Acharya Shri Vinaychandra Gyan Bhandar, Jaipur
Shrimadrajchandra
Front matter
प्र--सेठ मधीमाम, वारसगीपन और
भैपरमारपाल प्रभावमामामा
मागायनाम, म
मा-पुमाप दीपाशी रसाई
यूमस प्रिम्मि
पिडी*
श्रीमद् राजचन्द्र-वचनामृत मूह तत्वमें कही मी भेद नही, मात्र पिम मेद, यह मामकर नाशप समास पवित्र धर्ममें प्रपन करमा (पुष्पमाग ११) जिमेपरके करे हुए पर्म-तत्वोंसे किसी भी प्राणीको झेशमात्र मी खेद उत्पम नहीं होवा इसमें सब बारमामोंकी रक्षा और समितिका प्रकाश समिहित है। इन भेदोंके पामेसे, समासनेसे वौर उनपर अस्पत सम्म विमार करनेसे भास्मशक्ति प्रकाश पाता है, और पर बैनदर्शनको सर्वोप सिद्ध करती है ( मोसमा ६०) 'धर्म' बहुत गुप्त बस्तु है । बा बाहर से नहीं मिटती । यह तो मपूर्ण वसंशोधनसे ही प्राप्त होती है (२६) सब शादोंको जाननेका, क्रियाका, जानका, पोगका और भकिका प्रयोनम निज स्वरूपको प्राप्ति करना ही है। मिस अनुप्रेक्षासे, मिस दर्शनसे, मिस झानसे, भामत्व प्राप्त होता हो, पी मनुप्रेक्षा, पही दर्शन बौर वही छान सोपरि (११) हेगी ! र भूठ मत । कमी कमी उपयोग कर किसीके रसम करनेमें, किसीके हारा रवित होनेमें, मयका मनको निर्वछताके कारण दूसरेके पास जो मा हो जाता यह तेरी मूछ है ठसे न कर (८६) हमें तो मामण, पेण पाहे वो हो सब समान हो। कोई न कहा जाता हो मौर मवसे प्रस्त हो तो वह वहितकारी, मतरत ही हितकारी है। वणव, बौद्ध, बेताम्बर, गिमार म मादि चारे कोई मी हो, परन्तु जो कामहरहितमारसे मुद समवासे बामरणों को पगबेगा, उसीका करपाण होगा ( उपदेशापा) मैनपर्मका वाशप, दिगम्बर तया वापर बाचाका बाशय, मौर डागीका भाप मात्र वामाका समावनभम प्राप्त करानेका है, और यही सारम्प (म्याम्पानसार. प्रमसमाधान) प्रकाशकका निवेदन वि० म १९५१ में मू। गुग्गवो ' श्रीमवारपट्र' प्रचहित एमा पा। उसी समय इसरा हिन्दी अनुवाद निकाम्नेका चार पा। इसके लिए सम्बत् १९७५ में बाम गराइक स.स पुवामाई होरापन्दगीने पोषमार पपेकी सहायता मा परमभुपमाषक मादौ । उसके बास १९८२ में 'भाभदावन' को मोवापि मा निका मां पर हिन्दी अनुवाद निक: सका। मेरे पिताजीने इसके Pए गुव पुरमपन किया, एक दो दिनोस Fधम मी करापा पर अनुमान सोपान होनेसे रोक देना पड़ा बार इस तर समप बीतता ही गपा) मायान्तर कामे झटिनाया थी, जिनमे एक हो या पानुवाकको अनसिवात. यो वपा मनो मर्मज्ञ होना चाहिम मे गुरती माय शासकर मीमदाम बहकी भाषा व जानकारी होमी भागिर, तीसरे उसमें सनी योम्पता चाहिये Rपको पगम करके में उत्तम ममें लिख सके। इतने मे समपके मा उक गुपेश मिशि Pि प्रति घोर पा AAN Fप मारा दिन में प्रकाशित हो पा है। इस बीच मरे परम पिता वौर गमाईका वर्गवास हो गया और अपने जवनमारमें इस री बनुमाइ देख सके । फिर मी मुझे हर्ष है। मैं भपने पूज्य हिनाभर स. म पुगभाईकी एक माम् इमली प्रतिकार गा। ६. गीराचनमा सो पनुपाद और साइनमें अत्यन्त परिभम किया है। इस येम गरे सम्पबार दबाबमें मय स पुरामवार्षिक सापना, मेरे मानाय प्य शिक्षाको प्रेरमा ममामा गधी वत्परिक भाप और परिवार परिबममे ही परमार्य अपने वर्तमान अपने पूर्ण रहा। खिर तीन बार बम रापमानशाधमाला बर को मय सम्पादित हार निको सिको प्रसा शिमोने मुकार की है। मरिम्पमी पन्त उपयोगी ak मपम च निकामा बापान रिया राई अपूर्व फ्याका र अनुगर भी unt मा पपाममप प्रथगित होंगे। पाटकोम मिलान RT इम अपस मा प्रकाशित प्रयो। पाम-पारन भार मा प्रचार परे स्मिसे हम मन्ये दार महान् पुरनाम सस सस । म मापन साधारणमें सूब प्रभार से माहिर भूप भी बालो कम एग गया है। मगिमुन्न, निक- परमपन्तिम १.१ मणीमाम रेवाकर भगमीन मोहरी } प्रास्ताविक निवेदन दो वर्षसे मी वधिक गए, जब मैंने 'श्रीमर रामचन्द्र के हिन्दी अनुवादका काम हापमें लिया पा, उस समय मेरी कल्पना थी कि यह काम मुम्म ही होगा और इसमें अधिक प्रम मोर समयको नापश्पकसा न पड़ेगी। पर म्पों म्यों में मागे बढ़ा, मो मो मुझे इसकी गहर्गाका वधिकाधिक वनुमय होता गया । एक तो प्राम्प और सातमिमित गुजराती भापा, पाराप्रवाह सम्बे समो वाक्योंका विपास, भावपूर्ण मपे-तुसे शम्द और उसमें फिर अभ्यारमतत्वका स्वानुमूत विवेचन भावि पासे इस कार्पकी कठिनताका अनुभम मुझे दिनपर दिन पहता हो गया । पर मय कोई उपायान्तर न था। मैंने इस समुद्र में पूर ही गोते म्गाये । वने जीवनको अभेक परियाँ इस्फे एक एक शब्द वौर बारपके चिन्तन-ममन करने में ताई । अनेक स्थगने के बार मगाये, और गुसोको सुशामदें मी करमी पी । वाम गई बरसके भनबरत कठिन परिश्रमके पश्चात् मैं इस भनुवादको पाठकों के समक्ष मेकर उपस्थित मा । यदपि मुझे माश्म है कि पर्याप्त साघमामान नादिके कारणोंसे इस मनुवादमें स्वरमा भी(ये सब 'सशोपन और परिवर्तन में सुधार दी गई है), पर इस समय इतना कर देना पर्यास होगा कि मैंने अपनी योग्यता और शछिको न सिपाकर इसे परिपूर्ण और निर्दोष बनानेमें पूर्ण परिश्रम मौर सपाईस काम किया है। 'मीमर पनपत्र ककई सस्करण प्रकाशित हो पुके हैं। प्रस्तुत हिन्दी अनुवादमें मारुतकी गप्पायें वादिके सशोपनके साप साप मपका और मी ममेक स्पगेपर सोवन फिया गया है। मुझे सर्य रामचन्द्रबीके हस्तलिसित मूस पत्रों आदि समाके देसनेका वासर नहीं मिल सका, इसठिये इन पत्रों वादिका मकस' तया बाबतक प्रकाशित 'भीम रावचन्द्र 'के गुजराती सस्करणोंको हो बापार मानकर काम पलामा पड़ा है। प्रस्तुत प्रथमें रामचन्द्रमांक मुल्प मुख्य हेषों और पत्रों मादिका प्राय सब संपामा चाता है। इन प्रकाशित पोमें जादि-अन्तका दौर गतसा बगह बीपका माग मोर दिया गया है। नहाँ किसी म्यफिविशेप बादिका नाम बावा है, पहा बिन्दु. गये हैं। इन सब बातोंमें गुजरातीके पूर्व सस्करणों का ही अनुकरण किया गया है। अनुवाद करते समप पपपि गुमरावीके पम्प सत्करणों के साप मी मूछका मिगन किया है, पर यह अनुसार सास करके भौयुत स० मनमुसमाई कीरतपरशरा सम्पादित, परमभुतप्रमापकमारके गुजराती संस्करण (विक्रम संवत् १९८२) काही वरण वनुमाद समझना चाहिये । बनुवारके बत्तमें म परिशिर १, यो सम्पुर नतम है। में प्रपके मवर्गत मिथिए शोका संक्षिप्त परिचय, दूसरेमें उपरोके स्था वाहिके साय उनकी वर्णानुक्रमणिका, तासरेम विपिए शम्दोको वर्णानुक्रमणिका, चौमें प्रय मोर प्रत्यकाको वर्णानुक्रमणिय, पाँचमें मुमश्चमीफे नामोंको स्पी, वौर परिशिपमें 'मामसिपिक पदोंकी वर्णानुक्रमणिकादा।बम्तमें प्रपका संशोबन बौर परिवर्तन' दिया ...गा दिये गया है। पाठकोसे प्रार्थना है कि प्रत्य पुर करनेके पचात् प्रेपका बम्पपन करें। वादि विषय- सूचो वौर रावचननामा सलिम परिचय है। ये मी मिश्र स्वतंत्र मौर मौमिक। इस महाभारत-काम बनेक महलमानोंने मेरी बनेक प्रचार सापता की है। सर्वप्रपम में परमजुतममायक्रमप्परक व्यवस्थापक श्रीयुत सेठ मनांगर, रेबापाकर जगमावन सहरीका पात कर । प्रपके पारंमसे सेकर इसकी समाप्तिकक उन्होंने मेरे प्रति पूर्व सहानुभूतिका भाव रखा। विशेष करके रामाननीय संक्षिस परिचप नापको प्रेरणासे ही किसा गया है। श्रीयुत दाममा फेराबगी बई पजनीक सास मुमुसुमिम ।। बापको कपासे हो मुसे पनपनानी के मूग पत्रों मादिक नबर और तसपी और पावसा साहिम देखनेको मिम है। सचमुच मापके इस सपोग बिना मेय सहाकार्पात वधिक कठिन होनावा। श्रीयुत सुरेन्द्रनाप साहित्यरान बम्बई और मायुत परित गुणमारी अगासमे मुझे फोले देख्ने बादिमें मेरी सापता को है । सम्मति भांमुत गटर मगयामपस मनपुरमास मा मायुत मोहनमस मद देसाई मीठ और मणि विमा यस समिट रापद गुग्नमी बैन मोति बानि मपना गत पुस समय इस विषयको पमि दिपा है।। मेरे मित्र भीयुत इसमाई मानणीमामे इस म्पका 'सशोवन परिवर्तन' म्यार किया है। परमात- प्रारकमणके मैनेजर मौयुत पुदमामीने मुझे बनेक प्रकारसे सहयोग दिया। मेरी जान संगिनी सौमारपती मीमती मम्मने बनेक प्रसंगोपर कर्मणा और मनसा बमेक वयसे कमी सरफर देकर इस हममें बात बधिक प टापा है। रमा, पमान, बगास बोर मिपाके मामासी और मुमुक्षुमनोंने सासर मानेपर मेरे प्रति अपना सौहार्द बभिम्पच किया है। समि मोहनमा केट्स जैन सायक कर्मचारियोन सपा म्यू मारव प्रिंटिंग प्रेस पम्पों और कम्पोत रोम समप समयपर मेरी मदद की है। इम सब महानुभागोंका में अपसे वाभार मानता ति, पर्म और पसारय मदर बोध प्रदान कर मेरे जीवन में नई म्पतिका संचार करनेवाले मद् राजपत्रमा परम उपकार मानता हवा में इस कार्यको समाप्त करता । वासा मिशन पाक मेरी कटिनयोध जनुभव करते हुए मेरे इस प्रफरनका बार करेंगे। अश्विन ममदीपचन्द्र - - १) ।
विषय-सूची 1 | पाक मयमा निवेदन २५ परिग्रहका माश्विना प्रास्ताविक निवेदन २५ वलसमझना एमपन्द्र मोर सनकाचित परिचय १-४५२- पहना ११-१२ १५ वर्षस परि २८ यात्रमोग्न पुपमाम १-५२९ बीओन रण (.) २ किती ना मेरवा (कविता) - सब जीवोंकी रखा (१) मर्मविषयक (कविता) --९९ प्रस्पास्यान १४-१५ २.बाव १२ किमयसे वलकी सिदि ४ मोसमासा- ११ ११ मुरान सेठ २१-. पाच मनुष १४ वकि विपरम गुमापित (कविता) २.-१८ मम्मपर्म (कविता) १-१ ५ नमतारमैन मका पमकार ११-१५ १५ मनुरी ४ मानव १२-१ [.मापिकवियर ( ५ ममापी मुनि (१) १८ साम्परिकारिपार (१) ४१-४२ नापो मुनि () १४-१५ २७ समापिकविचार (1) ४१-४५ मनापी मुनि (1) ४ प्रविक्रमवाविचार ८सरेवत १५-16 | मिसागका और.) ४५-४ काल 16-101 मिसाधर(१) भनुपम पम्प ११ मतल() ४ाराग ११ठचम पाप 14-१५ ४५ मा मनोरम (कविता) ४५-. निवरकी माफ (1) -४ १४ पिर माल(२) ४.पिमुनि (२) ४८ १५ मधिन उपदेध (विध) ४८ फपिन्मुनि (1) पाशविक माचा २२ ४९ तुप्पाही विमा (कविता २२-२५1५ प्रमार “परमति १-१४५१ को मर्प १९परी चार रपम् (.) २४-२५५१सानिमाने पेराम्या उपदेसमा दिपा ! ५१-५५ . चारकी चार उपमा (१) २५-२५५१ महापरणासन ५५-५४ २१वाय मारना २४ भारि बिते । २२कामदेव ५५ नमामापनिबम १-१८[पापना २४ाय २८-२९ । ५.यम वर्मशाला *इस विस-लीय प्रत्यो वा नस गुस्स पी ही तूची गई ।निमय पर - ऐच यो पमपम्मी पारेर गरी नो (शाप ) नमाना चाहिये। १८ भीमद् पसवमा P पत्रांक ११-१२ - ५. मी ममेर (२) मसमेन) (एनके सिम पर(.) (मुखोप AIR (1) दुसरे AIR (1) गुनो RR AIR (1) १५TA AIR (1) मैं AIR () भूम्स काविचार (प) पर्माक १८ वष (१.) ५८1१बीमासम्म मनोनिय नि ११मतिम रमने मोय सागर ११-11] विवि प्रम (१) ११-4.1 विषय मम (२) १३-१४STAN प्रम (1) १४-14AAN प्रम (४) १५-१ मि (1) शिवम पानी (प्रेता) 11-101८पूर्वभारिप मम (प्रज) १८वाब १ पर मौको मम्मर (१) १ रा प्रधानाय भावना - .३-४ .५मान () -मिलाकर पर-प्रथम माना .. पन्() THएम(१) नोमि(१) ८ मापन() --ममिपनि पथम-बमुशि भावा ८२(१) समाप (1) सत्तामोष() वसर (1) तम तिमापना ११८ र माना ११८ -arate() aai () (6) ५ वाप(.) लाप(१) १९) ९२ () variN) turer(१४) ८५ AAMA मना ११ -८९ । माननी है .मर CATNA .जय (१) पर्दाफ पत्रांक सरोगमन १२-१४१ पुनम्म्म १ पपरेसचम विचार १२९ दशौका वारपर्व समझने मिस पपा से १५५ ११बानीपविमति ४५ माबमाम २२ पासपी ॥ मस्त ग्रामोफोननेत्र, बानका पोगा, २०बाप मोर मधि भारि सनमग्रेसन निज १५मनुपम मम ११२ सम्मकी प्राप्ति १४ एकमत बात १३२ ४५ अगत्म नप पो १५८ १५ भारुमतम फेरएस १३२ ' मेरे उपर उममायसे एक पग रम्तो २५ मर्षकी पेदरकारी न पसे ४४ मतमेरे पारण मारमा निधर्मको मप्राति १५८ २. सत्यका ममात्र १२२-1 ४. माहमाका एक मी मन सुन्दर रातो १८भारमापा स्पस्स मानव मनप्रीम निषा बम १९मारमाननेस विमाम नवी रिचर भूगार पुरषोत पार २ तब पाने मि सचम पात्र अमे उपयोग १५९ अनरनमें मित्र मित्र मत प्रचश्ति दोनेके में किसी गहमें नहीं माप । कारण १५४।४९ सत्पुरुष कौन धर्ममाविकी कठिनता २१५/५ पुनर्मम मिति (पिता) प्रतिमा सिन १५१-१ जीबी विचार २१ गाँव ५२ मतके मिय मिल मन मौर वर्णन पत्र २१ पुस्मीरपा मेहमान है (कविता) ५भारमा भनारिख माकी १४ ५३ प्रवासी पुष्य २३ मेरी भोर मोहरणान रमत्रो ५४ कर्मका विविध स्पति २४ पोकली म्पूनवा मोर पुम्पनी परिश्ता १४ ५५ विरामो मते मप्रनी २५भारम्पाटिके मार्गफीसोब ५६ पदस्थाममापी १६४-५ १४१ उत्सान गुयमन २.मगारानि १४१-१ मवास्ति २८ भारीर देते यो १४२ २२ पर्प २. रामविपकमरमपाधि १४५५७ इम्ना भवसारना ३ पुस्पात उपरेप १४।५८ जगदी मोहिनी सनिपात धर्म १४४.५९ निवामपनकी ममाति १२ मोसमापन मोष नम १४५ +भामास्मिक सिमाम (गुजरतान) १५.-01 १४ मैत्री नादिर मापना ४१ १२ नवम भी परिसर 1.१ ३५ पामे मार्य मर्म महाँ १४ व मयति १.१-२ स्वामन मर न समझो २३ वर्ष व मनिधर्म ६४भारमपा १८ पुनमनभव १५ -१६५ो मारमधर्म २१ पम्माय बमम्मान १५१-चिज सिलवी ४ जिससे भासमान सम्मान और पाकर ६.याम गुण भोर दन भर सिभी मार्म मलमा चाहिये नभमाष पुनर्थम्मनाकी १५१-९बरसना बगांव १.८ ।
न १९८ १९८ ११८ भीम पन्द्र पर पाक भार मानती व १५८१५और बिपिता .१ ममतामयास १७ रूपा 1.बिपनपने मेवामन परंमपात समा नभरम नधर्म मामले मे मही १११८ उपचनता पम और सस्य चार पुषपार्ष नेपाम पुखपानेच मनुरोप बार पुष्प मागम ११ पामीरन माग .८ पर माम बार बार पुर्य 14 -११११ मनपणी योन १८१ | १९९ोपचय मसी सेगमा ११५मिमी विपमा पयका ममाय पाठकीत ११५(१) मन्दिम रुपण भरली १८२११४ पल मिति गएकीप १८११५५मा और माम १८१-१९५८पमा उपाधि स्पस (चित्र) १-"ममा प्रक्कन मिसन १८५-१८ मामले पर १८-८ समरमा प्रचारमा १५ सय ८८R १८८ एन परमार्थ विक्रम मन्न ८५ भाव मने (पित्र) १८८ पुनमलाप मारमा माNIRONT (वि) १८५ .१ मारप बालिग(कर) मोतिप, धीमारिधी और सी १८१ २२ ई म मात्री भी २१परिसीमरमा १५-१९सामाश्रिमा परी- मीप्रति १९१४मामणाम १५ भन्या मात्र १७५ मा मरेप गैध मोर नव भोर मेमभितin १२माल माबानमा पचम १९२१२. मलावन्ने पौरमा |१८ सपोच पाठामे पारख १७२१९ तू मामात मार Music १११११ महिलामीमा पमान मौसमी ११ परम प्रामा भिमान १५मा माति महापाप्रबार १९४९ मोपवि + ११४-१५ प्रान सामालिनी १९५/१५मामा माक्या *नमाचर १३ १४ २५ पिपप-सूची पक पक १५६ मपूर्व मानन्द २११-२ १५४ हरिम्नकी स्मतिका भमाय २२५ +१३६ (२) वा मतिम निसलमान १६५हमारी चिबोरना चाहती है या एक ११. उदासीनता मम्मामकी बननी है निकारण परमार्थ है २३८ मा साधन पायो (कारिया) २१११५६ मुमुक्षुषिराजपकी मिया ૨૨ ११९ उपपोय पाँबर्म १५७ मार्गकी परस्टा १४ निस्पस्मृति २११ मनकाम् जीवका परिप्रमच २२ १४१ सय प्रति १९ीबोपन २१८ १४ भारमगम्म बत २१४ १. एकातपातसे पारेन दूर होना २२९ १४१ महावीर कपमा छान २१४-५ १.१ जीपको सकी ममाप्ति २२५ १४ जनगुपसम्पा भाषान्मे रोष १५२ मनुम्मस्व प्रसताके सिप बीना मोपली भाषश्यकता २१५१०३पचनावरी २१-१ १५ माम्म बाम भापमतमै प्रेममशिन वर्णन २५-1 १४६ मुचनबनाता बास २७४ मागक्तकी मासायिका २५१-२ २४पाँवर्ष मकि सोपरि मार्म १४. भरम्यान पाया +207 (२)'कोई सम्मना मोगी" उम्मवरण २१-१ | १.५ के मात मार्गका प्रदान २॥ .१०(२) मा पुग्यो के गुण २१-९ १.शानीको सत्र मोप २१५ ..(.)ीतयगदर्शन २१९-२ १.. मौन एनेका कारण परम्पस्माषी इमा +11८पणम माब २२ १.८ ईपरेकाली सम्मति २१४ +१४८ (२) रया को पर गई २२ १०. यम्पवर्षकवचनौका मप्पयन १४९मात्मविषयक प्रतिरोने कारण २१ -१४ शानीकी बापीनी नयम ठरावीनता १५ परिकमा मके मामरस विषम पडकी प्राप्ति १५१ योग मपूर्ण रित +१८ (२)नब मारिता सम्मानन्द २० १५२ वकीपरपमेगा २२१ | १ दूर नहीं १५५भतरण १८१ पर्मबीका एसव १५४ बोरने से ही पता है पाकनमें १०२ समीक्नमूर्तिी परिचान २५० मही भावा ९९२ १४ पुस्य ही धरण १५५ पत्र प्रान भारिका पनप रोना २२॥ इस माम्म मोटोसम्वारे २२० २५,स्म पोफ्रेप देने मनोमय २२५ परमारमा म पुरसमें भमिाया २६८ १५. इस कामे मोमन इसन स्पारपूर्वक विचन १२५-४१८५ अपके प्रति परम उरामानमान १५०ीनो कास्मानवा २२४१८ बनातक धम १५.पी इषमता २२४ १८. सका भविद्यम १५ मारमाको कुशानेके मेन मामाभाग एक है २४. समन्तिम सस्मकी समझ मोरी मामा संगहीन होनेके मेक्नबाल १९५-१८८ मागपत में प्रेममाउन वन २४) मोम मगनरचम भारिका १८९म्पोतिषमारिपरिपतफ्ना परम बोमीपना ११ वरनबनुपर २६९ बम्बई उपापिणेमारपान २२५ १९१ मषियनभी पापा २. २५ 'मन्त नाम पुन मी गगन" (पिता) २५ १९२ पंचम अपम सासंग मोर सत्याबकी मा २४१ सब हमा मोम परबम्ब ॥ है पक सीनियर २४१९९९ बम मरम सम्म भार किमो (कवि, पामबदम पर २४१२१५पामा परिममे (करिण) मामले पनि मेरो मस २४४ २१७(१)माम Aru २४१९ निपर प्रेशन ने (ख) २९५ मन परिव १९५बजारले तर ऐसे प्रने २२८ प्रमेचर प्रहमचा ४५/५९मनुमसराम लिखा १९.र मौर मरती श्वान बषित ५ एसोपान परिषर १४१२११ बी १५८ मा मन्त्राचार २४२११ मा १५.लाut एम मपति २ बरणीय २ १३४ जागाने संबर मेला २.९१५ मचात मनमोमल समालोलीपात्र मपिताना 79 समाज मालवता २४ २१८ मम १४.९प्रीयता पासमा . २१ संभ्रम मित्तल २४९।१४ माराम anीच १ । २ २५)मपा-वर्य मी ११ १५प मेजा परम बापन २९ोकमान मामी २१२ मिना १५२।१०मामी समसामन १४८मा बाकस्पटेना १५पिता मलमपरसम्म . . श । ११ ममतमा रोपमा ठरावानमा ११८ प समोरापना २ 1 वामपण ११मता पदमपीपमालवी २२.मात्र १५.१५पनामाम्म १५८.५८ पावरमेय १५९मन्या विषप-सूची " पक प? पत्रांक स 'मनुमसे संबम स्पति २०५/२९५ मारमाकी स्वता २११मविस्पर्म वाम २०५ | १५॥ न मोर व मारके मरका त्याग १५२बाचारित्रका रमरम २०५२९.याँ पूर्वप्रमता है माँ सतारे २९५ सान पाता ही योग २०११ २९८ पूर्णशानका पम १५४ निसरप दुरमा २९९ पोपीमन ठीचार बादिकमामावका स्मरण २९५ एछ परिनामोन परतापरख दो।' मरमारमपानकी दणमे विकार २१६ उच परमपिचन १७-८ उपाधियोगका उरब २९. 'मुभारत' सिर मनिता उदातीनमाष-मोसमी २६८मिनरमी मम्ममा मनन्त । २०९ निकप्ता पर नपि पुम्पी" २०९ 1 २ माव समाधि भौर नाम उपापिकी २. माय मुखर २७-८ मिपमानता संपरसपीचिम्वाका मन करना १५ मनके कारण ही सब ही पित PC तीरभर मापन २४या भौर माविमा मिप्पापना १८१ १५ भारमविवार धर्मपन करना सौम्म २९० २.१ सम्मम्वनिष मुख्य मन बीवक्ता १८२ २५५ "मी रतन बिमावती उरिमापु बीसिये सूमागके पानेकी २८२ निममता २. रमान परमा सम्पमत बीमादि सम्भौर मामानुसीमास्सा मने भारये नमस्कार १८२ सदवा विचार पाये २८॥ ३.कानीको प्रारम्ब परेकामादिम समझार २९. २.५ उपाधिका प्रसंग 1 समयसार पानेका मनुरोष । १.५ म यो ठौर" माटो इस माम मी हो सकता २. पूर्वका निधन मोती नियावा २८३ बनमारकी पार २८४ ५ प्रमुमक्किम तसरठा २.८ पनपरिम २८५ मत मतावरकी पुखकौन निषेध ५.९ पुरपायकी प्रपानवा रोग गुषस्थानमा खस्म २८ भवरामचिम ९८५ १रूप श्रीपम २ रोनेपर मी पूर्ण विरागवाकी बमवता २८. ARRच ने समान २८२ परिचामा वाट मात्र २. ११४ उपाधि विषपदव माचिधी भग्निवा २ चम्सने राममायते पेदन भरना १०८ १.५ ठानी परिवानले बानी हो या २८४ परिवाम्पम मत्वात एनिवा २० समीप बाक्स २८५ मोठप मामि भवधि २८८ २.पर मौत मोपले माकी मित्रता २०५ जान नपम है पर माप्ति गुम २८९ १८ नापर सुन पामर मायाले २०. भापपिगैर माना जीवनरोप २० पसिनापन २८९ १९मानपनमाम्म २१ममे प्रमाण मावना मन मरिगपापपणे' २१ सांगता २५ २११ कासव मन सरे" १०ी स्थिति सरि प्रतिमा पनि महान १ १९५प्रारबका मोमे ना पुरप्रय नहीं १५साविमपिच १५ पीर उरस्काम करना ११४ारीवा १४पिन प्रविरंग कामस्थाम १४ ३ २०६पमकान भीम प्रमाण उपरनामी नहीं पड़ना १४२ पांक परमावरमप्राप २१-५५१५ भनुभम्पा कालविठोप १२५गमन २१५-१५२ संसारम राजन यसप्रेई PLAथामा १. पापम पर ११८१५१ पासपोरसा प्रतिवा १८३५४ विपानि पिपरमेलापता २२९ जास्पोमात्मधर्मकामाल उस्म परमात समस्परोकीमा १३५५नाउन पुचप्रमद्याय ११ मात्य वाम मस्यौ परमेममापीनवा पचपरमाननोनेपर हो ३५६ बानी पुन निमम हरिदम परमा . याना ३५. इस मा पम्मरम्मा! २१४पनी पुस्लीम मन माचरण १५."हमा रमय रपय" २१८ होम एपही देय -सबुधरकी प्रातिले समान १५ १५ गोपविले परमवारीदोमा धर्म बिना मेपे नाच महीने २०५१ सपत्रिी मीन ४१ १५-मार २२२ | ३१ मतगम परिचर पाने मनुष ४१ र मोरन २११२५० मायग्नता समाप्रपार सीमर दुम्सन ५८मामिल ११ मातिा बोय समानी पुन्धन १४ गते मगमनमानुष १४ वैजयम २१४] १९५एक हमनेसमै मरमाका ४१मामा रमप्राव वान भमर ५ मिरेष १४॥ ३४२मानसम्म १५-रेही उसमे मचा रखना (१)मानोमानी पुल अमन मि मारिन मर्म 10 परिचालन निम दोन महान् ऐप ११. रमाका फरमान m प्रभार २१-१८ निलमलमा नियाम ३ भवपाली मूगरण १८ मोदी ३४५स्मै ! १९८३६९ पर्यनुज्य मारमेय पोपममा १९. मोर मन्त्री एमवा १४ - प्रात्मतम परिणाम पाना १९२१ पालम रखने मोम एकपमा २९९ १.१ उपरियोजनम मामले ११७ मनोमा २०४ वा मोरया मापौर २१ 1५सम्बंधति मिरच 1४८पाल्पता ११पाललाको गनमा मोनी मापालिम पार करत प.ला और निस्किीमावानवा नशाम मेरी २५१ माया पदा ११ मारकी म्यूवारे विचारमार्गम नम्मा सिर ५-४ रमविप्रेपोप्रा विपप-सूची १५ पांक पक १८१ महाका पर्म माम्पमें ४१४ साएको पत्र समाचार मादिसिनेका पान देने योमपात विधान २०६-९ २८१ हानी पुस्यफे प्रति मध्य निश्चय ३५६४१५ व्यको पत्र समाचार मारि सिनेका १८५मीनदयासे पुसकी निधि विधान २०९-८९ १८ प्रति समरि २५.] ४१६ चमका-मतपती पूज्य १८२ १८५ महान् पुस्गका मामिप्राप ३७४१ नित्यनियम २८२ १८१वीबहान २५८४१ सितोष मौर उपदेशोष १८. सुबारस पर १५८-१ HORपठिनाईका मनुमव १८ २८ रोपामौर पपायोम्म समसम मौनमार ३५ *४१९ (२)मारमपरिणामकी प्रियता २८५ २८९ मासमभाषना माया" ४२ बीष मौरमा संघ ९परका मातासम्म सारी मोरबीदोंकी समानता २८. २९१ ममोपा पर मर्म १११ | ४२ (१) बैनरन और बस्त २८८ ११ चियो उपयमये नापिकी २७वार्य १८८ १९५पाधिमा बनाम्बका यम्प १६५४२२ धानी पुस्पकी भाभमायणन १८९ १५४ पानीका बम ५२ मशानकी म्पामा १८५-१ १९५पिल्पभाव ३१२४११ (२) 'नमो रिचा गिदमदाय २१५ क्विा भात्म्पक मापन १५.४२३ वक्ष्म एकेद्रिय मापापी मम १९१ २१. उपापिपिपता १५४|४२४ मेदांत मार मिनसिविकी तुम्ना १९८खस्वस्मका पेदन १६४|४२५मच्चरन प्रलंय ११सब बापभाचार पति १४|४२५ सत्य-पद्वाचन ४ कि मेगे पिना मिचि नहीं २५५ ४१७ पक्षरणवाका कारण ४१ मुरन हेठ १९ ५४५८ की उपासना १९५४२९ उपमें भी प्रतिपय पनि ४ प्रकार पुम्पार्य १५५ ४१ पम्प उपाम माने पभात् भातमारे ४ मा उपमेण पिलमफिल भादिका पार ४५मामरिक प्रपोषी पिता ४११ पान भारिप भएम्मता ४६पम्पद 11.- १४३२विचकी मस्थिता ४ (२)म पर बमारतीयसको मारमानुमा ४.ऐमपरकम प्रारकावेरन स्तार अधिकार काना ४१ पुरुष पहिचान मोम्म नहीं २.१४१४ पर परिके बने विचारोमै उपरोपन +४८(४)मा पानी भी न भमा परम नामिपूर्ण पाना २०१४३५ यान माहात्म्म भनिष्ण १ उपरोपको माया मोती भगााना १९५-४ ४११ मोगबाट ७. परेप मोर निर्मम्पमापी रिपर ४ ४१२ मरताप पाना २०.४७मबारविहार ४१३ गम्प उपामयी प्रमानवा ४५८ सम्प्रपान उपरेपहार और मिशन २०४-५ | राम मन ममार YB ४१५ (१)एवम्पमसातव्य पहा!1. I. Tीन बावैध बम ४१४ ४१४ ४३४ ४३४ ४१४ १५ ४१ १८ भीम पाचन पाक पक भसाको माप ४.०४. माम भार परेशात +रोपमाधि ४४०५ मुमचार मन्तिी मना ४ ४]४. महापुररन बन योगबिमारि पुन पन ..औपनमा मोगाबर ५ भात्परिवम प्रमार नमना ४०८रम मापना ममोप्रपन मेका मर्म (1) प्राय करने पत्तान-01- v८ प्रेम भार से मारनप्रवाह परसम्म ४४.१ समापन पीको प्रोत्र ४५-१५४८२४ पद (गापीगीको) ४८ मटिम्पन मारिसपी प्रभ १समोर मारप माम सामग्रीमे YYीमान रण धान मनम ४११|४५मामाभावी मावि v५ वी मारण ४८५ तृषा पमना ४५१ मधये प्रभारी पणा ४ वर्षाचन ४५२ चास्माना भर ४१-८८ माटाला मास बीमा परनियम बारिने तर १८४८९माचारमारिनपाचन ४५३गपत्तिा पाचन ४१८ ४. परावति ४५४ मनिष क्मेका मनुष ४१५ रममदापस ४५५पनीम ४९९RAमपर १५५ ()ो मैतमा रेल करमौर मानेरन ४११ ब परस्पर-माधि माना (वा) ४१४ परम्परामा विचार artoगुमन ४१५ मामान ४५८ पमप्रात मामस्वरमोनियम पूज ४ ४५.नामिना ४१ पन उजामन्त्री पनि ४२५ ४९८निमयबारा ममिमत ४१४ ६१ पोमध रक्ष ४१४ ११ पासमानातिल मेनापका १४ ४५५मधमक्षायी १४ ४९ M ४३ m५ ५ मिचय मन्ना +५१(१) सौपम्मेवार ५ भानिसमापिसमें ५४ . प्रसारमा ममुवामा पाप m-मननप्रना r ४८ m ५ वाला मन ४४९-५ में ५८ मिमकीन ११मत मोरनरमपना ११ उपाधिविसर पत्र ४११११मस्मि परमम्रपाम ४११५१५ रुस्लम रफ्ना विषय-सूची ४. ४६९ ४७ Y १ ४-१ पाक पांच ५१३ पति-मितिविषयक मन ५४३ धर्म, माम मारिविषयक ५१४मयका म्बर ४५२५ मारमानी पीनभवम ५१५ एमेरिकन ४१५४५ उपसमधी उपरेशका सार ५१५ एम्नेमै एवं विषार मोम्म नहीं ४५२५४६ एवंमूत घरि मुहम स्पिति पर ५१. उरत माप ४११.५ में निमतस्प हूँ ५१८ जनाके मार्ग माघको उपदेप ५४. “ देखव भूी र करनेवाले पास ४५1-1 | ५४९ भास्मा मसंग है ५१९ हानी पुस्प ४५५/५५ भात्मप्राप्तिश्री मुहमता ४५६ ५५, त्याग पैगम्म मारिनी भाषस्यकता ५२१ मामी भाग्य नसभम विकृति ४५५ ५५१ स का भी बम भूमिकाफी कठिनवा ५१२ विचारणा ४५६५५१ समस्या से एमाई रमा ५२१ मनवानुषी कवाय ४५. ५५४ बोलकी रमन करता रोग ५५४ रमान नास्तिक, थिमममा यो ५२५ मम्मुरे विचार करने पोप्प बात ४५.५५५ लम्र मातिए ममाव ५२६ परस्पर नाम मेर ४५४५५६ इसकी सकारणा .५२.दनांकी गुरुना ४५८५५- निर्वावमार्ग मगम मगोचर .५२८ पप भारिपनाकी तुम्न्य ५५८ हानी पुरयौफा मनव ऐमर्य ५२९ ठरप प्रति ५९) ५५९ पर ममूम्म । ५५ निधिको रम्हा ४५९५६ ववव बाविम उपदेश ५.१ सदम मौर उरीर प्रकृति ५२९ भनेवानुवपीन मण मेर ५.१ "समीने एमाईमा समगीने एमाई ५१ मन पर्यशान गया ५५४ 'करब निमिचमाती। ५९१ मुममु मोर सम्पनीला गुन्ना १५ फेरनिरांची ४११) ५५मुरररासी पंप ५१रपान मारिपिपरा प्रम १२५६४ पाप अभियोग ५१. गुपो मनुरासे गुणी मित्र है या नहीं १२५५म परिमाग साम्मरमान रोयीन ५६ फिट भोर पानीव भामिनिषेध विरामवहान v.-1५. इसका महायोग मलिनमान बीच सिमा माता राता ४९ 'मामान माथे पर सम्मानम भूत भविष पपका हाल ५६.समीप भमिनिये किस पर रोक ४५. उपाधि स्वाग करनेका विचार ५३८ देशना भारम्पका पुष या नहीं। ४१४ |+५.१ भून्ना मारमा समस्त घरममें माफ होनेपर ...बिनोपविभागमभान मी मनुर मागते योजना १४५.१ बोग मम्मोमिनमा एयरमें पीड़ा से समप समस्त प्रोगका ५॥ स्पपरियामान उपरेप एफस्पानर सबभाना ४१५५.५ परमाई मोर म्पपारचम परेशम ४१५५.भारम परिमारा स्पाग ५. भारत्या विकार उस ने कारण ५.-मायनेमा ५४१ मिची रिगका साम ५. मका त्याग १५७९ लंगा माएम्म २९याँ " ४.४ - ww r." v ४८ भनी पुण्य " भीमद् पसबान्द्र पाक 4410ोपीय माग्न मारमा ५८. एसका निसात ४८. 'सामनी तिरंगा" ४.७१ असार पनामतम सपर्म गमका भर ९८३ ४८1 (११ मारमण *५८ पुस, ४०११ मार बस दुस्तर प्रति ५८५ प्रीप, समय, परमाणु ४८२ ५८५ महवियर ६१४ तिरासमोर प्रणाम ५८. एकदेव पप रोनेली खसर ३१५, मारिन नदिना ती। ४८.-1 *१२१बिमोर मापन ५८८परिवनियमाना Y८४ ११. कम्मरमरिम सनी-पुष्यामै समस्या YAY १८पचालिकारसमस ७वानी भौर एकाता मेर ४८५ ११९ एम मनुमा पमान परिममा ४८५-८६ मारमाबी +९१स्वयम्प्रधान प्रेम पठय ४८८ | पतिकार मारिसमी मन १९१चन पुरषी में ४८८ कस्ता ५५सानी पुस्पी विधान ४८८-१ ३१ मापस मधिनात ८-11 ५.४ मयुरेम १४ राममोर उपसम मुमता ५९५ परमयान १५मलोपा हान ५९५मिपम सामरिनर 11वी खारने मना ५१.शान रामविषय ४९१ उमवि साधन ५९ मिनाममममानममर्ष "सापक विमा बाम्य १५ मामा मात्मायणी चार एनाली मीमण नरऐनगपाकिस ४४मानसमाचान वापता ४९४ | ३ग्परेश-पापा- पपानीशरपेय ५५विमवस्यमांच मदन ४९५ एकनियनममिम्पन परिबारे पिषमै मडिप्रेकरमा .यामाग मानसिप माको मूब मन मोर मानम Rive. पापा ...मर बेन समान ततस्प पाणी ११४ "माजिय ही सवयरपोठी न mo प्रय उपनामाकर ५२५ समान माया गुणवान जीव में सपा को साम्यवाR एक एपबार मामले ५२६ परत सापक-अपनी ५ पानीपचनको ली ४९९ इसमम एवम ४९ विपय-सूची कस्बाम नहीं पांक पक मान्न भाषाकीकपा सवाँका वात्पर्य मास्माको पहचानना ५५४ सास्वादनसमीत गीपको किस तर परखना चाहिये एपेनिस मारिकी मायावासे बीवना तीन प्रकार समलित एकमेए समान है सस्ते मुमशिरूर समशिदीयमानी है ५५० सब नाकी एकता बेहछेत्री परीषा करनेका पांच ५५० रावसकर्म किसे कावे तप बगैप करना महामारत नही ५५८ मोहममिश मोर दुम्लगमित गम पुस्याकी मुगमता रोपमै यम्मान पुम्सकी परीचा ५६० भटमासनेते मियालकी हानि इस काम्मै मोबन दोनेकी बातको सुनना पेद-पुरावफामा झिये मारी पचन मी नहीं नीलामीला परदेशी रागको पोष समवसरबसे मगवान्की पहिचान नहीं होती ५६२ निर्णय से करते है भवसे नौ समयमै केवहान मेगौम पुग्नेके लिये शान नहीं ग्चे गये ५१. समाधिो गहमानकी इच्छा नहीं साधुस्नाचमा बागा निर्षन कौन? ५३ पनि पाकरन सिबी उपवास सर्वश्रेषकरनेसे ही प्रेम होता रनेकी भाशा पती पुरयास सम्मानकी प्राप्ति पीरम्हान र मगर वा ५५८ मात्मा की या नय भारमा एकीया मनेक सममिती पुस्तक मुक्त होने पारमा बीय एनकार पग रेपो नाण्ठे मुकि ५६८ हो पाया है स्पुश्य माठमकी हकपर मपम्पबम पुरुष बाण मवदिती हिवामी भाषक किसे कहते है तीन पुरमर्पकी बाते समान एक पंचमकाने गुरु ५४२ मकस्याप नहीं ५७२ एक मुनिका पाव पगस्बम मारिप परिमापा उचाई बिना तर नोंकी निरर्थकता ५७४ राखेको दुए पनकी प्राप्ति सम्मत भौर मिप्यात मापा विच प्य मुम्भ देती भमुम्ब प्रपरको परमपी प्रति ६४ मावहान म मनम्पर्यपान ५.० जानके प्रकार ५४५ मूहमार्गात (पिता) ५४५ सिम मापपी बगैरम फरमान नहीं ६४ासबोध ५.८-१ सम्पपीते प्रसर होता है ६. मधामपविचार (गवियो) +६४८ र मापकता मादि ५८१ मिप्यायमोहनीव भारिकी परिमापा +६४९मात्मसाधन ५८१ प्राधिपूरो सम्पपलोदय +६५.बचनबम कस्पानन मार्ग एक ५८२ मेव प्रिवे ५५-१५२म्पान ५८२ समान बरामाचा ५१ १५. विरारपनका मान ५८२ चार भोर उपयोग ५५९५४ १८३ पुखक मोष ६५१ *६५५ मात्मानमरमपाव प्रल ५८२ नकामप परिका ममन ३. मोमा गमवान | पाक स १५६ मत मारिप मामा ५८३ १५.मन मोरय ८१ नीधी ममममम +९५८ माया मममम परमात्र मर ५४४ ५९पासव मन्त्रीज्ययापन परिणा) १५-4 १५ यति ६९ मनुगमन स्विामपिरहमान ६. बास्मसिरि- ५८५-१२२ 1. परमात्मविश्न विचार सिमोली ५८५-५.१ मायसिकी करिना मामान ५४. | गोत्र भन्नता ५८८-चीन सम्योच मान पैका मन गुस्से में प्रार ५९.-१ | मार्मा ५१ ९एमएम पारम ५९२-३-1मयमा उपरेप पाने मला शाम १९४ाम उपामीर मेचीदरल समनिस निषाका उपयोग ५९५ नौ पुस ममकR ५६.९मानिमय ५१-८१८ मारम्परिणाम मग पचूमनामा ५९९१मोमासर मान मामलेगाव- पास १९९१८२ सय पिबा मापन नियम मारबपनी-एपेला साइनामी " पापमान १-५५ मार समान भेटी H भामाश्रीपती मान्य न मोर पसान सामसमापन पोपर पम्पो -भगा भत्ता प्रचलिर-t 14. पम्पिक और नमनामा-१-१ तीन प्रगसमरित समसमाधान (११-11९ साभारिमा पE0-सीभ मापन ५ () वर्ग देशा आपमहतो ५१४-५ प्रास्मान १९७१गुस्स धर्म समापा मेरी १.१९१मान-मन-विरोचन (१८९ममा RBI मिरी मारमा पुश्या बोगना तु रिममा भौर वापर Huminst १२१ नियम मेर मिRML पर (५Aपदभार 1. ॥
विषय-सूची ७ पांक पर पत्रक मासप मादिरे म्य ६५१-१0 पूम्प पिताजी मोपका सप्त चिन १५२-10 बाम किया क्य १५३ | १२ भपार मंग्यब पार मनुयोग ५.३५ दिगमरवायरस १९५म्प मौर पर्याव १५४] 0१४ बम भारिको नमसार १८५-4 ६५४.१५धमाशी १८५ *१९. सब गीयौको मुसप्रेस १५. उप भूमिका ६८९-0 १९. (२) विश्व मनादि । ५५५-100 पुण्यात +९९८ एकात भारमाधि ५५६०१८'योमन्तिमुखर 'मार +९९ में महंग भवन । १वापर्व पंपाविना (मनुपार) ६५-६६01.७१९ पैम्प ६८८ - निबिमारि ४ वरतापान क्षेत्रमें विचरना ८८ .७२सारमरण-प्रया ६६.०८.१ दुम्ला सर होने उपाय १८८ यस्पात भपमा मितिविचार ०४२ मारमामोरा पोग ६८८ • मन-मशन सम्पमै ६० -२५परोपएम मारिभव .५समक्ति मोर मोग ६७२ | 0 भासनयरी नुम्म ६०.४५ पिसवान दिवसी प्रभ . भोपप और उसका मटर १.२-४ | मारमादितमै यसपान प्रविषय .८भोपप निमितभारण १७५ | मौन पना मोम्प मार्ग नारमनीनाम समागमन बन .१ प्रदेश ६.४९ोसफ्न .११ पपपपुरुष पापान १.५ समाधि भारकहान ०१२समागम 10.पिचारने योग्य प्रश्न .१६समरन्याम्व भारिरणय .५२ मुमुखातिरावा १९२ .१४ ममता ५७८ पप्पाबयामसार- १९२-०१२ ०१५ परमपुपरणपन ६.८ बष गुपरपान १६भीतीमामा मरण-समाचार १०१-८ मात्र भनुममा भीनीमागो नमस्कार निर्णय ४१८ सपे हारके बिना जीराकस्पात्र नहीं सिमौर रोचर मार्ग ७१९ स्थगनगम तासमारी इन्द्रियमी देवयानी विरेचन परम संयमी पुरोको नमस्कार पाणभीम उठाना माहीत" ०२१ पुष्पोप पान ५८१ पुररान हमसीमा ०१५ मारम्पभोधनमार इसपमै मेज ०१४ मोडम्पयन पप विपारामिष मही १९ ०२५ मारामाररिचार १८५ जीबसे मारपरपान AII १९८ ७२६ मार और मात्रामयम मनिम्पन भौर ममापीरपन ०२. 'माशदर्गराय' बनार मममम्म .१०मिमारना भनिन मम्पमा . मातुर नमस्कार .
१२ भीमद् रामचन्द्र . म मानसिप मदिनमा मन UtGRESTHA .६१ मम्मे सम्पयन बर बावापानकी .पवारले ममरमर मार २ मनत्री रोखम्पये मम्मता २५ स्सिदमें मनवीर बन्ने समय मोसे मानापम बनत परमाणु ३ अपमावि र विषाद माना फ्यासमा सौरयो। " विधिमा मविशि .n८दमतीच ऐन देना मन मोर अपने मान .२८ ...गरायो किन लवप्रतिमा मापका मेरी समोर एयर ... बारम्वनिप्रतिमा हो १ मरमान! १ *.बोधत मरन मागविलय •९१ उपमा एमालेमान एगे हमपे मामबापीर" पुस्पति वा पत्मा मस्त .११.८ म्यादी गोधरे बारिमल निबने पक ...मेव निभाष पावर सार, पलामीषन मेमाण पम्प १४ .८१ पत्र भयो उखेलेर मेह हैन और पावर ८५ मनपा वाम मान - Arth .४मारसम्म २१बाप .५८नमा कपर मामले मेर .८५ मा पमप चौरममावस्येन ..नी पुलाममाम मा पर ग्रामीर मरपाला .14 1 DAसम धादिपर्वमा ११ १८ .१ प्राणीमारे १८ प्रापि- प्रीति .५८ २५.११दि भी मावा ७. H बरिणाम .२२ •मोसम भारम्न ऐमे M २४-५.५* उपवन " ४ पिपप-सूखी २३ - .४४ D " ४ पाक | पाक पर ..मानुप्रैगी प्राप्ति OY *८१५ (२)सस्पष .९८ मा सरमूरममते पार होमो ७४१ |८४मवगाहन्न ०५० -०९९ सर उपकारक मान् कार्यप्रेरके १८३५ "बा ने चसम्पनि इम्वोससमाव मिप ०५. ८ हानियाँ सदाचरप ४२ |८५६ महामारीघ्र या ८ १ मा अपात् शास्वापुस्पोरन ०४१८५७ मनिषगकी परणोमना ८१ मारमहिती समता ०४२ ८५८ 'व मुनिषरापासे समभारे" ८ भणु मौर संप ४१८१९ मताताकी मुसव ८४ मेहमामो पिपमें ७४, उपधम छापितभादि माप वखम मोमरे उरखम बाम्नारे ८" 'परागत से kि ८६मद्रभाग भार भानरफ्न ४५ 01 मगमद्रीवाम पूर्वाम्पीये ०५९ मारतवर्षकी मोमति नियमेन । ४६ ८४१पमान कासम सरोगकी सदि ०१२ ८भोवताकरिताना ४४० ८४ यमनरया ८ ९बीवयग मामयी उपना ८४ मनोहर ०१७ ८१ लापरवपूर्वक पना परमपुरका समागम ११ कासिमानुप्रय ४ ५ मोजमाप में ७६४ .८१२ समय ४८ ८६ माय पुस्यों की 644 १५ सय ४८ ८४. नियमादि मुमुभीका धर्म -०१४पर किसे ४८ मारमापीका करम ८१५' मंत्र मंत्र भोपप नहीं ८४८ मार निमुवनका येस्सग ८१६ महो! पुरा पचनामृत ४९ rs मुसिका सम्प प्रतीति ८. मेनो काळ किती मो" ४५ ८५ म्पयन ८१८अन ८५१ परीर प्रकृति सरपरस्प ८१९ सस्पनिष्ठाति ०४९ ८५५ उपरोक्ष दुर्गम बसाएं .. निमाओप ४९ ८५३ म्यों माधर्म ८२. उपदेश कार्यमाचा १४ पानामि भारिन भपमेन ८१२ सिन्ध नयन परेनर्स ८९१ परम पुरपणी मुरण भक्ति "प्रामरनिमनपुर्व प्रकर्ष ८२४ परिणाम ०५१ ५ मारमा ८२५ सय मुलभुनाममा ०५१ ८५८ पयरमै सपा मावनाका उदर ८२६समापना ०५१ ८५९ नमा मायारिरिवारनिसारित ८२.पुण्यका .११ जनाकी प्रपन माशा ८१८ममविभूना मनन ०५५ ८७ गणम्र ८५ मातिम्मनारम सम्पनविना ५३ १२ पर्प मापन ८५ पपर एम्या महार ०५४ सम्पापामसारमोर प्रससमाधान- ८.१ प्रति मागम सपाट ..२-०९९ कापर्य ८१ गुरुगुमपर पर भापिh सतमत प्ररेणाप मोर पियर ૮૧૧ ममगुनमा पारण माकुम्मै ८५ पीयगाना मोर पर्चर ८५५ परमधर्म " .. ४७ 1 11मनिया भीम पवाद . ' . पर्धाक चस्मान दिपक पवमारियम विपनाम उपायम उपाय समापम समय-मोम सनी मौरस पुस्पकी निसा १८५४ पमपमोच ममी मना ५-५ १५ोप बासमयमन माम तिमि प्रमाण माधुर्म ७८-९ • 'साममममेगान पाठलाग का मानुजारना ../८५ मश्नरेवा शिकार ८. भक्रोिध ममाटीमापकना ८. पसायले प्रयास ८१मे भारतम ८२ बमोपिम्पको समय .८२ ८.पामार मान मनमर्ष घोषमी .८२ ८ विम रे (कविता) ८२-1 बैं .4 परिशिप (१) रेफगायोन ७८४ भीमा ममम ममाप प्रेष प्रकार भाग्य भाव परचय स्वविकसी मोर मादी १८५ परिशिप (२) चामल परिमादि एन ४. भी या बार ए आरपाली परम्नमा ८८ पानमाला ८४१८५४ यमानो पियम गम्बर परिशिप (1) स्वारममे मदद भीमा एकाधियोभी ८९ पदमविध ८५५८८ पालामाती .८९ परिशिप (1) मेरकर बाद क्या में मारे दुर कर बम्पोमयाधि चौर प्रतीनमनिका ८५१८५५ स्वरसमास ०११ | परिशिप (५) नवमेकी मोशा अमम् परा में मारे हुए प्रमों एक तमाम किनी मनच ११-३ नामकी पूजी ८५ मधुशव .१५ (परिशिप (1) पचवावर एमार भाषि मात्मनि क्यापि ८५५-२५. .१४-५ ओपन मार परवान ८५८-८.४ •प्रस्तावना श्रीमद् रामचन्द्र के पत्रों और छेसोको इस नापिकी प्रस्तावमा लिसनेके लिये मुझे भोरेवाशकर गनीयनने गिनें में अपने पो माके समान समझता , का, मिसके लिये में इन्कार म कर सका । श्रीमद् रामचन्द्र के लेखोंको प्रस्तावनामें क्या दिल, विचार करते पर मैंने सोचा कि मैंने भी उनके संस्मरणोंके बोरसे प्रकरण यरवदा मेम्में किसे है, यदि तौर तो दो काम सिख होंगे । एक वो यह कि यो प्रयास मैने बेछमें किया पर बपूरा होनेपर मी केवस धर्मचिसे लिया गया है, इसलिये ससका मेरे जैसे मुमुभुको पाम होगा, और दूसरा यह है कि गिनें भीमका परिचय नहीं चनें उनका कुरा परिचय मिगी नौर उससे ठमके पातसे शोक समचनेमें मदद मिलेगी। नीचे के प्रकरण भपूरे है, बौर में नही समझता कि में उन्हें पूर्ण कर सकूँगा। क्योंकि गो ममे मिला है, मवकाश मिलमेपर मी उससे आगे बात मानेको मेरा नही होती । इस कारण मपूर्ण मन्तिम प्रकरणको पूर्ण करके उसमें ही कुछ बातोंका समावेश कर देना पाता है। इन प्रकरणोंमें एक विषयका मिपार महीमा । उसे पाठकों के समझ रस देना उचित समानता है। कुछ लोग करते हैं कि श्रीमद् पचीसवें तीर्थकर हो गये हैं। पुरु ऐसा मानते है कि उन्होंने मोक्ष प्राप्त कर लिया है। मैं समचता है कि ये दोनों ही मान्य वा भयोग्य हैं। इन बातोंको माननेवाठे पा तो ग्रामरको ही महीं पहचानते, अपना तीर्थकर या मुफ पुरुपये ये प्याल्पा ही दूसरी करते हैं। अपने प्रियतमके लिये मी हम सपको हल्का अपना सस्ता नहीं कर देते हैं। मोक्ष ममत्य बस्तु है । मोक्ष महमाको मंतिम स्थिति है। मोक्ष मात महगो बस्तु है। उसे मस फरमेमे, मितना प्रफान समुदके किनारे परकर एक साक मेकर उसके ऊपर एक एक द ना पाकर समुद्रको साठी करनेवालको करना पाता है और धौरव रसना पता है, उससे मी विशेष प्रयत्न करनेकी मावश्यकता है। इस मोशका संपूर्ण वर्णन नसम्मन है। दीपंकरको मोक्षके परकी विभू तियों सहन ही प्राप्त होता है। इस देरमें मुफ पुस्पको रोगादि कमी मी मही होते । निवारी घरीर रोग मही होता। राके बिना रोग नही रोता! रिकार है यहाँ •बासामा महासम्म गोपीने परमप्रमागरमामय र १९८मत भीमर पम्पब मावि सिम गुम्पटीम मिती । परम भनुपरअरला. ।
राग पता ही भोर को गोही मोक्ष संभव महो। मुक्त पुस्पके पोग्य पीतयता पा ठीकरका विभूतियों मामदको प्रत नहीं थी। परस्त सामान्य मनुष्योंकी अपेक्षा भीमको बालगता वोर रिमनियों एव अधिक पी, इसलिये हम उमें गैतिक मापा पति बोर नतिमान करते हैं। परम्त मुझ पुरुपके लिये मानी । गौतमगा और तापी विभूतियोंको मोमन् न पहुंच सके थे, यह मेरा र मत है। यह कुछ में एक महान् बौर पूम्स म्पलिके दोष बताने से नहीं उता परन्तु उरें और समको म्याय देने के लिये हिसता है। पर हम संसारी और वो श्रीमद् बसस ये। में परि भनेक योनियोंमें भठकमा पहेगा तो श्रीमको शायद एक ही नाम बस हागा । हम शाप मोक्षसे दूर भागते होंगे तो भीमद् मापुग मोभ- मोर सजाय थे। पास पोका पुस्पार्थ नही पा होनेपर भी मुझे प्रमा होगा कि मोमदने मिस पूर्व परका सपं पुर वर्णन किया है, उसे वे प्रास न कर सके थे। सनने । साप का कि उनके प्रयासमें उन्हें सहाराव मस्पीच का गया और उस पर परमामाकीरा गया । परस्त मौमद् पजन्य वसाधारण म्पति थे । उनके स उनके भनुमबके बिदुके समान है। उनके पानेवाले, विचारनेबारे और पक्षमार माचरण करनेवाको मोक्ष सम्म होगा, उनको अपा मा पाँगो, और पाप मोर मेरकर भात्मापा करेंगे। इसके अरसे पाठक रेगे कि मिल्के सेस वधिकमी सिपे पोग्य रे । व पाठक तो उसमें रस नहीं सकते। काकाको उसकी टीका कारण मिलेगा । परस्त मापन ये उससे रसगा। उमके होंमें सत् नितर या, पर मुझे हमेशा मास पगा। उन्होंने अपना काम बचाने के छिपे एक मो असर नहा विध | मका ममिप्राप पाठकोको भर्पन बापावरमें सापोगी बनाया था। जिसे बामक्रेशर करना है, जो अपना बम्प बामने ये मुकरे, उसे प्रोम मिसे गाव कुछ मिलेगा, ऐसा मुझे RARE , फिर म। कोई हम्पर्मचमनुमामी हो पा भय मी मरे पश्चा ऐसे अधिकार, समरे पोरेसे सस्मरणों को पार की सभी उपयोगी होगी, सबसे उन संस्मरनोंको प्रस्त्रमा स्थान देवा ।
- रायचन्द माईके कुछ संस्मरण प्रकरण पहला प्रास्ताविक में निनके पवित्र सस्मरण सिम्समा बारम करता है, उन सगीय श्रीमद् रामचन्द्रको बाप जन्मतिथि है। कार्तिक पूर्णिमा ( सवत् १९०९) को उनका सम्म हुआ था। मैं कुछ यहाँ भीमद् रामबाबका बीयनचरित्र नहीं मिस रहा। यह कार्य मरी शक्तिके मार है। मेरे पास सामग्री भी नहीं । उनका पदि मुझे बीवन चरित्र लिसना दो ता मुझे चाहिये कि मैं उनकी मम्मभूमि माणीआ बदर में कुछ समय बिताउँ, उनके यनेका मकान देने, उमके मेसने उदने के स्थान देस, उनके पास-मित्रों से मिछ, उनकी पाठशालामें नाउँ, उनके मित्रों, अनुयायियों भौर सग सबधियों से मि, और उमसे मामने पोग्य बातें जान कर ही फिर कही लिसना पारंभ करें। परस्त इनमें से मुझे किसी भी बात का परिचय नही। इतना ही नहीं, मुझे सस्मरण सिसनेको अपनी शक्ति और योग्यताके विषयमें मी शका है। मुझे या मैन कई बार ये विचार प्रकट किये है कि मपाश मिसनेपर उनके संस्मरण सिमेंगा । एक शिम्यने निनके लिपे मुझे बहुत मान है, ये विचार मने मोर मुल्यमापसे यहाँ उनीक सतोपके लिये पर मिला है। श्रीमद् राजपाको में 'सपर माई' अयत्रा 'कवि' कहार प्रेम और मामपूरक सबोधन करता था। उनके संस्मरण सिसफर उनका रास्प मुमुभुफि समक्ष रसना मुझे वहा भगता है। इस समय तो मेरा प्रयास के मित्रके सखोपके लिये है। उनके सस्मरणोपर म्पाय दने के लिये मुझे मैनमार्गफा बच्चा परिचय होना चाहिये, में स्वीकार करता है कि वह मुझे नहीं है। इसलिये मैं अपना रवि-बिन्दु भरपंत संकुचित राँगा। उनके पिन सस्मरणों की मेरे गीवनपर अप पड़ी , समके मोट्स, भौर उनसे गो मुझे शिक्षा मिली है, इस समय उसे ही लिखकर मैं सतोप मानगा। मुझे बाशा है कि उनसे जो मम मुझे मिली यह पासा हो गम उम संस्मरणोंक पाठक मुमुसुनको भी मिटेगा। मुमुक्ष' शम्दका मेमे पहा नान सकर प्रयोग किया है। सब प्रकारके पाठकों के लिये पर प्रयास नही। पेरे उपर तीन पुरोने गहरी छाप है--ग्रन्मुटॉप, रस्किन और रापमंद मा । टासटॉपने अपनी पुस्तकोशरा और उनके साप पारे पत्रपबहारमेररिकनने वपनी एक पुस्तक 'माट सि पाए 'से मिसस गुमराही माम मैने 'सोप' मा और सपा मानि अपने साप गाई परिचपमे ! बर मुझे रिम्पर्ममें संघ पैनई उम समय उसके निवारण फरनेमें मदद करनेगाडे एपर्षद मई पे । सन् १८९१ में दक्षिण ।
प्रस्तावना वामिका में इस विपियन समनों के विशेष सर्वच बापा । उनका पोरम सण पाने अम्त धर्मरमा थे।क्य पनियोको क्रिपियन होने के लिये समझाना उनका मुख्य म्पक्साप पा। यपि मेरा और उमसंप्रय मापारिक कार्यो पर दमा या तो मी उन्होंने मेरा नामाप्रपामके लिये बिता करमा मुह कर या । उस समय में अपना एक कम्प समा सका कि नाटक मरम्पक सस्पको पूरी तौरसे न मानने और उससे मेरो बारमाको जस्तोप म हो जाय, तबतक मुझे अपना कुलधर्म कमी म छोड़ना चाहिये। सम्मेि मैने दिनुपर्म बौर क्प बोकी पुस्तकें पना पुन कर दी। झिधिपन और मुसम्माशी पुस्तकही। सापतके मर मित्रों साथ पपार किया। उनके समक्ष बनी दोका रमी । तपा सिंदुस्तानमें मिन उपर मुसकुछ मी हा पो उनसे पर- प्पाघर किपा । उनमें एपर्चर भाई मुख्य पे । उमके साप पो मैप वन संबंध दो पुत्र पा। उनके प्रति मान मी मा सकिने उनसे को मिल सके सप्से केनेडा मैने पिचार किया । उसका फरयामा मुझे शति मिसी । दिनभर्ममें मुझे चो चाहिये पर मिल सकता 1, ऐसा मनको निवास [मा । मेरी इस स्पिति गाशर रापथद माई ए, इससे मेरा ठमके प्रति कितना अधिकमान होना चाहिये, इसका पाठक योग कुछ मनुमान कर सकते हैं। इतना होने पर भी मैने रमें धर्मगुर मही माना । धर्मगुरुको तो मैं सोग किया । परवा और बात मुझे सबके विषपमें पहा मसाब मिम है कि महापसा संपूर्ण गुरु प्राप्त करने के लिये तो परिष्म चाहिये, मह में मासे । मकरण दूसरा रामचन्द्र भई साप मेरो भेट नौमा सम् १८९१ में उस दिन में विणापासे कई बापिस मापा । इन दिनों समममें एकान वाया करता है, इस बरण माग पतये देशसे परना । म रास्टर-रिटर-और सनके प्रमपात सय पाण- गोपनदास मेहता पर उतरा पा। एयचन्द माई ठमके यो माकि जमाई होते थे। गाटर सामने से परिचय कराया। उनके सरे बरे माई सबरी रेपासकर बगीवनरासकी पहिचान भी उसी दिन । बास्टर साहबने रापद मईच कवि भरकर परिचम पापा और पनि रोते हुए मा बाप हमारी साप प्यापारमें है, वाप पानी और माना किसाने सूचना कि मैं उस एप मुना, और ये शम पारे सी भी मापा , बिस मधे मैं पोशा उसी कमसे में दरारा भागे। सुने या मकर नार्थ मा म तो उस समप ममान मार लिमपतसे गेटा पाप मुझे माया- मध मा भमिमाम पा । मभिपता मी कुछ कम म गोपी। उन दिनों RE- तसे बापा मानों बारसे उतरा । मम मफ्ना समस्त बन BE Pपा, बोरमा ग मापाड पाम् पारे दो मैले सिमम्मियोंकि मुहे पा कम पाद हमेवाम पामबीर बाइमें सम शोच में बाँच गया। उसी प्रमे रापम् मानि पोरसे ५ रापचंद भाईके संस्मरण एकके बाद एक सब शम कह सुनाये । में राजी हुवा, चकित हुआ और करिकी स्मरण शक्तिके विषयमें मेरा उप विचार एमा। विडापतकी हसा कम पानेके लिये यह सुन्दर अनुमपामा करा चा सकता है। कविको अंग्रेमी वान पिस्कुस म था। उस समय उनकी उमर पचीससे अधिक न पी। गुजराती पाठशागमें मी उमाने पोका ही पम्पास किया पा । फिर मी इतनी शकि, इतना शान और आसपाससे इतमा ठमका मान | इससे में मोहित हुआ । स्मरणशकि पाठ शाहा नही विकती, वौर जान भी पारशालाके बाहर, पदिइच्छा हो--विज्ञासा होतो मिसता है, तथा मान पानेके म्येि विलायत पवा काही मी नहीं माना पाता, पम्त गुणको माम चाहिये तो मिलता है-यह पार्यपाठ मुझे पपई उतरते ही मिश। करिके साप पर परिचय बहुत वागे पहा । स्मरणशक्ति बहुत लोगोही ती होती है, इसमें भामर्पकी कुछ बात नहीं । शाहान मी मोमें पाया जाता है । परन्तु यदि न गोग संस्कार न तो उनके पास घटी कौसरी मी मही मिलती । वहाँ सस्कार अणे होते है, वही स्मरणशति वीर शाबहानका संघ शोमित होता है, और जगत्को शामित करता है । कवि सस्कारी हानी थे। प्रकरण तीसरा वैराग्य वपूर्ण अवसर एवो क्यारे वायशे, क्यारे पाच बायान्तर निर्भय बा सर्व संबपनु बधन तीक्ष्ण छेदाने, विचरनु का महत्पुरुषने पंपो! सर्व माश्पी भौरासीन्य वृधि करी, मात्र देश ते सयमोटोप चो, अन्य कारणे काय क कप नदि, दो पण किंचित् म मा गोप गो-मपूर्ण रायचन्द भाईका १८ वर्षको उमरके निकले हुए पूर्व सनाको प पहली सेकड़ियों। नोबेराय इन कमियोंमें एक या है, यह मैंने उनके दो पर्षक गार परिचपसे प्रत्येक क्षणमें उनमें देखा है। उनके सोही एक बसाधरणता यह है कि उन्होंने सप नो बनु मग किया वही लिखा है। उसमें कही मी पत्रिमता नही। दूसरेके उपर छाप गन्ने के लिये उनोंने एक गइन मी लिसी हो या मैने नहीं देसा । उनके पास हमेश्य कोई न कोई धर्मपुस्तक और एक कोरी कापी पदी हो गती थी। इस कापीमें रेवाने मममें दो विचार भाव उमें विस ते थे। ये रिचार कभी गपौ बार कमी पपमें होते पे | सौ तर अपूर्व मसर' वादि पर मी विसा इजा होना चाहिये । खाते, पैठते, सात बार प्ररपेक क्रिया करते हुए उनमें वैराग्य यो होता था। किसी समय दरें इस मगरके किसी मी मगर मोहा हो पा मैने नही देखा। समका यन-सहन में भादरपूर्वक परम्त सूक्ष्मतासे देसना पा । भोजनमें जो मिरे उप्सीसे संतुर रहत थे। उनकी पाशाक सारी पी । इर्चा, अंगरमा, सेम सिका कुमार और पोती यही उनकी पाशासपी । तपा पे मी एम पर सारू पा इस्तरी रिपए ३ मस्वादमा - 1 राते हों, या मुझे पाद मही । पानपर बैठना और कुरसीपर बैठना में दोनों ही समान थे। सामान्य प्रतिसे अपनी दुममें गरोपर बैठते थे। उमको पामी पौ, बौर रेसनेवाग्म समझ सकता था कि पते हुए भी रेषपने रिचर म्म है। बोपमें उन चार पा । वे सत्यव रोगसी थे । गिम्ता बरा भी म पी । बाँधमें एकमता पिचित की। चेहरा गोलाकार, होठ पतळे, नाक म मोकार और चपटी, शरीर दुप, कर मप्पम, वर्ण श्याम, और देसभेमें ये शान्त मर्षि पे। उनके ठमें इसना मधिक माधुर्य था कि उसे मुमनेगा यते न थे। उनका पारा सिमुन और प्रश्चित था । ससके उपर वायनेदको छापा यौ। मापा उनका इतनी परिपूर्ण पी कि इनेबपने विचार प्रगट करते समय कमी कोई शब्द मा पहा हो, या मुझे पार नही। पत्र लिने बैठते तो शाप शिम पर ए मैंने उमें देखा होगा । फिर भी पानेकामे को याम माम होता पालिस निचर वर्ण है, वपा मापनपना बुटिव है, अपच दोके जुमाव कमी है। मा वर्णन संपीके विषयमें सभव है। बावादरसे ममुप्प वीतरागी हीरो समता । बापगता वास्माको प्रसाती। पर अमेक समों के प्रमानछे मिल सकती है, ऐसा हर मनुप अनुमब पर सकता है। पोको निकालने प्रयत्न करमेपाल मानता रिमा रगत होना दिखना कठिन है। यह राग रहित दशा कविध सामाविक पी, ऐसी मेरे उपर पाप पपी। मोका अपम सानी बीवपगता है। बातक नगतको एक मा बामें मन रमा । बतफ मोसी बात से बोगस अपना दी गठी माती वो के कानों0-ठीक वैसे ही जैसे कि हमें बर्षक समझे बिना किसी संगीत के सर ही मम गया है। ऐसी रेस पूर्णप्रिय मासे मोशका अनुसरण करनेवाले भापरणके बानेमें बात सम्म पा जाता है। मांतर राम्प बिना मोक्षको मान नही होती। ऐसे एम्पकी गम कमि पौ। प्रकरण बोया पापारी जीएम •बपिपरले नाम मेहई पर बोठे पमिक शेर्न माम, सोश मोई ना तोणे, पनिक देव माम बापे पोते पाळे पमिक एम माम व्यावस्तीत पन माळे, शिवकत ९ मणिकनु भुम्वाम पो ए शत है, पार पूरे गो पामो, सळ पाव हे -सामळम्म मेरा र पाठेमीएमचा बनिरहेकापेममी म्यागनिय समाम बने विप्र रस निमावामिन सघ्र नामसारमा मन खारेजबान टीम रोयदि बावजमेपनिया विपिनास।
रापर्वद माईक संस्मरण सामान्य मान्यता ऐसी है कि म्पबहार अपना म्पापार और परमार्य भयना धर्म से दोनों बम्ग व विरोधी बस्तुएँ । म्यापारमें धर्मको पुसेड़ना पागम्पन है । ऐसा करनेस दोनों विगा पाते हैं। यह मान्यता यदि मिथ्या न हो तो अपने मापने केवल निराशा ही लिसी है, क्योंकि ऐसी एक मी बस्तु नहीं, ऐसा एक मी म्यबहार नहीं निससे हम धर्मको बना रख सकें। धार्मिक मनुप्पका धर्म उसके प्रत्येक कार्य, सछकना ही चाहिये, यह रापचद माईने अपने जीवन में बताया था। धर्म कुरा एकादशाके दिन हो, पर्यपणमें हो, ईद के दिन ही, या रविवार के दिन ही पाठमा चाहिये, वयवा उसका पाठन मदिरोंमें, देराममि, मोर मधिदों में हो होता है और दूकान या दरवारमें नहीं होता, ऐसा कोई नियम नहीं। इतना ही नहीं, परन्तु पा करमा धर्मको म समझनेके बराबर है, यह रायचा माई कावे, मानते और अपने भाचारमें बताते थे। उमका म्यापार को चमारातका या । धीरेवाशकर चगमावन झरेरा के सासी थे। सापमें वे कपरेको दुकान भी पणते थे। मपने पहारमें सम्पूर्ण प्रकारसे ये प्रामाणिकता बताते थे, ऐसी उमनि मेरे उपर छाप बाकी पी। वे जग सौदा करते वो में कमी आना पास ही उपस्थित पता । उनकी बात स्पर और एक ही होती थी। पासाकी' atel कोई वस्तु उनमें में न देसवा पा । सोकी पागकी के तुरंत ता पाते पर उमें अन्य मालूम होती थी। ऐसे समय उनको भकुटि मी पर माती, भौर मामि टासीमा नाती, या में देखता था। धर्मकुछ छोग म्यगारमत नहीं होते, इस बामको रापपद माईने मिप्या सिम करके बताया या । भपमे पापारमें पूरी सामनामी और शिपाध बवते थे। हारे बगा- रातको पचा पात बारीकीसे कर सकते थे । यपपि वमेनीका ज्ञान उमें न पा फिर मी पेरिस पगैरके अपने बारतियाँको पिरियों और तारों के मर्मको रे फौरन समठ जाते पे, मोर सनकी कला समझनेमें उनें देर न गती । उनके दो तर्क होते पे, नेमधिय सोनिकसते थे। इतनी सावधानी भोर होशियारी होनेपर मी म्यापारको तमिता जयबा पिता न रसते थे। दुकाममें बैठे हुए मी सब अपना काम समाप्त हो जाता, तो समके पास पी पार्मिक पुस्तक नपवा कापी, शिसमें वे अपने उदार हिरते थे, मग गाती यो।। मेरे वैसे खिास तो उनके पास रोग बाते ही पते थे और उमरे साय धर्म-करनेमें बिचकते न पे। पापारफे समयमें व्यापार और धर्मक समपमें धर्म' मर्यात् एक सम यमें एक ही नम होना चाहिये, इस सामान्य छोगाके उदर नियमन करि पालन न करते पे। वारपानी रोकर इस पाठम म करें तो यह हो सकता है, परन्तु पदि वीर गोग उसका राईपन करमे घणे तो जैसे रो पोषोपर समाप करनेवाला गिरता है, सेहरा भी जयाप गिरते । सम्पूर्ण पार्मिक भौर मौतरागी पुरुष मी मिस किपाको पिस समप करता हो, उसमें हो न हो जाप, यह पोप है। इतना ही नही परतु उसे पाई शोमा देता है। पर उसके योगही निशानी है। इसमें धर्म है। प्यार मपरा इसी तरह जो कोई ८ मस्ताबमा कप किया करना हो तो उसमें मी पूर्ण एकामता होनी ही चाहिये। वरंग बार- पितन तो मुममुमें उसके सास तप सतत पम्मा ही चाहिये । उससे पह एक अपमर मी अपित नही पता। परन्तु इस तर बामचिन्तन करते हुए मौ को कुरा मा वाम रता हो यह उसमें हो तम्मय पवाद। में परमर कहना चाहता कि कवि ऐसा म करते थे। उपर में कामक अपने पापार में पूर्व सावधानी रखते थे। ऐसा हनिपर भी मेरे ऊपर ऐसीपहर हो कि कपिने अपने शरीरसे परस्पकवासे अधिक काम लिया है। यह पोगको गपू र्णता को नही हो सकता ! यपपि कर्दम्प करते हुए शरारतक भी समर्पण कर देना या मति है, परन्तु उठिसेबरिक मोर ठयार ठसे कम्प समझना या रग। ऐसा अर्मत सम्म राग निमें पा, यह मुदनुभव हमारे। मात बार परमार्थसेि मनुष्प धलिसे मरिक काम मेता और बादमें उसे पूरा परनेमें उसे कर साना पड़ता है। इसे हम गुण समझते है और इसी प्रमसा करते हैं। परत परमा वर्षात् पर्मानिस देसनेसे इस तरह किये गए धममें सूक्ष्म मर्मका होना बत संमत्र है। परि हम इस जगत पर निमिछमात्र 01, परि यह शरीर में मारे मिग, मोर उस मार्गसे इसे तुरंत मेश्व-सावन करना चाहिम, ममी परम कर्दम्प है, वो इस मार्गमें गो पिन बाते हो उनका पाग बास हो करना चाहिये। यही पारमार्थिक कसरीन । को दही मैंने ठार दोहै, उन्हें ही किसी दूसरे प्रकारसे रामपंद माई नपयो चम्कारिक मापा मुझे सुना गये थे। ऐसा होनेपर मी उमाने ऐसी कैसी उपाधियाँ चटई किनिस पडसर उसज बीमारी भोगनी परी। पचर भई मी परोपनरके कारण मोहने मणमरके किये पर लिया पा, परि मेरी परमपता ठीक से दो प्राति पति भूतानि निम्न परिप्पति' पर स्का यहाँ ना है। और इसका वर्ष मी इतना कार्य पर रनेके लिये उपर्युकाणचनचा उपयोग करते हैं, परम्प तो सपा दुस्सपोग है। रापचर भई प्रालि उपहार गहरे पानी में गई । ऐसे कार्यको दोररूपसे भी गमग सम्पूर्ण सामामि । माना जा सकनाम सामान्य मनुष तो परोकारी कार्प पछि भास पागस मा, मी उसे कथित् प्रा र पाते हैं । इस लिपपको इतना ही रिपुर समान प्रते। पर मी सपना रेनी गाती भाति मनुप लिने मोरे होते हैं किपरे पाई या समा। गरे निपाची बोध कुछ मी लार नदी पाती। पदि पर ल फोनोरणय और समवन्द्र रोनों समयको केस संसारी मनु हो मना पाहिले से हर उसमयमा साना समय होना अनुन पारित मनिवाम् होनेपर भी कारापिकीनरो परमा म्प्रेचये पनि भोर मनुमान सुगम होना चाहिये। रिसे अनुमान हो गया है, उसके पास रायपद माकिसंस्मरण पासा निम दो महीं सकता । सत्यके पास असस्प नहीं निम सकता। नरिसाके सानिध्यमें रिसा बद हो गाती है। यहाँ सरस्ता प्रकाशित होती है यहाँ सहरूपी अपकार नए हो पाता है। पानपान और पर्मान यदि कपटीको देसे तो उसे फौरन पहिचान देता, मौर उसका एप दमासे बाई हो पाता है। निसने बारमाको प्रस्पक्ष देस लिया है, पसरेको पहिचाने पिना कैसे प सकता है। कविके संबंधमें यह नियम हमेशा ठीक पाता था, यह में नहीं कर सकता । कोई कोई धर्मके नामपर उमें ठग मी मते थे। ऐसे उदाहरण निपमकी पूर्णता सिद नहीं करते, परन्तु ये मुख बामको ही दुर्टमता सिद्ध करते है। इस तबके अपबाद रोते हुए मी म्पबहारकुशसता पोर धर्मपरायणताका घर मेठ मितना ममे करिमें देखा है उतना किसी दूसरेमें देसनेमें नहीं आया । प्रकरण पाँचवाँ धर्म रायचम्द माइक पर्मका विचार करमेसे परिए यह गानमा भारपक है कि धर्मका उनॉन स्पा स्वरूप समझापा था। धर्मका वर्ष मत-मतान्तर नहीं। धर्मका वर्ष शाओंके मामसे कही नामेवारी पुस्त- कोका पा गाना, कंठस्प कर सेना, अथवा उनमें जो कुछ करा, ससे मानमा भी मही। पर्म बारमाका गुण है और मा मनुम्प बातिमें प्य वपमा पापहमसे मौन्द है। धर्मस हम मनुष्य-जीवनका कम्प समझ सकते हैं। धर्मधरा हम दूसरे बीचोंको साप अपना सबा संबध पहचान सकते है। यह स्प है कि बतक हम अपनेको म पहचान है, तबतक यह सब कमी मी नहीं हो सकता। इसध्येि धर्म का साधन है, जिसके परा हम अपने भापको लय परिधाम सकते हैं। पा साधन हमें जहाँ कही मिले, वहीसे प्राप्त करना चाहिये। फिर मछे दी मा भारतवर्षमै मिस चाहे यूरोपसे भाप पा अरबस्तानसे भाप । इन सामनोंका सामान्य सरूप समस्त पर्मशामों में एक ही सा है। इस बातको मका सकवा निसने मिम मिम शानोंका बम्पास किया है। ऐसा कोई मी शाल नही करता कि मसाप बोटमा पारिय, अपा बसय पाचरण करना चाहिये । हिसा करना किसी मा शाबमें नहीं बताया। समस्त मागोका दोरम करते पर शकराचार्पने का!-प्रम सर्प जगमिप्पा'। उसी मातको कुपन में दूसरी तय कहा कि वर एकहीमौर ही है, उसके बिना और इसराइस मही। पानिमें कहा कि मैं और मेरा पिता एक ही । ये सर एक ही पस्तुके रूपांतर है। परन्तु इस एक ही सम्यके स्पा करमेमें वपूर्ण मनुप्पोने पमे मिम मिम परि-विहाँको काममें लगाकर हमारे लिये मोहमाल र दिपा है, उससे हमें पार निक- भना है। हम अपूर्ण है और मपमेसे कम वर्णकी मदद कर मागे माते है और अम्तमें म बाने ममुफ एतक पाकर ऐसा मान छते हैं कि बाग रास्ता रानी, परन्तु पास्तबमें ऐसी बात नहीं है। अमुक दो बार पाच मदद नहीं करते, परस्तु बनुमर मदद करता है। इसशिप रापर्षद भाईने मारे र पर मौसी सीट पानम्, छी शाया मही ते पर धीमगत भो एर परमप-प्राप्तिनु कर्यु प्यान में, गवारगर पण छठ मनोरप मम दो- , प्रभाबना सम्मेि बन्समें वो नामाको मोम देनेवाली बामा है। इस पर सपा निरूपण गपचन्द माने बनेक प्रस वपने गोम किया है। रापद मदने पास धर्मपुस्तबमा अभ्यास किया था। संत और मागधी मापाडे समाउनेमे ग्रा भी मुसि परती भी । सममि मैदासप वम्पास किया था, इस प्रकार मागमत और गोताका मां सम्ममि बम्माप्त किया था। म पुस्तकें हो चिक्नी मी समके हापौ माती, वे बोध नावे थे। उनक पाँचन वौर प्रण करनेकी गाडि अगाध पी । पुस्तकमा एक सय सन पुस्तकोंके रास्प बाननक काका पा। माल, कायस्ता मादि पुस्तके मी मनुवारले बरिये पर गय पे। ने मुम्से मते कि उनका पापाव धर्मको बोर पा। उनकी मान्यता पीक मिनागममें भामामको पराकाष्ठा मुझे उन या चार बता देना वापक है। इस निफ्यम वपना मत देनेके छिपे में बपनेको विशाम मनमिका समानता है। परम्स सपथर माईध से धके प्रति नार न था, पति के प्रति पक्षपात मी मा । मेवाको यो पनि माती ही मझम पड़ते थे। मेरी साप पर्वा करवे समम मुझे उमनि कमी मी र महामुळे मोक्षप्रानिक किसे किसी साह पावन केना भारिपे । मुझे अपना समाचार विचार पाने के लिये सम्मोंमे कहा । मुझे कौनसी पुस्तके माननी चाहिये, पर प्रस उठनेपर, उसने मेरो पि बोर मेरे सपनो सस्कार रेशम मुझे गोवामा चमके पि सवेशित किया। पर इस पुस्तमें पाकरण, मणि राबमाम, पोगवासिहका गम्प का पोरन पारणा माग, और अपनी माघमाग बाँध दिया। पपद मई गाव बारमा करने पे कि मिम मित्र धर्म वो एक ताप और सनो मनुप दिए बाम । पिसने मोक्षप्राठि पुस्मार्प मापा है, उसे अपने मापपर किसी भी प्रतिमाने बापा मारी। x सूतर बारेम, पम पम करिने हरीने जैसे मसाप सूत्र या बसे । रापपा माईका भी पार पार्मिक प्रगति रमेश ने यो पेन्सनमें से सबरी कमी पत्ते । समस्त बोकी नियों पूर्व अपसे दसवे और वन पर्यावलम्बियो साम्मे रहते थे। रविण सामिपके पास हारमें भी मैने यही बस्तु उनसे प्रम। यस तो मानमेषाम कि समस्त धर्म उस धर्म मानी पिसे सम्पूर्ण और इस रिसेमपूर्ण है। सहमसे AIR करनेसे सब धर्म पूर्णापूर्ण है। मुपर स्व शामस्म मास परवे। परम्पको गुणातवी पात्या पर माई रिसे विचार पोलिसांचे सपना में प्रोदने मालाएका नही मर जाने अपने धर्मम एम पी सता-मोप RB पॉकि मोर प्रामसरनेध मोगसे एग रेप रित रोना हो। मोहनदास करमर गोपी परम, नयाभल मार।
उनका सक्षिप्त परिचय राजचन्द्र और रामचनीका मम बत् १९५४ (सन् १८५७) कार्तिक मुरी पूर्णिमा रविवार दिन, पाठिमागार-मोरगी गर भन्तर्गत पानीमा गाँसमै, रणीमाली स बाविम हुआ वा। इनके पिता नाम एषयीमाई बाम मोर माताका नाम देशपाई बनके एक माई, पार बहन, रो पुन मौर रो पुत्रियों का माननाम मनमुलमाला पहनाका नाम शिपचरवाई, सरनाई, मेनागाई, भौर बीबीचाई, पुणेका नाम भानगा मौर विमा प्य पुलिसका नाम सम्माई मौर कापीमाई मा । मग यमकनीकी गोक्ति भक्त्यम मौए थे। इस समय उनकी बस एक बान सपाई मौर एक पुत्री सम्बाई मौजूद हैं। तेरा वर्पकी पयर्या बामक पक्की सात मतककी पालावस्या निवास सेन्रम बीवी थी। उस रणा विमान करते हुए उनाने स्वर मफ्नी मारमचा मिला है। इस समस्का बस इक्ना मुझे पार पावाल मेरी भास्माम पिपत्र परफ्ना (समाना लस्म मपया तुको वमो मनाही)मा करती थी । समरमें भी विमल पाने मौर यमानेसर अती उषी परली प्रास करनेकी मेरी फरम बमित्मप्य या करती थी। बा परिननेकी सम पनेकी, साने पीने सेने बैठनेकी मेरी मी पणा किसी भी । फिर मी मेयरल फोमा पवारण मा मी मुझे पार भाती है। मदि मामका विपुल शान मो उस मक्त्वाम रोता तो मुझे मोक्षक दिए बहुत अधिक ममिवाया न रापती । देवी मिरपाय पणा सेनेते या दण मुझे पुन' पुन पार माती है।" रामचनीका सात वर्षस माय वर्षतामा समय शिक्षा प्रात करनेमे बीता था। उनकी स्मृति इवनी निम्मी कि उने एक बार ही पाठका भरमेन करना परवा परामपत्र भम्पास करने में पाच प्रमाणे, पात बनानेमे रोधिमार सिछापी मौर बहुत मानन्ही प्रकारे उस समरकी भनी राजे सम्मममे सिते 1- 'हस समय मुभम प्रीति मोर वालम यात प्रामससे मिश्वा पैरा करना पाट्य या! नमै भातृमाव दो मुख है, यह विम्बात मेरे मनमै स्थापिकम्मत पा वा पा गौम किसी मी प्रकार पुका भर रेलवे ही मेरा मतामरण पावा । उस समय स्थित गावै मने मुझे बात भारत की । भम्पास मेने इतनी तसे या किस भादमीने मुझे परिभ पुस्तक सिवानी एक की भी उसीने, मन गुम्पती मापान पिकण ठीक वयते प्रतर, राखी पुलामो सामापा। उस समर मनेर काम्प-पन्य समे थे । पमा भनेक प्रकारके मेरे मोरे पर उपरफेशनमय देस गया था जो प्राया भत्र मी स्मृतिम है। उस समय मन स्वामाविकस्मसे मनिवास लिन किया था। मैं मनुष्य यतिका बाप विश्वास था । स्यमात्रिक सी-रचनाफर मुने पावही मौदिदी। गायो क्विामहामाही मधिकरते थे । बन्ने उनके पारापन परीको धम १ भीमा फ्यान मारमाया-परिचय. १९५१-२मप येरणी मरता. १९४-100-11--मर्गत प्रसव प ६४ पौ पत्र, 12 बाट ९बापती वर भाग भी समझना चाहिये २५-10-11 ४भीबुट पामा वामकाममा कि रामपबीती मावान मौर स्तिा पर थे। इसरिसेपे परवद्रोप्रापर्म पेपर मानते है (भीम एपना चिमण्नो !"। परत ऐमपम मेकरण महता पम्पमारे भान भूम धर्म स्पमपाती न सितो (माम राम मामाच परिचर) २ बास्पायस्पा मेरे भायातमन्त्री ममता मुना पारितले इनमें सन मक्ताम प्रति मोर प्रीति उत्सा होमा श्रीमालीन पमग्रम मायकलते पान भी। ये नित्यही बोगन को उनका मुनानके मायने मारी बाRIR मुग्प दो मोर ठसम्ममा इस प्रब उन पने कारेकी मुहे पम खाना उप्यार मक मय सानो होतो ना मानत मिक्स महीनामा दी थी। तमाम कम मिती पन-माती विभूति देता तो समर्ष मायाकी ने एफम भा की थी। उसी पीपमै पालकमा नाम भी मानना। पपि र मषित स्मशा दोन बार मापी समीन पे और नियमि हार पाएँ प्राय मा दो, हो न बामन एयरो ! वही मी तूचा पाठी गुम्पती मपाल पाठमाण गमतीने सरके मालो विपरमै सा पार गर्न पाम गई बीमारग कोई भी पसं ना नाये यही बन सवा । इस काल में भनि स्थाप्य पारसी । सिने :-- मेरी मम्मिम पिउने पवित्र मग पते। उस व प्राची मित्र मित्रो, मिनी पर प्रविम्पपूम्नो माही समान की। इस परम उन मेगाको मुहे दुधना काभेप मुहे परिते की समर्षपध्याममोर ध्रप्रधिपाय पनवे, मि म भनी प्रगतोष बनसार से माम रेग्म बनी कि सिप प्रमान पखामेय की मापने कप भरबार मी दास मंत्र से, वो भ म न पापकार भोर में समापनेम नम बार बार परायोति प्रजनन इत्पनि पुरा पाने मिर्ग।' उसमें पशुत विनयपूर्वक समाके समय से मिताली मामा म श्री पी1 ग्नी प्रीत उनमेमोई भी परम भी पी पीर मापस पापा मग मी बाचार Rो मरेपी पर और अपनी पारी बारा पाया पचायकी यसीमा पार से मपिवानपरम्नेमकाममे मारी भयोभन परपर मरम्मै सिमिया बाया सलमाना। अपना पो ए मन नाना प्रकारको मेमन को, पम भारत परिमापर अलिपी Rक तमाये तो महीने की कम बात मान कहा, ममता पोमर नया पर पारमा पारे। भषय, वपानी प्राप्ति पानाम पर मात्र मारिका सिमित भम्बार मयाबी पातुन मास एकमाल गो मर्मवरतीबरोबमास्नी .1-10-11 बी 60-१0५-५ ४ पम्मीने पता (रोग) म (राम) ga (आदि) बलिया (भाग मातम), 7 (1) मारे अनेक मा मात्र ने सोम प्रोग्य मिले ममय मोने ये मत समय का माचा मारया की में पहुचते तर मनाइने मी मान्म ऐ कि पराका का और मात्रा मम्मत ५कमा पल बोवयं व मत्वा वम मियते-- रिममे ए मा म उसोप सलाम मीनारे । मेल मास्वा प्रण पणे पका सनम . गलगदावीबो पायी ममती माया प्रेममा परि एकाग्रेस मस ऐदी t- ८९४-01-18 रामबन्द्र मौर उसका संक्षिप्त परिषप वीर यी किसिमको मम मम मुनि मौर पिलान् ग नहीं समझ पाते थे, उसमे राजपत्रामीक प्रदेश मापत सन्चासे हो माता या । मोकि रामचन्द्रबीने भरा बरसके मीक ही समस्त आममौका मरमेमन कर लिया था। ममें पारमावस्यम हो सवगन मासिक पी। इस सम्मम्मम एक बगा गम्यमाने सर्व विचार- मुबपी मत पयो सत्तमन्नो योग । एक सूचो एम के मति मगति काणेष । स्पर पणा परे, मति मम्मा मानना परिमम ते पो, मार्गका पी साय ॥ -मर्यत् मुझे बो मेला भरलासे पानका पोष हुमा है वही पुनम्मकी सिद्धि पवार यति-मागति ( पुनम्म) की घोषणी क्या भाषापाता है। ता मो संस्कार माग्नु भम्पा करनेके पार उत्प होवे । मुझे पिना किसी परिभमफेदी गरे। त्रिभर पुनमकी सपा सका। पुनर्मम्मी सिदि एबमनीने भौर मी पावते प्रस्मत भौर परोष प्रमोसे की। इस बनमें मिलते है- "पुनम्म्म है-भवस्म है इसके लिये में मनुमपते हो पानेमें भव- पास पूर्वमय किसी स्पोगो स्मरण होते समय सिम होनेसे सिन्हा । रिसने पुनर्गम भादि माव । उत पदार्य किसी प्रकार बानकर या बाम बिना गया है। वे कि पवन बमाम्म पाँच परके थे, वो उनके सम्मम जॉप काम्नेते किती पास्की मृत्यु हो गई। परम् बीच उनपर पाव प्रेम पा । रामयम् उनके मरष-समापार हुनते ही पर रो भाये मोर परगेगरि नेगेकि मी र ए -मर बाना किसे पाये है। पर गेगाने समताक परन् यमी पाको पार बारगा। इसमें उने इस पातको मुमनेका प्रपन्न करने गे । पर परचमा न माने मौरसिमर स्मशानम परि तप पर स्पिकर बैठ गमे । यमपनयने रेखा हमकेतर मेग उत मृतक ने समये । गा रेखाहर उनके भान ठिकाना न रहा । उनके परपमें एक प्रकारको सम्ममारसी मच गई और इण समय विचार रखे पते परमभूमीन पारा हम भौर में पूर्वममकी प्रवीति । शवापपानके प्रयोग रामचम्या स्मरणपछि इतनी जोगपी किमो 50 एक बार पाँच सेते रहे मित्र मरिकमसे की भूमे थे। पयस्त बहुत मेरी मरस्पसे दी मरवान के प्रपोग करने लगे थे। रे बारे मवावधानतक पहुँच गये थे । बत् १९४३ मैं समीत वर्षकी मालामै यम्मीने बम्बइम एक सामनिक तमाम सारर मिनके समापतित्वमें, सौ मबयानों के प्रमोग पवार पर बोयोको मामचकित किया पावावधान में रावरंग से बाना मारेराने पिनवे पना बोर बर गुना रखे गाना बा भाषाभकिशए कमते ठसे तीये नपी साप मोमो सार रक्षकर बास बनावे एना रोकोठमि सिले दुऐ उसे सीचे मत कपिता को खाना भार मिम मित्र समस्यामाँकी पूर्षि रखपना इस्पारि पे कामको एक गम २रेसो ४-१५३-11 (पापा पवनीने गुम्पतरे यार सगीप मननुवयम त्रिपाटीको रिखप) ३३५.-411-२१ ४१रावा कति समय पर बनागारा प्रिम देखने परे थे, यहाँ मी सने इसी वा मनुमत दुमा पप गोम ऐसी भी प्रतिति । पन्द्र माने पूरे पनवे पे-पीबुत रामवी मामे भीमझे उसमें मारे पुए एप मुमुरे लिए गाचम्मच माघारले. मप शतापमान माविक प्रयोग परम प । भौर उसमे नियम पापील पर्वोनेवर मिना मिले पा रिना रिख सिता प्रयको रस्ते पाते थे । यस समर पायोनियर, शान सैमेर, याम्प माया मुंए समाचार भावि पी रास्कीन परोगणेही मुखापते प्रचाकीवी। पनि इनिप दि भी बहुताय की अवमा इन मित्र मि मामाको पाप मचा मोर ग्न पुस्सी नाम में सरममा । पमनको भानपर पी योग मां । उन्नति राप रयर ग्न न पुमोरे म्मम र रिपे । उस समय का सिर पर बरस बरपा हारने यम्मीनेन भाषामा सताव पारसनाने मारपी, पर यमरने से सामना । भरिप्परता पाये एक हुन भो मरिसर मौके पर समाज भारि सार मनमा मोज मामरागरे पास समन ( मीणाम) मरण समर्थन हमारी पर सिर । तो अविरिक के मरियशन कम मौर मी बनती ना मुनी बसे। पर ई गरी उमडे पाठ देषन भाषा परीने उस भाव सर किये। पर भविमगमते माममा Aमाता पर पा गायक रामकले सो समय, मौत सोने उस सपथ तो बगल से पारित कर दिये । भगो हैन पीमा बस्न था सम पर उनका व मदी गयी। पास रेमनी मनपातमा एमालेगमई (पमान मेरे सिर मी) ये लार पनपने को पनपाठनी एकागनम सिर रनर भोर मानमाईको उसे वापबेभाया तो पाप नापति ए TAमर गारभार मप्रभार उचोर बाब गन। परमी नगी सरप बीयप मामले भी प्रभावोंने माठ भवरणाम ली हम उसमें रहने पर मर गीय मिना मी बलाचरे पग भर मरामास्त पायानगीन सपने मालूम arn समान नगनने मने Rचय माम मामा गरेर भागनन मीनानियोष परेटीमो नति उम्पनि सरकारले भागना पाती भारिसमावि भोर रणेविस्पिरा भी गरमे सामरविता मना मारिए र मनमान- १ पास रिया गोलो' Rela RI गरनाम्य मुखमा बामगर १९११ १r its A स पाकर मन मुझ । समान- सिर मेरा सम्मान-ना- rambो रामा भाग १९ गुमारील सuTO रोबर मदिर RAIL-नान शिवपमा भारी, मी HDESI+ना-या गोम्पानमा गत SASTERatmमामिलान Rनमे सभी मार Ivant trd मा भीमरे म मा एक पुरे (ने CHIT जयन्द्र मौरमका संक्षिप्त परिपप ५ मपान की रोटी ।' मम्मतापविधार' नामक काम्पमै यसरीने समस्त पलहानका यस्य निस पपमै कितनी मुमारता मामिम्मत किया:-- बममी भने भविभागमा पपुवे तो मोर के परिवारपी यामागं ए नम प्रो। पभषाप सारनु नवरने हारी सपो। एनो विचार नहीं महो हो । एक पर वमने सो॥ मात् पदि तुमा ममी भौर मचा या गई, वो कहो वो नही कि तुम मा गामा कम भौर परिवार पानसे तुम मफ्नी पती मानते होमि ऐणा मत मानो संसारका पाना मानो मनुपाने पना है। महो। इसका तुमने एक परामर मी विचार ना शेता। निस्सावा विना साहनपर मी यस्मनीको मान, मैरिसार मादि प्राव करनेकी पोषी मी महत्वाचा न की। पार ये चारवे तो मवमान मोविष भारिक प्रय माप ही पन भोर पएक रपे भेगी हो उठे थे, भनी प्रविमा यस्प ' एक प्रविमाणसे भा पाइने पन समले पर भार उनका निम्मपत्र मीस नाइन पाठौको मारमेसर के सामने ये 'भति तु समयाते थे। पार समस्त मात् योनेल मों न हो बाग, उसे सुपर ही मानवे रिसोग भारि निगमपया परसपी साहारिक सापन न करने समान प्रविन रस्ती ।' उनकास निमा कि 'बोई मानी शिवनी पौमिक पाई पारगो की उवनी ही ममति होती । यास्पामममें प्रवेश यस्पनीने मत् १९माप 50 १२ को उपास पर्षकी भवस्वम गधि परममिक स्वाव रेवाकर मगजीवन पास मेहवाफ बड़े ई पेपरमी पुत्री सरनाईके गप विचार किया । दुर्मपते रामवनी विवामियक पिप मिगत नहीं मास्म होती। माना रोशात ऐतरेक समचा सापामै ‘मनाते उनके प्रति ममचमार ने ना पड़ा मर' पोषकी १५ मा १४ फेरिन लप' बसि पानिमाण र नेो मे खाना । वय ती पत्रमे पक्कामपने विवाहमें पुरानी समिम मनुकरण म पपने लिये बम्पूर्वक मार देते हुए त -'पा उनके हरममें ऐसी गोम्ना है एम प्रतयम सद्विवेकी भौर सति प्रतिमा प सकते बिसवे परस्म भरूपसे और पम ही पिता पियमै राममनने मिला:--पिता पिता के लिये भायपन करना पोप नहीं-चार मे भाराकम परता बोम्म नहीं। परि उसका प्रयोम्न मागवारले मनोमे-- मात्मसम्माप सिमे पोर नब गुलाकी रोशमवामिता -१९५-१९५-२. मरण भस्माचारमें पनपद्रव भक्टरफर गांधीजीले ठहार, vad यो पमा पोपी उसति जमीसे किसी में प्रभर हिदि मोगसे निवसपी भरमा परमयावरिक सामन न करनेत्री प्रविमा रस्सी भोर पाबार मी परता कि इस प्रतिमा मक्त एक पचमरो मे मी मदता बाई रो-१. -२८ -१५ ५ तामी एम्दीपने मफ्नी नियाताका निम एमॉमन मा है:- Away yo thoughth ye desire which concern the transient, TUDO coat fue or ricber of this world Theater be tbo state of this body it concers fo not-अर्थात् ए भनि मौर मम्गुर पर नमी सांपाकासमोर होनी । इस धरम केटी मी रण यो न हो उनघ मेले कमी । पास्पामम के मस शैली बोम्ना मे ! माई व्य ऐखरेया! पर विचार पुनः पुन इसमें भाषा परवा । एवम पपल ही चित्र विचार माई समावे। पति पतु और AT पर प्राप्ति भाव समानी पाच परिपाचे मी मोर पंचममा नयी न पथ मोर उठ पदको र सम्पूर्ण पा ऐन मा। गरसे समा मै तो मत पनिमपी पुस्यो परिषedseal इले इवरा पो मार मास रोचक बनी मा एक मम्मामबानी की नमा, मा एक मस सुपर मा गुम्वाभम रदासीनमार मागमा बामसमें रखने योगी परम पावावम् पचरनेश मेकी भार पर्ष मी भाति नौकराग्नी ममै भी यही मयता सो दम्मामी भारी भीम मास मेरे देवार माया है। उसका पिसना मे मार को दीमी एमाले मिला कर पी लया है, उता मा मम मी त पास मी यो माँ हो सम्णा स्रोताका निमित्त मौर बनारस मोरे पनेम ।' मतपय श्रीमन् रिकपारसे उपतीनम्पक्से नवम स्पोपपीत राय, सामान प्रति बाद पूर, पूर्णाति मोम मेम पमतमी भपना पत्पाहम पम्।। मम्मी पति सोएdिi गरि लिया मौका पान किया जाप को निमरे में न ले समागम मा सकता। मेरेइन नासो कर बाई चरम पारमिय विमा रकम्प चाप मपया इसे मेय प्रम म पान ठेप का सम्मान पी समदेवा। अमर ना मानना मामला नहीं म्पनना पुरा नहीं मनरा सिसा मामा, मानस नई मानना पसल नही मारना मप मम पलसी पूजा मनमा मुझे कि जो व्यभाव। पण का मौका नहीं चिन्न न0 पर नही बबनरामा मनपरी, बच्चा पिनो टोल समन मोर - मिरो वो एका मी माँ। पयतु मे AN उस पुस्तकालमापौर हम मत। शवना योमर मानना मना सातापनी सब मण्यत्र माम मा बाम गालामा मामले एक मेरो पौरका पोवान, समीम वरण हम भी बसो माना जानेवाय राणमामा पुष माता । म त में मुहमले से भग सलम। समय समहमें न बने मत पड़ी बरी प्रसना मामा की पाकी पापा ममी और इसमें भी मा बाप बर्गाचे तप राबराक मौत मनोररहनु परेको पानाहारीमायतमानाका एक सो ऐव-मम्मन पुनमेम्म । न पार और पुचसे राना मौर ARRA ना कभी पका है। इसमे ये बात म पाम वर्मी माना मी नमा राना मी र नापार मी मन मचा मामानहाजिषा पब पीने समेत निमावि ने निभाना मानवच मिले मेले मानेपाम मे प्राम में नप ये बचानक घर TRI ११-१३ १-१. १ ।
पमपम्न मोर उनका संक्षिप्त परिचय मनुमस हुमा भौर पर मनुभव ऐज मा नो प्राय न पामि ही रिक्षा मा, मोर न गागादियों की फरफ्नाम ही था । यह मनुमय क्रमते मा, भौर पाकर मब एक 'वहीन ही' की नाप करता है। भव यहाँ समाधान हो जायगा । यात भरस मापकी समसमे भा बामगी कि मुझे भूत- कामे न मोगे हुए भयका मरिणामीन मल मादिक दालमसे एक भी गुल नहीं है। बीके सिवाय मग परार्थ खास करके मुझे नहीं रोक सकता । दूसरा ऐसा कोई भी संसारी पदार्प नहीं , मित मेरी प्रीति हो भौर में सी मी मपसे भषिक मात्रामै पिस दुमा भी नहीं। के सचम मेरी ममिमय और है, मौर माचरण 50 भौर है। पति एक पसे इस काम्वक उसका सेवन करना मास रस्सा,रिमी मेरी दोपणे सामाम्य प्रीति भी है। परन्तु पुल योकि ममिगवा न रोनेपर मी पूर्वधर्म मुझे क्या परे हुए है। इनेसे ही इसका भन्त नी रोला । परन्तु इसके कारण मप्छे नमानेवाये पदार्थको देखना एफ्ना मौर स्कर्ष करना पड़ता है भौर इसी कारबते प्रायः उपाधिमै यना पड़ता है। महारैम, महापरिमर, गोष, मान, मावा, मेम मपया ऐसी ही मम्प गावे मदमै अ मी नहीं, इस प्रकारका इन मुमनेका मान करनेसे परमानंर पता है। उसने उपरोक काममंचि देखना पाता है। यही महासेरकी बात है। मकरंगच मी प्रगर नहीं सकती, ऐसे पामोकी मुझे तुमठा हो गई है। यही बस मेरा लीपनामा यसकता है।" सीपी पिचार एक पूज्य बात पा सास मान भावि करनेपाम यायमा स्पाममसे उरातीन पवे कुए मी मारतके पर्वमा पि मनियाँधी व्य मीको रेख मपणा तुम महीपमाते । परन्तु 'परस्पाममको विमेकी भौर सम्मको स्वर्ग बनाने की माझ्ना रखते हुए मीके प्रति पर्पत सम्मान प्रकट करते ६ मोर ठठे तापमियी समसर सपा-भान देनेच मनुषेप करते । बिते - मीम र बोप नहीं । परन्तु ऐप को अपनी मारममि है। सोको यामा-वान देना चाहिये । उसे एक संगी समझना चाहिये । उसले सब धर्मपानका सब रखना चाहिये । मतावरफ्ते किसी भी तर मा बहनमें मोर उत्तम मन्तर न रखना चाहिये । उसके पायरिफ भामचकिती मी तय मोहनीम कम बरते उपमोय निा जाता है। उसमें पोपकी ही स्पति रलनी पाहिये। पावो में से मुखमा अनुमय परवा ! मा मूग पाना चाहिये पाल्पर्व पर या म्पनना भट है)। ऐ मित्र परस्पर अपारप पीबका उपमोग करते से ही उस बस्न (रनी ) का सर उपमोम र पूर्वमन ए माना चाहिये । उसके जप से बने से निर्विघरी मात करना चाहिये-वित्रा चायाले भनुमान भी उपयोग नियनपर रखना चाहिये। सम्मेवानोत्पश्चिरो यो पर एक बारम रस-पा समसार माल न करना चाहिये । - । " २ विलि (मे राममायने मानादियोष नामकला पप मी wिt, मिलम गाने जीविध भारि सपोडा प्रतिपारन यासो भागे ३ गुमपती मूग पत्र इस व्य है। मीन सदाचारी बान भाई। एक सौ ठेने गयी। सेनाथ पपीननो रंग पो। भतारणपी ईएन प्रो मा परेन भने हेमा मंदर न एसयो । हेना पागरिक प्रयनो कोईपन से मोहम्मन पणे उपभेग म्बाम , स्पा गोपनीय स्मृति पती मा यो मनम् एममन्त (वार्य हे मान्न मन्)। मित्र मिन नपरक पोम्नो पारमा उपपोम मेमेर, म वे पल (से पनी) नो उत्तेर उपम गर्न पूमकनपीएई। पेनाप बेम बने तेम मिनिमय बातमी-विमरपनो कागए भनुमण करतो पण ठप्पोम निपानमवलयो।देनापीकर स्वानोत्पति वो एफपारण पशु एम समय ममाल न करए पर पत्र प्रलो. पत्रका ही एक महै। मीमर पालन मस्तक प्रभाषित किसी भी समरणम या मंशन। Rसा गा । उस परम पा मेघ मुझे प्रमुख एममी पावकी माते प्रात दुमा । इसके भिवा उनका गुव भामाय।
आसपी पियार पना नानी उपवासार यस मनी मीते मी सम्पन भोर प्रेमप्र वर्जय स्क्वे, या उसे निम पार माहम दोना है। पाप पसरतमीने भनी पीने यो वर्ष में मनुगक पक्षIR तुम भने भातमें पोप निधी हम उमस में उतपने हा रोगा। तुम मे मनुवानी हो भोर रसम समाउरो योनसे मुझे प्रमान मिल है इस परम मने मेमामबानो मामला ग माना मोर मैं मी तुम्हारे पाप चितस्पो ममदार पाया तिने पूरे प्रहारते मी पनि मानसिप, टोकी बियेय साध्ये । ऐक ना में सपिच पाता परि म कोर्मपाले कप मेय सान ये ऐप होना चाहिये । इम तुम जारी ने प्रकन २१ ले पबन रे । तुम्हारी गली नाम मे मति यही पेचा मनुम्न र मया है- मतिम । में उता मना पारखीमपुर सिपाही। भीम रख णमो उम्मेयरमा पसे होगे भी प्राम में मनुसार एम र प्रोमेकी भाग। प्रम लाये गुव माविक मना, वीतराव महिको गुवही मषित पाना । मेरे मकिको मामूम और बारना । म सस मेरी महिम को उस समय मिल जाते मोजागरी सत्यते पना। पिचाप मुख पद मोगपूर्ण समलमा | मोम उपगम्य । म उससे सांस और तप दिलाये । परमेशरणारेर म मा । सास्वाभमसे पिरक होनी मम पलभ पाभिम पप ए में क्या लसी मोर पसाराम भाषण पर ममी समो विवाए वी- मत भी न पो परमाप पेपण हक्ना बी से ठप में गत्वावमसे अधिकतर पिरक रोनेशी गाव सा पणन निरोप घाममति सम्मान नहीं बन जता- उत्पी परिवाय ही बात। दवा सामाषिकी प्रासिमरन एम मका रोगारको नायब उपरीय-पश्यिाम लेते ही मत है। रामका- का माना हनी dth Aणी पण मना, अपापोम का पनियोग बना एकमात्र सेना बोला और बोमरपत्र राना मामी दी।इस सब पक्की मनमै व मै मेयम नसकिएम हानि-रिल परमानी मनम व्यापार मेमोन मैमोस्प मीही मामीची मेप मीना मौनीमरपालीबहीतिमा m म मोर उभीमबम एकटी एयवाऐम ऐममें भी कमर सामोर रले प्रापमा परेमा मलाला माम इनामपदमनामनामाता माता मा मौन प्यानमारमना मनस्यता समापन प्रमचम्ट्र मार उन संसिप्त परिचय अपवा है मगेना मफा माता, न बामना भया माठा है, न खाना मगा माता न भूले पना मम मान मसंग मफा पता है, मग मला माता न ममी मी गती है, मौर न मममी की मची गती है-ऐसी पण हो गई वो भी उसके प्रति माया या निराण मी उदस होती हुई नहीं माराम वाया भी कम न होवो भी ठीक, मा ३० पुसका कारण नहीं है। इसकी प्राम के एक नियम मारमा दी। भौर पर पारिसम है वो पुखी है। इस विके परप समाथि गती है वो भी बाहरसे मारपफ्नकी प्रापि करनेमे पाक्से मन्वय है। फिर भव कसा रे सा पर्वतकी गुममे परे प, और मास होगम! पी रम्न या परती। दो मी बासम्म कुरी प्राति करनी पदमी, उसके लिये तो नहीं है, तो मी ठसे सहन करने के लिये व इम्म नहीं करता। परमा- नन्द स्पायर इसी एम करे मी से ! भोर इसी कारण मोतिप भारि मेरे में विच नहीं है-सिम सपके मविप्पान मया सिदिगोषी हा नहीं है। वा उनके उपयोग पप्लेमें भी उदासीनता एवी। उसमें भी बरामे वो भौर मा मषित यी है।" उपसम्पापारी वहानी पर भी पनपन एको मारी मापारी।देबचारपसरा पा पखे। भन् १९४९ में बाईत वर्ष मनत्यम राबपन्द्ररीने भीमुठ रेवार मगनीमरा सामे बम्बईम मापार मारंम रा प प्रारममै रोनि मिकर कपाा किराना, मनाय यौय बाहर भेनेशी भाष पका काम एक रिपा बादमे पर पीके भीकुठ मारेमा पम्ममाई भोर रखक नवीनर भारि साप मोविमोश पापार बताया। एसपने मफ्नी कम्पनीके नियम बनाएर मरमेटी पुत्वा मी प्रमाण्वि की पी। प्रनेकी मारपणा न भीमद् रामपा मापारमै मस्पव भगाये। भप्रिमी मापाका शान न होनेपर मी विबाबतके R भाका मर्म मण्डी वय तमश समये । से म्पायरतापी कामी बहुत उपयोगपूर्वक सूप च विचार कर रहे थे। परी कारण या उस समम मोम्पिक पागारम श्रीव रेबाकर जगनराठी ती माफी मामी पहरोम एक गिनी बने गी थी। सर्व यस्पनर मापीकर भीडव मानेकाला वेगमाईको पम्पन्द्रमी म्मापार-मारवार सिपात मान च । उमाने एक मारमा 'भीमान् रामलमपी साप मेयममम पार पर्पा परिवरप भौर उस्मे खत माठ वर्षो मेरा उनकी खच एक मामले में पाया। इनिमारा मनुमा मिति परिचपसे परसरप मास कम बता है।रिम मुझे मापन पोलिउनकीरण पेशी मारममय उनके प्रति मेरा मतिमात्र दिन प्रतिनिपातारा गया । मामले कोम्पापारी मेय। उन भनुमहिमापरके प्रम ऐन ते गुर पार मागी- में मवमेद होता भनेक बार परसर रिमें पाषा पता है। परन्तु मुझे पना रोप र भीमान् रचनदी बप मेरा माविमा तिने सर्प संच या उसमें उनके प्रति २ २माने अंग्रेजी भारिप मम्पारक मि मा सिलवे --शिवमेवीस चिउर नेते विसी भी प्रभरका परमान भम्मान नहीं हो पायक प्रापके पारण मामपालमा सनने आपोरामात मी म रो सका; भोर का नही सम, लिए रेता भीमर मा न्यानोकि इन मामा मोर मी भषित में पा बती (इस शिसभी पात्र में सारे र नसरा, परन्तु य रेषमम्नी मपेयमे ही पासा मौर रिस मारिधरपको माय परने हम्म भै , इसलिए ये मामा सामप्रक "मा-१९५-१९१-१५ काडम्यापारी म मामलाई ममम भाभी मी पर भी मिलान सामानहीनी सब नाममा मेरे अपर गाय पर पड़ी। पमा सिमे प्रसारमा सहनीम्नम यास्मथ भोर प्रामापिय मै Arrett र मनेने संबोक्न एक-ति बप मपारमै सम्बर दुमा रके सब महक मझR पच मनेका ग के का। पी से बगुल माने गे और मम मा तिन्प पे उस क्यापर्णन एकमाता हो या मेमरेना में भारोम सीबगपास )म्निा मी मम्मी पाप मारी शान न पचाउँन । मास मे परम पूज्य कोई मन मा। तब पि मम किमी भी प्रभाव नहीं है। मौर में मायके वापरेला पर नाम चार बना है। नही पर 1 पर मन मन मोर माते विपरीत माघरममा दोये तो मे पधाचापमा । मेला मरने से परीगुरु मरकानी । बाप का माम पर पुर में मनमानी कर पंगा । मे भूले ये रिमाप मोडm मतोम उलया गायकाचम्पा प्रांत मी भागदेष भनमा भारत मिली मया मरोष मन भाया । मापी स्पी सपनो भार से परे, म भासा अपपर माया और उन्धक्य कहेंगा । श्री मुपता न कोडमा मात्र मलम योगा। समापसे इतना भया !ी में प्रसार मेरे तिमिले माम प्रेम प्राति नमुरेठ मानी निलिम प्राति पर मोर सरी र सपने तालमेय नमोर पर मन की भारणे भरलपीपा उतनीको नमानेको मेयरमा पनि मेला खारेगामापा भानो कभी मी पप गा गोर मम्तो गरि पाीि में मार माप मेला पानी भापक पाले-मारो किसी में पान पहुँचा क्लिा, पण मम चार और राम सेवा सहा बहुमाका" मलाम निरक उपचामिन सी है। म्यापारम अनासकि पापी मन मनाक्रमापार-मालम्पाय पर परम भाभ नहाए ।धेसन उपबिपीन को कामम-ति- मारले नमामान बनो भनाजमलमान ही पाप मामे परोपकानामापनि इमा प्रसस्वा स्वामीस्पलेपना और पर मानता र पारी माम मोहमप ममलेगा और परिमोसनमरत प्रेग्नोरमले। निन्यसासनी उसएका सो सम्मानम्मर मा पर बालिन पर उनकमा दुमाल बीतापयामा प्रस्तान vRaut नामी में पर्म 10 AM t-- नएन एक दिन के कमरे मस ANो भार पर A | मनमामि तपनाम का एक मात्र में न अनेरा मामला सामन्यावाम म मरा-रागमन -१९५-१६पमा--..
राजचन्द्र और उनका संक्षिप्त परिचय . " । मिसने मनमोकना मोर सेक्न किया पाया पीतरागी मौर शोगावोस प्रया से पवित्र पुस्य ! इसके लियत से मतप, सम्पूर्ण मौर गाम । इसमें पूपण कोईरी नहीं! या निरोप तो नवर्णन । ऐता एक मी वाल नहीं किमोनिवर्णनमें नऐ। एक विषयको भनत मासे परिपूर्ण करनेवाण नरन हो। इसके समान प्रयोगनभूत रस भम्पत्र श्री मी नहीं है। एक राम ऐ मारमा नही होती ठख क्य समस्त पतिम दोन मई मेनके सम्म पूज्य कोई रन नहीं। ऐच प्रनेका कारण सा ! या उपकी परिपूर्णता, पीतपिता, सस्पता, और पापिता । मनपर्मका तुलनात्मक मम्पास भागे बम्बर तो रामनगीने नरन, देहान्त, समानुस तसि मारि पनौम तुम्नात्मक मम्पास किया मौर निको माम्प पता कि 'भास्मसापका ठग निर्धारण भौवर्षमानस्वामी भाविने किया है, ता इमे सम्प्रदायाम न । वे ।-रात भादि वर्णनाभ मी भारमानी और सम्पूर्ण मोपी मोर माता दुमा देसनेम भावा है परन्तु सतमें सम्पूर्णवा सम्म पागोम्प निर्धरण माम्म नी दोवा-मयते है। मालम होता है, और उसका मी पपार मायम होता है। यपि पेराम्बम बगरमा मारमदान विवेचन किया गया, परस्पर चर्चा रास्मसे मरिमी ऐम भमीवर माइम महीं हो सका । पर मो ना मा कसवित् विचारसी सदस्मेवसे रम्भमाधम मित्रम्पसे समझमे माता हो मोर उससे पिरोप मातम होवा रो-पेटी माचा मी पिरमिनियम है विशेष भविविक्षेप परिचमाकर इसे मनियेषी रेसनेमे विचार किया गया है। फिर मी ऐज माझ्म होय है कि बेपतम चित कारसे नाम तस्मा, उप प्रकारसे देवात मेण मदिरोषमारको प्रत नहीं हो स्वासक बिस वरावर करवा पारमत्वस्म उसी तय महा-उम्मै कोई सा मेद देखने में माता । मोर उस उस मारते साम्प भारि मनोम भी मेर देखा जाता है। मात्र एक मनने बो भारमसरूम मा है, या विशेषातिविशेष मविरोधी रेचनेम भावा उस पारसे पेरन करने में माता । निमावान्का का मा भारमलम सम्पूर्नव्या भविरोपी हो, ऐसा नहीं मापा उसम ख मा इदना दी कि ममी सम्पूर्णवन मारमा- बस्म प्रगर नही। इस कारण ये भस्वा मप्रगर उत मारपाका पर्वमानमें मनुमान । मिलते उस मनुमानो उसपर मामत भर न देने योग्य मानकर पा निपातिविशेष भरियेपी, ऐसा का सम्पूर्ण माविरोमा होने योगी ऐष लगता है। सम्पूर्ण मामलम लसी मी पुरसम्मै पो प्रपर रोना चाहिये-स प्रकार मारमपम निमम प्रवीति-मार नाया। मौरमासे पुश्यमै प्रभार होना पारिये, यह विचार करने पर मिनमावान् को पुरको प्रगर होना चाहिसे यह सा मालूम होता है। इस माम मर मि मी सम्पूर्ण मामलाम्म भयर ऐने बोल्प तो पासर्वप्रथम मरम्मानस्वामी प्रगर होने मोम्मपता है।" मतमतावरकी भावामसे माँसौम माँस् पाप गुप मा नपसनो मनुपियाँ रेकर यमचमीका कोमा समाते उमा भावा पा मोर वन मावि स्पस भभुषार पाने भनी पी। प्रबस्ति मतमाती बात कनकर में मनुसे भी मविसरमा जी।' पम्पमा परोको- मार मालामो पसनम ये पाले मतमतावर पर गये। उन मुस कारण यही है सलमाकी भोरसे उपासमार्गका पनि गमावस मन मेपोम रोहपर पुरस मै सकिने । मयल पाना बानवे २५९९-२८ २ शासनावरकी तीन मिहापा समे । मनन और बिगार गावाचे पुरानो मन्दिर पिनने का में न निकम्मे । इस समदपपोते पामते इतने अधिक मत प्रचलित यो भवस्म पगा।" font-गोल पुरुपात कम है। कनेको तपमै मामला बनेपा मोर पुलाचे नेपामाम। उपर जर्मन मचा सामग्री मिन्ना तुम मरा है। पीने चमो पन मनी मानी माते । सिसी मोर पसभी मार दो मही बडा । मात्र नेपाले माप मिमा प्रमोचर करके बेस बनी सरस्वति सामोर एलेन मी सति सानेपलिमित्त होते है। प्सीम पूर्ण बात यदि कोई एक मशोषक मामा मा तो में भी भागोवन व भिमा न परे भरत गई है। मी मनुमा वर्मपर भामा माता मंटन गया। इल्परने मेप प्रलेस ना ममिमात्र नसी है मारमा भै नरवनका भाषण मार पाच मातम पार हो म गौर काम उनमें मुख के चाय पूज्यको मा भनिमपान मौर बने बातया भावासी मनी भास्म समर्पन वो ऐसे भग तो शेयर पनने मारी | माँगे रन रक्षा करना उत्पच हो भावी। बसिविर के रेलो यो में मेवम सप्रमाय बिगा। पासनीदारकी तीन ममिसापा वीमेनपानमा सार रनेकी र मह पतीने प्रविधी सल्में पोप तो मरिणामेरकमेची परकमकी ती ममिमचाग्निच मावि नही मबन पण B नएन दिन प्रतिदिन बोल रोवमा यमाई देख मानवामोरे पाम रहम को नामा मेरो परे। समयाभरपरमा मावि भामर भारत प्रफन मे ममेक-मुदाय मार्ग पर माँ मामा पबनमें 10 मानी उब िस्पि मोR NO से हो सकती । तिवमान नरम निरन सात बारा वा दुमा बने बाबा का विष कि क्या हो सकता है। सामान पर मलिभाव परिमात्मा महावन माविमामा पद ममान स्विीtin पासनोदारकी योग्यता प्रने बाक्सानी पानी नपाम्मन सर पर पानको पूर्व प्रेम समवेब साबित करने AA पुस्यन बोके मम्मे हना पूर्णम पुराय पीय समि। प्रारसे बात सेयो । पुरुस्त मन म मपि दोष योग दिन मानेन।मामले ऐसा पोप मिल । म यो पनवे बिल पेभो । निमाकी यापूर्वक उपए काम को फम भाषि हम तम गुना भारत का पैए है। :- मे ममै मन मार बोले समे भभिनव भी। उसे मान सम्मण मानेर से । रथमाई। पानी बेग पवन भाये में Pा साथम पनामाभरच मीरमानीपत नमो। परमपरिवार मेो मायारामे पार । मानसमापन १४-1 मोर सनका संसिष्ठ परिचय १३ होनेसे उनका 5 मूस मार्मर सभागा, मौर इस मार दो रेसो मौर एयरी मनुग समागममें भाये, निमसे कुछ समतबामे सपा उपदेशको प्रति मापापासे ऐठे सीएष मनुन निको । इसके कार पारेखने में माया सिमेम पर होनेकी इमरनेवाले तो पास है, परन्तु उन सा संगोप नही मिम्वा । परि ने उपरेपा पुम्पका संयोग मिसे तो बहुतसे और मूक मार्ग का सकते है और दरा मारिन विशेष उतना समान है। ऐसा मान्म होनेते कुछ पिचम भावारे किसरि इस कार्यको कोई करेगे भन्म है। परन्तु गम्नेसे मेवा कोई पुरष पानमैं नहीं माता । इसमे मिलनेवारी मोर ही सरल माती है। परन्तु मिलनेवासेन नामसे ही सप इस वरका या हैकित पदक सम्बन एक मोलम-मरा पद न, भौर गतिक उसकाकी मफ्नी सी चाहिये बेटी मोम्मता न ये, गाँवक उतश्री इम्जा मात्र भी न करनी, भौर प्राप' भवतक उती घरह प्राठि करनेमें भाई है। मार्गका पोषा पात स्वस्म मी किसी किती समस्या है, फिर मी कितीको एक मव-पाखापव भी न रिया मया तुम मेरे शिम हो भौर हम गुर। या मेर प्रापः मदर्शित नरी किया ।" इसे रकिचके उसार करने उतरे पुनः स्थापित करनेम-पमान का मामा मपमा मानहामि भाचा कारण नहीं बेबस पर ममुरेश मारिसे ही मत प्रस्व निपाम सत्य मन मोर सस्प मानर स्पति करनेके लिये', उनमें यह धि उरत भी। रणन्ति - उसका पास्तविक भामा नौ है, मात्र अनुमा मारि पण हान-प्रमाण पता है, इससे कभी भी पर पति रखती है, भमरा मस्पोपतेरी भेगमें पावर मी या स्वाधीन है।हम समम कि मदि उस वर सक्रीम पाय ग्रयो वो गरी ग मत मून मार्मी मम्त रे । मोर मागेग उत सम्मागा भागबन का सदनिको पागे, ऐना हमारे रोना समय है। हम्पर संगो साग करने के लिये भनेक जीवादी धि हो, ऐडा अपने स्मा। पर स्पम्ति करने माना है। उसकी दहा मी कपिद ऐसी चिगनी, परस्तु मारमा मनपार रेननेपर उसकी मावा, इस समरती पण कमी मान्म होती है। भौर पर FO सचम यी रोगी वोपा मी सीमो बाबी ऐसा भरमा मावस वासी पाहिल देसी सोमवारे बिना हर बार ही सपना हो, ar मी मर्गत उपरे महीं करना ऐसा भात्मनिमम निस्प पता है। पर इस सम्मान प्रापस ही परिमर भारिले स्पाग करने दिपार पावा। १६१-५१५-२९ २ यवन्द्र कावे - मीमो महावीर प, एम मने मारमा प्रतियोगमा । म्परा पदस विकानीए की कमर गए उनमा। समुपके सम्मान रिपतिमा एरपर्मा जीए। दुनिया मतभेरना निषी कर पानी की मपी। साप हुन भने तत्व भानन भामा मारे स्पारा एक नये धर्म पापा मारे भारम्पए सायं। धर्म प्रवावीयामापीर येना सममा माय धर्म केरमा मी पातो म्हगे।सेना पुरसोना मानि प्राण न्यभापर्म रपान परीणामा ए धर्मना धिप्प मा। मत्र ए बर्मनी पाना सीवी - बरसेनीपुर रामग्री पर महमें एर मुगुवारा पयरम्य यावर माघारते पाया गया। यहाँगाबात मानने योग्य है कि भारत सरिस्में ल प्रमाणे मी मन है।सामी रामती बनेको पम गरणा र मम्ने दुस्मनामे मापनेपने पर प्रतिम गोद मौर भाव रेमा यता मोर दस भौर ममै मल पाती पारभरी प्रम्पकार:- There is not a lame there is not on or star lich shipce bat to me is doo it, lastre. To me i loo the glory of all the hearenly bodie To mo is duo all the utretire nature all the clorms of the things deiret स्वबहायेपाधिकी माता प्पारापापिनी प्रास्ता नही भागात पान में रहने गेम गालगालीन अगर करने मातर भाममा रोनार मीमापाविम ने मापक सर ने उसमे नियमा मस्त ठिमो हारामा मिला है- ऐते पाविपरपम टीम को पुरे मन में मोना तो कम्नीबरदार माग न हो तो इसमें प्रभार उापिसाप गरेर मिया पता भी कठिन हो या ऐता र म ए देखा है और पिने काम पर मचा ऐसे पुल्ला मोरसर मेसा पो भपिक निमय Te" ( महो वा धमतोमा उनका दाना र म जारी, परम्मतमुणमये उनकी मीन ना मात्र पुमोर जीयो Rast ऐना समर मी सहमर गायकीन मपल्पना मनुमाया पाकर सनलमापने गाने विषय ममारमै पोषित मान ही मी, मोर पूरी मोरगम माने नियमानी हानि नभी माना। यामक इस बार मना में प्रतिपा-मे मोर नवमानते गले हुए मटि AIR मा कलाकार उस पर सर रेपर मेकर उस प्रमाने माने भRAपमा पलेवाम उमस प्राधिमपर या मी मत। स दयने से प्रभारी एक मविपूर्ण वाचवा मोर प्रथम प्ले एनिमियात यना पड़े वो पर्व पर रखनी है और वासोमि पर नाला न प । श्री सेमरीमपानरनिये। सेताम किरेना, मनमा मरे ला यापम नापी, बोरगाने गमाला ताब नहीं लिया। विमानमोगरेर ना हमारा चला कि उमरते र प्रत ये ऐख नहीं पता।" रामनभात्य पOAपित सो नपाक (AMपुर सापाचरण पारली पारिनार र ऐलाकरापारमा सामोपरमपिता और लतपमपाराचन0ठी। राममा लावाहिया मरने पनि माधम । मौतमतिर इन परेन च मा पला INो सिमामे नममने सामान देन्योरेन नेपर भी ममापनेमकी Antiरसर मिया बाय! - मामामीण इन मारे पारसमनिषा सपन उमेपानामा म्पक कोष समानत RINTRON उपपatedो पर्व मनु मपूर्ण (Mitatuwो परामपामा मालिनी यो मे पपEL. ३.न.-10 राजबन्द मीर समका संक्षिप्त परिचय मौषि उसका विस्तार विशेषस्पले देखने में माता है। पापारस्पतिबसे पुरावरमा प्रतिषमते, वासरूपसे, मकास्यस्पसे, उपस्वरूपसे, इत्पारि प्रसि या परम विलारम्प मान्म " ३६ पर्प सर्वसंग-परिस्यागमा निमय भागे पठार गयपनी छ वातका निमन करते? 'एकस इम्प, एकर क्षेत्र, एकाच कामोर एकांत माषरूप संयमी भागबना ये बिना विकी पतन ऐगी सपा सबर्तमपरिस्पाग किये बिना--पापातर निर्मप दुए मना-रोगौच माप नहीं है। सवा । में मग्नेको मास का शिलवे :-"पयनुप्रास्म परम पारम्पत्ति करते हुए मी प्रपम पवम्प लिनप्रतिमा का वासर्य पाएकांत रिपरनयम, एस एमपम भोर केस बापमान निरपेयता प्राप्तकर उसके सारा नि सम्पप्रतिमाम पर भीख मारमावस्पा पार-- मग मीकि सम्मान में मपात् मार्गक पुमम्दार के लिये प्रति करना चाहिये । प्रन रखे 1- या मा प्रा। उत्तरमै मा मना है-उत्तम निश्मि रोपा देना सोसार। पा देता पराक्रम है। मप्रमत्त एरवीर बन । क्या उवना मापुरत है। क्याबिनेमाको भतर्मुस उपयोग पर देना पमा मफ्नेको स्बोधन करके सिलते-ष मसारस्त पानेबारे इस मामले भर मनाच! उस मायके करनेमे बारे बिखना पडमान प्रारम्पेस रिसाई देता हो, वो म उसमे नाच समाच!" *जी! मग रंग निाचिस्प पाडकी प्रतिमा पर प्रतिक्षा। पदि नपा समानाधिस्म प्रविहामा विशेष माप देखनमें म भाने वा एररेण संग-निए चिस्प सम्मक्तारा स्पार, परत पागनी भमिमय होनेपर मी गाम 'मायकारक उपापि' में परे पनेक कारण भने मनोरप स नहीं रोठे । म निम्ममारसे उपापिरोपकानही करना पड़ा। राम And tr- जो पूर्व निबबन रिय गरा, उसे निपने लिये-पो मार म मेरे लिये, इस मापार नाम नाम तरे लिये पेन कसे।।' ' भारमा कमी यती विरम मारमानुसार परे भता प्रमााम ठप मा परन्तु उसमें प्रीति भणीति करने में बस भी न करना चाहिये । " “चिके पनपुट न रो उम्ने भरप गरीब बारह समे मी मारि स्पले मात हुए। उन बीत रहा मी तुलानी पानी रोवी । म र म मनु भोर मा पाप मारिले उपकार भारिश उपाधिगम बानो बेदन रते। २२लो......-१९०५-११ २२-४२४१-२. - मारिनम चरते हुए एसा मौन एनिमगवान नमान मानस में सम्मका मसर रोगा'। 'मेप पिच-रिवातियों-लनी शबामो cिatर मम नरे सर गुम्नीमानी ही समयोग पर्प नहर भने निरसी गाय मिनरल ज्रीरोग-भारि गान माम माग गन रहर ममियर की। पामा भमुरुमर समात्र गेर, पापिय मा गरेप भाति निमपर में मगर ममता नर पर मने प्यागररे मासिमपरम पिन नाम भार एतम्या का मात्विपूर्ण प्रश्न एप्रिसदी हमलामा म" मे या निरपास समनिमाले बारम्बारे मरममय-परित्यार उपोध कनेकपाको २ मित्र। मैन मंपीर भाग्न गन्ने रे वो समयमै पनि मधमान परिवर मात । सच्यमान पनि मानी माता भात भागबमोदी ममम । रेखा गये। पा माले पर RIP रमेष समतमा पर मचना मोकामा पीपत माननात देवाचारवियमा मौर मरतीयाना एम मुझ मापान यमाये मरान और मन रमेस एमपी पति भाषान मारिप्रेमात परेपनि मि ने भी मानो नाम प्रकाश गुमान मारि परेलीया गया तो शुक्गमा परोसम्म रनीको माप्रति रोने मे पते पर भोर मुनि ने उनका सामा या उसे मर्म-प्रनाउरी पामर पमना और मागे पान तो परमात्रा व समय मनोने या साक्ने मनमा भनेक मोनारिभाधारहे असा भी सर से लिपर सीरप पिम मालपूर्व प्रमाला गरमाने ये सपनाम मा जे मासूम होगायने नमन - मरमन पिया कएको म्यमान KIRक मौरीप को सर हे पुनसम्पत्ति बनानेही उमगत माना । एमालपूर्ण ममोपर (1) मारमान ऐन्य। उभर-भाटी बार आम बोली नि मारन At इतर पानी कोमो मम पूर्व मामलापपोप का अंग पर माले मम्मो से से ही उन पुण्यात मा मातमे पुल मारको पन ते मोर पेवा हातात नहीं। मित पुस्पगे मामला निमगाशान, ते मत मनना पेय-anti भनने वारदम्ब-यम- कायनरी में वा किती मामा पूर्वमा पर पुष तो नमको सामानको बानता - भारती है। मनुभास है सब प्रकारे समवेत हर पल गरे। परि मे माता स्वतचा दो दीपासपने में मालाम में ही या माण तो नही | भाम्मम कान दो बाप्पी मौर मार में समास दोधा बने कचरे मानने सनम पी 4 मास्त्र ANTी । (१) मायाम मिले किए को कम t! Tru-सारको मिठसम्म प्रो नरमी सम्पति- पेसन मनसममा चाहिने । बाराब प्रभरका वापस मरममा बाधिक ava गुगल बागमन टोमा कण मार मानक काम प्रना स्पो मम क्या नहीं। इसी तपती मारि मारे AIR में ऐसा मा पोषA मानवममे से कुल्ले ममाते पसम्भीर उनका सक्षिप्त परिचय २ मह ऐना मत्लव समवित है। ऐसा मनेका प्रमोम्न नहीं कि सर्वत्र ऐसा ही हुमा है परत करने का मभिप्राय यह है कि ऐसा ऐना हेमन है ऐना होना योम है।गों पूर्ण मामसम्म यही सर्व मात्प्रमान-मोग मामितम्से गया, पर निमयात्मक पाठ है-तिस्ना मंगीपर करने मोम्म पात है। रस भारमलापले प्रेमी पहान् नहीं है। ममापाग पूर्ण मारमस्तकाको मी प्रास न इन प्रकारका इस समिम का प्रमार-मोग उस्म हुभा नहीं पईमान है नहीं मोर मागे उत्तम हागा नहीं। परन्तु इस प्रमाणपोगवियर भारमतस्पो पर प्रतिपक्षम नहीं है या बात दो बबस्ती मोर यदि उसे उस प्रावयोगविषयक कार सत्तम मादम होता है तो वह पुस्य भारम्सस्पो भाव भन्नम यता है, पेमा मानते हैं। प्रनेका ममिग्राम पर भारमाप महाप्रम्प ती कर सर प्रकारका प्रमाव होना योग्य है-होता है परन्तु उनके एक मंगका भी प्रकार करना उने योग्य नहीं । किसी सामाषिक पुष्पके प्रमपमे सुवर्ण-गी इस्पादि से ऐमा मना मसमय नही, भोर पर तीपरपर पापाचरक भी नहीं। परन्तु मा सीपहर भास्मस्सस्प बाय काई भन्म प्रभाव मादि नहीं पर भार बो परखे ये मास्मस्म पीकर बने मोम ना एका मानते। मौर ऐसा । बारित समन्वि (1) प्रना-इस माम माषिक एमस्ति ना समय है पामही । उचराचित् पेला मान में पताम्मे भाषिक समवित नहीं होवा ऐना गिना. गममे स्मरपिता। मब उत जीवो चार करना योग्य है कि समस्तिका मा मर्प है। मिसले पर नवकारमा विना मी प्रत-पासान नहीं होता फिर भी पाबीच भपिसे भरिकवीन माम मौर नहीं वो उसी मबम परमारको मात करनी महान् भार करनेवाी उस समरिचकी भ्याम्पा है। सिर मब ऐसी मानसी र सममनी पारित सिधारित समरिच हा बाय ! गरि वीर भगवान्की प्रदान नाम साविक समषित मानेवठी कौनसी मा समानी चाहिये सिकिस्म हम कब निस्पयते इस काम होठी ही मरी । बरि ऐना मालूम नरी दावा कि ममुक रमा मपा ममुक मदाको पारित समपित करावारि दम कर लिसिनाम- म शोभा यही मर्प मा साविक समषित आता ही नहीं। मा परि ऐसा समझा 6 मे एम रिती पूरे माण्वसे करे गये। ममा सिी पीछे काम तिम्न दोपसे रित रिस मरे हैं, णे जिसने इस पिपरमें मापा प्रतिपादन किया हो या बसोयमे प्राम्स शेगा या सोए करमापूर्वक विचारना पोम्प है। रबिनतोके नाम परा माता है उन सूनाम सापिस उमति नहीं। ऐग स्था नहीं मिला दपा पम्पमत मौर दूसरे में बहुत से प्रयों पर बव परी मावी है ऐना दमने पारे पर मुना मापौर पर पाम मिपा मग मी एका इमरा ममियाब नहीं। वा या नाम जिस प्रकार Pat पर एकात भमिप्रापसे मिला ऐसा में नहीं हावा । पराचित् पेला नमझा कि बरपास एकतरफ्स ऐसा वो भी किसी भी पारसे म्पागम होना पोम्प मी । कारण पदि इन सब बास्त्रमाप्रे पुरे पापपपूर्वक नही पाना सारिये मापसायरी सबल नाचित् समझो कि स्थानम मिनागमसिता दो पौध पापी दर पाचरे काममे मी बात भी मोर दगा तो इस बासघ्र भरपरना प्रेई मार मार एमारे किस्पार कारीमी से सम्मा मनपा मोरयासिन प्रारच मही हो सकता कि मैं पा मोर-मासे htहणी प्राति et पोपी मौर कसायरी है। मम्द पापित समतिका शिक्षा सरदार करते हुए पापन करतेk- बीमारने मी पता सीमा भौर पर हममें उतरे मागममें भी एना शालारामि परि ऐम्म मामा मप । 11..
