Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
Khara Sona
Front matter
No text on this page.
खरा सोना न्या लेखक- जगदीश भा 'विमल'। सन् १६२१ प्रथमावृत्ति २०००] [मूल्य १) BSITE वतन्त प्रकाशक- महादेवप्रसाद भूझनूवाला, ३१, वडतल्ला स्ट्रीट, कलकत्ता। । मुद्रक- श्रीहपोकेश घोप, रुद्रप्रिण्टि वर्क ७, गौरमोहन मुसजों स्ट्री T ETAPIT
कोलो
।
...
NEETISMETERMINATE
दो शब्द। * आजकल हिन्दीके साहित्य-स्रोतकी गति विलक्षणरूपसे सामयिकताके पथपर अग्रसर हो रही है। पाठक-समुदाय विरह-व्यथाओंकी कथाओंको नफरतकी निगाहसे देख, राजनीति और समाजनीतिके उपन्यास खोजने लग गया है और वह भी मौलिक। ऐसी अवस्थामें प्रकाशकोंको इच्छाका थोडे ही परिश्रमसे पूर्ण होजाना नितान्त असम्भव कार्य है। पयोकि वर्तमान हिन्दी लेखकोंमे अधिकांश अभीतक अनुवादके ही पचडे में पड़े हुए हैं। आजकल मौलिक, फिर सामयिक विपयोंपर लिखी गयो मौलिक पुस्तकें बहुत ही कम देखने में आती हैं। ऐसी अवस्थामें हिन्दीके उदीयमान लेयक विमल- जोने हमें अपनी यह स्वतन्त्र रचना देकर अत्यन्त सन्तोप-प्रदान ‘किया है, क्योकि इसमे हमारी रुचिके अनुसार राजनीति और समाजनीतिका यथेष्ट समावेश है। यही कारण है, जो आज हम अपने प्रेमी पाठकोंको यह भेंट देते हुए प्रसन्नताके मारे फूले न समा रहे हैं । आशा है, पाठकगण इसे पढफर हमारी हो भांति प्रसन्न होंगे और लेखक परिश्रमको सार्थक करेगे। अन्तमें हम मनोरजन-सम्पादक पण्डित ईश्वरीप्रसादजी मार्मा और पण्डित नरोत्तम व्यासको परम धन्यवाद देते हैं, जिन्होंने क्रमश ' इसकी भूमिका लिख और प्रूफ सशोधनकर हमारे इस अनुष्ठानमे हमें पूर्ण सहायता दी। -महादेवप्रसाद भुंझनूवाला। A. -
सरे और खोटेके अपूर्व एवम् निभीक परीक्षक,
परम धार्मिक, समाज-सुधारमें अप्रगण्य,
श्रद्धास्पद श्रीविलासराय जी डालमियां
महोदय
---
के
करकमलों में प्रकाशफकी यह मेट,
प्रेम और श्रद्धाके साथ सादर समर्पित है।
- महादेव प्रसाद।
200000000000000000DON
हमारी प्रकाशित पुस्तकें।
--
१। रालेट-ऐ-मूल्य-२)
इस पुस्तकमें उसी काले कानूनकी कथा है, जो पंजावके
हत्याकांड और असहयोग-आन्दोलनका जनक है। बड़े बडे
राजनीतिक नेताओंके विचार पढने योग्य हैं। सुनहरी जिल्द
बँधी हुई हैं
२। सुवर्ण-प्रतिमा-मूल्य २
यह एक सुप्रसिद्ध शिक्षाप्रद बंगला उपन्यासका हिन्दी
अनुवाद है। सब विद्वानों और पलोंने प्रशंसा की है। घडाही
मनोरञ्जक है।
३। लोकमान्य तिलक-मूल्य १, सजिल्द ,
लोकमान्य तिलकको ऐसी अपूर्व जीवनी अभीतक फही
न निकली। दो सस्करण होचुके हैं। कई चित भी दिये गये हैं।
अन्यान्य पुस्तकोके लिये वडा सूत्रीपत्र मगा देखिये।
1
भारतपुस्तक माण्डार,
३१, बडतडा ष्ट्रीट, फलकत्ता।
-
है
-
का
वि
हारमें हिन्दोभापाको प्रधानता होनेपर भी
लेखकोंका दुर्मिक्षसा है। जो लिखते भी
हैं, उन्हें 'विहारी लेखक' कहकर अन्य
प्रान्तोंके निवासी हिन्दीभापी कुछ उपेक्षाको दृष्टिसे देखते
हैं। साथ ही विहारमें प्रन्य प्रकाशकोंका बडा भारी अभाव
होनेके कारण बिहारो लेखकोंको बाहरी प्रकाशकोंका ही
मुँह जोहना पड़ता है, इस लिये भी हमारे यहाँ लेखक वढने
नही पाते। इन सब कारणोंके होते हुए भी जो लोग पुस्तके
लिखते जाते और विहारकी ओरसे मातृमन्दिरमे पुष्पाञ्जलि
चढाते जाते हैं, उनके सत्साहसकी हम प्रशसा करते हैं।
ऐसेही लोगों में असरगक्ष जिला मुंगेरके 'प. जगदीश मा
"विमल' भी हैं आप हिन्दीके होनहार लेसक हैं और इधर
फई वर्षों से धडल्ले के साथ पद्य और पुस्तके लिखते जाते हैं
यदि यही क्रम आपने कुछ दिनोंतक जारी रसा, तो हमें पूरी
आशा है, कि आप हिन्दीके लेपक समुदायमें एक अच्छा स्थान
प्रहण कर लेगे।
'सरा सोना' आपकी हालकी रचना है। हमें इसकी
-
।
, [ २ ] कापी देखनेको मिली थी। उसे पढ़कर हमने जहाँतक देसा, उससे हमें यह पुस्तक अच्छी, शिक्षाप्रद और सामयिक मालूम पडी। यद्यपि उपन्यासोंके गुण दोपका विवेचन करनेवाले पाठकों और समालोचकोंको इसमें एक उत्तम उपन्यास-लेखकके अनुरूप चरित्र-चित्रण और मानव-हृदयके अन्तर्गत भावोंके विल "ण विश्लेषणको कुछ कसर दिखाई देगी, पर इसमें सन्देह नही, कि लेखकके भाव शुद्ध और उद्देश्य पवित्र हैं। इसकी कहानीपर सामयिकताका रंग चढाकर आपने अपनी देशभक्ति और कालज्ञानका अच्छा परिचय दिया है। देश-सेवा, समाज- सेवा, स्वावलम्बन, परार्थ-साधनके भाव इसके विविध पात्रों द्वारा भली भांति झलकाये गये हैं। इसीसे यह पुस्तक बड़े-छोटे सवको नि सङ्कोच पढनेके लिये दी जा सकती है। लिसनेका ढग अच्छा और भाषा सुन्दर है। प्रकाशकने इसे छापकर हिन्दीमें एक अच्छी पुस्तककी सस्या बढ़ायो, यह देख, हम सुसी हुए हैं। आशा है, कि अनतिदूर-भविष्यत्में हमारे प्रिय 'विमल जा' हिन्दीमें अनेक उत्तमोत्तम मौलिक उपन्यासोकी रचना कर झालेगे। - । A 4 कलकत्ता, ..} ईश्वरीप्रसाद शर्मा मार्गशीर्ष शुक्ला २२० १६७८ । ।
.
--
"
ABASABASAGARD6*
090sa
खरा सोना।
kesseBest
SHerSUREUsease
-
पहला परिच्छ
.
--
--
रका समय! या। सुरसरिको सुभग धारा
भो, स्वच्छन्दतापूर्वक कलकल करती हुई प्रवाहित
हो रही थी। अनेक प्रकारके जल विहङ्गोंके
कलरवमे अपूर्व आनन्दका अनुभव होता था। ' किनारेके सघन
रोपर चिडियोंकी सुन्दर सुरीली ध्वनि पथिकोके चित्तको
उसके खातन्त्यू सुपको आर आकृष्ट करती थी। एसे ही मनो-
मोहक , समयमें पक नरयुवक गडाके किनारे एक पत्थरकी
--
सरा सोना
चट्टानपर बैठा हुआ उन दृश्योंको निनि मेष नयनोंसे देख रहा
या। भगवान् भुवन-भास्करके उदय होनेसे पहले हो समीपवत्ती
नगरोके स्त्रीपुरुष अपने अपने हाथोंमें जलपाल ओर धोतो लिये
मानके लिये आने लगे। सूर्योदय होनेतक उस घाटपर स्नान
करनेवाले स्त्री पुरुपोंकी संख्या हजारोंके लगभग हो गयी। स्त्रो
और पुरुषोंके स्नान करनेके घाट अलग अलग बने हुए थे।
स्त्रियोंके स्नान करनेका घाट पुरुषोंके घाटसे सौ गजकी दूरी-
पर पच्छमकी ओर था। लोग स्नानकर अपने-अपने जलपालों-
को साफकर उसमें पानी भर अपने-अपने घरको लोट रहे थे।
कोई आ ओर कोई जा रहा था। कोई सुरसरिके विमल सलिलमें
भानन्द से तैर रहा था। कोई हाथ पैरोंका मैल साफ करता था
तो कोई "हरगगा"को आवाज लगाता हुआ गोता मारता था ।
कोई आप करता था, तो कोई भगवान् भास्करको जलका अर्घ्य
दे रहा था। चट्टानपर बैठा हुआ युवक इन दृश्योंको देख अपनेको
बिलकुल ही मूल सा गया ओर प्रतिमाको भौति टकटकी
लगाये उसी ओर देखता रह गया ।
धीरेधारे स्नान करने वाले स्त्री पुरुपोंकी भीड छैटो।
सरिताके वक्षस्थलपर अनेक छोटी बडी डोंगियां और
नौकायें अठखेलियां करती हुई इधरसे उधर आती-जाती
दिखाई देने लगी। घाटके स्वामी भी घाटपर बने हुए
अपने छोटे बँगलेके बाहर चौकीपर आ डटे। गगापार
जानेवाले यात्रियोको खेवा देकर टिकट लेनेकी सूचना दी गयी।
न
३
खरा सोना
-
.
यात्रीगण अपने-अपने टिकटके लिये आगे बढे । देखते ही
देखते घाट-स्वामीके निकट भारी भीड़ लग गयी । उचित किराया
देकर सबने अपना अपना टिकट खरोदा। उनको पार उतारने
वालो नौको मो किनारे आ लगो । एक एकर यात्रीगण उसपर
सवार होने लगे।' ज्याही चट्टानपर बैठे हुए युवककी दृष्टि उस
ओर मुडो, त्योहो उसको अपने कार्यका स्मरण हो आया।
युवकने भी शोधतापूर्वक टिकट खरीदा और अपनी छोटीसी
गठरी संभाल, नावपर जा बैठा। धीरे-धीरे यात्रियोंको सख्या
बढ़ती गयी और थोड़ी ही देरमें नाव भर गयो। मल्लाहोंने
नाव सोलनेका यन किया। गड्डामें डाला हुआ नावका लगर
उठाया गया। एक मल्लाहने नावको बाँसके सहारे किनारेसे
हराकर आगे बढाया और दूसरेने पतवारको घुमाकर नावका
मुंह फेरा। साथही दो मल्लाहोंने डाँड खेना आरम्भ कर दिया
एकसाथ ही अनेक यात्रियोंने "जय गङ्गामैयाको" आवाज को ।
देखते ही देखते नाव किनारेसे धाराको काटती हुई आगे बढी ।
किनारपरके घर, द्वार वृक्ष और चट्टाने हटती हुई दिखाई देने
लगी। यात्रियोको शीघतासे कुशल-पूर्वक गङ्गापार हो जानेको
चिन्ता थी , किन्तु उस चट्टानाले युवकके मनमें कुछ और हो
विचार उत्पन्न हो रहा था, जिसे उसकी मुखाकृति ही प्रकेट
किये देती थी। उसके मुग्वको देखनेसे ही मालूम होजाना था,
कि वह किसी गम्भीर विचारमें डूबा हुआ है।
ठोक वीच धारामें आकर नाच रुक गयो। मल्लाहोंने सार
खरा सोना
.
सेना छोड दिया और लगे यात्रियोंसे अपनी "खुरदनी" वसूल
करने । जिन यात्रियोंको यह बात मालूम थी, उन्होंने तो मल्लाहके
हाथ फैलाते ही दे दिया और जिनकी यह पहली यात्रा थी,
उनमेसे भी अनेक लोगोने औरोंको देखा-देखी विना मीन मेख
किये ही अनुचित शुल्क चुका दिया , किन्तु जिन बेचारोके पास
अधिक पैसे नही थे, वे निरुपाय हो मौनी बने बैठे रहे। मल्लाह
उनको झिडकियां सुनाने लगे। बेचारे तो भी चुप रहे। उसी
समय किसीने उस युवकसे भी किराया मांगा। युवकने
कहा, -“अव कैसा किराया ?"
मल्लाह - क्या आपको अभीतक ज्ञात नहीं हुआ, महाराज '
युवक-नही।
मल्लाह-इन यात्रियोसे पूछिये ।
युवक-मैं फिसीसे क्यो पूछने लगा ? मैं तुम्हारे स्वामीको
उचित किराया देकर टिकट ले चुका है।
मलाह-चलिये, आप जैसे कितनोसे वसूल किया गया है।
यदि अपना भला चाहते हैं, तो दे दे , अन्यथा बलपूर्वक वसूल
किया जायेगा।
बलपूर्वक वसूल किये जानेकी बात सुनते ही युवक
गम्मोर गर्जन करता हुआ बोला-"मैं किसी प्रकार दुगना,
ज्योढा किराया नहीं दे सकता। तुमको जो कुछ करना हो,
करो।"
मलाह-महाराज, इसमें आधा हिस्सा हमारे मालिकका
--
11
,
.
खरा सोना । भी होता है। इसलिये आप दे दे, अन्यथा आपके हकमें अच्छा नहीं होगा। युवक-मैं अत्याचारियोसे डरता नहीं। तुमको जो कुछ करना हो करो। युवककी इसप्रकार निभीकतापूर्ण याते सुन उन यात्रियोके हृदयमें भी वलका सञ्चार हुआ, जिनके पास इस अधिक किरायेका पैसा नहीं था और वे भी युवकके साथ देनेको प्रस्तुत हुए, जो इस कुरीतिका मूलोच्छेद करना चाहते थे , किन्तु इने गिने दो-चार यात्री ऐसे भी थे, जो युवकके व्यवहारको, एक दो- पैसेके लिये इस प्रकार बखेडा करना अच्छा नहीं समझते थे युवकको इस प्रकार अडा देख मल्लाहोंने नावको वीच बारामें छोड डॉर्ड खेना बन्द कर दिया। नावको दूसरी ओर वहते देख यात्रियोने मल्लाहोंसे नाव खेनेकी प्रार्थना की। मल्लाहोंने उत्तरमें निवेदनपूर्वक कहा, कि जबतक हमको सबके पैसे नहीं मिले गे, तबतक हम नाव नहीं खे सकते , क्योकि जब मालिक ये पैसे मांगेगे, तर हम उन्हें क्या जवाव देगे यदि आपलोग नहीं देना चाहते, तो नावको वहने दीजिये। मल्लाहोंकी बातें सुन कई व्यक्तियोने उन्हें निर्दापी ठहराकर यवकसे पैसे दे देनेके लिये कहा। इसके उत्तरमें युवकने नम्रता पूर्वक सबसे प्रार्थनाकर कहा-"में दोको जगह चार पैसे देनेको तैयार है, किन्तु इस दूषित प्रथाके अनुसार मै एक छदाम भी नहीं दे सकना और जबतक हमलोग इसको दूर करनेकी चेष्टा न करे गे, ?
खरा सोना
1
तवतक यह दूर नहीं हो सकती। इससे दीन दुःखियोंको बड़ा
फष्ट होता है, और इस प्रकारकी छोटी छोटी कुरीतियोंसेही
लोगोंका मन वढ जाता है, दुर्जनकी प्रवृत्ति धीरे धीरे बढने लगती
है , क्योकि खीरेका चोर ही होरेका चोर हो जाता है। आप
लोग घघराये नहीं , मैं आज ही इनको इसी मध्य धारमें सदाके
लिये प्रवाहित कर दुगा , फिर कभी कोई खुरदनी'का नाम भी
न लेगा।" युवककी इन बातोंको सुनकर यात्रियोके ज्ञाननेत्र
खुल गये। सवने युवकका साथ देना स्वीकार किया और
उसकी निभीकताकी चडी प्रशसा की। मल्लाहोंके हृदयमे
भयका सञ्चार हुआ। “इनको इसी मध्यधारमें सदाके लिये
प्रवाहित कर दूंगा"-युवकको इस नातका मतलब उनलोगोने
यही समझा, कि ये लोग मिल-जुलकर हमें नदोमें डूबो देगे,
कारण सभी यात्री इसी युवकके पक्षमें हो रहे हैं। यह सोच
वे बहुत डर गये और सबके पैसे लौटाकर चुपचाप नाव
खेने लगे। नाव धीरे धोरे गङ्गा पारकर उस किनारे जा लगी।
यातियोके उतरनेके पहले ही नावसे उतरकर एक मल्लाहने
किनारपर राडे हुए अपने स्वामीसे सव बातें कह दी। नावके
मालिक विगडते हुए शीघ्रतापूर्व क उस नावके निकट आकर
यालियोंको रोकने लगे। यानियोने घटवारको वातोंकी और
कुछ व्यान नहीं दिया और सबके सब नावसे नीचे उतर गये।
कुछ यानी तो नावसे उतरते ही अपने-अपने निर्दिष्ट स्थानोकी
ओर चलते बने किन्तु वह युवक कुछ यात्रियोंके साथ घाटसे
७
खरा सोना
कुछ अलग हटकर स्नानादिके प्रवन्धमें लगा। घाटके स्वामीको
लव वाते विदित हो गयी थीं अनण्व उसने उस समय उस
विषयको लेकर उस युवकसे किसीप्रकार छेड छाड न करनेही
अपना कल्याण समझा। युवक स्नानके अनन्तर कुछ भोजनकरके
न मालूम किस और चला गया ।धीरे-धीरे उस दिनको घटनाका
समाचार इधर-उधर फैल गया। यात्रीगण उसी दिनसे खेवाके
अतिरिक्त गुरदनी प्रभृतिके नामसे एक-द्रो पैसा देनेमें भी
चीचपड करने लगे, कोई-कोई उदार कहलानेवाले महापुरुष
कुछ दे भी दिया करते थे, किन्तु उसी दिनसे मल्लाह लोग
भी सावधान हो गये। विना तग किये जो कुछ मिल
जाता, वे उसीपर मन्तोष करलेते , क्योकि घाटके स्वामीने उन्हें
ऐसा करनेको मना कर दिया था। उसको भय था कि अब
समय बदलता जा रहा है, ऐसे नाजुक समयमें कडाईसे काम
होनेका नहीं।
अव रामराज्यका समय आनेको है-प्रेमके
अतिरिक्त दनाव प्रभृतिसे इम नवीन युगमें कार्य नहीं हो सकता।
ऐसा मनिचार होनेपर भी उसका चित्त स्वार्थकी ओरसे नहीं
यह पिर भो किमो युकिसे कार्य, माधनेको चिन्ता
करता रहा, पर प्रफटमें उसने किसीर फिसो प्रकारका जोर.
जुरम नहीं किया । उसमें ऐमा परिवर्तन होने देय, यात्री विशेष
प्रसन हो, उस युवकको निमीकतापर उसे धन्यवाद देने थे,
जिसकी कृपासे यालियोका वह फट दूर हुआ। उस पागणहृदय
घटनारका हृदय भी मोमसा पिघला हुआ दिखाई दो लगा।
खरासोना , दुनिया दीवानी है। नहीं तो रुपयेके लोभमें पड़कर आदमी, खून आदमीका क्यो चूसता ? पिताको पुत्र क्यो अलग करता ? एकके दु खपर दूसरा क्यो हंसता, एकका सत्यानाशकर ' दूसरा अपनी उन्नतिका साधन क्या करता ऐसी अवस्थावाला देश और जाति क्यो न रसातलको जायेगे, जिस देशवासियोके घर- घरमें फूटको जबर्दस्त टांग अडी हुई है , वहाके स्वाथि योको अपने अभीएको सिद्धिमें कौनसा अडङ्गा पड सकता है ? जहाँ वाले , अखण्ड मण्डलाकार उन भगवान्की प्राप्तिको ही मोक्षका मार्ग समझते हैं, वहांपर एक धनी मानी घटवारको अपना मतलब पूरा करनेमे कितना विलम्ब लग सकता है। उसने स्थानीय अधिकारियोंकी पत्न-पुष्पसे पूजा अर्चाकर मन- माना वर पालिया और फिर पूर्ववत् टके सीधे करने लगा। 1 - , ३ -
खरा सोना
।
दूसरा परिच्छेद
गा
यत्रीने अपनी भाभी सुरभिको गोदमें उसके
नन्हे पुत्र महादेवको देकर कहा- "भामी।
आज न मालूम महादेव मेरी गादमें क्यो नही
रहना। मैंने कईवार इसको इधर उधर ले जाकर कई चीजे
'दिखायों, फिन्तु वह चुप नही होता।"
सुरमि-आज लल्लाका जो अच्छा नहीं है वह रातमे भी
फईचार रो रो उठा था।
गायत्री-क्या मैयाको ये याते ज्ञात हैं ?
सुरभि-उनको किसने कहा । फिर उन्हे कहकर ही क्या
होता ? ये कुछ करे तर तो?
गायत्री-चे नही करते, तो कौन करता है ।
सुरभि-उनको अवकाश भो हो ?
गायलो-अवकाश नही रहता,नो करते क्या हैं ।
सुरभि-तुम कैसे समझोगी ? जो कमाता है यही समझ
नाहै। अगर ये कुछ नहीं करते, तो यह मनाली पाडको साडी
और दोनों वक्त खानेको कहांसे मिलता है ? चुपचाप सेठानीको
तरह भोजन कर हथेली में मेंहदी लगाये रहती हो, तुम्हें
पया मालम फि चे क्या करते हैं।
खरा सोना 1 भाभीको वात गायतोके हृदयमें जहरोले तीरके समान विध गयो। यह अत्यन्त दुखित हुई , पर कुछ नही बोली, चुपवाप उस जगहसे हट गयो। जबसे गायत्रोको माता मरी तभीसे सुरभि उसको बहुत तग किया करतो थो, किन्तु यह लडकी इतनी सुशोला थी, कि भूल कर भी उसने अपने जेठे भाई और पिता- को कभी अपनो वीतो नहीं सुनायो। उसके अग्रज, सुरभिके खामी, यमुना वावू अपनी अनुजा-सुशीला गायत्री पर सदा वात्सल्यभाव रक्खा करते थे। उनको आपनो धर्मपत्नी सुरभिके उप्र वमाने सदा यही शका बनी रहती थी, कि वह हमारी अनुजा गायत्रीको अवश्य कष्ट पहुँचाया करेगी, इसीलिये वे वरावर गायबोसे पूछताछ करते रहते थे, कि-किसी प्रका ग्का कटतो नहीं होता है । गायत्री उनको सदा यही उत्तर देती कि-मुझे किसी बातका कष्ट नहीं है। आप मेरे लिये कोई चिन्ता न करें। वे गायत्रीके उत्तरले हो. प्रसन्न हो जाते थे। गायत्रीको खाने-पहननेका तो कष्ट था नहीं , हाँ यदि कुछ कष्ट था नो अपनी मामीके तीर जैसे और व्यगभरे वाक्योंका। इसीसे वह सदा चिन्तित रहा करती थी। सुरभिके चार वाणोंले गायत्रीके कोमल-हृदयपर ऐसी चोट पहुँचो थो, कि-चारी सदेव विहल रहती थी। - अन्तमें उससे मुक्तिको कोई युक्ति न देश उसने अपने पतिदेवको पत्र द्वारा सूचना देदी। उसमें सव वाते प्रत्यक्षकरके नहीं लिपी, सिर्फ इतनाही लिय दिया, कि-ठासी चरणोंसे अधिकदिन अलग नहीं रह सकेगी। उसको अपने
११
खरा सोना
पलका उत्तर पानेमें विलम्ब होते देख और भी चिन्ता होने लगी।
एकदिन दिनके बारह बजे गायत्री अपने कमरेमें पलङ्गपर लेटी
चिन्तामें मग्न थी। सुरभि अपने पुत्र महादेवको लिये अपने
कमरेमें नीद ले रही थी। इसी समय एक सप्तदशवपीया नव
युवती गायत्रीके कमरेमें आयो। गायत्री चिन्तामें ऐसी लीन
थी कि उसको किसीके कमरेमें आनेकी रावर न हुई ।
नवयुवतीने अपनी वाल्य-सखी गायत्रीको चिन्तित देख मुसकुराते
हुए धीरेसे कहा -"वहिन गायत्री। इसप्रकार एकाग्रचित्तसे
किसका ध्यान कर रही हो?"
"यहिन गायत्री" यह शब्द सुनते ही गायत्री सम्हल गयी,
' चिन्ताका माव छिपाकर हसती हुई उस नवयुवतीके स्वागतके
लिये शीघु पलगसे उन सडी हुई ओर कुछ आगे बढ उसका हाथ
पकड बोली.-"यहिन प्रमा। तू अपने ही समान सवको सम
अती है जैसे आप रात दिन महावीर पाबूको चिन्तामें व्यस्त
रहती है, वैसा ही सब किसीको समझती है
प्रेमा-मैं रात दिन उनको चिन्ता नहीं करती। यदि इसपर
भी ऐसा ही समझती हो तो समझो। मैं भी स्वीकार करती है।
यदि उन्हींको चिन्ता किया करतो ह तो कुछ बुरा थोडे ही
करती ह, पतिसे बढकर समाग्में दूसरा है कौन १ पर यह तो
कहो किसका ध्यान करती हो? अगर उनका नहीं तो क्या
किसी दूसरेसे प्रेम करतो हो?
h
गायत्री-तुमने तो अच्छा मतला निकाला। और मुझको
-
खरा सोना किसीसे प्रेम नहीं है, जब कमी ध्यान करती है तो उसी दीन दु.ख-भञ्जन करुणामय भगवान्का । क्यों कि जव में उनकी इस विमल सृष्टिकी ओर दृष्टिपात करती हु, तभी इसकी विचिवता- को देख मौन हो जाती है। मुझे इसका भेद कुछ समझमें नहीं आता, कि उन्होंने जीवनमें श्रेष्ठ मनुष्यको ऐसा स्वाथीं क्यों बनाया ? इससे तो अन्यान्य श्रेणीके जीव ही अच्छे समझे और कहे जा सकते हैं। न मालूम मनुष्य इस नश्वर शरीरको पाकर भी इतना अभिमान क्यों करता है। गायनोको वात सुनते ही प्रेमा ताड गयी, कि गायत्रीको सम्भवत सुरभिने कुछ कष्ट पहुँचाया है. इसीसे वह ऐसा कह रहो है । क्यों कि इसके प्रथम भी कईबार उसको ये सब वाते विदित हो चुकी थी। प्रकटमे प्रेमाने कहा-“वहिन ! ईश्वरको सृष्टिका भेद पाना तो हम जैसो अज्ञान स्त्रियोंके लिये विलकुल असम्भर है , क्यों कि बडे बडे तयश पियोंने नो इस भेदको समझा ही नहीं। हाँ, दोचार नर पिशाचोंके व्यवहारसे मनुष्य मानको दोषी ठहराना भूल है।" गायत्रो-मैं मनुष्य मातको स्वार्थी नहीं कहती, लेकिन इसमें भी सन्देह नहीं, कि ससारमे स्वार्थियोंकी सख्या बहुत है। प्रमा-ठीक है। गायत्री इसीसे तो अधिक अनर्थ होता है। प्रेमा-भला यह तो बतायो कि आज तुमको हुआ क्या है ?
खरा सोना
(90
.
गायत्री- आज मुझे हुआ तो कुछ नहीं है , यों ही बैठी चैठो
-कुछ सोच आ गया।
प्रमा--किन्तु मै तो तुमको हो स्वाथीं समझती हू ।
गायत्री-( हंसकर ) सो कैसे ?
प्रेमा-जो सर्वदा तुम्हारे लिये जीता मरता है उसको तुम
नही चाहतीं।
गायत्रो-(खिलखिलाकर हंसती हुई ) ऐसा कोन है
धहिन?
प्रेमा-(एक पत्र निकालकर गायबोके हाथमें देकर )
देखो, कौन है?
गायत्रीने प्रेमाके हाथसे पत लेकर कहा,-"वहिन । यह पत्र
तुझे कहा मिला?"
प्रमा-पहले पत्र सोलकर पढ लो, पीछे सब वाते, बता
दूंगी।
गायत्री-क्या लिखा है--तू ही बता दे ?
प्रेमा- मुझे क्या मालूम, मैं दूसरेका पत्र क्यों पढने लगी?
गायत्री-पहिन • अब तक तू मुझे दूसरोही समझती है ?
मै तो तुझसे किसी प्रकारका भेद भाव नही रखती। इसीलिये
ऐसा कहा । तू भले ही मुझको भिन्न समझे , लेकिन मैं वैसा
नहीं समझती । तेरे नामका पन मुझे मिल जाय, तो मैं पहले ही
पढ लिया करूँ। पोछे तू अप्रसन्न भी क्यों न हो, पर मुझे उसकी
चिन्ता नही।
।
2
+
खरा सोना
।
-
' प्रमा-नही गायत्री। मैं तुम्हें भिन्न नही समझती , लेकिन
पत्र पढने में मुझे सङ्कोच मालूम होता था, इसीलिये ऐसा कहा ।
यदि तुम मेरा पत्र पढ़ लिया करो, तो मुझे 'प्रसन्नता ही होगी
अप्रसन्नता नही । देखो तो वावू साहब क्या लिखते हैं ?
गायत्री प्रेमाके हाथमें पत्र देकर वोली-“तू ही पढकर
सुना दे वहिन
प्रेमाने सरसरी निगाहसे पत्रको देखकर कहा,-"बहिन
मुझे इस पलका पूरा पूरा मतलय नही लगता है, न मालूम तुमने
उनको क्या लिखा था । जब तक वे वाते शात नही हों, तबतक
इसका मतलब नहीं खुलेगा।"
गायत्रो - और तो कुछ लिखा नहीं थी, पर इतना अवश्य
सूचित कर दिया था, कि दासी श्रीचरणोंकी सेवा करना
चाहती है।
प्रमा-क्या तुमने उनको यहां बुलानेकी इच्छासे ऐसा
लिखा था?
