Adarsh Library, Jaipur
Parkha Heen Titli
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पंखहीन तितली
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पवहान तितक
तितली
हंसराजरहबर
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दो शब्द । मैंने यह उपन्यास आपात स्थिति के दौरान सेंट्रल जेल अम्बाला में लिखा था। गिरफ्तारी से कुछ दिन पहले मैंने अख- वार में यह खबर पढी यी. 'वे एक सुन्दर युवती, जिसकी आयु तेईस-चौबीस बरस है, सुबह-सवेरे मिराडा हाउस के पास सड़क के किनारे वेहोश मिली।' मैं इस खबर को आधार बनाकर उपन्यास लिसने की सोच रहा था। जेल मे इसके लिए काफी फुसंत थी। मैंने एक कथानक बुना, उसके उपयुक्त पात्रो का निर्माण किया और उपन्यास लिप डालने का निश्चय कर लिया। कोई भी घटना अनायाम घटित नही होती और न वह एकाएकी होती है, उसका तत्कालीन समाज मे गहरा सम्बन्ध होता है और वह किमी प्रवृत्ति विशेष की प्रतिनिधि होती है। "इसलिए किमी घटना या सवर को आधार बनाकर उपन्यास लिखने का मतलव यह कदाचित् नहीं कि उसे नमक-मिर्च लगा- कर पाठको के लिए रोचक बना दिया जाए । लेखक का कर्तव्य पाठकों की रचि का अनुमरण करना नहीं बल्कि उसे परिष्कृत करना है। पाठक की रचि तभी परिष्कृत होगी, जब उपन्यासकार उमकी चेतना के स्तर को कचा उठाने का प्रयास करेगा । चेतना का स्तर ऊंचा उठाने का एकमात्र उपाय यह है कि वह कथानक और पात्रों के माध्यम से समाज का विश्लेषण प्रस्तुत करे और उस घटना के पीछे जो प्रवृति काम कर रही है,
उसे भली भांति उजागर किया जाए। अगर वह प्रवृत्ति स्वस्थ
और हितकर है तो पाठक के मन में उसके प्रति आस्था और
अगर प्रवृत्ति रुग्ण और अहितकर है तो घृणा जगाई जाए।
मैं समझता हूं, साहित्य का उद्देश्य यही है और साहित्यकार
इस उद्देश्य की पूर्ति तभी कर सकता है जब वह अपनी समाज
प्रवक्ता होने की भूमिका भली भांति समझे और फिर इस
भूमिका को ईमानदारी और दृढ़ता से निवाहे । साहित्य समाज
का दर्पण भी तभी बनता है।
मैंने यह उपन्यास इसी उद्देश्य से लिखा है । निस्संदेह मैंने
इसे पाठक के लिए रोचक बनाने का भी भरसक प्रयास किया
है। लेकिन मुख्य प्रयोजन वर्तमान समाज का विश्लेषण करना
और उसकी परस्पर विरोधी प्रवृत्तियों को उजागर करना है।
समाज का अतीत होता है, परंपरा होती है, अतीत से वर्तमान
और वर्तमान से भविष्य बनता है। अतीत और परंपरा को
नकारने वाली प्रवृत्ति निस्संदेह रुग्ण और अहितकर है।
भविष्य का मार्ग प्रशस्त करने वाली स्वस्थ प्रवृत्ति अवरुद्ध
हो गई है। क्यों अवरुद्ध हो गई है ? शायद पाठक को इस
उपन्यास से यह बात भी समझने में मदद मिले।
-हंसराज रहवर
पता
नवीन शाहदरा,
दिल्ली.32
पंखहीन तितली - अर्थशास्त्री डा० त्यागराज ने अपनी अखरोट की सफेद छड़ी उठाई और वह टहलने के लिए कोठी से बाहर निकले । सड़क पर प्रभात का धुंधलका फैला हुआ था, हवा में ठहक थी और नमी भी। पानी लगातार दो दिन बरसने के बाद रात के नौ-दस बजे थमा या । अब कही-कहीं बादलों के सफेद टुकडे घर से रूठकर आए आवारा बालको की तरह इधर- उधर मंडरा रहे थे, वर्ना आकाश स्वच्छ और निर्मल या। तारे दूर-दूर तक छिटके हुए थे, जो प्रभात हो जाने के कारण अपना वर्चस्व सो बैठे थे, और शन:-शनः मद्धिम पड़ते जा रहे थे। डाक्टर साहब ने रात रेडियो पर सुना था कि जन से अब तक ६०.६" वर्षा हो चुकी है और पिछले दस-बारह वर्ष में इतनी अधिक वर्षा कभी नहीं हुई। मनुष्य प्रकृति को समझने और उसपर विजय पाने का लाख प्रयत्न करे, पर वह अचानक अपना असाधारण रूप प्रकट करके उसके सारे अनुमान झुठला देती है। सितम्बर आधा बीत चुका था फिर भी पानी थमने में नहीं आ रहा था। बादल उमड़-घुमड़ आते थे और मूमलाधार मेंह बरसना शुरू हो जाता था। कुछ वर्षा और कुछ बुढ़ापे के कारण डा० त्यागराज ने विस्कुटी रंग का स्वेटर पहन रखा था और सिर पर समूरी टोपी पी । वरावर पानी बर- सते रहने के कारण वह दो दिन कोठी से बाहर नहीं निकल पाए थे वर्ना इस अवस्था में भी जब तक सुबह-सवेरे दो-ढाई मील घूम नही आते थे, उन्हें चन नही पड़ता था। कभी नागा हो जाए तो सारा दिन एका अभाव, एक रिक्तता-सी महमूस होती थी। दो दिन कमरे में बद रहना पड़ा तो मन बहुत सटपटाया और अब वह नियत समय से पंद्रह-बीस मिनट पहले ही घर से निकल पड़े थे। रूपनगर से निकलकर मौरिस नगर होते हुए वह माल रोड पर पहुंच गए, तव भी अंधेरे ओर उजाले में आंखमिचोली हो रही थी। अभी तांगे, बसें इत्यादि चलना शुरू नहीं हुई थीं और कोई आता-जाता व्यक्ति भी दिखाई नहीं पड़ रहा था। रास्ता उनका देखा-भाला था, वह अपने- आपमें खोए-खोए महज़ अभ्यास से चल रहे थे । मिरांडा हाउस से वह दस-बीस कदम भागे बढ़े होंगे कि पांव किसी चीज़ से टकराया और वह भौचक्के रह गए। जो कुछ देखा, उसपर उन्हें विश्वास नहीं हो रहा था। युवती ! - . यह कुछ देर यों ही खड़े देखते रहे । फिर अपनी सुनहरी फ्रेम की ऐनक उतारी, उसे रूमाल से भली भांति साफ किया और दोवारा लगाकर गौर से देखा। उन्हें किसी प्रकार का धोखा नहीं हुआ था। शीराम के पेड़ तले एक सुन्दर युवती अचेत पड़ी थी। वह उसपर झुके, सिर से पांव तक एक दृष्टि डाली और उसका अंग-प्रत्यंग बड़े ध्यान से देखा । ठोकर लगने के बाद भी वह हिली-डुली नहीं, जैसे पहले लेटी थी, उसी तरह अचेत लेटी रही। 'शायद कोई हत्या करके उसका शव यहां फेंक गया है।' उन्होंने सोचा, फिर वह इस विचार पर टिक नहीं पाए क्योंकि उनको अनुभवी आंख को मृत्यु की भयंकर परछाई कहीं भी दिखाई नहीं पड़ रही थी। मृतक का शरीर काला पड़ जाता है और हाथ-पैर ऐंठ जाते हैं । वह जाने कब से वहां पड़ी थी, पर उसकी देह पर कोई भी ऐसा लक्षण नहीं था। चेहरे पर मुर्दनी के बजाय ताजगी थी और लम्बी धनी पलकें देखने से लगता था कि वह गहरी मीठी नींद सो रही है। वह झुगो झुके युवती को सुन्दर सुडौल देह को ओर देखते रहे, देखते रहे और सोचते रहे। फिर वह अपनी हथेली उसकी नाक के पास ले गए। मालूम हुआ कि सांस चल रही है और सांस में गरमाहट है । अव संदेह की कोई गुंजाइश नहीं थी। वह निश्चित रूप से जीवित थी और किसी कारण बेहोश हो गई थी। ८/पंखहीन तितली युवती ने गहरे हरे रंग का सर्ट और पूरी बांहों का काला टाप पहन रखा था और गले में स्कटं से मैच करती हुई हरे रंग की कंठी थी। देह मासल और रंग एकदम गोरा था।शरीर पर न कहीं घाव और न किसी चोट का निशान। 'मामला क्या है ? वह यहा आई कैसे ? वेहोशी मे तो आ नहीं सकती।' उनके लिए कुछ भी समझ पाना सम्भव नहीं था । वह कुछ क्षण शान्त और स्थिर खड़े देखते रहे। फिर सोचा, 'क्या में इमे यों ही लेटी छोड़ जाऊं ?' हा. त्यागराज असमंजस में पड़ गए। करें तो क्या करें? वह समाजसेवी व्यक्ति थे। दूसरे के दुस को अपना दुःख समझना और यथाशक्ति सहायता करना उनका स्वभाव बन चुका था। एक अस- हाय शिक्षित युवती को इस दशा में छोड़कर आगे बढ जाना उनके लिए कदाचित् सम्भव नही था। आखिर उन्होने अपना कर्तव्य निश्चित किया और वह सडक पार करके सामने वाली कोठी मे चले गए। उसमे उनका परिचित रजवतसिंह नाम का मजिस्ट्रेट रहता था। कोठी मे सन्नाटा छाया था। परिवार के सभी लोग सो रहे थे। वैसे भी उस दिन इसवार था; शायद इसलिए भी देर से उठने का प्रोग्राम हो। सीसपाल नाम का चौकीदार बरामदे मे बैठे-बैठे ऊप गया था। उसने पदचाप सुनी तो हडबडाकर उठा । पलभर उनीदी आखों से डा. त्यागराज की ओर देखता रहा और फिर उन्हें पहचानकर प्रणाम किया। "साब को जगाऊं?" उसने पूछा। "नही, उन्हें सोने दो। मुझे जरा फोन करना है।" सीसपाल डा० साहब को फोन वाले कमरे में ले गया। उन्होंने डायल युमाया और अपनी कोठी का नम्बर मिलाया। "हैलो!" "कौन, नरेंद्र ?" "जी हा, में नरेंद्र हूं।" बाप ने बेटे की और बेटे ने चाप की आवाज पहचान ली थी। पंखहीन तितली/६ । "मैं माल रोड पर मैजिस्ट्रेट रजवंतसिंह कोठी के सामने खड़ा हूं, तुम कार लेकर चटपट वहां पहुंच जाओ।" "क्या बात है ?" नरेंद्र ने घबराहट और चिंता के मिले-जुले स्वर में छा। "वात तुम्हें यहीं आकर मालूम हो जाएगी। जल्दी करो।" डा० त्यागराज ने रिसीवर रखा और बाहर निकल आए। सीसपाल भी उत्सुकता और आश्चर्य में भरा डा० त्यागराज के पीछे- पीछे चला माया था। वे दोनों युवती से तनिक हटकर पेड़ के नीचे खड़े थे और सड़क अव भी सुनसान थी। नरेंद्र कार लेकर दस-बारह मिनट में घटनास्थल पर पहुंच गया। वह कुछ क्षण आश्चर्यचकित-सा अचेत पड़ी युवती की ओर देखता रहा। "यहां यह कैसे आई ?" "कोन जाने !" "मुर्दा है या वेहोश?" "बेहोश।" डा० त्यागराज ने उत्तर दिया और कहा, "मैंने देख लिया हैं, सांस इसकी चल रही है।" कुछ क्षण मीन के बीते । वाप ने वेटे और वेटे ने वाप की ओर देखा। "मैं समझता हूं कि हम इसे अस्पताल ले जाकर इमर्जेंसी वार्ड में भर्ती करा दें।" "कहीं चोट-वोर तो है नहीं । अस्पताल में जाकर क्या करेगे?" नरेंद्र ने युवती की ओर देखते हुए उत्तर दिया। "तो?" "कोठी पर ले चलते हैं। वहां से भद्रसेन को फोन कर देंगे। वह आकर देख लेगा।" "ठीक हैं। देख-जांच कर, वह जैसा कहेगा, बाद में वैसा कर लेंगे।" सीसपाल और नरेंद्र ने युवती को उठाकर पीछे वाली सीट पर लिटा दिया। बाप और बेटा दोनों आगे बैठे और कार चल दी। उजाला हो चला था; पर सड़क अब भी निर्जन थी। सिर्फ एक सीस- पाल ने कार को मोड़ पर घूमते देगा। १०/ पंखहीन तितली २ - हा त्यागराज देश के एक प्रसिद्ध अर्थशास्त्री थे। आठ-दस वर्ष तक राष्ट्रीय योजना आयोग के सदस्य रहकर अवकाश प्राप्त किया था। आयु तो उनकी छियासठ-सहमठ बरस थी, पर वह अब भी सक्रिय जीवन बिता रहे थे । नाक चपटी, मुखमुद्रा चिंतनशील और सिर पर घने सफेद बाल थे। देश की आर्थिक समस्याओ पर अखबारों में उनके लेस अक्सर छपते रहते थे, रेडियो और टेलीविजन पर भी बोलने जाते थे। इसके अलावा वह अखिल भारतीय शान्ति परिषद् की कार्यकारिणी के एक प्रमुख सदस्य और भारत-हस मंत्री संघ को दिल्ली शाखा के अध्यक्ष थे। १९६२ के सीमा- संघर्ष में पहले जब भारत और चीन के आपसी संबंध अच्छे थे, तब वह अखिल भारत-चीन मैत्री सघ के भो उपाध्यक्ष थे। कई मतंवा विदेश घूम आए थे और वह राजनीतिक मूझ-बूझ रखने वाले वामपक्षी विचारो के प्रसिद्ध बुद्धिजीवी थे। उनकी पत्नी सुभद्रा की आयु इस समय साठ वरस के करीब थी। वह भी जनकल्याण मे रुचि लेने वाली सुशिक्षित महिला थी, और प्रत्येक कार्य मे डाक्टर साहब का हाथ बटाती थी। जनेंद्र और नरेंद्र उनकी दो संतानें थी। बड़ा बेटा जनेंद्र शिक्षा समाप्त करने ही कनाडा चला गया था और लगता था कि वह अव स्थायी रूप से वही वस गया है। घर पर पति- पत्नी, नरेंद्र योर पानसिंह नाम का एक पहाडी नौकर था। जब बाप-बेटा घर पहुंचे तो मुमद्रा पानसिंह के साथ फाटक पर खह उनकी राह देख रही थी । जब से डाक्टर साहब का फोन आया था, व मन में बड़ी चितित थी और सोच रही थीं कि ऐसी क्या घटना घट गई जो तुरन्त कार लेकर आने को कहा है। सर को तो वह हर रोज जाते थे, मगर पहले कभी ऐसा नहीं हुआ था। कार भीतर आई और डाक्टर त्यागराज दरवाजा खोलकर बाहर निकले तो उन्हें सकुशल देखकर सुभद्रा ने इत्मीनान की सांस ली पर दूसरे ही क्षण एक रूपवती माधुनिक युवती को गाड़ी में पड़ी देखा तो वह दंग रह गई। कुछ देर उनके मुंह मे एक शब्द तक नहीं निकला,वह विमूढ़- सी देखती ही रहीं-कभी पति और बेटे को, कभी उस युवती को । "यह क्या है ?" - "लड़की।" "यह तो में भी देख रही हूं, परन्तु "सुना नहीं, भगवान जब देने पर आता है तो छप्पर फाड़कर देता है तुम कितना चाहती थीं कि घर में एक लड़की होती तो कैसा अच्छा रहता। तुम्हारी यह चिरकामना पूरी हुई । तुम्हें पालने-पोसने का भी झंझट नहीं करना पड़ा और भगवान ने यह जवान बेटो भेज दी।" डा० त्यागराज विनोदी जीव थे। उन्होंने हास-परिहास की मुद्रा में अपनी बात कही और वह पत्नी की ओर देखकर मुस्कराए। नरेंद्र और पानसिंह ने युवती को कार में से उतारा और बड़ी साव- धानी से उठाए-उठाए वे उसे भीतर ले चले ?" सुभद्रा ने पूछा। "हां, जीवित है।" डाक्टर साहब ने उत्तर दिया। सोने के कमरे में ले जाकर युवती को पलंग पर लिटा दिया गया। यह पहले ही की तरह वेसुध और निश्चल थी। आंखें बंद और मुखमुद्रा शान्त थी। गीली धरती पर पड़े रहने के कारण स्कर्ट और टाप सील गई थों; पर उन्हें यों ही रहने दिया गया। बेहोशी की इस अवस्था में कपड़े बदल देना सम्भव नहीं था। भद्रगेन उनका एक सम्बन्धी डाक्टर था । वह करीव ही शक्तिनगर में रहता था । उसके पास अपनी कार थी और जब भी जरूरत पड़ती थी, यह उसे चुनया लेते थे यानी यह उनका फैमिली डाक्टर था। नरेंद्र ने "क्या यह जीवित है १२ / पंखहीन तितली उसे फोन किया तो वह स्टेथेस्कोप और दवाओं का वक्म लेकर कोई आप पटे में वहां आ पहुचा। भद्रसेन की उम्र चालीस-बयालीस बरस थी। कदमझोला, रंग गोरा, शरीर स्वस्थ-सुडौल और चेहरा गोल-मटोल था । वह युवती की रूप-छटा देखकर ठगा-सा रह गया। उसे स्कूल में पढी 'स्लीपिंग ब्यूटी' (निद्रामग्न सौंदर्य) कहानी स्मरण हो आई। धनुषाकार पतली भवें, लम्बी घनी पलकें, सुतवां नाक, गुलाब की पंखुड़ियों से नाजुकहोंठ और अंग-प्रत्यंग में मादकता भरी पी। डाक्टरी क्लास मे कई लडकिया उसके साथ पढ़ती थी, एक से एक सुन्दर, चंचल और नटखट । यो भी अभिजात वर्ग के परिवारों, ब्याह- शादी और पार्टियों में जाने कितनी रमणिया और कितनी महिलाएं संपर्क मे आई थी, पर यह रूप अद्वितीय था। गले की हरी कंठी उसे और भी आकर्षक बना रही थी, जैसे कामदेव की स्त्री रति मार्ग भूलकर अथवा अभिशापित होकर धरती पर उतर आई हो। "डाक्टर महोदय, क्या सोच रहे हो ?" नरेंद्र ने उसे खोया खोया- सा देखकर चुटकी ली। "मैं सोच रहा हूं," भद्रसेन ने एक क्षण रुककर उत्तर दिया, "ऋषियों का तप-मंग होने की कहानियां झूठी नहीं हैं।" नों ने मूक दृष्टि से भद्रसेन की ओर देखा और अपने भीतर एक झुरझुरा-ती महसूस की। नारी-सौंदर्य के प्रति उसने जो एक प्रकार का उपेक्षा भाव अपना रखा था, वह इस अनुपम रूप की धूप से बर्फ के सदृश स्वत. पिघल चला। भद्रमन और नरेंद्र पलग के दायँ-बायें आमने-सामने खडे थे। दोनो की दृष्टि चेसुध युवती पर केंद्रित यो। वे आत्मविदग्ध से देख रहे थे कि उसके मुख पर एक रंग आ रहा है और एक जा रहा है । शायद वह कोई मघर स्वप्न देख रही थी। इस स्वप्निल अवस्था का चित्र अगर किमीने ले लिया होता तो उसकी गणना विश्व की उत्कृष्ट कला-कृतियो मे होती। भद्रसेन भूल गया था कि उमे युवती को निहारने के लिए नहीं बल्कि उसका निरीक्षण करने के लिए बुलाया गया है। नरेंद्र ने भी उमे यह माभास नही कराया क्योकि वह खुद भी एकटक युवती की ओर देख रहा था। पखहीन तितली/१३ . " .
- सहसा त्यागराज और सुभद्रा ने कमरे में प्रवेश किया तब वे दोनों सतर्क हुए । भद्रसेन ने स्टेथेस्कोप संभाला और वह रोगिणी की जांच करने लगा। कि हृदय की गति बिलकुल ठीक थी । नब्ज पर हाथ रखा तो मालूम हुआ वह भी ठीक चल रही है। घने काले बाल हटाकर सिर का निरीक्षण किया और कनपटियों को टटोला, सभी कुछ ठीक-ठाक था । बीमारी का कोई 'चिह्न, कोई लक्षण नहीं था और न कहीं परोक्ष-अपरोक्ष चोट आई थी। "नींद की वेहोशी है। कुछ देर सो लेने के बाद अपने-आप ही टूट 'जाएगी।" भद्रसेन ने अपना निष्कर्ष घोपित किया। "अस्पताल ले जाएं कि नहीं?" डा० त्यागराज ने पूछा। "घंटे-दो घंटे देखिए । मेरा खयाल है कि वह होश में आ जाएगी। न आए तो मुझे फिर फोन कीजिएगा।" भद्रसेन ने उत्तर दिया। वे कभी एक-दूसरे को और कभी युवती को देख रहे थे। स्थिति बड़ी विचित्र थी। "पर इस नींद का कारण क्या है और वह इस अवस्था में सड़क पर आई कसे?" "यह सब तो वही बता सकेगी।" भद्रसेन ने अपना सामान संभाला और बक्मा बंद किया। "अच्छा, आज्ञा दीजिए, मैं अब चलूं।" "ऐसी क्या जल्दी है ! तुम मेरे साथ नाश्ता लोगे।" नरेंद्र बोला और उसने भद्रसेन से वसा लेकर अलग रख दिया। नरेंद्र के बड़े भाई जनेंद्र का व्याह भद्रसेन की वहन से हुआ था, जो उससे मात-आठ बरस छोटी थी और वह भी पति के पास कनाडा चली गई थी वैसे भी उनमें दो पीढ़ी से पारिवारिक संबंध थे, जो इस विवाह से और भी घनिष्ठ हो गए थे। नरेंद्र और भद्र सेन में इस संबंध ने मित्रता का रूप ले लिया था। डा० त्यागराज सैर से लौटने के बाद बोर्नवीटा के साथ दूध लिया करते थे, जो वह ले चुके थे। इसलिए नरेंद्र मोर भद्रसेन ही नाश्ता लेने । । बैठ गए। "अब बताओ, इस बेहोशी का कारण क्या है ?" नरेंद्र वोला। वह दरअसल भद्रसेन से अकेले में बात करना चाहता था। १४ / पंखहीन तितली -- .. "कह तो दिया, मुझे मालूम नही ।" भद्रसेन ने उत्तर दिया और निगाहें नरेंद्र के चेहरे पर गड़ा दी। "मालूम नही । तुम कंसे डाक्टर हो?" क्या तुम मुझे डाक्टर के अलावा ज्योतिषी भी समझते हो?" "इतनी गहरी नीद कोई चीज खाने ही से आई होगी। उसका पता लगाना ज्योतिषी का नहीं, डाक्टर का काम है।" "यह पोस्टमार्टम द्वारा ही मभव है। क्या तुम चाहते हो कि उसका पोस्टमार्टम किया जाए ?" भद्रसेन कनखियो से नरेंद्र की ओर देखते हुए मुस्कराया। पानसिंह आकर आमलेट, टोस्ट और मक्खन रख गया । नरेंद्र ने एक प्लेट भद्रसेन की ओर सरका दी और एक अपने आगे रख ली। दोनो ने नाश्ता लेना किया "कुछ अनुमान ही से बतायो।" नरेंद्र फिर वोला। "अनुमान से मनुष्य भ्रम में पड़ सकता है। भ्रम पैदा करना दाक्टर किर्तव्य नहीं है।" भद्रसेन ने स्लाइस पर मक्खन लगाते हुए उत्तर दिया और वह सामने निस पर रखे हुए चित्र की ओर देखने लगा। बर्फ ही बर्फ और ऊपर ला--एकदम नीला विस्तृत आकाश । "क्या यह कश्मीर का दृश्य है ?" "नही । पिताजी यह चित्र रूस से लाए थे।" "प्रकृति का अपना ही आकर्षण है जिसका जवाब नहीं।' भद्रमेन ने कहा और वह कुछ क्षण मौन दृष्टि से चित्र की ओर देखता । फिर उसने जो बात शुरू की, वह कश्मीर, नैनीताल, डल्होजी और मला के पहाडी दृश्यों से संबंधित थी । इसके बाद नाश्ते में जो समय ता, उसमे नरेंद्र भद्रमेन के साथ पहाडो ही की सर करता रहा। जव उठकर चला तब भी युवती के बारे में कोई चर्चा नही हुई। भद्रसेन मूड पहचानकर नरेंद्र ने भी इस बारे में चुप ही रहना उचित समझा। पंखहीन तितली/१५ ३ । . युवती को बेहोशी उसी समय टूट गई थी, जब डाक्टर भद्रसेन स्टेथे- स्कोप लगाकर उसका निरीक्षण कर रहा था। फिर भी वह आंखें बंद किए निश्चल और स्थिर लेटी रही। पहले वह चाकई बेहोश थी और उसके बाद बेहोश होने का अभिनय करती रही। नाश्ते के दौरान नरेंद्र और भद्रसेन में जो बातें हुई, कमरा नजदीक होने के कारण उनकी भनक उसके कानों में बराबर पड़ती रही थी। भद्रसेन का यह वाक्य कि 'अनु- मान से मनुष्य भ्रम में पड़ सकता है', उसने स्पष्ट सुना था। उसने जब अपने-आपको कमरे में अकेले पाया तो आंखें खोल दी और इधर-उधर निगाहें दौड़ाकर हर एक चीज का जायजा लिया और इसीरो परिवार की हैसियत का अंदाजा लगाया। अजनवी लोग, अजनवी स्थान ! इस नई परिस्थिति में उसे क्या भूमिका अदा करनी होगी, वह मन ही मन सोचती रही और देखती रही। युवती की आयु तेईस-चौवीस बरस थी। इस थोड़ी-सी आयु में वह अब तक कितने ही प्रयोग कर चुकी थी और उन प्रयोगों में उसने विभिन्न भूमिकाएं अदा की पों। जीवन उसके लिए सतत प्रयोग था और संसार एक प्रयोगशाला । इस नई परिस्थिति में अचानक आ पड़ना भी तो एक प्रयोग था-अद्भुत और दिलचस्प प्रयोग। देखना यह था कि इस नई परिस्थिति में उसकी भूमिका क्या होगी और वह उसे कैसे निवाह पाती है । उसके लिए यह परीक्षा की घड़ी थी। मजा तय है जव उसकी भूमिका भी उतनी ही अद्भुत और दिलचस्प हो जितना यह नया प्रयोग जान । पं..
