Government College, Kota

The Vakyapadiya (brahma Kanda)

Hari, Bhartri · 2012/04

PDF Proofread

Front matter

DUE DATE SLIP
GOVT. COLLEGE, LIBRARY
KOTA (Raj.)
Students can retain library books only for two
weeks at the most.
BORROWER'S
No.
DUE STATE
SIGNATURE

काशी संस्कृत ग्रन्थमाला १२४. (व्याकरणविभागे ( १५) पञ्चदर्श पुष्पम् ) Airary महावैयाकरणश्रीभर्तृहरिविरचित वाक्यपदीयम् (ब्रह्मकाण्डम् ) भूतपूर्वकाशास्यराजकीयमधानपाठशालाध्यापक- न्याय-व्याकरण-साहित्याचार्यपण्डितश्रीसूर्यनारायणशुक्लेन समगीतेन भावप्रदीपास्यव्याख्यानेन टिप्पणेन च समलंकृतम् तत्पुत्रेण चाराणसेयसंस्कृतविश्वविद्यालयपण्डितेन न्याय-व्याकरण-साहित्याचार्यश्रीरामगोविन्दशुक्लेन हिन्दीव्याख्यया विशिष्टया भूमिकया च समलहत्य सम्पादितम् चौरखम्बा संस्कृत सीरीज आफिस.वाराणसी-१

प्रकाशक : चौखम्बा संस्कृत सीरीज आफिस, वोपर
मुद्रक :विद्याविलास प्रेस, वाराणसी
संस्करण : द्वितीय, संचत् २०१८.
मूल्य
:४-५०
© The Chowkhamba Sanskrit Series Office,
P.0. Bor 8, Varanasi. ( India)
1961
Phone3145

THE
KASHI SANSKRIT SERIES.
124
mere
(Vyākarana Section, No. 15 )
THE
VÄKYAPADIYA
A TREATISE ON THE PHILOSOPHY OF SANSKRIT GRAMMAR
BY
BHARTRI HARI
(BRAHMA KANDA)
with the
BHĀYAPRADIPA SANSKRIT COMMEMT. RY & NOTES
BY
Nyāya-Vyākaranáchărya
Pt. S'ri Suryanarayana S'ukla
Professor. Govt. Sanskrit College, Varanasi
EDITED WITH HINDI COXDENTARY ETC.,
By
Nyāya-Vyåkarana-Sahityācharya
Pt. Sri Ramagovinda S'ukla
THE
CHOWKHAMBA SANSKRIT SERIES OFFICE
POST BOX VARANASI-1 (INDIA)
1961

श्रीविश्वेश्वरः शरणम् किञ्चिनिवेदनम् अयि श्रद्धया विपश्चिदपश्चिमा दार्शनिकशिरोमणयो चैयाकरणाः ! सुविदितमेवेदं तत्र भवतां भवतां यद् व्याकरणसिद्धान्तभूतस्य शब्दब्रह्मयादस्य निरूपणाय प्रवृत्तं श्रीमतो महायैयाकरणस्य भर्तृहरेः कृतिक्यिपदीयं नाम, यन्महावैयाकरणैः कैयटनागेशादिभिः स्वस्थ नियन्धेषु भूयस्समादृतम्, दर्शनान्तराचार्यः कुमारिलशङ्कराचार्यवाच. स्पतिमिश्रादिभिर्भूयः समालोचितं च । तस्य परमोपादेयतामालोच्य तत्तत्परीक्षाध्यक्षैाकरणाचार्यपरीक्षायां निवेशिततया तस्य यथार्थ- मर्थावबोधाय सरलव्याख्यामन्विष्यद्भिश्छात्रैस्तदलाभेन प्रार्थितेन मया थाक्यपदीयभावप्रदीपनानी व्याख्या विरच्य विश्वेश्वरचरणकमलयोः समय॑ भवतां करकमलयोरुपहारीक्रियत इति । भवदीयस्य सूर्यनारायणशुक्लशर्मणः।

पाकथन (द्वितीय संस्करण) व्याकरणशान के ज्ञाताओं को यह सदा स्मरण है कि जैसे व्याकरण एक वेदाङ्ग है वैसे वह एक दर्शन भी है। हमने व्याकरण के 'रक्षोहागमलन- संदेहाः प्रयोजनम्' के द्वारा पाँच प्रयोजनों की जानकारी प्राप्त की। इन पाँचों प्रयोजनों की पूति व्याकरण में होती है । प्रकृति-प्रत्यय, प्रकृत्यर्थ- प्रत्ययार्थ, और उनका सम्बन्ध जान लेने मे वेदाइ होने का कार्य पूरा हो जाता है। किन्तु इसका केवल प्रकृत्यर्थ-प्रत्ययार्थ आदि के ज्ञान द्वारा वेदार्थज्ञान मात्र प्रयोजन नहीं है, व्याकरणशास्त्र शब्दों के साधुत्वज्ञान द्वारा साक्षात् मोक्षपद भी है-'इयं सा मोक्षमाणानामजिला राजपद्धतिः' यह व्याकरण विद्या ही मुक्ति चाहने वालों के लिए एक उत्तम मार्ग है। ऊपर हमने कहा कि व्याकरण वेदाह के अतिरिक्त एक दर्शन भी है। हम यहाँ उसके थैदा होने के विषय में विशेष नहीं कहेंगे किन्तु दोनों धाराओं को स्पष्ट करने के विचार से सामान्य रूप में विचार करना भावश्यक है। व्याकरण के सूत्रों के रचयिता पाणिनि ने प्राचीन व्याकरणों की अपेक्षा यही एक विशेषता लाई कि व्याकरण किमी दार्शनिक आधार पर बना है। उसकी व्याख्या अनेक व्याख्याकारों ने की किन्तु कात्यायन के यातिकों में धारणदर्शन की झलक रही जिसे व्याडि ने अपने एक लक्ष श्लोकों के संग्रह में पड़ी व्यवस्था मे पपित किया । यही संग्रह यास्तर में व्याकरण का दर्शनस्रोत है।

यद्यपि अपनी विशाल प्राकृति के कारण ही वह वैयाकरणों में बहुत दिन नहीं टिक सका तथा आज उसका नाम मात्र ही अवशिष्ट है फिर भी महर्षि पतञ्जलि ने उन सिद्धान्तों के बीज की अपने महाभाष्य में रक्षा की और उनके बाद के विद्वानों ने उन्हें विस्तृत किया। उन्हीं में महावैयाकरण भर्तृहरि भी है जिन्होंने वाक्यपदीय ग्रन्थ में पूरे 'व्याकरणदर्शन' का उत्तम रीति से चित्रण किया। यह ग्रन्थ समस्त उपलब्ध है या नहीं यह कहना भी कठिन है फिर भी ब्रह्मकाण्ड, वाक्यकाण्ड और पदकाण्ड में जो कारिकाएँ उपलब्ध हैं उनकी कुल संख्या दो सहस्र के मध्य में ही है। हमारी अपनी धारणा है कि यह अन्य दो हजार श्लोकों से अधिक न रहा होगा। आज जो १४० के लगभग कारिकायें कम हैं वे ही कहीं इधर-उघर नष्ट हो गई है। इस अनुमान की पुष्टि में हम इतना ही कहना चाहते है कि व्याकरण- दर्शन जो एक लक्ष श्लोकों में बिखरा था आचार्य भर्तृहरि ने उसे दो हजार श्लोकों में किया हो और व्याकरण के इस अगाध सागर को क्रीडा-पुष्करिणी बनाया हो, क्योंकि इनके परवर्ती विद्वान् श्राचार्य सायण ने 'जैमिनीय- न्यायमाला' का दो हजार श्लोको में संग्रह किया है और प्रारम्भ में ही लिस दिया है- - 'सर्वथापि सहने द्वे नातिकामति संग्रहः । मीमांसासागरस्तेन क्रीडापुष्करिणी भवेत् ॥' सम्भव है वास्यपदीय के श्लोकों की संख्या दो सहस्र देख कर ही उनकी यह प्रवृत्ति हुई हो। कुछ भी हो, यह वाक्यपदीय व्याकरण के दर्शनस्रोत का आज उपलब्ध अाधारभूत है। हम व्याकरण की अष्टाध्यायी से जैसे शब्दों के साधुत्य का ज्ञान करते हैं—काशिका अथवा सिद्धान्तकौमुदी व्याख्याओं के आधार पर, वैसे ही इस वाक्यपदीय के द्वारा ही हमें व्याकरण के दर्शनरूप का प्रत्यक्ष होता है । वैयाकरणभूपणमार, वैयाकरणलघुसिद्धान्तमंनृपा, वैयाकरणसिद्धान्त- सुधानिधि आदि किसी भी ग्रन्थ में व्याकरण के दर्शन रूप का हम जो प्रत्यक्ष करते हैं उसका आधार हमें वाक्यपदीय मे ही मिलता है।

اسه -- इन मब स्थितियों के रहते हुए भी यह अत्यन्त खेद का विषय है कि इस युग के वैयाकरणों में इस ग्रन्य के प्रति आकर्षण नहीं है। आज कम वैयाकारा है जिन्हें पूरा वास्यपदीय ग्रन्च देखने को प्राप्त हो । आश्चर्य होगा यह सुनकर भी कि कुछ कारिकाये शैवागम की है, जैसे 'स्वरूपज्योति- रेवान्तः परा वागनपायिनी'। इस कारिका को वाक्यपदीय की कारिका समझ कर इस युग के कुछ प्रकाण्ड वैयाकरणो ने पिताजी द्वारा लिखित वाक्यपदीय मानप्रदीप टीका की 'वैखर्या मध्यमायाश्च' इत्यादि कारिका की व्याख्या पर क्षोदक्षेन करके पग वाक् सिद्ध करने का पूरा दुःमाहम भी कर डाला है। सयं तो नहीं किन्तु एक पण्डित ने पुत्र के नाम मे एक लेख मी 'सारस्वती- सुपमा में मुद्रित कराया है। इस प्रकार व्याकरणदर्शन का जीवनभून यह अन्य लोगों की दृष्टि मे परे रहा रिमी पूज्य पिता श्रीसूर्यनारायण शुकजी ने चौखम्या संस्कृत सर्गिज के अध्यक्ष श्री चा जयकृष्णदासजी की प्रार्थना पर वाक्यपदीय अन्य पर भाषपदीप नाम की टीका रच डाली। इस टीका के रचने में उन्होंने कितना परिश्रम किया है यह तो टीका देखने मे ही पता चलेगा। किन्तु इतना बता देना अनुचित नहीं है कि व्याकरा के दर्शनम्स का प्रत्यक्ष होने में वाघा नहीं रहेगी। इस हिन्दीकपए के युग में छात्र हिन्दी टीका की विशेष मांग करने लगे, अतः मैने इमी संक्षित हिन्दी व्याख्या निख दी है जो पिताजी के वाक्यों का संक्षिप्त हिन्दी माषान्तर मार है । 'वाश्यादीर अन्य और ग्रन्कार के विश्य में एक लेख मी प्रस्तुत है जिसे पड़ने पर इन ग्रन्थ के मन्यन मे निकल रनो का परिचय प्रात होगा। 17 अग्र पर मै श्री पार जादामजी ( प्रत्यक्ष चसना मंगत मार्शन, पारागनी ) को विशेष गुभाशीगंद प्रदान करता हूँ जिन्होंने मुझे इन अन्य पर कुछ लिखने का अवसर प्रदान किया है।

[ ४ ]
अन्त में भगवान् विश्वनाथ के करकमलों में इस ग्रन्थरत्न को अर्पण करता
हुआ विज्ञजनों से अपनाने की प्रार्थना करता हूँ। यदि मेरे इस परिश्रम से
किसी भी विद्वान् को कुछ सन्तोप होगा तो मैं आनन्दित होऊँगा।
पाठकों से निवेदन है कि प्रेस की असावधानी से अथवा मेरे ही नेत्रदीप
या बुद्धिदोप से कहीं कुछ त्रुटियाँ रह गई हों तो सुधार कर मुझे सूचित
करने की कृपा करेंगे।
विजयादशमी
विद्वानों के स्नेह का पात्र
रामगोविन्द शुक्ल

भूमिका आचार्य भर्तृहरि और उनका वाक्यपदीय बेयाकरणों की परम्परा में पागिनि, कात्यायन और पनजलि के बाद जिनका नाम बड़े आदर और सम्मान से लिया जाता है वे भर्तृहरि है। इन्होंने किम समय भाग्नभूमि को अलपत किया अथवा इनके द्वारा भारत भू और भारती ने कब अपना गौरव बढाया यह कहना अत्यन्त कठिन है । इन्होंने अपने परिचय के लिये भी कुछ नहीं लिया है। केवल इनके परदनों विद्वानों ने जहाँ कहीं इनका नाम ग्रहण किया है उमी से इनके पूर्ववर्ती होने का अनुमान किया जा सकता है। परिचय आचार्य भर्तृहरि ने अपने परिचय के लिये जो लिया है वह वाक्यपदीय के द्वितीय काण्ड के अन्त में ही रहे। मायेण मक्षेपरचीनल्पविद्यापरिग्रहान् । संप्राप्य वैयाकरणान् संग्रहेऽस्तमुपागते ।। कृतेऽप पतञ्जलिना गुरुणा तीर्थदर्शिना । सर्वेपां न्यायचीजानां महाभाष्ये निवन्धने ॥ अलब्धगाधे गाम्भीर्यादुत्तान इध सौष्ठवात्। तस्मिनकृतबुद्धीनां नैचावस्थित निश्चयः॥ यैजिमीभवहर्यः शुप्फतर्कानुमारिभिः । आर्षे विप्लाविते ग्रन्थे संग्रहप्रनिकजुके। यः पतञ्जलिशिष्येभ्यो भ्रो व्याकरणागमः।काले स दाक्षिणात्येषु ग्रन्थमात्रे व्यवस्थितः।। पर्वतादागमलवाभाष्यबीजानुमारिभिः।सनीतो बहुशाखत्वं चन्द्राचार्यादिभिः पुनः॥ म्यायप्रस्थानमार्गास्तानभ्यस्य स्वंच दर्शनम् । प्रणीतो गुरुणास्माकमयमागमसंग्रहः ।। जब व्याकरण पढने वाले विद्यार्थियों में आलस्य आ गया, वे सक्षिप्त अध्ययन और अल्प विद्या से हो सन्तुष्ट होने लग गए नव व्याहि रचित एक लक्ष शेफ का मंग्रह ग्रन्थ लुप्त हो गया। उस समय भगवान् पतलि को दया आई और तोदशी इस विद्वान् ने समस्त न्याय बोजों या सग्रह करके व्याकरण शास्त्र पर महाभाष्य की रचना की, जो इतना गम्भीर है कि थाह लगाना कठिन है और इतना सरस और मनोरम है कि छिछला लगता है। अनुशत विद्वानों के लिए ने उमके स्वरूप का टीक परिज्ञान ही नहीं हो सकता । दैजि, सोमब और हर्यक्ष आदि ने व्याकरणागम के रहस्य को न समझ कर केवल गुष्क तर्क द्वारा आग्रन्थ को खादालेदर पर डालो। इस प्रकार पनालि के शियों से व्याकरणाम भ्रट होकर दाक्षिणात्यों को घर में केवल अन्य नर में आलमारी की शोभा बढाने लगा। गिर चन्द्राचार्य प्रति विद्वानों ने (निस्ट पर्वत पर स्थिर विनिंग देश से राबा रचित मूलभूत घारगागम जिसे किमी बन गक्षम ने चन्द्राचार्य और वनुरात प्रभृति विद्वानों को दिया था प्राप्त करके) प्रचार किया तथा उसमें अनेक शाचार्य दनों । मेरे गुरजी ने, जो वाक्यपदीय टीका के आधार पर वमुगन कहे जा म्बने है, भागन मंग्रह बनाया।

[ २ ] इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि महाभाष्यकार पतञ्जलि के वटुन दिनों के दाद आचार्य भर्तृहरि का जन्म माना जाना चाहिए तथा वमुरात के शिष्य महरि ने यह ग्रन्थ रचा। ॥ आचार्य भर्तृहरि किस काल में हुए यह कहना नो अत्यन्त कटिन अथवा असम्भव है। आजकल के विद्वानों ने चीनी यात्री इत्मिा के कयनानुमार भर्तृहरि का समय विक्रम के सप्तम शतक का अन्न अथवा अष्टम शनक वा आरम्भ स्वीकार किया है। दन्सिग ने दिला है कि 'उम मर्नुहरि वी मृत्यु दुए चारीम वर्ष बीत चुके थे। किन्तु यह कथन असत्व सिद्ध हो जाता है जब काशिका के ४।३३८८ मून के उदाहरण में वाक्यपदीय ग्रन्थ का उल्लेख मिलता है। यह मंवत् ६८० से ७०१ के मध्य लिसा गया है। कातन्त्र व्याकरण की दुर्गसिंह कृत वृत्ति काशिका से प्राचीन सिद्ध हो चुकी है क्योंकि साय ने काशिका के ७।४।९३ सूत्र पर दुर्गसिंह की वृत्ति के सण्टन की बात लिपी है। दुर्गमिद ने वाक्यपदीप की एक कारिका ३१२४१ सूत्र पर उद्धृत की है जिमसे महरि की दुर्गसिंह से भी प्राचीनता सिद्ध होती है। शतपथ ब्राह्मण की टीका में हरि स्वामी ने वाक्यपदीय की प्रथम कारिका का उत्तरार्ध उद्धृत किया है । इनका समय इनके निम्नलिग्विन शोक मे परिशात होता है- श्रीमतोऽवन्तिनाथस्य विक्रमार्कस्य भूपतेः। धर्माध्यक्षो हरिस्वामी व्याख्यछातपथीं श्रुतिम ॥ यदाब्दानां क्लेजग्मुः सप्तत्रिंशच्छनानि वै। चत्वारिंशत् समाश्चान्यास्तदा भाप्यमिदं कृतम् । इसके अनुसार हरिस्वामी का ममय ३७४० कलिगताब्द अथवा वि० सं० ६९५ में पडना है । जैमा मीमांसकजी ने अपने इतिहास में लिखा है वह खींचातानी न भी की जाय तो कोई कठिनाई न होगी। तन्त्रवानिक के अ०१ पा०३ अ०८ में वाक्यपदीय की श१३ कारिका को उद्धृत कर कुमारिल भट्ट ने मर्नुहरि को अपना पूर्ववती सिद्ध किया है। अष्टाङ्ग संग्रह के टीकाकार वाग्मट्ट का शिय इन्दु उत्तर नत्र अ०५० को टीवा में रिपना है- तामु च तत्र भवतो हरेः श्लोको- संयोगो विप्रयोगश्च साहचर्य विरोधिता। अर्थः प्रकरणं लिङ्ग शब्दम्यान्यस्य सनिधिः॥ सामर्थ्यमौचिनीदेवाः कालो व्यनि. स्वरादयः । शब्दार्थस्यानवच्छंद विशेषस्मृनिहेतवः ॥ इत्यादि यह कारिता वाक्यपदार के २।३१-३.६ में परब है। काशी स्करण में दूता भाग चुटित है जो अशुद्धि पत्र में छपा है। वाग्मट्ट का सार ऐतिहानिनों ने चन्द्रगुप्त का काल माना है। पाश्चात्य निदा मा चन्द्रगुप्त द्विशय का काल वि०म० ४३७-४७० नम स्थिर करने हैं । इस प्रकार भर्तृहरि का न्मय वि०म० ४०० के पश्चात् मानना उचित नहीं प्रनीत होना।

[३] जनश्रुति विक्रमादित्य, जिन्हें उज्जैन मालवगण राज्य का गजा कहा जाता है, उनके भाई के रूप में भर्तृहरि का स्मरण लोग करते है। भर्तृहरि के योगी होने में वान प्रायः अधिक प्रसिद्ध है। जैन के किले में भर्तृहरिको गुफा है जिसकी सरकार ने खुदाई की है : चुनार के किले में भी भर्तृहरि गुफा प्रसिद्ध है। यह शिला भी विक्रमादित्य मा बनवाया हुआ रहा जाता है। इममे यह नो सिद्ध होने लगता है कि भर्तृहरि और विक्रमादित्व में पोई सम्बन्ध अवश्य है। कुछ भी हो एक उच्चकोटि का वैदिक विद्वान् मर्तृहरि अवश्य बडुन प्राचीन विद्वान है। इत्सिग का मत चीनी यात्री इन्सिन ने-जिमने मप्तमी शती ई० के अन में भारत यात्रा की थी, लिया है कि हमारे भारन पहुँचने के ४० वर्ष पूर्व लगभग ६५१ ई० में भर्तृहरि नामक एक वैयाकरण की मृत्यु हो गई थी जो निश्चय ही भारतीय व्याकरणशास्त्र की अन्तिम मौलिक कृति वाक्यपदीय का लेखक था। इनके मम्बन्ध में इत्सिंग कहना है कि "उमका मन विरक्त नथा गृहस्थ जीवन में सदा दोलायमान रहता था और वह सात बार मठ और संसार के बीच में आना जाता रहा । मा कि बौद्धों के लिए अनुज्ञात है । एक अवसर पर जब वह बौद्ध विहार में प्रवेश कर रहा था उमने एक विद्यार्थी से अपने लिए बाहर रथ मजित रखने के लिए कहा जिससे कि उसके दुःसाध्य निदय पर यदि सासारिक इच्छायें काबू पा जाँप नो वह उस पर चढ़ कर जा सके। ( सस्कृत माहित्य का इतिहास, कोथ ) इत्सिग को भले ही किमी ने भुलाबा में डाल दिया हो अथवा किम्ग भतृहरि नाम के वैयाकरण की उस समय मृत्यु भी भले ही हो गई हो और वह बौद्ध तथा जमा इमिग ने समझा वैसा ही रहा हो। किन्तु दावापदायकार भर्तृहरि के विषय में छात्मग का कहना अत्यन्न असत्य है, क्योंकि जैसा मैं आगे भर्तृहरि को वैदिक सिद्ध करने चल रहा हू' उन युक्तियों से भइरि को कथमपि बौद्ध नहीं सिद्ध किया जा सकता। किसी पाठक के लेख का हवाला देकर श्रीष ने लिखा है कि 'बड़े ठोम साक्ष्य के आधार पर यह दिखाया जा चुका है कि इत्मिा का कथन भ्रम पूर्ण नहीं है। हमने वडा प्रयत्न किया कि पाठक का लेप मिले और उसमें देखा जाय कि किन तशे पर उन्होंने आचार्य मर्तृहरि को बौद्ध मिद्ध किया है किन्तु पत्रिका 'मरस्वतीभवन पुस्तकारय' में भी उपलब्ध न हो सकी। भर्तृहरि रचित ग्रन्थ आचार्य भर्नुहरि के रचित निम्नलिखित ग्रन्थ है जाने है- ()महामापदीपिका (महानापा। {7 ) वास्यपदी (३ बाट (३) वाक्यपदीय.ीफा (१-०६) (४) मट्टिान (५) भागवृत्ति (६) सुभारिमत्रिदशनी [ ४ ] इनके अतिरिक्त तीन ग्रन्थों के नाम और उपरम है जो भर्तृहरि रचित कहे जाते है- (१)मीमासाभाष्य। (२) वेदान्तसूत्रवृत्ति। (३) शब्दधातुसमीक्षा। इन ग्रन्थों के परि रनित होने के लिए कुछ करना भावदना है जो हम धागे कह रहे है। युधिष्ठिर मीमासक ने अपने 'सस्कृत व्याकरणशास्त्र का इतिहाम' ग्रन्थ में प्रथम नीन नथा चार और द्वितीय तीन ग्रन्थों को भर्तृहरि रचित मिद किया है । भट्टिकाब्य और भागवृत्ति किमी अन्य भतृहरि की रविन है यहा जा ममता है। मामामा जी ने अनेक उदाहरणों के द्वारा यह भी सिद्ध किया है कि भर्तृहरि और भागवृत्तिकार एक नहीं हो सक्ने । एक तो भापा भिन्न है दूसरे सिद्धान्त भी भिन्न है। कहीं-कहीं भर्तृहरि का सण्टन भी है अनः दोनों का एक मानना अयुक्त है। यह गी सम्भावना हो सकती है कि आचार्य भर्तृहरि के नाम से कई विद्वान् प्रसिद्ध हुए हों। क्या भर्तृहरि बौद्ध थे? चीनी यात्री इन्मिग ने लिगा है कि 'वामपदीय और महामाष्य व्यारया का रचयिता आचार्य भर्तृहरि बौद्धमतानुयायी था, उसने मान वार प्रव्रज्या ग्रहण की थी।' किन्तु दास्यपदीय ग्रन्थ के देखने से पता चलता है कि 'वाक्यपदीयकार और महाभाष्य की टीना का रचयिता आचार्य भर्नुहरि वैदिकधर्म का अनुपाया था और उसने कभी भी दौद्धधर्म नहीं स्वीकार किया था। इसे हम सप्रमाग सिद्ध कर रहे है- (१) वाक्यपदीय के ब्रह्मकाण्ड के आरम्भ में लिखा है कि- अनादिनिधनं ब्रह्म शब्दतत्त्वं यदक्षरम् । विवर्ततेऽर्थभावेन प्रक्रिया जगतो यतः॥१॥ एकमेव यदाम्नातं भिन्न शक्तिभ्यपाश्रयात् । अपृथक्त्वेऽपि शक्तिभ्यः पृथक्त्वेनेव वर्तते ॥२॥ माप्त्युपायोऽनुकारश्च तस्य वेदो महर्षिभिः । एकोऽप्यनेकवर्मेच समानातः पृथक पृथक् ॥ ३॥ इन कारिकाओं द्वारा जिसने अनादि और अनन्त शब्दब्रह्म का विवर्न जगत् को वाकार किया और उस ब्रह्म की प्राप्ति का उपाय महर्षियों के अभ्यस्त वेद को स्वीकारा वह क्षणिक विज्ञानवादी और बदबाह्य वौद्ध कैसे कहा जा सकता है । (२) आचार्य भर्तृहरि ने दाब्द को ब्रह्म नथा काल शक्ति उसको स्वतन्त्र शक्ति को स्वीकार किया है- अध्याहितफलां यस्य कालगनिमुपाश्रिताः । जन्मादयो विकाराः पड़ भावभेदस्य योनयः॥ १॥३॥ तमस्य लोकतन्त्रस्य सूत्रधारं प्रचक्षते । प्रतिवन्धाभ्यनुज्ञाभ्यां तेन विश्वं विमन्यते ॥ ३४ ॥ (कालसनुद्देश) दन फारिकाओं से ब्रह्म को दाक्ति से अभिन्न और शक्ति का आश्रय मा स्तीकार किया है। यह सिद्धान्त वौद्धों का की मी नहीं है।

[ ५ ] (३) आचार्य भर्तृहरिने व्याकरण को स्मृत्ति और ब्रह्मप्राप्ति का साधन स्वीकार किया है- यदेकं प्रक्रियाभेदैर्वहुधा प्रविभज्यते। तद् व्याकरणमागम्य परं ब्रह्माधिगम्यते ॥ १॥२२॥ ( ४ ) स्मृतियों को वेद मूलक स्वीकार किया है- स्मृतयो बहुरूपाश्च दृष्टादृष्टप्रयोजनाः। तमेवाश्रित्य लिनेभ्यो वेदविभिः प्रकल्पिताः ।। १७॥ (५) व्याकरण को वेद का मुख्य अग स्वीकार किया गया है- आसनं ब्रह्मणस्तस्य तपसामुत्तमं तपः। प्रथमं छन्दसामंगं प्राहुळकरण बुधाः ॥ ११ ॥ (६) शब्द ब्रह्म को छन्दोमयो तनु कहा गया है- अनातीतविपर्यासः केवलामनुपश्यति । छन्दस्यश्छन्दसां योनिमात्माछन्दोमयीं तनुम् ॥ १॥१७॥ (७) वेद शब्द से ही जगत् की उत्पत्ति है- शब्दस्य परिणामोऽयमित्याम्नायविदो विदुः । छन्दोभ्य एव प्रथममेतद्विश्वं व्यवर्तत ॥ २० ॥ (८) प्राणियों में चेतना शक्ति भी शब्द ही है- सैपा संसारिणां संज्ञा बहिरन्तश्च वर्तते । तन्मात्राममतिमान्तं चैतन्यं सर्वजन्तुषु ॥ २६ ॥ (९) समस्न आगम कर्तृक है उनका विनाश भी ध्रुव है। किन्तु समस्त आगों का मूल वेदी सदा व्यवस्थित और नित्य है- न जात्वकर्तृकं कश्चिदागर्म प्रतिपद्यते । बीजं सर्वागमापाये वय्येवातो व्यवस्थिता ॥ ११३३ ।। (१०) वेद और शास्त्र मूलक नर्क ही नेत्र है-- वेदशाम्बाविरोधी च तर्कश्चक्षुरपश्यताम् । रूपमात्रद्धि वाक्यार्थः केवलानावतिष्ठते ॥ ११३६ ॥ (११) भर्तृहरि ने आत्मा को नित्य स्वीकार किया है- आम्मा वस्तु स्वभावश्च शरीरं तत्वमित्यपि। द्रव्यामित्यस्य पर्यायस्तञ्च नित्यमिति स्मृतम् ॥ द्रव्यसमुद्देशः । इन ममल प्रमाणों को देखकर नया वाक्यपदीय को दार्शनिक पृष्ठभूमि को देखकर कोई भी नहीं स्वीकार कर सकता कि आचार्य भर्तृहरि बौद्ध थे अथवा उनके हृदय में बौद्धधर्म के प्रति कोई आस्था या राग रहा हो। अतः आचार्य महरि को बौद्धधर्मावलम्बी कहने में इमिग ने भूल की है । सम्भवतः उमने किमो बौद्ध भरि के विषय में कुछ सुना हो और वाक्यपदीय आदि ग्रन्यों का उमौसे मम्बन्ध जोड दिया हो, क्योंकि कोई भी विद्वान् वाक्य- पदीय ग्रंथ को देखकर अवा श-काय देसार भर्तृहरि वो दौर कहने का साइस नहीं करेगा।

[ ६ ] वाक्यपदीय आचार्य भर्तृहरि रचित अनेक ग्रन्थों का नाम पीछे वतराया जा चुका है। हम इस प्रकरण में उनके समस्त ग्रन्थों का न तो परिचय देंगे न उन पर कुछ विचार ही करेंगे किन्तु प्रकृत ग्रन्थ वाक्यपदीय के विषय में कुछ परिचयात्मक विचार व्यक्त करने चल रहे हैं । वाक्यपदीय नाम आचार्य भर्तृहरि ने इस ग्रंथ का नाम वाक्यपदीय रस। जिसका अर्थ है कि वाक्म और पद के विषय में विचार के लिए आरम्भ ग्रन्थ (वाक्यं च पदं च वाक्यपदे ते अधिकृत्य कृतो ग्रन्थो वाक्यपदीयम्)। इस वाक्यपदीय में तीन गाण्ड है इमीलिए इसे निकाण्डी भी कहा गया है। महामहोपाध्याय पण्डित श्री गङ्गाधर शास्त्री मानवल्ली ने काशी सस्करण की भूमिका में लिखा है कि 'वाक्य और पद विचारक ग्रन्य होने के कारण दो काण्ड की ही 'पाक्यपदीय' संज्ञा है, यह बान द्वितीय काण्ड के अन्तिम इलोकों से ही व्यक्त हो जाती है जो ग्रन्य-समाप्ति में लिखे गये है। नृतीय काण्ड तो कारक आदि विचार परक है अतः आरम्भ के दो काण्डों को ही 'वान्यपदीर' स्वीकार करना चाहिए।' इधर जो बाक्यपदीय पर स्वोपच टीका प्राप्त हुई है वह भी दी काण्डों पर ही है, यह भी सिद्ध करता है कि आचार्य भर्तृहरि ने प्रथम और द्विताय काण्ट को ही वाक्यपदीय' के रूप में स्वीकार किया हो। द्वितीय काण्ड की- पर्मनामत्र केपाश्चिद् परतुमात्रमुदाहृतम् । काण्डे तृतीये न्यण भविष्यति विचारणा ।। २।४८४ ।। कारिका में आचार्य भर्तृहरि ने स्वय नृतीय काण्ड रचने की प्रतिज्ञा भी की है। इससे तृतीय काण्ड के भर्तृहरि रचित होने में कोई विवाद नहीं है। हाँ, यह अवश्य है कि वास्यपदीय पूर्ण है किन्तु तृतीय काण्ड में उन्हीं सिद्धान्तों पर विशद विचार है। अतः यह कहना कि 'वास्यपदीय' दो काण्डों में पूर्ण नहीं है असंगत है । नृनीय काण्ट के बिना दो काण्ड अधूरे है यह कहना सगत हो सकता है । इसीलिए प्राचीन विद्वानों ने (वय हेलाराज तथा वाक्यपदीयवार ने) तृतीय काण्ट को 'वाक्यपदीय' का पूरक माना है और इसीलिए उसे प्रकीर्ण काण्ड भी कहा जाना है। अतः हम श्री चारदत्त शास्त्री के इस कथन से सहमत नहीं हैं कि 'तृनीय काण्ड वाक्यपदीय का मुख्य अंग है, प्रकीर्ण नही।" वाक्यपदीय कारिकायें - वाक्यपदीय की प्रत्येक कारिका भाष्य के किसी न किसी पान्य को अपार मानकर रची गई है। जैसे भाष्य के त्रिपादी में 'यथाऽग्वाम्वेति शिक्षामाणो वालोऽन्यथोच्चारयति' इमको आधार मानकर- अस्वाम्बेति यथा वालः शिक्षमाणो अभापते । अव्यक्तं तद्विदां तेन व्यक्त भवति निश्चयः ॥ इत्यादि । इस पर विशेष रूप से अनुसन्धान अपेक्षित है कि भाष्य के किन सिद्धान्त के आधार पर किस कारिका का निर्माण हुआ है।

[ ७ ] कुछ लोगों का कान है कि वाक्यपदीय' को ममस्त कारिकायें आचार्य भर्तृहरि रचित नहीं है किन्तु बहुत सी कारिकारें संग्रह ग्रन्थ से ले ली गई है। यह कोई असम्भव नहीं है । मम्भवतः व्याधरणागम की रक्षा को ध्यान में रखकर ग्रन्थ निर्माग प्रवृत्त ग्रन्धकार ने अपने पूर्ववर्ती संग्रह अमवा गुरु रचित आगम संग्रह के इलोकों का संग्रह किया हो। कुछ भी हो वाक्यपदीय की कारिकायें व्याकरण शास्त्र की दर्शन शासा के लिए आधार स्तम्भ है । आज जो वाक्यपदीय कारिकायें उपलब्ध हैं उनको तालिका इस प्रकार है। ब्रह्मकाण्ट २५६, वाक्यकाण्ड ४८६, पदकाण्ड १२१८, वाक्यपदीय के कई सस्करणों में कुछ कारिकायें अधिक उपलब्ध होती हैं किन्तु हमने तो अभी नक वाक्यपदीय कारिकाओं का संग्रह किया है वह कुल १८६० है। हमारी अपनी राय है कि वाक्यपदीय का लगभग १४० कारिकायें नष्ट हो गई है। यह ग्रन्थ दो सहन इलोकों से अधिक का न रहा होगा । हम यह भी सोच सकते हैं कि जैसे व्याकरणसागर को आचार्य भरि ने दो महस्र इलोकों मेंसगृहीन किया वैसे ही आचार्य सायग ने 'जैमिनीयन्याय माला' मय किया हो और मायण को वाक्यपदीय से प्रेरणा मिली हो। वाक्यपदीय के द्वितीय काण्ड की कारिका ७९ में पुष्पराज ने लिखा है कि 'एनेपां वितत्य मोपपत्तिकः सनिदर्शनं स्वरूपं पदकाण्डे लक्षगममुद्देशे विनिर्दिष्टमिति ग्रन्थकृतैव स्ववृत्ती प्रतिपादितम् । आगमभ्रंशाल्लेखकप्रमादादिनावा लक्षणसमुदेशश्च पदकाण्डमध्ये न प्रसिद्धः।' म उद्धरण से पता चलता है कि लक्षासमुद्देश्य नाम का कोई प्रकरण वाक्य- पदीन का अभी अनुपलम है। दमी कारिका को न्याख्या में पण्यराज लियते है कि 'यम्मादुक्तम्। मेयमपरिमाणविक- कल्पा वाधा विस्तरेण वाधाममुद्देशे समर्थयिष्यते' यह वाधा समुद्देश भी अभी तक अनुपलम है। इमी प्रकार- 'अपाये यदुदासीनं चलं वा यदि वाचलम् । ध्रुवमेवातदावेशात्तदपादानमुच्यते ॥ पततो ध्रुव एघाश्वो यस्मादश्वात्पतत्यसौ । तस्याप्यश्वस्य पतने कुड्यादि ध्रुवमिप्यते ॥ इत्यादि कारिकाओं को भर्तृहरि के नाम से आचार्य भट्टोजी दीक्षिन प्रभृति ने रमरण किया है किन्तु ये ग्रन्थ में उपलब्ध नहीं है। इससे यह नो निद्ध हो हो जाता है कि वास्यपदीर ग्रन्थ कीयोज अभी बन्द नहीं होनी चाहिये। वाक्यपदीय टीकार्य आचार्य भर्तृहरि की वृत्ति वाक्यपदीय ग्रन्थ में व्याकरणागम का यथार्थ रूप प्रकट है । यह शुद्ध कारिका के स्प में रचा गया है। कारिकायें कण्ठ करने में सरल नो पहनी हैं किन्तु पूर्ण विषय का विवेचन उनमें नहीं हो पाता मौलिए सर्वप्रथम वास्यपदीयकार भर्तृहरि ने ही आरम्भ के दो वाण्डों पर विवरण लिया है। आचार्य मम्मट, न्यायममार उरन आदि ने वृत्ति महित कारिकाओं वो वाक्यपदीय स्वीकारा है। मम्मट ने 'नहि गौः स्वरूप गौः नाप्यगो गोवा- मिसम्बन्धात्तु गौरिनि' इस वाक्यपदीर पक्ति का उल्लेग अपने कान्य प्रकाश में दिया है । इसमे यह सिद्ध होता है कि वाक्यपदीय पर सर्वप्रथम स्वय ग्रन्थकार ने हो विवरण रिया है। यह वृत्ति अभी तक अमुद्रित थी किन्नु कुछ विद्वानों के प्रयत्न से बझाष्ट नथ . 3B .

[ ८ ] । - वाक्यकाण्ड का कुछ भाग मुद्रित हुआ है । इम वृति के प्राप्त हो जाने से 'वाक्यपदीप की कारिमाओं का आशय लगाना सरल नो हो हो गया साय में अगले पण्डिों की व्याख्या में प्रामाण्य भी आ गया है। प्रथम काण्डवृत्ति यह एक विवाद का विषय बन गया है कि महरि ने वाक्यादीय पर दो वृत्तियों रची थी। एक लघुविवरण दूसरी बृहनीवृत्ति । दोनों वृत्तियाँ अब मुद्रित हैं। प्रथम धृत्ति चौग्यम्दा मीरीज में मुद्रिन है, जिसके अन्त में लिखा है कि 'इति महावैयाकरणहरिवृषभविरचित- वाक्यपदीयप्रकाशे आगमसमुच्चयो नाम ब्रह्मकाण्ड प्रथमं ममाप्तम् ।' दूसरी वृत्ति लाहौर से मुद्रित है जिसके अन्त में लिखा है कि 'इति श्रीहरिकृषभमहारैयाकरणविरचिते वाक्यपदीये आगमसमुच्चयो नाम ब्रह्मकाण्डं समाप्तम् ।' इस प्रकार हरिवृषभक्त दो वृत्तियाँ ब्रह्मकाण्ड पर मुद्रित हैं। दोनों में यत्र तत्र अवतरण आदि में भेद भी है। लाहौर मुद्रित वृत्ति विशद है तथा उस पर एक वृषभदेव की टोका भी मुदिन है, जिससे लाहौर सस्करण की अत्यधिक उपयोगिता सिद्ध हो जाती है। पुण्यराज बाक्यपदीय के द्वितीय काण्ड पर पुण्यराज की टीका भी चौखम्वा वाराणसी और लाहौर से मुद्रित है। यह टीका मर्तृहरि की वृत्ति के आगार पर रची गई है तथा वृत्ति से कुछ विशद है, वाक्यपदीय के तात्पर्य मात्र का निर्देश करती है। फिर भी रोका अत्यन्त उत्तम है। इनका जन्मकाल क्या होगा यह कहना कठिन है क्योंकि इन्होंने अपने जन्म के विषय में कुछ भी नहीं लिया है। केवल किसी काश्मीर के राजा राजानकशूरवर्म के समय में शशाङ्क के शिष्य से इन्होंने व्याकरण का अध्ययन किया तथा यह टीका लिखी, यह इन्हीं की टीका के अन्तिम इलोक से पता चलता है- नत उपसृत्य विरचिता राजानकशूरवर्मनाम्ना वै। शशाङ्कशिष्याच्वेतद्वाक्यकाण्डं समासतः॥ वामन रचित अलकार सूत्रवृत्ति के प्राचीनतम टीकाकार सहदेव ने अपने विषय में लिखा है कि चतुर्दशानामपि यः प्रसिद्धो विद्यास्थितीनां परपारदश्वा । शशाङ्कपूर्वधर इत्युदारं यन्नामलोके नितरां प्रसिद्धम् ॥ तदीयशिष्यः सहदेवनामा कुले प्रसूतः खलु तोमराणाम् । व्याख्यामिमां काव्यविचारशास्त्रे व्यधत्त लम्वीमिह वामनीये ।। काश्मीरदेशादपशर्पतो मे शब्दानुशुद्धिं त्रिमुनि निशम्य । इससे पता चलता है कि करमीर के शशाइधर के शिष्य सहदेव से ही पुण्यराज ने व्याकरण शास्त्र सीखा हो। हेलाराज वाक्यपदीय के तृतीय काण्ड पर जो अभी तक मुद्रित हे एक ही टीका हेलाराज की है। हेलाराज ही इस माग पर प्रथम टीकाकार है यह नहीं कहना चाहिए क्योंकि स्वयं हेलाराज ने ही अपने पूर्ववर्ती टीकाकारों का अनेक स्थानों पर उल्लेख किया है। इनके भी समय का डीक परिशान नहीं हो सका है फिर भी इन्होंने जो कुछ अपने विषय में लिखा है उसीसे पर्याप्त प्रकाश मिलता है। हेलाराज ने तृतीय काण्ड के अन्त में लिखा है कि- मुक्तापीड इति प्रसिद्धिमगमत्कश्मीरदेशे नृपः श्रीमान् ख्यातयशा वभूव नृपतेस्तस्य प्रभावानुगः । मन्त्री लक्ष्मण इत्युदारचरितस्तस्यान्ववाये भवो हेलाराज इम प्रकाशमकरोच्छ्रीभूतिराजात्मजः॥ इससे पता चलता है कि कश्मीर देश के राजा मुक्तापीड के प्रधान मन्त्री लक्ष्मण के वंश में भूनिराज के पुत्र के रूप में हेलाराज ने जन्म लिया था। इससे लक्ष्मण के कितनी पीढी के वाद हेलाराज ने जन्म लिया यह सन्दिग्ध ही रह जाता है। फिर भी बूहलर महोदय (जो अनेक प्राचीन पुस्तकों की खोज ही किया करते थे) ने अभिनव गुप्त रचित गीताभाष्य पुस्तक प्राप्त की, जिसमें अभिनव गुप्त ने भूनिराज के पुत्र मद्देन्दुराज को अपना गुरु स्वीकार किया है। भूनिराज के पुत्र होने के कारण यह स्वीकार करना पडता है कि भद्देन्दुराज और हेलाराज सोदर भाई थे। अभिनव गुप्त काल के आधार पर हेलाराज का काल खीस्तीय दशम शनक का उत्तरार्ध स्वीकार किया जा सकता है। राजतरंगिणीकार महावि कहाण ने देलागज की एक भोक में चर्चा की है- बद्धा द्वादशभिम्रन्थसहस्त्रैः पार्थिवावलिः । प्राशहाबतिना येन हेलाराजद्विजन्मना ।। टा. कीथ ने कल्हण का ममय ई० को १२वीं शराब्दी स्वीकार किया है इससे भी स्पष्ट है कि लाराज उनसे पूर्ववर्ती रहे है। हेलाग ने मम्पूर्ण वाक्यपदीय पर टीका रची है । इन्होंने स्वयं लिया है कि 'काण्डद्वये यथावृत्ति सिद्धान्तार्थसतत्वतः। प्रथम माण्ड की शैझा का नाम इन्होंने 'शब्दप्रभा' रक्पा था मा कि इन्होंने लिया है कि 'विस्तारणागमप्रामाण्य वाक्यपदीयेऽस्माभिः प्रथम- काण्डे शब्दप्रभायां निर्णीतम् । हेलाराज ने वाक्यपदीय टीका रचने के पूर्व कियाविवेक' और 'वार्तिकोन्मेष' नाम के दो अन्यों का भी निर्माण कर लिया था । जैसा कि उन्होंने तृतीय काण्ड की कई कारिकाओं को व्याख्या में निर्देदा किया है। १. तृतीय काण्ड जाति ममुद्देश ५० कारिका की व्याख्या में लिसा है कि क्रियाविवेके विस्तरेणास्माभिरभिहिनमिति तत एवावधार्यताम् ।' २. कियाममुद्देश की १ कारिका की टीम के अन्न में 'फलतस्तु सामावति क्रिया- विवेके क्रियैव प्रधानभूता वाक्यार्थ इति नितिं तत एवावधार्यम् । इन अशी नया इसी प्रकार अनेक स्थानों पर अपनी कृति का क्रियाविवेक के नाम से स्मरण किया है। ३. वार्निवोन्मेष की चर्चा तो लिंगसमुदेश के अन्त में सिद्धान्तस्तु यथाभायं गुणा. वस्यारूपं लिङ्गमित्यस्माभिः बार्तिकोन्मेपे यथागमं व्याख्यातं तत एवावधार्यम् ।' ४. द्रव्यममुद्देश वी १५वी कारिका को टीका में इन्होंने अपने 'अद्वयसिद्धि' नाम के ग्रन्स की सूचना दी है । जैसे-'कारणान्तरभ्युदासश्चाद्वयसिद्धावभिहित इति सत्यधिस्वे सत एवावगन्तव्यः।' २बाभू० हेाराज की टीका जो केवल नृतीय काण्ड को उपलब्ध है वह भी पूर्ण नहीं है। काशी से मुद्रिन सस्करण में कई स्थलों पर लिया है 'इतो ग्रन्थपातसन्धानाय फुल्लराज- कृतिलिस्यते। फुल्लराज पुखराज ने वाक्यपदीय के कितने भाग पर टीका को यह अभी तक गवेषणा का विषय है । हाँ, टीका के कुछ भागों के देसने से पता चलता है.कि वह टीका भो 'वाक्यपदीय' को सुवोध बनाने में अवश्य सहायक है । इनका क्या समय रहा होगा यह तो कहना असम्भव है तबतक जबतक उनके विषय में विशेष गवेषणा न हो। सूर्यनारायण शुक्ल .वाक्यपदीय जैसा दार्शनिक ग्रन्थ है और उम पर जिस प्रकार की विवेचनापूर्ण टीका की आवश्यकता है उस प्रकार की एक भी टोका अभी तक नही रची गई है। जो टीकार्य अभी तक बनी थीं वे किसी समय के लिए गले ही मार्गदर्शक रही हों किन्तु इस युग में जब 'वाक्यपढीय' का पठन पाठन बन्द्र है और विद्वानों में 'बहुश्रुत' होने की प्रवृत्ति कम हो गई है वाक्यपदीय पर विशद टीका की आवश्यकता थी। आचार्य भर्तृहरि ने हो कहा है- प्रज्ञा विवेकं लभते भिन्नैरागमदर्शनैः। कियद्वाशक्यमुन्नेनुं म्वतर्कमनुधावता ॥ इन्ही स्थितियों को ध्यान में रख कर मेरे पूज्य पिता श्री शुक्ल जी ने 'भावप्रदीप' नाम की टीका रचनी आरम्भ की जो अनेक कारणवश ब्रह्माण्ड के आगे नहीं छप सकी। श्रीशुलजी का जन्म १९५२ विक्रम में फैजाबाद जिले की अकबरपुर तहसील के निमदीपुर ग्राम में श्री पं० रामेश्वरदत्त शुक्ल के घर में हुआ था। इनके पिता अवध की रियासत दियरा के राजा रुद्रप्रतापशाहि के राजपण्डिन थे। इन्होंने आरम्भिक शिक्षा अपने पिता से प्राप्त की और तदनन्तर राजगोपाल पाठशाला अयोध्या में थी प० चन्द्रधर पाण्डेय से न्याकरण- साहित्य, श्रीगमानुजाचार्य से शाकर, रामानुज वेदान्त तथा मीमासा और श्रीश्रीदत्तजी पाण्डेय मे नन्यन्याय का अध्ययन किया था। आपने काशी के जो० म० गोयनका मस्कृत महाविद्यालय में ४ वर्ष तक व्याकरण पढाया और उसके बाद गवर्नमेण्ट संस्कृत कालेज वाराणसी में १४ बर्ष न्यायशास्त्र का अध्यापन किया नदनन्तर ११४४ के 'चैत्र (मार्च ) में इस जगत् को छोड दिया। आपके रचित ग्रन्थ- वादरत्न (न्याम भाग) व्याकरण २. वादरत्न (परिष्कार भाग) " ३.माध्वभ्रान्निनिरास देदान्त ४.माध्वमुग्गभग ५.निर्विवसताराद निवन्ध ६ आशौचमकरव्यवस्था धर्मशास्त्र .

" " [ ११ ] आपकी रचित टीकायें १. मुक्तावलीमयूग्द न्याय २. तत्त्वचिन्तामणि (मंगलबाद) 3. तर्कसंग्रहदीपिकामयूप ४. वाक्यपदीय भावप्रदीप व्याकरण ५. लघुमंजूषा ( आकांक्षायोग्यता प्रकरण)' ६. भादृचिन्नामगिमयूम मीमामा ७. खण्डनरलमालिका (मण्डनयाय टोरा) वेदान्त इनके अतिरिक्त प्रायः १५ ग्रन्थों का आपने सम्पादन किया जो चौखम्बा संस्कृत पुस्तकालय अथवा मरस्वतीभवन पुस्तकालय मे मुद्रित है। ऊपर लिखे हुए प्रन्धों में प्रायः ममस्त चौग्यम्बा संस्कृत मीरीज में मुद्रित है। वाक्यपदीय पर अन्य टीकायें वास्यपढीव पर कुछ लोगों ने केवल छात्रों के लिए कुछ टीकायें रची है जो इतनी मंक्षिप्त है कि इन्हें महत्त्व देना आवश्यक नही है। इनमें श्रीद येश झा नथा श्रीनारायणदत्त शास्त्री (नृसिंह ) जी की टीका अवर उल्लेगलीय है इधर श्री पं० रघुनाथ शास्त्रीजी ने ममम्न वाक्यपदीय पर टीका लियना आरम्भ किया है जो भर्तृहरि की वृत्ति के आधार पर रची जा रही है तथा भावदोध के लिए बटी सरल भी है । यदि इस महाविद्वान् को मस्कृत विश्वविद्यालय ने इस कार्य में रन रखने की व्यवस्था वी तथा इम ग्रन्धरल का मुद्रण किया तो वाक्यपदीय का मचमुच उद्धार हो जायगा। अब हम आगे वाक्यपदीय ग्रन्ध का कद सक्षिप्त परिचय देना चाहते हैं जिसमें प्रकृत काण्ड का विशेष तथा शेष काण्टों का मामान्य परिचय होगा। वाक्यपदीय वाक्यपदीय के तीन काण्ड में से प्रथम चाण्ड अथवा नामकाण्ड आगमममुच्चय काण्ड है । इस काण्ड में आचार्य भर्तृहरि ने वाक्यपदीर के दार्शनिक आधार का चित्रग किया है। प्रथम काण्ड का प्रतिपाद्य विषय प्रथम काण्ड मुख्यतः आगमकाण्ट कहा जाता है। इस काण्ड में शन्द को न के रूप में स्वीकार किया है। आचार्य भरि ने शब्द को अनादिनिधन, अक्षर, जगत्कारण, नित्य और चेतन स्वीकार किया है। शब्द ब्रह्म अपनी स्वतन्त्र शक्ति 'कारशक्ति' के द्वारा ममग्न जगत् की उत्पत्ति अथवा अभिव्यक्ति को नियन्त्रित मानता है। इसीलिए इनके यहाँ एक ही सद से एक काल में अनेक कार्य नहीं अपन्न होते। उन ब्रह्म का स्वरूप और प्राप्ति का मुग्न्य उपाय 'वेद' है, जो है, किन्तु महवियों के द्वारा विभिन्न रूप में अभ्यस्त होने के कारण अनेक रूप का हो गया है। वह वे अनेक अनों और आगों से युक्त है, जिसमें व्याकरण वेद का प्रधान अगई और व्याकरण के द्वारा प्रत्यगात्म स्वरुप र म का माक्षात्कार होता है जिससे मोक्ष की प्राप्ति होनी है। पन्न, अर्थ और उनरा मम्बन्धी भी नित्य है, जिनमें प्रकृति प्रन्यर आदि की कल्पना उनके माधुन्वरूप के साक्षात्कार के लिए की गई है। शब्दों के नित्य होने के हो कारण व्याकरण शास्त्र बनाना सार्थक है अन्यथा शब्दों की अनित्यता से सुस्थिर व्याकरण का बनाना सम्भव न होना। अतः साधु शब्दों के परिज्ञान के लिए व्याकरणागम की रचना वेद के आधार पर की गई। आगम प्रामाण्य आगम समस्त प्रमाणों में श्रेष्ठ है । अनुमान प्रमाण में आगम का अन्तर्भाव नहीं हो सकता क्योंकि आषाढ़ में बोया गेहूँ और कार्तिक में बोये हुए धान से फल उत्पन होना सम्भव नहीं है। अनः शक्ति के भेद से वस्तुस्थिति में भेद हो जाता है। धर्माधर्म निर्णय के लिए भो आगम ही प्रमाण है। शख की पवित्रता की भाँति मनुष्य के शिर का कपाल अनुमान द्वारा पवित्र सिद्ध नहीं किया जा सकता। अनुमान में सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि वह किसी वस्तु को एक तर्क से सिद्ध करता है फिर विपरीन तर्क से खण्डित हो जाता है। अभ्यास-भी अनुमान में अन्तर्हित नही हो सकता। मणि के मूल्य में तारतम्य का धान अनुमान से नहीं हो सकता। अहट भी प्रत्यक्ष और अनुमान से परे ही है। पितरों, राक्षसों और पिशाचों की सिद्धियाँ प्रत्यक्ष अथवा अनुमान नहीं है। वाक्यपदीयकार के मत में प्रमाण इन विवेचनों से प्रतीत होता है कि वाक्यपदीयकार प्रत्यक्ष, अनुमान, शब्द, अभ्यास और अदृष्ट इस प्रकार ५ प्रमाण मानते हैं। प्रत्यक्ष वाक्यपदीयकार के मन में प्रत्यक्ष दो प्रकार का है एक लौकिक और दूसरा अलौकिक । लौकिक प्रत्यक्ष तो हम लोगों का है किन्तु अलौकिक पत्य ऋषियों का है जो बिना मन्द्रिय की सहायता के ही होना है और लोक उसे अपने प्रत्यक्ष से कम महत्व नहीं देता। का०) ३७-४०॥ अनुमान प्रत्यक्ष के अतिरिक्त अनुमान प्रमाण को निशेष सिद्धि के उपाय तो नही नर्णिन है किन्तु उसका सण्डन भी नहीं किया है अनः 'अप्रतिषिद्धं हनुमतं भवति' न्याय के आधार पर स्वीकार किया जाता है कि वाक्यपीयकार अनुमान प्रमाण स्वीकार करते है। शब्द (आगम) शब्द को प्रमाण स्वीकार करने के लिए वाक्यपदायकार ने अपनी पूरी शक्ति लगा दो हैं। ऊपर कहे गए. समस्त तर्फ आगम को प्रमाण ही सिद्ध कर रहे है। अभ्यास वाक्यपदीयकार ने अपनी ३वी कारिका के आगर पर अभ्याम नाम के प्रमाग की चर्चा थी तथा कहा कि 'जो मगि आदि के मूल्यों के नारतम्य का ज्ञान है वह दूसरों को बताया नहीं जा सकता किन्तु अभ्याम मे ही होता है, इसमे पता चलता है कि दनको अभ्याम नाम का प्रमाग भी स्वीकृत रहा होगा। दूसरे दार्शनिकों का कहना है-'कल मेरा माई आएगा । १३ । यह मेरा हृदय कहता है। इस शान की भाँति अभ्यास भी प्रत्यक्ष ही है जैसे आर्ष शान। अदृष्ट वाक्यपदीय की ३६ वीं कारिका के आधार पर अदृष्ट प्रमाण की भी चर्चा की गई है। प्रेत अथवा पितर भोत से बिना छिद्र बनाये हाथ बाहर निकाल देते है ये मिद्धियाँ अदृष्टजन्य हो हैं। दूसरे दार्शनिक इसे भी आर्ष शान की भाँति प्रत्यक्ष हो मानते हैं। जैसे नपःसाध्य आपज्ञान है वैसे ही पितरों की सिद्धियाँ भी है । वाक्यपदीयकार ने उपमान, अर्थापत्ति, अनुपलन्धि, सम्भव और ऐतिह्य नाम के प्रमाणों की कोई चर्चा भी नहीं की है। सम्भवतः उन्होंने इन प्रमाणों को नगण्य माना हो श्री म०म० तात्याशास्त्रि प्रभृति वैयाकरणों ने व्याकरण सिद्धान्त में साख्य सिद्ध प्रमाण मान्य कहे हैं । अत एव यह भी एक पक्ष प्रामागिक प्रतीत होता है कि व्याकरण सिद्धान्त में प्रत्यक्ष, अनुमान और शब्द तीन हो प्रमाण मान्य रहे हैं। इस प्रकार नित्य चेतन शब्द बन की प्राप्ति के लिए उसकी प्राप्ति के माधन वेद के प्रधान अआ व्याकरण का अध्ययन आवश्यक, प्रामाणिक और आभ्युदयिक सिद्ध है। फिर भी सर्वदा शब्द का प्रतिभास न होने कोई कारण अवश्य होगा। इत्यादि अनेक शंकाओं के समाधान के लिए. शब्द के वास्तविक स्वरूप का प्रतिपादन किया गया है। शब्द के दो रूप वैयाकरणों ने शब्द के दो रुप स्वीकार किये हैं। एक निमित्त और दूसरा अर्थबोधक । स्फोट और सरी रूप से दो प्रकार के दाब्दों में कार्यकारणभाव माना गया है। स्फोट स्सोट वह शब्द है जहाँ अन्य शब्द छिपकर बैठे रहते हैं और जिसके अनुग्रह से शम्द मुनाई पडते है तथा अर्थ का बोध होता है। स्फोट निमित्त और अर्थ बोधक भी है। श्रोता के लिए वैखरी निमित्त है और स्फोट अर्थबोधक है क्योंकि पूर्वपूर्ववर्णो के नाश हो जाने से उत्तर- उत्तर वर्ण के एक साथ न रहने से अर्थबोध नही हो सकता था। अतः स्फोट ही अर्थबोधक माना गया है। वक्ता के तात्पर्य से स्फोट वैसरी का निमित्त है और वैखरी हो अथवोध (स्फोट प्रकाशन ) के लिए उच्चरित होती है। इन दोनों पक्षों में स्फोट ही अर्थवोधक स्वीकृत है। यद्यपि धनियों के क्रम से जन्म लेने के कारण स्फोट सक्रम प्रतीत होता है तथापि वह सकम नहीं है किन्तु जैसे मयूर के अण्डे के रस में मयूर के अंग प्रत्यंग अक्रम रहते है किन्तु क्रम से ही विरसित होते है वैसे स्फोर भी अक्रम है किन्तु ध्वनि के क्रम से उच्चरित होने से स्फोट में सक्रमता प्रतीत होती है। इमा प्रकार शब्द में वर्ण, पद, वर्णावयव, पदावयव, जाति, व्यक्ति, सराण्ड आदि प्रतीनियाँ भ्रम है। वस्तुतः एक तथा सत्य वाक्य ही स्कोर है। जगत् शब्द का विवर्त है वाक्यपदीयकार ने जगन को शम्द का विवन और परिणाम दोनों माना है यह 'शब्दस्य परिणामोऽयम्'-'एतद्विश्व ग्यवर्तत' इम कारिका से सिद्ध होता है। कुछ ऐसे वचन मिले हैं जिनसे परिणाम और विवनं शम्द में पर्यायता प्रतीत होती है जैसे भवभूति ने 1 [ १४ ] 'भावर्तवुवुदतरङ्गमयान् विकारान्' कहा है । विकार और परिणाम पर्याय शब्द है। बुद्बुद पानी का विवर्त है विकार नहीं। फिर भी दोनों शब्दों के व्यवहार में साकये कहा है। स्फोट सिद्धि के प्रारम्भ में गोपालिका टीकाकार ने शब्द को जगत् का विवर्त और विकार दोनों माना है। उनका कहना है कि स्फोट का विवर्त जगद है किन्तु ध्वनि अथवा देखरी का परिणाम है । यह उचित भी प्रतीत होता है। जब 'वागेद विश्वाभुवनानि अज्ञे' 'सभूरिति व्याहरत् मुवमसूजन्' श्रुतियाँ भूव्याहार को जगत् सृष्टि में कारण मानती है तब वैखरीका परिणाम जगत् मान लेने में कोई हानि नहीं प्रतीत होती। शब्द से सृष्टि प्रक्रिया वैयाकरणों के मन से सष्टि का क्रम इस प्रकार मान्य है। सृष्टि के आरम्भ में पश्यन्ती वापो शब्द ब्रह्म ने अपनी अपरिमित शक्ति वाली माया के साथ होकर विभिन्न प्रकार के प्राणियों के कर्मों की महायता से समस्त नाम रूपात्मक जगत् को वुद्धिस्थ करके 'यह मैं करूंगा' संकल्प करता है और तद अपनी स्वतन्त्र शक्ति कालशक्ति के साथ आकाशादिकों की, उसके बाद भूनों का सृष्टि करना है । कहा भी है कि- 'यः सर्वपरिकल्पानामाभासेऽप्यनवस्थितः । तर्कागमानुमानेन बहुधा परिकल्पितः॥ अन्तर्यामी स भूतानामाराद दूरे च दृश्यते । सोऽयन्तमुक्तो मोक्षाय मुमुक्षुभिरुपास्यते ।। तस्यैकमपि चैतन्यं वहुधा प्रविभज्यते । अंगाराङ्कितमुत्पाते वारिराशेरिवोदकम् ॥ त्रयीरूपेण तज्ज्योतिः प्रथमं परिवर्तते। ब्रह्मेदं शब्दनिर्माणं शब्दशक्तिनिवन्धनम् ।। विवृत्तं शब्दमात्राभ्यस्तास्वेव प्रविलीयते।' 'जो प्रलय के बाद भी स्थिर है, जिसकी नर्क, आगम और अनुमान द्वारा अनेक प्रकार से कल्पना की गई है, जो समस्त प्राणियों के दूर और अन्तर विद्यमान है, जो मुक्त है और मोक्षार्थी जिसको उपासना करते हैं उसका एक चनन्य अनेक रूप में प्रविभक्त है। जिसकी प्रथम ज्योति त्रयो (वेद) रूप में परिणत होती है वह शब्द है और उसी की मात्रा से जगत् का विवर्न हुआ है और उसी में यह विलीन होता है। नागेशभट्ट ने सृष्टि का क्रम कुछ दूसग ही स्वीकार किया है। जैसे 'प्रलय काल में समस्त प्राणियों के भोग्य कर्मों का जत्र प्रक्षय हो जाता है तब जगत् माया में और माया ईश्वर में लीन हो जाती है । यह लोनना नाश नहीं है किन्नु मुप्त होना है। उसके बाद जो कर्म फल देने योग्य नहीं थे काल दश फल देने के लिए उन्मुस हुए तब भगवान् की माया और पुरष के रूप में अवुद्धिपूर्वक सृष्टि होनी है फिर परमेश्वर में सृष्टि चलाने की इच्छा रूपा माया धृत्ति का उदय होता है और अन्यत, विगुण विन्दु जवान होता है। इस ही 'शक्तितत्व' कहते है। दम बिन्दु में तीन पश है। चिदश (दाल) चिदचिन्मिथ अश नाद (परावाक्) चिदश विन्दु । इस प्रकार उत्पन्न नाद ही परावाक् है जिसे बाक्य- पदायकार ने यावत्सटिस्थिति अथवा प्रदाहनित्यना के आधारपर अनादिनिधन शब्द से कहा है । वस्तुतः शन्द अनादि और अनन्त नहीं है।'

। १५ । यह हो मन 'प्रपञ्चसार' में (जो तन्त्रशास्त्र का ग्रन्थ है ) प्रतिपादित है जैसे- प्रकृतिः पुरुषश्चैव नित्यो कालश्च सत्तम । अगोरणीयसी स्थूलात्स्थूला व्याप्तचराचरा । स जानाति विपाकांश्च तस्यां सम्यग्व्यवस्थितान् । सा तत्वसंज्ञा चिन्मात्रा ज्योतिषः सन्निधेस्तदा। विचिकीर्षुर्घनीभूतः सा चिदभ्येति विन्दुताम् । काले न भिद्यमानस्तु स विन्दुर्भवति विधा ।। स्थूलमूमपरत्वेन तस्य वैविध्यमिप्यते। स विन्दुनादीजस्वभेदेन च निगद्यते। विन्दोस्तस्माद्भिद्यमानाद्रवोऽव्यक्तारमकोऽभवत् । स रवः श्रुतिसम्पन्नैः शब्दब्रह्मेति कथ्यते ॥ इत्यादि । तात्पर्य यह कि घनीभून ब्रश, उमको विचिकीर्षा, अव्यक्त (कारणविन्दु), अव्यक्तरव (परावार ), पश्यन्ती (कर्मविन्दुरुप मामान्यस्पन्दवती), मध्यमा (नादरूप स्पन्दविशेषवती), वैसरी ( वीजरूपा अकारादिवर्णरूपा)। इस प्रकार नागेश का मत तन्त्रशास्त्र को वामना के आधार पर वाक्यपदीय कारिकाओं का अर्थ अन्यथा करने वाला है। जहाँ वाक्यपदीयकार शब्द ब्रह्म को नित्य मानते हैं तथा जगत् को शाब्दबद्य का विवर्त मानने है वही नागेश शब्द ब्रह्म को अनित्य मानते हैं तथा प्रवाइनित्यता को ध्यान में रखकर वाक्यपदीय की 'अनादिनिधन ब्रह्म' कारिका का अन्यथा अर्थ करते हैं। इनका यह मन शैवागम के 'शिवदृष्टि' ग्रन्थ तथा दौडदर्शन के तत्त्वसंग्रह ग्रन्थ में वैयाकरणमन के रूप में उद्धृत नथा स्वीकृत सिद्धान्त से भिन्न होने के कारण तथा वाक्यपदीय के सर्वथा विपरीत होने के कारण असगत है। यह अन्य ग्रन्थकार (जैसे न्यायमंजरीकार जयन्त और शारदातिलक) के दारा ज्ञात वैयाकरण मत से भी विरुद्ध है। सिद्धान्तशैव, शांकर और वैयाकरण मत में भेद सिद्धान्तशैव का मत है कि 'शिव और शक्ति ( शानरूपा) एक तत्त्व, शिव की परिग्रह शक्ति 'विन्दु' जो कियाशक्ति' भी कही जाती है द्वितीय तत्त्व, आत्मा तृतीय तत्त्व, इस प्रकार तीन 'रत्न' हुए । विन्दु के दो भेद एक शुद्ध ( महामाया) दूसरा अशुद्ध (माया)। विन्दु की शक्ति का नाम विकल है । उसे ही आश्रय बनाकर शिव शुद्धबिन्दु को धुब्र करते है । उससे शब्द और अर्थ सृष्टि की धारा उत्पन्न होती है। वह दाम्दधारा क्रम से परा. पश्यन्नी, मध्यमा और बैसरो के रूप में है फिर अशुद्ध बिन्दु शुभ होकर भगुद्ध शब्द धारा उत्पन्न करना है। वह भी क्रम से परा, पश्यन्नी, मध्यमा और वैखरी रूप है। इस प्रकार दोनों प्रकार के बिन्दुओं से उत्पन्न धाराएं जड है। उनका परिणाम वागी भी जड है। उमका अनिकम ही मोक्ष है 1 वाक् तादात्म्य मोक्ष नहीं है। यह मत शव मिझान्न के अष्टप्रकरण में प्रतिपादिन है। विशेष वहीं देखना चाहिए। अभिनव गुप्त का मन है कि प्रकाश और विन दो ही वस्तु है। प्रकाश ही शिव है और विमर्श ही उसको स्वातन्यशक्ति उमा कही जाती है। फिर भी प्रकाश के बिना निमर्श और विमर्श के बिना प्रकार नहीं रह सकता अनः दोनों एक ही है। इसीलिए इन्हें । १६ । 'अद्वैतो' कहा जाता है। विमर्श को परावाक् और प्रकाश को अर्थ माना है। यही सिद्धान्त कालिदास ने 'दागर्थाविव सम्पृक्तौ वागर्थप्रतिपत्तये। जगनः पितरौ वन्दे पार्वतीपरमेश्वरी।' में वर्णित किया है । जब सर्वस्वतन्त्र शिव अपनी स्वतन्त्र शक्ति का संकोच करते हैं तब 'मैं यह जानता हू' भेद बुद्धि होती है । इस प्रकार स्वातन्व्य शक्ति रहित अश जडवर्ग है और शक्ति सहित अंश चेतन वर्ग है। शांकरमत में विशेषता यह है कि 'प्रकाश को स्वप्रकाश मान लेने से कार्य चल जाना है प्रकाशक के रूप में विमर्श मानना आवश्यक नहीं है । प्रकाश ही ब्रह्म है जो अनिर्वचनीय अविद्या के द्वारा अनेक रूप में प्रतीत होता है।' शब्द ब्रह्मवादियों का मत है कि विमर्श (पश्यन्ती) ही ब्रह्म है । वह अविद्या के द्वारा अनेक रूप में भासित होता है। इम प्रकार वैयाकरण के मत में पश्यन्ती वाक् ही शब्द ब्रह्म है और शब्द ब्रह्म में तादात्म्य ही जीत का मोक्ष है। मुक्ति में भी शब्दात्मना जीव की स्थिति रहती है। सिद्धान्तशैव के मत में मोक्षदशा में अशुद्ध वाक् रूप वन्धन का अतिकम हो जाता है और शुद्ध वाग् रूप का अनुगम रहता है इसलिए वह 'चित्' रूप में भासित होता है और वाणी 'चिद्' रूप में प्रतीत होती है । वस्तुतः जीव का वाक् तादाम्य नहीं होता। वाणी के तीन भेद वाणी के तीन भेद माने गए हैं पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी । इन तीनों के भी तीन-तीन भेद है, स्यूला, सूक्ष्मा और परा। इस प्रकार वाणी के नव भेद हुए। वर्ण विभाग रहित स्वर प्रधान संगीत रूपा वाक् स्थूला पश्यन्ती, यही जिज्ञासा सहित सूधमा पश्यन्ती, यही जिज्ञासा हीन सविद्रूपा परा पश्यन्ती। चर्म से जटित मृदंग पर उत्पन्न ध्वनि रूप स्थूला मध्यमा, यही वजाने की इच्छारूपा सूक्ष्मा मध्यमा, यही बजाने की इच्छा रहिता और निरुपाथिक परा मध्यमा। पृथक-पृथक विलक्षणता के कारण स्पष्ट व्यक्त वर्ण रूपा वाक स्थूला वैखरी । यही विवक्षा रूपा सूचमा वैखरी । यही विवक्षा रहित होने परसंविद्रूपा परा वैखरी । इस प्रकार पश्यन्ती ही सूक्ष्मनर अवस्था में 'परा' वाक् मी कही जाती है । तात्पर्य यह है कि एक विन्दु में तीन रेग्या डाल देने से भी मूलभूत विन्दु एक हो है। उस एक विन्दु में पश्यन्नी, मध्यमा और वैखरी तीन रेखायें हैं और इन एक एक रेखाओं में भी स्थूला, सूक्ष्मा और परा तीन रेखाएं है । इस प्रकार नव वाणी वनती है जिनमें एक वह अलग ही है जिनमें सीन नोन भेद के माध तीनों वाणियाँ हैं अतः वह रूप दशम भेद है। पूर्वोक्त नव और उनकी कारण तीन वाणियाँ इस प्रकार द्वादश भेद हुए । इन्हें द्वादशररिमयाँ कहा जाता है और सूर्य भी कहा जाता है। अत एव कहा है कि- सर्वभूतान्तरचरः शब्दब्रह्मात्मको रविः। भित्वा यं बोधखगेन निर्गच्छन्त्यविशतिताः ॥ 'समस्त प्राणियों के हृदय में विचरने वाला शब्दब्रह्म रूप सूर्य बोधरूप सग से जिसका भेदन कर निटर रोग निकल जाते हैं।' आमदातियाँ ही चिन्मरौचिों अथवा सूर्य रश्मियों है । सूर्य ही समस्त अर्थों का प्रकाशक होने से शब्द ब्रह्मात्मा अथवा वेदात्मक है। घोडदाकला वाले पुरुष में १५ कलायें परिगामशालिनी है फिर भी सोरहवीं कला - चिन्कला और परिणाम की साझीभूना और परम अमृत रूप है। इसीलिए इसका निरोध भी सम्भव नहीं विनाश तो दूर की बात है। सिक्षन्तशैवों का मत है कि परा, पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी नाम को चार बागियों है और ब्रह्म उनसे अलग है। पश्यन्ती आदि तीनों धाणियों परावस्था में परब्रह्म से सगत होकर एक रूप में स्थिर हैं। फिर वाचस्पति परमेश्वर अपनी ज्योति से अपने से अभिन्न वस्तु समुदाय को नित्य भासित करता है जिससे इच्छा उठती है और यही सष्टिक्रम का कारण बनता है। नागेशभट्ट ने सिद्धान्तशैव के सो मत और 'पा वाड्मूलचक्ररथा पश्यन्ती नाभि- संस्थिता । विस्था मध्यमा ज्ञेया वैखरी कण्ठदेशगा' इस तन्त्रशास्त्र के मत के आधार पर वाणी के चार भद परा, पश्यन्ती, मध्यमा और वैसरी मान लिया जो वास्तव में व्याकरण सिद्धान्त के विरुद्ध है । क्योंकि आचार्य महरि ने 'वैखर्या मध्यमायाश्च पश्यन्त्याश्चैतदद्ध- तम् । अनेकतीर्थभेदायास्त्रय्या वाचः परं पदम्' कारिका में वाणी के तीन ही भद स्वीकार किए है। 'मारस्वनी सुषमा' के लेख में जिस विद्वान् ने 'स्वरूपज्योतिरैवान्तः परावागनपायिनी' झारिका को वाक्यपदीय की मानकर पमाण के रूप में उपस्थित कर परा वागो को भर्तृहरि सम्मन कहने का दुःसाहस किया है उसने वाक्यपदीय को न देसकर ही ऐसा किया है अनः इम इस विषय में कुछ नहीं कहेंगे। जिन लोगों ने 'चत्वारि वाग परिमिता पदानि' महाभाष्यस्थ मन्त्र की नागेश का टीका के आधार पर वाणी के चार भेदों की कल्पना का समर्थन किया है उन्हें इसी मन्त्र का प्रदीर देखना चाहिए, जहाँ वैग्यट ने लिया है कि- 'चतुर्णा (नामाख्यातोपसर्गनिपातानाम्) पदजातानामेकैकस्य चतुर्थभागं मनुष्या भवैयाकरणा वदन्ति ।' यद्यपि 'चतुर्गाम्' की व्याख्या 'नामाख्यानोपसर्गनिपातानाम्' इस मन्त्र की व्याख्या में कैय्यर ने नहीं लिसा है तथापि चत्वारि भट्टा' मन्त्र की व्याख्या में भाष्यकारने स्वय कण्ठतः 'नामास्मात' आदि की गणना की है, इस प्रकार नागेश की वागी के चार भेद स्वीकार करने वाला सिद्धान्त व्याकरण सिद्धान्त के सर्वथा विरुद्ध है। हो, एक बात यह रह जाती है कि वे वाणी के चार भाग कौन है जिनमें अवैयाकरण केवल चतुर्थ भाग बोलते है। इसका उत्तर तो अत्यन्त स्पष्ट है। एक तो यह कि अवैयाकरण वाणी के उम रूप को जानते हैं जिसमें लोक व्यवहार होता है, शेष साधुत्वादि रूप नही जानने । दूमरा उत्तर यह हो सकता है कि- 'विपादूर्व उदैत् पुरुषः पादोस्येहा भवत् पुनः। पादोस्य विश्वाभूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि ॥ इस मन्त्र में वर्णित मा के चार अश का जो विवचन है वही शन्द ब्रह्मवादियों के मन में सुस्थिर है। यह वाक सस्कृन धाक है जिसके ज्ञान से पुण्य होता है जिसका पल है 'एकः शानः सम्याशातः सुप्रयुक्तः स्वर्गे रोके च कामधुग भवति।' द्वितीय-काण्ड का प्रतिपाद्य विपय एम यही द्वितीय वाण्ड के प्रतिपाय समस्त विषयों की चर्चा न करके केवल उमको मुख्य रिचारधारा का निर्देश मात्र देना उपयुक्त समझते है।

। १६ प्रथम काण्ड में वाक्यस्फोट को ही मुख्य सिद्ध किया गया है किन्तु वाक्य का स्वरूप क्या है इसका विवेचन द्वितीय काण्ड का मुख्यतया प्रतिपाद्य विषय है। वाक्यपदीय के द्वितीय काण्ड के आरम्भ में वाक्य के विषय में विभिन्न दृष्टिकोणों की चर्चा की गई है जिनमें मुख्य ये है। - वाक्य विवार वाक्य दो प्रकार के है एक अखण्ड और दूसरा सग्दण्ड । अखण्ड पक्ष में वाक्य के तीन भेद है । (१) संघातवतिनीजाति, ( २ ) एक अनवयव शन्द और (३) बुद्धयनुसंहति । सराण्ड पक्ष में पाँच भेद है (१) केवल आख्यानशब्द, (२) कम, (३) संघात, (४) आद्यपद, (५) पृथक् सर्वपद साकांक्ष। सखण्डपक्ष के पाँच भेदों में सवात और क्रम अभिहितान्वयवाद पक्ष में और आख्यात शब्द, आद्यपद, पृथक् सर्वपद साकाक्ष तीन रक्षण अन्विताभिधानवारपक्ष में है । इस प्रकार विभिन्न दर्शनों के आधार पर आठ प्रकार के वाक्यों के लक्षण किए गए हैं। इसके बाद बार्तिककार और मीमासको के मत से वाक्य के लक्षण कहे गए हैं। वाक्यार्थ विचार वाक्यार्थ का विचार अनेक पक्षों में किया गया है । जिनमें अभिहितान्वयवाद, अन्विना- भिधानवाद और प्रतिभावाद मुख्य हैं । उपर्युक्त प्रथम दो वादों में अनेक प्रकार के दोषों का उद्भावन करके प्रतिभा को हो वाक्यार्थ रूप में स्थिर किया गया है। प्रतिभा का स्वरूप वैयाकरणों के मत में प्रतिभा ही वाक्यार्थ है । नागेश ने भी मंजूपा में स्वीकार किया है। कि 'प्रतिभा वाक्यार्थः । वाक्यपदीयवार ने कहा है कि संज्ञावाचक शब्दों में नियत संशी की ही प्रतीति होती है। अनः कल्पित पदार्थों से सिद्ध प्रतिभा को ही वाक्या कहा गया है- विच्छेदग्रहणेऽर्थानां प्रतिभान्यैव जायते । वाक्यार्थ इति तामाहुः पदारुपपादिताम् ।। यह प्रतिभा प्रत्येक आत्मा के लिए भिन्न भिन्न सिद्ध है तथा यह उसका स्वरूप है' यह जानकार भी दूसरे को नहीं समझाया जा सकता। इदं तदिति सान्येषामनाख्येया कथञ्चन । प्रस्यात्मवृत्तिसिद्धासा कापि न निरूप्यते। उसका यह स्वभाव है विना विचार का अवसर दिये ही समस्त अर्थों का मेल कर देती है इसलिये विषय में मरूपता प्राप्त कर गई है। उपलेपमिवार्थानां सा करोत्यविचारिता। सार्वरूप्यमिवापना विपयत्वेन वर्तते ॥ चाहे किमी की भावना से अथवा शब्द द्वारा उत्पन्न हुई इस प्रतिभा का कोई भी व्यक्ति वार्य के प्रकार निर्णय करने में अतिक्रमण नहीं करता। साशतशब्देन अनितां भावनानुगमेन वा। इतिकर्तव्यतायां तां न कश्चिदतिवर्तते ॥ समस्त प्राणी इम्मी ( प्रतिभा ) को प्रमाण मानते हैं और मनुष्यों की भाँनि पशु और पक्षियों के भी समग फर्मों का भारम्भ प्रतिमा ही करती है। प्रमाणस्वेन ता लोकः सर्वः समनुपश्यति । समारम्भाः प्रतीयन्ते तिरश्चामपि तद्वशात्॥ यह सर्व प्राणियों को सिदि है जैसे किन्दी द्रव्यों के परिपाक के साथ ही बिना किसी . प्रयत्न के मादकना आदि आ जाती है। वैसे प्रत्येक व्यक्तियों नियत संस्कार से जन्य प्रनिमा भी प्रतिभा वालों के विकसित होने में यत्नान्तर की अपेक्षा नहीं करती। यथा द्रव्यविशेषाणां परिपाकैरयत्नजाः । मदादिशक्यो दृष्टाः प्रतिभास्तद्वतां तथा ॥ प्रनिमा हो एक ऐसी वस्तु है जो समय-समय पर स्फुरित होनी रहनी है। वसन्त में कोयल के मीठे शब्द स्वय हो जाते है, पक्षियों को घर बनाने की शिक्षा भी स्वयं आ जाती है । किसी प्राणी को किसी आहार के प्रति प्रोति, दूसरे को द्वेष, जैसे ऊँट यो आम के पल्लव से द्वेष और नीम के पल्लव से प्रोनि है । मनुष्य को बड़े प्रयल पर तैरना आता है किन्तु भैंस के बच्चे जन्म लेते ही तैरने लगते हैं । इस प्रकार यह मानना पडता है कि समस्त प्राणियों को समत क्रियायें प्रतिभा के हो द्वारा हो रही है। प्रतिभा का कारण भी शब्द हो है । हाँ; यह भेद हो सकता है कि किमी अवमर पर इस जन्म का अनुभूत शब्द प्रतिभा का कारण बने और किसी अवसर पर पूर्वजन्म का अनुभून शब्द प्रतिभा का कारण बने । वाक्यार्थ प्रतिमा है यह पक्ष इस प्रकार का उपस्थित किया गया है जिससे व्याकरण के सिद्धान्त की नीव दृढ हो जाती है। 'सर्वे सर्वार्थवाचकाः' सिद्धान्त उसी समय पुष्ट हो जाता है जब हम स्वीकार कर लेने है कि 'प्रतिभा' में जितने अर्थ उपस्थिन है सब उस शब्द के अर्थ है क्योंकि प्रतिभा का कारण वह शब्द है जिससे विभिन्न प्रकार के अर्थों का प्रनिभान हुआ है । मन्त्रों के जप में भी ध्यान का यही महत्व है कि आराधक मन्त्र के अर्थ का ध्यान करता हुआ अपने ध्यान में स्थित आकार वाले देवना को उस योग्य साक्षात् करे। अस्तु प्रनिभावाद के स्वीकार कर लेने से ही वैयाकरणों का एक-वृत्तिवाद भी समन्वित हो जाता है। इन्हें लक्षणा अथवा व्यजना भी सिद्धान्ततः नही मानना पटना। जब किसी शब्द की विभिन्न आनुपूर्वी से विभिन्न अर्थों की उपस्थिति होती है नव कोई कारण नहीं कि मुरत्यार्थ और अमुख्यार्य का विवेचन किया जाय तथा वाक्यार्थ बोध के लिये लक्षण माना जाय । इसी प्रकार व्यञ्जना भी मानने की कोई आवश्यकता नहीं है क्योंकि जब समस्त अर्थ दादजन्या प्रतिमा से जन्य है तब तो सब अर्थ समान रूप से प्रतिभा ही है, उनमें शक्ति, लभगा और व्यजना का भेद स्वीकार करना अयोग्यता हो है। अतः यदि किमी ने किमी टीका में यह लिख दिया हो कि वैयाकरणों के मन में तीन वृत्तियाँ है शक्ति, लक्षगा और ध्याना' तो यह निश्चय जान लेना चाहिए कि इसे व्याकरण के मूल सिद्धान्त का परिशान नहीं है। हो, एक बात है, शन्दशास्त्र में दो पहलू है एक सम्यग्शान और दूसरा सम्यक् प्रयोग। व्याकरण द्वारा कृत्रिम उपायों से सम्यग्ज्ञान सम्बसाधुत्वज्ञान होता है अर्थात् शब्द के व्याव- हारिक रूप से शम्द के पारमार्थिक रूप का प्रत्यक्ष होता है। किन्तु सम्यक प्रयोग नो पारमार्थिक नहीं शुद्ध व्यावहारिक ही है तथा व्यवहार में किसी शब्द की शक्ति नियत है फिर व्यवहार में मुग्यार्थ बाप आदि के रहने से किमी रूप में तीन अथवा चार वृत्तियाँ भी मान्य होती ही है। हम तो यह मानते हैं कि 'एकः शब्दः सम्यग्ज्ञातः सुप्रयुक्तः स्वर्ग लोके च कामधु. ग्भवति' मन्त्र के सम्यग्ज्ञान का शास्त्र व्याकरण और सम्यक् प्रयोग का पत्र साहित्य है। अत एव इसी मंत्र को आधार मानकर दोनों शाल अपनी उपादेयता भी सिद्ध करते है - [२०] इस प्रकार वाक्यपर्दाय के द्वितीय काण्ड में वाक्य और वाक्यार्थ के विषय में जितने भी तर्क उपस्थित हुए है अथवा हो सकते हैं सब पर सक्षिप्त विचार किया है। पुण्यराज ने इस काण्ड की टीका के अन्त में कारिकाबद्ध विषयानुक्रमणिका लिखी है जिसे हम यहाँ नहीं दे रहे हैं। तृतीय काण्ड का प्रतिपाद्य विषय वाक्यपदीय का तृतीय काण्ड जो प्रकीर्ण काण्ड भी कहा जाता है उस पर विशेष विवेचन की आवश्यकता नहीं है केवल उसके प्रकरणों का निर्देश कर देने से इस अन्य को देखने के प्रति रुचि जाग उठेगी और प्रतिपाद्य विषयों पर विचार करने का दृष्टिकोण बनेगा। अतः मैं यहाँ केवल प्रकरणों की सूची मात्र दे रहा हूँ। १. जातिसमुद्देश, २. द्रव्यसमुद्देश, ३. मम्बन्धसमुद्देश, ४. द्रव्यलक्षणसमुद्देश, ५. गुण- समुद्देश, ६. दिक्समुद्देश, ७. साधनसमुद्देश (कारकविचार), ८ क्रियासमुद्देश, ९. कालसमुद्देश, १०. पुरुषममुद्देश, ११. संख्यासमुद्देश, १२. उपग्रहसमुद्देश, १३. लिंगममुद्देश, १४. दृत्ति- समुद्देश। यह समुद्देश वडा तो है किन्नु वृत्तियों का रमणीय विशद विवेचन इसे महत्वशाली बनाए हुए है। इस काण्ड में लक्षणसमुद्देश और दाधासमुद्देश नाम के दो प्रकरण अनुपलब्ध है जिनको चर्चा हमने पहले सप्रमाण की है। विजयदशमी २०१८ विक्रमी रामगोविन्द शुक्ल - विषय-सूची कारिका १-४ (ब्रह्म का स्वरूप) ब्रह्म के स्वरूप का निरपण, एक ब्रम की शक्तिगतभेद से विभिन्नता, ब्रह्म की कालशक्ति, एक ही ब्रह्म भोक्ता, भोक्तव्य और भोगत्प मे स्थित है कारिका ५-१० (वेद ब्रह्म-प्राप्ति का उपाय और ब्रह्म की प्रतिमा) ब्रह्म प्राप्ति का उपाय वेद, वेद की अनेक शाखायें, वेद की महिमा, वेदों में स्मृति प्रकल्पन, वेदों से दर्शन शास्त्र और उनमें परस्पर भेद, मन्य विद्या क्या है, वेद से ही विभिन्न विद्याओं का उद्गम । कारिका ११-२२ (वेद के प्रधान अंग व्याकरण का प्रयोजन) वेद का प्रधान अंग व्याकरण, व्याकरणाध्ययन के रक्षा-ऊह-आगम- लघु-अमंदेह पाँच प्रयोजन, व्याकरण का मोक्ष द्वार होना, शक्तिप्राहक व्याकरण, मोक्ष का प्रथम द्वार व्याकरण, व्याकरणज्ञान से प्रान्मज्ञान, वैकृतध्वनित्प श्रन्धकार में शुद्ध ब्रह्म का थाप्त स्वरूप, स्फोटरूप ब्रह्म में अक्षरों को प्रताति, वेदों में विभिन्नरूप से लात ब्रह्म की व्याकरण द्वारा प्राप्ति । कारिका २३-२९ ( शब्द की नित्यता ही व्याकरण निर्माण में हेतु) शब्द-अर्थ और सम्बन्ध की निन्यता, माशु शब्दों का ज्ञान करना लक्ष्य, सानु शब्दों में धर्मजनकता, नित्यशब्दवादियों के मन मे कूटस्थनित्यता और अनिन्यशब्दवादियों के मत में प्रवाहनिन्यता कथन, नित्य व्यवस्था निरर्थक नहीं। कारिका ३०-३४ ( अनुमान से अतिरिक्त आगम प्रमाण की सिद्धि) माधुन्चज्ञान के लिए श्रागम की श्रावश्यक्ता, तर्क धर्ममार्ग का वाधक नहीं, अवस्था देश और काल के भेद से शक्ति मे भेद, अनुमान में ही वस्तुमिद्धि असम्भव, शक्ति के प्रतिबन्धक होने के कारण भी अनुमान वस्तुमिद्धि में सहायक नहीं, तर्क मे मिद्ध भी वस्तु कुशल विद्वान् के तकों मे अमिद्ध । कारिका ३५-३६ (अनुमान से अतिरिक्त अभ्यास और अदृष्ट प्रमाण की सिद्धि) अनुमान से भिन्न अभ्यास और अदृष्ट पृथक् प्रमाण । कारिका ३७-४३ ( वेदमूलक आर्य आगम की श्रेष्टता) ऋषियों का प्रत्यक्ष भी अनुमान मे वाधित नहीं, ऋषि वाक्यों पर जनता का विश्वास, ऋषि के बचन पर मवा विश्वाम, आगम के विश्वाम पर चलने [ २ ] वालों को तर्क वाद से हटाया नहीं जा सकता, केवल अनुमान को प्रमाण मानने से धोखा अवश्य, तर्कों की अव्यवस्था और आगमों की श्रेष्ठता के कारण ही व्याकरण की रचना । कारिका ४४-५० (शब्द के दो भेद) शब्द के निमित्त (स्कोट ) और प्रत्यायक (वैखरी ) दो भेद, कार्यकारण में भेदवादियों का मत, कार्यकारण मे अभेदवादियों का मत, निमित्त (स्फोट) विभिन्न विनियों का कारण, स्फोट की एकता में भी विभिन्न स्वनि को प्रताति, अबम स्कोट की सत्रम प्रतीति स्थानजन्य है, नाद के धर्म का स्फोट में आरोपित होने का प्रकार, स्फोट की स्वप्रकाशता । कारिका ५१-५५ (शब्द में अनेक धर्म समावेश) शब्द के दोनों भेदों की उदाहरण द्वारा मिद्धि, शब्द का अर्याभिधान प्रकार, शब्द की अर्थ की भाँति कियाङ्गता निषेध, शब्द को ग्राह्य और ग्राहक स्प मे स्थिति । कारिका ५६-५७ (चोधकत्व निर्णय) ज्ञान शब्द ही वोधक, अज्ञात शब्द में बोधकत्व का निषेध । कारिका ५८-६९ ( स्वं रूपं की दूसरी व्याख्या से जाति- व्यक्तिभेद की कल्पना) एक ही शब्द दो रूप में गृहोत होने पर कार्य में विरुद्ध नही, उच्चरित शब्द कार्यभाक नहीं, इसमे कारण, व्यक्तिसंज्ञापक्ष और व्यक्तिसंज्ञीपक्ष । कारिका ७०-७२ ( मीमांसकों के मत से शब्द का एकत्व) शब्द के एकन्यवाद और नानात्ववाद की कल्पना, मीमासरों के मत से शब्द की एकता का वर्णन, वर्ण के अतिरिक्त वाक्य और पद की अस्वाकृति । कारिका ७३-७४ (वैयाकरण मत से वाक्य का एकत्व और व्यवहा माकरणों के मत से वाक्य का स्वरूप, पाणिनीय व्याकरण में एकच और नानाविवाद में व्यवहार । कारिका ७५-७७ (स्फोट में प्राकृत पनि के भेद की ही प्रतीति) निन्य स्फोट में कालभेद नहीं फिर भी वृत्तिभेद की उपपत्ति, ध्वनि के दो भेद, प्राकृतध्वनिकाल का स्फोट में आरोप, वृत्तिभेद मे चकृतपान कारण । कारिका ७८-८० (ध्वनि से स्फोट की प्रतीति) ध्वनियों से सोट की उपलब्धि में निमित्त बनने के लिए तीन मत । कारिका ८१-८४ (ध्वनि की अभिव्यक्ति में तीन मत) ध्वनि की अभिव्यक्ति में तीन मत । अन्यध्वनि की सहायता से स्फोट ग्रहण, उदाहरण, स्पष्टीकरण ।

कारिका ८५-८७ (वाक्य में पद और वाक्य की प्रतीति असत्) वाक्य मे पद और वर्ण की प्रतीति एक उपाय, पद और वाक्य के भेद की प्रतीति भी एक उपाय, उदाहरण । कारिका ८८-९२ (क्रम से वर्ण, पद और वाक्य ग्रहण का कारण) वाक्य मे पदादि प्रतीति का कारण, उदाहरण, श्रम मे वर्ण पद ग्रहण के द्वारा बुद्धि से वाक्य ग्रहण, बुद्धि श्रम नियत । कारिका ९३-९४ (स्फोट पर अनेक वाद) जातिकोट वाद, व्यक्तिस्फोटवाद, एक नित्य शब्द तत्त्ववाद । कारिका ९५-१०१ (स्फोट में ध्वनिकृत काल भेद की प्रतीति) ध्वनियों के अभिव्यंजकच पक्ष मे स्फोट के अनित्यत्व आदि दृषणों का परिहार, ध्वनि और सोट के भिन्न-भिन्न देश में रहने पर भी व्यङ्ग्य व्यक्षक भाव बनना, व्यङ्ग्य व्यञक के लिए योग्यता भी नियन, व्यञक की अनित्यता व्यंग्य में नहीं, उदाहरण, ध्वनिगत काल भेद का सोट के काल भेद में कारण कथन । कारिका १०२-१०६ (स्फोट और ध्वनि का स्वरूप परिचय ) स्फोट और ध्वनि के स्वरूप, सोट काल की एक्ता, उदाहरण, नित्यपक्ष में समाधान। कारिका १०७-११२ ( शब्द के विषय में मतभेद ) शब्द के विषय में तीन भेद, शिक्षाकार का मत, जैनियों का मत, महाभा- प्यकारका मत. कारिका ११३-११७ (शान के शब्दभावापत्ति में तीन मत) एक मत में ज्ञान के शब्द रूपता में परिणत होने का प्रम, दूसरा मन, तीसरा मिद्धान्त मत । कारिका ११८-१२४ (जगत् में सर्वत्र शन्द रूपता का अनुगम) शब्द को जगकारण मानना, मर्वत्र अथों का शब्द मे जन्म, शब्द के विवन, जगत् की ममस्त प्रानि के मूल में शब्द, शब्द के उच्चारण में होने वाले प्रयत्नों का कारण शब्द, ममस्त ज्ञान में शब्द का अनुगम, वाणी के निकल जाने पर अवबोध का अभाव । कारिका १२५-१२७ (सर्वत्र चारूपता का अनुगम) समस्त विसर और काय शब्द जन्य, प्राणियों जब तक वार-प का अनुगम तभी तक चेतना, वाणी ही प्रेरक ।

कारिका १२८-१३१ (शब्द ही सर्वत्र व्यापक परमात्मा)
स्वप्न मे भी चाग्रूपता का अनुगम, सब जगत वाणी का ही विकार इस पक्ष
का समर्थन, शब्द ही पुराण प्रसिद्ध परमात्मा ।
कारिका १३२ (ब्रह्म प्राप्ति का उपाय )
शब्द का सम्यक ज्ञान ही ब्रह्म की प्राप्ति का उपाय और शब्द के तन्व का
झान ही मोक्ष प्राप्ति का साधन ।
कारिका १३३ (वेद मूलक होने से व्याकरण प्रमाण).
मनुष्य निर्मित भी व्याकरण वेद मूलक होने में प्रमाण है।
कारिका १३४-१३५ ( वेद ही धर्म, आचार और आगम का मूल )
स्मतियों के अभाव में प्राचार भी धर्म का मूल, ममस्त आगम वेद मूल
होने से ही प्रमाण ।
कारिका १३६-१३८ (वेदमूलक तर्कशास्त्र आवश्यक)
आगमों के वेदमूलक होने पर भी तर्कशास्त्र की अपेक्षा, शुकतर्क की
हेयता।
कारिका १३९-१४२ (साधुशब्द ही पुण्यजनक)
माधु और अमावु शब्दों से अर्थवोधकता की भाँति धर्मजनता का निपे ।
कारिका १४३ (वाणी के समस्त स्प व्याकरण के लक्ष्य)
वाणी के तीन भेद । व्याकरण द्वारा तीनों का प्रतिपादन ।
कारिका १४४-१४६ (जगत् के प्रलय और नित्यपक्ष मे घेद का प्रामाण्य)
शब्दों की साधु असायु व्यवस्था भी ऋपि कत्पित, मीमांसक के मत मे बंद
प्रामाण्य, प्रलयवादी के मत में चेद प्रामाण्य ।
कारिका १४७-१५६ (अपभ्रंश के विभिन्न इतिहास)
व्याकरण भी एक स्मृति, अपभ्रंश के लक्षण, शब्द क्रिमी नियत अर्थ में ही
मायु, असाधु मे परम्परया बोव, अयातु के लक्षण, अपभ्रंश की उत्पनि
का इतिहास।