गायत्री-"नहीं वहिन, उनको यहाँ बुलाकर 'मैं कहा
रक्खू गो”-कहकर आगे न वोल 'सको , उसका गला भर
आया । उसकी यह अवस्था देख, प्रमोंने कहा, "सची बात
क्या है, जरा समझा कर फहो।'
गायनो-और तो कुछ नही, पर अव मैं इस घरमें अधिक
दिनोंतक नहीं रह सकती। जितना शीघ हो सके, यहासे अलग
होनेमें ही मैं अपना कल्याण समझती ह ।
-
-
खरा सोना प्रेमा-क्या तुम्हारे भैयाने तुम्हे 'कुछ डाट-सुपट तो नही सुनायी है। गायत्री-घरकी बाते कहांतक बताऊँ, वहिन । भैयाका व्यवहार मेरे प्रति वैसाहो होता है, जैसा भाईका वहिनके प्रति होना चाहिये , किन्तु मेरी मातृतुल्या भाभी मुझको दासीसे भी गयो-बोती समझती हैं , प्राय हो जलो कटो कहती रहती हैं। मैं उनकी झिडकिया सुनते सुनते ऊर उठी हू । प्रेमा- -क्या तुम्हारे भैया इन यातोंको नही जानते ? गायत्री-उनसे कहे कौन । यद्यपि वे मुझेसे पूछा करते हैं, कि “तुमको किसी प्रकारका फैट तो नहीं है ?" लेकिन मै उनको उचित वांत कहना भी उचित नही समझती , क्यों कि मेरी पृष्ठपोषक कोई नहीं है। यदि भाभी वातका बतङ्गड फर दे तो मेरे लिये अच्छा नहीं होगा। प्रेमा-बाबूजीसे क्यों नहीं कहती ? गायत्रो-मैं वाचूजीसे फहना भी उचित नहीं समझती। क्यों कि इससे उनको भी इस चौथेपनमें मानसिक मेद होगा। और चे इसके लिये कुछ फर भी नहीं सकते। सिर्फ एक भाई- भाभीके अतिरिक्त मुझे कोई दूसरा भाई और भाभी भी नहीं है, तव में इस बातको अपने ही हृदयमें क्यों नहीं रहने दू. दूसरेसे कहकर उसे भी दुग्नो करना ठाक नहीं समझती। इसीलिये तेरे अतिरिक और फिसोसें मेने अपनी चीती बातें नहीं कहीं और तुमसे भी प्रार्थना करती हू कि तुम भी ।
खरा सोना 'T किसीको ये बाते' कहनेका कष्ट न उठाना-महावीर घावूसे भी न कहना। प्रेमा-नहीं वहिन, मैं किसीसे नहीं कहगी लेकिन इससे मुक्ति पानेको कोई युक्ति है ? गायत्री-यही, कि जितनी जल्दी हो सके, यह घर छोड दू. क्यो कि एक दिन तो मुझे यह घर छोडना ही पड़ेगा। प्रेमा-तेरा कहना विल्कुल ठीक है। पयों कि इसको प्रकट करनेमे लाभके स्थानमें हानि ही दिखाई देती है। ग्रामीण पड़ौ सो अपवाद किया करेंगे और आपसमें द्वप भी बढता-जायगा। गायत्री-मनुष्यको विचारना चाहिये, कि मैं बहुत कम समयके लिये इस ससारमें आया है। एक दिन यहासे अवश्य जाना ही पडेगा। न कुछ लेकर आया हूँ और न कुछ - साथ लेकर चलूंगा। तव फिर इन चार दिनके जीवनमें व्यर्थका विवाद क्यो खडा करू ? प्रेमा-यदि सबके चित्तमे इस प्रकारका विचार हो जाय, तब फिर दुनियामें लोगोंकी दुर्गति क्यों हो । जो लोग विद्वान् हैं दूसरेको उपदेश देकर राहपर ले आनेकी चेष्टा करते हैं स्वयं वे लोग भी अपने उपदेशके अनुसार- कार्य नहीं करते फिर हम अबलाओंका तो कहनाही या सैर हुआ, पर अब तो बताओ, तुमने अपनी इस- सोलह वर्ष की अवस्थामें ही इन बातोंका ज्ञान कैसे प्राप्त किया, गायत्री-यहिन । तूभूलती है, क्या तुझको स्मरण नहीं है, . -- - है? यह तो
परा सोना
कि माताजी हमलोगों को क्या उपदेश देती थीं। उन्हीं के पुण्य -
प्रतापसे मुझे पढ़ना-लिखना भी आया और कुछ कुछ उपदेश भी
प्राप्त हुआ। यदि वे अभीतक जीवित रहनी, 'तो मुझे जीवन
यावा की पूरी पूरी सामग्री मिल जाती।
प्रेमा-हां, बहिन । तुम्हारी माताजीके आशीर्वादसे मैं भी
कुछ कुछ पढने लगी। अगर उस समय कुछ लिखना पढना नहीं
सोखती तो सासारिक वाताके विषयमें न कुछ सुन हो सकती
और न समझ सकती।
गायत्री-यह पत्र कौन लाया है ?
प्रमा-और कोन वे रातको आये हैं।
गायत्री-क्या महावीर वाबू आये हैं ।
प्रेमा-हाँ,
आये हैं।
.
.
गायत्रो-इस रुपाके लिये जरा मेरी ओरसे उनको धन्यवाद
अवश्य देना।
प्रमा-आप ही देना । वे तुमसे मिलना भी चाहते हैं।
गायत्रो-मैं उनसे अवश्य मिलूगी । इस कृपाके लिये अलग
ही बन्यवाद देना, बहिन । मै तो उनसे कबको मिली रहती , पर
न मालूम वे आकर भी बिना मिले ही क्यों चुपक्से भाग जाते
हैं ? क्या जाने तूने क्या कह दिया है, कि वे मुझसे मिलते
भो नहीं। तू डरती है, कि कहीं ये भी न उनके पीछे लग जाय।
प्रेमा-खूब कहनी हो--चलो, आज हो मैं तुमको उनके
साथ मिलाये देती है।
।
खरा सोना
11
तीसरा परिच्छ
READ
नके चार बज चुके थे। प्यारे वाबू, अपने
मित्र उदयभानु प्रसादके साथ, नित्यकी
भाँति, छडी हाथमें ले किलेके मैदानको
ओर, वायुसेवनार्थ जारहे थे , आपसमें इधर-उधरकी अनेक
बाते हो रही थी। युगल मिलोंका निवासस्थान तो एक जगह
नहीं था, पर दोनो बहुत दिनोसे एक ही साथ इलाहावादके
म्योर कौलेजमें शिक्षा पा रहे थे। दोनामें कुछ भेद-भाव नहीं
था। एक दूसरेको अपने सहोदर भ्राताकी भांति प्रेम भावसे
मानते थे,'एकके विना दूसरेको चैन नही पड़ता था। दोनो
हो एम० ए० की प्रथम श्रेणीके छाल थे। पढने लिखने में भी
दोनों एकसे थे , किन्तु दोनोंकी आर्थिक अवस्था एकली नहीं
थी। प्यारे वावू अच्छे लक्ष्मीपात्रके लाल थे और उदयभानु
दरिद्रता देवोके अनन्य प्यारे एक कुलीन भद्रपुरुपके पुत्र थे।
सरस्वती देवीको' कृपासे किसी न किसी प्रकार 'उदयभानुने
मद्रीकतक शिक्षा पायो। आई० ए० में आनेपर। उनको अपने
सहृदर्य मित्र प्यारे वावूकी कृपासे खर्च इत्यादिके लिये कुछ
म झट नहीं उठाना पडा। उनके वृद्ध पिता तथा एकमात्र
अबोध अनुजकी भी उनके मित्र प्रतिमास कुछ न कुछ सहायता
-
२४ खेरा सोना कर दिया करते थे, क्योकि जिस समय उदय पावू बी० ए० को प्रथम श्रेणी में पढ़ते थे, उसो समय उनकी पूज्या माता उनके अतिरिक्त एक पष्ठरपीय पुत्रको छोर्ड इस संसोरसे विदा हो चुकी थीं। उनके पूज्य स्तिाजी अपनी प्रामीण कन्या पाठशालामे सिर्फ दश रुपये मासिक वेतनपर अध्यापकका कार्य करते थे , किन्तु इस विश्नयापी विकराल दुर्मिक्षके दिनोमें दश रुपये महीनेसे दो व्यक्तियोंका भोजनादि किसी प्रकार नहीं चल सकता था।' इसी लिये प्यारे चावू, मित्रके पिता और भ्राताके लिये दश रुपये प्रतिमास अपने पाससे दिया करते थे। उदयभानु बाबू मिके' दिये हुए रुपयेको घडे सीवके साथ ग्रहण करते। कभी कभी तो कह बैठते,-"माई ! अब तुम मेरे लिये इतना कष्ट न उठाओ। अवे मुझे भाशा दो कि किसी प्रकारको छोटी मोटी नोकरी करके पढूं।" किन्तु प्यारे बाबू मित्रके प्रस्तावको स्वीकार नहीं करते , उनका कहना था, कि मुझको तुम अपना ही समझो, पिताजीको कृपासे मुझे धनकी कमी नहीं है। तुमको जव जिन चीजोकी आवश्यकता हो, नि सङ्कोच मगा सकते हो। मित्रके उसे प्रकारके वचनपर उदयभानु यही कहकर चुप हो जाते, कि “मेरे शरीरके रोम रोममें तुम्हारे उपकार मरे हुए'हे!' तुम्हारी ही कृपासें मैं यहाँतक पढ सका। उस दिन किले मदर्शनमें पहुंचकर दोनों मित्र एक वृक्षके नीवे बैठ गये। कोई दश मिनस्तक प्यारे गवू'चुप रहकर बोले- in- 1 - खरा सोना . जानेवाली गाडी साढे आठ बजे खुलती थी। उदय वाबू पाठ वजकर अठारह मिनट पर स्टेशन पहुंचे। वहाँ तक उनके अन्यतम मित्र वायू प्यारेलाल जो भी साप आये। यथासमय गाडी प्लेटफार्म पर आ लगी। यात्री लोग चढने लगे। उदय भानु बाबू भी अपनी छोटी सी गठरी लिये गाडी पर सवार हो गये। फकफक करती गाडी आगे बढी। प्यारे वागू अपने डेरे में लौट आये । उदयभानु मन हो मन सोचते जारहे थे कि किस प्रकार जांच करूंगा। कही वह स्वभावकी अच्छी न निकली, नो प्यारे जीवन भर मुझे झिडकना रहेगा ओर न मालूम उस बेचारी पर क्वा बीतेगी? क्यो कि मेरा मित्र अव्वल दरजेका हठी है। जिस वातके लिये हठ करता है, उसको विना पूरा किये नहीं छोडता । एकवार देस लेनेसे या उससे दोचार वानें करने ही ने किसीके स्वभावका परिचय पाना कठिन है। इत्यादि अनेक प्रकारका तर्क वितर्क करते उदयभानु चले जा रहे थे। प्रत्येक स्टेशन पर यात्रियोंको चढाते उतारते यथासमय गाडी मुगल- सराय स्टेशन पर आ गयी। यहा एक तरहसे गाडी खाली हो गयी, क्यो कि बहुतसे यात्री यहां उतर गये। उदयभानुने भी वह गाडी छोड दी और मुकामा जानेवाली दूसरी गाडीके इन्त जारमें मुसाफिरखानेमें जा ठहरे। यात्रियोंकी इतनी भीड बढ चली, कि मुसाफिरखानेमें पैर रखने की जगह नहीं थी। उदय मानु वावू भो एक कोनेमें बैठ उसी दृश्यका निरीक्षण कर रहे थे। सहसा वहा बडा गोलमाल हुआ । अधिक हल्ला होनेके कारण ये खरा सोना - भी अपनी जगहसे उठे। समय भोरका था, मुसाफिरखानेमें लालटेनसे पूरा प्रकाश हो रहा था। कुछ आगे बढ कर उदय घाबूने जो दृश्य देखा, उससे उनके हृदयमें बडा क्रोध और दुख हुआ। वे देखते क्या हैं, कि एक नवयुवक भद्रपुरुष साधारण पोशाको खडा है और उसकी बांयी ओर एक नवयुवती सुन्दर चेप-भूपासे सजिता होकर सिर झुकाये खड़ी है। उसके आगे दो तीन रेलवे पुलिसवाले पगडो वाधे, हाथमें डण्डा लिये अपनी अभद्रता का परिचय देनेको खडे हैं। साथ ही दो तीन दुवले पतले बङ्गाली बाबू पुलिसके साथ ही उनको तग कर रहे हैं। पुलिसने उस नवयुवकसे उसका परिचय पूछा। युवकने अपना नामधाम सत्र साफ शब्दो में बता दिया और अपनी धर्म पतो कहते हुए उस युवतीके पिताका नाम और निवासस्थान भो बता दिया। यद्यपि युवतीने भी युवकको वातोका अनुमोदन किया, किन्तु वे नर-पिशाच उसपर विश्वास क्यो करने लगे। उनके हृदयमें बुरे भाव लहरा रहे थे। वे लोग अनेक प्रकारले युवकके प्रमाण देनेपर भो नही माने । उनका कहना था कि यह तुम्हारी धर्मपत्ना नहीं है तुम किसी दुसरेको बहू वेटोको उद्धाकर लिये जारहे हो । जिस स्टेशनपर तुम सवार हुए वहाँके स्टेशन मास्टरने तार द्वारा ऐसी सूचना दी है। अस्तु हमलोग तुम्हें छोडेंगे नहीं, दोनोको हिरासतमें रसकर सच्ची बानका पता लगा ये गे । अगर तुम्हारा ही कहना ठोक निकला, तो तुम दोनो छोड दिये जाओगे , अन्यथा अपने कियेका फल भोगोगे। उस नन- । . N बरा सोना २६ युबकने अनेक प्रकारसे समझा बुझाकर उन नतोंसे कहा किन्तु वे काहेको माने १ युवतो वेचारी इस दुघटनासे घडी लजित हुई। सर नोचा किये रेल-यात्राको बुरा वताने लगी। उस समय दर्शकोको मोड लग गयो थी। उनमेंसे कोई उन युवक-युवतीको पति-पती समझ रेलवे पुलिसको बुरा कहते, कोई युवक-युवतीको ऊंच-नीच कहते थे। इसी प्रकार जिसके मनमें जैसा विचार उठता, वह उसीका अनुमोदन करता। एक ओर खड़े-खडे उदयभानु वाबू भी यह दृश्य देख, उन नर- पिशाचोंपर जो बेचारी अवलाका सतीत्व नष्ट करनेको घातमें थे, दात पीस रहे थे। जब कई बार कहनेपर भी युवक और युवती पुलिसके साथ चलनेको राजी नहीं हुए, तब एकने बल- पूर्वक युवकका हाथ पकड उसे आगे बढाया और दूसरा युवतीका हाथ पकडने ही को था, कि दश वीस व्यक्तियों के आगे पोछे उदयभानु वाबू उसके सामने आ सडे हुए और भय दिखाते हुए उसको ऐसा करनेसे रोकने लगे। उनको ऐसा फरते देख युवकने भी अपना हाथ पुलिसके हाथसे छडा लिया और अपनी धर्मपत्नोके निकट आकर बडी उत्तेजनापूर्वक बोला "जरा सत्र कगे, तुमलोगोंको नीचताका पुरस्कार देकर ही मैं यहासे प्रस्थान काँगा। अभीतक मैं अपना पृष्ठपोषक नहीं पाकर चुप था और नम्रतापूर्वक सथी बाते कह रहा था।" उदयमानु बाजूने युएफको सहायताके लिये अनेको यात्रियोको बदाकर लिया। दोनो दलोमें बडा शोरगुल हुआ। यह देस
खरा सोना
है
स्टेशनके बडे कर्मचारी घटनास्थलपर आ पहुँचे। उन्होंने
मामला येडव देख, दोनो दलोको डाट-डपट सुनाकर आगेसे
पोछे हटाया और युवक तथा उनके सहायकोको समझाबुझाकर
उनसे क्षमा मांगी। उदयभानु वावू तो उसे क्षमा नहीं करना
चाहते थे, किन्तु युवकके समझानेपर उन्होंने भी क्षमा कर दिया,
सात बजते ही हाड़ा जानेवालो, गाडी स्टेशनपर आ लगी।
युवक अपनी धर्मपत्नी के साथ गाडीपर सवार होने चला, किन्तु
कुछ आगे बढनेपर युवती रुक गयी और अपने पतिसे उदयमानु
चाबूको बुलानेके लिये बोली। युवकके पुकारनेपर उदयभानु
वावू उनके आगे आये। युवकने उनके आनेपर कहा- मैं नही,
ये आपको बुलाती थी।
उदयभानु बाबूने युवतीसे नम्रतापूर्वक कहा-"क्या आज्ञा
होनी है।"
युवती नतमस्तक किये,बोली-"आज आपने मेरी रक्षा की
है मैं आजसे आपको पिता समझनी है और इसी लिये
नि सङ्कोच एक प्रार्थना करती हूँ। आशा है, कि आप उसे
म्वीकार करेगे। यह यह कि आप मुझे बाकीपुरतक पहुँचा
आनेकी कृपाकरें, अन्यथा न मालूम फिर कहीं मुझपर कोई
विपत्ति आ पडे।"
उदयमानुने, “जो आता" कह उन दोनोको एक डबे में
विठाया और माप भी उसोमें बैठ गये।
मार्गभर युवक और उदयमानु यात्रुमे इन्ही सब विपयोको
खरा सोना
लेकर अनेक प्रकारकी बाते होती रहों। देशको अधोगतिपर
भी अनेक प्रकारके तर्क-वितर्क होते रहे।
+'T
7
कथा परिच्छ
क सजे हुए सुन्दर कमरेके बीच मेजसे
लगी हुई आराम कुसींपर एक युवक 'यड
इण्डिया' नामक समाचार-पत्र पढ रहा
था। मेजपर चुनी हुई स्रो शिक्षा की कई मासिक पत्रिकाएं
और पुस्तकें भी रक्खी हुई थीं। युवकका ध्यान न तो किसी
उत्तम लेखपर था, न सम्पादकीय टिप्पणियोपर। उसको दृष्टि
आवश्यकता वाले कालमोपर अडी हुई थी। इसी समय एक
युवती, एक छोटीसी वालिकाको गोदमें लिये, युवकको कुसीके
पीछे चुपचाप आकर पटी हो गयी। युवक पत्रको देसनेमे ऐसा
लीन हो रहा था, कि उसे किसीके आनेको कुछ सवर ही न
थो। दश मिनट तक चुपचाप पड़ी होकर युरती बोलो,-
"कैसी नौकरी पोजते हैं, महावीर यावू?"
इतना सुनतेही युवक चौंक पडा। मुंह फेरकर देखा, कि
एक देवाड़ना उसके पीछे आकर खडी है। कुछ देर मौन
खरा सोना
-
अब्द
रह कुसीसे उठकर बोला-"मैं आपको पहली इष्टिमें नहीं
पहचान सका, गायत्रीजी। क्षमा करेंगी। वर्षों बाद आपसे
भेट हुई। अर तो आप पहले जैसी नही मालूम होती। कई
प्रकारका परिवर्तन दिखाई देता है।"
गायनी-(हसती हुई ) मुझमें तो किसी प्रकारका परि-
वर्तन नहीं हुआ है। पर हां, आपके नेत्रोंमें अवश्य परिवर्तन
दिखाई देता है , क्योकि यद्यपि इस वार दो वर्षों बाद भेट हुई
है, तथापि पहले तो बरावर भेंट हुआ ही करती थी?
तो आप ऐसे बदल गये, कि हमलोगोको दर्शन देना भी अनुचित
समझते हैं।
महावीर-क्षमा करे , मैं अवश्य दोषी हूँ।
"आप क्षमापात्र नहीं हैं, इसलिये मै कदापि क्षमा न
करूंगी, कहकर गायत्री हँसपडी।
महावीर-खैर, मै क्षमापात्र नहीं हूँ , पर आप तो क्षमा
शीला हैं न? अपनी ही ओर देखकर क्षमा कर दे ।
गायत्री-मैं तो नहों क्षमा करती,,किन्त यदि प्रेमा दीदो
कह दे, तो क्षमा करदूँगी।
प्रेमा भी बाहर खड़ी थी। गायतीके मुखसे इतनी यात
सुनते ही धीरे धीरे वहासे सरक गयो। पुन महावीर वायूने
कहा--"आप यहा कितनी देरसे सडी थी ?"
गायत्री आप खडे क्यो हैं। जाइये, आपका अपराध
क्षमा हुमा,
धैठिये
,
खरा सोना
।
है। लोगोंपर मनमाना रैक्स लगानेहोसे अच्छी तरह पुजवानेका
अवसर मिला करता है।
गायत्री-(मुँह बनाकर) किन्तु मैं इस प्रकार पाकेट
भरनेको अच्छा नही समझती और न इस प्रकारकी आमदनीसे
किसीको उन्नति करते ही देखती है।
महावीर-(हंसते हुए ) आज तो मुझे अच्छी उपदेशिकासे
भेंट हुई।
गायली-तो शिक्षा ग्रहण कीजिये, जनाव !
महावीर-समय आनेपर देखा जायगा। लेकिन कोरी शिक्षा
ही कहाँ तक कारगर होगी।
गायलो-अवश्य कारगर होगी , पर यदि सच्चे हृदयसे
आप स्वीकार करे तातो?
महावीर- अवश्य स्वीकार करूंगा। यह कहकर बोले-
“मैंने आपका एक बडासा ,कार्य कर दिया है। मुझे उसका
पुरस्कार मिलना चाहिये।"
गायत्री-पुरस्कार योग्य कौनसा कार्य आपने किया है,
-
M
जनायी
महावीर-“वही, आपका पल।"
गायत्री-(हंसती हुई ) तव तो आप चिट्ठी-रसा हुए।
जिसने आपको पत्र दिया था, उसीसे पुरस्कार मांग लीजियेगा।
फिर आपने तो मुझे पत्र दिया भी नहीं, बहिन प्रेमा ही पुरस्कार
चुका देगी।
खरा सेना
.
47
गायत्रीका कहना पूरा होनेहोको था, कि किसो कायवश
प्रेमा भी उस कमरेमें आयी। उसको आया देख, पुन गायत्रोने
कहा-"महावोर वावू मुझसे चिट्ठो लानेका पुरस्कार मागते'
है, किन्तु मैं तो किसी दूसरेके हाथ विक चुकी है, यहिन ।
अब मेरे पास रहा हो क्या, जो इनको देकर सन्तुष्टं करूं?
इसलिये तुमसे निवेदन है, कि मेरी ओरसे इनका पुरस्कार चुका
देना, जिससे फिर कमी ये पुरस्कारके लिये न गिडगिडाचे"
गायत्रीकी बाते सुनकर प्रेमा हंस पडों और महावीर वायू
लजित हो गये। महानोर यावू' गायत्रीको वाक्पटुता, की वडी
प्रशसा करते थे और साथ ही उसकी बुद्धि और विचारपर
! अपनेको धिकारते थे। करीब दो घण्टेतक उनलोगोंमें आमोद
प्रमोदको चुटकीलो चुटकिया चलती रही । अन्तमें गायत्रीने इतना
पूछा ही था कि-"उनसे आपको कहा भेंट हुई, जो आप पत्र
लाये ?" उसी समय घरसे ढासी उसको बुलाने आयो ।
दासोको आती देख गायत्रीने वहा विलम्ब करना उचित नहीं
। समझा । उसको भय हुआ कि न मालूम आज भामोसे यया सुनना
पडे गा १ अपने प्रश्नका विना उत्तर पाये ही गायली वहांले चलती
वनी। यहा उसके आनेमें इतना विलम्ब देख सुरभि देवी बड़.
। यडा रही थी। उसी समय उसके पतिदेव, गायत्रोके अग्रेज भी,
किसी कार्यवश घर आये थे। सुरभिको अच्छा अवसर हाथ
लगा। उसने उनको सुना-सुनाकर कहना आरम्म किया- मैं
इस छोकरीसे लाचार है, किसी समय घण्टे दो घण्टे अपने
३
.
-
खरा.सोना । घरमें नही रहतो और जब कभी घरमें रहती भी है । तो घरके कार्यों की देखभाल तो करती नहीं, कोई न कोई पुस्तक लेकर" पढती रहती है। ने मालूम, कैसी पण्डितायन हुई है। उनके भाई राम तो समझते हैं, कि मेरी गायत्री बडी सुशीला है। विना माताकी लडकीको यदि मैं कुछ कहती भो हूँ तो लोग मुझे ही बुरी भली कहते हैं। अच्छे घरकी सयानी लडकीका इस प्रकार टहलना किसको नहीं खटकता होगा ?" गायत्रीके भ्राता उसकी वडवडाहटको स्वाभाविक समझ कुछ नहीं बोले । उसी समय गायत्री अपनी वालसखी प्रेमाके घरसे, जो उसके घरहीके निकट था, चली आयी। उसको आयी देख उसके माईने पूछा, "कहाँ गयी थी, गायत्रो ?" गायत्री, भाईके इस प्रश्नसे बहुत, भयभीत होकर धीरे धोरे सिर झुकाये बोलो,-"प्रेमा दीदीके स्वामी महावीर वाव आये हैं। उन्होने ही बुला भेजा था" । अनुजाके उत्तरसे सुरभिके पतिदेव यमुनाप्रसादजीको किसी प्रकारको अप्रसन्नता नहीं हुई किन्तु सुरभिके क्रोधका, पारा बहुत चढ गया। वह बडो उत्तेजित होकर वोली-"तुम घरमें फब रहती हो? तुम्हे सदाहो तो प्रेमा दीदीके पीछे घूमती देखती हूँ। क्या प्रमा तुम्हारे घर कभी भूलकर भी आती है ? मैं तो तुम्हे कुछ कहती नहीं, लेकिन तुम अब बहुत बढती जारही हो। कभी घर आती हो तो पुस्तक.ले एक किनारे बैठ पढने लग- जाती हो। तुम्हारी जैसी में भी अपने पिताको पुत्रो और -- . जव खरा सोना भाईकी दुलारी वहिन हूँ।" भामो सुरभिको वाताको सुन नत मस्तक किये पैरकी अंगुलीसे पृथ्वीपर चिह्न करती हुई गायत्री आसू बहाने लगी, किन्तु कुछ बोली नहीं। अनुजा गायत्रीको रोते देख यमुनाप्रसादजीको बडी दया आयी। उन्होने प्रबोधयुक्त पातासे उसे चुप किया और अपनी धर्मपत्नी सुरभिको कहा, "तुम इस प्रकार इसको मत डाटा करो। पुस्तक पढना बुरा कार्य नहीं। गायत्री जितनी पुस्तके पढ, पढने दो और यदि हो सके तो उसोके निकट बैठकर तुम भी पढ़ा लिखा करो।" पतिकी बाते सुनते ही सुरभि क्रोधसे नृत्य करने लगी और पोली-"पुस्तक पढनेसे मेरा काय कैसे होगा? क्या मैं भी फिसी दूसरेपर पेट पालती हूँ ? यदि गृहकार्यो को न देखू, तो पाचौ अ गुलियां मुंहमें कैसे जाया करे ? फ्या बाहरसे अर्जनकर ले आनेहोसे पेट पूजा होने लगती है ? या उसको भी बनाना पकाना पड़ता है ?" स्त्रीकी बाते सुतते ही यमुना यावूकी क्रोधाग्नि भडकी और गायत्रीके हृदयमें पुन विपेले वाणके सदृश “क्या मैं भी दूसरेपर पेट पालती हूँ?" ये वाक्य वाण निध गये। वेचारो वहीं खडी आंसू बहाती, रोती रहो । यमुनाप्रसादने सुरमिको दोचार खोटी- खरी याताके साथ कहा--"सावधान, फिर कभी ऐसी यात सुनूंगा, तो जीम पकडकर सींच लूंगा' पतिके मुससे इस प्रकारके अपमानजनक वाक्योंके सुनते हो सुरमि रोने चिल्लाने तथा अपनी माया फैलाने लगी। मुनाप्रसादजीके घरमें कुह--
खरा सोना
३४
घरमें नही रहतो और जब कभी घरमें रहती भी है तो घरके
कार्यों की देखभाल तो करती नहीं, कोई न कोई पुस्तक लेकर"
पढती रहती है। ने मालूम, कैसी पण्डितायन हुई है। उनके
भाई राम तो समझते हैं, कि मेरी गायत्री बड़ी सुशीला है।
विना माताकी लडकीको यदि मैं कुछ कहती भो हूँ तो लोग
मुझे ही चुरी भली कहते हैं। अच्छे घरकी सयानी लडकीका
इस प्रकार टहलना किसको नहीं खटकता होगा ?" गायत्रीके
माता उसकी बडवडाहटको स्वाभाविक समझ कुछ नही बोले।
उसी समय गायत्री अपनी वालसखी प्रेमाके घरसे,,जो उसके
घरहीके निकट था, चली आयी। उसको आयी देख उसके
भाईने पूछा, "कहाँ गयी थी, गायत्रो"
गायत्री, भाईके इस प्रश्नसे बहुत भयभीत होकर धीरे धोरे
सिर झुकाये बोलो,--"प्रेमा दीदीके स्वामी महावीर बाव आये
हैं। उन्होने ही चुला भेजा था" । अनुजाके उत्तरसे सुरभिके
पतिदेव यमुनाप्रसादजीको किसी प्रकारको अप्रसन्नता नहीं हुई
किन्तु सुरभिके क्रोधकाः पारा बहुत चढ गया।
उत्तेजित होकर बोली-“तुम घरमें फब रहती हो? तुम्हे
सदाहो तो प्रमा दीदीके पीछे घूमती देखती है। क्या प्रमा
तुम्हारे घर कभी भूलकर भी आती है ? मैं तो: तुम्हे कुछ
कहती नहीं, लेकिन तुम अब बहुत बढती जारही हो। जव
कमी घर आती हो तो पुस्तक ले एक किनारे बैठ पढने लग.
जाती हो। तुम्हारी जैसी मै भी अपने पिताको पुत्री और
वह बडो
.
खरा सोना
माईको दुलारी वहिन हूँ।" भामी सुरभिकी बाताको सुन नत
मस्तक किये पैरकी अगुलीसे पृथ्वीपर चिह्न करती हुई गायत्री
आसू बहाने लगी, किन्तु कुछ बोली नही। अनुजा गायनीको
रोते देख यमुनाप्रसादजीको बडी दया आयी। उन्होने प्रचोधयुक
पोतोसे उसे चुप किया और अपनी धर्मपत्नी सुरभिको कहा,
"तुम इस प्रकार इसको मत डाटा करो। पुस्तक पढना दुरा
कार्य नहीं। गायत्री जितनी पुस्तकें पढे, पढने दो और यदि
हो सके तो उसोके निकट बैठकर तुम भी पढा लिया करो।"
पतिकी बाते सुनते ही सुरभि क्रोधसे नृत्य करने लगी और
घोली-"पुस्तक पढनेसे मेरा कार्य केसे होगा ?