पड़ता है। वह अपनी भूमिका जितनी कुशलतापूर्वक निवाह पाएगी और उसका अभिनय जितना सफल रहेगा, वह उसके सम्पूर्ण नारी होने का उतना ही बड़ा प्रमाण होगा." 'सम्पूर्ण नारी! मम्पूर्ण नारी !' युवती ने सस्वर कहा और वह इन शब्दों को ध्वनित-प्रतिध्वनित होते मुनकर मुग्ध होती रही, जैसे वे तानसेन अथवा बीथोवन द्वारा गाए गए संगीत के मधुर बोल हों। उसके जी में आई कि वह खिलखिलाकर हंसे और अजनवी स्थान को अट्टहास से भर दे। लेकिन परिस्थिति को गम्भीरता को सम्मुख रखते हुए उसने हसी को अपने भीतर ही दबा लिया । दवा लेने से वह मुस्कान-विद्रुप-मरी विलक्षण मुस्कान में बदल गई। युवती ने आखें दोबारा बंद कर ली और वह फिर मे यों निश्चल और स्थिर लेट गई कि अगर कोई व्यक्ति भीतर आकर देखे तो वह यही समझे कि उसकी नीद अभी नही टूटी, वह पूर्ववत् बेहोश पड़ी है। कुछ देर योंही आखें बंद किए वह लेटी रही और सोचती रही। फिर वह अकस्मात् उठ बैठी। आंखें पूरी खोल दी और अपने लम्बे-लम्बे स्याह बालों को कंघों पर से पीछे मटककर वातावरण मे यह चुनौती फेंकी: 'मैं तुम लोगों को ऐसा भ्रम में डालूगी कि तुम्हारे लिए उसका अनु- मान तक लगाना सम्भव नही होगा।' इसी समय सुभद्रा ने कमरे में प्रवेश किया। उन्होंने युवती को बैठे देखा और उसे बोलते भी मुना, पर वह यह न समझ पाई कि उसने कहा क्या है। "वेटी, तुम जाग गई ? तुम्हारा जी अब कैसा है ?" सुभद्रा ने सस्नेह पूछा। "ठीक है ।" युवती ने चट पलंग से उतरकर हाथ जोडे और सविनय प्रणाम किया। सुभद्रा का कद लम्बा और शरीर दुबला था। उन्होने नौले बार्डर को मूतो साड़ी पहन रखी थी। उनके एक हाथ में सोने की दो चूड़ियां और दूसरे में घड़ी बंधी पी। सिर के बाल खिचड़ी नहीं, बल्कि अधिकाश सफेद पंखहीन तितली/१७ - और कहीं-कहीं काले थे, गाल कुछ पिचक गए थे और चेहरे की रंगत ताम्बे जैसी थी। "जिमो बेटी, जिओ।" सुभद्रा ने आशीर्वाद देते हुए युवती को छाती से लगा लिया। "अभी डाक्टर आया था। उसने देखकर बताया कि तुम गहरी नींद में हो और नींद थोड़ी देर में टूट जाएगी। फिर भी हमें बड़ी चिता थी।" जब देसा कि सुभद्रा युवती से बातें कर रही हैं तो डा० त्यागराज, नरेंद्र और पानसिंह भी भीतर चले आए । युवती ने जिस प्रकार सुभद्रा की सम्पर्थना की थी, उसी प्रकार अब डा० त्यागराज को और नरेंद्र को नमस्कार किया। "वेटी, तुम्हारा नाम क्या है ?" डाक्टर साहब ने उसे आशीर्वाद देते हुए पूछा। "नाम !" युवती सकुचा गई और आंखें झुकाकर बोली, "मुझे याद नहीं।" "अमरज है कि अपना नाम भी याद नहीं !" "नाम क्या, मुझे कुछ भी तो याद नहीं।" युवती ने माथे पर हाथ रराफर वेद और विवशता व्यक्त की और फिर इधर-उधर दृष्टि घुमाकर कातर स्वर में बोली, "हे भगवान, मुझे क्या हुआ है ! न कुछ याद है और र कुछ समझ में आ रहा है। कृपया आप लोग ही बताएं, मैं कहां हूं और यहां से आई?" चारों व्यक्ति विस्मय और कौतूहल में भरे युवती को देखने लगे। किसी के मुख से एक शब्द तक नहीं निकला। वे उसकी ओर देखते ही रहे क्योंकि होश में आने के बाद भी वह एक ऐसी पहेली बनी हुई थी, जिसे बूझ पाना कठिन था। "शायद यह अपनी स्मृति खो बैठी है।" नरेंद्र ने पिता की ओर देखते हुए अंग्रेजी में कहा। "ऐसा सम्भव है।" उन्होंने भी अंग्रेजी में उत्तर दिया और तनिक रुवा- गार जागे कहा, "ऐपा भक्सर हो जाता है। इस प्रकार की घटनाएं पहले भी देखने-सुनने में आई हैं।" . ।
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लेकर सोचना-पछताना व्यर्थ है। सच तो यह है कि मनुष्य का जीवन ही एक पहेली है जिसे वह इतना यत्न करने के बावजूद आज तक समझ नहीं पाया।" डा० त्यागराज ने एक-एक शब्द पर बल देकर धीरे-धीरे कहा। सुभद्रा मुस्कराई, नरेंद्र मौर युवती भी मुस्कराए। लेकिन पानसिंह विस्मय-विमूढ़-सा देखता-सुनता रहा। उससे न मुस्कराते बनता था और न कुछ कहते बनता था। "इस पहेली को ऐसे ही रहने दो। तुम उठो और चलकर नहाओ- घोमओ।" सुभद्रा ने युवती को बांह से पकड़ा और उसे अपने साथ भीतर ले चलीं। २०/पंसहीन तितली
४
। नरेंद्र
डा० त्यागराज ने आज काफी दौड़-धूप की थी, अब वह पकान मह.
सूम कर रहे थे; इसलिए अपने कमरे में आराम करने चले गए ये
ने फोन का रिसीवर उठाकर डायल घुमाया और जब नम्बर मिल गया तो
दूसरी तरफ से आवाज आई :
"कहिए, में भद्रसेन बोल रहा हूं।"
"और इधर मैं नरेंद्र है।"
"अच्छा, यच्छा । क्या युवती को नींद टूटी ?"
"नोद तो टूट गई, पर एक दूसरी समस्या उठ खड़ी हुई, जो पहली
से भी अधिक विकट है।"
"समस्या क्या है ?"
"समस्या बहुत गम्भीर है। मुझे तुमसे उसोपर बात करनी है।"
यह बताओ कि तुम्हें आने की फुरसत है ?"
"फुरमत तो खैर है, क्योंकि इतवार को क्लिनिक मे छुट्टी रहती है।
में सिर्फ खास-साम रोगियों को देखने आता हूं और इस समय उन्हीको देस.
रहा हूं।"
"कितने बाकी हैं ?"
"एक मिनट रुको, अभी बताता हूं।"
नरेंद्र ने रिमीघर कान से हटा लिया और वह अनमना-सा अंगुलियों
के नासून देखने-टटोलने लगा। उसके होंठ भिचे और फिर सामान्य स्थिति
पर आ गए। रिसीवर दोबारा कान से लगाया तो कुछेक सेकंड बाद
भद्रसेन की आवाज़ सुनाई पड़ी: "सिर्फ तीन मरीज़ देखने बाकी हैं। उन्हें निपटाकर मैं अभी आ रहा हूं।" . । "कितनी देर में ?" "देर' 'देर कुछ नहीं, ज्यादा से ज्यादा आधा घंटा।" नरेंद्र ने रोविंस का 'स्कैंडल' उपन्यास उठाया और उसे पढ़ने के खयाल से वह सोफे में धंस गया । उपन्यास उसे पसन्द था क्योंकि उसमें एक के बाद एक रोचक स्कैंडल का वर्णन था। वह इसे आधे के करीब पढ़ चुका था और सोचा था कि माज छुट्टी का दिन है, फुरसत रहेगी और वह इसे समाप्त कर लेगा। इसलिए जहां छोड़ा था, वहीं से आगे पढ़ना शुरू किया। चार-पांच पंक्तियां पढ़ गया; पर कुछ भी उसकी समझ में नहीं आया। शब्द निरर्थक जान पड़ते थे, उनमें कोई सम्बन्ध, कोई तारतम्य नहीं था और पीछे जो पढ़ा था वह भी स्मृति-पट से उतर गया था। पुस्तक बंद करके वह सामने दीवार की ओर ताकने लगा। लेकिन निगाहें खाली- खाली थीं। उसे न कुछ दिखाई पड़ रहा था और न कुछ सूझ रहा था । वह नितांत अंतर्मुखी था । सुबह की घटना उसके मन-मस्तिष्क पर छाई हुई थी और हरी कंठी वाली उस युवती को आकृति उसकी दृष्टि में तर रही थी। यह आकृति जितनी सुंदर और आकर्षक थी, उतनी ही निरीह और भोली भी थी। नरेंद्र के मन में एक आशंका मंडरा रही थी और वह न चाहते हुए भी सोच रहा था, 'संभव है, इस निरीहता और भोलेपन में भी कोई स्कैंडल छिपा हो।' पर अनुपम सौन्दर्य में स्कैंडल सूंघना भी तो उचित नहीं था। किसी व्यक्ति पर अकारण संदेह करने और उसे दोपी ठहराने के लिए उसका अपना मन तैयार नहीं था । यह उसका अनुमान ही तो है और मनुमान जैसाकि भद्रसेन ने कहा था, उसे भ्रम में डाल सकता है। भ्रम के माधार पर कुछ भी तय करना उचित नहीं था। लेकिन आशंका लोट-लौटकर उसके मन में आ रही थी और वह उसे अपने से दूर रखने का भरसक प्रयास कर रहा था। स्कैंडल पढ़ते-पढ़ते उसे हर तरफ स्कैंडल दिखाई दे रहा था। यह उसने पहली बार जाना । एक तरफ भ्रम और संदेह और दूसरी तरफ न्याय और औचित्य । उसके भीतर द्वंद्व भयंकर - २२/पंखहीन तितली द्वंद्व उठ खड़ा हुआ था और वह कुछ भी निर्णय नहीं कर पा रहा था। "पहेली !" स्कंहल सम्बन्धी विचार को झटकने के लिए जो एक प्रकार से विच्छू बन गया था, वह सस्वर चिल्लाया। कमरे में कोई दूसरा व्यक्ति नहीं था। वह अपने इस उच्चारण पर चौंका और 'पहेली' शब्द को ध्वनित-प्रतिध्वनित होते हुए सुनने लगा... कई क्षण स्थिर बैठा सुनता रहा मोर अपनी मन.स्थिति पर विचार करता रहा। "पहेली है तो इसे समझना होगा।" वह पुस्तक सोफे पर पटककर उठ खडा हुआ और बरामदे में आकर तेज-तेज कदमों से टहलने लगा। उसके भीतर आंधी चल रही थी और वह इधर से उधर घूम रहा था । आखिर जब आंधी थमी तो वह भी सहसा रुका और गमलो में उगे फूलो की ओर देखने लगा, जिनमे कैक्टस के अलावा सफेद लिली भी थी। गाड़ी का हानं सुनाई पडा । नरेंद्र ने लपककर फाटक खोला। भद्सन की कार भीतर आई और फिर वे दोनो हाप मे हाथ डाले ड्राइंगरूम में जा बैठे। "अब बताओ, नई समस्या क्या आ पड़ी है ?" भद्रसेन ने वाहें फैला- कर सिर सोफे की पुश्त पर टैक दिया। "समस्या यह है," नरेंद्र रुका और वह जो उपन्याम पटक गया था, उसके पृष्ठ पलटते हुए वात जारी रखी, "होश में आने के बाद युवती कह रही है कि अपने पिछले जीवन की उसे कोई भी बात याद नहीं है।" "क्या मतलब?" "मतलब यह कि उसे अपना नाम तक मालूम नहीं।" "सच?" "और क्या मैं गलत कह रहा हूं?" भद्रसेन सकते में आ गया। वह चुप बैठा सोचने लगा-सोचता रहा और फिर सामने दीवार पर लगे एक चित्र की ओर देखते हुए धीरे-धीरे यो बोला, जैसे वह खुद अपने आपसे सम्बोधित हो: "यानी वह अपनी स्मृति खो बैठी है !" पंखहीन तितली '२३ "हां, वह कह तो यही रही है।" नरेंद्र ने उत्तर दिया और वात जारी रखी, "उसे यह भी मालूम नहीं कि वह सड़क पर कब और कैसे आई।" "उसकी यह बात तो यों सही हो सकती है कि कोई उसे वेहोशी की हालत में सड़क पर फेंक गया हो मोर जब वेहोशी टूटी तो वह तुम्हारे पास कोठी में थी। उसे क्या मालूम कि वह वहां कब और कैसे आई।" भद्रसेन अब भी दीवार पर लगे चित्र की ओर देख रहा था। "मेरा विचार कुछ और है।" "क्या?" नरेंद्र ने 'स्कैडल' उपन्यास हवा में उछाला और गेंद की तरह लपक लिया। कुछ क्षण वाद अपने को स्थिर और संतुलित करके बात शुरू की: 11 "आजकल के इन लड़के-लड़कियों में मेंडिक्स, एल०एस० डी०, माफिया और मारिजुआना जैसे मादक पदार्थों का बहुत चलन है।" "वह तो है।" भद्रसेन ने सिर हिलाकर हामी भरी। लेकिन फिर यह भूलकर कि वात किस संदर्भ में हो रही है, उसने अपनी व्याख्या शुरू कर दी, “पर उनका शरीर पर अलग-अलग प्रभाव होता है । जैसे माफिया का इंजेक्शन लेने से मनुष्य की ऐसी अवस्था हो जाती है कि शरीर पर चोट करें, चुटकी काटें तो कुछ भी महसूस नहीं होता। और मेंड्रिक्स खाने से नींद खूब आती है, ऐसी गहरी नींद जो दो-दो, तीन-तीन दिन तक नहीं टूटती।" "क्या ताज्जुब है कि इस युवती ने भी मेंड्रिक्स की गोलियां खाई हों और वह उन्हीं से वेहोश हुई हो !" नरेंद्र ने भद्रसेन को बीच ही में टोक दिया वर्ना मादक पदार्थों पर वह अपनी व्याल्या जाने कब तक जारी रखता और असल समस्या ध्यान ही से उतर जाती। "हो सकता है, वह मेंड्रिक्स ही से वेहोश हुई हो।" भद्रसेन ने समर्थन किया, लेकिन आगे कहा, "पर स्मृति खो जाने का कारण फिर भी समझ में नहीं पाता। इसका मेंड्रिक्स से कोई सम्बन्ध नहीं।" "मैं समझता हूं कि स्मृति खो देने का बहाना बनाकर वह हमें बना .
रही है।" नरेंद्र ने पहलू बदलते हुए वह शंका व्यक्त की जो उसे बड़ी देर में परेशान कर रही थी। भद्रसेन विचारमग्न हो गया । वह एक पल चुप रहा और फिर होंठों को गोलाकार बनाकर बोला: "मकसद?" "खिलवाड़-तफरीह । मकसद और क्या होगा! इन अन्दा माडनं लड़के-लड़कियो के लिए पूरा जीवन ही खिलवाड़ और तफरीह है।" नरेंद्र ने अपनी बात इस ढंग से कही कि भद्रसेन खिलखिताकर हंस पड़ा और नरेंद्र भी मुस्कराया। 'टनन-टनन !" फोन को घटी हुई। नरेंद्र ने लपककर रिसीवर उठाया। मालूम हुआ कि नागपुर से कोई अर्थशास्त्री दिल्ली आया हुआ है और वह डा० त्याग- राज से भेंट का ममय चाहता है। नरेंद्र ने उसे बता दिया कि इस समय डाक्टर साहब बाराम कर रहे हैं, वह कोई आध घंटे बाद दोबारा फोन करें। "देखो नरेंद्र ! मेरा एक सिद्धात है।" वह जब लौट आया तो भद्रसेन ने बात शुरू की,"और सिद्धात यह है कि सौ के सो व्यक्तियों पर अविश्वास करने के बजाय किन्ही दस से धोखा खा लेना कही अच्छा है।" "धोखा तो खर वह क्या देगी? मैंने तो यों ही अपना..." 'अनुमान मन्द नरेंद्र के गले मे अटक गया क्योकि भद्रसेन ने पहले ही कहा था कि अनुमान से मनुष्य भ्रम मे पड सकता है। "दूसरी बात ।" भद्रसेन फिर बोला, "मैं जब मधु देखता हूं तो सौंदर्य को कल्पना करता हू और जब सौन्दर्य देखता हूँ तो मधु की। मधु का यह गुण है कि वह कभी सडता नहीं, बल्कि दूसरी चीजो को सड़ने से रोकता है । आयुर्वेद वाले मधु के इस गुण को जानते हैं और उसका प्रयोग करते हैं । अब ऐलोपंथी वाले मधु की जगह अलकोहल इस्तेमाल करते हैं।" "डाक्टर महोदय ! मधु और मलकोहल मे जो अंतर है, जरा उसकी भी कल्पना कीजिए।" इस बार नरेंद्र खिलखिलाकर हंसा और मद्रसेन मुस्कराया। भाव यह पंखहान तितली/२५ गा कि आज सौंदर्य भी मधु न रहकर अलकोहल बन गया है । डा० त्यागराज आराम कर चुके थे। एक दरवाजे से उन्होंने और दूसरे दरवाजे से सुभद्रा ने ड्राइंगरूम में एकसाथ प्रवेश किया। सुभद्रा के साथ युवती भी थी। उसने अव सफेद साड़ी और सफेद ब्लाउज पहन रखा था और गले की हरी कंठी उतार दी थी। सफेद परिधान में उसका रूप ही बदल गया था। वह अव अत्याधुनिक चंचल युवती नहीं, सुशील- लजीली भारतीय कन्या थी। "आप डाक्टर भद्रसेन हैं । सुबह जब तुम बेहोश पड़ी थी तो इन्हींको बुलाया गया था । आप हमारे संबंधी भी हैं।" नरेंद्र ने परिचय दिया और युवती ने भद्रसेन को सविनय प्रणाम किया। . "नलिनी की साड़ी-जम्पर में मुझे तो यह हू-ब-हू दूसरी नलिनी जान पड़ती है।" सुभद्रा ने सस्नेह युवती की ओर देखा और उसके होठों पर मृदु. मुस्कान तिर आई। नलिनी सुभद्रा के बड़े बेटे जनेंद्र की पत्नी और डा० भद्रसेन की छोटी बहन थी। "डाक्टर, यह बताओ कि जीवन की पिछली बातें भूल जाने का ., कारण क्या हो सकता है ?" त्यागराज ने भद्रसेन से प्रश्न किया। "मेरा सयाल है कि वेहोशी वैसे तो टूट गई है, पर दिमाग पर उसका प्रभाव अव भी बाकी है।" भद्रसेन ने एक नजर युवती की ओर देखा और तनिक रुककर आगे कहा, "जब यह प्रभाव पूर्ण रूप से दूर हो जाएगा तो स्मरणशक्ति अपने-आप लौट आएगी।" "कब तक?" "यह कुछ नहीं पाहा जा सकता।" भद्रसेन ने उत्तर दिया । त्यागराज ने दृष्टि हटाकर दीवार पर टंगे चित्र की मोर देखा और उसी ओर देखते हुए भागे कहा, "एक दिन, एक हपता, एक साल या इससे भी अधिक समय लग सकता है।" युवती ने भद्रसेन फो वात सुनी तो अपना सिर सुभद्रा के कंधे पर रख २६/पंखहीन तितली दिया, जैसे जंगल को निस्सहाम बेन ने पेड़ का सहारा ले लिया हो । याप मोर बेटे दोनों की दृष्टि उसके चेहरे पर केंद्रित थी । लेकिन बाप की दृष्टि में सहानुभूति और बेटे की दृष्टि में संदिग्ध क्रूर प्रश्न था । "तय तक क्या किया जाए? पुलिस को सूचना दें?" त्यागराज ने युवती पर मे दृष्टि हटाकर भद्रसेन की ओर देखा। "सूचना देने में कोई हर्ज नही।" भद्रसेन ने उत्तर दिया और कहा, "शायद वही कुछ खोज-सवर निकालें।" "तब तक इसे नारी-निकेतन में रखा जाए 'नारी निकेतन' शब्द पर युवती यों चौको जैसे विच्छू ने डंक मारा हो। उसने आंखें पूरी सोलकर सुभद्रा की ओर देखा, उनमें करणाजनक याचना पी। "वाह, मुबह तो कह रहे थे, तुम्हें पली-पलाई बेटी मिल गई और अब उसे नारी निकेतन भेजने को तैयार हो ! न यावा, में अपनी बिटिया को उस नरक मे कभी न जाने सुभद्रा ने युवती को छाती से लगा लिया और प्यार से उसका सिर सहलाने लगी। युवती भी सुभद्रा सटकर स्नेह और वात्सल्य का पान कर रही थी । लगा कि चिर काल से विछुट्टो मां-बेटी सहसा एक-दूसरे से आ मिली हैं। पंखहीन तितली/२७ अगले दिन जब अखवार आया तो पहले ही पृष्ठ पर एक खबर की सुखियां देखकर नरेंद्र चौंक उठा : 'एक युवती की रहस्यमय मृत्यु किदवई नगर में लाश मिली' अगल-बगल देश-विदेश की महत्त्वपूर्ण खबरें छपी थीं। जाने क्यों सबसे पहले इसी खबर ने नरेंद्र का ध्यान आकर्षित किया । सुखियां पढ़कर वह एक क्षण रुका और फिर एक दीर्घ निःश्वास छोड़कर नीचे का पूरा विवरण पढ़ा : 'नई दिल्ली: 17 सितम्बर--मीना नाम की एक तेईस-चौबीस वर्षीय युवती, जो के० एंड के० कंपनी में रिसेप्शनिस्ट थी और वकिंग गर्ल्स होस्टल में रहती थी, आज सुवह किदवई नगर में मृत पाई गई । उसका चेहरा बुरी तरह विकृत था। वह सिर्फ कपड़ों से पहचानी गई । लगता है कि हत्या कहीं और हुई थी; पर हत्यारे उसका शव यहां गंदे नाले के निकट फेंक गए। पुलिस इस रहस्यमय हत्याकांड की जांच कर रही है।' अगर नरेंद्र ने खुद एक रहस्यमय घटना का साक्षात्कार न किया होता और संज्ञाहीन दशा में इतनी ही आयु की एक युवती घर में न आई होती तो शायद वह इस खबर को बिना पढ़े ही छोड़ देता और अगर पड़ता भी तो बिलकुल सरसरी तौर पर, वह उसका मर्मस्थल कदाचित् न छू पाती । हत्या और अपहरण की ऐसी सनसनीखेज खबरें अक्सर छपती रहती हैं, कोन उनकी परवाह करता है ? नरेंद्र उन्हें प्रायः नज़रंदाज कर देता था। लेकिन आज इस खबर का उसने एक-एक शब्द ध्यान से पढ़ा, पढ़कर यह सिहर उठा और उसके भीतर चिंगारियां-सी फूटने लगीं। खबर उसने पिता को सुनाई, मां को सुनाई और शरणागत इस अनामिका युवती को सुनाई। "ऐसी घटनाएं दिनों-दिन बढ़ती जा रही हैं।" खबर पढ़ लेने के बाद नरेंद्र ने अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की। "इन घटनाओं का भ्रष्टाचार से सीधा सम्बन्ध है। जैसे-जैसे भ्रष्टा- ३०/पंखहीन तितली चार बड़ेगा, ऐसी घटनाएं भी बढ़ेगी।" डाक्टर साहब ने बेटे की बात को सैद्धातिक रूप दिया। लेकिन युवती को इस चर्चा में तनिक भी रुचि नहीं थी। खबर सुनते ही उसका रंग सरसों के फूल जैसा पीला पड़ गया था और होंठ भिच गए थे, जैसे फिर से बेहोश हो जाएगी। ज्यों ही डाक्टर साहब ने वाक्य पूरा किया, वह वहां से चलने के लिए उठ सड़ी हुई। "क्यों बेटी, तबियत कैसी है ?" मुभद्रा ने पूछा। "ठीक है।" युवती ने संक्षिप्त उत्तर दिया और वह ड्राइंगरूम से बाहर चली गई। "वैचारी के मन पर जाने क्या बीत रही है। अच्छा था कि यह खबर उमे न सुनाई होती।" सुभद्रा ने बेटे की ओर देखते हुए कहा । "मैं न सुनाता तो वह खुद पढ़ती और तब भी उसके मन पर यही बीतती।" नरेंद्र ने मां की बात का उत्तर दिया, लेकिन उसने खुद महसूस किया कि युवती के मन को वाकई गहरी ठेस लगी है वर्ना यह कदाचित् यों उठकर न चली जाती। कोठी में कुल मिलाकर सात कमरे थे। जब युवती का फिलहाल यही रहना तय हुआ, तभी उसे एक अलग कमरा दे दिया गया ताकि वह हर तरह स्वच्छद महमूस करे, इच्छा अनुसार उठे-बैठे और जब चाहे आराम करे। हाइगरूम से उठकर वह अपने कमरे में आई और आते ही धम्म ने पलंग पर गिर पड़ी। उसने सिरहाना उठाकर छाती के नीचे रखा और उमपर औंधे मुह लेट गई। खबर ने युवती के भीतर जो उपल-पुथन कर दी थी, किसी दूसरे के लिए उन सात तेना सम्भव नहीं था। पा क्षण-क्षण घढ रही थी। उसने गरि बोला छोड़ दिया और वो दी। सुभद्रा माई और दरवाजे पर एक नजर देखकर लौट नहा-धोकर दफ्तर चला गया। पर गान्नि यो। दृदती इस लेटी रही। वह बीच-बीच में दिया नीवनी बोर कर कती थी। काफी देर का हो मेटे ने के बाद उसने बह:: ।
