Sanmati Library, Jaipur
Hariharasgunnirgun Padawali
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-- दिला में विष्ट - দেবিদ্বানুগলী भन्न जगलवचनकलिकाका নিহিলিৰে গৰাধলীলমুলশিক্ষা স্ব पशव्याशा के लिये नीरसीसनी होगी जिनका व्यापारलीजामोपचारे स्थानके हतमिम अंपया मालिक के नासरवत नकर कालानिगार साद नासक्षिणाय . नाशिद नामित भाचा इतिहास वनपई नये का महाभारत बिराटगब्द প্রত্যাশী विस्तानिशादिषद / उच्चारण মানূকুলে স্কুলেমা सभापर्व बनपल, ६g कालांतीकाराड : विनामसागर डोनाल बाललाराज प्रमागर उधोगपर्व भीमाप पर्ख अयोध्याकाण्डकादिला. या पद, शिल्पपर्च- गानारायलाण्ड विजयनुतावनी हिलाकर्णपर्व नोमिक पर्वषययो-किरिकन्याकाण्यानेनार्थ भन्यपदापर्च, एक दिशोकवस्ती सुन्दरकाण्ड इन्दोदियाल झिकाई योशित पर्व लंकाकाण्ड कविकुल कारपरक नियोकप,लीपर शांतिपर्व राज उत्तरकाण्ड रनराजः शोरिम में राज. धर्मवमापदधर्मर रामायगशब्दाथकोण मत्सई सदाक धर्म मापदधर्म मोटामोलपम्मेवदानधम्मारामायांकाइतिहास सत्सई धर्म, भायम समाधरणमानसदीपिका समाविलास.. हिस्सामे, शांतिपर्व वासक मुशालपर्ख रामायणकवितावली तुलसी शब्दार्य सानधर्म अश्वमेध, महावस्यानलंगोगहन रामायणगीतावली भजनावली प्राश्रम चासकपर्व हरिवंशपर्व रामायणगीतावलीस प्रेमरस्म मौसलपर्चवमहार रामायणरामविलास विनयपत्रिकाचा-मो युगुलविलास स्थान स्वर्गारोहनपी गमायणनुलसीहत विनयपत्रिकाका शि चिचन्द्रिका: वहि यशमन रामापरणसटीकमयमा पुराणा बारहमासावर महाभारतपईपर्क नंदपिकालो भारि देवी भागवत मनोहरलहरी सहदा भी वनरापारीक . वेदान्न गंगालहरी आपद, स्वधी : योगनाशि यमुलालहरी नदारोदारकी जनोश्चन्द्रोदवनाटक जगदुनिोद home ॥ हरिहरसगुणनिर्गुणपदावली ॥ .00 . . थीसद्धिदानन्द स्वरूप विश्वरूप स्वामी बत पदावली लिख्यते ॥ कवित्त ॥ सिंदुर सुभाल सोहे बालचन्द लोक मोहे कोहे जग जासु नाम विना यश पायो है । सोहे बेदगाथ हाथ मोदक परशुबर अभेसु योति अंगअंग महं छाया है। योग यज्ञ जप तप यतन अनेक कर प्रथम गणेश पूजि अछे फलपायो है । विस्वरूप विश्वके अधार करतार एक उमा के उदार वार चित्तमें साहायो है ॥ १॥ सोहत अखण्ड चंड कोटिन्ह दिनेश अंग विधन प्रचंड खंडखंड.करि डारो है । शंभुके सुक्न गज बदन भुवन माह विदित अनादि गति मतिको अधारी है। कविवर शुद्धि बुद्धि कुमुद सुचंद योति होत है भालक वेद मत जतसारो है । बिश्व रूप झावी सों झलक हिय मांझ होतायोति घन सुंड फेरि शोच धन टारो है ॥ २ ॥ राग भैरो ॥ एक दन्त गज बदन दयानिधि सिद्धि सदन जन सुखकारी । शोक निकंदन शंकर नन्दन भुज बिॉल सहित चारी ॥ कंज मंजु पुस्तक बर सुंदर अभय दानि मादक धारो ॥ १ ॥ सिद्धि बुद्धि छवि खानि सोहा- वनि सोहति संग परम प्यारी । विश्व रूप गुण सिंधु दया निधि वाहन मूषक भयहारो ॥ २ ॥ राग भैरो ॥ ज्ञान सिंधु गज वदन मदन मद मर्दन सुत जनहितकारी॥ विघन हरण जन शरण दानि प्रभु कृया सिंधु भव भय हारी ॥ गौरी सुवन भुवन यश तेरो विदित बेद गावत चारो ॥ १ ॥ विद्या बुद्धि दानि सुख सागर कोटि दिनेश योति धारो ॥ बिश्वस्य प्रभु शरणं परो हे हरहु कुमति ममता भारी ॥ २ ॥ राग भैरो ॥ गणपति शंभु सुवन छवि न्यारे जा छबि बरनि न सकत सहस. फशि सारद नारदमुनि जन हारे. ॥ चन्द्रभाल छबि यु ति बिशाल अति सूर्प वार्ण गजवदन उदारे ॥ २. ॥ कोटिन्ह भानु योति छबि सोहै मुकुटं किरोट यति उजि यारे ॥ वित रूप जेहि हेरत दगते छटत बेगि बिधन दखभारे ॥ ३ ॥ राग भैरो .
२ हरि हर स० नि० पदावली ॥ गणपति वदन हरण दुख भारो शोक सिंधु गण कुंभन केवमाविधनं हरण प्रण नाथ तुम्हारो ॥ ॥ प्रथम पुज्य श्रुति लोक विदितं चहुं, तेज पुंजगुण ज्ञान अंगारो ॥ नासु नाम जपि सकल सुरामुर होत कठिन संकठ ते पारो ॥ २ ॥ विश्वं रूपं प्रभु लस्सा सागर शंकर सुवन जगत हित कारो ॥ ३ ॥ रागभैरो ॥ गणनायक ज्ञान अनारो ॥ करिवर बदन मदनरिपु बालक हारक मोह विकारो ॥ ६ ॥ गिरिजा प्रीति कुमुद रुचि कर अति भालचन्द उजियारो ॥ हसत लसत दुति रदन सोहावन वसन ‘मनोहर धारो ॥ २ ॥ विद्यानिधि गुणनिधि सुखनिधि प्रभु सिद्धी नाथ उदारी ॥ नयन कार हिसार निहारत सो न लहत दुख भारो ॥ ३॥ कुहनिशा जड़ता अति सतिका विघ्न प्रचंड पहारो वोटि दिवाकर वन अमित सम पवन गवन करि टारो ॥ ४ ॥ मंगल मूल अमंगल हारक दायक बुद्धि बिचारी ॥ विश्वरूप नग जाल कालते लखि निज शरण बारो ॥ ५ ॥ रागभैरो ॥ गुरुः मोहि राम रूप मन भावे ॥ सबके तारन सारन सबसे ज्ञान सरूप सोहावै॥५ समरथ शील दयागुण सागर भानु अमित दुति छावे ॥ सब तीरथ मय चरण नासल जल पीवत मोह नसावे ॥२॥ जाके पद पंकज की महिमा सुरनर मुनि यश गावै ॥ जाका पार वेद नहि पावत लघुमति कवि किमि पावै ॥ ३ ॥ नदिाता चाता को गुरु सम अस निश्चे उरावै॥ विश्व रूप प्रभुऋपा करत जेहि पलमे अलख लखावै ॥ ४ ॥ रागभैरो ॥ अचल. श- रण गुरु की हम पाय! छूटे ताप विविध अति दारुण प्रेम प्रीति उरछायो ॥ १ ॥ सुतवित वनिता अहिंगण नाशकमारुड मंत्र लखायो । छायो सहन परम नुख • केवल सकल सोच विनसायो ॥ २ ॥ छूटो द्वैत जगत भ्रम नाना सहज स्वरूप साहायो ॥ विश्वरूप जल थल चहुं पूरण ब्रह्म रूप दरशायो ॥ ३ ॥ भंजन मेरो ॥ वन्दौ श्रीगुरु देवचरण को । भव 'दुख उदधि पार नहि सूझत पायो सहजे तरणि तरणम ॥ १ ॥ जेहि पदकंज बसत सुर सरिता चारि पदारघ दानि शरणको ॥ करुणा सिंधु वुद्धि-गुण दायक ठिन दुमह भय जनम सरजनों ॥ २ ॥ श्री गुरु तारक ब्रह्ममहा प्रभु विश्व रुप गुरु भजु चरणन ॥ ३ ॥ सोर० । देखो वन भरत आ- नन्द ज्ञान : गुरु चरण रज ऋतु सोहावन घटा समता ध्यान ॥ गुरु स्वारूप अनूप नुन्दर मेघ सजल सुजान ॥ १ ॥ आठ याम अखंड वरये धरि वतन भान । विश्वरूप. प्रताप गुरुको अचल अमल. ठेजान ॥२॥ भजनठुमरी ..मन कव राम नाम रट लेहो ॥ छन छन छीनहातइन्द्रगण ॥ ॥ 1 हरि हर स० नि० पदावली ३ कब हरिके गुणगेहो ॥ १॥ नीच कर्म तस्लाइ लोभ जलसोंचि अमिय फल कैसे हो। पर अपकार यहार शोधरि भव जल कोहि बिधि पारसिधइहो ॥२॥ जगत गहन बन दावचहूं दिशि कहु केहि मगुते वाहरनइहो ॥ विश्वरूप अवसरके चूके सिरधुनि घुनि पुनि पुनि पछितइहो ॥ २ ॥ बिहाग भनन ॥ मनरे भूले बिराने देश ॥ इत अपना हित दीशतनाही जेहि बससहत कलेश ॥ ५ ॥ जेहितन कहं पालत निशि वासर करि बहु पाप हमेस ॥ सोतन गीध श्वान मुख नइहे कारिहै कि अनल प्रवेस ॥ २ ॥ नयन अंधभये प्रवन सुनत नहि पग न चलत बहु तेस॥ जर्जर भये दर्शन सव टूटे सेत भये सबकेस 1.३ ॥ अलप धनिको कोनचलांवे जइह अवशि धनेश । काल गालते नहि कोउ वाचत सुर नर असुर सुरेश ॥ ४ ॥ जेहि पद सेइ अचल पद पायेना- रदादि मुनिशेस-1 विश्व रूप दृढ़ अवशि गहो सोइ अवर सकल चल भेस ॥ ५ ॥ भजन ॥ मनरे हरि बिनु सकल बिराने ॥ अहित होत सब समय पाय के जाकहं हित करि जाने ॥ १॥ यदपि दिवाकर रुचि करकर लाह कमल तुरित विग साने ॥ सोइ रवि कर गन पाइ बारि विनु वारिजतुरित सुखाने ॥ २ ॥ सकन शस्य पालक वारिद है पालत संबहि समाने ॥ बर्पत बिपुल उपल कवहूंको बिनसत ब्रीहि विताने ॥ ३ ॥ वनिता भोग राज सुत्र चाहतं मूढ़ विना पहिचाने। इतदुख मूल नरक दायक उत करि तेहि प्रीति भुलाने ॥ ४ ॥ जेहि डरते यम राण डरत नित निशिदिन काल सकाने । विश्वरूप सिय नाथ भजे जो सोजन परम सयाने ॥५॥ भजन ॥ मनरे समुम्मि मि अब देखो ॥ तेरो तन तेरे संग ना जइहे अवर करों कालेखो ॥ १॥ कूच नगारा वाजि गयो ठोकेउ यम गन मेखो ॥ काल कर्म को धार बड़ाहै सो नहिं मूढ़ निरेखा ॥ २ ॥ ध्यावा मन करुणा निधि रघुवर जलधर वर रुधिवेखो ॥ विश्व रूप जग सुख सपनेके प्रचजिन नेनन्ह पेखा ॥ ३ ॥ भंजन। रेमन तून भयो अपनी ॥ कोटि सिखावों ने न मानत देत दुसह तपना । १ ॥ तेरि बस परि सहेउं बहुत दुख चौरासी भ्रमना ॥ ऊंच नीच घरनास घनेरो मातु गरभ दहना ॥ २ जानि दिवाकर कर शीतल जल साहस करत घना । निकटहि आतम रसहित कारक पियत न एक छना ॥ ३॥ केतिक युग बीते भरमत तोहि निज हित समुझतना ॥ विश्व रूप निज बोथ हेतु करि जानु जगत सपना. ॥ ४ ॥ भजन ॥ समुझि न परत अलख गति तेरो ॥ सब जग कारन आपु. अकारण निर्गुण सगुण घनेरो ॥ १॥ मायातें बहु खेल कियोहे रचेउ भुवन चहुं फेरो। बिनिधि सुभाव भेदतें जहं तहं बहु बिधि , ॥ ॥
." .. ४ हरि हर स० नि0. पदावली. . . ॥ जीव बसेरो ॥ २ ॥ चहु दिशि विषय दियो फैलाई जीव कहत तेहि मेरो: काम कोथ की. बाट परोहै सुधि नहि कती करो ॥ ३॥ जब यह जाल दया धारि खंबहुनयन कोर हरि हेरो ॥ विश्व रूप जग झूठ सांच मति सह- नहि होत निवेरो ॥ ४ ॥ बिहाग भजन ॥ भजारे मन सब गुण निधि भगव- न्त ॥ दीनबंधु करुणा के सागर अफल अनीह अनन्त ॥. जीव चराचर रमेउ दयानिधि केवल. कमला कन्त ॥ १॥ निज समान अयना हे साहेब कोउ पटतर.नलहंत ॥ अति अगाध.महिमा है जाकोकहि हारे श्रुति संत.॥२॥ सब विभूति प्रभु को जग छायो तेन वंत गुण वंत ॥ विश्व रूप से प्रभु हेरो क्या हेरसि धनवंत ॥ ३ ॥ भजन ॥ मनरे भटकत हरि बिनु जाने ॥ धर्माधर्म विचार करत नहि लामचीक दृगताने ॥ १॥ अवरन कह समुझावत बहु विधि अपनी राह हेरोने ॥ जगत सघन बनभूलि गया हे नहिकरतन पहिचाने ॥ २ ॥ वड़ो गुनी सब मह कह वा वत हम उत्तम उराने ॥ खानपान तन पालन रतनित पर धन हरण सयाने ॥ ३ ॥ करत कुकर्म दिवस सबबीते अजहुंन मंढ भघाने ॥ विश्वरूप अब चेत सनेरे झूठे जनम नसाने ॥ ४॥ विहागा ॥ मनरे विषय कारण वहु नाचा ॥ जो जग दोश ताहि बिसरायो घर घर निसि दिन यांचा ॥१॥ गुरु उपदेश नही राष्टरत उर जेसे जल घटकांचा ॥ विश्य बयन सुनि तुरित ढरत. शठ जिमि पावक घृत प्रांचा ॥ २॥ अंध भये मणि नाम न देखत वरमस कांचुहि रांचा ॥बर नस चलत कुमारग निशिदिन वेद पुराणहि बांचा ॥ ३ ॥ झूठ पसार सार करि मानत गहत न हरि-पद- सांचा ॥ विश्व खूप अवसर के चके यम गण देत तमाचा ॥ ४ ॥, भेरी में भजन ॥ भजुमन शंभु शरण सुखदाई ॥ जासु शरणले लहे परम पद वहु- रि न भव छल आई ॥ १ ॥ जेहि यांचे ते होत अयांचक दारिदः सकल नसाई || सकल भूति कर तूति सोहावन निशिदिन करतले छाई ॥ २ ॥ अति दयाल समरथ सुख दायक मूढ़ ताहि विसराई ॥ कामी कुटिल विषयः रस बसे नित गहत न जेहि शरणाई ॥ ३ ॥ तजि चिंता मणि सब सुख दायक गहत काचु हठि धाई ॥ सुर तरु सकल मनोरथ दायक परि हरि- पाक लगाई ॥. ४ ॥ विधु शेपर हर वरण प्रीति कर जो चाहसि कुशलाई ॥. विश्व रूप भव अगम तरण कहं दूसर नाहि उपाई ॥५॥ धनाश्री ॥ अजहूं. समुझ मन होत अवेरो ॥ नाहनहीं सब दिवस वितायो कबहुं न हरि पद, हेरो ॥ ॥ वालका पन बीते अजान मह असन शयन रुचि ढेरो करतं: चपलता इतं. उत.. धावत नहि सुधि साधन,केरो ॥ २ ॥ तरुण; भो . -- .
हरि हर स० नि० पदावली मुधि सकल भुनाने तरुण तिमर मद घेरो || मतमहिप वृष राज सरिस मठ भये कामिनि कर पैरो ॥ ३॥ कृषी वणिज व्यवहार करत बहु धन मह प्रति घनेरो नीति अनीति विचार करत नहि संगति कुपथिन केरो॥ 8 कंपत गात भात नहि पछत. नेह पर ममता तेरो ॥ विश्व रूप भजु जनक मुता पर काल किये पिर डेरो ॥ ५ ॥ भनन ॥ मन बसहु सरोवर जाई ॥ घाट विचार सुचारु शमादिका छवि से पानसाहाई ॥१. निर्मल जान वारि परि पूरण मुखद मनोहर ताई ॥ निज स्वरूप सुख रूम मुमोती चुंगत प्रीति बढ़ाई ॥ २ ॥ नहितहं भरदम भेदजनित दुख अमित बामना काई । शोक गृपम ऋतुं तापन लागता शीतलता भति छाई ॥३॥ कामी कुटिल नीच अभिमानी काक गीध विपुलाई । पर अपकार विपयरस निशि दिन रोहियल वासन पाई ॥ ४ ॥ मुनि जन धीर मराल मगन होय करत निवास सदाई । विश्वरूप घर अचल करोतहं पावा गवन नसाई । • ॥ ॥ भजन : पान कृपान गहो मन मेरी ॥ अति हुसियार रहो निशिबासर : रिपु घेरेठ पहुंफेरो ५१ ॥ मोह मान मदमार प्रवल रिपु इन्ह संग फउन घनेरो ॥ करत उनारि भवन सवहीके भरन परो इन करो ॥ २॥ शमदम योग विराग यतन बहु पहिरी फवच अछेरो ॥ होइ : अभय मारो रिपु दल को दयनहु दुसह . दररो ॥ ३ ॥ प्रातम रूपराज - अविचल पद वेठो सव तजि घेरो ॥ विश्वरूप सुख सिंधु मगन रहु दशहु दिशा जय तेरी । ४ । भनन ॥ यह तनके ममता दुखटाई ॥ कहुं पूजेते गगन करतुहे काटुं परिभवतेदेख बढ़ाई ॥ नवतक हृदय ग्रंथि नहि छूट तव तक मिटत न मनमलिनाई ॥१॥ भ्रम वस कर्म करत बहु भातिन जन्मत मरत बहुत टुग्न पाई । यह भव उदधि अपार धार है हठकरि परेउ बोचतेहि जाई ॥ २॥ काम क्रोध नहं न तु घनेरेःयास करत सव महं बरिआई ॥ विश्वरूप गहु राम नाम दृढ़ सकल चाहत मनको विसराई ॥ ३ ॥ खेमटा' झूठे गत भुलाना में कैसे सुग्व पावों ॥ ऐको छन हरि भजन करत. नहि राजेस गति चित लावों । काम, क्रोध जल करत रैनदिन अनई भवननहिं छात्रों ॥ १ ॥ हरि जनहरि सो प्रीति बिसारेउ सुत वनिता. गुणा गावों ॥ नि- 'कटाहि व्यापक प्रभु सुख सागर देश बिदेशहि धावा ॥ २॥ करि . पखंड प्रभुता चित चाहों अति सारग विसरावा ॥ विश्वरूप अस. दिन कव है हैं राम शरगा महं आवें ॥ ३ ॥ खेमटा । संवलिया लाल में : तोहि जानी ।। विनति, करौं ननि लाव नजरिया छटासे मारे नैना लाभानी ॥.१.॥ विश्व- हरि-हर स० नि पदावली - रूप चिन चार कन्है या तुमरे हाथमेनाहि विक्रानी ॥ २ खेमटामुरलिया लालदे माहि आनि ॥ चांद सुरघरि योति मुरलिया बजाई हरै नियरा. विरानि॥ १॥ विश्वरूपं हंसि हेरि नजरिया लगादे प्यारे नेना निसानि ॥ २ ॥ खेमटा ॥ धनुहियां हाथ में लेइतानि ॥ कर गहि वाण सुजान संवलिया चलाइ कीन्हो दशमुख हानि ॥ १ ॥ विश्वरूप करिअभय धरनियां छुड़ाइ दीन्हो जगकी गलानि ॥ २ ॥ खेमटा। नजरिया हेरिदे माहिंदानि ॥ कमल कोस छवि इरनि नजरिया. छुड़ादे मेरो ममता गलानि ॥ १ ॥ विश्व रूप रघुबर वरदानियां कहां लो तेरो महिमा वधानि ॥ २ ॥ खेमटा राघो तेरो छवि यां मजरी मह लेयों हो ॥ सरयु सोहावनि बिहरण नीको छन छन नेहिया बढ़ावत रहियो हो ॥ ५ ॥ बचनः माधुरि मनहि वसे हो सुख घन रसिया को ना बिसरेया हो ॥ विश्व रूप लालनं दश रथके पदरज मतिया लगावत तरियोहो ॥२ खेमटा ॥ राघो तेरो सुधिय कवन विधि पेयोंहो ॥ रोदन करति परत धरणी महं कहत कौशिल्या प्रा. महो देयोंहो । जनक दुलारी प्यारी प्राणहूं ते मेरी कवन यंतन तेरि सिया सुधि ले येोहो- ॥ २ ॥ छिन छिन कोटिन युगतें कठिन भयो केहिविधि रतियां अगम वितै योहो ॥ विश्व रूप विधि विपति भवन दियों दुखर्क, समैया अब कासो सुनैयोहो३॥ खेमटा । कोने मद भूलिबिगारे सव कमवां। जगकर सपना भोग लखतना जोरत रहत. लाख. को जमवां ॥ १॥ जरत • गरमको सोच करत ना क्रियारे कठल जपिहाँ हरि नमवां ॥ २ ॥ पुरजन वनिता. संग रहताना जीवन चपल लखा हरदमवां ॥ ३ ॥ विश्व रूप गुरु घरण गहतना करतव नीच चहत-सुख घमवां ॥ ४ ॥ खेमटा । लागे दिन रैन हमारे मन रमवा ॥ कुटिल करम को आश करवना चरण कमल जपि, हो सुख घमवां ॥. १ ॥ कठिन जगत को बंधन सहिहां बहुरि नपैहों गरभ जनमवों ॥ २ ॥ भरम भवन में वास न लहिहां तजिहां कुटिल कुमति मद कमवा. ॥ ३ ॥ विख रूप माहि अंबरन भावे हारिल की लकड़ी घन:समवां i-४ ॥ ध्रुवपद ॥ सखि राजको समाज सान सोहत रघुनाथ जोको कांति सदन मदन कोटिपटतर नहि पावैरी ॥ १॥ भूपन की पांति पांति सुरपति सुरमुनि सोहाति गान करति देव वधू भुवन को रिझावेरी ॥ २॥ ज्वलित वरण तरण योतिःभूषण पट योति होलि शीस मुकुट मणि गण छवि दू गन को चुरांवरी ॥ ३॥ महारांन भूप न को भूप विश्व रूप राम ऐसा प्रभु छोड़ि आस दीनी लगावरी ॥ ४ ॥ ध्रुव पदविलावला मोहन कुंजन 1 हरि. हर- स०नि०पदावली. . वज जन प्यारे । कून विहरन चित हरन श्याम श्याम रामः संग सिधान रे ॥ १॥ कुंजन प्रति कुंज कुंन गुंजत चहुं भंगीर कुसुमित तरु ललित मोर सोर से पुकारें ॥ २॥ लीन्हे संग ग्वालवाल खेलत ब्रज लाल खेल निरखत चित. भरत माद कुसुम हरपि डार ॥३॥ विश्व रूप व्यापक जेहि नेति नेति गावै श्रुति भाग्य पुंज पुंजन संग विहरत निसवारे ॥ ४ ॥ ध्रुवपद ॥ पालीरो सा- वन आयो घनमन भावन झनन घनन अंगार चंपल दो दृग झपन ॥ १ ॥ वनवारी बल रोम सुनाम गये वन सोचति माहत विश्व रूप सखिरी ठर छाया मोहि कंपन २ 'ठुमरी ॥ भ्रमवंश तेंभव जालमें भटको ॥ यतनं करत सुखहेतु अनेकन कामिनि कोप विषय चित अटकोः॥ १। आश पिशाध बिवश भयो निश दिन बाहर धावत सुधि न निकट को ॥ २ ॥ विश्व रूप रघुबीर शरण गहु हरण द्वद जग फन्द विकटको ॥ ३॥ ध्रुव पंद सामकल्यान ॥ येाजु पावन कोन्ही सुख धन छवि निधि-भवन भुवन संभोग रण योग जन पावन ॥ १ ॥ बहु रंगी पट रंग सुरंग सुभूपण सोहत माहत विश्व रूप सखोरी श्याम सोहावन ॥ ९॥ ध्रुवपद सामक ल्यान । बिरहत मोहन वाला गोपी साथ लेई ॥ सघन वाटिका कुसुमु घनेरो नाना गन्ध फूले हैं चंवेली मुख धृत वंशीःशोहन ॥ १ ॥ मंजरी माल मणि माल झोना सजे हैं अंबर छवि न्यारे ॥ विश्व रूप बैशी धुनि सुनि सुरनि किलकि हा हा देई देई ये लागत सुर मुनि जोहन ॥२॥ध्रुपद । निर्तत मोहन श्यामा वंशी हाथ गहें ॥ चपल सोहावनि बैन सोहाई झुकिकि आवत दूर पराई सुखधन विहरे मोहन ॥ १ ॥ मधुबन विहरत श्याम कन्हाई बालन्हवोसंग केलि मचाई ॥ विश्व रूप निर्तत यदुनन्दन थेई थेई तता थेइ तंतं गगन मुरली वाजत सोहनः ॥ २॥ ध्रुवंपद ॥ श्रायो धन-घोर मोर नाचत चहुं औरहेरि कीन्ही प्रिय सोर भोर भई दशा तन की ॥ ऐसें ब्रज ग्वाल बाल हेरे नन्दलाल ओर फेरे नहि नेकु नैन चित्रलिखा मनकी १॥ भूषण सुअंग अंग मारत अनंग कोटि रंग रंग पीत योति चपला ज्यों धन की ॥ ऐसेामोहन अनूपहेरे दृग विश्वरूप नैन-बेन भेद कियो खोटो विधिःजनकी ॥ २॥ शु. पंद ॥ जीतोरी जबही ऐसा कामकामिनी को माया जाल पै हो तबही तूं श्यामा प्यारे ब्रज चन्द जी जीवन अलख जान पथिकसो संग मानो चपला-मांचित लायों भूलेमति मंद जी ॥१॥ सपना को राज पायो में आनंद छायो जागे पछ तायो' ऐसा जानां जग फन्द जी ॥ विश्वरूप भजो नाम जीवन सुखद श्याम मोहन मुकुंद माधो प्यारे सुख कन्दनी ॥शा राग ठुमरी ॥ मन मेरो ८.
हरिहर स० नि: पदावली
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रघुबीर सौ. अटकी । मुर नर नाग अवधं सुख चाहत सो तजिं भवन छांह
तरुघट की . नृप किरीट पद परत जाहिके तापस वेपसों, वन वन
भटकी ॥२॥ विश्वरूप कहै भरतसों पुर जन विधि रहे मुकुट जटा सिर
लटकी॥ ३॥ ठुमरी | खगपति अहि निमि कंसको झटकी. । गहि कर केश
नरेश बीच में श्याम घुमाय भूमितल पटको ॥ १॥ घायो रिकंस सहोदर
रिपुगण छिन में हतेउ खेलि कियोनटकी :: २ ॥ विश्वरूप जासों काल डरतु:
है गिनती कवन असुरदल भटकी ॥. ३. ॥ ठुमरी॥ मन जिनके धन गेहसों
अटकी ॥ छांडेरिसुपथ वृथा भयो जीवनरविकर वारि तृपा कहुं हटकी ॥ १ ॥
होत विफल जप योग कांच जेसे वहंत सकल जल रहत न घटको ॥२॥
विश्वरूप गुरु चरण सरोरुह वेगिगहो तजि चौक कपटकों ॥ ३ ॥ ठुमरी ॥
सखि सबके चित श्याम से अटकी । ढरत नयन जल नीद न आवत
कोटि न युगशत होत पलककी ॥ १ ॥ विसरत नहि सखि मोहन कीछवि
यमुना नीर रुधिर छवि तटकी. ॥ २ ॥ विश्वरूप मधुपुर गये मोहन मोहि
सुधि रहत न भूपन: पटकी ॥ ३ ॥ ठुमरी॥.मन नवते हरि ओर से हटकी ।
तब तेरे भव जल पावत दुख धन आवत जात अमित युग भटकी ॥ १॥
विश्वरूप श्रुति मगनहि हेरत सुत-वित नेह गेह सुख अटकी ॥२॥ ठुमरी ॥
भूपन जो धनन योति से झलको ॥ उर वनमाल भाल सोहै चन्दन मृकुटी
ललित हास मन ललको . १ ॥ मव गुणअयन वैन मन मोहन लटक जलज
मुखछवि अलि दलको ॥ २॥ विश्वरूप मन माहन कीनी विसरत नहि :
छवि नयन चपलकी-॥ ३ ॥ ठुमरी ॥ बिन समुझेहिये सोच से भटको ॥ राज
विभव सुख बंधु सहोदर आस छनिक तृणजल जिमि लटको ॥ १ ॥ सैनि
सपन सुख गंगन कुसुम सम मानस चित्त चपल चित-अटकी ॥ २ ॥ विश्व..
रूप.गुरु यद रज अंजन गंजन दृग दुख दोय कपटको ॥ ३ ॥ ठुमरी मन
जिनको निज बोधस अटकी । विहरत अभय सबहिं महं पूरण भय न
होत उर रिपुगण खटकी ॥ १ ॥ वाहर नामरूपं दृगं गोचर पुतरी ललित
रचित जिमि पटको ॥..२ ॥ विश्वरूप सुख अमल सोहावन योति भालक !
मिमि रविगन ठटकी ॥ ३ ॥. रागभैरवी. बतावा माहि श्याम गये केहि
र ॥ श्याम श्याम. रटि थकित भई अति नहि मिले नन्द किशोर ॥2.
कचतें कुसुम झरत चहुंदिश टूटो गललर जोर ॥ विकल भई. सुधि सकल
भुलानी मन अटको चित चोर ॥ ३ ॥ मुरलीटेर करत मुरली घर आइ गये
तेहि और ॥ विश्वरूप सखि निरखि मगन भई जैसे: चन्द चकोर - ॥ ३ ॥
; हरि हर स० नि० पदविली । - ॥ 'गिभैरवी ॥'माधव माया सबहिं नेचावे ॥ योगी जंगम नय. संन्यासी पार कोउँ नहिं पावै ॥ १ ॥ जाकी त्रास वास मुनि जन सेव बनमें जाय लगावै॥ मानस बेंग' प्रबल नानासर हठि तहं तुरित पठावै ॥२॥ कहुं तिय सुत धन रूप भईहै नानी भेषदेखावे ॥ कहुं परिवार वधुहित अपना बहुविधि जोल बढ़ावै॥३॥ ही पंडित ज्ञानो स!त्तम अहमिति उर आर्थकावै ॥ से नहि संमुझत मूढ़ माह वस हठि निज शीस कटावै॥४॥काहंकही करुणा के सोगर केछु उपाइ नहिं आवै ॥ विश्वरूप रघुनाथ शरणतवे दृढ़े भरोस मनं भावै ॥ ५ ॥ रागभैरवी ॥ माधव मन जीतव "कठिनाई ॥ मुनि जन यतनं करत बहुहारे नेकु थाह नहिं पाई ॥ १ ॥ मूल सहित गिरिवर उखारि बरु करतेलेइ उठाई। सन सागर एक बार सिमिटिवर मंजुलि माह समाई ॥ २ ॥ पोवंक प्रवल प्रचंड असन कर वरु शीतलता छाई ॥ नमकह सिमिटिं घरनि मह मेले वरु विप दुसह पचाई ॥ ३ ॥ स्वर्ग नरका दुख सुख वहु भांति- न यह मन कृत समुदाई ॥ चौरासी मह ममत दिवस निशि नहिं पावंत थिर ताई ॥४॥ जापर दया करहु करुणा निधि माया पति · रघुराई । विश्व रूप वसि होत ताहि मन विनु प्रयास सुख पाई॥ ५॥राग भैरवी।। मेरो मनः हरत कपाली बन मालिया ॥ मुख मुरली डमरू छवि साहै करें धनु बान चिशूल छटालिया ॥ १॥ शीस मुबाट मणि जटित सोहावन शंकर केसरि सोहत नटालिया ॥ २॥ विश्वरूप करपूर गौर हरश्याम वरन मनं 'मोहत घटालियां ॥ ३ ॥ भैरवी ॥ काहे रंघुवर कूप भाकावत हो ॥ श्रुति 'मत बिदित. सकल अंतर गतिं जाननि हार लखावति हो । १॥ विश्वरूप जगदीश दीन प्रभु नाम की लाजन. आवत हे। ॥ २ ॥ भैरवी ॥ सखि मोहन मोकंह भावतरी ॥ श्याम अलक मुख झलक सूर सो कोटि मदन छबि छा- वतरी ॥ 11 विश्व रूप दृग कमल चपल सों श्याम सनेह लगावतरी । २ ॥ भैरवी ॥ तारि राम धनुष जगत यश छाया है ॥ छवि रुचि कार सोहे देखि त्रिभुवन माहै एकटक नर नारि पलकन लायो है ॥ ॥ रबि , दुति उजियारी जगमग ज्योति सारी भूप जान खान देखिउर सकुचाया है ॥ ननक को पन पाले खल नृप मद घाले साधु नृप उर माह अति सुखमायो है ॥ ३ ॥ भृगुपति मद तोरे मुनि जन करजारे जानि प्रभु शीस 'नवाई. बनको सिघायोहै ॥ ४ ॥ रुचिर समाज साहै गिरा बिधि शेष जाहै उपमा न पायो ताते अनुपम गायोहै ॥ ५ ॥ विश्व रूप प्रभु राम जनहित. सुखधाम जानकी समेत रथ चढ़ि गृह आयो है॥६॥ भैरवी जारे कर भरत - -- -- - १० हरि हर स नि० पदावली। जो अरज़ सुनायो। चलहु भेवन न च अवध करो. सनाथ..करुणा निधान तुमैं लेन काह आयो है ॥ १:॥ सुनिता बिनद वाली रसुसंशि सुखदानि स- मुझि पिताको पन उर सकुचायोहै ॥ २ : नेइभ सकत न रामटारी प्रेम के विवंश भये दूग जल छायो ॥ ३॥ य रूप. रघुराज समुझायो सुर काज चित्रकूट ते भरत कह पटले ४ ॥ भैरवी ॥ श्यामा मोरे चित को चुराय लई भवन भोग लेई ..... तो सुन्दर गति छबि ललित मोहन की ब्रज पुरचन को IN ५. ॥. श्व. रूप- मुरली मोहनशी सुर नर जाग मोहाय लई ॥ २ की सयां सिरे संगमें : छपाय रही ज्ञान नैन सो हिणं लखिही प्यारेज रहतं महदी. कीत. जैले छोर में छ यरहो ॥ ॥ विश्व कप : सोसा- मिलनेकि और. उपाय नहीं ॥ २॥ रग लैरवी ॥ . ..। नसाय दई रामसे नेह हिया धरि अव॥ घेर कति जारि सतपथसों बिचलाय दई ॥ विश्वरूप निलबोध ब्रह्म मुख ६ वरू त राय दई ॥२॥ भैरवी, ॥ काया तेरे संगमें न जाय कही लान है। यही प्यारे ॥ सुख धन, ब्रह्म सरूप भालका चहुं लेवल सनको र... विश्वरूप अवसर दिन दशको अनतोहि काल फसाय चहीं ॥ १ ॥ वो ॥ रघुबर जबतक प्रीति न तोसे ॥ माह भये बनज बटोरे ख.न पान का पोसे || काह, भये मृग छाल बिछाये समुसत ना गुण देले ।। काहभर टा.बढ़ाये मनलाश धनकोसे ॥ १॥ अखर बीज सारख करतब सब मिनीशं कृत जासे ॥ विश्वरूप जगदीश नापपद जो पद रति, नहिं मे से ॥२॥ हारीकीताल ॥ मैंतो मन मेहन को रखती रही । ज्योति मन से घटती रही ॥ कुबरी संग प्रीति हरि कीन्डों कवन कलाल जाटती रही। इत आवन नहिदेति श्याम को विरह विधान सकती रही ॥ २ ॥ मधु.पुर नवल सनेह श्याम सों सखि दुचना सी पटती रही ॥ विखरूप ब्रज्ञ हरि नहिं अहै. प्रीति इहां सो हटती रही ॥ ३ ॥ तालहोरी || मैंतो दुख सागर से तरती नहीं चरन शरण पता नहीं ॥ १ ॥ गुरु पदनाव अचल वृत चौकी घोर पवन से डरती नहीं ॥ भो अशंका पार भव.लतें योगयतन कांकरती. नहीं ॥ ॥ अक्षत प्रसाद सुख घन यि छायो द्वत फन्दशो मरती नहीं॥ बिलाप शशिहर उदय भयो ज्योतिपलकारो टरती नही ॥३॥: होरीकोताल। ऐसे मदन पहतो रही चरण युगल को बहती रही ॥ चन्द्र चूड़ रिपु आहे चहुं छाया शोच अनल से दहती रही। रैनि दिवस दृग नींद.