॥ श्रीः।। वाक्यपदीयम् 'भावप्रदीप' संस्कृत-हिन्दीव्याख्योपेतम् प्रथमं ब्रह्मकाण्डम् यस्याई गिरिजा मूर्ध्नि गगा भाले विधोः कला । अङ्के कुमारगणपो तं सदाशिवमाश्रये यदीयपादाब्जरजोऽभिषेकान्मूकोऽपि वागीश्वरतामुपैति । तं दक्षिणामूर्तिमहं स्वकीयायोधोपघाताय समानयामि ॥ २ ॥ प्रदीपसाहाय्यमवाप्य भाप्यं विगाह्य तन्त्रान्तरमागाँश्च । वितन्यते वाक्यपदीयभावप्रदीप एषोऽतितरामुदारः ॥ ३ ॥ अथ महाभाप्ये प्रसङ्गवशात्तत्र तत्रोपनिबद्धस्य व्याकरणागमस्य कियता कालेन महाभाष्याध्येतृसम्प्रदायविच्छेदेनोत्सनक्ल्पस्य चन्द्राचार्येश व्याकरणमूलभूतं रावण. रचितमुपलतले लिखितं व्याकरणागममवाप्य पुनरुजीवितस्य स्वगुरोर्वसुरातादुपलब्ध. स्य प्रचारमभिलप्यन् भर्तृहरिर्वाक्यपदीयं नाम व्याकर गागमसर्वस्वभूनं निबन्धं निवघ्नन् शिष्टाचारपरम्पराप्राप्तं वस्तुनिर्देशामकं शब्दब्रह्मस्मरणरूपं मङ्गलमाचरति- नीलोत्पलदलश्याम नवनामरसेशगम् । सीतानिङ्गितवामान राम वन्दे महाप्रभुम् ॥ वादतोपिनविश्वेशसाधुवादोपवृहिनाः। प्रमिद्धास्तानपादाना जयन्निं विमला गिरः।। स्मरणाद् यस्य वादीन्द्रा मूकता प्रतिपेदिरे । मूर्यनारायण शुक्लं त नौमि पितर मम ।। न्याय व्याकरणाचार्यों मीमामा-काव्यवारिधि. । गमगोविन्दशुष्ठरश्रीसूर्यनारायगोदितः ॥ ग्रन्थं वाक्यपदीय दि दुर्वोर महतामपि । पितु पन्यानमानिय याख्यास्ये लोकमापया। समस्त शुभ कार्यों के प्रारम्भमें भगवानका स्मरग मार्गमें आने वाली समस्त बाधाओं पर विजय प्राप्त करनेको शक्ति प्रदान करता है, इसलिए ग्रन्यारम्भ जैसे महत्वपूर्ण कार्यके प्रारम्भमें भो उसकी निवित परिसमाप्ति की भावनामे मगवानके स्मरणरूप मङ्गलाचरणको परिपाटी सदाचारप्राप्त रही है। यद्यपि भगवानरसा स्मरण मानसिक व्यापार है तथापि ग्रन्धकार जिस । रूपमें भगवान का स्मरण करता है उमरी शियोंको शिक्षाके लिए ग्रन्यके आरम्ममें अविन कर देने की प्रथा भी मस्कृत साहित्यको एक सदाचार प्राप्त परिपाटी है। इसलिए सस्कृतके अन्यों में प्रायः मर्वत्र मागचरण पाया जाता है। वास्यपदीयकार महावैयाकरण सीमर्तृहरिजीने व्याकरण-महाभाध्यमें प्रमहश कहीं-कहीं २ पाक्यपदीयम् लिखे हुए व्याकरणदर्शन के सिद्धान्नोंको जो महाभाष्यके अध्ययनाध्यापनके बन्द हो जाने के कारण नष्ट हो गए थे और श्री चन्द्राचार्यजीने रावणदारा रचे हुए व्याकरणके मूलभूत जिन सिद्धान्तों को पुनर-नोवित किया था उन्हें अपने परमपूज्य गुरुजी श्रीवसुरात नौसे सीसकर और उस सिद्धान्त के प्रचारको अभिलाषामे व्याकरणदर्शनके सर्वस्वभून ग्रन्य की निर्विघ्न समाप्ति और इस मार्गमें बाधा डालने वाले विनापर विजय पाने के लिए आशीर्वाद, नमस्कार, तथा वस्तुनिर्देशरू। त्रिविध महलाकारों मे वस्तुनिर्देशात्मक मङ्गलाचरण करते हुए शब्दब्रह्मका स्मरण किया है। अनादिनिधनं ब्रह्म शब्दतत्त्वं यदक्षरम् । विवर्ततेऽभावेन प्रक्रिया जगतो यतः॥१॥ अनादिनिधनम् - उत्पादविनाशरहितमत एव नित्यम्, 'पूर्वापरीभावरहित मत उपसंहृतकमञ्च, यद् अक्षरम्--अक्षरस्य विभक्तककारादिवर्णरूपाया वैखा वाची निमित, सत् बाझार्थवासनया विद्यारूपया अर्थभान घटादिरूपेण विवर्तते भासते अत एव शब्दार्थोभयरूपम् यत-उपसंहृतकमात् शन्दाख्यात्, जगतो विकारजातस्य प्रक्रिया प्रथमत उत्पत्तिर्व्यवहारो या तत् शब्दतत्त्वं पश्यन्तीवा ब्रोति संबन्धः । जो उत्पन्न नथा विनष्ट नहीं होता और जिसमें आगे पीछे उत्पन्न होने का क्रमभी नही है, जो (नकारादिरूप) वर्गों का कारण होते हुए भी ( अविद्यारूपी वास अर्थों की वासनासे घट पट आदि) अर्थ (कार्य ) रूपमें भासित होना है (जो शब्द अर्थ उभयरूप है ) जिससे जगत् की (मस्त विकारोंकी ) निया (उत्पति या व्यवहार ) चलनी है पद पश्यन्ती वाकपा सन्दतत्त्व ही ब्रह्म है। इदमन तत्वम्-सर्वनाशाहकाकारपर्जिता अपरिच्छिन्ना सर्वतः संहनप्रमा पश्यन्तीरूपा वाग् ब्रह्म तदेव अविद्यालक्षणया अन्तःपश्यदवस्थया भोक्तृनारूपया विशिष्टं ज्ञेयरूपशून्यं चैतन्यमानं जीव इत्यभिधीयते । तथा च भागवतम्- स एव जीवो विवरप्रसूतिः प्रागेन घोपेग गुहां प्रविष्ट । मनोमयं सूक्ष्ममपेत्यरूपं माना स्वरा वर्ण इति प्रविष्टः ॥ इति । स एव च पश्यन्तीरूपः शब्दः अर्थ प्रतिपादनेछ्या उपलपिनो मनोविज्ञान- रूपये भास्थिनो मध्यमा वागुच्यते । मैव च वनकुहरं प्राप्ता कण्ठादिस्थान मागेषु १. अनादिनिधनपदस्य पूर्वापरीभावाहित्यमप्यर्थ इति 'अनादिनिधनपदनिवेदना पूर्वा परान्तरहिना वस्तुमत्ता' पनि न्यायमरीदर्शनादवगम्यते । २. "तित एव वाचः एग वागेन पश्यन्ती' पनि शितदृष्टयनुसारेणेदम् । यदि तु परा वाक् चतुर्थी तदा परावामा ब्रह्मति बोध्यम् । अत्रत्यं नत्वं वैपर्या मध्यमायाशनि कारिकाव्यापाया स्पष्टम् । शन्दस्य परिणामोअमिति कारिकान्याख्यावमरे शब्दब्रह्मविपये हरिनागेशयोर्म नभेदः पदर्शित इति तत्रैव द्रष्टव्यम् । ३. विवरप्रमूनिः-विवरेषु आधारादिषु प्रमुनिरभिव्यक्तिय येन्यर्थः ।

मकाण्डम् ] संस्कृत हिन्दी व्याख्योपेतम् ३ विभक्ताकारादिवर्णरूपा वैखरी वागुच्यते । ततः सैव बाह्यार्थवासनया अविद्यारूपया क्रमेण घटपटाद्याकारैर्विवृत्ता चक्षुरादिना गृह्यते इति । अयमेवार्थ:-- इत्याहुस्ते परं ब्रह्म यदनादि तथाऽक्षयम्।तदक्षरं शब्दरूपं सा पश्यन्ती परा हि वाक॥ स एवारमा सर्वदेहव्यापकरवेन वर्तते । अन्तः पश्यदवस्थैव चिद्रूपत्वमरूपकम् । तावद्यावरपरा काष्ठा यावत्पश्यन्त्यनन्तकम्। अक्षादिवृत्तिभिहीन देशकालादिशून्यकम्॥ सर्वतः क्रमसंहारमात्रमाकारवर्जितम् । ब्रह्मतत्वं परा काष्टा परमार्थस्तदेव सः ॥ भास्ने विज्ञानरूपत्वे स शब्दोऽर्थविवक्ष्या। मध्यमा कथ्यते सैव बिन्दुनादमरुत्क्रमात् ॥ संप्राप्ता वककुहरं कण्ठादिस्थानभागशः । वैखरी कथ्यते सैव बहिर्वासनया क्रमान् ॥ घटादिरूपैया॑वृत्ता गृह्यते चतुरादिना । इति कारिकाभिरनूदितो वैयाकरणमतत्वेन शिवदृष्टौ । पतदुक्तं भवति-यथा कार्यपु कारणधर्मसमन्वयदर्शनात् वैशेषिकदादि. कार्यस्य पृथिवीत्वेन तरकारणस्य परमाणोः पृथवीरवं, यथा वा सांख्यैः विकारग्रामेषु सुखादिसमन्वयदर्शनात् तत्कारणस्य प्रधानस्य सुखादिरूपत्वमास्थिपत तथैव घटादिषु शब्दरूपानुगमात् तत्कारणस्यापि शब्दरूपत्वमास्थेयम् । घटादिषु शब्दरूपानुगमश्वेत्यम्-प्रत्यक्षं तावत् जास्यादीनां मिथो विशेष्यविशेषण. भावानवगाहि जात्यादिस्वरूपावगाहि 'घटघटस्वे' इत्येवरूपं निर्विकल्पकं, गौः, शुक्ला, चलः, डिस्य इत्यादिविशेष्यविशेषणभावावगाहि सविकल्पकं वा, द्विविधमपि शब्दा. नुविद्रमेव इति सर्वेऽर्थाः सर्वथा सर्वदा सर्वत्र नामधेयेनान्विता इति नास्ति सोऽर्थी यः कश्चित् कदाचित् कवितामधेयेन वियुज्यत इति दाब्दार्थयोस्तादात्म्यमभ्युपेयम् । अत एव अर्थाः मनीयमानाः नामधेयरपेता: स्वसामानाधिकरण्येनावगम्यन्ते गौरित्य- योऽध इत्यर्थ इति । न च शब्दस्य अर्थज्ञानोपायतया सामानाधिकरण्यम्, चतुरादे- रूपादिज्ञानोपायवेऽपि रूपादिसामानाधिकरण्यस्य चनुरादावदर्शनात् । न च ज्ञाय- मान एव अर्थज्ञानोपाय उपेयसामानाधिकरण्यमनुभवति चतुरादि तु न तथेति वास्यम्, वह्रिज्ञानोपाये शायमानेऽपि धूमे धूमोऽयं वह्निरिति सामानाधिकरण्यानु. भवादर्शनात् । किञ्च अशब्दोपायेऽनुमेयादौ न शन्दसम्भेदेनाधिगमो भवेद् अस्ति तु तस्मासामधेयैः सह अर्थस्य सामानाधिकरण्यानुभवो नामधेयात्मानोऽर्था इति पर्यवसाययति । ननु सस्यपि पुरोवर्तिप्तामानाधिकरण्येन रजतप्रत्यये न शुक्तिकाया रजतारमा तहापि किन्न स्यादिति चेन्न । तत्र विसंवादादुत्तरकाले वाधानुभवाच तरप्रतीतिरप्रमाणम् इदं तु अविसंवादात्प्रमाणं सदर्थतादात्म्य शब्दस्य साधयत्येव । किज पड्जादिषु शब्दापकऽर्थप्रत्ययापकर्षात् तदुरकर्ष स्वर्थप्रत्ययोरकर्षात् प्रत्ययस्य च प्रत्येतायोत्कर्षाधीनोकपरवानामधेयोकगोकोऽर्थस्य तादात्म्यं कथयति । तदे. वमर्थानां नामधेयारमावे स्थिते रूपमिति रसमिति यत्प्रयासानं तदपि नामधे. यगोचरमेव । न चैवं प्रत्ययस्य शाब्दस्वात्तिरिति वाच्यम्, न शन्दप्रमाणतया वाक्यपदीयम् शाब्दमपि त शब्दे जातं शादं शब्दश्चास्य विषयो न जनक इत्यदोपात् । किन सर्व प्रत्यय उपजायमानो नानुल्लिखित शब्दक उपजायते तदुप्लेषविरहिणोऽनासादि. तप्रकाशस्वभावस्य प्रत्ययस्यानुत्पन्नकल्पवाद । इदम्, ईदृशम्' इति परामर्शमुपित. वपि वेदने वेदनात्मकतैव न स्यात् संविदा प्रकाशशून्यत्वात् । यदाहुः- 'वामपता चेदुरकामेदवबोधस्य शाश्वती। नप्रकाशः प्रकाशेत सा हि प्रत्यवमर्शिनी॥' इति। येऽपि वृद्धव्यवहारोपयोगधुयेंगानवाप्तशब्दार्थसम्बन्धविशेषव्युत्पत्तयो बालदार- कप्रायाः प्रमातारस्तेपामपि विज्ञानं पाब्दानुयाधानुवेधवदेवानादिवसनावशात् । अत एव तेऽपि नूनं यत्तस्किमित्यादिशब्दजातमनुतिसन्तो न प्रतियन्ति किमपि प्रमेयमतः शब्दोन्मेपप्रभावप्राप्तप्रकाशस्वभावत्वं सर्वप्रत्ययानाम् । यदाहु:- भाद्यः करण विन्यासः प्राणस्योवं समीरणम् । स्थानानामभिधातश्च न विना शब्दभावनाम् न सोऽस्ति प्रत्ययो लोके यः शब्दानुगमारते । अनुविद्धमिव ज्ञानं सर्व दशब्देन भासते ॥ इति । एवच निर्विकल्पक सविकल्पकं वा ज्ञानं गौः शुकुश्चलो डिस्थ इति शब्दविशिष्ट मेवार्थमवबोधयति शब्दाख्यविदोषणानुरक्तस्य वस्य विशेष्यस्य म्वरूपं पृष्टः शब्देनैव दर्शयसि, शब्दापरित्यागलब्धप्रकाशस्वरूपया वाऽनुभूस्याऽनुभवसि हति सोऽपि विशेष्यः शब्दरूप एवेति जानीहि । शब्द एवार्थोपास्टः प्रतिभाति इति व्यवतिष्ठते । किञ्च यदुपारूढः शब्दः प्रकाशते तस्य पृथक प्रदर्शयितुमनुभवितुं चाशक्यत्वात् शब्द एव तथा प्रतिभाति यथा चेन्द्रियजज्ञाने पु प्रक्रमस्तथा शाव्देष्वपि प्रत्ययेषु शब्दविशिष्टो पार्थः शब्दारूढो वा प्रतिभाति इति शब्दविवतं एवायमर्थो नान्यः कश्चित् । अतश्च शब्दब्रीदमेवमविद्योपाधिदर्शितविचित्रभेदमवियोपरमे यथावस्थितरूपं प्रका• पाते इति सिद्धम् । अनुमोदयति चामुमेवार्य श्रुतिरपि तद्यथा-'वागेव विश्वा भुवनानि जरे, नामवेदं रूपत्वेन वने, इति । अत्रेदमाक्तम्-विवतंशब्दस्य परिणामवाचकत्वमपि दृश्यते प्राचा ग्रन्थेषु यथा उत्तररामचरिते- एको रसः करुण एव निमित्तभेदाद्भिन्नः पृथक् पृथगिवाध्यते विवर्तान् । भावर्तबुद्बुदतरङ्गमयान् विशरानम्भो यथा सलिलमेव हि तत्समस्तम् । इति । भावतः-जलस्य भ्रमः, बुद्रुदः-ड्मलाकारजलसंस्थान विशेषः, तरङ्गः- भङ्गः, एते विकारा जलमेव न ततो व्यतिरिक्ता, निमित्तभेदात् विभावाद्यभिव्यञ्ज- कविच्छित्तिविशेष.त् इति तदर्थः । १. आधः-अशिक्षिनरन्दोचारणम्य या प्राथमिकः करणविन्यासःकरणानो शन्दोच्चारण नियोग इत्यर्थः । सदभावना प्रागभवीयरन्ददारनाम् । २. सर्व ज्ञान शब्देन अनुविद्धमिव यनो मामते अनः शन्दानुगमरहितः प्रत्ययो नास्तीत्यर्थः।

ब्रह्मकाण्डम् ] संस्कृत-हिन्दी व्याख्योपेतम् अत एव शान्तरक्षितेन अनादिनिधन मिति कारिकामर्थतोऽनुवदता विवर्तः पदमपहाय परिणामपदमेव प्रयुक्तम् । तथा हि- नाशोत्पादासमालीढं ब्रह्म शब्दमयं च यत् । यत्तस्य परिणामोऽयं भावग्रामः प्रतीयते ॥ इति । विवर्तपदेन परिणाम एवाभिप्रेतो वाक्यपदीयकारस्यापि 'शब्दस्य परिणामोऽय. मित्याम्नायविदो विदुः इति अनिमकारिकादर्शनादवगम्यते । विवर्ततेऽधंभावेन इत्यस्य 'एकस्य तत्वादाच्युतस्य भेदानुकारेणासस्याविभक्ता- न्यरूपोपमाहिता विवर्त' इति टीकादर्शनात् शब्दस्य विवर्तोऽर्थो न परिणाम इत्य- वगम्यते । न्यायमञ्जयो शब्दविवर्तमादस्य शब्दपरिणामवादस्य च खण्डनदर्शना- दुभयमपि वैयाकर गानामभिमतमित्यवगम्यते इत्यलमलिजल्पनेन । विवर्तपरिणामयोलंक्षणे तु-भतत्वतोऽऽन्यथा प्रथा विवर्त इत्युदीरितः । सतावतोऽन्यथाप्रथा विकार इत्युदीर्यते' शुक्तौ रजतं विवर्तः । दुग्धं दधि भवति इति परिणामः । अधिष्ठानसमसत्ताककार्यापत्तिः परिणामः, अधिमानविषमसत्ताककार्या- पत्तिर्विवत इति यावत् । ॥१॥ जैसे वैशेषिकदर्शनमें कार्य ( घट ) में पृथिवीत्वधर्म रदनेसे उसके कारण (परमाणु ) में भी पृथिवीत्वधर्म ही मानते है और सारख्यदर्शन में विकारों (पञ्चमहाभूत और एकादश इन्द्रियों ) में सुस दुःसका समन्वय देखकर इनके कारण प्रधान (प्रकृति) में भी सुखदुसरूपता मानी गई है। वैसे घट पट आदि अर्थो में भी शब्दरूपनाके अनुगम होनेसे घट-पट आदिके कारणों को भी शब्दरूप मानना ही पडेगा। क्योंकि प्रत्यक्ष दो प्रकारका होना है एक सविकसक दूसरा निर्विकश्यक । दोनों प्रत्यक्ष मर्वदा, सर्वथा और सर्वत्र किमी न किसी माग्दसे ही कहे जाने हैं । शब्दसे ही अर्थको प्रनीति होती है । अनः शब्द और अर्थमें तादात्म्य माना जाता है। अतः वैयाकरणों के मतमें शब्द हो ब्रह्म है। यह शब्दतत्त्व ही जब अविद्या विशिष्ट शेयरूपनासे शून्य चैतन्यमात्र रहता है में तब जीव कहा जाता है, जब किसी अर्थ (घर) के उच्चारणकी इच्यासे युक्त होता है तब उसे मध्यमा चाक् कहते हैं, जब मुंदमें आकर कण्ट, तालु आदि स्थानों से क, ख, ग, आदि वणों के रूप में व्यक्त होता है तब उसे चैपरी वाक् कहते हैं और वही अविद्यारूपी बाध अर्थ को वासनासे प्रेरित होकर घट-पट आदि रूप में परिणत (विवन ) हो जाता है। विवर्त--अवास्तविक अन्यथा भावको कइने है। जैसे रस्मीमें सर्पबुद्धि । वस्तुतः रस्सी सर्प नहीं है, किन्तु मासित होती है वैसे ही हम हो घटरूपमें मसित होता है वस्तुनः शब्दप्ते अनिरिक्त घर कोई अलग सत्य नहीं है ॥१॥ एकस्यैव सब्दयह्मणः क्यं विचित्रघटपटादिकार्यजनकत्वमेकरमाद्विचित्रकार्योत्प. तेरदर्शनादिस्यत माह- यद्यपि एक (माद बन)से परस्सर अत्यन्न भिन्न घर-पट आदि नहीं होने क्योंकि एक कारण से भिन्न-भिन्न और विचित्र कार्यों को उत्सति नहीं देसी गई है । तथारि- वाक्यपदीयम् एकमेव यदाम्नातं भिन्नं शक्तिव्यपाश्रयात् । अपृथक्त्वेपि शक्तिभ्यः पृथक्त्वेनेव वर्तते ॥ २॥ यत्-शब्दब्रह्म 'एकमेवाद्वितीयम्' 'अद्वैत एक एवाभवत्' 'सलिल एवैको दष्टा' इत्यादिश्रुतिभिः एकमेवान्नातं कथितं तत् शक्तिव्यपाश्रयात् शक्तीनों घटपटादिविचित्रकार्यजननयोग्यनारूपाणां व्यपाश्रयात् आश्रयणात् शक्तिमतभेदा. रोपादिति यावन भिन्नं पृथग्रूपम् 'प्रणव एवैकस्त्रेधा व्यभज्यत' इति श्रुतेः । सलिल शब्देन ब्रह्म। प्रणवोऽत्र अविवृत्तं ब्रह्म त्रेधा त्रिप्रकारेण-ऋग्यजुःसामरूपेश ग्यभज्यत विभक्तमभूदिति तदधः। तथा च ब्रह्मण एकरवेऽपि तद्गतशक्तिवैचियाद् भेदमारीप्य विचित्रकार्यजनकत्वमिति भावः । भन्वेकस्य विभिन्नरूपताऽनुपपोत्यत आह-अपृथक्त्वेऽपीति। अपृथक्त्वेऽपि अभिन्नत्वेऽपि ब्रह्म शक्तिभ्यः पृथयरवेनेव वर्तते शनिभेदमाश्रित्य पृथगिव भिन्नमिवावभासते न तु वस्तुतो भिन्न मिति भावः । शक्तिभ्य इत्यत्र ल्यब्लोपे पञ्चमी तथा च शक्तीराश्रित्येति तदर्थः । ननु ब्रह्मणो नानाकारावग्रह एकत्वानुपपत्तिरिति चेन्न, वृक्षा इति एकस्या- मुपलब्धौ नानावृक्षाकारावग्रहसमवेपि 'यथा ज्ञानस्यैकावं नानुपपन्नं तद्वद ब्रह्मणोऽ- पीन्यदोषात् । (वह एक और समस्त जगत् का कारण ब्रह्म (शब्द) )जो (कमेवाद्वितीयं ब्रह्म, आदि श्रुतियोंमे) एक ही कहा गया है वह उस नित्य शक्तिका भाग्य है (जिससे घट-पट आदि विचित्र प्रकारके भिन्न भिन्न कार्य और ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद रूपसे भिन्न भिन्न रूपमें प्रकट होने है।) यद्यपि उस ब्राह्ममें वास्तविक भेद नरी है रिमी शक्तिको विचित्रतासे भेद दिखाई पडता है। एतदुक्तं भवति-आवर्तवुवुदरगाख्या जलविकाराः परस्परं भिन्ना अपि जलमेव न ततो व्यतिरिका तथा घटपटादयो विकाराः परस्परं भिक्षा अपि पृथिव्येव न व्यतिरिक्ता इति घटपटादीनों भेदः पृथिव्या एकत्वमिव विलक्षणकार्योदयानुमीय- मान वैलक्षण्या शक्तयो ब्रह्मण एकत्वं न विरुधन्ति इति घटादिरूपेण भिन्नरवेऽपि पृथिव्याः स्वतोऽभिनस्ववत् शकिरूपेग ब्रह्मणो भिन्नत्वेऽपि स्वतोऽभिन्नरवमिति ब्रह्मगि नानात्वं काल्पनिकमेक्वं च वास्तवमिति न तयोविरोध इति भावः ॥ २॥ जैसे भरी, बुलबुले और तरङ्ग परस्परमें भिन्न है फिरभी सब जल है। घट पट आदि परस्पर भिन्न है फिर भी सब पृथिये हैं। पैसे एक ही शब्द ब्रह्म भक्तिरूपसे भिन्न होते हुए मी स्वतः अभिन्न है अर्थात शब्द ब्रह्म का एक होना स्वाभाविक और भेद काल्पनिक हो है ॥ २ ॥ शब्दब्रह्मानिएशक्तीनां कार्यवैचिन्योपपादकरवे नित्यानां तासां सर्वदा सत्वात कुतो न सर्वदा सर्वकार्योत्पाद इत्यतो नियामक्माह- इसनिय शब्द और शब्दकी विचित्र कार्योरी उत्पन्न कर सकनेवाली शक्तिके नित्य होने पर मो सदा सत्र कार्य नहीं होने । क्योंकि-

LIBAT
ब्रह्मकाण्डम् ]
सस्कृत-हिन्दी व्याख्यापतम् :
अध्याहितकलां यस्य कालशक्तिमुपाश्रिताः।
जन्मादयो विकाराः षड् भावभेदस्य योनयः ॥ ३॥
यस्य ब्रह्मणः अध्याहित आरोपितः करा भेदः (निमेषादिकियोपहितनानास्वं
यस्थास्ताम् अध्याहितकलां कालशक्ति विश्वात्मा एक एव परं ब्रह्माभिधानं
सत्यो भावः स एव नानाविधकार्यकारितयाऽनन्यशक्ति वन व्यवहियते तस्य स्वात.
ज्यशक्तिः काल स्ताम्, उपाधिता जन्मादयः जायतेऽस्ति, विपरिणमते, वर्द्धते,
दसति, नश्यति इत्येवंरूपाः पड विकारा. भावभेदम्य योनयः कारणानि
भवन्ति । औपाधिकभेदमादायकस्यापि कालस्य क्रमरूपतया क्रमवकार्यजनकत्व-
मिति भावः।
जिस ब्रह्मको काल्पनिक भेदों वाली शक्ति काल शक्ति स्वतन्त्रशक्ति है (जिसमें निमेष पल-
घटी आदि की कल्पना को गई है और जिस शक्ति के कारण ब्रह्म अनन्तशक्तिमान् माना जाता
है।) उमीके अनुसार जन्म (जायते, अस्ति, विपरिणमने, वर्षने, हसनि, नश्यनि) आदि छः
प्रकार के विकार है जो भावों (पदार्थों) के भेदके (क्रमिक भेदके ) कारण माने जाते है ।
अयं भाव--सर्वाः कारणशक्तयः कालेन अनुज्ञाताः सत्यो जनयन्ति कार्यम्,
प्रतिबद्धाः सत्यो न जनयन्ति कार्यम, हेमन्तादिकाले प्रतिबद्धाः चसन्तादिकाले अनु-
झायन्ते इति कालः स्वातम्यशक्तिः अन्याहां च काटपारतन्यम्, यथा धीवराः पक्ष्य-
न्तराणां ग्रहणाय सूत्रप्रतिबद्धान पक्षिणश्वेष्टयन्ते तथा च ते सूत्रप्रतिबन्धादस्वतन्त्रा
इव भवन्ति तथेच्छायां तन्तुनाऽऽपंगात् । एवं कालसूत्रप्रतिबन्धात् पदार्थाः संकोच-
विकासलक्षगारपत्तिवसावनवरतमनुभवनि । 'अतश्व कालसूत्रान्तर्गत विश्वं प्राप्तकालं
प्रसूयते' इति जायते इत्यवसीयते, प्रसूतमवतिष्ठने इति अस्ति इति व्यपदिश्यते,
भवस्थितस्य विकासपत्तिरिति विपरिणमते, तच्च विपरिणमन्मुहूर्तमपि नावतिष्टते
इति वर्धते यावदनेन वर्धितव्यं, ततोऽपक्षीयते मुहूर्तमप्यनवस्थानादेश ततः भव.
स्थितं कृत करणीयं विनश्यति । तदुनं वाक्यपदीये-(का० ३ समु०९)
उत्पत्तौ च स्थितौ चापि विनाशे चापि तद्वनाम् ।
निमित्तं कालमेश विभक्तैनारमना स्थितम् ॥
तमस्य लोकयन्त्रस्य मूत्राधारं पचहते । प्रतिवन्धाभ्यनुज्ञाम्यां तेन विश्वं विभज्यते ।
यदिन प्रतिवनीयान् प्रतिवदंच नोरसृजेत् । अवस्था व्यतिकीर्येरन् पौर्वापर्य विना कृताः॥
विशिष्टकाल साबन्धो वृत्तिलाभाय करते । शकीनां सम्प्रयोगस्य हेनुरवे नावतिष्ठते ।
पतस्यानुग्रहस्तेस्तैध संसनि भिन्नता प्रतिबन्धस्तिरोभावः प्रहाणमिति चारमनःn
प्रतिषदाश्च यास्तेन चित्रा विश्वस्य वृत्तयः। ता. स एवानुजानाति यथा तन्तु. शकुन्तिनः॥
विशिष्ट कालसम्बन्धासम्धपाकासु शक्तिपु ।
कियाभिम्यम्यते नित्या प्रयोगारयेन मंगा । इति ॥ ३॥

८ - पाक्यपदीयम् समस्त कारण शक्तियाँ कालकी आशानुमार कार्य करती है और शेके जाने पर कार्य नहीं करती। हेमन्त कालमें जिन्हें रोका गया है वे वसन्त कालमें आशा पा जाती हैं। इसलिए काल एक स्वतन्त्रशक्ति है। इसरी शक्तियों कालके अधीन हैं। जैसे न्याय दूसरे पक्षियों को पकडनेके लिए एक पक्षीको सूत्रमें वॉवकर प्रेरित करते है ये पक्षी सूत्रमें बंधे रहनेके कारण अस्वतन्त्र की नरह है। क्योंकि मूत्रके सोचने पर पुन. पकड लिए जाने हैं। पैसे कालरूपी सूत्र में बंधे हुए पदार्थ सोच और विकास रूपी उत्पनि और ध्वंसका सदा अनुभव करते हैं। इमीलिए कालरूपी सूत्र में बँधा हुआ विश्व काल आने पर जद प्रसून होता है तब जायते कहा जाना है, जब प्रस्त स्थित होता है नब अस्ति कहने हैं, जब विकार होता है तब विपरिणमते कहते हैं, जद विपरिणामित ग्क नही सकता तब वर्धते कहते है जब तक बढना है जब क्षीण होने लगता है नव इसति कहते हैं और जब वह नष्ट हो जाता है तब नश्यति कहते हैं । यह कालशक्ति एक होने पर भी कालनिक भेदों के कारण अनेक और क्रमवाली है। इसीलिए क्रमसे कार्य उत्पन्न होता है, एक कालमें सब कार्य नहीं उत्पन्न होते ॥३॥ अभिन्नस्यापि ब्रह्मणः सर्वकार्यजनकम्वमुपपाद्य सांप्रतं सर्वव्यवहारहेनुरवमुपपादयति- एकस्य सर्वचीजस्य यस्य चेयमनेकधा । भोक्तभोक्तव्यरूपेण भोगरूपेण च स्थितिः ॥ ४ ॥ सर्ववीजस्य यस्य एकस्य ब्रह्मणः इयं तत्वान्यत्वाभ्यामनिर्वाच्या (ब्रह्म- स्वेन ब्रह्मभिन्नरवेन च वक्तुमशक्या) शक्तिरूपा स्थिति. अनेकधा भोक्तृभोक्त- व्यरूपेण भोगरूपेण च लोकव्यवहाराय प्रवर्तते । भोक्ता-पुरुषः, भोकव्याः- विषयाः, भोगः-विपयोपभोगजन्यमुखदुःखाद्यनुभव इति विवेकः । तद्वक्ष्यति- सशक्तयारमभूनत्वमेकस्यैवेति निर्णयः । भावानामात्मभेदस्प कल्पना स्यादनार्थका । जो समस्त जगत्का कारण और एक है उसकी यह शक्तिरूपा स्थिनि (जो बहारूप तथा ब्रह्मभिन्न मी नही कही जा सकती अर्थात् अनिर्वचनीय स्थिति है ) अनेक प्रकारसे लोकके व्यवहार में आती है। जैसे भोक्ता (पुरुष) भोत्तात्र्य (विषय रूप, रम, गन्ध, स्पर्श और शब्द) भोग ( विषयों के भोगसे उत्पन्न सुख दुःख आदि') एकमेव ब्रह्म सर्वशक्तीतिप्रमाणेन सिद्धे अविद्याकल्पितस्य भावभेदस्य अपारमार्थि- करवात् कार्यनानास्वोन्नीयमानः शक्तिभेद एकस्यैव युक्तो न तु स्वरूपभेद इत्यर्थः ॥४॥ इस तरह सर्वशक्तिमान् और अद्वितीय ब्रह्म है, पदार्थभेद अविद्याल्पित और अवास्त- विक है किन्तु विचित्र कार्योंके देसनेसे शक्तिमें ही विचित्रता माननी पड़ती है। ब्रह्ममें अनेकता मानना निरर्थक ही है।।४।। एवं प्राप्यस्य ब्रह्मणः स्वरूपमुक्त्वा तस्याप्युपायमाह- प्राप्त्युपायोऽनुकारश्च तस्य वेदो महर्षिभिः । एकोऽप्यनेकवर्मेव समानातः पृथक् पृथक् ॥ ५॥ तस्य ब्रह्मणः, प्राप्त्युपाय.-प्राप्तिसाधनम्, अनुकारर-प्रतिमा च वेदः वरसुनो भेदाभावाद् ब्रह्मणोऽनुकार इव वेद इत्यर्थः, वेद एव ब्रह्मेति यावत् । स ।

ब्रह्मकाण्डम् ] संस्कृत हिन्दी व्याख्योपेतम् च वेदः एकोऽपि महर्षिभिः पृथक् पृथक् समानातोऽभ्यस्त. अनेकवत्र्मेव । ऋग्यजुःसामाधर्ववेदभेदेन चतुर्विध इद भवतीत्यर्थः। तमाम्नान इत्यनेन वेदस्य महर्षिप्रणीतत्वनिरासः । इस अद्वितीय ब्रह्मकी प्राप्तिका साधन और उसकी प्रतिमा देश है। यद्यपि वेद भी एक हो है तथापि महर्षियोंने अलग अलग अभ्याम किया है अतः ( ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेदके रूपमें) अनेक प्रकारका दिसाई पड़ता है। या अध्ययन करनेवाले ऋषियों के नामसे अनेक वेद मालूम पड़ते हैं। जैसे शाकल शासा, बाष्कल शामा आदि । प्राप्त्युपाय इति । ब्रह्मणः प्राप्तिः-ममाहमित्यहङ्कारपन्थिसमतिक्रममात्रम् । अहङ्कारचिदारमनोस्नादाम्याध्यास एवं प्रन्थिः सनिवृत्तिश्च प्रन्थिसमतिक्रमः । इस कारिकामें प्राप्त्युपायमें दो पद हैं एक प्राप्ति और दूसरा उपाय । 'मेरा' और 'मैं' इस प्रकारकी अहकार-अन्थिका छूटना हो प्राप्ति है। भवार और चिदात्माका नादात्म्याध्यास ही ग्रन्थि है॥५॥ तदुक्तं पञ्चदश्यां चित्रदीपे- अमवेश्य चिदात्मानं 'पृथक् पश्यमहड्कृतिम् । इच्छंरतु कोटिवस्तूनि न वाधो प्रन्थिभेदतः ॥ १२ ॥ इति । आह- वाचः संस्कारमाधाय वाचं ज्ञाने निवेश्य च । विभज्य बन्धनान्यस्याः कृत्वा तां छिन्नबन्धनाम् । ज्योतिरान्तरमासाद्य छिसमन्धिपरिग्रहः । परेण ज्योतिषकत्वं हित्वा ग्रन्थीन् प्रपद्यते ॥ इति । चत्वारि शृङ्गा इति मन्त्रव्याख्यावसरे-'महता देवेन नः साम्यं यथा स्यादिरय. ध्येयं व्याकरणम्' इति महाभाष्यप्रतीकमुपादाय 'महता परेण ब्रह्मणेत्यर्थः' इति कैयटा, ब्रह्मणा-शब्दब्रह्मणा साम्यं-सायुज्यमिति नागेशः, भपि प्रयोक्तुरारमानं शब्दमन्तरवस्थितम् । प्राहुमहान्तमृषभं येन सायुज्यमिप्यते ॥ इनि हरिः । द्वौ शब्दारमानी कार्यों नित्यश्च तन्नारयः सर्वेश्वरः सर्वज्ञः सर्वशक्तिमान् शब्द- वृपमस्तस्मिन् खलु वाग्योगवित् शाखजशब्दज्ञानपूर्वकप्रयोगेण होणपापः पुरुषो विच्छिद्याहारग्रन्थीन् अत्यन्तं संहग्यत इति तयाख्यातारः । अविवृत्तो नित्यः विवृ. त्तः कार्यः इति केचित् । कार्यों वैसरीरूपः नित्यो व्यङ्गय प्रान्तरःस्फोट इति छाया। . १. अहङ्कारे चिदात्मानमवेश्य-तादाम्याभ्यासेनानन्नर्माभ्येत्यर्थः । यथा आत्मनो ब्यापकत्वेऽपि वृक्षादिजन्मनाशैनं दुसित्वं तेषु ताशम्याध्यासामावाद एमहकारगनेच्छादि मिगतल्याध्यादिभिश्च न दुनिन्दनित्यः । २. बन्धनानि-भविधाहद्वारादौनि । २वा० - १० वाक्यपदीयम् इदमत्रावधेयम्-ब्रह्मणः सकाशात् प्रथमतो वेद एक एव विवर्तते ततोऽप्येत. गामशक्तः प्रविभक्तः पुनस्पसंहृतभेदः । पुनश्च भिद्यत इति मतमवलम्व्येयं कारिक उत्तरा च । तदुक्तं भागवते- चातुर्होत्रं कर्मशुद्ध प्रजानां वीक्ष्य वैदिकम् । व्यदधाद्यज्ञसंतत्यै वेदमेकं चतुर्विधम ऋग्यजुःसामाथाख्या वेदाश्चत्वार उद्धृताः। तत्रग्वेदधरः पैलः सामगो जैमिनिः कविः। वैशम्पायन एवैको निष्णातो यजुषामुत। अथर्वाङ्गिरसामासीत् सुमन्तुर्दारुणो मुनिः ॥ वायुपुराणेऽपि- वेदमेकं चतुष्पादं चतुर्धा व्यभजत् प्रभुः ब्रह्मणो वचनात्तात लोकानां हितकाम्यया ॥ चातुझेत्रमभूत्तस्मिस्तेन यज्ञमकल्पयत् । आध्वयंव यजुभिस्तु ऋभिहीनं तथैव च ॥ उद्गात्रं सामभिश्चके ब्रह्मत्वं चाप्यथर्वभिः ॥ इति । सनरसुजातीयेऽपि- एकस्य वेदस्याज्ञानाद् वेदास्ते बहवः कृताः। इति । अत एवाभियुक्तानां वचनम्- सर्वार्थवेदको वेदश्चतुर्धा भिद्यते कमात्। ऋग्वेदोऽध यजुर्वेदःसामवेदो ह्यथर्वणः ॥ इति। अन्ये तु अनेकवदंव अनेकशाखा इव भवतीत्यर्थमाहुः। तेषामयमाशयः अस्य महतो भूतस्य निःश्वसितमेतद्यग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदोऽथवाङ्गिरसः' इति चतुर्विध एव घेदो ब्रह्मणः सकाशादाविर्भूतः केवलं शाखाभेदः अध्ययननिमित्तः। तदुक्तं शौन- कीयप्रातिशाख्ये- ऋचा समूह ऋग्वेदस्तमभ्यस्य प्रयत्नतः । पठितः शाकलेनादौ चतुर्भिस्तदनन्तरम् ॥ सांस्यायनाश्वलायनौ माण्डको बाफलस्तथा(यहृचा ऋषयः सर्वे पश्चैते एकवेदिनः॥ इति। • : येन च ऋषिणा या शाखाऽभ्यस्ता सा तवाम्मैव प्रसिद्धिमुपगता यथा शाकल. शाखा या कलशाखेति । तदुकं शाबरभाष्ये-'स्मयते च वैशम्पायनः सर्वशाखाध्यायी कठः पुमरिमा केवला शाखामध्यापयारबभूवेति स बहुशाखाध्यापिनो सग्निधावेक- शाखाध्यायपन्यां शाखामनधीयानस्तस्यां प्रकृष्टवादसाधारणमुपपद्यते विशेषणं कठशाखेति' इति आख्या प्रवचनादिति सूत्रे ॥५॥ इदानी ब्रह्मप्राप्युपायस्य वेदस्य स्वरूपकथनेन माहात्म्यमाह- भेदानां बहुमार्गत्वं कर्मण्येका चाङ्गता । शब्दानां यतशक्तित्वं तस्य शाखासु दृश्यते ॥६॥ तस्य वेदस्य भेदाः-ऋग्यजुःसामाथर्ववेदाख्यास्तेषां भेदानां बहुमार्गत्वं बहुशाखरवं वर्तते 'यथा एकशतमध्वर्युशाखाः, सहयवा सामवेदः, एकविंशतिधा यादृध्यं पञ्चदशधेस्येके, नवधायर्वणो वेद' इति । तस्य वेदस्य भेदानां शाखानाम एकत्र एकस्मिन् कर्मणि च अङ्गता-तस्यां शाखायामनुक्तानामपि तदन्यशाग्यो।

ब्रह्मकाण्डम् ] संस्कृत-हिन्दी व्याख्योपेतम् ११ पदिष्टानामङ्गानां सर्वशाखाप्रत्यय'न्यायेनोपसंहारेण उपकारकत्वं चेत्यर्थः । ननु यदि सर्वशाखामामेककर्मबोधकत्वं तर्हि शाखाभेदः किंनिबन्धन इस्यत भाह-शब्दा. नामिति । तस्य वेदस्य शाखासु शन्दानां यतशक्तित्वं यता नियता शक्तिः बोधजनकता अभ्युदयहेतुता चा येषां तेषां मावस्तत्वं दृश्यते । येन रूपेण स्वरेण च युक्तो यस्यां शाखायामुक्तो यः शब्दः स तथैवोच्चरितः तत्रैवार्थमभिधत्ते पुण्यजनकश्च नान्यथा न शाखान्तरेऽतोऽर्थक्रियानियमेन शक्तिनियमस्तरप्रयुक्तश्च शाखाभेद इति भावः । यथा 'सिमस्पाथर्वगेऽन्त उदानः' 'देवसुम्नयोर्यजुषि काटके' इत्यादिः । वस्तुतस्तु-तस्य वेदस्य भेदानां तत्तद्वेदगत शाखानां वहुमार्गत्यं बहवः पदक्रमजटामालादयो मार्गा अभ्यासोपाया येषां तेषां भावस्तरवम्, एकत्र एकस्मिन् कर्मणि अङ्गता एककर्मबोधकरवं च वर्तते । तथा च शाखाभेदेऽपि कर्मभेदा. भावाच्छाखान्तरविहितानामप्यङ्गानां शाखान्तरीयैस्तस्मिन् कर्मण्युपसंहरयानुष्ठान- मिति भावः । ननु यजुर्वेदगतकाठककाण्वमाध्यन्दिनीयादिशाखासु विहितस्य दर्श. पूर्णमासाख्यस्य कर्मण एकरवं न सम्भवति एकरयां शाखायां विहितस्य शाखान्तरे पुनर्विधाने तद्विधैरज्ञातज्ञापफावाभावेनानर्थक्यापया 'एकस्यैवं पुनः श्रुतिरविशेषा. दनर्थकं हि स्यादिति न्यायेन कर्मभेदादत आह-शब्दानामिति। तस्य वेदस्य शाखासु शम्दानां तत्तरकर्मविधायकवाक्यानां यतशक्तित्वं तत्तच्छाखाध्यायि- पुरुषसमेवतबोधजनकरवं दृश्यते इत्यर्थः । यद्यपि उस वेदके (ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेदके) भेदों में भी एक-एक वेदको अनेक शासायें है (जैसे एक सौ अवयुकी शाखा, एक सहस्र सामवेदकी शाखायें) और उन (परस्पर में विभिन्न ) शाखाओंका क कर्म ( याग) में (जो अब एक शासा नहीं लिसे है किन्तु दूसरी शासामें लिखे हैं वे अङ्ग भो ) परस्परमें उपकार्य उपकारक भाव रखते हैं, तथापि वे शाखायें परस्पर भिन्न हैं। क्योंकि) उस वेदकी शामाके शब्दोंकी बोधजनकता रूप और अभ्युदय( पुण्य )जनकता रूप अपनी शक्तियाँ अलग-अलग नियत है। अथवा यद्यपि उस वेदकी शासाओं (पद, क्रम, धन, जरा और माला आदि) में बहुन मार्ग (अभ्यासके उपाय) है और शाखाओंको भिन्नता रहनेपर भी एक कर्ममें दूसरी शाखाके अओंका परस्सरमें उपकार्य उपकारक माव मी है। तथापि (एक वेदको अनेक शाखाओं में विहित दपूर्णमास याग एक नहीं है। क्योंकि वेदकी शाखाओंमें उन-उन कर्मीका विधान करनेवाले वाक्यों की शक्तियों उन उन शाखाओके अध्ययन करने वाले हो जानते हैं ॥ ६ ॥ अयं भावः-यथा 'अध्वर्यु वृणीत' इत्यत्राध्ययोद्देश्यत्वेऽपि घृतैनाश्वयुंणा १. सर्वशासाप्रत्ययः-सर्वशासाप्रतिपाद्यमकं कर्म । सर्वशासाप्रत्ययन्यायश्च- शाखाभेदारकर्मभेदोन वा कर्मात्र भिद्यने । दृष्ट काठकनामादि वभेदस्य कारणम् ।। अन्यदारादिना होते युज्यन्ते भेदहेतवः । रूपादिप्रत्यभिधानाइभिन्नं कर्म गम्यते ।। (इति न्यायमालायामुक्तः) १२ पाक्यपदीयम् स्वकार्य कुर्यादिति कल्प्यविधाबुपादेयताया श्रवणादेकत्वविवक्षा, एवं 'स्वाध्यायोऽध्ये. तष्य' इत्यत्र अध्ययन प्रति स्वाध्यायस्योद्देश्यत्वेऽपि अधीतेन स्वाध्यायेनार्थज्ञानं भावयेदिति विनियोगविधाधुपादेयत्वश्रवणात् तद्विशेषणस्य स्वस्वस्थकरवस्य च विवा. ति स्वैः पितृपितामहादिभिरधीयते इति स्वाध्याय इति व्युत्पत्या स्ववेदे स्वकीयशा- खामात्रस्यैवाध्ययन विधानेन एकैकस्य पुरुषस्यैकैकशाखाध्यापिरवात् तत्तच्छाखाध्या- यिपुरुषान् प्रति तत्तच्छाखास्थविधेरैज्ञातज्ञापकस्बेन अर्थवत्वात् 'एकस्यैवं पुनः श्रुति. रिति न्यायाप्रवृत्या कर्मभेदाभाव इति । नन्वेवं शाखान्तराध्ययनाभावे तदुकानाम- शानामुपसंहारः कथमिति चेन्न-कल्पसूत्रादिभिः शाखान्तरीयानानां ज्ञानं संपाद्यो- पसंहारस्य कतुं शक्यत्वात् । न च स्वत्वस्य विवक्षितम्वे वेदान्तराध्ययनमपि न स्यादिति वाच्यम्, वेदानधीस्येति शास्त्रेण वेदेषु समुच्चयविधानात् । एवं च वेदभेदेऽ. सति बाधके कर्मणां भेद एकत्रोत्पत्तिरपरत्र गुणविधानं वा तत्र वेदान्तरशाखाध्यायि. पुरुषाभेदेन एकस्य विधायकस्वेऽपरस्यानुवादकरवापत्या उक्तन्यायप्रवृत्तेरिति ॥ ६॥ बेदमूलकत्वादेव स्मृतीनां प्रामाण्यं नान्यथेत्यतोऽपि वेदस्य महरवमाह- इसलिए ब्रह्मप्राप्तिका उपाय वेद ही है, उसीके द्वारा ब्रह्म जाना जा सकता है । स्मृतियाँ स्वतः प्रमाण नहीं है किन्तु जो कुछ वेदमें कहा गया है वही कहती हैं । अतः वेदमूलक होने के कारण वे मी प्रमाण मानी जाती है। स्मृतयो बहुरूपाश्च दृष्टादृष्टप्रयोजनाः । तमेवाश्रित्य लिङ्गेभ्यो वेदविद्भिः प्रकल्पिताः ॥ ७॥ बहुरूपाः-काश्चन 'गर्भाष्टमेऽन्दे कुर्वीत ब्राह्मणस्योपनायनम्' इत्येवंरूपाः 'अष्टवर्ष ब्राह्मणमुपनयीत' इति प्रत्यक्षधुतिमूलाः, काश्चन शिष्टेषु प्रसिद्धसमाचाराः 'भष्टकाः कर्तव्या' इत्यादयोऽनुपलभ्यमानश्रुतिमूलाः, दृष्टादृष्टप्रयोजनाच-तत्र 'गुरनुगन्तव्यः' इत्यादयः स्मृतयः अनुगमात्प्रीतो गुरुरध्यापयिष्यति ग्रन्थमन्धिभे. दिनश्च न्यायान्वक्ष्यतीत्येवंरूपष्टप्रयोजनाः, भष्टकादिस्मृतयश्च अदृष्टप्रयोजनाः, स्मृ. तयो लिङ्गेभ्यः तत्तदर्थबोधकमन्त्रादिभ्यः तं वेदमेवाश्रित्य वेदविद्भिः प्रक- ल्पिता रचिता इत्यर्थः । वे स्मृनियाँ भी अनेक रूपको मिलती है। जिनमें कुछ स्मृनियोंका प्रयोजन स्पष्ट दिसाई पडता है, कुरका प्रयोजन अदृष्ट ( पुण्य ) मात्र है। ये स्मृतियों मन्त्रमें पढ़े हुए लिड्गों (चिह्नों) फो देखकर वेदके जानकार विद्वानों द्वारा कल्पित (रचित) हैं। तद्यथा 'यां जनाः प्रतिनन्दन्ति रात्रिं धेनुमिवायतीम् । संवत्सरस्य या पत्नी सा नो अस्तु सुमगली। अष्टकासु राधसे स्वाहा' इति मन्त्रोऽकास्मृती लिङ्गम् । 'तस्माच्छ्रेयांसं यन्तं पापीयान् पञ्चादन्येतीति' श्रुतिणुर्वनुगमनस्मृतौ मूलम् । एवं १ पापीयान्-लघुः।

ब्रह्मकाण्डम् ] संस्कृत हिन्दी व्याख्योपेतम् १३ च श्रुतिमूलकस्मृतिकर्तृकत्वसामान्यात् असंप्रतिपन्नश्रुतिमूलकस्मृतीनां मूलं श्रुतिरनु- मेया, तदुक्तम्-'अपि वा कर्तृसामान्यात् प्रमाणभनुमान स्यात्' इति सूत्रेण जैमिनिना। स्मृतयो बहुरूपाश्चेति । स्मृतीना पञ्चविधस्त्वमुक्तं भविष्यपुराणे- दृष्टार्था तु स्मृतिः काचिददृष्यार्था तथापरा । दृष्टादृष्टार्थरूपान्या न्यायमूला तथाऽपरा ॥ अनुवादस्मृतिम्वन्या शिष्टेष्टा तु पञ्चमा । एतासामुदाहरणानि तत्रैव- पड्गुणस्य प्रयोज्यस्य प्रयोग कार्यगौरवात् । सामादीनामुपायानां योगो ड्याससमासतः । अध्यक्षाणां च निक्षेपः कण्टकानां निरूपणम् । दृष्टार्थेयं स्मृतिः प्रोक्ता ऋषिभिर्गरुडात्मज ॥ सम्योपास्या सदा कार्या श्रुतौ मांसं न भक्षयेत् । अटार्था स्मृतिः प्रोक्ता ऋषिभिनिकोविदः॥ पलाशं धारयेद्दण्डमुभयार्थी विदुर्बुधाः । न्यायमूला विकल्पः स्याज पहोमश्रुतौ यथा ॥ श्रुतौ दृष्टं यथा कार्य स्मृती तत्तादृशं यदि। अनूक्तवादिनी सा तु पारिवज्यं यथा गृहात् ।। पड्गुणा:-सन्धिविप्रहयानासनद्वैधीभावसमाश्रयाख्याः । सामादीनां कार्य- गौरवायाससमासाभ्यां योगः प्रयोगः कर्तव्य इत्यर्थः । जपहोमवताविति । सूर्यो- दयावधि सावित्रीजपोऽनुदितहोमविषयः । अनूनावादिनी - अनूदितवादिनी । यथा 'यदि घेतरथा ब्रह्मचर्यादेव प्रव्रजेत् गृहाद्वा वनाद्वा' इत्यनयाऽनूदितं 'ब्राह्मणः प्रबजेद् गृहात्' इति मनुस्मृतिर्वदति विधत्त इत्यर्थः ॥ इति । ननु 'वैसर्जनहोमीयं वासोध्वर्युगुलाति' इत्येवंभूताः स्मृतयो लोभमूलाः 'औदु- म्वरी सर्वा चेटयितव्या' 'अष्टाचवारिंशद्वर्ष वेदब्रह्मचर्यम्' इत्येवंभूनाश्व स्मृतयः 'औदुस्थरी स्पृष्ट्वोद्गायेत्' 'जातपुत्रः कृष्णकेशोऽग्नीनादधीत' इत्यादिश्रुतिविरदाः, तासा कथं वेदमूलक वसम्मव इति चेदनोच्यते, वैसर्जनहोमीयस्मृतेः-स्मृतीनां श्रुतिमूलवे रहे पूर्वनिरूपिते । विरोधे सरपि ज्ञानुं शक्यं मूलान्तरं कथम् ॥' इत्यनेन लोभ. मूल करवं निराकृत्य श्रुतिमूलकत्वस्य, भौदुम्बरीवेष्टनस्मृतः- १. भरिविजिगीयोव्यवस्थाकरणमैक्य सन्धित विरोधो विग्रहः। विजिगोलोररि प्रनि यात्रा यानम् । तयोमियः प्रतिवदशक्त्योः कालनीशया तूगोमवस्थानमामनम् । दुईलप्रन्योर्वाचिक- मात्मसमपंग धोमाः । अरिगा पोयमानस्य वग्वाश्रयानं संश्रयः। २. मामदानदण्डभेदाः । सामदाने दण्डभेदावित्युपायचतुष्टयमित्यमरात् । माम मान्वम् । दानं प्रमिदम् । दण्टो दमः। भेद उपजापः।

१४ वाक्यपदीयम् सतश्च श्रुतिमूलस्वादाध्योदाहरणं न तत् । विरुद्धत्वे च बाधः स्यान्न चेहास्ति विरुद्धता न हि वेष्टनमानं हि स्पर्शश्रुस्या विरुद्धयते । यदि द्विवाडगुलं मध्ये विमुच्योत्तरभागतः ॥ वेष्टयेतोदुम्बरी तत्र किं नाम न कृतं भवेत् । सर्वा वेचित्तव्येति न ह्येवं सुव्रकृद्वचः॥ प्राक् च लोमादिह स्पर्शः कुशैरेवान्तरीयने । वेष्टितपा कुशैः पूर्व वासप्ता परिवेष्यते । इति ग्रन्थेन श्रुतिविरुद्धवं निराकृत्य शाध्यायनिवासगगतश्रुतिमूलकत्वस्य तन्त्र- कार्तिके स्थापनात् । 'अष्टाचत्वारिंशद्वर्षम्' इति स्मृत्तिरपि अन्धषग्वादिविषया नैष्टिक ब्रह्मचारिविषया वेति न जातपुत्रश्रुतिविरुद्धा। तदुक्तं तन्त्रवार्तिके- तत्रैवं शक्यते वक्तुं येऽन्धपवादयो नराः । गृहस्थर न शक्यन्ति कतु तेषामयं विधिः नैष्ठिकब्रह्मचर्य वा परिव्राजकताऽपि तैरवश्य ग्रहीतव्या तेनादावेतदुच्यते ॥ इति । ननु सर्वात वेदवित्कल्पितस्मृतीनां श्रुतिमूलकत्वात्प्रामाण्याङ्गीकारे "विरोधे स्वनपेक्ष्यं स्यादसति हनुमानम्' 'हेतुदर्शनाच' इति सूत्राभ्यां कस्याः स्मृतेरप्रामाण्य- मुच्यते इति चेत् वेदवाझबौदादिकल्पितायाः स्मृते रिति गृहाणेरयलम् ॥ ७ ॥ जैसे गर्माष्टमेन्द्र कुर्वीत ब्राह्मणस्योपनायनम्' यह स्मृति 'अष्टवर्ष ब्राह्मणमुपनयोत' इस प्रत्यक्ष श्रतिसे बनाई गई है। कुछ 'अन्वष्टका कर्तव्या यह ग्मृति शिष्टाचारसे ही बनाई गई है और इनका मूल 'अष्टकासु राधसे स्वादा' मन्त्र है। इसी तरह 'गुरनुगन्तव्यः' यह स्मृति 'तस्मात् श्रेयासं यन्त पापीयान् पश्चादवेनि' इस श्रुतिको देखकर रची गई है। इनमें 'अष्टका' स्मृनिका प्रयोजन केवल अदृष्ट है और 'गुरुरनुगन्तव्यः' स्मृनिका प्रयोजन गुरुजीको प्रसन्न रखना दृष्ट प्रयोजन भी है॥७॥ दर्शनभेदा अपि वेदादेवेश्याह-~- इसी तरह दर्शन भी बेदमूलक होने के कारण ही प्रमाण है। जो दर्शन चेद-मूलक नहीं वे प्रमाण नहीं और उनसे ब्रह्मकी प्राप्ति भी नहीं सकती है । दर्शनों में भी जो भेद दिखाई पड़ते हैं वे भी वेइसे ही हैं। भेद कहीं बोचमें नहीं बन गया है । भेद होने में कारण यह तस्यार्थवादरूपाणि निश्चित्य स्वविकल्पजाः । एकत्विनां द्वैतिनां च प्रवादा बहुधा मताः ॥ ८॥ तस्य वेदस्य अर्थवादरूपाणि पर्थवादानर्थवादरूपाणि वाक्यानि निश्चित्य भाश्रित्य स्थविकल्पजाः स्वस्वबुद्धिप्रभवा, विकल्पो बुद्धिभेदः तदुक्तं 'रुचीनां वैचित्र्याजुकुटिलनानापथजुषाम्' इति, एकत्विनां द्वैतिनां च बहुधा मिश्रमिन- ब्रह्मकाण्डम्] संस्कृत हिन्दी व्याख्योपेतम् रूपेण, ममैव दर्शनं सत्यमित्येवंरूपः प्रकृष्टो वादो येपु ते प्रयादाः अनल्पादरा दर्शनभेदाः, मता अभिमत्ता इत्यर्थः । वेदके ही मन्त्रों में जहाँ अर्थ परस्पर विरुद्ध दिखाई पड़ते हैं वहाँ (भिन्न भिन्न दर्शनाचार्योने ) उनमें एकको अर्थवाद (प्रशसा करनेवाला ) और दूसरेको सिद्धान्त मानकर अपनी अपनी रुचि के अनुसार एकत्ववाद या द्वैतवाद मान लिया है और अपने अपने आग्रह पर अपने अपने पक्षका समर्थन करते हैं। भवादश्चानवादशार्थवादानर्थवादी रूपं येषां सानि अर्धवादरूपाणि शाकपा- र्थिवादिस्वादुत्तरपदलोपः। अथवादाश्वानर्थवादरूपाणि च अर्थवादरूपाणीति यड्' यड्लुक् च यड्लकोरितिवदेकशेपो वा। केपाजिद्वादाः अर्थवादमूलाः, केवाचित श्रुतितारपर्यविषया इति तभावः । एकत्विन:-अतिनः 'एकमेवाद्वितीयम्' 'आरमैवेदं सर्वम्' 'ऐतदारस्यमिदं सर्वम्' 'तत्वमसि'नेह नानास्ति किञ्चन' 'वाचारम्भणं विकारो नानाधेयं मृत्तिके. स्येव सत्यम्' 'वत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः' इत्यादिश्रुतिबलेन जीव. ब्रह्मणोरक्यं ब्रह्मण्यतिरेकेण जगतोऽभावं चालिष्टमाना: 'द्वा सुपर्णा' 'य भात्मनि तिष्ठन्' 'अज्ञो होको जुपमाणोऽनुशेते जहास्येनां भुक्तभोगामजोऽन्यः' इत्यादिवैत. बोधकधुतीमा प्रत्यक्षसिद्धभेदानुवादकत्वेन हीनबलरवाद्वाध्यात्वमाचक्षते । तिनस्तु-प्रत्यक्षविरोधेनाद्वैतश्रुतय उपचारितार्था जगत्यास्थानिवृत्तये वै. ग्योपटम्भार्याः । द्वैतश्रुतयस्तु प्रत्यक्षसंवादेन सत्यार्था इति मन्यन्ते । एवं चार्वाकादयोऽपि 'अहं गौरः' 'अहं स्थूलः' इति प्रत्यक्षाभासमाश्रित्य 'स वा एप पुरुषोऽस्तरसमयः' इति वाक्यं 'भारमैव देहमयः' इति वैरोचन सिद्धान्तमति- पादवाक्यं च स्वमतोपष्ट भाय स्वीकृत्य स्वमतमपि श्रौतीक प्रतिपेदिरे। तदुक्तं विद्यारण्यस्वामिभिः- कूटस्थादिशरीरान्तसंघातस्यात्मतांजगुः । लोकायताः पामराश्च प्रत्यक्षामाप्तमाश्रिताः । श्रौतीक्तुं स्वपक्षं ते कोशमन्नमयं तथा । वैरोचनस्य सिद्धान्तं प्रमाणं प्रतिक्षिरे । इत्यादिना- एवमन्ये स्वस्वपक्षाभिमानेनान्यथान्यया । मन्त्रार्थवादकल्पादीनानिरय प्रतिपेदिरे । इत्यन्तेन अन्यजातेन । उदयनाचार्या-अपि आरमतावविवेकशेपे-'प्रथम पहिरर्थ एव भासते यमाधिस्य धर्ममीमांसोपसंहारः चार्वाकसमुस्थानं च ताप्रतिपादनाथ 'पराशि सानि' इत्यादिः 'तदानार्य परं मम्य' हरयादि । भमार्थाकारः यमाधिस्य वैदण्डिकमनोए- संहारः योगाचारसमुत्यानं च तरप्रतिपादनार्थम् 'आमैवेदं सर्वम्' इत्यादि, ता. नार्थम् 'अगन्धमरसम्' इत्यादि । अथार्थाभावः यमाश्रित्य वेदान्तदारमानोपसंहारः शून्यत्वनैरारम्पसमुत्थानं च सम्प्रतिपादनार्थम 'भसदेवेदमन भासीत्' इत्यादि, वाक्यपदीयम् तदानाय 'अन्धं तमः प्रविशन्ति ये के चारमहनो जनाः' इत्यादि । ततो विवेकः यमाश्रित्य सांख्यमतोपसंहारः शक्तिसावसमुस्थानं च। तत्प्रतिपादनार्थ च, 'प्रकृतेः परस्तात्' इत्यादि, तहानाय 'नान्यत् सत्' इत्यादि। ततः केवल आश्मा प्रकाशते यमाश्रित्याद्वैतमतोपसंहारः तत्प्रतिपादनाथं न पश्यन्तीत्याहुरेकीभवतीत्यादि, तद्धानार्थ 'नाद्वैतं नपि च दैतम्' इत्यादि । ततः समस्तसंस्काराभिभवात् केवलोऽपि न विकल्पते यमाश्रित्य चरमवेदान्तोपसंहारः तत्प्रतिपादनार्थ 'यतो वाचो निव- र्तन्ते अप्राप्य मनसा सह' इत्यादि । सा चावस्था न हेया मोक्षनगरगोपुरायमाण. स्वात् । निर्वाणं तु नस्याः स्वयमेव यदाश्रित्य न्यायदर्शनोपसंहारः तत्प्रतिपादनार्थम 'अथ यो निष्काम आत्मकाम आप्तकामः स ब्रह्मैव सन् ब्रह्माप्येति न तस्य प्राणा उरक्रामन्ति तत्रैव समवलीयन्ते' इति प्राहुः ॥ इति ॥ ८ ॥ एकरववादी-(अद्वैतवादी) 'एकमेवाद्वितीयं ब्रह्म, आत्म वेद सर्वम् , ऐतदात्म्यमिद सर्वम् , लत्त्वमसि, नेइ नानास्ति किञ्चन' इत्यादि श्रुनियों के आधारपर जीव-ब्रमकी एकता और ब्रह्मासे अलग जगत्की सत्ताका अभाव मानने हैं तथा 'द्वा सुपर्णा, य आत्मनि तिपति, जो हो को जुषमाणोनुशेते इत्यादि दैनको बतानेवाली श्रुतियोंको प्रत्यक्ष वस्तु कहनेके कारण होनवल मानकर एकत्यवादिनी श्रुतियोंसे इनका वार कर देने हैं और अपने एकात्ववादका समर्थन करते है। द्वैत वादी 1-प्रत्यक्ष वस्तुके विरुद्ध होनेके कारण अद्वैत श्रुतियाँ केवल संसारमें विश्वास हटाने के लिए हैं और द्वैत श्रुतियाँ प्रत्यक्ष सिद्ध सत्य अर्थका बोध कराती हैं अतः द्वैतको दी उचित मानते है। चार्वाक भी-'आत्मैव देहमयः' इस श्रुनिको प्रमाण मानकर अपने पक्षको वेदसम्मत बतानेका साहस कर सकता है। अतः जिनने पक्ष हो सकते हैं, सबके मूलमें वेद ही ॥८॥ ननु यदि एते दर्शनभेदाः आग्रहैक शरणपुरुषबुदिप्रभवा अन्यथायोज्यमानश्रुति. मूलाः परस्परविरद्धाश्च तर्हि असत्या एव वस्तुनि विकल्पासंभवात् अतः सत्यं कि तस्वमत शाह- अब बात यह उठनी है कि दर्शनोंके वेदमूलक होनेपर भी सबमें आग्रह के कारण एकता न होनेसे यह कैसे जाना जा सकता हैं कि ब्रह्मप्राप्तिका सच्चा मार्ग कौन है? सत्या विशुद्धिस्तत्रोक्ता विद्यैवैकपदागमा । युक्ता प्रणवरूपेण सर्ववादाविरोधिनी ॥९॥ य एते दर्शनविकल्पा भिन्नरूपानुगताः (भेदमाश्रिताः) ते भ्रमकारणरागद्वेष- मूलत्वादसत्या इति न वेदतात्पर्यविषयाः किन्तु अभिन्नरूपत्वाद् विशुद्धिः विशिष्टा शुदिः रागद्वेषादिराहित्यं यस्यां सा, एकपदागमा एकं पदं प्रणवरूपमागमो घोधकं यस्याः सा, तथा च श्रुतिः-ओमित्येकाक्षामुद्गीथमुपासीतेति, एकस्मिन्पदे विषये आगमः समन्वयो यस्याः सा वा, विद्या ब्रह्मरूपा एकस्वयोधकश्रुतिर्वा एव न द्वैतं द्वैतश्रुतिर्वा सत्या अतः तत्र वेदे उक्ता-वेदतात्पर्य विषयः, सत्यार्थप्रति- ब्रह्मकाण्डम् ] संस्कृत-हिन्दी व्याख्योपेतम् पादकत्वेन पठिता वा । अद्वैतवादे कुतो न रागद्वेषावत आह-प्रणवेति । यतः सा- विद्या प्रणयरूपेण सर्ववादाविरोधिनी भनो युक्ता परमार्थो नान्येत्यर्थः । (जो रागद्वेष आदि दोपोंसे रहित ) विशिष्ट शुद्धिवाली है और एक प्रणय (कार) ही जिसे व्यक्त कर सकता है वह ब्रह्मरूपा एकत्वयोपिका विद्या ही सत्य है । वह ही विद्या सत्य अर्थ प्रकाशित करने के कारण वेदमें वर्णित है। क्योंकि जितने (परमाणुकारणवाद) प्रधानकारणवाद आदि) वाद है इन सबसे कोई विरोध भी नहीं है। अत: वही वेदका परम सिद्धान्न है। परमाणुकारणवादो हि प्रधानकारणवाइविरुद्धो नाद्वैतवादः कानयाऽद्विनीय. ब्रह्मण एवं प्रधानपरमाणुरूपवादतः यदृपं दानभेदा ब्रह्मणः कल्पयन्ति तम्मणव एतदप्यस्य रूपमित्यभ्यनुजानाति । तया तार्किकेण परमाणुजगत्कारणं, सांख्येन प्रकृतिर्जगत्कारणमित्युक्तेऽद्वैतिना सोमिति वक्तुं शक्यते परमाणुप्रकृत्यादीनां ब्रह्मा- भन्यस्वादिति सर्ववादाविरुदावं ब्रह्मणः । यद्वा प्रकर्षण नौति स्नौति इति प्रणवः, भगवो हि ब्रह्म स्तौति इति प्रणवेन ब्रह्मणस्तादात्म्याद प्रणव एव ब्रह्म तदेव सत्यं तद्विवर्ताश्चान्ये मिथ्या इति न मिथ्याभूतेन द्वैतेन सत्यस्याद्वैतस्यविरोध इति भावः । एतदेवाभिप्रेत्य गौडपादाचार्यरुक्तम्- स्वसिद्धान्तम्यवस्थासु द्वैतिनो निश्चिता टम् । परस्पर विरुष्यन्ते तैरयं न विरुभ्यते॥ अद्वैतं परमार्थो हि दैतं तद्भेद उच्यते । तेपामुभयथा द्वैतं तेनाय न पिरुभ्यते । कपिलकणादबुद्धाहतादिदृष्टयनुसारिणो द्वैतिनो रागद्वेपोपेताः स्वसिद्धान्तदर्शन- निमित्त परस्परं द्विपन्ति अद्वैतिनो हि सर्वानम्यत्वात् यथा कदाचित् हस्तपदा- दिभिराहतोऽपि कश्चिन विरुध्यते तथा तैनं विरुध्यन्त इति तदर्थः । यतः अद्वैतं परमार्थः द्वैतं च तद्भेदः-तकार्यम् तद्विवर्त इति यावत्, एकमेवाद्विनीयं तत्तेजो. असृजत इति श्रुते । अतो न मिथ्याभूनेन द्वैतेन विरोधः। यथा मत्तगजारूढः उन्मत्तं भूमिष्ठं प्रति वाहय मा प्रतीति भुवाणमपि तं प्रति न वाहयत्यविरोधबुद्ध्या तद्वत् दैतिना तु उभयथा परमार्थतोऽपरमार्थतश्च द्वैतमेवातो विरोध इति । भत एव परमार्थसारे पतञ्जलि:- यरिसद्वान्तागमतीदिषु प्रमस्ति रागान्धाः । अनुमोदामस्ततत्तत्तेषां सर्वात्मवादधिया ॥ इति । इदमत्र तत्त्वम्-कणादादयो हि मायिकत्वेन मिथ्याभूतत्वेन ब्रह्मरूपरवेन च ज्ञातमपि प्रपञ्च बोधनीयशिष्याधिकारानुसारेण तदीयमायिकस्वाधरलप्य ब्रह्मरूपत्वेन, शातपरमाग्वादिभ्यः सृष्टिमाहुः । यथा:-'न बुद्धिभेदं जनयेदज्ञानां कर्मसहिनाम्' इति अतो न ऋषीणां परस्परं मतभेद इति ॥९॥ दात्पर्य यह है कि वे दर्शन जो परसर भित्र है और एक पक्षपर आग्रह किए है। जैसे परमाणुशारणवाद और प्रधान कारणवाद । परमाणुकारणवारी कगाइ अगदको मष्टि परमाणुसे मानते है। वहीं प्रानकारगवादी कपिल जगत्मा कारण प्रधानको (प्रनिको) वाक्यपदीयम् मानते हैं इनमें परस्पर मत भेद है किन्तु जो सत्य है उससे दोनोंसे कोई मतभेद नहीं है। क्योंकि प्रधान या परमाणु महासे अन्य है ही नहीं। अतः ब्रह्मको कारण मानने वाले अतियों की दृष्टिमें दोनों में कोई विरोध नहीं है। अतः ब्रह्म ही सत्य है। अथवा ब्रह्मको प्रकृष्ट स्तुतिति करने वाले प्रणवसे ब्रह्ममें तादात्म्य है अतः ब्रह्म होनेके कारण प्रणव सत्य है उसके विवर्त जो अन्य हैं वे असत्य ( मिथ्या ) हैं। मिथ्या दैतसे सत्य अद्वैतका कोई विरोध नहीं है । यहाँ वास्तविकता यह है कि दोधनीय शिष्यको शत्ति के अनुसार ही विषयका ज्ञान करना चाहिए। बोद्धा परमाणुको ब्रह्म समझता है अतः उसे वही जगत्का कर्ता बनाया गया है ॥९॥ किंबहुना सर्वेऽपि विद्याभेदा वेदादेवेत्याह- विधातुस्तस्य लोकानामङ्गोपाङ्गनिवन्धनाः । विद्याभेदाः प्रतायन्ते ज्ञानसंस्कारहेतवः ॥१०॥ लोकानां विधातुः-उपदेष्टवेग सर्वव्यवस्थापकस्य सर्वशब्दार्थप्रकृतिरूपत्वेन सर्वनष्टुश्च तस्य प्रणवरूपस्य वेदस्य अङ्गोपाङ्गनिवन्धना:-अगानि-विधयः, उपाङ्गानि-मन्त्रार्थवादोपनिषदादयः निबन्धनं मूलं पेषां अजानि-ग्याकरण- शिक्षानिरुक्तकल्पज्यौतिपच्छन्दाशस्त्राणि, उपाङ्गानि पुराणन्यायमीमांसाधर्मशास्त्राणि निबन्धनं प्रयोजकं येषु ते वा। ज्ञानसंस्कारहेतवः-ज्ञान-सम्यगज्ञान, संस्कार:- पुरुषसंस्कारः धर्म इति यावत् तयोर्हेतवः, यद्वा ज्ञानमेव संस्कारः उत्पन्नज्ञाना हि संस्कृता इत्युच्यन्ते तस्य हेतवः । विद्याभेदाः व्याकरणादयः प्रतायन्ते विस्तृता भवन्ति । जगतकी सृष्टि या उपदेश करनेवाले इसी प्रणवरूपी वेदके अग (विधि) और उपाय ( मन्त्र, अर्थवाद और उपनिषत् ) अथवा अङ्ग (व्याकरण, शिक्षा, निरुक्त, कल्प, ज्योतिष और छन्दः शास्त्र) और उपाङ्ग (पुराण, न्याय, मीमासा और धर्मशास्त्र) मूलक शान और सरकार• के कारण ही व्याकरण भादि विधाके भेदोका विस्तार हुआ है। तदाहुः-'सर्वा वाचो वेदमनुप्रविष्टा' इति ॥ सपदेष्टावश्च वेदस्य- सर्वेषां तु स नामानि कर्माणि च पृथक् पृथक् । वेदशब्देश्य एवादी पृथक् संस्थाश्च निर्ममे ॥ इति मनुनाभिहितम् । नामानि घटपटादिसंज्ञा, कर्माणि अध्ययनादीनि, पृथकसंस्थाः लौकिकीर्य- वस्थाः-घरनिर्माण कुलालस्य, पटनिर्माणं कुविन्दस्य, इत्यादिका वेद शब्देभ्य एवं कृता इति तदर्धः। सर्वशब्दार्थप्रकृतित्वं च प्रणवरूपस्य वेदस्य-ॐकार एवं सर्वा चाक सैपा इपीष्मभिव्यंज्यमाना यह्वी नानारूपा भवति' इति श्रुतेः। यही-वाक्यपदादिरूपा नानारूपा-घटपटादिरूपा च । स्पष्टीकृतं चैतद् 'ओमित्येतदक्षरमिदं सर्वम्' इति भुति (माण्डूक्योपनिषद् ) व्याख्याने श्रीशङ्कराचार्यभगवत्पादैः। तथाहि- 'यदिदमर्थजातमभिधेयभूतं तस्यामिधानाव्यतिरेकात् अभिधानस्य चौताराव्यतिरे.

ब्रह्मकाण्डम् ] संस्कृत-हिन्दी व्याख्योपेतम् १६ कादोद्धार एवेदं सर्वम्' इति । ननु शब्दातिरिक्ता भावे शब्दस्यार्यवाचकावानुप. पतिः एकत्र विषयविषयिस्वायोगात्, लया च निर्विकल्प वारयवाचकविभागशून्य सन्मानं वस्तु प्रामोति इति चेदिष्टमेवैतत् कार्यस्य सर्वस्य मिथ्यारवादित्यवेहि । तथाच श्रुतिः-'वाचारम्भणे विकारो नामधेयम्' इति । 'वाचया केवलमारम्यते विकारजातं न तु तावतोऽस्ति यतो नामधेयमात्रम्' इति तदर्थ भामतीकाप भाहुः । ननु वाच्यं च वाचकं च सर्वमोकार भवेत्यभ्युपगमेऽपि परं मा पृथगेय स्थास्यति इति चेन्न यद्धि परं कारणं ब्रह्म सच्चेदवगम्यते किञ्चिदभिधानं तेनेदममिधे- यमित्येवमारमकोपायपूर्वकमेव तदधियमः। अभिधेयं च स्वाभिधानाव्यतिरिक्त तरपुर. रोङ्कारमात्रमिति वाश्यं ब्रह्मापि वाचकाभिन्नं तन्मानमेव भविष्यति । तदुक्तं भगवत्पादः-पान ब्रह्माभिधानाभिधेयोपायपूर्वकमेव गम्यते इत्योङ्कार एव' इति । रज्ज्वादिरिव सादिविकल्पस्यास्पदमद्वय आत्मा परमार्थः सन् प्राणादिविक परस्यास्पदं यथा तथा सर्वोऽपि बामपनः प्राणायामविकल्पविषय ओझर एच' इति च। इदमवावधेयम्-प्रणवो द्विविधः परोपरवा परः प्रसारमकः अपरः शब्दात्मकः । संथा च सूनसहिना- परम्परतरं ब्रह्म ज्ञानानन्दादिलक्षणम् । प्रकरें नवं यस्मात् परं ब्रह्म स्वभावतः । अपरः प्रणवः साक्षाच्छब्दरूपः सुनिर्मलः । प्रकर्पण नवस्वस्य हेनुवाप्रणवः स्मृतः । पर एव प्रणव भान्तर इति अविवृत्त इति चोच्यते । भागवतेऽपि-[१२ स्क० ६ ० ३७-५४ ठो०] समाहितात्मनो मान् ब्रह्मणाः परमेछिनः । हृद्याकाशादभूनादो वृत्तिरोधाद विमाध्यते। सतोऽभूरित्रवृदोकारो योऽव्यकप्रभवः स्वराट । यत्तहिङ्गं भगवतो ब्रह्मणः परमात्मनः। कोऽसौ परमात्मा तग्राह- शृणोति य इमं स्फोटं सुप्ते धोत्रे व शून्याक । येन वाग म्यज्यते यस्य व्यक्तिराका भात्मनः ॥ इति । विधानो ब्रह्मणः साक्षाद्वाचका परमात्मनः । स सर्वमन्त्रोपनिषद् वेदधीजं सनातनम् ॥ तस्य शासन् त्रयो व भकाराचा भृगूदा धायन्ते येवपो भावागुणानामावतयः । ततोऽक्षरसमाम्नायमस्जदावानजः । अन्तःस्थोप्मस्वरस्पर्शदीर्घहस्वादिलक्षणम् ॥ तेनासौ चतुरो वेदाचतुभिवंदनैर्विमुः । सन्याहृतिकान् सोङ्कारान् चादहत्रिविवक्षया । त्रिवित्-त्रिमा भव्यक्तः-परब्रह्मरूपः प्रणवः प्रभवः कारणं यस्य, लिभाम- कम्, पेन-प्रणवेन, भाकाशे हृदयाकाशे, बारमनः सकाशाद्ववक्तिः, प्रणव एव पर- मारमा, स्वपान रसकारणस्थ, गुणाः समाजरतमांसि, नामानि ऋग्यशुम्मामानि, अर्या:-भूर्भुवःस्थलों का, वृत्तयः जामत्स्वानमुपुप्तयः । एवं च अपरप्रणवरूपो वेद परवह्मणः मारयुपायः तरकार्यश्चात् कार्यकारणयोरभेदात् । केचित्तु-'एतदालम्प मम्' इति श्रुतिप्रामाण्यात. प्रतिमायो विष्णुयुझिवदोहारी प्रमवुदयीपारपमानो ब भभिन्नात् संहृतक्रमात् अन्तःसन्निविष्टात् पश्यन्तीरूपात् शब्दतत्वात्-प्राप्तो वर्णपदवाक्यलक्षणो रूपविभागो यया, यद्वा अभिधेयरवेन प्राप्तः रूपविमागः अर्थ- विशेषः गवादियंया, यद्वा माप्तः रूपविभागः गवादिर्थः कार्यकारणभावेन यया, शब्दो हि गवादिरूपेण परिणमते ते च गवादयस्तत्रैव लीनाः वायूपेण व्यवति छन्ते यदाहुः-'नामैवेदं रूपरवेन धवृते रूपं चेदं नामभावेऽवतस्थे । एके तदेकमविभक्त विभेजुः प्रागिवान्ये भेदरूपं वदन्ति' इति, सा तस्याः प्राप्तरूपविभागायाः . मायाः वाचा वाचकत्वादभ्युदयहेतुत्याच यः परमो रसः सारस व्यवस्थितसाधु- भावः शब्दसमूहः, यदाहुः 'ऋजीपमेतद्वाचो य. संस्कारहीनः शब्दः' इति निष्पीडि. सरसस्याग्रे रसः सारः यदन्यस्किस ऋजीपः' इति यत्तत् श्रुतिप्रसिद्ध पुण्यतमम् प्रकाशाप्रकाशयोः प्रकाशकं ज्योतिः शब्दाख्यम्, यथाहु:-'इह त्रीणि ज्योतीपि त्रयः प्रकाशाः स्वरूपपररूपयोश्वद्योतकाः 'योऽयं जातवेदाः यश्च पुरुपेवान्ता प्रकाशो यश्च प्रकाशाप्रकाशयोः प्रकाशयिता शब्दाख्यः तत्रैतत्सर्वमुपनिबद्धं यावरस्थास्नु चरिष्णु ध' इति तस्य साधुशब्दसमूहस्य ज्ञाने अयं सामान्य विशेषलक्षणवान् व्याकरणरूपः आञ्जसः सरलो मार्ग ठपाय इत्यर्थः । प्रतिपदोक्तशब्दपारायणरूपस्तु भरयन्तकृच्छ्रो मार्गः तथा च भ्रूयते 'वृहस्पतिरिन्द्राय दिव्यं वर्षसहस्र प्रतिपदोक्तानां शब्दानां शब्द- पारायणं प्रोवाच न चान्तं जगाम' इति । तथा च लभ्यर्थ व्याकरणम् इति भावः॥१२॥ और जिसने एक और क्रम रहित पश्यन्नी वाक् रूपी शब्दतत्त्वमे वर्ण-पद-वाक्य रूपी रूपविभाग प्राप्त किया है। अथवा वाच्यरूपमें रूपविभाग ( अर्थ विशेष) प्राप्त किया है। अथवा कार्य-कारणके रूपमें जिसने अर्थरूप धारण किया है और जो क्रमवती वाणीका (बैखरी) वाचक या अभ्युदयका कारण होनेके नाते परमसार है, जो श्रुति प्रसिद्ध पुण्यतम आलोक और तमको प्रकाशित करने वाली शब्दनामकी ज्योति है उसके साधुत्व शानके लिए यह व्याकरण शास्त्र ही सरल मार्ग है। क्योंकि शब्द अनन्त है । उनका शान कोषके द्वारा होना असम्भव है। एक बार इन्द्रजी. को इच्छा हुई थी कि सब शब्दोंको पढ़ लिया जाय। उन्होंने देवगुरु बृहस्पनिको बुलाया और पढने लागे। एक हजार वर्ष बीत गए किन्तु शब्द राशिका अन्त नही हुआ। आजकल तो जो बड़ा दीर्घायु होगा वह सौ वर्ष जी सकेगा फिर उसे इस शब्द राशिका शन कैसे हो सकता है । इसलिए शब्दोंके ज्ञानके लिए कुछ नियम बना लेना चाहिए। जो नियम कुछ सामान्य नियम हों और कुछ विशेष नियम हो । विशेष नियमोंसे सामान्य नियमोंका बाप हुआ करेगा। इस प्रकार थोड़ेसे समय और परिश्रमसे बड़े शब्द सागरको पार किया जा सकता है। अनः व्याकरण नामके इस शास्त्रका निर्माण हुआ जो थोडेसे परिश्रममें शब्द राशिका शान कराना है। अतः यह व्याकरण शब्द ब्रह्मके शानमें लाघव (शीत्रता) करने वाला है अर्थात् थोडे परिश्रममें अधिक शब्दोंका शान कराना है ॥ १२ ॥ सर्वव्यवहारसम्पादकजारयादियोधकशब्दस्वरूपबोधस्वादपि व्याकरणं प्रशंसन् भाप्योक्तं संदेहामावरूपं पञ्चमं व्याकरणप्रयोजनमाह- अर्थप्रवृत्तितच्चानां शब्दा एव निवन्धनम् । - तम् २३ । तत्वावबोधः शब्दानां नास्ति व्याकरणाहते ॥ १३ ॥ अर्थप्रवृत्तितत्यानाम् अर्थस्य घटादेः प्रवृत्ती व्यवहारे-जलाहरणादिरूपा थक्रियाकारिश्वे, अयं घट इत्यादिशब्दप्रयोगे वा, निमित्तानि जातिगुणक्रियासंज्ञाः सेषों, तथा च भाष्यम् 'चतुष्टयी शब्दानां प्रवृत्तिःजातिशब्दा गुणशब्दाः क्रियाशब्दा यहछाशग्दाः' इति । भत्र-'भाब्दानामर्थे या प्रवृत्तिः (प्रयोगः ) सा प्रवृत्तिनिमित्त- भेदात्मकारचतुष्टवतीत्यर्थः' इत्युद्योतः । यावयक्तयो जात्यादिभि परश्यन्ते तावविद सदिस्येवं ग्यवहार्या न भवन्तीनि भवति तेषां व्यवहारे निमित्तत्वम् । शब्दा पव निवन्धन घोधकाः, सर्वो हि व्यवहारः शब्दमूलः न हि शब्दमनुशार्यकश्चिद्वयवहाँ शनोतीति भावः । निबन्धनमिनि वेदाः प्रमाणमितिवनिर्देशः। नन्वेतावता किमा- यासं म्याकरणस्य, शम्दस्वरूपयोधस्य श्रोत्रेन्द्रियादेव सस्वादत आह-तत्त्वेति । शब्दानां तत्त्वाववोधः तत्त्वम् अवैकल्यं साधुरवं, यथार्थबोधकरवं, वा तस्य भव. धोधः निश्चयः, स्थूलपृषतीमित्यत्रार्थनिर्णयस्य व्याकरणाधीनत्वात् । देवदत्तस्य गुरु- कुलमितिवनिस्यसापेक्षरवात् समासः । व्याकरणादृते नास्ति व्याकरणादेव भवति न श्रोत्रादिभ्य इति भावः । शवस्यैतदेव वैकल्यं यदपगतसंस्कारस्वम्, भन्यार्थयो. धकरवं वा । अनेन सन्देहाभावरूपं व्याकरणप्रयोजनमुन्नम् । और किसी भी अर्धके (घर, पट आदि के ) प्रवृत्ति ( व्यवहार, जैसे पानी भरना), और घट शब्दके प्रयोगमें (उच्चारण में जानिशन्द गुणशब्द और किया) शब्द ही बोधक हैं। क्योंकि जितने व्यवहार है सब शन्दसे ही चलते हैं। उन शब्दों के नस्वका (निःशेष साधुत्व, या यथार्थबोधकल्वका ) ज्ञान विना व्याकरणके नहीं हो सकता। अयं भावः-शब्दस्य द्वे रूपे शब्दवं साधुरवं च तत्राधस्य श्रोनेन्द्रिय ग्राह्यत्वेऽपि द्वितीयं व्याकरणादेव गृह्यते न श्रोन्नादन्यथाऽनधीतच्याकरणाअपि प्रतिपोरन् । एतेन 'तत्वावयोधः शब्दानां नास्ति श्रोत्रेन्द्रियाहते' इति कुमारिलभोक्तमपास्तम् । यथाऽऽहु:- शब्दार्थसंबन्धनिमिनतवं वाच्याविशेऽपि ध साध्वसाधून् । साधुपयोगानुमितांश्च शिष्टान वेद यो व्याकरणं न वेद ॥ इति । वाच्याविशेषेपिएकस्मिन्नेव गोरूपेऽर्थे गोस्वजातिनिमित्तेन गोणीशन्दोऽसाधुः भावपनप्तारयात्मयुक्त्तः साधुः इत्येवंभूतं-सदार्थसम्बन्धस्य निमित्तं प्रवृत्तिनि- मित्तं तस्य तस्वमविपरीतस्वं, साम्बसाधून् शम्दान् , भयं शिष्टः साधुशब्दप्रयोत्तृत्वा. दिरयेवमनुमितान् शिष्टाचावयारणो न वेदेभ्यर्थः ॥ १३ ॥ सम्मके दो रूप है। एक तो शन्दत्व और दूसरा माधुत्व । जिसमें शब्दत्वका शान तो मदगेन्द्रियसे भी हो सकता है। क्योंकि यह नियम है कि 'जो वस्तु जिस इन्द्रियसे शान होता है उसको जाति और प्रभाव भी उमो इन्द्रियसे ज्ञात होता है। अनः सदके अवान्द्रियमे शान होने के कारण उममें रहने वाली शम्दव जाति भी धवणेन्द्रियमे ही जानी जायगी। किन्तु भो दूसरा रूप साधुत है, वह नो भ्याकरणके बिना जाना ही नहीं जा सकता।

२४ वाक्यपदीयम् जैसे 'रथूलपृषतीमनड्वाहीमालभेत' इस वाक्य में 'स्थून पृषती' पदके अर्थका शान विना व्याकरण के नहीं हो सकता है। क्योंकि समस्तपदों के प्रकृति प्रत्ययमा विभाग व्याकरणसे होगा और उदात्तादि स्वरका ज्ञान भी व्याकरणसे रो होगा। इस पदके अर्थ विचारने में हमें उदात्तादि स्वर सहायता करेंगे । जब हम इस पदमें पूर्वपदप्रतिवर देखेंगे तो (स्थूलानि पृषन्ति पन्दा सा स्थूलपृथनी) इस तरह बहुव्रीहि ममास मानेगे और जब समासान्तोदार देखेगें तब तत्पुरुष कर्मधारय (स्थूला चासौ पृधनी च) मानेगें। इसलिए व्याकरण शब्दों के अर्थ-शानमें संदेह भी दूर करता है और व्याकरणका अध्ययन सदेह निवृत्ति के लिए आवश्यक हो जाता है ॥१२॥ तदेवं व्याकरणस्य महाभाप्योक्तपयोजनान्युक्त्वा अपवर्गसंपादनरूपंतदुक्तं मुम्य प्रयोजनमाह- इस प्रकार महाभाष्यमें वर्णित रक्षा, ऊद, आगम, लघु और असदेह रूप पाँच प्रयोजनों का वर्णन करके मुख्य प्रयोजन अपवर्गका प्रतिपादन करने हैं कि- तवारमपवर्गस्य वाङ्मलानां चिकित्सितम् । पवित्रं सर्वविद्यानामधिविद्यं प्रकाशते ॥ १४॥ तद् व्याकरणम् अपवर्गस्य द्वारम्-उपायः, तद्यथा साधुशब्दज्ञानपूर्वकाम- योगादभिव्यक्तधर्मविदोपः महान्तं शब्दात्मानं प्राप्नोति तथाहि व्याकरणसंस्कृतचे. तसा पूर्व वैखरीद्वारा मध्यमामधिगग्य वागविकाराणां प्रकृति समस्तशब्दार्थकारण. भूतामावृतां पश्यन्तीमनुगच्छति ततः शब्दपूर्वयोगाम्यामभावनावशात् अनावृतां विशुद्धा पश्यन्ती परास्यां प्रामोतीति तत्प्राप्तिश्च तत्तादाम्यं तदेवापवर्गः। तथा च व. चयति-'अपि प्रयोक्तुरा मार्ग शब्दमन्तरवस्थितम् । प्राहुर्महान्तमृषभं येन सायु- ज्यमिप्यते ॥ इति । सायुज्यमैक्यमित्यर्थ । प्रत्यवायजनकापभ्रंशप्रयोगरूपस्यापवर्ग- प्रतिवन्धकस्यापनयनाय व्यकरणस्योपयोगमाह-वागिति । वाडालानां प्रत्यवाय; हेतूनांवाचो मलानांदुरच्चारणरूपाणां चिकित्सितम् आयुर्वेद इव शारीराणां दोषा- णाम, सर्वविद्यानां पवित्रं-'यदाहुः आपः पविन्नं परमं पृथिव्यामपा पवित्रं परमं च मन्त्राः। तेषां च सामय॑जुषां पवित्रं महर्पयो व्याकरणं निराहुः । इति । विद्यार इति अधिविद्यं मर्वासु विद्यासु प्रकाशते स्वीक्रियते, अपभ्रंशप्रयोगामावाय अपे. प्यते इति यावत् ॥ १४॥ और यही व्याकरण अपवर्गका (मोक्षका) उपाय है, पापको उत्पन्न घरने वाले अपशब्दरूपी वाणीके मलेको चिकित्सा ( औषर) करने वाला है, मब विद्याओं में पवित्र और साधुशब्दोंको बतानेके कारण सब विद्याओं से आदन भी है ॥४॥ ननु 'श्रोतव्यः श्रुतिवाक्यम्यो मन्तव्यश्चोपपत्तिभिः' इनि स्मरणाच्छूनिवाश्यश्र• वजन्यमेव शब्दलज्ञानमपवर्गायालं' न व्याकरणजन्यम्, न च शब्दशनिमहाय १. इद च मतं वेदान्नमूलनिहामघुगणमौरपेयप्रवन्मानामपि पक्षे ( ब्रह्मविचाराय) प्राप्ति मंभवानियमोऽयम् ( आत्मा श्रोतय निविषिः) बस्नु' पनि ग्रन्थेत मिद्धान्तलेशमंग्रहे उपन्य- स्तम् । श्रुतिवाक्येय एव ब्रह्मवणे मोशे न पौरपेयवाक्येन्य दनि तात्पर्यम् ।