। । और कुहनियां पलंग पर टेककर सिर हाथों में थाम लिया। उसकी दृष्टि सामने दीवार पर टिकी थी। उसने सिर को एक झटका दिया और मुख से शब्द-प्रवाह पहाड़ी झरने की तरह फूट निकला: "मरने वाली चाहे कोई भी हो, उसे मेरा नाम मोढ़ा दिया गया है। यह नाम कफन के साथ ही जलकर हमेशा-हमेशा के लिए खत्म हो जाएगा। दुनिया भूल जाएगी कि मीना नाम की रिसेप्शनिस्ट युवती का भी कभी कोई अस्तित्व था। यह मेरे एक जन्म का अन्त और दूसरे की शुरुआत है। मरने वाली ने मुझे तमाम बंधनों से मुक्त कर दिया है । न कोई मुझे याद करेगा और न मुझे खोजने को सिरदर्दी मोल लेगा। मैं जीवित होते हुए भो दूसरों के लिए मर चुकी हूं। मृत्यु जो मनुष्य के लिए इतनी भयंकर है. मेरे लिए वरदान बन गई है । अब मैं आकाश में उड़ने वाले पंछी की तरह स्वच्छंद और स्वतन्त्र हूं। शायद यह युवती खुद भी सम्पूर्ण नारी बनने का प्रयास कर रही थी । वह अपने इस प्रयास में असफल रही, पर मेरा मार्ग प्रशस्त कर गई। यह मेरा नया जीवन है और इस नये जीवन में मेरा नया नाम-एक मात्र नया नाम है सम्पूर्ण नारी ! सम्पूर्ण नारी !" अपना यह नाम दोहराते हुए युवती उठकर बैठ गई। तकिये को उठाकर हवा में उछाला और उचक लिया । मन अब हलका था और वह चिड़िया बनकर उड़ जाना चाहती थी। "बेटी, नाश्ता ले लो।" सुभद्रा की आवाज़ सुनाई पड़ी। 'आई, मांजी !" युवती ने उत्तर दिया। जब वह कमरे से बाहर निकली तो उसके मुख पर गाम्भीर्य की मोटी परत थी और वह सर्वथा संयत और शान्त थी। ३२ / पंखहीन तितली नरेंद्र की उम्र बत्तीस-तेंतीस बरस थी। कद पाच फुट पांच इंच, रंग गेहुआ, दाहिनी आख के नीचे छोटा-सा तिल, बाल घने और धुंधरियाले थे । वह छ:-सात वरस पहले 'स्वस्तिका लिमिटिड' नाम की कंपनी में अठारह सौ रुपये मासिक वेतन पा रहा था। 'स्वस्तिका लिमिटिड' कपनी पश्चिम जर्मनी के साथ अनुबंध में चल रही थी। यह कंपनी ट्रेक्टर और स्वाटर बनाती थी। उसने अपने ट्रैक्टर का नाम 'किसान' और स्कूटर का नाम 'चेतक' रखा था। ट्रेक्टर और स्कूटर के कुछ पुर्जे कंपनी सुद बनाती थी, कुछ फरीदाबाद की "जयहिंद' कंपनी से खरीदे जाते थे और कुछ पश्चिम जर्मनी से मापात होते थे। फिर भी कंपनी ने अपनी उत्पादक वस्तुओं का शुद्ध स्वदेशी नाम इसलिए रखा था कि चौथे दशक से भारतीय संस्कृति की गौरव चर्चा विशेष रूप से बढ़ गई थी। राजनीति और व्यापार के क्षेत्र में संस्कृति और परंपरा से अव नही, हमेशा ही लाभ उठाया गया है। ब्रिटिश शासन काल में जब जमनी अविभाजित था और व्यापार के क्षेत्र मे ब्रिटेन से उसकी होड लगी थी, उसने अपने विशेषज्ञ भारत भेजे थे। उद्देश्य यह था कि वे यहां को रीति-रिवाज, संस्कृति और भाषा इत्यादि का अध्ययन करें ताकि भारत की मंडी मे मिटिश माल को मात दी जा सके। इसमे उन्हें पर्याप्त सफलता मिली थी। 'सफाचट' ब्लैड जिसका अविभाजित भारत में काफी चलन रहा, जर्मनी से बनकर आता था। जब से ब्रिटेन का एकाधिकार समाप्त हुआ था, तब से सभी उन्नत - अब भी वह एक प्रसिद्ध ट्रेड यूनियन नेता था। भद्रसेन ने राजनीति में चाहे सक्रिय भाग नहीं लिया था, पर उसका दृष्टिकोण साहित्य और राजनीति ही में नहीं अपने व्यवसाय तक में जनवादी था। वह देश के जनसाधारण और उनकी परम्पराओं से प्यार करता था। नरेंद्र भद्रसेन के इन गुणों से प्रभावित था और अपने विद्यार्थी जीवन में उससे प्रेरणा ग्रहण करता रहा था। इन दोनों में जो घनिष्ठता बढ़ी थी, उसे मैत्री की, गुरु-शिष्य के सम्बन्ध की अथवा कोई दूसरी संज्ञा दी जा सकती थी। वर्ना नरेंद्र से अगर पूछा जाता कि तुम्हारे मानसिक विकास में पिता के अलावा और किसका अधिक योगदान है तो उसका सहज उत्तर होता--'डाक्टर भद्रसेन का।' नरेंद्र के प्रति भद्रसेन के मन में स्नेह की जो भावना थी, उसे नरेंद्र ही नहीं, डा० त्यागराज नौर सुभद्रा ने भी भली भांति समझ लिया था। मनोगत भाव छिपाए नहीं छिपते, मनुष्य की तो बात ही क्या, उन्हें पशु- पक्षी तक समझ लेते हैं। 'स्वस्तिका लिमिटिड' में इंजीनियर बन जाने के बाद से नरेंद्र की चेतना अवरुद्ध और उसका व्यक्तित्व धीरे-धीरे कुंठित होता चला गया था। इस परिवर्तन से नरेंद्र स्वयं चाहे अनभिज्ञ था, पर भद्रसेन की स्नेह- मयी सूक्ष्म दृष्टि ने देख-समझ लिया था । एक अवसर पर उसका ठोस प्रमाण पाकर उसे बड़ा खेद हुआ और उसने नरेंद्र को चेताने का प्रयास भी किया। इंद्रसेन का छोटा साला भुवनेश नरेंद्र का सहपाठी था । एक पार्टी के सिलसिले में भद्रसेन जब उसके घर पहुंचा तो वहां चार-पांच आदमी पहले से मौजूद थे और उनमें बंगला देश की राजनीति पर बातचीत हो रही थी। नरेंद्र भी आ चुका था, पर वह इस बातचीत के प्रति तटस्थ भाव अपनाए अलग बैठा था और फिल्म-फेयर' पढ़ने में इतना तल्लीन था कि उसे भद्रसेन के ड्राइंगरूम में प्रवेश करने और चचित विषय पर अपना मत व्यक्त करने का पता तक नहीं चला। "नरेंद्र !" भावाज पहचानकर नरेंद्र चौंका और उसने हाथ जोड़कर प्रणाम किया। ३६ / पंखहीन तितली भद्रसेन सोफे से उठकर उसके निकट एक कुर्सी पर आ बैठा था। धीरे से बोला: "इस फिल्मी पत्रिका में तुम्हारी इतनी दिलचस्पी! ताज्जुब है।" नरेंद्र लजाया और उसने पत्रिका बंद करते हुए उत्तर दिया, "क्या किया जाए ? जिन लोगों में हर वक्त का उठना-बैठना है, उनकी बातचीत का एकमात्र विषय फिल्म है। आप जानते हैं, साप तो देना ही पड़ता "यों कहो, जो भी नमक को खान में जाता है, उसका नमक बन जाना स्वाभाविक है।" नरेंद्र ने वाहें ऊपर उठाकर अंगड़ाई ली और उत्तर में वह मुस्करा भर दिया। भद्रसेन उसके मुख की ओर देखता रह गया। उसे विश्वास नहीं था रहा था कि ढाई-तीन माल पहले का नरेंद्र मोडे-से समय में इतना बदल गया है। नमक की खान का मुहावरा उसने जिस तीव्र वेदना के साप इस्तेमाल किया था, नरेंद्र को वह छू तक नही पाई थी। लेकिन नरेंद्र नमक बना नहीं था,बनने की प्रक्रिया में या । उसने फिल्म फेयर' ही नहीं, जेम्स बांड और शैविस के जासूसी उपन्यास भी पड़ना शुरु कर दिए थे और उसे वै अच्छे लगते थे । गुप्त रूप से विकने वाला अश्लील साहित्य भी नजर से गुजरा था, जो उसने नाक-मों चढाकर अलग हटा दिया था। अपने एक सहकारी सुरेश के मकान पर लू फिल्मों में यौन विकृति के वीभत्स दृश्य मोर नारी को अत्यन्त घृणित, पतित रूप में देसा तो उसका मन ग्लानि से भर गया। पूर्वसचित संस्कारो को आपात पहुंचा और मास के उस दरिया में डूबने के बजाय यौन-संबंधों से उसे गहरी वितृष्णा हो गई जो आखिर अविवाहित रहने की प्रतिज्ञा का आधार बन गई । डा० त्यागराज ने इस संबंध में कभी कुछ नही बहा, लेकिन मा, दूसरे सगे-संबंधियों और भद्रसेन के लाख समझाने पर भी वह टस से मस नहीं हुआ और उसने ब्याह के हर प्रस्ताव को ठुकरा दिया।
७ वितृष्णा, माकर्पण-आकर्षण, वितृष्णा। जव से युवती घर में आई थी, नरेंद्र विपरीत भावनाओं के निरंतर द्वंद्व में जी रहा था। उसकी पहले दिन की वेशभूपा स्कर्ट, टाप और कंठी से यह शंका पुष्ट होती थी कि उसने मेंट्रिक्स की गोलियां खाई हैं वर्ना नींद से वेहोश हो जाने का कोई कारण नहीं था। रिक्शा अथवा स्कूटर में वह कहीं जा रही होगी कि उसमें बैठे-बैठे वेहोश हो गई। अब चालक उसे पहुंचाता तो कहां पहुंचाता-ठौर-ठिकाना कुछ मालूम नहीं था। झंझट से बचने के लिए वह इस बला को सड़क पर फेंक- कर चलता बना। मरे या जिए, उसे इससे मतलव ? दिसम्बर-जनवरी की रात होती तो शायद वह ठिठुरकर मर गई होती। अगर बेहोशी की हालत में वहां कुछ देर पड़ी रहती तो सम्भव था, चील, कौवे अथवा गुत्ते उसे नोच डालते और उसका वैसा ही विकृत शव पुलिस को मिलता जैसा किदवई नगर में इसी अवस्था की किसी दूसरी गुवती का मिला था। मौसम अच्छा था, पिताजी कुछ जल्द ही घर से निकले और उन्होंने इसे देख लिया। 'क्या यह सम्भव नहीं कि उसने स्मृति सो देने का नाटक रचा हो?' नरेद्र सोचते-सोचते एक विशिष्ट बिंदु पर पहुंचा तो उसका चिंतन मनायास प्रश्न बनकर मुखर हो उठा। लेकिन माता-पिता, उनकी बात ही अलग थी। ये सरल हृदय प्राणी ये। उन्हें जो जीवन विरासत में मिला था, उसे पग-पग आगे बढ़ाने का गौरव प्राप्त था। नई पीढ़ी को अत्याधुनिकता को न उन्होंने देखा-परता था और न ही उनके मन में उसके प्रति कोई पूर्वाग्रह था। किसी अच्छे पर की शिक्षित युवती को वष्ट और संकट में देखकर उनकी संस्कारगत करुणा उमड माई पो और उन्होंने उसे सहज स्वभाव 'बेटी' कहा था। स्मृति सो देने का अभिनय करके युवती ने उनकी सहानुभूति जीत ली थी। अब जब उसे माथ रहते दो महीने बीत चुके थे, सुभद्रा और त्यागराज के व्यवहार से यही लगता था कि उन्होंने उसे बेटी के रूप में स्वीकार लिया है । वह उनके लिए अगनवी या परायो नही है। और फिर डाक्टर भद्रसेन-उमका मन भो पूर्वाग्रही से मुक्त एक साफ स्लेट था, जिसपर वह कोई भी गलत शब्द अथवा अप्रिय बन्द लिखना नहीं चाहता था। डाक्टर के पास चौर माए या माधु आए, वह दोनो को समान भाव से देखेगा, अगर बीमार है तो वह दोनो का इलाज करेगा । वह किसी को भी का और संदेह की दृष्टि से नहीं देखेगा। फिर वह डाक्टर होने के अलावा साहित्य-प्रेमी और कला-प्रेमी भी था और उसके प्रगतिशील दृष्टिकोण के अनुसार देश-प्रेम का मतलब देश की जनता में प्रेम करना था। वह एक ऐसा व्यक्ति था, जिसने इम जीवनदान को व्यव- हार में ढाला पा । इसीलिए भद्रमेन ने युवती की अत्याधुनिक वेशभूषा के बजाय उसके सौंदर्य को देखा था और सहज ही में उसे मधु में उपमा दी थी-मघु, जो कभी सडता नहीं और दूसरी चीजो की भी सड़ने से रक्षा करता है। इसलिए बिना जाने-बूझे युवती के साथ किसी अप्रिय विचार को जोडना, उसमें किसी अवगुण की कल्पना करता भद्रसेन के लिए सम्भव नहीं था। निस्संदेह नरेंद्र भी मुवती के अनुपम सौदर्य से प्रभावित हुआ ५ भद्र. सेन के साथ वह भी उसे गुप्त अवस्था में एक टक निहारता रहा। फिर जब स्कर्ट और टाप की जगह वह नलिनी की सादी पर बना मामने आई तो उसका मधु रूप और भी निवर मार पिन उत्पन्न करने वाले लिगनिजे मोम की तनिक भी रिटन: । शुद्ध तरल अग्निशिखा-सा चमचमाता मधु । इस अग्निशिखा को तेज आच ने दुराग्रह में रिपना दिया था। पंखहीन तितली.
गरद्र गन से घृणा और उपेक्षा की काई मोटी-मोटी परतें एकसाथ उतर गई थीं। सुभद्रा मोर गुवती दाइंगरूम में बैठी हैं, पानसिंह साग-सब्जी सरी- पने पाजार गया है।" युपती की निगाहें दरवाजों और खिड़कियों पर खट पदों से टकराकर लौट भाती है, उसके होंठ गांपकंपाते हैं और वह गुछ गाहते-पाहते यगा जाती है। विचार बार-बार मन में उठता है और होंठ चार-पार गांपकंपाते हैं। भाखिर उसके लिए अपने गो रोक पाना, होंठों पर भाए विचार को पी लेना सम्भव नहीं रहता और यह सुभद्रा से पूछती है: "मांजी, ये पर्दे गाव रारीदे गए थे?" युवती जव मृदु भोर सगल स्वर में 'मांजी' गाहगार पुकारती है तो सुभद्रा गो उसमें बहू और बेटी दोनों रूप एकसाथ दिखाई पड़ते हैं और जनगी मात्मा का गाण-पण खिल उठता है। "पर्दै!" सुभद्रा ने दोहराया और रगति पर जोर डालकर कहा, "जनेंद्र गोव्याह को आठ-दस बरस हुए, तभी रारीदे गए थे।" "अब गये डिजाइन के नये पर्दे खरीदे जाएं तो कैसा रहे ?" सुभदा ने एक नजर युवती को देखा और फिर एक नजर पूरे साइंग- रूप पर डाली। पर्दे वाकई पिरा-पिट गए थे; रंग फीका पड़ गया था और उनपर बने अर्ध-नारी. निनों और हापी रांड को अलग-अलग पहचान पाना पाठिन था। "हां, ये पर्दे तो अब बदले ही जाने चाहिए।" सुभद्रा ने युवती गे प्रस्ताव का समर्थन किया। प बदल देने का सुझाय त्यागराज और नरेंद्र को भी पसंद आया चोर उन्होंने गहारा गिगा कि उनको जीवन में पाहीं गुछ ठहराय, उपा- सीनता अथवा नीरसता अवश्य आ गई है वर्ना पः इसने पुराने पड़ गए हैं कि उन्हें बहुत पहले बदल देना चाहिए था। इस बात को धेटे ने बाप से पपिक गहरास किया और पह सुझाव देने वाली युवती पी सुरुचि गा पायल हो गया। दूसरे ही दिन नये पर्दे आ गए। उनके गहरे पीले रंग की भूमि पर ४०/पंपहीन तितली । साल रंग में कमल फूल और उनपर मंडराती हुई तितलियां बहुत भली मालूम होती थी। न सिर्फ यह कि पुरानै पर्दी का स्थान नये पदों ने ले लिया था बल्कि युवती ने डाइंगरूम की पूरी सैटिंग बदल दी थी। सामान चाहे वही था; लेकिन सोफी, तिपाइयों, जहां-तहां रखी कला- कृतियों और दीवार पर टंगे चित्रों को नई तरतीय देने मात्र से डाइंगरूम का रूप ही बदल गया-उसमें एक नई भव्यता आ गई। नटराज की कांस्य मूर्ति जो एक बलभ्य कलाकृति थी, जिसे शायद बहुत पहले बजंता एलोरा के सिद्धहस्त कलाकारों ने बनाया था, यों कोण बनाती हुई रखी गई थी कि भीतर प्रवेश करने वाले व्यक्ति की दृष्टि सबसे पहले उसी पर पड़ती थी। फलहर के दोनों ओर रखे दो वृद्ध जिनको दाढी सन के सदृदा सफेद, कमर झुकी हुई और हाथो मे लाठियां थी, दूत गति से बीत रहे समय का बोध कराते थे। "वाह, क्या वात पंदा की है ! इस सैटिंग का जवाब नहीं।" नरेंद्र डाइंगरूम में आते ही बोल उठा और फिर एक-एक चीज को ध्यान से देखने लगा। नटराज की कास्य मूर्ति और झुकी हुई कमर वाले वृद्धों को देखते ही नरेंद्र को दृष्टि उस गुलदस्ते पर आ टिकी, जिसे युवती ने स्वयं बनाया था और जिसके फूल-पत्ते सुबह से शाम हो जाने पर भी मुरझाए नहीं थे। नरेंद्र ने जब ड्राइंगरूम में प्रवेश किया, युवतो भी पोछे-पीछे चली आई थी और अब पास में ही खड़ी थी। नरेंद्र ने उसपर प्रश्नसूचक दृष्टि डाली, जैसे पूछ रही हो कि फूल-पत्तों के न मुरझाने का कारण क्या 1 "मैंने गुलदान के पानी में चीनी मिला दी थी। उससे इन्हें सुराक मिलती रही और इसी कारण ताजगी बनी हुई है।" नरेंद्र अगर सतर्क होता तो वह पूछ सकता था कि जब तुम्हें अपना नाम तक याद नहीं है तो यह पानी में चीनी मिलाना कैसे याद रह गया। लेकिन उमे पूटने का होय ही नहीं था। वह युवती के मुस्कराते होंठों और घूमती हुई पुतलियों को ओर देख रहा था और उसके मुख से निकता एक-एक शब्द उसे अभिभूत कर रहा था। पंखहीन तितली/४१ -- "तुम बड़ी चतुर हो। जी चाहता है कि यह गुलदस्ता बनाने वाले इन हाथों को चूम लूं।" युवती ने निस्संकोच अपने हाथ आगे बढ़ा दिए । नरेंद्र कहने को तो कह गया; पर उसमें उन्हें स्पर्श करने का भी साहस नहीं था । वह भंपकर एक कदम पीछे हट गया। पुतलियां फिर घूमी, होंठ फिर मुस्कराए । युवती की आंखों में चंच- लता थी और उस भाव के अनुरूप मुस्कान भी चंचल थी, जैसे वह कह रही हो, 'महाशय, अपनी बात तो रखो। आगे बढ़ो, मेरे इन हाथों को चूम लेने में कोन बुराई है ?" युवती ने 'हाउ टू स्माइल' नाम की पुस्तक से मुस्कराने की विभिन्न विद्याएं सीखी थीं और उन्हें जाने कितने पुरुपों पर आजमाया-परखा था। अब उसे भांप लेने का अभ्यास हो गया था कि किस पुरुप पर किस समय मुस्काने की कौन-सी विधा कारगर होगी । उसने नरेंद्र को अवज्ञा और उपेक्षा को इस घर में आते ही भांप लिया था और एक योजनावद्ध रण- नीति द्वारा उसके विरुद्ध मोर्चा भी ले लिया था। युवती को अपनी शक्ति पर विश्वास था और उसने मन ही मन. कई बार सगवं दोहराया था, "लल्लूराम ! तुम चाहे जितना भी बनो, जीत आखिर मेरी ही होगी।" गदराया पारीर, बड़ी-बड़ी नशीली आंखें, बदलती-थिरकती मुस्कान और युवती को योजनाबद्ध रणनीति से नरेंद्र सर्वथा अनभिज्ञ था । धीरे- धीरे वितृष्णा और आकर्षण में संतुलन स्थापित हुआ, फिर जैसे सितम्बर की एक निश्चित तिथि को दिन-रात बराबर होने के बाद दिन घटने और रात बढ़ने लगती है, वैसे ही उपेक्षा घटती गई और देखने में सरल और निरीह, पर वास्तव में चंचल और चपल युवती का जादुई प्रभाव बढ़ता . चला गया। युवती की बड़ी-बड़ी स्याह आंखें जो भाव व्यक्त कर रही थीं, वह एकाएक बदला और उसके साथ ही मुस्कान भी बदली। इससे पहले की मुस्कान चंचल और पंनी थी, और यह दूसरी मुस्कान स्निग्ध और आकर्षक थी । उसमें युवती के होंठों की सारी ताजगी, सारी मधुरता सिमट आई थी। नरेंद्र ने इस मुस्कान के मागे सहज ही में हथियार डाल दिए । ४२/पंखहीन तितली "बैठो, मुझे तुमसे बात करनी है ।" नरेंद्र ने सुद बैठते हुए युवती को भी बैठने का संकेत किया। सुभद्रा और त्यागराज दोनों उस समय घर में नहीं थे। शायद किसी मीटिंग अथवा पार्टी मे गए हुए थे। बाहर अंधेरा और कमरे के भीतर विजली का प्रकाश था। नटराज की कास्य मूर्ति के दाय-बायें वे दोनों आमने-सामने बैठे थे। कुछ क्षण मौन के बीते क्योकि वे चुपचाप एक-दूसरे की ओर देखते रहे "कहो।" युवती के होंठ हिले और ठुड्डी के नीचे एक सुदर चिबुक बन गया। । "मुझे तुम्हें पुकारने में बड़ी दिक्कत होती है ।" नरेंद्र ने बात शुरू की। "इसलिए कि मेरा कोई नाम नहीं है।" नरेंद्र चौंगा, लेकिन ऊपर से स्थिर रहा । "हा। तुम्हें अपना पिछला नाम भूल गया है । और कोई दूसरा नाम रख दिया जाए तो .." "मुझे कोई आपत्ति नहीं।" युवती ने उत्तर दिया और ठोड़ी पर हथेली रखकर नरेंद्र की ओर देखने लगी। पर उसे चुप देखकर फिर बोली, "तुम्हे जो नाम पसन्द हो, खुशी से रख लो।" "मेरी ही पसंद क्यो, तुम्हारी अपनी पसद भी तो कुछ होगी।" "मेरी पसंद!" युवती विद्रप भाव से मुस्कराई, "जब वही नाम याद नहीं आ रहा जो माता-पिता ने बड़ी साघ से रखा था, जिसके साथ प्रिय- जनों को स्मृति जुडी हुई थी और जिसने अब तक जिंदगी का साथ दिया था, तो अब मेरी पसंद क्या होगी ! मेरी पसंद उस नाम के साथ खत्म हो गई।" उसने गहरा निःश्वास छोड़ा। युवती का खिला हुआ चेहरा उदास पड गया । लगभग वही हालत हो गई जो किदवई नगर मे युवती का शव मिलने की सरर सुनकर हुई थी। नरेंद्र को अफसोस हुआ कि वह बार-बार ऐसी बात क्यो छेड़ देता है, जिससे युवती के मन को आघात पहुंचता है। पंखहीन तितली/ ४३ ।। कुछ क्षण मौन के वीते । दोनों विक्षुब्ध-सा महसूस कर रहे थे, जैसे वातावरण में पत्थर के कोयले का कड़वा धुआं भर गया हो । "हमारे देश में वैसे भी रिवाज है।" नरेंद्र ने निस्तब्धता को भंग किया, "लड़की जब व्याही जाती है तो ससुराल में उसका दूसरा नाम रख लिया जाता है ।" नरेंद्र ने रिवाज की यह बात कह तो दी मगर इसमें 'ससुराल' शब्द ने उसे चौंका दिया और वह युवती से नज़रें हटाकर नटराज की ओर देखता हुआ वोला, "मेरा मतलब है..." "नाम बदल लेने में कोई बुराई नहीं," युवती ने उसके मुंह की बात छीन ली और वह जो कुछ क्षण पहले इतनी उदास थी, सहसा खिल- खिलाकर हंस पड़ी। नरेंद्र ठगा-सा उसके मुख की ओर देखने लगा। धुएं का स्थान इस खिलखिलाहट ने ले लिया और वातावरण में सांस लेना सहज हो गया । "तुमने रिवाज की बात तो कह दी; पर यह भूल गए कि दूसरा नाम रखते समय लड़की की पसंद कोई नहीं पूछता।" युवती के इस तर्क पर नरेंद्र मुस्कराया । भद्रसेन की उपमा के आधार पर उसने नाम पहले ही सोच लिया था और अब उसे कहने का साहस बटोरा। "तुम्हें अगर मधु नाम से पुकारा जाए तो कैसा रहे ?" "मधु नाम भी अच्छा है।" युवती ने धीरे से गर्दन हिलार्ड, "वैसे नीरा, निर्मला, निशा, निरूपा या सरोज क्यों नहीं ?" 'मधु' से युवती को अपना 'मीना' नाम स्मरण हो माता था, जिससे उसने छुटकारा पा लिया था और वह दोबारा किसी भी नाम के बंधन में पड़ना नहीं चाहती थी। इसलिए एक ही स्वर में इतने नाम एकसाथ गिनवा देने से उसका तात्पर्य नामों की व्यर्थता सिद्ध करना था और वह यह भी चाहती थी कि नरेंद्र अगर अपनी सुविधा के लिए उसका कोई दूसरा नाम रख लेना जरूरी समझता है तो वह 'म' के बजाय 'न' या 'स' किसी दूसरे अक्षर से शुरू हो तो अच्छा है। "यों तो नीरा या निरूपा ही क्यों, सुपमा, दीपा, दमयंती, दुनिया भर के नाम हैं। नामों को क्या कमी है ? पर तुम्हारे इतने सारे नाम एकसाथ ४४ / पंखहीन तितली कैसे रखे जाएं ?" नरेंद्र अव स्वस्थ पा 1 वह युवती की ओर देखते हुए सानंद मुस्कराया। "दोनों बहुत खुश हो, क्या कोई नई बात हो गई?" सुभद्रा की आवाज ने युवती और नरेंद्र दोनों को चौंका दिया। वे हड़- बड़ाकर उठ खड़े हुए। "बैठो।" मुमद्रा ने खुद मोफे पर बैठते हुए उन्हें भी बैठने का इशारा किया। "पिताजी क्या यमी नहीं आए?" नरेंद्र ने मा से पूछा। "वह अपने कमरे में हैं ।" उत्तर मिला। "नई बात यह हुई है," नरेंद्र ने युवती की मोर देखा और फिर आगे कहा, "मैंने इनका नामकरण कर दिया है। यापको पुकारने में मुविधा रहेगी।" "मैं तो इसे बेटी कहकर पुकारती हूं और आगे भी 'बेटी' कह कर पुकारूंगी।" मुभद्रा ने स्नेह और वात्सल्यमरी दृष्टि युवती पर डालो और फिर नरेंद्र की ओर पलटकर पूछा, "हा, क्या नाम रखा है ?" "मधु ।" "देखिए मांजी, ऐमा नाम रख दिया जो मुझे बिल्कुल पसद नहीं।" युवती ने कंधे इस अंदाज से झटके कि सुभद्रा को यह शिकायत की बजाय समर्थन जान पड़ा। "बेटी, मुझे विश्वास है कि तुम जो नाम भूल गई हो, वह भी 'मधु' होगा । तुम्हारे लिए यह नाम बहुत ही उपयुक्त है।' 