हरि र नि० एलोवली । 90 न आवै दुसह दपट को रक्षी !! १ ॥ सरणा सिंधु सुरलि खगपति सों नेह अचंल को गहती ॥ किप मलि गम्य शचना भतो छन छन रहती रही । २०॥ हे... जसरी बार नागर से पारती नही ।। कमल नयन गों डरती नही । श्याम लग रंग सुख काडु जैसे चितईन सोरी भरती नहीं । हशित लोहन साव कुवंजा सों बनती रहीं ॥ ॥ नलिई च..इ मोहन की इस गरती नहीं ॥ विजप तस हार : जोन तीनही ॥ २ ॥ ताल होरी की तो ::'। उतानिय सुंज घन सो टरती नही ॥ अयन: : ३. सीप रारती नहीं। कोजग जगणे मारहारी :: भरती नह॥२॥ मौन रूप निज प-यो दूतों isine जलजागचपल चरख सो बरतीनी ॥३।। को न पनि सारतरही अनव भवन पहा राजाले बने हृदय से गरती रही कार ! जाइर बालों डरती रही॥.१ ॥ सोचे तर पालन कर रही ॥ विश्व रूपं पावक विनु रविशति री ॥ २ ॥ शेषता ॥ गहा अब रामको प्यारे एनुग १. तिने हारे काबू नहिं हाथ आ.रे। ... प को पगल डारे लखो जंग झूठ मतमा बन्न ॥ १ ॥ ऐसत ॥ विनय महावीर नी मेरो दयाहारिन माला रनि वोटि तन सोहें निरखि शिर छच मनमोह ॥ सदाचरल कोसीमा पाहै तेरी ॥ १ ॥ साहे भूपेण अग्निमें वरूणरंग सुरंग ॥ सिटि रजि चन्दबहुतेरो साहै माला मजिन दोरो ॥ २ ॥ त बलर चोहि तनुव नन दहन छवि साहे ॥ अझै सलता सुतिरो हुँदी कानों पहूं मेरो ॥ ३ ॥ जलधि गोपाद से कीन्हो संदेशा रस का दोगे जरों पशु नाल को टेरी शरन है विश्व को तेरो ॥ ४ ॥ .. बन्न । सेल संत रघुजल दिनेश देखत समाज संकुचे सुरेश ॥ नित नूतन घर र मह उछाह दाहूको डर नहि विविध दाह ॥ वहां क..जो पियें मान जाय ते.ह पुरनियो सकतगाय ॥ १ ॥ देवनि कसा लियं समेत जावत स्वररुचि ताल देत ॥ गह गह धुनि चहुंविख सप होत मगन जैसे रंकभूप ॥ २ ॥ राम रागवसंत । खे- लत वसंत श्री महावीर बलसागर रबि सम तेजधार ॥ श्री अंगाध मारुत, ॥ ॥ .
१२. हाँ र हर स०- नि० पदावली । कुमार मजराज पापके हरि उदार ॥ प्रभुविश्वरूप रघुबर अंधार वरदान देहुः करुणा अगार ॥ २ ॥ ठुमरी ॥ श्याम रूप नबसों दृगहरे ॥ विकल होत मनकल न परेरे ॥ कहे जोवन मधुर रुचि कर अति मुरली टेर फेर चितदेरे।। हंसनि चातुरी चकृत चपलता नहिं पटतर हेरेडं बहुतेरे ॥ ५॥ गौवन के संगबालन लीन्हो कर कर जारि डगर चहुंघेरे ॥ विश्वरूप लीलाधर मोहन रैनि दिवस सखि चितमा वसेरे ॥ २॥ ठुमरी ॥ मल तेरो श्याम जवानी निरखत नैन अघानी ॥ रचि रचि विरवा पान सवारे दशन अधर छवि खानी ॥ तिरछे नैन हरत हरिजीको लसत ललित मुसुक्रानी ॥ १ ॥ पीत वसन छविचितको हरत है भूपण भूति निशानी ।। विश्वरूप मोहनछछवि तेरो लखि अनंग सकुचानी ॥ २ ॥ ठुमरी ॥ देखो देखो रे श्याम को सचि- राई ॥ कुंडल चपल करण महराजै मुखमुरली छविछाई ॥१॥ पीत वसनति अधिक विराजे लखि टामिनि सकुचाई ॥ २ ॥ मणिगण हार सुझवि उर शोभित मानहुं सिमिटि सूरशशि आई ॥ ३ ॥ विश्वरूप मनमोहन मोहन हरत फन्द दृगकी चपलाई ।। ४ ।। भैरवी ॥ राधिका संग श्याम सिधारे ॥ . हम सबते कछु वात कहत नही कपट करत सुरलीधर प्यारे॥ १ ॥ कहां गये मन मोहत मोहन अलिहम खोजति कुंजलतारे | चंचल नीति करत हरि हमसन कहा कहाँ सखि मोहन कारे. ॥ २ ॥ विश्वरूप हरि विरह विकल भई जाहत सव सखि यमुना विनारे ॥ ३ ॥ भैरवी ॥ मला नारे मोहन प्यारे सांवलिया नन्दलालारे ॥ नेयन लगीचितको ठगी लागी काम कमान ॥ वनवन सुधि कहुना मिली गये कहारी कान ॥ १ ॥ सुवर छैलसंग राधिका करती बहुत गुमान ॥ विश्वरूप धुनि वांसुरी लगो, विरह कोवान । ॥ २॥ भैरवी ॥ मिलनारे मुरलिया वाले सांवलिया मोहि : प्याररे । पोत वसन काछै भली वन माला छबिखान । चितवनि दृगो रसभरी निरखंत हरिले पन:१॥ तिलक भाल शोभा भली झलक कोटि.सत भान विश्व. रूप मनमा सीकिये सरसनों गान ॥ २॥ खेमटा ॥ वितत सवदिनवां नाह- करे ॥ नहिहरि भजन शरण नहिंगुस्के होइहै यमगण गांहकरः॥ १ ॥ कु. मति कुसंग सनेह बढ़ाये मोहभार सिरवाह करे ।। विश्वरूप मुनिपुनि पछित हो पैहो दुख उर दाहकरे ॥२. ॥ खेमटा ॥ सूरतिया पनि हारिनि भईमार। विनाकूप विन डोर भरत जल पिवत मगन नितरह बहुओर ॥ १ ॥ चिकुटि भवनवां रहति मौनवां कौनहु समय न लावति भार ॥ २ ॥ विनु टीपक,घृत वाति अनल-बिनु ज्योति वरत नित रहत अंजार || ३ ॥ काम लोध लहं + १३. । हरिहर सणानिए पदावली । सलस नहींहै विपय वायु नहिं करत भकोर ॥ ४ ॥ नूर जहूरझरतहै झला • भल नहि तहं. आसवास जगघोर ॥ विश्वरूप.गुरु गम्य अगमहे लखे मिटः मायाकृत घोरः ॥ ५॥ खेमटा ॥ सुरतिया लागि रही हरि ओर ॥ विषयविः बस जनिलावा भोर ॥ ५ ॥ सुरति. निरत.जे.पान करतुहे टूटिजात संनकर- सत्र जोर ॥ २-|| ज्ञानध्यांन यह महा रतन है ताहि हरत नहिं कबहूंचार ॥ विश्वरूप.हिया मगन भयाह मेटि गयड़ सब जगकी खार ॥ ३ ॥ भैरवी ॥ वेद वेद्यराम चन्द्रहरे प्रभो गहो.. मन, माधो केशो बंशीधर हरि गोसुर- नन्दन पीतांबरधर चापपाणि भव मोचन सियवर ॥ ॥ सिद्ध महीधर. केसि निसूदन गोप बाल सर्वेश्वर श्रीपति शोक निकन्दन जग जीवन कर ॥ २ ॥ श्रीशः गदाधर जग: चंदन प्रभु. पारब्रह्म अखिलेश्वर निधिपतिः फन्दनि कन्दन मुकुंद मुरदर ॥.३ ॥ अभय.भंजन तेज रासि बर अविनाशी अन परशुराम · मधु सूदन जनमन मोहन भय हर ॥ ४ ॥, बुद्धि सुखा कर परम पुरातन लोक. नाथ, विश्व श्वर: वसु पति काली मर्दनः नासयण नर्. ॥ ५ ॥ सत्य दया निधि- अकल समीरण हंस बंशईनेश्वर सत..पत्तिकर्दमः नन्दन बिश्व: सूप पर: ॥१६, भैरवी : नन्द, सुवन भुवन विदित शोक को हरैया:॥ चलत: चाल अति रसाल राजित छवि दृग विशाल बोल केलिः कारतः हात जन मन सुखइ दैया: १-१. ॥ सजल- अमल, कमल 'चार सरिस बदन छवि अपार :राजित रद शोभा, पर, अधर अरुन चैया ॥. २. शरदः चन्द मन्दा हास मान्द्र उदधि घटज राशि- बोलत बसवैन ऐन- साधु उरः बसया , ३: ॥ माता सुधि, विसरि गई: निरखत दृग नाहिटरी सुख अगार:- अटके मन चित्र सम रहैया ॥ ४ -11-करत-केलि प्रभुः अपार मुनिः जन मनः वन विहार घिणि भार हरण शरण दीन दुख हरैया :॥१५ ॥ शंकर अजः देव: नाथ आवत नितः अमर साथ गावंत प्रभु,गाथहाथ जोर परें पैया. .. ६. ॥ व्रज जना भये अति अशोक जैसे रवि निरखि कोक कमठ अंड सरिस- नन्द लाल-उर सुहैया- ॥ ॥ विश्व रूप मेन. सुचारु राजिल ब्रज़ वरबि हार बिहरी निशि बार काम कन्स- को-नसैया ॥ ८ ॥ रागः परज़ ॥ मना रे अव निज रूपःनिहारो ॥ जेहि देखे जग होत समन सम सानु निकर:- जियारो॥ १॥ अगमः अविद्या रजनि नसानी ज्ञान विचार- अपारो ॥ विग: से सरोज भये-मुकुलित: अति मुकुद दुसह दुख : भासे २॥ चकई बुद्धि मिलत निय, पिय से छुटो हे वियोग बिकासे॥ बिश्वारूप पूरण जग माहीं। चार खानि विस्तारन हारो॥५३॥ रागः परज़ -॥ गहु मन अजहुं शरण स्पुर, . H - १४ हरिहर स० नि० पदावली । वरकी ॥ दोन बंबु प्रभु जगहित दारमतीवन छन अति निशि दिन हरकी ॥. दर पाई जिलि नीर बरंतु है तैसे तःधन जन ढरकी । यह तन की कछु अवधि न दीखते नदी-सूल जिमि गति तश्वर की ॥३॥ दामिनि दमक चमक जिमि घिर नहि अयसो घरखी भोग अमर की। तामहं हेतु करत निशि वासर सुधि नहिं काल रोल कुंसरकी ॥ ३ ॥ सोधन का अवसर भल पायो दुर्लभ साज लहेउ नर तनक्री ॥ विश्वरूप जगर्द श हेतु कर छेडु तुरित मनश अंपरकी ॥ ४॥ राग परज ॥ क- हत पधिज्ञ रघुबरीह निहारी ॥ श्याम , वरण्य हतिः अति अतुलाई विधि निन करतें सबारी ॥ १ ॥ जति सुझुमारी संग वर नारी शोमांति सचि- कारी : शरः चन्निसा र चन्द्र सरिसे बदन उजियारी ॥२॥ गौर.. वरण मन हरच निरजि छवि नैन पल्ल दिया टारी ॥ सुनि अद्भुत छवि देखन झाये यास नगर नर नारी ॥ ३ ॥ बांटक भवन धरणि विकट अति' कैसे को चरण मगु थारी ॥ विश्व रूप सब कहत परसपर धन्य जनक अरु पनि महतारी ॥ ४ ॥ परज ॥ अवलों भुलानों अपना मुलेहाँ । गुरु प्रसाद ते निशि दिन अनुछन हरि-मेहं प्रीति लगेही । चाहं दाह उर मांह घनेगे व रि विचार वुतेहीं ॥ माह ताल परिवार अनेकन्ह · करि प्रभु सुरति नहीं ॥ १ ॥ ग वन ढाव अनले चढुं दिशि अति तामह' पगु नहि देहों ॥ मार तोर दुखं सागर परि हॉर विशुटी भवन बनैहों ॥ ३॥. पाप पुन्य झरिके हरि गंणं दोउ तोके वीच न नहीं ॥ अमृतं.रस कर पान निरंतर लहि सुख मोंद वहीं ॥ ४॥ मन अति चपल फिरत जहं तह नित ताको वेग वटैहो । विश्व रूप निक रूप अजायव पूरण एक समै हो ॥ ५ ॥ परजा दिनु रघुबोर न बनिनसाई ॥ यह जग जालं क- राल दुखद अति छूट न वर उपाई ॥ १ ॥ध्रुव प्रहलाद अंबपि नारद सनकादिक समुदाई । राम नाम रस झमिय पान करि विहरतशोक विहाई ॥ ९॥ वाल्मोकं घट संभव मुनिवर जपेउ नाम मन लाई । ज्ञान भवन सुख रूप भयो है चहुं दिशि कोरति छाई ॥ ३ ॥ अनहूं मानु जानु हित अपना छोड़ो. यास पराई । विश्वरूप सुख सिंधु दानि हरि केवल गहु श- रनाई ॥ ४ ॥ राग खेपेटा ॥ रघुबर केहि अपराध विसारे ॥ जो प्रभु धर्म शोल कहं तारत रेपो वानि तुमारे । तो कत वेद पतित पावन प्रभु ऐसों विरद उचारे ॥ १॥ गींघ कवन सम दस व्रत कीन्ही गनिका का तपधारे ॥ अजामील द्विन बंधु शुमगुं रत ऐसी अंधमन्ह तारे ॥२ । निर्वल केवल 1 हरि हर स० नि० पदावली। १५ आपु दयानिधि निरर्थन धन हित कारे ॥ भारत सहि न सकतःजन को प्रभु हर गिरि तें अति भारे ॥ ३ ॥ केवन नाथ भरोस तुमारो तजि जग द्वन्द अगारे ॥ विश्व रूप प्रभु, बेगि दया करि हरो मोह मद मारे ॥ ४ ॥ खेमटा ॥ करमं गति कहि नहिं जाई ॥ वारम डोरि बंधन अनादि के फं- सेउ भुवन समुदाई ॥ १॥ तेज पुंज गुण'खानि दिवाकर शशि छवि यानि सोहाई ॥ अमित कल्प बीते मरमत नभ अंजहुं न नेकु थिराई ॥ २॥ य. दपि शेष सर्वेश सनातन महिमा वल बिपुलाई ॥ धरणी भार घरत शिर पर नित म्कत न फन्द छोड़ाई ॥३॥ नयन कार ना जग लय कर हर विदित अमित प्रभुताई । भिजाटन कपाल कर डोलत भवन ममान वनाई ॥ ४ ॥ जो बामन नगदीश लोगि पढ कीन्हे भुवन निकाई ॥ विश्व रूप बलि द्वारे ठाढ़े गहन करम तें बंधाई ॥ ५ ॥ परज ॥ पढ़ि वेद स्ति.वन हारे ॥ बांची वेद गही नहिं सांची चनत कुनगु निशिबारे ॥ १ ॥ फूलोहे फूल फल लागत नाही समुझि होत दुख भारे ॥ मन पतंग बसि काम पवन के धावत विषय विकारे ॥ २ ॥ निरखत भोग जगत के मृग जलचल जल बाढ़ि करारे ॥ विश्व रूप तेहि नेह लगायो तजि हरि नाम पियारे ॥ ३॥ परज ॥ अव की वार,कहो हित हेरी ॥ सुत वित गेह सनेह सजन की से जल गति पुरइनि केरी ॥ १ ॥ करम गहन बन घेर दहन कि पहा दुसह दारुण दुख फेरी ॥ विश्व रूप गहु गुरु पद सुख निधि बचिहान पान उपाय घनेरी ॥ २ ॥ परज ॥ जय जय दीन बंधु रघुराई ॥ ब्रह्मादिक सुरगण मुनि जेते अस्तुति जरत पार नहिं पाई ॥ १ ॥ धन जन रूपते. नाहिं मिलत हरि एक भक्ति ते होत सहाई ॥ २ ॥ ग.. को विभव कळू नहिं आहि भारत जानि कर प्राण बचाई ॥ ३॥ सब गुण युत द्विज भक्ति विमुख हायतेहि तजि भता स्वपचते मिताई ॥ ४ ॥ है व्यापक मज निर्विकार हरि निज जन हेतु रूप प्रगटाई ॥ विश्व रूप रघुबर कृपाल प्रभु बेगि ह- रो मन की कुटिलाई ॥ ५ ॥ राग परज ॥ देखो रे हरि बिनु जीव दुखारे। ॥ परे आट मति खाट भुलाने नाना भेद बिकारे ॥ निज स्वरूपं सुखरूप सनातन सत् चित् वेद पुकारे ॥ ताहि न गहत बहत मायो बस कामी काम कुधार. ॥ १॥ यह तन क्षणिक नित्य करि मानत अहमिति रथ पगुढारे । नेकु थिरात न भ्रमत दिवस निशि झूठे बिषयं पसारे ॥ २ ॥ सुत प्रिय वचन सुनंत हरये उर तीय सो प्रीति अपारे | धन संचत बहु भांति यतन करि अंत होत सब न्यारे ॥ ३ ॥ कस्यासिंधु वसत घट भी- ॥
ga हरिहर स० नि पदावली । ॥ - तर अजहूंचित गोरे ॥ विश्वरूप - अंतहु पछतैहो : जब-जैहो यम द्वारे Fil.४ ॥ भैरो भा. चलत अंगनवा : रघुवर चालं ॥ दधि आदनं मुखं मिल "पठाये चितवत तिरोछे नैन विशालः ॥ ॥ वोलत श्याम मनोहर वानी सुनत संमै जन होत निहाल लपना भरत संग सोहत शहन पैजनिया पगु देत है ताल । विश्वारूप पितु मातु मगन भये लूटतरक धन जिमि माला राग भैरो ॥ परि कमाई जग में तासु ॥ श्रवण कंया रसपान करत नित जीह निरंतर नाम नंगांसु बनेननतें हरि रूप निहारे शीस नवावे हृदय हुलासु ॥ करनारे नित वंदन करई प्रेम नीति कंवहूं न अघासु ॥ विश्वरूप सतगुरु वलिहारी राम चरण महं जेहि नित वास ॥ ३ भैरों ॥ नाश्य अजाडु मोहि करहु उवार॥ नाथ मान करु नाथटया करोनाथन हा प्रभु अरन 'तुम्हार ॥ १॥ वनजं नयन होवननहित राजित बदन वनजः रिपुसत रुचिकर ॥ २ ॥ लक्ष्मी पति लक्ष्मी सागर प्रभु सब लक्षणः गुण और अंगार :-३ ॥ विश्वरूप प्रभु देखु दया-करि केहि अपराध न मुनत युझारः॥ ४ मेरो ॥ हरि इच्छा को मेटनिहार साहेवं एक अहै. करतार : १ ॥ जो ईच्छा से करत दयानिधि दीनबंधु प्रभु परमःउदार ॥ २॥ जो सिरजत पालत सेंबही को हरत सभै प्रभुः कृपा अंगारा ३ ॥ जि- न जस मति देत कृपानिधि तिनके उर तंस बसत विचार ॥ सवाल : कर्म फल दाता रघुवर ह्य निलेप. जगत आधार ॥ ॥ भक्त हेतु प्रभु-ब- पुरि प्रगटन, लीला करत सकलः सुखसार ॥ ६ ॥ प्रयत पाल प्रणतारतमा चन गावंत वेद लहत नहिं पार ॥ विश्वरूप शरणागत आये पाहि पुकारत तुमरे द्वार ॥ ८ ॥ राग परजः ॥ अानन्द रस पिया- मनुवां हमारे येहिमें म- गन रहे निशिकार ॥ जो रसपान किये सनकादिक मेटेउ सकल जगत के भारे ॥ विचरत सटा रुकल लोकन में नहिं कछु गहत हैं हर्ष विकारे ॥ २ ॥ गिय शुदेव लहेउ सुम्ब सागर मेटेड हानि लाभ टकसारे । यह रस को महिमा जानतु है शंकर, शिवा पिये यकतारे ॥ ३ ॥ काग रोजः पीयड़ मन लाई जीतेउ माया कॉग्न कुधारे ॥ जा पोवे सो युग युग जीवें निज मु- खते गावत श्रुति चारे ।। विश्वरूप यह रस हिंय आवे जव रघुवर पंद करै अारे ४ ॥ रागभेरो ॥ नहिं वनयोग अहै रघुवीर सुनतः मवन वन सभ अधीर । १॥ भयेउ अवधपुर महं पछितावा लागेउ कठिन हटय तिमितीर। नर अरु नारि सकल पुरवासी भूख नोंद नहिं कछुक शरीर २ ॥ विना खबार सब जहां तहां डोलत जैसे चलदल पत्र समोर ॥ हा विधि तोकहं ॥
हरि हर स० नि० पदावली । पं० ॥ अस न चाहिये राम वियोग देन दुख पीर ॥ ३ ।। विश्वरूप प्रभु बिना बिकल भये यथा फणिक मणि बिनु नहिंथोर ॥ ४ ॥ भैरो चिकुटि भवन 'वां पियावसे मार ॥ बिना सूर शि अनल अंजार ॥ १ ॥ नहिं उपजे नहिं विनसे कबहूं आवत जात न कवनिहु और ॥ रात दिवस तहं होत कबहुं नहिं संध्या नहीं होतह भोर ॥ २॥ आनन्द भारत एकरस निशि दिन सु. रति करे जिमि चन्द चकोर ॥ निरखि स्वरूप मगनमये मनमहं सहजै मिटै सकल भ्रमबोर ॥ ३ ॥ विश्वरूप धनि सोई सोहागिनि त्यागि सकल पिय चरण निहोर ॥ ४ ॥ मेरो ॥ ज्ञान खड़ग लेइ निशिदिन जागो वीर भावरस मनुवा पागा ॥ १ ॥ समदम फौज करो तैयारी,धीर धरो रनतेनहिंभागो। काम लोध दोउ रियुको मारो करिले राज सकल भय त्यागो ॥ २ ॥ सुभग विचार प्रजाके बसावा छोडु सबाल चित कलिमल दागी॥ रामको नाम सुधा- रस पोयो तेरो वेगि जगत को धागो ॥ ३॥ विश्वरूप जनि गाफिल परि- ये रामचरण करो दृढ़ अनुरागो ॥ ४ ॥ राग भैरवी ॥ कन्हेया मे.से होत न राजोरे ॥ चहुं दिशि ढूंढत नहि कहुं पायो मधुबन भाजीरे ॥ १ ॥ चलहु मनावन सखि सब हरिको भूपण साजीरे ॥ विश्वरूप मुरली मोहन की सखि कहुं वाजीरे । २ ॥ राग़भैरवी ॥ भोरहिं श्याम न आवतरे ॥ श्याम मिलन को चितमें चहतिहों इत सखि मोहिन भावतरे॥२॥ अबतो प्रीति किया गधे सो कुंजन केलि रचावत रे ॥ विश्वरूप यशुमति लालन का चित- वनि चितहि चुरावतरे ॥ २ ॥ भैरवी ॥ मधुवन श्याम बुलावत रे ॥ लाल अधर मोहन के चहतिहों वित मगु कोंन बतावतरे ॥ १ ॥ वंसीराग रुचिर मे हनको वरवस मनहि नचावतरे ॥ विश्वरूप बहु यतन करतिहाँ धोर- ज नेकु न पावतरे ॥ २ ॥ भैरवी । कन्हैया तेरो छबि दृग लागीरे ॥ कुसुम कमान वान ते वेधै विरहते पागीरे ॥ १ ॥ जलज नयन छवि अयन हरत मन सब निणि जागीरे ॥ विश्वरूप हरि कुंजन विहरो यह बर मांगी रे ॥ २ ॥ भैरवी । कन्हैया मोहि दोन्ह बिसारीरे ॥ गये परगेह सनेह बढ़ायो सुधि न हमारीरे ॥१॥ जेहगिरि बन महं केलि किया है श्रीबनवारी रे॥ विश्वरूप से थल निरखे तें दुख उरभारीरे ॥ २ ॥ भैरवी ॥ भोगहि योग न भावतरे । गंग यमुनको घार दुरायो जलकन आसपिवावतरे ॥ १ ॥नित नइ नेह करत कुबरी से रचि रचि योग पठावंतरे ॥ विश्वरूप असमति मे हन को सखि अब कौन छड़ोवतरे ॥२॥ भैरवी ॥ सो कहि योग दुरावत रे ॥ इंगल पिंगल सुख मन घर सौ छन छन वोध जगावत रे ॥ १ ॥ नाइ ॥ ॥ ॥
हरि हर स० नि० पदावली! - . गगन विच भवन बनावों जेहि थल काल न आवतरे । विश्व रूप धुनि होत गगन मां निशिदिन मनहि वसावतरे ॥ २ ॥ भैरवी ॥ नोकहिं श्याम निहारतरे ॥ श्याम हरत मन तुरित ताहि को वरवस जादुहि डारतरे ॥ १ ॥ काह कहांसखि छवि आनन को विधि उर शोच पसारतरे ॥ विश्वरूप भूषण मोहन को छवि रवि कोटिन्ह यात रे ॥ ३ ॥ राग भैरवी ॥ गति यालखि नहिंजाई तेरो हे श्यामा दृग चपलाइ रहत मन आइ मेरी ॥ सजल पयोद सरिस तन राजे अंग अंग कमनीय कांति मनोहर निक्षि मनोभव सकुचि. सकुचि रहे होय उपमा में किन को गाइ ॥ १ ॥ गौ चरायन जात वृन्दावन वाल वाल संग लोय जेसे मीन विना जल प्यासे तलफि तलफि तजेजोय तुमने माहि जादु लाइ ॥ २ ॥ विश्वरूप मोहन वनमाली जीवन धन व्रज तीय ॥ बदन कंज मकरंद मधुप मन हरपि हरपि साइ पीया. अवरना माहि सोहाइ ॥ ३ ॥ राग भैरवी ॥ उपमा कहि नहि जाइ तेरी हे रामा छबि रुचिराइ सुखद चित. छाइ तेरो ॥ लखन सहित विहरते वाहमा निधि नट बर साज करीय ॥चितवनि मन भावनि अति सोहै. पुलकि पुलकि उठेहीय ॥ सरसिज नयन से हाइ । १ ॥ सघन सोहावन वन विहस्त हरि करशर धनुष धरीय ॥ वनचर जाति निरखि छवि हरिके मुभि कि चरण परीय ॥ दृगन तें पला दुराइ ॥ २ ॥ विश्वरूप सुखरूप सनातन जनमन कंज अलीय । करि हरि कृपा टरश मेहि दीजे कलि दुख देष दलीय ॥ अविचलि तेरो प्रभुताई ॥ ३॥ राग भैरवी ॥ सुखमा अति अतुइ तेरो हे शंभो ॥ छवि ललचाइ रहत, मन जाई तेरो ॥ कुंद कपूर सरिस तन . राजे गल माला अहिकीय ॥ कर डमरू धुनि रुचि कर सोहे सुनत सुनत सुख होय ॥ दुख दर्शन तें नसाइ ॥ १ ॥ बाम अंग गिरजा ढुंगी- शोमा, अति रमणीय ॥ शोसगंग रुचि चन्द मनोहर भालपट ल छविदीय ॥ भसम सुअंग सोहाइ ॥२॥ विश्वरूप जगदीश निरंजन जनहित रूप धरीय." बेगि द्रवो करुणा गुणसिंधौ तारेउ विपुल अघीय ॥ मेरी सुधि क्या बिसराइ ॥३॥ राग भैरवी ॥ कन्ह या संगयारी नाले होरी ॥ यावंशी मेरो सरक्स खोयो जादू किया गिरधारी ॥ १ ॥ तवसों सुध्वुिधि सव हरि लीन्हो नहि. सोहात घर व.री' ॥२॥ विश्व रूप ब्रज,लाल सांवरों हंसि हरि मोहि निहारी ॥ ३ ॥ राग.भैरवी || कउल दियो टारी न.ऐ हेरे ॥ अंत स्मैसा हरि विठुरायो पाछिल नेह विसारी ॥ १ ॥ अव तो कन्हें या सुखसों सोयो राज काज़ भयो. भारी: ॥ २ ॥ विश्व. रूप. विधि - सब. सुख.खोयो पर बस ॥ ॥ .
हरि हर स०नि० पदावली । ११ ॥ .. . भयो बनवारी ॥ ३ ॥ रोग ठुमरी ॥ हमारे मन साथे. लई चितवनि ऐसी छलियां. ॥ अमल अभंग बाल रबिकेछवि कुंडल झलक. नई.॥ बोल अमोल कलोल केलिवर मनसिन कोटिनई॥ १ ॥ अचल प्रतोप राज़ सब दिशिनये कीरति तेज सई ॥ दशरथ लाल .कृपाल नृपति भये सव दुख दूरिंगई ॥२॥ वाहत निहारि निहारि नारि सब विधि सुख अवधि दई ॥ विश्वरूप सुख धाम मिला हरि जीवन सुंफल. भई ॥ ३ ॥ ठुमरी ॥ हमारे ब्रज वाते नई मुनि आई सव सखियां ॥ नवल किशोर श्याम छबि छायो. पटरत बिधि 'न:दई । कमल कुरंग मनोज: लगित भये. कोउ सनमुखः न भई ....१ ॥ रेनि व्याज रबिजाय छफ्ति भये शशि तन छीनभई. ॥ बाल तमाल; सघन वनमह गये तगि घन. सघन रई..॥ २॥ कलमद त्यागि,मौन भये कोकिल जल निधि प्यार मई ॥ विश्वरूप यदुलालन के सम कविगण बचनगई ॥३॥ ठुमरी ॥ निहारी मन पापमई छाडि कपट मतियां ॥. अपने लापु आपुमह मिलि गये पूरण रूप. भई ॥ सब अल सिंधु सिंधु सब जल भये मिन, पर, भेद मई ॥ १ ॥ जग मग ज्योति अगम उर छायो छन छन पुलक नई. ॥ विश्वरूप पूरण, सुग्यपायो गुरु पद अलख दई ॥ २.॥ ठुमरी ॥ विचारे बिनु सचिभई. देखा खालि अब अंधियों ॥ बांझ किशोर चापशर करलिये विहर- न विपिन गई ॥ करि मृगया मन माद वढायो गर्भ नजन्म लई ॥ १ ॥ धाइ बचन बाल सुनि विहरे मन अनुगम दई ॥ विश्वरूप. जग अंध वंध वस मनशियो विषय मई ॥ २ ॥ ४ ॥ ठुमरी ॥ का करव सांवरबहुसंगिया । ना सुने कंहल हमारि सखि. रे ॥ मंद हसनि मन रोच नीरे.शोभा अति रुचिकारि ॥ फर मुरली मुख में दियोरे अपना वंसकरिडारि ॥१॥ चन्दकि- रनि मन माहनोरे साहे उर उजियारि ॥, विश्वरूपःजलना भरव हो यमुना हरि रखवारि ॥ २ ॥ ठुमरी ॥ ना सूझत रघुवर बिनु अंखियां ॥ को. सहे विरह कटारि सखि रे । श्याम वरण मन मोहनी रे जैसे घन युतवारि . मुख की शोभा को कहे रे.मदनामित छबिधारि ॥ १ ॥ व्याज विपिन, सुख मेोचनी रे कीन्हों विधि बन चारि ॥ विश्वरूप अब ना जियव हो बिछुरे प्राण हमारि ॥ २ ॥ टुमरी ॥ ना उरत छन छन मन रंगिया ॥ का कहो बहुतं पुकारि हरिहो. ॥ काम कपट पटमोहनारे ओढ़े रंग. सवारि ॥ विषय भवन बसि बोहरे हो.सखियां संग सुधारि ॥ १ ॥ प्रीति चरण भयमोचनी- हो दीजे उर रखवारि ॥ विश्वरूप नभु ना बचब हो शरण भरोस-बिसारि ॥ २ ॥ ठमरी लेखत रहहिं संख:कर बि अंखियां ॥ नाटरे सुरति हमारी हर - .