मालपूर्व मम ८ 1 ममम न भी होने की सम समेगम है 1-नामम एम राम, देव (बगन नवीनी कारकिति प्रभास को दीर बनी है।' सकामे ये (४) प्रमास प्रमें मोहो सका। उप-सभमे या मुलाना न ऐसएमन्त प्रमा योग्य नही। ममीमावस्मर बना, भौर या पक्षमा में नहीं--पेव को पापमा सकिन मोर माँ। एमाली बस-समय हम दो ऐसा मानते है कि इस काम में पिको मोबाहर मीणामीमा मपान या पाकिस समें मोबन पा इस प्रतिपको समेत् अपने पसरण मौर म मोर ने सेवा सम्मानभान , र पर्व हमीप-माप प्ररान कर। पुमान स्म मैं और पुरु मै नमते । वेपेच हम तो पुलनामा है। मोम्बो माषीन रखा है मार हम पुण्य पर गते मना को नहीं बनने देरी माता में सम्बो मति प्रेम सत्पाती है। कि उसे लेकर मी गम्मत ना मार मलि भिमातून मेयर। मापन पनाम इस मै पुस्ता मकिन को म यो सन पर रिहम मी से बने पेठे हो, तर कधी पाला उपन्न भागमा ! पोपममममको माग (५) प्रयोगमा मागममै भाय। पराप्राक मिसम्म ने पायाचार भाविध माना और पीवी रियसि मय पर मीना फा- मनापरणेमा माघार महा बार । स्वरूप अवारका मा उपरेपी मोर का मन मम तो पो बस सेवा पनि मैपिमरमा पोपर भोपामस्म की है और समरिया मे स्वभावात मारिनामी प्रकार मायम है। निमामाकी भागामायब मनी पत्नी मारेपानमनस सप प्रास हो भौर परमान परिणव । पति मालामावाले पनि निम्मा गरे माम भी मार दमकमा मार मारो बोगते म at मामmbedोमा रस मामयौपदर-दराम निमेष - नेल्प ग्यसपने मन प्रामाचानिय निमच दावा सय पान नेपर . ५ १-५५५ मा पोपीरोग अरे - महात्मा बम And -जयी सभी AYीप बाणा खिसकनकी मौतम गा। वो चापाका प्रोगामी परनी में सपनाममायापारमा समानुपाप १५ कमेर ११॥ r tran८-१४ पजचम्मू मौरसमका संक्षिप्त परिचय - मी नारीको पार करने से प्रापानिपताम प्रसंगकी भाश परनी पी। ति माशाल परिणे- समुपका विशेष समागम करणे, सानु मायफन परेया, वो पंच महातारे निर्मछानेका समम भाषमा- परमानन मगवान्ने नरी पार करनेत्री भाग है। हमाछा, प्रस्पप प्रापातिपातस्म होनेपर मी पाच मएकी रमाकाखम को कारण है.पा प्रामातिपाती निवृत्तिका ही खमपि प्रापातिपात होनेपर मी नीके पार करनेकी नमागावपावस माझा रोती हि मोप्रकार प्रापातिपात निश्च होवा- पासको एक पार पति पहुंचती है। परन्तु पर पति फिरते पार करनेपर हो सकी विशेष एवारे किन दी माम रोती है। इसी पय पूरे प्रति किम है। मैं परिमाको ईरा निधि करवा- प्रकार रोनेपर मी यम पात्र मोर पुस्तकका संपरेखा बावा है- पीचर किया है। उन परिमाकी पंपा निा भरमा किसी प्रधाहे रमनस्म होने विधान पिया मोर उस परिवाममें मपरिमा। मूपपीत मापसे निस्ल ममरणापी म छेनेके दिन ही पुस्वषता ममीपर करना बताया है। वय इस काम्मे भरीरके मननकी हीनता देखार परिविकी स्पति सममात्र रहने निही पाम, पात्र मारका प्रान करना बताया है भर परमात्म-हतरेचा वो परिमा रखनेकी भारी। मैचुनस्पागमे मोमपचार नहीं है उनपरब या कि उसन प्रोपरे ना मग नहीं हो सकता। मौर मप मारम्पको माविका से भगवान्ने उसमे कोई भपवार महापसाया । नरंभ पार करना मगपके मना ये सवा पुस्तक प्राप करना भी पगोपो ना होना मतपरस्त मैपुनका मन ययोकेलिना संभव नहीं हो सकता । इसलिये मगवान्ने इसने मपसारव का भौर पूरे माम मास्मात दिवरे लिए माद पारे।श्त कारण ति क्या-संपमा-गान ए, सी प्यने से मिनापम रचना की गई। पत्र लिने मना समाचार मार प्रनम्न बो निषेप किया है, उसका मी पाही। नि मेसमागम पनि न हो प्रीति-मप्राधिक कारपकी दिम हो मियों भारिक परिपसमें मानेका प्रयोग्न न हो बम विपिड न होम, उस उस प्रकार परिषद विना कारणास्तीत नरोप-पस प्रारम्मिमित मर्नत भरपीको देहार पत्र मारका निषेध किया है परस्त पा भी अपनारक्षित है। जैसे बालपमें मनायभिम गिरी मना की है और माँ की मारा पाँची है परन्तु शान रमन मोर पिमके परम या मी विचरने विपन दिया गया है। मपी समठे मालूम होता है पदि ईशानी पुष्प पूर पा हो-जनन मापम ऐना सरिक हो, मोर मदि पर-समाचारके विवाय दूता कोई उपाय न हो वो फिर माम्मदिवो सिबाग जरी म मभरका हरिन लाग को उस ज्ञानी पुस्मनी भासासे अपवा मिती मा-मागाकी साम्पस भागले देता नेममिनापम निपेश नहीं होता ऐका माइम होगा। - " - । (1) मना-मा भूत मविप्प मोर पर्तमानकाकी मस्त फ्यान पुगपत् गान ऐनेको देवमानपते. .)बरेश मा मारिन शान समानाने होता है, ऐज मिनाममका पर्वमानम स्मै म । परिवारमानन भर्ष हो तो इसमें गुवा कि दिलाई देता है। परि मिनवम्मत नपानको रोमामेभावक माने तो उसमम्मानम पाहार, निहल, पिहार भारि किया परोसती! भोगवारीपना भई मन पन मोर कवीत Aति शेनेभार भारिक थिये प्राधिोठे उमर उपयोपावर रोपणे उत्तम 50 मी दृषिमा मर्मात उफ्पोमका नियेष ऐना मत है। एक समयमै २५९१-९२-१७ का उपयोग नही रहने सपा हिमाव मापार मरिधी मापि सम्म उपयोगमै यदा पुमा समानाका उपयोग पानोपरे प्रति पना मल नहींमौर मी ऐसा तो मक मानसको मनिला या मनिहत दुमा माना धार | माँ बित् ऐसा समाभान रे भी प्रसारामत से रिमानम र प्रमित होते; तथा रेपानी उनमें उपप्रेम म्याम उदबाना है या नहीं। पितु हम स्वमारी। पा ममामिल हुमा करते है रवि माहार मारिमै उपयोग रहते हुए बम समाप प्रतिमासिक ऐसा मसित मरे 'पोप मम से सम्मान में प्रतिमस्ति पार्षा भान सोनी और बस वो ऐमा बसमानाको ठन पराये शान हाशा तय उलोगो भान्माम एनाममा नप यहा बिनभाहल माबिमै उमसोम पता हो तर उस्मान प्रतिमानिने योग्य पो भरमा एनस? परदेशप्रस मारिन सिमेनहो उसको मि माने तोमरमर मानाच्या मते पोमचारीम्ना मी तुसमे मी या माना पाहिये कि मिमी बोगी मोच में से पानी मापना के बोगस्वप्ना रोनस उम देश आरिता शान सेमरी सम्हाला प्रतिपादन ने किया विवानि PATो ना मान रेममयी प्रतिपादन पर मरी मिला पिपिनियमी- भी ममुना रेल राज्यमी और मिगमनमा मेरी वा-नाको देश प्रमादिम नगल गान मा गोमय परम पूज्य मापासे नियम लव मिप ममा नागम मन प्रसरसे पार देखने मावा :-- समान ऐ समरमा-समीमारपसान मोर भरोगीमान सम्मान । गोषमान प्रारध-प्रम समन भवात् ठाम दोनो समय समोरीगम्यान, भीर अपरम पर भवान् भोगी नो प्रोप अममो परिका पत्यान । सीप भोगी- मायापान कामा- सम्पन सम्मान र अपम भवात् मिसे पनि मन्तिम परमपमान" (स) रेसकान परचम प्रा मारत मारो मेल पस्तुएं बन मार-उमरी मनवता PATI उनन मनारि मनवम्मा समझ ही माग बर्ष मान उनम्र नि पिस प्रतिमा से पता है। उता विचार बराकर अंक Acीरेउवा । मिनिमम पता कर सरमामान - मकर रापम भाष रमो मापन-A प्रारोमानी अमान है। बारम्पार निगमो योहान नाम उमा बस तु है जिसके मायने नाम पुष्पा माथि अ । भारतमणि गवार-एकदमे समसमलिगमान पाना। बसमान मान मानमरेपरमान, पाश्रीको भात्माम मनात है! परसरामा मानिस मारमा मन होता सतन मन प्ररमा, भो म सम्र मन प्रोमध दोभान मास ऐना पनि भोशने नमलरिसमाप्त है। हरि सम्मन इफा । १५९८-४९९५-१९ रामयन्द्र मोर उनका संक्षिप्त परिचय २१ . हमारतामपा सपा विमार रेगे मौसमयसम्मान दो गार, नहीं ता एप मर गान पर भोर भम्त की भम्मे तापमान जाता है। इनतिर नमविवार है। पाम सम्पमा सरणानको रणले म लनासारतताना मोच पा, मोर रसमे पुणविपास नहीं कर सगा। वारि रे मुरार- मुमने गित गाली म्यूनत्य है। इतना ही नहीं रिन्नु मुझे पाम करनमें मरी जास्त गती है। इन मतिरत बस्द्र पने परिप भम्प भी भनेर महारण रिस उरिपन किये हैं। उनमने पर प्रपतेरे- (१) मातिाप भरमाशिमा मरूपी होनेर भी वही परामको मामर्ष प्रशन करने १. भोर नबनोगे धमारत परगामी पराको प्रपी हानेरर भी काम से समापन सामने। (.)वलाप भौर भपमानिमार एान मबयारी। मोर उना समार परराए दर मी उनमें गतिवान परे मी पितिमापतारा भोर पतिशील पत प्रति मनिरासामपि पोनी भाता! (१)पमा सगर अपमासिार भोर पर भा मा से सीना मागायची, मा पग पगारी है। (v) धर्मानिसार भपमा राजा मागाना भम् भगासामे , एग रोने पर Tण स (UR-मापान एरा पगनरा गर। (१)एक नारा भी पर-ना नहीं माना ऐमी भनादिसति बारपमे मानना मार। (0) भाताप पारे । भारया भपरा परमाणु शरि मानन मूमदारापरतोपानु दारा पर मिान भामा सपा मारा। (6) भम्न मरेपाभरण! (१) ममूनता पारनामा यानी! ( ) पून पुगा भी अमूर्न गारा नयाग देना (११) भपक भार भागन पाकीसता भोर गुमम मिय मिस माटो भागमा भित्र निम मानना टी। -- सभामा प्रभामा 1 HIT और सिन मिनी गिर मा EIR मा पमा IT HAPTERS IN भR !मा Enrel Trममा भरपा - भरी पर प्रतापाग भाcिru-rrrt| मालपानमा सुनी-Mum ARTHTutam ANE IN HINDI भागनAARIनिभर- EmroPRE "गाGORuru -re AR TEN ATFORMe FACHI Mote(): Enrg UPEReinalrnment,17 mitr कामोंडा समापान (१)मते पते । मिना सन्मानासा साम! (11) ये मामा कार दी, संप्रेष विप स्पमापी वाचारित यो सताt! (१४)नियर नगरवासापन। (१५)मा मारिका प्रमो महमा पापमान-सम्मान, नन्ता भक्त निम्मनमनपान। (१५) न परपको प्रत में मा शविर परल । नगलमामा पुगेका पवा उसे मिली। (१.)तिर बातमै माममात्र ममर पे पनि सतपय म्याप माने ये माम्पो मानस-प्रमाण न नेपाल' (१०) गत एक मोर मारमा गुनी। इस सि पयो हुए मामाको सानो पमित्र किन मेरेखा मानना चाहने वाले माया मम किये गुणधबयते । (११)मनम-परिमापासुलबस परेमा। (1) मी मोकलाम मेरो परिव होता है? (११) पैम्पश्या, परिवाना साप, मोश-AR प्रभाव पर उमेरमो ना दाम्म सम्प्रबहाली। (११)मा मिनायममै थे मकान किया गया। भाषा सम्म मेमस पपवारोम। (१)मपम परिमान लिम, ग्रेप मारिका परिवामिड महमाय AR क्यपाते। (१४) माम मामा नपरेप। (१५) नमक पत्लिामिक मावये तस्य पर वा। (२५) मे चम्म मरेपी मौर म सम्पती , स्थादि वियेषगति प सम्पनीमा मोका समापान शर्मत पावसम, माम देवा गागी ना मामा ममम (१९.-48-) मना पालमपोका मात्र सम्पयन माविमा - मापन निकपुरमेलनमारमा मानिया बिपि।। जारिका सामेभावनिमम बात। मनन गर्म प्रमान माम मी ऐकाप्रमान पर मीन्यपरको मलाप भय मारे मना करने मोन मादम है। मोर मार माग्री परमेर परममा भाना ।पस पचि नाम परमापा मगर मास और - मै मानिसहरमा निर्माण मानस ऐवा समय रामको पाठ पर प्ररेण बौन चायनअन मालामानवालामा और पाल और मौरसमसलाले मात्र पारीमार बनेकमालाई | हममे नवापाराम। १५ २५911-1-1-511१४,५५,५८-५३,-१५५ राजा मोर सनका संक्षिप्त परिचय श मूर्विपूमनच समर्थन इस संप पर बात मरम्म प्यान रखने योग है कि यपि पनपा नवलशानन नम्मान न स्पानमानी सम्परागते एक दवा है, पर ये माँ उन सेताम्मर मूर्तिपूजक मौर दिगम्मर समावन सारिप रेसनेप्रेमिमता गपा, स्पा तो उनमें उत्तर उमरवाका मात्र आता गपा । उपारण म्मेि मारममै रामवन मूर्तिपूमके स्पिी थे, पर मापे पतकर ये प्रतिमाने मानने ओपे । बामनी इन प्रतिमापूनम पिचाय करप बहुत से लोग उनके विरोषी मी हो गये । पम्न उणे विधीची प्रता-ममममताका बिचार बिसे बिना ही जो ठने उचित भौर मार अंगव बान पाया घ, उती स्वीकार करना। रामचमूने इस संबमै मने निम्नरूपले AIR - मैं परिठे प्रतिमा नहीं मानता व मोर भर मानने कमा इसमे का पसावन काल महीं, परन्तु मुझे उसकी सिदि पदम , इसलिने मानता है। उसकी सिदिलोनेपर मी इसे न मानने पहिली मपन्या भी द नहीं यती, भोर ऐवा रोनेसे भायपकता मी नहीं पती । मोमव ममा उस मनी का मामला नहीं, परन्तु पगोपीत होने परम्पका है, मौर इसके लिये बोसन रो उन पनी मनसे इचना, उनसे करना ऐसी मेरी माम्पता भने महावीर परोपर पूर्ण विश्वात है। भवम रामचन्द्र भनेक प्रमाला प्रतिमा पूचनी मिल करने के पार, मयले मन्तिम अनुरोपमें मफ्नी स्पति त्या पखे हुए मिलते- कर इस मिसको मैने में पूर्व किया।गा प्रतिमासे । धर्म है ऐसा करने से मना प्रतिमापूजनकी सिदिके मि मैने इस मुकर्म कसम नही पाई । मतिमा-पूम्न के लिये मुझे ये बो भमान मपम पमेने उनप का रिसाहै। उसमें उचित मोर भक्ति देखने काम शाम- विपन र म्यापम पुस्पा मोर बारमै बो प्रामानिक मासूम हो सवाल पम्ना मौर तो मी उती वण प्रस्मन ना कर उनी मारमारे ऊपर भाषार रखता है। इस पुस्तकको में प्रसिद्ध नहीं कराया मोरिचित ममुप्पने एकसार मन्तिम्-पूना मरोच किया हो, र पदिपी मनुण सलम समर्थन करे वो इन्ले प्रकम पापा से बात मेर वा , भोर मा फराम कारण होता है। में समसवाक माप मी मेरे प्रति को समय पर ऐसी ही RAE मा गये। पर उस समय इस पुस्तक में प्रति वा वो भापका भवारण मक्कि पुरवा भार उके पुतानेका निमिव में ही सेवा इसमे भने ऐख नही किया समबतिमेरे बाद मे वापरपमें एक ऐसा विचार उत्पन्न दुमा किरे ने उन मामा मनमे मेण विचार भाते रंगे, वयले बिस ममानते इसे माना, पर मी एकदम प पगा, इससी सपतापूर्वक प्रxि भगास परमी काले । मबारको मैंने मान स्मिा । म उत्तम पर ही निर्मक ति विपारी मेरमा , उसे मेरा। महिमा मानो, इस मामले से या पुखक मनानेका परम नही है। पपठनपाले प्रतिमाको ममनने में बनवान हो नहीं बाळगा। दिगमर-शवाम्मरका समन्नप प्रवचनो रियम-पताम्बरा मी समन्वय विमा था। सननस्सन्म पाAR मर-पोवार भारि मताज परफ्ना पत्र । राग, रेप भौर मगन मा नारी मनमार्ग है। कमियर बनारणीसम्म पापम्प यो- पर पर भम्बर बिन मसे पर पर मन्दर चैन । मति-रियो पाना मवापसमुले म n --भत् प प नि पो मोर पापा न वे ६ परतु म्वरी मरियानो मधमा बीब ३० बायने नहीं समानता । शिलवे 'मिसे मतपत-रमारिव-गुमा पेशाम्त मादि वर्गमीच पम्पास बावा हेप माम्मान प्रबर दोषा हो हीनमा । नपर्मन माधव-रियमर तक सेनाम्म भाव मनमायणन भाए-मार मामास स्नान धर्म प्रारना 'नगमर भौर सेवाम नमसे कोई भी नहीं भेद या मसीहै। उनमें श्री ऐवा मे नही हो पर प्रकार के नियमसमताम्मल भादि देश का भौर अपियरे असेही उपकार कब है। पम मा बस पर बम सब मनुमसि समय रिगम्म इपिले गते हुए पारिषभ नाह मा नरी इसनिये गातीया उपोप सा दुमा म पूर्ण चार पिसे भाप भरना पवाया था। वम इस टय सभामा TARAगमा चिका एनिमेष करोगा-मूर्भ मारे प्रवास चारित्रम पिया करना भी पाप नहीं, इस मार से मारकरनालामा मा। गणपनीमा नाम नव प्रमाण, गुनपान अनुयोग विधि भाविकी पर्या परमार मेयवाई है। परन्तु पग माग नब माविकी पर्चा त हुप, नर भारिम है। यह तो सन्द अपच मनव नर रवाने नि एक मारमादि मम मारिता परमा बम विदोही होता है नही पोला नम पारिका शान रोटा भRAR मारनेम स्थान है। भएर पास्तपम मर प्रमान मारिने पानी समाना पारिय, वो फेमस एक वेदान्त मादि दर्जनों अभ्यास पण पिन नियमांक if न या परन्तु उनि गोयबा मगर विचार महिला सक्त्व पात्र गम्मलवक, रामीण विकास मेरमार प्रताप माल पेठ मार मौन मनन-लरिम्न मियामा पीप बन पाता रामनगर, सास, पतमा म्याय ऐयिक रामानुबनिमीका सामान्य परिस पानसमुपब भी मेन पुष्प पितु उनका देव पनि सम्पत पूत जडाइना नही मेरस नी भोर रामन मयुर भणम यात समावि मीर और पतले मधिरिलाय मेगात मी माने तुम्ना भी। नमो राती तुम्ना दुप- पौर निसिार इन ऐनीमे मन मस्ते भर। बत मासे विकोपाल मपम उसले मित्र हो लम्प भा गया। १९४-४८-11-11-4८५-1 १बोनस 4th- किा भी मारगमनमा मदिई। दिमाग लगभनुम गाने पा भावमवात पारिए ए मारनी। --मात्मवारपार मक्यवसामेवर निम्न १-१ 11५-५५.५८५-१९७१ -२१५-१४ ४ मा पर्म न माद मावस । बौरी र मेला हुए पालाने मामिक र एमालेको मिव नियबिमानमा वस्तुवा एवं पनि एमपरी भानुपर मारमा निशाना, परन्तु मनमो AL पी ले। पता ही वा एक मानव-नो ५१८ म मनुषा- और ५५. 11 ५१-09: ५९५-११-१५ १४-१९८५ 1-411-11९५०,५५८-५५४-१५ । .
रामधन मोर मा सक्षिप्त परिचय समवसर पारे मी बहुतते बोध एक प्रम माम्पतास्म सिद्धांत हो पाता है। गत संगते तपा यम मोर उपचमा विशेयस्मसे सने पापात् मियांतका विचार करना चारिसे । गरि ऐसा न मिा बार तो सीप पूरे गम माल रोम राय मौर उपशमते हीन होता है। एक 'मम्मक विपार फ्रनेमें बाबा मही मया भनेर मामा के विचार करने में पापा नी । तुम तथा रेलवी मुमुसुको मात्र भने लस्सका अनना ही मुम कम्म । मौर उसके बनने के घम, संवोप, चार मोर संग ने अपन। सन स्वपन सिदो बनेपर मौर राम्म उपचमके परिणामी दिनेफर ही मारमा एक है, ममा 'मारमा मनेका इस्पारि मेरा विचार करना पोय है। मैनपर्मक बाग्रहसे मोक्ष नहीं इस्ले स मम होता किम पीरे धीरे रामचन्द्रकामापारिक मापासेहरकर मास्म. शानी भोर पावापयामीदिम परवानगीने म्माममा यम्म भौर उपममफे परमभूव योगवाहित भारिपरि बावन मनन करनेका ममुरोप किया है। सास गित देते हैं. हम रायके पोका मसकन करने पिते बरप्ती होने से नहीं करते बान पोका मागे मन करने कि बन ने मिस नहीं करते । किन्तु येशन्त मौर मिनागम हारे भगोकन करनेका उदेश एक मात्र शान-ग्रामि है। हमें न मार राती मारिके मेरका स्वाग को । मात्मा पेसा नहीं तिम मत मारमा राम्म उपचम पहले नहीं माने तक मन मेराज माविक उपरिचा विच समापन होने पर उसी पम्ता रीठी है भार उन विचारोका निर्मक नहीं होता तच मिथित रोकर बारमै सपास्मते देयम्म उपसमको धारण महा दर तवा इतना ही नहीं इस समय रामचम् सहाय मारि मैन शामो मो पर्मदा किन पानेका निषेध करते।भार ये इन प्रमाके मी उखी मागने विशेषस्मते पठन करने से करीनिमें सत्पुम्यो परिव मचा मेसम्पमा मारिन वर्षन किया गया है और ये पाँवक किस ते 10 वित पुस्तक पेसम्म उपपम दो से सममिति पुस्तक है। बीरे धीरे रामचनीको मसा शेरम, प्रविम, बी, सरदात, मुच्यनम, पीप वागानन्द, भानरफ्न, बनारसीरास भारि करियाणी पापीन रसस्वादन करनेमिय मौर इससे उनम मपप्परपमाप-मममाव-नाना पा गया कि सोने वहाँ तक विसरिया-में पिची महमें मही परम्त मात्माम ।। तपा नधक मामासेही मोपत माम्पवा भरमा गाव समरते सब पाने बाननेका किसान मानन योगका भार मकिता प्रमोग्न निगतस्मकी प्राप्ति करना ही । चाहे रित मार्गत भोर पाहे मिशन पसाब रोता हो वो र मतमतांतरकी किसी भवाली पोषकरना बोम्म नहीं। मतमेर रसम किसीने मोजमही पापा' इसलिये ति मनुमसे चिरन भौर शान मारमात प्राप्त रोपही मनुध पोरन भार पही हान बोपरि है।" प्रते सम्पर अपना एक महात्म्यांका का एक' है। पाणी मारय होनेसे या सिधी मेरी समझाया या किसे उनके काम १० मेर परम वा - मम पुत। । १२९१-१९९-२५ ५४११-20४-२. ४ परचमनीने पप, मात्सम्म सुपर RS मपण, मनार पामलि, रिम्न भारिख यीस्प भनेक धमाका मा पर प्रयोग किया है, इससे त्या मान्म वा पापाने इस पारिसका लप मनन वा ५४४-१६-११ ६१.-१५१-१४ .m-१५-११ २६ सब पोका मूस पात्मभम - मत्सम उसमें मम नहीं ! बता क्सन मतमामा, पनवक साम मात्र म ऐया । कोई न मावा दो, मोर मतले प्रत हो पर भरिवार --मदी सिकारी है। बैना और विमर, रिंगमर बार कोई में है। पातु मामाचीव माय ममता मावलीको पयोमा प्रमान का रोगा, हमारे विचारों यम्मीने बगामा करना। सर पोका सम बात्मपर्म इस समय पमनमोका हमात्मपर्म क्या है, मोर सका। म मत र मेनो एक । एक ना मुम्मा माया मानो । हवलम्म र भामा सम्पनी विदिरेबर्म देश मन। -- मपम चे मित्र मिा मत पाई। मामा मेर मात्र नको पूमे एक पल पची, मोर यावत मामय है।मएकबो निम्म Rat, पी धर्म अपरेन । विपी परकामा करते थे "विचार दिन येराचीन मर्थन मिल रहना चाहिये मोर पेची समान राना पारिस । एपार रामकीन परमत मौर नम्वना खएर मन करे-वलम्व मने देर रमत पई भमारी मानी। नर और वो भने मम्मे को भरना न- मर्मत मन मतमोर येर रमत है हम्बरी जी तोपरम्त मौर पेपमतम्रत करे तो वा नम्व है। स्मो मोमेसा मे माम मी रोगा। हनी माणल तयनाचा कारण पमपमने किसान रिसर मामा पाकि पनीनो भवर मर्यसमा पनि अर्थ मत प्राप्त प्रनेमें-मेख मात करनेमें- नीचा मान तपमान मोर वनों मी मन नहीं हो सनिमाय- मरते मनापरबासी पायाने प्राम- पिपरिय भारोममेगानाम। परम्मानमेवी नीम्॥ -अर्याप्रति के निरोपच मोर नाच नाना पटो। म समीरली सिते परिम्मपचिमान माम मेसि-पनाले। ईवरमाकि सोपरिमार्ग परत पिपानमें रस्म पोपी पाणी पाँतिमी सबली पारे ले मागेको । म रु समय पोलम - १ रहने मोदी को मनचार ARMt कालो खोपणे जमा न पुनर्ग। पारणेपारो माटमा परमा मि॥ --अर्थात् पौरपना का मामीने नवम प्रमाण मय पीने को भाममा कोर पापान मा की भी रामी मारमा एमाले र माचो मानते। चार पाम बन गबुम सब प्रमेय एम पाम नमी Pारनेमे मरन ये मायम Aणेवणे मोना नसत अभिमोरामा को कौर । गाडमे पम् मेरम! ht पसचम्म और उनका संक्षिप्त परिचप १० 'पीनयुष मनुभा' माद पनौन मगर समा ठोस पते परपर विपात रबनेको एक मुहायक मार्ग' समझते है, सपा हरिबर्णन' मि मस्त मातुरवा प्रफर करते है। अपने भापको परिक किये एमन र देते है भौर यातक सि गते । तक रोपा न हामी सवक हमसे 50 मी न ऐ मा । एक तुम तो फोलेकी मी वा हममे मही ।' इस पामे ईपरमत्तिने योपरिमार्ग बताते हुए पन्द्रीने पे मफ्नी परम जासबुद्ध दणका वर्णन किया है उसे उनकि मि मुनियो-" भाग प्रम्मत रजनरेसका कोई मामुन मनुग्रह प्रकापित भा है। माव पशुव रिनते रमित परमात किसी मनुफ्मम्मसे उरित है। श्रीमप्रगतम एक माह गोरियों मावान् वासुदेव (समान) को पहीकी मरी में रखकर बने पिप निकाह प्रसंग माग गुव पारमाया है। गौ ममत मयादित होता है वही तासरहकमा मौर वही यारी मरी है, मोर को मारिपुष उसमें नियमान ही यहाँ मगवान् वासुदेव । पुरुपी विविल्मी गोरीको सत प्राति होनेपर पर गोपी उत्तम भाकर पूरी पिनी मुमुसु माहमावि प्रती किई माया गे हारे कोई मापन मे -मर्मर पर चिकाटी है कि हमें मारिएपकी प्राप्ति हो गई है और बल पर एक ही मात करने पोम, दूल्य इ० मी प्राप्त करने के योग्य नहीं। इससिमे तुम इसे मात करो। उत्सम या फिर सिर परती बादी है कि तुम उस पुपरपुरुषाने प्रात ये मोर नदि उव प्राति म मम मेमसे करते हो तो हम तुम इस भारिपुस्पको दे। हम इसे मरीम रखकर बेचने निक, प्रेम प्राइक रेसर देता है। कोई माह बनो, मचा प्रेमठे कोई प्राहक बनो, तो हम वासुदेवकी प्राति फरा।। मरामे रखकर चने निकनेम ह मामय पर कि हमें मसर कम बासुदेव मपमान मिट गये।सीमा नाम मात्र ही है। मरि समस्त सलो मपर मक्खन निम्तो या एक अमृतम्पी बासुरेख मपवान् नि। इस पाच नराम स्म सम्म नौ ।पितु उसको पनाकर म्पतीने ठते इस पते पर्णन किया है और उसके दाय मफ्नी बव मलिका परिचय दिया है। इस काका मार लम्स्व भाममनका मार भएर बस इस एपओ ही प्रात करने गरेप मा पहा, मोर पा (में) गुरु तमग पाले तममम मा गरा। भार बहुत ही पाप स्मरणम है। यदि सासार मनुमपकी प्राप्ति मौर इस परम मामी रा परम भद्ध है। पेती वा बीच उम्मच हुए बिना न येग्ने। सवा पासुरेष हरि मान तार छ समय लिये भन्तान भी हो मनेगा सापार इसमे हम मनम्ता बारते है, भौर मापन पगात मी मध्यणा सारण मी यह हमें विसप प्रिय है। माँ सत्तमम्मी है भौर विष्ट स्पनमै नियत है।हरिनयमपूर्वक भूमने करने ११५-१४५-२४ ५ फ्पमटिन पन रणतयने इसक्य किया है- मात्र मनु नि हुने नबनु मिनु स्म महार । रमा मनु उबरे मय पर पिस्वर । माल बरन बिनु दस्त नु दास पयो । मप विना मिलम पहुत भातर पनि । बिनु त म बाँसम्म सम्मान मे मिमि परमातमण मावमा परामक रो॥ नानपुर-५" दरपती रत रान निम प्रभा पा है- प्रेम परमेवरती व मपग्रेसियये पर बाप। नौ उनमचा मितही व नेरू यौन समप। स्थान पर रोम बोग नीर महरित बारा। मुर पौन र मया मिलि प्रदिपोस्त पी नाम || -कान-१९ १८ अगदका ममिष्ठान हरि प्रति ली है। इस साल मपपिर नहीं पातु मेम प्रनय महा मा पा समय, मोरयामा । मनेर भनेक प्रसस्त म्नन करने में भी सनिस्वयमा मल पोगर मार्ग और पा ऐसी मानुपम पदिसेन्स परवा समीप पारदीप तोमरकामा म मोबसी। नगका ममियान परि पमा परी मही गये। ये बरखाको नदी र भोर नन महार उपारनेर में adtAT बयत्न गई महिान मत् मिस मगर AAबर से भौर मितमाम पर भारत होना चाहिये। पापा पानात न पारनेर तो हम रफो सम्पूर्ण शान हो बाकावे प्रतिम पर बते । नामे मतमी दूरी होनी मारे । कार A इस भगतका अधिन का नया भर पान भनेक माला-पाच भाषा में प्राविम फारम भा है। वापि कार हम अपने भमियारो भOR AIR खेदो ऐसा माता सगरेको मात्मा गानो रोनी चाहिये । पात परिसर बात करता न किया और मेव में मेव मानते भादिम पर गरे।पोहोपण सम्म भरता र माय बनने गावाबारे प्रविण दोना पुम्मा लिएको पानपरनामा पोरम भी पुराना-पर मरो। उसी क्य नरकी नापिने-'मपिणन विनिम्म कामपामासा-पिप सम्म मही स्वामा हमारी बात मम्मच मामी। मरेप व हमे पारंवार AAVR करवा किसान इस माम मरिमा मन हल्का भव! उस भाषिनमान नहीं भा ऐम । मच्या नपिणन मनी अवमा किती गेसे पाषा रेप मरा नमस्ते परपाले समय म मानवे मामानविषाचन मगरा होगापा पर दुमा समापन पर इस महान् पुरुस मानव ठसे ममता से उसके पूर्व प्रपो समस इस परम माद, मौर उसे हम समसमापन तो उनम पना दुमा बा परत भनि परम्पले मी मममममममका कोई अपिलन ऐना चाहिने-ऐन पाक्से महासमांकन भर हम सीमtमान-मौरपति र मापार १RAणमेचारते। पौगोषणेम गये। मेरो ममता ११-२५१-17 चने ममस्प्रेमिए मोगा मhि- पनि दम लाम ठेवाय । अपच्या सभेन श्री प्राराका ११-१ निनी पोट दो मे सीम्ये सर्वसन होम एम वा प्रतिमा पार प. सामोरं एमी गए, पारवये प्रथम सामने तुमने म मा मातीमो-विपन बापापनि फल प्रान कई बार बम बमय अम्यिाप्रमाने पर दो एसमोषोपनीमाया ऐप पेण मनुसन्मने मामले भने मेरो मा एएम्मी समातिमा पमा मे जोसमा कपमा नर्गसंषमा मर्मसापानी गानमाम्मे प्रानी को पसले पाल- मन-ए मम मब नी कमी ई-भगिन नौ प्रविम समालसम्म दमने पही राजवम् मीर समय सक्षिप्त परिषय भारमविकासकी उप दशा एम्पनी र तमर मपाइ नापी बेरना का मनुमप करते । महानगुनकारन '- प्रमसमापि में लीन हो गते पुरु गोत्र पम्पासर सने बचनरूप हो उठवा स्पामाइ गुमत्तान माविकी सिर शुमा देनेवाम पाओसे उनका रिच पिरत रोगा। मौर तो मौर में अपना निबम्न मान भूगोठवे ने माना मिपानामधारी निमिचमात्र मन्प करण, समलम भारिपरि ठोस करते है मौर कमी तो गमतम भाकर भपने भापको ही नम- सारे करते है।माम पामे रामस्न इन्ने उन्मत हो बलिये सर्वगुरासम्म मावान्तम्मे मी रोयै निकाये । भौर तीन बननेको सम्मान पानी, भार मोस प्राप्त करनेवपीरका निर एमावर मादि वीके शोमै पत्रचन्द्रकी या माप या प्रलेसे कभी नहीं बानी भोर भिलनेते मिली नहीं पाती। उनके पिचरण एकदम निर्णय होती है। इस मामकरण 'उने तर मप्म पता भार 7 मी मपम नहीं माता। उमें किसी मी कामकी स्मवि सपा बार नहीं रहती किसी ममम ममोचित उपयोग नी राय, महातक कि उ मफ्ने उनकी भी मुष पुष नीयवा और स्पारने इसी रणका परिरस पीपायनियन अब बुमार । ममता मत मरे मारी वनकी जर "पार वर्णन किया है। गम्यम्मी मारणा पाउनदीपमाम सुनिये:-- एक पुराण-पुण्य भार पुरात्र-युप प्रेम संपति मना हमें कुछ भी कहा नहीं गया। में R मी पराम मिल भी बच नहीं पीछा मी प्राप्त करनेगी या नह0ती, पगार से पस्यो इसम भी मान नहीं, स्मात् ति स्विधिम है इसकी मी स्मृति नहीं पती, पशु-मित्रमें भी मेरमात्र नहीं पा कौन शत्रु भौर पौन मिन। इसकी मी खबर रस्सी नहीं जाती हमला पामार का माया मारखे विष मुरित पान प्रवे। मैं क्या करना बालसीकी मी मा ममी बात स्पस प्रम्बने देखाये दायरेषना सपा ममने पारगर व या कोई खेमने भपियन पर भा बक्त् पाठे-कम वेने भभिकान में पान मी दोष ! मपया 'मनिम्न'नहाय रोष-भपका कोई उणे पुपाम् । मपना कपनमो परपये नहीं तममा 'मपिन' रिपन सय पाम्मु ! मा विचार पपा मे बोके वीर्षकरने अमे मोरा पुस्प मानाय मेरा ने ममस्कार करीए ए, सेना भपूर्व गुम उस ममा परम माधि । मने वेपी भमे पारीए, डीए भपियन दोमन सरे-१ मेप्रेम परफ्यए मार्मनी भूमीप ये नाणु । बमवर्नु कोई अपियन रोई बोहए-एम पना बय मारमानानुन, भने ममे पत्र एमसीए और भविष्ठान ऐ-मने से मरिष्ठान हरी भगवान्हे- पीपरपरेशन बगरए टीप सीपरेकने मारे खवयमा लामो मारे तेने ममता, पर पाक १९१प्रीम है। इस पर या माय श्रीमद् यानक मत प्रापित तिमी संसारच ना पन। पर मुझे एक समन मुमुमुद पाते प्रत हुमा है- ने ये देखा उनका एव भामा।० पासे पापमय रिचय बहुत स्प होगा। १ नो ५६-११४-२१७९३-१९ -१३ + मानन्दनम्न मी मने मारतो भानन्दमनमीठी (14-1) में एक बगा नमत्तार किया- भगोबरोई मुम्ने नमो दुम नमो बुमरे। ममित न म एवारमीनी भैर मरे। १४-११५-१६ सो १५१-११५-१८-११-४-१४ मात्मविकासपीय पधा 1 समहमें माना महा। हम सभी पास उपलो बाते बाहेर प्रतिनियम में नियम नी रमवा मेमसका कोई मी प्रसय नर्स हमने अपने मुसमगम का भी माना नहीं हमारे सव ऐसे योन मिनेसे सेव या मता है पपि ममपूर है इसम्मेि पतिकी म नहीं परमार मनुमा त्रिदुए सिम स्मृतिम नबने करव-मपम चाहे रहे परेका को- एम सभी अपनी यो बानी इमारे ही योगी सापिकी बाती मित्र कममा परेको बते है। इस प्रायः एक सा हो गया। हादसों एमम्मोही तिमीस-प्रमान सरणम्-मेर पार मी माते मी पाँचनेमे पिच नसी वा मानेकी ने उनेकी सोने और मम्मी लियोन भनी भपनी रफानुपार वाम भने सानिया नहीं इसका भी सोच मान नहीं पा । इस प्रकार व पते चित्र सरासीमा बानेसे पारे ती प्राति से बात की। एक प्रकारले पूर्व पागवन है। एक मस्ते उस सामानको समान रमते, भौर विनी समाम उसे सिप रखते है मीनि। पोयम्सले प्राधिोपी भिमा भगोम्परम इस दिवस न रमला। मावि पुसमै एक महा मेमो माय रे मोर भारि मा- बोगी में भाषामनायो मना न होनस मोपना उपवनता नहीं भाई एण मानते । म प्रेममा प्रमाद ये न प्रबार या प्रसारित ऐना चाहिये। पर या प्रमारित नहीं 0 सा ऐण म रपे ऐसा करनेसे एमसर नसेका प्रबार प्रसारित होगा पता निस्वारे समाते है। फत उसे परममा कारपभूत हो गया है। मौरन नपरोष हमपर है पचारपर, हम ये गैर निश्चय महीय बसम्वा । इस्नी भक्ति मीनता रोनेपर मी पारोमितेपोनिमातेकपा मणि सा नहीं की हमारी रामऔर उन्य कारण ही लवकरको प्रबरराम मी म्पनी र मिनेवाम माँ पापाव सममे मापी समस मी मौसममि मै बन्न लालाम। इसमय पर अधि हार है RR R नाम पर Aण नि R। और मि भी हम इस मश्रा भरपारम पर है। या सिकारमा कारब के मान सेवा है कि यमपम् एक पधि हुए 4 ( Mysio ) । ननि जीर, नम, मानारम बारि वाक्य त अवामानस्पोवर नदी या धाका ननुभव RAINभ उपमा मिसिगान बौर परचमके बनेकौर रिचारपनि पामासान।सामवियनमनमे इस यात्रामा प्रकाले वर्णन या- Thore is no feeling of I wol get the mind worla, desiredom fro from rentherineu objectles, bodilen. Then the truth hloe in ita fall odulgence and so koor oamelot for Samadbi lice potential in tu allfor what ro truly are free immortal cunnipotent, loored from the finite Add it coats of good andaril altogether and identical with the Atmos or Uptrernal Bol-भर्ना उत राम नामकालिमार पी ए पात मन वापरत दोष, पति पम्प, मोमबत ऐ मोर भारत होकर प्रम करता है। समय नमे सेमराममनोपो और सबमे मारतो मानमनिटापराम २१-१५४-पाप- हरिमपम, सनी बारे मलय। बानियेतोपोनमी मेनेरे॥ चमारले गम्ममा रमेलापानापचिर मेग ५ प्रमचन्द्र मौर उनका ससिप्त परिचय 1 मम्पचरमसे मोर पती मोहिम पारसमे स्वान, भमर है, सर्वधाठिमान है, परिमितसे पुप त् मोर ममत्के मेदते पर है क्या भारमा मौर परमात्माते मामित्र है। ईसाई, मुसम्मान मादिमी पापकारोंने इस बा मिम मिम ममें वर्णन किया है। निता रामचन्द्र मरमविकासकी रण रणाको पहुँचे हुए थे; मौर बान पड़वा है इसी बपको उन्होंने प्रयतमश्विनामते उत्तेलसिा है। मिते है भोपनीस ने मुख्यालीसे सममित पर प्रकारे । मुव मनुभव सक्ती रण निमस्तस्म मपभास् रे। इस फ्यम उगाने संवत् १९. मैं, अपनी २४ वर्षकी भरकम भुत-भनुमय, पाती राणा, मौर निमस्वम्म मार होनेका सा उसे किया। । राजचन्द्रजीका लेखसंग्रह भीमद् फारमने मस्ने २५ पर्व से बीवनमै बहुत कुछ पाँच भौर पहुत ही इस मिला। बपि स्वयमा तो पत्रौ माविका पात संपर भीम राम' नामक प्रथम मा गया है। परन्तुमरीमा बता देना भावस्पक मम्म रामचनी पो मादिका गुवन माप और भी मौर भौर इस मग माग तो ऐसा है जिसे यमकनगी विचार मंचमै बाक्सी भई पार प्रत्रय पाता और सभी मावठी गुत्पिपा सुम्पाता है। रामबाबाको जमान्य तमा तीन बिमामाम मम मया व्यकता है। मपम मागमे रामपद्रवीर पिविष पोप प्रा माता "नि यसकमीने मिा मिल मबसगार मुमुमत्रिी सशानकी सिाग शान्त करने के लिये किया पा। इन पर्मिसे इस पोसे खास बात पत्र पहिसे उपव दिने या बुरे हैं। रामचन्नाचे पसि- सातार जिसमें गोपीने पमपन्द्रबीते सचाइस प्रभान पर मांगा गोपीगीको बात सविमी श्री मे ये रिनुपम स्विर यो पे पह बात मावते गेग मानते है। रामचन्नम्मे लोका रूप माग निमसपी है। इन पो पानेसे मालूम होता है कि रामा मना मत मारमनिरसन (Sak unalysu) करने में कितने सवई यो मे। ही वो उनका भरमनिरपल इतना रस भौर सूक्ष्म ऐवा उस पाने सामानोगौने उनके पिम मम होनेकी संभावना थी। इसी कारण एबमामी भफ्ना भतार सोबर रखनेके सि कोई गेम्प स्का नहीं मिकता बार बात करने रामचनीने इन पत्रौ भने महान् उपकारक परम निमाची मोडत सौमसमाईको दी मिला था। इस प्रकारमा बहिस मफ्नी मायोम एव ही कम है। इसमें दोनों के समस्त पत्र मत्व उपयोगी मौर राज्यको समझनेबिज पायका काम करते है। मनेक पर पम- कमानी मफ्नी निम्की रणाम पम भी वर्णन किया है। इस भावरित इस पिम पमपाकी थे प्राइवर गवरी (मौषपापी)-पिबमरी प्यावहारिक प्रमकाबले भपकाय मिमी जिसने बेठ गावे - मरमपूर्ण है। राजपनीको ये समय समवर नाना आपकी मवेकाननभायपोगान १८९५ २ रे ममेरिना प्रधि मनोमेशानिक विधियम भम्की The Varieties of Rdigious Experiences नामक पुस्तकमे Mystidam मामक प्रकरणाचा मरितपुरका Coomto Consciotunen 14 १० मागते रो मयपूर्व फौके भए पहिले उमत किये या बुराइन फ्ध छ माग मु यो मुधोपस पानेको मिण। एक परम एस या प्रय मुरीम यम्मम्मीने मस्ती नवतमानपी मामेबनान मवाद लिला है। मुझे इस पत्र परमणगीन मिनु समानेमें पुत मदर मिली है। इसके से गड मुनमुमो में पान मा ।
१२ सेखसंग्रह पर रति सती गेमम्मी गरीमें मोर बरपरि पानाती तय उनमें प्राइवर गमी मी मपूर्व मिमी ओपन मी यानी लोगवीय माम उनमौला मनवा मनुप्रमा और विपनाम रम। मासिक पना श्रीनीतिबोप बम भम पानी परे रमनाभौमे प्रपा रानी बीमार पपात्मक और पा १९४ में प्रकाशित भा है ।गापमान इस पनि मोम बनाने पर लिया। मम होगी गरम परो भागोंप्रेरित नी। रिके मुतपुर्ण वर मावि भाषारया AH परिणाम पचापमापार व पारो माय गमानी पनिता पाये। मामि को बा पनि रहेने मेलि म्पनी । पापाने ती प्रत्यापना मोती। उनम कि उस को पुग्न चार बोपमा उनका निराकरण किया है।वाभियोग्रेनुपातमी पाम्पबम विराम मारवाभा परेनेप्रोस भनुयेष इस पुस्ताको परमारने का माम कि प्रथम या लिप्मा परमपुर से मवाली पुलिस, सम्पब न सोमबार रातो मगम मम मनसिमर माम्पिको मानम सुवा, पान नीति ल, पशुस भाषा व बोरे मागमें गुमसती मोर सपा इस वप पर गया। परमपूपचपम्पमाया । नीबोष मम्मे A बिहाम्नमें पम्ने माग मा एक नीतिकोका पुमा नाम पार करना है। मातून पाय मनोई नयी निी परिरे । पुती एकी बार मनन कर गये ममे । इस पुपर पर्षय पानी । पाणीपुरकोषमतपती । पाने पानसम्पाप गुना पुनम स्मरल रणनेको खालम माती काय गो निम्न मस्ते - निरमा फदिम मनमा () हिनी र APUन (५.). मरिमाम(३१५/0कामे अधिक समय न पाई (१९) भावी वाप सनपा (१५) प्रेये सिपाई (५३) कर्म मा मेन (१५) पुधको सोम (५४५) मतममा (५) मायले पूर्वका नौ रमा पुष्पमा परमा मे एक मार ने उस पर चलने वाम समय नेक यि एकमा पनाम गुममधरनासम पम श्रीमत, पाकुर पर्व मन, प्रताप मारमा परेको नि पोम पल कम बारमै ने मार किपमा मान्य उपचार पाकर सामान का विवे- प्रकाशित भाहो के मारे प्रताउने मामा- मायरेको महाँ म । मैंने मन भी एमपी ममतमतसिओना महे। . कुम्मा वाम् फेश मानी जमपायमलने नमसण्यापमा मानव समस्पन बमनुस्मनोमन एमसिएम मोर पंचनाम्दी एकमम मममही।
रामबन मौर उनका संक्षिप्त परिचप मिस स्थिति मोमता पिस प्रमाणसे मागामी महती सावत् यौ नी बन सस्ता ! मिसकी एम करता है मामा नी मिसदार विविभित्रामा प्रयोगन है।) मूम्बल पी भी मर नहीं मान में मेरी, पा मानष्प मापन समझ पवित्र धर्ममें प्रसन करना (१४) किसी मी धर्म मानवा ऐ उसका मुझे पक्षपात नहीं। माष कानेका तात्पर्य यह है कि मित या संगर-ममा नाए हो उस मछि उत बम भौर उस उपचारको बन करना (१५) मीप सपा माल हो वो नैपोमिन बोनापाको ऐनो स्पिदिवे स्मरण र (३२) किमी मेरी मौर साम्पससम्म गाको मेयर, वो मुजम्मते मिगी सम्पी मासूम होगी । (५१) पग्यमानीकी पाची रचना मोसमानामा पात प्रखिए। बामपुरकोको मरिमेकी विषा प्रात पर भारमरिसीसे मारोते देख मौसम रिपत रहने 'पत्यम्मीने मोबमाम नागमोष नामक प्रपम भागकी रचना की है। अब उसके विषय गमन सि - " मानकी पुस्तककी पय बह पुस्तक पठन पानी नहीं परन्तु मनन करनेकी है। इससे इस मा मौर परमा एनाम तुमाय स्विमा । बेनमार्गको समझाने इसमें प्रयास किया है। इम मिनाक मापस ३० मी न्यूनाधिक नहीं मिले विराममार्गपर भाषामा परि से उसका सम्म समसमें पाये, उसके पीरसागमे रोपण हो इस हेतुस उसकी बाममोपम्प योजना की म सिनेस र मापस गारा एक मी माविक पचन रखनेका मफन नहीं किया । असा भनुमबमें मापा भौर कामेर देला सही मध्यरक्ताद यह पुस्तक मिली है। मोसमाममै अनधर्मक सिडानमा भौर मान मेवे, पाठौम रोष वर्णन किया गया है। भौर को भावकी बार वो माराबरकने सोम वर्ष मानेकी भवस्पाम इस तीन दिनमा बा। प्रेपो रपरको सम्पपता मी हि पार विमागोम विमक किया बसमता:- कामा नर्मविषयमित सर्वमान्यभिदात मौर काममाय । मोल्मामधाम एव रोचक मौर मे । पीप पेकपा में बात करके उत्तरापन भारि नप उमा बायोको मनुकरण कर ली गई है परन्तु कपाकिससे पता है कि मानो ये का मौकमोसमामी मनापी मुनि कति मुनि मिलायमसर के रियम विचार मारि कप सम्पर नकदी पर मोर ये सब इनी मार्य भौर परपरस्थान चिनी र मी पो उतनी ही पर नो भोर भतरकर मातम च।हम तो समझते कि मोसमामधी पारगमक कम मारतीय कपा-साविकी उनलीम बम रक्सीबातम्ची है। मेवामागसरे विभागमै सामायिक प्रदिवमन, खनिमोन प्रतापपान, पेपरपा नमस्कार मन पर्मान नपान स्मरकस भारि वर्मक मुस्प मुका प्राथमिक मिताभ भून ली सरस भौर मार सिंचन या मपा है। उशाप मे गरिमोसन विस्यम भिमा- पापमोम्नमा पुरन मारि मोम मी नमाम्य मापारके मिसाय पिला। मिमी उनम परपराको सीने पर परिमोग्न इस गया है। सरके मर रोपकार कम है। पूरे मस्से हरित ठे त कारण यातनाम समान मार होने से महित बाबा मायेपन मरण है । ऐला गरमे रपय नाकामी मदत ( भावमाम २०) ।ग प्रजिमय भारिको उखा मर्थ समते बिना उस्मरमागो विषम पचन लिन - मिनके मारे पास प्रत । ऐसे पुम पुर सिम् । परम्तु गिने यो बमनार मोड भौर विवेकपूर्व विधार पर यातना शान संगम किया हो ऐसे पुरुष मिने पुम। तत्व पर माना कोई मेरी पास नहीं पा एम समाप उगाच बानो मानth १पयमाने मोडमामको प्रगबोध विवक्म मोर प्रशोधन तीन मागौम बिजनेश रिचार विभागामापागोष मोलमासके, पतके दो मामौका नहीं सके। महारराव मोघमासीरामनामान वा सके। यह प्रस्तुत कम ८५४()-... Rotti ५ V मोसमासा । । म सक्न भाले र पवित्र बना टला,मने सामने सम्म उपान पर है। बिनाने उन्म मर्म पागा, उनको शाहले हुन मार खि भौर व महान् पाली ममि की है। पुख्य भिवग तुर बम और सवामिम्बीर इन मोको बस्ता रचना लिपामै समरि रिचार मौर निच प्रवचन मेरो समरि ने मपूर्वक निर्मन पचनामको पारन नही किया और असम मा विपार मीणा । पाप पापार करने में समर्षद-प्रमाली भागमभ्वात मी या विचार गमरमा परमही र भी पानी मग दो बाता। इसी व्यसने बना मत ठरवणो पानस्ति दो दो पात उपभोमी मानही वो पोतेषाम गम माम । तोकेको परिचय बार मोदी सिम पर होगी पल बने राम मनार पामगर" (मोघमात्य पाठ १५) पार चम्ने एक उपहासम्न मेरा मासिक व भीमा पमनासिव - 10 मारे परिवाने स्मात् मनादि से पाएकामको ठदामा होगा त पुपने ससा इसे F० मा पुन म नामा म्यानमार सिपमै समाना ऐमारिपारगे ने फरमेसर । पाममा मोर जगत् मनारि पो मने ऐजमा" ( मोवामान्य पाठ ९.)। • परमेवर भात् सक्ने भावस्पस्या ! परमेरपरने अपरभे रवा बेन पुल बनाने या कारवान पुत्र रमपर रिमोतको सिडिओ बनायामाग से बवानी। मारली रचा वारिस पनि स्था। उन्ले परिबनेकीरा देते सोम दुई। रन। भातो पासपोर प्रोगप्रेरणा को लिइसमें एक माचि रखनी इस पर अमलाम धमाजमावि या माना T ARRते भूप होम रोगी और न है। परन्तु ऐसी भाषमता पति यमनी नसकी स्ने भनेपानले उबारने मार पुस्प्रे म रिसोर एनिमें माम मौह पता? (मोचमा पार .)। मेवाताव्य मार्बमान बसि । सम पर्मा चमत्सर, मानपत्र, निष समान विनियम बरसाबममारोपन मा गरे। मनपरेपला- मनुहारकी नाप करते पान उते मनुपमहीमो परवले कोपरमरखे मनुन पाकिसके हाव पैर,भार होभन एक होठ र नौ उसे मनुनपाना पल्न हमें नहीं समझना चारिते। पति ऐवसमा पोर कररको मी मनुब मिना चाहिये। उल्न मतदय हार मारिल प्रश्न यिपि अपने गले मापसे मनामनुमना चाहिवामानामे मानवना समानता है पही मममम मममता (मोबसपा ४)ीएमर मराठीघ्र पाना- मेगा मेगम ऐमौतुकाम पर, मसनाने! भार व पपनपरी पानीपम परी ऐसी सहम ऐखा ऐती विकता ऐवं तुच्छ मौर ऐसा मान्बाम्न पो रिमी कमा समाना ! (मेतमाम पाठ ५१)। भिरबारे नियम:- मापक भीम लात मेमन पाटील मानिनोतुग मी माती, वामन पापिया बारिशमान और वारिस चावामिल पनोपन रेसका रासपा निभाता हैक मनुन निरणी नियमप्सिी निर्मम मोर नाप मी स्वामनमा मना मौतम है। पानी कम पैचवी । मनको बच्या पम्न एक सममम महती पोन्नम्नेबारे बोल्मा यमना पात में मति सामौर पमम न भनेपाम। महाभानाने शानमीणामो इसप्रेम रखननको" (मोबमम मा ५८)।
राजपत्र भौर उनका सक्षिप्त परिचय मोदमागका पौषा माम सम्ममाम है। इसमें सामाम्प पर्म मटिका उपरण बमपर्य समाम्म मनोरप तृषाकी विचित्रता ममस वत्तविचार, दिनेश्वरकी बागी मोर पूलम्पतिका मैयनके उपर मनहर, हरिगीत, मोरक मादि विष माम माठ क्विा है। भपने सामान मनोरपके विषयमें प्रमिलते है:- मोहिनीमाप विषम मधीन पई ना निरभु नपने पप्नारी। परमरम्म गणु परमात्र निर्मक वाला सोम समारी। धारणाच मने गनता परि, सात्तिक पसरूप विपारी। ए मुब नेम तराम चमक, निस्व मला सो माधये ॥१॥ ते विशयतन मन बिसषि शान पिक विचार पपाई। निस्प पीनपवसनो उत्तम दोष मनेक उमार। संपाम उमे नहीं मन्दर,मिनना पनो भरपार । राम्प ! सरा मुम एस मनोरप पार गए भपवर्म उतारं ॥२॥ सोप वर्षका गरीसी भरपाम कितनी उप मापनाये। मागे पम्फर तृप्पानी विषय मामक विधमै कपिने वापस्थाका विना मार्मिक चित्रा किया। वह पच पर रोषसी पी गठी गगनको रार बमो, कारी परिषे पटवा बाइयां। पतु सोम ने रेलवे मारीमन् देम समावी वेलरी सवाई गई। मकर यांनी र ग भंगरंग गो उठानी मात्र महामारी बाई मां । मरे ! पम्पबन एम मुबानी या पम, मनपी न वाप या ममता मई गई ॥२॥ -~-मर्थन मपर धरियों पड़ , गार विक गमे भी परेर पा गा रंगने मुनने मोर देखनेकी पठि पती पी बोर की पंछिपा सिर मर मपमा पिम गई। कमर रेसा हो गई माँस पूल गये शरीरका ग उस पया, उठने रेटनेशी चि गावी गी; भौर पम्ने जीनी पा गई। मरे पबफन इस तय मुचपस्वास हाप पोठे । परम्नु र मी मनठे पार ममता मी म। इसमें समर नही कि मोपमाम गारन्द्रीन एक भमर बना है। इससे उनकी मेरीती भारती विसरणति हेत्तनी मार्मिकवा, तकपटुवा मोर विसी प्रतिमा मामात मिला। नमन्तमा परेप करने यि पर एक मम पार। नवकिलास बात प्रामक समत निभरमै समावेश रोगवादमाममा पाहुन उपवागीणेपार न पाठयाममों मादिम लप्रपात मच्छा उपयोग हो सका है। मेवर ोग मी तो नर्मविषयक सवारण परिषय मातहते। १ इनमें मसापी निविदा अग माइम सती है। बस्न गा ममता मग मी पुरत पुरानो सिम | मम भंग गुम्बन नीपो र ममो पर प्रेस मेन मनन ऐयरटो साम मरसितारा राममान मात्र मारी गोरे माई पोयमबर।। बोक्न मा म्प सपोनिन भपो पुकारी की। जमाप ये वन मखबरी मनना पुरी पुग्यमी नारी । बातएप्पोदोमगर मप्पो भाई मना एवमा गये। रामन बालेरणीमा पाने म्पे ग्यु पुग्ने भरिप्पा मारी। पिरा-मनानीमानी र ११६, ८er मावनापौष एमममम भावनाबोध ।म्बनाकी रचना गायमानीने पत् १९४१ मममपी भवस्मेसिसमय मेहमानने वा उत्तरमा मात्र मकवाने मे मनायोषी रचना र पाप माफको उपारसम्म रिला पगा। मनायोपमै मनिप ममप एकस भापत्र मात्र संगर, मामा संवर, यि और रसम्म समानाका वन मिल गया है। प्रथम 0 उपेमासके बार, मथम रनमै प्रक्म पिटीम तृतीय, चतुर्व मैर पंचम चि मावि पाँच भानामौका मौर प्रसार सनम पाठ मम मम ममम मोरे रपम राम मन्ती पर मानाभाका विरेन । अपच दस मापनामात्र समन रस नाम समास रोगा। भावमामकी वरा म्यानागोषकी बप में मर्मत ऐपल मौर प्रमाणेसारकोपचार उपरेसका बार बताते हुए एक अपर एमपनये मt-न जलवामी संसार-मुमतीकताम्मा पोम्पापा उनके मयाब किन परिधाम । प्रत पास्मा , गौतम ब क भोर मन मोनने अपने प्राचनामे मार्मिक मोर साब पितये समरेपी उम्र यस नाममा माया - मसे मानियो नापी तमा मनव भार मपार । इस पर पीने पुम्पन्न उपयोग या उपपोम कये। मिरलमा माननाबोध राम्मरली एप हुदर रखना , मोर पाय मापनामारे सिवन मेवात उपयोगी है। गबीच मजा याबीने पुष्पमाबाबध ११ पचम पवनामृत मिता है।परम्मत म्हव बम-११-१९मरिणागत है। पवनामृत नो मामिलामा मन पराभस्टाt- माय पो बन हुनने मचा सनम बोरे पोका पारना प्रानकाय(१) बमै मानो मे भुषामना मनमानो (सी बार में उसने शाम पाना (११) बीच मा मोबसे हार हो पात ! RAR वाली इमे नग () गरि कना होगर तो में मेरी एम.-मत की परे, नित, मग ५ मा प्रेम करनेगा कर मामय मनुरुप की पुत्र अपनपत बालावत्या बोर मारमवत्त विपन (v ) मिनु पंख कमी मी होनेपानी मे मो शादी करवा (१) सहा. परई मी मत मप ममा (८)। ने गा इसी वर्ष परमायने भीवतत्वसंवधी विचार मौर जीवाजीवधिमति नामक ममत्वमीसने माममाम ऐवायम्मान प्रकला अस्पनपन समान भाषामा बारवे नौ मलमलम -१९९-१७ मोर 11-1-१९ मलव RT । बम रामचमाते प्रदिय ART पर एक निचला। म मागम, विपरफ्य, भमुखीर प्रमान इन पाच प्रमालो समापने विमानश्री मित्र गोमा। सपनामा भोर मन मम पिता मसुत प्रथम ८९- म भपूर्वक। बारमसिविशाल रामम मममम बने इसे नाम विता वा से रामलगने पर मोमग सामादि मुनका मन मनाते दिखने हिषमरिगारमेवार बन्यो पनि प्रम राम रामने बरे और भूमन्स पारित भार मा निर मरे। उस समयभीत भाममा उनले जाने एमपी और समस्या या मंगलममा सम्मेन रसोपे। बारपी परमपम वन बदाम्य भर मागमासमा मगर एक सय समयमारे। ।
राम मोर उनका संक्षिप्त परिचय जामति १४३ पपपी ४१ क्यों में प्रास्ताविक विरनके पमा शेष पपम 'मारमा पानिपानिकोपी बची है पर मोचो मोगरे, मोर मा उपाय न म पया 'सिन्द की गई है। प्रास्ताविक शिवेपनमै गारन्द्रयने नमानी, माग मतापी, मारमापी गुर, भगुर भाविका विषम सिा है यानी मौर कियारामपण पिसवे दुए एमालागी बामकियामा पख मतमेद न ।मनमा निषेपर्वाहमा माता र मोष पाना माले पानीमारिचे मोहावेधर्मा पानी मार ॥ --को मात्र सामकियाम रचे पवे पोनि मवरमें कोई मी मेद उरस्थ नहीं मा मोर येशनमार्गका निरेप से, समग कियाग काष मोर मोम का पनामार है-इस निमारको भो र बानी ही योग मा, भौर तमाम दहा मिली हुई नहीं, और मो मोह प्रमाबमे ही यता समापनमानीमा है। गुरु पचपम रामम् लते हैं- भारमसान समस्या निमे उस प्रयोग । मपूर्व पानी पाममा सद्गुरु मन मोप ।। --मामानम मिनat, मपति परमाबकी प्यास को गीत हो गये। सपा शत्रु मित्र, दर्प पो नमता, सार मारि मायके प्रति समता पती गा पूनम उम्पर हुए कोर रो पाली की रिचरण भारिपरि निकी बाली मानीसे प्रत्व मिभार, पनि वापरको मानते है उत्तम सागर । सयमात् पम्पकार गुस्-सिमान-सम्पबानस्म, परपरका कपन को प्रपम ही सिम मात्मक मामिल विषम पंवारे भोर करवा : न मारमा रेसनेम भाती है, न उम्म म माम पवाद भौर स्पर्ष मार भमुमाबले भी उसनशान नही दावा । परमात्मा मस्तु वीवो पर, मारिकी व्य उतघ्र शान मास एना अहिले १ मन उतर गुरुदत पणे रेल मतम मसते- भारमानी नमे मास्मा ते भार । एकानो करनार वे भवरख पा ममार ॥ -माम्य स्वयमात्माची कारकीरतु को सामनेवाम है, महीमात्मा-गायको मारमा पनती नही यह एक भीम माथ। भाग पर भारमा मित्काल त मस्त मुक्ति और उतने लापनमा विशेषन मला गया है। मामा वन विचार करणे तमप याकारीने चिरकालो बियम भनेक विकास उपकर उल्का बना है। तत्पमात् मोजे उपाय बप पिकावर to 'तारम भनेक मत मोर न मोगरेममय भौर एन मिमि म मोरे उपाय बताये रित मानिस भौर मस पसे माल सम्म है इस बात ममप रोमा अठिन है।मवएम मोपा उपप्रम १० नम गुप्ने नारम्विा पवार या मेरी मत मनमो मामा देम विषय | माया प्रचषकम रोहमा भास ।। पतिमी मेरनामो मार्गमा सारे महिए मरन कर -या मेरा मन मे मुझे इसी मम लगे धना चाहिये पहाय मेरा रन बनाने मित तय मोसमे उसानी बाहिर मामा भपका कप मेरम में उपर की पुए माननमा सही मेसकी माल हो पाती है। मेष सी मोवि मबार उपचार पत्रिमपणीने नया परस्पान तानी पाई मे नमानस पापा सोसरिया- मानवको साविकच सुचव पुषयपर्व। भावनिम्न पोवामो मम्मना। - नावा मात्मसिदि । रोस्पता-इसमें भी मेर न । मोवमे च नावनो में मेद नबो सतकी कामना करतापरत पाय। मम्मे मार उपवहार करते हुए कि- भारमाप्रनितम पेग नही जाच मुचान | गुरुमागस्य पमन भोपप पिपरपान । से परमा वोरोन पुस्पा । मनस्थिति मगर माम मोनही मात्मा । पम्पनी रफ्ना नहीं सदनापार | मान नही निममनु निथप न लार | भाग सानी पंगापमानमा हराएमा मरिषमा मामेर नहीं। -मात्माको प्रेमपने निम्तस्पन मान नहीं-इसके समान गुरुयी म रोय मही सगुण कमान राजापोई म बामपना भिपुष मे नागपुरी भागापूर्वक समान पूण्य कोई मी पर या भोर स्थिर दबा विम्याउना समान उसकी दूसरी बाई मी मौपच नहाँ । मार परमानामा ratो सोनचा पुरवाई करो, पौर मालिनि मारिन नाम र बाहमाम मन न परो । य- मनीबसना गमगार नही । बस अपने तस्मता वो मान नए-बिम्पर भनुम भाची सवय मामाका मनुमा दो दुमा महा-सापान हो पा है और बरगम भारि नकारे प्रातदिन ना निस्व मिस किया खिया रचन खबरमून नहीं है। भूवधानमै बोशानी मुख्य दो गोवर्षमागमा और मापकाम्मे योग उनका मामी मग मित्र नही रोगा। बारममिरिमाबका नाम रवालले रामायकमर और विपकमनीवर मिती नेमागमनि भायो विचम पागा Anti- उस उत्तमचम पसरे पार परने मन र भोर कारग या भात्यविचारम पाति रखेपास मधिम मे सितापि ont-मामपियारमें ही पल पी । गुत परमते मेरे मन चन पावणे पूर्व मामा परम प्रेम सपने URRY विचारसे पहन समागम बामविचारम वसा मारकरच करमापसे राने पे । भारमशिविर मोज, माम तर मेर लिपपर मे एका मोर मनुवार समाधान मिल भाव मननपम बाविपत भयप पर जापानीले पगुम बना इसापायी पालनमाविबेक मोससिांत मोर बसपा नामक निर मीनना । गरमपान ५९. मनपूर्णरूपये दिन मरे ।। इस मरिच याद्रपने पापा मारतालिका संयमाने (बरन मारभर १ ८१ में प्रकमिठ) वमनोने सलामत्र (सोपान मोर १८८५) पर कम पारित (माना १८८५), बार्यप्रणाली पाची (माननिमय मायार मकबर Rतमा १८८५) परम्मत (विममा रियर १८१) सये भीष (मिमप दिनमा १८८५) परस्मन (दुधिप्रमा) हवा मोर मचाम्मे से दुर भारि मना सामाग्रीने में मप्र सातो गुमाती और हिन्दीसम्म प्रदन ब अमुक माहिती अगुचरल Rो गोलमा 'माईमार पा मोमा मालपमा मान-ममा भी नाम ।पराध मरने माना मारिएम में मापा गुल प्रिय है। बामपन मामाची पायसम्प्रचार प्रम चार पिसनेम NिE अनुसादारपासना पालगनुबादामा पुनरावारिसमस और रमन की समतामगारपारे लोभेम।
रासपम्द्र मौर उनका संक्षिप्त परिचय माप मुम्परोनों प्रस्तुत प्रथम क्रमसे . -६५५.५ भौर ३-१-२१ में ये गये। मगमा भीमद् परमनने द्रम्पमा, बनारसीदासका समपवारनारक, मणिग्नमामा मादि गुपये पौधे भणेका माष भक्ता पमा मनुवार मनेक स्पामपर रिया है । गुनम्बर माम्मानुशासन मोर समवम्बरे नम्रणमाकाRD मंगका भमुबाद भी गमरमाबीने किया यो। पिपरनास्मक रचनायें पम्पनयने मने मोघ विरेचन मी मिला है। इनमें बनारसोरस, मानरपन, पिशनम्र, गोपिम्प मादि विद्वाना प्रपौके पच मुस है। यमनीने बनारसीयालये समपसारनारसका ना मनन किया । ये नारीशतके समरस्पर पोंको पार मारमानवसे उम्मच हो बोत थे। समभरके पोषो समवनयेने जमा बमा मत किन पोन ग्रामनगीने विवेचन मी सिता है। बनारराती तए भानसम्ममीको भी रामचन्द्र पाव मादरी से रेलवे । उनकी भानरममोतीसीका गबनतीने विवेचन मिलना भारंभ किया पा, परन्तु उसे पूर्ण न कर सके। पा मपूर्व सिचन प्रस्तुत प्रन्नमै १९२-६१५-1 में दिया गया है। मानमनबशिसीके भम्प भी मनेक पप राबरनगीने मनसि । राबवन्द्रीने स्वरोदयशान का चिन सिखना मीएर बिना पा । मा विवेचन भपूर्वरूप ९-१८९-१९ में दिया गया है। गोपिम्पनी माठ पस्निी तयहाको मन मरिमर्नु महाम उसे मारि पयका मी मम्मीने वियन मिला है। इसके भतिरिक्त यसरीने उमास्वाति के तत्वात सामी तवम माम्समामांना मोर हेमचन्द्र के मोमयमार मण्डावरणका लामा भर्प भी मिला है। उपसहार पवन ममेशिक रोमके धारक एक मसायल पुस्य थे । स्थग मोर राम ये मूर्ति । मफ्नी बेगम्यमाय मर्मत मत पते थे पविक उन साने पीने परिनने उम्ने, बैठने भारितककी मी मुब न गती बी परिवर्शनी में भविषम मान पी । मुहानरमी प्रमाम उनकी बरी रम्न पी- एन्वा रमतो प्रगर हरि ये रे मा बीसपत्र परे। मुच्चनरनो मान महाप रे भोपा बनगरी मम्री रे॥ मपूर्ण भवन एवो सारे भाषण-भादि पक्की रमना मी पम्पममीने इसी मतिपय राम मनासे प्रेरिखकर कौमीयम्पनीयम्प सभापमपा।उनमें बम भया परम दोय मीन बा। को उनके मनुमयमै माता उसे मात साता मोर निर्मक्वापूर्व तक तमा रसनेमें सरा प्यार यो पे । प्रतिमापून पारिक पति परमान भारि बासा प्रभार सार भने सर्वत्र पापूर्वक विचार प्रकट करने यजमानीने ती पण मी कोच मप मा प्रदर्शित नहीं किया । मफ्नी सास्मरणारा मरीन पते के मोर नसी का ती पण पाय मुमुमुभी मिल मैग्वे । पिस समाधि पाना भभी बाकी मनी स्पूनयाने पूर्णता प्रा मैं मी भापर्यफरक राषिर्य पड़ा। में पायेप रमन ममी मुम इलापि मम से मनी माताको मनोभेमरा मते ही पाये थे। भीमदनी बीवनमा ८८. १ परवीने मम्नी भपूर्व भवस्थामा अपामगर निम प्रभारसे मर्सन या- 'भो ! मत मके पाग्नम बसी पुश्या प्रतापते इस रणने प्राव एस रोगको तुम चाहते है। और उपकाळे मनु मायेनम कि भाभत्रक पारिमें पारपा मीसा महिंसा नवी मस्सिा बल पमी मा म इमादी नही सीने सरको मम पापनमें सदाप गाउनतीस मामताबी हमला माम भामश्विना सम- पीप मार्ग इसमें बासन प्रम नहीं है। मारी. मोरयर समय एमगानेनो भातम प्रन उसमापने पाय- प्रनल मुकारने मास समय मोकारने देना बारने से मन शामा बाहये । यहाँ ऐसा मान A उसे किसी दूसरी ज्यापी में पि नहीं । उजा-- सपारने देना चाहिये यह काम गरेपी तो बेचना पाया, रम परिममे मा बाना अभियर इस AORभूव परकी राणी Pooको उसमे RT ने माना हमें मोम ऐसा है: A भारतीय पारना उukर ममी रेसना पर रात्रि सीको बारी हम वा ठसक्या ना बोका उत्तर पहा असे नरक परिमै परसम्म करना चाहिये बात 4 मम मा बसी । मन्तु ऐसा उपरे म से राजमार्य- पितो उसे मारने उपरे या गेम और तुम स्वप्रम में न राम कप्ता मोग।" मोदी का सबसमा पापारागार पर नमें महिला मत मात्रामा धर्म सामाकी भोगते नम इस सिकर यन्मभूमीम गुमायो सनीपत पमपरामके पाप मनोजमापा में माम पाने मोम। सस्पचीपन परम पो-बनणेन ओ-मारिसे मार पर मवा मंचन बहानोतिस्परमसमादम मेरो प्रस्मसमय- मानेभमानापास मौर पर महा पाप, मोर दूसरी भोर मामताभरकी मात प्रमा-इन ऐनाम-समयकोमे-एमाभाग पापा एक करना । स ममापि मक मार्गमे मामी होती है-34 बाम सम पखीमपणे अपने माता में रहार सगरिधी मरबीरप माने यात आमाले पतिलपत भी अनि रममा भयेक सम्म साहिल र पाने का प्रभास योगासमोर मौसम PTNAमेरमी किन मामी ने अमीबा ने नाच burगुत उपयोगी होता । मजे से मेहमी मारमा यती म मापन माम मा ।इने भा और रजा मामा धर्म भनुमान पानमा नारो नागवान। मर्मत् मम की कम मा मोर पेच करनेमा म मा मनकी पिक्स समाधि प्रभारीपाली या t भीर रजेवामीनीAरिदी में प्रस्ते मा भारमा सामेन से मै मात्राम बारम बापन हुँचाने मागेकन माल में RRष महोबारा एक घरी ना एलान न ये, भोर मापन मी म मात्र मान सविसम्पम ए मैरवामपन H पपत्र र भमे में मुनीमत पर पूर्ण व एलाइन पी ऐसी रण म मा परवी ।" ममी इम्य पता अमे मस01 भावी पपा मीणा र मिला रामचन्द्र भौरमन संक्षिप्त परिचय नित्यपक मा पर गश्पम् होइन म बिरामोंकी बरा भी परवाहम को एप्रयोगले म ससी मोर मोठरीचे गये। भागे सर पीये ना हो उन भातारी न था। पवन वर्म मौर मपारका पाव सुन्दर मे बा-उन्न प्रापि-निषिध सम्बर सम माप किया था। ये एक यो मा मापारी होर भी सनापूर्णी मरना म्यागर पगते थे। मापारके उनि भनेक नियम बनिये। दर ही अपना कारोबार से पे । निस्सोवनी पामाधाराणपि पवे एर मामश्विनकी इन्नी उपदणको प्रान्त सापक पुस्य इनगिने ही निकली। एबम पुलमानकी तरा कमायावाका भी निषेप परखे थे। परम्तु इसका भयं या नहीं किया यामाही न मानते थे। उननि शान मोर पारिसका, बर्म मोर म्पबहारका भने बोक्नमें सचिव उमप किया था। समान-सुपार बकनी सी महापाप वाव यह पौ तिवानी रोने वाब ये एक उप्र सुधारक मी मानीवियोमानी मनपत्रिकामे राममनीने एक पच निम प्रकारसे मिला है।- हुरेश पारवार्मा गाउ सुनीति परमामा । सागुमो मोति मोह पार्मु गाएब मुझेपी नबाम । इस परसे मातम होता है बसम्रगीको रेणेवरित कामाम मी बहुद च पी मौर इसी कारण समेने पोम्पोपी, समय भाविधे प्रोमात करनेटरची श्रीमतोम मची माहिऐप और समागमतिविपना मनकाप भारिपरम्ना दी। बेलर भीमच और बीमव की एक मान् समान त्याफ्ना ना पाते। भीमेत मनोने मिसामन' नामक कायम एमकमाने भीम शिवा देते हुए पुनर्थ पराकोठामे प्रम परम "लिम सम्पस पुनयन मी समर्पन किरा है। पासपी मोवि रेखार तो ग्न भास्पद रया माती । कत्रा करने में कि सब गुरु की समाधि प्रकिमेर हो गया है 'मेग मोहमित भपा समर्मित देयप पचते है, ऐसे ता पूरनीय महा है। उनाने परक बिल दिया है कि मागासले जैन बाबुकि भाले सूप मच पना मी गोम्म मही। वय एनमें नमक तिने साधु कि । उन उमीको पिटी ना समझना उमेन रेनेमे हानि महीं है, परन्तु मेहमाय फसाम नहीं कर पाये पेण सम्मान नहीं रखा । को साइमा बामहिमा रिमा कणा है, उसमें गान नी । धन्न पो पारे मिसे मामलों कमाती है-सारपसे की प्रीति पर मावी है-बीच सो सभा उममने हमा सिते माप गुष प्रारमिन।' इठे मासूम at: पात्र माग पाम मोति करना चाहते थे। वीर सपायरी गाने रिकागोले बमपरपरमै म भनेर सरममावती मामधीपी उस समय मी गबर्मने बहुभियतापूर्वक लूर मेरार शाम भफ्ना मममत माना। उनके पनि प्रभाव पान मार-मलनरत पाका मनपाने भनाई रे में माने मा क माधि मेग्ननोचने-नगारपसार पिच परवानगी मने मान-माल सपना पास भाती धर्मो परमरकर, इसी बम्पर पैर रहर सी नरेश निरेष पा बमोठिमेका मतदानस्म भोर स्वाती मान भारिप यादी गुम्प समात-पर पर गांगपत्र भन्ने भारसिपमै ऐलामा । माधर्मही मुश परोसक महोमर नरव कुमार पाने और समझे रिना प्रतिमा परमानोगौन भी पर मनाएकतिर है ये पा मापुमो गनॉम्रेशन (मापारी। पत्र) मारिरमप्रभोध में परचम और नियम से मनी मामुपरफरमर मिसा है।
मामपान और पुग्णार्य मारमशान मोर पुरुपार्य सम्पाव गुव गुप्त बासु बर्म भाव पारे। निगम पर, मनुरूप मा मयुरनिय पर नहीं मिलावावा मनपोषन है।' पाया मर्म मा मर्म महागुनमनाभा मारे मर रेस मानेमापो मनुमन्य होता मारमाको नाप मारतो, चार- सरोही परचम धर्म है-माप ।मी भौर पारणामागेप भासी मतिना। मारमारे, मुहम्मान बनिय बारिश १० मी मरमा। तिमा मेरो परे । मेरमतिरोना मनातली भूमधारक भयुरी प्रकल्प मारमाही पासिम भाग्र हो भितीजाप म पामो से पहीचाही समेत परीणाममा मौरीप पीनापरिचित समारंभ पचनामा मार मया। परमार ने मौन विर भने मसापको हम मना पानी म साचा । गम्यममा मनपारमा दोवा amar पापा पारे बिना भी शान मारणे, रस्सी भी काम नहीं। मे मसूरी लिस माप्तमा एक जप मने, भारि मे कारण मामसर प्रासरनेमे बना जी मी । एक-अनेक बार AR पाव ए एप को पाग परना चाहिये। मामा परी दर यसमयमा तेल यल पन पुरी भाभीके रिभाषीयंने समझर मोर मालिी भी वासीयोपाने समे एपमा चार मिनी को परेमा सोधे किन पामरम्प पवमरमसमा रेसा भार मानुगडीका मेरनामे गाना बाद तय गेम में प्रमो मान मतिम गाय के मा पना कारिया' मान करना इसमें समान Aमति ARTA षतु सर पर प्रकन ममता बरिषदेख मन बनो मम पुष प्रणमामहीमोसारिया समाप्रास मिा और सिचानमा मेने उपम म विगो से समर) A (क)भमाकर होन्य पईमापा मारी पंचमात्य मोसम भावमा todia नाम पर सीतुमर प्लेबी पुरव, भौर समप्र मेरो समबहारकानेबाने उसा पास इसका। पचहा 0 वा बाबासमान माम मुस्तम PROमरने भी एक बारमा- बदसम्म परम वीरव मुमी। मूरचा भाषाई जान मम सपेरान फत् पविमलेनन Ag- प्रवाति एक बोले। गुरु पासान पारेर पारे। फम । स्पारएन भने मवमर्मित कर पाया। कुन पर महेईना। नामहिमपान प्रयो। मनोपमेयी-म्यो । -मात् पर, क्षेत्रो में.-..- htो राजवम् मीर का संक्षिप्त परिचय ४॥ बीरको मात्रा रस्ता है। बीबको पुथार्य करना नहीं भौर उसने कर बराना ना मारमा पुरषार्य करे वो क्या नहीं ये सवा! स्ने पो पोपसके पटार गरे। मौर विचार र सनको यो प्रममे लिया है। पायो यस बाहरका काम नि मी विमस पास की। भरमा विचार करना पा छ बारसी नाव नहीं। ऐपड़ी पुरवाय परे तो सम्मान हो बार--पेशाकरा। मेरपरि चोरेसा मी पुस्पर्म क्यों न करे, पो मी दो पाम तयार नहीं थी, वो फित्र सम्हान पिटना पर इस विचार दो करो! अस्पत सरासे परास उम मा पुषा कि रामचन् संसारके नाना मतम्यावरीत बहुत सी थे। भनुमा करते ये कि समय जगत् मतमात हि प्रस्त है मनसमुदायको साँचो पिय पाप मारित विषम हो गई । यम्मी तिन मनुकरण गोको मय हो गया। विवेरियाबी मौर परापोम्प उपशम पागेकी डापाव भी मही मिस्ती निकटौम्ना मनुषामते मानो बज दी गयो एम्मा भएका प्राय मी जी मी पर नहीं पायामोर पसानघ्र मार्ग वो सपा विसर्मित हीरो गरा है । पास देसार पगमनमो भपत मेगा माता पा भौर उनकी मालाम मात्र भा ज्यते । बहुत पर करा रखे थे कि चाय भोरते दो पहिया मौकरे तो या मता सम्वा, परम्नु जगत्मे बो उ पालेर और मस्याचार पर या बनामार मो भवर्म पर या उसी परडीगन नही सकती । गौ समस्त जगत् मम्ने गरे समान था। मपने भाई भवरा बानो मरते देलार यो प मफ्नो होता है उतना ही कोप सन पामें पुरानो-मरणको नेनार होता । व तय एक भेर तो रागरनमा संसार-चार मठप्स प मोर मप मोर उमें पायरको मर्मत प्ररवा पी। इससे रामनगी मस्त पारीरिक और माना मम उठाना पहा । उनका सामरिन पर दिन गिरता हीमपा। स्वाप्प मुधरने के लिये रामरती परमपुर, महम्म्दारार, पसबाम कैम्म मौर समोर रस्सा गया में रोगमुक करने के लिये कि प्रघर उपचार मारिरि गपे, पर इस नियम दुमा। पाएको राममन मे ममोम स्नीचरबन पिप न हुमा मौर में इस नश्वर दाणे जाना पा । पाकिस्मत् १९५६ मे पकने म्पबायपावे निधि मेहर पी भोर तम्मी लाग कर, मफ्नी मासाची माहा मिनेस, हम्पात प्राय करनेकी तेम्पा मी पर पीथी। रात स्वप्ने प्रपत्र पूरा करना पाच नया ममपात मा यया । सिर त पाहा पा उसे मारमनीपत मित भसवार रन पर पिचर उस व्य गवस्था करते हुए पैने सिफारित ठरसमान निभाम महमा पानीको भास्मा इस बिनाकर सरकार र कर गई । म पुषमप पानमाधवन १५ पार पाकर 3-4 एमपा या। गनीने मा० लि पास गेम्परराया, या मंतिम सरेण नामठे प्रस्तुत बम ८ पररिया गया है। भीम समुभाता भीपुन पननुमाने पानी भक्षिय मरारावर निम पनाम रिut- पामरे पर नाराको समान रेवागार माइ मरमेराम हा मुसे मा-म ARVA गनारा मारमा पात भाप AUR उत्तम गतिको मात वाम। तुम मोर समाधिमारते वन करना। ये पनप रानभाजीसतारा री महावी, उमरे नेत्र १ गागरा हन् १५०० मे भापबार रिपामा मामान २ पाप समरियमें मामसार सवार गाने पे उद्वार मसि परमानो एसयमानी समरे पी पदो हेर्नुहारल मने एक हागे । म्ने र पसर पर बगवना बार देर सेमने ८ मम। पर हर एक पवयोगारमा ने गती एव परम्ने गरेमाप सिम वाम्म भारवर्ग पारपणनी।
पाबासीकी सेवा 1 बमय नहीं। दम पुराचार करना। पतरे माई ने उन मर्मत सरपो । उस समय उनि मा ARषत पना ! मी पमाचि मृत्यू है। पर करने पीर हो गई । सो पौने भाठ बजे परिन । उनो मन परन भोर बाप - सम्पूर्ण परम ने नो को मोने मा- 'मनमनमी न ऐना । माने और रखना । मैं माने भारमा मैन ।(ग्नोपनेते गले मे कोषपर लिया हो)बापाव रे मोर मारमा विस्व मरते पर पथे। मात्र में मात्मा हि माइसन इए। तुरंभ नि मरम पानी माँचमै पानी यमा पचनासमन" इस प संभ १९५७ में समयमार रोपारकोपये पगप्रेम यस्मापने इस मापन उपरका पप किसास समर पवनयम सम्वगतब गुमण्य भाषावारगुतते बुमान पर उपस्थित । रामपन्द्रनीषी सेवार्य पाप गम्मन् सबमप अपनी रोवे मौकर नहाँ पर परोपम्मसे गुवमान मरे । उनके पा-बहिलमें उनम्र दिवस पर मोच रोख यांना कामाम 'उनके नाम त निवर या । उमाने बेसमें मनुमब बिगामही मिला है। सभा में ममता म)। पूरे र गने से एक मान मोमीने तो दो या मैंने नर्स रे। निम्न भविस्याण मागी सहमी साता ने पति- "बीचतिम मत पा से दिवधी मात मदो रे भन्तरमे 01 पर पारने महा मिडेगा। भवर, पुत।पार नहीं। द सलमवा है। रेबीच ! भूकमला। मुख भवाम पारनेसे महीं मि। बीच! मन मम्त । मी म्म उफ्नोग राम करने वय व नम भरा मरी निगो भरण परेके पास तू मर हो पाता है पाप है। गोस्वामी की भाषामा मिजाये। हर मा हागि एमाला बनाम मा पारे। तर महाया मानपर को पहनना पड़ा। उसे ग्मने बने पर सरिलिकमा मात्रामा भानी भारमलपमे बिमा पास समाचार याला मिनप्र म प्रपन बिमा सोमप मेरे दिल्म परमम्मी पापानान्न रिना मेरे टेर मन्वयक गरम मारताबा। उस सामाविम्बर में मेय इतना मारामामा। भोर से बालवा हे पन पूतन सर पे न पामो पब मुझे भोपाल से भपक हा गेम में भी भापा भिनायाम मा भावा।" मरे बनम तीन ने पारीमा गणे। मसमय, पन मार परवर पसरासरी स्नी ममर दुखमाप और गरबा को पारसे सेमी गरीएक पुमा अपु R IRR -विन गुमटी माम मने रख रखा है-मर सम्परंपरनो नव गात रबर र मानहाtra मोम कर परे पर पानी गुमत प्राइम मेरा एक पर्म में परम नव्या हानी Relati नामे Rarajा भोर मापाप बम बायस पश्चमबागमसिमाना पारेको मारत परमानी र मैन प्रचार मरने परममावगी श्रयमा माग बामप्रसार मारा हरर म पुगत में मरमर - पसबन्द्र मौर उनका संक्षिप्त परिचय ४५ मागमस रेवान परीकी देसर मफ्नी सेवा पय र है।इस मगाम्ने दिगम्बर मोर वापर पारि सामिग्रेमबस्न दिया है, और वर्तमानमै परया। उपते न समान काय परिव है।पर मग मी भीम यम्मान ममुह मेगम एक वर पाहता है। सरवाना रास्प प्रतेक मनुम्परेपनमयमै उति दुमा भरती है।बोबो महान् पुस्योर मोक्न इसी का बनते हैं। गरमागी बीवनमें मी मान उत्प्रति पौ। पहसे पहस हम उनसमको स्में एन पखे। साचात् में नर्मकी भोर मार्पित होवे ६, भौर स्पानाचाठी न सम्परायी माम्मवाला पान प्ले है। समय उनी मिदुमै परिसन वाद, भौर हम देखते हैगे परचम नवम प्रति माना एमत मामा मतग में थे। मा करते है कि 'नवमी भामरते ही मोसो इस बार भारमा पाल सम्बते मा गई माँ कासि मी राम मौर उमाम प्रात के नाम प्राप्त करना पाहिसे । इस समय दीदने पाबात वो हम पमनानी मौर मी नामे को हुए रेखामयी माम निकासार भानन्दसे उन्मच हो बाद में भौर सरनके मे मस्त मातुर दिखाई देते है ताकि इसके मना उमें खाना पीना उटना देऊना कमी मला नहीं मावा भौर से मपना मी मान गयो । वय हो कि गम्पनीको बहाव मी ये उत्तम पद मिली, उमौने उसे ताप मा-ग्नको मने मोर पराये माममा न । सपपुष यममा पनी याबी विशेषता की। वकवि मानपनमाम पणचनाप्रपन पार- रतन मन परब ब मान सम्म बनेकरे। प्रिमिस रस पीमियम निरन एकरेn पनवनी इस निस्किस रतका पान रिसा प्रारमिपर शाम उनकी र मापदी श्री- पप्प मपा सन्दम्पनाः समरे मस्ति मामस्मे गिराव। तपा विहानामस्माधिमुता परापो पुलमुपैति । मिति नरिसा माना नामम्मर मसमें गाकर एक हममें पवित्र माती उसी व समान मामरूपले मुख पर रिम्प परमपुरणप्रेमात पता शमवएप स्चारमें मिव मिम पद मोर वन रेखम मास मित्र मिस देश का मारिरी मनुनारोगी मिप मित्र विक कारन ही उब हुए है। एक किमानी मोर मार शामोन उपोय एक उती मारमा प्राप्त पोका भार वही न पोप मू ।। मिल्ने भनुमत्रतान हो गया है या पसनक भारतपरसेरोप है। पानी वो रसम परे - पारोपप एक ने एक कि। समयमानी ही परीस्थर समयन पत्र । -मर्पत थे मावा परान एक भोर समस्त नाम ही मत दर्शन समाने मित मित्र मानमें सवार मी एक ऐसी है। निरसमा राजपा एक परे हुए बोरस । सिलपमे नही भौर न पारेसे प्रमान पनवे अपने भगदीदी नहीं, परन् वर्ष एक महान विभूति । हरिराम पार पा १-१२-१. } मगहीपद
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भी प्राचार्य विनयचन मान भाभयपुर श्रीमद् राजचन्द्र १६ष धर्षसे पहले मीमान फरेतासमी भौचन्दयो गोलक बपपुर पतों की भोर से पेंट। १ पुप्पमाला सद , पनि म्यतीत हुई, प्रमात वा, निवासे मुलाए । भाग-निदा हटानेका प्रपन करमा । २ म्पतीत रात्रि और गई जिन्दगीपर प्ठि रात जावो । १ सफल हुए सस्तके लिये मानद मानो, वौर भागका दिन मी सफल को। निफस हुए नके छिपे पचाताप करके निफरताको विस्मृत करो। क्षण षण पाते हुए बनतकाल म्यतीत हुना तो माँ सिदि महोई। ५ सफलताजनक एक मी काम तेरेसे यदि न बना हो तो फिर फिर शरमा । ६ बघटित कृपाए हों तो शरमा कर मन, वचन और कायाके योगसे उन्हें म करने की प्रतिमा। ७ यदि स्वता हो तो संसार-समागममें अपने मायके दिनके मीधे प्रमाणसे माग बना । १पार---मजि-पार्सम्य १पार--- -~-धर्म-कम्पि १ पार--आहार-प्रयोजन १पहर-विधा-प्रयोजन २ पहर---मिदा २ पहर--ससार-प्रयोगन ८ ८ परित्याग पता लगाके बिना बनिताका सरूप Aचारकर संसारको कोर परिकरना। ९ परि तुम धर्मका भस्तित्र अनुसन माता हो तो भो माये करता है उसे विचार बाना । ए मिस स्पितिको मोगता है किस प्रमाणसे ! अागामी कामकी बात क्यों नहीं मान सकता। निसको कम करता पापों मही मिता। चित्र-विधिप्रतान स्पा प्रपोमन है। १० परि उसे मस्तित्व प्रमाणभूत माता हो और उसक ममतत्वको मार्शका होतो मात्र प्रता।
भीमान् पसपण ११ मा प्राणियों में समाशि- १२ सपना किसी प्राणीको बीवितम्पत नहीं करमा, एटिस भरिक उनसे काम माना। १५ अपना सपुप रिस रस्तस पडे पह। ११ मसात की मौ मेर नौ, मात्र परिमें मैर है, यह मानकर माशप समत परित्र पनि प्रपन करना। १५द किसी मी पो मानता हो, उसका मुञ्च पात म, मात्र करने पर्प यो कि जिस रासे संमार-मका मारा । उस मधि, उस धर्म भार उस सदाचारका त सेवन करना | १६ किसना मी परतत्र हवा मी मनसे परिप्रणको विस्मरण किये पिना भाषा दिन रममाप करना। १७ वाज पदि व दुस्वमे प्ररित होता मरण पार कर । १८ अपने दुसमुसक प्रसंगों की सूची, बार रिमा बेच देनेक ठिपे नापर हो वा स्परण कर । १९ गया वचा क क मी , परन्तु इस भारका चार कर मापारको मोर भाना इस पाका पुरुस पोरे मस्तके रिपे मात्र सारे तीन एप भूमि माँगमबागी। २. रामा तो फिकर मही, पर प्रमादम कर कारण हिमापसे नाच, अपमसे बनम, पभिवता, गर्भपात निशका, चौसा, कसाईध पौरपा बारिक कण साता है। तो कि २१ प्रबाके दुख वन्माय और पर इनको गोच करके भार कम कर । तू मी हे पनन् । कर बापामा पाना है। २२ कौर हो तो इस बारे चारको मनन कर पाना । २६ भीमंत हा वो पैसे उपयोग विचारना। उपान करनेका चरण पार कर करना । २१ पाप वा में मापारसे हानेकाम असत्य RAT स्मरणकर म्यापम म्पापारमें बाग फ्ना पिसाच । २५ पास हो तो भरने वायके कालबार र बारके दिनमें प्रवेश कर। २५ परिवाशर यामाहो वो निचाकीबोर वैर बापाचोर टिकर। २. परिपुमा हो वो उपम और प्रचार गरिन। २८ परिवार हो तो मौत वरक रिमामो ममें प्रवेश कर । २९मी तो अपने पति मोरको धर्मरमाणे याह कर, पोप ए 0 तो समको पमा मांग और छम्मको बोर पि कर । । पदिकीको पो बसमवित प्रशंसाको स्मरण कर मामले दिन में प्रवेश कर २१ पदिकरुपण ऐ वो अपूर्ण) १२ पदि दस्ता मत हो तो मेपोस्पिन बोनापार्ट पोमो स्पिक्सेि स्मरण कर | २१ कोई ल्प पूर्ण हो तो पूर्ण करने का विचार कर बारिममें प्रवेश कर ३१ बायसिस स्पोबारंभ करने का विचार पो किसे समप एदिर परिणामक मबार दिनमें मेरमा।
पुष्पमामा १५ पग रसनेमें पाप है, देसनेमें बार है, और सिरपर मरण समा है। यह विचारफर के दिनमें प्रवेश कर। ३६ अघोर कर्म करनेमें मान तुझे पहना हो तो परपुत्र हो, तो मी मिक्षाचरी मान्य कर के दिनमें प्रवेश करना । ३७ माम्यशाली से तो उसके आनंदमें दूसरों को माग्यशाली बनाना, परम्तु दुर्भाग्यशाली सो क्यका मुरा करनेसे रुक कर वायके दिनमें प्रवेश करना । १८ पर्माचार्य हो तो अपने वनाचारकी ओर कटान एि करफे भागके दिनमें प्रवेश करना। २९ मनुधर से तो प्रिपसे प्रिप शरीरके निमानेवारे वपने पविरानकी नमकहलायी भारफर के दिममें प्रवेश करना । १० दुराचारी हो तो मफ्नो मारोम्पता, भय, परतत्रता, स्थिति और सुम इनको विचार कर बके दिनमें प्रवेश करना । १२ दुसी हो तो बाबाविका (भानकी) बिप्तनी माशा रसकर मानके दिनमें प्रवेश करना) १२ धर्मकरणीका बक्स्य वस निकालकर बामको म्पहार-सिदिमें तू प्रवेश करना । १३ काचित् प्रथम प्रदेशमें मनुस्मता म हो सो मा रोम गाते हुए दिनका सलप विचार कर पि कमी मी उस पवित्र बस्तुका ममन करना । १९ बाहार, विहार, निहारफे सर्वपमें अपनी प्रक्रिया जाँच करके वायके दिनमें प्रवेश करना । १५ कारगर हो तो भागस भौर शपिके दुरुपयोगका भिधार करके मानके दिनमें पेश करमा । १६त् पाहे जोर्षमा करता हो, परन्तु बानीविका के लिये अन्यायसपम द्रम्पका उपान नही करना। १७ यह स्मरण किये बाद शौचक्रियापुक होकर मगपति छौन शेकर क्षमा मांग । १८ ससार-प्रयोजनमें यदि सपने द्विवके वास्ते किसी समुदायका बहित कर पाता हो बममा । १९ इत्मीको, कार्माको पनादीको उचेवन देते हो तो पटकना । ५० कमसे कम नापा पार मी धर्म कर्तम्प और विषा-सपछिमें गाना। ५१ मिन्दगी योगी भार सनी बनाठ है, इसलिये जमाको भेटी कर, पो मुसहपसे अम्दगी बम्पी मास्म होगी। ५२ मी, पुत्र, कुटुम्ब, लक्ष्मी स्यादि सभी मुख तेरे पर हो तो भी इस मुम्समें गौणतासे दुष्प हैपेसा समझकर मारके दिनमें प्रवेश कर। ५१ पविस्ताफा मम सदाचार है। ५१ ममके दुरंगी हो जानेको रोकने के लिये,-(अपूर्ण) ५५ सपनों के शव मधुर, कोमल, मप भार शौच मोग्नेको सामान्य प्रतिमा सेकर भागो ममें प्रवेश करना । ५९ कापा मठ-मभरा मस्तित्व है, इसलिये में यह क्या मपोम्प प्रपोमन करफे पानद मानता ऐसा मार विचारना।
५. रे हापसे बार किमाको नामीविका टूटती ऐ तो, (वपूर्ण ) ५८ बाहरक्रिया कारने प्रवेश किपा । मिताहारी भवर सर्वोम बायर गिना गया। ५९ परिवार निमें तेरा सोने का मन हो तो उस समय ईश्वरमविपरामण ऐ व सत् शासच भमकेगा। सममता कि ऐसा होना दुपट है तो मी अम्पास सम्भा उपाय है। ११ वडा माता इमा और भार निर्मट किया जाय वो उत्तम, नहीं तो उसको साबबानी रम्ना ५२ सा वर मया पैर नही माना, कारण कि पैर करक कितने काममा पुस भोगना ! र विचार वलदानी करते। १५ महारंभी-रिमापुल-पापार, वाय पाना पड़ता ऐ वो पटकना । ११ बात ममी मिम्नेपर मी भार बम्पायसे किसका मान जाता हो तो वटकना। ६५ वक्त मान्य है, यह बात प्रचार कर बारके किनकी २१६०.०पिपर्गका उपयोग करना । ५७ वास्तविक पुन मात्र सिमामें है, इसलिये नगार-मोहिनासे मानवयंवर-मोहिमी नहीबाना । ६. मकान हो तो परेकोलकातामुसार पम्मा । २८ किसी प्रकारका निपाप विमोद पपमा प कोई निम्पत्य साधन बायको वानदनीयताके लियेमा । ६. पुयोजक स्य करने में प्रेरित ऐना हे वो क्लिंग करमेका नायका रिन नही, कारण कि बार जैसा मगायकन इसरा नाही। ७. अधिकारी होतो मी प्रमाहित मूना नहीं। कारण कि विसघ (यमात्र) नमक माता, मी प्रमात्र सम्मानित नार है। ७१ म्पपारिक प्रयोजनमें मी उपपोगपूर्वक कारने सम्प्रतिकाकर नामके दिनमें माना। ७२ सापक होनेके पीछे विदाप शान्ति भेना। भारके दिनमें इक्ना बोको मात्रा म माने, तमी वास्तविक पक्षणता मगनी या समता-बारोम्पता २ महाचा । पवित्रता : फरम । ७० पनि मार से कोई महान् काम होता तो अपने सर्व मुसका बडिमान कर देना । ७५ पर। नौच रस (+) करब पके हापसे उम्पमस्तु, (कर+) पर परमपसा मात्र पुम्भी कर सूप करने वाला है। यह दो वो भान पवारमा और मपाग करते हुए मरना। 0 Pसरपका सान मादेन गाना। ७ पुप सरिर तो मां कुछ कम्पमा हो वो पापकर गौर मिशा। ७८ कोई परिवार, दान गम बपना श्पका मिव करके पापा हो जाने मान कर • गाने जमाने भी विपरीत या ऐसा मा उससे मारपना। : मारके नियम बना और बाकाश ससारको नापि सोर करमा ।
पुष्पमाग ८१ भान विस प्रकार उत्तम दिन भोगा, वैसे अपनी जिन्दगी मोगनेके लिये तू आनदित तोही या।-(अपूर्ण) ८२ भाम निस पममें र मेरी च्या मनन करता है, उसीको अपनी आयुष्य समाप्तकर सद्रातिमें प्रेरित हो। ८५ सत्पुरुष विदुरके को अनुसार मान ऐसा करय करना कि रातमें मुससे सो सके। ८५ भागका दिन मनहरी, पवित्र है+तकस्य होनेके योग्य है, यह सत्पुरुषोंने कहा है, इसपिये मान्य कर। ८५ मारके दिनमें से बने तैसे सपनीमें विषयासक्त मी कम राना। ८६ गामिक दौर शारिरिक शक्तिकी दिल्पताका मा परे, पहशानियों का अनुमबसिद्ध पचन है। ८७ तमाम्प सूंघने जैसा छोट्य म्पसन मी हो तो बार पूर्ण कर ।-(०) नया म्यसन करमेसे पटक। ८८ देश, मित्र इन सबका विचार सब मनुयोको इस प्रमातमें सशकि समान करना उचित है। - ८९ बाग कितने सत्पुरुषोंका समागम एवा, आन मास्तविक मानदसम्म स्पा मा ! यह चितवन निरसे पुरुष करते हैं। ९. बाम पाहे से भयकर परत उत्तम रूपमें तत्पर हो तो नाहिम्मत नहीं ोमा । ९१ पुख, सचिदानन्द, करुणामय परमेश्वरको मतिया मानके तेरे सहस्पका जीवन है। ९२ तेरा, तेरे फुटुम्का, मित्रका, पुश्का, पत्नीका, माता पिताका, गुरुका, विद्वान्फा, सल्यु पिका पपाशक्ति हित, सन्मान, विनय और सामका कर्तम्य हुमा हो तो वामके दिनको र मगप है। ९. जिसके घर पह Pम देश पिना, सम्छतासे, शोचतासे, ऐक्पस, संतोपमे, साम्पतासे, नेहसे, सम्पतासे वीर सुखसे बीतेगा उसने घर पवित्रताका वास है। ९१ कुशल बौर अपाकारी पुत्र बापालामा धर्मयुक्त मनुचर, मदणी मुम्दरी, मेवाडा उदम, पुरुपके एप मपनी दशा, निस पुरुषको होगी उसका भानका पिन हम सबको बदनाय है। ९५ इम सब पक्षणोंसे पुकानेके लिये जो पुरुष विचक्षणतासे प्रफन करता है, उसका दिन हमको माननीय है। ९५५ससे उम्टा बर्तन महों मप यापपर हमारी कटाक्ष ररिकी रक्षा है। ९७ मोदी मानी भाषिका नितना तू प्राप्त करता दो परम्त निरूपाधिमय हो तो उपाधि मप राय-मुन्न पारकर अपने वाजके रिमको अपवित्र नहीं करना । ९८ किसीने तु कामा बचन का होणे ठस पस्तमें सहनशीसता-निरूपयोगी भी, (अपूर्ण) ९९ दिनको भूठफे लिये पवर्म सना परस्तु पैसा सना फिरसे न ऐ यह सभमें रमना । १०. भाम कुछ पुदि-प्रमार बडापा ऐ मामिम शालि उगनस को रो, पवित्र हरपका पादि को तोप,-(अपूर्ण) १.१ अयोग्य प्रतिसे मार पनी किसी शक्तिमा उपयोग नहीं करना,--मामाानमे करमा पोतो पासमार पमा ।
भीमद् पचन्द्र १०२ सरस्ता धर्मका बीनसहप। प्रबासे मम्मा सेवन की हो तो जामका दिन समाधम है। १.३ पान, रावनी हो अपना दीनबनानी हो, परन्तु मुझे उसका कोई दरकार महो। यहासे चम्नेवाडौको मै वो क्या किन्त पवित्र शानियोंने मी प्रशंसा की। १०० माणसे जो हमारे उपर जगत्का प्रशस्त मोह होगा तोहे मान, तुम्हें मैं पहन करता है। १०५ मामान, नप्रमाल, विरबत करणसे परमात्माके गुणोंका चितवन-अबण-ममम, अर्तन, पूमा चर्चा इसकी जानी पुरषोंने प्रशसा की है, इसम्येि भानका दिम शोमित करमा । १६ सायाम पुसी । दुराचारी है। पर बात यदि मान्प न हो तो मासे तुम व रसकर इस बातको विचार कर देखा। १०७ सोका सान उपाय वाय का देता हूँ कि दोनको पाचाम कर दोषको दूर करना । १०८म्मा, भेटी वपना कमानकम किसी भी लसपसे यह मेरा कही पवित्रताके पुप्पोसे पीई माग प्रमावक मतमें, सापकात में वपया कप बनुन निमि विचारभेसे मंगायक रोगी । विशेष क्या करें। - २ काल किसीको नहीं छोड़ता जिनके गसेमें मोतियों की मम्पकान माका छोमती पी, मिनको कति होरेके शुभ हरसे भापत देवाप्पमान थी जो बाभूपोंसे सोमित होते थे, ने भी मरणको देसकर माग गये।हे मनुप्पो, मानो और मनमें समझो कि 1 किसी महो छोरता ॥१॥ जो मणिम्प मुकट मिपर पारण करके कानों में कुमार पहनते थे और मो हापोमें सोने के को पहनकर शरीरको मानेमें किसी भी प्रकार की कमी हो रमते पे ऐसे पप्पोपति मी वफ्ना मान मोकर फक मरमें मतम्पर गिरे। मनुमो, जानो वौर मनमें समझो कि कार किसीको नही पता ॥२॥ पारस गसिपोंमे मानिस्परित मांगलिक मुद्रा पनते पे जो बात शोकके साप बारीक प्रम नि मी हरित मोदी नी माम गामा मृलाती माटी एय का एम एमपी कारकमान्ती मारवाचौपा ममा भरको बस्ने मगलार मन मनाए सब कान म्हेने || १ ।। नमन पर बनेमास्ता, नमाराकोर मचान परत पम्मा पालापाच ए मन मसोनि मायनीर मन मनाए मब म कौनिया एप मामी मारामार मानिसी, अरममे पेय गाँधीप्रसपा 'कास फिसीको नहीं अता' नसीबाकी पोची धारण करते थे, ने भी मुद्रा बादि सब कुछ छोड़कर मुंह धोकर बस दिये, हे मनुप्पो, बानो और मनमें समझो कि काठ फिसीको नहीं छोपता ॥ ॥ यो म बांकीकर मम्वेता बनकर मोपर मीन रसते थे, निनके कटे हुए सुन्दर केश हर किसके मनको रते थे, वे मी सकटमें परकर सबको मेहकर चले गये, हे मनुष्यो, बानो वौर मनमें समझो कि काय किसीको नहीं छोपता ॥१॥ जो भपने प्रतापसे छहों सरका भधिराम मना ला था, भौर प्रमाण में बसवान होकर बना मारी यमा काणता पा, ऐसा चतुर पत्रपती मी यहाँसे इस सय गया कि मानों उसका कोई अस्तित ही नहीं था, हे मनुष्यो, बामो और मनमें समझो कि कार किसीको नहीं पता ॥५॥ नो राजनीतिनिपुणतामें न्यायपाले थे, जिनके उल्टे गछे हुए पासे मी स्था साँधे होपाते थे, ऐसे माग्यशाली पुरुप मा सब सटपर्ने छोड़कर भाग गये । हे मनुष्यो, जानो और मनमें समझो कि काय किसीको नी मेहता ॥६॥ यो वरूपार पठानेमें बहादुर थे, मफ्नी टेकपर मरनेवाले थे, सब प्रकारसे परिपूर्ण थे, मो हापसे प्रपाको मारकर फेसरी के समान दिखाई देते पे, ऐसे सभटभीर मा नंतमें रोत हीरा गये। हे मनुष्यो, मानो और मनमें समझो कि कार किसीको नहीं पता ॥७॥ एबेटी मेरी पाना मुख पोईने मनाए मन मानौर मब प्रम के कोनि ॥३॥ मुख बांटी मा पशुपमा परे, कमेव राती कावरा रफाईना वारे, प सकसीमा मानिनाममा तया सोईन अन मनाए मन नत्र पाठ के कौनि ॥४॥ होगमा अषियमोबीने नापना अमोहमपापान पाने भूप मारे उपमा, ए पर की पाठिपा दोवा मण्या हानि मपाए मन मातीर मामा मूक पोनि ॥ ५ ॥ मे राम्नाविनिपुषवामा म्पारवा मारमा भवानापासायसरा पाय पणा प माम्पण मागिनसम्परोपाईने नपरि मनमानीए नामोनि ॥६॥ दरबार मारमा पूर्वनाय नपा सपील रामपएम रुम रेनिया एका पता मापार भी ऐन पनि मनार मन मानार मान रोनि ॥1 भीमद् पवार ३ धर्मविषयक निसप्रकार दिनकरके विना दिन, शशिक पिना शरी, प्रमापति के बिना पुरको प्रगा, मुरसके बिना कविता, सहिम्मे पिना सरता, माफ विना मामिनी सामान दिखाई देते हैं, उसी करा, रापचन्द्र बार प्रते है, कि स्पर्मको मारम किये पिना ममुप्प महाम् कुकमा कडा पावा ॥१॥ बर्म बिना धन, बाम मोर मान्मको पके समान समझो, धर्म बिना परणामें मनुष्य तिरस्परको प्रास होता है, पर्म बिना धौमतोंडी धारणा बोसा साती है धर्म बिना मारम किया मा पुरके समाम पुपाता है, पर्म दिना यमा मेग टगाये जाते है (, बर्म विनाप्पानामा ध्यान रोग समसा माता इसलिय सुधर्मकी पास धुरंपताको धारण करो पारण करो, प्रत्येक धाम धर्मस पम्य पम्प माना जाता है।।२॥ प्रेमपूर्वक नापने हापसे मोह वीर मानके दूर करनेको, दुनिताले मात्र करमेको मौर माके फन्दको गोबमको सस सिखातको सहायतासे कुमतिके काटनेको, मुमतिके त्यापित करनेको पौर ममत्व के मापनेको। भर्म प्रचारसे महामोक्षक मोगनेको, अगदीशके बाननेको, वीर परम्मताके प्रश्न करने तथा मौलिक, मनुपम मुसका वनुभव करमेको पपार्प मप्पासायसे धर्मको धारण करो॥५॥ बमे पिक दिनमबिना यो दिनमा रेखार के साधनानी से मार, प्राविपिनासी प्रा पुरखनी पेखो तमिानी की कविता प्राप। नदी यानी धीमा भने महिनी ममिनी मम्मय परे पर बौअमन मा विना मानपी मान रोम, मध्यरा१॥ मर्म बिना नाम बापपुपानी पाये, बम विना मतीमा, रिया क्या" बर्मनीमनी बारनामोलो, पर्म ना, मयत: बर्म बिना पराक्र, जप न बामधुमे बर्मनापानी न रोम रमे रहे। पाच पायपास पर्मनी पुरता मरमाने पर पीपरा ॥२॥ मैपर मान मरने भारत मामार याने तेनिन दार इमारने मागने मुमत रपयामे मानन मसान पार्ष, माम मचाने मग या भाभाषपने मे मी मनापौर मन्धत मनुस्मन मनुस्मयाने बारपान बाये रतनग 'धर्मविपपक' धर्मक विमा प्रीति नहीं, धर्मके बिना राति नहीं, घमके विना हित मही, यह में हिसकी बात कहता . धर्मके निना टेक नहीं, धर्म मिना प्रामाणिकता नहीं, धर्मके विमा ऐक्य नही, धर्म रामका धाम है, धर्म विना ध्यान नहीं, धर्मके विना शान नहीं, धर्मी विना सथा भान नहीं, उसके बिना जीला किस धमका ! पर्मक बिना तान नहीं, धर्मफे विना प्रतिष्ठा नहीं, और धर्मके बिना किसी मा बचमका गुणगान नहीं हो सकता ॥१॥ सुम देनेवाली सम्पति दा, मानका मद , क्षेम झुमके उद्गारसे गाई मिससी हो, यह सम किसी कामका नहीं, अपानीका बोर हो, ऐशका उत्साह हो, दौरतका दौर हा, यह सब केवल नामका मुख निताका विष्णस हो, मौरसाका प्रकाश हा, सफे समान दास ने, धामका सुसरो, परन्तु अपचय करते है कि सधर्मको बिना पारण किये यह सा मुस दो ही कौपाका समझना चाहिये ॥५॥ जिसे चतुर लोग प्राप्तिसे चाइकर चिचमें चिन्तामणि रान मानत है, जिसे प्रेमस पीत सोग सरसमणि मानते हैं, मिसे कपि भेग कम्याणकारी कापतद करते , जिसे साधु छोग पुम क्षमस ममाका मगर मानते है, ऐसे धर्मको, मदि उमगसे भामाका उदार पाहते हो, ता निर्मल होने के लिये ति नियमो नमन कर। रामचन्द्र मीर करते है कि इस प्रकार धर्मपा रूप जानकर धर्मपि ध्यान स्लो धौर पहमसे सक्षम्युत न होओ ॥६॥ धर्म पिना मीत नहीं धर्म विना रीप नहीं, धर्म मना हित नहीं घुमनकामर्नु धर्म बिना रे नहीं, धर्म बिना नक नहाँ धर्म मिना ऐसा नहीं धर्म पाम राम। धर्म बिना मान नही बम बिना बानना धर्म लिना मान न प फोगा भानु ! धर्म मिना वान नही धर्म पिना चान नहीं धर्म बिना गान नहीं पचन तमाम ॥४॥ समती मुना राप मानवमा माहोप बमा सम्पनर हर तेषण कामद; हुपानी और रोग एपनो मारम दासतमा पर ऐप एवेनुन नाम: बनिता दिलासोप मौतवा प्रकारा पार रस मारा रोष रोष मुल बामर्नु पदे रापपर एम समर्मनेशरा मिला, गायीमुल एलोबेरपरामर्नु! ॥५॥ पानुपतिकी बासिामग्री वित्त पर परितो प्रभाव पारममन्त्री प्रमबी कोषपामग्रमवारीपरमान गरानी गरी सापु एम हमी भरममा सार्ममपी मनसे निर्मन पान पार, नमो माल नापी; परे पर ईधर्मग्री पानिमाम लिनाममपी H वि स १९९१ पैर ॐ श्रीमोक्षमाला 'मिसने मास्मा मान भी उसने सपा मान सिया" (निर्मपप्रवचम) १ पाचकको अनुरोध पापक या पुस्तक वाम तुम्हारे हस्त-ममममें भाती है। इसे पानपूर्वक बाँधना। इसमें को र विपर्पोको सिकसे चारना और परमार्थको एपमें धारण करना । ऐसा करोगे तो तुम नीति, विवेक, प्यान, शान, सक्षण वौर बाम पति पा सकोगे। तुम जानते होगे कि बहुतसे बाान भनुष्म म पाने योग्य पुस्तकें पाकर अपना वमान्य समप पा को देते है । इससे मे कुमार्ग पर चढ़ पाते हैं, इस मोको अपकीर्ति पाते है, और परमेकमें भाष गतिमें पाये। भाषा-पालकी पुस्तकोंडी तय पुस्तक पटन करने नहीं परन्तु मनन करनेकी है। इससे इस मन बीर परमा रेनों में तुसारा दित होगा । भगवान्के को हुए पचोंका इसमें उपयोग किया गया है। तुम इस पुस्तकाचा विनय और विकसे ठफ्याग करना। बिनय और विक ये धर्म गत है। तुमसे दूसरा एक पा मी अनुरोध है कि बिनको पाना न बावा और उनकी म हो, तो यह पुस्तक वमुक्रमसे उने पाकर सुमामा । में इस पुस्तकमें नो कुरा समातमें भ माने, उसे निचक्षण पुरुषोसे समान ना योग्य है। महारी वाल्माका इससे दित हो तुमान प्रति और वानन्द मि तुम परोपकारी दयाज, समानान विषको वीर पुनियानी बनो, मत् मगवान्से पाम याचना करके या पाठ पूर्ण करता है। २सर्वमान्य धर्म यो वर्मा का शुम जो उसे उसे लेहपूर्वक धनाताई। धर्म-तत्व का सिवा सार है समाप, गोरसपको हितरी॥१॥ भगवाने मारणमें कि दमाके समान सम्रा धर्म नहीं है। दोषाको नए करनेके किये बमदानबाप प्राणियोको सतोप प्रशन करो ॥ २॥ , मंगलबो मन तो समाई नोव्ने। मन मनोसामने विभर ॥१॥ मामलमा पवन पर्यन सिमाना अमरमस्वीर मानिने प्रमाऐव.२॥
मोसमासम ११ सत्य, शीठ और सम प्रकारके दान, दयाके होनपर ही प्रमाण माने जाते हैं। विसप्रकार सूर्यक बिना किरणें दिखाई नहीं देवी, उसी प्रकार दयाके म होनेपर सत्य, शील बीर दानमेसे एक मी गुण नहीं आता ॥३॥ गाँ पुष्पकी एक सहीको माहेश होता है, वहाँ प्रापि करमेकी मिनबरको बता नहीं । सब जीवोंके मुरकी इण्या करना, यही महापौरकी मुल्य शिक्षा है॥१॥ यह उपदेश सब दर्शनोंमें है। यह एकात है, इसका कोई अपर मही है। सब प्रकारसे निममगवानका यही उपरेश है कि विरोष रहित दया ही निर्मश दया है॥५॥ यह सप्तारसे पार करनेवाला मुटर मार्ग है, इसे उत्साहसे पारण करके सप्तारको पार करना पाहिये । यह सकस धर्मका नुम मूछ , इसके पिना धर्म सदा प्रतिकूल रहता ॥ ३ ॥ जो मनुष्प इसे ततरूपसे पहचानते हैं, वे शासत पुसको प्राप्त करते हैं। रामचन्द्र कहते हैं कि शान्सिनाय भगवान् करुणासे सिदए हैं, या प्रसिद्ध है ॥ ७ ॥ कर्मका चमत्कार मैं तु पन्सी सामान्य पिचितायें कहता । इनपर विचार करोगे तो तुमको परमका सदा रहोगी। एक बाब संदर पम्गपर पुष्पशम्पा शयन करता है और एफको फटीई गूदड़ी मी नहीं मिलती। एफ मति मांतिके भोजनोंसे तृप्त राता है और एकको काठी मारके मी छाडे परते है। एक जगणित ममीका उपभोग करता है और एक टी बादाम के लिये घर घर भटकता फिरता है। एक मधुर वचनोंसे मनुप्पका मन हरता है और एक नवाचक ससा होकर रहता है। एक मुर महासकारसे विमूपित होकर किरता है और एकको प्रस्सर शीतकालमें फमामा कपका मी वोइनेको महीं मिमता 1 कोई रोगी और कोई प्रथा है। कोई बुदिशाम बार कोई वा कोई मनोहर नयनवाग है और कोई मघा है। कोई एम-गम है और किसीके हाय और पैर रमणीय है। कोई कीर्तिमान है और कोई अपयश भोगता है।कोई डों मनुचरोंपर एम्म चगता है और कोई गोंके वाने सहन करता है। किसीको देसकर मानन्द होता है और किसीको देखकर बमन होता है। कोई सम्पूर्ण इवियोवानी चोर को पूर्ण इन्द्रियोनामा है। किसीको दौन-दुनियाका छेश भी मान महीं और किसीके दुसका पार भी नहीं। सपने का एन वा होइने सो प्रमाण सा ना तो ए नहीं एक पिना पुरण मी रेख॥३॥ पुषवर्गमावूमन मिनबरनी ला मही माशपा सर्व बीवन मे सब मानारको विच मुख ॥ ४ ॥ नरनि प उपरोछ ए एकाते नहीं निषा सर्व प्रकारे मनोयोग सासा निर्मन मषियेष ॥५॥ ए मपवार सेटर पर बार वारा सलाद धर्म उफनपाएम मन ए पर धर्म क्या प्रतिमा दसम्मवीर मोम्स हेलपाने वापत मुने सतनाव मफ्यान प्राम, गारमाए भि.॥
[ मानणे भीम पवन कोई गर्मापानमें बाते ही मरणको प्रस हो पाता है। नन्म लेते ही तुरत र पाता है। कोई मरा मा पैदा होता है और कोई सा पत्र पर होकर मरता है। किसाका मुख, माया भीर स्थिति एकसौ मई। मर्स रामगोपर खेम क्षेमके उगस बर्ष Pपा नावावीर समर्थ मिशन पका सावे । इम प्रचार समस्त नगत्य विचित्रता मिम मित्र प्रकारसे तुम देसते हो। क्या इसके उपरसे तुम्हें कोई चिR मता । मैंने बोया पदि उसक उपरसे तमें विचार बावा हो, तो कहो कि यह विचित्रता किस कारणसे होती है। अपने माग र शुभामुम कर्मस । कमसे समस्त संसारमें भ्रमण करना पता है। परमा नहीं माननेवास सप इन विचारों किस कारणसे करते हैं, सफर सपा विचार करें, तो ये भी इस सिबतच मान्य रम् । ४ मानपद जैसा कि पदिसे का जा चुका है विशम् इस मानकीको इस सब होंसे उत्तम करते हैं। उत्तम बनेके कुछ कारणाका हम पहागे । पर ससार बराइबसे भरा एमा। इसमेंसे जानो तरकर पार पानका प्रपान करते।। मोधको सावकर ये अनंत सुसमें विराजमान होते हैं।यमोश सरी किसी से नही मिन्ती । चि और नरक इनमे किसी भी गतिसे मोच न केस मानक्शा से ही मोक्ष है। पर तुम छोगे सिर माननियोको मालपों नहीं होता ! उसका उचर या कि जो म्पनापना ममानते है संसार-कसे पार हो जाते है। जिनमें विवेक युधि तय ईरो, और उससे मयामयके निणपको समसार, यो परम तत्त-भान वया उचम बारित्रलप सबर्मका समन करके अनुपम मेरा पाने हैं, उनके देशलापनेको मिस मन्तवपना करते है। मनुष्य के शारीरकी बगावत के उपरसे निशान उमे मनुष्य नही करते परन्तु उसके विपके कारण उसे मनुष्प करते हैं। सिके दो सप, हो , ति हो कान, एक मुफ दो हो और एक बार उसे मनुप्प करना ऐसा हमें मारी समझना चाहिये । परि सा समझे तो सिर बदरको मी मनुष्य गिनना चाहिये । उसने मी सवय पाप पर भारि र पुर प्राप्त किया है। विशेषमासे उसके एक ग मी कास्पा उसका मामनुन्य करना चाहिये ! मही, महो। यो मानवफ्ना समन्मताको मानव काम सकता है। पानी करते हैं कि पा मा बाम है, मवि पुष्पके प्रमानसे पर देर मिझती है इस रिप मे पास्तामे आममिरि र ना माहिथे । भपमतकुमार, गममममार जैसे छोरे बापाने मी नानापनेको समझनेसे माभ प्राप्त की। मनुष्यों को निक्षेप शदि उस शापिसेप मोगमा हामी म प्रामीकोमा पशम र तारे। इस शखिसे परिद अपने मममी हापो शहर हो नाम्पागो। रिमो मी पम्प में पूर्व सन्देिसका ग्य नहीं होप, और मोरके गम्-मार्गमें प्रवेश नही मामा म रिप से मिहुए समाव एम मान साह कर देना बारमक है।
मनापी मान] मोसमासा पतसे मूर्म दुराचारमें, अपानमें, विषयमें मौर बनेक प्रकारके मदमें इस मानबहको पया गुमाते है, अमाप कौस्तुमको सो मैठते हैं। ये नामके मानब गिने जा सकते है, पार्का तो बानरम्प हो। मौतकी पळको, निमपसे हम नहीं जान सकते। इस रिये से मने पैसे धर्ममें परासे सावधान होना चाहिये। ८ अनापी मुनि (१) अनेक प्रकारको ऋदिवाला मगध देशका श्रेणिक नामक राजा मनकापाके लिये मडिकुम मामके बनमें निकल पा । बनको विचिश्ता मनोहारिणी थी । यहाँ नाना प्रकारके बम सोपे नाना प्रकारको कामठ ये घटाटोप फैली हुई थी। नाना प्रकारके पक्षी आन्दसे उनका सेवन कर रहे थे, नाना प्रकार के पक्षियोंके मधुर गान को सुनाई पासे थे, नाना प्रकारके मोसे बह मन छापा एमा था, नाना प्रकारके उसके भरने यहाँ बहते पे । संक्षेपमें, यह बन नानमन संसा गता था । इस बनमें एक एसके माचे महासमाधिषत किन्तु मामार भौर मुम्मोचित मुनिको उस श्रणिकने बैठ पर रेसा । इसका मप देसकर उस राजाका मापन्त आनन्द हुआ। उसक उपमारहित मापसे सिस्मित होकर यह मन ही मन उसकी प्रशसा करने सगा । इस मुनिका कैसा जभुत वर्ण है। इसका सा मनोहर नप है। इसकी कैसी अनुत सीम्पता है । यह फैसी विस्मयकारक क्षमाझा धारक है। इसके अगसे वैराग्यका सा उत्तम प्रकाश निफान रहा है। इसकी निर्योमता कैसी दीखती है ! या सपति कैसी निर्भय नम्रता धारण किये हुए है। यह मोगसे फैसा निरक!स प्रकार चितमन करते करते, जानन्दित होते होते, स्तुति करते करते धीरे धीरे धरते हुए, प्रदक्षिणा देकर उस मुनिका परम फर न पति समीप और न अति दूर वा धणिक बैठा । वा में दोनों हाथोंका बोष कर विनयसे उसने उस मुनिसे पूछा 'हे आर्य ! आप प्रामा करने योग्य तरुण हैं । भोगविलासके लिये मापको पय अनुस है। ससारमें नाना प्रकारके सुर हैं। ऋतु इनके काम मोग, उस सबधी मिठास, तथा मनोहरिणी सियों के मुम-सपनके मधुर श्रमण होनेपर मी इन सबका स्पाग फरफे मुनिस्पर्म वाप महाउपम फर ये है इसका क्या कारण है, यह मुझे अनुमा करके कहिये।' रामक पेम पपन सुनकर मुनिने फरा--- 'हे पनन् ! मैं अनाप था। मुझे वर्ष पम्नुका प्राप्त करानेवासा, योग क्षेमका करनेवाला मुसर भनुकपा डानवाला फ्रुणामे परम-मुमका दनेबाला कोई मरा मित्र नही एमा। पद कारण मेरे मनापीपमेका पा) ३ अनापी मुनि (२) श्रमिक मुनिफ मापमसे स्मित हास्य परफ मोठा, "आप महापरितका नाय क्यों म दागा। परि फाई आर नाप नहीं है तो मैं हाता हूँ। मयप्राण ! आर मागासे मोर्ग। संपति। मित्र झातिमेसम इम माने मनुष्य मपो म परें । " नापीने कहा- अरे भणिक गा! परम्नु तू ता प्रिय अनाप , तो मेरा माप क्या होगा! निर्भन पनाम्य पहामि बना मुम्मा । माप पुदिनान कराने कर सकता ! वारिला घाम । सता! बप्पा सेवाम पाहीमे - - भीमद् रामचन्द्र मना मुनि दे सकता है। पन तू सप बनाप है तो मेरा नाप कैसे होगा!" मुनिके बचनसे रामा पति बाल और अति विस्मित इमा। बिस रचनका कमी मी ममम नहीं हुआ था, उस बबनके पतिके मुससे रण होनेसे पा संक्ति इला और योग- मनेक प्रश्यर कसोका भोगी। अनेक प्रकारके मयोन्मत्त हापिोका स्वामी जनक प्रकारकी सेना मेरे बापान है। मगर, प्राम, जवापुर वार चतुपादकी मेरे कोई म्यूमता महा। मनुप सबपी सब प्रकारके मोग मैंने प्राव मे, अनुपर मे बसाको मण मति पालते है।इस प्रकर रामाके पेय सब प्रकारकी सपति मेरे पर है मोर भनेक मनोभित पर मेरे समीप दवा है। इस तर महान् होनेपर भी मैं बनाय क्यों । को भगमन् ! माप पपा म बोलते हों।" मुनिने कहा "फ्यम् । मेरे कानेको त भ्यायपूर्वक नहीं सममा । म म जैसे बनाय एषा वीर पैसे मैने ससारका माग किया र पाता। उसे एषा और सावधान पिसे सुन । मननके या तू अपनी शाकाके समासम्मका निर्णय करना • कौशांबी मामकी मति प्राचीन बौर विविध प्रकारकी मम्पवासे भरपूर एक पर नगरी है।को इपिसे परिपूर्ण षम सक्य मामका मेरा पिता पता था ।रे महाराय | पलनके प्रथम मागमें मरी बसि बतियेमासे रि गई और समस्त शरीरमें अमि चम्ने गौ । शससे भी अतिशय ताण यह रोग की तरह मेरे ऊपर कोपत्पमान हुमा । मेरा मम्तक म बाँसकी क्सप पेनासे हुसमे ग्गा । के प्रसार सी, सरोकने मी और भय उपमानेवाण इस दाम्म ऐनासे में पत योको पा । पक-शाबमें निपुण तसे वराब मेरी इस मेमाको दूर करनेके रिपे आपे और उन्हाने अनेक भौषष उपचार किये, परम्त स्व सपा गये । ये महानिपुण गिने मानेवाले वैवयन मुश उप्त रोगसे मुक्त न कर सके। हे रामन्! पही मेरा वमाषफ्ना था। मेरी बासको पेदनाको र करने के लिये मेरे पिता व पन देने यो परम्त उससे मी मेरी मायेनार नहीं है। एम् ! यही मेरा नापपना पा । मेरी मावा पुश्के शोकसे अति दु नार्व पी, परत ए म मुझे रोगासे न हटा सकी। रणन् । पही मेरा बनायफ्ना पा । एक फेरसे जन्मे ए मेरे म्मेष्ठ बौर कनिष्ठ मईपनि जम्नेसे मनता परिप्रम किया पर मेरी वेदना दूर म हे रापन् । यही मेरा पनापफ्ना पा । १६ फेसे मामी मेरो ग्येण और कनिष्ठ भगिनियाँसे मी मेरा पसर नहीं सारे महाराणा पही मेरा वनापपना पा। मेराको जो पतिस्ता, मेरे उपर अनुरळ वौर प्रेम बती पो मने बासुजोंसे सपको प्रक्ति करती पौ उसके सम पानी देनेपर मौ वीर माना- प्रकरके उबटन धुप बा मुर्गचित पदार्थ तपा बनेक प्रकारके एम वादिने माने जमाने सिग्न किये जानेपर मौ मैं उस स्विफ्नसे अपने रोगको शान्त नहीं कर सका । क्षणभर मी मा म रहनेवाली मी मी मेरे रोगको नही र कर सारे महायम यही मेरा वनापपना पा । इस तब रिसोरे प्रेम सिमाकी भोरपिसे किसीके मापसे और किसीके परभमसे या रोग शान्त मामा। इस समय पुम पुन में मसम मेमा भोग रहा था। बादमें मुझे प्रपंची समारसे केरामा। पार परि रस या पिशवनामपदमासे मुक्त हो गाउँ, वो वी, ती मीर निगरमी प्राम्पाने रण १६, ऐसा विचार कररे में सो गया । स प पतात ई उस समपरे महायम ! मेरा बा मनारी मुनि मोसमाम बेदमा क्षप हो गई, वौर में निरोग हो गया । माता, पिता, सवन, बाधम बादिको पूंछकर प्रमासमें मैंने महसमानत इन्द्रियोका निग्रा फरमेवाळे, मौर वारम्मापाविसे रहित भनगारपनेको पारण किया । ७ममापी मुनि - . श्रेणिक राजा ! तबसे में मामा-परमाका नाय एला । बस मैं सब प्रकारके बीयोंका नाय । तुझे बो शका हुई थी वह वप र हो गई होगी। इस प्रकार समस्त मगर-चक्रवती पर्यंत- मशरण बार मनाप है। यहाँ उपाधि है वहाँ अनापता है। इस टिये जो मैं कहता हूँ उस कपनका तू मनन करना । निधय मानो कि अपनी लामा हो दुसको मरी हुई पवरणीका कर्ता अपना बारमा ही फूर शामसि सबके दुसका उपनाने वाला है, मपना बारमा हो पारिस पस्तुरूपी की देनेवाला कामधेनु सुसका उपनानबाता है अपना वामा ही नवनानके समान वानदकारी है, वपना बारमा पीकका करनेवाम है सपना बारमा ही ठस कर्मका टालनेवाला है। वफ्ना लामा हो दुलोपाठन वार अपना बारमा ही और मुस्तोपार्जन करनेवाला ह; अपना वरमा ही मित्र, वीर मफ्ना बारमा ही पैरी, अपना मारमा ही कनिष्ठ माघारमें स्थित, और अफ्मा बारमाही निर्मर वाचारमें स्थित यता है। इस प्रकार प्रणिकको उस मनायो मुनिने बास्माके प्रकाश करनेवाले उपदेशको Pिया। येणिक रानाको यात संताय वा । वह दोनों हायोंको गोद कर इस प्रकार बोला-" हे भगवन् । नापने मुझे ममी भाँति उपदेश किया, आफ्ने पयार्थ अनायपना कह बताया । महर्षि ! बाप सनाप, आप स्थापन और वाप सधर्म है। माप सब मनापाक नाप है। पवित्र स्पति ! मैं मापसे क्षमा मांगता । मापको बानपूर्ण शिक्षासे मुझे प्रभ हुमा है। महामाम्पान्त ! धर्मप्यानमें विन करनेवाले मोगोंके मोगनेका मैने बापको नो मामत्रण दिया, इस अपने अपराधको मस्तक नमाकर मैं क्षमा माँगसा हूँ।" इस प्रकारसे स्तुति करके राजपुस्पकसरी भेणिक विनयस प्रक्षिणा करके अपने स्थानका गया। महातपोधन महामुनि महाप्रभात, महापरावत, महानिप्रय धौर महामुत अनापी मुनिमे मगध देशके अणिक रामाको वने यांते हुए परिप्रसे गो उपश दिया है, यह सचमुच मशरण मावना सिद्ध करता है । महामुनि अनायासे मोगी हुइ वेदना के समान अपना इसस भी अस्पत विशप देनाको बर्नव मारमानोंको भोगते हुए हम देखते है यह कैसा परणाय ! ससारमें बशरणता और बनत अनाफ्ता छाई हुई है। उसका स्याग उत्तम पत्तहान और परम धीम्फे संबन करमेसे ही होता। यही मुक्तिका कारण है । जैसे संसारमें यता मा मनापी वमाय था उसी तर प्रत्येक वारमा वहानकी प्राप्तिके विना सदैव अनाथ ही है। सनाप हानेके सिय सरब, सर्म और सास्को बानना भौर पहचानना बावश्यक है। ८सदेवताप तीन तत्वोंको हमें समय मानना पाहिये । जब तक इन वालोंके सबमें मानता यता तब तक वाहमाका हित नहोना। ये तीन तल सरेच, सद्धर्म, और सद्गुर है। इस पाटमें हम सरेमा स्वरूप संक्षेपमें करेंगे।
भीम रावत [समक्त चायती रानाविरार भपका रामपुत्र होनेपर भी गो ससारको एकांत पनंत धोकका कारण मानकर उसका त्याग करते है, जो पूर्ण दया, शांति क्षमा, मीतयगता वोर वाम सपदिसे त्रिविध तापका रूप करते ; गोमाटम तप और मानके द्वारा बारम-चिसोपन करके कमकि समाको मम रास्ते है, मिनेंद्र और पसे मौ पत उम्ना शुरप्पान प्राप्त होता है। वो सब प्रकारचे निशका पप करते है। नो संसारमें मुख्य गिमे पानेबारे कानावरणीय, दर्शनावरणीय मोहनीय वौर पतराप इन चार फर्मोको भस्मीभूत करके वशान बौर के दर्शन सहित अपने सरूपसे बिहार करते है। यो पार बपाति का गने तक पयासातचारिऋप उत्तम शौछका सेवन करते । जो कर्म-माणसे बकुलापे गए पामर प्राणियाको परमशति प्राप्त कराने के लिये शुम सारभूस तानका निफारण करमा मेघनारापासे उपदेश करते है जिनके किसी भी समय किंचित् मात्र मी संसारी मन विगतका स्पेश मी बाकी नहीं या बो पनघाति कर्म अप करने के पहले अपनी पस्पता मानकर भौमुस- बायास उपदेश मही करते जो पाँच प्रकारका वंतराम, हास्प, रति वरति, मय, मुगुप्सा शोक, मिप्यान, सान अपस्यास्पान, राग, प, निवा, वौर काम इन कठाय पोंसे रहित है। यो सविधामम्द सम्म निराजमान हैं निमो महाउपोतकर पाय गुण प्रगट होते हैं, जिनके पम्म, मरण भार बनत सतार मा हो गया है। उनको निर्मथ बागममें सदेव कहा है। इन दोपोंसे रहित घर नामस्वरूपको प्राप्त करनेके कारण ये पूनाप परमेसर को जाने योग्य है। पर कोहए भयययोमेसे परि एक मी दोष हो तो सरेपका स्वरूप मही घटवा । इस परमतत्वको महान् पुरुपोंसे पिपसे नानमा भागदपकरें। ९ सर्मतत्व बनानिमाससे कर्म-गाउके वनसे यह बामा प्रसारमें मटका करता है। सण मात्र मी उसे सवा सुम्स नही मिझता । या बोगविध सेवन किया करता है। मधोगतिम पाताई बामाको रोककर नासहतिको देता। उसका नाम धर्म मा जाता है और यही सप पुम्का उपाप है। इस धर्म तपके मब भगवान्ने भिम भित्र मेदर है। उनमें मुम्प मे दो है।—म्यवहारधर्म और निपपर्म । म्पबहारधर्ममें दया मुम्प ।स्प बाद मायके चार मझाम्त मी दयाको रक्षाके छिये ।। प्याके मार भद्रम्पदपा भारदपा सपा परदपा, स्वपश्या, वनुवपदमा म्याहारदया, निधपापा । प्रपम इम्पश्या-प्रस्पेक काम यमपूर्वक जीवोंधी रक्षा करक करमा 'इम्पदया। दूसरी मापदपा -पूसरे बीनको दुर्गनिमें बाते मकर वनुरूपा बुद्धिस उपदेश दमा 'मायया है। नोसरीमदया–पा आमा मनार काम्मे मिष्याबसे प्रसित है ततो नही पावा, दिनमाा नही पा सकता हम प्रचार विधान कर धर्ममें प्रवेश करना • सदपा है। पीया परपा-र कम्पड़े गीतों की रक्षा करना परइया है। पचिपी सरपदया-ममम Rकस सम्प नार करना सबपल्या की अनुपदया-सद्गुरु बता सुशिका शिष्य को पचनासे उपदेश देमा परपि पह देगनम अपाय हगता है, परन्तु परिणाम करणारा कारण है-इसन्न माम अनुयदया है।
मोसमाना सातवी म्पपारदया–उपयोगपूर्वक भार विधिपूर्वक दया पाउनेका नाम 'म्यबहारदया है। पाठी निसयदया-मुद्र साप्य उपयोगमें एकता भाष और बमेद उपयोगका होना निधयदया है। इस भाठ प्रकारको दयाको लेकर मगबान्ने म्यवहारधर्म का है। इसमें सब जीवोंके मुस, सतोर मार नभपान प सब विचारपूर्वक देसमेसे मा जाते है। दूसरा निमयधर्म--भपने स्वरूपको भ्रमणा दूर करनी, नामाको मारममावसे पहचानना, यह ससार मरा नहीं, मैं इससे मिम, परम असग, सिट साश शुर वारमा ' इस तरवारम- ससमाबमें प्राधिकरमा 'निसयमर्म है। वहाँ किसी प्राणाको दुस, महित वा असतोष होता है, वहाँ दया नहीं, भार वहाँ दया नहीं यहाँ धर्म नहीआंत मगवान्के को एए पर्मतत्तसे सब प्राणी मप गित हावे है। १. सहस्तव पिता-पुत्र ! तू निस शाखामें पाने पाता है उस शामका शिक्षक कौन है। पुत्र-पिताजी ! एक विशन् भार समसार ग्रामण ।। पिता-उसकी पाणी, पाउचकन वादि फसे है। पुत्र--उसकी नामी बहुत मधुर हापा किसीको भविषेस नहीं मुसाता, श्रीर यात गंमार है, जिस समय पर गोडता है, उस समय मानों उसके मुखसे झक मरते है।म किसीका भपमान मही करता वीर जिससे हम योग्य नीतिको समठ सकें, ऐसा हम शिक्षा देता है। पिता - वहाँ किस फारणसे जाता है, सो मुछे कह । पुत्र--बाप ऐसा क्यों करते है, पिताजी ! में ससारमें विचक्षण होनेके लिय परतिपाका समई और म्यबहारनौतिका सौर्य, इसरिपे बाप मुझे वहाँ भेजते हैं। पिता-सेरा शिक्षक पनि दुराचारी अपना ऐसा ही होता सो ! पुत्र-तब तो बहुत मुरा होता । हम अधिक भार पुषचन बोम्मा वाता । म्पपहारनाति तो फिर सिम्पमता हो कान! पिता-लेमा पुत्र ! इसके उपरस म अब तुम एक उत्तम शिक्षा करता है | बसे ससारमें पानेक सिपेम्याहारनाति सम्पनी भाष'पकमाई से ही परमपके लिये धर्मतत्त भार धर्मनीनिमें प्रवेश परनको मापकता ह । बस या पबहारनानि सवारी शिक्षस उत्तम प्रकारसे मिल सकती ह, पसे दी परमपमें भयस्पर पमनानि उत्तम गुस्से से मिट सकता है। म्पबदारनीतिक शिक्षक और धमनास्तिक शिसम्में बहुत मेर। बिहारके टुकाक समान पबहार-शिक्षक और भम्म्य कीम्नुभफे ममान आमपर्म-शिक्षक है। पुष-सिरसय ! भासा ना पाप है। पमरे भी मुम्हा आपला मारने पार बार ममारफे अनंत पो संच मुचन कदा । ममाग्मे पार पानक रिो धर्म सदापमून इमार धर्म कम गुम्स प्राप्त पानेमे अपम्फर हो माना है, या मुप्तमा फरफ दिए ।
भीमद पन्त ११ सहस्तत्व (२) पिता-पुत्र! गुरु तीन प्रकार के कोमाते हैं--कारस्वरूप, कागवतरूप और पपरसस्म । काटसरूप गुरु सोचम रें। क्योंकि संसाररूपी समुद्रको काटस्वरूप गुरु पार होते है, और इसको पार कर सकते हैं । कागस्वरूप गुस् मध्यम है। पे संसार-समुद्रको रूप न0 पार कर सकते परम्त छ पुण्य नपान कर सकते हैं। ये दूसरेको नहीं पर कर सकते | पपरस्वरूप गुरु सप हसते हैं, और दूसरों को मी सुमाते हैं। कायस्वरप गुरु के ग्नेिश्वर भगवान् के ही शासनमें है। मात्र दोनों प्रकारके गुरु कावरणको पदि करनेवाले हैं। हम स्व उचम पसको बार है, और उत्तमसे उत्तम बस्वर मिल मी सकती हैं । गुरु परि उधम हो तो यह भा-समुद्र माविकरूप होकर सर्म-मानमें बैठाकर पार पाँचा सकता है। तत्मानके भेद, स्वस्वरूपमे, कार्गक विचार, समार-सम्म यह सब उत्तम गुस्के बिना नहीं मिल सकता । अब में प्रश्न करनेकी म होगी कि ऐसे गुरुके कौन कौनसे सहण है । सो करता है। जो मिनेश्वर भगवान्को को हुई वादाको जानें उसको पथारपसे पाठ और सरको उपदेश करें कपन वौर कामिनीके सर्मपा त्यागी हमर माहार-वठ ते 0 पईस प्रकारके परोपह मन करते हों, सात, पात, निरमी वीर जितेन्द्रिप , सैदान्तिकतयानमें निमत पते हो फेक धर्म किये ही शरीरका निर्वाह करते हों, निर्मप-पंपो पालते हुए कापर न होते हों, सौक तक मी विना Pय नम्वे हों, सब प्रकारके पनि मोरमके स्पागी हों, सममाषी हा, वार मातरम्गवासे सपोचक संक्षेपमें, ठकाष्टस्मरूप सगुरु मानमा चाहिये । पुत्र ! गुरुक जाचार और जानके संबंध वागममें परत फिर्णक वर्णन किपा गया है । यो म्पों व बागे विचार करना सोसता नापगा, त्यों स्पों पाये में हुई इन विशेष तसोका उपदेश करता जाऊँगा। पुत्र-पीनामा मापने मुह संशा गत उपयोगी और कायाणमय उपदेस या मैं इस निरन्तर मनन कराएगा। १२ उतम रस्म संसारमें एने पर मी उतम भापक मस्यामके एरा वाम-म्पाणका सापन करते है, उमका गृहस्थाश्रम मी प्रशंसनीय है। उपम पुरुष समापिक, समाना, चोलिमार प्रत्याभ्यान इत्यादि पम नियमो सेवन करते हैं। पर-पनी भोर माशिम रि रहते है। सपा पपाशक्ति दान देते है। गत मधुर और कोष मारा मोसे है। सत् शो मनम करते हैं। पपारादि गोरियमें भी भाया- प्यादि नही करने । सी पुर माता BAT मुनि और गुरु इन समरामपापम्प सम्मान करते हैं। मा बारचे धर्मग्न उपदेश देते है।
मिनपरकी म मोसमाता यत्नसे घरकी स्वच्छता, भोग्न पकाना, शयन इस्पादि कराते हैं। म्मर्प विचक्षणमासे माघरण करते हुए भी और पुत्रको विनयी और धर्मामा बनाते हैं। कुटुम्म में एक्यको पदि करते है। आपे हुए अतिपिका पयायोग्य सन्मान करते है। याचकको झुधातुर नहीं रस्ते । सत्पुरुषोंका समागम, मौर उनका उपदेशा धारण करते है। मिरतर मर्यादासे और समोपयुक्त पते है। यपाशाकि परमें शाम-सचय रसते हैं। मम्प वारंमसे म्पबहार पठाते हैं। ऐसा गृहस्पानास उपम गतिका कारण होता है, ऐसा मानी मोग करते हैं। १३ जिनेश्वरकी भक्ति - विज्ञामु विचक्षण सस्य ! कोई शकरकी, कोई प्रशाकी, कोई निष्णुकी, कोइ सूर्यफी, कोई ममिका, काई भवानीकी, कोई पैगम्बरका और कोई प्राइस्टको मक्ति करता है। ये लोग इनकी भकि करके क्या भाशा रस होंगे। सस्प—प्रिय सिामु ! पे भळ लोग मोक्ष प्राप्त करनेको फ्रम मापासे इन देवोंको मजते । निहास-तो करिये, क्या वापका मत है कि इससे ये उत्तम गति पा सगे ! सपनकी भक्ति करनेसे ये मोझ पा सकेंगे, ऐसा में नहीं कर सकता । मिनको ये होग परमेघर करते उन्होंने कोई मोलको नहीं पाया, तो ये फिर उपासकको मोक्ष कहसि दे सकते है। शकर गय कर्माका क्षय नहीं कर सके, वौर ने दूपोंसे युद्ध है, इस कारण वे पूमने योग्य नहीं । निवास-पे दूपण कौन कौनसे है, यह कहिये । स्प-यान, निशा, मिप्याल, राग, देप, परिरति, मय, शोक सुगुप्सा, दानांतराप छानराप, पर्यावराप मोगातयय, उपमोगातराप, काम, हास्य, रति और मावि इन षटार दूपगों से परि एक मी पण हो तो मी नेमपूम्य है । एक समर्थ परितने भी कहा है कि ' मैं परमेश्वर ।' इस प्रकार मिथ्या पैतिसे मनानेबारे पुस्प सप अपने वाफ्को ठगते हैं। क्योंकि पासमें भी होनेस ने लिपपी बरते हैं, काम धारण किये हुए होनेसे बेरेपी टयरत है, जपमान धारण करनेसे उनके पिता म्पमपमा स्थित होता है, मेरो घरममें मा, मैं सब पापोंको हर दंगा' एमा कानेगा बमिमानी और नास्तिक यरता । एसी दशा मिर मरेको में से पार कर सकत । तया पतस बरतार लेनेके कारण परमेशर कागते है, ता इससे सिम होता है कि उन्हें किसी कर्मा मोगना ममी बाकी है। विामु-मई ! तो पम्प कीन है, और किसको मति करनी चाहिये, निमसे मामा सशठिका प्रकाश करे!