'मेरा नाम मधु नही, 'मीना' था-मीना। युवती ने अपने मन में कहा, पर वह प्रत्यक्ष बोली, "माजी, छोड़िए पिछली बातें। जो याद ही नही, उसकी चर्चा व्यर्थ है।" "समझ लीजिए, इनका यह नया जन्म है और मघु नाम भी नया है।" मरेंद्र ने युवती की ओर देखते हुए मा से कहा। "मेरा यह नया जन्म इस घर में हुआ है और मुझे अब आजीवन यही रहना है।" युवती ने 'यहीं पर विशेष बल दिया। वह और न दोनों हंसे । मुमदा उन्हें देख-देखकर मुस्कराती रही। पंसहीन तितली/४५ ८ मधु अर्थात् युवती नहाकर लौटी थी। अब वह अपने कमरे में आदम- कद आईने के सामने खड़ी गोले केश झटक रही थी और बुदबुदा रही थी: "यह कैसी दुनिया है ! विना नामों के जैसे उसका काम ही नहीं चलता। मैंने एक नाम को दफनाया और यह दूसरा नाम जबरदस्ती मुझ- पर चस्पा कर दिया गया। नहीं, मेरा कोई नाम नहीं। मैं इसे भी झटका दूंगी। मैं न मीना थी और न मधु । मैं हूं नारी-सम्पूर्ण नारी, जिसमें पुरुषों को वश में करने की अद्भुत शक्ति है।" उसने अपने-आपको आईने में देखा । दायां हाथ वालों को झटकने की प्रक्रिया में उठकर रुक गया था पौर आंखें यों फैली हुई थीं जैसे समस्त शक्ति उनमें सिमट आई हो। उसने केशों को जोर-जोर से झटका और फिर बुदबुदाई, "यह नरेंद्र जो कल तक नड़ा ऐंठता था, मोम की नाक बन गया है-मोम की नाक ।" वह मुस्कराई और बालों को फिर झटका, “निरा लल्लूराम । नामकरण तो मैंने तेरा किया है, तू क्या मेरा नामकरण करेगा! मैं हूं सम्पूर्ण नारी । हा हा हा–सम्पूर्ण नारी!" वह जोर-जोर से बालों को झटक रही थी और विजयोल्लास में भर- कर 'हा हा हा हंस रही थी। खूब हंस लेने के बाद उसने अपना आप माईन में देखा, कुछ देर स्थिर खड़ी देखती रही। "मैं हूं सम्पूर्ण नारी- सम्पूर्ण नारी।" उसने केशों को झटकते हुए दोहराया और फिर अपने-आप से आंखमिचौली का खेल खेलना शुरू कर दिया । घनी लम्बी पलकें 1 झुकाकर वह कभी अपनी परछाई को अपने से छिपा लेती पो और कभी पलकें उठाकर देखने लगती यो तो देखती रहती थी। उसके होंठ यों हिल रहे थे, जसे कह रही हो, 'देखो, मैंने तुम्हें पकड़ लिया है। अपने से आंख- मिचौनी का यह खेल भी शायद उसके सम्पूर्ण नारी होने ही का एक लक्षण या क्योकि इसके अंत में वह सानंद मुस्कराई और एक भरपूर दृष्टि अपने- आपपर डाली। "आपकी चाय।" "ओह, पानसिंह !" युवती ने पलटकर नमको ओर देखा और आदेश दिया, "चाय तुम यहो ले आओ।" आधे-आधे वाल दायें और बायें कंधे पर से आगे लाकर दोनों हाथों में थामे। बारी-बारी एक दष्टि दोनो हाथों की केश राशि पर डाली और फिर होठो को सुदर सपुट बनाकर अपने को आईने में देखने लगी। उसे अपना-आप अत्यन्त मोहक लगा । "सम्पूर्ण नारी ! सम्पूर्ण नारो !!" फिरकी के सदृश अपने गिर्द घूमते हुए वह सस्वर गुनगुनाई। पा सह ने सुना। वह ट्रे थामे देहरी पर रुक गया। "आ जाओ और चाय रख दो।" उसने भीतर आकर चाय मेज पर रख दी। लेकिन जब वह लौटने लगा तो मधु अर्थात् युवती ने आदेश दिया,"हको !" पानसिंह पलटकर युवती की ओर देखने लगा। "तुम्हें मेरा नाम मालूम है ?" युवती ने एक मृदु मुस्कान उसको मोर फेंकी। "नहीं।" पानसिंह ने इनकार में सिर हिलाया। "तब तुम क्या कहकर पुकारोगे मुझे?" "छोटी बीबीजी।" उतर मिला। "छोटो बीबीजो, मधु, मीना! हा हा हा ! मीना, मघ, छोटी बीवी जी । सुनो पानसिंह।" पानसिंह सिर से पाव तक कान बना सुन रहा था और विस्मय से भरा युवती की ओर देख रहा था। पंखहीन तितली/७ "मेरा नाम है संपूर्ण नारी । समझा?" पानसिंह गाछ भी समझ नहीं पाया । यह हतप्रभ-सा सिर सुजलाने लगा। "सम्पूर्ण नारी नाम सुना है ?" "नहीं।" "किसी सम्पूर्ण नारी को देखा है ?" "नहीं।" पानसिंह यंत्रवत् बोल रहा था, जैसे युवती ने उसपर मोहिनी मंग पूंगा दिया हो। "तुम्हारे देश में कोई ऐसी लड़की है, जिससे तुमने प्रेम किया हो?" "नहीं।" "प्रेग गारना जानते हो?" पानसिंह फिर उराड़ गया और चुपचाप सिर सुजलाने लगा। "तय तुम गिरा लिए भाग खड़े होते हो? गया करोगे अपने घर जाकर ?" गुवती ने फिर पूछा, गौर पानसिंह विमूढ़ बना उसकी ओर देखता रहा। पानसिंहगी उम्र इस समय इसकीस-वाईस बरस थी। लेकिन कद छोटा, शरीर इनहरा और पेहरे पर बालसुलभ भोलापन था, इसलिए रामह-अठारह से अधिक का दिरााई नहीं पड़ता था। कांगड़ा की अपनी हरी-गरी विशाल धरती उससे तभी छूट गई थी, जब उसकी आयु सिर्फ दस ग्यारह बरस थी और वह दिल्ली आकर परेलू नौकर का काम करने लगा था। सुभद्रा और टा० त्यागराज को उसपर पूरा भरोसा था। ये उसे वीस-तीस रुपये देकर फल, सब्जी और परूरत की दूसरी चीजें एक कागज पर लिगकर बाजार भेज देते तो यह सारा सामान साफ-सुथरा और नाप- तोल में पूरा रारीद लाता था। दुरारे नौकरों की तरह उसपर कभी नार भाने की भी हेरा-फेरी पा संदेह नहीं हुआ था। गाई वार डा० त्यागराज सपरिवार कहीं बाहर चले जाते थे तो पानसिंह भोला गोठी पर रह जाता पा। यह गोठी गो रगवाली करता था और पेड़-पौधों को सींचता था। त्यागराज पर गो जैसा साफ-सुगरा छोड़कर जाते थे, लौटकर वैसा ही ४८ / पंसहीन तितली साफ सपरा पाते थे। उसकी तनख्वाह हर महीने घर चली जाती थी। उसे रोटी-कपड़ा और जरूरत की दूसरी चीजें यहीं से मिल जाती थी। वह इतने ही में खुदा पा। सुभद्रा मोर त्यागराज भी खुश थे। पर कभी-कभी पानसिंह के मन में कुछ ऐसा भयंकर उबाल उठता था कि वह खूटे पर बंघे बल्हड़ बछड़े की तरह रस्सा तोडकर भाग रहा होता था। उसका बड़ा भाई सोतू भी नई दिल्ली की किसी कोठी मे रही काम करता था। वह उसके पास चला जाता था। तब उसे चाहे कितना ही समझाया जाता, वह एक ही रट लगाए रहता था, "मैं यहां नही रहूंगी, मुझ घर जाना है।" यह घर कभी गया नहीं था, लेकिन सब काम छोड़-छाहकर यों ही इधर-उपर पूमता रहता था और चार-पाच दिन के बाद अपने-आर ही सोट याताया। फिर सब सामान्य हो जाता था और उसे काम में लगे देख यह मोच पाना सम्भव नहीं था कि उसके मन में भी कभी विद्रोह को भावना उत्पन्न हो सकती है। मधु अर्यात् युवती के इस घर में आने के पंद्रह-मोलह दिन बाद पान- सिंह के मन में एक बार ऐसा हो उबाल उठा था। वह तभी जान गई पो कि यह उमका स्वभाव है और सुभद्रा इसीलिए पैसे और छुट्टी देकर उमे बीच-बीच में घूमने-फिरने योर तफरीह करने भेज दिया करती है । "बडा विचित्र प्राणी है।" सारी बात सुनने के बाद युवती को वडा आश्चर्य वह पानसिंह के भोले-भाले निरीह मुख की ओर ताकती रह गई थी। उसे विश्वास नहीं हो रहा था कि इस व्यक्ति के मन में भी कही विद्रोह की चिंगारी छिपी हुई है और उसकी आत्मा भी बंधनों को तोड़कर भाग जाने के लिए व्यग्र हो उठती है। युवती इस विद्रोही तत्त्व की टोह लेना चाहती थी। तभी उसने पूटा पा, 'क्या तुम्हारे देस में कोई ऐसी लड़की है, जिससे तुमने प्रेम किया हो? क्या तुम प्रेम करना जानते हो?' पर सिर खुजलाता हुया निरत्तर पानसिंह पहले से भी अधिक निरीह और मामूम जान पड़ा । युवती का विस्मय और बढा और उसने पूछा, "तुम पर क्यों जाना चाहते हो ? तुम्हें यहा क्या तकलीफ है ?" पंखहीन तितली/ ४६ हुआ था और अपनी तकलीफ पानसिंह खुद नहीं समझ पाया था। वह नहीं जानता था कि कांगड़ा की हरी-भरी विशाल धरती उसे रह-रहकर पुकारा करती है। इस हरी-गरी धरती पर ज्वालामुखी धधक रहा है। ज्वालामुखी का एक टुकड़ा यहीं उसकी देह में भी रखा हुआ है । यह टुकड़ा उस विशाल ज्वालामुखी से जा मिलने के लिए तड़प उठता है, जिसका वह एक प्राय- तिक अंग है और जिसे पहाड़ी धरती के लाल सदियों से पूजते आए हैं। गया वह उससे मिल नहीं पाएगा? हमेशा अलग ही रहेगा ? यह अलगाव पानसिंह की आत्मा को सालता रहता है। अपनी धरती-अपने ज्वाला- मुखी से अलग होकर उसका व्यक्तित्व धूल में मिलता जा रहा है । उसे मक्सर 'पन्नू' अथवा 'मुंडू' कहकर पुकारा जाता है। पानसिंह चाहे समझ न पाए, कह न सके, पर व्यक्तित्व के मिटने की तकलीफ क्या मनुष्य कभी सहन कर सकता है ? इस तकलीफ का विद्रोह में बदल जाना, लावा वन- कर फूट पड़ना स्वाभाविक है । धरती के इन लालों ने अपनी इस तकलीफ को जाने कितनी मर्तवा भयंकर ज्वाला का रूप दिया है, व्यक्तित्व की रक्षा पो लिए जाने माज तक कितने विद्रोह किए हैं, व्यक्तित्व कुचलने वालों के विरुद्ध वे बरावर संघर्ष करते आए हैं । जब तक उस हरी-भरी विशाल धरती पर ज्वालामुखी धधकता रहेगा, घोर दरिद्रता के बावजूद विद्रोह की आग का शान्त होना और संघर्ष की परंपरा का मिट जाना सम्भव नहीं इन विद्रोहों का इतिहास बहुत लम्बा है, जिसे किसीने आज तक न समझने का प्रयास किया और न लिखने का । फिर भला पानसिंह उसे कैसे बता पाता और युवती भी उसे कसे समझ पाती? परिणाम यह कि पानसिंह निरोह और निरुत्तर युवती की ओर और युवती आश्चर्य- चकित पौर विस्मय-विमूढ़-सी पानसिंह की ओर ताकती रही "अच्छा, तुम जाओ।" गुवती ने उसे आदेश दिया। पानसिंह चुपचाप लौट आया। मधु अर्थात् युवती स्थिर और अवार उसे देगती रही । नासिर वालों को एक भाटके के साथ पीछे फेंकती हुई वह बुदखुदाई, "तू भी एक पहेली, मैं भी एक पहेली।" कांधे पर रऐ तौलिये से उसने अपना चेहरा पोंछा क्योंकि गीले केशों ५०/ पंसहीन तितली
को झटकते हुए कुछ बूदें उसपर आ पड़ी थी।
चाय पीते समय भी वह अपनी और पानसिंह की बात सोचती रही,
अपने प्रश्नों को मन ही मन दोहराती, रही और अंत में साली प्याला मेज
पर रखते हुए सस्वर बोली:
"दरअसल यह दुनिया ही एक पहेली है। जो इसे वृझे यह नादान
और जो न बूझे वह भी नादान ।"
पंखहीन तिवली/ ५१
९ फरवरी का महीना बीत रहा था। सर्दी जोवन पर आई और फिर ढलने लगी। मधु अर्थात् युवती अब डाक्टर परिवार की एक सदस्या थी। छ: महीने से ऊपर हो गए, न उसकी स्मृति लौटी और न किसी उपाय से पीछे की खोज-खबर मिली। युवती ने अब इसी घर को अपना घर बना लिया था। त्यागराज मोर नरेंद्र के मुलाकाती आते थे तो सुभद्रा की जगह वह उनका स्वागत करती थी और अपने हाथ से चाय बनाकर देती थी। त्यागराज के विद्वान गतिथियों गौर मित्रों की बातें वह चुपचाप सुना फरती थी। जब बहुत आवश्यक होता था तभी वोलती थी और सभी उसकी शिष्टता और विनम्रता से प्रसन्न होकर लौटते थे। लेफिन नरेंद्र के युवा मित्रों की महफिल में उसका दूसरा ही रूप देखने में आता था। तब वह एक चिलिया के सदृश चहनाती, हास-परिहास और चुटकुलेबाजी में किसी तरह पीछे नहीं रहती थी । वह न सिर्फ दूसरों पर फस्ती कसकर खुश होती थी बल्यिा फन्नी जव खुद उसपर कसी जाती थी तब भी वह खुश होती और सानंद मुस्कराती थी। मिग-मंटली प्रसन्न होकर लौटती, युवती की मुखमुद्रा, उसकी निश्चल हंसी और उसके तीमे-चुस्त वाक्य याद आ-आकर उनके मन को गुदगुदाया करते थे । "मैं अपनी तरफ से निमंगित करता हूं, इस इतवार की काफी नरेंद्र मे पर होगी।" "चाह, मधु के हाथ को काफी ! मजा मा जाएगा।" "अयं पनचक्कर, वैसे ही मज़ा ले रहे हो । पहले नरेंद्र बाबू से तो पूछो । वह हामी भरे तव ना।" "जब मैने तुम्हें कह दिया वो समझो, निमंत्रण पक्का। क्यों नरेंद्र में ठीक कह रहा हूं ना?" "तुम कहो और वह ठीक न हो, यह कैसे सम्भव है ?" नरेंद्र मुस्कराते हुए हामी भरता और उसके साथी-मित्र 'यो चीयर्स फार मरेंद्र' के उद्घोष के साथ ताली पीट देते। "ग्री चीयसं फार सुरैश, जिसने तुम्हें निमंत्रित किया है।" सुरेश छाती पर अंगुली रखकर अपने को इंगित करता! और भी चीयसं फार मधु जिसके हाय को काफी बोतल का नया मम्मिलित स्वर सुनाई पड़ता और फिर सम्मिलित कहकहीं को बाढ- सीमा जाती। शुरू-शुरू में सहकारियों को चुहलबाजी नरेंद्र को भी अच्छी लगती थो और उनके कहकहों से मन प्रसन्न होता था। पर धोरे-धीरे चहल- बाजी छेड़खानी पे बदल गई, कहकहों से विद्रूप की दुर्गध आने लगी और वे उसके मन पर फूलों में छिपे विन्छुओं की तरह डंक प्रहार करने लगे। महकारियों में सुरेश नरेंद्र पर अपना सबसे ज्यादा अधिकार सम- झता था। उसने एक दिन यों ही जिज्ञासावश पूछा था, "यह मप कोन है ? क्या तुम्हारी कोई रिश्तेदार है ?" "रिश्तेदार तो नही, पर अब रिश्तेदारों से भी पयादा है।" नरेंद्र में सहज स्वभाव से उत्तर दिया या । वात जव चल पड़ी तो यह भी बताया कि मधु नाम को यह युवती से सड़क पर बेहोश मिली थी, कैसे वे उठा- कर कोठी पर लाए थे और जब बेहोशी ट्टी तो उसे अपना नाम तक याद नहीं पा, वह अपनी स्मृति खो चुकी थी। उसका मधु नाम भी मैने ही रखा है।"पूरी कहानी सुना देने के बाद नरेंद्र ने सगर्व कहा था। सुरेश का रंग सावला और गाल कचौरी के सदृश फूले हुए थे, शरीर स्थूल और कद नाटा होने के कारण वह मुगदर-सा दिखाई पड़ता था। लेकिन वह व्यावसायिक बुद्धि का विनोदप्रिय व्यक्ति या। नरेंद्र जब स्वस्तिका लिमिटेड मे आया तो सुरेश बड़े तपाक से मिला और उसके पंसहीन तितली/५३ '。 या निश्चय कर लेता था। लेकिन दूसरे ही दिन सुरेश जय 'हेलो हालिग' कहते हुए हाथ आगे बढ़ाता तो नरेंद्र मारे शिकवे गिले भूल जाता पा और उसके साथ फिर से घी-दाक्कर हो जाता था। अब जब उसने मधु को मात छेडी तो नरेंद्र ने उससे कुछ छिपाया नहीं और न ही छिपाने की जरूरत समझी। मीधी-सच्ची बात जंगी थी चमी यह सुनाई, पर सुरेश ने जब उसी बात को बढ़ा-घडासर और नमक- मिर्च लगाकर अपने ही ढंग से बयान किया तो वह फैक्टरी भर में पर्चा और मनोरंजन का विषय बन गई। "सुना तुमने, यह नरेंद्र बड़ा शरीफ बनता है ?" "क्यों, क्या कुछ गोलमाल पकड़ा गया है ?" "एक्दम छिपा रुस्तम निकला। हम फिल्म जाने को कहते हैं तो वह नाक-भौं चढ़ाकर उत्तर देता है, में ऐमी वाहियात फिल्में नहीं देखता। औरत के जिस रूप पर तुम लोग सट्ट, हो, मुझे उससे सस्त घृणा है." "बहा ब्रह्मचारी बनता है और कहता है कि मैं शादी नहीं करूगा।" "उमे शादी को शहरत ही क्या है। बिना मादी किए ही एक लाजवाब चीज़ घर में रस छोडी है।" "अच्छा! उमे देखा है तुमने ?" "देवा नहीं तो क्या, मना तो है । यही मधु जो मदिया काफी बना- कर पिलाती है, दोस्तों की महफिल मे धुनयुल की तरह वहफती है, उसे नरेंद्र ने रसल बना रखा है।" "हैं ? रखल?" "हां, रवल । विश्वास न हो तो यह मा गए नरेंद्र बाबू, खुद इन्हीं से पूछ लीजिए।" मुबह-सुबह दफ्तर का काम शुरू होने से पहले सहकारियों में ये बातें हो रही थीं। इतने में नरेंद्र भी आ पहुंचा और सबकी प्रश्नमूचक दृष्टि उसकी ओर उठ गई। "सुनाओ भाई, क्या हाल है तुम्हारी उस मुर्गी का ?" उसी सह- कारी ने पूछा, जिसने आते ही बात शुरू की थी। नरेंद्र अवाक्-सा उसके मुस की ओर देखने लगा, जैसे उसे रिजली पंपहीन तितती/५५ है - । . का करेंट छू गया हो। "देखा, चोरी पकड़े जाने पर चोर इसी प्रकार चौंकता है।" लम्बू- तरे चेहरे और सुडौल शरीर का वह व्यक्ति विद्रूप भाव से मुस्कराया। "क्या बात है? कैसी मुर्गी, कैसी चोरी ?" नरेंद्र के स्वर में घबराहट थी और आक्रोश भी "यार, खफा क्यों होते हो ? उसी युवती की बात है, जो काफी एकदम बढ़िया वनाती है और जिसका नाम तुमने मधु रख छोड़ा है।" उत्तर सुरेश ने दिया मीर उसने सहकारियों पर जो अर्थपूर्ण दृष्टि डाली, वह नरेंद्र के मन में कांटे की तरह चुभ गई। "मधु को मुर्गो कहने का क्या मतलब ?" नरेंद्र की भवें तन गई। "मेरे दोस्त, खुद तुम्हीं ने तो बताया था कि वह तुम्हारी रिश्तेदार नहीं, पर अब रिश्तेदार से भी ज्यादा है।" सुरेश ने नरेंद्र ही की बात दोहराई और आगे कहा, " "इस रिश्तेदार से भी ज्यादा' का मतलब क्या हो सकता है, यह तुम खुद समझ लो। पढ़े-लिखे आदमी हो, इंजीनियरिंग पात कर रखी है।" सबके सम्मिलित ठहाके से दफ्तर की दीवारें हिल गई। नरेंद्र की हालत शिकारियों से घिरे उस जंगली हिरण जैसी थी, जिसके लिए भागने के सभी रास्ते बंद कर दिए गए हों। उसने सुरेश की ओर शिकायत- भरी निगाहों से देखा, जैसे कह रहा हो, 'यह तुम्हारा कैसा आचरण है ? तुमने तथ्यों को मिथ्या रूप दे दिया है। अगर इसी का नाम मित्रता है तो फिर शत्रुता किसे कहेंगे?' पर सुरेश को इन निगाहों की और उनमें भरी शिकायतों की तनिक भी परवाह नहीं थी। दूसरे लोगों की तरह उसे नरेंद्र को बनाने और उसे सटपटाते देखने में मजा आ रहा था। जीवन को एकदम सरस बनाने का ऐसा भी अवसर भाग्य ही से हाथ लगता है। जिस समाज में कुत्ता ही प्रधान तत्त्व हो और जिसे उन लोगों ने जो अपने को शिक्षित कहते हैं, विशिष्ट गुण समझकर अपना रखा हो, उसमें का, किसी एक व्यक्ति की सच्चरित्रता या पवि- पता का मूल्य ही क्या है ? भोंडा हास-परिहास उनका मानसिक भोजन 'न चुका है, मक्खी को सुगंध से क्या प्रयोजन, वह गिलाजत खाती है मूक्ष्म भावनाओं ५६ / पंखहीन तितली और गिलाजठ पर बैठती है। नरेंद्र पर दिन-प्रतिदिन किसी न किमी पहल से मंग्य प्रहार होने लगे और दफ्तर में उसे दुगंध भरे कुत्सित अट्टहास का सामना करना पड़ता था। यह सटपटाकर रह जाता था, उससे न कुछ कहते बनता था और न करते बनता था। कई बार सोचा कि लम्बी छुट्टी ले ले और इस माहोल से दूर--बहुत दूर भाग जाए। पर सही समस्या का कोई समाधान नहीं पी। कौन कह सकता है कि जहां जाएगा, वहां भी यही माहौल नहीं होगा? "यार ! ऐसी क्या नाराजगी है ? क्या यव काफी बिल्कुल नहीं पिलामोगे?" नरेंद्र पाहे चिट गया था और सिंचा-खिंचा रहता था; पर मुरेश की मुख-मुद्रा पूर्ववत् खिती रहती थी और उसके माधरण में कुछ भी अंतर नहीं माया था। "छोड़ो, इन बातों को। मैंने तुम्हारे जमा आदमी नहीं देखा।" नरेंद्र ने आक्रोश व्यक्त किया और मुह दूमरी थोर पमा लिया। सुरेश हंसा, यूब हसा और वह अपने मुह का पान पक कर बोला, "दोस्त, तुमने यह सौ रुपये की बात यह दो । दुनिया में जब मेरे जैसा कोई दूसरा आदमी है ही नहीं तो तुम देखते यहां से?" उमने गिले को हमेशा की तरह मजाक में उड़ा दिया। लेकिन नरेंद्र मुह मोड़े बैठा रहा क्योकि इस बार जो घाव लगा था, वह पहले से कहीं गहरा था। "प्यारे, बताओ तो सही, आदिर ऐसी क्या गुस्तायी हो गई कि तुम्हें हमारी शक्ल तक देखना गंवारा नहीं है ?" वह उठा और नरेंद्र की वी परडकर उसे हिलाने लगा। "छोडो भी।" नरेंद्र मुस्कराया। "तो, छोड दिया। दतामो, बात क्या है ?" "वात वही है जिसकी हर रोत्र चर्चा रहती है ।" नरेंद्र ने धीरे-धीरे रहा । उमके स्वर में अब भी फटता थो, "मैंने तुम्हें दोस्त सममा, पर तुमने मेरा लिए काटे वो दिए । यह गुस्तायो नहीं, गुस्तानी में पयादा है, मित्रद्रोह है। मैं समन्त्र हूं,तुम किसी तरह भी विश्वास के योग्य नहीं हो।" पंसहीन वितती/१७ "अहाहा!" सुरेश खिलखिलाकर हंस पड़ा। वे दोनों ट्रैक्टर-इंजन के एक नये संम्पल का निरीक्षण करके वर्कशाप से लौटे थे और सुरेश के कमरे में बैठे चाय पी रहे थे । सुरेश नरेंद्र का कंधा थपथपाते हुए कहता चला गया, "मेरे दोस्त ! तुममें यही कमी है कि तुम अपने-आपको माहौल के मुताबिक नहीं ढाल पाए। बेकार सोचते हो और जरा-सी बात मन को लगा लेते हो। वर्ना जब दूसरे हंसते हैं, तुम भी हंसो । 'जिंदगी जिंदादिली का नाम है' को अपना उसूल बना लो।" "यह भी खूब रही कि में अपने-आपपर हं ! भद्दी और फिजूल बातों पर खुश होकर दूसरों की नजर में तमाशा वनूं ! "नरेंद्र, मेरी बात याद रखो । जिंदगी में कुछ भी फिजूल नहीं है । अगर तुमसे जरा-सा मजाक भी बर्दास्त नहीं होता, तो मर्द वनो और उस मधु नाम की युवती से शादी कर लो। सबके मुंह बंद हो जाएंगे।" वह एक क्षण राया और नरेंद्र के कंधे पर कुहनी रखकर बोला, "तुम्हारे चिड़चिड़ेपन का भी यही एक इलाज है । फिर मधु जैसी युवती तुम्हारे हाथ इत्तिफाक से लग गई है । अपनी किस्मत को दुमाएं दो। तुममें हिम्मत नहीं तो उससे पूछ लो, मैं हर जोखिम उठाकर दूसरी शादी करने को तैयार ।" सुरेदा मुस्कराया । इस मुस्कराहट में विद्रूप नहीं, एक ऐसे व्यक्ति फा दपं था, अपनी समझ-बूझ पर इतराना जिसका स्वभाव बन चुका है, जिसकी मोटी त्वचा में महसास का कांटा न कभी चुभा है और न चुभने को सम्भावना है। ५८ / पंखहीन तितली १० संगीत के बोल क्या है, इसका कोई महत्त्व नहीं, उसमें स्वर और ताल ही संगीत है । हृदयगत कोमल और सूक्ष्म भावनाओं के स्पर्श से जो मूक संगीत उत्पन्न होता है, उसीका एक दूसरा नाम उल्लास है। सुर-ताल की रचना भी इन्हीं भावनाओ को स्पर्श करने के उद्देश्य से हुई है। डा० त्यागराज आज बहुत प्रसन्न हैं । कारण यह कि कनाडा मे उनके बड़े बेटे जनेंद्र का पर आया है। पत्र के साथ पप्पू और मिन्नी के फोटो आए हैं। दोनों बच्चे गोल-मटोल, सुदर और स्वस्थ हैं । लिफाफे में एक छोटा पत्र पप्पू का लिखा हुआ है । उसने अपना 'पप्पू' नाम टेढे-मैड अक्षरों में अपने हाप से लिखा है और साथ ही यह भी लिखा है-'दादा को मेरी नमस्ते । मैं आपकी गोद में बैठकर आपमे बातें करूंगा।' पप्पू ने अभी साल सदा साल पहले पढना शुरू किया है। हिंदी शायद नलिनी ने उसे घर पर सिखाई जनेंद्र बच्ची के फोटो साल में दो यार अवश्य भेजता है । दादा-दादी उन्हें फैमिली एलबम में लगा लेते हैं । इस एलबम का उनके लिए किसी भी धार्मिक ग्रन्य से कही अधिक महत्त्व है। दोनो प्राणी इस एलवम को फुरसत के समय अक्सर ले बैठते हैं। उसमे लगी तस्वीरो को देख-देखकर तुम होते और मुस्कराते रहते हैं। इन तस्वीरों के देखनेमात्र से विरक्तता और जड़ता दूर हो जाती है और इस पदावस्था में भी वे अपने भीतर ताजगी और स्फति अनुभव करने लगते हैं। इतवार का दिन या और चार-पांच बजे का समयाजावटर के सभी सदस्य और भद्रसेन ड्राइंगरूम में बैठे थे और यह एलबम उनके दरम्यान मेज पर रखा था। जनेन्द्र के खत को आए चार दिन हो चुके थे, पर इस समय उसीकी चर्चा चल रही थी, बच्चों और नलिनी के बारे में बातें हो रही थी। इसी समय सोमनाथ सहगल नाम के एक परिचित व्यक्ति ने भीतर प्रवेश किया और वह आते ही दोला, "मौसम एकदम बदल गया है। बाहर शरीर को चीरकर निकल जाने वाली ठंडी हवा चल रही "शिमला में बर्फ पड़ी है और उसी से पूरे उत्तरी भारत में शीत लहर दौड़ गई है।" नरेंद्र ने बात में बात मिलाई । "अक्सर ऐसा होता है । सर्दी जाते-जाते दो-चार दिन के लिए फिर लौट माती है।" भद्रसेन ने अपना मत व्यक्त किया और हिमपात के कारण तापमान चदलने की वैज्ञानिक व्याख्या शुरू कर दी। सहगल की उसमें रुचि नहीं थी । वह एलबम उठाकर उसमें लगे फोटो देखने लगा । भद्रसेन को अपनी बात बीच ही में छोड़ देनी पड़ी। "पप्पू और मिन्नी के नये फोटो आए हैं, देसे आपने ?" त्यागराज ने सहगल का ध्यान नये फोटुओं की ओर दिलाया। पिछले चार दिन से वह अपने हर मुलाकाती को ये फोटो दिखा रहे थे और उन्हींके बारे में बात कर रहे थे। "बहुत सुंदर ने फोटो देखते हुए कहा, "मिन्नी ने भी खूब पोज बना रखा है। देखो तो सही, कैसे मुस्करा रही है ! अब तो वह चटर-पटर बोलती होगी।" "डेढ़-दो साल की हो गई, वात क्यों नहीं करेगी। पर हम तो उनकी आवाज तक सुनने को तरस जाते हैं ।" सुभद्रा ने हसरत-भरे स्वर में कहा और जाने क्यों गर्दन घुमा कर खिड़की में से बाहर ताकने लगीं। वे सव सुभद्रा की ओर देख रहे थे और उनके अंतिम वाक्य को ध्वनित- प्रतिध्वनित होते हुए गुन रहे थे । यह वाक्य नहीं, संक्षिप्त महाकाव्य था, जिसमें मानव हृदय की कोमल सूक्ष्म भावनाएं संजो दी गई थीं। "और यह पप्पू का खत है जो उसने अपने हाथ से लिखा है।" !" सहगल ६०/ पंखहीन तितली त्यागराज ने पोते का नन्हा पत्र सहगल की ओर बढ़ा दिया।