हरि हर स० नि० पदावली।. - -- हो, चन्द गरल शुभ सोहनी रे गंग जटा दुखहारि । अहि भूपण डमरू लिया हे गिरिजा वाम पियारि ॥ १ ॥ कुन्द बरण मन मोहनी रे कोटिन रवि उजियारि ॥ विश्वरूप मे वो अवशोक हरण त्रिपुरारि ॥२॥ ४॥ : ठुमरों ॥ मजा हरिहो काम कोटारी॥ हृदय नयन उघारि देखो नगत दुख कारी ॥ ताहि मांह सनेह लायो विषय सचि मारो ॥ १ ॥ शुभं अशुभ जंजीर तारो बैठु घरहारी ॥ अलखरूप अनूप निरखो मोहमदनारी ॥ २ ॥ विश्वरूप विचार देखो विदित दशचारी । विना राम दिनेश तेरी उर न उनियारी ॥ ३ ॥ ठुमरी ॥ लखो छवि हो रामको न्यारी । दृग विशाल कृ- पाल प्रभु के कंज रुचि धारी ॥ १ ॥ श्रवण कुंडल चपल राजे कुटिल कच कोरी । तिलक भाल भूपाल मणि के भानु उजियारी ॥ २ ॥ रुचिर वसन अमोल सोहे वाम सियप्यारी ॥ विश्वरूप सरूप हरिको ध्यान भयहारी॥ ३॥ ठुमरी ॥ चला सखिहा श्यामके वारी ॥ शोत मन्द सुगन्ध सोहे छायोपवन गति न्यारी | जुन कुंज अनूप सोहे कुसुम रुचि कारी ॥ १ ॥ देखि छवि सुर रांज मोहै चकित चितभारी ॥ करत केलि मनोज मदके मथन बना वारी.॥ २ ॥ रुचिर वाल अमोल सखिरे विवस करिडारी ॥ विश्वरूप हमेस मनको हरत गिरधारी ॥ ३ ॥ ठुमरी । लखो गतिहो ज्ञानको न्यारी । सुरति देत विसारितनके दशा मतवारी ॥ निज सरूप असंग विहरे जलज जिमि. वारी ॥ १॥ जानके हरि झपटि छन में लपटि नख डारी - लोभ माह . मनाजगज को अमित ढल डारी ॥ २ ॥ विषम भेद भाव जगको कुमति मति टारी ॥ विश्वरूपं अंदेश छूटो अभय वनचारी ॥ ४ ॥ ठुमरी ॥ यशी- मति वारो देखो रावरो कन्हैया मटुकि पटनि पट लोन लियोहै ॥ देतह गारी कहा माने न हमारी कछु वरजेवनेको परत हो पैयां ॥ १ ॥ आलिके वचन सुनि यशोमति मन गुनि विहंसि मवने कछु उतर न दैया ॥ २ ॥ विश्वरूप लखि भइहै मगन सखि ॥ भरोहै पुलक जल नयनन छैया ॥३॥ ठुमरी ॥ हरी मन मेरो प्यारो सांवरो कन्हैया लटकि भवर मुख कंज दियोहे || दृगसो निहारि हंसिमोहि क्तवारी सखि ॥ तवसों ठगोरोघर न.; सहिया ॥ १ ॥ शशिको निहारी, जैसे तरु को पुलक भारी रविसां जलनं. पुलकांवलि थैया ॥ २ ॥ विश्व रूप ऐसा छवि पट तर कैसो ॥ विधि मति छीन लियो ब्रज के . बसैया ॥ ३ ॥ २ ॥ राग टोड़ी ॥ अंग छवि छाये घन नन्द के किशोर है । मधु पुर नर नारी नयन पलक टारी हृदयं निहारि बोले कैसे चिंत चोर है ॥ १ ॥ कोटि कोटि सुरं साह निरखि मनोज .
म ॥ हरि हर स० नि० पदावली । मोहे वन को सुभाग ऐसा विधि से निहोर है ॥ कमल नयन श्याम संग मोहे बलराम.आये धनुमख जहां नृप को बटोर है ॥ ९॥ मल्ल को पछारि मारे खल नृप नास डारे खंड खंड धनु तोरे जेसे तृन कार है ॥ कन्सको झपटि मारे धरणि को भार टारे विश्व रूप छायो यस ऐसो शिर मार है ॥ ३ ॥ राग टोड़ी ॥ संग दोउ आये बन मुनि के किशोर है । एक संग सोहे नारी मुख छवि अति भारी मोहनी मनोज नारी रवि सो अंजार हे ॥ १ ॥ सुनि के पुलक छाये मिलने का मुनि आये नयन सनेह जैसे.चन्द से चकोर है चित्र कूट के निवासी मुनिवर तपरासी भयो हे मगन देखि जैसे धन मारहै ॥ २ ॥ पुर नो पथिक ग्राम लखि प्रभु छवि धाम करत अंदेसा केस जनक कठोर है ॥ विश्व रूप सुरनाथ कहें पगु धरि माथ रघुवीर बेगि हरी भार चहुं ओर है ॥ ३ ॥२॥ राग बहार ॥ श्याम हमारा भावरी ॥ सुख दादरी वसन्त सुहावना ॥ फुलवा फूले बन भवरा लोभेले ठोर ठौर गुन गावरी ॥ १ ॥ रुचि सह कार वहारि मारिला कुसुमा कर छवि छावरी ॥ २ ॥ विश्व रूप वन वंसिया बजायो सुनत भई हम बावरी ॥३॥ वहार ॥ राम पियारा आवरी सुख.दादरी वसन्त पंचमी ॥ बगिया फूले घन वनवां फूलेलो मधुप मधुर धुनि छावरी ॥ १ ॥ मोतिया घने घन. धनवां लुटायो आवध प्रेम वसवावरी ॥ २ ॥ विश्व रूप दशरथ के छवीलो हसि हेरै करि भावरी ॥ ३ ॥ २ ॥ राग होरी ॥ आजु की वारी मानि क्यान लेरे कान्हा ॥ विनति करों में पायन करि के ज़नि कस मोतेरारी ॥ यदुनन्दन वरजो लरिकन्ह को राखहु लाज हमारी ॥१॥ जिन डारो रंग मोहन मापर भिजने है रंग सारी ॥ हमतो हैं अपने भवन को छोड़ डगरं गिरिधारी ॥२॥ सुनत सखी कर बचन मनोहर तिरछे नैन निहारी ॥ विश्व. वरजा नहि माने श्याम दियो रंग डारी ॥३॥ होरी काफी ॥ हाल की सारी फारि काहे दोन्ही कान्हा ।। फागुन मस्त बाल संग परिके वाउर बो- लतुह्मारी || लाज न सहिहों तोरे संग वसि के होइहे हांस हमारी ॥१॥ तजदे कुवाद वाद अब मोहन छोड घाटर वारी ॥ हमतो यमुन जल जैसे भरन को निन रोको गिरधारी, ॥ २ ॥ नन्द नगर कोइ नृप ना वसेरेना- करो नेति विचारी ॥ विश्व सुय हरि हेरि नयन, सी हंसि.दीन्हों बनवारी: ॥ ३ ॥ होरी ताल जलद || कान्हा खारि में करत रंग बोरिरे । जात रही. हम कुंज.भवन महं जहां रहत पिय मारिरे । बीचहि..महं, अस हाल, कियो सखि यदुनन्दन वर. जारि ।।.९ । मुख में दिया है. गुलाल लगाइ. ॥ - - .
हरि हर सा नि० पदावली. . .. 4- रतन हार लियो छोरिरे । काह" कहों में नन्द नगर महं होत धूम चहुं ओरिएँ । अति उतं पात करतं व्रज बान्तक कर गहि देतःमरीरिर॥ विश्व उप मोहन मंतबारे रंग मचावे वन होरिरे ॥ ३॥ होरी ताल जलद ॥ कान्हा चोरि से हरत पठ मॉरि रैः॥ जाय सखी हरि यमुन पुः लिन में नागर वाल वटोरित् ।। सब ग्वालिनि पट छोनि लियो हरि गर भूषण दियों तोरिरे ॥ १ ॥ जल में किया है. कलोल कन्हाई संग साहत वल जारिरें ।। काहं कंहों में नटनागर सखि धूम रचो हरिःहोरिरे ॥ २ ॥ कंबहु कदम चढ़ि जात कन्हाई जल विचं परत झकारिर॥ विश्वं रुपं सखि यशुमति बारे हंसि इंसिं हाथ मरोरिरे ॥ ३ ॥ होरी काफी - वृन्दावन पावन श्याम लोमाये ॥ चहुं दिशि गुंजन पुंज भवंर को सुख सागर धुनि मेदि वड़ायें ॥ १ ॥कार पिचकारी अविर कुम कुमा भरि कानन रंग नभं चहुं छाये । विश्व रूप के प्रभु होस हेरत बसत बांग होरि कान्ह मचायें ॥२॥ होरी काफी ॥ वृन्दावन लालन फागु मचाये ॥ चला सखि देखन नन्द कुवर को छवि सागर शत काम लजाये || १ | उड़त अरगजा. गुलाल कुम चुसा मन भावन सुख अमित साहाये ॥ विश्वरूप के प्रभु मन मोहन चहत साथ मोहि नाय वोलाये ॥ २ ॥ होरी जंगला ॥ काहे को नेह लगाइ रे माईनन्द के बाना ॥ नेह लंगाई मोहनी डारे कान्ह कान्ह चित छाई १॥ नेह वढ़ाई सांवरो मोहि विश्व रूप बिसराई ॥२॥ होरी ऊँगला . काहे को प्रम वढ़ाई रे माई नन्द के बाला ॥ प्रेम बढ़ाई द्वारिका वैठे श्याम वाम अमाई ॥ ६ ॥ घर न सोहाई वावरी कीन्हो विश्व रूप सुखदाई । २॥ हरी ॥ लाल.कुचाल न घारो ॥ अब बोलो न निलज देहे गारों फोरि देही घेट भारो ॥ नन्द वारोनं नजरि लेही तासे लूटि लेहों धन प्यारो म १॥ रंग वो न विगरि जेहे सारी छूटि नेहै रंग सारो ॥ विश्वरूप प्रभु पैयाँ गहतह चंचल दृगन निहारो ॥ २ ॥ होरी ॥ लाल कुचाल नं प्यारो संग ने.रों न बिछुरि जे हो मासे छोड़ि देहो मंतवारो॥ रंग डारो न नजरिला वो मेसे खेई दै हो पटसारी ॥ ५. हसि बोला न विगरि जेहे माधो मोहि देहो दुख भारो ॥ विश्वपरू प्रभु. अरज करत हा मोहन हंसि न निहारे । होरोधी माता ॥ हरि खेले रिमोहन धायधाय ॥ खेलतरंगसंग ग्वाल- न ले वनवासिन सो जाय नाय ॥ १ ॥ डारे अवीर तीर यमुना के पिचुका- रिनं रंग लाय लायं ॥ छीनत विखरूप भाजन को दघि ग्वालिनि के खाय खाय । हरीधीमाती गा प्यारि अवरि मोहन पांय पांय हेरंत श्याम १ हरि: हर स० नि० पदावली :- ३ . वाम. नयनिनको,बनमालन को.लाय. लाय ॥डारत रंगसंग.,सखियन्ह के घने बुन्दन सो छाया छाय ॥ हेरत विश्वरूप लालन को सखि रागन-को गाया गाय ॥२॥ होरी ताल जलद ॥ कान्हा तोरि भारि.नजरिया कवन विधि टारों ॥ तारि नजरिया. अंग में लगारि मारिहाल निहारो॥ १ ॥ नन्द किन: गरिया रंग से भरि मेरी: काह पियारो ॥ विश्वरूप प्रभु संग में वसारी चेरीश्याम तुम्हारी ॥ २ ॥ होरो ताल जलदः ॥ कान्हातोसे हासन गरिया कठिन नन्द वारो ॥ तजब. नगरिया अवनावसे रि घेरी राह हमारी ॥१॥ चटक चुन्दरिया रंग सो भिजाई मेरी सान. बिगारो ॥ विश्वरूप प्रभु हंसि के मिलोरी दे दृगः श्याम निहारो ॥२॥ हारी जंगला. ॥आजु नारंग लालरे मै तो छांडोंगि अबिर गुलाल सैयां ॥ पिय तोरे वैन सोहावन लागेनाहै चित निशबारः॥ जारो काम. मिलि होरी खेलो राखा नाथ करार ॥१॥अपना भवन सोहावन लागे ज्योतिन्ह की उजियार ॥ विश्वरूप हरि होरिमचायो छूटी लान: हमार ॥२ होरी: जंगला॥ छाडिदे जंजाल रे.जे पेचाही रि लालगुलाल सैयां ॥; आवो भवन पिया फागुन आया होरीके दिन चार डारो रंग संग होरिखेलो,लागी आस. हमार ॥१॥ केस सवारि.सिंगार बनायोलाखों की गल हार ॥ विश्वरूप.प्रभु, मिलिरंग खेलो लागे. फागु बहार: ॥२॥: राग होरी जंग, ला नाहकर मोहि रंग से भिजाई । आवन सुनिके श्याम. डगरिया होछाडि मिलेहिय. गाहकरे ॥१॥ आजु चले हो श्याम नजरिया हो देहो. नयनाजिय डांहकरे ॥ विश्वरूपप्रभु न हों संगियातू व लिनिचित चाहकरे ॥३॥ राग होरी जंगला.) सांव.न. रे मोरिअंखियां लगाई ॥ मोहन चितवो हासि के ननरिया हो कियो जियराके बावलरे ॥१॥ वैरिन घरमें मारिननदिया हो करि देहे जगमें रावलरे॥२। विश्वरूप तेरो दृगयर छबिया हो हम सरबस धन पावलरे ॥३. राग हारी जंगला ॥.होरिखेलतरंगिली-श्याम संग छवि सद- न साहाबन.बदनरंग ॥ मोहित;सकल निरखि ब्रजवासी सुनत राग माहनि उमंग ॥१॥ खेलतरंग रुचिर कुंकुम: सो.रोरी भालरमनी सुअंग २...गावत श्याम ललित गत छाये. बजत बीन सुरलीमृदंगः॥ ३॥ विश्वरूपः सुख घन , अबिनाशी, तनि कोटि दुति छबिअनंग ॥ ४ ॥ होरीजंगला:" हरि खेलत रंगीली राम संग... रचि सुभग सिंगार बिहार रंग ॥ १ ॥डारतरंग, लपन पिचकारी सनत रंग जलनिधि तरंग ॥ २ बालक वृन्द अवध नर नारी . खेलत संग मिमि रति अनंग ॥ ३ ॥ गावत. रागसंकल मनहारी वाजत डफ ढोलक मृदंग ॥ विश्वरूप त्रिभुवन पति प्यारी सजलमेघ दामिनि सुअंग । M 7 २४ - . हरि हर स० नि० पदावली । ४॥ होरी काफी n माहि भावे संवलिया कि चालरी कैसि साहै छवि रोरी भाला वांकमाह नयन रतनारे पंच रंग साह वन मालरी | भरिभरि रंग कनक पिचुकाले झकि डाले नन्द लालरी | अंबर लालगुलाल वढन भरे संग लीन्हें ब्रज वाल री. ॥ ३ ॥ विश्वरूप मेोहन विनुदेखें जलविनु मीन कि हालरी ॥ ४॥ हारी काफी ॥ माहिलागी संवलियाकी चालरी ॥ अव नजियों मैं नन्दलाल || भूपन भार भवन नहिभाव नोंद नयन नहि आवरी ॥१॥ मोहन मधुपुर जाय लोभाने शोच अधिक उर छावरी ॥ २॥ फागुन राग रंग नहि भावे शोक विरह उर दावरी ॥३॥ विश्वरूप मोहन नहि माने नाहक 'नेह लगावरी ।। ४ ।। होरी तालजलद ॥ हम नहीं खेलब तोसे होरि पुरज- नकसंग व्रज खारी ॥ वरजारि कहत गहत कर यदुवर वे सर मचले मगु छोरी ॥ पांय परो श्याम तोरिसंग नखेलांगी होरि चुन्दरि विगरि गइमारी॥ २ ॥ मुखमारि हंसत बसतलरिकन्ह संग बेदरद खेलेरंग होरी ॥ छांडो व्रज विश्वरूप कैसे के वसांगो म्याइ मुंदरि छिनत वरनारी॥२॥ होरी तालजलद । तुम दई बिरह मोके होरि सवछन कि हाल नइतेरि म संग जोरि करत हरत सव करमन वे चलनचले चहुं अरि ॥ भावे करो सोइ सोई मान न करो रिहाई गुनरि मलतमुख रोरि॥ १ ॥ दधि मारि हरत उरत नहि नट- वर वे कहल सुने नहि मारि॥ छाड़े बने और संग विश्वरूप होरिरंग कुवर करत बरजारि ॥ २ ॥ होरी ॥ छयल गही करमोरी हो हारो | मैंजो सुनी . मोहन गये वनको लरिकन्ह संग लियोरी || चपलन गरि करि नेह लगायो छवि छायो सो हियोरी ॥ एरिये कंज नयन मोहि मगुमें मिलोरि मैं लखि . के भई भारी होहोरी ॥ १. ॥ कुंडलमालक अधर रतनारे केशर तिल कियोरी॥ ॥. अपना हार मोहि पहिर.यो चित भायो सो दियोरी ॥ एरिये नन्द छ यल मोहि मन में बसोरि मैं इनके संग जारी हो होरी ॥ २ ॥ कर पिचकारी .. कंचन केरी छवि अपना लवनारी ॥ विश्वं रूप मन से छवि भायो पाया सो नियोरी ॥ एरिये मन्द हसनि मोहि उर में लगोरी में घर कोदई छोरी हो होरी ॥ ३ ॥ होरी नंगला ॥ होरी खेलत श्रीअवधेश ॥ देवन्ह संग लिये। चतुरानन लावत मुखरोरी डारे गुलाल गणेशरे ॥देवन्ह सं० -१ ॥ गिरिजा नाथ लिये पिचकारी ॥ झारि अवोर सुरेश ॥ देव० ॥२॥ गावत नाचत किन्नर गण मव छिरकत रंग जलेशर ॥ दे० ॥ ३ ॥ विश्व रूप प्रभु जनक किशोरी रघुवर शरण हमेश रे। दे० ॥ ४ ॥ हारो काफी ॥ घर कैसे कही बोच खड़े अवधेशरे । नयन शयन करि भेजत लरिकन्ह घरि लेत. चहं देशर ॥ ॥ . 7 . हरिहर सं० नि० पदावली। ॥ जिमि दामिनि धन ललित विराजे कोटि काम रुचिबेशर ॥ २॥ विश्वरूप लखि जलज वंदन छबि मोद सिंधु परवेशरे ॥ ३ ॥ होरी जंगला' ॥ यमुना कैसे जेहों झुकि डारत हरि रंगरे । फोरंत गागरि भूषण तारत राखिलेंत निज संगरे ॥ १ ॥ हंसि हंसिरारि मचावत मोहन गारा देत वड़वंगरे ॥२॥ वाल सखा सबचौहट ठाढ़े विश्वरूप भरेरंगरे ॥ ३ ॥ होरीजंगला ॥ होरी कैसे मचेही राग द्वेष दोउ संगरे ॥ फागु साज सब छीनलिया है। फौज घ- नेरो जंगरे ॥ १॥ किये 'पैसार नगर महं.बलते ममता माह अनंगरे ॥२॥ सब कह भयो है अगम दुख' सागर,नेक नहींत उमंगरे ॥ ३ ॥ विश्व रूप यह अवसर नीके नहिं मन होत उमंगर ॥ ४॥ होरी काफी ॥ सोहताजु नई श्यामा श्याम को जारि ॥ बुज भवन में माधो आये राधे संग लई ॥ करत कलि भरे प्रेम रंग दोउ रस बस मगन भई ॥ १ गावत ग्वालउ- मंग छाव उर वाजत बीन रई ॥ विश्वळूप ब्रज श्याम सिधारे गोपन्ह मोद दई ॥ २ ॥ होरी काफी ॥ होरी कुंजन आजु भई श्यामा श्यामसो ॥ बाल यूथसंगमोहन लोन्ही करिकरि साज नई ॥ बलिनियूथ सिंगार साजि राधे साथ लई ॥ १ ॥नाचत श्याम नचावति राधे हसिहंसि तालदई । बिश्व- संपछबि हेरत हरिके संबसखिश्याम भई ॥२॥ होरी काफी ॥ खेलतलछमन रामफागरी॥आर सुरेशसहितसुरंमुनिवर छविनिरखतमानाअमिय पागरी॥१॥ छायो उमंग श्रवध पुरजन कहं होतसरस धुनिसुभंग रागरी ॥ २ ॥ सरयू गंभीर तीर छवि घन अति रंग रुचिर भानो बहन लागरी ॥ विश्वरूप' छबि निरखत पुरजनरक धनंट निमि अमित भागरी ॥ ३ ॥ होरीकाफी ॥ तूमेरे श्याम लियोरी ॥ कुंजन फागखेलत सखिहरि सो देखत करक हि- योरी ॥ ॥ संव की भाग अधर मोहन के छीनि अलि पियोरी ॥ २ ॥ चपले अमलं दूंग टोनालाई निज वस प्रभुहि कियारी ॥ सिलति राधिका हंसि मोहन सो. दृग मुखचंन्द्र दियोरी ॥ २ ॥ विश्वरूप भइ मगन बारि जिमि तलफत मोन जियोरी ॥ ३ ॥ हारी ठुमरी ॥ नृपति सुतन जर ल- गायों मेरि ओर ॥ सकुचानी जानी हरिभेटे होरि खेलेंवर जोर ॥ १॥ वि- श्वरूप रघुवर रंग डारत भई चूंदर सर वोर ॥ २॥ भैरो ॥ हारी खेलत जनक नन्दनी रघुवर ओर निहारी ॥ केसर अविर गुलील- उडावती छिरके कनके पिचुकारी ॥१॥ देव बधू सबनाचतगावति सुरगतिताल संवारी होत उमंग रंग खोरिन्ह मह रुचि वह चिबिंध क्यारी ॥ विश्वरूप भयो फागु सु: ‘फल अब तन-मन प्रभु पद वारी ॥ ३ ॥ रागभैरों ॥ नन्दकुवर बलराम श्याम हरि हर स० नि० पदावली । । . छायो M दोउ खेलत ब्रजमे होगा अपना अपना यूथ वांधि केसखि सब खेलरचोरी । काउ गावत कोउ राग सराहति कोउ नाचति चिन तोरी ॥ १: कोउ मा- हुन कहं पान खवावति कोड:चमति सुख मारी ॥ कोउ वसन भेवतिय चुकारिन्ह नई दिशि रंग चुवारी ॥ २ ॥ काठ काहे हरि जाने न पावे घेरि लेहुचई खोरी ॥ विश्वरूप माइन छवि सुन्दर राधे नयन लगोरी ॥ ३ ॥ राग भैगे । काशी पुरि गिरिःज शिशोरी सहित खेलत हरि होरो ॥ विधन हरण ग़ण पति गुण सागर भूचि कर साज कियारी ॥ डंफ बनावत नाचत 'गावत फणि पति ताल लियोरी ॥ १ ॥ करि शंगार अमर तिय निरखंत. हर मुख नयन. लगारी ॥ गावत रुचिर सुनत सुख दायक सब उर उमग 'बढ़ोरी ॥ २॥ ढोलक बीन बजावत तुंबुर वरुण रंग छिर कोरी ॥ अविर गु- लाल उड़ावत धन पति सुरपति हरए भरोरी ॥ ३ ॥ चतुरानन बोलत धुनि 'जय जय हरिः लावत मुख सेरी ॥ विश्वरूप विश्वश नगर की उपमा .. कासे करोरी ॥ ४ ॥ होरी ॥ सब जाडरे आनु से.ई सजि आमरण मन में वाठ सुनि सुनि के धावत पगु डारि झुकि झुकि..... जाइ प्रावे तेहि संगहि जारे यूथिया बटोरे बाल नारि जत जावै. मुकि मुकि ॥ १ ॥ आये तुरंत जनकना कंत के देखि रही दृग डारी रुकि रुकि;॥ राम सिया अस ,खेल रचो है बाट न सूझै बाजि रही धुधुकारी घुकि, धुकि. छाये उ- मंग सवन के अंग में डारि देत पिचुनारि ढुकि-ढुकि ॥ ग्वाल, वाल सब संग सखा लिये विश्वरूप, गारी गावै लुकि लुकि ॥ ३॥ होरी काफी तन में व्रज आई वनारी इन्द्रिय गण सव सखिय बनो हेसमः भूषण पहि रोरी ॥ रुचिर बिचार पहिरि अंवर शुचि जग मग ज्योति जगेरि काम मंद सकल भगोरी ॥ १॥ विमल विराग वनो बिन्द्रावन यमुना सुरति बढ़ोरी ॥ ज्ञान सुरंग प्रोति पिचकारी सव सखि मिलि छिरकोरी खेलो आतम संग हारी ॥२ ॥ अनहद शब्द ठठत निशि वासर बहु विध. धुनि गरजारी ॥ विश्वरूपं खेला. अस होरी आनन्द रंग मचारी प्रीति प्रीतम सों करोरोरी ॥ ३ ॥ हारों काफी ॥ ब्रज में जिन आजु वसारी ॥ श्वाल सखा सव संगः, लियो है ढूंढत फ़िरत मुरारी ॥ जेहि पावत तेहि रंगहीमे बोरत बहियां पकर झक झोटो. खोल-दृग उतचित ,आरी ॥ १ ॥ घेरि लिया हरि सव सखियनः मिलि राधा मलत मुख रोरी ॥ विश्व रूप छवि देखि श्याम की अति आनन्द बढ़ौरो भलो यह खेल :मचोरी॥२॥होरो काफ़ी-सी ॥ व्रज में हरि फागु मचाई | करि सिंगार राधिका बहु विधि गज गामिनि रुचि . . . . ॥
हरि हर स० नि० पदावली । ॥ ॥ ॥ ॥ रई ॥ यूथयूथ सखि संग अाएनी लइ यदुपति पहं आई ॥ नलट दामिनिधि छाई ॥ १ ॥ भूषणा बजन बिबिध पहिरे सखि वरण अनेक सोहाई ॥ सकल भुवन की सहाल संपदा प्रति प्रति अंग लगाई ॥ धनद लखि बहुत लन.ई॥ २ ॥ उड़त अबीर भगे नभ माहि चहुं दिशि भइ : अरुणाई । मोहन पर छिरकत पिचुकारी रोरी वढन लगाई ॥ श्याम मुख्न निरखि लोभाई ॥ ३ ॥ धीन सितार ताल डफ बाने सुनत उमग अधिकाई ॥ विश्वरूप राधे मोहन दोठ होरी खेलें हरपाई ॥ सिंधु गिसि सरित समाई ॥ ४ ॥ काफी की हारी ॥ हरि हारी अवध में मचाई ॥ महा रान शिरनाल भूप मगि दशरथ सुत सुखदाई ॥ राम लपन अरु भरत शत्रु हन जारी अतुल सोहाई ॥ अमित रति पति छवि छाई ॥ १ ॥ डारत रंग राम पर लछमन रोरी स.. रत लगाई ॥ रिपु सूदन हाटक पिचकारी भरि भरि रंग चनाई ॥ पीते पट हरि को भिजाई । २ ॥ मारत नन्दन वीन वजावत झालर लिये कपिराई ।। ढोलक एचिर वावा अंगद सुनि मन हरत लोभाई ॥ पर्थिक कह लेत बोलाई ॥ ३ ॥ कपि दल करि सब साज मनोहर गावत अविर उड़ाई ॥ विश्वरूप रघुनाथ सखा सब प्रानन्द दधि न समाई ॥ रंक निमि सब निधि पाई ॥ ४॥ हारी काफी की ॥ नित हे रि खेलो हरपाय पशु पहं नाइके । सुरति निरति पिचुकारि करो यह ज्ञान को रंग बनाइ छिरिकु चित लाय. के ॥ शम दम तोए अबीर उड़ावा टसहुँ दिशा में छाई ॥ काम क्रोध मद लाज छोड़ि के मिलु निज रूपहि धाई । कपट विसराई को॥ २ ॥ अहमित भेद तंगे निशि वासर प्रेम प्रीति उरलाई ॥ विश्वरूप गुरु ज न फगुः गहु आवागवन नसाई । भुला इत अ.ई के ॥ ३ ॥ हारी ॥ सैयां हम-रे वि. देश सिधारे. कासे में खेलागी हारी ॥ सामु ननद दुप देति है दारुण सवति करै बरजोरीरे । दुष को मल परोस मलो है कैसे मैं बासनसारी, ॥ ५.२ ॥ खान पान मोहि कछु न सोहाई भूपन भार लगोरी ॥ चिन्ता अनन्न दहत' निशि बासर नेनन नीर बहोरी ॥२॥ नहिं अ.ए नहिं प.ति पठाये कोहि विधि धीर धरौरी ॥ फागुन मास विते ऐसे मंखि कवन उपाय करोरी ॥ ३ ॥ गुरु के वचन,सोहावन मगु वर तूं धनि बेगि चलारी ॥. विश्वरूप सहनहि पिय पेहो मन . करहिरिस टरोरी । ४.॥ होरी माफी ॥ में न खेला तोसे होरीरे ॥ नाहक मांस करत बरजारी ॥ ५॥ लरिकन माघ हाध पिचकारो भिनइ चुनरि सबमेरीरे । घाट वाट मह रोकत टोकत वरवम हाथ.मरोरोरे ॥२॥ नन्दवबा जिस नायकहोगी. ऐसा हालकियोरी विख ॥
हरि हर म०नि० पदावली - रूप ब्रज राज निरखि छवि बिहंमि सखी मुख मारी ॥३॥ होरों काफी I रघुबर जना किशोरोरे यूय यूथ मिलि खेलत होरी ॥ बढ़ो है उमंग तरंग मरोहै, रंग अवधि की खारीरे । जिमि बरवेय परम चिकर धरि रति मन मिन सहि जेरीरे ॥ १. ॥ सत्र तिय चढ़ि चढ़ि निरखें अटारिन 'सुरतिय सरिस वनारी ॥ विश्व रूप महराज राम.के माल तिला सोहै रोरीरे ॥ २ ॥ चोरी कापी । अंखियां लगे वनवारि रखिरे ॥ कल न परे चिनु देखे मुरा- हिरे ॥१॥ चपल नयन चित बनि अति साहै हास मनोहर भारीरे ॥ चाल मोहावन श्वाल हाल संग कोटि काम छवि धारीरे ॥ २ ॥ भूपन पट धारे रुचि कारे मनई ताड़त उजियारीरे ॥ विश्वरूप प्रभु नट नागर संग होरी खेले। रंग डारीरे ॥३॥ होरीकांफी ॥ अव न कान्ह संग मति को जारे यमुना नागरि सारि छीन लियेरे ॥ आये अचानक चीर हरत हैं मानेन सस्त्रि सचालति के बारे ॥ विश्व रूप येरि नन्द छबीलो मनसाहन सव पर रंग डारे ॥ २ ॥ होरी काफी की ॥ यदुवर संग खेलेोगि होरो ! कोमल वा लु पुलिन यमुना को छवि रमनीय वनारी ॥. अमित काम सम श्याम मनो- हर ले सखि संग चलोरी बेगि जनि विलम करोरी | कोड काहै कंचन ते सुन्दर बुसुम सुगन्ध मरोरी विविध वयारि नहै रुचिकारी मिलि जुलि फागु रचौरी । विहंसि बोलें ऐसी गोरी ॥ २ ॥ वन मोहन पहं. सखि संव चलि को सान संवरि गहोरी ॥ विश्वरूप प्रभु होरी खेलो मो सों विनय रोरी । सखी सब पांय परेरी ॥ ३॥ होरी मेरों । ज्ञान भवन पिय हारी रखेले सनि मापु कनोद वाले ॥ निज निज रंग न डारति मपिं सब वैठि दो दरवाजे ॥ १ ॥ तुरिया रूप झलक अति सोहै उनियारी. चहुं छाजे । निरखत रस वस पाहै मगन सखि पुरण फागु विराजे ॥ २ ॥ नगको लाज साज सब तेरो कर्म जुटिल सब भाजे ॥ विश्वरूप लगो नेह पियासों रंग अजम्ब साजे ॥ ३ ॥ होरी काफी ॥ राम लपन सियं होरी खेलें आजु ठसंग छ.ने ॥ धाई सखी निज यूथ वनाई पहुंचि सबै दरवाजे ॥ ५ ॥ रतन जड़ित नासन पर बैठे भूपन अमित बिराने ॥ होरीबीचं मची चढुं देरी वरस्त घन जिमि गाने ॥ २॥ सकल सूति सूरति घरि घरिको कारों तितक शिर ताजे ॥ विश्वरूप सतगुरु परचे विनु होत न दृग अनुरागे । ३॥ हेरी मेरों में ॥ मुनि समाज मिलि चित्रट मह रघुवर खेलत हारी। नब तीरव निज निज विभूति युक्त रूप अनूप धरोरी ॥ आये जहां रघुवीर जानकी रघुकुल चन्द चकोरी.अ.ये सुरेश शेष विधि शंकर सहित ॥
हरिहर सं0नि0 पदावली। 48. ॥ .. नगेश किशोरी॥ बनचर वृन्द सखा सब आये विशद समान भरोसे ॥२॥ • सुर वनिता सबं बनि बनि आई। बसन तड़ित छबि छोरी । तेहि समान शोभा को बरने शरद पति सकुचे री. ॥ ३... केसरि रंग अबीर उड़ीवति ढोलक बीन बजारी ॥ विश्वरूप.जग भूप राम छबि निमि रबि उदय भयो- री ४ ॥ होरी ॥ साई फागु मन भावे ललारे होरि खेले पै रंगन लावे ॥ १ ॥ आवंति सखि सब सान बनाई निज निज भाव दिखावे ॥ ता महं नेकु नजर नहिं लावै तसंग खेल मचावे ललारे ॥ १ ॥ अंबर आढ़ि दिगम्बर हवै मुख रोरी न लगावै ॥ विश्वरूप अस फागु लागु जेहि युग युग अमर कहावे ललारे ॥ ३ ॥ हरी ॥ होरी खेलो पिय संग मापने फागुन समय भलारी ॥ प्रति चुंदरिओ चटक रंगनि कीनिशि बांसर पहिरोरी ॥ इन्द्रिय समन सिंगार बनावों जग मग ज्योति नगोरी ॥ १ ॥ बिमल विवेक बिराग सोहावन सिंदुर भाल्न कारोरी ॥ सुमति सखिनका साथ मिलावो झुमति सवति को तजोरी ॥ २॥ है पर पुरुष मोह परि पंथी जनि इन कहं निरखोरी ॥ ज्ञान अमल पिचकारी बनो है पूरण रंग भरोरी ॥ ३॥ हंसि छिरवाति आ-' तम सुख घन पर भेद भाव बिसरोरी ॥ विश्वरूप जंग शोधनि नोंकी जा . अस फ गु रचारी ॥ ४ ॥ होरी कॉफी ॥ ऐसा भैरव खेले होरी ॥ करिसमा- ज सुर.रान देव गण निज निज यूथ बटोरी ॥ आये सबै महराज सभा में चहुं दिशि भीर भयोरी ॥ सकाल मुनि वृन्द भरोरी ॥ १ ॥ अाये विष्णु चतुर मुख शंकर ज्योति सभा पसरोरी ॥ जिमि राकेश दिनेश अमित शत युगपत उदय कियारी ॥ रुचिर अति ज्योति लगोरी ॥ २ ॥ भूत बेताल साज करि सुन्दर करि निज यूथ खंडोरी ॥ छिरकत रंग अवीर उड़ावत वाजा अमित बजारी सुनत सुख सिंधु बारी ॥ ३ ॥ डारत रंग परस्पर सब कोइ आनन्द रंग मचारी ॥ विश्वरूप भैरव दरबारहि भुवन भूति निवसारी । अचल नहिं नेकु चलारी॥ ४ ॥ होरी ॥ देखा . सखी व्रज धूम' मचारी ॥ वासरनहिं कोई निकसन. पावै नन्द लला अस कोटरंचारी ॥ ॥ रंगन बोरत छारत,पटको ऐसा हाल करोरी कोउ ईत नाहि वचारी ॥ २ विश्वरूप ब्रजराज सांवरो ग्वालिनि कर गहि अापुन चेरी, ॥ ३ ॥ होरी काफी को ..सेयां होरी खेलो मेसि जात हे फागु बहार ॥ कान्ह तुम्हेवि- न कछु न सहाई लागत भूपन. भार ॥ ५ ॥ डारो रंग प्रभु पैंयां परतहें। वीती .जात बहार ॥ २ ॥ विश्वरूप प्रभु चतुर शिरोमणि राखो लान हमार ॥ २ ॥ होरी गन्ना :तू मेरे श्याम लियोरो ॥ कंजन बाजति हरि अध- .