- । व काण्डम् संस्कृत-हिन्दी व्याख्योपेतम् तदपेशा, कोशाच्यादित एव तदुपपत्तेरनो व्याकरणग्यापवर्गद्वारस्वमुपपादयन् लौकि. कान्दानुशामनरूपं प्रयोजनमाह- यथार्थनातयः सर्वाः शन्दाकृतिनिबन्धनाः । तथैव लोक विद्यानामेपा विद्या परायणम् ॥ १५॥ यथा सर्या अर्थजातयः घटादिसमवेता घटावादिजातयः शब्दातिनिबन्ध नाः शब्दानां घटादिशब्दानामाकृतयो घटशब्दापादयो निइन्धन बोधकं यास ताः अर्धगतज्ञातीनां शक्यवं शब्दातजातीनां च शतत्वमिति भावः। अर्थगतजातीनां योधः शब्दादेवेति यावत् । तथैव एपा विद्या व्यावरण लोके सर्पविद्यानां कोश. काव्यादीनां परायणम् स्वघटकपदशत्तिमहाय अपेक्षणीयम् । ततश्व-'लोकावगत- सामर्थ्यः शब्दो वेदेऽपि बोधकः' इति न्यायालोके शब्दशतिग्रहस्य व्याकरणाधीन- स्वादिकशब्दशक्तिमहस्यापि तदधीनस्वमिति धुण्यापि तदपेक्षणीयमिति भवस्यप- वर्गद्वारं व्याकरणमिति भावः ॥ १५॥ क्योंकि जैमै सब अर्थों ( घर, पट आदि) में ममवाय सम्बन्ध से रहने वाली घटत्व जातिका बोषक घटशम्दत्व है। (क्योंकि अर्थगनजातिमें शश्यत्व और दाम्दगतजानिमें शक्तत्व है।) वैसे ही शेकमें जितनी ( कोश काव्य आदि ) विद्यायें है उन सबके लिए शक्तिबाइक अतः लोककी नरद वेदमें भी शक्तिप्रद व्याकरणके द्वारा ही होनेके कारण व्याकरणका अध्ययन वेदशान द्वारा मोक्षके लिए उपयुक्त है। इम प्रकार परम्परया व्याकरण भी मोक्षका साधन है ॥१५॥ इदानी न केवलं शतिग्रहायापेक्षितस्याद् व्याकरणमपवर्गद्वारं किन्तु सापाच्छ. ब्दब्रह्मसाक्षात्कारजनकरवादपीरयाह- इदमायं पदस्थानं सिद्धिसोपानपर्वणाम् । इयं सा मोक्षमाणानामजिह्मा राजपद्धतिः ॥ १६ ॥ सिद्धिसोपानपर्वणां मिनिमषिः तस्य या अन्तरालावग्यास्ता तत्प्राप्ती सो- पानतुल्यात्वात्मोपानानि तेपो विभागाः पाणि नेषां मध्ये इदं प्यारणम् आद्यं प्रथमं पदम्थानं पर्व, यथाचैनन् तथा 'तद्वारमिति कारिकाप्यार याने स्पष्टम् । मोक्षमाणानां मुमुक्षूणां सा इयम् अजिमा अकुटिला राजपद्धतिः राजमार्ग हरयर्थः । “रयं हि यासा मतिर्नलम्य' इनियत् उद्देश्यप्रतिनिदेश्ययोरक्यमापद- यासर्वनाम पर्यादेश तत्तशिलमामितिभ्यान 'यंस इति निर्देशः ॥ १६ और मिद्धि (मोक्ष) प्राप्त करने की जो मौदियों ( उपाय, अवान्तर भूमिका) है। उनमें यह व्याकरण-शास्त्र पहली सीढी है और मोश चाहने वागेकै रिए यह मौधी महक है। तात्पर्य यह है कि व्याकरण केवल शक्तियदके लिए ही नही उपयुक्त है अपितु ब्रममाक्षात वारके लिए मीहै। व्याकरणके द्वारा ही परी मायगा और पश्यन्तीका क्रममे छान होता व्याकरण ही है। ४चा वाक्यपदीयम् है । पश्यन्ती ही परा स्पमें ब्रह्म है । अनः ब्रह्मशानका कारण न्याकरण भी है ॥१६॥ ननु 'आरमा वारे द्रष्टव्यो मन्तव्यो निदिध्यामितव्य' इति श्रुन्या प्रत्ययाममा- तारकारस्यैव मोक्ष हेनुश्रवणाच्छब्दसाक्षात्कारमाधकस्य व्याकरणस्य कथं मोचहेतु- रवमित्याशय शब्दस्यैव प्रत्यगात्मरूपत्वप्रदर्शनेन व्याकरणस्य मोशहेनुनामाह- यहाँ इस शङ्काका उठ जाना स्गमाविक है कि मोक्ष आत्ममाक्षात्कारमे होता है सन्द साक्षात्कार से नहीं। व्याकरण शास्त्रसे शम्दका साक्षात्कार मले हो दो किन्नु ब्रामाशान न होने के कारण मोक्षका कारण नहीं माना जा सकता, किन्तु यह गका उचित नहीं- अमातीतविपर्यासः केवलामनुपश्यति । छन्दस्यश्छन्दसां योनिमात्मा छन्दोमयीं तनुम् ॥१७॥ अन्न व्याकरणे अतीतविपर्यासः अतीतो नष्टो विपर्यामो-भ्रमो यस्य स सम्य- ग्ज्ञानवान् शब्दविपर्यासपूर्वको हि अर्थविपर्वासः 'स्थूलपृषतीमि'त्यादौ पः तं च शब्दविपर्यासमतिकामनि उदात्तादिज्ञानेन व्याकरणान् , हत. व्याकरणादपगत. शब्दार्थविपर्यासः सन् छन्दस्यः छन्दसे वेदाय हितः वेदग्रहणममर्थः आत्मा छन्दसां वेदानां योनि छन्दोमयी इन्दोरूपां केवलां शुद्धाम् अपभ्रंशविविका- मिति यावत् । तनुं भषमा स्वस्वरूपभूना वा प्रणवरूपां पश्यति । पाइब्रह्मण एव वियों जीव.-"स एव जीवो विवरपसूति." इनि भागवतात् । तथा च शब्द सासरकार पुन आत्मसातारकारः।तनश्व व्याकरणस्य मोपदेतु वमुपपन्न मिनि भावः ॥ क्योंकि इस व्याकरणाके शान हो जानेसे शब्दके वारेमें बुद्धिभ्रम दूर हो जाता है और मनुष्यको सायुशन्दोंका पता लग जाता है। उस समय आत्मा वेदोंके शानमें समर्थ हो जाता है और वेदोंकी छन्दरूपी योनिको जो शुद्ध है ( अपभ्रससे अलग ) उम सूक्ष्म पणवरूपी ब्रह्मकी देहको देख लेना। यह प्रथम कारिका की व्याख्यामें ही बना चुका हूँ कि पश्यन्तीत्रक ही किसी अदम्या जीव है। इसलिए पश्यन्तीका साक्षात्कार और आत्मसाक्षात्कार में कोई भेद नहीं है। अन शब्दसाक्षात्कार के द्वारा व्याकरण मोक्ष देता है ॥ १७ ॥ ननु 'भान्मा चारे द्रष्टव्यः' इति भुस्या आत्मसापाकारस्येय 'तमेव विदित्वाऽतिमृायुमनि' इतिश्रुस्या ब्रह्मसाक्षाकारस्यापि दानिवृत्ति (मोक्ष) हेतुन प्रतिपादिता । एवं 4 शब्दविवर्तस्य प्रत्यगात्मनो व्यारण वेद्यस्वेऽपि परब्रह्मणो व्याकरणावेद्यतया कथं प्यावरणाध्ययनान्मोच इत्यारावा निराचिकीर्षुः परमाणो व्याकरणवैद्यनोपपादनाय शब्दब्रह्मरूपता पञ्चभिः श्लोराह- ..वय्याकरण दागौके पश्यन्नी, मध्यमा और वैपरी नामके तीन भेद ही मानते हैं वाणीका परा नामका भेद शैमिद्धान्तके आधार पर नागेशन वैय्याकरणों का माना है इसकी विवेचना आगे १४३ वी कारिकामें पदिए । २.समेवेन्यत्र एककारो मिन्ननमः विदित्वेत्यस्यानन्तर इष्टयः यथाश्रुतं तु न युक्तम आत्मसाक्षात्कारस्य मोक्षहेतुत्वदधकश्रुतिविगंधापत्तेः ।

वैकृतं समतिक्रान्ता मूर्तिव्यापार सनम् राबहामार ब्रह्मकाण्डम् । संस्कृत-हिन्दी व्याख्योपेतम् यद्यपि जैसे 'आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः' इस अतिसे आरमसाक्षात्कार मोक्षका कारण माना गया है। वैसे 'तमेव विदित्वानिमृत्युमेति-' इत्यादि श्रुनिसे ब्रह्मसाक्षात्कारको भी मोक्षके प्रनि कारण माना गया है। जिसमें आत्मा शब्द ब्रह्मका वितर्न है । व्याकरण द्वारा शामके शानसे आत्माका ज्ञान हो सकता है । किन्तु ब्रह्म नो शब्दसे अलग है, इमलिए शब्द शानसे ब्रह्मशान नहीं हो सकता। नव व्याकरण मोक्षका कारण कैसे मान लिया जाय यह शङ्का उठती है। तथापि यह समझ लेना चाहिए कि शव ही ब्रह्म है । शमशान दी ब्रह्मज्ञान है ब्रह्मशान हो मोक्षका कारण है। क्योंकि प्रत्यस्तमितभेदाया यद्वाचो रूपमुत्तमम् । तदस्मिन्नेव तमसि ज्योतिः शुद्धं विवर्तते ॥ १८ ॥ प्रत्यस्तमितभेदाया' उपसहतकमाया घाचो यदुत्तमम् अविवृत्तं रूपं पर. ग्रह्माण्य शुद्ध मायोपप्लवरहितं ज्योतिः प्रकाशाप्रकाशयोः प्रकाशक शब्दाख्यं तत् अस्मिन्नेव वैषध्वनिरूपे नमसि अन्धकारे विवर्ततेमाच्छादित पर्तते इत्यर्थः॥१८॥ ओ क्रम रहिन वाणाका उत्तम और शुद्ध ( मायाके प्रावोस परे) आलोक और तमका मी प्रकाशक शदनारूपी ज्योति है । वह इसी कृतघ्ननि रूपी अन्धकारमें दिखी है ॥१८॥ प्राकृतकृतध्वनिभिन्नं स्फोटं व्यवस्थापयन् पूक्तिमेव रूपं स्पृश्यति- व्यतीत्यालोकतमसी प्रकाशं यमुपासता २९ इदमत्र योध्यम्-वनिद्विविधः प्राकृतो वैकृतश्च प्रकृतो, स्फोटे भवः प्राकृती स्फोटाभिव्यञ्जक इति यावत् । ध्वनिस्फोटयोः पृथक्वेनोनुपलाभात् स्फोट वनः प्रकृनिमिव मन्यन्ते । तत्र स्फोटस्य प्राकृतध्वने दाग्रहाद् वर्गोपरागाभिव्यक्तिजनकय. रनीयकालोपरागेणैव भानम् । अत एव तस्य प्राकृनरवेन व्यवहारः । वैकृत, प्राकृताः जातो विकृतिविशिष्ट चिरस्थायी स्फोटानभिग्यञ्जकः स्फोटोपलेब्धिधाराजनकः । प्राकृनेन ध्वनिगा स्फोटेऽभिग्यक्ते, तदुसरकालभावी ध्वनिःस्फोटाद्विलक्षण उपलभ्यते इति विकारापत्तिरिव स्फोटस्येति वैकृत उच्यते । यथा उद्यन्नेव प्रकाशो घटमवभा. सयति तदनन्तरं घायनिष्ठमानः घटोपलधिधारी जनयन्नपि न घटे कश्चिद्विरोपमा. दधाति, एवं प्राकृतम्वनिनाऽभिव्यके शब्दे उत्तरकालमनुवर्तमानो वैकृतध्वनिः शविषया युनिधारा जनयन्नपि न शब्द प्रकाशयति । अतो वैकृतम्वनिसंसृष्टमपि स्फोटं वैकृतम्वनिभिन्तमुपलक्ष्यन्तो वैकृतध्वनिगतं देशकालभेद स्फोटे नाभ्यारोपयन्ति । ध्वनि भी दो प्रकार की है। प्राकृत और वैकृत । प्राकृत धनि 'प्रकृती खोटे भवः प्राकृत.' अर्थात् 'रकोटोयक्त करने वाली वनि'। क्योकि कोट और ध्वनिमें से पार्थस्य प्रतीत नहीं होता । अतः स्तोटको वनिको प्रकृतिको तरह रोग मानने है और वर्गको अभिव्यक्तिके प्रयत में लगने वाले का के द्वारा हो सोट में प्राकृत ध्वनि का बोर होता है। इमीनिर उमे 'प्राकृतध्वनि' कहते है। D २८ वाक्यपदीयम् वैकृत ध्वनि नो 'प्राकृताजात विकृति विशिष्ट प्राकृतसे उत्पन्न विकार से विशिष्ट, चिरकाल स्थायी, स्फोटका अनभिन्यजक और स्फोटकी उपलब्धिधाराको उत्पन्न कराने वाली है । इमीलिए उसे 'वैकृतध्वनि' कहा जाता है। प्राकृतध्वनि स्फोटको अभिव्यक्त करती है और वैकृत ध्वनि चिरकालतक बुद्धि धाग बनाती है। जैसे उदित होते ही प्रकाश घरका प्रत्यक्ष करा देता है किन्तु घटमें और कोई गुण नहीं डालना वैसे प्राकृाचनिसे अभिव्यक्त शब्दमें, प्राकृन ध्वनिके पीछे चलने वाली वैनध्वनि शब्द विषयक बुद्धिधार। बनाने के अतिरिक्त और कोई विशेषता नहीं उत्पन्न करनी। इसीलिए वकृत ध्वनि से सम्बद्धभी स्फोट वैकृत ध्वनिसे भिन्न है और वैकतध्वनिके देश और कालको व्यक्तभी नहीं करता। ततश्चायमर्थः-वैकृतं वैकृतध्वनिसम्बन्धि मूर्तिव्यापारदर्शन-मूतैर्देशस्य व्यापारस्य क्रियायाः क्रियोपलक्षितकालस्य दर्शनमनुभव, देशकालभेदमिति यावत, समतिकान्ताः स्फोटेऽनासोफ्यन्तः आलोकतमसी स्फोटाभिव्यञ्जकरवात्प्राकृतो ध्वनिरालोका' स्फोटानभिव्यक्त्वाकृतो ध्वनिस्तमः ते व्यतीत्य अतिशय स्थित प्राकृतिकृतध्वनिभिन्न मिति यावत् प्रकाशं स्फोटाख्यं समुपासते जानन्तीत्यर्थः ॥ क्योंकि-विद्वान् लोग वैकृत ध्वनिसे सम्बद्ध मूर्ति (देश ) व्यापार ( क्रिया और क्रियाने उपलक्षिन काल) के अनुभव (प्रतीनि)ो सोटम विना औरोपित किए ही आलोक (प्राकून ध्वनि ) और नम (वैकृन ध्वनि ) से अलग स्थित प्रकाश ( स्फोट ) का हो शान प्राप्त करते हैं । अर्थात स्फोट एक है तथा यह प्राकृत ध्वनि और वैकृत ध्वनिसे भिन्न है ॥ १९॥ तथा च महाभाप्यम् 'येनौच्चारितेन सास्नालालककुदखुरविपाणिनां संप्रन्ययो भवति स शब्दः' इति । उच्चारितेन--प्रकाशितेनेस्यर्थ इति कैयटः। ध्वनिः शब्द इति न लौकिकदृष्टिमनुरुध्य तदुनं भाष्ये 'लोके ध्वनिः शब्द' इति ॥ तथा च वक्ष्यति-- शब्दस्य ग्रहणे हेतुः प्राकृतो चनिरिष्यते। शब्दस्योर्ध्वमभिव्यक्ते स्थितिभेदे तु वैकृता. ॥ ध्वनयः समुपोइन्ते स्फोदारमा तैनं भियते । इति । शब्दस्याभिव्यक्तरुवं जायमाना वैकृतध्वनयः स्थितिभेदे फोटोपलब्धिस्थिति- भेदे, वृत्तिभेदे इनि पार्टी द्रुतादिवृत्तिभेद इत्यर्थः, समुपोहन्ते कारणानि भवन्ति स्फोटस्तु तैनं भिद्यने वर्णोपरागाभिव्यक्तितनकध्वनिकालोपरागणैव तद्भानादिति शेषः । तदुक्तं तपरस्त्रे भाष्ये 'स्फोटः शब्दः ध्वनिः शब्दगुणः 'यथा भेर्याहन्ता भेरीमाह- प्य कश्चिविंशतिपदानि गच्छति कश्चिरित्रंशत् कश्चिञ्चस्वारिंशत् स्फोटरतावानेव ध्वनि कृता वृद्धिः' इति । एवं (दुतादि) वृत्तिपूपलब्धीनां कालभेदो विषयस्य स्वभेद इति प्रदीपः । वनिकृता-वैकृतध्वनिकृनोपलब्धिकालकृतेत्यर्थ इत्युद्योतः ॥ १९ ॥ १. 'यस्य कस्यचिवमासक नज्योति, शन्दनाभिधीयते इति 'ज्योनिश्चरणाभिचानात्' [१।१।२४] इति सूत्रे शाङ्करभाष्यम् ज्योतिरालोकः इति च पर्यायौ । ।

ब्रह्मकाण्डम्] संस्कृत हिन्दी व्याख्योपेतम् ननु यत् युगपद्विरद्धसंसर्गयत् तन्नाना यथा द्विशफैकशफवान् गवाश्वादिः युगपरकत्वगरवादिधर्मवांश्च स्फोट. तस्मासानेति कथ स्फोटरूपस्य शब्दब्रह्मण एकरव- मत आह- यद्यपि जो एक समयमें अनेक परस्पर विरुद्ध वस्तु से सम्बद्द हो वह एक नही हो सकता जैसे एकशपत्व और विशपत्व ये दोनों धर्म न तो गौमें ही है न अश्वमें हो। किन्तु ये दोनों धर्म अलग अलग दो पशुओं में रहने है । वैसे कन्व गत्व रूपी विरूद्धधर्म एक स्फोट में नहीं रह सकने । तथापि- यत्र वाचो निमित्तानि चिह्नानीवाक्षरस्मृतेः । शब्दपूर्वेण योगेन भासन्ते प्रतिबिम्बवत् ॥ २०॥ यत्र स्फोटाल्ये शब्दब्रह्मणि अक्षरस्मृतेश्चिहानीव लिपय इव वाचो वागभि- पस्य प्राकृत वनेः निमित्तानि, वागभिव्यक्तिनिमित्तवनिगना. कस्वादिजातयः शब्द पूर्वेण शब्दाभिव्यक्तिपूर्वभाविध्वनिना योगेन मम्बन्धेन भेदाग्रहगेति यावत् यद्वा भाब्दपूर्येण साधुशब्दज्ञानप्रयोगपूर्वकेग योगेनकमसहाररूपेण, प्रतिविम्ववत् प्रतिबिम्ब हर भासन्ते इत्यर्थः । तत्र तस्येव' इति वतिः । जैसे-जिम स्फोट शब्दब्रह्ममें अक्षरोंके स्मृति चिह (लिपियाँ ) वाणी (प्राकृतध्वनि ) का कारण मानी जाती है। वैसे शन्दको व्यक्त करने वाली कत्व, गत्व जातियाँ भी शब्दोच्चारण के पूर्व में होने वाली नियों से अभिन्न होने के कारण प्रतिविम्बकी नरद मानने है । अथवा- शन्दको व्यक्त करने वाली कत्व, गत्व जातियाँ माधुशब्दका शान पूर्वक अक्रम प्रयोगके रूपमें प्रतिविम्ब की तरह प्रतीत होती है। जपाकुसुमादिगतलौहित्यादिव्याकोपरागवान् लोहितः स्फटिक इतिभानवत् ध्याकम्बनिगतकवावादयः स्फोटे भासन्ते प्रतिविम्बगनधर्मवैशिष्टयेनैव विवस्य लोकेऽवधारणादिति न वस्तुत. स्फंटे कापादयो येन भेदः स्यादिति भावः ॥२०॥ तात्पर्य यह है कि जैसे जपाकुसुमका र स्फटिकमणि पर पडना है और वेन भी सटिक माणे लाल मालूम पडने लगता है। वैसे व्यावनिके ही धर्म कल गवादि सोटमें मासित होते हैं । वस्तुतः वे स्कोरके धर्म नहीं है । अतः स्फोट एक है ।। २० ॥ रफोटेऽन्यगतरवायभासयदन्यगतस्यैवोदात्तत्वादेरवभागोनो नोदात्तवादि- विरुदधर्मसंसर्गकृतोऽपि स्फोटभेद इन्याह- अथर्वणामगिरसां साम्नामृग्यजुपस्य च । यस्मिन्नुसारका वर्षा पृथस्थितिपरिग्रहाः ॥ २१ ॥ यस्मिन् स्फोटाख्ये शब्दब्रह्मणि अथर्वणामगिरसां साम्नाम्-ऋग्यजुपस्य च ऋग्यजु सामाधणाम, उच्चायचाः उदाजानुशतादयो वर्णाः-वर्णधर्माः वर्णधर्म. रवेन भासमानाः पृथस्थितिपरिग्रहाः पृथक् स्फोटभिन्ने तदभिप्याके ध्वनी वायुसंयोगे वा स्थितेः परिग्रहः स्वीकारो येषां ते स्फोटामिनकवनिनिष्टा ताश.

वाक्यपदीयम् धन्यभिध्यक्षकवायुसंयोगनिष्टा वा भासन्ते इति पूर्वान्वयि । तथा च न कल्पित विरुधर्माध्यासात् स्फोटनानास्वमिति भावः। ऋग्यजुपस्येति 'अचतुरविचतुर""""" स्यादिनाच ॥ २१ ॥ और जिस स्फोट शब्दब्रह्ममें ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद के जो उदार, अनुदात्त और स्वरित आदि वर्गों के धर्म है या धर्मकी तरह प्रतीत होते हैं वे भी सोटके धर्म नहीं है । किन्तु स्फोटकी व्यजक ध्वनिमें अथवा वायु मंयोग ( अभिघात ) में रहते है । अन जैसे अन्यगन कत्वादिधोका स्फोटमें अवमास होता है वैसे उदात्त आदि विन्द धर्मके सम्बध होनेसे भी स्फोटका एकत्व बना रहेगा ।। २१ ॥ यदेकं प्रक्रियाभेदैहुधा प्रविभज्यते । तयाकरणमागम्य परं ब्रह्माधिगम्यते ॥ २२ ॥ यदेकं ब्रह्म प्रक्रियाभदायामाख्यवेदान्तादिदर्शनैः कालापादिव्याकरणभेदै - पहुधा भिन्न भिन्न प्रकारेण कर्तृरवोदासीनत्यविवर्तीपादानवादिना वर्णपदवाक्या- दिभेदेन वा प्रचिभन्यते निरूप्यते तत्परं ब्रह्म श्रान्तरमणवरूपं व्याकरणमा गम्य प्राप्य मध्यमादिवाग्ज्ञानद्वारा अधिगम्यते प्राप्यत इत्यर्थः ॥ २२ ॥ यही स्फोट रूप एक ब्रह्म जिसे न्याय, साख्य और वेदान्त आदि दर्शनों के विद्वानगम का उदासीन और विवर्तका उपादान आदि अनेक रूपसे कहते हैं तथा जिसे कालाप, ऐन्द्र और नान्द्र आदि व्याकरणों के आचार्य, वर्ण, पद और बाक्य आदि अनेक रूपसे कहने है य विभाग बनाने हैं। वह ही आन्नर प्रणवरूपी पर-ब्रह्म मध्यमा, वैखरी आदि वाणी के द्वार व्याकरगसे जना जाता है। अवायं निष्कर्षः-जग'कारणस्य-'सदेव सोम्येदमा आसीदेकमेवाद्वितीयम् 'ब्रह्मैवेदं सर्वम्' 'मास्मैवेदं सर्वम्' इत्यादिश्रुतिभिः सत्यत्वमेकत्वं ब्रह्मस्वमात्मस्वं यथा प्रतिपाद्यते तथा 'वागेवार्थ पश्यति वागेवार्थ ब्रवीति वागेवार्थ निहितं सन्तनो ति । वाच्येव विश्व बहुरूपं निवद्धं तदेतदेकं प्रविभज्योपभुक्ते' लोमित्येतदक्षरमि सर्वम् 'ओमिति ब्रह्म' 'नोमिनीदं पर्वम्' 'वाचो ह वाक्' इत्यादिश्रुतिभि. शब्दरूप तापि प्रतिपाद्यते इति शब्दब्रह्मैव जगत्कारणम् । तच 'तमेव भान्तमनुभाति सधं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति' इति श्रुत्य स्वप्रकाशमपि । अत एवं 'इह ब्रीणि ज्योतीपि जय प्रकाशाः स्वरूपपररूपयोरवयो तकाः तद्यथा-योऽयं जातवेदा यश्च पुरुषेस्वान्तरः प्रकाशः यश्च प्रकामा प्रकाशयो प्रकाशयिता शब्दाख्यः प्रकाशः तत्रैतरसर्वमुपनिवद्धं यावरस्यास्नु चरिष्णु च' इति हेलाराजीयस्थाभियुकोक्तिः। तथा च वक्ष्यति 'ग्राह्यत्वं ग्राहकत्वं च द्वे शती तेजसं यथा । तथैव सर्वशब्दानामेने पृथगवस्यिते' इति । जमे सदेव मोम्येदमय आमीदेवमेवादिनीयम् , ब्रझैवेद सर्वम् , आत्मैवेद सर्वम् । श्रुनियोंके आधार पर जगनके कर्ताको मन्य, एक, ब्रम और आत्मारूप मानते हैं। से ब्रह्मकाण्डम् ] संस्कृत-हिन्दी-च्याख्योपेतम् 'वागेवार्थ पश्यति, बागेवार्थ नवोनि, वागेवार्थ विहिन मन्ननोनि, वाच्यमेव विश्व बहुरूप निव दम्, ओमित्येतदक्षरमिद सर्वम्, भोमिति मना, प्रोमिनीद मम्, वाचोद वाक इन श्रुनियोंसे शब्द मी जगत् कारण कहा गया है। इन दोनों ध्रुनियों को एक वाक्यता तमो बनती है जब शब्द और ना एक ही माना जाय । अतः शन ही ब्रह्म और जगत्का कारण है। वह शब्द ब्रह्म 'तमेव भान्तमनुभानि सर्व तस्य भामा सर्वमिद विमानि' श्रुतिके अनुसार स्वप्रकाश भी है। इलाराजने एक मान्य विद्वान् के वचन का उस किया है कि 'यहाँ नीन ज्योनियाँ और नीन प्रकाश है जो अपने और अन्यके रूपके प्रकाशक हैं। जैसे- यह जानवेदा ( अमि), दूसरा पुपों के अन्तर स्थित प्रकाश, नीमरा वह जो प्रकाश और अप्रकाशको प्रकाशित करना है शब्दरूप प्रकाश है उमीमें स्थावर और जगम ममान समार अनुस्यूत है। इसलिए आगे करेंगे कि जैसे प्रापत्य और ग्राहकाय दो शक्तियों नेजमें होती है वमे ही समानशब्दों में ये शक्तियाँ अलग अलग स्थिर है। एतदेव घ वाम्यक्षकस्येन 'यद्वाचानभ्युदितं येन वागभ्युद्यते । तदेव ब्रह्मरवं विद्धि नेदं यदिदमुपासते' इति केनोपनिषदा ब्रह्मपदेन 'शृणोति य इमं स्फोटं सुप्ते श्रोत्रे च शून्यम् । येन वाग् व्यज्यते यस्य व्यक्तिराकाश मारमन.' इति भागवतेन परमारमपदेन 'ईश्वरः सर्वभूतानां हृदेशेऽर्जुन निष्ठति' इति गीतया ईश्वरपदेन च प्रतिपादितम् । यत् चैतन्यमानसत्ताकं भक्रमं शब्दतत्वं वाचा सझमया वर्णपदवा. क्यरूपया नाभ्युयते । येन च भक्रमेण शब्दतावेन सकमा वागभ्युद्यते तया इदं यदनारमभूतमुपाधिभेदविशिष्टमीश्वराग्रुपामते तन्त्र ब्रह्मेति विद्रोति श्रुतेरधः । यः स्फोट रफोटाभिव्यञ्जकं धनि शृणोति, सुपुप्तौ इन्द्रियगणे विलीनेऽपि शून्यम्-अशान पश्यतीति शून्याग सुप्तोस्थितस्य 'न किंचिददिपम्' इति स्मरणं सदानीमज्ञामानु- भवं माधयति येन अफ्रमेण प्रणवेन वाग्व्यज्यते यस्य च भागमन सकाशात् हृदया. काशे प्रत्यक्ष म परमात्मेतिमागवतस्यार्थः । वाचो नित्यावं च 'नहि वक्तुर्वक्तदि- परिलोपो दृश्यते' इतिश्रुत्या प्रतिपाद्यते । वाध्येव च सुषुप्ती भारमनो ल्यः 'सता सोग्य तदा सम्पठो भवति स्वमपीतो भवति' इति श्रुत्या प्रतिपाद्यने 'सा वाम् चैतम्यस्यापि प्रकाशिका वागेवेति- 'वापता निष्कामेदवयोधस्य शाश्वती । न प्रकाशः प्रकाशेत सा हि प्रत्यवमर्शिनी' इनि वक्ष्यमाणतर्यात् ।। यही शब्दमा केनोपनिषद् में ब्रह्मा शम्से, भागवत में परमात्मा सन्दसे गीनामें पर शम्दसे कहा जाता है । जैमे-यद्वाचानभ्युदिन येन वागम्युचने । नदेव अन्न व विद्धि नैद यदिद. मुपामते. (केनोपनिषद् ) जो चैतन्यमात्रमत्ताबाग अक्रम शम्म तत्व है वद वर्ग, पद और वास्यरूप सकमा राणीका विषय नहीं है। निम असा शब्द नवसे सत्रमा वागी उच्चरित होनी है वह ब्रह्म है । जिस भनात्मभून उपारिभेद विशिष्ट ईश्वको तुम उगमना करते हो वह मान नहीं है। 'भूगोनिग इमं सो मते प्रोत्रे च शून्यदृक् । येन वाग व्यज्यने यस्य व्यक्तिराफाश मात्मनः। (भागवत ) जो सोरको व्यक्त करने वागेचनिशे मनता है, वह स्पुतिने जब सर इन्द्रिया गिन रहती है अशानको देखता है, क्योंकि जब कोई मोरर उटना है तब कहना है कि 'ऐमी नाद नगी फिर भी पता न चग'। यही स्मरण अशान के अनुभवको 1 ३२ वाक्यपदीयम् सिद्ध करता है। जिस अक्रम प्रणव से दानीको व्यक्ति होती और जिसका हृदयाकाशमें प्रत्यक्ष होता है वह परमात्मा है। 'ईश्वरः सर्वभूनाना हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठनि' (गोना) समस प्राणियों के हृदयदेशमें जिमका पत्यक्ष होता है वह ईश्वर है। तच्चैकमपि भक्रम शब्दतत्वाख्य आरोपितभेदकालशक्तिसहकृनया नानाविधका- यंजननशक्तिमत्या मायया' 'बहु स्यां प्रजायेय' इति सङ्करप्य सक्रम विचित्रं जगदरचयति । संकल्पश्च मायाया वृत्तिविशेषः । सा च मायाख्या शक्तिनं ब्रह्मणो भिन्ना तस्याः कारणान्तरस्वापत्या जगत एक्कारणकत्वबोधिकानां 'सदेव मोम्येदमन आसीदेकमेवाद्वितीयम्' इत्यादीनां श्रुतीनां व्याको पापत्तेः, नाप्यभिन्ना तस्याः स्वध. मिणोऽभिन्नरवे तद्वत् स्वधर्मभूनानामपि शकीनां स्वाभिन्नस्वापरया जगद्वैचियोप- पादकरमानुपपत्तेरतस्तत्वान्यत्वाभ्यामनिर्वाच्या सा इति 'ममादिनिधनम्' 'एकमेव यदाम्नातम्' 'अध्याहितकलाम्' इति कारिकाभिः स्पष्ट कृतम् । वह एक अक्रम शब्दब्रह्म अपनी आरोपित भेद वाली काल शक्तिकी सहायता तथा अनेक कार्यको उत्पन्न करने वाली माथाके 'मैं एकसे अनेक बन सकपके द्वारा सक्रम विचित्र जगत की रचना करता है। सकल्प मायाकी एक वृत्ति है। माया ब्रह्ममे भिन्न नहीं अन्यथा कारणान्तरकी कल्पना एक कारणकत्व सिद्धान्तका विरोध होगा। ब्रह्मसे अभिन्न भी नहीं अन्यथा धाँके अभेदसे धर्मभूतशक्तियों के अभिन्न होने पर विचित्र जगन् नहीं उत्पन्न हो सकेगा। अत: वह माया अनिर्वचनीय है। शब्दतत्याख्यं ब्रह्म प्रथम स्वलिङ्गं विमानमोकारं ततोऽक्षरसमाग्नायं ततश्चतुरो वेदान् विरचय्य सर्व जगद्व्यरचदिति । 'विधानुस्तस्येति' श्लोकोदाढतभागवतेन- 'अनादिनिधना' नित्या वागुत्सृष्टा स्वयंभुवा । भादौ वेदमयी दिव्या यतः सर्वाः प्रवृत्तयः ।। नामपंच भूतानां वर्मणां च प्रवर्तनम् । वेदशब्देभ्य एवादी निर्ममे स महेश्वरः ।। इत्यादिस्मृतिभिश्चावगम्यते । तदेव च 'तत्वमसि श्वेतकतो' 'अनेन जीवनात्मनानुप्रविश्य' 'अयमात्मा ब्रह्म' इत्यादिश्रुतिभिः अविद्यावशाभोक्तृनापन्न ज्ञेयरूपशून्यं चैतन्यमानं जीव इत्यभि. धीयते । स च मनोवृत्यात्मकस्वसंकल्पनेश्वरसृष्टं योषिदादिकं वस्तु भोग्यतया रचयति इति 'एकस्य सर्वबीजस्थ' कारिकया स्पष्टीकृनम् । 'इत्याहुस्ने परं ब्रह्म यदनादि तथाक्षयम् । तदक्षरं शब्दरूपं सा पश्यन्ती पर। हिवाक स एवामा सर्वदेवव्यापकत्वेन वर्तते । अन्तः पश्यदवस्थैव चिद्रूपत्वमरूपकम् ॥ इति कारिकाभ्यां शिवदृष्टौ वैयाकरणमतत्वेनानूदितञ्च । १. अय चार्थ 'कर्माण्यपेक्ष्य शम्भुमाया विक्षोभ्य शक्तिभिः स्वाभिः । प्रतिपुरषं भोगार्य वषि करणानि चायचे ॥ नानाविवशक्तिमयी सा जनयति कालतत्वमेवादी । भाविमवद्भूतमयं कलयति जगदेष कालोनः' इति शैवैरप्याश्रितः । २. अनादिनिधना पूर्वापरीभावरहिता अक्रमापति पावन अतो न नित्या इश्यस्यानर्थक्यम् ।

बमकाण्डम् ] संस्कृत-हिन्दी व्याख्योपेतम् ३३ तय ईश्वरोपाधिभूतमायाया एक्स्वात्तनिशिया ईश्वरपृष्टं वस्तु एकविधमेव । यथा माममयी योपित् । जीवानां च नानान्वेन तदीयमनमां नानास्वानचढत्या ईश्वरसृष्टमेस्मेय योपिपं वस्तु जीर्नोग्यता भार्या, स्नुपा, ननान्दा, माना इनि नानाकारेण सृज्यते। शब्दतावास्यं ब्रह्मच सूक्ष्मप्रणवरूपं पायह्मपदेन विमानमोकारं च अपरमह्मपदेन शब्दब्रह्मपदेन च व्यपदिशान्ति पुराविदः। तथा च श्रुतिः 'एतद्वै सत्य काम परं चापर च ब्रह्म यदोङ्कारः । तस्माद्विद्वानेतेनैवायननेनैकनारमन्बेनि' [ प्रश्नोप० ५ प्र० ३ म० ] इति । एतेनायतनेन परब्रह्ममाप्तिमाधनेन भोङ्कारेण एकतरं परब्रह्म अनुगच्छति मेदिष्ठं हालम्बनं परब्रह्मणो यदोहार इति तनावः । अत एव च 'देब्रह्मणी वेदितव्ये शब्रह्म परं च तत् । शब्दब्रह्मणि निष्णातः परं ब्रह्माधिगच्छति' इति स्मृतिः । वैयाकरणैस्तु पर ब्रह्मैव वादग्रह्मपदेनोच्यते । मोक्षारस्य परब्रह्मप्राप्तिसाधनस्वाश 'ओमित्येतदक्षरमिदं सर्व तस्योपव्याख्यानम्' 'भोमिति ब्रह्म ओमितीदं सर्वम् ओमित्येतदनुकृति ह स्म वा 'एनदाटग्यनं श्रेष्टमेत- दालम्पनं परं एसवालम्बनं ज्ञात्वा ब्रह्मलोके महीयते' इति श्रुतिभिर्वाध्यते । तस्य पाब्रह्मरूपस्योहारस्य श्रोमित्युपध्यारयानं तरसन्निहितं यादयानं साहातरोधकरवात् । ओमिति शब्दरूप ब्रह्म तस्य ब्रह्मणोऽनुकृतिरनुकरणम् , ह स्म वाइति प्रसिद्धी प्रसि झोकारयानुकृतिरवम् , करोमि यास्यामीति पृष्टे भोमित्यनुक्रोत्यन्यः । अम्मादेवो. शास्त्रयी विद्या प्रभवति 'तेनेयं त्रयी विद्या विनर्तते' इतिश्रुते । सत एव याश्च समासम्' [३३] इति सूत्रेण ओद्वारस्य सर्ववेदव्याविरदमुक्तं वादरायणेन । भयमेव सोहारः 'प्रारयुपायोऽनुकारव' इति कारिकया वेदशब्देनोक्तः । सम्माप्राप्युपायत्वं च व्याकरणस्य शब्दसंस्कारद्वारा-'तस्माद्यः शब्दसंरकारः साहिदि परमात्मनः । तस्य प्रवृत्तिनत्वज्ञो ब्रह्मामृतमश्नुते' इति वच्यमाणका. रिक्यावगम्यते । शरदसंस्कारस्य च सिद्विग्वं मिट्युपायावात । व्यवस्थितयाधुभा- येन रूपेण तब्दे मंदियमाणेऽपभ्रंशोपघातापगमा धर्मविशेषाविर्भावे सति साधु- शान्दप्रयोगज्ञानपूर्वकं तस्य शब्दब्रह्मण, प्रवृत्तितत्वं व्यवहारनिमित्तं रूपं समस्त- दाधारणभूनं पश्यस्यास्यं यो जानानि स तद्वारा भविवृत्तं ब्रह्म प्रामोतीत्यर्थः । मी शम्दनाव रूपी ब्राने प्रथमतः विन ओंकार, उमसे अधर सामानाय, उममे चार वेद और चारों से जगत् की रचना की। यही भविचाके वशीभूत होकर मोचा बन कर देय रूपनामे पदय चैतन्य मात्र जीव कहा जाता है और मनकी वृत्ति रूप सापके द्वारा ईश्वरसे मुष्ट या चादन योविद आदि वस्तुओं को मोग्य वस्तु के रूपमें रचना है। माम प्रगव का दाम्म तत्वारय बद्रको परा और त्रिमात्र आँशरको अपर ब्रह्म या शब्द बन्न नामले वृद्ध विद्वानों ने पड़ा । दो प्रम जानना चाहिए पद बन्ना और परमा सन्द मावान हो जाने पर पादाकी प्राप्ति होनी' स्मृतिका कथन है। वैयाकरण ४वा वाक्यपदीयम् लोग परब्रह्मको ही शन्दब्रह्म शब्दसे कहने है । इसी शब्दब्रह्मकी प्राप्तिका उपाय शब्द मरकारचे द्वारा व्याकरण कहा जाता है ।।२।। इत्थं व्याकरणस्य प्रयोजनमुक्त्वा इदानी शब्दानामनिस्यत्वे व्याकरणेन शब्दा- नुशासनस्य कर्तुमशक्यस्वममिनवानां शब्दानामुत्पादनस्य सम्भवेनाध्यवस्थितत्वापा- तादतः शाव्यवस्थासिद्धयर्थ शब्दार्थसम्बन्धानां नित्यता प्रमाणयन् शास्त्रेणास्य ग्रन्थस्य सम्बन्धार्थमुपोद्भातमारचयति- वह शब्द-ब्रह्म, दा-दका अर्थ और शब्द अर्थका सम्बन्धमी नित्य है। क्योंकि- नित्याः शब्दार्थसम्बन्धास्तत्राम्नाता महर्षिभिः। मूत्राणामनुतन्त्राणां भाष्याणाञ्च प्रणेतृभिः ॥ २३ ॥ सूत्राणां तन्नं शास्त्रमनुगतानि अनुतन्त्राणि वार्तिकानि तेपाम् अनुत- त्राणां भाष्याणां च प्रणेतृभिः व्याकरणस्य प्रकृतत्वावरागिनिकारयायनप- तालिभिः महर्षिभिः प्रत्यक्षधर्मभिः तत्र व्याकरणे शब्दश्चार्थश्व सम्बन्धश्च ते शब्दार्थसम्बन्धाः नित्याः समानाताः अभ्यस्ता बहुत्र कथिता इति यावत् ॥ सूत्रकार (पाणिनि ) अनुतन्त्रकार ( वार्तिककार कात्यायन ) और भाष्यकार (पतअलि) आदि महर्षियोंने शब्द, अर्थ और उनके सम्बन्धको नित्य माना है। अतीन्द्रियार्थदर्शिभियः सूत्रवार्तिकभाष्याणि प्रणीतानि तैरव शब्दार्थसम्बन्धान नित्यवमानातमिति तरनमाण्यात् शब्दार्थसम्बन्धानां नित्यावे न विप्रतिपत्तव्यं तद. चनविरोधे तदनित्यत्वसाधकानुमानानां शब्दोऽनित्यः कृतकृरवादित्यादीनामागमविरोधे 'नरकपालं शुचि प्राण्यगरवादि'त्यनुमानस्येव बाधितत्वेनोदेतुमशक्यत्वात् । एवं च व्यवस्थितसाधुभावेषु नित्येषु शब्देषु 'एकः शब्दः सम्यग्ज्ञातः शास्त्रान्वितः सुप्रयुक्त स्वर्ग लोके च कामधुरभवति' इतिश्रुत्या साधुत्वज्ञानपूर्वकशब्दप्रयोगे धर्मोत्पत्तिबोधनात् साधुस्वज्ञानाय शास्त्रप्रणयनमावश्यकमिति व्यवस्थितसधुत्वेषु शन्देषु व्याकरणाख्यं स्मृतिशास्त्रं प्रवृत्तमिति भावः ॥ १ इदमत्र बोध्यम् यद्यपि 'ब्राह्मणेन निष्कारण' इनि श्रुत्या सन्ध्योपासनादाविव उत्तमाधिकारिणः व्याकरणाध्ययने स्वन एवं प्रवृत्ता मविष्यन्तीत्यभिधाय व्याकरणप्रयोजन नोक्त सूत्रकृता, वातिककृता च 'शास्त्रपूर्वके प्रयोगे धर्म' इत्यनेन मध्यमाधिकारिणः प्रवृत्तये प्रयोजनमुक्तम् । तथापि मन्दाधिकारिणां प्रवृत्ते. प्ररोचकप्रयोजनप्रतिपत्यधीनत्वात् अतीन्द्रियेषु स्वर्गापूर्वादिष्वनाश्वासात् साक्षाच्छन्दव्युत्पत्तिलक्षणं प्रयोजनम् 'अथ शब्दानुशासनम्' इत्यनेन परम्पराप्रयोजनं वेदरक्षादिकं च भाष्यकृता उत्तः नत्र-'आसन्न ब्रह्मग' इत्यारम्य 'परं ब्रह्माधि. गम्यते' इत्यन्तेन 'अथ शम्दानुशासनम्' इत्यारभ्य 'किं पुननित्य. शब्दः आहोन्वित् कार्य:' दत्यतः प्राक्तन उपोद्धातरूपो महाभाष्यग्रन्थस्नात्पर्यतो विवृतः।साप्रनं सिद्ध शब्दर्थसम्बन्धे इनि प्रथमं वार्तिकं व्याख्यातुमाह-नित्याः शब्दार्थसम्बन्धा इति । २. सानुतन्त्राणामिनि पाठे सानुतन्त्रसूत्रभाष्यप्रणेतृभि. चात् सूत्रवार्तिकपणेभिरित्यर्थः । महाभाध्यं हि न सूत्रागामेव व्याख्यानं किन्तु वार्निशानामपति भावः ।

प्राकाण्डम् ] संस्कृत-हिन्दी व्याख्योपेतम् यद्यपि नैय्यायिकॉने 'शब्दोऽनित्यः कनक त्वात्' इम अनुमानसे शब्दको अनित्य कहा है नगापि यह अनुमान आगमविरोधी होने के कारण नरशिरः कपाल झुचि प्राण्यद्गलान्' को भाँति बाधिन है। क्योंकि-अनोन्द्रियार्थदशी महषियोंने ना 'एकः शब्द-आदि श्रुनिन शब्दको नित्य माना है। तत्र सूत्रकृता पृषोदरादीनि यथोपदिष्टम्' इति सूत्रेण यथोपदिष्टस्य पृथोदरादि- स्वारसाधुरयाभ्यनुज्ञानात् , 'तदशिष्यं संज्ञाप्रमाणस्वात्' इति सूत्रेण भापो दारा इत्यादिषु लोकावगमाहिङ्गवचननियम इव पयाला इत्यादौ संज्ञानं संज्ञा-अवगमस्त. प्रमाणत्वात् लिङ्गवचननियमो भविष्यतीति तत् 'लुपि युक्तिवव्यक्तिवचने' इति सूत्र मशिष्यमित्येवं युक्तवद्वचनप्रत्याख्यानात्, 'लुब्योगाप्रख्यानात् 'योगप्रमाणे च तदभा. वेऽदर्शनं स्यात्' इति सूत्राभ्यां पञ्चाला इत्यत्र पञ्चालानां निवासो जनपद इत्येवंभूतस्य योगस्यावयवार्थस्य प्ररूपानमवगमो नास्ति यदि स्यात्तर्हि सम्प्रति विनापि क्षत्रिययोग देशविशेष पालशम्म्यवहारदर्शनं यद्भवति तन स्यावतो योगानवगमात्तरितो नोपयते ततश्च 'जनपदे लुप्' इति सूत्रमपि न शिष्यमित्येव लुपप्रत्याख्यानाच्च व्याक- रणारप्रागपि ग्यवस्थितसाधुभावाः शब्दाः सन्नीति सूचितम् । सा च व्यवस्था शब्दानां निरयस्वे एवोपपद्यते नानिरयस्वे तथासति स्वयंकल्पितरवाच्दानां शारकीटा. दिवदम्युदयार्थरवाभावेन व्यवहारमानार्थस्यापत्ती व्यवहारस्य च तैस्तैः पुरुपैः स्वस्व. बुद्ध्यमुसारेणाभिनवान् तद्विपरीतान् शब्दानुस्पाय निर्वोढुं शक्यत्वेन लोकावगमस्या- यवस्थितवापत्तौ तदनुरोधेन सूबहदुक्कायाः साधुत्वव्यवस्थाया असामञ्जस्यापातान् । बार्तिकरता 'सिझे शब्दार्थसम्बन्धे 'सिदं तु नित्यशब्दत्वात्' इति वार्तिकाभ्यां, भाष्यकृता च 'संग्रहे एतरप्राधान्येन परीक्षित निस्य शब्दः 'निरयेषु, शब्देषु कूटस्थैर. विचालिभिर्वजैर्भवितन्यम्' 'सर्वे सर्वपदादेशा दासीपुत्रस्य पाणिनेः । एकदेशविकारे हि नित्यावं मोपपद्यते' 'एक इन्द्रशब्दः क्रतुशते प्रादुर्भूतो युगपरसर्वयारोवहं भवति' इत्यादिभाष्यैः कण्ठत एवं शम्दाना नित्यत्वमुक्तम् । किं च शास्त्रारम्भादपि शब्दाना नित्यत्वमभिमतं पाणिन्यादीनाम्, अन्यथा ये शब्दाः पूर्व साधव भासन् त एवापरका- लिकैरसाधकृताः अभिनवाश्च साधूकृता इति माधुस्वमव्यवस्थं स्यादिति साधुवयो। धकं व्याकरणममध्यवस्थमनर्थक च स्यात् अतीन्द्रियार्थादर्शिकल्पितशम्दानामर्थबो. धनमात्रार्थत्वेनाभ्युदयार्थवायोगादिति किमिनि व्याकरण प्रगयेयुः । तथा च वच्या ति-नानार्थिकामिमां कविद्यवस्था कर्तुमर्हति' इति । सूत्रकारने-पृषोदरादीनि यथोपदिष्टम्' इम सूत्र की रचना करके यह सिद्ध कर दिया कि शम्दों को साधुता, लिङ्ग और वचनों के सम्बन्धमें जैमा रोक व्यवहार हो वैसा ही साधुत्व, लिङ्ग और वचन मानना चाहिए और व्याकरण शामको रचना करने की प्रवृत्तिमे यह मी मिद हो जाता है कि शन्द स्वभावतः साधु होने वार्तिककारने-सिद्ध शम्दार्थ सम्बन्थे; नितु नित्यशन्दत्वात् , इन वानिकों के द्वारा मम, अर्थ और उनके ममन्धको कण्ठनः नित्य स्वीकार किया है।

वाक्यपदीयम् भाष्यकारने भी-'संग्रहे एतत्प्राधान्येन परीक्षिनम् , नित्यः शब्दः' 'सर्वे सर्वपदादेशा दाक्षीपुत्रस्य पाणिनेः, एकदेश विकारे हि नित्यत्वं नोपपद्यते । इत्यादि वचनोंके द्वारा शब्दोंको नित्यता कण्ठनः स्वीकार की है। ननु नाभियुक्तवचनमात्रेणाप्रामाणिकं शब्दनित्यत्वं शक्यमभ्युपगन्तुम् । यदाहु 'न ह्याप्तवादान्नमसो निपतन्ति महासुराः। युक्तिमद्वचनं ग्राह्यं मयान्यैश्च भवद्विधैः इति चेदुच्यते-दिनान्तरेऽनुभूत गकारे पदं वाधुनाऽनुभूयमानस्य सोऽयमिति प्रत्यभिज्ञया तावत्कालं स्थिरस्वसिद्ध्या 'तावरकालं स्थिरं चैनं कः पश्चान्नाशयिष्यति' इति न्यायात् शब्दानां नित्यत्वं म्यक्षकाभावात्तु सर्वदोपलग्भाभावः । अत एव अना दिवृद्धपरम्पराव्युत्पत्तिपूर्वकस्य शब्दव्यवहारस्योपपत्तिः । अन्यथा अभिनवेषु शन्देषु शक्तिमहासम्भवात् सा न स्यात् । या च उत्पन्नः ककारः विनष्टः ककार इति प्रतीतिः सा' पिटरपाकवादिमते रूपनिष्टोत्पत्तिविनाशयोघंटे आरोपेणे श्यामो नष्ट रक्त उत्पन्न इति प्रतीतिवद् व्याकध्वनिनिष्टोत्पत्तिविनाशयोवगैप्वारोपेणोपपाद्या । शब्दा. मां नित्यस्वादेव शब्दमुच्चारयतीत्येव प्रत्ययो न तूरपादयतानि वदतां मते वर्णानां विभुषेन निस्यत्वेन च तदवयवकपदानां नित्यत्वं निरपवादम् । 'किमी वैयाकरणने शब्दको नित्य कह दिया इससे शब्द नित्य नहीं माना जा सकता। अतः बिना किमी युक्तिके शब्दपी नित्यता स्वीकार करना ठीक नहीं' यह कहना अनुचित है क्योंकि-दूसरे दिन सुने गए गकारका तत्काल थुन गकारमें 'यह वही गकार है। इस प्रत्यमिशात्मक शानके कारण शब्दकी स्थिरता उतने दिन तक मान लेनेपर फिर नारा मानना उचित नहीं। अतः शब्द नित्य है। केवल व्यअकके न रहनेसे सर्वदा मनाई नहीं पडते । 'उत्पन्न ककार और विनष्ट ककार' यह प्रतीति नो जैसे पिठरपाक्-वादियों के मतमें रूपकी उत्पत्ति और विनाशको घटमे आरोप करनेसे 'शामघट नष्ट गया, रक्तघट उत्पन्न हुआ' इस तरह प्रतीति होती है वैसे व्यजक वनिकी उत्पत्ति और विनाशको वर्णो में आरोप करनेसे 'ककार उत्पन्न हुआ नष्ट हुआ आदि प्रतीनियाँ होती है। इसीलिए शब्दमुच्चारयति' यह प्रनीति होनी है 'शदमुत्पादयति' यह प्रतीति नहीं होती। इस प्रकार जब पदका अवयव वर्ण विभु और नित्य है व पदवी नित्यनामें कोई बाधक ही नहीं हो सकता । ये च वर्णा अनिस्याः पदानि वाक्यानि चानित्यानीतिकार्यशब्दिकास्तम्मा तेऽपि-अनादौ संसारे अनादिवृद्धव्यवहारपारम्पर्याविच्छेदेन शब्दव्यवहारस्य व्यव- स्थितस्यायवहारनित्यतया शब्दानां नित्यत्वम् । तथा चाहुायचार्तिककाराः "नित्या वर्णा, नित्या वेदा इति च सम्प्रदायाविच्छेदात् नित्या पृथिवी नित्याः पर्वता इतिवत्' इति । यद्वा 'जात्याख्यायामेकस्मिन्बहुवचनमन्यतरस्याम्' 'माकृत्युपदेशा- सिदाम, इति स्वातिकादिभिवृतिमानिसहर, म्याकरणशासतितिपय १ पिठरणकवादिनोबस्थिन एव घटःनिमयोगेन तस्य नाशमुत्पत्तिं च मन्यन्ने इनि नमते घटस्य नाशाभावात् श्यामो नष्ट इति प्रनीनिर्न घटनाशविषया किन्तु रूपनाशविषया । पौलुपाकवादिनश्च अग्निसंयोगेन घटनाश परमाणौ रूपस्योत्पत्तिः नतः घटान्तरमुत्पद्यते इनि मन्याने नन्मने दयामो नष्टः रक्त उत्पनो नियतीनिः मम्यगवेनि नागेपस्योपयोगः ।

भद्मकाण्डम्] सस्कृत हिन्दी व्याख्योपेतम् गम्यते तथाचात्रापि शब्दपदेन शब्दाकृतिरभिधीयते तनश्च यथा घटशब्दस्यकघठव्यक्ती शक्तिस्वीकारे घटव्यक्तयन्तरबोधेन शक्तिग्रहयोधयोः कार्यकारणभावे व्यभिचारः, सर्वासु घटम्पत्ति शक्तिस्वीकारे शस्यानन्त्यमिति घर वनातौ शक्तिः स्त्रीक्रियते एवमेकस्य घटशब्दस्य शनत्वे घटपदान्तराद्वोधेन व्यभिचारः, सर्वस्य शतरवे च शक्मयानन्य. मिति घटशब्दत्वज्ञातिः शक्त्याश्रयत्वेन स्वीक्रियते । सा च निस्या तदाश्रयत्वाच्च शब्दे निस्यतोपचारः । तथा चाहुः 'आकृतिनित्यस्वान्निस्यः शब्द' इति । आकृतिपदेन धात्र जाति चयवानां सनिवेशविशेष कार्यशब्दिकमते शब्दस्य गुणत्वेन निरवयव. वात । गनु घट शब्दवरूपजातेनिकरवे तस्याः सर्वदा सवारसर्वदार्थयोधापत्तिरिति चेत तत्तदोचारणेन अभिव्यक्ता सती सार्थबोधिका न स्वरूपसतीत्यङ्गीकारेणादो पात् । तदुक्तम्-'अनेकव्यवस्यभिव्यगया जातिः स्फोट इति स्मृना' इति सोऽयं जातिस्फोटवाद इत्युच्यते। जिन लोगों ने वर्ग, पद और वाक्योंको अनित्य माना है वे भी अनादि संसार में अनादि वृद्धव्यवहार परम्पराके (लगातार ) बने रहने के कारण शब्दों की नित्यता स्वीकार की है। न्यायवार्तिककार ने कहा है कि वर्ण नित्य है, वेद नित्य है। यह व्यवहार सी परम्पराका लगा रहना बनाना है जैसे 'पृथ्वी नित्य है, पर्वत नित्य है।। अथवा 'जात्याख्यायामकस्मिन् बहुवचन मन्यतरस्याम् , आकुन्युपदेशात् सिद्धम्' इन सूत्र और वाति के आधारपर यह कहा जा सकता है कि 'शब्द नित्य है। इस घाफ्यमें शब्दपदसे शब्दाकृति विवक्षित है और व्याकरणशास्त्र इसी पक्षको ध्यानमें रखकर प्रवृत्त हुआ है। जैसे घर व्यक्तिमें शक्ति स्वीकार करने पर घर न्यनत्यानरबोध होनेसे कार्यकारण- भाव में व्यभिचारय मयसे तथा समस्त घरव्यक्तियों में शक्ति स्वीकार करने पर अनन्तशक्ति मानने के भय से पवनानि शक्ति स्वीकारते है वैसे ही एक घट शादमें शक्ति माननेवर पशब्दानामघोर होनेमे यभिचार नथा मवमें शक्ति माननेसे शस्त्यानन्य होनेके भयसे घटशदव जाति में शक्ति मानते है। यह जाति नित्य होकर शब्दमें रहती है अतः शब्दको भी नित्य' कहा जाता है। परशब्दत्व-जानिके वाचक होनेपर भी सर्वदा अर्थबोध नहीं होता क्योंकि जानि अभिनत होकर ही बोध कराने है स्वरूपमा होकर नही। अनः उन उन वर्गों के उच्चारमे अभि यक्त जाति ही अर्थबोध करा सस्तो है । इमे हो जातिस्फोटबाद कहने है। गनु घटशदाय जातो किमानम्-इनि दुपते भिन्नेषु घटेपु अयं घट , अर्य घट दत्यनुगतपतीया या घटवं जातिः स्वीकियते तथा शुक्रवारिकामनुप्यादिप्रयुनेपु अनुभूयमानबैल एण्यषु भिरेषु घटशब्देषु अयं घदशब्दा, भय घटशब्दः इत्यनुगतप्रती. स्या घटशादरवजानिसिः। ननु घटशन्दे गुणवशब्दयघटशन्दस्वजातीनां साधात् घरशब्दावे एव शनया- श्रय विमिति क्रुप्यते न गुणस्वशन्दस्वयोरिति चेदुध्यते-यथा घटे दम्यावथिवी. वघटस्वादिगतीना सावेऽपि घटावस्यैव घरपदसत्यस्वं तत्रैव घटप,निष्ठशक्सि. ग्बन्धस्वीकारान् एवं घटशब्दे गुणरवशम्दावघदशब्दवनातीनांसावेऽपि घटशब्दस्वायद पटशात सत्रैव शत्याश्रयतास्वीकारादिति । , वाक्यपदीयम् घटशब्दत्व जाति है। जैसे अनेक घटोंमें 'यह घट है, यह घंट' इस प्रकारको प्रतीति के आधारपर धरल जानि मानी जाती है वैसे ही शुकसारिका आदि द्वारा प्रयुक्त विलक्षण शन में भी यह घट शब्द है, यह घटशब्द है'इम प्रतीनिके आधारपर घटश-दत्व जाति भी स्वीकार करना चाहिए। जैसे घरमें द्रव्यत्त, पृथिवीत्व, घटत्व जातियोंके रहनेपर भी घटत्वमें ही घटपदको शक्ति मानी गई है वैसे घटशब्दमें गुणत्व, शब्दत्व और घटशनत्व जानियों के रहनेपर मी घरशन्दन्य ही घटपदका शक्य माना जायगा। ननु स्थिरा घटावयवा घटाख्यमवयविद्रव्यमारभन्ते इति व्यवस्थिनावको घटाख्योऽवयवी स्वसमवेतां घटस्वजातिमभिव्यनक्तीति युक्तम् । इह तु क्रमसन्मवन्द्रिः- क्षणिकरवेनायुगपरकालैवर्णरूपैरवयवैरव्यवस्थितैः व्यवस्थितं शब्दान्तरं नारन्धुं शक्य मिति घटशन्दत्वजातिः क समवेयात् को वा तामभिव्यज्यात्-न च शब्दत्वजातिवद घटशब्दस्वजातिरपि प्रत्येकवर्णपरिसमाप्ता प्रत्येकवर्गाभिव्यङ्गया चेति वाध्यम तथा सति केवलेषु कारादिपूचरितेषु घटशब्दोऽयमिति प्रतीत्यापत्तेः द्वितीयादिवोच्चारण यापत्तेश्चेति चेदत्रोच्यते-यथा पूर्व कर्म ततो विभागः ततः पूर्वसंयोगनाशः तत उत्तरदेशसंयोगः ततः कर्मनाशः ततः कर्मान्तरं कर्मवति द्रव्ये च पूर्वकर्मणि भविनष्टे सति न कर्मान्तरं कर्मणोः सहावस्थायित्वविरोधात् अतः कर्मान्तरसहितैः कर्म- विशेषैः अवयविस्थानीयमवस्थित कर्मान्तरं मारब्धुं शक्यते पत्र भ्रमणत्वादिजातिः समवेयात् यहा भ्रमणत्वज्ञातिमभिव्यज्यात् तथापि कर्मवजात्युपलहितेषु क्रम विशेषयुक्तेषु पूर्वापरीभूतेषु कर्मसु उत्क्षेपणस्वभ्रमणस्वादिजातिरङ्गीकियते । तत्र उरिक्ष पति, भ्रमति इति भिन्न भिन्नमत्ययजननेन भमणजनककर्माणि उत्क्षेपणअनककर्मापेक्षया भिन्नानि प्रत्यवयवं भ्रमणरवाश्रयत्वं प्रतिपद्यमानान्यपि प्रत्येककर्मदर्शनवेलयां उत्क्षे. पणत्वाश्रयकर्मापेक्षया भेदमप्रतिपद्यमामानि इदं कर्म उरक्षेपणत्वाभिव्यञ्जकं भ्रमण- स्वाभिव्यञ्जक चेति निर्धारयितुमशक्यत्वेऽपि यदा देशविशेपे संयोगविभागविशेषानू जनयन्ति अपेक्षाबुद्धया विषयीकृतानि क्रमानुवृत्ति जनयन्ति कर्माणि दृश्यन्ते तदा पूर्वपूर्वकर्मप्रत्यक्षाहितसंस्कारसहितेन परमकर्मप्रत्यक्षेण भ्रमणस्वमुत्क्षेपणत्वं वा जातिरभिव्यज्यते इति स्वीक्रियते वैशेषिकः । एवं यत्नविशेपैरुत्पन्ना धकारादयः घटशब्दरवस्य आश्रयत्वं प्रतिपद्यमाना अपि धनशब्दघटकघकारानेदमप्रतिपद्यमाना घटशब्दत्वजातिमनमिव्यञ्जन्तोऽपि यदा तदुत्तरोत्तरवावलम्भेन अपेक्षाबुद्ध्या विषयीकृताः क्रमानुवृत्तिं जनयन्ति तदा पूर्वपूर्ववर्णप्रत्यक्षाहितसंस्कारसहितेन धरमवर्णप्रत्यक्षेण पूर्वमगृहीताऽव्यक्तं गृहीता वा घटशब्दवरूपा जातिः संस्कृतेऽन्तः करणे गृह्यते हत्यदोपात् । एतदेवोक्तं भट्टपादैः श्लोकवार्तिके 'तत्र' ताल्वाहिसंयोग- १. अत्र न्यायरलाकरः-तास्वादिसयोगविमागक्रमवशेन तत्परितानां बनीन कमो भवति द्वये च तावादयो ध्वनयश्व जात्या नित्या तेन गकारौकारविसर्जनीयानां कममिच्छन् तदभिव्यञ्जकाना धनिजानीयाना तत्तदनुरूपेण क्रमैग पेरणं चिकीर्षन् ताल्वादिजातीयाना स्थानाना सयोगविमागी कमेगारमने इति । ननु स्वाश्रयमेव जातिस्पलक्षयति नाश्वादिसमवेनया ब्रह्मकाण्डम् ] संस्कृत-हिन्दी व्याख्योपेतम् विभागक्रमपूर्वकम् । ध्वनीनामानुपूयं स्याजात्या चोभयनित्यता ॥ यथैव भ्रमणादीनां भागैस्यिा च लक्षितः। मानुवृतिरेवं स्यात्तात्यादिश्वनिवर्णभाग' इति । योग- भाग्येऽपि 'वर्णः पुनरेकैकपदामा सर्वाभिधानशक्तिप्रचितः सहकारिवर्णान्तरप्रति- योगिरवादैश्वरूप्यमिवापनः पूर्वश्वोत्तरेणोत्तरश्च पूर्वेग विशेषोऽवस्थापितः' इत्युक्तम् । ननु भभिव्यञ्जकैराश्रिता एव घटत्वादिजातयो व्यज्यन्ते इति दृष्टं तदिह उत्पन्न. विनष्टरवाच्छन्दव्यक्तीनां स्वाममवेता घटशब्दाकृतिः कथं व्यज्यते इति चेन्न-एक विधैयाभिव्यक्तिप्रमिया सर्वत्राथयिनन्येति नियमाभावात् । यथा प्रदीपालोकेन्द्रियादयः स्वानाधितानामेव घटादीनामभिव्यक्षका एवं वर्णा अपि स्वानाधिताया एव घटशाद- स्वादिजातेरगिन्याका इत्यदोषादिति । पतदुक्तं भवति यथा भ्रमणस्वादिजातिवरमक्रियाप्रत्यत्तव्यगया एवमेपापि घामवर्णप्रत्यक्षव्यगया घोद्धे क्रियासमुदाये भ्रमणस्ववदेपापि तादृशे वर्णसमुदाये ग्यासज्यवृत्तिरिति । अब प्रश्न यह उठता है कि घटके स्थिर अवयव घटरूप अवयवी द्रव्य उत्पन्न करते है और वह घट समवायसम्बन्बसे रहनेवाली घटत्व जातिको व्यक्त करता है। शब्द तो क्रमसे जन्म लेना है क्षणिक है फिर अनेक कालके अव्यवस्थित अवयव.से व्यवस्थित शब्द कैसे बन सकता है। शब्द के न बन मकनेसे उसमें परशददल जाति कैसे समवाय सम्बन्धसे रह सकती है ? ठीक है, जैसे वैशेषिकों के मनमें कर्मवान् द्रव्यमै पूर्वकर्मके विनष्ट हुए बिना कर्मान्तर नहीं उत्पन्न होना और कानरके साथ कर्मविशेष कर्मान्तरको नहीं आरम कर पाता जहाँ भमणत्व आदि जानियाँ व्यक्त हों फिर भी कर्मत्वनानि से उपलक्षित कमविशेषसे युक्त पूर्वापरीभूत कर्मों में उ-क्षेपणत्व, भ्रमणत्व आदि जातियों व्यक्त होती हैं और कहा जाता है कि पूर्वपूर्व कर्मके प्रत्यक्षसे उत्पन्न सस्कारके साथ अन्तिम कर्मके प्रत्यक्षसे भ्रमणत्व आदि जातियाँ व्यक्त होती है। वैसे यन्नविशेषसे उत्पन्न धकार घटशब्दत्वका आश्रय होते हुए भी घट शके घकारसे मिन्न नहीं प्रतीत शेना और घटशब्दख जातिको व्यक्त भी नहीं कर पाता किन्तु वही पकार उत्तरोत्तर वर्गों के साथ अपेक्षाइद्धि के बल्से क्रमानुवृत्ति उत्पन्न करता है । नत्र पूर्व पूर्व वर्णके प्रत्यक्षसे उत्पन्न सम्कारके साथ अन्तिम वर्णके प्रत्यक्षमे पूर्व अगृहीन पदसदत्वरूप जातिको सरकारपाले भन्नम्पारणसे ग्रहण करते हैं। परेतु-नष्टविद्यमानयोरव्यवहितोत्तरत्वस्य वक्तुमशक्यतया पूर्वापीभावरूप. शमविशेषाय ज्ञानामाभव इति पूर्वोक्तरीत्या अन्त्यवर्णानुभवोद्यसंस्कारेण युगर- रसर्ववर्णरमरणेन पदप्रत्यक्षोपपादनस्य कर्तुमशस्यत्वात् येन मेगानुमवस्तेनैव क्रमेण तरसंस्कारोबोध इनि नियमाभान विशीतकमेग सरकारोबोधे सरो रसः नदी दीन नि विपरीतक्रमापत्ती प्रत्येकमन्यार्थबोधापत्तेः, अविद्यमानस्य घटशब्दस्य शनयाश्र- तु जात्या वधमतदाश्रयः ब्रमः शक्यते लक्षयितुमन माह-यथैवेति । विनति (कम) विशेषयुक्ताः बहवः पूर्वापरोभूनक्रियाणा प्रमशमुच्यने तेश च क्रमानुक्रिया भ्रमणभागक्रियाक्षगसमबेनया दिया जात्या लक्ष्यने तथा तात्वादिष्वनिवर्गभागेपि क्रमानुवृत्तिः नास्वादिजात्येव शक्योर समयिनम् -भागैरिया चेनि । जान्युनिक्षित_मगमाः मोक्षामित्यर्थः इनि ।

वाक्यपदीयम् यस्वानुपपत्तिश्च, अविद्यमानस्याप्यश्रयस्वाङ्गीकारे नष्टो घटो जलवानियापत्तिश्चेनि- आकृतिमनङ्गीकुर्वन्तोऽनेकध्वनिव्यङ्गयां नित्यामक्रमां शब्दव्यक्ति स्फोटाख्यां वाचावे- नाहुः । तथाच कैयटः- वैयाकरणा वर्णव्यतिरिक्तस्य पदस्य वाक्यस्य वा वाचकरव- मिच्छन्ति वर्णानां प्रत्येकं वाचकत्वे द्वितीयादिवर्गोशारणानर्थक्यप्रसङ्गात् भानर्थक्ये तु (समुदायस्य वाचकरवमुपेयं तत्तु न युक्तम्) प्रत्येक मुत्पत्तिपने योगपद्यनोस्पत्यसम- वात् अभिव्यक्तिपते तु क्रमेणैवाभिव्यक्तया समुदायाभावादेकस्मृत्युपारूढानां वाचकवे सरो रस इत्यादावर्धप्रतिपायविशेषमसगात् तद्यनिरिक्तः 'स्फोटो नादाभिव्यङ्गयो' वाचक इति विस्तरेण वाक्यपदीये व्यवस्थापित.' इति । किन्तु इस मीमांसक के मतमें दोष यह है कि नष्ट और वर्तमानसे अव्यवधान नहीं बन सकता, अन्तिम वर्णके अनुभवसे एक साथ सब वर्गों का स्मरणके द्वारा पदप्रत्यक्ष भी ठीक नहीं क्योंकि जिस क्रमसे अनुमव हो स्मरणमें वहीं क्रम रहे यह नियम नहीं है, अविद्यमान घट शब्द शक्तिका आश्रय नहीं माना जा सकता अन्यथा 'नष्टो घटो जलवान्' यह प्रतीति भी होने लगेगी। अतः वाक्यपदीयकार के मतमें अनेक ध्वनियोंमे व्यद्गय, नित्य और अत्रम स्फोट नामकी शब्द में रहनेवाली शक्ति ही वाचक है यह वैय्यटने कहा है। यत्तु उत्तरवर्णप्रत्यक्षसमये तरिमन्नध्यवहितोत्तरत्वसम्बन्धेनोपस्थितपूर्ववर्णवत्वं तथा तदुत्तरवर्णप्रत्यसकाले उपस्थितविशिष्टतद्वर्णवावं तस्मिन् सुग्रह मिति तादृशानु- पूर्वीघटितपदस्वस्येव वाक्यत्वस्यापि मुमहत्वात् श्रूयमाणवर्णा एव वाचकाः त एव च स्फोट इत्यद्गीकृत्य कैयटमतं निराकृतं कौण्डभट्टेन, 'तत्तुच्छम् नष्टविद्यमानयोग्य पूर्वोऽयं पर इत्यभिलापासंभवेनाव्यवहितोत्तरस्वसंवन्धस्य वक्तुमशक्यतया निरुक्त रीत्या पदस्य वाक्यस्य वा ग्रहीतुमशक्यत्वात् । स्फोटस्य वाचकत्वमभ्युपगच्छतामपि केचित् सखण्डस्फोटवादिनस्ते स्फोटे वर्णादीमा सवमाहुः । अन्ये तु अखण्डस्फेटवादिनस्ते च प्रतिवर्ण प्रतिपदं प्रतिवाक्यं च एक एव शब्दात्मा क्रमोत्पन्नध्वनिगतकरवादिरूपेण प्रमोस्पन्नावयवरूपप्रतिभासो १. 'स्फोटपदस्य च-तत्तवर्णपदादिरूपेण ताल्वाधभिधानाज्ञानविषयो मध्यमावस्योऽर्थ पति' 'एवं च पदादिरूपः आन्तरः स्फोटो वाचक इति' 'तत्र मध्यमाया यो नादोऽशस्तस्यै स्फोटारमनी वाचकत्वेनाक्षते ' इति ग्रन्थैर्मध्यमावस्यस्य नादस्य स्फोटत्वमुक्त मञ्जूषायाम् । स च स्फोटो यद्यप्येकोऽसुण्ड एकैकवर्णेनामिन्यज्यते तथाप्यन्त्यवर्णाभिव्यक्तो दोषहेतुः । अनो नेकवणंजामिन्य- वत्युत्तरमर्थप्रत्ययः । अयं चान्तरत्वाच्योत्रग्रामसरीसस्कृनान्तःकरणग्राह्य रव व्यजकरूपरषितस्य तस्यैवाथै सकेनग्रहः । अतो घटकलशादिपर्यायाभिव्यक्तसोटे गृहीनशक्तिरस्य पुसो प्रसिद्धपद- श्रवणे नार्थबोधः एतदेव 'श्रोत्रोपरन्धिर्बुद्धिनिग्रायः प्रयोगेगाभिज्वलितः आकाशदेशा शब्द' इति माष्ये उक्तम् । कवादिनाभिव्यक्त. श्रोत्रग्रास पदादिस्पेश बुद्धिनि ग्राह्यः प्रयोगेण वैखरीरूपेग अभिज्वलित आकाशदेशः हृदयाकादेश इति तदर्थ ॥ २. नादामिगहयः दनिः नादो वर्षः। ननूनादोशतवापि कब निस्तार इति चेदुच्यवे-यथा नानारजकद्रव्यवृत्ति नानावपराग कमेग तथा एकस्मिन्नेव तस्मिन्नुच्चारणमे क्रमवानेव तत्र स्वरूपानुरागः स च स्थिर नस्य च मनमा ग्रहणमिति न दोषः ।।

प्रद्मकाण्डम्] संस्कृत-हिन्दी व्याख्योपेतम् भासते परमातश्च तत्र वर्णाः पदानि च न सन्तीति मन्यन्ते। तथाच ऐौच सूत्रे भाष्यम्-'उभयतः स्फोटमानं निर्दिश्यते रधुनेलश्रुतिर्भवतीति । अत्रोद्योतः 'वस्तुतः स्फोट एव श्रोन्ननाशः वायुनिष्टकत्वादिना च तदमिग्यक्तिः। एवं च साचादववतो. ऽभावेन करपत इत्यत्रापि भप्रवृतावस्य वैयर्यापत्तिः एवं च रेफावमासिनः स्फोटस्य प्रसङ्गे लकारावमासः स्फोट इत्यर्थः' इति । तदयं निष्कर्षः-शब्दनिध्यतावादिनां मीमांसकाना' व्यक्तिस्फोटवादिना जाति. स्फोटवादिनां वा वैयाकरणानां मते शब्दनियरवं सूपपादम् । कार्यशनिदकाना मते स्वतोऽनित्यत्वेऽपि व्यवहारनित्यतया आकृतिनिध्यतया दपदस्प शन्दाहविपरतया वा सदस्य निरयरवोक्तिरिति । मनु भक्रमं वांतिरिकं पदं वाक्यं वा वाचकमिति वदतो वैयाकरणस्य मते पड़ा- देनित्यत्वेऽपि मीमांसकमते पदवाक्यादीनां नित्यत्वासंभवः। तथा हि-मानुपूर्वी भेदवन्तो हि वर्णाः पदम्, पदानि धानुपूर्वभिदवन्ति वाक्यम् , ध्वनिधर्मश्चानुपूर्वी न वगंधमः पर्णानां नित्यागां विभूनां च कालतो देशनो या पौर्वापर्यविरहात् । बनयो हि क्रम- यतिनः क्रमेण शम्दानभिन्यनयन्तः स्वीयं क्रमं वर्णेषु दर्शयन्ति क्रमरचना च पुरपा. धीना इनि परमाणूनां नित्यत्वेऽपि तदारब्धघटानित्यरववत् वर्गानां नित्यत्वेऽपि पद- स्यानित्यत्वमिनि सुतरा बास्यस्यानिस्यायम् । किस मंदिना वर्णानां प्रतिपादक- स्वासम्भवात् क्रमस्य च वाचकत्वात् पदरवं न क्रमविशिष्टानां वर्णानां तस्य च पुरुषा. धीनस्वेनानिरयस्यमिति चेदुच्यते-क्रमविशिष्टामा वर्णानामेव वाचकरवं प्राधान्यात् ने वर्णवमस्य तस्य सर्वपदार्थागवेनाप्राधान्यात् न बसौ स्वतन्त्र एव बम्स्वन्तरत्वेन कचिवपदद्विपसे इति तदुक्तं 'गारीकार विसर्जनीयाः पदम्' इति शायरमाप्ये तथा ध वर्णानां नित्यरवादात्मकरदाना निरयस्वमतम् । नन्येवमपि-मस्या निस्यस्य तद्विशिष्ट वर्णानामनित्यतया पदस्यानित्यावं पुन. रापामिनि चेर, येन फ्रमेश पई परेणोच्यते तेनैवापरेति व्यवहारनिरयतया क्रमस्थ नित्यावमिति तदेव पदस्य नित्यस्वमिरयदीपात् । इत्यमेव वेहेऽपि नित्यावं घोध्यम् । इदमेव च वेदापौरपेयरवं नाम यत्तदीयमे न पुरुषस्वातन्त्र्य लौकिकवाक्ये तु क्रमस्म पुरुषतन्नावात पोहोयस्वमिति तत्वम् । यदा पौर्वापर्य क्रमः पूर्वापर-चिर-शिवप्रन्ययाश्च कालालम्चनाः तेग घनिभिर्वर्गेषु प्याज्यमानेषु पूर्वापरमागेन म्यन्यमानः काल एवं क्रमः स च नित्य इति तद्विति. १. इसे पक्षा:-केपि वनिम्य वात्मक नित्यं शब्दमाधुः । अन्ये वध्यतिरिक्त पद- सोमिन्दन्नि । वाक्यरकोटमपरे सहिरन । भन्ये तु ध्वनिरव सम्मः स च कास्तव्यतिरे- फै गन्यस्यानुपलम्मादित्याशते' इति तत्र नित्यः सुम्दो मानिसोटयो व्यक्तिरसोटयो वाति च के.यटेन टक्काः। ६चा वाक्यपदीयम् ट्रस्य वर्णस्य निस्यत्वे बाधकामाव इति । यदाहुर्याक्यपदीयकाया-'प्रत्यक्षप्रत्य- भिज्ञानाद्वर्णेकरवं प्रतिष्ठितम् । वर्णात्मक पदं तच तदभेदान्न भियते ॥ इति । ननु काल एव चेत् क्रमः स चैको विभुनित्यश्चेति कथं पूर्वापररूपेण विभक्को भासते । उच्यते-यथा वर्णो नित्यः सर्वगतोऽपि दीर्घादिरूपेण विभक्तो भासते ध्वन्यु पाधिवशात् तथा कालोऽपि स्वयमभितोऽपि आदित्यगतिक्रियोपाधिवशानिनो भासने उपाधयश्च विनष्टवर्तमानानागताः सूर्यादिक्रियाः इति तद्वशेन कालेऽपि चिरक्षिप्रवि. भागः बहुक्रियापक्रियापरिच्छेदाभ्यामिति क्रमस्य नित्यत्वे सुतरां पदस्य नित्यन्य मिति स चेदं सर्व शब्दनिस्यताधिकरणे श्लोकवार्तिके। अर्थानामपि व्यक्तिः 'शब्दार्थ इति पक्षे भाकृतिनित्यतया प्रवाहनित्यतया वा नित्यता, सर्वशब्हानामसत्योपाध्यवच्छिन्नं ब्रह्मतत्वं वाच्यमिति मते जातिः शब्दार्थ इति मते च सुतराम् । सा अर्थमित्यता 'जात्याख्यायाम्' इति सूत्रेण 'नित्ये शब्दा. र्थसम्बन्धे' इति वार्तिकेन तदाप्येण च उक्ता । अर्थ नित्यता तो व्यक्ति शब्दार्थ पक्षमें आकृति-नित्यता अथवा प्रवाह-नित्यतासे नित्य है। सब शब्दों का असत्य उपाधि से अवच्छिन्न ब्रह्मत्व हो यदि वाच्य है तब तो जाति शब्दार्थ मनमें नित्य है। यह अर्थ नित्यता नित्ये शब्दार्थराम्ब बार्तिक द्वारा तथा 'जात्याख्यायाम' के भाष्यद्वारा शब्दतः उक्त है। एवं शब्दार्ययोः संबन्धोऽपि नित्यः स हि नेदंप्रथमतया केनापि शक्यः कर्तुम् । सर्वपदशक्त्यग्रहकाले केनापि पदेन अर्थादेशनस्याशक्यकर्तव्यावात् । यदाहतुर्वार्तिक कारभाष्यकारी निरये शब्दार्थसम्बन्धे' 'निरयो ह्यधंवतामर भिसम्बन्ध' इति । जैमिनिरपि 'औत्पनिकस्तु शब्दस्यार्थेन सम्बन्ध' इत्याह । 'औत्पत्तिक इति नित्यं घूम' इति तद्भाष्यम् । औत्पत्तिकः स्वभावसिद्धोऽनादिरिति यावत् । शब्दार्थयोनि स्यावे तयोः सम्बन्धस्य मुनरां नित्यत्वम् । शब्दार्थयोरनित्यस्वे तयोरिव सम्बन्ध स्यापि निस्यत्वम् । स च सम्बन्धः-शन्दैरानो बुद्धौ कल्पनात् अर्थबुद्ध्या ६ तरप्रतिपादनाय शब्दकल्पनात् कार्यकारणभावलक्षणः, यथेन्द्रियविपययोः प्रकाश्य प्रकाशकभावस्तद्वद् योग्यतालक्षणो वा । योग्यता च बोधजनकरवरूपा इति केचित् । १. 'तत्र जातिवादिन आहु'-जानिरव शन्देन प्रतिपायते व्यक्तीनामानन्त्यात्सम्बन्धग्रह णासम्भवात् । सा च जाति: सर्वयक्ति वेकाकारप्रत्ययदर्शनादस्तीत्यवतीयते तत्र गवादयः शन्दा मिनद्रव्यममवेता जातिमभिदधति तस्या प्रतीताया नदावेशात्तदवच्छिन्नं द्रव्य प्रतीयते शुक्लादय शब्दा गुणममवेनां जानिमावभुते गुणे तु तत्सम्नभान् प्रत्यय द्रव्ये सम्बन्धिसम्बन्धात् मवाशब्दा- नामुत्पत्तिपनृत्याविनाशान पिण्डस्य कौमारयौवनाद्यवस्थाभेदेऽपि स एवायमित्यभिन्न प्रत्ययनि- 'मित्ताडित्यत्वादिश अस्तिवाच्या क्रियास्वीप जावियेत सैव धातुवाच्या पठति पठनः पठन्तो त्यादेशभिन्नस्य प्रत्ययस्य सद्भाशत् ननिमित्तजात्यभ्युपगमः। व्यक्तिवादिनस्वाहुःशब्दस्य व्यक्तिरेव बाच्या आनेरुपलक्षमावेनाश्रयणादानन्त्यादिदोषानवकाश.' इति कैयः॥ २. अयं पक्षः 'अनित्येऽर्थ कथ सम्बन्धस्य नित्यनेनि चेत् योग्यतालक्षणत्वात्मम्बन्धस्य' इनि कैयटेन उनः । योग्यता-बोपजनकन्वन् ।

। ब्रह्मकाण्डम् ] संस्कृत-हिन्दी व्याख्योपेतम् ४३ वाच्यवाचकभावरूपशक्तियाहकतादाम्यरूपा इत्यपरे।' उभयविधस्थापि सम्बन्धस्य परिच्छेदकः सङ्केत इति नागृहीतसङ्केताच्छन्दादर्थयोधः। ईश्वरेच्छारूपा शक्तिरेव सम्बन्धः सा च नित्या इति तामिकाः। वायवाचभावल आय. सम्बन्धः । शनिस्तु पदार्थान्तरमिति मीमांसका इत्यलम् ॥ शन्द और अर्थका सम्बन्ध मी नित्य है। वह मम्बन्ध इन्द्रिय और विषयक प्रकाश्य. प्रकाशककी भाति योग्यतारूप, अथवा कार्यकारणभाव रूप है। योग्यता किमोके मन में गोषजनकतारूप और किसीके मतने 'वाच्यवाचक माश्रूप शक्तिमाहक तादात्म्यरूप है ननु साधुत्वव्यवस्थार्थ शब्दार्थसम्बन्धानां नित्यत्वे आश्रीयमाणे व्याकरणशाखा- नर्थस्यमिनि वृश्चिकभिया पलायमानस्य भाशीविषमुखनिपातन्यायापानः। न हीदानी शब्दनिष्पत्तये व्याकरणम् शब्दानां स्वतः सिदत्वात् नापि सम्बन्धज्ञानार्थ लोकत एवं धोरपत्तेः 'एका शब्दः सम्यगज्ञातः बाम्रान्वितः' इतिश्रुन्या बोधनेन व्याकरण- सार्थवयात् ॥ २३॥ इस प्रकार शब्द अयं तथा उसके मम्बन्धके नित्य होनेके कारण व्याकरणशासकी इसलिए सार्थकता है कि अनिने शास्त्र द्वारा प्रदर्शित विधिके स्मरणके साथ शब्द के प्रयोगमे पोत्पति कहा है । 'एकः शब्दः सम्यग् शातः मुप्रयुक्तः स्वर्ग लोके च कामधुग भवनि' ॥२३॥ एवं शब्दार्थसम्वन्धानां नित्यत्वे सिद्धे साधुरयबोधनार्थ व्याकरणमिति स्थितम् । तय न अपशब्दयोधनद्वारा साधुशब्द। व्याकरगेन बोधनीया किन्तु साधुशब्दा एवेति निरूपयन-अष्टपदार्थारूपं शास्त्रशरीरमाह त्रिमिः श्लोकः- इमलिए नित्य शब्दोंकी साधुना बताना भी व्याकरणका कर्नन्य हो गया है। क्योंकि जब शब्द नित्य है नब उनमें किमी भी काल में कोई विकार नहीं आ सकता अतः उनका ठोक शान प्राप्त करना भौर -याकरण द्वारा उनका निरूपण करना रचित है। शब्दों का साधुत्व दो प्रकारसे बनाया जा सकता है। एकतो साधुसन्दों को बनाकर शेषको अमाधु कह देना और दूसरा असाधु शब्दों को बताकर शेषको साधु कह देना इन दोनों क्रमों में साधु शब्दोंका बताना ही उचित है। क्योंकि व्याकरण का प्रयोजन है सरल उपायसे दाद ममुदायका शान कराना। साधु शब्दोंकी अपेक्षा असाधु शन्दोंको सल्या भरिक है। मै एक गो शन्दके हो गावी, गोणी, गोपोनलिका आदि अनेक अपभ्रश है। अत:- बारपदार्था ये ये चार्थाः स्थितलक्षणाः । अन्याख्येयाश्च ये शब्दा ये चापि प्रतिपादकाः ॥ २४ ।। कार्यकारणभावेन योग्यभावेन च स्थिताः । धर्म च प्रत्यये चाङ्गं सम्बन्धाः साध्वसाधुपु ॥ २५ ।। ते लिङ्गश्च स्वशब्देश्व शास्त्रेऽस्मिन्नुपवर्णिताः । ३. भय पशः 'सदार्थयोः सम्बश शक्तिरूप नादाम्यमेवेन्यन्यत्र प्राचिनम्' इति ग्रन्येन 'निस्शदार्थसम्बन्धे पनि वानिके उदोन उर । 1 साधवः शब्दार्थसंबन्धा' चाक्यपदीयम् स्मृत्यर्थमनुगम्यन्ते केचिदेव यथागमम् ॥ २६॥ साध्वसाधुपु-शब्दार्थसम्बन्धेषु ये धर्म धर्मोपत्तो प्रत्यये अर्थावधांधे अङ्गम् ते अस्मिन् शास्त्रे व्याकरण लिझैः प्रकृतिप्रत्ययैः स्वशब्देश्य उपवर्णिता नासाधवः तेषामविवोधमानोपकारकत्वात् , तन्त्र पानि वास्यानि च लिहै। प्रकृतिप्रत्ययास्वशब्दैरिति विवेकः । के इत्यपेशामाह-अपोद्धार-पदार्था इति । सन ये प्रतिपादकाः प्रकृतिप्रत्यय रूपाः, ये च अन्वाख्येयाः, पदवाक्यरूपाश्च शब्दाः ये अपोद्धारपदार्थाः प्रकृतिप्रत्ययार्थाः ये च स्थितलक्षणाः पद्वाक्यार्थरूपाश्च अर्थाः ते द्विविधा अपि शब्दाः अर्थाश्च कार्यकारणभावेन योग्यभावेन तादाम्येन च स्थिताः साधवः यस्य शब्दस्य येनार्थेन कार्यकारणभावः तादाम्यं च वर्तते तस्मिन्न स साधुरिति यावत् । ततश्च कार्यकारणभवलपणा योग्यतालक्षणाश्च संवन्याः साधय इति लब्धम् । नन्वसाधव एव किमिति न वर्णिताः असाधुपु गादयादिपुर पदिष्टेषु तदन्येषां गौरित्यादीनां साधुत्वेनावगमसंभवादत आह-स्मृत्यर्थमिति । स्मृत्यर्थं लाघवेन स्मृतिगयनाथ, केचित्-साधव एव आगममनतिक्रम्य इनि यथागर्म यथाशास्त्रम् अनुगम्यन्ने नासाधवः यतो गौरित्यस्य शब्दस्य गावीगोणीगोतागोपोतलिका इत्येवमादयो यहयोऽपभ्रंशारतेषामुपदेशे गौरवम् । मावशब्द, अ और सम्बन्ध तथा असाधु शब्द, अर्थ और सम्बन्धमें जिसके (साधुसन्द) शानसे धर्मकी उत्पत्ति और अर्थशानमें सहायता मिलती है, वे ही पद और वाक्य इस व्याकरण शास्त्रमें लिङ्गों, पान, प्रत्यय और स्वशब्दसे वर्णित हैं और जो अपने स्वरूप मेधन साय पद और वाक्योंका प्रतिपादन करते है वे प्रतिपादक ( प्रकृति और प्रत्यय) जो शब्दों प्रकृति और प्रत्ययको करना दारा सरलतासे पद और वाक्योका शान कराते हैं वे अन्यायेट (पदरूप और वाक्यरूप, शब्द ) जो पदार्थों से विभक्त होते हैं वे अपोदार और जिनसे मा का ज्ञान होता है वे प्रकृति और प्रत्यय, पद उनके अर्थ पदार्थ रूप अपोद्वार पदार्थ ( प्रकृति प्रत्ययार्थ) जो अपने स्वरूपकी किसी प्रकार रक्षा करते है वे स्थितिलक्षण अर्थ ( पदार्थ और वाक्यार्थ) है और जो कार्यकारण भाव सम्बन्ध और योग्यभाव (तदात्य सम्बन) में स्थित है। अर्थात साधु हैं उनका हो लघुभून उपायक द्वारा शत्रज्ञानके, साप स्मरण के लिये इस शालमें वर्णन किया गया है। इदमन ध्येयम् साधूनां शब्दानामर्थः संबन्धश्च साधुः असाधनामर्थः सम्बन्धश्च असाधुः साधुत्वस्य शब्दार्थसम्बन्धत्रितयमाश्रित्यैव शामेश बोधनात् । अत एव अस्वशब्दस्य दरिदे साधुत्वेऽपि न वाशिनि साधुतेति ॥ पदार्थादपोधियन्ते विभज्यन्ते इति अपोद्धाराः, पद्यते बोध्यतेऽयोऽनेननि १. नित्पदानि ते मे नौ या नात्यादीनि क्वचिद्वाक्यानि ऐकागारिकः श्रोत्रिय हरडव त्यादीनि स्वसभरपाणितानि ।

ब्रमकाण्डम् ] संस्कृत-हिन्दी व्याख्योपेतम् पदं प्रकृतिः प्रत्ययश्च न पारिभापिकम् तस्यार्थाः अपोद्धाराश्च ते पदार्थाः अपोद्धारपदार्थाः प्रकृतिप्रत्ययार्थाः । यहा 'अपोद्धारपदाय में दो पद हैं। प्रथम पद 'अपोद्वार का 'विमाग' और दूसरे पदार्थ पदका पदस्यार्थः इस व्युत्पत्ति में प्रकृति प्रत्यया अर्थ है । 'महिन्न पद' बमे परिभाषित पद दाब्दका अर्थ नहीं है। अतः पदायी विभक्त प्रकृत्यर्थ और प्रत्य- पार्थ अपोद्धारपदार्य पदका अर्थ होता है। स्थितममच्युतं लक्षणं स्वरूपमेपां ते स्थितलक्षणाः अर्थाः-पदार्धा, वाक्या- श्चि, प्रकृतिमत्यार्थावबोधो हि पदार्थवयोधोपाय इति पदार्थ प्रतिप्रत्ययास्ति- रोहिता भवन्ति न तु पदार्थ इति पदार्थस्य स्वरूपमाच्युत भवति । एवं पदार्थावरोधी वाक्यार्थावबोधोपाय इति पदार्था वाश्यार्थे तिरोहिता भवन्ति न वाक्यार्थ इति पदार्थापेक्षयाऽपि वाश्यार्थस्याप्रच्युनस्वरूपल्यमिति स्थितलक्षणपदेन तयोर्ग्रहणं युक्त न प्रकृत्यर्थस्य प्रत्ययार्थस्य या किमप्यपेक्षया तयोरमच्युतस्वरूपत्वाभावात् । अन्यारथायरा इमि अन्याख्येयाः शब्दाः पदानि वारयानि च लाघवेन वकृतिप्रत्ययकल्पनया पदानि वारयानि चान्वाख्यायन्ते व्याकरणेनेति भावः । एतदुक्तं भवति-यद्यपि वाक्यस्फोटो वास्तवस्तस्यैव लोकेऽर्थवोधकत्वात् तेनै वार्थाकासापूतश्च न पदरफोटो वर्णस्फोटो वा, लोके वृक्ष इत्युक्ते तन्मात्रेणार्थाकाहापू- पर्यभावादव्यवस्थितत्वाच' एवं वाक्यार्थ एव वास्तवो न पदार्थः तस्याव्यवस्थितत्वे- नासत्यत्वात्, तथापि प्रतिवाश्यं शक्तिग्रहस्य साधुत्ववोधनस्य च लघ्पायनाशक्याचात् वाक्यार्थेभ्यः२ पदार्थान् तेभ्यश्च प्रकृतिप्रत्ययार्थानपोद्धन्य वारयेभ्यः पदानि पदे. भ्यश्च प्रकृतिप्रत्ययानपोद्धृत्य प्रकृत्यर्थे प्रकृतेः,प्रत्यार्थ च प्रत्यम्य शक्तिः साधुन्वं चन्या. करणेन बोध्यते तद्वारा च पदार्थे पदस्य वाक्यार्थे च वाश्यस्य शक्तिः साधुत्वं च सुग्रहमिति आन्चारयानलाघवाय प्रकृतिप्रत्ययकरपगं न तु तयोरेवान्वात्ययत्वं नदन्वाख्यामद्वारा पदवाक्याम्वाख्यानस्यैव शास्त्रकृत्तात्पर्यविषयत्वादिति आन्वास्थय शब्देन पवाक्ययोहणं युक्तम् । स्वस्वरूपबोधनद्वारा पदानि प्रतिपादयन्तीति प्रतिपादकाः मकृतिप्रत्यया प्रकृतिप्रत्ययौ हि पदप्रतिपच्युपाय इति प्रतिपादकशब्देन नयोर्पणम् । यद्यपि पदमपि वाश्यप्रतिपत्त्युपायस्तथापि प्रकृनिप्रत्ययापेक्षया मनिपाद्यत्वमपि नास्ति प्रकृतिप्रत्यययोस्तु न किमप्यपेक्षया प्रतिपाद्यन्वमिति अतिपाद्यपासमानाधिकरण प्रतिपादकत्वामिह विवक्षित मिति न प्रतिपादकशब्दन पदस्य ग्रहण मिनि। १. पाना सत्यत्व राजरूपाप्रत्यायनाय राजा राजाने राहत्यादेपदनियत व दृश्यन नत्र स्यात् सत्यस्य नियतल्लादिति भाव । २. नक्तं सनडे-'नदि विचित्पदं नामरूपेग नियन क्वचिद् । पदानामर्यरूपं च वाक्या- थादेव जायने । नि वा ।