वह बच्चे की लिखायट और टेढे-मेढे अक्षरों को देखकर मुस्कराया और फिर पत्र पढ़कर बोला, "यह गोद में बैठने की बात पप्पू के मुंह से मुनी होनी तो कैसीप्यारी लगती!" "बच्चे की तोतली भाषा साधारण को भी असाधारण बना देती है। उसके मुख से निकला निरर्थक शब्द भी साधक बन जाता है-मधुर संगीत जान पड़ता है।" जैसे पहले सुभद्रा की ओर देसा था, अब के सबने मधु अर्थात् युवती की ओर देसा। लेकिन देखने का भाव बदल गया था और दृष्टि भी बदल गई थी। वह एक शिशु के सदा मुस्करा रही थी और उसके शब्द कानो में रस घोल रहे थे। नरें जब युवती की ओर देख रहा था तो उसे हठात् अपने सहकारी मुरेश की बात स्मरण हो आई-'मर्द बनो और उससे शादी कर लो। तुम्हारे चिडचिडेपन का भी यही एक इलाज है।' "नरेंद्र, तुम क्या सोच रहे हो? कही बहुत दूर चले गए जान पडते हो!" भद्रसेन ने उसकी ओर देखते हुए पूछा। "यह महाशय शायद भाभी और बच्चों के पास कनाडा पहुच गए हैं।" सहगल दूर की कौडी लाया मोर अपनी बात पर आप ही आप हंगने लगा। पर जब किसी दूसरे ने हसी मे साथ नहीं दिया तो वह डाक्टर त्यागराज को ओर पलटकर फिर बोला, "जनेंद्र को अपनी मातृभूमि को याद क्या विलकुल नहीं आती? क्या वह कनाडा ही का नागरिक बन गया है ? पया उसे स्वदेश लौट आने का खयाल ही नहीं आता?" सोमनाथ महगल एक स्थानीय कालेज में अर्थशास्त्र का प्राध्यापक था। रंग सांवला, होठ मोटे, लम्बा-तडंगा और ऊंचा डोल-डौल । अगर वह शुरू ही से मुक्केबाजी का अभ्यास करता तो शायद आज इस कला के विश्व- विख्यात व्यक्ति मुहम्मद अली का प्रतिद्वंद्वी बन गया होता । ८० त्यागराज के पास वह हफ्ते में तीन-चार मर्तबा अवश्य आता पा(जब वह विद्यापी था, तभी उनके निकट सम्पर्क में आया था और यह सम्मकं उसके लिए प्राध्यापन के निजी क्षेत्र मे और वामपक्षी विचारधारा के सार्वजनिक क्षेत्र पंखहीन तितली/६१ में हमेशा लाभदायक सिद्ध हुआ था। इसलिए सहगल के मन में डा० त्यागराज के प्रति भक्तिभाव से उसने तीनों प्रश्न ताबड़तोड़ यों हवा में उछाल दिए थे जैसे वह क्लास में अर्थशास्त्र के सिद्धान्त पढ़ाते समय एक के बाद एक रटे-रटाए वाक्य उछाला करता था। उसके चेहरे पर किसी प्रकार का उतार-चढ़ाव नहीं आया, वह पूर्ववत् रिक्त और शुष्क बना - । पर डा० त्यागराज ने अपनी समूरी टोपी सिर से उतारी, उसे यों ही एक नजर देखा और दोबारा ओढ़ लिया। उनके हाथ कांप रहे थे और घुटने जोर-जोर से हिल रहे थे। "जनेंद्र हमारा पहलोठी का वेटा है। नरेंद्र उसके सात-आठ बरस बाद पैदा हुआ था । हम दोनों उसे कितना चाहते थे, कितना प्यार करते थे ! उसने जैसे वह सब कुछ भुला दिया है।" सुभद्र का गला रुंध आया और उन्होंने उसांस छोड़ी। कुछ क्षण मौन के चीते । नरेंद्र कभी माता और कभी पिता की ओर देख रहा था। शायद वह मन में सोच रहा था कि मां को जहां जनेंद्र से शिकायत है, वहां उससे भी है। उसने मां की बात कव सुनी और कर उसकी भावनामों का आदर किया? "हम जिस युग में जी रहे हैं, उसमें पैसा प्रधान है। मनुष्य पैसे के लिए जाने कहां से कहां भागा फिरता है। जहां भी उसे अधिक पैसा मिल जाए, वहीं का होकर रह जाता है। उसे न फिर मां-बाप की चिंता रहती है और न देश की याद सताती है । पैसे ने मनुष्य का ऐसा साधारणीकरण किया है कि उसे एकदम 'रोवाट' बना दिया है ।" डा० त्यागराज ने धीरे- धीरे कहा जब कि उनके घुटने अव भी ज़ोर-जोर से हिल रहे थे। "रोवाट !" युवती ने दोहराया और छाती पर बांहें कसकर ऐसी आकृति बनाई कि नरेंद्र, सहगल गौर भद्रसेन-तीनों के होंठों पर एक अजीव मुस्कराहट दौड़ गई। इस मुस्कराहट का संबंध मनुष्य से नहीं, उसके रोवाट रूप से था। "जनेंद्र को पैसे की यहां भी क्या कमी थी? आप लोगों ने बहुत कामाया और खुद उसे भी हजार-डेढ़ हजार रुपये की नोकरी सहज में मिल - ६२/पंखहीन तितली जाती।" सहगल बोला। "कमी चाहे कुछ नहीं घी; पर एक ललक है । संधी दौड़ लगो हुई है। उसमें प्रत्येक व्यक्ति दूसरे से आगे निकल जाना चाहता है।" भद्रसेन ने सहगल की बात का उत्तर दिया और नरेंद्र की ओर पलटकर आगे कहा, "इंजीनियर, डाक्टर, प्रोफेसर-जिसे देखो विदेश जाने के लिए उतावला है। उसे न देश की परवाह है और न किसी सगे-सम्बन्धी की। अगले- अगले खीच ले होर, पिछले-पिछले ले गए चोर' का शोर मचा हुआ है।" पानसिंह ने प्याले-प्लेटें लाकर मेज पर रसी। युवती भी उठ सड़ी हुई। उसने काज, विस्कुट इत्यादि लाने में पानसिंह की सहायता और चाय बनाकर सबके सामने रखी। "अगर नरेंद्र शादी कर लेता, इसके बच्चे होते, तो जैसे अपने बच्चों में रमकर वह हमें भूल गया है, शायद हम भी उसे भूल जाते । उसके दूर चले जाने का हमे जो दुस है, वह न होता।" सुभद्रा ने आई स्वर में कहा । चाय की एक चुस्को लो और सबसे नजर हटाकर छत की थोर देखने लगी। "नरेंद्र, अब भी कुछ नहीं बिगड़ा । तुम अपनी बेकार की जिद छोड़ो और शादी कर लो। तुम्हें अपना ख्याल नहीं, तो मां-बाप ही का ख्याल करो और उन्हीकी खातिर यह कइदा भूट भर लो।" सहगल 'कड़वा घूट' मुहावरे के प्रयोग पर प्राध्यापकीय अंदाज से मुस्कराया और दाद पाने के लिए उसने पहले नरेंद्र और फिर युवती की ओर देखा। सहगल के इस अनायास देखने से भद्रसेन के मस्तिष्क में एक विचार कौंध गया और उसकी मासों में बिजली-सी चमक उठी। उसने निचला होठ दातों तले दबाकर एक क्षण सोचा और फिर मुभद्रा को और देखते हुए बात शुरू की: "सहगल ने वहा सुदर मुझाव दिया है और मैं समझता हूं कि अगर नरेंद्र मान जाए तो मधु को भी कोई आपत्ति नहीं होगी।" बात चाहे धीरे कही गई थी, पर सुनकर सभी चौंक गए. से कांच की कोई भारी चोग गिरकर टूट गई हो, अथवा जैसे कोई विस्फोट हुआ हो। सबसे अधिक सुभद्रा चौकी, जो कभी पति, कभी नरेंद्र और कभी मधु अर्थात् पसहीन तितली/६३ युवती की ओर देख रही थी। "डाक्टर, हाथ मिलामो । दरअसल में भी यही बात कहना चाहता था, पर कह नहीं पाया । यों कहो कि तुमने मेरे मुंह की बात छीन ली।" सहगल ने उत्साह में भरकर हाथ आगे बढ़ाया, जो भद्र सेन ने तपाक से थाम लिया, "अगर हम चिराग लेकर ढूंढ़ने निकले, धरती के एक छोर से दूसरे छोर तक घूम आएं, तब भी मधु जैसी लड़की नहीं मिलेगी। माधु- निक, सुशील, शिक्षित-सभी गुण हैं उसमें। संयोग से जोड़ी बन गई सहगल खुशी से उछल पड़ा और प्लेट से एक काजू उठाकर मुंह में डाला। "वाह, मामला है नरेंद्र और मधु का, जोड़ी तुम बना रहे हो। उनसे तो पूछ लो।" भद्रसेन ने वात सहगल से कही, पर देख वह रहा था त्यागराज और सुभद्रा की ओर, जैसे जानना चाहता हो कि इस संबंध में उनका मत क्या है। लेकिन वे दोनों चुप बैठे रहे थे। "आजकल के लड़के-लड़कियों के सिर पर व्याह न करने की जो सनक सवार है, उसे मैं संसार से विरक्ति-जिम्मेदारी से भागने की प्रवृत्ति समझती हूं, जो इसी साधारणीकरण का परिणाम है।" सुभद्रा ने प्याला मेज पर रख दिया और मधु के मुख पर दृष्टि केंद्रित करके पूछा, "क्यों बेटी, तुम्हारा क्या विचार है ? क्या मैं गलत कह रही हूं?" युवती से कोई उत्तर देते न बन पड़ा। उसने लजाकर आंखें झुका लीं। "चुप्पी का मतलब है सहमति । नरेंद्र, तुम बताओ, तुम्हारा क्या विचार है ?" सहगल ने मेज थपथपाई। नरेंद्र असमंजस में पड़ा सोच रहा था कि उधर दफ्तर में खिल्ली उड़ती है और इधर उसके विवाह न करने को व्यथं की हठ वताया जा रहा है। जिस प्रतिज्ञा के कारण मां-बाप दुखी हैं और खुद उसे दम्भी और सनकी समझा जा रहा है, ऐसी प्रतिज्ञा से क्ण लाभ ? रहा मधु का सवाल, सभी उसकी प्रशंसा करते हैं और सभी चाहते हैं कि मेरा और उसका ६४ / पंखहीन तितली पं.४ विवाह हो जाए योर वह इस घर की पुत्रवधू बने । सहगल ने जब मेन पपपपाई, नरेंद्र सहसा अपनी सोच में से उमरा और अपने को सीधा खीचकर बोल उठा: "मुझे कोई आपत्ति नही बसत कि..." और वह वाक्य अधूरा छोडकर मधु अर्थात् युवती की ओर देखने युवती कब चूकने वाली थी। उसको नई भूमिका का यह परम विदु पा और वह पहले ही से इस अवसर का इंतजार कर रही थी। उसने गर्दन ऊपर उठाकर दृढ निश्चय के स्वर में कहा, "मुझे कोई आपत्ति नहीं बगर्ते कि माजी और पिताजी को कोई आपत्ति न हो।" स्यागराज और मुभद्रा को क्या आपत्ति हो सकती थी ! उन्होंने मधु को इतने दिनो मे भली भांति देख-परस लिया था, वे उसकी व्यवहार- कुशलता से प्रसन्न थे और सबसे बड़ी प्रसन्नता यह थी कि नरेंद्र का व्याह देखने की चिराकांक्षा पूरी हो रही थी। दोनो की चूड़ी आंखें चमक उठी और चेहरे खिल गए।
११ नरेंद्र का विवाह किसी धार्मिक रीति के बजाय उस आधुनिक पद्धति से हुआ, जिसे 'सिविल मैरेज' कहते हैं। उसने फक्टरी से एक महीने को छुट्टी ले ली और वह नवविवाहिता पत्नी को साथ लेकर कश्मीर चला गया। लगभग दो हफ्ते श्रीनगर में बिताए। रिहाइश का प्रबंध हाउस वोट में किया था। काश्मीर की एक सुन्दर उपत्यका में जहां जेहलम नदी नगर के बीचोंबीच चल खाती हुई वह रही है, डल झील दूर क्षितिज तक फैली हुई है और पर्वतों की आकाशचुम्बी चोटियों पर पल-पल प्राकृति बदलने वाले बादल मंडराया करते हैं, वहां हनीमून मनाने में कितना सुस, कितना मानंद था ! वे कभी होंगे में बैठकर झील की सैर करते, उसके नीले स्वच्छ पानी में उठी हुई लम्बी-लम्बी पास से गेलते, कभी जगली हिरण-हिरणी के सदृश चौकड़ियां भरते हुए पहाड़ों पर चढ़ते-उतरते और कभी चिनार की छोह में हरी-हरी कोमल घास पर आमने-सामने अध-लेटे भविष्य की योजनाएं बनाते और मधुर स्वप्न देखते थे। वे हर तरह स्वच्छंद और स्वतंत्र थे। मनचाहा हाउस बोट में आराम किया, मनचाहा पहन-ओढ़- कर बाहर निकल गए और फिर दिन भर मनमर्जी से घूमते रहे, कोई चिता नहीं और किसी प्रकार को रोक-टोक नहीं। "मधु अलिंग, तुम्हें स्मृति सोकर नया जीवन मिला और मुझे तुम्हें पाकर नया जीवन मिला।" नरेंद्र ने अपने भीतर उठ रहे उछाह को सहसा व्यस्त किया। उन्हें श्रीनगर आए अभी सिर्फ दो दिन हुए थे। वे दोनों खुले में एक - । निनार के नीचे बैठे थे। झोल थी और उससे परे शंकराचार्य का मंदिर पा, जिसे वे देस आए थे। एक सुन्दर नन्ही चिड़िया चहचहाती हुई उनके कार से गजर गई। "तुम्हारे दम नये जन्म पर मधु की यानी मेरी बहुत-बहुत बधाई!" युवती ने मुस्कराते हुए कहा और पलकें उठाहर आखें पूरी फना दो। "इसी सुगी में कोई शे'र हो जाए।" "शे'र !" "हा, शे'र । पर इंजीनियर योर शेर का क्या सम्बन्ध !" युवती के मस्तिष्क में 'पदर क्या जाने अदरक का स्वाद' उक्ति उमर आई। पर वह इसे कहते-कहते रुक गई। "डालिग, ऐमी वात नहीं । भद्रमेन की साहित्य और कला में विशेष रुचि है । उन्हें बहुत-मे शे'र याद हैं और मैं भी उनका शिष्य रहा हूं। मुनो, उनको पसद का एक शेर पेश करता हूं।" "इरशाद !" युक्ती शे'र मुनने को उत्सुक और अघोर थी। नरेंद्र उठ खड़ा हुआ और युवती को भी उठने का संकेत किया । फिर उसे पेड के करीब एक सास पोज मे स्थिर रहने का आदेश दे कर यो सिर मे पाय तक देसा, जैसे वह उसकी तस्वीर उतारेगा। युवती ने "शिफान' को महीन जापानी साडी पहन रसोधी। गाडी का रंग नीला था और उसपर मितारै टिके हुए ये । कार पश्मीर की शान, हायों में लाल चूडा और साडी मे मंद करती हुई नीले रंग की पूडियो यों, कानों में टाप्प, गले में मंगलमूत्र और बालों का जूड़ा बनाकर उनमें वेगी बांय रखी थी। नववधू के इस परिधान और शृंगार में यह सनी बन्टी लग रही थी कि देसते ही बनती पो। नरेंद्र एकसाथ दो कदम पीछे हट गया और मयु के चेहरे पर दृष्टि गड़ा कर बोला: "लो, अब और मुनो।" "इरशाद !" युवती के होंठ हिले। "सोए है जिनकी याद में वह स्वरू सहे करते हैं सब हम यह मशारा कभी-कभी।" पंबहीन तिवनी/१७ नरेंद्र ने शे'र पढ़ा। युवती खिल उठी। महीन साड़ी के भीतर उसकी गोरी मांसल देह जगमग-जगमग कर रही थी। "वाह, मैं तो तुम्हें एक इंजीनियर भर समझी थी, पर तुम तो बड़े रसिक निकाले !" युवती ने दाद दी और साथ ही फरमाइश की, "इसी तरह का एक और 'र, प्लीज ।" "डालिग, एक नहीं दो सुनो।" नरेंद्र भी तरंग में था। उसने युवती की ओर देखते हुए नाटकीय ढंग से शे'र पढ़ी : "होठों पे भाई वात पी के मुस्करा दिए । होता है इस तरह भी इशारा कभी-कभी।" युवती के लाल कोमल होंठों पर मृदु मुस्कान तिर आई । नरेंद्र एक क्षण रका और फिर अगला शे'र पढ़ा : "आते हैं किस अदा से वो मन कर करीबतर है उनका रूठना भी गवारा कभी-कभी।" नरेंद्र शे'र पढ़ते-पढ़ते मागे बढ़ा और 'कभी', 'कभी' शेर कहते हुए युवती को अपनी मजबूत वांहों में भर लिया। नन्ही सुंदर चिड़िया फिर चहचहाई। "प्यारे, मैं दुल्हन दरअसल आज बनी हूं। माज यह विश्वास हुआ है कि मुझे मन का मीत मिल गया।" युवती ने इठलाते हुए अपना रूप-लावण्य प्रदशित किया। "और मुझे यह विश्वास उस दिन हो गया था जब मैंने तुम्हारा नाम मधुरसा था।" युवतो कहना चाहती थी, 'मैंने तुम्हारा नाम लल्लू रखा था', पर वह होंठों पे आई बात पो के मुस्कराई और एक कदम आगे बढ़ाकर नरेंद्र को भी चलने का संकेत किया। निशात बाग देसकर वे कितने सुश थे। जी चाहता था कि एक छोटा- सा बंगला दुनिया से न्यारा यहीं वन जाए और दोनों प्राणी उसी में जीवन बितादें। "नूरजहां और उसका पति जहांगीर भी यहां इसी प्रकार घूमते होंगे।" जब वे हाथ में हाथ पामे रंग-बिरंगे फूलों को क्यारियों के दरम्यान - ६८ / पंसहीन तितती घूम रहे थे तो मधु के मन से संगीत-सा फूट निकला। "स्वर्ग अर्थात् जन्नत जिसे कहते हैं, वह यही है । हम-तुम इस समय जन्नत मे हैं।" नरेंद्र ने स्वर में स्वर मिलाया और फिर वे दोनों एकसाप 'हम-तुम जन्नत में, हम-तुम अन्नत में गुनगुनाते हुए एक रविध से दूसरी रविश पर मटरगश्ती करने लगे। जब वे लौटकर आए तो अंधेरा हो चला था। सूरज के दूबने का दृश्य रन्होंने डोंगे पर झील ही में देखा । पहाड़ों पर फैलो लालिमा झील के पानी में प्रतिविम्बित होकर और ही छटा दिखा रही थी। धीरे-धीरे धनियाते हुए अधकार ने पहाड़ों, और देवदार और चिनार के छजनार पेडों और पूरे दृश्य को लीत लिया । अब आकारा पर तारे और घरती पर बिजली के बल्ब टिमटिमा रहे थे। मधु अर्थात् युवती के हाथ में वे कमल फूल पे जो उन्होंने एक-दूसरे डोंगे वाले मामी से खरीदे थे। भूख खूब लग आई थी, इसलिए पाते ही भोजन दिया, जो हाउस चोट के मालिक गफूर की बीवी तैयार कर दिया करती थी। पता चला कि कुछ सामान अभी सरोद लाना आवश्यक है, पर्ना नास्ता सुबह देर से मिलेगा। "हालिंग, चलो, थोड़ा टहलना हो जाएगा और सामान भी खरीद लाएंगे।" नरेंद्र ने मघु से कहा। "प्लीज, तुम अकेले ही ले आओ। मुझपर बडा अहसान होगा। मैं पोड़ा आराम करना चाहती हूं।" मधु ने मचलकर उत्तर दिया और वह तुरंत विस्तर मे दुवक गई। नरेंद्र चला गया और युवती कम्बल ओढ़कर कुछ देर निश्चल लेटी रही। उसे कुछ पकान और कुछ सर्दी महसूस हो रही थी। वह कभी लेटे- लटे आसें बद कर लेती थी और कभी खोल देती थी। निशात का मनोरम दृश्य अब भी दृष्टि में प्रम रहा था। उसे सहसा पंचत मेहरुन्निसा स्मरण हो माई और वाग का यह दृश्य जव शहजादा सलीम ने उससे पूछापा, 'एक कबूतर क्या हुआ ?' और उसने दूसरा कबूतर फर से उड़ाकर उत्तर पंसहीन तितली/६९ दिया था---'यों उड़ गया। सलीम मेहरुन्निसा की इसी अदा पर मर मिटा युवती ने करीब ही रखे लम्बे-लम्बे डंठलों वाले कमल के फूल उठा लिए जो मोरछल की तरह एकसाथ बंधे हुए थे । मेहरुन्निसा की चंच- लता ने उसे गुदगुदा दिया था और उसके भीतर स्फूर्ति की तरंग-सी दौड़ गई थी। वह कमल के फूलों से कभी दायां और कभी वायां गाल सहलाकर मुस्कराने और अपने से खिलवाड़ करने लगी। सहसा उसका हाथ रुका, होंठ भिचे और मन में एक विचार विजली-सा कौंध गया । वह कम्बल अलग फेंककर उठ खड़ी हुई। "वीवीजी, मैं अब चली जाऊं ?" गफूर की वीवी रहमत न पूछा। "हां, जामओ। मैं अकेली मजे में हूं, मेरी कुछ फिक्र न करो।” युवती ने उत्तर दिया। रहमत अगर न पूछती भी, मधु खुद उसे जाने की छुट्टी दे देती क्योंकि अपने विचार को व्यवहार में लाने के लिए उसे एकान्त की आवश्यकता थी। पास ही एक दूसरा हाउस बोट था, जिसमें गफूर सपरिवार रहता पा । रहमत वहां अपने बच्चों में चली गई। नरेंद्र जव बाजार से लौट कर आया तो हाउस बोट में मधु के बजाय एक युवक को वैठे पाया, जो उसे देखते ही बोल उठा। "हैलो, मिस्टर नरेंद्र ! में बड़ी देर से तुम्हारी राह देख रहा हूं।" मधु को पुरुप-वेश में देखकर नरेंद्र स्तब्ध रह गया । युवती नरेंद्र का कोट-पतलून पहने हुए थी और एक समूरी टोपी ओढ़ कर, जैसे कि डा० त्यागराज पहनते थे, वाल उससे अच्छी तरह ढांप लिए थे। "यह क्या स्वांग भरा है ?" नरेंद्र ने मधु पर एक दृष्टि सिर से पांव तक डाली। "मिस्टर, यह स्वांग नहीं, मेरा वास्तविक रूप है। इसे स्वांग समझ लेने वाली तुम्हारी नजर ने जबरदस्त धोखा खाया है । आज में पति और तुम पत्नी हो । मेरे ये कपड़े उतारकर तुम अपने वे कपड़े पहनो। चलो, जल्दी करो।" युवती ने अपनी साड़ी-जम्पर की ओर संकेत किया, और । ७०/पंखहीन तितली वह सिलसिलाकर हंस पड़ी। "वाह, क्या दिल्लगी मूझो है.! मानना पडेगा कि तुम जितनी सुदर हो, तुम्हारी कल्पना उससे कही अधिक सुंदर है।" नरेंद्र यासो में कोत. हल भरकर मुस्कराया। "हां, में जितनी सुदर हूं, मेरी कल्पना भी रतनी ही सुंदर है। इसमें कोई शक नही। पर इस कल्पना का मगा तभी बाएगा जब तुम मेरी प्रेयसी वनकर इटलाओ, इतराओ और अपनी मृदु मुस्कानों से मुझे भर- माओ।" मधु ने सुद साडी उठाकर नरेंद्र की ओर बढा दी। युवती के जिस पुरुष-वेश पर नरेंद्र को थोड़ी देर पहले विस्मय हुआ था, इम व्याख्या के बाद अच्छा लग रहा था और यह उसकी चंचलता पर मुग्प था। जब वे मन बहलावे और मनोरंजन करने के उद्देश्य ही से कश्मीर माए हैं तो स्त्री बनने में भी क्या बुराई है । वह थोडा भिमका, फिर साटी का एक पल्लू सिर पर ओढ़कर और घूपट-सा बनाकर उसने कनखियों से मप की ओर देखा और कमर जरा लचकाई। "ऊं हूं।" युवती ने सिर हिलाया, "ऐसे बात नहीं बनेगी। जिस तरह मैंने ये कपड़े पहन लिए हैं, तुम भी यह साडी-जम्पर पहनी।" और जम्पर भी उठाकर उसकी ओर बढा दिया, "इसमे शरमाने की कौन-सी बात है ? तुम पुरुषों ने हम स्त्रियों को हमेशा हीन और तुच्छ ममग. कर हमे नीचे रखा है। क्या हमें पुरुष बनकर कपर आने का अधिकार नहीं है ? कल में तुम्हारी पली पी और तुम मेरे पति थे। याज की रात में तुम्हारा पति और तुम मेरी पत्नी हो, समझे हमारा यह याधुनिक यग समानता का युग है, इसमे हर तरह की घाघली गरम होकर रहेगी। मैं तुम्हारे मन का मीत और तुम मेरे मन की मीत तभी बन सकती हो जब हम और तुम पारी-बारी नारी और नर की भूमिका अदा करें। ताली एक हाथ से नहीं बजेगी।" "इसका मतलब यह हुआ कि अगर एक बच्चा तुम जनती हो तोटूमरा बच्चा मुझे जनना होगा?' नरेंद्र ने प्रतिवाद दिया। वह निस्संदेह दिल्लगी के मूड में था, पर दिल्लगी की भी कोई सीमा होती है । साड़ी उम्पर पहन- कर नारी की भूमिका अदा करना ऐसी विचित्र वात थी, जो उसके पंसहीन तितली/०१ 1 परम्परागत संस्कारों के विपरीत थी। "वाह !" युवती ने विद्रूप भाव से नरेंद्र की ओर देखा और सिर से पांव तक एक पनी दृष्टि डालकर पूछा, "क्यों महाशय, क्या मैं उसी व्यक्ति को देख रही हूं जो कल तक शादी के नाम से कानों पर हाथ रखता था और आज इतनी जल्दी वाप बनने को उतावला है ! सच कहा है, बिल्ली को छीछड़ों के सपने। इस पुरुष नाम के प्राणी का भी कोई ठिकाना नहीं।" नरेंद्र के मर्मस्थल पर प्रहार हुआ था, उसका अंग-अंग सिहर उठा। हास-परिहास में भी एक ऐसी गंभीर परिस्थिति उत्पन्न हो गई थी कि वह अपने को एक तरह के धर्मसंकट में महसूस कर रहा था। न तो उससे युवती की बात स्वीकारते बनता था और न उसमें साफ इनकार कर देने का साहस था। चालाक युवती ने उसकी इस मनःस्थिति को भांप लिया और वह मृदु मुस्कान होठों पर लाकर बोली, “एक प्रेमी जहांगीर था, जिसने अपना राजपाट भी प्रेम की भेंट चढ़ा दिया था और नूरजहां को स्याह-सफेद कर देने का अधिकार सौंप दिया था। और एक प्रेमी तुम हो, जो इतना भी नहीं कर सकते कि एक रात भर के लिए अपना यह अहम-भरा पुरुष-वेश त्याग- कर स्त्री वेश धारण कर लो! हैस-वैस छोड़ो, लो, पहनो ये कपड़े । मुक्त मनोरंजन-~-परम आनंद तभी सम्भव है, जब तुम खोल से बाहर निकलोगे, संकीर्ण भेद-भाव से ऊपर उठ सकोगे ।" गर्म लोहे पर पड़ी चोट कारगर सिद्ध हुई। नरेंद्र ने यंत्रवत् युवती के मादेश का पालन किया और मुंह से एक शब्द कहे विना ही अपने कपड़े उतार कर साड़ी-जम्पर पहन लिया । पुरुप-वेशधारी मधु अर्यात् युवती ने अपनी सोने की जंजीर भी नरेंद्र के गले में पहना दी। एक तिरछी नजर सिर से पांव तक उसपर डाली और फिर ठुड्डी पकड़कर कहा, "मेरी जान, जरा कार देखो और मुस्करा- कर 'पिया' कहो।" "पिया!" नरेंद्र ने झिझकते-शरमाते कहा और वह सायास मुस्क- राया। "अहा में तुमपर कुर्वान !" युवती ने उसके हाथ अपने ७२/पंसहीन तितली मेरी जान,
हायों में पामकर नाचना-पिरकना और रेडियो पर कई बार सुने हुए एक
पंजाबी गीत में थोड़ा-मा अदल-बदलकर गाना शुरू किया :
तू बन जा मेरी हीर
तुझे से चतू कश्मीर
तेरी सोने की जंजीर
मेरे दिल में तेरी तस्वीर
वाह वा, क्या कहने !