" भीम रासचान [म्निमें मच रुपएस, सविद्यानन्दस्वरूप, जीवन-सिन भगवान्, तपा सर्पक्षण पित, कर्ममम्मीन, मुळ बातम्ग, सफरमपसे रहित, संघ, सपर्य, निमबर मगवान्की मभिसे वारमशक्ति प्रकट होता है। --क्या या मानना है कि इनकी मक्कि करनेसे हमें ये मोश्च देते है। सम-माई विघाम ! अर्नत बानी मगमन् तो पतिरागी भोर निर्विकार है । उन्हमें सुति-निन्दाका कुछ मी फारेनेका प्रपोग्न नहीं। हमारी बामा कानी और मोहोर होकर रिस धर्म-से निगई, उस कर्म-मको दूर करनेक रिये क्नुपम पुरपाको वासकता है। सब कर्म- को आयकर बनवान, भनतर्शन बनतचारित्र, मनतार्थ और स्वस्वरूपमय हुए जिनसरका स्वरूप भारमाको निश्चफ्नयस प्रति नेसे उस मगवान्या स्मरण चिंताम, पान, और मणि पा पुस्पार्थ प्रदान करता है विकारसे वाहमाचे विरत करता है, तया शौति और निरा देता है। जैसे तबार हाप सेनेसे चौपाणि वीर भांग पानसे नशा उत्पन होता है वैसे ही इनके गुणों का पितान परनसे भारमा सस्वरमा की श्रेणी मता नाता है। रर्पण देखनेसे नसे मुसको बातिका मान पता है से ही सिर मपमा निनेश्वरके सरपके पितानरूम वर्पणसे आत्म-सम्मका मान होता है। १४ जिमेश्वरकी मति (२) शिमलार्य सम्प! सियसम्मको प्रा गिनवर तो सभी पूज्य है, जो फिर मामसे मणि करमेको स्पा वाश्यकता है। सयौ, काश्य है। बनत सिद्रसम्मका पान करते हुए मुबसरूपा विचार होना यह कार्य है। परन्तु उनाने निसके शप उस सम्मको प्रत किपा प कारण कौनसा है, इसका विचार करनेपर उनके उमनप महान् परम्प ममत दया और ममान् प्यान इन सबका स्मरण होता है, तपा अपन ात् तार्यकर-प में व मिस नामसे बार करते थे, उस नामसे उनके पवित्र मात्र वोर पनि परिबका बतावरणमें उप होता। परम्प परिणाममें ममा गमदापक । उदाहरणके लिये महापौरका पवित्र नाम स्मरण करनेसे ये काम पे, कब ए, उहोंने किस प्रकारसे सिसि पापी इत्पारि चरित्रों को स्मृति होती है। इससे हमार राम्प लिक इस्पादिका उम्प होता है। शिम- परम्त सोगस्स में वो चौमाम रिनेपरके मम्मोंका सूचन किया है इसका क्या हेतु पर मुखे समसमप । सत्य-सका यही कि इस कामें इस क्षेत्र में हानेपाम पौस जिनपरो नामकेवर उनके परिपके स्मरण करनसर सम तापवयगीका पारित बरम्पका उपेपरामर्मत बासौर मनानाम मिदसतापमें समग्र मा गाते हैं। मान पाके पौषीस वर्षिक नाम इस काठमें नमको पनि पान सम्म बाम मा सतिम भाता। वैसे इनके नाम इस काम में छिपे 1 मे हो बाबीसी बांधीमान नाम और पीवीसी बाटनेपर मिपे गाते है इसलिये बमुक नेमें कोई नहीं है। परन्तु उसके गुमो पुस्पाकी सविक किये मान कोषासावीसति ना या तारा है। उनका म, मिार, उपसा यह सब माम निक्षेपसे माना जा सकता है। इससे
।
माया उपदेश
मोसमासा
२१
हमारी भारमा प्रकाश पाती है। सर्प जैसे बांसरी के शम्दसे मागृत होता है, वैसे ही मारमा अपनी सस्प
अदि सुननेसे मोह-निनासे बागृत होती है।
मिशासु-मुझे मापने मिनेश्वरको मछि करनेके स्वपमें बहुत उत्तम कारण बताया ।बिनेश्वरकी
मकि कुछ फलदायक नहीं, माधुनिक शिक्षासे मेरी मो यह आस्था हो गई थी, या माश हो गई।
मिनेसर मगवान्को मजि अश्य करना चाहिये, यह मैं माम्प रसता है।
सस्य-विनेश्वर मगमान्की महिसे अनुपम साम है । इसके महान् कारण है। उनके परम
उपकारके कारण मी उमकी मलि बस करनी चाहिये । तपा उनके पुरुषार्थका स्मरण होनेसे मी
शुभ चियोंका उदय होता है। जैसे जैसे प्रीमिनके स्वरूपमें पति छय होती है, कैसे पैसे परम
शक्ति प्रवाहिस होती है। इस प्रकार मिनभफिके कारणोंको यहाँ सक्षेपमें कहा उनें मारमापियोंको
विशेषरूपसे मनन करना चाहिये ।
१५ मक्तिका उपदेश
निसकी शुम शीतवसामय छाया है, जिसमें मनवामित फोकी पति स्मी है, ऐसी कल्पाप-
ममा निनमतिका बाप को, नौर भगवान्की माळ करके भवके मतको प्रास करो ॥१॥
इससे मानन्दमय वफ्ना बास्मस्वरूप प्रगट होता है, और मनका समस्त सताप मिट जाता
है, वपा बिना दामोंके ही कौको अस्पन्त निर्मरा होता है, इसलिये भगवान्की मफि करके मपके
अंतको प्रास करो।।२।।
इससे सदा सममाषी परिणामों की प्राप्ति होगी, कत्यत गा और अधोगतिमें छेनानबारे जम्मका
माश होगा, तया पह सम मगठमप है, इसकी पूर्णत्वपस इन्डा करो, वीर मगवान्को मति करके मनके
मतको प्राप्त करो ॥३॥
शुम मावोंके द्वारा मनको सुन करो, नवकार महामत्रका स्मरण करो, इसके समान और दूसरी
कोई वस्तु नहीं है, इसलिये मगवान्की भक्ति करके भबके क्तको प्राप्त करो ॥ ॥
इससे सम्पूर्णरूपसे राग-फयाका क्षय करगे, और पयार्य रूपसे शुभतत्त्वोंको धारण करेंगे।
रामचन्द्र पाते हैं कि मगपजिसे अनस प्रपचको दान करो, पौर मगपानको भक्तिसे मयके भतको
प्रस करो ॥५॥
महिनोपदेश
बोरकर
प्रम पौवम्वामय काय या ममाव पोम्पककही।
निम्मच महो तामस भो मारने ममावत मखमो॥१॥
निवभारमस्वस्म एमपरे मन ताप उवार दम्पम मरे
भावनताबणराम प्रो मने मपर्वत मत पा॥२॥
सम्मावि सरा परिवाम मो बामद भयोगति म को;
गुम मप मा परिपूर्णपणे मम्ने मात मत समो॥३॥
प्रम मावो मन मकर मकार महासने समये
नदिप्यमान गुमामो मने ममद मद मो॥४॥
करणेबपवारपारणे पुम वापसम्म पपा,
नपान मपंचमनट पो मने मास मदो॥५॥
૨૨ भीमन् पवन [मावत मज . १५ बास्तविक महता पातसे डोग समासे महत्वा मानते है, गुस्से महान् दम्पसे महत्ता मानते है, मातसे पुत्रसे माया मानवे, तपा यातसे परिधरसे मदचा मानते हैं। परस्त पर उनका मानना किसे विचार मानेपर मिथ्या सिता है । ये योग जिसमें महा व्हयते हैं उसमें माता नहीं, परन्तु प्मुवा है। मममांसे ससारमै सान, पान, मान, अनुपयर वा पौर मब पे सब मिस्ते, मौर पर महाचा है, ऐसा तुम मानते होगे । परन्तु इतनेसे इसकी सत्ता नही माननी पाहिसे । ममी भनेक पापोसे का होती है । पह आनेपर पौठे ममिमाम, बेहोशी वीर ममता फैा करती है । फुटुम्म समुदायको महता पाने के लिये उस पाम्न-पोषण करना पाता है। उससे पाप और दुस सहन करना पाता है। हमें उपाविसे पाप करके इसका उदर भरना पड़ता है। पुसे कोई शत नाम नी पता । इसके लिये मी वनेक प्रकार के पाप धीर उपाधि सहनी पाती। तो मी इससे अपना क्या मगध होता है ! वभिकारसे परतता और वमतमद माता रे वोर इससे पुस्म, वौति, रिस्त बीर पाय करने पाते है अपना होते है। फिर कहो इसमें क्या माला। केप पापम्प कर्मको। पाप कसे वामाको मौच गति होती है । जहाँ नौच गति है हौ महत्ता नहीं, परन्तु मुता है। आमाको महता तो सस्प बचन, दया, क्षमा, परोपकार, और समताने मी इमार तो कर्म महा। ऐसा होनेपर मी पर पुरुप मर्मका दान देते हैं उत्तम विवाशाम स्माक्ति करके पशुस भवन करते है । एक विहित बीमें ही सम्पूर्ण प्रतिको रोककर परमौकी तरफ पुत्री भाषसे दोलते । कुटुम्बके 10 किसी समुदायफा हित करते हैं । पुत्र होनेसे उसको स्तरका भार कर सप धर्म प्रवेश मामि करते है। अधिकारके धरा विचषणतासे बाचरण कर रामा भर प्रया रोनोमा हित करक पर्मनातिका प्रकाश करते हैं। ऐसा करमेसे बहुतसी मातायें प्राप्त होती है सही, तो मी से महत्ता निषित नही है। मरण मप सिरपर जा, बार भारणा परीय पाती है। संसारका सा मोह ही एमा है कि मिसमे किये हुए सभाप वपना विक इपसे निकल जाते है। इससे से पान मशय समझना चाहिये, कि सपाचन दया क्षमा अनचर्य वौर समता सीमामाता और कहीर मी मही।पुर पाँच महातभारी मिन जो हरि मोर माता प्राप्त की? या प्रनत जैसे पानि मी सम्मी, कुलुम पुत्र अपना अनिकारसे नहीं प्राश की ऐसी मेरी मापता है। १७ पाहुपल बारत अर्थात् अपनी मुमाला बस'-पार वर्ष यों नहीं करना चाहिये । पोंकि माण नामके महापुरपरा यह पक छोगसा मत परित्र है। समिंगका परित्याग करके भगवान् उपमदेवजी मरत और बाहुबह मायके अपन दो पुोंको राय प्रेरकर EिR रते थे। उस समय भरतेवर परमती ए। मायुधमासा परी उत्पति होनेके पचात् प्रत्येक पापपर उनाने मनी माम्नाप स्थापित की और समाको प्रमुता प्राप्त की। बकेगे मादरम्ने हो म प्रमुताय स्पीचर मी की । इमसे परिणाममें भरनेसर और पावसमें मुर मागान ममपतम मरते पर भोर पाठ इन दोनोमसे एक मो नही स्टा । रामाशाम भापर मरमसरने बानुपपर 5 मेगा । एकबार्यस उपमएए मईपर चार प्रमा मकर फता।
पारसति] मोक्षमामा २६ पका, 1 इस नियमसे यह पत्र फिर कर पछि मरसेश्वरक हायमें पाया । भरतके चक्र छानेसे वापसको पात क्रोष नाया। उन्होंने महावयचर मुभि चाई। सकाछ ही नहीं उनकी भाषनाका स्मनप वदसा । उनोंने विचार किया कि मैं यह बहुत निंदनीय काम कर रहा है, इसका परिणाम फितना दुखदायक है। मले ही मरतेवर राप भोगें । म्पर्य ही परस्परका नाश क्यों करना चाहिये। यह मुएि मारनी योग्य नही है, परन्तु उठाई तो मब पीछे हटना मी योग्य नहीं। यह विचारकर उन्होंने पचमुधि-केशलांच किपा, पौर पदमि मुनि-भाक्से घछ पड़े। उनहोंने नहों भगवान् मासर मठान दीक्षित पुत्रोंसे भार वार्य, पार्या सहित पिार करते थ, पई चानेकी इष्टा की। परन्तु मनमें मान भाया कि यदि यहाँ मैं गाउँगा तो अपने छोटे मठान माईयोंको पदन करना पड़ेगा । इसलिये यहाँ हो जाना योग्य नहीं । इस प्रकार मानपिसे वनमें व एका म्यानमें अबम्पित हो गये । धीरे बोरे मारह मास बीत गये । महातपसे मार मकी काया अस्थिपनरावशेष रह गई। ये सूखे हुए हम बैस दौसने सगे, परन्तु पयतक मानका बार उनके वंत करणसे नहीं हटा, तबतक उनोंने सिद्ध नहीं पापी | ग्रामी वीर मुरीने वापर उनका उपसा किया -"वार्यपार ! अब मन्मत्त हापापरसे उतरो, इससे तो मार सहन करना " उनके इन वचनोंसे बाहुब विचारमें परे । विचरते विचारत उनें मान हुआ कि 'सस्प है, मैं मानबसी मोमव हायपरस अमी को उतरा । पर इसपरस उवरना हो मगरकारक। ऐसा रिचारकर उन्होंने पान फरनेके लिये पैर उठाया, कि उन्होंने अनुपम दिम्य कैवात्य कममाका पाया। पाचक 1 देखा, माम या कैसी दुरित बस्तुए। १८ पारगति जीव सातादनीय भार जसातामेनीयका बेन करता हुआ सुमागुम कमका फल भागनके सिपे इस ससार मनमें चार गतिपोमें मटका करता है । तो इन चार गलियोंको अवश्य जानना चाहिये । १ नरकगति–महामारम, मदिरापान, मसिमक्षण झ्यादि तीज हिंसाके करनवाल जीप भघोर मरको पाते हैं। यहाँ पन भी साता, विश्राम मपमा सुन नहीं। वहाँ महा अंधकार म्पम , अंग-गेम सहन करना परता र अमिमें गहना पड़ता है,बार परेको धार जैसा जस पौना पाता है। वहाँ बनत दुसक द्वारा प्राणियोंको सोश, असाता आर विसविधाहर सहन करने पाते है । एसे दुमोका कसबानी मी मही कर सकते । बहो ! इम दु सोको अनत पर इस मारमाने मागा। २ तिथंचगति - घर, प्रपथ हयारिको पारण नाप सिंह बाप, हाया मृग, गाय, मंस, 48 इस्पादि तिम्पक शरीरको पारण करता है। इस तियच मतिम भूम, पास, तार, बघ, धन, तापन, मारपन एयानि दुहको सहम करता ह। ३ मनुष्पगति-बाप अापके विषय निवकरीत हाता माहीन कर माता धीर पुप्रीक प्रय काम-गमन करनेमें निम पापापका मान नहीं, को निरवर मांसमवण, भारी, परसी गमन बगरह महा पातफ किपा करता है या तो मानो मनाप देशपण मनापं मनुष्य है । भाप देशमें भी क्षत्रिप, मामण पाप वा मनिशान, दरियो, मान और रोगसे पारित मनुष्य है भार मान अपमान स्पानि भनक प्रकार हुन्न माग । . - स - भीमद् पचन्द्र [ OR बार उन्माने देवगति-परस्पर और ,, मेग, धक रसर, काम, मद, सुधा, आदिसे देखगेग मी माय पतात कर थे। यह देवगति है। इस प्रकार चारों गतियोका सहप सामान्य रूपसे कहा। इन चारों गतियोंने मनुप्पगति सबसे मेष्ठ मार दुम है, बारमाका परमवित--मोक्ष इस गतिसे प्राप्त होता है। मनुष्पगतिमें भी एनसे दुसबार वामकस्यान करने में क्राप वा। एक ताण सामारको रोमरोममें कप्त स मा सुए गुमानस गो बसा ना होती। सससे मागुनी बेदना बीन गर्मस्पानमें यो हुए मत करता है। पर पाव भामग ना माना मम, म्ल तूम पाप मारिन दिनरम्त मूर्मगत स्थितिम वेदना भोग मोगकर बम्म पाया है। गर्मस्पानी देखनास मनत्गुनी बेदना जन्म के समय होती है। तत्पश्चात् मास्यास्पा प्राप्त होती है। सपा मा मन मोर नमानस्या वनसमास ये झटककर पूर्ण होती है। इसकगार युवावस्था वाती है। इस समय पन उपार्यन करनक किम नामा प्रघरके पापोंमें पड़ना पड़ता है। बसि तत्पर मा ४, पापर आंद विपप-विचार, पति माना है। सम्माद, पाप, अमिमान, निप-मि, स्पोग, रियोग इस प्रकार घटमासमें युपा पय बसी जावी फिर सालस्यामा माता। शरीर कॉपम भगता है, मुझमे भर पने भगती है तचापर सिकान पर माती हैसम्ने, पुनने, और दसने सकियो बिस मद पर बाता है। केश पास होकर सिरन गते हैं। पम्ने शक्ति नया यती; एपमें सीकर लाए पम्ना पाता है। अपना जीवन पर्यंत साळपर ही पका बना पाता। पास खसी इमानि रोग पाकर पेरे, वीर पोरे में समाकर शामित कर जाता है। इस देह चार पर निकलता ।कामाका होना म होने के समान हो जाता है। मरण समपर्ने मी कितना अधिक करना होता है। चारों गलियामें बेठ मनुप्प देने मी कितने अधिक दुस मरे गए। ऐसा होते ए भी उपर कदे सर लम्से बाताबो यह बात मी ही सब बाबर जाताशाक्मेि विचक्षण पुरुप प्रमा विना वामकम्पाणकी वापवमा करते है। १९संसारकी बार उपमायें मसारको वाधानी एक महासमुत्रकी मी उपमा देते हैं। संसार मपी समा भर्ना और अपार है। मो प्राणिपों ! इसमे पार होनेके म्पेि पुस्पाका उपयोग को उपयोग करो। इस प्रकार उनके बनेकस्पानोपर वचन । ससारको समुद्रको उपमा उचित मौसमममें से भरे उव्य करता है सेही संसारमें निफ्पहपी बनेका ठठती है। मेगा उपरसे सपाट विस देता है सार मी सरण दस पापा से समुद्र होगात गहरा और कहा मा रातो सेहोसार मस प्रपंच बाहिमें बहुत गहरा और 4 मोहरूपी मघरों में देता।से पोपा पहपते ए मी समामें पो गर्न चहमें पस पाने से सारफे मामर प्रसगमें मार पप्णाम्पा काचामें पंसस रेता ह। जैस समा नाना प्रकारको मानो चौर एम्नोंसे मारपानामको पोषम पाँचाता है से हो ससार वीरूपी पाने और कामरूपी पानसे वास्माको मौसम पशिसे समयका गाव जाहाना विसई देमैपर मौ उपमें सामानः अमि वास करती जैसे ही सारमें मात्रा र पार उपमाम] मोसमासा अनि बला का करती है। उसे समुद्र बीमासमें अधिक नल पाकर गहरा उतर जाता है, ममार पापप्पी बस पाकर गारा हो जाता ह, अयात् यह मजबूत वा समाता जाता है । २ समारको दूसरी उपमा लमिकी लाग् एती है। नम भनिन महातापकी उम्पति होती है, पंस माग्मे मी त्रिविध तापकी उत्पत्ति होनी है।जैस अग्निमे अठामा जीव महा मिसमिसाइट करता है, ससारम बम हा जीव मनत दुसरूप मरकसे क्स विउविजाट करता है। जैसे अग्नि सब पोका मक्षण कर जाती ह, कम ही अपने मुम्छमें पड़े हुएका समार भक्षण कर जाता है । जिस र अमिमें यों ज्यों घी बार इवन हामे जाते हैं, क्यों स्यों का सादि पाती ह, उसी प्रकार समारनप में सीन माहनप धी वार विपयनप धनक होम अग्नम पद इमि पाती है। ३ समारका सीमरी उपमा अधकारका लागू हो। म अधकारमें रम्पा सर्पका भान कराती म्स ही ससार सपफा असम्परप बताना स ममकारमें प्राणी इबर उभर भापकर विपठि त है पसे ही मसारमें बेमुष होकर अनल मारमायें मनुर्गनिमें इधर उधर भटकती फिरतानमे घमें कांच और हीरेका ज्ञान नहीं होता, बस ही समारनपी अधकाम विवेक भार अधिवकका मही होना । से जयकारमें प्राणी आम्मॉक हानेपर भी अंभे धन बात है, मही शक्तिके हानपर समाग्ने प्राणी माइधि मन जात ।। स अधफारमें उम्म् भाविका उपद्रव बह जाता ह, मी रमें मोम, मापा भारिका उपपम जाता है। मनगह जनक प्रकार सम्बनेपर समार अधकार माझ्म होता है। २० संसारकी चार उपमार्प (२) र सुमारको यो उपमा शकर पा अयात गादक पहियोंको लाग हानी है। बताता --भर फिरता गातार, बस प्रदेश हानेपर मुमार रिता गता।। मे शकरपा पुरेक । नहीं चल सकता बम ही ममार मिपाचनपी पुरेके पिना नहीं बन सकता। वैसशकर मि का एला, बम हा समार-राकर प्रमा' आ आराम Pिा मा। इस तरह अमेर रमे पाकर पत्रको उपमा भी मंमारको दो गा माना है। इसप्रकार स्मारका जितनी जरा उपमापी जा सफ उतनी हो थाही है । मुप्प मपम ये उपमा दमन मान मी मा इममेमे दम नत्त मना योग्य १ म सागर मजबूत मार भार उनकार नारिकम भरा पार किया जाता है, सही मदमाता और सारनपी मारिफमे संमार-मागर पर किया । मरना । जैम मागरमें विचाय पुरपनि न राना निपटार मे हो जिनपर भगवान्ने तत्तशनगपनि उत्तम रानामापा। २ म भमि मबसे मशन फर जाती है, परम्नु पाना मुह जातो, पमही पराम्प-अमे म-मामि गुप्त सरती। । म कारमे दौरकम गतम प्रवरा दानम हम पासमा मते, मेरे शारीन युग दीपक ममारमा प्रकाश कार मप ममुगेबनाना।
[पाय माना , १ २१ भीमद् रामचन्द्र स शकर भक मक बिना मही बस सकता, वैसे ही ससार-चक्र यग और उपके बिना नाही पस समता। इस प्रकार इस FAR-रागके निवारण प्रताघर उपमाहारा भनुपान मादिके साथ कहा। इमे गामहितपियोंको निरतर मनन करना मार सका उपदेश देना चाहिये । २१ बारह भावमा राम भार ऐसे ही अन्य वामनीतपी विषयों को पता होगके लिये तत्कामियोंन गरा मानाका पितान करने के लिय करा १शरीर वैमन, उसमी, उदय, परिवार भारि सम विनाशी है । जीका मगधर्म अक्निाशी ६, पमे पितान करना पाटी अनिस्मभाना है। २ ममारमें मरणक समय सबका शरण रमनपाडा कोई मही, कपल एक मुभ धर्मकी कारण ही सप ऐमा चितवन करना दूसरी अशरणमावना है। इम भाहमान सम्पर-समुद्र पर्मग्न करते हुए सम्पूर्ण भोंका भोगा। इस संसाररूपी मीरस में कब गा । यह ममार मेरा नही, म मोक्षमयी !,' एमा शितान करना तीसरी ससारमामा'। पह मरा वामा भकल्प , या बसा आया। ममम ही मागा, और अपमे किये दुए कमात्र बसा ही भागगा ऐसा तिन करमा पीपा करमानना'। ५ इस संसारमें कोई किसीका मही, ऐसा पितान करना पौचनी 'जन्मनमानना'। ६ पर शरीर पवित्र । मामूलको खान ६, रोग और गरके गनमा पाम है इस शारीरम में म्पारा ऐमा चितवन करना मी समुचिमानना है। ७ मा, प अनाम, मिप्पाच स्पानिक आमरणमा लिन करना सती आनामाषना है। ८ बोल हान भार म्यानम प्रात्त होकर नये कमौका नहीं गौरता, ऐसा चितवन करना भारणी परभाषना'। •मानमहिन किया करना निर्मक कारण। एमाधिनान करना माता नियमानना ह। १ सोम्स स्वरकी उत्पत्ति स्थिति भर मिनाशका माप विचारमा बसी 'साकस्पनर मापना " समारम भरते हुए आमाका सम्पमालको प्रमादी ग्राम होना मी असा सम्पवान प्राम भी एमाप नारिप-म रितिपरिणामन्य धर्मका पाना शुभ है ऐसा पितान करना मायनी पापितुर्मममानना । १२ पम उपासक क्या पुर शासक बाधक गुरु और इनके उपदेशका प्रवण मिपना एर्सम ऐमा रिनाम करना बागी 'पर्मतुर्सममानना'। इन बारह मानाभाका मननपूर्वक निरंतर विचारनेमे सपुरूषोन उच्म परको पाया , पाले बार पारेंगे। .
प्रमय भार] मोसमामा २२ कामदेष भापक महातीर मगमान्क समयमें वारा मताको विमल भावसे धारण करनेमाग, विपको और मियाममा नुरक कामदेव नामका एक धात्रक, उनका शिष्य था | एक बार सुधर्माकी समामें घने कामरेसको धर्मम अषमताकी प्रर्शसा की । इसममें यहाँ जा एक तुछ घुटियाठाया हुआ था, उसमे फामपकी म मुखताक प्रति अविश्वास प्रगट किया, भार कहा कि अबतक परीपह नहीं पाती, तमी तक ममी सहनशास और धर्ममें छ दाम्पते ।। मैं अपनी इस घातका काम सको पछायमान करके म्य करक Pमा सकता है। धमात कामदेव उस समय कापोत्सगम सौन था । अपम होटबताने विक्रिया से हावाका नप धारण किया, वीर काम का मूव होग, परन्तु कामम अचल ग्रा | मन देवताने मस जैसा अग बना करक काठे वर्णका मर्म होकर भपकर पुकार मारी, तो भी कामदेम कायोत्सर्गस रेशमात्र भी चारापमान नहीं हुआ। नप चात् यमाने आपाप करते हुए राक्षसका शरीर धारण काफ भनेक प्रकार उपसर्ग किले तो भी काम कायोत्सर्गसे न डिगा। उसने सिंह बगर अनेक मपकर मप बनापे, ता मी काम वके फापोमर्गम खेशमर मी हीनता नहीं भापी। इस प्रकार बहरेवता रातक पारों पहर उपटय करता रहा, परन्तु वा अपनी भारणामें सक्षम नहीं हुआ। इसके बाद उस देखने भाविधानके उपयोगस दमा, नो कामको मेरुके निसरकी तग अडोल पाया । बहरेषता काम- देवको बद्भुत मिश्रमता जानकर उमको विनय मानसे प्रणाम करके अपन गोपाका भमा मांगकर अपने म्यानपो चसा गया। कामय भावकको धम-सना यह शिक्षा देनी है, कि सप धम बार सस्य प्रसिहामें परम स रहना चाहिये, बार कायोत्सग मारियो से बने तैम एकाग्र चिचमे नौर मुखतासे निॉर कपमा पाहिये । पल-विवस मावसे किपा हा पायोमग आम बहुल दोप पुक्त होता है। प नितने म्यक पामके लिय धर्मकी सांग मानवालाकी धर्ममें रहना काम ग मुकली ह। भीर गह सकती दोनो कमी रहेगी, पानिमाग्न एण् म होता है। । - सम्य सामाम्प नापम यह कहा मी गाता , कि सप इस जगएका आधार ह, अपना यह जगत् पपके आधारपर यरा भा है । इस पपनसे पह शिक्षा मिठती है, कि धम, नानि, राज भीर म्पहार पे सब मायके भाग पड ऐहै और पनि पे चारों माना जगतका रूप कितना भयंकर से बाप! इमनिय मुप जगतका भाषार यह कहना कोई अतिगयाति सा अपना म मानने पोम्प माही। बमुरामाका एक पारका अमय बामना फितना इमाया एवा पा इम प्रमुगपर विचार कामके लिये हम यहाँ पुछ करेंगे । गना बसु, मार और पनि इन तीनोम एक गुम्के पास स्पिा पी पी। पर्वत अध्यापक पुत्र पा। भप्यारफका मरण मा । इमरिय पर्वत अपनी मौ मदिन पमु गवाफलामे आफर रान गा | OF CRET पपती मो पाम को थी तया पर्वत भार भार पानाम्पास पाये। टम ममय पतन "भर्यटन' ऐसा एक बाय बोटा । नापन पतम पुत्रा, " सिम कान!" ।
पतिने का " वनका वर्ष प्रति " - २८ भीमद् पजचम्म [जन बा बाट समय इमारत बोला, " म तीनों जने जिस समम तेरे स्तिके पास पाते पे, उस समप तेरे पितामे तो अब का वर्ष तीन वर्ष प्रतिमा पा, भात विपत बर्ष क्यों नहा है। इस प्रकार परस्पर बयाका विवाह बा । तब पक्ने मा, ॥जो में पसराश कर दे।' इस बातको नारने सोचर की, लो जोते, उसके लिये एक पास गई । पर्वतकी माँ नो पासमें ही बैठी थी, उसने पर सब सुना । वम' का वर्ष प्रति' उसे भी याद पा । परत वाम उसका पुत्र हारेगा, इस ममसे पर्वतकी माँ एतम रमाके पास गई और पूष्म,--- रामन् ! 'ब' का क्या अर्ष है।"मुराणामे सवधर्वक या, ता'।म पर्वतको मनि रामासे कहा, "मेरे पुत्रने गाय बर्ष 'बकरा' कर दिया है, इस- निये भापका ठमका पर ना फोगा | डोग मापसे फ्रनेके लिये जायगे।' बमराजा मोम, 'म असस्प कैसे कहूंगा, मुम्से बना सकेगा । "पर्वतको मनि कहा, परन्तु यदि भाप मेर पुका पसन मो, तो मैं बापको हत्याका पाप गौ। " राश विचारमें पा गया, कि सपके कारण ही मै मणिमय सिंहासनपर अपर बैठा, लोक समुदायका म्याप करता है, वोर ग मी यही जानते है कि राणा सस्प गुणसे सिंहासनपर बतरा र करता है। अब क्या करना चाहिये ! पनि पतिका पक्षम तो भणी मरता है वीर या मेरे गुरुकी नीतिमें चार रोकर रामाने प्रापणास करा, तुम मेरो नामो, में पतिका पच शा। इस प्रकार निथप कराकर पर्वतकी माँ पर मापी। प्रभातमें नाद पर्वत और उसकी माँ सिाव करते हुए रामाने पास बाप । राना बनवान शंकर पूछने भगा कि स्पा बाती, पर्वत । पर्वतले था, 'म्नाभिराम ! मनका क्या मर्प है, सो करिये।' राजाने नारसे पूम, 'तुम इसका पा अर्प करत हो।" मारने कहा, अम'मामपवान का हि होता है। हमें क्या याद माही भाला। बमुरागा बोग, मन' का जप करा मोहि महा। इतमा करने हो देवताने मिहामनसे उपाकर बसचे मार गिरा दिया । म कार- परिणाम पामर नरक गया । इसके उपरसे प मुम्प सिमिती है, : सामान्य मनुप्पोको सप और रामाको पापमें मपात और सस्प बानों प्राण करने यौम्य है। मगतान्ने हो पाँच महान है, उनमेंसे प्रथम महासको रखा कि बालोके चार त पारस्प और उममें मी पहली बार सम्म महान है। इस सस्पके भनेक मेदोको सिमानसे माण करमा आरपकरे। २५ सत्संग सत्सग मोका ।ससंग साम मिझते ही उसके प्रभासे पकिन सिरोही गा। अधिक भाषिक मी पवित्र रोमके लिये संग अष्ट साधन संगकी पक पदी नितमा शाम देती है, उतना मुगिने करोगा वर्षमी गम महीं दे सकतेमधोगतिमप मापाप करत, मौर मामाकी मनिन परते। साध सामाप भर्ष उत्तम मोगांच सालाम करना है। जैसा अनीसा मही माती, जो रोगको पता , से हाँ मसंग नही, ही भामरोग माता .
मलम] मोसमाप्ठा २९ है। से दुर्गघसे घासाकर हम माक्में पस भगा लेते है, बस हो कुसगका सहवास मा रमा भानश्यक है। ससार मी एक प्रकारका सग है, और यह भनत पुसगरूप सथा दु सदायक होनस त्यागने याम्य बारे निस तयका सहसास हो परन्तु जिससे पारम-सिदि म हो, यह सग महीं। जो वाग्मापर सुम्पका रंग पहावे, या ससग है, और जो माझका मार्ग बता र मत्री उत्तम शाम मिगतर एकाम बना भी सम्सग है मपुरुपोंका समागम मी ससग है । असे मसिन मन सानुन तथा जलस साफ हो नाता है, पैस ही शास-बोध और सपुरपाका समागम भरमाको मसिनताको हराकर मुदप्ता मान करते । बिमक साथ हमेशा परिचय एकर राग, रग, गान, सान और स्वामि भोजन सेवन किये बात हो, या तुम्हें चाहे कितना मी प्रिय हो, तो मी निश्चय मानो किया समग नहीं, परम्त संग है। मसंगसे प्रम मा एक पबन मी मरम्प साम देता है । तस्वनानियोंका या मुम्य उपशा, किन सुगका परिस्पाग करके अमरगमें रामवाले सब विकास निरक बकर एकांतका मेपन करो। उसमें सत्सगका माइम्म्य मा जाता है। सम्पूर्ण एकान ता म्यानमें गहना भयत्रा योगाम्पासमें राना।। परस्त रिममे एक ही प्रकारकी इतिका प्रवाह निकमाता हो, पेमा ममम्ममातीका समागम, मावस एक ही मप होनम बाम मनुष्योर होने पर भी, और परम्परका सहबास होमपर भी, भारतमए हो बार ऐसा एकान्त नो मात्र मत-समागममें ही है। कापित कोई ऐसा साचगा, कि हाँ विपयामास एकत्रित होता है, वहाँ मममात्र भोर एक सरही गति होनस उसे भी एफरत क्यों नही करना चाहिय ! इसका समाधान तकास्ट हो जाता है, कि पे छोग एक समाक्क नहीं होने । उनमें परस्पर स्वार्यबुद्धि और मायाका मनुसुभान होता भार जहाँ इन से कारणोंसे समागम होगा, ही कम्पमात अपया नियता नही होती । निर धीर समसमायोका समागम तो परम्पर शान्त मुनीसरोकार, नया बह धमप्पानसे प्रशस्त बप्पारमी पुरुषांफा मी पुछ अंशमे है । वहाँ पेपर स्पार्प और मापा-कपट ही रहता है, या स्मस्वभावता नहीं, बीर बहसम्मंग मी मही। ससगमे नो मुमार वामन मिसता, यह भस्यन्त स्तुनियात्र । नहीं शाहक पर प्रभातर हो, यहाँ उचम घान भीर म्पामकी सुकया हो, महाँ स्पोंके परिप्रॉपर विचार बनते हों, यहाँ तलवानके तरगको परें छती हो, हाँ सरठ समावसे मिटान-विपारी पर्चा हाती हो, जहाँ मोश पिया फापनपर मा विपवन पता हा ऐमा सम्मा मिलना महा दुर्गम । पर कोई पह करस्पा मसंग मंडर्म कोर मापा नही होता ! तो इसका समाधान या नहीं मापा भीरमार्थ दाता समग दी नहीं पाता । रामसकी ममाका कत्रा पनि उपग्स ममम काचित् न पापाना जाय, नो सरसे वाय पहचाना जापगा । पदि यह मान र ना मुम्बकी मुद्रामे परचाना जयगा | पग्नु पहकमी रिपा न ऐगा । इससफार माया हग ममग मापफ सिप जारर क्या करेंग पर मानेही बात का होती नही । पदि पदो पड़ी रही गार विभाति एक ते ना तुम सिम गंग मग नहीं नो मर्ग बार उनका आगमन नहीं डाला | त्रिम प्रसार अमानपर नहीं लग पाता, उमा मरद ममगसे नही त । एमी तमंगमें समाति । निता म मि र ममागममें मापारी एकर आप भी कौन ! फोर्ट । मागी, नीर पर मा अममम ।। ममंग या भामा पाम हिनकारी । - भीम रावधान [ परिमाय मानव मात्र । परन्तु वो हो ० परिप्रहका मर्यादित परमा जिस प्राणीको परिणाकी मर्या मह, प प्राणी मुसी नहीं । उसे गिना भी मिलाप र पोहा ।योंकि जितना उसे मिलता गातार इतनसे विशेष प्रल करनेकी उसकी रम हाती गाता है। परिणाको प्रसनामें गाय मिग हो, उसका मी सुन नहीं मांगा गाता पा भी कदापित पला जाता ह । परिग्रहसे निरतर परीयार परिणाम और पाप माना गती है। अकस्मात् पसौ पाप-मायनाम यति आयु पूर्ण हा, ता पर बहुधा भवागतिका कारण हो जाता है। सम्पूर्ण परिम्ह तो मुनापर हो पाग सकते है । परन्तु गहत्य मी इसकी कुछ मयादा कर सकते है। मर्यादा हानके उपरांत परिपाकी उपपति ही मही गती । तपा इसके कारण निरोप मातमा मी माना मही होती, और जो मिग, उममें माप रसमको बारन पा जाता है। इसमें कार हमसे मनात होता । । न जान सामी वारिम कसी विचिता , किस मंस उसका गम होता गाना, से समभको मि होती माती । पर्सबभी कितना हो बान होनेपर और धर्मको सवा होने पर भी परिमाके पासमें पोए पुरुष कई वर हीट सकते हैं । चि दसमें होमको गती है। परन्तु मति किसी कार में मुसापक मयमा भामशिनपी नहीं हुई। जिसने उसकी मर्यादा पोश मशीको पपात दुमका भागी मा। म पागेको गीतकर माता पानेपाडा रामाविराम चक्रपती कासवाम समर्प पर गर्तिमाम सुभूभ नामक एक बापता हो गया है। प म मो नौतनेके कारण पता माना गया । परन्तु इनमेसे उसय मनोमठा तत न हुई, शमी प वग्ता हो हा । इसलिये इसने पास के छ सोको जाननेका निचय किया। सब पक्रयता सॉको गीतस , और में मी शने गा उसमे क्या मायबाप गरे भीतनस में चिरकाम तक प्रसिद गा, आर समर्प माना गोरुपयत इन बडापेर वा सगा । इस विमासे उसने समुद्रमें बर्मरम्म डोसा । उसके उपर सब मय वाशिका वाधार पा । धर्मस्नक एक हगर देवता सेवक होते है। ठनम प्रथम एकन विचा, किन गान इसमेम कितने बमि रकम्प होगा इसरिये अपनी देवगनासे तो म आउँ। ऐसा विचार कर र रम गया । इसी विचारसे दूसरा देवता गया, फिर नौसरा गया । से करते करते हमारक इबार देखा परे गये । मन पर्मरनपुर गया । नब गब भीर सत्र मनाने साप सम्म पाहता भी हम गया। पापभीर पाप मान्नामें ही मरकर पाता भनत दुसमे मरे ए सावन तमतम्ममा नरकमें माकर पड़ा। देशो मशाका आधिपत्य तो भोगना पक भोर पा परन्तु मकस्मात् और मर्यकर सिसे परिमाको प्रतिते इस कामताको दर, तो सिर सरोहिये तो करना ही पा । परि या पापच मूह पापका पिता 1, भीर बम्प एक माशेप देना इसका सभान है । सम्पि वात्महितषियोंको से बन से इसका पाना कर मपातापूर्वक भाचरण करना चाहिए । २६ तस्व समाना बिनको मानके भाव टम्प हो ऐसे पुरुष पात मिस मत है। परन्तु मिन्होंने पोरे पचनों जल समाना] माममाला पर प्रौर और विवकपूर्वक विचार कर शान मितना हान यंगम किया हो, ऐसे पुरुष मिख्न दुर्सम हैं। तत्पको पाँच जाना कोई छोटी बात नहीं, यह कूदकर ममुद्रके उटाच जाने के समान है। अर्थ शप, लक्ष्मी, तत्व, और शम्म, इस तरह बससे अर्थ होते है । परम्तु यहाँ भर्य वात् । इस विषयपर कहना है । मो निमय प्रबचनमें आये हुए पवित्र पचनोंको फलस्थ परते है, वे अपने ठरमाहा बलसे सफरका उपार्जन करते हैं । परन्तु जिन्होंने उसफा मम पाया , उनको सो इससे मुस, आनद, विवेक बार इसमें महान् परकी प्रामि होती है । अपम पुरुप जितना सदर अमर और सेंची हुई मिप्या छकार इन दोनोंक भेको मानना है, उतना ही मुमपारी अन्य प्रयोक विचार भौर निमय प्रवचनको मदरूप मानसा हास्योंकि उसने अर्थपूर्वक निमय मचनामृतका पारण नहीं किया, और उसपर यथार्थ तस्म-विचार नहीं किया । यपपि तस्व-विचार करनमें समर्थ बुदि-प्रमाकी आवश्यकता है, सा मी कुछ विचार जर कर सकता है । पचर विफलता नहीं, फिर मी पानास मांग नाता ह । इसीतरह मिसन पत्रमामत करम्प किया हा, यह अथ सहित सानो वहुत उपयोगी हो सकता है । नहीं तो तालेबाठा राम नाम । तोरीको कोई परिचयमें आकर राम नाम कहना ममे ही सिमला दे परन्तु तोतेकी बला जाने, कि राम भनारको करते हैं, या अगरको । सामान्य अर्थक समसे बिना ऐसा होता है। कभी मत्योंका एक एन कहा जाता है । इ दाम्पयुक्त अवस्प है, परन्तु इसम उत्तम शिक्षा मिल सकता है । इसलिये इसे पहौ करता है। कटके मिसा गाँवमें भावक-धर्मको पाटते हुए रायशी, देवशी भोर तशी नामके सीन ओसमास गत थे । नियमित रातिम सम्पाका भार प्रभातम प्रतिक्रमण करने थ । प्रमातमें रापशी आर संम्पाकापमें देवशा प्रनिक्रमण करते थे। रात्रिका प्रतिफमण रायशी कराता पा। रात्रिके स्ववस 'गपशी पश्चिमणु ठाममि 'स तब उसे पुढबामा पाता था | इसी तर देवशीको दिनका संबंध हानसे देशी पणिमणु यम्पमि' पर मुसबाना पाता था । योगानुपागसे एक दिन बहुत ठागोके नामसे सम्पाकामों सेवधीको प्रतिक्रमण दुखमान मेराया। मेनशान यहाँ देवशी परिकमणु ठायमि' माया, यहाँ 'सेतशी परिकमशु यायमि यह माय गा रिया । यह सुनकर सब स्ने सगे और उदोन पूज, या क्या । सेसशी बाग, स्पा' सबने कहा, कि तुम सेतशी परिकमगु गर्यमि से क्यों बोलते हो। मेतर्शने पदा, कि मैं गरीब है इसलिये मेरा माम आया ताप भाप टोग पुरत हो तकरार कर घर । परन्तु रापशी मोर देनशाके लिये ता किमी दिम फाई वोउसा मी नही । ये दोनों क्यों ' रापशी परिणाम ठापनि ' भीर देवहा परिषमणु लामि' ऐसा करते हैं ! तो सिर में खेतशी परिकमणु गपमि' ऐसे क्यों न करें। इसकी मयताने सबपो बिमोइ उत्पम किया । बाटम प्रतिममणका करण सहित मर्प समझानेसे सेनशी अपन मुम्मस पाठ किय पर प्रतिक्रमणसे शारमापा । पर ता एक सामाम्प मात है, परन्तु भयनी मची म्यारी है। तय ग उसपर पात विचार कर सकते हैं। यानी तो जैसे गुरु मगही भगता है, बस हो निर्प्रय पत्रमापत मा प्रष्ट फसका ही देते है। भयो । परन्तु मर्म पानेकी बावको तो बटिया ही है! २७ पतना से विशेष धर्मका मूल तत्व है, से हो पानमा धर्मका उपतत्व । विवस धर्मवाहण किया जाता है, तपा यतनासे करतल शुद्ध रक्टा मा सकता है, और उसके अनुसार भाचरण मण भीम प्रसाद [संवमान जा सकता है। पाँच समितिम यतमा तो बहुत भष्ठ है, परन्तु गृहस्भाभमासे का साधारूपमे नही पा सकती । ता मी नितन अशोम या पाठा मा सकना , उक्ने बोंमें मासे उसे सावधानासे मी परत सकत । जिनसर मगवान्को उपश की हुई स्पस भार सूक्ष्म दयाके प्रति जहाँ मेरकाई, यहाँ परत दौरस पामै गा सकती ।। पर यानाके रमनकी न्यूनत्ताक कारण रामदी वीर संगम घाम, पानी मनकर उमा विनम्न रखनेकी अपूण विधि, काष्ठ मा धनका विमा हो, बिना दस उपयोग, अनाजमें गनबाले अतुओकी अपूर्ण शोभ, विमा सारे मुहारे पात्र असल रम्मम ए कमरे बोगममें पार्माका उममा, मृदमका रम्प माना, पोक मिना पपाती पानका नाच रमा इनस हमें इस गेम असता, प्रतिकता, पमुनिया, अस्त्रापता स्पादि फल दिसत र कार में परसाको मो मायी हत्या करण हो जाते ह । इसनिय कामका तार्य पर , पिसनेमे, भटममें उग्नमें, मोजम करने और दूसरी हरेक क्रियामें पवनाका उपभोग करना चाहिये । इससे म्प और मात्र होमों प्रकारक साम ।। पासका पामा भीर गमार रसना, भाका सद रमना, पानाका विधि सहित मनना, कार मारि पनका पाकर उपयोग करना, अब हमें असुविधा नेपाझे काम नहीं मार इनमें विशेष समय भी नहीं पाता। ऐसे नियमोका पासिस भरमेके पापात पाना मी मुस्किम नहीं। इससे विचार मसम्मात निरपराधी गोंकी रखा हो पाती है। प्रत्येक कामको पतनापूर्णक ही करना यह किसको मात्रा करम्प है। २८ राषिमोजन भाईसा बालि पाच महाताको तए मगषामने पत्रिमोशनसाग मी कहा । गनिमें पार प्रकारका मबार अभय ह । प्रिस मालिके माधरका गहना तस जाति के तमाप मामके मात्र उस भागारमें उपमहोस सिमाप रात्रिमाननम और भी अनेक पोगरानिमें भोजन करमेनाको रस कि सिमे अमि गठानी पड़ती है। उस समय समीपको विवापर यते पर निरपरापी सूक्ष्म + मास पानक वास्त हापे हुए चष्ठ बादिम पत हुए मंतु पनि न दोबस नाश हो जाते हैं। गतिमोजममें सपके मारका मात्र मारकर मौर मार मान सूक्ष्म शुओका मी मप यता है । कमी कमी या कुटुंब मारि के मथकर रोगका मा कमण हो जाता है | राविमोमनाय पुषण मावि मनामें मी सामान्य मापारके सिम स्पान किया। फिर भी उनमे परपराकी सदिकोदर रात्रिमान धुम गया है । परस्त पर निपिर att। समककर दो प्रकारकमा हात है। सूर्य वस्तमे समुचित हो जाये । इसकारण राविमोमनमें सम्म गानोका मक्षण होनेमे पारित होता है या महारोगका कारण है। एसा बरसे स्पोमबापुन मी मन है। सपापो का हिनसे पार करते है, भारो पड़ी दिम परोसे से किसी मी प्रकारका भाहार नहीं करते । राविमोचन किये विशेष विचारों मुनियोंकि समागमसे अपना शबोस नाममा पाहिपे । इस संबमें बहुत सूक्ष्म भेटमा मानना बालस्यक है। चार प्रकारके बाहार पनि त्यागनस महान् परम बिनापन है। ।
करणा] मोसमा २३ २९ जीवकी रक्षा दयाफे समान एक भी धर्म नहीं। दया ही धर्मका सहप है। वहाँ दया नहीं यहाँ धर्म नह।। पृपिषीतमें ऐसे अनर्पकारक धर्ममत प्रचरित, बो करते है कि जीपका बप करनेमें छेदा- मात्र मी पाप नही होना । यात करो तो मनुष्य दोको रक्षा करो । पे धर्मममवाळे छोग धर्मोम्मादी और मदान है, और ये दयाका देशमात्र मी सहम नहीं मानते । यदि ये लोग अपने हृदय-पटको प्रकाशमें रहकर विचार करें, तो उनें अवश्य माश्म होगा, कि एक सूरमसे सूक्ष्म मतुका भी बष करनेसे महापाप है। जैसे मुझे मेरी बारमा प्रिय है, वैसे ही मन्य जीवोंको उनकी आमा प्रिय ।। मैं सपने समर प्पसन के लिये नया सामके लिये ऐसे संस्थानों मीयोंका बेपरक बघ फरसाई, पा मुझे कितना अधिक मनत इसका कारण होगा । इन लोगोंमें पुदिका मीन भी नहीं है, इसलिये के सोग ऐसे सात्विक विचार मही कर सकते । ये पाप ही पापमै निशदिन मन खते हैं। वेद पौर वैष्णम वादि पयोंमें मी सम्म दयाका कोई विचार दसनेमें नहीं भाया । भी ये दयाको बिसकुछ मही समझनेवालों की अपेक्षा पात उत्तम हैं।प्ठ चीयोंकी रक्षा करना ये सोक ठीक तबसे समझ । परन्तु इन सबको अपेक्षा हम किसमे भाग्यशाली है, कि वहाँ एक पुप्पको पैसाको भी पीका दो, याँ पाप है, इस वास्तविक तत्वको समझे, वीर पा याग आदिको हिंसास तो सर्वथा पिरत रहे । हम पपाशक्ति चीयोंकी रक्षा करते है, तथा बान-सकर बाघोंका पप करनेकी हमारी एशभर भी मही । मनतकाय अमापसे बहुत करके हम विरल हो। इस का यह समस्त पुण्य प्रताप सिद्धार्प भूपाके पुत्र महापौरके को हुए परम तत्वके उपदेशके पोग-बसे बड़ा है। मनुष्य इदि पाते है, मेर मी पावे । मसानुवर्ती पुत्र पाते है, बहुत बड़ा कुटुम्भ परिवार पात है, मान-प्रतिष्टा और अधिकार पाd पीर या पाना को दुर्गम भी नहीं । परन्तु पास्तविक धर्म-तत्त, उसकी भदा अथवा उसफा पोग वश मी पाना महा दुईम है । ये इदि इत्यादि भविवेकसे पापका कारण होकर अनंत दुसमें ले जाती है, परन्तु यह पोको पा-माना मी उत्तम पयामें पचाता है । यह दयाका परिणाम है। हमने धर्म-तप युक्त पुसमें कम पाया , इसलिये वा जसे बने विमा दयामप भाचारमें बाना चाहिय । सम बीनाको रक्षा करनी इस बातका में सब में रहना चाहिये । दूसराको भी एसी हो मुखि प्रयस्पिोंस उपदेशाना चाहिये । सब भागोंकी रक्षा करमक लिये एक शिक्षामा उतम पुति पुदिलाठी भभयकुमारमे की पा उसे में बाग पाठमें कहता है। इसी प्रकार उत्तमोधक ठिप पुतियुक म्पापसे मनाकि समान धर्ममतवादियोको हमें शिक्षा देनेका समय मिउ, तो हम कितने मापाठी ने ३० सप जीयोकी रक्षा (२) मगप देशको रामगो नगरीका भपिराग भ्रणिक एफ समप ममा भरकर बेटा एमापा। प्रमुगल बाबीतपे प्रमंगमें मार-मुग्ध सामंत बोउ कि आरकट मोम विशर सम्ना राय पान ममपकुमारन मुनी । इमफ उपरस बमपामारमे इन हिमच मामताको उपश दनकर निपप रिमा । - .
३४ भीमद् रामान्द्र [सामान साँसको समा विसर्जन ई भार राना क्त.पुरमें गया । तपथात् मिस मिस्ने प्रप- विपके छिपे मासको पात की पी, बमपकुमार सन सपके म गया । पिसके पर ममपपुमार गया हो सकार किपे जाने के बाद सब सात सने भो, किनापने हमारे पर पपारनेका कैसे कर उठाया वमपकुमारमे महायन मेणिकको अकस्माय महापैग उत्पन हो गया है। पोंके को करमेपर होने का है कि पति कोमा मनुष्य के कम्ने सप पैसेभर माँस मिमे तो पा रोग मिट सकता । म बोग पगाके प्रिय माप ही इसठिये में हमारे यहाँ इस मौसा लेन वाया।" प्रत्येक सामतने विपार किया कि कोनेका मॉस विना मरे किस प्रकार Pया सकता है। उन्होंमे बममइमारसे कहा, महाराम, या तो कैसे ऐ सकता है। यह करनेके परमात् प्रत्येक सामंतने समयमारको अपनी बालको राना माग न सोमनक किस पाल्सा दम्प दिया । बमयकुमारने इस सम्मको प्राण किया । इस तरह बमपकुमार सप सामताक पर फिर वापा । कोई मी सामत मोस न सका, वीर अपनी बात लिपानके लिये वम्होंने द्रम्प लिया । सत्पथात् सरे न जब सभा मरी, उस समप समस्त सम्मत बपने अपने मासमपर बा भाकर । राजा मी सहारनपर विराजमान था। सामत गेग रामसे कम्को कुशम पडने मग । राजा इस वातसे निस्मित एमा। उसने बमय- कुमारकी भोर दसा । समयकुमार गौण, ' महारान ! कस आपके सामताने सभामें छा पा, कि वानका मांस सस्ता निता है। कारण मैं उनके स मांस लेने गया था । सपने मुझे बहुत दम्प दिया, परन्तु कसैका स्वा पामर माँस लिसाने मी न दिया । तो इस मासको प्रस्ता कहा जाप पा मांगा ।। ' सुनकर सब सामत हारमसे नीचे देखने म्यो। कोई कुछ बोल म सका । तत्पपात् ममयकुमारने या कुरा बाप छोगोंको इस मेक पे म किया, परन्तु उपदेश इनके लिये किया है। अपने शरीरका मांस देना पो तो हमें मनतमय होता, कारण सिमें अपनी देर प्रिय है। वो वय बन्म औबॉका माँस उन बीबोको मा प्यारा सार से हम मम्म्म बस्तुमोंको देकर मी गफ्नी रेहकी रक्षा करते है, सही विचारे पामर प्राणी मी मफ्नी पाकी रक्षा करते होंगे। हम समर वीर पोसते 'पासते प्राणी पारे पापा और निराकार प्राणी । उनको सस्पुरूप इस देना कितना पार पापका कारण में समधनको निरंतर सक्षमें रहना चाहिये कि सब प्राणियों को अपना अपना गौर प्रिय है, बीर सब बातोंकी रखा करमे पैसा एक मो धर्म महो।" भमयमारक भाषणसे मेणिक मापनको सतोप वा । सब सामताने मा सिधा परण की । सामताने उस दिन माँस न जानेको प्रतिका कारण कि एक पोए बमप है और इसे किसी के मारे बिना नही मिन्ता वा वर्म है। बतएग प्रपानका कपन पुनकर उनमे भमयदान बा दिया । बमपान मात्मा परम सुका कारण है। ११ प्रस्यास्पाम 'परसाण प्रम कमेक गR सुनने में पापा होगा। इसका मूल हाम्द प्रत्याश्यान है। मा (प ) किसी वस्तु की तरफ पित न मा इस प्रकार आपसे समझकराक नियम । करने के अपये प्रपुष्ठ ईला है । प्राप्याच्यात करमेका हेतु महा उत्तम और सूक्ष्म है । प्रयाम्मान नही . लियो पापकी सिदि मोममाया करनेसे चाहे किसी मस्सुको न सामो, मपया उसका मोग न करो, तो भी उससे संवरपना नहीं । कारण कि हमने तत्वहपसे दमका रोध मही किया । इम रात्रिम मोक्न न करते हों, परत उसका पदि प्रत्याख्यानरूपमें नियम नहीं किया, तो मा फल नहीं देता । क्योंकि अपनी या सुमा रहती है। जैसे घरका दरवाजा खुला होनेसे पुत्वे वादि मानबर अयमा मनुष्य भीतर पले भाते है, से होइण्ठाका द्वार खुटा हो तो उसमें कर्म प्रवेश करते हैं। इसरिये इस ओर अपने विचार सरसतासे बसे गाते है । यह कर्म मन्धनका कारण है। यदि प्रत्यारूपान हो, सो फिर इस ओर इष्टि करनकी इम नहीं होती । जैसे हम जानते है कि पीठ के मध्य मागको हम नहीं देख सकते, इसलिये उस बोर इम रि मी नहीं करसे, उसी प्रकार प्रस्पास्याम करनेसे हम ममुक बहसको मही खा सकते, अपा उसका मोग नहीं कर सकसे, इस कारण उस बोर हमारा सम सामाविकरमसे नहीं माता । यह फर्मोक मानेके लिये पीधमें दीवार हो जाता है। प्रत्यारूपान करनक पपात् पिस्मृति आदि कारणोंसे कोई दोष या नाय तो उसका प्रायश्चित्तसे निवारण करनेको आका भी महरमाओन दी है। प्रत्याख्यानसे एक दूसरा भी बना साम है। वह यह कि प्रत्याक्ष्यानसे कुछ बस्तुओंमें ही हमारा व य गाता है, माफी सब वस्तुमाका त्याग होमाता है। मिस मिस बस्तुका हमारे स्याग , उन उन वस्तुमि सबध फिर विशेष विचार, उनका प्रण करना, रसना नपवा ऐसी कोई अन्य उपापि नही यता । इससे मन पहुस पिनास्ताको पाकर नियमलपी साकपर चला गाता है ।जसे या अपना- ममें या बाता है, तो फिर पाहे यह किसना ही प्रबस हो उसे अमीर गम्तेसे B जाया जा सकता है, पैसे ही मनके नियमरूपी गाममें वाने मा में उसे पाहे जिस भुम पस्तेसे के गाया जा सपना है, और उसमें बारम्बार पर्यग्न करानेसे या पकाप, विचारशील, आर विवेकी हो जाता है । मनका मानना शरीरको मी नियेगी करता है। अमाय, अनतफाय, परसी सारिका नियम फरनेस मी शरीर निरागी ए सकता है। मारक पार्थ मनका कुमार्गपर स जाते है । परम्मु प्रस्पाम्पानसे मन वहाँ गाता हुआ कामता इस कारण बह बिमल होता है। मायाम्यान यह कैसी उत्तम नियम पासनेकी प्रतिज्ञा है, यह बात इसके उपरम तुम समश ग्रेगे । इसको पिशप सरक मुससे भार शामाषामनसे ममतनेका में उपरेश करता है। ३२ पिनपसे तस्मकी सिटि परगही नगरीके राम्पासनपर जिस समय प्रणिका पिराबमाम था उस समय उस नगरीमें एक पाउ रहता था। एफ समप इमपासको खोपर गर्म रहा। पाालिमारो वाम पानेको या वस्न । उमने सामोसा मानक लिये पंगस फहा। पाामने कहा पर आमा माम मही इमलिये में मिरुपाप है। महीं तो मैं भाम चाहे कितने ही उप हो यहाँसे उन्हें अपनी मिपा बरसे तोरकर तेरी इण्या पूर्ण करना | पापिनीने हा रामाकी महारानीर बागमे पफ वस- मपमें परमेबाठा भाम (1 उममें वापस बाम ग होंगे। इमलिय भार नहीं नारर उन मामाका पो। अपनी मौसपा पूर्ण माना गए उस पागमे गपा । उन गुम एलिम मामक मुमार बार मा पार न ममापा, भार उमसे बान ताइचिपा में दूसरे मंत्रमाग उसे मासतमा फर रियाबा में पास अपने घर भाप । म तरद पानी डाइसा पूर्ग बग्न . - भीमद् रामबाण [मुरान दिये निरतर ए पाके से माँसे वाम गने लगा । एक Pिन फिरते फिरते मागेकी रति भामोपर गर्गा | मार्मोको पोर हुई चानकर उसने भेणिक मारे जागे पाकर ममवार- पूर्वक सब हम छ । भेणिक पाताले बमयकुमार नामके बुद्धिशाषी प्रमानने युक्तिके राय नम पालको निकाला । पंगको अपने आगे गुमाकर वममनुमारने पूम, इतने मनुष्य बागमें पते है फिर मौत किस तिस पर चरकर बाम तोपकर मेगावाट, कि परमात किसाथै बालनमें मही माती गम्ने कसा बार मेरा वराव मा फरें । मैं सप सप करदेवा कि मेरे पास एक दिया है। उसके प्रमाणसे में इन वामोंको तोर सका। ममयकुमारने कहा, में सर्प तो क्षमा नही कर सकता । परन्तु महाराज भेणिक पदि त्यस विधाको ना मोकार करे, तो उस लिया भेनेकी अभिगया हानेके कारण हेरे उपकारके में मैं तेरा अपराम क्षमा करा सकता है। पाने इस मासको स्वीकार कर दिया । रूपरचात् बमयकुमारमे पंजाको पहाँ रेगिक परा सिंहासनपर है ये गा कर श्रेणिक के सामने सा लिया और एनाको सब भात र मुनाई । इस बातको रामामे पाकर किया । बादमें पगड सामने सरे एकर परपराते पगसे मिकको सविधाका बोध देने गा परत पर बोध महो मगा । उसे पो होकर भमयकुमार बोडे, महारान! नापको पवि पपिपा पादप सामनी तो बाप सामने जाकर सोयें, और इसे सिंहासन । रामाने या नेके मारते ऐमा किपा, तो तव निपा सिम हो गई। पा माता शिक्षा प्रण करने के मास्क है। एक पराकी मी दिनम किये बिना भेणिक जैसे रामाका मा सिर मई, इसमेसे हो सर प्रण करना चाहिमे कि सद्विपाको सिय करनेके निय निप करना सापक है ।बामनिया पाने पि पदि हम निम्रप गुरुका लिनय करे, तो चितमा ममामापको। नितम मह उचम पीकरण है। उत्तग्रप्पपनमें भगवान्ने विनयको धर्म म काकर वर्णन किया है। गुस्का मुनिका विशाम्का माता-पिताका वीर अपनेसे पड़ोस विलप करमा, ने अपनी उममताके रण है। सुरर्शन सेठ प्राचीन काम पुर एकपनामतके पाल्नेबारे बसस्प पुरुष हो गये। इनमें संकट सहकार प्रमिद हानेबारे पुदर्शन नामका एक सपुस्प मी हो गया है। पनाम, पर मुखातिपात काति- मान और मम्पनयम पा | निस मगर पर पता पा एक बार सी कामके प्रसंग वस नगरके पदरबारके सामनेसे उसे निकम्मा पा । उस साप रानाको बमपा नामको पनी अपने महके हरो में टी यौ । पास उसी पि सुनकी तरफ गई । प्रदर्शमा उतम रूस पौर शरीर देसार बमया मन काच गपा । बमपाने एक रासको मेकर कर-मापसे निर्मक कारण जवाहर दर्शनको उपर गुगापा । नेक तहको मातचीत करने के पचात् बमयाने भुवनको भोगोंकि भोगनेश बामण दिया । फुपर्धनने यात उपदेश दिया तो मी बममाका मन त महामा। अन्तमें पफार सुदर्शनने पुलियूक या परिन में पुस्पल हूँ। तो मी यनाने बनेक प्रकारचे m-माल बताये न सब काम नयमोसे पर्शन बसपमान नही एमा । इससे हारकर पनाने उसकी शिसिपा।
पर विस्व सम्पति]
मोसमासा
२७
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एक बार इस नगरमें कोई उत्सब या । नगरके बाहर नगर-मन मानदसे इधर उधर घूम रहे
ये, पूमाम मच रही थी । सुदर्शन सेठके छह देवकुमार असे पुत्र मा यहाँ आये थे । ममया रानी
मी पिण नामको दासी के साथ ठाठवारस यहाँ बाई थी। मुदर्शनके देवपुतले बसे या पुत्र उसके
देसनेमें पाये। उसने कपिलासे पूँछा, ऐसे रम्य पुत्र किसके हैं । कपिठाने सुदर्शन सेरका नाम लिया।
मुनका नाम सुनते ही रानीकी छातीमें मानों कटार रगी, उसका गइरा पाप लगा । सम भूमधाम
गीत जानेके परयात् माया-पचन धाकर अमपा और उसकी दाने मिलकर रामासे कहा, 'सुम सम-
छते होगे कि मेरे राम्यमें न्याय और नाति पटती है, मेरी प्रना दुर्घनासे दुसी नहीं, परन्तु यह सा
मिथ्या है। बत पुरमें भी हुईन प्रवेश करते है, पहाँ तक तो अौर है। तो फिर दूसरे स्थानों के लिये
तो ना हो पा ! तुम्हारे नगरफे सुदर्शन सेटने मुझे मोगका मामश्रण दिया, वार नहीं कान
पोम्य कपन मुझे सुनना पा । परन्तु मैने उसका तिरस्कार किया। इससे मिशेष अधेर भार क्या
का बाप !" पास रामा से ही कानके कारे होते है, यह बात प्राय सर्पमाप जैसा है, उसमें
निर बोके मायावी मधुर बघन क्या असर नहीं करते ! गरम रोममें ठा अस गस्नके समान नौक
पोंसे रामा क्रोधित हुमा । उसने सुनको मूतीपर पड़ा देने की तत्काल ही आशा, और तर
नमार सब कुछ हो भी गया । कल सुदर्शनके यूपीपर मैग्नेकी ही देर थी।
पु० मा हो, परन्तु सरिके दिम्प मारमें उनाडा है। सम्यका प्रमाव का मही रहता।
सर्शनको शूटीपर बैटरते हो मी परकर उसका सिउमिकाता एषा सोनेका सिंहासन हो गया।
ने दुमिका नर किपा, सर्वत्र मानन्द फंस गया दर्शनका सम्पाठ विष-माटमें एक उठा।
सपशीलको सामय होता है।
सानिका शीउ और उत्तम सता ये दोनों भामाको पत्रिम श्रेणीपर पदाते है।
३४ प्रलपर्पक पिपपमें सुभापित
गो नबयोपनाको देसकर शमर मी विषय रिकारको प्राम नहीं हावे, मो उसे काटको पुवठक
समान गिनते है, ये पुरुष भगवान्के समान हैं ॥१॥
इस समम्म संसारपा नापकाम रमणी सर्वथा शोकम्पाप है, उनफा निन्दनि स्पाग रिपा,
उसने सर पुछ त्याग किया ॥२॥
जिस प्रवर एफ एमके गीत सेनमे उमरन सम्पए, मगर भार परिकार बनाये जाते
१, उमा तप एक पपको गौर ने समस्त ममार गीत लिया जाता ॥३॥
जिस प्रकार पोरा मी मरियान परनेमे प्रदान छा जाता है, उसी तप पिपली सतमे
शान और प्पान मर हो जाता ||॥
१४ प्रसवपपिरे सुमारिन
मरलनमा रोना सिनिम्न गरेपानी स्टी है मगरातामन n ta
मामला मगरनी रपती भापरर एम्यागी स्पीमाता ॥
एरिने र बनी ', पुने बरपर
तसार रात में मन मापन मनन ॥ ॥
में भीम पमबन्द्र [नमताम्मेव जो विमुख मा बाइपूर्वक मनायक शासको धारण करता है, उसका ससर-श्रमण बहुत कम हो पाता है। माई ! यह तालिक बचन ॥५॥ संदर शौहरमी कापावको मन, पचम, और कामसे जो मर मारी सेवन करेंगे, वनुपम फसको प्राप्त करेंगे ॥ ६ ॥ पात्रके मना कोई वस्तु मही गती, पात्र हो भारमशान होता है, पात्र बननके लिये, हे मुरिमान् गो, प्रमचर्यका सा सेवन करो ॥ ७ ॥ ३५ नमस्कारमंत्र नमो बर्दियाम, णमो सिदाण, णमो वापरियार्ण । णमो उपन्यापार्ण, णमो ठोए सबसाइण ॥ इन पवित्र पापोंको निम्रपणाचनमें भाकार (नमस्कम) मत्र अयका पंचपरमेष्ठीमत्र करतो संत भगवान्के बार गुम, सिख भगवान्के बाट गुण, बाचाक मास गुण, उपाप्पापको पास गुण, मीर साधुके सनईस गुण, पे सब मिम्फर एक सौ बाळ गुण होते है। मैंगूठेके बिना बाकीको चार गुलियों के बाद पोरने होते है, और इनसे इन गुणों के नितान करनेको म्यानस्या होनेसे पारको नासे गुणा करनेपर १०८ होते हैं। इसरिप नवकार करनेसे या माशप मारम हाता है कि है. मम्प बपनी गुटियों के पारसे ( नकार) मत्र मी बार गिन ! कार सम्पन्न मर्म करनेवाशा मी होता है। बायको नासे गुणा करनेपर कितने हो, ठतमे गुणोंसे मरा आ मत्र नाकारमको ऐसा नकारना बर्य होता है। पंचपरमेधाका वर्ष इस सफल बगदमें परमोधर पाँच बरखा होता है। कौन कीन है ! तो बनाब देवरे, कि गित मिन, वाधर्म, उपाप्पाप और साम् । इनको नमस्कार करमेका मत्र परमेष्ठीमत्र है।पोच परमेष्ठियोंको एक सायमें नमस्कार होनेसे पचपरमेष्ट्य मत्र या शाम बना । पर मंत्र मनाविधिय माना नावा, कारण कि पचपरमेश्य बनाविसियो। इसम्मेि ये पचों पात्र बार प्य नहीं, ये प्रमादसे मनान, और उनघ सम्मेवाम मी नाशिसिय से पहचाप मी अनारसिद यरती है। प्रम-म पंचपरमेष्ठीमा परिपूर्ण जाननेसे मनुष्प उत्सम गतिको पाते है, ऐसा सपुस्प कावे है। इस पयमें मापा मा मत। उचर-परफाना पापपूर्वक है ऐसा मैं मानता है। प्रम-इस किस कारण म्यायपूर्वक बाबा सकता है! उचर-1 पर हमें में समा । मनके निपके सिपे या सोतम मापापण सुप गुणका पितान है। तया तत्त्वसे देख्नेपर वतरुप सिससस्म बाचार्यस्वरूप, उपामा पररूप और साबुसरप इनका किनेकसे विचार करनेका मी यह सूचक है। क्योंकि वे किम नरामोलिना मादेनोम पी पे, दलवाए मात्र || ५ ॥ दुर मगुप्ता, मन पाली में रेप नरनाको भनुम्म प्रो॥ पाबना परमपे पोबारमा परसावो वपन मालम- मोक्षमामा परगस पूरने योम्प है, ऐसा विचारनेसे इनके स्वरूप, गुण इत्यदिका विचार करनेको सस्पुरुपको तो स्था वाक्यकता है। भव करो कि यह मन कितना कम्पाणकारक है! प्रश्नकार—सत्पुरुप नमस्कारमको मोक्षका कारण कहते , यह इस म्पास्पानसे मैं भी मान्य रसवा । ईत मगवान् सिर भगवान् । "असिभाउसा " श्राचार्य, उपाध्याय और साधु इनका एक एक प्रथम अक्षर लेनेसे यह मान् वास्य घनता है। जिसका ॐ ऐसा योगपिंदुका स्मरूप होता है। इस लिये हमें इस मन्त्रकी विमळ भाषसे जाप करनी चाहिये । ३६ भनुर्वी नरकानुपूर्वी, तिचानुपूर्वी, मनुष्यानुषी और देवानुपूर्वी इन अनुपूर्मियोंक विषयका यह पाठ नही है, परन्तु यह अनुपूषा ' नामको एक ववधान सवधी म्मु पुस्तकके मत्र स्मरणके लिये है। . १ २ १ ។ २ १ ४ ५ १ २ १ २ १ ५ १ ५ ३ २ १ पिता-स तयकी काठकसे मरीई एक छोटीसी पुस्तक , क्या उसे तुम देखा। पुर-का, सिवानी। स्निा-इसमें उम्टे साये मकरसमे है, उसका कुछ कारण तरी समझमें भाया है। पुरमा पितामी । मेरी समझमें मही वाया इसलिये बाप उस फारणको फरिये । पिता-पुत्र या प्रत्योकि मम एक बहुत अचल पाम हा इसे एका फरमा बहुत ही अधिक कि मानब 45 एकाग्र नहीं होता, तब तक भामाको मसिनता नही नाती और पापके विचार कम महारोते । इस एकामताके पिये भगवान्ने गाए प्रतिज्ञा भादि भनेक महान् सापोको कराट मनको एकापतासे महायोगको मेणी पढ़नेके लिये भौर उसे बहुत प्रबरसे निर्मठ फरमके लिये सगुरूपोंने यह एक साधनस्म कोठक बनाई है। इसमें पहरू पचपरमेष्ठीमत्रके पाँच फोफो रममा , और पीछे मोम-विलोम स्वरूपसे इस मरके इन पाच फोका रामबन रमकर भिम मिम प्रफारस मोम बनाई है। इसे करनेका कारण मी पहा, विविसम मनकी एकाग्रता होकर निर्यय हो सके।
भीमद् राजबन्द [सम्परेकरियर पुत्र-पिवानी ने अनुमसे मेनेसे पा क्यों मही बन सकता ! -पदि ये ठोम-विगम हों तो जोरते पाना परे, मोर नाम याद करने परें। पौरका अंक रखनेक बार दोका मक माने तो 'मो मोए सम्बसाइण' के बारमें ' णमो बपिताण' पा बास्स मेकर णमो शिवाण' पाप याद करना पो । इस प्रकार पुनः पुम म्पको पता रसभेसे मन एकामता पर पहुँचता है। ये मक वनुक्रम पर हो तो ऐसा नहीं सकता, पारण कि उस दशा में विचार नहीं करना पाता । इस सूक्ष्म समयमें मन परमेष्ठोमोसे निकलकर संसार-का मटपटमें ग पावा है, और कमी धर्मको नगर मारपाय मी कर बैठता है। स्से सपुराने बन पूषाको पोग्ना की । यह बात सदर और बारम-तिको देनेवाला। ३७ सामायिक पिचार (१) आममतिका प्रकाश करनेवाग, सम्पनिका सदय करनेवाग, पुर समापिभानमें प्रवेश करनेवाडा, निर्मराका पम्प छाम देनेवाग, राग-रेपसे मध्यस्प मुनि करमेवाम सामायिक नामका शिक्षात है। सामायिक घरको म्पुत्पति सम + बाप + क इन पदोंसे होती है। 'समर्प गग शेप रहित मध्यस्थ परिणाम, 'बाप' का वर्ष उस सममाननासे उत्पम इला शान दर्शन चारित्ररूप मोश-मार्गका माम मोर 'क' का पर्व माल होता है। पर्यात् जिसके पय मोरके मार्गका गम- दायक माल उत्पन हो र सामायिक । वात और मन दो प्रकारके स्थानका त्याग करके मन, पन बोर कापके पार-मावोंको रोककर विवेकी मनुष्य सामायिक करते। मन पुग तरगी है। सामाप्पिकम बम विक्षुर परिणामसे पना बताया गया है, उस समय भी पार मन आकाश पातालके पार पहा करता है। इसी तर भूष विस्पति, उग्मार स्पादिसे पपन बोर प्रपो मी पण बानेस सम्मायिक दोष उगता है । मन पचन और कायके मिथर बतास दोष उपम दोत है। इस मनके, दस पचनक और बारह कायके इस प्रकार मर्गस दोपोंको बानना वाम्पका इनक जाननेसे मम सावधान यता है। मनक इस दोर काप १ अविलोप---सामायिकका सप नहीं गामनेसे मनमें ऐसा विचार करना कि इससे क्या पर होना था। इससे ता किमने पार पापा होगा, ऐसे निकम्पोका नाम अतिकदोष है। २ पोहोर-दम सप सामापिक करत है, ऐसा दूसरे ममुष्प मानें तो प्रशंसा परे, ऐसी खास सामायिक रमा ए मोशेष है। पमापार-धमय इप्यासे सामायिक करमा बममाप है। शर-मुझे लोग धर्मामा करते ६ वार में साम्पपिक मी पैसे परता ! ऐसा माप पसाप माना गोर। ५ मार-मैं प्रारक कुरा गया। मुट सोग मा मानकर माम देते है पदि में सामान पिक कर तो छोग कहगे कि इतनी मिपा भी नहीं करता, ऐसी निशाने भपसे सामायिक करमा पपशेर।
सामापिथौचर] मोसमामा ४१ ६ निदानदोप---सामायिक करके उसके पळसे धन, जी, पुत्र बादि मिटनेको ठा करना निदानदोष है। ७ सशयदोप–सामायिकका फल होगा अपना नहीं होगा, ऐसा विकल्प करना सशपदोप है। ८ पापदोप-प्रोम आदिसे सामायिक करने बैठ जाना, अपमा पाछेस झोप, मान, माया, पौर लोममें पति गाना या कषायदोष है। ९ भक्निक्दोप-मिनय रहित होकर सामायिक करना भक्निक्दोष है। १० अमानदोप-मकिमाव और उमगपूर्वक सामायिक न करना वह बहुमानदोष । ३८ सामायिकषिपार (२) मनके दस दोप करे, बब वचनफे दस दोप करता है। १ गोलोप--सामापिकमें अपन वोडना वा कुलोदोष है। २ सहसाकारदोप–सामायिकमें सबससे विचारपूर्वक वाक्य मोसना यह सहसात्कारदोष है । २ बसदारोपणोप-दूसको सोटा उपदेश देना पर मसारोपणदोष है। १ निरपेझोप–सामायिक शासकी उपेक्षा करके पाप बोम्ना यह निरपेशलोप है। ५ सोफ्योप--सूत्रके पाठ इत्यादिको सक्षेपमें बोस बाना, पपार्य नहीं योगना मह संचपदोप है। ६ शिदोप–किसीसे नगमा करना बहशदोष है। ७ विक्रपादोप-चार प्रकारकी किया कर बैठना पर विरुपादोपहै। ८हास्पदोप--सामायिक किसीकी सी मस्सरी करमा महास्पदोष है। ९ गगुरदोप–सामायिकमें सूप्रपाठको म्यूनाधिक भीर मधुर बोसना का अवलोप ।। १. मुममुणदोष-गावा मोटाळेस सामापिकमें इस तरह पाटका मोडना बो बपने आप मी पूरा मुकिससे समझ सके वा मुणमुणदोष है। पे पबनके दस दोप कहे, अव कायके मारह दोप करता है। १अयोग्यासनदाप–सामायिकौ पैरपर पैर माकर भेटना, यह भीगुरु बारिक प्रति मपिनप नासनसे मेठमा पहम अपोम्पवासनदोष है। २ पसासनदोप-उगमगाते हुए वासनपर बैठकर सामायिक करना, अपना जहाँसे बार बार उदना पो ऐसे आसनफर भेटना पसारानटोपी। १ चमारिदोप--कायोसमें जोगेका पपट हाना परमिशेष है। १ सावकिपादप-सामायिकमें कोई पाप-क्रिया अपना उसका सश फरमा सापपरिया- रोष। ५ बाउंबनदोष-भात मादिका सहारा लेकर बैठना लिससे पहों पर हुए जीव जंतुओं बारिका नाश हो अपना उमें पीड़ा हो और अपनेको प्रमा की प्रचि ० यह भाटबनो। ९ वाकुचनप्रसारणदोष-प पैरका सिकोडना, सबा करना आदि आयुषनप्रसारणार!
भीमद पमबम्ब [जमाAAIR ७ मामसोप-अगमा मोहना, गठियोंका घटकाना बानि माम्सोयो। ८ मोटनगेष--अगुती गए टेदी करना उँगशियोका पटकाना मोटनोपो। ९ ममदार–प्रसा पसाकर सम्मायिकमें सुबाकर मैट निकामना मदोष है। १० विमास्मोपला पप गडकर मैटना स्मादि लिमासणोप है। ११ निवाोप–सामायिक नाव वाना निवाशेप है। १२ बबसंकोचनोप–सामायिक, हर गरेके भपसे बससे शरीरका सिकोरमा कर समोचनदोपी। स्त बचीस दोसे रहित सम्मायिक करमाचाहिये । सामापिकके पाच मताचारोंको इटामा चाहिये ३१ सामायिकषिपार (१) एमता और सारधानांके बिना इन पचास दोषों से कोई न कोई पोप मा नाते हैं। शिान ताजाने सामापिका बम्प प्रमाण रो पड़ी गोरा है। यह त सानभानीपूर्वक करनेसे परमशा- देता है । पतसे ठोगोंका अब या दो घच कामही बीतता तब ये गात म्पाकुल हैं सम्मायिक माली बेटनसे कार बात भी कसे सकता । मानिक कामे सामपानीसे सम्मापिन करनपाउ बहुत ही पोर ग है। जब सामायिक साप प्रसिपमण करना होता है, तो समा पीतना सुगम होता है । पपपि एसे पामर रोग प्रतिक्रमणको क्षपूर्वक नहीं कर सकते, तो मी के पाजी बटने अमेधा इसमें कुछ न कुछ अन्तर माइप परता है। मिरें सम्मायिक मी पूरा नई माता चारे मामापिकी बात पाा। बदसे मारकर्मा छोग इस बासरपर म्पहार प्रपच मी पाहते हैं। इसस समापिक बहुत एपित होता है। मामायिकका विधिपूर्वक न होना इसे बहुत सेदकारक और कर्मको बाहुम्यता समझना चाहिये सार पकनरात म्पर्ष पछ मात । सम्पत दिनास परिपूर्ण बनतों का म्पतीत करने पर मौ यो मिद नही होता पदोपहार विबुर सामापिकसे सिद्ध हो जाता है । एमपूर्वक सामापित कग्नक हिय सामापिफमें प्रवेश करके परमात् चार भोगस्ससे भरिक गस्सा कम्पोरसर्ग कर पिको ए वापता प्रा करनी चाहिय और पार में सूत्रपाट अपया किसी उत्तम प्रथका मन- करना चाहिए । पैराग्यरे उत्तम शास पढ़ना चाहिये परिठेके अप्पमन किये हुएको स्मरण कर गाना पदिय भोर मूतन अम्पास हो सके तो फरना चाहिय, पपा किसी पास वापारसे परे देना चाहिय । इस प्रकार सामापिरमा कार म्पनीत प्रना चाहिये । परि मुनिराका समागम हो ता भागमको पानी सुनमा भार उमग्र मनन करना चाहिये । परि ऐमा म हो, और शामोर परिपप भी न तो विभाग अम्पामियों पाम रम्यकोषक उपदेश भरण परना चाहिये मपरा पर अम्पाम पग्ना चाहिए । पदि ये सब अनमताय न रो, तो कुछ भाग म्यानपूर्व- पापामगर्म मगाना चापि भार भाग म्हापुस्ताको परिप्र-कथा सुनने उपपोगपूर्व प्रगान बाहिय पर गबन मे सिर और उसादम मामायिक्फे कम्पनीत करना चाहिये । प-ि बुछ साहितमा, तो पंचपरमेमर गार ही उत्साहपूर्वक करना चाहिये । परनु काठको म्पय बषम और . प्रविणमाक्विार] मोसमाला नहीं गवाना चाहिये । पौरमसे, शान्तिसे और पतनासे सामायिक करना चाहिये । नसे बने तैसे सामायिक, शारका परिचय बनाना चाहिये । साठ धाके बदोरात्रमेंसे दो घड़ी वय बनाकर समायिक तो समापसे करो! ५. मतिक्रमणविचार प्रतिक्रमणका बर्य पीछे फिरना-फिरसे देर बाना-होता है। मावको अपेक्षा मिस नि बीर बिस मक प्रतिक्रमण करना हो, उस पळसे पहले वया उसी दिन जो भो दोष पए हों उन्हें एकके यार एक अतररमासे देस चाना और उनका पमालाप करके उन दार्पोसे पीछे फिरना इसको प्रति प्रमण करते। उत्तम मुनि वार माविक श्रावक Pनमें ए दापोंका सम्याकाळमें और रात्रिमें हुए दोपोंका राषिके पिछले मागमें अनुक्रमसे एपाचाप करते है अपना उनकी क्षमा माँगते है, इसका नाम यहाँ प्रतिक्रमण है। यह प्रतिक्रमण हमें भी भाश्य करना चाहिये, क्योंकि यह पारमा मन, कापके योगसे अनेक प्रकार के कर्माको गाँधती है । प्रतिक्रमण सूत्रमें इसका दोहन किया गया है। जिससे Pमराममें हुए पापका पश्चाताप हो सकता है। शुद मावसे पचाचाप फरनेसे इसके द्वारा मात्र पाप मी नेपर परोक भय और मनुकपा प्रगट होती है, मामा कोमध होती है, भार त्यागने योम्प बस्तुका विवेक बाता जाता है। मगवान्को साक्षासे महान मादि मिन दिन दोपोंका विस्मरण सुना हो उनका मी पपाधापो सकता है। इस प्रकार या निरा करनेका उत्तम साधन है। प्रतिक्रमणका नाम बावश्पक मी है। वप ही करने योग्यको भावश्यक करते है, यह सप है। उसके द्वारा बारमाही मछिनता दूर होता है, इसलिये इसे माश्म करना चाहिये । सायका जो प्रतिक्रमण किया जाता है, उसका नाम 'देवसीयपरिममण' अर्थात् पिस सपनी पापोंका पश्चाताप है, और रात्रिके पिछले मागमें मो प्रतिक्रमण किया जाता है, उसे रखपपडिक्मण' करते है। 'देवसीय ' भौर । वय । ये प्राकृत भापा शम्द है । पचमें किये जानेवाले प्रतिक्रमणको पाशिक बार संवरसरमें किये जानेबारेको सांयसरिक (एम) प्रतिक्रमण करते हैं। पुरुपोंकी योजना द्वारा मापा आ यह मुदर नियम है। पाससे सामान्य पुरिक लोग ऐसा कहते हैं, कि दिन भौर पत्रिका का प्रायपितम्प प्रति- फमण समेरे किया नाप तो कोई सुराई महो । परन्तु ऐसा कामा प्रामाणिक नहीं है, क्योंकि यदि रात्रिमें अकस्मात् कई कारण वा माप, अपवा पत्यु हो बाप सो गिनका पतिवनण मी व माय । प्रतिफमण-मूहको यो प्रना बहुत मुटर है। इसका मूल तत्त पहुत उत्तम है। चमे बन से प्रतिक्ष्मण पीरमसे, समछमें आ सकनवासी भाषासे, चोविसे, मनको एफामवास और धवनापूर्वक करना चाहिये। ४१ मिम्मारीका म्बर । - एक पामर मिमारी जगउमे माफता फिरता था । यहाँ उस मूम् गा । ह मिपारा छा माता हुआ एक मगरमें एक सामान्य मनुष्पक घर पहुँचा। वहाँ नाफर उसमे मनक प्रकारस मार्पना भीम पमबान [मिलारसेर की। उसकी प्रार्थनापर करणा करके उस गृहस्पको बौने उसको घरमें पौमनेसे पचा वा नियम हा कर दिया । मोबनके मिझनेसे भिखारी बहुत बारित होता या मगरके पाहर मापा, वीर एक उसके नीचे बैठ गया । गाँ पण साफ करके उसने एक वरफ मस्पात पुराना अपना पानीका पा रस हिमा । एक तरफ अपनी फी पुपनी मैरी गूसी रस्सी, भौर दूसरी तरफ पर सपं उस भोजनको केकर भय । मुशी सुधाक साप उसने उस मोमनको साकर पूरा किया । तत्पपात सिपने एक पत्पर रसकर सो गया । भोजनके मासे बरा देरमें भिसाको बाँसे मिच गई। मा निवाके पश वा । इसनेमें उसे पक सज बापा । उसे ऐसा भगा कि उसने मानों महा रानऋतिको प्राप्त कर लिया है, सुन्दर बामपण धारण किये है, समस्त देशमें उसकी विषयका रफा बन गया है, समीपमें उसकी वदा उठानेके छिपे अनुचर डोग सोए, वास पासमें छपवार क्षेम खेम पुपर ये है। पर एक रमणीय माम्में सुन्दर पगपर व्यापा, देवांगना सी लियाँ उसके पैर गायो, एक तरफसे पसेकी म म पान हुए हो। इस साप्नमें मिसाएको भारमा पा गई। उस सजका मोग करत ए र रोमांचित हो गया । इतने में मेध महापम चा वापे, विठी चमकने गो, सूर्य बारसे क गया सब नगा बधकार फैल गया । ऐसा माम मा कि मसाधार बर्षा होगी और इक्ने बिमाको गर्ननासे एक जोरका काम हुमा । साकेकी वाला- जसे मयमात कर पा पामर मिसारी नाग उठा । ४० मिनारीका खेद (२) तो ऐसता पाहै कि जिस जगह पानीका कटा एखा ा पहा था, उसी जगह पर पामा है गो फटी पुरानी गूपी पी पी रही पड़ी है। उसने जैसे मै और फळे गए कप पाने के पैसे से ये बस उसके सिरके उपर है । म तिम्मर मुगा और म बोमर पठा; न र देश, म यह नगरी न प मा, म प पम्गा न वे चामर पुत्र बोरनेवाले पौर न मार सिपी गौर नये बबासकारण म प पैसा और न पह परनाम अनुचर और न पहनावा मुसलिमस वर न बह मदोन्मत्ता । विचरा पा सर पैसा पासाका सा ही साई Rपा । इस कारण इस एपको देखकर उस केर वा । सप्नमें मैंने मिष्या मारबर देखा वीर उससे मानद माना पम्त उस्मे का वो गाँसमी महाँ । मैंने सन मोगोको भागा नही, ति उसके परिणामरूप से मै मोग या !!स प्रकार पर पामर बीप पवाजपम पर गया । भो मम्यो । मिधारक नको पण ससा सपनिमय है। जैसे उस मिसायने सम्नमें मुस-समारो देना और बानर माना इसी तय पामर प्राणी ससार-सप्न भ्समा मानद मानते । जैसे पर सस नागनेपर मिप्पा माम मा उसी प्रकार बम प्राप्त ऐनेपर ससारके सुस मिथ्या माश्म लेते हैं। सजके भोगोंको म मोगनेफ्र मी से मिपारी की प्राति से हो भारपि प्राली संस्पर मुस मान बैठते है, और उसे मोगे के समान गिनते है । परन्तु परिणाममें ४५ अनुपम पमा ] मोसमासा से, दुर्गति और पश्चापापी प्राप्त करते है। मोगाके चपल वीर विनाशीक होने के कारण स्वप्न के सेदके समान उनका परिणाम घेता है । इसके उपरस मुद्धिमान् पुरुष भरम हितको सोबते । ससारको पनि पताके उपर एक काम्प है उपनात विपुत् एश्मी प्रमृता पतग, आयुष्य ते सो गळना तरग, पुरदरी चाप वनंगरग, र गघिये त्या क्षणनो प्रसग' विशेपार्य -समी निनके समान है। वैसे विजलीकी चमक उत्पन होकर विधान हो जाती है, उसी वर मी बाफर पछी गाती है। अधिकार पतगके रंगके समान है। वैसे पतगका रंग पार दिनको बाँदनी है, वैसे ही अधिकार केवट यो कार तक कर हापर्मेसे दाता राता है। गाय पानीको मरों के समान है। वैसे पानीकी हिलोरे इमर बाई कि उघर निकल गई, इसी तय मन्म पापा, और एक देह में राने पाया भयत्रा नहीं, कि इतने हीमें इसे दूसरी देहमें जाना परता है। काम भोग बाकाशमें उत्पम ए इन्द्र-धनुषके समान है। जैसे छ-अनुप वर्षाकालमें उत्पम रोकर क्षण- भरमें विलीन हो जाता है, उसी तग यौवनमें कामके विकार फलीभूत होकर जरा-पपमें माते राव है। सक्षेपमें, हे मीन ! इन समस्त बस्तुगोंका सबध क्षणभरका है। इसमें प्रेम-बधनको साँकलसे कर मम क्या होना ! सात्पर्य या है, कि पे सब घपल मौर विनाशीक रे, तू बसा और भनिनाया है, इसकिये अपने जैसी पक्षको प्राप्त कर, यही उपदेश यथार्थ है। ४३ भमुपम समा बमा क्वात्रुको जीतने में सहग है पवित्र माचारको रक्षा करमेमें बस्तर है। झुर भाबसे बस एसमें सम परिणामसे धमा रस्नेवाला मनुष्य मा-सागरसे पार हो जाता है। पण पामुदेवका गवसुकुमार मामका छोटा मई महासरूपवान धीर सुकुमार था । यह केवल पण वर्षकी क्यमें मगवान् भेमिनापके पास संसार-स्यागी होकर स्मशानमें उप्र प्यानमें अवस्थित था। उस समय उसने एक बहुत धमामय परिप्रसे महासिद्धि प्राप्त की उसे में यहाँ करता है। सोम नामके मामणकी सुन्दरवर्णसपम पुत्रीके साप गपसुकुमारको सगर्व ई थी। परन्त विवाश होने के पहले ही गसम्मार ससार त्याग कर घसे गये। इस कारण अपनी पुत्री के मुसके माय होने के पसे सोमस प्रामणको भ्यर कोष उत्पम हुआ । यह गमकुमारको सोग करते करते उस स्पयनमें का पांचा, गों महा मुनि गरमामार एका विजय भासे कायोसमें मौन थे।सामने कोमल गबमुश्मारके सिरपर चिकनी मिाको गार बना कर इसके भीतर भमकते हुए मगारे भरे, मीर इसे बनसे पूर दिया । इस कारण गमुकमारको महाताप उत्पन हुआ। अब गजमुषमारकी कोमल देह बख्ने मो, ब सोमल पर दिया । उस समयके गसम्मारके बसम टु सका वर्णन केस हो सस्ता । फिर मी गनमुपुमार सममा परिणामसे थे। उनके दयमें कुछ मी कोष अपमाप उत्पन नाहा। उन्होंने अपनी मामाको स्थिविस्थापक दशा हाकर पर उपदेश दिया, कि देस रिले सभामणकी पुत्री के साथ विरार किया होता तो या कन्या-दानमें तुझे पगड़ी देता । यह पगली पारे दिनोंमें घट गादी और अन्तमें इसापक होती। किन्तु पर इसका बहुत बहा उपकार भा, कि इस पापीके बदले इसने मोचको फाही बोध दो ऐसे विगुर परिणामोंसे भाग एकर सममाषसे बसघ । मीमा रामचन्द्र [प्प केमा सरकर गनमकुमारमे सह सर्वशी होकर अनंतनावम मुसको पाया। कैसी वनुपम शमा पौर कैसा उसका सदर परिणाम ! तत्वानियों का कथन है कि वामाओंको कंबर वन सभा में बाना चाहिये और वात्मा अपने सहभागमें मापी कि मोष इपेमें ही है। गनमकुमारको प्रसिम प्रमा कैसी भिषा देती है। ४४ राग मम्ण भगवान् महावार के मुख्य गणषर गावमका नाम तुमने मात बार सुमा है । गौतम- सामाके उपोश किये गए मासे शिष्यों के कान पानेपर मी स्वर्ष गौतमका केवलान न मा क्योकि भगवान् महापारके संगोपांग, वर्ण रूप स्पारिके उपर सभी गौतमको मोह था । निर्मप प्राचनका निष्पक्षपाती म्याप ऐसा ह कि किसी मी वस्तुच राग हु सापक होता है । एग ही मोही और मोदी ससर है । गौतमक एपसे या रण चक्तक र न मा तबतक उनें केनामको प्राप्ति मार्ग । भमण भगवान् घातपुझ्ने नब मनुफ्मेय सिद्धि पाई उस समय गौतम नगरमेसे वा से थे । भगवान्के निर्माण समाचार सुनकर उने से हवा । मयसे गौतमने पे वनुरागपूर्ण वमन कहे है महापार ! मापने मुझ साप तो न रमसा परस्त मुझे माद तक मी न किया । मेरो प्रतिके सामने भापन रवि मी नही की ऐसा मापको उचित न पा।" ऐसे विकल्प होते होते गौतमका कम किय भौर ने निराग-धणी परे । ' मैं बात मर्मता पर हा। पे पोतराग, निर्विकारी बीर रागहीन है मुझपर मोर जैसे रस सकते है। उनकी पत्र और मित्रपर एक समान रिपी। इन रगहीनका मिप्या मोह रमता । । मोर ससरका प्रबस करण है।" से विचारते विचारते गौतम भोमो मेकर रागरित हुए। तत्सम हो गीतमको अनवधान प्रकाशित हवा और ये बतमें निर्वाण पपार । गौतम मुनिका राग में बहुत सूक्ष्म उपोश देता है। मगवान्के उपरका मोर गातम पैसे गणधरको मीसापकरमा दो फिर ससारका और उसमें मी पामर वारमाओंका मोर कसा बनत दुस देता होगा 1 मसारम्पी गायक एग बार वेप नमी दो बैग । पनि ये महों तो ससार मठक माप । ज्यों पग नही पोप मी महाँ, यह माना वा ति। रग तीन कर्मषधका कारण हजार सो भयो भारम-सिदिहै। ४५ सामाम्प ममोरय मादिनीमायके विचारकि अचान होकर मपासे परनाको म दे। नर्म ताकि गोभको परार स्कमको पथरके समान समएँ । बाया मार दानता पारण करके स्वरूपको विचारकर सानिक गर्ने । यह मेरा सा घेम करमेवाम र मारनेवासा नियम निस्म बम्बर १॥ ४सामान्य मनोरम गा मोहिनीमर कि मौन ईमाननाने मनाप परतुम गर्नु रसमा मर्मय सालिम समाप! गरपाच मने पानता पाणलाई सस्पतिचाय एर नेम य एमबमध, निरमाया ममा॥१॥ + मोसमामा ७ उन त्रिशलावनयको मनसे चिंतन करके, शान, श्विक और विधारको का, निस्य नो वनों का विशोधन करके अनक प्रकारके उत्तम उपदेशोंका मुससे कपन कसे, निससे सशयरूपी वीनका मनके मातर उदय न हो ऐसे दिन भगवान्के कपनका सदा ववधारण काँ। हे रायचन्द्र, सदा मेरा यही मनोरथ है, इसे धारणकर, मोक्ष मिरगा ॥ २ ॥ ४६ कपिलमुनि . सावी नामका एक नगरी थी। महक राजदरबारमें एग्यका मामूपणहप काश्यप नामका एक शखी एता था। इसकी नीका नाम नाम ग्रीदेवी था। उसके उदरसे कपिल नामक एक इन उत्पम हुआ । कपिछ नव पदा वर्षका एला उस समय उसका पिता परक सिधारा । कपिल पा पारमें पाले जाने के कारण कोई विशेप विद्वत्ता प्राप्त न कर सका, इसलिप इसके पिताकी मगह किसी दूसरे विद्वान्को मिली । कारपप शास्त्री को भी कमाकर रस गया था, उसे कमानेमें वराण कपिसन साकर पूरी कर राही । प्रौदवी एक दिन घरके झारपर सपी पी कि इतनेमें उसने दो चार नौकरों सहित अपने पतिकी शास्त्रीय पदवीपर नियुक्त विद्वान्को उभरसे माता हुआ ऐसा । यो मानसे गाते हुए इस शामीका देसकर पीयाको अपनी स्पितिका स्मरण हो पाया । जिस समप मेरा पति इस पदवीपर था, उस समय मैं कैसा मुस भोगती थी ! यह मेरा मुख गया सो गया, परन्तु मेरा पुत्र मी पूरा नहीं पड़ा। ऐसे मिषारमें चूमते घूमते उसकी बॉलॉमेसे पट फट मॉस् गिरने प्यो । इसनेमें फिरते फिरत हो कपिस आ पहुँचा । श्रीदेमीको राताई देसफर कपिन म्नेका कारण डा । कपिलके बहुत भाषासे प्रीदेवीने गो बात यी ५ कह दी । पिर कपिसने घा, 'देस माँ ! मैं युनिशाती हैं, परन्तु मेरी बुद्धिका उपयोग जैसा चाहिये पैसा महीं हो सका। इसलिम्प विचाके बिना मैंने यह पानी नहीं प्राप्त की। अब नहीं कहे मैं यहाँ नाफर अपनेसे बनती विपाको सिन ।' प्रोग्याने स्लेसे कहा यह तुमसे नहीं हो सकता, यया आर्यावर्तकी सीमापर स्थित मास्ति नगरी इन्द्रदत्त नामका तेरे पिताका मित्र यता है पर अनक विपापियोंको निवासन देता । यदि त्यहाँ पा सक सो इएकी सिद्धि अथप हो।" एक दो दिन रुककर सब तैयारी कर 'भस्तु' काफर कपिउनान रास्ता पकड़ा। स्वापि मीटनेपर कपिछ भाषतामें शामी मौके पर मा पहुँच । उन्होंने प्रणाम करके शापानीको भपना इतिकास कर सुमाया । गाग्रीमाने भपन मित्रके पुत्रका पिघाशन इनके छिपे बहुत भामद रिसापा; परन्तु फक्सिके पास कोई मी म पी, बिमसे पर उसमेसे म्पासा और मम्याम कर सकता। इस कारण उसे मगरमे माँगनेक ठिये जामा परता पा। मांगते मांगते उसे दुपहर हो जाता था, पामें परसोई करता और भोजन करनेतक सौत होनमें कुछ ही देर बाकी यानी यौ। इस फारण पा तेमियमय मन ति सान विवेक रिपार पवार निरव पोषीब पलनो उचम पार भनेक उम्बाई माय मे नही भएपनि कपना मरधर पम राम एक मनो शे माग उतारं ॥२॥ .
१८ भीमद् पश्चान्द्र कुछ अभ्यास नहीं कर सकता था। परितमीने बम्पास म करनेका कारण या, तो कपिछले सप हिमा । परितनी कपिठको एक गास्पके पास मे गये । उस गइस्पने कपिपर अनुकंपा करके एक विषया प्रमणाने पर इसे हमेशा मोमन मिक यनेको म्पपस्या कर दी। उससे पिसकी एक पिता कम हुई। ४७ कपिलमुनि (२) पही एक छोटी शिवा कम हुई, पोसरी यी यमाय पदी हो गई। मोगा कपिर का पुजा हो गया पा, और जिस विषवाके पर र मोनम करने जाता पाए पिया बई मी पुरती पी। विषयाके साप उसके परमें दूसरा कोई वादमी न था। हमेशकी परस्परको बातचीतसे दोनों स्बर बना, वौर मकर हास्प निमालपमें परिणत हो गया । इस प्रकार होते होते दोनोंमें गार प्रति भी। कपिल उसमें सम्म हो गया ! एकांत बहुत भनिए चीन है। कपिल मिपा प्रभ करमा मूग गया । गृहस्थकी तरफसे मिझने माझे सौदेसे दोनोंका मुसिखसे निता पा करेग्नेको भी बापा हाने गौ । कपिस गृहस्पाश्रम जैसा बना बैठे थे। कुछ मीदो किर मौ सपुषमा पार होनेसे पपिम्मो संसारके विशेष प्रपथ सबर मी न पी। इसखिये 4सा से पा करना इस बातको महविचारा बानता मी म पाच सोने उसे रास्ता बताया कि पानसे कुछ म ऐगा उपापसे सिधि होती है। इस गाँके रामाका ऐसा मिपम है, किसको सबसे पइसे जाकर मोमण उसे भाशीर्वाद दे, उसे दो मागे सोना मिमेगा । यदि तुम यहाँगा सको और पास बाशी दे सको तो या दो मासा सोना मिल सकता है । कपिल इस मावको साकार को। कपिलने भार दिनका पके सापे परन्तु समय बात मानेपर पांचनेसे उसे इस समता म मिती पी। एक दिन उसने ऐसा निश्चय किया, कि पदि में भीरमें सोते तो चिन्ता के कारण ठगा। पामें सामा । बाधी रात बीतनेपर केन्द्रका उदय मा । कपिठ प्रमात समात्र जान मुसी बाँधकर माशाद देनमे लिये दौड़ते हुए जाने भगा । रमपा ने उसे चोर बानर पर किया । मेक देने पर गपे । प्रभात हुमा रक्षपामने कपिम्को गाकर रागके समन सहा कि.पा | कपिल मुष सा सहाया | रामाको उसमें चार प्रक्षण रसाई नहीं दिये । इसलिये रानामे सबसत पूसा के प्रयाको पूरे समान गिननेवालेके मोफ्नपर रामाचे दया भाई । उसको रणि ताकोर करनेकी रामाय राई इमरिये उसने परिकसे कहा कि यदि नाक कारण दसे एलनी अधिक असर परनी पी तो बात अपनी इच्छानुसार माग । मैं तुम ऍगा । पिड पोपी देर तक मासा हो गया। इसम सजाने कहा, क्यों विप्र 1 मगत यों नही। कपिलने उत्तर Rपा, मेरा मन ममी पर नहीं हुमा इसलिये क्या मांग पर मही सूचना । यमाने सामने के बागमें मार ही बैठकर साम्यतापूर्वक विचार करके कपिलको मागमेकेरिये कहा कि बागमे गाकर रिचार करन बगा समनि मोसमाग ८कपिलमुनि बिसे दो मासा सोना लेनेकी इच्छा थी वह कपिल अब दाणाकी वरगोंमें या गया। जब उसन पाँच मोहर मांगने की इच्छा की ता उसे विचार वाया कि पाच मोहरोंसे कुछ पूरा नहीं हागा । इस- पे पास मोहरे मॅगना ठीक ह। यह विचार भी पापील मोहरोसे कुछ पूरा षष नहीं गा, इसलिये सौ मोहरे मांगना चाहिये । यह विचार भी बदग । सा मोहासे दो वर्ष तक मेमर भोगेगे, रितु सका दु सही है। मतएव एक हजार मोहरोंको याचना करना ठोकरें। परन्तु एक गर मोहरे, बालोंके दो घार मुर्च वाय, कि सतम हा जागी, ता पूरा मी क्या पोगा । इस- निये दस हजार मोहरे माँगना ठीक है, जिससे कि जिन्दगी भर भी विधा न हो। यह मा रस काय । दस हजार मोहरं सा जाने के बाद फिर नाके बिना राना पड़ेगा। इसलिये एक टास म्यागकी माँगनी करें कि निसके म्यानमें समस्त बमको भोग सई । परन्तु हे और ! म्माधिपति ता पहुत है, इसमें में प्रसिद कासि हा सकता है। अतएष फरोग मोहरें माँगना ठीक , कि मिसस में मान् श्रीमान्त का नाउँ। फिर पछि रग वाटा महान् श्रीमतपनेसे मी परपर अमदा नहीं की वासकती। इसस्टिये राजाका भाषा राम्प माँगना ठीक ।परा य में आधा राज्य मागूगा तो रामा मेर हुम्प गिना जावेगा और इसके सिवाय म उसका यापक भी गिना आगा। इसलिये माँगना ता किर समस्त राश्य ही माँगना पाहिये । इस तर कपिल तृष्णामे पूना । परन्तु पर था तुच्छ ससारी, इससे किरसे पीछे पीटा। ममा बीब 1 ऐसी तमता म्यों करनी चाहिये कि मो तरी इण्यानुसार दनक PR तत्पर हो, उसका ही राग्य से है और उस ही भए करें। वास्तवमें देखनेसे वो इसमें अपनी हो अता । इसस्लिप भाषा राम्प माँगना ठीक है। परन्तु इस उपारिकी मी मुझे मागस्यकता नहीं कर स्प पसेकी उपाधि ही क्या है। इसलिये करोड़ पास छारकर सा दौसो मोहरें माग छना ठीक । र सा गेसी मोहरें मिलेगी तो फिर विषय बमबमें ही समय थला मायगा, और विषाभ्यास मी पर यगा । इससिय मा पाँच मोहरें सो पारेको मात पीछ । अरे । पौध मोहरोंकी मी ममी हामें पर कई मादयकता नहीं। कह दो मासा सोना उन बाया था उस ही माँग । यौन ! यह ता ठा बहस हुई। तृष्णा-समुइमें उन बहुत दुबदियों सगा । समम्न गम्य मांगनेस मी या तृष्णा नहीं पुमा यी उसे कम सतोप भार विकसे घटाया ताटी। यह राग यदि पत्रपती हाता, ता सिर मैं इससे विशप क्या माँग सकता था और विशेष जबतक न मिसता तबतक मेरी तृष्णा मी शान्त म होती । जाता तणा शान्त न होती, तबतक मैं मुसी मी न होता। जब इतनमे पा मग तृष्णा शान्त न हुई तो दिर दो मास सोनेस बसे शान्त हो सकती ह। कपिलकी मामा रिमाने ना आर बा मोटा, मा मुझे मी मास सोनका भी कुछ काम नही। दो मासम भाका म कितनतक पहुँच गया 1 मुमता स्सा ही है। कृष्णा ससारका बीया इसकी तुम या भावयता है। हण करता हुआ विपयमें पड़ गया विषयमें पड़नेम इस उपाधिमें पा गया उपाधि पारण त् मनम्ननृणा समुहमें पड़ा । एक उपाधिमे म ममारमें पसी पनन्त उपाधियों सदन करमा पानी प्रीमद् चन्द्र [तमाना है। इस कारण इसका त्याग करमा ही उचित है। सप संतोषके समाम निरपाधिक पुस एक मी नहीं। ऐसे विचारते विचारते, तृष्णाके शमन करनेसे उस कपिल भनेक बारणाका एम एमा, उसका बतरण प्रकृति भार बात विकासाला कि निको ही उत्तम शानसे पावनी बामाका विचार कर सका । उसने बर्ष प्रेणी सर केपणानको प्राप्त किया । तृष्णा कसा कनिष्ठ पताना ऐसा करते है कि तृष्णा वाशके समान पनत है, पर निरंतर नवयौवममें यती है। अपनी चार मितना कुछ मिश कि उससे बाद मौर मी मनाती है। संतोय ही कम्पवृक्ष है, और यही प्रत्येक मनोमको पूर्ण करता है। १९वष्णाकी विधिपता (एक गरीबकी परवी विष्णा) विस समय दौमताई पो उस समय जमादारी पानेको इमई, पब जमीदारी मिली तो सेठाई पानेको इगई, जब से प्राप्त हो गई तो मंत्री होनेको इमई, मा मंत्री इबा तो रागा कम- मेको मापन राम्प मिला, तो देव बननेको पाई जब बाबा तो महादेप होनेको म । का रम्पचन्द्र ! या परि महाच मी हो पाप तो भी तृष्णा तो बहती हो जाती है, मरती मही ऐसा मानों ॥१॥ मुंहपर हरियों पर गर, गाठ पिच गये, काठी कसको पार्यो सफेद पागा स्ने, सुनने और देमनेको पहिया वाती दी और दाँतोको पति सिर गई अपना पिस गई, कमर यो हो गई, हस सूस गपे, शरीरका रंग उग गया उसमे पैटनेको शकि नाती पो, और बसनेमें हापौ महीनी पा गई । बरे! एपचय इस तर पुपारपासे एप घोटे, परन्तु फिर भी ममस पारा ममता नहीं मरी॥२॥ करोगोंके का सिरपर रच मग या सरीर सूखकर रोगसे प गया है, राजा मी पाया दोनये मीमा तक ही और फे मी पूर्ण तयसे नहीं मरा माता । उसपर माता पिता और वयानी विविधता (एक परीफ्नी पती ममी तपा) मनार र लीपीन पर वासी पर बने मी पटसरे पाळानि। सपी टाईबार तामाई मने भाषी मनासार वामपणाईने । मजी मलाई स्वर तात्री सम्मने मी देसाई वार वा पनि बापमा मानो सानो भाई मम्मै पतृलाई दोष न माने ॥१॥ पपीती सानो र परो पापी पे नवा माई पर दुनामा रेल ही मज मारमनपसवाई गई। की, जगागीय गयो, उपानी भासामारी बाई मई। बो! यगम एम पुरानी र २ मनमोल पर ममना मार्ग ५२॥ बोरोन्यममा प्रेम प्र पगे एमय बचाई गर्नु र मानि पुरकीत पब सपने क्यामेरालेर दुई। , - .