६०... हरि हर. स०नि० पदावली । . रन में देखत कर: कहियारी । १ ॥ सबको भाग अधर मोहन के क्रोनि: 'केलि पियारो ॥ चपल अमन्न दृग टोना लाई, निज बस प्रभुहि कियारी ॥ २ ॥ मिलति राधिका हंसि मोहन से दृग मुख चन्द दियारी ॥ विश्वरूपं भंड मगन बारि जिमि तलफत मीन जियारी ॥ ३ ॥ होरी जंगला सखी- रौं मन मोहन को हेरी आज खेले हैं। ॥ आज कहूं भागनं नहिंपैहे वाह. पारि विनमैंहैं। ॥ १ ॥ डारोगि रंग अंगपर हरिके मुखमें गुलाल लगैहे।. ॥ विश्वरूप अव रसिक लाल संग कुंजन धूम मचे हैं। ॥ २॥ होरो जंगला ॥ तू सम्नि व त न मानत मारी मैं हारी कहत वहुतेरो ॥ यमुना तीर रहत वनमाली रार करत हठिहे री ॥ डारत रंग पिच कारिन भरिभरि गारी हमि हमिदेरी ॥ १ ॥ पनियां भरन तेहि घाट जाहु जिनि मग वट पार बसेसे ॥ विख रूप ब्रजनाथ सखा संग वर वस लेत है. घेरी ॥ २॥ होरी. काफी ॥ तनमें अम रंग रचेरी ॥ पिचुनारी रुचि कारी सुमति.की. जान रंगते मरोरी | झिलि मिलि. ऐसो फागु मंचायो चहुं दिशि कीच कारोरी अमल पट रंग सारी ॥ १ ॥ वायु विचार वहत रुचिकारी भरम. अवीर उडोरी ॥ युक्ति साज करि सखि सब आवति समता भाल पुरोरी झलक छावै चहुंओरी ॥ २॥ गुरु गम अगम समाज संगले अनहद ताल परो से ॥ विश्वकप विसरो सुधि तनको भेद लाजको तोरी उमंग उमड़े चहुंओरी ॥ ३ ॥ होरी जंगला ॥ घर कसे क पैहों जान गहों गुरु रंगरे। ताकहं फा- गुन दूर बोहै फागु रंग रस भंगरे ॥ १ ॥ हारों विना जीवन नहिनीको मूठ सांज दुख संगरे ॥ २ ॥ विश्वकप जेई निजरंग बसे फूलफाग उरदंगरे । ॥ ३ ॥ हरी जंगला ॥ संगति से भलो जहां आतम रूप बिचार ॥ कुमतिकु- संग तो निशि वापर केवल नाम अधार ॥ भरम अवीर उड़ाउ तुरित. सब कर्म रंग ननि डार ॥ १ फागुन मास महामद बाढ़ोधनि वनिता परि- वर ॥ इनके हेतु भूलो जनि कवहूं अंत महां दुख भार ॥ २॥ सम्मत मन को चाह बना है सुख दुख मूल अपार ॥ अमल चान गत भेद विशद अति प्रवल अनल तेजार ३ ॥ वोवल ब्रह्म निरंजन परण गुणा तीत गोपार ॥ विश्वरूप सोइ रूपगहा निज तजि सव भेद विकार ॥ ४ ॥ राग वसंत ॥ श्री गंगेचि करतवतरंग ॥ निरखत व उपमहं उमंग || १|| कलि कोश कलिल हर सलिल धार ॥ मुनिकृन्द मनोरथ पुर करार ॥ सुरधेनु देव तरसम उदार ॥ अव आघमहा तरु तर कुठार ॥ २ ॥ सब सिद्धि दानि गुन भवन नीर ॥ मुग्य मूल दानि पद अजर योर ॥ सुबट मुरेश सुयोगि वीर ॥ किया विश्वरूप - हरि हर स० नि पदावली । .३२ : तव भवन तीर ॥ ३ ॥ राग वसंत ॥ जय जय हरि वाहनि जगत मात ॥ भय शोक हरणि दुति भानुगात ॥ १ ॥ जय नन्दासुते कुरु मति विशाल॥ • हरु मोह मान मद काम जाल ॥ अघ मूल हरणि वर दानि दानि ॥ २॥ जन इच्छित. फल वर अमितखानि ॥ जगदीश्वरि.क्दन विशेष चंद ॥ वर- हास मोदकर सचिन मंद ॥ सब सिद्धि सदाकर जारि जारि ॥ ३॥ पटकंज वसत चपलाई छोरि ॥ तव चरित भानु जन मनु सुकोक ॥ दुख शूल हरण करता बिशोक- जगतारणि कारणि सकलं लोक ॥ अबविश्वरूप तबशरण ओक ॥ ४.॥ राग वसंत ॥ को शंकर सम जग महं' उदार ॥ देखिदीन नहिं ढरत बार ॥ १ ॥ मथेठ सुरासुर उदधि जाय ॥ प्रगटेउ दारुण बिपनिकाय ॥ जरत भुवन करै चाहि चाहि ॥ शरण टेरि परे चरण माहि ॥ १॥ अतिदयाल प्रभु अभय दीन्ह । जलकण सम बियपान कीन्ह ॥ सुखिय भये अति जन समूहः तपत मीन जिमि बारि व्यूह ॥ २ ॥ साधन हीन मलीन दीनं ॥ अथ अवगुण मदमोह पीन ॥ प्रभु ऐसा कलिजन कहं बिचारि ॥ मुक्ति जननि काशी सवारि ॥ ३ ॥ निवसत नितगिरिजा समेत ॥ अगजग मरतहि मुक्ति देत॥ विश्वरूप प्रभु विनय मारः॥ चरण युगल शशिचित चकोर ॥ ४॥ रागबसंत । खेलत वसंत-रघुराज राम ॥ संग भरत लघण रियुसुदन. नाम ॥ २ ॥ फुलेउ फूल:बहु विपुल-जातिः॥ भांति भांति सोहे अमित पांति ॥ लटपट खटपद करेगुंजार ॥ सुरभि सोहावन वहै. बयार ॥ २ ॥ बालकेलि. करें:सहित बालुः। सरयू तट शोभा बिशालु ॥ कंचन 'मय जहां बनेउ घाट । बीचबीचं मणिनि कर ठाट ॥ ३ ॥ सुचिमचि दायक-मालपोय ॥ छवि अनुपम बहुरंग जाय ॥ हरषि सबै प्रभु कंठ डारि ॥ मानहु रवि शशि सिमिटि धारि॥ ४ ॥ सब के उरअति भयो: ठमंग. ॥ जैसे पर्ब शशी उदधी उमंग ॥ विश्वरूप धनि अवध लोग ॥ योगी अलाभ सुख करत भोग ॥ ५ ॥ रागबसंत ॥ डारत अबीर खे-- लत वसन्तःश्री अवध राजसुतं सीय कन्त ॥ बाजत मृदंग ढोलक सितार अति भोर भई महराज द्वार ॥ सब नृपन कियोबहु रंग साज करि अाये जहां है भूपराज ॥ १ ॥ सुरशेषसिद्ध मुनिवर सुरेश छवि देखि चकित भये विधि -धनेश ॥ चहुंगान करत किन्नर उमंग लखि विश्वरूप सत्रुचे अनंग-|| २॥ राराबसंत ॥ मनचेतो केवल हरि स्वरूप ॥ अजहुं तनहुं भवजालकूप । ममता, बश जेहि कहत मोर। सो नहिं ऐहै काम तोरः॥ दाराः धन सुत विषय, रंग गहाट. पथिक जन सरिस संगः ॥ ॥ काले उरग सिर बेठुआय ॥ .. यास करेगा समय पाय ॥ नाम, सजीवन रस अगाध ॥ गहत दहत सब . ॥
२. हरि हर स० नि० पदावली । ॥ मोह वाध ॥ २ ॥ आदि अंत. जगलेशनाहिं ॥ रवि कर जल. समवीच 'आ. हिः॥ देखते सो नहिं नयन हीन ॥ मृग सम चाहत प्यास छीन ॥ ३ ॥ अबकी अंवसर बना आई ॥ पायो है सांधन साजभाई॥. विश्वरूप साइ धरु अधारः॥ जेहते न चौरासी कगार ॥ ४ ॥:राग : वसन्त ॥ करु मेरो मनुवां हरि को आस ॥ नेहते नशै जग दुसह चाशं ॥ १ ॥ जाके शरण व्र- ह्मादि शेश ॥ निशि दिन सेवत रूचि होश | लहत परम सुख पुलक छाव.॥ लहे निमि सुरेश पट रंक पाव ॥ २॥ ना छन छन रहे नाम ली- 'न. बिषय हेतु नहिं होत दीन ॥ जिमि अगाध. जल माहं मीन ॥ नहिं निदाघ तप होत.खीन ॥ ३ ॥ शुक शारद नारद वालमोक ॥ 'चरण सरी- रुहःचंचरीक ॥. पिवत मधुर रस स्वादु सारः ॥ रहतः मगन तजि भेद भा- र ॥ ४॥ विपुल नृपति तजि सकल रान ॥ जात विपिन लखि सुख समा- ज ॥. विश्वरूप प्रभु रूप ध्याउ ॥ अगम. ज्योति घरं वास पाउ:॥: • : राग वसंत ॥ वोला निशि वासर गुरु के नाम ॥ सुख सागरः गुण वल तेज धाम । १ ॥ हरि रूप ज्योति मय गुरु सरूप ॥ फागु.वसंत अनूप भूप ॥ पावन पद रजः फूला है फूल .॥ मन मधुकर मोद अखंड भूल २ ॥ गन्ध सुहावन भरो. हे देश ॥ सुख. खानि दानि सेवत हमेश ॥ गन विश्व रूप गुरुचरण आस॥ रनि कोटि ज्योति तम हरण भास ॥ ३॥ राग वसंत ॥ आये बसंत तुः पुलक, छात्र ॥ नित नेह राम पट रज. सुभाव ॥ १ ॥ फुलेव फूल बि- रहत अलिन्दा तप ज्ञान सिंधु मुनि वृन्द वृन्द ॥ अबभाग रोग दारुण वि- योग ॥ मदमानकुमति हर अचल योगा :२.॥ सुख धाम.राम पुर छवि अपा- र ॥ सुख दानि खानि, सोहे सरयुः धारः ॥ लखि होत चकित चित देवर न ॥ पुर विश्वरूप नृप मुनि समाज ॥ ३.| रोग बसंत ॥ खेलत बसंत शंक- र कृपाल ॥साहै छनि अनूप दुति चन्द भाल ॥ १ ॥ शिर श्वेतकुसुम सोहे गंग धार ॥कर पूर गौर शोभा अपार ॥ कर साहे डमरू व्यालं माल ॥ भसम अंग सेहे दृग बिशाल ॥ २ गिरि सत्र.सुता साहे वामवाम भय शोक है- रंणि गुण तेज धाम ॥ जग विश्वरूप हर सम को आन ॥ तम रैनि द्वन्द घन तरुण भान ॥.३ ॥ राग घाटो ॥ सजनी कठिन दुख छायो होइ गेले हरिसें दुसवरे: । कुमति सवतिया वसलि परासवा निशि दिन झंगरा लगायो ॥१:॥ वहत अनिय रसधार, अंगनवां वाहर नाहक धाया। कांच गहत ऐसे बाडि रतनवां पारस को विसरायोरे ॥२॥"विश्वन हे- रत मूढ़ नयनवां विषय न नेह लगायोरे ॥ ३॥ राग घाटो॥ भूलि गैले शहर -- हरि हर स9 0 पदावली। ममारिया हो रामा ॥ ना कोइदीखत सांचम जरिया हो ना रुचि रंग नगरिया हो ॥१॥ना भव साइबविश्व बजरिया हो। नापुर पति से जुहरियाहो ॥ २ ॥ रोग घाटो। झूठ रंगे मनुआरहे वरुझाइहो रामाभजन कडलवादिये बिसराई । भव रसपरले भुलाई रामा ॥ १ ॥ कंपट कलेवर रुचिर बनाई ॥ सरसम रहेय लेभाई हारामा ॥ २ ॥ सुमति संघतिया उरन सुहाई ॥ कुमति संपतिया वढ़ाई होरामा ॥ ३ ॥ विश्वबिना रघुबर शरणाई ॥ नहिछुटे जगदुख दाई हारामा ॥ ४॥ रागबाटो ॥ कुंज बन राधिका कन्ह या हो रामा || करत बिहार सुहावन यदुपर ॥ कुसुमित तस्नुडि छेयां हो रामा ॥ १ ॥ सब वन चेत फुलाने रुचिकर ॥ अलिगन धुनिसुन दैया हो रामा ॥ २ ॥ फुलवा लाढ़ि लोढ़ि मोहन राजत ॥ मंगिया शूधत रुचिरैया हो समा ॥ ३ ॥ विश्वरूप प्रभुको यहजारी। यमुनातर साहिया होरामा ॥ ४ ॥ राश घाटो ॥ पिया मारे बसले विदेशमा होरामा पनि समैया पिया लेोरे हे निशिदिन रहत अंदेसवा होरामा ॥ १॥ बानि विरहिनी पिय जिलमाये.अनहुंन पाये संदेश- या हो रामा ॥ २ ॥ कुमति संवलिया देति दुख दालन कहि विधि सहिह। लेसबा हो रामा ॥ ३ ॥ विश्वरूप गहु गुरु शरना अति सहजइ हाई उप- देशवा होरामा पियं मारे ॥ ४ ॥ रागघाटो पिंजरा लामाई गइले मुगना नहिं जानमारे रामा हो । १ ॥ चरेिपिंजरया रंगनहि करे पहिचान मारे । २॥ पनियां अगिनि मिलि घरति यह बनाई निसान मेरे ॥ ३॥ न- वमिंटूटि जैहे सब की लिहें पुरान मारे ॥ ४ ॥ एनो न कोउ विश्व एमा बिना भगवान भोरे ॥ ५ ॥ रागघाटो ॥ धनिसा अजबरे कुवां जल भरे मुंसुझाय मेरे रामाहो. ॥ २ ॥ बिनुरें कलजवां डोरिया भरे दिनु कार पांय मारे ॥ २ सखियां सहेलियां मिलि गये सुख उदधि समाय मेरे ॥ ३ ॥ पनियां अमिय रस छाको दुखव तनसाय मारे ॥ ४ ॥ विश्व भागम यहगति- यांदिनु गुरु' न लखाय मारे ॥ ५ ॥ रागघाटो । जियरा उटासी भैलो नहि आयें यदुराय मोरे रामाहो. • १ ॥ कुबजा सतिया बडिरे लिये हरि बेल- माय मारें ॥ २॥ घरवां न नीनो लागे कुंज बन न सोहाय मारे ॥ ३ ॥ ढरत नयनवां जलरे दुख कहि नहिं जाय मारे ॥ ४ ॥ बिश्न कवन विधि सखिरे यह विरह नक्षाय मोरे. ॥ ५ ॥ रागबाटो ॥ सजनि बहाली · सुनावों सैयां क बोलना कठिन मेलो. सयां कहत' हम जैहें विदेशवा केहिलिदितें मिल मावोरे ॥१॥ केहि बिथि रहिहों अमेलि भवन से विरह बितावारे ॥ २॥ मारे सहि नयन कमनियां जैसे में दरद बुझी ॥ ३ ॥ विश्व ॥
हरि हर स० नि० पटारली । -- कवन विधि रहिही भवनबा नेहते हियोग न पात्र रामघाटे मनि बडादुरन पाना हरिजिल मिलना कठिन नैलो १५ नावाच. काये हरिके संदेसवां क्षेश्वो विरह वितायें रे ॥ ॥ जौन कन्हैया ये सवना तेसो हैन वितात्ररे ॥३॥ विश्वमै लगिही पहिले गहनां हि विधि शोच मिटावारे ॥ ४ ॥ घाटो ॥ सननि कहाँलों बुझ को दगिया भंवरा लुमें लारे ॥ १॥ बगिया लोभाये जनते संत्ररवां तवते सोहागन पायो रे ॥२ जोरे संवरवा ऐहे भवन मुलया कि सेत्र विद्यावारे ॥ ३ ॥ विश्व अगम घर कारि हो गवन मिल्लि सिलि घोति जगवारे ॥ ४ ॥ राग घाटो ॥ रामा वाजि गेलो बाजि गेलो मधुर मुरलिया । ॥ १ ॥ ना अघ भावत सस्त्रियां नमरिसा हो ना घरकी टकमरिमलो ॥ २ ॥ ना अब भावत यमुना करिया हो नाइंकन शि डगरिया ॥ ३ ॥ नःभोवल चटकं चुन्दरिया हो। नाग- लहार सुंदरिया हो ॥ ४ ॥ विश्व लिना शव सांवरि सुरतिया हो ना कहूं जात ननरिया हो ॥ ५ ॥ राम घाटो ॥ रामा लागि मेलो लागि गैलो विषय करिबाहो ॥ नालेइ आपन लखत नगरिया ते ना प्रीतमकी हगरियाहोम २ ॥ नाकोड़ नातन विश्व बलरियां हो नाहक लाचे नरिया हो ॥३॥ रागबाटो ॥ जियरा उवामी मेला लगि विरह समान मारे समाहो ॥ १ ॥ चितरे संवलिया रंगेमुला छवि सुग्न स्वानि मेरे ॥ २ ॥ बिछुरे कन्हे या नव से भयोल्न दिनु प्रान मेरे ॥ ३ ॥ विश्व भवनवां बादारे रहें यदुकुल भान मोरे ॥ ४ ॥ रागबाटो | सैयां सुरतिया रूमि पर भल बना है तोहाग मोरे रामाहा ॥ १ ॥ आमरे महन पिय गाये छुठि गये दुखदाग मेरे ॥ २॥ भ्रम सिमरिया गिरिगरे भयो पिय पनुराग मोरे ॥ ३ ॥ नियम गहनवां सतके माहे तंदुर मांगमेरे ॥ ४ ॥ विश्व सोहागिनि सोई पायो अबिचलि भाग मारे ॥ ५ ॥ रामघाटो । मोतियन्ह मंगिया संवरतिंब माधों ॥ १ ॥ नामें जति मोहन मारे ऐहे काहको नहिया लगवति माचों ॥३॥ जो मैं जति बिधुरि केहे मोखे काहेको सेजिया संवरतिउं साधी ॥ ३ ॥ नाने ननति जिरह माहि देऽहें काहे को बतियां सुलवतिडं माधो ॥ ४ ॥ विश्वमें जनतिउं जोहरि नहि रेहेकाहे के पतियां पटवतिउं लायो।। ५.! राग मलार ॥ ब्रज में श्याम नये ये वषि घन गई श्याम घटा प्यारि रेन रूटोरी आयो ॥ १॥ मेघ घटा-चहुं जल घन बरसे श्याम सुधा भरे नयन ॥ २ ॥ तड़ित थ्टा छवि चमकं सोझवन सुपन सोहे मुद दैन । चति गंभीरगगन घन गरने सखि मोहन मेहेदैन । ३ ॥ जलद घटा शिर .4 हरि हर स० नि० पदावली । ३५ . ॥ रहत न निशि दिन श्याम सदा बधि ऐन ॥ विश्व रूप घनश्याम पियारे अंग अमित से है मैनं ॥ ४ ॥ मलार ॥ जवते श्याम गये ये बिछुरनि मेरो शोपहियां सारी रेन सखीरि मधुवन ॥ १ ॥ सघन घटा लखि अहिरिपु दुग से चान चपल महि दैन ॥ १ ॥ चपल पमित चयला चहुं धावति सजन निरह के चेन ॥ अवती सखि भये युगल प्रगट घन एक जलधर दूजेनेन ॥२॥ दुग्न सागर तन छीन रैन दिन चित मोहन छबिरेन ॥ विश्वरूप रसना नहिं दुग्नलखे जालखे ताहिन वेन ॥ ३ ॥ मलार॥ पुलकि पुलनि यदुवर सखि ललकि ललकि फूले ॥ १ ॥ भारत बुन्द वहत चार चपल चमक बार बार च. ढो चढ़ी सखि कहि कहि कहि रस रस हिय भूले ॥ २॥ बिखरूप कहि न- जात पवन वेग नभ सोहात झमकि जात लटपटात नम सर चहुं, फूले ॥३॥ मालर ॥ गरजि गरजि जल घर घर सखि चमका चमकि आवै ॥ १॥ य- दुवर जलते विदेश पाये नहिं कछु संदेश ॥ सुनो सुनो सखि रहि रहि रहि, धक धना हियछावै ॥ २ ॥ विश्वरूप नहिं साहात समुझि समुझि पिछिलि यात सुरति जात श्याम गात घर नहिं मोहि भावे ॥ ३ ॥ राग मलारण न- फुलित दल अमल कमल चपन नयन, हेरे ॥ १॥ तरज लरज काहुकि नावे मंधुर वचन टेरे संग संग बालक लेइ करते कंज फेरे ॥ २॥ दरज परज कामिन भावे कृपा तर घनेरे विश्वकप निरखत साई दृगन टरत मेरे ॥ ३॥ रागमलार ॥ हरि विगसित राजीव नयन वै मधुर टेरे ॥ १ ॥ गगन स- धन वादर छाये घटा चहुं घनेरे ॥ गरमत उप घोर पवन सिपकि शोचमेरे ॥ २ ॥ विपिन सघन सुधि न पाये निशिचर बहुतेरे ॥ विश्वरूप लपन संग मुनि भवन हेरे ॥ ३ ॥ मलार ॥ छ्यो बदसरे माहि घिरह बढ़ायो ॥ १ ॥ घहरि घहरि झरि करि चहुं दिशवां अंथियरिया वहुं छायो । काकि कड़कि चपला नभ धावे शोच उदधि अधिकायो ॥ २ ॥ कोइलरिया घुनि करक जि- यरवी सोवत माहि जगायो ॥ विश्वरूप उर अधिक अंदेश हाल न श्याम ..पठायो ॥३॥ मलार ॥ आयो सारे नाहि रघुवर अायो ॥ १ ॥ लटकि लटकि वन घन चहुंओरवां गह बर लता साहायो ॥ टपकि टपनि घन बरसन ला- गे केहिविधि बास लगायो ॥ २ ॥ साड़कि कड़कि आवत छन छनवां बिधि वियोग दरशायो। विखस्य सियवर देखेविनु रजनी धन युग छायो ॥ २॥ मलारः ॥ आयो बदारे नाहिं भवन 'छवाय ॥ १ ॥ अवधन गरनिगरनि चहुंओरवां बरपत झरी लगायो । चुवत भवनवा केहि घरजेहों जुममय शो- च बढायों ॥ २ ॥ महरि महरि चहुँ बहत. वयस्यिा जल थल जल भरि.
हरि, हर स० नि० पदावली। -- - - प्राया ॥ विश्वरूप राज , श्याम सिले बिनु पल पल कलप चनायो ॥ ३ ॥ मन्नार । प्रमि धूमि धूमि धेरेरे डगरवा. ॥ ग्वालिनि पारिवदन चमि छीनले दरवा ॥ बाट साथ, कोउ न मेरे तड़पै बदरवा ॥ १ ॥ जामिनि फि- रिक अंगना माये वड़ोरे निउरवा ॥ विश्वरूप सोहि लेत सांवरो लंगरवा ॥ २ ॥ सलार ॥ हेरि हेरि हरि लायोरे नजा-सामिनि कारि सखिरि घरे कारि रेबदरवा ॥ मोहन हंसि मुरलि टेरे मोहिले जिसरबा ॥ १ ॥ कानि. काछे मधुर बोले गन्द को पियरवा ॥ विश्वरूप श्याम निठुर मोहरे सह- पन्ना ॥ २ ॥ मलार ॥ आगम भदायां भैलि रतियां हो प्रभु सारै बस, लैं विदेश॥ २ ॥ पांच सवति वसे शिर पर कलह करति निशि बार ॥. निज निज स्वारघ धावति जीवन कोसे. हमार ॥ १ ॥..देति ननद दुख दारुन मिलिहे परोसिनि जाई ॥ कल न परत सखि मोलह अबका करउं उपाई ॥ २ ॥ विश्वरूप गुरु पतियां हो पठनों सुरति सुधार ॥ तवहि पिया घर आ- इ है पुनि न वियोग बिकार ॥ ३ ॥ पलार | नगम सइलि सब जल नदिया- हो केसे के उतरन पार ॥ १ ॥ धन बरसत.धन बंदहि सिमिटि मिलें बहु- धार ॥ लहरि अपार चहूं दिशि सूझत वार न पार ॥ १ ॥ कषट गरबी सुनंत नहिं हारे पारिको पुशार ॥ नहिं कोउ साधी खरच नहिं सांभा भइलि अंधि- मार ॥ २ ॥ बिखरूप गहु अनुचन- के वल गुरु को अधार ॥ अवर, उपाई न तरीही हा कोटि करी उपधार ॥ ३ ॥ ,सलार.॥ विभुवन संयां भुलइले हो से सहा दुसरा भार ॥ १ ॥ वनरे. सधनं चहुं ओरहिं तहां न पवन पैसार ॥ केहि बिधि गुथि हम पाइन. यह चिन्ता, निशि बार,॥ २ ॥ कर- क सु जंतु नसत पहुं सव कहं करत प्रहार ॥ बाट नहीं कहुं दीखत दिशि कांट करार ॥ ३ ॥ विश्वरूप जग, महं कोउ दीखत नहीं न हमार ॥.मा से भरज सुनावों हें। सुनत करे उपशार ॥ ४ ॥. राग मलार ॥ सखि खुमर लिन नहिं पातु मावत ॥ १ ॥ कुसमय विधि बनवास देवायो धी-. रन उर नहिं भावत ॥ २ ॥ अति सुकुमार घरग्य सियमर को महि अंकुर पहुं धावत ॥ विश्वका धन निशि दिन बरसे दादुर दरद बढ़ावत ॥ ३ ॥ मलार || चहुं दिशि घन गरजत डर पावत ॥ १ ॥ घन घमंड सहितका निगराने श्याय नगरि नहिं भावत ॥ २॥ कन देखब, नयनन्हते प्रभुकहं.. शोच अधिन उर छाबत ॥ अंधियारी भई लानु छपित भोबुंद गगन झरि . लावत ॥ २ ॥ दामिनि दसक दरद . उर महं अति दादुर विरह जगावत । विरूप दुख मिव बिना हरि को जग माह वचावत. ॥ ३ ॥ मलार ॥ .
हरि हर :स०नि० पदावली । बटोहिया हो हरिमों काहियो संदेश ॥ श्याम घटा घन चहुं दिशि छायो दृग घाल: ढरत हमेश ॥ १ ॥ भिधों धनस्याम निरखि छवि उरि गयो धन न गयो तेहि देश ॥ विस्वरूप किंवों श्याम डरो हे पावत उरमें अंदेश ! २.॥ राग मलार-क्टोहिया हो हे कावने देश, ॥ आवत घन बरषत कित रहिहो भारी भयो: है: अंदेश ॥ १ ॥ भजहुं विदेशि समुझन, करि हो पैहो- तु कठिन कलेश । विजुरि चमक चहुं गगन गरज मरे डरपे जियरा ह- मेश ५.२ ॥ नाचत घन लखि मोरवा मगन भये दादुर धुनि चहुं देश ॥ विश्वरुप घर:जान फिर जैहो पावस भल ना विदेश ॥ ३ ॥ राग. मलार ॥ गरि है। श्याम शोच. विधि दई है आजु री रैन सवाई होय ॥ कासों संदेश पठायों इहां के हित नहि आपन कोय ॥ १ ॥ श्याम लखे नहि हाल हियाको तडित चमकं चहुं ओय ॥ दादुर शोच वढ़ावे हियामा हरि मधुपुर रहे सोय ॥ २ ॥ अवतो जोरि साहायो सखिरे कुवरी माहन दोय || वि- श्वरूप प्रभु मलन कियारे श्याम सरम दियो खोय ॥ ३ ॥ राग मलार । एरिहें। महि फांसमें फसिहा पायरी नेन नसाये दोय ॥ सुन्दर पातम रूप हियामा ने- सुरति नहि होय ॥ १ ॥ ज्ञान विचार सुदृगः श्रुति गावे से मुधिं लखत न कोय ॥ सटबात आवत जात चरखमों नरक सरग दुख नाय ॥-२ ॥ अजहुं संभारो सुरति गरभको सहब कठिन दुस्ख रोय !- विश्वरूप लखु राम हियामों जनम वृया दिया खाय ॥.३.॥ मलार-॥ भलाछवि वृन्दा- बन धनघोर ॥ शाखा रुचिर फूल चहुं फूले जंतु रमत चहुं और ॥ तरुवर- सोहत मोहत श्यामहि चित मोहत धुनि मार ॥ १ ललित सुरंग-पटल से- घनकी सजल संघन-चितचोर ॥ विश्वरूप- परपल घन बूंदन दामिनि चमक अंजार ॥ २ ॥ मलार ॥ लगा मन-श्रीमोहन की ओर ॥ ललक झलक कुंडल छवि कानन जरुण ललित दृग कोर ॥ मुरलो हाथ साथ गोपियन्ह के सखि मोहि परत न भार ॥ १ ॥ ब्रज तजि हरि-जबसों मधुपुर गये जलधर गये तेहि ओर ॥ विश्वरूप सखि मेघः न वरपे विरह बाण किया जेर ॥ २ ॥ मलार ॥ करि हारी श्याम निहारा-रे ने वचन मन नाहि घरे ॥ १ ॥ बंदु-नन वारि डारि नजरि लगाये लखै दरद नहि मेरारे ॥ २ ॥ ब्रज विसराये छाये घन मधुवन घोर गरज चहुं ओरारे ॥ ३ ॥ झरतः नयन वरषत जलघर चहुं सखि चहुं पवन भावोरारे ॥ ४ ॥ विश्वरूप वंस भयो गोपिन्ह को चित लियो कान्ह कठोरारे ॥५॥ राग मलार ॥ मनभावै नन्द को छोरोरे ॥ नयन. सुछबि दृग मांहि भरे.॥. ६ ॥ धुनि सुख कारि प्यारि .
हरि हर स० नि० पदावली । - मुरलि बजावे | चित कियों चन्द चोरारे ॥ २ ॥ एक घनश्याम श्याम- घन दूजे वन साहे चहुँ ओरारें ॥ ३॥ लसत हंसत मुख मधुर वैन सोहै। मणि गण भानु अंजारारे. ॥ ४ ॥ विश्वरूप प्रभु मधुबन छाये । सखि अटक चिंत मोरारें ॥ ५ ॥ मलार ॥ बोले सोइलिया प्यार ॥ प्यार गरजतं मेघस- धन चहुं कारे ॥ ६ ग्वाल समासंग बनों सिधार । घटा मनोहर नन्द दुलारे । शोकास दरद सुनांवा हिया को दांदुर बोलियां दुख को टारे ॥ १ ॥ बजे चित चारवा चितमा हमारे शचि हेतु विधि दिवसः संवारे ॥ विश्व- रूप पल युग सो हियामा श्याम मुरलिया जो न निहारे ॥ २ ॥ मलारं ॥१॥ झुलत सैयां परिजे कुसंग हिडोल " अगम अपार खम्भ दुइ लांगे गुणमय' gण अनमोन ॥ १ ॥ पाया चारि सोहावन चमकत रात रुचिर खटोत । मणि गा जडित सहित ऐम सुन्दर छवि अति बना है अतोल ॥ २ ॥ बिनु कर पाय मुगावति पिय काहं वचन मनोहर बोल ॥ हंमति हंसांवति' रागंहि गावति बहु बिधि करति कलोल ॥ ३ ॥ रैनि दिवस पीढ़त नभ माही कबहुं न हेत मझोल ॥ विश्वरूप अव भूल झुलारे पुनि निन चढ़हुः मचाल ॥ ४ ॥ मलार ॥ हिंडालना ना भूले तेरो रंग ॥ भुलि झुलि माति रहत से निशि दिन छूटत कर्म सुमंग ॥ १ ॥ भुमि झुगि जात न हारत महि पगु बाढ़ा अजब उमंग ॥ विश्वरूप गुरु मोहि झुलावो सेहं भाल अभंग ॥ २ ॥ राग मलारं "सखि नहि श्याम संदेश पठाये ॥ आशा दिये श्याम आवनकी कौन हत विसराये ॥ १ ॥ बारी घटा छटा बिजुरिन को निरनि शोच उर छाये ॥ धार अपार वहत यमुना की नीर नदी भरि पाये ॥ विश्वरूप प्रभुश्याम मिलन कहं देव कुयोग बढ़ाये ॥ २ ॥ मलार. । सुरपति कीन्हेड कोच घनेरे। ॥ जगलयकर धन बंधन छोड़े ब्रज पहें तु- रितहिं प्रेरो ॥ १ ॥ करिवर कर समवरपतं धारहि व्रज व्याकुल बहुतेरो । प्रभु, करुणा निधि भारत मोचन कहि बज चन्दहि टेरों ॥ २ ॥ मुनहि गिरि कंह कर पर धारों दीन्हो अभय बसे। ॥ विश्वरूप जगदीशं दया जेहि सो न परत दुख घेरो ॥ ३ ॥ राग मलार || अंधियारि माये बरंसा- ति ॥ घेर सघन चहुं और मेघंशी चपला चमक दिन राति ॥ १ ॥ मधुपुर नेह किये युवतिन से गोप बघून सोहाति ॥ २॥ भवन भोग सर्विमाहि नहि भावतं अब जीवन केहि भांति ॥ ३॥ मलार ॥ देखारी काम घटाघन धेरो ॥ विषय वृंद वरपत निशि बासर साहस वाद घनेरो ॥ १ ॥ प्रबलघि- राग बसन अति रुचि. कारं तेंहि भेवत चहुं फेरों ॥ समता भूमि नजरिनहिं . ॥
.. हरि हर स० नि० पदावली ३६ पावत वारि मरेउ बहुतेरो ॥ २ ॥ ले.गुरु बचन सुसाज रुचिर अति छावा भवन सबेरो॥ विखाप सुरक्षा मा यिहरो अयं नान उपाइ न हेरो ॥ ३ ॥ राग मलार ॥ हरि विना नियरबा तरसे.॥ रैनि दियस अनुछन दृग वरये ॥ १॥ चरपत घन मन चपल करतं साइ ॥ दामिनि दमक विरह उर सरसे ॥ २ ॥ सुरति करत मन हरत .तुरित से शचि रमणीय सचिर नलः घरसे ॥ विश्वरूप सुख रूप अलख .सो चरंश कमल कब परसव करसे ॥ ३ ॥ राग मलार ॥ देखा सखि कारकीर मिताई ॥ कारे कृष्ण प्रीति करि. हमसों कोन्ह दुराव कन्हाई ॥ १ ॥ कारे मेघ घटा अरपावत घुमडि.घुमड़ि घहराई ॥ त- इपि तडपि उर साल बढ़ावत विरह को वागा चलाई ॥ २ ॥ कारे घन घन मगु नहि दीखत जंतु वियुल सखि मोहि नेकु न भावत ॥ ३ ॥ मलारबि- हाग ॥ सखि नहि मधुपुर से कोइ आवत ॥ तन त मन जहां श्याम पि- यारे. भवन काच नहि भावत ॥ १॥ निरखि सघन वन मोर मगन मन ग्रा युवतिन दुख छावत ॥ दादुर कोकिल केलिमचायो दै जुबियोग सहा- वत ॥ २ ॥ सखि अचरन पावस ऋतु आयो वरयत अगिन वढावत ॥ विश्वरूप मति बाम श्यामको. कुबरी आस पुरावत ॥ ३ ॥ मलार विहाग ।। संदेशन मधुवन कूप भरे ॥ लिखि लिखि, पाती.श्याम पठाये कउलन सांच वारे ॥१॥ नेसे दाव अनलवन भीतर गिरह ते देह, नरे ।।. कवनः पास नल देहि दुझावों मन न भरीस धेरै ॥ २॥ अवतो मावन दूर वात सखि मोहन दूर परे ॥ विश्वरूप उर.एक शोच उर मुख छवि दृगों हरे।।३ ॥ मलार बिहाग | देखा सखि हरि अगहुं नहि आये ॥ बरपा हेतु अवं आय तुलाने मेघ घटा नभ छाये ॥ १॥ बोलत बेन मयूर कोकिला नाचता माद बढ़ाये॥ टादुर धुनि. चहुं ओर करत अति अस्तु आगमन जनाये ॥ २ ॥ ऋठिन विरह कछु कहि नहिनाई हरि न संदेस पठाये ॥ विश्वरूप एक श्याम दरश विनु नीरनयन झारि लाये ।। ३ ।। राग कजरी ॥ ऐसेहरि जिबिताये न पठाये पतियां ॥ एक वार घन वरंपत जल धारा दूजे दूजे रे झरत गैना रतियां ॥ १॥ एक दुख मून ग्रहने अंधियारो जाने जाने रे कवन दूजे दुख वतियां ॥ २ ॥ विश्वरूप मन मोहन माही. देखो देखो रे सवनकी मुलाई वर्तियां ॥ ३ ॥ कजरी ॥ ऐसे हरिको हिंडोल मुलावें सखि- यां ॥ मुसुम बाण तिय छत्रि सखि धारे गावें गाव.रे सुराग कवन लखियां 11 १ 1. मोहन मुरली मथुर वनावै मोहें माहे रे सुरेश सहस अखियां ।। २ । विश्वरूप. धनं टान बनाता टेखो टेखो रे, अगम हरि रस चखियां ॥ .