जव नाचते-गाते तबीयत सूब भर गई और अंग-अंग पर मस्ती छा
गई तो उसने युवती वेशधारी नरेंद्र को बाहों में कम लिया और अपने गर्म
होंठ उसके होंटों पर बंकित कर दिए ।
पंखहीन तिततो/७३
१२ - 'औरत बड़ी कांटे की है।" 'वह तो है वर्ना तुम्हें पुरुप से स्त्री कैसे बना पाती ?' 'मैं स्त्री कैसे बन गया, यह तो दो घड़ी का मनोरंजन था।' 'तर्क अच्छा है। 'तर्क ?' 'हां, दिल की तसल्ली के लिए मनुष्य तर्क ढूंढ़ ही लेता है।' 'तुम व्यर्थ का पचड़ा डालते हो।' 'तुम्हारे रंग में मंग पड़ता है, तुम तो पचड़ा कहोगे ही। लेकिन मुझे जरूरत क्या पड़ी है पचड़ा डालने की। तुम अपना मनोरंजन करो। साड़ी- जम्पर पहनो, खूब नाचो, थिरको।' नरेंद्र की मांसें सुबह-सवेरे खुल गई थी और वह उठकर हाउस वोट के भीतर खुले में आ बैठा था । सामने कुहासे में लिपटा पहाड़ों का मनो- रम दृश्य था और नदी में डोगे चल रहे थे। पर नरेंद्र यह सब नहीं देख रहा था। उसे रात को घटना याद आ रही थी और जितना सोच रहा था उतना ही उसे अटपटा लग रहा था । जैसे मकड़ी जाले में उलझ जाती है, वह उसमें उलझा हुआ था। उसे खुशी भी महसूस हो रही थी और मन में एक टीस भी उठ रही थी। मधु कर उसके निकट आकर बैठ गई, उसे यह पता ही नहीं चला। "माई डियर, क्या सोच रहे हो?" मधु ने उसके कंधे पर सिर रख- कर मधुर स्वर में पूछा।
नरेंद्र चौका । कुछ क्षण उसकी ओर देखता रहा और फिर असल यात छिपाकर बोला: "मैं सोचता हूं कि हम आज ही यहां गे पहलगाम चल दें।" "पर रात तो तुम कह रहे थे कि सुबह शंकराचार्य का मंदिर देखने चलेंगे?" "मंदिर एक बार तो देर ही आए हैं । अब दोबारा यया जाना है। कभी फिर देखा जाएगा।" उसने एक नजर युवती की ओर देखा और बात जारी रसी, "पहलगाम कश्मीर का सुंदरतम स्थल है। वहाँ दूर-दूर से पर्यटक माते हैं और वहां देखने को भी बहुत कुछ है। बेहतर है कि आज ही चल दें।" "जैसी तुम्हारी इच्छा।” युवती ने प्यार को जिस दृष्टि से देसा, उमसे रात को घटना का सारा कुहासा हट गया । अब सामने का दृश्य भी स्पष्ट पा पेड-पौधे और पहाडो को चोटिया सूरज की नर्म-नर्म किरणों में नहा रही थी। पहलगाम में खूब चहल-पहल थी। वहां दिल्ली और बखनऊ ही से नही, बम्बई गौर कलकत्ता इत्यादि नगरो मे भी पर्यटक आए हुए थे और उनमे विदेशियो को भी अच्छी-खासी सख्या थी। वहा जिसने लोग थे और यापम मे इस तरह रल-मिल गए थे जिम तरह कबूतरो में बाबूतर, अवा- वोलों में अपायील-या गेहू मे गेहूं और चने मे चना मिल जाता है । टेd. भेडे सतरनाक रास्तो पर घोड़े दौडाने, ग्लेशियर देखने, दूर तक पैदल निकल जाने, लौटकर लिद्दर के स्वच्छ शीतल जल में नहाने, तट पर वंठ- फर बोपने-बतलाने अथवा आराम करने में समय यो बीत जातापा कि सूरज याब निरूला और कब छिप गया, यह पता ही नहीं चलता था। कुछ लोग घरी को लौट जाते थे, लेकिन उतने ही अपवा उन से अधिक नित्य नये आ जाते थे। पहलगाम की चहल-पहल ज्यो की त्यो बनी रहती थी, उसमें कोई अंतर नहीं माता या। नये आने वाले भी शीघ्र ही आपस में मिल-जुल जाते थे। वहा जो लोग थे, अजनवी होते हुए भी अजनवी नही ये षयोकि उन्हें प्रापस मे मिलने-जुलने और बोलने यतलाने में कोई संकोच नहीं था। उनके हास-परिहास फूलों और शहद की इम - पखहीन तितली/७५ -- धरती पर कल-कल बहने वाले स्रोतों के जल के सदृश निर्मल और स्वच्छ घे, उनमें राग-द्वेष और विद्रूप की तनिक भी मिलावट नहीं थी। पेड़ों पर चहचहाने अथवा नीले विस्तृत आकाश में मंडराने वाले स्वच्छंद पक्षियों के सदृश प्रकृति की इन संतानों के हृदय भी शुद्ध, पवित्र और निश्चल थे। शायद प्रकृति की गोद में बैठकर प्रकृति से तादात्म्य स्थापित करने के उद्देश्य ही से वे इतनी दूर-दूर से वहां आते थे। अगर एक व्यक्ति की किसी पूर्व परिचित व्यक्ति ते भेंट हो जाती थी तो वे दोनों यों उल्लास में भरकर गले मिलते थे जैसे भू-लोक के दो प्राणी स्वर्ग-लोक में अचानक एक-दूसरे से आ मिले हों। वे बोलने-बतलाने और बीती वातों को सुनने-सुनाने में अपूर्व आनंद महसूस करते थे। नरेद्र दिन में तीन-चार मर्तवा लिद्दर में नहाया करता था। यहां दूसरे लोग थोड़ी देर पानी में रहने के बाद ठंड महसूस करने लगते थे और फिर बाहर निकलकर धूप सेंकते थे, नरेंद्र देर तक पानी में डुबकियां लगाता, उल्टा-सीधा तैरता अथवा स्थिर लेटकर धारा के साथ बहता था। एक बार नदी में घुस जाने के बाद जी चाहता था कि घड़ियाल के सदृश पानी ही में पड़ा रहे । निर्मल शीतल जल के स्पर्श से वह अपने तन- एक अवर्णनीय सुख महसूस करता था। "तुम पिछले जन्म में अवश्य कछुवे होंगे।" "इसलिए कि मुझे पानी में रहना बहुत पसंद है ?" "और क्या ! शायद तुम इसीलिए पहलगाम आने की जल्दी मचा मन में "हां, यह भी एक कारण था। मैं दो बार पहले भी यहां आ चुका हूं। वैसे तुमने देखा कि श्रीनगर की तुलना में यह कितना सुंदर स्थल है।" "निस्संदेह यहां से लौटने को जी नहीं चाहता।" "ऐसी बात है तो एक हफ्ते की छुट्टी और बढ़वा लेते हैं।" "प्लीज डू। आप हो तार दे दो।" नरेंद्र का अपना मन भी वहां अभी कुछ दिन और रुकने को चाह रहा पा। उसने तार देकर मधु की इच्छा पूरी कर दी लेकिन आखिर यह हफ्ता भी खत्म हो गया और उन्हें अगले दिन वहां ७६ / पंखहीन तितली से चले जाना था। मुबह दम-पारह बजे का समय पान नरेंद्र नदी में नहा रहा था और मधु तट पर बैठी मूरज की किरणों और पहाड़ पर उगे पेड़- पौधों को पानी में प्रतिविम्बित होते देख रही थी। और लोग इधर-उधर बैठे बोल-बतला रहे पे और कुछ घूम-फिर रहे थे। उमौकी हमउम्म एक दूसरी युवती उसके निकट आकर रुकी। मधु ने भी बाहट पाकर गर्दन घुमाई और वे दोनों कुछ क्षण विस्मय विमूड-सी एक दूसरी को देसती "ओह, मीना हो।" "रीता हो।" उन्होंने एक दूगरी को पहचाना और अपनी मायनिक पद्धति में एक मरी का अभिवादन किया, फिर मधु ने रोता नाम की इस सम्बी को होतो पर अंगुली रपार सतकं किया-समझाया और अपने निकट विठा लिया। रोता को यह इत्मीनान हो गया कि उसने अपनी चिरपरिचित ममी को पहचानने में कोई भूल नही की। वह समझ गई कि उनकी ससी अपने 'मीना' नाम और पिछले जीवन को गोपनीय रखना चाहती है या वह इतने दिनों बाद मिली थी, उठ कर गले से लिपट गई होती। "मखबार मे सवर पढकर हम तो यह समझे थे कि तू दूसरी दुनिया में पहुंच गई है।" रीता ने सरगोशी में बात शुरू की, "पर मैं यह क्या देख रही हूं!" "मेरी जान, मेरे जिगर के टुकई ! तू बो देख रही है, वह सोलह माने सही है मोर तूने जो अखबार में पढा, वह मात-प्रतिशत भूठ था।" मीना अर्थात् मयु ने मुस्कराते हुए उत्तर दिया। "यह सब हुआ कैसे ? वढे अचरज की बात है।" "अचरज की बात न हो तो दुनिया को दुनिया कौन कहे ?" मधु ने गुदगुदी-सी महसूस की और घास का एक तिनका सोड़कर परे फेंक दिया, "बड़ी अच्छी थी बेचारी मेरा नाम बोड़कर चलती बनी और मुझ सभी बंधनों से मुक्त कर गई।" "सवाल तो यह है कि उसे यह नाम मोडाया किसने?" पंखहीन तितली/७७ 12 । . "मैं होस्टल से गायब थी और कंपनी में ड्यूटी पर भी नहीं जा रही थी। हो सकता है, इसकी सूचना पुलिस को हुई हो और पुलिस वालों ने यह नाम उसे मोढ़ा दिया हो।" मधु ने अनुमान लगाया। "शायद यही बात हो । पर हमने तुझे मर गई समझ लिया था।" रीता ने कहा और दोनों सखियां एकसाथ मुस्कराई। "कुछ भी हो, उस वेचारी ने नई भूमिका निभाने में मेरी बड़ी मदद की। मैं हर तरह से निश्चित हो गई। मेरा नाम अब मीना नही, मधु है।" नाम बताते हुए उसका स्वर और भी मद्धिम हो गया था। "अच्छा मधु !" रीता ने सखी के नये नाम का उच्चारण बड़े दुलार से किया और उत्सुकता में भरकर पूछा, "तू उस समय कहां थी और तेरी यह नई भूमिका क्या है ? "इधर इस लल्लूराम को देख, जो नदी में मगरमच्छ की तरह नहा रहा है।" रीता ने कनखियों से नरेंद्र की ओर देखा और मधु ने वात जारी रखी, "इसके बूढ़े आदमी (उनकी आचार संहिता में वाप को बाप कहना वजित था, उसके लिए 'बूढ़े आदमी' की परिभाषा प्रयोग होती थी) ने मुझे सड़क पर वेहोश पाया और उसकी महा करुणा सक्रिय हो उठी। ये लोग मुझे उठायार अपनी कोठी में ले गए। मैंने होश में आकर स्मृति खो जाने का नाटक किया। अव में इस लल्लूराम की धर्मपत्नी हूं और उसके साथ हनीमून मनाने यहां आई हूं।" मधु ने 'धर्म पली' और 'हनी मून' शब्दों का उच्चारण इस ढंग से किया कि दोनों सखियां खिलखिलाकर हंसने लगीं। उनकी यह हंसी शायद नरेंद्र ने भी सुनी, क्योंकि वह पलटकर उनकी ओर देख रहा था। "तेरे इरा हनीमून पर मैं तुझे हृदय से बधाई देती हूं।" रीता आंखों में चंचलता भरकर बोली। मधु ने उसका हाय अपने हाथ में लेकर दवाया और वे दोनों फिर हंसी। जब तक नरेंद्र ने नदी रो निकलकर तौलिए से बदन पोछा और तनिक सुस्ताकर कपड़े पहने, मघु ने अपनी स्मृति खो जाने के अभिनय से विवाह हो जाने तक की पूरी कहानी बिना किसी लाग-लपेट के अपनी आधुनिक ७८/ पंखहीन तितली ती में ससी को कह सुनाई। रोता सुनकर गद्गद हो उठी। मघु भो प्रसन्न थी क्योकि जिम रहस्य को उमने इतने दिनों से बसने भीतर छिपाकर रखा था, उसे अपनी एक अतरंग सपो को बताकर मन हल्ला हमा और उसने राहत की सांस ली "तूने सबकी आखों में धूल झोंगी और अपनी भूमिका बड़ी सफाई से निवाही," रीता ने दाद दी और ससौ को ओर प्रशंसा की दृष्टि से देगा। नरेंद्र जब कपड़े पहनकर उनके निकट आया तो ये पहलगाम की सुंदरता और ग्लैशियर के बारे मे पातें कर रही थी। "मेरीससी रोता मे मिलिए।" रीता ने हाय आगे बढ़ाया जो नरेंद ने निस्सकोन थाम लिया। "यह उद्योग मंत्रालय में चीफ मेक्रेटरी की स्टेनो हैं।" मधु ने बात जारी रखी । नरेंद्र और रोता एक-दूसरे का हाथ थामे मुस्करा रहे थे। "आप हैं मिस्टर नरेंद्र. मेरे मेरे वह यानी हर।" मयू ने नरेंद्र का परिचय मसी को दिया। नरेंद्र और रीता ने एक-दूसरे का हाय दवाकर इस परिवार हार्दिक प्रसन्नता व्यक्त की और फिर रीता ने 'बाई-चाई कहते हुए उन दोनों से विदा ली। मरेंद्र पोय-पोया-सा उसे जाते हुए देखता रहा और उसके नवरों से मोमल हो जाने के बाद भी वह स्थिर सहापा। उसको आॐ एकदम सूनी हो। "क्या सोच रहे हो ?" मघु बोली। नरेंद्र ने पत्नी को ओर देसा और कई दाग मो ही देखता रहा। "इसका मतलब है कि ससी से मिलकर तुम्हें अपने पिछले जीवन की सारी बातें याद या गई?" "हा, आ गई।" मधु ने साफ-साफ उत्तर दिया। उसके स्वर में ओर उसके मुख पर संकोच या झिझा नाम मात्र को नहीं थी। "मैं के एड के० कंपनी में रिमनिस्ट थी, किम मत होस्टल में रहती थी और मेरा नाम मीना था।" पंसहीन तितली एक और नवविवाहित जोड़ा उनके करीब से गुजरा। जाहिर है कि वे भी हनीमून मनाने आए थे, बहुत प्रसन्न थे और अपनी किसी बात पर हंस रहे थे। नरेंद्र और मधु दोनों उन्हें जाते हुए देखने लगे और देखते रहे । नरेंद्र की मुख-मुद्रा गम्भीर थी और मधु के होंठों पर मुस्कान और आंखों में विद्रूप था। "नाम के अलावा और क्या था?" "जो कुछ भी था, वह एक रहस्य है । वेहतर है कि रहस्य को रहस्य ही रहने दो। उसके उद्घाटन से न तुम्हें कुछ लाभ होगा और न मुझे।" मधु ने पूर्ववत् दृढ़ और स्पष्ट स्वर में उत्तर दिया। नरेंद्र अवाक् उसकी ओर देखता रह गया । इसमें तनिक भी संदेह नहीं था कि वह ठगा गया है। लेकिन मधु अर्थात् मीना का रहस्य अब उसका भी रहस्य था। इसे रहस्य ही रखना होगा। उसके उद्घाटन से मधु का शायद कुछ न विगड़, पर वह उसकी और उसके परिवार की रुसवाई का कारण निश्चित बन सकता था। । ८० /पंखहीन तितली १३ 1 पहावत है कि मुह से निकली वात कोठे चढ़ जाती है । रीता सेढ हपता कश्मीर में बिताकर दिल्ली लौटी तो उसके लिए बात को पेट में पचाए रखना मुश्किल हो गया। आठ-दरा प्राणियों का एक ग्रुप था। उम प्रप में रीता, मीना, आशा, दीपा इत्यादि युवतियों के अलावा तीन-चार युवक भी शामिल थे। उनकी उन्मत्त युवा शक्ति समाज के बंधनों में घृणा करती थी। जैसे बाढ पर आई नदी किनारो को तोड टालती है, उन्होंने तमाम मान-मर्यादाओ का उल्लंघन करके जीवन को उन्मुक्त मन मे भोगने का मार्ग अपना लिया था। जिस मोना को उन्होंने मृतक समझ लिया था, वह जीवित है और कितने ही लोगों को मूर्म बनाकर शिक्षित सम्मन्न पर की पुत्रवधू बनी हुई है, इतने बड़े नाटकीय काड की फम से काम अपने ग्रुप में चर्चा करने और उन्हें चौका देने के आनंद से रीता अपने पो कमे वचित कर लेती? उसने दिल्ली लौटते ही मरमे पहला काम यह किया कि टेलीफोन का रिसीवर उठाकर नम्बर मिलाया और दूसरी तरफ की आवाज पहचानकर बोली : "मोह, आशी हो।" "रीता हो! कहो, कंसी रही कश्मीर की सर?" "यहुत मजेदार । तुझे एक सबर मुनाती हूं, पहले दित पर हाप ररा ले।" "वयो, मर तो है "बान वैसे यशी की है।" " "सुसी की है तो तूने मुझे घबरा क्यों दिया ? सुना, जल्दी सुना । घट पट।" "हमारी यह मीना थी ना ?" "हां, थी।" "मेरी उससे मेंट हुई।" "पगली, पया तू नींद में बोल रही है ?" "नहीं, मैं जाग रही हूं। सुन तो सही।" - "मुझे यह पहलगाम में मिली। वहां वह नरेंद्र नाग के अपने नये हस्वंग गो साथ हनीमून मना रही थी।" "अजीब बात है। यह तो मर गई थी! "गरने गी जिस रायर पर हमने विश्वास कर लिया था, वह उसने भी पढ़ी थी और यह बिल्कुल गलत थी।" "लाओ, इरा सुशी में तुम्हारा मुंह चूम लूं।" 'पुच' की सी आवाश सुनाई पड़ी । अपने हाथ की हथेली चूम लेने के बाद माशी फिर बोली, "मीना का पहला हस्वेट गुरमेल भी उसके बारे में पूछ रहा था।" "वह रशिया से लौट आया?" "हां, लौट आया । मुझो वह बैंगर में मिला था।" बात चल निगलो । एक से दूसरे और दूसरे से तीसरे मुंह चढ़कर जंगल की आग की तरह फैल गई । बात ही ऐसी थी, जो भी सुनता था, चलित रह जाता था और फिर किसी दूसरे को पकित कर देने के लिए अधीर हो उठता था। ग्रुप में और ग्रुप से बाहर मधु की इस नई भूमिका की पर्चा विभिन्न प्राार से होने लगी। "कमाल है, जिरा मीना को दुनिया ने मर गई समझ लिया था, वह हनीमून मनाती घुग रही है !" "मनुष्य गारने पर आए तो वह गया-गया पगलार नहीं कर सकता!" "गोपने की बात यह है कि भगवार वालों ने किसी भी युवती को शव को मीनाहा गयनोसे बना दिया?" "अये लालबुझाड, उसे गोगा का शव भरावार वालों ने नहीं, पुलिस - १२/पंराहीन तितली ने बनाया।" "पुलिस का इसमें क्या लाभ पा?" "हो तुम सचमुच बनिये को पोलाद । हमेशा साभ-हानि में सोचते हो। वर्ना यह सीधी-मी यात है, जिसे ऐरा गरा-नत्य-संरा भी महत्र में समझ सकता है।" "योंही तीसमारखा बनोगे या बताओगे भी कि सीधी गत कसे है ?" "सुन, सीधी यो है । मीना जय चार दिन तक लापता रही तो होस्टस वालों को चिंता हुई कि यह कहीं,सडक दुर्घटना में पायल न हो गई हो। गभी अस्पतालों के इममी यार्डों में फोन करने पर मालूम हुआ कि यहां ऐमा कोई मरीज नहीं पहुंचा । तब उन्होंने पुलिस में रपट लिगवा दी। अब इत्तिफाक की बात है कि रपट लिसवाने के दूसरे ही दिन रिमी युवती पा शव मिला। उसने भी वैमा ही स्कर्ट, टाप और कंटी पहन रबी पी जैसी मीना पहनती थी। बस, इसी आधार पर पुलिस और होस्टल फे अधिकारियों ने इस शव को मीना का शव मान लिया और अपने-अपने रजिस्टरो में उसे मृतक लिसकर अपने को योज-पयर लगाने के झंझट से मुक्त कर लिया । सममा कि नहीं?" "इससे तो उनकी गैर-जिम्मेदारी, बल्कि ठों कहिए कि-मनता गिद्ध होती है।" "और 'यह भी सिद्ध होता है कि अपने महान यादों और नैतिक मूल्यो का दिदोरा पीटने वाले इस सम्म समाज में मनुष्य का पूहे या मेडक से अधिक महत्व नहीं है।" श्रोता मुस्कगए। वपता ने मेज पर मुस्का मारा। बोर बात जारी रसी, "इससे यह भी सिद्ध हुमा कि प्रति के विरुद्ध संघर्ष में मनुष्य अपनी जिस विजय की डींग हाक रहा है, जिसे प्रगति अथवा उन्नति को संज्ञा दे रहा है, वह सब व्ययं है । गुरुत्व माकपंग से कार उछार पार हा पहंघी अथवा मंगल ग्रह तक पहुंच जामो, समाज को निर्ममता और कुरता गो को त्यों बनी रहेगी। समाज के विपद व्यक्ति का संघर्ष ही मानव-मुक्ति का वास्तविक संघपं है। जब समान नहीं था, पक्तिसम्पूर्ण पापोर गमान जब नहीं रहेगा, वह फिर से अपनी सोई हुई समूगंवाको प्राप्त कर मेरा। पंगहीन तितुसी/८३ हम इस संघर्ष में किसी वर्ग विशेप का नहीं, हर उस सामान्य प्राणी का नेतृत्व कर रहे हैं, जो अपनी सम्पूर्ण स्वाधीनता के आदिम युग को भूल बैठा है। हम विद्रोही और मानववादी हैं । उन्नति और उज्ज्वल भविष्य के सब्जबाग दिखाने वाले मानवता के शत्रु घोर रूढ़िवादी हैं..." "हेयर ! हेयर !!" श्रोताओं ने तालियां बजाई। "मीना की वर्तमान भूमिका के बारे में तुम्हारी क्या राय है ?" रेखा ने वक्ता से पूछा। "मीना ने समाज के विरुद्ध व्यक्ति के इस विद्रोह को सफलतापूर्वक आगे बढ़ाया है। मीना ज़िदावाद !" "मीना जिंदाबाद !" ग्रुप के सदस्यों का सम्मिलित उद्घोप वाता- वरण में गूंज उठा। "सिर्फ जिंदाबाद कहने से काम नहीं चलेगा। हम लोग हर तरह से उसकी सहायता करेंगे।" प्रवक्ता ने दृढ़ स्वर में घोपणा की। ग्रुप के सदस्यों ने मीना को उसकी इस भूमिका में सक्रिय सहयोग देने का प्रस्ताव किया और उसे पूरे समाज को चौंका देने वाली पराकाष्ठा तक पहुंचा देने की योजना तैयार की। इस योजना के अनुसार माशो ने गुरमेल से सम्पर्क स्थापित किया और बताया कि मीना नाम की तुम्हारी प्रेमिका, जिसके तुम हस्बैंड हो, मरी नहीं, जीवित है। "जीवित है !"गुरमेल को खुशी भी हुई और आश्चर्य भी। "हां, जीवित है और उसने नरेंद्र नाम के एक इंजीनियर से दोबारा व्याह कर लिया है।" "आशी, तुम मुझे बनाओ मत । मैं कभी नहीं मान सकता कि मीना अगर जीवित है तो वह मुझे धोखा देगी, किसी दूसरे व्यक्ति से व्याह रनाएगी।" गुरमेल ने प्रतिवाद किया। "तुम्हें अगर मेरा विश्वास नहीं तो मैं तुम्हें खुद मीना से मिलवा देती हूं। तुम अपनी आंखों से देख लोगे कि यह जीवित है। दोबारा याह की बात भी तुम खुद उसीके मुंह से सुन लेना। क्यों, ठीक है ?" "हां, ठीक है । तुम अगर मीना से मेरी मेंट करा दो तो मैं तुम्हारा यह ८४/ पंसहीन तितलो , अहमान कमी नहीं भूलूगा।" गुरमेल ने अपना हाथ बागे बढ़ाया, जो माथी ने निस्संकोच थाम लिया और वह उसके मुस पर दृष्टि गड़ाकर बोली, "याज क्या है- संटे ? तुम थमंडे को मुझे इसी समय इसी जगह मिलना, मैं उसे अपने साय लेती आऊंगी।" मामी और गुरमेल में यह वार्ता पाच बजे सायंकाल इंदिया गेट पर हुई थी। वहस्पतिवार को ठीक पाच बजे सायंकाल वह मोना और रोता को साय लिए वहा पहुंची। गुरमेल पहले ही पन्त की मूर्ति के पास सड़ा उनका इंतजार कर रहा था। गुरमेल भीना में और मीना गुरमेल से मिलकर बहुत प्रसन्न हुए । सगता था कि दोनों एक-दूसरे के लिए वैचन थे। अपनी परेशानी बयान कर देने के बाद गुरमेल ने पूछा, “यह दूसरे व्याह की बात क्या सच है ?" "प्यारे, मच क्या है और झूठ क्या है, इसका निर्णय परिस्थिति से होता है वर्ना इस दुनिया का सच झूठ और झूठ सच है।" मोना ने दूर क्षितिज की ओर देखते हुए दासनिक ढंग से उतर दिया। "मतलब?" "मतलब यह कि मेरे साथ कुछ विचित्र घटना घटित हुई । में रीता, आदशी, तुम्हें और खुद अपना नाम तक भूल गई। बद्धत सोचने पर भी महीनो कुछ याद नहीं आया। स्मृति बिलकुल सो गई थी। इसी स्थिति में यह दूसरा ब्याह हो गया।" गुरमेल ने ब्याह की बात मौत की खबर की तरह दुस के साय सुनी। वह कुछ देर सिर झुकाए चुप बैठा रहा। शायद यह निर्णय नहीं कर पा रहा पाकिमोना ने जो कुछ बताया, उसे झूठ माने या सच। "अब ?" उसने मीना के मुख पर दृष्टि गहाकर पूछा। मोना एकाएक गम्भोर हो गई और सूनी आखों से पों गुरमेल को और देखने लगी, जैम स्मृति एक बार फिर सो गई हो। "अब यही हो सकता है," वह सोचते हुए धीरे-धीरे बोली,"तुम बदा- मत में जाओ।" "अदालत में ।" गुरमेल ने यो दोहराया, जैसे कह रहा हो कि मौना, पंखहीन तितली/५
मुझे तुमसे इस उत्तर की अपेक्षा नहीं थी।
"हां, तुम अदालत में मुकदमा दायर करो।" उसने विना विचलित हुए
वात जारी रखी, "पहले हस्बैंड के रहते दूसरी शादी कानून के विरुद्ध है।
फैसला तुम्हारे हक में होगा।"
पेड़ों की परछाइयां दूर तक फैल गई थीं। घूमने वालों की खूब
भीड़-भाड़ और गहमागहमी थी। इस खयाल से कि वे दोनों खुलकर बातें
कर सकें, रीता बोर आशी टहलती हुई दूर निकल गई थीं।
"क्या अदालत में जाना जरूरी है ?" गुरमेल ने प्रश्नसूचक दृष्टि उसके
मुख पर डाली।
'मैं पवांरी होती तो तुम्हारे साथ भाग सकती थी।' मीना मन ही
मन खिलखिलाकर हंसी और प्रत्यक्ष बोली, "अब तो मुझपर तुम्हारा भोर
नरेंद्र का समान अधिकार है।"
"अगर अदालत ने तुमपर फैसला छोड़ दिया और पूछा कि
तुम
किसके साथ जाना चाहती हो..."