प्रमार मोक्षमासा ही मनेक प्रकारको उपाधि मचा रहे है, दुम्माया पुत्र और पुत्री साउँ साऊँ कर रहे है । मरे रायचम्म ! तो मी यह नाव उधेर न किया ही करता है और इससे तृणाको अफर जनास नहीं छोड़ी माती ॥ ३ ॥ नाकी क्षीण पर गई, भवाचकको तर पाहा, र जीवन-दीपक निस्तन पर गया। एक भाईने से अतिम अवस्थामें पड़ा देसकर यह कहा, कि अब इस विचारेको मिटी 31 हो पाप तो ठीक है । इतने पर उस मुोने वीनार हायको हिलाकर इशारेस कहा, कि हेमर्स ! युप रह, तेरी चतुर्थपर आग लगे। अरे रायचन्द्र ! देखो देसो, यह बाशाका पाश कैसा है ! मरते मरते मी थोकी ममता मही मरी ॥१॥ ५०प्रमाद धर्मका धनादर, उम्म', मावस्य, पौर कपाप ये सब प्रमादके क्षण है। मगणान्ने उपराष्पयनसूप्रमें गैातमसे कहा है, कि हे गौतम ! मनुष्यकी वायु कुशकी माफ- पर पीई चलके मूम्दके समान है। जैसे इस इनके गिर पानेमें देर मही गती, उसी वर इस मनुष्प-मायुके बीतनमें देर मही लगती । इस उपशको गायाकी चौथी कड़ी स्मरणमें भाप रखने योग्य है-'समय गोयम मा पमायए'। इस पवित्र बास्यके दो अयं होते हैं । एक तो पह, कि गौतम ! समय पर्यात् अवसर पाकरके प्रमाा नहीं करना चाहिये और दूसरा यह फि क्षण क्षणमें बीतते गाते हुए काटके बसम्त्यात माग भर्षात् एक सम्पमात्रका मी प्रमा' म करना चाहिये, क्योंकि देह क्षणभगुर है । काठ शिकारी सिरपर धनुष बाण पाकर सा है । उसने शिकारको लिया भपवा छेगा बस यही दुविधा हो रही है। प्रमा' करमेसे धर्म-कर्राम्प य नायगा | अति विपक्षण पुरुष संसारको सर्वोपाधि स्याग र नि रात धर्ममें सावधान गत , भार पटभर मी प्रमा' महीं करते । विचक्षण पुरुप महोरात्रके पोरे भागको भी निरंतर धर्म-फर्तम्पमें बिताते हैं, और मवसर भवसरपर धर्म-कम्य करते यत है । परन्तु मा पुरुष नि , बाहार, मौज, शीफ, विपा तथा राग रग मापु म्पत्तीत कर गाते हैं । ये इसके परिणाममें बागति पाते हैं। वैसे बने सम पतना और उपयोगस धर्म साघम करना योग्य है।सार परीके मोपत्र बोस पड़ी तो हम मियामें बिता दते हैं। यानीको पाठीस पड़ी उपाधि, गपशप, मौर पर उपर मटकनमें बिना देते हैं । इसकी अपेक्षा इस सार पाके पम्तमम पार पडी मिगुर धर्म-फर्तम्पके लिये उपयोगमें एगा तो पर आमानामे से सकने सी बात है। इसका परिणाम भी फैमा पुर। पर अमन्य पार है। पाती मी पनि कप पानेक सिये अपनी समस्त शरि देतो रितु मने परमी मगरे मानकर पुर पुषी माने माउंप पुननि मेरे गम्मत र र हारा पाप महा नर्गतम्नानि ॥३॥ पासीन माती मोरया पही रनमा समान एमाले पन्य मार्य एवं एम मम्म र यो परी र माता मैर माने । रामपा वाम बुरे बाप, र पिना परपसागे परगने ! भरे गम्पकमलो देना भागागरी मनगममा मगसि॥
५२ मम भीम रामचन्द्र मौर उसे नही पा सकता । एक पटको म्यर्थ सोना एक मप हर गाने के समान है। पर तल रिस सिस। ५१ विवेकफा अर्थ समु शिप्प- मगन् ! बार हमें जगह जगह करते पाये है कि मोफ महान् श्रेयस्कर है। सिक कारमें पी ई आमाको पहचान के लिप दीपक हाकिसे पर्म रिकता है। नहाँ वियफ नही हो पम नही तो क्विक किसे कहते हैं, या हमें कहिये । गुरु-भायुप्मानों ! सपारम्पको उसक सरपसे समझनेका नाम दिक। ममु शिप्य-सपको सूय, और मसपको बसस्प करमा दो समी समझते हैं। ता महाराज ! क्या इन रोगोंने धर्मक मूमको पा लिया, पह कहा जा सकता है। गुरु-तुम रोग जो बात करते हो उसका कोई प्रान्त दो। मु शिष्प-म सप कारेको काला ही करते है, ममुरको मभुर फरते हैं, गारको मार भीर वपतको नमन करते है। गुस् मापुमानों । ये समस्त दम्म पदार्य है। परन्तु बारमा क्या कामास, क्पा मिगस, क्या मार और क्या वस्तीत मात्र पदार्थोको क्या इससे परोसा हो सकती है। समु शिष्य--भगवन् ! इस ओर तो हमारा मप भी नहीं। गुरु नसरिये यही समझना चाहिये कि पानदर्शनरूप वामाके स्पमात्र पदार्पको शाम और कार्यानरूपी असत् वस्तु ने घेर मिया है। इसमें इठनी अधिक मिझता वा गई है कि परीछा फरना मयत हो दुर्गम है। ससारके मुसोको वामा मनत बार भोगनेपर भी उनमें से नमी मी वात्माका मोह नहीं था, बीर बारमाने उनें अपतके तुम्प गिमा, यह परियक । कारण कि संसार कागो तथा यह कामे लिपाकको देवा । सी तर वामाने कामे विपाकको भीषम रूप रम्यको काला गिना या मी बनियेक । हान दर्शन वादि गुणोंको शानदर्शनने भेरकर वो मिमता पर जाम। ठसे पहचानकर माल-अपतम बानेश माम कि।बम कहो किमिक पर कमी वस्तु सिाई। भु शिष्प-हो ! कि ही धर्मका मूह वीर धर्मका रक्षक करमता है, या सप है। मामाके स्वरूपको किके बिना नहीं पापान सम्ते परमी सम्प है। शाम शाह, धर्म तल और तप पे मग निको बिना उति नही होते पर भारमा करना पाप है। बोधि माँ, रबानी और मरोहा पुरुप मतभेद और मिष्या नमें रिपय यता ।। मापका - संबंधी शिष्माका हम निरन्तर मनन करेंगे। ५१ सानिनि पैराग्या उपवेश क्यों दिया ! संसार स्वरूपके संबंध पहले कुछ कापसारे प्यानमें होगा | नियोने से ममत डेरमप, गर्नत र समय सम्पवस्थित वस्थिर बार बनित्य कहा है। विशेषण मामेके पहले उन्होंने संसारमा सम्पूर्ण पार किया मान्म होता है। मनत मक्का पर्पटन, अनंत काका महान मनात जालनका म्यापात मनात मरण, और वनंत शोक सहित मामा ससार चको प्रमण किया करती है। -- प मानने परम्पका उपदेश क्यों दिया !] मोसमाछा . । ससारको दिसती हुई इन्द्रबारणाके समान मुटर मोहिनीने भात्माको एकरम मोहित कर गा है। इस समान मुस मामाको कहीं मी नहीं माश्म होता । मोहिनीफे कारण सत्यमुख भार उसका पहप देसनेको इसने माकांक्षा मी नहीं की। जिस प्रकार पसगकी दीपकके प्रति मोहिनी है, उसी तय वारमाको ससारके प्रति मोहिनी है।शानी छोग इस ससारको क्षणभर मी सुसरूप नही पाते । इस ससारकी विसमर जगह भी जहरके बिना नहीं दी । एक सूजरसे मेकर पत्रपतिक भाषझी अपेक्षासे समानता है। अर्थात् पश्यताका ससारमें नितनी मोहिनी है, उतनी ही बल्कि उससे भी मधिक मोहिनी सूभरकी है। मिस प्रकार चक्रवसी समप्र प्रजापर भधिकारका भोग करता है, उसी तय पा उसकी उपाधि भी भोगता है। सूभरको इसमेंसे कुछ मी मोगना नहीं पाता । अधिकारको अपेक्षा उमटी उपारि विशेष है। चयताको अपनी पत्नीके प्रति नितना प्रेम होता है, उसना ही वपना उससे अधिक सूबरको अपनी सूबरनी के प्रति प्रेम यता है। चक्रवती मोगसे मितना ग्स ता है उतना ही रस सूबर मी माने हुए है। पाकि सितनी मनकी बहुलता है, उतनी ही उपाधि मी है। सूअरको इसके रेमबके अनुसार ही उपावि है। दोनों उत्पन हुए है और दोनोंको मरना है। इस प्रकार मूम्म विचारसे देसभेपर मणिकसास, रोगसे, मरा वारिसे दोनों प्रसित है। दम्पसे पावती समर्प है, महा पुण्यश्चाठी , मुल्यमापसे सातावेदनीय भोगता ह, सूबर विचारा क्सतावेदनीय मारहा। दोनों के वसावा भौर साता दोनों । परन्तु पामती महा समर्थ है। परन्तु यदि या जीवनपर्यंत मोहांध ये तो यह विठकुछ बानी हार जानेके जैसा काम करता है। सूभरका मी यही हाल है। चक्रपाक शलाकारुप होनेके कारण सूअरसे इस सपमें इसकी बराबरी नहीं, परन्तु स्वरूपकी परिसे बराबरी है । मोगकि मोगर्नमें दोनों तुम दोनों शरार ए', माँस पारिक, और मसानासे फ्राधीन है । ससारको या सर्वोत्तम की ऐसी है उसमें ऐसा दुख, ऐसी षणिकसा, ऐसी उम्ता, गोर ऐसा अंधपना है, तो फिर सर्प जगह मुख कसे माना जाप ! यह सुन नही फिर मी मुस गिनो वो जो मुख मययुक्त वार क्षणिक यह दुसot। मनत ताप अनस शोक बनत दुस देसकर शानियोंने इस समारको पीठ Pई है, यह सप । इस बोर पाउ छौटकर देखना योम्प नहीं । यहाँ दुख ही दुख है। यह दुस्ठका समुद्रा। पम्प हो ममत सुसमें से पाने वाला ठाए मार्गदर्शक है। ५३ महावीरशासन बाजार को दिन भगवान्का शासन चल रहा है वह भगवान् महावीरका प्रणीत किया हुमा है। भगवान महापारको निर्माण पधारे २१०० बर्षम ऊपर हो गये । मगध देशाके पत्रियका मगरमें सिदार्प राजाकी रानी निष्ठामा क्षत्रियागानी कोम्मे भगवान् महावीरमे मम किया पा । महापौर मगवान्क या भाइका माम मन्दिवर्धमान था। उनकी सीक्य नाम यIT था। तीस वर्ष गहस्पा- भ्रममें ये । नाने एकति द्विारमें सारे मारा पर्ष एक पक्ष तप आदि सम्पफ् आधारमे सम्पूर्ण पनपाति कर्माको जलाकर भस्मीभूत किया अनुरमेय कायान भार पानको पारिपा नके किनारे प्राम किया दुष्ट मगमग बहत्तर वर्गकी मायुक्य भोगकर मा कोको मम्मीभूत कर सिदस्वरूपका प्राम किया । वर्तमान पीपीसीके पे अन्तिम त्रिनेपर थे।
प्रीम प्रसन्न [मारपन्न इनका समर्मवीर्ष पछया। पा २१,० पर्ष वर्षात् पंचमकामे पूर्ण होनेतक गा, ऐसा भगतासूत्र का है। इस कामे दस भापोंसे पुक होने के कारण इस भौधर्म-तीपक उपर भनेक पिनियों वाई है, भाती , और बायेंगी। जैन-समुदायों परस्पर मात मतमेद पर गये है। पे मतमेद परम्पर निशा-मन्या घरा माल कम बैठे है । मन्मस्य पुस्य मत मातरमें म पाकर विवेक विचारसे गिन मगमान्य शिक्षाका तत्पर मात उत्तम भोम्माम मुनियोंपर मछि रसते है, और सय एकामतासे अपनी बामात्र इमन करते है। काके प्रमापके कारण समय सम्पपर शासन कुरा न्यूनाधिक रूपमे प्रकाशमें वावा है। पबाग य पणिमा'मा उत्तराभ्ययनस्त्रका पचन है। इसका भावार्थ यह है कि अतिम तार्यकर (महातीरस्वामी) के शिष्य मा मैर ना होंगे। इस कपनको सपताके विषय में किसीको बोमनको गुनामश महा।इम तत्वका कहा विचार करते हैं। उत्तम शासका को विचार करते है! मिपमित बाराको धर्ममें कहाँ म्यतीत करते है ' धर्मतापफ उदयके लिये काव्य रमते । मानसे कहा धर्म-तत्वको सोन करते है। भाषक में जन्म मेनके कारण हो मानक करे गोरे, या बात हम मालकी रहिसे मान्य नहीं करनी चाहिये । इसाम्ये पापापक बाधार-बान-सोन अपना इनसे मिसक कोई निराप क्षण हो से भावक महें तो पा पोम्प है | बनेक प्रकारको इम्प भादि सामाम्प दया भानको घरमें पैदा होती है और यह इस दयाको पाता मोरे, पात प्रभासा करने योग्य है । परन्तु तलको कोई पिर ही गान।।। माननेकी उपेक्षा पात शंका करमाके अर्धदाय मी है। मानकर महंकार करनेवाले मी है । परम्त जानकर तल फेरिमें वोग्नेका कोई गिरा। परम्पराको वाम्नापसे केरमान, मम पर्पयज्ञान और परम अवधिद्वान विछेद हो गये। शिवा का मोदी और सियतका गुस्सा भाग मी विद हो गया है। पोडेसे पषे मागपर सामान्य बुनिसे शंका घरमा पोम्प महो । यो रांचा हो उसे विशेष बानमेवाछेसे प्रश्मा चाहिये । यहाँसे संतोपचमक उत्तर म मिले तो मी बिमवचनको मया पसी करना योम्प नही स्पोकि कमेकात शेमके स्वरमको बिरो पामते है। मगवान्के कपनहप मणिके परमे मातसे पामर प्राणी दोषरूप किलोको सोबनेका मफ्नकर प्रयोगतिको ले जानेपा कोको बोभते ।री पनस्पतिक उसे समाकर काममें मा किराने रसि विचारसे निकाला होगा! पविषय गत बगा। यहाँ इस संबंध कामेकी जसरत महा । वास्प यहा कि हमें अपनी बात्माको सार्पक उनके ये मतमेवमें नहीं उत्तम पौर सात मुनियेता समागम विमा वावर विक (या, क्षमा नायिका सेक्म रना चाहिये । महरिके ताप से हो सके तो विवेकपूर्ण उपोश मी कारण सहित देना चाहिये। प्रबिसे शक्ति नही होना चाहिये । इसमें अपना परम मंग से भी भूखना चाहिये ।
भाविकाते१] मोसमामा ५४ अशुचि किसे कहते है ? निकाल–मुझे मैन मुनियोक नाचारकी बात बहुत रुचिकर हुई। इनके समान किसी मी दर्शनके सतोका वापार नहीं । चाहे जैसी शीत तुको र हा उसमें इने अमुफ बससे हो निमाना पड़ता है, प्रीष्ममें कितनी ही गरमी पानेपर मौ ये पैरमें जूता भार सिरपर छत्री महीं थ्या सकसे । इने गरम रेती बावाफ्ना छेनी पाती है। ये जीवनपर्यंत गरम पानी पीते हैं । ये गृहस्यके पर नहीं बैठ सकते, गुर ब्रह्मचर्य पाउते हैं, फटी कौड़ी भी पासमें नहीं रख सकते, अयोग्य पचन नहीं बोल सकते, बार बाइन नहीं से सकसे । मास्तबमें ऐसे पवित्र वाचार ही मोशायक है। परन्तु नब माइमें भगवान्न स्नान करनेफा निपच क्यों किया है, यह बात पपार्यरूपसे मरी समछमें नाही भैठती। स्प-क्यों नहीं बैठता। विद्यासु-क्योंकि स्नान म करनसे भगुचि पाती। सस्य-कौनसी मधुचि बढ़ती है! बिान-शरीर मछिन गया है। सम्प -माई ! भारीरको मस्मिताको अमुधि कहना, यह बात कुछ विचारपूर्ण महीं। शरीर सप किस चीजका बना है यह तो विमार करो। यह रत, पित, मल, मूत्र, श्रेप्मका भडार ह । उसपर केवल तपाईको फिर यह पवित्र कसे हो सकता है। फिर साधुओंने एसा कौनसा ससार कम्य किया है कि जिससे उन्हें स्नान करनेकी बावश्यकता हो! विशामु-परन्तु स्नान फरनेसे उनका हानि क्या है। सम--यह तो स्यूस मुनिका हा प्रश्न है। स्नान करनसे कामानिकी प्राप्ति, मतका मग, परि णामका बाम्ना असम्न्यातों गजोका पिनास, पह सब भपिता उत्पन होती है, भार इससे आमा महा मरिन होती है, प्रथम इसका विचार करना चाहिये | गौर-हिसासे युक्त शरीरको जा मरिनतार परमगुधि है। तत्त-विचारम तो ऐसा समझना चाहिप फि दूसरी मसिनताभोंसे तो बामाको उमममता होती है, स्नान करनेस समग हराकर वामा मरिन होतीर, भार मामाकी मलिनता ही भपि है। निजामु-मुझे आपन बहुत मुर कारण बवापा । म विचार करनस दिनभरके पनसे शिक्षा भार बापानर प्राप्त होता है । अभ्य, गृहम्पाश्रमिपोंका सांसारिफ प्रतिमे अनिमित गाना-हिंसा मारिसे पुष शरीरको बपवित्रता दूर करनी चाहिय कि मही! सप–इमिपूर्षक भरिका र रमा हपाहिये । जैन दर्शमा समान फ मी परित्र दशन मा, वह पपाप पपिप्रवासा योगा है। परम्त गौचाफा सरप समात एना चाहिय। ५. सामान्प नित्यनियम प्रभात पहले जागृत होकर ममतमारमत्रका स्मरणर मनको गुर करमा पाहिय । पार म्यारारतिरोपकर राभिमें हुए रोगका उपयोगपूर्वक प्रतिवमग परना चाहिय । प्रतिक्रमण फरनके बाद पपात्रमा भगवान्फी उपाना, भूमि भार मापापग मनका उगमस बनाना पाहिये ।
भीमद् रामचन्द्र [बमामा माता पिताका बिनय करके संसारी कामोमें मारम-हितका म्यान म मूछ सके, इस तरम्पमहारिक फापोम प्रति करनी चाहिये । साय भोजन करनेसे पहले सपाको दान दनेको परम भातुरता रसकर बसा योग मिटनेपर यथोचित प्रति करनी चाहिये। बार बिहार वादिमें नियम सहित प्राति करनी चाहिये । सत् धाबके अम्यासच नियमित समय रस्ना चाहिये । साम्पकारमें उपयोगपूर्णक सप्यावसक करना चाहिये। निदा नियमितरूपसे देना चाहिये । सोनेके पास भाग पायस्पामक, बाय कि दोप, आर सब गायोंको क्षमाकर, पंचपरमष्ठी- मत्रका स्मरणकर समाधिपूर्वक शयन करना चाहिये । ये सामाप नियम पात मंगरमा इनें पाहों सक्षपमें कहा। निशप विचार करनेसे बोर तदनुसार प्राप्ति करनेसे में विशेष मगम्यापक और वानम्दफारक हागे । ५५समापमा हे भगवन् ! मैं बहुत भूग मैने बापक वम्य पचनोको भ्यानमें नहीं रहा। मैंने भाके कई इए अनुपम तत्वया विचार नहीं किया | बापक परा प्रणात किसे उत्तम शासका सेवन नहीं किया । आपके को ए दया पति, समा और पवित्रताको मैने नही परपाता । रे मगन् ! मैं भूमा, किरा भरका और वनव ससारकी पिटम्बनामें पका हूँ। मैं पापी । मैं गात मदोन्मत लौर फर्म रक्से मछिन ।हे परमारमन् ! भापके पर तत्वोंके बिना मेरी मोक्ष मही होगी। में निरता प्रपधर्मे पहा है। वहानसे बधा हो रहा है, मुश्चमें मिरेक-शक्ति नहीं । मैं मुह में निराभित " में अनाप रे बासरगी परमारमन् ! मब में भापका बापके धर्मका भार वापके मुनियोक्य शरण लेता है। वपने मपराध छप करके में उन सब पापोंसे मुक्त होने की मेरी ममिगपाप किसे हुए पापका में भव परचाताप करता है। जैसे जैसे मै सूक्ष्म विचारसे गहरा उतरता जाता , से पैसे अापके तापम पम्कार मेरे स्वरूप प्रकाश करते है।वाप गौतयगी निकारी सचिदान सम्प समानती मनतातो भगतशी और श्रेणाप-प्रकाशक में केस वपने हित के लिये आपकी सांसे क्षमा चाहता है। एक फल मी वाफ्के को ए रात्वमें शका न हो बाप बताये हुए राम्रोमें मैं रात्र D यही मरी बातम्या जार मृति होभो 1ो संघ मगबम् । मापसे में विशेष क्या आपसे कुछ लत नहीं। पचाचाफ्से मै फर्मवन्य पापको भमा पाहता- तिति शाति । ५७ पैराग्य पर्मा स्वरूप है सममें रंगा हवा बसम्मसे पोप बानेपर ठम्बस मही हो सकता परन्तु अषिक रंगा जाता है, पदि इस बालको पानीसे घोरे तामह मसिनता र सकती है। इस प्रान्तको मारमापर पटात है। मानानि कापसे प्रारमा संसाररूपी मनसे मसिन है। मफिनता इसके प्रदेश प्रदेशमें म्पास होगी। इस मनिताको हम विषय-गारसे र भरना चाहें तो यह दूर हो नहीं सकती। मिस 1 परि मतमेर] मोसमाठा ५० प्रकार मनसे सून नहीं पापा बासा, उसी तय शृंगारसे विषयनन्य आत्म-मठिमता दूर नहीं हो सकती। यह मानों निमयरूप है। इस जगत्मे बने धर्ममत प्रचलित है। उनके समधमे निप्पशपाव होकर विचार करनपर पासे इतना विचारमा बावश्यक हरि अर्को रियोंका भPा करनेका उपदेश किया हो, मा-सीधाको शिक्षा दी हो, रंग, राग, गुटखान आर एशा आराम करनेके तत्वका प्रतिपादन किया हो, यहाँ अपनी लामाको सस् शांति नहीं। कारण किसे धर्ममत गिना जाम सा समस्त ससार गर्भपुस । प्रस्पेक गृहस्थका पर इसी योगनासे भरपूर है । माट-बाद, सी, रंग, राग, तानका यहाँ जमकर यता है, वार यदि उस घरको धम-मदिर का नाप ताकिर अधर्म-स्पान किसे कहेंगे और फिर से हम बर्ताव करते हैं, उस तरह के पांव फरनेस पुरा मी क्या है। यदि कोई पा को कि उस भर्म-मदिरमे ता प्रमुफी मकि हा सकती है, वो उनके लिये सपूर्वक इतना । उत्तर देना है कि यह परमारम-तत्व भौर उसका राम्ममय मजिको नहीं जानता । पाहे कुछ भी हो, परन्तु हमें अपने मूस विचारपर जाना चाहिये । सत्ववानीकी पहिसे अम्मा ससारमें पिम्प बाकी मठिनतासे पर्यटन करती है। इस मचिमताका छय विधुर मापनप बससे होना चाहिये। पतिक तत्सम साधुन बार पैराग्यरूमी मध्ये उत्तम भावाररूप पपरपर बाम-गको धोनेवाले निर्भप शुरु हो । इसमें यदि राम्प बन न हो, तो दूसरी समस्त सामी पुउ भी नहीं कर सकती । एक परम्पको धर्मका सक्षम कहा जा सकता है । माईत-प्रणात सत्त राम्पका ही उपोश करता है, तो यही धर्मका समस, ऐसा बानना चाहिये । ८८ पर्मफे मतमेष इस नगरमें अनेक प्रकारक धर्मक मत प्रचलित है। ऐसे मतभेद अनाकारसे, या 'यापसिदए । परन्तु ये मतमे कुछ कुछ रुपामर पाते जात है । इस सबभमें पह कुछ विचार पातसे मतमद परस्पर मिरते हुए और भतसे मतभेद परम्पर विम्। किनन दी मनम- मा नास्तिकाके शराये हुए हैं। बससे मत सामान्य मीमिका धर्म करते. पातम जानका ही धर्म बतात, कितने ही मदानको पो पर्ममत मानते हैं। जिन ही भकिको पर्म फारत, शिफ्ने हो किपाका भम मानते हैं, कितने ही दिनपको धर्म कहती, धार किन हो पामके सैंमा मने दीर्ममय मानते है। इन धर्ममता स्थापने पर मानकर एसा उपदेश किपा मास हाता कि दम बाव ६ र सी गाणीप बत्रा सत्य है । बाइक समस्त मत भस्म्प भार मग तथा उन मतवादियोंने पक इसका योग्य अपना योग्य मान भी दिया IP उराक यही उपदेश करत । सम्पध्र मी यही उपबादका मी पही उपशम्पापमा मी पए उपशाबशपिक गोंका भी यही उपदेपा शक्ति-पथम माननबार मी यही सारेण प्रल [पर्म मप्रमेव भीमरामचन्द्र है। रणा वादिका मी मही उपोध ; इस्लामय भी हो उपदेश है और इसी तब मास्टका मौ पाई उपदेश है कि हमारा कपन तुम सब सिद्रियों देगा । तब हमें किस तिसे विचार करना चाहिये ! बादी वौर प्रतिवादी दोनों सो नही होने, और दोनों झूठे मी मही होते | अधिक मा वो मादा कुछ भधिक सबा पौर प्रतिपादो कुछ योगा ,ठा होता है। भषा प्रतिबा छ मधिक सभा, चौर मादौ कुछ कम भूठा होता है। हाँ दोनों बात सर्वया ठी न होनी चाहिये । ऐसा विचार करनेसे तो एक धर्ममत सथा सिब होता है, और ऐप सब ठे ठारते हैं। मिहामपह एक बापर्यकारक बात है। सबको पम्प वपना सपको सत्प कैसे करा जा सकता है ! यदि सपको माप करते है तो हम मास्तिक यरते हैं, तपा धर्मको समई गाती राता है। तो निश्भय है कि भर्मको समाई, और पा सचाई नगदमें मप है। पदि एक पर्ममतको सस्प और बाकी सबको पम्प करते है तो इस बातको मिस करके बतानी चाहिये । साको माप कावे तो या रेतकी मात मनाने जैसी बात ई पोंकि फिर इतने सब मतभेद से हो गये। परि तुम मी मतभेद न हो तो फिर पुदे पूरे उपदेशफ अपने पपने मत स्थापित करके किये क्या कोशिश करें। इस प्रकार परस्परके निषसे पोड़ी देरके सिपे सजाना पाता है। फिर मी इस संबपमें हम कुछ समाधान करेंगे। परम्मापान सप वीर मध्यस्प- भावनाको पिस किपा है एकांत अपना एकमतको रास्सेि मना किया । पर पसपाती वपमा पनि की नाही, किन्तु उत्तम और विचारने योम्प है । देखने में यह सामान्य मादम होगा परन्तु सूक्ष्म विचार करने से पह मदत यस्पपूर्ण मोगा । ५. पर्मक मतभेद (२) रुना तो हमें पर मानना चाहिये कि कई मी एक धर्म इस सप्तारमें मर्म समतासे पुछ है। अब एक दर्पनको सत्प प्रनेमे बाकी धर्ममतोको सर्वपा वसस्प करना पडेगा ! परन्तु में ऐसा नहीं कर सकता । पर मारमान वा निश्चयनयसे तो पे क्सयहम सिर होवे? परतु पहार मपसे उसे माप मही कहा जा सकता । एक स्स है, और पाकर मपूर्ण और साप, ऐसा में करता है। तया किसने दो धर्ममत कुतर्षमाही और नास्तिक में सर्वपा असम है । परन्तु भो परलोका वपना पाप कुछ भी उपशवपना भप बताते हैं, इस प्रकामदे धर्ममतों को मपूर्ण और सोपप सकते हैं। एक दर्शन मिसे निकाय वा पूर्ण कहा जा सकता है, उसके विषयको पात अमी एक और रहते है। बब तुम का रोगी कि सदोष वार अपूर्ण कपनका इसके प्रपतकोम किस कारणसे उपदेश Pया होगा। का समापन ऐना चाहिये । इसका समाधान कि तम पर्ममताने जातक उनको इपि गति पाँची तिको विचार किया । मनुमान तर्क और उपमान वार्षिक बाधारसे उन्हें भो कपन सिद माम मा पास्पसे मानो सिम है, ऐसा उन्होंने बताया ।
धर्मर मदमेव ] मोसमामा उन्होंने बिस पक्षको लिया, उसमें मुस्स एकान्तमादको किया । भाक्ति, विपास, नीति, कान, क्रिया भादि एक पक्षको हो विशेषरूपसे किया। इस कारण दूसरे मानने योग्य विषयोंको उन्होंने पित सिम किये । फिर मिन विषयों का उन्होंने वर्णन किया, उन विषयों को उनहोंने कुछ सम्पूर्ण भावभेदसे गाना न था। परस्त मपनी मुरिके अनुसार उनहोंने गत कुछ वर्णन किया । तार्किक सिमांत त बाविसे सामान्य बुद्धिमाके वपया जब मनुष्योंके मागे उनहोंने सिम कर दिखाया । कीर्ति, गेरित अपना भगवान् मनमानेको वाकांक्षा इनमेंसे कोई एक मी इनके मनकी भमणा होने के कारण उन्होंने वायुम उपम भादिसे विजय पापी । पाक्सोने मृगार मोर छोकप्रिय साधनोंसे मनुष्यके ममको हरम किया । दुनियाँ मोहमें सो वैसे ही बी पी है, इसरिये इस इदर्शनसे मेररूप होकर उन्होंने प्रसन्न होकर उनका कहना मान म्यिा । वाताने नीति तथा कुछ वैम्प वादि गुणोंको देसकर उस कपनको मान्य रक्सा । प्रवर्तककी मुदि उन लोगों की अपेक्षा विशेष होनेसे ठनको पौरोसे भगवानरूप ॥ मान लिया । यानि पैराम्पसे धर्मन्त फैलाकर पाछेसे वातसे मुसशील साधनों का उपदेश दासिक कर अपने मतको पशि की। वपना मत स्थापन करनेको महान् भमणासे और अपनी अपूर्णता स्पादि किसी मौ कारणसे उमें सरेका कहा था मम नहीं गा इसलिये उन्होंने एक शुदा ही मार्ग निकास्म । इस प्रकार बनेक मतमानरोंकी नाल उत्पम होती गई। पार पाँच परियोतक किसीका एक धर्ममत हा, पौडेसे मी कुमधर्म हो गया। इस प्रकार जगह जगह होता गया । ६० पर्मक मतभेद पदि एक दर्शन पूर्ण बौर सस्प न हो तो दूसरे धर्ममतको वपूर्ण और मसस्प किसी प्रमाणसे मही कहा जा सकता । इस कारण वो एक दर्शन पूर्ण वौर सस्प है, उसके तत्त्व प्रमाणसे दूसरे मतोंकी अपूर्णता वोर एकात्तिकता देखनी चाहिये। एक दूसरे धर्ममतोंमें तत्वानका ययार्य सूक्ष्म विचार नहीं है। कितने ही नगदकका उपदेशश करते है, परन्तु जगत्कर्ण प्रमाणसे सिद्ध नहीं हो सकता । बहुतसे पानसे मोश होता है, ऐसा मानते हैं ये एकातिक है । इसी तय क्रियासे मोक्ष होता है, ऐसा करनेवाले मी एकतिक है। पान और किपा इन दोनोंसे मोक्ष माननेवाले उसके पयार्प स्वरूपको नहीं मानते और पे इन दोनोंक मेको भेणोक्न मही कर के इसीसे इनको सताको कमी विवई दे माता है। ये धर्ममयोंके स्थापक सदेवतत्वमें को हुए वठाण पोंसे रमित न थे, ऐसा इनके उपदेश किये हुए शाम अपना परिप्रोपरसे भी पलारिसे देसनेपर हिसाई देता है।ई एक मतोंमें विसा, मामधर्म स्पादि अपवित्र भावरणका उपदेश है, तो समावत पूर्ण और सगाशरा स्थापित किपे हुए दिखाई देते हैं। इनमें से किसीने सम्पारक मोच, किसीने शूम्परुप मोध किसीने साकार मोझ और किसाने कुरा कास्तक एकर पतित होनेरूप मोक्ष माना है। परन्तु इसमेंसे कोई मी गात उनको सप्रमाण सिम मही हो सकता । निस्पृही तत्तताजाने इनके मिनाका पूर्णपना दिखाया है, उसे पयास्थित पानमा उचित है।
भीमद पनपत्र [मुख निपमै निगर के सिवाय इसरे मतों के प्रमर्वकोके परिन और विचार त्यादिके गानमेसे व मत अपूर्ण है, ऐसा मालूम हो जाता है। वर्तमानमें भी बेद मामद है ये बहुत प्राचीन अप है, 'ससे इस मतकी प्राचीनता सिम होती है, परन्तु ये भी हिंसासे इफ्ति होमेके कारण अपूर्ण , और सरागियो बाम । यह स्पए माम हो जाता है। मिस पूर्ण दर्शनके पयमें पों करना है, यह जैन बर्याद मायगीधरा स्थापित किये हए दफनके विषय है। इसके उपदेशक सर्व वौर सदिशा पे। मेक होनेपर मी पा बात सितपूर्ण मास होती है। दया, प्रमचर्य, शौक, विवेक, मेरम्प, पान, किया पारिको इनके समान पूर्ण किसीने मी वर्णन नहीं किया। इसके साप पर भारमान, उसकी कोटियों, जौबके पतन, मम, गधि विप्रागति, योनियर, प्रदेश, का उनके सरूमके विषयमें ऐसा सूक्ष्म उपोपा दिया गया है कि बिससे उनकी सरतामें सका नहीं यती । काल-मे से परम्परामायसे केपणान मानिशान देखनेमें नहीं माते फिर भी वो बिनेपरके छोए सैद्धानिक वचन है, वे मरी। उनके कितने 0 सित समें सूक्ष्म है कि जिनसे एक एकपर भी विचार करनमें सारी पिन्दगी बीत जाप । निनेपर कोए धर्म से किसी भी प्राणीको लेशमात्र मी के उत्पम नहीं होता। इसमें सब मामामोंकी रक्षा और सारमशक्तिका प्रकाश समिहित हैन मेक पानसे, समामेसे भोर उनपर अपन्त सूक्ष्म विचार करमेसे बाहम-शक्ति प्रकाश पाती है बार ए बैन दर्शनको सोहर सिम करती है। मात मननपूर्वक सब धर्ममताको नामकर पारसे तुम्ना करनवासको पा कपन माश्य सप मामगा। निदोप दर्शनके मुख्याल गौर सोप दर्शनके मन्तोक पियौ यो विशेष कानेको बगह नही है। ११ सुमके विषयमें विचार (१) एक ग्रामण दणिस्पासे बहुत पौषित पा । उसने तंग भाकर मतमें देवकी उपासमा करके मी प्राप्त करने नियय किया। सय मिशन नेके कारण उसने उपासना करनेसे पारे या विचार किया कि काचित् कोई देख सो स्तर होगा । फ्रस्तु उस समय उससे स्पा मग माँगना चाहिये ! कम्पना करो कि तप करने के बाद का मांगने के लिये म सूप पो अपना म्यूनाधिक सूक्षे तो किपा मा म्प मा निरर्पक होगा। समिप एक बार समस्त देशमें प्रवास करना चाहिये । स्मारक महम् पुस्पति पाम मन मोर सहदेसने नाहिये । ऐसा निस्पकर ए पास के म्पेि निकल परा। मारतके जो जो रमणीय र अशिमा शार थे उनें उसने देखा पुषि-प्रयुक्तियोंसे गमाभिरामके तपुर पुम और वैमा देने मीमतोंके मठ कारवर बाग-बगीचे और फुटुम्ब परिवार देने पर एससे किसी तब उसज्ञा मम न माना । पिसीको पोका दस दिसाको पविका दुम किसीको मानसे दुब, किसोयो प्रियके वियोगका दुस, किसको निर्धनताका दुस, किसीको ममीको उपा- विका दुम मिसानो शरीरका वास किसीको पुन, लिसाको पका दम, लिसाको ना किमीको माँ बाप हम किसी भम्पका दुस, लिसाको उम्मका रस, किसीको मुमो सिफ्यम विचार] मोक्षमास्म भपने नीष कुल्टका दुमड, किसीको प्रीतिका दुख, किसाको ईर्ष्याका दुरण, रिमीको हानिका दुस्स, इस प्रकार एक दो भविक अथवा समी दुस अगा जगह उम विप्रफे देग्मनर्म आये । इस कारण इसका मन किमी मी स्पानम नहीं माना । वहाँ देसे यहाँ दुम ता था ही। किसी जगह भी सम्पूण मुम्ब उसके देखने नही आपा । तो फिर स्पा माँगना चाहिये ! ऐमा विचारते विचारस यह एक महापनामकी प्रशसा सुनकर शरिफा वाया । उस शारिफा महा अदिवान, बममयुछ, माग-बगीचोमे मुशोमित और बस्तासे मरपूर शहर लगा । मुर बार मध्य महलोका देखते हुए और पूंछत छत पह उस महापमापके घर गया। ग्रामन्त बठकमानेमें बरा या। उसने अतिथि जानकर ग्रामणका सन्मान चिया, भामता प्रसीनर उसके लिये मोजनकी म्यवस्था कराई । थोड़ी दरके पाद धीरजमे शेठने ग्रामणसे अ, बाप वागमनका कारण यदि मुझे फहने योग्य हो तो कहिये | प्रामणने कहा, धमी भाप क्षमा करें । पहले आपको अपने सब तबके बमम, पाम, वाग-बगाच स्पानि मुध पिम्बाने पड़ेंगे । इनका देखने के बाद मैं अपने आगमनका कारण ,गा । शटन इसका कुछ ममम्प मारण मानकर हा, आप भानन पूर्वक अपनी इण्यानुसार करें । भोजनफे मा' प्रामणने शेरको म्पय सापमें पककर पाम भादि तानेको प्रार्थना की। धनाढपने उसे मीकार की आर स्पप साथ जाकर माग-बगाचा, धाम, मन सब दिमाये । यहाँ शेरपी बी आर पुत्रको भी प्रानणने गया । उन्होंन पोग्यतापूर्वक उस प्राक्षणा सकार किया। इनके रुप मिनप आर ममता रेमफर आर उनकी मपुरवाणी सुनकर मामण प्रसमा । तत्पश्चात् उसने उसकी दुफानका फारगार सा । बड़ों सौ. एक फारबारियोंफो बैठे हुए देना । उस बामणने उन्हें मी समय, मिनपी और मम पापा। इससे रमान सनुप हुआ। इसके मनको यहाँ पुछ सताप मिडा । मुमा ता जगत्मे यही माझ्म हाता है, ऐमा उसे माश्म एवा। ६२ सुबक पिपयमें विचार (२) फैमा सुगर इसका घर मी मुन्दर इमझी स्वप्ना और म्यगम्या है। कमी पतुर और मनोजा उसी मीठ सी है।म फातिमान और भागाकारा उसफ पुष ।' मा प्रमम रहनवारण उसका कुटुमा है। मामारी सपा मी इससे घर कमी ! समम्त मारनमें इसर ममान दूसरा का मुगा नहीं। अब तप पाक पर पुछ मांग का मायनर शिकना ही मर कुछ माँगगा मरी इच्छा नही कगा। रन बीत गया भार राति ई मानेमा सपपमा धमठप भार प्रापग मांगने कोय। भनाजपने रिममे अपन आगमनध पारा फनी प्रापना की। मित्र-मैं परम पर विचार करपे निदा कि नो मुगम भनिर मुलीचा मग और तर पर हिर उममे समान गुण मपाम फो । मन गमन माग्न र ग्ना ममग मनाप एपठोमाग, परम्नु रिमा गाषिगरम पर भी मुन्न मन्या मुगगनमें नही आरा | साँगा दाभारि, पानि, और गरि गनमें गई । भारी मार भात र मन भारी प्रामा मुनी, श्रीमद् पजचन्द्र [मुमो मिस RR इसलिये में यहाँ वामा, और मैने संगोप मी पापा | बापके समान पनि सपुत्र, मामाई, मी, अनुम्म, पर बार मेरे देखनमें छा मी नहीं मापे । आप सर्व मी धर्मशाउ, सपणी और दिनेतरके उत्तम उपासक है। इससे में या मामता कि वारके समान पुस भार कही मी मही है। मारवमें बाप विशेष सुपी है । उपासना करके कमी देवसे भावना करेंगा तो भापके समान ही पुस-स्पितिको पाचना करेगा। पमान-परिवा! बाप एक बात मर्मपूर्ण विचारसे को है, क्ाएष वापको कास्प पपार्प सानुमनकी बात करता हूँ। फिर जैसी मापक इणा हो कैसे करें । मेरे घर बापने पो पुस देखा मह सब पुर मरतमें कहा मी नहीं, ऐसा बाप करते है तो ऐसा ही होगा । परन्तु वास्तवमें पर मुझे समझ नही माम्म होता । मेरा सिमात ऐसा है कि बगदमें किसी स्पल्में भी वास्तविक मुसमा है। नगरपसे पर है। बाप मुझे मुसी देसते । परम्तु पास्तविक रतिसे में मुख माही। विप्र--भारा पा करना मुझ अनुमसिए और मार्मिक होगा | मैंने अनेक शाम देश है, परन्तु इस प्रकारके मर्मपूर्वक विचार म्याममें लेने का परिझम ही मही उठपा । तपा मुझे ऐसा अनुमण सबके लिये मही हुमा । मन नापको क्या है, यह मुझसे कहिये । पनाम-परिता ! बापकी इच्छा है तो मैं करता। ध्यानपूर्वक मनन करने पोम्प है चौर इसपरसे कई रास्ता दूंगा पा सकता है। ५५ सुबके भिपपमै विचार (३) नैस स्पिति माप मेरी इस समय देस दे। वैसी स्पिति ममी, कुटुम्ब और बीके सपने मेप परे मी पी । मिस समयकी में बात प्रता, उस समयको गमग बास बरसणे गपे । म्मापार गौर भैमबकी मास्ता र सम कारबार उम्ठा होनेसे षटमे भगा। कापति कानेपाम में एक बार एक हानियों मार-पन करमेसे तीन वर्षमें मनान हो गया । योनिमपसे सामा दास समनकर गापा पा यहाँ सम्य दाल पण। इतनेमें मेरी मी मी गुजर गई। उस समय मेरे को स्तान में पी। माईस्त नुकसानोंके मारे मुझे पासि निकर माना पड़ा । मेरे उद्यमियोंने पपासति रथा कप परस्त सभाकाय फटनेपर पेगरा म्याने बेसा पा । मन और दतिक और होने स्पिनिमें में पात मागे निक पहाबब में यासि निकम तो मेरे कुटुम्बी भेग मुझे रोकगार रखनेग, प्रने गेले गौरका दरमामा मी नहीं देखा इसरिये हम तसे मी माने रेंगे। वेरा कोमल शर कुए मी नही कर सकता वोर यदि त्यो रावर पुसी होगा तो फिर बागा मी नहीं, साहिपे इस विचारको तवे मेर देना चाहिये । मैने ठने पर क्यसे समसपा कि पदि मैं मम स्पतिको प्रास करेगा तो मैं बस होगाउँगा-ऐसा वचन देकर मै बालारकी पात्रा करने निष्ठ पा । प्रारम्पके पाछ गैठनेको स्प्यारोपपोगसे मेरे पास एक दमड़ी मी नही र गई पी । एक दो महीने उदर-पोषण भने साथम मी नहीं रहा था। रि मौ में बाला गपा । मेरी पुदिने प्राप्मको सिम दिपा । मिस महाममें में बैठा पा उस गाम्के माविकने मेरी पंचमता और असो तपपमें AIR] मोसमाष्ठा नम्रता देखकर वपन शेटसे मेरे दुसकी बात कही। उस शेरने मुझे युगकर एक काममें लगा दिया, निसस में अपने पोषणसे चौगुना पै। करता पा । इस प्यापारमें मेरा पिच जिस समय स्थिर हो गया उस समय भारतके साप इस म्यापारके महानेका मने प्रपन्न किया, वीर उसमें सफसता मिली। दो पोमें पांच गसकी कमाई। बादमें शेटसे रानी सुशीस नाया लेकर में कुछ माल खरीदकर शरिकाकी मोर घर दिया । पोडे समय बाद में यहाँ वा पापा। उस समय बहुत लोग मेरा सन्मान करनेफ लिये लाये । मैं वपन फुदम्बियोंसे पानदसे वा मिला । ये मेरे माम्पकी प्रशसा करने सगे। गावासे लिपे हुए माउने मुझे एकके पाँच कराय । पछिसमी । यहाँ मनेक प्रकारस मुझे पाप करने पड़ते ५ । पूर्व साना भी मुझे नहीं मिसता था । परन्तु एकबार एश्मी प्राप्त करनेको यो प्रतिक्षा की पी पर प्रारम्घसे पूर्ण ई । निस दुमदायक स्थिति में में था उस दुसमें क्या कमी योमी पुत्र तो घे ही मही; माँ बाप पहमेसे परोक सिधार गये थे । फुदमियोंके वियोगसे वार बिना दमपीके जिस समय में गाया गया, उस समयकी स्थिति बहान-रिसे देखनपर बारहमें ऑस् छा देता है। इस समय मी मैन धर्ममें प्यान रखा था | Pनका कुछ हिस्सा उसमें उगाता पा । यह छमी नया सालचसे नही, परम्त संसारके दुससे पार उतारनेवासा यह साधन है, तथा यह मानकर कि मौतका मप क्षण मी दूर नहीं है इसलिये इस फम्पिका जैसे बने शामतासे पर मना पाहिये, यह मेरी मुम्प नीति पी। दुराचारसे कोई सुस नहीं, मनको वृमि महीं और धारमाको मसिनता है-इस तत्तको भोर मैने अपना प्यान उगाया था। ६४ सम्बके पिपपमें विचार (१) यहाँ आनक बार मैंन अा घरकी फम्पा प्राप्त कोमा मो मुटमणी और मर्याशीउ निकली। इससे मुझे तीन पुत्रए । कारमारके प्रबल होनेसे और पैसा पसको बहाता है, इस नियमस में दस पमि महा करोड़पति हो गया। पुत्रों की मौति, विचार, आर युरिक उपम रहने के लिये मैन पात र साधन जुगपे, जिसम उन्होंने यह स्थिति प्राप्त की है।मपने पुटुमियोंको पोप रपानाम गाकर उनका स्पिनिमें प्रभार किया। दुकान के मेने अमुक निपम गरि, तपा उच्चम मकान बनवानफा वारंम मी कर किया। पद फाउ एक ममबफे बाम्ते किया गया एला पाछे फिरस प्राम किया, नया कुल-परंपराको प्रसिदि जाते हुए राफी, या पासानके लिये मने यह सब किया । इम में मुग नहीं मानता । यपरि में दूसरों की अपेशा सुनी है।रि भी पह सातापाय ६, सप्मुम नही । जगत में बात करके भसातारे नापही। मैन धर्ममें अपना समय पान फरमय निपम रम्मा है। मवमानोंका मापन मनन, सपुरुषोंग समागम, पम-निपम, एक महीनेमें बाए नि पचप, पपा कि गुपन, स्पानि धर्मम में अपना पाउ रिखानामा म्पहारका उराधियोमेरी बहतमा माग बन जामें मन छोर पा। पुरोग्य म्पहार पपापोप बनासर में निप रानेफी इमा राता । अभी निय मही दा सपना, इनमें समार-मोदिनी अपरा पमा हमरा पुरा परत नहीं है, परन्तु यह मी धर्ममधीदी कारण है । गृहम्य-धमके आचरण र कनिष्ट हो गये है और मुनि माग उन्हें मही मुगर मन | ग्राम गृहायोग्य मोर उमरा कर माल , भावग्णम मी अमरापर . .
श्रीमद् पमचन्द्र [मुसा पिपपम R सकते है । इमठिय धर्मकै सबमें गास्थवर्ग में प्राप उपोश देकर यम-नियममें छाता है। प्रति समार हमारे यहाँ मगमग पोषसा सद्गृहस्पोंकी सभा भरता है। माठ दिनका नया अनुमा और शेष पहिल्का वर्मानुमत्र में इन छोगोंको दो तीन मुहूर्त तक उपरेश करता हूँ। मरी का मर्म गायकी कुछ जानकार हानसे मौजीवर्ग उत्तम यम नियमका उपदेश करके समाहिक समा मरती है। मेरे पुत्र भी शामोच यमा गम्प परिचय रमत ।। विद्वानाका सन्मान, मविधियोंको विनय, और सामान्य मयत एकही मार-ये नियम पाषा मेरे अनुचर भी पाते हैं। इस कारण ये सब साम्य भोग सकते है। मांक साथ साप मेरी नाति, धर्म, सहम भीर चिनयन धन-समुशायपर बहुत पस क्सर राठा है। इतना तक हो गया है कि रानातक भी मेरी नीतिको पातको मानवाया माम-प्रभसाके लिये नहीं कर रहा, यह बात माप पानमें रस्से । केबस भापकी पूर्ण बात स्पकिरणके लिये सक्षेपम यह सब कहा है। ६८ मुम्बक पिपपमें विपार मैं । इन सर वातासे में सुनी ऐसा वापको माम्म हो सकेगा कर समाप विचारस बार मुझे बहुत मुमी मानें भी ता मान सकत है । धर्म शास और नौविसे तपा पाखापानसे मुझे ना बान मिलता र अामनाय । परन्तु तत्सरिसे म मुखी नहीं माना जा सकता । जबतक सब प्रकारसे बाप और बभ्यतर परिपाइका मने त्याग महीं किया तबतक गरेपका मात्र मीनदोपपपि यह बात मसमें नहीं परन्तु है क्य, इसलिये यहाँ उपाधि भी । स-सा परित्याग करनेको मेरो सम्पूर्ण आशा है परन्तु अबतक ऐसा नहीं हुआ तबतक किमी प्रियननका वियोग म्पहारमें हानि, पद वियोमा दुख पे यो भूतमें मौ तपावि उत्पम कर सकते हैं। मपनी देहमें मौतक सिवाय कप नाना प्रकारके रामगोका होना समय है । इसलिये जक्का सम्पूर्ण निम्प, पार्पतर परिमरका पाग अम्पारमका स्पाग पा सत्र महो हुबा नबतक में अफ्नको सर्मपा पुस्ती नहीं मानता। वापका वाशिम विचार करनस माम पोगा कि लक्ष्मी की पुप्र अथवा कुटुम्बसे पुस नहीं होता, और परि इसका मुग्ध गिर्ने ता विस समप मम्पति नि हो गई थी उस समय या मुसा पम गमा पा। जिसका रियोग है यो क्षणमगुर मार चहा मम्यानाथपना नहीं सम्पूर्ण मपणा पास्तविक मुख मही। इस कारण म बस्न आपको मुसी मही कर सकता। में बहुत चार विचारकर म्यापार और कारगार करता था तो भी मुझे मारमोपारि मनीति और संशमात्र भी कपरमा सेक्स करना मही पड़ा, पर तो नहीं कहा मा साना | कनक प्रकार के बारम भार पटका मुझे समान करना पड़ा था। बार परि दमोपासनासे एक्मी प्रास करना चार करते हो तोप पर पुष्प न होगा वो कमी मी यह मिम्मेवाती नहीं। पुष्पस प्रत को मामास महरम, कपर और मान पारिका माना पर महासयका काप | पाप नरकम गमवापापसे मामा महान् मनुप-योको म्पर्प गुमा दत्ता । एक तो माना पुण्यका सा गाना भार उमसे पाएका बषरमा । सम्मांकी और उमर गाय समम्न संमारकी उपाधि मोगना, में समानता है कि यह विरेको आमाको मान्म महीना - दुख सिप पिचर] मोसमासा सकती । मैंने निम कारणसे कश्मा उपार्जन को पी, पह कारण मैने पाटे मापसे फह गया है। अब वापको नैसी इण्टा दो सा करें। आप विशन हैं, मैं विशनोंको चाहता हूँ। भापको भमिठापा हो तो धर्मप्यानमें सस होकर कुटुम सहित भाप यही खुशीसे रहें । आपकी भानोनिकाकी सरठ पानना सा माप को सी में मानन्दसे करा ।आप यहाँ शास्त्र अध्ययन बीर सवस्तुका उपदेश करें। मिप्यारंभोपाधिको पताम, मैं समझता है, न पों। मागे बसी वाफ्की पहा । परित--आपने मपने अनुमपकी बात मनन करने योम्प आम्न्यापिका कही। भाप अवश्य ही कोई महास्मा है, पुण्यानुषधी पुण्क्यान् जीव है, मवेकी है, और भापकी विचार शक्ति बहुत है। में दरिखतासे वेग वाकर नो इच्छा करता था, यह इस एकातिक थी। ये सब प्रकारफ विवेकपूर्ण विचार मैंने मही किये थे। मैं चाहे जैसा मी विशन् , फिर मी ऐसा अनुभव, ऐसी विफ-शपि मुझमें नहीं है, यह बात मैं टोक ही कहता हूँ । वाफ्ने मेरे लिये भो योगना वसाई है, उसके लिये में आपय माव उपकार मानता है और उसे नम्रतापूर्वक स्वीकार फरमेक किये में हर्ष प्रगट करता है।म उपाधि नहीं चाहता । सम्माका फ उपाधि ही देता है। आपका भनुमसिद्ध कयन मुझे पाहत वडा एगा है। ससार नछ हो रहा है, इसमें मुम्ब नहीं । आरने उपाधि रहित मुनि-मुमकी प्रामा की मह सप हर ममार्ग परिणाममें सोपानि, आदि म्यादि तपा बदान भाषमे रहित पात मोझका है। ६६ सुस्तके विपयमें विचार (६) पमाट्य-आपको मेरी बाल रुपिफर इसमे मुझे निरभिमानपूर्णफ बानद प्राम मा है। आपके लिये मैं पोम्य पोगना करेगा। में अपने सामान्य रिपारोंफो रूपानुग्प यहाँ फहनेफी मात्रा चाहता है। माकाउ छरमांक उपारन परनमें पपट साम और माया पसे पाबत दुम्मी है। प उसरा पूरा भया बग उपयोग नहीं कर सकन । फार उपाधि ही मोगत ८, वे भम्पात पार करत, उन्दे कान अपाना उठा जाता है, प जीय अनोगतिका प्रान दासर अनंत ससारी पनि फरते है मिउ हुए मनुष्य-मबको निर्मान्य र रामने ६, विमम पे निरनार मी जिन्होंने भग्ना भाषारिका जिनमे साधन मात्रा मसारमम गा, गा पुर पसरनौनत, मान, परामारी रमा, पम, निपम परमार अन्य गग, जय दयमापा, मप और शारगप्पपन गुनहगा सपुरुरॉफी सा करते ६, विग्होंने निग्या मनारप रमादा पान प्रगम्म समारमे स्यागीक ममान यतदै निमय बरम्प भार विएफ नगर ६ मे पुरुष परिप्रमाने मुगरक पाउ म्पनाम पर गगर प्रमरप भारम जार पग्निइमे गिगाहारम बिम, फाम आर भाग भानिमम पिरला-मित्रा प्रति गमान पर रगत आर रिना पापुद भार
[भम्स परिवार
मीमद् एसबन्द्र
प्पानमें म्पतीत होय है, वौर जो स्वाध्याय एवं म्यानमें मन है, ऐसे बितेन्द्रिय और नितकपाप में
निर्मप परम मुसी।
निहोंने सब पमपाती फोन क्षय किया है, निमके चार वपाटी-कर्म श पर गमे, यो
मुळ , मो वनवानी और बननदक्षा हो सम्पूर्ण मुसी। मोझमें वनंत गीवन मर्मत
मुख्में सर्वधर्मसे रिवहोर निरागते ।।
स प्रकार म्पुरमाशय का पुमा मत मुझे माम्य है । पहला तो मुझे स्माम्यो । स्वमी
मात्य है, और मात मराम से प्रहण करनेका मेरा उपदेश है। तसरा मत मान्य है, और पौया तो
समान्य पौर सबिदामाद ससप है।
इस प्रकार परिवानी माफ्को वौर मेरी मुसके संघमें बातचीत ई । यो न्यों प्रसंग मिस्ते
गागे त्यो पो हम पातोपर पर्धा पौर विचार करते जायगे । इन विचारों के आपसे करनेसे मुझे मात
वानन्द मा ।। भाप ऐसे विचारों के बनाए हैं इससे वर मी वामन्दमें वि।स तरह
परम्पर बातचीत करते करते एक साप समाधि-भावमे सो गये ।
यो विवेकी इस मुसके विषयपर विचार करेंगे ये बात तप और बारममेणाको उत्तरताको
प्राप्त करेंगे । इसमें कराए वापारमा, निरारमी मौर समुहके क्षण प्यानपूर्वक मनन करने पोप
है। वैसे ने तैसे वन्मारमी होकर समभावस बम-समुदापक हितको बोर भगमा परोपकार, दया,
शान्ति, षमा चौर पमित्रताका सेक्न करमा या गात मुसदापक है। निर्मपताके विषयमें तो विशेष
कामेको बामस्पकता महो। मुतात्मा वनव पुस्मय है।
६७ भभूस्प तत्पपिचार
हरिगीत छद
पात पुष्पके पुमसे इस प्रभ मानन वाको प्राति तो मी भरे रे ! मक-पाका एक मी
पार र महाामा । मुसको मात करनेसे मसर ऐता जाता है इसे जरा अपने प्यानमें में।
बहो। इस क्षण धणमे रानाडे मपकर मान-मरणमे तुम क्यों मान येो।॥१॥
पवि तुम्हारो ममी और सत्ता कम गई, तो कहो तो सौ कि तमाम्य या दीपा गया! पा
कुटुम और परिवारक मानेसे तुम अपनी भावी मानते हो । पर्गिम ऐसा मत मानों पोंकि ससारका
मना मानों मनुष्प देवको हार माना है। हो ! इसका तुमको एक पामर मी विचार नहीं बता ॥२॥
१७ ममूम्ब तत्वविचार
हरपति
या पुषम्य पुरब एमरा माननो मन्ये
वो मेरे सानो भांप नीि पोयम
मुख प्रात पवा पुलके मेम्
सलमर मामले का जो पाया।॥१॥
पापी भो भाषिकार पक्वा एपले तो से।
परिवारकी पम्प पर मो
परपातुंना मरने यो
एनो पार नही मही है। एक पळ हमने हो।11॥१॥
, भिनिता] मोसमाता निर्दोष सुम और निर्दीप माननको, जहाँ कामे मो वह मिल सके पहीसे प्रमत करो निससे कि यह दिम्पशक्तिमान लामा बंबासे निकाल सके । इस बातकी सा मुन्त दया है कि परवस्तुमें मोह नहीं करना । जिसके मन्तम दुख है उसे मुस काना, या त्यागने योग्य सिद्धांत है ॥३॥ में फौम , कराँसे आया , मेरा सपा स्वम्प क्या है, यह सबध किस कारणसे हमा है, उसे रक् या छोर' पदि इन बातोंका विवेकक शांत मापसे विचार किया तो बारमशानके सब सिमांतराल अनुमबमें मा गये ॥१॥ पह सब प्राप्त करने के लिये किसके पपनको सम्पूर्ण स्य मानमा चाहिये ! यह जिसने अनुमब किया है ऐसे निप पुरुपफा कपन मानना चाहिये । बरे, बारमाका उदार करो, मामाका उमार करो, इसे शाम पहचानो, भार सप वामानोंमें समापि सम्मा, इस पचनको एपमें धारण करो ॥५॥ ६८ जिनन्द्रियता जबतक भीम स्पादिए मामन चाहती है, चक्तक नासिफाको मुगध पछी भगती है, जबतक कान पारंगना मारिक गापन भौर बाचित्र पाहता है, पता माँस बनोपन देम्ममेका मा रम्मती है, जबतक सचाको सुगंधि-खेपन बछा गता है, तबसक मनुष्य निरागी, निप्रंप, निष्परिमझी, निरारंमा, और ब्रमपारी नहीं हो सकता । मनको पछमें काना यह सोचम है । इसके द्वारा सब इन्द्रियों पर की गा सकती है । मनमा जीतना बहुत दुर्घ है। मन एक समयमें असम्पानों योजन पसनेवाले मायक समान है। इसको पकाना बहुत कटिन है । इसकी गति पाठ और पकड़में न जामेबारी है। महा शानिपोंने पानसपी गामसे इस माम रमकर सपको जीत लिया है। उत्तयम्पयनमूपमें ममिराम महर्पिने शस्त्रसे ऐमा कहा है कि इस सुमोको बीतनेपाले मनसे परे है, परतु अपनी आमाको गौतनमा बहुत ही दुर्सम है, और मे दसमाम्म मुमगेको गीनने- पाडौंकी अपेक्षा मयुधम है। मन ही सोपाधिको बमला भूमिका है। मन ही मन और मोशका कारण है। मन दो सप संसारका मादिमाप है। इसको बन कर छेनेपर नाम-स्पकपको पा गाना रेशमात्र मी फाटिन नहीं है। निरगुन न मानर सो गम पांच मो ए रिम्पणनिम्पन बेपी गिरपी ना। पररस्तुमा न िमुहरा एनी दया मुम्नदी ए पागा मितपमान मनन ॥ ॥ और साधी परो!सम्म मान! पोनारामा गए पनि पना मार गिपूर गा मार या मीनामानना समय अनुमना || मनसारमन नगरेसमाना। मरमरपन माती भनुम । रे! माता ! माम साय! पने भटमा मर्गमम्मी पापा बनने सेना भीमद् रामचन्द्र [प्रसपी नीमा मनसे पतियोंकी मेहसता है । भोगन, पादिम, सुगंधी, बीस निरीक्षण, सुंदर दिसेपन पर सब मन ही मागताए। इस मोहिमांक कारण मर धर्मनी पर मी नहीं माने देता । यार बानेके पी. सावधान नही होने देता । सापपान होने के बाद पवित करने में प्रार होता है । इसमें सब समस नही होता व सावधानामें कुछ म्यूमता पर चावा है | जो इस ग्मनताको मी म प्रत होकर भाग एकर वस मनको गालते हैं, वे सपा सिदिको पाते हैं। मनको कई मकस्मात् चौत सकता है, मह तो पर गृहस्पाभममें अभ्यास करके गौता जाता है। मावभ्यास निर्मयता बात हो सकता है। फिर मी पहि कई सामान्य परिपय करना पारे तो उसका मुस्य मार्ग यही है कि मन को दुरिमा को, उसे मूस जाना, वीर सा मही करना । मम मन सद, स्पर्श मावि निवासच दफा करे तब उसे मही देना । मपमें हमें इससे प्रेरित म होना चाहिये परन्त इसे प्रेरित करना पाहिये | मनको मोश-मार्गके बिम्तनमें गाना चाहिये । मिद पिता पिमा सम प्रकारको उपाधियों सही ही यती , स्पाग मयागके समान होता है। डोक- मनासे उसे निगहना पाता है। बतएव अभ्यास करके मी मनको स्वाधीनतामें पाकर जनस्य भारम. रित करमा चाहिये। ६९ ब्रह्मचर्यकी नौ पारे पानी हो!ने पोये शयोंमें कैसे भै भीर कैसा सरूप बताया है। इससे कितनी पनि बारमोमति होती. प्रमचर्य से गमार विषयका सहप संक्षेप बस्यन्त चमत्कारिक विस कर दिया है। अपार्यको एक मुदर पक्ष और उसकी रक्षा करनयाग मा विषियोंको ससकी पारका रूप देकर मिस आधर पानेमें विशेप स्पति य सके ऐसी समता कर दी है। इन मी पाहाको पपार्परुमसे ही करता है। १ सति-मचारी सापुको बी पमु मया नपुसकस स्युक्त स्थानमें मही रहना चाहिपे । सियों दो प्रकारकीरेमनुपिणी वौर दबांगना । इनमें प्रत्येक के फिर दो दो भेद है। एक तो मौर सग बाकी मति नपमा चित्र । इमसे या किसी भी प्रकारको हो, होमचारी साएको म बना पाहिम क्योंकि में निकारक त है । पमुक्य तिपचिणी होता है । जिस स्थानमें गाम भैस स्पादि में उस स्थानमें नही यना चाहिये । तपा यहाँ पण बर्षात् नपुसका वास हो पाँ मी नाही यमा चाहिये । इस प्रकारका बास पचर्यको शाम करता है। उनकी कामय हम मात्र स्मादिकार मनको भए करते है २ कपा-केमा बदेली सिपोको ही अपना एक ही बाको प्रचारको धर्मोपदेश नहीं करना चाहिये । पया मोरकी उत्पचि कम हपचारीको बाके रूप कामविलासस्पषी प्रपोंको नहीं पाना चाहिये, तथा विस्स पिच पमपमान ऐसी किसी भी पपको एगरसबरी पातचीत अमचा मह परनी चाहिये। वासनलियोंके साप एक बासनपर म बैठना चाहिये तृपा मिस मगर माँ बैठ चुकी हो उस पानमें दो बहानक सरचारको नाममा पाहिये । पर बिपोकी स्मृत्तिका कारण है। से विकारको उत्पति होती है, ऐसा मगवान्मे पाई।
मोसमासा १ इन्टिपनिरीक्षण–प्रमचारी साधुओंको सियोंके भगोपांग प्यानपूर्वक वा पटि गया गाकर न देसने चाहिये । इनके किसी अंगपर रि एकाप होनेस विकारको उत्पति होती है। ५ कुड्यांतर-मौत, कनात या टारका प्रवरपट रमकर नहीं सी-पुरुष मैथुन करते हो वहाँ प्रमापारीफो नहीं रहना चाहिये, क्योंकि शम्, पेय आदि विकारफे कारण है। ६ पूर्णका-रूप प्रापारी साधुने गृहस्पापासमें किसी भी प्रकारको शुगारपूर्ण विषय- कामाकी हो तो उसकी पति न करनी चाहिये । ऐसा करनसे प्रमचर्य मग होता है। ७ प्रणात दूध, दही, पृत आदि मधुर और सचिमण पापोका पहुभा आहार न करना चाहिये । इससे वीर्यको पदि और उग्माद पर होते हैं और उनसे फामको उत्पति होती है। इसलिये अपचारियोंको इनका सेवन नहीं करना चाहिये । ८ भतिमात्राहार–पेट भरकर मापासे भधिक भोजन नहीं करना चाहिये । वपा जिसमे अतिमात्राको उत्पति हो ऐसा नहीं करना चाहिये । इससे मी विकार मता है। ९ विभूषण-अमचारीको म्मान, विवेपन परना, व्या पुष धारिका ग्रहण नहीं करना पाहिये । इसमे प्रमचर्यको हानि होती है। इस प्रकार निमुर प्रमच रिपे भगवान्ने नी बारें कहा है । बात करफ ये तुम्हारे मुमनेमें भई होगी। परन्तु गहस्पावासमें अमुक नमुफ नि प्रप्तपर्य धारण करनेमें बम्पासियोंफे एभमें एनेके लिये यहाँ कुछ समठाफर कहा। ७० सनत्कुमार चापताके बभबमें स्या कमी हो सकती है। समस्तुमार पकरी पा । उसका वर्ण वार कप अपचम या । एक समप मपर्माको समामें उसके सपको प्रशसा हुई। किती दो देयोंको यह बात भी न ठगी । बा में रेनों देव दाका-निवारण करनेक ठिये विप्रफ रूपमें सनरकुमारक मंत पुरमें गये । समकुमार गरीरपर उम समप उपरन भगा हुमा था । उसक भेगम भागमा सब जगह उिन्न हो रहा था । पर एफ छोटामा पचा पहने एला था और बह स्नान-मप्रन करनेफोरा था । प्रिफ रपमें भाय रेयतामोको उसका मनहर मुग, संपन पर्ग कापा, आर चम्म मी कति पाकर बहन भानम् भा आर उन्होंने सिर हिलाया । यह दापसर पनि पूज, तुमने मिर स्पो दिसापा ! दोंने कहा हम मारके रुप बार बणका देखने के लिप बहन अमिगरी। हमन जगह जगह भारकम्प और वर्गकी प्रासा सुनी थी। मान हमने उसे अपर देय, निमम हमें पूर्ण भान हुमा । सिर हिरानका कारण यह है कि उमा मारमें कया जाता पैसा दो भार पहा इममे भरिफ दौरे परन्तु कम नही मन कुमार अग्ने माप भार मति मुनकर प्रमुनमें नाफर योग निमुमन इस ममप मरा नप गा मा टौर, पाठ रिम ममप गरसभा पपायर पारणसर मारिएमे मार दार मिहामार मा उम समप मेराल बार आग मी देम्न योग्य है। अभी तो में शायरमें उबग्न उगारर । परि उम । । भीमरामचन्द्र [स्मतार सम्प तुम मेरा स्प वीर वर्ण देखोगे तो पात चमकार पायोगे मोर पबित हो जानोगे । देवाने त्रा, तो फिर हम गम्समामें बायेंगे । ऐसा करकर ये पासि पछ गमे । उसो पर सनाकुमारने उचम बमाकार धारण किये। जनक उपचास निस्से वपनी काया विशेष भापर्य उत्पम करे उस तरा सत्र होकर यह गम्समा माफर सिहासनपर बेटा । रानों जोर समर्प मंत्री, मुम्, निशान औरय सभासद मेग अपने माने योग्य वास्नपर मैठे पे । गोबर घमर छबसे दुठाया गावा रामा धार घेम क्षेमसे बबई या नावामा विशेष शामित हो या पापों देवता के रूपमें वाये । भव सप- पस वानन्द पान के बदले मानों में से एगा, ऐसे उन्होंने अपने सिरको रसपा । पाताने पूछा, कहो बामणो ! पर समपको पेशा इस समप तमने दूसरी तय सिर रिमया, इसका पा कारण है, प मुझे करो। ममाथिकान के अनुसार रिमोमे कहा महारान उस रूपमें और इस रूपमें नमीन माम्मानका फेर हो गया है। परनि सारे इस मातको सर एमासानेको छ । मोंने कहा, पिरान | बारको काया पहले भगवतम्य थी, इस समप गारफे समय है । बब बापका वंग अपततस्य पा तब बानन मा, बीर इस समप पारके तुम्प है इस मे से हवा । जो हम करते हैं पनि उस बातको सिम करना हो तो बाप ताम्को एक बमी उसपर मरिसपा बैटेगी और ये परमेक पाप मालेगी। ७१ सनस्कमार समकुमारने सको परीक्षा में तो पह बात सप निकला । निर्मक पापके मागमें इस कापाके मह मिठालट होनेसे इस चालता कम्पा विपमप से गई पी। नायीक और बपिम्प पापा ऐसे प्रपंचको रेकर समकुमारकेत परणमें पैगम्य उत्पम मा । पर ससार केरल मेने पोत्य। और ठीक ऐसा ही बपवित्रता की, पुत्र मित्र बारिके शममें है। यह सब मोर मान करने पोम्प माँ, ऐसा विचारकर पर प्रमुता स्पागकर पा निकला । मिस समय मा. साधुमसमें विचरता पा उस समप उसको ईमहारोग से गया। उसके सपथकी परीक्षा लेनेको एक देर बााके रूपमें भाया वौर उसने साधुसे था, में गत पुसमा पमच । मापकी कापा रोगका मोग बनाई। यदि म हो तो तww में इस रोग निवारण कर । साने कशोप ! कर्मरूपी एग मा उम्मत है स रोगको दूर करनेको पदि हमारी सामर्प हो तो सुशासे मेरे इस रोगको दूर करें। पवि इस रोग दूर करने सामर्म महो तो यह रोग भले ही हो । रक्ताने पा पा रोग दूर करने मुहमें सामर्प नहीं है। सामुने अपनी जम्मिको परिपूर्ण प्रनम्तासे पूजबाग गुली करके उसे पेगपर फे0 कि काश ही उस रोगन नाथ हो गया और कम्पा सी पी सी हो गई। उस समय देवने अपने सम्मको प्रगट किया और पापन्यवाद देकर वीर क्वन करणेबपने स्थानको वाम गया । केके समान सैप सून पीपसेरादातेर मागको उत्पति सि पामे पपमरमें दिनस मानेमा विसका समान है, सिके प्रत्येक पेममें पौने दो दो रोग होनेसे वो रोगका मगर, 1 बचाव पोप] मोसमाखा भम बादिको म्यूनाधिकतासे गो राग प्रत्येक कायामें प्रकट होते हैं, मसमूत्र, मिष्य, हार, मॉस, गद मौर खेप्मसे निसको दोचा Pका हुभा है, केवठ लचास मिसको मनोहरता है, उस कापाका मोह सचमुच निमम हो । सनत्कुमारमे निसका लेशमात्र मी मान किया, यह मी उससे सहन नहीं एमा, उस कापामें महो पामर । क्या मोह करता है। यह मोह मंगच्दापक नहीं। ७२ पत्तीस योग सम्पुरुषाने नाचेके मत्तीस योगोंका संग्राकर आत्माको उपलको बनानेका उपदेश दिया है- १ मोक्षसाधक पागके लिये शिष्यको भाचार्षक प्रति मासोचमा करमा । २ भाचार्यको बाठाचनामो दूसरेसे प्रगट नहीं करमी । ३ वापसिकाटमें मी धर्मको पता नहीं छोड़नी । . इस लोक और परलोकके सुसके फसकी गांडा बिना तप करना । ५ शिक्षा के अनुसार पतनासे वाचरण करना भौर नपा शिक्षाको विकसे ग्रहण करना । ६ ममत्वका साग करमा । ७ गुम तप करमा। ८ निर्मोमता रखनी । ९ परंपाके उपसर्गको जीतना। १० सर चित्त रसना । ११ मामसपम गुर पालना । १२ सम्परूप शुद रसना । १३ चितको एकाप समाधि एएनौ । ११ पट रमित माचारफा पाउना । १५ दिनप करन योग्प पुरुपोंकी पयायोग्य नय करनी । १६ सनोपफे नारा तृष्णाको मपा कम करना । १७ परम्प मारनामें मिमा पना। १८ मापा पित म्पहार करना । १९ गुर किपामें सावधान होना। २. सारफा पारण करना भार पारका राफमा । २१ अस्ने दार्थोकी समभाम र परना। २२ सब प्रफारके सिपोम मिरत रहना। २३ मध्गुणोंमें पाच महानोंका रिगुर पाना। २. उघरगुणोंमें पौच महाप्रमोंस मिगुर पाना । २५ उपमारपूर्वक फापोमग मरना । २६ प्रमा रहित हान प्यान गग रहना।
भीमद् रामचन्द्र [ मोजुन २७ हमेशा भारमचरित्रमें सूक्ष्म उपयोगसेगे रहना । २८ रितेन्द्रिमता के लिये एकामतापूर्वक म्पान करना । २९ पस्युकेएससे मी मयमात मही ऐना । नियों वादिके सगको छोरमा । २१ प्रापषिचसे निमुदि करनी । १२ मरणकासमें वारापना करना। एक एक पोग अमाप है । इन सबका संग्रह करनेवाया बव वर्मत मुसको पाता है। ७३ मोससुख इस पृथिवीमराम्पर कुछ ऐसी बातुयें मार मनको ग १ मिन ए अंश, जाननपर भी कहा नहीं जा सकता । फिर मी पे बस्तुयें पुछ स्पूर्ण पासत अथवा मानत हत्पपूर्ण मही है। जब रेसी वस्तुमा वर्णन नहीं हो सकता तो फिर बनत मुसमप मोमध तो उपमा कति मिल सकती है। मगमान्से मौतमत्वामीने मोक्षक वर्नत पुसके विपयमें प्रश्न किया तो भगवान में उत्तरमें कहा, गौतम । इस पनत सुसको मै बानता !, परम्त बिससे उसकी समता दी जा सके, ऐसी यहाँ कोई उपमा नहीं। जगत्में इस मुसके हम्य कोई मी बस्तु भएका पुस नहीं, ऐसा कहकर उपोंने निम्नमपसे एक माम्फा तया पा। किसी जगलमें एक मोममाछा मांस बपने बासयों सहित पता था । शहर बगैपकी समरिकी उपाधिका उसे शमर मी मान न पा । एक दिन कई या क्सकोमा के लिये किरवा फिरता पाँबा निकला । उसे गात प्यास ग्गी पी। रामाने वारेसे मोम्से पानी माँगा। मारने पानी दिया। छातक बस पीकर राणा संदर मा । वफ्नेको मीशकी तरफसे मिले हुए मम्म्य जक- दामकामा जुवानके लिये मासको समझाकर रागाने ठसे साय किया। मगरमें वान पथात् रागाने मौका उसको बिदगाम नहीं देखोई वस्तुवोंमें रक्या । सदर माण, पासमें बने बनुपर, मनोहर इत्र फग सारिप मोबन मद मय पान भौर मगषी रिसेपमसे उसे बाद मानद कर दिपा । र विविध प्रकार के औरा माणिक मौजिया, मणिन और रंगबिरंगी वमन्स पायें निरतर उस भौको देने के लिये ममा करता था, उसे बागीचोंमें पूमने फिरनेके सिमे मेगा करता था इस व्य रामा उसे उस दिया करता था। एक यतको अब सब सोये कुए थे, उस समय मानको अपने पाचौंकी पाद वई समिपम पहाँसे कुछ किये करे बिना एयरक निकर पा और माकन अपने कुपियाँसे मिम । उन सोने निमार गा कि तु को पा! माध्ने करा पात मुसमें । पही मैंने पत प्रशसा करने भयक वस्तु देशों । ।—परन्तु ये कैसी पी यह तो हमे कर। मार-पा को यहाँ सा एक मी मस्त हो महो। बुम्मी-पा से हो सकता है! पे पास सौप को कैसे संदर पो है! क्या माँ कोई ऐसी देसमे सपा पस्तु पी! उम्मी- धर्मप्पान] मोसमाळा ७२ मीठ-नहीं भाई, ऐसी बीच तो यहाँ एक मी नहीं । उनके सौर्य अथवा इनारयें मागतकको मी मनोहर चीज यहाँ कोई नहीं। कुटुम्बी-तो त् चुपचाप बस य । तो ममगाई है। मछा इससे मच्छा और क्या होगा ! हे गौतम ! से पह मील रामबके मुस भोगकर भाया था, और उन्हें जानता मी पा, फिर भी उपमाके योग्य वस्तु न मिल्नेसे वा कुछ नहीं कर सकता था, इसी तर अनुपमेय मोक्षको, सविदानद सम्पमय निर्विकारी मोशके मुसके वसन्यात मागको मी योग्य उपमाके न मिटनेसे में उसे कर नहीं सकता। मोक्षके स्वम्ममें शका करनेवाले तो कुतर्कवादी है। इनको क्षणिक मुसके विचारके कारण समसका विचार कासि वा सकता है। कोई आरिमक-मानहीन ऐसा मी कात है कि ससारसे कोई विशेष मुसका साधन मोक्षमें नहायसा इसलिये इसमें जनस सम्पावाप पुस कर रिया , इनका यह कपन मिकयुक्त नहीं । मिदा प्रस्पेक मानीको प्रिय है, परन्तु उसमें वे कुछ मान भयत्रा देस नहीं सकते। वौर पर कुछ जाननमें माता माँ है, तो यह केवल मिथ्या सप्नोपाधि माती है। जिसका पुल असर हो ऐसी स्वप्नरहित मित्रा निसमें सम्म स्पूछ सब कुछ गान भौर देख सकते हों, और निरुपाभिसे शात मी ही ना सकती हो, सो मी पोई उसका वर्णन कैसे कर सकता है, और कोई इसकी उपमा मौ क्या दे। यह तो स्पून रर्णत है, परन्तु धापत्रिकी इसके उपरसे कुछ पिचार कर सकें इसलिये यह का। मीटका रस्त समझाने के लिये भाषा-भेदके फेरफारसे में कहा है। ७४ धर्मध्यान (१) मगवान्ने चार प्रकारके पान वताये हैंआरी गग, धर्म आर शुभपहसे दो ध्यान स्यागने पोप है । पारोके । पान मारमसार्थक है। तहानके भेटोका चानक लिये, शान-विचारमें कुशल होनेक सिये, निन्ध प्रवचनक तत्व पानेके लिये, सपुरपोशरा सवा करने योग्य, विचारने योम्प बार ग्रहण करने योग्य धर्मभ्यामके मुरूप सोलह मर हैं। पहले चार मेरोको करता हूँ- १ माणाभिचप (माजाविषय) २ बावायविषय (अपापविषय ) ३ विभागनिभप ( मिपाक- विषय) : सगणविषय ( सस्मानविषय)।' आयाविषय [—अदा वर्षात् हि मगवान्न धर्म तत्वसकती गो कुछ भी कहा पर सव स्म्य है उसमें शका करना योग्य नहीं । काकी हीनतासे उधम बनके निस, बुद्धिकी मदतासे अथवा ऐसे ही अन्य किसी कारणसे मरी समप्तमें पे तल नहीं भाते परन्तु महन्त भगवान्ने वशमात्र मी मायायुष अपना बसप्प नहीं कहा, कारण किसे वीतरागी, स्पानी और निस्पृहा ।इनको मृपा कहनफा कोई भी कारण न या । तपा सर्व पर्ष सदिशा दोनेक कारण अधानस मा मृषा नहीं करेंग । यहाँ जवान ही महीं यहाँ तरसंबंधी मृपा पास से सफताह इस प्रकार पितन परनामाचाविचप ' नामका प्रयम मे।। २ भपायविषय- मग रेप काम, क्रोध स्या िमे गोषको दो टुडि उत्पम होता उममे इस भबमें मरममा पाता है। इसका चितान करना 'अपापविषय मासा दूमग मे है। भरापा भर्य मविपाक- . श्रीमद् बन्न [चान विप–में पण क्षणमें भो नो हुस सहन कर या, मबाटीमें पर्परन कर याबान वादि प्रास कर रहा सब कमांद फलके उदयसे है-ऐसा पितान करना धर्मपान मामला वास्य कर्मविपाकविन भेद है। १ सस्पामविषय-तीन कप सहमतिपन करना। कस्तस्म मप्रतिधितके वाकारा अाबसे सर्वत्र भरपूर है, प बसंत्यात योगनको कोठानुकोटिस सिरहा डोक है।समें बससातो दीपसमुनो। बसपाठों ग्योतिपी, मानवासी, मत माविका इसमें निवास है। उत्पाद, म्पय वौर प्रौम्पको विचित्रता इसमें गाईपमें समन्य ताकर बोस और उत्तर एकसी सवर हाते हैं। जहाँ ये तथा केवली भगवान् और निर्मप मुनिराज हिवरते हैं, उने "पामि नमसामि, सकारेमि, माणेमि, छाप, मगर, देवय काय, परतुमासामि" करता है। इसी तण पो एमेवाडे धावक-बाचिकामोंका गुणगान करता है। उस ठिरले सोकसे वसंस्पातगुना अधिक कर्ममेक है । पाँ बनेक प्रकारके देवताओंका निवास है। इसके उपर ईवत् प्रारमाय है। उसके उपर मुक्कामा विराजती है। उन्हें बामि यावत् पाठमाठामि " करता। उस ऊर्भ- बोकसे भी कुछ विशेष पोषक है। उसमें वनव दुचोसे मयामा नरकास और मुचनपतियों के मुक्न बादि है। इन तीन कके सम स्पानोंको स भारमाने सम्यरसारीत किमासे बनतबार सम्म मरणसे स्पर्म किया है-पेमा चितवन फरमा संस्थानविषय नामक पर्मप्पामका पौधा भेट है। इन बार मेमोको विचारकर सम्मत्वसहित भूत और चारित्र धर्मको वारापना करनी चाहिमे बिससे पह भगत मन्म- मरण रहो। धर्मभ्यानके इन चार भेदाचे स्मरण रस्मा चाहिये । ७५ पर्मप्याम (२) धर्मभ्यानके पार पक्षणोंको कहता । १ बाधारषि-वर्या भीतराग भगवान्की वाचा अंगीकार करनेकी रधि उत्पान होना। २ निसर्गरपि -बामाका वपने सामाविक नाविस्मरण माविमानसे भुवसहित चारित्र-धर्मको धारण करनेकी रुचि प्राप्त करमा उसे निसर्गरधि करते । सूत्राषि- भूतबाम गौर बनत आपके भेके लिए भगवान्के पनि पचोंका जिनमें गूंपन वा ऐसे सूत्रों को मरण करने, मनन करने और मानसे पठन करनको अचिका सत्पन होमा कति । उपरेशाषि-मानसे उपार्जित कमीको हम बानसे सपा और हमसे मय काँपो म यदि मिथ्यात्मके I उपार्जित कर्माको सम्पमासे सपा और सम्यक्माबसे मपे कमाको म बघि भनेरम्पसे उपाति कोको रापसे सपा और परम्यसे नये क्रमोन्ने म बपि। कपापसे उपाति गमको कपाएको दूर करके सपा बौर क्षमा आरिसे मपे कर्मको न बोष वाम मोगसे उपामित माको प्रम योगसे सपा और मम पोगसे नये कौने म बर्षि पाँच इन्द्रियोद सामरूप बाससे उपार्वित कर्माको संबरसे सपा और सपरूप (मोन) सबरसे नये फर्माको न बाब-इसके लिये मान मादि मान मार्गोकर कान भारि सवर-मार्ग ग्राण करने के लिये वीर्षकर भगवान्ले उपदेशको सनकी भिक उत्पन होनेको उपवेधावियते। धर्मभ्यामके ये पार जमण को। धर्मधामदे पर बामन काता-१ पाचना २१मा, ३ पवना, बिपा।
बर्मयान] मोसमामा १ वाचना-विनय सहित निर्नरा तथा पान प्राप्त करनेक किये सूध- सितके मर्म पानने माहे गुरु नपना सपुरुपके समीप सूत्रवत्तके भम्पास करनेको, वाचना वामन करते है। २ प्रपना-अपूर्वान प्राप्त करनेके लिये मिनेघर भगवान्के मार्गको Pपाने तया शका-शम्यको निवारण करनेके लिये, तथा दूसरों के तत्वोंकी मभ्यस्य परीक्षाके किये यथायोग्य विनयसहित गुरु वारिसे प्रश्नों के पूछनेको पृष्चना करते है।३ परावर्चना–पूर्वमें जो निमभाषित सूत्रार्य पाहो उन्हें मरणमें रसमेके लिये गौर निर्मराके रिये मुर उपयोगसहित शुद सूत्रार्थकी बारंबार सम्माय करमा परामर्थमा भावन है। धर्मकया-पाठराग मगमान्ने हो माल मैसा प्रणात किया है, उस भाषको उसी तर समझकर, प्रहमकर, विशेष रूपसे निमय करके, शका कसा विविगिधारित अपनी निराके निये सभा उम माोंको उसी तर प्रणात फरमा, निससे मुममेवा और भदा करमेवाले दोनों ही भगवान्को बाबाके नारापक हों, उसे पर्मकपा मावन करते हैं। ये धर्मम्यानके पार मायन करे। बा धमप्पानको चार अनुप्रेक्षाएँ करता-१ एकरलानुप्रेक्षा, २ मनिस्पानमेसा, २ बशरणानुप्रेक्षा, १ ससम्पनुप्रेक्षा । इन चारोंका उपदेश मार माक्नाके पाठमें कहा जा चुका है।मा में स्मरण होगा। ७६ धर्मप्यान पर्मभ्यानको पूर्व वाचार्या बौर आधुनिक मुनीश्वरोंने मी विस्तारपूर्वक बात समझाया है। इस प्यानसे मारमा मुनिलमाव निरतर प्रवेश करती जाती है। चो मो निमम बर्षात् भेद, लक्षण, वालमान और अनुप्रेक्षा को बहुत मनन करने योग्य हैं। अन्य मुनपाके को अनुसार मैंने उनें सामान्य मापामें तुम्हें कहा है। एसके साप निरतर म्यान रसनेको नाश्यकता यह कि इनमेंसे हमने कौनसा भेद प्राप्त किया, लपवा कौनसे भेदकी बोर माक्ना रक्सीन सोम मेदोंमें हर कोई हितकारी बार उपयोगी है, परन्त मिस वनुकमसे उन मरण करना चाहिये उस अनुक्रमसे प्राण फरमेसे में विशेष वाम-झामके कारण होते है। मगरसे ग सूध- सितके सम्पयन कठस्थ करते हैं। पदिरे उनके वर्ष, और उममें को मूल- तत्वोंकी भोर प्यान दें तो वे इस सूक्ष्म मेको पा सकत है। पैसे के के एक पप्रमें दूसरे और सेरेमें तीसरे पत्रको प्रमाति है, वैसे ही सूत्रामें मी चमति है । इसके उपर विचार करमेसे निर्मठ भौर केस दयामय मार्गक मौतराग-प्रणीत तत्वबोधका बीर बंतकरणमें अंकुरित होगा | वनेक प्रकारके शामवणेकनसे, प्रमोचरसे, विचारस और सत्पुरुषों के समागमसे पोपण पाकर आदि होकर समसप ऐगा । या पाले निर्मरा और माम प्रकाशरूप फल देगा। याण, मनन वीर मिरिभ्यासन के प्रकार बेतियोंने मी बताये है। परन्तु जैसे इस धर्मम्यान के प्रपा पृषक सोम मेद पों को गये स तत्पूर्वक मेट कम्पत्र कहाँ पर भी नहीं करे गये, यह अपूर्ण है। इसमेंसे शामों का प्रवण करमका, मनन करमेका, विचारमेका, क्यको मोध करनेका, शका कसा र करनेका, पर्मकाया करनेका, एक Aचारनेका, अनिस्यता विचारनेका, मशरणता पारनेका, भीमासचन्द्र [प्रानो मे पेपर राम्प पानेका, संसारकै अनंत स ममम करनेका और मौतरण भगतको मापासे समस्त डोका- छमेकका Aधार करनेका पर्व उत्साह मिलता है। भेट मेसे इसके बौर भनेक मात्र समझाये है। इसम फुल भानोंके समचमेसे तप, शति, प्रमा, दया, वैराग्य और मानका पात गगत उदय शेगा। तुम मराषित् इन सोम मेका पठन कर गये होगे तो मी फिर फिरसे उसका पुनरावर्तन करना। ७७शानके संबंध में वो शम्य " जिसके एप बस्तुका स्वरूप मामा जाय उसे शान करते है शान शमा यही बर्ष है। का मफ्नो भुमिके अनुसार विचार करना है कि क्या इस बानको कुछ माश्यकता है। पदि बाप करता है तो उसकी प्राप्ति के क्या साधन है ! परि साधन है तो क्या इन सामनोंके अनुकम्प, देश, घा वीर मार मौन है । यदि देश, 3 मारिनुस । तो वे कों तक मनु और निशप विचार करें नो इस मानके कितने भेद है। मानने पोग्य क्या है। इसके भी कितने मे है। जाननेके कीन कौन सापन । किम किम मासि इन साधनोंको पास किया जाता है! सबानका पा उपयोग अपना क्या परिणाम ! पे सब बातें जानना बाचस्प है। १ बामका या भावस्पकता है। पहले इस शिष्यपर विचार करते हैं। यह मास्मा इस पोहा रार प्रमाण लोकमें चारों गतियामें बनाविकासे कर्मसहित स्थिति में पर्यटन करती है। जहाँ क्षणमर भी मुहका मात्र मही ऐसे नरफ निगोद मा स्यामाको इस भारमाने भात पात कामतक पारम्पार सेवन किया है। मसप दुबोको पुन पुन पौर करो तो बनतोबार सहम किया है। इस संतापसे निरतर सतम बास्मा के अपने ही काळ विपाकसे घूमा करती है । इस घूमनेका कारण अनंत दुसमेगा बानापरणीय वादि कर्म । निनके कारण मारमा पमे सम्मको प्राम नहीं कर सकता और विषप बार मोहक बनको अपना लक्ष्म मान हो। इन सबका परिणाम फेरस ऊपर कर मनुसार होता है वात् वामाको बना दास बनत माघोंसे सल करने पाते है। कितना हो अप्रिय, कितना ही सेलापक और सिमा न होनेपर मी जो सपनेत फारसे जमतभार सहन करना पका, उस दुसको केवल बयान बादि कर्मस । साम किया, सपिये बान पारिको दूर करने के लिये कानको वमत मासकता है। ७८ ज्ञानके संपंपमें दो शप (२) २ अब बान-ग्रामिफे सावनों के विषयमें कुछ चार करें। अपूर्ण पसिसे परिपूर्ण वारम-कान मिर नही होना इस रण म पक्षियोंसे युक्त देह हो बारम-बानको सिर कर सकती है। ऐसी देह एक मानव-नापही प्रश्न उठेगा कि किमान मानोको प्राप्त किया ऐसा भनेक भामा है तो सब मात्मभानको पो नही प्राम करती ! इसके उजरमें हम पर मान सकते। खिोने सम्पूर्ण मामपानको प्राप्त किया। उनके पवित्र बनामृती गर्ने प्रति मही पती । प्रतिके दिना पार नहीं, और पदि सम्बार नहीं तो फिर ममा पास हो सकती है। और यहाँ इनमेसे शाना संगम होगम] मोसमासा - ३ रस मी नहीं यहाँ शान-प्राप्ति मी किसकी हो। इसलिये मान-टेके साथ साथ सर्वपके वचनामृप्तको मामि बार उसकी प्रदा मी साधनम्प हैं । सर्पके पचनामृत वर्मभूमि अपवा केक्स अनार्यमूमिर्म नहीं मिक्ते, तो यहाँ मानव-रे किस कामका ' सठिये कर्मभूमि भार उसमें मी भार्यभूमि. -यह भी साबनरूप है। ततकी प्रा उत्पम हानेके लिये और शान होने के लिये निर्मन्य गुरुफी भाषश्पकता है।म्यसे नो कुल मियामी है, उस फुल्में बम हाना मी वामनानकी प्राप्ति में हानिरूप ही होता है। क्योंकि धर्ममतमेद वत्यम्त दु सहायक ( । परंपरसे पूर्वजोंके शारा ग्रहण किये हुए दमान ही स्प माम होने जगते है । इससे भी माम मान सकता है । इसलिये बम कुछ मी भावश्यफ है। यह सब मात करने निम्ना भाग्यशाली होनेमें स्पुण्य नर्यात् पुण्पानुषत्री पुण्य इत्यानि उत्तम सानन में। यह दूसरा साधन में कहा। पनि साधन है तो क्या उनके अनुकूम देश बोर का है, इस तीसरे भेदका विचार करें। मरत, महाविदेह इत्यादि कर्मभूमि बौर उनमें मी वार्यभूमि देशम्पस बनुकूल में । निहामु मम्प ! तुम सब इस समय मरतमें हो, वीर भारत देश अनुम। काउ मात्रको अपेक्षासे मति और शुसलाम प्रास कर सकनेकी अनुकूलता भी है। क्योंकि इस दुपम पचमकाठमें परमावधि, मन पर्यव और केवल ये पमित्र प्रान परम्परा नामापके अनुसार निद हो गये हैं। सारांश यह कि कारको परिपूर्ण मनुश्मता नहीं। देश, कास मादि परि कुछ भी अनुठी तो ये कहाँतक है। इसका उत्तर पर है कि अपशिष्ठ सैदतिक मतिज्ञान, भुतहान, सामान्य मतसे मान, कारकी अपेक्षासे स्मास हमार वर्ष ग्रेगा; इनमेंसे माई बार वर्ष बीत गये, अव सारे भठाय इबार बर्ष माकी है, वर्षात् पंचमकारका पूर्णतातक कालकी अनुसता । इस कारणसे देश भार काल अनुल हैं। ७९ ज्ञानफे संयंधम पो शम्य १ बबरशेप वचार करें। आपकता क्या ! इस मुम्स विचारपर नप और गमीरतासे विचार करें तो माझम होगा कि मुस्प वाव पकता तो भपनी स्वरूप-स्पितिको भणी पाना है । बनत दुमका मारा, भीर दुखके नारासे मारमाके मेयस्कर मुटकी सिदि यह स्पोंकि मामाको मुस निरन्तर ही प्रिय है। परन्तु पासुस यदि ससम्मक मुस दो तमा प्रिय है। देश कारको वपेधासे मा बाम इत्यादि उत्पन करने की बाप्पकता, सम्यग् मात्रसहित उचगति, मासि महाविदहमें मानकदेहमें जम, हाँ सम्यग् मावकी भीर भी उमति, तलपानको विशुद्धता और दि, अन्तमें परिपूर्ण मामसापम, बान और उसका स्प परिणाम, सम्पूर्णरूपसे सब द सोका कमाल मर्षात् ममर, मनुपम, मनव शामत, पमित्र मोनको प्रामिन सबके सिपे शामफी आपरफ्पता है। २ बानके कितने म है, तस्सबधी विचार करता है। इस शानक वनंत मेद है। परन्तु सामाम्प रपिसे समझने लिये सह भगवाम्मे मुस्प पोप मद कई है, उन्हें पों का त्यों करवा - " । १ भीमद् रामचन्द्र [सनाव पल -पाण मति, इस्प मुत, तीसरा बाधि, चौपा मन पर्यव और पाचर्चा सम्पूर्णसम्म केनछ। इनकमी प्रतिभेद वीर उनके मी भनिय सरूपसे बनम्त मगनाक है। २ मानने योग्य क्या है! वब इसका पार करें। पके सरूपको पालने माम पान, तब वस्तु तो क्नंत, पहें किस पजिसे गाने ! समझ होनेपर सपाप सर्वदर्शितासे अनत मस्तक स्तरमको सब मेदोंसे जानने और देखते है, परन्तु उन्ोंने इस सनी पदमाको किन बिम मस्तमौके पानमेसे प्राप्त किया । पक्तक बनत भेणियोंको मही गाना तबतक किस पस्तुको जानते मानते वे बनन्त बस्तुओं वनन्तमपसे पान पायेंग! इस काका का समाधान करते है। मो धनत पस्तुयें मानी बनत भैगोंको बफेयासे है। परन्तु मुफ्स पस्तुलको पिसे उसकी यो भेणियों है-बीच मोर मग । विशेष प्रस्तुत सरूपसे नौ तत्त बपना न दम्पको प्रेमियों मामी मा सती । इस पंकिसे कहते पावे सर्व मानसे बात होकर बोकाडोकके सरूपको इस्ताम- रको तय मान और देख सकते है। इसलिये सामने याम्प फार्म तो केरठ मीन भौर भगा। इस व्य जाननेकी मुस्स दो श्रेणियों का। ८.मानके संपमें वो शम्प (१) इनके उपमेदों को सक्षेपमें करता।'बार' पैतम्प भणसे एकरूप है। लिपसे और सम्परूपसे बनवानत है । देहत्तरूपमें उसके इन्द्रिय बादि जानने योग्य है उसकी गति, निगति इस्पारि मानने पाप है उसकी ससर्ग असि गनने पोम्प।इसी तरा बगन' के रूपी वरूपी पुनर नाकाश आदि मितिमात्र कामपाक मार जान पाम्य है। प्रकारतरसे जीव, वीरको माननेफेसिब समान नौ भणिरूप नव वत्तको कहा है- पाल बीच पुष्प पाप, वाय, सबर, निरा बम और मोक्ष । इनमें कुछ प्राण करने पोग्य पौर मुख मागने योम्प । स्व पल बामन योग्य तो। जामनेके साधन । यपि सामान्य विचारसे इन सापोंको बान मिपा फिर मी रिसेप AIR करते है। भगवान्की बना और उसका एक स्वरूपको यपारूपसे जानना चाहिये । सप तो कोई निर हो गते है नही तो इस निर्म पानी गुरु बता सकते हैं। पगहीन बाता सर्वोत्तम है। इसलिये मदाका बीय रोपण करनेवाला आपला उसे पोषण करनेवाग गुरु के साधनरूप है। इन स्मन मारिके किये संसारको निति बत् कम दम मचर्य बादि साप सापन । सपनों को प्राप्त करनेका मार्ग कहा माप तो मी करे। इस बालके उपयोग नपा परिणाम के उत्तर वाम्प स्परमा गया है, परत कामेदसे कुछ करना है और पा इना हो कि दिनमें दो पाता कम्त मी नियमितरूपसे किसकर दिनेवर भगवान्के को ए तत्वोपशको पर्यटना करो। बीतरागके एक साविक शमसे बनायर पीपका पात झपोपशम ऐगा ऐसा में किसे करता। ८१ पंचमकास सायकले विचारों को कम्य गानना चाहिये । मी मिनेबरने इस बार के दो मुम्म भेद करे ५ ।
पंचमका] मोसमासा । ₹ वसर्पिणी और बमसर्पिणी । एक एक मैदके माम बारे है । भान फसफा पाइ माप पचमकार करता है, और यह मवसर्पिणी कामका पाँचवा वारा। वसरिणी उतरते हुए काठको करते है। इस उतरते हुए काळके पाँचवे भारेमें इस मरतक्षेप्रमें फैसा वाचरण होना चाहिये इसके लिये सापुरुषोंने कुछ विचार बताये है, वने माश्य भानना चाहिये। होंने पचमका के सरपको मुख्यरूपसे इस प्रकारका बताया है। निर्मय प्रबननके ऊपरसे मनुप्पोंकी मदा क्षीण होसी मावेगी। धर्मक मुझसत्वोंमें मतमतांतरोंकी पदि होगी। पासरी और प्रपची मतोंका मान होगा। चन-समाकी रुचि अधर्मकी और फिरेगी । सत्य वीर दया भीम भीमे पराभवको प्राप्त होंगे। मोह आदि तोपोंका इनि होती जायगी । दभी और पापिष्ठ गुरु पूज्य होंगे। सुमपिक मनुष्य अपने फरमें सफल होंगे । मीठे किन्तु पूर्तनका परित्र माने बायेंगे। शुर नामचर्य बादि शीलसे युक्त पुरुष मलिन करगगे । बारमानके मेद नए होने मागे । हेतुहीन क्रियाएँ गाती पार्यगी । बगान क्रियाका महुभा सेवन किया जायगा। म्याकुल करनेबारे विषयोंके साधन बढ़ते जायेंगे। एकतिवादी पक्ष सवारी होंगे। भंगारसे धर्म माना जायेगा। सो पत्रिपोंक बिना भूमि शोकसे पारित होगी । निर्माम्य रामशी मेश्याके विमसमें मोहको प्राप्त होंगे धर्म, कर्म भीर सवी सननति भूल जायेंगे, मम्यापको जन्म देंगे, जसे स्टा नावेगा पैसे प्रयाको पेंगे समय पापिष्ठ माचरणको सेवमकर प्रमासे ठन बाचरणोंका पाटन करेंगे । रामशके मामपर शूम्यता वाती नायगी । नीच मत्रियों की माणा बढ़ती गापगी । ये मोग दोन प्रनाको पूसकर भार मरमेका रामाको उपदेश देंगे शास-भग करनेके धर्मको रामाको अगाकार करायगे शौर्य बार सगुणोंका नाश करायगे मृगया वादि पापोंमें अब बनायेगे।सम्पारिकारी वपमे मधिकारसे हमार गुना माकार रक्सेंगे । मामण पासची वोर गेमी हो जायेंगे सरिपाको मुपा देंग ससारी सावोंको धर्म प्रमोंगे । मेश्य डोग मापापी सर्वपा स्थायी और कोर लपके होते आयेंगे । समप्र मनुष्यवर्गकी सारातियों घाती मायगी । बस भौर मकर स्य करनेस उनकी बधि नहीं रुकेगी । निक, विनय, सरमा स्पादि सगुण घटते जायेंगे । अनुकपाका स्थान हीनता के गी | माताको अपेक्षा पनीमें प्रेम पहेगा। पिताको अपेक्षा पुत्र प्रेम बहेगा। पातिस्पको नियमसे पासनेसाठी सुंदरियों पर गायेंगी। मानसे पवित्रता मानी नागोपनस उत्तम कुछ गिना जायगा । शिष्य गुम्से उल्टा पड़ेंगे । भूमिका रस घट जायगा । संशपमें करने का भावार्थ पहा कि उत्तम बस्तुओंकी कोणता और कनिष्ठ बस्तुका उदय होगा । पचमकासका सहप उन बातोमेका प्रत्यक्ष सूचन मी कितना अधिक करता है। मनुष्प सधर्मतत्वमें परिपूर्ण प्रवाधान नहीं हो सकता, सम्पूर्ण वौर तलबान नहीं पा सकता । असामाके निर्माण के बाद इस निर्माणी वस्तुएँ इस भरतक्षेप्रसे म्परा हो गई। पचमकासका ऐसा सलूप बानकर विवको पुरुष तत्वका रण करेंगे; कानुसार धर्मवली मदा प्राप्त कर उबगति सापकर मातमें मोश मास करेंगे । मिर्गय प्रधान, निर्मग्य गुरु स्यादि धर्म तल पानेक साधन है। इनकी भारापनास कर्मको विरारना है।
[लाव भीम रामचन्द्र ८२ तस्यापमोप १ वशीकारिक सूत्रमें कपन है कि रिसने मात्रामीवके भावों को नहीं माना पा वष सपममें कसे रिपर र सकता है । इस बचनामृतका तत्पर्य यह कितम वामा बनारमा सरूपको जानो, इसके जाममेकी भापत भावसकता है। बामा बनारमाका सस्प स्वरूप नि:न्य प्रवचनर्मेसे ही प्राप्त हो सकता है। वनेक बम मोमें इन तलाके विपपमें विचार प्रगट किये गपे है, परन्तु मे सपार्थ नहीं है। महापशाबान भाचार्यो- सारा किये गपे विधन सहित प्रकारतरसे करे ए मुस्म नौ तानोंको मो मक पुरिसे बानता है, पासपुस्प वास्माके स्वरूपको पहचान सकता है। स्या की शैग अनुपम दौर मनत मान-भेदासे मरी है। इस शैको परिपूर्णवपसे तो सभी और सदिशा ही जान सकते हैं फिर भी इनके वचनामृतके अनुसार भागमको मादसे मुद्रिके जनुसार नी तत्वका स्वरूप मानमा मात्र यक है। इन नौ तातोको प्रिय मदा मापसे जान से परम विक-युधि, सुर सम्यक्त्व वीर प्रभाषिक बारमानका उदय होता । नौ तलोंमें पोकालोकका सम्पूर्ण स्वरूप का नाता है। मितती विसकी पुषिकी गति है उतनी तत्यानकी भोर पि पाँ पाते है, और मानके अनुसार उनकी मात्माको उम्ममता होती है। इससे में वामनानके निर्मळ रसका अनुभव करते हैं। जिनका तत्वज्ञान उत्तम और सूक्ष्म , तपा नो मयुक्त तत्वज्ञानका सक्म करते है पुरुप महान् माग्पशाम है। तत्वो माम परिसके शिवापाटमें मैच गया है । इन रिशेप स्वरूप प्रभावान् भाचोक महान् प्रपोंसे कास्य जानना चाहिये स्पोंकि सिखातमें जो भी कहा है उन सबके विशेष मे से समझनेम प्रजातान् बाचारों हरा निरचित प्रप सहायभूत है। गुरूगम्प भी है। नप, निक्षेप और प्रमाण में मतलके शानमें मावश्यक है और उन पपाशाम इन महारोंने बताया है। ८३ तत्वावपोप (२) सलम भगवाने ठोकाको सम्पूर्ण मावोंको गामा और देखा पार उनका उपोश उम्हाने भम्प खगों को गिया । मगपान्न अनत हानके द्वारा कामको सम्पनिपपक बनत भर जामे थे परस्त सामान्य मनुम्पोको उपशके हारा भणी पाना लिए उन्होंने मुस्स मा यार्पका तापा। इससे गोसामोरके सब मात्राका इसमें समावेश हो जाता है। निर्मम्प प्राचनमा को को सूक्ष्म उपदशाह तत्तको सि ममतापमें समापिए हो बाता है। तपा सम्पूण धर्ममतोत्र सूक्ष्म विचार इस मक्तात- शिनर का भागाता। वामाची ही अनंत पत्तियों को उने प्रकाशित करनक विपईत मगास पवित्र उपदेश । ये अनंत पालियों उस सम्प प्रक्षित हो सकती है पर किमरतल-विशनका पाचारामाहो साप ।
वाचार] मोसमाला प्रभ- सूक्ष्म सादगी शान मी इस मबतल सम्म शानका सहायरप है, यह मिम मिन प्रकारसे इस नववत स्वरूप प्रानका उपदेश करता है। इस कारण यह निकरूपसे मानना पाहिय कि बिसने भनस भावमेइसे नवतत्वको मान लिया पहा सर्वज्ञ और सर्वशी हो गया । यह नववस्म त्रिपदीकी अपेक्षासे घटाना चाहिये । हेय, अय और उपादेय अयात् त्याग करन योग्य, मानने योग्प, और माण करने योग्य, ये तीन मेद नषतत्व स्वरूपके विचारम अन्तर्हित है। -यो स्पागन योग्य । उसे नामकर हम स्पा करेंग ! शिस गाँसमें गाना नहीं है उसका माग टनेस क्या प्रयोजन । उत्तर-गुम्हारी इस शफाका सहबमें ही समाधान हो सकता है। स्पागन पोम्पको भी जानना पाश्यक है। सर्पह भी सब प्रकारके प्रपोंको नाम ये है। त्यागमे योग्य पस्तुको सामनेका मूल तत्त या कि यदि उसे न माना हो तो मी अस्याम्म समझकर उस बस्तुका सेवन म हो जाय | एफ गाँबसे दूसरे गाँवमें पहुँचनेतक यस्समें गो गो गाँव जाने हों उनका रास्ता भी ना पाताह । मही तो इष्ट स्थानपर नहीं पहुँच सकत । जैसे उस गाँव उनपर मी उसमें यरत नहीं है, उसी तरह पाप आदि तत्वोंको जानना चाहिये किन्तु उन प्रहण नहीं करना चाहिये । पिस प्रकार रास्तमें आनेपाल गातोंको छोरवे आते है, उसी तरह उनका मी त्याग करना वापश्पक। ८४ नस्वापपोष नरतत्तका कासम से गो सत्पुरुष गुरुके पाससे भत्रण, मनन आर निरिम्पासमपूर्वफ ग्राम प्राम करत है, ये सुपुस्प महापुण्यशाग भौर पन्यवादके पात्र है । प्रत्येक मुझ पुरुषोंका मेरा बिनयमा- भूपित यही उपोश कि नबतपको अपनी पुदि-अनुसार यया जानना चाहिये । महावीर भगवान के सामनमें बहुम्से मतमतांतर पा गपे है, उसका मुम्य फारण यही कि तस्यान भोरसे उपासफ गफा बस फिर गया । ये लोग केवल क्रिपामा में ही मग ग्रे, विमा परिणाम पिगापरातमान खाबमें आपो थिाकी आग मगमग रेसबरबकी गिनी जाती १, उसमें सब गरोघे मिटाकर न लोग काम बीस ठाम है। ये माग भ्रमणापासक है। इनमेमे म अनुमान करता है कि हमार पुरप मी मुरिफलसे मरतसका पमा मानन हॉग । मनन आर विचारपूर्वक मामनमा पुरुष ता उँगशिपोम मनमापक भी होंगे | तमसानको जब ऐसी पनित स्पिति हो गई, तमो मतमतापर या गपे । एक हात कि "मी म्पाने क मत भनेक तरपिचारप पुरषोक मनमे बरपा मिमता नही आ इमरिप तसातबाध परम भापक। इस मानस-विचारफ मर्पधर्म प्रन्या मुनिसि मेरा मिलि कि ये पिक भौर गुरगम्पनाम इमके झामको शिपमपम दि फरें, इसम उनक पवित्र पाच महान साग, जिनपा पचनापतफ अनुपम आनम्पो प्रमाही मिगी मुनिम आचार पारमेमें मारा पगा; शान अम मिया पिपुर रामम मम्पासा पगाऔर परिणाम ममारका अन होगा। " मी मरा २ मीमद परचन्द्र [मलायव ८५ प्तत्त्वावलोप गौ मममोपासक मतकको ममा मी नहीं मानते उने उसे वास मानना चाहिये । पान नके बाट मात मनन करना चाहिये । मितना समझमें ना सके, उतने गमार बाशयको गुरुगम्पतासे सदाबसे समाना चाहिये । इससे मारमनानकी उम्पमता ऐगी, और यमनियम माविका पात पाटन होगा। नवताका ममिप्राय नववत्त मामको किसी सामान्य मिसाई पुस्तकसे मही। परन्त निस मिस स्पड पर मिन मिन विचारों को शानिमाने प्रणात वि.मा विचार नपतालमैके किसी न किसी एक, ऐ अपना विशेष तायक होते हैं। केपी भगवान्ने त भेणियोसे सफा नगमा सारिया है। इससे जैसे जैसे भय वादिके भेदसे इस रामानको प्राप्ति होगी से पैसे बर्ष वानन्द बार निर्मकताको प्रामि केगी । केवल विवेक, गुहगम्पता वौर वप्रमादकी नाश्यकता है। मानब गण- शान मुझे गत प्रिय है । इसके रसानुमपी मी मुझे सदैव प्रिय है। काम्मेवस इस समय सिर्फ मति मौर चुत पे दो बान मरतक्षेत्रमें नियमान है, बाकी के तीन सान म्याचे हो गये है। तो मा यो म्पों पूर्ण मनासहित मावसे हम इस नक्सत्त्यानके विचारों की गुफामें उतरते गातेपो स्यों उसके भीतर बहुत मामप्रकाश मानद, समय तपानको फरणा, उत्तम विनोद, गेमार चमक बौर बाश्चर्यचकित करनेवाले गुर सम्यमामके विचारोंका पात अधिक उदप करते हैं। स्पायनापतके बनत सदर बाशयोंके समानेकी शकिके इस काल में इस क्षेत्रमे बिपो होनेर मी उसक संघम यो यो संवर भाशय समहमें जाते हैं ये बाशय वस्यन्त ही गभीर वोंसे मरे पर । यदि इन वाशर्योको पुन पुन मनन किया जाय तो ये बाशय पाक-मतिके चल मनुप्पाको भी समर्ममें स्थिर पर दनेबारे हैं। सारांश है कि संक्षेपमें, सब प्रधरका सिम्मि, पवित्रता माशील मम भोर गेमौर निर्मम निबार सा रम्पकी भेट, ये सब तत्पानसे मियते । ८५तरवावयोप - एकबार एक समर्थ मानक माप निन्य प्रपचन चम्कतिके सबमें बातचीत गई। इस समें उस शन्ने कहा कि इतना मैं मानता। महापौर एक समर्थ तसानी पुस्प ये उन्होंने जो उपदेश किया है उसे महण करके प्राक्त पुरुपाने वग उपागकी पोजना की है। उनके मो रिचार पमानिम पूर्ण है परन्तु इसके उपरसे इसम योगाभेकका समान मा जाता है, पर मैं नहीं कर सम् । ऐसा होमपर मौ परिवार इस संबपमें कुछ प्रमाण ते तो मैं इस पातपर पुर अदा कर सकता है । इसके उत्तरमें मैन पडू हा कि मैं कुछ नवपनापुरको पपार्य तो था, परम्नु AT मेट सहित मी नहीं मानता। परन्तु जो दुस सामापरपस गानता। इसके उपरम मी प्रमाण मापद सकता । बादमें नव-नसमिानक धमें बातचीत की। मैंने कहा तत्वारोप] मोक्षमाला 1 इसमें समस्त सरिफा ज्ञान आ जाता है, परन्तु उसे यथार्य समप्तनको शळि चाहिय । उन्होंने इस फयनका प्रमाण मांगा । मन आठ कमकि नाम लिपे । इसक साप ही यह सूचित किया कि इन सिपाय इससे मिम मात्रको दिसानेमाला आप कई नौबा कर्म निका, पाप और पुण्य प्रातियों नाम छेकर मैंने कहा कि भाप इनके सिबाप एक मी अधिक प्रकृति दें। यह कहनेपर अनुकमसे मात चसी । सबसे पहले जातक भे करकर मैंने पूछा कि क्या इनमें भाप कुछम्यूनाधिफ कहना चाहते हो ! जगीय ट्रम्पके म बताकर पूछा कि क्या माप इससे कुछ विशेष करत हो। इसी प्रकार मा नमतसके संगमें बातचीत हुई तो उशेने पोनर विचार करके कहा, पर तो महापौरको करने के अमृत चमाति है कि जीवका एफ मी नया भेट नहीं मिमता । इसी घरह पाप पुष्प मागिकी एक मी विशेष प्रति माही मिडती; सपा नौंवा कर्म मी नहीं मिलता । ऐस ऐसे तलमानक सिद्धांत जन दर्शनमें है, यह बात मेरे प्यान न थी, इसमें समस्त सृरिका तहान कुछ अशोम माय आ सकता है। ८७ नरमायपोष इसफा उत्तर हम भारस यह किया गया कि अभी शी भाप इतना कहते है यह तमतिया करता है जब तक कि जनधर्मक तरप-विचार आपके एयमें नहीं आये, परन्तु मैं मम्यस्थतास सस्प फहता है कि इसमें दो विशुद ज्ञान बनाया गया है वह अन्यत्र कहीं भी नहीं है; आर स माने जो तान बताया है वह महावीरफे तत्वानके एक भागमें भा नाता है। इनका फ्पन ग्यास है, एकपक्षीय मदी। मारने कहा कि कुछ मशमें सएिका तस्बान इसमें मवश्य मा सकना , परन्तु यह मिश्र पचन है। हमारे समतानेको अहवास ऐसा बश्य हो सरला है परम् इमस इन सस्तोंमें कोई मपूर्णमा , ऐमी यात तो मही है। पर कोई पमरानयुक्त क्यन नहीं। विपफरनेपर समम्न सटिममें इसके मिाप पाई दमो वल सात करने पर कभी भी मिनबाठा नही । इस समपर्म प्रसंग माने पर सहम छोगोंमें पानीत आर मम्पस्थ पर्चा होगी तब समाधान होगा। उत्तरमें उन्होंने कहा कि इमा उररसे मुश यह ता निम्र कि बगदान पफ अमुत दर्शन है । भगीपूर्वक मान मुश मब तत्वा पुश माग करे इससे में यह पाक कर मनाई कि मदागर गुममेको पापे हुए पुग्प थे। इस प्रकार घोसीमा पातपात फरफे " "दिगमे पा पह पीनाम्प उग्होंने मुझे कहा । पा पाइनरे पभात् उन्होने बताया कि इन दागेके मामात्य मधमें ता पाई चमार Pिाई नही रती । उपम होना ना साना और भपता पी इन तीन शाा भय है । लमु भीमान् गणधरोने नो ऐमा उष्टेप किया कि इन सपनोंक गुम्मुम्मे भाग कर पाक मानिस शिप्पोको शरागीय आपा मन । याता पा। इसके लिए मैंने पुर पिार करफोगा मी, ना मुम मा माम हुआ कि पेमा ताना अममय पारि भपन माम माना मा महानिररान इममें भाग ममा मरमा म मधमें क्या भार पुउ परना मरेंगे। उप्पमा [लामोष भीम रामचन्द्र ८८ तत्वावपोष सत्तरमें मैन कहा कि इसमें तीन माहानोका मारतमे विसे हो गया है। ऐसा होनेपर में कोई सर्व वया महा प्रभावान् नहीं तो मो मेरा बितना सामाप म्ब पाँच सकेगा उतना पाँचाकर कुछ समापान र साँगा, यह मुछ समय प्रतीत होता है।तब उमाने का कि परिया समय तो यात्रिपदी गावर "मास्ति" चौर अस्ति"विचारसे गर्म | पा इस तय कि गाँधमा उत्पत्तिस्मोकि नही । नीपल्या म्पयरूप है। कि नहीं। बीच क्या प्रौम्परूप तो कि नहीं, इस तरा एक मार पटाये बौर दूसरी बार बीन क्या उत्पत्तिसप। सो कि । मात्र या म्पपस्प है। तो कहाँ । मात्र क्या प्रौश्यरूप है! तोकि हाँ ऐसे पाये । पे विचार समस्त मशहमें एकत्र करके योषित किये हैं। इस पर पपार्थ नहीं कर सकते तो ममेक प्रकारके दूपण वा सकते हैं । पति वस्तु म्पपस्म हो तो रूप मा हो माता-~-यह पारी है। यदि सत्पति म्पप और पता नही तो गारको किन प्रमाणोंसे सिय करोगे-पाएमा माका है। म्पप और हुक्ताका परस्पर विरोधाभास है-यह तीसरी पाका ।पार केसी उत्पपिमें जस्ति काना पसत्य हो वायगा-पापा विरोष । सत्यम भाको रूप यो वो उसे उत्पम किसने किया—मा पाँची शका वौर विरोव । इससे उसका पनारिफ्ना नाता यता - यह छठी शंका है। फेम म्पपनप है ऐसा कहो तो पापाक-मिप्रवचन मा पा सावर्षों दोप है। उत्पति बर मयल्प करोगे तो केस पाकिका सिति का गापेगा-पापाठयों पोप है। उत्पत्तिका ममाल म्यपका वमान और पुस्ताका जमाव पाकर फिर पीनाका वस्तिव काना-पे या दोष । स तय मिशकर सब बौदा दोष होते है। केस वा निकाल देनेपर तीके पचन सारित हो जाते है- फनामा दोष है। उत्पपिता नेपर कम्किी सिदिती से सर्प पचन सरित हो जाते है--पह सोमपों दोपहै। उत्पत्ति म्यपहफ्से पाप पुण्प वाटिका बमात्र मान तो धर्माधर्म सबन मेप ऐ जाता है -~पा सणे दोष। नत्पति म्पप और सामान्य स्पितिसे (केबरमाही ) त्रिगुणामा माया सिर होती है-बठायला दो। तत्पापमोप (८) इन कपोंके सिवन होनेपर इतने दोष माते । एक मैन मुनिने मुझे और मेरे मित्र-मरम्से ऐसा करा पा फिजैम समंगानय वर्ष है और इससे सब पाप सि होते है। इसमें मास्ति मस्तिका मगम्प मे समिपिए। कपन सुनकर हम सब पर वाम मिर पोगना करते करते इस सम्भिवायचे मीनपर पटापा । मैं समझता किस प्रकार नास्ति मस्तिके दोनों मात्र पारपर मही पा सकत । इससे सबिमाप मी माम्प हो पायेगे। फिर भी इस बारे मे कोई तिरस्कारको इसके उत्तर मेने कहा कि मापने से मास्ति और अस्ति भोगे जोपर पम्मेका विचार तत्त्वाम्योप] मोसमामा बा मिस किया है या सनिक्षेप शेटीसे मही, अर्थात् कभी इसमें एकांत पक्षका माण किया जा सकता है। वीर फिर मैं कोई स्पाशार शैलीका यथार्थ नानकर नहीं, मदमुविस रेशमात्र मानता है। नास्ति वस्ति मपको मी आपने पपार्य शैनीपूर्वक नहीं घटाया । इसठिये में तकसे जो उत्तर दे सकता ! उसे आप सुनें। उत्पतिमें " मास्ति" की बो योजना कोई बह इस तर यथार्थ ऐ सकता है कि 'जौन अनादि बनती"। म्यपमें " नास्ति' को गो योजना की और इस तर यपार्य हो सकती है कि "इसका किसी कामें नास नहीं होता। ध्रुवतामें "मास्ति'को बो योजना की है। इस तर यथार्थ हो सकता है कि "एक देश में पर सब पिये एनेबाठा महीं"। ००मस्याबपोष (०) उत्पतिमें "बस्ति" की गो पोजना की है यह इस तर यथार्थ हो सकती है कि जीवको मोक्ष होनेतक एक देहमसे मुक्त होकर वह दूसरी देहम उत्पम होता है"| म्पयमें "अस्ति"की जो योजना की है यह इस तर यथार्थ हो सकती है कि दोमसे माया सि प्पय प्राप्त जा, नया प्रतिक्षण इसकी खामिक ऋमि विषय आदि मरणसे रुकी है, इस प्रकार म्पम पटा सकते हैं। छपतामें "अम्नि" की नो पोजना की । मह इस तर मपार्थ हो सकती है कि " ब्रम्यकी मपेक्षासे गौर किसी कामें नाश नहीं होता, मा त्रिका सिद है। का इससे अर्पात् न मपेक्षामोंको प्यानमें रहनेसे मुमे आशानिये दोप रहो नायग। १जीब म्पपम्पसे नहीं है इसलिये घ्राम्प सिदामा यह पहल दोष दूर भा। २ उत्पपि, म्पप और धवता ये मिम मिम यायसे सिद्ध है अर्थात् जीसका सस्पल सिब एमा-पा सरे दोरका पहिार हुना। १ पौषको सप स्वमपसे शुषता मिस इससे म्पम मए माया तीसरे दोपका परिवार एजा। दम्पमासे गोषको उत्पत्ति असिना–पा चौथा दोप र एमा। ५ जीब बना सिद खा इसलिये तस्वचिसपी पाँचों दोय रमा। ६ उत्पत्ति प्रसिद्ध इसलिये क संपनी छोरोपका परिधर एमा । ७ ताके साप प्यय मेनेसे वापा नहीं जाती, इसडिये बाकि मिश्रमपन नामक सातों दोपका निराकरण एवा। ८ उत्पत्ति और म्पप पृषक् पृथक् देहमें सिद्ध हुए इससे केवल भाकि सित नामो मार दोपका पवित्र मा ।
भीम रामचन्द्र [सारण ११ शकाका परस्पर विरोरामास निकल गानेसे बौदा तकक सब दोष दूर हुए। १५ जनादि बनतता सिरोनेपर स्पासाम्स बपन सिम मा पर पदय गोषका निराकरम वा। ११ कक न सिम होनेपर मिन-पचनको सम्पता सिदई इससे सोममें दोपका निराकरण एमा। १७ धर्माधर्म, देह वारिक युमरवर्तन सिद्ध होनेसे सम्हा दोषका पयिार हुआ। १८ पे सर बातें सिा होनेपर मिणामक मापा पसिन होनेसे भठम्यारोप र हुला। ०१ तत्त्वावपोप (१०) मुझे माशा है कि भापके द्वारा विचार को हुई पोजनाका इससे समाधान मा होगा। या कुछ पयार्थ शेण नही पटाई, तो भी इसमें कुछ न कुछ विनोद माश्य मिस सकता है। इसके उपर मिशेप मिषन करनके लिए गुरु समपकी आमयकता इसलिये अधिक नहीं करता । परस्त एक तो समिम पात मासे करनी है, सो यदि यह समाषान ठीक ठीका हो तो उनको नामा में उनको बोरसे सतापमनक उत्तर मिण, और उनाने का कि एक दो वान यो भापको खानी ही उन सार्प कहो। पारमें मने अपनी पातको सीमित करके अम्बिके सबघकी बात कही। परिवार इस अभिके समौ शंका करें बमका से शरूप में तो इन पचनाक प्रति बन्पाप होता है। इसमें मपन्त उम्बर बामिकशक्ति गुम्गम्पता बार बैरम्यकी मानदयकता ।। बतक पह मही तबतक बिके विषयम का गना निश्चित है । परन्तु मुझे आशा है कि इस समप इस सांभमें से पाम् भने निरर्पक नही होंगे। ये किसे इस पोग्नाको नास्ति बस्विपर पाकर भी वैसे ही इसमें मी मात सूक्ष्म विचार करमेके हैं । दहमें एक पृषक् प्रषा उत्पत्ति, पान, विभाम गर्माधान पर्याप्ति, इन्द्रिय, सता काम महा बाबुष्य लिपप इत्पादि अनेक कर्मप्रतियोको प्रत्येक मेरसे नेपर भी विचार इस मधिसे निकलते है मपूर्ण है। वहाँतम निसका पान पहुँचता है पातक विचार करते है परम्ठ दम्पार्षिक मातापिंक नपसे समस्त सपिका काम इन तान शाम भा जाता है, उसका विचार कोई हो करते है पा मा सद्गुरुक मुसी पनि विरूपसे प्राप्त हो सकता है तो फिर इसमे सादगी कान क्यों नहीं । सकता ! मगरके करते ही मनुष्यको एक र एक मास एक गाँव एक या एक देश एकमा एक पृथिवी या सब छोरकर मसंख्यात शेप स्मादिसे मरपूर वस्तुओंत्र बान कसे हो जाता है। इसका कारण केवल इतना है कि म धम्की म्पापकताको समझे वाहै नपा इस क्ष इसकी वमुक म्पारकता पांचामा मिससे भगत क्षम्य पते पाइने यो मर्मको समन जाता है। इसी तय और सर सयात्र शिप मिपि गुस्से इन होम सम्दोको गम्पता प्राप्तकर रागी शान प्रश्न करत पे । इस प्रकार पनि पहता नेपर मी से देस्मेपर शम्प है।
पोष] मोसमासा ९२ तरवाषपोष याही नमतापके संबंध हैं। विस मम्पायके क्षत्रिय-पुत्रने जगत् अनादि । ऐसे मेचमक फहकर कर्णका उपाया होगा उस पुस्पन क्या इसे कुछ सहताके गुप्त भेदके विना किया होगा ! तया इनकी निर्मोपताक विषयमें जब बार परेंग तो निश्चयसे ऐसा विचार करेंगे कि ये परमेयर प । कता न था और नगर भनार पासो पसा उसने कहा । इनके निप्पश और केवल तस्त्रमय विपापर भाषको अवन्य मनन करना पोम्प है। जननिक अवर्णमादी न दशनको नहीं मानते इससे वे इसके साप जम्पाप परत है, वे ममन्यसे अधोगतिका प्रास होग। इसके बाद बहुतसी बावधीत हुई । प्रसग पाकर इस तलपर मिपार करनका बचन हकर में सहर्ष वहसि उठा। तस्थावबोधके सबममें यह कपन कहा । मनम्त भेसे मर हुए ५ नपविभार कामासे मितन जान मायें उतने मानने चाहिये, विसन प्रहण किये जा सकें ठवन प्राहण करने चाहिये, और नितम स्याम्प Pस दें उतन त्यागने चाहिये। इन तोंको नो यया मानता है, यह भमन्त चतुएपमे विराजमान होता , इसे सम्प समन्चना । इस नबतत्व के प्रमकार नाम रखनमें गीपका मोशसे निकतामा आधा अभिप्राय सधिप्त होता है। ९३ तस्याषयोप (१२) पह तो तुम्हारे पानमें है कि जीप मजीव इस क्रमस अन्तम मोक्षका नाम आता । अन इसे पके या पक रखमे मा वो बीच बार मोश नमसे आP भीर अतमें आयेंगे-- और, अर्माप पुण्य, पाप, धानब, सबर, निरा, पत्र, मोक्ष । मन पहिले कहा था कि इन नामोंके रमनेमें चार बार मोशी निकरतात, परम्तु यह निकटता ता नई किस्तु जीव भीर मारकी निकटता । पस्तुत ऐमा नही । मानमे ही ता इन दोनोसी निकटता । परन्तु वानसे जीव और मोक्षको निकटता , मस-- पुण्य पाप मम्मेष जीर नवतत्वचक्र nt सपर ८८ भीमद् रामान भब देसो, इन दोनामें कुछ निकटवा है । हो, निर्दिए निकटता बा गई है। परन्त म निफरता तो म्परूप्से है। अब भाक्से निकलवा माने तमी हरसिमित होगी । इम्प-निकटताका साधन सपरमात्मतत्त, सगुस्ताप, वौर समर्मतकको पापानकर प्रदान करना है । मात्र निफ्टता बार केवल एक ही रूप होनके पिहान, बोन और पारिन सावन रूप है। इस पासे यह भी माशका हो सकता है कि दोनों निकट है तो क्या बाकायको मादें। उत्तर में करता कि यह सम्पूर्णत्वास त्याग कर सकते हो तो त्याग दो स मोशहप होगाओगे । महो मा हेम इप और उपायका उपश प्रमाण कये, इससे मारम सिद्धि प्राप्त होगी। ०५ तस्वापपोप (१५) में कर गया प स बल जैनकुळमें जन्म पानेमागके लिप ही नहीं, किन्तु सबके लिये है। इसी तर पर मी न संदेश मानना कि मै बो करताप निप्पलपात और परमार्प मुरिसे कहता। मुझे तुमसे जो धर्मवच घना एर पक्षपात अपना सार्पबुदिसे कानका मेरा कुछ प्रपोगन नही। पापात अपना सार्यसे मैं तुम्हें बधर्मतत्वका उपदेश देकर अपोगतिको सिदि क्यों करें! मारमार में में निर्मपके बचनापतके लिये काता, उसका कारण यही कि मापत तत्व, परिपूर्ण है। मिनपरोक पेसा कई मी कारण न पा कि निसके निमित्तसे 4 सपा वपना पक्षपातपुत उपदेश देवे, तपा मे कानो मी न थे कि बिससे उनसे मृषा उपदेश दिपा बाता | पोम पोका करोगे कि ये महानी नहीं थे पर किस प्रमाणसे माश्म हो सकता है! तो इसके उत्तर में इसके पवित्र सिताके यम्पये मनन करनेको करवा । और एसा या करंगा र पुनः सा भी बार्शका नही करेगा । बनमतके प्रवर्तकोंफ प्रति मुखर्धा राग बुद्धि नहीं है, कि निसस पक्षपातपय मैं तुमें कुछ मी का , सौ तय कन्पमतके प्रवर्तककि प्रति मुझे कोई और पुलि ना कि मिया हो इनका संबन पई। दोनोमें में तो मदमप्ति मध्यस्थाप । मात गत मननस वीर मरी पुन गतिक पाँची महोतक विचार करनेसे मे बिनपपूर्वक करता Rो प्रम मम्पो । बैन दर्शनके समान एक मी पूर्ण और पवित्र दर्शन नहीं; पोतरागक समान एक भी देव महो। तैरकरके बनत तुमसे पार पाना हो तो इस सम दर्शनरूप परमका सेवन करो। ०५ तत्वापोप जैम दर्शन इतनी बभिक सूक्ष्म विचार संकलनामोसे भरा ाला दर्शन है किसमें प्रवेश कर मेम मी यात समप चाहिये । उपर उपग्से वपना किसी प्रविपीके करनेसे अमुक पतके सत्वमे बमिप्राय पना म्ना अपना बमिप्रम दे देना या विधिमोका करीम्प मही। वैसे कोई तव मा म मा हो उमय पण उपरसे समान माइम होता है। परन्तु जैसे मैसे बागे बाते जाते है से वैसे अधिक अधिक गारान माता जाता रिमी पर वो जल स्पाठ हो यता है। इसी तर जगतक सब धर्ममत एक तामा समान है उन्हें रुपरसे सामान्य जाट देसकर समान का तातोप] मोसमामा देमा उचित नहीं । ऐसे करनेवाठोंने तलको मी नहीं पाया । बनदर्शनक एक एक पवित्र सिदत ऐसे है कि उमपर विचार करनेमें आयु पूर्ण हो जाय तो भी पार न मिछे । अन्य सव धर्ममतोंक विचार मिनप्रणीस पहनामृत-सिंधुके आगे एक बिदुके समान मी नहीं । जिसने चैनमतको नाना और सेवन किपा, पकवल पौतरगा और सर्वह हो जाता है । इसके प्रवर्तक कैसे पवित्र पुस्प थे! इसके सित कसे मसंग, सम्पूर्ण धौर दयामय है । इसमें दूपण तो कोई है ही नहीं ! सर्वथा निर्दोष सो केबल जैन दर्शन है। ऐसा एक मी पारमार्थिक विषय नहीं कि वो जनदर्शनमें न हो, वीर ऐसा एक भी तत्व महीं कि जो मैनदर्शनमें न हो, एक निपयको बनत मेर्टोसे परिपूर्ण करनेवाला बैनदर्शन हो। इसके समान प्रयोजनमत सत्व अन्यत्र कही मी नहीं है। जैसे एक देहमें दो बारमाएँ नहीं होती उसी तय समस्त सरिमें दो जैन वर्षात् जैनके तुल्य दूसरा कोई दर्शन नहीं । ऐसा कहनेका कारण क्या ! केपर उसकी परिपूर्णता, गीतरागवा, सत्पता वौर मग हितैपिता । ९६ तस्यापपोष (१५) म्यायपूर्वक इतना तो मुझे मी मानना पाहिये कि मग एक दर्शनको परिपूर्ण करकर बात सिम करनी हो ता प्रतिपक्षको मप्पस्थदिसे मपूणता दिखानी चाहिये । परम्त म दोनों बातोपर विषम करने की पाँ जगह नहीं, तो भी योहा योगा करता आया है। मुख्परूपसे पही करना कि पा पात मिस रुचिकर माश्म न होती हो मयमा वप्तमन गती हो, उसे जनता शिानी शामोंको और बन्पताल-मिलामी शानोंको मप्यस्पबुनिस ममनकर न्यापके टिपर तोड़ना चाहिये। इसके स्परसे अवश्य इसना महा माप निकलेगा कि वो पहले की बाट कहा गया था पी सका। जगत् मेरियाषसान है। धर्मके मतमेसमधी शिक्षापाठमें जैसा कहा था मुकाए कि अनेक धर्ममतोंके गाल फैल गये हैं । विशुद भारमा तो कोई ही होता है । विमेकसे तलको सोच को ही करता है। इसशिप जमतलोंको अन्य दार्शनिक मेग क्यों नहीं जानते, यह बात सद भयमा बाधका करने पोम्य मही। फिर भी मुझे पात पापर्य भगताई कि काठपुर परमात्मतलको पाये हुए, सकलपणीत, मृपा करमका बिनके कोई निमित्त नहीं ऐसे पुरुषके कोए पवित्र दर्शनको स्वप तो जाना नहीं अपनी आत्माका हित तो किया मही परन्तु मदिवसे मतमेदमें पाकर सपा निपि भार पवित्र दर्शनको नास्तिक स्पों का परन्तु ऐसा करनेवाले नैनदर्शनक तत्वको मही मानते थे । तपा इसके तत्तको चाननेसे अफ्नो प्रदा गि गादेगी, तो फिर सोग मपन पहले कोइए मतको नहीं मानेंगे, मिस टौकिक मतक बाधारपर वपनी भागवित्र रिकोई है, ऐसे मेद भादिको महत्ता पटानेसे मफ्नौ । महत्ता पर लापगी; मफ्ना मिप्या स्थापित किया पुमा परमेश्वरपर नही भगा। इसलिये जनतस्वमें प्रवेश करमेकी रुचिको मूम्से ही वर करनके लिपे ताने लोगोंको एसी भाकर- पी दी कि अगदर्शन तो माम्तिक दर्शन ।।ग तो विचारे ररपोक मेके समान है इसलिमे थे विचार मी कासि करें। या करना कितना भूपा मार कनर्पकारको इस बातको रे ।
[मलाकर भीम रामचन्द्र पान सकते है मिन्होंने वीतरगप्रणात सिहत किसे जमे है। संभप है, मेरे इस नेको मावि गेग पक्षपात मान बैठे। ९७ तत्वावपोष पवित्र नदर्शनको मास्तिक करनेवाले एक मिम्या साम्से जीवना पारते है और यह है कि नैर्शन परमेश्वरको स जगत्का फर्ण नही मामता, वौर मो परमेयरको बगत्का मा मामता प तो नास्तिक हो इसप्रकारको मान सी ई मात मरिकननोको शीम को पता है, क्योंकि उनमें यथार्प विचार करनेकी प्रेरणा न होती । परन्तु यदि सके अरसे पर विचार किया बाप कि फिर बैनदर्शन जगतको बनादि वर्नत किस न्यायसे करता है। गत्कर्ण न मानमेव इसका क्या कारण है!स प्रकार एकके बाद एक भेदरूप विचार करनेसे वे बैनदर्शन पवित्रताको समान सकते है । परमेबरको जगत् रबमेको स्पा वामश्यकता पौ ! परमेभरने रगतको तो पुसतुभ मानेका क्या कारण था । पुससको रपकर फिर मौतको फिसरिये बनाया । पर सा उस किसको बतानी पी जगत्को रचा तो मिस कर्मसे रचा। उससे पहले रचनेको एम उसे क्यों न ई ईपर कौन है। अगदक पदार्थ क्या है। पर इम क्या है। नगदको रचा तो फिर ममें एक ही धर्मको प्रापि रखनी पी इस प्रकार भमणा शम्नेकी क्या जरूरत पौ! कहा- चित् पा मान है कि यह उस विचारेसे मत हो गई। होगी ! सैर क्षमा करते है परन्तु ऐसौ बालम कतासे वनिक सम्मादी उसे कासि सूची कि उसने अपनेको हो मम्से उसानेबारे मापौर जैसे पुरुषोको कम दिपा ! इनके को हुए दर्शनको जगत्में क्यों मौन रम्या ! सपने पैरपर अपने पसे पुन्हाका मारनेको उस स्पा वावश्यकता पी। एक तो मानो इस प्रकारके पचार, और कप दूसरे प्रकार के ये विचार कि मानके प्रवर्तकोंको क्या इससे कोई रोष था! पनि बगत्का की होता वो ऐसा करनेसे पा इनके गमको कोई पनि पचती पी! जगत्का का नहीं, जगत् मनाति मनत है। ऐसा करनेमे नको या कोई मापा मिल जाती पी! इस प्रकारके अमेक विचारोंपर विचार करनेसे माझ्म होगा कि जैसा बगत्का स्वरूप है। उसे पैसा । पवित्र पुम्मोंने कहा है। इसमें मिमस्मस कानको इनका शमात्र मी प्रयोजन न पा । सूझमसे सूक्ष्म अतुको रमाका बिसने विमान किया है एक रग-कणसे कर समस्त जगत्के विचार बिस्ने सब मेदासहित को है, ऐसे पुरुषों पवित्र दर्सनको नास्तिक करनेवाले किस गतिको पागे पाविचारमेसे दपा भाती है। १८ ताबाबमोप यो पापसे पय प्राप्त नहीं कर सकता र पाठेसे गाण देने माता सीता पवित्र मदर्शनके बर वत्तसिचोंका मय शंकराचार्य, वपानन्द म्यासी गैर मन म कर सके तो निरन मास्तिक सो पाकिसे सत्पन हमारे -ऐसा कामे मो । परन्तु पहाँ कोई प्रमरे कि महाराम महरिवन नास पौधेसे करें। इन शम्दोको काममें समय कि अपना - " समान मापसकता] मोसमासा उनको कोई पसरत नहीं होता परन्तु आप इस बातका उत्तर दे कि मैनदर्शन फेदसे किस वस्तुमें उतरता हुआ है, इसका बान, इसका उपदेश, इसका यस्य, और इसका सशीठ कैसा है उसे एक बार करें तो सही । आपके पेदके विचार किस बाबत मैनदर्शनसे कहकर इस तराचर मर्मस्पानपर आते हैं तो मौनके सिवाय उनके पास इसरा कोई साधन नहीं रहता । जिन स्पुरुपोंके वचनामृत -चौर योगके पसे इस सरिम सम्प, दया, तलहान मौर महाशीम उदय होते हैं, उन पुरुषोंकी वपेचा गो पुरुप गारमें रचे पचे परे हुए है, जो सामान्य तत्यानको भी नहीं मानते, भौर मिनका बाबर मी पूर्ण नहीं, उनें मकर काना, परमेघरके नामसे स्थापित करना, और सत्यस्वरूपकी निंदा करनी, परमात्मम्वरूपको पापे ओंको नास्तिक काना, ये सब बातें इनके कितने अधिक कर्मकी मालताको चित करता है। परन्तु जगत् मोहसे कम है, चाँ मतमेरे हाँ मेरा है। यहाँ ममल षषषा राग हो सस्य तत्व नही। ये बातें हमें क्यों न विचारनी चाहिये । मैं हमें निर्ममत्व बौर न्यायकी एक मुस्प बात करता है। यह यह है कि तुम पाहे किसी मी दर्शमको मामो; फिर जो कुछ मी तुम्हारी रमि मा पैसा जैनदर्शनको कहो।सब दर्शनोंक शाम-तत्वोंको देसो, तथा मैनतत्वोंको भी देसो । स्वतत्र नाम-पाकिसे मो योग्य माइम हो उसे वांकार करो। मेरे कहनेको मपका अन्य किसी दूसरेके करनेको म हो एकदम तुम न मानो परन्तु तत्वको विचारो। ९९ समाजकी आवश्यकता माम्म्देशवासियोंने संसारके बनेक फगकोशों में किस कारणसे लिमय प्राप्त की है। यह विचार करमेसे हमें तत्काल ए माम होगा कि उनका बहुत उत्साह वौर इस उत्साह में अनेकोंका मिर जाना ही उनकी समताका कारण है। कमकौशसके इस उत्साही काममें इन भनेक पुरुषों के शरा स्पापित समा गफ्षा समामको क्या परिणाम मिग तो उत्तरमें यही का पायगा कि मामी, कीर्ति और अधिकार । इनके इस उदारणके उपरसे इस जातिके कामकौशलको सोग करनेका मैं पहाँ उपदेश नहीं देता, परम्त सब भगवान्कय करा [मा गुम तत्त प्रम-स्थितिमें गा पा है, उसे प्रकाशित करनेके छिये तपा पूर्वाधापीक ये हुए महान् शाओंको एकत्र करनेके छिपे, पो गए गोक मतमतांतरको हटाने के लिये तथा धर्म-विपाको प्रक्षित करनेके सिपे साधरणी श्रीमान् और भीमान् दोनों को मिवार एक महान् समाजकी स्थापना करनेकी मापकता है यह करना चाहता ।। पवित्र स्पासादमवके कि हुए तत्वोंको प्रसिदिमें मानेन अपतक प्रपन मही होता तबसक शासमकी उमति मी नहीं होगी। संसारी कामकौशम्से मम्मी, कीर्ति वीर अधिकार मिलते है, इस पर्म-फलाकौराम्से तो सर्व सिम्मि प्राप्त होगी । महान् समाके अतर्गत उपसमानोंको स्थापित करना पाहिये । सम्प्रदायके बारेमें बैठे रनेकी अपेक्षा मतमतांतर कर ऐसा करना उचित है। मैं पाहता कि इस उदेस्पकी सिद्धि होकर क वर्ग मतमेर र हों; स्य वस्तुके उपर मनुष्प- समानका म्य भाले भीर मस्त र हो। १०० मनोनिप्रहके विप्न भारम्बार गो उफ्रेश किया गया है, उसमेंसे मुख्य शापर्प पही मिलता है कि मामाका परन्तु २४ भीमद पम्पन्न [AINT - गुणस्पानक किसने है। ठ-नौवह। प्र-ठमके माम चीये । ~१ मिप्यात्वगुणस्पानक। २ सास्वादन (सासादन) गुणस्थानक । ५ मिमगुणस्थानक | " भारतिमापारिगुणस्थानक । ५ देशविरतिगुणस्पानक । ९ प्रमपसंपवगुणस्थानक | ७ बमसंपत गुणम्यानक । ८ अपूर्वकरणगुणस्थानक । ९ वनिविबाहरगुणत्पाना । १० सूक्ष्मपियपगुणस्थानक । ११ उपश्यतमम्हगुणम्पानक । १२ क्षीणमोगुणम्पानक । १५ सपोगकेपीगुणत्पानक । १० प्रयोग रेशमगुणस्पानक। १०० पिपिप प्रक्ष प्र-केवसी तथा तीधार न दोनोम क्या मतर है! उ-केपली तया तीर्पकर धतिमें समान है, परन्तु तोर्पकरमे पहिले तीपर नामकर्मका संय किया है, इसठिये निशपम्पस बाय गुण और वनेक अतिशयोंके प्राप्त करते है। F-चीफर भूम घूम कर उपदेश क्यों देते हैं। तो बातरगा है। उ~-पूर्वमें महिए ताकर नामक वेदन करने के लिये उने समय ऐसा करना पावा है प्रभावका प्रचमिया शासन किसका। उमण मगवान मानीरा प्र--मा मालारसे पहले बैनदर्सन था। --, या प्र---उसे किराने उत्पम किया था। -उनके पहले वोपकाने । उसके बीर मारके उपदेशमें क्या कोई मिaut! ठ-सत्तरपिसे एक है। मिह मिभ पात्रको केकर उनका उपशहरोसे और उसकामे नेके कारण पामाप मनुप्पको मिमता नस माम्म होती है, परन्तु म्पापसे देख्नेपर उसमें को मिया नही। प्र-सका मुम्प फ्देश पारे। उ.--उनका उपेश य क मामाचा उदार करो, बामाको मत परियोंका प्रकार करो और से कर्महप बनत से मुक्त करे। प्र-पि उन्होंने कौनसे साधन बराये है। उ-पार मसे सदेष सरर्म और सहरका सलप बामना। सदेवका गुणगान करमा तीन प्रपरके धर्मका माचरण करना। और निर्णय गम्से धर्मधलाप समयमा ) प्र--तीन प्रकारका धर्म कौनसा है। 3 --सम्पमानरूप सम्पदर्शनरूम मीर सम्पचालिस्म । म विविध प्रम] मोसमाछा ५ १०५ विविष प्रम प्र—ऐसा मैनदर्शन यदि सोचम है तो सब जाल इसके उपदेशको क्यों महीं मानते। उ ---कर्मको बाहुल्यता, मिप्यावके जमे गए मम्से और समागमकेबमासे । प्र-बनदर्शनके मुनियोंका मुख्य बाधार क्या है ! ठ-पाच महात, दश प्रकारका यतिधर्म, सत्रह प्रकारका सयम, दस प्रकारका पैयाइन्य, नष प्रकारका प्रमचर्य, बाद प्रकारका तप, क्रोध नादि चार प्रकारको कपायोंका निग्रह, इमके सिवाय मान, दर्शम तथा पारिप्रका बायपन इस्पारि मनेक मेट है। प्र-मैन मुनियों के समान ही सम्पासियों के पाँच याम है। बौदपर्मक पाँच माशीक है, इसलिये इस भापारमें तो चैनमुनि, सन्यासी तया बीयमुनि एकसे । म ! उ-नहीं। प्रक्यों नहीं। ठ-नके पचयाम और पच महाशीठ अपूर्ण । नानिमें महारतके भेद प्रतिमेद गति सूक्ष्म हैं । पर दोनोंके स्थल है। म–सकी सूक्ष्मता दिखाने के लिये कोई पूर्णत दौमिये । उ - स्पष्ट है । पचयामी करमूर मादि ममप सावे है, मुस्खशप्पा सोसे है, विध प्रकारके बाहम और पुपोका उपभोग करते है केवळ शीतल पम्से अपना म्यहार पगते, पत्रिम मोनम करते है । इसमें होनेवाग नसत्पाता बीमोंका नाश, ब्रह्मचर्यका मग इत्यादिकी सूक्ष्मताको नहीं जानते । तया पौरमुनि मांस वादि समस्य वीर मुसशील साधनोंसे पुछ। नैन मुनि तो इनसे सपा विरकरें। १०६ विषिष प्रभ (५) वेद और चैन मिकी प्रतिपक्षता क्या पास्तविकी। उ-नदशनको इससे किसी विरोधी मापसे प्रतिपक्षता नहीं, परन्तु से सस्पका असन्य प्रतिपक्षी गिना जाता है, उसी तर मैनदर्शनके साथ देशका सबप है। प्र-इन दोनों बार किसे सत्य करते हैं! ठ-पमित्र बनदर्शनको । प्रदर्शनवासे बेदको सत्य बताते है, उसके विषपमें माफ्फा पा करना है। उ-यह तो मतभेद और जैनदर्शनक तिरस्कार करनेके लिये है, परन्तु भाप म्पापपूर्णक दोनोंक मूलतलोंका देखें। प्र-तना तो मुझे मी गवाह कि महापौर भारि निमसरका फयन म्यायके कोटेपर। परस्तु व जगत्क मचाका निपभ करते है, और नगतको मनादि अनंत करत र, इस विषयमें कुछ मुछ शका होती है कि यह अम्म्याव द्वारसमुद्रम मुक्त प्रगत् स्निा बनाये पहास भा गया ! प्र भीमर रामचन्द्र [स्मृतिम लाने गाम महापास उवार को और उदार करनेके सिप तयानका प्रकाश करो तथा सास्का सेवन करो। इसे प्राम करनेके छिपे गो गो मार्ग बताये गये सब मनोनिप्रहताके बापीन है। मनोनिता होने के लिये मम्मी परम्ता करना बहरी है। वास्ता करनेमें निमसिमित दोष विमरूप होते है १ माम्प १० अपनी पाई २ बनियमित निहा ११ मा वस्तुसे वानन्द इलिशेप बाहर १२ रसगारवल्लुम्पत्ता १ सम्मा प्राति १२ मतिमोग ५ मापाप्रपन १. सरेघ बनिए वाहमा बनियमित काम १५ कारण बिना सबप करना ७करणीय मिस १६ बातोंका स्नेह ८मान १७ पोम्प स्पम्में जाना . मावासे मधिक काम १८ एक मी उत्तम नियमका नहीं पासना सक्तक इन पठायपिसे मनका सबध । तबतक बठाय पापके स्थान षय नही गे । इन काय कि मप्ठ होनेसे मनोनिता और नमीप सिदि हो सकती है। जबतक इन दोपोंकी मनसे निकलता है तक कोई मी मनुष्प मारम-सिदि नही कर सकता । वति मोगके कद में केवल सामान्य मोग ही नही, परम्तु निसने सर्वया मोग-पग प्रतको धारण किया है, तथा निसके एपमें इममेस किसी मी दोपका ह न हो पा सत्पुरुप महान् भाम्पशायरी।। १०१ स्मृतिमें रम्बने योग्य महाबाप १ निपम एक तबसे इस बगका प्रवर्तक है। २ को मनुम्प सपुरोके परित्र यस्पको पाता है यह परमेसर हो जाता है। च: पिच स्व विपम सौका है। पोका मिअप और पोहोर साथ गति समागम ये दोनों समान हु सापक रें ५ समस्बमाके मिलनेको बानी भोग एकात करते ५न्द्रियों में बीते और तम पुस मानो इसकी अपेक्षा तुम इनियों के बीतनेसे ही मुस मानद वीर परमपर प्रास करेंगे। ७ राम विना ससार प्रो और ससार दिना राग नहीं। ८ सुपारस्पाका स सगका परिपाग परमपको देखा है। ९ उतरतुरे विचार पाँगो किबो बस्तु मन्त्रिपसरूम है। १० गुनियो गुणोंमें बमुरत होवो । १०२ विविध प्रभ भाग में में पतसे प्रलोको निर्णय प्रवचन मनुसार उपर देमके किप प्रज्वा । म कहिये धर्मको क्यों मापाता है।
पिपिच प्रम] मोसमामा प्र ग्र -मनाटिकारसे भास्माके कर्म-बाय दूर करनेके सिपे । प्र-गाय पाहम अपना कर्म! उ-दोनों अनादि है। यदि नीर पाये थे तो इस विमल बस्तुको मस सगने का कोई निमित्त पाहिये । यदि कर्मको पास करो तो मीवके भिमा कर्म किया किसने ! इस म्पायमे दोनों अनादि हैं। प्राय नमी है मपया वरूपी। उ --सपा मारे और जरूपी मी है। प्रहपी किस म्यायसे वौर परपी किस म्यापसे, यह कीये। ठ-दहके निमित्तसे सपी वीर वपन सम्पसे अमपी है। प्र-देह निमित किस कारणसे है। उ.-अपने कमीक विपाक्से । -फोकी मुख्य प्रतियाँ कितनी । ठाठ। -कौन काम। उझानावरणाप, दर्शनावरणीय, मेदनीप, मोहमीय, वाय, नाम, गोत्र वीर अतराय । प्र--न बाठों कमका सामान्यस्वरूप को। जारमाको बानषी बनत शालिके बाछादन हो नानको छानावरणीप करते है। मारमाको मनत दर्शन प्राधिक वापसदन हो जानेको दर्शनावरणीय करते हैं। देहके निमित्से साता, बसाता दो प्रकारके वेदनीय कसि ममामाघ मुखम्प बामाकी शक्केि रुके हनेको वेदीप करते मात्मचारित्ररूम शक्तिके रके बनेको मोहनीय करते हैं। ममप स्पिति गुणके रो गनेको बामुकर्म प्रते।भमसिम्परम्पराधिक रुके एनेको मामकर्म करते हैं। भटा भवगाहनाथप भास्मिक प्रतिक के बनेको गोकर्म कहते है। वनत दान, काम, बर्पि, भोग और उपभोग शापिक के रानेको मतराप करते हैं। १०३ पिविष प्रभ (२) प्रन ककि स्य होनेसे बारमा का नाती है। ट-अनंत वार शायव मोघमें । प्र-क्या इस बामाको कमी मोशो! नही। क्यों। -मोश-पास वात्मा कर्म मम्से रहित है, इसलिये इसच पुनर्मग्म नहीं होता। प्र केवपके स्पा सण! ४-चार पनपाती कमांध क्षय करके और पप पार कर्माको कश करके जो पुस्प योगा गुणस्पानकारती होकर विहार करते है, केसी। 7- श्रीमद् रामचन्द्र [मिति प्र-गुमस्पानका कितने । ---चौर। प्र-उन माम कहिये। उ~१ मिप्यालगुणस्थानक । २ सलाइन (सासान) गुणस्पानका १ मिमगुणस्पामक | १ भारविमम्पाणिगुण पानक । ५ देशनिरतिगुणस्पानक | ६ प्रमत्सपवगुणत्यानक । ७ भामजसपर गुणम्पानक । ८ वर्णकरणगुणस्यानक । ९पनिाविबादरगुणस्पानक । १ सूक्ष्मसापरम्पगुमपानक । ११ उपशवमोगुणम्पानक । १२ माममोगुणस्पानक । १५ स्पोगकेवीगुणस्पानक । १० भाग केवगुणस्थानक । १० पिपिप मम प्र-के तपा तोपर इन दोनों क्या बतर है। ठ देव तथा तीर्थकर शालि समान है परन्तु तीर्थकरने पहिले ताकर नामकर्मा पंप किया है, इसलिये वे निरापरपसे बारा गुण और वनेक अतिशयोको प्रस करते है। प्रतीकर घूम घूम कर उपदेश क्यों देते हैं। वो बोवरगा है। उ --पूमि पनि र तापकर नामकर्मके येम करने के लिये उने माप रेसा करना पाता है। प्रामकस प्रचलित शासन किसका है। उमण मगवान् महावीरका । प्र-क्पा महावीरसे पहले बैनान था। प्र-उसे किसने उत्पम मिा पा। र उनके पाठेके तापमाने। प्र--उनके और ममापार के उपरेशमें क्या कोई मिमता। -तलरिसे एक ही है। मिम मिम पात्रो मेकर उनका उपयोनसे और कुछ काम्मे होने के कारण समाम्प मनुष्पको मिमता माप माश्म होती है, परन्तु म्पापसे देने पर उसमें करें मिना नही। मनका मुम्प उपरेप पारे। उ ---उनका उपदेश RR नामाका उभार करो, मामाघ मत एकिपोंका प्रकाश कर और इसमन्प मर्मत से मुक्त करो। प्रनके लिये होने से सावन तापेरें! 1-पार मपसे सदेव सर्म और सदाका सहप गामना, सपा गुणगान करना तीन प्रकार के पर्मन भाचरण करमा और निधि गुरु पर्मन सकप समाना। म तीन प्रकारका धर्म नसा है। व-सम्मानम्प, समादर्शनमप भीर सम्पचारिशहर ।
मक प्रम] मोसमाठा я . १०५ विविध प्रभ (१) -ऐसा जैनदर्शन पनि सर्वोतम है तो सब जीव इसके उपदेशको क्यों नहीं मानते। -कर्मको पारस्पत्तासे, मिप्पावके ममे हुए मम्से और ससमागमके अमापसे । प्र--नदर्शनके मुनियों का मुख्य बाचार क्या है! उपाँच महात, दा प्रकारका यतिधर्म, सत्र प्रकारका सयम, दस प्रकारका पाइम्प, गव प्रकारका प्रमपर्य, बार प्रकारका तप, कोष आदि चार प्रकारको कपायोंका निव, इनके सिमाप बाम, दर्शन तथा चारित्रका बाराघम स्पादि मनेक भेद है। प्र-चैन मुनियों के समान ही सम्पासियों के पाँच याम है। गौवधर्मके पाच महाशील है, इसलिये इस बापारमें तो बैनमुनि, म्यासी तथा पौरमुनि एकसे है न । -नहीं। प्र–क्यों नहीं। ठ-नके पंपयाम वौर पर महापास अपूर्ण है। मैनदर्शनमें महासके मेद प्रतिमेद पति सूक्ष्म है । पहले दोनोंके स्पष्ट हैं। प्र-सकी सूस्मता दिसानेके मिये कोई पत दीनिये । उ - स्पर है । पचयामी कर छ वादि ममात्य साते है, मुराशप्पासोते है। निविष प्रकार के माहन और पुप्पोंका उपभोग करते है, केवल शीतल नम्से अपना म्पसार पलाते । रात्रिमें मोबन करते हैं । इसमें होनेवाग असंख्यातों गायोंका नाश, प्रमचर्यका मग इत्यानिकी सूक्ष्मताको में नहीं मानते । तया बोरमनि मास बादि समय और पुप्तशाल साधनोंसे युक्त है। जैन मुनि तो इनसे सपा विरक है। १०५ पिविष प्रम प्रद और चैनदर्शनका प्रतिपक्षता क्या वास्तविको। उ -भैनदर्शनकी ससे किसी विरोपी मानसे प्रतिपक्षता नहीं, पम्तु जैसे सायका मम्म प्रतिपक्षी गिमा जाता है, उसी तरह नैनार्धनके साप मेदका सबध है। प्र-इन दोनों में पाप किसे सत्य करते है! पमित्र नदर्शमको। वेद दर्शनबासे बेदको सय बताते है, उसके विषयमें बापका क्या करमा है। उ-या तो मवमेव वौर पैनदर्शनके तिरस्कार करनेके लिये है परन्तु भाप न्यायपूर्वक दोनोंके मूल्यों को देखें। प्र-तना तो मुझे मी धाता है कि महापौर वादि विमेघरका कपन न्यायके पर । परन्तु ये जगत्के कर्ताका निपध करते है, और जगत्को जनादि वर्नत करते है, इस विषयमें कुछ कुम का होता है कि यह भरण्यात फ्समुद्रसे मुक्त नगर निमा बनाये कासे ना गया ! म
भीम पत्र
[भिनेर माला
उनमें जबतक वामाननत शफिकी शमर भी दिम्प प्रसादी मही मिन्वी तमावक ऐसा
भगा करता हैपर तत्काल होनेपर ऐसा महेगा । समतिम वादि प्रपोका भार अनुमण
नरेंगे तो पाका र पायेगी।
प्र--परन्तु समर्प शान् अपनी मृपा बातको मी त वारिसे सिखातपूर्ण सिर कर देते है,
इसलिये यह सरित नहीं हो सकता परन्तु इसे सस्प कैसे कर सकते है।
3-परस्त ने पूरा करनेका पुस मी प्रपोजन म पा, पौर घोड़ी दरक लिये एसा मान
भी में कि हमें ऐसी का किया कमन मृपा होगा, तो फिर जगतकानि ऐसे पुरुपको बम्म
भी स्पों मिया ! ऐसे नाम मानवाल पुत्रको जन्म देने उसे क्या मारत पीपा पे पुस्प तो सपा
ये बगतमा कता सिद्ध होता तो ऐसे करनेसे उमको फुय हानि न पी ।
१०७ सिमेम्बरकी पाणी
बोनंत बनत मासे से भरी हुई है, बस कमत मम निक्षेपोंस जिसकी पात्या की गई
1 यो सम्पूर्ण जगतको दित करनेवामी है, यो मोरको हानेपाही है, संसार-समुद्रसे पार करनेवाली
है जो मोमें पचानेपाम है मिसे उपमा देनेकी म रसना भी म्पर्प है, जिसे उपमा
देमा मानों सपनो युरिष दो माप दे देना है ऐसा मैं मानता। वो रापचय | इस पातको
बास-मनुप्प भ्यानमें मही छावे कि एसी स्नेिबरको वाणीको विरसे ही जानते है॥१॥
१०८ पूर्णमालिका मंगल
जो तप और प्यानत रसिप होता है और उनकी सिर करके गो सोमापसे चोमित होगा।
मा महामगकी पदवी प्राप्त करता है नाँ पशुपको प्रणाम करके किये जाता है।
वत्पपात्र सिविधायक नित्य गुरु मना पूर्ण पापाता लय शुक्रका स्थान प्रण करता ।
उस दशा में तीनों योग मंद पर बाते हैं, और नामा ससप सिदिमे लिधरती हा विशाम लेता है।
बिवलीबाणी
मनार
अनंत बनवमरमरी मेली मी बन ममत नब मामानी
जबावरी हामी मार बरिया मवाद चारवी समापी
उपयमाणानी ने वरीपर्व मापनापी बिमी मार्च में मानी।
मोमिनपामा मर्च पता ए, निधी पापी बाली गनी
१०८ पूर्णमासिका मगर
उसी
स्पेयमाने सि पर एसपने मन
मान हे मंधा परि पाम मार पीएमाला ॥१॥
निबाम गुपतिमा सो समर्माता
किसान पामर पामे लापारी मिामे ॥ २॥
वापा . भावनायोध उपोदात सपा मुख किसमें है। चाहे से तुम विषयमें प्रवेश होमेपर मी उम्म मामाजको सामा- रिक अमिपि पैराग्यमें ला पानेको बोर या करती है। पाप रपिसे अबतक उम्बा मारमा संसारके मायाम्प प्रपच मी ईसाई देता तबतक इस कपनका सिद होना शायद कठिन है, वो मी सूक्ष्म रिसे अवगेकन करनेपर इस कपनका प्रमाण पात वासामासे मिठ गाता है, इसमें सोमही। सुम्मसे सूक्ष्म असे छेकर मोन्मत हापौ तक सब प्राणियों, मनुम्पों, और देव- दाममों आदि सबकी सामाविक हा सस गौर बानद प्राप्त करनेकी है, इस कारण वे इसकी प्राप्तिके उपोगमें को रते है, परम्त उन्हें रोक-युतिके उदपके बिना उसमें भ्रम घेता है। संसारमें माना प्रकारके मुसका बाराप कर मेते है । गहरा अवलोकन करनेसे यह सिर होता है कि यह । इस बारोपका उड़ा देनेवाले दिरहे मनुष्य अपन विवेकके प्रकाशक र मात इनके अतिरिक्त अन्य विषयों को प्राप्त करने के लिये करते पाये है। नो मुख मयसे युक्त है, पुस मस नहीं परन्तु पुस । निस बस्तुके प्राप्त करनमें महातार, बिस पस्तुके मोग में इससे मी विशेष सताप समिविए तथा परिमाममें महाताप, बनत शोक, और मर्मत मय छिमेर ३, उस पस्तुका मस फेरस नामका असो अथवा बिउकुस है ही नहीं । इस कारण विषको छोग उसमें अनुराग मही करते । ससारक प्रत्येक मुससे सपन गयर होनेपर सप तापानको प्रसारी प्राप्त होनेके कारण उसका त्याग करके योगमें परमानंद मानकर महरि सस्य मनोपारतासे अम्य पामर बहमानोंको उपरेशाते है मांग रोगमय इस पविभप रिचे नृपासानप माने दैन्पमपं बसे रिपुमर्य स्प तरुम्पा मय । साखे बादमपं गुण खसमय काप क्लातार्य सर्व पक्ष मयापित सपि नृणां पराम्पमेयामयं ॥१॥ मापा-मागमें राम मय है, पुर्णमयमें प्रयुक्त होनका मप है, सम्मान प्रमाका भय है, मानमें दानवाका भय , वो शत्रुताका भय है, ममें चीन मप है, शाबमें बादका मप , गुणमें एक भप र, और कापामे फाडका भय है। इस प्रकार सब बस्नु भपसे पुट केवल एक रम्य ही मपररित t!