घया में भी
किसी दूसरेपर पेट पालती है? यदि गृहकार्यों को न देखू,
तो पाचों अ गुलियाँ मुँहमें कैसे जाया करे ? या बाहरसे
अर्जनकर ले आनेहोसे पेट पूजा होने लगती है ?
या उसको
भी यनाना पकाना पडता हे?"
स्त्रीको बाते सुतते ही यमुना वावूकी क्रोधाग्नि भडकी और
गायत्रीके हृदयमें पुन: विपेले वाणके सदृश “क्या में भी दूसरेपर
पेट पालती हूँ?" ये वाक्य घाण विध गये। घेवारी वही गडी
आंसू बहाती, रोती रहो । यमुनाप्रसादने सुरभिको दोचार खोटी-
खरी बातोके साथ कहा--"सावधान, फिर कभी ऐसी धात
सुनूंगा, तो जीम पकडकर खींच लूंगा।" पतिके मुखसे इस
प्रकारफे अपमानजनक वाक्योके सुनते हो सुरमि रोने चिल्लाने
तथा अपनी माया फैलाने लगी। मुनाप्रसादजीके घरमें कुह,
.
खरा सोना
को
रामसा मच उठा, टोले मुहल्लेकी स्त्रियां शोरगुल सुनकर दौड
पडी , पर यमुना यात्रुको आंगनमें खडा देव किसीको अन्दरे
प्रवेश करनेका साहस नहीं हुआ। प्रेमा मी. उस समय वहातक
आई। गायत्रीको खडी खडी रोती देख वह समझ गयी, कि
सुरभिकी कृपाहीसे यह रो रही है। यमुना वायूको देखकर वह
भी भीतर नहीं आयो। यमुना चावूने उसे बाहर पडी देख चुला
कर पूछा-"प्रेमा, इन दिनो तुम और गायती कौनसी पुस्तक
पढती हो।"
यमुना बाबूके प्रश्नके उत्तरमें प्रेमाने निवेदन किया,-"इन
दिनों तो कोई नयी पुस्तक नहीं मिली। भैया । यद्यपि तुम्हारी
दी हुई इन्दुमतीको मैं कईचार पढचुकी तथापि कोई दूसरी
पुस्तक नहीं मिलनेसे जव तब उसीको देखा करती हूँ।',
यमुनाप्रसाद-मैं और भी अच्छी-अच्छी पुस्तके ले आया
है. तुम दोनो बहिने इन पुस्तकोको पढना और होसके तो अपनी
भामीको सुनाना।
• प्रेमाने बडी प्रसन्नतापूर्वक कहा-"अवश्य पढकर उन्हें भी
सुनाऊँगी, किन्तु भामी पढना लिखना देखकर बहुत बिगडती हैं।"
यमुनाप्रसाद-यह सब उसको अविद्याके कारण है। जव
एकवार उसको पढनेकी चाट लग जायेगी तव फिर काम बन
जायगा, वह भी मनुष्य हो जायगो। किन्तु देखना, यदि इस
कार्यमें तुमलोगोको कुछ कठिनता भी. पडतो.घवडाना नहीं।
"उस दिनसे प्रेमाकी इच्छा हुई कि जितना शीघ हो सके
-
.
सरा सोना सुरभिको शिक्षिता करूं पहले पहले तो उसे 'इस कार्य में बड़ी कठिनाई पडी । सुरभिका स्वभाव ऐसा ईर्षा हे पसे भरा हुआ था कि यह गायत्रीको अपने यहां रहने देने में भीतरसे कुढ रही थी। साथही भाईकी कृपा उसपर अधिक देख उसके जलते हुए हृदयमें घृत सा पड़ जाता था। गायत्री, भाभीफे खभावसे बहुत दुःखी थी और उससे मुक्तिका मार्ग भी अन्वेषण कर रही थी। दूसरे ही दिन महावीर वायूँ प्रेमासे विदा हो अपने कार्यपर गये और यहा आते ही आपने पदत्यागका पत्र दे दिया। गायत्री फी याते उनके हृदयमें ऐसी घुसी, कि उन्हें नीच सेवा-वृत्तिसे विल्कुल घृणासी होगयी। सहसा उनमें ऐसा परिवर्तन होते देख उनके साथियोंको बडा आश्चर्य हुआ। लोग कहने लगे, कि क्या कारण है कि इसको नौकरीसे इस प्रकार घृणा हुई १ थोडे ही दिनोंके बाद लोगोंको महाबोर वाबूके फायकर यतालिग गया। नौकरी छोडनेके बाद ही महावीर वाचूने अपनी सुसराल जगतपुरके निकट ही एक छोटासा कारखाना खोला, जिसम मेशीन द्वारा सूत तैयार किया जाता था। इस कार्य में उनको फई धनी मानियोंसे अच्छी सहायता मिली। पहले पहल तो उस कारखानेसे महावीर वाव को कुछ अधिक लाभ नहीं हुआ , किन्तु थोड ही दिनोके याद उसीके द्वारा चे अच्छे लक्ष्मीपात्र हो गये। वृद्ध भारतके नये युगमे लोगोके हृदयमें मनोमोहक विदेशी चीजोकी ओरसे श्रद्धा हट गयो और अपने देशको धनी हुई चीजोहीसे अधिक प्रेम होने लगा। लोगोंको अपनी -
खरा सोना
३८
-
भूलका पता लग गया, कि अपनी भद्दी चीजही अपने कामको
होती है और उसीपर देश और जातिको उन्नति भी अडी है।
अव झोपडीसे बडे बडे महलोंकी स्त्रियांतक चरखेसे सूत
काटनेको तैयार हुई हैं। इस नये युगमें भी महावीर वावृके
कारखानेकी भला उन्नति क्यो नही होती?
महावीर वायू उन्नतावस्थामें पहुँचनेपर चाहते.थे, कि मैं
पुन. एकवार अपनी उपदेशिका गायत्रीदेवीसे मिलूं, पर उनकी
इच्छा पूरी नहीं हो सकी। उसके बाद उनको फिर कभी गायत्री
से भेट नहीं हुई। जिस दिन उन्होने नौकरी छोडी, उसीके
आठवें दिन गायत्री अपने पतिके साथ ससुराल चली गयी और
फिर कभी लौटकर पिताके घर जगतपुर नही आयी। कई वार
यमुना वाव ने उसे लानेका यत्न भी किया, किन्तु सब निफल
हुआ। इससे यमुना वाव के हृदयमें बडी गहरी चोट लगी।
वे समझ गये थे कि सुरभिके अत्याचारहीसे मेरी अनुजा अब
यहां नहीं आती। समय-समयपर वे सुरभिको यह विषय लेकर
स्वरी,सोटी भी सुनाया करते थे। गायत्रीके जानेपर प्रेमाकी
संगतिसे सुरभि भो पढने लिसने लगी। पीछे वही सुरभि,
जो पुस्तकोंसे घृणा करती थी, पुस्तकोंका कीडा हो गयी।
साथ ही साथ उसके स्वभावमें बहुत परिवर्तन हो गया। अब
वहीं सुरभि ननद गायत्रीके लिये दिन रात पश्चात्ताप करती है,
रोती पीटती है, पर अब हो ही ध्या सकता है? समयपर
चूक जानेसे पोछे सभलनेपर भी कुछ लाभ नहीं होता ।
३ खरा सोना (पाँचवा परिच्छ त महीनेके उप कालका समय था। शीतल, मन्द, सुगन्धित वायु चल रही थी! वसन्त- तुके रामराज्यमें लता-वृक्षोंकी शोभा खिले पुष्पोंसे सजकर कुछ और ही बहार दिखा रही थी। अलनेले अलिन्द स्वच्छन्दतापूर्वक इधर-उधर घूमते दिखाई देते थे। सुन्दर मुकुलित रसालके घने वृक्षोंकी डालियोंपर कलकण्ठी कोयलोकी मनोहर कूक पथिकोको सहमा अपनी ओर आकर्पित किये लेती थी। सुगन्धित पुष्पोंके मधु पराग से सनी सौरभित वायु मनुष्योंके मनको अपार आनन्द प्रदान कर रही थी। गानले गौओंको लिये हुए ग्वाला उसी समय जगलकी ओर जा रहा था। ठीक उसी उप कालमें गङ्गाके किनारे बने हुए एक छोटेसे ग्रामसे पांच-र -सात छोटी-बडी लड- कियां हाथमें अपनी अपनी साडी और जलपान लिये गङ्गाकी जोर जा रहा थो। वे सर आपममें एक दूसरोके साथ न मालूम क्या क्या कहती हुई हंसती बोलती चली जाती थीं। नित्यकी भाति अपने निर्दिष्ट स्थानपर पहुँच, अपनी अपनी साडी रस, वे लडकिया जलपान परिष्टनकर घाट किनारे रखे हुए
खरा सोना
शिलाखण्डोंपर बैठ अपने-अपने पैरोंका मैल साफ करने लगीं।
उस समय उनके पृष्ठभागपर काली नागिनसी लटकती हुई लटें
अपूर्वशोभा दिखा रही थी। हाथ-पैरोंका मैल साफकर सबकी
सबने एकसाथ ही स्नान करनेके लिये गडामें प्रवेश किया और
घण्टोंतक डुबकी लगाती और एक दूसरीपर जलका छोटा देती
रही। उधर नीले -आकाशके क्षितिजको लोहित करते हुए
भगवान् भास्कर अपनी झांकी -दिखाने लगे और इधर स्वच्छ
गङ्गाजलको प्रभासित करती हुई उन वालिकाओंके मुसचन्द्र
शोभा दिखाने लगे। उस समयका-चह अनुपम दृश्य देसनेसे मन
स्वर्गीय आनन्दका अनुभव करता था। यह जड लेसनी उसका
वर्णन करने में सर्वथा असमर्थ है।
लडकियां स्नानकर, अपनी-अपनी साडिया पहन, उतारी
हुई साडी घो, जलपान- जलसे पूर्णकर गावकी ओर चलने
लगी। उनके ग्रामके पासही एक शिवालय था, स्नान करनेके
वाद ही वे सब शिवजीको जल चढानेके लिये नित्य जाया करती
थी। जिस समय वे लड़कियाँ पूजा करने जाती, उस समय
मन्दिरका पुजारी भी नहीं रहने पाता था। यही वहाके
मुखियाकी आज्ञा थी। पुजारी उन बालिकाओंके आनेके कुछ
पहले ही पूजा करके-गन्दिरके वाहर आकर टहला करता था।
लडकियोंके पूजा करने बाद और लोग पूजा करने आते थे।
सदाकी भांति उस दिन भी सव लडकियां एक साथही वहा
आ पहुँची। सबके केश-पाश सुले हुए पृष्ठदेश पर लटक रहे
खरा सोना थे। सबके हाथों में जलपान था। उनमें दश वर्षसे ऊंची और सोलह वर्षसे नीची उमरको लडकिया थीं। उनके आनेके पहलेसे मन्दिरके पुजारीजी बाहर टहल रहे थे; किन्तु सदाकी माति आज वे अकेले नहीं थे, उनके साथ एक नवयुवक स्नानकर हाथमें पुस्तक लिये टहल रहा था। वह उस प्रामका नहीं था। आगन्तुक नवयुवकने पुजारीसे पूजाके लिये आज्ञा मागी। उत्तरमें पुजारोने कहा, "लडकियोंके पूजा करके जानेके बाद आप पूजा कर सक्ते हैं। दोनों में इस प्रकार वाते हो ही रही थी, कि लडकियोका समूह मन्दिरके सामने आता दिसाई दिया। उन्हें आते देख, युवकने पुस्तकमेंसे एक चमकता हुआ चित्र निकालकर हाथमें लिया और पुजारीकी आख बचाकर उस चित्रको देश पुन. उन वालिकाओंको देखना आरम्भ किया सहसा पुस्तकको बन्दकर युवक सर नीचा किये न मालूम चया विचारने लगा। कुछ देर इसी अवस्थामें रहकर वह फिर टहलने लगा। जवतक लडकिया पूजा करती रही , तब- तक वह पुजारीके साथ मन्दिरके निकट ही वाहर टहलता रहा । यद्यपि युवक पुजारीसे कुछ बाते भी कर रहा था , किन्तु उसका चित्त लडकियोकी पूजाकी ओर लगा हुआ था और वह ध्यान लगाकर उनको वाते भी सुन रहा था । लडकिया पूजा कर मन्दिरसे बाहर निकलीं। उन लडकियोके मुण्डमें एक पञ्चदश- वर्षीया अपूर्व सुन्दरी थी । उस नवयुवक पथिकने कईवार औरोको आंख बचाकर उसकी ओर देखा। युवक उसको कमनीय
खरा सोना
४२
कान्तिसे विमुग्ध सा प्रतीत होने लगा। उस लडकीकी दृष्टि भी
संयोगवश उस युवकके हाथवाली पुस्तकके चमकते हुए चित्र
पर जा पडी। लडकी उस चिलको देखते ही न मालूम क्यो
आश्चर्यान्विता हो वार वार उस युवककी ओर सतृष्ण दृष्टिसे
देखने लगी। उसकी कई सपियोने उसको ऐसा करते देख
लिया। धीरे धीरे सबकी सव मन्दिरसे बाहर हो धरकी ओर
चली। मार्गमें एक लडकीने उस लडकीसे पूछा,-"क्यो
अनुराधा जीजी ! तुम बारम्बार उस युवक पुजारीकी ओर
घयों देखती थीं"
अनुराधा, (हँसती हुई)-तुम झूठ क्यों बोलती हो आनन्दी ?
आनन्दी -नहीं जीजी। मैं झूठ तो नही कहती, पर
तुम छिपा रही हो।
अनुराधा,--छिपाती कुछ भी नही हैं।
मैं
उस अपरिचित
युवककी ओर नहीं देखतो थी किन्तु मैने एकबार उसके हाथ
को पुस्तकको और अवश्य दृष्टि डालो थीं।
आनन्दी,-उसके हाथकी पुस्तकमें कौनसी विशेषता थी,
जिससे तुमको उसकी ओर कईवार देखना पडा ?
अनुराधा,--पुस्तकमें कोई विशेषता हो या नहीं, पर मैं
चाहती थी-
आनन्दो -क्या चाहती थी।
अनुराधा,-यहो कि, यदि नमयुवकसे मेरी प्यारो आनन्दी
का विवाह हो जाय तो अच्छा हो।
४३
खरा सोना
अनुराधाकी इस वातको सुनकर सब लडकिया हंस पडी।
उनमेंसे एकने कहा,-"तब तो आनन्दीदेवीको पूजाका यथोचित
पुरस्कार ही मिल जाय। क्या आनन्दो। तुम उस नवयुवकको
स्वीकार करोगी रग ढगसे तो वह भद्र पुरुप प्रतीत होता
था और रूप भी अपूर्व ही था। फिर स्वीकार करनेमें विलम्ब
क्यों करती हो?
जरा मुंह खोलकर योल टो, हाँ । देपो तो
कैसा आनन्दोत्सव होता है।" उसकी बातोका कई लडकियोने
समर्थन किया। उनको याते सुन आनन्दी मुसकुराती हुई
बोली,-"यदि तुमलोगोका चित्त उस युवककी सुन्दरतापर
जा अडा है, तो क्यों नही तुम्हीमेंसे कोई उसे अपना पति चुन
लेती हो ? मुझसे व्यर्थ ही ठठोली क्यों करती हो?"
अनुराधा,-क्यों आनन्दी । तुम अप्रसन्न तो नहीं हो गयी ?
आनन्दी,-अप्रसन्न होनेकी क्या आवश्यकता है?
बात
टालनेसे कार्य नहीं चलेगा। मैंने देख लिया था, जीजी। तुम
उस युवकको पुस्तकपरके चित्रको देख रही थी क्यों ठीक है न
अनुराधा, (छिपाती हुई )-तुमको भ्रम हो गया है,
आनन्दो!
आनन्दी, हो सकता है।
अनुराधा-विगडो नही।
आनन्दा-विगडतो नही हैं, पर तुम असल बात कवतक
छिपाओगी
इसीप्रकार बाते करती है, वे सब अपने-अपने घर चलो
?
खरा साना
गयो। अनुराधा अपनी सहेलियोसे विदा होते समय आनन्दीसे
चोली,-"भोजनके बाद मुझसे भाकर मिलना।" घर पहुँच
कर अनुराधा, निश्चिन्त नहीं रह सकी। उसके मनमें कई
प्रकारके तर्क-वितर्क हो रहे थे। उस युवकके हाथवाले चित्रको
देखनेहीसे उसके मनमें अनेक वाते' उठती थीं। उसको इसकी
चिन्ता हो गयी कि वह नवयुवक है कौन ? और उसके हाथमें
मेरा चिन कैसे आया १ कभी अनुराधा अपना वक्स सोलकर
एक पुस्तकमें सम्मिलित दो नवयुवकोंके चित्रोको देखती
और फिर उस मन्दिरवाले नवयुवकको मुखाकृतिको स्मरण
करती। पुस्तकके नीचे लिखे हुए चित्र-परिचयको पढकर
अनुराधाके मनमें कुछ शान्ति हुई। मुखपर प्रसन्नताकी
रेसा देख पड़ी। उसे अपने अनुमानके सत्य होनेको-आशा देख
पडी। वह इसी उधेडवुनमें थी, कि उसकी बालसखी आनन्दी
उसके कमरे में आ उपस्थित हुई। आनन्दीको आते देस अनुराधा
ने प्रसन्न हो कहा-“आओ वहिन । तुम्हारे विना मैं अपने
कार्यमें सफलता.न प्राप्त कर सकगो, उस समय तो मैंने तुम्हें
यथाथमें सच्ची बाते नही कही थी, किन्तु अव अवश्य कह गी।"
आनन्दी,-क्या कहती हो, जीजी! कहो।
अनुराधा-उस मन्दिरवाले युवकके हाथमे एक चित था,
क्या तुमने उस चित्रको देखा था
आनन्दी-अच्छी तरह तो नहीं देख पाया। क्यों ? किसका
चित्र था?
7
खरा सोना
अनुराधा-वह तो मेरा ही चित्र था।
मानन्दी-ऐ तुम्हारा चित। उस युवकके हाथमे ।
अनुराधा-उसका कारण भी अब कुछ कुछ प्रकट
हुआ है।
आनन्दी-क्या ? शीघ्र कहो, वह कारण क्या है ?
अनुराधाने अपने हाथको पुस्तकका चित्र दिखाकर आनन्दी
से पूछा,-"देखो, उस युवकसे यह विन मिलता है या नहीं ?"
आनन्दी-हा, वहिन । यह चित्र उसी युवकका है। कहो
यह कौन है ?
अनुराधा-देख लो, नीचे नाम अङ्कित है।
आनन्दी-(हँसती हुई ) तव तो ये तुम्हारे भी मित्र ही,
ठहरे । अब मैं समझती हूं कि वे विचार मित्रका ही कार्य करने
आये होंगे। अच्छा, तब तो तुमको उन्हें सम्मानपूर्वक अपने यहां
बुलाना चाहिये।
अनुराधा-अभी घया मालूम, कि वह कौन है ? हो सकता
है कि मेरा यह अनुमान असत्य हो ।
आनन्दी-अच्छा, ठहरो। मैं उसका परिचय पुछना
मगवाती हूँ।
अनुराधा-इसीलिये तो मैंने तुम्हे बुलाया था। लेकिन
देराना, कही उनको यह रहस्य न मालूम हो जाय ।
आनन्दो-सम्भवत रहस्य नहीं मालूम होने दूगी।
उस युवकने जरसे अनुराधाको देखा था, तमीसे उसके
।
बरा सोना
रूपको अपने मित्रके अनुरूप समझ प्रसन्न था, किन्तु उसके गुण
की सोजमें लगे रहने पर भी पूरा पूरा पता नही पा सका था
और इसी फिकमें था, कि किस प्रकार उसके गुणोंका पता
पाऊ। युवकके इसी खोजमें वहा दो दिनोंतक टहलनेपर उसका
पूरा पूरा पता उसको लग गया और युवककी सब बाते
अनुराधा ओर आनन्दीसे भी छिपी न रहीं। दोनों दोनोंका
'परिचय पाकर प्रसन्न हुए। अब मैं भी पाठकोंको वता देना
चाहता हू , कि वह युवक प्यारे वाबूके अन्यतम मित उदय
भानु थे । वह अपने मित्रके आज्ञानुसार पार्वतीपुरके जमीन्दारकी
लडकी, अनुराधाके रूपर ग और गुण-अवगुणोंकी जाच करने
आये थे।
उस दिन गङ्गा पार करनेमें मल्लाहो की खुरदनीकी प्रथा
दूर करनेवाले भी यही उदयभानु बाबू थे।
पार्वतीपुरसे वापिस जाकर उदयभानु वाचूने अपने मित्र
थ्यारे बावूको सब बाते' कह सुनायौं। मित्रके मुखसे अपनी
भावी पत्नी अनुराधाको प्रशसा सुनकर प्यारेवाबू भीतर ही
भीतर बहुत प्रसन्न हुए। साथ ही उन्होंने उदयभानुको धन्यवाद
भी दिया। उदयभानुने मित्रसे कहा--"भाई। सिर्फ धन्यवादसे
कार्य नहीं पूरा होगा, अपने वचनको भी पालन करना
पडेगा।"
प्यारे वावून कहा, "आप घबराधे नहीं, जनाव। आपकी
इच्छाके अनुसार तैयारिया होनेको हैं। अब समय कम है,
-
फ्या
खरा सोना
इस शुभ समयमें तुम अपनो श्रीमतीको स्वर्णपुर आने दोगे?
माताजी मुझसे कईबार कह चुकी थी।"
उदयभानु-पहले आपकी श्रीमतीजी तो आ ले। पीछे
दूसरेको श्रीमतीको बुलाते रहियेगा। माताजी चाहे गी तो
वय वुलवा लेगी। आपसे और मुझसे पूछनेको आवश्यकता
ही क्या है?
प्यारे वाबू-इसीलिये, कि कहीं आपकी मी न हो तो वे
कैसे बुलाये गी?
उदयभानु-"अथवा आपकी श्रीमती जो आना नही स्वीकार,
करें तो क्या हो ?" यह कह एक पल निकालकर अपने मित्र
प्यारे वा–के हाथमें देकर कहा कि देखो, उसकी क्या इच्छा है ?
पन्न पढकर प्यारे बाबूने कहा-“यह पल कव आया था,
उदय?"
उदयभानु-"पार्वतीपुर जानेके एक दिन पहले मिला था।
इसीलिये मै एक दिनके लिये घर भी गया था, पिताजीको
कह
आया था, कि उसको वहासे मगवा ले ।
प्यारे चावू-तो क्या श्रीमती गायत्रीदेवी भरतपुर
आगयी?
उदयभानु-सम्भवत आगयी होगी। बडी आवश्यकता है,
तो जाकर दर्शन कर आओ।
सरा सोना
छठा परिच्छेद
उनका
* या जिलेके अन्तर्गत भरतपुर ग्राममें उदयभानुके
ग पिताजीका निवासस्थान था और दरभंगे जिलेके
भामा अन्तर्गत स्वर्णपुरमें प्यारे वावूके पूज्य
पिता,
राजकुमार प्रसादजी निवास करते थे। राजकुमार प्रसादजी
छोटेमोटे जमीन्दार थे और प्यारे प्रसादके अतिरिक्त उनको
कोई दूसरी सन्तान नहीं थी। इसोसे माता-पिताका स्नेह उनपर
सीमाके किनारे पहुँचा हुआ था। उदयभानु भी' जब तय
अवकाशके समय मित्रके सार्थ स्वर्णपुर आया करते थे।
वहा आना राजकुमार बावूको अच्छा नही लगता था, क्योकि
वे इसको 'फजूल समझते थे उनका ख्याल था कि मिल
समश्रेणीका होना ही अच्छा है। किसी लक्ष्मी-पालकी
अर्थहीन कङ्गालसे मैलो 'नही शोमती और न उसमें प्रतिष्ठाही
है । इच्छा नहीं रहने पर भी चे प्यारे वाचूके कार्यमें छेडछाड
नहीं करते थे, इसी लिये उदयभानुके विषयमें कभी कुछ नहीं
कहते , किन्तु उदयभानु उनको मुखाकृति देखकर ही ताड गये
थे, कि मैं इनकी आंखोंमें खटकता है और इसी कारण मित्रके
अधिक आग्रह करनेपर कभी ही कभी आते थे।
वायू प्यारेप्रसादजीकी माताजीका स्वभाव बडा ही
४६ खरा सोना - प्रशंसनीय था। वे दीन-दुखियोको देखकर किसी न किसी प्रकार उनकी कुछ न कुछ सहायता अवश्य करतो यो यथार्थमे उन्होंने अपने पुत्रसे कईवार कहा था, कि मेरो इच्छा होती है कि तुम्हारे विवाहके समय एकवार तुम्हारो मित्राणीको बुलाऊँ, किन्तु कुछ आगे पीछे विचारनेसे साहस नहीं होता है। “आगे-पोछे विचारनेसे साहस नही होता है,” इस वाक्यका अर्थ प्यारे यावूने कुछ दूसरा ही लगाया था। इसीसे उन्होने अपने मित्रसे वैसा कहा था। उदय वाचूने भी अपनी धर्मपतीको वहा नहीं जाने देनेका विचार करलिया था। वह और किसी मतलबसे नहो, सिर्फ राजकुमार वाचूके उग्र स्वभावहीसे डरकर । यथासमय बडी धूमधामसे बाबू प्यारेप्रसादजीका विवाह पार्वतीपुरके जमीन्दार वाबू नीलमोहनको कन्या अनुराधासे हो गया। वर कन्याको युगल जोडी सब प्रफारसे प्रशंसनीय देस, दर्शकोको अपार आनन्द हुआ। उदयभानुने मिलके विवाह- में अपने ऊपर बहुत कार्य उठाया था और सबको सफलतापूर्वक निवाइते देश, राजकुमार वाचू भी उनकी सूव प्रशसा करते थे। विवाह-कार्य मङ्गलपूर्वक पूरा हो जानेपर राजकुमार धावू पुत्र और पुत्रवधूके सोथ म्वर्णपुर पहुँचे। पुत्रवधूको देखते ही प्यारे यात्रुको माता प्रसन्नतासे खिल गयी। उन्होने उसके रूपको देखकर समझा, कि साक्षात् भगवती ही, मनुष्यरूपमें उसके घर यायी हैं। प्यारे. याने उदयमानुको स्त्री गायतीको अपने विवाहके - ४
खरा सोना
समय बुलवानेको बहुत चेष्टा की, किन्तु अस्वस्थताके वहाने
उदयभानुने उसे वहां नहीं आने दिया।
सातवाँ परिच्छेद
-
.
.
Prohee म० ए० की परीक्षा देनेके कुछ दिन पहले
ए ही प्यारे चावूने पढ़ना' छोड दिया, क्योकि
में जबसे उनका विवाह हुआ तभीसे उनका
चित्त पढनेको ओरसे विल्कुल हट गया। वे तभीसे अपनी
अनुराधाके अगाध प्रेम-सागरमें लहरें मारने लग गये। चे घरका
कार्य भी नही देखते थे। रात-दिन महलोहीमें पड़े रहते थे,
यद्यपि अनुराधा उनको ऐसा करनेसे मना करती थी, किन्तु
वे उसके कहनेको टाल देते। कहा करते, कि ईश्वरने हम
लोगोको जन्म सुपभोगके लिये ही दिया है। किस चीजकी
कमी है । इस नश्वर शरीरके नष्ट हो जानेपर यह धन किस काम
आयेगा ? राजकुमार बाबू पुत्रको विलासिताके गर्तमें गिरते देख,
बहुत दुःखो थे। वे परिश्रमसे सञ्चय, किया हुआ धन
विलासिताकी अग्निमें भस्म होते देख, भीतर ही भीतर कलपते
थे। प्यारे बाबूकी माता भी पुत्रके स्वभावमें इस प्रकार परिवर्तन
होते देख बहुत घबरायो , पर कोई युक्ति न देख चुप थौं । जबसे
प्यारे बाबूने पढना छोडा, तभीसे भूलकर भी उन्होने अपने अन्य
-
,
खरा सोना , तम मित्र उदयमानुको सोज नहीं की। उदयभानु वाचूने कई पत्र लिखे, लेकिन एकका भी उत्तर उन्हें नहीं मिला एकवार उदयभानु स्वर्णपुर गये भी, लेकिन वहा भी मिलसे मेंट नहीं हुई। बेचारे निराश होकर लौट आये और फिर कभी वहां जानेको इच्छा न की। जवसं प्यारेने पढना छोडा, तमासे उश्यभानुको खर्च देना भी बन्दकर दिया। किसी प्रकार लडकोंको घरपर पढ़ाकर उन्होने एम० ए० को दियो प्राप्त कर ली। एम० ए० की डिग्री प्राप्त करनेपर कुछ दिनोंतक उदय- भानु अपने प्राममें ही माकर रहे। उनके घरको अवस्था पाठकोसे छिपी नहीं है। उनके वृद्ध पिता सिर्फ दश रुपये महोनेके नोकर ये और घरमें पुत्रवधू गायत्रोके सिवाय छाटो लडका विश्वनाथ भी था। दश रूपयामें तीन व्यकियोंका" निर्वाह इस कराल दुभिक्षके समय ग्लिकुल असभव था। तक प्यारे बाबू दश रुपये महोने सहायताके रूपमें देते रहे, त्तपतक किसी प्रकार उनका निर्वाह हुआ, पर जर उन्होने खर्च मेजना बन्द कर दिया, तमीसे उनके कप्टको मात्रा अधिक बढ़ गयो। उधर तो आमदनी बन्द हुई और इधर गायनोके आनेसे खर्च अधिक हो गया। कुछ दिनोंतक उदयमानुके पिता बहुत घराये , किन्तु चतुरा पुत्रवधूगायत्रीके सुप्रवन्धसे उनका कष्ट दूर हुआ। गायत्रीने अपने ससुरसे कहकर एक चरखा मंगवा सून कातना आरंम्म कर दिया। बूढा, गायत्रोके काते हुए सूतको बाजारमें लेजाकर बेच लाया करता था। इसी प्रकार महीने में जब- बरा.सोना 1. । बोस रुपयेकी आय हो जाती थी, जिससे सुखपूर्वक उनलोगोंका समय कट जाता था। गायत्री इसी अवस्थामें प्रसन्न रहती थी। उसको कभी अपने पिताके घरका स्वगीय सुख ,स्मरण आकर दुखी,नही कर सकता था। हां, उसे जब कभी अपने पिता, भ्राता और भ्रातुपुत्र महादेवका स्मरण होता, उस समय वह अवश्य कुछ दुःखी हो जाती थी। उदयभानु वाब ने कुछ दिन घरमें रहकर गायत्रीके कार्यों को देखा। उसके कष्टोंको देख, उन्हें बडा दुःख हुआ। उन्होंने मनही मन उन्होंने अपनेको बहुत धिक्कारा । वह इसलिये, कि यह एक बडे घरकी लडकी,, होकर भी अपने ऊपर, अनेक कट उठाकर हमारे पिता-भ्राताका पालन करती है और मैं ऐसा अधम हैं कि और तो क्या, ,आजतक दूसरेहीकी सहायतासे अपना पेट, भी पालता रहा।। कभी कभी वे गायत्रीके सामने,भी ये बाते' कह बैठते थे। गायत्री इससे बडी लज्जा, पाती थी और उन्हें , ऐसा फहनेसे रोकती थी। पूरे तीन महीने तक. गायत्रीको कमाईसे उदयभानु वाव ने अपनी पेट पूजा को। बहुत दौडधूप करनेके वाद चौथे महीने उनको आरा टाउन-स्कृलमें हेडमाटरकी जगह २००) दो सौ रपये मासिक वेतनपर मिली। गायत्रीके सूतकी निक्रीके,३०) रपये गह-खर्च लेकर वे अपने कार्य पर गये । प्यारे बाबू अच्छे विलासी निकले। अनुराधा भी उनको संगतिमे उन्हीं जैसी हो गयी। पाच ही वर्ष के अरसे में उनके घरको,लक्ष्मी चलती, वनो। राजकुमार बाबू पुत्रके व्यवहारसे .