.४० हरि हर स० नि पदावली। - ३॥ कजरी प्र ऐसे हरिके नयन मेरि माहे मतियां ॥ चपलाई दृग टोना लाई कोसे नोसे रे नियों मारि अस गतियों ॥ ५ ॥ भइही विकल सनिकाल न परत माहि नहिं सोहात वन मुत पतियां ॥ ३ ॥ विश्वरूप धन बरण शरयमाहि अवर साहात न दूजी वतियां ॥ ३ ॥ कजली ॥ देखा अगमदिरह बरपत रतियां. कालि रईनि वदरा चई कारे वारे करेरै । करका हरि निकि वतियां ॥ ५.॥ केतिक अवध बिताये ऐसेमुठे मुठेरे मोहावे हरि मेरि मतियां ॥ २ ॥ विश्वरूप मगु सुरली धरके जोहे लोहेरे. सकल वनच- • रजतियां ॥ ३ ॥ कजरी हरिगैया चरावेरे वजावे वंसिया । मधुर मधुर मुरलि धुनिटेरे लगो लगारे सबहिकों विरह गसिया ॥ १ ॥ ,खग मृग मुख चारा कि राखे दो वझारे सवै मोहन फसियां ॥ २॥ विश्वरूप उर का- गजहारको लिखोलिखो रे प्रीति पिरोतम ममियां ॥ ३ ॥ जजरी । बसे अजब महलरे हमारे पतियां. ॥ दश दरवनवा वसे सव सखियांग पियन मनावे नहि सुने वतियां ॥ 2 ॥ करति कलोल देखावतिः लोमहि नयन सखन दर सावै मतियां ॥२ ॥ विश्वरूप यह नगरि न. रोहो मेटि रे गईलदुख वर सतियां ॥ ३ || कजरी 1६ ॥ रागसारठ ॥ सखिर कवन हरि हाल. सुरति नजकि निसारि दीन्हो के गोपी म्वावं ।। केसें, यशुमति नन्द हे कोसे वजने वाल ॥ सप्खा संग जोकेलि कोन्हों झुंज मधुबन. ताल. ॥ विश्वरूप सनेह हरिको. देत दातगा शाल II- १. | सोरठं । मनरघुनाथ पंदरन यार ।। विषय परि हरि सुरति उरधरि कुटिल कर्म निवास ॥ २ ॥ जाहि सेवतं. सिद्ध मुनिवर शंभु हृदय अगारु । कागराज विहायं निशदिन सेइ कालहि. .टारु ॥ १ ॥ सकल पदके दानि केवल हरण ममता भाला जनम मरण अनेक वंधन सवनवन कहनार ॥ २ ॥ कहत वेद पुराण महिमा लहतं. अनहुंनं पार ॥ शेशशारद कहत हारे शरण शरण पुकार ३ सकल तोरथं भूतिनि- वसत अगम ज्योतिसु चार ॥ विश्वरूप बसेसदां. डरछुटो नग टका सारु ॥ ४ ॥ सखिरे श्याम दुखमोहि दई | विरहगांसी लाई हरिगयो कठिन जी वनभई ॥ १ ॥ वितेउ केतिक दिवस सखिरे सुनेव वात ननई ॥ विश्वरूप वियोग दुखक्रोवेद विधि छिने लई ॥ २.1) सोरठ। सखिरे आजु दुख मोहि: सई ॥ राम बिनु मोहि कलन सजिरो पलकायुग समछई ॥ १ ॥ कहाँ केहि विधि शोड उरको निन्द दृगसो गई ॥ २ ॥ विश्वरूप वियोग छायो प्रांग. शिधि हरिलई ॥ ३ ॥ सरळ ॥ संघिरे प्रोति प्रभुजि सोगई ॥ भूठि ‘पाति स्यामपटंया कपटारसदई ॥१॥ कवन पहिलो आवसखिरे शोच उरमेंनई ॥१॥ + हरि हर स० नि० पदावली। ४० "- ॥ विश्वरूप सनेह नोको भलन बिछुरनि भई ॥ ३॥ सोरठ ॥ सखिरे राज: कुंवरिहि भये ॥ लोक नाथ सनाथ कीन्हो सकल सुख विधि दये ॥ १ ॥ झूठसवमन राज सखिरे मिलनको विनगये ॥ विश्वरूप चितेर जेसे मन मु- रतिलिद्धि गये ॥ २ ॥ सोरठ ॥ चखारे नाम रससुषमई ॥ नाम रस सुख धाम जाना अवररस दुखहई ॥ नारदादि मुनीश चांखा भेद मति दुरिगई ॥ विस्व- रूप अलेख देखो आप पूरगा भई ॥ २ ॥ सखिरे श्याम वसाह विदेस ॥ स्न- दिन धन भरत जल' कहं पवन सरस हमेस ॥ श्याम विरहते सुख तरिवर होत कठिन कलेस ॥ १॥ गोप गोपी हाल लखिके होत जियमें अंदेश ॥ विश्वरूप श्री द्वारिकाको आपु भयोहे नरेश ॥ २ ॥ लखुरे कामबंधन दई, n: काम वसतें राम भूले सहज सुख दुरिंगई ॥ १॥ कठिन जाल पसारि दीन्होः, प्रीति नितिनितिनई ॥ २॥ विश्वरूप सुसाज पायो रीलि हरिसो नभई ॥ ३ ॥ सोरठ ॥ जापे कोई नेम अयसो धरे ॥ छूटति तुरितहि जगत फन्दा मोह ममिता टरे ॥ १ ॥ जैसे चातिक तृपा.व्याकुल गंग जलमें परै ॥ वारि कण मुखमें न डारे चोंच बंधन करे ॥ २ ॥ वारिचर जिमि वारि विहरत मादउर में भरे ॥ पलक भरि होय जलसो बाहर प्राण को परि हरैः॥ ३ ॥ विषय. आशा सकल परिहरि प्रीति प्रभु अनुसरे ॥ विश्वरूप अपार भवनिधि सहन हाँसो तर ॥ ४ ॥ सोरठ ॥ बिना प्रभु हिय दरदछाई ॥ रटतवीतेउ दिवस मोहिबहु टरशनहि पाई ॥ जलज जल विनु रहत नाहि तुरित कुंभिलाई ॥ १ ॥ सरितपति सर दिंदु संगम वाढ़ि अधिकाई ॥ विरह चन्दहि पाई तैसे शोक बहुताई ॥ २ ॥ कल परत नहि एकाछन जाल मीन बिलगाई ॥ विश्व अवविनु दरश हरिके मोहि न रहिजाई ॥ ३ ॥ ८ ॥ राग विहाग ॥ कामना को तेज चाउंमाना कहाएहि दाउहें। ॥ अपने रंगन्ह सुरति भिजाऊं असपै हो न उपाउं ॥ १ ॥ जगमग सुन्दर ज्योति जगाउं विनु पतंग दुति छाउं । वरपत सुख हरपत जनतामह जेहि गुरुभेद लखाउं ॥ २ ॥ विश्वरूप निन सुख अरुझाऊं ॥ जनमन विषय भुलाउं.॥ ३ ॥ बिहाग |. सांवरेके संगनांउ सखि मोहि घर न सोहाउं हो ॥ १ ॥ मधुपुर हरि गये सुधि नहि पाऊं .|| . 'सखिदुख उर माहि छाऊं ॥ २ ॥ स्वाति धन चाचिक चित चांउ हरि छवि चित अरुझाउ ॥३॥ विश्वरूप विधिगति को. लखांउ हरिमोसे करिहे दुराउ। ४. । विहाग ॥ राघो हरत नपीर । केहि कारण हरि देरीलगायो भय मे- चन रघुवीर ॥ १॥ दोन बंधु प्रभु नाम कहावतः भवसागर भरेनोर ॥ २ ॥ जो महिारा नहि नामके रखिहा को लइहे मोहि तीर ॥ प्रभु केतिक खल - ४२. हदि हाँ २० नि पकवली । - ॥ गन कदंतरे गिनि. नमके कोई और ॥ विस्वरूप देहु दयाकरि बरंगा भवन मोहिं थीर ॥ ३ ॥ विहाग । कवरे, सवीर, सबन सजिनिः. दिवस दुखन अघि काय ठरत दृगन से नीम ॥ ॥ हरिनु दोषः ॥ नि बिनु शशिक भुर. गन मणि दिनु घोर ॥ 2 ॥ पति विनु नानि वारि चिन्नु सफरी ब्रजनन का हियपोर ॥ ३ : यमुना केलि देलि मन्नन किया जट नागर रनवीर बिल्लरूप प्रभु नंट नागर विनु मन न लहत कबीर # 8.1 बिहाग ॥ लेजर से जिमि कीर जगत नुख सेवत निशदिन. आस लगाया चांच लगत भयोपीर शिक्षालरंग फेन लहरिसजसे निसनी: . र ॥ वनिता राज भवन सुज तैमो. मूढलहर लोहियोग ॥ पाई दिपय सुख हाय वढायो वि होत जारी विजलप दृग नंधालयोटाउ गर, हंगुरु ज्ञान भंभिर ॥ ३ ॥ बिहान सत्र नागर चटुनीर अगन सखि गना कईनानि खेवन हारो ना भतकडं तोर in छन छन अगस लहर, रि चहुंछादै. पाई कुलंग समीर ॥ रैनि दिशम स्वारन लछायो केहि विधि ते घरों धीर ॥ २ ॥ वारंवार पुनार करतही विनति सुने यदुवीरः॥ वि; खरुप प्रभु जन सुना वर राति लड्डु रघुबोर ॥ ३॥ बिहान ॥ प्रभु जग बाल कब परि हरिहो || कवनाउन करिहा सुना-बायकों का हरि पद पर छरिहो ।। १ । नरलन पाइ जो करत उपाइ न ससे अनल महं. जरिहा॥ २ ॥ इत दारूव दुल विपुल लहाने बहुर नरक पहिरिहो का विश्वकप विनु गुरु सरणागति सम गण कह जिमि रिहो ॥ ४ ॥ विहींग ॥ बने : विद्ययन में अरु झाई । तदतें चिदानन्द पुरण सुख दिये बिसराई 1. १ ॥ कठिन. त्रिगुण को फांस यरो है परपस जहं तहधाई ।। सुख दुख लहत मनेशन्ह निर्मश दिन ऊंच-नीच घर जाई ।। ५. 3. कबहुँका देव द' नुन मुर पति भये कबहुं को नस्तन य.ई. ५. वाला राज भोग नमाने मति विचार विहाई ॥ २ ॥ कबहुँकोट पतंग भयाहे उचल तिमिर : रहा । चान उयाय नहीं साधन की सरमिस्नुमि पछताई ॥३॥ ज- बगुरु बन्न विच जन र दृग नांह लगाई। विस निवरूप लो नत्र दोष तिमिर बिनमा बिहान भजुमन सम शाम बिसराई चातका पुंज समच पिन नाबत नुख मागर उर छाई ॥ १ ॥: तरेडे अजामि- न ऋदि अत्रम बहु अचल लोक व जाई. ॥ जोन तरे कारे गिनती के गेम गिरा उचाई ॥ २ ॥ सकल विभूति ग्रता नाहि को चरगन्हं भवन बनाई । महिमा अगम पार पाडे बेट नेति वाहि गाई ॥३. जो.
हरिहर स० नि पदावली। चाहमि कल्याण काय तर तो यह मुगल उपाई ॥ त्रिखप हरि सरण गले पत्र आवागमान नमाई ॥ ४॥ बिहाग ॥ जनम हम हारे हरि लागी चाग कामरन अतुरागि ॥ नाहि वहां धन धान विश्व सुख नहि मुर पति पद मांगी । भरि गातार बड़ाई वाहा नेह तुमहि पानी ॥ नहिं तन मानाय वाम नहिं चाहा वर मागी ॥ २ ॥ काहु दया- ल दया बन जाना सानु शुभह दुम्म दागो ॥ क्षेतिया न बम लिये अपना- ई पर नाच नाहि त्या ॥ ३ ॥ तुम भु मातु पिता सुत बंध काम मवनयने नाग-11 वियप मन मधुप पियत रस चरण कमल अनुरागी ।। ४ ।। बिहाग ॥ बटिया रायल मान दुख पावल रेकि । बात बात मुनि जनी महावन करन धरि बन्न मायन्न रेवि ॥ १ ॥ विनय मुनत नाह देत. ढरेरो बहु यिधि च.म देण्याबल रेजि ॥ २ ॥ तु पनेरे जहं तहं गरनहि निरपत धोर परायन रे कि ॥ ३ ॥ करत विपाद बहुन पछितावा कोठ नहि उगर वतावान रोबिा ॥ ४ ॥ खावत वाजत गलि नं निचवां सत गुरु सह मिलाबल रोधित ॥ ५॥ विखाप जवपिय घनाये ताप सकाल विसर- वन रेति ॥ ६ ॥ विलग ॥ हिसलामो दूख तीर मोहन बिनु । मन मोहन किया खान पुलिनमें हरे सुवतिन्ह के चीर ॥ १) यदुनन्द नसों व्रज छवि छायो ज्योति बरै सिमिहीर ॥ से व्रक्ष ने न मावत नयां सर जेमे बिनु नौर ॥ २॥ याह को गति बज चुवतिनकी मधुबन 5 अधीर । विश्व- रूपं प्रभु मनारि लीन्मों सांबल छवि यदुवीर ॥ ३ ॥ विहाग ॥ आशु भयो विश्व बामरी सजनी ॥ राज · मुनाई विपिन या रामहि को सही दुम्न 'धाम ॥ १ कब गहें सियराम लपन घर ज्योति तलित पनश्याम ॥ यह चिन्ता मे हि रैनदिवस सखि नहि भारत मुख काय ॥ २ ॥ गृहं अंशियार दीय विनु बेरोने से भयो यिनुराम ॥ विश्वरूप शोचति हियनननी कोटिन्ह युगसम साम ॥ ३ ॥ विहाग ॥ जग जीवन केहि काम भजन बिनु ॥ साह भये गजरबो पाये का सुरपतिको धाम ॥ १ ॥ काह भयो गुस्ता गुंगपाये, .महि मंडनके ग्राम ॥ वाह भयेतन भेष बनाये अंत विविध परिनाम || काह भये वहुनेम बढ़ाये मन न लगा सियाराम ॥ विरुरूप एकदिन अस ऐहै. छूट जेहेंघरदाम् ॥ ३ ॥ विहाग ॥ नानको ज्योति छाउ फेरिगरभ नहि आउं ॥ विषय सोग ईधन चिंतचा महिमा बेगि जराउं॥२॥ क मोध सदतम दुरि जांउ भानु प्रकाश माहाउं ॥ विश्वरूप गुरु ऐसा लखाऊं सहजहि वीत 'नसाउं ॥ ३ रागभैरो ॥ प्रात समय मन्त्र निरखि रामको शैशिन्य. हरयाई ।. H ४४ हरि हर स० नि पदावली). ॥ -- निज करतें प्रभुको मुख धोवति लेई भारी सचिराई ॥१॥ अंचल पछि गोद बैठावंतिमन छवि रहेबलेमाई फेल अरुं फूलदेति प्रभुके कर मेवा विविधि मंगाईब्रह्मादिक समूह सुरजेते निन निन थलतें भाई ॥ जय जय धुनि करिप्रभु यश गावत पूजत प्रीति बढ़ाई ॥३॥ चारिउ वेद रामगुण गावतःनिज निन वेप छपाई ॥ गान करत गंधर्व मनोहर नाना राग. वनाई ॥ ४ ॥ शो- मा खानि मदन छवि हारक उर धरि सबै सिवाई ॥ विश्वरूप प्रभु त्रि. भुवन स्वामी हरो मोह समिताई ॥ ५ ॥ राग भैरव ॥ श्री रघुवीर धीर जन पालक दानि अचल पद करे ॥ वारिन नयन.मोह मद खंडन जन:: मंडन हित हेरे ॥ १ ॥ बालापन ध्रुव कीन्ह महा तप असन बसन तज़ि जेरे ॥ दीनबंधु भगवन्त महा प्रभु तुरित गये तेहि नेरे ॥ २ ॥ सुर दुर्लभ वर देई शीस पर रघुवर निज कर फेरे । जहं कालहुको गति न परतु है सो पद दीन्ह बसेरे ॥ ३ ॥ सुर नर धरणि धरम बाधक खल अस रावण प्रगटेरे ॥ ताकाहं मारि उवारि विभीषण कहं प्रभु तिलक करेरे ॥ ४ ॥ जय जय धुनि नभ सब मुनि गण करें कुसुमं समूह बखेरे ॥ विश्वरूपं असंप्रभु सरणा गति को नहिं जग उबरेरे ॥ ५ ॥ राग भैरव ॥ रमा रमण रघुवीर धीर भजु तो मोह मद मायारे ॥ भूलि परेसि का विषय भोग में झूठे तनधन नायारे ॥ १॥ नासु प्रताय अखंड अनुपम भुवन चतुर्दश छायारे । ताहि बिसारि भ्रमसि कामी नस मिथ्या जन्म गवांयारे ॥ २॥-काकों मृग जल तृपा गयोको स्वग्नरान सुख पायारे ॥ उदधि पारचा हंसि गहि वीची हरि वोहित बिसरायारे ॥ ३ ॥ अर्थ अनर्थ रूप श्रुति गावत ब्याध सरिस:दुख दायारे ॥ तेहि नित मुख जोवत तुच्छनको अजहुं समुझ नहिं आयारे ॥४॥ जो सुख निधि चाहसि निशि वासर निरावाध चित भायारे ॥ विश्व रूप. गहु राम कल्प तरु सबकर भूल सोहाबारे ॥ ५ ॥ राग भैरों ॥ भजुमन रमा रमण भयहारी ॥ जगत बंधू जग नाल काल हर ममता भेद कुठारी ॥ कुमति कुसंग कुचाल कुमग तनु विषम रैन अंधियारी ॥ चण्ड भानु शत कोटि तेल घर अज अनीह अविकारी ॥ २ ॥ जनमन कुटिल कर्म दारुण वन लाम मोह वनचारी ॥ जारत अनल अखंड अमित शत तरुण तेज़वपु धारी ॥ ३ ॥ अभिमत दानि बानि सब सुखको करुणा सिंधु मुरारी ॥ अंतर गति जानत सव जनकी जल यल जीय अपारी ॥ ३ ॥ .सवकोई ससूत्र घर कोवल रखुबाल कमल तमारी ॥- विखरूप प्रभु आरत मेोचन जो गजराज उवारी ॥ ४ ॥ राग भैरों ॥ अब भोहि शंभु दया करि हेरो ॥ बल अंगार हरि हर,स०, नि0 पदावली ४५ .- भव-भाव. हरण प्रभु देहु 'चरण महं डेरो ॥ १ ॥ जगत सघन वन पार न । दोखत मोह ग़र्त बहुतेरो ॥ काम क्रोधके हरिद्वीपी बहु हठि घेरत चहुं फेरो ॥ २॥ खलको वचन कंठ उर वेचत सुधि न रहत तन करो ॥ आसा नदी बहुत वाढ़ी है दीखत नाव नवेरो ॥ ३. ॥ वनचर वंधु सखा बालक, पितु तिय पुरजन सब केरो ॥ इनके सुख दुख ते मानत उर हर्ष बिषाद घनेरो ॥ ४ ॥ घायउंसव दिशि कियेउ यतन बहु लगत उपाय न मेरो.॥ विश्वरूप अव शरण परो है, नाथ करो निज चेरों ॥ ५.॥ राग भैरों, ॥ श्री. रघुनायक जनः सुखदायक द्विज सुर हित. तन धारी ॥ कहत मंदोदरि विनय वहुत करि सुनु पति वचन हमारी ॥ राम विरोध बहुत पछतैहो देखा नैन उघारी ॥ १॥ कालहुको भक्षक जनरक्षक जाहि नमत त्रिपुरारी ॥ तिनसों का पुरपारथ करिहो कालं वदन शिर डारी ॥ २ ॥ सुनि सवण असि.गरनि तरनि अति कहत बचन भयकारी ॥-मा:समको योधा जग माहीं जा सकिहे भुन टारी ॥ ३ ॥ लखि विपरीत विधाता पियको शौच करति अति भारी ॥ विश्वरूप रघुबीर बिमुखको सक्रि है कवन उबारी ॥ ४ा राग भैरों। जय महेश अखिलेश सनातन-करुणा सागर शोक हरी ॥ कुंद इन्दुवर ‘बरण सरिस तन- अमित दिवाकर तेज घरो ॥ ॥ उदधि मयन संभव जिप दुर्जर जरत सुरासुर ताय गरो ॥ करिविय-पान निमिय महं सबको अभय कियो यस भुवन भरो ॥३॥ पर उपकार उदार काहि अस जाके प्रभु मैं चरण परा:-॥ शिव केदार दानी उदारहो दानि चारफल देव तरी॥ ३ ॥ अर्ज मानिनन नानि दयानिधि मन इच्छित फल दान . करो। विश्वरूप तव शरया परोह आन ठपायन काज सरी ॥ ४ ॥ रागभेसें कोन वचेहै हो ॥ हरि, बिन साथी नहीं बोइहाइ हे मरणसमय जबरोहै हो । मातु सुता सुत धन हित मानत सातो इतरहि जेहेहो ॥१॥ देखु बिचारि समुझ मन अपने जेसा पाप कमैहो । सो जन तेसो अवशि लहेगी निज फल कवन दुरैहे हो ॥३॥ सावन हरित रहत नहि सब छन कछु दिन वीति सुखेहे हो ॥ देखतह जग अंध भयो है अंत समय पछितेहेहे ॥३॥ साधन मूल याइ नर तनं कहं ना तुम अचहि बने हे हो ॥ विश्वरूप सोइ भाग पुंज नर अमर लोक घर है हो ॥४॥ राग भैरों ॥ देखो कर्म रेख कठिनाई ॥ जोनस करत लहत तेसो फल ऐसोवेद हु गाई ॥१॥ कोउ जन असन वसन नहि पावत दुखतें दिवसःबित ई-॥ कोउ सुरराज भवन विहरत नित नमत सफल सुर पाई ॥२ ॥ के उ सब धरणी राज करतु है दल चतुरंग: सोहाई ॥ ॥ यमपुर ।
हरि हर नि पदविली. H कुल -- ॥ खंड खंड मपाल जेम्किर पड रेज शोसं चढाई कोउ नर बाहेन सरिस भयों से परम मेदि उर छ.ई. ॥ संझले भुवन विहरते कोठि निजे संचि कोउ यम गेहं सिचाई ४॥ गहन कर्म गति लखि न परत यहाट रत न आने उपोई । विश्व ईप गहु हरि शरनौगलि तंत्र यह जान नस:-' ई ॥ ॥ रोग भैरों । सुनहु सिख वन रोवण मेरों कहत बिभीषण विनय करो ॥ ने अगदीश चराचर नायक रधुन'यक से रूप घरी ॥ इनते वैरकु. शल नहि होइ हे पछितेही शिरभाय परी ॥ १ ॥ उरत सुरेश खेस सुर जेते नेहतें निशिदिन कील डरी ॥ वंदतं चरण शंभु अन गाको विनय करतं. उर प्रीति मिल ॥ २ ॥ जनकता जगदम्व जानकी विन समुझे तेहि मूढ़ हरों ॥ ले सिय' चा परों रघुबर को में.र उपाय न काज सरी ॥ ३ ॥ सुनत बर्चन के पेड दशवरं सकन नग मह ागि वरी-॥ विश्वरूप विधि वाम. जाहिक कोटि यत न नहि बाल्ने टरों ॥ ४ ॥रागमेरो जय रघुवीर दनुज नाश न गहासन जन अब न गहे * चौदह नहँस प्रवल अति खन दन खर ,पण जे। विदित रहे ॥ छनमहं कीन्ह बिनःसं संवन को जैसे प.व तून दहें ॥ १ ॥ संवणः शकुन सैन सब मारें मेोद उदधि चहुंओर वहे ॥ मु ना नाग धर्मविज धरणी है प्रसन्न सुग्न अंचल लहें ॥ २ ॥ है- य भव"तप रत मुनि गर्णभये निज. सरूप सुखं अचल चहे ॥ विश्वरूप महराज रामक अति अगाध यंश कवन कहे ॥ ३ ॥ रोग भेसे ॥ सोई धीर सई परम बिगो रहे एक चितलाई ॥ वैत भाव कछु ह देय न दीख ब्रझे स्वरूप सेहई ॥ १ अंतर व हर भेद नहीं कछु सैंधव घेनं स.. मुद्राई ॥ लाभाला भाव नहि आवत ममता सेतु नसाई ॥ २ ॥ पाप पुण्य को लेप न होवे ज्ञान अनने दलिजाई ॥ रहंत मुखी- दुग्व लेसन श्रावत: संग दोष तजि जाई ॥ ३ पवन' अन न नंभ भानु सरिसं विचरत सवदिवस... विताई ॥ विश्व कप सोइ गुणातीत है नित्र स्वरूप लेखिपाई ॥ ४ ॥ राग मेरो ॥ प्रभु पालक सब कर अचेही तय कृपा टरें भवतापेहो। संतान को सतत प्रा रावत ऐसी रोत्ति काहां का हो ॥ ॥ जामहं प्रभु तुम निज करि मानत. वन्य भाग है बांके हो ॥ निर्गुय निर्विकार अविनाशी सुख स्वरूप चहुँ व्यापेहो ॥ २॥ अरू मार तोर यह बंधन उदधि घटज हरि जापै हो । विश्वसन बसा राम सदा हिय सहित वाण धरं चाहो ॥३॥ राग भैरो निशिं दिनचनी हरिको नाम जीज्ञानाम अमित खल तारे ॥ जुग सांगर मुखबाम निहिण अंगाल कहत अतिज का हरण दुरित सम धाम ॥
४० 1 हरिशहर--सा निक पदावली 1-- जननि जनकल्सामा पालक- जनगो जल थल नभ सब वास - नन, प्रीति सहित लो लावे घरी पलका छना याम- सकल सुवन, महं आग दधि सोलह अचल, विश्राम:॥ ३ नहि कलिमाह अवर साधन- केवल नाम अकासा विश्वरूप-रघुवीर टी निता जीवन इन अभियान, • ४. ॥ बिहाग ॥सन अपने रूहि अटका काया में देख विचारी-वार हर नाहक अट को- २ | सपने में सब खेल, रचो हे जेसे लाला नटको ! यापुहि में सव लीन रहत जिमि बाज़ माह तर वट के ॥ ३ ॥ अमित ख.नि. पुतली कंचुका : बहु-होत-मूत संघट को ! खोलि निहारो नजरि न आवे कछु निसानी पटकाः ।। ३... सुख, सरूप मानन्द घन केवल-दसंव दिशा में लटो ॥ विश्वरूप, नेहि समुझ. परोहे सहजहि सव भ्रम, सटवो. ॥ ४ ॥ विहाग ॥: भरमत बोतेउ दिन सब तेरो;॥ पर अपवाद निरन, निशि वासर वाचन प्रोति घनेरो ॥ १ ॥: रसना रस बस विपच, विवस भये नाम कबहुं नहि. टेरो ॥ पर तिय नेह गेह, रुचिधार नहि हार चरणा बसेरो, ॥ २.नमृत, रस सुम्न ने पिवत नहीं भूलेउ झूठ झमेरो !! थोरे दिन महं- समुझि परेगा जब करिहे-यम मेरो ॥ ३ ॥ मानु कहा तनु अजहुं जरात, सुन भजु रघुवीर सबेरो ॥ विश्वरूप यह, अवसर नीलो गरम कउल मन, हेरो ॥ ४ ॥ विहाग ॥ करो, मन ज्ञान भानु उजियारो ॥ ममता (मति, कुसंगति रजनी;छूटत जब, अधिधारी ॥ १ ॥ शमटम तोप सगेरुह सुन्दर विगसेड़ अति रुचि कारो ॥ काम उलूका लुकाने उहंतह लोध कुमुद कहं नारो ॥ २ ॥ तारा गण अब हम हमार यह, कुटिल-वार्मदुख. भारो ॥ भये हत तेज टरत तुरितहि सब पुनि नहिं लहत समारो ॥ ३ ॥ बेट सारउर प्रगट भयो भालकत ज्योति अपारो ॥ विश्वरूप धनि भाग ताहिको जो निरखत निशि बारो॥ ४ ॥ बिहाग, ॥, ज्योति सहम नयन: बिनु, हेरो ॥ कोटिन्ह रजनी पति दिन: कर दुति सान्नि रहे.. तेहि नेसे ॥ १ ॥ भरत अगम सुख बरत-रैनि दिन तेज:पुंज बिलेरो शोक-लोभ मय : मोह . सघन तम नेसन करत बसेरो ।।-२ ॥ करि: बहु यतन् रमत, योगी जन परि हरि माया घेरो ॥ मगन रहत सुख सागर, महं नित तजि सँव इन्दि: य झेरो ३ ॥ अजन वस्तु अति निबाट सदा है. ओंट परउ.बहुवेरो ॥ विश्वरूप जो देखने चाहो गड्ड एन संत गुरु केरो ।।.४ ॥ विहाग " मन तेरोलाज़ नेसाती ॥ चलत जुपथ अभिमानी ॥ २ ॥ सचि-सचि, लछमी भवन,संवारे पाछिलावात-नजानी ॥ नारि नयनरारं दुबके सागर, अगहुंन 1 ॥ - ४८ हरि हर स० नि० पदावली। 11 शठ पहिचानी ॥ २॥ काल कोलाहल करतन दिन चलन समय नियरानी विश्वरूप कंब हरिपद भनिहै। समुझत होत गलांनी ३॥ विहांग जियों हरि कव दरशन देइहै। कोल किये सों वीति गयंउ अंब काबधों ग्रंटुपति गेहे: '१ ॥'नैनन नीर बहत निशि वामर कहुंकव श्यामं चितैहै । शोक अनल जारत चहुँदिशिते कत्र होइ जलद बचे है ॥ २ ॥ कव प्रभुमधुर पियूप वचन बर मुरली टेर सुने हैं ॥ विश्वरूप मोहनदेखे विन यमपुर प्रागसिधै है ॥ ३ ॥ बिहाग ॥ अथौ हरि सो कहिया संदेसा ॥ कहिंगये और करत है। और यह मन बहुत अंदेमा ॥ १.॥ रसना रटत यक्तिंभइ निशिदिनः मन रहे चपन हमेसा ॥ तुम बिनु जीवन नभुनहि हो विनु जलमीन" मरेसा ॥ २ ॥ श्रावन कहेउ वचन सोइ पालियंका भूलेउ दुसरेसो ॥ विश्व रूप प्रभु प्रेम मगन सखी सुधि विसरीतन केसा ॥ ३ ॥ बिहार्ग ॥ मधुकर ते संखि कहै मुसुकाई || जय ते अस कहति सुनायो बचनं माधुरीअति सुख टाई ॥ ६ ॥ कारते हम प्रीति करत नहि मधुर मुखर तब मोहि न सौहाई ॥ २ ॥ करितुम नीति अवशि विधुरोगे जैसे यदुंकुल नलिन कन्हाई ॥ ३ ॥ उडि उड़ि जात पलटि आवंत पुनि बैठत अंचल प्रोति बढ़ाई। ४॥ तुमरी कहा कबहुं नहिं करिहों कोटि भांति जो करिही उपाई ॥३R कार में गुण एक बड़ो है वरवस मन कहं लेत लोभाई ६ ॥ विश्वरूप विन मोहन जीवन विधि ने उलटी चाल चलाई। यी बिहागं ॥ धो कव हैं न ज राज ॥ हमसजकर सुधि नाई विसारेउ भूले रान समाज ॥ १ एक पलक शत कलप विततुहे नहि मूझत कछुकान ॥ करि अति नीति मोहनी डारे प्रभु नटवर सिरताज ॥ २॥ इन्द्रिय गय गति भयेउ थकित अति निमि वटेर लखि वाज ॥ विश्वरूप हरिसों कहियो असकरि- ये शरण को लाज ॥ ३ ॥ विहाग ॥ माता सोच करत मनमाही कोमल पद मगु उबाट विकट अति बन घमंड चहुं पाहीं ॥ १ ॥ अति सुंशुमार गात रघुवर को कोड पटतर जग नाही ॥ जनका सुता की काहं कहाँ मैं मुनेउन दुख परि छांहो ॥२॥ रैनदिवस 'उर माह विकल प्रति पलक कलप सम नाहि ॥ यह दुख उदधि पार किमि जेहो कौन सुने कहों काहि ॥ ३ ॥ काह कहां विधि की उलटी गति नहि विबेक कछुआहीं ॥ विश्व- रूपं सिय राम विरहते प्राण अष्टम न नसाहीं॥ ४॥ रागभैरो । दशरथ राज दुलारे प्यार करत मचे रकवारे हो । कौशिल्या नन्दन जग वंदन हरतं. मोह मद म.रेहो ॥ १ ॥ सत्रके नाग्म प्राण पति जीवन टोनबंधु हित कारे . . 1 हरि हर स० नि0 पढारली। - -- हो ॥ जो नित जपत. टरत भव संकटकाल कर्म दुख मारहे। ॥ २ ॥ जे- हि अनादि अन त्रुति अस.,गावत संक्त. हेतु वपु चारहो ॥ सञ्चित धन सुखसागर साहेव सवःमहं सवते न्यारोमा- ॥ ३ ॥ लीला करत ·हरत मन जनके सुर ना होत सुमारेहो । अस्तुति करत बिनय कर जारे अशरण शरण उदार हो ॥ ४ ॥ अवध पुरी बालका-बड़भाती संगमें करत बिहार हो। निश्वरूप साई बड़ भागी को कवि वरणै पारेहो ॥ ५ ॥ भैरवी ॥ बालक वृन्द लिये रघुजर कर केलि बिबिध फुलवारी ॥ वारत गुंजार मनोहर म- धुजर द्विन धुनि बहुरुधि पारी || १० मानहुं मुनि जन रूप साज करि गावत प्रभु.यश प्यारा । आनन्द उदधि परो उरअंतर तनही दया विखा. री ॥ ३ ॥ फल अरू फूल लगे. बहु भांतिन्ह भूमि नवै तरुझ.रो ॥ प्रभु से विनय करत. बहुभांतिन्ह करिप्रणाम अनुलारी ॥ ३॥ काउ गावत कोउराग सराहत कोउ नाचत देतारी ॥ वानत ढोल मृदंग बीन डफ होत उमंग अति भारी ॥ ४ ॥ प्रात. पाल.करुणा. निधि केशो अशरण शरमा पुकारी । विखरूपं प्रभु कृपा कीजिये सुनिये, अर्ज हमारी ॥ ५ ॥ भैरवी ॥ सखियां उपमा प्रभुः की नहीं ॥ ऐसा रूप नहीं जग कोई हारेउ खोजि महो ॥ ni जाइ जलन ज़ल, माहि भवन करि ,अनछन सत्रुचि रहीः ॥ श्याम तमाल ग़रव निज परि हरि सघन गहन को गहो ॥ २॥ बारिद भाइ सिधारेनिन थल व्याज शरद को लही ॥ विश्वरूप अनुपम सुखमा हवि दृगनिशिवार चही ॥ ३ ॥ रागभेरो ॥ आस तोप हर नाम तुमारो ॥ ननपर दया वारत तुरितहि प्रभुहरत फन्द दुखंभारो ॥ १ ॥ श्रवण सुखट अति परम मनोहर ना करै नाम उचारो ॥ अणि मादिक तेहि पायन लोटे कार तल सुगति सुधारो ॥ २ ॥ अंस दयोलता प्रवण सुनेनहि खोजेउं सब जग स.रो बिनु श्रम योग यज्ञ बिनु साधन अग नग जीवहि तारों ॥ ३ ॥ फयि नायक सारद मुनि नारद गज मुख बुद्धि अगारो ॥ चरित सोहावन अमित कल्प सत:गावत लहत न गारो,II. ४ ॥ गुण अगार संसारभार हर जनहित परम • उदारो विश्वरूप प्रभु अंतरयामी जानत हाल हमारो ॥ ५॥ भैरवी ॥ माया. में भुलाने मन हरि को न जाना ॥.निशि. दिन करत विषय कोलटिनी माह जाल अरुझाना ॥ १ ॥ रविकर निकर सरिस जग सुखहे तूसठ नाहिं किये पहिचाना ॥ २॥ कहुं सपना संपति को धनिक, भयेतेहि बस नाहक होतं हैसना !! ३ ॥ अव करु, हेतु रघुबरते. धन, जन विभव जानु दुख थाना ॥४॥ धीर शुजान सोइ जगमाही जो हरिपद लंपटाना ॥ ५ ॥ विश्वरूप - - -- - -- . - ५५ हरि हर स० नियदावली यह अवसर बोते यम पुर में परि है पछिताना ॥