भीमद पसत्र [उपमान महापोगो महरिका मा पन सरिमाम्य बर्थात् समस्त उम्मळ पाहमानोंको सदैव मान्य रसमे पोप है। इसमें सम त वयाना दोहन करने के लिये होने सह तलवेत्तामा सिमातका पास भीर संसR शोकके स्वानुमका सेका सा चित्र सीप Pया है। सोने मिन बिन बस्तुमोपर भपकी भपा दिये सब मस्तुयें संसारमें मुस्पलपसे मुसरूप मानी गई है। संसारको सर्वोत्तम निधि नो मोग है, तो रोगोंके धाम ठहरे; मनुष्य उभे कुलासे पुस माननेवासा है, यहाँ पुत होनेका भप दिखाया ससार परमें म्यभारका ठाठ चमनेमें गो दरस्वरूप सामी, राना इत्पारिक भयसे मरपूर है किसी मा पम्पहारा यतिसे मान प्राप्त करना अपना मानना ऐसी संसारफे पाम बोध बमिया रहा करती , इसमें मादौनता वीर सपनेका मम । यस पराक्रमसे मी (सी प्रकारको उरएता प्राप्त करनेकी चार हा करती है उसमें शानुन भय रहाआ है, हम-काति भोगीको मोदिनानाप है, उसमें माप-कति धारण करमवासी वियों निरतर भयम्स है वनेक प्रकारको गुरिपोंस भरपूर शाब नामें बिका भय रहता है। किसी भी सांसारिक सुख्के गुण प्राप्त करन्से मो वानद माना नाता पसरा मनुप्पोच्च निके कारण मयभिती जो अनंत प्यारी सगती है ऐसी पर काया भी कभी न कभी कामापी सिंहके मुम्भमें पानेके भपसे पूर्ण है । इस प्रकार संसारके मनोहर किन्तु अपम मुस-साधम भपस मरे हुए ह । विसे विचार करनेपर माँ भय । का केस शोक हो । यहाँ शाक माँ मुसका अमाचा बार यहाँ मुखका ममार है तिरस्कार करना उचित हो। बको योगीन्द्र महरि हो ऐसा कर गये । यह मात नहीं । माफ अनुसार परिक निर्माणके समयसकर मरिसे उत्तम महरिके समान और महरिसे कनिष्ठ कोटिके बस्टस तत्याना हो गये है। ऐसा कोई काम अथवा भारिश नहीं त्रिसमें तत्मानियोंकी बिलकुल मी उत्पति नईहो । इन तत्तवामोंने ससार-सुसकी हरेक सामाको शोक्लप बताई है। या उनके भगार दिनकका परिणाम है। प्यास माम्माकि, शंकर गौतम पावनति कपिल, वौर पुवराज शुशयनने अपने प्रवचमा मार्मिक गतिसे और सामाम्प रातिसे जो उपरेश किया है, उसका बस नचिके शमें कुछ कुछ बा जताई महो प्राणियों ! ससाररूपी समुद्र बना और अपार है। इसका पार पानके लिये पुस्पार्यका उपयोग करो! उपयोग करो। इस प्रकारका उपदेश देनमें इनका व समस्त प्राणिपोको शोकसे मुक्त करमका पा । इन सब बनियो पेशा परम माप रखने योग्य सर्व महापौरका उपदेश सर्वत्र पहा कि संसार एकांत और भनेव शाकस्म तपा दुसर। महा! मम्य लोगो ! इममें मपुर मोदिनाको प्राप्त न होकर इससे नारोमो निच होभो !! म्हारक्य एक समपड़े किस भी संसारका उपदेशना।होने अपने समस्त उपदेशोंमे यही मतामा है और यही अपने भाषरण सिरमौर Pाया है। कान वर्णही झापा, पशो- मती मी रामा भनुम सामाग्पम्मी भार प्रतापी बबन परिवारमा समा होमेपर मौ उनका ठपोवास ] माबमाबाप - मोह त्यागकर और मान-नि-पोगमें परायण होकर इन्होंने चो भासता दिसलापी है, वह भनुपम है। इसी बस्यका प्रकाश करते हुए पवित्र उत्तराप्पयनसूत्रके बाठो मध्ययनकी पाली गाया तत्वाभिलापी फपिल केवठी मुसकमन्स सहागीरने लाया है कि अधुपे भसासर्पमि ससारमि दुपस्सपठराए। किं माम हुस कम्म जेणार दुग्गः न गरिछना ॥१॥ मान और मरासत ससारमें अनेक प्रकारके दुस है। मैं ऐसी कौनसा करणी कार्कि मिस करणीसे दुर्गतिमें न नाउँ!" इस गाथामें इस भावसे प्रभ होनेपर कपिल मुनि फिर आगे उपश दते हैं। मधुरे मसासयमि"-प्रतिमुक्त योगीश्वरके पे महान् तत्वज्ञान के प्रसाशीभूत पपन सतत हो पैरम्यमें से जानेवाले हैं। बति बुद्धिशालीको संसार मी उत्तम ससे मानता है फिर मा ये बुदिशासी संसारका त्याग कर देते है। यह तत्त्वज्ञानका प्रशसनीय पमस्कार ।।ये अस्यम्त मेपाली मतमें पुस्पार्यको स्फुरणाकर महायोगका सामनकर मारमा तिमिर-पटको दूर करते है। ससारको मोकारिष कानेमें तत्तानियोंकी भ्रमणा नहीं है, परन्तु ये ममी तत्वज्ञानी की तत्वज्ञान पदको सोसा कामोंसे पूर्ण नही हुआ करते इसी कारणसे सर्व महावीर के वचनोंसे तत्वानके लिये यो प्रमाण मिलता या महान् त, सर्वमान्य पोर सर्मपा मगठमय है। महावीरके समान रुपमय बाद जो नो भौर सह तीर्थकर हुए है उनाने मी निराहतासे उपदेश देकर जगदहितपकी एपी प्राप्त की है। संसारमें जो केवल और मनत भरपूर तारी, ताप तीन प्रकारके -आधि, म्याभि नौर उपानि । इनसे मुक होनेका उपरेश प्रत्येक तसवाना करते बाये है । संसार-याग, शम, दम, दया, शाति, क्षमा, पति भप्रमुख, गुरुमनका मिनय, निक, निस्पाहता ब्रमचर्य, सम्यकल और बान इनका सवम फरमा कोर, पोम, मान, माया, अनुराग, अप्रति, विषय, हिंसा, शाफ, भवान, मिष्पाप इन समका त्याग करना यह सब नोंका सामान्य गतिस सार है। मारेक दो परणोंमें इस सारका समावेश हो जाता है मम ममा मीति समा, परी परापकार बरे ! यह उपपा स्तुनि पोम्प है। पा उपदेश देने में किसीने किसी प्रकारको भौर किसाने किसी प्रकारको विचक्षणवा दिमाई । ये सब स्थूम रश्सेि का समय दिखाई देते हैं, परन्तु मूराम रिसे विचार करनेपर उपक सपमें सिदार्प जाके पुत्र भ्रमण मगवान् परिवे नम्बर पाते है। नितिक छिये मिन बिन विषपोको पहले पार उन उन सिपयोंग पास्तविक सम्प समसार संपूर्ण मगउमप उप फरने में ये रामपुप्र सरमे आगे पर गये हैं। इसके उिपे मे अनंत पम्पबादके पात्र है। इन सम पिपपोका भनुसरण परमेका क्या प्रयोगम आर क्या परिणाम हा इस निणप करे । सर उपशफ यह कहते भाये है कि इसका परिणाम मुकि प्राप करना है और इमरय प्रपारन दुगको निति है। इसी कारण सरनामें साम्पर पस मुनिको अनुपम श्रेट महा।सूभाग नामा दिलीप अंगके प्रपम भुवम्फरसे डो मग्यपनको बीबीसरी गाथाके वासरे पाणः कसा गया कि- - भीम पवाद [प्रस्य पर निमाणसा मा सम्मभम्मा सप पनि मुनिको श्रेष्ठ प्रार सश कि मुलि ठसे कहते है कि संसार-शो से मुफ हाना, और परिणामम बार दम बादि वनुपम बस्तुमोको प्राप्त करना । शिपमें परम एस बीर परमानाका बना मिरम्स है, मन्म-मरणको निम्मनाका जमात है, शोक और दुमका मम स स बिनबुछ विषयका पिन किसीप प्रसंगपर करेंगे। पर भी निर्विवाद मानना चाहिये कि उस अनंत पोक और बनत दुसको मिति हा सांसारिक विपोंसे नही होगी। से भिरसे भिरका दाग महीनाता, परन्तु मा दाग बम्से दूर हो जाता है इसी तय शृंगारसे नफ्या गारमिभित धर्मसे संसारको मिछि नहीं होती। इसके लिये तो परम्प-यम्को भानपकता नि सशम सिद्ध होता है और इसस्थ्येि मातरम्गके अपोंमें मनुरक होना उचित है। कमसे कम इससे सिपमापी विपका जम्म नही होता । म यहाँ मुकिमा कारण हो माता हैमनुप्प ! इन पातराग के पचनोको हक-दिसे मरण, मनन गोर निविपासन करके वास्माको उम्मए कर ! मपम दर्शन मरम्पको बार बारमहितपी विस्पोको पता होने किसे बाण मारनामोंका तलमानिने उपदेश पारे- १ बनिस्पमावना: शरीर ममा, कुटुमा परिवार बादि सब किनाशक है । जीका के मूलमर्म ही पग्निाची। ऐसा चिंतन परमा पाणे बनिस्पमानना है। २ शरणमाना -संसारमें मरमके समय पीपको शरण रखनेवाम कोई मही, केवल एक प्रम पर्म की हो भरण म्प है, ऐसा चितवन करना दूसरी बारगमाना है। । संसारमानना नस बारमाने ससार-समुदमे पर्यटन करते हुए सब पोनियों में सन्म लिया है, इस सप्ताररूपी गंगरसे मैं का झंगा। यह संसार मा मही मैं मोहमयो , इस प्रकार तिन करना तो सारमावना है। १ एकरलमाना - मेरो बारमा बसा है याबी हो जाती है, और मोम जापगी, और अपने किराए कोको बकेगो मोगेगी इस प्रकार अंतरमसे बितया काना पायो एकालमाना। इस संसारमें कोई किसका नही ऐसा AIR करमा मम्पलमापना। ५ कानिमामा - पा शरीर अपवित्र है मन्त्रको पान । ऐग मोर जरामा निमासम्मान है। इस पारीरसे में म्प पर बिन रना बधुचिमाना है। • मानमाना, देष, मान, मिप्याल स्पादि सब मायके कारण इस प्रकार म करना सातवी बावभावना है। ५मन्यामाना- मनिस्वमाना] भावनाघोष १०१ ८सारमापना म्यानमें प्राच होकर नीष नये कर्म नहीं बाँधता, यह माठवीं परमारमा है। ० निरामानना -पानसहित क्रिया करनी निराका कारण है, ऐसा चिमन करना नारी नरामापना। १० गोकस्वरूपमावना --बौदा गम् सोकके रखरूपका विचार करना लोकम्मरूपमाषनाह। ११ वोविदुरीममावना – संसारमें भमण करते हुए भारमाको सम्पदानको प्रसादी प्राप्त होना बसि कठिन है। और यदि सम्पमानकी माति मी हुई तो पारिप्र--सर्वविरतिपरिणामस्प धर्म-का पाना तो अत्यत ही कठिन है, ऐसा पिंतपन करना मा ग्यायवीं वोधिदुर्सममावना है। १२ धर्मदुमभावना --धर्मके उपदेशक तथा गुर शालके बोधक गुरु और इनके मुझसे उपोशका प्रण मिडना दुर्गम है, ऐसा चितवन करना बायीं धर्मदुर्गमभावना है। इस प्रकार मुछि प्राप्त करमेके म्येि निस बैरम्पको भानश्यकता है, उस सपको स करने पाणी बाय भावनामोमेंस कुछ भावनामोंका इस दर्शनके भतर्गत वर्णन करेंगे । उ माग्नाको अमुक लिपपमें बाँट दी है और कुछ मावनामक सिप मन्य प्रसंगको आश्यकता , इस कारण उनका यही विस्तार नहीं किया । प्रथम चित्र भनित्पमापना उपगति विपुलमी प्रमुता पलंग, नायुप्य तो चम्मा वरग पुरंदरी चाप नगरग शु चिये स्पा क्षणनो प्रसग विसपार्थ:--मी नियमके समान है। मिस प्रकार बियोकी चमक उत्पम हराकर तत्क्षण ही एप से जाती है, उमा तय ममी भाकर चर्ग पाती है। अधिकार पतंगके रंगके समान है। मिस प्रकार पत्गका रंग पार शिनको बारमा है, उसी तय अधिकार के पारे काठ तक यकर हापसे माता यता है। बायु पानीका विगेरके समान है। असे पानाको हिगरें इसर कई और उपर निकल गई उसी तय भन्म पाया और एक देहमें यने पाया अपना नहीं, इतने में हो सरी दहमें गागा पाता है। काममोग माकाशके विपनुपके समान है। जैसे श्यपनुप पर्पाकाममें उत्पम होकर क्षणमरमें तय हो जाता है उसी प्रकार यौनमें कामनाले विकार फीमूत होकर मुरापेमें नए हो जाते है । सक्षेपमें, हे बीष ! इन सब पस्तुषोंका सबप क्षणमरका है। इसमें प्रेम धनकी सौकससे एकर पन क्या होना । तापर्य यह है कि ये सब पर और रिनाक है, ममी और अमिनाशी, ससिये अपने बैंसी निस्य बस्तुको प्रसार । मिम्बारीका मेष (देशो मोशमान पृष्ठ १३-१५, पाठ ११-१२) भीमद् पम्पन्न [समयमा प्रमामरिया --निस प्रघर उस मिम्बारन मप्नमें सुम्म-ममुताप देम, उनका मोग किया बार उनमें भाना माना उसी तरह पामर प्रश्मी ससारके सनक समान सुख-समुदायको महा जानइनप मान टेहै । पिस प्रकार निमारको रे मन-समुदाप गागनपर मिम्पा मारम हुए थे, उसी तय तानपी जागृतिसे ससरके मुन मिप्पा माम्म होते है। जिस प्रकार सनके मोगोंको म संगमेपर मौ उस मिसारीको शासकी प्राप्ति उसी तय पामर भम्प समारमें अन्न मान बैठते हैं, कर उन्हें भोगे मोंके समान गिनते हैं, पर उस मिवारीका -सद ये बतौ बेर, पपाचर, और मनोगति पाते हैं। बसे मसकी एक मी तुमय नहीं उसी तर ससारकी एक मी बस्तु सप्प नाह)। दोनों ही पपस वोर शाकमम है, ऐसा विचारकर बुद्धिमान् पुरुप माम- कम्पाणको सोन करते है। द्वितीय चित्र अशरणमायना उपाति सपनो धर्म सुशर्म वामी, भापम्प भारम्प प्रभाष आणी बनाप एकात समाप पाशे, एना मिना कोई म बाप हाये । विशेपार्य - पतन ! सा प्रिनेपरदेषके शरा निस्पृहतासे उपरेश किये ए धर्मको उत्तम कारणम्म मानकर मन, वचन और काम्पाके प्रमावसे उसका वागमन कर भारापना कर! केका मनापस्म है उससे सनाप लेगा । इसके लिना भवान्बीके भमण करनेमें वेरी बोह पकानेवाला कोई माही। भो भामा संसारफे मापामय मुसको अपना आदर्शनको शरणम्प मानती है, वे ममोगतिको पाता है और सदेव अनाय पी। ऐसा उपदेश करनेवाले मगवान् मनापामुनिके परित्रको प्रारंभ करते हैं, इससे माप माना होगी। भमापीमुनि (हेमा मोक्षमाम प्रष्ठ १३-१५, पर ५-६-७) . प्रमाशिषा-बो मम्या | महातपोवन, महामुनि, महान् महायशवंत महानिर्मप और महामन्त मनापी मुनिम मायदेशाके रामाये अपने बीते पुए चरिबसे जो उश Pया या सप मुची मारण मावना सिद्ध करता है। महामुनि मनाया तारा सहम यह नाके समान बना इससे मी मस्यन्त विशेष बसम को अनंत भामा सामान्य प्रपिस भोगता ईस पाता है, इनके संपमें तुम कुछ विचार करो । ससाग्में पापीईजनत मारणताका स्पार सम्म धरणरूप उत्तम तत्मान और परम सुशडका सेक्न करा। काम दो मुचिका घरण है। जिस प्रकार संसारमै यता एमा मनापी बनाप पा उमौ तर प्रत्येक भारमा वलाानक उतम प्रति मिना सच मनाप हो। सनाप होनके लिये पुस्पार्प करना ही परसर है।
समानो] "माषनापोप तृतीय चित्र एकस्यमापना उपजाति शरीरमें न्याधि प्रस्पक्ष याय, ते काई मन्प माना पाकाय ए मोगरे एक स्व मारमा पोसे, एकल पयो नय मुझ गोत । विशेषार्य -शरीरमें प्रत्यक्ष दिखाई देनेवाले रोग आदि वो उपत्रम होत . उन्हें स्नही, कुटुम्बी, बी यफ्या पुत्र कोई भी नहीं ले सकत । उनें केवल एक अपनी आरमा हो साप भोगती है। इसमें कोई मी मागीदार नहीं होता । तया पाप, पुण्य वादि सब विपार्कोका अपनी आग्मा ही मोगती है। या बफेठी आती है और अकमी माती है इस तरह सिद्ध करके मिकको भली मसि जानने बाठे पुरुष एकलकी निरसर सोर करते। ममिराजर्षि महापुरुपक उस न्यायको मधछ करनेवाले नमियनर्षि और शन्द्र के पैराग्यके उपदेशक सवादको यहाँ देत है। नमिरा मिथिला नगरीक राजेसर थे। सी, पुत्र बादिसे विशेष दु सका प्राप्त न करने पर भी एफलके स्वरूपको परिपूर्णरूपसे पहिचाननमें रामेश्वरने कंपित् मी बिमम नहीं किया । शाकेन्द्र सबसे पहले वहाँ नमिरान नित्तिमें विरागत पे, पो विपके रूपमें भाकर परीक्षाके लिये अपन म्पास्यानको शुरु करता है- विन हे गवन् ! मिथिटा मगमें वान प्रब कासाहरु म्यान हो या एय मार मनको उद्वेग करनबारे विलापके शसे राजमरि भीर सब घर उप्रये हुए हैं। केपट तरी एफमा ही इन सब दु सोका कारण है । अपने आरा सरेकी वरमाको मो दुस्स पचिता है उस हुसको ससारके परिभ्रमणका कारण मानकर त् यहाँ गा, मोगा मत मम । नमिरा-(गौरव मरे बचनोंसे) हे विप्र ! रोहता ह यह कबर महाननप । मिपिठा नगरीमें एक बगीचा या उसके मीच एक स था, पर शीतल प्रयासे रमणीय पा, र पत्र, पुष और फलोंसे युक पा और ना नाना प्रकार पक्षियोंका ठाम देता था। इस पसके पापुटारा कपित होनेस इसमें इनका पक्षी खाद और शरणरहित मानेसे माकर नकर ये पक्षा सप पक्षक लिये माप नहीं कर ये पिस्तु भपने मुम्के मा हानक कारण ही शोकस पीड़ित हो । प्रि —परन्तु यह देस! अनि बार पायुके मिमणसे तेरा नगर, तेग अत पुर, भार मन्दिर जम ये, इसठिये नहीं जा और इस ममिको शांत कर। नमिराज - विप्र 1 मिथिला नगरीके उन मत पुर और उन मदिक नमनसे मेरा कुछ भी नही गया । मैं उसी प्रकार की प्राति करता हूँ पिससे मुझे मुम हो। इन मंदिर भादिमें मेरा मम्प मात्र मी राग नहीं । मैंन पुत्र, बीमारिके म्पबहारका घर दिया है । मुझे इनमेम कुछ भी प्रिय मही, और कुछ मी भनिय नहीं। -
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ममिराब]ि मापनाचीप १०५ चित्र-निर्वाह करनेके लिये मिक्षा माँगनेके कारण मशीय प्राभ्या असप परिमम सहना पाता है, इस कारण उस प्राध्याको स्यागकर अन्य प्राण्या धारण करने की इधि हो जाती है। अतएव उस उपाधिको दूर करनेके लिये तु गृहस्थाश्रममें गकर ही पौषध भादि मोमें तत्पर य। हे मनुष्यके मधिपति ! मैं ठीक करता हूँ। नमिराम -(हेत कारणसे प्रेरित ) हे विप्र ! माल अविवेकी चाहे जितना मी सम तप करे परन्तु ए सम्यक् मुवधर्म तथा पारिप्रवर्मके बराबर नहीं होता । एकाव कठा सोय कला के समान कैसे माना जा सकता है। चिन--महो क्षत्रिय ! मुवर्ण, मणि, मुजफर, पनाहकार बोर मध वादिको पनि करके फिर नाना। नमिराम -(तु कारणसे प्रेरित ) काचित् मेरु पर्वतके समान सोने चाँदीक सत्यातों पर्वत हो चाप उनसे भी सोमी मनुप्पको तृष्णा नही मुद्धती, उसे कित्रित्मात्र भी सतोप नहीं होता। तृणा भाकाशके समान अनत है। यदि धन, सुवर्ण, पशु स्पादिसे सकल ठोक मर नाय नम सबसे मी एक गेमी मनुप्पकी तृष्णा दूर मही हो सकती । डोमकी ऐसी कनिष्टसा है ! अतएव पियकी पुस्प सतापनितिसपी तपका भाचरण करते हैं। विप्र —(कारणसे प्रेरित)ो क्षत्रिय ! मुझे क्यन्त वापर्य होता है कि तूतिपमान मोगोंको ओड़हारे। बादमें अनिपमान काम-भोगके सकल्प-मिफापोंके कारणसे सेदसिम होगा। कएव इस मुनिफ्नेको सब उपाधिको छोड़ दे। ममियम - कारणसे प्रेरित) काम भोग शन्यके समान है, काम माग विपके स्मान । काम मोग सपके छम्प इनकी पॉम करमेसे मीन मरफ भादि अधोगतिमें नाता है। इसी तय क्रोध वीर मानके कारण दुर्गति होती है मापासे सहतिका विनाश होता है छोमसे इस डोक बीर परोकका भय सता है, इसज्येिो विप्र ! इनका द मुझे उपोश न कर । मय एप कमी मी पठायमान होनेवासा नहीं और इस मिथ्या मोहिनीमें भभिरुचि रखनेवाला नहीं। नामसूमकर पिप कौन पिपेगा । पानसकर दीपक छेकर कुरमें कौन गिरेगा ! मानकर विभममें कौन परेगा ! मैं अपने वस्तके समान पैराग्यके मधुर रसको बप्रिय करफ इस महरको मिय करनेके लिये मिपिछामें मामेबाठा मही। महर्षि नमिरामको मुखता दराकर केन्द्रको परमानद भा। बाद में प्रामणके रूपका मरकर उसने इन्दपनेकी बिक्रिया पारण की । फिर पदम करके मपुर बरसे रामपाँचरकी स्तुति करने म्गा कि महापालि! बसा वापर्य है कि सूने क्रोध गीत लिपा । वाधर्य ( कि ने जाकरको पराजित किया । माधप है कि ने मापाका दर किया। भाप (फिदने ठोमका बामें किया । वामपकारी है तरा सरसपना मापर्यकारी वेय निर्ममध, माधर्यनरी तेरा मभान क्षमा भौर भाधर्म कारीत नियोभिता । है पूज्य ! तू इस मामें उत्तम बार परमत्रमे उत्तम होगा। तू कर्मरहित श्रीमद् रामचन्द्र [नामप बोर व शिवगतिको प्रास करेगा । इस तर ति करते करते, प्रदक्षिणा करते ए भा-मक्सेि उसमे सस पिके चरणकमळगेको क्दन किया । तत्पश्चात् प सुदर मुकुटपाला शोत मात्रा मासि पग गया। प्रमाणशिक्षा-विप्र के रूप ममिरामा रम्यको परीक्षा करनेमें इन्द्रने क्या म्यूनता है। कुरा मी नाही की । संसारको नो मेलपवाय मनुष्यको पठापमान करमेवासा । उन सब मेहपताकि विपमें महागौरवपूर्ण मान करनेमें उस इन्दने निर्मम मातना प्रशंसायोप चातुर्य पिलाया है, तो मी देखनेकी बात वो यही है कि नमिराय बततक फेवर कचनमय दे। वीर असा रायके संगमें अपने प्रवाहित होमेको साने बने उत्तरों में प्रदर्शित किया है। विप्र तू मिन मस्तुवाको मेरी काम्यावा वस्तु मे नही । मैं मोसा , वोम मानेवाग, भौर फेरस प्रशंसनीप एकपको दो चाहता । इस प्रकार के रास्पमें ममिपय वपने उपरको वीर राम्पको सपनाते गये। ऐस परम प्रमाणशिमासे मरा मा उस महर्षिका चरित्र है। दोनों महामावोंका परस्परका संवाद पुर एफलको सिर करनेके लिये तथा कम्य वस्तुको त्याग करने के उपदेश के लिये ही कहा गया है । इसे भी शेष हरनेके म्पेि नमिरानको एकमात्र किस क्या प्राप्त एमा, इस विपपमें ममियमके एकलसंबपको सोपमें यहाँ मां देते। ये शिवेश पैसे महान् राम्यक अविपत्ति पे। पे कनेक यौचनपती मनोहारिमा मियोंके समुदापसे मिरे हए । दर्शनमोहिनी के ठाय म होनेपर मी ग ससार-सम्प जैसे विसर्ग देते । एक बार इनके शरीरमें पालर रोगको उत्पपिई। मानों एमस्त शरीर पर या ऐसी समन समस्त शरीरमें म्याप्त हो गई । रोम रोममें एगर विमुक सिने जैसी बेनाके समान एस होने मगाव-पिया प्रमाण पुरपोक वोपयोपचारका अनेक प्रकारसे सेक्न किया, परत पापा गमा । या म्पाधि शामात्र मी कम न होकर अधिक ही होती गई। सम्पूर्ण औषत्रियों सह-कारकी रितेपी ही रोती गई। कोई भी वोपति ऐसी न मिला कि मिसे दाहरसे कुछ भी रेप हो। निपुण व हताश हो गये और नेबर भी इस माम्मारिसे तग खा गये। उस्कोर करने वाले पुरुष को सोमबारों तरफ होने गी। तमें एक महावा च मिठा, उसने मम्यागिरि पदमका रेप परना बताया । सपती रानियाँ कम सिनेमें ज्ग गई। परन पिसनेसे प्रत्येक रानाके शापमें परिने हुए सोने समुदापसे सम्ममट होने म्या । मिपिसेपाके बगौ दाबरी एक बसर देवमा तो पो हो बीर सरी केइना इन ककमा गाइम्से उत्पम हो गई। यब पा सम्मान उनसे सहन हो सका तो उन्होंने रानियाँधे माकन पिसमा मन्द करो। तुम यह क्या धोर करती । मुझसे पर छा मही पाता । मैं एक महापापिसे तो प्रसिव 10, मौर सय म्याभिक समान मर कोमात हो या है, या बसम। सब रानियोने के एक एक कामको मंगल- सरूप रसकर बाकी कामगोको नियत सम्मा इससे होतामा गठमाइट शांत हो गया । ममिरानने रानियोस भ, स्पा तुमने परम पिसना बन्द कर दिया ! गनिषोंने कसा कि नही, होगा शांत रमेके लिये हम एक एक कारणको रसकर पानी कोका परियाग करके चम मयसमापना] मावनापोथ १०७ धिस या है। अब हमने ककणोंको समूहको अपने हायमें मही रस्सा इसलिये कोठाहस नही होता । रानियोंके इतने पचनोंको सुनते ही ममिरामके रोमरोममें एकाव उदित हुआएकात्र म्याप्त हो गपा, और उनका ममत्व दूर हो गया। सचमुच! यात मिसनेसे बहुत उपाधि होती है। देसो ! सब इस एक करणसे यामात्र भी सहमलाइट नहीं होता। कणोंके समासे सिरको पुमा देनेवाला सम्मलाहट होता पा। वहो पेवन ! मान कि तेरी सिदि एकलमें ही है। वधिक मिझनेस मधिक ही उपाधि पाती है। ससारमें बमन्त वामाओंके सबन्धसे से उपाधि भोगनेकी क्या बापश्यकता है। उसका त्याग कर बौर एकापमें प्रवेश कर । देखथब यह एक ककण सग्मगाहटके बिना कैसी उत्तम शान्तिमें रम या है। जब ममेक ये तब यह कसी अनतिका भोग कर या पाइसौ तय मी फणरूप है। उस ककणकी तरह मा बक्तक स्नेही कुटुबीरूपी फंकण-समुदापमें पा रोगा अबतक मवरूपी समसाहका सेक्न करमा परेगा। और यदि इस फकणको वर्तमान स्पितिकी तय एकसको मारा पना करेगा तो सिदगतिरूमी महापवित्र शतिको प्राप्त करेगा। इस प्रकार यग्यके उत्तरोतर प्रवेश ही उन ममियमको पूर्वभवका स्मरण हो पाया। ये प्रमभ्या पारण करनेका नियय करके सो गये । प्रभातमें मगठबक वानों को पनि । ममिराम दाहरसे मुछ हए । एकलका परिपूर्ण सेवन करमेषाले श्रीमान् नमिराम ऋषिको ममिक्दन हो! शालविक्रीषित राणी सर्व मळी मुचंदन पसी, ने वर्षामा हती, मुइपो स्या काळाट कंकणतणो, प्रोवी नमिम्पति, संवादे पण इन्द्रमी र रामो, एकल साई कसं, एमा ए मिथिलेशनु परित वा, सम्पूर्ण मो फ्यु ॥१॥ विशेपार्थ-सब मिया मिठकर पंदम पिसकर लेप करने सगी ईपी। उस समय कमोंका कोठगात सुनकर ममिरानको मोघ प्राप्त हुआ । ने इन्द्र के साथ सभा में भी बह रहे। धौर उन्होंने एकलको सिद्ध किया । ऐसे इस मुष्टिसाधक महानिरागी मिथिमेशा परित्र माझ्नाबोध प्रयके तृतीय चित्र में पूर्ण एमा। चतुर्य चित्र अम्पसमाषना शाकविक्रोपित ना मारा तन स्म ति युवती, मा पुत्र के ग्रात मा, मा मारा सत स्नेहियो सबन के, मा गोत्र के हात मा मा मागे धन पाम पीचन पय, ए मोर भावना, २।२। बीच विचार पमा सा कम्पत्वा मानना ॥२॥ विशेषार्थ पर शरीर मेरा नहीं यह रूप मेरा मही, यह प्रति मे नहीं, यह भी मेरी मही, पर पुप्र मेरा माहीं, ये मई मेरे नहीं, पे दास मेरे नहीं, ये स्नेही मेरे मी, पे सभी मेरे मही, पाह गोत्र मेरा महो, यह पति मेरो नहीं, पह छम्मी मेरो मही, पर महम मेरा नही, पर पोपम मेरा नही, भौर पर भूमि मेरी मही, यह सब मोह केरण मानपनेका है। न सिदगति पाने के ठिये भन्यत्वका टपोश देनेपाली मन्फपमानाका विचार कर पिचार कर।
मधुर भीमपराधम्द्र [मोका मिथ्या ममालको प्रमणा र करमेके लिये वीर गम्पकी दिके मानपूर्वक ममम करमे पोम्प राबराबर मरतका चरित्रका महाँ इस करते हैं। मरतेश्वर निसको जपशामें रमणाप, चतुर और अनेक प्रकारके तेजी वर्गाका स्मा शोमाममान होता पा जिसकी गरमाममें भनेक नाविक मोमत एपी एम ये गिसके अंत पुरमें नवपीना, सम्परिका र मुग्धा नियों हजारोंकी सस्पा घोमित हो गी थी, जिसके समानेमें विद्वानोदाम्प पसा उपमासे वर्णन कोई समसको पुत्री मी स्थिर हो गई थी जिसकी को दबन्देवांगन बाचीन होकर अपने मुकुट पर भाये थे, जिसके वास्ते भोजन करके किये गाना प्रकारके पास भोमन फळ पसमें निर्मित होते पे, मिसके फोमा कर्मक विकासके पि बारीक और सरसे गापन करनेवाली वारंगना कपर बी पी निसके निरीक्षण करने के लिये कनेक प्रकारके मारक समाप्ने विप नात प, मिसकी यश कौति गायु समसे फैलकर बाकाशके समान म्पास हो गई पो निसके नुमोको पुरसे शयन करनेका समय न बापा पा क्षमा मिसो परियोको बनिताबोके नयनोंमेंसे सध मोसू ही टपकते यते थे, जिससे कोई वा सामेको तो समर्प पा ही मही, परन्तु बिसके सामने निर्दोफ्तासे गगरिसाने मी कोई समर्थ म पा मिसके समय बनेक मंत्रियोंका समुदाय उसको रुपाकी पाचमा बता पा मिसका मप, पति और सदर्य मनोहारक पे बिसके गर्भ महान् स पार्य, शक्ति और ठप पराक्रम उनका येथे मिसके कोमा करनेके सि मार्गमिमय बाग-बगाने मोर मन उपयन बन हुए पे मिसके महाँ मुम्म कुमार पुत्रोंका समुदाय पा) मिसको सेवामें गों अनुचर सम होकर मोया करते थे या पुरुप यो अहाँ गाता या कॉमहाँ क्षेम क्षेमक उडासे, कचनके एक और मोतियाँक पास बधाई दिया जाता था, मिसके कुममणके परणकमका स्पर्श करनेके मित्र से मी तरसते यो प रिसको मामुपागमें महायशोमाम विम्म चक्रको उत्पपिई या त्रिसके पों साम्रायका बस दीपक प्रकाशमान या जिसके सिरपर महान् म संरको प्रमुताका तेमस्ती वीर प्रमान मुकुट मोमित पा; कानेका अभिप्राय यह है कि जिसका साधन-सामा बिसके रम्भा, मिसके मगर पुर और पाना मिसके मनका और विकासका संसारमें किसी भी प्रकार से म्यूनमात्र न पा; ऐसा र भीमाम् पजयमेवर मरत अपने संदर मार मुक्नमें साम्पस तिमलित होकर मनोहर सिंहासन पर य या । चारों तरफ हर मुझे पे, नाना प्रकारको पोका म सम्म प्रतिसे फैल हा पा; नाना प्रकारके पुगंमित पार्थ बोरसे मांक येथे नाना प्रकारके सुन्दर सरपुत्र बात्रि पत्रिक कमसे सर माग रौतम, म और सुगमित पापुध मारे वीपी। मामूषण मा पार्टीका निरीक्षण करते र श्रीमान् रामगनेसर भरत उस मुक्ममें अमुपम से दिखाई देते थे। इनके हापकी गलामेसे बरी नळ पी। भरतका पान उसमोर जाति मा मीर उम्रे अपनी गाविसपुस शोभाहीन माझम हाने गी। मी उँगठिये बारियोज्य मिस मनोहरवाको पारण पानी थी उस मनोहरतम्रो प्रित इस गयको मार इसके उपरस भरणेघरको मात गंभीर मोस] भावनाधोप poo विचारकी हरणाई। किस कारणसे यह उँगग ऐसी लगती है! यह पियार करनेपर उसे माम हुमा कि इसका कारण फेवल उँगमसे अगूठाका निकल जाना ही है। इस बातको विशेषम्पसे प्रमाणित करमेके लिये उसने दूसरी उँगाको अग्लो भी निकाली। जैसे ही दूसरी उगलास बैंगूठी निकाली, वैसे ही यह उँगली मी शोमाहौन विसाई देने लगी। फिर इस बातको सिद्ध करनेके म्येि उसने तीसरी उँगसे मी मैगी निकाल ली, इससे यह बास और भी प्रमा- णित। फिर चीपी उँगसीमेसे मी बेंगूठी निकाय मी, या भी इसी तरह शोमाहौन रिसई दी । इस तरह मरतने क्रमसे दसों उँगलियों साली कर राग । भाली हो मानेसे ये सबकी सब गलियों शोमाहान विसाई देमे बगी। इनके शोमाहीन माम होनेसे राजरामेश्वर वन्यस्वमामनामें गवार होकर इस तरा बोले- - " वहा हो । कैसी विधिनता है कि भूमिसे उत्पाई वस्तुको झटकर कुरामतापूर्वक पडनेसे मुछिका बनी इस मुद्रिकासे मेरी उँगली सुदर दिखाई दी। इस गर्ग से इस मुविकाके मिकल परनेसे इस्से विपरीत ही पश्य दिखाई दिया । विपरीत पसे गर्नाकी शोभाहीनता और नगापन सेदका कारण हो गया। शोमादौन मालूम होनेका कारण फेस मॅग्ठीका न होमा ही बारा न ' यदि मॅगूठी होती तो मैं ऐसी अशोमा म देसता। इस मुद्रिकासे मेरी यह गठी शोमाको प्राप्त ) इस उँगलीसे यह साप शोमित होता है इस हापसे या शरीर शोभित होता है, फिर इसमें में किसकी शोभा मार्ने । बरे वापर्यफी पात है। मेरी इस मानी जाती हई मनोहर कातिको पौर मी विशेष दीप्त करनेवासे ये मणि माणिक्य नादिके वटकार और रगबिरंगे पर ही सिब हुए। पह कति मेरी लषाको शोमा सिदई। यह स्वचा शारीरको गुप्तताको ककर संदरसा रसाती है वहो हो ! यह कैसी उन्नी बात | निस शरीरको में अपना मानता र शरीर केक्स त्वचासे, वह स्वचा कातिसे, और पति पखाकारसे शोभित होती है, तो क्या फिर मेरे शरीरको पुस शोमा ही मही ! क्या यह फेछ रविर, मांस और मों का पर है और इस पबरको हो मैं सर्वथा मफ्ना माम रहा। कैसी मूल 1 कैसी भमणा । बौर कैसी विचित्रता है। मैं केवा परपुनमको शोमासे ही शोमित हो पाई। किसी और पौनसे रमणापता धारण करनेवाले शरीरको मैं अपना फैस मान । और कदाचित् ऐसा मानकर पदि मैं इसमें ममल मात्र रम् तो यह भी फेवण दुसाद भौर सपा है । इस मेरी बारमाका इस शरीरसे कमी म कमी पियोग होनेवाण है। जब मामा दूसरी देहको धारण करने वर्ग बापगी तब स दोके यही पर रानमें कोई मी शंका नए है। या काया म तो मेरोई और न ऐगा, फिर मैं इसे अपनी मानता अपना मान याह के मूसता है। जिसका कमी न कभी नियोग होनेवागी बौर नो केस पम्पलमानको ही धारण किये हुए है उसमें ममत्व क्यों रहना चाहिये । यब या मेरी मही होती तो फिर क्या मुझे इसका होना उचित है। नहीं, नहीं । पर या मेरी नहीं तो मैं भी इसका मही, ऐसा विचारू, सकते और भाबरण कर ही विवेक मुनिका बर्ष है। पर समस्त सरि मनत वस्तुओंसे भीर बनत पदापोसे भरी हुई है, उन सब पापोंको नपेक्षा मिसके समान मुझे एक मी बस्तु प्रिय नहीं पर वस्तु मी बब मेरी नई, तो फिर इसरो कोई बात मेरी हो [मटेड श्रीमन् परचन्द्र सकती है ! मैं बात भूल गया | मिग्या मोहमें फंस गया । नवयौवनायें, ये माने एप कुल- दीपक पुत्र, या बस ममी, हम भाका महान् गम्य- मेरा नहीं। इसमेंका देशमात्र भी मेय नहा। इसमें मेय कुछ मी माता नहीं। विस कापासे मैं इन सब वस्तुओका उपमोग करता, सबका भोग्य बस्तु ही मेरी नई वो मेरी इस मानी हुई वस्तुयें-स्नेही, कुटुगोस्पानि-फिर क्या मेरे हो सकते हैं। मही, मी नहीं। इस ममबमाकी मुझे कोई पाइपकता मही! या पुन, प मित्र, पर कात्र, या मन पौर स समाको मुझे अपना मानमा ही नहीं | मैं इनका मही और ये मेरे मही! पुष्प वादिको सापकर मैंने नो नो बस्तुएँ प्राप्त की येथे वस्तुऐं मेरी न इसके समान संसारमें दूसरी और क्या मेरकी बात है। मेरे दम पुष्पलका क्पा यही परिणाम ।। पन्तमें इन सबका वियोग ही होनबाधा है म ! पुष्पकके इस फरमो पाकर इस पानिके लिये मैंने जो जो पाप किये उम सबको मेरी मामाको ही मोगना है और यह भी क्या बोले क्या इसमें कई मी स्पषी न होगा ! नहीं नहीं । ऐसा अपवमामाग होकर मी में ममलमार बताकर वारमात्र परितपी हो और इसको र नरकका मोच्य बनाई, इसके समान सय वर स्पा महान है! ऐसी कौनसी भमणा है। ऐसा कौनसा बरिवेक है ! प्रेम शाका पुस्पोंसे में भी एक गिना नाता है, फिर भी मैं ऐसे एस्पको पूर न कर सई और प्राप्त कोई प्रमुताको मी सोम, मा सर्वपा मनुपित है। इन पुत्रोंका, इन प्रमशायोंका, इस राममय, और इन पाहन बारिक पुसका मुझे कुछ मौनुराग नहीं ! मम मही। परामेपर मरतके क्व करणमें पैराम्पका ऐसा प्रकाध पहा कि उनका विमिर-पट दूर हो गया। उनमें छापान प्राप्त मा बिससे समस्त कर्म चक्कर मस्मीभूत हो गये !! माविम्प मोर साम- किरणोंसे मी बनुपम कतिमान करसमान प्रगट हुमा । उसी समय होने पचमुधि फेशगेंच किया । NRनपान हें सानु के उपकरण प्रदान किसे मारने महावीतरागी सभा सदशी होकर पतुति, बोबास दरक, तपा वानि, म्याषि वौर उपालिसे विरकर, बफ ससारके सम्पूर्ण मुस रिमोसे होंने निरपि प्राप्त की, प्रिय मप्रिया मेद रामा, गौर से निरन्तर स्तवन करने पोम्प परमात्मा ऐ गमे । प्रमाणशिष्मा -स प्रकार म सके प्रमु देयोंकि देखके समान, अनु सामाम्प सम्माके मोत्तत्र, महामापुर पनी, बनेड एनाक मारक गबरनेपर मरत बाद मुक्नमें केस अन्यलमानाके उपाय होनेसे पर रमवान् हुए। मरतेश्वरका बस्तुत मनन करने योग्य चरित्र संसारको सोचार्यता और पसीनताका पूरा पूरा मात्र उपरेश वीर प्रमाण उपस्थित करता है। करोइनके म किस बातकी कमी पौ। न इनके पर नापीना बियाँधी कमी थी न रासादिकी कमी थी म पुत्रको समुदायको कमी पी मद-परिवारको कमी पी न विजप-सिविकी कमी पी म नपनिपिकी कमी थी, न समकाति- की कमी पी वीर म ममकीर्ति की ही कमी पी। इस तप पारे कोई उनकी प्ररिका पुन स्मरण कराकर प्रमाणकेरा हम शिया प्रसादी पही देना चाहते है मरकेलरमे कमपन सरूपको देखा पाना, बसर्प- कंफरत् संसार १ भाविभाफ्ना] भावनापोप । परियाग करके उसके ममत्वको मिण्या सिर कर बताया। महापराम्पको वता, निर्ममान, और वामशक्तिको प्रपुरसता ये सब इन महायोगाश्वर के परिप्रमें गर्मित है। एक पिताके सौ पुत्रों से निन्यान पुत्र पाडेसे ही बातमकरूपाणमा साधन करते थे। सारें इन भरतेश्वरने बारमसिदि की । पिताने भी इसी कल्याणका साधन किया । उचरोवर होनेवाले मरसेसरके राज्यास्नका भोग करनेवाले भी इसी बारम्-मुक्नमें इसी सिधिको पाये हुए को गाते हैं। यह सकस सिदिसाधक मास बन्पत्वको ही सिर करके एकत्वमें प्रवेश कराता है। उन परमात्मामोंको बभिनन्दन हो। शार्दूलविकारित देसी बागडि माप एफ वापी, पैराग्य बेगे गया, मंडी रामसमानने मरतमी, कैगम्यहानी थया; पोधु चित्र पवित्र एम परिते, पाम्पु वहीं पूर्णता, जानीनो मन तेग रबम करो, पैरम्प मात्र पया ॥१॥ विशेषार्य – अपनी एक उगसी शोभारहित देसकर मिसने पैम्यक प्रबाइमें प्रवेश किया, मिस्ने रान-समायको छोड़कर फेवानको प्रस किया, ऐसे उस भरतेवरके परित्रको बतानेवाला यह दीपा चित्र पूर्ण इमा । यह पयायोग्पल्पसे पैरम्पमात्र प्रदर्शन करके हामी पुरुपके मनको रंजन करनमाया होभो। पचम चित्र अशुधिभावना गीतरच माण मन में मना, रोग जगने निवास पाम, फापा एका गणि न, मान स्पग्रीन कर सापक वाम ॥१॥ शिपाई -रे बैतम्य ! इस कायाका मल और त्रको सान, रोग और पदता यमका पाम मानफर उसका मिप्पामिमान स्पाग करके सनत्कुमारकी तरह उसे सकस कर । इन मगवान् समानुसारका चरित्र यहीजपुषिमाषनामी सपना बतानफे लिये भारभ किया जाता। सनत्कुमार ( प ६-७१ पार ७०-७१) . . . रोमा होनार मी आग पडफर मनुण दहका सब देशम उत्तम प्रना पगा। कहना तापर्प यह है कि इसम मिदगतिकी सिदि हानी ह । तसंबधी सम शकाओंका र फरमफ यि यहाँ नाममात्र प्याम्पान किया गया। जब आमाफ गुभरमग उग्य आग तर पद मनुष्य र मिनी । मनुश्य अयात साप, पर, अंग, दो पान एक मुं, मोर भार मारुपात देरका मामी मही, परम्मु इसका मर्म , भीमद् रामचन्द्र [मोर पुग पुगो । परि हम इस प्रकार परिषेक Pसा तो सिरदरफो मी मनुष्प गिननमें स्पा ऐप इस विचारेको वा एक पूछ वीर मी अधिक प्राप्त है। परन्तु नहीं, मनुप्पत्तका मर्म पीक मिसके मनमें सिक्युवि तपाईको मनुप है, बाकी इसके सिबाप तो समी दो पैरमाले पमु हो । मेपाली पुस्प निरंतर इस मानापनेका मर्म इसी पद प्रकाशित करते है।सिक मुहिक उत्यसे मुहिक रानमामि प्रवेश किया जाता है, और इस माम प्रपेश करना ही मानपदोहको उत्तमता है। फिर भी यह मात सदैव प्पानमें रसना उचित है कि पदो तो सपा मुनिमय और बधिमपही। इसक समावमें इसके सिपाप वौर मुल नहीं। भावनाबोध प्रथमें बधिमाधमाके उपके लिये प्रथम दर्शनके पाच चिप्रमें सनामारका रणत और प्रमाणशिक्षा पूर्ण हुए। अंतर्दर्शन पष्ठ चित्र निति-योप हरिगीत छद भनत सौप्स माम इस सीन मित्रता ! नमत हुन नाम सीरूप प्रेम स्मा, विधिता !! उपा न्पाप नेने निहारे । निहाळ । मिचि शोममेव पारित प्राति बाळ तु ॥ १ ॥ चिराचार्य --गिसमें एकति वीर बनत समको तरंगें उम यो ऐसे शोभानचे केवल माममात्र के दुस्से तग नाकर ठमें मित्ररूप नहीं मामता और उनको एकदम मुग गमता है। वर केवळ बनत ह समय ऐसे संसारके नाममात्र मुसमें वेप परिपूर्ण प्रेम है, यह कसा मित्रता है। को बेवन बब अपने व्यापस्मी नेत्रोंको सोसकर देस! रे देश !! देसकर शाम होनापि वर्षात् महापपत्र पारण कर और मिथ्या काम-मोगको प्रालिको जला दे। ऐसी पवित्र महानितिको परमेके लिये तब मेरमपमान युफ्राम मुगापुत्र मनम करने योग्य चरित्र को ठदान किया है। सू कैसे दासको मुख मान बेटावर से पुसको इस मान बैठा है। इसे पुनराबके मुभन ही पापातय सिद्ध करेंगे । मुगापुत्र नाना प्रकारफे मनोहर पोंसे मरे हुए उपार्मोसे मोमित पाल नामका एक मगर पा । उस नगरमे कम नामका एफ ' राय का पानी मिग्मापिणां पठनधि भाम मूगा पास दंपति पम्मी नामा एक कुमार अपमहमा किन्तु सम छोग र मृगापुत्र छकर दो पुकारा करते पे। पर मपमे माता पिताको भायात प्रिय था । इस युषरामने ग्रास्थामममें यते ए मी सपत्रिके गुर्गों को प्राप्त किया पा । इस कारण यह दम्पर भर्यात् पत्तियोंमें नोसर ताने बाने पोत्य पाप संगापुत्र शिखरमद वानकारी प्रासादमें अपनी प्राणप्रिपाके साथ दोगहुक देमके समान विमस किया करवा पा । पर निरंतर प्रमोदसहित मनसे पता था । उसके प्रासावध र्श पाल बादि मणि मृगापुष] मायनामोम भार विविध रत्नासे बड़ा एमा था । एक Pन वा कुमार अपने घरोन्में बैठा मा या । वहाँसे मगरका परिपूर्णतपसे निरीक्षण होता था । इतनेमें मृगापुत्रको परि चार राममार्ग मिटनेवाले धारायफ उस सगम-स्पानपर पड़ी जो तीन राजमाग मिझते पे । उसने गाँ महातप, महानियम, महासपम, महाशीठ वीर महागुणोंके पामरूप एक शांत तपस्वी साधुको देखा । ग्यों ग्यों समय मीतता जाता था, स्यो स्यों उस मुनिको यह मृगापुत्र निरम निरसार देस रहा था। पसा निरीक्षण करनसे का इस तर योउ उठा-जान पड़ता कि मैंने एसा रूम कहीं देखा, भार सामाग्ते बोलते उस कुमारका शुम परिणामों की प्रामि हुई, उसका मोहका पादार गया, और उसके भावोंका उपशमता होनसे उसे पक्षण आतिम्मरण धान उरित हुना। पूर्वजातिका स्मरण उत्पन हानेसे महासद्रिके माता उस मृगापुत्रको पूर्वके चरित्रका मी स्मरण हो वाया । यह शौम ही उस विषपसे विरल हुमा, मार सपमको आर बाप हुआ । उसी समय यह माता पिताक समीप माकर बोला कि मन पूर्वमबमें पाँच महास्तो निफ्यमें मुना था; नरकके भनत दुमोका मुना था, भीर तियंचगतिक मी भर्नत दु खोको मुना था । इन अनत दु खासे दु जित हाकर मैं उनसे निरस हानका अभिमा हुभा । हे गुरुजनो ! ससारनपी समुइसे पार होनेक लिये मुह उन पोप महाश्तोंको धारण करनकी बाशा दो। कुमारफे निवृतिपूर्ण पचनोंको सुनकर उसके माता पिताने उस भागोंका मागनेका आमंत्रम पा भामप्रणा बस समिम होपर पगापुत्र ऐसे करन म्गा, कि माता पिता ! जिन भागोंका माग नेका माप मुछ मामप्रण कर यह उन मोगोंको मैन मूर मोग लिया हवे माग विपर-पिंपाक वृक्षके फसफ समान है ये मागेमके बाद कासे निपाको देत है, और सप सापनिज फारण है। पर शारीर अनिय और सर्वया भन्नुचिमय है समुचिस उपम खाद यह जानका वशास्वत पास है, भार बनस दुमका । यह शरीर रम्ग, जरा भौर क्लेश भाका भाग्न । । इस शारीर में रमि कसे करें। इस गानका कई नियम नहीं कि इस शयरको गाउकफ्नमें छोर दना पडेगा अपरा पृरफ्नमें । पा पार पानीक फनके गुरुबुलक समान है। एसे शरीरमें स्ना करमा कैसे पाग्य हा सफता है। मनुप्पामें इस नरको पाकर यह शरीर कोष, खर नगरे म्पाभिस बार जरा मरणस प्रस्त यता है, उसमें में स्पों प्रेम करें। चम्मच दुख, नराकास, रोगका दुस, मरणका दुग-इस तय इस समारों का सही दुम । भूमि क्षेत्र, पर कपन, फुटुन, पुत्र प्रमा, बांधन इन सबको छोड़कर कमठ देश पाकर इम शरीरका पारकर अश्य ही माना पगा। निम प्रकार दिपकक्षा पसका परिणाम मुग पिक मही हाता मुदी मोगका परिणाम मी मुनापक मही हाता । जैसे कई पुस्प महकास गुरुर किन सापमें अम-ख न स, तो अन माकर बसे वह भुषापामे दुमीमा, बस धर्मक भाषरण म फरनम परमबमें गता मा पुस्प दुमी होता है। और जम्म उरामाग्मि पारित दाता है। जिस प्रकार महाप्रबासमें जानबाठा पुस्प सम-त्रण भा साप टेनस क्षुधापास रहित होकर समका प्राम करता हैम हो धर्मस्य भाचरण करनेबारा पुरुष परमामें जाता मा मुमफा पानाk अन्य कर्माहित हार और वातनापम दिन हालात गुरुस्नोस निम समय किसी गृहम्पका घर जम्न स्गता , उस समय उस परका मालिक पा मम्म्य पत्र मादिया हो कर बाको मार्ग बल वारिका छोड़ दता है, बस ही सारको जमा देगर जीर्ग पसरप गरा मरणको छोरकर उस दाहसे (मार माहादें ता में) अमम्प मामाका उपार ।
प्रीमन् पसन्द [मृगाएंग पगापुरके ऐसे बचोंको पुमकर पगापुरके माता पिता शोकात होकर मोडे, हे पुत्र 1 माव स्पा करता। चारित्रका पाना गुत कटिन है। उसमें यतियोका धमा मारि गुणोंको पारण करना पाता है, उमें विवाहमा पाता है, वीर ठमको परनसे रक्षा करनी पाती है।संपतिको मित्र मौर रामें सममात्र रसना पाता । स्पतिको अपमी और दूसरों को मारमाके उपर सममुनि रसनी पाती है, अपका सम्पूर्ण जगत्के । व्यर समानभाव रसना पाता है-ऐसे पासनमें दुर्गम प्राणाविपाशपिरति भामरे प्रथम पतको जीवनपर्यन्त पालना पाता है। सपतिको सदैव सप्रमादपनेसे सपा मचमका त्यागना, हितकारी चमका मोसमा-ऐसे पानेमें दुष्कर सरे प्रतको धारण करमा पाता है। संपतिप्रेत- भोपनक सिमे एक सौकतक भी बिना दिये हुए म छेना, निर्वच और दोपरमित मिश्रा करना-ऐसे पासनेमें दुकर तीसरे प्रतको धारण करना पावा। काम-मोगके ससारको मानने वार नामचर्य पारण करनेका त्याग करके सपत्तिमा समपर्यन्पो प्रतको पारम करमा पाता, पिसका पाम करमा मात कठिन है। धन, पाप, दासका स्मुराय, परिण मला त्याग, सब प्रकार के आरमका त्याग, इस त्या सर्वथा निर्ममनसे या पाचवा महालत धारण करना संपतिको भक्त ही विकट है। विमोचनका त्याग, वीर पत भारि पदाकि बासी रसनेश त्याग, या मी बति दुकर है। हे पुत्र ! द पारित्र चारित्र क्या रटता है। क्या चारित्र जैसी दूसरी कोई भी दुःसपर वस्तु है। हे पुत्र सुधाका परिपाइ सहम करना तपाय परिण सहन करना, टेडका परिपा सहम परमा, ठण-तापका परिपर सहन करना, गस मम्मका परिपह सहन करना, जानोश परिपा सान करमा, उपाध्मका परिपह सहन करना तृण बार स्पर्शका परिपा सहम करना, मसका परिपा सहन करना। निष्प मान है ऐसा भारित्र कैसे पाला जा सकता है। का परिपह, वीर परके परिपा कैसे गि मिनाचरी सो दुर्गम है । भावना घरमा कैसा तुम है। पाचना करनेपर भी कसका . मिना या काम परिपा कितना कठिन है कायर पुस्यों को भे राजनेषाध्य केशलोच कसा का विचार कर, कर्ग के लिये रूप मचर्य मतका पारमा सा दुर्घम है। समुभ, बार बारमाको यह सब मति गति विक। प्रिप पुत्र 10 मस भोगनेके पोन्म है। तेरा मुमार शरीर अति रमणीय रतिसे निर्मक स्नान करनेके का सपा पोप है । प्रिय पुत्र नियंप ही सचारिकको पानेमें समर्थ महा। बारित्रमें मामीन मी विभाम महा। सपसिके गुणोंका महासमुदाय परेको तए पात माय है । संयमके मारा मान करमा त्यात विकट है। जैसे बाबाश-गंगा प्राहक सामने जाना इकर है से हो याचन क्पमें सयमका पाना महाकर से बोतके विमर पाना कठिन है, से हो योनपा स्पमका पानामानि ।। बसे मुग से समुाका पार करना दुफर है, जैसे ही पुना वपमें संयमगुण-समुद्रका पार करना महातुकर है। जैसे का कर नौरस है से प्पम मा नारस।से सापके पर पम्मा विकट से हो तरकाबाचरण करमा माविको। जैसे सय एकात मात् सोपा रिसे बम्ता सेतो चारित्रमें समिति के कारण एकर तमापसे चम्ना महापर। हे प्रिय पुत्र से मोके पनों माना टिन से ही सपमका पाना मौसम है। जैसे बानि शिलाका पाल करना एकरी से हो पौननमें पतिपमा कार सरमा महामुपरहै। जैसे बापत मइ मननके धारक कापर पुस्पा पतिपोको पारण करमा गीर पाना हु है। वैसे तयम्से मैर पक्षध तोमा इमार , से निपल्पमेसे, ममापुर] भावनाबोध शकारहित दा प्रकार के पतिधर्मका पाम्ना दुकर है। जैसे मुनामोंसे सर्यभूरमण सम्मका पार करना दुष्करी से ही उपशमहान मनुष्योका उपशमपी समुद्रको पार र नाना दुष्कर । हे पुत्र , प, गप, रस, स्पर्श इन पांच प्रफारके मनुप्पसंबधी मोगोंको भोगकर मुक्तमांगी हराकर त्र अवस्थामें धर्मा आचरण करना । माता पिता भोगसर्वधी उपदेश सुन कर बह मगापुर माता पिनासे इस तर बोग बिसके निपयका भोर रुचि ही मही उसे स्पमका पाम्ना कुछ भी दुकर नही । इस बारमाने शारी रिक और मानसिक वेदनाको असातारपसे मनत बार मानकी-मोगी है। इस बारमाने महानु ससे पूर्ण मयको उत्पम करीवाली मति और बेदमाएँ मोगी है। क्म, जय वीर मरण ये भपके भाम हैं। चतुर्गतिरूपी ससार-अलार्म भको हए मैंने मति पर दस मोगे हैं।रे गुरुजनो ! ममुम्प लोकमें ममि मा अविशय उष्ण मानी गई है, इस ममिसे भी अमतगुनी उष्ण ताप-मेदना इस बारमामे नरकम भोगी ।। मनुमोको टासी यति शीतक मानी गई है, इस ठासे मी अनतगुनी टाको मसातापूर्वक इस बारमाने मरकमें मोगी है। लोहे के मामनमें उपर पैर बाँधकर और नाचे मस्तक करके देवसाओंशय विकिपासे बनाई छ घघकसी ममिमें मान करते हुए इस भारमाने मस्पम्त उम दुमा मागा। महासको वमि जैसी मशकी परम्प मारके समान कर नामकी नीका बार है, पूर्वकालमें ऐसी रण बादमें मेरी पर परमा जनतबार मलाई गई है। माकन करते हुए मुझे मोजन पकानेके बरतममें पकाने के लिये बनतबार परका गया है। मरकमें महारो परमापार्मिकोंने मुझे मेरे कारे विपकके लिये मनतोंगर उसे पक्षकी शाम्बा गाँधा है। बधिरहित मुन कमी कमी वारिपासे चीरा है पति तारण करकोसे म्पान हो शामकिशमसे बोरकर मुझे महान् खेद पहुंचाया है। पाशमें बांधकर भागे पछि पीपकर मुझे अत्यन्त रमा किया? मदा मसन कोन्हमें ईमकी तरह अति रोप्रवास मानन्दन करता मा मैं पेठा गया है। पह सब को मोगना पडा केस भपने बभुम कर्मके बनतोबारक उदपसे ही मोगमा प| साम मामले परमाभार्मिकोने मुझे कुजा बनाया शक्स मामले परमाषार्मिकोने उस फुके रपमें मुझे जमीनपर गिराया। औग गपकी तप का क्षको तय कया इस समय में मस्यत्त पाता पा। विकरात मासे, भासे नपा दूसरे समोसे उन प्रहोंने मेरे दुयो को किये । मरकमें पापसे गम्म सेकर मान्मे मन् दुसोक मोगनेमें विकमर भी कमी न रही थी। परता मुसको अपव प्राममित रपमें रोमकी तब जबर्दम्नी गीता गया था। मैं देवताओंकी छिपक अमिमें महिषको तय नमपा गया पार में माड़ो मना गाकर असतामे वस्तुप वेदना मोगता पा । मैं बैंक और गिद मामले मकरास पचिपोको सणसी के समान पोचोसे पंपा जाकर अनंत मासे कापर होकर विसाय करता था । पाके कारण अस पौनको मारनामें बेगमे दावे हुए मैं पुरको पारके समान भनत दुम देमेवारो मैतरणीने पानामा पाला पा । पहरे में तो पदी पारके समान पगाडे भार महातापसे संगम मे अमिश्य बन जाता पा । पहारर पूर्वगामें मुछे जनन बार देश गपा था । मुारसे, तीन शपसे बिमसे, मममस और गामे मेरा शरीर मा किया गया था । शरण भए सपके बिना में जागरण अनंत दुपको पता था । मुम पलके समान गरेको तीण पारसे, सुस भार चामे काटा गया पा । मेरे मामा मामय गये ५। मुझे आ बारपार माया गा पा । पररर दाद करती हुई मेरी तर उतारी गई पी राम प्रसार मैने बनतम पापे ।
भीमा पजचम्न [स्सापुर में परपशवासे मृगको वय बनतबार पाचमें पकड़ा गया था। परमाचामिने मुझे मार मक रूपमें बार रायकर मनतबार नुस दिया था। मुझ बारके अपने पाका तय मारमें फंसाकर अनंतार मारा था। फरसा स्पादि शससि मुझे बताया की ता कातर मरे मेटे गोरे दुको किये थे । बसे छहार हपोषों वानिक महारसे छोहेको परिवार से हो मुझे भी पूर्णकारों परमाधार्मिकों ने मनोबार घटा पा र तांबा, सोहा बार साँसेको अग्निमें गारकर उनका कमर शम्प करता हुषा रस मुझे पर्नतबार पिम्पा पा । पति पतासे ये परमापार्मिक मुझे ऐसा करते पाते पे कि पूर्णमबमें तुझे माँस प्रिय पा बर या मोस। इस वर मैन वपने ही शरीर मा मातुको बनतभार गटके थे। मबकी प्रियवाफे कारण भी मुझे इससे पर कम स नहीं सामे परे । स तय मन महामपसे, माणससे और महादु ससे परपर र र बनत ना मोगी पी। नो बेदना सानेमें वति ताम, पैर और सरस काठ स्थितिकी है, और वो मुमने मी बवि मकर में ऐसी पदनामें उस मरकमें मैने अनंतबार मोगी पी । मेसी पेदना मनुष्पोको दिसई देती है । भी बमनानी बधिक मसातदिनाप नरकम पी। मैने सर्व ममि असाप्तानाप भोगी हो क्षणमात्र भी मुसमपा। इस प्रकार मृगापुम्ने मेयम्यभाषसे ससारक परिभ्रमणके दुसरे कहा । इसके उत्तरमें उसके माता पिता इस तरह गोले, किरे पुत्र ! पति वेरी या दामा नेको है तो तू दांचा प्राम कार परत चारिमें रोगोत्पत्तिके सम्म तेरी गई कौन करेगा 'दु सनिधि कौन करेगा। इसके विमा यही दिनता दोगी। मगापुत्रने पाया ठीक है परन्तु वापरचार करें कि नमें मृग और पची मोहीयते , पब र रोग उत्तम होता है तो उनकी चिकित्सा कौन करता है। जैसे वममें मृग बोले । हिर करते है वैसे ही में मी चारित्रनमें बिहार काँगा, वो सब प्रकार के पुर स्पममें मनुएमी होऊँगा बाग प्रकार के तपश्च बावरण काँगा तथा मृगासे विचाँगा । का मृगको क्ममें रोगका वपश्य होता है तो को उसकी चिकित्सा कौन करता है। ऐसा प्रकरण पुनः बोला, कि उस मृगको कौन भापति देता है। उस भगके वानप, स्वति और समको कौन प्रवास सस मगनो बाहर जस काम मकर देता है। सेप मग उपद्रवीत होने पर गमन कनमें वहाँ मरोर देता है, पाँ जाता है और मास पानी मासिका सेवन करके फिर मपेछ मासे विचरता से ही मे मा चाँगा। साक्ष याक में इस प्रकार पगपर्याध बापरण काँगा । सतरा मै मौ सगके समान संपतान होगा। अनेक स्पमें विचरता मा पति पगके समान प्रतिबद्ध यो पतिको पारिप ५ परके समान विचरकर पगचर्या सेवन करके, सावर करके विपरे । मे मग, तृण प्रामाविका गोचरी करता है वैसे ही यति भी गोचरी करके स्पम- मारकर निररे।पहारके विप इस्पा निरस्कार अपना उसकी निंश न करे, में ऐसे ही सपमा बाचरण करेगा। एवं प्रचा महामुस'- पुत्र! असे तो मुसो से कर ! इस प्रकार माता पितामे बाबा दे दो। बाबा मिलते ही जैसे महानग पी मागकर पसा जाता है सेहत मुगापुत्र मनमाये मर करके संसारको स्वागबर संपा-धर्ममें सामान एमाबोर कपन कामिनी मित्र पु, हाति मौर को सपियों का परिपागी हमा । जैसे मल्को हककर को बाप रामने से होम भी समस्त प्रांत मगर दक्षिा मेरे लिये निकल पा । र पवित्र पांच महामसि पुछ ।
- मृगापुर माषमायोप रामा पाँच समितियोंसे मुशोभित मा त्रिगुमियोंसे गुम हुमा, बाय और मम्यतर शाश सपसे संयुक्त हुमा; ममस्मरहित हुषा, निणकारी हुआ, मियों मारिफे सगसे रहित हुना और इसका समस्त माणियोंमें सममात्र मा । बाहार बर प्राप्त हो अपमा न हा, सुम्स हो या दुस हा, नीयन हो या मरण हा, कोई सति करा अथवा को निंदा करो, कोई मान करा जयका अपमान करो, वह उन सबपर समभाषी एमा । या अधि, रस बार मुम्न इन सीन गकि वहप में विरत एआ, मन, बपनर बार कायदइसे निषा, पार पायासे मुफ हुआ वह मापाशन्य, निगनशम्प आर मिथ्यास्यशान्य इन तीन शम्पोसे रिसमा सात महामयासे भयरहित जा भ्य और शकिसे नित दुमा, निशानरहित हुमा, गग पनपी वधनसे ए गया याचारहित हुआ, सब प्रकारके विलाससे रहित हुआ और काई तयारसे काटे या कोई पनका बिशेप फरे उसपर सममापी हुमा । उसने पापके खाने के सब शराको बद कर Pया यह घुम् अत करण सहित भमभ्यान आदि म्यापारमें प्रशस्त हुआ, जिनेन्द्र-शासनके सत्त्वोंमें परायण हुआ यह ज्ञानमे, आमचारिप्रसे, सम्पानसे, तपसे और प्रत्येक महातकी पाँच पाँच मारनामोंसे अर्थात् पाँचों महालनोंकी पचीस भावनामोसे, और निर्म" तासै अनुगम- मापसे विभूषित सा । अतम बह महाशानी युवराज मृगापुत्र सम्यक् प्रकारस बहुत पर्पता आरम- चारित्रकी सेवा करके एक मामका अनान करके सर्वोष मोक्षगतिमें गया । प्रमाणशिक्षा - सात्वशानियोंगरा सप्रमाण सिदकी हई वादा भावनाओंमें फी समारमाननासोर फरमेके लिये यहाँ मगापुरके चरित्रका वर्णन किया गया है। मुमार जटयामें परिभ्रमण फरनेमें अनत हुमरे या विवेफ-सिरी बार इसमें मौ बिसमें निमेषमात्र भी सम्म मही ऐमी नरक अभोगतिके अनत दु सोको युगक सानो योगीन्द्र मृगापुमने अपने माता पिताके सामने वर्णन किया है। मह बर समारसे मुक्त होनेका पीतरागी उपवा देता है। आम धारिपके पारण फरनेपर तप, परिपह भारि बामद मो इस मानना और महा नभोगतिक भ्रमणप अनत दुमको बहिर्माच मादिनार पुमा मानना, या देगा पैसा भमनिधित्रता है। आम-धारित्रका दुदुम नहीं, परन्तु का परम मुग है, भार बम्तमें बह जनतमुम्म-तरगकी प्रालिका कारण है। इसी तय भोगविलास आरिका सम मौ क्षणिक और महिदप मुम्म केवल तुम ही है, पर मन्नमें भनन दुमका कारण है। यह बात स्प्रमाण सिद करने के लिये महापानी पगापुत्रके पराम्मको यहाँ दिखाया है। इस महाप्रमापवान, महा यशोमान मुगापुप्रकी तब गो सापु तप आदि धीर भाम चाम्नि मारिका पुराचरण करता है, पह उत्तम सानु प्रिटोको प्रमिद आर सोच परममिनिगायक मिदगतिक पाता तसवानी ससारके ममय मामिलए मानपर इस मुगापुरी तरह परम मुम और परमानदफे पारण शान, दर्शन पारिश्रय रिम्य चितामगिरी बारापना करते हैं। महर्षि मृगापुप्रमा सर्वोत्तम चरित्र ( समारभावमाफ गपमे ) ममार-परिभमगच निरपिका और उसके साथ अनेक प्रकार निधियोरा उपदेश करता है । इसके ऊपरसे कर्शनका माम निति- पोर रपर आम-पारिश्मी ठत्तमतामा वगन भरते एए पगापुरका यह पग्नि पहा पूर्ण होतादातरा हानी माहीममार-परिभ्रममा निसि बार मारप उपराग निकविका परित्र विचार करत हो है। ग प्रसार भनन समारमापनाए यो चिम्म मगाउन परित्र समाम मा मीम राबाद [मामामाना सप्तम चित्र भामवमानना माग अविरति, सोय कपप, मब मोकपाय, पाँच मिष्यात और पड़ा योग ये सब मिस्र सत्तावन बाधव शर वर्षात् पायके प्रवेश होने प्रनारिका है। महाविहमें विशाल पुरिकिणी नगरीके राम्पसिकाएनपर पुण्डरीक और फुगडराक नामके दो माई राम करते थे | एक ममय यहाँ तत्वविधानी मुनिराम विहार करते हुए वापे | मुनि सम्म पचनापनसे पुररीक पौधा वनुरत हो गया, और उसने घर मानेके पचात् प्रेरकको राज्य सौंपकर चारित्रको भंगाकार किया । भामा सूमा मसार करने के कारण या पारे समयमै रोगप्रस्त हो गया, इस कारण अतमें उसका भारिप्र भग हो गया | उसने पुरीकिणी महानगरको वचोकवारिका वाकर पा मोर मुखपची पक्षपर ष्टका Pये और यह इस बातका निरंतर सोच परमे गाल का पुरक मुझे राम देगा पा मही ! नरभकने कारकको पहचान लिया | उसमे पाकर पुग्यसे कहा कि पात पातु भारपा भापक भाई अशोक बागमें बरे एहै। कनेहा बापर कारबके मनोगत मायाको धान रिमा, वौर उसे चारित्रसे रंगमगाते देखकर बहुतसा उपस दिया, और बम्तमें रान सौंपकर घर पहा वाया । फागका बाबाको सामत नफ्षा मंत्री मेग को मान मानते थे, और वह गार वर्पतक प्रभम्पाय पालम करके पतित हो गया है, इस कारण सब कोई उसे विकारते थे। मनमे पर होने के बाद पति बाहार र सिमा, इस कारण उसे रात्रिमें बहुत पौड़ाई और पमन मा उसपर अप्राति होनेके कारण उसके पास कोई भी म बाया, इससे एमरक मममें प्रथा कोप उत्पमाला। उसने लियय किया कि यदि इस रोगसे मुझे शान्ति मिले तो फिर मैं सा होते न समको रेखा। ऐसे महानुपानसे मरकर प सात नरको अफ्पण पाप सती सागरको मायुके साथ बनत दुसमें आकर उत्पम मा । जैसा विपरीत वाममार!11 इस प्रकार समम पि बामसमाना समाई। मष्टम चित्र संवरभाबना सभर भातना-बो उपर ना मामाभार । और पापनाधिकाको सर्व प्रकारसे रोकमा ( भाते हुए कर्म समाको रोकमा ) समरमान है। पुंगरीक (कुकरपा अनुसत्रान) कुडरीके मुखपत्ती स्पानिपकरणों की प्राणकर पुारीको निश्चय दिया मुझे पहिले महा गुरुके पास जाना चाहिये और उसके मातही मन जय प्राण करना चाहिये। नंगे पास पाने के कारण उसके पैरोमें कारों और कोटयोंके उमनेसे सनको धारा निकलने Tी तो मी र उपम पालमें समतामापसे समस्थित रहा। इस कारण पा सानुभाष पुंडरी भरकर समप सपिसिदि मानमें सवास सागरकी उस मापुसहित क्षेत्र पुजा । भाप्रसेनाको कमी माशाई और नरमे पुरोगको सो मुम्मा मिसौ !
निम्यमापना] मापमापाप संघरमापना-द्वितीय रष्टात भीपनत्रामी श्रीरस्वामी करन-झामिनाके उम्प-मावस सम्पूर्णसपा परित्यागी ५ । पिसी श्रीमतको रुक्मिणी नामकी मनोहारिणी पुत्री पाम्बाकि उत्तम उपशको अपण परफ उमपर मादित हो गा । उसने पर बाफर माता पितासे कहा कि परि में इस देहस किसका पति बनाउँतो केवस पालामाको ही बना ऊँगी ! किमी दूसरफ साय सम्म न आनेकी मेरी प्रतिया है। रुक्मिणीको उसके माता पितान बहुत बुरा समझाया, भौर कहा कि पगरी ! विचार तो सही कि कहीं मुनिराज मी विचार करत लिने तो वाप्रव-दारको सम्प प्रतिज्ञा रण को , तो भी रुस्मिान न माना | निरुपाय हाकर पनामा सेटन पहुससा द्रम्प बार मनपा सक्मिणीका सायमें छिया, भार नहाँ वमस्वामी मराजते थे, वहाँ आपर उनसे कहा कि इस मौका नाप पयारचि उपयोग करें, इसे बमक-विठाममें काममें है और इस मेरी महासकोमम रुक्मिणी पुत्रीमे पामिण करें। ऐसा करकर मह अपने घर चा पाया। यौन-सागरमें रती भूपको गति रुक्मिान मम्मामाको अमफ प्रकारस मोगोंका उपश Pयार बनेक प्रकारसे मोगके मुसोंका वर्णन किया, मनमाइक हापमान तथा अनफ प्रकार के चसापमान करमेनासे बाक्स उपाप किये। परन्तु मे सब या गर्य । महादरी सक्मिणी अपने मोह-कराम निष्फल हुई। उप्रचरित्र विजयमान गाम्मामी मेरुकी तरह अप भार बार। रुक्मिणीक मन, पचन बार जनक सब उपरेशों बार समापसे ये सशमात्र मी माही रिफ्ले | पमी महाविशाउ सरता देखकर रुस्मिणी समान गई, भौर उसन निधय किया कि य समर्थ विभेन्द्रिय महामा कमी मी पापमान होनेवाले नहरी । छारे बार पत्थरका विषठाना मुठम है, परन्तु इस महापवित्र साधु मालामाको पिघममेकी भाशा निरर्थक ही है, और यह अधोगतिका कारण से पिचार कर उस रुक्मिणीने भपन पिताकी दाई ममीको शुभ क्षेत्रमें गाकर पारिएको प्रहण किया मन, पपन आर कायाको धनक प्रकारस दमन करके आत्म-सम्यामको साधना की, स सानी समारमात्रमा करते है। इस प्रकार बम चित्र समरमानना समाई। नवम चिन . . निर्मरामापना बाय प्रकारफे तपस फर्मकि सम्मको जाफर मम्मीमत पर अपना नाम निभावना है।वाय प्रकारके वाम प्रकारका बाप भार स प्रकारका बम्पतर तपा भनशान, उगा सतिसक्षेप, रसपरियाग, कायाश भार मानता ये एह बान्न तप । प्रायभिच, निय, पाय, कासपटन, पाम, मार म्योप्सर्ग ५ छह मपंवर तप । निर्मग हा प्रकारफी - काम निर्बरा भार इमरी सकाम नि । निजपमानमार हम एक छि-पुत्रका दर्शन पाहत है। साहारी रिमी मानणने अपने पुत्रको ममम्पसनका मकवानपर वपन परम निकाल लिया नहर नित पन, और जाकर भागा माली मा मिठा । उस माडीक अगुभान तम मान काममें परमी मुकर उसे माना पुत्र बनाकर रखामा । पर त्रिपुत्र दुणेक गमन रनमें उपहार सिदामा, इमुक उपरम इसका उपनाम एप्रहारी पहा । यह लाहारी चाय बगुभा से गया, और नगर मार मार्मोक मास करनमें प्रबल छाताबाठा सिट मा । उसन मातम प्रागिपॉफ भीमद् जाम्य प्राग निये । एक समय भपन साथी राकुओंको पर उसने एक महानगरको मुना । पहारी पक विपके घर बटा पा । उस विपके यहाँ वात प्रेमभाषसे धार-मोजन बनाया गया था। उस धौर-भोग्नके भाननस उस पिके पापा मारक चिफ ये थे । राप्रहारी उस भोगनको छने भगा | मामान श्रा, हे मर्मराज ! इस क्यों ना है। यह सिर हमारे काममें नहीं बावेगा, तू इतना मी मी सम- मना । सपहारको इन वजनोंमे प्रथा का वा गया, भार उसने उसीन सोको मार गडा । नहान महान ग्रामण सहायता सिप न अाया, उसने उसे मी परमको पचाना । इनम परमसे एक सी ई गाय पापी भीर यह अपने सारे प्रहरीको मारने गी । उस मारने उसे मी कारके सुपुर्द की । उसी समय इस गापक पेटमेंसे एक बा निकलकर नीचे पड़ा । उसे फता देत समायो मनमें गात या पधायाप हजा! मुझे विकार है कि मैंने महापोर बिसार कर Tठी अपने इस पा से मेरा का ठुटकारा होगा! सचमुच धाम-काम्याणक साधन करनेमें ही महै। ऐमी उत्तम मावनासे उसने पपमुषि कशठोंच किया । यह नगर के किसी मुहमें वापर उप्र कापासर्गसे अवम्वित । गया । सपहारी पहिस इस समस्त मगरको सतापका कारण हमा था, इस फारम गेगोंने इसे अनेक तरइस संताप देना आरम किया | वा पाते हुए गोगोंके भूस-मिशी बार इंट पर फेंकनमे बार सम्मारकी मटसे मारनेसे उसे कपात समता मा । यहाँ सोगाने गे महिमेतक उसका अपमान किया । बादमें जब मग पफ गये तो उन्होंने उसे डोर दिया। समारी हाँस कापासर्गका पाउनकर दूसरे मुझमें ऐसे उप्र कापासर्गमें अवस्थित हो गया। उस Pिart Pान मी उसका इसी तय अपमान किया। उन्होंने मी उसे टेक महीने तंग करके छोप Pया । होस कापणका पापनकर सहारी हौसर मुहहमें गया। पाके छोगोंने मी उसका इसी तर महापमान किया । पास मे महीने बाद पपीय मुदमें रेप मासतक का । माँ अनेक प्रकारके परिपोका समनकर पर ममा डीम या । 1 मासमें अनंत कर्म-समापको बताकर जायन्त पुराने पह धर्मरहित हो गया। उसने सब प्रकारके ममका त्याग किया । पा अनुपम कम्यवान पाकर मुहिक भनत मुखानइस मुलाया। यह निरामाना समय- दशमचित्र लोक्स्सस्पमापना कसनपभाना -'म मातना समप यहाँ सशेपम छना है। पर पुरुष दो हाप कमरपर रखकर पर पारे करके सहा हो तो बसा ही कमाल अपना मोका सम्म बानमा बाटिप। पाक सम्पनिर धाक आकारका . अपना खरे पर्दगक समान है। गोरके मात्र मुखमपति पतर र सान मर है। मध्य भागमें, भारी, उपर गाए देशाक, ना पर, पाँच भनुतर विमान और उनक उपम भनन सुखमय पवित्र विगतिको पोसी सिमशिण है। पर अमाक प्रयाक सत्र सनशा भार निरुपम केवगानिपाने का है। संक्षेपमें सोफम्परप मारनामेछा। इस निमें पा-प्रमाशिकाको रोगमफे लिए मानमात्रमा और स्वरमानना तप महासडक मिसे नियमातना भोर अपमएका मानफ यि सम्पमा नाप इस बार चिोंमें पूर्ण हुई। वहम पिम समाप्त ।
विविध पत्र आदि सग्रह १९वा वर्ष ६ बि स १९०२ रेवादियो ! मुझे हमारे लिये एकांतवाद ही शानकी अपूर्णताकी निशानी विसाई देती ।। क्योंकि जैसे नवसिम करि लोग कान्पमें जैसे से दोपको रिमानेके लिये 'ही' शम्दका उपयोग करते हैं, बैस ही तुम मी नमसिमे पानसे 'ही' वर्षात् निश्चयपनेको कासे हो। हमारा महावीर इस तर कभी भी नहीं कहेगा । यही इसकी सकषि जैसी चमचति ।। सपनामृत वि स १९९३ कार्तिक १ पा सो बस सिखात मानो कि सपोग, रियोग, मुछ, दुस, सेद, आनद, भाति, अनुराग इस्पादि योग किसी पथस्पित कारणको लेकर होते है। २ एकांतमानी वयना एकांत म्याफ्दोषको न मान बैठमा । १ किसीका भी समागम करना योग्य नहीं। मबतक ऐसी दशा न हो तबतक अवश्य ही सत्पुरुषों के समागमका सेवन करना उचित है। निस म्यके मन्तमें हम उसका सम्मान करते हुए प्रयम विचार करो। ५ पहिले तो किसीको बत्त करण नहीं दना यदि दो वो रि उससे मिमता मही रसना, परि तकरम देकर मी मिमता रम्तो तो मत करणका देना न देनेके ही समान है। ५ एक भोगको मोहात हुए मी कर्मकी दि महीं करता, धौर एक मोगको मही भोगते हुए भी धर्मको रवि करता है। या माचर्यकारक किन्तु समप्ने योप कपन है। ७ योगानुपोगसे बना मा एय यात सिमि देता है। ८ हमने मिस्से मेव-मालको पापा हो उसको सर्वस्व वर्पण करते ए माही हकना । ९ तब ही छोकापमान सहन करना गय किये हो डोग स्वय किये हुए अपमादका पुन पश्चाताप करें। १०हगारों उपशाक पचन सममको मपेशा उनमेंसे थाई पपनाको विपारमा ही शेष कापाणकारी। ११ नियमपूर्वक किया हुमा काम शौनतासे होता है, मार सिद्धि देता है, बार मानन्दका कारण होता है।
[. भीमद् रामचन्द्र १२९ पम्मत १२ शानियोशण एकत्र कोई कहत निधिक उपभोगी बना। १३जी बातिमें जितना माया-कपर है उतना भोगापन मी है। १० पहन करमेका अफेया मनन करनेवी बोर विशेष व्स देना । १५ मापुरपके पाचरण स्नको वफेवा उनन्तकरण देखना यह अधिक उसम है। १५ पचनससरातको पुनः पुन स्मरणमें रस्सो। १७ महारमा होना हो तो उपमादि रसो सम्पुस्पके समागममें यो माहार, EिR मादिमें बम्प और नियमित यो, मशासका मनन करो, बार ची श्रेणी में रुस रक्थे । १८ पति नसे एक मा म से तो स्मसकर यानंद रसमा साँसो । १० मा में बालक बनो, सत्यमें युवा बनो, वौर शानमें भर बना। २. परिसे तो रण करना ही नहीं, यदि परमा हो वा सपुस्पपर करना इसी तरा पहिले तो देप करना ही नहीं, पौर यारमा हो ता मुशासपर करमा । २१ जनतबान बनवान, ममतचारित्र वीर अनंतपास अभिम एसी आमा एक पर भर मी तो विचार करा। २२ निसने ममको बसमें किया, उसने जगदको वश किया । २१ इस समारा क्या करें । मनतबार ई मौका ही वाय हम मौरूपसे भोगवे है। २४ निर्मपता मारण करनेसे पहिले पूर्ण विचार करना इसके चरण दाप गानेको अपेक्षा अपारमा हाना। २५ समय पुरुष कल्याण समए पुकार पुरकर र गरे, परतुर किसी किर हेही यापमापसे समझमें आया है। २६ मीर सरूपपर होनेवाले महको राम्मे सिये तचा नाके उसके भपका पारंवार पितान करना पम्प है। २७ श्रम मे पर किया जा सम्रिया पार नौरग करता है से कुपात्र मी सत्पुरुपके रस्मे र हापस पार बन गावा। २८ स निरो लोमानेसे दो ही पाते। उसी तरह परिवारमाका सरस सम्प परशुर मुहिम मयत मौरभालिसे मिल ही मासित होला। २. पपा पन प्रण करनमें दम नहीं बना, भीर मे पचनाके उपरेश देनेगाडेका उपकार मुगाना महो। ३.:मने पल पार करक इस मूष मतको मोर की है कि-'गुस बमपरी गनिमय नही । १पपरा रमायरमा उमादापमा मागियाहै ना। १२ निर्माणम भापास चार घरमा पाप है। ~ , .परनामृत] पिविष पत्र मादि सपा-कौ पर्प २२३ ३१ नहाँ मैं ' मान रहा है यहाँ 'ह' नहीं है, और जहाँ 'तू' मान हाईको 'तू' नहीं है। ३१ हे गौरा मोगसे शांत हो, शांत 1 बरा विचार तो सही कि इसमें कौनसा मुम है। ३५ मात दुचियामानेपर स्सारमें नहीं बना। २६ स्थान मौर सशीलको साप साप माना । १७ किसी एक बस्तुसे मैत्री नहीं करना, पदि करना ही हो तो समस्त जगत्से करना। १८ महासौंदर्यस पूर्ण देवांगनाके कोश-विलास निरीक्षण करनेपर मी मिसके तकरणमें कामसे अधिकाधिक वैराग्य प्रस्फुरित होता हो उसे पन्य है उसे त्रिकात नमस्कार है। १९ भोगके समयमें योगका स्मरण होना यह मुकमाका प्रमण है। १० पदि इतना हो जाय तो मैं मोशकी इम न करें समस्त सरि सशीलको सपा करे, नियमित मायु, मीरोग शरीर, मचस प्रेम करनेवाली सुन्दर बिया, बावानुमती मनुधर, पुल-दीपक पुत्र, जीवनपर्यत बाल्यावस्पा, और आत्म-तत्तका पितवन । ११ किन्त ऐसा तो कमी मी होनेवाय महीं, इसलिये मैं तो मोधकी ही म करता है। १२ सहि क्या सर्व अपेक्षासे अमर होगी ! १३ पुस निर्जनस्याको मैं बस मानता हूँ। ११ सृएि-सोलामें पतिमाबसे वप पर्या करना या मी उचम है। १५ एतिक कफ्न करमेबाला पानी नहीं कहा बा सकता | १९ पुस्ल वंत करणके बिना मेरे कपनका कौन साफ करेगा। १७ बातपुत्र भगवान् कपनकी ही महिलारी है। १८ देव देवीको प्रसपावाको हम क्या करेंगे । जगत्को प्रस्मसाको हम क्या करेंगे। प्रसमता- की इशा करो दो सत्पुरुपको करो। १९ में सचिनन्द परमात्मा हूँ। ५ पदि तुममें वफ्नो बारमाके हितके ठिप प्राति करनेकी ममिगपा रसानेपर मी इससे निराशाई तो उसे मी अपना माम-हित ही समझो । ५१ पदि अपने मुम विचारमें सफल न हो, तो स्थिर बिसे सफल हुए हो ऐसा समयो । ५२ बानीमन नवरग मेद और पसे रहिव होते हैं। ५३ यहाँवक उस तलका प्राप्ति न हो हातक मोक्षका सार नहीं मिग । ५१ नियम पानेको जता करनेपर मो पर नहीं पता, या पूर्वकर्मका ही दोर, ऐसा हानियों का कहना है। ५५ ससाररूपी उरके पर मफ्नी मारमा पाहुनेके समान है। ५६ भाम्पशाली हो । यो दुर्भाम्पदापर दया करता है। ५७ महर्षि घुम इम्यको शुम मात्रका निमित्त प्रते है।
भीमद् पमान [. पकनाव ५८ स्पर चिउसे धर्म और पुस्खम्मान प्रापि करो | ५० परिमाकी मर्ज पापका मूल है ५. जिस स्पके करते एमप मामो मे में ग्रते हो, और क्वमें भी फातरो हो, वो मानी छोग उस एपकी पूर्वकर्मजोरपते है। ११ मुझे जा भरत और किती जनकको दशा प्राप्त होगा। ५२ गोम्पुरपाय भवकरणपूर्वक माभरण किया गया हैभपना कहा गया है, यही धर्म है। १३ रिसको भतरग मोहका प्रपा नए हो गई हो ही परमात्मा है। ६१ मतको र उसे वहसमुख परिणामसे मग नही करना। ५५ पकमिष्टासे हानीको भाका वापधम करनेसे तरचान प्राप्त होता है। २६ त्रिपा हो कर्म है, उपयोग हो धर्म है, परिणाम हो, भ्रम होमियाल, शोकको स्मरण नही करना पे उत्तम वस्तु मुझे शानियोंमे दी है। २० अगर जैसा है उसे तमानक पिसे पैसा ही देखो। १८ श्रीगौतमको भार का पाठ किया आ देसनक डिपे श्रीमान् महावीरस्वामाने सम्पन् नेत्रदिये थे। १९ मगरता जो हई पुरस नामके परिणायकको कथा तत्कालियोका का जा र यस्प। ७० पोरके छाए गायोमें मुमहरी बचन यहाँ व्हो मम्मा गसग और गुम। ७१ सम्मन्नेव पाकर तुम चाहे निस किसी धर्मदामका मनन करो तो भी उससे ही नाम- रित प्रास होगा। ७२ बरत ! पर तेरा प्रबड न्याय है म विचार कोई मतिसे तू मेरा कर म्पताल नही कराती ! (परत गति पूर्वकर्म )। ७५ मनुष्य । परमेपर ऐ गाता है, ऐसा शामाजन है। ७९ उत्तरायपन नाम चैनम्मका तत्तापिसे पुन पुनः पलीकन कये। ०५ जाते हुए मा ना सके तो फिरसे R मरना परे, पेसे मरणको इन्सारमा पोम्प है। ७५ मुझे समता के समान बम्प कोई मी महाग्रेप महोगता । ७० गात्म पदि मान म होता तो यही मान दी। ७८ वस्तुको वस्तुमापसे लो। .९ पर्मा मम । ८ रिचा उसीका माम सिरिस्मे अपिपा प्राप्त न हो। ८१ क क क पापको भी समझो। ८२ महंघर, सनता, उम्मूम-प्रमपणा, मकिपम ये दुर्गतिरे पत्रण है। पहनावा मार मार दुए रतन पिस लावि Aa, Rथ, ना और योनी गोमुता।
पनामव] विविध पत्र मादि संग्रह-1ो वर्ष ८३ का कोई अग सेशमात्र मी मुखदायक नहीं तो भी उसे मेरी देह मोगता है। ८१ देह और दोहके लिये ममत्व यह मिथ्यात्वका एवण है। ८५ मिनिवेशके उदयमें प्ररूपणा न हो, उसको मैं ज्ञानियों के कामेसे महाभाग्य कप्ता हूँ। ८६ स्पावादीलासे देसनेपर कोई मी मत असस्य नहीं टयरता । ८७ जानीवन स्वादके स्पागको बाहारका सन्चा स्पाग करते है। ८८ मिनिवेशके समान एक मौ पासा नहीं है। ८९ इस काममें ये बातें कही-बहुक्से मत, महतसे सत्वद्वानी, पहुतसी माया, मौर बहुससा परिग्रह। ९० पदि तत्वाभिवापासे मुझसे पूछो तो मैं सुमें मास्य गगरमित भर्मका ठपरेश दे सकता। ०१ बिस्ने समस्त मगरके शिष्य होनेरूप प्रष्टिको नहीं जाना यह सरु हाने योम्य नहीं । ९२ कोई भी गुदागुर पर्म-क्रिया करता हो तो उसको करने दो। ९३ वारमाका धर्म बारमामें हो। ९. मुसपर सम सरतमानसे बाबा घसममें तो मैं सुशी हूँ। ९५ में ससारमें सेशमात्र मी रागयुज नहीं तो भी उसीको भोगता है, मैंने कुछ न्याग मही किया । ९६ मिर्षिकारी दशापूर्वक मुझे अकेला पर्न दो। ९७ महापारने जिस शानसे जगत्को देसा है वह मान सब मामाजोंमें है, परन्तु उसका लानिर्मान करना चाहिये। ९८ बहुत ऊब मामो तो भी महापारको बाहाका मा मही करमा । चाहे जैसी शाशे वो भी मेरी तरफसे वीरको मोरिणत मानना । ९९ पार्सनापस्लामीका म्पान योगियोंको भाग्य स्मरण करना चाहिये । निश्चयसे मागको एम-आपाके समयका या पार्श्वनाप कुछ और हो पा ! १०० गरमकमारको खमा, और रामीमती मो रहमेमाको बार देती है यह पोष मुझे प्राप्त होगी। १.१ मोग भोगनेतक (योतक उम कर्मका उदप है यहाँतक) मुझे पोग ही प्राम यो! १०२ मुझे सब सामोंमें एक ही तल मिला है पदि मैं ऐसा करें तो यह मामाकार मही है। १०३ म्पाप मुझे बहुत प्रिय है। पीरफी शैली यही पाप है, किन्तु इसे समझना दुर्तमी। १०. पवित्र पुस्पोंकी पाणि हो सम्पदर्शन है। १०५ महरिका मा मा मत पिपुर-दिमे विचारनेम बानकी बहुत वर्म-दशा होने तक रहता है। १. मैं किसी मौ धर्मसे विहर मही, मैं सब धर्मोफो पाठना ; भार तुम सब पाँम विस्म हो ऐमा करमेमें मेरा भाशय उत्तम ।।
भीम राबाद [पनाम १०७ अपने माने हुए धर्मका मुझे किस प्रमाणसे उपदेश करते हो, या चानना मुझे नम्री । १८ शिपिट बधन पहिसे नारे बावे बाते ही विमर पाता है। (यवि मिरा करना माता हो तो~) १० मुझे किसी भी वाममें पांच न हो। ११० पे लोग तु सके मारे गए मेरम्प कर जगत्को समर्म गम है। १११ इस समय मै कौन ! इसका मुझे पूर्ण भाग नहीं। ११२ सत्पुरपका शिष्य है। ११५ यही मेरी बाया। १११ मुझे गमकुमार बैम् कोई समय प्राप्त होगा। ११५ कई राजीमती जैसा समप प्राप्त होगी। ११६ सपुस्प ते मही, करते नहीं, तो मी उनकी सत्पुरुपता उनकी निर्विकार मुस-मुद्रा ११० सस्थानविषपप्पान मारियों को प्राप्त होता होगा, ऐसा मानना योग्य माइम हाता है। तुम भी उस पाम करो। ११८ वामाके समान और कोई देव नही। ११९ भाम्पशाग कौन ! मपिरति सम्पमरि अपना निरनि । १२ किसीको बानिका नही तोपना । बम्ई कार्तिक १९०३ १ प्रमादफे कारण बारमा अपने प्रश्न ए सापको भूल जाता है। २ बिस बिस कामों को दो करना है उस को सश उपयोगमें रस्से यो। १रि उसको कमसे सिदि करो। १ मप बाहार सम्पपिहार, जाप निवा, निपमित पाणी नियमित कामा वीर अनुरण स्पान, ये मनको वश करने के लिये उत्तम सायन । ५ मे पस्तुको शिशासा करना पड़ा मामाकी मेहता है। काचित् पद निसा पूर्ण सरो सके तो मी पर क्षिासा चप उस मेस्ताके वाले समान है। एमपे पाका मही करना और पुरानों को भोग सेमा, ऐसी रिसको वा मिनासा है पद तनुसार भाचरण कर स्वत्व है। ० सि सम परिणाम पर्म नदी उस सत्पको करनेकी इस से दीदने देमा पोप नही। ८ पनि मन संचशील हो गया हो तो उम्पानुमा चमचारना योग्य है। प्रभारी से सगरमान] विविध पत्र मादि संपा-१५ौ पर्प १२७ . , पा हो सो 'चरणकरणानुयोग' का पिचारना योग्य है, कषायी हो गया हो तो 'पर्मकपानुयोग' विचारना पोम्प है और ना हो गया तो गणितानुयोग' का विचार करना योग्य है। ९ कई मी काम हो उस कामको निराशाको इच्छा करना, फिर जन्तमें जितनी सिदि हो तना ही काम ना समझो, ऐसे करनेसे स्तोषी रह सकते हैं। १० यदि पृषीसमधी झेश हो तो ऐसा समझना किमा साप मानेवाली नहीं, उम्टा में 7 उसे कपनी देहको देकर चला नाउँगा; तपा यह कुल मूल्यवान भी नहीं है । यदि सोसाधी देश, शका, भौर भाव हो तो यह समसकर अन्य मोक्तामोंके प्रति सना कि अरे । त् मम मूत्रकी नमें मोहित हो गया (मिस बस्तुका दम निस्प त्याग करते है उममें )! यदि धनरंबधी निराशा स्यमा क्लेश तो धनको मौ च प्रकारकी एक फैकर समझकर सतोय रसना, तो कमसे नस्पृही हो सकेगा। ११ तू उस वोपको पा कि निससे तुझे समाधिमरणको प्राप्ति हैं। १२ यर एक बार समापिमरण हो गया सो र्म कालका असमाधिमरण दूर हो जायगा | १३ सर्वोत्तम पद सपत्यागीका ही है। ९ - स्वरोदयज्ञान यमई, कार्तिक १९०३ यह खरोदयाहान' मप पानेवालेके करकमलोंमें रसते हुए इस विषयमें कुछ प्रस्तावना छिसनेको भारत है, ऐसा समाकर मैं यह प्राप्ति कर मा।। हम देख सकते है कि ये पानकी मापा भाभी हिन्दी और आधी गुजराती है। उसके का एक मामानुमपी मनुष्य पे; परन्तु उनोंमे गुनराती मोर हिन्दी इन दोनोंमें से किसी मी माषाको नियमपूर्वक फा थे, ऐसा कुछ भी माराम मही होता । इससे नको वारमशक्ति मपया पोगदशामें कई बाधा मी भाती वीर इनकी मापाशाली होनेकी मी कोई इच्छा न थी, इसलिये इन्हें भपने आस्को गो कुछ नमुमरगम्प वा उसमेंका छोगोंको मर्यानपूर्वक फुल उपरेशनेकी निकासासे ही इस प्रेयको उत्पति, बार ऐसा होने के कारण ही इस ग्रंथमें मापा जपमा उदको टोपगप षयमा युधि- प्रयुक्तिका बाधिस्य वेसनेमें नहीं पाता। जगत् नब मनादि वमत है तो फिर उसकी विचित्रताकी भोर क्या विस्मय करें , धाम कदाचित् बहला के सिप जो सशोधन पस गार भारमबारे उमा दनेका प्रपरन है, परन्तु ऐसे मी मनतकाठ बापे है सब कि बारमबारका प्राधान्य था इसी तर कमी गहमादका मी प्रापम्प था । तत्तानी छग इसका कारण किस्प Aचारमें पा नहीं पाते, क्योंकि जगत्को ऐसी ही स्थिति किर विकम्पोंशय बारमाको पो दुसाना। परन्तु स्मारनामोंका त्याग फरनेक मार जिस बस्नुभनु मा हुमाया बस्तु है अर्थात् अफ्ना और पराया पाप इस प्रमके उत्तरमें इस बातका निर्णय किया कि अपना अपनाहीवार पराया पराया ही हो इसके बार तो मेदाति होमही । फम यहामा कि . भीमद् पासवान [९मनारमन एनको सम्पत्ततासे उनकी यही माम्यता हो कि मोहामीन मामा बपन वापको भर माफ्ना साकार कर लेता है, इसमें कोई नाचर्प नहीं। फिर उसका स्वीकार करना शम्पको तकरारमें ९ (२) पर्तमान शताब्दिमें वौर फिर उसके भी कुछ वर्ष म्पतीत होने तक चिदानन्दची बात्मा मौन थे। पात ही समापका समय होमेके कारण लिनको उनका दर्शन, समागम, और उमकी दशा अनुभव वा ऐसे प्रतीतिमा कुल मनुष्योंसे उनके लिपपमें फुल मागम हो सका है। इस विषयमें बर मी उन मनुष्योंसे नए नाना जा सकता है। सनके मैनमुमि हो जाने के बाद बफ्नो परम निर्विकल्प दशा हो गामेसे उनें गान पान किये बर कमपूर्वक दम्प-क्षेत्र-कार-मावसे पम-निपमोच्च पासन म कर सकेंगे। तामियों की मान्यता है कि मिस पदार्थको प्राप्तिके लिए यम-नियमका सम्पूर्वक पान किया जाता है उस बस्तुको प्राप्ति होने के बार फिर उस मेणासे प्राचि करना वपया न करमा पोनों समान है। सिको निर्मप-अपचनमें अप्रमत्तगुणस्पानवता मुनि माना है, उसमेंको सर्वोत्तम पालिके म्पेि कुछ मी मही कहा जा सकता, परन्तु केवग उनके पचोंका मेरे वनुमसानक कारण परिचय होनेसे ऐसा का पा सका कि प्राय मध्यम मप्रमपदशामें थे। फिर उस दशा पम नियमका पान करना गौणता पा जाता है, इसलिये बाधिक कमानन्द के लिये उन्होंन र दशा स्पीकर की । इस समय ऐसा दशाको पारेर मात । पोडे ममुम्योंका मिना मी मा कठिन है। उस अस्पामें अप्रमतताविषयक मातको वर- माझ्ना मासानीसे हो नायगा, ऐसा मानकर उन्होंने अपने मागमको ममियतपासे और गुरारूपसे वितापा। पदि ये ऐसी ही दशामें ये होत तो पातसे मनुम्प उमके मुनिपमेकी शिपिस्ता समझते और ऐसा समझनेसे उनपर ऐसे पुरुपका उम्टी हो मप परती । ऐसा हार्दिक निर्णय होनेसे उन्होंने इस दशाको स्वीकार की। 1 जैस बुक स्पागसें बिनसव नहरी राजेग, देर स्पागर्से नार पनि वैस राव ममम-भौचिदान जैसे काँचमका त्याग करनसे सर्पका नाश महोवा मे होकर स्पाग करनेसे जीका मी भाग मही ता अर्थात् यो वर्मग ही यता है। इस कपनरारा गोत्रको देशसे मिम सिम किया है। मात्तसे मंग ऐसा मानते है और करते ₹करेह और आप मिमता नही मार देशका नाप होनेसे पौषका मी नाश हो जाता है, उमा पर कपन केबस विकम्पपी प्रमाणभूत नहीं कारण किये काँधमाक मारासे सर्पका मी मारा होना समझते हैं। भार या बात तो प्रत्यक्ष अँधमा पागसे सर्पका मारा नहीं होता । यही बात मानक किसे मी समझनी चाहिये । देश का दावठीमात्र । अबतको सकि साथ भोई, तबतक से बस सर्प ।
- १० वयातक तपमै विचार ] विषिष पम मादि संप्रह-५९यों वर्ष ૨૨૧ पटता है, से बसे कारी मी साथ साथ चम्मी , उसके साप साप ही मुमती है, अर्थात् काँचतीकी सब किया सर्पकी क्रियाके वाचीन राती है। योही सर्पन कॉपटीका त्याग फिपा कि उसके बाद फाँघटी उनमेंकी एक मी क्रिया नहीं कर सकती । पहिले महगो चा रिया परती पीये सब क्रिया कपल सर्पकी ही थी, इसमें काँचठी केवल सवपस्प हो यो । इसी तह से जाम कर्मानुसार क्रिया करता है ममा ही मर्ताम यह दे मी करती है। यह चलती है, बटता है, उठती है, यह सब जीवको प्रेरणासे ही होता ह । उसका वियोग होते ही इनमेंसे कुछ भी नहीं रखा। १ मानिश मपिका मम लगाय, मोगानस परमादि जगाप, मसागर भासन र नपनयफी निद्रा परहर। मत दिन पान-विषयमें मात प्रेम टगानेसे योगरूपी अमि (कर्मको ना दनपाची) घरमें नगाने । (यह मानों पानका जापन हुआ।) अब इसके अतिरिफ उसके पूरी साधन बताते हैं। थोपा वाहार और आसनकी पता करे । यहाँपर मासनसे पप्रासन, पीपसन, सिमासम अपना चाहे जो आगमन हो, जिसस मनोगति पारकर इधर उपर न माप, ऐसा भासन समाप्सना बाहिये । इस तरा वामनका बप करके निवाका परित्याग करे । यहाँ परिप्पागसे एकदेश परिस्पागका बाप है। योगमें निस निवासे बाधा पहुँचती है उस निद्राका मात् प्रमत्तमाफ कारण दर्शमावरणीपकी रवि प्रत्यादिसे वत्पम ई निदाका अपना वासिक निवाका स्पाम करे । । जीवनस्पके संपपमें विचार १ जीव तत्वको एक प्रकारमे, दो प्रकारमे, वीन प्रकारसे, चार प्रकारसे, पाच प्रकारसे बार ध्य प्रकारसे समझ सकते हैं। ब-सब गीतों कमसे कम भुतवानका क्नवर्षा माग प्रमाशिव यवा इसलिये सब गार पैम्प माणसे एक ही प्रकार हैं। नो गरमीर्मम एम्पा भाषे, डापासे गरमा गाय जिनमें पख्न किरमकी शकि, गो भपाठी बम्नु दसकर रस , ऐस बाबोको मातिको प्रमुकाते हैं। पानके सितापके रोगील एक ही जगहमें पित यते हों, ऐसे गीतोंकी गतिको स्पावर काइते है। इस तर सब गौर दो प्रकारोंमें भा गान हैं। पदि सब गायोंको केदकी पिसे देसतेरे ठोसी, पुस्प भौर नपुंसकोदमे सबका समावेश हो जाता है। कोई जीव मापे में, कई पुस्पबेदमें और कोई नपुंसको में यते है। इनके सिवाय कोई चोथा ये महीं है इसठिये बेवारिसे सब सीब तीन प्रकारसे समा गा सकता है। महतसे नाव नरकगतिमें रहते हैं, बहुत से लिपंपगतिमें यत है, पावसे मनुष्पगतिमें रत है, और बातसे देवगतिमें रहते हैं। इसके सिमाप कई पचिनी ससारी गति नहीं है इसलिप और पार मकरसे समझे मा सकते हैं। १.