खरा सोना ऐसे दुःखी हुए, कि तीन ही चार वर्ष के बाद पुत्रका साथ सदाके लिये छोड ससारसे ही चल 'वसे । पिताके' मरते ही प्यारे वाबू पर विशेष विपत्ति आ पडी। "जमीन्दारीके कार्यों को देखभाल करनेवाला कोई न रहा। महाजनोंसे बहुत रुपया उधार लाया गया। धीरे धीरे उनको सव जमीन्दारी बिक गयी। यहांतक कि रोरियोके लाले पड़ने लगे। अनुराधा, पतिकी ऐसी अवस्था देख, बडी दुखी रहने लगी, किन्तु इतना होनेपर भी प्यारे बाबूको प्रकृति अभी नहीं बदली थी। अपनेको अर्थका कष्ट होते देख नौकरो'करनेकी चिन्ता हुई सही, किन्तु खर्चकी ओरसे मन नही हटा। एक एककर अनुराधाके सव भूषण बिक गये। 'उसी अवस्थामें उनकी पूज्या माता भी वर्गीया हो गयीं। इस प्रकारको विपत्तियोंके झमेलेमें पडकर प्यारे चाबूको अपनी भूल देस पडी। इधर माताके श्राद्धकर्मसे उन्होंने किसी प्रकार उद्धार पाया हा था, कि उधर अनुराधा वीमार पडो। धर्मपतीको वीमार पडते देख वाटू साहब बहुत घबराये और कोई युक्ति न देख, उसको पिताके घर पहुँचा माये। धनजन सबसे अपना घर खाली हो जानेसे प्यारे ग को हाँ रहने में बडी तकलीफ होने "लगी । इसी अवस्थामें उनको अपने अन्यतम मित्र उदयभानुका स्मरण हुआ। पहले तो अपने व्यवहारसे उनको मिलके यहाँ जानेमें संकोच हुआ , फिर मित्र समझ नहीं जाकर क्षमा मागनेंका विचार कर चे उनकी खोजमें बाहर निकले। उदयमानु वायू ने आरा-राउन स्कूलमें दो वर्पतक मध्यापकका ।
खरा सोना
1
कार्य करनेके बाद अपनी धर्मपती गायत्री और अपने अनुज
विश्वनाथ तथा पूज्य पिताजीको भरतपुरसे बुलवा कर अपने
साथ ही रपरखा। इस समय विश्वनाथ उसी स्कूलकी तीसरी
श्रेणीमें पढता था। अव गायत्रीको किसी प्रकारका कष्ट नहीं
था, किन्तु अभीतक उसके घरसे चरसेका कार्य बन्द नही हुआ
है ।, अन्तर इतना ही हुआ है कि अव उस कार्यको वह दासि.
योंके द्वारा कराती थी , क्यो कि गृह कार्यसे उसे अवकाश ही
नहीं मिलता। आरे आनेके एकही वर्ष बाद गायत्रीको एक
पुत्र हुआ था।
उदयभानु याव के पूज्य पिता पौल-रतको
पाकर बहुत ही हपित्त थे। उदयमानुका, छोटा भाई, विश्वनाथ
भ्रातृपुनको देख बडा आनन्दित, रहता था। अब सब प्रकारसे
उदयभानु यावू सुखी थे। यदि कभी कभी दुख होता, था, तो
सिर्फ अपने मित्रकी प्रकृतिका स्मरण कर ।
- एक दिन संध्याके समय उदयभानु वाबू घायु सेवनकर लौटे
आ रहे थे कि उनकी दृष्टि एक ऐसे आदमी पर पडी, जो पटे-
पुराने कपडोंको पहने उनसे कुछ आगे दूसरी ओर जा रहा था
उसको देखते ही ये बड़ी तेजीसे उसकी ओर बढे । कुछ आगे
बढने पर न मालूम क्यों ठहरकर फिर उसीको देखने लगे। कुछ
देर उसे देख फिर आगे वढे और शीघ्र ही उस पथिकके निकट
जा वोले,-"पया आप अपना परिचय देनेकी कृपा करेगे।"
इनकी इतनी बाते', सुनते ही वह पथिक 'मुडकर इनकी ओर
देखने लगा। आ चार होते ही एक दुसरेके गले लग गये
.
२५
खरा सोना
?
.
कुछ देर तक तो दोनो चुप ही रहे फिर उदयभानु यावूने पूछा-
-"तुम्हारी यह अवस्था क्यो है ?"
प्यारे वायूकी आसोंमें मांसू भर आया। उनकी यह दशा
देख उदयभानुने कहा- "कहो, कुशल तो है न ?"
प्यारे वायू-मित्रका अनादर करनेसे कबतक मनुष्य
कुशलसे रह सकता है ?
उदयभानु-पिता माता कैसे हैं
प्यारे वाबू नतमस्तक किये बोले, "वे लोग मुझे छोड
स्वर्गको गये, अनुराधा पिताके धर वीमार पड़ी है। धनका
जमाखर्च लग गया। मैं इधर-उधर भटक रहा हूँ, विपत्तिमें मिल
ही साथ देता है, इसी विचारसे तुम्हारे निकट आया हूँ।"
उदयभानु वावूको मित्रकी वातपर बडा दुख हुआ। किसी
प्रकार वोध-प्रबोध देकर उनको अपने घर लाये और बडे ही
आदर-सत्कारसे रक्खा। रातमें भोजन करनेके बाद दोनो एक
सजे-सजाये कमरेमें बैठे । प्यारे बाबूने अपने मित्रके घरकी सजा-
वट तो वहा नही पायी, लेकिन जो कुछ देखा, सबको सव चीजे
कामकी और अपने ही देशको वनी पायीं। यह देखते ही उनके
आनन्दकी सीमा न रही। मिवद्वय आपसमें कुछ बातें कर रहे
थे, कि एक सुन्दरी युवती चार पान लिये कमरेमें आयो । उसने
दो दो पान दोनोके हाथमें देकर नतमस्तक किये धीरे धीरे
प्यारे वाटूसे कहा-"कहिये, मेरी बहिन अनुराधादेवी तो
अच्छी हैं न?"
.
खरा सोना- प्यारे वाव -अच्छी तो नहीं हैं,-ज्वरावस्थामें पिताके घरमें हैं। वीचहीमें छेडकर उदयभानु वायू बोले,-"वे कितने दिनोंसे योमार हैं" प्यारे वाव - एक महीनेसे क्या कम हुआ होगा ? उदयभानु-तो क्या बरावर एकही सी अवस्था चली आती है। । -फिर यहा करे? प्यारे वाव -परसोंके पत्रसे ज्ञात होता है, कि ज्वर घर रहा है और तबियत कुछ अच्छीसी मालूम होती है, देखें ईश्वर क्या करते हैं। वहां भी सेवा कम होती है। गायतोने कहा-"क्या उनको यहा नहीं बुलवा सकते " उदयभानु-हा जी, अच्छा तो होगा, यही लिया लाओ। प्यारे बाबू- कौन है, जो उसकी शुभ्रपा गायत्री-आप चिन्ता नहीं करे । मै उनको यहा किसी प्रकारका कष्ट न होने दूगी। अच्छा हो, यदि आप शीघ्रही उनको यहां वुलवा गायत्रीकी बाते सुनते ही प्यारेवाबू भीतर ही भीतर उसकी प्रशसाफर कहने लगे, "मालूम होता है, यह कोई स्वगीया देवी हैं।" प्रकटमें बोले,-“देखा जायगा।" उदयभानु वावू-देसा क्या जायगा ? अव तो सवका श्राद्ध कर ही चुके भला अव मी तो आँख खोलो। अनुराधाको यहा धुलवानेमें तुमको आपत्ति क्यो होतो है ? अरे, यह घर भी - M 1 ५७ खरा सोना 2 तो तुम्हाराही है मेरा यह प्रकाण्ड शरीर भी तो तुम्हारे ही अन्नका पला है ? इस घरको अपना ही समझो। यदि तुम नहीं जा सकते हो, तो कहो, मै हो जा कर लेआऊँ। उदयभानु वाबूकी बात सुनकर प्यारेवाबू चुप रह गये, बार- वार-आग्रह-अनुरोध करनेपर बोले,-"तुमको मना कौन करता है? तुम तो अगले ही दिन लाये थे ? जव जी चाहे, लिवा लाओ अथवा मुझे कहो तो मै भी जानेको तैयार हैं।' आठवे दिन प्यारेयावूने अनुराधाको पार्वतीपुरसे आर पुलवा लिया। अब वह भी विज्वरा हो गयी थी। आरे आनेके एकही महोने वाद वह पहले जैसा हृष्टपुष्ट हो गयी। अव प्यारेवावू आरेहीमें किसी देशी चोनीके कार्यालयमें प्रधान कमचारोके पदपर नियुक्त हो गये और सुखपूर्वक दिवस व्यतीत करने लगे। दोनो मित्र सपरिवार साथही रहा करते थे। गायत्री, अनुराधाको और अनुराधा, गायवोको पाकर बहुत खुश रहा करती थी। दोनोने साथ रहकर कसीदेके कार्यमें अच्छी उन्नति कर ली। विश्वनाथ भाभीके आनेसे माताका दुख भूला हुआ था। सबके सब अमन चैनसे रहने लगे, किन्तु उन सयका यह सुस अधिक दिनोतक नहीं रहा। विपत्ति भी उनके पीछे ही पीछे घूम रही थी। वेचारे प्यारेवाव को यहा भी अधिक दिन सुख नही मिला। थोडे ही दिनोके वाद स्त्रीने ससार छोड़ दिया। इस विषम वियोगके दुसको वे नही सह सके, विक्षिप्तकी भांति हो गये। अनुराधाको मृत्यु जहरीले ।
खरा सोना सर्प के डसनेसे हो गयी। प्यारेवावू भी विक्षिप्तकी भांति उसी विषेले सर्प को ढूंढते फिरने और कहा करते, "मुझे क्या नहीं काट साता?" उनकी अवस्था भी उत्तरोत्तर विगडती हो चली। उदयभानु पावू मित्रको अवस्था देख वहुत घबराये। अन्तमें निरुपाय हो कुछ दिनका अवकाश ले अपनी जन्मभूमि भरतपुरको गये। प्यारे वायू भी साथ ही थे। वहां कुछ दिन रहने बाद उन्होंने देवधरके लिये प्रस्थान किया। पूरे वीस दिनोंतक इसी' प्रकार इधर उधर घूमते हुए वे आरे पहुँचे। आरे पहुँचकर घर थानेके पहलेही किसी विद्यार्थीसे ज्ञात हुआ कि उनकी धर्मपली गायत्रो बहुत वीमार हैं। घर आते ही वे गायत्रीके कमरेमें गये। वहांका दृश्य देखते ही उदयभानु बहुत घवराये। गायत्री ज्ञान हीनावस्था में पड़ी थी। दश बारह घण्टे पहलेसे ज्वर उतर गया' था। दशा शोचनीय हो रही थी। नाडी अपना स्थान छोड़ चुकी थी। कभी कभी गायत्री नेत्र खोल घरके मनुष्योंमें किसीको ढूंढती थी और फिर आखें बन्द कर लेती थी। ज्यों ही मिलके साथ उदयभानु वाचूने चारपाईके निकट जाकर गायत्रीको पुकारा , त्यों ही उसने अपनी आंखें खोल उनकी ओर देखा। उस समय उसके कमल-मुखपर प्रसन्नता की छाया दीख पडी। । वह टकटकी लगाये उनकी ओर कुछ देर देखती रही। उसकी वोली अन्द हो चुकी थी, इसलिये वोल नही सकी, चेष्टा करके दोनों जोड प्रणाम कर गायतीने फिर आ यन्द करली र उसकी प्राणवायु शरीरसे निकल गयो । उदयभानु गायत्रीके ५६ खरा सोना - वियोगसे बहुत दुखी हुए, किन्तु ढाढस बांधे हुए उन्होंने मनका दुख किसीपर प्रकट नहीं होने दिया। गायत्रीका श्राद्ध भी न हुआ था, कि प्यारेवायू भी मित्रका माथ छोड चुपकेसे न मालूम कहाँ चले गये। उदयभानु वागू को फिर कभी उनका पता नही लगा। इस प्रकार दुप झझटोंके झमेलेसे उनका मन किसी कार्यमें नहीं लगता था। स्कृलसे पूरे तीन महीनेकी छुट्टी लेकर वे अपने वृद्ध पिता और उस छोटेसे एक वर्षके बच्चेको लिये हुए भरतपुर चले आये । घर आकर उन्होंने उस छोटे बच्चे के पालनेके लिये एक धाय नियत को, जो बडी साव- धानी से उस बच्चे का पालन-पोषण करने लगी। आरेसे आते समय उदयभानु वाव ने अपने अनुज विश्वनाथको वही छोड दिया था, क्योंकि उसकी परीक्षाके दिन वहुत निकट थे। आनेपर उदयभानु वाव का मन किसी प्रकार बदला हुआ रहता था। कुछ समय तो वे ग्रामीण वन्धुओंसे मिलने में व्यतीत करते,और कुछ समय बैठे समाचारपोंके पढने में बिताते थे। ग्रामीण बन्धुओंने मिलकर उनसे कई वार अनुरोधपूर्वक कहा. कि आप ही हमलोगोंसे बुद्धिविद्यामें श्रेष्ठ हैं। इसलिये आपके निकट हमलोगोंका निवेदन है कि कृपाकर हमलोगोंकी रक्षा करे , अत्याचारोंके चङ्गुलसे हमें वचाचे । अन्यथा राज्यके अत्या- चारी अमलोंसे हमलोगोंका लाण नहीं है। वे पशुसे भी हमको नीचा समझते और सदा मनमानो घरजानी किया करते हैं, कुछ कहने पर उलटे हो और बिगड़ते हैं। आगे बढ़ने पर भी घर .
खरा सोना
"मचाये
।
-
हमारी कोई सुननेवाला नहीं हैं। ये हमलोगोंके बच्चों की
शिक्षा का कोई प्रवन्ध होने नहीं देते। सब जगह धूम
हुए हैं, कि भरतपुर-निवासी बडे बदमाश हैं। अस्तु, अब
आपको इस नामको शुभचिन्ता करनी चाहिये। आर्गे जैसा आप
उचित समझे; करे । प्रति दिन कोई न कोई व्यक्ति उदयभानुके
निकर ग्रामीण कचहरीके गुमास्ता साहब को शिकायत लेकर
आही जाता था । - कभी कोई कहता कि साहब । गुमास्ताजीने
मुझसे पचास रुपये दण्डके रूपमें मार-पीटकर अभी वसूल किये
हैं। कोई कहता कि उसने हमसे रुपयेमें चार सेरको दरसे धी
वसूल किया है। कोई कहता, कि उसने अपनी गोंओंसे हमारों कृषि
चरा डाली है। इसी प्रकारको अनेक बातें सुनते सुनते उदयभानु
को घड़ी करुणा उपजी। उन्होने सोचा कि यह नश्वर शरीर
योही किसीन किसी दिन अवश्य नष्ट होही जायेगा। यदि यह
देश- और बन्धुओंके कार्यमें लग जाय, तो सार्थक हो जाय ।
अपना पेट हो -पालकर मरजाना निरर्थक है। समाचार
पनोंके पढ़ते रहनेसे ही उनके मनमें यह अचि उत्पन्न हो चुका
अतएव इन्हीं सव विचारोसे उन्होंने एक वर्ष की छुट्टी
.
और ले ली।
T
६१ सरा सोना आठवाँ परिच्छेद 1 . नके आठ बज गये थे। उदयभानु वायू अनेक जरूरी कार्यों से निपटकर बाहर जानेको थे, किन्तु अमीतक उनके बच्चे की धाय नहीं आयी थी, इसीसे रुके थे। बचा भूखसे चिल्ला रहा था। उनके वृद्ध पिता लोकनाथ वाचूने नौकरको कई वार धायके घर भेजा, लेकिन तौमी वह नही आयी। अन्तमें विवश हो वे अपने ही हाथसे, गायका दूध बच्चेको पिलाने बैठे। , उदयभानु वावू अपना कोट-मुरेठा लिये याहर निकलनेहीको थे, कि उधरसे उनके घरकी धाय रोती चिल्लाती हुई उनके आगे आगिरी। उन्होने उसको- अनेक प्रकारसे सान्त्वना देकर पूछा, “क्यों, क्या बात है?" धायने कहा,-"बाबू साहब ! मेरे लड़केको गुमास्ताजीने खूब पीटा है और वाधकर कोठरीमें वन्द किये हुए हैं।" उदयभानु-क्यो। -लगानके लिये ये। १ उदयमान-लगान कितनी देनी पड़ती है। धाय-मालिकके लिये दो रुपये, और गुमास्ताजी तथा अन्यान्य अमलोके लिये चौदह रुपये। लगानके अतिरिक्त दश धाय- - -- - खरा सोना ६२ . रुपये मैं देती है, लेकिन चे चोदहसे नहीं घटते, इसीलिये मेरे वञ्चे पर इतनी मार पड़ी। और न मालूम वह क्या करेगा ? धायके मुपसे इतनी बाते सुनते ही उदयभानु यावू बहुत दुःखी हो वोले-"जिस देशके निवासियोंका अपने बन्धुओंके साथ ऐसा व्यवहार है, उसको दुर्गति क्यो न हो ? स्वार्थ । तू भी धन्य है। भाईसे माईका खून चुसवानेमें भी तू आगा पीछा नहीं करता। लोग विदेशियोहीके मत्थे कलङ्कका टीका लगाते हैं। जरा अपने हृदयपर हाथ' रख अपने देशबन्धुके व्यवहारके विषयमें तो कहे कि यथार्थमें किसके द्वारा हमारी अथवा हमारे देशकी अधोगति हो रही है? यदि हमलोग आपसमें वन्धुभाव रखे', एकका सर्वनाशकर अपनी धीवृद्धि न चाहे, तो क्यो देशमें इस प्रकारका आर्तनादं सुनाई पडे। मेरी इष्टि जिस ओर जाती है, उसी ओर अपने देश-भाईकों दूसरे भाईका खून चूसते देखता है। वह उनके साथ व्यर्थको झगडा खडाकर स्वार्थ साधता है और वाहरवालेको भी वैसा करनेका मौका देता है। आप जिस ओर देखिये, चाहे कोई रेलवे कर्मचारी हो, चाहे पुलिसविभागमें रहनेवाला हो, अथवा कोई देशी-राज्यों हीका कर्मचारी क्यो न हो, सबके सब अपने देशहीके हैं, परन्तु अपने भाइयोका ही गला घोंटनेमें वहादुरी दिखलाते हैं। नहीं तो क्या कारण है, कि सौ रुपये महीनेकी अयापकी छोड लोग तीस रुपये मासिकपर रेलवे, पुलिस, और देशी राज्योंको नौकरीकी ओर छलोंगें मारते हैं । इसी प्रकार कुछ देर विचार .
खरा सोना
4
करनेके वाद उदयमानु बाबूने गुमास्ताजीके नामसे एक पत्र
लिख दिया कि आप कृपाकर इस धायके लडकेको छोड दें।
इसके यहां जो , कुछ लगान वाकी है, वह मै आपको भाजही
किसी वक्त चुका दूंगा।" पत्र लेकर धाय राजकी
कचहरीकी ओर चली गयी।
भरतपुर गया-जिलेके अन्तर्गत एक छोटमा ग्राम है, जो
एक साधारण जमीनदार वायू
अनर्थ नारायण जीकी जमीन
दारीके अभ्यन्तर है। अनर्थ जीके जितने कारिन्दे थे, सबके
सब यथार्थ में अनर्थ के मूल थे। इससे उनकी जमीनदारोके
भीतर कही शान्ति नहीं थी। भरतपुरके गुमास्ता जमीनदार
साहबके अग्ने सम्बन्धी थे, इसी कारण वहा की प्रजापर
जोर
जुल्म करनेमें किसी प्रकारका भय नही करते थे
धायने उदयभानु वावू का पत्र लेजाकर गुमास्ताजीके आगे
रख दिया। गुमास्ताजी पत्र पढते ही शेषावतार हो गये । आज्ञा
दो, कि इसको मार-पीट कर बाहर निकाल दो। उन्होंने क्रोधके
भावेश पत्र फाडकर फेक दिया। साथ ही पत्र लिखनेवाले
उदयभानु बाव को भी ऊँचनीच वाते. कहीं। धायने मार पाकर
रोती पीटती उदयभानु बाबू के निकट आकर सव बाते
उन्हे सुना दी। सुनते ही उदयभानु यहुत बिगड़कर घोले,-"में
उस नराधमकी नीचताका प्रायश्चित्त अभी कराये देना हजा, तू
सडकके किनारे ठहरना। धाय सडककी ओर गयी और
उदयभान वाइसिकिल लिये न मालूम किघर गये।
खरा सोना
।
चुकी थी, आरही
गुमास्ताजीको पीछे अपने किपे पर पश्चात्ताप हुआ कि हमने
पक भले आदमीको क्रोधमें आकर व्यर्थ ही कडी घातें क्या सुना
न मालूम उस धायने 'जाकर क्या कहा होगा?
अपने
पटवारियोंके निकट बैठ वे इसी विषय की बात कर रहे थे कि
प्यादेने आकर सवर दी कि दारोगा साहव आरहे । रिना किसी
प्रयोजनके दारोगा साहबके आनेको वात सुनकर गुमास्ताजी
विचारमें पड गये कि क्या बात है , इतनेहीमें देखते क्या हैं कि
एफ याइसिकिलपर दारोगाजी, और दूसरीपर एक अपरिचित
युवक, दो तीन कनिष्टवल और सबके पीछे वहीं धाय, जो
कुछ देर पहले अपमानित करके निकली जा चुकी थी,
है। दारोगाजोने कचहरोमें पहुँचकर धायसे पूछा-"बताओ,
तुम्हारा लड़का कहां बांधा गया है" दारोगाजीके मुखसे
इतनी बाते निकलतेही गुमास्ताजीका प्राण ओठोंपर आने लगा।
धायने एक बन्द कमरेकी ओर सकेत कर दारोगाजीसे
कहा कि इसी कमरेमें मेरा लडका चन्द है। दारोगाजीने
गुमास्ताजीसे ताली मँगवा कर कोठरी खुलवायी। कोठरीका
दृश्य देखतेहो उनको गुमास्ताके अत्याचारका पता लग गया।
उन्होंने कमरे में पांच-सात व्यक्तियोको हाथ-पैर बांधे पड़ा हुआ
पाया। उसीमें धायका लड़का भी उनी वन्धनावस्था मिला।
यत्धन खोलते ही सबके सब दारोगा साहयके निकट फूट फूट
कर रोने लगे। उनकी पीठपर ऐसी मार पड़ी थी, कि चमडे
उघड गये थे। पुलिस-सवइन्सपेकरने सवको बन्धन मुक्त
सरा सोना किया तथा उनका बयान ले गुमास्तेको गिरकार-कर लिया। गुमास्ता पीछे जमानतपर छोड दिये गये। उदयभानुमायने उनसे उसी समय कहा,-"आशा है, अब आप अपने किये कर्म का प्रायश्चित्त कर ले गे।' उदयभानु यावूकी वात उनके हृदय, तोरसी चुभ गयी। प्रकटमें उन्होने कहा, “अब आप क्षमा फरें, मुझसे भूल हुई, मैं आपसे परिचित नहीं था।" गुमास्ताजीको यातपर उदयभानु याव को दया आयी और उन्होंने मुकदमेकी पैरवी छोड दी, जिससे बेचारे गुमास्ताजीने रिहाई पायो। इस मुफद्दमेसे निर्दोप, छूट जानेपर गुमास्ताजी चुटोले सर्पकी भाति उदयभानु बाबूके पोछे पड गये, किन्तु ऊपरसे वहुत मिले रहते थे ओर भीतर ही भीतर अपनी घात अचूफ बैठाने के यलमें लगे रहते थे। जबसे गुमास्ताजीपर मुकद्दमा चला, तभीसे वे प्रजासे अत्यन्त मिल गये थे, किसीपर किसी प्रकारका अत्याचार नहीं करते थे, जिससे प्रजाके मनमें विश्वास सा हो गया कि अब ये ठीक हो गये। पर गुमास्ता जो चुप नही थे, वे भीतर ही भीतर अपना कार्य ठीककर राह साफ करनेकी फिक्रमें लगे हुए थे। उदयभानुनाव ने वृद्ध पिता और छोटे मातृहीन पुत्रको साधाले, पुन आरे जानेका विचार कर लिया। जाने की सब तैयारिया हो गयी, गठरिया बन्धवायी जा चुकी। वे ग्रामीण बन्धुओंसे हिल-मिलकर पिदा हो चार बजे भोरको भरतपुर छोडनेको थे। भोजनकर वे अपने कमरेमें जा लेटे । वृद्ध भी उसी
ख़रा सोना
*
,
गिर
{ कमरेमें पोलके साथ दूसरी चारपाईपर पोधे । ठीक चार को
Fमौकरने गाडी लाकर मालिकको पुकारा। नौकरको
सुन युद्धको आखें खुली। उन्होंने उदयमानु बायको .. !
कई बारापुकारने पर कुछ उत्तर नहीं मिला। अन्तमें घुसने
अपनी चारपाईसे उठ उदयभानु - यायू को चारपाईके निक
जाकर पुत्रका हाथ पकड उठाना चाहा। ज्यों ही वृद्ध लोकनाथ
चायूने अपना हाथ उदयभानु बापूकी देहपर रखा, त्योंही
पडे । उनका हाथ खूनसे बिल्कुल भीग गया, किन्तु म
कारमें दिखाई नहीं : पडनेसे वृद्धने लालटेन जलायी।
"लेकर लोकनार्थ वायू उदयभानु की चारपाईके निकट गये, किन्तु
वहाका दृश्य देखते ही चीस मारफराजमोनपर मूर्छित हो
“पडे । नीकर यह गोलमाल देखकर कमरेके भीतर आया।
फा दृश्य देखो वह कुछ देर बाद लोकनाथ गको-जलके छींटे
ओर हवा कर होशमें ले आया। धीरे-धीरे यह बात
में फैल गयी। सव लोगोंके हृदय,पर इस दुर्घटनासे बडी गहरी
चोट लगी। दर्शकों की भीड लग गयी। गुमस्ताजी
उदयभानु वावूकी लाश देखने आये । अनेक अनुसन्धान कार
भी घातकका पता नहीं लगा। न मालूम किस दुष्टने ची.
-भाँति उनकी हत्या कर डाली। यो तो अनुमानसे
किसीने हत्यारेका पता लगा हो लिया, फिन्तु भयसे किस
फो कुछ कहनेका साहस नहीं हुआ और फिर होता ही कैसे
किसीने अपनी आखों किसीको ग्यून करते देखा भी तो नहीं था
र
।
सरा सोना दारोगा इन्सपेकरके लाख सिर मारने पर भी कुछ पता नहीं लगा। यथासमय विश्वनाथको भी माताको इत्याका समाचार मिल गया। इस दुघटनाका समाचार पाते ही आरेके शिक्षित समाज में भी यहा शोक फैला । विश्वनाथ मैट्रिक परीक्षा दे चुका 'था। समाचार पाते हो वह रिहल होता, रोतो लिखता हुआ घर पहुँचा। उसको देखते हो वृद्ध लोकनाथका शोक और यढ गया। 'टोले-मुहल्लेके स्त्री पुरुषोंने अनेक प्रकारले वोध- प्रबोध देकर विश्वनाथ और वृद्ध लोकनाथको धैर्य वन्याया। ज्यों ज्यो ममय बीत गयो, त्यो त्यों उन लोगोका शोक भी घटना गया । यथासमय विश्वनाथका परोक्षामा फल निकल गया। उसने परीक्षा में सफलता पायो सहो , किन्तु उदय- भानुके बिना उसको आगेका पंढना रुका हुआ दिखाई पड़ी। उस दिन 'विश्वनाथ पुन• अपने अग्रजके लिये बहुत रोया। 'लोकनार्थ नायू वृद्ध हो हो चुके थे। दो वर्षका अमोध भ्रातृपुत्र माताके बिना अनेक कष्ट पा रहा था। घरमें कोई स्त्री नहीं रहने सेनाने पकानेका भी कोई प्रन्धि नहीं। इन सब कष्टों को देख विश्वनाथ अघोर सा हो गया। उसने अपनो दु पगाथा अपने पड़ोसियों को मो न सुनायो। फिलो किपाको उसकी विपत्ति पर यहा दुस हुआ। वे लोग कई प्रकारसे उसको सहायता करने को भी तैयार हुए। कई पडासियोंने उसके वृद्ध पिता * तथा मातृ-पितृ-होन छोटे मताजेको रक्षाका भार उठाकर विश्वनाथको पढने के लिये घाँकोपुर भेज दिया। विश्व- . .