कारका प्रयोजन ४६ वाक्यपदीयम् कार्यकारणभावेन-कार्यकारणारमना, शब्दैरानां वुद्धौ कल्पनात् अर्थबुद्ध्या च तत्प्रतिपादनाय शब्दकल्पनात् बौद्धशब्दार्थयोः कार्यकारणभाव इति भावः । यहाँ शब्द और अर्थका कार्यकारणभाव सम्बन्ध बौद्ध हैं। क्योंकि शब्दोंको मुनकर अर्थका भाव बुद्धिमें होता है फिर प्रयोग की इच्छापर अर्थका ध्यान रसकर शब्दोंका प्रयोग होता है। अतः शब्दों और अर्थोका बौद्धकार्यकारणभाव बनता है। अन्यथा शब्द और अर्थ के मिन्न मित्र स्थानों में रहने के कारण कार्यकारणभाव बनता ही नहीं। योग्यभावेन-तादाम्येन यथेन्द्रियविषययोः प्रकाश्यप्रकाशकभावस्मम्बन्ध म्तथा तयोः समयोपाधिस्तादात्म्यमस्तीति भावः । तदेवम् अपोद्धारपदार्थस्थितिलक्षण देनार्थी द्विधा, अन्वाख्येयमतिपाइकभेदन शब्दो द्विधा, कार्यकारणभावयोग्यताभेदेन संवन्धो द्विधा, धर्मार्थावबोधभेटेन प्रयोजनं द्विधेति अष्टविधासु शास्त्रतत्वं परिसमाप्यने । २४-२६॥ इस प्रकार अर्थ दो प्रकार का है। एक अपोद्धार पदार्थ और दूसरा स्थिति लक्षण । शममी दो प्रकार का है एक अन्वाख्येय और दूसरा प्रतिपादक । सम्बन्ध मी दो प्रकार का है एक कार्यकारणभाव और दूसरा योग्यता । धर्मशान तथा अर्थशानके भेदसे दो ग्न भाठ प्रकारों में शब्द तत्व की पूर्णता है ।। २४-२६ ॥ नन्वेपा साध्वसाधुव्यवस्था निर्मूलेत्यत आह- यह साधुशब्द और असाधु शब्दको व्यवस्था निर्मूल नही कही जा सकती क्योंकि-- शिष्टेभ्य आगमात् सिद्धाः साधवो धर्मसाधनम् । अर्थप्रत्ययनाभेदे विपरीतास्त्वसाधवः ॥२७॥ साधूनाममाधूनां च अर्थप्रत्ययनाभेदे अर्थप्रत्यायकत्वस्य तौल्येऽपि, तदुर भाष्ये 'समानासामर्थावगतौ शब्दश्वापशब्दैश्च शास्त्रेण धर्मनियमः क्रियते शब्द नैवार्थाभिधेयो नापशब्दन एवं क्रियमाणमभ्युदयकारि भवतीति', शिष्टेभ्योलम्याद आगमात् व्याकरणात् सिद्धाः धर्मपाधमत्वन वोधिताः साधवः धर्मसाधनम् विपरीता अमिद्धाः अनिष्टसाधनत्वेन वोधिता इति यावत् असाधवो ऽधर्म साधनमित्यर्थः ।। साधुशन्द और असाधु शन्दोंसे समानरूपसे अर्थशन होनेपर मी शिष्टोंके द्वारा प्रार व्याकरणागमसे सिद्ध साधुशन्दोंके प्रयोगमे धर्म और असाधुशन्दों के प्रयोगसे अधर्म उत्पन्न होता है। 'इको यणचि' इत्यादिभिः स्वविधेयघटिते साधुत्वं तदितरस्मिन् स्वोत्तरशाम्रा- बोधिनेऽमाधुन्यं च वोध्यते, अन्यथा समासविधायकशास्रण सुधाउपास्य इत्यस्यापि साधुस्वबोधनात्तस्यापि प्रयोगापत्तिः असाधुत्वासमानाधिकरणे च साधुत्वं लोकप्रयो- गार्हत्वसम्पादकमिति तत्वम् । 'एकः शब्दः सम्यग्ज्ञातः शास्त्रान्वितः सुप्रयुक्त स्वर्ग लोके कामधुग्भवति' इनि श्रुत्या साधूनां धर्मसाधनत्वस्य 'तेऽसुरा हलयो हलय इति कुर्वन्तः पराबभूवुः तस्माद बाकाण्डम् ] संस्कृत-हिन्दी व्याख्योपेतम् ब्राह्मणेन न म्लेच्छित नापभाषित म्लेच्छो ह वा एप यदपशब्दः' इनि श्रुत्या असाधनामधर्मसाधनत्वस्य बोधनात् आगमसिद्वेऽर्थे न विवदितव्यम् । यथा अन्येषु आगमविहितेषु, अष्टकाभ्राद्धादिषु यथा वा आगमनिपिद्धषु हिसानृतवदनम्तेयादिषु धर्माधर्ममाधनवविपये न कश्चिद्विप्रतिपद्यते नवदिनि भावः ।। 'एकः शब्दः सम्यग् ज्ञातः शाखान्वितः सुप्रयुक्तः स्वर्ग लोके च कामधुम् भवनि । इस वनिके अनुसार साधुशब्दज्ञान धर्मका साधन कहा गया है और 'तेऽसरा हेलयो हेलय पनि कुर्वन्तः परावभूनुः, तस्मात माह्मणेन न म्लेक्षिनवै नापभाषितबै म्लेक्षो हवा एष यद पशब्द हम वनिक द्वारा अमाधुशब्द-ज्ञान अधर्ममाधन माना गया है। अनः साधुशब्दका प्रयोग करना हो उचित है॥२७॥ एतदुक्तं भवति-आगमा द्विविधाः-शिष्टागमा वायागमाश्च । शिष्टो नामानु- भवेन वस्तुनवस्य कात्स्न्यं न निश्चयवान् गगादियमादपि यो नान्यथावादी, यथा मन्वादिः । तेषामागमा मनुस्मृत्यादयः, वाह्या बंदवाह्या बुद्धादयस्तेपामागमा बुबायागमाः तत्र शिष्टागमनामेव धर्म प्रामाण्यं न वाह्यागमानामित्येतत्सूचयिनमुक्त शिष्भ्य आगमा इति । एतदेवाभिप्रेत्य स्मृतिचरणे तन्त्रवार्तिके बौद्धाचागमानां परिहार्यन्वमुक्तम् । तथाहिननु वोद्वाद्यागमा अपि धर्मे किमिति न प्रमाणम् तेष्वपि अहिंसाब्रह्मचर्यनपो- दानादयो विहिताः तेऽपि हि स्वपितृपितामहादिचरितानुयायिनः तेषामाप्यगमाः द्वीपान्तरस्थमहाजनैरनुगृहीताः-महाजनगृहीतत्वं पित्रावनुगमादि च । मेऽपि दीपान्तगपेतं यदन्न्येव स्वदर्शने ॥ नच ते न वेदमूला इति वाध्यम, उत्पन्नशावा- भूलन्यम्य तेप्यपि कल्पयितुं शक्यत्वादिति चेद-अनोच्यते-कतिपयदानदमादिवर्ज मण्येव शाक्यादिवचनानि समस्तचतुर्दशविद्यास्थानविरुद्वानि यीमार्गम्युत्थिन- विरुद्वाचरणैश्च बुद्धादिभिः प्रणीतानि यीबाह्येभ्यश्चाण्डालादिमायेभ्यो व्यामुढेभ्यः समर्पितानि न वेदमूलवन संभाव्यन्ते । स्वधर्मातिक्रमेण च येन क्षत्रियेण सता प्रवन्धप्रनिग्रही प्रतिपन्नौ स धर्मगविप्लुतमुपदेच्यनीति का समाश्वामः । उनं -- परलोक विरद्धानि कुर्वाणं दूरनस्त्यजेत् । आत्मानं योऽतिसन्धते मोऽन्यम्मै म्यान्कथं हितः ॥ इति । बुद्धादे पुनरयं व्यतिक्रमोऽलबारदी स्थितः येत्रमाह- कलिक्लुपटनानि यानि लोके मयि निपतन्तु विमुच्यनां तु लोकः ॥ इति । यः किल लोहिनाय क्षत्रियधर्ममनिकम्य ब्राह्मणवृनं प्रयन्त्रं प्रतिपद्य प्रनिपे- धानिक्रमासमायणैरननुशिष्टं धर्म या जनाननुशामदर्मपीडामप्यान्मनोगीकृत्य परानुग्रहं कृतवान् इम्यविधेरेय गुणैः स्तुगते तदनुमारिणश्च स एव ध्रुतिस्मृतिवि- हितधांतिक्रमेण ध्यत्रहरन्तो विरदाचरणवेन ज्ञायन्ते। तनश अन्यत्तश्रुतिविन्दवा- दंगामागमा न वेदमूला इति न धर्म प्रमाणम । किं च यथा उपनयनादिम्मनीनां वाक्यपदीयम् शावान्तरदृष्टश्रुतिसंवादः न तथा चैन्यकरणतद्वन्दनशृद्धसम्प्रदानकदानादीनां संवाद सम्भवति । न च मूलान्तरकल्पनावकाशः- लोभादि कारणं चात्र बढेवान्यातीयते । यस्मिन्सन्निहिते दृष्टे नास्ति मूलान्तरानुमा॥ शाक्यादयश्च सर्वत्र कुर्वाणा धर्मदेशनाम् । हेतुशालविनिमुनां न कदाचन कुर्वते । न च नैवेदमूलत्रमुच्यते गौनमादिवत् ।हेनवश्चाभिधीयन्ते ये धर्माद दूरतः स्थिता पतएव च ने येषां वाङ्मात्रेणापिनार्चनम् । पाग्वण्डिनो विस्मस्था हेनुकाश्चन एव हि ॥ एतदीयग्रन्था एव च मन्वादिभिः परिहार्यविनोक्ताः-- या वेदयाह्याः स्मृतयो याश्च वाश्व कुष्टयः। मस्ता निष्फलाः प्रोक्तास्तमोनिष्टाहिताः स्मृताः ॥ तस्माद्धर्म प्रति त्रयीवाधं बौद्धादिशास्त्रमप्रमाणमिति सिद्धम् ॥ २७ ॥ ननु नित्यशब्दवादे शब्दानां व्यवस्थितस्यात् साधुत्वन्यबस्था युन्यतां कार्य- शब्दवादे तु अभिनवान् कांविच्छब्दानुत्पाद्य नेपां स्वकल्पितव्याकरणेन स्वगोष्ठीषु साधुत्वबोधनमम्भवान् कथं साधुन्वव्यवस्था स्यादन आह- साधुशब्दोंका ज्ञान मी व्याकरणमे ही हो सकता है। व्याकरण भी यदि शब्द नित्य हों नो उनका साधुत्व बनावे । शब्दोंकी नित्यताके बारे में विद्वानोंमें मतभेद है। कोई निल मानते हैं कोई भनित्य । जो नित्य मानते हैं उनके मनसे व्याकरण रचना ठीक है, किन्तु जो शब्दको अनित्य मानते हैं वे तो नया शब्द गढ़ेंगे और नया व्याकरण मनमानी रचेगें, फिर आपके व्याकरणकी दुर्दशा ही हो जायगी यह शना उचित नहीं है क्योंकि- नित्यत्वे कृतकत्वे या तेपामादिर्न विद्यते । प्राणिनामिव सा चैपा व्यवस्थानित्यतोच्यते ॥ २८॥ ये हि वैशेषिकादयः आत्मनां नित्यन्चमाविष्टन्ते तेषां कूटस्थनिन्यतया ये च चार्वाकादयः आत्मनां शारीरेन्द्रियरूपतां मन्यमाना अनित्यत्वमानिष्टन्ते तेषामनादी संसारे अप्रवृत्तमाणिव्यवहारम्य कालस्यामत्वात् प्रवाहनित्यतया प्राणिनाम् आत्म. नाम इव नित्यत्वे शब्दनि यत्ववादे कटस्थनित्यनया कृतकत्ये कार्यशब्दवादे वा अनादौ संसारे अप्रवृत्तशब्दव्यवहारम्य कालस्यामत्वान् प्रवाहनिन्यतया तेषां शब्दानाम् आदिः इदंप्रथमता न विद्यते नास्तीत्यर्थः । एवं चायं माधुरयममाधुरिनि व्यवहारप्रवाहम्यानादिनया नाभिनवान् दाब्दानुत्पाद्य तेषां साधुत्ववोधनं शक्य- १. अनादौ संसारे सृष्टिप्रलयवादेऽपि पूर्वकल्पीयरेव शब्दार्थसम्बन्धैठत्तरकापऽपि व्यव- हारः स्वापप्रबोधयोः प्रलय प्रमवश्वणेऽपि पूर्वप्रबोधवदुत्तरप्रदोधव्यवहारबदिति न प्रवाहनित्यना हानिः । तदुक्त शादरभाध्ये 'अनश्व सर्वकस्यानातुल्यव्यवहारसदान कस्पान्तरव्यवहारानुसंधान क्षमत्वाच्चेश्वराणां समाननामा एक प्रनिसर्ग विशेषाः प्रादुर्भवन्ति समाननामरूपत्वाचावृत्ता वपि महामर्गमहाप्रलययणायां उगनोभ्युपगम्यमानाया न कश्चिन्छब्दप्रामाण्यादिविरोध' इनि, कागे न रोशून्यः कालवादिदानींननकाल वदिनि सृष्टिप्रलयानगोकर्तृमीमांसकमने तु भूतरां प्रवाहनित्यतेनि बोभ्यम् ।

3101 ब्रह्मकाण्डम् संस्कृत-हिन्दी व्याख्योपेतम् ४६ सम्भवमिनि साधुत्यव्यवस्था निर्विवादेति भावः। ननु केयं नित्यता या शब्दानां अन्यत्वेऽपि न विद्वत्यत आह-साचैया कृटस्थनिरयताया अन्या व्यवस्थानित्यता प्रवाह नित्यता उच्यते शास्त्रदर्शिमिरित्यर्थः । तदुक्तं भाष्ये 'तदपि निन्यं यस्मिस्तत्वं न विहन्यने' इति यस्मिन् विहतेऽपि आश्रयप्रवाहाविच्छेदात् तवृत्तिधर्मों न विहन्यते इति तदर्थः ॥ २८॥ जैते वैशेषिक दर्शनके आचार्य आत्माको निल्य मानते हुए आरमाका कूटस्थ नित्यता, शरीर और इन्द्रियको आत्मा माननेवाले चार्वाकदर्शनके आचार्य आत्माको अनित्य मानने पर मी अनादि मंसारप्रवाहको नित्य मानते हुए प्रवाह नित्यना मानने है। किन्तु किसी के दर्शनकी दुर्दशा नहीं है। वैसे भात्माको नित्यताको मौनि शब्दोंकी नित्यता मानने पर कू स नित्यता और कृत्रिमता (अनित्यता) मानने पर अनादि ससार पाइनें प्राह नित्यता मानने से व्याकरण कौरचना व्यर्थ न होगी। तात्पर्य यह है कि नए शब्दों का निर्माग दोनों पक्षोंमें नहीं हो सकता ।। २८ ।। मनु नियमद्वयार्थ हि व्याकरणं 'साधूनेय प्रयुञ्जीन नासाधून्' इत्येकः प्रयोग- नियमः, 'गवादय एव साधवो न गाव्यादयः' इति अपरः साधुम्वरूपनियमः । रादेतद्यमपि न नियन्तुं शश्यने । तथाहि-न तावरसाधूनेव प्रबुजीतेति नियम- सम्भवः शब्दप्रयोगफलस्यार्थावबोधस्य असाधुभ्योऽपि सम्भवेन नियमस्यानर्थ- कन्वात् । ननु न शब्दोच्चारणमायघोधायैष किन्सु धर्मायापि। तथाच नियमस्या- पोधेऽनुपयोगेऽपि धर्मे उपयोगो भविष्यतीति चेन्न मूलासम्भवात् । न तत्र प्रत्यक्ष मूलं तस्य धर्माधर्मयोरप्रवृत्तेः, नापि व्याकरणस्मृतिकल्पिनानि मूलं तेषां प्रतिपदं 'कल्पने अनन्तवाक्यपाठासम्भवः सुशब्दं प्रयुञ्जीत नापशब्दमिन्येवंरूपमेकमेव वेदवाक्यं तु कल्पयितुमशक्यं श्रोत्रनामस्वरूपस्य वाचकत्यरूपस्य था सुशब्दावस्या- साधुशब्देवपि सावनाध्यवर्तवरवात् अन्यादृशस्य चासम्भवात् । अत एव न माधुस्वरूपनियमोऽपि सम्भवति श्रोत्रमाझस्वरूपस्य वाचकत्वरूपस्य वा साधुरवस्या- मायुमादेवपि सत्वेन नियन्तुमशक्यत्वात् तस्मादियमनधिका माधुत्वामाधुन्व- व्यवस्था मरेव शब्दः व्यवहारस्य कर्नु शक्यत्वादित्यन आह- व्याकरण दो नियम बना सकते है। एक 'साधुशन्द का ही प्रयोग करना असाधु का नहीं' और 'दूसरा गोगन्दी माधु है गावी आदि नहीं, किन्तु सब शब्दों से व्यवहार जबरन जाता है तब दोनों नियमों में कोई मूल नहीं है। अतः यह साधुत्व और असाधुत्व पी गवरथा व्यर्थ है यह कहना ठीक नहीं। क्योंकि नानार्थिकामिमा कचियवस्था कर्तुमर्हति । तस्मान्निबध्यते शिष्टैः साधुत्वविषया स्मृतिः ॥ २९ ॥ कश्चित् मन्दोऽपि अर्थिक नियोजनाम इमां माधुध विपरिको दुर्जयां दुरपयां च व्यवस्था कर्तुं नार्हति 'प्रयोजनमनुद्दिश्य न मन्दोऽपि प्रवनन' १. दानादिस्वरमानेऽपि तस्याशयोचारणताइदुरध्येयत्वम् । ७बार वाक्यपदीयम् धर्मस्य चाव्यच्छिन्नाः पन्धानो ये व्यवस्थिताः। न ताँलोकासिद्धत्वात् कश्चित्तण वाधते ॥ ३१॥ ये धर्मस्य पन्थानः धर्मप्रतिपत्त्युपाया श्रुतिस्मृत्यादयः व्यवस्थिता लोक- प्रसिद्धाः अव्यवच्छिन्नाः सर्वैः शिष्टैरपरित्यागाद्विच्छेदरहिताः पारम्पर्यक्रमादागना. इति यावत् । तान् आगमान् लोकप्रसिद्धत्वात् कश्चित्तर्केण न बावते लोक विरोधे तर्कस्यानुत्पादात् । प्रत्युत नरकपालाशुचित्वबोधकागमैन तर्क एव वाध्यते यत आगमालोकविरुद्धं तर्कविरुद्धं च अग्निपोमीयपशुहिंसादिलक्षणमाचरणं प्रतिपद्यन्ने शिष्टाः अतो नागमस्नर्कवाध्य इति भावः ॥ इदमेवोक्तं चोदनासूत्रेश्लोकवार्तिके-धमांधात्रवोधस्य तेनायुक्तानुमानगाः। अनुग्रहाच धर्मत्वं पीडातश्चाप्यधर्मताम् ॥ बदनो जपसीध्वादिपामादी नोभयं भवेत्। कौशता हृदयेनापि गुरुदाराभिगामिनाम् ॥ भूयान् धर्मःप्रसज्येत भूयसी ग्रुपकारिता। अनुमानप्रधानस्य प्रतिषेधानपेक्षिणः ॥ हृदयक्रोशनं कस्माद् दृष्टां पीडामपश्यतः । नस्मादनुग्रहं पीडां तदभावमपास्य च । धर्माधर्माणिभिनित्यं मृग्यो विधिनिषेधको । तस्माद्यद्यादृशं कर्म यत्फलोत्पत्तिशक्तिकम् । शास्त्रेण गम्यते तस्य तादास्यैव तत्फलम् ॥ इति ॥३१॥ जो धर्मके प्रतिपादक ( श्रुति, स्मृति आदि ) आगम है वे व्यवस्थित (लोकपसिद्ध) है और सब शिष्टों (गुरुपरम्परा) से ज्ञान है । अतः उन लेक प्रसिद्ध आगोका तकी बाप नहीं हो सकता। क्योंकि लोकके विरोध पर तर्कका ही बार होता है ॥ ३१ ॥ इदानी लौकिकपदार्थचपि शक्तिभेदेन व्यभिचारादनुमानस्य न सामर्थ्यमित्याह- अवस्थादेशकालानां भेदाद्भिनासु शक्तिपु। भावानामनुमानेन प्रसिद्धिरतिदुर्लभा ॥३२॥ भावानां पदार्थानां शक्तिपु अवस्थादेशकालानां भेदाद् भिन्नासु सतीषु अनुमानेन भावानां शक्तेरिति शेषः, भावानां तत्तत्कार्यजननसामय॑स्य प्रसिद्धिा अनुमितिः अतिदुर्लभा असंभवा इत्यर्थः । इन तकीको आगों में ही नहीं लोकमें भी विफलता सिद्ध है। जब भावों ( पदाया) की शक्तियाँ अवस्था, देश और कालके भेदसे भिन्न मिन्न होनी है। नप अनुमानके द्वारा उन उन पदार्थाने उन-उन शक्तियोंकी धनुमिति अतिदुर्लभ है। अवस्थाभेदात् धान्यबीज्ञानामवस्थान्तरे अङ्कुरजननहानिः मूषिकामातानां चन, पिप्पल्याल्यौपधेराईस्य कफजननशक्तिः शुष्कस्य च त्रिदोपशमनशक्तिः, यौवने यादृशं वलं न तथा वार्धके, देशभेदात् हैमवर्तीमामपां स्पशोऽतिदानः यलाहकाग्निकुण्डादिषु तु उष्णः, कालभेदात् हेमन्त कुपोदकमुगं प्रीमं च शीलम् , ग्रीमे अग्नेरत्युष्णः स्पर्गः न तथा हेमन्ते इनि शक्तिभेदः । एवं च जलबनुना जल उशस्वस्य शीतस्त्रस्य वा नानुमान क्रमेण हैमवतीष्वप्मु अग्निकुण्डोदक्षु च - ..... अझकाण्डम्] संस्कृत हिन्दी व्याख्योपेतम् व्यभिचारात् । किञ्च अग्निर्न धूमं व्यभिचरति इन्यभिमानमात्रं नाव्यभिचारः यतोऽ- वस्थाभेदादनेकरूपाः पादास्तत्र स्यादपि कश्चित् धृमो यो नाग्नेः यथा शादकादपि शालको गोमयादपि इति । पुत्रञ्च यदि लौकिकेषु पदार्थेग्वियं दुरवस्था अनुमानस्य तहि का धार्ता अप्राकृतगम्ये धर्म इति तमागमचतुरन्तरेण अनुमानमात्रेण को मूढः साधयितुं प्रयतेतेति आगमैकसंबेद्य एव धर्मादिरर्थ इति भावः ॥ अवस्थाके भेदसे जैसे-~हरी पीपर कफ दा करती है और सूखी त्रिदोष नाश करती है। अन्नमें किमी अवस्था अकुर उत्पन्न होता है, दूसरी अवस्था नहीं । देशके भेदसे जैसे- हिमालयका जल ठण्डा होता है किन्तु किगी-किसी कुण्डमें उथा ( गरम ) भी होना है। कालके मेदसे जैसे-हेमन्त ऋतु कुआँका जल गरम और ग्रीष्ममें ठण्डा होता है। एतदेवोक्तं शारभाप्येऽपि तथाहि-~'लौकिकानामपि मणिमन्त्रीपधिम- तीनां देशकालनिमित्तवैचित्र्यवशाच्छक्तयो विरुद्धानेककार्यविपया दृश्यन्ते ता अपि तावनोपदेशमन्तरेण कंघलेग तणावगन्तुं शक्यतेऽस्य यस्तुम एतावस्य एतत्सहाया एतद्विपया एतव्ययोजनाश्व शक्तय इति क्रिमुताचित्यस्वभावस्य 'तस्माग्छन्द मूल एवातीन्द्रियार्थयाथाल्यावगम' इति ॥ ३२॥ बम तरह शक्तियाँ अवस्था, देश और कालके भेदसे भिन्न भिन्न है। फिर जतत्व हेतुसे अलमें शीतत्वानुमान नहीं हो सकता। 'अयं शीतः जलवा । इसी तरह उपास्वानुमान भी नही शे सकता । अतः जब लौकिक पदायाँके बारेमें तर्ककी दुर्दशा ही है ता धर्म निर्णयमें आगमरूपी नेत्रके दिना कोई मार्ग ही नहीं है ॥ ३२ ॥ शक्तिप्रतिबन्धेन व्यभिचाराच्चानुमानस्य न सामयमित्याह- नितिशक्तव्यस्य तां तामक्रियां प्रति । विशिष्टद्रव्यसम्बन्ध सा शक्तिः प्रतियध्यते ॥३३॥ तां ताम् अयस्य बढेः किया दाहादिः ताम् अर्थमियां प्रति नितिशक्तः निधितशतरपि द्रव्यस्य वयादेः विशिष्टद्रव्यसम्बन्चे अभ्रपटलचन्द्रकान्ता- विदन्यसम्बन्धे सति सा शक्तिः दाहजननसामर्थ्य प्रतियध्यते इति संवन्धः ॥ और उग उन वस्तुओंकी उन-उन क्रियाओंमें शक्तियों के नियत रहने पर भी किसी विशिष्टाध्यके सम्बन्धसे उत्तको शनि नष्ट भी हो जाया करती है। अयं दहति अग्निग्यात् इत्यादिभिरनुमाननं शक्यते दाहजनकन्वमनुमा चन्द्र- कान्नादिवतियन्धक्ट्रव्यममवधाने अग्नित्वस्य दाहजनकत्वन्यभिचारादिति वस्तु. पभावो नानुमानादनगन्तुं शरयः किं स्वागमा वेति भावः ॥ ३३ ॥ अ: 'अय दहति मित्तान' यह अनुमान भी चन्द्रकानमरिफ रहने पर व्यर्थ ही होगा। एम प्रकार वाघमात्र अननकै लिए तर्क दर्थ है किन्तु आगम हो सहायक है॥३३॥ ननु केनचिन्महापुरपेण यस्तो व्यवस्थितो भरियति तथा च न सकंग भर्माधर्ममिनिर्भविष्यतीनि चेन्महापुरपागामपि कपिलकणादादीनों मियो विप्रतिप. निदर्शनन तदीयतकांशामध्यवस्थितस्वमियाह- वाक्यपदीयम् बडे बड़े महापुरुषोंके तर्कसे मी धर्म और अधर्मका निर्णय असम्भव है। क्योंकि- यत्नेनानुमितोऽप्यर्थः कुशलैरनुमातृभिः । अभियुक्ततरैरन्यैरन्यथैवोपपाद्यते ॥३४॥ यतः कुशलैः अनुमातृभिः कपिलादिभिः यत्नेन अनुमितोऽपि 'जगत कारणं प्रधानम्' इत्येवंरूपोऽर्थः अन्यैः अभियुक्ततरैः कणादादिभिः अन्यथैव 'परिमाणुः जगत्कारणम्' इत्येवंरूपेण उपपाद्यते एवं तदन्यैरपि अन्यथा इति, ततश्र युक्तमुक्तं 'न चागमाहते धर्मस्तण व्यवतिष्ठते' इति । यतः यत्नेन विवचिता अपि आगमानपेक्षाः पुरुपोत्प्रेक्षामात्रनिवन्धनास्ता अव्यवस्थिता भवन्तीति नागमगम्य- ऽर्थे केवलेन तर्केण प्रत्यवस्थातव्यमिति तथा चाहुर्बादरायणपादाः 'तर्काप्रतिष्ठाना- ......." इति भावः ॥ ३४ ॥ अनुमान करने में बड़े चतुर कपिल आदि महर्षियोंने जिसको सिद्धि बड़े यलसे अनुमान द्वारा की हैं । उसोका दूसरे ( कणादि) महर्षिने उलटा अर्थ कर दिया है। जैसे कपिलने यत्नपूर्वक अनुमानसे जगत्का कारण प्रधान सिद्ध किया है और वैसी ही युक्तियोंसे कणादने परमाणुको जगतका कारण मान लिया। अतः चतुर अनुमाता भी धर्मके बारे में अनुमानसे कोई निर्णय नहीं कर सकता है ॥ ३४ ॥ नन्वेवं धर्माधर्मयोः प्रत्यहागोचरत्वेन शब्दोपमानयोश्च 'एते पदार्थाः मिथः संसर्गवन्तः आकाङ्क्षादिमत्पदोपस्थापितत्वात् , गवयपदं सप्रवृत्तिनिमित्तकं साधुपद- त्वात् ,' इत्यनुमानविधयैव 'प्रामाण्येन अनुमानानतिरिक्तत्वात् अनुमानस्य चाव्य- वस्थितत्वेन धर्माधर्मप्रमापकरवायोगात् धर्माधर्मप्रमितिनिर्मूलय स्यादित्याशङ्कामपा. कतु प्रत्यक्षानुमाने एव प्रमाणे इत्यभ्युपगमनं व्यभिचारयितुं प्रमाणान्तरमाह-यद्वा तर्कस्याव्यवस्थितत्वेन धर्माद्यप्रमापकत्वमुपपाद्य आर्पज्ञानस्य धर्मादिप्रमापकत्वेऽपि तस्यागममूलकरवमुपपादयितुं लौकिकालौकिकभेदेन द्विविधमार्पज्ञानं वक्तुमुपक्रमते- इस प्रकार अनुमान धर्माधर्म निर्णय में अप्रमाण है। आर्षशान प्रमाण होते हुए भी भागममूलक है क्योंकि-आर्ष ज्ञान दो प्रकारका होता है। एक लौकिक और दूसरा अगतिक- परेपामसमाख्येयमभ्यासादेव जायते । मणिरूप्यादिविज्ञानंतद्विदां नानुमानिकम् ॥ ३५ ॥ परेपामसमाख्येयं परेभ्यो वनुमशक्यम् मणिरूप्यादिविज्ञानम् मणिरूप्या- दितारतम्यज्ञानं यत् तद्विदां मणिरूप्यादिविदां रूपतकोणां सूक्ष्मान् कार्षापणा- दितारतम्यममधिगमहेतून् कल्पयित्वापि परेभ्यो वक्तुमशक्नुवताम् अभ्यासादेव अपरमणिपरिचेतृवचनपूर्वकात् प्रत्यक्षपौनःपुन्यात् नेन्द्रियादिभ्यः जायते तत् नानुमानिकं व्याप्तिज्ञानाजन्यत्वात्, न प्रत्यहं पटुभिरिन्द्रियैरपि अभ्यामरहितैरधि- १. शम्दोम्मानयान र पृथक् प्रामाण्यामध्यन । अनुमानगतार्थत्वादिनि वैशषिक मनम् ॥ २. रूप रूपभेदः दीनारादिःन नयन्नि परीश्चन इति रूपनाः सौगिका।

- ब्रह्मकाण्डम् ] संस्कृत-हिन्दी व्याख्योपेतम् गन्तुमशक्यतया इन्द्रियमात्राजन्यावात् , इति सौकिकप्रत्यक्षानुमानानिरिक्त विंचित लौकिकममाधिजन्यं भावनापरपर्यायमभ्यासाख्यं प्रमाणान्तरमाश्रयितव्यम् । एवं पदनभगान्धारवतादिभेदः प्रत्यक्षप्रमागविषयोऽपि अभ्यामरहितः प्रणिहितमनो. भिरपि अभियुक्ताधिगन्तुमशक्यतया गान्धर्वशास्त्रपूर्वकैण प्रत्यक्षाद्यतिरिक्तनाभ्या. पाध्यममाणेन संवेध इत्यास्थेयम् । तमिमं 'वो मे भ्राताऽऽन्तेति हृदयं मे कथयति' इतिकन्यकाज्ञानमिव लौकिकमार्पमित्याचदने । स्पष्टं चेदं प्रशस्तपादभाष्ये । शन्दोपमानयोश्च व्यातिज्ञानाजन्यवान्नानुमानान्तर्भाव इति तत्वम् ॥ ३५ ॥ लौकिक मगि भौर गिश्री आदिके मूल्यो नारतम्पका शान जानकार स्वर्णकारोको ही होतारे । वे इसे चाहने पर भी बना नदी मकने । क्योंकि किसी वस्तुको विशेषताका शान तो अभ्यास से ही होता है। इस अभ्यामसे होनेवाले ज्ञानको अनुमान नहीं कहा जा सकता। (क्योंकि न्याप्ति शान जन्य नहीं है।) यह अभ्यास नामका धान लौकिक प्रत्यक्ष और अनुमानसे भिन्न है भोर मैलिक तमापिसे जन्य है। अत: यह कोई अन्य प्रमाण है।॥ ३५॥ अलौकिकस्यापि आर्पज्ञानस्यागगमूलकत्वोपपादनायादृष्टविशेषजन्यत्वमाश्यानु महटविशेषजन्यं पित्रादिनामलौफिकमार्पज्ञानमाह-- प्रत्यक्षमनुमानं च व्यतिक्रम्य व्यवस्थिताः। पितरक्षःपिशाचानां कर्मजा एवं सिद्धयः ॥ ३६ ॥ प्रत्यक्षमनुमानं च व्यतिकम्य व्यवस्थिताः लौतिकप्रत्यक्षानुमानागो- वरवेन लोकप्रसिदाः पितरक्षापिशाचानां सिद्धयः उड्यादीनामवयत्रविभागम- लौव गृहान्तःस्थितवस्तुविषयक दर्शनमन्तर्धानादयश्च कर्मजा कर्णाधीनादृष्टविशेष. पदा पय सन्तीत्यर्थः । एवमपीणामपि जानं तपःमाध्यारष्टजन्यं न प्रत्यवानुमा- नजन्यमिति भावः ॥३६॥ और, भौतिक जो लौकिक प्रत्यक्ष और अनुमानसे न जानने योग्य लोकमें प्रसिद्ध पितर, इस और पिशाच आदिको सिदियों (जैसे कद कमरेको वान कर देना, प्रकट होना, देर नाना आदि)काधीन होती है। यह दो प्रकारका मा जान तपके द्वारा उत्पन्न अष्टसे जन्य है। अत: तर्क जन्य ॥३६॥ नन आप जानन प्रत्यक्षमिन्द्रियाजन्यत्वाचानुमानिक व्याप्तिज्ञानाजन्यग्यानी. सानिक सादृश्यज्ञानानन्यावान् नागमि शब्दशानाम्यन्यादिन्यसमागमेव कि दियन वाहू- यदि आपहाल इन्द्रियजन्य न होनेसे प्रत्यक्ष नको, स्याप्तिशन नन्य न होनेसे अनुमान स, सादस्यान इन्य न होनेमे उपमान नहीं, भोर मचान जन्य न होनेसे शाम साना- १. पाच-२ मम्बधिना ध्यातियोर शम्दादिवोपतः वि मुहानही ।

वाक्यपदीयम् . आविर्भूतप्रकाशानामनुपप्लुतचेतसाम् । अतीतानागतज्ञानं प्रत्यक्षान्न विशिष्यते ॥ ३७॥ न उपप्लुनानि रजस्तमोभिराकान्तानि चेतांसि येषां तेषामनुपपप्लुतचेतसाम् तपसा क्षीणकल्मपाणाम् अत एव आविर्भूत आवरणरहितः प्रकाशो ज्ञानं येषां ते तेपाम् आविर्भूतप्रकाशानां निरावरणस्यातीनां योगिनाम् यत् अतीतानार्गतज्ञानं जायते तत् प्रत्यक्षात् अस्मदादिप्रत्यक्षात् न विशिष्यते न भिधते न विलक्षण मिति यावत् ॥ यदपि लौकिकमापं तदपि आगमसहकृतयलपूर्वकप्रत्यहाभ्यासजन्य- नया प्रयत्नपूर्वकमानादिना दृश्यद्रष्टृणां सिद्धानां ज्ञानमिव उपनेत्रसहकृतचाचप- मिव च प्रत्यक्षमेवेनि ध्येयम् । यथा लोकः स्वमुखमपश्यन्नपि स्वच्छदर्पणे प्रतिविम्व रूपेण पश्यन्येचम् ऋषयः तपसा विशुद्ध अन्तःकरणे अस्मदादिभिरग्राह्यमपि वस्तु अव्यभिचरितं पश्यन्ति तच्च ज्ञानं योगजप्रत्यक्षजन्यं न लौकिकप्रत्यक्षजन्यमनुमान जन्यं धा येन लौकिकमत्यतानुमानयोरसंभवाल्लोकानां तत्राविश्वासो - भवेदिति भावः ॥ ३७॥ जिनके चित्त रजोगुण और तमोगुणसे अमिभून नहीं । जिन्हें प्रकाश (शान) हो गया है उन महषियोंको जो भूत और भविष्यका शान होता है । वर भी हम लोगों के प्रत्यक्षकी ही माँति प्रयच है''३७॥ नन्विन्द्रियासम्बद्धविषयकम् ऋपीनां ज्ञानं कथं प्रत्यक्षम् कुतो वा 'आप ज्ञानं मिथ्या इन्द्रियासम्बद्धविश्यकावे सति प्रत्यक्षत्वाच्छुक्तिरजतपदिति' इत्यनुमानेन न बाध्यते इत्यत आह- यद्यपि महषिर्योका यह प्रत्यक्षज्ञान इन्द्रियजन्य नहीं है। तथापि 'आपंचानं मिस्या इन्द्रियासम्बद्धविषयकरवे सनि प्रत्यक्षत्वार' इस अनुमान से बाधित नहीं होता। क्योंकि- अतीन्द्रियानसंवेद्यान्पश्यन्त्यार्पण चक्षुपा । ये भावान् वचनं तेपां नानुमानेन बाध्यते ।। ३८ ॥ इन्द्रियमनिक्रान्ता अतीन्द्रियास्तान् अतीन्द्रियान्-इन्द्रियैरग्राह्यान् अत एव असंवेद्यान् प्रत्यक्षपूर्वकैरनुमानादिभिरपि अग्राह्यान् भावान् अन्तर्यामिगं, चतुर्विधपरमाणून् , अविवृत्तं शब्दब्रह्म, देवताः, कर्मणां फलप्रदसंस्कारम् फलजनन- शक्तिवैकल्यं महायान्तरप्रतिबोधितशते. फलदानाभिमुरयम् , आतिवाहिक' शरी- रम् , इत्येवमादीन् ये ऋपयः आर्पण व्यावहारिकादम्येन अलौकिकसमाधिरूपतपी. लब्धेन चक्षुधा चनुः सदृशेन योगजधर्मण पश्यन्ति तेषां वचनम् अनुमानेन अव्यवस्थितेन अतीन्द्रियार्थे प्रार्दिनुमशनेन च न वाध्यते इत्यर्थः ॥ लौकिकप्रत्यते विषयन्द्रियसम्बन्धस्य कारमयपि योगजनन्य तस्याकारणत्वेन आर्पज्ञानस्य १. इह मृतस्य देशान्तरे शरीरान्तरग्रहगाय यदन्नरा भव शरीर तदेशमतिवाइयति तदानिवादिकम् ।।

-
ब्रह्मकाण्डम् ] संस्कृत-हिन्दी व्याख्योपेतम्
प्रत्यक्षस्व वाधकाभावः प्रत्यक्षपूर्वकस्यानुमानस्यातीन्द्रियार्थे अप्रवृत्त्या अनुमाना-
बाध्यत्वं चेति भावः ॥ ३८॥
जो इन्द्रियोंसे गृहीत नहीं हो सकने और जो प्रत्यक्षमूलक अनुमानसे भी अग्राह्य हैं ।
भाव ( पदार्थ जैसे भगवान् , परमाणु, शन्नब्रह्म, देवता आदि) जिन्हें महपियोंने आर्ष
अलौकिया समाधि रूप सपसे प्राप्त ) नेत्र (नेत्र सदृश योगसे उत्पन्न धर्म) के द्वारा देखा
। उनके वचन अब्यवस्थित अनुमानसे बाधित नहीं हो सकते ॥ ३८॥
यद्यपि ऋषीणां वचनमनुमानेन न वाध्यते नथापि तद्वचनात् ये प्रर्वतन्ते तेषां
नवृनि' शक्या कर्तुम् , अनुमानेन तद्वचनप्रामाण्ये संशयोत्पादादत आह-
और इन वचनोंको प्रमाण मानकर जो कार्यरत है उन्हें रोका मीनहीं जा सकता। क्यों कि-
यो यस्य स्वमिव ज्ञानं दर्शनं नातिशते ।
स्थितं प्रत्यक्षपक्षे तं कथमन्यो निवर्तयेत् ॥ ३९ ॥
यः परिग्रहीता यस्य योगिनः दर्शनं स्वं ज्ञानमिव नातिशङ्कते न व्यभि-
परशङ्कां याति प्रत्यक्षपक्षे स्थितं योगिनां वचनं स्वं प्रत्यक्षमिव मन्यमानम्
म् अन्यः तर्कशरणः कथं निवर्तयेत् तदीयानुमानेषु तस्यानाश्वासादिति
नावः ॥३९॥
जो व्यक्ति जिस योगीके प्रत्यक्षको अपना प्रत्यक्ष मान बैठा है। उसे दूसरा व्यक्ति
के द्वारा अपनी और कैसे खींच सकता है। क्योंकि उसे उसके तर्क पर विश्वास ही
रही है ॥ ३९॥
इह कृतानां कर्मणां देहादूर्ध्वम् इष्टानिष्टफलप्राप्तिर्भविष्यतीति ऋपिवचनानु-
कारिणामाप्तानां वचनवलादेव सर्वैर्मनु-यैः शास्त्रोपदेशं विना ब्राह्मणत्वादिजातिरिव
निस्मन्दिग्धं मन्यते तथैवानुगम्यते चेत्याह--
इदं पुण्यमिदं पापमित्येतस्मिन्पदद्वये ।
आचण्डालं मनुष्याणामल्पं शास्त्रप्रयोजनम् ॥ ४० ॥
घण्डालेभ्य आ इति आचण्डालं चण्डालपर्यन्तं मनुष्याणाम् इदं पापं इदं
पुण्यम् इत्येतस्मिन्पदद्वये शास्त्रप्रयोजनम् अल्पम् इति सम्बन्धः ।। एनादी
ख्याति प्राप्तमपीणां वचनं यत् पामरा अपि जनाः शास्त्रमनधीत्यापि ऋपिवचनानु-
सार्याप्तवचनविश्वासादेव पुण्यं पापं च जानन्तीति ततः कथं केनापि ऋपिवचनानु-
सारिणः निवर्तयितुं शश्या इति भावः ॥ ४० ॥
यही कारण है कि-ब्राझगसे लेकर चाण्डाल तक जितने मनुष्य है । वे सब 'यह पुण्य है'
और 'यह पाप है। (यह ऋषियों के वचनों से हो आन लेते है और विश्वास करते है।) अतः
टनके लिए शासका प्रयोजन अस हो।
तात्पर्य यह है कि आशान तर्ककी सहायताके बिना स्वयं प्रमाण है। क्योंकि वह
भागममूलक है।॥४॥

५० वाक्यपदीयम् ननु विविधमपि आर्य प्रत्यक्ष यद्यपि लौकिकप्रत्यवानुमानागमेभ्योऽनिरिनं तथापि आगमसकृतप्रत्यक्षजन्यतया आगमोदीरिततपोनुष्ठानजन्यादृष्टजन्यतया च आगममूलकमेव मत् । अत एवोक्तम् 'ऋषीणामपि यज्ञानं तदप्यागमपूर्वकम्' इति । एवं च आगमा स्वप्रामाण्याप तर्कमपेक्षत इति तकापेक्षया दुर्बल इति तन्मूलकस्य आर्पज्ञानस्य सुतरां दौर्बल्यमिति शङ्कामपनुन् आगमरय स्वतः प्रमाणत्वेन तर्कान पेक्षणात् र्कावाध्यत्वमाहया एवमार्पज्ञानत्यादृष्टविशेषजन्यत्वे उपपादिवे अदृष्टभ्यागमवेद्यतया तजन्यमापं ज्ञानमागममूलकमिति मिमिति सांप्रतमागमस्य सर्वतो बलवत्त्वाय स्वतः प्रमाणतामाह- इसी तरह आगमोंका प्रामाण्य भी तर्कके अधीन नहीं है। किन्तु आगम तर्फको अपेश प्रबल और स्वतः प्रमाण है। चैतन्यमिव यश्चायमविच्छेदेन वर्तते । आगमस्तमुपासीनो हेतुवादैन बाध्यते ॥४१॥ अविच्छेदेन-रखतः, स्वप्रकाशतया वर्तमान चैतन्यमिव यश्चार्य श्रुतिलक्षणः आगमः अविच्छेदेन विच्छेदोऽप्रामाण्यम अविच्छेदः प्रामाण्यम् तेन स्वतः प्रमाणतया वर्तते तम् स्वत: प्रमागमागमम् उपासीनः आगमानुरोधेन प्रवर्तमानः हेतुवादः तार्किकवादः, न वाध्यते न्याय्यात्पथो न विचाल्यते इत्यर्थः । जैसे भविच्छेद रूपसे (स्मय प्रकाश ) चैतन्य वर्तमान है। वैसे यह वेदरूपी आगम भी अविच्छेदरूपसे (स्वनः प्रामाण्यसे ) युक्त है। ऐसे स्वतःप्रमाण आगमों पर विश्वास करनेवाले लोग तकवादसै विचलित होकर आगममे विश्वास नहीं खो बैठने । पतदुक्तं भवति यथा विज्ञाने जाने कश्चिदपि जानामि नवैति न संदिग्धे न जानामीति वा न विपर्यस्यति अतः विज्ञानं स्वप्रकाशमास्थीयते इति न तत्प्रकार शायानुव्यवसायो' ज्ञाततालिङ्गकानुमितिर्वाच्यते एवं आगमेऽपि कश्चिदपि 'आगम प्रमाण न वेति न संदिग्धे "न प्रमाणमिति वा न विपर्यस्यति अत. आगमः स्वतः प्रमाणमित्यास्थीयते इति न तत्प्रामाण्याय तर्कादिकमपेक्ष्यते इति आगमोऽनपेततया तकांदिभ्यो बल्वानिति तर्कावाध्य इति ॥ यहा चैतन्यमिव यथा कचिदपि अहमस्मीति प्रन्ययानुगते अनादिचैतन्यरूपे आमनि 'अहं वा नाहं वा' इति न संदिग्धे न च माहमेव' इति विपर्यस्यत्ति तथा योऽयं श्रुतिस्मृतिलक्षणः आगमः अविच्छेदेन अनादिशिष्टपरम्परया धर्तते प्रमाणमेवेति स्वीक्रियते न च तत्र कश्चिदपि 'प्रमाणं न चा' इति सन्दिरारेन च 'अप्रमाणमेव' इति विपर्यस्थति किं बहुना येऽपि भिन्नाः प्रवादिनस्नेऽपि कार्याकार्य- १. मुरारिमित्राण मने शानमनुव्यवसायेन गूखते। मट्टानां मते शानमतीन्द्रिय शानजन्या शातता प्रत्यक्षा तया शानभनुमायते । वेदान्तिनस्तु शनं स्वप्नकाशमानिष्ठन्त तन्मतेनेदमिति- ध्येयम् ।

ब्रह्मकाण्डम् ] सस्कृताहन्दी व्याख्यापेतम् भक्ष्याभयागम्यागम्यादिषु अहिंसावादानप्रमचर्यतपःसत्यवदनप्रभृतिषु च यमा- गममुपजीव्यैव प्रवर्तन्ते न हि तेषां कार्याकार्यादिनिर्णयः स्वागममूलः स्वागमस्य अनीन्द्रियार्थादर्शिपुरुषबुद्धिप्रभववनाप्रमाणत्वात् ते सर्वत्रादिभिरुपसेवितमागमम् , उपासोनः आश्रितः हेतुबादः तानिकवादैः न वाध्यते न न्याय्यात्पथो विचाल्यत इत्यर्थः ॥ अयवा-जैसे 'मैं हूँ' इस ज्ञानके दाद 'यद मै हूँ या नही' यह सन्देह नहीं होता और 'मैं नहीं हूँ इस तरह उलटा शान भी नहीं होता। वैसे यह श्रुतिस्मृतिरूपी आगम अनादि परम्परासे प्रमाणरूपमें स्वीकृत हैं और इसके प्रामाण्यके बारेमे न तो किसीको सन्देह है और न तो अप्रामाण्यरूप उलदा ज्ञान ही है। इस तरह सब लोगों के द्वारा स्वीकृत आगमपर विश्वास करनेवाले लोग तार्किकवादों के द्वारा न्यायमार्गमे विचलित भी नहीं किए जा सकते है । तात्पर्य यह है कि आगम भी तर्फमे प्रबल है ।। ४ ।। स्पष्टीकृतश्चायमर्यो न्यायमार्याम् तद्यथा-'चातुर्वर्ण्यचातुराभम्यरूपचैप महा- जनी चंदपथप्रवृत्तः आगमान्तरवादिभिरप्यप्रत्याख्येय एव । तथा चैते बौद्धादयोऽपि दुरात्मानो वेदप्रमाण्यनियमिता एव चाण्डालादिस्पर्श परिहरन्ति निरस्ते हि जातिवादावलेपे छ चाण्डालादिस्पर्श दोपः ... ईदृशश्वायमनन्यसामान्यविभवो महाभागी वेदनामा प्रन्यराशिः यदन्ये याद्यागमवादिन एवमेनं स्पर्धन्ते ते स्वागम प्रामाण्यमभिवदन्तो वेदरीत्याभिदधनि । वेदे यथा तथा प्रवेष्टुमीहन्ते वैदिकाना- नन्तरान्तरा स्वागमेषु निवान्ति वेदस्पर्शपूतमिवात्मानं मन्यन्ते तेपामप्यन्तर्रदर्ष ज्वलतीव (वेद) प्रामाण्यम्' इति ॥ ४ ॥ तदेवमागमस्य तांदलवत्वमुक्त्वा आगमानपेक्षादनुमानाद्धर्माधर्मादिविषये प्रवर्तमानस्य दण्डमाह- भौर धर्म-अधर्मका निर्णय भी केवल अनुमान के बलपर नहीं हो सकता। क्योंकि- हस्तस्पर्शादिवान्धेन विपमे पथि धावता । अनुमानप्रधानेन विनिपातो न दुर्लभः ॥ ४२ ॥ विपमे दुर्गमे पथि गिरिमार्ग चतुप्मन्तं नेतारमन्तरेण हस्तस्पर्शात् कचिन्मार्गकदेशं हस्तस्पर्शनावगम्य तत्प्रत्ययादपरमपि मार्गक्देशं धावता त्वरया गच्छना अन्धन इय विषमे प्रत्यक्षानुमानाभ्याममंवेद्ये पथि दृष्टादृष्टफले कर्मणि आगमं नेतारमन्तरेण एकदेशे केवलेनानुमानेन प्रतीत्य स्थालीपुलाकन्यायेन एक- देशान्तरमपि तत्प्रत्ययात् धावता त्वरया आगममनपेक्ष्य प्रवर्तमानेन भनुमानं प्रधान यस्य तेन अनुमानप्रधानेन विनिपातः पतनम् अपरत्र प्रत्यवायः न दुर्लभः अवश्यम्भावीत्यर्थः ॥ ४२ ॥ जैसे विषम (दुर्गम) मार्गमें किसी आँखवालेकी सहायताके विना केवल हापसे छूकर सर्वत्र समतल भूमिका अनुमानकर भन्या व्यक्ति दौड़ता है और विना गिरे नहीं बचता। वेसे अनु मान और प्रत्यक्ष प्रमाणोंसे न जानने योग्य दृष्ट और अदृष्ट फल देनेवाले कर्ममें भागमरूपी स h सहायकके विना अनुमान के आधार पर कार्य करनेवाले व्यक्तिका पतन दुर्लभ नहीं है ।। ४९ ॥ 'म चागमाहते' इत्यारभ्य एतावता प्रबन्धेन धर्माधर्मयोस्तकांगम्यन्वमा ज्ञानस्य च आगमपूर्वकत्वमुपपाद्य धर्माधर्मयोरागमैकवेद्यत्वमुपसंहरति- तस्मादकृतकं शास्त्रं स्मृतिं च सनिबन्धनाम् । आश्रित्यारम्यते शिप्टैः शब्दानामनुशासनम् ॥ ४३ ॥ तस्मात् तस्याव्यवस्थितत्वेन आर्पज्ञानस्य चागमपूर्वकरवेन धर्माधर्मयोरा- गमैकवेद्यत्वात् अकृतकम् अपौरुषेयं शास्त्रं पुरुपहितोपदेशाय प्रवृत्तमानायं निवध्यतेऽनेनेति निबन्धनं मूलं तेन सहितां सनिवन्धनां शिष्टपरम्पराचरणानु- गृहीता 'पोदरादीनि यथोपदिष्टम्' इत्यादिरूपां स्मृति च आश्रित्य प्रमाणीकृत्य शिरैः पाणिन्यादिभिः शब्दानामनुशासनमारभ्यते क्रियते इत्यर्थः ॥ अयं भावः शब्दानुशासनमारभमाणाः पाणिन्यादयः अनादिप्रवृत्तं व्याकरणा- गममुपजीन्यैवारभन्ते अत एव शाकल्यस्य शाकटायनस्य इति पूर्वागमस्मर्तृन स्मरन्ति तेऽपि हि स्वपूर्वान् स्मर्तृन् इति अनादिप्रवृत्तव्याकरणागमूलभूतश्रुतिमूलक एव साध्वसाधुप्रविभाग इति 'तस्मान्निबध्यते पूर्वः साधुत्वविपया स्मृतिः' इति यदुक्तं तदुपपन्नमिति ॥ ३ ॥ इसीलिए अपौरुषेय शास्त्र और शिष्टाचार परम्परा स्वीकृत स्मृतियोंको प्रमाण मानकर । पाणिनि, कात्यायन और पतजति आदि शिष्टमहर्षियोंने शब्दानुशासन (व्याकरण-शास्त्र) का निर्माण किया है ॥ ४३ ।। (वाक्यपदीयकी इस कारिका तक ध्याकरणशास्त्र निर्माणका प्रयोजन कहा गया है और 'अथशब्दानुशासनम्' वाक्य की यह विस्तृत व्याख्या है। अब वाक्यपदीय ग्रन्थका भारम्भ विषयकी दृष्टिसे किया जा रहा है।) लोके नदीघोपतन्त्रीशब्दकाकवाशितादौ, व्यवहतपु, पदार्थबोधकत्वेन प्रसिद्ध भोप्रेन्द्रियग्राझे ध्वनी च शब्दशब्दप्रयोगात् शब्दशब्दस्य सामान्यशब्दतया प्रकरणादिकं विना विशेपेऽवस्थानासम्भवेन शब्दानुशासनेऽस्मिन् शास्त्रे नदीघोषा. दीनामप्यनुशासनप्रसनः इति इदानीमनुशासनकर्मीभूतं तपरसूत्रभाष्यादावुक्तं ध्वनिव्यङ्गय शब्दविशेषमभिधातुमाह- यद्यपि नदीकी हरहराइट, वीणाका नाद और कौवे की काँच काँव भी शब्द ही कही जाती है। तथापि इस व्याकरण शास्त्रमै हम उन शब्दों का अनुशासन ( साधुत्व ) बेतावेगे- द्वाघुपादानशब्देषु शब्दो शब्दविदो विदुः । एको निमित्तं शब्दानामपरोऽर्थे प्रयुज्यते ॥४४॥ उपादीयते स्वरूपेऽध्यारोप्यते अर्थरूपतां विहाय स्वरूपमिव आपाद्यतेऽों येन स उपादानः वाचक शब्दस्तस्यार्थरूपेण रजोः सर्परूपेणेव विवर्तनागन्जुरिव सपस्य अर्थस्य विवर्तीपादानं शब्दः, शब्दार्थयोः कार्यकारणभावादेव योऽर्थः स शब्दः यः ब्रह्मकाण्डम् । संस्कृत हिन्दी व्याख्योपेतम् शब्दः सोऽर्थ इति शब्दार्थयोस्तदारयमिति ध्येयम् । ननु अग्नेगित्यादौ वाच्य- वाचकयोरुभयोरपि एकरूपतया नार्धरूपस्य शब्दे आरोप इति न तत्राग्निशब्दोऽग्नि- शब्दस्य विवर्तोपादानमिति तस्य उपादानशब्दपदेन महणं न स्यादिति चेदुच्यते द्वयोः शब्दयोर्भेदमारोप्य संज्ञासंज्ञिभावस्येव उपादानोपादेयभावस्य स्वीकार इत्य- दोपात् । यहा उपादीयतेश्यों योध्यतेऽनेनेति व्युत्पत्या उपादानशब्दोऽत्र वोधकपर एव न विवर्तीपादानपर इति न क्षतिः इति ॥ तथा च उपादानशब्देपु वाचकशब्देषु उच्चारणेन प्रकाशनीयेषु द्वौ शब्दों व्यायव्यञ्जकरूपी लच्यते इति शब्दचिदी वैयाकरणाः विदुः। शब्दद्वयागीकार किमानमिति चेत् शन्दस्वरूपावधारणरूपम् अर्थावधारणरूपं च कार्ययमेव तदही- कारे मानमित्याह-एक इति । एकः स्फोटस्य ( यन्त्र निलीय स्थिताः येनानु- गृहीता भ्रूयमाणाः पर्यावाः शब्दाः अर्थ प्रतिपद्यन्ते सः) शब्दानां वैखरीरूपाणां निमित्तम् । अयं भावः-श्रूयमाणशब्दानां न वाचकत्वं किन्तु तदभिव्ययस्फोट- स्यैवेति स्फोटन्यञ्जकत्वादेव अर्थविवक्षया प्रयोक्ता शब्दान् वैखरीरूपान् प्रयुके इति स्फोटः एषां शब्दाना निमित्तमध्यनेन वसतीम्यादौ फलस्यापि हेतुत्वदर्शनादिति, अपरः स्थानवायवभिधातरूपाकरणव्यापारात् श्रोत्रानुपाती वैखरीरूपः अर्थे प्रयुज्यते अर्थबोधेरछ्या स्फोटप्रकाशनाय उञ्चार्यते । यद्वा एकः करणव्या. पारादुपजातक्रमः वैखरीरूपः श्रोतृवुद्धिस्थस्य अक्रमस्य प्रत्यायकस्य निमित्तम् सदुपायत्वात्तस्य, अपरः श्रोतृशुद्धिस्थः अक्रमः स्फोटः अर्थे अर्थवोधाय प्रयुज्यते, उपस्याप्यते तत्रैव प्रत्याय्यप्रत्यायकशक्तरवस्थानादित्यर्थः ॥ जो उपादान (वाचक) शब्द वैय्याकरणों के द्वारा व्याध और व्यञ्जा के रूप में माना गया है। जिसमें एक स्फोट रूपी शब्द जो वैखरीका निमित्त (कारण) है और दूसरा वैखरी रूपी शब्द जो अर्थबोधकी इन्चासे उच्चारित होता है। अथवा जो उपादान (दाचक) शब्द वैय्याकरणोंके द्वारा व्यगय और व्याकके रूपमें माना गया है। जिसमें एक (खरो रूप) स्फोटका निमिच है और दूसरा वह है जो श्रोताओंकी बुद्धिमें स्थित अक्रम स्फोट है और अर्थबोध के लिए उपस्थित होता है। पदा सहकारा- अविभत्तो विभक्तेभ्यो जायतेऽर्थस्य वाचकः । शब्दस्तवार्थरूपारमा सम्भेदमुपगच्छति ॥ अविभक्तोऽक्रमः श्रोतृवुद्धिस्थः विभन्नेभ्यः क्रमवद्यो वर्णेभ्यः वैखरीरूपेभ्यः अभिव्यक्तः अर्थस्य वाचको जायते तत्र बुद्धौ अर्थरूपान्मा शब्दः सम्भदं तादात्म्य. मुपगच्छति बौद्धशब्दार्थपोस्तादाम्यमिति बौनव शब्देनार्थप्रतीतिरिति भावः । एतदेव तपरस्त्र भाष्ये उक्तम्- ननिः स्फोटश्च शम्दाना बनिस्तु सलु लक्ष्यते । अल्पो महाश्व शाजिदुभयं तत्स्वभावतः ।।

६२ वाक्यपदीयम् अत्र कैयटः 'ध्वनिः स्फोटश्च व्यङ्ग्यो व्यञ्जकश्च स्त इति शेपः, शब्दाना व्यगयानां सम्बन्धी व्यञ्जको यो ध्वनिः स एव महानल्पश्च लक्ष्यते व्यङ्गयस्व- भिन्नकाल एव, उभयं-व्यङ्गयो व्यञ्जकश्च प्रमाणेन स्वभावतः-स्वरूपेण सिद्धा केपांचित् व्यक्तानामुभयं गृह्यते अव्यक्तानां तु घनिरेव' इति । एतदेव 'एवं तर्हि स्फोटः शब्दः ध्वनिः शब्दगुण' इति भाष्येणाप्युक्तम् 'शब्दगुण.-उपकारको व्या कत्वेनेत्यर्थः इति कैयटः। ध्वनिः-वर्णा कृतध्वनिश्च, वैकृतध्वनेरप्युपलब्धिपौनः पुन्यकारणत्वात् व्यञ्जकत्वम् 'व्यजकत्वेनेति-स्फोटोपलब्धिप्रतिवन्धकस्तिमितवाय्व- पसारणद्वारा स्वधर्मरूपिततदुपलब्धिहेनुत्वेनेत्यर्थः' इत्युद्योतः । ध्वनिपदेन वैखरी, स्फोटपदेनाभिव्यक्तकत्वादिक आन्तरः शब्दः । ध्वनिस्तु इत्यस्य वैकृतध्वनिस्तु इत्यर्थः।। ये दोनों अर्थ परस्पर भिन्न नहीं हैं। प्रथम अर्थमें अकम स्फोर निमित्त और सनम वैखरी प्रतिपादक माना गया है। इनका अभिप्राय प्रयोक्ता से है। क्योंकि वक्ताको बुद्धि स्थित अक्रम स्फोट है। वह जब बोलता है तो अक्रम स्फोटसे वैखरी रूपी सक्रम स्फोट उत्पन्न करता है। दूसरा मत वैखरीको निमित्त और अक्रम (स्फोट) को प्रतिपादक मानता है। इनका अभिप्राय श्रीनासे है। क्योंकि श्रोता पहले वैखरी वाणीसे शब्द सुनता है फिर बुद्धिमें अक्रम स्फोट से वही अर्थरूपमें समझता है। तात्पर्य यही है कि जिससे प्रथम शान उत्पन्न होता है वह निमित्त है और जिससे बादमें शान होता है वह प्रतिपादक है। वक्ता पहले मनमें मोचकर बोलता है इसलिए प्रथम अर्थ उसके पक्ष में है। श्रोता सुनकर समझता है अतः दूसरा अर्थ उसके पक्षमें है॥४४॥ व्यायव्यञ्जकशब्दयोर्भदमाह- इस प्रकार स्फोट व्यगय और वैखरी व्यजक सिद्ध होती है । व्यङ्गय और व्यजक शब्दोंके भेदके बारे में विद्वानोंके दो मत हैं। आत्मभेदस्तयोः केचिदस्तीत्याहुः पुराणगाः । बुद्धिभेदादभिन्नस्य भेदमेके प्रचक्षते ॥४५॥ केचित् कार्यकारणयोभदवादिनः पुराणगाः पूर्व स्मर्तारः तयोः निमि तप्रतिपादकयोः स्फोटबैखयों: आत्मभेदः स्वभावान्यत्वं भेद इनि यावत् अस्ती त्यातुः । पके कार्यकारणयोरभेदवादिनः' अभिन्नस्य एकस्यैव शब्दस्य बुद्धिभे दात् स्फोटः मनोग्राह्यः वैखरी श्रोत्रग्राहा इत्येवंरूपात् भेदं नानात्वं प्रचक्षते न स्वत इत्यर्थः ॥ ४५ ॥ उमें एक कार्यकारण भेद मात्रेपले. प्रत्येक लेग है जो स्फोट और वैखरीमें स्वभावभेद होनेसे भेद मानते है। और दूसरे कार्य और कारणमें अभेद माननेताले हैं । वे पकही स्फोटके बुद्धि-भेद होनेके कारण भेद मानते हैं। १. कपालन जलाहरणादिरूपकार्यस्यासमवः घटेन तस्य संमवश्च तयोर्मेंदे वीजम् । २. मृस्ट इनि समानाधिकरण्येन प्रनीनिस्तयोरभेदे बीजम् ।

ब्रह्मकाण्डम् ] संस्कृत-हिन्दी व्याख्योपेतम् ६३ जो भेद वादी हैं वे घटको कारण कपालमें पानी मरनेकी शक्ति न रहने परभी कार्य घटमें उम शक्तिको देखकर कार्यकारणमें परस्पर भेद मानते हैं। और इसे स्वामाविक भेद कहते हैं। और जो अभेद वादी हैं वे मिट्टी का घडा' इस वाक्यमें मिट्टी और घड़े में भेद नहीं मानते। इनके मतसे एकही शन्द बुद्धि भेदसे भिन्न भिन्न माना गया है। जैसे मनोग्राह्य स्फोट और श्रोत्रयाय वैखरी ॥ ४५n 'तत्रैको निमित्तं शब्दानाम्' इति यः स्फोटवैखर्योः कार्यकारणभाव उन्तस्त- मुपपादयति- स्फोट और वैसरीके अभेद पक्षमें मी कार्यकारण भाव बना रहता है। अरणिस्थं यथा ज्योतिः प्रकाशान्तरकारणम् । तद्वच्छन्दोऽपि बुद्धिस्थः श्रुतीनां कारणं पृथक् ।। ४६ ।। अरणिस्थं निघर्षगान्प्राक् काष्ठान्तः स्थितं अविवृत्तं ज्योतिः यथा विवर्त- काले प्रकाशान्तरकारणं प्रकाशान्तरस्य 'उबुद्धस्य वह्नः कारणमुपादानं भवति तद्वत् तथा चुद्धिस्थः बुद्धिरन्तःकरणं तत्र भिन्नशब्दबीजरूपेणावस्थितः तदवच्छि- नहृदयाकाश देशस्थ इत्यर्थः, हृदयदेशे बुद्धिविषयीकृत इति यावत् । 'तेनाकाशदेशः शब्द' इति भाग्येण न विरोधः । शब्दः अविवृत्तः अक्रमः स्फोटोऽपि अर्थबोध. नेच्छया स्थानकरणाद्यनुगृहीतः विवर्तकाले पौर्वापर्यवानुपलभ्यमानः पृथक् भिन्नानां धूयन्त इति श्रुतयस्तासां श्रुतीनां भिन्नभिन्नघटपदादिशब्दानां कारणं भवति इत्यर्थः । जैसे अरगि (काष्ठ ) में रहने वाली ज्योति ( अग्नि) जद मथनके बाद प्रकट होती है। तब दाइक अभिका कारण हो जाती है। वैसे बुद्धि ( अन्तःकरण) में स्थित शब्द ( अक्रम स्फोट ) मी अर्थबोध की इच्छासे क्रमसे प्रकट होकर भिन्न भिन्न श्रुतियों ( शब्दों) का कारण माना जाता है। अयं भावः यथा वीजावस्थमविवृत्तं ज्योतिरुत्तरेण प्रकाशात्मनाऽभिज्वलितं स्वरूपपररूपप्रतिपत्तिकारणं भवति एवं वक्तूबुद्धिस्थः रफोटः वक्तृप्रयवाभिव्यङ्ग्य- प्वनिरूपरूपिनः परश्नवणगोचरो भवति स च परेण श्रुतः तद्बुद्धिस्थं स्फोटमभि. प्यनक्ति ततोऽर्थबोध इति व्यकम्बनिभेदानुपातेन पौर्वापर्यवानुपलभ्यमानः स्फोटः स्वरूपपररूपयोः प्रकाशको भवति इति प्रकाश्यप्रकाशभावमूलक एव चैखरी. स्फोटयोः कार्यकारणभाव इति ॥ ४६॥ अरणा में भाग बीजरूपमें है। वह मन्थनके बाद प्रकट होकर प्रकाशक आग बन जाती और प्रकाश करती है। इसी तरह वक्ताको बुद्धि में वक्ताकै प्रयत्नसे ध्वनि बनना है और श्रोताके कानों तक पहुँचकर उसकी बुद्धि में स्थित स्फोटको अभिव्यक्त करता है तब अर्थशान होता है । इस लिर स्फोट ही अपना और वैगरीका प्रकाशक है ॥ १६ ॥ स्फोदग्य बुद्धिस्यवं धनिव्यङ्गयत्वं चोपपादयन् तस्यैवत्वेऽपि घटवन्यभिन्य- निकाले ने पटवोधकत्वमित्याह- यह एक, बुद्धिस्प और ध्वनिन्यङ्गा सोट एक निसे दूभरी पनिका बोधक नहीं होता क्योंकि- ६४ वाक्यपदीयम् वितर्कितः पुरा बुद्ध्या क्वचिदर्थे निवेशितः । कारणेभ्यो विवृत्तेन बनिना सोऽनुगृह्यते ।। ४७ ॥ पुरा उच्चारणा प्राक् बुद्ध्या अन्तःकरणवृत्त्या योऽयं शब्दः सोऽर्थों योऽर्थः म शन्दः इत्येवंरूपाध्यासात्मकसङ्केतबुद्धिरूपया वितर्कितः विशिष्टेन अन्यव्यावृत्तेन रूपेण विपयीकृतः क्वचिदर्थे यस्मिन्नर्थे यादृशध्वन्यभिव्यक्तस्य स्फोटरूपस्य शब्द स्याध्यासस्तस्मिन् निवेशितः तत्तादात्म्यापन; यः शब्दः सः तद्बोधनेच्छया कार- णेभ्यः स्थानप्रयत्नेभ्यः विवृत्तेन सूक्ष्मे वनौ कारणव्यापारेण प्रचीयमाने स्थूलेन नादात्मना प्राप्तविवर्नेन ध्वनिना अनुगृह्यते अविक्रियाधर्मकोऽपि विक्रियाधरण ध्वनिमनु ध्वनिधर्मेण कत्वगत्वादिना भासते इत्यर्थः । तथा च घटध्वन्यभिव्यक्तस्फो- टस्य पटध्वन्यभिव्यक्तस्फोटा देन न घटध्वन्यभिव्यक्तस्य तस्य पटबोधकतेति भावः ॥ उच्चारण के पहले ही दुद्धि (अन्तःकरणको दृति) से शब्द और अर्थमें अभेदाभ्यास कर किसी एक अर्थमें विचारा गया और उसी अर्थसे तादात्म्य प्राप्त शब्द ( स्फोट )फिर बोध कराने की इच्छा से स्थान और प्रयत्नोंके द्वारा मासिन होकर स्वयं अविकारी मो कत्व, गत्वरूप विकृनधर्मों में भासता है और घटध्वनि मभिग्यतत्पोट पटध्वनिसे अमिन्यतस्फोरसे निन्न है अतः घरध्वनि पटका वोध नहीं कराना ।। ४७ ।। एतदुक्तं भवति-बौद्धस्य शब्दस्य बौद्धनार्थेनाध्यासस्पात्मङ्केनात् बौदादा- र्थयोरतादात्म्यमुपगम्यते इति वौद्धे शब्द अर्थवोधननिका वाच्यवाचकभावरूपा शातिरस्तीत्यवगम्यते । तदुक्तं निरुक्तमाप्ये 'व्याप्तिमत्वातु शब्दस्य' इति प्रतीक [निरकनिघण्टु १२ ]' अभिधानाभिधेयरूपा बुद्धिहृदयाकाशप्रतिष्टिता परवोध- नेच्छया पुरपेणोदीर्यमाणा कण्टादिषु वर्णभावमापद्यमाना वाद्याकाशदेशम्धं शब्द स्वस्वरूपं कृत्वा श्रोनद्वारेण स्थितां श्रोतुर्बुद्धिमनुप्रविश्य सर्वार्थसर्वाभिधानरूपा तबुद्धिं व्यामोति पुरषप्रयत्नजा वक्त्रोद्धानाः परं विनश्यन्ति न शब्दः स च तदनु रकोऽर्थप्रत्ययं जनयति इति तत्यपदत्वादिकं यत्रोद्धातेप्वारोपयन्ति तद्गतनाशादि च तस्मिन् पुरुषबुच्चदस्थस्यैव चार्थस्य प्रत्ययमादधानि शब्दः तेनैव तस्य सम्बन्धात् इति । एवं च अभ्यासः तादात्म्यग्राहकः तादाम्यंच शक्तिप्राहकमिति । प्रयोक्ता अर्थ वोधनेरछायां मत्या याइशध्वन्यभिव्यकम्य स्फोटरूपस्य शब्दस्य यस्मिन्नर्थे तादा. म्यं गृहीतवान् तदभिव्यञ्जनाय नादृशध्वनि करोतीति तेन च ध्वनिना स्वरूप- रूपितः स शब्दः अभिव्यज्यते तवः शक्तिविषयसंस्कारे उद्बुद्ध शाब्दबोधो भवति । यथा घटादी मृदाद्यात्मकत्वग्रहे मृदादी घटाद्यमिव्यक्तिराकिशते तथा शब्दे बोधा- स्मरघटादितादात्म्यग्रहे वोधात्मकघटायभिव्यनिगक्तिहते। एवंच बौदशब्दज्ञानाय ध्वनेर्जननात् वौद्धशब्दस्य ध्वनिनिमित्तत्वं वनेश्न तबकाशकत्वमुपपन्नम् । तासर्य यह है कि दौर शब्दका बौद्ध अर्थसे अध्यासस्मो सकतवे द्वारा दौरशन्द और बौद्ध अर्थन नादात्म्य मानते हैं। इस प्रकार अध्यास नादात्म्य ग्राहक और दाशाम्य शदि ब्रह्मकाण्डम् ] संस्कृत हिन्दी व्याख्योपेतम् ग्राहक है। फिर प्रयोत्ता अर्थ समझाने के लिए स्कोररूप शब्दका जिस अर्थ में तादात्म्य गृहीत करता है उस प्रकारको ध्वनि उसको प्रतीतिके लिए करता है। उसोध्वनिसे स्वरूपा- वस्थि शन अभिव्यक्त होता है और शक्तिविषयक सस्कारकै उख़ुद्ध हो जाने पर शाद. बोध होता है। जैसे घटको मिट्टीका रूप आननेके बाद मिट्ठी में घटके अभिव्यक्ति की शक्ति मानते हैं। वैसे शन्दमें वोधात्मक घटते तादात्म्य ग्रहण शेने पर बोधात्मक घटाभिव्यक्ति- शक्ति स्त्रीकारते हैं। इस प्रकार जब बौद्ध-शन्दको ज्ञानके लिए ध्वनि उत्पन्न दुई तप बौद्ध शब्दका ध्वनि निमित्त है और बौद्ध-शन्द ध्वनिका प्रकाशक है। नन्यध्यासस्य सङ्केतरूपत्वे किम्मानमिति चेदुच्यते-'ओमित्येकातरं ब्रह्म' इत्यादि शास्त्रेषु, 'वृद्धिरादैच्' इत्यादी व्याकरणे, 'कम्युनीवादिमान् घर.' इत्यादी लोक, 'अमरा निर्जरा देवा' इत्यादौ कोशे च योऽयं शब्दः सोध. योऽर्थः स शब्दः इन्ययमितरेनराध्यापरूपस्य सङ्केतस्य दर्शनमैवेति गृहाण । न च ओमित्येकाक्षरमि- त्यादौ नत्तच्छन्दवाच्य लक्षणेति न तेन शब्दार्थाध्याससिद्विरिति वाच्यम्-~लत. णायां मानाभावात् । अत एव ईदृशानाद्यभेदारोपेणैवागमिनो मन्त्रार्थयोरभेदेनो- पासनामामनन्ति। मीमांसकाश्च मन्त्रमयी देवतामाचक्षते। ईदृश एव सङ्केतो मुख्यः। सचित्तु भेदं परिकल्प्य अस्यार्थस्यायं वाचक इत्यपि कदाचित् सङ्केतः यथा पागिने 'कर्मणि द्वितीया' 'उजः' प्रगृह्यमित्यादिः ॥ तदिदं बौद्ध स्फोटाल्यं नित्यमक्रमं निरंशं शब्दतत्वम् अन्त्यवर्णप्रत्ययरूपव्यापा- रेणाभिन्यक्तं परं प्रति प्रतिपिपादयिषयावक्तृभिरुध्यमानैःश्रोतृभिः श्रूयमाणैर्वणैरपरा- गादनादिवाग्व्यवहारवामनावशीकृतया लोक्षुधा परमार्थवदन्योन्याभेदेन सङ्घनेन प्रतीयते न तु तदतिरिकरूपेण । यद्यपि लाक्षाधुपाधेरपगमे स्फटिकः स्वच्छधवलोs- नुभूपते उपाधि विनापि प्रकाशात् अस्य तूपाधिन्यतिरेकेण प्रतीत्यभावान्न केवलम्य प्रत्ययः यधा राहोश्चन्द्रध्यतिरेकेणेति ॥ ४७ ॥ नम्वेवं स्फोटो नाना स्यादित्याशङ्कय औपाधिकं भेदमुपपादयन् वुद्धिस्थस्य दाब्दस्य स्वरूपमाह- नादस्य कमजन्मत्वात् न पूर्वो नापरच स । अक्रमः क्रमरुपेण भेदवानिव जायते ॥४८॥ यापि सः बुद्धिम्यः नादव्यङ्गयः स्फोटास्यः शब्दः न पूर्वो नापरश्च चो हेती यतः पूर्वापरीभावरहितः अनः अक्रमः तथापि नादस्य स्फोटाभिव्यञ्जम्बनेः वैखाः मेण जन्म यस्य तत्वात् कमजन्मत्वात् धनिकारणीभूतैः क्रमवद्भिः स्थान करणा- भिघानः जायमानस्य बनेरपि क्रमवत्वेन तद्गतेन कमरूपेण भेदयानिव सनमो भिन्न इव जायते भवति भासते इनि यावत् । न तु स्वतस्तस्य वास्तवः क्रमो भेद- धास्ति नित्यत्वैक्त्वाभ्यां विरोधात्। ततश्च घटवन्यभिध्यतास्फोटात् घटरूपार्थस्य बोधः न तु परस्पार्थस्य घरपायभिव्यक्तस्फोटे घटरूपाम्यैव तादाम्येन तत्रैव नम्न स्वीकारादिति भावः ।। ४८ ॥ ६वा० पाक्यपदीयम् ( यद्यपि बुद्धिEथ नाद व्यंग्य स्फोट रूपी शब्द )न पूर्व है और न तो अा है किन्तु पूपिरीमावरहित है (अ) अकम है। तथापि स्कोको व्यक्त करनेवाले नादकी उपत्ति कंगसे होनी दे दसीलिए स्पोट भी सक्रमकी तरह मासिर होता है॥४८॥ अन्यधर्मस्यान्यत्र भानं दृष्टान्तेनोपपादयति-- यद्यपि दूसरेका धर्म दूसरी वस्तुमें नहीं प्रनीत होना चाहिए यह कहा जा सकता है। नयासि ठीक नहीं । क्योंकि एक दूसरेके मो धर्म दूसरे प्रतीत होते हैं। प्रतिविम्यं यथान्यत्र स्थितं तोयक्रियावशात् । तत्प्रवृत्तिमिवान्वेति स धर्मः स्फोटनादयोः ।। ४९ ॥ यथा अन्यत्र तोये स्थित भासमान प्रतिविम्वं चन्द्रप्रतिविम्व वस्तुतोऽ. नियमपि तोयक्रियावसात् तत्प्रवृत्ति जलक्रिया चावल्यमन्येति अनुगनि स स्फोरनादयोः धर्मः सादृश्यम् नादवर्तिन क्रमं कावहस्त्रत्वदीर्घत्यादि। अतथाभूतोऽपि स्फोटोऽनुगच्छत्तीत्यर्थः ॥ जोमे जलमें झलकना हुआ चन्द्रमा का प्रतिविम्ब स्वयं नहीं दिलता किन्तु जलके हिलने दिलना हुआ प्रतीत होता है। वैसे नाइके धर्म (सादृश्य और नादमें रहनेवाले क्रम जैसे हस्पत्य, दीर्घत्व, कल, गरव आदि) स्फोटके धर्म न होने पर भी स्फोटके धर्मकी तरह प्रतीत होने लगते हैं। अयं भाषः जरुगतं हि चन्द्रबिम्ब जलवृद्धौ वर्धते, जलहासे इसति, जलचलने चलति, जलभेदे भिद्यते इत्येवंधर्मानुयायि भवति न तु परमार्थतः चन्द्रस्य तथास्यम्। एवं परमार्थतोऽक्रमपि एकरूपमपि शब्दत्त्वं ध्वन्युपाध्यन्तर्भावान्, भजत इचोपा धिधर्मान्कमकत्वादीनिति। अन्न दर्शनद्वयम् चन्द्रविश्वसन्निधाने तच्छायोपरक्तास्तोयावयवाश्चन्द्रप्रतिबिम्ब मित्येकम् । अत्र पक्षे तोयक्रिययैव तोयावयवाश्चन्द्रप्रतिबिम्वरूपाः क्रियावन्तोऽव भासन्ते न पस्तुतस्तोयावयवेपु क्रियास्ति तथा सति अवयवविभागपर्वकोऽधयविनाश स्यात् । तीयभिन्नं चन्द्रप्रतिविम्बमित्यपरम् । वत्र च मतद्वयम् स्वदेशस्थमेचे च न्दप्रतिविग्वजलादिस्यन्द्रन्योपाधिसन्निधानरूपात् दोषात् उपाध्यन्तर्गतत्वेन भास विश्वमेव प्रतिविम्वमित्येका, तीये विश्वसन्निधायनिर्वचनीयं मिथ्याभतं चन्द्र प्रनिवित्वं शुक्तिरजवमिवोत्पद्यते इति परम , मतद्वयऽपि नोयादन्यदेव प्रतिबिम्ब मिति सुतरां प्रतिबिश्वमक्रियमिति बोध्यम् ॥ ४ ॥ प्रतिबिम्ब के बारेमें दार्शनिकोंके दो मन है एक मत यह है कि पानी में चन्द्रमाको दायार सम्बद्ध जलके अवयव ही प्रतिविम्ब है। इनके मतमें जलकी कियासे जलके अवयव चन्द्रप्रतिबिध कियावान् मालम पढते है । वस्तुतः जलावरमें क्रिया नहीं है । अन्यथ जालावरों ने किया किया विमाग और बलका नाश हो जाता है। १. पचपादिवाविवरणकता मतम् । २, इदं चावैतविधाकना मतम् । मतदूर शास्त्र सिद्धान्तले शे निरूपिनम् । .

बमकाण्डम् ] संस्कृत-हिन्दी व्याख्योपेतम् दूसरा मत यह है कि जलमे भिन्न किन्तु अनिर्वचनीय और मिथ्या मुस्मेिं रजतकी तिबल में प्रतिविम्म उत्पन्न होता है। इन दोनों मनोंसे यह तो निर्विवाद सिद्ध है कि जलसे प्रतिविम्ब भिन्न है और क्रिया त है । अतः अन्यके धर्ममी अन्यमें प्रतीत होते है यह सिद्ध होता है ।। ४९ ॥ स्फोटरूपस्य शब्दस्य अर्थभकाशवमिव म्वप्रकाशनमाह- यह मोटरूपी शब्द, आत्मरूपं यथा ज्ञान यरूपं च दृश्यते । अर्थरूपं तथा शब्द स्वरूपं च प्रकाशते ॥ ५० ॥ निविषयरम्य ज्ञानस्याभावात् ज्ञानं शेयपरतन्त्रमिति यथा ज्ञाने जाते ज्ञेय. पं घटादिकं तद्विदोपगनयाआत्मरूपं ज्ञानरूपं च 'ज्ञातो घर' इतिप्रतीतो दृश्यते प्रतीयने नया अर्थबोधनेच्छया शाब्दप्रयोगात् शब्दः अर्थपरतन्त्रमिति शन्दे श्रूय. गि अर्थरूपं धादि तद्विशेषगत यास्यरूपं शब्दरूपं च 'घटशब्दवोध्यो घटः' 'युधि- देशब्दवाच्यः कश्चिदासीत्' इति प्रनीती प्रकाशते शब्दानालिहितप्रन्ययस्यानभ्यु- गमादिनि भावः। लोके शब्द भुज्यादिक्रियावाधादर्थविशेषणतया ज्याकरणे तु स्परयस्य प्रत्यये बाधादर्थविशेष्यतया शब्दस्य भानमिति मन्तव्यम् ॥ ५० ॥ जमे हाती घर: इम प्रतीनिमें ( शान में) यरूप (घट ) और उसका विशेषण भात्म. प( शानरूप) प्रतीत होता है । वैसे 'घटशब्द बोध्यो घटः' इस शानमें मी अर्थरूप (घटरूप) और उसका विशेषग स्वरूप (शब्दरूप) मी प्रकाशित होता है । क्योंकि जैसे कोई भी शान निविषयक नहीं होता किन्तु ज्ञेयके अधीन ही रहना है वैसे द भी अर्थ समझाने के लिए ही प्रयुक्त होता है और अर्थके अधीन रहता है। लोक और मालमें कुछ विशेषता रहती है। जैसे लोकमें 'मुनक्ति' इस पद: भोजन क्रिया शण्इकी नहीं ले सकती अतः में उमका विशेष तथा अन्वय होता है। और व्याकरणमें अर्थ (पट) से रे प्रत्यय हो नहीं सकता अतः पट शमके आगे ही प्रत्यय दोनेको व्यवस्था भी है ॥५०॥ यदुक्तमको निमित्तमपरः प्रतिपादक इति तदुदाहरणेन म्पष्टयति- बद दो निमित्त और प्रतिपादक मी है। ( ४४ वी कारिकामें यह बनाया गया है।) केन्तु यहाँ दो पक्ष है। एक तो यह है कि भक्कम निमित्त और सक्रम प्रतिपादक है। दूसरा त यह है कि सकम निमित्त और अक्रम प्रतिपादक है। जिसमें प्रथम पश्च वालोंका नरकि- आण्डभावमिवापन्नो यः क्रतुः शब्दसंज्ञकः । वृत्तिस्तस्य क्रियारूपा भागशो भजते क्रमम् ॥५१॥ २. यदाहुः चिमुकादायोः अनुभूतिर्थप्रकाशन समये यदि न प्रकाशन तथा सत्यननर• श्रो विमोस्तत्र सदेहो विपगोवा विपरीतप्रमा बोदीयात्, म च कश्चित् 'भमुमाराधीनो वा मान्' पनि पृथेऽनन्तरक्ष सदिग्धे विपर्यस्यनि सक्दिमा वा प्रमिगोति किन्तु निश्चिनोत्यैत्र 'दमहमद्राक्षम' इनि तेन प्रकाशमानेवानुभूनिरर्थव्यवहारं जनयतीति युक्तम्' इति ।

६८ वाक्यपदीयम् यः शब्दसंशकः लोक शब्द इति प्रसिद्धःवाह्यः प्रोत्रानुपाती वर्णरूपावयवदान् सक्रमः शब्दः कतुः ज्ञानमिवार्थमनतिक्रामन् अनुमदृशः 'यत्रनुः पुरुषः' इत्यादी झाने क्रनुशब्दप्रयोगात् अण्डे भकः आण्डो रसस्तस्य भावः आण्डभावः रसरूपनानम् आण्डभावम् आपन्न इव वर्तते तस्य क्रियारूपा आविभावतिरोभावरूपा वृत्तिः भागशः अव्ययेषु काम भजते इत्यर्थः ॥ जो लोगोंके कान तक कमसे मुनाई पड़ता है वह शन्द नामका ऋतु (शान) मयूर पक्षांक अण्ड में स्थित कलल ( रस ) की तरह है। उसकी क्रियारूप ( प्रकट और तिरोहिन होनेवानी) वृत्ति अवयवोंमें कमसे प्रकट होनी है। पतदुक्तंभयति-यथा मयूरादयः अद्गप्रत्यगचन्द्रकानामुपसंहारेण लीयमानाः मूक्ष्मरूपेण तदुत्पादनाश्त्या सह रसभावमापन्ना अण्डे समवनिष्टन्त पुनश्च अण्ड1- त्तथैवाविर्भवन्ति। एवं वैखरीरूपः वर्णरूपावयववान् सक्रमः शब्दः अवयवानुपर्महरन् अक्रमान्तरशब्दरूपतामापद्यमानः अन्तः करणे समवतिष्टने पुनः अर्थवोधनेसायां सत्यां तत आविर्भवन् सावयवः मनमः आविर्भवति इति । इदमत्र बोध्यम्-'द्वायुपादानशब्देषु' इति कारिकायामकम्य निमित्तत्वमपरम्न प्रतिपादकत्वमुक्तम् । तत्र च मतद्वयम्-अक्रमो निमित्तम् सक्रमः प्रतिपादकः इत्य- कम्, सक्रमो निमित्तमक्रमः प्रतिपादकः इत्यपरम् , तत्रादिमं प्रयोक्त्रभिप्रायेण-प्रयो- क्ता हि स्वान्तःस्थं शब्दं बहिः प्रकाशयन् सक्रमं करोतीति वुद्धिस्थोऽनमः प्रारभा- वित्वात सक्रमस्य निमित्तम् । द्वितीयं तु श्रोत्रभिप्रायेण श्रोत्रा हि श्रुतेन सक्रमेण आ. न्तरमक्रम पश्चावुध्यते इति पूर्वभावितया सक्रमो निमित्तमक्रमस्य इति ॥ ५५ ॥ तात्पर्य यह है कि जैसे मयूरके प्रत्येक अवयवोंके गुण सूक्ष्मरूपसे रसके रूपमें मण्डे रहते हैं और फिर बच्चा बनने पर अपना रूप प्रकट कर देते हैं। वैसे ही वैखरी रूपी मक्रन शब्द अपने अवयवों को समेटकर अन्तःकरण अमरूपसे स्थिर हो जाता है और जब अर्थको समझानेकी इच्छा होता है तब पुनः सकम सावयव शुन्द प्रकट होता है ॥ ५ ॥ उदाहरणान्तरमाह- भौर दूसरा पक्ष है कि- यथैकबुद्धिविषया' मूर्तिराक्रियते पटे। मूर्त्यन्तरस्य त्रितयमेवं शब्देऽपि दृश्यते ॥ ५२ ॥ यथा पूर्व सावयवा पुरपमूर्तिरवयरक्रमेण विज्ञाना पश्चात् पकवुद्धिविपया एक- नुद्धिविषयाकृता मूर्त्यन्तरस्य पुरसस्य मूर्तिः पटे आक्रियते क्रमेण आकारवती क्रियते एवं त्रितयं पूर्व मक्रमन्वं ततोऽक्रम पुनः सक्रमत्वं शन्देऽपि दृश्यते । यथा पूर्व सक्रमा नत एश्वुद्धिविषयीभूना अक्रमा ततचित्रे सत्रमा पुरपनि- १. एकबुद्धिविषयः' इनि युक्तः पाटो विषयशब्दस्य पुस्वाद 'घनजपः पुसि' इत्यस प्रायिकन्वे तु यथाश्रुन साधु ।

प्रमाकाण्डम् ] संस्कृत-हिन्दी व्याख्योपेतम् ६६ एवं बाह्यः शब्दः सक्रमस्ततोऽनुसंहारत्रुध्या विषयीकृतः हृदयस्थः आन्तरः स्फोट. अक्रमः ततो बुबोधत्रिपयामयुक्तः सक्रमः नादरूपा वैसरी वाग् भवनि इति स्फोटना. दयोभद् इति भावः ॥ ५२ ॥ जैसे चित्रकार किसी पुरुष की मूर्ति बनाने से पहले कमसे उस व्यक्ति के प्रत्येक अवयर्वोको देखता है और बुद्धि उसपक व्यक्तिक रूपमें स्थिर कर लेना है विन्नु जत्र चित्र फलक पर चित्रका निर्माण करने लगता है तब फिर अवयवाके कमसे ही मूर्तिका निर्माण करता है। वैसे यह तीन कम शब्द को विषयमें भी देसा गया है। अर्थात् शन भी पहले सनम सुनाई पडा है फिर अक्रम रूप बुद्धि में स्थिर होता है और बोलने की इच्छा होने पर सक्रम नाइके रूपमें वैखरी वाग पकर होती है। यही रसोट और नादमें भेद है॥५२॥ इदानी शब्दम्य अर्थविशेषगतामाह- हम यह बता चुके है कि अर्थ के प्रति शब्द विशेषण ह~- यथा प्रयोक्तुः प्राग बुद्धिः शन्देप्येव प्रयतते । व्यवसायो ग्रहोतृणामेवं तेष्वेव जायते ॥ ५३ ।। यथा प्रयोक्तुः उच्चारयितु मा पूर्व शध्देष्वेव बुद्धिः प्रवर्तते पचं ग्रहीतॄणां श्रोतृणां व्यवसायो बुद्धिः प्राक् पूर्व तेम्वेव शब्दप्येय जायते इति । यया प्रयोक्ता अर्थबोधयिषया शब्दविगेपविषयक प्रयत्न चुर्वन् स्पृशसिव मनः प्रणिधत्ते तथा श्रोताऽपि अर्थवुभुसया शब्दान् श्रोतुं यत्नं कुर्वन् मनः प्रगिधत्ते इत्यर्थः। एवञ्च यथा घटत्वज्ञानपूर्विकायां व्यनितुद्धौ धन्वं प्रकारः एवं भादज्ञानपूर्विकायामर्थबुद्वौ शब्दः प्रकार इति अर्थप्रकारतया घदशब्दादेः घरमानये- त्यादौ भानमिति भावः ॥ ५३ ॥ जैसे किमी शब्द उच्चारण करनेमें उच्चारणा को बुद्धि पहले शब्दों पर हो जाता है । वैसे उन शब्दों को सुननेवाले लोग भी पहले शब्द ही सुनते हैं । इससे यह बात सिद्ध होती है कि जैसे किसी शब्द का प्रयोग करने वाला व्यक्ति जब किसी अर्थका बोध कराना चाहता है तब शब्दोका स्पर्श करना हुआ सा मनको सचेत करता है वैसे श्रोता भी अर्थ समझनेके लिए शब्दों के सुनने का प्रयत्न करना कुभा मनको स्थिर करना है। इसी तरह जैसे घटत्व ज्ञान पूर्वक घट व्यक्ति के शानमें घरव विशेष है। वैसे सदशान पूर्वक अर्थज्ञान शम्द विशेषग है। अतः 'घरमान इत्यादि वाक्यों में पर शब्दका बोष अर्थमें विशेषण के रूपमै हो होना है॥५३॥ ननु शम्परय भागेश्यस्य वस्य कियागना तो मेन्यन आह- फिर भी कन्य विशेषणों की भाँतिर किमा क्रिया अन्वित नही होगा। क्योकि- अर्थोपर्सजनीभतानभिधेयेषु केचित् । चरितार्थान् परार्थत्वान लोकः प्रतिपद्यते ॥ ५४॥ परार्थत्वात् अर्थमनिषापर्यवान् कपुचिन् अभिधेयेषु चरितार्थान् वाक्यपदीयम् अभिधेयं प्रतिपाद्य कृत्यकृत्यान् अत एव अर्थोपसर्जनीभूतान् अर्थविशेषणतापन्नान् शब्दान् लोकः न प्रतिपद्यते क्रियाङ्गत्वेन न जानाति 'एकत्र विशेपणतयान्वित- स्य अपरत्र विशेषणतयाऽन्वयायोग' इति न्यायादिति भावः ॥ शब्दसे अर्थशानरूप परार्थ सिद्ध होता है। और किमी वस्तुका प्रतिपादन करके कृतकृत्य हो जाता है । इसलिए अर्थ के विशेषण बने हुए शब्दोंको लोग क्रियाका भग नहीं मानते। इदमत्रावधेयम्-विद्यमानत्वं सति इतरव्यावर्तकं विधेयान्वयि विशेषणम् । यथा दण्डिनमानय शुक्लं घटं पश्य इत्यत्र विधेयभूतानयनदर्शनक्रिययोः दण्डि- घटयोरिव दण्डरूपयोरप्यन्वयः। यथा वा शुक्लं घटमानय इत्यादौ घटद्वारा शुकस्या- प्यानयनान्वयः। अविद्यमानत्वेऽपीतरच्यावर्तक विधेयानन्वयि उपलक्षणम् । यथा काक- वहेवदत्तस्य गृहम् इत्यादौ गृहे इव काके न देवदत्तसम्बन्धित्वरूपविधेयस्यान्वयः। एवं च उपलक्षणविधया अर्थशेपतां प्राप्तं शब्दं लोकः न क्रियागतां नयतीति ॥ ५४ ॥ विशेषण दो प्रकारका होता है। एक विशेषण दूसरा उपलक्षण । 'जो विद्यमान रहकर इतरका व्यावतंक हो और विधेयसे अन्वित हो वह विशेषण है । जैसे शुक्ल घटमानय' इस वाक्यमें आनयन रूपी क्रियाके साथ घटके द्वारा शुक्ल गुणका भी अन्वय होता है । और 'जो अविद्यमान रहकर इतरका व्यावर्तक हो और विधेयके साथ अन्वित न हो वह उपलक्षण होता है। जैसे 'काकवदेवदत्तस्य गृहम्' इस वाक्य में जैसे देवदत्त का अन्वय गृहपद में वैसे काक में अन्वय नहीं है। इसी प्रकार अर्थ का विशेषण शब्द मा उपलक्षण और लोक उसे क्रिया में अन्वित नहीं मानता। नियम भी है कि 'एक स्थळमें जो विशेषण बनकर अन्वित हो यह अन्यत्र विरोपण घनकर अन्वित नहीं होता। ॥ ५४॥ संज्ञासंज्ञिभावस्य भेदाधिष्ठानत्वात् 'स्वं रूप'मितिसूत्रबोधितः 'अग्न्यादिशब्दः अग्न्यादिशब्दस्य संज्ञा' इत्येवंरूपः संज्ञासंज्ञिभावोऽनुपपन्न इति एकस्यैव शब्दस्य उपाधिकृतभेदेन संज्ञासंज्ञिभावमुपपादयिष्यन्नुपाधी आह- यद्यपि सज्ञा और सजि को मिन्न भिन्न होना चाहिये तथापि अग्नि शब्द ही सशा और सशी दोनों है और उचित भी है। क्योंकि एकही शब्द उपाधि भेदसे संडा और संशी बन सकता है। ग्राह्यत्वं ग्राहकत्वं च द्वे शक्ती तेजसो यथा । तथैव सर्वशब्दानामेते पृथगिव स्थिते ॥ ५५ ॥ यथा तेजसःप्रदीपादेः ग्राहात्वं ज्ञान विषयत्वं ग्राहकत्व घटादिविषयकज्ञान- जनकत्वं च द्वे ग्राह्यत्वग्राहकत्वरूपेशक्ती स्तः तथैव सर्वशब्दानां एते ग्राह्यत्वग्रा- हकरवाती शक्तिशक्तिमतोरभेदात् नित्यमात्मभूते अपि पृथक् भिन्ने इय स्थिते प्रतिभासमाने स्त इत्यर्थः । शब्दः स्वं प्रकाशयन्नेवार्थ प्रकाशयतीति यावत् । यद्यपि घटे ग्रामस्वमेव न ग्राहकत्वम्, इन्द्रियेषु ग्राहकत्वमेव न ग्राह्यत्वं स्वभावादिति ग्राह्य- स्वग्राहकत्वशत्योविरोध इव भासते तथापि प्रदीपे तयोः समावेशस्यापि दर्शनात उ. है ब्रह्मकाण्डम् ] संस्कृत-हिन्दी व्याख्योपेतम् ७१ भयोरेक्त्रायस्थानमविरुद्धमिलि शदे ग्राह्यत्वं प्राहकत्व स्वभावादिति सा- स्पर्यम् ॥ ५५ ॥ जैसे दीपक अपने रूपको प्रकाशित करते हुए अन्य वस्तुओंका भी प्रकाशक होता है। क्योंकि उसमें ग्राहाव और ग्राहकत्व दो शक्ति है। वैसे शब्दों में भी ग्राह्यत्व और मादकत्व दो शकिया है जो अलग अलग मालम पटनी है। इस तरह शब्दमें दीपककी भांनि दाद और अर्थको प्रकाशित करने वाली शक्ति स्वाभावतः वर्तमान है॥५५॥ ननु स्वरूपस्त एव शब्दस्य वोधकत्वमस्तु न ज्ञानस्येन्यत आह- यह शब्द एक होनेके कारण ( स्वरूपतः) प्रकाशक नहीं होना किन्तु ज्ञान ही शब्द अर्थका प्रकाशक होता है क्योंकि- विषयत्वमनापः शब्दैनार्थः प्रकाश्यते । न सत्तयैव तेर्थानामगृहीताः प्रकाशकाः ॥ ५६ ।। यतः ते शब्दाः अगृहीताः श्रोनेन्द्रियाविषयाः सन्तःसत्तयैव सत्तामाग्रेण चतु- रादयः इव अर्थानां न प्रकाशकाः न वोधकाः अतः विपयत्वम् ग्राह्यत्वम् अना- पानः अप्राप्तः भोजेन्द्रियागृहीनैः शब्दैः अर्थो न प्रकाश्यते इति सम्बन्धः ॥ ५६ जो शन्द कानोंतक सुनाई नहीं पडरहे हैं उनसे अर्थ शान नहीं हो सकना । अतः जो शन्द कानोंसे नहीं सुने गए वे शब्द अर्थवोधक नहीं हो सकते ॥ ५६ ॥ अगृहीतस्य शब्दस्य बोधकत्वे घाधकमाह- अतोऽनितिरूपत्वातिमाहेत्यभिधीयते नेन्द्रियाणां प्रकाश्येऽर्थे स्वरूपं गृह्यते तथा ॥ ५७ ॥ अतः गृहीतस्यैव शब्दस्य बोधकथात् यदा शम्दस्वरूपमनितिं भवति तदा अनितिरूपत्वात् न नितिं निर्धारितं रूपं यस्य तावात् अर्थबोधननकशब्द- स्वरूपमत्ययाभावात् अर्थप्रत्ययाभावेनार्थबोधजनकशब्दस्वरूपनिर्धारणाय किमाह इत्यभिधीयते पृच्छयते, यदि अनितिमपि शब्दस्वरूपमर्थमवबोधयेत्तदा प्रयोस्त्रा उच्चारितं श्रीवाश्रुतमपि वोधयेदिति 'रिमाह' इति प्रश्नो व्यर्थ एव स्यादिति भावः । ननु यथा अर्थावबोधकारणं शब्दो गृहीत एपार्थबोधःएवं इन्द्रियाण्यपि गृहीतान्यत्र कुतो नार्थमनवोधयन्तीत्यत आह--इन्द्रियाणामिति । इन्द्रियाणां प्रकाश्येऽर्थे तथा शब्द इव स्वरूपंन गृद्यते इति तानि सत्तयवार्थप्रकाशनि न ज्ञातानि शन्दम्नु नैवं वस्तुस्वभावादिति भावः ॥ ५ ॥ अन एव जो शरीक रूपसे नहीं सुने जाने उनके विषय रोग पूछते हैं कि क्या पाहायह नियम इन्द्रियों के बारे में नहीं है। क्योंकि इन्द्रिया अपने स्वभावका प्राय के विषयमें अपनी सत्तामात्र से अर्थका ज्ञान कर देता है।५७ ॥