"क्या तुम्हें विश्वास है कि [अदालत फैसला मुझपर छोड़ देगी?"
मीना ने उसकी बात काटकर पूछा।
"मान लो कि वह छोड़ देती है, तब तुम्हारा उत्तर क्या होगा?"
"मुझपर और अपने पर भरोसा रखो । प्रश्न जब पूछा जाएगा,
उत्तर में तभी दूंगी।"
मीना इस ढंग से मुस्कराई कि गुरमेल आश्वस्त हो गया।
८६/पंखहीन तितली
१४ गुरमेल ने जम तक मुकदमा दायर किया, तब तक मीना का एक और दावेदार पैदा हो गया। यह भरे चेहरे, गोरे-चिट्ट रंग और वही बड़ी आँखों वाला नौजवान था और उसका नाम अनीस अहमद था। मीना अभी बालेर में पढ़ती थी, उसकी उम्र अठारह-उन्नीस बरस होगी कि उसे फिल्मी हीरो- इन की तरह किसीसे प्यार करने और प्यार पाने का शौक चर्राया। अनीस सामने के मकान में रहता था। वह सूबसूरत ईसा जवान था। मीना ने उसकी निगाहों को गर्मी कई बार अपने शरीर में महसूस को यो। उमने पिघली और प्यारभरी निगाहों का जवाब प्यार मे देना शुरू किया। मापस में पर्वबाजी और फिर मुलाकात होने लगी। प्यार दिन-दिन गह- राता चला गया। आखिर एक रोज भाग जाना तय पाया । मीना पर से कालेज जाने का बहाना करके मा गई, अनीस महमद पहले से स्टेशन पर मौजूद था। वे दोनों गाड़ी में बैठकर मुरादाबाद पहुंच गए। मोना लखनऊ के सुप्रसिद्ध वकील परिवार की लहको यो । 'बोल परिवार' नाम इसलिए पड़ गया था कि हमारे इस देश में जब से अंग्रेजी का चलन हुआया, इस परिवार के सभी लोग पीढ़ी-दर-पीढ़ी में ग्रेजी पड़ कर वकालत का धंधा फरते आ रहे थे, जिसमे पंसा भी था और प्रतिष्ठा भी। वर्ना यह वह परिवार या, कल्हन ने अपनी राजतरंगनी मे जिसकी राजनिष्ठा का मविस्तार उल्लेख किया है । शिक्षा इस परिवार के लिए राजदरबार तक पहुंचने का सोपान थी। इसी उद्देश्य को सम्मुम रमते हए जब संस्कृत का पलन था, ये सोग संस्कृत सीसते थे।जब फारसी मोर अंग्रेजी राजभाषा बनी तो इन्हें फारसी और अंग्रेजी सीखने में भी कोई कठिनाई नहीं हुई। इस परिवार की यही बड़ी विशेषता रही है कि वह अपने को बड़ी सुगमता से वातावरण के अनुकूल ढालता आया है। मिलीजुली गंगा-जमनी संस्कृति जिसका फिरंगी नाम 'कम्पोजिट कल्चर' है, इन लोगों की इसी विशेषता पर आधारित थी। मतलब यह कि इन लोगों ने मुगलिया रहन-सहन में अंग्रेजी तौर-तरीके मिलाकर उसका सहज में पश्चिमीकरण कर लिया था । अपनी इस विशेषता और परम्परागत राज- निष्ठा के कारण इस परिवार के वकील लोग बहुत जल्द महाअधिवक्ता, महान्यायवादी और न्यायाधीश का उच्च पद पा जाते थे। मीना का दादा अवधनारायण दस-बारह बरस वकालत करने के बाद महा अधिवक्ता अर्यात् बटार्नी जनरल नियुक्त हुआ था । एक राजनीतिक साजिश नेस में उसने मान्तिकारियों को फांसी और उम्रकैद की सजाएं दिलाने में अपनी तर्क-शक्ति और बुद्धि-चातुर्य का भरसक प्रयोग किया था। परिवार की इन्हीं सेवाओं के एवज मीना का बाप शिवनारायण हाईकोर्ट का न्याया- धीश नियुक्त हुआ था। शिवनारायण को दो लड़के राजनारायण और सत्यनारायण थे, वे भी वकील थे । पैसे की खूब रेल-पेल थी मोर ठाठ का रईसी जीवन था। लखनऊ के रईगों में दो रो-शायरी का शौक नवाची जमाने से बदस्तूर चला आ रहा था। इस.परिवार में भी शे'रो-शायरी की महफिल अक्सर जमती थी। सुद शिवनारायण ने 'खलश' तखल्लुस रख छोड़ा था और वह आतिश, नासिस और मुसहफी के घिसे-पिटे अंदाज में इश्किया गजलें लिखा करता था, जिन्हें यह मुशायरों ही में नहीं हो रो-शायरी की महफिलों में घर पर भी सुनाया करता था । जय 'याह-वाह', 'मुकरर-मुकरर' के तौर में शे'र दोबारा पढ़ने को फरमाइश होती थी तो वह गर्व से फूला नहीं समाता था। पिता को देखा-देसी मोना ने भी कविता करना और प्रेमगीत लिखना शुरू फर दिया था। उसने ये गीत छाय-छानामों की गोष्ठियों में सुनाए और कालेज पनिका में छपे, जिससे उसे वांछित लोकप्रियता मिली और वह अपने को हीरोइन' महसूस करने लगी। लेकिन प्रेम-गीत लिखते-लिखते उसपर प्रेम दीवानी बनने की भी धुन सवार हो गई। इसी धुन में वह अनीस के ८८/पंसहीन तितली 1 । साथ घर से भाग सही हुई ताकि रोमांस का आनंद भोगकर रोमाटिक गीतों को सार्थक बनाया जाए। वकील परिवार को जितनी बडी प्रतिष्ठा थी, सडकोका पाएकाएक पर से भाग जाना उसके लिए उतनी ही बडो रुसवाई थी। अपनी गंगा- जमनी सस्कृति के बावजूद ये लोग बहुत परेशान थे। उसी दिन से बनीस भी चूकि गायव था, इमलिए अपहरण को रपट पाने में लिसवा दी। इपर उनकी पोज शुरू हुई, उधर अनीस ने काजी को बुलाकर निकाह पढ़ लिया। पद्रह-वीस दिन मजे से गुजरे-गुब प्रेम की पागे पड़ी । लेकिन उनके पास पैसा-पला जो मुछ पा, यह इस बीच में पचं हो गया और मुरादाबाद के जिन यार-दोस्तों ने शरण दी थी, उन्होंने भी इमदाद से हाप गोच लिया। अनीस को सबसे ज्यादा दु.स इस बात का हुआ कि उसने जिन यार-दोस्ती पर भरोगा किया था, वे उनके दित की मलिका मीना को उससे हथिया लेना चाहते थे। अनीस परेशान हो उठा और सारी स्थिति स्पष्ट करके मीना के सम्मुख प्रस्ताव रखा: "मैं समझता हूं, हम लोग लसनऊ लौट चलें।" मोना दुविधा मे पड गई । यहा रहने या आगे जाने का कोई सापन नहीं था; पर वह लखनऊ लौटे तो किम मुह से लौटे। "क्या हमारे रोमास का यही अंजाम होना था?" मह न सवाल था और न शिकायत थी। यह निरागा का चीत्कार था। दोनों चुप ये और उन्हें एक-दूसरे की बोर देसने तक का साहस नहीं हो रहा था। कुछ सण यों ही बीत गए । "अजाम क्यो, इसे आजमाइश कहो। जिस इक को आजमाइश न हो, यह इश्क ही क्या है " मासिर अनीस ने मामोगी तोड़ो और यह पहीद के अंदाज से मुस्कराया। वे दोनों ससनऊ लौट आए मोर उन्होंने अपने को मंजिस्ट्रेट को मदालत में पेश कर दिया। मीना वालिग थी। उसने अदालत में बयान दिया कि अनीस ने उसके साथ किसी प्रकार को जोर-जबरदस्ती नहीं की, वह स्वेच्छा से उसके साथ गई थी। पंसहीन तितली/ अदालत ने अनीस को मुक्त कर दिया और मीना अपने घर चली आई। - यह तय पाया था कि मीना कुछ समय अपने परिवार में रहे, इस बीच गनीस कोई रोजगार, कोई अच्छी नौकरी ढूंढ़ेगा । जब कोई सिल- सिला बन गया, वह मीना को अपने पास बुला लेगा। 'सुबह का भूला शाम को घरपाया' की लोकोक्ति के अनुसार घरवाले मीना के लोट आने से संतुष्ट थे और उन्होंने इस घटना को युवावस्था का उन्माद समभकर नजरंदाज़ कर दिया था। उनका यह भी ख्याल था कि दो-चार साल में बात आई-गई हो जाएगी और जात-बिरादरी का कोई अच्छा लड़का देखकर वे बेटी का व्याह उससे कर देंगे। पर वे लोग, जो दूसरों के मामूली से मामूली छिद्र ढूंढ़ते रहते हैं, इतने बड़े कांड को पैसे नजरंदाज़ कर देते ? उन्हें तो सौभाग्य से कोतूहल और चर्चा की सामग्री हाथ लगी थी। "क्या यह वही लड़की है जो घर से भाग गई थी ?" "हां, वही है, । देखती हो, कसे थिरक रही है, इसे ह्या-लज्जा तो छू तक नहीं गई!" "जो हया-लज्जा वाली होती हैं, वे परिवार की मान-मर्यादा का ध्यान रखती हैं और ऐसी बात सपने में भी नहीं सोचतीं।" मीना किसी उत्सव, किसी पर्व अथवा व्याह-शादी में जाती, उसकी ओर उंगलियां उठती थीं और उसे इस प्रकार के कटाक्ष सुनने पड़ते थे । अंतरंग और सगे-सम्बन्धियों तक की बातों से अवज्ञा और अवहेलना का भाभास होता था और वह मन ही मन में तिलमिलाकर रह जाती थी। गय न राहा गया तो उसने किसीसे मिलना-जुलना और घर से बाहर जाना ही बंद कर दिया। निकाह की बात सिर्फ उसे मालूम थी, वह अनीस पी याद में दिन विताती रही। इस प्रकार साल-सवा साल बीत गया; पर इस बीच में न मनीस का कुछ पता चला और न उसका कोई सत-पय भाया । इरा वातावरण में दम घुटने लगा। वह के० एण्ड फे० कंपनी में रिसेप्सनिस्ट बनकर दिल्ली आ गई और वकिंग गर्ल्स होस्टल में रहने .. सगी। ६०/पंसहीन तितली तालाव का मेढक समुद्र में आ गया । मीना का धीरे-धीरे उन युवक- युवनियों और अधेड स्त्री-पुरुपों में परिचय बढा, जो उमापनिकता में जिसकी उसे मामूली हवा लगो यो, बहुत आगे निकल गए थे। ये शा में जीते और चेहरे देषकर 'हैलो, हलो' करते और हाथ मिलाते थे। जो मामने नहीं था, वह मांग ओमल पहाट ओमान, उसकी किसी को चिंता नहीं पी। दिल्ली का यह वातावरण मीना को इसना रास आया कि उसने अपने लसनम के परिचितों और परिवार के सदस्यों तक पो बहुत जल्द मुना दिपा। धीरे-धीरे अनीस का चेहरा भी विस्मृति के कुहासे में गो गया। लैला-मजनू, सस्सी-पुन्न, हीर-रामा रूपयतीन्यारवहादुर इत्यादि यो प्रेम कहानियों का क्षण में जाने वाली आधुनिरता की दृष्टि में कोई महत्व नहीं था। उनका प्रेम, प्रेम नहीं, पागलपन या प्रेम का व्यक्ति विशेष में कोई सम्बन्ध नहीं, वह किसी क्षण किसीमे भी किया जा सकता है । महत्व है तो प्रेम के उन क्षणों का जो जीवन को आनंदविभोर बनाते हैं, जिनमें व्यक्ति आन्तरिक सुम की स्थिति में पहुंच जाता है। मोना को भी अद मिर्फ मुरादाबाद में विताए गए दिनी की याद आती थी, जो उसके अंग. प्रत्यंग को रोमाचित कर देती थी। यह नई अनुभूति आखिर इतनी तीन हो उठी कि अनायास कविता में ढल गई मुझे वह समय याद आता है जव में तुम थी और तुम में ये हम तुम एक साथ मोए ये मेरा गरीर तुम्हारे पारीर में और तुम्हारा शरीर मेरे में मोम के सदृश विलय हो गया था। हम-तुम में कोई पर्दा नहीं था। फिर समाज की विडम्बना बीच में आई परछाइयां लम्बी होती चली गई संपरागहराता चला गया अब तुम कहीं हो, में कहीं हैं तुम मुझे और मैं तुम्हें मूल गई पंमहीन तिवली/११ पर वे दिन रह-रहकर याद माते हैं और याद को हम से कोई नहीं छीन सकता याद-प्यारी याद! फविता उसने एक साहित्य-गोष्ठी में सुनाई। वहीं उसकी गुरमेल से मेंट हुई । गोष्ठी में जो कवि और लेखक उपस्थित थे, उनमें से कुछ आधु- निक, कुछ प्रगतिशील और कुछ अपने को आधुनिक और प्रगतिशील दोनों मानते थे। दरअसल माधुनिकता और प्रगतिशीलता के बीच की विभाजन- रेखा बहुत ही क्षीण थी । माज के आधुनिक को कल प्रगतिशील और आज के प्रगतिशील को कल आधुनिक वन जाने में कोई कठिनाई नहीं थी। दर- असल अपने को आधुनिक और प्रगतिशील कहलाने वाला हमेशा लाभ में रहता था और ऐसे ही साहित्यसेवियों की संख्या अधिक थी। गुर- मेल 'भाभा' नाम की एक पत्रिका निकालता था और उसमें तीनों प्रकार के कवियों और लेखकों की रचनाएं प्रकाशित होती थीं । एक सम्पा. दक, कवि और आलोचक के नाते गुरमेल को उन सबमें एक विशेष महत्व प्राप्त था और इस गोष्ठी का संयोजक भी वही था। मीना को देख सबके चहरे खिल उठे और गुरमेल समेत सभी ने उसकी कविता की मुक्त कंठ से प्रशंसा की। "क्या मुझे आपको यह सुंदर कविता अपनी पत्रिका में छापने का श्रेय प्राप्त हो सकता है ?" गोष्ठी के बाद काफी पीते हुए गुरमेल ने मोना से कहा। "नेकी और पूछ पूछ !" मीना ने चहचहाते हुए उत्तर दिया,"आपको पत्रिका में अपना मेरे लिए गौरव की बात है।" 'भाभा' के अगले अंक में मीना की सिर्फ यही एक कविता नहीं, एक साथ पांच कविताएं प्रकाशित हुई। आगामी चार अंकों में भी यह सिल- सिला जारी रहा। छठे अंक के मुख पृष्ठ पर मीना का चित्र और भीतर 'आधुनिक कविता की मौलिक प्रतिभा' शीर्षक लेख छपा। हिन्दी के प्राध्यापक डा० हर्षनाथ सिसोदिया ने अपने इस लेख में मीना को मौलिक विचार, मौलिक विम्ब और मौलिकी शैली की उदयमान कवयित्री सिद्ध करने के लिए आधुनिक आलोचना की सारी शब्दावली उंडेल दी थी। १२ / पंखहीन तितली गुरमेल और मीना में गोष्ठियो से अलग भी बक्सर मेंट-वार्ता रहती पी। धीरे-धीर घनिष्टता इतनी बड़ी कि वह मै तू और तू में बन जाने के अंतिम बिंदु तक पहुंच गई। एक बार गुरमेल और मोना गाद्वारा साहब देसने अमृतसर गए और वही उन्होंने स्वेच्छा से शादी कर ली। गोरा रंग, बड़ी-बड़ी आग, घोडा माषा-गुरमेल अनीस मे रिमो तरह कम सुदर नहीं था। उमका जन्म पजाय के एक मम्पन्न मिल परिवार में हुआ था, पर युवावस्था में पग रपते ही उसने देश मुंडया दिए थे और धर्म के तमाम चिह्न त्यागकर घरवालों में सम्बन्ध विच्छेद कर लिया था। अब वह आधुनिकता, प्रगतिशीलता और धर्मनिरपेक्षता फा विद्रोही जीवन बिता रहा था । शाह स आदमी था। पत्रिका की आप और मीना के वेतन से भी काम नहीं चलता था और हाथ हमेशा सग रहता था। पता चला कि भारत सरकार से रूस ने विभिन्न भाषामो के अनुवादक मांगे हैं, जिन्हें चार साल के अनुबंध से मास्को जाना होगा। गुरमेत अग्रेजी से हिन्दी और पजावी दोनो भाषाओ मे आसानी से अंनु- पाद कर लेता था। अच्छा वेतन, विदेश घूमने और आगे बढ़ने का सुअय. गर। यह जोड-तोड करके अनुवादक के नाते हम पहुच जाने में सफल हुआ। मीना फिर वकिंग गल्रां होस्टल मे रहने सगी । अब वह माशी और रीता के सम्पर्क में आई। उसने श्रीमती हेलिन, बी० इडेलिन, और मारपस्त मागिन द्वारा लिखी 'आकर्षक नारी' और 'सम्पूर्ण नारी' पुस्तकें पड़ी, जिनमे पुरुषों को लुभाने और वा में करने के ढंग सताए गए थे । दोनो महिलाओं ने अमेरिका में इसी नाम के आन्दोलन भी चला रये पे और ये पुस्तकें उन्होंने इन आदोलनों में प्राप्त अपने-अपने अनुभवों के आधार पर लिखी थी, जो लाखों की तादाद में निको पी। इन पुस्तकों ने मोना को यहाँ तक प्रभावित किया कि यह उन्मुक्त यौन व्यापार को समयंका और माशी के पुप की सदस्य यन गई। मीना के जन्मजात सस्कार इसमें किसी प्रकार की बाधा नहीं थे, दूसरा कारण गुरमेल के बारे में मिली यह सूचना रही होगी कि उसने वहा किसी रूसी महिला से ब्याह कर लिया है। जो व्यक्ति मोना के प्रति निष्ठावान नहीं रहा, मोना भी क्यो उमके प्रति निष्ठावान रहती पंसहीन तितली/६३ । ?
