोग करनेकी रीति भी विभिन्न होती है । दूसरोके घात उसके प्रयत्नसे जनताकी भी उन्नति हो सकती है। - स्वाहा' का स्वाहा विधि चोर-नाशन-मुक्त (१४१) छोराशन सूक्त कां. १, सू. १६ (ऋषि:- चातन । देवताः- अग्नि., इन्द्र , वरण । येमिावास्यांई रात्रिमुदस्थुजिमत्रिणः । अग्निस्तुरीयो यातुहा सो असभ्यमधि ववव ॥१॥ सीसायाहि वरुणः सीसायाग्निरुपावति । सीस म इन्द्रः प्राय॑च्छत्तढुङ्ग यातुचातनम् ॥ २ ॥ इदं विष्कन्धं सहत इदं वांधते अत्रिणः । अनेन विश्वा ससहे या जातानि पिशाच्या: ॥३॥ यदि नो गां हंसि यद्यश्वं यदि पुरुषम् । तं त्वा सीसैन विध्यामो यथा नोऽसो अवीरहा ॥ ४ ॥ अर्थ- (ये अत्त्रिणः) जो डाकृ चोर (अमावास्यां रात्री) अमावसकी रात्रि के समय हमार (ब्राजं) समूहपर (उदस्युः) हमला करते है, उस विषयमे (यातुहा स. तुरीयः आग्निः) चोरोका नागक वह चतुर्थ अग्नि (अस्मभ्यं) हमें (अधि ब्रवत्) सूचना दे ॥ १ ॥ (वरुणः सीसाय ) वरुणने सीसेके विषयमे (अध्याह) कहा है । (अग्नि सीसाय ) अग्नि सीसेको (उपावति) रक्षक कहता है । (इन्द्रः) इन्द्रने तो (मे सीसं) मुझे सीसा (प्रायच्छत्) दिया है। हे (अंग) प्रिय ! (तत् यातु- चातनम् ) वह डाकू हटानेवाला है ॥ २ ॥ (इदं) यह मीसा (विष्कंधं) रुकावट करनेवालोंको (सहते) हटाता है । यह सीसा (अत्रिणः) ढाकुमोको (बाधते) पीडा देता है । (अनेन ) इससे (पिशाच्या या विश्वा जातानि) पिशाचोकी जो जातिया है, उनको (ससहे) में हटाता हूं ॥३॥ (यदि नः गां हंसि) यदि हमारी गायको'तू मारता है, (यदि अश्वं) यदि वोढेको और (यदि पूरुपं) यदि मनुष्यको मारता है (तं त्वा) तो उस तुझको (सीसेन विध्यामः) सीसेसे हम वेधते है, (यथा) जिससे तू (नः अ-वीर-हा अलः) हमारे वीरोंका नाश करनेवाला न हो ॥ ४ ॥ भावार्थ- अमावास्याकी अंधेरी रात्रिक समय जो डाकू हमारे सघपर हमला करते हैं, उस विषयमे हमें ज्ञानीसे उपदेश मिला है॥१॥ जलके रक्षक तथा उपदेशक सीसेकी गोलीका प्रयोग करनेकी प्रेरणा देते हैं। शर वीरने तो सीसेकी गोली हमें दे रसी है । हे बंधुओ । यह डाकुओको हटानेवाली है ॥ २ ॥ यह सीसेकी गोली डाकुओको हटाती है और प्रतिबंध करनेवालोको दूर करती है। इससे खून पीनेवाली सब जाति- दूर भगाया जाता है ॥३॥ हे चोर | यदि तू हमारी गाय, हमारा घोढा अथवा मनुष्यका वध करेगा, तो तुमपर हम गोली चलावेंगे, जिससे तू हमारा नाग करनेके लिये फिर जीवित न रह सके ॥ ४ ॥ योको (१४२) अथर्ववेदका सुबोध अनुवाद 'दीर्घजीवन और आगेग्य' . । । चोर--ताशन--स्मृक्त सीसेकी गोली हम मूमें मग्रुपर गोली चलानेकी माना है यह विशेष इम सूक्तम मीसकी गोलीका प्रयोग डाओपर करनेको ‘यानसे देखना चाहिये । यदि आपसमें उत्तम म्पसे संगठित कहा है। सूनम केवल 'सीम' शब्द है, गोलीका वाचक न हुए हुए लोग अत्रुपर हमला करेंगे, नो मंभव है कि ये म्वय ही नष्ट भ्रष्ट हो जाये । इसलिये 'प्रथम अपना संग- गब्द नहीं है। तथापि 'मीसेन विध्यामः' (मीनक द्वारा बंध करेंगे ) हम प्रयोगसे सीम गन्दगे सीसेकी गोलीका ठन और पश्चात शत्रुपर चढाई करनी चाहिये । भाव समझना उचित है । क्वल मीसेका उपयोग डाकि आर्य वीर नागमे किसी अन्य प्रकार समवनीय नही दीसता है। अग्नि, इन्द्र भादिक विषयमें सूत सातके प्रसंगमे वर्णन (विध्यामः) वेब करनेका भाव दरमे चादमार्गके समान भाया ही है। (अग्निः) ज्ञानी उपदेशक, (इन्द्रः) निगाना मारना है । आजक्ल सीसेकी गोली बंदुककी नलीमे शूरवीर ये आर्यवीर है यह पहिले बताया है। इन दो गन्दोसे रग्वकर उमसे दूरस शत्रुको वेधते है। बाण भी बनु यपरसे ब्राह्मण और क्षत्रियोका बोध होता है यह बात पहिले बतायी दूरसे ही निगानेपर फेंका जाता है । तात्पर्य यह कि इन जा चुकी है। मंत्रोंके गन्द बता रहे है कि मीसेकी गोलीने दरसे ही ढाकु- लोका वेध करना चाहिये। लाठी सोटी समान इसका पाससे इस सूक्तमे वरुण' शब्द भाया है । वरण समुद्र अथवा प्रयोग नहीं होता इतना ही यहां बताना है। जलका अधिपति वेदमें तथा पुराणामे प्रसिद्ध है । जलस्यान, ཨུg नदी आदि तथा समुद्र परसे जो गत्रुलोके हमले होते है उनसे रक्षा करने का यह मोहदेदार है। जिस प्रकार 'अग्नि 'अचिन् यातु' मत्र गब्द डाकू चोर लुटेरे अर्थात् समाजक गत्रुओंके वाचक है। इनमे भिन्न जिन गन्दीका गब्द ब्राह्मणत्ववाचक, 'इन्द्र' शब्द क्षात्रधर्मका बोधक है, इससे पूर्व विचार नही हुमा उनका विचार यहां करते है उसी प्रकार 'वरुण' शब्द जलमार्गसे आनेजानेवाले और देगांतरोमें व्यापार करनेवाले वैश्योंका अथवा वैश्यत्वका १ विष्कम्भ- प्रतिबंध करनेवाला, म्कावटे उत्पन्न करने- चाला, हरएक बातम विन्न टालनेवाला। सूचक यहा प्रतीत होता है । इसलिये गोली चलाने के विषयमे २ पिशाच, पिशाची- रक्त पीनेवाले और कच्चा मांस (आग्नि) ब्राह्मण, (इन्द्र) क्षत्रिय और (वरुण) वैश्यने सानेवाले कर लोग, जो मनुग्यका माम भी पाते है। भी गंमति दी है और ( इन्द्र)क्षत्रियने तो सीसेकी गोलिया हमारे पास दे रखी है, इत्यादि द्वितीय मत्रका भाव इस ये सब तथा (अविन्) भूसे डाकू , (यातुः) चोर ये मत्र समाजके शत्रु है । इनको उपदेशद्वारा सुधारनेका विषय प्रकार स्पष्ट हो जाता है। सप्तम सूक्तमे दिये उपदेशानुसार पूर्व आये हुए (कां १, मृ ७, ८) धर्मप्रचारक सूक्तोमे ब्राह्मण प्रचारकोने प्रयत्न किया और उन्होंने कहा कि ये आचुका है । जो नहीं सुधरते उनको दढक लिये भत्रियोंके डाकृ सुधरते नहीं है, क्षत्रियोंने भी कहा कि अनेक वार आधीन करनेकी आज्ञा भी सप्तम सूक्तके अतम दी है। देहदंड देनेपर भी इन दुष्टोका सुधार नहीं हुआ, वैश्य तो उपदेश और दण्ड इन दो उपायोसे जो नहीं सुधरते उनपर लूटे जानेके कारण कहते ही रहे, इस प्रकार तीनो वर्गों की मीसेकी गोलीका प्रयोग करनेका विधान इस सूक्तम आया परिपद जब गोली चलानेकी आज्ञा दे तब गोली चलायी जा है। अपने संगठन करनेका उपदेश पूर्व मूक्तम देनेके पश्चात सकती है। .
डाकुओंकी असफलता
(१४३)
-
डाकुओंकी असफलता
कां. २, सू. २४
(ऋषि:- ब्रह्मा । देवता- आयुष्यम् ।)
मेरैभक शेरंभ पुर्नवों यन्तु यातवः पुनहेतिः किमीदिनः ।
यस्य स्थ तमत्त यो वः प्राहेत्तमत्त स्वा मांसान्यत्त
॥ १ ॥
शेव॒धक शेवध पुर्नवों यन्तु यातयः पुनहतिः किमीदिनः ।
यस्य स्थ तमत्त यो वः प्राहेत्तमत्त खा मांसान्यत्त
॥ २॥
म्रोकार्नुम्रोक पुनर्यो यन्तु यातवः पुनहेतिः किमीदिनः ।
यस्य स्थ तमत्त यो वः प्राहेत्तमत्त स्वा मांसान्यत्त
॥३॥
सर्पा सर्प पुनर्यो यन्तु यातवः पुर्नहेतिः किमीदिनः ।
यस्य स्थ तमत्त यो वः प्राहेत्तमत्त स्वा मांसान्यत्त
।।४॥
जूणि पुनर्यो यन्तु यातबः पनहेतिः किमीदिनीः ।
यस्य स्थ तमत्त यो च। प्रात्तमत्त स्वा मांसान्यत्त
॥ ५ ॥
अर्थ- हे (शेरभक शेरभ ) वध करनेवाले । हे (किमीदिनः) लुटेरे लोगो । (वः यातवः ) तुम्हारे अनु-
यायो और तुम्हारे (हेतिः ) शस्त्र (पुनः पुनः यन्तु ) लौटकर वापस जाय । ( यस्य स्थ ) जिसके साथी तुम हो
(ते अत्त ) उसको सानो । ( यः वः प्राहैत् तं अत्त) जो तुम्हें लूट के लिये भेजता है उसीको खाओ अथवा (स्वा
मांसानि अत्त ) अपना ही मास साओ ।। १ ॥
है ( शेवृधक शेवृध) घातपात करनेवाले । हे (किमीदिनः) लुटेरे लोगो । (वः यातवः ) तुम्हारे अनुयायी
और तुम्हारे (हेतिः) शख (पुनः पुनः यन्तु) लौटकर वापस जाय । (यस्य स्थ) जिसके साथी तुम हो (तं अत्त)
उसको खाओ। (यः वः प्रात् तं अत्त) जो तुम्हे लूटके लिये भेजता है उसीको खामो अथवा (स्वा मांसानि अत्त)
अपना ही मांस खाओ॥२॥
(हे म्रोक अनुम्रोक) हे चोर और चोरोके साथी ' हे (किमीदिनः) लुटेरे लोगो । (वः यातवः) तुम्हारे
अनुयायी और तुम्हारे (हेतिः) शस्त्र (पुनः पुनः यन्तु) लौटकर वापस जाय। (यस्य स्थ) जिसके साथी तुम हो
(ते अत्त) उसको खाओ। (यः वः प्रात् त अत्त ) जो तुम्हें लूटके लिये भेजता है उसीको खाओ अथवा (स्वा
मांसानि अत्त) अपना ही मांस खाओ ॥ ३ ॥
हे (सर्प अनुसर्प) हे सांपके समान छिपके हमला करनेवाले ' हे (किमीदिनः) लुटेरे लोगो ' (वः यातयः)
तुम्हारे अनुयायी भौर तुम्हारे (हेतिः) शस्त्र (पुनः पुनः यन्तु ) लौटकर वापस जाय। (यस्य स्थ) जिसके साथी
तुम हो (तं अत्त) उसको खाओ । (यः वः प्राहेत् तं अत्त) जो तुम्हे लूटके लिये भेजता है उसीको खाओ अथवा
(स्वा मांसानि अत्त) अपना ही मास खाओ ॥ ४ ॥
हे (जूर्णि) विनाशक ' हे (किमीदिनः) लुटेरे लोगो । (वः यातवः ) तुम्हारे अनुयायी और तुम्हारे (हेति.)
शम (पुनः पुनः यन्तु ) लौटकर वापस जाय । (यस्य स्थ) जिसके साथी तुम हो (तं अत्त ) उसको खाओ (य.
वः माहत् ते अत्त) जो तुम्हे लटके लिये भेजता है उसीको खागे अथवा (स्वा मांसानि अत्त) अपना ही मांस
।
-
-
-
--
साभो ॥५॥
(१४४) अथर्ववेदका सुबोध अनुवाद -'दीर्घजीवन और आरोग्य' - उपदे पुनर्यो यन्तु यातयः पुर्नतिः किमीदिनी । यस्य स्थ तमत्त यो वः प्राहेत्तमत्त स्वा मांसान्यत्त अर्जुनि पुनर्यो यन्तु यातयः पुनतिः किमीदिनीः । यस्य स्थ तमत्त यो वः प्राहेत्तमत्त स्वा मांसान्यत्त ॥ ७॥ मरूँजि पुनर्यो यन्तु यातवः पुर्नहेतिः किमीदिनीः । यस्य स्थ तमत्त यो वः प्राहेत्तमत्त स्वा मांसान्यत्त ॥ ८॥ अर्थ-हे (उपदे) चिलानेवाले ' हे (किर्मादिनः) लुटेरे लोगो । (वः यातव.) तुम्हारे अनुयायी और तुम्हारे (हेतिः ) गस्त्र (पुनः पुनः यन्तु) लौटकर वापस जाय । (यस्य स्थ) जिसके माथी तुम हो (तं अत्त) उसको याओ । (यः वः पाहत् तं अत्त) जो तुम्हें लटके लिये भेजता है उसीको खामो अथवा (स्वा मांसानि अत्त) अपना ही मांस सामो॥ ६॥ हे ( अर्जुनि ) दुष्ट मनवाले ' हे (किमीदिनः) लुटेरे लोगो ! (वः यातवः) तुम्हारे अनुयायी और तुम्हारे (हेतिः ) शस्त्र (पुनः पुनः यन्तु ) लौटकर वापस जाय । (यस्य स्थ) जिसके साथी तुम हो (नं अत्त) उसको वामओ । (यः वः प्राहत् त अत्त) जो तुम्हें लूट के लिये भेजता है उसीको साओ अथवा (स्वा मांसानि अत्त) अपना ही मांस खामो॥७॥ हे (भरूजि) नीच वृत्तिवाले ! तुम सबके (यातवः) अनुयायी और (हेतिः) शस्त्र तथा (किमीदिनीः) लट करनेवाले जो हो सब तुम्हारे पास ही ( पुनः यन्तु) वापस चले जाय । जिसके अनुयायी तुम हो (तं अत्त) उसी को सामो जो तुम्हे भेजता है उसीको खामो, मथवा अपना ही मांस खामो ॥ ८॥ (परंतु किसी दूसरेको कष्ट न दो।) भावार्थ- जो दुष्ट मनुष्य अथवा घातपात करनेवाले मनुष्य होते हैं वे गस्वास्त्रोसे सज्ज होकर अपने अनुयायियोंके साथ दूसरोंपर हमला करके लूटमार करते और सजनोको सताते है । राजाकी सुव्यवस्थासे ऐसा प्रबंध किया जावे कि इन दुष्टोमने कोई भी किसी दूसरे सजनोंको लूट न सके । इनके अनुयायी कृतकारी न होते हुए वापस लौट जाये, इनके शमन व्यर्थ हों, ये डाइसब भूखे मरने लगे । य लोग कही भी सफलताको प्राप्त न कर सकें । विफल मनोरथ होते हुए ये डाक आपसमें मार पीट करके एक दूसरे स्वय ही नष्ट हो जायें ॥ १-८॥ - दुष्ट लोग नगरमें सजन नागरिक रहते है और जालोंमें डाकू चोर लटेरे रहते हैं। ये साराग्रीके या दिन के समय नगरो पर हमला करते है और लूटमार करके भाग जाते है । इस प्रकार लूट पर ये अपना निर्वाह करते हैं। राजाका सुराज्यका प्रबंध ऐसा हो कि ये किसी भी समय, सफल मनोरथवाले न हो सकें। सर्वदा इनका हमला निष्फल होवे । प्रतिममय हमला निष्फल होनेसे ये लोग भूसे मरने लगेंगे । पश्चात् आपसमें लड़ेंगे और आपसमें लट कर मर जागेगे। इनके शस्त्रास्त्र जो दूसरों के लिये थे वे उनपर ही गिरेंगे ये जो दूसरोंके मांस साते थे वेही अपने मांस सायेंगे क्योंकि दूसरोंके मांम इनको मिलेंगे नहीं और दसरोंकी सपत्तियां इनको लटमारके लिये प्राप्त नहीं होगी। रान प्रबंध द्वारा ऐसी व्यवस्थाका होना और चोर लेटेरेका भूससे मरने लगना ही उन दुष्टोके सुधारका ऐमा सुप्रवध होनेसे ढाकू लोग नागरिक बनने लगते हैं और उनको ढाकूके व्यवहारसे हानि और उत्तम नागरिक बननेसे गम प्रतीत होता है। मार्ग यक्ष्म-नियारण (१४५) - । ॥ १ ॥ यक्षक-निवारण कां. ९, सू. ८ (ऋपिः- भृग्वगिरा. । देवता- सर्वशीर्षामयाद्यपाकरणम् ।) शीर्षक्तिं शीर्षामयं कर्णशूलं विलोहितम् । सर्वं शीर्पण्यं ते रोग वहिनिमन्त्रयामहे कर्णाभ्यां ते कळूपेभ्यः कर्णशूलं विसल्पकम् । सर्वं शीर्पण्यं ते रोग बहिनिमन्त्रयामहे ॥ २ ॥ यस्य॑ हेतोः प्रच्यते यक्ष्मः कर्णत ऑस्य॒तः । सधै शीर्पण्यं ते रोग बहिनिमन्त्रयामहे ॥३॥ यः कृणोति प्रमोतमन्धं कृणोति पूरूपम् । सर्वं शीर्षण्यं ले रोग बहिनिमन्त्रयामहे अङ्गभेदमङ्गज्वरं विश्वाङ्ग, विसल्पकम् । सबै शीर्षण्यं ते रोगै वहिनिमन्त्रयामहे यस्य भीमः प्रतीकाश उद्वेपयंति पूरूपम् । तक्मानं विश्वशारद बहिनिमन्त्रयामहे ।। ६॥ य ऊरू अनुसर्पत्यथो एति गवीनिके । यक्ष्म ते अन्तरङ्गेभ्यो वहिनिमन्त्रयामहे यदि कामादपकामादधृदयाज्जायते परि । हृदो बुलासमङ्गेभ्यो वृहिनिमन्त्रयामहे ॥४॥ ॥ ५ ॥ ॥ ७॥ ॥ ८॥ अर्थ- (शार्षक्ति) मस्तकशूल, (शीमयं) सिरदर्द, (कर्णशूलं) कर्णशूल, (विलोहितं) रक्तरहित होना, मथवा पाण्डुरोग, (ते सर्व शीर्पण्यं रोगं) तेरा सब मस्तक विकार (वहिः निर्मन्त्रयामहे) बाहर करते हैं ॥१॥ (ते कर्णाभ्यां ) तेरे कानासे और (कंकूपेभ्यः) कानों के भीतरी भागसे (विसल्पकं कर्णशूलं) विशेष कष्ट देनेवाले कर्णशूलको तथा (सर्व शीर्पण्यं ते रोगं) तेरे सथ मस्तकका रोग हम (बहिः निमन्त्रयामहे) बाहर करते है॥२॥ (यस्य हेतोः) जिस कारण (यक्ष्मः कर्णतः आस्यतः प्रच्यवते) यक्ष्म रोग कानसे और मुखसे थहता है, उस (सर्व शीर्पण्यं ते रोग वहिनिमन्त्रयामहे ) तेरे सिरके रोगको हम याहर करते हैं ॥ ३ ॥ (यः प्रमोतं कृणोति ) जो यहिरा बनाता है, तथा (पुरुषं अन्धं कृणोति) मनुष्यको भन्धा बनावा है, ( सर्व शीर्षण्यं ते रोगं वहिः निर्मन्त्रयामहे ) उस सय सिरसंबंधी रोगको हम दूर करते हैं ॥ ४॥ (अंग-भेदं ) अंगोको तोडनेवाले, (अंग-ज्वरं) अंगोंमे ज्वर उत्पा करनेवाले, (विश्वांग्यं विसल्पक) संपूर्ण अंगोंमें पीडा करनेवाले (सर्व शार्पण्य ते रोग बहि. निमन्त्रयामहे) सब सिरसंबंधी रोगको हम दूर हटा देते हैं ॥५॥ (यस्य भीमः प्रतीकाशः) जिसका भयंकर रूप (पुरुपं उपयति) मनुष्यको कंपाता है उस (विश्वशारद तक्मानं) पूरे सालभर होनेवाले उष्णरोगको (बहिः निर्मन्त्रयामहे) हम याहर करते है ॥ ६ ॥ (यः ऊरू अनुसर्पति) जो जंघाओतक बढता है (अथो गवीनिके एति) और जो नाडियोंतक पहुचता है, उस (यक्ष्म ते अन्तरंगेभ्यः) रोगको तेरे आन्तरिक भगोंसे हम (वहिः निर्मन्त्रयामहे) बाहर कर देते है ॥ ७ ॥ (यदि कामात्) यदि कामुकतासे अथवा यदि (अ-का-मात्) कामको छोड़कर किसी अन्य कारणोंसे (हृदयात् परि जायते)हृदयके अपर उत्पन्न होता है, तो उस (यलासं) कफको (हदः अंगेभ्यः) हृदयसे भौर मंगोंसे ( बहिः निमन्त्रयामहे) बाहर हम हटा देते हैं ॥ ८॥ १९ (अथर्ष, भा. ४ हिन्दी) - (१४६) अथर्ववेदका सुवोध अनुवाद दीर्घजीवन और आरोग्य' हरिमाण ते अझैथ्योऽप्यामन्तरोदरात् । यक्ष्मोधामन्तगत्मनो बहिनिमन्त्रयामहे ॥९॥ आसो बलासो भवतु शूत्रै भवत्वामयत् । यक्ष्माणां सर्वेपां विषं निरंवोचम॒दं त्वत् ॥ १० ॥ हिबिलं निवतु काहावाहं तवादरात् । यक्ष्मा॑णां सर्वेषां विषं निरंवोचम॒हं त्वत ॥ ११ ॥ उदराते क्लोनो नाम्या हृदयादई । यक्ष्माणां सर्वपां विषं नियोचमहं त्वत् ॥१२॥ याः सीयाने विजन्ति मूर्धानं प्रत्यर्पणीः । अहिंसन्तीरनामया निद्र्वन्तु बहिर्विलम् ॥ १३ ।। या हृदयमुपर्पन्त्यनुतन्वन्ति कीकसा: ! अहिंसन्तीरनामया निद्रवन्तु बहिर्विलम् ॥१४॥ या पार्श्वे उपर्पन्त्यनुनिक्षन्ति पृष्टीः । अहिंसन्तीरनामया निद्र्वन्तु बहिर्विलम् ॥ १५॥ यास्तिरची रुपर्पन्त्यर्पणीक्षणासु ते । अहिंसन्तीरनामया निवन्तु बहिर्विलम् ॥ १६॥ या गुदा अनुसर्पन्त्यान्त्राणि मोहयन्ति च । अहिंसन्तीरनामया निद्रवन्तु बहिर्विलम् ॥ १७ ॥ .. अर्थ- (ते हरिमाण) तेरा कामिला रोग-रक्तहीनताका रोग- (अंगेभ्यः) तेरे भवयवोसे, (उदरात् अन्तः अप्वां) उदरके अन्दरसे जलोदर रोगको तया (आत्मनः अन्तः यक्ष्मः-धां) अपने अन्दरसे यक्ष्मरोगको धारण करने- वाली अवस्थाको (बहिः निर्मन्त्रयामहे ) बाहर हम निकालते हैं ॥९॥ (वलासः आसः भवतु) कफ थूकके रूपमें होवे और बाहर जावे । (आमयत् मूत्रं भवतु) आमदोष मुत्र होकर बाहर नावे । (सर्वेषां यक्ष्माणां विपं) सत्र यक्ष्मरोगोंका विप (अहं त्वत् निरवोचं) मैं तेरे शरीरसे बाहर निकालता हूं ।। १०॥ (नव उदरात्) तेरे पेटसे (काहावाहं विलं ) शब्द करते हुए विप मूत्रनलिकासे (निवतु ) निकल जावे । (सर्वपां यक्ष्माणां विपं) सब रोगीका विप (अहं त्वत् निरवोचं) मैं तेरे गरीरसे बाहर निकालता हूं ॥ ११ ॥ (ते उदरात् ) तेरे पेटसे (क्लोम्नः नाभ्याः हृदयात् अधि) फेफटोंसे नाभिसे और हृदयसे (सर्वेषां यक्ष्माणां विषं निरवोचमहं त्वत् ) सय रोगोंका विप में दूर करता हूं ॥ १२ ॥ (याः सीमानं विरुजन्ति) जो सीमा भागको पीडा देते हैं, और जो (मूर्धानं प्रति अर्पणीः) सिरतक बढते जाते हैं, वे रोग (अनामयाः अहिंसन्तीः) दोपरहित होकर न मारते हुए (बहिः विलं निवन्तु) द्रवरूपसे रन्ब्रोके वीचसे याहर चले नाव ॥ १३ ॥ (याः हृदयं उप ऋपन्ति) जो हदयपर आक्रमण करती है और (कीकसाः अनुतन्यन्ति) पसलीकी इड़ियों में फैलती है वे सब पीढाएं (अनामयाः अहिंसन्तीः निवन्तु बहिर्विलं ) दोपरहित होकर और मारक न यनती हुई सब रन्ध्रोले द्रवरुप होकर दूर हो जाय ॥ १४ ॥ (याः पार्थे उप ऋपन्ति) जो पृष्ठभाग पर आक्रमण करती है और (पृष्टीः अनु निक्षन्ति) पीठ पर फैलती है, वे मय पीढायें (अनामयाः अहिंसन्तीः) दोपरहित होकर न मारते हुए (वहिः विलं निर्द्रवन्तु) सब रन्ध्रोंसे द्रवरप होकर दूर जाएं ॥ १५॥ (याः तिरश्चीः उप ऋपन्ति) जो तिरछी होकर भाक्रमण करती हैं, और (ते वक्षणासु अर्पणीः) तेरी पस- गियोमं प्रवेश करती है वे (अनामयाः अहिंसन्तीः निवन्तु बहिर्विलं) सय दोपरहित और अमारक होकर द्रवरूपसे गेमरन्ध्रोक द्वारा गरीरके बाहर चले जावें ॥ १६ ॥ (याः गुदाः अनुसर्पन्ति) जो गुदातक फैलती है, और (आन्त्राणि मोहयन्ति च ) आतोंको रोकती है वे सब पीरा (अनामयाः अहिंमन्ती निवन्तु बहिर्विलं) टोपरहित और अमारक होकर द्रवरूपसे शरीरके रोमरन्ध्रोसे बाहर घरी गा॥20॥ है यक्ष्म-निवारण (१४७) या मज्ज्ञो निर्धयन्ति परुपि विजन्ति च । अहिंसन्तीरनामया निद्रवन्तु बहिविलम् ॥१८॥ ये अङ्गानि मदयन्ति यक्ष्मासो रोपणास्तव । यक्ष्माणां सर्वेषां विषं निरयोचमहं त्वत् ॥ १९ ॥ विसल्पस्य विद्र्धस्य वातीकारस्य वालजेः । यक्ष्माणां सर्वेषां विषं निरवोचमहं त्वत् ॥ २० ॥ पादाभ्यां ते जानुभ्यां श्रोणिभ्यां परि भसंसः । अनकादर्पणीकृष्णिाभ्यः शीर्णो रोगमनीनशम् ॥ २१ ॥ सं ते शीर्णः कपालानि हृदयस्य च यो विधुः । उद्यन्नादित्य रश्मिभिः शीर्णो रोगमनीनशोऽङ्गभेदमशीशमः ॥ २२ ॥ अर्थ-(याः मनः निर्धयन्ति ) जो मज्जाभोको रक्तहीन करती हैं, और ( पसंपि विरुजन्ति च ) जोडोमे वेदना उत्पन्न करती हैं, वे सब रोग (अनामयाः अहिंसन्तीः निर्द्रवन्तु वहिर्विलं) दोपरहित और अमारक होकर रन्धोंसे बाहर द्रवरूप होकर निकल जावें ॥ १८ ॥ (ये यक्ष्मासः) जो यक्ष्मरोग (रोपणाः ) व्याकुल करते हुए (तव अंगानि मदयन्ति ) तेरे अंगोको मद- युक्त करते है उन (सर्वपां यक्ष्माणां विपं) सब यक्ष्मरोगोंका विष (अहं त्वत् निरवोचं) मै तुझसे हटाता हूं॥ १९ ॥ (विसल्पस्य) पीढा, (विद्रधस्य ) सूजन, (वातीकारस्य ) वातरोग और (वा अलजेः) रोग इन सबके तथा (सर्वेषां यक्ष्माणां विषं ) सपूर्ण रोगोके विषको (अहं त्वत् निरवोचं ) मैं तेरे शरीरसे हटाता हूं ॥ २० ॥ (पादाभ्यां ते जानुभ्यां ) तेरे पांवोसे और जानुभोसे, (श्रोणिभ्यां भंससः परि) कूल्होसे और गुप्तभागसे (अनूकात् उप्णिहाभ्यः) रीढसे और गुदोकी नाडियोंसे ( अर्पणीः ) फैलनेवाली पीडामोको और (शीर्णः रोग) सिरकी पीडाका मैं (अनीनशं) नाश करता हूं ॥ २१ ॥ (ते शीर्णः कपालानि ) तेरे लिरके कपालभाग, ( हृदयस्य च यः विधुः ) और हृदयकी जो व्याधि है, उसे (उद्यन् आदित्यः रश्मिभिः) उगता हुमा सूर्य अपनी किरणोसे (शीर्णः रोगं सं अनीनशः) सिरके रोगको नाश करता है भौर ( अंगभेदं अशीशमः) मंगोंकी पीढाको गांत करता है ॥ २२ ॥ सिरदर्द इस सूक्तमें सिरदर्द को हटानेके लिये सूर्यकिरण एक उपाय बताया है सूर्यकिरणों में शरीर सेकनेसे सिरका रोग, वर्णक रोग, पाण्डुरोग तथा अन्यान्य कई रोग दूर होते है। संभव है कि ये सूर्य किरण विशेष प्रवंधसे उस रोगग्रस्त स्थानपर भी लेने योग्य हो। इस सूक्तमें यह चिकित्साकी विधि तो बतायी नहीं है, परंतु इतना कहा है कि सूर्यकिरणसे इस सूक्तमे कहे अनेक रोग दूर होते हैं। कई सिरके रोग दृष्टिको मन्द करते हैं, अंधा बनाते है, बहिरा बनाते है, रक्त कम होनेसे कई सिरके रोग होते है, कानोंके दोषसे और आंखोंके दोपसे भी सिरकी पीडा होती है, कानसे और मुखसे पीप आदि बाहर निकलता रहता है जिससे सिरदर्द होता है, इस प्रकार भनेक लक्षण और हेतु सिरदर्द के इस सूक्तमे दिये है। इन सबका विचार वैद्य और डाक्टर करे मौर सूर्यकिरणोंका उपाय इन सबपर किस प्रकार करना चाहिए इसका भी निश्चय करें। अथवा कोई अन्य उपाय यहां लक्षणासे बताया है, इसका भी निश्चय होना उचित है। यह सूक्त वस्तुत. अति सुबोध है, तथापि सिरदर्दका विषय अति शास्त्रीय होनेसे इस सूक्तके कई शब्द वैद्य और डाक्टर ही जान सकते है।
(१४८)
अथर्ववेदका सुनोध अनुवाद
'दीर्घजीवन और आरोग्य'
॥ १॥
एक्ष्मरोगकाशन
का. १२, सू. २
(ऋपिः- भृगुः । देवता:- सग्निः, मन्त्रीकाः, मृत्युः।)
नडमा रौष्ठ न ते अन लोक इदं सीस मागधेय त एहि ।
यो गोषु यक्ष्मः पुरुषेषु यक्ष्मस्तेन त्वं साकमधराङ् परेहि
अवशंसतासाभ्यां करेणानुकरेण च । यक्ष्मं च सर्व तेनेतो मृत्युं च निजामसि
निरितो मृत्यु निति निरातिमजामसि ।
यो ना द्वेष्टि तमद्धयग्ने अक्रव्याधी द्विष्मस्तम ते प्रसुवामसि
यद्यग्निः ऋव्याधदि वा व्याघ्र इमं गोष्टं प्रविवेशान्योकाः ।
तं मापाज्यं कृत्वा प्र हिणोमि दूरं स गच्छत्वप्सुपदोऽप्यनीन्
॥ २ ॥
॥३॥
॥४॥
अर्थ- (नडं आरोह) नढपर चढ (ते अत्र लोकः न ) तेरे लिये यहां स्थान नहीं है। (इदं सीसं ते
भागधेयं ) यह सीस तेरा भाग्य है । (पहि) तू इधर था । ( यः गोपु यक्ष्मः ) जो गांवों में क्षयरोग है, (पुरुषेषु
यक्ष्मः ) जो मनुप्योम रोग है, (तेन साकं त्वं अधराट् परा इहि ) उस रोगके साथ तू नीचे की ओरसे जा ॥ १ ॥
(अघशंस-दुःशंसाभ्यां तेन करेण अनुकरेण च ) पापी और दुष्टके साथ उस कृति और अनुकरण के द्वारा
(सर्व यमं मृत्युं च ) सब रोग और मृत्युको भी ( इतः निरजामसि) यहांसे दूर करते है ॥ २ ॥
(इतः मृत्यु निः) यहाँसे मृत्युको (ऋति निः अरातिः निः अजामसि ) दुसको और शत्रुको दूर भगा
देते हैं । हे अग्ने ! (यः नः टेष्टि ) जो हममे द्वेष करता है (तं अद्धि ) उसको सा अर्थात उसका नाम कर । (यं
उ द्विप्मः ) जिससे हम द्वेष करते है ( तं उ ते प्रसुवामः ) उसको तेरे पास भेज देते हैं ॥ ३ ॥
(यदि क्रन्यात् अग्निः) यदि मांग सानेवाला अग्नि और (यदि वा अनि-ओकाः व्याघ्रः) यदि घरबारसे
रहिन च्यान-हिंसक- (इमं गोष्टं प्रविवेश) इस गोगालामें प्रविष्ट हुआ है, तो (तं मापाज्यं कृत्वा ) उसे माप-बीसे
युक्त बनाकर (दूरं प्रहिणोमि) दूर भगा देता ह (सः अमुपदः अग्नीन् गच्छतु ) वह जलों में रहनेवाले भग्नियोके
पान जावे ॥४॥
भावार्थ- कोई भी रोग मनुप्यों के स्थानमें न रहे । किमी दूरके स्थानपर वह चला जाय । जो रोग मनुष्यों और
पशुसोंमें दो, बह एकदम दूर हो जाएं । सव मनुष्य और
पशु
नीरोग और स्वस्थ हों॥ 1 ॥
सब रोग पापियों भौर दुराचारियोंक माय दूर चले जावें । वसी ही कृनि भौर भनुकृति होवे कि जिससे सब रोग
दूर हो सके ॥२॥
यहाँसे मृत्यु, दुप, दरिद्रता और गत्र दूर हो । हम सब इनसे द्वेष करते हैं, इसलिये ये हमारे पास न रहें ॥३॥
प्रेतदाहक अग्नि यदि किसीक वरमें प्रविष्ट हुई हो अर्थात यदि किसीके घर किसीकी मृत्यु हुई हो, तो वहां माषा-
ज्यविधि होने के पश्चात् उस घरका वह मृत्युभय दूर होवे अर्थात मृत्यु फिर यहा न माये ॥ ४ ॥
यक्ष्मरोगनाशनं
(१४९)
है
यत्वा क्रुद्धाः प्रचक्रुर्मन्युना पुरुषे मृते । सुकल्यमग्ने तत्वया पुनस्त्वोहीपयामसि
पुर्नस्त्वादित्या रुद्रा वसवः पुनर्ब्रह्मा बसुनीतिरने ।
पुनस्त्वा ब्रह्मणस्पति॒िराधादीर्घायुत्वार्य शतशारदाय
यो अग्निः ऋष्यात्प्रविवेश नो गृहमिमं पश्यन्नितरं जातवेदसम् ।
तं हरामि पितृयज्ञाय दूरं स धर्ममिन्धां परमे सधस्थै
॥ ७॥
व्यादमग्निं प्र हिणोमि दूरं यमराज्ञो गच्छतु रिप्रवाहः ।
इहायमितरो जातवेदा देवो देवेभ्यो हव्यं बहतु प्रजानन्
॥८॥
ऋव्यादमग्निमिपितो हरामि जान्हन्तं वज्रेण
मृत्युम
नि तं शास्मि गार्हपत्येन विद्वान्पितॄणां लोकेऽपि भागो अस्तु
॥ ९॥
अर्थ- (मृते पुरुपे) मनुष्यके मरनेपर (यत् क्रुद्धा मन्युना त्वा प्रचक्रुः ) जो क्रुद्ध होकर क्रोधसे तेरा
भन्याय करते है, हे अग्ने ! (त्वया तत् सुकल्पं ) तेरे द्वारा वह अन्याय ठीक होने योग्य है । अत (पुनः त्वा उत्
दीपयामसि ) फिरसे तुझे प्रदीप्त करते है ॥ ५ ॥
हे भग्ने । (आदित्याः, रुद्राः, वसवः) आदित्य, रुद्र और वसु, (वसु-नीतिः ब्रह्मा ब्रह्मणस्पतिः) धन
देनेवाला ब्रह्मा और ब्रह्मणस्पति ( शतशारदाय दीर्घायुत्वाय त्वा पुनः अधात् ) सौ वर्षकी दीर्घ आयुके लिये तुझे
पुनः स्थापित करते है ॥ ६॥
( यः क्रव्यात् अग्निः) जो मांसभक्षक अग्नि (इतरं जातवेदसं पश्यन् ) दूसरे जातवेदस् अग्निको देखता
हुभा (नः गृहं प्रविवेश) हमारे घरमें प्रविष्ट हुई है, (तं पितृयज्ञाय दूरं हरामि) उस अग्निको पितृयज्ञके लिए दूर
जाता हूँ (सः परमे सधस्थे धर्म इन्धां) वह अग्नि परम धाममे उष्णता वढावे ॥ ७ ॥
(क्रव्यादं अग्निं दूरं प्रहिणोमि) मासभक्षक अग्निको दूर ले जाता है । (रिप्रवाहः यमराक्षः गच्छतु)
करनेवाला वह यमराजके पास चला जावे । (इह अयं इतरः जातवेदाः) यहा यह दूसरा जातवेद अग्नि है वह
प्रजानन् देवः देवेभ्यः हव्यं वहतु) जानता हुआ देव देवोके लिये हवनीय भाग ले जावे ॥ ८ ॥
(जनान् वज्रेण मृत्यु इंहन्तं) लोगोको वज्रके द्वारा मृत्युके प्रति ले जानेवाले (क्रव्यादं अग्निं इपितः
हरामि) मांसभक्षक अग्निको इच्छापूर्वक ले जाता हू। (विद्वान् गार्हपत्येन तं नि शास्मि ) जानता हुक्षा मैं गार्हपत्य
मग्निद्वारा उसका शासन करता हूं। उसका (पितॄणां लोके भागः अपि अस्तु) पितरोके रोकी भाग अवश्य रहे ॥९॥
भावार्थ-- किसी घरमें किसीके मरनेपर उसको जलानेके लिये अग्नि क्रोधित उग्र अर्थात् प्रज्ज्वलित करते हैं । उससे
भागे किसी प्रकार भय न हो। फिर भनि प्रदीप्त करनेपर सर्वत्र शान्ति हो जावे ॥५॥
दो
घरमें यज्ञादि करनेके लिये जो अग्नि स्थापित करते है, उससे उन घरवालोको सौ वर्षकी दीर्घ भायु प्राप्त
सकती है॥ ६॥
एक प्रेतमासभक्षक अग्नि है और दूसरी यजनकी अग्नि है। प्रेतदाहक अग्नि पितृया करे भौर उस यज्ञको पितरो के
परले स्थानमें ले जावे ॥ ७ ॥
प्रेतमासभक्षक अग्नि मनुष्यस्थानसे दूर रहे अर्थात् प्रेतोका दहन मनुष्यस्थानसे दूर होवे । परतु जो यह दूसरी जात-
वेद नामक भग्नि यजन करनेके लिये स्थापित की जाती है वह हवन द्वारा देवताकी तृप्ति करती रहे भात यह मनुष्योंकि
ले
दोष दूर
।
घरों में रहे ॥८॥
मनुष्योंके प्रेतोंको दहन करनेवाली अग्निके कार्यकी शान्ति गाईपस्य भनिसे भर्थात् विवाहके समयकी भमिस करते है।
मर्थात् इनका कार्य परस्पर भिन्न है। एकसे वशका नाश भौर दूसरेसे वंशवृष्टि होती है ॥ ९ ॥
(१५०) अथर्ववेदका सुबोध अनुवाद दीर्घजीवन और आरोग्य - कव्यामग्निं शंशमानमुक्थ्य प्रहिणोमि पथिभिः पितृयाणैः । |॥ १०॥ मा देवयानः पुनरा गा अवैधि पितृपुं जागृहि त्वम् समिन्धते संकसुकं स्वस्तये शुद्धा भवन्तः शुर्चयः पावकाः । जहाति रिप्रमत्येन एति समिद्धो अग्निः सुपुना पुनाति ॥ ११ ॥ दे॒वो अ॒ग्निः संकसुको विवस्पृष्ठान्यारुहत् । मुच्यमानो निरेगँसोऽमौगुस्माँ अस्त्यिा! ॥ १२ ॥ असिन्वयं संकेसुके अग्नौ रिप्राणि मृज्महे । अभूम यज्ञियाः शुद्धाः प्र ण आयूंषि तारिपत् ॥१३॥ संकसुको विकसुको निथो यश्च निस्वरः । ते ते यक्ष्म सवेदसो दूरादूरमनीनशन् ॥ १४ ॥ यो नो अश्वेषु वीरेषु यो नो गोबजाविपुं । ऋव्यादं निर्गुदामसि यो अग्निजनयोपनः ॥ १५ ॥ अर्थ- ( उक्थ्यं शशमानं क्रव्यादं अग्निं) प्रशंसनीय गतिमान् मांसभक्षक अग्निको (पितृयाणैः पथिभिः प्रहिणोमि ) पितृयानके मार्गौसे दूर भगाता हू । ( देवयानः पुनः मा आगाः) देवयानके मार्गासे पुनः यहां मत मा । (अत्र एव एधि) यहीं रह (त्वं पितृपु जागृहि) तू पितरोमे जाग्रत रह ॥ १० ॥ (शुचयः पावकाः शुद्धाः भवन्तः) शुचि, पवित्र और शुद्ध होकर (स्वस्तये संकसुकं सं इन्धते) कल्याणक लिये विदाहक अग्निको प्रदीप्त करते है। वह (रिमं जहाति) दुष्टताको त्यागता है और (एनः अति पति) पापका अतिक्रमण करता है । (समिद्धः सुपुना अग्निः पुनाति) प्रदीप्त हुई पवित्रता करनेवाली अग्नि सबको पवित्र करती है ॥ ११ ॥ (संकसुका देवः अग्निः ) विदाहक अग्नि (दिवः पृष्टानि आरुहत् ) धुलोकके ऊपर चढी है, वह (अस्मान पनसः विमुच्यमानः) हम सबको पापसे छुडाती हुई (अ-शस्त्याः अमोक्) अप्रशस्ततासे मुक्त कर देती है ॥ १२ ॥ (अस्मिन् संकसुके अग्नौ) इस विदाहक अग्निमें (वयं रिप्राणि मृज्महे ) हम सब अपने दोषोको शुद्ध हैं । इससे (यलियाः शुद्धाः अभूम ) हम पवित्र और शुद्ध होते है। बह (नः आयूंपि प्रतारिपत्) हमारी भायु बढावे ॥ १३ ॥ (संकसुकः विकसुकः) संघातक और विधातक (निथः यः च निस्वरः) विनाशक और शब्दरहित भग्नि ( ते ते यक्ष्मं ) तेरे रोगको (स-वेदसः दूरात् दूरं अनीनगन् ) ज्ञानवाले प्राज्ञके द्वारा दूरसे दूर करके नष्ट करे ॥१४॥ ( यः नः अश्वेपु, यः वीरेषु ) जो हमारे घोडों और वीरोमें, (यः नः गोपु अजाविपु) जो हमारी गौओमे और भेडबकरियोम और (जनयोपनः अग्निः) लोगोको कष्ट देनेवाली अग्नि है, उस (क्रव्यादं निः नुदामसि) मांस- भक्षक अग्निको हम दूर करते है ॥ १५ ॥ भावार्थ- पितरोक मार्गीपर चलनेवाली (म्मशानमें ) यह मांसभक्षक अग्नि है और देवोके मंगल मार्गोंपर दूसरी यजनकी अग्नि है॥१०॥ मनग्य शुद्ध, पवित्र और मलरहित होकर अपने कल्याणके लिये इस अग्निको प्रदीप्त करते हैं। इससे सब दोष दूर होते है, पाप दूर होता है और पवित्रता बढती है ॥ ११ ॥ इसी अग्निके प्रदीप्त होने पर उसकी ज्वालाएं माकाशतक जाती हैं, और हमे पापसे बचाती है और अप्रशस्तमार्गसे हमारी रक्षा करती है ॥ १२ ॥ इस अग्निमे हम हवन करते है और हम अपने दापोको शुद्ध करते है। इससे हम शुद्ध, पविन और यज्ञके योग्य बनफर अपनी मायुको बढाते है ॥ १३॥ अग्मिमें संघातक, विघानक गुण है, इनका ज्ञानपूर्वक प्रयोग करनेसे ज्ञानी योजक इसकी सहायतासे रोगोको दूर कर सस्ता है॥१४॥ इस तरह घोटे, वीर, गीचे, भेद, बकरियां मादिको नीरोग करना संभव है ॥ १५ ॥ करते
यक्ष्मरोगनाशन
(१५१)
॥ १८ ॥
अन्येभ्यस्त्वा पुरुषेभ्यो गोम्यो अश्वेभ्यस्त्या। निः व्यादै नुदामसि यो अग्निर्जीवितयोपनः ॥१६॥
यस्मिन्देवा अमृजत यस्मिन्मनुष्या उत । तस्मिन्घृतस्तावों मृष्ट्वा त्वमने दिवं रुह ॥ १७॥
समिद्धो अम आहुत स नो माम्यपंक्रमी । अत्रैव दीदिहि छवि ज्योक च सूर्य दृशे
सीसे मृड्वं नडे मृड्ड्समनौ सकसुके च यत् । अी अव्यां रामायो शीर्पक्तिमुपवर्हणे ॥ १९॥
सीसे मलं सादयित्वा शीपंक्तिमुपवर्हणे । अव्याममिकन्यां मृष्ट्वा शुद्धा भवत यज्ञियाः ॥२०॥
परं मत्यो अनु परेहि पन्था यस्त एप इसरो देवयानात् ।
चक्षुष्मते शृण्वते ते ब्रवीमीहेमे वीरा बहवो भवन्तु
॥ २१ ॥
अर्थ- (यः जीवितयापनअग्निः तं कन्यादं ) जो जीवनाशक क्रव्याद् अग्नि है उसको (अन्येभ्यः पुरुपेभ्य.
गोभ्यः अश्वेभ्यः त्वा) अन्य मनुप्यो गौवो और घोडोसे (निः नुदामसि ) नि शेष रीतिसे दूर हटाते है॥ १६ ॥
हे अग्ने ! (यस्मिन् देवाः अमृजत ) जिसमे देव शुद्ध हुए, (उत यस्मिन् मनुष्याः) और जिसमे मनुष्य
भी शुद्ध हुए, (तस्मिन् घृतस्तावः मृट्वा) उसमे घृत-आहुति देकर, शुद्ध होकर (त्वं दिवं रुह) तू स्वर्गपर
(आहुत अग्ने' ) बाहुति दिये हुए अग्ने । (समिद्धः सः नः मा अभि अपक्रमीः ) प्रदीप्त होकर तू हमारा
अतिक्रमण मत कर । (अत्र एव द्यवि दीदिहि) यहां घुस्थानमे प्रकाशित हो (सूर्य ज्योक् दृशे) सूर्यको हम
निरंतर देखें ॥ १८॥
(यत् सीसे मृड्ढ्वं) जो सोसेमे लगा हुआ, जो (नडे मृड्ढ्वं) नडमे लगा हुभा और जो (संकसुके अग्नौ)
विनाशक अग्निमें तपकर लगा हुआ है, ( अथो रामायां अव्यां उपचहणे शीर्पक्तिं) और जो काले रंगवाली भेटमे तथा
सिरहानेमें लगा है, उस मलको शुद्ध करो ॥ १९ ॥
(सीसे मलं सादयित्वा) सीसेमें मल शुद्ध करके, (उपवर्हणे शीर्पक्तिं ) सिरहानेपर सिर रसकर, (असि-
क्या अव्यां मृष्ट्वा) काली भेढमे शुद्ध करके ( यनियाः शुद्धाः भवत) पवित्र और शुद्ध हो जावो ॥ २० ॥
हे मृत्यो ! (देवयानात् इतरः यः ते एपः ) देवयानसे भिन्न जो तेरा मार्ग यह है, उस ( परं पन्थां अनुपरा
इहि ) परले मार्गसे दूर चला जा । (चक्षुष्मते शृण्वते ते ब्रवीमि ) मांखवाले और सुननेवाले तुझे मैं यह कहता हूं।
(इमे वीराः बहवः भवन्तु ) ये वीर बहुत हो ॥ २१ ॥
भावार्थ- इनसे प्रेतदाहक अग्निको दूर करना योग्य है ॥ १६ ॥
यज्ञसे देवताओंकी शुद्धि हुई, याजक भी यज्ञसे शुद्ध बने । इस तरह यज्ञमे घृतकी आहुतियां देनेरे मनुष्य शुद्ध
होकर उत्तम स्थान प्राप्त कर सकता है ॥ १७ ॥
यज्ञकी अग्नि प्रदीप्त होकर घरदारके ऊपर न भावे । अपनी यज्ञशालामे प्रदीप्त होकर रहे । उपासक सूर्यको प्रतिदिन
देखे ।। १८॥
जहा जहां मल लगा हुआ हो, वह स्थान शुद्ध और पविग्न करना चाहिये ।। १९-२० ॥
मृत्यु हम सबसे दूर रहे, हमारे पास न आवे । हमारे बालबच्चे हृष्टपुष्ट भौर नीरोग तथा दीर्घजीवी वने ॥२१॥
अथर्ववेदका सुवोध अनुवाद (१५० - दीर्घजीवन और आरोग्य' ॥ २ ॥ ॥ २३ ॥ इमे जीवा वि मृतैरावन्न द्रा देवहूति! अद्य । प्राञ्चौ अगाम नृतये हसाय सुवीरासो विदथुमा वंदेम इमं जीवेभ्यः परिविं दधामि मैषां नु गादपरो अर्थमेतम् । शतं जीवन्तः शरदः पुरूचीस्तिरो मृत्यु दधतां पर्वतेन आ रोहतायुजरस वृणाना अनुपूर्व यतमाना यति स्थ । तान्यस्त्वष्टा सुजनमा सजोषाः सर्वमायुर्नयतु जीवनाय यथाहान्यनुपूर्व भवन्ति यथर्त ऋतुभिर्यन्ति साकम् । यथा न पूर्वमरो जहोत्यवा धातराषि कल्पयैपाम् ॥ २४ ॥ ॥ २५ ॥ अर्थ-(इमे जीवाः मृतैः आ ववृत्रन् ) ये जीवित लोग मरे हुओने घिरे हुए है। (नः देवहूतिः अद्य भद्रा अभूत्) हमारी ईशप्रार्थना आज कल्याणमयी हो गयी है। (नृतये हसाय प्राञ्चः अगाम) नृत्य और हास्यके लिये हम सब मागे बढ़े और हम (सुवीरासः विदथं आ वदेम) उत्तम वीर होकर युद्धका विचार करें ॥ २२ ॥ (जीवेभ्यः इमं परिधि दधामि) जीवोंके लिये मैं यह मर्यादा देता हूं। (एपां अपरः एतं अर्थ मा नु गात् ) इनमेंसे कोई भी इस अर्थके पार कभी न जावे । (शतं शरदः पुरुचीः जीवन्तः ) अतिदीर्घ सौ वर्षोंका जीवन अनुभव करते हुए (पर्वतेन मृत्यु तिरो दधतां) पर्वतके द्वारा मृत्युको परे रख ॥ २३ ॥ (जरसं वृणानाः आयुः आरोहत) वृद्धावस्थाको स्वीकार करते हुए दीर्घ आयुको प्राप्त करो। ( अनुपूर्व यतमानाः यति स्थ) एकके पीछे दूसरा सिद्धितक प्रयत्न करता रहे । (सुजनिमा सजोपाः त्वष्टा) उत्तम जन्म- वाला उत्साहवाला त्वष्टा (तान् वः जीवनाय सर्व आयु नयतु ) आप सबको दीर्घजीवनके लिये संपूर्ण भायुतक ले लावे ॥ २४ ॥ 1. (यथा अहानि अनुपूर्व भवन्ति) जैसे दिन एक दूसरेके पीछे भाते हैं। (यथा ऋतवः क्रतुभिः साकं यन्ति) जैसे ऋतुयें प्रस्तुओं के साथ चलती है । (यथा पूर्व अपरः न जहाति) जैसे पहिलेको दूसरा नहीं छोडता, हे धाता ( एवा एपां आयूपि कल्पय ) इसी प्रकार इनकी आयुकी योजना कर ॥ २५ ॥ भावार्थ- यहां जो लोग जीवित हैं वे चारो मोरसे मृतोंसे घिरे हुए है अर्थात् उनके चारो ओर मृत जीव है। हम ईगप्रार्थना करके कल्याण प्राप्त करें । हम हास्यमें और नृत्यमें अपना मंगल समय व्यतीत कर । हम सब उत्तम वीर बनें भोर युद्ध में अपना गौर्य प्रकट करें ॥ २२ ॥ नीबों के लिये भायुप्यकी मर्यादा निश्चित की हुई है। कोई मनुष्य इस दीर्घजीवनको मर्यादा न तोहे अर्थात् अस्थायुमें न मरे । मेय लोग अतिढी मायुतक जीवित रहें और मृत्युको दूर कर ॥ २३ ॥ वृद्धावस्थाको प्राप्त होकर दीर्घ आयुको स्वीकार करें । एकके पीछे एक अर्थात् वृद्धके पश्चात् तरुण चले, वृद्धके पूर्व तरुण न मरे । दीर्घ भायुप्यको प्राप्त करनेका यत्न प्रत्येक करे । ईश्वर सय यत्न करनेवालोंको दीर्घायु देवे ॥ २४ ॥ जमे दिनके पीछे दिन, ऋतुके पीछे ऋतु भोर जैसे पहिलेके पीछे दुसरा आता है, वैसे ही वृद्धके पीछेसे तरुण चले जावे, टोफ पूर्व कोई न मरे भर्थात मब लोग वृष्ट होकर ही पूर्ण भायुकी समाप्तिपर मरें ॥ २५ ॥ -- 1 यक्ष्मरोगनाशन (१५३ । ॥ २६॥ अश्म॑न्वती रीयते सं रभध्वं चीरयध्वं प्र तरता सखायः । अत्रा जहीत ये असन्दुरेवा अनमीवानुत्तरेमामि वाजान् उत्तिष्ठता प्रतरता सखायोऽमन्वती नदी स्यन्दत इयम् । अत्रा जहीत ये असन्नशिवाः शिवान्स्योनानुत्तरेमामि वाजान् वैश्वदेवीं वर्चस आ रभवं शुद्धा भवन्तः शुचयः पायकाः । अतिक्रामन्तो दुरिता पदानि शृतं हिमाः सर्ववीरा मदेम उदीचीनैः पथिमिर्वायुमद्भिरतिक्रामन्तोऽवरान्परेभिः । त्रिः सप्त कृत्व ऋषयः परेता मृत्यु प्रत्यौहन्पदयोपनेन ॥ २७॥ ।। २८॥ ॥ २९॥ अर्थ-(अम्मन्वती रीयते) पत्थरोंवाली नदी वेगसे यह रही है । (संरमध्वं)संभलो, (धीरयध्वं ) वीरता भारण करो, और (सखायः प्रतरत ) हे मिग्रो । तैर जाओ। (ये दुरेवा असन् अत्र जहीत ) जो दुःखदायी हों उनको यहीं फेक दो। (उत्तरेम अनमीवान् वाजान् ) यदि हम पार हो जायगे तो नोरोग मा प्राप्त करेंगे ॥ २६ ॥ है ( सखाय.) मियो ! ( उत्तिष्ठत प्रतरत ) उठो और तैरो। (इयं अश्मन्वती नदी स्यन्दते) यह पत्यरो- बाली नदी वेगसे यह रही है । (ये अशिवाः असन् अत्र जहीत) जो अशुभ हों उनको यहीं ही फेंक दो। (उत्त- रेम शिवान् स्योनान् अभि) यदि हम तैर जायेंगे तो हम शुभ और सुखदायक अन्नोको प्राप्त करेंगे ॥ २७ ॥ (शुद्धाः शुचयः पावकाः भवन्तः) शुद्ध पवित्र और मलरहित होकर (वर्चसे वैश्वदेवी आरमध्वं) कल्याण के लिये विश्वदेवकी उपासना भारंभ करो। (दुरिता पदानि अतिक्रामन्तः) पापके स्थानोको दूर करते हुए (सर्वत्रीराः शतं हिमाः मदेम) सब वीरोंके समेत हम सौ वर्ष तक आनंदसे रहे ॥ २८ ॥ (घायुमद्भि. उदीचीनः परेभिः पथिभि.) वायुवाले ऊपरके भेष्ठ मागासे ( अवरान् अतिझामन्तः ) मीचौका अतिक्रमण करते हुए ( परेताः ऋययः त्रिःसत कृत्वः) दूर पहुंचे हुए ऋघि तीन वार सात इक्कीस पार तपस्या करके (पदयोपनेन मृत्यु प्रत्यौहन ) अपने पदविन्याससे मृत्युको दूर करते रहे हैं ॥ २९॥ - भावार्थ-यह संसार एक पढीभारी पत्थरोंवाली नदी है, अर्थात् इसमें दुखोके और कप्टोके पडे बढे पत्यर है। इस नदीका वेग भी यडा भारी है । इसलिए इस मदीसे पार करनेके लिए सावधानीसे वीरतायुक्त संगठन करना चाहिये । हे ममुन्यो । इस तरह यदि मिलकर चलोगे तो पार कर सकोगे, मापसमें फूट पडामोगे तो इस मदीमे यह जाओगे। जो चीजें तुम्हारे पास अनावश्यक हैं उन सबको यही फेक दो, जब तुम तैरकर पार हो जाओगे तय वहीं उत्तम-उत्तम धीजीको प्राप्त कर सकोगे। परंतु यदि अनावश्यक चीजोका भार अपने ऊपर रखोगे, तो तुम उस भारके कारण ही य जानोगे ॥२६-२७॥ शुद्ध, पवित्र और मलरहित बनो और ईश्वरकी भमि करो । पापके स्थानमे अपना कदम न रखो । इस तरह निदीप बमकर भानंदसे सौ वर्ष जीवित रहो ॥२८॥ प्राणायामका अभ्यास करके प्राणका स्वाधीन करनेवाले योगी स्थूल शरीरको निदॉप पनाकर अपने माधीन करते है। ये ही ऋषि तपस्या के द्वारा मृत्युको दूर करके वीर्घजीवी मनते हैं ॥ २९ ॥ २० [भथर्व. मा ४ हिन्दी]
(१५४)
अथर्ववेदका सुवोध अनुवाद - 'दीर्घजीवन और आरोग्य'
॥३०॥
|| ३१॥
मृत्योः पदं योपर्यन्त एत द्राीय आयुः प्रतरं दधानाः ।
आसीना मृत्यु हुँदता सधस्थेऽथ जीवासौ विदमा चंदेम
इमा नारीरविधवाः सुपत्नीराजनेन सर्पिा सं स्पृशन्ताम् ।
अनश्रवौ अनमीवाः सुरत्ना आ रोहन्तु जनयो योनिमने
व्याकरोमि हविषाहमेतौ तौ ब्रह्मणा व्य१ह कल्पयामि ।
स्वधा पितृभ्यो अजरी कृणोमि दीर्घेणायुपा समिमान्सृजामि
यो नो अग्निः पितरो हुन्स्वन्तरविवेशामृतो मत्यैपु ।
मय्यहं तं परि गृहामि देवं मा सो अस्माद्विक्षत मा वयं तम्
1॥३२॥
॥३३॥
अर्थ-(मृत्योः पदं योपयन्तः) मृत्युके पांवको दूर करते हुए (आयुः द्राधीयः प्रतर धानाः) इम
मायुको दीर्घ और श्रेष्ठ बनाकर धारण करते हुए (एत) आगे बढो, भौर (आसीनाः मृत्यु नुदत) भासनादि करते हुए
मृत्युको दूर करो। हम (अथ जीवासः सधस्थे विदथं आवदेम) जीवित रहकर अपने घरमें यज्ञकी बात करें ॥३०॥
(इमाः नारीः सुपत्नीः अविधवाः) ये स्त्रियां उत्तम धर्सपत्नियाँ बनें और कभी विधवा न हो । (आअनेन
सर्पिपा संस्पृशन्तां ) तथा मान मोर घृत शरीरको लगावें । तथा (अनमीवाः अनश्रवः सुरत्नाः) रोगरहित मथुर-
रहित होकर उत्तम रत्नोसे युक्त हो । ऐसी (जनयः अग्रे योनि आरोहन्तु) स्त्रियाँ प्रथम अपने घरमें ऊँचे स्थानपर
चढें ॥ ३१ ॥
(अहं एतौ हविषा व्याकरोमि) में इन दोनोंको हविसे विशेष उन्नत करता हूं। (ब्रह्मणा अहं विकल्पयामि
ज्ञानसे मै इसको विशेष शक्ति सम्पन्न करता हूं। (पितृभ्यः अजरां स्वधा कृणोमि ) पितरोके लिये मैं अविनाशी
अपनी धारण शक्ति बढाता हूं। (इमान् दीर्पण आयुपा संसृजामि) इनको दीर्घ भायुसे युक्त करता हू ॥ ३२ ॥
हे (पितरः ) पितरो। (नः यः अमृतः अग्निः) हमारी जो अमर अग्नि (मत्येपु हृत्सु अन्तः आविवेश)
मर्त्य हृदयों में आवेश उत्पन्न करती है (तं देव अहं मयि परिगृहामि ) उस दिव्य अनिको मै अपनेमें धारण करता हूं।
(सः अस्मान् मा द्विक्षत) वह हमसे द्वेष न करे, तथा (तं वयं मा) उससे हम द्वेप न करें ॥ ३३ ॥
भावार्थ- इस रीतिसे मृत्युका पांव अपने सिरपरसे दूर करते हुए अपनी मायुको भतिदीर्घ बनाकर नासन प्राणायामादि
द्वारा मृत्युको दूर करके और दीर्घ जीवन प्राप्त करके उत्तम स्थानमे विराजकर अपना जीवन यज्ञरूप बनाओ ॥ ३० ॥
स्त्रियां उत्तम धर्मपत्नियां यनें, ये कभी विधवा न बनें । वे सौभाग्ययुक्त होकर अपने गरीरको अञ्जन आदिके द्वारा
सुशोभित करें । नीरोग बनें, शोकरहित होकर अश्रुरहित रहें और उत्तम माभूपणोसे सुशोभित रहें । अपने घरमे ये नियां
सुपूजित होती हुई महत्वका स्थान प्राप्त करें ॥३१॥
हवन द्वारा मृत और जीवितोंको अर्थात् दोनोंको लाभ पहुंचता है। ज्ञानसे ही इसकी विशेष कल्पना हो सकती है।
हवनसे मृतोंको स्वत्वधारक बल प्राप्त होता है और जीवितोंको दीर्घ आयुष्य प्राप्त होता है ॥ ३२ ॥
यह अमरधर्मयुक्त भग्नि मनुप्योंका हितकर्ता होनेसे सबको प्रिय है । इसको मनुष्य प्रज्ज्वलित करें और उसकी सहा-
यतासे उन्नति प्राप्त करें ॥१६॥
यक्ष्मरोगनाशन
(१५५)
अपावृत्य गार्हपत्यात्व्यादा प्रेत दक्षिणा ।
बियं पितृम्य आत्मने ब्रह्मभ्यः कृणुता प्रियम्
॥३४॥
द्विभागधनमादाय प्रक्षिणात्यवां । अग्निः पुत्रस्य ज्येष्ठस्य या ऋव्यादनिराहिता ॥३५॥
यत्कृषते यनुते यच्च वस्नेन विन्दते । सर्व मत्य॑स्य तन्नास्ति ऋव्याच्चेदनिराहितः ॥३६॥
अयजियो हतवर्चा भवति नैनन हविरतवे । छिनत्ति कृष्या गोधनाचं ऋव्यादनुवर्तते ॥३७॥
मुहुर्राध्यैः प्र वदुत्याति मर्यो नीत्यं । ऋच्याद्यानग्निरैन्तिकादनुविद्वान्वितावति ॥ ३८॥
अर्थ- (गार्हपत्यात् अपावृत्य दाक्षिणा कन्यादा प्रेत) गाईपत्य अग्निसे हटकर दक्षिणकी ओर प्रेतमांसभक्षक
ममिके प्रति चलो। और (पितृभ्यः आत्मने ब्रह्मभ्यः प्रियं कृणुत).पितरों के लिये, अपने लिये तथा बाह्मणोके लिये
प्रिय करो ॥३४॥
(यः अनिराहितः कव्या अग्निः) जो न बुझायी गई प्रेतमांसभक्षक अग्नि होती है, वह अग्नि (ज्येष्ठस्य
पुत्रस्य द्विभागं धनं आदाय ) व भाईको धनके दो भाग प्राप्त होनेपर भी (अवां प्रक्षिणाति) दारिद्रयसे
उसकी क्षीणता करती है ॥ ३५ ॥
(क्रव्यात् अनिराहितः चेत् ) प्रेतमांसभक्षक अग्नि यदि न बुझायी जाये, तो वह (मर्त्यस्य तत् सर्व न
अस्ति ) मर्त्यका वह सब नष्ट करती है कि जो ( यत् कृपते ) जो खेतीसे मिलता है, ( यत् वनुते ) जो अपने सवि-
भागसे प्राप्त होता है और (यत् च वस्नेन विन्दते) जो कारीगरीसे मिलता है ॥ ३६ ॥
वह मनुष्य ( अयज्ञियः हतव ः भवति ) अपवित्र और निस्तेजें होता है, (एनेन हविः अत्तवे न ) इसका
दिया हुआ भन्न खाने योग्य नहीं होता, (कृष्याः गोः धनात् छिनत्ति ) कृषि गौ और धनसे वह छीना जाता है, (यं
कव्यात अनुवर्तते) जिसके साथ शवमांसभक्षक अग्नि चलती है ॥ ३७ ॥
(यान् अन्तिकात् कन्यात् अग्निः) जिनको यह गवमांसदाहक भग्नि (विद्वान् अनु वितावति ) जानकर
पीछे पीछे पडती है, वह (मर्त्यः आति नीत्य ) मनुष्य कष्टको प्राप्त होकर (गृध्यैः मुहुः प्रवदति) प्रलोभनोके साथ
वारंवार पुकारता रहता है अर्थात् रोता रहता है ॥ ३८ ॥
भावार्थ- मनुष्योंको ऐसा आचरण करना चाहिये कि जिससे अपना हित हो, ज्ञानियोका समान बढे और पितरोका
या वृद्धिंगत होवे | गृहस्थधर्मसे लेकर मत्येष्टितक मनुष्य यही करता रहे ॥ ३४ ॥
प्रेतदाहक अग्निको अच्छी तरह विधिपूर्वक शान्त न किया जाय तो पितृधनके दो भाग प्राप्त होनेपर भी ज्येष्ठ पुत्रको
दारिद्रयके कष्ट भोगने पड़ते है, इसलिये अन्त्यष्टिकी अग्निको विधिपूर्वक शान्त करना चाहिये ॥ ३५ ॥
कृषिसे, कारीगरीसे तथा पैत्रिक विभागसे प्राप्त हुमा धन भी नष्ट होता है, यदि अन्त्येष्टिको अग्निको शान्ति न की
जाय ॥३६॥
अंत्येष्टिकी अग्नि सतत मनुष्य के साथ रहनेसे मनुष्य अपवित्र और निस्तेज होता है । उसका भन्न भमक्ष्य होता है,
उसकी कृषि, गौवें और धन नष्ट होते है। इसलिये उसकी शान्ति करके मनुष्यको स्नानादिसे पवित्र बनना चाहिये ।। ३७ ॥
जिनके घरमें अथवा जिन मनुष्योंमें यह अन्त्येष्टिकी अग्नि वार वार प्रज्ज्वलित होती है अर्थात् जिनके घरमे वारवार
मृत्यु होती है उनको बहुत कष्ट होते है और वे लोग वारवार रोते पीटते हुए मरे हुओके लाभोंका वर्णन करते हुए पुकारते
रहते हैं।॥ ३८॥
(१५६)
अथर्ववेदफा सुबोध अनुवाद -
'दीर्घमीवन और आरोग्य'
ग्राह्यो
गृहाः सं सृज्यन्ते स्त्रिया यन्मियत पतिः । झैव विद्वानेष्यो यः ऋष्माद निरादर्धत ॥३९॥
यद्भिग्रं शमलं चकुम यच्च दुष्कृतम् । आपो मा तस्माच्छुम्मन्बग्नेः संकेगुकाच्च यत् ॥ ४०॥
ता अधरादुदीचीरावृत्रन्प्रजानतीः पृथिभिर्देवयानः ।
पर्वतस्य वृषभस्याधि पृष्ठे नवाश्चरन्ति सरितः पुराणी।
॥४१॥
अग्ने अक्रव्यान्निः व्यादै नुदा देवयजनं वह
॥४२॥
इमं अव्यादा विवेशाय अव्यादुमन्वगात् । व्याघौ कृत्वा नानानं तं देरामि शिवापुरम् ॥४३॥
अन्तर्दैिवानो परिधिमनुष्याणामग्निर्गार्हपत्य उभयानन्तरा श्रितः
॥४४॥
अर्थ-(यत् स्त्रियाः पतिः नियते) जय स्वीका पति मर जाता है, तब (गृहाः ग्राह्याः सं सृज्यन्ते) भर
पीटानोंसे युक्त होते है। उस समग (विद्वान् ब्रह्मा एव ऐप्यः) ज्ञानी ब्राह्मण ही बुलाने योग्य है, (यः क्रव्याद
निराधत् ) जो शवमांसभक्षक अप्तिको हटा सकता है ।। ३९ ॥
( यत् रिग्रं शमलं) जो पाप और मलिनता तथा (यत् च दुष्कृतं चक्रम) जो दुराचार हमने किया है
(तस्मात् संकसुकात् अग्नेः ) उग्म विघातक मग्निसे (आपः मा शुभन्तु ) जल मुझे पवित्र करें ॥ १० ॥
(ताः अधरात् उदीचीः ) वे नीचेसे ऊपरकी मोरसे जाती हुई (प्रजानतीः देवयानः पथिभिः आववृत्रन् )
शान प्राप्त कर देवयानके मार्गोंसे वारंवार घलती है । (वृपभस्य पर्वतस्य अधिपृष्ठे ) जहाँ वृष्टि बहुन होनी है ऐसे
पर्वतके उपर (पुराणीः सरितः नवाः चरन्ति) पुरानी नदियां नवीन होकर चलती है ॥ ११ ॥
हे भन्ने ! ६ (अक्रव्याद् कन्यादं निः नुद) मांसभक्षक न बनकर मामाहारीको दूर कर । मौर (देवयजनं वए)
देवकि यजन करनेवालेको पास कर ॥ ४२ ॥
(इमं क्रव्यात् आविवेश) इसके पास मांसभक्षक भा गया है । भौर (अयं कव्यादं अन्वगात् ) यह मांस
मक्षकके पास चला गया है । (व्याघ्रौ नानानं कृत्वा) इन ऋर श्वापर्दोको विभिन्न बनाकर (तं शिवापरं हरामि)
उस मशुमको में दूर करता हूँ॥ १३ ॥
(देवानां अन्तर्षिः) देवोंको भपने अंदर रखनेवाला (मनुष्याणां परिधिः) मनुप्यका संरक्षणकर्ता (गाईपस्यः
भग्निः ) गाईपत्य अग्नि (उभयान अन्तरा श्रित.) दोनोंके मध्य में रहना है । ॥ ४ ॥
-
!