खरा सोना
।
-
+
नाथ नोमराजी होकर पटने गया। वह आदमी खर्चके लिये
लोकनाथ वाव को कुछ रुपया भी देता गया।
इन दिनो लडकोंको अंगरेजी पढाने में कितना खर्च होता है,
इसको भली भांति वही लोग जानते हैं. जिनको पढने या पढानेका
सौभाग्य प्राप्त हुआ है । साधारण स्थितिवाले मनुष्योंका अङ्गरेजी
पढना तो विल्कुल असभव ही हो गया है ,क्योंकि जो लोग कठि
नतासे अपना जीवन निर्वाह करते हैं वे लोग किसी नगरमें अपने
लडकेको अगरेजी पढनेके लिये भेजकर प्रतिमास तीस चालीस
रुपये कहाँसे दे सकते हैं ? अव पाठक ही विचार करें, जिस
विश्वनाथको खानेका भी ठिकाना नही है, वह किस प्रकार तीस
चालीस रुपये मासिक खर्च करके पढ सकता है। किन्तु
उद्योगी,पुरुपको कहीं किसी प्रकारका कष्ट नहीं उठाना पडता,
ईश्वर अवश्य उसको सहायता पहुँचाते हैं। ईश्वरकी कृपासे
विश्वनाथको भी अधिक दिनोंतक कष्टके साथ नही भटकना
एक भद्र-पुरुषके यहां दो छोटे छोटे बच्चोंके पढानेके
लिये, भोजन और कालेज की फीस मिलने लगी। विश्वनाथ
जिसके यहाँ पढाता था, धीरे धीरे उसके घरवाले उसके कार्य
पर वहुत प्रसन्न हुए।
वावू ललिताप्रसादजी डिष्ट्रिक-बोर्ड-औफिसमें हेडक्लार्क ये
उन्हींके दो छोटे-छोटे लडकोंको विश्वनाथ पढाता था। जिस
-दिनसे ललिता वाबू तथा उनको धर्मपत्नीको पता लगा,
कि
विश्वनाथ, भरतपुरवाले उदयभानु यावूका छोटा भाई है, उसी
पडा।
खरा सोना दिनसे ये लोग विश्वनाथको अपने पुत्र के समान प्यार करने। लगे। उदयभानुका स्मरण होते ही ललिता यावूकी धर्मपत्नी 'रूपवती'को मुगलसरायवाली पुलिसकी वह दुर्घटना स्मरण, माजाती, जिससे उदयभानु वाचूके द्वारा उसने रक्षा पायी थी।" विश्वनाथके द्वारा उदयभानु यावू तथा उनकी धर्मपत्नी गायत्री प्रभृतिके मृत्यु-समाचार सुनकर रूपवती बहुत दुखी हुई। विश्वनाथ ललिता बाबके दो छोटे-छोटे पुलोंको सुवह शाम । पढाया करता और दश वजे कोलेजमें पढने जाता था। विश्व- नाथके शील-स्वभावसे ललिता वायू उससे बहुत प्रसन्न रहा करते थे। उनकी आन्तरिक इच्छा थी, कि विश्वनाथका विवाह अपनी पुत्री उत्तरासे कर दूं। किन्तु अभीतक किसी- पर उन्होने अपने मनका भाव नहीं प्रकट किया था। उत्तराने भो जवसे विश्वनाथको देख लिया था, तनीसे उसके हृदय-क्षेत्रमें उसके प्रति प्रेम वीज अङ्कुरित हो गया था। विश्वनाथ भी उत्तराको बडे स्नेहकी दृष्टिसे देखता था । दो-तीन वर्षों से लगातार पटनेमें श्लेप्न-ज्वरका विशेष प्रकोप हुआ करता है। - इस वर्ष भी शहरमें ज्वर उसी प्रकार फैला हुआ है। प्राय प्रत्येक घरमें कोई न कोई उस ज्वरके चङ्गुल में अवश्य ही फंसा दीखता है। ललिता वायूके यहा तो एक: व्यक्ति भी निचर नहीं रहा। विश्वनाथके अतिरिक्त सबके सब ज्वरमें पड़े थे। इस ज्वरमें नियमपूर्वक दो-तीन दिनोंतक - उपवास कर लेनेहोसे विगत-ज्वर हो जानेको विशेष आशा ; A खरा सोना - - नाथ नोमराजी होकर पटने गया। वह- आदमी खर्चके लिये लोकनाथ वायू को कुछ रुपया भी देता गया। इन दिनो लडकोको अंगरेजो पढाने में कितना खर्च होता है, इसको भली भाति वही लोग जानते हैं, जिनको पढ़ने या पढानेका सौभाग्य प्राप्त हुआ है । साधारण स्थितिवाले मनुष्योंका अङ्गरेजी पढना तो विल्कुल असभव हो हो गया है , क्योंकि जो लोग कठि नतासे अपना जीवन निर्वाह करते हैं. वे लोग किसी नगरमें अपने लड़केको अगरेजी पढनेके लिये भेजकर प्रतिमास तीस चालीस रुपये कहाँसे दे सकते हैं ? अब पाठक ही विचार करें, जिस विश्वनाथको खानेका भी ठिकाना नहीं है, वह किस प्रकार तीस वालीस रुपये मासिक सर्च करके पढ़ सकता है। किन्तु उद्योगी पुरुषको कही किसी प्रकारका कष्ट ,नही उठाना पड़ता, ईश्वर अवश्य उसको सहायता पहुंचाते हैं। ईश्वरकी कृपासे विश्वनाथको भी अधिक दिनोंतक कष्टके साथ नहीं भटकना एक भद्र-पुरुपके यहा दो छोटे छोटे बच्चोंके पढानेके लिये, भोजन और कालेज की फीस मिलने लगी। विश्वनाथ जिसके यहाँ पढ़ाता था, धीरे धीरे उसके घरवाले उसके कार्य पर बहुत प्रसन्न हुए । वावू ललिताप्रसादजी डिष्ट्रिक-बोर्ड-औफिसमें हेडलार्क थे। उन्हीके दो छोटे-छोटे लडकोंको विश्वनाथ पढ़ाता था। जिस दिनसे ललिता बाबू तथा उनकी धर्मपत्नीको पता लगा, कि विश्वनाथ, भरतपुरवाले उदयभानु वाबूका छोटा भाई है, उसी 1 पडा। - - खरा सोना फैला हुआ है। प्राय प्रत्येक घरमें कोई न कोई उस ज्वरके चङ्गल दिनसे वे लोग विश्वनाथको अपने पुत्रके समान प्यार करने लगे। उदयभानुका स्मरण होते ही ललिता यावूकी धर्मपत्नी 'रूपवती'को मुगलसरायवाली पुलिसको वह दुर्घटना स्मरण बाजाती, जिससे उदयभानु धावूके द्वारा उसने रक्षा पायी थी। विश्वनाथके द्वारा उदयभानु यायू तथा उनकी धर्मपत्नी गायत्री प्रभृतिके मृत्यु-समाचार सुनकर रूपवती बहुत दुखी हुई । विश्वनाथ ललिता वारके दो छोटे-छोटे पुत्रोंको सुबह शाम पढाया करता और दश बजे कोलेजमें पढने जाता था। विश्व- नाथके शील-स्वभावसे ललिना वायू उससे बहुत प्रसन्न रहा करते थे । उनको आन्तरिक इच्छा थी, कि विश्वनाथका बियाह अपनी पुत्री उत्तरासे कर दूं। किन्तु अभीतक किसी पर उन्होने अपने मनका भाव नहीं प्रकट किया था। उत्तराने भो जबसे विश्वनाथको देख लिया था, तनीसे उसके हृदय-क्षेत्रमें उसके प्रति प्रेम वीज़ अड्डरिन हो गया था। विश्वनाथ भी . उत्तराको वडे स्नेहकी दृष्टिसे देखता था । दो-तीन वर्षों से लगातार परनेमें श्लेष्म-ज्वरका विशेष करता है। इस वर्ष भी शहरमे जर उसी प्रकार; प्रकोप हुआ - में अवश्य ही फंसा दीखता है। ललिता वायूके यहा तो एक व्यक्ति भी विश्वर नहीं रहा। विश्वनाथके अतिरिक्त सरके सब ज्वर में पड़े थे। इस ज्वरमें नियमपूर्वक दो-तीन दिनोंतक उपास कर लेनेहोसे - विगत-ज्वर हो जानेको विशेष आशा -- .
खरा सोना
वर्षके मातृ-पितृ हीना पौत्रके पालनके कष्ट उन्हींको उठाने पड़े।
साथ ही अर्थ संकट भी सतानेको तैयार था। उदयभानु बाबू की
कमाईके बचे चार-पांच सौ रुपये कितने दिन चलते। सब
तरइके कर सहकर भी दुध-मुंह वच्चे को पालना ही वृद्धने
अपना कर्तव्य समझ लिया था। कभी-कभी उनकी इच्छा,
होनो, कि अब विश्वनाथका विवाह हो जाये तो अच्छा हो,
किन्तु मुझ दरिदके लडकेको कौन अपनी लड़की देगा, यहो
सोच कर वे बहुत चिन्तित हो जाया करते थे। प्रामवाले यथा
साध्य वृद्ध लोकनाथकी सहायता किया करते थे उनको
सारी आशा विश्वनाथ पर- लगी थी। उन्हें विश्वास था,
कि कभी न कभी वह हमलोगोंके कष्ट अवश्य दूर करेगा।
एक दिन समय पाकर रूपवताने अपने पतिदेव ललिता
प्रसादजीसे अपनी-पुली उत्तराके विवाहकी वात छेडते हुए
-"अब तो उत्तरा विवाहके योग्य हुई.। लडके की खोज
क्यों नहीं करते ?"
ललिता-मै चुप नहीं बैठा ह पर एक, वात तो, मैं
तुमसे कहना भूल ही गया था। वह यह, कि क्या विश्वताथ:
उत्तराके योग्य नहीं है,--
रूपचती-में भी यही कहनेको थी। आप विश्यनाथके
पितासे जाकर मिलें और यातचीत ठीक करें।
ललिता-पहेले. विश्वनाथके सनको जांच करलो
वह नहीं चाहता हो, तो अच्छा नहीं होगा।
-
कहा,
-
tr
-
.
खरा सोना
-
। समवती-मैं विश्वनाथ और उत्तरा दोनोके मनके.
मावोंको देखलूंगी। आप बातें तो करें ।
ललिता--इसमें एक बखेडा और भी है।
रूपवती-क्या ?
ललिता-वह यह, कि विश्वनाथके पिता उच्च फुलके
है, हमारी लडकीसे अपने लडकेका विवाह करना स्वीकार
करेंगे या नहीं?
रूपवती-आप इसको चिन्ता न करे । मैं इन दोनों भाइयोंके
खभावसे समझती हू, कि ये लोग सहृदय हैं। इनके पिता
भी अवश्य आपकी प्रार्थना स्वीकार कर लेंगे।
ललिता वाबूने भरतपुर जानेका विचार कर लिया। इधर ।
रूपवतीने एक दिन उत्तरासे कहा, “वेटी ! अब मैं तुझे अधिक
नहीं पढा सकती। जिस समय सुरेन्द्र और उपेन्द्रका पढना
हो जाये, उस समय तू जाकर विश्वनाथसे पढ लिया कर।
उसको दूसरा मत समझ।
यह अपने ही घरका लडका है।
यदि हमलोगोंकी ज्वरावस्थामें वह सेवा नहीं करता तो न
मालूम क्या दुर्गति होतो? लडका बडा सहनशील और
सहदय है।"
..उत्तरा माताकी यातोफा अनुमोदन मन ही मन कर रही
थी। वह तो चाहती ही थी, कि माता मुझे उनसे योलनेको
स्वतंत्रता दे क्योंकि उसने प्रथम ही अपनेको विश्वनायके
चरणोंकी दासी समझ लिया था। माताको आशा पाते हो।
-
खरा सोना - उत्तराने उत्तरमें हर्पित-चित्तसे कहा, "मैं आजहीसे उनके निकट पढना आरम्भ कर दूंगी।"TIT जवसे उत्तरा को वोमारा अच्छा हुई, तभीसे उसने विश्व नाथसे बोलने में किसी प्रकारका संकोच नही किया था किन्तु विश्वनाथ उसके प्रश्नों का उत्तर देते समय सर नीचा कर लिया करता था। उसकी यह अवस्था देख उत्तरा एकान्तमें चुद किया भी लिया करती थी। वह कहती-"मास्टर साहब अप मुझे देखकर इतना लजाते क्यों है...आपकी लजालेप्रतीत होता है, कि आपको ब्रह्मा त्रिी बना रहे थे,, किन्तु भूलसे उन्होंने पुरुपका शरीर गढ़ दिया। - उत्तराको ,धाते सुन, विश्वनाथ हँसकर कहता; -"और तुम पुरुष होनेको-- थी।" इतनी बात भी वह ओठ दवाये हुए ही बोलता और तुरत ही सरक जाता । एक दिन आठ बजे रातके समयः विश्वनाशा अपने कमरे लैम्पके निकट बैठकर समाचारपत्र पढने में मग्न ,था.। उसके छाल , पढकर जा चुके थे, , उसो -समय महिलादर्पणका विशेषाङ्क लिये उत्तराने कमरे में प्रवेश किया। वहा आ, कुछ समय तक वह चुपचाप विश्वनाथके पीछे खडी रही ।। विश्व- नाथ एकान-चित्त हो समाचारपत्र पढनेमें ऐसालीनाथा कि उसे उत्तराके मानेकी कुछ सर भी नहीं लगी। उसको इस प्रकार ध्यानस्थ देख, उत्तराने हँसकर कहा-मास्टर साहब पया मुझे मी.पढानेकी कृपा करे,गे ? - ROFITTIFTER 3 ३ I -1 - 1
खरा सोना-
L
-
उत्तराकी बातें सुन विश्वनाथ चौंक कर बोला,-"ऐं !
तुम कबसे यहां पडी हो"
उत्तरा-कुछ देरसे।
-विश्वनाथ-किस लिये कष्ट उठाया है ?
। । उत्तरा (मुसकुराती हुई)-आपसे पढने आयी हूँ।
विश्वनाथ-मैं तुमको नहीं पढा सकूँगा।
। उत्तरा-मेरे भाइयोंको फैसे पढाते हैं ।
विश्वनाथ-वे अभी लदके हैं।
उत्तरा-"तो में क्या वुड ढो ह ? मुझसे आप डरते क्यों
है ।” कहकर फिर मुसकुराने लगी।
विश्वनाथ तुम्हे वुड ढी कौन कहता है, पर विना माता-
जीकी आज्ञा पाये मै तुम्हे नहीं पढा सकता।
उत्तरा--आप मुझसे अप्रसन्न क्यों हैं, महाशय ?
विश्वनाथ-इसमें अप्रसन्नताकी तो कोई यात नही है,
माताजीको सम्मति पाकर ही कार्य करना उचिता है।
उत्तरा-में माताजीको सम्मति लेकर आयी हूँ।
विश्वनाथ-तुम चलो, मै अभी आता है, माताजीसे
पूछ लूंगा।
उत्तरा-आप'तो व्यर्थ ही डरते हैं।।
विश्वनाथ-मैं' सुरता नहीं, पर दूसरेकी यस्तुविना उसके
अधिकारोकोआज्ञा पाये छू नहीं सकता। तुमको पढानेमें विना"
मातापिताकी आजा पायेअनेक प्रकारके, भयकोमाशंका है।
खरा सोना
४
T
बालकको हठ करते देख वृद्ध वोला- बेटा, तेरी चाची
तुझे जूता खरोद देगी।"
"चाची जूना खरोद देगी।" यह सुनते हो लड़का चारपाईसे
उट अपनी चाचीको गोदमें जा बैठा और जूतेके लिये हट करने
लगा। युवती वालकको हठ करते देख वोला- कल तुमको
भी वैसा ही जूता मगवा दूंगी। अभी बाहर जाकर खेलो।
अभी बाबूजीकी तबीयत अच्छी नहीं है।"
"कल जूता मगवा दूंगी' सुन, बालक युवतीको गोदसे उठ
चाहर चला गया।
चिन्ता
.
,
पिताको चिन्तनीय अवस्था देख, युवक अधिक अधीर हा
उठा । उसको पिताको मृत्युकी उतनी चिन्ता नही थी।
थी तो केवल अपनो दरिद्रताको, क्योकि उस समय उसका हाय
विल्कुल सालो था. ओपधिका मूल्य चुकाना भी कठिन हो रहा
। था, युवतीने उसे कई बार वैद्यजीको बुलाने कहा,, पर युवकको
विना रुपया लिये वैद्यराजके यहां जाने की हिम्मत नहीं होती
वैद्यजीका वह रौद्र रूप, भयङ्कर मुख-मुद्रा स्मरण , आतेह
वह डर जाता। युवक. इसो, चिन्तामें था।
पुन दौडता हुआ हाथमें किसीका नया जूता लिये चावी
निकट आकर बोला-"चाची । - मुझको ऐसाही जूत
मंगरा देना।"
लडकेफो मधुर वातें सुनते ही युवतीने प्रेमपूर्वक उसे गाद
ले मुख चूमकर कहा-"अच्छा, मुन्नू। तुमको भी ऐसाही जत
लड़क
7
खरा सोना
।
देश मेत्रफकी गिरतार्ग
दमपटा प्याक प्रास त दिइना न्याय ग मा
युवा -मार प्रमनना पुर मा गगदपसा परत
भन्यायाम्पिार अमरना य11 ATTE
,
-
-
N'
खरा सोना - - - in १ मंगवा दूंगी।" लड़का चाचीकी बातें सुन प्रसन्न हो उसके गलेसे लिपट गया। '' जैसे तैसे युवक-युवतीने वृद्धकी सेवामें वह रात व्यतीत की। प्रात:काल युद्धको अवस्था पहलेसे कुछ बिगडी सी दिखाई पडी। युवतीको मालूम हो चुका था, कि आज विना संपया लिये वैद्यजी नहीं आयेगे। उधर बचा जूतेके लिये अलग हो हठ कर रहा है। यदि आज उसको भूता नहीं मिलेगा, तो यह बुरीतरह जिट करेगा । मुनसे अवोध मातृ पितृ हीन पालकका रोना नहीं सुना जायेगा। इधर हाथमें रुपया नहीं है। ऐसी अवस्थामें इन दो एक माभूषणोंको रसकर ही क्या करूंगी। इसी विचारसे युक्तीने अपना “कर्णफूल" उतारकर युवकके हाथमें देते हुए कहा,-"अभी आप इसे बन्धक रख, बाबूजीकी दवा फरे और मानके लिये भी एक जोडा जूता लादे । वैद्यराज जी भी विना रुपये के आते नहीं। अस्तु उन्हें भी रुपया देकर शोध ले आने, क्योकि वाबूजी को हालत वरावर विगडती ही जा रही है, कलसे तो गाजकी अवस्था और मी घुरो मालूम पेडती है।" युवक-युवतीशी बातें सुन लम्पी सांस छोडता हुआ बोला- । मुझसे तुम्हारे आपण अब नहीं चे जासकेंगे। एक- एक करके तो अनेक नेत्र चुका । यदि अब इन एक दोको नी नहीं रहने दूं,ते मेरे जेसा अकर्मण्य इस! ससारमें दूसरा कोई नहीं। इनमेंसे एक भी आभूषगता मेरा बनाया हुआ नही था !" . - यारी ६ खरा सोना S । " अपने - T स जबसे युक्ती-आप सङ्कोच न करें। इससे बढ़कर इनका उपयोग नहीं हो सकता कि, समयपर शरीरको शोभावढ़ाये और आवश्यकता पड़ जानेपर मान-मर्यादाको रक्षा करें युवकने और कोई युक्ति न देख युवतीके अनेक हठ करने पर उसके “कर्णफूल” बन्धक रखकर भ्रातपुत्र मदनके लिये जूता लिया और वैद्यराजकी पूजाकर पूज्य पिताके लिये ओषधि का प्रवन्ध किया। लड़का, जूता पाकर दौड़ता हुआ बालसखा मोहनको दिखाने ले गया। पाठकोंको बतलानेकी आवश्यकता नहीं होगी, कि युवक वृद्ध लोकनाथका एकमात्र' पुत्र, विश्वनाथ था और युवती ललिता बाबूकी पुत्री, विश्वनाथको धर्मपत्नी, उत्तरा थी उत्तरा अपने पतिके घर भरतपुर आयी, तभीसे उसके कोंका श्रीगणेश हुआ , किन्तु वह सुशीला कभी धवराती नहीं, बल्कि स्तपूर्वक उनको दूर करने ही की चेष्टा करती रही है। पाठक ढ़ हो चुके हैं, कि वह एक-एककर अपने सब आभूपण बन्धक एखकर ससुरकी ओषधि तथा घरका खर्च चलाती रही है। उसने कभी अपने मुग्वपर चिन्ताको छायातक नहीं आने दी। लोकनाथ वायूके पास स्थायी सम्पत्ति तो कुछ थी नहीं,घड़े पुत्रकी जीवितावस्थातक फिसी प्रकार सुस था , किन्तु उनको मृत्युके याद हो भोजनादिके लिये भी कष्ट उठाना पड़ा। विश्वनाथ भी अभी पढ हो रहा था, कुछ उपार्जन नहीं करता था अनस्याम यह अर्थ-संकट भा पडा। यह माग्यका खेल है ! । ऐसी
.
खरा सोना
FA
ܙܝ4
।
उत्तराके आभूषण घेचकर विश्वनाथने वैद्यराजको रुपये देकर
औषध लो और उन्हें लेजाकर पिताको नाडी दिखलायी।
वैद्यराजने युवकसे रुपया ऐठ, वृद्धको दश पन्द्रद दिनोंतक
उसी अवस्थामें रखनेके लिये अधिक यक्ष किया। यह.इस
'मतलयसे, कि 'चलते .समय भी वृद्धकी पदौलत वीस पचीस
रुपपे जोही मिल जाये , वही ठीक है। इसी आशासे पृद्धफे
लिये वैद्यजीने दो-तीन कीमती दवाओंका भी प्रयोग किया।
दिनके तीन बज चुके थे। विश्वनाथ चिन्तित चित्त, और
म्लानमुख किपे,पाजारसे घरको आ रहा था। उसके हाथमें दो-
तीन छोटी गठरियां थीं। वह अपने घरसे अनुमानत सौ फदम
को दूरीपर होगा, कि उसफा भ्रातु पुत्र 'मदन', दौडता हुआ
उसके निकट आकर बोला, "चाचाजी! जल्दी घर चलो,
चाची आपको बुलाती हैं। रह-रहकर धावाकी आंखें बन्द
हो रही हैं।"
-मदनकी बात सुनते ही विश्वनाथ शीघतापूर्वक घर आया।
उसके आगे-आगे मदन भी दौड़ता हुआ आया। उत्तरा वृद्धको
चम्मचसे गङ्गाजल
पिला रही थी । पिताका अन्तिम समय निकट
देस, विश्वनाथ बहुत घबराया। मदन दौडा आकर वृद्ध लोक
नाथके सिरहाने बैठ उनका हाथ पकडकर बोला- बाबा । तुम
क्यो सोते हो ? उठो, देखो, मैं अभी दौड़कर चाचाको बुला
लाया हूँ। मदनकी मधुर वाते सुनकर युद्धने अपनी आंखें
खाली । सामने अपनी पुत्रवधू और पुवको देख उसने हाथ बढाया
:
-
खरा सोना - और उन दोनोंको भी अपना हाथ उसपर रखने के लिये क्षीणखरमें कहा। ज्योंही उत्तरा और विश्वनाथने अपना-अपना हाथ वृद्धके हाथपर रखा त्याही बालक मदन'ने भी हंसते-हँसते अपना हाथ उनके हाथोंके ऊपर रख दिया। "मदनका हाथ ऊपर पडते ही वृद्धने अपनी आँखें बन्द करली । मदनने वृद्धकी छुट्टी पकड कईवार जोरकी आवाजमें 'वाया, बाबा' कहकर पुकारा और कुछ उत्तर नहीं पानेपर रोने लगा। "उधर पिताको स्वर्ग-प्रयाण करते देख विश्वनाथ और उत्तरा भी चीखे मारकर गिरपडे । उनकी यह अवस्था देख, 'मदन' और भी 'विह्वल-हो रोने लगा। इससे विश्वनाथके घरमें तुमुल नादसे हाहाकार मच उठा। उसे सुनकर' अनेक पडोसी सी-पुरुष वहां दौड आये। सबने बोध प्रयोध देकर उनलोगोको शान्त किया। विश्वनाथ और उत्तराके लाख प्रबोध देनेपर भी मदनने रोना बन्द नहीं किया, उसका 'सिसकना बड़ी देरतक जारी रहा। प्रामीण बन्धुओंकी सहायता तथा ललित यावूके हाथ घटाने 'पर विश्वनाथने पिताफे श्राद्ध-कमसे कुशलता पूर्वक निवृत्ति पायो । गांववालोंके कहनेसे आवश्यकता समझकरही विश्वनाथने अपना एक आमका वृक्ष जलानेके लिये काटा था। इसके लिये उसने गुमास्तको आशा नहीं ली थी', क्योंकि ऐसे समय उसकी आवश्यकता ही क्या थी ? गुमास्ताजी तो इसी घातमें ये, कि का मौका मिले, कि इन्हें धर दवाऊँ बस फिर क्या था। गुमास्ताजीने दो-तीन प्यादीको बुलाकर विश्व- खरा सोना 1 नाथको अपमानित करते हुए कचहरीमें उपस्थित करनेकी आज्ञा दी आज्ञा पानेकी देर थी, कि प्यादे यमदूतकी भांति क्रोध- मूर्ति बनाये, घडे-बडे लट्ट लेकर विश्वनाथ बाबूके दरवाजे पर आये। वहाँ आ उन्होने उन्हे फईगर पुकारा। विश्वनाथ या भोजन फरने धैठे थे, इसीलिये उन्होंने कुछ उत्तर नहीं दिया। पुकारनेपर कुछ उत्तर नहीं पाकर प्यादे अण्डवण्ठ बकते हुए हवेलीके भीतर प्रवेश करने लगे। उनको ऐसा करते देख, विश्वनाथने भोजन छोड दिया और बाहर आकर उनलोगो- को दरवाजे पर जानेके लिये वडे जोरसे डाटा । परन्तु प्यादोंने उनकी डांटकी कुछ परवा न कर, उनको. पकडनेके लिये हाथ वढाना चाहा। इसी समय भरतपुरके कई व्यक्ति, शोरगुल सुन वहाँ आ उपस्थित हुए। उनको आया देख, विश्वनाथका चल दूना बढ़ गया। वे भी आगे बढ अव क्या था ? दोनों दलोम सूय गुत्थम-गुत्थी हो गयी। प्यादोंपर भरपूर मार पडी, वे लोग गांवकी कचहरोकी ओर, प्राण बचानेके लिये भागे। पीछेसे ग्रामीणलोग भी उन्हें खदेडते हुए वहीं पहुंचे। प्रजाको आवेशमें लाठी लिये भाते देख, गुमास्ताजो बहुत घराये और घे बेचारे प्राण-रक्षाके लिये पाखानेकी ओर लपके जा रहे थे, कि इसी समय किसीने पीछेसे पुरस्काररूपमें उन पर भी एक लाठी जमाही दो। शरीरके लम्ने चौड़े गुमास्ताजी वहीं चित हो, दाँत निकाले, दीनता दिखाते हुए क्षमा याचना करने लगे। भरतपुरको प्रजाको वापस करते हुए विश्वनाथ घर लौटे। --
निलम्ब हुआ।
कि
।
प्रसन्नता होगी, मैं भी उसीमें प्रसन्न रहूँगी, जिससे आपको'
तुम्हारी जैसी स्त्रियोंले हों देशका उद्धार होने को है। यथार्थ
खरा सोनार
युवक-एक नयो दोस्नो लगी है, उतो तितके निकर इतना
युवती-कुळे कहिये भी तो, कि आपके दोस्त हैं कौन ?
युवक हँसता हुआ युवतीका करस्पर्शर बोला- नहीं
उत्तरे। उसका नाम मैं तुमको नही बताऊँगारी सम्भव है,
उसका परिचय पाकर तुम दुःखी हो जाओ।
युवती आप एक नहीं, अनेकों से मैत्री कीजिये, मैं कमी
दु.पो न हाऊंगी। आये निश्चय समझे। जिससे आपकी
दुय होगा, उसी से मुझेमी टु खो समझें।
पाठक समझ होंगे, कि ये
युपक उत्तराके पतिदेव बाद
विश्वनाथ प्रसादजी । पती को बातें सुन, वे उससे पुन
प्रेम पूर्वक बोले -"तुम्हरे “साहसको मै धन्य समझता हूँ।
.
1
मे तुम मेरे सुख से सुग्यो और दुखरे दुःखो रहनेवालो हो ।'
लो जुनो, समवत. कल मैं जेल' जाऊँगा, आजही दारोगा जीने
मुख्ने, चुलाकर कहा हे, कि "यदि गार पांच हाजार रुपया
लेकर गुमास्ताजोके मेलमे ‘नों आइयेगा, तो कलहौसे आप,
अपनेको वडे घरका मेहमान समझिए. आज रातभर मुझको,
विचारनेका समय दिया गया है। अपनी मित्र मण्डलीमें
अभीतक इसीके विचारमें था, अब तुमसे भी पूछने आया
कहो, क्या करने कहती हो?"
.