७२ वाक्यपदीयम् 'पृथगिन स्थिते' इत्यनेन शक्त्योभैद उक्तस्तस्य साम्प्रतमुपयोगमाह- अतः एकही शब्द संज्ञा और संज्ञी भी बन सकता है। क्योंकि- भेदेनावगृहीतौ द्वौ शब्दधर्मावपोद्धृतौ । भेदकार्येषु हेतुत्वमविरोधेन गच्छतः ॥ ५८ ॥ द्वौ शब्दधर्मा ग्राह्यत्वग्राहकस्वशक्ती यद्यपि शब्दस्वरूपभूते शक्तिशक्रिमतो. रभेदात् तथापि अपोद्धृतो अपोद्धारवुद्ध्या कल्पनया आरोपितभेदौ अतः भेदेना. वगृहीती भिन्नतयाज्ञानी भेदकार्येषु भेदाधिष्टानेषु संज्ञायज्ञिभावेषु अविरोधेन शब्दभेदमापाद्य विरोधविघटनद्वारा हेतुत्वं गच्छत इत्यर्थः । अयं भावा-लोके देवदत्त शब्दस्य संज्ञावं पिण्डस्य च संज्ञित्वं दृष्टमिह तु 'स्वं रूपमिति शास्त्रेग अग्निशब्दस्यैव संज्ञात्वं संज्ञित्वं च विरुद्ध कथं वोध्यत इति शहापरिहाराय यथा राहोः शिर इत्यत्र पष्टयुपपादनाय एकस्मिन्नपि वस्तुनि अने. कावन्थायुक्तशिरसो राहुशब्दार्थत्वं यत्किञ्चिदेकावस्थायुक्तशिरशः शिरः शब्दार्थत्वं पाश्रित्य शब्दार्थभेदानेदमाश्रित्यावयवावयविभावः एवं ग्राह्यत्वग्राहकत्वशक्तिरूपो- पाधिकृतमेकस्मिन्नेवाग्निशन्दे भेदमाश्रित्य ग्राह्यत्वशक्तिमतोऽग्निशब्दम्य संझिन्वं ग्राहकत्वशक्तिमतोऽग्निशब्दस्य संज्ञात्वमिति औपाधिकभेदमादाय एकस्मिन्नपि अग्निशब्दे संज्ञासंज्ञिभावो न विरुध्यन इति ॥ १८ ॥ जब शब्दमें ग्राह्यत्व और ग्राहकत्व रूप धर्मों की कल्पना करही ली गई और भेदके रूपमें चात इन शब्दों से जहा भिन्न भिन्न कार्य करसा है वहा भी एकही शब्दमें (राहो चिर) की भाँति औपाधिक भेद मानने पर विना विरोधके अनेक धर्मभी कारण बन सकते हैं ॥५॥ एतदेव स्पष्टयति- वृद्ध्यादयो यथा शब्दाः स्वरूपोपपिबन्धनाः । आदेच्अत्यायितः शब्दैः सम्बन्धं यान्ति संज्ञिभिः ॥५९॥ अग्निशब्दस्तथैवायमनिशब्दनिवन्धनः । अग्निश्रुत्यैति सम्बन्धमग्निशब्दाभिधेयया ॥६०॥ 'द्विरादैच्' इत्यादौ यथा वृद्धयादयः शब्दाः संज्ञाः स्वरूपमुपनिवध्यते योध्यते यैस्ते स्वरूपोपनिवन्धना स्वरूपबोधकाः सन्तः आदेच्प्रत्यायितैः आदै- चशब्दबोधितैराकारादिभिः शब्दैः संशिभिः सम्बन्धं तादात्म्यं 'घृद्विपदाभिन्ना आदेचः' इत्येवं यान्ति प्राप्नुवन्ति तथैव अग्निशब्दः निवध्यते वोध्यते अनेन इति अग्निशब्दनियन्धनः अग्निशब्दरूपस्वस्वरूपबोधकः सूत्रस्थोऽग्निशब्दः अग्निश. ब्दाभिधेया अग्निशब्दबोध्यया ग्राह्यन्वशक्तिमत्या अग्निश्रुत्या अग्निशब्देन लक्ष्यस्थेन सम्बन्धं तादाम्यमेति इति सम्बन्धः ॥ जैसे 'वृद्विरादेच' इत्यादि मूत्रों में वृद्धि' आदि शब्द संज्ञा के दोषक हैं और आदेच' ब्रह्माण्डम् ] संस्कृत-हिन्दी व्याख्योपेतम् ७३ शरसे बौधित आकार, ऐकार, और नौकार आदि संज्ञी शब्दसे 'वृद्धि पदमिन्ना भादव" इस प्रकारका सम्बन्ध (तादात्म्य) भी बनाने हैं। वैसे अग्नि शब्द स्वरूपका बोधक 'भोटक सूत्रका अभि सन्दमी अपने स्वरूपका और अग्नि शब्दसे बोध्य लक्ष्यस्थ अग्निशब्दसे दादरम्य सम्बन्ध बना देता है। एतदुक्तं भवनि-यथा 'वृद्धिरादैच्' इत्यनेन स्वरूपयोधकस्य वृद्धिशब्दश्य स्व- मिन्ने आदेचशब्दबोधिते तादात्म्यरूपसम्बन्धग्रहः। एवं स्वरूपमिलि सूत्रेण स्वरूपदो. धरस्य अग्निशब्दस्य स्वभिन्ने अशिशब्द मम्बन्धग्रहः ग्राहकत्वशक्तिमतोऽग्निशब्दस्य ग्राह्यन्वशक्तिमदग्निशब्दभिन्न वात्। तत्रैतावानेव विशेषः यत् वृद्धिशब्दादादैशब्दयोः स्फुटावभासो भेदः प्राहकत्वशक्तिमदग्निशम्दग्राह्यश्वशक्तिमदग्निशब्दयो. समानानु- पूरित्वेन न रफुटावभासो भेद इति अस्ति तु औपाधिको भेदः राहोः शिर इनिवदिति न संज्ञासंज्ञिभावस्प भेदाधिष्ठानाक्षतिरिति ॥ ५९ ॥ ६ ॥ विशेषता केवल इतनी है कि वृद्धि शब्दसे आदैन् शब्दको स्पट भेद प्रनीति होती है और मादकत्व शक्तिमान मिशन और ग्राहाव शक्तिमान भग्नि शब्दोंकी आनुपूर्वी एक ढंगकी होने के कारण भेद रफर नहीं प्रतीत होता। इसलिए सदो. शिर: की भाँति औपाधिक भेद रहनेमे ऐकमें मंडा-सज्ञि भाव बन सकता है ॥ ५९॥६०॥ ननु 'अग्नेढक' इत्यादाव वही कार्यस्य टको प्राधेन सूने उच्चारितस्यैव कार्यभा. वस्वमरवत आह- और उचारित शब्द से ही दक् आदि प्रत्यय भी होने है अर्थ से नही। क्योंकि मि शम्दका अनि अर्थ है उससे परे प्रत्यय भा नहीं सकता। प्रत्यय तो पिसी शब्दके सामने भायेगा । अतः प्रत्यय का अधिकारी उच्चरित शब्दही होगा। क्योंकि यो य उच्चार्यते शब्दो नियत न स कार्यभार । अन्यप्रत्यायने शक्तिर्न तस्य प्रतियष्यते ॥ ६१ ॥ यो यः शव अग्नेक, जराया शरण इत्यादिः उच्चार्यते स नियतं नियमेन कार्यभाग न भवति तस्य ग्राहकत्वशक्तिमान संज्ञाबाद ग्रामविशक्तिमप्रयोगस्थ. संशिप्रत्यायनमानार्थयात् 'संज्ञा संशिनं प्रत्याय्य रवयं निवर्तत' इति न्यायादिति- भावः । नन्वेवं कार्यभाववाभाव इव तस्य प्रत्यायकत्वमपि न स्यादत आह-अन्य- मत्यायन इति । तस्य उच्चारितम्य अत्यप्रत्यायने अन्यस्य लक्ष्यस्थशब्दान्त. रम्प बोमने शचिः प्रत्यायक्वं न प्रतिवध्यते प्रतिबन्धकाभावादिति भावः ।। जो शन्द 'आगेईक' या 'नराया जराम्' इत्यादि उच्चरित होते है। वे सूत्रस्य सन्द संज्ञा होने के कारण केवल संघीका निश कर शान्ति हो जाते है। उनमें कार्य तो नहीं हो सकता मितु इनकी क्ष्यस्थ शम्शो सबालोवता (प्रलायकायका) पास नहीं होता। एतदुक्तं भवति-शब्दो विधिः प्रत्याय्यः प्रत्यायश्च तर सूत्रस्थः प्रन्या- यः लक्ष्यस्था प्रत्याय्य । प्रन्यायको हि प्रत्याय्यार्थमुसरितः तं दंगादिकायें नियुक्त नस, मस्याय्यश्च अर्धप्रत्यायनार्थमुशरितः तमानयनादि कार्य नियुद्धे न तु खं ना वा कलप्यते ।। ७४ कार्यान्वयार्थ तयोरनुचरितत्वादिति तस्मिन्कार्यान्त्रयाभावेऽपि प्रत्यायकावं न प्रनि- वध्यत इति ॥६॥ शब्द दो प्रकार के होते हैं। एक प्रत्यायक है जो स्त्रमें पठिन है और दूसरा प्रत्यारा जो लक्ष्यस्थ है। प्रत्याय शन्द प्रत्याय्य शब्द के निमित्त उच्चीत होता है। इसलिए, ढक आदि प्रत्यय प्रत्याप शन्दमे दी माने है प्रत्यायव में नहीं। प्रत्याय्य पद उच्चरित होकर अर्थधान कराना है इसलिये आनयन आदि कार्य में नियुक्त होता है ॥६॥ उच्चारितस्य कार्यभाववाभावे हेतुमाह- उच्चारित शब्द से कार्य नहीं होता। क्योंकि- उच्चरन् परतन्त्रत्वाद् गुणः कान युज्यते । तस्मात्तदर्थैः कार्याणां सम्बन्धः परिकल्प्यते ।। ६२ ॥ उच्चरन्' उच्चार्यमागः शब्दः परतन्त्रत्वात् लर्थप्रत्यायनार्थत्वात् गुणः अर्थ विशेषणीभूनः अतः कार्य न युज्यते कार्यान्वययोग्यो न भवति । 'एकत्र विशेषणतयाऽन्वितस्यापरन्न विशेषणवायोग' इति न्यायेन अर्थे विशेषणीभूतस्य क्रियाया विशेषणवायोगादिति भावः । तस्मात् सूत्रे उच्चरितस्य शब्दस्य कार्यान्व याभावात् तदथैः लक्ष्यस्यैरग्निशब्दादिभिः कार्याणाम् गादीनां सम्बन्ध परि- उचरित शमन केवल अर्थान के लिए उच्चारित है और में विशेषण होने के कारण गोग है । अनः कार्य-श्रोग नहीं होता क्योंकि 'एकत्र विशेषग रूपसे अन्वित होकर भय पुनः विशेषग नहीं बन सकना' इसलिए सूत्रस्थ शब्द के कार्यान्वित न हो सकने पर ही लक्ष्यस्थ अनि आदि मान्दों में रक श्रादि प्रत्ययों के सम्बन्ध को कसना की गई है ॥ ६ ॥ पतदुक्तं भवति-यथा गामानयेत्यादी अर्थवोधनाय प्रयुक्तः गो शब्दः क्रियासु साधनत्यं न प्राप्नोति एवं लक्ष्यस्थशब्दान्तरवोधनाय प्रयुक्तः सूत्रघटकोजन्यादिश- दोऽपि, पारायंस्याविशिष्टस्यात् । प्रत्याय्यश्च लक्ष्यस्थोऽग्निशब्दः चक्षुर्ग्राह्यो गवादि- वि कार्यसम्बन्ध प्रतिपद्यते इति ॥ १२॥ भन्वेवम् 'अग्नेर्डक्' इत्यादर्थभूतस्याप्याग्नेय इत्यत्रत्यस्याग्निशब्दस्योचारणे अर्थपरतन्त्रत्वात् कार्यगादिभिर्योगो न स्यात् अनुचारितेन तु कार्यबोधनम वाक्यमत आह- उरित प्रयोगस्य अनि शब्द से अप्रत्यायक होने के कारण दक प्रायय नहीं हो सक और अनुचारितसे कार्य नहीं हो सकता यह कहना ठीक नहीं। सामान्यमाश्रितं यदुपमानोपमेययोः । तस्य तस्योपमानेषु धर्माऽन्यो व्यतिरिच्यते ॥ ६३॥ उपमानोपमेययोः 'ब्राह्मगवदधीते क्षत्रियः' इत्यत्र ब्राह्मणक्षत्रिययोः 'बाह पाध्ययनेन तुल्यं त्रियाध्ययनम्' इत्यत्र च ब्राह्मणाध्ययनज्ञत्रियाध्ययनयोः यद्यर 1. उच्चशियलभांविनय महाकाण्डम् । संस्कृत-हिन्दी-व्याख्योपेतम् सामान्य साधारणधर्मः आये अध्ययनं द्वितीयेऽध्ययनातं सौष्टवम् आश्रितम् उपमेय क्षत्रिय क्षत्रियाध्ययन वा श्रुतं तस्य तम्य' क्षत्रियाध्ययनात् क्षत्रियाध्यय- नगनमौवाय अन्यः उपमानेषु ब्राह्मणे अध्ययनरूपः ब्राह्मगाध्ययने सौष्टरू. पश्च धर्मो व्यनिरिच्यते व्यतिरित्तो वर्तते इत्यधः ॥ ६३ ॥ जसे 'बालगवदधीते क्षत्रियः' यहाँ माग तथा क्षत्रिय, और 'बामगाध्ययनेन तुल्य क्षत्रि. याध्ययनम्' या बामगाध्ययन तथा क्षत्रियाध्ययन रूप उपमान और उपमेय में जो जो साधारण धर्म (जैसे प्रथम वाक्य में अध्ययन और द्वितीय वाक्य में अध्ययनगन सौन्दर्य) उपमेय क्षत्रिय या क्षत्रियाध्ययन में तुम हैं वह उन-उन क्षत्रियाध्ययन या क्षत्रियाध्ययनगन- सौरव से भिन्न उपमान बाह्मग में अध्ययन रूप और बाझगाध्ययन में सौष्ठवरूप धर्म अविरही है॥१३॥ यथा वा- गुणः प्रकर्षहेतुर्यः स्वातन्त्र्येणोपदिश्यते । तस्याश्रिताद् गुणादेव प्रकृष्टत्वं प्रतीयते ।। ६४ ॥ 'शुक्तरः पट' इत्यत्र स्वतः परस्पदन्यस्य न प्ररुपांप्रकप किन्तु गुणप्रक- देवेति या प्रकर्षहेतुः द्रव्यप्रकर्षहेतुः गुणः शुक्लादिः स्वातन्त्र्येण शुक्लता रूप मरप इत्यादी प्राधान्येन उपदिश्यते तदानी तस्य द्रव्यत्वेन लत्प्रकर्षहेतुरन्यो गुणः तस्यापि द्रव्यत्वे विवक्षायामन्य इति शुहरूपस्य तस्य आश्रितात् संसर्गिभेदकल्दैन विहितात् गुणात् शुक्रत्वरूपादर्मात् एव प्रकृष्टत्वं प्रकर्षः प्रतीयते ।। वैयाकरणाः प्रधान द्रव्यमप्रधान गुण हत्यामनन्ति यदाहार्तिककृतः यस्य गुगस्य भावाद् द्रव्ये शन्दानिवेशलदभिधाने स्वतलौ' इति तदेतदप्रे वपर्यात 'संसर्गिभेदकं यद्यत्सव्यापार प्रतीयते। गुगत्वं परसन्नत्वात् तस्य शाख उदाहृतम्' रपर चेदं समर्थः पदविधिः, तस्य भावः इति सूत्रयो प्यादिषु। ततश्च शुक्लरवमपि गण इति शरुतरः पर इत्यत्र शुकु रूपस्य प्रपं. शुकृतरं रूपमस्वत्यत्र शोरल्यस्य । यद्यपि शोरू जातिरेका तथापि संसगिशुभेदेन भेदमारोप्य शौक्ल्य प्रकर्पदयपदेश इलि भावः ॥ ६ ॥ भोर, जैसे 'शुकुर पर कहने पर बछ का कोई विशेषता नही प्रतीत होता किन्तु गुण की ही विशेषता प्रतीत होती है और जो गुद्रण के उत्कर्ष के कारण है वे ही स्वतन्त्र रूप से दस वर का बड़ा उलार है। हम रह प्रधान रूप से कहे जाते हैं। इससे पट में आश्रित गुण को ही उत्तमता कही गई है ॥ ६ ॥ एवं प्रश्तेऽपीत्याह- वस्थाभिधेयभावेन यः शब्दः समवस्थितः । वस्याप्युचारणे रूपमन्यत्तस्माद्विवियते ॥ ६५ ।। तस्य उवार्थमाणस्य 'अग्नेक' इत्यत्रस्यस्य अभिशब्दस्य अभिधेयभायेन १. सम्बन्धित्वेन विवप्रया पटी षट्रीयो मेघस्य भेद विद। - वाक्यपदीयम् वाच्यत्वेन यः शब्दः 'आग्नेय'इस्यत्रत्योऽग्निशब्दः समरस्थितः स्वीकृतः तस्यापि उच्चारणे तस्मात् 'अग्नेर्दक' इत्यत्रन्याद् अग्निशब्दोच्चारणात् अन्यद् रूपं विवे- च्यते विविक्तं गृह्यते इत्यर्थः ।। वैसे उचारित 'अग्नर्दक सूत्र के अग्निशन के वाच्य रूप में स्थित जो 'आग्नेयः इत्यादि लक्ष्यस्थ अग्निशब्द स्वीकृत है। उसके भी उच्चारण में स्वस्थ अनि शब्द से भिन्न कोई दूसरा ही रूप है। एतदुक्तं भवति -यथा ब्राह्मणाध्ययनारक्षत्रियाध्ययनं भिन्नं यथा वा संस- गिभेदेन शावल्यं भिनमेव सूत्रस्थाग्निशब्दोच्चारणाहदयस्थानिशब्दोचारणं भिन्नं सूत्र स्थस्योच्चारणं लक्ष्यस्थप्रतिपत्यर्थ लक्ष्यस्थस्योचारणं चानिस्पार्थपतिपत्यर्थमिति । एवं च स्वार्थस्य यकार्यान्वयवोधनाय यन्त्र यस्य शब्दस्योच्चारणं तत्र तस्य शब्दस्य तस्कार्यान्वयो न भवतीति नियमः न तूञ्चारितस्य कार्यान्वयो न भवतीति । यथा अग्नेर्ट गित्यादौ अग्निशब्दस्योञ्चारणं लक्ष्यस्थाग्निशब्दस्य उपकार्यान्वयवोधनाय इति लचयस्थ एव ढकसम्बन्ध प्रतिपद्यते न सूत्रस्थः । यथा वा गामानय इत्यादी गोशब्दस्योच्चारणंगोरानयनान्वयवोधनायेति गौरेवानयनान्वयंप्रतिपद्यते न गोशब्दः । एवमाग्नेय इत्यत्राग्निशब्दस्योचारणं स्वार्थस्याग्नेहविः सम्बन्धाय इनि अग्निरेव हविः सम्बन्ध प्रतिपद्यते नाग्निशब्दः इति आग्नेय इत्यत्र उच्चरितस्य अग्निशब्दस्य अग्नेई- गित्यत्रोच्चरितत्वाभावन ढकसम्बन्धे बाधकामाव इति ॥ ६५॥ तारपर्य यह है कि जैसे ब्रह्मगाध्ययन से क्षत्रियाध्ययन भिन है और जैसे एक ही शुल गुण आश्रय के भेद से भिन्न भिन्न है। वैसे सूत्रस्य अग्नि शब्दोच्चारण से लक्ष्यस्थ भग्नि शब्दो धारण भिन्न है। क्योंकि सूत्रस्व का उच्चारण लध्यस्थ को प्रनीति के लिए था और लक्ष्यस्थ का उच्चारण अर्थ की प्रनीति के लिए है। इसी प्रकार 'जो शब्द जिसके कार्यान्वयबोध के लिए उच्चरित होता है वह स्वयं कार्य से अन्वित नहीं होता' यह भी नियम है। इस नियम के भाधार पर 'अग्नेर्दक' इस स्त्र में अग्नि शब्द का उच्चारण लक्ष्यस्थ अग्नि शब्द में दक् रूपी कार्य के मन्वय के लिए किया गया । अतः लक्ष्यस्व अनि शब्द से ढक होगा सूत्रस्थ से नहीं। इसी तरह अमेयः' इस पद में उच्चरित अग्निशब्द स्वार्थ भनि में इविः सम्पादन के लिए प्रयुक्त हुआ अतः अग्नि अर्थ ही हविःसम्बन्ध प्राप्त कर सकता है अग्निशम नहीं। किन्तु 'आमेय.' इस पद में उच्चरित अग्निशन्द 'अमेढेक्स्त्र से उच्चारित न होने के कारण उससे ढक् सम्बन्ध होने में कोई बाधा नहीं है । अत. प्रयोगस्थ अग्निशब्द स्वस्थ अग्निशब्द से भिन्न है ।। ६५ ।। 'वृद्धयादयो यथा शब्दा स्वरूपोपनिवन्धनाः' इति (५९, ६०) अदुक्कं तदुपपादयन्नाह-- प्राक् संज्ञिनाभिसम्बन्धात् संज्ञा रूपपदाथिका । पष्ठ्याच प्रथमायाय निमिचत्वाय कल्पते ।। ६६ ॥ संझिना मादजादिना अभिसंबन्धात् प्राक् संक्षा वृद्धिपदादिः, रूपं स्वरूप- मेव पदार्थो यस्याः सा रूपपदाथिका सती भेदविवक्षया पष्ठयाः अभेदविवक्षया प्रथमायाश्च निमित्तत्वाय कल्पते समर्था भवतीत्यर्थः ॥

प्रेमााण्डम् ] संस्कृत-हिन्दी व्याख्योपेतम् अयं भावः द्विपदस्य आदैजादिना संयन्धात्मा न मंक्षिपदार्थकत्वमिति अर्थवस्वाभावन प्रातिपदिकत्वं न स्यादतः वृद्धिपदस्य वृद्धिपदमेवार्थः स्वीक्रियते वृदिरादैनित्यादौ । ततश्च आदेतु शक्ति प्रहे वृद्धिपदस्यादैभिरभेदे विवक्षिते प्रथमा, भेदै 'उन्न' इत्यादी पष्टोति ॥ ६६ ॥ 'वृद्धि' आदि सावाचक शब्द 'आदेच' आदि सची शब्दों के सम्बन्ध से पूर्व केवल शब्द स्वरूप परक हैं ( अन्यथा निरर्थक होते और प्रातिपदिक मशा हो न होनी) बाद में जब शक्ति-ग्रह ( सम्बन्ध ) हो जाता है तब आदेच् के साथ अभेद विवक्षा में प्रथमा और भेद दिवसा में षष्ठी का निमित्त बनना है ॥६६॥ उपयोः प्रथमाषष्ठयोपियविभागमाह- तत्रार्थवचात्मथमा संज्ञाशब्दाद्विधीयते । अस्येतिव्यतिरेकश्च तदर्थादेव जायते ॥ ६७ ।। तत्र तयोः पष्ठीप्रथमयोः यदा 'अयं देवदत्त' इनि शब्दम्यरूपं संझिनि नादात्म्ये. न' निवेशयितुमिच्छति तदा संज्ञाशब्दात् अर्थवत्वात्प्रथमा विधीयते यदा तु 'अस्य वाचकः देवदन' इति शब्दम्वरूपं सज्ञिनि तादाम्येन निवेशयितुं नेच्छति तदा अस्येति व्यतिरेकः भेदः तदर्थादेव शब्दस्य जायते प्रतीयते इत्यर्थः। स एव च भेदः पष्ठीनिमित्तमिनि भारः ॥ ६७ ॥ यहाँ भी जन सवारन और सशी में तादात्म्यसम्बन्ध आरोप करते है तब भवान् होता है तथा उस सशाशद से प्रथमा आती है और जब तादात्यारोप नहीं करना चाहने (जेजे 'अस्य वाचकः देवदत्त.') अस्य यह शब्द हो भेद बताता है और भेद विवक्षा में षी आती है।६७ ॥ स्वं रूपमितिसूत्रमेवं शक्तिभेदकरपनया व्याख्याय जातिव्यक्ति नान्यथा प्याचक्षणानां मते पद्यद्वयनाह- कुछ लोग स्वरूप सूत्र की व्याख्या दूमरे ढग से करते है । उनका मत है कि अनेक म्पत्तियों से उच्चारित भिन्न भिन्न भनि शब्द में अग्निशन्दत्व एक है वही स्वरूप' है और 'सदस्य पद से शररूप व्यक्ति का दोष होता है और बोध्यम् का अध्याहार करते है । फिर मिलकर अर्थ होगा कि 'सन्दस्य (अग्निशम्द का ) स्व १ (खरूप ) अग्नि शब्दत्व है। इस प्रकार इस अर्थ में व्यक्ति संशा है और जाति की यह अर्थ सिद्ध होता है । जैसे- स्वरूपमिति कैश्चित्तु व्यक्तिः संज्ञोपदिश्यते । व्यक्तः कार्याणि संसृष्टा जातिस्तु प्रतिपद्यते ॥ ६८ ॥ संरूपमिति' सूत्रे स्वं रूपमित्यनेन शुरुसारिकापुरुषोदीरितभिन्न भिन्नशब्द- यनिसमवेतमग्निदत्वादिकं यामान्यं, शब्दस्येतिशब्दपदेन च शब्दव्यक्तिरभि. १.निवेशयितुम्-आरोपयितुम् । २. वृषभदेवस्त । स्वरूपमित्यनेन व्यक्दिशन्देन च जानिरुवारयाह ।

वाक्यपदीयम् धीयते । वोध्यमिति चाध्याहियते । तथा च शब्दस्य-अग्निशब्दादेः स्वं रूपम् अग्नि- शब्दत्वादिकं वोध्यमिति स्वरूपमिति सूत्रस्यार्थः । एवञ्च स्वरूपमिति सूत्रे व्यक्तः संज्ञात्वं जातेश्च संज्ञित्वं बोध्यते । तदाह- ह-कैश्चित्तु स्वरूपमिति सूत्रेग व्यक्तिः भग्निशब्दरूपा संज्ञा उपदिश्यते जातिश्च संज्ञिनीति तद्भावः । नन्ववमग्नेगि त्यादी अग्निशब्देन अग्निशब्दत्वजातेः प्रतीतो तया ढकः पौर्वापर्यासम्भवात्सूत्रार्था- नुपपत्तिरत आह-व्यक्तरिति । व्यक्त-व्यक्तिसम्बन्धीनि, कार्याणि-पौर्वापर्या- दीनि, संसृष्टा-व्यक्तिसंसृष्टा जातिः प्रतिपद्यते व्यक्तिद्वारा जातेः पौर्वापर्यमादाय सूत्रार्थोपपत्तिरिति भावः ॥ ६९ ॥ कोई लोग 'स्वरूप' इस सूत्र में (अग्निशब्दरूपा) व्यक्ति संशा (और जानि संत्री) मानते हैं और व्यक्ति सम्वन्धी पौर्वांपर्यादि कार्य उस (व्यक्ति) में सदा संसृष्ट रहने वाली जाति में व्यक्ति के द्वारा माना जाता है । अत एव 'अग्नेर्ड' सूत्र के अग्निशब्द से अग्निशम्दत्व जानि की प्रतीति होने पर भी पौर्वापर्व बनता है ॥६८॥ दूसरे लोग ऐसे हैं जो 'स्वरूपं' सूत्र में दोषक पद का अध्याहार करते हैं । उनके मत से 'शब्दस्य ( अग्निशब्द रूपी व्यक्ति का) स्वरूपं (अग्निशब्दत्व ) आदि बोधक हैं। इस प्रकार अग्निशब्दत्व जाति सहा और अग्निशब्द व्यक्ति सशी मानी जाती है। जैसे- संज्ञिनी व्यक्तिमिच्छन्ति सूत्रग्राह्यामथापरे । जातिप्रत्यायिता व्यक्तिः प्रदेशेपूपतिष्ठते ॥ ६९ ।। यदि तु स्वरूपमिति सूत्रे बोधकमित्यध्याहियते तदा शब्दस्य अमिशब्दादि व्यक्तः, स्वरूपम्-अग्निशब्दत्वादिकं बोधकमित्यर्थः इति अग्निशब्दत्वादिजातिः संज्ञा अग्निशब्दादिव्यक्तिश्च संज्ञिनी तदाह-अथापरे सूत्रग्राह्यां सूत्रबोध्या व्यक्तिम् अग्निशब्दादिरूपां संज्ञिनीमिच्छन्ति जातिं च संज्ञामिति भावः । तथा च जातिप्रत्यायिता जारया वोधिता आक्षिप्ता व्यक्तिः प्रदेशेषु 'आग्नेर्दक्' इत्या- दिपूपतिष्ठते इत्यर्थः । जातेः शक्यत्व इव शक्तत्वे लाघवमिति भावः ।। ये लोग सूत्र से गृहीत (बोध्य ) होने वाली अग्निशब्दरूप व्यक्ति को सशिनो (और जातिको संशा) मानते हैं और जाति से उपस्थित व्यक्ति ही 'भग्नेर्डक्' आदि सूत्रों से उपस्थिर होती है ॥६॥ उद्योतकारास्तु-प्रायेण संज्ञामंज्ञिनोः सामानाधिकरण्यस्यैव दर्शनात् शब्दस्य रूपम्-अग्निशब्दत्वादिकं, स्व-व्यक्तिसंज्ञकमित्यर्थेन व्यक्तः, शब्दस्य-तत्तजाति निशियस्य स्वंयक्ति रूप-समान्यज्ञमरियान इ जस्ते संज्ञा लन्यते हरित वर्णयन्ति । इदमत्र योध्यम्- -जाने व्यक्तेर्वा मंज्ञात्वमिति पक्षद्वयेऽपि फले न कश्चिद्भेदः। १. 'दह केचिद् वृत्तिकाराः पठन्ति स्वरूप शब्दस्य ग्राहक मवनि घोनक प्रत्यायकमिति' अपरे तु स्वरूपं शदस्य ग्राह्यं द्योत्य प्रत्याव्यमिति' पुञ्जराजः।

ब्रह्मकाण्डम् ] संस्कृत-हिन्दी-व्याख्योपेतम् ७३ नन्वेवं किंकृनस्तहिं पक्षभेद इति चेदुच्यते जातो विवत्तितायां व्यक्तिर्नान्तरीयका जातिः प्रधानम्, व्यक्ती विवक्षितायां जातिर्नान्तरीयका व्यक्तिः प्रधानम्, यदा जातिः संस्कर्तुमिष्टा तदा नान्तरीयको व्यक्तिसंस्कारः यदा च व्यक्तिः संस्कर्तुमिष्टा तदा तद्द्वारको जातिसंस्कार इत्युभयमुभयत्र संस्क्रियने इति जाति: संज्ञाः व्यक्तिः संज्ञा इति पनिज्ञाभेदमा फले तु न भेदः' इति ॥ ६९ ॥ इन दोनों पक्षों में कोई भेद नहीं हैं। जाति सज्ञा हो या व्यक्ति संज्ञा हो । विशेषता दोनों पक्षों में यही है कि जब जति की विवक्षा होगी तब जाति प्रधान और व्यक्ति अप्रधान और जब व्यक्ति को विवक्षा करते हैं तब व्यक्ति प्रधान और जानि अप्रधान होती है । सशा प्रधान में होती है । संस्कार के बारे में भी नियम यहो होगा। सब जाति में संस्कार करने चलेगें तो व्यक्ति के द्वारा ही होगा और जब व्यक्ति में संस्कार करेंगे तब जाति के द्वारा संस्कार होगा। क्यं कि जाति और व्यक्ति एक दूसरे के निकट है। इसी प्रकार शब्दों के एकत्व और अनेकत्व के विषय में विद्वानों के मनभेद है। येपामर्थभेदेऽपि नवसु भर्थेपु एक एव गोशब्दो न बहवः इति मनं तेषां जानिमन्तरेणापि व्यक्त्यैव स एवायम्' इति प्रत्ययोपपत्तेम जातिपरिकल्पनेति तेषा जातेः संशावमिति नास्ति, येषां च अर्थभेदेन शब्दभेद इति मतं तेपामनेकेषु गोश- ग्देषु ‘स एवायम्' इति प्रत्ययो गौशब्दत्वजातिनिबन्धन इनि तेपा जातिः संरे- त्यग्नि इति पक्षद्वयोपपादकं शब्दानामेकत्वमनेकत्वं चाह- कार्यत्वे नित्यतायां या केचिदेकत्ववादिनः। कार्यत्वे नित्यतायां वा केचिन्नानात्ववादिनः ॥ ७० ॥ प्रकान्तस्वाच्छन्दस्येति सम्बध्यते । शब्दस्य कार्यत्वे नित्यतायां या केचित् एकरववादिनः यन्मतमाप्रित्य 'एक्श्च शब्दो वोऽक्षाः पादाः माप इति' अभेदव्यवहारः केचित् शब्दस्य कार्यत्वे नित्यतार्या या नानात्ववादिनः यन्मतमाश्रित्य नद्यः सारण्यके ससीमके सस्थण्डिलके वर्तते तस्येदं ग्रहणम्' इति भेव्यवहार रति । कुछ लोग शब्दों के कार्यत्वपक्ष और नित्यत्वपक्ष में शन्द को एक मानते है । दूसरे योग कार्यत्वपक्ष या नित्यल पक्ष में शन्दों में भेद मानते हैं। इदं तु योध्यं शकायत्वपक्षे नानात्वं गुरयमेवं तु सकृदुचरितस्य वर्णस्य पदस्य वाक्यस्य वा पुनरुच्चारणे भेदेऽपि रूपमामान्यमूलिकया 'म एवायं शन्द' इनिप्रत्यभिज्ञया अभेदप्रत्ययादौपचारिकम् । नदुक्तं 'रूपसामान्याहा सिद्धम्' इति शन्दनिस्यन्वपक्षे एकत्वं मुख्यं नानात्वं त्वर्थभेदादारोपितशब्दभेदमूलरमौपचारिकम् ।। .. फले सु न भेद इति । हाशम्देन चैहानिशब्द-वादिकं शुभसारिकापुरषोदारितमित्र- व्यक्ति समवेत सामान्यमभिधीयते। तत्र व्यक्त सामान्य संशा सामान्यस्य वाव्यतिरिनिव्याख्यान कामचारः व्यक्ति कार्य प्रनिराधमाना सामान्यप्रतिद्धव प्रतिपद्यते सामान्यमपि कार्य पनिषयमा पचितारेगैव प्रतिपपते इति फले न कश्चिद्भेदः नि कैयटेन स्पुटीतोऽयमर्थः ।

८० वाक्यपदीयम् महाभाष्य में दोनों मत लिखे हैं। 'एकः शन्दो वहोंःक्षाः पादः मापाः' इत्यादि भाष्य को पतियाँ शब्दों में अभेद्र व्यवहार कहनी है और 'तत् यः सारण्यके ससोमके सस्थण्डिरके वर्नने तस्येदं ग्रहणम्' इत्यादि भाष्य को पहियाँ भेद व्यवहार बताती है । किन्तु दोनों पक्षों का तात्पर्य यह है कि जो लोग शन्द को कार्य ( अनित्य) मानते हैं। उनके मन में दशब्दों का नानाल मुख्य है और एकत्व (अभेद) को प्रति उच्चारण में शन्द भेद' होने पर भी 'यह वही शब्द है। इस प्रकार प्रत्यभिज्ञात्मक ज्ञान होने से काल्पनिक मानते हैं। इमका मूल 'रूपमामान्यादा सिद्धम्। यह वार्तिक है और जो शब्दों को नित्य मानते हैं उनके मत से एकच मुख्य है और नानात ( अर्थ भेद होने के कारण शब्द भेद) कालनिक और आरोपित है ॥७॥ शब्दनित्यतावादिमीमांसकमतेन शब्दानामेकत्वं वर्णयग्नाह- मीमांमकों के मन में शब्दनित्य तथा एक है । उनका कहना है 1 कि- पदभेदेऽपि वर्णानामेकत्वं न निवर्तते । वाक्येषु पदमेकं च भिन्नेष्वप्युपलभ्यते ।। ७१ ॥ पदभेदेऽपि पदानाम्-अर्कः अश्वः अर्थ इत्यादीनां भेदेऽपि वर्णानाम् अकारा- दीनामेकत्वं न निवर्तते स एवायमकार' इति प्रतीतेः तदुक्तं भान्ये 'एकत्वादकारस्य मिद्धम्' इति। नन्वकारस्यैकत्वे कालशब्दव्यवायः देशपृथक् वदर्शनं च न स्यादिति चेन्न उपलब्धिव्यवधानेन कालशब्दव्यवायस्य सत्तावद्देशपृथक्त्वदर्शनस्य चोपपत्तेः । एवं भिन्नेष्वपि वाक्येपु एक पदं चोपलभ्यते 'तदेवेदं पदम्' इत्यनुभूयते इत्यर्थः। पदभेदेऽपि वर्णम्त्वमिव वाक्यभेदेऽपि पदैकत्वमेवेति भावः ॥ १ ॥ पदों ( अर्थ , अर्कः, और अश्वः) के अकार के भेद होने पर भी स एवायमकारः' इम प्रतीनि के कारण अकार वर्ण वही है (एक हो है) उनको एकता निवृत्त नहीं हो सकी। इसी मॉनि निन्न-भिन्न देश और कालमें उच्चरित व क्यों में पदों के मिन्न होने पर भी पद एक ही है क्योंकि 'नदेवेद पदम्' यह अनुभव प्रमाण है। इसे भगवान भाष्यकार ने मी 'एकत्वादकारस्य सिद्धम्' वार्निक से स्पष्ट किया है । ७१ ॥ नन्वेवं वर्णातिरिक्तं पदं पदातिरिक्तं च वाक्यं स्यादित्यत आह- किन्तु इससे यह नहीं समझना चाहिए कि वर्ग से भिन्न पद और पद से भिन्न वाक्य है। क्या कि- न वर्णव्यतिरेकेण पदमन्यच्च विद्यते । वाक्यं वर्णपदाभ्यां च व्यतिरिक्तं न किञ्चन ।। ७२ ॥ वर्णव्यतिरेकेण वर्गव्यतिरिक्तं पदं च अन्यत् वर्णेभ्योऽन्यत् न विद्यते एवं वर्णपदाभ्यां व्यतिरिक्तं व क्यं च किञ्चन न विद्यते वर्ग एव पदं वाक्यं चेति यावत् ततश्च वर्गानामेकत्वात्तद्रूपागां पदानां वावधानां चैकत्वमुपपन्नम् ॥ वर्गों से अलापद की कोई सत्ता ही नहीं है और वर्ण तथा पर्यो से अलग वाक्य मी कोई वस्तु नहीं है । अर्थात् वर्ण हो पद और वाक्य है । वर्ग भी एक है । अतः पद और वाक्य मी एक ही सिद्ध है। ।

बमकाण्डम् ] संस्कृत-हिन्दी व्याख्योपेतम् अयं भावः क्रमजन्मभिरुचरितप्रध्वंसिभिरयुगपत्कालैः सावयवैः पदैः वाक्य, कमजन्मभिरुचरितप्रध्वं मिभिरयुगपत्कालैः वर्णेश्व पदं नारब्धुं शक्यते इति पदाति. रिनं वाश्यं वर्णातिरिक्तं पदं च नाम न किंचिदस्ति किन्तु नित्या वर्णास्तान्येव पदं चाक्यं च । तदुक्तं शावरभाष्ये 'गौरित्यत्र कः शब्दः गकारौकारबिसर्जनीया इति भगवानुपवर्ष' इति स्पष्टीकृतं चैतच्छ्लोकयार्तिके स्फोटयादे- 'विलियन यद्धैश्च नित्यः सर्वगतैरपि । व्यतिरिक्तपदारम्भो वर्णांनोपपद्यते ।। यावन्तो यादृशा ये च यदर्थमतिपादने । वर्णाः प्रज्ञातसामर्थ्यास्ने तथैवावबोधकाः' इति । यच्च गौरित्येकं पदम्' इति लौकिकाला व्यवहारः स च वर्णविषय एव एक- मिति च एकार्थावच्छेदकरवान् 'येनोचारितेनेति' भाग्यमपि वर्णानामेघाप्रत्याय- कत्वात्तद्विषयमेव न च वर्गातिरिक्तं पदं वाक्यं नाम किंचित् । तदाहुभट्टपादाः । वर्णातिरिक्तः प्रतिपिश्यमानः पदेषु मन्दं फलमादधाति । कार्याणि वाश्यायवाश्रयाणि सस्यामि तुं कृत एए यनः ॥ इति । सत्र न्यायरत्नाकरे पार्थसारथिमिश्राः 'स्फोटपक्षे हि निरवयवं वाक्यं निर- वयवस्य यावयार्यस्य वाचकम् अवयवास्तु पदारमका यस्मिकाय मृपा भूताः इति । तमश्च पदतदश्यवाश्रितस्योहादेर्महावाक्यावयवानान्तरवाक्यामियाजाधाधितप्रसङ्ग- तन्त्रादे.' कार्यस्य मृपावं स्यात् अतस्तत्सत्यतासिद्धयर्थ स्फोटवादनिराकरणं न निष्फल मिति' इत्याहुः ।। ७२ ॥ तात्पर्य यह है कि मित्र-भिन्न काल में कम से उत्पन्न होने वाले या ध्वस्त होने वाले पर्णो से पद तथा इसी प्रकार उत्पन्न होने वाले सावयवपदों से वाक्य बनाया नहीं जा सकता। मतः पद से अतिरिक्त वाक्य और वर्ण से अतिरिक्त पद नहीं है किन्तु षणं निता है और पद तथा वाक्य हैं। भगवान श्रीकुमारिल भट्ट ने भी कहा है कि- 'वर्ण के अतिरिक्त पद और वाक्यों को सना नहीं है। पद और वाक्य तो सावयव है। अनः निरवयव वर्गों के शान के लिए ही पद और वाक्य का प्रपञ्च रना है ॥ ७२ ॥ एवं मीमांसकमतेन वर्णातिरिक्तस्य पदस्य धाश्यस्य मृपात्वमुस्त्वा वर्णाना- मैव पदत्वं वाक्यत्वं चोपपादितम् । साम्प्रतं स्वमतेन वाक्यस्य सत्यत्वं वर्णपदयोश्च मुपारवं प्रतिपादयति- किन्तु वैच्याकरण इस मत को सिसात नदी मानते। उनका कहना है कि- पदेन वर्णा विद्यन्ते चणेववयवा न च । वास्यात्पदानामत्यन्तं प्रविवेको न कथन ॥ ७३ ॥ १. अन्योरेशनान्यदीयस्यापि सहानुष्ठानं प्रसङ्गः। यथा अग्नाशेमीये पौ चोरकप्राप्तैरनुष्ठि- हैं: पश्यः प्रयागरायः पशुतन्त्रमध्ये नुष्ठितस्य पशुरोडाशस्योरकारः। उमयोद्देशेन सहनुष्ठान तन्त्रम् । ययाग्नेयाधुद्देशेन सकृदेव प्रयाजावनुष्ठानन्। ११वा० ८२ वाक्यपदीयम् घणेषु ऋकारीकारादिषु प्रतीयमाना अपि अवयवाः अवयवसदृशाः रेफादयः नच विद्यन्ते । एवं पदे प्रतीयमाना अपिवर्णा न विद्यन्ते एतेन स्वाश्रयत्वेनाभिमत- यावन्निष्ठात्यन्ताभावप्रतियोगित्वरूपं मिथ्यात्वं वर्णावयवानां वर्णानां चोक्तम् । एवं वाक्यात् पदानामत्यन्तं प्रविवेकः पार्थक्यं पृथक्सत्ता कश्चन न विद्यते एनेन वाक्यसत्तातिरिक्तसत्ताशून्यत्वस्य पदे प्रतिपादनात् अधिष्टानसत्तातिरिक्तसत्ताशून्य- स्वरूपं मिथ्यात्वं पदानां बोधितम् । वाक्ये प्रतीयमानानि पदानि पदे प्रतीयमाना वर्णाश्च न सन्तीति यावत् ॥ जैसे (ऋकार, औकार आदि ) वर्षों में जो अवयव के सदृश रेफ और म, उ आदि प्रतीत होते हैं वे अवयव नहीं है । वैसे पदों में जो वर्गों की प्रनीति होती है वह भी भ्रम है । क्योंकि वाक्यों से पृथक् पदों की कोई सत्ता ही नहीं है। यद्यप्येकोऽखण्डः स्फोटस्तथापि जपाकुसुमादिगतलौहित्यपीतत्वादिष्यकोपरा. गवशात् लोहितः पीतः स्फटिकः इति मानवत् मुखे मणिकृपाणदर्पणच्यञ्जकोपाधि- वशादैर्ध्यवर्तुलस्वादिभानवच्च प्रतीयमानवर्णावयवादिव्यगयः वर्णरूपः पदरूपो वाचय. रूपश्च भासत इति भावः ॥ इदमत्र तत्त्वम् वर्णाः पदानि च असत्यानि वाक्यमेव तु अक्रममपूर्वापरमेकं नित्यं सत्यम् तस्मिन्नेव अतत्त्वभूता वर्णपदरूपनिर्भासाः क्रमवस्यो धुद्धय उत्पद्यन्ते न परमार्थतः वर्णाः पदं च माम न किंचित् व्यक्षकसादृश्यात्तु शब्दान्तरग्रहणाभिमानः। तदुक्तं स्फोटसिद्धौ- 'नानेकावयवं वाक्यं पदं वा स्फोटवादिनाम् ।' इति "निरस्तभेदं पदतत्वमेतद्वयदर्शि युक्त्यागमसंध्येण । विभूतभेदग्रहमेतयैव दिशा परं सम्प्रतियारवभेदम ।' इति च । निरस्ता वर्णास्मानो भेदा यस्य तादृशम्, अत्र तावदयं वर्णानामेव वोधकत्वं त एव च पदानीति वादी प्रष्टव्यः 'गौ: 'अश्वः' इति वा केवलोच्चारणे वा विसर्जनीयस्य १. अभिमतपदं वस्तुतः स्वाप्रयाप्रसिद्धयाऽसम्भववारणाय । यावत्पदं कपिसंयोगानय- त्वेनापिमते वृक्षे मूलावच्छेदेन वर्तमानात्यन्ताभावप्रतियोगित्वस्य शासावच्छेदेन स्थिनकपिसंयो गादैरप्यस्तीति तत्रातिव्यातिवारणाय ! यावत्पददाने तु यावदन्तर्गतमूलावच्छेदेन कपिसयोगा- भावान्नातिव्यामि॥ २. स्याद्वादरताकरे 'पदेन वर्णा' इति कारिका चैत्यं व्याख्याता ननु वाक्ये पदानि पदेषु वर्णाः वर्णेष्वयवाःन सन्ति, पूर्वापरादिमा' क्रमवर्णपदरूपावसायः पुनरमिन्यजकाना ध्वनी- ना धर्मानुविधानात् क्रमवना हि ध्वनीना ये निष्पादकालालादयस्तेषा प्रतिध्वनि भिन्ना एच शक्तय इति विभिन्न शक्तिवात्वादिकारणनि-पादिता ध्वनयः परमार्थत. परस्परमत्यन्त विमाशा अपितुल्यस्थानकरणजन्मनया स्वयं सदृशमा मजन्तः स्वव्यङ्गथानामन्योन्यविलक्षणानां वर्णपद- वाक्यस्फोटानामपि तुल्यतामुपव त्सयन्नो मागदहिभूनानपि तान् मागसक्रान्तानिवावमासय न्ति । मुखमिव मणिकृपाणदगादयो नियतस्थानवर्णपदपरिमाणसंस्थानमनुपप्लवमेकमनेकमिवा नेकविधस्थानवर्णपरिमाणसंस्थानभेदोपप्लवमादर्शयन्ति । इति ।

बमकाण्डम्] संस्कृत हिन्दी व्याख्योपेतम् को भेदः यस्कृतोऽर्थधीभेदः प्रत्ययभावाभावी व । नन्वयमेव भेदो यदेकन असहायः भपरत्र वर्णविशेषसहाय इति चेन्न वृत्ताया वर्णविशेषोपलधेरसवेन सहायत्वासमवात् । नव वर्णाः सहायाः, नेपां न्यापकत्वेन नित्यत्वेव सर्वदा सर्वत्र सचात् इति वर्णाति. रितमैव पदं वाक्यं चैति युक्तिः। 'येनोचारितेन' 'भावार्थाः कर्मशब्दाः' इत्यादिराग- भः। परं पदस्फोटात्परम् वारपरफोटग, अभेद-निरस्तभेदम् निरवयम संपति. यन्तु-जानन्तु इति तदर्थः ।। ७३ ॥ तारपर्य यह है कि वर्ण और पर असत्य है। वाक्य ही क्रमरहित एक निल और सत्य है। उसी में कासनिक वर्ण भौर पद प्रतीत होते हैं। वर्ण भौर पद मिथ्या है। मिथ्यात्व दो प्रकार का है। एक तो 'स्वाश्रयत्वेनामिमतयावनिष्ठात्यन्ताभावप्रतियोगित्व' है। यह मिथ्याव सौक के पूर्वार्ध से प्रतीत होता है। (वर्णावयवाश्रयत्वेनामिन जो यावत् वर्ण वन्निधा त्यनामार प्रतियोगिल वर्णावयव में है और दूसरा 'मविधानसजातिरिकरालाशून्यत्त्वरूप है। यह मिथ्याल लोक के उत्तरा से निकलता है। क्योंकि वाक्य सत्ता से अतिरिक्त किसी पद्रमादि की सत्ता मानी ही नहीं गई है ।। ७३ ।। दे अपि एकत्वनानात्वदर्शने अधिकृत्य शास्त्रे व्यवहार इण्याह- यपि निरवयव वाक्य ही सत्य है । तथापि व्याकरणशास्त्र में जो व्यवहार हुमा है पर मकरन और भामात्य दोनों पक्षों को लेकर चला है। क्योंकि- मिन्नं दर्शनमाथित्प प्यपहारोऽनुगम्यते । तत्र यन्मुख्यमेकेषां तवान्येषां विपर्ययः ॥ ७४ ॥ भिन्नं दर्शनं शब्दानामेकत्वम् आश्रित्य हलोऽनन्तराः संयोगः इति सूत्रे 'मामशब्दोऽयं यर्थः' इवि, सरूपमूत्रे 'एक शब्दो बहर्थोऽक्षाः पादा मापा' इति व्यवहार अनुगम्यते भाध्ये क्रियते शब्दानां नानावं धिरय तत्रैव संयोग संहासूर्य 'तयः सारण्यके ससीमक सस्थण्डिसके वर्तते तस्येदं ग्रहणम्' इति भेदेनो- पसंहारः क्रियते । तत्र इयो। एकेपा यद् एकस्वं नानारचं वा मुख्य तत्रान्ये. पां विपर्यः गौणमिति मतिः। एकरववादिनः शब्दनानाखौपचारिक शब्दैकरद १ मुस्यं मन्यन्ते । नानारयवादिनम शब्दकत्वमीपचारिक शब्दनानारदं च मुल्यं मन्यन्त इति विवेकः॥ ग्यारहार नो भित्र-भिन्न दर्शनों को धार पर ही चलता है। (मैले हलोमन्नरासंयोगः सूत्र में 'ग्रामशन्नोऽय वहः, तथा 'सम' सूत्र में एकः शब्दः बहार्थो' इत्यादि पक्तियाँ सद के एकत्व पक्ष में लिखी गई है और 'सयोग संशा सूत्र में ही 'तद् यः सारण्पदे ससौमके सस्या हलके वर्तते तस्येदं ग्रहणम्' यह माष्य पंक्ति नानात्व पक्ष में लिखी गई है।) इसमें बिनके मन में एक पक्ष मुख्थ है उनके मन में दूसरा पक्ष गौग है। तदुक्तं कैयटे 'केचिदर्यभेदेन शब्दभेदमिछन्ति प्रत्यभिज्ञान तु' सामान्य १. सामान्येति । प्रामवाभित्रसामन्यनिमित्वाभिप्रायमित्यर्थः ।

मा । L . निवन्धनम् अन्ये तु एकशब्दत्वं तत्र चानेकशक्तियोग एकशक्तिवं चेति दर्शन- विकल्पः । तत्र यदा एकशब्दत्वपक्षस्तदा 'यासारण्यके ससीमके' इति भाप्यं शक्तिभेदादुपचरितभेदाश्रयम् भेदपते तु 'ग्रामशब्दोऽयं वह्वर्थः' इति भाष्यम् अभिन्नसामान्यनिमित्तकैकत्याभिप्रायम्' इति ॥ यद्वा भिन्नं दर्शनं वर्णाः सस्याः पदानि वाक्यानि चासत्यानि इत्येक दर्शन- माश्रित्य 'गकारौकारविसर्जनीयाः शन्द' इति व्यवहारः वाक्यानि सत्यानि वर्णाः पदानि चासत्यानि इत्यपरं दर्शनमाश्रित्य श्लोकादर्थ प्रतिपद्यामहे इति व्यवहारः अनुगम्यते क्रियते तत्र एकेषां पदवाक्यसत्यत्ववादिनां यन्मुख्यं सत्यं तत्र अन्येषां वर्णसत्यत्ववादिनां विपर्ययः मिथ्यात्वमिति मतिः ॥ भयवा (वर्ग नित्य तथा पद और वाक्य अनित्य है । यह ) एक दर्शन मानकर (गकार मौकार और विसर्ग शब्द है । इस प्रकार का ) व्यवहार है और (वाक्य को सत्य तथा वर्ण और पदों को असत्य हैं ) दूसरा दर्शन मानकर (श्लोक से अर्थ समझ रहे हैं ) इस न के व्यवहार किए है। इन दोनों पक्षों में जो लोग पद अथवा वाक्य को सत्य तथा मुख्य मानते हैं वहीं दूसरे लोग वर्ग को सत्य मानकर पद और वाक्य को मिथ्या वताते हैं ॥ ७४ ॥ वर्णातिरिक्तो ह्यङ्गीक्रियमाणः स्फोटः वेदस्य प्रामाण्यमापादयति इतरथा वर्णा- भामवाचकायेन तदन्यस्य चासत्वेन प्रामाण्यस्यैवासम्भवः स्यात् वाक्यावयवाश्रिता- न्यूहादीनि तु कार्याणि गत्यन्तरासम्भवादपोद्धृत्य कल्पनया समर्थनीयानि वर्णाति- रिक्तस्य वाचकरवादेव 'सुप्तिडन्तं पदम्' 'अर्थप्रयुक्त शब्दप्रयोगे यनोच्चारितेन' 'भा- वार्थाः कर्मशब्दाः' 'भावमाख्यातनाचष्टे' 'एतं मन्त्रमपश्यत्' इत्यादयः स्मार्ताः श्री. ताश व्यवहारा उपपद्यन्ते इनि तत्त्वम्॥ ७४ ।। 'नित्याः शब्दार्थसम्बन्धा' इति कारिकया शब्दार्थसम्बन्धानां नित्यत्वं प्रतिज्ञानं तन्न कः शब्दः यस्य नित्यत्वमुच्यते इति शिव्यजिज्ञासाशान्तये शब्दद्वैविध्यं ततो. अर्थबोधप्रकारश्चोक्तः सांप्रतं नित्यत्वेनाभिमतस्य स्फोटरूपस्य शब्दस्य सति कालकृत- परिच्छेदे नित्यत्वं न स्यादिति दुतादिवृत्तिभेदस्य प्रयोजकमाह- भर तक शब्दों को निस्यता सिद्ध करने के लिये शर्ड्स के दो भेद तथा अर्थवीप का प्रकार बताया गया। अब शङ्का उत्पन्न हुई कि यदि काल कृतभेद शब्द में है तब शब्द नित्य नहीं दो सकता । दुतादिवृत्तियाँ तो शब्द में ही रहती है । इस पर हमारा कहना है कि- स्फोटस्याभिन्नकालस्य ध्वनिकालानुपाविनः । ग्रहणोपाधिभेदेन धृत्तिभेदं प्रचक्षते ॥ ७५ ।। न भिन्नः कालः कालभेदो यस्य तस्य अभिन्नकालस्य कालकृतपरिच्छेदशून्य- स्य नित्यस्येति यावत् नित्यं हि वस्तु न कालेन परिच्छिद्यते नित्येषु कालिकायोगाव तथापि ध्वनिकालमनुपततीति ध्वनिकालानुपाती तस्य ध्वनिकालानुपातिना १ अनेकदाक्तीति । निरूपकभेदातिभेद इति भावः । २. एकशक्तीति । निरूपकभेदेऽपि समवायस्येवैकत्वं शतरिति मावः।

ब्रह्मकाण्डम् | संस्कृत-हिन्दी व्याख्योपेतम् स्वाभिव्यक्षकध्वनिकालात् प्राप्तकालपरिच्छेदस्य तावकालमुपलभ्यमानस्य स्फोटस्य ग्रहणोपाधिभेदेन गृह्यतेऽनेनेति व्युत्पत्या ग्रहणं बुद्धिः व्यञ्जनीभूतो पनि स एवोपाधिस्त देन वृत्तिभेदं वृत्तीनां दुतामध्यमाविलम्बिताना हस्वादिप्रमाणरूपाणां च भेदं प्रचक्षते न तु वास्तवस्तस्य द्रुता दिवृत्तिभेद इत्यर्थः। तदुक्तं तपरसूत्रे भाष्ये 'यथा भेर्याहन्ता भेरीमाहत्य कश्चिद्विशतिपदानि गच्छति कश्चित् त्रिंशत् कश्चिञ्चन्वारिंशत् स्फोटस्तावानेव ध्वनिकृता वृद्धिः' इति ॥ ७५ ॥ यपि यह स्फोटरूपी शब्द कालकृतपरिच्छेद से रहित है। अतः नित्य है। क्योंकि कालिक सम्बन्ध से नित्य कहीं नहीं रहता। तापि स्कोर को व्यक्त करने वाली ध्वनि में कालिक सम्पन्न होने से स्फोट के ग्रहण (बुद्धि या व्यास पनि ) रूपी उपाधियों के भेद से (दून, मध्य, लम्बित, या हस्व, दीर्घ, प्लुत ) आदि वृत्तियों के भेद माने जाते हैं । तपर सूत्र का भाष्य देखने से पता चलता है कि जैसे एफ नगाड़े में एक आघात करके कोई बीस बग भरता है। कोई तीस । यह भेद ध्वनि के कारण होता है। क्योंकि स्फोट तो एक ही है । इसी प्रकार ध्वनि की द्रुतता से स्फोट की नित्यता में बाधा नहीं पती ॥ ७ ॥ नन्वेवं स्फोटे स्वतः कालकृनभेदाभावेऽपि धनिकृतकालभेदेन स्फोटेषु हम्बदीर्घ- प्लुतेषु कालभेदमाश्रित्य तपरसूत्रेण अतकालयोदप्तियोर्यथा व्यायत्तिः क्रियते तथा दुतादिवृत्तीनां भेदेऽपि कालभेदमाश्रित्य अतःकालव्यावृत्तिः स्यादिति तथा च 'दुतायो तपरकरणे मध्यमविलम्बितयोरुपसंख्यानं कालभेदात्" इति यातिकमा- रब्धव्यं स्यादिश्यत आह- स्वभावभेदानित्यत्वे हस्वदीर्घप्लुतादिषु । प्रातस्य ध्वनेः कालः शब्दस्येत्युपचर्यते ॥ ७६ ॥ प्राकृतध्वनिरूपसपितस्यैव स्फोटस्य भानात् स्फोटप्राकृतध्वन्योनीरक्षीरम्यान भिवत्वेनाप्रत्ययात्प्राकृतो ध्वनिः स्फोटस्य स्वभावः स्वरूपमिति स्वभावभेदात् स्वरूपविशेषात् स्फोटारपार्थक्येनाग्रहणोपाधिकरफोटस्वरूपत्वाभिमानवशात् प्राय- तस्य वनेः यः कालः एकमात्रादिरूपः ह्रस्वदीर्घप्लुतादिपु उच्चारणीयेषु वर्त. मानः सः शन्दस्य स्फोटस्य नित्यत्वेऽपि उपचर्यते शब्दै अध्यारोप्यते व्यवहि. यते इति यावत् ॥ और, प्राकृत ध्वनि को स्फोट का एक विशेष रूप मान लेने से प्रातध्वनि का हो पात्रिक आदि काठ हस, दी और प्लुत में स्थिर रहना है ओ सोट के नित्य होने पर मौ ६५ मैं आरोपित है वास्तविक नहीं ॥ ७६ ।। १. कालभेदादिति । 'ये दि दुताया वृतो वर्गविभागाधिकास्न मन्यमाया ये च मर मागी वोलिभागापिकास्ते विलम्बितायाम्' इति मध्यन् । नस्वार्थ द्रुन शेषन्व वा उच्चार पनि वचरि नाडिकाया या नवपानीयाल निति तस्यास्त्र मधमायावृत्तौ नारशासनि सन्नि नवाना मागाखिभागालोमि पानि तदश्किानिनवादश सायन्ते विगवितानां तु वृत्ती पोटानानि सनि । नाडिका-सयुम्ना ब्रह्माण्डसादा समृतबिन्दुनावि । पानिन्दिाः । २. 'स्तमावस्तु नित्यलाद' लघुमाया पाठः।

- बाक्यपदीयम् अयं भावः पाकृतो वैकृतश्चेति विविधो ध्वनिः तत्र प्राकृतध्वनि विना स्फोटः सामान्यरूपेण विशेषरूपेण वा न भासते इति प्राकृतध्वनियतिरेकेण स्फोटानुपल- म्भात् प्राकृतध्वनि स्फोटस्वरूपमित्र मन्यन्ते प्राकृतध्वनिरेव च हस्वदीर्घप्लुतादिभेद- व्यवहारहेतुरिति प्राकृतवनिगतकालभेदस्य प्राकृतध्वन्यभिन्नत्वेन प्रतीते स्फोटे प्रतीतौ बाधकामाव इति 'अत्' इत्युच्चारणे अतत्कालस्य दीर्घादेावृत्तियुक्तका वैकृत- ध्वनिस्तु प्राकृतध्वनिप्रतीतं स्फोटमुत्तरकालं स एवायमित्युल्लेखेन चिरकालमुपलम्भ- यति इति स्फोटमतीत्युत्तरकालमावितया स्फोटवलक्षण्येनावभासमानः द्रुतादीनां वृत्तीनां भेदे कारणमिति तद्गतकालभेदस्य तद्भिन्नत्वेन प्रतीते स्फोटे न प्रतीतिरिति वैकृतध्वनिभिः स्फोटो न भिद्यते तमादाय च धनिकृता वृद्धिः' इति' भाष्यम् । ध्वनिकृता-वैकृतध्वनिकृता, वृद्धिः-उपलब्धिकालवृद्धिः न तु स्फोटवृद्धिः तस्य वर्णोपरागाभिव्यक्तिजनकयनकालोपरागेणैव भानात् वैकृतध्वनिकालोपरागेण तु स्फोटस्य न भानम् उपलब्धिवृद्धावपि 'हस्वाकार एवायम्' इति प्रत्यभिज्ञानादिति दुतादिवृत्तिभेदेऽपि स्फोटवृद्धयभावात्-न 'दुतायाम्' वार्तिकावश्यकतेति तदारः॥७६॥ तात्पर्य यह है कि ध्वनि दो प्रकार की है एक प्राकृत भौर दूसरी वैकृत । जिसमें प्राकृत ध्वनि के बिना सामान्य रूप से या विशेष रूप से स्फोट की प्रतीति हो नहीं सकती। अत: प्राकृत ध्वनि को स्फोट का स्वरूप मानते हैं। प्राकृत ध्वनि ही हस्व, दीर्घ और प्लुत भेद ध्यबहार का कारण है। प्राकृत ध्वनि के काल भेद की स्फोट में प्रतीति होनी चाहिये । इसलिए 'भतू' में तपर करने से तत्काल का ही बोध होता है। वैकृत धनि तो प्राकृन ध्वनि के बाद "यह वही है। इप्त प्रनीति का नियामक होता है। अतः स्फोट रूप नहीं है और उसके १. व्यवहारहेतुरिति । यः प्रथम जातो ध्वनिस्तस्य मात्राकालत्वात्तदुश्वारेण तदभिव्यक्तिः स्वतो निरवयवत्वादत्यन्तं पूर्वापरमागरहितः स्फोटोऽपि मात्रकाल इति ब्यपदिश्यते तन्निमित्ता च हस्वसंशा शास्त्रेण व्यवहाराय क्रियते । यः प्रवर्म जातो ध्वनिर्यश्च तजस्ताभ्यामभिव्यक्तः स्फोटोऽपि तयोदिमात्राकालत्वात्तदुप चारेण मात्राद्वयकाल इत्यपदिश्यते तन्निमित्ता च दीर्घसशा क्रियते । प्रथमध्वनिजातध्वनेर्जातो यस्तृतीयो ध्वनिस्तेन पूर्वाभ्यां ध्वनिभ्यां चाभिव्यक्तस्तेषां त्रिमात्राकालपरिमाणस्वादत्यन्ताप्रमाणोऽपि शब्दस्त्रिमात्र इत्युच्यते तन्निमित्त प्लुतसंशा लमते । दतीत्थं ध्वनीना हस्वादिव्यवहार हेतुतां स्याद्वादरलाफरकृत आहुः। शेखरकृतस्तु मात्राकालि. कत्वरूपहस्वत्वादिक तु वारपालमहत्वकृतमिति नाभिप्रदेशात् प्रेरक्यत्न एव कश्चिद्विल्क्षगोऽल्प वायु प्रेरयनि कश्चिदधिकमिनि चदन्तः हम्वामिन्यामध्वन्यपेक्षया विलक्षण एव ध्वनिदीर्घम- भिव्यनक्ति न तु हरवामिजयध्वनिरेव स्वजातध्वनिसहाय इत्यभिप्रयन्ति । २ 'वनिकृता वृद्धिः इनि भाष्यस्य वैकृपध्वनिकृतोपलब्धिकालवृद्धिरित्यर्थः । बों पररागाभिव्यक्तिजनकयनकालोपरागेगैव स्फोटस्य भानम् अत एवास्य प्राकृतत्वेन व्यवहारः वर्णा- मिव्यक्युचरं जायमानस्तु वैकृत. तत्व चालस्पादिकृनत्वात् अय तूपलब्धेरैव पौनः पुन्य कारण पौनः पुन्यं चाविच्छेदेनोपलब्धिधारामात्रेण न तु विच्छिद्यविच्छिद्योपलपा एतदवच्छिन्नत्वेन तु न स्फोटोपभिः हस्वाकार एवायमिनि प्रत्यभिज्ञानात्। आरोपे सति निमित्तानुसरणं ने तु निमित्तमस्तीत्यारोपः इति न्यायात् इत्युद्योतः ।।

ब्रह्माण्डम् ] संस्कृत-हिन्दी व्याख्योपेतम् काळभेद दुत आदि स्फोट में प्रतीत नहीं होने जिनसे दुन आदि वृत्तियों के ग्रहण को रोकने के लिए कोई प्रयत नहीं करना पटता । ननु प्राकृतध्वनिकालभेदेनेव वैकृतध्वनिकालभेदेनापि स्फोटभेदः स्यादित्यत आह- यह हस्व आदि भेद जैने प्राकन ध्वनि ले बार में है किन्तु स्फोट में आरोपिन होना है और स्फोट में उसके बारण के लिये तपर करना पड़ता है वैसे वैन धनि प्रनाति कृत कालभेद स्फोट में आरोपिन नहीं होने। क्योंकि- शन्दस्योर्ध्वमभिव्यक्तेत्तिभेदे तु वैकृताः। धनयः समुपोहन्ते स्फोटात्मा तैन मिद्यते ॥ ७ ॥ शब्दस्य स्फोटस्य अभिव्यक्तः प्राकृत धनिजन्याभिव्यक्तः ऊर्यम् अनन्तरं जायमानाः बैठता ध्वनयः वृत्तिभेदे दुतादिधृत्तिभेदै स्थितिभेदे इति पाठे स्फोटो. पलम्मकालभेदे तत्कालं स्फोटोपलम्भे समुपोहन्ते कारणानि भवन्ति तैः चैकृत. ध्वनिभिः स्फोटात्मा स्फोटस्वरूपं न भिधते वृत्तिभेदेऽपि स एवायमकार' इति प्रत्ययादित्यर्थः ।। स्फोटरूपी शब्द को अभिव्यक्ति के बाद उत्पन्न होने वाली वैकृत-ध्वनियों दुतादि वृत्तिभेद (स्थनिभेद पाठ में स्फोट की उपलब्धि काल के भेद ) में कारण होती है। उन वैकृतध्वनियों से सोट के रूप में भेद नहीं होता क्योंकि 'यह वही आकार है' यह शान होता रहता है। यदातुः संग्रहकार:- "स्फोटस्य ग्रहणे हेतुःप्राकृतो ध्वनिरिप्यते । घृत्तिभेदे निमित्तत्वं वैकृतः प्रतिपद्यत' इति ॥ अयं भावः यथा प्रकाशः उद्यनेव पटादियो भिन्न घटं प्रकाशयति अनन्तरं सु प्रकाशेन पुनः पुनदृश्यमानोऽपि घटो न पूर्वप्रकाशितघटाद् भेदमवलम्बने तथा प्राकृतवनिरेव भिन्न स्फोटमभिव्यञ्जयति अनन्तरं वैकनवनिस्तु पूर्वाभिव्यक्तस्यैव तावस्कालमुपलम्भ हेतुर्भवति न पूर्वाभिव्यमाद् भेदे अत एव मुतादिवृनिभेदेऽपि अकार एव पुनः पुनरुपलभ्यते तथाचानुभवः तमेवायं विलम्बितमुच्चारितवानन्यो १. वृत्तिभेदे इति । वृत्तयश्च तिस्रः- अभ्यासार्थ द्रुना धृत्तिमध्यादै चिन्तने स्मृना। शिष्याणामुपदेशार्थ वृत्तिरिष्टा विमिरा पृत्तिणु उरलमय १३ मिन्नकाल : वर्गास्तु तत्काला एव सर्वासु वृत्तिषु न वर्णानामुपचया- पचयो। यथा गन्नगामा स्यादिभेदाद् गतिभेदेऽपि न मार्गभेद इत्यर्थः ॥ २. धुमधापरमलघुमायोः 'स्फोटम्य' इनि, काशी मुदितवाक्यपदीये श्रीगाधरशानि- संपादिते तस्थाने 'वर्णरय नि, राहोरमुद्रिते समय इनि, पाठः अर्थे तु न भेदः र. मषायां 'वृत्तिभेदे' त्यस्य स्थाने स्थिनिभेदे' इति पाठः निराचिरोपनिविशेषे इति तदर्थः रयंकारिका संग्रहकारीया अमातु हरिकारिकामु पतिता नि राहोरपुस्तके उपादिनम् ।

वाक्यपदीयम् द्रुतमिति हस्वदीर्घयोस्तु नैवमनुभव इति तत्र विपयभेद एव इति वृत्तिभेदेऽपि वर्णस्य भेदो न गृह्यते' इति सर्ववृत्तिषु तत्कालत्वम् । यदाहुर्तिककारा' 'सिद्ध त्ववस्थिता वर्णा वक्तुश्चिराचिरवचनाद् वृत्तयो विशिष्यन्ते' इति। अत्र प्रदीपः 'सर्वासु वृत्तिषु न वर्णानामुपचापचयो यथा गन्तृणामालरयादिभेदाद् गतिभेदेऽपि न मार्गभेद इत्यर्थः' इति । आलस्यादिनोच्चारण क्रियया वैकृतध्वनिभेदेऽपि न वर्ण- स्वरूपभेद इति भावः । वक्तुश्चिराचिरवचनात् चिराचिरकालोञ्चारणजनकयत्नात् जायमानवैकृतध्वनेरुपलब्धीनामेव भेदः केवलं वृत्तयो भिद्यन्ते न वर्णा इति भावः । हस्वदीर्घप्लुनास्तु' स्वत एव भिन्नाः भिन्नैर्ध्वनिभिव्यंज्यन्त इति युक्तस्तेषां कालभेदः । तदुक्तं श्लोकवार्तिके-वर्णान्तरत्वमेवाहुः केचिद् दीर्घप्लुतादिषु । नहि दुतादि- वत्तत्र प्रयोगो नान्तरीयकः इति ॥ यथार्महाभाष्यकाराः 'भेर्याघातवन्' इति वार्तिकव्याख्याने 'तद्यथा भेर्याहन्ता भेरीमाहत्य कश्चिविंशति पदानि गच्छति कश्चित् त्रिंशत् कश्चिच्चत्वारिंशत् स्फोटस्तावानेव ध्वनिकृता वृद्धिः' इति अन्न कैयटः भेरी- माहन्तीति भेर्याधातः उपलब्धिसामान्ये दृष्टान्तः । यथा प्रयत्नवशादुत्पन्लो भेरीशब्दः कश्चिदल्पकालमुपलभ्यते कश्चिचिरं कश्चिचिरतरं च एवं वृत्तिपूपलब्धीनां कालभेदो विषयस्य त्वभेद' इति ॥ 'ननु दृष्टान्ते ध्वनेरुपलभ्यमानस्य भेदी न तथेह वर्गस्य द्रुतादिन्थिति वैपम्यमत आह उपलब्धिसामान्य इति । यथा तन ध्वनेस्तावत्काल- मुपलम्भस्तथेहापि तत्तवृत्ती तावत्तावत्कालं तत्तदभिव्यञ्जकरूपरूपितत्वेन परि- च्छिशस्यैव स्फोटस्योपलम्भमानमित्येतावत्येव दृष्टान्तः न चैतावता स्फोटभेदः परिदृश्यमानकालभेदस्योपलब्धिगतत्यादिति तात्पर्यम् । एक एव स्फोटस्तत्तद्गुणैस्तत्त- दूपेणाभिव्यज्यत इति' इत्युद्योतः ।। ननु यदि नित्यः शब्दस्तर्हि तस्य कुतो न सर्वदोपलम्भ इति चेदन तपरसूत्रे भाप्यकृतः 'स्फोटः शब्दः ध्वनिः शब्दगुणः' इति स्फोटोपलब्धिप्रतिवन्धकस्ति- मितवावपसारणद्वारा स्वधर्मरूपिततदुपलब्धिहेतुत्वेन ध्वनिः स्फोटाख्यस्य शब्दस्य गुण उपकारक इति तदर्थः । एतदुक्तं भवति–स एवायमकार' इति प्रत्यभिज्ञाना- स्फोटस्य निस्यत्ये मिद्धे सर्वदा तदुपलम्माभावो व्यञ्जकाभावकृतः न तु स्वाभाव- कृतः तथा मेघान्धकारे विद्युजगिता घटवुद्धिर्न चिरमनुवर्तते तत्र व्यञ्जकाभाव एव कारणम् न तु घटाभावः । तदाहुः श्लोकवार्तिककाराः 'सन्नेव साधनाभावाच्छब्दो. १. भेदोन गृह्यत इति । ध्वनिः शब्दगुण इति भाष्ये ध्वनिशब्देन वर्णाः वैकृतध्वनिश्च उमयोरपि शब्दामिन्यजकत्वात् । तत्र वैकृतध्वनेः स्फोरस्य तद्रूपेण पुनः पुनरमिन्यक्ति: कार्य- मिति न तदभिव्यक्तस्फोटस्य तत्कालत्वं इस्वदीर्घप्लुतरूपस्फोटस्तु भित्रकालावच्छिन्नविनाती वैयनिभिरभिव्यक्तो भिन्न इव लौकिवर्ध्वनिगनभेदेन तदेवस्यापि प्रत्ययात् ॥ २. हस्वदीर्घप्लुनास्तु इति । व्यञ्जकभेदेनारोपितभेदा एवं मिन्नवनिमिरमिव्यज्यन्त इत्यर्थः।

बाकाण्डम् | संस्कृत-हिन्दी व्याख्योपेतम् 8 नैवोपलभ्यते । तणिकं साधनं चास्य बुद्धिरप्यनुवर्तते ॥ मेघान्धकारशर्वयाँ विद्युजनितदृष्टिवत् ॥' इति ॥ ७७ ॥ संपकार ने भी लिखा है कि- प्राकृतध्वनि स्फोट की प्रकाशिका है और वैकृषध्वनि द्रुतादि वृत्तियों के भेद में निमित्त बन जाती है। तात्पर्य यह है कि जैसे प्रकाश उत्पन्न होते ही पट से मिन्न घट को प्रकाशित करना है और प्रकाशित करता रहता है किन्तु प्रथम प्रतीत घर से अनन्तर प्रतीत घट में भेद नहीं उत्पन्न करता। वैसे प्राकृतध्वनि मौ भिन्न स्फोट को व्यक्त करती है। उसके बाद उत्पन्न वैकृतध्वनिप्रथम व्यक्त स्फोट के उपलब्धि काल तक प्रतीति में कारण है न कि पूर्व व्यक्त सोट के भेद में । इसीलिर हुन मध्यमा आदि वृत्तियाँ पूर्वाभिव्यक्त अकार में कोई भेद नहीं प्रतीत फरानी। अनुभव मी इमी का समर्थन करता है कि 'उसी वर्णको इमने विलम्बिन उच्चारण किया और दूसरे व्यक्ति ने द्रुत उच्चारण किया। किन्तु हस्व और दीप के बारे में ऐसा अनुभव नहीं है । अतः स्फोट के अभिव्यक्तिकाल में प्रतीत होने वाले प्राकृतध्वनि के धर्म स्फोट में न प्रतीन हों इसलिए तपरस्तत्कालस्य सूत्र बनाया गया। वैकतध्वनि के धर्म स्फोट में नहीं प्रतीत होते अनः उनकी प्रतीनि रोकने के लिए कोई यल करने की आवश्यकता नहीं है। वार्तिककार ने भी कहा है कि-वर्ण सदा एक रूप है किन्तु चिरकाल और अचिरकाल में उच्चारण के कारण वृत्तियों में भेद है। प्रदीपकार ने कहा कि जैसे अलस्य के कारण गनि-भेद हो जाने पर भी मार्ग-भेद नहीं होता वैसे सम्पूर्ण वृत्तियों में वर्णों का उपचय अथवा अपचय नहीं होता। इस्व, दीर्घ और प्लुन नो स्वतः भिन्न है और भिन्न भिन्न धनियों से अभिव्यक्त होते हैं । अतः हस्वादि से द्रुनादि वृत्तियों में बढ़त बड़ा अन्तर है । १. वायवीया हि ध्वनयोऽभिव्यञ्जकाः ते च पौत्र प्राप्यवान्नः प्रयानाः शुदबुद्धिरपि तअनुवर्तिनी मेघान्धकारे विद्युञ्जनिता घटबुद्धिरिव न चिरमनुवर्तत इति ॥ ननु वोयमन्धकारो नामदन्य गुणकर्मनिष्पत्तिथानामावस्तमानि काश्यपीयाः। नया तु नील्बुद्धिनिमित्ताम्यात अमावस्प नीलिगामावात् न चासतो नीलिग्नः किंचिद्राहक स्मारकं वास्ति लोकादर्शन- मात्रैग तु तद्भमो भवतन्छ्न्यगागेऽपि स्यात् अतो द्रव्या-नरमिदं वायुपत्रीलिमगुणम् । वायुररूपः स्पर्शवान् इदं चास्पर्श रूपवदित्यनावान् विशेषः । अथवा य एते पार्थिवानसरेणवो वातायनविवरेषु दृश्यमानाः सर्वतो भ्रमन्ति तेषा ये नीलगुणकाः नदूतमिदं नीलरूपं गृह्यमार्ण गुगनरागा द्रब्यान्नराणां च तदनरालस्य चाग्रहणात् व्याप्ताखिलब्रह्माण्डवच्चकालि नौलरूप. मदने चालोकापेक्षा नास्तीति दर्शनबनादभ्युपगम्यते । नन्वेवं गवादिगतमपि नीलरूपमन्धकार एघेत केन च नोक्तं नेति तत्तु गोरग्रहणात्तद्गतत्वेन न लभ्यने सर्वमेव नौलरूपं तदा गृह्यते प्रमाया तु ममारूपेग गृधमाणेन यानि ग्रहणायोग्यसूक्ष्मद्रव्याश्रितानि नौलरूपाणि तान्यभिभूः जानि न गृधन्ते निमीलिते तु नेरे प्रमारूमाग्रहणादविनाभूनानि गृय ने निमोलिननेत्रस्थापि केयरपरि चाक्षुषागि तेजासि शुक्तिवच्छिद्रादिवनिःसान्त्येव यैनौलरूपं गृह्य-नै बस्त्वन्तरागि न तावद्भिग्रंशन्तै । जात्यन्धानामुवृत्तनेत्रा च यबन्धकारदर्शन नास्ति ततो न किंचित- पन् । मप स्वलिनतस्तेषामपि सन्ति कानिचिनेजासि इति कार्यदगदेव वरूप्यते । नदि कार- करनस्यात्कार्यमपोतुं युकं सर्ववस्तूनिम्मीनामा हवामगाव तत्कारणान्यरि होन्द्रित रिवान्ये वेत्याला तावत् इनि न्यायरवास , वाक्यपदीयम् नित्य शब्दों की सर्वदा प्रनीति प्रत्यायक के न रहने के कारण नहीं होती। इसीलिए भाष्यकार ने कहा है कि 'स्कोटः शब्दः ध्वनिः शब्दगुणः । तात्पर्य यह है कि जैसे मेघ के घने अन्धकार में बिजली की चमक से प्रतीन भो घटबुद्धि चिरकाल तक नहीं बनी रहती क्योंकि व्यजक नहीं है वैमे ध्वनि के बिना स्फोट की प्रतीनि सर्वदा नहीं होनी ॥ ७७॥ ध्वनयः स्फोटाभिव्यञ्जकाः इत्युक्तम् , तत्र कीदृशं ध्वनीनामभिव्यञ्जकत्वमिति विषये मतनयमाह- इस प्रकार यह सिद्ध होता है कि ध्वनियाँ स्फोट की अभिव्यक्षिका है । और, इन्द्रियस्यैव संस्कारः शब्दस्यैवोभयस्य वा। क्रियते ध्वनिभिर्शदात्रयोऽभिव्यक्तिवादिनाम् ॥ ७८ ॥ अभिव्यक्तिवादिनाम् शब्दाभिव्यक्तिवादिना शब्दाभिव्यक्तिविपये प्रयो- वादाः सन्ति । तत्र ध्वनिभिः इन्द्रियस्यैव श्रोत्रस्यैव संस्कारः क्रियते तत्संस्कृतं च श्रोत्रं शब्दोपलब्धौ द्वारनां प्रतिपद्यते चक्षुप आप्यायनानुग्रहं कुर्वदुपनेत्रं चातुप- स्य लिप्यादेः यथाभिव्यञ्जकं तथा श्रोत्रस्याप्यायनानुग्रहं कुर्वन् ध्वनिः श्रौतस्य शब्दस्याभिव्यञ्जक इत्युच्यते इत्येको बादः । शब्द एव ध्वनिसंसर्गात्प्राप्तसंस्कारः श्रोत्रस्य विषयत्वमापद्यते इति ध्वनिभिः शब्दस्यैव संस्कारः क्रियते इति द्वितीयो यादः । ध्वनिभिः उभयस्य शब्दस्य श्रोत्रस्य च संस्कारः क्रियते इति तृतीयो चादः इति ॥ ७८ ।। स्फोट की अभिव्यक्ति के बारे में अभिव्यक्तिवादियों के तीन वाद माने गए है । जिसमें एक मत है कि ध्वनियों से इन्द्रिय (श्रोत्र (कान) में ही संस्कार (शब्दग्रहण- योग्यता) उत्पन्न होती है ।' दूसरे लोगों का मन है कि 'ध्वनियों से शब्द में ही संस्कार होता है। जिससे वह श्रोत्र का विषय बनता है। तीसरा मत है कि 'ध्वनियों से शब्द और सन्द्रिय दोगे में संस्कार होता है। ॥ ७८॥ तत्राद्यं पदं दृष्टान्तद्वारा उपपादयति- जो लोग पहला पक्ष मानते हैं उनका कहना है कि- इन्द्रियस्यैव संस्कारः समाधानाञ्जनादिभिः ॥ समाधानाअनादिभिः समाधानेन प्राकृतेन चित्तैकाग्रतारूपेणअञ्जनादिव्येण उपनेत्रेण च इन्द्रियस्यैव चक्षुष एवं संस्कारः क्रियते न विषयस्य अलौकिकेनापि समाधानेन सूक्ष्मव्ययहितविप्रघुष्टोपलब्धौ चतुप एव संस्कारःन विषयस्य तथा सति एकेन समाहितचेतसो चक्षुषा विषये संस्कृते असमाहितचेतोभिरपि अन्यैः विप- यस्य ग्रहणं स्यात् एवं ध्वनिभिरपि श्रोत्रस्यैव संकारःन शब्दस्य तथा सति शब्दरय विभुत्वेन सर्वोत्रसंबद्धतया सर्वैरपि तद्ग्रहणं प्रसज्येत विशेपाभावादिति भावः । जब हमें दूर की वस्तु नही दिखाई पटती तब हम आँख में आँजन लगाते हैं या वडी सावधानी से चित्त की एकाग्रता से देखने का प्रयत्न करते हैं, तब हम वस्तु देख पाते है। अतः इन्द्रियों में ही संस्कार होता है विषय में - 10 ॥

ब्रह्मकाण्डम् । संस्कृत-हिन्दी व्याख्योपेतम् यदाहुः-'तत्र सर्वैः प्रतीयेत शब्दः संस्क्रियते यदि' इति । नच केन रूपेगधनेः संस्कारजनकत्वं न हि संस्कारजननानुगुणं किंचिद्रूपं धनात्रुपलभ्यते इति धारयम् वनैः शब्दजनकत्वं केन रूपेगेति पर्यनुयोगस्य शब्दोत्पत्तिवादिनोऽपि समन्वात् । तभावभाषितामात्रेण कार्यानुमेयातीन्द्रियशक्त्या समाधाने तु मन्मतेऽपि अभिव्य- जधानुमेय अनिगतानीन्द्रियशक्त्या समाधानसम्भवात् । ननु शन्दविजातीयस्य घनेः कथं व्यजकत्वमिति चेत् घटविजातीयस्य दीपस्य शब्दविजातीयस्य श्रोत्रस्य वा कथं व्यन्जकत्वमिति पश्य ! तदुक्तं श्लोकवार्तिके- 'नच पर्यनुयोगोऽत्र केनाकारेण संस्कृतिः उत्पत्तावपि तुल्यत्वाच्छक्तिस्तत्राप्यतीन्द्रिया ॥ नित्यं कार्यानुमैयात्र शक्तिः किमनुयुज्यते । तद्भावभावितामात्रं प्रमाणं तत्र गम्यते ॥ अतोऽतीन्दियवेते शक्त्या शक्तिमतीन्द्रियाम् । इन्द्रियस्याऽऽदधानाः स्युः शब्दाभिव्यक्तिहेतवः ॥ व्यञ्जको नान्यज्ञानिश्वेच्ट्रोनं शब्दम्य ते कथम् । पाधियानां घटादीनां प्रदीपादिश्व तेजसः ॥' इति । द्वितीयं पतं दृष्टान्तद्वारा उपपादयति- जो लोग दूसरा पक्ष मानते हैं। उनका मत है कि- विषयस्य तु संस्कारस्तद्गन्धप्रतिपत्तये ॥ ७९ ॥ यथा विषयस्य सैलादेर्गन्धस्य-भारापेन, आतपशुष्कायाश्ना पृथिव्या गन्धस्य उदरेन, संस्कारः तद्गन्धप्रतिपत्तये पृथिवीगन्धप्रतिपत्तये क्रियते में प्राणेन्द्रि यस्य संस्कारः तथासति संस्कृतासंस्कृतयोः पृथिवीगन्धयोर्भेदो न स्याद्विशेषाभावात् । तथा ध्वनिभिरपि शब्दस्यैव संस्कारः क्रियते न श्रोत्रस्येति भावः । यदाहुःश्लोक- चार्तिककाप:--'सकच संस्कृतं श्रोत्रं सर्वशब्दान् प्रबोधयेत् । घटायोन्मीलितं चतुः पटं न हि न बुध्यते ॥' इति ॥ ७९ ॥ जब पथिवी गौ से नए जाती है और हम उपका गन्ध जानना चाहते है तब उस पर पानी गिरा कर उसके गन्ध का यह टोक रूप से कर लेते हैं। बर्दा गन्ध प्रण के लिए विषय (वी) में संस्कार करते है प्राणन्द्रियों में नहीं ॥ ७९ ॥ तृतीयं पदं दृष्टान्तद्वारा उपपादयति-~- जो लोग तीसरा मन मानते है। उनका मत है कि- चक्षुपः प्राप्यकारित्वे तेजसा तु द्वयोरपि । विपयेन्द्रिययोरिष्टः संस्कारः स क्रमो ध्वनेः ।। ८० ॥ यथा चनुपः मायकारित्वे विषयदेशं गया विषयमादकत्व तेजसा झालो. केन प्रदीपादिना द्वयोरपि विषयेन्द्रिययोः विषयदेशं गतस्पेन्द्रियस्य विषयस्य च 1 ६२ वाक्यपदीयम् संस्कारः इटः स एव ध्वनेः अपि क्रमः तथैव ध्वनिविषयेऽपि मतत्रय मन्त- ध्यमित्यर्थः । दीपेन विपये तमोरूपावरणनिवृत्तिरूपः चक्षुपि च चक्रश्मिवर्धनरूपः संस्कारः क्रियते धनिना च शब्दश्रोत्रेन्द्रिययोरतीन्द्रियः कश्चनसंस्कारः क्रियते इत्येके। शब्दे शब्दावारकस्थिर वाय्वपसारणरूपः श्रोत्रे च श्रोत्रमभिव्याप्य स्थित. स्य कोष्टयस्य वायोरपसारणरूपः संस्कारः क्रियत इत्यपरे इति तत्त्वम् । जैसे चक्षुरिन्द्रिय विषय (घट ) के समीप जाकर उसका ग्रहण करती है, किन्तु अन्धकार में पड़े हुए घर का प्रत्यक्ष तब होता है जब दीपक की सहायता मिलती है। इससे यह मानना पड़ता है कि दीपक विषय (घर) और इन्द्रिय दोनों में संस्कार करता है। अर्थात विषय से अन्धकार निवृत्ति और नेव में ज्योति की वृद्धि रूप संस्कार करता है । वैमे ध्वनि मी शब्द और श्रोत्रेन्द्रिय दोनों में कोई मतीन्द्रिय सस्कार करती है ५८० ॥ अयं भावः-यः कश्चन पुरुषः सन्तमसे स्थितः भालोकस्थितं घटं पश्यति तत्र चन्नुपःप्राप्यकारितया घटदेशगतं चतुरपि विषयमिवालोकः संस्करोति न चक्षुर्मानं तथा सति भालोकदेशस्थितोऽपि अन्धकारस्थं घटं पश्येत् न धा विषयमानं तथासति सर्व आलोकस्थस्य विषयस्य ग्रहणं स्यात् विशेपाभावात् । विपयेन्द्रियसंस्कारपने तु न पूर्वोक्तपक्षद्वयदोपप्रसङ्गः । यदाहुः श्लोकवार्तिककारा:-'द्वयसंस्कारपक्षेऽत्र मृपा दोपद्धये वचः । येनान्यतरवैकल्यासः सर्वो न गृह्यते ॥' इति ॥ येषां बौद्धानां चक्षुपियासंबद्धमेव चतुर्विषयग्राहकं यदि प्राप्य प्रकाशकं स्या तदा रसनादिवदधिष्ठानसंवद्धं गृह्णीयात् नचैवं गोलकासंवद्धग्रहणात् किं च यदि चक्षुः प्राप्य गृह्णीयात् तर्हि स्वतोऽधिकपरिमाणवन्न गृलीयात् न खलु नखरजनिका परशुच्छेद्य छिनत्ति । एवं च गोलकस्य विषयदेशप्राप्त्यसंभवात्प्राप्यकारित्वानुरोधेन गोलकातिरि- तस्य चक्षुपः परैरङ्गीकारो वृथति गोलकमेव चतुः इति मतम् । तेषां विपयदेशस्थेना लोकेन न चतुपः संस्कारसंभव इति 'चक्षुषः प्राप्यकारित्वे' इत्यनेन सूचितम् । वस्तुतस्तु भधिष्ठानासंवद्धार्थग्राहिण्याः प्रदीपप्रभावा इव चक्षुपोऽपि प्राण्य- कारित्वम् पृथुतरग्रहणं च गोलकनिर्गतस्य महतश्चतुषः पृथ्वप्रत्वेऽपि प्रदीपप्रभाया इवोपपनम् स्वाधिकपरिमाणग्राहिणा त्वगिन्द्रियेण व्यभिचारेण प्राप्यमाहिणा नाधि- कपरिमाणवग्रहणमिति नियमे मानाभावाञ्च प्राप्यकार्य चक्षुरिति अन्य कर्तुराकूतम् ॥ ८ ॥ स्फोटाभिव्यक्तिविषये इव ध्वनिग्रहणविषयेऽप्यभिव्यक्तिवादिनां मतत्रयमित्याह- इसी प्रकार ध्वनि के ग्रहण के बारे में भी अभिव्यक्तिवादियों के तीन मत है। स्फोटरूपाविमागेन ध्वनेग्रहणमिष्यते । १. स्थिरेति । कथ पुनर्वायोः स्थिरत्वं सदागनिरिति हि त समाचक्षते सत्यं सूक्ष्मत्वात्तु पदार्थान्तराण्यचालयन् स्थिर व भवतीति स्थिरामिधानम् । न च तत्र वायोः सद्भावे किं मान न्यजनादिचालनेन वायूपलम्म एव । न हि तत्र पार्थिवं व्यजनं तदुपादानं व्यस्तास्तु वायवयवा व्यजनेन सहन्यन्त इत्येव युक्तम् ।