भावार्थ- जब किसी स्त्रीका पति मर जाता है तब उस घरमें वढी पीरा होती है। उस समय विहान प्राह्मणको
चुलाकर उस प्रेतढाइक भग्निकी गान्ति करनी चाहिये ।। ३९ ॥
जो पाप, टोप और दुराचार प्रेतदाइक्र अग्निके कारण होता है, उससे शुद्धि जलस्नानसे होती है ॥ ४० ॥
नदियां पर्वतोपरसे नीचेकी भार चलती हैं, वे गर्मी के दिनाम कृश होती और वृष्टिके दिनों में नवीन होकर चलती है।
(हली तरह ) मनुष्य मरनेके पश्चात् दूसरा गरीर धारण करके नवीनसा वनकर विचरता है ॥ ४१ ॥
जिसमें देवोके उद्देश्यसे हवन होता है, वह भग्नि प्रेतबाहक अग्निको दूर करे, अर्थात् वर घरमें इष्टियां हाँ मौर मनुष्य
टीवायु हों ॥ १२॥
एक अग्नि प्रेतदादक है और दूसरी देवयानक है । दोनोंस भक्षक भाव है, परतु एक शिव है और दूसरी मशिव है ।
मनुष्य ऐसा माचरण कर कि जिससे शुभ अनि सदा प्रदीप्त रहे और अशुभको प्रदीप्त करनेका कभी अवसर न आवे ॥ ४३॥
देवोंके अन्दर रहनेवाला मनुष्योंका रक्षणका गाईपत्य अग्नि दोनों जन्म भौर मृत्युकी अग्नियों में रहती है ॥ ४४ ॥
यक्ष्मरोगमाशन
(१५७)
नीवानामायुः प्रतिर त्वमग्ने पितॄणां लोकमपि गच्छन्तु ये मृताः ।
सुगाई पत्यो वितपन्नतिमुपामुपा श्रेयसी घे स्मै
॥४५॥
सर्वानने सहमानः सपत्नानेपामू रयिमस्मासु धेहि
॥ ४६॥
इममिन्द्रं वह्नि पप्रिंमन्वारभचं स वो निक्षरितादेवयात् ।
तेनाप हत शरुमापतन्तं तेन रुद्रस्य
परि पातास्ताम्
॥४७॥
अनड्वाह प्लवमन्वारेमचं स वो निवक्षदुरितादवद्यात् ।
आ रोहत सवितुर्नावतां पडुभिरु/भिरमति तरेम
॥४८॥
अहोरात्रे अन्वेषि विभ्रत्क्षेम्यस्तिष्ठन्तरणः सुवीर ।
अनातुरान्त्सुमनसस्तल्प विभ्रज्ज्योगव नः पुरुषगन्धिरेधि
॥ ४९ ॥
अर्थ- हे मन्ने (त्वं जीवानां आयुः प्रतिर) तू जीवोकी भायु निर्विघ्नता के साथ पार करा तथा (ये मृताः पितृणां
लोकं अपि गच्छन्तु ) जो मर चुक है वे पितृलोकमें चले जावें। (सुगार्हपत्यः अराति वितपन) उत्तम गार्हपत्य
मग्नि शत्रुको ताप देवे । ( उपां उपां अस्मे श्रेयसी धेहि ) प्रत्येक उपाकाल इसके लिये कल्याण धारण करे ॥ ४५ ॥
मग्ने । (सर्वान् सपत्लान् सहमालः) सब शत्रुओंको परास्त करता हुक्षा तू ( एषां रयिं ऊर्ज अस्मासु
बेहि ) इनका धन भौर वल हमारे मदर स्थापित कर ॥ ४६ ॥
(इम इन्द्रं वह्नि पप्रिं अन्वारमध्वं) इस ऐश्वर्ययुक्त पालकको अनुकूलतापूर्वक शुरू करो। (सः वः अवद्यात्
दुरितात् निः वक्षत् ) वह हमें निदनीय पापसे छुटावे । (तेन आपतन्तं शरु अपहत) उसके द्वारा हमला करनेवाले
भातकका नाम करो। (तेन रुद्रस्य अस्तां परिपात) उसकी सहायताले रुद्रके भनसे सय भोरसे अपने भापको सुरक्षित
(अनड्वाहं प्लवं अन्वारभध्वं ) बलवान् नौकाको तैयार करो । (सः वः अवद्यात् दुरितात् निर्वक्षत् ) वह
तुम्हें निद्य पापसे बचावे । (एतां सवितुः नावं आरोहत) इस सविताकी नौकापर चढो। हम (पभि. उर्वीभिः
ममति तरेम ) छः बडी विशाल नौकाक्षोसे दुष्टबुद्धिवाले शत्रुके भयसे पार हो ॥ ४८ ॥
तू (अहोरात्र क्षेभ्यः प्रतरण) दिनरात सुख देकर दु खसे पार करानेवाला (सुधीरः विभ्रत् तिष्ठान् अन्वेपि)
उत्तम वीरोंसे युक्त धनादिका धारण करनेवाला स्वय स्थिर होकर अनुकूल रहता है । हे (तल्प) पलग, हे विछोने ' तू
(सुमनसः अनातुरान् विभ्रत् ) उत्तम मनवाले नीरोग मनुष्योको धारण करता है, ऐसा तू (ज्योक एव पुरुपगंधिः
नः पधि) सदा मनुष्योके सुगंधसे युक्त होकर हमारे पास रह ॥ ४९ ॥
भावार्थ- अग्निमे हवन करनेसे मनुप्योकी आयु दीर्घ होती है। इसी हवनस मृतोको पितृलोक प्राप्त होता है।
गाईपत्य भग्नि शत्रुको दूर करती है, और प्रतिदिन कल्याण प्राप्त कराती है ॥ १५ ॥
भग्नि सब शत्रुओंको परास्त करे और उनके धन और भन्न हमारे पास लाकर रखे ॥ ४६ ॥
यह अग्नि धनदाता, सुखके पास पहुचानेवाली और सब कामानामोको पूर्ण करनेवाली है । उससे मनुष्य पापसे बचता
है। इससे शत्रुका नाश करना योग्य है और उसीसे घातपातके शस्त्रास्त्रोंसे बचाव भी हो सकता है ॥ १७ ॥
बलवती नौका तैयार करो और उसले भयानक जलाशयके पार हो जाओ । इस नौकापर चढो, ऐसी 3 नौकालोकी
सहायतासे दुर्मति शत्रुका पराभव करें । ( अर्थात् यज्ञरूपी नौकाले मृत्युको दूर करें ) ॥ ८ ॥
बर-घरमे पलग रहता है, सब उसपर सोते हैं, उससे सुख प्राप्त करते हैं, वीर पुत्रोका पालन उनपर होता है । सहा
सर्वदा ऐसे पलंगोपर उत्तम विछोने रखकर मनुष्य सोवे और मानंद प्राप्त करें (यशरूपी विश्रामदायी पढंग सब घरों में
करो॥ १७ ॥
हो)॥ १९॥
- अथर्ववेदका सुबोध अनुबादः (१५८) दीर्घजीवन और आरोग्य' ते देवेभ्य आ वृश्यन्ते पापं जीवन्ति सर्वदा । कपाधानग्निन्तिकादव इवानुवर्पते नडम् ॥ ५० ॥ श्रद्धा धनकाम्या व्यादा समानते । ते वा अन्येपा कुम्मी पर्यादधति सर्वदा प्रेव पिपतिपति मनमा मुहुरा वर्तते पुनः । ऋव्याद्यानुग्निरन्तिकादतुविद्वान्वितावति ॥ ५२ ॥ अविः कृष्णा भागधेय पशूनां ससि क्रव्यादपि चन्द्रं तं आहुः । मापा। पिष्टा भागधेय ते हव्यमरण्यान्या गहरं सचरच सुपीको जरतीमिष्ट्वा तिल्पिजं दण्डनं नडम् । तमिन्द्र इध्मं कृत्वा यमस्यामिं निरादधौ ।। ५४ ॥ प्रत्यछमु प्रत्यर्पयित्वा प्रविद्वान्पन्या वि ह्या विवेश । परामीपामहन्दुिदेश दीर्घणायुपा समिमान्सृजामि ॥ ५५ ॥ अर्थ- (ने देवेभ्यः श्रावृश्चन्ते) जो देवोंस अपने आपको अलग करते हैं वे (सर्वदा पापं जीवन्ति) सदा पापका जीवन व्यतीत करते हैं। (यान क्रन्यात् अग्निः अन्तिकात् अनुपवते ) जिनका मांसभक्षक मनि पाससे उसी प्रकार नाग करती है (अश्वः इव नड) जैसे घोडा घासका ॥ ५० ॥ (ये अश्रद्धाः वनकाम्याः) जो अढाहीन परंतु धनलोभी है (क्रव्यादा सं आसते) मांसमक्षणके लिंग एकत्र बैठते हैं, (नेवै अन्येषां कुम्भी सर्वदा पर्यादधति ) ३ निश्चयसे दूसरोंकी हांढीपर सदा मन रखते हैं ॥ ५५ ॥ (मनसा प्र पिपतिपति इच) वे मनसे मानों गिरना चाहते हैं, (पुनः मुहुः आवर्तते) और फिर लौटना पाहते हैं, (यान् विद्वान कन्यात् अग्निः अन्तिकात अनु वितावति ) जिनको लानती हुई मांसमक्षक भनि पास नाकर पीछे पढती है ।।७३|| हे (क्रव्यात्) मांसभक्षक अग्ने । (पशूनां कृष्णा अधिः ते भागधेयं ) पशुमि काली भैड तेरा भाग्य है। नया (सीसं चन्द्रं अपि ते आहुः ) मीन और लोह भी तेरा ही कहते हैं । (पिष्टाः मापा ते हव्यं भागधेयं) पिग्मा उहद तेरा हव्यभाग है । अतः त् (अरण्यान्या गव्हरं सचस्व ) वनके गहरे भागमें रह ॥ ५३ ॥ है इन्द्र ! (जरती इपीकां) अविजीण मुंजको (तिल् पिंजं दण्डन नडं दृष्ट्वा ) तिलोंका पुंज, समिधा और नदकी माहुनि देकर अर्थात् (तं इध्मं कृत्वा) इसको इंधन बनाकर (यमस्य आग्निं निरादधौ) यमकी अग्निका माधान करे ।।५४५. (प्रत्यञ्च अर्क प्रत्यर्पयित्वा) मस्त होनेवाले सूर्यको सत्कार समर्पण करके (पन्यां प्रविद्वान् हि वि आविवेश) सन्मार्गका जाननेवाडा धर्मपथमे विशेष रीतिग्ने प्रविष्ट होता है । ( अमीयां असून परादिदेश) यह मृतोके प्राणोंको परम गतिको भनता है और (इमान् दणि आयुषा सं सृजामि) मैं इन जीवितोंको दीर्घ आयुसे संयुक्त करता हूं ॥५५॥ भावार्थ- जो अपने आपको देवासे अलग करते हैं वे पापमार्गसे प्रवृत्त होते है और उनका वैसे नाग होता है जैसे पोटावका नाम करता है ॥५०॥ जो अन्दाहीन और धनलोभी होने हैं, वे सदा दूसरोके पकाय अन्नपर अपनी दृष्टि रसते हैं, वे दुर्गति पाते हैं और वे शवदाहक अग्निके भक्ष्य होते हैं, अर्थात् अल्पायु होते हैं ॥ ५५ ॥ जिनके पास महा गवढाइक अग्नि रहती है अर्थात् जिनके घरमें वारंवार मृत्यु होती है, वे वारंवार दु.स्त्री कष्टी भौर मटिन होते है । इनको उचित है कि वे प्रयत्न करके अपना बचाव करनेका उपाय करें ॥ ५२ ।। पिसे टडका दव्य बनाकर टमका इबन अग्निमें किया जाये । काली भेटका दध या वृतका ईवन किया जावे । इस तरकी गवढाइक पनि मनुष्य स्थानसे दूर वनमें प्रदीप्तकी जाये । अर्थात प्रेतका दहन नगरसे दूर हो ॥ ५३ ॥ हम गवढाइक अग्निमें जीर्ण इपिका, विर की पुन, समिधा और मरकंटेंकी भाहुतियां दी जावें । इस साधनसे इस समयकी अनिसा भाधान किया जावे ॥४॥ मन्मार्गको जाननवाला मनुष्य अस्तंगत सूर्यकी अर्चना करके अपने आपको धर्ममार्गके योग्य पवित्र यना सकता है। मृनोंको परम गनिकी भोर हवनहारा प्रेरित करके जीवित मनुष्योंको टसी इवनसे दीर्घायु करना चाहिए ।। ५५ ।।
यक्ष्मरोगनाशम (१५९) इनको दूर यक्ष्मरोगनाशन इस द्वितीय सूक्कमे मुख्य विषय यक्ष्मरोगके दूर करनेका करनी चाहिए इससे मनुष्यकी उन्नति होगी। परंतु मनुष्य है। परमेश्वरकी प्रार्थनासे मुख्यत. इस रोगको दूर करनेका अच्छी बातोका अनुकरण नहीं करता, प्रत्युत मनुष्यको बुरेका उत्तम उपदेश यहां है। ईश्वरप्रार्थनासे बडा भारी बल । ही अनुकरण करना पसंद होता है। इसलिये वेद सावधान जो मन एकाग्र करके प्रार्थना करते हैं और अपना हृदय करता है कि देखो ऐसे बुरेका अनुकरण करोगे तो मृत्युका ईबरके सामने खोल देते है, अनन्य होकर आत्मनिवेदन डर है । यदि मनुष्य इस विषयमें सावध रहेगा तो करते हैं, उनको ही इस यलका अनुभव हो सकता है । मृत्युका भय दूर होगा। नीचेके मार्ग कंजूसी, दारिद्रय और मृत्यु पहले मंत्रका कथन यह है-जैसे प्राण दूर चला जाता है, मृत्यु, दरिद्रता और कंजूसी करनेकी सूचना वैसे मनुष्यमें जो रोग है वह नीचके मार्गसे शीघ्र चला जावे। तीसरे मंत्रमे । कंजूसीसे दरिद्रता लाती है और दारिद्यसे मर्थात् दूर चला जावे, मनुष्यके पास न रहे । नीचेके मार्गसे लोग मृत्युका भय होता है। ये एक दूसरेके साधक है। (अघराङ्) जानेका तात्पर्य यह है कि सब रोगबीजोको उदारता संपन्नता और भखड जीवन यह मनुष्यको प्राप्त दूर करनेका उपाय नीचेके मार्ग खुले रखना ही है। मूत्र- करना चाहिये । यही अखड जीवन अमरपन है, जो सबको मार्ग, पुरीपमार्ग (पाखाना अथवा गौच होनेका मार्ग), प्राप्त करना चाहिए। पसीनेका मार्ग (अर्थात संपूर्ण रोमरंध्रोका मार्ग), नासिका यदि किसी स्थानपर व्याघ्रके समान सवका भक्षणकर्ता मार्ग ( जिसमें श्लेष्मा द्वारा मल दूर होते है ) ये सब मार्ग प्रेतदाहक अग्नि पहुंचती है अर्थात् यदि किसीके कुटुंयमें मृत्यु परमेश्वरने किये है। शरीररूपी मंदिरकी ये सय मोरियां है, हो गई हो तो वहासे उस मृत्युको हर प्रकारसे दूर करना जिनमेंसे मल बाहर निकाला जाता है। चाहिये यह चतुर्थ मंत्रका उपदेश है। इस स्थानपर 'मापाज्य' विधिका उल्लेस है । माषका रस लेकर उसको घीके साथ पापाचार और दुष्ट विचार खानेसे माषाज्य बनता है। एक दिन पूर्व माष जलमे भिगो द्वितीय मंत्रमें भघरांस और दुःशंस' अर्थात् पापाचारी लेवे । उसमें नल पर्याप्त डालना चाहिये, तीन चार घण्टे दूसरे भौर दुष्टविचारी ये दोनों मृत्युके दरवारतक पहुंचानेवाले है, दिन पकाकर उनका जल लेवे और उसमें घृत नमक आदि ऐसा स्पष्ट सूचित किया है। अत मनुष्योको पापसे और डालकर सेवन करे यह बलवृद्धि करनेवाला होता है। इसमें दुष्टविचारसे बचना चाहिए । दुष्टविचार और पापाचार ये अन्यान्य पदार्थ भी डाले जा सकते है। यह मायाज्य पेय परस्पर साथी है । दुष्ट विचार पहिले आता है और पश्चात् है। इसके सेवन करनेसे दुर्बल मनुष्य भी सयल हो सकता पापका माचरण होता है। इसलिये मनुष्यको वढी साव- है। इसकी संपूर्ण विधि उत्तम वैद्योको खोजकर निकालनी धानता के साथ रहना और इनसे बचना चाहिये। चाहिये । यह एक ऐसा विषय है कि जिससे अनेक मनुष्योको मनुष्य जो पतित होता है वह 'कृति और अनुकृति के लाभ हो सकता है। यह पेय तो बडा सस्ता, मधुर और पौष्टिक है। ज्ञानी वैद्य सोज करके निर्णय करे। द्वारा ही होता है। मनुष्य प्रथम दूसरेके दुष्ट विचार सुनता है और उन विचारोंकी अनुकृति (अनुकरण) करता है । घरमे किसी मनुष्यकी मृत्यु होनेके पश्चात् घरमे दुखके पहिले केवल अनुकरणकी ही इच्छा होती है, परंतु अनुकरण कारण हवन बंद रहता है। परंतु प्रेताग्निका शमन करके करते करते वैसे ही विचार करने लगता है। इसी तरह पापके हवनाग्निका प्रदीपन करना चाहिये, क्योंकि यही हवनाग्नि भाचरण पहले देखता है और फिर उसी प्रकार करनेकी चेष्टा भारोग्यवर्धन करनेवाली है। यह पचम मत्रका उपदेश है। करता है। इसमें प्रथम केवल अनुकरणकी इच्छा ही प्रबल भर्थात् खानेमे माषाज्य मिल जाए और हवनके लिये पनि रहती है। परंतु अभ्यास होनेपर वही इच्छा स्वभाव बन जाता प्रदीप्त की जाए, तो मृत्यु दूर हो सकती है। है। इसलिये अनुकरण करनेके विषयमें भी बढी सावधानता पठ मंत्रमे सौ वर्षकी दीर्घायुके लिये हवनाप्तिको घरमें धारण करनी चाहिए। स्थापित करनेका विधान है, वह प्रत्येक गृहस्थीको उसने सरपुरुषोंकी, भले भाचारविचारकी भन्नुकृति और कृति योग्य है। बड़ा इसका ।
- अथर्ववेदना सुबोध अनुवाद (१६०) 'दीर्घजीवन और आरोग्य' ग्रह - पितृयज्ञ बारमय मत्रसे कहा कि यह छवनाग्नि (पनमः मुच्य- मानः ) पापसे छुडाती है, दोपको दूर करनी है, (अश- किसीके घरसे मृत्यु हो गयी हो तो उस प्रेतका दाह- सस्कार (पितृयज्ञाय दुरं हरामि ) अर्थात् पितृयज्ञ कर- स्त्याः अमोक) अग्रगम्न अयम्थाको हटाती है और सक नेके लिये दूर स्थान नियत करना चाहिये । घरक, ग्राम प्रकारकी (आरुहत्) उन्ननि करती है। तेरहा मंत्रम या मानवोंकी बस्तीक समीप प्रेतदाहसस्कार करना नहीं कहा है कि हमी अग्निमें हम (अस्मिन् अग्नी रिपाणि चाहिये । क्योंकि इस दाहने जो दुगंधयुक्त विषमय वायु मृज्महे) यपूर्ण दोषोका हवन करते हैं। अर्थात हमारे याहर आती है, वह जीवित मनुष्योस भनेक रोग उत्पन्न सपूर्ण दोप, हम अग्निमें हवन सामग्री टालनेसे दूर भाग करती है । इसलिये सप्तम और अष्टम मंत्रमे प्रेतदाह यस्तीम जायगे । और हम (शुद्धाः पूताः) याहरमे शुद्ध और अन्दरसे पवित्र बनगे जिसका परिणाम (प्र ण आयूंधि दूर करनेका आदेश दिया है। नारिपत्) हमारी आयुकी वृद्धि होगी, क्योंकि दोषोंक जो प्रेतका दहन करती है उस अग्निका वैदिक नाम है रहनेमे ही गीघ्र मृत्यु होती है और पवित्रता होनेने मृत्यु 'कन्याद्' अर्थात मांस सानेवाली अग्नि । दूसरी भग्नि है दूर होती है । 'जातवेदाः' घरों में प्रदीप्त रहती है, यह इवि चौदहवें मंत्रमे कहा है कि यही हवनाग्नि यक्ष्मयीजोंको सग देवताओको पहुंचाती है और इवनकर्ताको मारोग्य देती दरसे दृरतक ले जाती है अर्थात हवनकर्ताक घरमें रोगवीज है । सय ढोप दूर करके सबको आनद देनेवाली यह अग्नि नहीं रहते इसलिये उनको नीरोगता और दीर्वायु प्राप्त होती है। जो प्रेतदाहक अग्नि है वह मृतकको यमराजके आधीन है। इस तरह घोडे, गौव, बालबचे, भेडबकरियाँ आदिमें करती है और हवनाग्नि देवताओंके साथ संबध लोटती है। जो रोगवीज और मृत्युका भय रहता है यह सब इस इवमा- इम तरह इन दोनों अग्नियोके कार्य है। निके द्वारा दूर किया जा सकता है । यह भागय पंद्रहवं यही यात नवम मंत्रमे कही है। प्रेतबाहक अग्नि और और सोलहवें मंत्रका है। गाहपत्य अग्नि ऐसी दो अग्नियां है। इनका ध्येय भिन्न है। सत्रहवं मत्रमें भी यह विषय पुनः अन्य रीतिसे भाया प्रेवढाहक अग्नि प्रेतको जलाकर मृतको पितरोंके स्थानमे है । जिम्म अग्निमें (घृतस्तावः मृथ्वा) घृतकी शुद्धिकारक पहुंचाती है और दूसरी जो गाईपत्य अग्नि है, वह यहांके आहुतियां डाली जाती है, उसी हवनाग्निकी सहायतासे निवासियोको आरोग्य प्रदान करती है। इसीलिये प्रेतदाहक (रुह ) उन्नति प्राप्त करना संभव है । मठारहवें मंगमे कहा अग्निका कार्य सतत नहीं चलता रहना चाहिये । दैवताग्नि ही है कि जहां ऐमा हवन होता है, वही स्वर्गलोक है । मनुष्य मनुष्योंके वरोमें प्रतिदिन प्रदीप्त होनी चाहिये। नवम मंत्रका हवनसे ही इस भूमिको स्वर्गधाम घना सकता है । भी यही भाव है। सूर्यप्रकाशका महत्व । इसी भागयको दशम मनमे प्रकट करते हुए कहा है कि भारोग्यकी दृष्टिसे सूर्यप्रकागका अत्यंत महत्त्व है। सूर्य- प्रेसदाइक सप्नि पुनः पुग यहां न आवे । वह पितृलोकमे प्रकाशसे ही संपूर्ण आरोग्यकी प्राप्ति होती है। इसलिये प्रदीप्त होती रहे । मनुष्यों के स्थानमें तो यही ज्ञातवेद अग्नि वेदमे (ज्योस् च सूर्य दृशे) निरंतर सूर्यदर्शन होता रहे, ही प्रतीत होनी चाहिये । नाववेद अप्तिका माग देवयान है ऐसी प्रार्थनाएं आती है। र्यदर्शन करना ही मनुष्यके लिए और प्रेनवाइक अग्निका मार्ग पितृयान है। आहादका स्थान है । प्रत्यक्ष सूर्यदर्शन करनेसे मांखोके रोग दूर होते है, युक्तिसे सूर्यदर्शनका अभ्यास यढानेसे ऐनक हवन-अग्नि लगानेकी भी आवश्यकता नहीं रहती। सूर्यातपस्नानसे ग्यारहवें मंग्रसे कहा है कि शुद्ध, पविन और निर्मल होकर संपूर्ण गरीरका तेज घढता है, आरोग्य वढता है और रक्त- यस वनाग्निको लोग प्रदीप्त करते है। इस इवनसे सब संचार यथायोग्य होकर बहुतसे रोग दूर होते है। सूर्यप्रकाश दोष होते हैं और यह हवनानि सब प्रकारकी पवित्रता ही आरोग्यदाता है। करती है, लोगोंको भारोग्य और दीर्घायु देवी है । वैदिक धर्मियोंके वरकी ग्रह अग्नि एक महत्त्वका स्थान रखती है। शुद्धिका उपाय मंत्र १९ और २० वे कुछ शुद्धिका उपाय कहा है। इसोफेो केन्द्र पगाकर वैदिक धर्मियोंके सत्र संस्कार होते हैं। परतु (शुजाः यत्रियाः भवत) शुद्ध- भऔर पवित्र धनो दूर यक्ष्मरोगनाशन (१६१) इतने संकेतसे ये मत्र शुद्धिके विषयमें आदेश दे रहे है ऐसा इन मंत्रोंमे आये शुद्धिसाधनोंके ये वैद्यशास्त्रोक्त अर्थ पता लगता है, परंतु जो शुद्धिके साधन इन मंत्रोसे वर्णन है। इनका उपयोग कैसे करना और इनसे शुद्धि किस रीतिसे किये गये हैं वे क्या है और उनका उपयोग कैसे करना करनी चाहिये इसका निश्चय सुविज्ञ वैद्य ही कर सकते हैं। चाहिये यह बात अनेकबार विचार करनेपर भी अवतक हमारी समझमे नही आयी है। इन मनोमे जो शुद्धिके और अपने घरके बालवच्चे हृष्टपुष्ट, भानदित और उत्साही इक्कीसवें मंत्रमे प्रार्थना है कि इस तरह मृत्यु दूर होते साधन कहे हैं वे (सीस) सीसा, (नड ) नल, (संक- हो, अर्थात् कोई न मरे। यह उपदेश (चक्षुष्मते शृण्वते) सुक) हवनीय अग्नि, (रामा- असिस्नी अवी) काली देखने और सुननेवालेके लिये कहा है। अर्थात् जो विचारसे भेड, (उपवहण) सिरहाना ये है। इनमे हवनान्निसे शुद्धता देखता है और सुनकर समझता है उसीके लिये यह सय होनेका कुछ ज्ञान हमे है। परतु अन्य साधनोके विषयमे हमे कहा है। जो देखेंगे नही और सुनेंगे नहीं उनके लिये कह- इस समयतक कोई पता नहीं लगा। मनुप्यके नीरोग और नेसे क्या लाभ होगा? दीर्घजीवी होने के लिये इन शुद्धियोकी आवश्यकता है, अतः इस विषयका महत्त्व बहुत है । इन शब्दोके ये ही भर्थ हैं नृत्य और हास्य मथवा दूसरे कुछ अर्थ है, इसकी भी खोज होनी चाहिये। थाईसवें मंत्रमे कहा है कि ये जो हमलोग यहा जीवित है १ अवि- अवि शब्दका अर्थ 'कुलित्थ,' कुलथी है। उनके चारों भोर (मृतैः आववृत्रन् ) मृत जीव हैं, अर्थात् यह चक्षुप्य अर्थात् नेत्रके दोष दूर करनेवाली वनस्पति है, ये इस मंतरालमे भ्रमण करते हैं। वे हमारे चारों ओर भाते ऐसा रत्नमाला नामक वैद्यक ग्रंथमे कहा है। होगे, परंतु उनका स्थूल देह नष्ट हो जानेसे वे हमे दिखाई २ (नड)- नल, देवनल यह एक प्रकारको घढी घास नहीं देते। वे तो मृत हो चुके हैं। जो जीवित है उनके है। इसके गुण वैद्यग्रंथमें ये दिये है- (रुचिकरः) मुखकी (नृतये हसाय) नाचने और हंसनेके लिये अर्थात उनको रुचि बढानेवाला, (मधुरः) मीठा, (रक्तपित्तघ्नः) रक्त- मानन्दप्रसन्नताके लिये ही यत्न करना चाहिये। दोष दूर करनेवाला, (दीपनः) क्षुधा प्रदीप्त करनेवाला, मनुष्यके भारोग्यके लिये नृत्य और हास्यकी अत्यंत भाव- (बलदः) शक्ति देनेवाला, (वृष्यः) वीर्य बढानेवाला, श्यकता है। हास्यसे मनकी प्रसन्नता रहती है और शरीरके (वीर्याधिकः) वीर्य अधिक करनेवाला । (देखो राजनि- पुठोमे उत्साह बढता है । नाच एक बडा उत्तम व्यायाम है घण्टु व.८) और आनंदके साथ किया जाता है। मायाँको नाच सीखना ३ सीस-सीस, सीसा, शीषा, सीपक । यह ( मेह- चाहिये और उससे यदा लाभ प्राप्त करना चाहिये । भाज- नाशनं ) मेह रोगका नाश करनेवाला, (नागशततुल्य- कल नाचको बुरा मानते है, परंतु नाच कोई बुरी चीज नहीं बलं दधाति) सौ हाथियोके समान शक्ति देता है, (व्याध है, नाच करनेवालोमें कई लोग घुरे होगे। परंतु नाच आरो- नाशयति ) रोग दूर करता है, (जीवितं आतनोति) ग्यवर्धक होनेसे बढा लाभकारी है । दीर्घजीवी बना देता है। (वह्नि प्रदीपयति) क्षुधा प्रदीप्त (सुवीरासः विदथं आवदेम ) हम उत्तम वीर बनें करता है, (कामवलं करोति) कामका यल बढाता है, और शत्रुको दूर करनेका ही विचार करे । इस तरह (मृत्यु च नाशयति) मृत्युको दूर करता है, ( वेदना- जिस क्षेत्रका शत्रु हो उसको दूर करना चाहिये । ऐसे हरः) पीडा हरता है, (रक्तरोधकः) रक्त-स्राव बंद सब शत्रु दूर हो जाएं तो पूर्ण भारोग्य, उत्तम स्वास्थ्य, करता है । कुष्ठ, गुल्म, पाण्डु, प्रमेह, अग्निमाद्य, सृजन, भतुल आनंद और पूर्ण सुख प्राप्त होगा। यही मनुष्यका भगन्दर आदि रोगोको दूर करता है ॥ (भाव० पू० १ म० साध्य है । जबतक किसी स्थानपर शत्रु रहेगा तबतक किसी धा. व० देखो) प्रकार सुख प्राप्त नहीं हो सकता। इसलिये शत्रुके साथ ४ रामा- एक औषधी है जिसके गुण राजनिघण्टु व, ऐसा बर्ताव करना चाहिये कि वह दूर हो और उससे हम ५, १०, १२ और १३ में दिये है। स्वतंत्र रहें । यही (भद्रा देवहूति.) कल्याणकारक प्रार्थना ५ असिनी औषधि है जो नेत्रको लाभदायी है। हम करते हैं। अर्थात् हरएक मनुष्यको उचित है कि वह ६ शीर्ष (शीर्पक्ति)- भगुरुवृक्ष, जिसके जलानेसे इस कस्याणमयो प्रार्थनाको करे भौर मपना कल्याण प्राप्त बायुसदि होती है। करे। २१ (मथर्व. भा. ४ हिन्दी) । - एक (१६२) अथर्ववेदका सुबोध अनुवाद 'दीर्घजीवन और आरोग्य' - मनुष्यकी आयुध्यमर्यादा कारीगरी में निपुण होये । क्योकि कारीगरी मनकी तल्लीनता तेईसवें मंत्रमें कहा है कि मनुष्योंकी (जीवेभ्यः प्राप्त होती रे और इसी कारण जागतिक दुग्यो मुक्तता परिधिः) मायुष्यकी मर्यादा, जीवोंकी भायुप्यमर्यादा, होती है और दीर्घजीवन प्राप्त होता है। दीर्घतीयन प्राप्त करने के प्रत्येक योनिमें उत्पन्न होनेवाले प्राणियोंकी शायुप्यमर्यादा निर्देश तीन शब्दों द्वारा इस मंत्रने यहां दिया है। निश्चित है। मनुष्योकी भायुज्यमर्यादा (शतं शरदः) पच्चीसवे मंत्रमे बताया कि यथाक्रम मनुष्यको मृत्यु सौ वर्षकी है । यह निश्चित मर्यादा है अर्थात् सुनियमों के प्राप्त हो अर्थात् वृट मनुष्य पहिले मरें, उनसे पीछे भायुके पालनसे यह बढ सकती है जोर भनियमोके अवलंबन कर- नेसे घट भी सकती है। यह मनुप्यके माधीन है मनुष्य चाहे फ्रमसे मनुष्य मेर। वृन्द्रों के पूर्व तरण अथवा पालक न मरे । सब लोगोका यथायोग्य जनन, पालन और पोपण होता योगादि साधनों के अनुष्ठानसे अपनी मायुप्यमर्यादा वढा सकता है अथवा व्यभिचारादि द्वारा घटा भी सकता है। रहेगा तो अकालमृत्यु दूर होगी और यथाफम मृत्यु होगी। इस तरह दोनों बातें संभव है, इसलिये मंत्रमे उपदेश है नदीका प्रचंड वेग (मृत्यु अन्तर्दधतां) “ मृत्युको अन्तर्हित करो, अर्थात भागेके (२६ और २७ इन) दो मंत्रोंमें संसाररूपी मृत्युको बाहर आनेका अवसर न दो, वह छिपा पठारदे, प्रचंड वेगवाली महानदीका उत्तम काव्यमय वर्णन है । ये वह उठकर किसीकी अपने वश में न कर सके। तुम ऐसा मंत्र सबको ध्यानमें धारण करने चाहिये । इस प्रचंड वेगवती व्यवहार करो कि जिससे वह मृत्यु दूर हो जाने।" नदीसे ही हम सबको पार होना है। यह ( अरमन्वती) चौबीसवें मंत्रमें कहा है कि वृद्धावस्थाको स्वीकार करते पत्थरोंवाली भयानक नदी है। इसमें स्थानस्थानपर पत्थर हैं, अतः मार्ग अच्छी प्रकार नहीं मिलता। इसपर चलनेसे पत्य- हुए दीर्घायु (आरोहत आयुः) धारण करो। अर्थात् अल्प आयुमें न मरो । ब्रह्मचर्यादि सुनियम पालन करते है। यह नदी (स्यंदते रीयते ) यढे प्रचंड वेगसे चल रही रोसे ठोकर लगती है। और गठेमें पटनेकी संभावना रहती हुए मृत्युको दूर करो। (यतमानाः यति स्थ) दीर्घायु है, इस वेगके कारण पार होनेवारेका पांव किसी स्थानपर प्राप्तिका यत्न करते हुए अपने सुनियमोमें रहो । उन धर्म- नहीं ठहरता। यहां वडा भय है। इससे पार हुए बिना नियमोका उलंघन न करो । ऐसा करोगे तो (जीवनाय कार्य नहीं चलेगा।पार तो होना ही चाहिये । अत. हरएकको सर्व आयुः नयतु) दीर्घजीवनके लिये पूर्ण मायुतक जानेकी पार होनेके लिये कटिबद्ध होना चाहिये । सभावना होगी। कैसे पार हो सकते है ? क्या आपेला भरेला मनुष्य इस यहां दीर्घजीवनके पहिले नियमको 'सुजनिमा' शब्द नदीसे पार हो सकता है ? कभी नहीं ? इस नदीसे पार द्वारा प्रकट किया है । सुजनिशास्त्र (युजेनिक्स) का यथा- होनेके लिये कहा है कि (उत्तिष्ठत, संरभवं ) उठो ! योग्य पालन होना चाहिये। जननशास्त्रके नियम जानकर अपनी अपनी चीजोंको संभालो, अपने जीवनको संभालो। और उनका यथायोग्य पालन करके संतान उत्पन्न करनी असावधानतासे ही सर्वस्वनाश होगा, ध्यान रखो । समय चाहिये । मातापिता वैपयिक अत्याचारसे अपने आपको बडा ही कठिन है, सबको बढी सावधानी धारण करके तैयार यचावें । सुसतान निर्माण द्वारा राष्ट्रका यश वृद्धिंगत करना होना चाहिए । (चीरयचं प्रतरत ) वीरता धारण करो, अपना कर्तव्य है, यही मनमें धारण करें और सुप्रजा-जनन ढरनेसे कोई प्रयोजन सिद्ध नही होगा। दरोगे तो भी मरना करें । दूसरा नियम 'सजोपाः' शब्दद्वारा प्रकट हुआ है। है और न डरोगे तो भी मरोगे, परंतु सभलकर मिरकर प्रीति के साथ, उत्साहके साथ, एक जीवनके भावके साथ युक्तिसे उपाय करोगे तो ही पार हो सकते हो । यहां रहकर स्त्रीपुरुषका संबंध होना चाहिये । इसी तरह राष्ट्रमे सयका रोतेपीटते जाओगे तो कोई लाभ नहीं होगा। रोना पीटना जीवन एक हो और सब लोग उत्साह के साथ अपना कर्तव्य ठरना छोट दो, (प्रतरत) तैरनेका यत्न करो, मिलकर उत्तम प्रकार करते रहें । यह पररपर व्यवहारका उपदेश तैरनेका यत्न वढी सावधानीसे करो, तभी कुछ बन सकता है। तीसरा नियम 'त्वष्टा' शब्द द्वारा बताया है । स्वष्टाका है। नहीं तो कोई दूसरा उपाय नहीं है। अर्थ है कारीगर, कुशल कर्म करनेवाला, कर्ममें कुशल । परतु तुम्हारे पास व्यर्थकी चीजोका भार बहुत है । यह मनुष्य जो दीर्घजीवन प्राप्त करना चाहता है, वह किसी सव भार भपने पास रखोगे तो निश्चयसे पीचमें ही इन ? ।
यश्मरोगनाशन (१६३) है मरोगे। ये व्यर्थकी चीजें तुमने अपने पास क्यों रखी हैं ? यदि उन्नति करनेकी इच्छा है तो २९ वे मंत्रमें कहा (अत्र जहीत ये असन् दुरेवा अशिवाः) मतः इनमेंसे उसके अनुसार (अवरान् अतिक्रामन्तः ) नीचे मार्गोका जो चीजे अनावश्यक है, व्यर्थ हैं, जिनका कोई उपयोग नहीं अतिक्रमण करना चाहिये । कभी नीचमार्गसे एक भी कदम हैं, उनको यहीं फेंक दो । इतना भार नदीके बीचमे मागे बढाना नहीं चाहिये, यहाँ बढा रढनिश्चय लगता है, संभाला नहीं जाएगा। मतः ये अनावश्यक पदार्थ माप यहीं क्योंकि नीच मार्गसे गिरना वढा भासान है । ऊंचे मार्गपर गेर दीजिये ! इससे अपने पासका बोझा कम होगा और घहना ही प्रयाससे साध्य होनेवाली बात है । (उदीचीनः हम भानंदसे पार हो सकेंगे। अतः भनावश्यक पदार्थोंका पथिभिः) उच्च स्थानके मागासे जाना चाहिये, तभी उन्नति लोभ छोर दो। होगी। (ऋपयः परेतः) इसी तरह अपनी उन्नति करते यदि हम (उत्तरेम) नदी पार हो जायगे तो उस परले हुए ऋपिलोग उच्च धामको पहुंच सके हैं । उन्होने बडे बढे वीरपर बडा क्षेत्र है, वहां जो जो भावश्यक वस्तुएं होंगी, यत्न करके तीन तीन बार मौर सात सात बार तप (त्रिः ले लेंगे। उसकी चिन्ता यहां करनेकी क्या भावश्यकता सप्तकृत्वः) करके भपनी उन्नति की है । इसी साधनाले नहीं है। वहां उतरनेपर (अनमीवान् शिवान् स्योनान् (मृत्युं प्रत्यौहन् ) वे मृत्युको दूर करनेमें समर्थ हुए । वाजान् अभि) नीरोग, शुभ, सुखदायी भोग अवश्य प्राप्त यही मार्ग दीर्घजीवन प्राप्त करनेका है। करेंगे। परंतु इन अनावश्यक पदार्थाका भार सिरपर रखोगे (मृत्योः पदं योपयन्तः) अपने सिरपर जो मृत्युका तो परले तीरपर पहुंचना असंभवनीय है। पांव है, उसको अपने प्रयत्नसे दूर करो । तुम प्रयत्न करोगे वहाँ काव्यमयी भाषासे वढा मनोहर उपदेश दिया है। तो वह पांव दूर हो सकता है । तुमने प्रयत्न न किया तो हरएक स्थानपर कप्टका समय दूर करनेके लिये यही उपदेश उस पावके नीचे तुम्हारा सिर दव जायगा। मतः अपमृत्यु मत्यंत उपयोगी है। दूर करनेके लिये तुम्हें प्रतिदिन प्रयत्न करना चाहिये । सौ वर्षोंकी पूर्ण आयु (द्राधीय आयुः प्रतरं दधानाः) यह सौ वर्षकी पूर्ण महाईसवें मंत्रमें (शतं हिमाः सर्ववीरा मदेम) सौ वर्षकी भायु है, यह तो स्वाभाविक मर्यादा है। इस मूल वर्षतक बालबच्चोंके समेत हम मानदसे रहें, ऐसा कहा धनकी वृद्धि करना तुम्हारे माधीन है, तुम्हारे प्रयत्नसे ही है । कैसे सौ वर्षकी दीर्घ आयु प्राप्त कर सकेंगे? अपमृत्युको इस आयुरूपी धनकी वृद्धि हो सकती है। (आसीनाः किस तरह दूर कर सकेंगे? इसका उत्तर यह है कि (दुरिता मृत्यु नुदतः) आसनादि योगसाधन तत्परताके साथ करते पदानि अतिक्रामन्तः) पापोके स्थानोंका अतिक्रमण कर हुए तुम सब अपमृत्युको दूर करो। यम नियम आसन नेसे यह सब हो सकेगा। पारके स्थान भनेक है, उनकी प्राणायाम मादि योगसाधन करनेसे गरीरस्वास्थ्य उत्तम गिनती नहीं हो सकेगी। परंतु जो पापका स्थान हो, वहां प्राप्त होता है, ध्यान धारणासे उत्तम मानसिक स्वास्थ्य मिलता नहीं नाना, उस कार्यमें भाग नहीं लेना और पापमार्गपर है, इस तरह मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य प्राप्त होनेसे पांच नहीं रखना यही एक उपाय है कि जिससे निश्चयसे मनुष्यकी आयु बढती है । मनुष्य इस तरह जीवित रह कर दीर्घायु प्राप्त हो सकेगी। ही (विदथं आवेदम) ज्ञानको फैलानेका विचार कर पापके मार्गसे न जानेसे ही (शुद्धाः शुचयः पावकाः) सकते है। शुद्ध पुनीत और पवित्र होना सभव है । शुद्ध और पवित्र मागे ३१ । मन्त्रमें कहा है कि स्त्रियां विधवा न हो होनेसे ही दीर्घायु संभव है । इसकी साधनाके लिये (वर्चसे अर्थात् उनके पति अल्प भायुमें न मरें। स्त्रियां सौभाग्यसे वैश्वदेवी आरभध्वं ) सब देवताओको अपने अन्दर धारण युक्त हो और (अञ्जनेन ) माखमें काजल-अञ्जन लगाकर, करना चाहिये और इनकी प्रार्थना करनी चाहिये । सब देवता तेल आदि सिरमें मलकर लाभूषण धारण करके सुन्दर रहे। तो अपने शरीरमें हैं ही उनको जानकर उनका यथायोग्य ये घरके भूषण हैं । ये देवियां हैं, भत. इनकी पूजा घरघरमें स्वागत करना चाहिये । सब देवताओका निवास वेदमंत्रोंमें होती रहे । स्त्रियां किसी भी घरमें न (अन्-अश्रवः ) रोवें भी है, उस दैवी वाणीको धारण करनेसे मनुष्य पवित्र और वे भानन्दप्रसन्न रहें तथा वे ( अन् अमीयाः) नीरोग रहे शुद्ध हो सकता है। भौर (सु-रत्नाः) उत्तम रत्नोंके भाभूषण धारण करके ?
(१६४) अथर्ववेदफा सुवोध भनुवाद दीर्मजीवन मौर मारोग्य' । ३४ अपना सौंदर्य यदाती है। अर्थात् घरमें नियोंको रदास यहां पुपका ये पल वानवाया है। पर्वतभिपरपर सुर नहीं रहना चाहिए। ऐसी स्त्रियाँ पतिक साब मानन्दप्रसन्नता- वायु यल यवानेवाली ही होती है। वायु ही प्राणका रूप पूर्वक गृहस्थधर्मका पालन करें। धारण करक मनुष्याम जीवनसकि वहाती है। यह पानसे घरमे रहनेवाले सभी लोग हवन करते रहें। प्रतिदिन (नवाः सरितः) नुतन भरने चलो है, उनका जल भी मानन्दप्रसन्न होकर इवन करें । इस हवनसे पितरोको स्वधा- भारोग्यवर्धक होता है । व्यायाम, शुद्ध वायु, उनम जन मौर शक्ति मिलेगी और जीवित मनुष्योको दीर्घायु प्राप्त होगी। परिशुन्च वायुमंडल इतनी बात पर्वत शिवरपर हानी हैं, इस- (मत्र ३२) लिए पर्वतशिखर जीर्घायु देनेवाग होता है। ३३ वे मन्त्रमे इतना ही कहा है कि हवनाग्निक साय कोई मंत्र ४२ भार ४३ मे जव्याद् अग्निको रचनेका ही विमान उपभाव अथवा विरुद्धभाव न रखे। सब लोग भादरके साथ । नव्याद् अग्निको दर करनेका ही भर्य मृत्युको दूर करना हवन कर से ३६ तक तीन मन्त्रोमें कहा है कि प्रेत- है । भागेके तीन मत्रोमे मुख्यतया यह कदा है कि गृहस्थी दाहक अग्नि सतत जलती न रहे, इसके लिये यत्न करना लोग घर घरमै भग्नि प्रदीप्त करके हवन करें। इस हवनये चाहिये। अर्थात् मनुष्योको अपनी दीर्घायुके लिये यत्न करना मनुप्योको दीर्घ आयु प्राप्त हो । जो मर चुके हैं वे पितृलोक चाहिये । हरएक मनुष्यका कर्तव्य है कि वह (पितृभ्यः) पितरोक लिये अपने (ब्रह्मभ्यः) ज्ञानी विद्वानों के लिये में चले जाने और जो जीवित हैं उनको कल्याण धन मौर या और (आत्मने) अपने लिये जो हितकारक हो, वही करे । प्राप्त हो और वे दीर्घजीवी बनें । मय शत्रु दूर हो जांच भौर इनका अहित कभी न करे । जनताको सुस और शान्ति मिले। आगेके ३ मन्त्रोमे भी वही व्याद भग्निकी ही बात कही भागेक १६ से ४९ तक मंत्रोमें कहा है कि गृहस्थी लोग है । जिनके घरमे मृत्यु होती है, वे घर (अ-यक्षियाः) अपने घरमें हवनानि प्रदीप्त करें। यह अग्नि उनको शुभ अपवित्र होते है, (हतवर्चाः) निस्तेज होते हैं, शोभारहित भवस्थाको प्राप्त करा देगी। गृहस्थी लोग यज्ञरूप नौकाके होते हैं । कृपि, गौ और धनसे हीन होते हैं। (ग्राह्याः द्वारा अपने दुःख दूर करें, सूर्य प्रकाशले लाम उठावें भपने गृहाः) वे घर पीढासे युक्त होते हैं। सब लोग क्लेशसे युक्त रोग और व्याधि दूर करें और नीरोगता प्राप्त करके भानन्दके होते हैं । वहा कोई भी मनुष्य आनन्दप्रसन्न नहीं रहता है, साथ दीर्घायुका आनंद भोगे। जहां पुरुपकी मृत्यु होती है, वहां सी विधवा होती है और जो लोग पापम अपना जीवन व्यतीत करते है, वे भप- वह घर सुखदायक नहीं रहता है। इसीलिये हरएकको मृत्यु दु ख भोगते है । अत मनुष्योको उचित है कि वे दीर्घजीवन प्राप्त करनेका यत्न करना चाहिए । ३१ वे मंत्रका पाप न करें और सदा पुण्यमार्गमें ही दत्तचित्त रहें । यह विचार इन मन्त्रोके साय करनेसे प्रतीत होता है कि विधवा आशय ५० वें मंत्रका है । इक्यावनवे मत्रमे कहा है कि जो स्त्रियां न अञ्जन आसमें डालती है, न माथेपर तेल मलती श्रद्धाहीन, धनलोभी, मांसभक्षी लोग है और जो दूसरोके हैं, न अच्छे कपडे पहनती है, न जेवर पहनती है, वे तो सदा सिरपर चढकर उनको साते है, या लूटते या उनको दु स देते रोती रहती है, आंसू बहाती हैं मीर दु सके कारण कृश होती है, वे सदा पापभागी होते है। उनके पाप अनगिनत होते है और रोगी भी होती है। हे और उस कारण उनके दु स भी बहुत ही होते हैं । मत मागे ४० वें मन्त्रमे कहा है कि जो (रिप्रं) पाप और मनुग्य पापसे बचे रहें जिससे वे सुखी हो सकते हैं। बावनवे (शमलं) दोप मनुष्य करता है, जो (दुष्कृतं) कुकर्म मंत्रमें ऐसा कहा है कि जो वारंवार पाप मार्गसे ही चलते मनुष्य करता है, उसकी शुद्धि जलसे होगी। जलप्रयोग हैं उनको दुस भोगना ही पटता है । अत दुस भौर शुद्धता करनेवाला है । सब रोगबीज जलके प्रयोगसे दूर होते मृत्युसे वचनेका एक मात्र उपाय यह है कि वे पापसे बचे है, शरीर निर्मल होनेसे दीर्घजीवी होता है । ४१ वे मन्त्रमें रहे । पापसे बचनेसे ही केवल दुःखसे भौर अपमृत्युसे बचना पर्वतगिसरपर (पर्वतस्य अधिपृष्ठे) वास करनेसे यदा सभव है। लाभ होता है ऐसा कहा है। पर्वतके शिसरपर वायु शुद्ध भागे तिरेपनवे मंत्रमें कहा है कि (कृष्णा अविः) काली होती है और उसके सेवनसे मनुष्य नीरोग हो जाता है। यह भेद अथवा कुलथी (सीसं) सीसा, (चन्द्रं) लोहा, भनुभवकी यात है। यहा 'पर्वत' को 'वृपभ' कहा है, (माषा पिष्टाः) पिसे उडद यह सब भाग्यका साधन .
यक्ष्म-चिकित्सा (१६५) । वैध लोग इन शग्दोंका विचार करे भौर इनसे किस तरह मागे ५५ वे मंत्रमे कहा है कि सूर्यदर्शन सादरपूर्वक भाग्य प्राप्त हो सकता है, इसकी विधि निश्चित करे । यह मनुष्य करें। यह तो आरोग्यका एक साधन भपूर्वताके साथ मंत्र या महत्वका है और खोज करने योग्य है। आगे ५४ मनुष्य के पास आया है। मनुष्य इसका उत्तम उपयोग करे वे मंत्रमें भी (इपीकां) इपिका मुंज (तिलपिंज) तिल- और लाभ उठावे । जो मनुष्य मर चुके हैं वे तो पितृलोक- रटल ना भादि गन्दो द्वारा कुछ महत्वका प्रयोग कहा है। के मानके पथिक बन चुके है। परंतु जो जीवित है उनको यह भी अन्वेपणीय है । इसका विचार सुविज्ञ वैद्य करें । यह यहां रहकर ऐसा कार्य करना चाहिये कि जिससे उनको दीर्घ यज्ञमात्रका विषय है और भारोग्यके साथ इसका धनिष्ट क्षायु प्राप्त होवे । संबंध है। मत. इमकी पद्धति सुविज्ञ वयो द्वारा निश्चित इस तरह इस सूक्तमें केवल प्रार्थनाएं ही है, परंतु उनमें होमी रचित है भी वडा बोधप्रद उपदेश दिया है। यक्षम चिकित्सा कां ६, सु. ८५ ऋषि:- अथर्वा । देवता- वनस्पति ।) वरणो वारयाता अयं देवो वनस्पतिः । यक्ष्मो यो अस्मिन्नाविष्टस्तमु देवा अवीवरन् ॥१॥ इन्द्रस्य वचसा वयं मित्रस्य॒ वरुणस्य च । देवानां सर्वेषां वाचा यक्ष्मं ते वारयामहे ॥२॥ या वृत्र हुमा आपस्तस्तम्भ विश्वा यतीः । एवा ते अग्निना यक्ष्म वैश्वानरेण वारये ॥३॥ अर्थ-(अयं देवः वरुणः वनरपतिः) यह दिव्य वरण नामक औषधि (वारयाते ) रोगनिवारण करती है । (अस्मिन् यः यक्ष्मः आविष्टः ) इसमें जो रोग घुसा हुआ था (तं उ देवाः अवीवरन् ) उसका देवीने निवारण किया ॥१॥ (इन्द्रस्य, मित्रस्य वरुणस्य, वचसा ) इन्द्र, मित्र, वरुण इनके वचनसे तथा (सर्वेषां देवानां वाचा ) सब देवोंकी वाणीसे (ते यक्ष्म वारयामहे) तेरा यक्ष्मरोग दूर करते हैं ॥ २ ॥ (यथा वृत्रः) जैसे वृनने (विश्वधा यतीः आपः तस्तम्भ ) चारो ओर बहनेवाले जलप्रवाहोको रोक दिया था एवा) उसी प्रकार (ते यक्ष्म) तेरे रोगका (वैश्वानरेण अग्निना वारये) वैश्वानर भग्नि द्वारा निवारण करते हैं ॥३॥ भावार्थ- वरण वृक्षके उपयोग करनेसे यक्ष्मरोग दूर होता है ॥ १-३॥ - वरुण वृक्ष वेदमें जिसका नाम 'वरण' है उसी वृक्षको संस्कृत भाषामें वरुण' कहते हैं। परुण वृक्षकी मौषभिसे यक्ष्मरोग दूर होता है। इसको हिंदीमे 'विलि' वृक्ष कहते हैं । इसके गुण ये है- कटुः उप्णः रक्तदोषघ्नः शिरोदातहरः स्निग्धः आग्नेयः विद्रधिवातघ्नश्च ॥ (रा लि. व. ९) वरुणः पित्तलो भेदो श्लेष्मकृच्छाश्ममारुतान् । निहन्ति गुल्मवातास्त्रक्रिमीश्चोष्णाग्निदीपनम् । कपायो मधुरस्तिक्तः कटुको रुक्षको लघुः ॥ (भा० )
अथर्ववेदका सुबोध भनुवाद
दीर्घजीपन और भारोग्य'
Ama-
है
'यह वरण बोपभि रतदोष दूर करनेवाली, सिरस्थानीय वातदोष दूर करनेवाली है, कट रग मिग्य तया गाय
गुणयुफ है। डेन्मा, मूत्रदोप, वातदोप, गुल्म, वातरफ, क्रिमिदोष इन रोगोंको दूर करती है।'
इस औषधि के ये
गुण । इसका नाम 'आग्नेय' उपर दिया है अतः तृतीय मंत्रमें
वैश्वानरेण अग्निना यक्ष्म वारये । (म. ३)
कहा है । यहां अग्नि पदका मर्य 'वरुण' वृक्ष करना उचित है। अर्थात् इस मंयका मर्थ वरण वृक्ष के प्रयोगले
यक्ष्म रोग दूर करता हू' ऐसा करना चाहिये । इस औषधि प्रयोगका विचार वैद्योंको करना चाहिये।
।
या नशन
कां. २, सू. ३३
(ऋपिः- ब्रह्मा । देवता- यक्ष्मविवणं, चन्द्रमाः, भायुप्यम् ।)
अक्षीम्यां ते नासिकाभ्यां कर्णीभ्यां छुचुकादधि । यक्ष्म शीर्षण्यं मस्तिष्काज्जिताया वि वृहामि ते ।।१।।
ग्रीवाभ्यस्त उष्णिहाभ्य: कीकसाभ्यो अनुक्यादि । यक्ष्मं दोषण्यंमंसाभ्यां बाहुभ्यां वि वृहामि ते ।।२।।
हृदयात्ते परि क्लोनो हलीक्ष्णात्पाश्र्वाभ्याम् । यक्ष्म मतम्नाम्यां प्लीहो यनस्ते चि वृहामसि ।।३।।
आन्त्रेभ्य॑स्ते गुदाम्यो वनिष्ठोरूदग़दधिं । यक्ष्म कुक्षिभ्यां प्लाशेर्नाम्या वि वृहामि ते ॥४॥
ऊरुम्या ते अष्ठीवद्धयां पाणिभ्यां प्रपदाम्याम् ।
यक्ष्म मसद्य श्रोणिभ्यां भासद भंसंसो रि हामि ते
अर्थ- (ते अक्षीभ्यां नासिकाभ्यां ) तेरी भाखो और दोनों नार्कोने (कर्णाभ्यां छुयुकात् अधि ) कानों
मौर ठोटीसे (ते मस्तिप्कात् जिह्वायाः) तेरे मस्तकसे तथा जिद्वासे (शीर्पण्यं यक्ष्मं वि वृहामि ) सिर सम्बन्धी
रोगको हटाता हूँ ॥ १ ॥
(ते ग्रीवाभ्यः उष्णिहाभ्यः ) तेरे गले और गुर्देकी नाडियोंसे (कीकसाभ्यः अनूक्यात् ) पसलीकी इड़ियो
भौर रीढसे और (ते अंसाभ्यां, ते वाहुभ्यां ) तेरे कंधो और भुजामोसे (दोपण्यं यक्ष्मं वि वृहामि ) दोषोंको
मौर रोगोंको हटाता हूँ ॥ २॥
(ते हृदयात् , क्लोम्नः, हलीक्ष्णात् ) तेरे हृदय, फेफड़े और पित्ताशयसे (पार्थ्याभ्यां परि ) दोनों काखोंसे
(ते मतस्नाभ्यां) तेरे गर्दोसे (प्लीन्हः यफ्नः ) तिल्ली भौर जिगरसे (यक्ष्मं वि वृहामि) रोगको
हटाता हूँ॥३॥
(ते आन्त्रेभ्यः गुदाभ्यः ) तेरी आंतों और गुदासे (वनिष्ठो उदराद् अधि) मलस्थान और उदरसे (ते
कुनिभ्यां प्लाशेः नाभ्याः) तेरी कोसों, अन्दरकी थैली और नाभिसे ( यक्ष्म वि वृहामि) रोग हटाता हूँ ॥ ४ ॥
(ते ऊरुभ्यां अष्ठीवद्यां ) तेरी जंघाओसे और घुटनोंस (पाणिभ्यां प्रपदाभ्यां ) एटियों और पैरोंसे (ते
श्रोणिभ्यां ) तेरे कृत्होसे (भंसस , भसा, भासद) गह्मस्थानसे कटिके सम्बन्धके गुह्य ( यक्ष्मं वि वृहामि)
रोगको मैं हटाता हूँ ॥ ५॥
फफक्षयकी-चिकित्सा
(१६७)
अस्थिभ्य॑स्ते मज्जभ्यः स्नावभ्यो धमनिभ्यः। यक्ष्म पाणिभ्यामङ्गुलिभ्यो नखेभ्यो वि वृहामि ते ॥६॥
अङ्गअङ्गे लोम्निलोम्नि यस्ते पर्वणिपर्वणि ।
यक्ष्म त्वचस्यं ते वयं कश्यप॑स्य वीवर्हेण विष्वञ्च वि वृहामसि
॥७॥
अर्थ-(ते अस्थिभ्यःमजभ्यः) तेरी हड्डियोसे सौर मज्जासे (स्नावस्यः धमनिभ्यः) पुट्ठोंसे और नाडियोंसे
(ते पाणिभ्यां अंगुलिभ्यः नखेभ्यः) तेरे हाथ, अंगुलि और नाखूनोंसे ( यक्ष्मं वि वृहामि ) रोगको हटाता हूँ ॥६॥
( यः ते ) जो तेरे (अङ्गे अङ्गे लोम्नि लोम्नि पर्वणि पर्वणि) प्रत्येक अंग, प्रत्येक लोम और प्रत्येक जोडमें
(ते त्वचस्यं विवंचं यक्ष्म ) तेरी त्वचासम्बन्धी फैलनेवाले क्षय रोगको (कश्यपस्य विव£ण) कश्यपके उपायसे
(वयं विवृहामसि) हम हटा देते हैं ॥ ७ ॥
भावार्ध- आख, नाक, कान, बाहू आदि स्थूल शरीरके बढे अवयवोंसे, हृदय, प्लीहा, यकृत् आदि आन्तरिक भव-
यवोंसे हड्डी, मज्जा मादि धातुओसे अथवा जहां जहा रोग हो, वहासे उसे कश्यपको विद्यासे हम उन रोग जन्तुओंको दूर
करते हैं। १-७॥
मूक्त भस्पष्ट होने से इसके विषयमे कुछ लिखना मशक्य है।
कफक्षयकी चिकित्सा
कां. ६,
सू. १२७
(ऋषि- भृग्वाङ्गिराः । देवता.- यक्ष्मनाशन, वनस्पतिः।)
विधस्य बलासस्य लोहितस्य वनस्पते । विसल्पकस्योषधे मोच्छिपः पिशितं चन
यौ ते
बलास तिष्ठतः कः मुष्कावपश्रितौ । वेदाहं तस्य भेषजं चीपुर्दुरभिचक्षणम्
॥१॥
॥२॥
-
अर्थ- हे (वनस्पते) औषध ' (वलासस्य विद्रधस्य) कफक्षय, फोठे फुन्सी, (लोहितस्य विसल्पकस्य)
रुधिर गिरना और विसर्प अर्थात् त्वचाके विकारका (पिशितं मा चन उच्छिषः) मांस बिलकुल शेष न रहे ॥ ३ ॥
(बलास) कफरोग । (ते यो मुष्कौ कक्षे अपश्रितौ ) तुझसे बनी जो दो गिल्टियां, कांखमे उठी है। (तस्य
भेषजं अहं वेद ) उसकी औषध मैं जानता हूं । उसका (अभि चक्षणं चीपुद्रुः) उपाय चीपुट्ठ भौषधि है ॥२॥
भावार्थ- खांसी, कफक्षय, फोदे, फुन्सी और त्वचापर बढनेवाला विसर्प रोग, खांसीसे रक्त गिरना, और मांसमें
डोष उत्पन्न होना, यह सब इस चीपुटु नामक औषधीसे दूर होता है ॥ १ ॥
जिस रोगसे गिष्टियां बढती है, उसका भी भौषध यही चीपुनु भौषधि है ॥ २ ॥
(१६८)
अथर्ववेदका सुधांध अनुवाद
-
'दीघजीवन और आरोग्य'
यो अङ्गयो यः को यो अपोर्धिमल्पकः । वि वृहामा विमल्पक विधं दयामयम्
परा तमातं यक्ष्ममधराञ्चै सुवामसि
अर्थ- (यः अंग्यः) जो अंगोमे, (यः कर्ण्यः) जो कर्णमे, (यः अयोः) शांगि, ( य. विमरपकः)
विमर्प रोग है, (विसरपकं विद्धं हृदयामय) उस विसर्प, फोटे बोर होगको (विरामः ) नत्र पर है। (तं
अक्षातं यक्ष्म) उस अज्ञात यक्ष्म रोगको (अधराञ्च परा सुवामलि) नांचंगी गनिये दर सी ॥३॥
भावार्थ- जो संगोक, कानो के, सांसोक, हदय के, स्कर या मांसक रोग होने, निगेगा और फोरे
फुन्सीका रोग है, अथवा इस प्रकारका जो भज्ञात रोग है,
মিনারি
दर
पो॥॥
चीपुद्रु' एक मोपधि है । यह नाम वेदमे में अन्य ग्रंथाम नहीं मिलना । हम मनमे इसका बहुत वर्णन १, परंतु
यह वनस्पति इस समय अज्ञात ही हैं। इस कारण इस विषयमे अधिक लिपना असमतल भापधिती बोर करनी
चाहिये । इसका कोई दूसरा नाम आर्यवैद्यकग्रंथोमे हो तो उसका भी पता लगाना चाहिये।
wenarwarod
Marwa
-
Ma
~
उसको एम
श्रीपधि द्वारा हम
क्षयरोयतिकारण
कां. ६, सू. १०
(प्रापि - भृग्वनिग । देवता- यक्ष्मनाशगम् ।)
अग्नेरिवास्य दहत एति शुष्मिण उतेवं मत्तो विलपन्नायति ।
अन्यमस्मदिच्छत्तु कं चिंदतस्तपूर्वधाय नमो अस्तु तक्मने
॥१॥
नौ रुद्राय नमो अस्तु तक्मने नमो राज्ञे वरुणाय विपीमते ।
नौ दिवे नमः पृथिव्यै नम ओषधीम्या
॥ २ ॥
अयं यो अभिशोचयिष्णुर्विश्वा रूपाणि हरिता कृणोपि ।
तस्मै तेऽरुणाय वभ्रवे नमः कृणोमि वन्याय तक्मने
|॥३॥
अर्थ-(दहतः शुष्मिणः अस्य अग्नेः इव) जलानेवाले इस बलयान् अग्निके तापके समान यह ज्वर (पति)
आता है । (उत मत्तः इव विलपन् अपायति) और उन्मत्तके समान यसबढाता हुआ चला जाता है। (अग्रतः
अस्मत् अन्य के चित् इच्छतु) यह अनियमवाले मनुष्यको आनेवाला ज्वर हमसे भिन्न किसी दूसर मनुष्यको दर लेवे
(तपुः-वधाय तक्मने नमो अस्तु) तपाकर वध करनेवाले इस ज्वरको नमस्कार हो ॥ १॥
रुद्र, (तक्मने) ज्वर, (त्विपीमते) तेजस्वी राजा वरुण (दिवे पृथिव्यै ओपधिभ्यः ममः) घुलोक भूलोक
और भौषधियाँ, इन सबके लिये नमस्कार हो ॥२॥
(अयं यः अभिशोचयिष्णुः) यह जो शोक यढानेवाला है, (विश्वा रूपाणि हरिता कृणोपि ) सब रूपोको
पीला और निस्तेज बनाता है, (तस्मै ते अरुणाय वभ्रवे) उस तुझ लाल, भूरे भौर (वन्याय सफ्मने नमः कृणोमि)
वनमें उत्पल ज्वरको नमस्कार करता हूं ॥३॥
क्षयरोगका-निवारण (१६९) । क्षयरोग निवारण ज्वरके लक्षण और परिणाम ८ अभिशोचयिष्णुः- गोक थानेवाला है । (मं.३) म सुमसे बरके रक्षण और परिणाम कहे है, देखिये ९ विश्वा रूपाणि हरिता कृणोति- शरीरको हरा, टन सूचक शब्द ये है- पीला भर्यात् निस्तेज बनाता है। ज्वर भानेवालेका गरीर , अग्निः इव दहन्- भनि समान जलाता है, ध्वरके फीका होता है । (म ३) भाने के बाद पारीर अनि ममान उण होता है और यह १० वन्यः- वनमे इसकी उत्पत्ति है । (म, ३) उगता रक्तको जाती है। (म.) इस वृत्तमे इतने ज्वरके कारण, लक्षण और परिणाम कहे २ शुग्मिन्- शोप उत्पन्न करता है, सुपा देना है। हैं। व्रत पाल्न अर्थात नियम पालन करनेसे यह ज्वर नही शरीरको सुखाता है। (मं.१) माता क्षौर माया हुआ हट जाता है। इसलिये इसको ३ मत्तः इव विलपन्- पागल जैसे रोगीको समासा 'अवत' कहा है । पृथ्वी भूमि, सौषधी, वरुणराजा सय है, इस कारण वह रोगी बदबाता रहता है । (म.) जलस्थान, रुद्र के स्दसूक्तोक्त स्थान और रूप इनकी सुव्यव- ४ अवतः- यह ज्यर व्रतहीन अर्थात् नियम पालन न स्थासे यह ज्वर हट जाता है । करनेगरेको ही भाता है। अर्थात नियमानुकूल व्यवहार रुद्र सूक्नमें रुद्रका जो वर्णन है उसका विचार करनेसे करनेवाले को नही मताता। (मं.) पता लगता है कि यह ज्वर रुद्रका रूप है। रुदके दो प्रकारके ५तपुः वरः यह र तपाके वध करता रूप है, एक घोर (उग्ण) और एक शिव (शान्त)। (म १) इनके सम रहनेसे मनुष्यको भारोग्य प्राप्त होता है और ६ तक्मा- कष्ट देता है। (म.) विषम होनेसे रोग सताते है । इस प्रकार योजना द्वारा ज्वर ७ रुद्रः-- यह रुलानेवारा है। (मं. २ दूर करनेका उपाय जाना जा सकता है। है क्षयरोगका निवारण कां. ६, सू. १४ .. (ऋपि.- बभ्रुपिंगल । देवता- वलास ।) अस्थिसं परुसमास्थितं हृदयामयम् । वुलासं सर्वं नाशयाङ्गेष्ठा यश्च पर्वसु ॥१॥ निर्बलास वलासिनः क्षिणोमि मुष्करं यथा । छिनम्य॑स्य॒ वन्धनं मूलमुर्वाि ईव ॥ २॥ निवलासेतः प्र पंतागुंगः शिशुको यथा । अथो इट इव हायनोपं द्राह्यवीरहा ||३|| अथ-(अस्थिस्लंसं परुलंस) हटियों और जोडोमे ढीलापन लानेवाले (आस्थितं दृदयामयं) शरीरमे रहने- बाले हृदयके रोगको अर्थात (सर्व वलासं) सब क्षय रोगको भौर (यः अंगेष्ठाः च पर्वसु) जो अवयवो और जोडोमे रहते हैं, उन मय रोगोको (नाशय) नष्ट कर दे ॥ १ ॥ (यथा मुप्-करं) जिस प्रकार चोरी करनेवालेको दूर किया जाता है। (पलासिनः बलासं नि:क्षिणोमि) उसी प्रकार क्षयरोगको दूर करता हू। (उर्वार्वाः मूलं इव)जैसे ककढीके जठको काटते हैं (अस्य बंधनं छिनभि) उसी प्रकार इस रोगके संबंधको छेद डालता हूं ॥२॥ हे (बलास) क्षयरोग । (यथा आशुंगः शिशुकः) जिस प्रकार शीघ्रगामी यउटा जाता है। (इतः मिः प्रपत) उसी प्रकार यहासे हट जा । (हायनः इटः इव) जैसे प्रतिवर्ष उगनेवाला भास नाशको प्राप्त होता है (अथो अधीरहा अप द्राहि) उसी प्रकार वीरोका नाश न करनेवाला त् यहांसे भाग जा ॥३॥ २२ (मथर्व भा. ४ हिन्दी)
(१७)
अथर्ववदका सुबोध अनुवाद - 'दीर्घजीयन और आरोग्य'
कफक्षय
इस सतमे 'बलास' शब्द है, इसका अर्थ कफ और कफाक्षय है। यह शरीरक पों, जोड़ी, हदय और अन्यान्य
अवयवों में रहता है और रोगीका नाय करता है । इसको दूर करनेका वर्णन इस सूक्तमे है । इसमे जिम उपायका वर्णन है,
उसका पता नहीं चलता। इसलिये क्षयरोग निवारणका जो उपात्र इस सूनम कता है उस विषय में कुछ अधिक कहना,
विना अधिक सोज किये, कठिन है। हमारे विचारसे नो यह मूल मानमचिमित्मामा मून है । अपने मनके स्वास्थ्यप्रभाव-
पूर्ण विचारोम रोगीके रोग दूर होते है। इसका यहां संबध प्रतीत होता है ।
प्र
रवासीको दूर करना
को. ६, सू. १०५
(ऋपिः- उन्मोचनः । देवता- कासा ।)
यथा मनो मनस्केतैः परापतत्याशुमत् । एवा त्वं कासे प्र प॑त मनसोऽनु प्राय्यम ॥१॥
यथा बाणः सुसंशितः परापतत्याशुमत् । ए॒वा त्वं कासे प्रपंत पृथिव्या अनु संवतम् ॥२॥
यथा सूर्यस्य रश्मयः परापतन्त्यागुमत् । एवा त्वं कासे प्र पंत समुद्रस्यानु विक्षुरम् ॥३॥
अर्थ- (यथा आशुमत् मनः) जिस प्रकार शीघ्रगामी मन (मनस्केतः परा पनति) मनके विषयों के साथ
दूर जाना है, (एवा) इसी प्रकार, हे ( कासे) खासी आदि रोग (वं मनसः प्रवाय्यं अनु प्र पत) तू मनके
प्रवाहके समान दूर भाग जा ॥ १ ॥
(यथा सुसंशितः वाणः ) जिस प्रकार अतितीक्ष्ण वाण (आशुमत् परापतति ) शीव्रतासे दूर जाकर गिरता है
(एवा) इसी प्रकार, हे (कासे ) सासी' (त्वं पृथिव्याः संवत अनु प्रपत) तू पृथ्वीक निन्न स्थलमे गिर जा॥२॥
(यथा सूर्यस्य रश्मयः) जिस प्रकार सूर्यकिरण (आशुमत् परापतन्ति) वेगसे दूर भागते हैं, (एवा ) इस
प्रकार, हे (कासे ) सासी ! त् (समुद्रस्य विक्षरं अनु प्रपत) समुद्रक प्रवाहक ग्यमान दुर गिर ॥३॥
भावार्थ- मन, सूर्यकिरण और वाण इनका वेग बहा है। जिस वेगसे ये जाते है, उस वेगसे खांसीकी बीमारी दूर
होवे ॥ १-३॥
(समवत सांसी निवारणका उपाय मनके नीरोग सकरप और सूर्यकिरणके संबधर्म होगा।)
-
-
হFহpহত্য-=
कां., १ सू. १२
ऋषि - मृग्वगिरा। देवता- यक्ष्मनाशनम् ।)
जरायुजः प्रथम उत्रियो बृपा बातभ्रजा स्त॒नय॑न्नेति वृष्ट्या ।
नो
मृडाति तन्य ऋजुगो रुजन् य एकमोबेधा विचक्रमे
॥ १॥
अर्थ-(वात+ध्र+जाः) वायु और मेघसे उत्पन्न होकर (प्रथमः जरायुजः) पहिली जेरीसे उत्पन्न होने-
वाला (राचय बृपा) तेजस्वी बलवान सूर्य (वृष्ट्या स्तनयन) वृष्टिके साथ गरजता हुमा (एति) चलता है ।
(स ऋजुगः) वह सीधा चलनेवाला और (रुजन) दोष दूर करनेवाला (नः तन्वे ) हमारे शरीरको (मृडाति) सुख
देता है । (यः) जो (एकं ओजः) एक मामध्यंको (घा) नीन प्रकारसे (विचक्रमे) प्रकागित करता है ॥ १॥
श्यालादि-रोग-निवारण (१७१) अङ्गअङ्गे शोचिषा मिश्रियाणं नमस्यन्तस्त्वा हुविपी विधेम । अान्समकान् हविषा विधेम यो अभीपास्या नीता ॥२॥ मुञ्च शीर्पक्त्या उत कास एनं परुष्पराविवेशा यो अस्य । यो अभ्रजा वातजा यश्च शुष्मो वनस्पतीन्सचता पर्वतांश्च शं मे परस्मै गात्राय शमस्त्ववराय मे । शं मे चतुर्यो अङ्गेभ्यः शमस्तु तन्वे मम ॥४॥ अर्थ-(अंगे अंगे) प्रत्येक अवयवमें (शोचिपा शिश्रियाणं) अपने तेजसे रहनेवाले (त्वा) तुझको (नमस्यन्तः) नमन करते हुए (हविपा विधेम) तेरी अर्पण द्वारा पूजा करते है। (यः) जो (अभीता) ग्रहण करनेवाला (अस्य पर्व) इसके जोडको (अग्रभीत्) ग्रहण करता है उसके (अंकान्' समंकान्) चिन्होको और मिल हुए चिन्होको (हविषा विधेम) हवनके अर्पणजे पूजें ॥२॥ (गीपंक्त्याः) सिरदर्दसे ( उत) और (य. कासः ) जो खांसी है उससे ( एनं मुञ्च) इसको छुडा । तथा (अस्य) इसके (परुः परः ) जोद जोडमें जो रोग (आविवेग) घुस गया है उससे भी छुडा । (यः अभ्रजाः) जो मेघोंकी वृष्टिले उत्पन्न हुआ है अथवा जो (चात+जाः) वायुले उत्पन्न हुआ है तथा जो (शुष्मः) उष्णताके कारण उत्पन्न हुमा है, उमको दूर करनेके लिय (वनस्पतीन् पर्वतान् च । वृक्ष, वनस्पति और पर्वतोके साथ (सचतां) सबंध करें ॥३॥ भावार्थ- वायु (मे परस्मै गात्राय शं) मेरे श्रेष्ठ भवयवोका कल्याण हो । (अवराय शं अस्तु) मेरे साधारण अवयवोका कल्याण हो । (मे चतुर्थ्यः अंगेभ्यः शं) मेरे चारो अंगोको आरोग्य प्राप्त हो । (मम तन्वे शं अस्तु ) मेरे गरीरके किये सुख होवे ॥ ४ ॥ और मेघसे प्रकट होकर मेघोके आचरणसे प्रथम बाहर निकला हुआ तेजस्वी वृष्टि और मेघगर्जनाके माथ भा रहा है । वह अपनी सीधी गतिसे दोषो अथवा रोगोको दूर करता हुआ हमारे शरीरोकी निरोगता वढाता है और इमें सुख देता है । वह सूर्यका एक ही तेज तीन प्रकारसे कार्य करता है ।। १ ।। वह गरीरके प्रत्येक अगमे अपने तेजक अंगसे रहता है, उसका महत्त्व जानकर, हम हवन द्वारा उसका सत्कार करते है । जो मनुग्यके हरएक जोडमें रहता है उसके प्रत्येक चिन्हका भी हवन द्वारा हम सत्कार करते हैं ॥ २ ॥ इसकी सहायतासे सिरदर्द हटाओ, खांसी हटाओ, जोडके भटरकी पीडाको हटाओ । जो रोग मेघोझी वृष्टिसे अर्थात् कफसे, वायुके प्रकोपसे अर्थात वातसे और गर्मीक कारण अर्थात् पित्तसे होते है उनको भी हटाओ। इसके लिये वनस्पतियों और पर्वतोंका सेवन करो ॥३॥ इससे मेरे उत्तम अंग, साधारण अंग तथा मेरे चारो अंग अर्थात मेरा सव गरीर नीरोग होवे ॥४॥ श्वासादि रोग-निवारण सूक्त यह 'तक्मनाशन गण' का सूक्त है अर्थात् रोगादि- वर्णन वेदमे अनेक स्थानमे आया है । यहांका यह वर्णन नामक भाव इसमें है। समझने लिये कुछ निसर्गकी ओर ध्यान देनेकी भावश्य- महत्वपूर्ण रूपक सबसे पहले प्रथम मंत्रमें वर्णित महत्त्वपूर्ण रूपक विचार वरसातके दिनों जब कई दिन भाकाश मेघोसे नाच्छादित करने योग्य है । यहां सुपुत्रका वर्णन बढे महत्त्वपूर्ण रूपकसे रहना है और सूर्यदर्शन नहीं होता, वृष्टि होती है, वायु चलती किया है । इस रूपकमै सूर्य ही पुत्र' हे सूर्यके पुत्र होनेका है, विजली चमकती है तब कभी कभी ऐसा होता है कि थोडी कता है।
(१७२) अथर्ववेदका सुयोष अनुवाद दीर्घसीवन और आरोग्य' - . वायु चलनेले बीचमा भाकाम मेघरहित हो जाता है और नहीं है । प्रसनिक स्थानम भी विपुर प्रकाश माना चाहिये, स्वच्छ सूर्य-मंगल दिखाई देता है। मानो यही पुन-दर्शन तभी माता मोर नृतन उत्पन्न बालकका स्वान्ध्य उत्तम रह है। पुत्रजन्मके समयमें भी प्रसूति होते ही गर्भके उपर जेरी मकता है। यदि बरके कमरोमे विपुल प्रकाम माता रहेगा मादिका वेष्टन होता है, जलादि प्रवाह प्रसूतिके समय होते तो घरवालोंका स्वास्थ्य ठीक रहेगा। इस प्रकार वेट कहना है, यह सब मानो सूर्यपर वेष्टित मेघ और उनकी दृष्टि है। है कि सूर्य प्रकाश सबके स्वास्थ्यक लिये भावश्यक है। इस प्रकार इस उपमाम साम्य देख सकते है। प्रथम मत्रका मंतिम कथन है कि (एकमोजोधा विच- बहुत दिनोंतक मेवाच्छादित माझागके पश्चात जब मूर्य क्रमे) अर्थात एक ही प्राक्ति तीन प्रकार प्रकागित हो रही दर्शन होता है, हवा साफ हो जाती है तब मनुर्योको अत्यंत है। यह बात कई न्यानामें सत्य है। सूर्यका ही तेज धुलो- मानद होता है, मनुष्य प्रसन्न चित्तने उत्सव मनाते है। कमें सूर्य प्रकाराने, अतरिक्षमें विद्युन रूपने और भूलोकमें इसी प्रकार जब गाभणी म्बीके पुत्र प्रसव होता है, उमपरकी भग्निके रूपले प्रकाशित हो रहा है। यही बात शरीरमें जेरी अलग की जाती है, उसको स्वच्छ किया जाता है, तब मस्तिष्कम मज्जास्पमें, हृदयमें पाचनानि के रूपमे भौर उसका मुसरूपी सूर्य देखकर जो आनढ माताके हृदयमे सव गरीन्में उगताके रूपमे सूर्यका तेज प्रकाशता है मौर चमक उठना है उसका वर्णन क्या कभी गन्दीमे होना मभव विविध कार्य करता है। आरोग्यका विचार करनेके समय है ' माताका आनंद इन्ही गन्दोसे व्यक्त हो सकता है कि इस वातका अवश्य विचार करना चाहिये । सूर्य प्रकामसे यह पुत्र घरका सूर्य है, यह माताके हृदयकी ज्योति है, इन तीनो शारीरिक स्थानोमे योग्य परिणाम होकर शरीरका यही माताकी सांसोका प्रकाश है।' जिस प्रकार सूर्य अधेरा आरोग्य होता है, बुद्धिका तेज बटता है और सुखकी वृद्धि हटाता है, उसी प्रकार पुत्र घरको, कुलको और जातिको होती है । यह है संक्षेपले सूर्यका हमारे भारोग्यसे संबंध । उज्ज्वल बनाता है।' इस प्रकार बालक के मुखकी रोगनीका इम रीतिमे प्रथम मत्रमे भारोग्यका मूलमंत्र बताया है वर्णन माता अपने शब्दरहित भावोंसे ही कर सकती है। और उपमासे यह भी कहा है कि जिस प्रकार घरमें वारक- परंतु यहा नृतनोत्पन्न बालकका वर्णन ही करना नहीं है, रुपी सूर्यका उदय होता है, उसी प्रकार विश्वमें दिवस्युन कितु जीवनदाता सूर्यका ही वर्णन भर्थात् सूर्यके जीवन- सूर्यका उदय होता है । घर एक छोटा विश्व है तथा विश्व ही पोषक रश्मि-रग्मायनका वर्णन करना एक वढा घर है । इसलिये इस घरके सूर्यका और विश्वके प्राय प्रसूतिके समय तथा पश्चात् स्त्रियोंमें भगक्तता मा सूर्यका संबंध देखना चाहिये । मारोग्यके लिये तो इस घरके जाती है और नाना रोगोके उत्पन्न होनेकी संभावना उत्पन्न सूर्यका विश्वक साथ संबंध करना चाहिये अर्थात् जहातक होती है । इसलिये इस कष्टको दूर करना सुगमतास किस हो सके वहांतक बालकको घरमें बंद न रखते हुए विश्वसूर्यके रीतिसे साव्य होता है, यही बताना सूक्तका मुख्यतया विषय खुले प्रकागमें शनै गर्न लानेका यत्न करना चाहिये, है। मानो इस मिपमे मारोग्यका विषय इस सूक्तमे प्रदर्मित जिससे घरका सूर्य भी नीरोग और बलवान बन मके किया है। सूर्यकिरणोंसे चिकित्सा भागे द्वितीय मंत्रमें कहा है कि (अंगे अंगे शोचिपा मूर्य ही भारोग्यका दाता है यह बात इस सुस्तके प्रथम- शिश्रियाणं ) शरीरके प्रत्येक अंगमे तेजके अंगसे यह सूर्य मन्त्रक उत्तराधमें स्पष्ट कही है। रहता है, उनको (नमस्यन्तः) नमन करना चाहिये, नो भर्थात् उसका भादर करना चाहिये, सूर्यके तेजले भपने रुजन् मृडाति । (मं.) तेजको बढाना चाहिये । जो लोग वरके अंधेरे कमरेमे अपने 'मीये जानेवाले दोषोका नाम करके वह (सूर्य) हमारे आपको वंढ रखते हैं वे निस्तेज होते है, परंतु जो न्बुली हवामे गागरोंको भागेग्य देता है,' इस मत्र भागका स्पष्ट भागय घूमते हुए सूर्यप्रकागसे अपना तेज बढाते हैं वे तेजस्वी होते यह है कि वह सूर्य दोपोंको दूर करता है और मारोग्य जाते है। बढाता है। यदि यह सत्य है तो यह भी सत्य है कि सूर्य गरीरके प्रत्येक (पर्व ) जोडमे यह अंग रहता है, इस प्रभाग जहा नही पहुचता वहा भारोग्यका रहना समव ही सूर्यके अंगने इस स्थानपर (ग्रभीता) अपना अधिकार है आरोग्यका दाता तन्वे स ऋजुगो
विप-चिकित्सा
(१७३)
--
जमा रखा है। हरएक भवयवमे इसके ( अंकान ) चिन्हो- पित्त, (अभ्रजाः) कफके प्रकोपकं कारण उत्पन्न हुए
को पहचानना चाहिये और ( समंकान् ) मिले जुले चिन्दो सन्य रोगोका भी उसी युक्तिसे दूर करनेका मार्ग तृतीय
को भी पहचानना चाहिये। जैसे भाखमै तेजरूपसे सूर्यका मंत्रम बताया है । (पर्वतान् सचतां) तथा पर्वतो पर
निवास है, अन्य स्थानोमं अन्य अंगोंसे है। यह सब जानना रहकर (वनस्पतीन् सचतां) उचित वनौषभियांका
चाहिये । और जिम स्यानम अनिरोग्य या बीमारी हुई हो सेवन करनेका भी उपदेश इसी मंत्रमे है। वनौषधियोंका
उस स्थानका भारोग्य सूर्य-प्रकाशका उचित रीतिने प्रयोग सेवन करनेका भी उपदेश इसी मंत्रमें है। वनौषधियोका
करके प्राप्त करना चाहिये । सबेरेके मंद सूर्यके प्रकागमे सेवन दो प्रकारसे होता है, एक वृक्षाटिकोके नीचे रहनेसे
खुली भांखसे सूर्यका विव देखनेले त्रायः नेत्ररोग दूर हो जाते और दूसरे योग्य औषधियोके रसादिका उपयोग करनेसे
हैं । विशेष नेत्ररोगोंके लिये विशेष युनिसे सूर्य-किरणका पर्वतोके उच्च शिखरोपर निवास करना और वृक्षोंके नीचे
प्रयोग करना चाहिये। विशेष अंगके लिये भी विशेष युक्तिस बैठना उठना बडा आरोग्यदायक है, यह बातें हमने कई
ही सूर्यकिरणका प्रयोग करना होता है साधारण मारोग्यके रोगियोपर युक्तिसे आजमाई है और हमारे अनुभवसे बड़ी
लिये वह विशेष अवयव सूर्यकिरणोमें तपानेसे भी बहुतसा
लाभदायक सिद्ध हुई है।
कार्य हो जाता है। इस युनिसे केवल सूर्य-किरणचिकि चतुर्य मंत्रमे सिर आदि उत्तमांग तथा पांव आदि मध-
सासे बहुतसे रोगोको दूर करना सभव है । यदि सूर्य रांग तात्पर्य सब शरीरका स्वास्थ्य-पूर्वोक्त रीतिसे प्राप्त
सहन होने लायक उष्ण प्रकागसे नंगा शरीर कुछ देरतक उपाय करनेका प्रार्थना मंत्रहारा बताया है।
तपाया जाय तो भी सर्वसाधारण शरीरकी नीरोगता बढती
है । गीतकालमे यह करना उत्तम है, परंतु गर्मीकै दिनो
सर्वसाधारण उपाय
और उया देशो में विचारसे और युक्तिसे ही इसका प्रयोग इस सूक्तसे सर्व साधारण लिये भी बडा बोध प्राप्त हो
करना चाहिये । नहीं नो मारोग्यके स्थानपर अनारोग्य भी सकता है । मुख्य बात है कि जो नगे होकर सूर्यको किरणोसे
हो सकता है इसलिये यह सब अभ्यास युक्तिने ही वटाना घूमते है अर्थात् अपने शरीरको सूर्यकिरणोसे तपाते है उनको
चाहिये।
चर्म रोग, खासी, दमा तथा क्षय आदि रोग होते ही नहीं।
तृतीय मंत्रमे (शीर्षक्त्याः) सिरदर्द, (कासः) ये सब रोग उनको होते है कि जो नंगे गरीरपर सूर्यकिरण
खामी, (परुः) संधिस्थानके रोगोका उक्त भी प्रकार नहीं लेते, अर्थात सदा वस्त्रोसे वेष्टित होकर तंग मकानोमे
हटानेका उपाय बताया है । (वातजाः) वात, (शुष्म ) रहते है । वेदमें इसीलिये घरका नाम ही 'क्षय' आता है।
,
।
विष-चिकित्सा
को. ७, सू. ५६
(ऋषि:- अथर्वा । देवता- वृश्चिकादयः, वनस्पतिः, ब्रह्मणस्पति ।)
तिरश्चिराजेरसितात्पदाको परि संभृतम् । तत्कङ्कपर्वणो विषमियं वीरुदनीनशत ॥१॥
अर्थ- (तिरश्चि-राजे: अलितात्) तिरछी रेखावाले, काले और (पृदाको. कंकपर्वणः) नाग जैसे पर्ववाले
सांपके (संभृतं तत् विपं) इकट्ठे हुए उस विषको ( इयं वीरुत् परि अननिशत्) यह वनस्पति नष्ट करती है॥१॥
भावार्थ- जिसपर तिरछी लकीरें होती है और जिसके पर्व होते है ऐसे सांपके विषको मधु नामक वनस्पति दूर
करती है ॥ ३॥
अथर्ववेदका सुबोध अनुवाद (१७४) - दीर्घजीवन और आरोग्य - ॥२॥ इयं वीरुन्मधुजाता मधुश्चन्मधुला मधूः । सा विहृतम्य भेपज्यों मशकजम्बनी ||३॥ यतो दुष्टं यतो धीतं ततस्ते नियामसि । अर्मस्य तृप्रदुशिनों मशकस्थासं विषम् अयं यो वक्रो विपङ्गा मुखानि चक्रा जिना कृणोपिं । ॥४॥ तानि त्वं ब्रह्मणस्पत हुपीकामिव सं नमः अरसस्य शर्कोटस्य नीचीनस्योपसर्पतः । विपं ह्यश्यादिष्यथो एनमजीजमम् न ते बाह्रोर्बल मस्ति न शीर्षे नोत मध्यतः । अथ किं पापामुया पुच्छे बिभर्यकम् ॥६॥ || ७॥ अदन्ति त्वा पिपीलिका वि श्चन्ति मयू: । सबै मल वाथ शार्कोटमर्स विषम् अर्थ-(इयं वीरुत् मधु-जाता मधुला) यह वनस्पति म बुग्ताक साथ उत्पन्न हुई, मधुरता देनेवाली (मधुश्चुत् मधृः) मधुरताको चुआनेवाली और स्वयं भी मधुर है । (सा विहरूतस्य भेपजी) वह इटिल मापके विपकी मोपधि है और वह (मगक-जम्भनी) मच्छरोका नाश करनेवाली है ॥२॥ (यतः दृष्टं ) जहां काटा गया है, (यतः धीतं) जहाले खून पिया गया है, (ततः) वहाँस (तृप्रदंशिनः अर्भस्य मशकस्य ) नीक्ष्णतासे काटनेवाले छोटे मच्छरके (अरसं विषं निः द्वयामसि) रसहीन विषको हम हटा देत है ॥३॥ हे (ब्रह्मणस्पते ) ज्ञानके स्वामिन् । (यः अयं चक्रः वि-पमः) जो यह टेढा और संधिस्थानमें शिथिल और (व्यंगः) कुरूप अंगवाला हुमा है और जो (मुखानि वका वृजिना कृणोपि) मुसोको टेढ़े मेढे और विरुप करता है, (तानि त्वं इपिकां इव सं नमः) उनको तू मुझके समान सीधा कर ॥ ४ ॥ (अरसस्य नीचीनस्य उपसर्पतः) नीरस और नीचेसे आनेवाले (अस्य शोर्टस्य वि) इस विच्छू या सर्पके विपको मै (आ अदिपि) सपिढत करता हूं, (अथो एन अजीजभं) और इसको मार डालता हूँ ॥ ५॥ हे विच्छ (ते बाह्वोः वलं न अस्ति) तेरी बाहुओमे बल नही ह और (नः मी उत न मध्यतः) न सिरम भौर ना मध्य भागमें ही है । (अथ कि अमुया पापया) तब फिर क्यो इस पापवृत्तिसे (पुच्छे अर्भकं विभर्षि) पुच्छमें योडामा विप धारण किए रहता है ? ॥६॥ (पिपीलिकाः त्वा अदन्ति) चीटियां तुझे खाती है, (मयूर्यः विवृश्चन्ति) मोरनियां तुझे काट डालती है । (सर्वे भल वाथ) सब भली प्रकार कहते हैं कि (गाट विपं अरसं ) बिच्छुका विप खुष्की करनेवाला है ॥ ७ ॥ भावार्थ- यह बनस्पति मीठे रमवाली है, मिठासके लिये प्रसिद्ध है, इसका नाम मधु है । वह विषयाधासे टेठेमेटे रोगीके लिये उत्तम औषधि है । इससे मच्छर भी दूर होते हैं ॥२॥ जहा काटा गया है और नहांसे रक्त पिया गया है, वहांगे मच्छर आदिक विषको उक्त लोपधिके प्रयोगसे हटा देते हैं ॥३॥ विपत्राचासे जो रोगी टेढा मेढा, विरूप अंगवाला, ढीले सवियोवाला हो गया है और जो अपने मुख टेढ़े मेढे करता रोगीको इस औषधि द्वारा ठीक किया जा सकता ॥४॥ नीचेने भानेवाले बुष्की पैदा करनेवाले, मापके या विच्छक विपको हम इससे दूर करते हैं और उनको हम मार भी देते हैं ॥५॥ विच्छका वल वाहुमोमें, मिरक अथवा मध्यभागमे नहीं है। कंवल पलके अग्रभागमें उसका विष रहता है ॥ ६ ॥ चीटियां, मोरनिया या मुर्गियां उसको (बिच्छू और सांपको भी ) सा जाती है । इनका विष शुष्कता उत्पन्न करने- वामा है म वनस्पनिसे यह विष निर्यल हो जाता है ॥ ७ ॥ । shoot --
विपको दूर करना
(१७५)
य उभाभ्यां प्रहरसि पुच्छेन चास्येनि च । आस्ये न ते विपं किमु ते पुच्छधावसत् ||८॥
अर्थ-(यः पुच्छेन च आस्येन च उभाभ्यां) तू पृछं और मुख दोनोग्ये (प्रहरसि) प्रहार करता है
परन्तु (ते आस्ये विपं न) नेरे मुसमें विप नहीं है, (किं उ पुच्छधा असत्) फिर पंछसे क्या है ? ॥ ८ ॥
भावार्थ-विच्छ पंठसे प्रहार करता है, मुसले भी काटता है । पर इसके मुसम विष नहीं है केवल पूछमे ही है ॥८॥
इसमें सर्पविष अथवा बिच्छूका विष दूर करने के लिये मथुनामक औषधिका उपयोग करनेको कहा है। यह औषध
शर्तिया इलाज है । परंतु यह कौनसी वनम्नति है इसका पता नहीं चलता। विषबाधाले शरीरपर जो परिणाम होता है,
उसका वर्णन चतुर्य मंत्रमें है । भयंकर सर्पविपने मनुष्य कुरूप और टेढामेटा हो जाता है । इस सूक्तमे कहा हुआ भन्य
भाग मुबोध है । इसलिये उस विषयमे अधिक लिसनेको आवश्यकता नहीं है ।
विपको
कां. ४, सू. ६
दूर करना
.