--- : +रिपा। लिपने तीसरे ही दिन पुन परी दानों सर.. उपेपर कई चौकोदार प्याटोंके साथ विश्वनाथ यायूको योग-. खरा सोना उत्तरा-नाथ। यह शरीर नश्वर है। यह, ससारमें सदा नहीं, ग। तर फिर किस दिनके लिये यह पाप-सत्रय करे गे' रुपए काम नही देगे। फिर कठकमा टोका क्यों माथे लगाते. - जाइये, प्रसनता पूर्वक वडे घरको वायुका लेवन कीजिये। आपने चरसेसे अपने बच्चे का पालन पोपण करलूंगी। विश्वनाथ वाबूने उत्तराको यातोंपर उसको धन्यवाद मा और कपडे बदलने के पश्चात् भोजन किया। पीछे राने भी भोजन कर विधाम किया। दूनरे दिन सवेरे ही तोन कानिष्टबुल विश्वनाथ वायूको बुलाने आये। उत्तरमें होने कहा,-"तुमलोग साइन्सपेयर सादरसे कहना, कि मैं, न्य मार्गपर संडा है। आपलोग किसी प्रकारके प्रलोभनसे- सभोष्ट मार्ग विचलित नहीं कर सकेगे।" कानिय ठाने ठोकलोप्रकार दारोगानीमे जाकरीचार- मन्देशों कह सुनाश। इस समाचारले रोगाका यडा एमा। वे निगड पार चोले- अच्छा घबडाये नहीं, उनको का अला प्रतिफल मिलेगा वे मुझे माधारण सदइन् उपेपर समझे, इतना कहकर उन्होंने न मालूम अपने अफसरों भरतपुर पहुंचे। ज्योंही विनायको उसके योग, चार मिला, त्यों हो ये निभीरतापूर्वक डाके सामने, उप- त होगये । सबइन्सपेरे साददने प्यारेको भाश दो दनको S 11
खरा सोना
इथकडी लगाओ, मैं इन्हें गिरसार करने आया हूँ।"
विश्वनाथ वाबूने बडी खुशीसे अपने दोनों हाथोंको उनके आगे,
बढ़ाकर कहा-"आप प्रसन्नता पूर्वक मेरे हाथोंमें हथकडी डाल
सकते हैं। मैं झूठ मूठके फन्द-फरवोंसे डरकर सत्य मार्गसे
कमी विचलित नही होऊँगा, कमी अत्याचारियोंके अत्या
चारोंसे न उहंगा, आप स्मरण रखें, अन्तमें दूधका दूध
और पानीका पानीही होगा। यतो धर्मस्ततोजय।"
भरतपुरवासियोंके सामने ही विश्वनाथ वावूके हाथों में हथ
कड़ी देकर पुलोस उन्हें ले गयो । गांववालोंने जमानतपर उन्हें
छुडानेके अनेक यन किये, किन्तु वे नहीं छूट सके। गुमास्ता
जो इस समाचारसे वहुत प्रसन्न हुए। यथा समय विचारालय
मामला विचारके लिये पेश किया गया।
सशस्त्र सैनिकों
साथ हाथमें जजोर पहनाये विश्श्नाथ बाबु उपस्थित किये गये
उनपर राजद्रोहका दोप लगाया गया था। विचारालयके साम
दशकोंकी खाली भाड लगी थी। विश्वनाथ बाबू हर्पित वित
से उन्नत मस्तक हो खडे थे, उनको हथकडो प्रभृतिसे किस
प्रकारका भय-संकोच नहीं था, बल्कि वे उससे अपना गौर
समझते थे। यथा समय हाकिमने विचारकर अन्तिम फैसल
सुना दिया। विश्वनाथ यात्रू निर्दोप समझे जाकर मुक्त कि
गये। उनके बाहर आते हो जनताने गगन भेदा नादसे वन्
मातरम् का घोप किया। यहाँ सैकडोंकी सण्याने भरतपुर
बासी उपस्थित थे। ये लोग वडे सम्मान के साथ विश्वनाथा
।
n
स्वरा सोना
--
डरोभरी
ज्याही यह समाचार गुमास्ताजीको सात हुआ, योदी उनकी
गरमा। यादी यो पुल एफपी समा मदिराकी
त गुमालानो तथा उन सापकों को कानूनी मा
मानोरा गोगी। मभाका नापमा
समका पारा दिया गण, मिनीरा Terle
को
भरतपुर लाये । उनके मुक्त होने का समाचार पाते ही प्रामी-
गौ हर्षको सोमा न रहो। उन साने मिलकर घडा आनन्दा-
नमा मनाया। उत्तरा पति सत्कार्य पर उन्हें बधाई देने लगी,
आगालता मुरडा गयी। आज कई दिनोंसे जिन-जिन
पायों के करनेका विचार हो रहा था, पर उन्हें उस प्रकार
रने में जिन दिसायी देने लगे।
साथ ही आपके सामो कई
मैयण रिपतियों सामना करनेको समारना नाचने लगी।
मरनपुरवालोने उनको अत्याचार सम्बन्धी कई सुप मे उनपर
बापरे थे, गुमास्ताजी भर उनका स्मरण करके भी घरमा
ने लगे और उसे हर प्रकारले घर रहना पाल्याण-प्रद नहीं
था। जव हजारों रुपये व्ययकर और भी गुमास्ता
को भगा अमोष्ट निद गले कर सके, तर तो ये विशेष
मतरता के साथ वहाँ ने लगे। भरतपुरवालों। उम मा
आत्मसी मिटाई गुमास्तातीफे या गी मेग दी थी। पों
गो मिठाई उन्मलो, पितु मा उन्हें पा
২ ৰী বানাই না , dr - বা
को भी PRITTTTTTimi Arti
मालूम होता
सरा सोना . उनका रुपया जमाकर दिया करे, और प्रत्येक ग्राममें एक ऐसी सभा नियत की जाये, जिसके द्वारा प्रामीणोंपर आये नए दुःपको दूर करनेका यत्त होता रहे।" सभाका निर्णय सुनकर गुमास्ता- जी बड़े ही घबराये। उनकी आशाका स्वर्गमहल जलकर सर हो गए। सय वनी-बनायो बात विगंड गयी।. भरतपुरके गुमास्ताजीफा शुभ नाम था नटवर प्रसाद सिंह। वे जमीन्दारके अपने सम्बन्धियो में ये और यही कारण था, कि अपने मालिक नामको सार्थक करनेके लिये वे मनमाना अत्या: चार किया करते थे। पहले तो नही, पर उदयभानुफी मृत्युफे बाद हो ने अपनी धर्मपती प्रभारतीको भी यही लिवालाये थे और कचहरीके अहातेके भीतर ही अपने परिवारके साथ रहते थे। जबसे प्रभानती प्नको लाय आकर रहने लगी, तमीले वे श्रीवृद्धि करने लगे। सीके कार्यके लिये ही उन्हें कभी-कमी जमीन्दारके तोडेमे हाथ लगाना पड़ता था, किन्तु तोमी शाति नही। प्रभा- वती वरावर गुमारत्ताजीको सरी-खरी सुनाया करती नि: नयी नयी चीजोंके लिये फमाइशें करती 1.. यदि बेचारे उसका फहना नमाननेका विचार करते, तो रातकी दुलत्तियां स्मरण आ जातो, जिससे किसी न किसी प्रकार उसकी, अवहेला गई होने पाती। बरावरके तकाजोंसे तंग आकर उन्होंने प्रभावतीक इतने स्वर्णभूषण बनवाये थे, जितने संभवत. उनसे अधिक धन मानीकी स्त्रियों को भी नहीं मुस्सिर होंगे और इसी कारण प्रजापर नित नया कर लगाया जाता था। कभी घोडे
--
स्तरां सोना
1
पर
। बहाने, कमी घंडीके बहाने और कमी सायकिलका नाम
रेलेकरके वे चन्दा समा. फियों करते और 'स्त्रीके गहने
बनवाते थे। उन्होने होन प्रजापर अत्याचारका प्रचारकर
उनका रक्तं चूलचूसकर धन संग्रह किया था और जब कभी
उससे पूग न पडता या, तो मालिक कोपमे भी हाथ लगाकर
प्रभाको आशा पूरी को नाती थी। भरतपुरके निकटपतीं
अन्य कई ग्रामोंपर भो वा अनर्थसिर होका अधिकार था।
वहाँको मजा भी भरतपुरलालीका सभाोंने सम्मिलिग हो हो कर
“गुमास्तांजीमो अनीनिको पालोना करती थी। गुमास्ताजीके
सुससूर्यमा अस्त होते ही मन दुखल्पी गलिसप्रादुर्भाव हुना।
मनोको तग करने के लिये इन्होोक्तिनेही फन्द-फरेव रने,
सबमें इनोंने मुंहतो पायी। अतएव उसमे घरावर निथिलना
योने लगी। मामले मुहले पो मालिके कई राहत सपने
मनोभून हो गये। अन्यायले कर मिलनेत रास्ता बन्द हो गया।
उलटे ही अपने सिर पडे की मुबद्दमोसे अभी गुमास्ताजी मुक्त
नहीं हो पाने थे। वान अनर्थ तहत गुमास्ता नटर
- प्रसाद को सर वाते धीरे-धीरे मालूम हो गयों। उसोने भी
अपने कोयले रपया सर्च करनेको आशा ग दी। আয় ঘী
दनको रोकटं प्रभृतिको जांच करनेके लिये एक विश्वामात्र
व्यक्तिको भेजा। स तरहसे डाकी भामदशीका मा पन्द
खचका मा पहले ही जैसा बना रहा ,
पही क्सिीप्रसारमा रकावट नही माने पायो । दकि
गया, किन्तु
खरा सोना
१००
आजकल पहलेसे और भी अधिक फरमाइशे किया करती
है और जहाँ उसमें जरा भी विलम्ब हुआ, कि गुमास्ताजीकी
सोपडी पानेको तैयार होने लगती है। नटवरजी उसके
रोड रूपको देख बहुत भयभीत हो जाते हैं। हरप्रकारसे मगर
में उलझ जानेसे नटयरजी उधार रुपये मंगवाकर कार्य करते
थे। ज्योही महाजनोंको पता लगा, कि-इनसे रुपये मिलनेकी
आशा नहीं है, त्योहो उन्होने तकाजे यारम्भ कर दिये और
उसले मो कार्य नहो चलते देख, नालिशें कर दी। रोकड चेक
हो जानेपर नटवरजीके पास मालिकके कई हज़ार रुपये वाको
निकले। वस , अब पाया। उधर भी वे क्रोधके भाजन
हुए। रपया नहीं देनेपर कामसे अलग कर दिये गये और •
रूपयेके लिये नालिश कर दी गयी। उपर भरतपुरको प्रजापर
अत्याचार वाले मुकदमों में भी इनको कुछ आथिक दण्डकी
थाना हुई । स्परेके लिये चारों ओरसे एक साथ हो तकाजे होने
लगे। उस सक्टावस्थामें वे प्रभावे निकट यात गिड़गिड़ाये.
पर कुछ लाभ नहीं हुआ।, उलटे वहो इनपर बिगडी और कई
अभावों की पूर्तिको आवश्यक्ता बताने लगी। अन्तमें मनोरथ
पूर्ण होनेको सम्भावना न देख, यह अप्रसन्न हो, अपने पिताके
घर चली गयो। रपयेका कहींसे कुछ प्रवन्ध नहीं हो सका,
यह देश नम्वरजी चहुत घवडाये। अनेकों पैरो पर्डे पर सब
व्यर्थ ! विचारालयसे सिर्फ दो, सप्ताहका समय मिला था।
उसके भीतर दण्टफा रुपया नहीं चुकानेसे फठिन जेलकी
-
खरा सोना निना सहनी पडेगी। जब कही से कुछ नहीं मिला, तो चन्तमे फिर अपनी प्राणेश्वरी प्रभाके निकट प्रार्थना फरनेके लिये वे उसके पिताके घर गये। यहां एकान्तमें उन्होंने प्रभावी मे में टकर कहा-"प्यारी प्रमा, मैं पहुत सङ्कट में पड़ा हूँ इस समय तुम्हारे सिवाय मेरी सहायता करनेवाला इमरा कोई नहीं है।" प्रमा-(कुमलाकर ) हरोजी, मेरे सामने नसरा करने माये हो ? में सो होकर तुम्हारी सहायता और रक्षा कैने कर्क ? मेरे पास रुपया आया कहा ? तुम पुरुष किसलिये १ इसप्रसार स्त्रीके निकट गिडगिडानेमें लजा नहीं मालूम होती? छि। लोक-लाज सब पी गये? नटवर-यदि इस बार तुम मेरी रक्षा नहीं करोगी, ते स्मरण रह. में जेलहोमें सडकर मरजाऊँगा, वहाँसे रक्षाको दूसरी कोई युक्ति ही नही दिपाती । प्रभा--जाओ, हटो, मेरे सामनेने। जहाँ जी चाहे, सडकर मरो। मैं समझ चुकी कि आजके फईदिन पहलेले ही ईश्वर- ने मुझे विधवा बना दिया मैं' सुखपूर्वक बैरव्य यन्त्रणा सहगी। नरवर प्रभाका नोरस उत्तर सुन पुन गिडगिडाकर बोले- 'मैं जाता है कि तुम्हारे पास रपये हैं, यदि तुम उन रुपयोंसे नेरी महायता नहीं करना चाहती, तो मत करो, किन्तु मेरे ही निनाये ये अनेकों वर्णभूपण हैं इन्दीमेंसे दो एफ देकर मुझे
C
वरा सोना
.
.
-
आपत्तियोंसे छिनाओ, मापत्तियोंसे स्टनेपर मै- वह भी,
उपार्जन कर लादूंगा।
, - भूपण देनेका नाम सुनतेही प्रभा सिहिनीसो गर्जन करती
हुई . नटवरको टाटती हुई; धका- देवर- बडबढ़ातो. भीतर
चली गयी।
.
T
तेरहवा
FOR
उका महीना था। जिनका एक वजा था । सूर्यदकी
चमचमाती-हुई-किरणोसे-पृथ्वी उत्प्त हो
रही थी। सर जीवजन्तु कहीं न कहीं छाया ।
आश्रयमे उस ज्वलन्त नीमको चिता-रहे थे।
बड़े, बड़े लक्ष्मीपात्रोंके महलोंमें अनेक प्रकारके यनोंले ठण्डलमा,
प्रवन्ध्र. पिया गया था.और वे लोग मध्याह्न समयमें सुनते।
निद्रादेवीको गाउमें सो रहे थे किन्तु ऐसे समयमे भी उत्तरा-
विधाम नहीं लेती थी; कमरेको-भीतर एक चारपाईपर उसका
प्राणाधार. मदन और दूसरीपर विश्वनाथ यानू सोचे थे
और वह उन्हें पंपा- हाल रही-थो- चारपाईले कुछ, आने
उसका प्यारा चरपा विश्राम कर रहा था, उसी समय इसके
.
-
-
-
सरा सोना
। दरवाजे पर फिसीने क्षीणस्वरसे गृहस्वामीको पुकारा । उत्तराने
उत्तरमें कहा- कौन है ? क्या चाहते हो ?"
उत्तराके उत्तरमै पिसी चीजके गिरनेका शट सुनायो पटा।
वह दौडती दुई दरवाजे की ओर दढी। देसतो क्या है, कि एका
बादश वषीय -दुर्वल भिक्षुक उसके दरवाजे पर गिर पड़ा है।
उसको देखते ही उसने विश्वनाथ बापूको उठाया और पसा
पानी लिये शीता पूर्वक आगे वडी। गिरे हुए वालकके मुसमे
पानी डालकर हवा करनेपर उसने यावं सोली और कृतज्ञताभरी
झरिसे उसकी ओर देखने लगा। कुछ देरमै उम्पतिके चलते
उसको शान हुआ.। उस वडी. नन्नतासे पुल भोजन मांगा।
उत्तराने प्रेमपूर्वक उसको भोजन कराया भोजन कर लेनेके छ
समय बाद उसके हसे -पुष्ट ग्राते. निक्लने लगी। उत्तराने
कई दिनों तक उसको सुस्वादु भोजन देकर रखसा और एकदिन
उसका..नाम-बाम.. पूछकर कहा,-"यदि तुतारी इच्छा हो
तो,यहाँ रह सकते हो, अन्यथा सी इच्छा हो करो। उत्तरावर
यातोंको सुनकर वर-बष्टुत सन्तुष्ट होकर गोला-"माता ! दि
रुष्ट न हो, तो मुझे अपनी सेनामे रक्यो। .याप को आज्ञा
फरे गी, मैं उसे सहर्ष पालन करू-गा।"
उसी दिनसे वह उत्तराके यहाँ रहने लगा और उसको याांके
फाम प्रसन्नतापूर्वक करने लगा। यह समय समयपर काते
हुए. सूतको चालामें लेजाकर पेच लाया करता था मोर धरके.
प्रासही लगी हुई वाड़ीमें परिश्रम पूर्वर.फन्द-मूल लगाया परत:-
.
.
--
खरा सोना १०८ था। । . थोडे ही दिनोंमें विश्वनाथ और उत्तराको उसने अपने कार्यों से ऐसा प्रसन्न किया, कि वे लोग इसको अपने घरके लडकेकी मांति प्यार करने लगे। उन्होने उसका नाम "चेतन- दास" रखा। मदनको उससे बडा प्रेम हो गया। दोनो एक दूमरेके साथ पढने लिखने, खेलने कूपनेमें मन लगाने लगे। चेतनदासकी सहनशीलता और बुद्धिचातुर्यसे दम्पतिको बड़ा आनन्द होने लगा। विश्वनाथ वावूके उद्योगले भरतपुरमें भी एक अच्छी पाठशाला सोली गयी, जिसमें दो सुयोग्य अध्यापक नियुक्त किये गये। उनके कार्यो को देख भालका मार विश्वनाथ बाबू पर हो रहा। अध्यापकोंके भोजनादिका प्रबन्ध मुठिया द्वारा ठीक कर दिया गया। मदन और चेतनदास भी वहीं पढ़ने लगे। धीरे बोरे भरतपुरको काया पलट गयी। पहले वहावालों- की शिक्षाका विशेष रूपले कोई प्रबन्ध नही था, 'छोटीसी पाठशाला थी, जो नहींके बराबर थी। अब वह एक अच्छे विद्यालय के रूप में हो गयो और धीरे-धीरे माध्यमिक अग्रेजो शिक्षातकका प्रवन्ध होगया। विश्मनाय यान का अधिक समय सभा समाजोंके कार्यों होमे पोलता था। उसोमें उनको आनन्द भी मिला था। प्रारम्भिक कार्यकाल में तो उनको भूठे झूठे मुकदमोके झमेलोंने साडिपाया, कि और किसीको उनका दर्शन भी दुर्लभ हो शायिराम फरसे विपत्तियोंका सामना करने पर सिर्फ एक - । -- I १०६ खरा सोना विजय भी उन्हीके हाथ लगी। अत्याचारियोके अत्याचारों के जनाजे निकल गये। गुमास्ताजी बडे घरमें कोल्हपर चले गये। भग्तपुरसे हाहाकारको विदाई हुई और शातिकी स्यायो स्थापना हो गयी। विश्वनाथ (पाव का नाम भागमें तपाये हुए "परे सोने को मांति सर्वत्र चमकने लगा । गुमास्ता नटवर प्रसादके जेल जातेही जमीन्दारके अमले भी विल्कुल सीधे हो गये। हर प्रकारसे भरतपुरमे शान्ति स्थापित हुई। यहाँके रहनेवाले सुख चैनसे रहने लगे सही, किन्तु धावू विश्व- नाथ प्रसाद जीको चैन नहीं था। धोरे-धीरे उनकी प्रकृति देश कार्यों की ओर होती हो गयी। आप बड़ो-वडी राष्टीय समाओंमे आने-जाने लगे और वहाँ भी लोगोंसे उनका परिचय होने लगा। थोडे ही दिनोंमें लोगोंको उनको स्वार्थ सहित देश सेवाका परिचय मिल गया। फिर क्या था। उनकी गिनती नेताओंको श्रेणीमें होने लगी। वे यथाथमें सच्चे नेताको मोति कायकुशल निकले। संन्यासी निरअनदाससे प्राय इनकी मेंट हुआ करता थो, किन्तु एफ दूसरेको पहचानते नहीं थे। सयोगवश एकदिन सयुक प्रान्तको प्रान्तीय राष्ट्र सभासे निरञ्जन जो लोटे आरहे थे, उनके सायदा विश्वनाथ वार् उनसे कुछ राजनैतिक चर्वा करते आरहे थे, कि संन्यासोजीने याचदा उनसे उनका शुभ नाम और निवासस्थान पूरा। मामये साथ ज्योही विश्वनाथ वायूने अपने निवास्थानका नाम पताया, त्यही संन्यासीजीने भाश्चय भरी पिसे उनकी भोर पुरा देर
खरी सोना
देपर उन्हें अपने गलेले लगाकर कहा भाई विश्वनाथ
मैं
तुम्हारा परिचय पाफर बहुत प्रसन (आ। “फहो,
मेरा मित्र
उदयभानु और उसका प्रिय पुत्र मदन कहां और कैसे हैं।"
संन्यासोके मुखत इतनी बात सुनते ही विश्वनाथ बड़े
ध्यानपूर्वक संन्यातीके मुखकी और देख, सहसा उनके पैरोंसे
लिपटकर रोते हुए बोले-"पूज्य प्यारे बाबू । आपके दर्शनले
यह अभागा हतार्थ मुआ। आज मुझे यथार्थमें वैसाही आनन्द
होता है, मानो मेरे भनजे स्वर्गले आकर मुझको दर्शन देने
आये हैं।"
उस मिलनका दृश्य ही अपूर्व था। उदयमानुके स्वगीय
होने की बात सुनते ही संन्यासी निरजनटास पृथ्वीपर गिर
'बडे। बहुत आग्रह-अनुरोध करके विशनाथ संन्यासीजीको
भरतपुर लाये। निरसनदास मदन को देरा बहुत प्रसन्न
हुए। उमोदिन चेतनामका परिचय भी सन्यासोंजीने पत्रा,
जिससे विश्वनाथ वानूको पता मिल गया, कि यह भदनका
• भिमेरा भाई, गायत्रोका मात्एन है , उसका परिचय पाकर'
। और 'निश्वनाधको अत्यन्त हर्ष छुआ, साथही उसकी
वित्तिर्यातदुत भी कम नहीं हुआ।
'मदन और चेतनदासके योग्य होनेतका कमी-कमी
नगा या उनकी देखभाल में घर आजाया करते लेकिन
वह देना भाई 'चतुर हुए और उचराको भी एक पुत्ररत
चुका, तमाउनको घरको चिन्ता विल्कुल टसो गर्यो और
-
२११ परा सोना Audio - चे सुपपूर्वक । सन्यासी निरसनदास के साथ रहकर अपना शेष जीवन देश-कायमें व्यतीत करते रहे। उत्तराके सुपरवले उराके घरको अवस्था भी पद्धत परिपतन हुमा, यह भी लडकोका देखेमाल करने के बाद उनके कार्यों ने प्रफुलित रहती हुई जीवन-यापन करने लगी जर कमी, अश मिलता, किसी न किसी ,उत्तम पुस्तको अवलोकन करने में ही उत्तरा सपना समय -विताती थी। ललिता वानू यथासमय अवकाश पानेपर 'उत्तरा'को देखने या जाया करते थे। रूपवतीको बहुत दिनोंसे पुनोंसे मेंट नहींई थी, जिसमें वर पत पडारही यो। यद्यपि उत्तराको इच्छा भी माताके दर्शनको कुछ कम नहीं थी, किन्तु अझटासे मरकाशन मिलनेसे वह मायके नहीं जासकती थी। ललिता बाबूने कईचार उले-थोडे-समयके लिये भी .. पटने चाटनेको का था, पर इसके उत्तरमे उत्तरा। निोदन किया था कि में अवश्य माता जीके -दर्शनाय जाऊँगी, जरा."गरकाश मिल जाने की देर है। उत्तरोने जवसे विश्वनाथ बाबू के घरों पैर रखना था, यथार्थमे तवले. घेचारीको नाममातका मोअर- काश नहीं मिला नित्य नई नई भाफेलोंसे सामना करना पड़ा, विपत्ति-विद्यालयमें अनेकाफठिन कठिन परीक्षाये देनी पड़ीं, मिन्तु सव परीक्षाओं में उसने सफलता पायो, उन सा बखेडोको दूर होनेपर उत्तरोने पिता के पास पत्र लिखकर सूचित कर दिया शरा सोना ११२ - कि मैं अमुक तिथिको, श्रीचरणोंके दर्शनार्थ आऊंगी। यथा. समय ललितावाको पुत्रोका पन मिला, पत्र पढ़ते ही उनका मुख कमल खिल गया। नियत समय से कुछ पहले ही आज उन्होंने अपने कार्यालयसे घरका मार्ग लिया। रूपवती उत्तरासे मिलनेके लिये व्याकुल हो रही थी। ययपि दोनोंसे पत व्यवहार जारी था , किन्तु उससे दोनोंमेंसे किमोको सन्तोप नहीं होता था और जबसे रुपवतीने पुत्रीका कष्ट समाचार सुना था, तमो से वह बहुत अधोर रहा करती थी उस दिन पतिके औफिम जानेके वाद हो वह अपने कमरेमे बैटो कुछ देर उत्तगहो- के विषयमें चिन्ता करनेके बाद उसोको पन लिख रही थी, कि उघरमे ललिताबाबूने उस कमरेमे प्रवेश किया, असमयमें पतिको कार्यालयले आया दग्व बोला -"आज इतने पहले क्यों मा गये । ललिता० - "यो ही चला आया, इन दिनों कार्यालयमें उतना कार्य भी नही है, पेठे-बैठे कुसी तोडना उचित नहीं समझा और कुछ सिरमे भी दई था। रूपवती-पे सिर में दर्द। कहिये तो, अब केसा है? ललिता-किसी प्रकारकी चिन्ता न करो, धवडानेकी बात नहीं है। बहुत साधारण दर्द और वह भी कम हो रहा है। रूपवती-समय खराव है, इसीसे डरती हैं। ललिता.-नहीं, किसी प्रकारका अर मत करो। कहो बामो तुम पया लिख रही थी ? अपवती-भोर मया लिखूगी। इधर कई दिनोंसे उत्तराका' - T -- - - ११३ खरा सोना पया आपको । इराकी कुछ कोई पत नही आया, इसीसे चित्त बडा चिन्तित रहता है। उसोको पत्र लिख रही थी। अच्छा हो, यदि आप उसको एकवार देस आयें। इसबार जिस प्रकार हो, उसको अवश्य लिया लानेका यत्न करेंगे। वच्ची जावनमर दुख ही उठाती रही। आप दूसरोंको तो नौकरी दिलाते हैं। किन्तु अपने दामाद के लिये कुछ नहीं करते। अगर उसको कोई अच्छी जगह मिल जाती, तो नह राह राहकी धूल क्यों फांकता ? सुनती हूँ, कि उत्तरा भी चरखा चलाती-चलाती आधी हो गयी है। चिन्ता नहीं है?" ललिता-तुम व्यर्थ ही घराती और मुझे कोसती हो। ईश्वर उत्तरा जैसी कन्या सव फिसीको दे । यदि वह चरसा कातकर ही घर-खर्च चलाती है, तो तुमसे हरप्रकार भली है। उसे कभी किसी महाजन-दूकानदारको लाल-पीली आँखे तो नही देखनी पटती' यदि में सैकड़ों रुपये मासिक प्राप्त करता है, तो फिस कामका? महीना अन्त होते न होते तकाजोंके तोते लगजाते हैं। जब कभी चेतन मिलनेमें दो-चार दिनका विलम्य हो जाता है, तब दूल्दा ही नही जलता। वह हर प्रकारसे भली-बड़ी है, साधारण भोजन- पत्रोंके साथ सानन्द जीवन-च्यतीत करती हुई देशका बहुत कुछ कार्य कर रही है। विश्वनाथको नौकरीके पियो मुसे दोप देना व्यर्थ है। मैंने एक बार उससे इस विषयमें कहा था , किन्तु मैं उसको इस ओर अभिरुचि नदों देखता। यह भी जो t
है
सरा सोना
११४
m
१
.
कुछ करता है, अच्छा ही है। इस नश्वर शरीरसे जहाँतक
हो सके, दूसरोका उपकार करना ही चाहिये ।
रूपवती,--मैं भी इतना समझती हूँ, किन्तु अपने प्राणोंकी
रक्षा करके ही सब कुछ करना होता है। साथ ही लड़के
वालो के लिये भी कुछ अवश्य सञ्चय करना चाहिये। यदि
उसके पिता उसके लिये कुछ भी स्थायी सम्पत्ति छोड जाते,
तो आज उसको इतना कष्ट नही उठाना पडता ओर मेरी उत्तरा
भी इन भीषण विपत्तियोमे पड़कर नहीं झुलसती। खैर, इसकी
चिन्ता पीछे को जायगी , किन्तु अभी उसके लानेके विषयों
क्या कहते हो?