६॥ भैरवी. ॥ भारपरो जग को चतुरैया ॥ अपने गये अवर को खावत करत कुपथ में प्रीति सदैया ॥ १. ॥ सपनेहु नहिचित परम धरतुं है असंत कर्म के नाव चलैया ॥ ३॥ कब हुन हरि सौ हेतु करतु है हेतु निरंतर सुत पितु मैया (३'॥ विश्व- रूप धग राम शरण विनु को सठ तो कहं पार लगेया ॥ ४ ॥ भैरवी ॥ सम्वि नियरैलो ते र "गवनवां ॥ समुझ करो का गहसि मनववा ॥ १ ॥ नैहर गैलै गर्व मुले ले बासन #वे. पिय के भवनवां ॥ २ ॥ ॥ जवउहं स- हवे ताप निविधि, विधि तव तूं लगवे केहिके गोहनवां ॥ ३ ॥ विश्वरूप पिय चेत सवेरे फेरि नहि ऐने देश भवनवां ॥ ४ ॥ भैरवी ॥ भूलेसि कातनं रहेउ लाभाई ॥ शिम विट भस्म अंत है ना तो कह सा सुधि अनहुन आई ॥ १ ॥ गये वंचा वे नृप न रहे कोउ. अवर तुच्छ की पावन 'च. लाई ॥ २ पृथु पुरु ग्वा गाधीनहु सगये और ययाति नृपति समुदाई ।। ३ ॥ गये नमुचि संवर भामासुर कनक कशिपु गये तजि ममताई ॥ ४i. रावण गये जासे डस्त सकल जग तिहमारे क्षण महं रण नाई । " विश्वरूप गहु राम अचल पद नवकी भून्नःबहुत दुख ढाई ॥ ६ ॥ भैरवी ॥ हंसा करो सरोवर वास ॥. आनद जल तहं पूरिरहो है प्रेम कमल साहेपर गास ॥१॥ काई कपट रहत नहंनीही अति अगाध निशिदिन सुखरास ॥ २॥ घटत बढ़त लहूं मर नाहीं रहत येका रस बारहमास ३ तह अंधि- यार लेश कछु नाहीं अमित भानु सम संदां प्रकाश ॥ ४ ॥ कूरं काक तह जात कहिं नहिं उहां मिलत नहिं बिषय विलाश ॥ ५ ॥ विश्वरूप सत गुरु शरणागत मोति चुगे. मिटे जग बास ॥ ६ ॥ भैरवी॥ हरिबिनु मेकिहं अछु न सुहाई, ॥ गयउ बहुत दिन सुधि नहि मई ॥ १ ॥ काह भये कछु झि न परंतुहै पर बस भये कि सुधिः-बिसराई ॥ २ काहे को हरि प्रीति लगायो अब हरि विनु मोहि कछु ना सहाई ॥ ३ ॥ विश्वरूपं ब्रज नाथ दरश बिनु पलका वाल्प सम निशि दिन नाई ॥४॥ भैरवीं ॥ गहिरि नदि- या कैसे पार हो बहुतः अंदेशा चित में रहो ॥ आरतं हरण सुनत हों नाम, प्रभु सत्य करो जस वेद कहो ॥ २ ॥ अगमलहरि कछु सुझिन परतुं है परेउ मांझा बहुताए सहो । ३ । विश्वरूप प्रभु संकंट टारों आपन जानि के. बांह गहो. ॥ ४ . भैरवी ॥ गये बहुत दिन रहि गये थरि ।। अजहुँच प्रभु की ओर ॥ १ ॥ विषय लहरि मह भूलि गये का आइ. तुलाने काल कठोर ॥ ६ ॥ किये गजन को कोल गर्भ में बाहर आवत परि . गये " ॥ लेसिना प्रभुः हरिहर सनि पदावली न परतु नासन भोर ॥ विश्वरूप अंत पछितै हो' हरि बिनुनाहि मिटे मेरवी ॥ चलना अको संग नही रे॥ सुत बित नारि तुं हित करि मानत सोतो के तजि इहाई रहीरे ॥ १ ॥ बहुत नृपनन्ह को राज गयो है रहत न' धन मद को समही रे ॥ २ ॥ जाके सँग बहुत दल सोभित सो सम छिन महं. नात वही रे ॥ ३ सूर बोर कोते चलि गये जाको बल को संमत कही रे ॥ सभ नर अंध भये नहि सूझतं निशु दिन रहत कुपंध गहीरे ॥ विश्वरू गहु राम शरण भव भव जल अगम जो पार चहीं रे '६ ॥ भैरवी ॥ भारि. नदिया- देखि बहुत डरों अब केहि भांतिनि बाह परों ॥ १ ॥धार अपार नहीं ठहरावा 'ता महं जन्तु समूह भरो ॥ २ ॥ जो सत सो पलटि न आवत गाह"सकर गहि ग्रास करो ॥ ३॥ नाव वेरा कछु बुझि न परतुहे केहि विधित अब पार तरों ॥ ४ होत चकोह भयंकर नाना सभ कर धोरन निरखिःटरो ॥ ५ ॥ ऐसन हित कोइ बुझि 'मेरो काज सरो ॥ ६॥ राम नाम दृढ़ नाव करे अब कन हरि या गुरु चरणे धरो ॥ ॥ विश्वरूप रघुनाथ कृपा ते सह- ने भव जल पार तरौ ॥ ८॥ भैरवी ॥ रघुबर अजब तमासा तेरो ॥ नट- वर समें प्रभु खेल किया है जोव फसे तेंहिफेरी कोउ भूले रानभोग सुख कोठममता फन्द धनेरो ॥ १ ॥ नारि पियारिबहुत मानत उर भयो है काम को चेरो ॥ परबस भ्रमत सदा कपि समनित नहि थिरता छनौरो ॥ २॥ तृष्णा उदधिबढ़त छनछन अतिलाभ शशिहि नब हेरो। बड़ो तरंग ढगे सब दृग चहुंदिशि भयो अंधेरौं ॥ ६ गाडि तब स्वरूप श्रुति संमत जब उर करै वसेरों विश्वरूप भव जाल छुटै तब मुनि नन सबै निमेरो ॥ ४ भैरवी ॥ गहुशरणागति मन रघुवंरको काभूलेसिजग नातारे॥ताहि बिसारत मढ़ मोह वसि तजि प्रसृत विपखाता रे॥२॥ रिपुके बंधु विभीषण भारत परे चरण जल जाता रे । रियुमति उरन गहे करुणानिधि दीनबंधु जनचाता रे ॥२. ॥ कीन्ह अस कलंक पति कहं प्रभुसिबल नयन मुसुझाता रे ॥३॥ भेटत करि सतकार बार बहु हर्ष न हईय समाता रे ४॥ कोमल चित जनअध न गहत हरि जिमि जननी शिशुगतारे ॥ विश्वरूप अस प्रभुः उदार भजु मन वांछित फल दातार ॥ ॥ भैरवी दॉनि शिरोमणि' सम सुजान प्रयत कल्प तां कृपानिधान ॥५॥ अभिमतदाता भव भय चातापालने मातीस समान जन-सुकंठकोपाप नेवारो बालि अंधम हेति एक वानः। गोकatrnanा नीति समर मैदान । बिन संढामांकिमी अयाचक्र सक Mk . Acc. It ५२ हरि हर स० नि० पदावली । : . भुवनमें यश प्रगटान.॥ विखरूपप्रभु कृपा करी अवहरो मोहममता अज्ञान॥४ भैरवी । विगुण तनीया सभै अरुझान ॥ आपन रूप नहीं पहिचान ॥ आवत . जात भमत बहु भातिन्ह काम क्रोध सदमें लप टानं ॥.. हरि पद नीति करत नहि कबवं विपय चाह दिन दिन प्रधि कान. ॥ परमारथ यि नाहि गहतु हैं स्वारथ में सब दिवस सि रान ॥ ३ ॥ भक्ति प्रभाव लखत नहि कवहूं माया मोह को हित करि म न ॥ इन्द्रिन के वसि भूलि गयों हे निज करनी नपरत पहि चान ॥ विश्वरूप भम त्यागि सजा हरि सो जन जंग महं चतुर सुजान ॥ ४ ॥ विहाग :॥ सोई गवंवले मनुवां मार ॥ १ ॥ रालि सके शासकोउ जग नाही इहा न बस गति होइ है तोर ॥ २॥ नाना दूर नही पाछु सागर कैसे जेबे राह कठोर ॥ निर्दय दूत कहा नहि माने कितना विनय करों करिसोर ॥ ३ ॥ अवर उपाय नही बचिने की बेगिना- हु तुम हरि की ओर ॥ विश्वरूप प्रभु शरण गहहु अव तवं मिटिहे भवः भयदुख घेर ॥ ४ ॥ विहाग ॥ मस्ताना: मन मत वारे रहा निरंतर एकता . रे ॥१॥ निमि उन्मत फिरत है नहं तहं सुधिन रहतहः तनकारे । जे कछु भये बहुरि ना होइहे जो वर्तत नहि चिल धारे॥ २॥ काम, शोध का तार शठिन है जान अनलते. तेहि नारे ।. प्रेम पियाला पियो मगन होय सवान वस्तु महं यह सारे ॥३॥ है यह, अगम मिलत सुधि नाहों खोजत. मला जनसव हारे ॥ सतगुर कृपा कोउ जन पावतपियत छूटेजग व्यवहारे । निस्वरूप घर अचल बेठिरड यावा गवनते भयेन्यारे ॥ ४ ॥ परज ॥ सून भवन मन करो वसे ॥ अहवां चन्द सूर कोड नाही राति दिवस.नहि सांझ स- बेर ॥ स्वर्गनरक तह लोक नहीहे धर्मअधर्म न कछुक निवेर ॥ नहिंछितिते- ज पवन नहि पानी नहि माया पार लागत घरः ॥ २ ॥ घर अरु अचा तहं नाही नाहि सुरासुर कर्मके फेर ॥ ऊंच नीच तहवां भोजनाहीं नहि है. साहेब नहि कोउ र ॥ ३ ॥ विश्वरूप हय अलख पुरुष यक नेहि समुझे सभ मिटि हे अंधेर ॥ ४ ॥ परन II भजुमन दशरथ नन्दकु- मार ॥ भूमीद्विन सुर भार हरण हरि लिये जनहित अवत्तार:॥ ॥ १॥ रावण साल सदल मारे:इत करी उते लोना रुचिकार ॥ उत खल कठिन कंस. . वाहं मारे टार इत मही सुर भार ॥ २ ॥ उपसेन कहं और विभ.पण इत उस कीन्ह भुवार ॥ पावनि नीर वहति सरयू इत भानु सुता: उत घार ॥ 2 ॥ त चरित्र वन हंतेठ ताडिका उत्त व भगिनिहीं मार ॥ गौतम तियः शारे हत प्रभु उत्त धन पति तनय उलार ॥ ४.॥ राम वाणा वर बेप मनाः , .
२३ हरि हर! से0 नि० पदोक्ली । हरसियं राधा नर प्यार ॥ विश्वरूप प्रभु भक्त हेतु कर मथुरा अवध बिहार ५ ॥ भैरवी । जयो ऐहैं की नहि ब्रज लाल. ॥ एक पलक, सत कल्प विततु है हमसब प्रभुविन रहतःबिहान ॥ १ ॥ कोड सखि कहत अबहि नहि रेहें भूलेउ. धन मद राज विशाल ॥ २ ॥ हम सब ग्वालिनि कवन पुछन हे जेहि सेवत अन शिवधन पाल ॥ ३ ॥ लक्ष्मी जेहि पद नाहिं बिसारतः रहति निरंतर तजि निजचाल ॥ ४ ॥ प्रीति करत थिर नहि नन्द नन्दन छन में विछुरै छन में दयाल ॥ विश्वरूप हरि प्रेम मंगन भई सुत वित बंधु भुलेउ जगवाल ॥ ५ ॥ भैरवी ॥ राम ब्रह्म व्यापक निरधार ॥ सदाप्रशांत अभय निशि बासर जंहवां वत नहीं व्यवहार ॥ १ ॥ वाघसरूप शुद्ध सुप्त सागर सब कारन कारंणते न्यार ॥ २॥ वेदहु की जहां गति न पग्तु है भेद प्रपंच कर पैसार ॥ विश्वरूप जेहि संमुझि परो है छूटेठ साधने कर्म अपार ॥ ३॥ भैरवीं- भूलेमनुवा भटका खात तेहिते अनमि जनमि पछितात ॥ १ ॥ पावत जात चर्खे चौरासी भ्रमत सदाई नहीं घिरात । कर्म कउिन भरभेट देत हे शिर परसहत महा दुख घात॥ २ ॥ विश्वरूप हरि शरण अजहुं गंहु. भैलो भांति सववनी हेवात ॥ ३ ॥ विहाग ॥ अब मोहि निजे जानो रघुवीर ॥ प्रणत पालकरुणा निधान हरि सेवक बंस श्रुति सेतु शरीर ॥ १ ॥ सकल सुरं शुरनमतसदा जेहि कार्ड संमुख न परत असधीर ॥ पालत मातु पिता जिमि बालक पालन करत हरत समपोर ॥ इन्द्री गणदुख घोर नेवारो.चरण कमल मन देहुगम्भीर ॥ २ ॥ अवकी विनय भोर मंति डारो अर्ज सुनो, प्रभुचित होय थोर ॥. विश्व रूप प्रभुदीन 'बंधु हो. अशरण शरण हरो जनपीर ॥ ४.॥ विहाग ॥ सखि हिंगहि लेपिय के शरणवां ॥: चेतु सवेरे फेरि. न प्रवन वां ॥ १ ॥ सैदुर सत्य सोहाग बना हे पहिरो सुन्दर भक्तिगनवां ॥ ज्ञान बिराग वसनझल- कावा निशिदिन होइरहु प्रियको मंगन:वां ॥ २ ॥ लोक कानि. यह सवति बड़ी हे तेहि के बीचका ताप सहन :वाः॥ विश्वरूप यह समय के ते.. मेटिहे नहि जगजन्म मरणवां ॥ ३॥ भैरवी को दयाल रघुबर समभाई ॥ मुनि जन हेतु गवन किये बनके अवधराज सुख सब. पिसराई ॥ १ ॥ देखि राज सुरपति मन चाहतं चिण समान. सो मनहि'न आई ॥ सकेल मुनिनःसहंदरशने टीना निरखंत नैनन नाहि अघाई ॥ २ ॥ निरखि मगन भए सुधि सब निसरी :जेसे रंक सकल निधि पाई ॥ तप फल भएउ गयेउ झतन को जैसेवातरु समुदाई ॥३॥ अस्तुति करत भरत उर भानन्द, ५४ हरिहर सं०नि० पदावली। -- -- । . जयकृपाल जयजन सुखदाई । माल अरु फूलंदेत' भरि दोनन्हनेत गेम अति प्रोति जनाई ॥ विखरूप गहु रोमचरण अवछडुः सकल मननी चतु... राई ॥ ५ ॥ परज ॥ बांदिन भजन बिनु.जन्म कियेरे ॥ ना सतसंग नं साधु की सेवा ना बिपन के दानदियेरे ... ॥ त.रथ वरता नहीं कछकोन्हो पर उपकार' न कबहुं शियरे ॥ ३॥ कथा सुधारस धार बहतु हे नाहि श्रवण पुट कबहुं पियेरे ॥ ३ ॥ विश्वरूप रघुवीर शरण विनु कीट सरीखे जगमें नियेरे ॥ ४ ॥ विहांग ॥ गेहुरे निजसरूप मन भावन ॥ तचु प्रपंच सब अगम माह बार दारुण शोक बढ़ावना : • अलख अगोचर नेति नेति जेहि करत हे वेठसिखावन ॥ अंगम अनादि सनातन सुख घन शुद्ध निर- जन पावन ॥ २ ॥ जैसे रविप्रतिबिंब । अमित घटदोखतः प्रमित रूप छवि छावन !! नहि परमारथ भेद वस्तुं कछु केवल एक सहावन ॥ ३ ॥ लवणं पूलरी परेऊ अंगम जल सके कवन विलगावन । विश्वरूप अपने पूरण भये फेरि रहत नहिं श्रावन १.४। विहागः विनुः हरि मन सुख कतहुं न पैवे कोटि यतन करि जा नग धैवे.॥ सुर तर आकढावा सम तो कहं अमिय भानन चिखसम खैरे करतल विभव बिराने होइ है नरक सरिस स्वर्गहु जो जेवे ॥ ३॥हित अरि हाइहें गुण :गुण सम विविध भौति सेवा ना लेवे ॥ ३॥ विश्वरूप येकरास भेजनः बिनु पर. वसहाय अंतर्दु पछितवेः ॥ ४ ॥ठुमरी ॥ जगासुन जन्म क्या खायारे देवाने वाहवा ॥ नंजीरी चंकी गाने क्यों गालि हातरे काजेगरम तो फेरों. ताजे ॥ १॥ रैनदिन सैन के राने नो वालुन घेरि के छाजें प्रियय सुख में हसों दाने ॥ २ ॥ समुझि जव जगत से भाजे जो काननं दाव की ताजे लखारे विश्वमै प्रांजे ॥ ३ ॥ खेमटा ॥ छड़ी नेहियां रसीले छवीले हरि अपने मुख भवन वातु कहि नांगर रंग रंगीले ॥ १॥ ब्रजललना दूग चपल वाण गहिमारत मोहिंगर्स ले । विखरूयः मन. मोहन प्यारे कोरिहारे रुबीले ॥ भैरो हिरो क्यान मानरामाहों अपनी जन हॉर जान ॥ संय हरिः लीने सुख पद दीने देहु ज्ञान के वानी । अगनग कती सर्व का हत्ती मोह तिमिर को भान ॥ प्रभु, मुखतरों मुनि हित हेरों बिखरूप से ध्यान २: मेरो ॥ राम कृपाल दयानिधि के शे पतिरोखो प्रभु तुमहि वड़ाई ॥ एक भरोस पास हरितेरो अवर नहीं मोहिद्धतिय सहाई ॥१॥ गति मति भुक्ति टानिसवहीं कह पालतं यथा भाग समुदाई ॥ सकलचसचर की केवल इन्द्रजाल मयजग दरशाई जा२॥
. - - ॥ हरिहर संनि पदावली । ऐसी प्रतीति भई प्रल्हादहि "सुखी भये सब भय बिसराई ॥ पितुः कृत ताप दाप नहिं ब्यापेनिसि अनीशकर्तब टैरिजाई । जलं थल सरिस मैगन होय सोवत बिपं अमृतं पावक शितलाई । महामंत कुंजर पगुतन परंराई सम नहिं भारंबुझाई मारण मंच किये सबद्विज गण भये विपरीत गिरे मुरछाई । विश्वरूप जेहिं गंभु रखवारों काल प्रचंड निकट नहि आई ॥ ५ ॥ परज ॥ देखी देखा मुरलिया श्याम का ॥ अमित चन्द रवि दुति उजियारी निरखंत मन बिनाम को ॥ ६ ॥ संकले निगमं ते परि रही है 'आनन्द कर छवि धामको । त्रिभुवन.मन मंह पटतरनहितोउ हारी सर्व शशि आन को ॥ २॥ विश्वन मोहंति मन महिन करत अंधररस पानको ॥ ३ ॥ भैरो । "अद्वयं ब्रह्म सनातन पुरणं केवल एक अधारी ॥ स्वगत सजाति बिनाति भेद ते रहित शुद्ध सुख सारो ।। निजगत भेदरहत जिमि तरुमहं पा- तफल फल डारी ॥ भिन्न भिन्न तरु भेद सजाति गिरि विजावे देवहारी ॥ '२॥ विविध भेदनहि घंटत अलमेह असमते वेदबिंद्यरो ॥ अचल.अम लानचोति अपम बुद्धि वचन मन न्यारों । २॥ मिमि माला मह अहि व भात पोई कछुक अंधियारी । तिमि निगुणामहं नाम रूप दोउ 'गुख मयभेद अयारों ॥३॥ तजि त्रिपुटोरति भेट जनित मंति होत सर्व विषय विकारों ॥ निश्वरूप निज बोधं आत्मा साई रूप हमारो ॥ बिहाग. ॥ माधव मनकृत जंग व्यवहार । बामने जीति वियों व अपने सार्जन भव तेन्यार inजोइ जेःइ गुणत हात सेंईिवपुनट वर 'सम टंक सारं ॥ छन महं भुवन सकल फिरि आवत जिमि सबैठोर अगार' ॥३॥ नोरि नयनप्रति प्रबल सिलीमुख. जेब वैधत उरपीर ॥ तासु सरूप होत आतुर तंब 'भूलत सकलबिचार ॥ ३ रसनात रसस्वाद पाई बहु धावत' करतअपार ॥ पाये हर्प विषाद मिलेविनु झरिहित गहतबिशारं ॥ ३ ॥ तवस्वरूप सुखस्य भानु '. जब ईदय करे 'उजियार । विश्वरूप मिन दोष अमित तम नसतं न लोग वारनी ४ विहांग ॥ रघुबरजों से 'आदर चहुरे ॥ नेहं आदर तें सब घर आदर पुनि न अनादर लहुरे ॥ १ ॥नाको भूति भुवन महं व्यापी कजअखें- डित वहुरे ॥ आज्ञा करत सुरासुर' जोको कर वांधे सिरैमहुरे ॥ २॥ नाके बेलतें शेष.शीस पर सरस पशम महिरहुरे ॥ ये कलिकाल कैठिनं पातक टले नाम अनलते दहुरे ॥३: । निर्बल बोवल प्रोकरुणा निधि जो दृढ़ पद रज गहुरे ॥ मार्नुप देह साज भल पाया परबस दुख जनि सहुरे ॥ ४ ॥ कमल नयन जनतप विमोचन तासे बिनय निज काहुरे ॥ विश्वरूप प्रभु नाम ॥
५६ हरि हर स नि० पदावली । उधारण केहि अपराध तजहुरे ॥ ५ ॥ विहागा माधव मनकी मेलिहरोः॥ विनु तव कृपा कटाक्ष महाप्रभु कबहुन फन्दटरो ॥ १॥ मुकुर मलीन नाहि मुख दीखत जो सनमुखहि धरो ॥ तिमिउर बसत दीखत नाही हरि ऐसा ओट- परी ॥ २॥ मनकृत वेग अनेक विविधि विधि सहस प्रवाहभरो ॥ नीवनि काय व्रहतन लहत थिति कोटि उपाई करो ॥ ३ ॥ सवको पतिहित मतिः दायक असढीखत नहि दुसुरो ॥ सिंधु प्रगममहं उपल तरणि चढ़ि माहहु कवन उवरोः॥ विश्वरूप प्रभुगहु शरणागति को भवज़ल-न तरो। मेरिवेर प्रभु देरिकिये का मन अतिशोक गरो ॥ ५ ॥ भनन ठुमरी ॥ कामये बहु भेप बनाये जादिल रामन आयारे । लोभ- विबस मन छोभ वढावत, रसनावस नित धायारे ॥ गहत कुसंगकुचाल कुमारगक्रोधके कोशभयारे ॥ १ ॥ परतिय परधन प्रीति निरंतर परअपकार बढ़ायारे॥ निगमागम गुरुमत नधिमानत कल्पित मतठर भायारे ॥ ॥ -२.५ पूना हेतु.दंभबड्ड विधि कर देखरावत वहु मायारे ॥ एकोछन हरि भजन करत नाहिकपट वजार.वसायारे. ॥ ४॥ देखतहु भये अंधनेन देउ नहि समुझत समझायारे ॥ विश्वरूप जन यम गणरे हैं भुलिहे सकल उपायारे ॥ ५ ॥ परज भजन ॥ देखोरे जग-धोन्हत नाहो ॥ अकल अनोइ नाहि श्रुति गावत सेवैिठे. अपनेवट माही ॥ १ ॥ शुद्ध सनातन व्यापक चेतन कोटि चन्द रविद्यु ति समुहाही ॥ २ ॥ रवि करनीर निरपि नितधावत तृपा न ण्टेि अधिक अधिकाही,॥ भयेदृग अव वंधनहि सूझत जैसे हठिकपिकीर बंधाही ॥ ३ ॥ चिन्तामणि, तजि कांच गहतु हे भटकत फिरत नक्रवहुं थिराही ॥ तजि. आत्मा सुखसिंधु मे हवस पिवत आसक्रण कैसे अघाही ॥ ॥ ४ ॥ सुतवित देहनेह अति बाढ़ो सपन बिभव मानत थिरताही ॥ विश्वरूप गुरुघट संभव विनुभव दुर्गम जलनिधि नसुखाही ॥ ५ ॥ साम, कल्याण ॥ मेरेहिये वसोधनु णनी चितनहि टरत हरत दृगदृग बरकर सर लसत बसतमनहि नितकंज नयन छबि ऐनवेन क ह मतियां हरत मुसुकानी ॥ १ ॥ गति चतुराई चित लेतहे चोराई चहुं चमक छटाई तड़िताई पटछाईहै ॥ विश्वरूप चित लज्जित मदन भयनिरपि वदन छवि खानि ॥ २ ॥ साम कल्याण ॥ . हमभले तुम्हें पहि । चानी ॥ थिर नहि रहत गहत कर यदुबरं रसवस चपल हरत चितवनि चितकंज, बदन छवि सदन शिरोमणि मन मोहन छविखानी-॥ १ ॥ नन्द कोदोहाई तोहि कहत कन्हाई अवछोडः चपलाई लरिकाई न भलाई है विश्वरूप. ब्रजजन वसक्रिय कवियन सरसरस खानी ॥ २ ॥ भजनठुमरी:
हरि:हर.स० नि० पदावली । ye ॥ : मनचेतो. राम सुजान. सपने समनगरे, ॥ काम कुटिल दुबमूल शूल प्रदतेह वमि, अधम भुलानि विश्यारस मगरः॥ १॥ बानका कामिनो कोश-तोष धरे भटकत. जन्म सिरान झूठे चितपगरे । चेतनतन मानुप को पाया सोनदि ममुझ अपान जेसे जडानरे ॥ २॥ विश्वरूपं शिरकाल बैठहहिं अवशि-हवे गोपीन बचिहा कहिलगरे ॥ ३ ॥ अजुन ठुमरी ॥ मनभजिले सम उदार, निशि दन छनछन। मातुउदर दुख लहे विविधि विधि कीन्हे सजनकरार ॥ भूले तन धन ॥ १ ॥ अजहुंकुमग तजुशुभ मग पम सजु जग सुखदरतान वार नेसे रनकनरे.. ॥ २॥ करिवहु यतन कहेठगुहित मति वेधत नाहि पहार जैसे :सर घनरे ,३ ॥ विश्वरूप प्रभु एक शरण विनु सुनि हे, कवन पुकार जब गहे यम: गनरे ॥ ४ ॥ भजन बिहाग ॥, अब: जिन विरो राम दृगनते ॥ गुगा निधान करुणा को सागर ममता हरू विपयनतें...!! तव मुखाचन्द चकोर होद मन प्रोति पपीहा घनतें ॥ तेरी चरित अगाध बारि:मन मीन पोन निशि विनते ॥ २ ॥ दृग भरोस आशा दृङा तो दू- सर आस न मनते ॥ हसनि चलानि वोलनि, मन, भावनि निरखो, प्रभु अनु छनंतें ॥ ३-॥-काम-कुटिल तामय दुख्य दाई बेगि टरो-यह तन । विश्व- रूप :रघुवर सुस्तरु तगि यांच, काहि. कृपिनते ॥ ४ ॥ पुरना करितसर कान अवध प्रभुः आये ॥ सहित:लपन सिय राम विराजत अगणित रलि पति छवि सकुचाये ॥ १ ॥-पुर- जन कंज राम रबि निरखत विगसैं मोद सरम उर.छाये । निरखत भरत-परे • प्रभुचरणन्ह मगन भये-लन सुधि बिसराये ॥ २ ॥ मिनत मप्रीति भरत से प्रभु जिमि राका शशि-जल निधि एकठाये ॥ ३॥ एकहि वार-मिले. सवते प्रभु धरि प्रति रूप-न-कोड लिखि पाये ॥ गुरु वशिष्ठ मुनिः वृन्द सबै मिलि रामहि तिलक दिये। हरपाये ॥ • वरयत कुसुम देव मुनि हरपत ब्रह्मा नन्द मगन समुदाये ॥ विश्वरूप-प्रभु राम राजतें साल भुवन के शोक नसाये ॥ ५ ॥-पुरज ! राधिका हरि रास लोमाये 2 कुंज लता, वन सघन सोहावन तर फूले दल हरित साहाये- ॥ १ ॥ राधे केश कुसुम विकासे निज़ कर रुरि हार पहिरायः ॥ कुमुद बंधु कर सचि कर सोहेबन प्रकाश: चहुं ओरहिछाये ॥ २॥ मुरली-टेर किया मधुवन हरिर सुनत सखी-मन-मोद बढ़ाये ॥ विश्वरूप माहन संग विहरति सवः सखि छन:समर इन बिताये ॥३॥बिभास, अवध पुरी सग्य तटीबिहरत रघुराई । सघन वन सोहावन अति सुन्दर-सुर -पुर समान निरखत मन चि लेत माद-हिय-बलाईः ॥A1 भरोहे सुगन्ध अ- 4 . । हरि हर सनिः 'पढावली : मित लहत नाहि कोउ प्रमितं सुमन फल अपार लगे महि तर ने ना- ई ॥ अलि गन गुंजार करत विविध वियि प्रमोद बढ़त पीवत रस मधुर- खानि रहत नित लोभाई ॥ २ ॥ निलते हैं मार जाति गान करत कीर. पति कोउ द्विज राम चरण निरखि ध्यान लाई ॥.३ ॥ पंछी फल मंदिर खात हर्ष नाहि उर समात कंचन मय भूमि सकल सोमा निधि छाई विश्वरूप राम धीर बिचरत कर धनुप तोर सीता लछिमन समेत मानन्द अधिकाई ॥ ४ ॥ ठुमरी ॥ बिनु रघुवीर न नरनि नमाई । यह नगं जाल कराल स.ल पद छुटे न अवर उपाई ॥ १ ॥ ध्रुव प्रहलाद अब पि ना- रंद सनकादिक समुदाई ॥ राम नाम रस अमिय पानं करि विहरत. शोक विहाई २ ॥ वालमीक घट संभव मुनिवर जपेउ नाम मनलाई ॥ ज्ञान भवन सुख रूप भयो है चहुं दिशि वारति छई ॥ ३ ॥ अवहूं म.नु जानु हित अपना छोड़ो अंश पराई ॥ विश्वरूप सुख सिंधु टानि हरि केवल गहु शरनाई ॥ ४ ॥ भजन तल जल्द ॥ जय नय अवधेश सुवन रघुवर सुखदाई॥ जगत जाल तिमिर हरन दोन दानि सकल शरन नटवर सम खेलकरन लोला दर्शाइ ॥ १ ॥ रावणारि असुर मारि विज सुर महिताप टारि मुनिजन होय अभय ध्यान चरण में लगाई ॥ अस्तुति सभ देव मा. 'रत सुमन वृष्टि सुभग शेत वाजत बाना अनेक दिशि दिथि धुनिछाई 16. २॥ नाचत सब देव वधू मुनिजन मिलि गान करतं निरखत हियं मगन : होत अ.नन्द अधिकाई ॥ ३ ॥ कपि दल संत्र निकट ठाठे चरण कमान प्रीति बाढ़ लंका पति भूषण पेट सब के पहिराई ॥ ४ विश्वळप रामदास करत नाहि जगत आश रिद्धि सिद्धिविभव सवै आपहिं चलिआई ॥ ५ ॥ गग टोड़ी॥ हरहु राम काम घोर मोर के घटासें ॥ निवार चित चार विषय .. चन्द प्रेम कीन्ह चरण कमल छाडि दीन्ह मोहं मंद फांसे ॥ ॥ तड़ित चमक सघन गेह तासे प्रेम अधिक कीन्ह अपना निहारि लीन्ह मूढ़मंद आसे ॥ २ ॥ जात कुपथ करि कुसंग निगम बोधं चित न दीन्ह कोटि भांति रोध कीन्ह योग युक्ति पासे. ॥ ३ विश्वरूप म, रमेश कमल नयन नर्यन कोर हेरि हरो कुमति घोर सकाल शोक, बासे । ४i रोग टोड़ी ।" रवि ललाम श्याम चोर भौर के इंटासें । ग्वाल चाल संग वटोरि कुंज भर वनं केलि कोन्ह 'अमित मोद सबै दीन्ह प्रेम पुंज प्य से । १ झलकार: चिर ललितं केश कमल कोस भवर पांति मणि समूह भौति भांति तड़ित. धने घटोसे ॥ २॥ वमन कमन कटिं मुदेश लजि हर देव छन्द ज्योति हरि हर.स०:निए. पदावली । 1. झनक मूर चन्द मन्द मन्दः हासे ॥ ३॥:विश्वरूप छवि अपार चक्रितहोत मदन हेरि सकुचि सकुचि दृग:न फेरि सरिस कहो.कहांसे ॥ ४ ॥ खेमटा ।। नाहकरे वितत-सव दिनवाः ॥ नहि हरि भजन-शरण नहि गुरुके वे हेयम गा गांहकरे :: ॥ कुमति कुसंग सनेह बढ़ाये माह भार शिर वाहकरे ॥ विश्वरूप.पुनिपुनि पछितैहा पैहोदुख डर दाहकरे ॥ २ ॥ मलार ॥ देखोरी मायाघन चहुंघेरे ॥ कपट कुसंग कुभाव कुमतिजल आठयामवसेरे ॥ ज्ञान ध्यान छवि चांद: सूरवर ज्योति ढपैचहुं पोरे ॥ भयो अंधियार विचार नसानो सझत्त रूप.नमेरे ॥ २ ॥ सूखेव धर्मजवास, पाश दुख लताललित बहुतेरे ॥ विश्वरूपगृहगुस्सा शरण गहोतंब यह व दकटेरे ॥३॥ मलार ॥ देखोरे विगार गसबबात जहां मनोराज्ञ साजसुख केसे झूठी शानकनात ॥ १ ॥ गहुगुरु चरण कंजं सुखसागर सेभिन रितु, वसीत...सहज-सुभाव ज्ञानधन बर्षत. आनट वारि साहात, ॥२- मनोराजा दुखद्वन्द फन्द भ्रमतपत धरि बर्बाद जात, विश्वरूप जिन को मुघरो हे नागुरु शरण समात ॥ ३॥ छन्दमधु- . कर - रघुवीर धीर-कृपाल गहु मन शरण सुनयन कारयां ॥ अवधेश बाल दयास्त तरहरि गर्न अघडल बारणे ॥ १ ॥ मुनिकज पटपदं सवारि रमेश रानित भूपयां ॥ खरदूपणारि मुरारि मशरुषि- तेज- भगणित-पूपणं ॥ २ ॥ श्री रावणारि रमेस माधव पुरारि नरहरि-नीधरं ॥ सर्बश शेष सुरेश मुनिबर सेव्य चरण-सुखावई:॥ ३ ॥ नरकारि ईश-व कारि-प्रभु गोपाल नन्दन चिद घनं -यसुदेव नन्दन नन्द मुतगो गायी जीवन मुनि धनं ॥ ४- ॥ शिरछत्र धरमुख मुरलि घर भगवन्त भक्त भयापहं ॥ शरचाप- घर रघुबंश बर मुति गेय मुयश सुखा वह: ॥ ७. ॥ बल विश्वरूप नगारि रियू सनकादि व्यास सनातन ॥ मिथिलेश नंदिनि नंदकर हर नाथ भवभय जातनं ॥ ६ ॥ राग कल्याण ॥ चित्रकूटि-पावन थल हरण समाल पातक मल निवसत रघुवंश बीर भक्तन सुखदाई ॥ मुनिजन-समूह ,धीर राम चरण प्रीति थीर प्रभु के आगमन सुनत दर्शन के बाई 1-फूलनको अमित जाति माला गुथि निनिधि भांति प्रभुके पहिसवत उर आनन्द- अधिकाई ॥२॥ निगुण हरि निर्विकार अज़- अनादि.जगप्रधारमहिसुर महिभःर हरण वपु प्रगटाई ॥ ३ ॥ ग- पत गुण-सहित प्रेम भक्तिभाव अचल नेम जोरेकर बिनय करत बचन बर, सुनाई ॥ ५ ॥बनचर सवजीव जाति -पक्षीसब विविध भांति निरखत मन सुखी होत बिहरत हाई ॥.६. ॥ संबकर सबहीसों प्रीति काहुसन कछुना. भौति- साधुभाव सरिस सबै बयर के बिहाई ॥ ७ ॥ विश्वरूप प्रभु उदार.. .