(ऋपि - गरुमान् । देवता - तक्षक ।)
ब्राह्मणो जल्ने प्रथमो दर्शशीपो दास्यः । स सोमै प्रथमः पपो स चकारारसं विषम्
यावती द्यावापृथिवी वरिम्णा यावत्सप्त सिन्धवो वितष्ठिरे ।
वाचे विषस्य दर्पणी तामितो निर्रवादिषम्
॥२॥
सुपर्णस्त्वा गुरुत्मान्विर्ष प्रथमावयत् । नामीमदो नारूरुप उतास्मा अभवः पितुः ॥३॥
अर्थ-(प्रथमः दशशीर्पः दशास्या ब्राह्मणः जज्ञे) सबसे प्रथम दस सिर और दस मुसवाला ब्राह्मण हुक्षा।
(सःप्रथमः सोमं पपौ) उसने पहले सोमरसका पान किया और (सः विप अ-रसं चकार) उसने विषको रसरहित
बना दिया ॥१॥
(यावती द्यावापृथिवी वरिम्णा) हातक द्युलोक और भूलोक फैले हुए है और (सप्त सिन्धवः यावत्
वितष्ठिरे ) सात नदियां फैली हुई है, वहांतक (विपस्य दूपणी तां वाचं ) विषको दूर करनेवाली उस वाणीको (इतः
निरवादिय) यहासे मैने कह दिया है ।। २ ॥
हे विष ' (गरुत्मान् सुपर्णः) वेगवान् गरुडपक्षीने (प्रथमं त्वा आवयत्) प्रथम तुझे खाया। उसे (न
अमीमदः) न तूने उन्मत्त किया और (न अरूरुपः) न बेहोश ही किया । (उत अस्मै पितुः अभवः ) पर इसके
विपरीत उसके लिए,भन्न बन गया ॥ ३ ॥
भावार्थ-ज्ञानी ब्राह्मणने सोमपान करके विषको दूर किया ॥ १॥
यह विप दूर करनेके उपाय की मैं घोषणा करता है, यह सय जगत्मे फैल जावे ॥२॥
गस्टपक्षीको विपकी बाधा नहीं होती, वह विष साता है परन्तु वह न तो पागल होता है और ना ही बेहोश होता है,
क्योकि विष तो उसके लिए अस जैसा है ॥३॥
अथर्ववेदका सुबोध अनुवाद 'दीर्घजीवन और आरोग्य' न - बस्न आम्यापोटगुरिर्वनाच्चिदधि धन्वनः । अपस्कम्भस्य शल्यान्निरवोचमहं पिषम् ॥४॥ ॥ ५॥ गुल्गाद्विप निबोच प्रार्जनादुत पर्णधेः । अपाष्ठाच्छृङ्गात्कुलमलान्निरवोचम॒हं विपम् अरमन इपो शन्योऽयों न अग्मं विषम् । उतारसस्य वृक्षस्य धनुष्टं अरसारसम् ॥६॥ ये अपीमन्ये अदिहुन्य आस्यन्ये अवासृजन । सर्वे ते वर्धयः कृता वर्धिर्विपगिरिः कृतः ॥ ७ ॥ बधंयग्ने गनिनागे वधिस्त्वम्यापधे । चधिः स पर्वता गिरियो जातमिदं विषम् ॥ ८॥ अर्थ- (य पंचांगुरिः) यि पाच भगुलियोन युन बीरने ( वक्रात् चित् धन्वनः आधि) टेढे धनुषके ( अगमम्य मल्यान्) मधन ने निकाले गए वाणसे (ते विषं अहं निरवोचं) विपको मैंने दूर किया है ॥ ४ ॥ (डाल्यात प्राञ्जनात् उन पर्णधेः ) मल्यो, नीके भागमे और पंववाले स्थानसे (विपं निरवोचं) मैने विष टाया, (आष्टात. गगान् , कुल्मलान्) फालये, मांगने और वाणके अन्य भागसे (अहं विपं निरवोचं) मैने नि!..॥ (यो ) गाण ! (ने गल्यः अग्सः) नेरे बाणके भागका हिस्सा निस्मार है, (अथो ते विपं अरसं) और पिमा माती (अरस) रमरहिन शुक । (उन अरसस्य वृक्षस्य ते धनुः) साररहित वृक्षका तेरा धनपर अन्स) निम्मच की जाए ॥६॥ ये अपन)लाने पीमा रे, (य अदिहन ) जिन्होने जलाया है, (ये आस्यन् ) जिन्होने फेका है, (ये अगल)निनियर बाग ठोसा है ( सर्व ते वध्रयः कृताः) वे सब निर्यल कर दिए गए है, (विपगिरि नधि न पिया भी नियंर कर दिए गए हैं ॥७॥ (और परी औषधि (ने खनितारः वध्रयः) तेरे ग्योदनेवाले निःसत्व हुए, (त्वं वधिः असि) तू ife: । (यन. इदं विप जानं ) जहांने यह विष उत्पन्न हुआ है । (स पर्वतः गिरिः बधिः) वह in Tभी नियमा भावार्थ-पार गंगाविप एर्ण बाण घगते हैं, उससे हम विपको दूर करते है ॥ ४ ॥ दिमान और प्रभागमे हम चिपसी करते है ॥५॥ र पर या हम पिसे नाहित करते ॥६॥ ; mait, इममे मा को बुझान, याण फकते है, मधमा चौधते है, उनके मय प्रयत्न इस रीतिसे # Artir frप भी नीम ही मिट आ7 || ७ ॥ असr freोदने धामि परवपर विपक्ष उगन है या परंग भी निःमय हुभा है ॥ ८ ॥ विप दूर करने का उपाय *April राय बगायो । पगि उपाय 'मोम पान'।माम पान करनेमे विष दूर होता 1.म मर गय ममे 17 कदर गार झोर दम मुग्रमाग ग्राहाण उपज हुमा, 'म मार दमाम्य मन्द माता विगेषण है। शीर्ष गद * : nare TAITE | दार गाभिमान मार अप गुना विद्वान, या इस मटका भाव है। - 1.::... राम टापि र टोना है, पर यहां भागय दीमता है। मर्वन ३ : ४ . . . . " frain र निषि यग्नेका उपाय यः मोम याग।। २. ! HTTriran दिनुा माता, उनका पिप उनी पंटम जाता है, पर ....... . . . . . ." frame wer मना कि इस विषयी योग्य शोज करनेसे - . ॥८॥ ६ - ----- --- TRENT गंधश निररनेका विपको दूर करना (१७७) विपको दूर करना कां. ४, सू. ७ (ऋपि.- गरुमान् । देवता- बनस्पति. 1) वारिदं वारयाते वरणावत्यामधि । तत्रामृतस्यासिक्तं तेना ते वारये विषम् ॥ १ ॥ असं प्राच्य विषमरसं यदीयम् । अथेदर्मधराच्य करम्भेण वि कल्पते || करम्भं कृत्वा तिर्य पीवस्पाकर्मुदाथिम् । क्षुधा किल त्वा दुष्टनो जक्षिवान्त्स न रुपः ॥ ३ ॥ वि ते मदै मदावति गुरमिव पातयामसि । प्र त्वा चरुमिव येपन्तं वर्चसा स्थापयामसि ॥ ४ ॥ परि ग्राममिवाचित वर्चसा स्थापयामसि । तिष्ठा वृक्ष ईव स्थाम्न्यधिखाते न रूरूपः ॥ ५ ॥ अर्थ- (वरणावन्यां अधि) वारणानामक औषधिमे रहनेवाला (इदं वार् वारयातै) यह रस, जल, विपको दूर करता है । (तत्र अमृतस्य आसिक्तं) वहां अमृतका स्रोत है (तेन ते विपं वारये) उससे तेरा विष मै हटाता हूं ॥ १ ॥ (प्राच्यं विपं अ-रसं) पूर्व दिशाका विप रसहीन होवे (यत् उदीच्यं अरसं) जो उत्तर दिशामे विष हो वह भी रसहीन होवे । (अथ इदं अधराच्यं ) और जो नीचेकी दिशाका यह विष है वह (करम्भेण विकल्पते ) दही से विफल होना है ॥ २॥ हे (दुः+तनो) दोपयुक्त शरीरवाले । (तिर्य-तिल्यं ) तिलोंका (पीवः+दाकं) पीके साथ पका हुआ (उदा- रथिं उदर-थि) पेटको ठीक करनेवाला (करम्भं) दही मिश्रित अन्न यदि (क्षुधा किल जक्षिवान् ) क्षुधाके अनु- क्ल खाया जाये तो (सः त्वा न रूरुपः) वह तुझे बेहोश नहीं होने देगा ॥३॥ फेक हे ( मदावति) मूळ लानेवाली । (ते मदं शरं इव वि पातयामसि ) तेरी येहोशीको वाणके समान दूर देते हैं। मोर (येषन्तं चहें इव) चूनेवाले बर्तनके समान (त्वा वचसा प्रस्थापयामसि ) तुझको वचा औषधिसे हम हटा देते हैं।॥४॥ (आचितं ग्राम इत् ) इकटे हुए ग्रामीण जनोके समान तुझको हम ( वचसा परि स्थापयामसि) वचा औषधिसे स्थिर कर देते हैं । ( स्थानि वृक्ष इव तिष्ठ) स्थानपर वृक्षके समान स्थिर रह । हे (अभ्रि-खाते ) कुदा- लसे खोदी हुई । तू (न रूरूपः) वेहोश मत कर ॥ ५ ॥ भावार्थ- वारणा नामक औषधिका रस विषको दूर करता है, उसमे जो अमृतका स्रोत होता है उससे विष दूर होता है॥1॥ इससे पूर्व दिशा और उत्तर दिशाका विप शान्त होता है। निम्नभागका विष दहीके प्रयोगसे विफल सा होता है ॥२॥ विष शरीरको विगाढता है। उसके लिये तिलोके पाकमे बहुत घी डाल कर उसका उत्तम पाक बनाकर और उसको दहीके साथ मिश्रित करके अपने पेटकी स्थिति और भूखके अनुकूल खाया जाय तो विषसे आनेवाली मूर्छा दूर हो । सकती है ॥३॥ औषधिके विषसे मूर्छा या बेहोशी आती हो तो उसके लिये वचा औषधिका प्रयोग किया जावे, इससे मूळ दूर होगी ॥ ४॥ वचा औषधि प्रयोगसे विष अपना असर नहीं कर सकता और बेहोशी दूर होती है ॥ ५ ॥ २३ (मथर्व. मा. ४ हिन्दी) (१७८) अथर्ववेदका सुवोध अनुवाद दीर्घजीवन और आरोग्य' -- - पृचस्तैस्त्वा पर्यंक्रीणन्दुशेभिरजिनैरुत । प्रक्रीसि त्वौपधेऽभिंखाते न रूरूपः अनाप्ता ये वः प्रथमा यानि कर्माणि चक्रिरे । वीरानो अत्र मा दन्तद्व एतत्पुरो दधे ॥७॥ अर्थ- (पवस्तैः दुर्शभिः उत अजिनः ) ओढनेकी चादर, दुगाले और कृष्णाजिनोंसे, हे ओपधे ! तू (प्रक्री: असि) सरीदी जाती है । हे (अभि-खाते) कुदालसे खोदी हुई 'तू (न रुपः) मृति नहीं करती ॥६॥ (ये प्रथमाः अनाप्तः ) जो पहिले श्रेष्ठ ज्ञानी पुरुष थे । उन्होंने (कः यानि कर्माणि चक्रिरे ) तेरे लिये जो कर्म किये, वे (नः वीरान् अत्र मा दभन् ) हमारे वीरोंको यहा कष्ट न दे । (तत् एतत् वः पुरः दधे) बह यह सब तुम्हारे सन्मुस मै धरता हूं ॥ ७ ॥ भावार्थ- यह मोपधि एक विकाऊ चीज है, इससे मूर्छा हट जाती है, इसलिये यह विविध वस्तुएं देकर खरीदी जाती है |॥६॥ इस प्रकारके सोपधिक प्रयोगसे प्राचीन ज्ञानी वैद्याने जो जो चिकित्साएं की थी, उनका स्मरण कर भार इस प्रकार अपने बालबच्चो तथा पुरुषोंको विनागसे वचा ॥ ७ ॥ दो औषधियां इस सूक्तम वारणा और बचा इन दो औषधियोका उपयोग विष दूर करनेके लिये कहा है । त्रिपके पेट में जानेपर मूर्छा मानेपर तिलौटनको दहीके साथ सानेका उपाय तृतीय मंत्रमें बताया है। ये सूक्त तथा इस प्रकारके जो अन्य सूक्त चिकित्साके साथ संबंध रखते है, उनका विचार ज्ञानी वैद्योंको ही करना चाहिये, क्योकि औषधिवाचक शब्दोके अर्थ कई प्रकार होते है और केवल भाषा विज्ञानसे यह विषय सुलाया नहीं जा सकता । इसलिये वैद्यकीय प्राचीन परंपराको नाननेवाले सुयोग्य वय यदि इस विषयकी खोज करेंगे तो इससे जनताका बहुत लाभ हो सकेगा। केवल भाषाविज्ञानी ऐसे सूक्तोका जो अर्थ करते है, उसको सुविज्ञ वैद्य ही ठीक रीतिसे सुधार सकते है और मर्यक सत्यासत्यका निर्णय भी वे ही कर सकते है। स्फशिष दूर करना को. १०, सू. ४ (ऋपि.- गरत्मान् । देवता- तक्षक. 1) इन्द्रस्य प्रथमो रथो देवानामपरो रथो वरुणस्य तृतीय हुन् । अहीनामपमा रथ स्थाणुमारदापत् ॥१॥ दर्भः शोचिस्तरूणकमश्वस्य चार: पल्पस्य बारः । रथस्य बन्धुरम् ॥२॥ अर्थ-(इन्द्रस्य प्रथमः रथः) इन्द्रका पहिला रय है, (देवानां अपरः रथः) देवोका दूसरा रथ है, (वरु- णस्य तृतीयः इत् ) वरुणका तीसरा है और (अहीना अपमा रथः) साँका नीच गतिबाला है जो (स्थाणुं आरत् अथकपत् ) संभपर चलता है और नागको प्राप्त होता है ॥ १ ॥ (दर्भः गोचिः तरुण ) कुशा, भाग, तृणविशेप और (अश्वस्य वारः पुरुषस्य वारः ) अश्ववार मौर पुरुषबार ये मय सोपभियां तथा (रथस्य वन्धुरं ) स्थ बंधुर या नाभि ये सब सर्पविष दूर करनेवाला है ॥ २ ॥ PM 4
सर्पविष दूर करना
(१७९)
अर्व वेत पदा हि पूर्वेण चापरेण च । उदप्लुतमिव दाहीनामरसं विषं वारुग्रम्
अरंघुषो निमज्योन्मज्य पुनरत्रवीत् । उदप्लुतमिव दाहीनामरसं विपं वारुग्रम् ॥४॥
पेढो हन्ति कसील पैद्वः श्वित्रमुतासितम् । पैद्रो स्थाः दि र सं विभेद पृदाक्काः ॥ ५॥
पैट्ट प्रेहि प्रथमोऽर्नु त्वा वयमेमसि । अहीन्व्य स्यतात्पृथो येन स्मा वयमे॒मर्सि ॥६॥
इदं पैद्वो अंजायतेदमस्य परायणम् । इमान्यवतः पदाहिन्यो वाजिनीवतः
॥ ७॥
संयंत न वि परयात्तं न सं यमत् । अस्मिन्क्षेत्रे द्वावही स्त्री च पुमाश्च तावुभावरसा ॥८॥
असाम इहायो ये अन्ति ये च दूरके । धनेन हन्मि वृश्चिकमहि दण्डेनार्गतम् ॥ ९॥
अपाश्वस्येदं भजमुभयोः स्वजस्य॑ च । इन्द्रो मेऽहिमघायन्तुमहिं पैद्वो अरन्धयत् ॥१०॥
पैदस्य मन्महे वयं स्थिरस्य स्थिरधाम्नः । इमे पश्चा पृदाकवः प्रदीयत आसते ॥ ११ ॥
अर्थ-हे (श्वेत ) श्वेत औषधे । ( पूर्वेण अपरेण च पदा) पूर्व और उत्तर पदसे (अव जहि) विषका नाश
कए। जिससे (विपं उग्रं अरसं) भयानक विष भी नीरम हो जाय और ( उदप्लुतं दारु इव) भरे हुए जलमे लकडीके
गिरनेके समान वद्द विष बह जाय ॥ ३ ॥
(अरघुपः निमज्य उन्मज्य ) अलंघुर औषधि निमजन और उन्मज्जन करके (पुनः अब्रवीत् ) फिर कहने
लगी कि ( उग्रं रसं अरसं) उग्र भयानक विष भी सारहीन हो जायगा (उदप्लुतं दारु इव ) जैसे जलमें लकडी
होनी है ॥ ४ ॥
(पैठः कसणीलं श्वित्रं उत असितं) पैदने कसील श्वित्र और असित सोको मारा (पैदः रथाः पृदा-
क्यः सिरः सं विभेद ) पैदने रथा और पृदाका सिर तोडा ॥ ५॥
हे ( पैद) पैट ! (प्रथमः प्रेहि ) तू प्रथम आगे जा ( त्वा अनु वयं एमास) तेरे पीछे हम चलेंगे। और
(येन वयं एमास ) जिन मार्गोंसे हम जायगे उन ( पथः अहीन व्यस्यतात् ) मार्गोंसे सौको दूर कर ॥ ६ ॥
( इदं पैवो अजायत) यह पंढ उत्पन्न हुभा है, (इदं अस्य परायणं) यह इसका परम स्थान है । ( वाजि-
नीवतः अहिन्यः अर्वतः ) बलवान् सर्पनाशक अर्वाके ( इमानि पदा) ये पदचिन्ह हैं ॥ ७ ॥
(संयतं न वि प्परत् ) मर्पका बंद मुख न खुले और (व्यात्तं न यमत् ) खुला हुमा बंद न होवे । (अस्मिन्
क्षेत्रे द्वौ अही) इस सेतमे दो सर्प है (स्त्री च पुमान् च ) एक स्त्री और दूसरा पुरुष है । ( तौ उभौ अरसौ ) वे
दोनों सारहीन हो जाये ॥ ८ ॥
इह ये अन्ति ये दूरके) यहां जो पास और जो दूर (अहयः अरसासः) सांप है वे सारहीन हो जाय । (धनेन
हन्मि वृश्चिकं) योटेसे विच्छुको मारता हूं और (आगतं अहिं दण्डेन) भाये हुए सर्पको डण्डेसे मारता हूं॥९॥
(अघाश्वस्य स्वजस्य च ) अघाश्व और स्वज इन ( उभयोः इदं भेषजं ) दोनोंका यही औषध है, ( इन्द्रः
मे अधायन्त अहिं) इन्द्रने मेरे ऊपर आक्रमण करनेवाले सर्पको तथा (पैदः अहि अरन्धयत् ) पैद सर्पको नष्ट
किया ॥१०॥
(स्थिरस्य स्थिरधाम्नः पैदस्य ) स्थिर और अचल धामवाले पैदकी महिमाका (वयं मन्महे ) हम मनन करते
हैं जिसके ( पश्चा) पीछे (इम पदावा प्रदाध्यतः आसते ) ये पृटाकु नामक सर्प देखते हुये दूर खडे रहते है ॥१५॥
(१८०) अथर्ववेदका सुवोध अनुवाद दीर्घजीवन और आरोग्य नष्टासवो नष्टविपा हता इन्द्रेण वजिणा । जघानेन्द्रों जप्तिमा वयम् ॥१२॥ हुतास्तिरश्चिराजयो निपिटासः पृदाकवः । दवि करितं श्वित्रं दुर्भेष्वसित जहि ॥ १३ ॥ कैरातिका कुमारिका सका खनति भेषजम् । हिरण्ययीभिरप्रिंभिगिरीणामुप सार्नुपु आयमगन्युवा भिषक्पृश्निहापराजितः । स वै स्वजस्य जम्भन उभयोवृश्चिकस्य च ॥१५॥ इन्द्रो मेऽहिमरन्धयन्मित्रश्च वरुणश्च । वातापर्जन्यो भा इन्द्रो मेऽहिमरन्धयत्पृदाकुं च पृदाकम् । स्वजं तिरश्चिराजि कसील दशौनसिम् ॥ १७॥ इन्द्रो जघान प्रथमं जनितारमहे तव । तेषामु तृह्यमाणानां का स्वित्तेपामसुद्रसः ॥ १८॥ सं हि शीर्पाण्यग्रमं पौञ्जिष्ठ इव कवरम् । सिन्धोर्मध्ये पुरेत्य व्य निज़महेर्विपम् ॥ १९ ॥ अहीनां सर्वेषां विष परां वहन्तु सिन्धवः । हतास्तिर्रश्चिराजयो निष्टिासः पृदाकवः ॥२०॥ ओषधीनामहं वृण उर्वरीरिव साधुया । नाम्यवतीरिवाह निरैतु ते विषम् ॥२१॥ अर्थ-(नष्टासवः नष्टविपाः) जिनके प्राण और विष नष्ट हो चुके हैं (इन्द्रेण वज्रिणा हताः) जो वज्रधारी इन्द्र के द्वारा मार दिए गए है जिनको (इन्द्रः जघान ) इन्द्रने मारा है उन्हें (वयं जनिम ) हम भी मारते हैं ॥१२॥ (तिरश्चिराजयः हताः) तिरछी लकीरोंवाले सर्प मारे गये, (पृदाकवः निपिष्टासः) पृढाकु सांप पीसे गये, (दविं, करिक्रतं श्वित्रं) दर्वि, करिक्रत और श्वेत जातिके सांपको तया (असितं दर्भपु जहि ) काले सांपको द में (सका कैरातिका कुमारिका) वह भीलोंकी लडकी (हिरण्ययीभिः अभ्रिभिः) लोहेकी कुदारोसे (गिरीणां सानुपु) पहाढाके गिसरोंपर (भेषजं उप खनति) औषधिको खोदती है ॥ १४ ॥ (अयं युवा पृश्निहा) यह तरण सर्पनागक (अपराजितः भिषक् ) अपराजित वैद्य आता है। (सः वै स्वजस्य वृश्चिकस्य) वह नि संदेह स्त्रज नामक सर्प और विच्छु (उभयोः जम्मनः) टोनोका नाग करनेवाला है ॥ १५॥ (इन्द्रः मित्रः वरुणश्च ) इन्द्र, सूर्य और वरण (मे अहिं अरन्धयन् ) मेरे पास माये सर्पोको मारते हैं तथा (वातापर्जन्यौ उभा) वायु और पर्जन्य ये भी सपॉको मारते है ॥ १६ ॥ (पृदाकुं पृदाक्वं स्वज तिरश्चिराजि कसीलं दगोनर्सि) पृदाकु, पृदाक्व, स्वज, तिरश्चिराजी, कसील' दयोनम्मि इन सपाकी जातियोंको (इन्द्रः अरन्धयत् ) इन्द्रने मारा ॥ १७ ॥ हे (अहे) मर्प । (तव प्रथम जनितारं ) तेरे पहिले उत्पादकको (इन्द्र. जघान ) इन्द्रने मारा । (तेषां तृह्यमाणानां) नागको प्राप्त हुए हुए उनमें (तेषां का स्वित् रस असत् ) क्या उनका कुछ रस रहता है ? भर्थात वे सब पूर्णतया मर जाते हैं ॥ १८ ॥ मैने सापोंके (शीर्षाणि अग्रमं) सिरोको पकड लिया है (पोजिष्ठः सिन्धोः कर्वरं मध्यं परेत्य ) जैसे कैवट नदी गहरे मध्य भागतक जाकर सहज ही वापिस भाता है, उस प्रकार में भी (अहेः विपं व्यनिज) सांपका विष विशेष प्रकारने नष्ट करता हूं ॥ १९॥ (सर्वेषां अहीनां विषं) सब सपाके विषको (सिन्धवः परा वहन्तु ) नदियां दूर वहा ले जाय । इस तरह (तिरश्चिराजय पृढाक्चः हताः) तिरश्चिराजी और पृढाकु जातिके सब सर्प मारे गये हैं ॥ २० ॥ (अहं ओपधीना उर्वरीः इव साधुया वृणे) मैं औपधियोंको उपजाऊ भूमीपर धान्य उगनेके समान सहज हीसे प्राप्त कर लौर ( अर्वती. इव नयामि ) घोढीकी तरह गीघ्रतास उनको ले जाऊं, अतः हे (अहे) सर्प। (ते विर्ष निःपेतु)रा विष दूर हो जावे ॥ २१ ॥ मार ॥ १३ ॥ - न सर्पविष दर करना (१८१) ते यदुनौ सूर्य विषं पृथिव्यामोपंधीषु यत् । कान्दाविप कनलकं निरत्वेतु ते विषम् ॥ २२ ॥ ये अग्रिजा औषधिजा अहीनां ये अप्सुजा विद्युत आवभूवुः । येषो जानानि बहुधा महान्ति तेभ्यः सर्पेभ्यो नमसा विधेम ॥ २३ ॥ तौदी नामांसि कन्या वृताची नाम बा असि । अधस्पदेन ते पदमा दंदे विपदूषणम् ॥ २४ ॥ अङ्गादङ्गात्प्र च्यावय हृदयं परि वर्जय । अर्धा विषस्य यत्तेजोऽवाचीनं तदैतु ते ॥ २५॥ आरे अभूद्विपमरोहिपे विषमप्रागपिं । अनिर्विपमहेनिरधात्सोमो निरणयीत् । दंष्टारमन्वंगाद्विपमहिरमृत ॥ २६ ॥ अर्थ- (यत् विपं अग्नौ पृथिव्यां ओपधियु) जो विष अनि, भूमि और औपधियोम है, तथा जो (कान्दाविप कनलकं ) शब्दोमे तथा वनस्पति विरोपामे है, यह तेरा विप (नि. पेतु ऐतु) नि.गेप चला जावे ॥ २२ ॥ (ये अग्निजाः ओषधिजाः ) जो अग्निसे उत्पन्न, औषधियोसे उत्पन्न, (ये अहीनां अप्सुजाः) जो सांपो और उत्पम, (विद्युतः आवभूवुः ) जो बिजलीये प्रकट होते हैं, (येपा जातानि बहुधा महान्ति) जिनकी अनेक प्रकारको जातिया है, (तेभ्यः सपेभ्यः नमसा विधेम) उन सांपोको हम नमन करते है ॥ २३ ॥ (तोदी नाम घृताची नाम ) तौदी अौर घृताची इन नामोंकी ( कन्या असि ) कन्या नामकी एक औषधि है। (अधः पदेन ते विपदृपणं पदं आदढे ) नीचेवाले विपनामक भागके साथ तेरी जड में प्राप्त करता हूं ॥ २४ ॥ हे मौषधि ! तू (अंगात् अंगात् ) प्रत्येक अवयवसे (प्र च्यावय) विपको दूर कर ( हृदयं परिवर्जय) हृदय- दे, (विपस्य यत् तेजः ) विपकी जो चमक है, (तत् ते अवाचीनं एत) वह तेरे शरीरसे नीचेकी भोर दूर हो जावे ॥ २५ ॥ (विपं आरे अभूत् ) विष दूर हुआ, (विपं अरौत् ) विष चला गया, (विपे वियं अप्राग् अपि) विषमे विष मिलकर पहिले जैसे विपरहित हो चुका है । ( अहे. विपं अग्निः निरधात् ) सर्पका विष अग्नि दूर करता है, (सोमः निरणयीत् ) सोम औषधि विष दूर करती है । (दंष्टारं विषं अन्वगात् ) दंश करनेवाले सर्पके पास ही उलटा विष पहुचा और उसले ( अहिः अमृत) वही सर्प मर गया ॥ २६ ॥ यह संपूर्ण सूक्त सर्पविपको दूर करनेके लिये है। इसमें कई नाम भोपधियोके हैं, जो अच्छे वैद्योको ही ज्ञात हो सकते । वैसा तो यह सून सरल है, परंतु कई मंत्र मंत्रशास्त्रकी दृष्टि से देखने योग्य है और कई सकेत वैद्यशास्त्रकी दृष्टिसे खुल- नेवाले हैं । इसलिये उन विषयोंके विशेषज्ञ इस सूक्तकी अधिक खोज कर । अलों को भी छुटा
(१८२)
अथर्ववेदका सुबोध अनुवाद
'दीर्घजीवन और आरोग्य
सर्प छिप दूर करना
कां. ५, सू. १३
(ऋषि - गरुमान् । देवता- तक्षकः 1)
दुदिहि मह्यं वरुणो दिवः कविर्वचौभित्रैनि रिणामि ते विषम् ।
खातमखांतमुत सक्तमग्रममिव धन्वन्नि जजास ते विषम्
यत्ते अपोदकं विषं तत् एतास्वग्रभम् ।
गृह्णामि ते मध्यममुत्तमं रसमुतावमं भियसा नेशदादु ते
॥२॥
चूषा मे रखो नर्भसा न तन्यतुरुग्रेण ते वर्चसा बाध आर्दु ते ।
अहं तमस्य नृमिरग्रभं रसं तमंस व ज्योतिरुदेतु सूर्यः
॥३॥
चक्षुषा ते चक्षुईन्मि विपेण हन्मि ते विषम् ।
अहे म्रियस्व मा जीवीः प्रत्यगस्येतु त्या विपम्
॥४॥
अर्थ- (दिवः कविः वरुणः हि मह्य ददिः) धुलोकके कवि वरूणने मुझे उपदेश दिया है कि (उग्रैः
वचाभिः ते विष निरिणामि) बलवान् वचनोक द्वारा तेरा विप दूर करता हूं। (खातं अखातं उत सक्तं) घाव
अधिक मुदा हुमा हो या मुद्रा हुमा हो अथवा विप केवल उपर चिपका ही हुआ हो, इस विषको (अग्रम ) मैं लेता हूं।
(धन्धन इरा इब) रेतीले स्थानमे जिस प्रकार जलधारा नष्ट होती है उस प्रकार (ते विपं निजजास) तेरा विष
नि होप नष्ट करता हूं ॥ १ ॥
(यत् ते अप-उदकं विपं ) जो तेरा जलगोपक विप है (तत् ते एतासु अग्रभं ) वह तेरा विप इनमें लेता
हूं। (ते उत्तमं मध्यम उत अवमं रसं गृहामि ) तेरा उत्तम, मध्यम और नीचवाला रस पकढकर लेता हूं । जो
(आत् उ ते भियसा नेगत् ) तेरे भयले नष्ट हो जाता है ॥ २ ॥
मे रखः नभसा तन्यतुः न बृपा ) मेरा गब्द आकागक्री गर्जनाके समान बलवान् है ( उग्रेण आत् उ ते ते
बाधे) बलवाले वचनोस निश्चयपूर्वक तुझेही बाधा पहुंचाता हूं। (अहं नृभिः अस्य तं रसं अग्रभं ) मैंने मनुष्योंके
साथ इसके उस रसको ले लिया है । (तमसः ज्योनिः सूर्यः इव उदेतु ) अन्धकारसे ज्योति देनेवाले सूर्यके समान यह
उदयको प्राप्त होवे ॥३॥
(चक्षुपा ते चक्षुः हन्मि ) भाग्यमे तेरी मांसका नाम करता हूं। (विपेण ते विपं हन्मि ) विपसे तेरा विष
नष्ट करता हूं । हे ( अहे नियस्व, मा जीवी) मर्पत मर जा, जीता मत रह । (विपं त्वा प्रत्यक् अभ्येतु) विप तेरे
प्रति लोटकर भा जावे ॥४॥
(मे
।
-
भावार्थ- दिव्य ज्ञानी कहता है कि बलवाले वचनोसे सर्पका विप दुर होता है । विष गहरे घावमे गया हो, छोटे
घावमें गया हो अथवा कवर ऊपर ही चिपका हो । उसको मैंने पकडता हूं और निःगेप करता हूं ॥ १ ॥
सर्प विष योपक है । उसको ऊपर, मध्य भागमे और नीचेके भागमें पकढ लेता हूं और सर्प विषके भयसे तुझे दूर
करता हूं ।। २ ॥
मेरा शब्द प्रभावशाली है, उग्मने विषकी बाधा दूर करता हूं, मैंने अन्य मनुष्योंकी सहायतासे विपके रसको स्तंभित
किया है, भय यह मूर्यटदयके समान जाग उठेगा ॥३॥
विपसे विष दूर करता हूं। हे साप ! अव तू मर जा, जीवित न रह । वेरा विप लौटकर वेरे प्रति जावे ॥२॥
सर्पविष दुर करमा (१८३) ॥ ५ ॥ - करात पृश्न उपतृण्य बभ्र आ में शृणुतासिता अलीकाः । मा मे मुख्युः स्तामानमपि ष्ठाताश्रावयन्तो नि विषे मध्यम् असितस्य तेमातस्य वभ्रोरपोदकस्य च । साबासाहस्याहं मन्योरव ज्यामिव धन्यनो वि मुंञ्चामि रथाँ इव आलिंगी च विलिंगी च पिता च माता च । विज्ञ वः सर्वतो वन्ध्वरसाः किं करिष्यथ ॥७॥ उरुगलोया दुहिता जाता दास्यसिक्न्या । प्रतङ्क द्रुपीणां सर्वांसामरसं विषम् कर्णा श्ववित्तदववीगिरेरवचरन्तिका । याः काश्चमाः खनित्रिमास्तासामरसतमं विषम् ॥ ९ ॥ ॥८॥ . अर्थ- हे (कैरात, पृश्ने, उपतृण्य, वभ्रो, असिताः, अलीकाः ) जंगलमे रहनेवाले, धब्बेवाले, घासमें रहने वाले, भूरे रंगवाले, कृष्ण सर्प और निंदनीय सो । ( मे आशृणुत) मेरा भाषण सुनो । (मे सख्युः स्तामानं अपि मा स्थात) मेरे मित्रके घर पास मत ठहरो। (आश्रावयन्तः विपे नि रमवं) अपनी फुफकार सुनाते हुए दूर अपने विषमें ही रमते रहो ॥ ५॥ (असितस्त) कृष्ण (तैमातस्य ) गीले स्थानपर रहनेवाले (वभ्रोः ) भूरे रंगवाले ( अप-उदकस्य) जलसे दूर रहनेवाले और (साबासाहस्य मन्योः) सबको पराजित करनेवाले क्रोधी सर्पको विषवाधाको मै उसी प्रकार (वि- मुञ्चामि ) ढीली करता हूं, जिस प्रकार (धन्वनः ज्यां इव रथान् इव ) धनुष्यकी दोरी और रथोके बंधनोको ढीला करते हैं ॥ ६॥ (आलिगी च विलिगी च) चिपकनेवाली और न चिपकनेवाली (पिता च माता च ) तथा नर और मादा (वा बन्धु सर्वतः विद्म) तुम्हारे बंधुओंको भी हम सब प्रकारसे जानते है ( अरसाः किं करिष्यथ ) तुम नीरस होने पर क्या करोगे? ॥७॥ (उरु-गूलायाः दुहिता) बहुत हिंसक सर्पिणीकी लडकी (असिक्न्या. दासी जाता ) कृष्णसर्पिणीकी दासी हो गई है । इन ( दद्रुषीणां सर्वासां ) दाद पैदा करनेवाली सब सांपिनोका (प्रतङ्कं विषं अरसं ) कष्टदायक विष नीरस होवे ॥ ८॥ (गिरेः अवचरन्तिका) पहाडके नीचे घूमनेवाली (कर्णा श्वावित्) कानवाली साही (तत् अब्रवीत् ) वह बोली (याः काः च इमाः खनित्रिमाः ) जो कोई इस भूमिको खोदकर इसमें रहते है, (तालां विपं अरसतमं) उन सापि- नोका विष नीरस होवे ॥९॥ - भावार्थ- जंगलमे रहनेवाले धब्बोवाले, घांसमें रहनेवाले सौर भूरे रंगवाले काले और घृणित ऐसे होते है । हे सब माँ । मेरे मित्रके घरके पास न ठहरो । और कही जाकर अपने विपके साथ रमो ॥ ७ ॥ कृष्ण, गीले स्थानपर रहने और भूरे रंववाले, जल स्थानसे दूर रहनेवाले और क्रोधी सर्पकी विषयाधाको मैं दूर करता । धनुष्यपरसे ढोरी उतारनेके समान मै दूर करता हूं ॥६॥ विषकी बाधकता नष्ट होनेपर नर या मादा सांप क्या हानि करेगा ॥ ७ ॥ हिसक कृष्णसर्पिणी और दाद उत्पन्न करनेवाली सांपिनका विष नीरस होवे ॥ ८ ॥ सब पहाडी सपाका विप साररहित हो जावे ॥ ९॥ १ (१८४) अथर्ववेदका सुबोध अनुवाद दीर्घजीवन और आरोग्य' ॥ १०॥ ताचं न तायुचं घेश्चमसि तावुर्वम् । तावुर्वनारसं विषम् तस्तुवं न तस्तुर्व न घेत्त्वमसि तस्तुवम् । तस्तुचैनारसं विषम् ॥ ११॥ अर्थ- (ताबुवं न तावुवं ) ताबुव हिंसक नहीं है। (त्व तात्रुवं न घ इत् असि) तू ताबुव तो हिसक निःसंदेह नही है । ( ताबुवेन विपं अरसं) ताबुवक द्वारा विष नीरस होता है ॥ १० ॥ (तस्तुव न तस्तुचं ) तस्तुव भी नामक नहीं है । (त्वं तस्तुवं न घ इत् असि ) तू तस्तुव तो नाशक नि.सदेह नहीं है । (तस्तुवेन विपं अरसं ) तस्तुव द्वारा विष निरस होता है ॥ ११ ॥ भावार्थ- तावुव और तस्तुव नामक पदार्थ विशेषसे सांपोका विष निर्वल होता है ॥ १०-११॥ सर्पविष दूर करना सर्पविष इतनी सापोकी जातियोंके नाम इस सूक्तमें है। इनमेसे दो तीन नामोके विषयमे इसमे संदेह है और उनके ज्ञान इम सूक्तमे निम्नलिखित सर्पजातियोका वर्णन है- निश्चित करनेके लिये अभी बहुत खोजकी अपेक्षा है। १ कैरातः-- भील जहा रहते है उस जंगलमे रहने- उपाय वाला सर्प। २ पृश्निः-धब्बोवाला सर्प । सर्पविपकी बाधा पर ताबुव और तस्तुव ' का उपाय ३ उपतृपयः-घाससे रहनेवाला सर्प । इस सूक्तके अन्तिम दो मंत्रोमे लिखा है। परंतु ये पदार्य ४ वभ्रः-भूरे रंगवाला सर्प। क्या है इसका ज्ञान खोज करने पर भी अभीतक हमें नही ५ असित काले रंगवाला सर्प। हुमा । संभव है कि ये कुछ औपधी खनिज पदार्थ या पत्थर अलीक:- अमंगल सर्प । जैसे पदार्थ अथवा मणि हो । संभव है ये सर्पविशेषके मस्त- ७ तैमातः- गीले प्रदेगमे रहनेवाला सर्प । कमें मिलनेवाले मणियोके नाम हो। कुछ निश्चयसे नही ८ अपोदक:- जो जलके पास नहीं रहता। कहा जा सकता। इस विषयमे खोज करनेकी आवश्यकता है। ९ सानासाहः- इसके संबंधमें आनेवालेका नाग दूसरा उपाय तीन स्थानपर बंध लगाकर विषकी गतिको करनेवाला सर्प। रोकना है- १० मन्युः-क्रोध धारण करनेवाला सर्प । गृहामि ते मध्यम उत्तमं अवमम् । ११ आलिगी-चिपकनेवाली अर्थात् गरीरको लपे एतासु विषं अग्रभम् ( म. २) टनेवाली मापिन। मध्यमें और नीचे ढोरीसे वाधके, इनमें विषको १२ विलिनी-शरीरसं दूर रहनेवाली सांपिन । पकड लेता हूं।' यह विधि इस प्रकार है । प्रायः हाथ या १३ उरु-गुला- जिसका निम्न प्रदेश बढा होता है। पावमे ही सांप काटता है। काटने के साथ ही वहांसे विष २४ असिस्नी--काली मांपिन । ऊपर चढने लगता है, इस लिये काटते ही जघाके मूलमे, घुटने- १५ दद्रपी-जिय मांपिनके काटने पर शरीरपर दाद पर तथा कटे स्नानसे किंचित् ऊपर ढोरी वाध देनेसे विषकी टता और दाउने रक्त निकलता है। ऊपर मानेकी गति रुक जाती है । इस प्रकार विपकी गति १६ कर्णा- कानकारी मांपिन । रोककर फिर जहां तक विष गया हो, वहां पर उक्त पदा- १७ च्यावित्-- कुजा जिमको काटना है, कुत्ता जिसको याँका प्रयोग करनेसे विष निःसत्त्व हो जाता है। ददकर निकारता। परंतु ' तावुव और तस्तुव' पदार्थ प्राप्त न होनेकी १८ खनित्रिमा-रोटी हुई भूमिमे रहनेयाली मापिन। अयन्याम यह टपाय कैसे किया जाय यह एक शंका है। ऊपर, सपाधव (१८५) । जहां तक धमनीमे विष पहुंचा होता है, वहांके पाल मेरे मित्रके घरके पास न ठहर । ' इत्यादि मंत्र पढनेसे खडे नहीं रहते, इसलिये बालोको देखनेसे पता लगता है ऐसा प्रतीत होता है कि रहनेवालेको इच्छाशक्तिके प्रभावसे कि यहाँ तक विष आया है । अतः विष जहां है वहां जलती सर्पपर कुछ प्रभाव पड़ता होगा। हमने स्वयं अभीतक मग्नि रखकर वह स्थान जला दिया जाए तो मनुष्य बच देखा नहीं है; परंतु बहुत लोग कहते हैं कि महाराष्ट्रमे सकता है। परंतु यह बात इस सूक्तमें कही नहीं है। ऐसे मांत्रिक है कि जो सर्पद्वारा दंशित मनुप्यके पास उस यह सूक्त दुर्बोध है । इसलिये कई मंत्रोंका अर्थ भी ठीक काटनेवाले सांपको बुलाते हैं, और उससे व्रणसे सब विष प्रकार समझमें नहीं आया है, इस कारण मंत्रोका विवरण चुसवा लेते हैं । और इस प्रकार सर्पका विष शरीरसे याहर भी मधिक नहीं हो सकता। निकल जानेपर वह मनुष्य जाग्रत होनेके समान उठता है। इस सूक्तके कई मंत्र ऐसे हैं कि जो मंत्रसामर्थ्यसे सापके तृतीय मंत्रके अन्तिम चरणमे 'अन्धकारसे सूर्य उदय होने- विषको उतारनेका ज्ञान देते हैं जैसे- के समान यह मनुष्य जाग उठे' (मं. ३) ऐसा कहा प्रत्यक् अभ्येतु ते विपम् । ( मं. ४ ४) है। संभव है कि इस प्रकारका कुछ भाव ही इसमें हो । अहे म्रियस्व । (मं. ४) यह सर्पदंशका विषय अत्यंत महत्त्वका है और इसलिये 'हे सांप । तेरा विष लौटकर तेरे पास जावे । हे सर्प । सब प्रकारक उपचारोकी बड़ी खोज करनी चाहिये और तू मर जा।' तथा- निश्चय करना चाहिये कि कौनसा उपाय निश्चित गुण- मे सख्युः स्तामानं मा अपि स्थाः। (मं. ५) कारी है। सर्पविक्ष कां. ७, सू. ८८ (ऋषि:- गरुमान् । देवता- तक्षकः ।) अपेहरिरस्यरिर्वा असि । विषे विषमपृक्था विषमिद्वा अपृक्थाः । अहिमेवाभ्यहि त जहि ॥ १ ॥ अर्थ-तू ( अरिः वै असि ) निश्वयसे शत्रु है। (अरिः असि) शत्रु ही है ( अतः अप इहि) इसलिए दूर चला जा । (विषे विपं अपृक्थाः) विषमे विष मिला दिया है । (विषं इत् वै अपृक्थाः) नि संदेह विष मिला दिया है । अतः (अहिं एव अभि अप इहि ) सांपके पास ही जा और (तं जहि) उसको मार ॥ १ ॥ सर्पविष मनुष्यादि प्राणियोंका शत्रु है, अत: उसको मनुष्योसे दूर रखना चाहिये । विषका उपचार विषसे ही होता । ऐसा सुननेमें भाया है कि सांपके काट लेने पर यदि वह मनुष्य उसी सांपको काट ले, तो वह मनुष्य बच जाता परंतु मनुष्यमे इतना धैर्य चाहिये । इससे विषके साथ विष मिल जाता है अर्थात् सांपके विषके साथ मनुष्य के शरीरमे माया हुआ विष मिल जाता है और वह मनुष्य बच जाता है । इस विषयमें अधिक खोज करनी चाहिये और निश्चय करना चाहिये, यह बात कहां तक सत्य है। २४ [भयर्व भा. ४ हिन्दी] (१८६) अथर्ववेदका सुबोध अनुवाद - 'दीर्घजीवन और आरोग्य' लिए निवारणका उपाय कां., ६ सू. १०० (पिः-- गल्त्मान् । देवता- वनस्पतिः।) देवा अंदुः सूर्यों अदाद द्यौरदात्पृथिव्य दात् । तिस्रः सरस्वतीरदुः सचित्ता विषदर्पणम् ॥ १ ।। यद्वौ देवा उपजीका आसिञ्चन्धन्वन्युदकम् । तेने देवप्रसूतेनेदं दूपयता विषम् ॥ २ ॥ असुराणां दुहितासि सा देवानामसि स्वमा । दिवस्पृथिव्याः संभूता सा चकारसं विषम् ॥ ३ ॥ अर्थ- (देवाः विपदृपणं अदुः ) देवोंने विषनिवारक उपाय दिया है। (सूर्यः अदात् ) सूर्यने दिया है। (द्यौः अदात्, पृथिवी अदात्) धुलोक और पृथ्वी लोकने भी दिया है । (सचित्ताः तिस्त्रः सरस्वतीः अदुः) एक विचारवाली तीनों सरस्वती देवियोंने विषनिवारक उपाय दिया है ॥१॥ है (देवाः ) देवो । (उपजीकाः यत् उदकं ) उपजीक नामक औषधिया जो जल (धन्वनि वः असिंचत्) मरुदेगमें आपके समीप सींचती है, (तेन देवप्रसूतेन ) उस देवके द्वारा उत्पन्न जलसे (इदं विषं दुपयता ) इस विष- का निवारण करो ॥२॥ हे औषधि । त् (असुराणां दुहिता असि) असुरोकी दुहिता है। (सा देवानां स्वसा असि ) वह तू देवो- की बहिन है । (दिवः पृथिव्याः संभूता ) धुलोक और भूलोकसे उत्पन्न हुई (सा विषं अरसं चकर्थ) वह तू विष को निर्वल बना ॥३॥ भावार्थ- पृथ्वी, सूर्य, वायु, जल आदि सब देव विषको दूर करते है । तथा कुछ विद्याएं भी ऐसी है जो विष दूर करती है ॥१॥ मरुदेशमें भी जो जल होता है वह विष दूर करता है ॥२॥ औषधि भी विष दूर करनेवाली है ॥ ३॥ यह सूक्त बढा दुर्योधसा है । पहिले मंत्रमें कहा है कि पृथ्वी भादि भनेक देव विषनाशक गुण रखते है। ममि, जल, सोम आदिके प्रयोगसे विष दूर होनेकी बात वैद्यक ग्रंथोमे भी कही है। द्वितीय मंत्रमें 'उपजीका' मरुदेशमें नल उत्पन्न करती है वह जल विषनाशक है, ऐसा कहा है। यह उपजीका कौनसी वनस्पति है इसका पता नहीं चलता । ' उपजीक' शब्दका अर्थ दूसरेके ऊपर रहकर अपनी उपजीविका करनेवाली।' इससे सभा प्रतीत होता है कि वृक्षोंपर उत्पन्न होनेवाली कोई वनस्पति हो, जिसमे रस बहुत आता हो भौर जो मरदेशमे भी विपुल रमसे युक्त होती हो । इस वनस्पतिके रससे या उसके जलसे विप दूर होता है । यह वनस्पति ( असु-राणां दुहिता) प्राण रक्षण करनेवालोंकी सहाय्यक और (देवानां स्वसा) इंद्रियोके लिये भगिनीस्प है अर्थात् भारोग्यवर्धक है, यह निर्जल भूमिमे उगती है भौर विष दूर करती है । वैद्योंको इस वनस्पतिकी खोज मरनी चाहिये।
सर्पसे बचना (१८७) सर्पसे बचना कां. ६, सू. ५६ (ऋषि:- शन्तातिः । देवता:- विश्वेदेवाः, रुद्रः।) मा नौ देवा अहिर्वधीत्सतोकान्त्सहपूरुषान् । संयंत न वि परड्यात्तं न सं यमुन्नमो देवजनेभ्यः ॥१॥ नमोऽस्त्वसिताय नमस्तिरश्चिराजये । स्वजाय बभ्रवे नमो नमो देवजनेभ्य: ॥ २॥ सं ते इन्मि दुता दुतः समु ते हन्वा । सं ते जिह्वया जिह्वां सम्बालाई आस्यम् ॥३॥ अर्थ-हे (देवाः) देवो ! (अहिः सतोकान् सहपूरुषान् ) सांप संतानो और पुरुषोंके समेत (नः मा वधीत् ) हमें न मारे (देवजनेभ्यः नमः) दिव्यजनों अर्थात् वैद्योके लिये नमस्कार है। (संयतं न विष्परत्) बंद हुमा न खुल सकता है और (व्यात्तं न संयमत् ) खुला हुभा बंद नहीं हो सकता है ॥ १ ॥ (असिताय नमः अस्तु) काले सर्पके लिये नमस्कार हो, (तिरश्चिराजये नमः) तिरछी लकीरोवाले सापको नमस्कार हो (स्वजाय वभ्रवे नमः ) लिपटनेवाले और भूरे रंगवाले सापके लिये नमस्कार हो। तथा (देव- जनेभ्यः नमः ) दिन्यजनोके लिये नमस्कार हो ॥ २ ॥ हे ( अहे) सर्प ! (ते दतः दता संहन्मि) तेरे दांतोंको मैं दातसे तोडता हूं। (ते हनू हन्वा सं उ) तेरे ठोढीको ठोढीसे सटा देता हूं। (ते जिह्वां जिह्वया सं) तेरी जिह्वाको जिह्वासे तोडता हूं। (ते आस्यं आस्ना सं हन्मि) तेरे मुखको मुखसे फाढता हूं ॥३॥ मनुष्योंको अपने निवासस्थानमे ऐसा सुप्रबंध करना चाहिये, कि जिससे सर्पदंशसे मनुष्य मा पशु कदापि न मरे । तृतीय मंत्रसे सर्पको मारना चाहिये ऐसा भी पता लगता है । मत्रोंका भन्य भाव दुर्बोध है भौर बढी खोजकी भपेक्षा करता है । सर्पविष निवारण कां. ६, सू. १२ (ऋपिः- गल्मान् । देवता- तक्षकः । परि चामिव सर्योऽहीनां जनिमागमम् । रात्री जगदिवान्यद्धंसात्तेना ते वारये विषम ॥१॥ यद् ब्रह्मभिर्यदृषिभिर्यवैिविदितं पुरा । यद्भूतं भव्य॑मासन्वत्तेना ते वारये विषम् ॥ २ ॥ अर्थ- (सूर्यः द्यां इव) जिस प्रकार सूर्य धुलोकको जानता है, उस प्रकार मैं (अहीनां जनिम परि अगम) सपॉके जन्मवृत्तको जानता हूं। ( रात्री हंसात् अन्यत् जगत् इव) रात्री जैसे सूर्यसे भिन्न जगतको भावरण करती है (तेन ते विषं वारये ) उसी प्रकार तेरे विषका मैं निवारण करता हूं ॥ १ ॥ (ब्रह्मभिः ऋषिभिः देवैः) ब्राह्मणो ऋषियों और देवोने ( यत् पुरा विदितं) जो पूर्वकालमै जान लिया था तत् भूतं भव्य आसन्वत ) वह भूत भविष्य कालमे रहनेवाला ज्ञान है, (तेन ते विषं वारये) उससे तेरा विष दूर करता हूँ॥२॥ * (२८८) अथर्ववेदका सुयोध अनुवाद दीर्घजीवन और आरोग्य' मचा पृञ्चे नद्यः पर्वता गिरयो मधु मधु परुष्णी शीपाला शमास्ने अस्तु शं दृदे अर्थ-(मध्वा पृञ्चे) मधुसे सिंचन करता हूं, (नद्यः पर्वताः, गिरयः मधु) नदियां, पर्वत, पहाट सब मधु देवें। (परप्णी, गीपाला मधु) परुष्णी मोर गीपाला मधुरता देवे ।(आस्ते शं अस्तु ) तरे मुखके लिये गान्ति भौर (हटे श) हृदयके लिये गान्ति मिले ॥३॥ इस मंत्रमें नदियों और पर्वतोंक भरनों सादिके जलकी धारासे सर्पविष उतारनेका विधान प्रतीत होता है। परंतु निश्चय नहीं है। इसकी खोज सर्पविषचिकित्सकको करनी चाहिये । जलधारासे सर्पविष दूर करनेका विधान वेदमें अन्य- स्थानमें भी है। परंतु उसका तापर्य क्या है, यह समझमें नहीं भाता । यदि बिच्छुका विष चढ़ रहा हो तो उसपर जलकी धाग एक बेगम गिरानेमे विच्छूका विष उतरता है । यह अनुभव हमने लिया है परंतु इससे सर्पविष उतरता है- ऐसा मानना कठिन है । इसी प्रकार इस सूकके भन्य विधान भी विचारणीय हैं। - कां. ७, सू. ११६ (ऋपिः- अथर्वाङ्गिराः। देवता- चन्द्रमाः।) नमो सराय च्ययनाय नोर्दनाय धृष्णवे । नमः शीतार्य पूर्वकामकृत्वने ॥ १ ॥ यो अन्येचुरुमययुरभ्येतीमं मण्डूकमध्ये स्वतः ॥ २ ॥ अर्थ- (रुराय) दाह करनेवाले, (च्यवनाय) हिलानेवाले, (नोदनाय) मदकानेवाले, (धृष्णवे) रानेवाले भयानक, (गीताय) गीत लग कर भानेवाले भौर (पूर्वकृत्वने) पूर्वकी अवस्थाको काटनेवाले वरके लिये (नम नमः ) नमस्कार है ॥ १ ॥ (यः अन्ये-युः ) जो एक दिन छोडकर भानेवाला है, ( उभय-युः ) दो दिन छोटकर (अभ्येति) माता है अथवा जो (अवतः ) नियम छोडकर लाता है वह (इमं मण्डूकं अभ्येतु) इस मेंढकके पास चला नावे ॥ २ ॥ इस मुन्नम नौ प्रकारक ज्वरोका वर्णन है इनके लक्षण देखिये- कर:- जिम ज्वरमें गरीरका दाह होता है । यह संभवत. पित्तज्वर है। २च्यवन.- हम ज्वरक मानेपर गरीर कांपने लगता है। यह ज्वर अतिमीत लगकर भाता है। ३ नोदनः- इस ज्वरक मानेपर मनुष्य पागलसा बन जाता है । मस्तिष्कपर इसका भयानक परिणाम होता है । 'गु.- इससे मनुन्य भयमीन होते हैं, रोगी बढा बेचनसा होता है ५शीन.- ममि लानेवाला यह ज्वर है। ६ पूर्वकन्वन- भगैरकी पूर्व अवस्थाको काट देनेवाला यह ज्वर है, अर्थात् इसके मानेसे गरीरके सव भवयव विगढ जाते है। ७ अन्यः- एकदिन छोडकर भानेवाला बर । ८ उभयद्यः- दो दिन छोडकर भानेवाला ज्वर । ९अवन:-मिरे मानेका कोई नियम नहीं है। ये नौ प्रकार पर हैं। इनके आमनके उपाय इससे पूर्व दवाये हैं । वेदमें वृनके वर्णनसे ज्वर चिकित्सा (वेदे वृत्र- मिपण यचिकित्सा) यताया है । अर्थात जैसे दृष्टिके होनेपर वृनका नाग होता है, टसी प्रकार पसीना भानेसे इस रमका नाम होता है। भव पसीना लाना इस ज्वरनिदारणका उपाय है।
ज्वर-नियारण (१९८९) कर-निवारण कां. ५, सू. २२ ऋषि:- भृग्वाङ्गिराः । देवता- तक्मनाशनः ।) अमिस्तुक्मानमपं बाधतामितः सोमो ग्रावा वरुणः पूतदक्षाः । वेदिहिः समिधः शोशुंचाना अप द्वेपास्यमुया भवन्तु ॥१॥ अयं यो विश्वान्हरितान्कृणोष्युच्छोचय॑न्न॒ग्निरिवाभिदुन्वन् । अधा हि तक्मन्नरसा हि भूया अधा न्यड्डिधराङ् वा परेहि ॥ २॥ यः प॑षः पारुपेयोऽवस ईवारुणः । तक्मानै विश्वधावीर्याधराञ्च परी सुव अधराञ्चं प्र हिणोमि नमः कृत्वा तक्मने । शकम्मरस्य मुष्टिहा पुनरेतु महावृपान् ॥४॥ ओको अस्य मूर्जवन्त ओको अस्य महावृषाः। यावज्जातस्तक्म॒स्तावानसि बल्हिकेषु न्योचरः ॥५॥ अर्थ- (अग्निः सोमः ग्रावा, वरुणः पूतदक्षाः वेदिः) अग्नि, सोम, पत्थर, वरुण और ये पवित्र बलवाले देव और वेदी (वर्हिः शोशुचानाः समिधः) कुगा, प्रदीप्त समिधाएं, (इतः तक्मानं अप वाधतां ) यहांसे ज्वरादि रोगको दूर करें। (अमुया द्वेपांसि अप भवन्तु) इससे सब द्वेष दूर हो ॥ १ ॥ (अयं विश्वान् हरितान् कृणोपि) यह जो तू ज्वररोग सवको निस्तेज करता है । (अग्निः इव उच्छोचयन् अभि दुन्वन्, ) अग्निके समान तपाता और कष्ट देता है । हे ( तक्मन् ) ज्वर ' (अधा हि अरसः भूयाः ) नीरस हो जा । (अधा न्यङ् अधराड् वा परा इहि ) और नीचेके स्थानसे दूर हो जा ।। २ ।। (यः पुरुपः पारुषेयः ) जो पर्वपर्वमे होता है और जो पर्वदोषके कारण उत्पन्न होता है और जो (अरुणः अव- ध्वंस: इव) रक्तवर्ण अग्निके समान विनाशक है । हे (विश्वधा-वीर्य) सब प्रकार के सामर्थ्यवाले (तक्मानं अध- राञ्चं परासुव) ज्वरको नीचेकी गतिसे दूर कर ॥ ३ ॥ (तक्मने नमः कृत्वाः) ज्वरको नमन करके (अघराचं प्रहिणोमि) नीचे उतार देता हूँ। (शकं- भरस्य मुष्टिहा ) शाक भक्षककी मुष्टिसे अर्थात् बलसे मरनेवाला यह रोग (महावृषान् पुनः एतु) महावृष्टिवाले पुन. पुन. भा जाता है॥४ । (अस्य ओकः मूजवतः ) इसका घर मुञ्ज घासवाला स्थान है तथा ( अस्य ओकः महावृषाः) इसका बढी वृष्टिवाला स्थान है । है (तक्मन् ) ज्वर । ( यावत् जातः ) जबसे तू उत्पन्न हुआ है । (तावान् बल्हिकेपु गोचरः असि) तबसे बाल्हिकोंसे दीसता है ॥ ५ ॥ भावार्थ- यज्ञसे ज्वर दूर होता है, अग्नि, सोम, समिधा और हवनसामग्री ज्वरको दूर करती है ॥ १ ॥ ज्वर मनुष्यको निस्तेज बनाता है, उसको अनि तपाकर निर्वीर्य बनाता है, इस कारण यज्ञसे ज्वर हटता है ॥ २ ॥ ज्वरसे पर्व पर्वमे दर्द होता है, इसलिये ऐसे ज्वरको हटाना चाहिये ॥ ३ ॥ बहुन वृष्टि जहां होती है, उन देशोसें यह ज्वर होता है। शाकभोजी लोगोमें एक विशेष पल होता है इस कारण उन- से यह ज्वर दूर भागता है ॥ ४ ॥ बहुवृष्टिवाले और मुंजा घासवाले देशोमे यह ज्वर बहुत होता है ॥ ५ ॥ औरत देशोमें (१९०) अथर्ववेदका सुवोध अनुवाद - 'दीर्घजीवन और आरोग्य' ॥ ८॥ तक्मन्व्याल वि गद् व्यगि भूरि यावय । दासी निष्टकरीमिच्छ तां वज्रेण समर्पय ॥६॥ तक्मन्मूजवतो गच्छ बल्हिकान्वा परस्तराम् । शुद्रामिच्छ प्रफ़यता तक्मन्बी व धूनुहि ॥७॥ महावृपान्मूजवतो वन्ध्वंद्धि परेत्य । प्रैतानि तक्मने ब्रूमो अन्य क्षेत्राणि वा इमा अन्यक्षेत्रे न रमसे वशी सन्मुंडयासि नः | अभूदु प्रार्थस्तक्मा स गमिष्यति बल्हिकान् ॥९॥ यत्वं शीतोऽयो लरसह कासावेषयः । भीमास्तै तक्मन्हेतयस्ताभिः स्म पर वृधि नः ॥१०॥ मा स्मैतान्त्सखीन्कुरुथा बलास कासमुंद्युगम् । मा स्मातोऽर्चाडै पुनस्तत्त्वा तक्मन्नुपं ब्रुवे ॥११॥ -- अर्थ-हे (व्याल व्यग तक्मन् ) सर्पके समान विषवाले और अंगोंको विरूप बनानेवाले ज्वर । हे (वि गद) विगेप रोग । त् (भूरि यावय) बहुत दूर चला जा । तू (निष्टकरी दासी इच्छ) निकृष्टतामें रहनेके कारण क्षयको प्राप्त होनेवालीकी इच्छा कर और (तां वज्रेण समर्पय) उसपर अपना वज्र चला ॥ ६ ॥ (तक्पन् । मूजवतः गच्छ ) हे ज्वर । मुजवाले स्थानकी इच्छा कर, (वल्हीकान् वा परस्तरां) दूरके बाल्हीक देश की इच्छा कर । उन देशोंमे (प्रफयं शुद्रां इच्छ) भ्रमण करनेवाली गोकमय स्त्रीकी इच्छा कर । हे (तस्मन् ) ज्वर । (तां वि इव धूनुहि ) उसको पक्षीके समान कंपा दे ॥ ७ ॥ ( महावृपान् मूजवतः बन्धु अद्धि ) अधिक वृष्टिवाले और मुंजा घासवाले उन बधन करनेवाले स्थानोंको तू खा। (परेत्य) दूर जाकर ( एतानि इमा अन्यक्षेत्राणि ) इन सब अन्य क्षेत्रोको (तक्मने वै प्रमः ) हम ज्वरके लिये बतलाते हैं।॥ ८॥ ( अन्यक्षेत्रे न रमसे) दूसेर क्षेत्रमे तू नही रमता (वशी सन् नः मृडयासि) हमारे वशमें रहकर तू हमे सुखी करता है । (तक्मा प्रार्थः अभूत् उ) ज्वर प्रवल होगया है (स वल्हीकान् गमिष्यति ) वह बालहीकोंके प्रति जावेगा।॥ ९॥ त्वं शीतः) जो तू सर्दी लगकर आनेवाला है, (अथो रूरः) अथवा अधिक पीढा देनेवाला रूक्ष है, (कासा सह अवेपयः) सांसीके साथ कंपा देता है । हे (तक्मन् ) ज्वर । (ते हेतयः भीमाः) तेरे गम भयंकर हैं। (ताभिः नः परिवृग्धि स्म) उनसे हम सबको बचाये रस ॥ १०॥ है (तक्मन्) ज्वर । (वलासं कासं उद्युगं) कफ, खांसी, और क्षय (एतान् सखीन् मा स्म कुरुथाः) इनको अपने मित्र मत बना । (अतः अर्वाड् मा स्म ऐः) इनसे युक्त होकर हमारे समीप न मा । हे (तक्मन्) ज्जर (तत् त्वा पुनः उपत्रुवे ) यह तुझे मैं पुनः कहता हूं ॥ ११ ॥ (यत् भावार्थ- इस ज्वरका विप सर्पके समान होता है, जिससे अंग टेढ़े मेढे हो जाते है, मलिन जीवनवाले लोगोंमें यह होता है ॥ ६॥ घासवाले स्थानोंमे और अधिक वर्षावाले स्थानों में यह रोग होता है और इस चरके आनेपर शरीर कांपता है।। ७ ।। बढी वृष्टिवाले और पासवाले प्रदेशोसे अन्य उत्तम क्षेत्रोंमें यह ज्वर नहीं होता ॥ ८ ॥ अन्य स्थानों में नहीं होता । नियमपूर्वक रहनेवाले लोगोंको यह रोग नहीं होता। उनसे दूर भागता है ॥ ९ ॥ यह ज्वर गीत, रूक्ष, और कफयुक्त होता है । इसका परिणाम भयकर होता है, इसलिये इससे बचना चाहिये ॥१०॥ इस ज्वरक कफ, सासी और क्षय ये तीन मित्र है। यह ज्वर हमारे पास कभी न आवे ॥११॥ - ज्यर-निवारण । तक्मन्प्रात्री बलासैन स्वस्रा कासिकया सह । पाप्मा भ्रातृव्येण सह गच्छामुमरणं जनम् ।।१२॥ तृतीयकं वितृतीयं सदुन्दिमुत शारदम् । तक्मानं शीतं रूर ग्रैम नाशय वार्षिकम् ॥१३॥ गन्धारभ्यो मूवद्भयोऽङ्गेभ्यो मगर्थेभ्यः । प्रेष्यन्जनमिव शेवधि तक्मानं परि दमसि ॥१४॥ अर्थ- हे (नक्मन् ) ज्वर । तू (भ्रात्रा क्लासेन) अपने भाई कफ साथ, (स्वस्ता कासिकया सह) बहिन खांसीके साथ, (पाप्मा भ्रातृव्येन सह ) पापी भतीजे क्षयके साथ (अमुं अरणं जनं गच्छ ) उस मलिन मनुष्यके पास जा ॥ १२ ॥ (तृतीयकं) तीसरे दिन भानेवाले, (वितृतीय) तीन दिन छोडकर आनेवाले, (सदन्दि ) सदा रहनेवाले, (उत शारदं ) और शरहनुमे होनेवाले, (शीतं, सरं) शीत अथवा पीडा देनेवाले, (गृष्मं वार्प) प्रीष्म और वर्षा ऋतुके संबंधसे भानेवाले ज्वरको (नाशय) हटा दे ॥ १३ ॥ (गन्धारिभ्यः मूजवद्भयः ) गांधार मुंजवान् ( अङ्गेभ्यः मगधेभ्यः ) मंग और मगधोको (प्रेष्यन् शेवधि जनं इव ) भेजे जानेवाले खजानेके रक्षक मनुष्य समानके (तक्मानं परि दध्मास ) ज्वरको हम भेज देते है ॥ १४ ॥ भावार्थ इस ज्वरका भाई कफ, बहिन सांसी मोर भतीजा क्षय है। मलिन लोगोके यह होता है ॥१२॥ तीसरे दिन भानेवाला, चौथे दिन या तीन दिन छोडकर भानेवाला, सदा अर्थात् प्रतिदिन आनेवाला, शरद्, ग्रीष्म मौर वर्षा ऋतुके कारण होनेवाला, शीत और रूक्ष ये सब ज्वर हटाने चाहिये ॥ १३ ॥ जिस प्रकार रक्षक मनुष्य दूसरे देशको भेजे जाते हैं, उस प्रकार सब ज्वर दूर भेजे जाय, अर्थात् ये मनुष्योको कष्ट न दे ॥ १५॥ ज्वर-निवारण ज्वर रोग १ शीत:-शीत ज्वर, जिसमें प्रथम शीत लगकर पात् ज्वर रोगके विषयमें बहुतसी विचारणीय बातें इस सूक्तमें उधर भाता है । २रूर:- रूक्ष, पित्त ज्वर, अथवा पीडा देनेवाला ज्वरके भेद ज्वर । (मं. १३) १ सदन्दि:- सदा, प्रतिदिन मानेवाला ज्वर । ये भेद इसका स्वरूप बता रहे है। ज्वरके साथ होनेवाले • तृतीयकः- तीसरे दिन भानेवाला ज्वर । रोग ये है। ३ वि-तृतीयकः- तीन दिन छोडकर चौथे दिन भाने- १ वलासः- कफ, बलगम, यह ज्वरमे होता है। वाला चातुर्थिक मादि ज्वर । (मं. १३) २ कास:- खांसी भी ज्वरमें होतीहै। (मं ११, १२) ये तीन भेद दिनोंके भन्तरके कारण होते है । ऋतुके कारण भानेवाले ज्वरके नाम ये है- ये दोनो लक्षण बहुत खराब है, इसका परिणाम- १ प्रैष्मः- ग्रीष्म ऋतुमें होनेवाला ज्वर । ३ उत्-युगं- ये दोनो अर्थात् कफ और खांसी जब २ वार्षिक: वर्षा ऋतुके कारण भानेवाला ज्वर । ज्वरक साथ इकट्ठी भाती है, तब इसका नाम क्षय है। इस- गरस्तुके कारण मानेवाला ज्वर (म १६) का परिणाम भयकर होता है । (मै ११) ये तीन भेद ऋसके कारण भानेवाले ज्वरके है । भब इस देश विशेषके कारण होनेवाले ज्वरोका परिगणन मिन्न ज्परके स्वरूप भेद देखिये । प्रकार इस सूक्तमे किया है। - - ३ शारद- - not- (१९२) अथर्ववेदका सुबोध अनुवाद 'दीर्घजीवन और आरोग्य' -- १ महावृधः- बडी वृष्टिवाले प्रदेशमे होनेवाला ज्वर । नः वशी मृडयासि । ( सं. ९) अस्य ओका महावृपः ' -~-इसका घर बढी वृष्टि 'हममें जो वगी अर्थात् संयमी पुरुष होता है, उसको वाला प्रदेश है । (मं. ५) सुरा देता है, ' अर्थात् यह ज्वर उसको कष्ट नहीं देता है। २ मूजवान् - वास जहां होती है ऐसे कीचटके स्थानमे इस प्रकार यह संयम ज्वरादिसे और क्षयादिसे बचानेका यह ज्वर होता है। एकमात्र उपाय है। 