ललिताप्रसादने अपनी धर्मपती रूपवतीके प्रश्नके
उत्तरमें उत्तराका पत हाथमें देकर कहा,-"यह पल आजही
आया है, याजके आठवे दिन उत्तरा स्वय आजायेगी, पढ़लो।"
“आजके आठवें दिन उत्तरा स्वयं आजायेगी",
घाफ्यसे रूपवतीको अपार आनन्द हुमा। उसने जल्दी-
जल्दी पत्रको पढना आरम्भ कर दिया।
1
F
सरा सोना + परिच्छेद चौदहवा गतपुरके निकट हो बाबू महावीरप्रसादकी काटन-मिल स्थापित थी और उत्तरोत्तर उन्नतिके मार्गमें अग्रसर हो रही थी। दशही पन्द्रह वर्षों के अरसेमें महावीर बाबू करोडपति कहे जाने लगे। इनके कार्यालयसे भारतके वाहर भी अच्छी तादादमें माल बाहर भेजा जाता था। जगतपुरसे लगे हुए उत्तर की ओर बडे लम्बे-चौडे मैदानमें उनके कार्यालयका भव्य भवन सुशोभित हो रहा था। कार्यालयसे लगा हुआ ही उनका दोमजिला निवास-गृह था। प्रेमाके साथ वे वही रहा करते थे। प्रेमा जव तव जगतपुर अपने पिताके घर माया करती थी। कभी-कभी तो उसकी माता भी स्वयं प्रेमोके घर जाया करती थी। प्रेमाकी माताको 'हेमा' नामकी एक और छोटी लडकी थी। इन दोनो बहनोंके अतिरिक उसको कोई तीसरी सन्तान नहीं थी। प्रेमाके पिता भी महावीर-काटन- मिलमें ही एक प्रधान कर्मचारीके पदपर नियुक्त थे। हेमाका विवाह महावीर घावूके छोटे भाई याधू रघुवीरप्रसादजीसे हुआ था। रघुवीर याधू भागलपुर में वकालत करते थे। यद्यपि उनकी वकालत उतनी नहीं चली थी, तोभी अपने घरके खर्चके
-
खरा सोना
।
लिये किसीके आगे गिडगिडाना नहीं पड़ता था। हेमा भी
पतिके साथ ही भागलपुरमें रक्षा करती थी। जव-कभी हेमा
के साथ वाचू रघुवीरप्रसाद, भाई और भाभीसे मिलने जगतपुर
जाया करते थे, किन्तु वहाँ इन लोगोंके साथ महावीर धावूका
व्यवहार उतना अच्छा नहीं होता था। प्रेमा भी हमासे दृदय
सोलकर नही मिलती थी। न मालूम, इस प्रकारके व्यवहारसे
वह क्या भला सोचती थी। मैं कुछ और ही समझता है । वह
यह, कि महावीर वायूने अपने उद्योग और परिश्रमसे करोड़ोंकी
सम्पत्ति अर्जित की थी। स्वार्थ उनको सिसा रहा था, कि देसना,
अपने अनुजके साथ प्रेम पूर्वक वर्ताव नही करना, अन्यथा आधी
सम्पत्तिसे हाथ धो बैठोगे। मेरा जहातक अनुमान है, प्रेमा भी
इसी कारण अपनी छोटी बहिन हेमाले सद्भाव नहीं रसती ।
हेमा, वहिन-बहनोई, या यों कहिये, कि जेठ-जेठानीका व्यवहार
अच्छा न देख ताड़ गयी, कि इनलोगोंके यहाँ आना अच्छा नहीं
है और इसी विचारसे उसने अपने पति रघुवीर वावू से भी यह
बात कह दो, कि हमलोगोंका अब यहां आना अच्छा नहीं ;
चयोंकि हमलोगोंके यहाँ आनेहीसे नापके भाईकी मुख मुद्रा
भयकर हो जाती है। मेरी प्रेमा दीदी तो मुझसे प्रेम पूर्वक
घोलती भी नहीं।
न मालूम धयों, उसके सिम्पर मैं वोझसी
प्रतीत होती है। रघुवीर यांबूने, हेमाके कहनेपर उतना ध्यान
नहीं दिया था और न अभीतक उन्होंने भाई और भाभीके
'ध्यवहारपर ही उतना ध्यान दिया था, लेकिन हेमाके कहने
त
+
+
खरा सोना पर वे इसकी जाचकी फिक्रमें अनश्य थे। अव हेमाका प्रेमाके यहाँ आना तो विल्कुल वन्द ही होगया, किन्तु रघुवीर चाबूका आना-जाना अभी जारी या और वह भी इसी मतलव- से, कि देखें, हेमामा कहना कहातक ठोक है। किन्तु इसके लिये वकील साहवको अधिक समयतक नहीं भटकना पडा, शीव ही पता लग गया, कि हेमाका कहना फहातक सत्य है। एकवार बड़े दिनको छुट्टियों में हेमाको भागलपुरहीमें छोड, चे भाईसे मिलने के लिये जगतपुर आये। यहाँ इसवार भाईका व्यवहार इनके साथ जैसा हुआ, उसको चे भूले नही और उसीसे पता लग गया, कि हेमाका कहना कहांतक ठोक है। रघुवीर बाबू ठीक दशही वो दिनको महावीर वायूके यहाँ आये। वहाँ आने पर न तो उनको भाई गोर भामीमे भेट हुई और न किसीने भोजनहीको पूछा । महावीर यापूने नौकरके द्वारा कहला भेजा, कि मुझको अभी किसीसे मिलने और वाते करने का समय नहीं है। उसको कह दो, कि इस प्रकार मुझे तंग करनेको चेटा न करे। नौकरने आकर रघुवीर वायूसे ठीक उसी प्रकार सर वाते कह दी। रघुवीर वाचू माईसे सम्मानित होते एए सीधे भागलपुर लौट गये। अनुजके लौट जानेको यात सुनकर महावीर वायूप्रसन हुए। उन्होंने समझा, कि सिरको बला टलो। ज्याही प्रमाको यह शुभ समाचार मिला, त्याही यह स्वामीके सत्कार्यपर उन्हें बधाई देने मायो। उसके भाते दो महापौर वायने कहा,-"आजको याते तुमको शात हुई।" - सरा सोना '११८ प्रेमा-यही न कि आपने अपने अनुजको अपमानित कर घरसे निकाल दिया? महावीर--नही, यों कहो कि सिरकी बला टाली । प्रेमा-सैर, यही सही, अच्छा किया। यदि उसे कुछ भी आत्म-गौरव होगा, तो यहाँ फिर कमी न आवेगा। महावीर-लेकिन यह कार्य अच्छा नहीं हुआ। न मालूम, उसके मनमें कितना दुःख हुआ होगा। फिर तुम्हारी बहिन सुनकर न मालूम क्या कहेंगी? प्रेमा-आप व्यर्थ ही चिन्ता करते हैं। यदि उन लोगोंके मनमें आपके व्यवहारसे कुछ दुःख हुआ हो, तो होने दो, अच्छा ही है। मापहीकी कृपासे वे आज मनुष्य हुए हैं। पढा लिखा- कर आदमी कर दिया, अब क्या चाहिये । यदि उन्हें प्रसन्न रखना चाहते हैं, तो मिलमें उनको आधा हिस्सा दे दीजिये। लेफिन याद रहे, यह कलियुग है। यहाँ किसीका कितना उप- कार धयों न किया जाये, लेकिन लोग कमी कृतज्ञ नहीं होते। महावीर-तुम्हारी यातोहीपर विश्वास करके मैंने उसे फटकारा है, अब तो वह पुन' लौटकर यहाँ नही आयेगा। प्रेमाके साथ महावीर वाबू अन्त पुरमें इसी प्रकार बातें कर रहे थे, कि धायने आफर सूचना दी, कि मिलका जमादार याहर सडा है। आपसे कुछ फहने आया है। महावीर बानू मिलके जमादारका नाम सुनते ही बाहर आपे। जमादारने बढे हो आदरसे अभिवादन कर निवेदन . ।
खरा सोना
किया,-"मैनेजर साहवने यह सूचना देनेकी आज्ञा दी है, कि
आज मिलमे हडताल हो गयो। कोई मजदूर अपने कार्यपर नही
ठहरा। सिफ आया और प्रार्थनापन देकर चला
गया
*
मिलमे हडताल होनेकी वात सुनते ही यानू साहय घेतरह
घबराये। शोधता-पूर्वक कपडा पहन, मोटरसाइकिलपर सवार
होकर मिलकी ओर चले।
मिलके वाहर मैदानमें कार्य
करनेवाले कुली-मजदूर्गेको सभा बैठी हुई थी। ये लोग
आपसमे विचार कर रहे थे। उनमेंसे एक अपने मन्तव्यको सूब
उच्चखरसे अपने साथियोंको सुना रहा था । उनलोगाने आपसमें
विचार कर तय करलिया, कि यदि इस विकराल दुष्कालमें
भी हमलोगोंकी मजदूरी नहीं वढायी जायेगी, तो हमलोग कभी
कार्यपर नही जायेगे। साथ ही मिलके मैनेजर यदि इसी-
प्रकार हमलोगोंपर कोडेबाजी करते रहे गे, तोभी हमलोगोंकी
हडताल जारी रहेगी। जिस समय उन मजदूरोंको समामें ये
प्रस्ताव पास हो रहे थे, उसी समय उनके बगलसे महावीर बाबू
मिलकी ओर जाते देख पडे । उनको जाते देख्न, मजदू में फाना-
फुसी होने लगी। किसोने कहा,-"मालिक आरहे हैं।
मालूम जिसपर अप्रसन्न होंगे।" किसीने करा,-"अप्रसन
होकर ही मेरा फोनसा अनिय करेंगे। यदि आधा पेट भोजन
देकर कोई किसीसे कार्य लेता रहे, तो ऐसा कितने दिन चलेगा?
रेसे नराधमको प्रसन्न रसनेसे लगम री पया ?" कोई
कहता,-"मालिकके आगे निवेदन फरनेसे क्षति पया है। चलो,
.
खरा सोना १२० ? , सव कोई उनसे जाकर अपनी बाते कहें।" मापसमें इस प्रकार वाते होते देख, उनके सरदारने कहा-"अमीसे आपलोग ऐसा करनेकी इच्छा चयो करते हैं ? जरा सब करें, सब कार्य ठीक- ठिकानेहीसे होगे। मालिक मिलकी ओर जारहे हैं, अच्छी बात हैं। वहा मैनेजर साहब उनको हमलोगोंकी मांग ' सुनाही देगे। देखिये, उसपर ये क्या आज्ञा देते हैं ? जब मजदूरी करके ही भोजन पाना है, तो फिर नवरानेकी क्या आवश्यकता? एक नही, अनेक स्थानोंमें मजदूरीके दरवाजे खुले है। 'जरा शान्तिपूर्वक धीरतासे काम लीजिये।" सरदारका व्याख्यान सुनते ही मजदूरोंमें शान्ति हो गयी, वे लोग चुपचाप बैठकर सरदारकी आज्ञाको 'प्रतीक्षा करने लगे। वावू महावीरप्रसादने मिलमे जाकर देखा, कि एक मजदूर भी कार्य करने नहीं आया। मिलके वडे -घड कर्मचारी, क्लार्क प्रभृति अपने कार्य पर आरूढ थे। पर मशीनें सवकी सव वन्द पडी थीं। मालिमको आया देख, मैनेजरने सब बाते उनसे कही। महावीर बापूने मैनेजरले कहा,-"पहले इसका पता लगाना आवश्यक है, कि इनका अगुआ कौन है ?" मैंनेजर-मैं सब पता लगा चुका हूँ, हमारे अनुमवसे तो कार्यालयके दो-तीन सार्क ही उनको भडकानेवाले हैं। महापौर- -उन लाों के नाम आप नोट करले और अभी तो उनसे कुछ न कहें', पर पीछे उन्हें अपने कियेका १ १२१ -- खरा साना भतिफल देने में किसी प्रकारको कोर-कसर नही रसेगे, अभी तो झिसो युक्तिले इन मजदूरोंको शोध राजी कर कामपर लानेका यत करना चाहिये। मैनेजर-मैंने भी ऐलाही विचारा था, सिर्फ आपसे आशा लेनेकी देर धी। महानीर-मजदूरोंको राजी करनेका आपने क्या उपाठा सोचा है। 1 मैनेजर-उनकी माग किसी अशमें पूरी कर देनेहीसे वे लोग कार्यारम्भ कर देगे। महागीर--अच्छा हो, यदि किसी प्रकारका प्रलोभन दे, उन मजदूर सरदागेको मिलाया जाये जिनके कहने मुताबिक मजदूर लोग चलते हैं, क्योकि इनकी चाल तो भेडियोसे मिलती है जिधर ही प्रधान जायेगा, ये लोग भी उधर ही नाम बन्द किये दौड पड़ेंगे। मैनेजर-आपका कहना ठीक है, लेकिन उनके सरदारोको प्रलोभन देकर अपनी ओर मिलाना टेढी खीर है। वे लोग अन- पढ, जाहिल, हठी हैं। जिसे वातके लिये हठ करे गे, उसको पूरा करके ही छोड़ेंगे। महावीरप्रसाद-आप भूलते हैं, मैनेजर साहर! रुपया सब करा सकता है। उसमें वह मोहनी शक्ति है, कि जिसको चाहे उसीको अपने कब्जे में कर ले। मैनेजर-आपका कहना बिल्कुल टीक है, लेकिन- } १२२ खरा सोना 1 मैं महा०-लेकिन क्या ? आप इनके सरदारोंको बतायें, हो उन्हें बुलवाता हूँ। मैनेजर-मैंने उन सरदारोंको बुला भेजा था। किन्तु वे लोग विना सव मजदूरोंके कार्यालयमें आना नही चाहते। मैंने कईवार उनको कहलाया , किन्तु वे राजी नहीं होते। महावीर-आप उनके नाम अलग लिस ले और चले, मैं उन्हें रही एक-एक कर बुलाऊँगा। मैनेजर साहबने एक अलग कागजपर कोई दश-पन्द्रह मजदूरोंके नाम लिखकर महावीर वाबूके हाथमें कागज दे दिया। महावीर वायू, मैनेजरके साथ कार्यालयसे वाहर, जहाँ मजदूरोंकी जमायत जमा थी, उनसे कुछ दूर अलग कुसी मैंगवाकर बैठे और एक-एक करके कागजपर लिखे हुए मज- दूरोंके नामको पुकार-पुकारकर चुलाना आरम्भ किया आनेके पहले वे लोग आपसमें न मालूम क्या विचार करते रहे, पीछे आना आरम्म किया। महावीर घावने उन मजदूरोंसे एक- एक कर कई प्रश्न पूछे, जिनका उत्तर सबने एकही दिया, जिससे उनको उन मजदूरों की दृढताका पता लग गया। पहले तो उन्होंने उनसे कहा, कि तुमलोग काम करना बन्द न करो, तुम्हारी प्रार्थनापर विचार किया जायेगा , किन्तु किसीने इसको स्वीकार नहीं किया। उन्होंने मजदूरोंके सरदारों को कुछ लोम भी दिया , लेकिन वे नहीं हटे । उन्होंने किसा प्रकारसे कार्य होनेकी सभावना न देसी, तो , जय
~~
खरा सोना
कुछ धमकी भी देने लगे, किन्तु वे सबके सब अपनी प्रतिज्ञापर
ऐसे अड़े थे, कि महावीर वाबूके साम, दाम, दण्ड और भेद,
सब निष्फल हो गये। अव किसी तरह कार्य नहीं निकला, तो
सिर्फ चार दिनके लिये मिल बन्द कर देनेको आशा देकर वे
घर लौट आये। प्रेमा मिलकी हडतालसे वडी घबरायी हुई
थी, उसको इसी वातकी चिन्ता श्री, कि कहीं क्रोधमें आकर
मजदूर लोग लूटपाट करना न आरम्म कर दे । पीछे उनको
सभालना कठिन हो जायेगा। महावीर वावून प्रेमासे मिलकी
सब वाते कहकर सम्मति पूछी, कि क्या करना चाहिये ?
उत्तरमें प्रेमाने कहा-"पहले मजदूरोकी मांग पूरी करके उनको
कार्य पर ले आना चाहिये। पीछे उनके भडकानेवालोका पता
लगाकर उनको पुरस्कार देनेका यन होना चाहिये।"
महावीर चावू स्त्रीको वातको वेदवाक्य समझते थे।
इसीलिये दूसरे ही दिन मजदूरोंको माग अनेक अ शॉर्म
पूरी कर उन्होंने उन्हें कार्य करनेकी आशा देदी। मजदूरोंने
आरम्भ कर दिया। मिलमें एक प्रकारसे
शाति हो गयी। अब मिलके मैनेजर साहय उन मजदूरों
और पलाकों को निकालनेकी फिक्रमे लगे, जिनके यहकारसे
मजदूरोंने हड़ताल को थी। हडताल मिटनेफे दोही महीने
पाद रामभरोसे नामक हाफ को नौकरी छोर दोषी माता
दी गयो। मोजर साहयको इरिमें यही अधिक अपराधी
देहरा। रामभरोमेने मेनेजरसे अपराध यतानेकी प्रार्थना की, फि.
कार्य करना
१२२ सरा सोना महा०-लेकिन क्या ? आप इनके सरदारों को बताये', मैं - ही उन्हें बुलवाता हूँ। मैनेजर-मैंने उन सरदारोंको बुला भेजा था। किन्तु घे लोग विना सव मजदूरोंके कार्यालयमें आना नहीं चाहते। मैंने कईवार उनको कहलाया; किन्तु वे राजी नहीं होते। महावीर-आप उनके नाम अलग लिख ले और चले, मैं उन्हें वही एक-एक कर बुलाऊँगा। मैनेजर साहबने एक अलग कागजपर कोई दश-पन्द्रह मजदूरोंके नाम लिसकर महावीर वाबूके हाथमें कागज दे दिया। महावीर यावू, मैनेजरके साथ कार्यालयसे बाहर, जहाँ मजदूरोंकी जमायत जमा थी, उनसे कुछ दूर अलग कुसी मैंगवाकर बैठे और एक-एक करके काग़जपर लिखे हुए मज दूरोंके नामको पुकार-पुकारकर बुलाना आरम्भ किया। आनेके पहले वे लोग आपसमें न मालूम क्या विचार करते रहे, पीछे आना आरम्म किया। महावीर गवूने उन मजदूरोंसे एक- एक फर कई प्रश्न पूछे, जिनका उत्तर सबने एकही दिया, जिससे उनको उन मजदूरोंकी दृढ़ताका पता लग गया। . पहले तो उन्होंने उनसे कहा, कि तुमलोग काम करना बन्द न करो, तुम्हारी प्रार्थ नारर विचार किया जायेगा , किन्तु किसोने इसको स्वीकार नहीं किया। उन्होंने मजदूरोंके सरदारोंको कुछ लोम भी दिया , लेकिन वे नहीं हटे। उन्होंने किसी प्रकारले फाय्य होनेकी संभावना न देखी, तो - - - जन . -
खरा सोना
कुछ धमकी भी देने लगे, किन्तु चे सरके सव अपनी प्रतिज्ञापर
ऐसे अड़े थे, कि महावीर याबूके साम, दाम, दण्ड और भेद,
सब निष्फल हो गये। जब किसी तरह कार्य नहीं निकला, तो
सिर्फ चार दिनके लिये मिल बन्द कर देनेकी आशा देकर घे
घर लौट आये। प्रेमा मिलकी हडतालसे बडी घबरायी हुई
थी, उसको इसी यातकी चिन्ता थी, कि कहीं क्रोधमें आकर
मजदूर लोग लूटपाट करना न आरम्भ कर दे । पीछे उनको
सभालना कठिन हो जायेगा। महावीर वावूने प्रेमासे मिलकी
सब बाते कहकर सम्मति पूछी, कि क्या करना चाहिये ?
उत्तर में प्रेमाने कहा-"पहले मजदूरों की मांग पूरी करके उनको
कार्य पर ले आना चाहिये। पीछे उनके भडकानेवालोका पता
लगाकर उनको पुरस्कार देनेका यत्न होना चाहिये।
महावीर वायू स्त्रीकी वातको वेदवाक्य समझते थे।
इसीलिये दूसरे ही दिन मजदूरोंको माग अनेक अशोमें
पूरी कर उन्होंने उन्हे कार्य करनेकी आज्ञा देदी। मजदूरोंने
आरम्भ कर दिया। मिलमे एक प्रकारसे
शाति हो गयी।
अब मिलके मैनेजर साहब उन मजदूरों
और क्लॉकों को निकालनेकी फिक्रमें लगे, जिनके वहकानेसे
मजदूरोंने हडताल की थी। हडताल मिटनेके दोही महीने
वाद रामभरोसे नामक क्लार्क को नौकरी छोड देनेको आशा
दी गयी। मैनेजर साहको दृष्टिमें वही अधिक अपराधी
कि
रहरा। रामभरोसेने मैनेजरसे अपराध रतानेको प्रार्थना की,
कार्य करना
सरा सोना १२४ 1 राम- किस कारण मैं हटाया जारहा हूँ ? किन्तु, मैनेजरने सिर्फ इतना ही कहा, कि अब तुम्हारी आवश्यकता नही है भरोसेने महावीरवाबूतक इसकी अपील की ; किन्तु वह भी निष्फल हुई। अन्तमें वह निराश हो घर बैठ रहा। नौकरी छूटनेके साथ ही उसको कोई दूसरी जगह नही मिली, इस हेतु बेकार ही बैठनेसे जीमें अनेक प्रकारकी बेचैनी वनो रहने लगी। बेचारके घरको अवस्था भी उतनी अच्छी नही थी, कि कुछ दिन घर बैठे रहनेले भी घर-खर्च चलसके। उसका चित्त चञ्चल और चिन्ता-ग्रस्त देप, उसकी धर्मपत्नी उराको कहा करतो, -“आप नौकरी छूट जानेसे इस प्रकार चिन्तित फ्यों हो गये हैं। ज़रा रत्न कीजिये, इधर-उधर दौड-धूप कीजिये, वहुत जगहें मिल जायेगी।" "नही, मैं चिन्ता तो नहीं करता और यत्नमें मी हूँ फहकर रामभरोसे चुप हो जाता मैनेजर साहवने एक-एक करके पांच मजदूरों और दो क्लार्को को। फिर, हटा दिया। ये लोग आपसमें मिलकर परामर्श करने लगे और पुन ऐसो युक्तिके यतमें लगे, कि फिर किसी प्रकार हडताल न हो। वे लोग रातमें मिलके मजदूरोंसे मिलकर उनसे कहने लगे, कि विना अपराधके हम लोगोंकी जीविकाका खून मैनेजरने किया है। हमने अपने स्वार्थके लिये उस वार हडताल नहीं करायी थी। हडतालका अगुआ होनेके अपराधमें इतने दिनों बाद एक-एक करके हमें था। उधर मिलके किया। पकाध १२५ खरा सोना निकाला गया है। उस समय मालिक हमें प्रलोभन देकर अपना कार्य कराना चाहता था, किन्तु हमलोगाने ऐसा नहीं आज उसीका फल है, कि हमलोग अपनी जीविकासे हाथ धो बैठे और तुम लोग इस ओर ध्यान नहीं देते। धीरे- धोरे मजदूरोके हृदय पर उनकी बातोका वडा असर हुआ। वे लोग आपसमें सम्मति कर पुन. हडताल रोको तैयार होगये। एक-एक कर उन मजदूरो ओर क्लाकों के हटानेसे शेष मजदूरोके अगुओंके हृदयमें भी आशका यनी थी, कि किसी न किसी दिन हमलोगोको भी यह अवश्य हटावेगा। साथ ही मजदूरोपर भी अधिक कडाई होने लगी। घण्टेकी भी देर होनेसे झट जुर्माना होने लग गया। बोनस प्रकृतिमें भी बड़े होने लगे। यद्यपि महावीर वायू के पास कईबार उन लोगोंने निवेदन किया , किन्तु उन्होंने इस ओर कुछ भी व्यान नहीं दिया। 'जो मैनेजर साहब करते हैं यही यही कहकर उन्हे लौटा देते थे। मैनेजर साहब को भी मनमानी करतेका अच्छा मौका मिला। महावीर यात्रु भी अपनेको लक्ष्मी दास समय ऐसे मदसे चूर रहने लगे, फि । अपने कामोंकी भी देखभाल नहीं कर सकते थे अधिक आरामतलव हो गये थे। प्राय दिन-रातका मरिक समयअन्त पुरमें प्रेमाके साथ प्रेमालाप ही व्यतीत होता था। ताश-शतरञ्जके सेल ही होते रहते थे। प्रेमाफा स्वभाव भी विल्कुल यदल गया था। iस मर मुँदासने ठीक है, भरघे अव
खरा सोना
-
।
बोल्नेमें भी अपना अपमान समझती थी। उसके स्वभावमें
विचित्र परिवर्तन देख, जगतपुरकी स्त्रियाँ परोक्षमें उसकी तीव्र
निन्दा किया करती थी। यद्यपि किसी न किसी प्रकार प्रेमाको
भी इन सव वातोका पता लग जाता था, किन्तु उसकी उसे,
कुछ पर्वाह नहीं थी, वल्कि वह उलटे उनपर बिगड़नी.
और कभी न कभी उसका बदला लिये विना नही रहती थी।
महावीर वाबू धन-मदसे ऐसे मदान्ध हो गये. कि उनको
फर्तव्याकर्तव्यका ध्यान ही नहीं रहा।
१२७ सरा साना परिच्छेद पन्द्रहवा त्तिकका महीना था। शुरु,पक्षको रात थी। निर्मल चन्द्रिका छिटकी हुई थी। रातके का साढे नौ बज रहे थे। नगरमें धीरे-धीरे सन्नाटा छा रहा था। समा बडे-छोटे लोग भोजनादिके प्रबन्ध लगे थे। कोई-कोई भोजनोपरान्त घरमें चारपाईपर लेटे निद्रादेवीके याहानमें लगे थे। किसी-किसी घरमें तो विरकुल सन्नाटा छाचुका था। लोग बहुत पहले ही सो गये थे। किन्तु किसी-किसी घरमें अभी रसोई भी नहीं हो पायी है। इसी समय एक साधारण दोमजिले मकानके एक कमरे में धीमे प्रकाशके साथ लालटेन जल रही थी, कमरेमें एक बडासा पलङ्ग विछा था, जिसपर एक युवती लेटी लेटी एक पुस्तक पढ रही थी। युवती पुस्तक पढ़ते ही पढते सौगयी। धीरे-धीरे दासोने आकर लालटेन बुझाकर भीतरसे किवाड वन्द कर दिये , परन्तु व्यौडा नहीं लगाया। पल गपर सोयी हुई युवतीके मुखचन्द्रपर गवाक्षसे कलाधरको स्वच्छ फिरणे माकर अठखेलियां करती थी।' युवतीके मुख- मण्डलपर काले काले केशोंको लटे वितरी हुई उसकी शोभाको और भी बढ़ा रही थी। सी, समय वाहरसे किसीने 'ठाकुर', 'ठाकुर की आवाज चेकी कोठरीमें . . ।
J
-
१३२
खरा सोना
11
अवश्य करती थी। हेमाकी सरलतापर रघुवीर वायू उलपर
विशेष प्रसन्न रहा करते थे। और इसी कारण प्रतिदिनकी वका
लतसे जो कुछ प्राप्ति होती, हेमाको सौंप देते थे। हेमा उसको
इस प्रकार व्यवहारमें लाती, कि थोडी आमदनीके समय भी
घरका खर्च कर उसमें कुछ न कुछ बच ही जाया करता था,
इसी प्रकार आनन्द-पूर्वक उनके दिवस व्यतीत होने लगे।
एक दिन कचहरीसे लौट आनेपर रघुवीर वावूने हेमासे कहा कि
आजके "सर्चलाइट में भैयामी मिलमे वडी भारी हडताल होने
की वात निकली है, यद्यपि इसके प्रथम भी दो-एक हडताले हो
चुकी हैं, किन्तु इसवार की हड़ताल बड़ी भीपण है, सैनिकोका
मिलके दरवाजे पर कडा पहरा है। इधर मजदूरोंको भी सभाएँ
हो रही हैं। मजदूरोंने अच्छे-अच्छे नेताओंको भी बाहरसे धुलवाया
है, देखें दोनों में समझोता होता है या नहीं। मिलके मैनेजरकी
वडी शिकायत निकली है। साथ ही साथ भैयाकी भी कुछ कम
शिकायत नही है। पतिके मुखसे मिलकी हडतालकी बाते सुनते
ही हेमा वोली,-"अच्छा ही हुआ है, मजदूरोंपर उनलोगोंक
अत्याचार भी बहुत अधिक हुआ करता है। यद्यपि माजवं
समाचारसे जो मैंने “पाटलिपुत्र में पढा है, उन मजदूरोंक
भी दोप अलकता है, किन्तु तोभी वे उतने दोपी नहीं है , उन्होंन
T
.
खरा सोना-
मिलमे भीषण हडताल
सैनिका मिलक दरवाजेपर कदा पहा ।
मागेकी विगट मभामें नता लोग व्याख्यान दे रहे है
No text on this page.
खरा सोना
ही चली आरही है कि-"मजदूरी बढा दे”, देश भीपण
अकालके चङ्गुलमे फँसा है, ऐसे समय उतनी कम मजदूरीसे
उनका निर्वाह कैसे हो सकता है, यदि इसीलिये उन्होंने प्रार्थना
की, तो कौनसा भारी अपराध किया".
रघुवीर-"हां, बात तो इतनी ही थी, इसको लोगोंने व्यर्थ
ही वढाकर तिलका ताड और राईका पहाड कर दिया।
हेमा-इसमें किसका दोष है ?
रघुवीर-और किसका दोप है ? सव दोप तुम्हारी प्रेमा
दीदी का है।
हेमा-(गुसकुराती हुई) और आपके 'बटे भैया बिल्कुल
पाक-साफ है ?
रघुवीर-“अय घे भी तो उसीफे हाथ विक गये
हैं। तुम्हारी दीदी जिधर चाहती हैं, उधर ही उनको
घुमाती हैं।
हेमा-यह भी तो उन्हींका दोष है, वे उसेही अपनी मान
दाली और पथप्रदर्शिका क्यों समझे बैठे हैं। यदि उसके
कार्यमे भूल होती है, तो वे उसे सुधारते क्यो नही ?
रघुगीर-अच्छा, लो, तुम्हारी हो जीत हुई। यहाँ भी
तो तुम्हारी दीदी ही विजय पाती हैं!
हेमा-यह अदालतको वहस नहीं है, फि मुठी सची पातें
बनाते गये। यहाँ सची पाते' माननीही पडती है, इसमें हमारी
जीत कैसी?
-
1
। T खरा सोना । ५ । /- . जो L रघुवीर-(हँसते हुए ) हाँ, मैंने समझा कि तुम वकीलों से बढी-चढी हो। “यदि मैं वकील होती, तो आपलोगोंका मुंह वहाँ भी बन्द ही कर देतो” कहकर हेमा खिलखिलाती हुई हँस पड़ी। रघुवीर बाबू हेमाकी युक्तिपूर्ण बाते सुनकर वोले, "वहाँ, नही सही, यही सही। यदि वहाँतक मी बढनेकी इच्छा होती है, तो पकालत पढ लो।" हेमा--आप मुझे पढाना कबूल करें, तो आजहीसे पढ़ना- भारम्भ कर दूंगी। रघुवीर-तुम्हें पढानेके लिये मैं अपने एक मित्रको, अभी ला-प्रोफेसर भी हैं, नियुक्त कर दूंगो। कहो, कवसे पढना आरम्भ करती हो ? हेमा-हँसती हुई ) क्या आप मुझे नहीं पढ़ा सकेंगे। रघुवीर-नहीं। "तब मैं आपके मित्रसे भी नहीं पहूँगी” कहकर हेमा पुन' हंसपडी। रघुवीर बाबू भी हंसते हुए बोले, "सैर, यह सब- हँसी-दिल्लगी तो होती ही रहेगी। अब तुमसे एक सम्मति पूछता है। वह यह, कि ऐसी विपत्तिके समय मेरा क्या कर्तव्य है। मैं चिना बुलाये भी उनकी सहायता करने जाऊँ या नहीं ? हेमा--जाना तो चाहिये अवश्य, किन्तु जब चे नही बुलाते है, तो आप जायेंगे कैसे ? फिर जाकर ही आप क्या करेंगे? - यदि ये आपको कुछ कहना मानें तब तो ? . । । ,
।
खरा सोना
-
-
.
उनका जाना
रघुवीर-मैं समझता हूँ कि जन मजदूरोंकी ओरसे नेता
लोग आये हुए हैं, तब तो ये लोग अपश्य झगड़ा निपटा नेका
यत्न करते होंगे। ऐसी अवस्थामें मेरा वहाँ जाना कुछ घुरा
न होगा। मै भी दोनोंको मिला देनेहीको चेष्टा करूँगा।
हेमा-अच्छा होता, कि वापूजीसे भी सम्मति ले लेते।
रघुवीरयासोने पूछ चुका हूँ, वे जानेहीके पक्षमें हैं
और आप भी चलनेको इच्छा प्रकट करते हैं।
भी अच्छा हो होगा।
हेमा--"जानेको इच्छा तो मेरी भी होती है--किन्तु दीदीका
तिरस्कार स्मरण कर पांव आगे बढनेको नहीं कहता। खैर,
आप चले, मैं भी चलूंगी। वहाँ नही जाकर अपने पिताके
घर जाकर रहूंगी। क्योकि यहा अकेले कई दिनोंतक जो नहीं
लगेगा।
रघुवीर-मेरी इच्छा होती है कि जवावी तार देकर में
भैयासे पूछलू, कि ये क्या कहते हैं। यदि आनेको कहे गे तो
चलूगा, अन्यथा नहीं।
हेमा-मैं भी यही उचित समझती हूँ।
रघुवीर वाचूने माईको तार भेजनेकी इच्छा प्रकट करके अपने
ठाकुरको बुलाकर कहा, कि तारका फार्म ले आओ। लेकिन
न जाने क्यो, फिर उसे मनाकर, व्यालू करके, सायकिल लिये,
आपहो स्टेशनको ओर चले गये। इधर हेमाने भी समझ लिया
कि अब संभवत. हमलोगोंका वहाँ जाना भी एकतरहसे निश्चय
-
,
खरा सोना
१३६
।
-
1
.