ब्राहम् ] संस्कृत-हिन्दी व्याख्योपेतम् ६३ कैश्चित् अथा जपाकुसुमरूपानुषक्त एव स्फटिकादिद्यते तया श्वनिरूपानु- पक्क एवं स्फोटो गृह्यते इति स्फोररूपाविमागेन ताल्वादिकरगाभिघातजन्यध्वन्य- भिव्यङ्गयस्फोटस्वरूपाभेदेन ध्वने प्राकृनयनेः ग्रहणं प्रतिपत्तिः इष्यते म्वीक्रियते । कुर लोगों का मत है कि-रफोट और प्राकृतवनि को ज्ञान एक रूप (अमंद रूप) से होता है। तेपामिदमाकूतम्---यथा प्रभाकरादिकारणजन्यालोकाभिव्यगायनम्मरूपापि भागेन आलोकस्य प्रतिपत्तिर्भवति नालोको न वा स्तम्भः परस्परं विभागेन ग्रहीतुं शस्यते तथापि प्रमाकरजन्य आलोकः कादिजन्यस्तु स्तम्भादिरिनि तयोर्भेदो व्यवस्थाप्यते । तथा नाल्वादिकारणजन्यधन्यभिव्यङ्गयस्फोटस्वरूपाविभागेन ध्वन. प्रतिपत्तिर्भवति न वनिनापि स्फोटः परस्परं विभागेन ग्रहीन शक्यते तथापि ताला- दिकारणजन्यो वनिः नित्यत्वादकार्यवस्फोट इति श्रनयोर्भेदो व्यवस्थाप्यतेन तु नयो- भैदैन ग्रहणम् केवलमेतदेव संभवति यत् आलोकजनिता स्तम्भादिप्रतिपत्नि. व. निजनिता तु स्फोटप्रतिपत्तिरिति । यदाहुः श्लोकवार्तिककाराः-'नादेन संस्कृता. होयद्यदा शब्दः प्रतीयते । तदुपरलेपनस्तस्य वोधं केचित्प्रचाने' इनि अश्रौत्र- स्थापि वायुसंयोगविभागरूपस्य ध्वनेः शब्दोपश्लेषण ग्रहणनिनि भावः । इनका तात्पर्य यह है कि जैसे प्रकाश में खम्भे को देखने पर खम्भे और प्रकाश का अलग-अलग शान नहीं होगा वैसे ता आदि स्थानों से उत्पन धनि द्वारा व्यङ्गय सोट का मो ध्वनि से अलग शान नहीं होता। फिर मी जैसे प्रकाश को सूर्यजन्य और स्तम्भ को काट बन्द मानते है वैसे नालु आदि कारणों से उत्पन्न ध्वनि और नित्य अकार्य स्फोट के भैर मी माने बाने हैं ॥८०३ ॥ कैश्विद्ध्वनिरसंवेद्यः स्वतन्त्रोऽन्यः प्रकल्पितः ।। ८१ ॥ कैश्चित्तु यथा विषयप्रतिपत्ति जनयन्त्यतीन्द्रियाणि असंवैधानि तथा स्फोटर- निपनि जनयन्नपि वनिरसंवेद्य इध्यते विषयप्रतीन्यन्ययानुपपायाऽनुमेयं किमपी- न्द्रियं नाम अस्तीनि यथा कार्यदर्शनाददगम्यने तथा स्फोटोपलभ्यन्मयानुपपत्या कश्चिदत्यन्तापरोक्षो ध्वनि म स्वकारणतोऽस्तीत्यनुमीयते। पितानवगमेऽपि रित्ता. ततिक्तत्वेन मधुरोपलम्भवत् पित्तगतेन पीतरूपंग शोपलम्भवञ्च बनेरवगमेऽपि प्वनिरूपमिश्रितःशुचःस्फोट उपलभ्यतेन ध्वनिःवायोरौत्रवेन मीमांसकाभिमनस्य पायुसंयोगविभागरूपस्य संपोगविभागविशिष्टवायुरूपस्य वा नस्याश्रोतवादिनि तपां मायः । भेर्याघातस्थलेपि स्फोट एव भेरीताहनाभिव्यक्तः श्रोत्रप्रायः शब्दानां चि. राचिरोपलब्धिकरायलमहत्ववान् वैकृतघ्ननिरेबापचादिना लक्ष्यते इति ध्येयम् । तदुक्तं श्लोकवाति के नैद वा प्रहणं तेषां राधे दुद्धिस्तु तद्वमात्' इति तेशं. प्वनीनाम् । भगृहीतेऽपि ध्वनिरूप व्या तशात्तपत्तामात्रंग शब्दप्रहण मित्यर्थः।

वाक्यपदीयम् अन्यैः दूरादुपलब्धौ स्वतन्त्रः शुद्धः स्फोटामिश्रितः ध्वनिः' प्रकल्पितः इप्यते केवलो ध्वनिरेव गृह्यते वैयाकरणैः शब्दविशेपो ध्वनिर्न वायवो वायुसंयोगा वा इत्यभ्युपगमेन ध्वनेः धौनत्वात् । तदुक्तं श्लोकवार्तिके 'ननु यस्य द्वयं श्रौत्रं तस्य बुद्धिद्वयं भवेत्' इति । यस्य-वैयाकरणास्य, द्वयं ध्वनिः स्फोटश्च, श्रौत्रं व्यङ्गयं व्याकं च श्रोत्रग्राह्यम् इत्यर्थः । दूमरे लोगों का मत है कि-ध्वनि असवेध है (अर्थात् अज्ञेय है) और उसकी अनुमान द्वारा प्रतोति होती है और तीसरा मत है कि स्फोट से अमिश्रित ( अर्थात् पृथक् ) ध्वनि का स्वतन्त्र रूप से ग्रहण होता है। स्पष्टश्चायं पक्षः तपरसूत्रे 'ध्वनिः स्फोटश्च शब्दानां ध्वनिस्तु खलु लक्ष्यते । अल्पो महांश्च केपांचिदुभयं तत्स्वभावतः॥' इति ग्रन्थेन भाष्ये। ध्वनिःस्फोटश्चेति = व्यञ्ज. को व्यगयश्वेत्यर्थः । शब्दानान्यद्गयानांसंबन्धी न्यञ्जकत्वेन योध्वनिःस एवमहानरूपश्च लच्यते व्यगस्त्वभिन्न काल एवेत्यर्थः । उभयमिति । व्यङ्गयो व्यञ्जकश्च प्रमाणेन स्व- भावतः सिद्धावित्यर्थः। केषांचिदिति । व्यक्तानामुभयं गृह्मते अव्यक्तानां तु ध्वनिरेव इति प्रदीपः । अत्रोद्योतः 'उभयमित्यावृत्त्या योजनीयम् उभयं गृह्यत इति शेपः । रोग व्यक्तवाचामुभयम् अव्यक्तवाचां वर्णधर्मानाकान्तध्वनिरेवेत्यर्थः। ध्व. निपदेन प्राकृतवैकृतावुभावपि उच्यते। ग्रहणकभूितमुभयं तु प्राकृतध्वनिस्फोटरूपम् । पैकृतस्याल्पत्वादि चिराचिरोपलब्ध्यनुमेयमिति बोध्यम्' इति । तदयं निष्कर्षः--ध्वनिः केवलमगृह्यमाणोऽपि स्फोटोपश्लिष्टः गृह्यते इत्येके । ध्वनिर्न गृह्यते तद्रूपरूपितं स्फोटमात्रं तु गृह्यते इत्यपरे । अध्यक्तानां ध्वनिरेव व्यक्ताना तूभयम् गृह्यते इत्यन्ये। केचित्तु 'स्वतन्नोऽन्यः प्रकाशक' इति पाठमभिप्रेत्य तस्य दूरस्वदोषारस्फोट- स्वरूपानवधारणे केवलो ध्वनिरुपलभ्यते तत्रापि स्फोटो भासत एव किन्तु दूरत्वदोपा- दस्फुटः यथा दूरत्वदोपात् प्रकाशमानस्यापि चन्द्रमसोऽल्पपरिमाणतया ग्रहणमित्यर्थ संगिरन्ते ॥ ८१॥ इनमें दूसरे मत का तात्पर्य यह है कि जैसे इन्द्रियों से विषय का शान होता है किन्तु इन्द्रियों का प्रत्यक्ष नहीं होना और विषय प्रतीति किससे होती है इस जिज्ञासा की निवृत्ति के लिए. इन्द्रिय का अनुमान करना पड़ता है, वैसे स्फोट की प्रतोति के कारण की कल्पना में अन्यथानुपति से अपरोक्ष बनि का अनुमान करते है। १. स्याद्वादरत्नाकरकारास्तु-यदा केवलरुणरुणायिनादिकरणे नाकारादिविशेषावगमः तदा स्वतन्त्रो ध्वनिःप्रतीयते भकारादिव्यक्तवर्णप्रनीते तु स्कोटे ससृष्टः प्रतीयते इति व्याचक्षते । २. एकस्य उभय वर्नने इत्यर्थः अपरस्य उभयं गृह्यत इत्यर्थः । ३. वायुगुणो ध्वनिः वायो कर्णविवर प्राप्त सयुक्तममवायेन श्रीवं संस्कृय तेन गृह्यमाणः कदाचिद्वर्णरहितः केवलो गृह्यते कदाचिदानभिन्यजन् तदुपविष्टः प्रतीयते प्रमारूपवत् अस्ति हि वर्णोच्चारणे धन्युपलब्धिः दूरादिभिन्नेषु वर्णरहितध्वन्युरनिदर्शनात् ।

महाकाण्डम् ] संस्कृत-हिन्दी-व्याख्योपेतम् तीसरे मत का तात्पर्य यह है कि अश्यक्त शमों की धनि हो गृहीत होती है और व्यक्त की ध्वनि के साथ स्फोट भी गृहीन होता है ।। ८१॥ ननु एको ध्वनिर्न स्फोटाभिव्यक्तिसमर्थः द्वित्तीयध्वन्युञ्चारणानर्थक्यापातात् न ध्वनिसमुदायः ध्वनीनामुपक्षप्रध्वंसितया समुदायाभावात् किन्तु पूर्वपूर्वध्वनिजनि- ताभिः स्वजन्यसंस्कारद्वारा करणभूनाभिर्बुद्धिभिः सहकृतेनान्त्यध्वनिना स्फोटः स्फुटं प्रकाशत इत्यत्र दृष्टान्तमाह- एक ही ध्वनि स्फोट को व्यक्त करने में समर्थ नहीं हो सकती क्यों कि दूसरी ध्वनियों व्यर्थ हो जायगी। स्वनि समुदाय भी स्फोट को व्यक्त नहीं कर सकता क्यों कि ध्वनियाँ उत्पन्न और नष्ट होती है फिर समुदाय मिल नहीं सकता शिर भी ध्वनि से स्फोट का ग्रहण होता है? यथाऽनुवाकः श्लोको वा सोढत्यमुपगच्छति । आवृत्या न तु स ग्रन्थः प्रत्यावृत्ति निरूप्यते ॥ ८२ ।। यथा अनुवाकः मन्त्रसमूहः श्लोको वा आवृत्या चरमावृत्या पुनः पुनराव सनैरिति वा अम्मिन्पक्षे आवृत्येति जातायेकवचनम सोढत्वं सोटुं शक्यलं स्वीकार्य- खं गुरुच्चारणनूधारणमन्तरापि स्वेरछया पठनयोग्यताम् उपगच्छति मत्यावृत्ति तु सः अनुवाक रूपः श्लोकरूपो वा ग्रन्थः न निरूप्यते न बुद्धिविषयो भवति न सोढत्वं यातीति यावत् प्रथमाधावर्तने लोकस्य स्पुटावभासामावेऽपि अने. कावृत्ती स्फुदावभामो भवति । एवं प्रत्येकं ध्वनिभिः स्फोटस्य स्फुटावभासाभावेऽपि चरमवर्णवनिना स्फुटावभासो भवतीति भावः ।। ८२ ॥ जैसे मन्त्रों का समूह या एक श्लोक बार बार पढ़ने के बाद (बिना किसी सहायता के) पढ़ने योग्य हो जाता है। किन्तु प्रत्येक आवृत्ति में वह बुद्धि का विषय या पदने योग्य नहीं बनत11८२ ॥ दान्तिकमाह- प्रत्ययैरनुपाख्येयग्रहणानुगुणैस्तथा । ध्वनिप्रकाशिते शब्दे स्वरूपमवधार्यते ॥ ८३ ॥ तथा अनुपारयेयैः प्रत्येक स्फुटं स्फोटाप्रकाशतया इदं तदित्यध्यपदेश्यैः नयापि प्रदानुगुणैः अन्यध्वनिजन्ययनम्फोट ग्रहणोन्मुखैः प्रन्ययैः पूर्व पूर्वध्वनिजनितबुद्धिभिः सह ध्वनिप्रकाशिते अत्यन निना प्रकाशिते शब्दे स्वरूप स्वभाविक रूपम् अक्रमस्फोटस्वरूपम् अवधार्यने रपुर निधीयते ॥ वैसे प्रत्येक पनि सष्ट रूप से मोर की प्राशिका नही है किन्तु सोट के प्रहा के लिर उन्मुख पूर्व पूर्ववनियों से जन्य बुद्धि के माथ अन्य ध्वनि से प्रकाशित शम्म में जा स्कोट का राष्ट स्वरूप प्रकाशित होता है तब समोर का रूप दम समझ लेवे है। एतदुक्तं भवति-यथा प्रत्येकमावृत्तिभिः श्लोकः फुटगनभायमानोऽपि चर- वाक्यपदीयम् भावृत्त्या स्फुटमवभासते तावतापि न प्राथमिक्य आवृत्तयो निरर्धिका चरमावृत्या- श्लोकस्य स्फुटावभासे जननीये तासां सहकारितोपगमात् । एवं प्रत्येकं ध्वनिभिः स्फोटः स्फुटमनवभासमानोऽपि अन्तिम वनिना स्फुटमवभासते तावतापि न प्राथ- मिका वनयो निरर्थकाः अन्तिमध्वनिना स्फोटस्य स्फुटावभासे जननीये तेषां सहकारितोपगमादिति ॥ इदमत्र तत्त्वम्-प्रत्येकं ध्वनयो न पदास्मानं स्फोटमवद्योतयन्ति अप्रकाशात् अवद्योतने वा उत्तरध्वनिवैयर्यप्रसङ्गात् अवयवशः स्फोटाभिव्यक्तिश्चानुपपन्ना स्फो. टस्य निरवयवत्वात् प्रत्येकमशक्तौ च समुदायेऽप्यशक्तिः क्रमजन्मनामनवाप्तयोगपद्या. नो समुदायासम्भवश्वेति कथं स्फोटस्य ध्वनिभिरभिव्यक्तिरिति चेदुच्यते प्रत्येकमेव ध्वनयोऽविकलं (कृत्स्न) स्फोटमभिव्यञ्जन्ति न चेतरध्वनिवैयर्थ्यम् अभिव्यक्तिभेदात् । तथाहि' सर्वान्तिमात्मागभाविनो ध्वनयोऽनुपजातसंस्कार विशेषस्य प्रतिपत्तुरब्यक्त पदग्रहणसमर्थाः सन्तिमध्वनिजनिप्यमाणव्यक्ततरपदग्रहणानुगुणसंस्कारोत्पादिकाः बुद्धीः प्रादुर्भावयन्ति । सर्वान्तिमस्तु ध्वनिः प्राक्तनध्वन्युपजाताव्यक्तपदानुभवजन्य- सकलसंस्कारसहकृतः स्फुटतरविनिविष्टस्फोटविम्वमिव' प्रत्ययमभिव्यक्ततरमुद्भावयति यथा रत्नपरीक्षकस्य प्रथमेन विज्ञानेनाव्यक्तम् अनुपाख्येयरूपः प्रत्ययैरुपजातसंस्का. रायां बुद्धौ क्रमेण चरभे विज्ञाने प्रकाशते रत्नतत्वम् । एतदेव-'शब्दार्थप्रत्ययानाम्' [३ पा० १७ सू० ] इति योगसूत्रे 'पदं पुनर्नादानुसंहारबुद्धिनिर्माह्यम्' इति व्यासभाष्यप्रतीकमुपादाय 'यथाप्रतीतिसिद्धान् नादान् वर्णान् प्रत्येक गृहीत्वाऽनु पश्चाद् या संहरति एकत्वमापादयति गौरित्येतदेकं पदमिति तया पदं गृह्यते यद्यपि प्राच्योऽपि बुद्धयो वर्णाकारं पदमेव प्रत्येकं गोचरयन्ति तथापि न विशदं प्रथते चरमे सु विज्ञाने तदनिविशदमिति नादानुसंहारबुद्धिनिर्ग्राह्यत्वमुक्तमिति वाचस्पतिमि- धैरुक्तम् ॥ ८३॥ जैसे बालक जब कोई स्त्र मन्त्र या शोक पड़ता है। तब अपने गुरु के साथ साथ रटता है। जितनी बार गुरु जी पढने हैं उतनी बार ही पढता है। कुछ देर रट लेने के बाद वह बालक गुरु की सहायता के बिना भी रटने लगता है और उसे इलोक का ठीक शान हो जाता है। यह शान पहली दूसरी आदि आवृत्तियों में न रहने पर भी अन्तिम आवृत्ति में हो जाता है फिर भी पहले की आवृत्तियाँ निरर्थक नहीं है किन्तु सहायक है। वैसे प्रत्येक ध्वनियों से स्फोट यद्यपि स्पष्ट नहीं प्रतीत होता और अन्तिम ध्वनि से स्पष्ट प्रतीत होता है फिर भी पहले की ध्वनियाँ स्फोट की प्रतीति में सहायक हैं निरर्थक नहीं ॥ ८३ ।। १. भूपणकारास्तु-रत्येकमेव सयोगा व्यञ्जका परन्तु केचिद्गत्वेन केचिदौत्वेन केचिद्वि- सर्गन्वेनेत्यनेकै प्रकाररित्येव स्फोटग्रहणमाहुः । २. स्फुरतरतया विनिविष्टः स्फोरात्मा विम्बो यस्मिन् प्रत्यये तम् । स्फोटस्य विम्बस्य प्रतिविम्बरूा वर्णाः यथा किल मुखादेविम्बस्य विवर्ताः कृपाणादिगता दृश्यन्ते एवमेकस्य स्फोटात्मनो विवर्ता वर्ण इति भावः।

बाम् संस्कृत हिन्दी व्याख्योपैतम् पूर्वोक्त शब्दस्वरूपावधारणं स्पष्टयनि- इसे ही पट करते है- नादराहितवीजायामन्त्येन ध्वनिना सह । आवृत्तपरिपाकायां बुद्धौ शब्दोधार्यते ॥ ८४ ॥ नादैः पूर्वपूर्वध्वनिभिः आदितचीतायाम् आहितं समर्पित वीज भावना य. स्यां सा तस्याम् आवृत्तपरिपाकायाम् आवृत्तोऽग्यम्नः परिपाको यस्या सा तस्या भारत्तोऽनधारण विघ्नभूतम्य रागादिकवायम्य परिपाक परिपाचनंयस्यामिनि धा प्रथमेन वनिता विजिहावनाधीनमादिन लेन च कश्चित् परिपाका कार्यजनन शनिविशेषः अर- दिन पूर्व द्वितीयेन एवं तृतीयन अनिना ततः उदयुद्धकागयां युद्धी अन्तःकरणे ফাইল নিল বং গংঘসমা লাগার যানী- घमिरवधार्यते तदा गीरिरयेवं शब्दोऽयवधायत इत्यर्थः । उत्तरोत्ताव पलब्धिला. यामपि पूर्वपूर्ववर्णाः स्मृत्याऽनुमंघीयन्ते सेनान्स्यवोंपलब्धावपि पूर्व स्मयम्से तेन येथे मदूपान्त्यवर्णविषय प्रत्यक्षा पूर्वपु चातीतेनु स्मृतिरूपा इनि प्रायहम्मरणामिकाचित्र- रूपा बुदिः सा च चितरूपा च त बुद्धिमत्रमहर्णगोचराम' इनि श्लोक्यानिके उता नया युद्धा गौरिस्येचं गारादिविलक्षणं वन्दाना प्रत्यक्षमवगम्यते इति भावः । मी पकार नार (पूर्व पूर्वध्वनि ) से ध्वनि में एक प्रकार की भावना उत्पन्न होती है फिर बादति से उममें बाय उत्पन्न करने की शक्ति आती है इस प्रकार उदबुद्ध संस्कार बाली बुद्धि में अन्यध्वनि के सार शम्या शान टीक रूप से होता है। तात्पर्य यह है कि किमी वाश्य के उच्चारण में अब तक अन्तिम वर्ग नहीं उचोता तब तक वा स्यार्थ बोध नही हो मकना किन्नु अनिम वर्ण नक पूर्वा घनियों का प्रदर्शन हो बाता है। अतः शबद का अवधारण करने के लिये मानना पटना है कि नाद (पूर्वपूर्व पनि) एक भावना बी उन्मत्र होता है म Har का परिपाक (काननन शाम विशेष) उगन शेता है हमी प्रकार द्वितीय और तृतीय ध्वनि से भी मानना बीज और परिपाक की पत्ति होती है कि संस्कार के हो भने पर अन्न, करण में अन्तिम ध्वनि के अत्र. पलके माथ साथ सम्मका भी अवधारण होता है। इस प्रकार उत्तर इतर काकी अपारग देश में भी पूर्व वा की स्मृति का अनुसन्धान बना रहता है इसीलिए अन्तिम बन के उपाधि काल में पूर्व एवं चनिया समृति में बनी रहती है । जिसमे यद अन्तिम के विषय में प्रत्यक्ष और पूर्व वा के विषय में स्मृति रूप है। मनः प्रत्यक्ष और माया- मा होने से चित्रमा चुदि से प्रकार का मकार, औकार और विसर्ग से विख्या वानर का पत्य हो जाता है। 2011 यता अन्त्येन ध्वनिना सहनादेः पूर्ववनिमि आदिनीतायां युद्धी पनिमन्वयानन्तरं शब्दः 'गोः इन्य पदम' इति अपधायते इत्यर्थः । इदं चावधा. रग ममम्नवर्गविश्यं मरणहपम् । यदाहुः श्लोक घातिककारा-'अन्यवर्ग:पि विज्ञाले पूर्वमन्कारकारितम् । स्मरणं योगपयन मन्यन्य प्रशन्नने । मषु धरम- हद वाक्यपदीयम् थेषु मानसं सर्ववादिनाम् । इति परमार्थस्तु प्रत्यक्षज्ञानमेवेदं न स्मरणं ध्वनिसंस्कृ. तश्रोत्रेन्द्रियजन्यत्वात् अन्यथा शब्दस्य स्फुटप्रकाशो नोपपद्यतेति मन्तव्यम् ॥ यद्यपि पूर्व क्रमेण ज्ञानं जातं तथापि अन्तिमध्वनिज्ञानानन्तरं समुचयात्मकं सर्व- वस्तुविपयं ज्ञानं भवति । न चैवं सरो रस इत्यादावविशेषप्रसङ्गः, उपलब्धिक्रमारोपेण क्रमवन्तोवनयः प्रतीताः पश्चाद्युगपत्स्मर्यमाणा अपि तत्क्रमेण स्मृनाः स्फोटमव- वोधयन्तीति । अथवा-अन्तिमध्वनि के साथ नाद (पूर्व पूर्वध्वनि) से उत्पन्न भावना वाली बुद्धि में अन्तिमध्वनि के बाद 'गौ' इस शब्द का निश्चय होता है। इस मत में केवल स्मरण के द्वारा ही शब्द का अवधारण होता है। नादो नाम वर्णातिरिक्तो वर्णप्यनको वायवीयाः संयोगविभागाः संयोगविभाग- विशिष्टा वायवो वा 'वायवीयाः संयोगविभागाः शब्दमभिन्यजयन्तो नादशब्दवा. च्याः" इति शावरभाग्यात् 'नादो वायुगुणस्तद्वान् वायुर्वा यदि करप्यते' इति श्लोकवार्तिकात् 'वायवीयास्संयोगविभागाः संयोगविभागविशिष्टो वायुर्वा नादो न तु शब्दविशेष' इति न्यायरत्नाकराचावगम्यते । न च वायोरश्रावणस्वाद्वाय- वीयस्य नादस्य श्रौत्रत्वं न स्यात् ततश्च शङ्खादिनादानां श्रवणं न स्यादिति वाच्यम् वायूनां नानात्वाभ्युपगमेन केपीचिद्वायूनां श्रावणत्वमभ्युपगम्य शङ्खघोपादेः श्रावण स्वाभ्युपगमात् । तदुनं श्लोकवार्तिके-'मरुतामेव नानारवाद् घोषश्रुत्युपपादनम् इति हरवत्वादिकं च तद्गतो धर्मः वर्णेवारोप्यते इति मीमांसकाः। एतन्मतमे. वानुसृत्य 'प्रत्येकमेय वायुसंयोगा व्यञ्जका' इति भूषणलारः॥ नादो हि न वायवात्मा तत्संयोगविभागारमा वा किंतु वायुगुणः शब्दविशेषो ध्वनिरिति चोच्यते । द्विविधो हि शब्दो वर्णोध्वनिश्च । द्वयोरनुगतं शब्दवम् । वर्ण- वंध्वनित्वं च तदवान्तरसामान्ये । वर्णविशेपा गकारादयः, ध्वनिविशेषाः शङ्खघोपा. दयः । ध्वन्यात्मकश्च शब्दो वायुगुणः श्रोत्रप्रायः । तदुक्तं श्लोकयार्तिके 'धनीना श्रोत्राग्राह्यत्वं तस्मास्केचित्प्रचक्षते' इति । स एव च वर्णात्मकानां गकारादीनामभि. ध्यक्षकः प्रभारूपमिव भावान्तराणामिति मीमांसकैकदेशिमतम् । वैयाकरणा अपि नादस्य वायुगुणवं शब्दत्वं चातिष्ठन्ते । तत्रुतावान् विशेषः यद्वैयाकरणाः वाचकत्वरूपध्वनिसादृश्यानादपदेन ध्वनिपदेन च अव्यक्त शब्दविशेष. मिव वर्णानपि गृह्यते । मीमांसकास्तु-अव्यक्तं शब्दविशेषमेव नादपदेनाचक्षते न घर्णानिति, तथाहि-'येनोचारितेन' इति भाग्यव्याख्यावसरे कैयटेन 'रफोटो नादव्यङ्गय' इत्युक्तम् । उद्योतकृता 'नादो-वर्ण' इति व्याख्यानात् 'अय वा प्रतीतपदार्थकः' इति महाभाष्यप्रतीकमुपादाय 'लोके व्यवहर्तृषु पदार्थबोधक- स्वेन प्रसिद्धः श्रोत्रेन्द्रियग्राह्यत्वाद्वर्णरूपयनिसमूह एव शब्द इत्यर्थ' इत्युद्योतात 'पदं पुनर्वाचक नादानुसंहारबुद्धिनिर्माह्यम्' इति योगभाष्यव्याख्यावसरे 'यथा प्रती- तिसिद्धान् नादान्वर्णान् प्रत्येकं गृहीत्वा अनु पश्चाद्या संहरत्येकत्वमापादयति गौरि-

बाकाण्डम् | संस्कृत-हिन्दी व्याख्योपेतम्
स्येतदेक पदमिति तया पदं गृह्यते' इति धाचस्पतिमिश्रलेसात् 'शब्दार्थप्रत्या-
यानाम्' इति योगसूत्रव्याख्यावसरे 'स च वर्णरूपोऽव्यवाचकत्वाद् ध्वनिरिष्युच्यते'
इति 'नादाख्यगकारादिवर्णान्' इति च मागेशभट्टलेखात् 'शब्दश्च वायुगुणो ना.
कारागुणः अत एव भाष्ये आकाशदेशः शब्द इत्युक्तमिति' मञ्जूपायां निरूपितरवा-
चावगम्यते । ध्वनिः शब्दरूपता च 'अध वा प्रतीतपदार्थको लोके ध्वनिः शब्द
इत्युच्यते' इति महाभाष्ये उक्ता। 'बुधैयाकरणः प्रधानीभूतस्फोटरूपव्यगायन्य-
अस्य शम्वस्य वनिरिति व्यवहारः कृत' इति काव्यप्रकाशकृता। ननु यस्य द्वयं
श्रीनं तस्य बुद्धियं भवेत्' इति भट्ठपादकारिकाम्याख्यावसरे तावसंग्रहटीकायर्या पशि.
फाख्यायां 'यस्य-वैयाकरणादेपारमको ध्वनियंअको मतु वायवीयसंयोगविभागा-
रमक' इति कमलशीलेन चानूदिता ॥ ८ ॥
ननु यदि ध्वनिभागाः प्रत्येकं कृत्वमेव शब्दं व्यञ्जयन्ति तर्हि वर्णेषु वर्णावय-
वाः पदे वर्णा वाक्ये पदानि च कथमवभासन्ते तत्र तेषां तदभिन्याकम्धनीना चा-
भावादत आहे-
यद्यपि ध्वनियों पूर्ण शब्द को व्यक्त करती है तथापि वर्गों में वर्णावयय, पदों में वर्ण
और वाक्य में पदों को प्रतीति होती है, क्योंकि-
असतश्चान्तराले याञ्छब्दानस्तीति मन्यते ।
प्रतिपत्तुरशक्तिः सा ग्रहणोपाय एव सः ।। ८५ ॥
अन्तराले-ध्वन्युत्पत्तिस्फुटशब्दग्रहणयोर्मध्ये निर्भागेषु अक्रमेषु वर्णपदवाक्येषु
ध्वनिभिरभिव्यज्यमानेषु वर्णे वर्णावयवसरूपाः पदे वर्णसरूपाः वाक्ये पदमरूपाः
वुद्धयो जायन्ते ताभिश्च घुद्धिभिः प्रतिपत्ता भागभूतान् असतः वर्णे पदे वाक्ये च
अविद्यमानानू यान् शब्दान् वर्णात्रयवान् पदानि च अस्तीति मन्यते सा प्रति.
पत्तरशक्तिः असामय॑म् तैः शब्दर शस्फोटग्रहणाक्षमता तशाचान्यराले शब्दा.
भिमानानच ते वस्तुतः सन्ति किन्तु स: अन्तराले शब्दग्रहणरूपो श्रमः अक्रमस्य
सत्यस्य स्फोटम्य अहणोपाय एय। यथा आराद्वनस्पती मिष्याभूतहस्तिमत्यय-
प्रवाहः सत्यवनस्पतितरवप्रतिपत्तिहेतुस्तथा भागावभासिन्यो वर्णपदविषया मिथ्या-
धुद्धयः सत्यस्फोटमतिपत्तिहेतव इति तावम् ॥ ८५॥
ध्वनि की उत्पत्ति और राष्ट्र के स्पष्ट ग्रहग के बीच के काल में जो अपय वर्ण, पद और
पावर में नहीं है किन्तु वर्णावयव, वर्ण और पद के रूप में प्रतीत होते हैं। वह समझने
पाने की शक्ति है। जिससे वह निरंशस्फोट का प्राश नहीं कर पाता । वास्तव में वे वर्गावयव
आदि शब्द में नहीं है। किन्तु यह बीच में जो शब्द भम होता है वह स्कोर के ग्रहण में
सहायक बनता है और स्फोट के ग्रहण का उपाय है। जैसे दूर के पेड़ को भ्रम से हाथी समय
लिया जाय फिर उसके ठीक रूप समझने के प्रयत करने पर यह पता चल जाता है कि
पेहरे। वैसे वांदिकों में जो विमाग की प्रतीति होती है वह असत्य है उसी बसाय से
सप फोट की प्रतीति होती है ॥ ८५॥

१०० था ॥ 7 ननु स्फोटस्यैकत्वे पदानां वाक्यानां च भेदः किंनिवन्धन इत्यत आह-- स्फोट एक है फिर भी वर्ण, पद, वाक्य आदि भेद उचित है । क्योंकि- भेदानुकारः ज्ञानस्य वाचथोपप्लयो ध्रुवः । क्रमोपसृष्टरूपा वाग् ज्ञानं ज्ञेयव्यपाश्रयम् ॥ ८६ ॥ यतः अभिन्नमपि ज्ञानं शेयव्यपाश्रयं किञ्चन ज्ञेयं विषयीकृत्यैव व्यवहारवि. पयः यतश्च भक्रमापि स्फोटरूपा वाफ् क्रमेण घटः पटः इत्यादिध्वनिगतभागक्रमेग. उपसृष्टं संलिष्ट रूपं यस्याः सा क्रमोपसृष्टरूपा व्याकध्वनिविशेषगतक्रमेणैवो. पलब्धियोग्या अतः घटज्ञानं पटज्ञानमिति शेयरूपोपमाहितया ज्ञानस्य घट इति पट इति व्यक्षकध्वनिगतक्रमोपमाहितया वाचश्च भेदानुकारः भेदरूपानुगमरूपः ज्ञाने विषयावभासरूपः स्फोटे वर्णपदावभासरूप उपप्लयः उपसर्गः कपमा ध्रुषो नियत इत्यर्थः । अत्र अप्रकृतज्ञानभेदनिरूपणस्यासम्बद्धत्वं माभूदिति 'ज्ञान स्यव वाचो भेवानुकाररूप उपप्लव' इति उपमालङ्कारो ब्यङ्गय इति ध्येयम् । जेसे शान एक है किन्तु व्यवहार में किसा ज्ञेय में नियत है। वस अक्रमस्फोट रूपी वाक् भी व्यजक ध्वनिक्रम से प्रतीत होती है अत. शेयरूपता स्वीकार करने वाले शान का और घट पट आदि व्याक पनि गन क्रम वाली वाणी का भेदानुकार (अर्थात् शान में विषयावभास. रूप और स्फोट में वर्णपदावभासरूप) असर्ग की कल्पना भी नियत है। एतदुक्तं भवतियथा विवादाध्यासिता संविस्वाभाविकभेदशून्या उपाधि- परामर्शमन्तरेणाविभाव्यमानभेदत्वाद्गगनवदिति अनुमानेन एकस्या एव संविदी गग- नस्येवीपाधिभेदेन घटज्ञानं पटज्ञानमिति व्यवहारोपपत्तौ न वास्तवो भेदः । तथा एकस्यैव स्फोटस्य व्यञ्जकध्वनिगतक्रमविशेषोपाधिक एव घट इति पट इति स्फोटभेदावभासो न वास्तव इति वर्णपदवाक्यव्यपदेश्याः यः स्फोटा निरवयवाः सन्तोऽपि अविद्ययोपदर्शितालीकावयवाः अन्योन्यमत्यन्तविलक्षगा एव नानाप्रकाराः प्रतीयन्ते । यदाहुः-सहकाराः 'ज्ञेयेन न विना ज्ञान व्यवहारेऽवतिष्ठते । नाल- न्धक्रमया वाचा कश्चिदर्थोऽभिधीयत' इति ॥८६॥ तात्पर्य यह है कि चेय के बिना शन व्यवहार में नहीं सकता और स्फोट के एक होने पर भी उस में भेद के बिना कोई कार्य चल ही नहीं सकता ॥८६॥ 'ग्रहणोपाय एव सः' इत्यनेन ध्वनिभियंक्तेषु वर्णपदवाक्यस्फोटेषु वर्ण वर्णावयव. सरूपभागाभिनिवेशिनी पदे वर्णसरूपभागाभिनिवेशिनी वाक्ये पदसरूपभागाभि- निवेशिमी बुद्धिर्जायमाना अखण्डस्फोटग्रहणोपाय इत्युक्तं तदृष्टान्तेनोपपादयति--- इसे उदाहरण द्वारा स्पष्ट करते हैं। यथाद्यसंख्याग्रहणमुपायः प्रतिपत्तये । संख्यान्तराणां भेदेऽपि तथा शब्दान्तरश्रुतिः ॥ ८७॥ यथा संख्यान्तराणां शतत्यादीनाम् भेदेऽपि एकत्वादितः शतत्वादेभिन्नत्वेऽपि बाकाण्डम् । संस्कृत-हिन्दी व्याख्योपेतम् १०१ आद्यसंख्याग्रहणम् एकरवादीनां संख्यामां ग्रहणम् ज्ञानं प्रतिपत्तये सतत्यादीनां उपायः तथा वाक्यस्फोटप्रतिपत्तये शब्दान्तरश्रुतिः अवान्तरदेवदत्तादिपदश्रवणमु- पाय इत्यर्थः। शतत्वादिसंख्यायाअयमेकः अयमेक इत्येवंरूपापेक्षात्रुद्धिजन्यत्वेन प्रका- रान्तरेण ग्रहीतुमशक्यतया तद्ग्रहणेच्छायामेकत्वादिसंख्याग्रहणं तद्ग्रहणोपायः प्रथमं गृह्यते ततश्चरमैऋत्वप्रत्यक्षेण ततोऽन्यन्तविलक्षणायाः शतवादिसंख्यायाः प्रत्यक्षम् एवं वाक्यस्फोटस्य वर्णपदभिन्नत्वेऽपि वर्णपदग्रहणं अखण्डवाश्यप्रत्यक्षोपाय इति भावः ॥ ८ ॥ जैसे सौ संख्या और एक सख्या परस्पर भिन्न है फिर एक संख्या का शान सौ सरन्या के शान में सहायक है। वैसे वाक्य स्फोट और वर्ण तथा पद परस्पर भिन है फिर भी वाक्य के बीच के पदों की प्रतीति वाक्य स्फोट की प्रोनि में उपाय है ।। ८७॥ इदानी वाक्ये पदाभावे पदे वर्णाभावे वर्णे वर्णावयवाभावे च सति वाश्यादिषु पदाद्यवभासो यनिमित्तकस्तदाह- फिर वाक्य में पद, पद में वण और वण में वर्णावयब कैसे प्रतीत होते हैं । प्रत्येक व्यञ्जका भिन्ना वर्णवाक्यपदेषु ये । तेपामत्यन्तभेदेऽपि संकीर्णा इव शक्तयः ॥ ८८॥ यथा भ्रमणत्वजास्यभिव्यञ्जकाः कर्मविशेषा उत्क्षेपणत्वज्ञात्यभिव्यनकाय कर्म- विशेषाः परस्परं भिन्नाः । यथा वा गोत्वज्ञात्यभिव्यञ्जका अवयवाः गवयस्वजात्यमि- व्यञ्जकाच अवयवाः परस्परं भिनाः तथापि यथा प्रत्येककर्मग्रहकाले इदं कर्म श्रम. णत्वाभिव्यक्षकमिदं चोत्क्षेपणस्वाभिव्यमिति । यथा वा प्रत्येकावयत्रग्रहकाले अयमवयवो गौरवाभिव्यकः अयं गवयस्वाभिव्यञ्जकः इति भेदेन प्रतिपत्तुमशस्यम् सेपामत्यन्तसादृश्यात् तथा वर्णवाक्यपदेषु व्यअकाः वर्णपदवाक्यविषयक भिन्न- भिवप्रयतमेरिनवायुभिस्तत्तस्थानेषभिहत्योत्पादिताः बनयः भिन्नभिन्न कारणजन्य- स्वात् प्रत्येकं ये मिना तेपामत्यन्तभेदेऽपि अत्यन्तसादृश्यानेदस्य ग्रहीतुमशस्य. तया वाक्यामिन्यञ्जनशक्तिमत्सु ध्वनिपु पदाभिव्यञ्जनशक्तयः पदाभिव्यञ्जनशक्ति मन्मु च वर्गाभिव्यजनशकायः संकीर्णा इत्र लक्ष्यन्ते। नच संकीः तावतैव निरवययेषु वर्णपदवाक्येषु वर्णावयवावमासः वर्णावभासः पदावभासः काल्पनिको मिथ्येति भावः॥ यपि वर्ण, वाक्य और पदों की व्यजक ध्वनियों भिन्न भिन्न कारणों से उत्पन्न होने के कारण सर परस्पर भिन्न है और उनका भेद सिद्ध है तथापि अत्यन्न सदृश होने के कारण पाय को व्यक्त करने में समर्थ ध्वनि में पद व्यञ्जक शक्तियाँ और पद को अभिव्यक्त करने की शक्ति वाली ध्वनि में वर्ण व्यञ्जक शक्तियाँसकोण है भेद से ज्ञान नहीं करा सकती एतदुक्तं भवति-वर्णाभिव्यञ्जकाः पदाभिव्यनका वाक्याभिव्यञ्जकाच ध्वनयः मत्येयं भिवाः तथापि सादृश्याभिन्नतया अप्रतीयमानाः वर्णपदवाश्यान्यभिव्यञ्ज- म्तीति वर्णाभिव्यकाबनिसरशध्वन्यभिव्यङ्ग्यत्वात्पदेषु वर्णाः पदाभिव्यञ्जकालनि- वाक्यपदीयम् सदृशध्वन्यभिव्यगायत्वाद्वाक्येपु पदानि च प्रतिभासन्ते न परमार्थतस्तत्र सन्ति तदभिव्यञ्जकध्वनीनामभावात् तद्यथा सादृश्यकल्पनया गौरित्येतदभिव्यञ्जके ध्वनी गकारस्फोटध्यक्षकध्वनिशक्तिमुत्प्रेक्ष्य तत्र व्यज्यमानं गकारं जानन्तो गकारादिव. र्णरूपाविभागेन स्फोटं जानन्ति तथा गामभ्याजेति वाक्यव्याके धनी गोस्फोट. ग्याकम्वनिशक्तिमुत्प्रेक्ष्य पदरूपाविभागेन स्फोटं जानन्ति । अयमेव हि शक्तीनां संकरो यापदव्यञ्जनशक्ति वर्णव्यझिकामपि कल्पयन्ति तत्कल्पनावशाच्च वर्णव्यञ्जका एव संहताः पदव्यञ्जकाः ते च संहता वाक्यव्यञ्जका इति भ्राम्यन्तीति ॥ ८८ ॥ ननु शब्दान्तराण्येव वर्णाः प्राक् प्रकाशन्ते न अन्यक्तं व्यक्तं वा पदरूपम् अन्याकरायाः संविदोऽन्य विषयत्वायोगादित्यत आह- यद्यपि वर्ण स्वतन्त्र रूप से शब्दान्तर को भाति प्रतीत होते हैं वे अव्यक्त अयका व्यक्तपदरूप नहीं है । तथापि अन्यरूप में उत्पन्न शान अन्यरूप में गृहीत होता है जैसे- यथैव दर्शनैः पूर्वरात्संतमसेऽपि वा । अन्यथाकृत्य विषयमन्यथैवाध्यवस्यति ॥ ८९ ॥ यथैव चतुपा दुरात् आकारमानोपलब्धौ वृक्षादीन हस्तीति व्यक्तालोका. देशात् सहसा संतमसे मन्दतरालोकेपि वा उपसृत्य तन्त्र रज्वादीन् सर्प इति पूर्वदर्शनैः प्राथमिकदर्शनैः विपयं वृक्षं रज्जु च अन्यथाकृत्य हस्तित्वेन सर्पत्वेन च गृहीत्वा तद्देशस्थित एवं प्रणिधानाभ्यासेन प्रकृतिस्थे चापि यथावयवं वृक्ष रज्जु चोपलभमानः परैर्दर्शनैः अन्यथैव पूर्वगृहीतधर्मातिरिक्तधर्मेण वृक्षत्व रज्जुत्वादिना अध्यवस्यति । पूर्वमव्यक्तालोचितं रज्जवृक्षादि भन्याकारेण भास- मानमपि व्यकालोचनदशायां स्वाकारेण रज्जुत्ववृक्षत्वादिना गृह्यते एवं पूर्वपूर्व- वनिप्रकाशनवेलायां तिरोहितारमस्वरूपः वाक्यस्फोटो वर्णपदाकारेण भासमानोऽपि अन्तिमध्वनिप्रकाशनवेलायां स्वरूपेण प्रकाशत इति भावः ॥ एतदेवोक्तं मण्डन- मित्रैः 'आरूपालोचितेष्वस्ति छन्यथारयप्रकाशनम्' इति । भारूपालोचितेपु- अव्यक्तालोचितेषु ॥ ८९॥ जैसे दूर से देखने पर वृक्ष हाथी की तरह मालम पड़ता है, प्रकाश अन्धकार में जाने पर रस्सी में सर्पभ्रम होना है अर्थात प्रथम दर्शन में विषय वृक्ष और रस्सी दूसरे रूप में (हाथी या सर्प रूप में) गृहीत होता है। पुनः ध्यान से मन को एकाग्र कर जा देखते हैं तब अन्यथा (दूसरे रूप में ) अर्थात् वृक्ष और रस्सी के रूप में देखते हैं ।। ८९ ॥ दृष्टान्तमुपपाच दान्तिकमुपपादयति- उदाहरण द्वारा स्पष्ट करते है। व्यज्यमाने तथा वाक्ये वाक्याभिव्यक्तिहेतुमिः । भागावग्रहरूपेण पूर्व वुद्धिः प्रवर्तते ॥९॥ १. प्रकृतिस्थे-चाश्चत्यरदिने ।

माकाण्डम् संस्कृत हिन्दी व्याख्योपेतम् तथा वाक्ये निर्भागे वाक्ये व्यग्यमाने न्यञ्जनीये वाक्याभिव्यक्तिहेतुभिः निर्भागवाक्याभिव्यक्तिविषयकप्रयत्नविरोपोत्पद्यमानैर्ध्वनिभिः पूर्व प्रथम भागायन- हरूपेण वर्णपदाभिव्यञ्जकध्वनिभिन्नैरपि सादृश्यात्तच्छक्तिमांकर्यमिवापन्नैः वर्णपद. प्रत्यवभासरूपभागावग्रहविषया बुद्धिःप्रवर्तते जायते। ततः प्रणिधानादिना वास्त- चमखण्डं स्फोटं बुद्धया विषयीकुर्वन्ति ताशप्रणिधानासमर्थास्त्वस्मादयः साव- यवस्वमेव सरयतया मन्यन्ते इति तात्पर्यम् । वैसे जब अखण्ड वाक्य की अभिव्यक्ति के प्रयत्नों से उत्पन्न ध्वनियों के द्वारा अखण्ड वाक्य व्यक्त करना है तब पहले धर्ण, पद के माग वाली बुद्धि प्रवृत्त दोनी है। पुनः प्रणिधानादिवस बास्तविक अखण्ड स्फोट का ज्ञान होता है।। ९०॥ ननु स्फोटाभिव्यञ्जकैर्वनिभिः कथं वर्णपदप्रन्यवभासरूपभागावगाहि मिथ्या- बुद्धिरिति चेत् कथं शुक्तिप्रमाजनकेन चक्षुपा रजतावभासा मिथ्यावुद्धिरिति पश्य । यदाहुर्मण्डनमिश्रा:-धवनयः सदृशारमानो विपर्यासस्य हेतवः। उपलम्भस्मेवेष्ट विपर्यासस्य कारणम् ।' इति । उपलम्भकमेवेति । यथा दूराद नस्पत्ती इन्द्रिय- समिकर्षों विपर्यासस्य निमित्तं स एव प्रणिधानसहायो वृक्षोपलब्धेनिमित्तमेवं निमित्तमेवेदृशं शब्दतायोपलब्धैः यहिपर्यासयदेव शब्दतावमुपलम्भयति । नहि शब्दान्तर विलक्षणध्वनयोऽन्ये तस्याभिव्यक्ती सन्ति येन कदाचिद विपर्यासो भवेत् तत् एव च तुस्यरूपः सर्वप्रतिपत्तॄणां तनिमित्तस्य समानस्वादिति भावः ॥ ९ ॥ ननु यदि वाक्ये असरयान्येव वर्गाः पदानि च कल्प्यन्ते तर्हि दूरस्थवृक्षादौ पूर्व कस्यचिन्मेघ इति कस्यचिरपर्वत इति कस्यचिदस्तीति कल्पनावश्यते न तु फ्रमनि. यमः इह सु पूर्व वर्णावग्रहा घुद्धिः ततः पदावग्रहा ततो वाफ्यावग्रहा इति क्रमनि. यमः किंकृत इत्यत आद्द-~- दूरस्थवृक्ष में किसी को मेघ, कप्ती को हाथी, किसी को पर्वत का अनियत भ्रम होना है किन्तु शन्द्र में पहिले नणं उसके बाद पद उसके बाद वाक्य रूप में नियतकम प्रतीत होने में क्या कारण है इस प्रश्न का उत्तर कहते है- यथानुपूर्वीनियमो विकारे क्षीरवीजयोः। तथैव प्रतिपत्तॄणां नियतो घुद्धिपु क्रमः ॥ ११ ॥ पदार्थानां नियतशक्तिवात् यथा क्षीरवोजयोः विकारे दधिवृक्षभावेन परिणाम । आनुपूर्वीनियमः क्रमनियमः तथैव प्रतिपत्तृणाम् अग्दिशामस्म- दादीनां स्फोट विषयासु बुद्धिपु पूर्व वर्णविषया ततः पदविषया ततो वाक्यविषया बुद्धिरिति कमो नियतो वर्तते नियतकमयायमस्य व्यङ्गयस्यापि क्रमनियम इत्यर्थः॥ जैसे दूध और पीज का रिकार ददो और वृक्ष है और इन विकारों का क्रम भी नियत १(अर्थाव दूध कुछ गादा होता है त दही बनता है। वोब में अंकुर निकलता है तब धीरे धीरे पक्ष बनता है इस प्रकार कम धा हुआ । वैसे ज्ञान प्राप्त करने वाले हम लोगों को १०४ वाक्यपदीयम् बुद्धि स्फोट को क्रम से ग्रहण करती है (उसमें भी पहले. वर्ण फिर पद फिर वाक्य विषयक बुद्धि) इस तरह क्रम नियत है। अयं भावा-यथा क्षीरस्य विकारे दनि जननीथे प्रथम तीरं किंचिकटिन ततोऽधिकं कठिनं ततो दधिभवतीति आनुपूर्वानियमः, यथा वा बीजस्य विशारे वृत्रे जननीये पूर्व वीज द्वैधीभवति ततोऽङ्करः ततो विपत्रितः ततः पक्षवितः वृक्षो भवतीनि भानुपूर्वीनियमः । तत्र च राज्ञापि प्रथमावस्था द्वितीया, द्वितीया च प्रथमा कतुं न पार्यते इति तयोविकारे नियतैयानुपूर्वी एवं प्रतिपत्तणां स्फोटप्रतिपत्ती व्याक. बुद्धिक्रममन्तरेण अशक्त्या बुद्धिपु नियता क्रम इति ॥ ११ ॥ तात्पर्य यह है कि जैसे दूध से दही बनने में पहले दूध कुछ गाढ़ा होता है फिर धीरे धीरे गाढता बढती जाती है और अन्त में कम से सुन्दर सजाव दही तयार हो जाता है श्रथवा जसे वीज विकृत हो कर जब वृक्ष बनता है तब पहले बोज दो फाँक हो जाता है फिर अङ्कुर, दोपत्तियां, पल्लव और धीरे धीरे क्रम से बढ़ कर हराभरा वृश बन जाता है यहाँ किमी राष्ट्रपति राज्यपाल या मंत्री का आदेश दढने के क्रम में ठलट फेर नहीं कर सकता। अतः इनके विकार में क्रम नियत हो है वैसे स्फोट के ग्रहण में मी व्यजक बुद्धि में क्रम नियत ही मानना पडता है॥९॥ येऽपि हि मीमांसका नित्यत्वं शब्दानामभ्युपगच्छन्तः संहतवर्णानामेव पदत्वं वाक्यत्वं चातिष्टमाना वर्णातिरिक्तं पदं वाक्यं वा न मन्यन्ते तैरपि अभिव्यञ्जकच. निक्रमकृनैव घटपटादिपदानां भेदप्रतिपत्तिर्वाच्या न प्रत्येकवर्णाभिव्यक्तिकृता पदसरू. पानवधारणप्रसङ्गात् नापि युगपत्सर्ववर्णाभिव्यक्तिकृता नदीदीनयोरविशेषप्रसमादित्य- भिप्रेत्याह- जो मीमामक शब्द को नित्य संहत वर्गों को ही पद और वाक्य मानते हैं उन्हें भी अभिव्यजक ध्वनिक्रम के द्वारा ही घट और पट आदि पदों में भेद प्रतीति माननी पड़ेगी। भागवत्स्वपि तेष्वेव रूपभेदो ध्वनेः क्रमात् । निर्भागेष्वभ्युपायो वा भागभेदप्रकल्पनम् ॥ ९२ ॥ मीमांसकाभिमतेपु भागवत्स्वपि समुदितवर्णरूपेषु तेषु सखण्डपदवाक्येषु धनेः क्रमात् ध्वनिगतक्रमेण एव रूपभेदः नदीदीनशब्दयोः स्वरूपभेदः नतु वर्ण- गसक्रमेण तन्मते नित्यानां विभूनां च वर्णानां कालतो देशतो वा पौर्वापर्यविरहात् । यदुनं श्लोकवार्तिके 'वर्णाः सर्वगतत्वाद्वो न स्वतः क्रमवृत्तयः' इति किन्तु क्रमवर्तिनः ध्वनयः क्रमेण वर्णानभिव्यञ्जन्तः स्वीयं क्रमं धणेपु दर्शयन्तः वर्णाभे- देऽपि नदीदीन शब्दयोः परस्परं भेदमवभासयन्ति । एवं पूर्वार्द्धन वर्णनित्यत्वम- भ्युपगम्य समुदिनवर्णपदरूपमखण्डपदवाक्यस्फोटयादिनां मीमांसकानां मनमुक्त्वा उत्तरार्द्धनाखण्डस्फोटवादिनां मतमाह-निर्भागेविति । वा अथवा यथा सखण्ड. पदवाक्यस्फोटवादिना पूर्वपूर्ववर्णानां सखण्डपदादिबोधे उपायता तथा निर्भागेषु भखण्डपदादिस्फोटेषु भागभेदप्रकल्पनम् उपायः इत्यर्थः ॥ -- बमकाण्डम् ] संस्कृत-हिन्दी व्याख्योपेतम् १०५ जैने मोमाता के मत से समुदित वर्ण रूप अखण्ड पद और वाक्यों में ध्वनि के कम से ही नदी दीन आदि पदों का स्वरूप भेद है । (वर्णगत कम से नहीं) क्योंकि इनके मत से नित्य और विभु वर्षों का कालिक सम्बध या दैशिक सम्बन्ध से पूर्वापरीमाव नहीं म ना जाना) वैसे असण्ड पद, वाक्य स्फोट में भी वर्ग, पद और ववियव आदि कल्पनाएँ एक प्रकार के उय हैं । सबग्डाखण्डस्फोटप्रतिपच्युपायस्योभयोः साम्येऽपि सखण्डस्फोटवादिमते अन- न्तपदानां पाचकरवस्य अनन्तचनीनां व्याकरवस्य च कल्पनापेक्षया लाघवेन एकोऽखण्डः स्फोट एवं वाचकः । म च आकाशवृत्तिः शन्दब्रह्मरूपो मध्यमानाद- म्यगायः तत्राभिव्यअकवायुनिष्टं तत्तस्थानाभिघातव्ययं क्वादिकं भासते । कत्वादिवजारयाक्रान्तः स्वरूपरूपितस्य भानम् । तदनाकान्तैस्तु ध्वनिरूपेण । अकारादीनामैषयमकारककारादीनां धानेकत्वमिति मीमांसकमतं तु अनन्तवर्गानामनन्तध्वनीनां च कल्पने गौरवात् । न च स्फोटस्यैक्ये ककारहकारयो- रभेदव्यवहारापत्तिः । विशेष्यांशमादायाभेदेऽपि उपाध्य नालिङ्गिततत्प्रतीत्यभावेन ध्यक्षकगतवैजास्येन भेदव्यवहारादिति भावः ॥ इदं त्वयातव्यम्-दर्णा एवं नु पदम् इनि वादिनो मीमांसका उत्तरोत्तर- वोपलब्धिवेलायामपि पूर्वपूर्ववर्णा. स्मृन्यानुसंधीयन्ते तेनायवर्णापलब्धावपि पूर्वे रमर्यन्ते । तेन येयं सद्रूपान्त्यवर्णविपये प्रत्यक्षा, पूर्वेषु चातीतेषु स्मृतिरूपा चित्रस्व- रूपा बुद्धिः सैवार्थप्रतीती निमित्तमिति वदन्ति; तन्न क्रमाक्रमविपरीतक्रमानुभूना- नामविशेषेणार्थबोधकस्यापत्तेः । क्षणस्याम्मदादिमनोभिरग्राह्यतया तदटितस्य पूर्वा- परीमावरूपस्य कमस्यानुभवाविषयत्वेन न स्मृतिविषयता । न चायं दोपः भखण्ड- स्फोटवादिनोऽपि समान इति वाच्यम् प्रत्येकमेव प्रयत्नभेदभिन्मध्वनिभिः परस्पर- विपदृशतत्तत्पदव्यञ्जकैस्तुल्यस्थानकरणनिष्पन्नत्वेन गणगौरगीरित्यादी गत्वेन सह- शेरेकोप्यनेक इवानवयवोपि सावयव वन्यज्यते। तत्र यथा दूरादनस्पती पूर्वऽव्यक्ताः प्रत्ययाः व्यक्तवनस्पतिप्रत्ययजनकाः तथा पूर्व ध्वनयः अव्यक्तस्फोटमहणसमर्थाः पश्चाद्यक्तं स्फोटं व्यञ्जयन्ति । न चेयं विधा वर्णानामर्थप्रत्ययजनने संभवति । न हि ते पूर्वमव्यक्तमधियं जानन्तीति शक्यमाख्यानम् प्रत्यक्षज्ञान एव तथा नियमात् । वर्गाधेयस्स्वर्थप्रत्ययः न प्रत्यक्षः वर्णभ्यो जायमानोऽर्थप्रत्ययः स्फुट एव जायेत न वा जायेत नवम्फुट इति विशेषादिनि । यदाहुमण्डनमिश्राः 'प्रत्यक्षज्ञाननियता थकान्यताप्रभासिता। मानान्तरेषु ग्रहणमथवा नैव हि प्रहः ॥ इन्द्रियं हि व्यक्तावभासिनोऽव्यक्तावभामिनश्च प्रत्ययस्य हेतुः यथा दुराग्रहगे सूदमार्थनिरू. पगायां च । लिङ्गशब्दादस्तु निश्चितात्मानं प्रत्ययमुपजनयन्त्येकरूपं नैव वा तत्र ध्यक्ताहणबुद्धिभेद. अर्थश्च शारदप्रत्ययावसेयः स्फोटात्मा प्रत्यक्षवेदनीय इति निरवद्यम्' इति ॥ ननु कयमन्यगनेन भेदेनान्यत्र भेदावमाय इति चेद्यथा माल्यारूढा वेगेन 41 वाक्यपदीयम् धावन्तश्च पुरुषाः पर्वतादीन् गच्छन्तः मन्यन्ते, यथा च पित्तोपहृतेन्द्रियाः मधुरं तिक्तरूपेण मन्यन्ते तथेहापि भ्रान्स्या अन्यगतेन भेदेनाभ्यन्त्र भेदावसाये वाधका- भाव इति गृहाण ॥ तदुक्तं श्लोकवार्तिके- मधुरं तिक्तरूपेण श्वेतं पीततया तथा। गृह्णन्ति पित्तदोपेण विषयं भ्रान्तचेतसः ।। तथा वेगेन धावन्तो नाच्यारूढाश्च गच्छतः । पर्वतादीन् विजानन्ति भ्रमेण भ्रमतश्च तान् ॥ व्यञ्जकस्थमबुध्वैव व्यङ्ग्ये भ्रान्तिर्भविष्यति ॥ इति ॥ ९२॥ इस प्रकार इतनी कारिकाओं से यह सिद्ध किया गया कि अखण्ड वाक्य स्फोट ही वाचक है और वर्ण, पद आदि भेद काल्पनिक हैं ॥ १२ ॥ तत्र अखण्डस्फोटवादिषु शब्दानित्यत्वमभ्युपगम्य अखण्डायाः शब्दगतजाते- चकत्वमभ्युगच्छता जातिस्फोटवादिनां मतमाह- जो लोग अखण्ड शब्दगतजगति को वाचक मानते हैं उन जानिस्फोटवादियों का मत है कि- अनेकव्यक्त्यभिव्यङ्गया जातिः स्फोट इति स्मृता । कैचिद्वयक्तय एवास्या ध्वनित्वेन प्रकल्पिता ॥ ९३ ॥ कैश्चित् आकृतिनित्यत्वाच्छन्दनित्यत्वमाचताणैः अनेकव्यत्यभिव्यगया अनेकाभिर्वर्णव्यक्तिभिरभिव्यगया इदं घटपदम् इदं घटपदम् इत्यनुगतप्रतीत्या घटोपस्थितिं प्रति घटपदज्ञानत्वेन हेतुत्वेन तदवच्छेदकतया च सिद्धा घटपदत्वादिरूपा जातिः स्फुटत्यर्थोऽस्मादिति स्फोटः वोधिका इति स्मृता लाघवात् अर्थगतजातेः शक्यत्वमिव शब्दगतजातेः शक्तत्वमिति भावः । अभिव्यक्तजातेर्बोधकत्वकथनात् जातेनित्यतया सर्वदार्थबोधापत्तिः परिदता अस्या जाते. ध्वनित्येन प्याकस्वेन व्यक्तयः जात्यायीभूता उत्पत्तिमत्यः शब्दव्यक्तय एवं प्रकल्पिताः स्वीकृताः । वर्णा एव ध्वनयः वर्णानां ध्वनिनयत्येनाभेदोपचारात् । अत एव पस्पशायाम् 'अथ गौरित्यत्र कः शब्द' इति प्रश्ने लोकेऽर्थवोधकत्वेन गृहीतो ध्वनिः वर्णात्मक शब्दसमूहः इत्यर्थरम् 'अथवा प्रतीतपदार्थको लोके ध्वनिः शब्द' इत्युक्तम् । अत च काव्यप्रकाशे 'वुधैयारणैः प्रधानीभूतस्फोटरूपव्यङ्गयव्यञ्जकस्य शब्दस्य ध्वनिरिनि व्यवहारकृत.' इत्युक्तमिति भावः ॥ अनेक वर्ण व्यक्तियों से अभिव्यक्त होने वाली घटलपटत्व आदि जाति ही स्फोट की वोधिका है । और इस जाति की व्यञ्जक जात्याश्रयीभूत उत्पन्न होनेवाली शब्दव्यक्तियों ही स्वीकृत हैं । तात्पर्य यह है कि यदि व्यक्ति स्फोटवादी के अनुसार अत्व जाति न मान कर अकार व्यक्ति को हो नित्य मानेगे तो उचित नहीं। क्योंकि अर्कः अश्वः अर्थः इत्यादि पदों में एक अकार नहीं रह सकता। अनः अकार अनेक हैं और अत्व जाति से ही सोयं अकारः यद प्रत्यमिचाभी बन जाती है । इसलिये जातिस्फोट ही मानना चाहिये । ९३ ॥ एव -

ब्रह्माण्डम् | सस्कृत-हिन्दी व्याख्योपेतम्
व्यक्तिस्फोटवादिना हि अस्वादिजाति म्युपेयने अकारादिव्यतोवैकवं नित्यवं
चा-युपगम्यते तब नयुक्तम् अकागदिव्यक्तरेकरवे दण्ड अग्रम इत्यत्र कालव्यचाया, दण्ड
इत्यत्र शब्दव्यवायः भवः, अको, अर्थ इत्यत्र दुगपशष्टयवस्वेधूपलम्भश्च नोपपद्यतेति
अकारादीना नानान्धमभ्युपैयम वतन तद्वतजाव्या सोऽयमकार इति मत्यभिज्ञोप.
पत्ती नाकागदिव्यतीनां नित्यत्वमास्थेयम् इनि जातिस्फोटवादिन आकृतम् ॥१३॥
घटपदस्वादिजातिमनङ्गीकुर्वनामेकं नित्यं शन्दतत्वमगीकुर्यतासिधान्तिनां मतमाह-
जो लोग घरपदत्य रूपा जाति नहीं मानने किन्तु नित्य और एक शदनव मानते है न
मिद्धान्ड शादियों का मन है कि-
अविकारस्य शब्दस्य निमितविकृतो ध्वनिः ।
उपलब्धौ निमित्तत्वमुपयाति प्रकाशवद ॥ ३४ ॥
प्रकाशवत् यथा प्रदीपप्रकाशः दानाधितस्य स्वमावदस्य घटादैः म्वरूपावि.
भागेन उपलब्धौ निमित्तयमुपयाति तथा निमित्तः तत्तवर्णपदवाक्यविषयकप्रयत्न.
प्रेरितवायभिधातरूपकारणैः विकृतः प्राप्तविकारः उत्पत्र इति यावत् ध्वनिः
शनाश्रितस्य स्त्रसम्बदस्य अविकारस्य विकाररहित्तस्य नित्यस्य आन्तरस्य
शब्दस्य एकस्य शब्दतत्वस्य स्वरूपएपितरमोपलव्धौ निमित्तस्यमुपयाति
शब्दस्यत्यत्रैकरवं विवक्षितमिति ध्येयम् ॥ १५ ॥
जेसे प्रदीप का प्रकाश अपने स्वरूप के माथ घट का प्रकाशक होता है। वैसे उन उन वो
# খাল ক কি সব ঔ মৰি ৰায় ই জাগরণী ক্যগে বিকুল (শ) নি
अपने से सम्बद्ध विकार रहिन नित्य मान्नर शुदात्त को उपलब्धि में निमित्त बनना है ।।१४।
ननु नित्यः शब्दो ध्वनिनाभिव्यग्यत इति न युक्तममिव्यङ्गयस्य घटादरनिरय-
पदर्शनेन अभिनयस्वस्यानित्यदिव्यध्यत्वावगमेन शब्दोऽनित्यः अभिन्या या
द घटवदित्यनुमित्या शब्दस्यानित्यल्पसङ्गात् अनभिन्यद्यन्ये चानभिन्यायस्य
कादाचिरकभानविषयस्य जन्यस्यनियमेन मुनरामनित्यत्पमत आहे-
इससे यह सिद्ध हुआ कि 'निय शब्द ध्वनि से अभिव्यक्त होता है। किन्तु को यक
है घर बादि वद नित्य नहीं है। इसलिए अमिव्ययत्व अनित्यत्व का व्याप्य है। नर पनि
से अभिव्यक्त शब्द नित्य नहीं हो सकता' यह नहों कहा जा सकता क्योंकि-
नयानित्येवभिव्यक्तिनियमेन व्यवस्थिता ।
आश्रयैरपि नित्यानां जातीनां व्यक्तिरिप्यते ॥ ९५ ॥
आश्रयैः जातीनामायः धादिभिनित्यानां जानीनां व्यक्तिः अभिव्यक्ति
रिष्यते । अतः अनित्येपु घटादिषु नियमेन अभिव्यक्तिः न च व्यवस्थिता
अनित्यमेवाभिव्यद्यमिति न नियम इति अभिव्यगायत्यं नानित्यत्वच्याप्यमिति
यावत् । नित्याया जानेरपि अभिव्यङ्गवत्य दर्शनेन अनित्यवायभिचारि अभि.
यजयवं नानित्यल्बसाधनक्षममिति भावः ॥२५॥

१८६ बांक्यपदीयम् घटस आदि जातियों के आनय अनित्य पर आदि पदों से नित्य घटत्व जाति की अभिव्यक्ति होती है । इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि 'अभिव्यक्ति अनित्य की ही होनी है। ॥२५॥ ननु समानदेशस्था एव घटादयः समानदेशस्थैर्दीपादिभिरभिव्यज्यन्ते न गृहा- न्तरस्था गृहान्तरस्थैरिति दर्शनात् । समानदेशस्थयोरेव न्यायव्यअकभाव एष्टव्य इति ताल्वोष्टादिव्यापारजन्यैः शब्दजशन्दन्यायन श्रौत्रदेशस्थितैर्ध्वनिभिः क्थमा- न्तरस्य स्फोटस्याभिव्यङ्गयता तदभावे चागतं शब्दानित्यवमत आह- यद्यपि जसे समानदेशस्थ दोप समान देशस्य घर का प्रकाशक है किन्तु गृहान्तरस दीप गृहान्तरस्थ घटका प्रकाशक नहीं होता। वैसे ओष्ट तालु आदि स्थानों में उत्पन्न और शम्दजशन्द न्याय से श्रोत्र देश तक आई हुई ध्वनि आन्तरस्फोट को व्यक्त नहीं कर सकती क्योंकि दोनों का देश समान नहीं है । तथापि- देशादिमिश्च सम्बन्धो दृष्टः कायवतामिह । देशभेदविकल्पेऽपि न भेदो धनिशब्दयोः ।। ९६ ॥ इह लोके कायवतांमूर्तानां परिच्छिन्नपरिमाणवतां घटादीनांदेशादिभिःसम्ब. न्धः अयमेतद्देशस्थः अयमेतद्देशस्थः इत्येवंरूपो दृष्टः नामूर्तस्य शब्दस्य तस्य व्यापक त्वेन सर्वदेशस्थत्वेन देशदेशिव्यवहाराभावात्। एवं च शब्दो नाभिव्यङ्ग्याध्यक्षकभिन्न- देशस्थत्वादिति स्वरूपासिद्धो हेतुरितिभावः। तुप्यतु दुर्जनन्यायेन ध्वनिशब्दयोः देश- भेदव्यवहारमभ्युपत्याह-देशभेदविकल्पेऽपीति । ध्वनिशब्दयोः देशभेदवि. कल्पेऽपि देशयोः श्रीब्रहृदयाकाशरूपयोः औपाधिकभेदवरवेऽपि धस्तुत आकाशस्य एकरपेन न देशभेदः । अथ च औपाधिको भेद आश्रीयते तहिंसा भेदप्रतीतिर्वस्तुशून्यतया विकल्पः तस्मिन् आश्रितेऽपि न भेदः नाधिकरणदेशभेदः वनेः श्रोत्रद्वारा हृदयदेश- गमनेन' उभयोरेकदेशस्थत्वादिति भावः ॥ तदुक्तं भाप्य 'श्रोत्रोपलब्धिर्बुद्धिनिर्माह्यः प्रयोगेणाभिज्वलितः आकाशदेशः शब्दः एकं च पुनराकाशम्' इति । काययताम पोति पाठे काययतां परिच्छिन्नपरिमाणवतामपि सूर्यादीनामेकदेशस्थानामनेकदेशे प्रतिपात्रं प्रतिबिम्बानामभिव्यक्तिदृश्यते । यदाहुः-'आइकेन निमितेन प्रतिपानं पृथक पृथक् । भिन्नानि प्रतिबिम्वानि जायन्ते युगपन्मम' इति किं पुनर्विभोः शब्दस्य सर्वगतस्वेन ध्वनिदेशस्थत्वादिति भावः ॥ ९६ ॥ इस रोक में मूर्त या देवानों (घट आदिकों के ही देश-आदि सम्बन्ध होते है, अर्थात ऊपर लिया नियम मूर्तों के लिये है) अमूर्त ध्वनि और शब्द तो भिन्न भिन्न (जैसे धनिया १. तदुक्त परमलघुमजपायाम् 'भत्रैद बोध्यम्-नचिद्धटमानयेति वैखरीनादः प्रयुक्तः म केनचिच्छोडेन्द्रियेग गृहीतः । स नाद इन्द्रिय द्वारा बुद्धिद्गतः (बुद्वयान्तःकरणेन हृदयदेशं गत) सन्नर्थवोधक शब्द खनिष्ठकवादिना यजयति तस्मादर्थबोमः । स्फुटत्यर्थोऽस्मादितिव्युत्प- त्या स्फोट. । उच्चारयिनस्तु युगपदेव मध्यमावैखरीया नाद उत्पयते। तत्र वैखरीनाको वहः फूत्कार वामध्यमानादोत्साहकः मध्यमानादः स्फोटं व्यज्जयनीनि शीनमेव तनोऽर्थबोधः। परस्य विलम्बन नुभवसिद्धत्वात्' इति ।

प्रकाण्डम् ) । संस्कृत-हिन्दी व्याख्योपेतम् १०६ प्रोत्राकाश और शब्द हृदयाकाम) देश में रहता है फिर भी स्थान भेद नहीं है। क्योंकि आकाश एक है और ध्वनि भी श्रोत्र द्वारा हृदयाकाश में पहुँचती है ॥ ९६ ॥ ननु जन्यजगस्योरेव नियतत्वं तश्यते यथा तन्तुभिरेव पटः कपालाभ्यामेव घट इत्यादिः । न तु व्यङ्गयव्यञ्जक्योः घटव्याकेनापि दीपेन पटादेरभिव्यने । किंच नाभिव्यङ्गय वेऽभिन्याकनियमः मगिप्रदीपौषधिभिरपि घटाद्यभिव्यक्तः। एवं च यदि घनिशब्दयोर्यनयन्यनकभावः स्यात् तदा कप्ठाभिघातजेन ध्वनिना अकार एवं ताल्वाद्यभिघातजेन चकार एवेति नियमो न स्यात् दृश्यते तु नियमः अतो घनिशब्दयोर्जन्यजनकभाव एव न व्यगायव्यञ्जकभाव इत्याशङ्कायामाह- यार जन्य और जनक (घर और कपाल, तन्तु और पर) की ही नियमितता देखी गई है व्यङ्गय और व्याक की नहीं। तथापि- ग्रहणग्राह्ययोः सिद्धा नियता योग्यता यथा । व्यङ्गयव्यञ्जकभावेन तथैव स्फोटनादयोः ।। ९७ ॥ यथा गृह्यतेऽनेनेति ग्रहणं चतुरादि, माझं रूपादि तयोः ग्रहणग्राह्ययोः यो- ग्यता चापि रूपग्राहकता घ्राणे गन्धग्रहकता, रूपे चतुर्माखता गन्धे प्राणग्राह्यता नियता चक्षुरेव रूपग्राहक नागमेव गन्धग्राहकमिति नियतत्वेन सिद्धा तथैव स्फोटनायोः व्यङ्गयव्यञ्जकमावेन योग्यता नियता कण्टाद्यभिघातजध्वनिरे- कारादीनां व्यञ्ज नान्य इति ॥ ९७ ॥ जेसे ग्रहण (न्द्रिय) और ग्राह्य (रूप आदि) की योग्यता निया है। (अर्थात् चक्षु न्द्रिय रूप का प्राणेन्द्रिय गन्ध का ग्रहण करती है तथा रूा चक्षु से गन्ध प्राग से गृहीत शेता है । और उन उन वस्तुओं के ग्रहण में नियत है ) वैसे स्फोट और नाद की व्यङ्गय यक्ष भाव से योग्यता नियत है (अर्थाकण्ठदेश के अभिघात से उत्पन्न ध्वनि ही ॐ कारादि की व्यरक्षक है)।।९७ ।। ननु द्विविधानीन्द्रियाणि कानिचित् स्वसजातीयद्रनमात्रसमवेतगुणग्राहकाणि यथा धागं श्रोत्रं च, कानिचिस्वसजातीयविजातीयव्यगतगुणग्राहकाणि यथा चतुः रसना खा च। चर्हि खसजातीयस्य तेजस इव विजातीयस्य पृथिव्यादेरपि रूपस्य प्राहकम, एवं रसनापि स्वसजातीयस्य जलस्येव पृथिव्या अपिरसस्य माहिका, एवं त्व- गपि स्वसजातीयस्य वायोरिव विजातीयस्य पृथिव्यादेरपि स्पर्शस्य ग्राहिका। वाण- श्रोत्रे नु स्व' सजातीयपृथिव्याकाशसमवेतयोरेव गन्धशब्दगुणयोहिके इति ते मदशग्राहके अन्यानि विसदृशग्राहकाणि । ततश्च रूपरमस्पर्शा विपशेन्द्रियग्राहाः गन्धरादौसरशेन्द्रियग्राह्यौतन सदृशेन्द्रियग्राह्ये गन्धेऽभिन्य कनियमो नास्ति इनि नाश शन्देऽपि अभिव्यञ्जकनियमेन न भवितव्यम्, भवति तु स इति शब्दस्य अभि- यस्यां च्यावर्तयन् उत्पाद्यतामापादयतीति शब्दस्यानित्यत्वप्रसङ्ग इत्यत आह- १. जातिस्त्रासापारगमोमिनः तेन भाकाशवाय मानि-वाभावऽपि नाकाशे श्रोतसना. भोपसतिः । वैयाकरणमते तु आकाशवमपि जातिरिति मन्तव्यम् ।

1 ११० वाक्यपदीयम् इन्द्रियाँ दो प्रकार की होती है। एक तो स्वसजातीय द्रव्य मात्र में समवेत गुण का ग्रहण करती हैं । जैसे प्राण और श्रोत्र । और दूमरी स्वजानीय तथा रवविजातीय द्रश्य समवेत गुण का ग्रहण करनी है। जैसे चक्षु,रसना और त्वम् । तैजस आँख सजातीय तेज के और विजानीय पृथ्वी के भी रूप का, रसना सजातीय जल और विजातीय पृथ्वी के रस का और वा सजातीय वायु और विज्ञानीय पृथ्वो के स्पर्श का ग्रहण करती है। प्राण और थोत्र तो स्वसजातीय पृथिवी और आकाश में समवेत गन्ध तथा शब्द गुणों के ग्राहक हैं। इस प्रकार सदृशेन्द्रियमाय गन्ध में जब अभिव्यञ्जक का नियम नहीं है तब सदृशेन्द्रिय प्राश शब्द में भी अमिव्याक नियम नहीं होगा। किन्तु जन्यजनक माव ही मानना चाहिये।' यह कहना ठीक नहीं, क्योंकि सदशग्रहणानां च गन्धादीनां प्रकाशकम् । निमित्तं नियतं लोके प्रतिद्रव्यमवस्थितम् ॥ ९८ ।। सदृशं स्वाश्रयसदृशमिन्द्रियं ग्रहणं ग्राहकं येषां तेषां सदृशग्रहणानां गन्या. दीनां प्रकाशकम् अभिव्या निमित्तं प्रतिद्रव्यं लोके नियतमवस्थि. तम् कुङ्कुमगन्धाभिव्यञ्जकं गोघृतं नियतं वर्तते । एवं च सदृशेन्द्रियमाझे गन्धेऽभि. प्यअकनियम इव नादृशे शन्देऽभिव्यअकनियम आस्तां न चेतायता गन्ध इव अभिव्यङ्गयवहानिरित्यर्थः ॥१८॥ जैसे समान इन्द्रिय से गृहीत होनेवाले गन्ध आदि गुणो का प्रकाशक (न्यजक) प्रत्येक द्रव्य के आधार पर कोई कोई द्रव्य नियत है। (जैसे गोघृत कुंकुम गन्ध का अभिव्यजक है। वैसे सदृशेन्द्रियन ह्य शब्द की भी अभिव्यञ्जना बनती।।। ९८ ॥ यद्वा ननु केचिद्विसहशग्रहणग्राह्या यथा घटादयः केचित्सदृशग्रहणग्राह्या यथा गन्धादयः । तथाहि-गन्धादीनां सजातीयमेव व्यञ्जक दृष्टं पार्थिवं घ्राणं गन्धेन गन्धान व्यनक्ति, आप्यं रसनं रसेन रसान् , तैजसं चक्षुरूपेण रूपाणि, वायवीयं स्त्रगिन्द्रियं स्पर्शेन स्पर्शान् तत्र योऽयं 'ग्रहणग्राह्ययोः' इति नियमो भवतोपदर्शितः स विसदृशग्रहणग्राह्य विषयः शब्दश्च सदृशग्रहणग्राह्यः तत्र च नाभिव्यञ्जकनियमो गन्धादिष्वदर्शनात् इति गन्धादिवैधाच्छन्दो नाभिव्यङ्ग्यः स्यादित्यत-सरः शेति । सदृशं विषयसमिन्द्रियगतं रूपादिक ग्रहणं ग्राहक येषामिति विग्रहः शेषं पूर्ववत् । अस्मिन्पचे सदृशग्रहणा रूपादयःविसदृशग्रहणा घटादय इति बोध्यम्॥९॥ अथवा-कुछ विप्सदृश इन्द्रिय ग्राह्य हैं जैसे घट, और कुछ सदृशेन्द्रिय ग्राम है जैसे गन्ध धादि। क्योंकि पार्थिव नाग से गन्ध, जलीय रसना से रस का ग्रहण होता है। अतः जो नियम ग्रहण और ग्राह्य के बारे में बने हैं वे विसदृश रन्द्रियग्राध के बारे में है शब्द तो सदशेन्द्रिय ग्राह्य है. अ1 उत नियम शब्द के लिए स्वीकार करना उचित नहीं है ।। ९८॥ ननु अभिव्यञ्जकानां दीपादीनां वृद्धिहासाभ्यामभिव्यङ्गयस्य घटस्य वृद्धिद्वासी न दृष्टचरौ नवादीपसहरभिव्यद्यस्य घटस्य नानात्वं दृष्टचरम। इह तु अभिव्यञ्जकस्य प्राकृतध्वनेद्धिहासाभ्यामभिव्यङ्गयस्य स्फोटस्य वृद्धिद्वासौ प्राकृतध्वनिभेदेन चैकस्यैव १. इय व्याख्या न्यायरत्नाकरानुराविनानि वेदित वम् । प्रथमव्याख्या सदृशग्रहणानामिति और मिव्याक भेद नदीं बन सकता। उनना वदना भी अमन है।क्य कि- प्रमकाण्डम्] संस्कृत-हिन्दी व्याख्योपेतम् स्फोटस्य घट इति पट इति भेदश्वानुभूयते इति अभिव्यगधधर्माभावात् स्फोटो ना. भिव्यज्यते किन्नूरपद्यते एवेति न स्फोरस्य नित्यता स्यादत आह- जो लोग सोट की अभिव्यक्ति का सण्डन करने के लिए कहने है कि जैसे अभिन्यक्षक दीपक के नृद्धि और हास से घट में वृद्धि और खास नहीं होता तथा सैकड़ों दीपकों से देखा गया घर भी अनेक नहीं होता। वैसे अभिव्यञ्जक प्राकृतध्वनि के वृद्धि और हास से अभिव्यगच स्फोट में वृद्धि और हास और अनेक प्राकन ध्वनियों से घट पट आदि अनेक स्फोटों की अभिव्यक्ति नहीं होनी चाहिए किन्तु होती है। अत: स्फोट व्यय नही है' यह कहना असहन है। क्योंकि- प्रकाशकानां भेदाच प्रकाश्योऽर्थोऽनुवर्तते । तैलोदकादिभेदे तत्प्रत्यक्षं प्रतिविम्बके ॥ ९९ ॥ प्रकाशकानाम् अभिब्यक्षकानां भेदान संरयाः चाद् वृद्धिहासाश्व प्रकाश्यः अभिग्यङ्गयः अर्थः अनुवर्तते अभिव्यक्षकभेदेऽभिव्यङ्गयभेदः अभिन्या वृद्धौ अभि- व्यङ्ग्यवृद्धिः अभिव्यञ्जमहामे अभिव्यङ्गयहासश्च दृश्यते, क दृश्यते इत्याह-तदिति। तत् अभिन्यायस्यभेदः नानावं लोदकादिभेदे प्रतिविम्बके प्रत्यक्षतद्यथा तैले रयामंजले रके, वनमणौ लघु ततो दीदर्पणे ततो दीर्घ जले, ख दीर्घ मुकुरे वर्मुलमि- नि अभिव्यञवृद्धिहासयोः अभिव्यङ्गयस्य मुखस्य वृद्धिहासी अभिव्यक्षकस्य दर्पण. जलपात्रादेच नानात्वे अभिव्यग यस्य मुखप्रतिविश्वस्य सूर्यचन्द्रप्रतिविम्बस्य च नाना- एवं एकस्यैव चैतन्यस्य अन्तःकरणाद्युपाधिभेदेन नानात्वं च दृश्यते इति अभिव्यञ्जक- वृद्धी अभिव्यङ्गयवृद्धः अभिव्यञ्जक दे अभिव्ययभेदस्य च एन्वादभिव्यक- बने दे वृद्धी चाभिव्यङ्गयस्य स्फोटस्य भेदो वृद्धिश्च न स्फोटाभिव्यङ्गयताविघातकी इनि भावः । तथा च 'यथा होको ज्योतिरामा विवस्वानपो भिन्ना बहुधैवोऽगुम- एछन्' इति श्रुतिः' 'एमधा यहुधा चैव दृश्यते जलचन्द्रवत्' इति स्मृतिश्च ।। ९९ ।। अभिन्यजक के भेद (सण्या, वृद्धि और हाम) से अभिव्य का भेद (संख्या, वृद्धि और हाम) मी होता है। इसका प्रत्यक्ष तेल और जल आदि के प्रतिबिम्ब में किया जा सकता है। जैसे एक ही व्यक्ति के मुख का प्रतिदिग्व तेल में श्याम, जल में गौर, वज्रमगि में छोटा, दर्पण में घटा, बल में उससे भी बटा, तलवार में लम्बा, दर्पण में गोला दिखाई पड़ता है हमसे यह सिद्ध होता है कि अभिव्यक के वृद्धि और हास मे अभिन्याय का वृद्धि और इस तथा अभिन्याक के भेद में अभिव्यङ्ग्य का भेद मो होता है । इसलिए अमि यदय में भेद, दृद और नाम नहीं होना यह कहना अनुदिन है ॥ ९९ ॥ ननु चन्द्रादिभ्योऽन्यत् प्रतिविम्य दर्पगादिपूत्पद्यते तच नानैव इनि नाभि- यशम्भेदनाभिव्ययभेदः प्रतिविम्वस्थले इति दृशन्नामगतिरत आह- जो लोग कहते हैं कि चन्द्र और चन्द्र के प्रतिविम्ब में भेद है। प्रतिबिम्ब अनेक बह ही दर्पण आदि में दिखाई पडता है। अप्रतिलिम को दृष्टान्न मानकर अमि यह ११२ वाक्यपदीयम् विरुद्धपरिमाणेषु वज्रादर्शजलादिषु । पर्वतादिसरूपाणां भावानां नास्ति सम्भवः ॥ १० ॥ पर्वतपरिमाणापेक्षया विरुद्धं भिन्नमल्पं परिमाणं येषां तेषु विरुद्ध परि- मायोपु वज्रादर्शजलादिपु लघुपरिमाणेषु पर्वतादिसरूपाणां महापरिमाणानां भावानां पर्वतादीनां चन्द्रादीनां च सम्भवः उत्पत्तिसम्भवः नास्ति । अयं भावः यन्महापरिमाणानां पर्वतहस्त्यादीनां लघुपरिमाणेषु दर्पणादिषु समावेशाभावेन तदारम्भकाणां तदवयवानां भानाभावेन तत्र नोत्पत्तिसम्भवः किन्तु दर्पणादिसम्बाधे तेषामेव पर्वतादीनां तथावभासो जायते इति न दृष्टान्तासंगतिः॥ १० ॥ पर्वत के परिमाण वी अपेशा सपरिमाण वाले 5 और दर्पण आदि छोटी वस्तुओं में महापरिणाम वाले पर्वत और चन्द्र आदि की उत्पत्ति नहीं मरनी। इसलिए मानना पडेगा कि बडे परिमाण वाले पर्वत आदि अल्पपरिमाण वाले दर्पण में समाविष्ट नहीं हो सकते फिर भी उनकी दर्पग में उत्पत्ति नही होती किन्तु बडे परिमाण वाले पर्वत हो दर्पण में अभिव्यक्त होते हैं ।। १०० ॥ एवं व्यवनिकालकृतं स्फोटे कालभेदमुपपाद्योपसंहरनि- तस्मादमिन्नकालेषु वर्णवाक्यपदादिषु । वृत्तिकालः स्वकालश्च नादभेदाद्विभाव्यते ॥ १०१॥ तस्मात् व्यगये व्यजकधर्मानुगमदर्शनान् अभिन्नकालेपु स्वतः कालभेद- रहितेषु वर्णवाक्यपदादिपु तदाख्यरफोटेषु नादभेदात् प्राकृतवैकृतध्वनिभेदात् वृत्तिकालः द्रुतादिवृत्तिकालः म्वकालः स्वीयस्य-स्वाभिव्यक्षकस्य प्राकृतध्वने- मौत्रादिकालश्च विभाव्यते प्रतीयते न तु तत्र वास्तवस्तादृशकालसम्बन्धोऽस्तीति भावः ॥ इयांस्तु विशेषः यत् प्राकृतः स्फोटेऽध्यस्यमानः हस्वदीर्घप्लुतभेद्ययहा- कारणं वैकृतस्तु शब्देऽवधारिते भवन् गृहीतभेदत्वात् नाध्यारोपनिमित्तं किन्तु घाह्यदुतादिकालव्यवस्थाकारणम् तावत्कालं स्फोटोपलम्भकारणमिति यावत् । तेन च न स्फोटभेद इति हस्वत्यदीर्घत्वादिकं च ध्वनिधर्म एवैति स्फुटमुक्तं श्लोकवार्तिके- 'स्वतो हस्वादिभेदस्तु नित्यवादो विरुध्यते । सर्वदा यस्य सद्भावः स कथं मात्रिका स्वयम् ॥ तस्मादुच्चारणं तस्य मात्रं कालं प्रतीयताम् । द्विमानं वा विमानं वा न वर्णो मात्रिक स्वयम् ॥' इति ॥ १० ॥ इसलिए व्याक धर्मों को देखकर यह मानना पहता है कि कार भेद रहित वर्ण, पद और वाक्य स्फोटों में वाद के ( प्राकृत और वैकृतध्वनि के भेद से [नादि वृत्तियों का तथा वर्ण आदि का अभिव्यञ्जक प्रकृति ध्वनि का काल प्रतीत होता है। व्याय ......