'अस्य ओकः मृजवतः इसका घर मुजवाला स्थान है। (मं. ५) ज्वर निवृत्तिका उपाय इस प्रकारक प्रदेश इस ज्वरके बढानेवाले होते है, अन्य संयम, ब्रह्मचर्य आदि उपाय ज्वरप्रतिबंधक है, परंतु किसी क्षेत्रों में यह नहीं बढता अर्थात् हो भी जाए तो भी गीघ्र हट कारणसं ज्वरक मानेपर उसको हटाने के उपाय निम्न लिखित है- जाता है । इस ज्वरमें बहुत विप होता है, जो गरीरमें जाता १ यन:- अग्निमें सोमादि भाषधियोका हवन करनेसे है और वहा पीडा देता है- ज्वर हटता है । (मं १) १.व्याल:- सर्पक समान इस ज्वरका विप है। २ अधराङ् परेहि-नीचके मार्गसे ज्वर दूर होता है, व्यंगः-अंगोमं विरूपता करनेवाला यह ज्वर है। (म.६) अर्थात् गौच शुद्धिसे, पेट साफ रहनेसे ज्वर दूर होता है । मलिन स्त्रीपुरुषोंक यह विशेषकर होता है, अर्थात् अन्त- (मं.२) हि पवित्र रहनेवालोके नहीं होता, इस विषयमें मंत्रका प्रमाण देखिये- ३शकं-भरस्य-मुष्टि-हा- शाकभोजीकी मुष्टिसे मर १ अरणं जनं- नीच जीवन व्यतीत करनेवालेको होता नेवाला ज्वर होता है । मासभोजी मनुष्यकी अपेक्षा शाकभोजी है। (म. १२) मनप्यमें ज्वरप्रतिबंधकशक्ति अधिक होती है, इसलिये मानो गाकमोजी २निष्टकरी-क्षीण और मलिनक होता है। (मं. ६) मनुष्य इस ज्वरको मुक्केसे मार देता है। (म, ४) ३ प्रफळ- फूला मनुग्य, जिसमें सच्चा वल नहीं होता इस प्रकार इस ज्वरके संबंधका विवरण इस सूक्तमें है। उसे होता है । (मं ७) वैद्य इस सूक्तका अधिक विचार करें। इस सूक्तमें कहे हुए यम, नियम पालन करनेवाला सयमी पुरुप सुसमे रहता लक्षणोसे प्रतीत होता है कि यह तक्मा आजकलका गीतज्वर हैं। इस विषयमें निम्न लिखित मंत्र मननपूर्वक देखिये अथवा ' मलेरिया' है। - । शीत- उदरीकरणात कां. १, सू. १५ ऋपि - भृग्वझिा । देवता- यमनागनोऽग्निः ।) यग्निरापी अदहत्पविश्य यत्रार्कण्वन धर्मधृतो नमांसि । तत्र त आङः परमं जनि स नः संविद्वान् परि वृङ्ग्धि तक्मन् ॥१॥ अर्थ- (यत्र ) जहाँ (धर्म-धृतः) धर्मका पालन करनेवाले सदाचारी लोग (नमांसि कृण्वन् ) नमस्कार करते हैं, यद्दा (प्रविश्य ) प्रवेश करके (यत् अग्निः) जो अग्नि (आपः अढहत्) प्राणधारक जलतत्त्वको जलाती है (तप्र ) यदा (ने परमं जनित्रं ) तेरा परम जन्मस्थान है, ऐसा (आहुः) कहते है । है (तक्मन् ) कष्ट देनेवाले ज्वर (म. संविदान् ) जानवा तुला तु (न परि ग्धि ) हमको छोद दे ॥ १ ॥ भावार्थ-धार्मिफ लोग जहां प्राणायामद्वारा पहुंचने और प्राणशक्तिका महत्व जानकर उसको प्रमाण भी करते हैं उस प्रागो मृटान पायकर यह बाकी भग्नि प्राणधारक भाप तवको जग देती है। यही इस ज्वरका परम म्यान है। यह जानकर हारसे मनुष्य बने ||1|| शीत-ज्वर-दरीकरण-सूक (१९३) यधुचियदि वासि शोचिः शकल्येषि यदि चा ते जनित्रम् । हुदुर्नामांसि हरितस्य देव स नः संवद्वान् परि वृङ्ग्धि तक्मन् ॥ २॥ यदि भोको यदि वाभिशोको यदि वा राज्ञो वरुणस्यासिं पुत्रः । हृडुर्नामांसि हरितस्य देव स नः संविद्वान् परि वृश्धि तक्मन् ॥३॥ नम शीताय तक्मने नमो रूराय शोचिपे कृणोमि । यो अन्येचुरुभयोरभ्येति तृतीयकाय नमों अस्तु तक्मने ॥४॥ अर्थ-(यदि अर्चिः) यदि तू ज्वालारूप, (यदि वा शोचिः असि) अथवा यदि तापरूप है, (यदि ते जनित्रं ) यदि तेरा जन्म स्थान (शकल्य-इपि) भंगप्रत्यंगमें परिणाम करता है, तो त् (हूडुः नाम असि) हूड [अर्थात् गति करनेवाला ] नामका है । अत हे (हरितस्य देव तक्मन्) पीलक रोगको उत्पन्न करनेवाले ज्वर देव ! (सः संविद्वान् ) वह तू यह जानता हुमा (नः परि वृंग्धि) हमे छोड दे ॥ २ ॥ (यदि शोकः ) यदि तू पीडा देनेवाला अथवा (यदि अभि शोकः) यदि सर्वत्र पीडा उत्पन्न करनेवाला हो, (यदि वरुणस्य राज्ञः पुत्रः असि) किंवा वरुण राजाका तू पुत्र क्यो न हो, तेरा नाम हूडु है। हे पीलक रोगके उत्पन्न करनेवाले ज्वर देव ! तू हम सबको यह जानकर छोड दे ॥ ३ ।। (शीताय तक्मने नमः) शीत ज्वरके लिये नमस्कार, (रूराय शोचिपे नमः कृणोमि) रूखे तापको भी नमस्कार करता हूं। (यः अन्येद्युः) जो एक दिन छोडकर भानेवाला ज्वर है, (उभयद्युः) जो दो दिन छोडकर मानेवाला (अभ्येति) होता है, जो (तृतीयकाय) तिहारी है, उस (तक्मने नमः अस्तु ) ज्वरके लिये नमस्कार होवे ॥ ४ ॥ भावार्थ-- यह ज्वर बहुत जोरकी तपिश चढानेवाला हो किंवा अंदर ही अंदर तपानेवाला हो, किंवा हरएक अग- प्रत्यंगको कमजोर करनेवाला हो, वह हरएक जीवनके मणुको हिला देता है इसलिये इसको ‘हूडु' कहते हैं, यह पांडुरोग भयवा कामिला रोगको उत्पन्न करता है, यह जानकर हरएक मनुष्य इससे अपना बचाव करें ॥२॥ कई ज्वर विशेष अगमें दर्द उत्पन्न करते हैं और कई संपूर्ण अंगप्रत्यगोमे पीडा उत्पन्न करते है, जलराज वरुणसे इसकी उत्पत्ति होती है, यह हरएक अंगप्रत्यंगको हिला देता है और पीलक रोग गरीरमें उत्पन्न कर देता है । इसलिये हरएक मनुष्य इससे बचता रहे ॥३॥ शीत ज्वर, रूक्ष ज्वर, प्रतिदिन भानेवाला, एकदिन छोडकर भानेवाला, दो दिन छोडकर भानेवाला, तीसरे दिन भानेवाला ऐसे भनेक प्रकारके जो ज्वर है उनको नमस्कार हो अर्थात् ये हम सबसे दूर रहें ।। ४ ।। - शीत-ज्वर-दूरीकरण-सूक्त ज्वरकी उत्पत्ति ही हैं। वरुण राजाके जलरूपी साम्राज्यमे यह जन्म लेता यह 'तक्मनाशन गण' का सूक्त है और इस सूक्तमे है। इसका सीधा आशय यह व्यक्त हो रहा है कि जहां घरकी उत्पत्ति निम्नलिखित प्रकार कही है। जल स्थिररूपसे रहता या सडता है वहांसे इस ज्वरकी उत्पत्ति होती है। मानकल भी प्राय यह बात निश्चितसी हो वरुणस्य राक्षः पुत्रः । (मं. ३) चुकी है कि जहां जर प्रवाहित नहीं होकर रुका रहता है, वहीं यह 'वरुण राजाका पुत्र है।' अर्थात् वरुणसे इसकी गीतज्वरकी उत्पत्ति होती है और शीतज्वर ऐसे ही स्थानों में रस्पति हुई है । जलका अधिपति वरुण है यह सब जानते फैलता है। २५ (मय मा १ हिन्दी) अथर्ववेदका सुबोध अनुवाद -'दीर्घजीवन और आरोग्य' - मन, ज्वरनागका पहिला उपाय यही है कि अपने घरक रसना चाहिये, यही निन्नलिखित मंत्रभागमें सूचित आसपास तथा अपने ग्राममें लयवा निकट कोई ऐस स्थान किया है- नही रखने चाहिये फिलहा जल लता और माता रहे। स नः संविद्वान् परिग्धि तक्मन् । (म १,२,३) घरका परिणाम यह बात जानता हुमा मनुष्य ज्वरको दूर रखे' अर्थात् ज्वरक कारण दूर करके उसका हमला मनुष्यपर न हो इस इस सूफी ज्वरका नाम 'ड' लिखा है । इसका अर्थ विषयमे योग्य प्रयत्न किये जाय । ज्वरके बाद उसके प्रति- 'गनि वन्नवाला है। यह ज्वर जब गरीरम भाता है तब कारका यत्न करना चाहिये इसमें किसीका विवाद नहीं हो गरीरक यनमें तथा अंगप्रत्यंगोंक जीवन-तत्त्वमे गति उत्पन्न करता है । और इसी कारण अगप्रत्यंगका जीवनरस (आप् कि अपने वकी और ग्रामकी व्यवस्था मनुष्य इस प्रकार सकता । इस सूक्त द्वारा वेद यही उपदेश देना चाहता है, नत्त्व ) जल जाता है । यही बात प्रथम मंत्रम कही है- रखे कि यह मलेरिया ज्वर आवे ही न और उसके निवारणके अग्निः श्रापः अढहत् । (मं.) लिये दवाइया पीनी न पटें । क्योकि यह विप इतना घातक ' यह ज्वर नीवनरसको ही जला देता है।' इसी कारण है कि एक बार आया हुआ हिमज्यर अपना परिणाम स्थिर चरंत गरीरकी गति कम होती है। माप नत्व प्राणशक्तिका रूपसे गरीरमें रख जाता है और उसके निवारणके लिये वयाँ- वारण करनेवाला है । (आपोमयः) भाप तत्त्वमय प्राण है तक और वढे व्ययस यत्न करना पड़ता है । यह टपनिपटोंका कयन है। प्राणका आश्रय गरीरस्थ भाप हिमज्वरके नाम नत्व हम ज्वरस द्वारा जल जाता है, इसी कारण ज्वरक भानपर जीवनमानि कम हो जाती है। इसी कारण इस इस सूक्तमें हिमज्वरके निम्नलिखित नाम ढिये है- चाकी पीर रोगका उत्पादक कहा है। देखिये- १ हृडु-गति उत्पन्न करनेवाला, शरीरमें कंप उत्पन्न हरितस्य देव (म. २, ३) करनेवाला, ज्वरका गीत जिस समय प्रारंभ होता है, उस 'पीरापन उत्पन्न करनेवाला' फीका निस्तेज बनानेवाला, समय मनुष्य कांपने लगता है। मराठी भाषामें इस हिम पीलगंग, कामिला, पादुरोग, जीवनरसका क्षय करनेवाला ज्वरका नाम 'हुडहुडा नाप' है, यह शब्द भी वैदिक 'हूई' रोग हा मयका टन्पादक ज्वर है । यह ज्वर इतने भयानक गान्ट के साथ मिलता जुलता है। यही शब्द विभिन्न हस्त- गंगा टसन करनेवारा, इसीलिये इसमे लिसित पुस्तकामे निम्नलिखित प्रकार लिखा मिलता हुआ मनुष्यको अपने भापका अचार करना चाहिये । यह ज्वर मूल स्थान- हृदु, हृदु, हूडु, हुड, रड, न्हूदु, रुद्ध, न्हूद्ध । अथर्व- पर हमग करा प्राणको कमतर यना देता है । इस विषयमें वेदकी पिप्पलाद गासाकी संहितामे 'हुछ पाट है। यह यह मय देमिये-- 'हुदु' शब्द मराठी 'हुडहुडा गब्दके ही महम गन्द है। (म २,३) यदन्निगपो अदहत प्रविश्य यप्राकृण्वन् धर्मवृती नमामि ॥ (मं १) २ गीतः-जो ज्वर गीत लग कर प्रारंभ होता है। ITI मार्मिक गंग जाकर मनन करते हैं वहां प्रविष्ट यह प्रतिदिन मानेवाला है । (मं. ४) र अलि-वर-प्राण धारक जीवनरसको जलावा।।' ३ अन्येाः- एक दिन छोडकर भानेवाला । (म, ४ ) मोगादि पापनहारा धार्मिक रोग ममाधि अपस्यामे चोदकर आनेवाला । ( में ४ ) दूसरे दिन आनेवाला अथवा दो दिन मेरिट , टमी हदय नीवनका रम है, समामे | स्यांत ज्यरका हदयपर यहुत ५ तृतीयक:- तीसरे दिन भानेवाला किंवा तीन दिन “ग पानगा, जिसमे यदुन कमजोरी भी उपस छांटकर मानेवाला अथवा नियत दिन बीचमें छोड़कर भाने- "Thी काम पर ज्वर पीक रोग मधवा पादुगंग याग। (म, ४) PATRI मा मूगो द्वितीय मत्रों का है । यह ६ तपमा.- जीवन टु समय बनानेवाला ज्वर । Irrimary- 'मरिया' कहा जाता है. बहुत ७ अचिः- अग्निकी ज्वालाए भटकनेक ममान जिसकी टिप उमरी हरक प्रयानरे दर उगवा बाहर पहुन होती है । (मं. २) ste . । ४ उभयद्यः -- ।
कुष्ठ-नाशम-सूक्त
(१९५)
८ शोचिः, शोक:- जिसमें गरीरमें पीड़ा होती है । उत्पन्न होता है। इसीलिए इस सूक्तमे इस ज्वरको 'जल
(मं.२) देवताका पुत्र' कहा गया है। इस प्रकार इस ज्वरका योग्य
९ शकल्य-इपिः- भंग-प्रत्यंग भलग अलग होनेके विचार करके उनसे सुरक्षित रहा जा सकता है।
समान शिथिलता भाती है । (मं. २ )
नमः शब्द
१० अभिशोकः- जिसमें सब शरीर दर्द करता है ।
इस सूक्तके अन्तिम मंत्रसे तीन बार नम. शब्द भाया
(म ३) है। यहाका नमस्कार उसी तरहका नमस्कार प्रतीत होता
है, जिस तरहका घातकी लोगोको अपनेसे दूर रखनेके लिए
इन नामोका विचार करनेसे इस ज्वरक स्वरूपका पता
लग सकता है और निश्चय होता है कि यह वर्णन शीतज्वर किया जाता है । इसलिए यहां नमः शब्द ज्वरसे दूर रहनेकी
जिसे मलेरिया आजकल कहते हैं, उसका ही है।
सूचना देनेवाला है, ऐसा हमारा विचार है। नमस्कार
और नमस्कारी गन्द एक औषधिका भी वाचक है । इस-
घरके पास जल सडता न रहे, घरके पासकी भूमि अच्छी लिए यदि नमः' शब्दसे भी किसी औषधिका बोध होता
रहे भौर किसी भी स्थानमे इस रोगकी उत्पत्ति होने योग्य हो, तो उसकी खोज आवश्यक है। नम शब्दके 'नमस्कार
परिस्थिति न हो, इसी प्रकार ग्राममे और ग्रामके आसपास अन्न, दण्ड' ये तीन अर्थ तो अत्यन्त प्रसिद्ध है। नम-
भी जगह भी साफ और आरोग्यदायक होनेसे यह रोग पैदा स्करी, नमस्कार, नमस्कारी' ये पद भौषधिवाचक
ही नहीं होगा, क्योकि यह ज्वर पानीके गीलेपन के कारण ही होनेसे संगोपनीय है।
।
.
कुष्ट नाशन-सूक्त
कां. १, स. २४
(ऋषिः- ब्रह्मा । देवता- आसुरी वनस्पतिः।)
सुपर्णो जातः प्रथमस्तस्य॒ त्वं पित्तासिथ । तासुरी युधा जिता रूपं चक्रे वनस्पतीन् ॥ १ ॥
आसुरी चक्रे प्रथमेदं किलासभेषजमिदं किलासनाशनम् ।
अनौनशत्किलासं सरूपामकवचम्
॥ २॥
अर्थ- (सुपर्णः) सुपर्ण (प्रथमः जातः) सबसे पहिले हुआ (तस्य पित्तं ) उसका पित्त (त्वं आसिथ)
तूने प्राप्त किया है । ( युधा जिता आसुरी ) युद्धसे जीती हुई वह आसुरी (वनस्पतीन् ) वनस्पतियोको (तत् रूपं
चक्रे ) वह रूप देनी रही ॥ १ ॥
(प्रथमा आसुरी) पहिली भासुरीने (इदं किलास-भेषजं) यह कुष्ठको औषध (चक्रे) बनायी । ( इदं ) यह
(किलासनाशनं ) कुष्ठ रोगका नाग करनेवाली है। इसने (किलासं) कुष्ठका (अनीनशत् ) माश किया और
(त्वचं ) त्वचाको (स-रूपां) समान रंगवाली ( अकरत् ) बना दिया ॥ २ ॥
भावार्थ- सुपर्ण नाम सूर्यका है उसकी किरणोमें पित्त बढानेकी शक्ति है। सूर्यकिरणो द्वारा वह पित्त वनस्पतियोमे
संचित होता है। योग्य उपायोसे स्वाधीन बनी हुई वनस्पतियां रूप रंगका सुधार करनेसें सहायक होती है ॥ १ ॥
भासुरी वनस्पतिसे
कुष्ठ रोगके लिये उत्तम औषध बनती है। यह निश्चयसे कुष्ठ रोग दूर करती है और इससे
शरीरकी स्वचा समान रंग रूपवाली बनती है ॥२॥
. (१९६) अथर्ववेदका सुबोध अनुवाद - 'दीर्घजीवन और आरोग्य' सरूपा नाम ते माता सरूपो नाम ते पिता । सरूपकृत्वमोपधे सा सरूपमिदं कधि |॥३॥ श्यामा संरू प्रकरणी पृथिव्या अध्युम॒ता । इदमु पु प्र साधय पुना रूपाणि कल्पय ॥ ४ ॥ अर्थ- हे औषधे तेरी माता ( सरूपा) समान रगवाली है तथा तेरा पिता भी समान रंगवाला है। इसलिये (त्वं स-रूप-कृत्)तू भी समानरूप बनानेवाली है (सा) वद्द तू (इदं सरूपं) इसको समान रंगरूपवाला (कृधि ) कर ॥ ३ ॥ श्यामा नामक वनस्पति ( सरूपं-करणी ) समान रूपरंग बनानेवाली है। यह (पृथिव्या' अध्युभृता) पृथ्वीसे उखाडी गई है । ( इदं उसु प्रसाधय ) यह कर्म ठीक प्रकार सिद्ध कर और (पुनः रूपाणि कल्पय ) फिर पूर्ववत् रंगरूप वना दे ॥ ४ ॥ भावार्थ- जिन पौधोके संयोगसे यह वनस्पति बनती है, वे पौधे (अर्थात् इसके माता पितारूपी पौधे भी) शरीरका रंग सुधारनेवाले हैं । इसलिये यह वनस्पति भी रंगका सुधार करनेमे समर्थ है ॥ ३ ॥ यह श्यामा वनस्पति शरीरकी चमडीका रंग ठीक करनेवाली है। यह भूमिसे उखादी हुई यह कार्य करती है । मत इसके उपयोगसे शरीरका रग सुधारा जाय ॥ ४ ॥ गुणधर्मसे कुष्ठ-नाशन सूक्त वनस्पतिके माता पिता दवापर इस प्रकार प्रभुत्व संपादन करना पड़ता है । वनस्प- इस सूक्तके तृतीय मत्रमे वनस्पतिके मातापिताओंका तिके गुणधर्मोंसे पूर्ण परिचय और उसका उपयोग करनेका वर्णन है अर्थात् दो वृक्षवनस्पतियोंक संयोगसे बननेवाली उत्तम ज्ञान वैद्यको होना आवश्यक है नहीं तो औषध सिद्ध यह तीसरी वनस्पति है । दो वृक्षोक कलम जोटनेसे तीसरी नहीं कही जा सकती। (मं. १) वनस्पति विशेष युक्त बनती है, यह उद्यानशास्त्र सूर्यका प्रमाव जाननेवाले जानते ही है । कुष्ठनागक श्यामा आसुरी वनस्पति इस प्रकार बनायी जाती है। शरीरके रगका सुधार करने- सूर्यमें नाना प्रकारके वीर्य हैं। वे वीर्य किरणों द्वारा वाली दो औषधियोक सयोगसे यह श्यामा बनती है। जो वनस्पतियोमे जाते है । वनस्पति द्वारा वे ही वीर्य प्राप्त होते माधारका पौधा होता है उसका नाम माता और जिसकी हैं और रोगनाश अथवा बलवर्धन करते है। इस प्रकार यह सब सूर्यका ही प्रभाव है। (म १) शासा उसपर चिपकायी या जोडी जाती है वह उसका पिता तथा उस सयोगसे जो नयी वनस्पति बनती है वह सूर्यसे वीर्य प्राप्ति उक्त दोनोका पुत्र है। (मंत्र ३) सूर्यसे नाना प्रकारके वीर्य प्राप्त करनेकी यह सूचना सरूप-करण बहुत ही मनन करने योग्य है। गरीरके वास्तविक रंगके समान कुष्टरोगके स्थानके चम सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुपश्च । (ऋ १११५१) डेका रंग बनाना सरूपकरण का तात्पर्य है । मासुरी सूर्य ही स्थावर जंगमका मात्मा है ' यह वेदका उप- श्यामा वनस्पति यह करती है इसीलिये कुष्टरोगपर इसका इसीलिये कुष्टरोगपर इसका देश भी यहा मनन करना चाहिये । जब सूर्यसे नाना प्रकार उपयोग होता है । (मं, २-३ ) से वीर्य प्राप्त करके हम अधिक वीर्यवान् हो जायगे तभी वनस्पति पर विजय यह मत्रभाग हमारे अनुभवमे आ सकता है। युद्धसे जीती हुई आसुरी वनस्पति भौषध बनाती है।' नंगे गरीर सूर्यकिरणों में विचरनेसे और सूर्यकिरणों द्वारा यह प्रथम मंत्रका कयन विशेष मननीय है। वैद्यको इरएक भपनी चमरी भच्छी प्रकार तपानेसे शरीरके-मंदर सूर्गका , ।
श्वेतकुष्ठ-नाशन-सूक्त
(१९७)
जीवन संचरित होता है, इसी प्रकार सूर्यसे तपी हुई वायु
वैद्योको उचित है, कि व खोजसे श्यामा वनस्पतिको प्राप्त
प्राणायामसे मंदर लेनेसे भययोगमें भी बदा लाभ पहुंचता करें और उसके योगसे कुष्ठ रोग दूर करें। तथा सूर्यसे
। इसी प्रकार कई रीतियोंसे हम सूर्यसे वीर्य प्राप्त कर अनेक वीर्य प्राप्त करने के उपाय ढूढकर निकालें और उनका
उपयोग भारोग्य बढानेमें करते रहें।
।
श्वेतकुछ-नाशन सूक्त
कां. १, सू, २३
(ऋपि - अथर्वा । देवता- मौषधि.।)
नक्तंजातास्योषधे रामे कृष्णे असिंक्नि च । इदं रंजनि रजय किलास पलितं च यत ॥ १ ॥
किलासै च पलितं च निरितो नांशया पृषत् । आ त्वा स्वो शितां वर्णः परी शुक्लानि पातय ॥ २ ॥
असितं ते प्रलयनमास्थानमसितं तव । असिक्न्यस्योपधे निरितो नाशया पृषत् ॥३॥
अस्थिजस्व किलासंस्य तनूजस्य च यत्त्रुचि । दूष्या कृतस्य ब्रह्मणा लक्ष्म श्वेतर्मनीनमम् ॥ ४ ॥
अर्थ- (रामे कृष्णे असिक्ति ) हे रामा कृष्णा और असिक्नि औषधि ! तू (नक्त जाता असि ) रात्रिके
समय उत्पन्न हुई है। हे ( रजनि) रग देनेवाली ! ( यत् किलासं पलितं च ) जो कुष्ट और श्वेत कुष्ट है (इद
रजय) उसको रंग दे ॥ १ ॥
(इतः) इसके शरीरसे (किलासं पलितं) कुष्ठ और श्वेत कुष्ठ तथा (पृपत्) धब्बे आदि सब (निः
नाशय ) नष्ट कर दे। (शुक्लानि परा पातय ) श्वेन धब्बे दूर कर दे (स्वम्वर्ण. ) अपना रंग (त्वा) तुझे
(आविशता ) प्राप्त हो ॥ २ ॥
(ते प्रलयनं) तेरा लयस्थान (असितं) कृष्ण वर्ण है तथा (तव अवस्थानं) तेरा स्थान भी (असितं)
काला है, हे औपधे । तू स्वयं (असिक्नी असि ) काले रंगवाली है इसलिये ( इतः ) यहासे (पृपत् ) धब्बे (निः
नाशय ) नष्ट कर दे ॥ ३ ॥
(दूप्या कृतस्य ) दोपके कारण उत्पन्न हुए (आस्थिजस्य तनुजस्य च ) हड्डीसे तथा शरीरसे उत्पन्न हुए
(किलासस्य यत् त्वचि श्वेतं लक्ष्म ) कुछका जो त्वचापर श्वेत चिन्ह है उसको (ब्रह्मणा अनीनशं ) इस ज्ञानसे
मैंने नाश किया है ॥ ४ ॥
भावार्थ- रामा कृष्णा मसिक्नी ये भोपधियां है, इनका पोषण रात्रिके समय होता है, इनमें रंग चढानेका
मामर्थ्य है । इसलिये इनके लेपनसे श्वेतकुष्ठ दूर होता है ॥ १ ॥
गरीरपर जो श्वेत कुष्ठके धब्बे होते है, उन श्वेत धब्बेको इस औषधिके लेपनसे दूर कर दे ॥ २ ॥
यह वनस्पति नष्ट होनेपर भी काले रंगकी होती है, उसका स्थान काले रंगका होता है और वनस्पति भी स्वयं काले
रंगवाली है, इसी कारण यह वनस्पति श्वेत धब्बोंको दूर कर देती है ॥ ३ ॥
दुराचारके दोषोंसे उत्पन, हड्डीसे उत्पन्न, मांससे उत्पन्न हुए सब प्रकारके श्वेत कुष्टके भन्योंको इस शानसे दूर
किया जाता है॥४॥
(१९८) अथर्ववेदका नुवोध अनुवाद - 'दीर्घजीवन और आरोग्य' श्वतकुष्ठ-नाशन-टुक्त - रंगका घुसना श्वनष्ट रामा, कृष्णा, असिस्नी' इन पत्रिका इस Tv. इस रोगमे गोरे कालेका भेड स्वाभाविक होनेपर भी पर उपयोग होता ये नाम निश्चय किन नोपधियांक चमढीका एक विलक्षण रग हो जाता है । और रंग नष्ट हो बोधक है और फिन औषधियोंका उपयोग इस कुष्टर कर चमटीपर श्वेतसे धब्बे दिखाई देते है। उसका नाम ही निवारण करने के लिये हो सकता है । इस विषय में चल श्वेत कुष्ठ होता है। इस श्वेत कुष्टक गरीरपर होनेसे गरीरका सुयोग्य वैद्य ही निश्रित मन दे सकते हैं, तथा ये ही योग्य सौंदर्य नष्ट होजाता है और सुढील सुंदर मनुष्य भी कुर- मार्ग सांज कर सकते हैं। पंढमे यहुतनी विद्याप होनेसे पसा दिसाई देता है, इसलिये इस (श्वेत लक्ष्म ) श्वेत भनेक विद्यामा पंदित विद्वानी मिलनेपर ही बंदकी पोज हो कुछक दूर करनेका उपाय वेदने यहां बताया है। सकती है । मत. सुयोग्य वैग्रोको भायुमेंट विषयक वेदभागकी निदान सोज करनी चाहिये और यह प्रत्यक्ष विषय हानेगे इन वेद इस श्वेत कुष्टके निदान इस सूक्तमे निम्न प्रकार औषधादिका प्रयोग करक ही इसका मप्रयोग प्रतिपादन देता है- करना चाहिये। (१) दूप्या कृतस्य- दोपयुक्त कृत्य अर्थात ढोपपूर्ण भाचरण । सटाचार न होनेस अथवा आचार विषयक कोई कई लोग समाते हैं कि अपर ही ऊपर बनस्पतिका दोष कुलमै रहनेस यह कुष्ट होता है । व्यक्तिदापसे तथा कुरक रस शादि लगानेसे चमढीका ऊपरका रंग बदल जाता है, दोपसे भी यह कुष्ट होता है। परंतु यह सत्य नहीं है । इस मूनके द्वितीय मंत्रम २) अस्थिजस्य- अस्थिगत दोपसे यह होता है। (३) तनूजस्य- शारीरिक अर्थात् मासक दोपसे आ त्वा स्वो विशतां वर्णः । (म. २) होता है। रंग अंदर घुस जाय ' यह मंत्रमाग बता रहा है कि (४) त्वचि- चमडीके अंदर कुछ दोप होनेसे भी इन सोपधियोका परिणाम चमदीने अंदर ही होना अभीष्ट यह होता है। है, न कि केवल ऊपर ही ऊपर। ऊपर परिणाम हो परंतु वे दाप सबक सब हो या इनमेसे योटे हो यह कुष्ठ हो विशतां' क्रिया ' अदर घुसने' का भाव बना रही है। नाता है। इसलिये चमढी भदर रंग घुस जाता है और वहा वह दो मेद और उनका उपाय स्थिर हो जाता है । यह मंत्रका कथन स्पष्ट है । इस कुष्टमे दो भेद होते है, एक किलास और दूसरा औषधियोंका पोषण पलित । पलित गदमे केवल श्वेत-वफा ही बोध होता है औषधियोका राजा सोम-चंद्र-है, इसलिये औषधियांका इस कारण यह श्वेत धब्बाका वाचक स्पष्ट है। इसको पोषण और वर्धन रात्रिक समय होता है । यही बात 'नक्तं छोटकर दूसरे कुष्टका नाम किलास प्रतीत होता है, जिसमें जाता' शब्दोस इस सूक्तमे बतायी है । रात्रिके समय बनी घमढी विरूपसी बनती है । सुयोग्य वैद्य इन शब्दोका अर्थ बढी या पुष्ट हुई औषधि होती है। प्रायः सभी औषधियोंक निश्चय कर। संबंधमें यह बात सत्य है ऐसा हमारा ख्याल है। --
गण्डमालाको चिकित्सा
(१९९)
गण्डमालाकी चिकित्सा
प
कां. ७, सू. ७६
(ऋपि.- अथर्वा । देवता- अपचिनैषज्यं, जायान्य , इन्द्र ।)
आ सुस्रसः सुस्रमो असतीभ्यो अमेत्तराः । सेहोरसतरा लवणाद्विक्लेदीयसी: ॥ १ ॥
या ग्रैव्या अपचितोऽयो या उपपक्ष्याः । विजाम्नि या अपचितः स्वयंस्रमः
॥ २ ॥
यः कीकसाः प्रशृणाति तलीद्यमितिष्ठति । निहस्तिं सर्व जायान्यं यः कश्चं ककुदि श्रितः ॥ ३ ॥
पक्षी जायान्यः पतति स आ विंशति पूरुषम् । तदक्षितस्य भेषजमुभयो सुक्षतस्य च || ॥
विद्म वै ते जायान्य जानं यतो जायान्य जायसे । कथं ह तत्र त्वं नो यस्य॑ कृण्मो हविगैहे ॥ ५ ॥
अर्थ- (सुनसः सुनसः आ) वहनेवालीसे भी अधिक बहनेवाली, (असतीभ्यः असत्तराः) बुरीसे
भी बुरी, (सेहोः अरसतराः) शुष्कसे भी अधिक शुक और (लवणात् विक्लेदीयसीः । नमकसे भी अधिक
पानी निकालनेवाली गण्डमाला है ॥ १॥
(याः अपचितः ग्रेव्याः ) जो गण्डमाला गलेमे होती है, (अथो या उपपक्ष्या ) और जो कन्धो या बग-
लोमें होती है तथा (याः अपचितः विजाम्नि ) जो गंडमाला गुप्तस्थानपर होती है, ये सय ( स्वयं स्रसः) स्वयं
बहनेवाली हैं ॥२॥
(यः कीकसाः प्रशृणाति) जो पसलियोको तोडता है, जो (तलीद्यं अवतिष्ठति) तलवेमें बैठता है (यः
कः च ककुदि श्रितः) जो रोग पीठमें जम गया होता है, (तं सर्व जायान्यं) उस सब स्त्री द्वारा आनेवाले रोगको
(निः हाः) निकाल दो ॥ ३ ॥
(पक्षी जायान्यः पतति) पक्षीके समान यह सीसे उत्पन्न गेग उडता है और (सः पूरुपं आविशति ) वह
मनुष्य के पास पहुंचता है, (तत् अक्षितस्य सुक्षतस्य उभयोः च ) वह चिरकालसे रोगग्रस्त न हुए अथवा व्रणयुक्त
बने
हुए दोनोंका (भेषजं ) औषध है ॥ ४ ॥
हे (जायान्य) स्त्रीसे उत्पन्न होनेवाले क्षयरोग ! (यतः जायसे) जहांसे तू उत्पन्न होता है, (ते जानं विन्न
वै) वह तेरा जन्मस्थान हम जानते हैं । (त्वं तत्र कथं हनः ) तू वहा कैसे मारा जाता है (यस्य गृहे हविः कृण्मः )
जिसके घरमें हम हवन करते हैं ।। ५ ॥
भावार्थ- सय गण्डमाला वहनेवाली, बुरी, खुष्की उत्पन्न करनेवाली और द्रव उत्पन्न करनेवाली होती है ॥ १॥
कई गण्डमाला गलेमें, कन्धेमें, गुप्तस्थानपर होती है और ये सब स्राव करनेवाली होती है ॥२॥
हड्डीमें, तलवेमें, पीठमे एक रोग होता है वह स्त्रीमंबंधसे रोग होता है ॥ ३ ॥
इसके बीज पक्षीके समान हवामें उढते हैं, ये मनुष्यमें जाते है और रोग उत्पन्न करते है। जो लोग ऐसे रोगसे
चिरकालसे ग्रस्त होते हैं, अथवा जिनमे व्रण होते है, ऐसे रोगका भी औषधसे उपचार करना चाहिये ॥ ४ ॥
स्त्रीसे उत्पन्न होनेवाला क्षयरोग कैसे उत्पन्न होता है यह जानना चाहिये । जिसके घरमे हवन होता है वहाके रोगयीज
हवनसे जल जाते हैं ॥ ५॥
(२००) - अधचंदका सुबोध अनुवाद दीर्घजीवन और आरोग्य' धृपरिपब कलशे मोममिन्द्र वृत्रहा शूर समरे वसूनाम् । माध्यन्दिने सर्वन आ वृपस्व रयिष्ठानौ रयिमस्मासु धेहि ॥६॥ अर्थ- है ( शुर धृपत् इन्द्र ) शर, गनुको दयानेवाले इन्द्र ! ( कलगे सोमं पिव ) पात्रमे रखा हुभा मोमरम पी।त (वमूना समरे वृत्रहा ) धनोंक युद्ध में शत्रुका पराजय करनेवाला है। (माध्यन्दिने सवने आवृपस्व) मध्य- दिनके मवन समय तू बलवान हो । ( गयि-स्थानः अस्मानु रयि धेहि ) तू धन के स्थानमें रहकर हमें धन दे ॥६॥ भावार्थ- हे शूर प्रभो ' इस सोमरसका सेवन करो। तू शत्रु का नाश करनेवाला और बल्बान है। हमें धन दे ॥४॥ गण्डमाला इस एक सूक्तम वस्तुत. भिन्न भिन्न दो मुक्त हैं । और एफका दूसरे माथ कोई संबंध नहीं। परंतु यदि इन दो सूक्तोंका सबंध देखना हो, तो एक ही विचारसे देखा जा सकता है । पहिले दो मंत्रों में जिय गण्टमागका उठेर है, वह गण्टमाला क्षयरोगसे उत्पन्न होती है जो क्षयरोग स्त्रीक विषयातिरकसे उत्पन्न होता है । इस प्रकार संबंध देसनेमे ये दो सूक्त विभिन्न होते हुए भी एक स्थानपर क्यो से है, इसका ज्ञान हो सकता है । यह गण्डमाला बहनेवाली, गु'को बढानेवाली, नमक जैसी गौरी रहनेवाली, बुरा परिणाम करनेवाली, गलेमें उत्पा होनेवाली, पसलियोम उत्पन्न होनेवाली होती है इसकी उत्पत्ति गुप्त स्थान के विषयातिरेकसे होती है। इसके रोगवीज पसलियोको और हड्डियोको कमजोर करते हैं, हाथ पावक वलयोमें गर्मी पैदा करते हैं, पीटकी रीटमें रहते हैं । इन स्थानोंसे इनको हटाना चाहिये । इस क्षयके रोगवीज पक्षी जैसे हवा में उठते हैं और वे- पक्षी जायान्यः पतति । स पूरुपं आविराति ॥ (मं. ४) 'पक्षी जैसे अयरोगके वीज उहते है, और वे मनुष्यमें प्रवेश करते हैं.' तथा ये (जायान्यः) मोसंबंधसे उत्पन्न होते हैं अर्थात् स्त्रीस अति संबंध करनेमे भरीर वीर्यहीन होता है और इनको बढनेका अवसर मिलता है । वनसे नीरोगता यस्य गृहे हविः कृण्मः, तत्र हनः । (मं. ५) 'जिसके घरमें हवन करते हैं वहां इनका नाश होता है । ये क्षयरोगके यीज हवामें उढकर भाते है और हवन होते ही इनका नाश होता है । यह हवनका महत्त्व है। हवन मारोग्य देनेवाला । इस प्रकार नीरोग बने मनुष्य शूर होते हैं, वे मोमरस पान करें, और अपने शत्रुओंका दमन करके अपने लिये यश और धन सपादन करें । गण्डमालाकी चिकित्सा कां. ७, सू. ७४ (ऋषि - अथर्वाट्रिगरा । देवता- मन्त्रोक्ता , जातवेदा.।) अपचितां लोहिनीनां कृष्णा मातेति शुश्रुम । मुर्दैवस्य मूलेन सर्वां विध्यामि ता अहम् ॥ १ ॥ अर्थ- (लोहिनीनां अपचिता) लाल गण्डमालाकी (कृष्णा माता इति शुश्रुम) कृष्णा उत्पादक है ऐसा सुना जाता है। (ताः सर्वाः) उस मत्र गण्डमालाओंका (देवस्य मुनेः मूलेन अहं विध्यामि) मुनि नामक दिन्य वनस्पतिकी मूल-जट-से मैं नाग करता ह॥1॥ भावार्थ~ लाल रंगवाली गण्डमालाका नाश करने के लिये मुनि नामक भौषधीकी जर बसी उपयोगी होती है ।।।।।
गण्डमालाका निवारण (२०१) विध्याभ्यासां प्रथमा विध्याम्युत मध्यमाम् । इदं जघन्यामिासामा च्छिनाम स्तुकामिव ॥ २ ॥ खाष्ट्रणाहं वर्चसा वि त ईमिमीमदम् । अथो यो मन्युष्टै पढे तमु ते शमयामसि ॥३॥ व्रतेन त्वं व्रतपते समक्तो विश्वाहा सुमना दीदिहीह । तं त्वा वयं जातवेदः समिद्धं प्र॒जावन्त उप सदेम सर्वे ॥४॥ अर्थ- (आसां प्रथमां विध्यामि) इनकी पहिली गण्डमालाको मैं वेधता हूं, (उत मध्यमां विध्यामि) और मध्यमको वेधता हूं। (आसां जघन्यां इदं आ छिनमि) इनकी अत्यन्त खराब गण्डमालाको भी मै उसी प्रकार छेदता हूं (स्तुकां इव) जिस प्रकार ग्रंथिको खोलते हैं ॥२॥ (त्वाप्टेण वचसा) सूक्ष्मता उत्पन्न करनेवाली वाणीसे (अहं ते ईर्ष्या वि अमीमदं) मैं तेरी ईर्ष्या दूर करता है । हे पते । (अथ यः ते मन्युः) और जो तेरा क्रोध है, (ते तं शमयामसि ) तेरे उस क्रोधको हम गान्त हे (व्रतपते) प्रतपालन करनेवाले । (त्वं व्रतेन समतः) तू व्रतसे संयुक्त होकर (इह विश्वाहा सुमनाः दीदिहि) यहां सर्वदा उत्तम मनवाला होकर प्रकाशित हो । हे (जातवेदः) अग्ने । (सर्वे वयं तं त्वा समिद्धं ) हम सब उस तुझ प्रदीप्त हुएको (प्रजावन्तः उपसदम) प्रजावाले होकर प्राप्त हों ॥ ४ ॥ भावार्थ- इससे पहिली, बीचकी और अन्तकी गण्डमाला दूर होती है ॥२॥ क्रोध और ईर्ष्या सूक्ष्म विचारके द्वारा दूर किये जायें ॥३॥ नियमपालनसे सदा उत्तम मन रहता है और मनुष्य प्रकाशमान हो सकता है। इस प्रकार सब तेजस्वी होकर, बालबच्चोंको साथ लेते हुए हम तेजस्वी ईश्वरकी उपासना करें ॥ ४ ॥ मुनि नाम 'दमनक, बक, पलाश, प्रियाल, मदन' इत्यादि अनेक औषधियोंका है, उनमेसे कौनसी भोपधि गण्ड- माला दूर करनेवाली है इसका निश्चय वैद्योंको करना चाहिये । क्रोध मनसे हटाना, पथ्यके नियमोका पालन करना इत्यादि बातें भारोग्य देनेवाली है इसमें संदेह नहीं करते हैं॥३॥ - गण्डमालाका निवारण कां. ६, सू. ८३ (ऋषिः- भग. । देवता- मन्त्रोका।) अपचितः प्र पंतत सुपर्णो वसतेरिव । सूर्यः कृणोतुं भेजं चन्द्रमा वोऽपोच्छतु ॥१॥ अर्थ- (वसतेः सुपर्णः इव) अपने निवासस्थानसे जैसे गरुड उढता है उसी प्रकार, हे (अपचितः) गण्ड- माला नामक रोगो ! तुम (प्रपतत) उड जामो । (सूर्य. भेषजं कृणोतु) सूर्य इसका मौषध वनावे और (चन्द्रमाः था उप उच्छतु) चन्द्र रोगको दूर करे ॥ १॥ भावार्थ- गंडमालाका औषध सूर्य किरणोमें है, और चन्द्रमाके प्रकागसे भी होता है । इससे गण्डमाला शीत्र दर हो जाती है ॥१॥ २६ (भधर्व. भा. ४ हिन्दी) (२०२) अथर्ववेदका सुबोध अनुवाद - 'दीर्घजीयन और आरोग्य' एन्येका श्येन्येका कृष्णैका रोहिणी द्वे । सर्वांसामग्रभं नामावीरनीरपैतन ॥२॥ असूतिका रामायण्यपचित्प्र पतिष्यति । ग्लौरितः प्र पतिष्यति स गलुन्तो नैशिष्यति ॥३॥ वीहि स्वामाहुति जुाणो मनसा स्वाहा मनसा यदिदं जुहोमि ॥४॥ अर्थ- (एका एनी) एक चितकबरी, (एका श्येनी) एक श्वेत, (एका कृष्णा) एक काली, (द्वे रोहिणी) और लाल रंगवाली दो इतने इनमें भेद है । (सर्वासां नाम अग्रभ) सबका नाम मैने लिया है, भत, (अवीरघ्नीः अपेतन) मनुष्यकी हिंसा न करती हुई तुम यहाँसे दूर भाग जाओ ॥ २ ॥ (रामायणी असूतिका अपचित्) नाडीमें छिपी रहनेवाली रोगकी जद यह गंढमाला रोगकी उत्पत्ति न करती हुई (प्रपतिष्यात) दूर होगी। (इतः ग्लो प्रपतिष्यति ) यहांसे यह गलनेवाली दूर होगी, तथा (सः गलुन्तः नशिष्यति ) वह सटनेवाला रोग नाशको प्राप्त होवे ॥३॥ (स्वां आहुतिं जुपाणः वीहि) अपने हवनकी आहुतिका सेवन करता हुआ भाग जा, (यत् इदं मनसा जुहोमि स्वाहा) जो यह मैं मनसे हवन करता हूं वह उत्तम हवन होवे ॥ ४ ॥ भावार्थ-काली, श्वेत, चितकबरी, साधारण लाल और अधिक लाल ये पांच प्रकारकी गण्डमाला होती है । इनसे मनुप्यकी हानि न हो और ये सब रोग दूर हो ॥२॥ इसका वीज धमनिमें रहता है तथा इनमें फोडेवाली, गलनेवाली और सदनेवाली ऐसे भेद होते हैं। ये सब प्रकारके रोग पूर्वोक्त उपचारसे दूर होते है ॥३॥ मन लगाकर उत्तम हवन करनेसे भी यह रोग दूर होता है ॥ ४ ॥ 'गण्डमाला सूर्यकिरण, चन्द्रप्रभा और मन लगाकर किया हुआ हवन इन तीन उपधारोसे गण्डमाला दूर होती है। इसकी उपचार पद्धतिके विषयमें वैद्योंको विचार करना उचित है। रोग-कृमि निकारण कां., ५ सू. २९ (ऋषि:- धातनः । देवता- जातवेदाः, मन्त्रोक्ताः।) पुरस्ताद्युक्तो वह जातवेदोऽग्ने विद्धि क्रियाण यथेदम् । त्वं भिपग्मैपजस्यासि कर्ता त्वया गामश्वं पुरुष सनेम ॥१॥ अर्थ- हे जातवेद भग्ने (त्वं भिक्षा) तू वैद्य और (भेपजस्य कर्ता आसि) औषधका निर्माण करनेवाला है (पुरस्तात् युक्तः वह ) पहलेसे सब कार्यों में नियुक्त होकर कार्य के भारको उठा। (यथा इदं क्रियमाणं विद्धि ) जैसे यह कार्य किया जा रहा है, उसे तू जान । (त्वया गां अश्वं पुरुपं सनेम) तेरी सहायतासे गौ, वोटे भौर मनुष्योको उत्तम प्रकार नीरोग भवस्थामें हम प्राप्त करें ॥१॥ भावार्थ-हे तेजस्वी वैद्य तू स्वयं वद्य है और औषध वनानेमे प्रवीण है। रोगनिवारणके उपाय जो यहां किए जाते हैं, वे ठीक हूँ वा नहीं, इसका निरीक्षण कर । तेरी चिकित्सासे हम गौवें, घोटे और मनुष्योको उत्तम नीरोग भवस्थामें प्राप्त कर सकेंगे - रोग-कृमि निवारण (२०३) .. तथा तदने कृणु जातवेदो विश्वभिर्देवैः सह संविदानः । यो नौ दिदेव यतमो जघास यथा सो अस्य परिधिष्पाति ॥२॥ यथा सो अस्य परिधिष्पाति तथा तदने कृणु जातवेदः। विश्वेभिर्देवैः सह संविदानः अक्ष्योई नि विध्य हृदयं नि विध्य जिह्वां नि तृन्द्धि प्र दुतो मृणीहि । पिशाचो अस्य यतमो जघासाग्ने यविष्ठ प्रति तं भृणीहि ॥४॥ यदस्य हुतं विहतं यत्परांभृतमात्मनो जग्धं यतमपिशाचैः । तदने विद्वान्पुनरा भर त्वं शरीरे मांसमसुमेर्रयामा आमे सुपक्के शयले विपक्के यो मा पिशाचो अर्शने दुदम्म । तदात्मनो प्रजया पिशाचा वि यातयन्तामगदोयमस्तु ॥६॥ अर्थ- हे जातवेट अन्ने ! (विश्वेभिः देवैः सह संविदानः) सब देवोके साथ मिलता हुआ (तथा तत् कुरु) वैसा प्रबन्ध कर (यः नः दिदेव ) जो हमे पीडा देता है और (यतमः जघास) जो हमे खा जाता है (अस्य यथा सः परिधिः पताति) ऐसे इस रोगकी वह मर्यादा गिर जावे ॥२॥ हे जातवेट अग्ने ! (विश्वभिः देवैः सह संविदानः) सब देवोके साथ मिलता हुआ तू (तथा कुरु) वैसा भाचरण कर कि (यथा अस्य सः परिधिः पताति) जिससे इस रोगकी वह सीमा नष्ट हो जावे ॥३॥ हे अग्ने (अस्य अक्ष्यौ निविध्य) इसकी मांखोको छेद डाल, (हृदयं निविध्य) हृदयको वेध डाल, (जिह्वां नि तृन्धि) जिव्हाको काट दे (दतः प्रमृणीहि) दांतोको भी तोड डाल । हे (यविष्ठ) बलवाले ! (अस्य यतमः पिशाचः जघास) इसको जिस रक्त भक्षकने खाया है, (तं प्रति शृणीहि ) उसका नाम कर ॥४॥ हे विद्वान् अग्ने । (पिशाचैः अस्य आत्मनः) मास भक्षकोके द्वारा इसके अपने शरीरका (यत् हृतं, विहृतं, यत् पराभृतं) जो भाग हरा गया, छीना गया और लूट लिया गया है और (यतमत् जग्धं) जो भाग खा लिया गया है, (त्वं तत् पुनः आ भर ) तू वह फिर भर दे, और हम (शरीरे मांसं असु आ ईरयामः ) शरीरमें मांस और प्राणको स्थापित करते हैं ॥५॥ (यः पिशाचः आमे सुपरवे) जो मांसभोजी क्रिमी कञ्चे, पक्के (शवले विपक्वे अशने मा ददम्भ) मध- पके, विशेष पके भोजनमे प्रविष्ट होकर मुझे हानि पहुंचाता है, (तत् आत्मना प्रजया पिशाचाः) वह स्वयं और प्रजाफे साथ वे सब मांसभोजी क्रिमी (वि यातयन्तां ) हटाये जाएं और (अयं अगदः अस्तु) यह पुरुष नोरोग होवे ॥ ६ ॥ भावार्थ-- तू जल, औषधि, वायु मादि देवताओंको अनुकूल बनाकर ऐसा प्रबन्ध कर कि जिससे पीना देनेवाले और मांसको क्षीण करनेवाले रोग जन्तुओकी गरीरमें बनी मर्यादा नष्ट हो जावे ॥२-३ ॥ जिस मांस भक्षक रोग क्रिमीने इसके मांसको खाया है, उसका नाश कर, उसके सब अवयव नष्ट कर दे ॥ ४ ॥ मासभक्षक रोग क्रिमियोने इस रोगीक जो जो अवयव क्षीण किए हैं, उनको फिर पुष्ट कर भौर इसके शरीरमे पुनः मांसकी वृद्धि हो ॥५॥ जो शरीर क्षीण करनेवाले क्रिमी कथे, मधपके, पक्के और अधिक पके हुए भोजनमें प्रविष्ट होकर मनुष्यको सताते हैं, उनका समूल नाश किया जाए और यह मनुष्य नीरोग हो जावे ॥६॥ -
(२०४)
अथर्ववेदका सुबोध अनुवाद
दीर्घजीवन और आरोग्य'
क्षीरे मा मन्थे यतमा दुदम्भीकृष्टपच्ये अर्शने धान्ये यः ।
तदात्मना प्र॒जयां पिशाचा वि यातयन्तामगदोश्यमस्तु
॥ ७॥
अपां मा पाने यतमो दम्भ ऋव्याद्यातूनां शयने शयानम् ।
तदात्मना प्रजया पिशाचा वि यातयन्तामगदोऽयमस्तु
॥८॥
दिवा मा नक्तं यतमो दुदम्भ व्यायातूनां शयने शयानम् ।
तदात्मना प्रजयां पिशाचा वि यातयन्तामगदोयमस्तु
॥ ९ ॥
ऋव्यादमग्ने रुधिरं पिशाचं मनोहन जहि जातवेदः।
तमिन्द्रो बाजी वज्रेण हन्तु च्छिनत्तु सोमः शिरों अस्य धृष्णः
।। १०॥
सनार्दने मृणसि यातुधानान्न त्या रक्षौसि पृतनासु जिग्युः ।
सह गनर्नु दह ऋव्यादो मा ते हेत्या मुक्षत देव्यायाः
॥ ११ ॥
अर्थ- (यतमः क्षीरे मन्थे अकृष्टपच्ये धान्ये) जो दूधमें, मटमें, विना खेतीसे उत्पन्न हुए धान्यमें तथा (यः
अशने मा ददम्भ) जो भोजनमें प्रविष्ट होकर मुझे दवाता है । (तत् आत्मना प्रजया पिशाचाः) वह मांसभक्षक
क्रिमि अपना संततिक साथ दूर हटा दिया जाये और यह पुरुष नोरोग होवे ॥ ७ ॥
(यतमः ऋव्यात् ) जो मासभक्षक क्रिमि ( अपां पाने ) जलके पान करनेमें और (यातूनां शयने शयानं)
यात्रियोक बिछान पर सोते हुये (मा ददम्म ) मुझको दबा रहा है (तत् आत्मना प्रजया पिशाचाः) वह मास-
भक्षक क्रिमि अपनी संततिक साय दूर हटाया जावे और यह मनुष्य नीरोग होवे ॥ ८ ॥
(यतमः क्रव्यात् ) जो मासभोजी क्रिमी (दिवा नक्तं यातूनां शयने शयानं मां ददम्भ ) दिनमें वा
रात्रीम यात्रियोंक शयन स्यानमें सोते हुए मुझको दवाता है (तत् आत्मना प्रजया पिशाचाः) वह अपनी संततिके
साथ दूर किया जावे और यह मनुष्य नीरोग बने ॥ ९॥
हे जातंवद भन्ने ! (क्रव्यादं रुधिरं मनोहनं पिशाचं जहि) मांस भक्षक, रुधिररूप, मनको मारनेवाले, रक्त
खानेवाले, क्रिमीका नाम कर । (वाजी इन्द्रः तं वज्रेण हन्तु ) बलवान् इन्द्र उसको वज्रसे मार देवे, (धृष्णुः
सोम. अस्य शिरः छिनत्तु) निर्भय सोम इसका सिर काट देवे ॥ १० ॥
हे अग्ने ! (यातुधानान् सनात् मृणसि) पीडा देनेवाले क्रिमियोंको तू सदा नष्ट करता है। (त्वा रक्षांसि
पृतनामु न जिग्युः) तुझे राक्षस संत्रामोंमें जीत नहीं सकते । (सह-मूरान् ऋन्यादः अनुदह ) समूल मांसभक्षकों-
को जला दे । (ते देव्यायाः हेत्याः मा मुक्षत) तेरे दिव्य शस्त्रसे कोई न छूटने पावे ॥ ११ ॥
भावार्थ-दूब, छाछ, धान्य तथा अन्य भोजनके पदार्थों द्वारा गरीरमें प्रविष्ट होकर जो रोगकृमी सताते हैं उनको
दर किया जावे, और यह मनुष्य नोरोग बने ॥ ७ ॥
जा मामक्षीण करनेवाले कृमि जलपानके द्वारा तथा अनेक मनुष्योंके साथ सोनेसे गरीरमं प्रविष्ट होकर सताते है
उनको दूर कररे यह मनुष्य नीरोग बने ॥ ८॥
जो कृमि दिन समय अथवा रात्रीक समय भनेक मनुप्योके साथ सोनेके कारण गरीरमे प्रविष्ट होकर सताते
उनको दूर करके यह मनुन्य नीरोग बने ॥ ९ ॥
रक्त और मांसकी क्षीणता करनेवाले, मनको मोहित करनेवाले रोग क्रिमी हैं, उनको इन्द्र और सोमके प्रयोगसे दूर
स्यिा जाव ॥ १०॥
अग्नि इन क्रिमियोको सदा दूर करता है, ये भीणता करनेवाले क्रिमी अग्निको परास्त नहीं कर सकते । भतः अग्नि-
द्वारा इन रोगक्रिमियोंका कुछ समूल नष्ट किया जावे ॥११॥
रोग-कमि निवारण (२०५) । ! समाईर जातवेदो यद्धतं यत्पराभृतम् । गात्राण्यस्य वर्धन्तामशुरिया प्यायतामयम् ॥ १२॥ सोमस्येव जातवेदो अंशुरा प्यायतामयम् । अग्ने विरप्शिन मेध्यमयक्ष्मं कृणु जीवंतु ॥१३॥ एतास्तै अमे समिधः पिशाचजम्भनी: । तास्त्वं जुंपस्व प्रति चैना गृहाण जातवेदः ॥ १४ ॥ ताटवीरने समिधः प्रति गृहाझुर्चिा । जहातु ऋव्याद्रूपं यो अस्य मांस जिहीपति ॥१५॥ अर्थ- हे (जातवेदः) जातवेट । ( अस्य यत् हृतं यत् पराभृतं ) इसका जो भाग हर लिया और नष्ट कर दिया है उस भागको (समाहर) पुन: ठीक प्रकार भर दे। (अस्य गात्राणि वर्धन्तां) इसके अंग पुष्ट हो जावे, (अयं अंशुः इव आप्यायतां) यह मनुष्य चन्द्रमाके समान वृद्धिको प्राप्त होवे ॥ १२ ॥ हे (जातवेदः) जातवेद । (अयं सोमस्य अंशुः इच आप्यायतां) यह मनुष्य चंद्रमाकी कलाके समान बढे । हे मग्ने ! इसे (विरप्शिन मेध्यं अयक्ष्मं कुरु ) निर्दोप, पवित्र व नीरोग कर और यह (जीवतु ) जीवित रहे ॥ १३॥ हे (अग्ने) भने ! (पताः ते समिधः पिशाचजम्भनीः ) ये तेरी समिधाए मांस सानेवाले रोगक्रिमियोको दूर करनेवाली हैं । हे जानवेद ! (त्वं ताः जुपस्व) तृ उनका सेवन कर और (एनाः प्रति गृहाण ) इनको स्वीकार कर ॥१४॥ हे भग्मे ! (ता-अधीः समिधः अर्चिपा प्रतिगृह्माहि) तृषारोगका शमन करनेवाली इन समिधाओको तू अपनी ज्वालाओसे स्वीकृत कर । (यः अस्य मांसं जिहीर्पति) जो इसके मामको क्षीण करना चाहता है वह (क्रव्यात् रूपं जहातु) मांसभोजी इसके रूपको छोड देवे ॥१५॥ भावार्थ-- इस रोगीका जो अवयव क्षीण हुमा था, वह फिर पुष्ट होवे और उसके सब अवयव पुन पुष्ट हों, जिस प्रकार चंद्रमा बढता है उस प्रकार यह वढे ॥ १२॥ चन्द्रमाकी कलाके समान यह बढे, यह रोगी दोप रहित, पवित्र व निरोग होवे और दीर्घ कालतक जीवित रहे ॥१३॥ जो समिधाएं यज्ञम डाली जाती है वे रोगक्रिमियोंका नाग करनेवाली है। इनको जलाकर अनिद्वारा ये रोगक्रिमी दूर किए जाएं ॥ १४ ॥ जो क्रिमी रोगीके मांसको क्षीण करते हे उनका पूर्ण रीतिसे नाग होये । इन समिधाओको जलाकर प्रदीप्त की हुई मामि इन रोगक्रिमियोका नाश करे ॥ १५॥ रोग क्रिमी निवारण रोगोंके कृमि १ यः दिदेव- जो शरीरमें पीडा देते है, जिनके कारण इस सूक्तमें रोगजन्तुओका वर्णन है। कुछ जातिके कृमि गरीर अशक्त होता है, अवयवोके टूट जानेके समान जिसमे भशक्तता आती है। (३) हैं जो शरीरमें प्रविष्ट होते है और विविध यातनाएं उत्पन्न २ यतमः जघास- जो गरीरको खा जाता है और करते हैं, मनुष्यको इनसे बढे क्लेश होते है। इन क्रिमियोंको क्षीण करता है । (म ३, ४) दूर करनेका साधन इस सूक्तमें बताया है। यह साधन वैद्य, ३ पिशाच- (पिशिताच ) मांस खानेवाला, रक्त भौषधि और अग्नि है। इस सूक्तमे जिन क्रिमियोका जो वर्णन पीनेवाला। जिस रोगक्रिमिके गरीरमे घुसनेके बाद रक्त है वह पहिले देखिये- मांस भादि धातु क्षीण होने लगते है। (मं. ४-१०) (२०१) अथर्ववेदका सुबोध अनुवाद दीर्घजीवन और आरोग्य' - - । - ४ तं, विहृतं, पराभूतं, जग्धं-गरीरके रक्त मांसका किम रीतिसे हटाना होता है इसका विचार अव करना है। हरण करते हैं, जो उन्हें विशेष प्रकारसे लूटते है, गरीरकी इसकी पहिली रीति यह है- जीवन शक्तिको नष्ट करते है, और खा जाते हैं । (मं.५) युक्तः भिपक् । भेपजस्य कर्ता। क्रियमाण अग्रे वेत्ति (मं १) ५ कन्याद्- (ऋवि-अद् ) जो गरीरका कया मांस नाते हैं । (मं. ८-११) सुयोग्य वैद्य, जो औषध बनाना जानता है । किया ६ रुधिरः- यह रक्तरूप होता है, रक्तमें मिल जाने- जानेवाला प्रयोग पहिलेसे जानता है। इस प्रकारका सुयोग्य चाग है, रक्तमे रहता है । (म ११) वैद्य अपने इलाजसे रोगी मनुष्यको निरोग करे । यह वैच- ७ मनोहनः- मनकी मनन गनिका नाम करता है। विश्वेभिः देवैः संविदानः अस्य परिधि पताति । अब ये रोगक्रिमी नगरमें जाते है, तब मननगक्ति नष्ट होती (म-२,३) है, मन क्षीण होता है । (मं. १०) सब देवासे सहायता प्राप्त करनेकी रीति जानता हुआ, इस रोगकी अन्तिम मर्यादाको तोड ढालता है।' इस प्रकार ८ यातुधानः- (यातु) यातना (धानः) धारण करनेवाला । ये क्रिमी शरीरप्रविष्ट होकर तो रोगीको यात- उसकी मर्यादा गिरानेक पश्चात् रोगकी जढ स्वयं नष्ट हो नाएं देन हैं । (मं. ११) जाती है। प्रत्येक देवताकी शक्तिले जो चिकित्सा हो सकती है उस चिकित्माको करके रोग दूर करनेकी शक्ति रखना ही ९. रक्षः- (अरणः) क्षीण करनेवाला । (मं ११) देवोके साथ परिचय रसनेका तात्पर्य है मृत्तिका- ये मर शब्द रोगजन्तुओके गुण बताते हैं। ये क्रिमी किम चिकित्सा, जलचिकिसा, अग्निचिकित्सा, सौरचिकित्सा प्रसार गरीरमें प्रवेग करते है इस विषयम भव देखिये- विद्युचिकित्सा वायुचिकित्सा, औषधिचिकिसा, मानसचिकि- रोगजन्तुओका शरीरमें प्रवेश त्सा, हवनचिकित्सा आदि सब चिकित्साएं देवताओंकी आमे, गवले सुपक्के, विपक्के, अकृष्टपच्ये धान्ये, गक्तियोंकी सहायतासे होती हैं, देवोंके साथ मिलकर रोग अगने, श्रीरे, मन्थे, अपां पान, यातनां गयने दूर करनेका तात्पर्य यही है । चिकित्सक उक्त देवोंके साथ ददम्म । (मं. ६-८) रहता हुमा रोग दूर करता है । इस प्रकार- दिवा नक्तं ददम्म । (मं ९) तं प्रतिशृणीहि (मं. ४) 'फचा, अधपका, अच्छा पूर्ण पका, या अधिक पका अयं अगद अस्तु । (मं, ५-९) मानवताक दिना उत्पन्न हुआ हुया धान्य, आदि पदार्थाका उस रोगक्रिमिका नाग कर और यह मनुप्य नीरोग हो भोजन, दून, दही, मटा, टाळ, पानी आदिका पान और जावे और- ममगठरोगों के बिम्नरेपर मोना, इन कारणाने रोगक्रिमी विरप्शिन मेध्यं अयमं कृणु । जीवतु । (मै १३) दिनमें गया गतीम गरीरमे जाने हैं और रोग उत्पन्न करते इस रोगीको ढोपरहित, पवित्र और नीरोग कर । यह है। यही बाा अन्य रीलिसे यदम बाई है- मनुष्य दीर्घ आयु प्राप्त करे। वद्यको उचित है कि वह रोगीकी ये अनेषु विविन्ति पापु पिवतो जनान् । ऐसी चिकित्सा करे कि रोगीके मब शरीरके दोष दूर होजाय' ( यजु. १६६०) रोगीका शरीर पवित्र बने और उसके शरीरसे यक्ष्म रोग हट सो मम और पीनेर पाग्राम रहकर जना गरीरामें जावे । क्वल रोगको रोकनेवाले वैद्य अच्छे नहीं होते, रोका एमगे। गौर उना म्वास्थ्यको वेध हारते हैं।' अर्थात् हुआ रोग किसी न किसी रूपसे कभी न कभी बाहर प्रकट मनुष्यको भीमार बनाते हैं। इसी मंत्र स्पष्टीकरण ऊपर रोगका वीज दूर करना चाहिये । चौदहवे मंत्रमें- होगा ही। इसलिये शरीरको निटीप और मलरहितकरके रि दो गान मंत्र । पाटद मृम राष्टसे यजुट भी रोगका बीज दूर करना चाहिये । चौदहवे मंत्रमें- मना कर मंगा टीम भार भ्यानमें धारण । पिगाचजम्मनीः समिधः । (म. १४) आगग्य प्राप्ति इन सून सुखानेवाले कृमियोंका नाश करनेवाली समि- धाका वर्णन है' यहीय वृक्षाकी रकटियोका यह गुण है। कार संगम जान है, फिर वहां उनमो वन मामग्रीको माग रस्सनेमे भी यही गुण बह जाता है। । -- । .
रागोत्पादक कृमि
(२०७)
.