भीम पमबन्द्र जीवाजीव विभकि बि स १९९३ जीप बार बनायो विचारको एकाम मनसे अवम करो | मिसक जानमसे मिनु भोग सम्पक प्रकार सपममें फन करें। नहाँ चार और बनीष पाये जाते है उसे मेक . • करा है, और भजीबके के बाकाश या मागको अत्मक कहा है। शारीर वीरका हान सम्म, क्षेत्र, कास और मापसे रो सकता है। हमी मीर वनपीके मेदसे बगीरके दो भेद होते है। मल्पीके दस मेद, तथा कपीले चार भैद करे गये। पस्तिकाप, उसका देश वार उसके प्रपा वधर्मास्तिकाय, उसका देश मीर उसके प्रदेश) नाकाश, उसका दश और उसके प्रदेश क्या अर्बसमयकार इस तरह बरूपीके रस मे हो । भर्म बार मधर्म इन दोनोंको कोक प्रमाण है। बाकाश होकामेक प्रमाण बार मसमप मनुम्पधन-प्रमाम है। धर्म, अधर्म और वाकाश येनार अनंत । निरतरको उत्पतिको अपेक्षासे समय भी बनानि मनती । सतति नात् एक कार्यको अपेमासे पा सादि सान। संप रकन देश, उसो प्रदश वीर परमाणु इस प्रफर ससी वर्गव चार प्रकार। परमाणु भोक एकत्र हानेसे, मार निमस में पृपक् ते ? उनका स्कंभ करते है। उसके विमा गोदेश, और उसक अतिम अमिम बंशको प्रशा करते हैं। रसभ कक एकोप म्प है। इसके बाद विमागस चार प्रहार कडे जाते हैं। पे सब निरंतर उत्पत्तिको अज्ञासे भगादिवत है। वर एक क्षत्रकी स्थितिमी मफेशामे सादि बनाई १९१३ पाप बदौ १० पुषपार बिहक मम उन्होंने जामिति निषित की। परि इस विषयमें उनका वाहतोपा मिति मसती निषित रही। हमार प्रति न होनपर माँ या किसी पर्गका समम बहुत उपयोगी आ सकती है, ऐसा माइम हानेसे मीन धारण करफ में यहाँ उसो सांपमें उसकी मम्पपस्या करममें गा मा पा। एम म्यरम्यामा भमौर परिणाम भानैमें बहुत समप न पा पान्नु इनकी परफका पण ममतमात्र सोना करना जिसने स पुरा पा मारकर बी १३ मा १२ (पीपी) और पास रगामा होना।
पर १२] विषिष पम मादि संप्रह-१९याँ पर्प परोपकार करते हुए मी यदि कदाचित् छदमी बधापन, पहरापन, शृंगापन प्रान कर दे तो उसकी भी परमा नहीं। वरना जो परस्परफा स्पोप कुछ हितेदारीका नहीं, परन्तु दप-सम्मिडनका है । यपपि ऐसा प्रकट ही है कि उनमें परस्पर छारे बौर तुम्बकका सा गुण प्राप्त हुमा है, तो मी में इससे मी मिमवापसे भापको इसमप करना चाहता हूँ । सब प्रकारके समीपमेको बोर ससार-पोजनाको दूर करके ये विचार मुझ सत्मविज्ञानरूपसे बताने इ, भौर उमें आपको सप अनुकरण करना है । इतनी बात मात मुखमा हानेपर मार्मिकमपसे बामवरूपक विचारपूर्वक यहाँ सिमता हूँ। क्या उनके उपमें ऐसी सुन्दर योगना है कि शुम प्रसगमें सदिकी और स्मीसे प्रतिका ग सकते है निस्से परस्पर कुटुम्बसपसे स्नेह उत्पन हो सके' क्या आप ऐसी योमनाको करेंगे। क्या कोई दूसरा ऐसा करेगा ' या विचार पुन पुन लपमें जाया करता है। इसीलिये सापारण विकी मिस विचारको हलाई समझते है, तथा जिस बस्तु जार मिस पदकी प्राप्ति बान सम्पनी चक्रपती शिक्गेरिपाको भी दुर्सम और सर्वथा भसमय है, उन विचारोंकी, उस वस्तुकी भार उस फकी वोर सम्पूर्ण इम्मा होने के कारण यह जिम्मा है। यदि इससे कुछ संशमात्र मी प्रसिद्ध हो तो उस पाभिमापी पुस्पके चरित्रको पहा कलंक लगता है। इन सब (इस समय छगनेबार) हाई विषा- रोको में केनर मापसे ही करता हूँ। बंत करण मुक महत विचारों से भरपूर है । परम्तु वाप यहाँ हे या यहाँ र, एक हो पाती। - २०वाँ वर्ष १३ बाणाया १९९१ पैत्र एतरी ११॥ रवि पणभगुर दुनियाम सत्पुरुषका समागम होना पही अमाप वौर अनुपम नाम है। पवाणीया, मायाह दी ३ सुध १९११ पह एक बहुत बात है कि- चार पाँच दिन हुए या मोसमें, एक मेटापक मा निबर्गको पराका प्रकाश वा करता है, गो बोससे परा दूर जाकर वास्प हो आता है। या ध्गमग पाच मिनिटतक होता राता है, वपना पाँच मिनिटतक दिसई देता है। मेरी पिमें बारम्बार देसनेमें बता ससपमें किसी प्रकारको मी ममणा मही।सका कोई निमिचकारण मी माइम नहीं होता। इससे पार पापर्य पैदा होता है । माँसमें दूसरा किसी भी प्रकारका विकर नदी किन्तु प्रकाश वर Pम्यता विशेष रूपसे पा करनी है । माइम रोता है कि ममग पार दिन पहिले दुपहरके २-२० मिनिटपर एक माधर्षपूर्ण लण मानेके गार पर सका है। मत करणों गात प्रकाश ना करता है। शति पात वन पहा करती है। प्यान समाधिस्य दवा है। कोरण समत, मही वावा । पर बात गुप्त रखने के लिये ही प्रगट करता हूँ। मस इस स्वपमें विशेष फिर मिलगा । मामांपा, १९९१ भाषण दी १५ सोम गई बाल सभी चमत्कार मामणि पोड़ा फेरफार वा। वाणापा १९०० बाप ही पूल वाप बर्मका सरकारी न रम् । शरीर मौर वास्मिन-मुहकी इण करके म्पपका पुस सकोच करेंगे तो में समगा कि मेरे उपर उपकार बा । मनितम्पपाका माल होगा ता में बनुन समय मिस्नेपर मापके ससंगका बाम उदय सड़गा। १७ बबाणीया १९११ मारण ही ११ समास्या उपादि कम है या मानंदकी बात । धर्म क्रियाने सिमे वक्त मिता होगा। पाहिपाका पोगा समय मिकता है। वाम-तिरिका मा पोका समय मिता|शाब पठन और बप बाँधनका मी पादा समप मिमता । पोड़ा समय हन विमा चारता । पोगा पर १८, १९ २ ] पिविष पत्र भावि संप्रा-२व्या वर्ष २२५ नमय वाहार-विहार किया जाता है। योग समय शौच क्रिया में माता है । छह घंटे निगमें जाते है। पोरा समय मनोराज रोकते हैं। फिर मी न घटे बच जाते हैं । सगा ठेगमात्र मी म मिठ से यह विचारी बामा कि प्राप्ति के लिये छपाया करती है। वि स १९४५ नब मामा सान समावस मुक्त, वस्यस प्रत्यक्ष बोर अनुमवसरपर, तो फिर पानी पुरुषोंको मामा है, भारमा निस्प है, बघ है, मोह, झ्यादि अनेक प्रकारसे निरूपण करना योग्य न था। या बामा मगम गोघर ह तो फिर प किसी वारा नहीं जानी आ सकसी, बार यदि वा सुगम मुगोचर है तो फिर उसको नाननेका प्रयत्न करना ही योग्य नहीं । - बि सं १९४४ नेत्रोंकी श्यामतामें नो पुतलिया है, वे सप सपको दसवी । मौर साक्षीभूत हैं, किन्तु वे इस बतरकोपों नहीं देखती ! नो बधाको स्पर्श करती है, शौत उणादिकको मानती है, ऐसी सर्व भगोंमें म्पास होकर अनुभव करती- -जैसे तिलोंमें वेस व्यापक यता है-उसका अनुभव कोई भी नहीं करता । जो शाम्र-प्रवण-प्रियके मेदोंको ग्रहण करती है, उस शाम्पशक्तिको माननेवाली कोई न कोई सता अवश्य है, निसमें शर पाक्तिका विचार होता है, निसके कारण रोम सड़े हो जाते है, पर सवा दूर कैसे हो सकती है। जो अपनी मिहाके अप्रमें रसस्वा को प्राण करती है, उस रसका अमुमब करनेवाली कोई न कोई असेप सत्ता अवश्य है, वह सामने बाये मना कसे पसकता है। वेद वेदांत, सप सिस, पुराण, गीताशाय नो क्षेप भर्यात् मानने योग्य मामा । उसको हो जब मान लिया तप तमाम कैसे न हो। २० ब, बि स १९११ जिस बारमा विद्यामपि मम्पम्पवा, सरष्ता और जितेनियता इतने गुण हों, यह पामा तत्व पाने के लिये उत्तम पात्र है। मनतवार गम्ममरण कर चुकी हुई इस मामानी करणा एसे ही उत्तम पात्रको उत्पन्न होती है, भौर ऐसा मा पात्र हो कर्म-मुक्त हानेका भभिमानी पहा जा सकता है। पही पुरुष यथार्य पार्यको पचार्य स्वापस समसकर मुक्त दनक पुरुपामें सगता है। जो बारमाएँ मुक्त हुई है बामाएँ कुछ समंद माचरणमे मुछ नहीं हुई, परस्तुरे नाम पुरुषके उपग किये हुये माकि प्रपा अबसबनसे ही मुक्त है। भनाति मारके महाशरूपी राग, ख मार मोहके यमनमें यह अपने संजय पार नहीं कर १५५ भीमद् पचान [. सकी । मनुष्पल वाय, उपम कुल, शारीरिक संपत्ति ये भपेशित साबम है, और अतरग साधन केरठ मुक्त होनेको सबी अमिखाया हो। परि वा मामें इस प्रकारको सुग्म-कोर प्राप्त करनेको पोम्पवा भा गई हो, तो जो पुरष मुख ए अपना बर्तमानमें मुख्पनेसे अपना नाम्यान दासे चरते हैं उनके उपदमा किये हुए मार्गम किमी मी प्रकारके सरसे रहित होकर भदासीत हो सकते हैं। मिसमें गग, रेप, और मोर नहीं नही पुरुष वानों दोपोंसे रमित मार्गका उपदेश कर सकता है, अपना ता उसी परतिसे निशंकित होकर नाचरण करनेवाले सपुरूप उस मार्गका उपरेश दे सकत हैं। मा नोंको पत्र विचार करमसे राग, रेप और मोहरहित पुरुषका उपदेश क्रियामा निन्धि दर्शन हो विशेषरूपसे मानने पोम्प । इन तान दोनोंसे रखत, महा भतिशयसे प्रतापशाठी तोफर ने मोमके कारणलप जिस पमान उपोश दिया है, उस धर्मको चाहे नो मनप्प स्वीकार करते हों, परन्तु र एक परतिसे होना चाहिम, या बात है। उस धर्म भनेक मनुप्प बमेक पदातियोंसे प्रतिपादन करत हों और उसमे मनुष्पोंमें परस्पर मतमेका कोई कारण होता हो, तो उसमें वीर्षकरदेशका एक परतिका दोप मही है, परन्तु उसमें उन मनुष्पोंकी समाह पालिका को दोष गिना जा सकता है। इस विसे हम निर्मय मतके प्रवर्तक है, इस प्रचार भिम मिम मनुप्प का है, परन्तु उनमें से रे मनुष्य ही प्रमाणभूत गिने में सका है जो बातरगदेवको बाबाके सत्मानसे प्रकपक एवं पपर्तक । मा कास र पम नामसे प्रस्पात है। दुमका उसे करते है जिस कामें मनुष्प मा- से वायु पूर्ण करते हों, तथा जिसमें पर्माण्पनाम्म पापोंके प्राम फरमेमें आपमता अर्याद महारिन बाते हैं। इस समप पीतरामदेव के नामसे मैनवनिमें इतने अधिक मत प्रचलित हो गहने मत रेस मतरूप य गये, परन्तु नमक ने पोतरामदेव बाबाका नमन करके प्राचिन करते में तबतक रे सम्म मही को जा सके। इन मतोंके प्रचलित होने मुझे इतने मुख्य कारण माश्म होते है -१)पनी शिपिस्ताले कारण एक्से पुरगोशए निर्मपदशा प्रापयको घय देना । (२) परस्पर दो भाषाका पारनिबार । (३) मोशनीयकर्म उदप बोर तानुरूप बावरणच हो माना । (१)एक बार अमुक मत प्राम हो पाने के बाद उस मतसे घटनेका परि मर्ग मि मी पाए तो मी असे बोपिम्मवाके परण प्राण न करना । (५) मति म्यूनता । (६) विसपर एग हो उसकी बाबा परनेवाले बनेक मनुप । (७) पमपाय, चौर (८) शमानका पर माना । पदि मो समय समापान हो पाप और सब निसिताके साप पौतमको बारशुरूप मार्गपर प तो महासम्पाम परस्तु ऐसा होनेच संमाफ्ना कम । रिस मोक्षको - विविध पत्र मादि संपर-२०पौ पर्प भमिकाया है, उसकी प्राविवो उसी मार्ग में होती है, परन्तु खोनयमा हारिस पसनेवार पुरुष, वया पूर्वक दुर्घट कर्मो उदपके कारण मक्की मदाम परे हुए मनुष्य, उस मार्गका विचार कर सकें अपना उसका शान प्राप्त कर सकें, और ऐसा उनके कुछ बोधिदुग्म गुरु करने, सथा मतभेद दर करके परमारमाकी वाहाका सम्पमपसे वारापन करते हुए हम उन मतवादियों को देखें, यह मिसकुस मसमब सी बात है। सबको समान मुदि उत्पन होकर, सशोभन होकर, मीतरागनी बालाबप मार्गका प्रतिपादन हो, यपपि यह बात संयारपसे हाने बसी दीसती मही, परंतु फिर भी यदि मुसम-बोधि जामा उसक लिये भावश्यक प्रयत्न करती में तो परिमाम ममश्य ही श्रेष्ठ मावेगा, यह बात मुछ समय माश्म होती। उपमकासके प्रतापसे, जो सोग विपाका ज्ञान प्राप्त कर सके । उनको धर्मतत्पर मूससे ही मदा मही होती, तथा सरमताफे कारण प्रिनको पुठ प्रश होती मी, उमें उस पियका कुछ शान नहीं होता यदि कोई हानबाग भी निकले तो यह बान उसको धमकी दिमें पिन करमेवाला ही होता है, कि सहायक नहीं पता, ऐसी हो पायकसकी हालत है । इस तय शिक्षा पापे हुए मेगाँकि लिये पमप्राप्ति होना भयंत कटिम । गया है। शिक्षारहित मेगा स्वाभाविकपस पफ या गुण रहता है कि जिस पर्मको हमारे पापा मानते पसे गाये हैं, उसी धर्मक अर हमें भी घसना चाहिये, कार नही मत रूप मी होना पाहिये । तया हमें अपने गुरुके पपनोंपर ही विपास रखना चाहिये। फिर चाहेगा गुरु पात्रक मामतफ भी न मानता हो, परन्तु पही महमानी है ऐसा मानफर पटना चाहिये । इसी तय ना हम इस मानते हैं ही बीवगका उपरेश किया एला धर्म है, बाकी तो फेवक जनमतक मामसे अपसित मत है और ये सब बसर मत है । इस तर उनको समय हानसे ये विचारे उसी मतम सम्म रहने है। अपेक्षा रपिस देसनेमें इनको भी दोय नहीं दे सकते । चैनपर्मिक मन्तर्गत गो गो मत प्रचलित है उनमें बात कर चैनसबधी ही क्रिया होगा, यह माना ई बात है । इस तहको समान प्रापि देसकर यो साग बिम मतमें से त्रित हुए रो, उसी मनमें होने दाशित पुरुष सहन हा करते है । दीभितोंकी दशा मी या ता मरिकतारे कारण, पा मार मांगने जैसी स्पिनिमे पहा मानेक कारण, भपका स्मशानराम्पसे पैसा जैमी होती है। बाम्नरिक शिक्षा मा सुरणासे दीमा मनवा पुरुष तुम विरह लागे । भार परि देमंगे मी तो ये उस मतस तंग भाकर रेपस पातरमयको जाडामें महान हाना मय हो अधिक तपर होंगे। निसको शिक्षापी सापेश एरणा हुई है उसके मिश्राप मरे निम्न दौशित भपदा गारप मनुप है ये मब सपं जिम ममें पायते । वसीमें रागी होते है । उनको विचारों की प्रेरणा करम पास कोई मही मिटना ! गुर होग अपने मतमधी नाना प्रकारक योगना काक रस्त हुए विकणोंकी, बारे उसमें हर कोई पपार्प प्रमाग अयचा न रो, समतामर उनको गरम पंमें रमर उगे - 11..
। भीमर रामचन्द्र [पार सी सर त्यागी गुरुके सिवाय मार्दस्तीसे क्न सेए महातारदेनके मार्गरक्षफलफ्स गिने मानेका पतिपोंकी मार्ग गनेकी शैली के लिये तो कुछ बोम्ना ही बाकी नही यता । कारण कि गाम्पके तो मणुक्त मी हासे है, परन्तु पे तो वार्षकरदेवकी तरह फम्पातीत पुरुप बन है। सशोषक पुरुष बहुत कम है। मुक्त होने की अंतापरणमें वमिमपा रसनबासे वीर पुस्पार्प करमेनासे मास कम है । उने सहर, सरग भयका सदशाम बेसी सामपाका मिना दुर्गम हो गया है। यहाँ कसा मी पम्ने बायो यो सबभपनी अपनी ही गावे है। फिर सबी पोर ठीका कोई मान ही नहीं रुता । मान समेवालो धागे मिप्या प्रमोत्तर करके मे सप अपनी स्मार-स्पिति माते है और सरको मी संसारकी स्थिति मानेका निमित्त होते हैं। यो सीमें बात या कि यदि एक कोई सशोषक बामा है मी तो ये मी बायो- गममूत पिनी यानि विषयोंम शकाले कारण रुक गई। उ मी अनुमक-धर्मपर बामा बहुत ही कठिन पे गया। इसपरसे मेरा बनेका या ममिप्राप नही कि मामकल कोई भी बैनानघ बारामा माही। मनश्य, परन्त बात ही कम, बहुत ही कम । भौर मोरे मी उममें मुक्त होनके सिनाप दूसर्य कोई मौ अभियानाम हो, बार उन्होंने पातरमएकी बात ही मफ्नो मामा समर्पण कर दी हो वो पेस गोग तो गणेपर गिनभे सापक ही निकलेंगे मही वो दर्शनको दशा देखकर करणा सत्पम हो पाता है। पर स्पिर पिसे विचार करके देखोगे तो हमें पा मेरा कपन सप्रमाण । सिस होगा। नसन मतोंमें म मयों के लिषयमें तो कुछ सामान्य ही विकास किन्तु मुरुम विवाद तो स विषयका कि एक प्रतिमाको सिद्धि करता है, और दूसरा उसका सर्वपा साग करता है। दूसरे पक्षमे पहिले मैं मी गिमा माता पा । मेरी भमिसाया तो केवल पीतरगदेमकी भाशाके माराम करमेको मोरो । बपभी स्थिति सप्प सत्प पर करके पा मै बता देना चाहता कि प्रथम पच स्प। वर्षात् जिनप्रतिमा और उसका पूजन शाबोल, प्रमाणाध अनुमोज और बनुमबमें को योम्प है । मुझे उन पार्षीका मिस रूपसे पानाला है और उस समयमें मुझे नो! सस्प शका पी मी र हो गई है। उस पस्तुका कुल योगासा प्रतिपादन करनेसे उस साधम कोर्ट मी वाहमा विचार पर सफेगी और उस पस्तुको सिदि हो जाय तो इस सबरमे उसका मतभेवर रोनेसे प मुखमबोध पानेका मी एक कार्य होगा या समसकर अपने प्रतिमाफी सिविके लिये पुस निपाको काँकरता- मे प्रतिमामे भद्रा है, इसलिये तुम सब मी भदा करो इसभिसे मैं या नही कर पा! परत पनि उससे पौर भगवान्की माताका मारापन होता साई दे तो पैसा करो परत इतमा स्मरण - बागम के कुछ प्रमाणोकी सिधि होमके म्येि परंपरा के वनु स्पादिको वावश्यकता है। पति म कहो तो मैं कुतपस समस्त पैनदर्सनका मान कर दिखा परत उसमें सम्मान को ।
पिपिच पन मादि संप्रह-२ यो पर्व हो प्रमाणसे मार भनुमयसे वस्तु सत्य सिरई को निशामु पुरुप मपने चाहे कसे भी हटको प्रेड देते हैं। पर या महान् विकार इस कामें न पका होता तो मोगोंको धर्मको प्राप्ति पहुस सुखम हो नाती । सक्षेपमें म इस वातको पाँच प्रकारफे प्रमाणोंसे सिद्ध करता हूँ १ बागम प्रमाण, २ इतिहास प्रमाण, ३ परंपरा प्रमाण, १ अनुभष प्रमाण, नार ५ रमाण प्रमाण । १ आगम प्रमाण- धागम किसे कहते हैं। पहले इसकी प्पामया होनेकी जसरत है। जिसका प्रतिपादक मूड पुस्प बात हो और जिसमें उस भानपुरपके मन सनिमिए हो, पर वागम । गणधरीने पोतराग देवक उपदेश किये हुए वर्यकी पोजना फरके सक्षेपमें मुम्ल्प मुम्ज्य सपनोंको लिपिबर किया, वीर ही बागम मयका सूत्रके मामसे कहे जाते है । आगमका दूसरा नाम सिद्धांत भयका शास मो? गणपरदेवोन तीधारदेवसे उपरेशमी ई पुस्तकोंकी योजमाको दादागीरूपसे की है। इन बाद भंगोंके माम कहता हूँ-आचार्यग, प्रातांग, स्थानांग, समबायांग, मगरती, भाताधर्मकयांग, उपासकमागि, सहवदछ/ग, अनुत्तरीपपातिक, प्राप्नम्पाकग्ण, त्रिपाफ, और परिवार । १ निस्से वीतरागको किसी भी आवाका पालन होता हो वैसा भाचरण करना, यही मुश्प उदस्य। २ में पहिले प्रतिमाको नहीं मानता था और अब मानने घ्या , इसमें कुछ पक्षपातका फारण नहीं है परन्तु मुझे उसी सिद्धि माम दुई इसल्पेि मानता हूँ । उसको सिद्धि होनेपर मी इसे म माननेसे पहिसेको मापताकी मी सिद्धि नहीं यती, धीर ऐसा हानेसे भापत्रकता मी महीं यती। २ मुझे इस मन जयका उस मतको कोई मान्यता नहीं, परन्तु राग-द्वेपरहित होनफी परमा- या भर इसक सिम जो जो साधन हो उन सबकी मनसे पपछा फरमा, उनै कायसे करना, सी म मान्यता है और इसके लिये महापौर के सपनोपर मुझे पूर्ण विश्वास ह । १ मब पेबस इतनी प्रस्तावमा करके प्रतिमारे सबंध मा मुश अनक प्रकारस प्रमाण मिठ है उन्हें कावा । इन प्रमामोरर ममन करभेसे पासे बाबा साग पा र नापा बिचारोंको पानमें रस्में (a) तुम भी पार पानक पप दो भार में भी है। दोनों ही महापौरफे उपश-भस्म- हिमपी उपदायी इया करना है और रहो म्पाययुक्त मोह। इमठिये जहाँ मापता हो वहाँ हम दोनों ही निपक्षपात हार सपता साकार करनी पादिय । (आ) नाता पोई भी बात पोप राति समय न भाये तबतफ उस समन जाना मार उस संबंध में भनिम बात पहत र मौन रगना । (३) ममुक बाव सिर हो तो ऐसी है, पेमा इप्टा न करमा, परम्नु सप हो सस्प मिद . मीमत् रामचन [ हो यही म करना । प्रतिमा के पूरनेसे ही मोच है, भपवा उसे न मानमेसे ही मोक्ष है, इन दोनों विचारों प्रगट करनेस इस पुस्ताका योग्य प्रकारसे मनन करनेतक मौन राना। (६) शासकी शेगमे विस्य अपवा अपने मानको रक्षाके किये कदाही ऐकर को मी बात न करना। (उ) भातक एक बातको समय और मरीको सस्य माननमें निशेष कारण म यिाप सके तबतक अपनी बावको मम्पस्थानिमें रोककर रखना। (3) किसी मी शासकारका ऐमा काना नही है कि किसी ममुक धर्मको माननेपामा समस्त समुदाप ही मोक्ष चसा गायेगा, परन्तु मिनकी मरमा धर्मवको धारण करेगी समा सिधिको प्रा काँगे, इसलिये पहिस स्वरमाको धर्म-गोधकी प्रामि करनी चाहिये । उसका या मी एक साभम । उसका पराक्ष किंवा प्रस्पच अमुमन रिये बिना मूर्तिपूजाका सान कर राम्ना पोम्प मही। (4) पर तुम प्रतिमाको माननमार हो तो उससे जिस का सफल करनेको परमात्मा भवा है उसे सरल कर लो भार यह तुम प्रतिमाका क्षान करते हो तो इन प्रमाणोंको योम्प रवि विचार कर देनो । मुसे दोनों को ही शत्रु या मित्रमें से कुछ मी नहीं मानना चाहिये । इनकी में एक रम्प है, ऐसा समझकर उनें इस प्रपका पर जाना चाहिये । (पे) इतमा दी ठीक वा इनमें से ही प्रतिमाको सिरि हो तो वोहम मामेंगे इस तबका मामा म रममा, परन्तु पोरके उपदेश किये हुए शासि इसको सिनि हो ऐसीरमा करना (भो ) इमरिपे सबमे परिसे विचार करना पोगा कि किन किन शाखाको भीरके उपर किम हर काम कर सकते है वा मान सकत है, इसरिये में सबसे पहिसे इसी ससंभ करेगा। (भा) मुझे सारत मागी अपना भम्प किसी माषाका मी मेरी योम्पतानुसार परिमप मा। एमा मानकर परि आप मुम अप्रामाणिक दराभोगे वो यह बात न्यायो लिस्प होगी, इससि मेरे कंपनी और आरम-मायामनाम गाँध करना । (4) परि मेरे में विचार क न ग, तो उसे सार्प मुशस ना परन्तु उसके पछि ही उस विषयमें अपनी कल्पना शमा बनाकर मत बेटमा । (4) सक्षेपम यही कहना है कि भैसे फम्याम हो बस आपरम करमेक सबषमें पदि मे करमा अपम्प हगना हा ता उसके उिपे पपार्थ चार फरक फिर गो टीक उसीमो मल्प करमा शाब-मूत्र किमने है। १ प ऐमा कहना है कि मायकल पैनास अयथा पैतागसमे मी अधिक सूत्र भार उमरी मिडि माम्प पूर्णि और नौका इन सबका मी मानना चाहिये । दूसरा पक्ष प्रता किम मूब बत्तीमादी और ये बीम ही भगवान्क उपरेप दिसे हुए₹बावामें कुछ म मिगत हो गई नपा नियुकिस्पादि मौ मिश्रित दी है इसलिये कुछ सूत्र बास ही मान पाहिए । इस मामता मरमें पहिले मैं मानी समझम बापे हुए विचारों का करवाई। इमर पक्ष उपपिएर भाउ मगमग बारमा बर्ष हुए।ग मिन बीस सूत्रों मानत है के सूत्र इस प्रकार है--११ मग १२ उग ५, १, १ जारपक।
पत्र २ ] पिषिभ पत्र माविसमाह-२०षौ वर्ष । (२) मन्तिम अनुरोध अब इस विषयको मैने मईपमे पूर्ण फिया 1 फेबए प्रतिमास ही प्रम है, ऐसा कानके लिये अपमा प्रतिमा के पूननकी सिद्धिक छिये मने इम स्वु प्रपमें कसम नहीं पाए । प्रतिमा पूजनक लिय मुझे वो जो प्रमाण माम्म हुए थमने उन समपमें कर लिया है। उसमें उचित और अनुचिस दसनेका फाम शास-विचक्षण आर म्पायसम्म पुग्पोंका है। भार मा में जा प्रामाणिक माश्म हो उस सरह स्वप पसना और दूसरोंको मा उसी तरह प्रयपण करना या उनकी आमाक ठपर आधार रखता । इस पुस्ताका म प्रसिद्ध नहीं करता क्योंकि निस मनुष्यन एक बार प्रनिमा-बनका विरोध किया शे, फिर परि वही मनुष्य उसका समर्थन करे, तो इससे प्रयम फ्शनामोंक दिये बात म हाताह और यह कटानका कारण होता ह।म समझता है कि आप मी मेर प्रति पारे समय पहिल एसी ही स्थितिमें आ गये थे। यह उस समय इस पुस्तकका में प्रसिद करता तो मापका थत करण अधिक दम्रता आर ठसक दुम्मानका निमित्त में होता, इसलिये मैंने ऐसा नहीं किया । कुछ समय बीतनक बाद मेरे मन मरणमें एक ऐसा विचार उत्सम था कि तरे लिये उन माईयोंके मनमें सम्सश विचार आत गंगे तपा म निस प्रमाणसे इस माना ६, पर भी कास एक तेरे ही एपमें इ नापगा, इमलिय उसकी सप्यतामा प्रसिदि अवश्य करनी चाहिय । इस विचारको मने मान किया । तब उसमेंसे बात ही निम त्रिम विचारकी प्रेरणा , ठसे सभेपमें करता है। प्रतिमाका मानो, इस बाइक लिप यह पुस्तक बनानका कोई कारण नहीं है, तथा उन लोगों प्रतिमाको माननेसे में कुछ धनवान् सा ही नहीं नागा । इस संघमें मरे जो जो चार थे-
२१वाँ वर्ष
२१
मच, मगसिर मुदी गुरु १९१५
पत्रसे सब समाभार लिरित हुए । अपराध नहीं, परन्तु परर्ववता है । निरन्तर सत्पुरुषको कपा-
चरिको पारो भोर शोकरहित रहो, पर मेरा परम अनुरोध है, उसे स्वीकार करना । विशेष न
सितो तो मी इस आमाको उस बातका प्यान है । यौको सुमि रक्सो । सवा पारम परो।
(पूर्ण सुशाम ।)
।
२२ महोग, मगसिर सुदी १२, २०१५
गगत्में रागहीनता लिनप और पुरुपकी माला ये म मिमनसे पा बामा बनाविकारसे
भरकती यो, परन्तु पा करे पाचार्य पी। जो मा सो एला । अब में पुरुषार्थ करमा उचित
जय होमो।
२३
सा, मगसिर को मौम १९९५
जिनाय नमः
मेरी मोर माह दशा म रमतो । तो एक अस्पतिवामा पाभर मनुष्य है । सनिमें अनेक
सपुरण शिप पो है और विदितम्पसे मो, उन+ गुणका स्मरण कप, उनका पवित्र समागम
करें और मामिक मामसे मनुष्य माको सार्थक को यही मेरा निवर प्रार्थना है।
२४ समई, मंगसिर बदी १२ शनि १.४५
में ममयानुसार मानमें हैं। माका भरमानंद पाहता है। एक बा नियम पा करमा ?
कि विसमे हमे बी म्यूनता और पुरुषार्थ अधिकता प्राप्त हा इस तर पर हिने
प्रकन परते।
२५
म सं १.०५ मंगमिर
तमारा प्रतिमा मरित पत्र मिला । जिस मार्गस भामर प्राम हो उस मार्गकीबोर करो।
पम मुसार प्राम्गभार हामो ऐसा में पात्रमही तो मी पदि इस तरहसे नुमने माम पनि मिहती
हो हो ।
पत्र २६, २.] विषिम पत्र मादि संमा-२६षौ वर्ष - २६ पवाणीमा, माघ मुदी ११ बुध १९९५ सत्युम्पाको नमस्कार मनतानुबवी कोच, अनसानुबघौ मान, अनतानुबधी माया, और अनतानुबधी सोम ये पार, तया मिथ्यात्वमाहिनी, मिग्रमाहिनी, सम्पमस्वमोहिनी य तीन इस तरह जबसक साम प्रतियोंका क्षयोप- श्रम, उपशम अथवा अप नहीं होता तबतक सम्पगरि होना समय नहीं । ये सात प्रतियों जैसे जैस मद होता नाती है से बस सम्परताका उन्य होता बाता है। इन प्रातियों की प्रथाको हेमा माही कटिम है । निसफी यह थी नष्ट हो गइ उसको आत्माका हम्सगत होना मुखम । । तत्वज्ञानियोंने इसी प्रपाको मेन करनका बार बार उपोश रिया ।। जो मामा अप्रमादपनसे उसके भेदन करनेकी यो घटि करेगी यह मा भारमनको अवश्य पायेगी, इसमें सन्देह नहीं । सद्गुरके टप शके बिना आर नौबकी मापात्रताके बिना पमा रोना रुका हुआ है । उसकी प्रामि करके समार-ताम्स अस्पत तप्त आग्माका तल परना यही मतपता है। "धर्म" यह बहुत गुम पस्तु ।। यह नाहर नेम नहीं मिलती। यह तो अपूर्ण अनसशो धनस ही प्राप्त होता है । यह असंशोधन किसी एक महामाग्य सहरके भनुमाइमे प्राम रोता । सम्पुरुष एक भको पोस मुसके लिये बनत भवका अनत दुम वहानेका प्रफन महीं करते। पाप" यह बात भी माम्प है कि नो पात होनपाठी होकर दो एगी, और गो मात हानबाली महीमहकमा हामी मही; तो शिर धर्म-सिदिके प्रयत्न करने और आम हित साप्य फरनमें अन्य उपानिपोंके आधीन होकर प्रमा' क्यों करना चाहिये ! ऐसा है तो मा दश, काल, पात्र और भाप देएने पाहिय। सम्पुरुषोंका पागवत नगरका फल्याग परा। रागहीन भेगा-समुपपफो प्रणाम २७ पाणीमा, माप १.१५ विज्ञामु- आपके प्रश्नको उमन करफ अपनी पोम्पताफ अनुमार मारु प्रस्नका उत्तर भियना है। प्रश्न - म्पहार दि पमा मस्ती ! उत्तर --म्परहारमुदिको भाम्पसना भारे सभी दोगा, तो मी पचा प्रारम करने के लिये जाम्या मममरर इतना करना योग्य है कि निम मगार प्राप्तिम इम मारमें भार परसोरम मुग मित्र उमस माम पदारशुदिमुमा पुष मर है। परम्पहारादिम मुग मिलाता उमरी आपकना मी निम्म। १ त्रिम पम पर मी बार मा भार त्रिम मंत्रप परमकी दर नही उसे उाधि करके कमानेका प्रपन न परमा पारिपे ।
[पर २८ भीमद् रामचन्द्र २ बिसे धर्मका गोत्र इवा है, उसे फिर भी अपनी हाम्सका तुम हो तो उसे पयासम्म उपानि करके कमानेके लिये प्रपान करना चाहिये । (जिसको सर्पसंग-परिपागी छनेकी अमिछापा है उसे इन नियमोसे संबध मह।) १ जिससे नौवन सुखसे बीत सके इतनी पभेष्ठ समीके होनेपर भी निसका मन मामाके प्रिय पात ताफता रहता हे ठसे सबसे पहिसे अपने वापसे उम्मीको हरि रमेश कारण प्रश्ना पाहिये । यदि "सके उत्तरमें परोपकारके सिवाय कुरा दूसरा उत्तर वाता हो, वर्षमा पारिणामिक मामको हानि पहुँचने के अतिरिक्त सरा एट उत्तर पाता हो तो मनको समझा छेना चाहिये । ऐसा हानपर मा पनि मनको समसाया न पा सके तो ममुक मर्यादा बॉषनी चाहिये । या मर्या। ऐसी हानी चाहिये जो इसका कारण हो । ५ क्त्त बाप्पान करनेकी भहरत पो, ऐसी परिस्थिति सी र नेको मेधा वर्ष- समद करना कही जम्म। ५ जिसका जीवन निर्वाह क प्रकारसे पर या हो, उसे किसी मौ प्रकारके जनाधारसे ममी प्राप्त न करनी चाहिये । जिस काम्से मनको पुस म वा उससे कापाको चौरमपमको भी मस नहीं होता । बनाबारसे मन सुखी नहीं होता, पर एक ऐसा गात है यो सब किसके अनुमन्में भा सकता है। मायके होर नहीं माने देने चाहिये. १ किसी के साथ महा निबासमात ८ वरपाचारपूर्ण मात्र कारना २ मित्रो साय निवासपात • निपीको अप मापासे मी सग सेना १ किसीकी धरोहर सा माना १ म्यूमाधिक तोड देना "म्पसनका सेवन करना ११ एफके पर दूसरा सपा मिमण ५ मिम्मा रोपारोपण करके दे देना १ इंठा दस्तानेर किसाना १२ दिसायुछ पषा ७ हिसाबमें एकना १२ शिस्त मपत्रा ममदान इन मागौस पुत्र भी माना नही पा मानों मोवन-निर्वाहसंमंमी सामान्य पति कही। २८ मामीमा माय बदी ७ १९९५ सस्पुम्पाको ममस्कार बामाकोस दशाको से बने पैसे रोकतार योग्यता के बागन होकर उन सबके मनका समाधान करके, इस संगतिक मकरो, और पा संगति बपना पर पुस्प उस परमारम-सपमें मेन , पो मार देते या मरो। तन-मन-रन और माम-स्पितिको समामा धर्ममान रते रमेका मेप अनुरोष।
पर २९] वियिप पत्र मावि सप्रह-२१वौ वर्ष २९ खाणीमा, माघ बी ७ मुफ १९४५ . सत्पुरुपोंको नमस्कार मुत्र,—आप मेराम्यविषयक मेरी आम-प्रतिके विषयमें पूंछत है, इस प्रमका उचर किन शायरोंमें सिने ! आर उसके लिये आपको प्रमाण मी क्या दे सकूँगा ! सा भी सक्षेपमें परिझानांके माने गए इस ( तत्त!) को मान में कि उदयमें बाये हुए पूर्व कमाको भोग लेना और नूतम कर्म न धने "मा, तो इसमें ही अपना भारम-हित है । इस प्रेणीमें गनेको मेरी पूर्ण भाकांक्षा है, परन्तु पप ग्रामीगम्य है इसलिये वमी उसका एक अश मी बाय प्राति नहीं हो सकती । असरंग प्रति चाई कितनी मी रागरहित श्रेणीकी मोर जाती हो परन्तु अभी वाय प्राधिके वाधीन बहुत बना पोगा, यह म्पए ही ह । बोलो, चलते, मटते, उटते आर कोई मी काम करते हुए छोक्कि भेणीको ही अनुमरण करके पटना पड़ता है। यदि ऐसा न हो सके तो छोग तरह तरह के फुराक करने या मागे, ऐसी मुझे समावना माश्म होती है। तो मी कुछ प्रति फेरफारको रक्सी है। तुम सबको मेरा (पैराग्यमयी ) प्राविषिषयक माम्फ्ता कुछ यापास पूर्ण लगती ह, तथा मेरी उम भणीक लिपे किसी फिमीका मानना शकासे पूर्ण भी हो सकता है, इसलिये तुम सब मुझ पैराग्यमें जाते हुए राकनेका प्रफरन करो, और शका फरनेवाले उम मेरम्यसे उपेक्षित हाकर माने नहीं, इसमे से पाकर स्मारकी पदि करनी परे, इसी कारण मेरी पर माम्पमा ह कि इस पृधिषी माछपर सन्य अन फरणके दिखानेकी प्राय बहुत ही थोड़ी जगह समय है। से म्ने स भास्मा आरमामें उगकर पति जोवनपर्पत समाधिमाधम मुक रहे, ता किर उसे ससारसबपी में पड़ना ही म परे। अभी तो तुम जैसा देखते हो में वैमा हो । नो मसारी प्रहसि होती हैं, पर फरता है। धर्मसती मे मा प्रति उस संत परमात्माके वानमें समस्ती हबह टीक है। उसके विपपमें पटना पाम्प म था । एनेमे कही भी मही ना सकती । यो सामान्य उत्तर देना पोग्य पा रही Pपा ।क्या होता है। भार पाता हो। यह दार या। उप मापे दुए काफी माग रहा है, पास्तरिफ स्पिलिमें अमी एका अंधमे मी आया हाउँ, एसा करने में भामामा जमी बान हो जानेको समापना। पपाशस्ति प्रभुमाक्ति, मम्मग, भीर सप म्पहारक साथ धर्म, वर्ष पाम और मोच ये चार पुरुषार्थ प्राम करते पो । निस प्रपनस आमा अर्पगनिपो प्रम मा करी । समय समयमें गिर गीपन म्पनी दाता गाता है, उसमें मी प्रमार परत है, यही महामो- एमापका बल है। शिरापरका सपॉफी ममम्फार सहित प्रगाम भीम रागवान [पा ३४५६ उसके बाद इस पृमीपर वित् प्रामार वर्षात् सिलि, पर बात सपशाहोंने मान्य है। (मनन करना । ) पह कपन विकसित है। । ३४ मोरया, चैत्र वदी ९, १९९५ कर्मगति विचित्र निरंतर मैत्री, प्रमोद, कम्मा और उपेक्षा मावना रहना। की पर्याद सब नगतसे निर मुनिः प्रमोर वर्षात् किसी भी मामाका गुण देखकर इस्ति दोना) कणा मर्षात् समर-तापसे दुसित बारमाके उपर हुमसे अनुपा करना, और उपेक्षा बर्षात मिस्र मासे जगतके प्रतिववको भूकर वारम-विमें माना। ये मानायें करपाणमय और पात्र- साप देनेवास। ३५ मोरमी, चैत्र १९९५ हमारे दोनोंके पर मिले । स्याबादमिका सस्म माननेके मि उमारी परम विसासे मुझे स्वोष मा। परन्तु यह एक मात पम्प स्मरणमें रम्मा कि शाबमें मार्ग का मर्म नही करा । मम तो सपुरपको बतएमा हो, इसलिये मिलने पर विशेष वर्ग को पा सकेगा। धर्मका रास्ता सस सस गौर । परन्तु उसे पिरम मारमाने ही पापा, पापीk और पायेंगी। विस काम्पके लिये तुम्म सिमा । उस काम्पको प्रसंग पावर मेगा । दाहोंके अपने किसे भी ऐसा ही समझो। में तो इन चार माक्नामोंका भ्यान करना -- मैत्री-पुर्व जगतके उपर निर पुद्धि बनुक्सा-उनके रसके सर करणा प्रमोद बाम गुण रेहकर बार्नर उपेक्षा-निपा इति इससे पात्रता वाली। वाणीमा शाब मुदौ १ १९९५ हमारी सरसबपी शोचनीय पति चामकर म्पयरको मपेक्षा होता है। मेरे उपर अतिशय माना रहर पसने तुम्हारी इप्रका में रोक न सका पर ऐसा माना रहने परण पनि मार परीरको पोदामी भी हामि हो तो ऐसा म 20 मारा मेरे ऊपर रग पता इस कारण तुम्हारे अर पग रखने मेरो या हो। परम्तु तुम एक धर्मपात्र मात्र से और मुझे धर्मपात्रों के ऊपर कुछ विशेष अनुराग उत्पन्न करमेको परम इप्स है इस कारण किसी भी सिस मुम्हारे उपर पुछ पोडीसी म।
1.स्पति मनिषम] विविप पत्र मावि समर-२१ौ वर्ष (२) निरसर समाधिमाबमें रहो। मैं तुम्हारे समीप ही बैठा है, ऐसा समझो । मन देह-दर्शनका प्पान हटाकर माम-दर्शनमें स्पिर दो। मैं समाप हो, ऐसा मानकर शोक कम करो जहर कम करो, वारोम्पता बढ़ेगी । निन्दगीकी समाठ रस्सा । नमी हामें देह-पागका भय न समझो । पनि पेसा समय होगा मी तो और एबानीगम्य होगा तो जरूर पहसेसे कोई कर देगा अपवा उसका उपाय बता देगा । ममा हालमें तो ऐसा है नहीं। उस पुरुषको प्रत्येक छोटेसे छोर कामक भारंभमें मी स्मरण करो, यह समीप हो। पदि चामारस्प होगा तो पोरे समय बियोग रहकर फिरसे सयोग होगा और सब मम ही होगा। दाकालिक सिद्धांतको भाजफड पुन मनन कर याहूँ। अपूर्ण बात है। पदि पप्रासन गाकर बफ्या स्थिर वामनसे बैठा मा सके (वयमा लेटा जा सके तो मी टोक १, परन्तु स्थिरता होनी चाहिये ), गमग न करती हो, तो ऑम्स मींचकर मामिके भागपर परि पहुँचाभो, फिर उस ठिको मत मध्यमें साझर टेट फपालके मप्पमागमें के नामो, मोर सब जगतको शून्यामासरप चितवन करके, अपनी दहमें सत्र स्थलों में एक ही वेन प्याप्त हो रहा है, ऐसा पान रसकर, जिस नपसे पार्श्वनाथ आदि वातको प्रतिमा स्थिर वीर धक्स Pमाई देती है, छातीके मम्पमागमें पैसा दो प्यान करो । पदि ममेंसे कुछ मी न हो सकता हो तो सबेरेके पार पा पाच गये नागकर रचाईको तानकर एकापता लाने का प्रपन करमा, बोर हो सके ता मईत् सम्मका चितवन करना, माही तो कुछ भी चितवन म करते हुए समाधि सपना बोधि इन शालेका होषितान करना। इस समप बस इतना ही। परमकल्याणकी पह एक अमी होगी। इसकी कमसे कम स्पिति बाद पस और उत्तर स्थिति बर्मुहूतको रसमी। म स १०१५ शाम्स संपनि मुनिधर्म १ भयानपूर्वक बसनसे प्राणियोंकी हिंसा होती है। ( उसम) पापकर्म पता है, उसमे कपा फल प्राप्त होता है। २ अफ्नपूर्वक मा गनेस प्राणियोंको हिंसा हानी । (उसमे) पापकर्म पता: उसमे का फल प्राप्त होता है। ३ मपन्नपूर्वक पपन करनेमे प्राणियों हिसा होती है। (उसमे) पापकर्म पता उससे का फल प्राल होता । १ वपनपूर्वक आहार सनमे प्राणिपोरी हिमा होता है। (उम्म) पापधर्म भता, उसमे कापस प्राप्त होता है। ५ भयानपूर्वक बोटमेसे प्राणियोंकी रिमा हाती है। (उमम) पाकर्म पता है, उससपास प्रठ प्राम देता है।
भीम रामचन्द्र [पा!,१३ बवाणीया, माप दी ७, १९९५ रागहीन पुरुपोंको नमस्कार ससुस्पोकर या महान् उपदेश कि उदप माये हुए कर्माको मोगते हुए नये फर्माका बबन हो, इससे वामाको सचेत रमना । यदि यहाँ तमें स्मय मिता हो वो दिन-मफिमें भरियधिक उत्साहको मृति करते बना, बार एक पड़ोमर भी सरसग क्या सत्त्याच मनन करते रहना। (किसी समप) प्रमामुम कर्मक उदपक समय हर्ष शोकमें न पाकर मोगर्भसे हो कुटकारा है, और या वस्तु मेरा मही, ऐसा मानार सममाको भेणिको याम् रामा । बबाणाआ, माघ शी १० सोम १९४५ रागहीन पुम्पोंको नमस्कार निय मगवान्के प्रणात किये हुए पवित्र धर्मक लिये यो पुरा भी उपमा दो पाये वे सा 'पून ) है । आमा नताश मरकी, मह पर अपने निरुपम धर्म नमानके हो कारण | मिसके एक सममें भी किंचित् भी मान मोह अथवा यसमाति नहीं दी उस स्वरुपके पचन और बोचके सिम हम कुछ भी नहीं कर सकते उनके पपनमें प्रशस्तमासे पुमा पुन ममुरत होगा इसीमें अपमा सौतम श्रेय है। जैसी इसको दोसी है। महाँ वामा कारमय होनेका तयाँ मंश मी बाकी मही हा ऐमा भुर फरिक फन बार बदसे मी उम्भ शुमपानको भेणाम प्रारूपमें निकले हुए उस निपके पवित्र वचनोंकी मुभ बार तुमरे विकास प्रदा देयही परमारमाके योगासो भागे परम पापना। ३२ बधाणामा, फागुन १९ र १९४५ मिनन्य महारमाओको ममस्कार मालक मार्ग दो नही है। भूतकासमें मिन दिम पुम्मोंने मोचरप परम शांति पाई है, उन सब पुस्पोने इसे एक ही मार्गसे पई । पर्वमानकाळमें मी उसासे पाते हैं, और मतिप्पकामें भी उसाम पायेगे | उस मार्गमें मतभेट नहीं है पसरता नहीं है, उन्मता नहीं, भाभेद नहीं है, भार मायामामता मही है।बर मार्ग है, R समापि मार्ग है, तथा मह स्थिर मार्ग है। और मह सामायिक प्रतिस्प है। उस मार्ग सत्र में अस्तित्व ।। स मार्गक, मर्मका पापे बिना किसान मा भूतमें मोन मही पर, बर्तमानकालमें कोई नहीं पा पा, मोर भरिप्यकाल में कोई पापेगा नहीं। प्रोविन मगवान्न इम एक ही मार्ग बनामे सिगारों बियार बार हमारे उपा पत्र २५] विविध पा मादि संग्रह-२५पा पर्प दिये हैं। इस मार्गक निये ये क्रियाएँ वार उपदेश प्रण किये गोम तो ये समस, और यदि इस मार्गको भूलकर में किसाएँ और में उपदेव महण किये पॉप तो वे सब निष्कास ही है। श्रीमएवार मिस मार्गस पर हुए उसी मागस ग्रोहण भी पार होंगे । जिस मार्गसे श्रीकृष्ण गे उसी मार्गसे श्रीमहावीर पार हुए हैं। यह मार्ग चाहे जहाँ भेरकर, पाहे जिस कालमें, पारे निस श्रेणीमें, चाहे मिस योग, भय कमी मिसेगा तमी उस पवित्र वोर शासत सम्पदक बनत अती. विप ससका अनुभव होगा। 1 मार्ग सब स्थलोंमें समय है। योग्य सामग्रीक न मिसनेसे मप्यमन मी इस मार्गको पानेसे रुके हुए हैं, रुकेंगे मौर रुके थे। किसी मी धर्मसंबंधी मतमेदको छोड़कर एकममात्र और सम्पग्योगसे इसी मार्गको सोत्र करनी चाहिये । विशप क्या करें। यह मार्ग सर्प वारमामें ही मौन है। जब भारमत्वको पाने योग्य पुरुष मर्याद निर्भय-वामा वामलको याम्यता समझकर उस मातमत्वका अर्पण करेगा उसका उदय करेगा-समी मा यसको प्रम होगी, तभी यह मार्ग मिटेगा, तमी मे मतमेद वादिर होंगे । यतम रसकर किसीने मी माझ नहीं पाया । निसने विचारकर मनमे को दूर किया उसाने अति पाकर शमसे शासत मोभको पाया है, पाता है, वीर पाचंगा। ३३ बाणीजा, फाल्गुन मुदी ९गि १९५५ मिरागी महास्माभोंको नमस्कार कर्म मह या वस्तु है। ऐसा वनुमब होता मिस मिस मामाको इस मासे मिलना जितना मपिफ वाममुधिपूर्वक समागम ऐता। उस मामाको उक्नी उतनी ही अधिक माताकी अर्याद मानताको प्राप्ति होती है। भापर्यकी बात का पह कि कर्म सय यह होनेपर भी चेतनका अचेल्न मना हा है। पेतन वेतन-भावको भूगकर उसको निमसम्म हा मान या। जो पुरुष उस फर्म-सयोगधे और उसके उदयमे तत्पम ई पापोंको निमतमप मी मानते भार को सपा इनबारे पूर्व सपोगोंको बपरित परिणामसे भोग , पुरुप समाती उत्तरोत्तर उर्वश्रेणीको पाझर एस तम-भातका पागे, ऐसा कहना सप्रमान , क्योंकि भूतकाठमें ऐसा ही हुआ है, वर्तमानचाइमें ऐसा हो हो, और मरियकाठमें ऐसा ही होगा। जो कोई मा वामा उदयमें आनबाट कमको मोगते हुए समता-जामें प्रवेश करके भाभ-परिणामम् आचरण करेगी तो पर निपपसे चेतन अदिको प्राप्त करेगी। या मामा दिनपी (दोस) सरस और स्पुनभाको पाफर मंदर पुरुषक परणकमा ये तो दिन महामामाको नमम्फार प्रिया गया है उन महामात्रामा बसी ऋदिसा इदि प्राम फा मा सकती। पा तो अननकालमें मपापता ही नहीं , अपरा मापुस (मिमम महस्व, ममग भार मच्या गर्मित है)मही मिन नहीं ता निधपम मान में ही है।
भीमद् पयपत्र [पा १४ ५ ६ उसके बाद इस पृषीपर ही पत् प्रातमारा भात् सिदि, यह बात सबशामाको मान्य है। (मनन करना ।) यह कपन विकसित है। । ३४ मोरवी, क्षेत्र बदौ ९, १९१५ फर्मगति विचित्र निरंतर मैत्री, प्रमोद, फरणा भौर उपेक्षा माझ्ना रसना । मैत्री वर्षात् सर भगवसे निर मुनि प्रमोद बर्षात् किसी भी मामाका गुण देखकर हर्पित ऐना कम्णा माद संसार-तापसे दुसित वाहमाके उपर हु ससे अमुकपा करना और उपेक्षा अति निस्पृह भासे जगत्के प्रतिपको भूलकर बारमीत ष्णना। ये माना कात्याणमप और पान- ताको दनेवाली है। ३५ मारली, बत्र यदा १०, १९९५ पि तुम्हारे दोनोंके पर मि। स्पाशवदर्शनका स्वरूप जानने के लिये तुम्हारी परम निवासासे मुक्ते संतोष एमा। परन्तु यह एक बात बपप स्मरणमें रहना कि शायमें मर्ग कहा, मर्म माही पा। मर्म तो पुस्पको बसमामें दो, सहिये मिझनेपर ही शेप पर्चा की जा सकेगी। धर्मका रास्ता सरस सल और सार है, परन्तु उसे रिहा मामागोंने हो पाया, पाती है बार पायेंगी। जिस कम्पके सिपे तुम्ने बिमा है उस काम्पको प्रसग पाकर मेगा । दोहोंक मर्षके लिये भी ऐसा ही समठो । हसमें तो इन चार भावनामोफा पान करना मैत्री- मगरके उस निरि दुद्धि अनुसा- उनके दुखो ऊपर करणा प्रमोद आम-गुण देसकर मार उपेक्षा-नियर मुदि इससे पाना मापगी। . ३६ कामाला शास मुदी १ १९९५ तुम्हारी पारीरसबपी वाचनीय पनि बनकर म्पगारकी मोशा सेद होता है। मेरे ऊपर अनिशप मापना राफर पाएनको तुम्हारी रात्र में प्रेस महाँ सस्ता परम्तु पसी मावना रखने के कारण प.ि तुम्हार शरीरमा पानी भी हानि होता मा न करारानुसार मेरे पर राग यता, इम कारण तुम्हारे उर राग रावनेत्री मरी इच्छा नहीं है परन्तु तुम एक धर्मपात्र गौर हो और मुझे धमगर उपर मुग विशप अनुगग उन्म करनको परम इपया इस कारण किमी मी तिम महरे पर मुछ पोहांसी रहा।
२७ पनि मुनिषम] पिपिप पर मादि साह--२१पो पप (२) निरंतर समाधिमाधमें रहो। मैं तुम्हारे समीप ही बठा , प्रेमा समझो । बर देह-दर्शनका भान हटाकर वामन स्थिर हो। मैं समीप ही ऐसा मानकर शोक कम करा–चार कम करो, बारोग्पता योगी । बिन्दगीको समाउ रममा । वमी हाम्में देहत्यागका भय न समझो । परि ऐसा समय शेगा मी तो और ज्ञानीगप्प होगा तो जहर पहरसे पाई का देगा अपा उमका उपाय बता देगा | वमा हाटमें तो ऐसा है महीं। उस पुरुषका प्रत्येक अटेसे छोटे भामक आरममें भी स्मरण करो; वह समाप हो। परि हानी स होगा तो पोरे समय नियोग रहकर रिसे सपा दोगा और सब मम्मा ही होगा। रशीपातिक सिरानको वाप्रकास पुन मनन कर हा हूँ। वर्ण बात है। यदि पपासन पगाकर अथवा स्पिर वामनसे पैरा गा सके (मपा सेगमा सके तो मी टोक १, परम्तु स्थिरता एनी चाहिये ), देर रगमग म करती हो, तो भाम्प मापकर नाभिक मागपर परि पापाभो, किर उस शिका छातीक मप्पमें कर टेट पारके मप्पमागमें ले जामो, और सब जगतको शम्यामासनप वितबन करके, भपनी देर में सब स्थडोंमें एक दोन प्याप्त हो रहा है, ऐसा प्पान रमकर, जिम मपम पार्शनाय आदि आंदकी प्रतिमा स्थिर वीर पर रिपाई देता है, तोपे मध्यमागमें पैसा ही प्यान करो। पमिमसे कुछ मी न हो सपना हो तो सबके पार पा पाँच बजे नागकर रमाईको तानकर एकापता छानेका प्रपान करना, भोर हो सके ता बाद सन्दपका गितान नहीं तो कुछ भी चितवन म करते हुए समाधि अपना बोधि इन गेंका ही पितान फरना। इस समप यस इतना हो। परमपन्याणको पर एक भणी 1 इसकी फमसे कम स्पिनि बार पर भार उत्तर स्थिति बहसपी रमुनी । करमा, ३७ व सं १.१५ शाप सपनि मुनिधर्म २ भपनपूर्वक मनमे प्रामिपोंदी हिमानी । (उसमे) पारर्म पता है, उसमे पापा का प्राम है। २ भपस्नऊ गए हमेमु प्रागियोगी रिमा होती ।(उम्मे) पारगर्म पता, उसस पदा म प्राम होता है। ३ अपनप गपन करनमे प्राणियोग्य दिसा होगी। (उसमे) पारम्मता, उमम परापम प्राम होता है। १ अपनपूर्वक हार मनमे प्रागिरिमा होता है। (टसम) पार्म भताउस राम प्राप दामाद ५. अपनपूर्वक योग्नेमे प्रानि दिमा (उमम) परम धना : रममे पण प्रापना - भीमर परचन्द्र [मति मर्म ६ कैसे पो से सड़ा हो ! से बेटे से चयन करे। से बहार । से मोरे जिससे पापकर्म न !ि ७ पतनासे बड़े पतनासे सका ये पानासे पेठे पतनासे शयन करे, यतमासे बाहार से पन्नास गाड वा पापकर्मका ध नहीं होगा। ८ सय गोलोच अपनी बाहमाके समान देखे मन, वचन और कायासे सम्पन् प्रचारसे सप गानोंको देने, माति (0 मावसे वामाका दमन करे तो पापकर्म न धेि । ९ उसके सबसे पहिले स्पानमें महापौर पने सब वामानोंकी सपमहप, निपुण मरिसाका मननपूर्णक विधान किया है। १ बगमें वित्ने अस और स्पावर प्राणी है उनका पानकर वमा बनगामे सर्प पात न कर, मीर न उनका दूसरोंके रा घात कराये । ११ सब मौष मौक्ति बनेको इणा करते है, कोई मरणकी इमामही करता । इस कारणसे निर्मपको प्राणियों का मपकर बध मेष देना चाहिये। १२ अपने वीर मरेके लिये कोषसे अपना भपसे, निससे प्रामियोको कर हो ऐसा असत्य स्वर्ग म बोले बीर न इससि बुलाते । १२ पाना स सत्पुमाने निपेष किया है। प्राणियों को बपिनास उत्पम करता इसलिये उसका स्पाग करे। १० सपित अपना मषित योषा वपना बहुत यातक कि दाँत कुरेदने तक के लिये भी एक सौकमात्र परिमाको मी बिना मगन मे। १५ स्पति पुस्प सप बिना मगाई बस्तुका प्राण न करे, इससे नही मिलाने, तपास केमेवाका वनुमोदम भी न करे । १९ इस जगत्में मुनि महारोद, प्रमारके पनेका स्थान, वौर चारित्रको नाश करमबारे ऐसे नामचर्यका बाचरण न हो। १७ निर्मप भवर्मक मूल दौर महादोषोंको नामभूमि ऐसे मैनुनसंबपी बागपगपत्र माग १८ पुत्र पचनमें प्रीति रस्नेवाले मुलि सेंधा नमक नमक केछ, पी, गुरु अंगण बाहर पदार्पाको पत्रिम बासी न रपसें । जो ऐसे किसी पदापाको पनि बासी रसना पाहते मुनि नही किन्तु गृहस्प है। १९ कोमसे दणका भी स्पर्श न करे । २ सामु पर, पात्र कमा वीर रचोहरणो मी संपमती रमाके मिप हो पारण करे, मा तो उनका मी स्पागनी करे। २१ यो बस्तु संयमको रमाने कि रमनी पो उसे परिमाण नहीं करते, पेसा र कारके रसक पातपुत्रने कहा परतु मूर्ण परिग्रह है पेसा पूर्व महर्षिोंने कहा है। १ परे मूग पातम प्रति माहव रे लानर पागम (सव बासन मत माननन प्रकारे मासाचनपेष परमा रोग। मनुवारक।
1 - ५० पनि मुनिपम] विषिप पत्र मावि संप्रह-१२वा पर्प २२ तत्यानको पाये हुए मनुष्य फेल छाकायके गांवोंके रक्षणके लिये केवल उतने ही परिमाको इससे है, वैसे तो वे अपनी हमें मी ममल नहीं करते । (यह देह मेरी नहीं, इस उपयोगमें हो रहे है।) २३ वापर्य। जो निरसर तपश्चर्याम्प है। और जिसका सब सर्ववाने विधान किया है ऐसे सपमके मविरोधरूप मोर जीवनको रिकाये रमनेके लिये ही एक बार बाहार से। २१ रात्रिमें अस वार स्थावर स्यूट और सूक्ष्म-जातिके बीच रिसाई नहीं देते इसलिये यह उस समप बाहार कैसे कर सकता है! २५ गाँ पानी और बौनके वाषिप्त प्राणी पृथ्वीपर पैसे परे हों उनके उपरसे जब रिनमें मी बनेका निषेप किया गया है तो फिर सपमी रात्रि में वो भिक्षा के लिये कासि जा सकता है। २५ इन हिंसा मादि दोपोंको देखकर ज्ञातपुत्र भगवान्भे ऐसा उपश किया है कि निर्मय साधु रानिमें किसी भी प्रकारका बाहार प्रश्ण न करे । २७ श्रेष्ठ समाधियुट साधु मनसे, पचनसे और कापसे स्वय पृषाकायको हंसा न करे, इससे न करने, भौर करने एका वनुमि म करे । २८ पूपीकापका रिसा करते हुए उस पृथिवीके वायपमें बनेका पागम्प भार अपभुगम्प विविध प्रस प्राणियोंका पात होता है-- २९ इससिपे, ऐसा जानकर दुर्गतिका मानेवाले पृषिकायके स्मारमनप रोपका आयु पर्यतका त्याग करे। २० पुसमापिपुल सामु मन, वपन बार कापसे स्वयं नमकायको हिंसा म करे, इससे म करारे, बौर करनेवासेका अनुमोदन न करे । ३१ जम्कापकी हिंसा करते हुए जबके भामपमें एनेबारे पशुगम्प वौर अपभुगम्प प्रस पातिक निध प्राणिपोंकी हिंसा रोती- ३२ इसलिये, ऐसा जानकर कि मायका प्रमारम दुर्गमिको बहानेबाग दोप है, इसका यापुपर्वतकेहिये त्याग कर दे। २५ मुनि भमिकायको एसा न करे यह सीवके पात करनमें सबसे भयंकर बार तौलस। २९ बमि पूर्व, पश्चिम, उर्म, झोगमें, नीच, दक्षिण और उत्तर इन सब दिशामोंमें यते एए जीपोंको मस्म पर रामती है । १५. पा पनि प्राणियोंका पास करनेवाली है, ऐसा संदेह रहित माने, भौर इस कारण उसे संपति दीपसमयचा तापनेके ठिये मी म जठाये। ३६ इस कारण मुनि दुर्गलिक दोषको वकानेवाले इस मनिकापके समारमको आयुपर्पत न करे। २७ पहिस शान भोर पाछे दया (ऐसा अनुभव करके) सब संपमा मापु । प्रशानी (संपम ) क्या करेगा, क्योंकि साता कम्पाग पण पारको ही नही जानता । २८ अषण करपे कन्याणको ग्रानना चाहिप, भार पापो नामना चाहियो प्राण कर उमें माननके बा जो प्रेयस्कर हो उसने भावरण परना चाहिये ।
१५. भीमा पसन्द्र [10साल मुनियम ३९ यो साधु मात्र गर्षात् पैतम्पका सस्म नहीं चामता यो बनीष पात् याका सरप नहीं जानता वपया इन दोनों के तत्तको नही बामता, यह सापु स्पमकी बात प्रसि जान सकता है। १० को साधु पैतत्पका सम्म मानता है, जो गाका स्वरूप मानता है, तपा बो इन दोनोंका सनम जानता है। सापु स्पमका सहप मी बन सकता है। ११ जब यह गौर और बीच इन दोनोंको नाम मेता है तबर अनेक प्रकारसे सब जामोंकी गति-जगतिको मान सकता है। १२ बम सब गायोंको गात प्रकारसे गति-अगतिको गान गाता है तमी प पुष्प, पार, पर मोर मोपको चाल सकता है। ४३ जब या पुष्प, पाप, मध और मोक्षको जान जाता है, तभी वह मनुष्य बौर हेमसची मोगोंकी इण्यासे निच हो सकता है। ११ पदेव और मनुम्पबधी भोगोंसे निबर होता मी सर्व प्रकारके माप और बम्पतर संपोगध पाग हो सकता है। ०५ बब मा बायाम्पतर सपांगका त्याग करता है वमीप सम्प-मारसे मुंरित होकर मुनिश्रीक्षा मेता। १६ बर मुंगित कर मुनि दीक्षा के मेवा। तभी पy स्वरकी प्राति परता है और उत्तम धर्मका अनुभव करता है। १७ गए उतर स्वरकी प्राप्ति करता है वौर उधम पर्ममुळ होता है वमी या गीतको मन मापीर मिप्मातर्शनसे अपम होनेबाम्नै कर्मरचको र पाता। १८ मा मिष्पार्शमसे सपाई फर्मरमधे दूर कर देता है तमी सधानी और सम्पर्शन पुको नाता है। १९ सब सवाल और सदनकी प्राप्ति हो जाती है तमीमा रागररित होकर मेर- ठोका साम्प जानता। ५. या पगहान होकर एफेक्सी छोकाडोका सस्स गाम गातातमा पर फिर मन पचन और कापक पागको रोककर चौकी प्रस्थाको प्राप्त होता है। ५१ मा पोगको रोककर शेठेशी साम्पाको प्रान हो जाता है तमाग सब कमीका पर निबनोसर भिगति प्रसरता है। पालामा पेशास मुवी सोम १९४५ सत्पुरपोका ममस्कार मुझे पहा मारकर्शन आमग मास पाया। धर्म समय में प्रो योहाडी
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भीमद् सचम्म [पान नई एक निर्णपो परसे में या मानने म्गा कि इस कामें भी कोई कोई महामा पहरे माको नातिस्मरण पानसे मान सकते । बौर पा चानना कल्पित मही परस्तु सम्पन होता है। उत्तर सग, बान-मोग लौर एसगसे मी सामान प्राप्त होता है-पर्यात् पूर्वमा प्रत्पन्न वनुमसमें था बाता है। अबतक पूर्णमष वनुमवगम्प न . सबतक वामा भविष्यकासके पि कितमासे धर्म- मापन किया करती है, वौर ऐसा सशक्ति प्रपन पोम्प सिदि नहीं देता। वा 'पुनम है' इस लिपपमें मिस पुस्पको पप अपना प्रत्यक्षसे निशकता नही ई उस पुरुषको वामनान प्रात हवा है ऐसा शाख-गौरी नहीं करती । पुनमको सिदिके समंघमें मुत पानसे प्रप्स इबा गो बाप मुझे नुमनगम्प हुला है उसे पोकासा यहाँ काता। 'पैताप' और 'बा' न दोनोंको पहिचानने के लिये उन दोनोंमें जो मिम मिम गुम है उने परिपाननेको पहिम भापकता है। तपा उन मिम मिम गुणोंमें मी जो सबसे मुप्स मिमता दिखाई देती है याक ताप' में 'उफ्पोग' (वर्षात् निस्से किसी बराच मोष होवार गुण) यता है, और 'जसमें नहीं पता । यहाँ शाप में या शंका करे कि 'या' में शम्, स्पर्ण, रूप, रस वोर गप धजियों होती , भौर पल्पमें ये शक्तियों नहीं पापी पाती, परन्त पर भिन्नता भाकाश अपेक्षा नेसे समझ म ला सकती क्योंकि निरपन, नियकार, बरूपी स्पादि कई एक गुण ऐसे में मो मालास तर भरमामें भी यते है, इसलिये वाशको वरमा सरस गिना जा सकता है, क्योंकि फिर इन दोनों में कर्य भिम धर्म नपा। इसका समाधान पहल इन दोनों स्तर है और यह बात वामा पहिसे कयामा उपयोग ' नामक गुण बताता है, पोकि पप गुण बाकसमें नही। सबा पर तम्पका सहप समझना मुगम ऐ जाता है। (२) गनका मुम्प गुण अपना पण 'उपयोग' (किसी भी पस्तुसमेची मामा गोपाल) है।विस जागहमा बमुख और सपूर्ण उपपोग पता है या गालामा ( ' म्यहारनमको अपेक्षासे'- क्योंकि प्रत्येक बारमा अपने मुद्र नपसे तो परमामा हो, परस्तु जहाँतकाने तरूपको पपाप मही समष्ठौ पातक गौवामा ग्यस्य यता)-परमात्मशामें नहीं बापा | जिसमें शुर चौर सम्पूर्ण पपार्प उपयोग यता है म परमहमदशा पास ई बारमा मानी जाती है। भार उपयोगी होनेमे हो मम्मा कम्पित बान (बड़ान ) को सम्पग्जान मान यी और उसे सम्यगानके बिना पुष मा पुममा पपाप निश्चय ही हो पाता । भनुन उपयोग होनेका भी निमित्त होना चाहिप । यह निमिच अनुपम र भाते हुए बालमानसे प्रण किये एकर्म पुर। (इस कर्मच पयार्प सप समतामे सपहने याम्य है क्योंकि मामाको ऐसी दशामे किसी मी निमिउसे ही होना चाहिय | धार पनिमित मार पपार्थ दिमे समसमें न बने तबतक जिस रास्तेसे पाना । उस रास्लेपर माना ही हो नही सकना । ) जिसका परिणाम विर्यप हो उसका प्रारंभ मगुर उपयोगके बिना नही होता भीर मामुर उपयोग मृतकाएक किसी भी सपके बिना नही हम परि वर्तमान साधर्मस एक एक काला निकासी गार्प और उसपर ध्यान देते रहे तो .
पत्र ४] पिविष पर भापि संग्रह-२५वों पर्प प्रत्येक पस मिम मिम मनपसे गीता एमा माश्म होगा (उसके मिम मिम होनेका कारण कुछ तो होगा हो)। एक मनुष्यने ऐसा स सकल्प किया कि मैं सावनपर्यंत साका पितामतक भी न काँगा परन्तु पॉप पर मी म बीत पाये और उसका पितपन हो गया, तो फिर उसका कुछ तो कारण होना ही चाहिये । मुझे जो शाबका मन्महान हुमा है उससे मैं या कर सकता हूँ कि पह पूर्वकर्मके किसी मी मशका उदय होना चाहिये । कैसे कर्मका! तो कहूँगा कि मोहनीय कर्मका । उसकी किस प्राप्तिका ! तो कईगा कि पुरुपदका ! (पुरुषदकी पन्द्रह प्रतियों है।) पुरुपवेदका उदय र सफस्पसे रोक्नेपर मी हो गया, उसका कारण अब कर सकते है कि वा फर्म भूतकालीन कारण होना चाहिय, वीर अनुप से उसका सरप विचार करनेसे पर कारण पुनर्मम ही सिट होगा। इस बातको बाससे तोद्वारा कहनकी मेरी इच्छा थी, परम्त मितना सोचा पा उम्से बाधिक कपन बह गया है और आमाको जो बोध हुआ है उसे मन पयार्य नही जान सफता, और मनके मोषको पचन पयार्य मही कर सकते, गौर बनके कपन-बोधको काम सिम नहीं सकती; ऐसा होनेके कारण, और इस विषयके ठहापोहमें बहुतसे ना शम्दोके उपयोगको भावश्यकता ऐनेके कारण वमा हाल तो इस विषयको अपूर्ण र देता है । यह अनुमान प्रमाण पुजा । प्रत्यक्ष प्रमागके स्वपमें यह बानीगम्प होगा तो उसे रि, अथवा मेंट होने का अवसर मिसा सो उस समय छ का सगा । मापके उपयोग होरम या तो मौ बापकी प्रसस्ताके लिये एक वचनोंफो पहा बिसता १ स्वकी बफेशा मारमान श्रेष्ठ है। २ धर्म-विषय, गति, मागति निमपसे हैं। ३ म्पों म्पों उपयोगकी पुस्ता होती जाती है स्यों त्यो भारमान प्राप्त होता जाता है। । इसके लिये निर्विकार परिकी भावश्यकता है। ५ 'पुनर्जन्म है' यह योगसे, ग्रामसे और सभासे बनेक पुरुषोंको सिद एजा है। इस कामे इस लिपपमें अनेक पुरुषोंका निशका नही होती, उसका कारण फेछ सानि फनाकी म्यूलता, विलिप तारको म्प, भौगोकुलचरित्रमें भापको बताई ई निर्जनावस्थाको कमी, सस्सगका न मिसना, सामान और अपपार्थ रिहा है। आपको अनुसता रोगी तो इस रिम्पमें विशेष सिर कहूँगा । इसम मुझे भामाग्मताका परमधाम । इस कारण वारको मनुमा होगी हो। परि समप हो तो दो पार बार इस परफे मनन करमेसे कहा जा बन्य भाशय मी भारको बहुत रशिगोपर हो जापगा। ठोके कारण विस्तारम कुछ शिम्बा है, तो भी मैं समझना ! किसा चाहिये मा मही समझाया जा सका परम्तु मैं समझना है कि इस विषयको धीरे धीरे मारके पास मुरसलपमे एप सहगा । पुनमगवान्य औनवरिम मेरे पास नहीं मापा । बनुना व मिरमानेको सूचना परे । सपुगेका परित्र दर्पगरप है। दुद और जैनभमके उपगमें महान् जन्तर ।
[ भीम परान चौप गुणस्पान प्राप्त पुस्पको पात्रता प्राप्त होगा माना जा सकता है। यहाँ धर्मप्पानको गौणता है । पाँचोंमें मप्पम गौणता है। मोमें मुस्पता तो परन्तु व मध्यम है ।और साताम उसकी मुस्सता है। हम पहस्पामममें सामान्य निषिसे बपिकसे वधिक पाँच गुणस्थानमें तो आ सकते है। इसके सिवाय मावा लपेक्षा तो कुछ और ही बात है। स धर्मम्यानमें चार मानमात्रोंसे भूपित होना समवित ।- १ मैत्री-सब जगत्के गांवोंकी मोर निर बुद्धि । २ प्रमोद---किसीके अयमात्र गुणको मा देखकर रोमांचित होकर उपसिन होना । १ कामा-गल्के नाक दुसरेकर बनुमा करना । १ मा पस्म मपणा उपेक्षा---गुर समारिके सम्मायके पोम्प होना । इसके बार बान है। इसको चार मचि है। इसके पार पापे । इस प्रकार धर्मपान अमेक मेलोंमें विम। जो पान (पास) का बप करवा , म मनका जप करता है। जो मनका जप करता है हवाम-कौनसा प्राप्त करता है ऐसा मी या गावा है तो म्हारमात्र है। निषपसे निमय वर्षकी मपूर्ण योगना तो म्पुरपका मन हो मानता है क्योंकि भासका बय करते हए मी सत्पुरुषको बाहाका मग होनेकी समानना यती है इसलिये ऐसा घम्स-जय परिणाममें ससारको ही साता है। वासका जप या कि नौगासनाका म्य है। उसके दो सापन है-सरू और साग । उसकी दोमियो !-पपासना और पात्रता | उसकी दो प्रकासे परि होती है-परिचय और पुण्यानुषी पुष्पता । सबध मा एक बारमात्री सत्पात्रता हो।हामें तो इस लिपपमें मा0 किता। - . मपालसागर समापूर्वक पा जाम ता पर दसता देनेवाला प्रप है। नहीं ता या प्रशस्त मागोंको बानेबाम्म प्रप है। पबाणीमा १९१५ म्पेठ सदी की पक्षपाती म म मीरे, न पा पित्मदिए । पुतिमापन पस्म, वस्म कार्यः परिमा॥ -मोहरिम्यापार्य मापका पैशाव कोका धर्म-पत्र मिम । उस पत्रपर विचार करम मिमे विशेष मान्य मोस या पर जिसमे मुझसे इतना सिममा पुजा समिमे इस कम्पके सिपे क्षमा करे । उस पत्र में मार नियोकि किसी भी मासे मापारिमा बामका सपान करना र शानियोंका उपशाह, पवन मु? मी मान्य है। प्रत्येक दर्जनमें वामाका ही उपदा किया पिषिध पत्र मादि सह-पौवर्ष - गया है, बार सबका प्रयत्न मोक्षके लिये ही है। तो भी इतना तो भाप भी मानेगे कि जिस मार्गसे खामाको नरमान, सम्यग्नान, और यपार्य पशि मिसे यहाँ मार्ग सत्पुरुषकी वाहानुसार मान्य करना चाहिये। यह किसी मी दर्शनका नामोस करनेको नापश्पफता नहीं है, फिर भी यह तो कदा ना सकता है कि निस पुरुषका वचन पापर बसरित उसके द्वारा उपपेश किया जा दर्शन दी पूरि मितकारी है। यहाँस मामा 'यपार्थ दरि' भयका बस्तुधर्म' प्राप्त करे नहींस सम्पामान प्राम होता है, या सर्वमान्य बात है। मामय पानेके लिये क्या देय है, क्या उपादेय है, और क्या झेप, इस विषपमें प्रसग पाकर स्पुरुपकी भासानुसार आपको पोका पोहा निजता रहूँगा । यदि होय, हेय, और उपादेयरपसे कोई पदाथ-एक परमाणु मी मही माना तो यहाँ बारमा भी नहीं बानी । महावीरक उपदेश किय हुए आचार्यग नामके संशतिक शाम्भमें कहा है कि न एगं माई से सम नाई, न सम्म मामा स पग माई-वर्षात रिसने एकको माना उसने सब नाना, मिसम सब गाना उसने एक्फो गाना । यह बपनापूत पेसा ठपरेम पता है कि अब कोई मी एक भाष्माका माननके लिये प्रपान करगा, उस समय उसे सब जानने का प्रयत्न करना होगा, और सम माननका प्रपन काख एक मामा हो जानमेके सिये है । फिर भी जिसन विचित्र जगहफा स्तनप नहीं जाना बह नामाको मही गामाता-यह उपरेमा भयथार्य नहीं ठहरता । जिसे यह शान नहीं मा कि मा किस कारणस, फस, भार किस प्रकार बंध गई है, उमे इस माता भी दान नहीं हो सकता है यह किम कारणसे, कैम, मार किस प्रकार मुक हो सकती।बीर पर मान न हुआ तो यह वचनामृत ही प्रमाणभूत यदरता है। मातारक उप- देशको मुम्य नी उपर पचनापसे शुरु होताभार उन्होंने उसका सगा सोंचमसम्म समाया है । इसक विषयमें परि भापको अनुकूलता होगी ता बागे कहूंगा । पहा भारत पर पह भी निदेन कर देना पाग्य । फि महार जया किसी भी पूमर उप- एकफे पसरातो कारण मरा कोई कपन अपना मेरी काई माम्पता महा। परन्तु भामय पानक उिप निसमा उपना अमुई ससौक सिपे मुत पचपात (1) शिराग-और प्रशम्नराग, जयपा उमौक लिप मर्य मान्यता पार उसार मापारसे मेरी प्रतिमा है इसलिये यदि मरा गई भी कपन आमवर्ग वामा पहुँचान पाउादा तो उसे बनासर उपकार करते रहिय । प्रत्यक्ष समगी ता परिहाग हो और ए पुण्यानुवर्षी पुण्यका 1 फर ६ ता मी अबतक मानशिक अनुमार पराल ममग मिमा देगा तपक उम में अपना मनप ही ममगा। • निर्मप शासन शानहरका सरोनय र मानता है। गातिपदना, पर्यापदना पा पपनाये अनेफ भाई परस्मशानादतार बिना पै मा समापे र मामी दना भयमा गम्प परमाये ही ह। ३ पुनम गरम मस्न रिपार प्रगर पानक पि आन मगन किया था, उमझ माम्मे पर प्रभा निगना मार सक्षेम गिाला .
भीम पसचम्म [n. बकई एक निर्णयों उपरसे मैं पा मानने म्गा कि इस काम मी कोर्ष कोई महामा पहरे मषको नातस्मरण शानसे मान सकते है। और पा पानमा कम्पित महीं परन्तु सम्पन होता है। मा समेग, कानयोग मोर ससगसे मी पर धान प्राप्त होता है-अर्याद पूर्वमा प्रत्पन्न अनुमपमें मा गाता है। मदतक पूर्वमा भनुभवगम्प न हो तबतक मामा भविष्यको किम शकिवमानसे धर्म- प्रयत्न किया करती है, और ऐसा सशकित प्रफरन योम्प सिदि नहीं देता। मा 'पुनम है'स विषयमें मिस पुस्पक्चे परोस वपमा प्रस्पक्षसे निकला महोई उस पुरुषको बाम्बान प्राव हवा है ऐसा शाखसमै नही प्रती । पुनमको सिदिके संबंपमें मुस- पानसे प्राप्त हुषा को वाशप मुझे वनुमबगम्यमा उसे थोडासा यहाँ कावा, (१) पैम्प' और 'या'स दोनोंको पहिषामने के लिये उन दोनोंमें पो मिम मिम गुण है उ पहिचाननेको पहिम मानसकया है। तपा उम मिम मिम गुणोंमें मी बो सबसे मुस्य मिश्चा दिसई देता है पाकि पैन्य में उपयोग' (वर्षात् मिससे किसी बलका बोध होता है। गुण) यता, वर 'ना में पानी राता । यहाँ शायद कोई या शंका करे कि 'नर' में पद, स्पर्ग, रूप, रस और गंन शहियों होता है, और पैतत्पमें ये शालियों की पापी नाती, परन्त या मिमता वाकारको अपेक्षा नेसे समझ नहीं पा सकती क्योति मिरजम, निराकार, वरूपी स्पादि की एक गुण एसे मो नाकारा तय मारमा मी यते हैं, इसलिये भाकाको बारमा सारा गिना जा सकता है, क्योंकि फिर इन दोनोंमें कोई मिम धर्म न था। इसका समाधान पाकि इन दोनोंमें मन्तर है और पबन्तर बारमा पहिरो शामा उपपोग' नामक गुण बताता है, क्योंकिर गुम माकाशमें नही।मबना और बैतन्या साप समझना मुगम हो जाता है। (२) गोषका मुस्प गुण क्या क्षण उपयोग' (किसी भी पटसर्वपी मानना) योन बान) है। मिस पीतामा मयुर गौर वपूर्ण उपयोग यता गावाहमा ( 'म्यमारमको अपेक्षासे'- क्योंकि प्रत्येक मामा अपने घर नपसे तो परमात्मा है परन्तु वहाँतहमने सरूपको पपार्य नहीं समधी गतिक गोवामा उपस्थ यता)-परमात्मा ही वापा | मिसमें सम और सम्पूर्ण पदार्प उपयोग यता परमात्मामाको प्रसमामा मानी जाती है । वपुर उपयोगी ऐसे ही वात्मा कल्पित बाल (अजान ) को सम्पग्मान मान दी है। और उसे सम्पमानके किना कुछ मी पुनर्गमका पपा निश्चय नहीं हो पाता | मधुर उपयोग होनेका कुछ मी निमित्त होना पाहिये । यह निमित्त बनुमासे परे मासे हुए पासमा से प्राण ये एर्म पुगत है। (इस कर्मा यथार्य स्वरूप सस्मतासे समझने योग है, क्योंकि वास्माको ऐसी दशमे किसी मी निमित्से होना पाहिये । और एनिमित्त मक्तक पाप लिसे समहमें न वाले बता मिस पस्तेसे बाना है उस रास्तेपर बाना हो हो नहीं सकता।) विसत्र परिणाम निपप्प हो उसका मारम बपुर उपयोगके बिना नहीं होता और पावर उपयोग भूतकाळे किसी भी सर्वपके मिना मही होता । हम परि वर्तमानधास एक एक पल्मो निकाले पाप और उसपर पान देते थे, तो पर ४ ] पिपिप पर मारि संपार-२१ वर्ष प्रत्येक पल मिम मिम सम्पसे गाता मा माम्म दरोगा (उसके मिम मिम होमेका कारण कुछ तो ऐगा दी)। एक मनुप्पने ऐसा स सकम्प फिया कि मैं सावनपर्यंत खीका विषमतक मा म फलंगा परन्तु पाँच पट मी न बीत पापे और उसका पितमन हो गया, तो सिर उसका कुछ तो करण होना ही पाहिये । मुझे जो शामका सम्पदान पुमा है उससे में यह कर सकता है कि पर पूर्णकर्मके किसी मी जशका उदय होना चाहिये । कैसे कर्मका! तो कहूँगा कि मोहनीय कर्मका। उसको किस प्रासिका तो कहूँगा कि पुरुषोदका ! (पुरुषवेदकी फ्ला प्रहतियाँ हैं।) पुस्पोदका उदय प सकरपसे राक्नेपर मी हो गया, उसका कारण मन कर सकते है कि कोई भूतकालीन कारण हाना पाहिय वीर अनुपू से उसका स्वाप विचार करनेसे पकारण पुनर्जन्म ही सिद्ध रोगा। इस मातको पातसे नोशप करनेकी मेरी इच्छा थी, परम्तु जितना सोपा पा उससे अधिक कपन वा गया है, और मामाको बो बोध का है उसे मन पपार्य नहीं जान सकता, और मनके बोषका पन यथार्य नहीं कर सकते, और बघनके कयन-बोषको कसम विस नहीं सकती ऐसा होने के कारण, भौर इस विषयके आपोहमें पावसे ना शम्दोंके उपयोगको भापकता रोनेके कारण भी हाल तो इस पियको मपूर्ण छोर देता है । यह अनुमान प्रमाण इमा। प्रत्यक्ष प्रमागके सबध बाबानीगम्य रोगा तो उसे फिर, अपना मेंट होनेका अवसर मिला तो उस समय कुछ का सगा । भापके उपयोगमें हो रम रहा है, तो मी आपको प्रसमताके लिये एक सपनोंको यहाँ शिसता -- १ सनकी बपेक्षा बारमझान श्रेष्ठ है। २ धर्म-विषय, गति, वागति निथयसे हैं। ३ म्पो म्यों उपपोगको पुरता होती जाती है पो स्यों वाम्मान प्राप्त होता जाता है। . इसके लिये निर्विकार रसिको बाश्यकता है। ५. 'पुनर्जन्म है' पर पोगसे, शाससे गौर समावसे अनेक पुरुषोंको सिदामा। इस कामे इस विषयमें बनेक पुरुयोंको नका मही होती, उसका कारण केरठ सामि ताकी म्यूमता, नितिम तापको पूर्ण, नागोपरिप्रमें आपको बताई मिर्जनालस्याको कमी, ससंगका न मिलना समान और पपपार्य शिही। मापको अनुलता होगी वो इस विषयमें विशेष किर काँगा । इसस मुझे बास्मोग्नलताका परमठाम है, इस कारण वारको बनुकता होगी । पदि समय होतो दो चार बार इस परके मनन करनेसे कहा जा भन्य भाप मी मापको पात टिगोचर हो बापगा। शेखौके कारण विस्तारसे पुए दिमाई, तो मी में ममता कि जैसा चाहिये पैसा नहीं समझापा ना सका; परन्तु में समताकि इस विषयको धीरे धीरे मापक पाम सरलपमें रण सगा। . . + पुरभगवान्न गोवनपरिण मेरे पास नहीं मापा । पनुश्मा से तो मिनवानेको मुपमा परे । सयुपोंका परित्र दर्पगप है।पुर और चैनधमक उपदेशमें महान् बन्तर है।
भीम परवद्र [१४२ सबगोषोंकी क्षमा माँगकर यह पत्र पूरा (अपूर्ण स्थितिसे ) करता है। परिवारको वाया होगी तो ऐसा समय निकाल जा सकेगा कि निम्सेवामान हो। मुगमता म होने के कारण ऐसमें पोप बाना समय है, परन्तु कुछ भाषारी पौ सपा सरवाला उपयोग करमेसे बास्मसको विशेष गरि सकती है। रापचन्द्र रक्जीमाईल दिनपप्रभारसे प्रशस्त प्रणाम ४१ आमदावार से १९१५ म्येष्ठ मुदौ १२ भौम भने वास्को पवाणीचा कारसे पुनर्भमके सबमें परोपवानको अपेक्षासे एक विचार मिसे थे। इस विपपमें अकाश पाकर पुल बतानेके भाव, उस विषपका प्रत्यक्ष अनुभवगम्य बानसे को निषम मेरी समधमें भाया है, पर यहाँ करना चाहता है। पर पत्र मापको म्पेष्ठ मा ५ को मिग होगा । भाकाश मिम्नेपर परि कुछ उत्तर देना याम्प मादम हो तो उत्तर देकर, नही तो केवल पांच मिलकर शान्ति पापा, सो निग्न है। निर्मपहारा उपसा किये हुए शामोंकी मोजके लिपे करीब सात दिनसे मेरा यहाँ बाना वाहै। पर्मेपमीतनके मुफ रामचन्द्र रमणीमाईका यपानिषि प्रणाम ४२ बगामा (काठियावार) .स १९०५ भासा सवा १५एक वापका मापान मुरी का लिसा रामा पत्र मुझे समाण केम्पमें मिला। उसके बार मेरा पहा मामा ला, इस कारण पाँच मिसभेमें सिप मा। पुनर्जन्मसवपी मेरे विचार वाफ्को अनुइस ए इस कारण इस लिपपमें मुझे बापका सहारा मिमगपा। मापने मोतकरणीयाममातबन्य- -अमिळापा प्रगट की सौ वाशामपुरुप निरतर एमते अाप है। उन्होंने ऐसी दसाको मन पचन कापा और भाभासे प्राप्त की है और उस दराने प्रकाशसे दिम्प मारमासे गानाशरा सर्वोपम भाप्यामिक अपनापतों को प्रदर्शित कपा, मिनको पाप से सपात्र मनुम्प निरंतर सेवा करते है। धार यही मनतमयके वामिक दलको दूर कामे परम भापति। समन परिणामिक मासे मुहिका उपोक करते है या मि संशमी, परन्तु पपार्प राति दुए बिना सर दर्शनाप पहान इदयगत नही होता । या दोनेके मिपे सपापो प्रशस्तमति उनके पापा मार उमा उपदेशका असम्पन निरिकार बालयोग स्पादिषो सापन हैपुर उपयोगस माप दोने चाहिये। पुमम्मका माप निपप तपास्य मापालिक चारोंपो फिर कभी प्रसंगानुन करनेका भाडा पता।
पर ४१,४] पिपिए पर मावि संप्रह-२१वाँ वर्ष दुग्भगवान्का चरित्र मनन करने योग्य है, यह कपन पक्षपातरहित है। अम में पुन्छ आभ्यास्मिक तत्वोंसे युक्त सपनामृत किस सगा। धर्मोपनीवनके इशुरू गपचन्द्रका विनययुक्त प्रणाम ४३ बाणोधा, आपात बदौ १२ पुष १९१५ महास्वामी मोसमामा यषण करती है, यह बहुत सुप्स और छाम दायक है। उनको मेरी वरफसे निति करमा कि वे इस पुस्तकको पपार्थ प्रवण करें और उसका मनन करें। इसमें मिनेघरके मुर मार्गसे बाहरका एक भी अधिक बचन रखने का प्रयन नहीं किया गया । भैसा अनुभवमें आया और कालमेद देसा वैसे ही मध्यस्थतासे यह पुस्तक लिखी है। मुझे बाशा है कि महासतौनी इस पुस्तफको पकाममापसे पत्रण करके जाम काल्याणमें पदि करेंगी। ४४ भबीच, बि स १०९५ धापण सुदी ३ बुध पमाणा मामके गाँवसे लिखा इमा मेरा एक लिमप-पत्र वापको मिला होगा। में अपनी निवासभूमिसे पगमग दो माससे सत्योग और एसगकी पदि करनेके लिये प्रयासरूपसे कुछ स्पटोंमें रहार कर पाई। मामग एक समाहमें मापके दर्शन भौर समागमको प्रतिके लिये मेरा यहाँ आगमन होना समय है। सब सातोको नामनेका, क्रियाका, शानका, योगका और भफिका प्रयोजन अपने सपनपकी प्रामि करना ही है और यदि ये सम्पर भणियों आत्मगत गोप वो ऐसा होना प्रत्यक्ष संमत्र है, परन्तुइन पस्तुमोको प्राप्त करनेफ लिये सह-संग-परिपागकी मापश्पकता केवळ निनावस्या वोर पोगभूमिमें पास करनेसे ग्राम समाधिको प्रमि नहीं होती, मह तो निपमसे सर्म-संग-परित्यागमे हो रहती है। देश (एकदेश ) संग-परिस्पागमें केस उसकी मनना समय है।गबवक पूर्वकर्मक बम्से गहमास मोगना बाकी है तबतक धर्म, अर्थ और कामको उपसिन-उशसान मापसे सेवन करना योग्य है। माममापसे गृहस्प-भणी होनेपर अवरंग निर्मक भेणौकी वापता है, और महाँ पाईयहाँ सर्वसिदि है । इस मेगामें मेरा नास्माभिठामा मात महिनासे पा करती है।ई एक म्पमारोपाधिके कारण धर्मोप- गोपनको पूर्ण भमिलाया सफल नहीं हो सकती, किन्तु उससे प्रयच माय स्पाको मिति होती है पहचा सर्वमान्य 01, भौर इसमें किसी मास पर अपना बेपको अपेक्षा नरी है। निर्मपके उपरेशको अचठमाव और शेपरपसे मान्य करते हुए अन्य दर्शनोपे उपरेशमें सम्पत्पता रखना दी योग्य है। पाहे किसी मी एम्तेसे वार किमी दर्शनसे फमाण होतो हिर मततिरको कोई मरेमा गना योग्य नती । विस अनुभासे, रिस दर्शनसे, निम पानस माम्मम प्राप्त होता तो बही अनुप्रेक्षा, हौ दर्शन और ही शान सर्वोपरि है। तथा रितनी आमा पार है, पर्तमानमें पार हो दी है, आर मपिप्प पार होंगी ये सब इस एस दी भाषका पाकर । हम इस मापको सब तरस प्राप करे यहाँ इस मिठे हुए अप जम्मसी सामता है। 1 भीम पमान [पा ४५,४५, कई एक मान-विचार मिसते समय तपासोमताको इदि हो गानेसे बमोहलपमें रसमेमें नहीं वा पाये, और न उसे बाप गैसोधे बताया हरी चा सकता है। यह फिसी का कारण । कमरहित किसी मी रूपमें नाना प्रकार के विचार पदि बापक पम्स रस्में तो उन्हें मोम्यतापूर्वक भारमगत करते हुए दोक्के मिप-माविष्पके म्सेि मी धमामात्र ही रस्में । इस सम्प प्रमुखमानसे एक प्रश्न करमेकी बाबा चाहता है। वापके अक्ष रोगा कि प्रत्येक पदार्पको प्रापनामता चार प्रकारसे आती है: --म्य (उसका पसलमाब) से, क्षेत्र ( ससकी मौपचारिक रुपमा अनौपचारिक म्पापकता ) से, काम्से मौर भाव (उसके गुणाविक मात्र) से । म नके बिना लामाको म्यारसा मी मही कर सकते। बाप पदि काकाश मिन्नेपर इन प्राफ्नोक्का- जसे इस बास्माको म्यासा मिलेंगे तो इससे मुझे मात संवोन होगा । इससे एक बात म्पापा निभा सकता है परन्त वापके विचार पहिसे कुछ सहायक हो सकेंगे, ऐसा समधार पर माघमा की है। भोपनीमन प्राप्त करनेमें भापकी सखापताको प्राय वारश्यकता परेगी, परम्त सामान्यता चिमा सबषी भापक निमार गान लेने के बा हो उस बातको सन्म देना, ऐसी थी। शाब या परोधमान है। प्रत्यक्षमार्ग है। इस समय वो इतना । मिसकर पर पर विनय-भारपूर्वक समास करता है। वि मा स्पचद रखजीमाईक प्रणाम पर ममि मेठ पाग-भूमि है। मुझे एक समुनि इत्यादिका साप यसाहै। मौष, माषण पदी १० १५०५ जगदमें माममानसे पबहार करो, और क्तरगमें एकांत शीतगत बर्षात् निप यो, मान्यता मोर उपदशौ। ४६ बर्ग, महपर क्या : १९९५ मेर उपर सममापसे भर रग रमसा, इससे अधिक बोर कुमम करो । धर्मप्पान और म्पहार इन दोनों समाज रस्यो । सोमी गुरु, गुरु-शिष्य दोनोंकी पोरगतिका कारण है। मैं एक संसार मसे मापवान है। एद गुरुको बहरत है। ४७ बम्बई, माधपद की १२ पनि १९५५ (पदापि पादे मपर्दमान ) प्रतिमासंचारों के कारण पहकि समागममें बानेवाले मग मिस प्रवित पते ।। २ मतमेकि करण मामाने बनत कामें मोर मनत बग्मम मी माम-पर्म महो पापा, ममी कारण है कि सत्यप ससको पसइ नही करत पस्नु'सरस प्रणाम करते हैं।
पर ४८] विधिय पत्र मादि प्रह-२१ौ वर्ष १८ पना, पार्थनाप परमात्माको नमस्कार बम्बई, मासोमबारगुरु १९९५ जगत्को पुदर बसानेको जनतवार कोशिश की, परन्तु उससे यह सुन्दर नहीं हुआ, क्योंकि मातक परिभमण और परिभ्रमणके हेतु मौन्द राते हैं। परि आमाका एक मी भव सुन्दर हो जाय, मुन्रतापूर्वक बीत माप, तो जनत मपको कसर निकल बाया ऐसा में प्रमुखमारसे समन्चा , और यही करनेमें मेरी प्राति है। इस महामवनसे रहित ऐनेमें भो यो साधन मौर पदार्य श्रेष्ठ में उई प्राण करना, यही माम्यता है। तो फिर उसके लिये जगत्को अनुकूलता-प्रतिताको क्या देखना ! यह चाहे बसे बोडे, परस्तु वामा यदि अपनरहित होती हो, समाधिमय दशा प्राप्त करती हो तो कर छेना । ऐसा करमेसे सदा के लिप कौति-अफ्कोर्तिसे छप मा सकेंगे। इस समय इनके और इनके पक्षके सोर्गाके मेरे विषयमें मो विचार है मेरे प्यानमें है। परन्तु उनको भूरा बाना ही श्रेयस्कर है । तुम निर्मप रहना, मरे विपपमें कोई कुछ कहे ता उसे सुनकर पुप उसके लिये कुछ मी शोकर मत करना । मिस पुरुषपर तुमारा प्रशस्त पग है, उसके इस परमात्मा निन महायोगान्द्र पार्शनाप बादिका स्मरण रसना, गौर जैसे बने पैसे निर्मोही होकर मुक्त दशाको इम्य करना। जीने के संबंध अपना जीवनको पूर्णताके सपनमें कोई सकम्प-विकम्प नहीं करमा। उपयोगको शुर करनेके लिये अगदके सकल्प-मिकम्पोको मूग मामा पार्यमाप वादि योगी- सरको दयाकी स्मृति करना, और यहाँ बभिमपा रस्से पना, यही तुमे पुन पुन भाशावपूर्वक मरी शिक्षा है । यह मा बारमा भी उसी परकी भमिभपिणी और उसी पुरुपके चरणकमछमें तहान ई दौम मिप्य है, और तुम्हे मी ऐसी ही प्रश करनेको शिक्षा देती है। परस्सामीका उपदेश किपा इमा म्य, क्षेत्र, काल भाषसे स-सरूप यपातप्य है, यह मत मूसना । उसको शिक्षाको पदि किसी भी प्रकारसे विरावना हो तो उसके लिये पमावाप करना । इस काठको चपेशासे मन, रचन, कापाको आरममावसे उसकी गोदमें मर्पण करो, यही मोशका मार्ग है । नगदमे सम्पूर्ण दर्शनोका-मो प्रयाको मह बाना, बैनसबन्धी सब विचार भूलकर केवल उन सपुस्पोंके गमत, पोगपरित परिणमें होमपना उपयोग भगाना । इस पने मान ए " समाप पुरुष " के लिये किसी भी प्रफारस हर्ष-शोक नहीं करमा । उसकी या कपल संप-विफल्मसे रहित होनेको हो । उसको इस विचित्र जगत्से बुरा मी सबप भयका समा देना म। इसलिये उससे उसके लिये कुछ मी विचार वे अपना बोये गोप, तो मी अब उनकी वार गानेको इपया नही है । जगत्मसे जो परमाणु पूर्णकापइका किये , भीम पोमे उसे दकर प्रणमुक्त हो जाना यही उसकी निरंतर उपयोगपूर्ण, प्रिप, धष्ठ बार परम अपिठापाह-सके सिवाप उस पुछ भी माना जाता नहीं, वीर म उसे दूरी पुरा पाना हो उसमा जो पुरा रिचरना १९ उसके पूरकम धरण हो, एसा ममहर परम Wir रमना। पर बात गुम एपना । हम क्या मानते है, भार हम फेस बनार करना इस बात का जगदका रिमा- मा नबरत नहीं । परम्मु भामास लना ही नका मरना है कि पनि मुक्तिको इमा गती
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भीमा पसबम्द
[art, .
है तो समाविकाप, पग-पो मेड़ दे, और उसके माने परितुझे कोई बाधा मास्म हो तो उसे
पाए उसे स्वय माम बापगी भोर उसे अपने वाप छोड़ देगी । वहाँ कहाँसे मी रागापरीत
होना मेरा धर्म है, और उसका तुम्हें मी अब उपदेश करता। परस्पर मिटनेपर मरिहरें
पुल भामिन-सापना बतानी होगी तो बताउँगा। बाकी है जो मैने उपर कहा है यही धर्म ।
भार उसका उपयोग रसना । उपयोग हो साधना है। इतना तो पार कर देमा चाहता है कि विशेष
साधना तो फेछ सत्पुरुषों के चरणकम ही है।
भारमभावमें सब कुछ रसना । धर्मप्यानमें उपयोग रसना । बगतकै किसी मी पाच, सा
सपीका फूलगी वीर मित्रका कुछ भी हप-शोक करमा योग्य नहीं है। हम परमयति प को पस
करें पाही हमारा सर्वमाम्प धर्म है, और यह इम्म करते करते हो पा मिस पापगा, इसके लिये निर्मित
यो। मैं किसी गमें नहीं, परन्तु बामा है, यह मत भूगना ।
जिसका दो धोपयोगके प्रिय हो। ऐसी देहको रसमेका वो प्रयत्न करता है या मी
धर्म हो।
म रापर्षद
मोहमपी, यासावश १० शनि १०१५
दूसरी किसी बात को मार न कर, कास एक सपुरुषको सोनकर उसके चरणकममें सर्वमार
अर्पण करके प्राधिकरता यफिर पनि तुझे मोक्ष म मिले तो मुझसे ना ।
सपुस्प ही है जो निशदिन मपमी वाहमाके उपयोग सान राता है, और मिसका कपन
ऐमा है कि वो शाबमें मही मिता, मार गो पुननेमें नहीं वापा तो मी मिसका अनुमन किया जा
सकता है वीर जिसमे भतरग स्पा मही, ऐसा जिसका गुम भाचार; पाकाका तो ऐसा निरक्षण
है जिसका वर्णन मही किया जा सकता ।
पौर इस प्रकार किये बिना तेरा विकास में मौ फुटकारा होनेवाला मही। या बनुमवपूर्ण वचन
है, सेत् सर्वपा सुप मान ।
एक सत्पुरुपको प्रस्म करनमें, उसको समाओंको प्रशसा करनेमें, उसे ही सप मानने में
पर सारी स्विगी मी निकल गई तो बनिकसे अधिक पना मवमें त् सस्प मोक्ष चापगा।
न से १९९५
मुसकी साडी मोसी दासीनवा;
मम्मात्ममी बननी व सदासीमता ।
मुझे मेटीसी उमरसे होतानका मोध होना पुनर्गन्मय सिदिइरता है, फिर भी
गमन बार बागमनके साग परनेकी क्या माश्यकता है। १॥
मनुसरतमा बना गोष
एमपने एमबतिभाषा॥१॥
पर 11 विपिप पत्र मादिममा-२१ वर्ष वो सस्कार मापात नभ्यास करमेके या उत्पन्न होते हैं, ये सब मुझ बिना किसी परिमनक सिद हो गये, तो फिर बघ पुनर्मयको क्या शका है। ॥२॥ म्यों ज्यों बुरिकी अन्पत्ता होती जाती ह और मोह माना जाता है, स्यों स्यों समार-भ्रमण मी महावा मावा और अतोति मसान । जाती ॥३॥ अनेक वयके नास्तिकप चारोंपर मनन करनेपर यही निणय स होता है कि मस्तिनाप विचार. ही उत्तम है।॥१॥ पुनर्जन्मको सिद्रिके लिये यहाँ एक महा अनुकूल तक कि यह भव दूसरे भाके पिना नाही हो सकता । इसको विचारमसे भाग्मधर्मका भूम प्राप्त हो जाता ॥५॥ स १०१५ ग्रीसपी मेर पिचार बात पास शस्त विचार करनेपर यह सिर दुखा है कि निराबाध मुहका वाधार पुर बान, भार ही परम समानि मापस बाय बालरमकी रिसे भी समारका सचिम मुम मान ही गई है, परन्तु वस्तुतः ऐमा नहीं है। विवेक रिसे देखनपर माक साप सयोगमन्य समके भागनका का पिता का मन करने पोम्प स्थान भी नहीं हप्ता । जिन जिन पापोर में गुणा माती है ये सब पाप भीक शरारमें मान्द है, आर उनका बह नग्मभूमि है।र पा सम्म क्षणिक, मप, भार सुबसीले रोग समानही। उस समय स्परपमें आकिनकर पी उसार निमार करें तो सी बात है कि यह कैसा भूम । संक्षेपमें कानेका अभिप्राय यह है कि उसमें कुछ मी मुष नहीं। और यदि उसमें सुछ हो तो उसका धर्महित दशाका वर्णन ना कर देना ! तब उसमे यही माझ्म होगा कि यह माम्पना + मोहदशाके कारण हुई है। यहाँ मैं सीके भिम भिम अापम मादिक मागोंका विचन करने नही बेटा , परन्तु उस ओर पिर भी अPमा म पी जाप, पह यो कि मारे, उसका सामान्य मूमन किया है। श्री गोई दाप नहीं है, परन्तु पाप तो भपनी भामा है । बार इन दोगे निकल जानसे भामा को कुछ देती है यह मशन पान मस हो है। इसठिप इस आपसे हित होना, या परम भमिलाता है। Rो, मत भाजप दिमा पनि सरांनी ॥३॥ म सम प्रति भण्ा भने मार उपोना मम पाना भव भवर मात परीम्ना माना मामिवार पर भमि भूषनामा nrn भा भरमा नहीं पता मदार पिपरा सा गा, ममाम मराn
भीमर जवान
यदि मुख उपयोगको प्रालि हो गई ताकिर मह प्रतिममय पूर्वोपार्जित मानायचे मस्सी मूठ
कर सकेगी पर अनुभषणम्प बचन है।
परम्तु मबतक मुझसे पूोपानित कर्मन संबंध तक मी किस तरास तिहार
चिरनेस मुझे निम्न सिसित समाधान एमा।
५२
उस धानको प्रामिक ये
बि स १९९५
मगदमें गो भिम मिम मत भार पशन दसममें भाते है सब परिके भेद मात्र है।
मिम मिल मो मत दिखाई दे ये वह कास एक रिका हो मेद मे म मानों एक ही
पत्रके से पाए ॥१॥
उस तरूप का मूल भारमधर्म है जो धर्म नामचमको सिदि करता , यो उपारेप
धर्म ॥२॥
सबसे पहिसे मामाको सिहरनके लिये प्रामक विचार करा
अनुममा गुम्मी सेना करनी चाहिप, यही पडित छगाने निणय किपा ॥३॥
विसको बारमा से क्षण झणमें होनेवाली मस्थिरता बार मालिक मोह रहा गमा, 10
बनुमा पुरु॥१॥
निसके पास मोर बम्पतर परिमाको प्रथियों नहीं पी ठसे हो सरम ग्रिसे परम पुरुप
मानो ॥ ५॥
ल से १९९५
१ मिसको मनोवि निरानाभनपसे बहा करती है, निसो संकम्प-
किस मद पर गमे १,
गिसके पाँच विपर्यासे विरत पुरिक अंकुर प्रस्फुटित हुए, मिसने शक फारम निर्मुस कर दिसे
है, यो बनेकत-परिमुक्त एकान-रपिका सक्न किया करता निसी के यही प्रापि, या
प्रतापी पुरुप बफ्यान होयो।
२ में ऐसा बनने का प्रपाल करना चाहिये।
मिमिवासिय मेदनी या
एक वनमा मात्रा मावा मनोज॥१॥
रक्तमान मामर्म मूड
समानी सिदि को धर्म है नबनुन ||
प्रपमा प्रमाणितमा परिण शनचार
मनुमा गुने रोने दुषम्ममा म || ॥
जसमाया भने निमाविम्मोह।
मायनी पराभनुमी गुजरा ४०
बाल देम सम्पत्य मंच प्रति नरमा
परम पुज्य मेमो मोष ॥५॥
पत्र ५४, ५५] विविध पत्र मादि संप्रा-२१पौ पर्व वि सं १९१५ मधे। कर्मको सी विचित्र बघ-स्पिति t! निसको सममें भी इच्छा मही होती की मिसके लिये परम शोक होता है, उसी गमीरतारहित दशासे पम्ना पाता है। पेनिन-ईमान मादि सत्पुम्प कैसे महान् मनोमिनयी पे । उमें मौम राना, ममौन बना दोनों ही मुख्म पे, ठ, ननुकूम-प्रतिकूल समी दिम समान थे, उनें गम-हानि दोनों समान पी, वनका कम केवल भारम-समता के लिये ही था। कैसे माधर्षकी बात है कि निस एक कम्पमाका एक कम्पकालमें भी मप होना दुश्म है, ऐसी बनत फम्पनामोंको ठमोने कम्पके अमत मागमें ही शस्त कर किया। । स १९१५ परि दुसिया ममुप्पोका प्रदर्शन किया जाय तो निधयसे में उनके सासे वम भागमें जा सकता है। मेरे इन बचनोंको परकर कोई विचारमें पाकर मिम मिम काफ्ना म करने मग गाप, मपवा इसे मेरा भ्रम म मान बेटे इसलिये इसका समाधान यही संक्षेपमें किसे देता है तुम मुझे गोसंवधी दुस नहीं मानना, ममीसबभी दुस नहीं मानना, पुत्रसबषी दुस नही मानना, कीर्तिसपी दुस नहीं मानना, भयपी हर मही मानना, शरीरसभी दुग्ध मही मानना, अपना अन्य सम्बस्तुसंबंधी दु स नही मानना; मुझे किसी दूसरी ही तयका दुस है।या दुस पातका मही, कफका नहीं, पिचका महा शरीरका मह, पचनका मह, मनका नहीं अपना गिनो तो इन सभीका है, बोर न गिनो तो एकका भी नहीं) परम्तु मेरी विप्ति तस दुसको न गिननेक सिपी स्पोकि इसमें कुछ और हो मर्म बन्तहित है। स्तना तो तुम चकर मानना कि मैं बिना दिवानापनेके यह काम पाया। मैं रामचन्द्र नामसे कहा जानेवासा वाणीमा नामक एक छोटेसे गांवमा गनेवाला, मामें साधारण होमेपर मी मार्यरूपसे माना मानवाम दपाश्रीमीयका पुत्र गिना जाता है। मैंने इस देहमें मुस्परुमसे दो मन किये है, गौणका फूल हिसाब नही। सुटपनकी छोटी समझमें कौन मामे पास पे पी पी फरफ्ना बाया करती थी । पुसकी अभिष्मरा भी कुछ कम न पी, भौर पुसमें मी महल बाग, बगौचे, ही तया राग-रंगों मी उस फुv मनोरम पे, किंतु सबसे बड़ी कम्पना इस बातकी पौ कि यह सब क्या है ! इस काम्पमाका एक बार तो ऐसा फल निकम कि न पुनर्मम है, म पाप है, और न पुण्य है। सुरसे यमा, और संसारका मोग करमा, बस यही हतास्पता है । इसमेसे दूसरी सप्तटोंमें म पाकर पर्मको पासलायें मी निकाल रानी । किसी मी धर्मक किये पोका बहुत मी मान भयषा भवामान न हा, किन्तु पोका समय बीतने के बाद इसमेंसे कुछ और ही हो गया। ।
भीमद् रागवान [पत्र ५६ जैसा होने मन सम्पना मोम की थी, तपा जिसके लिये मेरे विचार मानेकाम मेरा कई प्रपरम भी न पा, हो मी मचानक फेरफार मा छ दूसरा हो भनुमा एमा और पाममुमत ऐसा पा गो प्राप' म शाखोंमें दो सिसा था, और म नापारियों को कम्फनामे हो या। पर अनुमान कमसेमा भोर मकर मर एक 'हो' का जाप करता है। म यहाँ समाधान हो जापगा। पह बात अपय बाकी समसमें भा गापगी कि मुझे मूतकाळमें म भोगे हुए अपवा मपिम्पकालीन भय आदिके उसमें से एक मौ स नहीं है। बीके सिपाप कोई दूसरा फार्थ सास करके मुझे नहीं रोक सकता । दूसरा ऐसा कोई मी ससारी पदार्य माही मिसमें मेरी प्रीति हो, और म किसी मी मयसे मरिक मात्रामें निरा मा मी नही समयमें मेरी भमिमपा कुछ और ह और बाचरण कुछ और है । मपपि एक पक्षमें उसका कास्तक सेवन करना योग्य मा गाई फिर मा मेरी ता हाँ सामान्य प्रीति-नीति, परम्नु दुस पो हैक अमिपा न होनेपर मौ पूर्णकर्म मुझे पो मेरे एनेसे ही इसका मत नही होता, परन्तु इसके कारण असे न गनेपा पदापोंको देखना, सपना और. स्पर्श करमा पाता है और इसी कारणसे प्राय उपानिमें बना पाया है। महारंभ, महापरिणा, कोष, मान, माया, सोम अपना ऐसी प बातें गगत्में कुछ मी मही, इस प्रकार इनको मुग देनेका म्याम करनेस परमानंद पता है। उसको उपयेळ कारणों से देसना परयो पही महादको पात है। अंतरंगवर्ग मी की प्रगट नहीं की जा सकती। ऐसे पात्रों मुझे दुर्गमता ४ गई है, यही बस मेरा महानुसीफ्ना या जा सकता है। Aस १९०५ यही शम्वा है । नापी मान्ठा परा। बाप मापका स्विास-पत्र मिग । इस निबार पत्रके उत्करके परमें दो पत्र भेना चाहिये पर पत्र पहा- इस पत्रमें हस्पाममके संमबमें मने कुछ विचार मापके समीप रस्ता ।इनके रकनेका खस इतमा मिससे अपना चीनम किसी मौ प्रकार के उत्तम क्रममें म्पतीत हो और भबसे उस क्रमका बारम होना चाहिये पर कामी मापके एप भारंम मा बर्षात् भापको उस कमरे बतानेच मह उपित समप है । इस तय बताये हुए श्रम विषार बात हो सकारपूर्ण साठेपे इस पत्राय प्रकार है। भारतको तथा किसी भी मामोमान अपना प्रशस्त प्रमको मरनेपाको बास ही बात उपपोगी होगे ऐसी मेरी मापता है। पत्यागको गारी गुम्का पनि दर्शन करमे गाँप तोमो नेपप्पमेंसे यही पनि निकम्मी मम से से बाये हो ! सो मापे हो। तुम्हारे पास पा सब क्या है। स्पा में अपनी प्राप्ति है!या तुम दिनमा, मरिनाषी बफमा तास ही राशि दो सवयक बनेक प्रश्न उस भनिसे एपमें प्रवेश करेंगे, और जब बामा इन प्रश्नोंसे मिरगा तो किर दूसरे विचारों को मात । पोगा बापरा पेगा| पचपि हा विचारांसे मतमें सिद्धि है। ही चार विकसे विस चम्पावाप 1 विविध पत्र मादिसपाह-सवों वर्ष पुसको पडा है उसकी प्राप्ति होती है और हा विचारोंके मनमसे जनत कालका मोहर शेवा है, तपापि सके लिये मही पास्तविक रिसे देसनपर जो उसे अनसतफ पा सके एसे पात्र बात ही कम है। काल बन गया है। इन मस्तयोंके अतको चन्दमामी अयशा नीचतासे लेने बामेपर महर निकलता है, और वा भाग्यहान अपात्र इन दोनों प्रकारके सोकोसे भ्रष्ट होता है। इसलिये कुछ सोको मपपादम्स मानकर गाकीको उस क्रममें जाने के लिये उस गुफाका दर्शन करमेके लिये बहुत समपतक बम्यासकी जरूरत।काचित् पदि उस गुफाका दर्शन करनेकी उसकी इस न हो तो भी अपने इस मवके मुसके लिये होने और मरनके घीयो भागका किसी तय बिताने के लिये भी इस बम्पासका निमपसे बबरत है। या कपन अनुभवगम्य है, यह बहुताके बनुमबमें गाया है, और बहुतसे मार्प-संतपुस्य उसक ठिये विचार कर गये हैं। उन्होंने उसपर अधिकाधिक मनन किया है। उन्होंने लामाको सोनकर उसके अपार मामिसे गो प्राप्ति है उसकेशारा बहुतोंको भाग्यशाली बनाने के लिये बने क्रम बपि। महात्मा भयान्त ! भार उमें विकास नमस्कार ! हम योगा देरफे रिपे तत्वानको गुफाको विस्मरण करके जब वायॊशरा उपदेश किये हुए अनेक पर मानेके सिप तैयार होते हैं, उस समयमें यह यया देना योग्य ही है कि हमें बो पूर्ण बाहारकर भगता है, और जिसे हमने परमसुखकर, निवार, और यम्प माना है,—ा सब कुछ उसीमें है एमनुमवगम्य है, और यही तो इस गुफाका निवास है, और मुझे निरंतर इसाको वमिमापा रहा करती है। यपि ममी हासमें उस अमिछापा के पूर्ण होनेके कोई चिन्न रिसाई नहीं देते, वो मी क्रम-श्रमसे इसमें इस क्सकको थप ही मिलेगा, ऐसी उसे निश्चयसे मुमाकांक्षा है, बार यह अनुमत्रगम्प मी है। ममीसे ही यदि योग्य निसे उस कमकी प्राप्ति हो जाय तो इस पत्रके किसने जितनी टोल फरनेको मी इण्य नही परन्तु काकी करिनता है माम्पकी मन्ता सतोको क्यापरि टिगोचर नहीं है। मौर ससगकी कमी है। वहाँ कुछ।- तो मी लपमें उस क्रम बीमारोपण भय हो गया है, और यही पुसकर एमा है। सालिक राम्यसे मा मिस मुसके पिम्नेको नाशा नहीं पी, तपा को मनरा शांति किसी भी विसे किसी मा भारपिसे, सापनसे, से, पुत्रस, मित्रस भपया इसरे भनेक उपचारोंसे नहीं होनेवाली पी पर भी हो गई है। अब महाक सिये मरिम्पकसकी मौति चसी गई है, और एक साधारण मारनमें भापाम करता हुमा या पारा मित्र इसीके कारण जी या नहीं तो चीनेमें नि पयसे शका हो पा । विघोष क्या करें। या भ्रम नहीं है, पाम नहीं , बिल्कुल सस्प दी है। मोनियलये एक्लम परमप्रिय और जीवन बसु उसका प्रमिका बीजारोपण कैस और फिस प्रकारसे मा! इस बात का विस्तारपूर्ण सिंचन करनेका यहाँ वासर महो, परतु पाही मुझे निश्चयसे निकायमाप, समा हो मैं यहाँ करना चाहता है, क्योंकि रोमन-सम्प गाव योगा। इस प्रिप जीवनको मत्र कोई पागप सब कोई इसके लिये पात्र बनें, यह सबको प्रिय खयो, सबको इसमें रुचि हो, ऐसा भूतकाम्मे कमी हुमा नहीं, वर्तमान गाउमें होनेवाय मही, भR मणि प्पकासमें कमी होगा मही, बार यही कारण है कि विकासमें यह जगत् विचित्र बना पसा है। या हम मनुष्पके सिवाय दूसरे प्राणियोंकी गानि देमाते है, तो उसमें इस बस्तुका विक नहीं माम होता भव जो मनुष्य ये उन सब मनुष्योंमें मी यह बात मही देख सकेंगे।
या या कर - २२वाँ वर्ष ५७ पईस १९९६ माई । इतना तो तुझे अपाय करना चाहिये - १ इसमें नो विचार करनेवाला बैयप देहसे मिम है। सुसारे या दुय। से २ तुमे हुस तो होता ही होगा, और इसके कारण मी तुझे एग्गिोचर होते होंगे, पिन भी पदि कदाचित् म ते 0 तो मेरे किसी मागको पद बाना, इससे सिदि दो बापगी । इसे दूर करनेका गे उपाय है प फेवर इतना है कि उससे बायाम्पतरकी वासतिरहित बना। ३ उस वासपिसे रसित होनेके पा फुल बार दमका अनुमान होता.पा में प्रजिता- पूर्वक करता है। . उस सापनके छिपे सर्पसंग-परित्यागी नको वापसकता है। लिप सारके चरणमें जाकर पत्ता योम्पी। ५ रिस मासेमा माय उस माबसे सकास गनेका सबसे पहिले निधय कर | पनि तो पूर्णकर्म सम्मान गते में तो पागी लयमा देशत्पागी हो य, किन्तु उस वस्तुको भूम्ना मत। ५ सम्से पहिले जैसे मने से त् अपने मोक्नको जान । माननेकी मसरत इसलिये निससे तो मचिम्प समाधि हो सके । इस सम्म अप्रमाशे होकर एमा । ७ इस जायुके मानसिक मारमोपपेगको केवल रम्पमें रस । ८ गौतम पारा मेटा है, उपाधि पात है, और उसका पाग मो सकता हो तो मांयका पाते पुनः पुनः या रस- १ उसी पस्तुकी ममिमपा रह। २ संसारको बंधन मान । १ पूर्वकर्म नहीं है, ऐसा मानकर प्रत्येक धर्मा सेवन करता जा; सिर भी पदि पूर्वकर्म दुमदे तो कोक नही करना । १ मितनी देशको चिंता रसता है उतनी न मितु उससे अनंतगुनी अधिक बारमा पिता रस, स्पोकि एक मबमें मातमा पूर करमे है । ५ परि तुमसे कुछ पारण किया जा सके तो उननेका भम्यासी बन । (जिससे मितना कर सके उत्तमा कर । परिणामिकचारगाछा बम । ८ अनुत्तरम्मी कर पा ९ प्रतिसाप मंतिम उदेश्यको मत भून गाना पीनमुरी और मही धर्म है।
विपिच पच मावि समर-२२वा वर्ष बई, कार्तिक वि स १९९६ समापूर्वक सम्पमाषी होनेवालेको पचाताप करनके पाती पोरे ववसर जानेकी समाना है। हे नाप । यहि सात तमतमप्रभा मामक नरककी मेदना मिली होती तो शापित् उसे स्वीकार कर लेता, परन्तु अगदकी मोहिमी स्तीकारी नहीं जाती। यदि पूर्वक अशुम कर्मका उदय होनेपर उसका पेदन करते पुए शोक करते हो तो अब इसका भी ध्यान रक्सो कि नये कौका बब करते हुए मैसा दुसद परिणाम देनेवाठे कर्मोका तो बच नही रहे। यदि मारमाको पहिचानना हो तो मामाका परिचपी, और परमस्तुका त्यागी होमा चाहिये । गो काई वफ्नो नितमी पौलिक गाई पाहता है उसकी उतनी ही बामिक योगवि जानेको सभावना है। प्रशस्त पुरुषको मकि कणे, उसका स्मरण करो, उसका गुणचितम कर। , बम्बई,लिस १९१६ प्रत्येक पापका भायत विवेक करके इस मीषको उससे अधिस रम्थे, ऐसा निर्मप कहते है। जैसे एप स्फरिको मम्प रगका प्रतिमास हानेसे उसका मूग वरूप उनमें नही बात मेस होपुर निर्मट पाक्न अन्य सपोगके तदनुरूम भण्यास अपने स्वरूप मझको नहीं पाता । इस्प मातको पोरे गात फेरफारफे साप जैन, वेदांत, सांस, योग भादिने भी कहा है। ६० बाई, ल स १९०६ सहज यो पुरुप प्रपमे 'साय मिस या पुरुष अपने भाषको ही साप करके यह सब कुछ उसको बब बतरंगने ऐसी दशा है कि बिना किसी अपना उसने सभी ससारी को मी विस्मृत कर दिया है। पर कुछ पा मी चुका है, और प पूर्णका परम मुमुक्षु मी है, पबन्तिम मार्गका निधक अभिलायी है। अमी हामें जो भावरम उसके उदय माये , उन भाषरफोस इसे सेद नही, परम्ड बस्तुभाषमें होनेवाली में ताका उसे पर है । वा धर्मको विभि, मर्यकी विधि, भीर उसके मातरम मोशी विधिको प्रकाशित कर सकता। इस काम मात ही कम पुरुषोंग प्राप्त पुजा होगा, ऐस क्षपोपशममारका पारकप पुस । उसे अपनी सविफ लिये गर्व महीं है, तर्कक डिपे गई महा है, तथा उसके लिये वसा , भीमद् रामचन्द्र पक्षपात मी मही है, ऐमा नेपर भी कुछ बातें ऐसी हैं मिमको उसे बाझाचारमें करना पाता, इसके छिपे उसे से है। उसका पब एक विषयको छोड़कर दूसरे विषयमें ठिकाना नहीं । यपरिय पुस्म वाश्म उपयोगबाग , तथापि उस तीक्ष्ण उपयोगको दूसरे किसी भी विषयमें मानेका या भरुन। मई सं १९५५ एक बार पर स्वमुखममें बैठा था। बगम कीन मुखी है, उसे गरा दे तो सही । मिर अपने किये अपना विचार करें। इसकी इस अभिगकी पूर्ति करनेके लिये अपना सप उस समर स्पानको देखने के लिये बातसे पुरुष (वारमा ), भैर बहुतसे पदार्प उसके पास भामे । "ममें कोई गा पदार्प न था।" "कोई मोनी वामा भी देसनेमें न बाई ।" सिर्फ कुछ हमारी ही पे। उस पुरुपको शंका ये मेरी निरपिके लिये वाले हैं। पप्पु बमि, पामी भार भूमि इनसे कोई क्यों नहीं मापा ! (नेपथ्य) पुसका विचार तक भी नहीं कर सकते । रे विचार दूससे फ्पपीन है। दिनन्द्रिय गौब स्यों नहीं बाप! (मैपप्य ) इसका भी यही कारण है । चरा आँस उठाकर देखो तो सही। उन विधाको जितना अधिक हुए। उनका भरमा उनकी परपणट, पराधीनता मादि देखे नही पाते बरोबधिक । ( नेपप्प ) इसी माँसे मन तुम समस्त जगत् दस छो । फिर दूसरी बात करो। वकी बात है। दर्शन रावा, भानंद पापा, परन्तु पास के उत्पम गुमा। (मेपप्प ) पर सेव क्यों करते हो। मुमो कुछ दिखाई Pया स्या परेक पा। " पनि ठीक पा तो फिर पावती बार सी पों दिखाई देते हैं। "जो इसी होते है ये दुपी मार मो मुची होते है ये मुबी दिखाई देते है।" स्पा चामता दुसी नही है। ॥सा देसी पैसा मानो । पदि निशेष देखना ऐ तो पलो मेरे साप ।" भारतामाकरणमें प्रवेश किया । भकरण देखते ही मुझे मामा मैम पहिले पो देसा पागोटीपथा। उसका र करण यात हुम्ही पा । मर्मत प्रकारके भोंसे परपर कॉप पा था। मासुम्पको गेराचे निगड गा पाहाव-मासमें उसका सिपी । कारों में उसकी प्रति पाप और मानन्धर उपासक था। गुवाहा।
विविध पत्र मादि संग्रह-२२खौं पर्प वण, तो क्या देयोंकी दशाको अक समझें । "निषय करने के लिये बसो इन्द्र के मन्त करणमें प्रवेश करें।" तो चछो- (उस श्द्रकी मभ्यताने मूखमें गल दिया । ) मी परम दुसौ था। विचारेको पुत ऐकर किसी वीमस स्पसमें चन्म सेना पा, इसलिये मा सेद कर रहा था । उसमें सम्पपटि नामकी देखो यती पी। पर उसको उस सेदमें सोचना दे दी थी । इस महान लक सिवाय उसे और भी मातसे सम्यक हुसपे। पन्त ( मेपप्य ) क्या ससारमें बोला जय मौर केली बारमा नहीं है। उनोंने मेरे इस वामणको स्वीकार ही नहीं किया । "जाफे शान नहीं है इसलिये या विचारा तुम्हारे इस बामणको कैसे साकार कर सकता है। सिक ( एकरममाषी ) मी तुम्हरे वामत्रमको स्वीकार नहीं कर सकत । उसमी उनें कुछ मी परवा नहीं।" भरे। इतनी मधिक बेपरमाही ! पर्ने वामत्रम तो स्वीकार परमा ही चाहिये, तुम क्या करते हो। 'परन्तुइनेमामत्रण-अनामत्रणसे कोई सबष ही नहीं। वे परिपूर्ण स्वरूप-सुसमें विराममान है"। हरे मुझे बतायो । एकदम बात गस्दीसे । उनका दर्शन बहुत दुर्लम है। लो इस गमनको बाम गे, पुसते ही उनके दर्शन हो मापगे।" महो ! ये यात मुसी। भय मी नहीं, शोक भी मही, हास्प भी मही, परता मी मही, रोग मी नहीं, माधि मी महाँ, म्पाधि मी नहीं, ठपाधि भी मही, इत्यादि कुछ भी नहीं । परन्त बे बमवानत सचिदानद सिदिसे पूर्ण है। हम भी ऐसा ही होना चाहते हैं। अम क्रमसे सकोगे"। एम प्रम हमें नहीं चाहिये, हमें तो तुरन्त ही यह पद चाहिये । "अरा पर्पत होमो समता रक्सो, मोर क्रमको अगाकर करो, नहीं तो उस पदपर पांच मेकी समावना नही"। "६, गौ पाँचमा सभव नो" तुम अपने इस पचनको वापिस हो। परम सौम बतानो और उस पदमें ममा तुरती मेमो । "तसे मनुष्य माये । । ठ, पहा मुममो । उममेसे में प्रम मिल सकेगा" इया की ही पी कि इतने में ना गये-~- बाप मेरे भामत्रणको लोकारकर यहाँ बडे मापे इसके लिये मैं जाप सागोका उपकार मानता है। भाप गेग मुसा है, क्या या बात ठीक है। क्या वापका पर सुलथुक्क गिना जाता है। एक पर पुरुषने मा--" तुम्हारे वार्मप्रणये सीकार करना मना न करना ऐसा हमें कुछ मी पवन मा है। हम सुटी है या दुसी, या बनाने के लिये भी हम यहाँ नही पाये है। । । २२ भीमद् रामचन्द्र [१ पदको म्यामा करने के लिये मी हमारा परवाना नहीं मा। हमारा मागमन सुमारे सम्पाणके रिये पाहै।" कृपा करके शौय करें कि बाप मेरा क्या करपाण करेंगे। इन बागन्तुक पुरसोंच परि पप तो करदये। उसने इस प्रकार उनका परिपप देना मुन फिया'- इस वर्गम १५७-८९१०१२ नंबरबा मुरूपत मभुप्प ही है। और ये सब उसी फके बाराषक योगी र मिस पदको तुमने प्रिय माना है" " नबर पोपेसे करा पर पुखरूप है। भौर बाकाको अगत्-मबस्पा जैसे हम मानते हैं उस ने मी मानते हैं। उस परके प्रास करमेकी उनकी हार्दिक अभिनया। परन्तु वे प्रपन मही कर सकता कि पारे समपतक उनेतराय है।" नवण्य क्या करनके लिये तत्पर एनिमजा ही समझना चाहिये । र-म जल्दी म करो । उसका समाधान तुमें नमी होनेवाला है, और हो हो बापगा। टोक, भापको इस बातको म माने ता है। पर --मबर "५" बासा कुछ प्रपाम भी करता है, और सब बातों पर "" केही अनुसार। पाम सब प्रकारसे प्रयत्न करता है, परन्तु प्रमत-पासे उसके प्रफनमें मदता मा जाती है। नंबर ७ माग मा प्रकारसे असमससे प्रयास करता है| नपर"८-९१ 'पाछे उसकी अपेक्षा कमसे उम्पस है, किन्तु उसी नातिके है । नबर "११' माग पतित हो जाता है इसम्मेि उसका पहाँ बाना मी 0 सका । दर्शन होनेके लिये में बायर्नमें । (हास हमें उस पदको सम्पूर्ण देण्मे बाग!) परिपूर्णता पानेवाग। वायु-स्पिति के पूरी होनेपर सपने देखे हुए फरमेंसे एक परपर तुम मुझे मी देखेंगे। पितामी:-बाप महाभाग्यशाली ऐसे नंबर कितने है। ब-प्रपम वीन मंबर में समुह नहीं बायेंगे । म्पायों मार मी वनइम नही होगा। मबर १९११ मारे म्हारे पास भावें ऐसा उनको कोई निमित नापा। नंबर" १३ पद मा बाप परम्त पैसा बारा पूर्ण कर्म हो तो ही उसका नामन हो सकता है, अन्यथा महई । बौदाद मानेके कारण माननेको इम मी मत करना । उसका कमण कुलदी नहीं। (मपप्प) एम इन सबोंडे वतरमें प्रवेश करे। में सहायक ऐता है। पगे। नबर १ स एकर ११+१२ वक म कमसे मुक्की उत्तर भरती पर मगर " - उमा यो पो वधिक स्पा करें। मुझे पर बहुत पिप गा । और 40 मुझे वरमा मगा।
पा १] विमिष पर माविसमाखों वर्षे परने मेरे मनोगत मावको धानकर कमा --पस, यही तुम्हारा कम्पाण मार्ग। इसपरसे होकर जाना चाहे तो भाग बात है, और जमी नाना ऐ वो ये तुम्हारे साथी थे। में ठठकर उनमें मिल गया । (स्वविचार मुवन, बार प्रयम) . ६२ बम्बई, कार्तिक सुदी ७ गुरु १९९६ इस परके साथ भफ बोर योगबिन्दु नामकी दो पुस्तके वापको टिसे निकल जाने के लिये मेन हा हूँ। योगक्नुिका दूसरा पृष्ठ डनेपर मी नहीं मिल सका, तो मौ बाकीका भाग समासमें वा सकने जैसा है, इसलिये यह पुस्तक मेमी है। योगशिसमुदय बादमें मेगा । परम गद तत्वको सामान्य बानमें उवार देनेको हरिमापार्यकी चमति प्रशसनीय है । किसी स्पछ्पर सापेष संग्न मनका भाग होगा, उसकी भोर बाफ्की रधि नहीं है, इससे मुझे आमद है। यहि समय मिल्नेपर अप' से मेकर इति' तक असोफन कर जायेंगे तो मेरे उपर पा होगी। (जैनदर्शन मोबका बसा उपदेश करनेवाला बौर मास्तविक तत्त्व ही प्रशा रखनेवाला दर्शन रे फिर भी कुछ लोग उसे 'मास्तिक' करकर परिसे ठसका संग्न कर गये है, पर सम्म ठीक नहीं मा स पुस्तकके प जानेपर यह पास मापको ररिमें प्राप मा बागी)। मैं मापको ममर्मसी अपना कुछ भी पापा नहीं बताता चौर बारमाका यो तरूपए स्वरूप उसे किसी मी उपायाय मिल बाप, इसके सिवाय दूसरी मेरी कोई मातरिक अमिडापा मही है। इसे किसी भी तरसे काकर या कनेको वाला माँगता है कि जैमदर्शम मी एक पवित्र वर्णन है। पर बल पड़ी समझकर कह या कि वो बस्तु मिस रूपसे स्वानुमबमें माई हो, उसे उसी रूपसे करना चाहिये। सब सत्पुरुष के एक मार्गसे पार हुए है, और यह मार्ग वास्तविक बारमशान और उसका बमुसारिणी देहको स्पिविपर्पत सखिपा अथवा गगरेप और मोहरहित दशाम एना है; ऐसी वधा गनेसे ही परवत उनको प्रस साहै, ऐसा मेरा स्वकीय मत है। बारमामें इस प्रकार लिनेकी ममिछापा पी इसलिये पर विशा। एसमें यदि कुछ म्यूना विक हो गया हो वो उसे क्षमा करें। ६३ बर्ग, वि सं १९५६ कार्तिक (१) पर पूर्ण कागजपमानों सर्वपापक चेतन है। उसके कितने मागमें मापा समझे। माँ नहाँ ए माया हो वहाँ वहाँ चेतनको प समाहें पा महा। उसमें पुरे मुद्दे गायोंको किस तए मानें ! और उस औषको बध होना किस तर माने। उसपको निमपि किस प्रकार माने ! उस गपकी निापि होनेपर चेतनके कौनसे मागको मापा- पीतामा समझें बिस मागसे पहिसे मुफ Pd क्या उस मागको निराकरण सपते पा और
भीमर राजबन्न
कुल बार एक नगर निगमरणाना, दूसरी जगह भाइरण वीर तासरी जगह निराकरम ऐसा कर
बन सकता है। इसका चित्र बनाकर विचार करो।
सम्यापक मामा-
भारित बहे
माया
जगत
स्टाभरा, चीत बोच स्टम्पम क्या करे।
मोम
लोक पिराद
इतन
ईपर
कोअपरण
स वर तो पर टीम ठीक नहीं पता।
(२) प्रकाशतरूप पाम है।
उसमें अनंत मप्रकाशसे भरे ए त करण है। उससे फर क्या होता है !
फस पर होता है कि नहीं नहाँ वे मत्त करण म्पाम हो जाते है यहाँ गएँ मापा मास'
होने प्रगती है मामा सगरमित होनेपर भी सुगसहित माम होने माती है, बकर्ण होने पर
फर्ग मास्म हम भगती है पारि भनेक प्रखर विपरीतकार सर्व देने प्रगती है।
तो उससे होता क्या है!
बामाको पका कम्पना हो तो उसका क्या करें !
पत्त करणका सम्म र करमेके लिये उसे उस्से मिम समझे।
मिम समझनेसे क्या वाद!