६० हार हर स नि पदावली । - विविध तापं हनि हार खंनदन हति विद्यम द्वन्द अभय मुनि वसाई। ८ भैरवराम ॥ याबि बंगो ननरिया संजनी महिने दंग सोहरे ॥ पिलं अग्नन कुंडल. कारें वदन कोज अलि घरे श्याम ज तन मंजु मनें हर भूपणं रुचिर बनेरें । कोटि काम छ घाम श्याम को निरखि समुचि मुंख फेरे ॥ २ ॥ तिरिछे चाल बाल संग विहरे दे मुख मुरली टेरे पंद पराग गुरगं निरन्तर विवंग मने मेरे ॥ ३ ॥ मलार महिन रहत 'नन यार । धन समान चंचल सखि में हन' जैसे टीप समीर कबहुं भवन का वनहि सिधारत को यमुनों के तौर ॥ युग समन युवता जैन को दिन कौन लेखें यह पोर भगवश्वरूपः सखि हरि बिनुदेव हात नयन मरिनीर ॥ २॥ आसावरी ॥ नन्दलाला हो भवं दुख मार्दन नाम ॥ शरद सोलह दृगयुगल शोभा सेव सुत्रदीनि । दर्शन पति दाडिमें बना अरुणावर छविखानि ॥ निरखत चित्तत्रिसरीम if I भृकुटि मालक सेहविना निज कर रचे सुनान । कुसुम चाप घर चाय के छवि धन सर्व हेरोन । सुमिरत पूरण काम ॥ २ ॥ कुंडल छवि कवि का कहै छुदिशि ज्योति निसन । मरकत मणि गिरि पर उदित प्रत युगल जिमि भान जनत महारशा घाम ॥ ३ ॥ कुटिल केशं मनको हरे मुजारिन बहुपास में जैसे मधुकर पिम से बारत सरम संग्राम । मुनिजनाचत अभिराम । कंठरुचिर वनमाल छवि मणि माला बिदेतानीभिताच गभारतर विवेनी चित हरिलेत ॥ हेरन पज छनयाम भुन विशाल जगनान्न हर अगद कटया अप ॥ अंगुलीय अंगुरिलसेंजडित नौनी खूप निन वन बांचित दमः॥ ६ ॥ जानु मनोहर चिन बसें सर्कन या छबि रेन । चरण युमन की चन्द्रिका युगल नएन सुखदयन । भई भवे टरत वाद । si वतन पोत मेहेभलो तड़ित चमक चहुंठाम विश्वरूप वंशो हाचर वसि झीन्हीं बन बाम ॥ जज धन नोवन श्याम.. आसावरीना श्री महार ना हो भव भय भंजन राम ॥ केज, वंदन छवि चित हरै चितवान चित हरिलेत ॥ वेनसुबारस छबि भरें सुनत श्रवण मुखदेते। कलि दुख मेचिन साम ॥ १ ॥ मृनुटी छवि सव छवि सिमिटि कोन्ही अपने पार्स ॥ उतपति लय जगत को छनमह करत विनास ॥ संवैट कीन्हीं विसराम । भान सिंशश रवि वाले छवि कुंडल तण्या दिनेश मई मेंद मुमुकात प्रभु सहित जुटिल मुझेश ॥ हेरत मोहनं काम ॥ ३॥ दहिने छबि धन लपन प्रभु बार धनु परम सुजान ॥ कारगार आगे बड़े मारत सुत बलवान । सीता. ॥
- , 'हरिहर स० नि० पदावली । - सौहतिग्वाम | Ter सोहत कंठा विशाल छबिमाल सुभूपेण 'अंगः॥ जगमग "जगमग ज्योति अति चहुंदिशि उदित पतंग । कलितम ट.रत भान ॥ भुला विशाल वरी चापेल्धराश्रीपतिकृपानिधान । किहना 'निधि जिवली निरखिटिरत-तोनि गुण मानना पीतवसन छनि धाम ॥ चरण युगल नख ज्योति अति मणि सुज्योति की प्राति ॥ माहे मान अज्ञान हर सजल वांजचि कांति हेरत पाठोयाम ॥ रतन सिंहासन ज्योति धन सौहताराम सुजाना। लपना सहिते। श्री नानकी विश्वरूप का ध्यान ॥ मंगल मूरति श्याम || रोखता.॥ बिना रुघुवीर छवि देखे कठिन सखि शॉन्च ठर छाये IT कहां ओह चैतादिन सजनी अवधपुर सकलं सुरक्ये॥ कहां बैशाख दिन पहिलो निरखि सुर राज़ सकुंचाये ॥१॥ बोहा अाह जेठ "दिन सजनीतपत दुख ने निहिपायो । कहाँ भिसाढ़ तु संजनी श्रीपमानिज धाम बिसराये ॥ ॥ कहां हि मास भादों की उडि नल 'धार महिछाये । कियो चहुंओर धुनि टादुर गयो सावन न सुख पायेगा। काही प्रासाज वह सखि रे धिवल सरयू"अमिय छ.ये ॥ काही सौ मसि केतिक के बसन मुनि ती तपलायेगा । कहीं अगहन साहायनासो सकल महिपाल' पुर आये। गयो सिम्यूष नेह दिन के "लपन सिय राम बना पाये ॥ ५ कुसुमचतुष्मांध नहि भावनिरखि नियन्मिादिक ये ॥ चढ़ी फागुन कठिन संखिन्रे भवन रघु नार्थ नहि बायें । हामकल पुर प्राण रघु नन्दनःविधाता वाम विठुराये पा कवेनोविधि विश्वजीवनरे जलजजिमि भान विलगाये || || वारहमासा । विहरे रघुबीर अगिमुक्त दशरथ केरो। चैत चतुर सखि मंगल गाउँ॥ परम माद सबको उर छोडे॥ रास श्याम बिप्रति रुदिकारिता निरखतंसकल अवच नर नारि गोनयन नहि फेरोम॥ वैशाख मास वेलित वरवेनं गा परम मनोहर श्रुति सुख दैन । सुनता हर्ष प्रति सकल समाज । जैसें पीक रुन्विर ऋतुराज मा बचन वर टेरी ॥२॥ जेठ जननि प्रभु छवि सुखदाय ॥ निरवतगीत न हृष्टय समाय। दुलभः सुख अनु छन अधिकाय ग रइनि नार्थ निमि सागर पायः॥ बढ़त बहु तेरो ॥ असाढ़ आस होय सत्र की पूरजे याचक होय जात हजूर । अचले 'राज संपति समुदाय पाई सुखी सब दुख बिन साय शोक नहिं नरो ४ ॥ सविन श्रुति कुंडन मालकार । पीतवसनं दामिनि उजिरे । अंग अंग भूपन बहुभाति । जैसे चोद मरनकी पति। किया है चिसैरो । भादों भक्त हेतु घरिस्प' । लोला करत सकल जंग हरि: हर म निकपदावली। भूपः ॥ बेटा चरित गावत; निशिवारा। सुनत लहत सुख सिंधुः अपार, म.परै न भव घेरो ॥ ६॥ कुवार कुमति छोडोट जगे-जाल | प्रोति करो मन द- शरथं लालः ॥ अयसो नर-तना उत्तम माईनिाहक धरणीधामःलो. भाई करता है अबेरो: 2 ॥ कातिक, कामिनि करके शिंगार मंजन करि सरयू सुचि धारला दिनः मणि ते मांगति कर जरि सम रूप विसै मान- स मेरिजा नयनः हित हेरो. ॥ ८॥ अगहन अगणित जन की भोरेः॥ ओरे जनकः पुरश्री रघुबीर हर धनु-तेरि जनक दुग्वटारि . सीता च्याहिं अवध पगु धारिमा मादा बहु तेरो .:E || पृष। परसः पर प्रीतिः अपार । किरति सखो. सव सोया शिंगार सेवा भारति बहुत मनलाय. ॥: छवि निरः- खति नहि नयन; अघाय ॥ पुलक उठेरो-10 माघ मुनीश शेपसेर राज ॥विधिहरबाणी वीणा:साज : ग.वत रुचिर सहितावरतानः॥ मंगल तेः- रण दीप बितानः- लगे चहुंझेरी ॥ १५ ॥ फागुन फल देखें सियराम पा: इ:अव पुर जन विश्राम|| विश्वरूप सुख धरे चहुं और उड़त:प्रवीर रंग भरेखारि ॥ देवजय टेरो ॥१२ रागभैरों । यशोटा नन्दनांजगवंदन मन मोहुन मुरली वाला-॥ बंशी बजावत चितहरि लीन्हो अजव मोहनी सवक्रो को हो ॥ प्रभु नन्द, लाला कमली वालाः ॥ पंचरंगः सोहै वनमालाः ॥ १॥ बारिज कर बारिज छवि छ यत बारिज नयन शयन दर. शीवत हं. सत इंसावत खेल-माचावत विहरी संग ब्रजवानाः॥ २॥ विश्वरूप गिरधर छविनीको दिन मणिटिन शशि सखः चरफ़ीका अजब-कना जे.इकाल का काला दृग हेरत पोवाला . ३ . राग पुरन ॥ प्रभुबिनी बवन करमेरो भाव ॥ विन प्रभु. शरन मिटैनहि कवहूं: यह दासण जगके दुखदाव : ज़ा- सुकृपा लहत स्कुलः सुख छनमें करता ते रान ॥२२॥ जो कछुकरों से प्रभुहि समपों छोडिदेहु मन अव अपनाव: ॥ ३ ॥ विश्वरूप एक आशराम के टूनो नहि अधार नितआव-n-४॥, विहाग ॥ शरणागति राम कृपालको । मिटै सकल जग-जालकी ॥ आनन्द धन प्रभु जनहित कारकजन उरबसत मराल की ॥ १.॥ श्याम सरूप अनूप.सेहवन शोभा घट्ततमालाको ॥ २ छनछन की सबचाता लेखन :प्रभु लानत सब-उर.हानकोषा: ३.॥ ज्ञानध्यान करि कोड जन पावत छूटत सत्र ठर सालको..४ ॥ विश्वरूप प्रभु द्ववत जाहि पर सान, पस्त मुख्य कालको ॥ ५॥ राग भैरोग अवध पुरी मामास सोहावन श्री नवमी कभीर भयोरी ॥ प्रजः अनादिःमन बुद्धि अगाचर शुति जेहि, नेति:कहोरी-॥ महाराज दशरथ तप बलते मुर हित जन्म लिया हरिहर स० नि० पदावली ।। ॥ ३ वाजु बधाव मोद निमि:बाढ़ा चन्द सिंधु निरखारी ॥ मणि तारनः घरघर: कंचन' घट मनिमय ज्योति जगारी ॥ २ :गजाबालो गोधरणी धाम बहु-पट भूपण बहु जारी ॥ महा राज दियेदान संवनी कहं भुवन.अयाच किनारी...३ गिरा श्रमर तिय उमा सहित बिधि सुरहरा नन्द किशोरी पाए रिद्धिसिद्धि जुत गणपति रविरथ नभविलमारी॥ ४ ॥ नारद सनक-स- नन्दन मुनिगेण श्रुति:गणरूप,.धरोरी । करि उतशाह साज सुर नायक सची सहित पहुंचारी ॥ ५ ॥ देवसरी यमुना विधि नियमिलि सर.सागर सगरोरी सरयु सोहावनि शोक नसापनि सव तीरथ बटुरोरी ॥ ६ ॥ परम मनोह- र शोभा पुरकी रचना अलेख बनेरी । शारदा की मति भूलि गई है बनि सके कवि कोरी । ब्रह्मानन्द मगन सबकाई. भये देहदशा विसरोरी, सकले भुवन के पाप-तापगये सुख्घन पुण्य भरोरी ॥ ८.. सबंधन सबछन रंत सुकर्म:महाकुपथ बिचार टरोरी ॥ तजि चपलाई.रमा सोहानि तेहि पुर.आइ वसारी ॥ ॥ कोशल्या मुखा कराम को निरखि नापलक यरो। ॥ विश्वरूप सर्वेश दयानिधि उरःपुर चास करोरी ॥ २० ॥ भैरवीः ॥ मनरे ग़- हिले नाम मिसांनी ॥ झूठे जाल कालके फन्दा अगहुंनही पहिचानी ॥ १ ॥ इन्द्रियागय सत्र दुखके. सागर निज. निज विपय सयानी; धोखा अंत कांगे तोस: जिमि ठग..झूठी वानी ॥ २ ॥लहि बर साज.मनन का आर अरुभेउ सूतपुरानी ॥. लाभ. अधिक कछु नरिन आवे मूल की भइहानी ॥ ३ ॥ चतो निशि वासर गुरु मगुको जो सब सुखको खानी- विश्वरूप अब जोन बने हो पछतेहो अभि मानो ॥ ४ ॥ भैरो ॥ राम भजनकी: सुधि विनराये. नाहक तू सठः जनम गंवाये ॥ विषय विबस परि लपट गया है स्वाना सरीके घरघर धाये 1 काम क्रोध मद लाभा महाबल नि दि- वसाहमाहि विताये। जो सुख अगम दिये बिसराई ओस चाटि जिमि . चाह अघाये ॥२॥ज्ञान नयनाले अंधे भयो है केहिबिधि साहेब.ल्खहिं लखाये ॥ विश्वरूपं अविगत अविनाशी विनुहरि कृपां शरण नहि पाये ॥ ३. परज- लानकरोः हरिः अपने जिनको राम कृपानिधिःकरुणासागर. : अंतर गति जानत सब मन को ॥ १ ॥ ग़ज जल मगन नगन भइ, द्रोपदि लोहउबारि, विदितहे भुवनको ॥ बेद पुर्राण संत संमत मत पालन करत सटा जन पनको ॥ २|| कमन. नयन चित चयनादयन प्रभु तुमसमानहिं भत्र. तापस-मनको || अघ्र बारिधि.नासन सब समरथः दायक, परमारथ सु- ख.धन को। ३॥ जन मः कामदेव तमसुन्दर जानदः प्रबलं अति माह टहनो ॥ " ।
हरि हर स० नि पदावली!
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विश्वकप शरणागति दायक अभय देहु जन जानि चरणकोः॥ ४॥ भैरत्री॥
रधुर्वर तुमयिन कवन उबारे ॥ पंकतें पंक छंटन नहि. कवहूं टुखिंया टुन्न
किमि टारे । विनाधि रैनि नसे कैसे जो उदय अमित शशि तारे ॥ १ ॥
संबनगदीन दान.. प्रभु तुम हो वेद विदितः मंतसारे ॥ पाहि करत अत्र
लम्व देत हरि ऐसे। विरदं तुम्हरे ॥ २ ॥ बोलक बनिता बंधुः सहोदर,
स्वरथे वित्रस बिचारे ॥ तासन व हतं निज कुशलाइ छारभसे-दृगद्वारे ।'
३i तुम सर्वत्र चराचर नायको अगनित पतित मुधारे विश्वरूप प्रभु
वेगिद्रवों अब करुणा सिंधु उदारे. ॥ ४ ॥ बिहाग ॥ मन अवां वाग्लेि वेगि
संभार । जोसुचके धावत निशिबासर सोनहि पैवे बिनु जोतीरा पा गृह
धनत्र देहध्रुव मानत येहः विनमत नहि लगिहै वार | करिअधर्म जे
हितू पालतहा सोनहि संगोहा इहै तुम्हार ॥२॥ यमकर दूतबांधि तोहि
लेइह तवनाही कोउ रोक निहार ॥ कहूं अनल कहूं तपत वालुहे. कॉट
विषम अति राह दुरारं ॥ ३ ॥ शिरपर मुद्गर बहुत परतहै मूर्छित जाय
गिरे यनद्वार गत्तपत नरकमहं सहत- बहुत दुख 'समुझत अपना कर्म
अपार । विखरूपं अंबइन्द्र जाल तजुनराम चरण हिय करो अंधार
विहांग ॥ गुरुनाहि रूपदियो दरलाई। जहां वाणीको गति नपरंतु हैं मन
गतिनहि ठहराई ॥ ५॥ जोजन लखन चवत अमृतरस विविध दोघदुरि
नई में हम हमार यहभेद गयो सबपरण सुख-उरछाई पर अचल अमल
'जनयल सचरीचर पूरण एक समाई गा कारज कारण भेद उभय जहं सीप
रूप समताई ॥ ३ ॥ अगह अगोचर अज अधिकारी चितसुख रूप सदाई।
संतगुरु परम दयाके सागर सेविट मांहा लग्नाई ॥ ४ ॥ यह चौरासीखें
कठिन हैं बंधन अति कठिनाई ॥ विश्वरूप गुरु कृपा करत जेहि छिनमें
देत छोड़ाई .. ठुमरी श्याम अवहम तीसन राते । नहि साहात
घरवासु नकु मोहि न ह सोहात हितनाते ६.१ ॥ नाहु भवन फिरि नाथ
कहतं मे.हि सुनि येह बचन दहत सवगाते ॥ २ ॥ जीवन धननिय प्रान.
हमारे तुमविनु प क कलप समजाते :: ॥ विश्वरूप-व्रज जीवन सुख
निधि भई मंगन सुनि कहि असवाते ॥ ४. ठुमरीमा रोरि कुवरणेने जादु
लाई- जाँके बतः परिश्याप्त मनेाहर "हम संवक्रह बिसराई माली
पॅथि प्रभुहि पहिरावति वहुविधि गंध'लगाई। चारु बचन कहि हरिहि
सुनावति बोगिनिज बस वरिपाई ॥३॥ कही बहुत पैक्रामन्नवत नहि
कछु लहंत उपाई ॥ विश्वकपःमन मोहन यदुरामुन्दर देखि लोभायाई ॥३॥
हरि हर स० नि पदावली ६५ . ॥ टुंमरी ॥ कुवरी पटरानो भईरे ॥ कूबर देखि हंसत सब जाकी अब सेतो दिन गईरे॥१॥ जानहि सुनेदेखेउ नहि नैनन साविधि प्रगट कईरे ॥ केहरि नारि अहार छीनिक गोदरि वदन दईरे ॥शा जादासी नित नीच वारमरतसोपद ऊंच 'पईरे ॥ विश्वरूप ब्रज रानराज महं अब सब होतनई रे ॥३॥ ठुमरी॥ रघुवर जाइहेंकेिहि पाहीं ॥ जनममरण दुखफन्द हरणको अभयकरणको आही॥१॥ कमल नयन छवि भवन तुमहि बिनु कौन दीनको चाहो ॥ विश्वरूप चहुं हेरि थकित भये प्रभु तुम सम कोउ नाहीं ॥ २ ॥ ठुमरी ॥ देखो सब यहएक समानी ॥ करि मतिभेद खेद जनपावत लखतनही अभिमानी ॥ १ ॥ विषय मांह करै चाह घनेरो सुख मेथा उर आनी ॥ वाहर बाहर धाइ मरतनित नहिं अंतर हरि जानी ॥ २॥ जिमि गिरिवर सागरमहं मणिगण रतनखानि सुख दानी ॥ विनु उपाइ ते नजरि न आवत दीखत पाहन पानी ॥ ३ ॥ जब गुरु ज्ञान उदय रबि होवे खावे भरम निसानी ॥ विश्वरूप तव अन अविकारी प्रभुपरण पहिचानी. ॥ ४ ॥ रागविभारा ॥ नेरो महाराज रामग्रीति भवन सोई ॥ जासों निन हेतु कहें। ऐसा कन नाई । हारे हम खाग्निस- कल भुवन नाहिं कोई ॥ १ ॥ करिवर कर गाहगहे बारि नाकले.ई ॥ हारेप. रिवार खींचि एक एक होई ॥ २॥ जय जय हरि प्रारत हरटेर कीन्हयोई ॥ तुरितहि प्रभु मनके वेगिशत्रु बटन खेई ॥ ३ ॥ दोपदि पनयालि बियोपाल- न जन ताई ॥ नाके पद बारि गंग अगत पाप धोई ॥ ४ ॥ गावत यश स- हस बदन शारट मति गाई । वहा सनकादि ईश शीस घरण माई ॥ ५ ॥ जानत सब वाल हॉल पिता मातु दाई ॥ विश्वरूप काली प्रभु करिहै सोइ होई ॥ ६ ॥ राग विभास ॥ सुरसरि तब विमल नीर सेवत मुनि वृन्दधोर मेटत भव दुसह पीर मोनस दुरिताई ॥ राजित तिर्छ पुर तरंग निरखत 'चित होतरंग हावै तिहुं ताप भंग कलिमल दुखदाई ॥ पातकतरुप्रति प्र- चंड होवे शत खंड खंड अतुलित ब्रह्मांड भूति सिमिटि धारआई ॥ २ ॥ शंकरके जट.व.स अतुलित छवि राशि मासे जैसे रवि अमित बीच अमित चंन्द छाई.॥ ३ ॥ शम ढम संतोषदानि निर्मल सुख ज्ञान यानि अर्य धर्म काम मुक्ति करतल ननु पाई ॥ ४ ॥ बिधि कमंडल विचित्र ध.रेतामहं प- वित्र तपोराशि निखिल सिद्धि सिमिटि जनु भराई ॥ ५ ॥ विष्णु चरण बांज मंजु दुति अनपं भूति गंज तहत प्रगटानी मही बेर सुयश गाई nar ब्रह्मद्व वहत नीर निरखत मनं हात धोर मज्जन अनुराग बढ़त छन छन विकाई ॥१० ॥ विश्वरूप अर्ज ज्ञानु मातु शरण लाज मान्नु हंसनल ॥
६ हरि हर. स० नि पदावली । . तंज हंस रामउर सोहाई ॥ ८॥ विहाग ॥ अगम घर ज्योति बरे निशिवार - ॥ होत प्रकाश अपार ॥ होत नहीं ठहराव नयनको कोटिन दिनकर सम आकार ॥ ५ ॥ आनंद नदिया वहंत सोहावनं पियत है कोउ काठ संत पियार ॥ ८॥ पियत मगन जग नवरि भुलानी.जैसे रहत सदा मतवार ॥ ३ ॥ चिगुण कर्म सब दुरित पराने निर्मन हृदय भयेउ उजियार ॥ ४ ॥ विश्व- रूप सतगुरु शरणागति अलम्य पुरुष नन गही निरवार ॥ ५ ॥ठुमरी ॥ मन कावडं नासरा रुगहोगे ॥ रघुबर पढ में प्रीति निरंतर जग के मुख कछु नाहि चहोगे ॥ १ ॥ पर अपवार घरो ह्यि नाही. पर निन्दानहि पत्तवन लहागे ॥ २ ॥ काम क्रोध मद विपद वास तजि- राम शरण नहं मगन- इहोगे ॥ ३॥ पुण्य समूह वसे हिय माहीं पाप अनलते. नाहिं दलोगे ॥ ४॥ गुरु सेवामें प्रति निरंतर सम अस्तुति निन्दाहि सहेगे ॥ ५ ॥: विश्वरूप हरि कृपा करे जब तब सवज्ञालते पारपरोगे॥ ६ ॥ राग विभास- ॥ परब्रह्म रामचन्द्र शुति समूह गावै. ॥ अलय पुरुप निर्विकार सकल विश्वके अधार सुगुण रूप भक्तन हित जगमें नगटावे ॥ १ ॥ धाता- हाय स्टष्टि करत वि. प्रमु रूप मवै भरत शंकर होय सकल हरत. उदर निज समावै ॥ २ ॥ साहेव प्रभु एक रूप पूर्ण अजब भर्व भूप नाम रूप विविधि भेद माया दरशावै ॥ ३ ॥ काम क्रोध दूरि करै प्रेम भक्ति हृदय घरे विषय च.स तजे आश: आनन्द उर छावै ॥ ४ ॥ मगन रहत अउ याम मेटेड मति विपम, वाम चारि खानि जीव एक अतम ठहरावे ॥ ५ ॥ विखरूप से ह बार त्य गिवे गि होहु न्यार कीट भृग सदृश र म निश स्वरूप पाई ॥ ६ ॥ रागनिभ स . ॥ हरि हर प्रभु एकरूप गावत श्रुति चारी - भेटभाव कर दुराव अानन्द तब ह दय छाव दिव्य दृष्टि उदय भई मिटि गई, अंधियारी ॥ १.१. जन्म मरण शेक गये ब्रह्मरूप मगनभये. इन्द्रीगन नार नसेड वाले कर्मटारी, .२ ॥ आनट रस पियत नित्त दूहर न गहत नित शकु मिस विषमभाव सबतें भये न्यारो ॥ ३ ॥ जीवन सन मुक्त भये दह दशा दरिंगचे विदरत निर्लेप होइ विधि निषेध भारी ॥ ४ ॥ धन्य पुंजके समूह जेहिको असदशा- जूह सुखी जग माहि माइ अवर सब दुग्यारी ॥ ५ ॥ विश्वरूप गुरु प्रसाद मेटत मनके विषाद अपर न उपाइ कळू खोजि सकल हारी ॥ ६ ॥ ठुमरी ॥ भनन विनु माहेको देह घरी ॥ विना भजन भव नाहि तरी. शठे कोटि उपाइ वारी ॥ १ ॥ आवत नात भ्रमत निशि वासरः काहुं न समुझि परी ॥ २ ॥ मुत दित हित मानत शठ अपनो सोते.से दूरि टरी ॥ ३॥ विश्व- - हरि हर स० नि पदावली । ६० रूप रघुबीर शरण विनु कबहुं न भवतें तरी ॥ ४ ॥ ठुमरी ॥ चेतु सवेरो अपना देश ॥ छन छन घरि घरि समय टरतुहे भूलि परेसि का विषय ह. मेश १ ॥ वहां कोई तेरो संगी न होडहे दिना चारिले सवाल सुत्रेस ॥ काल कठिन को पान्द परोहे सत नहीं कोइ रंक नरेश ॥ विश्वरूप एक राम शरण गहुं छेड़ सकल जग नाना सेप ॥ ३ ॥ ठुमरी ॥ ममता मन- तोहि नाच नचावत ॥ बाल कुमार युवा पन बोतेउ चौथे पन शिर शेत जनावतं ॥ १ ॥ विषय बिवम होइ अलि गये शठ मोहि निशा सर विवश वितावत ॥ २ ॥ अजहुन नागु हेतु कर हरिसी मानुपं तनका बिफल गं- वावंत । विश्वरूप रघुबीर शरण विनु यमपुरतो कहं भवन बचावत ॥ ३ ॥ राग मेरो माया पुरी अब ओघ नसावनि जन पावनि सुनराशी ॥ परम तपों यन मुनिजन निशि ठिनतेहंदथलकेर नित्राशी ॥ अञ्चल समाधि मुक्ति अन पायनि दायिनि अति सुख. मासी ॥ १॥ अप कीरति कुवृत करिणी सब प्रबलसिंह मायासी ॥ मोह सघन तम विद्युन्न चंड दुति रवि शशि अनले प्रभाशी'। मेख मास याची जन मावत ना जन यश अभिलासी ॥ ता कहं दानि खानि सब गुण की काम धेनु विदितासी. ॥ ३ ॥ अणिमादिक दासी निशि वांसर महिमा वेद प्रगासी ॥' विखरूप-जग जननि कृपा करि राम खूप बरदासी ॥ ४ ॥ राग बिहाग ॥ सब सुख साहेब के घरे जहां गये जन में न मरे॥ ब्रह्मादिक जहां सेइ रहे हैं कर नारे निशिवाखरें ॥ १ ॥ ऋद्धि- सिद्धि सर्व विपुल गड़ाई लक्ष्मी नाके चरण तरे ॥ ध्रुव प्रहाट बिभीपन नेते प्रस्तुति करत. शरणमें परे॥ २ ॥ सनकादिक बेहि रटत निरंतरशारट नारद शेष बरे ॥ ४॥ य प्रभु सकल अनीह निरंजन निज जन हेतु स्वरूप धर ॥ विखरूप अवि गति करुणा 'मय शरन गये सब ताप हरे ॥ ५ ॥ भैरवी ॥ प्रभु तजि यांचि हो अब काहि ॥ अब ढंर रन दीन को दोनी अशरण शरण को आहि ॥ १॥ अति कृपाल भन जाल हरण हर तोरो यश कहुकहाँ नाहिं ॥ करूणां करहुं हरहु भय संकट जानि शरणं गहुबाहि । विस्वरूप वर देहु दया करि चरन शरण गुरुमाहिं ॥ ३ ॥ भैरवी । समैया गैली नीति रे हरि से करत ना प्रीतिरे ॥ बालापन खोय अजान महं स- हत दुयह दुख शोतिरे ॥ १ ॥ भये मार खेलत बालक संग मति यिता महरीतिरे ॥ २ ॥ भये युवा युवती संगराते करत है बहुत कामतिरे ॥३॥ विरच भये इन्द्री गण थाके चलने की भई मातिरे॥ ४ ॥ सम गण आए मुद्गर मार विकल परोहै क्षीतिरे ॥ ५ ॥ सहत नरक महतोय विविध हरि हर स० नि०. पदावली-1: ॥ विधि कायन मिटावै भीतिरे ॥ ६ ॥ विश्वरूप का भूलि अवम पथ रामनाम कर चीतिरे ॥ ॥ राग भैरो ॥ अचल सुतापति अविचल गति मति दा- यक हर त्रिपुरारी ॥ सेत कंज शशि बरण यिशद लसि गंग तरंग: नटारी । शेप माल बिधु बाल भाल पर शोभा अमित बनारी ॥ १॥ नमत सुरासुर परत चरण महं कहत चरण भयहारी ॥ होत अशोक रोक सब छूटत जेसे कोकतमारी ॥ २ ॥ अग नग भवन दवन सब दुख. के टीनबंधु हितकारी। अति उदार सुख शारदानि प्रभु केतिक अधम उधारो॥ ३ ॥ निकटहि वसत लखत नहि कोज माया तिमिर पसारी ॥ विश्वरूप गुरुबचन तरणि विनु हाय न उर उजियारी ॥ ४ ॥ भै। ॥ बिखेखर नगरी सुख सगरी भू- लि आहु जिनि अवर घरे । अणिमादिक महारह कर नारे भुक्तिमुक्ति जह-. सकल भरे ॥ १ ॥ ब्रह्मादिक सेवत कर जारे यको छन पै-लखत. न परे सुर सरि पावनि परम सोहावनि काशीते कबहूं न टरे ॥ २ ॥ चार खानि के लोव चराचर होय मुक्त काशी जो मरे ॥ पातक पुंज,प्रचंड तूलहे का शी निरखत तुरत जरे ॥ ३ ॥ विश्वरूप गहु शरन शिवा शिब लाम क्रोध मल सकल हरे ॥ ४ ॥ राग बिभास ॥ काशी सैलाश भवन बरनि नहीलाई। निरखत अति आनन्द हाय प्रीति हृदय छाई ॥ ॥ शंकर- नित करत वास गिरिजा युत हिय हुलास सेवत ब्रह्मादि चरण पंकज चित लाई. । अस्तुति सनकादि करत नानन्द उर माइ भरत टारत नहि नेकु दृष्टिः निरखत चितलाई ॥ २ ॥ गावत यश शेष नासु पावत नहि पार तासु कवि नन सभ हारे कछु उपमानहि पाई ॥ विश्वरूप भाग्य राश शंभुपुरी करत वास मेटत यस चास मुक्ति करतल में आई. ॥ ३ ॥ राग, बिभास ॥ जय जय शंकर कृपाल टोन बंधु प्रणत पाल बेगि हरो जगत जाल दीने . शरनाई ॥ सच्चिद घन निर्विकार सुख स्वरूप अति उदार अलख -प्रभु :- खंड एक व्यापेव समुदाई ॥ १ ॥ नारदादि गावत यश पावत हिंय आनन्दः रस लगो हे समाधि अचल मेटेव दुचिताई ॥ २ ॥ उमा रवन ज्ञान भवन मोहि मारताप ढवन देवन हित चिंपुर हतेत्र भूतल यश छाई-. ३ ॥ जर.. जर विषयाम कियो अभेटान सभे दियो पर के उपकार हेतु निज सुधि . बिसराई ॥ ४ ॥ ब्रह्मा जो लिखेव भाल नरक भोग अति कराल फेरि अंक देइ डंस स्वर्ग तेहि पठाई ॥ ५ ॥ निरखि महा तेज सपन.चलित भये चतुर वदन शंभु के प्रताप सकाल सभा सांझ गाई ॥ ६ ॥ दाता शिरतानं माज भुवन ख्यात महाराज वचन मन अगोचर गति पारकोउन पाई ५२. ॥