हवन चिकि साका यह तस्व है, पाठक इसका अधिक विचार संसर्ग दोष दूर होता है । मिलकर हवन करनेसे भी इसी
करें। इस प्रकारको चिस्सिासे-
कारण संसर्ग दोष दूर होता है।
गां अश्वं पुस्यं सनेम । (मं. :)
रोग हटने का लक्षण
'गौवें, घोडे और मनुष्यों को निरोग भवस्था में प्राप्त कर रोग हटते ही मनुष्यका शरीर पुष्ट होने लगता है, यही
मकत है।
क्षारोग्य प्राप्तिका लक्षण है-
ग्यारहवें मंत्रमें भग्निचिकिसा इन रोगजन्तुनोंकोदूर कर शरीरे मांसं भर । असुं ऐरयामः । ( म. ५)
नेका संरत है। जहां ये मिमि होते है वहां अग्नि जलानेसे
सोमस्य अंशु इव आप्यायतां । (मं. १२, १३)
भयवा हवन करने से वहाका स्थान नीरोग होता है।
गरीरमें मांस बढना, प्राणकी चेतना प्राप्त होना, चन्द्र-
संसर्ग रोग
माझी कलाओंके समान वृद्धिको प्राप्त होना।' यह नीरोग-
कई रोग एक दूसंरके संसर्ग होते हैं, मलिन लोगोवे, ताका चिन्ह है । चन्द्रमाके समान मुख दिखाई देने लग
विस्तरेमें (शयने गयानं) मोनेले नधा उनके संसर्गमे रह- जाए तो समझना चाहिए की यह मनुष्य निरोगी है ।
नेसे रोग होते हैं। संसर्गम स्थानम अग्नि प्रदीप्त करनेसे इस सूक्तका विचार करनेसे अनेक बोध प्राप्त हो सकते है।
रोगोत्पादक कृमि
कां. २, सू. ३१
(ऋपि - काण्वः । देवता- मही, चन्द्रमाः।)
इन्द्रस्य या मही दृपस्क्रिीविश्वस्य तर्पणी । तया पिनष्मि सं क्रिमींन्दृषदा खल्या इव ॥१॥
दृष्टमदृष्टंमतृहमयों कुरूसैंमतृहम् । अल्गण्डुन्त्सर्वान् लुनान्क्रिमीन्वर्चसा जम्भयामसि ॥२॥
अर्थ- (विश्वस्य क्रिमे तहणी) सब क्रिमियोका नाश करनेवाली (इन्द्रस्य या मही दृषत्) इन्द्रकी
जो बड़ी शिला है (तया क्रिमीन सं पिनष्मि ) उससे मैं क्रिमियोंको इसी प्रकार पीसता हूँ (हपदा उल्वान् इव
जैसे पत्थरसे चनोंको पीसते हैं ॥ १ ॥
(दृष्टं अदृष्टं अतृहं ) दीखनेवाले और न दिखाई देनेवाले इन दोनो प्रकारके क्रिमियोका मै नाश करता हूं।
(अथो कुरूकै अतृहं ) और भूमिपर रेंगनेवाले क्रिमियोको भी मैं नष्ट करता हूं। (सर्वान् अलाण्डून ) सब
विस्तरे भादिमें रहनेवाले तथा ( शलुनान् ) वेगसे इधर उधर चलनेवाले सब (क्रिमीन ) क्रिमियोको (वचसा
जम्भयामसि ) वचाके द्वारा हटाते है ॥ २ ॥
भावार्थ-सब प्रकारके क्रिमियोका नाश करनेमे समर्थ इन्द्र अर्थात् मास्माकी दृढ शक्ति है उससे मैं रोगोत्पादक
क्रिमियोंका नाश करता हूं ॥१॥
भाखसे दिखाई देनेवाले और न दिखाई देनेवाले तथा भूमिपर रेंगनेवाले भनेक प्रकारके क्रिमियोको वचा भौष-
पिसे हटाता हूं।॥ २॥
अथर्ववेदका सुबोध अनुवाद दीर्घजीवन और आरोग्य' अलगण्ढून्हन्मि महता वधेन दूना अदूना अरया अभवन् । शिष्टानशिष्टानि तिरामि वाचा यथा क्रिमीणां नकिरुच्छिपति अन्चायं शीर्पण्यमथो पायं क्रिीन् । अवस्कवं व्यध्वरं क्रिमीन्वचसा जम्भयामसि ॥४॥ ये किमयः पर्वतेषु वनेप्वोपंधीषु पशुष्यस्वन्तः । ये अस्माक तन्य माविविशुः सर्वं तद्धन्मि जनिम कर्माणाम् अर्थ- (अलगण्डून् महता वधेन हन्मि ) विविध स्थानोंमे रहनेवाले क्रिमियोंको बटे भाधानसे मै मारता हूं। (इनाः अदृनाः अरसाः अभूवन् ) चलनेवाले और न चलनेवाले सय क्रिमी रसहीन हो गये। (शिष्टान् अशिष्टान् वाचा नि तिरामि ) बचे हुए चार न बचे हुए भी सब क्रिमियोका बचाने में नाम करता हूं। (यथा क्रिमीणां नकि: उच्छिपाते ) जिससे क्रिमियोमस कोई भी न बचे ॥ ३ ॥ (अन्वान्न्यं) मांतोम होनेवाले, (शीर्पण्यं ) सिरमें होनेवाले (अथो पार्टयं क्रिमीन) और पसलियोंमे होने- वाले क्रिमियोको तथा (अवस्कवं ) रेंगनेवाले और (व्यध्वरं ) बुरे मार्गपर होनेवाले सय क्रिमियोंको हम (वचसा जम्भयामसि ) वचा औपधिसे हटाते हैं. ॥ ४ ॥ (ये पर्वतेपु क्रिमयः) जो पहाडियोंपर क्रिमी होते है, (वनेषु, ओपधीपु, पशुपु, अप्सु अन्तः ) वन, औषधि, पशु, जल आदिमें होते है और (ये अस्माकं तन्वं आविविशुः ) जो हमारे शरीरमें प्रविष्ट हुए हैं (तत् क्रिमीणां सर्व जनिम हन्मि ) ऐगे क्रिमियोंका सम्पूर्ण कुल मै नष्ट करता हूं ॥ ५ ॥ भावार्थ-वचा औषधिसे में सब क्रिमियोंको हटाता है जिससे एक भी न बच सके ॥ ३ ॥ मातोमें, सिरमें, पसलीमें जो कृमि कुमार्गके आचरणसे होते हैं उन सबको मैं वचासे हटाता हूं ॥ ४॥ जो पर्वतोंमें, वनोमे, भोपधियों में, पशुओमे तथा जलों में क्रिमि होते है तथा जो हमारे शरीरोंमें घुसते है उन सब क्रिमियोंका में नाश करता हूं ॥५॥ रोगोत्पादक कृमि क्रिमियोंकी उत्पत्ति नाविके क्रिमि होते है और इनका संबंध मनुष्य गरीर के रोगोत्पादक क्रिमियोकी उत्पत्ति ‘पर्वत, वन, भोपवि, माथ होनेसे विविध रोग उत्पन्न होते हैं। शरीरमे ये कहां पशु और जल इनके बीचमे होती है।' (मं ५) जाते है इसका वर्णन मंत्र ४ कर रहा है- तथा ये क्रिमि- अन्वान्व्यं शीर्षण्यं अथो पा?यं क्रिमीन् । अस्माकं तन्वं आविविशुः। (मं. ५) (मं. ४) 'हमारे शारीरमे घुसते है' और पीढा देते हैं, इस- 'मांतोंमें, सिरमें, पसलियोंमे ये क्रिमि जाते हैं भोर लिये इन क्रिमियोंको हटाकर भारोग्य माधन करना चाहिये। वहां वढते है।' इस कारण वहा नाना प्रकारके रोग उत्पम यह पंचम मंयका कथन विशेष विचार करने योग्य है। होते है । इसलिये भारोग्य चाहनेवालोंको इन्हें दूर करना जलमें सढावट होनेसे विविध प्रकारके क्रिमि होते है, पशुक चाहिये । इनकी उत्पत्तिके विपयमे मं. ४ में दो शब्द बढे शरीरमे भनेक जनु होते है, हरी वनस्पतियोपर भनेक किमि महत्त्वके हैं- दोते है, वों में जहा दलदल के स्थान रहते हैं वहां भी विविध 'अवस्कवं, व्यध्वरं ' (म ४) - कामिनाशा (२०९) me- - १अवस्कर (अव+स्कव ) नीचे गमन । नीच. ललमें घोरकर भी इसका सेवन करनेसे पेटके अंदरके निमि- स्थानमें गमन करनेसे इनकी उत्पत्ति होती है। यहां भाच- दोप दूर हो जाते है । मौषधि जन्य उपायोमें यह सुलभ रणकी नीचता समझना योग्य है। २ व्यध्वर- (वि- मौर निश्चित उपाय है। मन-र) विरुद्ध मार्ग पर रमना । धर्मविरुद्ध व्यव २ इन्द्रस्य मही रपत्- इन्द्रका वडा पत्थर । इस हारके जो जो मार्ग हैं उनपर रमनेसे रोगके बीज उत्पा नामका कोई पदार्थ है या यह भाध्यात्मिक शक्तिका नाम होते है। ब्रह्मचर्यादि नियमोका न पालन करना मादि है, इस विषयमें अभीतक कोई निश्चय नहीं हो सका । इन्द्र बहुतसे धर्मविरुद्ध प्यवहार हैं जो रोग उन्पर करनेसे हेतु गन्दका अर्थ मामा है, उसका बडा पत्थर अर्थात् जिसपर होते हैं । इस रष्टिसे ये दोनों शब्द बरे महायक है। टफर खाकर ये रोग जन्तु मर जाते है वह उसकी प्रबल जीवनशक्ति है। आत्मशक्तिके मुकाबलेमें इन रोगक्रिमि- दूर करनेका उपाय योंकी क्षुलक शक्ति ठहर नहीं सकती । यह सब ठीक है, इन क्रिमियोंको दूर करनेके दो प्रकारके उपाय इस परंतु इस विषयमे अधिक सोज होनेकी आवश्यकता है। सूक्तमें कहे है- ये क्रिमि इतने सूक्ष्म होते हैं, कि भाखसे दिखाई नहीं १वचावचा नामक वनस्पतिका उपयोग करना । देते । (अदृष्ट ), दूसरे ऐसे होते हैं कि जो भाखसे दिखाई भाषामें इसको वच कहते है। क्रिमि नाशक मौषधियोमे देते हैं। कई शरीरपर होते है कपढोपर चिपकते है, बिस्त- इसका महत्व सबसे अधिक है। इसका चूर्ण शरीरपर रेमें होते हैं, इसप्रकार विविध स्थानोमें इनकी उत्पत्ति होती लगानेसे क्रिमि बाधा नहीं होती, वचाकी मणि गलेमें या है। इनका नाश उक्त प्रकार करनेसे इनकी पीढा दूर होती शरीरपर धारण करनेसे भी क्रिमिपीदा दूर होती है और है लौर आरोग्य मिलता है। कृमिनाशन कां. २, सू. ३२ (ऋपि:- काण्वः । देवता- भादित्यः ।) उद्यनादित्यः क्रिमीन्हन्तु निम्रोचन्हन्तु रश्मिभिः। ये अन्तः क्रिमयो गर्षि ॥ १ ॥ ॥२॥ विश्वरूपं चतुरक्षं क्रिमि सारङ्गमर्जुनम् । शृणाम्य॑स्य पृष्टीरपि वृश्चामि यच्छिरः अर्थ-(ये क्रिमयः गवि अन्त. ) जो फ्रिमि भूमि पर हैं (क्रिमीन उद्यन् आदित्यः हन्तु) उन क्रिमियोका उदय होता हुआ सूर्य नाश करे और (निम्रोचन् रश्मिभिः हन्तु ) अस्तको जाता हुआ सूर्य भी अपने किरणोसे उन क्रिमियोंका नाश करे ॥ १ ॥ (विश्वरूपं ) भनेक रूपवाले (चतुरक्षं) चार भाखवाले, (सारंग अर्जुनं क्रिमि) रंगनेवाले श्वेत रंगके क्रिमि होते हैं । (अस्य पृष्टीः शृणामि ) इनकी हड्डियोको मैं तोडता हूं ( अपि यत् शिरः वृश्चामि ) इनके जो सिर है वह भी तोडता हूं ॥ २ ॥ भावार्थ- सूर्य उदय होने के पश्चात् अस्त होने तक भपने किरणोसे रोगोत्पादक क्रिमियोका नाश करता है । ये क्रिमि भूमि पर रहते है ॥ १ ॥ ये क्रिमि बहुत प्रकारके विविध रंगरूपवाले होते है, कई श्वेत होते हैं और कई अन्य रंगोंके होते है । इनमेंसे कईयो- की धार भयवा भनेक भांखें होती हैं।॥ २॥ २७ [मर्व. मा. दिग्दी] - (२१०) अथर्ववेदका सुबोध अनुवाद 'दीर्घजीवन और आरोग्य' अस्त्रिवः किमयो हन्मि कण्यवर्जमदग्निवत् । अगस्त्य॑स्य ब्रह्मणा सं पिनप्म्यहं क्रिीन ॥३॥ हतो राजा क्रिमीणामुतैषी स्थपतिर्हतः । हुतो हतमाता क्रिमितभ्राता हुतम्बसा ॥ ४॥ हतासौ अस्य वेगसौ हतासः परिवेशसः । अर्थो ये क्षुल्लका इव सर्वे ते क्रिमयो हुता! प्र ते भृणामि शृङ्गे याभ्यो वितुदायसि । भिनयि ते कुपुम्भं यस्तै विधान ॥६॥ अर्थ- हे (क्रिमयः ) क्रिमियो' (अत्रिवत् कण्ववत् जमदग्निवत् ) अत्रि, कण्व और जमदग्निके समान (वः हन्मि ) तुमको मार डालता हूं। ( अहं अगस्त्यस्य ब्रह्मणा ) अगस्त्यकी विद्यासे (क्रिमीन सं पिनमि) किमियोको पीन टालता हूँ ॥ ३ ॥ (क्रिमीणां राजा हतः ) क्रिमियों का राजा मारा गया। (उत एपां स्थपतिः हतः) और इनका स्थानपति भी मारा गया। (हत-माता, हत भ्राता, हत-स्वसा क्रिमिः हतः) झिमिकी माता, भाई, बहिन तथा फिमि भी मारा गया है ॥४॥ (अस्य वेशसः हतासः) इसके परिचारक मारे गये। (परिवेशसः हतासः ) इसके सेवक पीसे गये। (अथो ये क्षुल्लका इच ) भव जो क्षुल्लक किमि हैं (ते सर्व क्रिमय. हताः ) वे सब किमी मारे गये ।। ५ ॥ (याभ्यां वितुदायसि) जिनसे तू काटता है (ते शृंगे प्र शृणामि ) इन तेरे दोनो मांगोको तोड डालता हूं। (यः ते विपधानः) जो तेरा विपका स्थान है (ते कुपुम्भं भिननि) ऐसे तेरे विपके आशयको मैं तोढता हूँ॥ ६ ॥ भावार्थ- मत्रि, कण्व, जमदग्नि और अगस्त्य इन नामो द्वारा सूचित होनेवाले उपाय है कि जिनसे इन रोग बीजोंका नाश होता है ॥३॥ इन टपायोंसे इन क्रिमियोंके मूल वीज ही नष्ट होते हैं ॥ ४ ॥ इनके सब परिवार पूर्ण रूपसे दूर हो जाते हैं ॥५॥ इनमें जो विपका स्थान होता है उसका भी पूर्वोक्त उपायोसे ही नाग हो जाता है ॥ ६ ॥ कृमि-नाशन सूर्यकिरणका प्रभाव क्रिमियोंके लक्षण सूर्य किरणों में ऐसी जीवन शक्ति है कि जिससे संपूर्ण इस सूक्तके द्वितीय मंत्रमें इन क्रिमियोके कुछ लक्षण कहे प्रकारके रोगवीज दूर होते हैं। इसलिये जिप्त स्थानपर रोग हैं, देखिये (म. २) जन्तु मोके बढनेमे रोग उत्पन्न हुए हों उस स्थानमें सूर्य १ अर्जुनः- श्वेत रंगवाला किरण पहुंचानेसे वे सब रोग दूर हो जाते हैं। जिस घरमेंसे २सारंग:- विविध रंगवाला, चित्रविचित्र वर्णवाला क्रिमि उत्पन्न हुए हों, उस घरके छप्परमेंसे सूर्य किरण विपुल धब्बे जिसके शरीरपर हैं। प्रमाणमें उम घरमे प्रवेश करानेसे वहांके रोग दूर हो जाते ३ चतुरक्षः- चार नेत्रवाला, चारो तरफ जिसके शरीरमें है। क्योंकि रोगीजोंको हटानेवाला सूर्यके समान प्रभावशाली नेत्र है। दूसरा कोई भी नहीं है। ४विश्वरूपः- विविध रंगरूपवाला।
रोगकृमिका नाश
(२११)
इन रक्षणासे ये क्रिमि पहचाने जा सकते है। समयतक हमने जो खोज की उससे कुछ भी परिणाम नही
रोगबीजोंके नाशकी विद्या
निकला है।
विप-स्थान
इन रोग बीजोका नाश करनेकी विद्या तृतीय मंत्रमें कही
है। इस मंत्र में इस विद्याके चार नाम आये है, देखिये इन क्रिमियोके शरीरमे एक स्थान ऐसा होता है कि जहा
(1) भत्रि, (२) कण्य, (३) जमदनि लौर (४) विप रहता है, (मं. ६ ) यह विष ही मनुष्य के शरीरमे
भगस्त्यके (ब्रह्मणा ) ब्राने अर्थात् इनकी विद्याले में रोग पहुंचना है और वहां विविध रोग उत्पन्न करता है । इसलिये
बीजभूत क्रिमियोका नाम करता हूं। रोगबीजीका नाश कर. इनमे बचनेक उपायकी शक्ति ऐसी चाहिये कि जिससे यह
नेको विद्याके ये चार नाम है । प्राचीन विद्याकी खोज करने. विप दूर हो जाय और मनुप्यके शरीर पर यह विष अनिष्ट
वालोंको उचित है कि वे इन विद्यानोकी सोज करें । इस परिणाम न कर सके ।
रोगकृमिका नाम
कां. ५, स. २३
(ऋषि.- कण्वः । देवता- इंद्र,।)
ओते मे द्यावापृथिवी ओता देवी सरस्वती । ओतौ म इन्द्रश्चाग्निश्च क्रिमि जम्भयतामिति ॥१॥
अस्येन्द्र कुमारस्य क्रिीन्धनपते जहि । हता विश्वा अरांतय उग्रेण वर्चसा मम ॥२॥
यो अक्ष्यो। परिसपैति यो नासे परिसपैति । दुतां यो मध्यं गच्छति तं क्रिमि जम्भयामसि ॥३॥
सरूपी द्वौ विरूपी द्वौ कृष्णौ द्वौ रोहितो द्वौ । वधुच बभ्रुकर्णश्च गृध्रः कोकच ते हताः ||४||
ये क्रिमयः शितिकक्षा ये कृष्णाः निंतियाहवः । ये के च विश्वरूपास्तान्क्रिीन्जम्मयामसि ।।५।।
अर्थ- (द्यावापृथिवी, देवी सरस्वती इन्द्रः अग्निः) द्यावापृथिवी, देवी सरस्वती, इन्द्र, अग्नि ये सब देव
(ओते, ओता, ओती) परस्पर मिलजुलकर (मे में क्रिमि जम्भयतां ) मेरे लिये क्रिमियोका नाश करें ॥ १ ॥
हे धनपते इन्द्र (अस्य कुमारस्य क्रिमीन् जहि ) इस कुमारके क्रिमियोको हटा दे । (मम उप्रेण वचसा
विश्वाः अरातयः हताः) मेरे पासकी उग्र वचासे सब दुखदायी क्रिमि मारे गये हैं ॥ २ ॥
(यः अक्ष्या परिसर्पति) जो मांखोंमे भ्रमण करता है, (यः नासे परिसर्पति ) जो नाकमे घुसा होता है,
(दतां मध्यं यो गच्छति) दातोके बीचमें जो जाता है, (तं क्रिमि जम्भयामसि ) उस क्रिमिका हम विनाश करे ॥३॥
(सरूपी द्वौ, विरूपी द्वौ) दो समान रूपवाले और दो विरुद्ध रूपवाले, (द्वौ कृष्णौ, द्वौ रोहितौ ) दो
काले और दो लाल, (वभ्रः च वर्धकर्णः च) भूरा और भूरे कानवाला, (गृध्रः कोकः च) गिद्ध और भेडिया
(ते
हताः) वे सब मर गये ॥ ४॥
(ये क्रिमयः शितिकक्षाः ) जो क्रिमि श्वेत कोखवाले, (ये कृष्णाः शितिवाहवः ) जो काले और काली भुजा-
वाले और (ये के च विश्वरूपाः ) और जो बहुत रूपवाले हैं ( तान् क्रिमीन् जम्भयामसि ) उन क्रिमियोका हम
नाश करते हैं॥५॥
, (२१२) अथर्ववेदका सुवोध अनुवाद दीर्घजीवन और आरोग्य ||७|| ॥८॥ ॥९॥ उत्पुरस्तात्सूर्य एति विश्वदृष्टो अदृष्टहा । दृष्टांश्च मन्नदृष्टांश्च सर्वाश्च प्रमृणन्क्रिीन् ॥६॥ येापामः कष्कपास एजन्काः शिंपवित्नुकाः । दृष्टश्च हुन्यतां क्रिमितादृष्टंश्च हन्यताम् हृतो येापः क्रिमीणां हतो नेदनिमोत । सर्वान्नि मध्मपाकरं दृषदा खल्या इव त्रिशीपणं त्रिकुदं क्रिमि सारङ्गमर्जुनम् । गुणाम्य॑स्य पृष्टीरपि वृथामि यच्छिरैः अत्रिवः क्रिमयो हन्मि कण्ययज्जमदग्निवत् । अगस्त्य॑स्य ब्रह्मणा स पिनष्म्यहं क्रिीन् ॥१०॥ हुनो गजा क्रिमीणामुतेपो स्थपतितः । हतो हृताता क्रिमितभ्राता हुतस्वसा ॥११॥ हतासौ अस्य वेशसौ हतासः परिवेशसः । अथो ये क्षुल्लका इव सर्वे ते क्रिर्मयो हताः ॥१२॥ सर्वेषां च क्रिीणां सर्वीसां च क्रिमीणाम् । भिनयश्मना शिरो दाम्यग्निना मुखम् ॥१३|| अर्थ- (सूर्यः उत् पुरस्तात एति ) सूर्य आगेसे चलना है वह (विश्वदृष्टः अदृष्ट-हा ) दीखनेवाले और न दीसनेवाले सभी कृमियोंका नाश करनेवाला है, वह (दृष्टान् च अदृष्टान् च सर्वान क्रिमीन् ) दीखनेवाले भौर न दीखनेवाले सब क्रिमियोंको (नन् प्रमृणन् ) नष्ट करता है और कुचल डालता है ॥ ६ ॥ (येवापासः कपकपासः) येबाप, कष्क्रय, (एजत्काः शिपवित्नुकाः ) एजक और शिपबित्नुक ये क्रिमि है । (दृष्टः क्रिमिः हन्यतां) दीखनेवाले क्रिमिको मारा जाय और (उत अदृष्टः च हन्यतां ) और न दीननेवालेको भी मारा जाय॥ ७ ॥ (क्रिमीणां येवापः हतः) क्रिमियोममे येबाप नामक क्रिमि मारा गया ( उत नदनिमा हतः) और नाद करनेवाला भी मर गया, । (सर्वान् मप्मपा नि अकरं ) सबको मसल मसलकर उसी प्रकार पीस दिया (हपदा खल्वां इव) जिस प्रकार पत्थरसे चनोंको पीसते हैं ॥ ८ ॥ (त्रिशीर्वाणं त्रिककुदं ) वीन मिरोंवाले, तीन ककुदोंवाले (सारङ्गं अर्जुनं क्रिमि) चित्रविचिन रंगवाले और श्वेत रंगवाले किमिको (गृणामि) मैं मारता हूं। (अस्य पृष्टीः अपि) इसकी पसलियोंको भी तोडता हूं और (यत् शिरः वृश्चामि ) जो सिर है टसको कुचलता हूं ॥ ९ ॥ हे (क्रिमयः ) जंतुओ! (अत्रिवत्, कण्ववत् , जमदग्निवत् ) अत्रि, क्ण्व और जमदग्निके समान (यः हन्मि) नुमको मारता है । (अहं अगल्यस्य ब्रह्मणा) मैं अगस्त्य के ज्ञानसे (क्रिमीन् संपिनमि) रोगके क्रिमि- यांको पीसता ॥ १०॥ (क्रिमीणां राजा हतः) रोगक्रिमियोंका राना मारा गया, (उत एपां स्थपतिः हतः ) और इनका स्थानपति माग गया । भौर ( हत-माता हत-भ्राना) इसके माता और भाई मारे गये है तथा (हत-स्वला क्रिमिः हतः) इमकी बदिन भी मारी गई है ॥ ११ ॥ (अस्य वेशस हतास.) इमके घरवाले मारे गये, (परिवेशसः हतासः) इसके परिवारवाले मारे गये। (अया ये क्षुल्लकाः इव ) और जो क्षुल्लक क्रिमि ये (ते सर्वे क्रिमयः हताः ) वे सब क्रिमि मारे गये हैं ॥ १२ ॥ (सर्वेषां च क्रिमीणां) सब पुरुष फ्रिमियोंका और ( सर्वासां च क्रिमीणां) सब स्त्री क्रिमियोंका (शिरः अमना भिनधि) पिर पत्थरसे तोहता हू और (अग्निना मुखं दहामि ) भनिने मुस्त्र जलाता हूं ॥ १३.॥ A
रोगामिका नाश
(२१३)
रोगक्रिमियोंका नाश
रोगके किमि गरीरमे घुसते है और वहां विविध रोग उत्पन्न करते है, यह वात वेदके कई सूक्तोमे कही है । अनि,
बायु, जल आदि द्वारा इन क्रिमियोका नाश होता है, यह प्रथम मंत्रका कथन है। छोटे बालकोके शरीरम भी क्रिमि होते
हैं उनको करनेके लिये बचा औषधिमा उपयोग करना चाहिये यह द्वितीय मत्रका उपदेश मननीय है ।
भार, नाक और दातोमें किमि जात है और वहां विविध रोग उत्पन्न करते है, यह तृतीय मत्रका कथन प्रत्यक्ष
देखने योग्य है । चतुर्थ और पन्चम मत्रमें क्रिमियोके रंगोका वर्ण है । सूर्य किरणने सब रोगक्रिमियोका नाश होता है यह
अत्यंत महत्वपूर्ण बात पष्ठ मंत्रमें कही है । विपुल सूर्यकिरणों के साथ अपना संवध करक पाठक रोगकिमियोसे अपना
बचाव कर सकते है। अन्य मंत्रोका कथन स्पष्ट है, इसलिये उस विषयमें अधिक लिसनेकी भावश्यकता नही है।
शिखण्डिनः
रोगकृमिका नाश
कां. ४, सु. ३७
(ऋपिः- बादरायणिः । देवता- अजशृंगी, अप्सरम.1)
त्वया पूर्वमधर्वाणो जघ्नू रक्षौस्योपधे । त्वयां जघान कश्यपस्त्वया कण्वो अगस्त्यः ॥ १॥
त्वया वयमप्सरसो गन्धवांश्चातयामहे । अर्जशृङ्गयज रक्षः सर्वान्गन्धेनं नाशय ॥ २ ॥
नदी यन्त्रप्सरसोऽपा तारमवश्वसम् । गुग्गुलुः पीला नलयो क्षगन्धिः प्रमन्दुनी ।
तत्परताप्सरसः प्रतिबुद्धा अभूतन
॥३॥
यत्राश्वत्था न्यग्रोधा महावृक्षाः
। तत्परताप्सरसः प्रतिबुद्धा अभूतन
॥ ४॥
अर्थ- हे (ओपधे) औपधे । ( त्वया अथर्वाणः रक्षांसि जघ्नुः ) तेरे द्वारा भायणीविद्या जाननेवाले वैद्य
रोगक्रिमियोंका नाश करते है। (कश्यप त्वया जघान ) कश्यपने भी तेरे द्वारा क्रिमियोका नाश किया। (कण्वः
अगस्त्यः त्वया) कण्व और अगस्त्यने भी तेरे द्वारा रोगोका नाश किया ॥ १ ॥
हे (अजशृंगि) अजशगी भोपवि । (त्वया वयं अप्सरसः गंधर्वान् चातयामहे ) तेरे द्वारा हम जलमे फैलने-
चाले गायक क्रिमियोको दूर हटाते है । ( गन्धेन सर्वान् रक्ष अज, नाशय ) अपने गन्धसे सब रोग क्रिमियोंको दूर
कर भीर उनका नाश कर ॥२॥
(अप्सरस अपां तारं अवश्वसं नदी यन्तु) जलके कृमि जलसे परिपूर्ण भरी हुई वेगवाली नदीके प्रति जाये ।
गुग्गुल्लू ) गुग्गुल, (पीला) पीलु, (नलदी) मांसी, (औक्षगन्धि ) औक्षगन्धी, (प्रमन्दिनी) प्रमोदिनी
ये पांच औषधियां हैं । यह (प्रतिबुद्धा अभूतन ) जान जाओ और (तत्) इसलिये हे (अप्सरस. ) जलमे फैलने-
वाले कृमियो । (परा इत) यहासे दूर जाओ ॥ ३ ॥
(यत्र अश्वत्था. न्यग्रोधाः) जहां पीपल वट ( शिखंडिनः महावृक्षाः) शिखण्डी आदि महावृक्ष होते है,
अप्सरसः) हे जलोत्पन्न क्रिमियो । (तत् परा इत् ) वहासे दूर भागो, (प्रतियुद्वाः अभूतन) यह स्मरण
रखो।॥४॥
भावार्थ- भज शृगी औषधिकी सहायतासे माथर्वण, कश्यप, कण्व, अगस्त्यने रोगक्रिमियोका नाश किया ॥ १ ॥
अजश्रृंगीके द्वारा हम रोग कृमियोंको दूर करते हैं, इस वनस्पतिके गन्धसे ही रोगक्रिमि दूर होते है ॥ २ ॥
ये क्रिमि नदीके जलमें होते है और गुगल, पीलु, मासी, औक्षगन्धी, प्रमोदिनी इन वनस्पतियोसे दूर होते है ॥३॥
जहां पीपल, बर भादि महावृक्ष होते है वहांसे ये रोगक्रिमि दूर होते हैं ॥ ४ ॥
(२१४)
अथर्ववेदका सुबोध अनुवाद - 'दीर्घजीवन और आरोग्य'
यत्र वः प्रेला हरिता अर्जुना उत यत्राघाटाः कार्य संबदन्ति ।
तत्परताप्सरसः प्रतिबुद्धा अभूतन
एयमगन्नोपंधीनां वीरुधा वीर्या वती । अजशृङ्गयुरािटकी तीक्ष्णशृङ्गी व्यू पितु ॥६॥
आनृत्यतः शिखण्डिनो गन्धर्वस्याप्सराप्तेः । भिनधि मुकावपि यामि शेषः
भीमा इन्द्रस्य हेतयः शतमृष्टीरयस्मयोः । तामिर्हविरदान्गन्धर्वानवादान्व्यू पितु
भीमा इन्द्रस्य हेतयः शतमष्टीहिरण्ययीः । ताभिर्हविरदान्गन्धर्वानवादान्व्यू पितु
अवकादान मिशोचानुप्सु ज्योतय मामकान् । पिशाचान्त्सर्वानोपधे प्र मृणीहि महस्व च ॥ १० ॥
॥ ७ ॥
॥ ८॥
॥ ९॥
अर्थ- (यत्र वः प्रेड्खा हरिताः ) जहां तुम्हारे हिलनेवाले हरे भरे ( अर्जुनाः) अर्जुन वृक्ष है (उत यत्र
आधाटा: कर्कर्यः) और जहां भाघाट और कर्करी वृक्ष अथवा कर कर गब्द करनेवाले वृक्ष रहते हैं, वहां हे (अप्सरसः)
जल सचारी कृमियो । (प्रतिबुहाः अभूतन ) सचेत होओ और (तत् परा इत) वहांसे दूर जाओ ॥ ५ ॥
(वीरुधां ओपधीनां वीर्यावती) विशेष प्रकार उगनेवाली औषधियोमे अधिक वीर्यशाली ( इयं अजशृंगी आ
अगन् ) यह अजशृंगी प्राप्त हुई है । यह ( अराटकी तीक्ष्णशंगी व्यूपतु) रोगनाशक तीक्ष्णभंगी औषधी रोगनाम
करे ॥ ६॥
(आनृत्यतः शिखण्डिनः गंधर्वस्य ) नाचनेवाले चोटीवाले गायक (अप्सरापतेः) जलसंचारी कृमियोंके
मुसियाका (मुष्की भिननि ) अण्डकोग तोड़ देता हूं और (शेपः अपि यामि ) उसके प्रजननांगका नाश करता
हूं ॥ ७ ॥
(इन्द्रस्य ऋष्टीः शतं अयस्मयीः हेतयः भीमाः) सूर्यकी किरणें सैकडों लोहमय हथियारोंके समान भयंकर
हैं । (ताभिः हविरदान् अवकादान् ) उनसे अन्न सानेवाले हिंसक (गंधर्वान् व्युपतु) कृमियोका विनाश करे ॥ ८॥
( इन्द्रस्य हिरण्ययीः ऋष्टीः ) सूर्यकी सुवर्णके समान तीक्ष्ण किरणें (शतं हेतय. भीमाः) सैकडो शस्त्रोंके
समान भयंकर हैं (तामि हविरदान अवकादान गंधर्वान् व्युपतु ) उनसे वह सूर्य अन्न सानेवाले हिंसक रोगक्रिमियोका
विनाश करे ॥ ९ ॥
है (औषधे ) औषधी (अवकादान अभिशोचान् ) हिंसा और दाह करनेवाले (मामकान् अप्सु ज्योतय)
मेरे शरीरके संदरके जलांगोमे रहनेवारोंको जला दे। (सर्वान् पिशाचान् प्रमृणीहि) सब रक्तशोपण करनेवालोंका
नाश कर और (सहस्व च) दवा दे ॥ १० ॥
भावार्थ- जहा वेगवाले अर्जुन वृक्ष, कर्कर करनेवाले और मावाट वृक्ष होते है वहांसे भी ये क्रिमि दूर होते है ॥५॥
मव बनस्पतियोमे अजशृंगी बढी वीर्यवाली औषधी है इससे नि.संदेह रोगक्रिमि दूर होते है ॥ ६ ॥
इससे इन क्रिमियों के वीर्यस्थान भी नाश किये जा सकते हैं ॥ ७ ॥
मूर्यको किरणें ऐसी प्रबल है कि जिनमे ये किमि दूर हो नाते है ॥ ८ ॥
र्यकी सुवर्णके रंगवाली किरण बढी प्रभावशाली हैं जिनके योगसे रोगक्रिमि दूर होते हैं ॥ ९ ॥
इस औषधीमे मेरे गरीरके अंदर जलसंगमे जो इनके स्थान है और जिनके कारण मेरा शरीरका रक्त सूखता
है उन-
का नाम किया जावे ॥१०॥
रोगकामिका नाश (२१५) श्वेवैको कपिरिक कुमारः संवकेशकः । प्रियो दृशः ईव भूत्वा गन्धर्वः संचते वियंस्तमितो नाशयामसि ब्रह्मणा वीर्या विता ।॥ ११ ॥ जाया इद्वौ अप्सरसो गन्धर्वा पतयो यूयम् । अब धावतामा मान्मा संचवम् ॥ १२ ॥ अर्थ- (एका वा इव) एक कुत्तेके समान है ( एकः कपिः इव ) एक वन्दरके समान है, (सर्वकेशकः कुमारः) जिसके सब गरीरपर चाल होते है ऐसे कुमारके समान एक है। (प्रियः दृशः इव भूत्वा) प्रियदर्शीके समान होकर (गंधर्वः स्त्रियः सचते) गंधर्व संज्ञक रोगकृमि स्त्रियोको पकडता है (वीर्यावता ब्रह्मणा तं इतः नाशयामसि) वीर्यवाली ब्राह्मी नामक लौषधिके द्वारा उसका यहांले हम नाग करते है ॥ ११ ॥ हे (गन्धर्वाः ) गन्धर्वो । (यूयं पतयः ) तुम पति हो, (अपलरसः वः जाया इत् ) अप्सराएं तुम्हारी स्त्रियां हैं। (अमर्त्याः) हे अमरो। (अपधावत) यहाँसे दूर हट जाओ, (मान् मा सचध्वं) मनुष्योको मत पकडो ॥१२॥ भावार्थ- कुत्ते और बदरके समान प्रभाव करनेवाले ये रोगोत्पादक क्रिमि स्त्रियोको पीडा देते है, इनको ब्राह्मी वनस्पतिसे दूर किया जाता है ॥ ११ ॥ इस उपायसे इन रोगमूलोंको दूर किया जाता है ॥ १२ ॥ - रोगकृमिका नाश रोग-क्रिमि 'दुर्गन्धयुक्त अपवित्र रहनेवाला, बहुत खानेवाला, बढ- इस सूकमें 'रक्षः, रक्षस्, गन्धर्व, अप्सरस्, बडानेवाला, रोने पीटनेवाला मादि दुर्गणोसे युक्त रोगी पिशाच पिशाच,' ये शब्द रोगोत्पादक जन्तुविशेषोके वाचक है। ग्रहसे पीढित होता है। वैद्यक ग्रन्थोमें इन रोगोंके विषयमे निम्नलिखित वर्णन 'रक्षः, रक्षस् और राक्षस् ' ये शब्द भी इसी प्रकारके मिलता है- रोगोंके वाचक है। इस विषयमें रक्षोन औषधि प्रयोग भी (१) गंधर्वग्रहः- माधव निदानमे इसका वर्णन ऐसा वैद्यक ग्रन्यमें दिये है । देखिये- मिलता है-- (१) भूतनी- भूतरोगका नाश करनेवाली लौषधि । हृष्टात्मा पुलिनवनान्तरोपसेवी प्रपौंढरीक, मुण्डरीक, तुलसी, शवपुप्पी ये मौषधियां भूत- स्वाचारः प्रियगीतगन्धमाल्यः । रोगनाशक है। नृत्यन्वै प्रहसति चारु चाल्पशब्दं सर्षप (२) भूतघ्नः- भूर्ज वृक्ष, गन्धर्वग्रहपीडितो मनुष्यः ॥ (मा. नि.) वृक्ष। गंधर्वग्रहसे पीडित मनुप्यका अन्तःकरण आनंदित होता (३) भूतनाशनः- भिलावा, हिंगु वृक्ष, रुद्राक्ष । है वह वनोपवनमे विहार करना चाहता है, गानावजाना प्रिय (४) भूतहन्त्री- दूर्वा, वन्ध्याकर्कोटकी वल्ली । लगता है, नाचता है और हंसता है, इत्यादि लक्षण गन्धर्व- (५) पिशाचघ्नः- श्वेतसर्षप वृक्ष । (६) रक्षोनं- काञ्चिक, हिंगु, भिलावा, नागरंग, (२) पिशाचग्रहः- इसका लक्षण इस प्रकार कहा है- (७) रक्षोहा- महिषाक्ष गुग्गुली, गुग्गुल । उध्दस्तः कृशपरुषोऽचिरप्रलापी इस सूक्तमें भी तृतीय मन्त्रमे गुग्गुल वृक्षको राक्षस., दुर्गन्धो भृशमशुचिस्तथातिलोमः । गंधर्व, अप्सरा, पिशाच आदिका नाशक कहा है, इससे ये बह्वाशी विजनवनान्तरोपसेवी शब्द किसी प्रकारके रोगविशेषोंके वाचक हैं यह बात सिद्ध व्याचेष्टन् भ्रमति रुदन पिशाचजुष्टः॥(मा. नि ) होती है । ऊपर लिखे वृक्ष भौर वनस्पतियां रामस, भूत, प्रहके हैं। वचा। - (२१६) अथर्ववेदका सुबोध अनुवाद - 'दीर्घजीवन और आरोग्य देव- - । है - प्रेत, पिनाचीको दर करती है, इनग्न सिद्ध होता है कि ये (१) गुगुल:- इमा सम्म नाम ये है- रोगविगेप है। धूप, भृतहरः, यातुन्नः, रोहा, 'ये इसके नाम हम द्वितीय मन्त्रमे कहा है कि 'अजगी गन्धरी मय सूतक कयन क साथ गंगन होने है, र्थात इस गुग्गुलक राक्षम (नाशय) नष्ट होते है और (अज) भाग जाते अपने भून, राक्षम, यातुधान नष्ट होते हैं, यह बात इन है । (म २)' अर्थात् ये गक्षम मृदम कृमि अथवा मुदम गन्दोग्य ही सिद्ध होती है । मन इसके गुण देखिये- रोगजन्तु होंगे। इस अजगी भापधिसे गंधर्व, अमरा और जराव्याधि हरत्वादरायनः । गक्षस रोग दूर होने है, यह द्वितीय मन्त्रका कथन है । इस कटुतिस्तोष्णः कफवातकासघ्नः । अजगीका वर्णन वैद्यक अन्योम देखिये- कृमिवातोदरडीहायोफार्शघ्नः ॥ ग नि व २ अजशृंगी- 'कटुः, तिक्ता कफार्शःशूलगोथनी 'हमसे बुढापा, और रोग दूर होत हैं, यह कफ, वात, चक्षुप्या श्वासहृद्रोगविपकासकुष्टघ्नी च । श्वास, कृमि, उदर, प्लीहा, मूतन, बवामीर रोगोंको दूर एतत्फलं तिस्तं कटूपणं कफवातघ्नं जठरानलदीति- करना है । ' इस वर्णनसे इसका महत्व ध्यानमें भा सकता कृत् हृद्यं रुच्यं, लवणरसं अम्लरसं च ।। है । (मं.३) (रा. नि. व १) (२) पीला, पीलु- मंत्रम ' पीला' शब्द है, इसका 'अजगी औषधि कफ, बवासीर, शुल, सृजनका नाम अर्थ चूंटी है । ' पीलु' गब्द बनसति वाचक है जिसको करनेवाली, मांखके दोष दूर करनेवाली, श्वास, हृदय रोग, हिंदी भाषामें 'अल' कहा जाता है। यह कफ वात पित विप, कास, कुष्ट दूर करनेवाली है। इसका फल कफ दोषाको दूर करता है । (म. ३) (भा. प्र.) और वात दूर करनेवाला, पाचक आदि गुणवाला है। इसमें (३) नलदा, नलठी- जटामासीका यह नाम मन्त्रोक्त रोगांका नाम नहीं है । नयापि भावुनिक वैद्य ग्रंथो- हमके गुण- 'जटामासी कफहृत् , भृतघ्नी, दाहनी, पित्तप्नी। की अपेक्षा वेदने यह विगंप ज्ञान कहा है। वोको हमकी (रा. नि. ब. १२) इस औषधीसे कफरोग, भूतरोग, पित्त- अधिक सोज करनी चाहिये। रोग ये दूर होते है । इसमे भूतरोग गमन इस सूक्तके साथ लक्षण मंगत होता है। (म. ३) इन भूतरोगोके लक्षण ग्यारहवें मन्त्रमे कहे है ये भव (४) औक्षगंधि-ऋपभक औषधीका यह नाम है। देखिये- इसके गुण- 'बल बढानेवाला, शुक्र बढानेवाला, पित्तरक्त (१)श्वा इव- कुत्ते के समान काटता है। दोप दर करनेवाला, दाह क्षय ज्वरका नागक है।' (ग. नि. व. ५) वाजीकरणमें इसका बहुत उपयोग होता है। (२) कपिः इव-बंदरके समान कुचेष्टा करता है। ये लक्षण पिशाच बाधित मनुग्न्योंमें दिखाई देते हैं। वे (५) प्रमंदनी-घातकी वृक्ष । हिंदी भाषामे 'धावई' रोगी कुत्ते के समान और वंदरक समान व्यवहार करते है। कहते है । इसके गुण 'कटुः, उप्णा, मदकृद्विपघ्नी, जिन रोगाम प्रवाहिकातिसारनी, विसर्पवणघ्नी च। (रा नि. मनुष्य ऐसे व्यवहार करना है उनको रोग कहा जाता है । इस उन्माढके ही पिगाच, मृत, रक्षा, व ६) तृष्णातिसारपित्तास्त्रविपक्रिमिविसर्पजित् । राक्षस, गंधर्व और मध्यरा ये नाम अथवा भेद है। और (भा प्र.)' यह औपधि विष नायक, अतिसार, विसर्प व्रण इनका नाश इस सूक्तमें वर्णित औषधियासे होता है । औष- और कृमि दोष दर करनेवाली है । (म ३) धियोंमे इनका नाम होना कहा गया है, इससे ये सजीव सूक्ष्म इन औषधियोंसे भूत रोग भादि अपर लिखे रोग दूर देही क्रिमी होग, ऐसा प्रतीत होता है, इसके अतिरिक्त होते हैं । इमी कार्यके लिये अश्वत्य, पिप्पल आदि महावृक्ष 'पिनाच' गब्द इनका रुधिर भक्षक होना सिद्ध करता है, टपयोगी है ऐसा चतुर्य और पञ्चम मन्त्रमें कहा ।इस अर्थान ये क्रिमि गरीग्में जाकर गरीरका ही रुधिर खाते हैं विषयमें वैद्यगास्त्रका कथन देग्निये- और गरीरको कृग करते है। इनका नाम निम्नलिखित (१) अश्वत्थः- हिंदीभाषामें इसको 'पीपल' कहते लोपधियोंम होता है। इन औषधियोके गुणधर्म देखिये- है। इसको संस्कृनमें, 'शुचिट्टम' कहते हैं, क्योंकि यह उन्माद .
रोगशामिका माग (२१७) - शुद्धता करता है। इसके गुण- 'पित्तम्लेष्मवणानजित् (६) कर्करी- कर्कटी, कांकरी। (इसके विषयसे योनिशोधनः वर्ण्यः। (भा. पू. १ भ वटादिवर्ग) मर्थकी खोज करनी चाहिये ) अर्थात् यह पित्त कफ व्रण मादिके दोष दूर करता है और ये सय वृक्ष मौर लतायें पूर्वोक्त रोग दूर करती है। योनिदोपोको दूर करता है । यहां पाक म्मरण रखे कि इनका वैद्यकथोक्त वर्णन मोर वेदमन्त्रोक्त वर्णन पाठक चियोंको जो भूत प्रेतादि रोग होते हैं वे विशेष कर योनि- तुलना करके देखेंगे तो उनको पता लग जायगा कि वेदने स्थानके दोषसे ही होते हैं, इस कारण इस वृक्षका पाठ इस इन रोगोके विषयमें कुछ विशेष ही कहा है। मूक्तमें किया है । इसके फलोके गुण देखिये- पष्टम और नवम मन्त्रमें यताया गया है कि सूर्य किर- अश्वत्थवृक्षस्य फलानि पकान्यतीवद्यानि च जोका उपयोग पूर्वोक्त रोग दूर करनेके कार्यमे हो सकता है। शीतलानि। कुर्वन्ति पित्तानविपार्तिदाह विच्छदिशोपारुचिदोपनाशनम्॥ (रा. नि व ११) वीर्यवती ब्राही भौषधिसे ये रोग दूर होते है। ग्यारहवें मन्त्रमें कहा है कि (वीर्यावता ब्रह्मणा) १) 'पीपलको फल पकनेपर शीतल भोर हृदयके लिये हितकारी होता है। पित्त, रक्तवाव, विष, पीडा, (७) ब्राह्मी-हिंदीभापामें इसको 'वरंभी, ब्रह्मी' दाह, वसन, शोष, मरुचि आदि दीपोको दूर करता है।' कहते हैं । इसके गुण ये हैं- (२)न्यग्रोधः-वट, बढ, वर, वरगद । इस यटके ब्राह्मी हिमा सरा तिक्ता मधुर्मेध्या च शीतला । गुण ये है- कपाया मधुरा स्वादुपाकायुष्या रसायनी ॥ स्वर्या स्मृतिपदा कुष्ठपाण्डुमेहास्त्रकासजित् । कफपित्तव्रणापहः। वयाँ विसर्पदाहघ्नः योनि- विपशोपहरी (भा.प्र.व) दोपहृत् । ( भा. प्र.) 'ब्राझी वनस्पति बुद्धिवर्धक, आयुष्यवर्धक, कुष्ठ पाण्ड ज्वरदाहतृष्णामोहव्रणशोफघ्नश्च । (रा, नि, य. ११) मेह रक्तस्राव खांसी विष प्यास आदिको दूर करनेवाली है । यह बढ कफ, पित्त, व्रण, योनिदोप, ज्वर, दाह, तृष्णा, मूर्छा और सूजन आदि रोगोका नाश करता है। इस ब्राह्मी भौषधीके गण सोमवल्लीके गुणोसे कुछ अंशमे मिलते जुलते हैं, इसलिये इसको- 'सोमवल्लरी, महौ- (३) शिखण्डी- गुञ्जा नामक लता, मोर अथवा मोरका पङ्ल, और स्वर्णयूथिकाका वाचक यह शब्द है। पधि, सुरश्रेष्ठा, परमेष्टिनी, शारदा, भारती' भी कहा है। बुद्धिवर्धक और आयुष्यवर्धक गुण इसके मुख्य है । यह (४) अर्जुनः- हिदीभाषामे इसको ' कहू, कौह' अपूर्व वल्ली है और निश्चयसे गुणकारी है। कहते है। इसके गुण ये है- कफघ्नः, व्रणशोधनः, पित्तश्रमतृप्णाहरः वात- अप्सरस्' शब्दका मूल अर्थ (अप+सरस् ) जलके कोपनश्च । (रा नि व.९) साथ संचार करनेवाला। नलागयमे संचार करनेवाला । 'मलेरिया' अर्थात् हिम ज्वरके कृमि जलसंचारी है। शीतलो हृद्यः क्षतक्षयविषरक्तहरो मेदोमेहब- मच्छरो द्वारा इनका फैलाव होता है और मच्छर गाते रहते णघ्नस्तुवरः कफपित्तघ्नश्च । हैं, इसलिये ये संभवत 'गंधर्व' ही होगे, और इनके (भा. पृ. १ भ वटादि.) माश्रयसे चारों ओर जानेवाले ज्वरोत्पादक क्रिमि अप्सरस वह अर्जुन वृक्ष कफ, व्रण, पित्त, श्रम, तृप्णाको दूर होंगे । गंधर्व और अप्सराओंको इस प्रकरणमे यह संबंध करता है । हृदयके लिये हितकारी है । व्रण, क्षय, विप और दीखता है। पीपल, बड, अपामार्ग, अर्जुन आदि वृक्षोके रक्त दोष दूर करता है । मेदादि रोग दूर करता है। कारण इन रोग कृमियोका दूर होना लिखा है। इसलिये (५) आघाट:- अपामार्ग औषधि । हिदीमे लटजिरा, 'मलेरिया' ज्वरके प्रदेशोमे इन वृक्षोकी उपज करके अनु- चिरचिरा कहते है । इसपर कई सूक्त है (अथर्ववेद का ४ भव करके देखना चाहिये । इसी प्रकार अजश्रृंगी गुग्गुलु सू. १७-१९ विवरण सहित पढिये । इसमे अपामार्गके गुण- आदि वनस्पतियोंका भी रोग निवारणार्थ प्रयोग करके देखना योग्य है। । - धर्म लिखे हैं। २८ (मथर्व. मा. ४ हिन्दी) (२१८) अथवेवफा नुवोध अनुवाद 'दीर्घजीवन और आरोग्य' रोयक्रिमीनाशक हम कां. ६, सू. ३२ (ऋषि:- चातनः, ३ मथर्वा । देवता- भग्निः, २ रुद्र , ३ मिनावरणो।) अन्तर्दावे जुडुता स्वतधातुधानुक्षयणं घृतेन । आराद्रक्षासि प्रति दह त्वमग्ने न नौ गृहाणामुप तीतपासि |॥१॥ रुद्रो वो ग्रीवा अशरत्पिशाचाः पृष्टीवोऽपि शृणातु यातुधानाः । वीरुहो विश्वतोवीर्या यमेन समंजीगमत् ।।२।। अभयं मित्रावरुणाविहास्तु नोऽर्चिपात्त्रिणो नुदतं प्रतीचः । मा ज्ञातारं मा प्रतिष्ठा विदन्त मिथो विघ्नाना उप यन्तु मृत्युम् अर्थ-(एतद् यातुधानभयणं) हम पीढा देनेगालोका नाश करनेवारी इविका (अन्तः दावे) अग्निकी प्रदीप्त अवस्थाम (सु जुहत ) उत्तम प्रकारने हवन करो । हे भग्ने । (वं रसांसि आरात् प्रतिदह) त् राक्षसोंके समीपसे और दूरसे जला मौर (नः गृहाणां न उप तीनपासि ) हमारे घरोंको ताप न दे ॥६॥ है (पिशाचाः ) पिशाचो ! ( रुद्रः वः ग्रीवाः यरत् ) रुद्रने तुम्हारी गर्दनोको तोड़ डाला है । हे (यातु धानाः) यातना देनेवालो ! (वः पृष्टीः अपि शृणातु) वह तुम्हारी पसलियोको भी तोढ ढाले । (विश्वतोवीय वीरुत्) अनंत वीर्योवाली औषधिने (वः यमेन समजीगमत् ) तुमको यमके साथ मयुक्त किया है ॥ २ ॥ हे (मित्रावरुणौ ) मित्र और वरुण ! (नः इह अभयं अस्तु ) हमारे लिये यहां अभय होवे । तुम (भर्चिप अत्रिणः प्रतीचः नुढतं) अपने तेजसे भक्षक शत्रुओंको दूर हटा दो। (मा सातारं ) ज्ञानीको वे न प्राप्त करें । कई भी वे ( मा प्रतिष्ठां विन्दत) स्थिरताको न प्राप्त हो। (मिथः विघ्नाना मृत्यु उपयन्तु) भापसमें एकदूसरेके मारते हुए वे सब मृत्युको प्राप्त हो ॥ ३ ॥ - ! रोगनाशक हवन रोगके कृमियोंका नाश करनेवाला इवन प्रदीप्त अग्निमें उत्तम विधिपूर्वक करनेका उपदेश इस सूक्तके प्रथम मंत्र किया है। इससे शरीरभक्षक सूक्ष्म रोगक्रिमि नाशको प्राप्त होते हैं। किमी ये हैं- १ (पिशाचाः) मांसकी क्षीणना करनेवाले, रक्तकी क्षीणता करनेवाले । २ (यातुधानाः) गरीरमें यातना, पीढा उत्पन्न करनेवाले। ३ (राक्षसाक्षरासाः)क्षीणता करनेवाले, और ४ (अत्रिणः अदन्ति इति) गरीर मक्षण करनेवाले ये रोगजन्तु अग्निमे किये गए हवनसे तथा- ५ (विश्वतो वीर्या वीरुत् ) मत्यंत गणवाली बनस्पतिक प्रयोगले क्षीण होते है और नागको प्राप्त होते है।
रोगोंसे बचना (२१९) रोगा बच्चन कां. ६, सू. ९६ (मपि.- भृग्वझिरा. । देवता- वनस्पतिः, सोमः।) या ओषधयः सोमराज्ञीर्यह्वीः शतविचक्षणाः । वृहस्पतिप्रसूतास्ता नौ मुञ्चन्त्वहसः ॥ १॥ मुञ्चन्तु मा शपथ्याईदो वरुण्यादित । अर्थों यमस्य पडवीशाद्विश्वस्माद्देवकिल्बिषाद ॥ २॥ पच्चक्षुषा मनसा यच्च वाचोपारिम जाग्रतो यत्स्व॒पन्तः । सोमस्तानि स्वधयां नः पुनातु ॥३॥ अर्थ-(याः सोमराज्ञीः बबीः ओषधयः) सोम औषधि जिनमे मुख्य है ऐसी औषधियां है और जिनसे (शत- विचक्षणाः ) सैकडों कार्य होते है, (वृहस्पति-प्रसूताः ताः) ज्ञानीके द्वारा दी हुई वे औषधियां (नः अंहसः मुश्च- न्तु) हमे पापरूपी रोगले वचावें ॥ १ ॥ वे भोपधियां (मा शपथ्यात् मुञ्चन्तु ) मुझको दुर्वचनके कारण होनेवाले रोगसे बचावे (अथो उत वरुण्यात् ) भौर जलके कारण होनेवाले रोगसे बचावें । (अथो यमस्य पवीशात् ) अथवा यमके पाश स्वरूप असाध्य रोगोले बचावे तथा (विश्वस्मात् देवकिल्विपात् ) सब देवोक विषयमे होनेवाले पापोके रोगोसे बचावें ॥ २ ॥ (यत् चक्षुपा मनसा ) जो पाप चक्षु और मनस् तथा ( यत् च वाचा ) जो वाणीसे (जाग्रतः यत् स्वप- न्तः) जागते समय और जो सोते समय हम ( उपारिम ) प्राप्त करते है (नः तानि ) हमारे वह सब पाप ( सोमः स्व-धया पुनातु) सोम अपनी शक्तिसे पुनीत करके दूर करे ॥३॥ भावार्थ- सब औपधियोंमे सोम औषधि मुख्य है इन औषधियोसे सैंकडों रोगोको चिकित्सा होती है। ज्ञानी वैद्य द्वारा दी हुई ये भीषधियां हमे रोगमुक्त करें ॥ १ ॥ दुर्वचनसे, जलके बिगडनेसे, यमके पाशरूप दोषोसे और सब पापोसे उत्पन्न हुए रोगोसे औषधियां हमे बचावें ॥२॥ भाख, मन, वाणी आदि इद्रियो द्वारा जाग्रतावस्था और स्त्रमावस्थामें जो पाप हम करते हैं, उन पापोसे उत्पन्न हुए रोगोंसे सोम भादि भौषधिया हमें बचावें ॥३॥ पापसे रोगकी उत्पत्ति इस सूक्तमें पापसे रोगोकी उत्पत्ति होनेकी बात बताई है । सब रोग मनुष्योके किये पापोसे उत्पन्न होते हैं । यदि मनुष्य अपने भापको पापसे बचावें तो नि.संदेह वे रोगोंसे बच सकते हैं। मनुष्य सोते हुए और जागते हुए अपनी इंद्रियोंसे अनेक पाप करते है और रोगी होते हुए दुःखी होते है । इनको चाहिए कि, ये पापसे बेच रहे और अपनी इन्द्रियोंसे पाप न करे । ' अर्थात् गालिया देना, बुरे शब्द बोलना और क्रोधके वचन कहना यह भी पाप है । इससे अनेक रोग होते क्रोध भी स्वयं रोग उत्पन्न करता है । मत. इससे बचना उचित है। रोग होनेपर भौषधि प्रयोगसे रोगनिवृत्ति हो सकती है, परतु औषध (वृहस्पतिप्रसूत) ज्ञानो वैद्य द्वारा विचारपूर्वक दी हुई होनी चाहिये। शपथ .
(२२०)
अथर्ववेदका सुबोध अनुवाद -'दीर्घजीवन और आरोग्य'
दूर करना
'sto
।
हाधिकातको
कां. २, सू. ९
(ऋपिः- भृग्वगिराः । देवता- बनरपतिः, यक्ष्मनाशनम् ।)
दर्शवृक्ष मुञ्चेमं रक्षसो ग्राह्या अधि यैनै जग्राह पर्वसु । अथौ एनं वनस्पते जीवाना लोकमुन्नय ||१||
आगादुदंगादयं जीवाना बातमप्यमात् । अदु पुत्राणी पिता नृणां च भगवत्तमः ||२
अर्थातीरध्यगाद्यमधि जीवपुरा अंगन् । शृतं ह्यस्य भिपजः सहस्रमुत वीरुधः ॥३॥
देवास्तै चीतिमविदन्ब्रह्माण उत वीरुधः । चीतिं ते विश्वे देवा अविदुन्भूम्यामधि ||४||
यश्चकार स निष्कर स एव सुभिषक्तमः । स एव तुभ्यं भेजानि कृणवद्धिपजा शुचिः ||५||
अर्थ- है (दा-वृक्ष ) दस वृक्ष ! ( या एनं पर्वसु जग्राह ) जिम रोगने इसको जोढोमें पकड रसा
ऐसे ( रक्षसः ग्राह्या ) रामम्मकी तरह जकडनेवाले गठियारोगको पीटामे (इमं मुञ्च ) इसे छुढा दे, हे (वनस्पते)
औपधि । ( एनं जीवानां लोकं उन्नय) हमको जीवित लोगोके स्थानमे जाने योग्य बनाकर ऊपर उठा ॥ १ ॥
(अयं) यह मनु'य ( जीवानां नातं ) जीवित लोगोक समूहमें (अगात्, आगात्, उदगात् ) भाया, भाप-
हुंचा, उठकर आया है । अब यह (पुत्राणां पिता) पुत्रोका पिता और (नृणां भगवत्तमः) मनुष्योमे अत्यंत भाग्य-
वान् (अभूत् उ) बना है ॥ २ ॥
(अयं ) इसने ( अधीति. अध्यगात् ) प्राप्त करने योग्य पदार्थ प्राप्त किए है, और (जीवपुरा अधि अगन् )
जीवोकी संपूर्ण मावश्यकतायें भी प्राप्त की है, (हि) क्योकि (अस्य गतं भिपज ) इसके संकटो वैद्य हैं और (उत
सहस्त्रं वीरुधः ) हजारों औपच है॥ ३ ॥
(देवा ब्रह्माण. उत वीरुध. ) देव, ब्राह्मण और वनस्पतिया (ते चीति अविदन् ) तेरे सादान, संदान
भादिको जानती है, (विश्वे देवाः) सब देव (भूम्यां अधि) पृथिवीक ऊपर (ते चीति अविदन् ) तेरे भादान
संदानको जानते है ॥ ४ ॥
(यः चकार स निष्करत् ) जो करता रहता है वही नि.गेप करता है और वही (सु-भिपक्-तमः ) सबने
उत्तम वैद्य होता है । (स एव शुचिः) वही शुद्ध वैद्य (भिपजा ) अन्य वैद्यसे विचारणा करके (ते भिपजानि कृण-
वत्) तेरे लिये औपवियोको तैयार करेगा ॥ ५ ॥
भावार्थ- दगवृक्ष नामक वनस्पति गठिया रोगको दूर करती है । यह गठिया रोग संधियोको जकड रखता
जिसने मनुष्य चल फिर नहीं सकता । इसकी चिकित्सा दक्षवृक्षसे की जाय तो वह रोगी शीघ्र भारोग्य प्राप्त करके भन्य
जीवित मनुप्योंकी तरह अपने व्यवहार कर सकता है ॥१॥
यह आरोग्य प्राप्त करके लोकममाओम जाकर सार्वजनिक कार्य व्यवहार करता है, घरमे अपने बालबच्चोंके संबंध
कर्तव्य करता है और मनुष्योम अत्यंत भाग्यशाली भी बन सकता है ॥२॥
वह निरोगी बन कर सब प्राप्तव्य पदार्थ प्राप्त कर सकता है, जीवोकी जो जो मावश्यकताएं होती हैं उनको प्राप्त कर
सकता है । यह रोग कोई असाध्य नहीं है क्योकि इसके चिकित्सक सेंकडो हैं और हजारो औषधिया भी हैं ॥३॥
इनकी अनेक औषधिया तो पृच्चीपर ही है, उनको कसे लेना और उनका प्रयोग कैसा करना चाहिए यह सब
दिव्यगुणधमासे युक्त ब्रह्मानानी ब्राह्मण वैद्य जानते हैं ॥ ४ ॥
जो यह चिकित्माका कार्य करता रहता है वही इसको प्रवीणतासे निभा सकता है। वारंवार चिकित्सा करते रहनेसे
ही जो प्रारममे साधारणसा वैद्य होता है, वही श्रेष्ठ धन्वन्तरी बन सकता है। ऐमा श्रेष्ठ धन्वन्तरी अन्य वैद्योको सम्मतिसे
रोगीकी चिकिस्मा उत्तम प्रकारसे कर सकता है॥५॥
सन्धिपालको दूर करना (२२१) - कुछ - यह गया प्रसिद्ध है। सन्धिवातको दूर करना संधिवात मंत्र दो और तीनमे कहा है कि इस औषधिसे मनुष्य वेदमें संधिवात रोगका नाम ग्राही है, क्योकि यह (पर्वसु नीरोग होकर लोक सभामे जाता है और घरके कार्य भी कर जग्राह) पर्वो अर्थात् जोडाको जकड लेता है और हिलने सकता है । अर्थात् वैयक्तिक, सामाजिक और राष्ट्रीय कर्तव्य दुलने नहीं देता । जोडीका हिलना डुलना भी बन्द हो जाता कर सकता है । सव मानवी कर्तव्य करनेमे वह योग्य होता है । इसे राक्षस अथवा पिशाच भी कहते है। ये नामरता है। इन मत्रोकी भाषा देखनेसे ऐसा प्रतीत होता है कि यह साथ इस रोगका संबंध बताते है क्योंकि ये नाम रुधिरप्रिय चिकित्सा अति शीघ्र गुणकारी है । जो अभी बिस्तरेपर अर्थात् जिनको रक्तके साथ प्रेम है, ऐसोक वाचक हैं। इस- समाजोमे जाकर कार्य करने लगता है। पहिले तीन मंत्रोका जकडकर पड़ा हुआ था वही रोगी घण्टोके बाद मनुष्य- लिये 'रक्षः ग्राही' का अर्थ रक्तके बिगाडसे होनेवाला समाजोमे जाकर कार्य करने लगता है। पहिले तीन मंत्रोका संधिवात है। सूक्ष्म रीतिसे विचार करनेपर ऐसा क्षाशय प्रकट होता है, इस शीघ्रताके दर्शक शब्द प्रयोग द्वितीय मंत्रमें पाठक अवश्य दशवृक्ष देखे- उक्त सधिवातकी चिक्त्सिा दशवृक्षसे की जाती है। अयं जीवानां नातं अप्यगात् । दश मूल' नामसे वैद्यग्रथोमे दस मौषधिया प्रसिद्ध है आगात्, उदगात् ॥ (म २) वातरोगके लिए वे रामबाण है संभव है कि ये ही दगवृक्ष जीवोके समूहोमे गया, पहुंचा, उठकर खडा होकर यहां अपेक्षित हो। इन दावृलोका तैल, घृत, कपाय, भासव, 1" अपने पावसे गया अर्थात् जो वहां बिस्तरेपर पडा भरिष्ट आदि भी बनाया जाता है जो वातरोगको दूर करनेमें हुआ था, वही इतनी शीघ्रतासे मनुष्य समूहोमे घूम रहा यह आश्चर्य व्यक्त करने के लिये एक ही माशयकी इस सूक्तक प्रथम मंत्रम 'मुञ्च' क्रिया है, इस 'मुञ्च' तीन क्रियाएं (आगात् , अप्यगात् , उद्गात् ) प्रयुक्त धातुसे एक ' मोच' शब्द बनता है जो 'सोहिञ्चना' की है। इससे यह चिकित्सा शीघ्रगुणकारी है ऐसा स्पष्ट या मुनेका आड अर्थात् शोभाञ्जन वृक्षका वाचक है । यह व्यक्त होता है। वृक्ष भी वान दोष दूर करनेवाला है । इस वृक्षकी लंबी इस चिकित्साकी औषधिये सहलो है और इसके चिकि- फलियां होती है जो साग आदिसे उपयोगी होती है। इस त्सक भी सैंकडो है। (मं.३) यह तृतीय मंत्रका कथन बता सोहिञ्चना वृक्षकी अंतस्त्वचा यदि जकडी हुई संधिपर बांधी रहा है कि यह सुसाध्य चिकित्सा है। असाध्य नही है। जाय तो दोचार घंटोके अदर जकडी हुई सधियां खुल जाती है, ऊपर जो ‘मोच' वृक्षसे चिकित्सा बतायी है वह प्राय यह अनुभवकी बात है । अन्य औषधियोसे जो सधिरोग यहांके ग्रामीण भी जानते है और करते हैं इससे कुछ ही महिनातक घण्टोमे आरोग्य होता है। दूर नहीं होता वह इस मतस्त्वचासे कई घंटोमे दूर होता है। रोगीको घण्टे दो घण्टे या चार घण्टेतक कष्ट प्रयोग करना (विश्वेदेवाः देवाः ब्राह्मणाः) सब भूदेव ये वृक्ष पृथ्वीपर बहुत है और उनको लाना और उनका सहन करना पडता है, क्योकि इस अन्तस्त्वचाको जोडोपर ब्राह्मण जानते है। अथवा ब्राह्मण तथा अन्य लोग भी जानते कुछ समय बाद उस स्थानपर बडी गर्मी या जलन पैदा होती है । ढोचार घण्टे यह कष्ट सहनेपर सबि- हे । इसमे 'चीति' शब्द (आदान संधान) लेना और जलन पैदा होती है । दोचार घण्टे यह कष्ट सहनेपर सवि- प्रयोग करना यह भाव बता रहा है किवा (आदान-संव- स्थान के सब दोप दूर होते है । यहा मन्त्रम 'मुञ्च' शब्द है रण) अर्थात् औषधका उपयोग और औषधके दुष्प- इस वृक्षका नाम संस्कृतमे 'मोच' है, इसलिये यह बात यहां कही है। हमने कवल दूसरोपर अनुभव ही देखा रिणामोको दूर करना, यह सब वैद्य जानते हैं। (मै ४) इसका शास्त्रीय तत्त्व हमे ज्ञात नही है। इस प्रथम मत्रके उत्तरार्धमे आगे जाकर कहा है कि इस पंचम मंत्रमें उत्तम वैद्य कैसे बनते है इस विषयमे कहा वनस्पतिसे सन्धिवातसे जकडा हुआ रोगी नोरोग लोगोंके है वह बहुत मनन करने योग्य है- समूहोमें भाता है भौर नीरोग लोगोके समान अपने कर्तव्य यः चकार, लः निष्करत् , स एव सुभिषक्तमः॥ (मं. ५) । बांधनेसे और करना है, उत्तम वैद्य फरने लगता है। (म.