भारमा निमबाप दशा पदी है।
किर बारे एका निराकरण हो अपना सकीय निराकरण ।
. । २३वाँ वर्ष ६४ बम्बई, १९४३ कार्तिक सुदी १५ स्पत् १९२१ में कार्तिक सुदी १५ को रविवारके दिन मेरा चन्म मा था। इससे सामान्य पनासे वार मुन्ध गाईस वर्ष पूरे हो गये हैं। इस बाईम वर्षकी अल्पवयमें मैंने आस्मासंबवा, नसबधी, पचनसमची, तमसबधी, और धनसबंधी अनेक रंग देसे है । नाना प्रकारकी तिरपना, नाना प्रकारका सांसारिक बरे और ममत टु सके मूसकारण इन सबके भनेक करसे मुल बनुभव हुए हैं। समर्प तत्तानियोंमे वीर समर्थ नास्तिोंने भो गो विचार किये है, सौ तबके बनेक विचार मैंने इसी अपवयमें किये है। महान् चक्रवर्तीशरा किये गये तृष्णापूर्ण चार वौर एक निस्पृही धारमाधरा किये हुए निस्तापूर्ण विचार मी ममे किये है। भमरत्वको नति और पणिकालको सिरिफर मैंने म्यूब मनन किया है। बम्पलपमें हो मैने महान् विचार कर है। वीर महान् विचित्रताको प्रति हई है। इन सब वावोंको बात गमारमावसे वाम मैं पान कि देस जाता तब पहिलेको उगती मेरो विचारमेणी वीर वात्म-दशा तथा मामको विचारमेणी और भाम-दशामें भाका पातका बतर रिसाई देता है। यह असर इतना बगा कि मानों (सका और इसका मन्त कमी मी मिठाया नहीं मिलेगा । परन्तु तुम सोचोगे कि इतनी सब विधि सामोंका किसी स्पहपर कुछ मेसन मया मित्रण कर रहा है या नहीं ! तो उसका इतना ही पर दे सकता कि यह सब हेमन-चित्रण स्मृतिके चित्रपटपर ही बंकित है, अन्यथा मेसनको बकर उन्हें जगत्में बतानेका प्रफल कमी नहीं किया । यपि मैं यह समझ सकता है कि मि-बर्या बनसमाको बहुत उपयोगी, पुन पुन मनन करन पोम्प, और परिणाममें उनकी वरफसे उसे मेपको प्राप्ति करानेवासी है, परन्तु मेरी स्मृतिने पैसा परियम उठानेकी मुझे सर्मपा मना को पी, (सकिये गवार होकर क्षमा मांगे मेता । पारिणामिक विचारसे उस स्मृतिकी इच्छाको दबाकर उसी स्मृतिको समसाकर पर सका वो उस बयन्वर्याको पौरे पारे पनप भरस पत्रपर निगा । तो मी समुचपन-पर्याको मुना वाता- १ सात पर्वतक मिलात बाळमय से में मौतो पो । उस समयका केवल इतना मुझे पार सता है कि मेरी मामा विचित्र फापना (फापना के समय अपना हेतुको समझे विना हो)मा करता पी । सेस-रमें मी विजय पामेकी गौर रामराजेश्वर जैसी पी एपी प्राम करमेको मेरी परम पमिळावा या करती थी । म पहिमनेको सम हनेकी, पाने पीनेको, सोन टनेकी मेरी सभी दशायें विदेशी पी फिर मौ मेरा इय चमठ पा । पर दशा अप भी मुझ गात या माती है। यदि मागका विकयुचबान मुझे उस यपस्थामें होता तो मुझे मोक्षके लिये बात भरिक अमि- काला न पगाती । ऐसी निरपराप दशा होनसे पा दशा मुख पुन पुन या जाता है। २ सास वर्षसे म्याद वर्ष तकका मेरा समय शिक्षा प्रान करने में बीता था। भार मेरी सतिक मिनी प्रसिदि उस प्रसिसिके कारण वह कुछ होन जैसी वाश्य मास्म होती है, पर भीमद् परचम्द्र [पा १४ उस समयको स्पति विशुद्ध होनेसे बस एकबार । पाठका परमेकन करना पाता था, फिर भी कसा मी स्याति पानेका हेतु न पा इसभिये उपाधि गत कम पो । स्मृति इन्नी अधिक प्रायो किसी स्मृति इस कामें इस क्षेत्रमें पाव हो पोरे मनुप्पोको होगी। मैं बम्बास करमेमें पाठ प्रमान था, बात बनानेमें होशियार, सिपी गौर यात बानी गाल पा । जिस समप पाटको शिक्षा माता पा उसी समप पाकर मैं उसका मावार्प का जाया करता या बस इतनेसे इस तरफसे ही मिस पाती थी। उस समय मुझमें प्रीति चौर रम पास्सत्य गात पा में सबसे मित्रता पैदा करना पाहता पा सबमें मानुमाव हो तो ही मुसहै, यह निवास मेरे मनमें सामानिमापसे या करता था । योगोंमें किसी मी प्रकारका पुदाईका बकुर देसते ही मेरा बत करण रो पाता था। उस समय पम्पित बातें करनेकी मुझे बात बात पौ । बाट वर्षमें मैंने करिता को पी, जो पीछेसे जाप करनेपर शासके नियमानुछ ठीक निकली। अभ्यास मैने इतनी प्रवासे किया था कि मिस बादमीने मुझे पहिली पुस्तक सिवानी पुर को पी, उसीको मैंने गुजराती भाषाका शिक्षण ठीक तबसे प्राप्त करके, उसी पुस्तकको पाापा पा उस समय मैंने कई एक काम्य-पंप पाये थे, तया अनेक प्रकारके छोटे मोटे, उम्टे सोचे शान- पंप देख गया था जो प्राय वर मी स्मृतिम है। उस समपतक मैने सामानिमनपसे मरिकताका सेक्न किया था । मैं मनुप्पमाविका पात विमाम पा | सामाविक परिरचनापर मुझे बात ही प्रीति पी। मेरे पितामहणकी भाव किया करते थे। उस वपमें मैंने उमके कृष्ण कामके फोको, तया हुदे मावारनपी पम्कामों को धना पा । रिम्से मुझे उन कतारोंमें मकि साप साप प्राप्ति मी उत्पन हो गई थी और रामदासजी नामके साधुसे मैंने बागमें कही मी पई पी । मैं निस्प हो कणके दर्शन करने जाता था। मैं उनकी मात बार कपासे उनता पा; मिससे असतारों के चमकाणेपर बारबार मुग्प हो जाया करता था, वौर उमें परमात्मा मानना था । इस कारण उनके यनेका स्थड देखनेकी मुझे परम उत्कंठा पौ। मैं उनके सम्प्रदायका महत अपना स्पागी होवो कितना मान मिळे नस यो कम्पना हुला करती पी । तपा मा कमी किसी पन- पैमनको निम्ति देखता तो समर्थ मपशाम होनेको इन्सामा करती थी। उसी बीच में प्रापसागर नामक प्रप मी में पा गया पा । पपपि उसे बधिक समष्ठा तो म था, फिर भी पासपी मुसमें मौन हो और निरपाधि होकर कया अषण करते हो तो कैसी बागद-दशा हो। यही मेरी तृष्णा या करती थी। गुगरानी मापा पाटमाछामें नई एक जगहमें जगककि सर्वपमें उपोश दिया गया है या उप मुझस हो गया पा । इस कारण जैन लोगोंसे मुल पार पणा हा करता पी। कोई भी पदार्प मिना मनापे कमी नहीं बन सकता, इसरिये जैन होगा मूर्म, उमें कुछ मी सबर नही। उस समप प्रतिमा-पूमनके बमदा मेगाली मिपा मी मुठं वैसी 0 सर्व देवी पी, इसलिये उन मियाओंके महीन गनेके भरण उनसे में बहुत सता पा, वर्षात् में शिल्पापे मुझे प्रिप मही छगती थी।
विविध पर भादि समाह-यावर्ष मेरी मम्ममुमिमें मिसने षणिक गेग यते थे उन सबको शा-मया मपि मिम मिम पी फिर भी पपोती एन प्रतिमा पूबनके मनवालके ही समान था, इस कारण उन सोगोंको ही मुझे सुधारना था । सोग मुझे पहिसे ही समर्प शकिवाला और गोषका प्रसिद्ध विचाया गिनते थे, इसलिये मैं अपनी प्रयस कारण बानसूसकर ऐसे मरमें बैठकर अपनी चपम शक्ति दिसानेका प्रयत्न किया करता पा । ये लोग कठो बाँधने के कारण बारपार मेरी हास्यपूर्वक टीका करते, तो मी मै उनसे पाद-विवाद करता और उन्हें समझानेका प्रमान किया करता पा । परन्तु धीरे धीरे मुझे उन लोगों प्रविषमणसूत्र इत्यादि पुम्त पानेको मिण । वनमें गात मिनयपूर्वक बगरके समस्त गासि मित्रताकी मावना म्पक की गई पी, इससे मेरी प्रति उनमें भी उत्पम दो गई मौर परिममें भी का धामे पामे यह समागम महत्या गया, फिर मा म बनके नौर दूसरे माचार-विचार मुझे वैष्णवोंके ही प्रिय थे, सपा भगकर्णकी मी प्रदा थी । वनेमें बैठी टूट गई, और इसे दुपाय मैमे नरी याँधी । उस समय योधने नावमेका कोई कारण मैने नहीं गया । या मेरो तेरा वर्षको नम-चया है। इसके बाद मैं अपने पिताको तुफानपर बैटने या था, अपने भक्षयेकी स्टाके कारण कण दरबारके महमें लिख- मके पि का मन बुलाया मासा पा तब तब कहाँ बाता था। दुकानपर यते हुए मैने नाना प्रकारको मौर मनायें की है, अनेक पुस्तके पढ़ी , राम आदिके चरित्रोंपर कविता रची है, सांसारिक तृष्णा- में की है, तो मी किसीको मैने कम अधिक मात्र नहीं कहा, वमा किसाको कम म्पादा तोपकार मा) दिया, या मुझे बराबर या वाया है। बबई, कार्तिक १९९५ दो भेदोंमें विभक्त धर्मको तीर्थकरने दो प्रकारका बताया है १ सर्वसंगपरिपाली २ देवपरित्यागी परिस्पाना- ससके अधिका- पात्र, क्षेत्र, काछ, भाष पात्र-वैराग्य मादि सहम, त्यागका कारण, और पारिणामिक माय मोर देखना । --उस पुरुपकी ममममि चौर त्यागममि में दोनों । कास अधिकारीकी अवस्था, मुस्स पार कर। माव-विनय भादि, उसकी योग्यता शकि, गुरु उसको सबसे पहिले क्या उपदेश करे, पर- सारिक माधारंग इत्यादिसबपी विचार; उसके नबाशित होने के कारणसे उस पात्र हिर करने देने याति।
श्रीमद् पसचन्द्र [पर 4 निरपर्या पर्पकम्प अन्तिम परस्पा ये बातें परम वायस्पकरें देवापागा- समपत्रिमा निश्यकम्प मदि अणुभव पान, चो, तप, भालका स्वरूम, बालके लिये उसका परिकार | -ये बातें परम बागायक (२) कानका बार- भधानका उदय करना चाहिये । पोगसबंधी प्रप त्यागसमंधी प्रय प्रक्रियासमंत्री प्रय मम्पारमर्सवपी प्रय धर्मसमी प्रय उपदेश प्रेय दम्पानुपोगी प्रय -पादि रिमाग करने चाहिये -उमपम और उपप करना चाहिये निय धर्म गा वाचार्य प्रवचम उपाभ्याप दम्पकिमी मुनि कम्य दर्शनसमापी मास्प -न स्पही योजना करनी चाहिये मतमतांवर मार्गको शैग उसका सस्प बीचमका बिताना उसको समझाना उपोत -पर विचार । मासान पंप पई, पतिक दगुफ. १९९१ माना प्रकार के मोहके होनसे बारमाकी पर अपने सामालिक गुणसे उत्पम मुस्की प्रालि को भोर पाती है, और बादमें उसे प्राप्त करने का प्रयत्न करती है, यही हि उसे उसका सिवि प्रदान करती है।
एक मोर पा., ५८] विविध पत्र मादि समाह-वाप पा, कार्तिक वदी १ रवि १९९६ हम मायुके प्रमाणको नहीं बानवे । बाल्यावस्था तो नासमझौमें म्यतीत हो गई। कम्पना करो कि २६ बर्षकी वायु है, मपया इसनी बात है कि साबस्थाका दर्शन कर सकें, परन्तु उसमें सिपिळ दशाके सिवाय हम दूसरी कुछ मी मात म देख सकेंगे । भव केवल एक युवावस्था बाको बधी, उसमें मी यदि मोहनापकी प्रथमता 7 वी तो मुसकी निद्रा न आपगी, निरोगी नहीं या बायगा, मिष्या सकल्प विकल्प दूर न होंगे, गौर बगह माह भत्कना पड़ेगा-लौर पा भी ना होगा जब कि अनि रोगी, नहीं तो प्रथम उसके प्रप्स करने का प्रयत्न करना पडेगा । उसकाइ मनुसार मिझना न मिलना तो हा, परन्तु शायद पेठभर बम मिल्ना मी दुर्सम दो बाप । उसीकी चिंता, उसीके निसम्पमें, और उसको प्राप्त करके मुस मोगेंगे इसी संकम्पमें, केवरु दु सके सिपाय दूसरा पुल मौ न देख सकेंगे। इस मबस्पामें किसी कार्यमें प्राति करनेसे सफल हो गये तो माँस एकदम तिरण रोबायगी । पनि सफल न हुए तो छोकका तिरस्कार और अपना निष्फल सेद महत इस देगा। प्रत्येक समप मृत्युका भपबाग, रोगका भयवान, आजीविकाका भयाछा, परि यश मा तो उसकी रक्षा करनेका भयपासा, यदि अपयश हुआ तो उसे धर करनेका मपवाठा, मदि मपमा भेना इषा तो उसे देने का भयबाग, यदि कर्म इभा तो उसकी हायतोवाका भययाम, यदि सी हुई तो उसके का माटा, यदि मई तो उसे पानेका विचारबाला, यदि पुत्र पौत्रादिक हुए वो उनकी पित्ताका भपणाम, पदि न हुए तो उन्हें प्राप्त करनेका विचारपाला, यदि कम दिई तो उसे मानेके विचारणाला, यदि बधिकई तो उसे गोदामें मर नेका विचारपाषा, स्पादिम्पसे दूसरे समस्त सापनों के लिये मी अनुभव होगा । कमसे को अपना भक्रमसे, किन्तु सभेपमें कानेका तारपर्य यही है कि मुक्का समप कौनसा हा पापवाल्यानस्पा ! युवावस्था बराचस्पा : निरोगाचस्पा ! रोगा- पस्पा । पनालस्पा ! निमावस्पा । गास्थावस्था । या वास्पास्या ! इस सब प्रकार के पाए परिभमके विना गवरगके श्रेष्ठ विचारसे गो विक हमारही हमें सरी पशि कपकार समकारके ठिपे मुसी वमाता है । इसका वर्म क्या । इसका अर्थ यही है कि अधिक नि तो मी एसी, म नि तो भी मुसा, ति मम सेना को तो मी मुसी, और माम म हो तो मी सप्सी। पई, कार्तिक १९९६ ऐसा पवित्रदर्शन हो गाने के बाद हिरबाहे जैसा मी आचरण क्यों न हो परन्तु उसे तीन बधन माही रहता, अमत संसार मही राहण, सौम भर नहीं गते, सम्पतर दुस माही पता, पाकामा निमित नहीं रहता भार बतरग मोहिमी मी महा गती। उससे सत् सत् निरुपम, समोचम, क, पतिल, अमृतम्य दर्शनान, सम्यक् म्योतिर्मय, चिरकात वादको प्रालि हा जाता है। उस बहुत सरप दर्शमको परिकारी महाँ मतभेद नही, माँ शेका, सा, विविगिष्णा, महावि, इनमें कुछ मी मी नो कुछ भीमर्राषन्द्र है उसे काम किस मही सक्ती, बचनचरा उसका वर्णम नहीं हो सकता, और उसे मन भी नहीं मनन कर सकता- ऐसाद बर। बर्मा कार्तिक १९९५ सब दर्शनासे टच गति हरा सकता , पन्त माय मार्गो शानियोंने न श सर रूपसे नही कहा, गोमतासे रम्बा ह । उसे गीण पों रस्सा, इसका सोचम पारण यही माम होता है मिस समय निमप मशान, निपानी गुरुकी प्राप्ति, उसकी बाहाका बाराभन, उसक समाप सदग याना, अपना समगको प्राप्ति, पे बातें होनापगी वसो समाप वात्म-दर्शन प्राप्त होगा। ७० बमाई कार्तिक १९९५ नवपर-म्पानियोंकी पदि करमेकी मरी बाकांक्षा। ७१ गई मंगसिर सदा १-२ रि १९९५ है गोदम ! उस में भार उस समयों में पपस्य परम्घामें एकादश बर्षको पर्यायसे, गम बामसे, सापभाना साप निरतर उपभर्पा और सपमपूर्वक मामलो मानना भावे र पूर्वानपुमासे नसते पए, एक गाँसे दूसरे गांवमें नात पर अपमारपर मामक मगरके मशगनमा बागके मशीककर के नीचे प्रमाविलापापर माया | माँ बाहर होकार के मारे, पाक्षिणा पाके उपर, बएम भरण करके दानों पैरों समुचित र हार्पोको व्या करके, एक पुामें पछिको स्पिर पर निर्मपरित नयमोंसे बरा नाचे मुल रखकर, योगकी समाधिपूर्वक, सब इन्द्रियोको गुम करके एक पत्रिकी महाविमा पारम र विचरता था। (चमर ૭૨ पर्व, मंगसिर मुरी ९ रवि १९९५ तुमने मेरे लिम्पमें गो गो प्रशना डिसी उम्र मने गत मनम किया।निस तय से गुण मुझमें प्रकाशित हो, उस तयका माचरण करने की मेरी ममिलाया है, परन्तु से गुणधी मुत्तमें प्रकाशिव हो गपे है ऐसा मुझे वो माम नहीं होता। मधिकसे भाषिक यह मान सकते है कि मात्र सनकी कपि मुख तापमई। हम सब स ने तसे एक ही परके ऐकर प्रपनाते है, और पर प्रपन : मोको पानापामाप मत है जिस तय मन सो उस तय माना ।
.1, ४, ५,.५] विविध पर मादि संपह-पों वर्ष ७३ बर्मा, पौष मदी । पुष १९१६ नीचेके नियमोंपर बात भय दिया जाना चाहिये- १ एक बात करते हुए उसके बीचमें ही मावस्यकता विना सरी मात न करनी चाहिये । २ कही गई वातको पूरी तरसे मुमना चाहिये । ३ स्लप धौरसके साप ठसका उत्तम उत्तर देना चाहिये । १ मिसमें बारम-बाधा अपना भारतानि न हो यह बात करनी चाहिये । ५ धर्म स्वपमें हार्म पास ही कम बात करना । ६ मेगोंसे धर्म म्यवहारमें न पाना । ७४ बम्बई, पौष १९९५ मुझे तेरा समागम इस प्रकारसे क्यों हुआ! स्पा कहीं व गुप्त पका हुवा पा! सर्वगुणाशी सम्पाव। ७५ बई, पोप सुदी २ दुध १९१६ पातसे उत्तम सापनोंसे यदि कोई ऐसा योचक पुरुप (होनेकी इच्छा करे तो) धर्म, वर्ष और कामको एकत्रता प्राय एक ही परसिमें—एक ही समुदायमें—साधारण भेणीमें ठानेका प्रपन रे, मोर का प्रपरन निरासमासे १ पर्मका प्रथम सापम २ फिर वर्षका साधन ३ किर कामका साधम १ अन्तमें मोक्षका साधन ७६ बर्प, पैर एदी , १९९६ सत्पुरूषोंने धर्म, वर्ष, काम और मोक्ष इन पार पुस्पाको प्राप्त करनेका उपरे या है। ये पार पुरुषार्प मिल दो प्रकारसे समसमें गाये है- १ पसके समाषको धर्म करते।। २ बा और पैल्पसंबधी विचारों को वर्ष पाते है। ३ चिम-निरोपको काम करते है। ४ सब बघोंसे मुक्त एनेको मोश करते हैं। चार प्रकार संग-परिस्पागाका भपेनासे ठीक येक पैटते हैं। सामान्य रीतिसे निमरूपसे- धर्म-नो ससारमें वोगतिमें गिरमेसे रोककर पकाकर रखता है वह धर्म ।।
मीमद् बन्न [पा वर्ष-पाक्नमें हापमूत वैमन, ममी बादि सांसारिक मापन गर्य है। काम-नियमिव सपसे मौका समपास करना काम है। मोक्ष -राव बमोंसे मुकिहो बाना मोक्ष है। धर्मको सबसे परिगे रसनेका कारण इतना है कि पर्य' और 'काम' ऐसे ने पाहिये जिनका मन 'धर्म'। इसलिये बर्प मौर कामको बादमें एक्सा गया है। यास्पाममी सर्वपा पूर्ण पम-साधन करना चाहे तो यह उससे नहीं बन सकता । उस स्यागके सिये तो सबसग परियाग ही वासक है । गहस्यके म्पेि मिक्षा गादि घ्प मी पोम्प नहीं है। वीर परि गास्पाममा ७७ बम्बई, पैस १९९६ मिस कारमें मार्प-संपकर्तामोंगरा उपदेश किय हुए चार नामम देशके बाभूपणके रूपसे वर्तमान ५, उस कामको पम्प है। चारों बामोमें भमसे परिग मरमम, इसरा गास्थामम, तीसम्य बामप्रस्थानम, बौरीपा सम्पासामम है। परम्भापर्यो साप करना पड़ता है कि यदि भावमा ऐसा अनुभम हो तो इसका भाग त्रिपा जा सकता हा परि को सौ वर्षकी बापाला मनुष्य इन भाममों के अनुसार पसता बाप तो पर मनुम्प इन सब बाममो उपभोग कर सकता है। इस वाममके नियमोसे माम होता है शिप्राचीनकाल में कार मौतें कम होती होगी। बम्बई, पाप १९०१ प्राचीनकाम्मे वार्यभूमिमें चार वामम प्रचयित थे, वर्षात् मे वामम धर्म मुम्परूपसे फैपुर पे । परमर्षि नाभिपुग्ने मारतमें निध धर्मको मन्म इनके परि उस के गोको इसो मासफ्नै पारधर्मका उपफा दिया था। कपासे मनोप्रमित पापैकी प्राप्ति होने उस समपके लोगोंच प्यार का परता या या पा। वधानी अपमपनीने देस दिया कि माता और म्यानमारको मानता के कारण, उस, पोगोंको कम्पास सफा पासोमा काल दुपात दोगा इस कारण प्रभुने उनपर परम काणाभाव र उमा म्पमहारच कम निमत कर दिया। बम भगवान् करकापस बिल पर ये पे उस समय उनके पुत्र मरतमे महापारिके रिपे उनके उपदेशका अनुसरणकर ताकाबीन विज्ञानाशप चार दोध पोगमा कम् | उनमें पार माममोके भिन्न भिन्न धर्मों तथा उन पाएँ वो माति-गतिका समावेश किपा । मगवान्ने गो परमकरणासे छोगोचे भविन्पम पर्मप्राप्ति हमे लिये म्पबहार-शिक्षा भार म्पमार-मार्ग रचाया था, उसमें मरतगक इस से परम अगमा हो गई। ।
पर.१,८] पिविष पर मादि संपर-शयाँ वर्ष इसके उमरसे चार बेद, चार वाश्रम, बार बर्ण और चार पुरुपायोंके सबघमें यहाँ कुछ विचार करनेकी रम है, उसमें भी मुम्पम्पसे घार माश्रम बौर पर पुरुषायीक समयमें चार फेंगे, और अन्तमें हेयोपादेयके विचारके सारा म्य, क्षेत्र, काम और मारपर विचार करेंगे । दिन धार में बाप-गाहधर्मका मुझपनपसे उपदेश दिया गया पा, वेद निम्नमपसे पे- बई पौष १९४६ प्रयोजन "नो मनुष्य धर्म, अर्थ, काम और मोन इन चार पुरुषार्षीको प्राप्त कर सकमकी दया करते हो उनके विचारों में सहायक ऐना-" इस पापमें इस पत्रको हिस्समेका सब प्रकारका प्रपोजन दिसा दिया है, ससे कुछ न कुछ सफरमा देना योम्प है। इस मगमें मिम मिम प्रकार के दोधारी गीवो तपा प्रत्पन्न भौर परोक्ष प्रमाणोंसे पह सिद्ध से करो कि उनमें मनुष्यरूपमें विपमान देहपारी आत्मा इम चारों वर्गीको सिर कर सकनमें विशेप सक्षम है। मनुष्य जातिमें बितनी बारमा । ये सब कही समान तिकी, समान विचारका, समान ममिकापाका और समाम इमामाली नहीं है, यह बात हमें प्रत्यक्ष स्पर विसई देती है। उनमेंसे हर किसीको सूक्ष्म ररिसे देखनेपर उममें पति, विचार, अभिछापा भौर इम्माओंको इतनी अधिक विधि प्रता माम होता है कि बदा मापर्य होता है। इस बारचय बनेका पात प्रकरसे पार करने पर यही धरण दिखाई देता है कि किसी भी सपना के भिमा सम प्राणियोंको मुल प्राप्त करनेकी या या करती है, और उसकी प्राप्ति बात कुछ बोंमें मनुष्प देहमें ही सिखा सकती है। ऐसा रोनेपर मीरे प्राणी मुसके कसको हो है, उनकी यह त्या केप माइरिसे पर्प, पीप १९९५ महावीरके उपदेशका पात्र कौन है? १ सत्पुरुपके चरणोंका इक २ र सूरम मोषको वमिनापा रसनेपास्म, १ गुणोंपर प्रेममात्र रसनेवाग, १ प्रमहफिम प्राति रसबाग, ५ अपने दोपोंको देखते ही टर करनेका उपपोग रहनेवाला, ५ प्रपेक परको मी उफ्पोगपूर्णक विवानेपाथा, ७ पतमासको प्रससा करनेवाला, भीम परचम्द्र [पन १, ८१ ८५४ ८ तादि प्रयास करनेकी उमग रसनभाग, ९ माहार RER, वीर निहारका निगम रसनेपाल, १० अपना गुस्ताको विमानेपाल, - गुणोंसे युध कोई मी पुरुष मानोरके उपदंशका पात्र है- सम्पवधाका पार है। फिर मा पहिक समान एक मी नहीं है। प्राम बई, पौष १९१५ प्रकाश अपन निषपसे या स्प है। ऐसी स्थिति है। तुम इस पोर फिरो-सन्होंने रूपकसे से है। उससे भिन्न भिन्न प्रकारसे शाम हुमा वोर होता है, परन्तु र विमगरूप है। पाह बोध सम्पा है। तो मी पा पाव ही सूक्ष्म है, और मोहके दूर होनेपर ो पाता है। सम्पा मोप मी सम्पूर्ण स्पितिमें महौ हाहै, फिर भी वो कुछ बचामा पोय हो। ऐसा समझकर का पाम्प मार्ग प्राण करो। कारण मत हो, मना मत करो, तर्क-वितर्क न करो । प तो ऐसा हो । र पुरुष पपार्थ पहा था । उनको अपपा प्रनेका कुछ भी कम न पा । मई, माघ १९११ फुटुभरूपी कायम्की कोखामें निवास करनेसे संसार कहता है। उसका कितना मी अपार करो वो भी कतवाससे शिफ्ना संसलका हो सकता है उसका सौला भाग मी उस काम पर पानेसे मही दो सा पोशिश कपायका निमित्त और बनाधिकाम्से मोरके यमेका पर्पत है। पा प्रत्येक अवर गुन गागापमान है। समन कि उसका पार करनेसे प्रयाको सस्पणिो माय, इसठिये को कपभावी होना वापरासी होना, कपपरिचपी ऐना प्रेममाव दिशामा, माप- मारना दिसाना, मापापाप होना, मश्यगुरु ऐना, और परिणामका विचार करना, हो सकते। । समई, माप दी २पुर में १९९६ मिनमगवान्के रे हुए पार्प पपाप हो।पही इस समय मुरोप है। ८४ गई म मा ८ गुरु १९४६ सामोशी
८५ मे मम्मे यस प्रभा] विविध पत्र मादि समासमा पर्प
१८५
र दूसरे सम्हारे समान मालकलोग धर्मकी इस करते हो, यदि या सबकी भतरामाको पो
परम कल्याणरूप है। मुझे हमारी धर्म-बमिमयाको यथार्थता देखकर स्ताप होता है।
जनसमाके भाम्पकी अपेक्षासे या कामात ही निकर है। अधिक क्या कहूँ । इस पावका
कबसरमा शानो साचो।
ब
-
सोक-अलोक रहस्य प्रकाश
बर्मा, फामम पदी १, १९०६
गेकको पुरपके खाकारका वर्णन किया है, क्या तुमने इसके एस्पको कुरा समझा है ! या
तुमने इसके कारणका कुछ समक्षा है, क्या तुम इसके समझानेको घरको समझे हो। ॥ १ ॥
म उपदेश शरीरकोप करके दिया गया है, और इसे शान और दर्शनकी प्राप्तिके उदेशसे
हा। इसपर मैं यो करता हूँ मुनो, नहीं तो क्षेम सुवालका भेना देना ही ठीक है ॥२॥
(२)
क्या करनेसे हम मुसा होते है, वीर मा करमेसे हम दुखी होते है । हम स्वय क्या है,
पौर कासि माये है। इसका धौम की अपने मापसे चबाम मे ॥१॥
यहाँ का है यहाँ संताप है, और गहाँ हानीयाँ शंका नहीं ग सकती । जहाँ प्रसको
मकिरी ही उत्तम धाम है, वोर गुरु मगवानमारा ही प्रमुकी प्राप्ति की जा सकती है।॥१॥
गुरुको पहिचानने के लिये पतरगमें राम्पको भाषश्यकता है, और यह मेरमय पूर्वमायके
उदयसे ही प्रश्न हो सकता है। यदि पूर्णकालीन माम्मका उदय न हो तो ग सत्संगधरा मिट सकता
है, और यदि ससगको प्राति न तो फिर या पिसी हु सके परोपर प्राप्त सा है ॥२॥
मेक लोक सस्पप्रकाश
बेक पुसपने मो पनो मेद स्मेको।
पले प्राण समला सममानी ! ॥१॥
परिपरपी ए सपरेश गान बसने ठोस
बम बनायो नियम बोए परम ॥१॥
प्राय पोये चीरपारी पोवेली।
पो साथी भारी एनो मागोजीम पार || १॥
मामिला मन तार हान वहाँ गन मवि लाप)
प्रमुभदिवा उपम मान प्रम मन्मना गुरु भावान ॥ १ ॥
गुद मागताना राम ते उपमा पर्वित मामा
देम नहातीय प्रेम मी वो इनरंग ॥१॥
t भीमद् रामबम्ब [८५ मेर-मगेर यस प्रमा (१) सन धर्मोमें जो कुछ तस्यान ना गया है पम्प एक है, और सम्पूर्ण दर्शनों यही मिली। पे समसामेको सैमियों है, इनमें स्थान शेशी मी सत्य है॥१॥ पनि तुम मुझे मम्-स्पितिके विषय मे तो मैं ए योगीको सौंप देता। बादिमें, मम्पमें वीर मतमें एकस्म है, वैसा हक्कम ठोक ॥२॥ उसमें जीव-माके स्वरूपको समझनेसे भासकिय मात्र हो गया और शंका दूर हो गई। स्थिति ऐसी है। क्या इसको सममानेका कोई उपाय नहीं !" उपाय यो महा"! मिससे सका महे॥१॥ पा एक महान् वार्य है। इस रास्पको कोई विरसा मानता है। जब बात्म-काम प्रार हो जाता है वमी पान पैदा होता है। उसी समय पर पात्र बप मौर मुकि यस्पको समना । और ऐसा समझनेपर होम सालार्शन शोक एव हुासको दूर करता है ॥१॥ सो बान पयुको हकमासे सहित है, और ये कर्म मिश्चपसे पुरानी हो रचना है। पार पुरको जाम, उसके पश्चात् ही मनुष्प-देहम म्यानकी प्राप्ति होती॥५॥ पथपि यह दे। पुसकी ही बनी , परन्तु वास्तविक स्पिति गस00 है। मादेव पिच पर होगापगा उसके बाद दूसरा शान कांगा ॥६॥ (५) जहाँग और रेप रे ग साहश मानो | यहाँ उदासीनताव पास है हासन सोच ना ॥१॥ माये वे सो एक बज रमि एक हमपलानी मे स्प्यापसमाप पा॥१॥ म बात बापू मने वो बोपीठ कोसी ने प्रथम मेयने मणे एक भेषरम मामे रे ॥१॥ बागायब चाहिने बाई म्मो मोटो रकममा एम सिविला नहीं सपाल उपसका मदिना॥ एमापनेते बाप बालेमा प्रमारे मान; स्मरमादिश्वर निरखी यो सोको || || संत व कर्म at पुराना मसाला म्यम प्रकमा मगोपी पामे मान ॥५॥ पुरनो एगो पर मनमा समय पर मNिA ॥६॥ कोपा अमेय एमालोमा राजमवानोमा बाल मनोमास ||१||
पर ८५]
पिविष पर मादि समावों वर्ष
ही तीनों काका काम होता है, और दोके यनेपर भी पही निर्वाण है । यह दशा ससरी
अतिम दशा है। इस वसा जम्माराम धाममें माफर विरानते है॥२॥
बर्षा, फागुन १९१६
मार! द मममें मत पा, तुझे हितका बात करता है।
मुस तो तेरे अन्तरमें ही है, वह बाहर रमेस नहीं मिझेगा ।
परन्तरका मुस अन्तरगकी सम-प्रेणी में है उसमें स्पिति रोमेके लिये वाध पायोका विस्मरण
करा मापर्य मूल।
सम-अपीमें गमा मात दुर्मम है, क्योंकि जैसे जैसे निमित्त मिस्ते जाते हैं म पैसे गति
पुन पुन पारित होती जाती है, फिर भी उसके बखित न होमेके लिये पण गमार उपयोग रख ।
यदि यह क्रम पपायोग्यरूपसे चलता पण जाय तो तू जीवन स्पाग कर रहा है, इससे
भगाना नही, तू इससे निर्मय हो नापगा।
मममें मत पर, तो हितको गात कहता है।
या मेरा है, प्राप ऐसे मायकी भावना म कर ।
या सका है, ऐसा मत मान बैठ ।
इसके लिये भविष्यमें ऐसा करना है, यह निणय करके न रक्ष।
इसकहिये पदि ऐसा न हुवा होता तो अाप ही मुम होता, यह स्मरण न कर।
इतना इसी तपसे हो गाय तो भन्म हो, ऐमा भाप मत करके रस।
इसने मेरे लिपे अनुचित किया, ऐसा स्मरण करना न सोश ।
इसने मेरे लिये उपित किया, ऐसा स्मरण न रस ।
या मुझे मनुम निमित्त है, ऐसा निकम्प न कर ।
पा मुझे शुम निमित है, ऐसी खता न मान बैठ।
पर न होता तो मन सता, ऐसा निपप न कर ।
पूर्पकर्म बवान है, इसीलिये पे सब मासर मिले है, एसा पकान प्रमाण न कर ।
यदि अपने पुरुषार्पको सफलता होता ऐसी निराशाका स्मरण न कर।
सरके दोपसे अपमेको मनम होता है पस्य न मान ।
अपने निमित्से दूसरों के प्रति तोर करना भूस गाभा ।
तेरे दोरस ही से बनी यह सती परिसा शिक्षा है।
इसमेको भफ्ना मान देना, भार स्वयं अपने भापको भूम माना, बस इतना ही तेरा पाप है।
मकान माल एमालनिसान
माखनीएपण यम बाय भारत पस्य॥२॥
[१८५ इन सबमें तेरे प्रति कोई प्रममान नहीं है, फिर भी मिन मिय स्पर्मम स मान गया है। शु! ऐसा न कर। या तुझे तेरा हित कहा । तेरे अन्तरमें सुसहै। जगत्में कई ऐसौ पुस्तक, ऐसा कोई मेस वषषा कोई ऐसा साधी नही है जो सो तुमको बता सके कि बमुफ हो पुस मार्ग , वफा में अमुक प्रकारसे ही घरममा चाहिये, वपना १वमुक कमसे ही चळेगे। यही इस बातको सूचित करता है कि इन सबकी गतिके पीछे कोई म प्रिम कारण मन्तरित। १ एक मोगी होनेका उपना करता है। २ एक योगी होनेका उपदेश करता है। १म दोनामेंस दम किसको मानें। . दोनों किसपि उपदेश करते है! ५ दोनों किसचे उपश करते है। ६ किसकी प्रेरणासे उपदेश करते है। ७ किसी को किसौल, बार किसीको किसीकर मेश पों बम माता। ८ सके क्या कारण है। ९ उसकी कौन सी। तुम क्या चाहते हो। ११ एकरसि मिझेगा अपवा बहसमें है। १२ उसे कौन प्राप्त करेगा। १५ उसे या होकर ममागे । ११ लामा कौन सिमावेगा। १५. बपना स्पं की सीर हो। १६ पनि सोचे गए हो तो कहसि साले। १८ गाव क्या है। १९ तुम क्या हो। २ समसमा सानुसार क्यों नहीं होता। २१ उसे कैसे कर सकोगे। २२ में बाबा प्रिप अपना निराशावता! २१ कहाँ कहाँ मार बिस किस तय है। सन निर्णय करो। नावरमें मुख मार महा। सुप प्रवा।
१८७ पिपिप पत्र मादि सपा-शार्प पर ८.] हे गाव । मूग मत, तछे सस्प करता है। एस मातरमें ही है, बाहर दनसे नही मिळेगा। मातरिक मुख अतरको स्पितिमें है, उस सुखकी स्थिति होमेके लिये तू माय फार्थसंबंधी भारपर्योको भूग गा। उस सुखकी म्पिति एनी गात ही कठिन है, क्योंकि जैसे जैसे निमित मिउते ना है, मैसे से मारबार प्रति मी पसित हा बाया करती है, इसलिये प्रतिका उपयोग स रसना चाहिये । यदि इस झमको तू यथायोग्य निबाहता बहेगा सो तुझे कमी हताश नहीं होने पड़ेगा। निर्मप हो पापगा। हे जीव ! तू मूठ मत । कमी कमी उपयेाग पूफार किसीके रबन करनेमें, किसीके शाप गमित होनेमें, अपना मनको निर्यकता के कारण दूसरे के पास भो व मंद हो जाता है, या तेरी भूठ है। उसे न कर। } ८७ समई, फागुम १०४९ परम सूप है। परम सस्प। विकास में ऐसा है। परम सस्प है। म्याहारके प्रसंगको सावधानीसे, मंद उपयोगसे, और समतामापसे निभावे माना। दूसरे तेय कसा स्पों महीं मानते, या प्रश्न तेरे क्तरमें फमी का न हो। सरे टेप का मानते है, मार या पात टोकरे, तसे ऐसा स्मरण कमी न हो। सब तबसे अपने ही प्राति पर । जोपन-बगीवन पर समाति हो। नीलन हो तो इसी पिसे पूर्ण हो । जबतक गहसास ये तस्तक प्रकारका प्रसंग होनेपर मौ सपको सस्प यो। गामासमें भी उसामें हो पाये। गरमासमें अपने कुटुम्बिोधे उपित पि रखना सिमा सबको समान दी मान । उस समपतषका तेरा का बहुत ही उचित म्यतीत रोगो'- अमुक प्यार के प्रसंगका काठ, उसके सिपाप वसभी कार्यान, पूर्वकर्मोन्य काय, यदि तेरी सतना और तेरे छमसे उसे सेरे उपवन वर्षात् पहा संधी सत्ता aaj राषित प्रकारसे माना म्पहार पाता।
१८८
भीमन् पसन्द
[फर ८८ ८१ १.
पर उसकी इसके सिमाप दूसरे किसी भी कारणसे सतापापि म पता हो तो उसे उसके करे
मनुसार प्राप्ति करके उस प्रस्गको पूरा करना चाहिये, वर्षात् प्रसंगकी पूर्णातितक ऐसा करने
तुश्च सदसिम म होना चाहिये ।
वेरे म्पमारसे ये साप में तो उसीन सेि नियमापसे उनका मन हो, से ऐसा
करनेको सामपानी रसना पाहिये।
बी, र १९११
मोहमति प्रयासे विरेक नही होता, १ ठीक बात,मम्पपा वस्तुमसे या पार्ष
है। पास ही सूक्ष्म भगवान रासो ।
१ सपको वो सपही बने दो।
२ सितना पर सदो दतना हो यो। परस्पता न मानो ।
१ एकनिा दो।
एकनिष्ठ यो।
किसी मा प्रशस्त प्राममें एकनिष्ठ यो।
वीतरागने पभार्थ कहा है।
नामम् । स्वितिस्थापक दशा प्राव कर।
एसएसको किससे करें। और कैसे इसे दूर करें।
अपने बाप अपने लापका बैरी है पर कैसा सभी बात।
बी, सी गुरु १९९६
बाप मुसे मनुफ्म मास होगा। माल परतावास मैरा सम्म सो गया है।
पस्तु क्या है उसका विक स्पा, उसका पिक कौन है इस हमके सर मानसे मुडे सपा
मार्ग मारम हो गया है॥१॥
बई, पेशल शो गुरु १९९५
बाव बासना परिसता मदन
मात्र पत्रिका है भूम गपं गत ए॥
रचना बिग-उपरेषा, परमोघम लिनु ।
इनमें सब मतपत है करते नि समाउ ॥२॥
मा मने राग भनुपम समालाई मोल मनायो
बालम लमबदमार्ग मचाये ॥1॥
-९१, ९२] बिविप पर मादि समाह-वों वर्ष रिन सोही है मातमा, अन्य होई सा कर्म; कर्म करे सो निनबन, तत्वानिको मम ॥ ३ ॥ सब नाम्पो निमरूपको, तब पान्यो सब होके । नहिं गम्पो मिनरूपको, सम बाम्यो सो फोक ।। १ ॥ एीि Pाकी महता, हम बिन मात्र, चिनसे मात्र बिनु कबू, महि त दुसदा ॥ ५ ॥ म्पमारसे देव मिन निहसे है बाप, पहिरनसे समन के, निनप्रवचनकी मप ॥ ६ ॥ एहि माहीहै फापना, ही नहीं विभग जब बागेंगे भातमा, तब जागेग रग ॥ ७ ॥ वई, वैसासको गुरु १९०६ मारग साचा मिल गया, ५ गये स्म्देह, होता सो तो बह गया, भिम किया निर देव ॥१॥ समम पि सा सरह है, मिन् समन मुशकील, ये मुशकीली क्या करें! ॥२॥ खोज पिस प्रमाका, पचा तो माय पेहि प्रमाणि पासना, जब गाये तब भाप वाकु मुठ गया, इनसें क्या बनेर । समर समर बब इसत है, मरि मुख्गे फेर ॥ १ ॥ यहाँ काफ्ना गल्पना, तहाँ मानु हुसई मिटे कम्पमा यष्पमा, तब बस्न तिन पर ॥५॥ है गौ ! क्या इष्पत हो या समूह जब इण्याका नाश पब, मिते बनादी मूठ ॥६॥ एसी कहास मति मा, माप माप माहि। मापनवु नत्र मुठ गये, अपर प्राम, भाप माप ए शोपसे, भाप बाप मिट जाय आप मिसन नप बाएको ९२ बमाई शाम बदौ ५ शुष १.१६ इशारहित कोई भी प्राणी नहीं है। उसमें मौ मनुष्य प्राणी ता विविध भाशाभोंसे घिरा हमा माइनिषित में ऐसा मी पास है। मनुसारक।
[पा ११ भीम प्रचन्द्र है । जबसक इया और आशा अतत रहती है तबतक पर प्राणी वोवि मनुष्य नैसा पाने जप करमेनामा प्राणी ऊर्मगामी मनुष्य जैसा है। ९३ बई शास पदी १२,१९१५ भाग भापका एक पत्र मिग । यहाँ समय वमुड है। वापके यहाँकी समय-समता पाहता है। भाको गो पत्र मे बनेको मेयरलायो, उसे अधिक विस्तारसे मिलने की बायकवा होनेसे- तया ऐसा करनेसे उसकी उपयोगिता मी अधिक सिद्ध होनेसे—उसे विस्तारसे लिमुनेकी या पी, और मामा । तपापि कार्योपाविकी ऐसी प्रवक्ता है कि इतना शात अक्कारा मी नही मिता, ना मिल सका और ममी पोडे समपतक मिसना मी समय नहीं। वापको इस समयके बौधौ पापा मिल गया होता तो बहुत ही अधिक उपयोगी होता तो भी इसके बाद मौ इसकी उपयोगिताये तो माप मनिक ही समझ सकेंगे । बाप मिशासाको कुछ शान्त करमेके लिये उस परका संधिम सार दिया। या भाग जानते हो कि इस ममें वापसे पहिले मैं मगमग दो पसे कुछ अधिक समय भा तबसे गृहस्थाश्मी शुमा है। जिसके कारण गृहस्थाममा करे मा सकते हैं उस वस्तुका और मेरा उस समपर्मे इछ अधिक परिचप नहीं मापा, वो भी उससे समधी कायिक, बाधिक और मानसिक पति मुझ पपाशस्य बात कुछ समसमें वो बार इस माणसे उसका और मेरा संप बस्योग- नमक नहीं ला । यह बतानेका कारण यही है कि साधारण तारपर मी गृहस्पाश्रमका म्यानपान देते हए उस सबमें जितना अधिक अनुभव हो उतना अधिक हो उपयोगी होता है। मैं बुक संस्कारिक मनु मरके उदित होने के उपरसे पर कर सकता कि मेरा गृहस्थामम अबतक जिस प्रकार असतोषजनक नही है उसी तरह यह उचित स्तोपनमक मी नहीं है। मह के मम्पम है और ससके मम्पम होनमें मरी पुष उसमानाति भी सहायक है। तत्यानी गुम गुमाका दर्शन करनेपर मविकतर गृहस्पानमसे विरत होनेको बात ही सूझा करती है। और मस्प हो उस परवामका सिंह भी इसे प्रगट एया था । काठको प्रबर बनिस्तके कारण उसको पापोग्य समावि-संग प्रामि न होनेसे उस रिपो महासेरके साप गौम करना पा और सचमुच ! पदि ऐसा म हो सका हो तो उसक जानका 0 व मा गाता । ( उसके मर्यात् इस पर का)। निसको मापके पाप गाण करना है उस कि विवाति प्रसम पा परती, उमा बाम प्रधानता नहीं रम्मी या ततो इसके लिये बकपनाप से होता है । तथापि माँ कोई उपाय महोदाँ सहनीमता ही मापक, ऐसी मान्यता होमेसे उप हो बैठा है। कभी कभी मंगी भोर साथी भी नुा निमिच दाने माने है। उस समप उस स्किपर विसी तरसभातरण आता है ता भामा बहुत ही भावी । उस समय पाचन रहित हो जानेकी- - ।
पत्र ९४, ५९५ ] पिविष पत्र भारि समाम्रो पर्प देहत्याग करनेकी तु स स्थितिकी अपेक्षा अधिक भयंकर स्थिति हो जाती है, परम्तु ऐसा बहुत समपतक मही गता, वौर पेसा नब देगा तो पश्य ही इसका त्याग कर दूंगा । परन्तु मैं वसमाधिसे प्रति न करें, ऐसी मक्तककी प्रविा बराबर कायम चली आई। ९४ वर्मा, स्पेष्ठ मुटरी १ गुर २०१६ हे परिषयी ! तुम्हें में अनुरोध करता है कि तुम अपने बापमें योम्य होनेकी रम उत्पम करो। मैं उस इलाको पूर्ण करमेमें सहायक होगा। तुम मेरे अनुपापी हुए हो, और उसमें सम्मांतरके योगसे मुझे प्रधानपद मिला इस कारण तुमने मेरी मायाका मरम्मन करके वाचरण करना उचित माना है। पौर में मी तुम्हारे साथ उचितरूपसे ही म्याहार करनेकी र करता है, किसी दूसर प्रकारसे नहीं। पदि तुम पहिछे जीवन-स्पितिका पूर्ण करो, तो पके लिए ही मेरी इजा ये। ऐसा करना में उचित समसा, और यदि मैं करें तो धमपात्र के रूममें मरा स्मरण ये,ऐसा ऐना चाहिये। हम तुम दोनों ही धर्मति होनका प्रयत्म करें । बोर्पसे प्रयत्न करे। तुम्हारी गतिकी अपेक्षा मेरी गति भष्ठ होगी, ऐसा अनुमान कर लिया है-"मतिमें 1 मैं तुम उसका गम देना चाहता है क्योंकि तुम बहुत ही निकरके सबधी । यदि तुम उस छामको उठानेकी इस करते हो, तो दूसरी कामों को मनुसार तुम जरुर करोगे, ऐसी मुझे आशा है। तुम स्वमताको बात ही अधिक वाहना, बीतराग-मतिको बात ही अधिक माहना मेरा मतिको मामूग तौरसे पाहना। तुम जिस सम्प मेरी स्गतिमें यो, उस समय मिस तय सम प्रकारसे मुठ मानन्द हो उस तबसे गना। मिधाम्पासी होमो। मुझसे विपायुक्त विनोहपूर्ण समाषण करना। मैं तुमे योग्य ठफेश दूंगा । तुम उससे रूफ्सपान, गुणसपम बार ऋदि क्या दुविसपन होगा बादमें इस दशाको देतकर मैं परम प्रसम होगा। , ९५ म म्येष्ठ सदी ११ पुत्र १९१६ सबेरके सबसे ८ बजे तकका समय समाधिमें बीता पा । महाके विचार बात स्परप विससे यषि, और मनन किये पे। बर्मा, म्पेष्ठ । १२ शनि १९९६ का माशंकरची मानवास है, इसलिये तबस मिसिसित क्रमको पार्यप्रम रशित :- श्रीमद् रामचन्द्र [१९. 1८,,!. १ कार्यप्रालि ३ सकरण साधारण मापम दोनकि मतकरणको निर्मम प्रीति १ धर्मामुपान ५ बैरम्पका वास्ता ९७ बई, म्पेष्ठ वदी ११ मुफ १९९५ तुम अपना अस्तित्व मानमेमें कौनसी का है। यदि कोई शकावठीक न । ९८ बम्बा, म्येष्ठ वदी १२ शनि १९९६ कस रातमे एक मत सप्न ब्रापा जिसमें एक-दो पुरुषोंको इस जगत्की रचनाके स्वरूपमा पर्मन किया परिसे सब कुछ मुखाकर बादमें जगतका दर्शन करपा । स्वप्नमें महापरिदेवकी शिक्षा प्रामाणिक सिकाई । इस सप्नका वर्णन बहुत मुनर और चम्कारपूर्ण पा इससे परमानद मामा उसके सबमें अधिक फिर भिगा । पई, बापत मुदी १ शनि १९९५ कालिकासने मनुष्यको स्वार्थपरम्पण और मोहके बरा कर लिया है। जिसका एप पर भार सौके बताये एप मार्गसे बस्ता है धन्य है। ससंगके बिना बड़ी बामणी वनिकसर पतित हो जाती है। बम, मापा मगरी ५ चि १९९९ मा पाम्पहापाधि प्राण को पी उस समय इसके प्राण करनेका हेतु या पा. समें जो उपाधि अधिक समय मेगा, यह उपाधि मदि अधिक दुमदायक मी ऐगा, तो भी उसे समपमें भोग मेना, यही अधिक श्रेयस्कर है। ऐसा माना पा कि या उपाधि मिनिक्ति हेतुसि समाधिहप होगी । इस घालमें गास्पाला निपपमें धर्मसभी अधिक बातचीत न हो तो बना।" महोदसे मुकिस स्माता हो परन्तु इसी क्रमसे बस । निश्चय ही इसी ममसे पर। दुसको सान परके क्रमको समारमेकी परिपद सहन करके मनुश्म-प्रविस उपसर्गचे साम कर मचा या भाव यह पावित् अधिकतर कठिन माम हगा परन्तु बातमें प परिनता सरस हो जायगी । घमें फैमना मत । पारपार करता 18 सना मत । मारक इसी होगा, और पथावार करेगा । इम मरेधा मासे इन बरनोंको सपमें उतार--- प्रतिपूर्वक उतार । १ निमार मी दार न देन । यो पुण्हता परे अपमे हो दोपसे होता है, ऐसा मान ।
विपिन पर मादि सपा-२वों वर्ष । २ बफ्नी ( बाम ) प्रशसा मही करमा, मोर यदि करेगा तो में समस्ता कितू ही इसका है। ३ मिस तब सरेको प्रिय लगे, नस तबका अपना भाचरण रसनेका प्रयत्न करना । यदि उसमें तुझे एकदम सिदि म मिक, वपना विट मात्र, तो मी आपसे धीमे धीमे उस मपर वपमी नि गाये रसना । १ द निसके साप म्पहारमें समादमा हो, उसके साप अमुक प्रफारसे दताव करनेका मिर्णय करके उससे कर दे । यदि उसे मनुस मावे सो ठीक है भन्यथा पा निस तय को उस सबका बर्ताव रमना । साप ही या मी कर देना कि मैं आपके काम (को मुझे सौंपा गया है उसमें ) किसी तर मी वफ्नी निष्ठाके द्वारा माफ्को हानि नहीं पागाउँगा । आप मेरे विषयमें दूसरी कोई मी शक न करना मुझे इस म्याहारके विषयमें अन्य किसी मौ प्रकारका माम नहीं है । मैं मी मापके द्वारा इस तराका पाप नहीं चाहता । इतना ही नहीं, पन्त पुल यदि मन, पचम वौर कापासे विपास पाचरण ना हो तो उसके सिपे मैं पचाताप करूँगा । पैसा म करनेके किये में परिलसे पीत सावधानी रसँगा । वापका सौंपा हुवा काम करते हुए में निरमिमानी होकर दूंगा। मेरी भूलके लिय यदि आप मुझे उपाहम देंगे, तो मैं उसे साम करेगा। नहातक मेरा वस बजेगा, नहातक में सप्नमें भी भारके साप देष अपया आपके विषयमें किसी भी तसकी भयोग्य कम्पमा नहीं करूंगा। यदि वापको किसी तयकी मी का हो वो भाप मुधे करें, में वाफ्का उपकार मानेगा, और उसका सपा मुलासा करूंगा । यदि सुखासा न होगा, तो मैं भुप देगा, परत समस्प म पोशा । केस मापसे इतना ही चाहता हूँ कि किसी भी प्रकारसे आप मेरे निमित्से बमुभ योग, प्रवृत्ति न करे । भाप अपनी रमानुसार वर्गम करें, इसमें मुझे पुस मी भधिक कानेकी नारत महो । मुम कक्स वफ्नो मितिमेणा प्रापि करने दे, और इस कारण फिसी प्रकारसे वपने बतरणको मेटा न करें और यदि मेटा करनेकी वापको इसम ही हो तो मुझे अबस्प ती पहिल्से कह दें। उस ग्रेणीका निमानेकी मेरी इसलिये वैसा करनेक लिये नौ कुछ करना होगा में कर दंगा। नहावक बनेगा माँतक में भापको कमी र नहीं पाँपागा, वीर अम्तमें यदि पा निपिणी मी वापको मप्रिय होगी तो भैसे बनेगा बैस सापपानासे, बापक पास्से-आपको किती मी तयको हानि पहुँचाये पिना पपाशक्ति मम पहुँचाकर, और इसके बाद मा हमेशा के लिय ऐसी सरसवा सा-मैं पगा। । १०१ मई, शान मुदी । १९१६ इस उपाधिमें पाम बार पदि मेरा निमा हसम्यान-र्शन मा ही या रा–पया हो या हो-सो जूट्यमाई आपाद परी ९कन गुरुवारी रातमें समाविशीत शकर इस क्षणिक यौनका स्पाग का बठे गायेंगे, ऐसा पान सूचित करता।
नीमर परवान [पा १११ (२) बर्मा, भापती १० १९१९ उपापिके कारण गिदहजप शानमें पोड़ा गत फेरफार प्रषा मारम दिपा । पमित्रामा मला माईके उपरोज विधिमें परन्तु दिनमें स्वर्गवासी होने की बाब पर मिली है। इस पाक्न वारमाके गुणोंच स्पा स्मरण करें। मह मिसाविको मपाश नही, हाँ सतिका ऐना कैसे मामा बाम! () दोपारी होनेके कारण इसका गैविक नाम हो सस्प पा, यह वारम-दसारपसे सवा सम्प ही था। उसको मिप्या माम्ना गाव क्षीण हो गई थी। यह पौतरगका परम रागी पा, संसारसे परम गुप्सित पा; मक्तिको प्रधानसा उसके अंतरगमें सदा ही प्रकाशित या करती थी, सम्प मानपूर्वक वेदनापकर्म बनुभव करनेकी उसका मनुव समता पौ। मोहनापकको प्रनता उसके मतरमें गात शून्म हो गई पी; मुमता उसमें उत्तम प्रकारसे देदाम्पमान से उठी यौ। ऐसे इस महामार्गकी पवित्रारमा मात्र जगत्के इस भागका त्याग करके पछी गई है। नारिमासे मुक्त ॥ गई है। धर्मक पूर्ण बामादमें उसकी बधामक हो वायु पूर्ण ऐ गई। (१) परेरे ! इस में ऐसे भास्माका नौवन होनसा होना, यह कोई वषिक वाधर्मकी बात नही । ऐसे परित्रात्माको स्पिति इस काम्मे काँसे हो सकती । दूसरे साथियोंके ऐसे भाप कहाँ कि उन्हें ऐसे पवित्रारमा पनिका माम वरिक कामतक मिलता ये! सिके बतरमें मोक्षमार्गको देम माम सम्यकल प्रकाशित भा था, ऐसे पवित्रास्मा महामाईको नमस्कार हो! नमस्कार हो। १०२ कई बापा पदौ ११ १९१६ (१) उपाधिकी विशेष प्रबस्ता गती है। यदि जान का में ऐसे किसी पोगके जानेको समागमा हो तो मीनसे-उदासानमासेमाधि कर ना ही पस्कर। (२) भगवता पाठ लिपपमें सथित मुमसा नीचे दिया जाता भर नोर्ग पाप गणारंमी। ममा नीग पाप भापारमी परारभी अभयारमी । बामा पुम पोगको बपेक्षासे मनारमी तथा मातुम पोगकी अपेक्षासे बास्मारमी, परारंभी, चार तदुमपारमी (बहमारमा मौर मनारंभी) होती है। पहाँ पुमका अर्प पारिणामिक घुम छेना चाहिये ऐसी मेरी हरिपारिमामिक बीत् विस परिणामसे तुम अपना जैसा चाहिये पैसा पला । पहा पोगका वर्ष मन पचा और काया है। ( मेरा रिसे । ) शासकारका या मामपान करनेका मुस्मरेतु पयार्थ बस्तु किसान और गुम योगमे प्रति करमका पाऐगा, ऐसा मैं समता पाटमें बरा हो सुन्दर उपश दिया गया है।
विविप पत्र मादि संग्रह-२वों वर्ष (३) तुम मेरे मिलापकी इच्छा करते हो, परन्तु यह किसी अनुचित काम्का उदय बापा, समिपे अपने मिशापसे मी मैं तुमको श्रेयस्कर हो सगा ऐसी बात ही कम माशा है। दिनोंने पयार्प उपदेश किया है ऐसे पीतरागये उपदेशमें तत्पर रहो, पर मेरा विनयपूर्णक तुम दोनों माइयोंसे और दूसरोंसे अनुरोध है। मोहापान मेरी बात्मा बामोपापिसे किसनी तरइसे घिरी है, यह सब तुम मानते ही हो, सल्पेि अधिक क्या लि। घमी पामें तो तुम अपनेसे ही धर्म शिक्षा गे, योग्य पात्र बनो, मैं मी योग्य पात्र बनें, अधिक फिर देखेंगे। १०३ बई, बापाल सुदी १५ मुष १९१९ (१) पपपि वि सस्पपरायणके स्वर्गवाससूचक शब्द मपकर में किन्तु ऐसे रामोंके जीवनका म्या दोना कासको सप नहीं होता । धर्म-नुकके ऐसे अनम्य सहायकका गने देना, मापादेवीको योम्प न मगा। कामको प्रमहरिमे इस बामाकेस जीवनफे-पस्यमय विमामको सोच मिया । पानरपिसे शोकका कोई कारण नही दीसता तपापि उनके उपमोचम गुण शोक करनेको गाम्प करते हैं। उनका मारत अधिक स्मरण होता है बधिक लिस मही सकता । सत्यपरायणके स्मरणार्थ यदि हो सका तो एक शिक्षा प्रय सिनेका विचार कर हा। (२) बहार, विहार और निहारसे नियमित" इस बास्पका सक्षेप मर्य यही निसमें योगदशा बाता है, उसमें द्रम्य वाहार, महार वौर निहार (शरीरको मडके स्पाग करमेका क्रिया ), ये नियमित अर्थात् जैसी चाहिये पैसी–भरमाको किसी प्रकारको मापा न पाँ चानेवाण-क्रिपासे प्रति करनेवाला । पर्ममें संमन हो यही बारबार अनुरोप है। यदि हम सस्पफ्ययणके मार्गका सेवन करेंगे तो मगत्यमेव मुनी गे भौर पार पायेंगे, ऐसी मुसे वाया है। उपाधिप्रस्त रायपदका यपायोग्प " . १०४ बम्बई, बापा १ रवि १९९६ रियाससे प्रवृत्ति करके बम्पपा बर्ताव करनेवाग भाग पाचाप करता है। १०५ मई, वायात को ७ भीम १९१९ निरतर निर्मयपनेसे गित ऐसे इस मातिरुम ससारमें गीतरगता हो वम्यास करमे योम्प है। निरंतर निर्मपपनेसे विपरमा ही श्रेयस्कर है, पापि काम्को मार कर्मको ममिवासे पराधीन होकर करते है। - भीमद् राजबन्द्र निसच माहाम्प अपार है, ऐसा वीयकरदेवका बाणी भाकर। १०६ बमई, पायात बदरी ११ शनि १.१५ (१) मिसका कोई अस्तित्व Aबमान नहीं है, ऐमे बिना मंगिक इस जगत्पो वारेमो । बर्ग, भागाद बदौ १२ व १९९९ (२) पर ऐमी सर करो कि मिसमें मम्मसे साम रोष मी दिमाई सके, और उन्हें देनते ही पय किये ना सकें। १०७ बमई (नागदेवी) नापार बदी १२ पी १९१६ इसके साप आपकी पोगवासिष्ठ पुस्तक भेव हा 1 उपाश्चि तापमान करने के लिये या गीता वंदन है इसके पाते हुए वारिपारिश्त्र वागमन संमप नही । इसके सिपे में बापका उपकार मानव वापके पास कमी कमी मानेमें मी एक इसा पपीही विज्ञासा है। बहुत से मापके भत करणमें पास करती हुई अपरिपाका वापके हो मुम्मसे जण मिले, तो अपूर्ण शांति हो।लिसी मी मार्गस पित पासमायोका नाश करके पयापोम्म स्पितिय प्राप्ति के सिपाय दूसरी कोई भी राम परम्तु पचारके समंधौ बातमी उपाधियों पती, इसमिये समागमका कितना बकाश चाहिम उन्ना नहीं मिलता । तपा मैं समझता बाप मी तसे कारणों से उतना समय देनेमें असमर्थ १वीर इसी कारणसे पारबार मत करणको अतिम विनापको नही बता सकता तथा इस संपर्ने बभिक मातचीत भी नही हो सकती । यह एक पुप्पको स्पूनता हो, सरा पा ! म्पचारिक समच बापके संबधसे किसी तरच मी सम उठानेको स्नमें भी इस मही की। तपा आप समान इससे मी सका दम महा। एक हो म गौर र मी यो । कासका उसे प्रारम्पानुसार बिता मेमें पौनया करमा अपित महाँ, पह मियपसे प्रिय है। साम-मापसे भाचरण करनेकी बम्पास-प्रणाटिका कुछ (पोसे) पसि परम कर रही है, भीर इससे निस्किी दि ऐया है। इस पातको पाँ बतानेच ना हो तो आप कारण हो, तपपि पूर्वायरसे मी सकारित गनेके लिये दिस दसे में आपकी ओर देखता है उसे करपा, बौर या स्टेशनसा संसारसे उपासानमाको प्रास दशाको स्यापक ऐगी, एसा माप ऐनेसे (कदा)। पोगवासिष्ठले समय में (प्रसग मिम्नेपर ) वापसे पाना चाहता। चैनधर्मके मापसे 0 मोह, इस मापको वामा यात समपसे मन की है। मुज- भारमें ही मोबसौ मे पारणा सरिये निवेदन है कि बातचीत के समप बाप पण अधिक कावेरन में।
पर १८ १,११] पिविष पत्र मादि समार-२३पा पर्व पबई, १९१६ माषा मिस पुस्तक के परनेसे उदासीनता, वैराग्य वया चिक्की सस्थता होती हो, ऐसी कोई भी पुस्तक पटना; ऐसी पुस्तक पढ्नेका विशेष परिचय रखना जिससे उसमें पोग्यता प्राप्त हो । धर्म-कथा लिस्नेके विषयमें मो लिसा, तो बह पार्मिक-फया मुख्यम्पसे तो सगमें ही मा भाती है। एपमारके होनेसे इस कामें सगका माहरम्प मी नीयो म्यानमें नहीं मावा, तो फिर पाण-मार्गक साधन फसे हो सकते हैं ! इस बातको तो बहुत गहुक्सी क्रियाएँ बादि करने- मासे गोको मी सबर हो, ऐसा माम नहीं होता । त्यागने योग्य समाचार बादि कारणों में तो बीन रुधिपूर्वक प्रति कर याद और जिसका भागबन करना योग्य है, ऐसे बरमालाम सपुरयों के प्रति या जौष मानो विमुमताका बथमा अनि पासपनेका वाचरण रहा है। पर ऐसे बसम्सगियों के सामासमें किसी किसी मुसमुको मी पना पपता है। उन दुसियामों में तुम और मुनि वादि मी किसी किसी वंशसे गिने जा सकता है। बससंग बौर स्पेयासे बाचरण न हो अपना उनका मनुसरण म हो, ऐसे आचरणसे भवति रसा मेका विचार रस्स गनासका सुगम साधन है। 1 १०९ बई, १९१६ वापर पूर्वकर्मका उदय गात विचित्र है। अब गसि आगे पासे प्रभाव हुमा समझना चाहिये । तीय रससे वार म रससे धर्मका बब होता है। उसमें मुम्म ख गग-रेप ही है। उससे परिणाममें वपिक परमात्ताप होता है। पुर पोगमें गोवामा नमारमी मद योग, मगाई मामा आरमी है। यह गाम्प पौरकी भगवतीका है। इसपर मनन करना । परस्पर एसे होमेसे धर्मको मूछाई बारमाको स्मृतिमें पोगपरका स्मरण होगा।धर्मकी बसताफे पोगसे एक ठो परमकाममें उत्पन्न हुए, परन्तु किन्दा एक पुम र पसे नो योग मिला से मर्मबोधका योग बात हो योषी मामाको मिमता है। बार परविकर होना पशुत ही कटिन । ऐसा योग केवर सपुरूषोंकी स्पारिमें है यदि भापकर्मका योग होगा तो ही पा मिस मगा। इसमें सराप नही कि जिस पुस्पको सावन मिरों और उस पुरुषको शुभोदय माहो वो यह निश्चपसे मिल सकता परि फिर मी न मिले तो इसमें बार कर्मका ही दोष समसमा चाहिये ! ११० मम्मा, २०१६ बापा धर्मप्यान मारक हो, यही मारम-हितका राता है । वित्तन सकारीको रहित होना, पर मावीरका मार्ग है। बस्तिमा में एना, परमिकोका कम्य है। 1 भीमद् पचन [पा १११ ११५ ११५ पाणीवा, मा बदी ५ मौम १९९६ (4) गं (मे) दिस इण (4) ण (1) रिसं बपरिपडे जो बिस मिस दिशाको मोर मानेको इम करता है, उसके विपे माप दिया प्रतिपय मर्यात् सूची है। ( उस रोक नहीं सकता।) जबतक ऐसी दशाका बम्पास न हो, तबतक यथार्प स्पागको उत्पति रोना कैसे सम्बो समता पौडलिक बनासे वरमाको स्तमित करमा उपित मही। , ११२ बमाणीया, भाषण बदौ १५शुभ १९९५ बाम मतांतरसे उत्पन मा पहिता पमण बारम गा | मग मम्समें दूसरा पपण परम होगा । सम्पपछिसे मततिर दूर करके देखनेसे यही मततिर गुने हामका कारण है, क्योंकि इससे दुगुना धर्म-सम्पारम किया जा सकेगा। पित गुफाके योग्य हो गया है। कर्मरममा विचित्र । पा याणात्रा प्र भार सदा १ सोम १९९५ (१) मापके दर्शनों का नाम मिळे ए मगमग एक माससे कुछ ऊपर हो गया है। वर्मा मेये एक पक्ष बा। बमका एक वर्षका निवास उपाधि-ग्राम या । समाधिमप तो एक वापका समागम वीर उसका मी वैसा चाहिये पैसा लाम प्राप्त न मा। सचमुच ही शानियोका फरफ्ना किपा मा पा कलिकाल है। बमसमुदायको सपियाँ विपय-कलाप माविसे विषमताको प्रत हो गई है। इसका प्रसस्ता प्रत्यक्ष है। ठमें रामसी गतिका वनुकरण प्रिय हो गया है। सापर्य-रिकियोंको बौर पोप उपशम पालोंकी तो मपा तक भी ना मिती। ऐसे विषमकाको बग्मी हई या पेमा बामा नादिकाके परिभमपकी पफाटको उतारने नियति के रिपे वई पौ, किन्त ठान्ट भविबातिमें फंस गई। मानसिक चिन्ता करी मी का मही ना सकती । मिनसे इसे कर में ऐसे पात्रोंकी मी कमी है। हावब क्या करें। पापि पपापोम्प उपशममा प्रा बामा ससर और मोक्षपर समाति रमती, बत् पक्प्रतिमरूपसे विचर सकती है परन्तु स वास्माको तो चमी पह दशा प्राप्त मी, उसका बम्पास है तो फिरउसके पास पर प्रति पा सकी होगी। जिसने प्रा करने में प्राचारी है उसको सहन कर गाना मुख्यापक है और इसी तरका माचरण कर मी रस्ता परन्तु गाम पूर्ण होने के परिरे पपापोम्प प्रतिसे मारेको पता बानी १ मन पन और कापसे मामाचा मुज-माल । २ मह उदासीनरूपसे प्रति ।
फा ११५ ११४] विविध पत्र मादि संमा-शवों वर्ष - ३ पचनका स्पागदपना ( निराप्रपना)। १ कापाकी पक्ष-दशा (माहार विहारकी नियमितता)। भषमा सा संदेशों की निानि, सर्व भपका छ्टमा; और सर्व बानका नाश । सतोंने मनेक प्रकारसे शामोंमें उसका मार्ग बताया है, साधन मवाये है, और योगादिसे सस्पन हवा अपना अनुमग कहा है, फिर मी उससे यथायोम्प उपशममाव वाना दुर्लम है। तो मार्ग है, परन्तु उसके प्राप्त करमेके लिये उपादानकी स्थिति यस्याम ऐनी चाहिये । उपादानको बमान स्थिति होने के लिये निरप्तर ससग चाहिये, और प नहीं है। (२) शिनुभयमेसे ही इस पिके उदय होनेसे किसी मौ प्रकारका फरमापाफा मभ्यास नहीं हो सका । अमुक सप्रदायके कारण शााभ्यास न हो सका । संसारके भनसे मापोराभ्यास मी न रो सका, और यह नहीं हो सका इससे किये कैसा मी क्षेद या चिन्ता नहीं है, क्योंकि इनसे बारमा और भी अधिक निकम्प पर माती (इस विफस्यकी वातको में सबके टिये मही कह रहा, परन्तु मैं केवल बपनी अपेक्षासे ही करवा ) और विकम्प आदि देशका तो माश ) करमेकी रम्छा की पी, इसलिये जो गुना वह कम्पाणकारक मा पन्तु जब जिस प्रकार मानुमाव बसिष्टमगमान्ने खारामको इसी दोपका विस्मरण कराया था, पैसा वा कौम करापे । र्यात् मापा अभ्यासके बिना मी शासका पात कुछ परिचय पुना है, धर्मके म्यवहारिक बातामोंका भी परिधप है, तथापि एससे इस बारमाका वादावरण दूर हो सके, यह बात नहीं है, एक ससंगके सिवाप और योग-समाधिक सिवाय उसका कोई उपाय मही! मन क्या करें ! इतनी बात भी कहनेका कोई सत्पात्र स्पड म था । माग्पके ठग्यसे बाप मिले, जिनके रोम रोममें यही राधिका है। (३) कापाकी नियमितता । बचनका स्पायदफ्ना । मनकी पसीनवा । बारमाको मुक्तता। -यही मन्तिम समझ । ११४ पानीवा, प्रपम भार मुदी,१९०५ बायके परमे, मतान्तरसे दुगुना ग्राम होता है, ऐसा इस पर्युषण पर्वको सम्पशिसे दमनेपर माझ्म हमा । यह बात अच्छी भगी, तपापि या टि कन्यामके सिपे ही उपयोगी है। समुदायके कम्पाणको रिसे रखने से दो पप्पोका होना दु मायक हैं। प्रत्येक समुदायमें मार बसे न चाहिये, किन्तु परमही चाहिये । .
२०. - भीमद् रामद [पत्र ११५ ११५ माणीवा, प्रपम मात्रफ मुदी,१९१६ प्रयम सबमरीसे लेकर भामके दिमतक पदि किसी भी प्रकारसे मेरे मन, बचन वर कापाले किसी मी योगाम्यवसायसे तुम्हारी बक्मिय, वासातमा और मसमाधि हो, तो उसके लिये मैं पुन पुन बापसे क्षमा माँगता है। बनिसे स्मरण करनेपर ऐसा कोई मौ काय मासूम महोवा, मयना याद नहीं पाताल मिस कामे, विस समपमें इस गाने परिभ्रमण न किपा हो, सकम्प-विकम्पका रत्न न किया हो, धीर इससे समाधि' को न मूठ गया हो निरन यही स्मरण या करता है, और यही महा- वैराग्यको पैग करता है। किर स्मरण होता है इस परिभ्रमणको पछ समतासे करते हुए इस बारको उपासानता क्यों न वई ! दूसरे माचक प्रति कोष करते हुए, मान करते हुए, मापा करते हुए, मेम करते हुए बरवा सम्पया प्रकारसे बताव करते हए, यह सब अनितो इसे योम्य ऐतिसे क्यों न वामार्पात इस तय मानना पोय पा तो मी न बाना, यह भी परिभ्रमण करनेका रम्य पैदा करता है। चिर स्मरण होता है कि जिसके बिना में एक पामर भी नहीं जी सकता, ऐसे गतसे फा (मी बादि ) को बनतबार गोरते हुए, उनका विमोग रोए बनत काम हो गया तपापि उनके बिना गाता या प कुछ कम बापकी बात नहीं । मात् जा जा पैसा प्रतिमा क्रिया या का सक्छ कम्पित हो या ऐसा प्रतिमात्र मों का पालबार फिर फिरसे परम्प पा करता है। फिर जिसका मुख कमा मी न देस, रिसे में कभी भी प्राण म करें। उसके घर पुत्रलपमें, सोम्समें दासस्म, पम्सालपमें माना गंतुस्प में क्यों जम्मा । बाद ऐसे रेपसे ऐसे हमि मुझे मम मना पा ! और ऐसा करनेकी तो विग मी म मही पी 1 तो यो क ऐसा स्मरण होनेपर क्या इस केपित बारमार गुप्सा महा माती ! बहर बाती है। बधिक क्या करें । पूर्व मिन मिन भतरोंमें भक्तिफ्नेसे भ्रमण किया, उमका स्मरण होनेसे भा से जिप या पिता हो गई है। फिर मी मो जन्म म सेना पर बार फिर इस तय म करना पो मात्मामें ऐसी सता फैश होती है परन्तु गत चारोको क्या करें । बो पा । उसे पूर्ण करना—माश्य पूर्ण करना, यस पो एन गो परम्म वो कुछ मि माता है उसे एक बोर हटामा पाता है, बाद उसे दूर करना पाता है और उसमें ही सरकाश पण गाती सब पावन पग पाता तक पापाम्प अमनो उस समय सकसे माने ला ऐसौ सता है। उसके लिये मरस्यारें। पनि काचित् किमी सतिसे उसमें कुछ करत भी हैं तो एमा स्थान दिया गाकर में। वर्षात् संत को गाकर इस दशाम बैरकर उसकी पुएता प्राप्त करें । तो कम स्पा करें।
- पत्र ११६ ११.] विविध पत्र मादि समा-२३पौ बर्ष मी हो, कितने ही दुस स्पों न पों, कितनी मी परिपा क्यों न सहम करनी परें, राने ही उपसर्ग क्यों न सहम करने परें, शिवना हो म्याधिों क्यों न सान करमी पों, कितनी हो पाधियाँ स्पों मना पा, फितनी ही मात्रियों क्यों न वा पहें, चाहे गोपन-काठ कास एक समयका क्यों न हो, वौर कितने दुनिमित्त स्पो म हतं, परन्तु ऐसा ही करना । है गांव ! ऐसा किये बिना फुटकारा नही" इस तब मैपप्पमेसे उत्तर मिलता है, और यह पोम्य ही माश्म होता है। क्षण क्षणमें परस्टनेवाली स्वमाविकी वालपकता नहीं, वमुक कास्तक शून्यके सिवाय सीकी मी मावश्यकता मही; यदि यह मी म हो तो अमुक कास्तक सतोंके सिपाप किसीकी भी रावस्यकता मही, पर यह भी न हो तो वमुक काब्सक सरस्गके सिमाय किसीकी भी मापकता मही दि यह भी न हो तो वार्याचरपके सिवाय किसीकी मी वाश्यकता नहीं, यदि वह मी म तो नमछिमें अति शुदमानसे डीन हो मानेके सिवाय किसीकी मी मावश्यकता नहीं यदि मा भी म तो फिर माँगनेकी मी या नहीं। (वार्यावरण-आर्य पुस्पोरा किये हुए वापरण)। समझे बिना मागम अनर्यकारक हा गाते हैं। ससाके बिना प्यान तरगत्य हो जाता है। संतके बिना अतिम मातका अत मही मिलता। होक-समासे छोकके अप्रमें मही या सकते । सोक-स्पागर बिना रैराग्यको पयायोग्य स्थिति पाना दुर्हम है। ११६ जाणाला, प्र मार मुली ७ शुक स १९०६ पश्यादि स्थडोंमें सहनकी ई उपाधिके कारण, तपा यहाँ वानेके बार एकांत भारिफ अमाव (म हाना), और दुएताको बप्रियता के कारण जैसे मनेगा बसे उस तरफ पाप हो जाऊँगा। ११७ भागाभा, प्र भादप' १११ माम १९९६ कुछ पा ए मन करणमें एक महान् इशा या करता है। मिसे किमी मी स्पहार नहीं करा, चामही कहीरा सकी मही कही जा सकती और उसको कामको बारश्यकता भी नहीं है। अपत माम् परिभमसे ही उसमें सालता मिल सकता है, तथापि उसक हिए जितना चाहिये उतना परिणाम नही होना, पर एक बार्प भार प्रमादामना। पहा सामारिक ही उत्तम हुई थी। जनकप पाग्य गनिस पूर्ण महा ताना मामा ममारिम्प हाना नही चाहती, अपना समाधिस्य मा सकेगी। किमी बबमर भापेगा तो उस इण्टाको सपा मानस प्रपाम करेगा। इम इस कारण जीर प्राप जिसमाया ही जीरन न करता रहता है। परिसर स्निा-दशा भी पम्पागकारक दो तयानि मरोंक प्रति उनना दी पम्पा मारक हान पर पुछ मौगाडी।
भीम परचम्न [पा ११८ बत करणसे उदय हई वनेक उर्मियोको पातबार समागममें मैंने तुम्हें पता है और उने एम- कर तमको कुलमोंमें धारण करने की तमारी इस देसनेमें वाई है। मैं फिर अनुरोप करता ! कि निम दिन स्कोंपर उन तर्मियों को बताया रो, उन उन स्पोंमें मानेपर फिर फिर उनका अधिक स्मरण क्षमाप करना। वहमा है। मा पाई। प्रकर्यकी का है। मकर्मकी मोची। मोक्षष उपाय। मामा उसे सिर कर सकती है। -ये भ महाप्रपन है, इसका निरंतर मनन करमा । प्राप ऐसा ही होता है कि दूसरेको किवनाका बनुमा नहीं करते हुए मपम अनुमाको हो मम करनैनारम नप मही पाता इसन्येि मै चाहता हूँ कि तुमने जो स्वरमाके बनुमहमें पिगई। उसकी पवि करते यो और इससे परका भनुपर मी कर सकोगे । धर्म विसकी अस्थि गौर धर्म हो मिसकी ममा, भर्म हो मिसका पित, धर्म हो मिसका वामिष है, धर्म हो मिसको बचा है, धर्म एनिसको इन्द्रियों , धर्म है जिसका कर्म है, धर्म । बिसका चम्ना है धर्म हो सका बेठमा धर्म ही बिसका समापना, पर्म हो बिसर शायनी, धर्म 0 विसको नागति है, धर्म हो जिसका पाहार है, पर्म हो मिसका निहार है, धर्म हो मिसका निहार (OT भर्म ही निसका विकल्प है, पर्म 0 निसका सम्पी बर्म । मिसन सर्वस्त्र १ से पुरुपको प्राप्ति ऐना दुर्गम है और र मनुम्प हमें ही परमात्मा है । इस दशा स्पा एम (मम्मी फरवे राम करते है, तो मी प्रमा मौर वस्सा के कारण उसमें पि नहीं देते। बारम-मारकी पवि करना और देह-भावको घटाना । ११८ (मोरपी) वेतपर, प्र भाग दो ५बुष १.१६ मगमतीमूत्रके पाटके संबंध मुझे वो दोनों ही बर्ष क गते । बामावों मफेवासे एमाले का बर्ष हितकारक बार मुमुक्षयोंके लिये तुम्हारा कम्पना किपा मा बर्षे हितकारक । तपा संतोक सिपे दोनों ही हितकारक है। मिससे मनुष्प शान के लिये प्रपन करे, इसके लिये इस स्पष्पर प्रस्यास्पानको दुग्यास्पास्मान कहा गया है। पदि शानको प्रानि बसौ बाहिपे सीन तो मो प्रस्यास्पान विना पदव वादि गति देकर संसारका ही कारग होता है, इस- लिये इसे प्रत्यापान मा परम्तु इस जगा के बिना प्रस्पास्मान विस मी करना हो नही, ऐसा कारना तोर्पारका वमिप्राप नही है।
पर ११९ १५ ] विषिष पत्र मादि संप्रह-शायर्प २०॥ प्रन्याम्त्यान मादि क्रिपात्रोसे ही मनुष्यत्व मिटता है। उब गोत्र और मादेशमें नाम मिलता है, पौर उसके बार बानकी प्रामि होती है, इसलिये ऐसी क्रियाको मी शानकी साधनभूत समझनी चाहिये। ११९ यमागाजा, प्र मान बदौ १३ मुक्र १९१६ क्षणमपि सजनसंगतिरेका, भपति भरार्णववरणे नौका सम्पुस्पोंका षणमरका मा समागम ससारनपी समुद्रको पार करने में नौकरूप होता है- पास्प महरमा शंकराचार्यबीका है। और यह पाप ही माश्म होता है। मतकरणमें निरतर ऐसा ही नापा करता है कि परमार्थप होना, और मनेकोंको परमार्थक साम्य करनेमें सहायक शेना, पही पम्प है, तो मी अमी ऐसे योगका समागम महीं है। १२० बागांमा, द्वितीय भाव मुदी२ भौम १९१६ यहाँ जो उपाधि है, या एफ भमुक कामसे उत्पम और उस उपाधिके लिये क्या होगा ऐसी कोई सम्पना मी नहीं होती, भात् ठस उपाधिके सबधमें कोई चिंता करने की प्रति नहीं है। या उपापि कलिकासक प्रसगसे एक पहिलेको संगतिसे उत्पम, और उसके लिये जैसा होना होगा, यह पोरे कामें हो रहेगा । ऐसी उपाधिका इस संसारमें माना, या कोई वायर्पको बात माही। ईभरपर विपास रहना यह एक सुखदायक मार्ग है । पिसका परिणाम होता है, पर दुम्सी मही घेता अपना दुसी हो मी तो या उस हुसका अनुमन नहीं करता, उसे दुश्म उक्टा एसम्म ए बाता है। मास्मे या ऐसी एती है कि ससारमें प्रारम्भके भनुसार पार किसी मी या गुम नधुम फर्मका उल्य हो, परन्त उसमें प्रीति भप्रीति करनेका हमें साम्पमात्र मी म करमा चाहिये। रात दिन एक परमार्प विषयका दी ममन या करता है। बाहार मी यही, निया मी यही है, पापम भी पा स्वप्न भी यो, मप मी पहा है, मग मी पही है, परिन मी याही । पन्ना भी यही है और बासन भी योवधिक क्या कहा गाय! हार, मांस और उसकी मात्राको एक इसी रंगमें रंग दिया। रोम रोम मी मामों इसोका विचार करता है, वौर उसके कारण न कुछ देसमा बम भगता है, मकुम (पनाममागता है,न कुछ सुनना बच्चा भगवा है, म कुसना जन्म व्यता है, न मुरा ना मन्मा जगताहै न पुश मोसना गन्गा माता है, म मौन बना बनाता है, न बैटना पाठा उगता है, म उटना महा माता है, म सोना वय गता है, म मागमा बम भगता है, न माना अमगता है म मूठे एमा म गता, न असग वप्न भगता है, न संग बच्चा पाता है, न समौ बी उगती है, और म ममम्मी बड़ी लगती है। ऐसी दवा दो गईतो भी उसके प्रति माया या निराशा कुछ भी उदय होता हई नही मारम होता हो तो मी टीक और न हो तो भी टोक या हुसका कारण नहीं है । इसकी २०४ भीमद् पावन्द्र [पा १२१, १२२ कारण केवल एक नियम वामा ही है, और यह पदि सम है, वो सब मुखएस अधिक काम समानि यती। तो मी बाइरसे गास्थपनेको प्रति महीऐ सकती, देह-मान दिखाना नही सहा यता, महम-मानसे प्रति नहीं हो सकती, और बामभासे प्रापि करनेमें गुस्से क्याम्प है, तो फिर स स्पा करें। क्या पर्वतकी गुफामें भले गाय वीर बरस्प हो जॉप । यही रख्न या करती है तो मी नामरूपसे कुछ समय प्रापि करनी पड़ती है। उसके लिये शोक वो नहीं है, तो मी उसे सहन करनेके लिये गान पा नहीं करता । परमानन्द त्यागी इसको हम करे भी कैसे ! और इसी परणसे म्पोतिष वाविध भोर में पिच न किसी मी तयके मविप्णयान नपना सिद्धियों की पण महो। तपा उनके उपयोग करनेमें मी उदासीनता यती है। उसमें मी हमें तो और मी मधिक पती। इसलिये इस मानसपी पोए प्रमेक विषयमें वित्तको सस्थता होने पर विचार करकिर शिंगा, पपा समागम हानेपर कहूंगा। थो मामी इस प्रकारके प्रमोके रसपानेसे मानन मानते हैं, वे मोजके मान हैं, और उनका परमार्थका पात्र होना मी दुर्लभ है, ऐसी मान्यता है इसलिये ऐसे प्रसंगमें वाला मी गम मनी हगता परम्त परमायके कारण प्राधिकरमी पगी, वो कम करूंगा। म तो नहीं होती। १२१ माणीमा, रितीय मार सुदा ८ पनि १९९६ रेलाको विपना ऐप तो एक धर्म है। फिर उसमें छेद करके बामाका पिस्मरण क्यों करना ! पर्म मौर मजिस मुच ऐसे रामसे ऐसी याचना करमे पाग केमा पूर्वकर्मने हो गया है। मामेण तो सस केपित है। निम्पायता के सामने समसामता मुख्यापक है। इस क्षेत्रमें इस कालमें इस देसारक सम्म होना पोप न पा । पापि सब को जन्म मेनका एमको उसने कोदो, पापि प्राप्त सम्मके पि शोक प्रदर्शन करमेके लिये पेसा.... मिसा है। किसी भी प्रकमसे किसी ना, पपायोम्य बानमुक्त-शाके बिना, त्यामोम्प निर्मप-दशाके बिना एक क्षणमरका मी बावन देख्ना गालको विकर मही जगता, तो पिर मासी होई शेप मापु कैसे बौदेगी ! या मामेचमको बिना है। पपापोम्म साया भी मैं मुमुक्ष, वो प्राति से गई वो मी सम्पूर्णता प्रम ए बिना या गाल विधे प्राप्त करे, ऐसी दश मल्म नहीं होता । पपके उपर का और सरेक पर शेष ऐसी स्थिति उसे एक रोममें मी प्रिय मही। बनिक या पाप ! सरेका परमार्थ परमेके सिवाप देह भी वो भी नहीभाती । बाम पापाणमें प्रति वरमा । १२२ सामीमा रितीप भए पुदी १० मे १९९६ मुमुधुवारे असे प्रण किया मा मारा एप पण स्वोष देता है। नाविकामका पत्र १२१ १२४ १२५] विविध पत्र मादि संग्राह-शा वर्ष परिभ्रमण सब समान हो, यस यही अमिठाया है, यह भी एक कल्याण ही है। जब कोई ऐसा योग्य समय मा पचिगा, तब इष्ट वस्तुको प्राप्ति हो जापगी। नियोको निरन्तर मिसते गना, सिसाको उत्तेजन देते राना, तपा निम्नलिसित धर्म-फयाको तुमने अक्षण किया होगा तो मी फिर फिरसे उसका स्मरण करना। सम्पर शाके पाँच क्षण है-- सवेग निर्वेद अनुकपा पास्या कोष वादि कपापोंका शप्त हो जाना, उदय वाईई कपार्योंमें मंदता होना, केन्द्रीमूत की बा सके ऐसी बारम-दशाका हो माना, मथषा बनादिकारकी पियोंका शान्त हो बाना शम है। मुद होने के सिवाय दूसरी किसी मी प्रकार की इच्छा और अमिपाका न होना ही संवेगहै। सबसे ऐसा समझमें माया कि केरल मातिसे ही परिभमान किया, तबसे वर मात मा! मरे माल का तोहर, ऐसा मात्र दोमा यह निद है। परम माहात्म्पबासे निशा पुरुषों के पचनमें से तीन बना यही भदा-बास्पा है। म सबके द्वारा या मात्र नीम वफ्नो मारमाके समान युधि होना या जनुकपा है। पे क्षण अस्प मनन करने योग्य है, स्मरण करने योग्य है, इम्म करने योग्य है, वौर वनुमान करने योम्प है। १२३ पत्राणीमा, रितीप भाद्रपद शुदी १४ रमि १९९६ भापका संवेगपूर्ण पत्र मिठा । पसे अधिक क्या बताऊँ । बवतक वाहमा बारम भाषसे सम्पपारूपसे अर्थात् देह-मापसे माचरण करेगी, ' मैं करता।' ऐसी बुद्धि करेगी, 'मैं हरि मादिमें अधिक। ऐसे मानेगी, शामोंको बालबप समझेगी, मम किये मिथ्यामद करेगी, उस समयतक उसको प्रति मिलना दुर्सम है । इस परसे पही करता है। इसमें ही बहुत कुछ समाया मा है। बात बगह बाचा पुना हो वो मी इसपर अधिक म्झ रसना । १२४ मोरभी हितोप मात्रफर बदौ १ गुरु १९९५ पत्र मिटा । शान्तिप्रकाश माही मिग । वापशातिमें प्रति भरना । योयता प्राप्त करना इसी तरहसे पह मिलेगी। पात्रताको प्राप्तिका अधिक प्रयास करो। १२५ मोयी, दितीय माधएर पनी ७ रवि १०१६ (१) भP रुचक प्रदेशों के विषयमें तुमारा प्रयम प्रस्न है।
भीमद् पनवन्द्र
[पत्र १२१, १२.
"
१२६ वाणाचा, रितीय माद बी १२ झ १९९५
भ्यासमगवान् घते :-
इपणदेपपिहीनेन, सर्मप्र समधेदसा ।
ममानचियुफेन, मासा भगववी गतिः।
इम भार टेपके बिना सब जगह समापिसे रेसनेबारे पुष्पनि मगवान्को मधिसे युष दोन
भागवती गतिको वर्भात निर्माणको प्राप्त किया है-
भाप देन, इस पचनमें मोंने किन्ना अधिक परमार्प मर दिया है। प्रसंगमा इस वात्मका
स्मरण होनेसे इसे कित्ता है।
निरतर साप यने देनेमें मगवानका क्या नुकसान होता होगा!
१२७ माणीभा, द्वितीय भार को१२ सनि १.४५
मांचेको मायाका बम्पास करने होगना -
१ किसी भी प्रकारसे उदय गाई और उसमें मानमा कपापोको मान्य करना ।
२ सम प्रकारको अमितापाको निति कर बना।
३ इलने कामतक ना फिपा उस सक्से निप रोजो, उसे करनेसे अब को।
१ तुम परिपूर्ण समी हो ऐसा मानो, और दूसरे प्राणियोपर मनुकंपा करते हो।
५ सिी एक पुरोगे, और उसके कैसे मी वा हों उनमें भरा रखो ।
पे पात्रों प्रकारके बम्पास अपम हो पोरयता प्रशाम करते है। पांच किर चारों समाला
हो पात है ऐसा माप मानो।
अधिक पान। किसी मो समय इस पौनको प्राप्त किय बिना परिभमणका व
माही पापगा।
बामाक बार इस पापको प्रत करनमें समासक।
पाँच नम्पामके सिपाप-~-उस प्रामिक सिपाप-मुन दूसरा का निर्माणका मार्ग नही
सूप, भार समा मामाको भी ऐसा ही मूझा होगा (महा)।
भानुजमा याम्प मास हो कसा करा । पर तुम सबको इमरि मौवधिक
त्या पण बन्दी न करो। जितना भी उतनी ही कचाई, और मितमी कपई उतनी ही कटाई
इम भापभिः कपनये म्यानमें रखना ।
प्रारम्पसे गौक्ति गपचदम मपापाप
पा १२८,१५९,११,१११]विविध पर मादि संग्रह-शयों पर्ष २.९ १२८ पाणामा, नितीय भार पदी १३, १९१६ तम तथा वौर जो जो दूसरे माई मुमसे कुछ माम-छामको इच्छा करते हो, ये सब नाम- छामको पामो, यही मेरीत करणसेप्छा है, तो मी उस मक प्रदान करनेकी पयायोग्य पात्रसाम मुझे वमी कुछ बाबरण है, और उस कामको केमेकी स्था करनेवालीकी योम्मताकी मी मुझे बनेक रायसे न्यूनता मालम इक्षा करती है, इसलिये भगतक ये दोनों पोग परिपक्व न हो गोय, तस्तक इस सिदिमें विसन है, ऐसी मरी मान्यता है । बार बार मनुकंपा वा नाती , परन्तु मिम्पायताके साममे क्या कहें। अपनी किसी न्यूनसाको पूर्णता कैसे कर। इसके उपरसे मेरी ऐसी इम या करती है कि में अब तो मिस तर तुम सब योग्यतामें मा सको उस तयका कुछ निवेदम करता , वौर जो कोई सुम्मसा मे उसे पुद्धि-बनुसार स्पर करता है, अन्यथा योम्यता प्राप्त करते रहो, इसी मासको मार मार सूचित करता हूँ। १२९ माणीवा, दि मावपद वदी १५ सोम १९१६ तापका निरतर विशिम बनुमत प्रिय है, यही चाहिये भी, एसके सिवाप दूसरी पुरा भी (अनही यती, परि यती हो तो भी उसे रस्नेको इम नही । बस एक हीत् ' यही एक वस्पमित प्रबाह निरन्तर चाहिये । वाषिक क्या कहा जाय ! यह मिसनेसे सिसा नहीं माता, और कहनेसे कहा नहीं जाता, पाकेक मानके गम्य है। बया या मेणी मेपासे समझमें वा सकता है। बाकी तो सब कुछ कम्पक ही। इसलिये जिस निह दशाका ही रटम है, उसके मिल्नेपर-इस कम्पितको भूल जानेपर गुटकारा। १३० वाणीमा, वासाच मुदी ५ पनि १९४६ हैप नीपनो अंदर नपी, समस्या पाम्पा सहवी तीपंकरदेवमे रग करनेका निषेध किया है, वर्षात् रक्तक राग यता है तबतक मोक्ष मही होती; तो फिर मुछ संबपी राग तुम साको बिकमफ कैसे होगा। जिसनेमा बम्पवयमा १३१ वाणीवा, वासोन सदी ६ रवि १९१६ बागा हो तम्मय पुए बिना परमापके मार्गको प्राप्ति पात ही दुर्सम है। इसके लिये तुम क्या उपाप करोगे, अपना तुमने क्या उपाय सोचा है! वधिक क्या इस समय इतना हो गत है। . - २.५ भीम प्रसाद [पर १५ उत्चसम्पयनसियातम गो सब प्रदेसोंसे कर्म-संबंध मवाया है, उसका देत मह समझमें वाता है कि ऐसा पना फेस उपदेश के लिये है। 'सब प्रदेशास' मेसे शासक या निपेष करते हो बाट उपक प्रणा कांसे हित मही है, यह नहीं समाना चाहिये । परन्तु बात यह है कि वा बमसात प्रची बारमा प्रेस वाट ही प्रदेश कर्मरित , तब समपात प्रदेशों के सामने से कौनसी गिनतम है। असम्सातके सामने उमका इतना बकिमक शाशकारने उपदेशका अधिपताके लिये इस बातको वंत करणमें रसकर बाहरसे इस प्रकार सपदेश किया है और समा सासकारोंकी पी शेसी है । इरफके लिये अंतर्मुर्तका साधारण बर्ष दो पाक मौतरका कोई मी समय होता है परन्तु शासमोठाके अनुसार इसका पह वर्ष करमा पपता कि भार समयके माद और दो भार भीतरका समय ही बात है। परन्तु पो तो पैसे पहले का? इसका बर्य रो पाक मौतरका कोई भी समप समझा जाता है वो मी घाबकारको शैली ही मान्य की गाती है । विस प्रकार यहाँ माठ समपकी बात बहुत ममु होनेसे शाबमें स्पस स्पम्पर उसका उस महा लिया गमा, इस पर वार चक प्रदेशों की बात मी है, ऐसा मैं समझता, और इस माता भगवती, महाफ्ना, ठाणग मावि सिाच पुष्टि करते है। इसके सिपप में तो ऐसा समया कि पति शासने समस्त शालोमें न होनेवाली मी किसी बात नहेत शाब किया हो वो पर मी कुम बिताको बात ही है। उसके साथ ऐसा समाना चाहिये किस धानों रचना करते हुए उस एक शामें कोई बात शासकारके वो पी। और समस्त शालोधी वपेसा कोई पिवित्र बात किसी शामें कहा हो तो इस वनिक मानमे मोम्म समझना चाहिये धरण कि पर बात किसी निरहे मनुप्पके लिए ही होती है भाकी पन तो साधारण मनुप्पो ये होता है।टीक ही बात बाट क प्रदेशोंको गा पाती है, इसलिये बाट रथक प्रोश बंपनरहित है, इस बातका निपेव नही किया गया है, या मेरा सम है। माको चार मस्तिकामा प्रपोक पम्पर इन रुचक प्रशों ने छोरकर बो केरके समुबात करमेका वर्णन पर माक्सी सफेवायस गीतका सर्जमात नही ऐसा समासाने के लिये का है। इस बातको प्रसंग पाकर समागम रोमेपर पर्चा को तो करोगा। (२) सरा प्रम यह है कि जान पासून तर पूर्ववाय तो जनतनिगोद में जाते है, और उम्प मानवाने मधिक से अधिक फटा मोंमें मोच नाते हैं। इस बात समाधान माप से करते हो। इसका उचर जो मेरे लपमें है उसे ही कर देता , पा सत्य मान मरा है और यह प्रसंग मरा है। उफ्प हान बर्षात् सामापरपस मौ मनस्तु काल वविधप म्यून होनेपर मी मोशका नागम्य इसीलिये ऐसा मा तथा एकटेश म ऐसा पर पूर्णपारीका बाल पक मूम- कातुरे पान के हिसाय मी सा कानुओका ग्रामनेवाडा ता गया परस्तुर देह-पविरमें रहनेवाले पान पार्षको मही जान सपा और यदि पर शामत पार्षदोन जान सकार, गिस पप समाज मा तर सार्प मिति नहीं पता इसी तरा पर मी पप जैसा हो गानिस पथके मात करने मिये मिनमगानने बाद पूर्वके शानका उपदेश लिया है, पनि ना - पर १२५ ] पिविष पन मादि संग्रह-२ वर्ष ૨૭ पस्त हीन मिली, तो फिर पोदा पूर्वका हान वानरूम हो मा यहाँ 'एकदेश कम' चौदह पूर्णका पान समझना चाहिये । यहाँ 'एकदेश कम' करनेसे अपनी साधारण मुद्धिमें तो यही समाप्तमें आता है पड़ते फासे बौदा पूर्वक मन्ततक पहुंचने में गो कोई एकाच वष्ययन बाकी र गया हो, ता उसके कारण मटक पके, परन्तु पस्तुत इसका ऐसा मतमय मही है। इतने माधिक शानका सम्पासी मी यदि केवळ एक पल्पमागके कारण । मम्यासमें पराभव प्राप्त करे, यह बात मानने मैसी नहीं, मर्यात सायको भाषा भयमा मर्प कोई ऐसा कठिन नहीं है जो उमें स्मरणमें रसमा कठिन परे, किन्तु वास्त- विक कारण यही है कि उन्हें उस मूवस्तुका हो शान नहीं हो सका, और यही सबसे बड़ी कमी है, और इसीने पादा पूर्वके समस्त ज्ञानको निष्फल बना दिया । एक नयसे ऐसा रिचार भी हो सकता है कि यदि तत्व ही प्राप्त महुवा दो शास-रिसे हुए पत्र का योगा टोना और पाना इन दोनों में कोई क्न्तर नहीं क्योंकि दोमाने हो वो को उठाया है। जिसने पत्रों का बोझा सोया उसने शरीरसे मोहा उठाया, गौर गो फा गया ठस्ने मनसे पोशा ठठाया, परन्तु पास्तनिक मस्पार्थ बिना उनकी निम्पयोगिता 10 सिब होती है, ऐसा समसमें भाता है। निसके घर समस्त लपणसमुद्र है, यह पा- तरको तपा मिटाने में समर्थ नहीं, परन्तु मिसके पर मीठे पानीको कुंदपा मी है वह बपनी और दूसरे बातोंकी तूपा मिटामेमें समर्प है, वौर हानहापिस देसनेसे महल मी उसीका है। तो मी पर दूसरे नयपर पशि करनी पड़ती है और पाया कि यदि किसी तय मी शासाभ्यास होगा तो कुछ न कुछ पात्र होनेकी अमिठापा होगी, और कार आनेपर पारता भी मिलेगी ही, मौर पर दूसरोंको भी पात्रता प्रदान करेगा, इसलिये यहाँ शाम्वाभ्यासके निषेध करनेका ममिप्राय नहीं, परम्त मूम्बासे र चानेवाले शास्सम्यासका निषेप करें, तो हम एकांतवादी नहीं कहे गोपगे। इस तय इन दो प्रभोंका सक्षेपमें उत्तर मिस गाहूँ। लिसनेको अपेक्षा बचनस अधिक समझापा मा सकता है, तो मी पाशा है कि इससे समाधान होगा और पर पासा के कुछ न कुछ वंशोंकी शादि फरेगा और एकांत-परिको घटायेगा, ऐसी मान्यता है। बो! मनत भबके पर्यटनमें किसी सपुरपके प्रतापसे इस दशाको प्रास इस बेहपारीको तुम पाहते हो और उससे धर्मकोण करते , परन्तु महतो बमी किसी बाधयकारक उपाभिमें पड़ा है। पदिय निात होता तो बहुत उपयोगी होतामा, तुम्हें उसके लिय जो इतना अधिक भापती है, उसका क्या कुछ मसकारण मामामा! इसके उपर कोई भया, और इसका कत्रा एला धर्म अनुभव करनेपर बनर्पकारक तो नहीं उगता है म! वर्षात् अमी उसका पूर्ण कमाटी करना, भौर ऐसे परभेमें प प्रसन है। उसके साथ ही साथ तुमे पोग्यताको प्राप्ति होगी भार काचित् पूर्वापर मीशकारत अदा ही हो तो उसको तो सी हो रखने कम्पाणी पसा स्पर काना पोग्य मास होता पा, इसलिये वान र रिया है। वायके पत्रकी मापा बहुत ही प्रामाण जिमी है, परन्तु उसका उद्देश केस परमार्य हो । वागमके महासको इदि करमा-बहर । बनामग्रीको प्रणाम
प्रीमद् रामम
[पत्र १२१, १२.
१२६ बाणांना, रितीय माद बदौ १२ मुक १९९५
ग्यासभगवान् करते है-
इणपविहीनन, सर्वम समवसा ।
ममवकिपुक्तन; माता भगवती गतिः॥
दश और पिक विमा म बगह समारिसे देख्नेवाले पुरुषोंने भगवानको भलिस पुल होकर
मागक्ती गतिको अपात् मिर्गणको प्राप्त किया है-
माप दे, इस पचनमें उन्होंने कितना अधिक परमार्य मर गया है। प्रसंगमरा इस बापका
स्मरण होनेसे से सिवाद।
निरवर साप यने मेमें भगवान्का क्या नुकसान होता होगा !
१२७ जाणीवा, शिवाय म १३ शनि १९९५
नाचेकी बातोंका बम्पास करते हो यमा'-
१ किसी भी प्रकारसे उदय भाई और उदयमें बानेवाली कपापोंको शत करमा
२ सम प्रकारको वमिपाको मिचि करते यना ।
३ इतने कातक मो विमा उस सबसे निचोयो, उसे करनेस पब की।
" तुम परिपूर्ण पुसी हो, ऐसा मानो, मोर दूसर प्राणियोपर मनुकंपा करत यो।
५. किसी एक सत्पुरुपको गे, और उसके कसे मी धन हों उनमें मना रस्तो।
पे पापो प्रमारके बम्पास बस हो योम्पता प्रदान करते हैं। पापोंमे मर चा समावेश
हो जाते हैं ऐसास मानौ ।
अधिक स्पा करें। किसी भी समय इस पोचको प्राप्त किस मिला इस परिचममा मन्त
माहीबापगा।
बाकी बार इस पाचो मात करममें सहायक है।
पाँचा बम्पासके सिमाप---उसकी प्रासिके सिपाप-मुझे इसरा कोई निर्माणका मार्ग नाही
मुमा भार धमी महामाजका भी ऐसा ही सूधाएगा ( सूक्षा)।
में जैसा पाम्य मामा पैसा भय । पा तुम सरको फिर मी बाधिक
स्म करो बगरको । मितना बदौ उपना ही कई और मिनी कबई उतनी कटाई,
इस मापेक्षिक कपनको ध्यान रथमा ।
प्रारणसे मषित रापचन्दका मपापोम्प
पर १२८,१५९,५,१११]विविध पत्र मादि सपा-यों व . १२८ मवाणीना, दितीय भार बदौ १३, १९९६ तुम तथा भौर यो जो दूसरे माई मुझसे कुछ मारम-छामको इन्टा करते थे, रे सब नाम- ममको पामो, यही मेरी मात करणसेवा है, तो मी उस हामफ प्रदान करनेकी पयायोग्य पात्रता मुझे अमौ कुछ भावरम है और उस डामको नेकी क्या करनेवालोको योग्यताका भी मुझे ममेक क्यसे म्यूनता माश्म मा करती है, इसलिये भवसक ये दोनों पोग परिपक्व म होनोय, तस्तफ इस सिदिमें विसप है, ऐसी मेरो मान्यता है । बार AR मनुकंपा भा नाती है, परतु निम्पायताके सामने क्या करूँ अपनी किसी म्यूमताको पूर्णता कैसे कर। इसके उपरसे मरी ऐसी इनाया करती है कि हमें भय तो मिस तय तुम सम योग्यता पा सको उस तयका पुछ मिवेदन करता एँ, भौर गो कोई सुसासा ने उसे पुदि-अनुसार स्पर करता है, म्यया योग्यता प्राप्त करते हो, इसी मातको गर मार सूचित करता हूँ। १२९ वाणीजा,दि मारपर दी १३ सोम १९९६ पका निरतर विभिन्न अनुमब प्रिय है। यही चाहिये भी, इसके सिवाय दूसरी कुछ भी इस मही यती या हती हो तो भी उसे रस्नेको एम नहीं । रस एक 'वहीत् ' यही एक भस्वसित प्रवाह निरन्तर चाहिये । भाषिक क्या कहा नाप ! पा लिसनेसे विधा नहीं चाता, बौर करनेसे कहा नहीं जाता। पर फेक इनके गम्प, भपका यह भेणी ग्रेणीस समममें पा सकता है। बाकी तो सब कुछ मम्मत ही है। इसलिये पिस मिसाह वाका ही रन है, उसके मिस्नेपर-इस कल्पितको मूल नामेपर १३० पाणीभा भासाम मुली ५ शनि १९९९ कंपनीचनो अंतर नयी, समम्पा पाम्पा समवी तीपंकरदेवने रण करनेका निषेध किया है, वर्यात् जबतक राग पता तबतक मोक्ष नहीं होती, तो फिर मुस संबपी राग हम सबको रिवकारक कसे होगा! मिनेवासा मम्पका बाणीमा, मासोज मी २ १९०६ मात्रामें हो तम्मय हुए बिना परमार्पक मार्गकी प्रामि बात हो सम है। इसके सिप हम स्या उपाय करोगे, अपना तुमने क्या उपाय सोचा। वधिक स्पा ! इस समय इतना पत। , २१. भीम पवन [पा ११५ ११५ १२४ १३२ सामीमा, वासोच सुदी १० गुरु १९४५ बांगाल मोन करे तोकेपथान मगवान् महापार पालको पाने योम्प सस्म नहीं । बामा स्नाकर ३ + १ १ ये सब मिमतियों किसने करो! हमने बानसे देखकर जैसा मोग्य माल्म हवा कैसी म्पास्या की। भगवान् महावीरदेव १०,९,८,७,५,१,२,२,१ (२) करीब पांच दिन पहले पत्र मिष्ठा पा (बह पत्र बिस पत्रमें ममी बाविकी चित्र दशा वर्णन किया। मा भारमा ऐसे कनेक प्रकारके परिस्पागो विचारोंको पर पाठकर एकल युविको पाकर महामाके सगी बायपना करेगी, मयमा सर्प किसी पूर्वक स्मरणको प्राप्त करेगी तो या इस सिमिको पायेगा, इसमें संशप है। (१) धर्मप्यान, शिपाम्पास स्पारिको दिनमा । मम्मामा, वि सं १९९६ बाग १३३ पर मैं उसे मौतकी मौषधि देता है। सफ्पोग परमें भूह नही करना। जोन प्रिपरे ! मुझे पहिचाननेवाला । ऐसा मारते हो। बमी देर है। रेकर्म ! से निषित बावा करता है कि मति मार नेकाले अपर मेरा पर नही माना । बि स १९०६ वासोग १३४ तान प्रकार का है- (१) मार्पि (२) मन्यता (1)मलार्म विविध पत्र मादि सपा-शा वर्ष (१) सात्विक (३) तामसिक (१) सालिक मिश्र (३) गुरुचारित्र (कोष) तीन प्रकारका महापार्य कहा है (२) रामसिक तीन प्रकारका साविक पुश महापौर्य कहा- (१) साविक इस (२) साविक धर्म तीन प्रकारका सालिक एक महापर्यि कहा। (१) खान (२) शुदर्शन सालिक धर्म दो प्रकारका कहा है- (१) प्रशस्त (२) प्रसिद प्रशस्त इसे मी दो प्रकारका कहा है (१) पतसे (२) अपर्मतसे । सामान्य केपली तार्यकर मह वर्ष समर्थ है। १३५ पवागावा, मासोग मुदी ११क. १९१६ परमा एमाही मोक्ष पाता है, ऐसा पो मही कर देते। ऐसी किसकारण किसा होने देता है। जिनमगवान्के पवनका रचना महत है, इसकी तो माही कर ॥ नहीं सकते । परन्तु पापेर पदार्पका सहस उसके शासोंमें क्यों नहीं। प्पा उसको पाचर्य मही माश्म ना होगा, क्यों रिपापा होगा! (२) एक बार पर अपने मुखममें पैर था प्रकाश पा, किन्तु धौसा पा। मंत्रीने बाफर उससे कहा, भाप जिस विचारका कर ठया ये है। पर यह योग्प दो तो उसे इस दौनसे करकर उपाय करें। पाणीजा वासोम पदी १११ १.०६ पद मिठा । सर्पसिदा ही पास है। निमियांतमें ऐसा पहा गया है कि सामिद हारिमानी नगामे बार पोग्न एपर मुद्धि- भिरा। कमर मी पगाले माम मानद भान में बा गपे है। बद पापकर परमानम् उमा। प्रभातमें गण उया, टमी समपसे कोई बर्ष दोभानन्द भीमद् रामचन्द्र [पा १३. १५८ या करता था । इवनेम फ मिम, वौर मूलपदका वतिय स्मरण युवा एकसान हो गया । एकाकारसविध वर्णन धम्दसे कैसे किया जा सकता है! यह दशा दिनके बार बनेक यी । अपूर्ण बानन्द तो का भी पैसाका सा हो है, परन्तु उसके बाद कार सर्प बाते (जानकी ) करनेमें पा गया। "बान से पामसु, पाम, पामच के०" ऐसा एक पर नामा । हदय पात मानन्दमें है। जौन बस्तित्वका तो किसी मी कारमें संशप मऐ। जीके मित्यपनका निकामें होनेकर किसी भी समय सराय न हो। जाके दम्पानेका-विकास बस्तित्वका-किसी भी समय सशप म । उसको किसी भी प्रकारसे परदशा एती है, इस बात का किसी भी समप संशय न हो। उस पथको निति लिसा मी प्रकारसे निस्सन्दो पोय है, इस बातका किसी भी समय साप हो। मोशर, इस बातका सिसी मो समय संशय न हो। १३७ मागोवा, पासोम मुदौ १२ धनि १९५६ ससारमें यना और मोष दोनौ करना, यह बनना कठिन है। सदासीनता बम्पाहमको मनमी है। १३८ मोरपी, मासोग १९९५ दूसरे बहुत प्रकारके साधन जुटापे, और सर्प आपमे बाप तसा फापना की, परत बसत पुकारण उज्य संतापीमता गपा ॥१॥ मिस समय पूर्वपुण्यके सदपसे सहमा योग मिग उस समप वनरूपी बपतके कानों पर मेसे पसे स प्रकारका शाक रह गया ॥ २ ॥ एम् मुमे निश्चय हो गया कि पापर सताप नए होगा । बस फिर मैं एक से नित्य ही उस सपा सगरनेगा ॥३॥ ११८ बोये गाना सम्मा भार असा मलामी गम्मे पमो ताप ॥ पुन्मा र मम्मी पापा-मालेमा चरम गणेग ॥१॥ मापर एप मचे सो महामारी में एक बाप ।
११९, १४ १४१] ૨૩ पिविष पत्र मादि संप्रह-शयाँ वर्ष मोरसी, भासोज १०१६ १३९ यहाँ ठपयोग यहाँ धर्म है। महावारदेवको नमस्कार. १ अन्तिम निर्णय होना चाहिए । २ सब प्रकारका निर्णय तत्लहानमें है। ३ बाथर, बिहार और महारको नियमितता । १ मर्पको सिदि। भार्यमापन उत्तम पुस्पान भाषरण किया है। १४० बई, स १९९६ नित्पस्मृति १ नित महकार्य के लिये तू पैदा एमास माकार्यका पारंबार चिन्तन कर । २ पान पर, समाधिस्प होगा। ३ म्पबहार-कार्पको विचार वा । उसमें विस कार्यका प्रमाद वाt, अब उसके लिये प्रमादम हो, ऐसा कर । विस कार्यमें साहस हुमा हो, अब उसमें पैसा न हो ऐसा उपदेश । " तुम प योगीले, सेहो हो। ५ कोई मी होगीसे छोटी मूह तेरी स्पतिमसे मही जाती, यह महाकापाणको बात है। ६ किसा, मी सित न होना । ७ महागौर क्न । ८ द्रम्प, क्षेत्र, काठ और मात्रको रिचार था। १. पधार्य कर। १० कार्य-सिदि करता मा पा गा। . बर्ग, स १९१९ सहजप्रकृति १ पर-हितको ही निननीत समतना, और परशुसको ही अपना दम समन्ना । २ उमस पे दोनों ही मन मात्र कम्पनामें है। १ छमा दी मोश्चका मभ्यशर है। . सबके साप मप्रमापसे पना हो सका भूपण है। ५, शांत समार ही सननवाका पदार्प मूड है।
२१५ भीमाबद्र [पा १४१, ११ ६ सपे स्नाकी पारी समनताका सास क्षण है। ७ दुर्जनका कम सहसास करो। ८ सा मुल कादिसे भावरण कये। ९ देगा वमान कये। इस (प) पस्तुको विपरूप मानो । १ धर्म कर्ममें पचि रहो। ११ नीतिको सीमापर पैर नाही रस्सो । १२ निवेनिप स्नो। १५ पान पर्या, विपा-विकासमें तपा शाखाप्यपनमें गुप यो । १. गंमारता रायो। १५ ससारमें बनेपर मी मोर मोतिपूर्वक मोग करभेपर भी निशा रक्सो । १५ परमप्रमाको मतिमें पि यो। १७ परनिन्दा हो सब पाप मानो । १८ दुर्घनतासे सकस होना ही हारना है, ऐसा मानो । १५ माम्बान और सबनोको गति रक्यो । १४२ बई, दि.सं १९९५ पारसी बातें ऐसी बोकेका बास्मगम्प है, और मन, वचन और कायासे पर ।। षा पारसी मा पेसी । जो पचन और कामासे पर परतु उनका अस्तित्व है। श्रीभगवान् । भीमपशाप । प्रोबसमाध। १९३ पम्नसं १९९५ म्यापरदेव प्रपम तानों काको मुर्मि कर लिया, बर्षात् जगत्को इस प्रकार देसार- उसमें वमन्त वैम्प बात्माओंको मुख देखा। अनम्त पैक्य नामाबोको देश । भनन्त पनामावको मोशन पाव देसा। जमस्त पैताप मात्मामाको मोपका पात्र देना। मनन्त लम्प आमामाबगतिमें देखा। मनन्त पम्प मामाको उर्भगति देय। मान् मरम, मोर माम मामागेप एक एक भार न मर और व मीना एसएस मम नेवेलमा सरमामपर। १ पर १४४, १४५] पिविष पन मावि संग्रह-श्यों पप २१५ ठमको पुरुषके रूपमें देखा। उनको घर पैतन्यारमक स्वहसमें देश । १४४ पा, कार्तिक मुदा ५ सोम १९४७ मगवान् परिपूर्ण सगुणसपनाको माते है, तो मी इनमें भी दोष कोई कम नहीं है। चित्र-विचित्र करमा ही इनकी लीग बधिक क्या करें! समस्त समर्प पुस्प सपने बापको प्राप्त हुए शानको होकर गये हैं। इस बामको दिन प्रतिदिन इस भारमाको भी विशेषता होती ना हो। मैं समझता है कि केवडान प्राप्त करनतककी मेहनत करना म्पर्य तो नहीं जायगा । मोक्षको हमें कोई बावस्यकता नहीं । निशकपनेको, निर्मयफनेको, मिमहपनेकी, और निस्पृहफ्नेकी जरूरत थी, यह त कुछ प्रासई मायम होती है, और उसे पूर्ण बंसमें प्राप्त करनेकी गुम ये हुए करणासागरको कपा एगी, ऐसी वाया यती है। फिर भी इससे भी अधिक वर्गकिक दशाको प्राप्ति होने की इच्छा हा करती है | यहाँ दिशेप क्या करें। तर-अनिमें कमी मही, परस्त गाडी पोरेकी उपाधि मणका थोराही पुस देती है। याँ नितिक सिपाय दूसरा समी कुछ माश्म होता है। जगत्को पार जगत्को खोलाको भेटे बेटे मुफ्तमें ही देखये। १४५ बम्बई, कार्तिक मा ५ सोम १९४७ सरपुरुप एफ एफ पाश्य, एक एक पदम, मनंत मागम मरे हुए है, पहपात कैस होगी! मांचे पाप मैंने मसल्स मत्पुस्पोंको सम्मतिसे प्रमेक मुमुक्षुओंके बिम्पे मंगलम्प माने है- मोझके सोंचम कारणरूप माने हैं। १ह कमी ही क्यों म ऐ फिरतु मापामय पुसको सब प्रकारको पामको मेरे मना कमी मी छुटकाय होनेवाग नहीं इसस्पेि अबसे यह गाय मुना है उसी समयसे उस मका मम्पास करमा हो पोम्प है, ऐसा समझ लेना चाहिये । २ किसी मा प्रकारसे सहरूको सोम करना सोप करके उसके प्रति तन, मन, पचम और मास्मासे मर्पण-मुखि रसना, उसीकी महाका सब प्रारसे सकारहित होकर बारापन करमा, वार तो हो सब मायामप पासनाका बमात्र होगा, ऐसा समसमा । १ अनादिकारक परिश्रमणमें बनम्तबार शास-अषण, अनम्तबार पाम्पास, मन्तबार निन-दीक्षा, भनम्तबार भाचार्यफ्ना प्राममा, क्ति एक सत् ही मही मिठा; सत् ही नहीं सुना, सत्का हो यान नहीं किया और इसके मिसनेपर, इसके मुनमेपर, तथा इसका मदा करनेपर ही पाहमासे एनेकी बातका मणकार होगा। १ मोक्षका मार्ग बाहर नहीं, किन्तु मामा ।
२१५
भीमद् पवाद
[प
१४६ बर्मा, कार्तिक । १३ सोम १९९०
१ सिने इसके स्वमा दर्शन प्राप्त किया है, उसका मन किसी दूसरी मी बगर भमण पी
करता । गिसे पणा मामात्र मी समागम यता है, उसके मनको संसाता समागम ही सही
समावा ॥१॥
में किस समय स्तेि सेमते हुए प्रगटरूपसे हरिको देस, उसी समय मेरा गान सम है।
पोषाकवि करते है कि उन्मुछ बातम्यमें बिहार करमेवा! ही हमारे जीवनका एक मात्र
वापार ॥२॥
२ म्पादये गुणस्पाममेसे अवमा बाँप कमसे कम तीन, और अधिकसे अधिक परा मन
करता है, ऐसा अनुमब होता है। प्यार में प्रातियोंका उपाममात्र होनेसे मन, पर वोर
कापाका योग प्रा मुममाघमें पता है, इससे साताका च होता है, वौर पर साता बहुत करके
पाँच बनुतर निमामि से जानेमामा होती है।
२४
पर्मुसरी मोन पामेपोर्नु मन नपरे पीछे मामेष
पापप्पनो मेगा प्रसंग ने नगमे संसारको संगरे।।
इसको एमा मगरारी, मार मीम्पु सफल सबपि
मुकामबनो नाप विहारी मोभा जीवनदापि ममापरे ॥२॥
२वाँ वर्ष १४७ वई, कार्तिक सुदी ११, १९४७ मामाने शान पा लिया, यह तो नि सशप है, मया-मेद हो गया, यह दोनों का स्प बात है सब शानियोंने मी या बात स्वीकार की है। का बातमी निर्षिकम्पसमाधि पाना ही माफी यो है, जो मुरुम है, वौर उसके पाने हेतु मी यह है कि किसी भी प्रकारसे नमूत-सागरका - जोकन करते हुए पोडीसी भी मायाका नामरण पाधा न पहुँचा सक, अपरोकन-मुसका किचित्मान मी विस्मरण म हो नाय एक 'दही त्' के बिना दूसरी रन न रहे, और मायामय किसी मी मयका, मोहका, सकम्प और विकल्पका एक मी मा बाकी न य जाय । पदि पर एकबार मी योग्य रीसिसे प्राप्त हो जाय तो फिर चाह से बाचरण किया नाय, पाहे से योग नाप चो से आहार-विहार किया माय तो मी उमे किसी भी तरकी गापा मही, उसे परमात्मा भी पंस नहीं सकते, और उसका किया मा समी कुछ ठीक है । ऐसी दशा पानेसे परमापक सिपे किया एला प्रयत्न सफल होता है, और ऐसी दशा हुए विना प्रगट-माकि प्रकाशन करनेकी परमात्माकी मात्रा नहीं है, ऐसा मुझे माझ्म होता है इसपि इस दशाको पानके बाद ही प्रगर मार्गको कामे वार परमार्थका प्रकाश करमेका र निषय किया है, तबतक नहीं; और इस साको पामेमें पब कुछ वषिक समय मी नहीं है। रुपयेमेसे पत्रा मानेता पो से पा गया , निकिस्मता तो है परन्म निधि मही है। यदि निति हो तो उसके परमापक सिपे स्पा करमा पाहिये, उसका विचार किया जा सके। उसके बार त्यागको वाव यकता है, और उसके बाद ही इसरों के द्वारा त्याग करानेको मानश्यकता है। महान् पुरषोंने कैसी दशा पाकर मार्गका उपदेश किया, क्या क्या करके मार्गका उपदेशा किया , इस बातका मारमाको गम्छी तर स्मरण हा करता है, और यही बात इस बातका हिमाम्म होती है कि प्रगट-मार्गका उपदेन करमे देनेको पिइया है। इसके लिय जमा हामें तो सम्पूर्ण हो गाना दो पोय है। एक अक्षर मी इस विषयमे गात करनेकी पा नहीं होती।मापको इणकी षा करमेके लिप कुछ ९प्रति यता है, अपना पात परिचयमें बापे ए पोगपुरुषको इ- के लिये कुछ कामा वयषा सिमना पाता है। इसके सिवाय अन्य सब प्रकारसे गुप्तता ही रसम्मी है। भमानी कर पास करमेकी इस रोज रमसा है। मिससे कि भपूर्वका में जानके प्रकाश होनेपर बाधा नवाये। कहिये बुरा नहीं लिखता । गुगागा पारिका उत्तर मही सिमना । सूत्रको छतातक मी नहीं है। केरल म्यवहारको रमाके लिय थोडीसी पुस्तकोंक पर्म उहता है। बाकी वो समौ कुछ पत्थरपर पानाक चित्र सा रस पीतमप - ... इन कारणास २१८ प्रीमद् रामचन्द्र [r और यही याचना मी वर योग ( मन, वचन मार काप) मामलपमें पूर्णकर्मको मोग या। टोयका माश होनेतक गृहस्यावासमें राना यम्य गता है। परमेश्वर पान मूमकर पेश्य रस्ता है। कारण कि पंचमकारमें परमार्पकी वर्षा हतु होने देमेको उसकी पोपी होम माझ्म होती है। तीर्थकरने को मो समझा बयका जो जो प्राप्त किया है उसे इस काम में म समझ सके वमा न पा सकें, ऐसी कोई भी बात नहीं है। यह निर्णय पुत समयसे कर रस्सा है। यपि तापकर हानेको मनही है, परन्तु ताफ्करक किये अनुसार करनेकी दया है, इतनी अधिक उन्मयता वा गई। उसके शमन करनेकी शक्ति मी वा गई है, परन्तु जान पूसकर ही शमन करमेकी रकम मापसे विति है कि पुरसे युवा बनें, और इस वस-पाति वप्रणांक मी वाणी बनें । पोरे हितको गुत समझना । गुणठणावक भेद कर समझने के लिये किये है। उपशम और सपक पे दो तरको रेणियों है। उपशममें प्रत्यक्ष-दर्शनको समाश्ना नहीं होती, किन्तु अपकमें होती है। प्रत्यक्ष दर्शनको समनवाने समानमें या बाल म्पायों गुणस्पानतक गाफर यहाँसे पीछे छौटता है। उपशममणी दो प्रकारका है--एक नाबारूप और दूसरी मार्गको माने विमा स्वाभाविक उपशम होनेरूप । भागारूप उपराम प्रेमाचामा बाबाका माराधन होनेतक पक्ति नहीं होता, कित पिण्णा तो एकदम ठेठ पहुँच जाने पार मी मार्ग न माननेके कारण पतित हो जाता है। यह वाससे सीई, और मामासे बनुमत्र की मा। समय है, पर किसी शामें मिल भी गाय, और न मिर तो कोई हरी महा। यह बात तोर्यकरफे यमें पी, पर हमने गान किया है। वसापूरपारी स्पादिकी भावाका भारापन करनेको महानारदेनको शिक्षा लिपपमें बापने नो लिसा ठीक है। इसने तो बहुत ही अधिक या पा) परम्त उससे पोनही बाकी बचा . भौर प्रकाशक पुरुष गहस्पानासमें है, माको गुफा है। कोई कोई मानते भी है, परन्तु उममें इक्मा पोगस मही। बानिक को बानेवाः मुनियोंका सूत्रार्थ पुमनेतको भी पोम्प नहीं। सूत्र कर उपदेश करनेको छ दिनों पीछे बहरत माही परेगी । स्त्र और उसके कोमे कोने सब कुछ गाने एहै। (२) (१) निनसे मार्ग का है, ऐसे महान् पुरोके विचार, बस, निर्मयता बादि गुण मी मान् हो । एक राम्पके प्राप्त करने में नितने पराक्रमकी भावसकता है उससे मी हो मषिक पराक्रमी मापकता बर्ष अभिप्रायसहित वर्म-सस्तविके चमके लिये चाहिए। पोरे समप पहिले मुसमें सौ तपास्म शाठि मास होती थी, ममी उसमें किस्ता देखने में जाती है, उसका खस्या होना चाहिये, चार करमे पोम्य है। ।
पत्र १.] विषिष पन भादिसंप्रह-सौ वर्ष २१. समन है, वह मार्ग सप्रदायकी पैतिशय बहुतसे गोत्रोंको मिल मी नाप, किन्तु दर्शनकी विसे वो पर रिछे हो जीवोंको प्राप्त होता है। पदि मिनभगवान्का अभिमत मार्ग निरूपण करने योग्य गिना जाय तो उसका समाप-मेदकी कोटिस निरूपण होना विसपुत मसंभव है, क्योंकि उस मार्गको रमाको सांप्रदायिफ स्परपमें साना बापन्त कठिन है। दर्शनको अपेक्षासे फिसी जीवका उपकारी होमे जितना निरास बाता है। (२) मा कोई महान् पुरुष हुए ये पहिलस ही सम्वरूप (निमशक्ति ) समझ सकते थे, माषी महान् कार्यके बीनको पहिटेसे ही अम्यकम्पमें वपन किये रसते थे-अपवासापरणको अनि रोन जैसा रसत थे। मुझमें यह दशा विशेष निरोधमें पाई जैसी मान होती है। पर विरोध क्यों माश्म होता है, उसके कारणोंको मी यहाँ सिम्म देता है - १ संसारीकी रातिके समान विशेष प्यबहार एनेसे । २ अमर्पका पारण । (३) वीतराग दर्शन (१) उदेश प्रकरण (३) भग ठपांग मूह ऐ मा-मीमांसा भाशय प्रकाशिता टीका पदर्शन मालोकन म्पबहादतु बावरण अभिप्राय बिमार | परमापद म्पबहार प्रकरण परमार्थ गीणवाफी प्रसिदि मुनिपर्म म्पहार विस्तारका पर्यवसान जागारधर्म अमेवारि देत मतमतांतर निरापरण । गत मतिर निहाधिप्रपान उपसहार. उपम्म उपसंहार भविसधि छान (२) मातापिन गुमम्थान रिपेचन | वर्तमानकाळमें भाममाधम भूमिका कर्मप्रतिदिन पोतरा दान म्याम्याग अनुगम रिचारपदति मायाभिषन बोधयानसरचि गोगमारिमति घामामामा स्यूयम हे २२. श्रीमद् परमान [पन १४८, ११ ! उत्तर मेकास्पान ! उन उन स्थानों में बनेगण सूर्य चन्द्र बादि वस्त धर्म गर्मि मस्तिकापाप द्रम्प अपना नियमित गति । स्वामाविक बमम्पल! दुपम पुपम मादि का अनादि बनत सिदि। | मनुम्पको उचाई माविका प्रमाण ! बनाविनतका काम फिस क्र! बमिकाप माविका निमिच्योगसे एकदम पर मामाला संकोच-विस्तार! हो जाना। सिब ठगमन-पेतम, सरकी क्यों नहीं है! एक सिबमें अनत सियोंकी मारना। केपानमें पोकाठोकका शान कैसा होता है! मेरस्थिति मदिराका ! शामतपतु साण. १४८ बर्मा कार्तिक १९१७ (१) उपचाममाय सोज भानामोंसे भूपित हानेपर मी न प सोप माना गया है, इसकी सक प्रताहे कारण वफ्नी न्यूनता होती, और कई मसरमाव माकर पला बाप तो यह उसको उपसम- मात्र पा धायिक नहीं पा पा नियम ।। (२) प या म्पों पर गई। मौर र दया को क्यों नहीं । कके सापसे, मानेमसे, जमा- गम्पपनेसे गौर सी बानि परिपहोंकी यप न करमेसे । निस क्रिया गोषको रंग माता। उसकी पही स्थिति होती है, ऐसा जो निमगाव ममिप्रापप सत्य है। प्रस्तीकर महामोहनापके मो तास म्पान को रुप । भनयानी पुरषोंने मिसका कोई भी प्रापमित नहीं कहा और मिसके त्याग ही एकात महा दी। ऐसे चमसे मोम्पाकु महाँ मा ही परमारमा है। १४९ कई पतिक मुदी ११ १९९७ वमन्तकाम्से वाहमाको मानविषयक जो भान्ति हो हो। यह एक बाप्य मत प्रचार परने जैसी बात है। मतिका गति नहीं पाँ बचतको गति कैसे हो सकता है। निस्तर उदासीनता के क्रमका सेवन करना) सत्पुरुषको भलिमें न होना सपुस्मोके परि - स्मरण करना पुस्पोकेम्पोच मिन्तवन करना; सपुष्पोंकी मुसाहतिका मापसे गरमेकम पत्र १५ १५१,१५२ १५विदिप पत्र मादि सपा-वाब ૨૨ करमा, उनके मन, पचन मोर कायकी प्रत्येक घेठाके अद्भुत पस्योंका रि रिसे निदिध्यासन करना बार उनके शाप माने गएको सर्वया मान्य करना । भई, कार्तिक सुदी ११, बुध १९९७ निरतर एक ही घेणी गती है। पूर्ण हरि-कपा है। (सत् प्रयाको पाकर) गो कोई महारा धर्मके निमिचसे इस करे उसका रूप रमतो । १५१ बर्ष कार्तिक व शनि १९४७ यह विमासपूर्वक मानना कि यदि इसको उ"यकामे म्पाहारका वपन न होता ता या हमें मार दूसरे यातसे मनुप्पोंको अपूर्व हितको देनेवाला होता । जो पुत्र प्रापि होती है उसक कारणसे उसने कुछ विपमता नहीं मानी, परतु यदि उसे निहाति होती वो बासरी वामामोंके लिये मार्ग मिम्नका कारण हो माता । नमी उसे रिसब होगा । पचमकाकी मी प्राचिो इस ममें मोच मानेनाले मनुष्योंका समय होना मी कम है यादि कारणोंसे ऐसा ही हुमा होगा, तो उसके मम्मे मुश सेद नहीं। १९०७ १५२ बर्थ, कार्तिक बदौ ५ साम संतकी शरणमें जा समसग या बसे गदा सापन है। पुरुषका प्रयाफे बिना पुटकारा नही । इन दो विपर्योका शास स्पारिसे उनको उपश करते गना । ससंगकी पदि करना। सय १५३ बमई नाला मोहल्ला, कार्तिक बदौ ० शुक्र १९४७ एक बार तो परमार्थ-मार्गको शीप्रतासे प्रकाशित करनेको इठा है, बार दूसरी बार बम ' में लीन हो गानेको पता है । यह बारमा भटम 'हप में पूर्व पूर्व समापिर हो गई है। योग के द्वारा समावेश करना यही एक एन गीई है। परमार्प मागको पदि बातम मुमम पा, मसन-समाधि पाये, तो पात मचा हो, आर इसीक लिये कुछ ममन भी है। दानधुकी सी रछा होगी पैसा हो ऐगा। निरतर ही महत दशा पा करती है। हम भाप्त हुए हैं। वौर बापूत करनका मत्से गोग प्रति रशि। महावीरदबने इस काठको पत्रकार काकर उपम कहा, म्यागने कलियुग या, इस प्रकार २२२ [ भीमा पाचन भनेक महापुरुपोंने इस फाको कठिन सा है या बात निस्सन्देई सप है, क्योंकि मधि और ससंग विश बछे गये हैं अर्थात् सप्रापमें नहीं थे, और इनके मिज ना चोलका फुटकामा नी । इस कामें इनका मिना दुपम ऐ गया है, इसीठिये इस काउको दुपम का है, पापाव पोम्म पिमरे फ्पिमें कमसे कम किसनेको म होता है परन्तु जिसने अपना योग्नेको परिक इणा नहीं था। पेशाके उपरसे हो समझमें आ मापा को ऐसा निपटा है। । ॐ मीसद्गुरुपरणाप नमा १५४ बाई, कार्तिक ९एक १९९७ मुनि ... संभमें आपका रिसना पयार्य है। मा-स्थितिकी परिपकता ए बिना, दोन- बधुकी का बिना, और संत-चरणको संमा बिना पीनों में भी मार्ग मिलना कठिम है। मोरो संसार-परिभ्रमणक मो वो कारण है, सनमें मुम्प सबसे बो कारण मेरे कि रूप निस जानके रिपय शकित है उसी शानका उपरे। परना। प्रगटलपमें उसी मार्गध रक्षा करनी; तपा उसके लिये दपमें भा-विषा मात्र होने पर भी अपने प्रवाहनोंको उसी मार्गके पपा दोनेक उपदेश देना । इसी तर पर बाप उस मुनिके समबमें विचार करेंगे तो यह बात ठीक ठाक हार हेगी। जिसका नीर समी कामें दुरक्रिया साता हो, फिर भी पदिय निशंक मार्गक उपदेश कर मेका दम रखकर समन जीवन बिता दे, तो यह उसके लिये परम शोचनीय है। मुनिके सबप यार- पर दुध कोर मागामें मिमा गया है ऐसा मास हाताद फिर मी यहाँ पैसा अभिप्राय किस मी मही है। जैसा ( मसाच बसा किरण बि डिमाइसी तपसे सरे बनत जोन पूर्वकाठमें मटके में वर्तमानकामें भगफ ये है, भोर मतिप्पकासमें मी मटकेंगे। गोलने के लिये ही माता। एबंधन नहीं भाता, या माक्य ल बनुमनपूर्ण है । अपनच त्याग करनेपर ही पूरा होता है ऐसा समझनेपर मा उसी मंथन पनि कर रहना, उसमें अपना महल स्पारित करमा थोर पुष्पवाका प्रतिपान करना या नीमको पात हो भषिक मासानेवाला है । यह पुदि संसार-समाक निकट मापे हुए जीवको ही होती, पर समर्प पक्रपती जैसी पर भाप हानेपर मी उसका माग करके कर-पानी मिधा मागकर जाने पार मे मौत संना परणों की बनत ननन्त प्रेममा से पते है, और ये जहर । न गाते है। नभुको पमा परि है कि एनके इकको बापना नहीं भर परफे मुकको सोना मही। पो रिमी पाचशेण गोवा एसी शका हा सकता है को तोपना कमी भी जमा मही हगता मा एमेकी हो या एता है तो सिर मात्र पो माता है ! इस काका निनाद समान है कि पना अनुमत्र मा है कि जिस मानेको रद होती है उसको पनाही मादीमिर गाना मोर इस क्समग्र पक्षी यह सत् है।
पिविप पर मादि समार-२४प पर्प २२३ - १५५ वर्मा, कार्तिक बली ११ गुरु १९४७ बतरकी परमार्य पगियोंको योरे समयतक प्रगट करनको पछा नहीं होती । धर्मको इच्छा करनेवाले प्राणियोंके पत्र, प्रम आदिको तो इस समय अघनरूप माना है, क्योंकि जिन इशानोंको बभी हाटमें प्रगट करनेकी इच्छा नहीं, उनके कुछ वश पिवश हाकर इनके कारणसे प्रगट करने पड़ते है। मित्य नियममें हमें तपा अन्य सब माईयों को इस समय तो मैं इतना ही करता है कि जिस किसी मी मार्गसे धर्मसकालसे प्रसित वाग्रहका, अपनेफ्नका, और असम्सगका नाग हो उसी मार्गमें धि प्रगानी चाहिये। पड़ी पितवन रमनेसे वार परमपका स पिचास रचनेसे कुछ अशोमें जय प्राप्त हो सकेगा। १५६ बम्बई, कार्तिफ बदौ १० शुक्र १९४७ ममी हासमें वो मैं किसीको मी स्पटम्पसे धर्मोपदेश देनेके योग्य नहीं, अपना ऐसा करने की मेरम नहीं है। या न होने का कारण उन्यमें गनेवाले कर्म ही है । मैं तो यही चाहता है कि कोई मी निकास हो पर धर्मप्राप्त महापुरुषसे ही धर्मको प्राप्त कर, तथापि में मिस वर्तमानकामें । या का ऐसा नही है। सबसे पहिने मनुष्यमें पपायोग्य निजामुफ्ना आना चाहिये पूर्वके वाहों लौर बससंगको इटमा चामिये भौर जिससे धर्म प्राप्त करनेकी इच्छा हो या सय मी उसे पाया जा है कि नहीं, इस बात की पूर्ण जाँच करनी चाहिये। यह संतको समरने जैसी बात है। " १५७ बर्मा, मगसिर मुरी सोम १९१७ मीचे एक वास्पपर सामाम्पत स्याशद पापाई- इस कालमें कोई मी मोझ महीं जाता।" इस काम कोई भी इस क्षेत्रसे मोष नहीं जाता । इस कामे, कोई मी इस कारमें उत्पन्न हुमा इस क्षेत्र मोक्ष मही माता । इस कालमें, कोई भी इस काठमें उत्पम (भा सापा मोल नहीं पाता । इस कामें कोई मी इस कारमें उत्पम हुमा सय कर्मास सपा मुक्त नही दाता । अब इसके ऊपर सामान्य विचार करते हैं । पहिस एक भागमाने या कि इस कामें मेरी मी मोक्ष नही जाता । पोहा पर वास्प निकम त्याही पकाई कि स्पा इस कासमें महाविदसे भी मोश नहीं माने । पास तो गा सकते हैं इसलिये फिरसे वाक्य बोलो । अब ठसन म पार या-इस फाठमें कई मी इस क्षसे मोच नहीं माना । तब फिर प्रश्न एका कि नम् , सुमासामी एपादि कसे मोक्ष बहे गये । पर मौ ता यही काळ था इसठिय सिर पर सामनबाठा पुष चार करके बोला-'म कामे, कई मी इस कारमें मग्मा हुमा इस क्षेत्रमे मान्न माहगावा।' रिप्रभ " १२१ भीमद् रामचन्द्र [पा ११५४ । निरस्तर सेवन किया करते हैं और इनके इस दासत्वके प्रति हमारा दासत्व होने का मौ यो कारण है। मोगा भगत, मिरत कोली स्पादि पुस्प योगी ( परम पोम्यताबासे)। निरंजनपरको मममनबारे निरनन सी स्थिति में रखते है, या विचारमेपर उनका मानिस गतिपर गमीर स्माभिपूर्ण सी बाता है! या हम अपनी दशा किसी मी प्रचारसे नहीं कर सकते फिर तो काम सगे। मापका दर्शन होनेपर होगा कुछ वाणी का मेगा पा करेगा, माकी तो मारी। हमें कुछ मुति तो चाहिये मही, और मिस पुरुषको मैनशनका केरमान मी नहीं चाहिये, उस पुरुषको परमेश्वर का कौनसा पर वंगा, क्या पर कुछ वा विचार पाता है। परि पाता हो वापर्प फरमाभन्यथा यहाँसे किसी रीतिस फुल मी बाहर निकाण पा सके ऐसी समागमा रिसर्च माही देती। भाप बारम्बार मिलते हैं कि दर्शनके सिपे पास बातुरता है, पम्त मालोरमने से परम- काल कहा है, और प्यासमगवान्ने कम्मुिग डापा हाँस साप रहने दे सकता है ! वोर पदि ग्रने दे तो मापको उपाधिमुत प्यों न रक्से । .. १६२ बम्ब, मगसिर पदौ १०, १९९७ यह भूमि (बम्बई) उपाधिका छोमा स्थान है। माविको पर एकबार भी बापका ससग हो माप तो यहाँ एक च परमा चाहिये यहाँ हो सकता है, पापपा हाना दुर्मम है, क्योंकि हातमें हमारी बापति पात कम है। १६३ प, पौष पदी ५ गुरु १५०० मसस्त माम धुनी नगी गगनमें, ममन पपा मन मेरामी । मासम मारी घरव एपारी, दिया मगम पर रामी । दरम्या यमस देवारामी। बई, पीप सुदी १० सोम १९४० प्रत्नम्याकरणमें रुपका माहम्प पदा। उसपर मगन मी किमी था। हामे हरिजमको संगतिक ममारसे कस कटिमतासे म्पतीत होणारिन्नको संगतिम मी उसके प्रति मति परमा यह पात प्रिप लगता। भापकी परमार्यविषयक मो परम भाभा बाईपरेमाई तो किसी भपूर्ण मार्गस सम्म हो बापगी । मिनको भातिक कारण परमार्थका व मिझना तुम ऐ गया। ऐसे भारतलासी मीति र परम पाव माया होगा I ami ani m HAE पहो, । परमार याम पर १५५, ११५, १९.] विविध पर मादि संप्रार-बाप बर्मा पौष मुदी १४ मुझ. १९१७ करना पकीरी क्या दिसगीरी; सदा मगन मन रानामी मुमुक्षुमोको इस पतिको अधिकाधिक वाना उचित है। परमार्यको पिताका होना या एक बुरा विषय है। भतरगमसे म्पहारको पिताका पेन कम करना यह मार्ग पानेका एक साधन है। हमारी पति नो करना चाहती है, मा एक निष्कारण परमार्थ ,भौर इस विषयमें माप भी चुके हैं तपापि कुछ समपाय कारणकी न्यूनताके कारण अभी हाम्में तो पैसा कुछ अधिक नहीं किया जा सकता इसलिय जनुरोप है कि ऐसा पन प्रगट न करमा कि हाल हम कोई परमार्थवानी है, अथवा समर्प है, क्योंकि यह हमें वर्तमान में प्रति जैसा है। तुमसे वो कोई मार्गको समसे है, ये ठसे साम्प करनेके लिये निरन्तर सत्पुस्पके परिजका मनन करना रा रस्में उस विषयमें प्रसग आनेपर हमसे पूछ, तया सशासका, सकपाका मोर सनका सेवन करें। वि निमितमात्र १६६ बर्मा, पौष बदौ २ सोम १९९७ इमको प्रत्येक मुमसुमोका दासस्व प्रिय है इस कारण उहोंने दो पुस मी उपदेश किया है, उसे हमने पहा है। यपापोग्य ववसर प्राप्त होनेपर इस तिपयमें उत्तर लिसा ना सहेगा, तपा अभी हम निस माधम (बिस स्थितिमें बना है स्थिति ) में उसे छोड देनेकी कोई वास्यकता नही । तुमने हमारे समागमको पो आवश्यकता बताई या माश्य हितैषी है। तपापि ममी इस दशाको पानेका पोग नहीं पा सकता। यह तो निरस्तर ही भानन्द है। यहाँ सम्को धर्मयोगविपरनेके रिये विमति। १६५ बर्थ, पौष १९४७ "जातको मार्ग नही मिना, इसका क्या कारण है"! इस बातपर बारम्बार विचार करके पति पोम्य गे तो सापका (मीचेका) पत्र साना । हमें तो माम होता है कि मार्ग मठ, मसम है, परस्त प्राप्तिका पोग मिझना हो दुर्गम है। सस्स्सम्मको ममेदभारसे भौर मनम्प मक्तिसे ममोनम जो निरन्तर वप्रतिममावसे विचरते है, ऐसे हानी पुरुषोंको भावाको सम्पन् प्रतात्तिके पे बिना तथा ठसमें वपळ स्नेह पर बिना सत्सरूपले विचारकी यार्य प्राप्ति नहीं होती, और पैसा दय बानेसे बिसने उनके चरणारस्दिका सेक्न किमा, या पुरुप बसी दशाको कम कमसे पा जाता है। इस मार्गका बारापन किये बिना मौसमे मनारिफाससे परिभ्रमण किया है। वहाँतक गारको सहमी अमापन मी यहाँतक इस मार्गका दर्शन नहीं ऐता । यह भयापन घर- के लिये गौरको इस मार्गका विचार करना चाहिये स मोमेन करनी चाहिये, और इस विचारमें २२४ भीमद पाचन्द्र [पा १५८ १५९ एला कि किसका मिप्यार दो नाच होगा या नहीं। उत्तर मिला कि हो, होता है। वो फिर शंका- कारने म कि यदि मिप्याव मए हो सकता है तो मिथ्यावसे मोक्ष हवा कहा जायगा या मही ! फिर सामनेबाटेने जवाब Pया कि, ऐसा तो हो सकता है। मातमें शकाकार योग कि ऐसा नहीं, परन्तु ऐमा होगा कि इस कामे, कई मी इस कमें उत्पम हुना सर कमसि सर्वया मुक मही होगा।' इसमें मी अनेक मे है। परन्तु यहाँतक कदाचित् साधारण स्पाराव माने तो र नशामके सिपे स्पीकरण हुमा नैसा गिना जायगा। गत मादि वो इस काम में भी सब कर्मास पया मुजिका प्रतिपादन करते है, इसरिये ममी और मी बागे गाना पडेगा उसके बाद भी नाकर गल्यको सिदि हो पावे । इस तरह माम्प बोम्नेको अपेक्षा रखना उभित करा जा सकता। परम्तहानके उत्पम हुए बिना इस मपेशाका सत यमा संभव नहीं, वरना हो सकता है वोप सम्पुरुपको कपासे हो सिर हो सकता है। इस समय बस पही। पो सिसेको गत समाना । उपर रिसोई सिर घुमानेवाण बातें मिला मुझे पसर नहीं। शामरके बाफरका समाने पमान किया है परन्तु यहाँ तो छासहित मपतका नारि पर है, इसलिये यह कैसे पसंद ना सकता है परन्तु साप ही इसे माफ्स मी नही किया जा सकता। मम्तमें बाज, फल और हमेशके लिये यही कानाकिसका संग होने के बाद सब प्रकारसे निर्भय बना सोचना । भापको यह बास्य कैसा माता है। १५८ बर्मा मगसिर मदा९पनि १९१७ सरस्वरुप हाँ तो तीनों ही काल समान है। पाय म्पबहार के प्रति विषमता नहीं है, और उसको स्पागनेको इन्टा रमणारे, पर पूर्व प्रावियो हामे बिना कोई पुटकाप मही। कासकाइपमता.. से या प्रति मार्ग बहुत से जीवोंको सत्य दर्शन करनेसे रोकता है। तुम सबसे पही अनुपेर है कि इस बास्माके सबमें इससे कोई बातचीत मत करना। १५९ बमई, मगसिर मदो १५ प १९४७ भाग लपके गो गो बहार दिसत है उन पर वारको योम्पदा के लिये प्रसम होता ! परम प्रसन्नता होती और फिर दिरसे सतयुगका स्मरण हो भाता है। मार भी मानते हो कि इस प्रमें मनुष्यो मन मापामय सपति इमायुक्त हो गये है। रिला रिठे ममुमोका दो निर्माण मार्गको रस इशायुक यमा समन । पालिसी रियों में दो सरसके चरणो साम करनेसे प्राप्त होती है। इसमें सौह मही महा अभकामपाले इम कारमें माना सम्म किमी कारण तामा परन्तु पा उपाय किपा माप, इसको तो सम्पूर्णतान गा पागा तभी कुछ उपाय बम सरेगा ।
विपिप पत्र मावि संप्रह-सयों पप २५ १६० पर्मा, मंगसिर मुटी १०, १९९७ आनन्दमूर्ति सस्मरूपको अभटमारस तीनों काल नमस्कार परता हूँ जो जो इच्छा उसमें कहीं है, ये फम्यामकारक ही हैं। परम्मु इम इप्टाकी सब प्रकारको धरणाएँ तो समे पुस्पके चरणकमउफी सेवामें ही मम्सर्भूत है (पा सब अनन्तझानियोंफा माना हुआ निशक पाप माफ्का पिया), श्रीर बह गएमा सगर्ने हो अन्तर्भूत है । परिभमण करते हुए जीवने अनारिकारसे मबतफ अपूर्णको नहीं पाया जा पापा सम पूर्वानुपूर्व ही है। इन सबको पासनाका स्याग फरनेका अम्पास करमा । प्रमसे और परम उछाममे यह अम्पास जयवंत होगा, भार मह फाउकी अनुकूलता मिउनेपर महापुरुषफ योगसे अपूर्णकी प्राप्ति करापेगा। सा प्रफारफा त्रियाफा, योगा, सपा, भौर इसके सिवाय अन्य प्रकारका पेसा छा एना कि भामाचे दानक लिये ही सब कुछ बधमके उिपे नहीं, जिससे बधन हो उन सबका (सामाम्प क्रियासे टेकर सर योग आर्पित ) स्पागना हो पोग्प है। मिष्पा भामधारीका पपायाम्प १६१ पई, मामिर बदरी ११, २०१७ माम हुए सस्मरूपी मभदमारस असून समापिमें स्मरण करता है अन्तिम सरफे समझने में और अनुमस करनमें पोपीमा भी फमी मही नही है पद से है मे ही मन प्रफारसे समसमें भा गया है। सर प्रकाश पेपर पा फर पसर पुछ भनुभरमें मा पुका । एक श मी एमा मही या वा समसमें न आया । परस्तु पाग (मन, पचन, पाय ) पूषा सगदीन हान ये बमबासको नापयफ्ना बार ऐमादामेपर दो पद पश मी अनुमबमें वा जागा अर्थात् उनीमें रहा गरगा परिपूर्ण पारातोर-मान उरम गा वि मे उस्म करनेफा (पैसा) भाशा नही रही तारि यह उपप्न मी मागा' पर भी वारपारफ ६! परिपूर्ण स्नान ता उपम ने पुगी भार इस ममारियम निरपा नगर-मक प्रति जाना कम गा! यह भी पर पप गुदी मही रन्तु पर रिममगामी एक का दामी । पुनमा भोर का जमा नातिमें भी पारी मागम पारफ पुश होगा। अन-ममुलपये उन मामाभोगी परिधान मम पारण उनम कमिाग गरीदि परम वीरश उन मनमानो प्रति मार उराम ना ५ मा भरतप गिन। इन गान बनियान पान उगा मिना उस गलती मुमम पामे रागो पुरगो र पो पानी पुग्ने प्रति गल गरम बोर मानो निरता उनसे परोसा करने मे, माना श मे मुमुधुप अपि उनम ti irahar .