ब्रह्मकाण्डम्] संस्कृत-हिन्दी व्याख्योपेतम् इदानी कार्यपत्रे नादस्फोटयोः स्वरूपमाह-- जो लोगाब्द को अनित्य मानते हैं उनके मत मे नाद और स्फोटका स्वरूप है- यः संयोगविभागाभ्यां करणरुपजन्यते । स स्फोटः शब्दजाः शब्दा वनयोऽन्यरुदाहनाः ।। १०२॥ करणैः कण्टतात्यादिभिः संयोगविभागाभ्यां वायुमंयोगविभागाभ्यां यः शब्दः प्रथमम् उपजन्यतेस स्फोटःबोधकःउत्तरोत्तरशब्दानां कारणं च ये चश. ब्दजाः म्फोटाच्यात् शब्दानातास्ते ध्वनयः अन्यैः स्फोटकार्यत्वयादिमिः आचार्यः उदाहताः कथिताः ॥ नित्यत्वपक्षे तु संयोगविभागजध्वनिव्यगायः संयोगविभागज- ध्वनिसंभूतनादाभिव्यङ्गयो' वा स्फोट: स्फोटरूपानुग्राहकाश्च यथोत्तरमपचीयमाना- भिव्यक्तिममर्थाः दुनादिवृत्तिभेदव्यवस्थाहेतवोऽपचयात्मका वनय इति ।। सोट को भनित्य मानने वाले ताकिक आचार्यों ने कहा है कि कण्ठतालु आदि के सयोग और विभाग के द्वारा जो उत्पन्न होता है वह स्फोट (वाचक शब्द) है और जो शन्दज शब्द है वे ध्वनियाँ हैं। वैशेषिकाः संयोगाद्विभागाच्छन्दादा शब्दोत्पत्तिरित्याहुः। तत्र यथा प्रथमं वातेनै- का वीचिरुत्पद्यते अनन्तरं तयैव तरङ्गान्तरं तेनाप्यन्यदिति पूर्वपूर्वतरङ्गेभ्य उत्तरोत्तर- तरगाणामुत्पत्तिस्तथा भेरीदपडसंयोगाद वेणुदलविभागाद्वा शब्द आमाशदेशे निप्पद्यते मचासमवायिकारणतया शब्दान्तरमारभने तच्च शब्दान्तरमिति परम्परया श्रोत्रपथ- मवतीर्णो गृहाते । 'भेरीशब्दो मया श्रुत' इनि धीस्नु भ्रम एव । अयं चीचीतरह- न्यायेन शब्दोत्पत्तिपक्षः ॥ इदमत्रायवेयम्--वैयाकरणा यं प्राकृतध्वनिरिति व्यवहरन्ति तमेव तार्किकाः वाचकाददं मन्यते यं च ते वैकृतध्वनिरिति व्यवहरन्ति तं च ताकिकाः ध्वनिरिति व्यवहरम्तीति ॥१०२ ॥ भेद कब इतना है कि वैयाकरण जिसे प्राकृत-ध्वनि कहते हैं ताकि उसे ही वाचक न (स्फोट) मानते हैं और जिन्हें वैयाकरण वैकृनध्वनि कहते हैं। ताकि उसे दनि कहते है।।१०२॥ संयोगजो ध्वनिः स्फोटः स्फोटजास्तु ध्वनय इति पूर्वोक्तपक्षे प्रक्रियामाह- इसकी प्रक्रिया इस प्रकार है- अल्पे महति वा शब्दे स्फोटकालो न भिद्यते । परस्तु शब्दसन्तानः प्रचयापचयात्मकः ॥१०३ ।। अल्पे महति या शब्दे वैकृतावनी जाते म्फोटकालो हुस्वाफारादिकालः न भिद्यते शब्दस्य अमूर्तत्वेन अल्पत्वमहत्वादिपरिमाणायोगात् किन्तु मुख्याल्पत्व- महत्वानां सूचीपर्वतादीनां यथा सूची अल्पदेशं पर्वतवाधिदेश व्याप्नोति तथा शब्दो- १. नादपदेन वर्गः। १५वा० ११४ वाक्यपदीयम् ऽपि अल्पमहान्नौ देशौ व्यामुवन् अल्पो महान्वा व्यपदिश्यते । सा चाधिकाल्पदंश- व्याप्तिवैकृतध्वनिकृता। परः कार्यभूतः शब्दसन्तानःप्रचयापचयात्मकः अधिक देशव्याप्तिमान् अल्पदेशव्याप्तिमाञ्श्वभवति।पचयोऽधिकदेशच्याप्तिः, अपचयोऽल्पदेश- ध्यातिः इति कार्यभूतानां वैकृतध्वनीनां वदोन कारणभूता स्फोटशब्दाः अकारादयः प्रचिना उपचिता वा न व्यहियन्ते उच्चैरुच्चारिते हस्वाकारे कवलं म्वनिरधिकदेश ध्यामोति अकारस्तु न भिद्यते इति भावः। शब्दोऽत्र ध्वनिः मच द्विविध उत्तरी- त्तरशब्दानां कारणरूपःकार्यरूपश्च । आद्यःस्फोटन्यञ्जकास्फोट एव वा परः कार्यरूपः। तवाद्यः प्राकृतः परो वैकृतः। तत्र कारणरूपस्य घनेः कार्यजनने सामर्थ्य भिद्यने, यथा भेरीदण्डाभिघातजस्य परम्परा दूरमनुपतति लोहकांस्याभिघातजस्य तु प्रत्यामवदेश- मिति ॥ १०३ ॥ शब्द (ध्वनि) चाहे छोटी हो या दही किन्नु स्फोट काल (हस्वादिकाल) भिन्न नहीं है। क्योंकि शम्द अमूर्न है। इसलिए अल्लत्व महत्व परिमाग का उनसे कोई मम्बन्ध नहीं है। दुमरी जो कार्यरूप शब्द की परम्परा है वह प्रचय (अदिक देश में व्याप्त होना) और अपचय (अल्पदेश में व्याम होना) रूप है। तात्पर्य यह है कि हस्त, दीर्घ, और नुन आदि व्यवहार स्फोट में नहीं हो सकते। क्योंकि अमूर्त शब्द में कोई परिमाण नहीं रह माना। इसलिए ध्वनि का न्यूनदेश में रहना अल्पता और अधिक देश में रहना व्याप्ति महत्ता है ।।१०३॥ अनित्यशब्दवादिनामेव मनान्तरमाह- शब्द को अनित्य मानने वाले हो कुर लोगों का मत ई-- दूरात्मभेव दीपस्य ध्वनिमात्रं तु लक्ष्यते । घण्टादीनां च शब्देषु व्यक्तो भेदः स दृश्यते ॥ १०४॥ यथा प्रदीप प्रभया महोत्पद्यते एवं स्फोटोऽपि ध्वनिना सहोत्पद्यने, यथा प्रदीप-प्रभा दूरव्यापिनी पुत्रं घनिरपि । तत्र नथा दूरात् दीपस्य प्रभा प्रभामानं लक्ष्यते न दीपः एवं दूरान् ध्वनिमात्रं लक्ष्यते न स्फोटः घण्टादीनां च शब्देषु स्फोटनादयोः स भेदः व्यक्तो दृश्यते आदिपदेन कांस्यपात्रादिकं गृहाते । जैसे प्रमाके महित व्यक्त दीपक को दूर से देखिए तो केवल प्रमा हो दिखाई पड़ता है, दीपक नहीं। वैसे ध्वनि के सहित व्यक्त सोट नहीं अनुभून होता किन्नु पनि ही अनुभून होती है। यह भेद घण्टा आदि के शब्दों में स्पष्ट रूप से दिखाई पडता है। केचित् तार्किका वीचीतरङ्गन्यायन शब्दोत्पत्तिपई सर्वतः प्रसरो नास्नीति सर्वतः प्रसरः शब्दमन्तानस्य यथा स्यादित्येतदर्थ यथा कदम्बगोलके अन्थिदेशः सर्वासु दिड केदारान्प्रसूने तथा आधः शब्दो दशमु दिनु बहून् शब्दानुन्पादयति । तेऽप्यपरान् तेऽप्यरान् उत्पादयन्तीत्याहुः । अयं च कदम्बगोलकन्यायेन दीपप्रमा- न्यायेन वा शब्दोत्पत्तिपदः ॥ १०॥ [ये ताकि वोचौतरङ्गन्याय से शब्द की उत्सति नहीं मानते किन्त कदम्बगोलकन्याय था प्राकाण्डम् । संस्कृत-हिन्दी व्याख्योपेतम् ११५ दीपपमान्याय मानते हैं। क्योंकि बोचीनरक में सर दिशओं में तरह का प्रमार नहीं होता और दीपकी प्रमा का अथवा कदम्नगोलक का सा दिद्या में प्रसार होना है]॥१०४॥ अव्यवहितश्लोकाभ्यामुक्तमर्थ स्पष्टयति- इसे उदाहरण द्वारा स्पष्ट करते है। द्रव्याभिषातात्प्रचिती भिन्ना दीर्घप्लुतावपि । कम्पे तूपरते जाता नादा वृत्तेविशेषकाः ॥ १०५ ॥ द्रव्यं स्थानं करपां च तयोरभिघातः शब्दहेतुभूतसंयोगः कण्ठादिभिर्वायूनां संयोग इनि यावत् , तस्मात् द्रव्याभिघातात् मिसौ दीर्घप्लुतावपि प्रचितो धनिकारणवायुसंयोगप्रचयात् दीर्घप्लुतयोः प्रचयः विशिष्टप्रयत्नजनितेन वायुना स्थानेषु अभिघातो जायते तेन च वायौ कम्पो भवति तेनाभिघातपरम्परा भवति । यथा महता प्रयत्नेन वादितायां घटायामधिककालं घण्टायां कम्पोऽनुवर्तते तेन च घण्टामध्यस्थेन (लम्बेन ) विजुलीपदव्यपदेश्यन पुनः । पुनरभिघातो भवति स च कम्पः शब्दस्वरूपलाभपर्यन्तमनुवर्तते सम्मिन् कम्पे स्पन्दे उपरते निवृत्ते मनि जाला नादाः वैकृतध्वनयः वृत्ते?नावृत्तेः विशेषकाः भेदव्यवस्थाहेनको भवन्ति ननु दीर्घप्लुनादेरिति भावः।। स्थान और प्रयत्नरूपी द्रव्य में अभियान (कण्ठादि स्थानों में वायु के सयोग) से पचित (बड़े हुए) दीर्घ और प्लुन यादि भेद है । इस अभिमान के जनक कम्पन के गमास होने पर जो नाद उत्पन्न होता है उमी से द्रुना आदि वृत्तियों के भेद की स्थापना होनी है। दीपप्लुन आदि को नहीं। इदमत्रावधेयम्-नित्यशब्दपले ध्वनीनां मात्रिकत्वात् नित्ये शन्दे मात्रि- कत्वाद्यारोप्यते इति हस्वस्वादिकं नाकारादिधर्मः कार्यशब्दपक्षे तु अकारादीनामेव मात्रिकत्वाद् ध्रस्वत्यादिकं तन्निष्टमेव वैकृतध्वनिकृतभेदाभावस्तु पत्तद्वयेपि समान इति ॥ १०५॥ तात्पर्य यह किशब्द की उत्पत्ति के पहले जितने कम है वे प्राकृत धनि के है और सन्द के उत्पन्न होने के बाद जो अनुरणन है वह वैकृत ध्वनि का विषय है। नित्यशम्द वादियों के मन से ध्वनि हो माविक है हसत और दीयत्व भादि धर्म ग्वनि के हैं और राम पर उनका आरोप होता है। कार्यशब्द वादी के मत से नो भकार हो मात्रिक है और हरवत्व आदि में उसी के हैं। इस प्रकार दानों पक्षों से यह सिद्ध मावि स्वत्व यादि धर्मकृतवनि के भेद नहीं है॥ १०५॥ मतान्तरमाह- अनवस्थितकम्पेऽपि करणे धनयोऽपरे । स्फोटादेवोपजायन्ते ज्याला ज्यालान्तरादिव ॥ १०६॥ करणे वरवादी अनवस्थितकम्पेऽपि अनुउर्तमानकम्पेऽपि अपरे धनयः - ११६ वाक्यपदीयम् वैकृता ध्वनयः ज्यालान्तरात् ज्वला इव स्फोटादेवोपजायन्ते पूर्व कम्पनिवृत्ती नादाभिव्यक्तिरुक्ता इदानी कम्पसच्चे एवेति विशेषः ॥ १०६॥ और दूसरे भाचार्यों का मत है कि करण (वागिद्विप ) में कम्प के रहने पर मी दूसरी ध्वनि (वैकृत ध्वनि ) स्फोट से ही उत्पन्न होती है जैसे एका ज्वाला से दूसरी ज्वाला। इनके मत से प्राकृत ध्वनि की उत्पत्ति नही होती। किन्तु प्राकृत ध्वनि से व्यक्त स्पोर ही वैकृत ध्वनि को उत्पन्न करता है। १०६ ॥ इदानीं शदविपये मतभेदानाह-- शब्द के विषय में विद्वानों के अनेक मन है- वायोरणूनां ज्ञानस्य शब्दत्वापत्तिरियत । कैश्विदर्शनभेदोन प्रवादेष्वनवस्थितः ॥ १०७ ॥ कैश्चित् वायोः कैश्चित् अणूनां कैश्चिज्ज्ञानस्य शब्दत्यापत्तिरिष्यते अत्र भयादेपु सिद्धान्तेपु दर्शनभेदोऽनवस्थित. अव्यवस्थितः मतनयमिति यावत् । अयं वैखरीरूपशब्दविषये मतभेद इति मञ्जूषाकृतः ॥ १०७॥ कोई वायु को कोई अगु को और कोई शान को शब्द मानते हैं। इन सिद्धान्तों के विषय में असो मी मल भेद बना हुआ है। १०७॥ शिक्षाकाराभिमतां वायोः शब्दभावापत्तिमाह- जिनमें शिक्षाकार का मन है कि- लब्धक्रियः प्रयत्नेन वक्तुरिच्छानुवर्तिना । स्थानेवभिहतो वायुः शब्दत्वं प्रतिपद्यते ॥ १०८॥ वक्तुः इच्छानुवर्तिना शब्दप्रयोगेच्छयोत्पन्नेन प्रयत्नेन लब्धक्रियः प्राप्त- क्रियो वायुः प्राणवायुः स्थानेषु कण्ठताल्वादिषु अभिहतः शब्दजनकसंयोगाश्र- यतां गतः शब्दत्वं प्रतिपद्यते इति सम्बन्धः । तथा च शिक्षा-'वायुः कोष्ठस्थान- मनुप्रदानमापद्यते स कण्ठगतः श्वासतां नादतां वा' इति, 'मनोऽभिहतः कायाग्निः प्राणमुदीरयति स नाभेरुद्यन् मून्य भिहतो पुनरुद्यता मरुताभिहन्यमानो ध्वनिः सम्पद्यते क इति वा ख इति वा' इति च ॥ जर बक्ता को बोलने की इच्छा होती है तब वह कोई प्रयत्न करता उस प्रयत्न से प्राण वायु में किया उत्पन्न होती है और वही वायु कण्ठ, तालु आदि स्थानों में टकराकर शव बन जाता है।०८॥ चायोः शब्दस्वापत्तिः शुक्लयजुः प्रातिशाख्येऽप्युक्ता-तथाहि-'वायुः खात्" [ : अ० ६ सू०] वायुः शब्दस्य कारणं स च खादाकाशादुत्पद्यते इत्युक्त्वा पायो परिणामः शब्दः इति स्पष्टयितुं 'शब्दस्तत्' इति सूत्रान्तरमुक्तं शब्दस्तदा• मका वारयात्मक इति तदर्थ. 1 यदि वारयात्मकः शब्दस्तहि वायोः सर्वगतत्वात सर्वत्र शब्दोपलब्धिः स्यादित्यशय 'सङ्करोपहितः' इति सूत्रान्तरमुक्तं करणानि फराः समीचीनाः कराः संकराः सम्यक् करणरुपहितो वायुर्वेगुशङ्खादिभिः शब्दी- माकाण्डम् ] संस्कृत-हिन्दी व्याख्योपेतम् भवति इति तदर्धः दाब्दी-भवतीत्युक्त्या शब्दस्य वायुपरिणामस्वं स्फुटीकृतम्।तत: 'समंधातादीन् वाक्' इति सूत्रेण गन्दीभूतस्य वायोः वर्णभावापत्तिरुक्ता । अस्याः-~- यो वायुः घेणुशक्षादिभिरुपहितः शब्दीभूतः स संघात:--पुरुषमयत्नः वाहाम्यन्तर- लक्षणः स आदिर्यपां स्थानादीनां ते नान् संघातादीन् प्राप्य वाक् वर्गों मवतोति । शब्दार्थप्रत्ययानामिति [३ पा० ५७ सू०] सूत्रै 'श्रोत्रं च ध्वनिपरिणाममान- भविषयम्' इति व्यासभाष्यप्रतीकमादाय 'प्रोन्नं पुन नेरुदानस्य पागिन्द्रयाभि- धातिनो यः परिणतिभेदो वर्णास्मा तेनाकारेण परिणतं तन्मात्रविषयम्' इति श्री वाचस्पतिमिश्राः । तस्मिन्नेव मूत्र ध्वनि म वागिन्द्रियादिवमिहतस्योदान- वायोः परिणतिभेदः तदभिघातात्तदयच्छिन्नाकाशोपादानको वा' इनि नागोजी. भट्टाच शब्दस्य धायुपरिणामतामाहुः ॥ १०८ ॥ ननु सप्रतिघद्रव्यस्य पृथिव्यादेः संयोगाद् विभागोत्पत्तिईटा नाप्रतिधद्रव्यस्या काशादेरिति अप्रतिघदव्यस्य' धायोः कण्ठलाल्यादिषु यः संयोगस्तस्य विमा गजनकता न सम्भवति ततश्च वायुः कण्ठत्तालवादः संयोगेन विभागमुत्पाद्य शब्दभा- वेन परिणमत इत्ययुक्तम् इत्यत आह-- यद्यपि जिन द्रव्यों में परस्पर आघात हो सकता है उनमें ही एक दूसरे के सयोग के द्वारा दिमाग की उत्पत्ति देसो गई है जैसे पृथ्वी के संयोग से विमाग होता है । तथापि जिन भाकाश की भाति प्रतिष द्रव्य में संयोग से विभाग की उत्पत्ति नहीं हो सकती जैसे वायु का कण्ट आदि में मयोग से विभाग ही उत्पन्न हो सकता। फिर कार में वायु के बाघात से दिमाग उत्पन्न होता है और वह उद रूप में परिणत हो जाना यह कहना ठीक नहीं इस शंका का समाधान करते हैं- तस्य कारणसामर्थ्यावेगप्रचषधर्मणः । सन्निपाताद्विभज्यन्ने सारवत्योऽपि मूर्तयः ।। १०९ ॥ कारणसामर्थ्यात् कारणस्य वेगप्रचयकारणस्य कर्मगः मामाद धैगः (म- कारविशेषः) प्रचयः (शिथिलः संयोगः) तौ धौ यस्य तस्य धेगप्रचयधर्मणः नस्प यायोः सन्निपातात् मंयोगान् सारवत्योऽपि मूर्तयः पर्वतशादयः विभज्यन्ते विभक्ता भवन्ति तर्हि का क्या कण्टतावादिविभागस्येनि भावः । वेग- प्रचयधर्मग इति धर्मादनिच केवलादित्यनि ।। एतदुक्तं भवनि वस्तुरिरलाजन्यप्रयत्नेन प्राप्तक्रिया कोटयो वायुः वेगप्रची जनयन् नाभ्यो कण्ठनात्याः संयोगविभागाधारभमाणः तत्सहकारेश शाइना मति- पद्यते नानः सर्वदा पर्वगन्दोपलम्म इति एतदेव 'संकोपहिनः" इति सूत्रेग शुल- यजुःप्रातिशास्ये उमाय ॥१०९॥ १.विधव्य संपतिधमप्रतिघ च । म स्वाश्रये द्रव्यान्नरस्थिनिबिरामि । यपा- पथिवी जलवानियतिघागि वारयादीनि ।

वाक्यपदीयम् जैसे कारण ( वायु को शन्द बनाने वाले प्रयन)के सामथ्र्य से वेग (एक संस्कार) और प्रचय ( शिथिल सयोग)रूपी धर्म वाले वायु के संयोग बड़े बड़े पर्वनों को जब उस ढ देते हैं नब कण्ठ तालु आदि का विमाग होना कठिन नहीं है ।। १०९॥ जैनभिमतामणूनां शब्दभावापत्तिमाह- जैनों का मत है कि- अणवः सर्वशक्तित्वाद् भेदसंसर्गवृत्तयः । छायातपतमाशब्दभावन परिणामिनः ॥ ११० ॥ सर्वशक्तिस्वात् सर्वकार्यजननशक्तिमत्वात् भेदसंमर्गस्य शक्तिभेदमूलकारी- पितभेदमंसर्गस्य वृत्तिर्यपु ते, भेदो विभागः संसर्गः संयोगः तयोर्वृत्तिर्येषु ते वा भेद- संसर्गवृत्तयः अणवः परमाणवः डायातपतमः शब्दभावेन विभताः छायावर भावेन संयुक्ताश्च शब्दभावेन परिणामिनो भवन्तीति शेपः इति ।। विभाग और सयोग जिनमें रहते है उन अणुओं में यह प्रकार के कार्यों को उत्पन्न कर सकने वालो एक शक्ति है जो विभक्त होने पर छापा, आतप और अन्धकार के रूप में तथा मयुक्त होने र अब्दरूप में परिणत हो गनी है ॥१०॥ एतदुक्तं भवति एकविधा एत्र परमाणवः दायारूपेण आनपरूपेण समोरूपेश शब्दरूपेण च परिणमन्ते । नचैविधस्य कथमनेकविध कार्यजनकत्वमिति वाच्य- म। तेभ्यः सर्वविघकार्यजननदर्शनेन तेषु सर्वविध वार्यजननशक्तिमश्वानुमानेन तत्त- स्कार्यजननशकिभेदकृतभेदारोपेग भिन्नभिन्नपरमाणुभ्यो भिन्नभिन्नकार्यजननसम्भ- वात् । अणूनां छायातपरूपविरुद्धपरिणामप्रतिपादनेन विरुद्ध नानाशनियोगः एक- स्यैव वस्नुन इति सूचितम् ॥ ११०॥ जैन मतानुयायियों का तात्पर्य यह है कि अणु में सब प्रकार के कार्य उत्तन करने की शक्ति होती है वे कमी छाया रूप से भेष दनकर कमी आनपरूप से, कमी नम रूप से और कभी शब्द रूप से परिणत हुमा करते हैं। यहाँ यह रक्षा उत्पन्न होना अनुचित है कि एक ही परिमाणु में अनेक प्रकार के कार्य उत्पन्न करने की शक्ति से होती है। क्योंकि अणुओं में सर्व प्रकार की शक्ति है और शक्ति के भेद से कार्य में भेद हो जाना स्वाभाविक है तात्पर्य यह है कि अणुओं के 'क होने पर भी शक्ति का भेद उनमें मानना पड़ता है और इसी शक्ति के भेद के कारण भिन्न प्रकार की शक्तिवाले परमाणु से भिन्न-भिन्न प्रकार की वस्तु उत्पन्न होती है। अतः एक परमाणु का छाया, आतप, तम और शब्द रूप में परिणत हो जाना अनुचित नहीं है। नन्वणूनो नित्ययतासर्वदा सत्वाकुतो न सर्वदा शब्दभावन परिणाम इत्यत आह-- यद्यपि अणु नित्य है अतः सर्वदा उनकी सत्ता भी स्वीकृत है फिर भी वे सर्वदा शन्द्र रूप में ही परिणत नहीं होते क्योंकि- स्वशक्ती व्यज्यमानायां प्रयत्नेन समीरिताः । अभ्राणीव प्रचीयन्ते शब्दाख्याः परमाणवः ।। १११ ॥ - - बमाण्डम् ] संस्कृत-हिन्दी-व्याख्योपेतम् ११६ प्रयत्नेन अर्थवोधनेच्छया समुपजातेन प्रयत्नेन शमोरिताः प्रेरिता शब्दा- ख्याः शब्दपरिणामत्वाछन्द इत्यख्याताः शन्दतन्मात्रारूपा वा परमाणवः स्वश. ''को घटशब्दाग्राकारपरिणमनशक्तो व्यज्यमानायां सत्याम् अभाणीव वर्षाकाले मेघपरमागय इव प्रचीयन्ते संधी भवन्ति इत्यर्थः । प्रयोक्तृयत्नेन संहियमाणाः शब्दत्वापत्तिाक्तियुनाः परमाणवः शब्दभावेन परिणमन्त इति न सर्वदा शब्दभाषेन परिणाम इति भावः॥ किन्तु जब किसी अर्थ को बनाने की इच्छा से किये गए प्रयल द्वारा शब्द या शब्दतन्मा. शारूपी परमाणुओं को प्रेरणा मिलनी है । नव उनको शक्ति उन-उन शब्दों के रूप में व्यक्त होती है और वे ही परमाणु जसे वर्षाकाल में मेघ के परमाणु आकाश में व्याप्त हो जाते हैं। वैसे शब्द के रूप में परिणत हो जाया करते हैं। इसो लिए नित्य अणुओं का सर्वदा शब्दरूप में परिणाम नहीं होता ।। १११॥ शब्दस्याणुपरिणामता च-शब्दः पौगलिकः अस्मदादिप्रत्यक्षत्वे सति अचेतनत्वे च सनि क्रियायवात् वाणादिवदित्यनुमानेन शब्दस्याकाशगुणवखण्डनप्रकरणे प्रमेय- कमलमार्तण्डे निरूपिता । मनसः आत्मनचापौगलिकत्वात् तत्र व्यभिचारवार- पाय क्रमेण सत्यन्तद्वयम् । सामान्ये व्यभिचारवारणाय विशेष्यम् । न च शब्दे क्रियायत्त्वमसिद्धम्, शब्दस्य निस्क्रियत्वे नस्य धोयेग ग्रहणं न स्यादसम्बन्धात् । न च श्रोत्रमेव शब्ददेश गन्तीति साम्प्रतं धर्माधर्माभ्यां संस्कृतार्णशप्नुल्यवरुद्धनभो- लक्षणोत्रस्य निस्क्रियत्वात् शब्दोत्पत्तिदेशे श्रोत्रस्य गतिप्रतीत्यभावाच । किंच शब्दः पौगलिकः भरमदादिप्रत्यतत्वे सति स्पर्शवाचादित्यनुमानेन शब्दस्य पौद्गलि- कस्यमिति । न च शब्दे स्पर्शवत्वमसिद्धमिति वाच्यम् शब्दः स्पर्शवान् स्वसंघद्धा. र्थान्तराभिधानहेतुत्वादु गुरु ववत् इत्यनुमानेन तत्सिद्धेः । सुप्रतीलो हि कांस्यपाल्या. दिवन्यभिसम्बन्धेन श्रोत्राद्यभिधातस्तरकायस्य वाधिर्यादेः प्रतीतेः । स चास्यास्पर्श. वत्वे न स्यात् नह्मस्पर्शवता कालादिनाऽभिसम्बन्धेऽमी दृष्टः । न च शब्दपहचरितेन वायुना तदभिधात इति वाच्यम् शब्दान्वयव्यतिरेकानुविधायित्वात्तस्य । न च शब्दो मपोद्गलिकः अस्मदाद्यनुपलभ्यमानरूपवत्वात् यत्पौद्गलिकं तदस्माद्युपलभ्यमान- रूपबत् यथा पट इत्यनुमानेन सम्प्रतिपक्ष इति वाच्यम यशुकादिना पौद्गलिकेन ग्यभिचारेण व्यतिरेकव्याप्तिग्रहासम्भवादिति ॥११॥ महाभाष्यकृदुला ज्ञानस्य शब्दभावापत्तिमाह-- महाभाष्यकार पनलिका मन है कि- अथायमान्तरो ज्ञाता सूक्ष्मयागात्मना स्थितः । व्यक्तये स्वस्य रूपस्य शब्दत्वेन विवर्तते ।। ११२ ।। आन्तरः शाता वृनिविशिष्टमन्त· करणं सूक्ष्मयागात्मना सूक्मशम्दाकारश- क्तिमत्वेन स्थितः स एव जीयो वियरप्रसूतिरित्युक्त्या वैयाकरणमते वाच एवारम- १२० वाक्यपदीयम् स्वमिति भावः। वर्तमानः स्वस्य रूपस्य वृत्या एकवुद्धिविषयीभूतार्थविषयक. घोधेच्छाविशिष्टस्य स्वस्य व्यक्तये प्रकाशाय श्रोतृबोधाय शब्दत्वेन स्थूलशब्दभावेन विवर्तते वृत्तिविशिष्टान्तःकरणस्य शब्दभावापत्तिरेव ज्ञानस्य शब्दभावापत्तिरि- त्यर्थः। प्रयोक्तृज्ञानस्य शब्देनैवाभिलापसम्भवादिति भावः । केचित्तु- सूक्ष्मे वागात्मनि स्थिति इति पाटमभिप्रेत्य ज्ञाता जीवः ज्ञानात्मकेऽपि तस्मिन् ग्रहीतृत्वव्यवहारोऽस्ति यथा शब्दतत्त्वमेवेदं वाड्मनसायप्रविभागमिति तेन ज्ञात- यपि वायूपानुपङ्गः सूक्ष्मे भेदरूपोपसंहारादतीन्द्रिये वागत्मनि स्थितिः व्यक्तये तस्यामवस्थायां शब्दरूपस्य ज्ञानस्याविवेकेनानवधारणेन शब्दरूपव्यक्त्यर्थ स्थूले. न्द्रियगम्येन रूपेण पिवर्तत इत्यर्थमाहुः । अन्येतु अथेदमान्तरं ज्ञानं सूचमबागा- स्मना स्थितमिति पाटमभिप्रेत्य स्वम्य रूपस्य ज्ञानस्येत्यथं वदन्ति तत् आत्मा बुद्धयेति शिक्षाविरुद्धम् आख्यातोपयोग इति सूत्रोस्थोद्योतविरुद्ध च । यह शब्द ही आन्तर शाला (वृत्तिविशिष्ट अन्तःकरण) है। ये सूक्ष्म शब्दशक्ति रूप में स्थित है यह अपने स्वरूप को प्रकट करने के लिए स्थूल शन्दरूप में भासित होता है। तात्पर्य यह कि-वृत्ति विशिष्ट अन्तःकरण शामरूप है। वही शन्द बन जाता है। इस लिए शब्दगान का परिणाम माना जाता है। ११२॥ शब्दो ज्ञानस्य परिणाम इति वैयाकरणाः । तथाहि-आख्यातोपयोग इति सूत्रे भाष्ये 'अयमपि योग: शक्योऽवक्तुम् । कथमुपाध्यायादधीत इति । अपकामति तस्मात्तदध्ययनम् । यद्यपक्रामति किं नात्यन्तायापकामति सन्ततत्वात् । अथवा ज्योतिर्वज्ञानानि भवन्ति' इत्युक्तम् । अत्र कैयटः यद्यपकामतीति । यथाफलं वृत्तादपक्रान्तं ग पुनर्पक्षे तद्भवति एवं शब्देऽपि प्रसङ्ग इत्यर्थः । सन्ततत्वादिति । शब्दस्य व्यजका ध्वनय उपाध्यायनोत्पद्यमाना भिन्ना अपि सादृश्यात्तत्वेनाध्यव- सीयमानाः श्रोतुः पुनः पुनः श्रोत्रप्रदेशं गच्छन्तो व्यक्तिस्फोटरूपं जातिस्फटरूपं वा शब्दमभिव्यञ्जयन्तीत्यर्थः । अथवेति । यथा ज्वालारूपं ज्योतिरविच्छेदेनोत्पद्यमानं सादृश्यात्तत्वेनाध्यवसीयमानं मन्ततं सथैवोपाध्यायज्ञानानि भिन्नानि भिन्न शब्द- रूपतामापद्यमानानि संततान्युच्यन्ते ज्ञानस्य शब्दरूपापत्तिरितिदर्शनमन्न भाष्य- कारस्य' इति ॥ ११२॥ ज्ञानस्य म्थूलशब्दभावापत्तौ क्रममाह-- शान के शब्द रूप में परिणत होने की प्रक्रिया यह है- स मनोभावमापद्य तेजसा पाकमागतः । वायुमाविशति ग्राणमधासौ समुदीयते ॥ ११३ ॥ स ज्ञाता अन्तःकरणं मनोभावमापद्य अर्थवोधनेच्छावन्मनो भूत्वा (सांस्यमा तानुसारेणेदं तन्मते इच्छादेर्मनोधर्मस्वात्। 'यदाहुः-संकल्पात्मकं मन' इति) तेजसा जाठराग्निना पाकं दाहं विलक्षणतेजःसंयोगं झातुः विषयावग्रहसामर्थ्यख्यापकम् संस्कृत-हिन्दी व्याख्योपेतम् १२१ आगतः प्रातः सन् प्राणं घायुमाविशति अभिहन्ति स्वरूपं तत्र प्रत्यस्यात्मरूप- सामापादयति अथ अभिघातानन्तरमसो सवृत्तिमनोयुतः प्राणः समुदीर्यते ऊर्ध्व गमनाय प्रेयते इति यावत् ॥ ११३॥ वहीं शाता (अन्तःकरण) अर्थ बनाने की इच्छा होने पर मन बन जाता है और वह जठराग्नि से संयुक्त होकर पाक प्राप्त करना है तथा प्राणवायु में भक्का लगा कर बाद में वृत्ति और मन के सहित प्राण ऊपर की ओर चलता है ॥ ११३ ॥ अन्तःकरणतत्त्वम्य वायुराश्रयतां गतः । तद्धर्मेण समाविष्टस्तेजमैव विवर्तते ॥ ११४ ॥ तनः अन्तःकरणतत्वस्य मनसः आधयतां गतो वायुः यत्र प्राणवायु म्ति तत्र मनो नैव तिष्ठति यथा मृतशरीरे अतः प्राणवायुर्मनस आश्रय इत्युच्यते तद्धर्मण मनोधर्मेण दाहेन ज्ञानरूपशब्देन वा समाविष्टः तेजसैवाजाठराग्निमहकारेणैव विध- तते बहिः गब्दरूपी भवति । तेजग्मेवेति पाके यथा इन्धमं तेज आश्रयतां प्रतिपन्नं तत्ममावेशादिन्धनरूपता बिहाय तेजोरूपं भवति नथा वायुः स्वरूपहानेन मनोरूतां प्रतिपद्यत इत्यर्थः ॥ ११४॥ तर अन्तःकरणतत्त्वरूपी मन का आश्रय प्राणवायु मनोधर्म (पाक दाइ-अधका शनरूप शब्द ) समाविष्ट होकर नेज (जठरानि) की सहायता से बाहर शब्द के रूप में मासिन होता है॥ ११४ ॥ विभज्य स्वात्मनो ग्रन्धीन् श्रुतिरूपैः पृथग्विधैः । प्राणो वर्णानभिव्यज्य वर्णेष्वेवोपलीयते ॥ ११५॥ दाहवशादेव माणः सवृत्तिकमनोस्पान्तः करणयुक्तः स्वात्मनो ग्रन्थीन् कादिव- जरूपान् विभज्य पृथगवस्थाप्य पृथग्विधैः भिन्नैः श्रुतिरुपैः श्रूयमाणैः स्वनिभिः वन अभिव्यज्य वर्गवेधोपलीयते वर्णतः पृथक् न तिष्ठति किन्तु तद्रूप एय भवनीति मवृत्तिकमनोरूपान्तःकरणयुतस्य वायोर्यः शब्दभावन परिणामः स एवं ज्ञानस्य शब्दत्वापत्तिरिति द्रष्टव्यम् ॥ और दाइ के शोभून होकर प्राण, वृत्ति विशिष्ट मनरूपी अन्तःकरण से युक्त होकर भपनी क, स बादि वर्णरूपी ग्रन्धिका विमाग करके अनेक प्रकार से सुनाई पडने वारी नियों से शब्दों को अभिव्यक्त कर पुनः उन्दी वर्गों में ही सीन होता है। अर्थाद, वृत्ति महित मनरूपी अन्तःकरण से युक्त जो वायु का सम्द रूप में परिणाम है। हो शान का शब्दरूप होना है ॥१५॥ अयमेव क्रम उक्तः शन्दोत्पत्तौ पाणिनिशिक्षायाम्-- 'आत्मा बुदा समेत्यर्थान् मनो युड्ने विवक्षया। मनः कायाग्निमाहन्ति स प्रेरयति मारतम् ॥ सोदी! मूयभिहनो वस्त्रमापद्य मारतः । वर्गान् जनयते' इति ।

१२२ वाक्यपदीयम् अस्यार्थी-आत्मा = अन्तःकरणं न चैतन्यं तस्य निर्विकारत्वेन वृत्तिरूप- परिणामासंभवात् अन्तःकरणविशिष्टस्य तत्सम्भवेऽपि चित्सन्निधौ अन्तःकरणस्यैव कर्तृत्वम् अयस्कान्तसन्निधानेऽयसः सक्रियत्वमिवेति सांख्यमतेन चेदम्। स चान्त'- करणरूप आत्मा संस्काररूपेण स्वगतानर्थात्, वुद्ध्या-स्ववृत्त्या, समेत्यैक्बुद्धिविपयान् कृत्वा तद्वोधनेच्छया मनो युक्तं करोति तदिच्छावन्मनः कायाग्निमाहन्ति स कायाग्निः मारतं प्रेरयति स मारतः उदीर्णः शब्दप्रयोगेच्छयोत्पन्नयनाभिहताग्निना नाभिप्रदेशा- दूर्व प्रेरितः वेगान्मूर्धपर्यन्तं गत्वा प्रतिनिवृत्तः वस्त्रं प्राप्य उक्तयत्नसहायेन तत्तत्स्था नेषु जिह्वाग्रादिस्पर्शपूर्वकं तत्तत्स्थानान्याहत्य पराद्याख्यमन्तः स्थितं शब्दं वर्णत्वेना भिव्यञ्जयतीत्यर्थः । स्वात्मानं वर्णवेनाभिव्यञ्जयतीत्यर्थो वा। विषमीकारास्तु आत्मान्तः करणमित्यपव्याख्यानम् आत्मपदस्य जोबपरत्वे बाधकाभावादित्याहुः ।। मतान्तरमाह- कुछ लोगों का मत है- अजस्रवृत्तियः शब्दः सूक्ष्मत्वानोपलभ्यते । व्यजनाद्वायुरिव स स्वनिमित्तात्प्रतीयते ॥ ११६ ॥ य अजस्रवृत्तिः वहिरन्तश्च वर्तमानः अन्तः संजल्परूपः अनिरूपः शब्दः सूक्ष्मत्वान्नोपलभ्यते स व्यजन्स्यनेनेति व्यजनं 'व्यजनं तालवृन्तकम्' इत्यमरः अजगतिपणयोः करणे 'वा यौ' इति पक्षे वीभावाभावः तस्मात् व्यजनाद्वा- युरिय यथा सर्वत्र वायुपरमाणको व्यस्ताः सन्त व्यजनात् संहता भवन्ति एवं स्व निमित्तात् वक्नुः प्रयत्नवशात् श्रोत्रदेशं प्राप्तः प्रतीयते उपलभ्यत इत्यर्थः । तदेतद्वक्ष्यति [चा० का २ कारि० ३०-३१] यदन्तः गन्दतचं तु नादैरेक प्रकाशितम् । यदाहुरपरे शब्दं तस्य वाक्ये तथैकता ॥ शब्दभागैस्तथा येपामान्तरो- ऽर्थः प्रकाशते । एकस्यैवात्मनो भेदी शब्दार्थावपृथक् स्थितौ ॥ इति ॥ ११६ ॥ जो बादर और भीतर सदा रहने वाला थनिरूपी शब्द अति सूक्ष्म होने के कारण भुनाई नहीं पड़ता। वह आकाश में व्याप्त वायु को जैसे पसा एकत्र लेकर प्रकाशित करना है। वैसे वक्ता के प्रयल से पान तक पहुंच कर उपलब्ध होता है (सुनाई पड़ता है)॥ ११६ ॥ सिद्धान्तिमतमाह- किन्तु सिद्धान्त पक्ष तो यह है- तस्य प्राणे च या शक्तिर्या च वुद्धौ व्यवस्थिता विवर्तमाना स्थानेषु सैपा भेदं प्रपद्यते ॥ ११७ ॥ तस्य शब्दस्य प्राणे बुद्धौ वृत्तिविशिष्टान्तःकरणे च या शक्तिः यहिः शब्दभवनशक्तिः व्यवस्थिता वर्तते सा एपा स्थानेपु कण्ठतात्वादिषु विवर्त- माना सती भेदं कादिभेदं प्रतिपद्यते इति सम्बन्धः ।

- संस्कृत-हिन्दीच्याख्योपेतम् १२३ प्राय में और बुद्धि में रहने वाली अर्थ बनाने वाली शब्द को एक शक्ति है जो इसमें व्यवस्थित रूप से रहती है। वह ही कठना आदि स्थानों से अकारादि रूप में व्यक्त होती हुई क,स, आदि भिन्न भिन्न रूपों में परिणा होती है। इस प्रकार शब्द की प्राण और बुद्धि में रहने वाली शक्तिही कण्ठ आदिथानों से व्यक्त होकर क, ग्व, भादि वेदों का कारण बनती है॥७ द्विविधो हि शब्दः प्राणाधिष्ठानः वुद्यधिष्टानश्च । म प्राणबुद्धिशक्तिभ्यां प्रतिल- धाभिव्यक्तिरय बोधयति । तत्र प्राशो बुद्धितत्वेनान्तराविष्टः ऊर्चमभिप्रवृत्तः तत्त- स्थानेषु विवर्तमानः अकारादिरूपेण भिन्नतया भाममानः अक्रमे शब्दात्मनि भेदानु- रागमात्रं सनिवेशयति ॥ शब्दविषये मतभेदो मट्टपादैः श्लोकवार्तिक उक्त:- त्रिगुगः पौगलो चायमाकाशस्याथवा गुगः । वर्णादन्योऽथ नादामा वायुरूपोऽर्थवाचक । पदवाक्यात्मकः म्फोटः सारूप्यान्यनिवर्नने ॥ इति ॥ अस्यार्थ:-- -सच्चरजस्तम स्वभावत्वान्त्रिगुणः शब्दः सांख्यैरिष्टः । पौहलो दिग. ग्यरैएि पुद्गलाः परमाणय उच्यन्ते नेपामयः पौगल: तदात्मक इति यावन् । आकाशगुणः कागादेरिधः । वर्णव्यतिरिन्हो नादान्मा लौकिरिष्टः । यथोक्नं पान. अलभाष्ये 'अपा प्रतीतपदार्थको लोके विनि. शब्द' इति वायुरूपोऽधायः शिक्षाकारैः यथाहुः 'वायुरापद्यते शब्दताम' इति । पदरफोटात्मको वाक्यस्फोटा- रमकश्च वैयाकरणरिष्टः । पारुष्यं विष्यवासीष्टम् । बौदेरन्यनियर्तनमन्यापोहो वाचकस्वेन य इष्टः' इति ॥ १७ ॥ इदानीं शब्दन्यैव जगन्मूलत्वं प्रपञ्चयनि- शब्द से ही जगत की उत्पत्ति हुई है यह सिद्धान विशद रूप से विचारते है। शब्देप्वेवाश्रिता शक्तिविश्वस्यास्य निबन्यनी। यन्नेत्रः प्रतिभात्मायं भेदरूपः प्रतीयते ।। ११८ ॥ अस्य विश्वस्य निश्च्यते अनयेति नियन्यनी व्यवहारकारणभूना शक्तिः याच्यवाचकभावरूपा शब्दे वेवाश्रिता मूक्ष्मं वास्तत्वं गवादिपदार्थरूपेण गोशब्दादि- रूपेण च विनंते इति अविधानस्य धाक्तत्वस्य पिण्डपरिणामेनाभिव्यक्ता गोत्यादि- जातयो वाच्या: गोवृक्षादिशब्दपरिणामेन गोशब्दत्यादिनातयो वाचिकाः सदेवमाथ- पस्योत्पत्ती जातीनाममिव्यत्या वाव्यवाचकरूपस्य व्यवहारस्य वास्तवं निबन्धन- मिनि भावः । यः शब्दो नेत्रं ज्ञापकं यस्य सः यक्षेत्रः प्रतिभात्मा प्रतिभाविषय- वाप्रतिभा अयं भेदरूपः व्यवहारः प्रतिपुरपं प्रतीयते । पदाहः-~'चागेका पश्यति वाग्यवीति वागेवार्थ निहित सन्तनोनि । वाच्येव विश्वं बहुरूपं निबद्ध तदेनदेकं प्रविभज्योपभुक्ते ॥ इति वास्तवमेव भोक्तृभोग्यभोगरूपेश चित्रनने न बाई वस्तु विशिदन्तीति भावः॥ - १२४ वाक्यपदीयम् इस मसार को उत्पन्न करने वाली वाच्यवाचक भाव रूप शक्ति शब्द में हो आश्रित है और इसी शब्द से प्रतीत होने वाला प्रतिभा रूपी यह भेद रूप (घट-पट आदि) यवहार प्रति व्यक्तियों को प्रतीत होने लगता है। अत्रेदं योध्यम्-वाह्यस्य वस्तुनोऽभावात् प्रतिभैव वाक्यार्थः। तथाहि-यथा- वस्थिते वनितात्मनि बाह्येऽर्थे वासनानुसारेण कुणप इति कामिनीति भक्ष्यमिति प्रतिभा भवन्ति तथा असत्यपि व्याघ्रागमने व्याघ्र आगत इत्युक्ते शूराणामुत्साहः कातराणां भयं भवति इति शब्दादर्थप्रतिभा भवति इति प्रतिभामात्रं जगत्। अत एवं असत्यपि वाह्येऽर्थे एप बन्ध्यासुतो याति, राहोःशिर इत्यादिवाक्यतोऽर्थप्रतिभा इति शब्द एव तत्तदाकारेण विवर्तत इति ॥ ११८ ॥ तात्पर्य यह है कि-शब्द से अतिरिक्त वाद्य वस्तु जब नहीं है ना धाक्यार्थ बोध केवल प्रतिमा दी मानना पड़ता है। जैसे किमी युवती खो को देखकर कोई कुणा, कोई कामिनी, और कोई (ध्यान धादि) मध्य रूप में मानना है यह मानना गी एक प्रतिमा है । जैसे सिंह नहीं रहता फिर भी कोई कह दे कि "सिंह आ गया' इस वाक्य के सुनने के माय ही शूरों में उत्माह और कातरों मे भय उत्पन्न हो जाना है। इसे भी प्रतिमा हो कहते हैं। इससे यह सिद्ध हो जाता है कि जगत् प्रतिमा मात्र है। इसीलिए 'वन्ध्याका पुत्र जा रहा है' यह 'राहु का शिर है। इत्यादि वाक्यों से भी अर्थ प्रतिमा होती है और यह स्वीकार करना पड़ता है कि शब्द ही उन उन रूपों में भासिन होता है ॥ ११८॥ पड्जादिभेदः शब्देन व्याख्यातो रूप्यते यतः । तस्मादर्थविधाः सर्वाः शब्दमात्रासु निश्रिताः ॥ ११९ ॥ पड्जादिभेदः पड्सर्पभगान्धारमध्यमपञ्चमधैवतनिपादादिः । शब्देन व्याख्यातः प्रतिपादितः सन् यतः रुप्यते उत्कृप्यते परिच्छिद्यते तस्मात् यतः तन्निवन्धनं पड्जादिभेदनिरूपणं तस्मात् शब्दमात्रासु शब्देषु सर्वा अर्थविधाः निश्रिताः आश्रिता शब्दतादाम्यापन्ना इत्यर्थः । इदमेव वाचस्पतिमिश्रस्ता. त्पर्यटीकायां-'पड्ञादिपु शब्दापक अर्थप्रत्ययापकर्षात् तदुरक वर्थप्रत्ययो- स्कर्षात् प्रत्ययम्य च प्रत्यैतव्योत्कर्षाधीनोत्कर्पत्वात् नामधेयोत्कर्षणास्किर्षः अर्थस्य तादाम्यं कथयति' इत्युक्तम् ॥ यह ही शब्द-पट्ज, ऋषम, गान्धार, मध्यम, पञ्चम, वैवत और निषाद स्वरों के भेद शब्द से प्रतिपादिन हैं। इससे यह निश्चय हो जाता है कि समस्ल अर्थ या उनके भेद शब्द से ही उत्पन्न हुए हैं। इदमत्रावधेयम्-असमाख्येया पजादयः समाग्येया गवादयश्च सर्थ एपार्धाः शब्देवध्यारूढाः शब्दतादात्म्यापन्ना शब्दानुविद्वधिया प्रकाश्यन्ते गोपालाविपालाद- योऽपि गवामयीनां च संज्ञापदानि प्रकल्प्यैव गवादीन् आकारयन्ति तस्मात्सर्वा अर्थ- विधाः ममात्यया असमारयया वा शब्दमात्रासु निश्रिता आरूढा इति ॥ ११९ ।। श्रयं दो प्रकार के है एक अममाख्येय और दूमरा समाख्येय 1 ये दोनों प्रकार के अर्थ - संस्कृत-हिन्दी-व्याख्योपेतम् १२५ शब्दों के आश्रित है । षड्जादि स्वर असमाख्येय है तथा जिनने सचा पर है सब समारध्येय हैं और मर शब्द की मात्रा में आश्रित है ।। ११९॥ शब्दादेव सृष्टिरित्याह-- शब्द से ही जगद की उत्पत्ति हुई है। शब्दस्य परिणामोऽयमित्याम्नायविदो विदुः । छन्दोभ्य एव प्रथममेतद्विश्वं व्यवर्तत ॥ १२० ।। अयं संसारः शब्दस्य परिणामः इति आम्नायविदः वेदविदः विदुः तमेव वेदमाह छन्दोभ्य इति । एतद्विश्वं प्रथमं सृष्टयादी छन्दोभ्यः वेदेभ्यः एव व्यवर्तत वेदस्य विवत इत्यर्थः । तथाच श्रुतयः- एष वै छन्दस्यः साममयः प्रथमो सन् चैराजः पुरुषः योन्नममजत नस्मात्पशवोऽजायन्त पशुम्यो वनस्पतयो वनस्पतिभ्योऽग्निः' 'स उ एवैष ऋड्मयो यजुर्मयः साममयो वैराज्ञः पुरुषः' 'वागेर विश्वा भुवनानि जज्ञे' 'स भूरिति व्याहरत् भूमिमसूजत्' इति, स्कृतयः-'वेदशब्देभ्य एवादौ पृथक संस्थाश्च निर्ममे' इति, पुराणानि च- 'विभज्य बहुधात्मानं स च्छन्दस्यः प्रजापतिः । छन्दोमयीभिर्मात्राभिर्वहुधैर विशेप- तम् ॥ साध्वी वाग्भूयपी येपु पुरुषेषु व्यवस्थिताः । अधिकं वर्तते तेषु पुण्यं रूपं प्रजापनः । प्रजापत्यं महत्तजस्तापारिव सवृतम् । शरीरभेडे विदुषां स्वयोनिमु- पधावति ॥ यदेतन्मण्डलं भास्वद् धाम चित्रस्य राधमः । तनावमभिसंम्भूय विद्यायां प्रविलीयते ॥' इति । वेद और शास्त्रों के जानकार महषियों ने कहा है कि यह समस्त जगत् शब्द का परिणाम है और कल के आरम्म में वेदों से ही विश्व का सुजन हुआई ॥ १२ ॥ इमंत्र बोध्यम्-यद्यपि उपादानसमसत्ताकफार्थापत्तिः परिणामः । यथा दुग्धस्य दधिभवनम् उभयोरपि व्यावहारिकसवात् , उपादानविषमसत्ताककार्या- पत्तित्रिवनः। यथा शुक्तिकाया रजतभवनम् । शुक्तिकाया ध्यावहारिक्सवादजतस्य च प्रातिभासिकम्मस्वात् । तथापि शब्दस्य परिणामोऽयमित्युपक्रम्य विश्वं ब्यवर्तत इत्युपसंहरान् पूर्ववर्तिशले परिणामविवर्तयो. पर्यायत्वमासीदिति प्रतीयते । अतएव शान्तरक्षितेन तत्वसङ्ग्रहे भनादिनिधनमिति कारिकाम् 'नाशोत्पादायमालीढं ब्रह्म शन्दमयं च तत् । यत्तस्य परिणामोऽयं भावग्रामः प्रतीयते' इति अर्थतोऽनु. वदना विस्तपदमपहाय परिणामपदं प्रयुक्तम् । अत एव च भवभूतिना 'पृथक पृथगिवाश्रयते विवान् आवर्नवुवुदतरगमयान्विकारान्' इति अलविकारे तर- शादी विवपदं प्रयुक्तम् । एवं चे शमगा जगन् परिणामो वा विवतों वा वाक्यपदीयकृतामभिमरा इति निर्धारयितुं दु शामिति प्रतीयते । तथापि सूदमे- शिक्या शब्दब्रह्मयिवर्त एव जगदिन्यत्र धाक्यपदीयकृतामभिमत इति प्रतीयते। तथैव हेलाराजादिभिारशतत्वात् शब्दपरिणामवादपक्षोऽपि कपां विदामीदिति न्याय- १२६ वाक्यपदीयम् मञ्जरीदर्शनात् 'इह तु अविसंवादात्प्रमाणं सदर्थातादाम्यं शब्दस्य साधयत्येव' इति तात्पर्यटीकादर्शनाचावगम्यते ॥ विशेष-सत्ता तीन प्रकार की मानी जाती है। १, पारमार्थिक, २, व्यावहारिक, ३, प्रातिमासिक । जो कार्य उपादानकारण की सत्ता के समान सत्ता का उत्पन्न होता है उसे 'परिणाम' कहते हैं। जैसे दूध व्यवहारतः सत है वैसे दूध का परिणाम दही भी व्यवहारतः मन है। उपादान कारण को सत्ता से विषमसत्ता का कार्य जब उत्पन्न होता है तब उसे 'विवर्त' कहते हैं । जैसे शुक्तिका में रजत का भ्रम। क्योंकि शुक्तिका की सत्ता घ्यावहारिक है और रजन को सत्ता प्रातिमाषिक है। रअत का व्यवहार शुक्तिका में नहीं होता। इस प्रकार परिणाम और विवर्त शब्द के अर्थ में मो भेद प्रसिद्ध है। किन्तु इस कारिका में 'शब्दस्य पारिणामोऽयम्' और 'विश्व व्यवर्तत' इन उपक्रम और उपसहार के वाक्यों से पता चलता है कि परिणाम और विवर्त शब्द पर्याय है। यह परिणाम और विवर्तशब्द का एक अर्थ में प्रयोग नया नहीं है। क्योंकि शान्तिरक्षित ने 'तत्वसग्रह' में वाक्यपदीय की प्रथम कारिका का भावानुवाद करते हुए अनादिनिधनं ब्रह्म शब्दतावं यदक्षरम् । विवर्ततेऽर्थ भावेन प्रक्रिया जगतो यतः। के स्थान पर नाशोत्पादासमालीढं शब्दब्रह्ममयं च यत् । यत्तस्य परिणामोऽयं भावनामः प्रतीयते यह कारिका रचा है। इसमें विवर्त के पर्याय के रूप में परिणाम शब्द का प्रयोग किया है। 'मवभूति' ने भी 'उत्तररामचरित में “पृथक्पृथगिबाश्रयते विवर्तान् आवर्तबुबुदतरङ्गमयान् विकारान्' लिखते हुए परिणाम शब्द के पर्याय विकार शब्द का विवर्त के पर्याय के रूप में प्रयोग किया है। इस प्रकार 'वाक्यपदीय- कार'ने जगत् को शब्द का परिणाम कहा है अथवा विवर्त यह कहना कठिन है। फिर मी हेलागज आदि टीकाकारों ने शन्द ब्रह्म का विवन ही जगत को स्वीकार किया है। कुछ विद्वानों का मत है कि शब्दब्रह्म का विवर्न और वैसरी ध्वनिका परिणाम जगत् है । इस प्रकार 'विवर्तते परिणामोऽयम्' दोनों को व्याख्या ठोक वैठनी है। यह मत मण्डनमिश्र की 'स्कोटसिदि' की टीका गीपालिया में स्पष्ट है। इदमत्रावधेयम्-सर्गाद्यकाले अनादिनिधनं सर्वग्राह्यप्राहकाकारवर्जितं पश्य- न्तीवाग्रूपं शब्दब्रह्म सृज्यमानप्रपञ्चवैचित्र्यहेतुप्राणिकर्मसहकृतम् अपरिमितानिरूपित- शक्तिविशेष विशिष्टमायासहितं सत् नामरूपात्मकनिखिलं प्रपञ्चं प्रथम बुद्धावाकलय्य इदं करिष्यामीति संकल्पयति ततो निजया कालाख्यया स्वातन्यशक्त्या समेतः अकाशादीनि अपजीकृताति तन्मानपदवाच्यान्युत्पादयति ततो भूनादय इति । यदाहुः- यः सर्वपरिकल्पानामाभासेऽप्यनवस्थितः । तर्कागमानुनानेन बहुधा परिकल्पितः।। अन्तर्यामी स भूतानामाराद् दूरे च दृश्यते । सोऽन्यन्तमुक्तो मोक्षाय मुमुक्षभिरुपास्यते । प्रकृतित्वमपि प्राप्तान विकारानाकरोति सः । अनुधामेव ग्रीप्मान्ते महतो मेघसंप्लवान् ।

विवर्तते ॥ संस्कृत हिन्दी व्याख्योपेत्तम १२७ तस्यैकमपि चैतन्यं वहुधा प्रविभज्यते । अगाराकिनमुपाते चारिराशे रिवोदकम् ॥ त्रयीरूपेण सज्योतिः प्रथमं परिवर्तते । पृथक्नीर्थप्रभेदेषु दृष्टिभेदनियन्धनम् ॥ शान्तविद्यात्मक योऽशस्तदु हैतदविद्यया । तया प्रस्तमिवाजत्रं या निर्वस्तुं न शक्यते । यथा विशुद्धमाकाशं तिमिरोपप्लुतो जनः । सङ्घीर्णमिव मात्रामिचित्राभिरभिमन्यते ।। तथेदममृतं ब्रह्म निर्विकारमविद्यया । कलुपत्वमिवापन्नं भेदरूपं ब्रह्मेदं शब्दनिर्माणं शब्दशक्तिनिवन्धनम् । विवृत्तं शब्दमात्राभ्यस्तास्वेत्र प्रविलीयते ।। इति । परिकल्पः प्रलयः । प्रकृतित्वं प्राप्तान्-प्रलये प्रकृती लीनान् सूचमरूपेणाव- स्थितान् । नागोजीमहास्तु-प्रलये नियतकालपरिपाकाना सर्वप्राणिकर्मणामुपभोगेन प्र. तये सर्व जगन्मायायाँ' लीयने मा च चनने ईश्वरे' लीयने ल्यधार्य मायाया मात्यन्तिको नाशः उत्तरसर्गानुपपत्ते., नापि सर्वधाऽभानम् प्रतिभापमानशरीरम्य मिथ्यावस्तुनोऽनवभासे तदभावस्यापतेः, किन्तु तदानी कार्यप्रवृत्यभावात् मुसा इव लिष्ठति स्वप्रतिष्ठेश्वरप्रकाशस्यात्यन्तनिर्विकल्पकनया तबलाद् भासमानाऽप्यभात- प्रायैव ततोऽपरिपकमाणिकर्मभिः कालवशात्प्राप्तपरिपाकैः स्वफलप्रदानाय भगवनो:- बुद्धिपूर्विका सृष्टिर्मायापुरुषो प्रादुर्भवतः ततः परमेश्वरस्य सिरसृक्षामिका मायावृत्तिर्जा- यते ततो विन्दुरूपमव्यक्तं त्रिगुणं जायते इदमैत्र शक्तितत्वम् तस्य रिन्दोरचिदंशो बीजम् चिदचिन्मिनोऽशो नादः चिदंशो विन्दुरिहि अचिन्छन्देन शब्दार्थोभयसरका १. लयश्चान्नः करणादीनां वासनादिभिः सह सूक्ष्मरूपेगाविद्याया कार्यप्रवृत्तिनिरोधान- पूर्वकमवस्थानम् । अविधाया लयइच मागि सूमरूपेगास्थानम् । २ ईश्वर इति । यथा स्फटिके अपाकुसुमसन्निधानादकत्वावमासस्तत्रैव स्फटिका प्रनीष यदगगनत्वावमामः एवं शुद्धायो चिति मायोराधिसान्निध्यादीश्वरत्वाध्यामः सोऽयमात्मावरण- विक्षेप शक्त्या अविद्याया आश्रयः तत्रावरणाशैन सुखरूपनिरोधानम् विक्षेपाशेनेशादिस्थूल देहा- नाना प्रतिभामः तयोनिवृत्तौ शुद्धचितपेगावस्थानम् । ३. काशीखण्टे- यदेकलो न शक्नोषि रन्तुं स्वर चर प्रभो। नदिच्छा तव चोत्पन्ना सैषा शक्तिरभूतत्र ।। स्वनेको हित्वनापन्नः शिवशक्तिप्रभेदनः। पनि सिसशारिमाया: मायावृतः शक्तित्वेन कधनं इत्तिवृत्तिमनोरभेदादिति मन्तव्यम् ।

१२८ वाक्यपदीयम् ररूपाविद्योच्यते । अस्माद्विन्दोः शब्दब्रह्मापरनामधेयम् वर्णादिविशेपरहितं ज्ञान- प्रधानं सृष्ट्युपयोग्यवस्थाविशेषरूपम् चेतन मिश्रं नादमात्रमुत्पद्यते एतजगदुपादानमेव रव' 'परा' आदिशब्दैर्व्यवह्वियते । एतत्सर्वगतमपि प्राणिनां मूलाधारे संस्कृतपवन- चलनेनाभिव्यज्यते ज्ञातमर्थ विवक्षोः पुंसः इच्छया जातेन प्रयत्नेन योग एवं मूला- धारस्थपवनसंस्कारः तदभिव्यक्तं शब्दब्रह्म स्वप्रतिष्टतया निःस्पन्दं परा वाग इत्यु. च्यते । इदं च सर्वशब्दतदर्थोपादानम् ‘क्रियाशक्तिप्रधानायाः शब्दशब्दार्थकारणम् । प्रकृतेविन्दुरूपिण्याः शब्दब्रह्माभवत् परा' इत्युक्तेः। अनादिनिधन मिति शब्दब्रह्मणो नित्यतोक्तिवत्सृष्टिस्थित्या व्यवहारनित्यतया वा नेया। एवं च एक्स्यैव स्फोटस्य शब्दब्रह्मरूपस्य सर्वशब्दतदर्थोभयोपादानत्वेनोभयरूपतया उभयोरपि तत्कार्ययो- रुभयरूपत्वमिरयाहुः । सचायं पन्था न वाक्यपदीयकारानुगतः किन्तु तन्त्रशास्त्रानुगतः । तथाहि- प्रपञ्चसारे-प्रकृतिः पुरुषश्चैव मित्यो कालश्च सत्तमः । अणोरणीयसी स्थूलास्थू. लाव्याप्तचराचरा ॥ प्रकृतिरिति शेप. स जानाति विपाकांश्च तस्यां सम्यग्व्यवस्थि- तान् । सा तत्वसंज्ञा चिन्मात्रा ज्योतिपः सन्निधेस्तदा । सः कालः। विचिकीर्षु- घनीभूता सा चिदभ्येति बिन्दुताम् । कालेन भिद्यमानस्तु स बिन्दुर्भवति विधा । भिद्यमानः-स्फोटयमानः । स्थूलसूक्ष्मपरत्वेन तस्य त्रैविध्यमिप्यते । स बिन्दुनाद- वीजत्वभेदेन च निगद्यते । विन्दोस्तस्माद्भिद्यमानाद्रवोऽव्यक्तारमोऽभवत् । म रवः श्रुतिसम्पन्नैः शददघालेति कथ्यते ॥ अव्यक्तादन्तरुदितत्रिभेदगहनात्मकम् । महन्नाम भवेत्तावं महतोऽहड्कृतिस्तथा ॥ भूतादिकवैकारिकतैजसभेदक्रमादरकारात् । काल प्रेरितथा गुणघोपयुजा शब्दसारथ शक्त्या ॥ शब्दायोम स्पर्शतस्तेन वायु- स्ताभ्यां रूपाहहिरेते रसाच। अम्भाँस्येतैर्गन्धतो भूधराधा भूना, पञ्च स्युर्गुणोनाः क्रमेण ॥ सत्वं रजस्तम इति सम्प्रोक्ताश्च त्रयो गुणास्तस्याः। तत्सम्बन्धात् विकृनै- भैदत्रितयस्ततं जगत्सकलम् ॥ इति ॥ अस्थार्थों ललितासहस्रदामस्थद्वात्रिंशदधिकशततमश्लोकीये भास्कररायकृते भाप्ये स्पष्टः । तथाहि-प्रलये सृग्यमानमाणिकर्मणां परिपाकदशायां तादृशकर्माभिन्नमाया- मच्छिन्नं ब्रह्म घनीभूतमित्युच्यते । कालवशात् कर्मणां परिपाके सति विनश्यदवस्था परिपाकप्रागभावो विचिकीत्युच्यते । ततः परिपाकक्षणे मायावृत्तिहदेति तादृशं परिपककर्माकारपरिणतमायाविशिष्टं ब्रह्माध्यक्तपदवाच्यम्। इदमेव कारणविन्दुपद- वाच्यम् । अस्माञ्च कारणविन्दो:सकाशात् क्रमेण कार्यबिन्दुस्ततो नादरततो बीज. मिति त्रयमुत्पन्नम् । योऽयं कारणविन्दुरक्तः स यदा कार्यविन्द्वादिवयजननोन्मुसो भिद्यते तद्दशायामव्यक्तः शब्दब्रह्माभिधेयो रवस्तत्रोत्पद्यते । सोऽयं रवः कारणविन्दु- तादात्म्यापन्नत्वात्सर्वगतोऽपि व्यञ्जकयनसहकृतपवनवशात् प्राणिनां मूलाधारे व्यज्यते । तदिदं कारणविन्द्वात्मकमव्यक्तं शब्दब्रह्म स्वप्रतिष्टतया निप्पन्दं परा .. वागिन्युच्यते । अयं तदेव नाभिपर्यन्तमागच्छता तेन पवनेनाभिव्यक्तं विमर्शरूपेण मनसा युक्तं मामान्यस्पन्दप्रकाशरूपकार्यबिन्दुमयं सस्पश्यन्ती पागिन्युच्यते । अध तदेव शब्दब्रह्म तेनैव वायुना हृदयपर्यन्तमागच्छताभिव्यज्यमानं निश्चयात्मिकया वुद्या युक्तं विशेषस्पन्दप्रकाशरूपनादमयं सन्मध्यमा वागित्युच्यने । अथ तदेव वदनपर्यन्तं तेनैव वायुना कण्ठादिस्यानेषु अभिव्यग्यमानमकारादिवर्णरूपं परप्रवण- योग्यस्पष्टतरप्रकाशरूपं वीजात्मकं सद्वैखरीवागुच्यते । इत्थं चतुर्विधासु परादित्रय. मजानन्तो मनुष्याः स्थूलदशो वैवरीमेव वाचं मन्यन्ते । तथा च श्रुतिः 'तस्माद्यवा- चोऽनाप्तं तन्मनुन्या उपजीवन्ति' इति । अनाप्तमपूर्ण निमभिर्विरहितमिनि घ्याव्या. नारः । चत्वारि वापरिमिता पदानि तानि विदुर्ब्राह्मणा ये मनीषिणः । गुहा त्रीणि निहिता नेगयन्ति तुरीयं वाचो मनुष्या वदन्ति ॥ यज्ञवैभवखण्डे सान्दे-अपदं पदमापन्नं पदं चाप्यपदं भवेत् । पदापविभागं च यः पश्यति स पश्यति । अपदं गतिरहितं निःस्पन्दं शब्दब्रह्मैव परादिपदचतुष्टयं जातं नदिदं पदचतुष्टयमेव ज्ञातं सदपदं ब्रह्मैव भवतीति तदर्थः । इति ॥ तदयं क्रम.-- -धनीभूतं ब्रह्म, ततो विचिकीर्पा, ततोऽव्यक्तं ( कारणविन्दुपदवा- ध्यम) ततो ऽव्यक्तो रवः ( कारणविन्द्वात्मकः निःपन्दं शब्दब्रह्म मूलाधारेऽभिव्य- क्तिमान् परावागरूपः) ततः पश्यन्ती (कार्यविन्दुरूपा स्पन्दमामन्यवती) ततो मध्यमा ( नादास्यस्पन्दविशेषवती) तनो वैसरी (बीजरूपा अकारादिवर्णरूपा) इति ॥ शारदातिलकेऽपि अयमेव प्रकारः उदृकिनः-- निर्गुणः मगुणश्चेति शियो नेयः सनातनः । निर्गुणः प्रकृतेरभ्यः सगुणः सकलः स्मृतः ॥ सनातनः-नित्यः । आयस्य स्वरूपमाह~-निर्गुण इति। प्रकृतेरन्यः-प्रकृति- सम्बन्धशून्यः । द्वितीयस्य स्वरूपमाह-सगुण इनि। सक्ल:-कला प्रकृतिस्तत्म- हिन इत्यर्थः । सोख्यमते साघरजस्तमसा साम्यावस्था प्रधानापरपर्याया प्रकृनिः । वेदान्तनये अविद्या । शिवतन्त्र शक्तिः । सच्चिदानन्दविभवासालापरमेश्वरात् आसीच्छक्तिस्ततो नादो नादाद्विन्दुममुद्भवः ।। राष्टिमाह-मदिति। अविद्याशवलितत्वेन जडवे क्थं नस्य स्रष्टत्वमिन्या- शङ्का वारयनि-सचिदानन्दविभावादिति। अनेनाविद्यावत्वेऽपि तस्य न स्वरूपहानि- रित्यर्थः । मालातिमहिनात्-शक्तिवामीदिति योजना । ननु शनिमहिनादेच पुनः क्थं शक्तिरासीदिनि चेत्पत्यम्-या अनादिरूपा चैतन्याभामेन महाप्रलये मूचमास्थिता तस्या गुणवैपायन साविराजमताममस्रष्टव्यकार्यमाधने या उच्छू- नावस्या सैवोत्पत्तिरित्ययेहि । तदुक्तं वायवीयसंहिनायां-'शिवेच्छया परा शक्तिः १६ या० वाक्यपदीयम् शिवतत्वैकतां गता। ततः परिस्फुरत्यादौ सर्गे सैलं तिलादिव ॥” इति । तस्या एव नादविन्दू सृष्टयुपयोग्यवस्थारूपो । तदुक्तं प्रयोगसारे-नादारमना प्रबुद्धा सा निरामयपदोन्मुखी । शिवोन्मुखी यदा शक्तिः पुंरूपा सा तदा स्मृता ॥ सैव सर्ग- तमा तेन' इति। परशक्तिमयः साक्षात् त्रिधाऽसौ भिद्यते पुनः। विन्दु दो वीजमिति तस्य भेदाः प्रकीर्तिताः॥ विन्दुः शिवात्मको बीजं शक्तिर्नादस्तयोमिथः । समवायः समाख्यातः सर्वागमविशारदैः। परशक्तिमयः-परः शिवः; शिवशक्तिमयः इत्यर्थः । समवायः क्षोभ्यक्षोभक- भावलक्षणः सम्बन्धविशेषः । तस्मात्कारणविन्दोः कार्यविन्दुः ततो नादस्ततो बीज- मुत्पनम् तदेवं द्विविधो विन्दुः कारणरूपः कार्यरूपश्चेति ॥ भिद्यमानास्पराद्विन्दोव्यक्तात्मा रवोऽभवत् । सन्दग्रहोति तं प्राहुः सर्वागमविशारदाः । पराद्विन्दोरित्यनेन शक्त्यवस्थारूपो यः प्रथमो विन्दुस्तस्मादव्यतात्मा वर्णा. दिविशेपरहितोऽखण्डो नादमानं रव उत्पन्नः स एव शब्दनल इत्युच्यते । तत्प्राप्य कुण्डलीरूपं प्राणिनां देह मध्यगम् । वर्णात्मनाविर्भवति गद्यपद्यादिभेदतः ॥ अथ बिन्द्वात्मनः शम्भोः कालबन्धोः कलात्मनः । अजायत जगत्साक्षी सर्वव्यापी सदाशिवः ॥ कालवन्धोः कलात्मन इत्याभ्यां कालस्य प्रकृतेश्च प्रलयेऽप्यवस्थानम् । सदाशिवाद्भवेदीशस्ततो रुद्रसमुद्भवः । ततो विष्णुस्ततो ब्रह्मा तेपामेवं समुद्भवः ॥ मूलभूतात्ततोऽध्यताहिकृतारपरवस्तुनः । आसीरिकल महत्तत्वं गुणान्तःकारणास्मकम् । अभूत्तस्मादहङ्कारम्रिविधः सृष्टिभेदतः॥ मूलभूतादिति । यस्माद्विन्दो, शब्दब्रह्मण उत्पत्तिस्तस्मादेव विन्दोः सदाशिवस्येति तन शब्दसृष्टौ शब्दवहोत्युक्तिः अर्धसृष्टौ सदाशिव इति परं विशेषः । १. षण्णवत्यकुलो देहायामः तत्रागुलामहितं सप्तचत्वारिंशदलात्मकमधः उपरि च परि त्यन्यैकाजुलपरिमिनं मध्यं 'मूलाधार' इत्युच्यते तदुतं-- पावन्तात् दयङ्गुला लिमाचाव्यङ्गुलादयः । मध्यगेकामुलं यच्च देवमध्यं प्रचक्षते ।। गुदरिद्ान्तरे चक्रमाथाख्यं चतुर्दलम् । अस्लि कुण्डलिनी ब्रमशक्तिरापारपङ्कजे ॥ इति ।

प्रद्मकाण्डम् ] संस्कृत-हिन्दी-च्याख्योपेतम् विविधः-वैकारिक तेजसः भूतादिश्चेति । वैकारिकादहङ्कारात्-दिग्वातार्कादयो देवाः । तेजसादहङ्कारात्-कर्मेन्द्रियाणि ज्ञानेन्द्रियाणि मनश्च । भूतादिकादहकारा- पञ्चभूतानि जातानि। पञ्चभूनात्मकं सर्व चराचरमिदं जगत् । अचरा बहुधा भिन्ना गिरिवृक्षादिभेदतः ॥ इति । तदयं निष्कर्षः-वाक्यपदीयकारा व्याकरणागममनुसृत्य नित्यं शब्दब्रह्म शब्दभावेन विवृत्तं सदर्थभावेन विवर्तते इति अनादिनिधनमिति कारिकया वदन्तः नस्यैव सर्वजगदुपादानस्वं मन्यन्ते । नागोजीभट्टास्तु-तन्त्रशाखमनुसृत्य शब्दब्रह्म णोऽनित्यत्वमास्थाय अर्थसृष्टी तजन्मानुपलम्भानियत्वमिति वदन्तः अनादिनिधन- मिति वाक्यपदीयकारोक्तिमन्यथयन्ति । तदिदमन्यथावरणम् 'इत्याहुस्ने परं ब्रह्म यदनादि तथाऽक्षयम् । तदत्तरं शब्दरूपं सा पश्यन्ती परा हि वाम् ॥' इति शिव- दृष्टिग्रन्थेन 'नाशोत्पादासमालीटं शब्दब्रह्ममयं च तत् यत्तस्य परिणामोऽयं भावग्रामः प्रतीयते ॥' इति शान्तरतितकृतनत्वसंग्रहेण प्रमेयमकरणेऽपवर्गनिरूपणप्रस्तावे 'अनादिनिधनम्' इतिकारिकामुत्य 'तत्रानादिनिधनपदनिवेदिता पूर्वापरान्तर• हिता वस्तुसत्ता नित्यत्वं चेति न्यायमरीग्रन्थेन च विरुद्धम् । तैस्तैरत्यन्तप्राचीन मन्धकारैः अनादिनिधनमिति पदरय कूटम्धनित्यवाभिमायेणैवानूदितत्वात् । मच तन्त्रागमानुरोधेन अनादिनिधनमिति पदस्य नागोजीभहोतं व्यारयानमेव रम्यमिनि वाच्यम् 'शब्दब्रह्मेति शब्दार्थ शब्दमित्यपरे जगुः । न हि तेषां तयोः सिद्धिर्जडत्वा. दुभयोरपि ॥ चैतन्यं सर्वभूतानां शब्दब्रह्मेति मे मतिः।' इत्यनेन तेषां वादिनां तयोः शब्दार्थयोः सिद्धिः शब्दब्रह्मत्वसिद्धिर्न उभयोर्जडत्यादित्यर्धकन शारदातिलके तन्त्रागमानुरोधिनि वैयाकरणसिद्धान्तस्य तान्त्रिकसिद्धान्तापेक्षया भिन्नत्वावगमेन तदनुरोधेन वैयाकरणसिद्धान्तनयनम्यात्यन्तमनुचितत्वात् इति अनादिनिधनपदस्य स्वारसिकमर्थमपलप्यान्यधार्थकरणं नागोजीभट्टस्य तन्त्रागमध्रया वा वैयाकरण- सिद्धान्तानभिज्ञतया वेति मन्तव्यम् । ततश्च शब्दब्रह्मोत्पत्तिवादस्तन्त्रागमसिद्धोऽपि न व्याकरणागमसिद्ध इति सर्व निर्मलम् ॥ १२०॥ ननु यदि घटादयः शब्दस्य परिणामविशेषाः स्युम्नहि यथा मृत्परिणामेषु घटा- दिषु मृत्स्वरूपानुगमो दृश्यते तथा शब्दस्वरूपानुगमोऽपि स्यादिति रावामिष्टापरया परिहा शब्दम्वरूपानुगमं प्रत्ययमात्रे दर्शयितुनाह- जैमे मिट्टी से बने हुए पट में मिट्टी की प्रीति शेनी है । ने जितने घर पर आदि पद के कार्य है सब में शन्द रूपता मी दिखाई देनी चाहिए । इतिकर्तव्यता लोके सर्वा शब्दव्यपाश्रया । यां पूर्वाहितसंस्कारो वालोऽपि प्रतिपद्यते ॥ १२१ ॥ लोके सर्या तव्यस्य प्रकारः इतिकर्तव्यता इदमित्थं वर्तव्यमिति सर्वव्य- १३२ वाक्यपदीयम् पहारः ( इतिशब्दः प्रकारवचनः देवतादिवत् स्वार्थे तल्) शब्दो व्यपाश्रयो मूल- मस्या इति शब्दव्यपाश्रया न हि शब्दमनुपन्यस्य कोऽपि कमपि कस्मिंश्चिदपि व्यवहारे प्रवर्तयितुं शक्नोतीति मर्यो व्यवहारः शब्दमूल एवेनि भावः । ननु सर्वा- सामितिकर्तव्यतानां शब्दमूलत्वे वालानां शब्दाज्ञानेन तेषामितिकर्तभ्यताप्रतिपत्तिः कथमत आह-यामिति । पूर्वमाहितः संस्कारः शब्दभावनाख्यो यस्येति पूर्वाहि- तसंस्कारः बालोऽपि यामितिकर्तव्यतां प्रतिपद्यते स्पष्टवचसामस्मदादीनां ध्यवहारः शब्दपूर्वको दृष्ट इति तत्साम्येन अस्पष्टवचसा वालानामपि व्यवहारः शब्दपूर्वक एव मन्नन्यः तत्रैतजन्मीयशब्दपूर्वक्त्वस्य प्रत्यक्षतो वाधेन जन्मान्तर- शब्दपूर्वकत्वमास्थेयमिति भावः । एतदेव वक्ष्यति [वा० का० २ कारि १५८] साक्षाच्छन्देन जनिता भावनानुगमेन वा । इतिकर्तव्यतायां तां न कश्चिदतिवर्तते । इति ॥ १२॥ लोक में जितने कार्य करने के नियम हैं उन सबके मूल में शब्द है। (बिना शब्द का उच्चारण किए, कोई कार्य हो ही नहीं सकता) बालक मो पूर्व जन्म के शब्द भावना नामक सस्कार के द्वारा ही अपना कार्य करता है। हमारे व्यवहारों की तरह बालकों के भी व्यवहार शब्द-भावना के रूप में स्थिर जन्मा- न्तरीय शब्द से ही होते रहते हैं ।। १२१॥ ननु का इतिकर्तव्यता वालस्य यन्न जन्मान्तरशब्दपूर्वकत्वमास्थीयतेऽत भाह- बालक की वह इतिकर्तव्यला जिनके द्वारा जन्मान्तर के संस्कार माने जाते हैं। आधः करणविन्यासः प्राणस्योर्ध्व समीरणम् । स्थानानामभिधातश्च न विना शब्दभावनाम् ॥ १२२ ॥ अशिक्षितशब्दोच्चारणस्य बालस्य यः आद्यः प्राथमिकः करणविन्यासः कर. पानां प्रथलानां विन्यासः' शब्दोच्चारणे विनियोगः तेन च रणविन्यासेन प्राणस्य माणवायोः ऊर्ध्वं समीरणम् तेन च वायुना ऊर्ध्वदेशं गत्वा मूर्धानमाहत्य प्रति- निवृत्य स्थानानामभिघातः तत्तद्वर्णोच्चारणाय तेषु तेषु स्थानेषु शब्दहेतुभूतः संयोगविशेष शब्दभावना अन्तः शब्दभावनां विना भवितुं नाहतीति शेषः ॥ क्योंकि शब्द-मापना के विना भरोध बालक करणों (प्रयत्नां) का शब्दोच्चारण के लिए विनियोग नहीं कर सकता। और विना प्रयत्नों के प्राणवायु का ऊपर की ओर बढ़ना तथा शब्दोचरण के लिए शिर नशा कण्ठ आदि स्थानों में अभिधात भी नहीं हो सकता। अर्थात ब्द का उच्चारण ही नही हो सकता ॥११॥ १. वाचस्पतिमिश्रारतु न्यायकणिकायाम्--'आधःकरणविन्यास' इतीमां कारिकां 'जात- मात्रः खल्वयं बालकः पित्रा मुसे हुते मधुसर्पिषी निलया लेढि । सोऽयमाघः करणविन्यासः प्राणाश्चोव समोरयति यच्चप्सितीनि उच्यते । अपि चोदीरितेन वायुनाहृदयादीनि स्थानान्य- मिहन्ति यतः शन्नभेद आविरस्ति तदेनत्प्रागभवीयशब्दभावनाविजन्मित्तमिति ध्याचस्युः ।

॥ ... १३३ अयं भावः बालानामेवंविधा चेष्टा कर्तव्यतावगतिपूर्षिका स्वतन्त्रचेतनप्रवृ- सिवान या या स्वतन्त्रचेतनप्रवृत्तिः सा सा कर्तव्यतावगतिपूर्विका यथास्मदादी- नाम तथा विवादाध्यामिता कर्तव्यतावगतिः शब्दयोनिः कर्तव्यताकारत्यान् । यो य एवमाकारः स सत्रः शब्दयोनिर्यथास्मदादीनां म च शब्दः सानादनुपलभ्यमानी भावनामुखेन करणभावमापद्यते, भावना च यथाकार्यदर्शनोन्नेया यावकार्यदर्शन व्यवस्थाप्यते इति न जात्यन्धयधिरादीनां जन्मान्तरानुभूतरूपादिव्याख्यानप्रसङ्ग इति ॥ १२२॥ संप्रति ज्ञाने शब्दरूपानुपगमाह- इसलिए यह समझ रसना चाहिए कि प्राणी के समस्तकानों में शम्मरूपता रहती है। क्योंकि- न सोऽस्ति प्रत्ययो लोके यः शब्दानुगमाते । अनुविद्धमिव ज्ञानं सर्व शब्देन भासते ॥ १२३ ॥ सः प्रत्ययः ज्ञानं लोके नास्ति यः शब्दानुगमाइते शब्दानुगमं विना. स्यात् सर्वमपि ज्ञान शब्दविषयकमित्यर्थः, शब्दार्थयोरभेदात् अर्थस्य शब्दप्रकाश्यत्व- नियमाद्वेति भावः । अत्रानुन्यबसायरूपं प्रमागमाह-अनुविद्धमिति । सर्व ज्ञानं शब्देन अनुविद्धमिव संसृष्टमिव भासते यज्ञानं यदाकारावग्रहं तत्तद्विपयक- मिति व्याप्तः ज्ञानमात्रस्य शब्दाकारावग्रहतया शब्दयिषयकवनियम इति भावः । लोक में ऐसा कोई ज्ञान नहीं है जो विना शम्द के अनुगम के होता हो । अत: सब शान शन्द से जुड़े हुए को मानि भासिन होते हैं ।। १२३ ॥ अत एव शारदातिलके-- नित्यानन्दवपुर्निरन्तरगलत्पञ्चाशदणैः क्रमाद् । व्याप्तं येन चराचरात्मकमिदं शब्दार्थरूपं जगत् ॥ शब्दब्रह्म यदूचिरे सुकृतिनश्चैतन्यमन्तर्गतं तद्वोऽध्यादनिशं शशाङ्कसदनं वाचामधीशं महः । इत्युक्तं संगच्छते ॥ इदमत्रावधेयम् सर्वेऽर्धाः सर्वथा सर्वदा सर्वत्र नामधेयान्विताः । मास्ति मोऽथों यः कदाचित् कचित् कथञ्चिन् नामधेयेन रियुज्येत । प्रतीयमानाचार्या मामधयमामा. नाधिकरण्येनावगम्यन्ते गौरित्यर्थोऽश्व इत्यर्थ इति नामधेयतादात्यमर्थानां सिध्यति । ने चोपायतया सामानाधिकरण्यं रूपादिप्रतिपायुपाये चतुरादौ रूपमामानाधिकरण्या. नमयात् नवज्ञायमान उपाय चुक उपेषतामामाधिकार यमनुमलियनुदिन तथेति वाच्यम ज्ञायमानोपायस्य धूमस्य वह्विसामानाधिकरण्याननुभवात् ।अपि चास. ब्दोपायेऽनुमेयादौ न शब्दसम्भेदेनाधिगमो मवेदस्ति तु तस्मान् तैर्नामधेयैः मह स. मानाधिकरणस्यार्थस्य यतःप्रत्ययस्तस्मान्नामधेयात्मानोऽर्थाः। पजादिषु च शब्दाप-

१३४
वाक्यपदीयम्
क अर्थप्रत्ययापकान् तदुक्क त्वर्थप्रत्ययोत्कर्षात् प्रत्ययस्य च प्रत्येतव्योत्कर्षाधीनो
स्कर्षस्वान्नामधेयोत्कर्षणार्थोस्कोऽर्थस्य तादात्म्यं कथयति । नन्वस्त्वर्थसम्प्रत्ययो ना.
मधेयसामानाधिकरण्येन नस्वेतावता नामधेयात्मता सिद्धयति अस्ति हि पुरोवर्ति
सामानाधिकरण्यन रजतप्रत्ययो नचैतायता शुक्ती रजतात्मिका भवति तत्र विर्म-
वादात् शुक्ते रजतात्मकत्वाभावेऽपि इहाविसंवादात् प्रमाण सन् सामानाधिकरण्यानु-
भवो नामधेयत्तादात्म्यं साधयत्यानामिति । एवं च चैयाकरणाः निर्विकल्प के
ज्ञाने घटघटत्वयोर्भानेन घटादितादाल्यापनः घटशब्दोऽपिभासत इति मन्यन्ते । तथा
च तात्पर्यटीकारुतः 'नामरहितमविकल्पकं नास्तीति ये विप्रतिपद्यन्ते वन्मत-
मपाचिकीर्षुरुपन्यस्यति माप्यकारः यावदर्थ वै नामधेयशब्दाः' इति, 'तथा च
नाविकल्पं शब्दरहितमस्तीति तात्पर्यार्थः, तथा चाहुः-न सोऽस्ति प्रत्ययो लोके
या शब्दानुगमादृते । अनुविद्धमिव ज्ञानं सर्व शब्देन मासते ॥ बालमूकादीनामपि
विज्ञानं शब्दानुव्याधवदेवानादिशब्दभावनावशात्' इति च वैयाकरणमतमुपन्या-
स्थन्। नामसंसर्गविपयफत्वंसविकल्पकलक्षणं वदभिःकीर्तिदिइनागादिभिःसविकल्पके
शब्दभानमभ्युगतम् 'इन्द्रियार्थसन्निकोरपन्नं ज्ञानमव्यपदेश्यमयभिचारि व्यवसा.
यात्मकं प्रत्यक्षमिति प्रत्यक्षलक्षणेऽव्यपदेश्यमिति विशेपणं वदता गौतमेन, शब्द-
विषयकत्वेन प्रत्यक्षस्य शाब्दत्वापत्तिरिति वदता वात्स्यायनेन, तत्रैव सूत्रै शब्द-
विषयक्त्वमेव च शाब्दन्वं न तु शब्दजन्यत्वमिति अशब्दोपायेऽनुमैयादौ न शब्द-
सम्भेदेनाधिगमो भवेदस्ति तु इति च वदता वाचस्पतिमिश्रेण च शाब्बानुमि-
स्योरपि शब्दभानमभ्युपगतम् । स्वं रूपमिति सूत्रे भाष्येऽपि शब्दपूर्वकश्वार्थसंप्रत्यय
इत्युक्तम् शब्दविशेपणक इत्यर्थः । मन्त्र यजुपि च यदुच्यते तत्र तन्त्र शब्दादौ कार्या-
सम्भवेन मन्त्रादिसहचरितेऽर्थे भविष्यतीति भाष्यप्रतीके साहचर्यं च शब्दानुविध-
स्यैवार्थस्यावगमादिति कैयटेन स्पष्टमेवोक्तम् । युक्तं चैतत् बौद्धर्थस्य बौद्धन शब्दैना-
विभागात्तन्मूलामेदाध्यवसायेन शब्दार्थाकारवुद्धौ जायमानायां स्वाकारस्यापि समर्प-
णम् इति शब्दम्यापि विषयता ।अत एव शब्दे माह्यत्वग्राहकत्वशक्त्योरङ्गीकारः एव-
मर्थेनापि स्वाकारसमर्पणे तत एव शब्दाकारस्यापि समर्पणमिति सर्व ज्ञानं शब्दानु-
विद्यमेव अत एव चक्षुषा दृश्यमानमपि अज्ञातवोधक पदार्थ 'किमिदमिति न जाना-
मीति' व्यवहरन्ति तदुपदेशे च 'ज्ञातमिदम्' इति व्यवहरन्ति । अत एव पिकपद-
शक्तिप्रहवतः 'भयं कोकिल इनि नानुव्यवसायः तव पिकत्वकोकिलत्वयोरभेदात्
मम तु तत्तत्पदभानान्न दोष इति ॥ १२३ ॥
ज्ञाने शब्दाकारानुगममनन्तरोक्तं गटयितुमाह-
और दूसरी बात यह है कि-
वाग्रूपता चेन्निष्किामेदवयोधस्य शाश्वती ।
न प्रकाशः प्रकाशेत सा हि प्रत्यवमर्शिनी ॥ १२४ ॥

संस्कृत-हिन्दी-व्याख्योपेतम् १३५ यथा अग्नेः प्रकाशकत्वं स्वरूपं यथा वा अन्तर्यामिणश्चैतन्यं स्वरूपं तथा अवयोधस्य शाश्वती नित्या वायूता वायूपानुपगः यदि उत्क्रामेत् निर्गच्छन् चेत् तदा वाग्रूप तायामसत्यामुत्पन्नोऽपि प्रकाशः न प्रकाशेत् पररूपानगी- कारेण प्रकाशक्रियासाधनं न स्यात् हि यतः सा वायुपता प्रत्ययमर्शिनी प्रकाशस्यापि प्रकाशिका व्यवसायप्रकाशकानुव्यवसाय इव । यदाहुः 'इह नीणि ज्योतीपि त्रयः प्रकाशाः स्वरूपपररूपयोग्घद्योतकाः तद्यथा योऽयं जातवेदाः यश्च पुरुषेधान्तरः प्रकाशः यश्च प्रकाशाप्रकाशयोः प्रकाशयिता शब्दास्यः प्रकाशः तत्रैत- पर्वमुपनिबद्धं यावत्स्थाप्णु चरिष्णु च' इति । विमर्श प्रकाशश्चेति तत्वद्वयं तन्त्र विमर्शः प्रकाशस्य प्रकाशक इति शैवैरङ्गीक्रियते तयास्माभिः विमर्शस्थानीया वाग- भ्युपेयते इति । जैसे भग्नि का प्रकाशकत्व स्वरूप है और आत्मा का स्वरूप चैतन्य है वैसे अवबोध (ज्ञान) का बाप होना मी नित्य स्वरूप है। यह यदि कहीं निकल जाय तब उत्पन्न भी प्रकाश न प्रकाशित हो । क्योंकि वह वापता जैसे अमुव्यवशाय व्यवशायका प्रकाशक है वैसे प्राश का मी प्रकाशक है ।। १२४ ॥ तद्यथा सर्वः प्रत्यय उपजायमान नानुल्लिखितशब्दक उपजायते शब्दोल्लेबवि- रहिणोऽनासादितप्रकाशस्वभासस्य प्रत्ययस्यानुत्पन्ननिर्विशेषत्वात् इदमीशमित्या- दिपरामर्शमुपितशरीरे वेदने वेदनात्मकनैव न स्यात् । येऽपि हि वृद्धप्यावहारोपयो- गानासादनेनानासादितशब्दार्थसम्बन्धविशेपच्युत्पत्तयो बालदारकप्रायाः प्रमातार- स्तेऽपि 'तत्' 'सत्' 'किम्' इत्यादि शब्दजातमनुल्लिखन्तः न प्रतियन्ति किमपि प्रमेयमतः शब्दोन्मेपप्रभावप्राप्तप्रकाशस्वभाववा सर्वप्रत्ययानाम इति वायूपाननुगमे संविदा प्रकाशशून्यतया अनधिगतविषयः सर्व एवान्धमूकमायो लोकः स्यात् । नच स्वप्ने स्मृतौ च वायूपानुगमो नास्तीति भ्रमितच्यम् मूक्ष्मस्य शब्दभावनारयस्य वापानुगमस्य तत्राप्यङ्गीकारात् । एवं निर्विकल्पके स्मृतावपि च मूक्ष्मवायूपानुग- मोऽस्तीति मन्तव्यम् ॥ १२४ ॥ पुनरपि सर्वस्य वाग्रूपत्वे वीजमाह- सर व्यवहारों के मूल में वाणो हो है क्योंकि - सा सर्वविद्याशिल्पानां कलानां चोपवन्धनी । तद्वशादभिनिष्पन्नं सर्व वस्तु विभज्यते ॥ १२५ ।। सा वाक् सर्यविद्याशिल्पानां सर्शसां विद्यानां सर्वेषां शिल्पानां कलानां चनु पष्टिकलानां च उपवध्यते अनया उपबन्धनी चोधिका तद्वशात् वायूप. तावताद् अभिनिष्पन्नं सर्व वस्तु समुत्थाप्यमानं विभज्यते अयं घटः अयं पट इति निरूप्यते । अत एव वाग्व्यवहारेणानुपगृहीतमर्थरूपमसतानुल्यम् अत्यन्तमम वाक्यपदीयम् शशविषाणं गन्धर्वनगरं राहोः शिरः इत्यादिकं वाचा समुत्थाप्यमानं मुस्यसत्तायुक्त- मिव भासते इत्यर्थः । और, वही वाणी सब विद्याओं, शिल्पों और कलाओं का बोध कराती है तथा इसी के द्वारा उत्पन्न घट, पर आदि समस्त वस्तुओं का विमाग मी सिद्ध होता है ।। १२५ ।। अयं भावः मनुष्याणां सर्वोऽपि लौकिके वैदिके वार्थे यो व्यवहारः स विद्या- शिल्पकलादिभिः प्रतिवद्धः मनुष्याधीनश्च स्थावरजङ्गमस्य व्यवहारः विद्यादयश्च वापायां बुद्धौ निवाः घटादीनां निष्पादनेऽपि प्रयोजकः 'एवं क्रियताम्' इत्युपदि. शति प्रयोज्यश्च एवं करोमि' इति समीहते स चासम्मवी वापतामन्तरेणेति ।। विद्या:-अष्टादश, ऋग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदोऽथर्ववेदः इति वेदाश्चत्वारः । शिक्षा क्ल्पो व्याकरणं निरुक्तं छन्दो ज्योतिषम् इति वेदाङ्गानि पट् । पुराणानि न्यायो मीमांसा धर्मशाखाणि चेति उपाङ्गानि चत्वारि । अनोपपुराणानां पुराणे वैशे- पिशाखस्य न्याये चेदान्तशास्त्रस्य मीमांसायाम् महाभारतरामायणयोः सांख्यपा. राञ्जलपाशुपतवैष्णवादीनां च धर्मशास्त्रेवन्तर्भावः । इति मिलित्वा चतुर्दशविद्याः तदुक्तं-'पुराणन्यायमीमांसाधर्मशास्त्रागमिश्रिताः। वेदाः स्थानानि विद्यानां धर्मस्य च चतुर्दश ॥” इति । एता एव चतुर्भिः भायुर्वधनुर्वेदगान्धर्ववेदार्थशास्त्रात्यैरुपवेदैः सहिता अष्टादश विद्या भवन्ति । अर्थशास्त्रे-नीतिशास्त्रश्वशास्त्रगजशासशिल्पशा- खसूपकारशास्त्राणामन्तर्भावः विस्तरस्तु महिलस्त्रोत्रान्तर्गत प्रयीसांख्यम्' इति श्लोक- व्याख्याने मधुसूदनसरस्वतीकृते द्रष्टव्यः । शिल्पं-शिल्पशास्त्रं गृहादिनिर्माणप्रकारबोधकं शास्त्रम् । चतुः पष्टिकलाच-गीतम्, वाद्यम, नृत्यम्, नाट्यम्, आलेख्यम, विशेष- कच्छेद्यम, तण्डुलकुसुमवलिविकाराः, पुप्पास्तरणम्, दशनवसनागरागाः, मणिभूमि- काकर्म, शयनरचनम, उदकवाद्यम्, उदकवादः, अद्भुतदर्शनबेदिला, मालाग्रथनकल्पः, शेखरापीडयोजनम्, नेपथ्ययोगः, कर्णपत्रभङ्गाः, गन्धयुक्तिः, भूपणयोजनम्, इन्द्र- जालम, कौचुमारयोगाः, हस्तलाघवम्, चित्रशाकापूपभक्तविकारक्रियाः, पानकरस. रागासवयोजनम्, सूचीवापकर्म, सूत्रक्रीडा, वीणाडमरुकवाद्यानि, प्रहेलिकाप्रतिमालाः, दुर्वञ्चायोगाः, पुस्तकवाचनम, नाटिकाख्यायिकादर्शनम्, काव्यसमस्यापूरणम्, पट्टिकावेबबाणविकल्पाः, तर्कुकर्माणि, तक्षणम्, वास्तुविद्या, रूप्यरतपरीक्षा, धातु. चादः, मणिरागज्ञानम्, आकरज्ञानम्, वृत्तायुर्वेदयोगाः, मेपल्कुटलावकयुद्धविधिः, शुकसारिकाप्रलापनम, उत्सादनम्, केशमार्जनकौशलम्, अक्षरमुष्टिकाकथनम, ग्लेच्छितकविकल्पाः, देशभाषाज्ञानम् , पुस्पशकटिकनिमित्तज्ञानम् , यन्त्रमातृका, धरणमातृका, असनाच्यसम्पाव्यम् , मानसकात्यक्रियाविकल्पाः छलितकयोगाः, अभिधानकोशच्छन्दोज्ञानम् , क्रियाविकल्पाः, ललितविकल्पाः, वसगोपनानि, छूतविशेषः, आकर्षक्रीडा, बालक्रीडनकानि वैनयिकविद्याज्ञानम् , वैजयिकविद्या- ज्ञानम , चैतालिकविद्याज्ञानम् , इति ।। १२५ ॥ .