(२२२) अथर्ववेदका सुवोध अनुवाद - 'दीर्घजीवन और आरोग्य' 'जो करता रहता है वही नि.शेष कार्य करता है और इस नियमके अनुकूल ही सिद्धि हुई है। यह कथा महाभारत वही सबसे श्रेष्ठ चिकिसक होता है।' मे आदिपर्वमे पाठक देख सकते हैं। जो कार्य करता रहता है वही मागे जाकर उत्तम प्रवीण इसी नियमका जो उत्तम पालन करेगे वेही हरएक विद्या- बनता है । इस प्रकार अनुभव लेनेवाला ही आगे उत्तमोत्तम में प्रवीण बन सकते है। यहां चिकित्साका विषय है इस- वैद्य यन जाता है। लिये इसकी प्रवीणता भी इसीमें कार्य करनेसे ही प्राप्त होती प्रवीणताकी प्राप्ति है । बहुत अनुभवसे ज्ञानी बना हुआ वैद्य ही विशेष श्रेष्ठ समझा जाता है अल्प अनुभवी वैद्य उतना श्रेष्ठ समझा नहीं प्रवीणताकी प्राप्ति करनेका साधन इस मंत्रमे वेदने बताया जाता, इसका कारण भी यही है। है। किसी भी वात प्रवीणता संपादन करनी हो तो उसका कर्म करनेसे ही सवको श्रेष्ठ अवस्था प्राप्त होती है यह उपाय यही है कि- नियम सर्वत्र एकसा लगता है। यः चकार, सः निष्करत् । (म. ५) इस सूक्तके चतुर्थ मंत्रमें 'ब्राह्मणः ' पद है। यह ब्राह्मणों जो सदा कार्य करता रहता है वही परिश्रमी पुरुष उस का वाचक है। इससे पता लगता है कि चिकित्साका यह कार्यको निःशेप करनेकी योग्यता अपनेम ला सकता है ।' व्यवसाय ब्रह्माणोके व्यवसायोंमें समिलित है। वेदमे अन्यत्र हम भी अनुभवमे यही देखते है, जो गानविद्यामे परिश्रम 'विप्रः स उच्यते भिपक् (वा, यजु भ. १२१८०)' कहा करते है वे गय्या बन जाते है, जो चित्रकारीम दत्तचित्त है, इसमे भी · वह विप्र वैद्य कहलाता है, यह भाव है । यहां होकर परिश्रम करते हैं वे कुशल चित्रकार होते है, इसी के 'विप्र' शब्दके साथ इस मंत्र के 'ब्राह्मणः' शब्दकी प्रकार अन्यान्य कारीगरी प्रवीण बननेकी बात है। एक- संगति लगानेसे स्पष्ट हो जाता है, कि ब्राह्मणोके व्यवसायोमें लन्य नामक एक भील जातिका कुमार था उसकी इच्छा वैद्यक्रिया संमिलित है । आंगिरसोके वैद्य विद्यामे प्रवीणताके क्षात्र विद्या प्राप्त करनेकी थी, कौरव पाण्डवोकी पाठगालामे चमत्कार प्रसिद्ध ही है । इन सबको देसनेसे इस विषयमे उसको विद्या सिसाई नही गई, परंतु उसने प्रतिदिन अवि- संदेह नहीं हो सकता। श्रांत रीतिसे अभ्यास करके स्वयं ही अपने दृढ निश्चयपूर्वक यह सूक्त 'तक्म नाशन गण' का सूक्त है । इसलिये किये हुए परिश्रमसे ही मात्र विद्या प्राप्त की। यह बात भी रोगनिवारक अन्य सूक्तोंके साथ इसका अध्ययन पाठक करें। क्षञ्चित्य शोह दूर करना कां. २, सू.८ (पि.- भृग्वशिरा । देवता- वनस्पतिः, यक्ष्मनाशनम् ) उदगातां भगवती विचूतो नाम तारके । वि क्षेत्रियस्य॑ मुञ्चतामधुमं पाशंमुत्तमम् ॥ १ ॥ अर्थ- (भगवती ) वैष्णवी औपवि तथा (विचूतौ नाम ) तेज बढानेवाली प्रसिद्ध (तारके ) तारका नामक चनस्पतिया (उदगातां ) उगी है वे दोनो (क्षेत्रियस्य अधर्म उत्तमं च पाशं) वंगसे चले आनेवाले रोगके उत्तम मार अधम पागको (वि मुञ्चतां) चोल दे॥ १ ॥ भावार्थ-दो प्रकारकी वैष्णवी और दो प्रकारकी तारका ये चारों औषधियां कान्तिको बढानेवाली हैं, जो भूमिपर उगती हैं। ये चारों भानुचशिक रोगको दूर कर ॥ १ ॥ ५ नेत्रिय रोग दूर करना (२२३) अपेयं राज्युच्छत्वपोच्छन्त्वभिकृत्वरीः । वीरुक्षेत्रियनाशन्यप क्षेत्रियमुच्छतु ॥२॥ बोरर्जुनकाण्डस्य यस्य ते पलाल्या तिलस्य तिलपिड्या । वीरुत्क्षेत्रियनाशून्यप क्षेत्रियमुच्छतु नमस्ते लाङ्गलेभ्यो नम ईपायुगेभ्यः । वीरुक्षेत्रियनाशन्यप क्षेत्रियमुच्छतु ॥४॥ नमः सनिस्साक्षेभ्यो नमः संदेश्य भ्यः । नमः क्षेत्रस्य पतये वीरुक्षेत्रियनाशन्यप क्षेत्रियमुच्छतु अर्थ- ( इयं रात्री अप उच्छतु) यह रानी चली जावे और उसके साथ (अभि कृत्वरीः अपोच्छन्तु ) हिंसा करनेवाले दूर हो तथा (क्षेत्रिय नाशनी वीरुत् ) वगसे चले आनेवाले रोगका नाग करनेवाली औषधी (क्षेत्रियं अप उच्छतु) आनुवशिक रोगको दूर करे ॥ २ ॥ (वभ्रोः अर्जुनकाण्डस्य ते यवस्य ) भूरे और श्वेत रंगवाले यवके भन्नकी (पलाल्या ) रक्षक शक्तिसे तथा (तिलस्य तिलपिया) तिलको तिलमञ्जरीसे (क्षेत्रियनाशनी वीरुत् ) आनुवंशिक रोगको दूर करनेवाली यह वनस्पति (क्षेत्रियं अप उच्छतु) क्षेत्रिय रोगसे मुक्त करे ॥ ३ ॥ (ते लांगलेभ्यः नमः) तेरे हलोके लिये सत्कार है (ईपायुगेभ्यः नमः ) हलकी लकढियोके लिये सत्कार है (क्षेत्रियनाशनी वीरुत्) आनुवंशिक रोगको दूर करनेवाली यह औषधि (क्षेत्रियं अप उच्छतु) क्षेत्रियरोगसे मुक्त करे ॥४॥ (सनिस्साक्षेभ्यः नमः) जलप्रवाह चलानेवाले अक्षका सत्कार, (संदेश्येभ्यः) सदेश देनेवालेका सत्कार और (क्षेत्रस्य पतये नमः ) क्षेत्रके स्वामीका सत्कार हो । (क्षेत्रियनाशनी क्षेत्रियं अप उच्छतु) आनुवंशिक रोगको हटानेवाली औषधि आनुवंगिक रोगको हटा देवे ॥५॥ भावार्थ- रात्री चली जाती है, तो उसके साथ हिंसक प्राणी भी चले जाते है, इसी प्रकार यह औषधि भानुवंशिक रोगको उसके मूल कारणोके साथ दूर करे ॥२॥ भूरे और श्वेतरंगवाले जौके भन्नके साथ तिलोके सेवनसे यह भौषधि आनुवंशिक रोगको हटा देती है ॥३॥ हल भूमिको ठीक की जानेवाली लकडियोसे ये वनस्पतियां तैय्यार होती हैं, इसलिए उनकी प्रशंसा करनी चाहिए ॥४॥ जिसके खेत में पूर्वोक्त वनस्पतिया उगाई जाती है, जो उनको जल देता है, जिस यनसे उन्हे पानी दिया जाता है, जो इस वनस्पतिका सन्देश जनता तक पहुंचाता है, उन सबकी प्रशंसा करनी चाहिए । यह वनस्पति भानुवंशिक रोगसे तथा बचावे ॥५॥ क्षेत्रिय रोग दूर करना क्षेत्रिय रोग ही सन्तानोत्पत्तिका अधिकार है। असाध्य भानुवंशिक जो रोग माता पिताके शरीरसे अथवा पूर्वजोके गरीरसे रोगोकी चिकित्सा इस सूक्तमे बताई है। चला भाता है, उस भानुवंशिक रोगको क्षेत्रिय कहते दो औषधियाँ हैं। वैद्यकशास्त्रमें क्षेत्रियरोगको प्राय. 'भगवती और तारका' ये दो मौषधियां है, जो शरीरकी जाता है। इसलिए रोगी मातापिताओंको सन्तानोत्पत्तिका कांति बढाती है और क्षेत्रिय रोगको दूर करती है । इन दो कर्म नहीं करना चाहिए । प्रथम ऐसे व्यवहार करने औषधियोंकी खोज वैद्योको करनी चाहिए। चाहिए कि रोग ही न उत्पन्न हो। इसलिए खानपान भादि १ भगवती- इसको वैष्णवी, लघुशतावरी, तुलसी, सब मारोग्य साधक ही होना चाहिए। जो नीरोग हों, उन्हें भपराजिता, विष्णुकान्ता कहा जाता है, तथा- असाध्य कहा - ।
(२२४) अथर्ववेदका नुवोध अनुवाद दीर्घजीवन और आरोग्य' २ तारका- हम भीपविको देवताइवृक्ष और इन्त्र प्रकार हम औषधीके प्रयोगले क्षेत्रिय रोग जबसे उपट चारणी कहा जाता है। इसका अर्थ परक्षार धीर मोती जाता है। भी है। तीसरे मत्रमें इस औषधि प्रयोगके दिनों में करने योग्य शब्दों अर्थ जानने मानसे इस औषविकी सिद्धि नही पथ्य भोजनका उपदेश दिया है। जिस जौकी इण्डियों भूरे हो सकती और कोगोहारा गन्दा करने मात्र ही औषध और सफेद रंगकी होती है, उस जौका पेय बनाकर उनमें नहीं बन सकती । यह विशेष महत्वका विषय है, अतः ये तिल डालकर पीना। यही भोजन इस औषधि-प्रयोगके किस बनन्पतिक नाचक नाम यहा है, इसका निश्चय करना समय निहित है । इस पथ्यके साथ ली गई उपरोक्त औषध आवश्यक है। 'भगवती और तारके' ये औषधीवाचक भानुवंगिक रोगसे मुक्त करती है। दोनों गन्द यहां द्विवचनी है, इससे ज्ञात होता है कि इस चतुर्थ और पचममंत्रमें इन पूर्वोक्त भापधियोको तथा इस एक ही नामके अन्तर्गत ढो दो लोपधियां लेनी होती है। पथ्यान्नको उत्पन्न करनेवाले, किसान, इस संतको समयपर इस प्रकार इन दो नामोने चार बनस्पतिया होती है, जो पानी देनेवाले, इस खेतीके लिए हल चलानेवाले, हलके क्षत्रिय रोगको दर करती है और गरीरकी कातिको बढाती मामान ठीक करनेवाले तया इम औषध और पथ्यका सन्देशा है अर्थात क्षेत्रिय रोगको जइन उपाढ देती है । यह प्रथम भानुवीगक रोगके रोगियोनक पहुंचानेवालेका सत्कार किया मंत्रका तात्पर्य है। है । यदि इस पथ्य एवं इन औषधियोसे भानुवगिक रोग दूसरे मंत्रमें कहा है कि जिस प्रकार रात्रीक जाने और सचमुच दूर होते हो तो इन सबका योग्य भादर करना दिनक शुरु होनेसे हिंसक प्राणी स्वयं कम हो जाते है, उसी अत्यन्त आवश्यक है। - ক্ষছি ঘষাঢ় दूर करना how कां. ३, सु. ७ (ऋषिः- भृग्वनिराः । देवता- यक्ष्मनाशनम् ।) हरिणस्य रघुष्यदोऽथि शीर्षणि भेषजम् । स क्षेत्रियं विषाणया विषचीनमनीनशत ॥१॥ अनु त्वा हरिणो वृषा पद्धिश्चतुर्भिरक्रमीत् । विणे वि प्य गुपितं यदस्य क्षेत्रिय ॥२॥ अदो यदेवरोचते चतुप्पक्षमिव च्छदिः । तेना तु सर्व क्षेत्रियमझेभ्यो नाशयामसि ॥३॥ अर्थ--- (रघुष्यदः हरिणस्य शीर्षणि अधि) वेगवान् हरिणके मिरके अंदर (भेपज) औषध है। (सः विषाणया) वह सीगर्म (क्षेत्रिय विपूचीनं अनीनगत् ) क्षत्रिय रोगको सब प्रकारसे नष्ट कर देता है ॥ १॥ (वृपा हरिणः चतुर्मि पद्भिः) बलवान हरिण चारों पांवोसे (त्वा अनु अक्रमीत् ) तेरे अनुकूल आक्रमण करता है । हे (विषाणे) मीग तू ( यत् अस्य हृदि गुपितं क्षेत्रियं) जो इसके हृदयमें गुप्त क्षेत्रिय रोग है उसको (वि प्य) नष्ट कर दे ॥ २ ॥ (अह. यत्) यह नो (चतुप्पक्ष छदिः इव ) चार पक्षवाले छनके समान (अवरोचते) चमकता है (तेन ने अंगभ्यः ) उममे तेरे अगोये (सर्व क्षेत्रियं नागयामसि) पब क्षेत्रिय रोगको हम नष्ट करते है ॥ ३ ॥ भावार्थ-बेगमे दौटनेवाले हरिणके मीगमे उत्तम औषध है उस मींगसे क्षेत्रिय रोग दूर होते हैं ।। १ ।। अध्यार हरिणक. मीगसे हदयमें गुप्त अवस्थामै रहनेवाला क्षेत्रिय रोग दूर हो जाता है ॥ २ ॥ पार पगारे रानरे समान हरिणका मीग चमकता है उससे सब मंगोमे रहनेवाले क्षेत्रिय रोगका नाश शाना: ॥
भानुवंशिक रोग दूर करना (२२५) .. अम् ये विवि मुभर्गे विचूतो नाम तारके । वि क्षेत्रियस्य॑ मुञ्चतामधमं पाशमुत्तमम् ॥४॥ आप इद्वा उ भेजीरापो अमीवचातनीः । आपो विश्वस्य भेजीस्तास्त्वा मुञ्चन्तु क्षेत्रियात् ॥ ५ ॥ यदासुतेः क्रियाणायाः क्षेत्रियं त्वा व्यानशे । वेदाहं तस्य भेषजं क्षेत्रियं नाशयामि त्वत् ॥ ६ ॥ अपवासे नक्षत्राणामपास उपसामुत । अपास्मत्सर्वं दुर्भूतमपं क्षेत्रियमुच्छतु ॥ ७॥ अर्थ- (अमू ये दिवि ) वे जो भाकागमे (सुभगे विचूतौ नाम तारके) उत्तम प्रकाशमान दो सितारे है- बनस्पतियां है । (क्षेत्रियस्य अधम उत्तम पाशं विमुञ्चतां) क्षेत्रिय रोगके नीचे और ऊंचे पागको छुडा देवे ॥ ४ ॥ (आपः इत् वै उ भेपजीः ) जल नि सन्देह सौपध है, (आपः अमीवचातनीः) जल रोगनाशक है (आपः विश्वस्य भेपजीः) जल सब रोगोकी दवा है । (ताः त्वा क्षेत्रियात् मुञ्चन्तु ) वह जल तुझे क्षेत्रिय रोगले छुढा देवे ॥५॥ (यत् क्रियमाणायाः आसुतेः ) यदि बिगडनेवाले रसले (क्षेत्रियं त्वा व्यानशे) क्षेत्रिय रोग तेरे मंडर म्यापा है । तो (तस्य भेषजं अहं वेद ) उसका गोपध मैं जानता हूँ और उससे मैं (त्वत् क्षेत्रियं नाशयामि) इससे क्षेत्रिय रोगका नाम करता हूं ॥६॥ (नक्षत्राणां अपवासे) नक्षत्रोके छिपनेपर (उत उपसां अपवासे ) उपाके चले जानेपर (सर्व दुर्भूतं अस्मत् अप) सब अनिष्ट हम सबसे दूर होवे तथा (क्षेत्रियं अप उच्छतु) क्षेत्रिय रोग भी हट जावे ॥ ७ ॥ भावार्थ- ये जो प्रकाशमान सितारों के समान तारका नामक दो औपधियां है उनसे वंशके रोग दूर होते हैं ॥ ४॥ जल उत्तम औषधि है, उससे सब रोग दूर होते हैं, सब रोगोके लिये यह एकही औषध, है उससे क्षेत्रियरोग दूर होता है॥५॥ यदि बिगड़े हुए जलके कारण तेरे अन्दर क्षेत्रिय रोग प्रकट हुआ है तो उसके लिये औषध मैं जानता हूं और उससे रोग भी दूर करता हूं ॥ ६॥ नक्षत्रके छिपनेपर और उपाके चली जानेपर सब रोगबीज हम सबसे दूर होवे और हमारा क्षेत्रिय रोग भी दूर होवे ॥७॥ इनकी चिकित्सा आनुवंशिक रोग दूर करना मातापितासे संतान में आये क्षेत्रिय रोग मृगशृङ्गं भस्मदोगे त्रिकशूलादौ शस्तम् । (वैद्यक शव्द सिधु) जो रोग मातापितासे संतानमे आते है उनको क्षेत्रिय रोग कहते है। इन क्षेत्रिय रोगोंका इलाज कठिन होता है। रोगोके लिये प्रशस्त है।' यह कथन इस सूक्तके कथनके मृगका सींग भस्मरोग, हृदयरोग और त्रिक शूलादि इस सूक्तमे कही है। साथ संगत होता है। हरिणके सींगसे चिकित्सा कृष्ण मृगके सीग बढे भारी होते है, उन सींगोंमें क्षेत्रिय इस सूक्तके द्वितीय मंत्रमें कहा गया 'हृदि गुष्पितं रोग दूर करनेका गुण होता है। हरिण सिरम औषध है, क्षेत्रिय (मं.२) हृदयमे रहनेवाला गुप्त क्षेत्रिय रोग प्रायः जो सोंगमें भाता है जिसके कारण क्षेत्रिय रोग दूर होते है । हृदय रोगही होगा। तृतीय मंत्रमें 'अंगेभ्यः क्षेत्रियं ( में (मं.)' हरिण के सींगके विषयों वैद्यकग्रंथका ३)' सब अगोसे क्षेत्रिय रोग दूर करनेकी बात कही है। २९ [अथर्व. भा. : हिन्दी] हृदय रोग (२२६) अथर्ववेदका सुबोध अनुवाद - 'दीर्घजीवन और थारोग्य' - . प्रथम मंत्रमें सामान्य क्षेत्रिय रोगका वर्णन है। ये सब रोग धुलोक और भूलोको समान औपधियां हरिणके सागसे दूर होते हैं । हरिणका सीग चंदनके समान वनस्पतियों के साथ गुलोकका संबंध बनाया है। सोम पत्थरपर जलमें घिसकर सिरपर लगाया जाता है अथवा थोडा धुलोकमें है और पृथ्वीपर भी बनम्पतिस्प है । इसी प्रकार थोडा अल्पप्रमाणम पेटमे भी लेते है। कई प्राताम छोटे बाल- कोको उसे घिसकर किंचित जलमें घोलकर पिलाते भी है वसविरूपमे पृथ्वीपर है और तेजस्पसे झुलोकमें है। यह सुभगा ( मगरती ) और तारका 'ये दो भापधियां भी और माताएं कहती है कि हमसे संतानोंको आरोग्य होता है वनस्पतिरूपसे पृथ्वीपर है और तेजस्पग्मे द्युलोकमें है। यह वर्णन वनस्पतिका प्रासापरक प्रतीत होता है। मिरमें गर्मी चढनेपर मिरपर लगानेसे गर्मी दूर होती है । पागलकी अवस्था यह उत्तम औषध है। जलचिकित्सा औषधि चिकित्सा क्षेत्रिय रोग दर करने के लिये चिकित्साका उपदेश इस चतुर्थ मंत्रमें ' सुभगा और तारका ' ये दो शब्द है। मनके पचम मंत्रम है। इस मंत्रमें कहा है कि ' जर सब रोगांकी इसी प्रकारका मंत्र कापड २ स. ८ मे आया है, देखिये- एक दवा है इसलिये क्षेत्रिय रोग भी इससे दूर हो सकते हैं।' सगवती और तारका पष्ट मंत्रका माशय यह है कि यदि रोग अथवा क्षत्रिय भग-धती विचूतौ नाम तारके । (कां. २ स्.८ मं.१) रोग विगढे सान या पानस हुए हो तो पूर्वोन प्रकार दूर हो इसके साथ इस सूक्तका मंत्र भी देखिये- समत है । अर्थात् पूर्वोक्त पांच मंत्रोम कहे ठपाय ही सब सु-भगे विचूतो नाम तारके। (कां. ३ सू ७ में ४) रोग दूर करनेके लिये पर्याप्त है । इसमें विधानकी समता है। इसलिये द्वितीय कांडके उक्त उपायोमे अति थोडे समयमें रोग दूर हो सकते हैं। अष्टम सूक्ता प्रसंगमें ' भगवती और तारका' वनस्पतियोंके यदि रोगका प्रारभ भान हुआ है तो रात्रीके तारागण के छिप विषयमें जो लिखा है, वही यहाँ पाठक सममें । ' सुमगा जानेके समय तथा उप काल दूर होकर दिनका प्रकाम शुरू और भगवती' ये दो शब्द एक ही वनस्पतिके वाचक होगे। होते ही ये सब रोग दूर होते है । यदि वर्णन कान्य परक और तारका शब्द दूसरी वनस्पतिका वाचक होगा । ये दो माना जाय तो उसका अर्थ इतना ही होगा कि ' अनिशीघ्र वनस्पतियां क्षेत्रियरोगको दूर करती है । रोग दूर होगे।' - पशुओं की स्वास्थ्यरक्षा कां. ३, सू. २८ (ऋपि.- ब्रह्मा । देवता- यामिनी । ) एकैकयॆपा सृष्टया सं बभूव यत्र गा असृजन्त भूतकृतौ विश्वरूपाः । यत्रं विजायते यमिन्यपर्तुः सा पन्क्षिणाति रिफ़ती रुशती ॥१॥ अर्थ- (यत्र भूतकृतः विश्वरूपाः गाः असृजन्त) जहां भूतोंको बनानेवालोंने अनेक रंग रूपवाली गौवें बनाई, वहा (एपा) यह गी (एक-एकया सृष्ट्या संवभूव) एक एकके क्रमसे सन्तान उत्पन्न करनेके लिये उत्पन्न हुई है। (यत्र अप-ऋतुः यमिनी विजायते) जहां ऋतुकालसे भिन्न समयमें जुहवें बच्चोंको उत्पन्न करनेवाली गौ होती है वहां (सा सशसी रिफती) वह गौ पीडा देती हुई और कष्ट उत्पन्न करती हुई (पशून् क्षिणाति ) पशुओंको नष्ट करती है ॥५॥ भावार्थ-मृष्टि उत्पन्न करनेवालेने अनेक रंगरूप और विविध गुणधर्मवाली गौवें बनायी है। ये सब गौवें एकबार एक ही बचा उत्पन्न करनेके लिये बनाई गई है। जब यह गी ऋतुको छोड़ कर अन्य समयमें इकट्टे दो बच्चे उत्पन्न करती है उस समय वह घातक और नायक होती है, जिससे अन्य पशु मी नष्ट होते है॥१॥ - 4 पशुओंकी स्वास्थ्यरक्षा (२२७) एषा पशुन्सं क्षिणाति कन्याद् भूत्वा व्यदरी । उतैना ब्रह्मणे दद्यात्तथा स्योना शिवा स्यात् ॥ २ ॥ शिवा व पुरुषेभ्यो गोम्यो अश्वेभ्यः शिवा । शिवास्मै सर्वस्मै क्षेत्राय शिवा ने इहैधिं ॥३॥ इह पुष्टिरिह रस इह सहस्रेसातमा भव । पशून्यमिनि पोषय ॥४॥ यत्रा सुहार्दः सुकृतो मदन्ति विहाय रोग तुन्व: स्वायोः । तं लोकं यमिन्यभिसंबभूव सा नो मा हिमीत्पुरुषान्पशूश्च ॥ ५॥ पत्रो सुहादी सुकृतामग्निहोत्रहुतां यत्र लोकः । तं लोकं यमिन्य मिसंबभूव सा नो मा हिंसात्पुरुपान्पशूश्च अर्थ- (एपा क्रव्याद् व्यद्वरी भूत्वा) यह गौ मास सानेवाले कृमीके समान होकर (पशून सं क्षिणोति) पशुओंका नाश करती है । (उत एनां ब्रह्मणे दद्यात् ) इसलिये यह गौ ब्राह्मणको दे देनी चाहिये । (तथा स्योना शिवा स्यात् ) जिससे वह सुखदायी और कल्याणकारिणी हो जावे ॥ २ ॥ (पुरुषेभ्यः शिवा भव) पुरुषोके लिये कल्याण करनेवाली हो, (गोभ्यः अश्वेभ्यः शिवा) गौमओ और घोडोके कल्याण करनेवाली हो, (अस्मै सर्वस्मै क्षेत्राय शिवा ) इस सब भूमिके लिये कल्याण करनेवाली होकर (नः शिवा एथि) हमारे लिये सुख देनेवाली हो ॥३॥ (इह पुष्टिः, इह रसः) यहां पुष्टि और यहां रसको देनेवाली हो । ( इह सहस्र-सातमा भव) यहां हजारो लाभ देनेवाली हो और हे (यमिनी ) जुडवें सन्तान उत्पन्न करनेवाली गौ । (इह पशून् पोषय) यहां पशुओंको पुष्ट . लिये (यत्र) जिस देशमे (स्वायाः तन्वः रोगं विहाय ) अपने शरीरका रोग त्यागकर (सुहार्दः सुकृतः मदन्ति) उत्तम हृदयवाले और उत्तम कर्मवाले होकर मानन्दित होते हैं, हे (यमिनी) गौ ! (तं लोकं अभिसंबभूव) उस देशामें सब प्रकार मिलकर हो, (सा नः पुरुषान् पशून मा हिंसीत्) वह हमारे पुरुषो और पशुओकी हिंसा न करे ॥५॥ (यत्र यत्र सुहार्दा सुकृतां अग्निहोत्रहुतां लोकः) जहां जहां शुभ हृदयवालो, उत्तम कर्म करनेवालो और अग्निहोत्रमें हवन करनेवालोंका देश होता है, हे (यमिनी) गौ ! (तं लोकं अभिसंवभूव) उस लोकमें मिलकर रह और ( सा नः पुरुषान् पशून च मा हिंसात् ) वह हमारे पुरुषों और पशुओकी हिंसा न करे॥ ६ ॥ भावार्थ-जैसे मास सानेवाले पशु नाशक होते है, उस प्रकार यह रोगी गौ नाशक होती है। इसलिये ऐसा होते ही इसको योग्य उपायज्ञ वैद्य ब्राह्मणके पास भेज देनी चाहिये, जहा योग्य उपचारोसे वह गौ सुखदायिनी बन जावे ॥२॥ यह गौ मनुष्यों के लिये तथा घोडे, बैल, गौएं मादि पशुओंके लिये, इस भूमिके लिये और हम सबके लिये सुख इस गौमें पोषणकारक गुण है, इसमें उत्तम रस है, यह गौ हजारो रीतियोसे मनुष्योंको लाभदायक होती है, इस प्रकारको गौ सब पशुमोको यहां पुष्ट करे ॥ ४ ॥ जिस प्रदेशमें नाकर रहनेसे गरीरके रोग दूर होते हैं और शरीर स्वस्थ होता है, तथा जिस प्रदेशमें उत्तम हृदयवाले और उत्तम कर्म करनेवाले लोग रहते है, उस देश यह गौ जाय, वहां रह यहां रोगी अवस्थामे रहकर हमारे मनुष्यों और पशुओंको कष्ट न पहुंचावे ॥५॥ जिस प्रदेशमें उत्तम हृदयवाले, शुभकर्म करनेवाले और अग्निहोत्र करनेवाले सज्जन रहते है, उस देशमें यह गौ आये भौर नीरोग बने । रोगी होती हुई हमारे पुरुषों और अन्य पशुओको अपना रोग फैलाकर कष्ट न पंहुचावे ॥ ६ ॥ देनेवाली बने ॥३॥ . .
(२२८) अथर्ववेदका सुबोध अनुवाद - 'दीर्घजीवन और आरोग्य' पशुओंकी स्वास्थ्यरक्षा रोगी पशु पशुओका स्वास्थ्य पशुओका स्वास्थ्य उत्तम रहना चाहिये, अन्यथा एक पशुक स्वास्थ्यक विषयमे भावच्या योग्य प्रबंध करने भी पशु रोगी होनेपर वह अन्य पशुओका तथा मनुग्योका पर भी गौ मादि पशु पूर्वोक्त कारणोंसे लथवा अन्यान्य भी स्वास्थ्य विगाड मकता है। एक पशुका रोग दूसरे कारणाने रोगी होते हैं। वैसे रोगी होनेपर उनको उत्तम पशुक लग सकता है और इस कारण सब पशु रोगी हो वैद्यके पास भेजना चाहिये, उस विषयमे कहा है- सकते है। तथा रोगी गौ आदि पशुओका रोगयुक्त दध उत एनां ब्रह्मणे दद्यान नथा स्योना शिवा पीकर मनुष्य भी रोगी हो सकते है। इस मनय परपराको स्यात् ॥ (मं.२) दर करनेक लिये पशुओंका उत्तम स्वास्थ्य रसनेका प्रबंध 'उस गेगी गौको माहाणके पास भेज देना चाहिये, करना चाहिये। जिससे वह शुभ और कल्याण करनेवारी बने' अर्थात् उस पशुरोगकी उत्पत्ति रोगी गौको ऐसे सुयोग्य ज्ञानी वैद्यके पास भेजना चाहिये पशुओंम रोग उत्पन्न होनेक तीन कारण इस सूक्तमें दिये कि जिसके पास कुछ दिन रहनेसे यह नीरोग स्वस्य और है, वे कारण दलिये- शुभ बन जाये । यहाँ 'ब्रह्मन् ' शब्द है; यह मायुवेद शास्त्र, धार भायर्वणी चिकिसा जाननेवाला ज्ञानी वैद्य है। ब्राह्मण १ अप+ऋतुः= ऋतुक विल्ट आचरण करनेसे रोग ही वैद्यक्रिया करते हैं, इस विषयमे बेटम अन्यत्र कहा है- उत्पन्न होते है । पशुओके लिये जिस समयमे नो सानेपीने यत्रीपधीः समग्मत राजानः समिताविव । आदिका प्रबंध होना चाहिये वद्द यथायोग्य होना ही चाहिये । उसमें अयोग्य रीतिसे परिवर्तन होनेसे पशु रोगी विप्रः स उच्यते भिपग्रक्षोहामीवचातनः । होते हैं। पूर्ण समयके पूर्व वच्चा उत्पन्न होनेने भी गा रोगी (ऋ. १०१९७१६;वा. य. १२२८०) होती है। 'जिस विनके पास बहुत भोपधियां होती है उस २यमिनी विजायते - जुटवेवच्चेको टत्पन्न करना । विप्रको वैद्य कहा जाता है, वही रोगके कृमियोंका नाश करता है और वही रोग भी दूर करता है । इससे प्रमूतिकी रीतिमें विगाद होकर विविध रोग उत्पन्न होते है। इस प्रकारके जो वैद्य होते है उनके सुपुर्द वैसी रोगी ३ व्याद् व्यद्वरी भूत्वा= मांस सानेवाली विशेष गायोग्य उपचार द्वारा आरोग्यको प्राप्त हो सके। जहां इस गोको तत्काल करना चाहिये। जिनके पास रहती हुई वह भक्षक होकर रोगी होती ह । गौ जिस समय प्रसूत होती है गोभना चाहिये वह स्थान कैसा हो, इसका वर्णन भी उसक गर्मस्थानसे कुछ भाग गिरते हैं। कदाचित् देखिये- वह गो उक्त भागोको सा जाती है और रोगी होती है। अथवा योनी मादि स्थानमें जुटब बच्चे के टत्पन्न होने के कारण यत्रा सुहार्दः सुकृतो मदन्ति विहाय रोग तन्त्रः स्वायाः। कुछ प्रणादि होते है और वहां प्रसूतिम्यानका विष लगनेसे (मं. ५) गौ गंगी होती है। इस प्रकार इस संबंधसे गीक रोगी यत्रा सुहार्दी सुकृतां अग्निहोत्रहुतां यत्र लोकः । (मं, ६) होनकी गंभावना बहुत है। इसलिये गौक स्वामीको टचिन तं लोक यमिन्यभि संवभूव ॥ (मं. ५-६) है कि वह एग समयमें योग्य सावधानता रसे और किसी 'जहां प्रतिदिन अग्निहोत्रमें हवन करनेवाले लोग रहते हैं, प्रकार भी सावधानी होने न दे। और जहां उत्तम हृदयवाले और श्रेष्ठ कर्मकर्ता लोग रहते ये सब रोग बढे घातक होते हैं और यदि एक पशुको है, और जहां गरीरका रोग दूर होकर मन आनन्द प्रसन्न यह रोग लग जाए तो टमकं ससर्गमे रहनेवाले अन्यान्य होता है, उस स्थानपर उस गीको भेजना चाहिये, नहा पशुनाफा भी नाग टक्क रोगोंके कारण हो सकता है । इस रहनेस सब प्रकारसे कल्याण होगा।' लिय जिपक वरमे बहुत पशु है उसको उचित है कि वह रूणालय के सब लोग अग्निहोत्रमे प्रतिदिन हवन करने ऐसी अवस्था नाम बढी सावधानता रसे और भपने पशुओंके पाले हो, क्योंकि सणालयमे विविध प्रकारके रोगी जाते है स्वास्थ्यरक्षाका उखम प्रबंध करे । और उनके संस्पर्गले विविध रोगोंके फैकनेकी संभावना होती है, , बाद केश-प्रतिमन्धक उपाय (२२९) इस कारण वायु शुद्धिके लिये प्रतिदिन हवन होना योग्य है, स्वायाः तन्वः रोग विहाय । (मं. ५) इस प्रातः सायं किये अग्निहोत्रके हवनसे वायु निदोष होगी अपने गरीरसे रोग दूर करके' पूर्ण नीरोग होगा, इसमे और रोगबीज नष्ट होगे, और ऐसे वायुसे रोगी भी शीघ्र कोई संदेह नहीं । इसीलिये कहा है कि ऐसे सुविज्ञ आचार- नीरोग हो सकता है । यह रुग्णालयकी वायुशुद्धिक विषयमे सपन्न ब्राह्मण वैद्यके पास उस प्रकारके रोगी गौको सत्वर कहा है । इसके अतिरिक्त रुग्णालयके कर्मचारी प्रतिदिन भेजना चाहिये । वहा जाकर वह गौ नीरोग वने और वहासे नियमपूर्वक हवन करनेवाले हो, जिससे उस स्थानकी भी वापस आकर 'घरके मनुष्यों, गौओ, घोडो और घरकी सय शुद्धता होगी और वे भी स्वस्थ रह सकेंगे। भूमिको पवित्र बनावे । (म ३)' नीरोग गौका मूत्र, साथ ही साथ रुग्णालयके कर्मचारी (सु-कृतः) उत्तम गोवर, तथा गोरस अत्यंत पवित्र होता है, परंतु रोगी गौके शुभ कर्म करनेवाले पवित्र मान्मा हो । इनकी पवित्रताले ये सब पदार्थ भयंत अनिष्ट होते है। इसलिये उक्त आश्र- ही रोगीका आधा रोग दूर हो सकता है । जो वैद्य पवित्र ममें पहुंचकर, बहा रहकर, पूर्ण नीरोगताको प्राप्त होकर जय उदयवाला और शुभ कर्म करनेवाला होगा, उसका औषध यह गो वापस भावेगी, तब वह मंगलकारिणी वनेगी, ऐसा भी अधिक प्रभावशाली होगा, क्योकि औषयके साथ उसके जो तृतीय मत्रमे कहा है, वह सर्वथा योग्य है। ‘गौके दिलके शुभविचार भी बढे सहायक होगे। अंदर पोपक पदार्थ और अमृतरस होते है। यह गौ अनंत ऐसे सदाचारी सद्भावनावाले धार्मिक वैद्यके पास जो भी प्रकारसे लाभकारी होती है, (मं. ४)' इसलिये उसके रोगी जाय, वह उस भाश्रमके पवित्र वायुमंडलसे- आरोग्यके लिये दक्षतासे योग्य प्रबंध करना उचित है - ছনি ভঞ্চা कां. ३, सू. ९ (ऋषि:- वामदेव । देवता:- द्यावापृथिवी, देवा।) कफिस्स विशफस्य द्यौः पिता पृथिवी माता । याभिचक्र देवास्तथाप॑ कृणुता पुनः ॥ १।। अश्रेष्माणो अधारयन्तथा तन्मनुना कृतम् । कृणोमि बधि विष्कन्धं मुष्काब) गर्वामिव ॥२॥ अर्थ- (कर्श+फस्य-कृशस्य) कृश अथवा निर्वलकी उसी प्रकार (विश+फस्य) प्रवलको भी (माता पृथिवी ) माता पृथ्वी है और उनका (पिता द्यौः) पिता धुलोक है । हे (देवाः ) देवो । तुमने पहले (यथा अभिचक्र ) जैसा पराक्रम किया (तथा पुनः अपकृणुत) उसी प्रकार फिर पराक्रम करके शत्रुओका प्रतिकार करो ॥५॥ जैसे ( अ-श्रेष्माणः अधारयन् ) न थकनेवाले ही किसीका धारण करते है (तथा तत् मनुना कृतम् ) उसी प्रकार वह कार्य मनन शीलने भी किया है । (मुष्कावर्हः गवां इव ) जैसे अण्डकोश तोडनेवाला मनुष्य बैलोको निर्वल कर देता है उसी प्रकार मैं (वि-स्कन्धं वधि कृणोमि ) रोगादि विघ्नको निर्बल करता हूं ॥ २ ॥ भावार्थ- बलवान् और निर्दल इन दोनोके माता पिता भूमि और धुलोक हैं। अर्थात् ये दोनो प्रकारके लोग आप- समें भाई हैं । देवता लोग पराक्रम करके शत्रुका पराभव करते हैं, शत्रुको हटा देते है और निर्बलोंका संरक्षण करते हैं ॥१॥ न थकते हुए परिश्रम करनेवाले ही विशेष कार्य करनेमें समर्थ होते है । मननशील मनुष्य भी वैसा ही पुरुषार्थ करते । मैं भी उसी प्रकार शत्रुको तथा विनोको निर्वल करता हूं, जिस प्रकार अण्डकोश तोडनेवाले वैलका अण्डकोष तोडकर उसको निवार्य कर देते है॥२॥ - (२३०) अथर्ववेदका सुबोध अनुवाद दीर्घजीवन और आरोग्य' पिशङ्गे सूत्रे खुर्गलं तदा बनन्ति वेधसः । श्रवस्युं शुष्म कावचं नधिं कृण्वन्तु बन्धुरः ॥३॥ येना श्रवस्यवश्वरथ देवा इवामुरमायया । शुनो कपिरिव दुषणो बन्धुरा काव्यस्य च ॥४॥ दुष्टयै हि त्यो भत्स्यामि दृपयिष्यामि काव्यम् । उदाशमा रथी इब शपथभिः सरिप्पथ ॥५॥ एकशत विष्कन्धानि विष्टिता पृथिवीमर्नु । तेषां त्यामग्र उजमणि विष्कन्धदर्पणम् ॥६॥ अर्थ- (वेधसः) ज्ञानी लोग (पिग सुत्रे ) र रंगवाले मूत्रमे ( तत् सृगले आवघ्नन्ति ) दम मणिको बांधते है । (बंधुरः ) बंधन करनेवाल (श्रवस्युं शुष्मं काव) प्रसिद्ध प्रपल गोपा रोगको (वधिं कृण्वन्तु ) निर्बल करें ॥ ३॥ हे (श्रवस्यः) यमस्या पुरषो । (येन ) जिससे ( अनुरमायया देवाः इव चरथ) जीवन दातासरी कुगरता- से युक्त देवोंके समान आचरण करते हो नथा (कपिः शुनां दृपणः इव ) बंदर जैसे कुत्तोको तुच्छ मानता है वैसे ( चन्धुरा काववस्य च ) बधन करनेवाले रोगका अयमा दु.सका प्रतिवध करो ॥ ४ ॥ (दुष्टय हि त्वा भत्स्यामि ) दुष्टताके हटाने के लिय मैं तुझे बांधंगा । और (कावचं दुपविग्यामि ) पिनको निर्मल बना दूंगा। और (आशवः रथाः इव ) शीघ्र चलानेवाले त्यो समान तुम (शपथेभिः उत् सारिप्यथ) शापों बंधनसे हो जामोगे ॥ ५॥ (एकशतं विष्कन्धानि) एक सौ एक दिन (पृथिवी अनु विष्टिता) पृथ्वीपर हैं। (तेषां अग्रे) उनके सामने (विष्कन्धदूपणं त्वां मणिं) फष्ट नाशक नुम मणिको (उत् जहरूः) ऊंचा उठाया है। सबसे बढकर माना है ॥६॥ दूर भावार्थ- भूरे रंगके सूत्रसे ज्ञानी लोग मणिको बांधते है जिससे प्रसिद्ध गोषक रोगको निर्य बना देते हैं ॥३॥ यशस्वी पुरुष जीवनके देवी मार्गसे जाते है और मृत्युको दूर करते है। वंदर वृक्षपर रहता हुमा कुत्तांको तुच्छ मानता है, इसी प्रकार रोग प्रतिबंधकी विद्या जाननेवाले रोगको दर करते हैं ॥ ४ ॥ दुष्ट स्थितिको दूर करने लिये योग्य प्रतिबन्ध करना चाहिये, उसी प्रकार रोगाटि विनोको निर्बल करना चाहिये । जसे वेगवाले रथसे मनुष्य पहुंचने स्थानपर भी पहुंच जाता है, उसी प्रकार उक्त मार्गसे मनुष्य दुष्ट भवरथासे मुक्त हो 'नाता है ॥७॥ पृथ्वीपर संकटो विघ्न और दुःख है। उनक प्रतिबंधक उपायोमे दुःस्वप्रतिबंधक मणि विशेष प्रभावशाली है जिसको धारण किया जाता है ।।६॥ . क्लेश--प्रतिवन्धक उपाय यह सूक्त समझनेमें बटा कठिन और अत्यत दुर्बोच है। कफस्य विशफस्य द्यौः पिता पृथिवी माता । इस मक्तके 'कर्शफ, विगफ, सृगल, कावव,' ये गब्द (म. १) अत्यंत दुर्वाध है और बहुत प्रयत्न करनेपर भी इन शब्दोका जगत में दो प्रकारके मनुष्य है, एक (कश+फ-कृश) समाधान कारक भर्य इस समयतक पता नही लगा। अशक्त वर हीन अथवा जगत्की स्पर्धा (क+शफ) बुरे सबके माता पिता खुरवाले अर्थात् जो अपना बचाव कर नहीं सकते, और दूसरे प्रथम मंत्रक प्रथमावमे एक महत्त्वपूर्ण बात कही है वह (विठा+फ) अपने आपका प्रवेश दूर दूर तक कर सकते सबके बंधुमावकी बात है। है और दूसरोंको पराजित करके भपना अधिकार दूसरोंपर लेश-प्रतिबन्धक उपाय (२३१) कि पाशवी शक्तिसे युक्त। - अमाते हैं। इसी शब्दका दूसरा अर्थ यह है कि (वि+शफ) 'जग्ने (अभिचन.) गत्रुपर हमला करना चाहिये पैसे विशेष खुरवाले अर्थात् जो पशु दूसरोंको लात मारनेम समर्थ ही (अपकृणुत) उनको दूर भी करना चाहिये ।' होते हैं। विशफ' के दोनों भोंसे समान भाव यह है करके शत्रुका पराभव करना चाहिए और उनको अपने स्थान परे भी हटाना चाहिये । इतना करके अशक्तोका रक्षण विश्ववन्धुत्व करना चाहिये। जगत्में ये दो प्रकारके रोग है एक (वि+शफ) पागवी इस सबके लिये, सब लोगोंका वधुत्त्व व परमात्माको शक्तिसे युक्त और दूसरे (कर्शफ) पागवी शनिसे हीन । सबका माता पिता मानना, इन दो बातोको आवश्यकता है। सदा ही ऐसा देखा जाता है कि पागवी गक्तिले बली बने परिथमसे सिद्धि हुए लोग निवल लोगोको दवाते रहते हैं। इस कारण सामा- परिश्रम करने के बिना कोई भी सिद्धि प्राप्त नहीं होती जिक, राजकीय और धार्मिक विषमता बढ़ जाती है और है ।जो भी सिद्धि होती है वह प्रयत्नसे ही साध्य होती है। जो उसी प्रमाणसे जनता के क्लेश बढते जाते हैं । इन क्लेगोंक भी विजयी लोग हुए है वे कभी भी थकते नहीं थे। वे निवारणका एक मात्र उपाय यह है कि सब लोग परस्पर परिश्रम करनेमे डरते नहीं थे, इसीलिये उनमे धारकशक्ति भाई है और एक परम पिता नौर एक परम माताको संतान उत्पन्न हुई और वे जातियो, समाजो और राष्ट्रोंका धारण इ, ' इस उच्च भावको जाग्रत करना। यदि निल भोर कर सके। इसीलिये मंत्रमे कहा है- सबल दोनों मानेगे कि 'हम सरका परम पिता और परम अश्रेष्माणो अधारयन् माता एक ही है, इसलिये हम सब मनुष्य आपसमे भाई तथा तन्मनुना कृतम् । (मं २) भाई हैं ' तो फिर एक दूसरेसे झगढा करनेका कारण ही 'जो परिश्रम करनेसे नहीं थकते वे ही धारण करते है। नहीं रहेगा। क्योंकि जो झगडा होता है वह परकीयताके मननीलने भी वैसा ही किया था।' परिश्रम करनेके बिना भावसे होता है, वह परकीय भाव इस प्रकार हट जाएगा तो धारणशक्ति नहीं पा सकती। और जो मननशील लोग सगढ़ा ही कहां रहेगा ? सामाजिक, राजकीय और धार्मिक है वे भी अपनी मननशक्तिसे इसी परिणाम तक पहुंचे है। मगडे हटानेका पहला उपाय वेदने यह बताया है। प्रयत्नगीलता ही मनुष्यमात्रका उद्धार करनेवाली है। मातृभूमिको अपनी माता मानना और सूर्य, धुलोक इसलिये हरएक मनुष्यको प्रयत्नशीलताका महत्त्व जानकर अथवा प्रकाशमय देवको अपना पिता समझना, झगडा पुरुषार्थ प्रयत्नसे अपना उद्धार करना चाहिये और अपने मिटानेके लिये यह उत्तम उपाय है। मातृभूमिकी भक्ति राष्ट्रका भी अभ्युदय करना चाहिये । यदि जनताके मनमे जाग्रत हो जाए तो उन सबकी एकता परिश्रमी पुरुष अपने प्रयत्नसे सब विघ्न दूर कर सकता होने में विलंब नहीं रगेगा। मातृभूमिकी भक्ति ही ऐसी एक है, उसके लिये सब ही अवस्थाएं प्रयत्न साध्य होती है, वस्तु है कि जो राष्ट्रीय एकताको विकसित कर देती है और उसके लिये अशक्य और अप्राप्य ऐसा कोई स्थान नहीं होता सबमें अद्भुत सामर्थ्य उत्पन्न कर देती है । मातृभूमिकी है वह निश्चय पूर्वक कहता है कि- भक्तिमें विशेषतः स्वदेशप्रेम ही आता है परन्तु भूमिमाताका कृणोमि वधि विष्कन्धं मुष्कावों गवामिव । विस्तृत अर्थ लेनेपर विश्वबंधुत्वकी कल्पना भी माती है । (मं २) पराक्रम 'मै निश्चयसे विनको उसीप्रकार निर्बल करता हूं जिस मातृभूमिका हित करनेका उद्देश्य अपने सन्मुख रखकर, प्रकार अण्डकोशको तोडनेवाले लोग बैलोको निर्वीर्य करते उस संबंधसे उत्पन्न होनेवाले अपने कर्तव्य करनेके लिये है।' पुरुषार्थ प्रयत्नसे सब विघ्न, सब प्रतिबध, सब और उस उच्च कार्यके लिये आवश्यक त्याग करनेके लिये आधिव्याधियोके कष्ट दूर हो सकते हैं। पुरुषार्थ प्रयत्नके मनुष्योको तैय्यार रहना चाहिये । जिस प्रकार देवासुर युद्धमें सन्मुख ये विघ्न ठहर ही नहीं सकते । देव मसुरोंको हटाने कार्यमे बडा पराक्रम करते है, असुरो- यहा बैलोके अण्डकोश तोडकर उनको प्रजननके कार्यके लिये असमर्थ वनानेकी विद्या बताई है। खेतीके लिये इसी पर आक्रमण करते हुए उनको हटा देते हैं, उमी प्रकार प्रकारके बैलोका उपयोग होता है। शत्रुओंको हटाने के कार्यमें बडा पुरुषार्थ करना चाहिये । शत्रुका पराभव करना और उनको दूर करना ये दो बात असुर-माया इस पुरुषार्थमें मुरय हैं- असुरमाया' का विषय चतुर्थ मंत्रमें आया है। माया यथाऽभिचक्र देवास्तथाऽप कृणुता पुनः । (म १) शब्दका भर्थ · कौशल्य, हुनर, कला, प्रवीणवाका कर्म' - - -- (२३२) अथर्ववेद सुवोध अनुवाद दीर्घजीवन और आरोग्य' - है । असुर' शब्दका अर्थ ' ( अ-लुर) दैत्य अथवा (अ-नुर) दैत्य अथवा वे कुत्तोंको तुच्छ समनने है क्योंकि ये कोंकी अपेक्षा बहुत (असु-र) जीवनकी विद्या जाननेवाले और उस विद्याका ऊचे स्थानपर रहते है. अतः कुत्ते टन अंरीका कुछ विगार प्रकाश करनेवाले ' है। इसलिये 'असुर-माया' का नही सस्त । इसी प्रकार जिन स्थानों में निम्न होने है उन सर्थ 'असुरोंके पासका कलाफौगल, हुनर अथवा जीवनके म्मानोंको जोडका उनले उचे स्थाना में रहने को पिन कष्ट साधन प्राप्त करनेकी चिया' है। यह असुरमाया अपनी नहीं दे सकते । जैसे बंदर वृक्षपर रहने के कारण कुत्तों कष्टोसे अपनी ढंगकी देवोके पास भी रहती है और दैत्यों के पास बच रहते हैं, इसी प्रकार हरएक विनमे मनुष्य अपने आपको भी होती है। देव सम्पूर्ण प्रकारकी यह विद्या प्राप्त करते है बचाये । विप्नका जो म्यान हो उमस अपना म्यान कचा और अपनी उन्नति सिद्ध करते है और श्रेष्टव प्राप्त करते करनेसे मनुन्य उनमे सदा दूर रह सस्ता है। इसी विय- है, इस विषयमें कहा है- यक सूचक निम्न लिखित मंत्र है- असुरमायया देवा इव श्रवस्यवः चरथ । श्रवस्युं शुष्मं कावव वधि कृण्वन्तु बन्धुरः ।। (म. ४) (मं. ३) इस जीवनकी विद्यासे जैसे देव चलते हैं, वैसे तुम भी काववस्य च बन्धूराः ।। (मं. ४) यशस्वी और प्रगसित होकर चलो। ' देव जैसे इस जीवन काववं दृपयिष्यामि ॥ (म.") विद्यास यशस्वी होते है वैसे ही तुम भी होला । यह चतुर्थ 'विनों का प्रतिबंध करनेवाले लोग प्रसिद्ध गायक विनको मंत्रका कयन मनुष्योको पुरुषार्थके मार्गपर चलाने के लिये निर्बल करे। विनका प्रतिबन्ध करें । मैं चित्रको परास्त ही है। जो मनुष्य इस मार्गसे चलेंगे, वे देवोंके समान पूज- करगा। नीय होगे और यगके भी भागी बनेंगे। ये सब विधान विनोंके प्रतिवन्ध करने के सूचक है । विना- सैकडों वित को परास्त करना अथवा विनोको दूर करना यह मनुप्यक इस पृथ्वीपर विघ्न तो सैकडो हैं, व्यक्ति, समाज, जाति ध्येय है और इसके उपाय इससे पूर्व दिये ही है । शारीरिक और राष्ट्रकी उन्नतिमें सैकड़ों किस्मके विन्न होते है,। व्याधियोसे अपने आपका बचाव करने के लिये मणि धारण- पुरुषार्थके कार्यमें विघ्न तो अवश्य ही होंगे, परंतु उनसे दरना का उपाय इससे पूर्व कई सूतोमें कहा गया है । (देखो नहीं चाहिये । इन विनोके विषयमे कहा काण्ड २ सूक्त ४ ) इस प्रकारके मणि धारणसे रोगोका प्रति- एकशतं विष्कन्धानि विष्टिता पृथिवीमनु । बन्ध हो जाता है इसलिये मणिधारणकी सूचना देनेरे लिये (म. ६) सूक्तमे निम्न लिखित मंत्र भाग - सैकडो विन्न पृथ्वीपर हैं।' जब ये विन्न हैं और हरएक कार्यमें ये रहेंगे ही तब उनसे डरनेकी कोई आवश्यकता पिशंगे सूत्रे गखलं तदा वन्ति वेघसः । (मं. ६) नहीं है। उनका प्रतिबंध करते हुए आगे बढना चाहिये । दुपये हित्वा भत्स्यामि । (मं. ५) आगे पढनेके लिये अपना वेग वढाना चाहिये- तेपां त्वामय उज्जहरुमणिं विष्कन्ध-दूषणम् ॥ आशवो रथा इव शपथेभिः उत् सरिष्यथ । (मं. ६) (मं.") भूरे रंगवाल सूत्र में ज्ञानी लोग इस मणिको बांधते हैं 'गीव्रगामी रथ जैसे गीत्र आगे बढते है उसी प्रकार दुरवस्था हटानेके लिये तुझे बांधूंगा। मणिको विघ्नोंका निर्वल पुरुषार्थ प्रयत्न करनेसे तुम भी विनोंको पीछे डालकर आगे करनेवाला सबसे मुख्य उपाय मानकर उपर उठाते और बढ जाओ।' अपना वेग वढानेसे विन्न पीछे हटते हैं, परंतु धारण करते है ॥' जो अपना वेग कम करते हैं, वे विघ्नोसे ग्रस्त होते है। इन मंत्र भागोले स्पष्ट हो जाता है कि व्यक्तिके शारीरिक इसलिये अपनी पुरुषार्थशक्ति बढानेसे मनुष्य विघ्नोको रोगरूपी माधिव्याधियोको हटानेके लिए यह मणिधारण एक परास्त करके विजयका मार्ग सुधार सकते हैं। इस विषयके उत्तम उपाय है। सामाजिक और राष्ट्रीय विनोंको दूर करनेके उदाहरण देखिये- लिये विश्वबंधुत्वको कल्पनामा फैलाव करनेका उपाय प्रमुख शुनां दृपणः कपिः इव । (म. ४) स्थान रसता है । तथा अन्यान्य संपूर्ण विनोको हटाने के लिये 'कुत्तोंका तिरस्कार करनेवाला बंदर जैसे होता है।' परिश्रम करने अर्थात् पुरुषार्थ करनेकी शक्ति मनुष्य में बदर वृक्षपर रहते हैं इसलिये वे कृत्तोकी पर्वाह नहीं करते । पर्याप्त है। है - - मारोग्य-सूक्त (२३३) मारोग्य सूक्त कां. २, सू. ३ (अपि:- भंगिराः । देवता- भैषज्यं, भायुः, भन्वतरिः।) अदो यवधावत्यवत्कमधि पर्वतात् । तत्ते कृणोमि भेषजं सुभेषजं यथाससि आढुङ्गा कुविदुगा शतं या भैपजानि ते । तेषाममि त्वमुत्तममनास्तावमरौ गणम् नीचैः खनन्त्यसुरा अरुस्राणमिदं महत् । तदास्रावस्य॑ भेषजं तदु रोगमनीनशव उपजीका उद्भरन्ति समुद्रादवि भेषजम् । तदोस्रावस्य॑ भेजं तदु रोगमशीशमत् अरुस्राणमिदं महत्पृथिव्या अध्यु तम् । तदास्रावस्य॑ भेषजं तदु रोगमनीनशत् ॥१॥ ॥ २ ॥ ॥३॥ ॥४॥ ॥ ५॥ अर्थ- (अदः यत्) यह जो (अवत् कं) रक्षक है और जो (पर्वतात् अधि अवधावति) पर्वतपरसे नीचे की ओर दौडता है (तत् ते) वह तेरी ऐसी (भेप कृणोमि) भौषधि बनाता हूँ, (यथा सुभेषजं अससि ) जिससे त् उत्तम मौषधि कहलाए ॥ १ ॥ (अंग अंग) प्रिय ' (आत् कुवित् ) अय यहुत प्रकारसे (या ते)जो तुझसे उत्पन्न होनेवाली (शतं भिष- जानि) सैंकडों औषधिया है । (तेषां) उनमेसे (त्वं) (अनाना) घावको हटानेवाली और (अ-रोगणं) रोगको दूर करनेवाली (उत्तम असि) उत्तम औषध है ॥२॥ (असु-राः) प्राणोको बचानेवाले वैद्य (इदं महत् अरुस्राणं) इस पदे व्रणको पकाकर भर देनेवाली भौष- धको (नीचैः खनन्ति ) नीचेसे खोदते है । (तत् आस्त्रावस्य भेषजं) वह घावकी भौषध है, (तत् उ रोगं अनी- नशत्) वह रोगका नाश करती है ॥३॥ (उपजीकाः) जलमें काम करनेवाले (समुद्रात् आधि ) समुद्रसे (भेपजं उद्भरन्ति) भौषधि ऊपर निकालकर लाते हैं, (तत् आस्रावस्य भेषजं) वह घावकी औषधि है, (तत् रोग अशीशमत्) वह रोगका शमन करती है॥४॥ (इदं अरुत्राणं) यह फोडेको पकाकर भरनेवाली (महत्) बढी औषधि (पृथिव्याः अधि उद्धृत) भूमिके ऊपरसे लाई गई है । (तत् आम्नावस्य भेषजं) वह घावकी औषध है (तत् ऊ) वह (रोगं अनीनशत्) रोगका नाश करती है ॥५॥ । भावार्थ- एक औषध पर्वतसे नीचे लाई जाती है, उससे सर्वोत्तम औषध बनती है ॥ १ ॥ उससे अनेकों औषधियां बनाई जाती है, परन्तु घावको हटाने अर्थात् रक्तस्रावको ठीक करनेके काममे वह भौषधि बहुत ही उपयोगी है ॥२॥ प्राणको बचानेवाले वैद्यलोग इस भौषधको खोद खोद कर लाते हैं, उससे घावको ठीक करनेकी औषध बनाते है, जिससे घाव ठीक हो जाता है ॥३॥ जलमे काम करनेवाले भी समुद्रसे एक औषधी ऊपर लाते हैं, वह भी घावको ठीक कर देती और रोगको शान्त करती है॥४॥ यह पृथ्वीपरसे लाई गई औषध भी फोडेको ठीक करती है और घावको भर देती है और रोगका नाश करती है ॥५॥ ३० (मथर्व. मा. . हिन्दी) -- अथर्ववेदका सुवोध अनुवाद (२३४) 'दीर्घजीवन और आरोग्य' शं नौ भवन्त्वप ओषधयः : शिवाः । इन्द्रस्य वज्रो असं हन्तु रक्षस आराद्विसृष्टाः इषवः पतन्तु रक्षसाम् ॥६॥ अर्थ- (आपः) जल और (ओपधयः) औषधियां (नः) हमारे लिये (शिवाः शं भवन्तु) शुभ और शान्तिदायक हो । (इन्द्रस्य वज्रः) इन्द्रका शस्त्र (रक्षसःअपहन्तु) राक्षसोंका हनन करे । तथा (रक्षसां विसृष्टाः इपवः) राक्षसों द्वारा छोडे गए वाण हमसे (आरात् पतन्तु) दूर गिरें ॥ ६ ॥ भावार्थ जल और ओपधिया हमारे लिए आरोग्य देनेवाली हो । हमारे क्षत्रियोके गस्त्र शत्रुओको भगा देवें और हम पर फेंके गए शत्रुओके शस्त्र हस सबसे दूर गिरें ॥६॥ औषधि इस सूक्तका 'असु-र' शब्द 'प्राण रक्षक' वैद्यका वाचक है न कि राक्षसका। पर्वतके ऊपरसे, समुद्र के अंदरसे, तथा पृथ्वीके ऊपरसे अनेकानेक औषधिया लायी जाती है, और उनसे सैकडो रोगा- पर दवाइया बनायीं जाती है। इन औषधोसे मनुष्योके घाव, व्रण तथा अन्यान्य रोग दूर होकर उनको आरोग्य प्राप्त होता है। जल और औषधियोंसे इस प्रकार मारोग्य प्राप्त करके मनुष्योंका कल्याण हो सकता है । इस सूक्तम यदि किसी विशेष नौषधका वर्णन होगा तो वह हमारे ध्यानमें नहीं भाया है। शस्त्रोंका उपयोग क्षत्रियोके शस्त्र गोपर ही गिर अर्थात् आपसमे लडाई न हो, यह अंतिम मंत्रका उपदेश आपसमें एकता रखनेका महत्त्वपूर्ण उपदेश दे रहा है, वह ध्यानसे धरने योग्य है। इस सूक्तके पष्ट मंत्रमें 'हमारे शर पुरुषका शस्त्र शत्रुपर गिरे, परंतु शत्रुके शस्त्र हम तक न पहुंच पाये' ऐसा कहा है, इससे अनुमान होता है कि यह सूक्त विशेष कर उन रक्तस्राबोके दूरीकरण के लिये है कि जो रक्तस्राव युद्धमे शस्त्रोंके भावातसे होते हैं । युद्ध करनेके समय जो एक दूसरेसे संघर्ष होता है और उसमें चोट आदि लगने तथा शस्त्रोसे घाव होनेसे जो व्रण आदि होते है, उनसे जैसा रक्त स्राव होता है, उसी प्रकार सूजन होना और फोढोका उत्पन्न होना भी संभव है । इस प्रकारके कष्टोसे बचाने के उपाय बतानेके लिये यह सूक्त है । परंतु ऐसी पीडा दूर करनेके लिये कौनसा उपाय करना चाहिए अथवा किस युक्तिसे आरोग्य प्राप्त करना चाहिए इत्यादि बातोका पता इस सूक्तसे नहीं लगता है। इसलिये इस समय हम सूक्तका अधिक विचार करनेमें असमर्थ हैं। आरोग्य सूक्त कां. १, सू. ३ , (ऋपि.- अथर्वा । देवता- मन्त्रोक्ता नाना देवता।) विद्या शरस्य पितरं पर्जन्य शतवृष्ण्यम् । तेना ते तन्वेई शं करं पृथिव्यां ते निषेचनं बहिष्टै अस्तु वालित ॥१॥ विद्या शरम्यं पितरं मित्रं शुतण्यम् । तेना ते तन्वेई शं कर पृथिव्यां ते निषेचन बहिष्टे अस्तु बालित ॥२॥ अर्थ- (विमा) हमें पता है कि गरके पिता (शत-वृष्ण्यं) सैकडों बलोसे युक्त पर्जन्य, मित्र, वरुण, चंद्र, सूर्य (ये पांच ) है । (तेन) इन पांचोंके वीर्यसे (ते तन्वे) तेरे शरीरके लिये मैं (शं करं)भारोग्य नन्छ । (पृथिव्यां) पृथिवीके अन्दर (ते निषेचनं) तेरा सिंचन होवे भौर सब दोप (ते) तेरे गरीरसे (वाल् इति) नीम ही ( पहिः अस्तु) बाहर हो नावे ॥ १-५॥
आरोग्य-सूक्त (२३५) विद्या शरस्य पितरं वरुणं शतष्ण्यम् । तेना ते तन्वे शं कर पृथिव्यां ते निषेचन बहिष्टै अस्तु बालित विद्या अरस्य पितरं चन्द्रं गतवृष्ण्यम् । ना ते तन्वेई शं कर पृथिव्यां ते निषेचन बहिष्टै अस्तु चालित ॥४॥ विद्मा अरस्य पितरं सूर्य शतवृष्ण्या । तेना ते तन्वेई शं कर पृथिव्यां ते निषेचन बहिष्टं अस्तु बालित ॥५॥ मूत्रदोष-निवारण यदान्त्रेषु गीन्योर्यदृस्तावधि संश्रुतम् । एवा ते मूत्र मुच्यतां वृहि लिति सर्वकम् |॥६॥ प्र ते भिनमि मेहनं वत्र वेशन्त्या इव । एवा ते मूत्रै मुच्यता बहिर्वालिति सर्वकम् विपितं ते वस्तिबिलं समुद्रस्यौदधेरिव । एवा ते मूत्र मुच्यता बहिर्वालिति सर्वकम् यथेषुका पराफ्तदवसृष्टाधि धन्वनः । एवा ते मूत्र मुच्यतां वहिर्वालिति सर्वकम् ॥ ९॥ अर्थ- ( यत् ) जो (आन्त्रेपु ) भांतीमे ( गवीन्योः) मूत्र नाडियोंमे तथा जो (वस्तौ) मूत्राशयमे मूत्र (संश्रुतं) इकट्ठा हुआ है वह (ते मूत्रं ) तेरा मुत्र (सर्वक) सबका सब एकदम बाहर (मुच्यतां ) निकल जावे ॥६॥ (वेशन्त्याः) भीलके पानीक (वर्ष ) बंधको (इव ) जिस प्रकार खोल देते है तद्वत् तेरे (वेहन ) मूत्रद्वारको म भिननि) में खोल देता हूं इस प्रकार (ते मूत्र) तेरा मृत्र (सर्वकं) सबका सब एकदम बाहर (मुच्यतां) ते ॥८॥ निकल जावे ॥ ७ ॥ (समुद्रस्य) समुद्रके अथवा ( उदधेः) बड़े तालाबके जलके लिये मार्ग खुला करने के समान तेरा (वस्ति- विलं ) मूत्राशयका बिल मैंने ( विपितं) खोल दिया है वह (ते मूत्रं ) तेरा मूत्र (सर्व) सबका सब एकदम बाहर (मुच्यतां) निकल जावे ॥ ८॥ जिस प्रकार (धन्वनः अवसृष्टा ) धनुष्यसे छूटा हुआ (इपुका) बाण (परा अपतत् ) दूर जाता है (एवा) उस प्रकार (ते सर्वकं सूत्रं) तेरा सब मुत्र शीघ्र ( वहिः मुच्यतां ) बाहर निकल जावे ॥ ९ ॥ भावार्थ- तृणादिसे लेकर मनुष्यपर्यंत सृष्टिकी माता भूमि है और पिता पर्जन्य, मित्र, वरुण, चंद्र, सूर्य ये पांच है। इनमे अनंत बल है। उनके बलोका योग्य उपयोग करनेसे मनुष्यके शरीरमें आरोग्य स्थिर रह सकता है, मनुष्यका जीवन दी हो सकता है और उसके शरीरसे सब दोप बाहर हो जाते है ॥ १-५ ॥ तालाब आदिसे जिस प्रकार नहर निकालते है जिससे तालाबका पानी सुखपूर्वक बाहर जाता है उसी प्रकार मूत्रा- मृग मूअनाढियो द्वारा मूत्रंद्रियसे बाहर निकल जावे ॥ ६-९॥ गयसे (२३६) अथर्ववेदका सुबोध अनुवाद 'दीर्घजीवन और आरोग्य' . तृणसे लेकर - इस कारण आरोग्य आरोग्य-सूक्त आरोग्यका साधन विदुओके साथ भूमिपर भाता है। इसलिये वृष्टिजलका स्नान भारोग्यवर्धक है। पांच मंत्रोका मिलकर यह एक ही गणमंत्र है और इसमे मनुष्यादि प्राणियो तथा वृक्षवनस्पतियोके आरोग्यके मुख्य मित्र (प्राण ) वायुसे आरोग्य साधन दिये है। 'शर' शब्द वास वाचक होता हुमा प्राणायामसे योगसाधनमे भारोग्यरक्षणका जो उपाय वर्णन भी सामान्य अर्थसे यहां उपलक्षण है और किया है वह यहां अनुसंधेय है। दोनो नासिका-रन्ध्र-सूत्र- मनुष्यतक सृष्टिका आशय उसमें है । विशेष अर्थमे ' शर' नेतिसे, भस्त्रिकासे अथवा जलको नेतिसे स्वच्छ और मल- सज्ञक वनस्पतिका गुणधर्म बताया जाता है यह घात भी रहित रखनेसे प्राणवायु अंदर जाता और उत्तम पवित्रता स्पष्ट ही है। स्थापित करता है। खुली वायुमे सव कपड़े उतार कर रहनेसे इन मंत्रोमें 'पाच' पिता कहे है।'पिता' गब्द पाता भी होनेवाला वायुस्नान बढा आरोग्यवर्धक है। जो सदा अर्थात् रक्षा, संरक्षण करनेवाला इस अर्थमे यहा प्रयुक्त है। वस्त्ररहित रहते है उनको रोग कम होते है इसका यही कारण तृणादिसे लेकर मानव-सृष्टिपर्यंत सबकी सुरक्षा करनेका है। वस्त्रों के बढनेसे भी रोग बढे है इसका कारण इतना ही कार्य इनका ही है । ये पांचो सब सष्टिकी रक्षा कर ही रहे है कि वस्त्रोके कारण प्राणवायुका संबंध शरीरके साथ जैसा है। देखिये- होना चाहिये वैसा नहीं होता और न्यून १ पर्जन्य वृष्टिद्वारा जलसिंचन करके सयका रक्षण होता है। करता है। २ मित्र प्राणवायु है और इस वायुसे ही सब जीवित वरुण (जल) देवसे आरोग्य रहते हैं। वरुण मुख्यत समुद्रका देव है। समुद्रके खारे पानीके ३ वरुण लका देवता है और वह जल सबका जीवन ही स्नानसे संपूर्ण चर्मदोष दूर होते है, रुधिराभिसरण होता कहलाता है। है, पाचनशक्ति बढती है और अनेक प्रकारसे आरोग्य प्राप्त ४ चंद्र औषधियोका अधिराजा है भौर मौषधियाँ नाफर होता है । अन्य जल अर्थात् तालाब, कुंए, नदी आदिकोके ही मनुष्य पशुपक्षी जीवित रहते हैं। जलके स्नानसे, उनमें उत्तम प्रकारसे तैरनेसे भी कई दोष दूर ५ सूर्य सबका जीवनदाता प्रसिद्ध ही है । सूर्य न रहे तो हो जाते हैं। जलचिकित्साका यह विषय है वह पाठक यहाँ मय जीवन नष्ट ही हो जाएगा। अनुसंधान करके देखें यह बडा ही विस्तृत विषय है क्योकि इन पाचोकी विविध शक्तियां हमारे जीवन के लिये प्रायः सभी बीमारिया जलचिकित्सासे दूर हो सकती हैं। यक हो रही है, इसलिये ये पाचो हमारे संरक्षक है और संरक्षक होनेसे ही हमारे पितृस्थानीय है । इनसे भारोग्य चन्द्र (सोम) देवसे आरोग्य किस प्रकार प्राप्त किया जा सकता है ? यह प्रश्न बडा गहन चंद्र औषधियोका राजा है, इसका दूसरा नाम सोम है। और बढे अन्वेषणकी अपेक्षा रखता है। परंतु संक्षेपसे यहां सोमादि औषधियोसे आरोग्य प्राप्त करनेका साधन चरकादि इस विधिकी सूचना दी जाती है । थाचार्योंने अपने वैद्य ग्रंथोमे लिखा ही है। इसी साधनका पर्जन्यसे आरोग्य दूसरा नाम 'वैद्यक' है। पर्जन्यका शुद्ध जल जो स्वाती आदि मध्य नक्षत्रोसे प्राप्त सूर्यदेवसे आरोग्य किया जा सकता है वह बढा भारोग्यप्रद है। दिनके पूरे सूर्य पवित्रता करनेवाला है । सूर्यकिरणसे जीवनका तत्त्व रघनके समय यदि इसका पान किया जाय तो शरीरके सर्वत्र फैलता है। सूर्यकिरणोका स्नान नंगे गरीर होकर सपूर्ण दोष दूर हो जाते है और पूर्ण नीरोगता प्राप्त होती है। करनेसे भर्थात् धूपमे भपना गरीर तपानेसे भारोग्य प्राप्त वृष्टि जलक स्नानसे शरीरके शुष्क खुजली भादिका निवारण होता है। सूर्यकिरणोंसे चिकित्सा करनेका भी एक बटा होता है मतरिक्षमें शुद्ध प्राण विराजमान है वह दृष्टिके जल भारी शान है। सहा- आरोग्य-सूक्त (२३७) पश्चपाद पिता १) वृष्टि जल-पान-पूर्वक लंघन करनेसे मूत्रद्वारा गरीर दोष बाहर हो जाते है। ये पांच देव भनेक प्रकारसे मनुष्य, पशुपक्षी, वृक्ष, वन- स्पति आदिकोंका आरोग्य सिद्ध करते है । वृक्षवनस्पति और (२) शुद्ध प्राणके अदर जानेसे रक्तशुद्धि होती है भौर भारण्यक पशु उक्त पंचपाट पितरों अर्थात् पांचो देवोक उन्छ्वासहारा दोष दूर होते है। साय पांचों पिताओक साथ-पांचों रक्षकों के माय नित्य रहते (३) जलचिकि.साहारा हरएक भवयवके दोष दूर किये है, इसलिये सदा आरोग्य संपन्न होने है । नागरिक पशुपक्षी जा सकते है। मनुष्यक कृत्रिम- बनावटी जीवनसे संबंधित होनेके कारण (४) सोम आदिक औषधियोका औषधि नाम इसलिये रोगोसे अधिक ग्रस्त होते है । जंगली लोग प्राय सीदे सादे है, कि वे गरीरके (दोप-धी) दोषोको धोती हैं। रहनेक कारण मधिक नीरोग होते है। परंतु नागरिक लोग (५) सूर्यकिरण पसीना लाने तथा अन्यान्य रीतियोंसे कि जो सदा तंग मकानोमे रहते है, सदा तंग वस्रोंसे वेष्टित ठारीरक रोग वीज दूर कर देते है। होते हैं और जल वायु तथा सूर्य प्रकाश लादिकोसे अपने इस रीतिसे पाठक अनुभव करें कि ये पाच देव किस भापको दर रसते है, अर्थात् जो अपने पंचपितामोसे ही विमुख रहते हैं वे ही अधिकमे अधिक रोगी होते है और प्रकार शरीरका (शं करं) कल्याण करते है । मारोग्य देते ह, (निपेचनं)जीवन बढाते है और (वहिः) दोपोको प्रति दिन इस गाने पीडित नागरिक लोगोमें ही विविध बाहर निकाल देते है। रोग बढ रहे हैं और मस्वास्थ्यसे ये ही सदा दुखी होते हैं। शं' शब्द 'गांति' का सूचक है। गरीरमे । गांति, इसलिये वेद कहता है कि पर्जन्य, मित्र (प्राण ) वायु, जलदेव वरण, चंद्र, सूर्यदेव इन पांच देवोको अपना पिता समता, सुख ' भाटि स्थापन करना आरोग्यका भाव बता मर्थात् भपना संरक्षक जानो और- रहा है। ये देव शं' करनेवाले है, इसका तात्पर्य यही है कि, ये आरोग्यके बढानेवाले है। आरोग्य बढानेके कारण जीवन वढानेवाले अर्थात् दीर्घ जीवन देनेवाले है और सदा सर्वदा 'इन पांचों देवोंके विविध वलोंसे अपने शरीरका मारोग्य दोषोको गीत बाहर करनेवाले है । पाठक इस मंत्रके मननसे प्राप्त करो' अथवा ' मैं उक्त देवोंकी शक्तियोसे तेरे शरीरको अपने आरोग्यके मुख्य सिद्धान्तका ज्ञान स्पष्टतया प्राप्त कर मआरोग्य युक्त करूं।' भारोग्य इनसे ही प्राप्त होता है। सकते हैं। इस प्रकार आरोग्यके मुख्य साधनका सामान्यतया भारोग्यका मुख्य ज्ञान इस मंत्रमें स्पष्टतया भाया है । उपदेश करके मूत्रदोष निवारणका विशेष उपाय बताते हैं- पृथ्वीमें जीवन पृथ्वी में प्राणिमात्रका सामान्यतः और मनुष्यका उन्ध मूत्र खुली रीतिसे बाहर जानेसे शरीरके बहुत दोष दूर हो जीवन विशेषत. उक्त पाचो शक्तियोपर ही निर्भर है।मंत्रका जाते है । शरीरके सब विप मानो इस मूत्रमे इकट्ठे हुए होते 'निषेचन' गन्द ‘जीवनरूप जल' का सूचक है इस है और इस मुत्रके बाहर जानेसे विष भी उसके साथ बाहर लिये- निकल जाता है और भारोग्य प्राप्त होता है । इसीलिये किसी ते पृथिव्यां निपेचनम्। रोगीका मूत्र अंदर रुक जानेसे मूत्रका विष शरीरमे फैलता है इस मंत्रभागका आशय · तेरा पृथ्वीमे जीवन' पूर्वोक्त और रोगी शीव्रही मर जाता है । इस कारण आरोग्यके लिये पांचो देवतामोके साथ संबंधित है यह स्पष्ट है । जो शरीरका मूत्रका उत्सर्ग नियमपूर्वक होना अत्यंत आवश्यक है । यदि भारोग्य, शरीरका कल्याण करनेवाले है वेही जीवन अथवा वह मूत्र मूत्राशयमे रुक जाय तो मूत्र नलिकाको खोल कर दीर्व जीवन देनेवाले निश्रयस हैं । इनके द्वारा ही- मूत्रका मार्ग खुला करना भावश्यक है । इस कार्यके लिये ते वाल् इति वहिः अस्तु । गर या मुआ औषधिका प्रयोग बडा सहायक है । वैद्य लोग 'तेरे शरीरके दोष शीघ्र थाहर हो जाय।' पूर्वोक्त पांचो इसका उपयोग करे । इसपर दूसरा उपाय मूत्रद्वार खोलने- देवोंके योग्य संबंधसे शरीरके सब दोष शरीरसे बाहर हो का है इसके लिये लोहगलाका यस्तियनं (Catheter कैथेटर ) का प्रयोग करनेकी सूचना इन मंत्रोंकी उपमाओंसे तेना ते तन्वे शं करम् । मूत्र दोष निवारण जाते हैं। देखिये- (२३८) अथर्ववेदका सुबोध अनुवाद - 'दीर्घजीवन और आरोग्य' । । ' मिलती है । यह मूत्राशय यंत्र सोनेका, चादीका या लोहेका सूक्तके अंतिम चार मंत्रोमे मूत्राशयके दोपको दूर करनेका बनाया जाता है, यह वारीक नलिका आरंभसे गोल सी होती साधन बताया है। है भाजकल यह रवर आदि अन्यान्य पदायोंका भी बना इस सूक्तका 'गत वृष्ण्यं ' शब्द अत्यत महत्वपूर्ण है। बनाया मिलता है । इस समय इसको हरएक डास्टरके पास 'वृष्ण्यं ' शब्द बल, वीर्य, उत्साह, प्रजनन सामर्थ्य पाठक देख सकते है । यह मूत्र इंद्रियसे मूत्रागयमे योग्य आदिका वाचक है । ये सैकडों वल देनेवाले पूर्वोक्त पांचो रीतिसे ढाला जाता है । वहा पहुंचनेसे अंदर का हुआ मूत्र देव है यह यहां इस सूक्तसे स्पष्ट हुआ है । वीर्यवर्धक अन्य इसके अंदरकी नलीस वाहर हो जाता है। उपायोका अवलंबन न करके पाठक यदि इन पांचोंको ही योगी लोग इसकी सहायतासे वज्रोली आदि क्रियाएं योग्य रीतिसे वर्तते रहेंगे तो उनको अनुपम लाभ हो साध्य करते है मूत्रद्वारसे गुनगुना दूध अथवा जल आदि सकता है । मंदर मूत्राशयम खींचने और उसके द्वारा मूत्राशयको शुद्ध करनेका सामयं अपनेमे बढाते है । इसका अभ्यास वटानेस द्वितीय सूक्तम भूरि धायस्' शब्द है जिसका अर्थ है 'अनेक प्रकारसे धारण पोषण करनेवाला' यह भी पर्जन्यके न केवल मूत्रागयपर प्रभुत्व प्राप्त होता हे अपितु सपूर्ण वीर्य नाटियोक समेत संपूर्ण वीर्यागयपर भी प्रभुत्व प्राप्त होता देवोका विशेषण बनता है। साहचर्यके कारण इस सूक्तमें अनुवृत्तिसे आता है और पांचो है । उर्वरेता होनेकी सिद्धि इसीके योग्य अभ्याससे प्राप्त होती है। योगी लोग इस अभ्यासको अतिगुप्त रखते है और भूरि-धायस्' शब्दका 'शत-वृष्ण्यं' शब्दसे योग्य परीक्षाके पश्चात् ही यह अभ्यास शिष्यको सिखाया निकट संबंध है, मानो ये दोनो शब्द एक दूसरेके सहायक है। जाता है । पूर्णब्रह्मचर्य रहना इसी नभ्याससे साध्य होता है। विशेष प्रकारसे धारण पोषण करनेवाला ही सैकडो वीर्योको गृहस्थ धर्म पालन करते हुए भी पूर्ण ब्रह्मचर्य पालनकी संभा- देनेवाला हो सकता है। क्योकि पुष्टि के साथ ही वलका संबंध बना इस अभ्याससं हो सकती है। है। इस प्रकार पूर्व सूक्तसे इस सूक्तका संबंध देखिये । जिस प्रकार तालाव या कुवेक अंदरसे पहिला जल निकाल शरीरशास्त्रका ज्ञान नेसे उसकी स्वच्छता होती ह, और शुद्ध नया जल उसमे मानेस इसका अधिकसे अधिक लाभ हो सकता है इसी शरीरशास्त्रका ज्ञान अथर्वविद्याके ययावत् जाननेके लिये इस सूक्तके मननसे पाठकोने जान ही लिया होगा कि प्रकार मन्त्रालयका पूर्वोक्त प्रकार योगादि साधन द्वारा बल बढानेसे बडा ही आरोग्य प्राप्त हो सकता है । अत्यंत आवश्यक है। मूत्रागयसे गलाकाका प्रयोग विना वहाके अवयवोंके जाननेके नही हो सकता। शरीरशास्त्रको सामान्य मनुप्योके लिये मुख औपधि के प्रयोगसे अथवा न जाननेवाला मनुष्य योगसाधन ज्ञान भी यथायोग्य रीति मूत्राशयम मूत्रबस्ति यत्रके प्रयोगसे लाभ होता है । योगियो- ने प्राप्त नहीं कर सकता। को वज्रोली आदि मायासस मूत्रस्थानकी सव नस नाटियो- को बरसे युक्त और शुद्ध करनेसे आरोग्य प्राप्त होता है। यह 'अंगि-रस' का विषय है, अर्थात् अंगोके रसोंका ही यह अथर्वशास्त्र है। अर्थात् जिसने अंगोका ज्ञान नहीं पूर्वापर सम्बन्ध प्राप्त किया है, मंगोको अदरके जीवन रसोका जिसको कुछ द्वितीय सूकमे भारोग्य साधनका विषय प्रारभ किया था। भी ज्ञान नहीं है वह अथर्वविद्यासे बहुत लाभ प्राप्त नहीं उसी आरोग्य प्राप्तिका विस्तृत नियम इस तृतीय सूक्तके प्रथम पांच मत्रोके गणमें कहा है । सबके भारोग्यका मानो डाक्टर लोग जिस प्रकार मुदोंकी चीर फाड करके शरी- यह मूलमत्र ही है। हरएक अवस्थामे सुगमतया आरोग्य- रागोका यथावत् ज्ञान प्राप्त करते हैं उसी प्रकार योगियो माधनका उपाय इस गणमंत्रमे वर्णन किया है । इस तृतीय और अथर्वागिरसविद्याके पढनेवालोको करना उचित है। कर सकता। है 1
हस्तस्पर्शसे रोगनिवारण
(२३९)
हरन्तरवार
रोगनिवारण
कां. ४,
सू. १३
।। १ ।।
(ऋषिः- शताति । देवता- चन्द्रमा, विश्वेदेवाः।)
उत देवा अवहितं देवा उन्नयथा पुनः । उतागश्चक्रुर्षे देवा देवा जीवयथा पुनः
द्वाविमौ वातौ वात आ सिन्धोरा परावतः । दक्ष ते अन्य आवातु व्यन्यो वातु यद्रपः ॥ २ ॥
आ वांत वाहि भेषजं वि वांत वाहि यद्रपः । त्वं हि विश्वभेपज देवानां दूत
||३॥
त्राय॑न्तामिमं देवास्त्राय॑न्तां मरुतो गणाः । ब्रायन्तां विश्वा भृतानि यथायमरपा असत् ॥ ४ ॥
आ त्वांगमं शंतातिभिरथों अरिष्टतांतिभिः । दक्ष त उग्रमामारिप परा यक्ष्म सुवामि ते ॥ ५ ॥
इयंसे
-
अर्थ- हे (देवाः ) देवो ! हे देवो । जो (अवहितं) अवनत होता है उसको (पुनः उन्नयथ) तुम
फिर
उठाओ । हे देवो' हे देवो । (उत आग' चक्रुपं ) जो पाप करता है उसको भी (पुन जीवयथ) तुम फिर
जिलामो ॥१॥
(द्वौ इमौ वातौ ) यह दोनो वायु है, एक (आ सिन्धोः) सिन्धु देश तक जाता है और दूसरा (आ परावतः)
बाहर दूर स्थान तक जाता है । इनमेसे ( अन्यः ते दक्षं आवातु) एक तेरे लिये बल बढावे, (यत् रपः अन्य.