. . हरि हर सं०नि० पदावली । ६ विश्वरूप शिव कृपाल तुरित, हरो मन कुचाल शरण लाज करीनाथहृदय वसोबाई ॥ ८॥ राग परज॥ जय,महेश जन आरत माथन ॥ उग्मालाराजित प्रति सुन्दर कुंद इन्दु दर वपुख विरोचन ॥ १ ॥ रहत अखंड समाधि सदा जेहि राम चरण वारिन चित दोचन ॥ २ ॥ य निलप अमाननिरंजनहि मदमोहकामभय मोचन ॥३॥-सदांमगनसुनअनअविनाशीहर्षविपाद लाभदुख सोचन ॥ ४॥ हरिपद कमल अप उरमोही भवनल काम गहेतेहि बोचन २५ ॥ विश्वरूप प्रभु दानि शिरोमणि राम भक्ति वरदेहु त्रिलोचन ॥ ६ ॥ रागपरन ॥ नयमहेश जयजय त्रिपुरारी॥ दीनबंधु प्रभुनन हित कारी ॥ करत सदा उपदेश शिधाके तत्वज्ञान वरभव भयहारी ॥ १ ॥ पर उपकार निरत निशिवासर करि विप पान विबुध भयटारी ॥ कर डमरू शिरजटा बिराने भसमभंग रतिपति सतकारी ॥ २॥ अहिमाला उरमांह बिराने तेन पुंज रविसत उजियारी ॥ गौरबरण ,सुख भवन दयानिधि गावत सुयश सदा श्रुति चारी ॥ ३॥ जासुनाम सभताप नसावन द्रवो बेगि प्रभुशिर शशिधारी ॥ विश्वरूप प्रभु हर दयालल्ला देहुं रामपद प्रीति अपारी ॥ ८ ॥ भेगे राग । जयसामेश्वर प्रभु निरि लेखर उमा रवनभय हारी ॥ तीरथ प्रतिके अक्षय काशको हमारान अधिकारी १ । नाका जो फल श्रमल सोहावन तपसो ताहि बिचारी | देत दयानिधि दरि करतनहि दरदवं हितकारी ॥२॥ दर्शनतें मति विमल करत प्रतिज्ञान रूपवपु धारी । यात्री ननमन शोक हरण हरअमित भानु उनियारी ॥ ३॥ इहभव अगम अपार सिंधुको तरणि घरण तुमारी ॥ विश्वरूप प्रभु अधर्म उधारण काहि शरण नहितारी ॥ ४ ॥. रागभेरो ॥ कर्दमेस सर्वस त्रिपुरहर शोकहरण जनचाता ॥ कलि मल देखि रोख हरशंवार अभय मुक्ति पददाता || तेरो चरित अगाध पारनहिं पावत अहिपति धाता ॥ १ ॥ शंकट तरुउन्मूलन करहर गहत नजन अघबाता ॥ प्रति उदारं सुनि चरित श्रवण पुटहोत पुलक सवगाता ॥ २ ॥ याची जन अघसिंधु अगमतर सोखक निमि घटनाता ॥ ज्योति सरूप अनप महाकवि अमित दिवाकर भाता ॥ ३ ॥ अरज़सुनो करुणाके सागर सब घट के तुम ज्ञाता ॥ विश्वरूप प्रभुचरण शरणदेह हरहु सकाल जग नाता. ॥ ४ ॥ राग भैरो ॥ जयनग जननी शंकट हरणी भवजल तरणी नन्दसुते ॥ छबिनतु-.. लाई बरणि न जाईबल प्रताप गुणसिंधु जुते ॥ हर कमलासन प्रभु गरुड़ासनं सिद्धासन सुरशन नुते ॥ १ प्रारतहरणी मानद करणी, भ्रमतम तरणी अध धूते ॥ गतिअन पायिनी शुभ मति दायिनी अभय विधायिनि अति ब्रूते ॥ . - ॥
90 हरि हर सा नि० पदावली। - २. नगधिति हरणी उदभव करणी सुयश वितरंगी बिदितडते जनमन रंजिनि कलिदुख गंजिनि शोका विमंजिनि बसते ॥ ३ ॥ याची तरणी सुर गौ शरणी सीम डिझे यश अनुते ॥ अज अविनाशिनि शोक विनाशिनि विश्वरूप पदकमलनुते ॥ ४ रसगकल्याण ॥ जयजेय कलिपांच समनिरोष राग,दाय दमनि तेोप मेम टायिनि जग भय कारिका । वंत लादि देव पावत नहि जासुमेव चरितामधुनावति श्रुतिप्रीति चारिता ॥ १ ॥ मोह मानमद कुधार वहेजात नीयभार और ठोर पापत नहि तुहीं तारिका. i नन्द भवन जन्म लिये अभय दानसहि दिये भूसुर भूभार हरणि सुरं मारिका ॥ २ ॥ उदभव थिति नाशकाणि जगके बगेवंय हरणि बुद्धि सुद्धि टानि सबशोक हॉरिका ॥ बाल काम जुटिल चंड जनशे भ्रम बिस मुंडे खंड खंड करणि निबिल शक्ति बारिका ॥ ३ ॥ रज निपति विमल बनि सेहति अतिमंद मनि धारेपट सूपन बरतंडित सारिका । तरुण तरखि तेजरासिल.ला तनुदेवि भासि दिव्यदृष्टि दायिनि मनभेद वारिका । ४ ॥ विखरूप जगत ननि अरन मानुडान पनि गमचरण शरणं तेंदु भीम चाडका ॥ ५ ॥ रागहेंगे । जव मारत सुतं जयहनुमान ढोनधु सुकृपा निधान । रामन.म स्टरहत निरंतर प्रेम सुधा नित करत हे पान | in अंजनि तनय तेजबल सागर ज्ञान भवन सभान गनखान ॥ कीन्हें भक्ति, परम मुख्सागर निजवसि गखेव रामजान ॥ ३ ॥ जाको यश रघुवर निजमुख तें कपिटल मह क्रिया बहुत वस्त्रान ॥ छन सह लांचि पयेचि गयो है जामु.. प्रताप नगत प्रगटान ॥ ३ ॥ खल दल तून्नताहि पाका सम बालापने मुझे मेले मानः ॥ विश्वरूप प्रारम्बूत बरदेहु बेगि हरिर्पद निर्वान ४i.. रागभैरो महावीर रनवीर शिरोमणि रामदूत गुरुवानो । यशप्रताप महिमा अतुलित बल कहिनमकत अति वानी ॥ गोपद सन लांघेव सागर कहलगे वननेकु थकानी ॥ कीन्हें परिक्षा देव विविध विधिलिखिरभुता सुग्नेमानी। १ ॥ सोताशोज हरण करुणाकर बन्सागर दरबांनी ॥ टनुन दितिज कुल अगम गहन वन टहन विदितं जग. जानी ॥ २ ॥ ज.रेउलंक शंशनहि मन मह तारेउ वाग वितांनी ॥ हाहाकार शिया सब पुरंजन टेरेत पानी पानी ॥-३ ॥ मुनि जन मुख कारक भय हारक द्रवो मुजन पहिचानी ॥ विश्व- रूपप्रभु दया कीजिये हरिये मोह निशानी ॥ ४ ॥-विहांग॥ जयगणेश जयं जय जगवंदन ॥ अशरण शरण भक्त उर चन्दन ॥ नाम प्रताप भले विध नानत मुमिरत तुम्हे नसै भ्रमफन्दन ॥ करिवर बदन हरजदुख सागर राम हरि हर स० नि० पदावलो। म.क्तउर जेहि चितनन्दन ॥ १ ॥ चरण कमल जेहि पजिसमा नर कबहुन लहत मोहमद मंदनं कोटि सूरसम कांति बिराजे निरखत रैताप-जग द्वन्दन ॥ २॥ विश्वरूप प्रभुशरण पुकारत रामभक्ति टेहु शंकर नन्दन ॥३ राग मेरो ॥ अघखण्डन पान मंडन शंकर काशी नाथ दयाला ॥ अति दाता उ- दार हर केवल हारका काम काराला ॥ ना सुरतए सुरधेनु सरिस कहो तो नहि वनत कृपाला ॥ ५ ॥ यह सव -अल्प पालन, को दायक जासकिये जि- हिकाला ॥ तुमप्रभु निज सरूप सुख प्रापम चिदघन रूप विशाला ॥ २ ॥ महिमा अगम पार नहि पावत पट दरशन श्रुति माला ॥ बरुणा तीर बसे याची हित. अघ. हरि करत निहाला ॥ ३ ॥ करूणा सिंधु टयाक्षरि खालो अज़र साहको ताला ॥- बिश्वरूप रामेश्वर दरवी जानि नाथ निज़ वाला ॥ ४ ॥ रागभेरो ॥ जय-रामेखर प्रभु सर्वेश्वर दीनबंधु अबिनासी ॥ अलख अन दिवेद जेहि गावत ब्रह्मा करत खवासी ॥ इन्द्र वरुण घरगन्ह पर लोटतं शरणागत अभिलाशी ॥१॥ अनल भानु शशि नम्न विराजते तेजपुंज सुवरःसी • R१. जापर दया करत चितवत प्रभु हरत मोह मद फांसी ॥ २ ॥ रामचन्द्र निज कति थापे छलनिधि तीर म.सी. ॥ देवांन कर. मुनिचर- युत पूजे जयनय धुनि नभ वासी ॥ ३ ॥ करुणा जलधि चन्द्र शेखर हर आसु ते.पना माशी ॥ विश्वरूप प्रभु यात्री तारण बसे वरुणा तटवाशी - '४ ॥ भैरवी ॥ धर्म राज महाराज क्ष्म निधि तेज पुंज तप धारी ॥ जाकर रिपुं बाहुं नजरिन आवत सवकरि सबै निहारी ॥ गर्व माह महता,मद माय निज स्वभावतें टारी ॥ १ ॥ नाको बंधुमहा वल सागर विदित.जगत मह चारी ॥ सुरपति देत नाहि अर्द्धसान उरपत स्वल भयकारी ॥ २॥ पापसिंधु श्रति लख्ख दुर्योधन कीन्ह उपद्रव भारी ॥ त.को टप हरण समरथ न्यशु- हांके कृष्ण मुरारी ॥ ३ ॥ शिवपुर वांस शिवरूप भयो हे.याची जन अघहा- री ॥ विश्वरूप जेहिनाम. जपेते होत धर्म मति. प्य.री ॥ ४ ॥ राग भैरो ॥ पंड्डु तनय अति. बुद्धि उजागर वलसागर गुण खानी ॥ धर्म राज़ महाराज साजसनि. दिशिदिशि तें धन प्र.नी-॥, रूव नृपजीति रोति श्रुति - मतके यज्ञहेत व्रत,ठानी ॥ १ ॥ स.ल दिश.तें मुनिवर आये वेद विज्ञा. बरज्ञ.नी ॥ कृष्ण सदलबल सुख निधि अाये सभा:हर्ष ,अधिकन ॥ २ ॥ प्र- थम पूजिसब मह निरणय, करि पूज्यकृष्ण काहजानी ॥ पूजावेद घोखद्धि नव- रसब. क्रिये यथोचित वानी ॥ ३ ॥ स धुन रेस हर्ष उरवाढो मुखेनृप आंभ- सानी ॥ विश्वरूप- यदुभूप जाहि वल ताको भुवननिवारी ॥ ४ ॥ रागभेरो॥ ॥ ॥ = २ हरि हर म0 नि० पदावली। ॥ जय भगवान अनादि सनातन कपिल जगत हितकारी ॥ देव हूति क्रर्दम के जाये जग तारण वपु धारी करि उपदेश बिबेक अनेकन्ह जननीभवले तारो ॥ १॥ तंत्रविवेचन मग सबडू बेनिज वल ताहिउबारी ॥ भयो हे पुनीत चरित मन म.यन विदित भुवन टशवारी ॥ ३ ॥मातुहि कार उपदेश ज्ञान वरमेह जाल सत्र टारो ॥ चेतन असल सोहावन निजसुख कीटभ ग 'सम डारी ॥ ४ ॥ अति कृपाल निजपाल बालजिमि जननी प्रोति संभारी । वि- श्वरूप कोशोश संभु जन यात्री को रखबारी ॥ ४ ॥ यह मोलह भजन पंच कोशी ॥ गरी ताल जल्द ॥ अ.रति श्री मोहन नीकी कीन्ही मानना थार यशोमति कर लोनी ॥ १ ॥ चांद सूर देोड ज्योति सेहाय जगमम ज्योति तरुण तमहीनी ॥ माल पटल रोरी छविसाहे नवल सुरंग लसत पटझोनी ॥ २ ॥ शीस मुकुट मणि जड़ित बिराने विभुवन' छवि सिंहासन छीनी ॥ वरपत देव कुसुम चहुं हरपे वनमाला छवि लसत नवीनी ॥ ३ ॥ गावत राग सकल वज नारी सवाल लोक छवि व्रज प्राधीनी ॥ विश्वरूप ब्रजलाल कन्है या भूपन व्यो ते हरत गुनर्तनी ॥ ४ ॥ गौरी तालजल्द ॥ आरति त्री रंघुबर जोकी कीन्ही सबाल भुवन छविचित महदीन्हीं ॥ भत्ति सुदीप मु. हावन लागे वातो तत्व विचार नवीनी ॥ प्रेम सोहावन घत छविछाजे वर- त जान मय ज्योति अलीनी ॥ १ ॥ श्रद्धा सचिव सकल इन्द्रिय गगा शुक्र • सनकादिक सुरदि जो बीनी ॥ शम दम योग विराग यतन सव ढोलक म- शुर मृदंग नफोनी ॥ २ ॥ आरति अलख लस्थत जनसाई श्री गुरुशरण बा- रिवर वीनी ॥ विश्वरूप प्रभु अचलं निरंजन झालबात ज्याति होत भ्रमछीनी ॥ ३ ॥ भैरवी त.लजल्द ॥ मंगल आरति श्री यदुवरकी ज्योति सोहावनं राने ॥ मकरा कृत कुण्डल छविसोहे मुकुट भानु छविछाजे' ॥ माल विशाल लसत मणि गणको पदिक काठमह साजे ॥ कटक बलय भूषण छबि छावंत पहला पन मह गाजे ॥ २ ॥ बढन सरोरुह लसत मनोहर कुटिल केश भलिताजे ॥ दास मनोहर ध्यान करत सुचि सिद्धि होत सवकाजे ॥ ३ ॥ वन वनिता वालक परिजन सब सानि सुमंगल माजे॥ विश्वरूप प्रभु रिति गायत भांझ विपंची वाने ॥ ४ ॥ भैरवी तालजल्द॥ मंगल आरति श्रीहरि- हर की ब्रह्मादिक सुरसाजे ॥ कनक थार कपूर कि वाती जगमग ज्योति. विराजे ॥ १ ॥ श्याम शेत घनझुंद सोहावन कोटिन्ह विवि छोजे । म णिगण हार माल अहिगण का वास शिवा नो भाजे ॥ २॥ गान करत सब . देव मनोहरं बहु विधि वागन बाजे ॥ रतन सिंहासन झलत प्रभुको देखि . - हरि हर स० नि. पदावली । . . मनो भव लाने ॥ ३ ॥ शारद शेस सिद्धि गुण गावत छोड़ि सकल भ्रमका- ने विश्वरूप महिला हरि हर को गावत व ति शिर ताने ॥ ४ ॥ राग भैरो ॥ आरति करत तुमारी रघुवर ॥ दीपक बुद्धि प्रति घत ता मह वाती सुरत सवारी । वरतहे ज्योति अखं निरंतर दशदिश उनियारी ॥ १॥ थार बिचार घरों ता जपर तत्व कुसुम चहुंतारी ॥ इद्भुत छबिरबि तरुण तेज सम शोक रेनि तम टारी ॥ २ ॥ शमदम ते प वमन भूषण वर इन्द्रियं गण रुचिधारी | गावत ताल देत बहु भांतिन्ह नितत मन रुचि कारी ॥ ३ ॥ यह गुरुगम आरति धारत उर मेटत ममता भारी ॥ विश्व- रूप लहे अचल अमल पद जेहि गावत तिचारी ॥ ४ ॥ जय जय गुरु प्रभु जग तारक त रक ब्रह्मानंन्द हो ॥ अति उदार सुग्य सार सिंधु प्रभु नमत चराचर चरण तरे ॥ सकल महीश अहीश नमत नित कर जे.नि. शि वार खरे ॥ १ ॥ आज्ञा करत देवगण जातो ऋद्धि सिद्धि दासी-सगरे.॥ सब गुण वयु धरि शरण शरण करि चरण एलोटत प्रीति भरे ॥ २ ॥ शरद सुरसरि सर नाना विध जो तप पुंज भुवन निसरे । तजि निज निज घन चरण कमल दल बसत पलटि नहि जात रे॥ ३ ॥ जन मन कुमुढ निशा कर रुचिकर सुर' तरु इच्छित दःनि वरे ॥ शम दम ज्ञान दया तप संयम चारो फल 'अति सरस फरे ॥ ४ ॥ दरशनतें अतिहर्ष बढ़तउर कलिपातक दल सकल हरे। जैसे पंचानन कह निरखत भाजत करि गया बहुतडरें। ५.॥ भानु निकर कर जासु वचन वर सुनत अविद्या रैनि टरे । कामक्रोध मद लोभ नखत गंन छीन भये नहि नै बरि परे ॥ ६ ॥ ईश बिष्णु विधि नाम भेदचय केवल आपुहिं रूप धरें ॥ मस्करीश परमीश पुरातन सतचित व्यापक प्रचर चरे ५७ ॥ दिशि दिशि भ्रमेउ लहेठ नहि अस प्रभु जादुखसुन- तहिं तुरित ढरे ॥ विश्वरूप मनमथुप मनोहर चरण सरोरुहवास करे ॥८॥ ॥ श्रीगणेशायनमः । शरच्चं वच्चन्द्रप्रतिमवदनां कोटिरविभा शुभांगंगाम्बांछा 'जलजकन्नशा भीति कारिकाम् ॥ शिरोरनेठान्धवामकरासीन जननीम पटेवच्छन्द्रलयित सु. तनुम्यामिशरणम् ॥ ५॥ बलेयांचाध्या न विपदभुवनांद्रान्तमयिना दुता दुकाबनि प्रखरनवविद्धांडमुखिरा ॥ श्रवद्धारापारा द्रुहिणनिलये नावि- शंदजा कपर्दै गच्छन्तीनकुलतपसामेरुशिखरे ॥ २ ॥ चतुद्धास्वकृत्वाऽवनित लेविशन्तीभगवती परिवाहाल्लोलप्रवरसुरवै मौतमतिदा ॥ अपराविष्टा शु. गंवानजिनान कहकया वहित्यादिव्याधि प्रचुरटरणी दीनजननी ॥ ३ ॥ जग ॥ . , ' ४ हरि हर स०. नि0--पदावली न्मातीर म्यरमसचिरन्ते शिपयगे वरंसेव्यं सारं सकलतपसां शुद्धमतिभिः । विहस्तस्याशारं निरपदनिकारोघशमनम् मनायाधीजाघ प्रशमविदधहिद्धश रयो ॥ ४ , सुनोन्द्रःस्त्वतीरेऽपिचबुमतयो व्रात्यनिच्या मनोनित्वोपित्वा पुरचलपदम्वेदविदितम् ॥ समारुह्यत्वष्टा सुरयंवटना खिनमनसा वृतिंदिव्यं आनंजननिनिययुनाकभवनम 1-1 || वियदगंगेऽनंगारि शिरसिचरद्वारि विः- मलेनुदापुण्य ऽनन सुरमुरवधूसेव्यसलिले ॥ चलवोचिने णि श्रमपदनगत्ताप हरणिहाशान्दुःपाश स्परमकृपयाविष्णुयदिमे ॥ ६ ॥ त्वमीशस्त्वं घातात्वम- सिहरिरम्वाऽखिलनृणामिरात्वं गदाणी जलदसवनात्यम्भगवती ॥ जगद्रना सृष्टिप्रलयमनिशं संविदधतीत्यदन्यत्किलोके यदसिनहितद्वहिनितराम ॥ ॥ अहोमन्दोलक्यप्रभृतिनिकरभैदकुशल रविच येते येनु ति सुगुरुतोवनद्ध विधुरैः । सुग्नेस्वच्छेऽव्यस्ताऽनमितजगदोके भुजगवतगुणेसच्चिद्रू पेत्वयिनि- शतुमस्वान्तमनिशम् ॥ ८॥ पवित्रस्तोते पठतिनियतायस् सुमनसा लभे- विसौख्यं सुवृपमवलम्बाद विधुरम् - ॥ दहेदंधोरहो वचनतनुधो जातम्- खिल बजेदन्ते ऽनन्तनिरवधिमुखं ब्रह्माविरनम् ॥ ६॥ इतिश्नीम त्परमहंस परिवाजास्वान्त मधुन्नतास्वादितांट्रिकमल. नोगौड़. स्वामि शिष्य श्रीविश्व- रूपानन्द स्वामि तं गंगाष्टकम् ॥ भोगणेशायनमः ॥ · विदोशमीश. तनयं बरदंगणेशं विनापहम् विवमशोक निवृत्तिहेतुम , बुद्धिप्रदं निखिल देव मुनीन्द्र वन्द्य वन्देऽर्म के टिसदृशं गजराजलावर्स . १ .वेदार्थसारमखिलं रचितममुनीन्द्र सूतदर्थ सुगमःयचक्रारभाष्यम् ॥. याशंकरो निखिललोक हितार्थदृष्टिस्तं: नौमितत्व मतिदभगवन्तमीशम: ॥ २ ॥, सन्यासिद्धिनवर्य मगडलवृतः श्र.स्वामिमतारकब्रह्मानन्द सरस्वतीतिविदितो मायातमासानु मान। सायब्रह्मसुखप्रकाशऋदसौ वर्वतिस.परियोतत्यानसरोन मेवसततं भृगे भनेऽहंमुदा- ५३ ॥ विद्वदृन्दवरालि सेवितपदाबद्वन्द्वसत्तारक ब्रह्मा नन्द सरस्वतीयतिबर श्रीमद्गुरु स्वामिनाम् ॥ मायानान्ति तमिनमान- निकरो सद्भक्त निवागदी वन्देऽहंचरणो मुभेदधिपशो न्मत्त भकंठीरवै ॥ ४ : काभ्यां नगदीश्वरं गिरिसुता नायं जगद्वल्लभम् पंचक्रोश्युपरताया विज़नता सवार्य देवगुमल ॥ बानीस्वान्त शरीरजावतमसे चंडांसु कोटि- भं सहिद्मलमुनिराहमचलं शोफर्टमेशभजे ॥ ५ ॥ श्रीमचन्द्र मुखीदिने: म सदृशीभूपाम्बगलतां खड्गाशकारपुमत् मुदधती निवासमांदिताम् । बागनाथमदाठि. नागभरगी साहेश्वरी मम्विकां. धात्रीशानुवन्दितानि चना ग्रामीमचण्डौम्भने ॥ ६ ॥ मायावन्धहरं जनेसितकरं वद्य विधा- हरिहर स! नि:पदावली । ०५ चादिभिः मोरामनियमोश्वरंजनकजा चिन्ताऽधिचिन्तामणिम : मिसाधु- मताममिव भसतांसर्वेश्वरंसानियां सञ्चित्कंचि सिंधुसागर गृहंश्रीबायुपुत्रम्भ जे 1.0 ॥ मुर्दा मीन्दुदृशं गिरीन्द्रतनयानाधमहेशं वि वंद्य धादिमुखैश्चक्नु न्द बलं भोगीन्द्रहारहरम् ॥ वांधावत सतांचवरुणा रोधस्थित शंशरं सचिब्रह्मनिरंजनं सुबवनं श्रीरामनाथंभजे ॥ ८॥ योवैभवाब्धितरणाय चरित्र से मायावकार भगवान व जनाऽनु कम्पो ॥ धावाऽर्थितो. .रघुकुलेयुकृतावता- रस्तं ज्ञानकोशमखिलाश्रुटमाग्नयेऽहम् ॥ ६॥ श्रीपण्डोस्तनयान्युधिष्ठिरमुखांसद्ध भचिन्त.परान्या खण्डादिक्रुता शार्वरतमाभानूनमुयात्यर्यदान् ॥ त्य झाराज्य मदंसदाशिव पुरस्थानबेदुरात्तत्पदं श्रीकृष्णांनिसरोज शृङ्गहृदयान्श्राद्रोपदी- शान्भने ॥ १० ॥ श्रीमत्मगुगारंभव भयच्छेत्तारमीडासुरैः कतीरंजगता मगभ्यम सताज्ञान वागम्यम्विभुम् ॥ वाण्टश्येडमजाभुंच. कपिलाधारस्थमीशं शिव: सर्वेशं वृपमंञ्चनेश्वरमहं श्रीपार्वतीशंभजे ॥ १९ ॥ श्रीमतखर्ब विना- यकं गजमुखं श्रीकेशयसिद्धिदं श्रीमत्संगमराड् त्रिलोचन विभु श्री बिन्दु लक्ष्मीधवान् ॥ सतमेव्यमणि वार्णि केश्वर. हरं श्रोतारकेशं प्रभु शो सप्तावरणं गजेन्द्रवदनं श्री सिद्धिराजभजे ॥ १२। श्री मन्माधव दंडपाणिगिरिजा: श्री ज्ञानवापी शुभः श्री मत्सानिविनायकं खलुमनः कामेश्वरशंकरं ॥ स्वान्त. च्छावरदं जगभयहरं श्री कोटिलिंगेश्वरं भक्तिज्ञान विरागशान्तिसुखदं श्री 'ढुटिराजभने ॥ ५३ ॥ पिंडाऽण्डोमन वृक्षजीवनिकरांसंशोध्यतेभ्य: प्रभा ज्ञान ज्येतिरजवासिगुरुगा . त्यामतत्वविभो ॥ सर्वशंकरुणाकरंशरणदं मार्तण्डचंडप्रभवाचा भूपणभूषितांगमनिशंत्रीभैरव संभजे.॥ १४॥ श्रीकाश्यां नियमाणजीवनिकरेभ्याऽज्ञाटि सेव्यविभुतत्वं ब्रह्मचराचरेश्वरमजंसोधयन्तं प्रभुम् ॥ संसारार्णवपादपोतमजरं देव्यन्नपूर्णापतिसंविट्वे द्यमनंत भानुसदृशं श्रीविश्वनाथंभने ॥ १५॥ भूचन्द्रगिनिशेशवत्सरगतमासेतथाकार्तिकेशुलेऽनंग तिभूगोश्चटिक्से नोतिरड रूपैःकृतः ! मुक्तिक्षेत्रातालयेश गिरिजाप्रभिरवा- देस्तवंश्योप्रेयः पठतांतनोतुनितरांसंशणवतांशद्धया ॥ १६॥.पंचक्रोशस्थदेवा- नांवन्दनस्तोत्रमुत्तमम् । य: पठेच्छ गुयाद्वाऽपिप्रदक्षियफललभेत् ॥ १० ॥ इति श्रीविश्वरूपानन्द स्वामिविरचितपंचकोशप्रधानदेवस्तवम् । चतुर्वेदेवद्याभुव नबिदितांतंबकवृत्तांध्रुवांस्वारामासेव्यपदयुगलाहंसकरभास ॥ तुलाकाटिदेवी स्वपदिदधतीचन्द्रवदनामुरोदेवळंदा सुतनुमनिशंनौमिवरंदाम् ॥, १. ॥ सह- 'मास्यादीसत्वनिखिन जयिनादैत्यनिरान् रसाभूदेवादित्रिदशसुतपोरऽण्य दहनान् ॥ स्फु रद्रोपापांग:प्रलयजनुदानन्त पटलेः प्रशन्यायँ तूर्णं भयमकृ- • .
हरि हरं स नि पदावली। - ', था:पाहिवरदे ॥ २ ॥ अंग्रेसेव्यैभव्य भविक्रमतिभिभावुलबरें स्पोमूतस्फू ते विधिहरिहरैतिचरिते । जगद्गारोन्मायेप्रगतमृगवट्ठविकृपयाविहस्तानो बद्धांजननिललितेमेचियनिंजान् ॥३॥ विराड्ड साक्षामड्डरिकगिरिश कारभृतजे रमेरोमारूसमयगुणते ऽनन्तमहिमे ॥ ध्रुवेऽम्बडातोऽत्स्यवस्सिनविश्व मखिलम्भवाम्भोधीनगांस्तरगिचरणेचोद्धरशिवे ॥ ४॥ विपञ्चोनिशाणैर्नि खेल सुखदेश्शान्तमुधियेकलर्मन्द्रस्तारैः सरसललितःकर्मरतये ॥ स्वंतत्वकमार्थ प्रथितकृपय वायसिभी हरन्त टोनातिप्रवितरचमेज्ञानममलम् । तम स्तामिस्रादिप्रयितविलसत्यर्वमुदधन्महामायाराघों निखिलसंवटामाचिजनि- कोस् ॥ अजाढिस्तम्बान्ताऽऽवरण करिकांशान्तिहरिकांकृपादृम्भ स्वहिर शरणदेपाहिगिरिजे ॥ ६॥ अयोध्याद्याःपुर्यः सुग्पतिमुखालोपतये फेगी- न्द्रादा नागाहिमगिरिमुख शैलनिकराः ॥ वियद्गंगा मुख्यानिखिलसरित्तों ऽभोधिनिचया:विराङ्मूत्रात्मशास्त्वतसिनिखिले पाहिबरदे 9 निजान- न्दानऽन्तोऽमृतसदनचिद् ब्रह्मणियरे जगत् वय्यध्यस्त अजिभुजगद्विन्ध्य भवने । नमोरूपेवेदो मुगुरुकृपचालव्धधिपवरंजानमा निगमगढितंदेहिंसु भगे ॥ ८॥ वरंदिव्यन्तत्वं पठतियदि देव्यकिमिदंमनावाणीकायार्जितवृजि नतोयाब्धिघटजम् ॥ परांसिद्धिलज्यामइहतरसानन्दकरिका ध्रुब गच्छेदंन्ते स्वमुखमचलं ब्रह्मपरमम् ॥ ६ ॥ इति श्री विश्वरूपस्वामिकृतंदुर्गाष्टकम् ॥ कुंडलिया ॥ ताकरनहानन्दपी स्वानोगोंडसुजान | ताबोशिंप्य सुजान है विश्वरूप जग यान ॥ कीन्हो हरि गुण गान सगुगा निगु गा मुबदाई । वासु- देव द्विज राज ताहि महं कीन्ह सहाई ॥ गंथिचरित बरमान उमानाहि. सुख कारक । विश्वनाथ उर माहि सम उ सबशग तारक १॥ उनइस शत येकतीस बरस हरि गुणरास ॥ २ ॥ सनपुरी में विदितः चहुं काशीक्षेत्र प्रधान । स्वामि गोड़ महाराजके दशाश्वमेवस्थान ॥ ३ ॥ गंगातीर पुनीत अति रुचिर घाट से पान ! पंडित वृन्दयतीन्द्रजन वसन मनाहरजान ! विश्वरूप स्वामी किया रचना ललित ललाम । वासुदेव तेहिका क्रमहिवाधि रागमनाम ॥ ५ ॥ इतिश्री विश्वरूप स्वामीकृत हरि हर मगुण निगु गा पदावली समान राग an मानकिताव नाकिलान 'नामकिताब मामकिलाद वजनिलास सागर अरावली सुचिमामाणिसारिणी नजदिलासछोटा वैद्य वर्तमान संधीत ज्योतिष झान जालीसी हद दीपक रागनकाश जानेवाचन्तित मनोहालली रजातकससीक मातकालंकार वालामोश जारमाललारसदीय गारपतीसी ram विसाधीशीप्रथाह नातला मा कित्सावशेरह जावरहगेना कितानी होरामकरंद নানানীবাসলেনা गरिनकामधेनु: संस्कृतउटीशास- ब्रह्मसार लोलावनी ननुमति शिवसिंहसरोज मुतफरकात. गरियोकोलकामा विशुनागत भक्तमाल शनिश्वरीका संस्कनकी पुलको महिमस्तोत्र रामाभियेक नाटक शान माला लामुलीसुदी संस्कृतभाषाटी- इन्द्रसभा गोपी चदभरारी सिद्धान्तचन्द्रिका अमरकोश विक्रमविलास कथाश्रीगंगाजी अमरकोशीको माइस-याशवल्दारमति बिनालपच्चीसी अवधयाना पंचमहायत মারি सिंहासन बत्तीसी भातरी गीत निर्णयसिन्धु गार्फ: पावती रण्ड दाननीलीवनागलीनासंग्रहशिरोमणि भगवझीनाटी हवी शुकबहतरी... दोहावलीरत्नावली भगवहीतानटीज भगवाहीनादी बकावलीसमन गोकर्णमाहात्त बीयाहस्टील शीतगोविंद चहारदरवश श्रीगोपाल सहस्त्रनामविल गोगटन दासत्यनारायणा किस्संहहातमताई कथासत्यनारायसास भविस्योरपुरा परमार्थसार सपूर्वकयां हनुमानवाहक अपराधमजनस्तेज पाईपरसंहिता किस्सागुलसनोवर जनकपच्चीसी. इंगस्तिोत्रं पाराहारी सहरंजनीचरित्र भानन्दा मानवविरतो कायस्थलभास्कर शीघ्रबोध रविन्सनका इतिहासवनयात्रा कायस्थधर्मनिरपणा लघजातक वैद्यक कायस्थवर्णनिर्णय नथालोदा यदपंचाशिका निघण्ट भाषा: विहारदिन्द्रावन समुगलमा सादिक अमर विनोद समरविहार ज्योतिष सरितालीकी वैद्य जीवन कल्यभाष्य बद्ध गायन भोधिसंगहकलावल्ली दरसी इ वदीपिका मबिलावं मासकिनब मायाकाण्ड मजनूमाजाविताको भूगोलदीण भारंगएकासह जिदारी শামী इतिहासतिहिना निविण्याकार २०६१ शक भाग सन्दरकाण्डुसेकासला सतमा मालकाकागड नाशीवरथी सालदेवीयनिहाल उत्तरदाराई ऐका रजिस्टरी० मालाचीरमा सवरेशीमोल गुटका २८६६ इंग्लिम्हादला इतिहास रसा ऐक्टरांना पाकिोथीकारती हितोपत्रिका नईसराई লীলাঞ্জনা লাইনঃ स पासंगही हिदायतवासामुविधलगान भिशाशिकारमा भाषाकाव्यमयह साई रि कवितरलाकारमा पचिकित्सा सनद रजपुरकीकहानी तयारभार पहाबखते कधी हंगेरा धसिंहकारतात मंगलको नियाकलियतः सेक स्टाम्प दस्ता पिशावली पत्रकाश जस्टरमाखिलखा वजात १८ सन् पहिरोधिगी राशिलनकाशमा रिज तुलचामदसौ १८६ ईसवी चवदीपिका रजिस्टरहाजिरीमा खुकदारा विद्याचना सदाभारा दिवाकर तया४भाग कानून सन् पदार्थादासार गणित किया . पटवारियों के कार्य पिकचौपायाकामदा- पदार्थ शानविदा क्षेत्रका क्षेत्रकाश उर्दू कैथीमहाजनी खिलतबेजारसना भोजप्रबंधसार क्षेत्रवेन्द्रितारभा- टिकट के लाइसन्स ऐसजभूजाविता सिकीलदायरा का ऐक्सर जीजदारी सानुबाई बोध रिखागणित भाग ईसवी एिकमालगुजारी भावालधुण्याकरता मांग भगरदीवाशमाली भाm बीजगरिमतमा रोक लगानमारती ई नया साग : वशिमाली तरमीम मनममाजावि भाषा तत्वदापिका समायरा तलसी २५ई. तामोजदार भाषाचेद्रोदय यालकाण्ट इंडियनपिनलकोई, तथा भाग লাৰী