बाकाग्दम् ] संस्कृत-हिन्दी-व्याख्योपेतम् और- सैपा संसारिणां संज्ञा बहिरन्तश्च वर्तते । तन्मात्रामनतिक्रान्तं चैतन्यं सर्वजन्तुपु ॥ १२६ ।। सा एषा वाक् संसारिणां संज्ञा इत्युच्यते या पहिः बाह्यस्य लोकव्यवहार- स्य साधनं या च अन्तः सुखदुःखादिसंविद्रूपा वर्तते यतः सर्वजन्तुपु तन्मात्रां वाइमात्राम अनतिकान्तं चैतन्यं वर्तते न स प्रागिविपयो यस्य वायूपानु गमो नास्तीत्यर्थः॥ और, यही वाणी प्राणियों में चेतना शक्ति है जो बाघ लोक व्यवहार का साधन है तथा अन्तःकरण के सुख दुःख का शान कराती है। क्योंकि ऐमा कोई प्रागी नही है जहाँ चे तन से और वाक्मात्रा न हो।। १२६ ॥ अयं भावः यावद्वापतानुवृत्तिम्तावदेव अन्तः संज्ञा सुग्वदुःससंविन्मात्रा पहिः संज्ञा वाइिनबन्धनो लोकव्यवहारच चायूपानुगमाभावे नियतमुत्सीदेत् । अत.. चैतन्येनाविष्टा नहि काचिनातिरस्ति यस्यां स्वपरसग्योधानुगमो वाचा न क्रियेत स्थावरेपु स्वसम्बोधानुगम एव भवति जनमेषु मनुप्येपु स्वपरसम्बोधानुगमः । स च वाचा कियते इति चितिक्रिया वाक्परिग्रहरहिता न भवति इत्येके । वागेव चिति- क्रियारूपा इत्यन्ये। - यदाहुः- भेदोद्ग्राहवियर्तेन लब्धाकारपरिग्रहा। आग्नाता सर्वविद्यासु वागेव प्रकृतिः परा ।। एकत्वमनतिकान्ता पाइनेवा वानिवन्धनाः । पृथक् प्रत्यवभासन्ते वाग्विभागा गवादयः ।। पडद्वारा पडधिष्ठानां पड्प्रचोधां पडव्ययाम् । ते मृत्युमलिवर्तन्ते ये वै वाचमुपासते ॥ इति । अयमर्थ:-भिधन्त इति भेदाः गवादयः तैपामुग्राहः स्वीकारः तदात्मको यो विकल्पो भेदः तेन लब्ध आकारपरिग्रहो यया यनश्च भावनाकारपरिग्रहेण परा प्रकृति तचैतन्यामना विवर्तन इति वाक्चैतन्ययोरभेदः ॥ पाचा नीयन्ते इनि वाइनेत्राः शब्दा अर्थाश्च शब्दा अपि वाचमर्थरूपापना प्रतिपादयन्ति सनिवन्धनाः गवादय वाग्विभागाः वाचोऽभेदमनतिक्रान्ताः वर्तन्ते ॥ पडद्वारा स्वभावचरणा- म्यागयोगाष्टोपपादिताम् । विशिष्टोपगतां चेति प्रतिभा पबिधां विदुः ॥ इनि पद्विधा प्रतिभाद्वारं प्राप्युपायो यस्या वाचश्च बहुधा शक्तयो या हि पविधा भनिभां जनयन्ति । ये हि प्रतिभायाम अर्धाकारास्तेऽस्या अधिष्टानम् नाच प्रतिमा वा २. १३८ चाचोऽध्यनिरिक्त इति ताभिः पटप्रबोधां पडव्ययां पड्ययवाम् पोडैव च तस्याः प्रतिपादनव्यापारः । सर्वाणि चैतानि स्पाणि तस्या इति ॥ २६ ॥ यतः वागेव संज्ञा ततः- प्राणियों में जो सज्ञा है वह वाणी ही है क्योंकि- अर्थक्रियासु वाक् सर्वान्समीहयति देहिनः । तदुत्क्रान्तौ विसंज्ञोऽयं दृश्यते काटकुड्यवत् ॥ १२७॥ सर्वान् देहिनः अर्थक्रियासु जलाहरणादिकार्येषु वाक् समीहयति जलमा. नयेति प्रेरयति वायूपानुपने एव पदार्थादीनां समीहनं चेष्टनं भवतीति वाचैव युक्ताः प्राणिनश्चेष्टन्त इति भावः । तदुत्कान्तौ अयं देही व्यवहारयोग्यस्य परिच्छेद- स्य अभायात् काष्ठकुड्ययत् विसंज्ञो दृश्यते विसंज्ञ इति व्यवहियते ॥ १२७ ॥ क्योंकि, समस्त प्राणियों को कार्य करने के लिये वाणी ही प्रेरक है (जैसे पानी लायो) और इसी वाणी के बन्द हो जाने पर यह देह काठ और मीत की तरह विना चेतना का हो जाता है ।।१७।। जाग्रदृशायां वायूपानुगममुक्त्वा स्वप्नेऽपि तमाह- आग्रनावस्था की भाँति स्वप्नावस्था में भी वाणी का अनुगम होता है जैसे । प्रविभागे यथा कर्ता तया कार्ये प्रवर्तते । अविभागे तथा सैव कार्यत्वेनावतिष्ठते ।। १२८ ॥ यथा प्रविभागे जाप्रदयस्थायां तया वाचा करणभूतया कर्ता देवदत्तादिः कार्य घटादी प्रवर्तते राधा अविभागे रवप्नावस्थायां सैव पागेव कार्यत्वेना- वतिष्ठते धागेत्र भोक्तृतया भोग्यतया भोगतया च विवर्तत इत्यर्थः । तथा श्रुति:-'भोक्ता भोग्यं प्रेरितारं च मत्वा सर्व प्रोक्तं त्रिविधं ब्रह्म चैतत्' । आहच- प्रविभज्यात्मनात्मानं दृष्ट्वा भावान् पृथग्विधान् । सर्वेश्वरः सर्वमयः स्वप्ने भोक्ता प्रवर्तते । इति । जैसे जाग्रत अवस्था में वाणी से प्रेरित होकर कर्ता कार्य करने में प्रवृत होता है। वैसे स्वप्नावस्था में भी वाणी ही भोक्ता, मोग्य और भोगरूप में परिणत हो जाती हैं ॥ १२८ ॥ एतदुक्त भवति जाग्रवस्थायां कर्तृकर्मकरणविभागः सम्भवति बाह्यस्य तदानीं सत्वात् इति सा प्रविभाग इत्युच्यते स्वप्नावस्थायां तु वाग्रूपं शब्दब्रह्मैव कर्ता कार्य करणं च तदानीं यासस्याभावात् इति सा अविभाग इत्युच्यते । यद्यपि जागरणेऽपि सैव कर्ता कार्य करणं च तथापि प्रसिद्धत्वादेवमुक्तम् कार्यत्वेन वर्तृत्वकरणत्वे उपलच्यते॥ केचित्तु-जाग्रदयस्थायां जीवपरमात्मनोः पार्थक्थात् सा प्रविभागावस्थोच्यते ।

संस्कृत-हिन्दी-व्याख्योपेतम् स्वप्ने तु 'यत्रतत्पुरुषः स्वपिनि नाम सना योग्य तदा सम्पन्नो भवति स्वमपीतो भवति तस्मादेनं स्वपिनीत्याचक्षते स्वं हारीतो भवनि' इति श्रुत्या यत्र मुली पुंपः स्वपितीति नाम भवति तदा पुरुषः सता सम्पास्नेनैकीभूनः हि यतः स्वं सदारमा. नमपीतो भवति लीनो भवति इत्यर्थः। मनः प्रचारोपाधिविशेषसम्बन्धादिक्रिया- र्थान् गृ?स्तविशेषापन्नो जीवो जागर्ति तदासनाविशिष्टः स्वमान् पश्यन् मगः शब्द. घाच्यो भवति स उपाधिद्वयोपरमे सुपुप्तावस्थायामुपाधिकृतविशेषाभावात रसात्मनि अलीन इयेति रचं ह्यपीती भवतीत्युच्यने इति सा अविभागावस्थोच्यते इत्याहुः ।।१२८] सर्यो हि निकारो वाच पुवैति स्वमतं समर्थयते- समस्त जगत् वाणी का ही विकार है। स्वमात्रा परमात्रा या श्रुत्या प्रक्रम्यते यथा । तथैव रूढतामेति तया ाथों विधीयते ॥१२९ ॥ स्यमामा स्वस्वरूपं परमात्रा परस्वरूपं यथा भेदेन अभेदेन याश्रुत्या याचा प्रकम्यते प्रत्याय्यते तथैव भेदेनाभेदेन वा सः अर्थों रूढतां प्रसिद्धिमेति हि यतः तया याचा अर्थी विधीयते युद्धावारोप्यते इत्यर्थः ।। जसे स्वस्वरूप अथवा परस्वरूप भेद या अभेद रूप में वाणो से प्रतीत होता है वैसे ही भेद अपना अभेद रूप में यह शब्द उमी अर्थ में रुढ़ हो जाना है। क्योंकि किसी भी अर्थ का ज्ञान शम् के द्वारा ही होना है। अयं भावः यया राहोः शिरोऽभिनत्येऽपि राहोः शिर इति यथा वा पुरुषस्य चैतन्याभिन्नत्वेऽपि पुरुषस्य चैतन्यमिति शब्दन भेदः प्रतिपाद्यते यथा च आदेशस्य स्थानि भिन्नत्वेऽपि स्थानिवत्सूत्रेगाभेदः प्रतिपद्यते तथैव स रूढिं प्रसिद्धि याति । शायदस्यैप महिमा यदसदर्थप्रकाशनं नाम । यथाः खण्डनकारा.-'अत्यन्ता. सत्यपि हाथै ज्ञानं शब्दः करोति च' इनि। योगसूत्रेऽप्युन्हं 'शब्दज्ञानानुपाती वस्तु. शून्यो विकल्प' इति । शन्दज्ञानमात्रेण युद्धावनुपत्तति पस्नुशून्यः यामार्थ- शून्यः विकल्पः विकल्पात्मकं ज्ञानमिति तदर्थः । अब योगवृत्ती नागोजीमहाः 'स (विकल्पः) न प्रमाणान्तर्भूतः वस्तुशून्यस्यात् नापि विपर्ययान्तर्भूनाज्ञानस्य यायाय सति यादृशस्तद्याथाय निवन्धनो व्यवहारः शब्दप्रयोगरूपस्नादृशग्यवहारस्यतोऽपि दर्शनात् । विपर्ययन्तु मैवम् वाधोत्तरमिदं रजतमिति शम्दप्रत्यययोरभावात् यथा चैतन्यं पुरुषस्य स्वरूपमिति अन्यथा चिनरेव पुरुषायाभेदनियतसम्बन्धरूपस्य पथ्यस्यामतीत्यापत्तिः भवति च चैत्रस्य गौरिति यथार्यशब्दवदवापि पट्यर्थं वृत्तिः ततो विकिनागपि चोधश्च । एवं निष्क्रयः पुरुषः, तिष्टति वाण, इत्यत्रापि द्रव्यम्। अमावस्य अधिकरपामात्रत्वेन कियाभावस्य गतिनिवृत्तेश्च पुरपेण बाणेन चानतिरे- कादाधाराधेयभावानुपपत्तेः' इति ॥ १२९॥ लोग का शिर, और पुरुष का चतन्य' इस प्रकार व्यवहार करने है और वानिव- १४० वाक्यपदीयम् दादेशः' मी कहते है । वस्तुतः विचारा जाय तो शिर हो राहु है और चैतन्य ही पुरुष है । किन्तु व्यवहार अभेद में भेद मानकर होता है इसी प्रकार स्थानो और आदेश के मित्र होने परभो स्थनिवत मूत्र मेंद में अभेद सिद्ध करता है और वह उसी प्रकार भेद मैं अभेद, अथवा अभेद भी भेदरूप से प्रसिद्ध (स्ट) हो जाना ।। १२९ ।। एतदेव स्पष्टयति- उदाहरण द्वारा स्पष्ट करते हैं। अत्यन्तमतथाभूते निमित्ते श्रुत्युपाश्रयात् । दृश्यते ऽलातचक्रादौ वस्त्वाकारनिरूपणा ॥ १३० ॥ निमित्ते बाह्ये अलातचक्रादौ अलात चक्रशशविपाणखपुष्पादिरूपेऽर्थे अत्यन्तमतथाभूते असत्येऽपि श्रुत्युपाचयात् शब्दबलात् यस्त्वाकारनिरू- पणा खपुष्पं भवसिद्धान्त इत्येवं शब्दप्रयोगो दृश्यते इति अत्यन्तासन्तमप्यर्थ शब्द एव जनयतीति सन्तमपि स एव जनयतीति शब्दमूलिकैच सृष्टिः अत एव शब्दसत्ताविहीनः कोप्यों न लभ्यते बाह्यसत्ताविहीनस्तु शशविषाणादिरूपो लभ्यत इति भावः ॥ १३० ।। जैसे, बाह्यवस्तु शशविषाण, अळात चक्र, आकाश पुष्प आदि अत्यन्न असत्य है फिर भी शब्द के बल से किसी वस्तु के आकार को बताने में आपका मत खपुष्प की भाँति है। इस प्रकार के शब्दों का प्रयोग देसा भी जाता है। जब अत्यन्त असत्य भई भी शब्द से उत्पन्न होता है तो सब अथं तो शम्दसे उत्पन्न होगा हो क्योंकि जगत में जिनने पदार्थ है वे सब शब्द के विषय है। जो जगत् में नहीं है खपुष्प आदि उनकी मी सत्ता शब्द में विद्यमान है। अतः शब्द ही जगत् का कर्ता है या जगत् शब्द का हो विवर्त है यह मान लेना हो चाहिए ।। १३०॥ परमात्मनो जगत्कारणताबोधकश्रुतीनामविरोधाय शब्दस्यैव परमात्मरूपतामाह- श्रुतियों में जगत का कारण परमात्मा माना गया है। किन्तु वद परमात्मा भी शम्द ही है। अपि प्रायोक्तुरात्मानं शब्दमन्तरवस्थितम् । प्राहुर्महान्तमृप येन सायुज्यमिप्यते ॥ १३१ ।। प्रयोक्तः उच्चारयितुः विवृत्तवाग्रूपस्य जीवस्य आत्मानम् अन्तर्यामिणम् तथा च श्रुतिः 'एष ते आत्माऽन्तर्याम्पमृतः' इति अन्तः शरीरान्तः हृदयाकाशदेशे अवस्थितं प्रतिष्ठितं शालिग्रामशिलायां विष्णुरिच तत्रोपलब्धियोग्यं शब्दं महान्तं व्यापकम् ऋषभं देवं स्वप्रकाशं ब्रह्मस्वरूपमपि माहुः येन ब्रह्मणा अविवृत्तवाग्रूपेण ध्वनिगतक्रमोपरागाभावे सायुज्यम् ऐक्यम् इष्यते । शब्दमेव अविद्यावशं जीवम- विद्यारहितं ब्रह्म चाहुरिति तत्यम् । यही कारण है कि-महर्षियों ने शब्द का उच्चारण करने वाले को आत्मा को जो शरीर के बीच में हृदयाकाश में स्थित है ( अर्थात् प्रतीत होता है ) उसे हो व्यापक देव ( ब्रह्म) भी माना है और उसी के साथ सायुज्य (ऐक्य ) मुक्ति मी चाहते है संस्कृत-हिन्दी व्याख्योपेतम् १४१ क्योंकि अविधा से आच्छन्न शन्द जीव और अविद्या से रहिन शब्द ब्रह्म कहा गया है ।। तथा च भागवतम्-'स एव जीयो विवरप्रतिः प्राणेन घोपेण च गुहां प्रविष्टः । मनोमयं सूचममपेत्य रूपं मात्रा स्वरा वर्ण इति प्रसिद्धः ॥” इति छाया। स. शन्द एवं जीवः विवरेषु हृदयाघाकाशेपु प्रसूतिरभिव्यक्तिर्यस्य प्राणेन प्राणवायुपरिणामरूपेण धोपेण धनिना गुहां हृदयशिरः कण्ठमूर्धरूपां प्रविष्टः सूधर्म रुपम् अपेत्य यरवा मनोमयम् अन्तःकरणपरिणामरूपं विकारं प्राप्यनि शेषः । मात्रा स्वरा वर्ण इति प्रसिदिमुपगत इत्यर्थः । सन्द एव जीवभाव. मापद्यते स एव च अन्तःकरणद्वारा वर्ण इत्यादिप्रमिद्धिमुपगत इति भारः । एतदेवाहुमहार्भाष्यकारा:-चयारि शृङ्गा यो अस्य पादा द्वे शीर्ष सप्त हस्तासो अस्य । त्रिधा बद्धो घृपभो रोरवीति महो देवो मत्यां आविवेश' इति । चत्वारि पदजातानि नामाख्यातोपसर्गनिपाताश्च, बयो अस्य पादाः अयः काला भूतभविष्यमानाः, द्वे शीर्थ द्वो शब्दात्मानी नित्यः कार्यश्व, सप्तहस्ता. सो भस्य सप्त विभक्त, विधा बद्धः त्रिपु स्थानेषु वदः उरसि कण्टे शिरमीति वृपभो वर्षगात रोरवीति शब्दं करोति कुत एतद्रीतिः शब्दार्मा महो देवो मायां आविवे- शेति महादेवः शब्दः मयां मरणधर्माणो मनुप्यास्तानाविवेशेत्यर्थः' इति । अत्रो घोतः 'महान् परब्रह्मरूपः देवोऽन्तर्यामिरूपः शब्दो मर्यवाविष्ट इत्यर्थः' इति । पनदुक्तं भवति शब्दो द्विविधः नित्यः कार्यश्च नित्यः सर्वव्यवहारयोनिः संह- नक्रमः सर्वेपामन्तः सन्निविष्टः सर्वविगाराणां प्रभवः शब्दब्रह्मरूपः । अयमेव अविद्या वृनः सन् घरस्थितदीप इव नाना विषयान् भामयन् जौवभागमापन्नः कर्मणामाप्रयः मुखदुःखयोरधिष्ठानं घटादिनिरुद्ध प्रकाश इस भवति । कार्यः व्यावहारिक पुरुषस्य वागारमनः प्रतिविम्योपमाही घटपदादिशब्दरूप इति ॥ १३ ॥ शब्दयातादात्म्यभावोपयोगिनमुपायमाह- शम्दब्रह्म में तादात्म्य प्राप्त करने का उपाय यह है कि- तस्माद्यः शब्दमस्कारः मा मिद्धिः परमात्मनः । तस्य प्रवृत्तितत्वजस्तद्ब्रह्मामृतमश्नुते ॥ १३२ ।। यस्मादुक्तं महात्म्यं शब्दस्य तस्मात् यः शब्दसंम्कारः अपयशरियन शानं सा परमात्मनः नित्यस्य शब्दब्रह्मणः सिद्धिःमियुपायः । अयंभावः ध्या- स्थितमाधुत्वेन रूपेश शब्दत संस्क्रियमाणे अपभ्रंशरूपप्रतिवन्धमापगमे धर्मति शेष आविर्भवति ततः शब्दब्रह्मनादाम्योपगमरूपा ब्रह्मणः प्राप्तिर्भवतीति । क्थं शम्दसंस्कारः ब्रह्मप्राप्त्युपाय इत्यार-तम्य शब्दाय प्रवृत्तितत्त्वज्ञ' प्रवृत्ति पद: भावविकाररूपा तस्याम्ना प्रतिभाग्या तां यो जानानि म तत् श्रीपनिषदममृतं ब्रह्म अश्नुते तेनैकीभवनीत्यर्थः ।।

१४२ वाक्यपदीयम् इस लिए जो शम्द का संस्कार व्याकरण मिद्धरूप है वह हो उस परमात्मा (नित्यशब्द- ब्रह्म ) की सिद्धि (प्राप्ति) का उपाय है। क्योंकि इम शब्द ब्रह्म की प्रवृत्ति (षड्भावविकार) और तत्व (प्रतिमा) को जो ठीक समझ सकेगा बद्द ही उस उपनिषद् में वर्णित अमृत ब्रह्म को प्राप्त कर सकता है । अर्थात् सायुज्य मुक्ति उसे हो मिल सकती ॥ १३२ ॥ तथा चाहु:- प्राणवृत्तिमतिक्रान्ते वाचस्तखे व्यवस्थितः । क्रमसंहारयोगेन संहृत्यात्मानमात्मनि ।। वाचः संस्कारमाधाय वाचं शाने निवेश्य च । विभज्य वन्धनान्यस्याः कृत्वा तां छिन्नबन्धनाम् । ज्योतिरान्तरमासाद्य च्छिन्नमन्धिपरिग्रहः । परेण ज्योतिपैकत्त्वं छित्वा ग्रन्थीन् प्रपद्यते ॥ इति । अयमर्थः 'तस्य प्राणेषु या शक्तिः' इति कारिकया प्राणाधिष्टानः बुद्ध्यधिष्ठा- मश्र द्विविधः शब्द उक्तः तत्र शब्दः प्राणबुद्धिशक्तिभ्यां प्रतिलब्धाभिव्यतिरथं प्रका. रायति यदा च प्राणवृत्ति प्राणवायुव्यापारमतिकामति तदा न वायोः तत्तत्स्थानेषु अभिघात इनि शब्दे भेदरूपावभासो न भवतीति भेदरूपस्यासत्यतावबोधात् प्राण- वृत्तिमतिक्रान्ते वाचरतत्वे बुद्धिरथे व्यवस्थितो भवति तत्रापि शब्दारमा प्रत्यवभा- समानः सक्रमः इय भासते इति क्रमसंहारयोगेन कमराहित्यभावनया आत्मनि बुद्धी आत्मानं शब्द संहृत्य क्रमसंहारबुद्ध्या विषयीकृत्य वाचः संस्कारं धन्युपरागरहि- त्यरूपम् आधाय कृत्वा वाचं ज्ञाने निवेश्य अस्या वाचः बन्धनानि भेदरूपाणि विभज्य पृथक कृत्य एनां वाचं छिन्नबन्धनामविद्याहङ्काररहितां कृत्वा दिन ग्रन्थि- परिग्रहः सन् आन्तरं ज्योतिः पश्यन्तीवाग्रूपं आसाद्य ज्ञास्वा ग्रन्थीन् छित्वा परेण ज्योतिपा शब्दब्रह्मणा एकत्वं प्रतिपद्यते ॥ इदमत्रावधेयम्-सिद्धान्तशैवादिमते शिवः तस्य समवायिनी शक्तिः ज्ञान- शक्त्याख्या सा निमित्त कारणम् समवायो नाम तादात्म्यमिति शिवः शक्तिश्च एक तत्वम् शिवस्य परिग्रहशक्तिः विन्द्वाख्या या क्रियाशक्तिरित्युच्यते परिग्रह उपादान- कारणम् इत्येकं तत्वमिति रत्नत्रयम् । स च विन्दुर्द्वि विधः शुद्धोऽशुश्च शुद्धविन्दुरेव महाविन्दुः महामाया इति अशुद्धविन्दुश्च मायेति उच्यते विन्दौ समयायिन्याः शक्तः सम्बन्धः स एव विकल्पः भेदज्ञानमित्याख्यायते तं च विकल्पमाश्रित्य शिवः शुद्ध- विन्दुं क्षोभयति तेन घम शब्दार्थसष्टिधारा जनयति सा च शब्दधारा परा पश्यन्ती मध्यमा वैखरी रूपा शुद्धा ततोऽशुद्धविन्दुः तुब्धः अशुद्ध शब्दार्थधारां जनयति सा च परा पश्यन्ती मध्यमा वैखरीरूपा अशुद्धा । द्विविधस्यापि विन्दोः जडत्वेन अचि. दात्मकस्वात्तत्परिणामो द्विविधापि परादिरूपा वागचिद्रूपैव तस्या अतिक्रम एवं वन्धनच्छेदलक्षणो मोक्षः न तु तत्तादात्म्यम् स च दीक्षादिव्यापारेण सम्पायते इति।

प्रमकाण्डम् ] संस्कृत-हिन्दी व्याख्योपेतम् १४३ यथाहुरष्टप्रकरणे- शब्दतत्वमघोषा वाग्ब्रह्म कुण्डलिनी ध्रुवम् । विद्या शक्तिः परा नादो महामायति देशिकः ॥ विन्दुरेव समास्यातो व्योमानाहतमित्यपि । चतस्रो वृत्तयस्तस्या याभिाप्तास्त्रिधाणवः। वैखरी मध्यमाभिल्या पश्यन्ती सूक्ष्मसंजिता । तन मा चैखरी श्रोत्रमाह्या यार्थस्य वाचिका ॥ स्थानेषु विवृते वायौ कृतवर्णपरिग्रहा । प्रयोक्तृणामियं प्रायः प्राणवृत्तिनिवन्धना ॥ केवलं बुदयुपादाना प्रमावर्गानुपातिनी । अन्तः संजल्परूपा तु न श्रोत्रमुपसर्पति ॥ प्राणवृत्तिमतिक्रम्य वाते मन्यामाह्वया । अविभागेन वर्णानां सर्वतः संहृतक्रमा । स्वयं प्रकाशा पश्यन्ती मयूराण्डरसोपमा। स्वरूपज्योतिरेवान्तः सूचमा वागनपायिनी। पस्या दृष्टस्वरूपायामधिकारो निवर्तते । पुरुष पोडशकले तामाहुरमृतां कलाम ॥ तामेव वाणी सूचमाख्यामाहुरात्मविदो जनाः । प्रन्यात्मनियता एता वृत्तयो वन्धनात्मिका ॥ आयो विभिक्तमात्मानं न हि पश्यन्ति पुद्गलाः । पदा वृत्तिशेषेण विलीना चित्तसंश्रया ॥ तदा सूचमा विशुद्धव चिदाभान्यविवेकनः ।। इति । विषाणव-उनममध्यमाधमभेदेन ज्ञानादिमन्तः। पुद्गला:-जीवाः । सूचमा- परा । यदा वृत्तिरिति । सूचमा तु अभिधेयदीजत्वेन सर्वभूतेप्ववस्थिता पश्यन्या अपि कारणभूना चिदा अत्यन्तसंरलेपात् तद्रूपैव मातीत्यर्थः ॥ अभिनयगुप्तपादाचार्यास्तु प्रकाशः विमर्शश्चेति वस्तुद्वयम्। प्रकाश एव शियः विमर्शस्तु तम्य स्वातन्यशक्तिः उमा इति चास्यायते । अथापि प्रकाशस्य विमर्शव्य- तिरेकेण विमर्शस्य प्रकाशध्यनिरेकेणासत्वादेवमेव तद्वयमिति मन्यन्ते । तन्मता- नुमारिणोद्वैनिन इम्युच्यन्ते । विमर्शश्च परा वाग् प्रकाशश्व अर्थ इति । यदाहुः 'शब्दजातमशेषं तु धत्ते शर्वस्य वल्लभा । अर्थजातमशेषं तु धने मुग्धेन्दुशेखर' इति सामरस्यमुपगतमनादिमिथुनं वागर्थयुगलं निरञ्जनं परब्रह्मपदमित्ययविदो परि- भाषा । विमर्श एव च पूर्णाहन्ता यदा च शियः स्वकीयस्वातन्त्र्येण म्वातन्यशक्ति मङ्कोचयति तदा अहमिदं जानामीति भेदमनुभवति इति रवातन्त्र्यशक्तिरहितोऽशो जहवर्गः स्वातन्यशक्तिसहितश्चांशः चेवनवर्गो जायते इति । अयमेव परमेश्वराद- यवाद इत्युच्यते ॥ शङ्कराद्वैतवादिनम्नु यत् प्रकाशः शिव इति विमर्शश्न तत्प्रकाशक इनि परमे. श्वराद्वैतवादिभिरभ्युपेतं तत्र प्रकाशस्यैव स्वप्रकाशत्वमभ्युपेत्य प्रकाशसम्भवे विमर्शी नाङ्गीक्रियते प्रकाश एव ब्रह्म तदेव भनिर्वाच्याविद्यया नानारूपंभासत इति वदन्ति ।

१४४ चाक्यपदीयम् शब्दब्रह्मवादिनस्तु विमर्शः (परा वाग) एवं ब्रह्म तदेव अविद्यया नानारूपं भासते इति प्राहुः। यद्यपि परमार्थन परमेश्वराद्धयवादस्य ब्रह्माद्वयवादस्य शब्दब्रह्मादयवादस्य च नात्यन्तं भेदः यतः परमेश्वराहयवादे प्रकाशविमर्शयोः भेदाप्रतिभासात् प्रकाश एवं विमर्शः ब्रह्मवादे च प्रकाया एवैक तत्वम् शब्दब्रह्मवादे च विमर्श एवेति तथापि तत्वनिरूपणप्रणालीनां भिन्नतया बयाणां भिन्नतैव । अयमत्र निष्कर्षः-विमर्श एव च परा वाक् शब्द ब्रह्म इति च व्यपदिश्यते वैयाकरणैः । वैयाकरणमते शब्दप्रह्मणा नादात्म्यमेव जीवस्य मोक्षः मोऽपि शब्दा. रमनावस्थितिरिति यावत् । सिद्वान्तशैवमते च मोक्षदशायामशुद्धवाग्रूपवन्धन स्यातिक्रमे शुद्धवाग्रूपस्यानुगमेऽपि तस्याः शुद्धतया चित्वेन प्रतिभासात् चिद्रूपेव तदानीं वाग्भवति जीवस्य च न वाक्तादात्म्यमिति' ॥ १३२॥ १ अत्रेद चिन्त्यम्-ब्रह्मवादे शब्दब्रह्मवादे च अनिर्वचनीयया मायया कथं शुद्धब्रह्मणः सङ्कीर्णता यतः मूले एकमेवाद्वैत वैनन्यं शब्दो वा परमार्थ तत्त्वं तनो द्वैतस्य कथं कस्य सन्निधी स्फुरणम् कश्च अविद्याश्रयः कश्च द्रष्टा एव शुद्धब्रह्म विवर्तात्मकस्य अनादिप्रवृत्तव्यवहारस्याविष्ठान. मधिकरणमात्र तत्र कर्तृत्वरूपं सातव्यं कल्पितं न गस्तवं तत्रापि करानाका जीव ईश्वरो वा न ब्रह्म स्वरूपदृष्ट्या तु स्रष्टत्वादयः सर्वेऽपि धर्मास्तत्रैवारोपिता अध्यस्ताश्च इति यद्वदन्ति तत्र ब्रहागो जीवमाव ईश्वरमावो वा कथ मवनि अज्ञानस्य कुतः कथं प्रवृत्तिः स्वप्रकाशं चिरमास्वरं शान सूर्यमकम्मात् अशानान्धकारः कयमावृणोनि अझैव अचानवशं जीवभावमशानाधीश च सतीश्वरमावमामोतीति तेपामुक्तिरपि न चेतश्चमत्करोति यदा अशानस्य प्रथमाविर्मावो बुरी नायानि तदा तदधीन जीवत्वमीश्वरत्वं वा कथमुपपचेत रदं सौ शङ्काजालं 'नोवेशौ च पिशुद्धा चिदविभागसयोईयो । अविद्या सचिनलोगोंगः पढस्माकमनादयः इत्यनादित्वमुक्त्वैव समाधाय सन्तुष्यन्ति । परमेश्वरादयवादेचे नैषां चोघानामवकाशः तथाहि-न्मते अशानं मारा न आत्मनः स्वान-प्रशक्तिमूलकस्यापरीगृहीतौ रूपविशेषो। यथा नटः शाला नानाप्रकारा भूमिका गृह्णानि एवं परमेश्वरोऽपि स्वेच्छामात्रेण नानाप्रकारां भूमिका गृह्णाति यतः स स्वतन्त्रः स्वस्वरूपस्यावरणाय प्रकाशनाय च समर्थः परन्तु सः यदा स्वस्वरूपमावारयति तदापि अना. वृनरूप नस्य रूप च्युत न भवति । अशान तदीयस्वानाध्यशक्तर्विजम्मणमात्रम् । यथा सूर्यः यदा स्वसष्टेन मेघेन स्वपाच्यादयति तदापि सूर्यः आच्छादितोऽपि अनाच्छादितस्वरूप एवावतिष्ठते अन्यथा मेघप्रकाश एव न स्यात एवं विश्ववैचित्र्यमपि स्वस्वरूपविमर्शमूलकम् । तदीश्वरवादि- ब्रह्मरादिनोरय विशेषः यदादिम:-ईश्वरः स्वातन्त्रात्मक तत्ववान् इति । द्वितीयस्तु ब्रह्म शुद्धः साक्षी अधिष्ठानगावम् भात भात्मा विश्वोतीण: सच्चिदानन्दः एका सत्यः निर्मल: निरकार: अनादिरनन्तः शान्तः सुधिस्थितिसंहारकारण भावामावविदीनः स्वप्रसाशः नित्यमुक्तःन तत्र कत्वमस्तीनि मन्यते । आगमसम्मवनादेतमते च विमर्श एवात्मनः स्वमाशान किया च तदर्थमकसदृश तस्य कियद शाने यतो ज्ञातुः मा धमेः तथा तस्य ज्ञानमेव किया तस्य कर्तृस्व. भावत्वात् । शानक्रिययोरौ मुख्यस्यैव इच्छेति नाम अतः स इच्छामयः। अथवा इच्छाधान. क्रियाशक्तियुक्तः । ऐश्वर्य विमर्शः पूर्णाहन्ता इति स्वातन्त्र्यस्यैव नामानराणि । हद च महामहोपाध्याय एम, ए, वाराणमेघराजकीय संस्कृतमहाविद्यालयाध्यक्ष गोपीनाय कविराजलेखस्य कल्याणपत्रीयशिवास्थस्यानुवादमात्रम् ।

संस्कृत-हिन्दी-व्याख्योपेतम् १४५ मनुमति व्याकरणस्मृतेः प्रामाण्ये शब्दमाधुत्वज्ञानपूर्वकधर्माधिामद्वारकः शब्द- ब्रह्मनादाम्पलक्षणो मोप उपपद्येन तदेव कुनः शन्दयाबुत्ववोधकव्याकरणस्मृते: पौरुषेयनया मनः प्रामाण्यायोगादिनिशा वेदमूलमन्चन नत्प्रामाण्यवोधनेनापाक- रिप्यत् पौरुषेयाणां मागमानां वेदमूलकत्वात् प्रामाण्यमाह--- यद्यपि शनसाधुत्वशान से उत्पन्न धर्म दारा शहर में नाबारम्यरूप मोक्ष मिलना २. शमों का माधुत्व व्याकरण शास्त्र बतलाता है, व्याकरण शास्त्र मनुष्य निमिन है वह भ्रमप्रमादि मानव दोषों से दूपित होने के कारण स्वनः प्रमाण माना नहीं जा सकता। तथापि पौरुषेय भागम वेद मुलक होने के कारण प्रमाण माने जाते हैं क्योंकि- न जात्वकर्तृकं कश्चिदागर्म प्रतिपद्यते । बीजं सर्वागमापाये वय्येवातो व्यवस्थिता ॥ १३३ ॥ जातु कदाचिदपि कश्चित् माख्यादिः आगम स्वागम कापिलादिदर्शनम् अकर्तृकम् अपौरुषेयम् न प्रतिपद्यते न स्वीकरोति सर्वागमेषु कर्तृपरिग्रहस्य दृट. स्मरणात् अतः आगमानां पौरुषेयत्वात् सर्वागमापाये सर्वेपामागमानां विनाशे न्यवस्थिता नित्या भयो ऋग्यजुःसामवेदलक्षणा त्रिवेदी पय मगिमानां वीज मूलमित्यर्थः । न हि तदानीमागमान्तराणि मूलं तेषां पिच्छिन्नन्वान् पीरुपेयागामा- गमानां स्वतः प्रमाण्यं स्यामामवि प्रायेग पुंसामनृतवादित्वाद् भ्रमप्रमादादिसम्भवा- चेनि अपौरुषेयाणि येदवास्याम्यंत्र भागमान्तानुमन्धाने बीजवानिष्टन इति भाकः॥ १३३॥ माल्य आदि जितने दर्शन है ये कोई मी किमी भी अवस्था अपौरुषेय नही माने जा सकने । इसलिए अनित्य इन गर्मा का जब विनाश हो जाता है उम अवस्था में व्यवस्थित (नित्य ) और अपौरुषेय नीनों वेद सत्र आगमों के बीज रूप में स्थित रहते हैं। (अर्थात वेद में ही सब आगम उत्पन्न होते है और आगमों के नाश होने पर मो उनका बीच वेद में मुसि रहता है) १३३॥ नम्बागमानां बिच्छदै तन्मूलभूनश्रुतीनामस्मदाद्यप्रत्यक्षनया धर्मानुष्ठान विच्छ- दोऽपि स्यादिस्यत आह- भागयों के विनाश हो जाने पर भी उन आगम मूलभून नियों की भी अनजानी में (अचान में ) मी धर्मानुशान में विश्व नहीं हो सकेंगे। क्योंकि- अस्तं यातेषु यादेषु कर्तृप्यन्येष्वसत्स्वपि । श्रुतिस्मृत्युदितं धर्म न लोको व्यतिवर्तते ॥ १३४ ॥ वादेषु धर्मशास्त्रेषु अस्तं यातेपु विनष्टेषु अन्येषु कर्तृपु धर्मशाम्रप्रणेतृपु यसत्सु अनुत्पन्नेषु अन्तराले लोकः शिष्टो जनः श्रुतस्मृत्युदितं धर्म श्रुतिविहि- तानि कर्माणि स्मृतिविहितान् भक्ष्याभध्यादिनियमांश्च न व्यतिवर्तते नानिम्मनि शाब्दमशाब्दं या स्मरणमडीकस्य धर्मानुष्ठानपरम्परा न कदाचिदपि व्यवचित इति भावः ।। १३४ ॥ १७वा० १४६ वाक्यपदीयम् जब धर्मशास्त्र विनष्ट हो जाते है और दूसरे धर्मशास्त्री जबतक नहीं उत्पन्न हो जाते इस अवधि के बीच में शिष्ट पुरुष श्रुति और स्मृति में वर्णित धर्मों का पालन परम्परा के भाधार पर करने है तथा परम्पराओं का उलहन नहीं करते ।। १४ ॥ मनु कपिलादीनां स्वभाविक्मेव धर्माधर्मादिशानं नागमान्तरमूलं न वा वेदमूल- मिति तदीयागमप्रामाण्यं स्वत एवेति न वेदमूलापेक्षेत्यत आह- जो लोग महर्षि कपिल आदि के शान को धर्मनिर्णय और अधर्मनिर्णय में स्वतः प्रमाण मानते हैं न कि वेदमूलक होने के कारण वे बड़ी भूल करते हैं। क्योंकि- ज्ञाने स्वाभाविके नार्थः शास्त्रैः कश्चन विद्यते । धर्मों ज्ञानस्य हेतुश्चेत्तस्यानायो निवन्धनम् ॥ १३५ ॥ कस्यचित् कपिलादेः स्वाभाविक प्रमाणान्तरानपक्षे शाने धर्माधर्मविषयक इध्यमाणे शास्त्रैः कपिलादिदर्शनैः कश्चन अर्थः किमपि प्रयोजनं न विद्यते कपि- लादिवदन्येषामपि जीवानां स्वत एव धर्माधर्मावबोधसम्भवात् । अथ कपिलादीनां ज्ञानस्य धर्मों हेतुरिति तेषामेव धर्मानुग्रहवशादतीन्द्रियार्थविषयकं ज्ञानं भविष्यति न गृहीतकर्मणां मन्दावयोधानामिति नागमप्रणयनवैयर्थ्यमिति चेत् तस्य अतीतार्थ- विषयकज्ञानहेतोधर्मस्य तदानीम् आम्नायो वेदो निबन्धनं मूलं नागमान्तरं तेषां विच्छिन्नत्वादिति भावः ॥ १५ ॥ प्रमाणान्तर की अपेक्षा के बिना स्वाभाविक किसी भी व्यक्ति के धर्माधर्म विषयक शान में शास्त्रों का कोई प्रयोजन नहीं है क्योंकि सब लोगों के स्वाभाविक शान में कोई विशेष हेतु है तो वह वेद मूलक होने के अतिरिक्त और कुछ नहीं हो सकता ॥ १३५ ॥ ननु सर्वागमानां वेदमूलस्वादेव प्रामाण्ये तर्काख्यं पूर्वोत्तरमीमांसाशास्त्रमनर्थक तन्निर्णतव्यार्थस्य अस्मदाद्युपलभ्यमानवेदादेवावगन्तुं शक्यत्वादत आह- यद्यपि जितने आगम है सब वेद मूलक है और वेद के शान हो जाने पर इन पूर्व- मीमांसा, उत्तरमीमांसा आदि दर्शनों की कोई आवश्यकता नहीं है । क्योंकि इन भागमों में वणित विषय वेद के द्वारा जाने जा सकते है तथाऽपि- वेदशास्त्राविरोधी च तर्कश्चक्षुरपश्यताम् । रूपमात्राद्धि वाक्यार्थः केवलानावतिष्ठते ।। १३६ ॥ अपश्यताम् वेदार्थनिर्णयासमर्थानां मन्दाववोधानां मादशां वेदशास्त्राविरोधी वेदार्थव्यवस्थापकः तर्कः पूर्वोत्तरमीमांसालक्षणः चक्षुः हि यतः केवलात् तर्का- सहकृतात् रूपमात्रात् वेदशब्दस्वरूपमानात् वाच्यार्थः श्रुतितात्पर्य विषयीभूतोऽर्थः नावतिष्ठते न निश्चितो भवतीत्यर्थः । वेदार्थनिर्णयाय तख्यिं मीमांसाशास्त्रमा- वश्यकमत एवाहुः 'यस्तकेंणानुसंधत्ते स धर्मों वेद नेतरः' इति भावः ॥ १३६ ।। जो लोग वेद के अर्थ का निर्णय नहीं कर सकते उनके लिए वेद के भर्थ का व्यवस्थापक मोमामा और वेदान्त रूपी तर्क ही नेत्र है। क्योंकि केवल वेद के शब्दमात्र से वेद का तात्पर्यार्थरूपी वाक्या निश्चित नहीं हो सकना !! १३६ ॥

संस्कृत-हिन्दी-व्याख्योपेतम् ननु को वेदतात्पर्य विषयीभूतोऽर्थः यदर्थ तर्कापेक्षेत्यत आह- वेद के वे तात्पर्यभून अर्थ जिनके लिए कंशास्त्र की अपेक्षा की जाती हैं - सतोऽविवक्षा पारायं व्यक्तिरर्थस्य लैङ्गिकी। इति न्यायो बहुविधस्तकेंण प्रविभज्यते ॥ १३७ ॥ ग्रहं समाटि इत्यादी ग्रहपदोत्तरैकवचनार्थस्यैकत्वस्य सतोऽविवक्षा' ततो बहूनां पात्राणां संमार्गः सिध्यति पारायं परोद्देशप्रवृत्तकृतिच्याप्यावरूपमङ्गत्वर 'वहिदेव मदनं दामि' इत्यादिमन्त्राणां वहिर्लवनागत्वम् अर्थस्य 'अताः शर्करा उपदधाति' इत्यादौ घृतसाधनकाञ्जनरूपस्य लैङ्गिकी अका इति वाश्यसनिधी 'तेजो वै धृतम्' इति पृतस्नुनिरूपलिङ्गजन्या व्यक्तिः प्रतिपत्तिः इति इत्येवं रूपो बहुविधो न्यायः तात्पर्यनिर्णयः तण मीमांसया प्रविभज्यते क्रियते ॥ १३ ॥ वेद के नात्पर्य जानने के लिए अनेक नकों का प्रयोग होता है जैसे-सत् (वर्तमान ) को अविवक्षता, पारायं और अर्थ की लिङ्ग द्वारा प्रतीति इस प्रकार के अनेक न्याय ( तात्पर्य निर्णय) नर्क (मीमांसा ) के द्वारा किये जाते है । सनः विवक्षा-पर सम्माष्टि' इस वाक्य में ग्रहपद के सामने द्विनीया का एक वचन अम् विमक्ति है। एक वचन के कारण एकत्र विमरत्यर्थ है। यदि उक्त वाक्य में यद एकत्व भी वक्ता के लात्पर्य का विषय हो तो एक ग्रह का सम्मान हो सकता है। दूसरे ग्रह (पात्र) पिना मांजे हो रह जायेंगे । अतः एकत्व की अविवक्षा का दी जाती है। जिससे सब पात्र माजे जा सके। पारार्य-पर (स्वर्ग और अग्निहोत्र) के उद्देश्य से प्रवृत्त पुरुष की, कृति का विषय अमिंदोष और दही दोनों है । इसलिए स्वर्ग के प्रति अग्निहोत्र और अग्निहोत्र के प्रति दही अङ्ग है । जैसे 'बदिदेव सदनं दामि' इस मन्त्र में 'दामि' इस पद से छेदन की प्रतीति होने के कारण यह मन्त्र लवन (छेदन ) में अङ्ग हो जाना है। 'भक्त शर्करा उपदयानि इस वाक्य को सुनकर शर्करा को अक्त बनाने के लिए घृत और तेल या डालडा के सदृश हानिकारक पदार्थ उपयोग में लाया जा सकता है किन्तु उसी चाक्य के आगे 'तेनोवै पृतम्' म वाक्य के रहने से प्रकरणवश घी की स्तुति शर्करा को १. महमिति । ग्रह पति पात्रविशेषस्य सश। ग्रहपदोत्तरदिनीयर्थिकत्वस्य विवक्षणे ग्रह- संमृज्यात समृज्यात् स चैक इत्येवं ग्रहोदेश्येन एकत्वसंमार्गोभयविधी वायभेदः स्यादिनि एकतमविवक्षितम् । पशुना यजेतेत्यादौ तृतीयायकत्वस्य विवक्षायामपि यागोदेशेन एक त्वरि- शिष्टपशोविधानेन न वाक्य भेद इति न तत्रैकत्वाविवक्षा। २. परेलि। पर स्वर्गादि भनिदोवादि च तदुदेशेन प्रवृत्तो यः पुरुषः तस्कृतिब्याप्यता अग्निहोत्रादौदध्यादौ च इति स्वर्ग प्रति अग्निहोत्र: अग्निहोत्रं प्रति च दध्यायगम । ३. वहिरिति । दामीस्यस्य लवनप्रकाशकत्वात् अर्थप्रकाशनं लिङ्गमिति रिटेन अस्य मन्त्रस्प स्वेनगना। ४. अक्ताः शर्करा इनि । अक्ता इति पदेन सामान्यतः सर्वाशनद्रव्यप्रसाई धुनद्रव्यमैवाजन- साधनत्वेन गृह्यते तत्सन्निधौ तेजी वैधृनमिति घृतस्तुतिरूपालिगात् ।

१४८ वाक्यपदीयम् घी में ही अक्त करना चाहिए न कि घृतेतर में दप्त अर्थ की प्रतीति होती है। इसी प्रकार से अर्थ की लिङ्ग द्वारा प्रतिपत्ति के लिए अनेक प्रकार का न्याय तर्क ( मीमांसा) के द्वारा करते है ।। १३७॥ अयं पूर्वोक्तस्तकः शब्दमूलक एव इत्याह- यह तर्क भी शब्दमूलक ही है क्योंकि- शब्दानामेव सा शक्तिस्तकों यः पुरुषाश्रयः। शब्दाननुगतो न्यायोऽनागमेष्वनिबन्धनः ॥ १३८ । पुरुषाश्रयः पुरुषनिष्ठः यः वाक्यभेदादिज्ञानलक्षणः तर्कः स शब्दानाव शक्तिः सामर्थ्यम् न हि शब्दशक्तिमनपेक्ष्य पुरुषैः तर्कः क्तुं शक्यते शब्दशक्तेः - एनादृशै अर्थप्रकरणलिङ्गादिभिरनुगमं कुर्वनि पुरषे शब्दाश्रितमेव तर्क पुरुषाश्रितं मन्यन्ते तमागमानुगृहीतं तर्कमधिकृत्यैव 'यस्तकेंणानुसंधत्ते स धर्म वेद नेतर' इति- वचनम् अनागमेषु आगमनिरपेक्षेषु पुरुषेषु वर्तमानो यः शब्दाननुगतः शब्द शक्त्याऽपरिगृहीतो न्यायस्तर्कः स अनिवन्धनः न आगमार्थनिर्णयजनक इत्यर्थः । एतादृशं शुष्कं तर्कमधिकृत्यैव 'हतुकान् वकवृत्तींश्च वाड्यांत्रेणापि नार्चयेत्' इति निषेध इति भावः ॥ १३८ । लोगों को जो 'ग्रहं सम्माष्टिं वाक्य के अर्थ में बाक्य भेद का तर्क होता है वह शन्दों की ही शक्ति है जो भागम को प्रमाण न मानकर केवल शब्द शक्ति से अपरिगृहीत तक है वह तो आगम के अर्थ निर्णय का कारण भी नही बन सकता ॥ १३८ ॥ ननु यथा अर्थबोधकरवं साधुष्विव असाधुपु वर्तते तथा धर्मजनकत्वं साधुविवा. साघुप्वपि स्यादितिशङ्कामपाक्तुं दृष्टान्तमाह- जैसे साधुशन्दों की भाँति असावुशन्दों में अर्थबोधकरव है। वैसे साधुशन्दों की भाँति असाधुशन्दों में धर्मजनकत्व नहीं है क्योंकि- रूपादयो यथा दृष्टाः प्रत्यर्थं यतशक्तयः । शब्दास्तथैव दृश्यन्ते विपापहरणादिषु ॥ १३९ ॥ यथा तुल्येऽपि रूपत्वे नीलं चतुषोऽनुग्राहक भास्वरं तूपघात तुल्येऽपि रसत्वे मधुरः श्लेष्माणं जनयति कटुकःपित्तम् इनि दृष्टफलाः। यथातुल्ये रूपयोगेवायव्योऽजः श्वेतगुण एवालम्यते तुल्येऽपिजलत्व मद्यं पापफलं तीर्थोदकं तु पुण्यफलमिति अदृष्टफला रूपादयः प्रत्यर्थ यतशक्तयो नियतशक्तयो दृष्टाः तथैव तुल्येऽपि शब्दत्वे केचन शब्दाः दृष्टेषु विपापहरणादिषु केचन सुतादयोऽभ्यस्यमाना अदृष्टेषु धर्मादिषु यतशक्तयो दृश्यन्ते ॥ १३९॥ जैसे सब रूपों में रूपत्व एक है किन्तु नील रूप नेत्र को ठण्डा करता है और चमकीला रूप आँखों को चकाचौंध पैदा करना है, सब रसों में रसत्व पक है किन्तु मंधुर कफ पैदा करता है भौर कटु पित्त । इस प्रकार रूपादिकों की शक्तियाँ मिन्न-मिन्न विषयों में ।

ब्रह्मकाण्डम् ] संस्कृत-हिन्दी व्याख्योपेतम् १४६ नियत है। वैसे सब शब्दों में रहने वाला शन्दल एक है। चाहे वह साधु हो या असाधु । फिर भी कुछ शाद साँप का विष दूर करने के लिए नियत देसे जाते हैं। (अर्थात् उन्हीं शब्दों को पढ़ने में विष उतरता है): १३९ ।। दार्शन्तियमाह- यथैपां तत्र सामर्थ्य धर्मेऽप्येवं प्रतीयताम् । साधूनां साधुभिस्तस्माद्वाच्यमभ्युदयार्थिभिः ॥ १४ ॥ यथा येषां केषांचित् शब्दानां तत्र विपापहरणावी सामर्थ्य वर्तते एवं धर्मऽपि साधूनां शब्दानां प्रतीयताम् यत एवं तस्मात् अभ्युदयार्थिभिः अदृष्टार्थिभिः पुरुषः साधुभिर्वाच्यं नामाधुभिरित्यर्थः ॥ १४ ॥ जैसे कुछ शब्दों की शक्ति विष दूर करने में देखी गई है। वैसे साधुत्व के एक होने पर भो वायव्य याग में इवेन अज हो मारा जाता है। सत्र जलों में जलव एक है फिर भी मय पापजनक और तीर्थोदक पुण्यजनक है। इसी प्रकार धर्म के विषय में साधु शब्दों को भी मानना चाहिए क्योंकि केल्याग चाहने वाले साधु का प्रयोग करते हैं असाधु का नहीं ॥१४॥ मनु शब्दविशेषाणां विषापहारकरवं प्रत्यक्षसिद्धं साधूनां तु अदृष्टजनकत्वं न प्रत्यक्षसिद्धं तत्कथं रवीक्रियतामप्त आह- जिन दाब्दों का सामध्ये प्रत्यक्ष उनके बारे में प्रमाणान्तर को आवश्यता नही किन्तु- सर्वोऽदृष्टफलानर्थानागमात्प्रतिपद्यते । विपरीतं च सर्वत्र शक्यते वक्तुमागमे ॥ १४१ ॥ सर्वो जनः अष्टफलानर्थान् यागादीनागमात् यजेत स्वर्गकाम इत्येवंरूपात् प्रतिपद्यते यागः स्वर्गसाधनमिति मनुते एवम् एकः शब्दः सम्यग् ज्ञातः मुटु प्रयुक्तः स्वर्गे लोके च कामधुग्भवनि' इत्येवंरुपात् आगमात् साधूनामपि भदृष्टजनका, मन्यताम् । मन्वदृष्टवाविशेषात् साधूनामधर्मजननसामर्थ्यमेव किं न करप्यते इत्यत आह विपरीतमिति । एवं मति विपरीतम् आगमेन यस्य पुण्यजनकत्तोक्ता तस्य पापजनकरवं यस्य पापजनकतोका तस्य पुण्यजनकत्वमिति सर्वत्र आगमे वक्तुं शस्यते तथापि कंचिदागमं प्रमाणीकृत्यं तदुपोशलकसया कांचिद्युतिमुदाहरन्तो दृश्यन्ते बना इत्यागमात् साधूनां पुण्यजनकत्वममाधूनां च पापजनकत्वमितिमन्न- व्यम नात्र विवदिनव्यं तथा मति सर्वागमोच्छेद एव स्यादिति भावः ॥ ११ ॥ जैसे भो सन्द अदृष्टजनक है उनका प्रामाण्य तो सब लोग 'यजेस स्वर्गकामः' इस प्रकार के भागम को ही मानते हैं। वैसे 'एक शब्दः सम्यग् शानः स्वर्ग लोके च कामधुन भवति' इस प्रकार के आगम से साधु शब्दों को भी अदृष्टजनक मानते हैं। यदि कोई इसके विपरीत करपना करे कि जो पुण्यजनक है वे पापजनक और जो पापजनक वे पुण्यजनक तो सब आगमों के बारे में यह विपरीन कल्पना हो सकती है। अतः लोक व्यवहार को ध्यान में रखकर आगमों को प्रमाण मानना ही पडना है ॥ १४१।।

वाक्यपदीयम् ननु कोऽसावागमः यद्वलेन साधुरवज्ञानं येन च साधूनां पुण्यजनकत्वमित्यत भाह- बह कौन भागम है जो साधुमशान और उमसे पुण्य जनम्त्व ज्ञान करता है- साधुत्वज्ञानविषया सैपा व्याकरणस्मृतिः। अविच्छेदेन शिष्टानामिदं स्मृतिनिबन्धनम् ॥ १४२॥ यथा भक्ष्याभच्यगम्यागम्यविषयाः स्मृतयो व्यवस्थिताः तासु निबद्धमाचार च शिष्टा न व्यनिझामन्ति तथा साधुत्वज्ञानविपया याच्यावाच्यविषया एपा घ्याकरणस्मृतिर्वर्तते पारम्पर्यात् स्मृनो ह्यर्थः पुनः पुनर्निबध्यत इति इदं व्याकरणं शिष्टानामविच्छदेन पारम्पर्येण स्मृतिनिवन्धनम् अनादिरागममूला चेयं स्मृतिः स्मृत्यन्तरवदत्यन्तमादरणीयेति तारपर्यम् ।। १४२ ॥ यह व्याकरण आगम शब्दों का साधुत्व बतलाना है और यह व्याकरण शिष्टों की अनादि परम्परा से चला आ रहा है अनादि है भागम (वेद) मूगक है ॥ १४२ ।। एवं शिष्टानुगृहीतस्मृतिरवेन व्याकरणस्मृतेः प्रामाण्यमुपपाथ तस्याः सर्व- शब्दविपयकत्वमाह- वैखर्या मध्यमायाश्च पश्यन्त्याश्चैतदद्भुतम् । अनेकतीर्थभेदायास्त्रय्या वाचः परं पदम् ॥ १४३ ॥ भनेकतीर्यन अनेकस्थानेन प्राणबुद्धिहृदयाख्यन भेदो यस्यास्तस्या अनेक- तीर्थभेदायाः वैखर्याः मध्यमायाः पश्यन्त्याश्च त्रय्या याच एतदद्भुतं व्याकरणं परं पदम् परमं स्थानं व्याकरणेन त्रयी वाक् विज्ञातुं शक्येति भावः ।। और यही व्याकरण स्मृति-शिष्टों से आदत होने से प्रमाणभूत है और समस्त शन्दों का शान इसी से होता है। क्योंकि प्राण, बुद्धि और हृदयरूपी अनेक स्थानों में परी, मध्यमा और पश्यन्ती नाम से प्रसिद्ध तीन वाणियों का यही व्याकरण स्मृति हो उत्कृष्ट स्थान है। तन्न परश्रोत्रविपया लिटव्यक्तवर्णा प्राप्तसाधुभावा भ्रष्टसंस्कारा च वैखरी। अन्तः सन्निवेशिनी परिगृहीतक्रमेव बुद्धिमानोपादाना सूचममागवृत्यनुगमा मध्यमा । क्रमसंहारभावेऽपि व्यक्तप्राणपरिग्रहेति केचित् । प्रतिसंहतक्रमाः सत्यप्यभेदे समावृष्टक्रमशक्तिः पश्यन्ती सा चलाचला प्रति- सम्भसमाधाना च आवृता विशुद्धा च सन्निविष्टज्ञेयाकारा निराकाराच परिच्छिन्नार्थ- प्रत्यवभासा संमृष्टार्थप्रस्यवभासा प्रशान्तसर्वार्थप्रत्ययभासा च । तत्र व्यावहारि- कीए सर्वाय मागतस्यासु गावस्थितः मासाप्रतिभा पुरस्कारहेतुः परन्तु पश्यन्तीरूपमनप्रभंशमसंकीर्ण लोकव्यवहारातीतं तस्या एव बायो ग्याकरणेन साधुरवज्ञानलभ्येन वा शब्दपूर्वेण योगेन भधिगम इति । यदाह- गौरिव प्रहरत्येका रसमुत्तमशालिनी। दिव्यादिम्येन रूपेण भारती गौः शुचिस्मिता ॥

१५१ प्रमाण्डम् ] संस्कृत-हिन्दी-च्याख्योपेतम् एतयोरन्तरं पश्य सूक्ष्मयोः स्पन्दमानयोः। प्राणापानान्तरे नित्यमेका सर्वस्य निति । अन्या स्वप्रेर्यमाणेव विना प्राणेन वर्तते । जायते हि ततः प्राणो याचमाप्यामयन् पुनः प्राणेनाप्यायिता सेयं व्यवहार नियन्धना । सर्वस्योच्छ्वासमासाद्य न वाम्बदति कर्हि चित् ॥ घोपिणी जातनिर्धापा अघोपा च मवर्तते । तयोरपि च घोपियोनिवि गरीयसी ॥ इति । पुनश्चाह-स्थानेषु विवृते वायो कृतवर्णपरिग्रहा । वैसरी या प्रयोक्तॄणां प्राणवृत्तिनियन्धना ॥ केवलं बुद्धयुपादाना क्रमरूपानुपातिनी। प्राणवृत्तिमतिक्रम्य मध्यमा वाक् प्रवर्तते ॥ अविभागा तु पश्यन्ती सर्वतः संहत क्रमा। स्वरूपज्योतिरेवान्तः सूदमा वागनपायिनी।। सेयमाझीर्यमाणापि नित्यमागन्तुकैमलैः। अन्त्या क्लेव सोमस्य नात्यन्तमभिभूयते ।। तस्यां दृष्टस्वरूपायामधिकारो निवर्तते । पुरुषे पोडशकले तामाहुरमृतां कलाम् ॥ प्राप्तोपारागरूपा सा विरबैरनुपङ्गिमिः। वैखरी समाव गुणैर्न व्यवहार्यते ।। इनि। स्थानेष्यति-ताल्वादिस्थानेषु, यायौ-प्राणमंश, विटो अभिघातार्थ निवे सति कृतवर्णपरिग्रहेति हेतुद्वारा विशेषणं ततः ककारादिवर्णरूपस्वीकारात् वैसरी. संज्ञा वकृभिर्विशिष्टायां सरावस्थायां स्पष्टरूपायां भवा पावरीति निरुतः, केचित्तु विनर इनि देहन्द्रियसबात उच्यते तत्रभवा वैश्वरीनि, वार प्रयोक्तृणां सम्बन्धिनी। यद्वा तेपु स्थानेषु । तस्याश्च माणवृत्तिरेव नियन्धनम् । नत्रैव निबद्धा मा तन्म. यस्वात् । या पुनरन्तः महरप्यमाना क्रमवती प्रोत्रपाद्यवर्णरूपाभिव्यनिरहिता वाफमा मध्यमेत्युग्यते । तदुनं केवलं बुद्धद्यपादानेति । अस्यार्थः स्थूलो प्रागति तुम्वेन वैपरीबदनपेक्ष्य केवलं बुद्धिरवोपादानं हेतुर्यस्याः सा माणस्थत्वात् क्रम- रूपमनुपतनि अम्याश्च मनो भूमावबस्थानम् । वैगरीपश्यन्यामध्ये मावामध्यमा चागिति । या नु प्रायदक्रमादिरदिना स्वप्रकाशा मंविद्रुपा वा मा परयन्ती- युध्यते तदुमम् अविभागा खिनि । अस्यार्थः पश्यन्ती सम्यां वाच्यावाचकयोक्ति मागेनावभासो नास्ति सर्वतश सजानीयविजातीयापेक्षायां मंहतो वाग्यानां वाक्यपदीयम् चाचकानां च क्रमो देशकालकृतो यत्र क्रमविवर्तशक्तिरतु वियते । वरूपज्योतिः न्यप्रकाशा वेद्यवेदकभेवानिक्रमात् सूक्ष्मा दुर्लच्या अनपायिनी कालभेदस्पर्शाभावात् । इदमत्रावधेयम् पश्यन्ती मध्यमा वैखरी चेति त्रिविधैव वाक् । त्रिविधापि सा स्थूला सूचमा परा चेति भेदत्रयेण भिद्यते इति वाचो नवभेदाः सम्पद्यन्ने । वर्णादीनां प्रविभागरहिता स्वरप्रधाना सङ्गीतरूपा वाक् स्थूला पश्यन्ती, जिगामा- रूपा सैव सूपमा पश्यन्ती, जिज्ञामाहीना संविद्रुपा परा पश्यन्ती । एवं चमावनः मृदङ्गादौ करघातादिना समुद्भता ध्वनिरूपा वाक् स्थूला मध्यमा, विवादयिपारूपा सैव सूक्ष्मा मध्यमा, तादृशेच्छारहिता निरूपाधिका सैव परा मध्यमा। एवं परस्परवैलक्षण्यापादनेन स्फुरीकृता वर्णरूपा वाक् स्थूला वैखरी, विवक्षारूपा सैव सूचमा, विवक्षारहिता परसंविठ्ठपा सा परा इति । पश्यन्त्वेव सूचमत्वेन परा वाक्, पश्यन्तीमतिकान्ता तद्भिन्नरूपा वा सा इति विचारस्तु व्यर्थ एव सगुणनिगुर्णादि: भेदेन परापरभेदेन वा द्विविधतया वर्णितस्यापि ब्रह्मणे यथा एकत्वं न विरुद्धम्, तथा एकैव प्रत्यवमर्शिनी वाक् गुणभूमिमतीत्य कदाचित्पश्यन्तीति कदाचिञ्च परेति मंज्ञयोपवर्ण्यते । प्राचीनेवैयाकरणैः पश्यन्त्येव परा इति स्वीकृतमासीत् । अत एक्-'इत्याहुस्ते परं ब्रह्म यदनादि तथाक्षयम् । तदक्षरं शब्दरूपं सा पश्यन्ती परा हि वाक् ॥” इति शिवदृष्टी वैयाकरणमतानुवादावसरे पश्यन्त्येव परात्वेनोपर्णिता । वाचां त्रित्वे एव मध्यमा वागिति व्यपदेश इत्युपपद्यते । इदमत्र तत्त्वम्-यथा एकस्मादेव विन्दोः रेखात्रयभावेन परिणामे रेखात्रय- मूलभूता विन्दवः एकत्रस्थिताः एवमेकैव वाक परसूचमस्थूलपश्यन्ती परसूक्ष्मस्थूल- मध्यमा परसूक्ष्मस्थूलवैखरीरूपेण विवर्तते इति अवस्थाभेदेन नवधा वाक् सम्पद्यते तदा सर्वावस्थाकारणं परा वाक् दशमीत्याख्यायते । पूर्वोक्ता नव कारणभूताश्च निस्रो वाचः सम्भूय द्वादश भवन्ति ता इमा द्वादशरश्मय इत्याख्यायन्ने तदाचाय रविरित्याख्यायते । यदाहुः सर्वभूतान्तरचरः शब्दब्रह्मात्मको रविः । भिरवा यं चोधखड्गेन निर्गच्छन्त्यविशङ्किताः । इनि 'सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुपश्च' इति श्रुतेः । आस्मैव सूर्यः सूर्य एवचारमा वेदितव्यः। आत्मशक्तयः चिन्मरीचय एव सूर्यरश्मयः सूर्यस्यार्थभासकत्वेव शब्दब्रह्मात्मकन्व वेदात्मकत्वं च शास्त्रेषु प्रसिद्धम् । पोडशकले पुरुपे पञ्चदशकलानां परिणामशालित्वेऽपि पोडशीरूपैका चित्क्ला परिणामस्य साक्षि- भूता परमामृतस्वरूपा निष्ठनि । अस्या दृष्टस्वरूपायामधिकारो निवर्तते । इयं देवी वाक योगिभिर्जानिभिश्च द्रष्टत्वेन निर्दिश्यते । अमृतरूपाया अस्या निरोधोऽपि न सम्भवति कुतस्तु विनाशः तथापि वक्तुर्विवज्ञावशान्निरोधे व्यपविश्यमाने महावि- न्द्वात्मकनिष्कलासनमारूढं निष्कलं परमं तावं तत्वोत्तीर्णमपि परतत्त्वरूपेणोपवर्य- मानं नित्यलीलारसोल्लासपरं स्वात्मनि मातास्क्रियते सामरस्यमुपगनमनादिमिथुनं वागर्थयुगलमेव निरञ्जनं परब्रह्मपदमिति ।

। শাহ संस्कृत-हिन्दी व्याख्योपेतम् १५३ सिद्धान्तशैवास्तु परापश्यन्त्यादयश्वतखो वाचः बह्म च ताभ्यो व्यतिरिक्त- मिति । पश्यन्त्यादयस्तिखोऽपि वाचः परावस्थायां परचिदात्मना परब्रह्मणा सङ्गति गतास्तदेकारमतयाऽवतिष्टन्ते । तदानीं तरपतिः (वाचस्पतिः) परमेश्वरः स्वाम- ज्योतिपा स्वाभिन्न भावजातं नित्यं भासयते तगासनादेव तनेच्छायाः समुद्रको भवति यदधीनः विश्वसदिष्पर: इति वदन्ति । नागोजीभट्टास्तु-सिद्धान्तशैवानां मतं, परा वाड्मूलचक्रस्या पश्यन्ती नाभिसंस्थिता । हृदिस्था मध्यमा ज्ञेया वैखरी कण्ठदेशगा इति तन्त्रशास्त्रं चानित्य- मूलाधारपत्रमसंस्कारीभूता भूलाधारस्था शब्दप्रारूपा स्पन्दशून्या विन्दुरूपिणी परा वागुरयते, नाभिपर्यन्तमागच्छता तेन वायुनाभिव्यका मनोगोचरीभूता पश्यन्ती वागुच्यते, ततो हृदयपर्यन्तमागच्छना तेन वायुनाभिव्यक्ता तत्तदर्थवाचकशब्द- स्फोटरूपा श्रोत्रग्रहणायोग्यवन सूक्ष्मा जपादी बुद्धिनिर्माह्या मध्यमा चागुच्यते, तन भास्यपर्यन्तमागन्छता तेन वायुनोर्बमाकामता च मूर्धानमाहत्य व तत्तत्स्था- नेवभिव्यक्ता परश्रोत्रेणापि ग्रहणयोग्या वैखरी बागुच्यते इति वाचश्चर्तुविधाव- माहुः । तत्तु व्याकरणसिद्धान्तानवोधनिबन्धनम् । हर्यादिभिर्वाचत्रित्वस्यैवो- महत्वात् । न च चत्वारि वा परिमिता इति भाग्योदाहृतश्रुतिमूलक भागोजी. भट्टोनम् अत एव माधवे। ऋग्वेदभाष्ये चत्वारि वापरिमितापदानीत्यनेन वैखरीमध्यमापश्यन्तीपरारूपामि दर्शितानि व्याख्यातं चैवमेवोद्योते इति वाच्यम् । कैयटेन उक्तश्रुतेः तन चतुर्णाम् (नामाख्यातोपसर्गनिपातास्यानां) पदजाता. नाककस्य चतुर्थभाग मनुष्या अत्रैयाहरणावदन्तीति व्याख्यातश्वेन माधवादि- थारपालस्य सन्त्रशास्त्रवासनामारकतया वैयाकरणैरगुपदेण्यात् । अतुर राई र वाग्ब्राह्मणः 'पादोऽस्य विश्वाभूतानि त्रिपाइस्यामृतं दिवि' इति श्रुतिमिद्धम् ॥ वाणी के तीन भेद आचार्य भतृहरि ने बागी का सीन ही भेद स्वीकार किया है वैखरी मध्यया और पश्यन्ती। वाणी के तीन होने पर ही दूसरी का नाम मध्यमा पड़ना युक्ति मगन मी है। शिवष्टिकार ने वाणी का तीन भेद ही वैयाकरण सम्गत कहा है। हत्यापुरते पर यदनादि नया कयन् । तरक्षर मरूप सा पश्यन्ती परा हि वाक् ।' इस कारिका से यह भी पता चलता है कि शिवाधिकार अच्छी तरह जानते है कि पश्यन्ती और पररा एक ही वस्तु है। हाँ, वैयाकरणों के यहां तीनों के तीन तीन भेद मान्य है स्थना सूक्ष्मा और परा। चों के विभाग से रहिन स्वरप्रधान सगान का वाणी स्थना पश्यन्ती है । वही जिज्ञासा से युक्त होने पर सूक्ष्मा पश्यन्ती है और वही विशशसा से रहित संविन रूप में परा पश्यन्नो कहाँ जाती है। इसी प्रकार मृदा में हाथ के आधान से उ-पत्र ध्वनिरूपी वाणी स्थूला मध्यमा, बनाने की इच्दारूप से स्थिर वही सूक्ष्मा मध्यमा और विवादविधा से रहित निरूपार्थिक वहीं परा मध्यमा क्हो जाती है इसी कार वित्दाण रूप से प्रतीत होने वाले वर्ण रूप वाणी स्था खरो विवक्षा रूप में वही सूक्ष्मा बेसरी और विवक्षा से रहिन सविन रूप वही वैवरी कही जाती है। जैसे मगुग निर्गुग के भेद से प्रक्ष को पर और अपर ब्रह्म कहा

-
वाक्यपदीयम्
जाता है वैसे पश्यन्नी से विलक्षण परा नाम का भेद स्वीकार करना व्याकरण सिद्धान्त का
मूल रूप से अशान हो है।
अतः नागेश भट्ट ने अपने ग्रयों में जो वाणी के चार भेद बताया है वह अत्यन्न अनुचित
है। वाणी के चार भेद मानने वाले सिद्धान्त शैवों के मन से तो परा वाणी मी ब्रा नहीं
है। फिर उनके सिद्धान्त के आधार पर व्याकरण सिदान्त की व्याख्या करना व्याकरण के
मूल सिद्धान्त पर ही कुठाराशत हुआ है। क्योंकि आचार्य भर्तृहरि ने वाणी के तीन भेद ही
स्वीकार किया है। यद्यपि 'चत्वारिवाक परिमिना पदानि- मन्त्र की व्याख्या करते हुए सायग
और नागेश ने पराश्यन्ती मध्यमा वैसरी आदि भेद से वाशी के चार भेद का प्रतिपादन
किया है नथापि यह व्याख्या तन्त्र शास्त्र की वामना से की गई है। क्योंकि भाचार्य कयट
ने 'चत्वारि पद की व्याख्या में 'नामाख्यात उपसर्ग और निगन' का नाम लिया है तथा
वाणी में चार अंश माने हैं। जो 'पादोऽस्य विश्वाभूतानि त्रिपादस्यामृत विवि' मन्त्र के द्वारा
प्रतिपादित ब्रह्म के चतुरंशत्व की भांति शम्दब्रह्म की चतुरशना सिद्ध करते हैं। कुछ लोगों
वा मत है कि अवैयाकरण चतुर्थ भाग बोलते हैं और वैयाकरण शब्द के समस्त
अशों को जानते हैं ॥ १४३ ॥
शब्दसाधुत्वव्यवस्थाया मार्पज्ञानमूलकत्वमाह-
तद्विविभागाविभागाभ्यां क्रियमाणमयस्थितम् ।
स्वभावश्च भावानां दृश्यन्ते शब्दशक्तयः ॥ १४४ ॥
विभागाविभागाभ्यां विभाग. परप्रत्यायनाय कल्पितः प्रकृतिप्रत्ययादिभेदः
यथा धातबस्तव्यदादयश्च अविभागः यन्न स्वरूपेणोच्चारणं यथा दाधर्ति दधर्ति
इत्यादयः ताभ्यां क्रियमाणम् तद् ~च्याफ्रणम् अवस्थितं व्यवस्थितम् भावानां
पदार्थानां स्वभावहः सर्वज्ञेयेप्वप्रतिबद्धान्तःप्रकाशैर्कापिभिः शब्दशक्तयः शब्द
सामानि इदं धर्मजननयोग्यमिदधर्मजननयोग्यमित्यादिरूपाणि दृश्यन्ते अती.
न्द्रियार्थदर्शिभिः ऋषिभिः शब्दानां मामयं दृष्ट्वा साध्वसाधुप्रविभागः कृती व्यव•
स्थितो दृष्टभ्यो न केनचिदन्यथा क्तुं शक्य इति भाव ॥ १५३ ।।
यह व्याकरण शास्त्र दूसरों की भी ममझ में आ जाय इसलि र विभाग (प्रकृनि प्रत्यय भेद)
और अविमाग ( स्वरूपोच्चारण जैसे क्षेत्रिय, श्रोत्रियः, दार्शन दनि इत्यादि) के द्वारा रचा
गया है और व्यवस्थित है। पदाओं के समाव को ठोक रीनि से समझने वाले महषियों
ने शन्दों की शक्तियों (जैसे यह शब्द धर्मजनन योग्य है यह नहीं है) देखी । ( इसलिए
इन्हें कोई मिटा नदीं सकता है)।१४४ ।।
कालो न लोकशून्यः कालत्वादिदानीतनकालयत् इत्यनुमानेन सृष्टिमलयमन-
गीकुर्वतां मीमांसकानां मतेन श्रुतिस्मृतिपरम्पराऽविच्छेदमाह-
कालः, न लोकशून्यः, कालत्यात, इदानींतनकालबत् इस अनुमान से जो सृषि वा प्रलय
नहीं मानते उन मीमासकों का मन है कि-
अनादिमव्यवच्छिन्नां श्रुतिमाहुरकर्तृकाम् ।
शिप्टैर्निवध्यमाना तु न व्यवच्छिद्यते स्मृतिः ॥ १४५ ॥

संस्कृत-हिन्दी व्याख्योपेतम् १५५ अकर्तृकां कर्तृरहिताम् अत एव अनादिम् अन्न्यवच्छिन्नामनश्वरां श्रुति- माहुः स्मृतिस्तु शिष्टैः निवध्यमाना न व्यवच्छिद्यते । अयं भावः सृष्टिकाले गतकल्पीयां श्रुति स्मृत्वा परमेश्वरः ब्रह्मणे उपदिशति इनि परमेश्वरकृतत्वाभावात् श्रुतिः अनादिनिधना, स्मृतिस्तु प्रतिकालं तैस्तैः शिष्टैरन्यथा अन्यथा निवध्यमाना पुरुषनिर्मितत्वेऽपि प्रवाहनित्यतया नित्येति ॥ १४५॥ जिसका कोई का नहीं है, जो अनादि है, प्रत्येक कल्लों में उमो रूप में जो रहता है, नित्य है वह वेद है। स्मृतिया नो समय समय पर बड़े बड़े महपियों से भिन्न-भिन्न रूप में रची गई है इसलिए उसमें भी व्यवच्छे नहीं है। (अर्थात् प्रवाह नित्यता उनमें भी है ) ॥ १४५ ।। सृष्टिप्रलयवादिनां मतेन चेदप्रामाण्यमाह~- जो लोग सृष्टि का प्रलय मानते हुए वेद को अपौरुषेय मानने है, उनका मत है कि- अविभागाद्विवृत्तानामभिख्या स्वमयच्छ्रुतौ । भावतत्त्वं तु विज्ञाय लिङ्गेभ्यो विहिता स्मृतिः ।। १४६ ।। अविभागात् एकस्मात् शब्दब्रह्मणः विवृत्तानाम् ऋषीणां श्रुतौ स्वमवत् अभिख्या ज्ञानं ब्रह्मैव ऋषिरूपेण विवर्तते तत्र यथा स्वप्ने श्रोत्रनिरपेक्षं ज्ञानं तथा ऋषीणां बुद्धौ वेदज्ञानं न उपदेशापेक्षा ततः भाक्तत्वं वेदार्थसामर्थ्य विज्ञाय लिङ्गेभ्यो वैदिकशब्देभ्यः स्मृतिर्विहिता । एक और अविभक्त या निरव शुन्दन के विर्त (ऋषि रूप में व्यक्त) ऋरियों को स्वम की गाँति वेदशान वय उत्पन्न हो जाता है। उसके बाद वे ऋषि पदार्थों का सागर्य समझकर लिहों (वैदिक शन्दों) से स्मृति की रचना करने है।। १४६ ॥ यथाहु'-अबाह नित्य एवायमागमः (संप्रवर्तते) आर्पज्ञानावबुद्धो वा पूर्व भवति कस्यचित् । ततस्तेनापरेभ्योऽयी शिष्येभ्यः प्रतिपाद्यते ॥ तैरप्यन्येभ्य इन्येवं शिप्याचार्य परम्परा । प्रवृत्ता तावदेवास्ते याबदाभूतसंप्लवम् ॥ पुनः सृष्टौ ततः कश्चिदाबाच दर्शनात् । नित्यं दृष्ट्वागमं साहाच्छिष्येभ्यः प्रतिपादयेत् ॥ असाक्षात्कृतधर्मभ्यस्तेऽपरभ्यो ययाविधि । उपदेशेन संप्रादुर्मन्त्रान् ब्राह्मणमेव च ॥ अशक्तास्तूपदेशेन ग्रहीतुमपरे वेदमभ्यस्तवन्तरते वेदाङ्गानि च यवतः । प्रथमाः प्रतिमानेन द्वितीयास्तूपदेशनः । अभ्यासेन तृतीयास्तु घेदार्थ प्रतिपेदिरे । इति । निरुक्तकारा भपि 'साक्षात्कृतधर्माण ऋषयो वभूवुः तेवोभ्योऽसाशास्कृतधमन्य था ।

वाक्यपदीयम्
उपदेशेन मन्त्रान् संप्रादुः उपदेशाय ग्लायन्तोऽवरे विल्मग्रहणायेम अन्यं ममान्ना-
सिपुर्वेदं च वेदाङ्गानि च' इति ॥ १५॥
श्रुतिस्मृतीनां स्वरूपमुक्त्वा व्याकरणस्मृतेरन्यस्मृतितुल्यतामाह-
अन्य स्मृतियों के समान व्याकरण मी स्मृति है।
कायवाग्युद्धिविपया ये मलाः समवस्थिताः ।
चिकित्सालक्षणाध्यात्मशास्त्रेस्तेपां विशुद्धयः ॥ १४७ ॥
कायवाग्युद्धिविषयाः कायाश्रितोः रोगः वागाश्रितोऽपभ्रंशः बुद्धवाधितो
रागद्वेषादिः एते ये मलाः समवस्थिताः वर्तन्ते तेषां चिकित्सालक्षणाध्यात्म
शास्त्रैः चिकित्साशास्त्रं चरकादिः लक्षणशास्त्रं व्याकरणं अध्यात्मशानं वेदान्तः तैः
विशुद्धयो भवन्ति यथा आयुर्वेदशासं रोगान आध्यात्मशास्त्रं च रागद्वेषादीन्
समूलघातमुपहन्तीति संप्रतिपन्न तथा लक्षणशास्त्रमपि वाचो मलान् अपभ्रंशानुप-
हन्तीति संमतिपत्तव्यमिति भावः ॥ ११७ ।।
(एक प्राणी के ) काय, वाणी और बुद्धि के मल (गेग, अपभ्रश, भौर राग द्वेष आदि)
जो स्थित है । उनकी पिशुनि कम से चिकित्सा, लक्षण, और अध्यात्म शाल (वेदान्न दिया)
के द्वारा ही होती है।
तात्पर्य यह है कि जैसे चिकित्सा से कायमल-(रोग) दूर होता है, अध्यात्म शास्त्र से
बुद्धिमल (राग-द्वेष) दूर होता है। वप्ते वाणी का मल (अपभ्रंश) व्याकरण के द्वारा दूर
किया जाता है। अतःचिकित्साशास्त्र और वेदान्त शास्त्र की भांति व्याकरण शाख मी मनुष्य
के जीवन का उपयोगी शास्त्र है ॥ १४ ॥
कः पुनरपभ्रंशो नामेत्यत आह-
सग्रहकार के मन से अपभ्रश लक्षण-
शब्दः संस्कारहीनो यो गौरिति प्रयुयुक्षिते ।
तमपभ्रंशमिच्छन्ति विशिष्टार्थनियेशिनम् ॥ १४८ ॥
गौरिति प्रयुयुक्षिते गौरिति प्रयोक्तुमिष्टे यः संस्कारहीनः शब्दः गाच्या
दिनिप्पद्यते विशिष्टार्थनिवेशिनम् विशिष्टे सासादिमत्यर्थे निविशमानं तामभ्रंश.
मिच्छन्ति । यथाह संग्रहकार:-'शब्दप्रकृतिरपभ्रंशः' इति ।। १४८॥
गौ शब्द प्रयोग करने की इच्छा होने पर जो व्याकरण संस्कार से हीन शब्द (गोगी,
गावी, अस्व आदि ) उसो सास्ना दाली गौ के लिए अथवा अइव के लिए प्रयुक्त होने लगते हैं
उन्हें अपभ्रंश कहते हैं ॥ १४८ ॥
शब्दानां साधुत्वमर्थविशेषनिवन्धनमित्याह-
शब्दों के साधुत्व और असाधुत्व की व्यवस्था भी अर्ध विशेष में हो है।
अस्वगोण्यादयः शब्दाः साधवो विपयान्तरे ।
निमित्तभेदात् सर्वत्र साधुत्वं च व्यवस्थितम् ॥ १४९ ॥

संस्कृत-हिन्दी व्याख्योपेतम् अस्वगोण्यादयः शब्दाः विषयान्तरे नास्ति स्वं धनं यस्येत्यस्मिन्नर्थे आपने अर्थे च साधवः निमित्तभेदात् प्रवृत्तिनिमित्तभेदात् सर्वत्र अस्वादिशब्दे साधुत्वं व्यवस्थितम् धनाभाव प्रवृत्तिनिमित्तमादाय प्रयुज्यमानः अस्वशब्दःसाधुः अश्वत्वजाति प्रवृत्तिनिमित्तमादायामाधुः आपनवं प्रवृत्तिनिमित्तमादाय गोणीशब्दः साधुः गोरवजाति प्रवृत्तिनिमित्तमादाय चासाधुरिति भावः ॥ १४९ ॥ जसे अम्ब शब्द दरिद्रता का वाचक है अश्व का वाचक नही और गोगी शब्द एक ढंग के बोरा का वाचक है गौ का नहीं, इस प्रकार अश्व और गोणी शन्द किमी भिन्न अर्थ में साधु होने पर भी अश्व और गौ अर्थ में असाधु हैं। क्योंकि साधुत्व सर्वत्र प्रवृतिनिमित्त पर स्थिर है। (अर्शन जिम दाद से जो अर्थ प्रतीत होता है वह शब्द उन उन अधों में साधु है) ॥१४९॥ तार्किकाद्यभिमनं साक्षाद्वाचकत्वलक्षणं साधुत्वं निर्वक्ति- जो तार्किक अमाथु शब्दों को माशात् वाचक मानते हैं उनका मन है कि- ते साधुप्यनुमानेन प्रत्ययोत्पत्तिहेतवः । तादात्म्यमुपगम्येव शब्दार्थस्य प्रकाशकाः ॥ १५० ॥ पूर्व ते अपभ्रंशाः गाव्यादयः साधूनां शब्दानां विषये प्रयुज्यमाना साधुपु अनुमानेन साधुशब्दविपयकस्मृन्या प्रत्ययोत्पत्तिहेतवः अर्थावबोधकारणानि भवन्ति पश्चात्तादात्म्यम् अर्थतादाम्यमुपगम्य इव शब्दार्थस्य प्रकाशका भवन्ति । तत्र गौरिति प्रयोक्तव्ये केनचित् अशक्त्या प्रमादेन वा गावीति प्रयुक्तं ततः श्रोतुः गौरितिप्रयोक्तव्ये गावीत्येनन प्रयुक्तमिति गोपदस्मत्या गोविषयको बोधो जानः ततः पार्श्वस्थेन गावीशब्दादेवास्य वोधो जात इति भ्रान्त्या प्रतिपन्न. मिति तेन गात्रीशब्दस्य गोरूपेऽर्थे तादात्म्याभावेऽपि तदात्म्यमुपगम्य गावी- शब्दादेव माक्षाद्वोधो भवतीति भावः । स्पष्टं चेदं तदशक्तिश्चानुरूपत्वात्' इति सूत्रे शावरभाष्ये ॥ १५॥ जब कोई असाधु शब्द का प्रयोग करता है तब साधु शब्द समझने वाला विद्वान् असाधु शब्द से साधु का अनुमान कर देता है और उमी भनुमान के द्वारा भयं बोध होता है । बाद मैं पार्श्वम्व वालक को नो बीच के अनुमान का पता नहीं चलता, वह गावी शब्द का गोरूप भर्य में तादात्य मान बैठता है और उसे साक्षात गावी शब्दसे ही बोध होने लगता है ॥१५॥ ननु माहादेवापभ्रंशानां कुतो न वाचकत्वमित्यत आह- किन्तु वैयाकरण भसाधु शन्नों को साक्षात वाचक नहीं मानते क्योंकि- न शिष्टैरनुगम्यन्ते पर्याया इव साधवः । ते यतः स्मृतिशास्त्रेण तस्मात्साक्षादवाचकाः॥ १५१॥ यतः शिष्टैः पर्यायाः साधव इव ते असाधवः स्मृतिशास्त्रेण व्याकरण- स्मृतिमूत्रेण न अनुगम्यन्ते तस्मात् साक्षादवाचकाः अमाधव इत्यर्थः । यदि. भमाधवो वाचकाः स्युस्तदा यथा पर्यायाः साधवः करः हंस इत्यादयः अनुगम्यन्ते

वाक्यपदीयम्
तथा तेऽपि अनुगम्येरन् मानुगम्यन्ते अतो न वाचकाः करः हस्त पाणिरित्येवमादिषु
अभियुक्तोपदेशादनादिरमीपामर्थेन सम्बन्धः तस्मात्साहाबोधकत्वं साधुत्वं परम्परया
वोधकत्वमसाधुत्वमिति भावः ॥ १५ ॥
बड़े बूढ़े वैयाकरण जैसे साधु (कर, हस्त और पाणि) शब्दों को पर्याय मानते हैं और
उनका व्याकरण सूत्रों से साधुत्व भी मानते है वैसे असाधु शन्दों का व्याकरण शान द्वारा
साधुत्व और पर्याय नहीं मानते । इमलिए अमाधु शब्द साक्षाद् अवाचक हैं ।। १५१ ॥
माधौ प्रयोक्तव्ये कथममाधूच्चारणं कुतो वा ततो बोध इत्यमुमर्थदृष्टान्तेनोपपादयति-
साधु शब्दों को सिखाते समय असाधु शब्द का उच्चारण तो हो जाता है-
अम्बाम्बेति यथा वाला शिक्षमाणः प्रभापते ।
अव्यक्तं तद्विदां तेन व्यक्त भवति निर्णयः ॥ १५२ ।।
यथा अम्बाम्बेति शिक्षमाणः वालः अव्यक्तं प्रभाषते तद्विदां शव्यक-
प्रकृति व्यक्तं जानतां तेन अव्यक्तेन व्यक्त साधौ निर्णयो साधुविषयकं ज्ञान
भवति इति । अव्यक्तशब्दज्ञानपूर्वकम्यकशब्दज्ञानाद्बोध इत्यर्थः ॥ १५२ ॥
जैसे वाल्के को अम्मा अम्बा सिखाया जा रहा है किन्तु बोलने में असमर्थ बालक अव्यक
(व, 4) बोलने लगता है। किन्तु इसको समझने वाले लोग उस अव्यक्त (व, बं) से
अम्दा अम्बा का ही निर्णय करते हैं । (अर्थात् साधु शब्द का अनुमान कर लेते है ।) ॥१५२।।
दान्तिक्माह-
एवं साधौ प्रयोक्तव्ये योऽपभ्रंशः प्रयुज्यते ।
तेन साधुव्यवहितः कश्चिदर्थोऽभिधीयते ।। १५३ ।।
एवं साधी गौरित्यादी प्रयोक्तव्ये प्रयोक्तुमिष्टे योऽशक्त्या प्रमादाद्वा अप-
भ्रंशः गावीत्यादि प्रयुज्यते तेन अपभ्रंशेन साधुव्यवहितः साधुग्यवधानेन
कश्चिदर्थोऽभिधीयते न साक्षादित्यर्थः ॥ १५३ ॥
इसलिए जो साधु शब्द का प्रयोग करने के स्थान पर अशक्ति मथवा प्रमाद से असाधु
( अपभ्रंश ) शब्द का प्रयोग करता है उसके उस अमाधु शब्द से जो कोई अर्थ प्रतीत होता है
वह साधु शब्द के न्यववान से प्रतीत होता है ( अर्थात साधुशब्दानुमान द्वारा हो
प्रतीत होता है)॥१५३ ।।
नन्वेवं साधुशब्दमजानता स्त्रीशूद्रचाण्डालादीनां बोधो न स्यात्तेपामसाधुशब्द-
श्रवणेन साधुशन्दस्मरणापंभवादत माह-
किन्तु जो साधु शम नहीं जानते उन्हें भसाधु शब्द सुनने से साधु शब्द का स्मरण भी
नहीं होता उनके लिये तो साधु ही अवाचक है। क्योंकि-
पारम्पर्यादपभ्रंशा विगुणेष्वभिधात्पु ।
प्रसिद्धिमागता येपु तेषां साधुरवाचकः ॥ १५४ ॥

याकाण्डम् ] संस्कृत-हिन्दी व्याख्योपेतम् १५६ अभिधातृषु शब्दप्रयोक्नृषु विगुणेषु दन्तादिभगवशेन विकलेपु सत्सु जाय- माना अपभ्रंशा येपु स्त्रीशूदचाण्डालादिषु पारम्पर्यात्प्रसिद्धिमागताः तेषां स्त्री शूद्रादीनां साधुरवाचकः किन्तु अमाधव एव वाचकाः साधवश्न असाधुस्मरणद्वारा बोधका इति मतिर्भवति ॥ १५४ ।। जब शब्दों का उच्चारण करने वाले दाँतों के टूट जाने के कारण शुद्ध शब्द नहीं बोल पाने तब वे ही अपभ्रंश जिन लिगों में परम्परा से प्रसिद्ध हो जाते हैं उनके लिए साधु हो भवाचक है।।१५४॥ स्वमतेनापभ्रंशपदार्थ निर्वस्तुं वस्तुस्थितिमाह- अपने मन से तो अपभ्रश का दूसरा ही लक्षण है। दैवी वाग्व्यवकीर्णेयमशक्तैरभिधातृभिः । अनित्यदर्शिनां त्वस्मिन्वादे बुद्धिविपर्ययः ॥ १५५ ॥ पुराकल्पे यथा मनुष्याणामनुनादिभिरसंकीर्णा वागासीनथा सर्वैरपभ्रंशैरसंकीर्णा पश्चात्तु अनृतादिभिरिवापभ्रंशैरपि संकीर्णा जाता इयंदैवी वागअशक्तैरभिधातृभिः व्ययकोर्णा व्यवच्छिन्ना अपभ्रंशपङ्कमलिनीकृता अस्मिन्वादे साध्वमाधु विभागे अनित्यदर्शिनां शब्दानित्यवादिनां तार्किकाणां साधूनां धर्महेतुत्वमजानतां धुद्धि. विपर्ययः पुरो अपभ्रंशा एवार्थयोधका इति भ्रमः साधुत्वेन. व्यवद्वियमाणा अपि बाह्यमलसंक्रमादपभ्रंशा एव वाचो बाह्यमलसंक्रमश्च भेदरूपावभास एवेत्ति भावः ॥ या दैवी वाक् असमर्थ वक्ताभों के द्वारा भ्रष्ट कर दी गई। इमो लिये इस साधु शब्द और भसाधु शदवाद में शम्द को भनित्य मानने वाले ताकिकों की दुद्धि उलट गई है ये अमाधु शब्द को भी वाचक मानने लगे है॥ १५५।। स्वमते साधूनामिनासाधूनामपि वाचकत्वमाह- उभयेपामविच्छेदादन्यशब्दविवक्षया । योऽन्यः प्रयुज्यते शब्दो न सोऽर्थस्याभिधायकः ॥ १५६ ॥ इति वाक्यपदीये ब्रह्मकाण्डं समाप्तम् । अन्यशब्दविवक्षया योऽन्यः शन्दः प्रयुज्यते सः अस्यार्थस्य अभि- धायको न भवति न हि घट इति प्रयोक्तव्ये पट इति भयुक्त कस्यापि घटरूपार्थ- प्रतिपत्तिर्भवति इति उभयेषां साधूनामसाधूनाम् अविच्छेदादविच्छेन शिष्टः स्मरणात् वाचकत्वं सममिति शेषः । तदुक्तं भाष्ये 'समानायामावगनी शनैश्वाप- १६० वाक्यपदीयम् शब्दैश्च शास्त्रेण धर्मनियमः क्रियते इति तथाच म्बमते पुण्यजनकतावच्छेदकधर्मवत्वं बाह्यमलसंक्रमरहितत्वं वा साधुत्वम्, तदहितत्वं चासाधुत्वमिति भावः ॥ १५६ ।। न्यायव्याकरणमाहित्याचार्य श्रीसूर्यनारायणशुक्ल प्रणीते वाक्यपदीय- भावप्रदीपे ब्रह्मकाण्डं समातम् । वस्तुतः जो किसी शब्द के प्रयोग करने के स्थान पर दूसरे शब्द का प्रयोग करने से उम अर्थ का बोधक नहीं होता है किन्तु साधु शब्द और असाधु शब्द का शिष्टों ने अवाथ प्रयोग किया है अतः दोनों वाचक है ॥ १५६ ॥ इन दोनों मतों में भेद यह है कि साधु शब्द के प्रयोग से धर्म होता है और असाधु शब्दों के प्रयोग से धर्म नहीं होता है। इसलिए साधु शन्दों का ही प्रयोग करना चाहिये । साधुत्व के बारे में कुछ मतभेद है। कुछ लोग साक्षात् बोधक को साधु और परम्परया बोधक को असाधु मानते हैं । वैयाकरण लोग पुण्यजनकत्व को साधुत्व और पुण्य अजनजल को असाधुत्व मानते है। इस प्रकार वैयाकरणों के सिद्धान्त के रूप में शब्द के दो रूप व्यक्त किए गये । एक तो जगव का कारण ध्वनि व्यख्य स्फोट रूप ब्रह्म और दूसरा कार्य रूप में परिणत शब्द इमलिये इस काण्ड का नाम प्रम काण्ड है। द्वितीय काण्ड को वाक्यकाण्ड और तृतीय काण्ड को पद काण्ड कहा गया है। न्यायव्याकरणसाहित्याचार्य श्रीरामगोविन्दशुक्ल द्वारा रचित वाक्यपदीय ब्रह्मकाण्ड की हिन्दी व्यास्या समाप्त ।

का. पृ० ११ २० २५ ५७ ९० ७४ ७ १५९ १२१ ६ ८ 1 १५८ वाक्यपदीय-कारिकाणामनुक्रमणिका पृ० का आदिभूतप्रकाशाना ३७ अग्निशब्दस्तथैवा ६० ७२ | आसन्नं ब्रह्मणस्तस्य अजस्रवृत्तिर्यः शब्दः ११२ इ मणवः सर्वशक्तिस्वात् ११८ इति कर्तव्यता लोके १२१ अत्यन्तमतथाभूते १३० ११० इदमा पदस्थान १६ अतोऽनितिरूप- ७१ इदं पुण्यमिदं पापमि- अन्नातीतविपर्यासः १७ २६ | इन्द्रियस्यैव सस्कारः शब्द. ७८ अतीन्द्रियानसवेद्या. ३८ ५६ इन्द्रियस्यैव सस्कारःसमा. ७९ अथर्वशामहिरसा २१ २९ उ अभायमान्तरो ज्ञाना ११२ उचरन परतग्नावात् ६२ अध्याहित कठो यस्य ३ उभयपामविच्छे अनवस्थितकम्पेऽपि १०६ ११५ अन्तस्करणसावस्य ११४ एकमेव यदानातं २ अनादिनिधनं ब्रह्म २ एकस्य सर्ववीजस्य अनादिमव्यवच्छिन्न १४५ १५४ एवं साधौ प्रयोक्तव्ये १५७ अनेकव्यरयभिव्य ९३ फ शपि प्रयोक्तुरारमान १४० कायवादिविषया १४७ भपोद्धारपदार्या ये २५ कार्यकारणभावेन २५ लम्बाम्बेनि यथा १५२ १५८ कार्यरवे निस्यतार्या वा भरणिस्थं यथा ६३ अर्थप्रवृत्तितावाना अर्थक्रियासु वाक् १३८ | गुणप्रकर्षहेतुर्यः ६४ भर्योपसर्जनीभूतान भि. १९! प्रहणप्रायोः सिक्षा भरपे महति वा शन्दे १०३ ११३ प्राय ग्राहकरवत अवस्थादेशकालान ३२ अविकारस्य शब्दस्य ९४ चापः प्राप्यकारिवे भविभागाद्विवृत्तानां १५५ चैतन्यमिव यशायम- सप्तश्रान्तराले ९९ भरत यातेषु वादेषु ११५ शाने स्वामाविके १३५ भस्व गोण्यादयः शब्दाः १४९ त आ तवार्थवावात् प्रथमा भाण्डभाव मिवापस ६७ तद्वारमपवर्गस्य भारमभेदस्तयो १२ तदिमागाविमागाभ्यां १४४ धारमरूपं यथा ६७ | तस्मादकृतकं शालं ४३ भाधाकरणविन्यासः १३३ | तस्माघः शन्द ७५ ९७ १०९ ५५ १०७ ८० ९१ ४१ ५८ १४६ २४ १५४ ५० १८ वा ८ ५ ११७ २१ १५७ ९२ १०१ १०४ ७४ ८६ ५८ ७२ २० ८७ १०० का० पृ० का. तस्मादभिन्नकालेषु १०१ ११२ | प्रत्यस्तमितभेदाया 14 तस्यार्थवादरूपाणि १४ | प्रत्ययैरनुपाख्येयः ८३ ९५ तस्याभिभेयभावेन ६५ ७५ प्रविभाग यथा कर्ता 1३८ तस्य कारणसामा १०९ ११७ | प्रासंज्ञिनाभिसम्बन्धात् ६६ ७६ तस्य प्राणेच या १७ / प्रप्युपायोऽनुकारश्च तस्य ८ से लिङ्गैश्च स्वशब्देश्व २६ ४३ प्राप्तरूपविभागाया यः १२ ते साधुष्वनुमानेन ५५० भ मागवत्स्वपि प्येव दूरारप्रभेव दीपस्य ११४ | भि दर्शनमाश्रिय देशादिभिश्च ९६ १०८ | भेदाना बहुमार्गस्वं . देवीवाक्यवकोर्णय १५५ ११५/ भेदानुकार ज्ञानस्य द्वाघुपादानशन्देषु ४४ ६० | भेदेनादगृहीतौ द्वौ द्रव्याभिघातारप्रचिती १०५ ११५ ध यःसंयोगविभागाभ्यां १०२ धर्मस्य चाव्यवच्छिन्नाः ३१ ५२ यत्नेनानु मित्तोप्यर्थः २५ पत्र वाचो निमित्तानि न चागमाटते धर्मस्तकण- ३० ५० यथाद्ययख्याग्रहणं नपानिरयेभिव्यक्ति यथानुवाकः श्लोकोवा न जास्वकर्तृक १४५ | यथानुपूर्वीनियमो १०३ न वर्णव्यतिरेकेश ૭૨ ८० यथाप्रयोक्तुः माग ३ ६९ न शिष्टैरनुगम्यते १५१ १५७ / यथार्थजातयः नसोस्ति प्रत्ययो लोके १२३ १३३ | यदेकं प्रक्रियाभेदैः नादेराहिनवीजाया. ९७ / यधैकबुद्धिविषया पर १०२ नादस्य क्रमजन्मस्वात् ६५/ यथैव दर्शनैः नातथिकामिमा यथैपां यत्र सामथ्र्य १४९ २९ नित्याः शब्दार्थसम्बन्धाः २३ ७३ यो य उच्चायते ३४ नित्यरवे कृतकत्वे च २८ ४८ यो यस्य स्वमिव ३९ नितिशक्तव्यस्य ५३ र १३२ प रूपादयो पदभेदेऽपि वर्णाना. ८० ल पदेन वर्णा विद्यन्ते ७१ लब्धक्रियः परेपामसमाख्येयं व पारम्पर्यादपभ्रशा १५४ १५८ | व्यज्यमाने तथा वाक्ये प्रत्यक्षमनुमानं च ५५/ वायोरणूनां ज्ञानस्य प्रतिविम्वं यथान्यत्र ६६ | वापताचेनिष्क्रामेद- प्रकाशकानां भेदाच ९९ वितर्कितः पुरा वुझ्या १०.1 विधातुस्तस्य लोकानां ९ १०७ ८२ ૨૨ ६८ ४८ ४० ६१ ५७ १४८ ८. ३५ १०७ १६ १२४ ४७ प्रत्येक व्यञ्जका १० 1८ ८८ पृ० विभाय स्वात्मनो विरुष्परिणामेषु विपयस्वमनापरी वेदशास्त्राविरोधीच चैकृतं समतिकान्ताः वैचर्या मध्यमायाश्च वृद्धपादयो यथामावा १५० १२. सत्याविशुद्धिस्तत्रोता ९ ११२ | सदृशग्रहणांच ७१ संदिनी व्यक्तिमिच्छन्ति ६१ १४६ स मनोभावमाण्ध ११३ २७] सोंफलाना- १५० सामान्यसाधित सा मर्वविद्याशिल्पानां १२५ साधुत्वज्ञानविषया १४२ १५६ । सैपा संसारिणां संक्षा १२५ | स्फोटश्याभिवकालस्य फररूपाविभागेन १४८ स्वमात्रा परमानावा 18 १२३ । स्मृतयो बहुरूपाश्च ४६ स्वभावभेदविरयस्ये स्वशनी ध्ययमानायां " म्वरूपमिति १२४ ह १४. हस्तस्पादिवान्धेन ७७ ८७ ८१ शब्दः संस्कारहीनो यो १५८ शब्दस्य परिणामोश्यं १२० शब्दस्योवमाभ- दादानामे सा शक्तिः १३८ शादेवाधिता ११८ शिष्टेभ्यः भागमातू प पड्जादिभेदः शब्देन ११९ ९२ ८५ १८ सतोऽविवहा पाराग्य १२ ५९

The Vakyapadiya (brahma Kanda)

Author
Hari, Bhartri
Title
The Vakyapadiya (brahma Kanda)
File name
The Vakyapadiya (brahma Kanda)
Text
OCR done
Citation
1961
Published
2012/04
Publisher
Varanasi, The Chowkhamba Sanskrit Series Office
Language
Sanskrit
Pages
192
Library
Government College, Kota
Classification
Literature
DLI number
407700
Barcode
99999990303619.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
SL6GxshfcEt
Download PDF

The Vakyapadiya (brahma Kanda)