आवातु) जो दोप है उसको दूसरा बाहर निकाल देवे ॥२॥
हे (वात, भेषज आवाहि ) वायो । तू रोगनाशक रस ला, हे (वात, यत् रपः, विवाहि ) वायो ! जो दोष हो
उसे निकाल दे। (हि ) क्योकि, हे (विश्व-भेपज ) सर्व रोगके निवारक ! (त्वं देवानां दूतः ईयसे ) तू देवोका
दूत होकर चलता है ॥३॥
(देवाः इमं त्रायन्तां ) देव इसकी रक्षा करें, (मरुतां गणाः ब्रायन्तां) मरुतोके गण इसकी रक्षा करे ।
(विश्वा भूतानि त्रायन्तां ) सब भूत इसकी रक्षा कर ( यथा अयं अरपाः असत् ) जिससे यह नीरोग हो जाय ॥४॥
(शं-तातिभिः) शांतिदायकोंके साथ और (अथो अ-रिष्ट-तातिभिः) विनाशनिवारक गुणोंके साथ ( त्वा
आ आगमं ) तुझको मैं प्राप्त करता हूँ। (ते उग्रं दक्ष आ अभारिपं ) तेरे लिये उग्र बल मै लाया हूं। और (ते
यक्ष्मं परा सुवामि ) तेरे रोगको मै दूर करता हूं ॥ ५ ॥
भावार्थ-- देवता लोग गिरे हुए मनुष्यको भी फिर उठाते है और जो पाप करते है उसको भी फिर सुधारते हैं ॥१॥
प्राण वायु हैं, एक फॅकडोके अन्दर रुधिरतक जानेवाला प्राण है और दूसरा बाहर जानेवाला अपान है । पहला
अल बढाता है और दूसरा दोपोको हटाता है ॥ २ ॥
वायु रोगनाशक औपध लाता है और शरीरमे जो दोष होते है उन दोपोको हटाता है। यह सब रोगोका निवारण
करनेवाला है, मानो यह देवोका दूत है ॥ ३ ॥
सब देव, मरुदण, तथा सब भूत इस रोगीकी रक्षा करे और यह सत्वर नीरोग हो जावे ॥ ४॥
रोगी ! मैं तेरे पास कल्याण करनेवाले और विनाशको दूर करनेवाले सामथ्यों के साथ आया हूं। अब मैं तेरे अन्दर
बल भर देता हूं और तेरा रोग दूर करता हूं ॥ ५ ॥
(२४०) अथर्ववेदका सुवोध अनुवाद 'दीर्घजीयन और आरोग्य' अयं मे हस्तो भगवानयं मे भर्गवत्तः । अयं में विश्वभैपजोऽयं शिवाभिमर्शन: हस्ताभ्यां दर्शशाखास्यां जिह्वा वाचः पुरोगवी । अनामयिन्नुभ्यां हस्तास्यां ताभ्यो वामि मृशामसि ॥७॥ अर्थ-(वयं मे हस्तः भगवान् ) यह मेरा हाय भगवान् है (अयं मे भगवत्तरः) यह मेरा हाथ अधिक भाग्यगाली है । ( अयं मे विश्वभेपजः ) यह मेरा हाथ सय रोगोंका निवारक । (अयं शिव-अभिमर्शनः) यह मेरा हाय शुभ और मंगल बढानेवाला है॥६॥ (दगशाखाभ्यां हस्ताभ्यां) दगमाखोंवाले दोनों हाथोंसे (जिह्वा वाचः पुरोगवि) जिह्वा वाणीको भागे चलानेवाली करता हूं। (ताभ्यां अनामयित्नुभ्यां हस्ताभ्यां) उन आरोग्यदायक दोनों हाथोंसे (त्वा अभि- मृशामसि ) तुझको स्पर्श करते है ॥ ७ ॥ भावार्थ- यह मेरा हाथ सामयंगाली है और मेरा दूसरा हाथ तो अधिक ही प्रभावगाली है। मेरे इस एक हाथमें सत्र रोग दूर करनेवाली शक्तियां हैं, और इस दूसरे हाथमे मंगल करनेका धर्म है ॥ ६ ॥ दस अंगुलियोंके साथ इन अपने दोनों हाथोंसे तुझे स्पर्श करता हूं और मेरी जिद्धा वाणीसे प्रेरणाके शब्द बोलती है । इस प्रकार नीरोगता करनेवाले इन अपने दोनों हाथोंसे तुझे स्पर्य करता हूं ॥ ७ ॥ हस्तस्पर्शसे रोगनिवारण देवोंकी सहायता है । इस चिन्ताको दूर करनेके लिये इस मंत्र के उपदेशपर पहिला मंत्र देवोंकी सहायताका वर्णन करता है- 'गिरे विश्वास रखे कि पूर्वोक्त देवताओंकी सहायतासे नीरोगता हुए मनुष्यको मी देव फिर उठाते हैं, एक बार पाप करनेमें प्राप्त हो सकती है । देव हमारे चारो ओर हैं और वे मनुष्य मात्रकी तथा प्राणिमात्रकी सहायता करते हैं, उनकी सहा- नो मरनेकी अवस्थातक पंहुचा है उसको भी देव फिर जीवन देते है ।' (मं. १ ) यह प्रथम मंत्रका कथन मनु: है और रोगी भी नीरोग हो सकता है। यतासे हीन अवस्था में पहुंचा हुआ मनुष्य उन्नत हो सकता प्यको बहुत महारा देनेवाला है। मनुष्य किसी प्रलोभनमें फंस कर पाप करता है, पापस अस्वस्थ होता है, रोगी प्राण के दो देव होता है और क्षीण होनेतक अवस्था आती है, मृत्यु मानेकी गरीरमें प्राणके दो देव है जो यहां यढा महत्त्वपूर्ण भी संभावना हो जाती है। ऐसी अवस्थामें पंहुचा हुमा कार्य कर रहे हैं। प्राण और भपान ये दो देव हैं, एक प्राण मनुष्य देवताओंकी सहायतामे नीरोग हो सकता है और हृदयके अंदर तक जाता है और वहां अपनी प्राणशक्ति पुन दीर्घ आयुग्य प्राप्त कर सकता है। ऐसी अवस्थामें स्थापित करके मृत्युको हटाता है और दूसरा अपान है जो महायता देनेवाले देव कौनसे हैं ? मृत्तिका, जल, अग्नि, सूर्य- गरीरके मलोंको दूर करता हुआ विविध रोग बीजोंका नाश किरण, वायु, विद्युत, औषधि, अन्न, रस, वैद्य आदि देव- करता है । पहिला बल बढाता है और दूसरा दोषोको दूर ताए हैं कि जिनकी महायतासे मनुन्य रोगोंको दूर कर सकता करता है, इस रीतिसे ये दोनों देव इस गरीरकी रक्षा करते है और दीर्घ आयुष्य प्राप्त कर सकता है । ये सब देव मनुप्य है और आरोग्य बढाते हैं। यह द्वितीय मंत्रका कथन स्मरण के सहायक है। मनुष्य चिन्तामें न रहे, बीमार होनेपर रखने योग्य है । यहा प्राण अपान अथवा श्वास और उच्छ्- भन्यधिक चिंता न करे । क्योंकि चिन्ता एक भयंकर व्याधि याम ये भी दो देव है ऐसा माना जा सकता है।
इस्तस्पर्शसे रोगनिवारण (२४१) देवोंका दूत - इस्तस्वयंसे भारोग्य प्राप्त करनेका सामर्थ्य प्राप्त हो सकता है। तृतीय मयका कथन है कि प्राण रोगनिवारक शक्ति रोगीपर प्रयोग करनेके समय प्रयोग करनेवाला केले गब्द शरी लाता है और अपान सद दोपोंको दूर करता है, बोले यही बात इन तीन मंत्रोमे कही है- इस प्रकार यह वायु सय रोगोको दूर करनेवाला देवोंका 'हे रोगी मनुष्य ! मेरे अंदर शांति और समता स्थापित दत ही है । ' (मं. ३) अपने शरीरमें सब इंद्रियां देव- करनेका गुण है और दोपो तथा विनाशको दूर करनेका भी ताओं क अंश हैं, उनकी सेवा यह प्राण पूर्वोक्त प्रकार करता गुण है । इन गुणोंके साथ मै तेरे समीप नाया ह, अब तू है, जीवन शनिकी प्रत्येक अवयवमें स्थापना करना और विश्वास धारण कर कि, मैं अपने पहिले सामर्थ्यसे तेरे अंदर प्रत्येक स्थानके दोष दूर करना यह दो प्रकारको सेवा इस बल भर देता हू और अपने दूसरे गुणसे तेरा रोग समूल शरीररूपी देवमंदिर में प्राण करता है । इस विचारसे प्राणका दूर करता हू । इस रीतिले त् नि संदेह नीरोग और स्वस्थ महख जानना चाहिये। हो जायगा। (मं.५) चतुर्य मंत्रमें 'सय देव, सब मरुत् और सब भूतगण 'हे रोगी मनुष्य ! देख! यह मेरा हाथ बडा प्रभाव- इस रोगकी सहायता करें। इस विषयकी प्रार्थना है। माली है, और यह दूसरा हाथ तो उससे भी अधिक साम- इसका माशय पूर्वोक्त विचारसे स्वयं स्पष्ट होनेवाला है। र्थ्यवान् है । यह मेरा हाथ मानी संपूर्ण औषधियोकी शक्ति- योंसे भरपूर है और यह दूसरा हाथ तो नि संदेह मंगल हस्तस्पर्शसे आरोग्य करनेवाला है। अर्थात् इसके स्पर्शसे तू नि.संदेह नीरोग हस्तस्पर्णसे मारोग्य प्राप्त करनेकी विद्या मानकल 'मेस्मे- भौर बलवान् बनेगा। (म. ६) रिज्म' के नामसे प्रसिद्ध है। यह ‘मेस्मेरिज्म' शब्द 'मेस्मर' नामक यूरोपीयन के नामपर है, यह विद्या उसने 'हे रोगी मनुष्य ! ये दस मंगुलियों के साथ मेरे दोनो प्रथम यूरोपमें प्रकाशित की, इसलिये इस विद्याको उसका हाथ संपूर्ण रोग दूर करनेवाले है । इनसे तेरा अब मैं स्पर्श नाम उसका गौरव करने के लिये दिया गया । मेस्मर साहब- नीरोग हो जाएगा। तू अब स्वास्थ्यपूर्ण हुआ है, यह करता हूं, इस स्पर्शसे तेरा सब रोग दूर होगा और तू पूर्ण ने पचास वर्ष पूर्व यूगेपमें इस विद्याका प्रचार किया, परंतु नीरोग हो जाएगा। तू लव स्वास्थ्यपूर्ण हुआ है, यह मैं पाक इस सूक्तमें हस्तस्पर्शग्ने आरोग्य ' प्राप्त करनेको अपने सामर्थ्यवान् और प्रभावशाली शब्दोंसे भी तुझे कहता विद्या देख सकते हैं, अर्थात् यह विद्या वेदने कई शता- हूं। (म. ७)' ब्दियां पहले ही प्रकाशित की थी और ऋषिमुनि इसका मंत्रास निकलनेवाला आशय अधिक स्पष्ट करनेके लिये मन्याम करके रोगियोको भारोग्य देते थे । हस्तस्पर्शसे, कुछ विशेष शब्दोका भी उपयोग ऊपर लिखे भावार्थमें किया रष्टिक्षेपसे, शब्दके कथन मात्रसे, तथा इच्छामात्रसे मारोग्य है। इससे पाठकोको पता लग जायगा कि इसका प्रयोग देनेकी शक्ति योगाभ्याससे मनुष्य प्राप्त कर सकता है, इसके रोगीके ऊपर किस विधिसे किया जाता है। प्रयोग करने- अनुष्ठानकी विधियां वेदादि आर्यगाम्रोमे लिखी हैं । इस वालेको अपना मन एकाग्र करना चाहिये और अपनी मान- विद्याको पाठक इस सूक्त के मं. ५ से ७ तक देख सकते है। सिक शक्ति द्वारा रोगीके मनको प्रेरणा देनी चाहिये। रोगीके मनको एकाग्र करना और अपनी सव शक्ति मनसे संग्रहीत मनको प्रभावित करनेसे और अपने पवित्र शब्दों द्वारा करना तथा जिस कार्यमे चाहे उसका उपयोग करना यह रोगीके मनमें विश्वास उत्पन्न करनेसे ही यह बात सिद्ध होती निसको साध्य है वह मनुष्य इसमे लाभ उठा सकता है, है । जो किसीपर भी विश्वास नहीं रखते वे अविश्वासी लोग भर्थात् अनुष्ठानसे सिद्धि पहिले प्राप्त करनी चाहिये, पश्चात् इससे लाभ नहीं प्राप्त कर सकते । ३१ [मयर्व. मा. ४ हिन्दी] (२४२) अथर्ववेदका सुबोध अनुवाद 'दीर्घजीवन और आरोग्य' दुर्गतिरहे बचाना कां. ६, सू. ८४ (अपिः- भगः । देवता- निर्गति ।) यस्यास्त आसनि घोरे जुहोम्येषां वृद्धानामवसर्जनाय कम् । भूमिरिति त्वाभिप्रमन्यते जना निऋतिरिति त्वाहं परि वेद सर्वतः ॥१॥ भूत हविष्मती भवैप ते भागो यो अस्मासु । मुश्चेमानमूने सः स्वाहा ॥ २॥ एवो वयनितेऽनेहा त्वमयस्मयान्वि चता बन्धपाशान् । यमो मह्यं पुनरित्वां ददाति तस्मै यमाय नमौ अस्तु मृत्य ॥३॥ अयस्मये द्रुपदे वैधिष इहाभिहितो मृत्युभिर्ये सहस्रम् । यमेन त्वं पितृर्मिः संविदान उत्तमं नाकमधि रोहयेमम् ॥४॥ अर्थ- (यस्याः ते घोरे आलनि) जिस तेरे क्रूर मुखमे (एपां वद्वानां अवसर्जनाय) इन बद्ध हुओकी मुक्तताके लिये (कं जुहोमि) अपने सुसकी आहुति देता हूं। (त्वा जनाः भूमिः इति अभिप्रमन्वने) तुझको लोग अपनी जन्मभूमि मानते हैं और (अहं त्वा सर्वतः नितिः परिवेद ) मे तुझको सब प्रकार के कष्टोकी जड मानता हूं ॥१॥ हे (भृते) उत्पन्न हुई । (हविष्मती भव) हवन करनेवाली हो (एपः ते भागः यः अस्मासु) यह तेरा भाग है जो हममें है । (इमान् अमून एनसः मुञ्च) इनको पापसे छुडा (स्वाहा-सु आह) मैं सच कहता हूं ॥२॥ हे (निर्ऋते) दुर्गति । (अनेहा एव उ त्वं ) अविनाशिका होकर तू (एवो) निश्चयसे (अयस्मयान् बन्ध- पाशान् अस्मत् सु विवृत) लोहेके बने बन्धनोके पार्शीको खोल दे। (यमः मह्यं त्वा पुनः इत् ददाति) यम मेरे लिये तुझको पुनः पुन. देता है । (तस्मै यमाय मृत्यवे नमः अस्तु ) उस यम मृत्यु के लिये नमस्कार हो ॥ ३ ॥ जब तू (अयस्मये द्रुपदे वेधिपे ) लोहमय काप्टस्तंभमें किसीको बाध देती है तब वह (ये सहनं ) जो हजारो दुस है उन (मृत्युभिः इह अभिहितः) मृत्युओंसे यहां बांधा जाता है। (त्वं इमं उत्तमं नाकं अधिरोहय) तू इसको उत्तम स्वर्गमें चढा दे ॥ ४ ॥ भावार्थ- दुरवस्था बढी कठिन है, उसमें बंधे अतएव जो पराधीन हुए है, उनकी मुक्तता होनी चाहिये । इस कार्यके लिये अपने सुखको त्यागनेका प्रयत्न करना चाहिये । कई लोग तो इसी पराधीनताको अपना आश्रय मानते है मौर उसके निवारण के लिये प्रयत्नतक नहीं करते । परन्तु यह दुरवस्था सबसे भयानक है ॥ १ ॥ जो दुरवस्थाका भाग अपने अंदर हो, उसको प्रयत्नसे दूर हटाना चाहिये ॥२॥ दुर्गतिको दूर करना चाहिये । लोहेके सब पाग तोडने चाहिये । इन पाशोको तोढनेके लिये ही यम वारंवार जन्म देता है मन उसको नमन करना उचित है ॥३॥ जिसके गलेमें ये पाग अटके है, उनको हजारो दुख और सैंकडो आपत्तिया सताती है, इन रक्षकोके और नियामकके माथ समलन करके इस मनुष्यको बन्धमुक्त करते हुए, इसको सुखपूर्ण स्वर्गधाममे पहुंचाओ ॥ ४ ॥ पराधीनता सम्पूर्ण दु सोंका मूल है, अत हरएकको उचित है कि वह पराधीनतारूप दुर्गतिके पाग तोदे भौर स्वतंत्र- रूप स्वगंधाममें स्थान प्राप्त करे।
दुर्गतिले वचनेका उपाय
(२४३)
दर्गतिर इक्ने का उपाय
कां. २, सू. १०
(ऋषिः- भृगुः अंगिराः । देवता- निति., धावापृथिवी, नानादेवताः।)
क्षेत्रियाचा नित्या जामिशंसा हो मुश्चामि वरुणस्य पाशात् ।
अनागमं ब्रह्मणा त्वा कृणोमि शिवे तु द्यावापृथिवी उभे स्ताम्
॥१॥
शं ते अमिः सहाद्भिरस्तु शं सोमः सहोपंधीभिः ।
एवाई त्वां क्षेत्रियानित्या जामिशंसाद् द्रुहो #ञ्चामि वरुणस्य पाशात् ।
अनागसं ब्रह्मणा त्वा कृणोमि शिवे ते द्यावापृथिवी उभे स्तोम्
॥ २॥
शं ते वातो अन्तरिक्षे वयो धाच्छं ते भवन्तु प्रदिशश्चतस्रः ।
एवाहं त्वां क्षेत्रियान्नित्या जामिशंसाद् द्वहो मुञ्चामि वरुणस्य पाशात् ।
अनागसं ब्रह्मणा त्वा कृणोमि शिवे ते द्यावापृथिवी उभे स्ताम्
॥३॥
हुमा या देवी प्रदिशश्चतस्रो वातपत्नीरभि सूर्यों विचष्टें ।
पवाहं त्वां क्षेत्रियान्नित्या जामिशंसाद् द्रुहो मुंञ्चामि वरुणस्य पाशात् ।
अनागसं ब्रह्मणा वा कृणोमि शिवे ते द्यावापृथिवी उभे स्ताम्
॥४॥
अर्थ-(त्वा) तुझे (क्षेत्रियात् ) मानुवंगिक रोगसे (नित्याः) कष्टोसे (जामिशंसात् ) सम्बन्धियोके कारण
उत्पन्न होनेवाले कष्टोसे (द्रुहः) द्रोहसे और (वरुणस्य पाशात् मुंचामि) वरुणके पाशसे छुडाता हूँ। (त्वा ब्रह्मणा
अनागसं कृणोमि) तुझे ज्ञानके द्वारा निप्पाप करता हूँ (उभे द्यावापृथिवी ते शिवे स्ताम्) दोनो द्युलोक और
पृथ्वीलोक तेरे लिए कल्याणकारी हो ॥ १॥
(आद्भः सह अग्निः ते शं अस्तु) सब जलोके साथ अग्नि तेरे लिए कल्याणकारी हो, तथा (ओपधीभिः सह
सोमः शं) औषवियों के साथ सोम तेरे लिए सुखदायी हो (एव अहं त्वां क्षेत्रियात् ) इसी प्रकार मै तुझे आनुवंशिक
रोगसे (निर्ऋत्याः) कप्टोसे (जामिशंसात् ) सम्बन्धियोके कारण उत्पन्न होनेवाले कष्टोसे (द्रुहः) द्रोहसे (वरुणस्य
पाशात् ) और वरुण पाशसे (मुंचामि) छुडाता हूँ (त्वा ब्रह्मणा अनागसं कृणोमि) तुझे ज्ञानसे निर्दोष करता
हूँ, (उभे द्यावापृथिवी ते शिवे आस्ताम् ) दोनो द्युलोक और पृथ्वीलोक तेरे लिए कल्याणकारी हो ॥ २ ॥
(अन्तरिक्षे वातः) अन्तरिक्षमे संचार करनेवाला वायु (ते वयः शं धात्) तेरे लिए बलयुक्त कल्याण देवे ।
तथा (चतस्र. प्रदिशः ते शं भवन्तु) चारो दिशायें तेरे लिए कल्याणकारी हो (एव अह त्वां क्षेत्रियात्) इसी
प्रकार मै तुझे आनुवंशिक रोगसे (निर्ऋत्याः) कप्टोसे (जामिशंसात् ) सम्बन्धियोके कारण उत्पन्न होनेवाले कष्टोसे
(द्रुहः ) द्रोहसे ( वरुणस्य पाशात् ) और वरुणके पाशसे (मुंचामि ) छुडाता हूँ (त्वा ब्रह्मणा अनागसं कृणोमि)
तुझे ज्ञानसे निर्दोष करता हूं, (उभे द्यावापृथिवीते शिवे आस्ताम् ) दोनो धुलोक और पृथ्वीलोक तेरे लिए कल्याण-
कारी हों॥३॥
भावार्थ- आनुवंशिक रोग, आपत्ति, कष्ट फैलनेवाले रोग, दोहसे होनेवाले कष्ट, ईश्वरीय नियम तोटनेसे होनेवाले
बंधन भादि सब दुतियोसे निर्दोष होकर पवित्र बननेका एक मात्र उपाय ज्ञान ही है दूसरा उपाय नहीं है ॥ १ ॥
(२४४) अथर्ववेदका सुवोध अनुवाद दीर्घजीवन और आरोग्य तासु स्वान्तर्जरस्या दधामि प्र यक्ष्म एतु नितिः पराचैः । एवाहं त्वां क्षेत्रियान्नित्या जामिशंसाद् द्रुहो मुंञ्चामि वरुणस्य पाशात् । अनागसं ब्रह्मणा त्वा कृणोमि शिवे ते द्यावापृथिवी उभे स्ताम् अमुक्या यक्ष्माद् दुरितादयद्याद् द्रुहः पाशाद् ग्राह्याचोदमुक्थाः । एवाहं त्वां क्षेत्रियान्नित्या जामिशंसाद् द्रुहो मुञ्चामि वरुणस्य पाशात । अनागमं ब्रह्मणा त्वा कृणोमि शिवे ते द्यावापृथिवी उमे स्ताम् ॥ ६॥ अहा अतिमविदा स्योनमप्यभूभद्र सुकृतस्य॑ लोके । एवाहं त्वां क्षेत्रियान्नित्या जामिशंसाद् द्रुहो मुञ्चामि वरुणम्य पाशात् । अनागसं ब्रह्मणा त्वा कृणोमि शिवे ते द्यावापृथिवी उमे स्ताम् 1॥७॥ अर्थ (इमाः या देवीः चतनः प्रदिशः) ये दिव्य चारी उपदिशायें जो (वातपत्नीः) वायुकी रक्षा करती है, वे तथा (सूर्यः अभिविचष्टे) जो सूर्य चारों ओर देखता है, वह तेरे लिए कल्याणकारी हो। ( एव अहं त्वां क्षेत्रियात्) इसी प्रकार मैं तुझे मानुनिक रोगसे (नित्याः) कष्टोसे ( जामिगंसात् ) सम्बन्धियोके कारण उत्पन्न होनेवाले कष्टोस (द्रहः) द्रोहमे (वरुणस्य पाशात् ) और वरणके पादसे (मुंचामि) छुटाता हूँ (त्वा ब्रह्मणा अनागसं कृणोमि ) तुझे ज्ञानसे निषि करता हूँ, (उभे द्यावापृथिवी ते शिवे आस्ताम् ) दोनों द्युलोक और पृथ्वी- लोक तेरे लिए कल्याणकारी हो ॥ ४ ॥ (तासु त्या) उनमें तुझको (जरसि अन्तः आदधामि) मैं वृद्धावस्था अन्दर धारण करता हूँ। तेरे पाससे (यक्ष्मः नितिः पराचैः प्र एतु) क्षयरोग तथा सब कष्ट नीचे मुंह करके दूर चले जाएं (एब अहं त्वां क्षेत्रियात्) इसी प्रकार मैं तुझे आनुवंशिक रोगले (नित्याः) कप्टोसे (जामिशंसात्) सम्बन्धियों के कारण उत्पन्न होनेवाले कष्टोंसे (दुहः) द्रोहम्मे (वरुणस्य पाशात् ) और वरणके पाशसे (मुंचामि) छुटाना हूँ (त्वा ब्रह्मणा अनागसं कृणोमि) तुझे ज्ञानस निदोप करता हूँ, (उभे द्यावापृथिवी ते शिवे आस्ताम् ) दोनो युलोक और पृथ्वीलोक तेरे लिए कल्याण- कारी हो ॥५॥ (यक्ष्मात् ) क्षय रोगसे (दुरितात्) पापसे (अवद्यात् ) निन्दनीय कर्मसे (द्रुहः पाशात् ) द्रोहके बंधनसे (प्रायाः) नाउनेवाले मंदिरोगसे तू (अमुक्थाः) मुक्त हुआ है (उत् अमुक्थाः) तू बिल्कुल छूट चुका है । (एव अहं त्वां क्षेत्रियात्) इसी प्रकार मैं तुझे आनुवंशिक रोगसे (नित्याः) कष्टोसे (जामिशंसात्) सम्बन्धियोके कारण उत्पन्न होनेवाले कष्टोसे (द्रुहः) द्रोहले (वरुणस्य पाशात् ) और वरुणके पागसे (मुंचामि ) छुढाता हूँ (त्वा ब्रह्मणा अनागसं कृणोमि) तुझे ज्ञानसे निर्दोष करता हूँ, (उभे द्यावापृथिवी ते शिवे आस्ताम् ) दोनों द्युलोक और पृथ्वीलोक तेरे लिए कल्याणकारी हों॥६॥ (अ-राति अहाः) कृपणताको तूने छोड़ा है (स्योनं अविदः) सुसको तूने पाया है (अपि सुकृतस्य भद्रे लोक अभूः) और भी पुण्यकारक आनन्ददायी लोकम त् माया है । (एव अहं त्वां क्षेत्रियात्) इसी कारण मैं तुझे धानुवशिक रोगस (निर्भत्याः) कष्टोंसे (जामिशंसात् ) सम्बन्धियोंके कारण उत्पन्न होनेवाले कष्टोसे (द्रुहः ) द्रोहसे (वरुणस्य पागात्) और वरण के पाशसे (मुंचामि) छुढाता हूँ (त्वा ब्रह्मणा अनागसं कृणोमि) तुझे ज्ञानसे निदीप करता हूँ, (उभे द्यावापृथिवी ते शिवे आस्ताम् ) दोनों द्युलोक और पृथ्वीलोक तेरे लिए कल्याणकारी हो ॥७॥ भावार्थ- इम ज्ञानसे ही धुलोक अन्तरिक्षलोक और पृथ्वीलोकके अन्तर्गत सम्पूर्ण पदार्थ अर्थात् जल, अग्नि, भोपचिया, सोम, वायु सब दिशाओमें रहनेवाले मब पदार्थ सूर्य आदि सब देव हितकारक और सुसवर्धक होते है और भारोग्य पटाकर ध्याधियोंसे होनेवाळे कोंको दूर करते हैं ॥ २-४ ।।
दुर्गतिसे ययनका उपाय (२४५) सूर्यमृत तमसो ग्राह्या अधि देवा मुश्चन्तो असृजन्निरेणसः । एवाहं त्वां क्षेत्रियान्नित्या जामिभंसाद् द्रुहो मुश्चामि वरुणस्य॒ पाशात् । अनागसं ब्रह्मणा त्वा कृणोमि शिवे ते धावापृथिवी उभे स्ताम् ॥ ८॥ अर्थ-(देवाः) देवाने (तमलः ग्राद्याः ) अंधकारको पकडसे तया (एनसः अधि सुचन्तः) पापसे मुक्त करते हुए (ऋतं सूर्य निः असृजन्) सन्यस्वरूपी सूर्यको प्रकट किया है, (एब अहं त्वां क्षेत्रियात्) इसी प्रकार मैं तुझे आनुवंशिक रोगस (निर्जन्याः) कष्टोसे ( जामिगंसात्) सम्बन्धियोंके कारण उत्पन्न होनेवाले कष्टोसे (द्रुहः) दोदमे ( वरुणस्य पाशात् ) मोर वरणके पागले (मुंचामि ) छुडाता हूँ (त्या ब्रह्मणा अनागसं कृणोमि ) तुझे ज्ञानसे निर्दोष करता हूँ, (उभे द्यावापृथिवी ते शिवे आम्ताम् ) दोनो द्युलोक और पृथ्वीलोक तेरे लिए कल्याणकारी हो ॥ ८॥ भावार्थ- इसी ज्ञानसे मैं तुझे वृटावस्थाकी पूर्ण दीर्घ मायु तक ले जाना । इसी ज्ञानसे तरे पाससे सब रोग दूर भाग जाएंगे ॥५॥ अयगेग, पाप, निंद्यकर्म, द्रोहके पाग, संधिवात भादि आपत्तियोस तू इसी ज्ञानसे मुक्त हो सकता है और मै भी इसी ज्ञानसे नुझे रोगादियोले छुनता हूँ ॥ ६ ॥ इस ज्ञानसे ही तू अपने अन्दरकी कृपणता छोट और सुकृतसे प्राप्त होनेवाले सुखपूर्ण भद्रलोकको प्राप्त कर । मै भी इस शानसे ही तुझे भारत्तिसे बचाता हूँ॥ ७ ॥ जिस प्रकार सूर्य अन्धकारको हटाकर स्वयं अपनी शक्तिसे उदयको प्राप्त होता है। इसी रीतिसे चन्द्रादि अन्य देव भी घने अन्धकारकी पकडको दूर करते हुए स्वय अपनी गक्तिसे प्रकागते है । इसी तरह स्वयं अपने पुरुषार्थसे अपने पाश दूर करके ज्ञानकी सहायतासे अपना उद्धार करना चाहिए, क्योकि उन्नतिका यही एक मात्र मुख्य साधन है ॥ ८ ॥ दुर्गतिसे वचनेका उपाय दुर्गतिका स्वरूप अपकीर्ति । इन दोनोको मिलानेसे 'जामिशंस' का अर्थ इस सूक्तमें दुर्गतिका वर्णन विस्तारमे किया गया है और होता हे ' नातेके कारण आनेवाली आपत्ति या अपकीर्ति या उससे बचनेका निश्चित उपाय भी थोडे गन्दी कहनेक स्त्रीविषयक होनेवाला शंछन या करंक' इत्यादि । इसी कारण यह सूक्त वटा महत्वपूर्ण है। इस सूक्तसे दुर्गतिका प्रकार अन्यान्य अर्थ भी पाठक विचार करके देख सकते है स्वरूप इस प्रकार बताया है। परन्तु अथामें भापत्ति या कष्टका सम्बन्ध अवश्य चाहिये, क्योकि निर्मति द्रोह आदिके गणमे यह 'जामिशंस' शब्द १ क्षेत्रियः- माता पितासे प्राप्त होनेवाले रोग, अशक्तता माया है, इसलिये इसका आपत्तिदर्शक अर्थ ही यहां अपे- भवयवोकी कमजोरी आदि आपत्तियां। ये जन्मसे ही खूनके क्षित है । (मं. १) साथ सन्तानमें भाती हैं। ४ द्रहः- द्रोह, घातपात, विश्वास देकर घात करना । २ नितिः- विनाग, अधोगति, आपसको फूट, सत्य- (मं १) नियमोका उल्लघन, दुरवस्था, विरुद्ध परिस्थिति, शाप, गाली, ५ वरुणस्य पाश:- वरुण नाम श्रेष्ठ परमेश्वरका है। हीन विचार आदिके कारण होनेवाली हीन स्थिति । (मं १) सबसे जो 'वर' है उसको वरण कहते है । उस जगदीशके ३ जामिशंसः- इसमें दो गब्द है, जामि+शंस । इनके पास सब जगत्म फैले हुए हैं और उनसे कुकर्मी पुरुष वांधे मर्थ है जामि= वंश, नाता, सम्बन्ध, जल, अगुली, सम्मान्य जाते हैं । जगत्मे उस परमात्माकी ऐसी व्यवस्था है, कि बुरे ची, पुत्री, बहिन, बहु और 'शंस के अर्थ है प्रशंसा, कर्म स्वयं पाश रूप होकर दुराचारीको बांध देते हैं और प्रार्थना, पाठ, सदिच्छा, गाप, कष्ट, भापत्ति, कलक, लांछन, उनसे बंधा हुआ वह मनुष्य आपत्तिमें पडता है। (मं.) । .
(२४६) अथर्ववेदका सुबोध अनुवाद दीर्घजीवन और आरोग्य' - - ६ यक्ष्मः-- क्षय रोग, क्षीण करनेवाला रोग। (मं. ५ ५) तुझे छुटाता है और नुझे ज्ञानसे निषि ७ दुरितं- (दुः+इन् ) जो दुष्टता अन्दर घुसी होती करना। यह वाक्य पुनः पुन. कदा है। वारवार कहने के है। मन, बुद्धि, इंद्विय और गरीरमे जो विजातीय दुष्टभाव या कारण इस वातपर विशेष बल दिया है यह स्वयं स्पष्ट है। पदार्य घुसे होते है जिनसे उक्त स्थानाम बिगाड होकर कष्ट दुर्गतिने मनुष्यका बचाव करनेवाला एकमात्र उपाय 'ब्रह्म होते हैं उनका नाम दुरित है। यही पाप है। (मं, ६) अर्थात 'सत्यनाल' ही है। ज्ञानमे ही मनुष्य बच सकता ८ अवयं- निदा करने योग्य । जिनसे अधोगति होती है है और अज्ञानग्न गिरता जाता है। जो उन्नति, प्रगति या आपत्ति आती है, और कष्ट होते हैं उनका यह नाम बंधन मुन्ति होनी है वह ज्ञानसं ही होनी है । परम पुत्पार्य (मं. ६) द्वारा अपना उत्कर्ष साधन करना भी ज्ञानसे ही साध्य हो ९ ग्राही- जो जकड कर रसता है, छंटता नहीं, जिससे सकता है । ज्ञानहीन मनुष्य किसी भी प्रकार उन्नति नही मुक्त दोना कठिन है। गरीरम संधिवात भाटि रोग जो जोडी- कर सकता। को जकद रसते है । मन विषयवासना आदि और बुद्धिम ज्ञानका फल मात्मिक निर्वलता आदि है । (मं ६) ज्ञानस क्या क्या हो सकता है इसका वर्णन करना कठिन १० अराति- (अ+रातिः) अनुदारता, कृपणता, है, क्योकि ज्ञानते ही सब छ उन्नति होती है । कोई उच्च कंजूसी । (मं. ७) ध्येय ऐसा नहीं है कि जो बिना ज्ञानके सिद्ध हो सकता है। २१ तमः- अज्ञान, अन्धकार, आलस्य । (मं. ८ नथापि इस सूक्तम ज्ञानसे जो कुछ सिद्ध किया जा सकता है ये शब्द मनुन्यकी दुर्गतिका स्वरूप बता रहे है । इन उसका संक्षेपसे वर्णन किया है। अब हमी बातका विचार शब्दोका शारीरिक, इंद्रियविषयक, मानसिक, बौद्धिक और करंगे । सत्यज्ञानका पहिला फल यह है- मात्मिक अवनतिक साय सम्बन्ध यदि पाठक विचारपूर्वक (१) उभे द्यावापृथिवी ते शिवे स्ताम् । (मं १ देखेंगे तो उनको पता लग जायगा कि इस दुर्गतिका कितना 'धुलोक और पृथ्वीलोक ये तेरे लिये कल्याणकारी शुभ वहा कार्य इस मानवसमाजमें हो रहा है और इस सवागतिस हो।' अर्यात जो सत्यज्ञानसे युक्त है उसके लिये पुथ्वीसे वचनेके लिये कितनी दृढताके साथ कमर कसके तथा दक्ष- लेकर युरोक पर्यतके मत्र पदार्थ शुभकारी होंगे। पृथ्वीसे तासे कार्य करना चाहिये। मनुप्योके मन, बुद्धि, चित्त, लेकर द्युलोक पर्यतके सम्पूर्ण पदायाँको अपने लिये कल्याण- अहंकार, इंद्रियगण तथा शारीरिक व्यवहारमे इस दुर्गतिके कारी बनानकी विद्या अकेले ज्ञानी मनुष्यको ही साध्य होती नाना रूपोका संचार देसकर विचारगील मनुष्यका मन है। पाठक विचार करेंगे तो उनको पता लग जायगा, कि चक्करमे पट जाता है और वह अपने कर्तव्यक विषयम यह वटी भारी प्रबलगक्ति है कि जो ज्ञानीको प्राप्त होती है। मोहित सा हो जाता है, उसको इस दुर्गतिके साम्राज्यसे बच- तृणसे लेकर सूर्य पर्वतके सब पदार्थ उसके वयवर्ती होकर नेका उपाय नहीं सूझता, ऐसी अवस्थामे यह सूक्त उस मृढ उसका हित करनेमे तत्पर रहते है। यह अद्भुत सामर्य वने मनुष्यस कहता है कि 'हे मनुन्य ! क्यो मृढ बना है, ज्ञानी ही प्राप्त करता है। मैं इस मार्गले तुझे बचाता हूँ और तुझे निप अर्थात पवित्र (२) अद्भिः सह अग्नि शम् ॥ (मे २) भी बनाता हूं।' (मं. १) 'जलोके साथ अग्नि कल्याणकारी होता है।' ज्ञानी एकमात्र उपाय मनुष्य ही जलसे तथा अग्निसे-दोनोंके संयोगसे या वियो- आपत्तियां अनंत है । यद्यपि पूर्वोक्त ग्यारह गब्दो द्वारा गसे-अपना लाभ कर सकता है, जनताका भला कर इस सूक्तमें नापत्तियोंका वर्णन किया गया है तथापि ग्यारह शब्दों द्वारा, मानो, अनन्त आपत्तियांका वर्णन ही है। इन (३) ओपधीभिः सह सोमः शम् ॥ (मे २) भनन्त क्लेगोने बचनेका एक्मात्र उपाय है और वह इस ' औयधियों के साथ सोम सुखकारी होता है।' सोम सक्तक हरएक मन्त्रने 'ब्रह्म' शब्दसे बताया है। प्रत्येक एक वढी भारी प्रभावशाली औपधि है, यह वनस्पति सब मन्त्र-- औपधियोका राजा कहलाती है। सोम और औषधियोसे मुञ्चामि त्वा ब्रह्मणा अनागसं कृणोमि । प्राणिमात्रका हित साधन करनेका ज्ञान वैद्यशास्त्रमें कहा सकता।
दुर्गतिसे बचनेका उपाय (२४७) । है । नानाप्रकारके रोग दूर करने विविध औपधियोग उस 'ज्ञानसे यक्ष्म, रोग, पाप, निंय कर्म, द्रोह, बंधना मानमें कहे है और यह विद्या भाजक्ल प्रचरित भी है। जकडना आदिसे मुक्ति होती है। ' अर्थात् इनके कष्ट दूर इसलिये इस विषयमे मधिक लिखनेकी आवश्यकता नहीं होते है। यह बात पाठकोके ध्यानमे पूर्ववत मा जायगी। है। पूर्वोन कप्टोमे जो रोगविषयक कष्ट होते है, ये सब इस (१०) स्यानं अविदः (मं ७) विद्यामे दूर होते है । जलचिकित्सा और भग्निचिकित्सा भी 'सुख प्राप्त होगा , ज्ञानसे ही उत्तम और सत्य सुस इसी संमिलित हैं। प्राप्त होगा । पृथ्वीसे लेकर द्युलोक पर्यन्तके संपूर्ण पदार्थ (४) अन्तरिक्षे वातः वयः शं धात् । (मं.३) ज्ञानसे वशवनी होते हे भौर उस कारण सुख प्राप्त होता 'अंतरिक्षमे सचार करनेवाला वायु आरोग्य पूर्ण सुख है। यह मानवी अभ्युदयकी परम सीमा है। इसीको देनेवाला होता है।' विद्यासे ही वायु लाभकारी हो सकता कहते हैं- । योगसाधनका प्राणायाम इन वित्राका द्योतक है। (११) सुकृतस्य भद्रे लोके अभूः । (म. ७ प्राणायाम करनेवाले योगी वायसे अत्यधिक वर प्राप्त करते सुकृतके कल्याण पूर्ण स्थानम निवास होगा।' ज्ञानसे रे और दीर्घजीवी होते है। आरोग्य शास्त्र में सब नियम ही मुकृत किये जायगे और उन सुकृतोके कारण मनुष्यकी इस ज्ञानमें ममिलित है। वायशुद्धि द्वारा मारोग्य साधन उत्तम गति होगी, उसको श्रेष्ठसे श्रेष्ट अवस्था प्राप्त होगी। करनेका विषय इसमे आता है। रोगनिवारक तथा रोग प्रति- ज्ञानसे ही सब जनताकी इतनी उन्नति होगी कि यही भूलोक बंधक होम हवन यज्ञ याग इस विवाके प्रकाशक हैं। स्वर्गधाम वन जायगा । सत्य ज्ञान के प्रचारसे इतना लाभ (५) देवीः चतस्त्रः प्रदिशः वातपत्नीः ते शम्। है इसलिये हरएक वैदिकधर्मी आर्यको सत्यज्ञान प्राप्त करके ( मं ३,४) उसका प्रचार करना चाहिये । 'दिव्य चारो दिगाएं, जिनमें वायुका पालन होता है, सत्य ज्ञानक ये ग्यारह फल इस सूक्तमे कहे है । सय तेरे लिये सुखकारक हो।' चार दिशाएं और चार उप- उन्नतिका यह मुख्य सावन है। इसके विना अन्य साधनोसे दिगाय अर्थात् उनके मदर रहनेवाले सब पदार्थ ज्ञानसे ही कोई लाभ नहीं होगा । अब इस सूक्तमे जो उन्नतिका मार्ग मनुष्य के लिये लाभकारी होते है। इसका भाव पूर्ववत ही बताया है वह यहां देखिये- समझना योग्य है। उन्नतिका मार्ग (६) सूर्यः अभिविचष्टे । (मं. ४) अष्टम मंत्रम एक विलक्षण अपूर्व अलंकारके द्वारा उन्न- सूर्य जो चारों ओर प्रकाशता है ' वह भी ज्ञानसे तेरे तिका मार्ग दर्शाया है वह भी यहा अब देखना चाहिये- लिये अनुकूल हो सकता है। सूर्य प्रकाशसे मनुष्य मात्रको तमसो ग्राह्या अधिमुञ्चतः देवा ऋतं सूर्य भनत लाभ होने हैं । इस विद्याको जो जानते है वे इससे अपना लाभ कर सकते है। एनसः असृजत् ॥ (मं. ८) 'जिस प्रकार अंधकारकी पकडसे छुडाते हुए देव स्वयं (७) त्वा जरसि अन्तः आदधामि । (म. ५) 'तुझे अतिवृद्ध आयुके अंदर धारण करता हूं। अर्थात् उठनेवाले सूर्यको अधोमवस्थासे ऊपर प्रकट करते है। ज्ञानसे तेरी मायु अति दीर्घ हो सकती है । ज्ञानसे जीवनके अलंकारकी माषा नियम ज्ञात होते है और उनके पालनसे मनुष्य दीर्घायु इस भष्टम मंत्रम एक अलंकार है। सूर्य और अन्य देवो- वाला हो सकता है। का अन्योक्ति अलंकारसे रूपक बनाकर यहा वर्णन किया ७) यक्ष्मः नितिः पराचः एतु । ( म. ५) है। वेढमें सूर्य और चन्द्र विषयक कई रूपक आते है उनमें यक्ष्मा मादि रोग तथा अन्यान्य मापत्तियां ज्ञानसे दूर यह विशेष महत्वका रूपक है । यह रूपक इस प्रकार देखना होगी।' ज्ञानसे आरोग्य संपादन के सत्य नियम ज्ञात होते चाहिये- हैं और उनके पालनसे मनुष्य नीरोग होकर सुखी होता है। चन्द्र रूपी पुत्रका पालन रात्री नामकी माता करती है (८) यक्ष्मात्, दुरितात्, अवद्यात् , द्रुहः और सूर्य रूपी बालक्का पालन दिनप्रभा नामकी माता पागात्, ग्राह्याः च अमुक्थाः, उदमुक्थाः। करती है। प्रारंभमे सूर्य अंधेरेमें दबा रहता है, उसी प्रकार म ६) चंद्र भी गाढ अंधकारमें दवा रहता है । मानो इसको मार्ग - ।
(२४८) अथर्ववेदका सुवोध अनुवाद 'दीर्घजीवन और आरोग्य' - प्राथनाका बल , . दिसानेका कार्य अन्य देव अर्थात सब नक्षत्र, शुपिना, वायु नी उन्नति करनेका प्रयत्न करता रहता है। पापने मुन होकर आदि संपूर्ण देवता करते है । मृर्य स्वय ऊपर उठनेका यत्न निर्दोष बनना, पारनंध्यके अधमे मुन होकर स्वयं शामित करता ही रहता है, अंतमें वह ऊपर आता है, उदयको प्राप्त होना, रोगमुक्त होकर नीरोग होना, अपमृत्युर यधनसे छुट- होता है, प्रतिक्षण अधिकाधिक चमकने लगता है और कर दीवायु दोना आदि मबके लिये स्वयं प्रगामी' मध्यान्हमें ऐसा चमकता है कि उस समय उसके अप्रतिम होना अन्यत पाया है। यही उपरक मंत्रमें 'ऋतं तेजको कोई सहन कर नहीं सकता। इसी प्रकार चन्द्र भी शब्द द्वारा बनाया है। जो मनगामी होना अर्थात सत्य- अपनी क्षयी अवस्थामे प्रगति करता हुभा पूणिमामें अपना नियमोके अनुसार चलता है वहीं यंधनोंको काट सकता है, पूर्ण विकास करता है। पागोको दूर कर सकता है भार मृयक समान सपने ते नये अपने प्रयत्नसे उन्नति करनेवाले की इस ढगमे उन्नति प्रकट हो सकता है। इस प्रकार यह मंत्र जयंत महत्वपूर्ण होती है, यह दर्शाना इन स्पकका प्रयोजन है । जो स्वय उपदेश दे रहा है, यत्न नहीं करेंगे उनकी उन्नति होनी कटिन है । दूसरोंकी सहायता भी तब तक सहायक नहीं होती जब तक कि अपना रोटम ब्रह्म शब्दका दूसरा अर्थ नोत्र, स्तुति, प्रयत्न उसमें समिलित नहीं होता । यह उन्ननिका मूल प्रार्थना' भी है। जो प्रार्थनावाचक वैदिक्सून हैं उनके मंत्र है। पुरुष व्य ययसे दूसरे भी भय होते हैं, परन्तु उनका स्तुत्यय खकीय प्रयत्न या प्रार्थना रूप भय हटाया नहीं जा सकता।ग प्रार्थना' इस मंत्रमे 'ऋतं, सूर्य देवाः तमसः मुञ्चतः' से बल प्राप्त करना या अपने बलका विकास करना, प्रार्थना अर्थात् ' स्वयं चलनेवाले सुर्यको ही देव भधकारसे छुढा से यात्मिक बल प्राप्त करना, वैदिक धर्मका प्रधान अंग है। सकते है ' ऐसा कहा हे । यदि सूर्यमें स्वयं अपना प्रयत्न इसीलिये प्रारंभसे अंत तक बेदक सूक्तोमे सहन्त्री सूक्त प्रार्थना न होता तो वे उसको अंधकारसे मुक्त कर नहीं सकते । इसी के है । जो लोग एकान्तमें जाकर दिल खोलकर ईश प्रार्थना प्रकार मनुष्य भी जो स्वय अपने उद्धारका यत्न रातदिन करना जानते है वे ही प्रार्थनाका महत्व समझ सकते हैं अन्य करता रहता है, उसीके अन्य गुरु जन सहाय्यकारी होते हैं। लोग उसकी शक्ति नहीं जान सकते । इसलिये यहां कहना इस दृष्टिमे विचार करनेपर पता लग सकता है कि इस इतना ही है कि रोगादि आपत्तियोंकी निवृत्ति के लिये जितना मंत्रमें 'ऋत' शब्द बहुत महत्वका भाव बता रहा है, उपयोग औषधादि प्रयोगाका हो सकता है, उससे कई गुना देखिये इसका आगय । ऋत= ' योग्य, ठीक, सत्य, हलचल अधिक लाभ ईश प्रार्थना से हो सकता है। यह मानो एक करनेवाले, गतिमान् प्रयत्नशील यज्ञ, सत्य नियम ईश्वरीय ‘प्रार्थना-योग' ही है । मोपधि योग से प्रार्थना योग' नियम, मुक्ति, बंधननिवृत्ति, कर्मफल , अढळ विश्वास दिव्य अधिक बलवान् है । दु सकी बान माजकल यही हो रही है मत्यनियम। कि लोग प्रार्थनाका महत्त्व नहीं समझते और उससे होनेवाले जो (ऋतं ) सत्य नियमका पालन करता है, वही संध- लाभसे वंचित ही रहते हैं । यह बढी भारी हानि है । कारके परे जा सकता है और जो स्वय प्रयत्न करता है उसी इस सूक्तमें 'ब्रह्म' शब्द विशेष कर स्तोत्रवाचक ही की दूसरे सहायता कर सकते है । सूर्य प्रकाशमान है उदय है। ईश गुणवर्णन, ईश गुणगान करते करते जिसका मन होना चाहता है, नियमपूर्वक प्रयत्नशील है, इसलिये उदय- प्रभुके गुणोमे तल्लीन हो जाता है वह संपूर्ण अपत्तियोसे दूर को प्राप्त होकर ऐसा तेजस्वी बनता है, कि सब अन्य तेज हो जाता है, क्योकि वह उस समय अद्भुत अमृत रसका उसके सामने फीके हो जाते हैं। जो मनुष्य ऐसा प्रयत्न भास्वाद लेता हुआ दुख मुक्त हो जाता है । पाठक इस करेगा वह भी वैसाही प्रभावशाली बनेगा। दृष्टिसे इस बातका विचार करें और अनुभव भी लें। वायु, जल, नक्षत्र मादि जगतके देव विद्वान् शूर मादि मानवोके अंदरके देव, तथा इंद्रियगण ये शरीर स्थानीय देव मनको धीरंज देना उसी पुरुपकी सहायता करते है कि जो स्वयं सत्यनियम वेदमें में छुढाता हूं' इत्यादि प्रकार कई वाक्य हैं, पालनमें सदा दक्ष रहता है और स्वयं अपने पुरपार्यसे अप- वे वाक्य 'मानसचिकित्सा' या 'वाचिकचिकित्सा' के - १ मृत्यु (२४१) - सूचक हैं। अपने अंदरके आरोग्यपूर्ण वधार अपनी मानस दीर्घ मायुवाला करता हूँ। (४) मब यक्ष्म रोगले मुक्त शक्तिकी प्रेरणासे अपने शब्दों द्वारा रोगीके निर्बल मनमें हुआ है । (५) जकडनेवाले रोग तू अब पार हो गया है।' प्रविष्ट करानेसे यह चिकित्सा साध्य होती है । इसमे रोगीके इत्यादि प्रकारके वाक्योंसे रोगीको धीरज देकर उसके मनका निर्बल मनको धीरज देना होता है। इस समय- आत्मिक बल वटाकर और उसमे दृढ विश्वास पैदा करके १ त्वा क्षेत्रियात्"मुंचामि । (म. १) आरोग्य उत्पन्न करना होता है। यह बढा भारी गहन विषय २ त्वा ब्रह्मणा अनागसं कृणोमि । (म. १) है। जो पाठक ईश प्रार्थनाका यल जानते है, वे ही इस ३ त्वा जरसि अन्तः आदधामि । (मं. ५) वातको समझ सकते है। ४ यक्ष्मात् अमुक्थाः। (मं ६) परमेश्वर पर जो हद विश्वास रखते हैं, उसकी उपासना ५ ग्राह्याः उदमुक्थाः। (मै ६) करते हैं, उसकी भक्ति करनेमें जिनको प्रेम भाता है, उनके ऐसे वाक्य बोलकर रोगीको धीरज देना होता है जैसे- पाल वीमारिया कम माती है । पाठक देखेंगे तो उनको पता (१) तुझको क्षेत्रिय रोगसे मुक्त करता हू। (२) तुझे लग जायगा कि परमेश्वरके विश्वासी ग्रायः आनंदमे मस्त ईश प्रार्थना द्वारा निर्दुष्ट करता हूं। (३) तुझको अति रहते है और अविश्वासी ही रोगी होते हैं । , ॥ २ ॥ मृत्य कां. ६, सू. १३ (ऋषिः- अथर्वा (स्वस्त्ययनकामः) । देवता- मृत्युः।) नमो देवधेभ्यो नमो राजवधेभ्यः । अथो ये विश्यानां बधास्तेभ्यो मृत्यो नर्मोऽस्तु ते ॥१॥ नमस्ते अधिवाकार्य परावाकार्य ते नमः । सुमृत्यै मृत्यो ते नमो दुर्मत्यै त इदं नमः नमस्ते यातुधानेभ्यो नमस्ते भेजेभ्यः । नमस्ते मृत्यो मूलभ्यो ब्राह्मणेभ्य इदं नमः ॥३॥ अर्थ- (देववधेभ्यः नमः) ब्राह्मणोंके शास्त्रोको नमस्कार, ( राजवधेभ्यः नमः) क्षत्रियोके शस्त्रोको नम- स्कार (अथो ये विश्यानां वधाः) और जो वैश्योंके शस्त्र हैं उनको नमस्कार है और हे मृत्यो ! (ते नमः अस्तु) तेरे (ते अधिवाकाय नमः ) तेरे आशीर्वादको नमस्कार और (ते परावाकाय नमः) तेरे प्रतिकूल वचनको भी नमस्कार हो । हे मृत्यो ! ( ते सुमत्यै नमः) तेरी उत्तम मतिके लिये नमस्कार और (ते दुर्मत्यै इदं नमः) तेरी दुष्ट मतिको भी यह नमस्कार है ॥२॥ (ते यातुधानेभ्यः नमः) तेरे यातना देनेवाले रोगोको नमस्कार और (ते भेपजेभ्यः नमः ) तेरे औषध उपा- यो के लिये भी नमस्कार हो। हे मृयो ! (ते मूलेभ्यः नमः) तेरे मूल कारणोको नमस्कार और (ब्राह्मणेभ्यः इदं नमः) ब्राह्मणोंको भी मेरा नमस्कार है ॥३॥ लिये नमस्कार होवे ॥५॥ ३२ (भयवं. मा. ४ हिन्दी)
(२५०)
अथर्ववेद्का सुवोध अनुवाद - 'दीर्घजीयन और आरांन्य'
मृत्यु
मृत्युके प्रकार
७ दुर्मतिः- दुष्टबुदि।
ये भी चार कारण निन म य है। अनुरा
इस सुन्से मृत्युकं प्रकार बनाए है, देखिये-
चनका अतिरेक होने भी शामिक मारण मृत्यु होनी
१ देववधः-देवोके द्वारा होनेवाला वध अथवा मृत्य
२, प्रनिकल वचन निगमा 17 टनम
सन्नि, वायु, सूर्यादि देव है, ब्राह्मण भी देव हैं। इनक कारण उद्धि होनेय वर नाशिक कार्याचा यान ने भारत
होनेवाली
मृत्यु
1 अग्नि प्रकोप, वायु विगटने, सूर्यम उनाप, शारीरिक निर्वलता उ सन्न हो गय मोती। और दुर्म-
तथा ब्राह्मणादिकोके कारण जो मृत्यु होती है।
निमे वो मृयु होती ही है । नग-
२ राजवधः- लढाई में होनेवाला बध, भयमा गज-
८ यातुधानः- यानना देनेगर गर म लगते ,
पुस्पोक व्यवहारोसे होनेवाली मृत्यु ।
और
३ विझ्यानां वध. वैश्यों, पृजीपतियों अथवा धन-
९ भेपज- औपति उपाय भी किसी किसी समय
वानों के कारण होनेवाली मृत्यु ।
मृत्युको लानेगाले होने हैं ये बौर म भि: जो भी गृउ-
इन तीन कारणोसे मृत्युप होती हैं। अत. इनका सुधार की है, उन सबको दूर करना चाहिये ।
होना चाहिये । तथा-
यही ग्रामणी अर्थात ज्ञानियोग कार्य है। इस कारण
४ अधिवाकः- अनुकूल वचन,
उनको नमस्कार है । सयको प्रयत्न रे दन मय मृत्यु
५परावाकः- प्रतिकूल वचन,
कारणोको दूर करक अपने आपको दीर्घजीपी बनानका यन्न
६ सुमतिः- उत्तम बुद्धि, मोर
करना चाहिये।
-
मृत्युसे खंरक्षण
.