ही हो गया, अतएवं वहाँ लेजानेकी आवश्यक चीजें अलग
निकालकर बंधवाने लगी और सब चीजोंको भी यथास्थान
सुरक्षित रख, घर चलनेत तैयारी करने लगी। यद्यपि उसको.
विश्वास था, कि मैं वहाँ अधिक समयतक नही रह सकूँगी,
किन्तु तो भी उतनी चीजें उसने साथ ले चलनेका विचार
किया, जितनी अधिक समयके लिये काफी होती।
सोलहवा परिच्छेद
खरा सोना
7
व
पवतीने पत्र पढकर अपने पतिदेव वायू "
ललिताप्रसादसे कहा,---"आप अब निश्चिन्त
रहे, किन्तु आज्ञा दे कि मैं सुरेन्द्र या उपेन्द्र
( अपने पुल ) को एकदिन भरतपुर मेज दूं।
योकि उत्तगको वहाँ जाकर ले थाना अच्छा होगा और साथ
ही विश्वनाथको भी -कह सुनकर दो चार दिवसके लिये
ले आयेगा।"
ललिताप्रसाद-"परीक्षाका दिन निकट है, ऐसे समयमें
लड़कोको एक दिन भी कालेजले अलग करना अच्छा नहीं।
यटि' कहो, तो मैं' ही एकदिनकी छुट्टी लेकर उन सबोंको
ले आऊँ।
रूपवतो-यदि आप कष्ट स्वीकार करें तो सरसे अच्छा
है, किन्तु आपके जानेसे घरका कार्य फैसे चलेगा?' काही
एक दिनकी जगह दो दिनका विलम्ब हो गया, तो महीना भी
पूरा हो रहा है, ग्यालिन, मेहतरानी और धोधिनमा ५
भारम्म हो जायगा। फिर उनके लिये कुछ प्रबन्ध भी
पडेगा। उत्तराके लडकी मी घुछ देना पड़ा.यदि
चले जायेंगे, तो यह सब चुफायेगा
t
-
-
-
-
खरा सोना - + - - L ललिताप्रसाद-इसको चिन्ता तुम मत करो ; मैं आजही, सव प्रवन्ध किये देता है। जबतक हाथमें कलम है, तबतक- ध्यर्थ ही चिन्ता करती हो। हाँ, अव हाथमें कलम नहीं रहेगी तो ऐसा कहना। रूपवती-लेकिन उस समयके लिये भी आपको अभीसे चिन्ता करनी चाहिये। क्योंकि यह समय भी दूर नहीं है। ललिता०-तुम भूलती हो। मैं क्या कार बैठा हूँ? सुरेन्द्र और उपेन्द्र किस दिनके लिये हैं? क्या वे उस समय काम नहीं देंगे? पतिको वाते सुन रूपवती चुप हो गयी। ज्यों ज्यों उत्तराके आनेका दिन निकट आने लगा, त्या-त्यों उसका हृदय उससे मिलनेको उछलने लगा। सुरेन्द्र और उपेन्द्रको भी इस शुभ समाचारसे बड़ी प्रसन्नता हुई। यों तो समय-समयपर उत्तरा और विश्वनाथका पत्र इन लोगोंके पास आता ही था। समाचार-पोंमे वहिन-बहनोईके ओदर्श चरित्रको पढकर वे लोग अपनेको भी कम सौभाग्यशाली नहीं समझते थे, उनले मिलनेके लिये कईबार माता पितासे आज्ञा भी मांगी थी, किन्तु माताको आशा मिलनेपर भी पिताको आज्ञा न पाकर वे उनके घरतक नहीं जासके थे। आज उनके आनेकी वात सुनकर उनको कितना आनन्द हुआ होगा, यह सहज ही अनुमानमस्य है। यथानमय, अरकाश लेकर ललिताप्रसाद उत्तरा और । .
.
स्वरा सोना
विश्वनाथको अपने यहां ले आये। मदन और महादेव भी उनके।
साथ याये
। कन्या ओर जामाताको पाकर रूपरती स्वर्गीय
सुख प्राप्त करने लगी। सुरेन्द्र और उपेन्द्रको भी इस सुखद
सम्मेलनसे अपार आनन्द हुमा। उसके कई मिल, भी
विश्वनाथसे आकर मिले। उस समय ललिता वाबूके धरमें
उन सोंके मिलनका आनन्द स्रोतसा प्रवाहित हो रहा था। सव
तो प्रसन्न थे, किन्तु रूपवती, पुत्रो और जामाताके वेशको देख
कर वढी चिन्तिता थी। जिसके कोमल शरीरको सुन्दर
बहुमूल्य वस्त्रोंसे सुशोभित करके, वह कुछ दिन पहले आनन्दित
रहा करती थी, आज उसकी देहपर स्वदेशी गाढका वस देखती
है! जिसको कभी उसने अपने हाथों अपनी भोती नही
धोने दी थी, आज उसके हाथमे चरखेकी ठेठे (छाले)
देखती है। कुछ दिन पहले, जिस विश्वनाथके खिलते हुए
कोमल शरीरको देखकर वह प्रसन होती थी, आज उसीको
एक साधारण कृषक जैसा मोटा-मद्दा वस्त्र पहने, दुर्यलकाय
देसकर अपार कष्ट पाती है। उन सोंकी ऐसी अवस्था देग
रूपवतीने उनके लिये अच्छे वस्त्रादि मंगवाकर उन्हें दिये।
वह समझती थी, कि उनकी आर्थिक अवस्था अच्छी नहीं है।
विश्वनाथपर वरावर शनुमोने मुकद्दमा ही चलाया। इसी-
लिये इस अवस्थामें है और इसी विचारसे उसने वस्त्रादि
मैंगवाये थे
ज्योंही नवीन वस्त्र रूपवतीने उत्तराके आगे
रखा, त्योही वह मुँह बनाकर योली-"माताजी, तुने
।
१४.
सरा सोना
-
1
।
व्यर्थका कष्ट क्यो उठाया? ईश्वग्ने मेरे लिये इन वस्त्रोंको
नहीं बनाया। मेरे कामके येही मेरे मोटे पवित वस्त्र हे,
और इन्हीको व्यवहारमें लाकर मै प्रसन्न रहा करती हूँ. क्योकि
ये मेरे परिश्रमके फल-स्वरूप हैं और इन्हें में सदा काममें नहीं'.
ला शकनो, क्यो कि इस प्रकारके अपव्ययके लिये मेरे पास
धनही कहां हैं। फिर तुमही इसको क्यो काममें लानी हो ?
क्यों अपने घरकी बनी हुई चीजोंको व्यवहारमें नहीं लातों ?"
उत्तराकी याते सुनतेही रूपवती चुप हो गयी। यद्यपि
उसकी इच्छा थी, कि इस विषयको लेकर कुछ समयतक उससे
वाते' करू, तथापि न मालूम
उस समय क्यों रुकगयी।
उत्तरामें विचित प्रकारका परिवर्तन देख कर रूपवती मन ही
मन दु पो थी। सुरेन्द्र और उपेन्द्र अपनी बहिन उत्तराको घड़ी
प्रशसा करते थे और वे लोग चाहते थे, कि हमलोग भी
देशका कुछ कार्य करे, हमलोगोंसे बढकर तो हमारी वहिन
ही बहुत कुछ करनी है। दोनो बन्धुओंने भी आपसमें परामर्श
करके निश्चय कर लिया, कि आज से हमलोग अपने देशकी
हो वस्तुओंका व्यवहार करेंगे। विश्वनाथ वायूको पटना
आये सिर्फ पांचही दिन हो पाये थे, कि इघर उधर कई जगहोंसे
उनको बुलाहट आने लगी। कई जगहोंसे तार आया। कई
जगहोंसे कई आदमी उन्हें बुलाने माये । दिनमें उनको पास भीड़,
एगी रहती थी। यह देख ललिता प्रसादजी बहुत घबराये ।
उनको भय हुआ, कि कही कोई भेदिया पुलिस झूठी-वातोंके
- 12
।
खरा लोना
भ्रममे पड कर जिलाधीशके पास मेरी शिकायत न कर दे और
ऐसा होने ही से मेरी नौकरी चली जायगी। अस्तु ।
जहाँतक शीघ्र हो सके, विश्वनाथको यहाँसे विदा करही देना
अच्छा है। इसी प्रकार सोच विचार कर ललिताप्रसाद
जीने जामाताको विदा करने का विचार स्थिर कर लिया।
इधर सुरेन्द्र और उपेन्द्रने अलग ही विचार कर लिया था,
कि मारटर साहवको (वे लोग विश्वनाथ वायूको मास्टर साहब
ही कहा करते थे) कुछ दिन यही रस कर, एक-शे सभाओं में
उनका व्यारयान कराये गे। समय पाकर सुरेन्द्रने अपने
पितासे अनुमति मांगी। ललिता बाबू यद्यपि इस कार्य को
बुरा नहीं समझते थे, तथापि गुलामीके बन्धनमें जकडे
रहने के कारण वहुत डरतेथे। अपने सामने विकट समस्या
उपस्थित देख कर कुछ देर चुप रहने के बाद वे बोले “सुरेन्द्र,
यद्यपि मैं इसको अन्त. करणसे अच्छा समझता है, किन्तु मैं
सरकारी नोकर ठहरा, कितने शत्रुओंको असर मिल जायगा।
वे मेरे अफसरों के निकट मेरी भरपूर निन्दा करेंगे। परिणाम
उसका यही होगा, कि इस वृद्धावस्था में नाकरीसे पटाया
जाऊँगा
सुरेन्द्र-पिताजी, आप इस प्रकार भूठी शिकायत करने
वालोंसे क्यों भरते हैं। जो व्यक्ति निदोपहै यदि उसकी
'कोई शिकायत ही करने चले, तो उमसे क्या होता है?
- इससे आपकी नौकरी पयों जायेगी?
-
.
-
१४२ खरा सोना - . ०- । ललिता०-अभी तुम लड़के हो, तुममे बिल्कुल लडकगन ' मरा हुआ है। तुम इन सासारिक बातोंको अभी नहीं समझते, और यह समय वडा नाज क है। ऐसे समयमें सत्यका झूठ झूठका सत्य हुआ ही करता है। और उसमें भी राजनीतिक शिकायते तो आंख और कान बन्द करके देखो और सुनी जाती और भेदिया पुलिसको वातोंकी तो वेद-वाक्य ही :- समझा जाता है। सुरेन्द्र-जहां ऐसा अन्धेर है, यदि आप वहाँ नौकरी नही करेगे तो क्या हर्ज है? ललिता० -तुम पया समझोगे, कि पया हर्ज है ? यदि मेरी नोकरी नहीं रहती तो, मैं अवतक क्या कर सकता था? पिताजी फा अर्जित स्थायी धन भी तो मेरे पास कुछ नहीं था, कि तुम, लोगोंका पालन-पोपण कर सकता। परिवारका भरण-पोषण करनेमे भी बडी कठिनता होती है। सुरेन्द्र-जिसको नौकरी नहीं है और स्थायी पैतृक सम्पत्ति भी नही है, क्या संसारमें उसका जीवन सुखपूर्वक नही व्यतीत होता ? ललिता०—जीवन-निर्वाह तो अवश्य होता है, किन्तु सच पूछो तो सुपसे नही। सुरेन्द्र---आपही कहें, कि गुलामीसे बढ़ कर ससारमें कौन सा वडा कष्ट होगा? ललिता०-अच्छे पण्डितसे विवाद ओरम्भ हुआ! तुम । . A - १४३ सरा सोना मेरी आज्ञा मानोगे या नहीं? मै वकवाद करना नहीं चाहता। सुरेन्द्र-आपकी आज्ञा मानूंगा। आप नाराज़ न हो। आपसे नहीं तो किससे मैं ये सव बातें जान सकूँगा ? ललिता प्रसाद-यों तो तुम एक नहीं, अनेक चार प्रश्न कर- सकते हो, किन्तु इसप्रकार मनमानी करनेकी इच्छा रखकर- विना मतलवकी वाते किया फरोगे, तो मैं उसे कभी अच्छा नहीं समझता । सुरेन्द्र-"मेरी अज्ञानतासे पद-पदपर भूल होनेकी सभावना है। यदि इस समय भी कोई अपराध होगया हो तो क्षमा करें", इतना कह, नतमस्तक हो, पिताके आगे सडा हो गया। ललिताप्रसाद भी चिन्तित होकर वहांसे चलते बने । उसी दिनसे सुरेन्द्र और उपेन्द्रका मन पढने-लिखनेकी ओरसे विल्कुल उचट गया। किन्तु तो भी पिताको प्रसन्न रखनेके लिये उन्होने अपना लिखना पढना अवश्य जारी रखा। पिताकी आज्ञाका उल्लंघन करनेका साहस उनमें नहीं था और वे इसको कर्तव्य भी नहीं समझते थे। इसीलिये, इच्छा होनेपर भी उन्होंने पिताकी अनुमति न पाकर विश्वनाथ वायूसे किसी सभामें व्याख्यान दिलानेका आग्रह नही किया और न उनको अपने यहां बहुत दिन रसही सके। विश्वनाथ वाव को ललिता वाचूफी पाते किसी न किसी प्रकार ज्ञात होही गयीं। अतएव उन्होंने भी अधिक समयतक वहाँ रहना उचित नहीं समझा। एक सप्ताह के वाद ही पुत्र फलत, मदन और चेतनके साथ, अपने घर, १४४ खरा सोना । . . -- भरतपुरको, वापस लौट आये। उत्तरा भरतपुर पहुंचकर अपने कार्यमें लगी और विश्वनाथ बाबू कुछ दिनोंके लिये वाहर निकले, क्योंकि कई जगहोंकी सभाओंसे लोग उन्हें बुलाने आये थे। मदन और चेतनदास अपने-अपने पाठ- अभ्यास करनेमें प्रवृत्त हुए। यद्यपि भरतपुरमे जमीन्दारके गुमास्तेकी ओरसे अव विसी प्रकारके अत्याचार नही होने पाते थे, तथापि उन अमलोंका हृदय अभीतक शुद्ध नही होने पाया था। ये प्रत्यक्षमें तो विल्कुल चुप थे, लेकिन अभीतक हृदयसे ग्रामीणोंका अनिष्ट करनेपर तुले हुए थे। भरतपुरवालोने अपने यहां एक "सेवा- समिति” स्थापित की थी, जो समय समयपर मेले ठेलेके समय स्वयंसेवकोंके द्वारा लोगोंकी सेवा करती थी, जिसके नायक वही विश्वनाथ घायू थे। इस • सेवासमितिके स्थापनसे पुलिसको जनताको रक्षामें अधिक सहायता मिलती थी। अब उसको किसी बड़े छोटे मेलेमें उतना कट नही उठाना पड़ता था। इस सत्कार्यसे उसकी समितिका कृतज्ञ होना चाहिये था, लेकिन वह उलटे उसको अपनी क्रोधाग्निसे भस्मीभूत करने लिये पागल हो रही थी। और ऐसा करनेका एक कारण भी था। वह यह कि, अब उसको जेब नहीं भरने पाती थी।। भले भले लोगोंपर आपना प्रभाव डालकर अब पुलिसके लोग कुछ ऐड नहीं सकते थे। आपसमें इस प्रकारका मनोमालिन्य वढते देख कर विश्वनाथ वायूने इसको शान्त करनेकी एक युक्ति, . .
कर प्रजाओंसे मिलकर रहने लगे। विश्वनाथकी याद सुपीर्ति । सहायक समझने लगे और उसीके अनुसार अपने-अपने फरीप्य किसी प्रकारका वडा नही हुआ। यहाँको जमीन्दार पा अनर्थ सिहने भी उन लोगोंके साथ फिर कभी किसी प्रकारका झगडा नही सडा किया। सनंदा सद्भाव ही से काम लेने और प्रेम दिखाते रहे। प्रजाओंने भी फिर कभी किसी प्रकार पारस्परिक प्रेम उत्तरोत्तर चढने लगा, तव येचारे थमलेमतमार जरा सोना निकाली! अन्तमें पुलिस सवइन्सपेकरसे मिलकर इसका एक उपाय सोच निकाला गया, कि “सेना समिति" पर दोनों दलवाले विश्वास रख कर कुछ दिन उसके कार्य की देखभाल करें। यदि यथार्थ में उसके द्वारा जनताको कुछ मी रोया होतो हो और किसी प्रकारकी अशातिकी आशंका न हो, तो फिर दोनों ही की देखभालमें सेवासमिति अपनी सेवाका पवित कार्य करती रहे। यद्यपि वहाँको पुलिसकी सम्मति ऐसी नहीं थी, तथापि वहाँके पुलिस-सवइन्सपेयरके सह- विचारके आगे उन्हें भी सिर झुकाना ही पडा। दोनों पक्षोंका मनोमालिन्य दूर हो गया। दोनों ही एक दूसरेको अपना का पालन करते रहे। फिर कभी भरतपुरवालोंफे मात्र उनके साथ अनधिकार चेष्टा नहीं की। जय राजा प्रताप याद - अव घे भी आनन्द पूर्वक अपने कार्य चारों ओर फैल गयो। सम्पादनमें व्यस्त रहने लगे। १.
सरा सोना - भरतपुरको, वापस लौट आये। उत्तरा भरनपुर पहुंचकर अपने कार्यमें लगी और विश्वनाथ बाबू कुछ दिनोंके लिये ' वाहर निकले, क्योंकि कई जगहोंकी सभाओंसे लोग उन्हे बुलाने आये थे। मदन और चेतनदास अपने-अपने पाठ- अभ्यास करने में प्रवृत्त हुए। यद्यपि भरतपुरमें ज़मीन्दारके गुमास्तेकी ओरसे अव किसी प्रकारके अत्याचार नही होने पाते थे, तथापि उन अमेलोंका हृदय अभीतक शुद्ध नहीं होने पाया था। वे प्रत्यक्षमें तो विल्कुल चुप थे, लेकिन अभीतक हुडयसे ग्रामीणोंका अनिष्ट करनेपर तुले हुए थे। भरतपुरवालोने अपने यहाँ एक "सेवा- समिति” स्थापित की थी, जो समय समयपर मेले ठेलेके समय स्वयसेवकोंके द्वारा लोगोकी सेवा करती थी, जिसके नायक वही विश्वनाथ बाबू थे। इस सेवासमितिके स्थापनसे पुलिसको जनताको रक्षामें अधिक सहायता मिलती थी। अब उसको किसी बडे-छोटे मेलेमें उतना कष्ट नही उठाना पड़ता था। इस सत्कार्यसे उसकी समितिका कृतज्ञ होना चाहिये था, लेकिन वह उलटे उसको अपनी क्रोधाग्निसे भस्मीभूत करने लिये पागल हो रही थी। और ऐसा करनेका एक कारण भी था। वह यह कि, अब उसको जेब नहीं भरने पाती थी। भले भले लोगोंपर आफ्ना प्रभाव डालकर अब पुलिसके लोग कुछ ऐट नहीं सकते थे। आपसमे इस प्रकारका मनोमालिन्य वढते देश फर घिश्वनाथ वायूने इसको शान्त करनेकी एफ युक्ति - . ।
खरा सोना . निकाली। अन्तर्मे पुलिस सवइन्सपेकरसे मिलकर इसका एक उपाय सोच निकाला गया, कि “सेवा समिति' पर दोनों दलनाले विश्वास रख कर कुछ दिन उसके कार्य की देखभाल करें। यदि यथार्थ में उसके द्वारा जनताकी कुछ भी सेवा होतो हो और किसी प्रकारकी अशातिकी आशंका न हो, तो फिर दोनों ही की देखभालमें सेवासमिति अपनी सेवाका पवित्र कार्य करती रहे। यद्यपि वहाँको पुलिसकी सम्मति ऐसी नहीं थी, तथापि यहाँके पुलिस-सवइन्सपेकरके सद्- विचारके आगे उन्हें भी सिर झुकाना ही पड़ा। दोनों पक्षोंका मनोमालिन्य दूर हो गया। दोनों ही एक दूसरेको अपना सहायक समाने लगे और उसीके अनुसार अपने-अपने कर्तव्य- का पालन करते रहे। फिर कभी भरतपुरवालोंके साथ किसी प्रकारका घोडा नही हुआ वहाँके जमीन्दार या अन सिने भी उन लोगोंके साथ फिर कभी किसी प्रकारका झगडा नही पडा किया। सर्वदा सद्भाव ही से काम लेते और प्रेम दिखाते रहे। प्रजाओंने भी फिर कभी किसी प्रकारसे उनके साथ अनधिकार चेष्टा नही की जब राजा-मजामें यह पारस्परिक प्रेम उत्तरोत्तर बढने लगा, तर बेचारे अमले झप मार फर प्रजाओंसे मिलकर रहने लगे। विश्वनाथकी यह सुकीर्ति चारों ओर फैल गयी। अव योभी आनन्द पूर्वक अपने कार्य- सम्पादनमें व्यस्त रहने लगे। -
१
मसतरहवा परिचय
1
भउका हो रहा था। वस, फिर क्या था? थोडही दिनोंके
हडताल की थी, उनकी संख्या अधिक थी। उन्होंने इंडतालियों,
भाइयोको भी, जिन्होंने हटताल नही भी थी, हडताल
उस समाने उन मजदूर,
खरा सोना
१४६
NEHRENT 5 महावीरप्रसाद जो समझे बैठे थे, कि
वा मजदूरों को भडकानेवाले फलाकों और उनके
अगुओंको निकाल देनेसे ही मिलमे शार्तिका
साम्राज्य स्थापित हो जायगा ,
किन्तु
ऐसा करनेपर भी ठीक इसके विपरीत हुमा। जिस दिन
रामभरोसे बिना अपराब निकाला गया, उसी दिनसे लोगों
काना फूसी होने लगी और ज्योज्यों एकके बाद दूसरे
क्लार्क और मजदूर हटाये जाने लगे, त्यों-त्यों उन मजदूरों में
पुनः सनसनी फैलने लगी। उधर रामभरोसे उन
बाद एक भारी हडताल हुई। किन्तु इस वार मैनेजर साहबने
अपनी मिलके कुछ मजदूर्गको प्रलोभन देकर अपनी ओर मिला
रखा था, जिससे मिलका कार्य बन्द नहीं हुआ। जिन मजदूरीने
की एक सभा सगठित को
मजदूरोंको
-
करनेको
।
बाध्य किया। इस कारण दोनों दलों में विशेष योचातानी और
अनपन हो गयी। अपनी सप्या करती
बहुत घबडाये सभाका कार्य नेताओमें वायू विश्वनाथप्रसाद जी भी शामिल थे। उनको फई मजदूरोने प्रार्थना करके घरसे बुलाया था। औरायो न मालूम, उनके भापणम क्या जादू भरा हुआ था, कि श्रोताओ के हृदयपर उसका एसा प्रमात्र पडा, कि समी मजदूर मिल-मालिकसे विना कुछ शत्त कराये परा सोना को एउताल करनी पड़ी। मिलके मैनेजर साहयने पुन उनको प्रलोभन देकर पलपूर्वक काम पर बुलानेका यस किया, इसीपर यात कुछ बढ गयो। दो एक मजदूरों पर मोजरने हाथ भी छोर दिया। उसका बदला मैनेजर साहबसे सदफे साथ वसूल किया गया। महागीर वायूको ज्योंही यह समाचार मिला, त्योंदी चे । सरकारसे अपनी रक्षाके लिये महावीर- यावूने कुछ सशस्त्र सेना मंगनायी। उबर मजदूरोंने भी अपनी किया एक दिन मजदूरोंकी समामें फिर मैनेजरने कुछ छेड-छाड की। दोनों ओर से गुत्थमगुत्थी होनेको यो, कि सभा स्थलपर वाचू महागीरप्रसादके अनुज यावू रघुवीर- प्रसाद जो दो-तीन नेतामोंके साथ पहुँच गये। उनको बीचमें आरा देख, दोनों ओरके लोगोंने अपना अपना हाथ रोक लिया। बाबू रघुवीरप्रसादके उद्योगसे उस दिन वहाँ मज़दूरों और मिलके अन्यान्य कर्मचारियोंकी एक सभा चाबू महावीरप्रसाद जो भी सम्मिलित हुए। सभामें अन्तिम रघुवीरप्रसाद भागलपुरसे लाये थे विश्वनाथ घाव का हुआ। हो हडताल बन्द कर काम करनेको उद्यत हुई। सभामें आये हुए भाषण -गये।
खरा सोना ૬૮ महावीर वायूके हृदयपर मी व्यारयानका ऐसा प्रमाव पड़ा, कि वे भी मजदूरोंके कोंको दूरकर उनकी मांगोंको पूरा करनेपर राजी हो गये। सवमें पारस्परिक प्रेमको जागृति हुई। सभा समाप्त होते ही हडताल बन्द हुई। सब अपने-अपने कार्यपर आ डटे । महावीर याव बड़े सम्मानके साथ बाहरसे आये हुप नेताओंको अपने यहाँ ले गये। यों तो विश्वनाथ बाब के नामसे महावीर बाव परिचित ही थे, किन्तु यह नहीं जानते थे, कि ये उदयमानु पावके अनुज हैं। ज्याही उनको इसका पता लगा, त्याही वे उनको छोटे भाईकी मांति गले लगाकर अपना परिचय देते हुए, गायतीका रमरण कर उठे। पीछे प्रेमा,मी गाय- वीके देवर विश्वनाथजीसे आ मिली। महावीर वाब ने अपनी पहली कहानी (जिस प्रकार वे गायनीके कहनेसे नौकरी छोडकर इस कार्य मे प्रवृत्त हुए थे) कह सुनायो। उसी दिन अपने किये पर पश्चात्तापफर महावीर वाव ने रघुवीर वाव को और प्रेमाने हेमाको हृदयसे लगाया और जीवनभर एक दुसरेपर विश्वास रखते और प्रेम करते रहे। मदन और महादेवको प्रेमाने बुलवाकर अपार थानन्द प्राप्त किया। मजदूरोंकी मजदूरी दूनी बढा दो गयी,और सबको जगह देदी गयी। यह कार्य महावीर याय ने अपनी इच्छासे कर दिया। अव मिलकी दिन दूनी उन्नति होने लगी। रघुवीर वायू को महावीर वाव ने तार देकर बुलाया था और हेमाको भी साथही लानेको कहा था। मिलकी हड़ताल --
१४६
खग सोना
A
-
बन्द होनेपर रघुवीर वाय ने भाईसे भागलपुर लौट जानेको आशा
मांगो, पयोकि तमादीका समय निकट था। इस समय बाहर
रहनेसे यही आर्थिक हानि उठानी पडेगी। अनुजको यातके
उत्तरमें महावीर धाय ने कहा,-"अब तुमको वकालत करने
की आवश्यकता नही। पयोकि मैं' अकेला सव कार्य नही
सम्हाल सफता और खय देख-रेख नही करनेसे ही हडताल
हुई थी। कर्मचारियोंका व्यनहार कुलियोंके साथ अच्छा नही
होता। इसीसे वे लोग आपसमें लडते झगडते रहते हैं।
मुझे आशा है, कि तुम्हारी देख रेखसे शान्ति रहेगी और उत्तरोत्तर
उन्नति होती ही रहेगी।" रघुवीर याब ने भ्राताफी आशाका
पालन कर वकालत छोट दी। हेमा भी अपनी बडी वहिन
प्रेमाके कार्यों में सहायता पहुंचाने लगी और आनन्दपूर्वक जीवन
यापन करने लगी।
सुरेन्द्र और उपेन्द्रने कालेजसे नाम फटा दिया। यद्यपि
ललिता वार ने दोनों पुत्रोंको पढानेका यहुत यन किया, लेकिन
कुछ फल नहीं हुआ। अन्तमें विवश होकर ललिताप्रसादने
अपने दोनों पुलोंको घर छोड देनेके लिये वाध्य किया। वन्धु-
द्वयने प्रसन्नतापूर्वक पिताको आशाका प्रतिपालन किया।
ज्योंही उत्तराको यह समाचार मालूम हुमा, त्याही उसने अपने
दोनों अनुजोंको अपने यहां बुला लिया। विश्वनाथ यायने
अपने दोनों शिष्योको सम्मति और ग्रामीण बन्धुओंको सहायता
से भरतपुरमें एक राष्ट्रीय विद्यालय
-
किया।
है ANDALA.COMARWNewseravivarer वोल्शेवि सीवन ऐवा 1 H माया हिंदी में विल करनपाला कुल नया ग्रं Fमको भूमिका भीमार मात्र भावादाम को गुप्त ने लिखी है 1 घे लिखते है ! HTन्न देया और सफर प्रमा " ऐसे विषय का शा मारनमर्ष के बार में वालों कलय महा पयोपिा मावश्यक है" ममें शुम में गम के मार का भन्न या प्रजा के हाथ में राज्य के प्राया, फौग और पुलिम प्रजा मे मिलई पत्यादि न करते भासविषम पे प्राचार्य लेनिन के विद्वानों का वर्णन उसकी उत्पत्ति स सगय की दहाँ की राज्य व्यवस्था का वर्णन किया गया है। भारत में वारशवि आयेगा या नही इरा पर खूब विवेचन किया है जा पढ़ने योग्य है । म. १६ जीवन में नई जागृति पैदा करनेवाला दुसर्गवार जल्दी मॅगाइये. (अर्थात म० गाधी के असहयोग का रहस्य बतानेवाले चुने हुए लेख और व्याख्या भूमिका सम्बक,-श्रीमान् पं० मोतीलाल नेहरू। रमकी गृमिका श्रीमान् प० मोतीलाल नेहरो लिम्बी है, इसीभे श्राप समझ सकरें कि यह पुस्तक विमनी उपयोगा है। छ मास में ही इमको दो हजार कापियाँ समाप्त हो ग अब इमरी बार छपी है । जल्दी मँगा लीजिये । बढ़िया कागज पर छपी हु । मू०१३) लाखों को बलिदान के लिये उभाइनेवाला, आजादी की यादगा - असहयोग-दर्शन NAGn छा गया -1 - हिन्दुस्थान का राष्ट्रीय झण्डा 1- Irry (रचयिता म० गाधी) यह अमइयाग दर्शन का दूसरा भाग है । भारत का राष्ट्रीय झण्डा कैसा होना चा। उस चित्र महित इसमें वर्णन है। ऐमा भएडा वनवाकर प्रत्येक भारतवामो को अपो ५ ना चाहिये । उसको अलावा सर्ग लाटमाइप की मुलाकात तक के ग० गाधी के ' नेत्र और व्याख्यान है। मूoj जल्दी मैंगाध्ये । (गदि आप असहयोग का पूरा रपत्य ना चाहते है तो इस पुस्तक को और मा १ शोग दर्शनशानों को भगाकार पटिय) । + -भारत पुस्तक भडार ३१चंडतानासीर कलकत्त
No text on this page.