- गुरमल जब स्वदेश लौटा तो मित्रों ने सबसे पहला सवाल यही पूछा कि क्या उसने वहां सचमुच व्याह कर लिया था? "हो, कर लिया था। पर वह व्याह सिर्फ वहीं के लिए था न कि यहां के लिए।" गुरमेल ने निस्सकोच उत्तर दिया। मीना ने जिस तरह पहले अनीस को भुला दिया था, गुरमेल को भी भुला दिया। लेकिन अब वे दोनों उमके दावेदार बन गए, दोनों उसे पाने के लिए मातुर हो उठे और दोनों ने नरेंद्र के खिलाफ मुकदमा दायर कर दिया। मीना खुश थी कि तीन-तीन पुरुप उसके लिए आपस में लड़ रहे हैं। तीनों उसे अपनी प्रेमिका, अपनी पत्नी समझते हैं, जवकि वह न किसीकी पत्नी और न किसीकी प्रेमिका है। जब मुकदमा दायर हुआ, उसने आईने के सामने खड़े होकर सगर्व कहा : "मैं हर बंधन, हर संबंध से मुक्त सम्पूर्ण नारी हूं। मुझे पुरुषों को लुभाने और उन्हें वश में रखने की कला आती है।" - ६४ / पंखहीन तितली १५ लोग अदालती से न्याय की अपेक्षा करते हैं, पर होता यह है कि यहां जनता पर से जितनो कर उतर सके, उतारी जाती है। ब्रिटिश सरकार का यापार हो थाने और कचहरी का भय था। यही शासन प्रणाली अब भी चल रही है। हमारे इस देश में न्याय जितना महंगा है, दुनिया के शायर बोर किसी देश में महो। प्यादे को सुम किए बिना सम्मन की तामीन मुमकिन नही । वह घर बैठे-बैठे लिख देगा, अभियुक्त मौके पर मौजूद नहीं था। पेशकार इस मदिर का ऐसा देवता है, जिसकी पूजा हो जाए तो यह जितनी लम्बी पेशी पाहे, हाल देगा। कोई पूछने वाला नहीं कि महा. मय, तुमने ऐसा क्यों किया? परिणाम यह कि मामूली से माभूसी मुकदमा बरसो पिसटता रहता है। जो व्यक्ति हत्या जैसे गम्भीर अपराध में गिर- फ्तार हो जाता है, बिना अपराध किए ही बरसो जेल में राहता रहता है। १०६ सीमार०पी० सी० को ऐसी दफा है, जिसके अंतर्गत किसी भी भले आदमी को गिरफ्तार किया जा सकता है। उसे अपराधी सिद्ध करने को जिम्मेदारी पुलिस पर नहीं, बल्कि सुद उसे अपने को निरपराप सिद्ध करना होता है, वर्ना पड़े रहो जेल में । अगर परदेसी है तो येचारा जमा- नत तक नहीं जुटा सकता। भौना का मुकदमा हो निराला था। इसमें गुरमेल, अनीस और गरेंद्र -तीनो को अपने अपने गवाह और अपने-अपने सबूत पेश करने थे। उन्हें गवाह और सबूत जुटाने के लिए कितना समय पाहिए। इसके बताया गवाहों को अदालत में लाना और भी टेको खोर पो। इसलिए मुगदर्म के सम्बे सिंच जाने की सम्भावनाए और भी अधिक थी। निराला होने के - कारण मुकदमे में लोगों की दिलचस्पी भी अधिक थी। अदालत का कमरा हर मर्तबा दर्शकों से खचाखच भर जाता था और पत्रों के संवाददाताओं की भीड़ लग जाती थी। मीना के कई प्रकार के चित्र प्रकाशित जिनके नीचे तीन-तीन शादियां एकसाथ करनेवाली सुंदरी युवती' लिखा रहता था और इन शादियों की कहानी इतनी रोचक बनाकर छापी गई थी कि जासूसी उपन्यासों को मात कर दिया था । मनचले नौजवान इस विचित्र युवती की एक झलक पा जाने के लिए टूट पड़ते थे और फिर आपस में वातें करते थे: "यार, चीज वाकई लाजवाव है।' "क्या तुम्हारा भी मन आ गया उसपर?" "मेरी बात छोड़ो, तुम अपने मन की बात कहो।" ये लोग दिलफेंक श्रेणी के थे, जिनकी सामाजिक चेतना शून्य के वरा- पर थी और भीड़ में इन्हींकी संख्या अधिक रहती थी। पर संख्या चाहे फम राही, दर्शकों में ऐसे लोग भी मौजूद थे, जो इस पूरी घटना को समाज और राष्ट्र के संदर्भ में देखते थे। इस श्रेणी के लोगों को तत्वदर्शी भी कहा जा सकता है । उनकी बातचीत का स्वर और स्तर पहली श्रेणी के लोगों से बहुत "मेरी राय में इस युवती को पद्मश्री या पद्मभूषण की उपाधि मिलनी चाहिए।" "क्यों भई, वह किस खुगी में ?" "वाह, जिस धर्मनिरपेक्षता की इतनी गुहार मचाई जा रही है, युवती उसका विशुद्ध रूप है।" "मौर सामासिक संस्कृति का चलता-फिरता उदाहरण है।" "अगर उसका एक पारसी और ईसाई पति भी होता तो यह उदा- हरण एकदम पूर्ण दिवाई पड़ता और युवती पांच पांडवों की पत्नी कहलाने का श्रेय प्राप्त करती। मुमकिन है, आधुनिक द्रोपदी नाम मे उसपर फिल्म भी बन जाती।" "कौन जाने पारसी और ईसाई पति भी हों और उन्होंने अदालत में माना जरूरी न समझा हो !" भिन्न था: ६६/पंखहीन तितली . "यह भी आपने ठीक होमहा है। शायद उनके पास गवाह और सबूत नहीं होंगे।" "आप क्या बात करते हैं ? बिना गवाह और सबूत के दो ही क्यों, भनेक होंगे।" इसपर जोरदार ठहाका पड़ता। "क्या कहा, क्या कहा ? जरा एक बार फिर यताना ?" कितनों ही यो कान खड़े हो जाते। मीना के पिता की मृत्यु हो चुकी थी। उसके भाई सत्यनारायण और राजनारायण ने इस मुकदमे की ओर ध्यान ही नहीं दिया, ध्यान देने की जरूरत ही नहीं समझी। मीना के मर जाने की जोरावर अखबार में निकल चुकी थी, उनके लिए यह अब भी सही थी। गलत समझ लेने में उनका कोई लाभ नहीं था। मीना जो उनकी बहन थी, वह दरअसल इम पयर के छपने से पहले ही मर चुकी थी, तीन पत्तियों वाली इस मोना से, जिसका मुकदमा अदालत में चल रहा था, जिसमें दर्शको और असवारो की इतनी रुचि थी, उनका कोई सम्बन्ध नहीं था। भाई जिरो बदनामी समकार चुप थे, मीना के लिए वह उसकी नई भूमिका का घरम-विदुपा। अम- थारों में उसके चित्र और उसका नाम जितना करता था, वह उतनी ही प्रसन्न होती थी। एक बार 'धर्मयुग' और 'इलस्ट्रेटिड वीकली' के अंतिम पृष्ट पर उसने कालेज को अपनी एक सपो अनन्ता का चित्र देसा था। दर- असल यह साड़ियों का इस्तहार था, जिसमें अनन्ता रविया की साड़ी पहने माहल बनी खड़ी थी। उस समय मीना के मन में सपी के प्रति ससपी उत्पन्न हुई थी। पर अब अगर संयोग से अनन्ता उसे कही मिल जाए तो वह उसमे सगर्व कहे, 'विज्ञापन में माडल बनकर पाना भी कोई बहा- दुरी है । देख, पब्लिसिटी लेना इमे कहते हैं।' साँप के मुंह में छछूदर, खाए तो कोटी और छोडे तो कलंकी। दुगो अगर कोई था तो वह नरेंद्र और उससे भी कहीं अधिक दुखी उमफे यूरे माता-पिता । नरेंद्र को पहलगाम में ही विश्वास हो गया पाकिमय अर्थात् युवती ने स्मृति खो जाने का अभिनय किया था वनां उसे अपने जीवन के बारे में राई-रत्ती भली भाति याद था। कुछ भी भूना नहीं पा न यार पंखहीन तितली/१० होती तो वह गुलदस्ते के पानी में चीनी कसे घोल देती ? फिर भी वह रहस्य को रहस्य बनाए रखना और पति-पत्नी के पावन सम्बन्ध को अंत तक निवाहना चाहता था ताकि माता-पिता मानसिक कष्ट से बचे रहे, उनका बुढ़ापा सराव न हो, ताकि उसके परिवार की जगहंसाई और रसवाई न हो। लेकिन जिस रहस्य को नरेंद्र ने छिपाया, मधु की सखी रीता ने उसे रहस्य नहीं रहने दिया, कश्मीर से लौटते ही उद्घाटित कर दिया । जब अदालत रो सम्मन पाए तो नरेंद्र के परों तले धरती घूम गई और वह सिर पकड़कर बैठ गया। "नरेंद्र, क्या हुआ?" डा० त्यागराज ने चिंता व्यक्त की। "पिताजी, क्या बताऊं ? रावनाश !" उसने हताश स्वर में उत्तर दिया। "सर्वनाश कसा ! कुछ बताओ तो सही, बात क्या है ?" उन दोनों को घबराए हुए देख कर सुभद्रा ड्राइंगरूम में माई और बेटे को सिर पकड़े बैठे देखकर वह भी घबरा गई। "यह मधु नाम की युवती यहां आने से पहले दो विवाह कर चुकी थी।" नरेंद्र ने उत्तर दिया। "दो विवाह !" सुभद्रा और त्यागराज दोनों के मुंह से एकसाथ निकला। "हां, इसने हमें धोखा दिया है। स्मृति खो जाना एक बहानामात्र था।" दोनों अवाक रह गए। उन्हें लगा कि उनकी उम्र भर की कमाई धूल में मिल गई है । ऐसी वह से तो नरेंद्र का आजीवन अविवाहित रहना कहीं अच्छा था। दुनिया सुनेगी तो क्या कहेगी ? गुछ देर सन्नाटा रहा। "मेरी अकन पर पत्थर पढ़ गए थे, जो मैं इस गुसीवत को उठाकर घर में लाया। वहीं सड़क पर पड़ी रहने देता।" डा० त्यागराज ने अपने को धिगकारा । उनकी आंखें चढ़ गई और घुटने तेजो से हिलने लगे। "पुराने लोग सम्बन्ध जोड़ने से पहले कुल, गोल और अतीत की जांच ६८/पंखहीन तितली थों हो तो नहीं करते थे। हमने न कुछ देवा, न समझा, अंधेरे में असम लगा दी।" मुभद्रा हाथ मलते हुए बोली। नरें चुप था और वह दांतों से बायें हाथ की अंगुली का नारान काट 1 "क्यों बेटी ' तुमने यह किम जन्म का बदला हमसे लिया ?" गुनद्रा ने युवती अर्थात मधु से उसके कमरे में जाकर पूछा। वह पलग पर मोधो लेंटो छत की ओर देख रही थी। सुभद्रा को देगते ही यह घट उठकर बैठ गई। "मा जी, यह मय झूठ है। वे लोग छटे हुए बदमाश हैं और मैं उन्हें जानती तक नहीं। शायद ब्लकमेलिंग करके वे आप लोगों से रूपया हथियाना चाहते हैं।" युवती ने विनयपूर्वक सिर मुकाकर सफाई पेश यो। "तुमने विवाह नहीं किया ?" सुभद्रा ने पूछा "नहीं किया, नही किया । मैं असतत में सबके सामने उनके भूट का भंडाफोड़ करूगी और उन्हें सजा दिलवाऊगी। उन्होंने समझा रा है ?" नरेंद्र भी सुभद्रा के पीछे-पीछे चला आया था और दरवाजे म सड़ा युवती का नाटक देष-सुन रहा था। "विवाह किया या नहीं किया, इस बात पर मिट्टी डालो।" नरेंद्र एक कदम आगे बढ़कर युवती से सम्बोधित हुआ, “पर क्या हम विश्वास कर में कि तुम अदालत में ठीक यही वयान दोगी?" युवती ने उन्हें आश्वासन दिया कि यह बयान विल्कुल सही है और इससे अलग कोई दूसरा बयान हो ही नहीं सकता। फौजदारी के मुकदमों में हाजिरजवाबी वकील का सबसे बड़ा गुण है। प्रेमनाथ चग को यह गुण अपने पिता दीनानाथ चुग से विरामत में मिला था। उसके बारे में प्रसिद्ध था कि फौजदारी में उसकी टवार का कोई दूसरा कोल नहीं है । वह अपनी तकंगक्ति से स्त्री को पुरप पौर पुष्प को स्त्री सिद कर देने में सक्षम है। विरोधी पक्ष के पकीन, मजिस्ट्रेट और जन उसका मुंह ताकते रह जाते हैं, सबके मुह में पुरापनिया पा पंसहीन तितली /RE
जाती है।
गरने पिता से मशपरा गारगे. चुग गो अपना पफील बनागाभार
दरा भाशा में कि गुपती गामापरण पाहे कुछ भी रहा हो, अगर ये मुका-
दमा जीत लेते है, तो सांसारिकन्टि से मान-प्रतिष्ठा पर तो आप नहीं
जाएगी, उसमी ऊपी से अंपी फीस अदा कर दी।
१००/ पंपहीन तितली
१६ हातहास निरंतर गतिमील है। इस गति में समय-समय पर नई स्थिति रूपायित होती रहती है। जो व्यक्ति अथवा राष्ट्र समझ न पाने अपा. :: किसी प्रलोभन के कारण अपने को इस नई परिस्थिति के अनुरूप नहीं बना पाता, वह जाने-अनजाने ऐमी भूलें करता है, जिनके परिणाम बई ही भयंकर होते हैं । अपनी भूत का बोध हो जाने पर एक ईमानदार पस्ति में लिए 'अब पछताए क्या होत, जय चिहिया धुग गई ऐत' की कहावत के अनुसार अपना सिर धुन लेने के अलावा और कुछ धारा नहीं रह जाता क्योंकि तब तक बहुत-मा पानी पुल के नीचे से गुजर चुका होता है। डा. मदन की भी ठीक यही हालत पी और वह उस समय को पता रहा पा जब उसने नरेंद्र को युवती से विवाह कर लेने के लिए प्रोत्साहित किया था। इस रहस्य-उद्घाटन से कि युवती ने स्मृति सो जाने का नाटक रचा पा, उसे बहा आघात पहुंचा। वह मुभद्रा और रयागराज से भी अधिक दुपी या । आतरिक क्षोभ ने उमे दिशिप्त-सा बना दिया था। रिमो मरीज को गलत दवा न दे दी जाए, इस भय से वह दो-तीन दिन अपने क्लिनिक भी नहीं गया । हवास बदुर ठिकाने पाए तब भी वह स्लिनिक जाने के राय पहले डाक्टर परिवार में गया और जाते ही चौता: "नरेंद्र भैया | आप लोगों पर जो मार टूटी है, उसके लिए दोघी में हूं। तुमने युवती को उसकी वेशभूपा से ठीक पहचान निमा या और तुमने मां मेडिस पाकर बेहोग होने की बात भी ठीर ही सोची थो; परम नहीं चेता, मैंने ही तुम्हारे पर नहीं लगने दिए। नई पौड़ी के प्रति मेरे - उदार भाव ने मेरी दृष्टि को धुंधला दिया था। मैंने यह नहीं समझा था कि यह अत्याधुनिकतावाद मधु को भी विप बना देता है।" "बेटा! तुम क्यों व्यर्थ में दुखी होते हो?" सुभद्रा ने उसे सांत्वना दी, "जो होनी है, वह होकर रहती है। मेरी तरफ देखो, सारी उम्र लड़. कियों को पढ़ाया, वाल सफेद हो गए, पर मैं उसे इतने दिन पास रखकर भी न समझ पाई। नरेंद्र का विवाह हो जाए, इसके अतिरिक्त मैंने कुछ नहीं सोचा।" "लेकिन मैं तो सब कुछ जानते-बूझते हुए मूर्ख बन गया। नरेंद्र के चेताने पर भी नहीं चेता । मेरी इस भूल से आप लोगों का कितना बड़ा अनिष्ट हो गया ।" "डाक्टर ! यह भावुकता छोड़ो।" त्यागराज का दृढ़ स्वर सुनाई पड़ा, "नरेंद्र के विवाह से हम भी प्रसन्न थे और तुम भी प्रसन्न थे। दोपो हैं तो हम सब हैं वर्ना कोई नहीं । तुम बहकी-बहकी बातें छोड़ो और अपने काम की मोर ध्यान दो। जो सिर पर आ पड़ी है, उसे सब मिल-जुलकर भुगतेंगे। तुम क्यों दिल थोड़ा करते हो?" जैसे कोई नींद से जागे और 'आग लग गई' सुनकर पहले कुछ घव- राए और फिर उसे मुस्तैदी से बुझाने में जुट जाए, वैसे ही डा० त्यागराज एक झटका खाने के बाद संभल गए थे। अव न उनके घुटने हिलते थे और न स्वर में कम्पन था । वह सोफे पर सीधे बैठे थे और मुखमुद्रा शांत और गम्भीर थी। उनके धैर्य को देखकर सुभद्रा और नरेंद्र को भी ढाढ़स बंधा था और उन्होंने सिर पर आ पड़ी को भुगत लेने के लिए कमर कस ली । । थी। भद्रसेन ने त्यागराज की यह सौम्य मुखमुद्रा देखी तो उसके मस्तिष्क में एक के बाद एक इतिहास के कई पन्ने पलट गए। त्यागराज के पिता शिवनाथ और उसके अपने दादा गयाप्रसाद नभिन्न मिन और उन्नीसवीं सदी के अंतिम दशक और बीसवीं सदी के दो प्रारंभिक दशक की राजनीति में सक्रिय भाग लेने वाले राष्ट्रवादी थे। उन्होंने गीता से प्रेरणा लेकर कर्मयोगी बनने का संकल्प धारण किया था। वे जनसाधारण में राष्ट्रीय चेतना उत्पन्न करने और उसे ऊंचा उठाने के १०२/पंखहीन तितली लिए 'नारा' नाम का पतेवार असवार निकालते और पैम्फलेट छापते धे। ये बाल गंगाधर तिलक मे इम मत मे सहमत थे कि मुधारों को मांग समाज के भीतर गे होनी चाहिए। वे तिलक ही की तरह अपने को अंग्रेज के सामने साहब बनाकर पेश करने वाले पश्चिमीकरण के इन्दुर गुपारयों के कहे विरोधी थे। तर्क यह था कि विदेशी सरकार की मदद से योपे गए गुधारों में कोई लाभ होने के यजाप जनसाधारण में होनता भाव उत्पन्न होता है और इम मिथ्या प्रचार को बल मिलता है कि ब्रिटिश शासन हमारे लिए देवी वरदान है। शिवनाथ और गयाप्रसाद मे दात घाटी रोटी थी। इन दोनो परि- यारों में तभी मे घनिष्ठ सम्बन्ध चले आ रहे थे। त्यागराज सिवनाया इकलौता बेटा था। उमने अर्गशास्त्र मे साक्टर की डिग्री ली और यह शिक्षा क्षेत्र में चला गया। शिवनाथ और गयाप्रसाद ने पम्फलेट छापने कानी मिलमिला शुरू किया था, उसने उनके जीवन ही में 'राष्ट्रीय प्रकाभने पट का रूप ले लिया था । भद्रमेन के पिता गणपतराय ने यह प्रकाशन मेह संभाला और यह राष्ट्रोपयोगी साहित्य छापता रहा। १९२१ के सत्याग्रह मे वह जेल गया और उसके द्वारा प्रकाशित दो पुस्तकें ब्रिटिश पासन एक पड्यंत्र' और जलियांवाला धाग के हत्याकार पर आधारित एक नाटक 'जंजीरें टूर्टी' विदेशी सरकार ने जन्त कर ली। पिता के बाद राष्ट्रीय प्रकाशन गृह' को भद्रसेन के बडे भाई इंटमेन ने संभाला। वह जेल ही में आतंकवादी से मावसंवादी बन गया था। उसने प्रगतिशील और मावसंवादी साहित्य प्रकाशित किया और उसका स्प भी जनसाधारण की चेतना के स्तर को ऊंचा उठाना और स्वाधीनता मंच को सही दिशा देना था। पिछले दिनों जब उसका देहान्त हुआ तो जमुना किनारे विद्युत् दावदाह गृह में उसके दाह-संस्कार के अवसर पर सगे-मयं. घियों के अलावा पुराने क्रान्तिकारी और कांग्रेसी नेता श्रद्धांजलि अर्पित करने आए थे। डाक्टरी शिक्षा के अलावा भद्रसेन को दादा और पिता से पटीम और माई में थामवादी परम्परा विरासत में मिली थी। दोनों तरह के माहित्य का यथाशक्ति अध्ययन और मनन करने के बाद वह इस निष्कर्ष पर पहुंगा पंसहीन तितली/१०३ ? M था कि ज्ञान पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ता है। नई पीढ़ी के प्रति उसका भाव इसी कारण उदार था। युवती की इस घटना ने उसे बुरी तरह झंझोड़ दिया था। जब उसका सम्बन्ध चितन की एक स्वस्थ परम्परा से था, उसने नरेंद्र को ग़लत मशवरा क्यों दिया? क्यों अपने एक प्रिय परिवार को मुसीवत में धकेला? राष्ट्र की चेतना को ऊंचा उठाने और सही दिशा देने का जो प्रयास लगभग एक सदी पहले शुरू हुआ था, उसका क्या बना? सुधार और क्रान्ति के सपने घरे क्यों रह गए ? दिन-दिन बढ़ रहे अपराधों के लिए अपने को शिक्षित- कहलाने वाले सबसे ज्यादा दोषी हैं । खुद उसने एक समाज-विरोधी और परम्परा-विरोधी प्रवृत्ति को प्रोत्साहन देने का घृणित अपराध किया है। आखिर यह सब हुआ क्यों? वह, नरेंद्र, सुभद्रा और त्यागराज-सबके 'सब इस जाल में मछलियों की तरह सहज में क्यों फंस गए भद्रसेन के मन को यह दूसरा आघात लगा था, जिसने उसके विश्वास को जड़ से हिला दिया था। पहला बड़ा आघात तव लगा था जब वामपक्षी आंदोलन टुकड़ों में खंडित हुआ था। तव उसके अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए सोमनाथ पूछा था, 'इसका कारण यह तो नहीं कि देश ठहराव और गतिरोध की स्थिति में पहुंच गया है ? 'डाक्टर, तुम बेकार सोचते हो।' सहगल ने उत्तर दिया था। 'मैं सोचता तो हूं।' एक विक्षोभ और विद्रूप-भरी मुस्कराहट भद्रसेन के होंठों पर तिर आई थी और उसने सहगल की ओर देखते हुए कहा था, "मुझे यह भी दुख है कि तुम 'तुम जो बुद्धिजीवी हो 'सोचते नहीं।' अब भी जाने क्यों मुक्केवाज मुहम्मद अली और प्रोफेसर सोमनाथ सहगल की आकृति एकसाथ मस्तिष्क में उभर आई "जो सिर पर आ पड़ी है, उसे सब मिल-जुलकर भुगतेंगे।' आकृति धुंधला गई। भद्रसेन ने गर्दन उठाकर त्यागराज की गोर देखा । उसे वह सदियों संचित धयं और संकट से जूझने वाले रढ़संकल्प के प्रतीक जान पड़े। वह स्वस्थ मन उठा और जाकर क्लिनिक खोला । हमेशा की तरह मरीजों को देखा और दवा दी। सहगल से १०४/पंसहीन तितली नरेंद्र का मुकदमा उसके लिए मुकदमा नही, एक गम्भीर समस्या पी, जिसे वह मन-मस्तिष्क की सारी शक्ति लगाकर सुलभाना पाहता था। यह हर पेशी पर अदालत में जाता था और सारी कारंवाई पाम से गुनता पा। ज्यों-ज्यों मुकदमा लम्बा खिंचा, मधु अर्यात मीना फे, अनीस, गुरमेल के बयान सुने और जिरह सुनी, 'आधुनिकता' और 'प्रगतिशीलता' के विभिन्न पहल उजागर होते चले गए । न सिर्फ यह कि नरेंद्र को दोप सलाह मे अपनी भूल को उसने सैद्धातिक रूप से समभा, रल्कि हमारेषाम- वाद और राष्ट्रीय जीवन की जिन असंगतियो को यह पहले मापात में नहीं समझ पाया था, वह अव स्पष्ट हो गई। "तुमने एक परीफ परिवार को धोसा क्यों दिया ?" मंजिस्ट्रेटने मधु से पूछा। "मैंने धोखा नहीं दिया, मेरी स्मृति सो गई पो।" उसने उतार दिया। "स्मृति कब लौटी ?" "पहलगाम में जब रोता से भेंट हुई और उसने मुझे मेरे गाम से पुकारा।" अब अगर सिद्ध हो जाए कि उसने स्मृति सो जागे का बहाना किया या तो उसे धोखादेही के अपराध में जेल भेजा जा सकता था। अनीस और गुरमेल ने उसके नरेंद्र के पर रहने पर आपति कीरा लिए उमे नारीनिकेतन में भेज दिया गया। वह गुशी से गली गई, it उसके लिए यह भी एक प्रयोग 1-एक नई भूमिका हो। युवती ने मनीरा और गुरमेल के साथ अपना विषाह नहीं पीनारा, सिर्फ इतना कहा कि उनके साप उसका प्रेम सम्बन्ध पाउन योगों को यह सिद्ध करना था कि न्याह वाकई हुआ था। जब वे लौट रहे थे तो अदालत में पड़े हुए समासादगी infeी ने सस्वर यह दोहा पढ़ा: 'रहिमन धागा प्रेम का, मत तोह पटाप । टूटे से फिर न मिग, मि गाट पर वाय।' भगेन इन सब बातों को राष्ट्रीय अंगना के मर्म में देवता मा मोर तमाशाइयों को प्रतिक्रिया और फमियों में भी स्थिति का गुमाग गाता पंपहीन तितली/१.५ पा। उसने अनीस और गुरमेल से दो-तीन मतवा व्यक्तिगत रूप से भेंट की ताकि उनके विचार जाने और मुष दमे के प्रति उनके रुख को समझे। नरेंद्र और सहगल से बातचीत का यही एक विषय रह गया था। भद्रसेन के मस्तिष्क में जो प्रश्न उटते थे, वह उनपर विचार-विमर्श किया करता था। मैं तुममें एक बड़ा परिवर्तन देख रहा हूं।" एक दिन सहगल घोला। "शुक्र है तुमने कुछ देखा तो सही।" भद्रसेन ने मुस्कराते हुए उसकी ओर देखा, "वताओ तो सही, वह परिवर्तन क्या है ?" "दौड़-धूप तुम बहुत करते हो । लेकिन पहले की तरह परेशान बिल्कुल नहीं होते।" "मैं इस घटना की जव राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय बड़ी-बड़ी घटनाओं से तुलना करता हूं तो मुझे यह बहुत छोटी और तुच्छ दिखाई पड़ती है। मेरे परेपान न होने का एक कारण यह है।" भद्रसेन ने दार्शनिक ढंग से उत्तर दिया। "यह बोध शायद अभी हुआ है ?" सहगल ने प्रश्न भद्रसेन से किया :. पर देखा नरेंद्र की ओर । वह आंखों ही आंखों से मुस्करा रहा था। "बोध काफी दिनों पहले हो गया था। लेकिन हुआ इसी मुकदमे के दौरान।" भदसेन ने पूर्ववत् उत्तर दिया । "कहावत भी है कि आदमी ठोकर खाकर सीखता है । खैर, अव दूसरा कारण बतागो ?" "दूसरा कारण !" भद्रसेन ने कुर्सी जरा मागे सरका ली और एक क्षण चुप रहने के बाद र स्वर में कहा, "जब तक देश में वर्तमान स्थिति बनी रहेगी, ऐसी घटनाएं अनिवार्य रूप से घटती रहेंगी। शरीर में विकार हो तो फोड़े-फुसियां अवश्य निकलेंगे।" "डाक्टर, फोड़े-फुसियां न हों तो आपके पास मरीज कहां से आएंगे?" सहगल हंसा, लेकिन नरेंद्र ने उसका साथ नहीं दिया। "मेरी बात का मसोल मत उड़ामो। उसे समभो।" भद्रसेन ने अंगुली १०६ / पंखहीन तितली - हिलाते हुए चेतावनी दी, "मैं यह भी बता दूं कि देश को इम वर्तमान स्थिति के लिए हमारा दामबाद जिम्मेदार है। इसमे तुम भी शामिल हो और मैं भी शामिल हूं।" "हेयर, हेयर, डाक्टर आज आत्मालोचना के मूड में हैं।" सहगल ने हल्के से ताली बजाई। "वात तो वह ठीक ही कह रहे हैं।" नरेंद्र धीरे से धोला। "लो, तुम्हें नई पीढी का समर्थन भी प्राप्त हो गया।" "वह तो होगा। नई पीढी सत्य को जन्दी पकड़ती है।" मदीन ने कमर पुश्त मे लगाकर कुर्सी का अगला भाग ऊपर उठाया। "डाक्टर, मेरी सलाह मानो । अपने इन विचारों को प्रमाणित कर दो। मैं मजाक नहीं कर रहा, एकदम मौलिक है।" "मैं मौलिकता का श्रेय भी लेना नहीं चाहता। मेरा पयाल है कि पूरे देश मे पुनचितन हो रहा है । राष्ट्र ने बहुत-मी टोकरें गाई है।" थै सहगल के मकान पर बैठे थे। उसको पाच-छः गाल की नन्ही बच्ची, जिसका नाम पप्पी था, दोडती हुई पाई और हाथ फैलाकर बोलो, "पापा, पैसे दो, मैं गुम्बारा लूगी।" "पप्पी, रहने दो। दो मिनट मे फट जाता है।" "ॐ हूं. मे दो।" सहगल ने दम का सिक्का बच्ची को पमा दिया। यह दौडती-मुस्क- राती चली गई। "अच्छा, डाक्टर । मुकदमा तो लम्बा चलेगा। अदालत में बाहर भी इसका कोई हल मम्भव है?" "अदालत में बाहर 1" भद्रमैन सोच में पड़ गया। सिर फुर्सी की पुरा पर रणे-रखे कुछ क्षण सोचता रहा और फिर एषदम कमर मीधी पाये बोला, "सम्भव है।" "वह बताओ। देश की समस्या तो जब हम होगी तर होगी। हम अपनी इस समस्या को तो हल कर लें।" "आज छ: तारीस है ?" "हा, छः।" पंगहीन तितली ; १७
"और मुकदमे को पेशी कव है ?"
"पंद्रह को।" उत्तर नरेंद्र ने दिया।
"इस पेशी पर फैसला हो जाएगा। इस बीच में अनीस और गुरमेल
को यहां या मेरे मकान पर बुला लीजिए। मैं अपना सुझाव उनके सामने
रखूगा और मुझे विश्वास है कि वे सहमत हो जाएंगे।"
"सुझाव क्या है, यह तो बताओ?" सहगल और नरेंद्र ने एकसाथ
पूछा।
"पहले ही चर्चा कर देने से बात का महत्त्व और प्रभाव कम हो जाता
है। में उसी समय सबके सामने बताऊंगा।" भद्रसेन ने उत्तर दिया।
तय पाया कि वे दस तारीख को सहगल के मकान पर फिर मिलेंगे।
गुरमेल और अनीस को भी बुला लिया जाएगा।
कुछ दिन पहले पानसिंह को फिर विद्रोह का दौरा पड़ा था और वह
सब कुछ छोड़-छाड़कर भाग खड़ा हुआ था।
"पान सिंह लोटा या नहीं ?" भद्रसेन ने चलते-चलते नरेंद्र से
"खयाल है कि अब वह नहीं आएगा। इस बार वह अपने घर पहुंच
गया है।" नरेंद्र ने बताया।
"उसे कांगड़े की धरती बहुत दिनों से बुला रही थी।" भद्रसेन ने
अर्थपूर्ण ढंग से नरेंद्र की ओर देखा।
पूछन।
१०८/पंखहीन तितली
१७
पावों भादगी राहगारे (tracter
भद्रसेन का सुझाव जान सी in enetwITNIA Ms, entet
सबसे पहले पही योसा:
"डायटर, भय मामी, मागमmtr"
भतरोन में एक भनीगmination
किये भी गुमाय जो fampinmum
गुरू की:
"भकदम को aminimumtam
और सा गया है।नियम in ament
माप सीना यतिमvinin-nama
म पनि whapthanentatuthe
भरमण यातीय,
"REAartitunirmanitiewmti
मीना महिमा MiAwrthine
-- "बशर्ते कि यह सुझाव मीना को भी मंजूर हो।" गुरमेल ने कहा । "मीना से पूछ लिया जाएगा।" भद्रसेन ने उत्तर दिया और फिर आगे कहा, "रही अदालत, उसका मेरे इस सुझाव से कोई संबंध नहीं और न हमें उसे बताने की जरूरत है।" पंद्रह तारीख की पेशी पर अनीस, गुरमेल और नरेंद्र-तीनों के हस्ता- क्षर से मुकदमा वापस लेने के कागजात अदालत में विधिवत् दाखिल कर दिए गए। उसके बाद नरेंद्र और मीना, उनका वकील प्रेमनाथ चुग, अनीस और गुरमेल और दोनों के वकील चुग के कमरे में इकट्ठे हुए। भद्रसेन और सहगल भी मौजूद थे। मीना ने लाटरी का सुझाव स्वीकार कर लिया था और अब वह देखना चाहती थी कि जिन दो के नाम की लाटरी नहीं निकलेगी, उनपर क्या बीतेगी, उनकी प्रतिक्रिया क्या होगी। वह यह सोचकर प्रसन्न थी और प्रसन्न इसलिए भी थी कि नारी निकेतन के जीवन से छुटकारा मिलेगा । वह इस प्रयोग से ऊब गई थी। तय पाया कि अनीस, गुरमेल और नरेंद्र कागज पर अपना-अपना नाम लिखें। उन तीनों कागजों की गोली बनाकर और एक गिलास में डालकर खूब हिला दिया जाए। फिर मीना अर्थात् मधु गिलास में से एक गोली निकाले । उसपर जिसका नाम लिखा हो, वह उसीके साथ चली जाए। "तुम्हें मंजूर है न?" चुग ने मधु से पूछा। "हां, मंजूर है।" उसने उत्तर दिया और अपनी लम्बी-लम्बी पलकें उठाकर अनीस, गुरमेल और नरेंद्र को बारी-बारी से देखा, जैसे वह उन्हें अब भी भरमा रही हो। प्रेमनाथ चुग ने एक ही साइज के तीन कागज लिए और एक-एक अनीस, गुरमेल और नरेंद्र की ओर बढ़ा दिया ताकि उसपर हर एक अपना नाम खुद लिखे। कमरे में नितान्त निस्तब्धता थी। सहगल भद्रसेन की ओर देख कर मुस्करा रहा था। नरेंद्र ने कागज लिया, लेकिन नाम लिखने के बजाय उसे पुर्जा-पुर्जा ११० | पंखहीन तितली 4
करके हवा में उछाल दिया।
"यह क्या है ?"
सभी ने विस्मय में भरकर उसकी ओर देगा।
"जिस औरत को मुझसे कोई लगाव नहीं है और जो रिसो के भी
साप जाने को तैयार है, मुझे उसमें कोई दिलचस्पी नहीं । मार दोनों
पर्वी डालिए।" नरेंद्र ने आने प्रतिद्वन्द्रियों से कहा ।
गुरमेल ने अनीस और अनीस ने गरमेल की ओर देता मोर भागों
ही आखों में मावरा किया।
"मुझे भी कोई दिलचस्पी नहीं।"
'और मुझे भी नहीं।"
उन्होंने कहा और अपनी-अपनी परिया पुर्ज-पुजें करके हवा
उछाल दी।
पुरुषों को लुभाने और वरा में रखने वाली सम्पूर्ण नारी उनके मुंह
की ओर तकती रह गई।
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