कां. ४, सू. ३५
(ऋषिः- प्रजापति । देवता- अतिमृत्यु.।)
यमौदनं प्रथमजा ऋतस्य॑ प्र॒जाप॑तिस्तपसा ब्रह्मणेऽप॑चत् ।
यो लोकानां विधृति भिरपात्तेनौदनेनाति तराणि
॥ १ ॥
अर्थ-(ऋतस्य प्रथमजाः प्रजापतिः) ऋत नियमका पहिला प्रवर्तक प्रजापति (ब्रह्मणे यं ओदनं अपचत्)
ब्रह्मक लिये जिस मन्त्रको पकाता है (यः लोकानां वि-धृतिः) जो लोकोको विशेष रूपसे धारण करनेवाला है और
(न अभि रेपात् ) जो कभी किसीको हानि नहीं पहुंचाता, (तेन ओदनेन मृत्यु अति तराणि) उस अजसे मैं
मृत्युको पार करूं ॥१॥
तराणि मृत्युम्
भावार्थ- जिसने संपूर्ण सत्य और अटल नियमोंका सबसे पहिले प्रवर्तन किया. उस प्रजापनिने विशेष महत्त्व
प्राप्तिके लिये यह ज्ञान रूप अन्न तैयार किया, यह सब लोकांका विशेष रीतिसे वारण पोषण करता है और इसमे किसीका
मी नाग नहीं होता है । इसी ज्ञानमे मैं मृत्युको दूर करता हूं ॥ १ ॥
मृत्युसे संरक्षण
(२५१)
येनातरम्भूतकृतोऽति मृत्युं थमन्वविन्दन्तप॑सा अमेण ।
यं पुपाचं ब्रह्मणे ब्रह्म पूर्व तेनौदनेनाति तराणि मृत्युम्
॥२॥
यो दाधार पृथिवीं विश्वभौजसं यो अन्तरिक्षमापणाद्रसैन ।
यो अस्तंभादियों महिम्ना तेनौदनेनाति तराणि मृत्युम्
॥३॥
यस्मान्मासा निमितास्त्रिंशदराः संवत्सरो यस्मानिर्मितो द्वादशारः ।
अहोरात्रा य परियन्तो नापुस्तेनौदनेनाति तराणि मृत्युम्
॥४॥
यः प्राणदः प्राणदान्यभूव यस्मै लोका धृतवन्तः क्षरन्ति ।
ज्योतिष्मतीः प्रदिशो यस्य सर्वास्तेनौदनेनाति तराणि मत्युम्
॥५॥
यस्मात्पक्कादुमृत संवभूव यो गायच्या अधिपतिर्बभूव ।'
यस्मिन्येदा निहिता विश्वरूपास्तेनौदुनेनाति तराणि मृत्युम्
॥६॥
अर्थ-- (येन भूत-कृतः मृत्यु अति अतरन् ) जिससे भूतोको बनानेवाले मृत्युके पार हो गये, (यं तपसा
श्रमेण अन्धविन्दन् ) जिसको लोगोने तप और परिश्रमसेप्राप्त किया, और (यं पूर्व ब्रह्म ब्रह्मणे पपाच) जिसको
पहिले ब्रह्मने ब्रह्म के निमित्त पकाया (तेन ओढनेन मृत्यु अति तराणि ) उस अन्नसे मै मृत्यु पार करू ॥ २॥
(यः विश्वभोजसं पृथिवी दाधार) जो सबको भोजन देनेवाली पृथ्वीका धारण करता है, ( यः रसेन अन्त-
रिक्षं आ पृणात् ) जो रससे अन्तरिक्षको भर देता है, (यः महिना ऊर्ध्वः दिवं अस्तनात्) जो अपनी महिमासे
अपर ही द्युलोकको धारण किये हुए है, (तेन ओदनेन मृत्यु अति तराणि) उस अन्नसे मैं मृत्युको पार करूं ॥३॥
(यस्मात् त्रिंशत्-अराः मासाः निः-मिताः) जिससे तीस दिन रूपी भरोवाले महिने बनाये है, (यस्मात्
द्वादश-अरः संवत्सरः निः मितः) जिससे बारह महिने रूप भरोवाला वर्ष बनाया है, (परियन्तः अहोरात्राः य
न आपुः ) गुजरते हुए दिन रात जिसको प्राप्त नहीं कर सकते (तेन ओदनेन मृत्यु अति तराणि) उस अन्नसे मै
मृत्युको पार करूं ॥४॥
(य प्राण-दः प्राण-द-वान् वभूव) जो जीवन देनेवाला प्राणके दाताओका भी स्वामी हुआ है (यस्मै घृत-
वन्तः लोकाःक्षरन्ति ) जिसके लिये घृतयुक्त लोक रस देते है, (यस्य सर्वाः प्रदिशः ज्योतिष्मतीः) जिसकी सब
दिगा उपदिशाएं तेजवाली है (तेन ओदनेन मृत्यु अति तराणि) उस अन्नसे मैं मृत्युको पार करूं ॥५॥
(यस्मात् पकात् अमृतं संबभूव ) जिस परिपक्वसे अमृत उत्पन्न हुआ, (यः गायत्र्याः अधिपतिः बभूव)
जो गायत्रीका अधिपति हुआ, (यस्मिन् विश्वरूपाः वेदाः निहिताः) जिसमे सब प्रकारके वेद रखे हुए है, (तेन
मोदनेन मृत्यु अति तराणि ) उस अन्नसे मैं मृत्युको पार करूं ॥ ६ ॥
भावार्थ- इसीसे भूतोको उत्पन्न करनेवाले मृत्युके पार हो गये, जिसकी प्राप्ति तप और परिश्रमसे होती है और
जो पहिले ब्रह्मने महत्त्व प्राप्ति के लिये परिपक्क किया था, उसी ज्ञानसे मैं भी मृत्युको दूर करता हूं ॥ २ ॥
जिसने पृथ्वीको धारण किया, अन्तरिक्षमे जलको भर दिया और धुलोक ऊपर स्थिर किया उस ज्ञान रूप अन्नसे मै
मृत्युको दूर करता हूं ॥३॥
जिससे तीस दिनवाले महिने सौर वारह महिनीवाला वर्ष बना और प्रतिक्षण गमन करनेवाले दिन रात भी जिसका
अन्त न लगा सके, उस ज्ञानरूप पक्कानसे मै मृत्युको दूर करता हूं ॥ ४ ॥
जो स्वयं जीवनशक्ति देनेवाला है और जीवन देनेवालोका भी जो स्वामी है, जिसकी तृप्ति के लिये सपूर्ण जगत् के रस
प्रवाहित हुए है और जिसके तेजसे सब दिशाएं तेजोमय हो चुकी है, उस ज्ञानरूप अन्नसे मैं मृत्युको दूर करता हू ॥ ५॥
(२५२) अथर्ववेदका सुवोध अनुवाद ~ीर्घजीवन और आगेग्य' ad अब बाधे द्विपन्तै देवपीयं सपत्ना ये मेऽप ते मवन्तु । ब्रह्मौदनं विश्वजित पचामि शृण्वन्तु मे श्रद्दधानस्य देवाः ॥ ७॥ अर्थ-(देव-पीयु द्विपन्नं अववाधे ) देवन्त्रक नाशक शत्रुओंको मैं हटाता। (ये में लपन्नाः ते अप भवन्तु जो मेरे प्रतिस्पर्धी है वे दूर होयें । मैं (विश्वजितं व्रत्मादनं पचामि ) मिको नीगनेवाग ज्ञान रूपी अब पकाना हूं । ( देवाः श्रद्दधानस्य मे शृण्वन्तु ) सब देव अन्दा धारण करने वाले मरा यह भाषण सन ॥ ७ ॥ भावार्थ- जिस परिपक मात्मासे अमृत उत्पन्न हुआ है, जो वाणीका पति और नियमें मय प्रकारका ज्ञान है, उस ज्ञानस्प अन्नने में मृत्युको दूर करता हु ॥ ६ ॥ देवत्वका नाम करनेवालोका में प्रतिबंध करता हूं, अपने प्रतिस्पर्धियोको भी मैं दूर करता, लौर जगतको जीतने- वाला ज्ञानस्पी भन्न परिपक करता हू । मैं इसमें श्रद्धा रसनेवालाई भत' मेरा यह कथन सय ज्ञानीजन मनें ॥ ७ ॥ a Huaintaन मृत्युसे संरक्षण ब्रह्मोदन चार भाया है। इसका मामय भी पूर्वोक्त प्रकार ही समम- ना उचित है । मैं भात्माकं ज्ञानरूप मनसे मृत्युको दूर ब्रह्म' शब्द 'ब्रह्म, ईश्वर, आत्मा, ज्ञान ' इत्यादिका वाचक है। यहां विशेप र ज्ञानवाचक है। मोदन' करता हूं। गुण और गुणीका अभेट अन्वय मान कर गुणके शब्द अन्नका वाचक है। इसलिये 'ब्रह्मोढन' शब्द 'ज्ञान- वर्णनमे गुणीका वर्णन यहा किया गया है। इसीलिये 'पृथ्वी रूप अन्न ' यह अर्थ बताता है । बुद्धिका अन्न 'ज्ञान' है। अन्तरिक्ष और युलोकका धारक यह है ' यह नृतीय मन्त्र- शरीरका अन्न चावल धादि साद्यपेय है। इंद्रियाका मन का वर्णन साथ होता है क्योकि परमात्माने इस त्रिलोकीको उसक विषय है, मनका अन्न मन्तव्य है और बुद्धिका मन्न धारण किया है इस विषयमें किसीको सन्देह नहीं हो ज्ञान है । आत्मा सच्चिदानन्द स्वरूप है, इसमें 'चित सकता । परन्तु इसमें कहा है कि ब्रह्मौदनने त्रिलोकीको धारण मिया है। ज्ञानरूप मनसे त्रिलोकीका धारण हुला है अर्थात् मन्द ज्ञानवाचक है, अर्थात् इससे स्पष्ट हो जाता है कि आत्मा ज्ञानस्वरूप है। इसका फलित यह हुआ कि मान्माका ज्ञान जिसका गुण है उस परमात्मासे त्रिलोकीका धारण स्वभाव गुण ही ज्ञान है । यह ज्ञान प्राप्त करक, भर्यात हुना है, यह अर्थ अब इस स्पष्टीकरणसे स्पष्ट हुआ । इमको सा कर बुद्धि पुष्ट होती है। इसी दृष्टिसे तृतीय, चतुर्थ और पचम मंत्रोंका भाशय जानना उचित है। जिसका ज्ञान गुण है उसी भात्माने आत्माका गुण ज्ञान होनेसे ज्ञानका सदा उसके साथ पृथ्वीको धारण किया, अन्तरिक्षमें जल भर दिया और रहना स्वाभाविक है। जिग्न प्रकार दीप और प्रकाग एक- आकागको ऊपर स्थिर किया है ॥ ३ ॥ उसी आमासे सूर्य त्रित रहते हैं, उसी प्रकार माझा प्रकार ही ज्ञानरूप है, चंद्रादि गतिवाले होकर दिन, महिने और वर्ष बनते हैं, इस कारण वह उसके साथ रहता है । दीप कहा जाए अथवा परतु ये कालके अवयव कालको मापते हुए भी उस परमा- प्रकाग कहा जाए दोनो एक ही बात है। व्यवहारमें यही बात स्माका मापन करनेमें असमर्थ है॥ ४ ॥ यह सबको जीवन है, मैं प्रकासे पढ़ता हूं, या दियेसे पढता हूँ इसका अर्थ एक देता है और सब अन्य जीवन देनेवालोंका यह ईश है, ही होता है । इसी प्रकार ' मैं ज्ञानसे मृत्युको पार करता हूं, अर्थात् इसकी गक्ति प्राप्त करके ही वे सब जीवन देनेमें अथवा में आत्मगनिने मृत्युको पार करता हूं, या आत्मासे समर्थ होते हैं। सब पदार्थमात्रमें जो रस होते हैं वे जिसको मृत्युको दर करता हूं' इसका तात्पर्य एक ही है। एक समय ही प्राप्त होते हैं सब जगत्की दिगा उपदिशाएं इस सूक्तम ‘ब्रझौढनसे मृत्युको पार करता हूं' (तेन जिसके तेजसे तेजस्वी यनी है, उसके ज्ञानामृवसे पुष्ट होता बोदनेन अतितराणि मृत्यु । मं. १-१ ) यह वाक्य छ. हुभा में मृत्युको दूर करता हूं ॥५ मृत्युसे संरक्षण (२५३) यह इन तीनों मंत्रोंका आगय है । इन मंत्रोमें गुणोके आशय यह है-(१) देव निन्दकोंको दूर करना, (२) प्रति- वर्णनसे गुणीका वर्णन किया गया है। अर्थात उस आत्मासं स्पर्धियोंको दूर करना, (३) सत्यपर श्रद्धा रखना (४) जो रस भरा है उसीको प्राप्त करके अमर बनना है और और विश्वमै विजयके लिये इस ब्रह्मज्ञानरूपी अन्नको पकाना मृत्युको दूर करना है। और पश्चात् अन्योके साथ स्वयं उसको सेवन करना । इससे अमृतकी प्राप्ति मनुष्यकी उन्नति होगी और वह मृत्युको दूर कर सकेगा, इसमें कोई संदेह नहीं है। देवकी निंदा करनेके श्रद्धाहीन भागे छठे मंत्रमे कहा ही है कि- विचार अपने मनमे उत्पन्न हुए तथा कामक्रोधादि विरोधी यस्मात् पक्कात् अमृतं सं बभूव । (मं. ६) भाव मनमें आये, तो उनको दूर करनेसे आत्मशुद्धि होती जिग्म परिपक्क मात्मासे अमृत उत्पन्न हुआ, उस अमृतको है और अन्य श्रन्दादिक धारण करनेसे उन्नति होती है। इस प्राप्त करके मै मृत्युको दूर करता है। यह बात स्पष्ट ही है रीतिसे मनुष्य शुद्ध और पवित्र होता हुमा मृत्युको दूर कर कि परमात्मा सबसे अधिक परिपक्क, पूर्ण, रसमय और सकता है। अमृतरस युक्त है तथा उसीका पान करके सब अन्य जन तप तृप्त होते हैं । यही गायत्री रक्षा (गाय-त्री) करनेवाली यह सब तपके आचरणसे और परिश्रमसे साध्य हो सकता वाग्देवीका अधिपति है, इसीलिये उसमें सब वेद रखे है। है। जो तप करेंगे और आत्मोढारके लिये तप करेंगे वेही जिसमें वाणी रहती है, उसीमे वेद रहते हैं । यह पष्ठमंत्रका अपना उद्धार कर सकते है, यह द्वितीय मन्त्रका कथन कथन अब स्पष्ट हो गया है। ध्यानमें धारण करके तपके नाचरण द्वारा अपने भापको आत्मशुद्धि पवित्र करक मृत्युको दूर किया जा सकता है और इस सप्तम मन्त्रमे भात्मशुद्धिपर वहुत जोर दिया है, इसका प्रकार अपना जीवन सफल बनाया जा सकता है।
अथर्ववेदका सुबोध अनुवाद [ भाग चौथा दीर्घजीवन और आरोग्य " सुमा जित । तू मुझसे को.११।४ १३ हे प्राण! यढा जिन्वसि आथर्वणीः आंगिरसीः देवीः मनुष्यजाः ओषधयः प्रजायन्ते- हे प्राण ! जिस १ प्राणाय नमो यस्य सर्व इदं वशे- जिसके अधीन समय तू प्रेरणा देता है, तभी आयर्वणी, आंगिरसी, देवी और यह सब कुछ है उस प्राणको नमस्कार हो । (१) मानवी औषधियां उपयोगमे भाती है । (१६) २ यस्मिन् सर्व प्रतिष्ठितं- इसी प्राणमे सब जगन् प्रतिष्टित है । (१) १४ यस्मिन् प्रतिष्टितः असि, तस्मै सर्व वलिं हरान्- जिसमे प्राण होता है, उसीके लिए सब बलि सम- ३ यदाप्राणःवर्षेण पृथिवी अभ्यवीत् तत् पशवः पित करते है । (१८) प्रमोदन्ते, नः चै महः भविष्यति- जब प्राण वृष्टि द्वारा पृथ्वीपर बरसता है, तब सारे पशु प्रसन्न हो जाते है कि १५ प्राणः मा अनुतिष्ठतु-प्राण मेरे अन्दर रहे। (४) १६ प्राण ! मा मत् पर्यावृतः- हे प्राण अब हमारे लिए बहुत अन्न मिलेगा। (५) ४ हे प्राण ! ते इदं नमः- हे प्राण ! तुझे यह नम- दूर मत हो । (२६) १७ मदन्यः न भविष्यसि-हे प्राण तू मुझसे अलग स्कार हो । (८) मत हो । (२६) ५ हे प्राण ! यत् तव भेपज, नः जीवसे धेहि-हे १८ प्राण वध्नामि त्वा मयि- हे प्राण । मै तुझे अपनेमें प्राण ! तेरे पास जो औषधि है वह हमारी दीर्घायुके लिए बांधता हूँ। (२६) हमे दे। (९) ६प्राणः तक्मा- प्राण जीवनगक्ति है। (११ कां. ८१ ७ प्राणः सत्यवादिनं उत्तमे लोके आभरत्- प्राण १ ते प्राणाः अपानाः इह रमन्ताम्- तेरे प्राण और सत्यवाढीको उत्तम लोकमे पहुंचाता है। (११) अपान तुझमे खेलते रहे। (१) ८ प्राणः विराट- प्राण विगेप तेजस्वी राना है। (१२) २ अयं पुरुपः असुना सह इह अस्तु- यह पुरुष ९ प्राणं सर्वे उपासते-- प्राणकी सब उपासना करते प्राणोके साथ यहा रहे । (१) है। (१२) ३ हे पुरुप ' उत्क्राम मा अवपत्था:- हे पुरुष ' तू १० यदा त्वं प्राण जिन्वसि, अथ स जायते पुनः- ऊपर चढ, नीचे मत गिर । (४) प्राण ! जब तू प्रेरणा देता है, सब जीव पुन: उत्पन्न होता ४ मृत्योः पद्वीशं अवमुञ्चमानः- मृत्युके बंधनसे है। (१४) अपनेको छुडा । (४) ११ वातः ह प्राण उच्यते- वायुको ही प्राण कहते ५ त्वां मृत्युः दयतां- मृत्यु तुझ पर दया करे । (५) है। (१५) ६ मा प्रमेष्ठाः-तू मृत्युको प्राप्त मत हो । (५) १२ भूतं भव्यं सर्व प्राणे प्रतिष्ठितम्- सव भूत और ७ उद्यानं ते पुरुप ' नावयानं- हे पुरुष' हमेगा तेरी भविन्य प्राणमें स्थित है। (१५) उन्नति हो, अवनति कभी न हो । (६) ।
सुभापित (२५५) ८ ते जीवातुं दक्षतानि कृणोमि- नो जीवन और २७ पुनः आगाः, पुनर्णवः- तू फिर लाया है, फिर बल देता हूँ। (६) नया होकर आया है। (२०) ९ इमं अमृतं मुखं रथं आगेह- इस क्षमर और सुन २८ त्वत् तमः व्यवात्- तेरे पाससे अन्धकार दूर हो देनेवारे रथ पर चट । (६) गया है । (२१) १० ते मनः तत्र मा गात्- तेरा मन बुरे विचारोकी २९ ते ज्योतिः अभृन्-तेरा प्रकाश फैल रहा है। (२१) ओर न जाये । (७) ३० त्वत् निक्रति मृत्युं अप निदधमसि- तेरे पाससे ११ जीवेभ्यः मा प्रमद.- जीवोका हित करते समय दुर्गति और मृत्युको हम दूर कर रहे है । (२१) तू मालस्य मत कर । (७) को.८।२ १२ विश्वे देवाः त्वा अभिरक्षन्तु- सब देव तेरा १ ते जरदष्टिः अच्छिचमाना अस्तु- तेरा जीवन संरक्षण कर । (७) बुढापे तक भापत्तिरहित रहे (१) १३ गतानां मा आविधीथाः- मरो हुदोके लिए तू २ ते अखं आयुः पुन आभरामि- तेरे अन्दर मै योक मत कर । (८) फिर प्राण और आयु भरता है । (१) १४ तमसा ज्योनिः आरोह- अन्धकारको छोटकर ३ तमः मा उपगा:- अज्ञानके पास मत जा । (१) प्रफाग पर चढ़। (८ ४ जीवतां ज्योतिः अर्वाड् आभि ऐहि- जीवित मनु- १५ पराड्मनाः मा तिष्ठ- विल्द्व दिगामें मन मत प्योकी ज्योति के पास जा । (२) लगा। (९) ५त्वा शत-शारदाय आ हरामि- मैं तुझे सौ वर्ष- १६ एतं पन्यांमाअनुगाः,भीमः एपः- इस मार्ग- की टायु तक ले जाता हूं। (२) से मत जा, यह मार्ग भयंकर है । (१०) ६ मृत्यु-पागान् अशस्ति अवमुञ्चन्, ते द्राधीयः १७ एतत् तमः, मा प्रपत्था:- यह अन्धकारपूर्ण मार्ग आयु. प्रतरं दधामि- मृत्युके पाम और अपकीर्ति इनको है, अत. इस मार्गसे मत जा । (१५) दूर करके तुझे मैं दीर्घायु देता हूँ। (२) १८ संकसुकात् आरात् चर- नाग करनेवालोसे दूर ७ अय जीवतु मा मृत- यह जीवित रहे, न मरे । (५) रह । (१२) ८ हे मृत्यो! पुरुष मा वधी:- हे मृत्यो ' इस पुरुष- १९ वोधश्च त्वा प्रतिबोधश्च रक्षतां- ज्ञान और को मत मार । (६) विज्ञान तेरी रक्षा करें। (१३) ९ दुरितं अपसिध्य, आयुः धत्तं- पापको दूर करके २० अस्वप्नश्च त्वानवद्राणश्च रक्षतां- जागरूकता इसको दीर्घायु दे । (७) और तत्परता तेरी रक्षा करें। (१३) १० अरिष्टः सर्वांगः जरसा शतहायनः आत्मना २१ गोपायन च जागृविः च त्वा रक्षताम्- रक्षा भुजं अश्नुतां- पीडा रहित, सब अंग अवयव और इंद्रि- करने और जागृत रहनेवाला दोनो तेरी रक्षा करे । (१३) । (१३) योसे युक्त होकर वृद्धावस्था तक सौ वर्षका होकर अपनी २२ मा त्वा प्राणो वलं हासीत्- प्राण तेरे वलको शक्तिके भोग प्राप्त कर । (८) कम न करे। (१५) ११ त्वा मृत्योः उत् अपीपरं- तुझे मृत्युसे ऊपर उठा २३ जम्भः संहनुः त्वा मा विदत्-विनाश और घात लिया है । ( २ करनेवाले तुझे प्राप्त न करे । (१६) १२ अस्मै ब्रह्म वर्म कृण्मसि- इसके लिए ज्ञानका २४ तस त्वा मा विदत्- अन्धकार तुम पर कभी न कवच में तैय्यार करता हूँ। (९) १३ ते दीर्घ आयुः स्वस्ति कृणोमि- तेरे लिए दीर्घायु २५ स्वस्तये त्वा उद्भरन्तु- लोग कल्याणके लिए तुझे कल्याण कारक करता हूँ। (९) उन्नतिकी तरफ ले चलें । (१६) वैवस्वतेन प्रहितान् चरतः सर्वान् यमदूतान् २६ सहस्तवीर्यण इमं मृत्योः उत्पारयामसि-हजारो अपसेधामि- यमके द्वारा भेजे गए सर्वत्र घूमनेवाले यम- भक्तियोसे इसे मृत्युके पार ले जाते है । (१८) दूतोसे तुझे दूर करता हूँ। (१३) फैले । (१६) अथर्ववेदका मुबोध अनुवाद - (२५) दीर्घजीवन और आरोग्य' १५ अराति निक्रति ग्राहिं सर्व दुर्भूतं नत् परः ८ इह अरिष्टः वर्धतां- यहां नष्ट न होता हुआ वृद्धि आरात् अपहन्मसि- शत्रु दुर्गति, गेग और जो छ प्राप्त करता रह । (५) अहितकारक है, वह मर दर करता है । (१०) ९ ने यक्ष्म परा सुवामि-तरं मन्दरसे यक्ष्मरोगको में १६ अमृतः न रिग्या- अमर हो और नागको मत दूर करता हूँ। (६) प्राप्त हो । (१३) कां. ७३३ १७ चरण नुतेजसा केगमथु बपनि मुखं शुभ- १ अयं मा प्रजया धनेन सिंचतु च मे दीर्घमायुः तंज उस्तंग्ग्गे जब तू बाल और दाढीकी हजामत करेगा, तब कृणोतु- यह मुझे प्रज्ञा और धन देवे और मेरी आयु लम्बी तरा चहरा सुन्दर दीसेगा । (१९) करे। (१) १७ सर्व त अन्नं अविपं कृणोमि-तेरा सारा अन्न मने कां. ५.३० विप रहित बना दिया है । (१९) १९ अगयेभ्यो जिघत्नुभ्यः इमं परिरक्षत- दान न १ प्रत्यक् भेषजं सेवस्व त्वा जरदष्टिं कृणोमि- देनेवाले हिसकोन इनकी रक्षा कर । (२०) औषधका योग्य रीतिसे सेवन कर, वृद्धावस्थातक मैं तुमे २० वर्षाणि तुभ्यं स्योनानि- वर्ष तेरे लिए सुग्यका• पहुंचाऊंगा । (५) रक हो। (२३) २मा विभेः, न सरिप्यसि, त्वा जरदष्टिं कृणोमि- २१ स अरिष्टः न मरिप्यसि, मा विभेः- हे अहिं- दर मत, तू मरनेवाला नहीं है, तुझे वृद्धावस्थातक पहुचाता मित मनुष्य | तू मरनेवाला नहीं है, दर मत । (२०) हूँ। (८) २२ सर्वो व तत्र जीवति, यत्रेदं ब्रह्म क्रियते- जहा ३ निरवोचं अहं यक्ष्म अंगेभ्यो अंगज्वरं तव-मैं यह ज्ञान फैलता है, वहां सब जीवित रहते है । (२६) तेरे शरीरने यक्ष्मरोग और ज्वर दूर करता हूँ। (८) २३ अमम्रिः अमृतः अतिजीवः- अक्षीण और अमर ४ ऋपी बोध-प्रतिवाघौ अस्वप्नो यश्च जागृवि होकर दीर्घायु हो । (२६) तो ते प्राणस्य गोतारो, दिवा नक्तं च जागृताम्- २४ असवः ते शरीरं मा हासिपुः- प्राण तेरे गरीर- बोध और प्रतिबोध ये दो ऋपि है, एक निद्रारहित है और को न ठोढ । (२६) दूसरा जागृत है । ये दोनों ही तेरे प्राणके रक्षण है। वे रात- २५रलोहा असि, सपत्नहा अमीवचातन:-राक्षस, दिन तेरे अन्दर जागृत रहे । (१०) गल और रोगोंको मारनेवाला तू है । (२६ ) ५ गंभीरात् कृष्णात् तमसः मृत्योः परि उदेहि- कां. ७५३ गाढे और काले अन्धकाररूपी मृत्युमुससे उटकर उदयको १. देवानां भिपजी शचीभिः अस्मत् मृत्यु प्रत्यौ- प्राप्त कर । (११) हताम् देवोंक वैद्य अपनी शक्तिक द्वारा हमसे मृत्युको ६ मा पुरा जरसो मृथाः- वृद्धावस्थासे पहले ही दूर करते हैं । (१) मृत्युको मत प्राप्त हो । (१७) २प्राणापानौ ! संक्रामताम्- हे प्राण और अपान ! इस गरीरमें अच्छी तरहसे संचार करते रहो। (२) कां. ५।३१; कां. ५।२८ ३ शरीरं मा जहीतं- इस गरीरको न छोडी । (२) १ शतशारदाय दीर्घायुत्वाय नव प्राणान् नवभिः वर्धमानः शरदः शतं जीव- वृद्धि प्राप्त करनेवाला संमिमीते- सौ वर्षकी आयुके लिए नौ प्राणोको नौ इंद्रियों- तू मी वर्षतक जीवित रह । (२) के साथ जोडता हूँ। (१) ५ इमं प्राणः मा हासीत्- प्राण इसे न छोहे । (४) २ दक्षं दधातु सुमनस्यमानं- सुविचारयुक्त मनसे ६ अपानः अवहाय परा मा गात- अपान इसे छोढ- वल स्थापित करे । (५) कर दूर न निकले । (४) ३ हिरण्य आयुपे विवृदस्तु- सोना तीनगुना होकर ७ सप्तर्पिभ्यः पनं परिददामि, ते पनं जरसे तेरी आयु बढानेवाला हो। (६) स्वस्ति वहन्तु-मैं हमे सप्त ऋषियोंको सौंप देता हूं, वे ४ द्विपतां उत्तरः भवः- द्वेप करनेवालोंकी अपेक्षा इगे वृद्धावस्यातक सुन्थमे लेकर जाए। (2) श्रेष्ट हो । (१०) - सुभाषित (२५७) . ५ मिन्दत् सपत्नान् अधरांश्च कृण्वत् महते सौभ ३ अयं सहसा क्षेत्राणि जयन्- यह अपने सामर्थ्यसे गाय आरोह- शत्रुओको छिन्नभिन्न करके और उन्हे नीचे देश जीतेगा । (३) गिराकर महान् सौभाग्यके लिए उमत हो । (१४) ४ अन्यान् सपत्नान् अधरान् कृण्वानः- दूसरे शत्रु- ओको यह गिराता है। (३) कां. ३।११ ५ अनमीवो मोदिपीष्ठाः सुवर्चा:- निरोगी और शक्ति १ मुञ्चामि त्वा हविषा जीवनाय अमातयक्ष्मात् युक्त होकर मानन्दित हो । (६) उत राजयक्ष्मात्- भज्ञात रोगोंसे और राजयक्ष्मासे तुझे २।२८ हवनके द्वारा छुडाता हूं और दीर्घायुसे युक्त करता हूँ। (१) १ अन्ये शतं मृत्यवः इमं मा हिंसिपुः- दूसरी सैंकडों २ यदि क्षितायुः, यदि वा परेतः, यदि मृत्योः मृत्युएं इसे न मारें। (१) अन्तिकं नीत एव, तं आहरामि निर्ऋतेः उपस्थात्, २ जरामृत्युं कृणुतां- वृद्धावस्थाके बाद इस मृत्यु अस्पर्श एनं शतशारदाय- यदि उसकी भायु समाप्त भावे । (२) हो गई हो अथवा यदि वह मृत्युके पास पहुंच गया हो, तो ३ मेसं प्राणो हासीन् , मो अपान:- इसे प्राण और उसे विनाशसे छुडाफर तथा दीर्घायु युक्त बनाकर सौ वर्ष मपान छोढकर न जावें । (३) तक जीनेके योग्य करता हूँ। (२) कां. ११३५ ३ सहस्राक्षेण शतवीर्येण शतायुपा हविषा आहार्प १ दाक्षायणं हिरण्यं ते बध्नामि आयुपे वर्चसे एनं- सैकडों शक्तियोसे युक्त तथा सैंकडो वीर्योंसे युक्त, सौ वलाय दीर्घायुत्वाय शतशारदाय- यह सोना तेरे वर्षकी आयु करनेवाले हवनके द्वारा उसे मैं वापस ले आया बांधता हूँ। इसके कारण तुझे आयु तेज, बल, दीर्घायु और हूँ। (३) सौ वर्षका जीवन प्राप्त हो । (१) ४ शतं जीव शरदो वर्धमानः- प्रगति करते हुए सौ २ यो विभर्ति दाक्षायणं हिरण्यं स दीर्घ आयुः वर्षतक जीवित रहो। (३) कृणुते- जो शरीरपर दाक्षायण सोना धारण करता है, उसे ५ विश्वस्य दुरितस्य पारं अतिनयाति- यह हवन दीर्घायु प्राप्त होती है । सब पापोंसे दूर ले जाता है। (४) कां. १३० प्राणापानौ प्रविशत-प्राण और अपान इसमे प्रवेश १ ते कृणुत जरसमायुः अस्मै- वे इसके लिए वृद्धा- वस्थातककी आयु देवे । (३) ७ अन्ये शतं मृत्यवः वियन्तु- दूसरी सैकडों मुत्यएं २ शतमन्यान मृत्यून् परिवृणक्तु- दूसरी सैकड़ों इससे दूर हो । (५) ८ प्राणापानौ इह एव स्तं, इतः मा अपगातं- हे कां. ७९४ प्राण और अपान ! यहीं रहो, इसके पाससे दूर न १ विशः संमनसस्करत्- प्रजाजनोको उत्तम मनसे युक्त करें। (१) ९ शरीरस्य अंगानि जरसे वहतं- शरीरके अवयवो- कां. ७।६९ को वृद्धावस्थातक ले जाओ । (६) १ अहानि शं भवन्तु नः, शं रात्रीः प्रतिधीयतां, १० जरायै त्वा परि ददामि- तुझे वृद्धावस्थाको उपा न शं व्युच्छतु- दिन, रात और उपा हमारे लिए कल्याणकारी हो । (१) ११ जरा त्वा भद्रा नेष्ट-वृद्धावस्था तुझे सुख देवे। (७) कां. ११२६ कां. २।२९ १ हेति अस्मद् आरे अस्तु-शस्त्र हमसे दूर रहे। (१) १ अस्मै आयुः धेहि- इसे दीर्घायु दे। (२) २ मृडत, मृडय नः तनूभ्यः तोकेभ्यः मयः कृधि- २ अयं शतं शरदः जीवाति- यह सौ वर्षतक जीवित हमें सुखी करो, हमारे शरीरको सुस दो और हमारी सन्तानो रहे । (२) अर्थात वंशजोको सुखी करो। (१) ३३ [मथर्व. मा. ४ हिन्दी] करें। (५) जाभो । (६) सौंपता हूँ। (७) (२५८) अथर्ववेदका सुबोध अनुवाद 'दीर्घजीवन और आरोग्य' - - ब्राह्मण ३ हे मन्यो ! सजोपाः तपसा नः पाहि- हे उत्साह ! झो. ७५९ प्रीतिसे युक्त होकर अपनी तपश्चर्याने हमारी रक्षा कर । (२) १ यानः अगपतः पात्, शपतो यश्च नःशपात्, तपसा युजा गन् विजहि- तपसे युक्त होकर मूलात् अनु शुष्यतु- गाप न देनेवाले होते हुए भी हम- शत्रुओको जीत । (३) को जो गाप देता है अथवा शाप देनेवालेको भी शाप देता ५ अमित्रहा दस्युहा विश्वा वसूनि नः आभर- है, वह जइसे ही सूख जाए । (१) शत्रुओ और दुष्टों को मारकर सब धन हमें भरपूर दे। (३) कां. ७४७ त्वं अभिभृत्योजाः स्वयंभूः भामः अभिमाति- १ चिकितुपी रायस्पोपं नः अध धातु-शानसे पाहः विश्वचर्षणिः सहुरिः सहीयान पृतनानु युन्त विद्या हमे धन और पोषण देवे । (0) अस्मासु ओजः धेहि-तू विजयी बलसे युनत, अपनी झां. ७८ गक्तिसे युक्त, तेजस्त्री, गोको हरानेवाला, सब लोगोका १ इमं सर्ववीरं आरे शत्रु कृणुहि- उन सब चीर हित करनेवाला, सामर्थ्यवान और शत्रुओको जीतनेवाला पुत्रोंको शत्रुभासे दूर कर । (१) होकर युद्धक समय हमें सामययुक्त कर । (८) ७ दस्यून् हनाव- हम दोनो मिलकर गओंका वध कां. ४॥३१ करें (६) १ गन् हत्वाय वेदः विभजस्व- गाको मारकर कां. २०१५ धन बांट दे । (२) १ ब्रह्म च क्षत्रं न विभीतः न रिप्यत २ ओजः विमानः मृधः विनुदस्व- अपनी शक्तिको और क्षत्रिय डरते नहीं इसलिए नष्ट भी नहीं होते । (४) मापकर शत्रुओको दूर कर । (२) कां. २०१७ अभिमातिं सहस्व- गनुमोको हरा । (३) १ ओजः सहः वलं आयुः श्रोत्रं चक्षुः परिपाणं ४ शत्रून रुजन् सृणन् प्रमृणन् प्रेहि- शत्रुओंको मे दाः- सामध्य, साहस, बल, आयुष्य, श्रवणशक्ति, मारते, काटने, छिन्नभिन्न करते हुए आगे बढ । (३) दर्शनशक्ति और संरक्षणाक्ति यह सब मुझे दे। (१-७) ५ विगं विशं युद्धाय सं शिशाधि- प्रत्येक प्रजाजन- का.६७ को युद्ध के लिए शिक्षित कर ।( ६वशी वशं नयासे- तू स्वयं संयमी होकर गत्रुको १ येन असुराणां भोजांसि आवृणीध्वं तेन नःशर्म भी अपने आधीन कर । (३ यच्छत-जिससे राक्षसांकी गक्तिको घेरा जा सकता है, उस गानिसे हमें ७ उत्तरं सहः विभर्पि- अत्यधिक उत्तम बल धारण सुस दो 1(३) करता है । (६) कां. ११२ ८ महा धनस्य संसृजि एधि-महान् धन प्राप्त होने- १ हे ऋतावरि ऋतजाते औषधि ! मधुला, मे मधु वाले युद्धस तू जा । (६) करः-हे सत्यपालक और सत्यसे उत्पन्न औषधि ! तु मीठी ९ संसृष्टं सं माकृतं अस्मभ्यं धत्तां- उत्पन्न और है अतः मुझे भी अपनी तरह मीठी कर । (१-१२) प्राप्त किए हुए धन हम दे । (७ कां. ४१३९ १० हृदयेपु भियः दधानाः शत्रवः पराजितासः १ प्रथम आयुः प्रजां पापं रयि- पहले आयु, फिर अप निलयन्तां- हृदयमे भय धारण कर ग पराजित ग्रनाओंका पोषण, फिर धन मुझे प्राप्त हो । (१-१०) होकर भाग जावें । (७) कां. २।१४ कां. ४।३२ १ सर्वान् आजीन् अजैषं इतः सुढान्वा नश्यत- १. विश्वं मह ओजः आनुपर पुष्यति-वह सत्र शक्ति सव युद्ध में जय प्राप्त की है। सारी पीटायें यहांसे दूर हो । (६) और मामब्याको निरन्तर पुष्ट करता है। (६) कां. १२९ २ त्वया युजा दासं आर्य साह्याम- नेरी सहायतासे १ सपत्ना अस्मद्धरे भवन्तु-हमारे शत्रु मधोगतिको हम दास और मायाँको पराजित कर । (३) जावें । (२) सुभाषित (२५९) २ इमं वर्धय, एनं सजातानां श्रेष्ठये आधेहि- इसे कां. २०३३ बढा और इसे अपनी जातिवालोंमें श्रेष्ठ बना। (३) १ यक्ष्मं ते विवृहामि- रोग तुझसे दूर करता कां. १११६ हूँ। (१-७) १ यदि नो गां अश्वं पुरुपं हसि, तं त्वा सीसेन कां. ६।१२७ विभ्यामः- यदि तू हमारी गायों, घोडे और मनुग्न्योको १ परा तं अज्ञातं यक्ष्म अधराञ्चं सुवामसि- उस मारेगा, तो हम तुझे सीसेकी गोलीसे मार देगे । (४) अज्ञात रोगको नीचेके मार्गसे मै दूर करता हूँ। (३) कां. ६।१४ कां. सद १ यक्ष्माणां सर्वेषां विपं निरवोचं अहं न्वत्- सब १वलासं सर्व नाशय- सब कफ दूर कर ।(१) रोग और मृत्यु इन्हे यहांसे दूर करता हूँ। (१-२०) कां. १११२ १ मुञ्च शीर्षक्त्या उत कास एनं परुः परुः कां. १२।२ आविवेश यो अस्य- सिर दर्द अथवा खांसी जो उसके १ यक्ष्मं च सर्व तेनेतो मृत्यु च निरजामसि-सव अंगमे व्याप्त हो गई है दूर हो जाए । (३) रोग और मृत्यु इन्हे यहांसे दूर करता हूँ। (२) कां.४७ २ मृत्यो परं पन्थां अनु परा इहि- हे मृत्यु यहांसे दूर जा । (२१) १ वीरान् नोअत्र मादभन्- हमारे पुत्र और पौत्रोको कष्ट मत दे । (७) ३ इमं जीवेभ्यः परिधिं दधामि, मैपां नु गात् कां. १०४ अपरो अर्थ एतम्- जीवोंके लिए आयुकी मै मर्यादा देता हूँ, कोई भी नीच होकर इस आयुष्यरूपी धनको न १ घनेन हन्मि वृश्चिकं, अहिं दण्डेन आगतम्- हथौडेसे बिच्छुको और दण्डेसे सांपको मारता हूँ । (९ कां. ११२४ ४ शतं जीवन्तु शरदः पुरूची:- सौ वर्पतक जीवित रहे । (२३) १ अनीनशत् कीलासं सरूपां अकरत् त्वचं- ५पर्वतेन मृत्यु अन्तर्दधतां- पर्वत अर्थात् पृष्ठवंशसे सफेद कोढका नाश हुआ और चमढीका रंग शरीरके समान मृत्युको दूर करो । (२३) हो गया है। ६ सर्व आयुः जीवनाय नयतु- जीवित रहनेके लिए कां. २०३१ पूर्ण आयुकी ओर लेजा । (२४) १ ये अस्माकं तन्वं आविविशुः सर्व तत् हन्मि- ७ उत्तिष्ठत, प्रतरत सखायः अग्मन्वती नदी जो कृमि जन्तु हमारे शरीरमे प्रविष्ट हो गए है उन सब स्यन्दत इयम्- उठो, तैरो, हे मित्रो । पत्थरोंसे युक्त यह कृमियोका नाश करता हूँ- उनका नाश करता हूँ। (५) नदी वही जा रही है । (२७) कां. २।३२ ८ शतं हिमाः सर्ववीरा मदेम- सौ वर्षतक सब १ उद्यन् आदित्यः क्रिमीन् हन्तु, निम्रोचन हन्तु मनुष्य पुत्रपौत्रोके साथ मानन्द करें । (२८) रश्मिभिः- उदय होनेवाला सूर्य कृमियोका नाश करे और ९ मृत्योः पदं योपयन्त एत, द्राधीय आयुः प्रतरं अस्त होनेवाला सूर्य अपनी किरणोंसे कृमियोका नाश दधाना:- मृत्युके कदम हटाते हुए चलो, दीर्घायुको और करे । (१) लम्बी करते चलो। (३०) २ ब्रह्मणा संपिनमि अहं कृमीन्- ज्ञानसे मै कृमि- १० दीर्घेण आयुपा इमान् संसृजामि- दीर्घायुसे योका नाश करता हूँ। (३) इसे संयुक्त करता हूँ। (३२) कां. ५।२३ कां. ६८५ १ सूर्यः दृष्टान् नन् अदृष्टान् च सर्वान् प्रमृणन् १ वाचा यक्ष्म ते वारयामहे- वाणीसे तेरे रोगको क्रिमीन्- सूर्य सभी दृश्य और अदृश्य कृमियोका नाम दूर करता हूँ। (३) करता है । (५) खोये । (२३) - - (२६०) अथर्ववेदका सुवोध अनुवाद दीर्घजीवन और आरोग्य' ! कां. ४१३७ २ आपः त्वा मुञ्चन्तु क्षेत्रियात्- पानी तुझे भानुवं- १ अजशंगि अज रक्षः सर्वान् गन्धेन नाशय- हे शिक रोगोये यचावे । (५) मजगि ! तू अपने गधसे सब राक्षसो-राग--जन्तुओंका कां.४१३ नाश कर । (२) १ बात आ वाहि भपज-हे पायो ! भोपध लेकर २ पिशाचान् सर्वान् ओपधे प्रमृणीहि सहस्व च- आ। (३) हे औषधि । सब पिशाचो-रोगकृमियों को नष्ट कर । (१०) २ त्वं हि विश्वभेषजो देवानां दृतः इयसे- तू मब मोपधिरूप देवोका दूत होकर जाना है । (३) फां.६.३२ ३ अयं मे हस्तो भगवान्, अयं मे भगवत्तर:- मेरा १ आराद् रक्षांसि प्रति दह- पाससे राक्षसोको जला हाय भाग्यवान है, मेरा हाथ भोर अधिक भाग्यशाली है। (६) दे । (१) ४ अयं मे विश्वभेपजः, अयं शिवाभिमानः- मेरा २ मिथो विघ्नाना उपयन्तु मृत्युम्- तुम परस्पर हाय सब औषधियों के प्रभावसे युक्त है और वह कल्याण एक दूसरेको मारते हुए मृत्युको प्राप्त हो । (३) करनेवाला है । (३) कां. २१९ ५ हस्ताभ्यां दाशाखाभ्यां जिद्वा वाचः पुरोगावे १ य. चकार स निष्करत् सुभिपक्तमः- जो मोपधि अनामयित्नुभ्यां हस्ताभ्यां ताभ्यां त्वाभि मृगामास- तैय्यार करता है, जो उत्तम औषधि तैय्यार करता है, वही दस (उंगलियोरूपी) शासाओंसे युक्त अपने हाथोसे तुझे में उत्तम वैद्य होता है । (५) छूता हूँ। जीभसे उन्मादायक शब्द बोलता हूँ, यह मेरा हाथ भारोग्य देनेवाला है, उससे मैं तुमे स्पर्श करता हूँ। (७) कां. २१८ १ वीरुत् क्षेत्रियनाशनी क्षेत्रियं अप उच्छतु- यह कां. दा.३ औपधि नानुबंशिक रोगोका नाग करनेवाली है, वह क्षेत्रिय १ ब्राह्मणेभ्यः इदं नमः-ज्ञानियोंके लिए यह नमस्कार रोगोको हो। (३) कां. ३७ कां. ४॥३५ १ आपः विश्वस्य मेपजी:- पानी सब रोगोंको दूर १ विश्वजितं ब्रह्मौदनं पचामि-विश्वको जीतनेवाला करनेवाली है। (५) ज्ञानरूपी भन्न मै पकाता हूँ। (७) दूर करे।
अथर्ववेदका सुवोध अनुवाद [ भाग चौथा ] 'दीर्घजीवन और मारोग्य' उ प मा सू ची ४ - पृष्ठ १ अपां गर्भ इव जीवसे त्वयि बध्नामि- (१११४२६) जलोके गर्भके समान इस प्राणको अपने अन्दर बांधकर रखता हूँ। २ जातं अग्निं इव त्वा प्राणेन संधमामि- (४) जिस प्रकार भग्निकी छोटीसी ज्वालाको फूंक फूंककर प्रदीप्त करते है, उसी तरह इस मनुष्यके प्राणको हम प्रदीप्त करते है। ४६ ३ यत् सर्वं दुर्भूतं तत् तमः इव अप इन्मसि- ( ८1१२) जो कुछ अकल्याण करने- वाला है, उसे हम अंधकारके समान हटा देते हैं। ४ अनड्वाही ब्रजं इव प्राणापानौ प्रविशत- ॥५३॥५, ३।१११५) जिस प्रकार दो बैल बाडेम घुसते हैं, उसी प्रकार प्राण और भपान मेरे शरीरमे ६२, ८१ ५ अयं शेवधि:- (७५३।५) यह प्राण एक बहुत बदे खजानेके समान है। ६२ ६ श्येनः इव यक्ष्मः परस्तरां प्रापप्तत्- (५।३०१९) जिस प्रकार वाज दूर दूर तक उडता चला जाता है, उसी तरह यक्ष्मरोग यहुत दूर भाग ४८ ८ प्रमनाः माता पुत्रं उपस्थे इव मित्रः मित्रियात् एनस. एनं पातु- (२१२८११) जिस प्रकार प्रसन्न मनवाली माता अपने पुत्रको अपने गोद- मे लेकर प्यार करती है, उसी तरह मित्र मित्रविष- यक पापसे.बचाकर इसे प्यार करे । ९ आदितेः अस्मै माता इव शर्म यच्छ-(२॥ २८१५) हे मादिशक्ते । इसे माताके समान सुख दे। १० इन्द्रे इन्द्रियाणि इव दक्षमाणः हिरण्यं विभ्रत्- (१॥३५॥३) जिस प्रकार आत्मामे इन्द्रिय धारण की जाती है, उसी प्रकार बल बढानेकी इच्छा वालोको सोना धारण करना चाहिए। ११ अशपतः शपतः नःशपात्- (७५९१) शाप न देते हुए अथवा शाप देते हुए हमें जो शाप देता है, वह आ मूलात् अनु शुप्यतु विद्युता आहतः वृक्षः इव-जह सहित उसी प्रकार सूख जाए, जिस प्रकार बिजलीके गिरनेपर वृक्ष सूख जाता है । १०७ १२ अस्य दहतः अग्नेः दहतः दावस्य- (७॥ ४५/२) इस मनुष्यकी ईर्पा जलनेवाली भनिने समान अथवा बहुत प्रज्ज्वलित वनाग्निक समान है। १०७ १३ एतां ईपा उद्गा अग्निं इव शमय- (01 ४५४२) इस मनुप्यकी ईर्पा पानीले अग्निरे समान शान्त हो जाये। १०७ १४ नरः तिग्म-इपचः अनिरूपाः-(३१) नेतागण तीक्ष्ण शशस्रोले युक्त पौर अभिने समान तेजस्वी हो। प्रविष्ट हों। जाए। ७ उक्षणः गां रज्ज्वा इव जरिमा त्वा आभ आहित-(३११८) जिम प्रकार बैल या गायको रस्सीसे बांध देते हैं, उसी प्रकार वृद्धावस्थासे तुमे बांध दिया है।
(२६२) अथर्ववदका मुबोध अनुवाद - 'दीर्घजीवन आर आरोग्य' - चला जा। 160 वाण वेगले १५ मन्या अग्निः इव विपितः सहस्त्र- २४ मुरकर यथा बलासं निक्षिणामि- (३२) हे उ माह ' तू अग्निक समान तेजम्बी ( ६।११।२) जिग्य प्रकार चोरको दूर किया जाता है, होकर यात्रुमाको हटा। ११२ उसी प्रकार गगीने यक्ष्माको दर करता हैं। १६ मन्युः इन्द्रः इव विजेपकृत्- (३०) २५ रे बलान अशुंग. शिशुक यथा इत. यह उत्साह इन्द्रक समान विनय करनेवाला है। १९३ नि प्रपत-(६१४३ ) है यक्ष्मा गंग | वेगसे दौडनेवाले यरटेक समान त भी यहां दूर भाग जा। १६९ १७ यथा द्यौः पृथिवी, अहः रात्री, सूर्यः चन्द्रः, ब्रह्म अनं, सत्यं अनृतं, भृतं भव्यं न २६ हायनः इटः इव अवीरहा अप द्राहि- विभीतः न रिप्यतः, मे प्राण मा विभेः- (२॥ (१३) जिस तरह प्रतिवर्ष बरमातम होनेवाली १५.५-६ ) जिस प्रकार द्युलोक और पृथ्वीलोक, दिन वास नष्ट हो जाती है, उसी तरह वीगंका नाश करने. मौर रात, सूर्य और चन्द्र, ब्रह्म और क्षत्रिय, सत्य वाले हे रोग ! तू भी नष्ट हो जा। १६९ और अनृन, भूत और भविष्य न डरत है और न २७ यथा आशुमत् मनः परा पतति एवा काले दुग्णी होते है, उसी प्रकार हे प्राण ! तू भी मत डर । १२८ प्र पत- ( ६११०५।१ ) जिम प्रकार वेगवान मन दूर १८ सर्वाः अपचितां वाकाः इव नश्यन्तु- दूर जाता है, उसी प्रकार हे खांसी संग तू भी दर ( दा२५/१-३ ) सभी पीटाये उसी प्रकार नष्ट होजाणे, जिस प्रकार पृननीय सज्जनोक सामने सामान्य मनु- २८ यथा सुसंशितः बाणः परा पतति कासे ग्योकी बात। १२० प्र पत-(६१०५।२) जिस प्रकार भनि तीक्ष्ण दूर जाता है, उसी तरह हे सांगी। तु भी १९. देवेभ्यः आवृश्चन्ते सर्वढा पापं जीवन्ति, दूर चली जा। १७० अग्निःअनुवपते-(१२।२५०) जो देवास स्वयको दूर रसते है और पापी जीवन व्यतीत करते है, अग्नि २९ यथा सूर्यस्य रश्मयः परा पतन्ति कासे उनका उसी प्रकार नाग करना है, जिम्न प्रकार अश्वः समुद्रस्य विक्षरं प्रपत-(६।१०५३ ) जिस तरह इच नडं बोटा घासका नाम करता है। सूर्यकी किरण दृर दर जाती है, उसी तरह हे सांसी' समुद्र के प्रवाहके समान तू दूर चली जा । १७० २० यथा वृत्रः आपः तस्तम्भ, ते यक्षम अग्निना वारये- (६८१३) जिग्न प्रकार वृत्र ३० हे ब्रह्मणस्पते ! यः अयं वक्र: वि अंगः पानियोको रोक लेता है, उसी प्रकार तेर यमारोगको इपिकां इव सं नमः- (७५६८) हे ज्ञानी जो अग्निक द्वारा गेक्ता हूँ। यह टेढा और विकृत अंगोवाला है, उसे मुनकी तरह १६५ १७४ २१ दहतः शुष्मिणः अस्य अग्नेः इव- ३१ हे मदावति! ते मदं शरं इव वि पात- (६२०११) जलनेवाले बलवान् अग्निकी गमीक समान यामसि-(७) हे मूळ तुझ मृ को हम बाण यह ज्वर व्यापता है। २६८ के समान दूर करते है। २२ उत मत्तः हव विलपन अपायति- ३२ येपन्तं चरुं इव वचसाप्रस्थापयमासि- ( ६२०११ ) और उन्मत्तके समान वदवढाता हुआ निकल जाना है। (१७४) चुनेके बर्तनके समान हे मुठे! तुझे हम १६८ बचा औषधिके द्वारा दूर करते हैं। १७७ २३ उर्वानीः मूलं इव अस्य बंधन छिनद्मि- ३३ आचितं ग्राम इव वचसा परि स्थापया- (६१४२) जिस प्रकार सरवृजकी जडको नोट देते मसि- (७) एकत्रित हुए हुए गांवके लोगोके है, उसी प्रकार इस मनुप्यके वचनको तोडता हूँ। समान हम वचासे औषधियोंको रोकते है। १७७ सीधा कर ।
उपमासूची (२६३) - पृष्ठ पृष्ठ ३४ स्थानि वृक्षः इव तिष्ठ- (४७५) हे ४३ स्तुकां इव आसां प्रथमां मध्यमां जघ- रोगो । अपने स्थानो पर वृक्षके समान स्थिर रहो। १७७/न्यां आछिनमि-(७७४२)निस प्रकार गांठको खोलते है, उसी प्रकार प्रथम, मध्यम और निकृष्ट- ३५ उदप्लुतं दारु इव अहीनां उग्रं विषं- प्रकारकी गण्डमालाको नष्ट करता हूँ। (१०४४) जिस प्रकार भरे पानीमें लकडी बह २०१ जाती है, उसी प्रकार श्वेत औषधिसे सापोका भयंकर ४४ अयं अंशुः इव आप्यायतां-(५।२९। विष भी बह जाता है। १७९ १२-१३) यह रोगी मनुष्य स्वस्थ होकर चन्द्रमाके समान वृद्धिको प्राप्त हो । ३६ पोजिष्टः सिन्धोः कर्वरं मध्यं परेत्य इव अहेः विपं व्यानिजम्-(१०१४४१९) जिस प्रकार ४५ दृपदा खल्वान् इव क्रिमीन संपिनष्मि- मल्लाह नदीके गहरे मध्यभागमे जाकर फिर वापस (२।३११) जिस प्रकार पत्थरोसे चने पीसते है, २०७ मा जाता है, उसी तरह मै भी सांपोके विषको नष्ट उसी तरह मैं रोगोकी क्रिमियोको पीसता हूँ। करता हूँ। ४६ अत्रिवत्, कण्ववत्, जमदग्निवत् ३७ उर्वरीः इव आपधीनां अहं साधुया वृणे- क्रिमयो हन्मि-(२१३२।३ ) अत्रि, कण्व और जमदग्निके समान में कृमियोको मारता हूँ। २२० (२०११।२१) जिस प्रकार उपजाऊ भूमिसे अच्छा धान्य अनायास ही प्राप्त किया जा सकता है, उसी तरह ४७ चतुःपक्ष छदिः इव अदः अवरोचते- औषधियोको भी मै सरलतासे ही प्राप्त करता हूँ। १८० (३७३) चार कोनोवाली छतके समान हिरणकी सीग चमकती है। २२४ ३८ धन्वन् इरा इव ते विपं (५।१३१) रेगिस्तानमे जिस प्रकार पानीकी धारा ४८ मुष्कवहः गवां इव विष्कन्धं वधि नष्ट हो जाती है, उसी प्रकार तेरे विपको दूर करता हूँ। कृणोमि-(३।९।२ ) जिस प्रकार अण्डकोष तोडने- वाला बैलोको निर्वीर्य करता है, उसी प्रकार मैं रोगो- को निर्वीय करता हूँ। २२९ ३९ तमसः ज्योतिः सूर्यः इव उदेतु-(५॥ १३३३ ) अंधेरेमे प्रकाश देनेवाले सूर्यके समान यह ४९ कपिः शुनां इव वन्धुरा काववस्य- उदयको प्राप्त हो। ( ३।९।४ ) जिस प्रकार बन्दर कुत्तोको तुच्छ समझता १८२ है, उसी प्रकार रोगोका प्रतिबंध करना चाहिए। २३० ४० धन्वनः ज्यां इव रथान् इव सत्रासाहस्य मन्योः विमुंचामि- (५।१३।६) धनुषकी डोरी ५० आशवः रथाः इव शपथेभि उत सरि- अथवा रथके बंधनोंके समान क्रोधी सांपके विषको व्यथ- (३६९।५) वेगवान् रथोके समान शापोंसे शिथिल करता हूँ। २३० ५१ समुद्रस्य उदधिः इव ते वस्तिविलं ४१ सूर्य द्यां इव अहीनां जनिम परि अगम- विषितं- (११३८) जिस प्रकार तलावके पानीके (६।१२।१ ) जिस प्रकार सूर्य द्युलोकको जानता है, लिए मार्ग साफ करते है, उसी प्रकार तेरे मूत्रमार्ग- उसी प्रकार में सांपके जन्मोको जानता हूँ। १८७ को साफ करता हूँ। २३५ ४२ प्रेष्यन् शेवधिं जनं इव तक्मानं परि ५२ धन्वन. अवसृष्टा इपुका परापतत् ते दद्मसि-(५/२२११४) जिस प्रकार खजानेकी रक्षा मूत्रं मुच्यता (१३।९) धनुषसे छूटा बाण जिस करनेवाले मनुष्यको दूर भेजा जाता है, उसी प्रकार प्रकार दूर जाकर गिरता है, उसी प्रकार तेरा मूत्र दूर हम ज्वरको दूर भेजते है । जाकर गिरे। २३५ निजजास- १८३ / दूर भाग जाओ।
अथर्ववेदका सुवोध अनुवाद [ भाग चौथा ] 'दीर्घजीवन और आरोग्य । कांडक्रमानुसार सूक्तकी अनुक्रमणि का कांड मंत्रसंख्या पृष्ठ कांड सूक्त मंत्रसंख्या पृष्ठ ९ २ २८ ९ ४ २९ २७० ८३ २०७ २०९ १६ ४ ६ ૨૨ ३३ ४ ७ ७ ७ १९७ । १९५ १९२ १०५ २५ ४ ९ द ८ ४ २८ ६ ३० ३५ ३ ६ २ ७ २२५ २२९ ७९ २२६ १७५ १७७ २३९ ११२ ११५ २५० २१३ ૨૨૨ ९ ५ १० ૨૨. २२० શરૂ १२७ ३१ ३२ ३५ ૩૭ ३९ ७ द १५ १७ ૨૨ ७ १९ १३४ ११ १२१ १५ २२ ૨૨ १३५ १३५ २११ ५ ૨૨ १३५ २९ १५ २०२ ६६ अनुक्रमणिका (२६५) कांड मंत्रसंख्या पृष्ठ कांड सूक्त मंत्रसंख्या पृष्ठ ३१ ७ ५ ६ २ ७ ३ ७१ १२० २८७ ६१ ૨ १२ १३ ३ ३ M २०८ २०९ २७३ ११० ३ २० ५७ २ .0 २ २ २०७ २५ ૨૨ ५६ ८३ ३ १ ४ २०० ४ १६८ १२० २१८ १८७ २०१ २४२ १६५ २१९ १८६ १७० १.६७ ७४ ७६ ८८ दि ३ or ८५ ९६ OM २०४ ९४ ११६ ३ २ ८ १ २१ २८ १२७ ३ २ ४६ ८ २२ १ १ ३२ ३३ ६ २६ १७८ M ६५ ६५ १०४ १०७ ११ २६ १ १ ४५ २ २ ३४ (मथवं. भा. ४ हिन्दी) अथर्ववेदका सुवोध अनुवाद [ भाग चौथा ] 'दीर्घजीवन और आरोग्य ' कांड-सूक्त-विषय-मंत्रसंख्या-ऋषि-देवताकी अ नु क्र मणि का कांट नित 2 ८ २ ७ ७ ३३ १ ३० ७३ २८ १२ ३ २ विषय मंत्रसंख्या ऋषि देवता १ प्राणका सरक्षण भागवो वर्तमः प्राण २ दीर्घायु प्राप्त करनेका उपाय २१ ब्रह्मा आयुः ३३ ३ दीर्घायु २८ ब्रह्मा आयुः ४४ ४ दीर्घायु ब्रह्मा आयुः. बृहस्पतिः, अश्विनी च ६३ ५ प्रजा, धन और दीर्घायु ब्रह्मा मरुत., पूषा, वृहस्पति , अग्नि.६५ ६ दीर्घायुकी प्रार्थना ब्रह्मा आयु ७ दीर्घायुकी प्राप्ति १७ उन्मोचनः (भायुकामः) मायुप्यम् ६६ । वातक प्रयोगको दर करना शुक्रः कृत्यादयणम् ७१ ९ दीर्घायुष्य और तेजस्विता १४ अथवा त्रिवृत, भग्न्यादयः १० हवनसे दीर्घायुष्य ब्रह्मा, भृग्वंगिरा., इंद्राग्नी, भायुष्य, यक्ष्मनाशनम् ७९ १५ दीर्घायु, पुष्टि और सुप्रना अथर्वा नानादेवता. १२ दीर्घायुष्य-प्राप्ति गमः ८८ १३ तेजस्विता, बल और भयर्वा भाय कामः हिरण्य, इन्द्राग्नी, विश्वेदेवाः ९३ दीर्घायुकी प्राप्ति १४ आयुष्य-वर्धक-सूक्त भयर्वा (आयुकामः) विश्वेदेवाः १५ स्वावलंबिनी प्रना भयवी सोम. २०४ १६ वाणी प्रस्ऋत्र: १०४ शान्तातिः सुखम् १०५ १८ मुख-प्राप्ति-मून ब्रह्मा इंद्रादयः १०५ १९ मापका दुष्परिणाम १ बादरायणि अरिनाशनम् १०७ २० ईर्ष्यानिवारक मौषध २ प्रस्कण्वः, अथवा इप्यापनयन, भषजम् १०७ २१ अमृतमक्ति २ नयी २२ ज्ञान और कर्म ब्रह्मा, भृगु. ऋक्माम, इन्द्रः १०८ २३ प्रकारका मार्ग भृगु. इन्द्र १०९ जरिमा, मायुः २८ ३५ ३ 2 १७ मुस ७ ७ २ ७ ऋपि-देवताकी अनुक्रमणिका (२६७) 1 ५७ विपय २४ मनुप्यकी शक्तियाँ २५ बलदायी भन्न मंत्रसंख्या ऋषि २ वामदेवः २ कोरुपथि. उपरिवभ्रव. २६ कल्याण प्राप्त कर १ ४ २७ उत्साह ब्रह्मास्कन्द: ३१ ३२ ७ ब्रह्मास्कन्दः २ ६ ब्रह्मा १५ १७ ૨ ७ ब्रह्मा ६ २५ शुन.शेप. ६ ७ ५ १५ ३ १२ १० अथर्वा विश्वामित्र अंगिराः मधुला वनस्पति. 2 २ ६ २८ उत्साह २९ निर्भय जीवन ३० आत्मसंरक्षणका बल ३३ कष्टोको दूर करनेका उपाय ३२ अद्रोहका मार्ग ३३ सत्यकी विजय ३४ समृद्धिकी प्राप्ति ३५ विपत्तियोको हटानेका उपाय ३६ वर्चःप्राप्ति-सूक्त ३७ शुद्धिकी विधि ३८ दुष्ट दमन ३९ चोरनाशन-सूक्त ४० डाकुओंकी असफलता ४१ यक्ष्म-निवारण ४२ यक्ष्मरोगनाशन ४३ यक्ष्मचिकित्सा १४ यक्ष्म-नाशन १ or चातन. अथर्वा अथर्वा २५ २ १९-२३ २ चातनः ovom १ ४ चातन. देवता पृष्ठ सरस्वती इन्द्रावरुणौ बृहस्पतिः ११२ मन्यु. ११२ मन्युः प्राणः, थपाना, मायु प्राणः, अपान', आयु ११९ मन्याविनाशनम् १२० सोम., अदितिः, विश्वेदेवाः १२० १२१ नानादेवता., संनति. ૨૨૨ शालाग्निदेवत्यम् १२७ वस्वादयो नानादेवताः १३० अग्निः, वायु., सूर्यः, आप. १३४ भनि अग्निः, इंद्र, वरुण १४१ मायुष्यम् १४३ सर्वशीर्षामयाद्यपाकरणम् १४५ अग्नि , मंत्रोक्ताः, मृत्यु वनस्पति १६५ यक्ष्मनिवईण, चंद्रमा., आयुष्यम् १६६ वनस्पतिः, यक्ष्मनाशनम् १६७ यक्ष्मनाशनम् १६८ बलासः १६९ कासा १७० यक्ष्मनाशनम् १७० वृश्चिकादय., वनस्पतिः, ब्रह्मणस्पति १७३ तक्षक. १७५ वनस्पति. १७७ तक्षक ૭૮ तक्षक, विषम् १८२ तक्षक वनस्पति विश्वेदेवा , रुद्र १८७ २ ८ ૨૨ ब्रह्मा भृग्वंगिरा. भृगुः अथर्वा ૨૨ २ ६ ३ ७ २ ३ बझा ६ ३ १२७ २० ३ ६ ६ ६ ४५ कफक्षयकी चिकित्सा ४६ क्षयरोगनिवारण ४७ क्षयरोगका निवारण ४८ खासीको दूर करना ४९ श्वासादिरोग निवारण-सूक्त ५० विषचिकित्सा भृग्वंगिरा. भृग्वंगिरा. बभ्रुपिगल. उन्मोचनः भृग्वंगिरा अथर्वा १ १०५ १२ ५६ ४ ८ + ४ ७ २६ ५ ५१ विपको दूर करना ७ ५२ विषको दूर करना ५३ सर्पविष दूर करना ५४ सर्पविष दूर करना ५५ सर्पविष १०० ५६ विषनिवारणका उपाय ५७ सर्पसे बचना ३४७ [भयर्व. मा. ४ हिन्दी] गरुत्मान् गरुत्मान् गल्मान् गरुमान् गरुत्मान् गरुत्मान् शन्ताति. ७ or ६ ३ ६ (२६८) अथर्ववेदका सुबोध अनुवाद दीर्घजीवन और आरोग्य' कांड व ३ ७ १ .. १ a ७ ६ २ ३१ ५ सूक्त विषय मंत्रसंख्या ऋषि देवता ૧૨ ५८ सर्पविष निवारण गरुत्मान् तक्षक ५९ ज्वर २ अया, संगिग. चन्द्रमा. १८८ २२ ६० ज्वर-निवारण भृग्वंगिरा तक्मनामना २५ ६, गीत-ज्वर-दूरीकरण सूक्त ४ भृग्वंगिरा यक्ष्मनागनोऽग्नि. १९२ २४ ६२ कुष्ठनागन सूक्त द ब्रह्मा भासुरी, वनस्पतिः २९५ ६३ श्वेतकृष्ट-नागन-सूक्त ४ अथर्वा औषधि १९७ ७६ ६४ गण्डमालाकी चिकित्सा अथर्वी अपचिद्भपज्यं, जायान्यः, इन्द्र१९९ G2 ६५ गण्टमालाकी चिकित्सा द अथर्वागिरा मंत्रोक्ता', जातवेदा २०० ૮૩ ६६ गण्डमालाका निवारण भगः मन्त्रोक्ताः २०१ २९ ६७ रोगकृमि निवारण १५ चातनः जातवेदाः, मंत्रोक्ता ૨૦૨ ६८ रोगोत्पादक कृमि ५ काण्व. मही, चन्द्रमा. २०७ ६९ क्रिमिनाशन ६ काण्वः मादित्यः २०८ २३ ७० रोगकृमिका नाम १३ कण्वः इंद्रः ३७ ७१ रोगकृमिका नाग बादरायणि मजरंगी, अप्सरस. २१३ ३२ ७० रोगकृमिनाशक हवन ३ चातनः, अथर्वा अग्निः, रुद्र , मित्रावरुणोः २१८ ९६ ७३ रोगोंसे बचना भृग्वगिरा वनम्पति , सोम. ७१ संधिवातको दूर करना भृग्वं गिरा वनस्पति , यक्ष्मनाशनम् २२० ८ ७५ क्षेत्रिय रोग दूर करना भृग्वगिरा. वनस्पति , यक्ष्मनाशनम् २२२ ७ ७६ आनुवंशिक रोग दूर करना ७ भृग्वगिरा यक्ष्मनाशनम् २२४ ७७ पशुओकी स्वास्थ्य रक्षा ६ ब्रह्मा यामिनी ૨૬ ७८ केटा-प्रतिबंधक उपाय वामदेव यावापृथिवी, विश्वेदेवा. २२९ ७९ मारोग्य सूक्त अंगिरा भैपज्य, माय , धन्वन्तरि. २३३ ३ ८. आरोग्य सूक्त, मुत्रदोष निवारण ९ अथर्वा मन्त्रोता. नानादेवता. २३४ १३ ८१ हस्तस्पर्णसे रोगनिवारण ताति चंद्रमा, विश्वेदेवाः २३९ ८. दुर्गतिसे बचना ४ मग. निर्जति २४२ १० ८३ दुर्गतिसे बचनेका उपाय ८ निऋति , द्यावापृथिवी, नानादेवता २४३ १३ ३ अथर्वा मृत्युः २४९ (स्वस्त्ययनकाम ) ८५ मृत्युसे संरक्षण ७ प्रजापतिः अतिमृत्यु. २५० १ द ८ द ३ . २ २ २ द द द २ भृगु. अंगिरा. द ८४ मृत्यु द अथर्ववेदका सुबोध अनुवाद [ भाग चौथा ] 'दीर्घजीवन और आरोग्य' वर्णानुक्रम मन्त्र-सूची मन्त्र पृष्ठ पृष्ठ २४४ अधीतीरध्यगाद अनड्वाहं प्लवमन्या अना। ये वः प्रथमा अनु त्वा हरियो अनुहृतः पुनरेहि पन्तकाय मृत्य अन्तरिक्ष धेनुस्तस्या अन्तरिक्षे वायवे अन्तर्गमश्वरति १५७ १७८ २२४ ६७ २२५ १६८ १७४ १८९ . १०३ ३ ४७ अन्तर्दावे जुहुता अक्षाभ्या ते नामिकाभ्या अक्ष्यों नि विध्य हृदयं २०३ मनावनिश्चरति प्रविष्ट १२४ मग्नि. सूर्यश्चन्द्रमा ७३ भनिरिव मन्यो अग्निस्तक्मानमप अग्ने अव्यानि १५६ भने यत् ते तपस्तेन १३४ अमे यत् ते तेजस्तेन १३४ अग्ने यत् तेऽचिस्तेन १२४ अमे यत् ते गोचिस्तेन १३४ अग्ने यत् ते हरस्तेन १३४ अमेरिवास्य दहत १६८ अग्नेरिवात्य दहतो १०७ अग्ने शरीरमसि अग्नेष्टे प्राणममृता ४८ अघशंसदुःशंशाभ्या अघावस्येदं भेषज अङ्गमेदमज्वर १४५ अङ्गभेदो अड्गज्वरो अजादशात् प्रयादय अझेअझे शोचिषा १७१ अनेअझै लोम्निलोम्नि १६७ मस्त्रिवद व क्रिमयो २१०, २१२ अदन्ति वा पिपीलिका १७४ अदो यदवधावति अदो यदवरोचते अघराच प्रहिणोमि भधि भूहि मा रमया ४७ २१८ १५६ १९० १५१ २०८ ४९ अन्तधिदेवानी अन्यक्षेत्रे न रमसे अन्येभ्यस्त्वा पुरुषेभ्यो अन्वान्च्य शीर्पण्यमयो अहे च त्या रात्रये अपचिता लोहिनीनां अपचितः प्रपतत अपथेना जमारणा अपवासे नक्षत्राणा अपानति प्राणति अपा तेजो ज्योति. अपामा पाने यतमो अपात्य गार्हपत्यात मन्त्र अभिवृष्टा ओषधयः अमीहि मन्यो अमुक्था यक्ष्माद् दुरिता अमुत्रभूयादधि अमू ये दिवि सुभगे अयं यो अभिशोचयिष्णु अयं यो वो अयं यो विश्वान् अय लोक प्रियतमो अयं जीवतु मा मृतम अयं ते अस्म्युप न अय देवा इहैवास्त्वयं अयज्ञियो हतवर्चा अयमग्निरूपसद्य अय मे हस्तो अयस्मये द्रुपदे अरघुषो निमज्य अरस प्राच्य विषमरस अरसस्त इपो शल्यो अरसस्त शर्कोटस्य अरसास इशाहयो अरायक्षयणमसि अरस्राणमिदं महत् अर्जनि पुनर्यो यन्तु अल्गण्इन हन्मि महता अवकादानभिगोचा. अब वावे द्विषन्त अव श्वेत पदा जहि अवि कृष्णा भागधेय भश्मन्बती रीयते ३७ १५५ ६७ २४० २४२ १७९ १७७ १७६ १७४ २०१ ७२ २२५ awww om २३३ १४२ २०८ अपेय रात्र्युच्छतु अपेद्यरिरस्यरिर्वा अभयं मित्रावरुणा अभाग सन्न परेतो अभि त्वा जरिमाहित अभि प्रेहि दक्षिणतो १५५ २२३ १८५ २१८ ११६ २५२ १७९ १५८ १५३ prostor (२७०) अथर्ववेद्का सुबोध अनुवाद - वीर्घजीवन और आगन्य' wave Aio पूर अग्रेमाणो अधारयन BE अष्ट च मेऽशांतिव अष्टाचा वर्तत असित ते प्रलयन असितस्य तमातस्य अमुराणा दुहितासि असूतिका रामाय० - असा यो अवराद 7 -- २०२ १९९ ६२ प्रष्ट २२९ पायर्या निहित ४६ युधिर म आ रमरमामाय tani भारादगति निति । ६.५ पापा १९७ और अभद्र नियमगंदविणे । उगाने १८३ श्रारेडमारमदस्तु ६.' १९.१५ नगर १८३ । आ रोहतायु आलिपिलिग आज पीनी १०७ मावतरत आसत. अपार १९७ भावात वादि भेष उपनाम पनि मानी आगाण कर्जमुत १६७ दगानी १६९ । प्रामुरी चो प्रयोट प्राचीन परिभिः १५० जा मुस्तम नमो १३० । साम्रो पलामो मग जगमीद आहामविद त्या आजाद nि ४७ ३७ यानं ने पर १३० इदं विपन्ध महत १४२ सहर तमगर २११ इद पंढो अजायत १७१ उपनामा नगरनि इन्द्र एता समजे उप प्रिय पनि इन्द्रम्य प्रथमो रथयो १७८ उपद पुनयों यन्तु १५७ इन्दम्य या मही सगुलाया दुदिना २२० इन्द्रस्य वचसा वयं १६५ ऊर पाते भष्टावद्भया इन्द्राउहणा मधु १११ ऊर्जमस्मा कस्तो २३९ इन्द्रावणा नत अर्थ मुप्तेषु जागार उद्रेण दत्ता वरुणेन ऋान माम यजामहे ३ इन्द्रो जघान प्रथम मच साम पदप्राक्ष ૨૩ इन्द्रो मेऽहिमरन्धयत् (१६.१५) १८० ऋतृभिटवार्तरायुपे २१४ इम कन्यादा विवेश भरपी बोधप्रतीयोचा. १६६ इमं जीवभ्यः परिधि १५० एक पादं नोटिवदति २२५ इममग्न आयुष वर्चसे एकगत विष्कन्धानि एका च मे दश च मे १३५ इममिन्द्र वहि १५७ एक्स्यपा सृष्टया १३५ इमा नारीरविधवा १५ एका घटनाममि इमा या देवीः प्रदिश. ०४३ एतास्ते अने ममिय १३५ इमास्तिस्रो देवपुरा ७५ एन्यका श्येन्येका कृष्ण १२४ इमे जीवा वि मृत १५२ एयमगजोषधीना इय वीरुन्मवुजाता १७४ एवो पस्मिन्नित इयमन्तर्वदति जिहा एपा पशून्त्स क्षिणाति इपाका जरतामिष्ट्वा १५८ ऐतु प्राण ऐतु मन इह तेऽसुरिह प्राण ऐपा यज्ञमुत वर्गों अरियजम्य क्लिामम्य अस्थिभ्यस्ते मनभ्य अस्थिम परुमम् अरिमन क्य संकमुके जस्मिन वमुवमा अस्मै मृत्यो अधि अस्य देवाः प्रदिगि अस्येन्द्र कुमारस्य अहा अरातिमविदः अदीनां सर्वेषां विप अहोरात्र अन्वेपि आगादुदगादय आ ने प्राण सुवामसि मा स्वागम शंतातिमि. आ त्वा वृतत्वयंमा आथर्वणीराक्षिरसी आददगा कुविदना मानृत्यन गिखण्डिनो आन्त्रेभ्यस्ते गुदाभ्यः आप इट वा उपजी. आषो यद् व नाचिस्तेन आपा यद वस्तपम्तेन आपो यद वस्तेजन्तेन आपो यद् वोऽचिस्तन आपो यद वो हरस्तेन माभूत्या सहजा वन आमे सुपक्चे शवल आयमगन युवा मिषा आयुरस्म हि आयुरस्यायुर्मे दा २४ १८३ १०० १०९ १५६ इममादित्या वमुना ७३ २१४ २४२ २०७ वर्णानुक्रम मन्त्र-सूची (२७) मन्म पृष्ठ पृष्ठ पृष्ठ १८९ ७४ २११ १८० १७७ १४५ १२३ १२४ २२९ १९७ १०८ १०८ २०७ १८६ ४७ २२० १५० १२३ भोको अस्य मूजवन्त मोजोऽस्योजो में भोते मे द्यावापृथिवी औषधीनामह वृण करम्भ कृरवा तिय कर्णाभ्यां ते कळूषेभ्यः कर्णा श्वावित् तदवर्वाद कर्शफस्य विशफस्य किलासं च पलित कुटुं देवीं सुकृतं फुहूर्देवानाममृत कृणोमि ते प्राणापानौ कृल्याकृतं वलगिन कैरात पृश्न उपतृण्य केरातिका कुमारिका ऋयादमग्निमिषितो क्रव्यादमभि प्र हिणोमि क्रव्यादमानि शशमानम् ऋम्यादमने रुधिरं क्षीरे मा मन्ये यतमो क्षेत्रियात् त्वा नित्या गन्धारिभ्यो मूजवद्भयो प्रात्या गृहाः सं सृज्यन्ते ग्रीवाभ्यस्त उष्णिहाभ्यः घृतादुल्लुप्तं मधुना चक्षुरसि चक्षुर्म चक्षुषा ते चक्षुहन्मि चतस्त्रश्च मे चत्वारिंशय चन्द्र यत् ते तपस्तेन चन्द्र यत् ते तेजस्तेन चन्द्र यत् तेऽचिस्तेन चन्द्र यत् ते गोचिस्तेन चन्द्र यत् ते हरस्तेन जनाद् विश्वजनीनात् जरायुजः प्रथमः जरायै त्वा परि जाया इद वो अप्सरसो जीवता ज्योति ७२ १८३ १८० १४९ १४९ १५० २०४ जीवला नघारिषा जीवानामायु प्र जीवेभ्यस्त्वा समुद्रे जणि पुनर्वो यन्तु तक्मन् भ्राता क्लासेन तक्मन् मूजवतो तक्मन् व्याल वि गद तथा तदग्ने कृणु तस्तुव न तस्तुर्व ता अघरादुदीचा. तावुव न तावुवं ताधिीरने समिधः तासु त्वान्तर्जरस्य तिरश्चिराजेरसितात् तिस्त्रश्च मे त्रिशच तुभ्यमेव जरिमन् तुभ्यं वात पवता तृतीयक वितृतीय ते त्वा रक्षन्तु ते ते देवेभ्य आ तौदी नामासि प्रया पोषास्त्रिवृति त्रय सुपर्णानिवृता त्रायन्तामिमं देवाः त्रिशीणिं त्रिककुद वेधा जात जन्मना त्र्यायुष जमदमे. त्व हि मन्यो अभिभू० त्वमीशिष पशूना त्वया पूर्वमथर्वाणो स्वया मन्यो सरथ. त्वया वयमप्सरसो त्वाष्ट्रणाह वचसा ददिर्हि मध्य वस्णो दर्भः शोचिस्तरूणक दश च मे शत च मे दशवृक्ष मुञ्चेम दिक्षु चन्द्राय ४७ दिवस्त्वा पातु हरितं १५७ दिवा मा नक्क यतमो ३६ दिव्यादित्याय दिशो धेनवस्वास दुष्टयै हि त्वा भत्स्यामि दृष्टमष्टमतहम् १९० देवा अदु सूर्यो २०३ देवाना हेति परि १८४ देवारते चीतिमविदन् १५६ देवो अग्निः सकसुको १८४ योर्धेनुस्तस्या आदित्यो २०५ घोप्टवा पिता पृथिवी २४४ द्वाविमौ वाती वात. १७३ द्विभागधनमादाय १२२ द्वे च मे विंशतिश्च ८८ ध्रुवं ध्रुवेण हविषा धृषत् पिव कलशे १९१ नकजातास्योषधे नडमा रोह ते १५८ न ते वाह्वोर्बलमस्ति १८१ नदी यन्त्वप्सरसो ७३ नम शीताय तक्मने ७४ नम सनिलसाक्षे नमस्ते अधिवाकाय २१० नमस्ते अस्त्वायते ७४ नमस्ते प्राण क्रन्दाय नमस्ते प्राण प्राणते नमस्ते यातुधानेभ्यो नमस्ते लागलेभ्यो २१३ नमो देववधेभ्यो नमो यमाय नमो ०१३ नमो रुद्राय नमो २०१ । नमो राय च्यवनाय नमोऽस्त्वसिताय १७८ नव च मे नवतिश्च १२२ नव च या नवतिथ २२० नव प्राणान्नवामि १२४ | नष्टासवो नष्टमिषा २३९ २५५ १२१ १०४ २०० १९७ १४८ १७४ २१३ १९३ २२३ २४९ २ २४३ १९१ १५६ १६६ ७५ १२० २३९ ७४ २ २४९ २२३ २४९ ६८ १६८ १२२ १३५ १३५ १३५ १३५ १३५ १०७ १७० ८१ २१५ १८७ १२० १०० ४ (२७२) अथर्ववेदका सुबोध अनुघाट 'दीर्घजीवन और शारोग्य पृष्ट -- १२५ १९९ २५१ २१९ १७२ १५५ ३९ ४८ ४९ १ १ निरितो मृत्यु निवलास बलामिनः निर्वलामेत प्र निर्वा गोष्टादजा. निासाला धृष्णु नीचः खननत्य सुरा नेन रक्षामि न पिशाचा पक्षी जायान्य पतति पञ्च च मे पञ्चागच्च पन्नच या पचागच्च परं मृत्यो अनु परेहि परि ग्राममिवाचित परि वा पातु समान न्यः परि द्यामिव सूर्यो परि यामान्यास परिपाणमसि पवस्तस्त्वा पर्यफ्रीणन् पादाम्या ते जानुभयो पार्थिवस्य रसे देवा पिगटे सूत्र खुगलं पिशाचक्षयणमसि पुनस्त्वादिया रुद्रा पुरं देवानाममृतं पुरस्तायुको वह पृथिवी वेनुस्तम्या पृथिव्यामनये पेंट प्रेहि प्रयमा पंढस्य मन्महे वय पद्वो हन्ति कमाल प्रत मिनधि मेहन प्र ते गृणामि शृंने प्रत्यञ्चमई प्रति प्रविशत प्राणापानी प्राण प्रना अनु प्राण मा मत्पर्यावृतो प्राणमाहुर्मातरिश्वान प्राणापानी व्रीहि० प्राणाय नमो यस्य पृष्ट मन्त्र पृष्ठ १४८ प्राणेन त्वा द्विपदा य उमान्य प्रहरमि १६९ प्राणनामे चक्षुपा ६८। य उरू अनुसर्पति १६९ प्राणा मृत्यु प्राणस्तक्ष्मा २ य. कोक्मा प्रशृणाति १२७ प्राणो विराट् प्राणो यः कृणोति प्रमोतः १७ प्रेव विपतिषति १५८ यः पुख्य पाया बधोरर्जुनकाण्डस्य 3 य प्राणदः प्राण ९३ वलमसि बल में ११९ यच्चक्षुषा मनसा १९९ बहिर्षिल निवतु १४६ यतो दष्टं यतो धीत १२२ योधथ त्वा प्रतीयोधथ ३६ यत् कृपते यद्वनुये १२० प्राह्मणो जने प्रथमो १७५ यत् क्षुरेण मर्चयता १५१ भद्रादवि श्रेय प्रति ११० यम् ते अपोदकं विष महज पुनर्यो यन्तु यत् ते नियानं रस भीमा इन्द्रस्य हेतयः (८-९) २१४ यत् ते माता यत् ते पिता १८७ भूतपतिनिरजतु १२८ यत् ते वास: परिधान १२८ भूत हविधमती भव २४२ यत् प्राण ऋतावा. १२० भूमिष्ट्वा पातु हरितेन ७४ यत् प्राण स्तनीयत्नु २७८ भ्रातृव्यक्षयणमसि १३९ यत्र व प्रेता हरिता १४६ सपा पृष्चे नद्य १८८ यत्रावत्या न्यग्रोधा ११५ सुक्रतो २३० महाषान् मूजवतो १९० यया सुहार्दा सुकृता १३९ मागतानामा ३४ य त्वं शीतोऽयो २४९ मा ते प्राण उप ६८ यत् त्वा कुद्धाः प्रचा ७२ मा ते मनस्तत्र गान्मा यत् स्वामिचरुः पुरुषः २०२ मा त्वा कव्यादमि ३५ यथा द्याश्च पृथिवी १०३ मा त्वा जम्मः सहनु यथा प्राण वलि मा नो देवा अहि यथा बाणः सुसशित. १७२ मा विभेन मरिष्यसि ६७ यथा ब्रह्म चक्षत्र १७९ मा स्मैतान्त्सखीन १९० यथा भूत च भव्य १७९ मित्र एन वरुणो ८८ यथा मनो मनस्केतः २३५ मुञ्चन्तु मागपच्या २१९ यथा नइमा आप० २१० मुच शीर्षक्तया उत १७१ मुन्चामि त्वा हविषा ७९ यथा सूर्यश्व चन्द्रश्च मुहुर्राध्यै प्र वदति १५५ यथा सूर्यस्य रश्मय मृत्युरीशे द्विपदा यथा सो अस्य परिधिः ४ मृत्यो. पद योपयन्त १५४ यचाहश्च रात्री मेम प्राणो दासीन्मा ६२ यथाहान्यनुपूर्व ययेयुका परापतदव० १ । म्राकानुम्रोक पुनर्वो १४३ यदग्निरापो अदहरु २१४ २१३ २२७ ८३ मन्युरिन्द्री मन्यु यत्रा मुहार्द Mom ur ram. १४९ . ३ १७० ११८ ९७० १६५ ११८ यथा सत्यं चानृत १७० २०३ ११८ १५२ ३ । मैतं पन्यामनु गा १९२ अर्णानुक्रम मन्त्र-सूची (२७३) पृष्ठ पृष्ठ ७० पृष्ठ २८१ ४९ २०३ यो अस्य सर्वजन्मनः यो दाधार पृयिवीं यो न पादशपत यो नो अग्नि. पितरो यो नो अश्वेषु वीरेषु यो ते बलास तिष्ठतः या ते २५१ १०७ १५४ १५० १६७ २. ३ यदमी सूर्ये विष वदनासि यत् पिबसि यदस्य इतं वित यदान्त्रेषु गवीन्योः यदा प्राणो अभ्य० यदायभनन् दाक्षायणा यदाशमा वदतो मे यदासते. क्रियमाणायाः यदि कामादप० यदि क्षितायुर्यदि यदि नो गा हसि यदि शोको यदि यदि स्थ क्षेत्रियाणां ९३ ११० यो ते चकु पुरुषास्ये या ते चकु. सभायां या ते चक्रुः सेनाया चमुरमूलाया यां ते चक्रुरामे पात्रे यां ते चकुरेकशफे या ते चक्रुर्गार्हपत्ये या पावें उपर्षन्ति या मज्ज्ञो निर्धयन्ति यावती द्यावापृथिवी या सीमान विरुजन्ति यास्तिरश्चीरुपर्षन्ति या हृदयमुपर्षन्ति ७१ ७१ ७२ ७१ ७१ १४६ १४६ १७५ रक्षन्तु त्वान्नयो ये १४५ २१८ १७६ १६२ १४१ 00 Urn यदेनसो मातृकृता. ६६ यूय न प्रवतो यदुदोहिथ शेपिये यद् ब्रह्मभिर्यदृषिभिः १४६ १४६ १०५ १८१ १४६ १७६ २०८ यद्यग्नि.क्रव्याद् यद्यर्चियदि वासि यद् रिप्रशमलं यद् वो देवा उपजीका १८७ १४८ १९३ १५६ १८६ २५० १०९ on va ar रुदो वो प्रीवा अशरत् वध्रयस्ते खनितारो वरणो वारयाता वातात् ते प्राणमावेद वायो यत् तपस्तन वायो यत् ते तेजस्तेन वायो यत् ते तेऽचिस्तेन वायो यत् ते शोचिस्तेन घायो यत् ते हरस्तेन वारिद वारयात वरणा० विजेषकृदिन्द्र विते मद मदावति विद्म ते जायान्य विद्मा शरस्य पितर चन्द्र विद्मा शरस्य पितर पर्जन्य विद्या शरस्य पितर मित्र विद्मा शरस्य पितर वरुणं विद्मा शरस्य पितरं सूर्य विद्रधस्य बलासस्य विध्याम्यासा प्रथमा विश्वरूप चतुरक्ष विश्वे देवा वसवो विषितं ते वस्तिविल विसल्पस्य विद्रधस्थ वीहि स्वामाहुति वृषा मे रवो नभसा वैश्वदेवीं वर्चस आ १२१ १२१ १०० २५१ २२० १७६ यमोदन प्रथमजा यश्वकार नगशाक यधकार स निष्क० यस्त आस्यत् पश्च० यस्ते प्राणेद वेद यस्ते मन्योऽविवद् यस्मात् पक्कादमृत यस्मान्मासा निर्मिता यस्मिन् देवा अमृत यस्य मीमः प्रतीकाश. यस्य हेतो प्रच्यवते यस्यास्त आसनि घोरे या भोषधय. सोमः या गुदा अनुसर्पन्ति या प्रेग्या अपचितो या ते प्राण प्रिया यो ते कृत्या कूपे १३४ १३४ १३४ १३४ १३४ १७७ ११३ १७७ १९९ २३५ २३४ २३४ २३५ २३५ १६७ २०१ २०९ ९८ २३५ १४६ २०२ ३ ये अग्निजा ओषविजा ये अगानि मदयन्ति ये अपीषन्ये अदि. ये फ्रिमय पर्वतेषु ये किमय शितिकक्षा ये ते पन्यानो ये देवा दिवि ठ ये येन देवा ससुराणा येन सोम साहन्या. येन सोमादिति. येनातरन् भूतकृतो येना श्रवस्यवश्वरथ येनेन्द्राय समभर येऽमावास्यां रात्रि ये मृत्यव एकशत येवाषास: कष्कषासः ये वो देवाः पितरो ये श्रद्धा घनकाम्या येषां प्रयाजा उत यो अक्ष्यौ परिसर्पति यो अग्नि कव्यात् ये अजयो यः को यो अन्येचुरुभया० यो अस्य विश्वजन्मनः ११५ २५१ २५१ १५१ १४५ १४५ २४२ २१९ ५१ २१२ ९८ १५८ १५३ २११ १४९ १६८ व्यवात् ते ज्योतिः २ ७३ व्याकरोमि हविषा व्रतेन त्व व्रतपते शत च मे सहस्र च १५४ २०१ १२२ यो ते चक्रुः (२७४) अथर्ववेदका सुवोध अनुवाद - 'दीर्घजीवन और आरोग्य' पृष्ठ ८० २४३ ०४३ २३४ १०५ १७१ १७६ २०७ १०४ शतं जीव जरदो गस तेऽयुतं हायनान् शे ते अमि सहादिः शते वातो अन्तरिक्ष मनो भवन्त्वप. ग नो वातो वात शं शमे परस्मै गात्राय भरदे त्वा हेमन्ताय शल्याहिपनिरवोच शिवा भव पुरुषम्यो निवाभिप्टे हदयं शिवास्त एका अशिवास्त शिवास्ते सन्वोषधयः शिवे ते स्ता द्यावापृथिवी शिवा ते स्ता त्रीहि नापति शीर्षामयं शेरभक शेरम गेवक शेष श्यामश्वत्वा मा गयल श्यामा मरूपकरण श्रोत्रमसि श्रोत्र मे दा वेवक पिरिक पट् च मे पष्टिश्च मे संयत न विपरद समृष्ट धनमुमयं पृष्ठ मन्त्र पृष्ठ सहोऽसि सहो मे ६०५ सीसायाध्याह वरुणः १४१ १५० सीसे मल सादयित्वा १५१ ६१ ससि मुढ्वं नडे १५१ १३९ सुपर्णस्त्वा गुरुत्मान १७५ २०४ । सुपर्णो जातः प्रथम १९५ १४६ सुध्दत मृडत १०५ १८७ सूर्यमृतं तमसो २४५ १३९ सूर्य यत् ते तपस्तेन १३५ सूर्य यत् ने तेजस्तन १२२ सूर्य यत् तेऽचिस्तेन १३५ १२० सूर्य यत् ते शोचिम्तेन १३५ ९३ सूर्य यत् ते हरस्तेन १३५ सोमस्येव जातवेदो २०५ १५१ सोऽरिष्ट न मरिष्यसि १५० हतासो अस्य देशसो २१०, ०१० ६५ हतास्तिरश्चिराजयो १८० हतो येवापः क्रिमीण ०१२ इतो राजा क्रिमीणा २१०,२१२ १४३ हरिणस्य रघुष्यदो ०२४ १५७ हरिमाणं ते अनेभ्यो १४६ २१२ हस्ताभ्यां दशशाखाम्या ८० हृदयात् ते परि क्लोम्नो १६६ हृदा पूत मनसा १०४ स हि शीर्षण्यप्रभ सखासावस्मभ्य संकयुको विक्रमको सं झामतं मा जहीतं सदान्वाक्षयणमसि सनादने मृणसि सं ते शीर्ण कपालानि सं ते हन्मि दता दत सपत्नक्षयणमसि सप्त बरन्ति शिशवे सप्त च मे सप्ततिच सप्त च याः सप्ततिय समाना मासामृतु० समाहर जातवेदो समिद्धो अग्न आहुत समिन्यते संकसुक स मा सिञ्चन्तु मरुतः सरूपा नाम ते माता सरूपो द्वो विरूपी सर्पानुसर्प पुनवों सर्वानने सहमानः सर्वेषा च क्रिमीणा सर्वे व तत्र जीवति सहस्राक्षण शत० महस्व मन्यो अभिः ४९ . ४९ १४५ १४३ .. १२० २१५ १२२ १७९ ११४