। १२३ भीमद् रामचन्द [ पत्र १६२, १११, १४ मिरम्तर सेवन किया करते है। और इनके स दासबके प्रति हमारा दान होने मी यी कारण है। मोगा मगत, निरंत कोसी स्पादि पुरुष पोगी ( परम योम्पतला) । निरमनपरको समझनेबारे निरंजन कैसी स्थितिमें रखते है, यह विचारमेपर उनकी प्रतीन्द्रिय गतिपर गंभीर समाधिपूर्ण सी माती है। व हम मपनी दशा किसी भी प्रकारस मही कर सकते फिर किस तो कासि सकेंगे। पापका दर्शन होनेपर दी जो कुछ बाणी कर सकेगीभ करेगी, मात्र तो मचा है। हमें कुछ मुक्ति तो चाहिये नहीं, वौर बिस पुरुषको जैनदर्शनका फेवमान भी नही चाहिये, उस पुस्पको परमेश्वर सब कौनसा प देगा, क्या पर कुछ वापके विचार जाता है। परि वाता तो बापर्य करना, अन्यथा पहसि किसी रीति से भी बाहर निकाश मा सके ऐसी संभाषमा दस नहीं देती। वाप पारम्बार पिसते दर्शनके लिये बात बातुरता, परम्त मालारदेखने से परम- कास कहा, वीर भ्यासमगवान्ने कमिमुग का प्रकासि साप एने दे सकता है। और पनि गने दे तो बापच्चे उपाधिमुक क्यों न रम्से ! - बी, मगसिर पदी ११, १९१७ या भूमि (बम्बई) उपाधिका शोमा स्थान है। बादिको पनि एकबार मी वापका ससंग हो बाप तो यहाँ एक करना चाहिये पोय हो सकता है, पपा होना दुर्मम है, क्योंकि हाल में हमारी माति बहुत कम है। 1 बर्मा, पौर सुदी ५ गुरु १९१७ मस माम धुनी सगी गमनमें, मगन भया मन मेरामी । भासन मारी पुरव एपारी, दिपा भगम-पर रेरामी। दरश्या मसस देवारामी। १६४ ब, पौष मा १ सोम १९४७ मत्तम्पारणमें रुपका महाम्प पड़ा है, उसपर मनम मी लिपी पा । हमें हरिजनकी सगतिक नमानसे कार कठिनतासे म्पतीत होता हैरिजमको संगतिमें मी उसे प्रति भक्ति करना या बहुत प्रिय स्गता है। भापी परमार्षभियपक को परम भाकांक्षा है, या चिरेमा हई तो किसी वपूर्ण मार्गस सस हो जायगा । मिनको भाविक कारण परमार्थका मन मिडना दुम हो गया है, ऐसे मारतलासी मनुके प्रति र परम कृपा परमापा करेगाः परत मभी हमें कुछ समपतक उसकी रचा हो, ऐसा माश्म नहीं होता। ।
विविध पत्र प्रादि संप्रार-२४पौवर्ष १६५ समाई पाप पुरी ११ भुक्र. १९९७ करना फकीरी क्या दिसगीरी, सटा मगन मन रानामी मुमुक्षुमोको इस इचिको अधिकाधिक बहाना उचित है। परमार्थको पिताका होना यह एफ का विषय है। बतरगर्मेसे म्पबहारको पिताका बेटन कम करना यह मार्ग पानेका एक साधन है। हमारी चि को करना चाहती है, वह एक निकारण परमाप ही है, और इस विषयमें बाप मी भारम्बार गान हो चुके हैं, तपापि कुछ समवाय कारणको म्यूनता के कारण ममी हासमें तो पैसा कुछ अधिक नहीं किया था सकता, इसलिये अनुरोध है कि ऐसा कथन प्रगट न करना कि हमें हम कोई वरमार्यमानी है, मपपा समर्थ है, क्योंकि यह में वर्तमानमें प्रतिकूल जैसा है। तुमर्मेस को कोई मार्गको समझे है, ये ठसे साप्प करनेके डिपे निरन्तर सत्पुरुपके परिप्रका मनन करमा चार रम्सें; उस लिपपमें प्रसग नामेपर हमसे पंछ, तथा सशामका, सस्थाका और सदमतका सेवन करें। मि मिमित्तमात्र बम्बा, पीप बदी २ सोम १९१० हमको प्रत्येक मुमधुमाका दाम्प प्रिय है। इस कारण उन्होंने वो कुछ मी उपदेश किया है, उसे इममे पहा है। पपापोग्य भवसर प्राप्त होमेपर इस लिपपमें उत्तर लिया जा सकेगा तया भमी हम बिस मामम (निस स्थितिमें बना है पर स्थिति ) में हैं उसे छोप देने की कोई बापश्यकता मही। तुमने हमारे समागमकी दो बावश्यकता बताई गमवाय हितप तथापि नमी इस दपाको पानेका पोग नहीं जा सकता। यहाँ तो निरम्वर ही बानन्दबह सबको धर्मयोगको गदि करमके लिये विमति। -- . १६७ बर्मा, पौष १९१० "बारको माग नहीं मिम, सका क्या कारण है" इस बातपर बारमार चार करके परि पोम्प गे तो सायका (नोचेका ) पत्र पाना । हमें तो माश्म होता है कि मार्ग सस, पुलम, परन्तु प्राप्तिका योग मिन्मा ही दुसम है। सस्तरपन मभेदमापसे मीर मनन्य मसिमे नमानम गो निरन्तर प्रतिबदमावसे विचरते है, ऐसे शामौ पुरुषों की बाबाको सम्पा प्रवत्तिक पे बिना, तथा उसमें अचछ स्नेह ए बिना ससमपके विचारको पपार्य प्राप्ति नहीं होती, और बसोय आनसे जिसमे उनक चरणारविन्दका सान किया है । पुस्प बसी दशाको अन्त मासे पा जाता है। स मार्गका वारापन किये बिना गीरने मनारि फारसे परिभमन किया है। गाँवफ मोलको सदनमी वायन मोगद, गहनिक इस मार्ग दर्शन मरीना | पर भान के लिये गालको इस मार्गका विचार करमा पाहिपेस मेटेकरमा चाहिम और इस पिचारमें २२८ भीमद् रामद [ष १५८ १५९ अप्रमत यना चाहिय, प्रमी मार्गकी प्राप्ति होकर बवास्न र सकता है। नारिफारसे का उम मार्गपर बसपापपपि उसने अप, तप, शाबाम्पयन बगैरे वनन्तबार किये है, क्यापि भो कुछ करना बाबयफ पार उसने नहीं किया, जो कि हमने पहिरो होछाया है। सुपगगस्त्रमें यहाँ भगवान् अपभवनाने अपने मान पुत्रों को उपदेश किया है, और उन्हें मोह-मार्गपर चढ़ापा यहाँ सवयमा उपदेश दिया है मायुष्मानों ! इस मारने एक बात आकर सब कुछ किपा पो मताभो कि यह एक बात क्या ! तो नियमपूर्वक प्रते है कि सत्पुस्पका का वा पचन--उसका उपदेश से इस पारने नही मुना, और ठीक दिसे नहीं धारण किया और हमने उसको मुनियों का सामायिक ( माम-सरूपये प्रति ) कहा है। मुपर्मातामा जम्मामाको उपदेश देते है कि, जिसने समस्त जगत्का दर्शन किया है, ऐसे मालारम्गबान्ने हमें इस तय कहा है-गुरुके भागीन कर माचरण करनेवाले ऐसे बनन्त पुरषोंने मर्ग पाकर मोक्ष प्रास किया है। एक इसी जगह नही परन्तु सब बगह बार सब शाम यही बात करनेत्रा तय है। माणाए धम्मो माजाए तो बाजाका मारापन ही धर्म है वाघ वामन होवप है- पा बाप्सम गोषको समझमें महीं बापा, इसके कारणों से प्रभात कारण सद। १६८ पई, पौष १९१७ सस्वरूपको अमेवरूपसे भमन्प भक्तिसे नमस्कार गिसको मार्गको इम उत्पम हुई। उसे सब निकम्पोको मेकर कस यही एक निकम्प सिर फिरसे स्मरण करना बापक- बनतका से बीन परिममण कर या है, फिर भी उसकी निति क्यों मोवी ! वीर पनिति स्पा करनेसे हो सकती है। इस पापमें वन्त बर्ष समापिए तथा इस पापमें सपपेच तिन किये बिना और उसके लिये सहोकर तम्मम हुए बिना मार्गको Pमाका किंचित् मी भान मही होता, पूर्वमें नहीं मा और भविष्यकासमें भी नहीं देगा। हमने तो ऐसे ही गाना ससिपे हम सबको मी साधी बोर करना है। फिर उसके बाद ही इम्रा क्या सामनेको जरूरत है उस बातका पता पकता है। मई, माघ सुदी ७ नि १९९७ रिसे मु- पनस यना पाता है ऐसे चिामु । नारफे दो बोबन - ~-एक सर्मा और दूसरा प्रतिष । मिसाध सभाता हटानेकौरस है उसे पानी नाका भाषन करना चाहिपे, तथा रिसको प्रतिवध हटानेही दम है, उसे सह- संगका त्पनी होना चाहिय । यदि ऐसा न ऐगा दोगनका नाश न होगा। जिसध सभ नए दो .
पत्र १.., १५१] विदिप पर मादि संग्रह-२५वी वर्ष २२९ गया है, उसका प्रतिवम मी अबसरके प्राप्त होनेपर नाश होता है, इवनी शिक्षा स्मरण करने योम्य है। यदि म्यारूपान करमा परे तो करना, परन्तु पाल्पान करनेको योग्यता नभातक मुझमें नहीं है, भौर यही मुझे प्रतिबध है-ऐसा समझते हुए उगसीन मासे म्पास्यान करना । म्पान्यान न करमा परे इसके लिये यथाशस्य मोतवर्गको मितने सचिकर प्रपन हो सके उतमे सब करमा, किन्तु परि सा फरमेपर मी म्पास्मान करना ही पड़े तो उपरिनिए उदासीन भावसे हो करना । १७० बम्बई, माघ सुदी ९ मोम १९१७ धान परोसो किंवा परोठ, इस विषयको पत्रमें नहीं लिया जा सकता, परन्त समाकी धाराके पीका फुल दर्शन हुना है, और यदि कमी मसगसाके साथ भापका ससंग मिग तो पा वतिम परिपूर्ण प्रकाश कर सकता है, क्योंकि उसे प्राप सब प्रकारसे मान लिया है और यही उसके दर्शनका मार्ग है । इस उपावियोगमें मगवान् इस दर्शनको नहीं होने देंगे, इस प्रकार में मुझे प्रेरित किया करते है अतएव जिस समय एकातबाप्ती हो सकेंगे उस समय पान मूछकर भगवान्का रक्सा इमा परदा पोही प्रपानसे हरायगा । बिसको सत्का साक्षा- १७१ वई, माप सुदी ११ गुरु १९१७ सत्को अमेवमावसे नमोममा दूसरी सब प्रापियोंकी अपेक्षा गीतको योग्यता प्राप्त हो, ऐसा मबार करना योग्य और उसका मुप्प सापन सब प्रकारके काम-मोगसे मेरमयसहित ससंग। समसग (समाम बपबारे पुरुषोंका-समगुणी पुरुपोका योग) कार हो गया है ऐसे पुस्पके बचोका अनुशासन करना चाहिये, और उसमें से योग्य काम बानेपर सत्को मास होती है। बाल वपनी कम्पमासे किसी मी प्रकारसे सत्को प्रास नहीं कर सकता । सनीषन मूर्ति प्राम होनेपर हो सत् प्राप्त होता है, सत् समसमें माता रे सदका मार्ग मिल्वा, पौर सत्पर व्य पाता है। समापन मूर्तिक ष्यक विना नो मी मुग किया जाता है, पर सब बीचको बधम ht, पही हमारा हार्दिक अमिमत है। पर काम मुठभावित प्राप्त होनमें विनत्य है, सिर मी इमे का की भपेशा वमी उसका विषमपना बहुत कुछ कम है ऐसे समयमें जिससे वश्यना भार अपना प्राप्त होता है ऐसे मापारूसम्यगारमें उदासान होना ही पस्कर है सत्का मार्ग तो कही मी माई नहीं देता। तुम सबको बाजकर बो कोई मैननिय पुस्तकें पानेका परिषय रहता हो, उसमेंसे निस मागमे गत्य विशेष वर्णम किया हो उस मागके पनेका मन फम करना; तथा गायने क्या नहीं पा, और उसे जा पा करना चाहिये, इस भागफे परमेका भार नपारनेका शिव मन रखमा ।
भीम पराबाद [पर १०२, १४ गो कोई दूसरे मी हपारे सहलासी (बालक बारि) धर्मकिपाके नामसे क्रिया करते हों, उसका निपेष मही करना। जिसने हमें उपाधिस्प इन्ठा साकार को ऐसे उस पुरुपको भी सिौ प्रकारसे प्रगट न करना । ऐसी पर्ममा किसी र गिजासुस हो पोई शदोंमें करना (ममी पदि यात्म रस्ता हो तो) बिससे उसका स्त्र मार्गको और मरे। पाको हसमें तो तुम सब अपनी समसतारे निये ही मिथ्या धर्म-वासनाओंका, विषम मादिकी प्रियताका, और प्रतिबका त्याग करना सीखो। कुछ प्रिय करने पोप है, तो बोक्ने कमी मही माना, बार बाकी दुक मी प्रिय करने पोप है नहीं, यह हमारा सिपाहै। पोम्पता के लिये प्रमचर्प महान् साधन है, और जमसंग महान् मिस है। १७२ मई, माप पुणे ११ गुरु १९४७ उपाधि-पोगके कारण परि शमाचम न हो साता का नमी उसे सने देना, पर उपानिस निस्प पोप मी काय कर मिससे पिचि स्थिर , ऐसी निापि बैटमेकी गाव वासकता है, वीर उपाधिमें मौ मालिक सस रसमेका म्पान रमना । नितना मापुन समप है उस संपूर्ण समयको परिभाष उपाधियोंमें म्गाये रस्तो मनुष्यत्वका सरह होना कैसे समय हो सकता है। मनुप्पत्वको समस्या के रिसे हो जाना कम्पा- कारक है, ऐसा निमय करना चाहिये | तपा उस समताके लिये बिन लिन साधम प्राति रमा पम्प में प्राप्त करनेके म्मेि निस्य निति प्राप्त करनी चाहिये । नितिका सम्पास किये बिना बाकी प्रापि दूर नहीं हो सकती, यह एक ऐसी बात है जो प्रत्यय समहमें ना जाता है। गौनका बंधन धर्मक रूपमे मिथ्या पासनामोंके सेवन करनेसे मास महापाको रखने हुए ऐसी मिग्मा गासनाएं किस तरा दूर हो सका चार करनेच प्रमान पार रहना। १७३ बई, माप पुदी १९९० बचनापती १ गोल अपने बापको मा गया है, और इसी कारण उसका समससे लिपोग हुवा है, ऐम मोमें माना है। २ बाम मिनेसे हो मपने बापो भूम्मानरूपी मालन नाश होता है, ऐसा सदा रहित मानना । ३ उस पानको प्राधि पानीके पाससे होनी चाहिये। पर सामरिकरूपसे समसमें भानेवाला बात है तो भी बोर मेलामा नादि कारणास मामाका मात्रय मही मेहता, यही बनवलपी कपापा । दोबानको प्राप्तिधाइम करता है उसे नौको मनुसR पम्मा चाहिये ऐप दिमागम मारिसमी शाल प्रते।बनी इसे बने हुए मीत वनाविकासे मटक या है।
पर १७१चनावमे] विपिन पत्र मादि सपा-सपाव । ५ पबतक प्रत्यक्षा-मामाको अनुसार, अर्थात् उसकी माहानुसार नहीं चला गाप, तक- व यामकी निवाति होना समय नहीं । ६ बानीकी बाजाका वाराधन नही कर सकता है बोएफनिग्रसे तन, मन, धमकी वासपिका स्याग करके उसकी मफिमें गे। ७ यबपि बानी लोग भक्तिकी इच्छा नहीं करते, परन्तु उसको किये बिना मोक्षामिष्ठापाको उपदेश नाही रुगता, तपा यह उपदेश मनन भौर मिनिप्यासन आदिका रे नहीं होता, इसलिये मुमनु मोको जानीकी भक्ति मनस्य करना चाहिये, ऐसा सपुरूषोंने कहा है। ८ उपमदेवजीमे मफ्ने वान पुत्रोको शाप्रसे शौम मोझ चानेका यही मार्ग बताया था। ९ परीक्षित रामाको शुकदेवगीने पही उपदेश किया है। १. यदि चीव अनन्त कास्तक मी अपनी इच्छानुसार परकर परिश्रम करता येतो भी यह जमे बापसे बात नहीं प्राप्त कर पाता, परन्तु शामौकी नाका नाराषक बन्तमम मी केवल- शाम पा सकता है। ११ शाब कही ई भाषा परोक्ष है, और ये बीतको अधिकारी होनेके लिये ही कही गई है, मोपप्रासिके लिये तो बानाकी प्रत्यक्ष पाशाका बाराषन होना चाहिये। चाहे जैसे विकट मार्गस मी यदि परमात्मामें परमस्नेह होता हो तो मी उसे करना हो पोग्प है। सरस मार्ग मिटनेपर उपाभिके कारणसे तन्मय मक्कि महीं पता, मोर एकससा स्मेल नही उमराता, इस कारण से हा करता है, और बारम्बार पनवासको इच्छा गुला करती है। पपपि पैगम्य तो ऐसा है कि प्राय र मौर मनमें नास्माको कोई भी मेद नही स्गता, परम्तु उपाधि प्रगा- के कारण उसमें उपयोग रसनेकी बारमार बहरत हा करती है, मिस्से कि उस समय परम स्नेहपर वावरण पाना पाता है, और ऐसे परम स्नेह मौर ममम्प प्रेममालिके वाये बिमा रयाग करमेका डा मही होती। पदि काचित् सा वारमाजोंकी ऐसी हो इस हो तो फैसी मी दीनतासे उस इमको निार करना, किन्तु प्रेममतिकी पूर्ण रुप मापे मिना देवस्याग नहीं किया जा सकता, और बारमार यही रटन एनेसे हमेशा यही मन यतालिबममें गाय' मनमें आप 'पदि वारका निर तर एसा गा करे तो हमें परमी बनबास ही है। भीमदभागवतगोपांगमात्र मुदर भास्पापिका दी है, और उनको प्रेममक्षिका वर्णन किया है। ऐसी प्रेममकि इस कठिकारमें प्राप्त होना कठिन है, पपपि यह सामान्य रूपन, तपापि कठिकारमें निश्चय मतिसे यही रटम पोहे तो परमा मा अनुपम करके शाप ही पद महिं प्रदान करता है। यह दशा बारम्बार यार माता है। मोर ऐसा उग्मत्पमा परमामाको पानेका परमधरी, पही या विषयी। भरतमा हरिणके मासे मन्म दिईपी, और उससे गहमरतके मरमें बसग होम .
२१५ प्रीम पावन्द्र [ फा .., १८, ११ बगत् मा, माँ मापापूर्वक ही परमामाका दर्शन , कुल चार पग रसने पैसा भगता है। इसी किम हम वसगवाकी इस करते है, अपना पापले सगको इन्म करते है, या योम्प हो। बम्बई, माष बी १५ मि १९१० गार परिचयके लिये बापने कुछ नहीं लिया, सो । पारमपिक विषयमें एमें मौन पने कारण परमामाको । पर हम मसंग में होंगे, और उसके बाद उसकी मा म हागी, सतक हम प्रगट रीतिसे मार्गोपदेशन करेंगे। पौर सब मामाजोन ऐसा ही Rबान है। हम तो केस दान है। मागक्तबाली बात हमने बाम- हानसे बानी है। १७८ बम्बई, माप १५ ीि १९९० वापको मेरे प्रति परम उठास होता है, और उस लिपपमें वाप बारम्बर प्रसमवा प्रगर करते है त इमारी प्रसमता जमात अपने ऊपर मां होती, क्योंकि जैसी पाहिपे मैसी संग- दयासे नाही या बाता दौर मिथ्या प्रतिवषम पास गया है। यपि फ्रमापके लिये परिपूर्ण इम है परन्तु बमी उसमें मातक सिरेमको सम्मति माह तक मेरे पियमें मन ही मनमें समय और चाहे से दूसरे मुमशुओं को मौ मेरा नाम लेकर इस न करना । ममी में हमें ऐसी दशासेयना प्रिय है। १७९ बम्बई, माघ वदी १३, १९१७ यपि किसी मी क्रिया मग नहीं किया जाता तो मी उमने सा गता, सका कोई कारण होना चाहिये, उस कारणको दूर करना यह कम्पामरूप है। परिणाममें 'सत् ' को प्रात मानेगा और प्रारममें सत् 'कोरेगमूत ऐसी समझो मनको प्रतमता देनेपाम रम्प-कपाका प्रमग पाकर उनके साप परिचय करेंगे, उनके समागमसे भी कम्पाण होपविगत ऐगा परिय कारण मी र ो गापगा। मिसमें प्रपिषी नारिका विस्तारसे विचार किया है, एसे मनमोकी मपेक्षा किया मैसे पचन रम्मी पति करते हैं, और उसमें दूसरे मतबाहे प्राणांको मी बापि नहीं होती। मो सापु सारा मनुकरण करते हों, उने समय सम्पपर काते यना "पर्म हसाको बाबा सकता है मोधर्म रोकर परिणमे पान उसीको बाबा सकता है कि गोशान कर परिणमे; परि म मेरे पहनेका हेतु म समतो हम वो सब पा और पाचन इत्यादि परवे १, रे मिथ्या है, जो में एमसे कुछ करना चाहता | काकर उने पर प्रना चाहिए कि ए गो पुस म करते हैं उसमें से ऐसी बात माकी य माती किस्से पर्म और जाल में अपने अपने में माही परिजमाने. तण पाप मोर स प्रकार पा १८ विविध पब मावि समा-२५वाब ૨૬ - . नप्पारन (सदर) मद नहीं ऐते, इसरिये हमें नौसके कम्पाणका पुन पुन विचार करना चाहिये और उसका विचार करनेफर हम कुन म कुछ फल पाये बिना म रहेंगे । हम छोग सब कुछ पानमेका जो प्रयान करते हैं, परन्तु हमारा ‘सदेशसे दूर हो, यह जाननेका पयन महीं करते। और जबतक ऐसा न करेंगे तबतक सन्देह कैसे जा सकता है, और चबतक सदेह है, तक्सफ न मी महा ऐ सकता, इसलिये सन्देह टानका प्रफन करना चाहिये । र सदेह यह कि पीय मम्प है या अमम्य ! मिप्याटि पा सम्पति! मासानासे पोध पानेवागोपा कठिनतासे रोप पानेवाला निकर ससाई या मधिक संसारी! बिससे हमें पे सब बातें माश्म हो सके रेसा मयन करना चाहिये । इस प्रकारको बान-कपाका उनसे प्रसग रखना योग्य है। परमापके उपर प्रीति होनेमें ससंग ही सर्वोत्कार मौर अनुपम साधम है, परन्तु इस काम पैसा सयोग मिलना बहुत ही कटिन है, इसलिये गीतको इस विकटतामें एकर पार पानेमें निकट पुरुषार्य करना योग्य है और पाया कि "अनादिकारसे मितमा नाना है उतना सबका सब माम है; उस सबका विस्मरण करना चाहिये ।" 'सत्' सत् हो, सरक, वौर सुगम है, उसकी सर्वत्र प्राप्ति ऐ सकती है परन्तु 'सत्को' बतानेपाथ कोई सत् ' बाहिये । मय वमत हैं। प्रत्येक पशम बनन्त गुम-धर्म-, उनमें बनत नय परिणमते हैं। इसलिये एक बपका दो बार नोंारा बस्तुका सम्पूर्ण वर्णन कर देना समा नहीं है। इसलिये नप बादिमें समवानाम हो गना चाहिये । शानियों को वाणी 'मय ' में उदासीन यती, उस बामाको नमस्कार हो। बर्मा, माघ पदी ११, १९५७ मयममम्त प्रत्येक पदार्थ बनात गुणोंसे, मौर बनम्त भोस पुज है। एक एक गुण और एक एक धर्ममें भनत मयों का परिणमन होता रावा सहिये इस मार्गस पदार्पका निर्णय करना पार तो नहीं हो सकता, इसका कोई सराही मार्ग होना पारिये बात करके इस बातको पानी पुरुप ही जानते हैं। और ये मय मादि मार्गके प्रति उदासीन गते हैं इससे किसी मयका एकांत खान मी मही पता, और न किसी मयका एकान्त मान ही होता है। नितनी मिसकी योग्यता है वस नयको उतनी सताशाली पुरुषों को मान्यता है। गिने मार्ग प्रात मही दमा ऐसे ममुम्प 'नयका पास करते है और उससे मिपम फलका प्राप्ति होती है। यहाँ किसा मी मपका विरोध नही होता ऐसे शानियोंकि सपनोंको म ममस्कार करते हैं। विसको कानोके मार्गको इणा हो ऐसे प्राणीको तो मय बादिमें उदासीन एनेका हो अम्पास करना चाहिये किसी मी नयमें बात नहीं करना चाहिये और किसी भी प्राणीको इस मार्गसे कर न देना चाहिये और मिसन पर मामार हो गया है, पर किसी भी तरसे प्राणियों को परेश पांचानेकी ठिा मही करवा ।
[rter भीमद् बन्द ये पे । इसी कारणसे मुझे मी मसगता यात पाद माती, मोर कमी कमी तो ऐसा हो जाता है कि वसगताके बिना परम दुसहोता है। नसमासे प्राप्पोको गितमा यम इमदायक नहीं लगता उससे भी अधिक हमें संग दु सापक माता है। ऐसा माक्सी बतियों है जो एक ही प्रकारको है, भो किसी भी नहीं जाती, भोर करें कि बिना पुप मी रहा नही पाता, गौर वापका वियोग सदा समता पता है। कोई मुगम उपाय भी नहीं मिम्सा | उदयकर्म भोगते हुए दीमत्ता करना वस्ति महो। भविष्य के एक क्षणी मी भिन्ता नही है। सत् सत् और सदके साधन सथप माप यहाँ है । वधिक स्पा करें। विरकी इस ऐसी ही है, और उसे प्रसमा रमसे बिना छुटकारा मही नहीं तो ऐसी उपाधियुत दशामें न यें और मनमाना करें । परम..... के परण प्रेममधिमप ही में, परन्तु प्रारम्ब कर्म प्रह। । १७४ सम्बई, माघ वदो १, १९९० सर्वथा निर्विकार रोनपर भी परमभ मेममय परामक्तिक पपरे, पा यम पिला, मिसन हदपमें इस पावका मनुमय किया है, ऐसे मानिकी यहाँ परमानन्द है। मरगति होनेसे समुदायमें बना पात टिम माझ्म होता है । सिका पपार्य मानन्द किसी भी प्रकारसे महकमा या सकता, ऐसा सस्वकप जिसके एपमें प्रकाशित एमा है, ऐसे महामाम्य हानियोंकी वीर बापको हमारे उपर समाये हम तो भापको चरणम । और दोनों का में निरंजनरेमसे ही प्रार्पना कि ऐसा ही प्रेम बना ये। भाग प्रमालो निरजमदेवका कई भात मनपा प्रकाशित हमारे । माग गत हिनते इम्ति परामलि किसी अनुपमलपमें उदित हुई। श्रीभागवतमें एक कपा है कि गोपियों भगवान पासुदेव (रणद) माखनकी मटकी रसकर बेचने के लिये निको पारद प्रसंग बाग पार पा पाया है। यहाँ भगत प्रवाहित होता है, हो सकर-कमल है, और यही पर मम्सनका मठको । और नो पारिपरम उसमें निराममान है, ने 10 यहाँ मावान् वासुदेव हैं। सत्पमका विपिनमा गोपाको उसकी प्राप्ति होनेपर बा गोपी उसमें वाकर सौ मला मुमसु मामाभास प्रतीकि कोई मानपगे, रिको मापन कार्यात् पासिकाती कि भारिपुरुपको प्रानि हो गई है, और बस पर एक ही प्राप्त करने के योम्य है, इसराइम मी प्राप्त करनेके योग्य नाही इसपि तुम इस मास करे। उसमें प फिर फिर करती जाती है कि म उस पुराणपुरुषको प्रस को और पति उस प्रातिपणा वर प्रेम्से करते हो तो हम तुरे इस मारिपुसको दे दे हम इसे मापा रखकर बेचने निकली है, गोप मा रेकर का कोई प्राहक बनो, नवर प्रेमसे मारक बनो, तो हम बामदेवकी प्राप्ति करें। मटकी में रखकर बनेको निकम्मेका गा भाशप पार कि हमें समय-समय पारेर भगवान् मिड गपे । मनन वन नाममात्र पनि समस्त सुरिको मथकर मासन म त एक अमृतरूपा मारेगमगान् हो मिकामते है। इस कपाता का सूक्ष्म सह पिविष पत्र मादि समा-सा पर्प २६३ . यहाँ है, किन्तु उसको स्पूस बनाकर, म्यासनाने उसे इस रूपसे वर्णन किया है, और उसके द्वारा अपनी बहुत मक्किा परिचय दिया है । इस क्पाका बौर समस्त भागवतका बर मयर केवल इस एफको प्राप्त करम के नरेशसे भरा पड़ा , और पह (हमें ) पात समय पागे समसमें वा गया है। मान बहुत ही म्पादा स्मरणमें है, क्योंकि साक्षात् वनुमनकी प्राप्ति हुई है, और इस कारण वानकी दशा परम पहत है । ऐसी दशासे नाव उमत्त हुए बिना न रोगा। तया वासुदेवारि मान बूझकर कुछ समपके छिये बन्सर्वान मी हो मामेवारे प्रक्षणों के धारक है, इसीलिये हम मसगता घाइते है। और वापका सास भी बसगता ही है, इस कारण मी का हमें विशेप प्रिय है। यहाँ सस्सगकी कमी है, और विकर स्थानमें निवास है। हरिदच्छापूर्वक ही घूमने फिरनेकी पि रमसा है, इसके कारण स्पपि कोई से तो नहीं परन्तु मेरका प्रकाश नहीं किया जा सकता यही पिता निरन्तर या करती बनेक वनेक प्रकारसे ममन रमेपर हमें यही निययावा कि मति ही सोपरि मार्ग है पौर या ऐसी अनुपम बस्तु है कि यदि उसे सम्पुरुपके चरणों के समीप यकर की माप तो पा क्षणमरमें मोक्ष दे सकता है। विशेष छ सिन्हा नहीं नाता; परमानन्द है, परन्तु बरसग है, अर्थात् सरसग नही है। (२) किसी सरसके मोक्ताको कोई विरछा योगी ही बानता है। । १७५ बर्थ, माघ यदी ३, १९९७ भी हुई बचनावळीमें भापकी प्रसमता होनेसे हमारी प्रस्मताको उपेगमा मिला। इसमें सतका प्रमुख मार्ग प्रकाशित किया गया है। यदि का एक ही पिसे इन बायोका मायधन करेगा, और उसी पुरपका माझा हान देगा तो भनन्तकारसे प्राप्त हुआ परिभ्रमण मिट नापगा। उसे मायाका विशेष मोह है, और यही माकि मिथ्नमें महान् प्रविषष माना गया है, इस- पिपे मेरी उससे ऐसा रियोंको धीरे धीरे कम करनेकी प्रार्थना है। १७६ बर्मा, मान दी ११ शुक्र १९९७ तत्र को मोह का शोका एकस्वमनुपश्यता यो सर्वत्र एकर (परमात्मस्वरूप) को ही देखता है, उसे मोह मा भार सोक क्या ! पशि वास्तविक मुस जगत्की मिमें वाया रोता तो पानी पुरुषोंसे निपत किया एला मोक्ष स्पान सशक नहीं होगा परन्तु यह जगत् ॥ मोझ स्पान होता । पमपि या मात सत्पएकबालीको तो सर्वत्र ही मोक्ष है। फिर मी उस हानाको पा मई महा मोपी बेईमना मेपी। गाने कोई पाहा मोपी को सरहना मेोगी।
श्रीमद् परचन्द्र [पक्ष १७, १८, १.५ गत् मी, नयाँ मामानक ही परमात्माका दम है, चारकर पग रसने जैसा भगता है, सौ. से हम पसगवाकी या करो है, मपया आपके सगकी इशा करते हैं, यह पोम्प है। बम्बई, माप बदी १२ वि १९४७ गार परिचयके लिये वापने कुछ मह मिसा, सो लिसे। पारमाधिक विषयमें हममें मौन एने कारण परमामाको एम। अबतक हम बसग म गे, वौर उसके बाद उसर्व इच्छा न हागा, तबतक हम प्रगट रीतिसे मार्गोपदेश म करेंगे। और सब मामाजोंका ऐसा स्पिाम , हम तो केवल दीन । मागमतवासी बात हमने बाम पानसे जाना है। बर्ष, माष बदौ १३ १९१७ मापको मेरे प्रति परम उग्राम होता है, और उस विपपमें बार बारम्बार प्रस्मता प्रगठ रखे है। परन्तु हमारी प्रसस्ता बावक अपने उपर महीं होती, क्योंकि पेसी चाहिये पैसा बसग- दशा मही या गावा बीर मिम्मा प्रतिष बास गता। पति परमापक लिये परिपूर्ण इम है, परन्तु ममी उसमें सक्तक रेपाको सम्मति महोई तक मेरे विषयमें मन ही मनमें सपत रहना; बार परे से दूसरे मुमामोंका भी मेरा नाम लेकर कुछ म कामा । वमी हाम्मे हमें ऐसी प्यासे दी बना प्रिय है। - १७९ बाई, मात्र यही १५ १९९० पपति किसी भी क्रियाका मग नही किया जाता तो मी उनको पैसा ध्यता है, इसका कोई पारण होना चाहिये, उस परणको दूर करना परमपाणम्म है। परिणाममें 'सत् को प्राप्त करानेवाली भोर प्रारममें सत् ' की हेतुभूत ऐसी तमको रविको प्रास्ता देनेवा राम्प-कपाका प्रसंग पाकर उनके साथ परिचय करोगे, तो उनके समागमसे भी कम्पाण विगत होगा, बार पहिस्स कारण मी दूर हो जायगा । निसमें पृथिवी माविका विस्तारसे AIR किया है, पसे बचोकी नशा तासिक 'अप्परम स पपन भैरसपान परते, बार उस्में दूसरे मतवाले प्राणीको मा बाप महा होती। यो साधु समाप वनुकरण करते उन्हें समय समयपर पते एना कि "म उसीको या जा सकता है या नर्म होकर परिगमे पान उसीको बहाना सकता है कि मान र परिणमा पदि तुम मरेपरनेच पातु न समझो के हम जो सब रिपामें और पाचन पादिर , मिथ्या है, तो में तुम पुए पाना चाहता । प्रकर उन्हें यह करना चाहिए कि यह गे कुछ हम करते है, उसमें कोई ऐसी बात माको प गती जिसमें धर्म भारत में मन नपभे रूपमें नहीं परिजमाते, तपा काय बोर । इस प्रकार पर १८ ] पिपिप पत्र मादि प्रह-२४ा पर्व मध्यान (सर)मद नहीं होते। इसरिये हमें नौरके कायाणका पुन पुन विचार करना चाहिये और उसका विचार करनेपर हम कुउ म कुछ फस पाये बिना म रेंगे। हम लोग सब कुछ जाननेका तो प्रयत्न करते हैं, परन्तु हमारा ‘सदह' कैसे दूर हो, यह जाननेका प्रयत्न नहीं करते । भीर ययनक ऐसा न करेंगे तबता सन्देह कैसे जा सकता है, और जबतक देह , मतक मान भी नहीं हो सकता, इसलिये सन्देह हटानेका प्रयत्म करना चाहिये । पसर यह है कि जीब भम्य है या बमम्प ! मिष्यामि या सम्पग्राहिवासानासे बोध पानेपाला या कटिनतासे बोध पानेमाला निफर संसारी या अधिक संसारी' मिससे हमें ये सम बातें मादम हो सके ऐसा मपरन फरना चाहिये । इस प्रकारको मान-कपाका उमसे प्रसग रसना योग्य है। परमार्यके उपर प्रीति होनेमें मसग ही सोतर वीर अनुपम सापन है, परन्तु इस कासमें पैसा सयोग मिझना बहुत ही कठिन है इसलिये चीनको इस विकटतामें यकर पार पानेमें विकट पुरुषार्थ करना योग्य है और पर या कि "अनादिकासे नितना जाना है उतना सबका सब वाम हो, उस सबका पिम्मरण करना चाहिये ।" सत् ' सत् हो, सरम है, और पुगम है, उसकी संत्र प्राप्ति हो सकती है। परन्तु 'सत्को' बतानवाला कोई 'सत्' पाहिये । नप वर्मत है। प्रत्येक पामें जमम्त गुण-धर्म- उनमें अनंत मप परिणमते है। इसलिये एक भपका दो भार नपर्पोरा वस्तुका सम्पूर्ण वर्णन कर देना समय नहीं है। इसलिये नप मामि समतावान होना चाहिये । शानियोंकी वाणी मप ' में उदासीन यता उस पाणीको नमस्कार हो। । गई, माप बी १५, २०१७ मय जनम्त है। प्रत्येक पदार्प बनम्त गुणोंसे, बोर भनन्त पसि युट है। पक एक गुण और एक एक पर्ममें अनत मोका परिणमन होगा पता है, इसलिये इस मास पार्पका निर्णय करना चाहें तो नही से सस्ता, इसका कोई सय दो मार्ग होना चाहिये गात करके इस गानको प्रानी पुरप हो जानते है और वे मय बारमार्गके प्रति उदासीन पत है इसमे तिमी मयका एक गान भी नही होता, और न म्सिी मपफा एकान्त मणान दी होता है । मितमी जिसकी योग्यता है उस मपकी उतनी सजा पानी पुस्यको मान्य होतीबि मार्ग प्राम नही हुमा ऐसे मनुष्य 'मप' का भामद करते है और उसमे शिपम फल प्रामि होती है। यहाँ किसा मी भपका रोष मदीना ऐसे निपोछे सपनोंको हम नमस्कार करते हैं । निमको बानाक मार्गी या दामे प्रागारोतो मय मामि ससान पनेका होमम्पास करना चादिप; किमी मी मपमें भाप्रद नही करना चाहिये। गौर क्लिी भी प्रागीको इस मास कर नना चाहिए; भोर निमग्र पद मामय दूर गपात, पर पिणी मी तपसे प्रातिपोश पचाने नहीं करना ।
भीमद् पयवाद [पा १८१, १८१ (२) मामा प्रकार के मय, माना प्रकार के प्रमाण, मामा प्रकारके भगवास, और नाना प्रकार के अनुपोग ये सब क्षणाम्प होतोय एक समिधानन्द है। - १८१ ब, माघ वदी १५, १९१० 'सत् 'कुछ दूर नहीं है, परन्तु र गता है और यही मानका मोह है। 'सत्' को छ है, 'सत् ही पसरत है, मुगम है; और उसकी सत्र प्राप्ति हो सकता है। परन्तु निसचे तिरूप बावरण-तम अश्या हमारे उस प्राणाको उसकी प्राप्ति कैसे हो सकती है। करके पार कितने भी भेट स्पो न करें किन्तु उनमें कोई ऐसा भेद नही पा सकता जो उमाका हो । निसे मावरण-तिमि म्पत है ऐसे प्राणीको फरफ्नामें कोई मी कम्पना 'सत् ' माझम मही होती और पर प्राणी ' सत् ' के पासतक भी जा सके यह समय महा।गो 'सत्' र भावि ही है, मस्तिसे सर्वमा म्पतिरिक्त (जुरा), कम्पनासे 'पर' (पूर ) है इसलिये सिने उसको प्राप्त करने म निषय किया । उसे यह स्वप कुछ भी नहीं पामता, ऐसा पहिले सनथप पुच्च विचार करना चाहिये, वौर पादमें सत्'की प्राप्तिके रपे हानीको शरणमें गाना चाहिये। ऐसा करनेसे काश्य मार्गको प्राति पवी ये नो पचन सिसे है, रे सा मुमुक्षयों को परमभन्मुफे समान , परमरक्षकके समान है, और उमें सम्यक् प्रकारसे विचार करनेपर ये परमपरको देनेवाले हैं। इनमें निर्णय प्राचनको समस्त गी, पदर्शनका सर्वोत्तम तस, और बानाके उपदेशका बीच स्पेपसे कर दिया है। इस मिसे गिर फिरसे उनकी संभाल करना रिचारना, समझना समधनका प्रयत्न करना इनका बाना पाँचानेपासे दूसरे प्रकारोंसे उम्सन गना) पौर महीमें विधव्य करना, हमें और न किसी भी मुमुक्षुको गुस्त रीतिसे नानेका हमारा यही एक मंत्र है। इसमें 'सत्' ही का है, पर समझने के छिपे नचिकसे बनिक समप गप भगामा। - १८२ बर्मा माष परी १६, १९९७ सत्स्वरूपको भभेदमापसे ममोममा स्पा किसे! र तो पुछ समता मी नहीं क्योंकि दशा दीदी यती । फिर भी प्रसंग पाकर कोई मावि मेवाली पुस्तक होगी तो मेगा। हमारे उपर तुमा पार सौ मी भठि क्यों न हो तो मी मायके सब चालाक और विष परके धर्म-गांवो तो हम तीनो काममें दस में तो समोइतना करना चाहिये कि पुराना मेरे बिमा तो समय ही नही बौर पर मेडने मोरपरा, या माना स करना । मार्ग सर। पर मावि दम है।
२४७ . पत्र १८१] पिषिप पत्र मादि संप्रह-२४याँ पप १८३ बम्बई, माष बदी १९१७ सतको नमोनम फाम' शम्य शा वर्षात् इशा, वीर पवेन्द्रियों के विपयोंके अर्थ में प्रयुक्त होता है। अनन्य' वर्षात् निसके समान कोई दूसरा न हो वर्यात् सर्वोकृछ । 'अनन्यमधिमाल' अर्थात् निसके समान कोई दूसरा नहीं ऐसा मन्तिपूर्वक उत्तपमात्र । निस्के पचन यम्से जीव निर्वाण-मार्गको पाता है, ऐसी समापन मूर्तिका याग यपि जीवको पूर्णकादमें मनेक पार हो जुफा है, परम्तु उसकी पहिचान नहीं हुई। चीवने पहिचान करमेका प्रसन्न शायद क्रिया मी होगा, सपापि भीतको ए पो रसनेवाली सिदि-योग वारि, अपि-योग बार एव इसी तहकी दूसरी कामनाजोंसे उसकी सुदको इणि मलिन थी, वार यदि दृष्टि मलिन हो तो उससे समर्तिके प्रति य म मगकर यह क्ष वन्य वस्तुओंमें ही पता है, जिससे परिचान नहीं हो पासी, भौर नग पहिचान होती है तब जीवको कोई अपूर्व ही स्नेह पैदा हो जाता है, और यह ऐसा कि उस मर्तिके वियोगमें उसे एक पामर भायु मोगमा भी मिरम्मना माट्म होती है, अर्यात उसके वियोगमें वह उदासीन मानसे उसीमें इति रसकर नीता है और इसे दूसरे पदार्थोका संपोग और मृत्यु पे दोनों समाम हो पाते हैं । अब ऐसी दशा वा माती है, तब चीत्र मार्गक बहुत ही निकट पा जाता है, ऐसा समझना चाहिये । ऐसी दशा बानेमें मायाको सगति पात हो विनम्प है। परतु इसी दशाको पानेका मिसका पनि थप है उसे प्राय करके थोरे । समयमें यह दशा प्राप्त हो जाती है। तुम सब लोग हासमें तो हमें एक प्रकारका बघन करने लगे हो, उसके लिये हम क्या करें; पर कुछ भी नहीं सूसता । 'सजीवन मूर्ति से मार्ग मिल सकता है, ऐसा उपदेश करते हुए हमने स्क्य वपमे पापको ही बघनमें राठ किया है, और इस उपदेशका वर्ष तुमने हमारे उपर गाना शुरु कर दिया । हम तो सभीवन मूर्ति के बिछ दास है, उनकी मात्र घरणम। हमारी ऐसी वर्ग किक दशा मी कहा कि मिस दशाम फेरस वसगता ही गती हो! हमारा उपाधियोग तो मैसा तुम प्रत्यक्ष देसवे पैसा हो। पे दो मन्तको पातें मैंने तुम मम लिपे किसी 1 बिससे हमको बब कम बंधन हो, ऐसा करनेकी सपसे प्रार्थना है। दूसरी बात एक यह भी कहना है कि तुम मेग हमारे विषयमें ना किसीसे कुछ मी न पहना । उदयकास तुम मानते हो। मुमा २० योगमार्गक बच्छे परिबपी है, इतमा ही मानता , पोम्प गीत । जिस करके साधारकारके पिपमें तुमने मोह उन्हें बीतक साम्राकार नहीं गुजारे। कुछ दिम पहिसे उत्तर Pघामें विचरनेकी बात उनके मुससे सुमी पी, मितु इस अपयमें स समय कुछ मी नहीं मिला मा सकता । पपपि में में इतमा विश्वास दिला सकता है कि नोंने तुमें मिप्या महाँ कहा। - २.८ भीमद् पवन [mter मर्थ, फागुन पदो शनि १९. पुराणपुरुपको नमोनमः यह लेक शिविर वापसे माकुम म्याकुल है, और ऐसा दौमीकि गतृष्णा नकोनेके मि दौरदीप करके उसस अपनी तुपा बुधानेको साक्षरता परमानक कमप्प अपने सपने मूग या वीर इसके कारण उसे मरकर परिभ्रमण मास पूजा है। समय समयपर या काम मार भादि रोग, मरण वादि भय, मोर नियोग वादि साता बनुमच करवा यता है । एसी बसर रणताना इस जगत्को एक सत्यम्प ही घरण है। मपुरपका वाणाले बिना इसरा कोई मो इस ताप वीर रूपाको शान्त नहीं कर सकता, ऐसा निश्चय है। स्वपन फिर किरसे हम उस सपम्प पर गोत्र म्पान करते हैं। ससार सर्वपा मसातामय है। यदि किसी प्राणीको यो माप मी साता दौस पर कोय मी सपम्पमा ही अनुपा। किसी मी प्रकार के पुम्पके बिना साताकी प्राप्ति नहीं होती और उस पुष्पको भी सत्पुरपके उपथके बिना कोई मही पान पापा । पात काह पूर्व उपश किया जाना पुम्प भाग अमुक पोपीसी सीयोंमें मान मिया गया है। इस कारण ऐसा माइम होता है कि मानो पाप वादि आप प्रान पा है, परन्तु प्रस्तुत इसका मग एक सपाप है। बस हम तो पड़ी जानते है कि सताके एक से मेकर पूर्ण मानदतककी सप समाधियोंका मम एक सपुस्म। हना अधिक सामर्थ्य होनेपर भी निसको कोई भी सहानी, उन्मत्तता नी, मफ्नाम ही गर्व मी, गौरव या, ऐसे बाथर्पको प्रविमारूप सपुरपके मामको हम फिर किरसे स्मरण करते है। नियोकके माप पशमें होनेपर मी ने किसी ऐसी ही वटपटी दशा गते है कि जिस सामान मनपको पहिचान मौ होना तुम है, ऐसे सपुरपका हम फिर शिरसे स्तन करते हैं। एक समयके पेि मी सर्पपा वसंगपनेसे एना, पानिकको परा परमेको पेक्षा की अधिक कठिन काम है।मो निमें ऐसे बरमापनस यता , एस सपुरपके तकरणको रेकर हम उसे परम बापट नमन करते है। से परमामम् ! हम तो ऐसा ही मानते है कि इस कामें मी जोरको मोड़ सकता है। फिर मी जैसा दिन मपोंमें कहीं कही प्रतिपादन किया गया है कि इस काम मोक्ष नहीवा, सो इस प्रतिपारमको सबमें अपने पास ही रस और में मात्र देनेकी पेक्षा, हम सम्पुस्पो हो परणका मान और उसके समापमें ये, ऐसा योग प्रदान कर। हे पापपुण्य! हम तुममें गौर सपुस्प भी मेमही समझते देरी पेशा हमें तो स्पुरुष ही विशेष माम शेवा पोकि मी उसके बापाम पवाद और हम ससम्मको परिचाने बिना दो मही पहिचान सके देरी ही दुर्घटना में स्पुम्भके प्रति प्रेम गरम करती है। मोदिले गश परनेपर भी ये सम्मत न होवेवौर मे तुझसे भी बारिक सह सक्रिय मा जैसा कोसा करें। हे माष! दगुरा न मानना बसे मी म्पसमादी पिक सापन करते समस्त पर १८५ १८५ विविप पत्र मादि समा-सौ वर्ष भगत् तेरा ही स्तवन करता है, तो फिर हम मी तेरे ही सामने बैठे रंगे, फिर तसे स्तवनकी कहा पाहमा है, और उसमें तेरा अपमान मी कहाँ हुमा! (२)शानी पुरुष विकाकी बात बानमेपर मी उसे प्रगट नहीं करते, ऐसा गो मापने पूसा है, इसके सर्वपमें ऐसा माराम होता है कि ईपरीय इण्य हो ऐसी है कि किसी भी पारमार्थिक बातके सिमाप हानी भोग विकासवधी दूसरी बात प्रसिद्ध म करे, तया हालाकी मांतरिक का मी ऐसी ही मास होती है | मिसको किसी भी प्रकारकी याचना नहीं, ऐसे बानी पुरुषको कुरा कम्प माही या, इसलिये यो कुष्ट मी उदयमें आता है उतना ही ये करते हैं। हमें तो कही पैसा बान है मही, निस्से दोनों काल सब प्रकारसे जाने ना सके, और हमें ऐसे बानका कर विशेप मस भी नहीं है। हमें तो ऐसा नो वास्तविक स्सस्स है उसीको मति वीर मसगता प्रिय है, यही निवेदन है। समई, फागुम पदौ ५ रषि १९४७ वमेद दशाके वापे बिना यो प्राणी इस जगतकी रचमा देसमा चाहते है, इसमें फंस बाते। ऐसी दशा प्राप्त करनेके लिये उस प्राणीको इस रचनाके कारणमें प्रीति करनी चाहिये। भौर मपनी बोरूम भतिका परित्याग करना चाहिये । सब प्रकारसे इस रचनाके उपमोगको या पानी ही योग्य है और ऐसा होने के लिये मपुरुषके शरण सी एफ मी मौषधि नहीं । इस निधय पाको बिचारे मोरपि प्राणी मही जानते, इस कारण तीमा तापसे उनें जो देसकर परमकरुणा वाती है, और बरबस यह उद्गार मुंहसे निकल पाता है कि नाप ! तू मनपा करके रेपनी गतिमें मति प्रदान कर। उदयकासके भनुसार घरते है। पति पदाचित् मनोयोगके कारण र उत्पम हो गय तो पर दूसरी बात है, परन्तु में तो ऐसा माझ्म होता है कि इस बगदके प्रति हमारा परम उदासीन मात्र यता है। यदि यह सब सोने का भी हो जाय तो मी हम वो इसे वणवत् ही मानते हैं, र परमामाको निमूतिमें हमारी मलि केन्द्रित है। वाकित बी, फारम भरी ८१९१७ ये प्रश्न ऐसे पारमार्षिक है कि मुमा पुरुषको उनका परिचय करना चाहिये । हमारों पुस्त- कोंके पाठीको मी ऐसे प्रश्न मी उठो, ऐसा हम समझते हैं। उनमें भी प्रथम मंबरके प्रत (जगत्के सारूममें मवमतांतर क्यों है!) को तो पानी पुरुष अपना उसकी मायाका अनुसरण करनेपाछे हो टदित कर सकते है। यहाँ सतोपानक निति नहीं पती, सठिये ऐसी ज्ञानमार्ग सिनेमें परा बिसम्म करनेकी बरत होती है । अन्तिम प्रश्न मापने हमारे बमबासके विषयमें प्यार मा प्रम मी ऐसा है जो बानीकी बत्ति बामनेवाले पुरुपके सिवाय पायद किसी दूसरे के शराण जा सके।
[tter भीमा राजबन्द्र भापकी सर्वोत्तम प्रहाको हम ममस्कार करते है। कठिकाउमें यदि परमाप्रमाको किसी भविमान पुरुषके उपर प्रसम होना हो तो उनसे बाप मी एक है। हमें इस कामें भापका सहा मिष्म, और उसासे हम पारित है। - १८७ कई फागुन सुदी ११ १९९७ 'सत्' सत् ६, सरसो, गम है उसकी प्रति सर्वत्र होती है। सत्' है, उसे कामसे बाधा मही, प सबका वनिष्टान है, और यह बाणासे वाप। उसकी प्राप्ति होती है। वीर उसकी प्रासिका उपाय है। समी म्पदापों एष दयानोंके महामायाका क्ष एक 'सत्' हो । बाणीचय वकम्प होने के कारण उसे मूक-घेणीसे समझाया गया है, निससे उनके कपनमें कुछ मे मास होता है, स्ति बस्तुस' उसमें कोई मेद नहीं है। सब कामें मेकका स्वरूप एकसा मही यता) या क्षणक्षणमें बदस्ता यता है उसके ममेक नये नये रूप होते, अनेक स्पितियों पैदा होती है, वौर अमेक व्य होती जाती है एक भबके पहिसे गो रूप मानानसे मम म ऐता पाए सामने दिखाई देमे भगता है, तपा मगमरमें मात वा विस्तारमा रुम एप हो जाते हैं। मामाकेशानमें मेवाका मेकका स्वरूप मानापर अनुमा करने के लिये पुस दे रूपसे कहा जाता है, परस्त मिसकी सर्व कालमें एफसी स्पिति गहरी, ऐसा या रूप 'सत्' मही1, इस कारण उसे परे बिस रूपसे वर्णन करके उस समय भाति एक गई वौर इसके कारण यह नियम मीकि सर्वत्र यही सरूप होता। ऐसा समझमें जाता है। बाल-गीत वो उस स्वरूपको शामतम्प मानकर भातिमें पड़ जाते हैं परन्तु कोई पात्र नौप ही ऐसे विविधतापूर्ण कथनसे ग भाकर 'सत् की तरफ सकता है। रात करके सब मुमधुनोंने इसी तबसे मार्ग पाया है। इस नगरके बारम्बार भसिम्म पर्जन करनेका बो पुस्पोका एक पही उसो कि उस सस्मने विचार करनेसे प्राणी भाति पाते है कि वीर बस्न सकप पारे ! इस तय को मक प्रकारस कहा गया है, उसमें क्या मान! और मुझे कम्पाणथरक स्या है!' ऐसे विचार करते करते,सको एक भातिका हो लिफ्प मानकर, 'यहाँसे 'सत्' की प्राप्ति होती है ऐसे सतको सरम विना का नहीं, ऐसा समाकर मे उसको लोग करते हैं, और उसको शरणमें पार सद' पावे और सय स्वस्म हो गाते है। जनक विशो ससारमें बनेपर मी विदेही ५ सके, यह पचपि एक सा बाप और या महाठिम है। तथापि परम्मानमें ही जिसकी वात्मा तम्म्प हो गई। ऐसी मान्मप मामा मिस तबसे सती है उसी तर मी यता बारे नैसा कर्मका उदय क्मों न मा बाप फिर मौ उसको नुसार गमेमें बाबा मही पांचती । दिनको पेइतका मी मापना र हो गया है, ऐसे उस मा माम्पको देश मी मानो माममानसे होती थी, तो फिर उनकी दशा मेवधाम से रो सकती है। मारण महात्मा थे। वे बानी होनेपर मी उदयमासे सारमें ये पे, इतना तो मैन बसि पा २८८,१८१ ११ १९१]विविध पत्र मावि संप्रा-सवों वर्ष , भी जाना मा सकता है, मौर मह पयार्य ही है, तपापि उनी गतिक मधमें ना मेद बताया गया है, उसका पुल हुदा की कारण है। स्वर्ग, मरक आदिकी प्रवीतिका उपाय योग मार्ग है। उसमें मा बिनको दूरदेशी सिदि प्राम हाती है, पर उसकी प्रतिके लिये योग्य है । मह प्रतीति सर्वकाठमें प्राणियोंका दुर्लभ हो गती है। पान-मार्गमें इस विशेष बातका उष्टेस नहीं किया, परन्तु य म जबर । बितने स्थानमें मोक्ष बताई गई है सस्य है । फर्मस, भ्रांतिस, बयना मापासे इनका माम ही मोक्ष है। यही मोश्च शाम्दकी म्पाया है। बीब एक मी है, और अनेक मी है। १८८ मी, फागुन वदी १ गुरु १९१७ एक देखिये बानिये " इस दाईके रिफ्यमें वापने डिसा है । इस दारको इमन मापको निःशकताको पता होने के लिय नहीं मिला था परन्तु यह दोहा सामाविक तौरसे में प्रशस्त मगा इसलिये इसे बाफको सि मेगा था । ऐसी छौ तो गोपोगनागोंमें पौ । श्रीमदभागवतमें म्हारमा प्पासने वामदेव मगवान्के प्रति गोपियोंको प्रेम-मतिका वर्णन किया है, यह परम बामादक और पावरकारको। नारद-मक्किसूत्र मामका एक छोटासा शिक्षाशास मार्पि मारवनीका रचा एमा। उसमें प्रेम-मलिका सोए प्रतिपादन किया गया है। १८९ बर्मा, फाल्गुन की ८ दुष १९९४ माम भागवत परमभकिसम है। इसमें जो नौ वर्णन किया गया है या सम केवल माको एपित करने के लिये है। पर मुनिस सर्वम्यापक वषिष्टयान-भरमाक विषयमें म चाय तो उनसे समाप मुछ मी उचर नही मिल सकता और कपित उत्तरसे कार्य सिदि नहीं होती। वाको भ्योतिप वादिकी मी गाउमें इस नही करनी चाहिये क्योकियाकत्पिती और कम्पिकपर मारा कुछ मी सक्ष नहीं। बी, फागुन बदौ ८ पुष १९४७ परमात्माकी क्लासे परस्पर समागम काम हो ऐसी मग इम। यहाँ उपावियोग लोप पता है, तथापि समाविमें योगकी वप्रियता कमी न हो, एमा सिरका अनुम्द देगा, ऐसा माश्म होता है। बमा, पम्गुन को १० शनि १९४७ बान बन्मारके साप मारष पर मिठा । जन्मकुंलाके सबमें बमी उत्तर नही मिल भीम रामधन [पत्र १९१, ११ सकता । मक्तिविषयक प्रमोंका उत्तर प्रसग पाकर भिगा । हमने पापको विस स्वरपूर्ण पामें "वनिछन "के संबपमें लिखा था, ५ माफ्से में होनेपर ही समाप्त पा सकता है। "बपिछाम" वर्षात् मिससे बस अपम हो, रिसमें यह स्पिर थे, और जिप्स व म्स पाने | "जगत्का अधिमान" का वर्ष इसी म्पाख्याके वनुसार ही समझना। मैनानमें पतःपको सम्पापक नहीं पा है। इस विषयमें पाप यो कुरा मा में उसे कि। . ११२ बम्बई, मम्माम दी ११षि १९४७ मोतिषको कथित मानेका यही है कि यह पिय पारमार्थिक शानको अपेवासे कल्पित है और पारमार्पिक ही सत्य है, और उसी की ही स्टन गौ। हामें वरमे मेरे सिरपर उपाविका मोमा विशेष रस मला है, ऐसे करनेमें उसकी मको मसाप हो मानता। नैनप्रय इस कामो पचमकायके मामसे करते है, बौर परामर्मप इस सकामे मामसे तो इस पर इसको टिम ही कहा गया है। उसका सही शेख किस काम को 'सग बौर AN' का सपोग मिना बाति कठिन है वोर मामि इस कपको ऐसा उपनाम दिया गया है। हमें मी पंचम अपना करिग हाम्मे को बनुमा रे पारिमाप वित्त अतिशप निस्पूह है, और हम नगदमें समाह होकर या सम कहि- पुगकी हो पाई। १९३ मा मन पौष १५१५ समिमाने गग्वेि, पिसाते परमात्मनि । मा या मनी मावि, तम वा समापपा॥ मैं कर्चा I, मैं ममुम्म , मै सी, मैं (सी, स्पादि सपसे एनेबाम निसमा मिमान भए हो गया है या सिने सोचम पहप परमात्माको पान या है, उसका मन यो हा मी पाता है, उसको समामि है। कई बार मापके पिसाव पत्र मिकी है और ये पत्र पर पहिले वो मा समागम हो बनेकी रम होती । पामि कारणसे टस का किसी भी वयसे विस्मरण करना पाता है। सपा पर निस्तर उसिनेको रमतो दो मास मी मात करके पापा से पूर्ण हो पाती है । इसके यो बरण-एक तो है कि इस विषय मषिक मिने पोम्प प पायो बार इस कारण उपाभियोग उपाधियोगको अपेक्षा विमान दशा मण अधिक काम है।दशामात निदान और उसके कारण मन मप विपमें प्रवेश नहीं करता, और उसमें मो परमापर्क लिपपमें मिलने से तो केवल शूम्म पैसा छापा | इस विपमें रेड पर १९५] विषिष पत्र मादि समा-२४वा वर्ष २४३ शक्ति तो गात ही मधिक शूम्य हो गई है।हो, पाणी प्रसग पाकर मब भी कुछ कार्य कर सकती है, और उससे भाशा मताकि समागम होनेपर नहर ईघर कपा फरेंगे । पाणी मी नैसी परिने क्रमपूर्वक बात कर सकती थी, वैसी या नहीं मालम होती । मेसन शक्तिके शून्यता पाने वैसी हो बानेका एक कारण मा मी है कि चिचौ उदित ई बात बहुत नयाँसे पुक होती है, और ये सब नय सिसभेमें मही पा सकते, मिससे चिच मिरफ हो जाता है। वाफ्ने एक बार मक्तिके विषयमें प्रम किया पा। इस सपपमें अधिक बात तो समागम होनेपर हो सफती है, और यात करके व बाकि किये समागम ही ठीक माश्म होता है, तो मी पाप्त हो सक्षिप्त उत्तर लिखता है। परमामा गौर वास्माका एक रूप हो जाना (1) पर परामधिको अन्तिम बद है। एक ऐसी हो तछौमताका यना ही फ्यमकि। परम महात्मा गोपांगना मारमा नामदेवकी महिमें स्सी प्रकारसे छान सी पी । परमात्माको निरजन बौर निर्देशरूपसे वित्तमन करनेपर बायको ऐसी तालीनता प्राप्त करना मति कठिन है, इसलिये निसको परमात्माका साक्षात्कार एबा है, ऐसा धारी परमारमा उस परामक्षिका एकतम कारण है। उस बानी पुरपके सर्व परित्रमें ऐक्यभावका म्य नेसे उसके पदयमें विराजमान परमात्माका ऐक्पमाप होता है, और यही परामाको। हामी पुरुष पौर परमारमा बिकु मी मन्तर नहीं है, और जो कोई मन्तर मानता, उसे मार्गकी प्राप्ति होना नमन्त कठिन है।बानी वो परमात्मा ही और उसकी पहिचानके बिना परमारमाकी प्रासि मही होती, इसीरिये सब प्रकारसे मछि करने पोम्प पेसी दोषारी दिम्पमनिपानीरूप परमात्माको-को नमस्कार वारि मजिसे गाकर परामकिक बततक एक तमीमतासे वारापन करना, ऐसा शामका पारे । परममा ही इस दोषारीरूपसे उत्पम इजा है, ऐसी ही हानी पुरुपके प्रति गोपको मुन्दि होनेपर मफि रवित होती है, और वह भकि कम क्रमसे परामचिस्प हो जाती है। इस विषयमें श्रीमद्भागक्तमें, मगवद्गीता बहुतसे मेद बता करके इसी प्रकी प्रशसा की है। वधिक क्या करें । बानी-सीर्षकरदेवमें मझ होनेके लिये जैनधर्ममें मी पचपरमेष्ठी मंत्रमें “ नमो वरितार्ण पदके बाद ही सिवको नमस्कार किया है। मही मालिके वारेमें यह सषित करता है कि प्रपम बानी पुरुपकी भाल करो, यही परमात्माची प्राप्ति और भतिका निदान है। दूसरा एक प्रश्न ( एकसे वधिक भार ) वाफ्ने ऐसे मिला था कि म्पयहारमें म्यापार मादिके संबधमें इस वर्ष जैसा चाहिये पैसा छाम मही दोसता मोर कठिनाई गा करती है। मिसको परमात्माको मलि ही प्रिय है ऐसे पुरुषको ऐसी करिनाई न हो तो फिर उसे सचे परमात्माकी ही मति नहीं है, ऐसा समझना चाहिये नपका पान बूझकर परमाहमाकी अरुप मायाने ऐसी कठि- नाईयोंको मेममेके कार्यका विस्मरण किया समझना चाहिये । सनक पिडा और महरमा रुणके लिपपमें मापाका विस्मरण एषा मास होता है तपापि ऐसा नहीं है। बना लिहीको कठिनाईक संबंधर्म यहाँ कानेका मौका मही है, क्योंकि यह कठिनाई मप्रगट कटिन, वीर महात्मा कृष्णको सकरप करिनाई प्रगट ही है। इसी तब उनकी भापसिदि वीर नानिधि मी प्रसिद्ध हो । तथापि कटिमाई तो पो हो भीर होनी मी चाहिये ।पा कटिन मायाकी. और " . भीमद् पाप [पत्र १९४ १९५ परमात्माके मसाका परिसे तो यह सरकता हो; वौर ऐसा हो। श्रम राबाने कोर तप करके परमात्माका बाराषम किया परमात्माने उसे दोपारके हमें दम दिया और पर मांगने के लिये कहा । इसपर उस रामाने पर माँगा कि हे भगवन् ! बाफ्ने वो ऐसी राम्फामी मुचे दो, प विकुम भी ठीक नहीं, पदि मेरे ऊपर तेरा मनुमा हो तो यह पर दे कि पतिपयकी साधनम्प इस रम्परामा फिरसे मुचे सन मौन हो । परमारमा बाधर्यचकित होकर 'तपात करकर सघामको पवार गये। कामेका वाशय पर कि ऐसा ही पोम्प है। कठिनता और सरकता, साता चौर वसावा से भगवान के मळको सब समान ही है। बौर सब सो वो कठिनाई और साता तो उसके लिये विशेष वमुम्पोकि यहाँ मापाका प्रतिवष रिंगत नहीं होता। भाप तो पर बात जानते हो। तपा कुतुमा बादिके मिक्समें कठिनता होना ठीक ना है, पर ऐसा भगता ऐ तो उसका कारण यही है कि परमात्मा ऐसा करते हैं कि 'तुम अपने मुटुम्बके प्रति स्नेह रहित होचो, और उसके प्रति समभावी होकर प्रतिष रहित बनो, पर हमारा है पेसा न मामो, और प्रारम्भ योग के कारण ऐसा माना जाता है, उसके हटाने के लिये ही मैंने यह कठिनाई भेषी '। वपिक स्पा करें। यह ऐसा है। - १९४ बर्ग, फागुन १९९० सस्स्वरूपको अमेव भक्तिसे नमस्कार बासमाके उपशम करने के लिये उनकी सूचना है और उसका सोचम उपाय तो पानी पुरपका योग निम्ना ही मुमुक्षुता हो वरफुल तक पैसा पोग मिला हो तो नीरा याम हो नाप । म सब संग, सात बार के पिपमें नमी से ( योगसे ) पते दो, या सिमना । इस पोगके लिये प्रमादभाव करना बिलकुल भी पोम्प नहीं है। रो, यदि पूर्वका कोई गाल प्रतिपणे तो मारमा इस विफ्पमें अप्रमत्त हो सकता है । तुमारी भातिक लिये कुछ भी विपना पाहिये, इस कारण प्रसंग मिल्नेपर सिनतामाकी तो वमा हाम्में सकपा सिली ना सके, ऐसी दशा (I)मही है। १९५ बम्बई, फागुन १९५० बनवकारसे बालको क्सत् बास्नाका बम्पास है। उसमें सल्का संस्कार एकरम स्पित मी होता । मे मत्रिन दर्पणमें पैसा चाहिये पैसा प्रतिविम्म मही पा सकता, सेक्सित् पासमा चित मी पत्ता संस्कार योग्य प्रचारसे प्रतिविम्मित नहीं होता; कुछ से ही होता है। और दिर माने जनतकम मिप्पा अम्पा सम्पमें एक जाता है, और इस कारण उन सके भोंपर भी बबित् बावरण समान है। सदसौपा संस्कारका पताके भये सब प्रकारको १९५, १९० १९८] पिविष पत्र मावि संप्रह-२सयों पर्व २४ मोक्समाफी उपेक्षा करके समगका परिचय करना ही श्रेयस्कर है। किमी मौ यो कारणको मिदिमें होम-समाका तो सब प्रकारसे स्याग करना हो पाता है। सामायत समगका सोक-समुदायमें तिरस्कार मही है, निमसे सोक-उना दु मायफ नहीं होती, कंबल चिचौ ससंगके लामका विचार करके निरवर पम्पास करते हैं तो परमार्थविषपक सता होती है। - १९६ बमाई, क्षेत्र मी ५ सोम १९९७ एफ पर मिठा, जिसमें कि पानसे गीतो पोम्पता तो है परन्तु मार्ग मतानेपाडा कोई नही,' पायात जिमी है। इस विषयमें पहिठे बापको बहुत करके सुगामा किया था, पपपि पर पुछ गूड ही था; तथापि वापमें मस्पपिक परमार्थकी उत्सुकता है, इस कारण नह सुडासा भापको पिम्मरण हो जाय, इसमें कोई वार्य नहीं है। फिर भी भापको स्मरण रहनेक छिये इवना निमताई कि अबतक ईपरेप्टा म दागी तबतक हमसे कुछ मी म हो सकेगा । एक तुपा तृपके दो टुको करनको मी सता हममें मदद। अधिक स्पा करें। आप तो करुणामप है। शिर भी बार हमारी फरणाक सबमें पों हश नहीं देत, और ईपरको पयों नहीं समझते। १९७ बई, पत्र मुरी ७ पुष १.४७ मदामा पीरजी तथा नरसी मेहता मकि भनन्प, बारिफ, बसुत, और सरिट पी; पेसा होनेपर मीप निस्पृह पी । ऐमी दूी स्थिति होनेपर भी उन्होंने सनमें मी भानातिका जिये--म्पहारके लिये परमेपरफे प्रति दीनता प्रफर मही की । पपरि दीनता प्रकट किये बिना पिप्पानुमार म्पहार पटता गया है, तपापि उनी रिदातम्या भाजतक जगप्रमिद दो भार यही उनका मुरत मादाम्प है। परमामाने इनका परपा ' पूरा किया है, बार बदमी मा या पिर मार शिपापोंकि मी मोंगी इशादी महीला, भौर पर माता उमें मनिफ एम्पी प्रामि मी न हो । भार मोही मागे बातें लि परम्नु बना र निगरी नदी (भपा मते) तर सब सिंबना ही है। १९८ रम, चैत्र • पुष १० परमानुपारी दमद महीं होना (१) मापारा प्राण प्रनित पापा पाता है। उम प्रायके गासी मावि मानो ग्मिी परम पापामे होती है, मग तो काम होती है। इन दानों में भी समग रा मनमा मार नितिन्ही हाती और इम एपको बम बात २॥ भीमद्पन्न [पा १९९ मेके सिपे गानको पोग्य होना प्रशस्त है। उस पोग्प होने में बापा करमेवाम या मापाप्रपंच, विसका परिचय ज्यों पा कम हो पैसा बाचरण किये बिना योम्पताका वापरण भंग मही होता। पा पगपर भयपूर्ण मान-ममिमें पोष बिना बारे ही करोगे पोगन तक पता चल जाता 4 हा योम्पताका मारा काम मिल सकता है। ऐसा न होने के लिए, किये गए कापर उपापको से बने कैसे प्राप्त करके (स विपपकी ) सर्व प्रकारसे निति करके योग्य म्पमारमें वानेका प्रयत्न करना ही उचित है। यदि सर्पया मचारी तो ध्यपहार करना चाहिये, किन्तु उस म्पहारको प्रारम्घा उपप समाप्तकर के निस्सा युनिसे करना चाहिये । ऐसे म्पहारको हो पम्प म्यमार मानना । यहाँ ईमरामद है। (२) कार्यनपी वामें वासनेके बाद प्रायः प्रत्येक मौरको पाचाप होता है। कार सम्म होनेके पहिले ही विचार हो बाप और मा सये, ऐसा ऐना बात ही कठिन है-ऐसा नो विचक्षण मनुष्प करते है ययार्थ हो। पमाचाप करनेसे कार्पर वाया एखा परिणाम बषपा महो होता, किन्तु किसी ऐसे ही इमे प्रगमें उससे उपदेश मास्स मिल सकता है। ऐसा ही होना पोम्य पा, ऐसा मानकर धोका परिस्पना करना पीर बेबस मापाको प्रनम्ता बिमार करना पड़ी उपम है। मापाका सम्मको ऐसा है कि इसमें 'सत्' प्रास हानी पुरुपको भी एना मुश्किल है, तो फिर मिसमें नमी मुमताले भगोकी मी मनिता है, ऐसे पुस्पको उसके सहपमें स्पिर यना परत कठिन, सभम राम्मेवाला पर पायमान करमेवाडा हो, इसमें कुछ मी बाप नही है-ऐसा जबर मानमा । . बम्बई, पैन सदा छक १९९० जम्मूत्रामाका यन्त प्रसगको प्रबल करनेवाला और बहुत भानन्दकारक मिसा गया है। पटा देशको इण होनेपर मी, चोरोंशय वपहरण हो जाने के कारण अमका पाग है, ऐसा मोक-प्रवाहको मान्यता परमापी किये गए है, ऐसा थो महात्मा का पाराप थाप सपथा। इस प्रकार पहाँ इस बात का मत करके मर भापचे प्रश्न होगा कि पित्तको मायाके प्रसंगोंमें भाग म्यासता हो, और उसमें वाभा पितित पा करे, क्या यह ईपर-मसमताका मार्ग है । तपा पानी पुरिसे मी, विस्तु छोक-प्रवाहो अरण मी ब्लुम पारिके कारणसे शोयुत होना, क्या पर वानिक मार्ग है ! या हम मानुस होकर कुछ कर सरते है और परि कर सकते है सोर वरपर रिमाम रमनेका क्या फर एमा । नियर पुरष क्पा ग्योतिष से परिपत विपप सम्मारिक प्रसंग श करते होंगे। हामें तो हमारी पनी राय हम ज्योतिष मानते या पुरु कर सकते है, ऐछ म मानें तो टीका पत्र २ ,२१,२२] विषिम पर मारि संग्रह-शायर्प सह, चैत्र सुदी १० शनि १९१७ सास्मस्वरूपको नमस्कार बह दशा निसमें अपमा और मिराना कुछ भी भेदमाष नहीं पता- उसकी प्राप्ति कर समीप ही है, (इस देह है); और उसके कारण परेठासे राते हैं। पूर्वमें रिस निस बिघा, बोध, बान, और नित्याको प्राप्ति हो गई है, उन सबको इस चन्ममें ही विस्मरण करके निर्षिकम्प पुए बिना छुटकारा नहीं, वौर इसी कारण इस तबसे राते हैं, सपाप माफको अत्यधिक बाकुलता देसकर परिकभित् वाफ्को उचर देना पड़ा ह, भौर यह भी स्लेअसे महीं दिया है। ऐसा होनेसे मापसे प्रार्थना है कि इन सब मापायुत विपा नथका मापायुछ मार्गके समधमें मापको सरफसे मेरी दूसरी दशा होनेतक स्मरण न रिखापा बाप, यही उत्तम है। २०१ बर्ग, क्षेत्र सुदी १५ गुरु १९४७ शानाकी परिपाल जस्पा (दशा) होनप राग-रेपको सर्पया निति हो जाती है, ऐसी हमारी मान्यता है। ईमरेमा मनुसार यो हो उसे होने देना, यह महिमान के लिये मुख देनेवाली बात है। २०२ बर्मा, क्षेत्रमा १५ गुरु १९४७ परमापम मीचकी बातें विशेष उपयोगी- १ पार होनेके छिपे नीमको पहिस स्पा बानमा पहिये ! १ जानके परिभ्रमण करने में मुन्य कारण क्या है। ३ कारण किस तर दर ऐ सकता है। . उसके लिये सुगमसे भुगम वर्षात् पम्पकाठमें ही फल देनेबाग उपाप कौनसा है! ५ क्या ऐसा कोई पुस्प है कि जिससे इस विषयमा निर्णय हा सके। क्या तुम मानते हो इस का में कोई ऐसा पुरुष होगा । और मानत हो तो किन कारणोंसे ! ऐसे पुस्पके कौनसे बक्षम हो सकते हैं। वर्तमाममें ऐसा पुरुष तुममें किस उपापसे प्राप्त हो सकता है। ६ स्या यह हो सकता है कि पुस्पकी प्राप्ति होनेपर पीपको मार्ग म मिळ। ऐसा तो उसका क्या कारण है। यदि इसमें चीनको बयोम्पता जान पड़े ताबह योग्यता किस विषपकी है। ...के सगसे पोपता बानेपर क्या उसके पारासे शानको प्राति हो सकती है। जानकी प्रासिके लिये योम्पता बहुत पसथान कारण है । ईसरेशा सम्मान है और मुसकारक है। बारम्बार यही शंका मनमें तय करती है कि क्या बपमहीन कमी बपनमें फंस सकता है। मापकी इस विषयमें क्या राय है। .
। . भीमद् परबन्द्र [पत्र ३१४१५ २०३ मई, पेत्री रति १९१० उस पूर्णपदकी मानी सोग परम मेमसे उपासना करव मगभग चार दिन पारे वारका पत्र मिठा । परमम्मरपके ममुपासे यहाँ समाधि है । साठियों रसनेकी भापको इन यता है-पर पाकर बारम्बार वानन्द होता है। वित्तकी सराका परम्प और 'सत्' प्राप्त होनेको भमिस्मपा-पे प्राप्त होना परम दुर्गम है, वीर उसका प्रतिमें परम करम- र 'ससंग' का प्राप्त होना ता और मी परम दुर्गम है। महान् पुोंने इस का कठिन काल कहा, उसत्र मुख्य कारण तो यही है कि जीवको संग'प्रयोग मिसमा पशुत कठिन है, भीर ऐसा होनेसे ही फरसो मा कटिन का है। पर या छोक मापाम्प बमिसे प्रश्नमित है। उस मापामें बीसको मुनि रच-पच ही है, और उससे चीन मी उस मनिष तापलपी अमिसे पम्म करता है। उसके लिये परमकाम्प मूर्तिका उपदेश । परम शौतम बल है, पापि बीचको पायें भोरसे पूर्ण पुष्पक कारण उसकी प्राप्ति होना अस्पन्त कठिन हो गई है। परन्तु इसी बस्तुका तिन रम्ना । 'सर' में प्रीति, साचात् 'सत्' रूप स्तमें प्रीति, वीर उसके मार्गको भमिगपा-मही निरन्तर स्मरण रखने योग्य । मोर इनके स्मरण रहने में परम्प वार परिवासी पुस्तके, रम्पयुत सरप बिच्चाले मनुम्पाका संग बोर वपनी पि-शुद्धि-पेपर करण । प्रातिको उन रखना कापाणकारक है। यहाँ समाधि है। २०४ बम्बई, क्षेत्र कयौ ७ गुरु १९१७ माप्' सौने ते मारपामरे पपपि का भात उपाधि सपक नाता है, किन्तु बिरेपानुसार पाना प्रेयस्कर और योग्य है, इसध्येि जैसे चल रहा है, से चारे उपापि सेतो मी ठीक, भौर म हो तो भी ठीक हमें तो दोनों समान ही। ऐसा तो समझमें भाता है मेरका मे दूर होनेपर ही पास्तविक तत्व समझमें जाता है। परम भमेश्यप 'सत्' सर्वत्र है। . २०५ बम्झ, पैत्र पदौ १० गुरु १९४० मिसे ना है, उसको ही गो, और उसमे उसे नाना है, और मो "पी पी" पुकारता पिरता है। मामा पेइमा कैसे घी माय ! मह कि मामीका भी प्रवेश महा। मधिक मा करें! पिसे गौ है उसको होगी। उसके चरणको शरण संगसे मिश्ता और पनि गाता है वमी पुकारा होता है। इसके बिना सा एगम मोचमार्ग दोनही तपापि को प्रपन नहीं करता । मोर बड़ा बयान है। ।
पत्र २१, २०१८,२१]विविध पत्र मादि संग्रह-यो वर्ष २४९ बर्माई, चैत्र १९१७ मुरल स्वमानसे भारमार्पका प्रयत्न करमा । वाम-फम्याण प्राप्त करमेमें प्रायः प्रबल परिषहोंके बारम्बार पानेको समाना है, परन्तु पदि उम परिषदों को शांत चित्तसे सह सिया माप तो दोर्षकाम- में हो सकने योग्य कल्याण शुत वल्पकामें ही सिम हो जाता है। सुम सब ऐसे शुर वापरणसे मना कि मिससे हमको काल मौतनेपर, निपम परिसे देसनेपाले मनुष्यमिसे बातोंको, अपनी उस दहिपर पश्चाताप करनेका समय भाये । धर्य रसकर आरम-कायाणमें निर्भप राना । निराश न होना । वामार्पमें प्रयत्न करते रामा । २०७ बा, पेशास पुदी ७ शुक्र १९४७ परम आनंदचि है। हम उसका तीनों काम मनुग्रह पाहते हैं फुल निरविका समप मिग करता है। परनम-विचार तो म्योंका मों या ही करता है। कभी कभी तो उसके लिये वामन्दकी किरणे मात गत स्फुरित होने प्राती हैं और फुलको कुछ (उमेद) यात समधमें जाती है। परन्तु यह ऐसी है भो किसीसे कहो नहीं पा सकती हमारी पा वेदना वपाह है। बेदनाके समय कोई न कोई साता पूछनेवाठा चाहिये, ऐसा म्यानहारिक मार्ग है, परन्त हमें इस परमार्प मार्गमें साता पूँज्नेगाम कोई मह मिष्ता, गोर गो हे मी ठसका वियोग रहता है। २०८ बम्बई, शास कदी ३, १९४७ लिमको भी मुसदायक मानना । असे हरिके प्रति वियामिको नहानेसे उसको सामान प्राप्ति होती है, वैसे ही सबके विरहानु मबसे साक्षात् उसकी प्राप्ति होती है। विरेकमसे अपने सबध मी ऐसा ही समझना । पूर्णकाम हरिका सरूप है। उसमें निसको निरन्तर मे लगी गती है, ऐसे पुरुषोसे मारत क्षेत्र प्राय शूम्प जैसा हो गया है। मापा-मोह हो सर्वप्र दिखाई देता है। मुमुसु कश्चित् ही साई देते हैं। जोर उसमें मी मतातर मादिके कारणों से ऐसे मुमुक्षुमोको मी योगका मिटमा भति कठिन हो गया है। भाप को हमें पारम्पार प्रेरित करते हो; उसके लिये हमार जैसी चाहिये वैसी योग्यता मही है, भौर मबतक हरिने साक्षात् दर्शन देकर उस बातको प्रेरणा नहीं की, तबतक उस विपपमें मेरी कोई एम मही होती, भार होगी मी मारी। मई शाल कदा ८ रवि १९४७ हरिफे मवापसे भय परिका स्मरूप मिलेगा प समझाऊँगा पिचकी दशा पैतम्पमय रहा करती है। इस कारण हमारे म्पहारके सब काम प्राय सम्प- परपासे दो होते है। हरिदम्याचे पुसायफ मानते हैं, इसरिये या उपापि-योग यता है उसे मी हम समापि-पोग मानते हैं। १२ है भीमद् रामचन्द्र [पा १ पिचको बम्पबस्थाचे कारण मार्ग माप्रमें हो सकनेवाले कापक विचार विचारमें हो फ्दा Pन निकल ना वोर कमी तो उस कार्य बिना किये हो याना परवाए। समौ प्रसवों में यदि ऐसा ही होता ये तो मी हानि नहीं माना; परस्त वाफ्को कुर कुछ मान-मार्ता को पास तो पिशेप बानन्द यता ,पौर इस सोचमें विचको पुन म्पपस्थित करनेका दावा करता है, सिर भी उस स्थिति में अभी हार हमें प्रमेश नहीं किया जा सकता, ऐसी पिचको निरंकुश दशा हो यो पौर सस निरंकुशताको प्राप्तिमें हरिकी परम कृपा हो कारणीम्स है, ऐसा हम मानते हैं और वह निरंकुशताको पूर्ण किये बिना वित्त पथोचित समाधियुक्त नहीं होता, ऐसा स्माता है। इस सम्म सब-कुछ बम ममता है, और कुछ भी गम महाँ भगवा, ऐसी स्थिति हो यो । म सम. छ मात्र मम होगा करेगा वमी निरफुमाता पूर्णता हेगा।सीका अपर नाम पूर्ण कामना है- जासत्र हरिएर सर रिसाई देते है। इस समय ये कुछ वस्पर से पोसते हैंपरस्त हैं स्फर, ऐसा अनुमन है। यो रस बगतका जीन है, उस रस बनुमय होनेके मा हरिके प्रति अतिशय की सगा। और उसय परिणाम ऐसा वायेगा कि हम माँ स्मि रूपमें हरिमर्थन करनेकी हम करेंगे, उसी रूपमें हरि दर्शन देंगे, ऐसा मविष्यकाल ईयरे माके कारण विमा है। हम अपने अंतरग विचारको मिस सकनेमें वतिशय भयक गये, इस कारण समागमको इण करते हैं परत घरेशा ममी ऐसा करनेमें वसामत माश्म होती है, इसलिम नियोगमें हो यते हैं। उस पूर्णस्वरूप हरिमें निसकी परम मधि है, ऐसा कोई मी पुस्प हाल में दिखाई नहीं देता, इस क्या कारण है। तया ऐसी बपि तीब अपना तौर मुमझुवा मी किसीमें Pई नहीं देता, इसका क्या कारण होना चाहिये । पदि की तीन मुमुक्षुता पसाई मी देवी भागी तो माँ बनम्तगुण-गौर शानावार पुस्तकाबपों महीं देसनेमें माता इसके कारण के समय जो वापको लगे सो सिमना । दूसरी बड़ी भारवर्यपरक गात तो पहोवा सोको सम्पमानके बीमकी-परामविके मटकी-प्रालि हानेपर मा उसके बाप मेद क्यों नहीं प्रास ता! तपा हरिविषयक सामरूप पम्प बितना पारिय उक्ना क्यों विंगत नहीं होता ! इसका जो कुछ मी कारण भारत भ्याममें जाना हो सो विसना। हमारे विषय ऐसी सम्पास्या हो मानेके कारण किसी भी काममें जैसा चाहिये पैसा उपयोग मादी यता स्मृति नहीं बता, अपना मारहो म यती; उसके लिये क्या करें। क्या करें इम्स हमारा भाशय यह है कि म्यगारमें यमेपर मी ऐसी सर्वोचम दशा दूसरे किसाको हुलम 40, ऐसा हम क्या करे ! मी तो हमारे माचार ऐसे है कि कमी कमी उनसे मिसाल परेप बायो। हम सो मिसाँच्चे मी मानादम्प छगे इस हरियो पिता पती है इसलिये वे इसे रंगे । माग पम पो रस रसाको पूर्णता प्रभ रमेश ऐसा मानते है। तपाइसर किसीको मो संघरप बनेका तो सममें मी चार महो। हम दो सबके पास है, तो सिर से मनप कौन मानेगा !
पर २१ २११] विविध पत्र मादि समर-२वा वर्ष २५१ प्रथापि यदि म्पबहार-प्रसग हरिको माया हमको महीं सो सामनेवाळेको मी एकके मदछे दूसरा मात्र पैदा कर दे तो चारी, परम्त इसके लिये मी हमें तो शोक ही होगा। हम तो हरिको सर्व- शकिमान मानते है, और उनीको सब कुछ सौप रहा है। अधिक स्पा सिमें। परमानन्द हरिको एक क्षणमर भी न मूछना, यही हमारी नाति, पति और किसनेका हेतु है। . २१० पा, पेशास बदी ८ रनि १९१७ ॐममा मगोपशतक मेमा है, पापांचा ऐगा । इस सतकका सम सपोंको श्रवण, मनन भौर नि प्पासन करना चाहिये । सननेपाको सबसे पहिणे या वात ध्यान रखनी चाहिपे कि इस पुस्तकको हमने देशातकी अदा करनेके छिपे नहीं मेनी, इसे किसी दूसरे ही कारणस भेगी, वोर मा कारण बहुत करके विशेष विचार करनेपर तुम मान सकोगे। हमें तुम्हारे पास कोई ऐसा बोर करमेनागा साधन न होने के कारण यह शतक ठीक साधन है, ऐसा समझकर इसे मेना है। इससे तुम्हें स्मा गानमा चाहिये, इसका विचार तुम स्वयं कर सेना। किसीको यह सुनकर हमारे विषयमें ऐसी शका मही करनी चाहिये कि इस पुस्तकमें गो कुछ मत बताया गपा है, यही हमारा मी मत है। केवल पित्तकी स्थिरता के लिये इस पुस्तक के विचार बहुत उपयोगी है और इसीलिये इसे मेगा है, ऐसा समझना। पई, पेष्ठ मुत्री ७ शनि १९४७ ॐनमः - कराठ कास होनेसे जोषको वहाँ वपनी चिगानी चाहिये बापमही गा सकता। इस कासमें प्राय सधर्मका ता छोर हो पता है, इसीलिये इस कामो पलियुग कहा गया है। समर्मका योग सत्पुरुप बिना नहीं होगा, क्योंकि इसमें सत् नहीं होता। प्राय सत्पुरपके दर्शनकी और योगको इस कासमें वप्राप्ति हो दिसई देती है। जब यह दशा है तो समर्मम समाधि मुमुमु पुस्पको कासे प्राप्त हो सकती है। बार अमुक काठ म्पतीत होनेपर मी बस ऐसी समाधि प्राम महा ती तो मुमुक्षुता मी कैसे रह सकती है। मापः ऐगा होता है कि साल से परिपपमें गता है, उसी परिचयप वपनेको मानमे गता है। इस बातका प्रत्यक्ष भनुम भी होता है कि वनार्य फुलमें परिचप रखनेवाला और मनार्थता ही मानी सता रमवा है। मोर वार्पलमें मति नहीं करता। इससिपे महान् पुरुषोंने बार उनके भापारसे हमने ऐसा स नियम किया है कि गोरके सिपे सासंग दी मोक्षका परम साधन है।
भीम राचन्द्र [ पत्र २१२, २१३ १४ पैसा अपमी पोसता है, कैसी योग्यता रसनेबारे पुस्पा संग ही ससंग करते है। वपनेसे पो पुस्पके संग निवासको हम परम सत्संग करते हैं। क्योंकि इसके समान को हितमा साधन इस जगत्में हमने म देश और म सुना है। पूर्वपता महान् पुष्पोंका विपन करना पपि कल्याणकारक है, तपापि यह सहप-म्पिति कारण महीरो सवा स्पोकि बोरको क्या करना चाहिये [-पर बात उनके स्मरण करने मासे समाधमें नहीं पाती । प्रस्पक्ष स्पोग होनेपर बिना समसामे भी ससफस्पिति ऐनी हमें समय माती, और उससे यही निम्मम होता कि उस पोगका दौर टस प्रत्यक्ष पितामय पर मोध तापोंकि सत् पुस्प ही मुर्विमान मोप है। मोक्षगत (बत बादि) पुस्पा चितवन गुत कसे भाषानुसार मोक्ष मार मात्र देनपाम होता है। सम्पत्यास पुरुषका निपम रोनेपर और पोपताके कारणसे नीच सम्पात पावा। २१२ कई म्पेष्ठ भदौ १५ रन १९९० साब मलिको पूर्णता पाने के योग्य तमी पता है जबकि मह एक दम मात्र मी हरिसे मही माँगता, और सब दशायोंमें मचिमय ही पता है प्पाहार चिन्तामोसे वापि होनेपर ससग गमावमें किसी मी प्रकारसे शान्ति नहीं होती, ऐसा यो वाफ्ने भिसा सो ठीक ही है, तो मी म्यावहारिक पिताबोको बापि करना उचित नहीं है। सर्वत्र पर इस यान है। पा बताने के सिप हो परिमे पसा किया है, ऐसा निस्सो समाना; समिपे यो मी हो ससे देने पायो पौर पिर पदि उससे नापि पा हो देसी।सब कमा समागम होगा तब स विषयमें हम बातचीत करेंगे । बचि मत करना । हम तो इसी मार्गस पर ए| छोटम हानी पुरुष थे। उनके पदको रथना पत श्रेष्ठ है। सामरूपसे हरिकी अगर प्राप्ति इसी शम्मको में प्राप प्रापमान मिलता है। २१३ ब, पेष्ठ पदा शनि १९४७ नासे चाना है, मौर पर इपास पन्ना है। बारिक क्या करें! २१४ बर्मा, पेष्ठ १९९७ में मेटमहत पा-संह मौह पुस्तके वाचनेका परिचय रम्ना | कोण सपसे ऐसा पुस्तके माना जिनमें आग मति, और पविणगता के माहात्म्पका वर्णन किया हो।
फा २१५ २१५] विविध पत्र मादि संपा -२४या वर्ष मिनमें सरसग नादिके माहाम्पका वर्णन किया हो ऐसी नो पुस्तके, पद या काम्य हों, उन्हें बारम्बार मनन करमा चौर गर्ने सतिमें रहना उचित समझना । वमी मालमें यदि मैनसूत्रोंक पढ़नेकी हम हो तो उसे निच करना ही ठीक है, क्योंकि उनके (मैनस्त्रों के) पड़ने और समझनेमें अधिक योग्यता लेनी चाहिये, उसके बिना पपार्य फम्मी प्राति मही होतीतयारी यदि दूसरी पुस्तके न हो तो ॥ उचयम्पयन वच्या " सूपगरं "के दूसे अध्ययनको पदना और विचारमा । - " २१५ बर्मा, भाषा एदौ १ सोम १९१७ जबतक गुस्से द्वारा मलिका परम स्वरूप समष्ठा मही गया, और उसकी प्राप्ति माही, तक- तक मछिमें प्रति करनेसे अकाठ बौर क्युधि दोप होता । वकाळ चौर अशुचिका महान् विस्तार है, तो मी संक्षेपमें पिसा है। एकातमें ' प्रमातका प्रथम पहर यह सेम्प-मणिके लिये पोग्प काह है। सरूप-पिवान भक्ति तो समी कामों में सेय है।र्व प्रकारको शपियोंका कारण एक कवर न्यास्थित मन है। गाय मन आदिसे रखित तन और शुद्र स्पट पाणी, इसका नाम शुधि है। २१६ बी बापान सुटी ८ मीम १९९७ निाशकवास निर्मयवा सत्तम होती है, और उससे नि:संगता माप्त वीरे प्रतिके निस्तरको पिसे चौरके कर्म अनंत प्रकारकी विचित्रता दिये गए है और इस कारण दोपोंके प्रकार मी मनन्त ही मासित होते है। परन्तु सबसे बना दोष तो या है कि मिसके कारण 'तीन मुमुक्षुता' उत्पम नई होती, वयया 'मुमुक्षुता' ही उत्पन्न नहीं होती। प्राप करके मनुप्पामा किसी न किसी धर्म मतमें होती ही पौर इस कारण उसे उसी धर्म-मतके अनुसार प्रापि करनी चाहिपे-ऐसा था मानती है परन्तु इसका नाम मुमुमुवा नही। मममुवा तो उसका नाम है किस प्रकारको महासलिछोडकर केवल एक मोशके लिये। पल करनाऔर वोग मुमुधुता उसे कहते है किसमन्य प्रेमपूर्वक प्रविषण मोचके मार्ग प्रापि करमा। तौर मुमुमुताके विषयमें यहाँ कुछ कामा नही । परम्तु मुमभुताके विषय हो करना है। अपने ऐप देखने में निष्पक्षपात ना, पहा मुमुभुताके उत्पम होनेका उमण है, और इसके कारण समका नाश होता है। यहाँ समयको पोपी वपना मत हानि ई, वहाँ उतनी ही बोध-बायके पोम्म भूमिध तयार होती है। यहाँ सम्पद प्राय दर गता है, फिर 'मार्गप्राप्ति' को रोग रमनेबारे केपछ वन कारण ही मुम्परूपसे होते है, ऐसा हम समझते हैं। इस प्रकको भाप मी मुझेगम, परम दिनपी न्यूनता, औरै पर्पका मनिर्णप, इन सब कारणों करमेके बीरको किर कमी मागे । उसके परिठे उन्ही कारणोंको विस्तारसे करते है। इस कोको वस्प मी ससेप्स, परमात बात करके टीम मुमुक्षुताको उत्पति हनेके पहिले - भीमद् रामचन्द्र [पर. हुला करती है। उसके छनेक कारण ये है कि 'सत्' है" इस प्रकारको मिसिमनेसे पता नहीं , वयता " परमानंदरूप हो?" ऐसा निमय नहीं हना मला तो मुमुभुता मी कर वानन्दका अनुभव हाता है, इससे बाध साताके कारण मौ कई बार प्रिप माते है, और इस कारण इस मोककी वाप मी मुसेन्छा या करता है, विस्से गौवको योम्पका रुक हो जाती है। पापातम्य परिषय होनेपर साझाम्में परमेसर-युधि रखकर उमा भयानुगाम कसना, से परम पिनप कहा। उसे परम मोक्ताको प्राप्ति होती है। बता पा मम मनमनही वाटी, बतक पीको योम्पता महीपाती। कदापित पे दोनों प्रास मी ए हों, पापि वास्तविक न पानेको फुल मोम्पताको समेत कारण पार्ष-निर्णय न वा हो, तो चित म्पापुर पतारे, मिप्पा समता माती है, और पित पामें 'सत्' की मान्यता होने प्रगती है निससे पात का पतात दो गानेपर भी उस अर्व फार्पमापी परम प्रेम उत्पम नहीं होता, और यही पम पोम्यताको पनि । हमें मिले हए बधिश मुमुक्षोंमें हमने देते है। केस सरे कारको परिकचित् म्यूनता किसी किसौमें देसी है। और परि उनमें सब प्रकारसे परम बिनयको काकी पूर्व होनेछ प्रकान हो योग्य हो ऐसा हम मानते हैं। परम निमय इन तीनोंमें कमान सापन है। अभिक क्या करें! बन्त कायमें फेस पही एक मार्ग। परिम और वासरा कारण दूर करने के लिये दूसरे कारणको धान करनी और परम विममें यना पोम्प है। या कवियुग रे, सरिये क्षणमर मी वस्तु के विचार बिना नयना देसी मामामोंकी सिलाई। (२) मुमधुके मेत्र महामाको पहिचान सेते है। तामों कारण, २१७ बमा मापान सदी ११ १९४० पुसना सिष भौसामानन्दगी, ममत्रीपनके जगपंदनी परणागवना सवा पुस्तावनी, परमस्नेही परमानन्धमी। हमें हमा दमा केसी । यह माननेको वा. परन्तप से स्वारसे बारिसे से निस्तारसे महा मी मा नया सामे इसे पुन पुम नहीं लिया। पी सकप किते है। एक पुराम-साप और पुराण-पुरुपको प्रेम सपत्ति बिना में कमी वम नहीं गता में किसी मी पाम नि मी सपि मही या कुछ मी प्राप्त करने म मही होती; पधार से सारे सवा मी मान को जगत् किस स्पिति । इसकी भी स्पति महाँ यती शा ममें कर्म मा मेरमात नही या कौन है वीर कौन मित्र मी समर मणी मही सी हम देता है या और कुछ माया पादरील मुक्ति से मान पाते है। हमें क्या करना पासाकी भी समसमें माने जैसा हम समी पदापासे मस हो मानेसे चारे से पत्र २१] विविध पत्र मादि समह---- -२४ोपर्प परतते है। स नियमका मी कोर्ष निमम नही रमता, भेदमावका कोई भी प्रसग नहीं, हमने अपनेसे विमुख जगत्में कुछ मी माना नहीं। हमारे स्मुस ऐसे ससगाके म मिटनेसे खेद दा करता है, सपधि भरपूर है, इसध्येि सपतिको या नही, द वादि अनुमर किये हुए विषय सतिमें मा पानेके कारण-अपना चाहे उसे ईश्चरेम कहो-परन्तु उसकी मी अब इम्भ नहीं पी अपनी से ही थोपी ही प्रति को जाता है, हरिकी इच्छाका क्रम से पता है वैसे ही चळवे चल पाते हैं। पय प्राय शून्य मैसा हो गया है। पान इन्द्रियों शुम्परूपसे ही प्राप्ति करती है, नय-प्रमाण पगैप शास-भेद याद महा माते, कुठ मा घिनमें वित्त मही लगता खानेकी, पानेकी, बैठनेको, सोनेकी, पहनेकी, भौर पोसनेकी पचिपा सब अपनी मनी इच्छानुसार होती रहती है; तपा हम अपने साथीम है पा मही, इसका मी यथायोग्य भान नहीं रहा है। इस प्रकार सब तबसे विचित्र उदासीनता आ बानेसे पाहे जैसी प्रकृति हो जाया करती है। एक प्रकारसे पूण पागष्पम है, एक प्रकारसे उस पागलपनको कुम छिपाकर रखते है। मौर जितनी मात्रयमें उसे माकर रसते है उतनी शनि है। योम्परपसे प्रवृति हो गयी है अपरा अयोग्य रूपसे, इसका पुछ मी हिसाब महा रस्ता । मानि-पुरुपमें एक असा प्रेमके सिपाप दूसरे मोक्ष वादि पापोको मा मायाका नाश हा गया है, इतना सब हानेपर मी सतोपमनक उदासी नता मही माई, ऐसा मानते हैं । ममा प्रेमका प्रवाह तो नशेक प्रमाह जैसा प्रवाहित शेना पाहिपे, परन्तु बसा प्रवाहित नहीं हा, ऐसा हम जान थे ऐसा करमेसे वह मसा मोका प्रयास प्रवाहित रोगा, ऐसा निपपरपसे समझते हैं। परन्तु उसे करनमें काल कारणभूत हो गया है। और इन सबका दोष हमपर भपमा हरिपर, उसका टोक यैस निश्रप मही किया जा सकता। इतनी अधिक उसीनता होनेपर मौ म्यापार करते हैं देते, देते हैं, मिसते १ पाँचते है। निमाते माग, से पाते है, और हसत भी है, जिसका टिफाना माही-ऐसा हमारी दशा है और उसका कारण केवल यही है कि अबतक परिकी मुसद डा नही मानी जातक सेद मिग्मेबारा नही। यह बात समझमें बाबा, समठ मी रहे हैं और समझेंगे मा, परम्नु सर्वत्र हरिकरणम्प है। जिस मुनिको भार समझामा पाहते पदासमें पोप है या नहीं, सो हम मही जानत क्योंकि हमारी दशा में मा-योग्यको छाम परमेवाली नहीं हम ऐमी बजटका एसमें नही पारवे इसे रौती नहीं और उम मुबका नरबार कसा चलता है, इसका स्मरम मी नहीं है। ऐसा होनेपर भी दम इन सबकी अनुक्पा वाया परती है । उममे अपमा फिमी मी प्रामीस दमन ममसे मित्रमा नी करा, और पा जा सकेगा मी नहीं। महिपाठी पुस्तके फभी कमी पारते है परम्नु भो सब पुरस करता बिना Pानकी दशासे करते हैं। प्रमुकी परम पा है। हमें किसीमे मी मित्रभाष मदो रहा है किमाके मा प्रति दोस्-बुद्धि मही माती, मुनिफे सिपमें हमें कोई एका रिचार नदी, परम्तु प्रेमी प्रहटिम प, निम तरको प्रामि दम हो । वा पाय-पान ही उनका इम्पा कर सके, मी नसी और दूसरे - [पत्र २१८ ११९ पातसे मनमुबोध दशा नहीं है सिवमान भी साथमें होना चाहिये । पर सिमामात हमारे श्यमें पारितस्मसे पसाया है। यदि हरिकी अ प्रगट होने देने की बाग म प्रगट ऐगा। हमारा देश नि है, भाति हर है, काठ हरि है, देवरि, रूप परि है, नाम हर है, दिशा हर समय हरि हो हरि है, और फिर भी हम इस प्रकार कारगारमें छोर है, इसकी इसका कारण है।शान्ति शान्तिः शान्ति । . २१८ बई, बापा बदी सनि १९९७ पाल समासे ही पितो, तो फिर उसके दोक्को मोर देशमा, पर बनुकम्पा लग करने जैसी बात है, और यो पुस्प इस तरकी नाचरण करनेकी इजा नहीं करते । अभिगमें मससंग एवं मासमाके कारण भूम्से भरे ए रास्तेपर , पम गाप, ऐसा होना बात होकठिन है। २१९ बम्बई, नाम १९९० भीसगुरू कृपा माहात्म्य बिना नफन पाये ना, बिना नयमको वाव । से सद्गुम्के परन, सो पाने साहात् ॥ १ ।। पुची चहत मो पाको, मुझनकी रात पाने मी गुस्गम मिना, शो नादि स्फ्ति ।। २ ।। एही नहीं कम्पमा, ए नही निमंगा यि नर पचमकाममें, देसी वस्तु ममंग ॥१॥ मरिंदे उपदेशक, प्रथम ग्रह उपदेश सबसे यो गाना रेश ॥ ॥ जप तप, गौर मतादि सब कभी भ्रममा माँगी हो सकको पर्वमा बनूप ॥ ५॥ पापाकी ए बात है निम दनको भेष पिसग सपुष्पक, तो सब भन तोड़ ॥१॥ (२) पातुर पिम्नेको मानत परमा। जो तपातुर नहीं उसे पार करनेको अमिषा पर करमा । मिसे पर अमिहापा पैदा न हो उसके प्रति उदासीन पना। उपाविरमा गाईपम भी नहीं हो पाता । परमेबरको बगुल मी माता बाम स्पा करे।
पत्र २२ २२१ २२२] विविध पर मादि समायों व - २२० बई, ग्राषण मी १ पुष १९९७ सर्वशक्तिमान हरिकी इच्छा संदेव मसरुम ही होती है, मौर निसे मळिके कुछ भी *श प्राप्त हुए ऐसे पुरुषको वो असर यही नियप करना योम्य है कि "हरिको इम मैग सुसम्प हो होती" जाफ्का दियोग रहनेमें मौ हरिको ऐसी ही ठा, और बहइया क्या बगी, यह हमें किसी तपसे माश्म मा है, निसे समागम होनेपर करेंगे। हम वापसे शानमारा " सबषी पोदा मू-मार्ग इस पारके समागममें करेंगे; वार यह मार्ग पर वयसे इसी जन्ममें मापसे कहेंगे, ऐसी हमें हरिकी प्रेरणा है, ऐसा माइम होता है। ऐसा माश्म रोता है कि वाफ्ने हमारे लिये ही सम्म धारण किया होगा। बाप हमारे अत्यन्त उपकारी, मापने हमें हमारी अनुसार मुख दिया, इसके लिये हम नमस्कारके सिवाय दूसरा प्पा मदस्म । परन्तु हमें ऐसा माश्म होता है कि हरि हमारे हापसे भापको परामचि विष्णयेगा, हरिके सकपका ज्ञान करापेगा; और इसे ही हम अपना महान् माग्यो प समझेंगे। हमाय चित तो बहुत ही वचिक हरिमय गा करता है, परन्तु सग सर्वत्र कठिमुगका ही राता है। यत दिन माया प्रसंगमें ही एना रोता है, इसध्येि चित्तका पूर्ण हरिमय रह साना बहुत ही कठिन हवा और पतक हमारे विचका उग भी मही मिठगा । ईसरार्पण २२१ सर्थ, प्रापण सुदा९गुरु १९४७ पकार मताकर योगको सिर करमा, या योगीका क्षण नहीं है। सोचम योगी तो वही कि गो सा प्रकारको स्पसे राहत ऐकर सस्यमें केवल अनन्य निष्ठास सम प्रकारसे सत्का ही वापरण करता है, और मिसको नगर विस्त हो गया है। हम यही चाहते है। २२२ बर्मा, भाषण मुग ९ गुरु १०४७ खभातसे पाच-सात कोसपर स्पा कोई ऐसा गाँव है कि माँ बासरूपमे में तो मनुकूम हो! परि ऐसा कोई स्थन प्यानमें आपे कि वहाँ गए पनम्पति बीर परिसपना टी हो तो सिपना। पप्पणसे पहले भीर भाषण सो १२ बार यहसि पोरे समपके लिये निहानेकी पाहाँ हमें भोग भर्मक संबपसे मी पहिचानते हैं, ऐसे गांधी मा वामें तो प्रति ही मानी? इसलिये पाली समात भाभेका चार समय नहीं। हा पोरे समपके लिये यह निति सेना पाहता है। अबतक मर्यकारक टिपे (भापुपर्पत) निसि पानेफा प्रसग म मापा । तबतक धर्म-सरंभसे मी मगरमें मानेकी या नहीं। जहाँ मात्र निरिकारनेसे गा मा सके ऐसी म्पत्रस्पा करना। समाधि ॥
८५८ [पा २१॥ मीम पचम्ब २२३ बर्मा, भाषण मी १९९० इस जगत्में, चतुर्पकाल से कामें मौ एसगकी प्राप्ति होना बहुत दुर्गम है, तो फिर इस दुमका में तो उसकी प्राप्ति होना कात हो दुईम है। ऐसा समझकर बिस मिस प्रकारसे संगम वियोग रहनेपर भी बारमा गुणोत्पति हो सके, उस उस प्रकारसे मापरम करमेका पुरपार्य काम्प जब कमी भी बोर प्रसंग प्रसंगपर करना चाहिये तथा निरन्तर सासगको इम-सम्म उदासीनता–सनेमें उसका मुरूप कारण पुरुषार्थ है, ऐसा समझकर मिाविक गो कोई कारण हो उन ठन कारणोंच बारम्बार पार करना योग्य है। हमको इस तर सिसते एए यह स्मरण वा हाकि "क्या करें" अपना "रिसी मी प्रकारसे नहीं होता " ऐसा विचार तुम्हारे पितमें बारम्बार वासा पता होगा तपाति ऐसा योग्य माम साता कि यो पुस्प दूसरे सब प्रकार के विचारको मरम्पम्प समझकर वाम पापमें ही उपमा होता है, उसमें कुछ न बाननेपर मी उसी विचारके परिणाममें बना मोम्प, मोर 'किसी मौ प्रश्नासे मही हाता' इस क्र मान्म होने के प्रगट होमेका कारण या तो पतिको उरम्य हो गाताहै अपना तापताका सम्प उत्पन्न हो जाता है। बामी पुरस्ने दोषपूर्ण स्थितिमें इस जगत्के बालों को तीन प्रकारसे देखा-(१) बीन म्सिी भी प्रकारसे दोर वना कम्पाणका विचार नहीं कर सका, वयवा विचार करनेको परिमें पर बेमुप-ऐसे जीवोंका पह प्रथम प्रकार है। (२)गीच बालतासे बससंगके बम्पारसे मास- मान होनेवाले बोपसे दोष करव, और उस मियाको कम्याण-सम्म मानता है-ऐसे पौध पर सय प्रकार है । (१) मिसको स्पिति मात्र उत्यके वाधीन रहता है, और सब प्रकारके पर-सरूपमा साधा ऐसा बोध-सरूप जोर केवल उदासीनतासे कर्ण सर्व देवा है-ऐसे गौका पा तासय है। इस प्रकार बानो पुस्पने तीन प्रकारके गानों समाये मारे। पापा कर मपम प्रकार मी पुप्र मित्र धन भाविध प्रामि-अप्राक्षिके प्रकारमे तयूष परिणामीके समान माझ्म नेपाछे गानोंध समावेश होता है। सर प्रकारमें गुना पुरा धर्मोको माननीया करनेवाले पौष, अपना सारा परिणामी, रोमन बारधे परमार्प मार्गपर घम्नवास मानते है, ऐसौ पुलिसे गीत गायका समावेश होता है। तोमरे प्रमरमें ऐसे गांवोंका समावेश होता है कि रिसो, पुत्र, मित्र बाकि प्रामि-भप्रानि वादिक माव पैराम्प उपम हो गया । भषा यग्य हमा करता है। मिनके समय परिणाम नर द ग पार को निरस्तर हो से मारपचारमें पत । वना विचार तो पेमा है कि निम्मे तमय प्रभार सिह दो बाप । । विचारवान है उन्हें पपामुनिपूर्वक, समपस समगमे पद रिचार प्रसार र उनमें मनुस्मसे दोपरक्षित बसा सब उत्पन होता है। पर रि रिमे सात हुए, मागत हुए और इस तसे मी विचारन और मनन करमे योग्य है। - २९४ भीम्माफियस्प] पिपिप पत्र मादि संग्रह-२४ वर्ष २२४ राम्ब, मार सुदौ ८, १९४७ भीसहमभक्ति रहस्य हे प्रमु! हे प्रमु । हे दीनानाप दयालरे करणेश! क्या करें, मैं तो अमत दोपका पात्र ॥१॥ मुझमें गुद-भाव महा है, वौर न मुझमें ठेग पूरा सम हो, म मुझमें प्रभुता है और न दोनता है, तो फिर मैं परम-सस्मकी तो बात ही क्या कहूँ। ॥२॥ न मैंने गुरुदेवको भावाको दयमें वषट किया है, म मुझमें आपके प्रति स विधास हो है, और न परम वादर होई॥ ३ ॥ म मुझे संगका पोग है, न ससेपाका पोग है, म सम्पूर्णनपसे अपनेको वर्पण करनेका मात्र है, और म मुझे अनुपोगका नामय ही है ॥१॥ में पामर क्या कर सकता। मुझे ऐसा विषेक महीं है। मरण समपतक मुसे वापफी चरण- धरणका पीरज भी तो नहीं है॥५॥ तेरे बपिनप मायाम्पका मुझमें प्रश्चित मात्र महा है, न मुझमें स्नेहका एक भी वंश ही है, और न किसी प्रकारका परम प्रभाव ही मुझ प्राप्त जा॥६॥ मुममें न तो अचस भासकि और म मयका ताप, म सेरे प्रेमको अपम्प कया है, और न उसका कुम परिताप होई॥७॥ न मेरा मषि-मार्ग प्रदेदा है, न ममनमें लता है, म अपने धर्मका समान र, भौर न शुभ देशमें मेरा पास हो॥ ८ विकासे कार-दोष हो गया है इसमें मर्प और धर्म नहीं ये, तो मी मुझे माकुसता महो। प्रमु ! मेरे कर्म तो देखो ॥ ९॥ २२४ भीसहरुमलिएस्प प्र प्रमुगलानाप र मनन, म्यम्न दुपरमार ॥१॥ परमार मुसा मी नाक मुरम्प नरपुर निवाई परमालाप ॥१॥ मर्थ भागा गुरदेवनी मनपरी गमामातलो विश्वान परमार नाहि ।।।। योग मा सगना नक्सा गा रेट मामा मच नमाभए भनुमग । ४॥ पापर पण एका नाप विष पर मन बीरब ममी र मुनी Gen५॥ मपि नु माम्पनो मी प्रामिल मात्र मेरा म एकलेनोम पम प्रमा॥ भबनकर माडिमी मी यिनो धार भनम गुरप्रेनी नरिनो पसिनारा मसियार्ग मायनी न ममलमान नमानपनी ममिरे रन ८॥ पररी पकामाधव पेपे मी म्पयाडमा मम ॥
२५. मीमत् रामपाल [११४ भोजमावास ओ सेनस्के प्रतिरूप धन है, उसका मैने त्याग नही किया है। देह और नियों मानसी मही है, और बार वस्तुपर राग किया करती है ॥ १० ॥ तेरा वियोग सरित नही होता, पम और नयमका कोई यम-नियम मही, सपा न मोगे ए पदासि वौर घर मारिसे ठासीन भाष महा॥ ११ ॥ म मैं बहमासे प्रत , न मैंने अपने धर्मका ही संचय किया है, और म मुझमें निर्मक- भारसे अन्य धमकि प्रति कोई निति ॥ १२ ॥ इस प्रकार में वनंत प्रकारसे साधनस रहित हैं। मुझमें एक भी तो सगुण नहीं) में अपना मुंर से बताई ॥१६॥ हे दोगमा दीनानाप बाप के काणाको मूर्ति थे, और मैं परम पापी बनाय रे प्रमुग्गा मेरा राम पकको ॥११॥ रे मगन् ! में निमा शानके नंत का माय किरा, मैंने सतगुरको या नहीको बार वभिमानका त्याग नही किया ॥ १५॥ सस्तके चरणों के मामयके विना मैंने मनेक साधन जुटाये, परन्तु उनसे पार नही पर्व, और विकका वंश मात्र मा उनसे सदित महामा॥१५॥ मित मर सामन पे सब बंधन हो उठे और कोई उपाय नही या। स स साधन हो तो फिर बंधन कैसे दूर हो सकता है!॥१७॥ म प्रमु प्रमुको गैरीगा, और न सद्गुरके पैरेंमें परेमा वपन दोष हो नहीं देसे तो रि किस उपापसे पार पा सकते।॥१८॥ में संपूर्ण जगत्में वषमसे भषम वौर पवितसे पवित स निश्चयर पर बिना साधन मी पारेंगे।॥ १९॥ है मगन् । मैं फिर फिरसे तरे चरण काम पर पाकर यही मांगवाल सयर संत है, ऐसा मुसौ सता सपन कर ॥२ ॥ समझा, चाने मन न लागणेरि माने नरिमेपासपर एग|| मपि पप्पो म पचन नम्म म नादि न उरात मटकी, म प्रारक म्या ॥११॥ मामाया त नतिर्मसनम, ममी निधि निर्मनसे मर्मनी बाई॥११॥ एम बनत मधरो न त म एक पर मुस मत सम्माधि में नियुनमा पसी परम मनापाई को प्रमा|| १४ ॥ भनव काठमी भावमो ना म्न माधान मरि मस्तन मूनहि माममान ॥ १५ ॥ पलमायाना अनमो मनेका पर न पामिग्रे सम्मान॥२॥ युगमन वा पापा ममममी न बचन ॥१॥ मम मममी कहाँ पो मनापाव ऐठा म नगर वो परेप उपार || १८॥ भारम बधिको पनि समयमा एनिमा मामा जान यो स!।१॥ पो पर ARA मा एक बागुल साम तुम एसवा पार || n पर २२५, २२५] वियिप पत्र मादि सपा-सवों वर्ष २६१ २२५ राब, मात्र मुदी ८, १९४७ सत् शु सापन पाकी रपे कनस्प पीन शु! पम नियम सबम बाप कियो, पनि त्याग विराग अपाग समो, क्नकास डिपो मुख मौन प्यो, बद बासन पम म्गाय दियो ।॥ १ ॥ मनपीननिरोप सबोध कियो, हठयोग प्रयोग सुतार मयो अपमेद सपे वप त्यहि तपे, ठरसहि उदासि ही सब ॥२॥ सब शासनके मय पार दिये, मत मान सडन म पिये, बह साधन बार वर्नत कियो, तदपी कम हाय हन न पर्यो ॥ ३ ॥ सा क्यों न विचारत है मनसे, का बोर या उन साधनसें । बिन सहर कोउ न भेद से, मुम बागळ है कर बात को! ॥ १ ॥ कम्मा हम पाबत तुमको पात रही मगुरु गमकी, फरमें प्रगटे मुख मागठसे, अब मगुरुचर्नसु प्रेम बसे ॥५॥ वनसें, ममसे, भमसें, सबसे, गुरुदेवकि वान साम बसे, तब कारन सिद बने मपनो, रस बमृत पाहि प्रेमफ्नो॥ ६ ॥ पप सम्प सुधा दरसालहिंग, पतुगुछ। गमे मित्र है। रसव निरगमको पिबही, गहियोग जुगोयुग सो बिवही ॥७॥ पर प्रेम प्रसर बढे प्रमुसें, बागममेद सुउर बसे। पए केवलको बिड ग्पानि को, नियको अनुमौ बतलाइ रिये ॥ ८॥ एडज, २२६ मात्र सुरी ८, १९५७ (१)माका नाप ही परिणमम दाता है, वीर बेतमका नवपसे ही परिणमन होता है। दोनोमसे कोई भी अपने ममायको छोड़कर परिणम्न नहीं करता ॥ जो सरतानो काम या दो गवारे मी तरह मा तन, वीनों काथ्में घेतन होता है या मा प्रगमापसे गनुपरमें गई है, इसमें संशप क्यों करना चाहिये । पी किमी मी कसमें गा पतन हो गप और देखन जा जाप, तो बा और मोक्ष नदी बन सम्ले, और निसियापि मी मही बन सकता ॥ ३ ॥ (1) गमाने या परिलमे फेशन पेट मा पिनो मी, बोडी मार समान ॥ १ ॥ गावामा फेनमेन चेम का माम, गरम्य ॥२॥ मोबानाम्मा वामपन्न दो माह दो महीप, माति प्रति मास ॥
२१२
भीमपमान
[१ २२०
मास्मा नक्क बध पौर मोधके संघसे मात या तस्यक बपने समावास्या हो
पता है, यह मिनमगवान्ने का
वारमा अपने फरक वानवसे बंपके प्रसंग प्रति करती है, परन्तु इससे मामा सर्प या
मी माती, यह सिमात प्रमाण है ॥ ५ ॥
बरूपी नापीको पका लेता है, यह बात माश्चर्य की बात है, जीव धनको चामता नहीं
यह कैसा अनुपम दिनमगवान्का सित tu॥
पहसे देवनार पी इससे देश की देह दिखाई देती पी, परन्तु मन मारमा पनि हो गई
इसलिये देशसे बहार हो गया है non
बा वीर पेनका या संपोग वनाविनंत है, उसका कोई भी कर्ण महा है, यह मिन-
मगवान्ने कहा ॥८॥
महदम्प न तो उत्पमतमा पा, मोर न कमी उसका नाश हो होगा, या वनुमसे
सिद, ऐसा जिनबरने मा॥९॥
बोबस्त मौजूद है उसका मास नहीं होता, वौर निस बस्तुका सर्वया बमाती उस उत्पति
मही हो सकता थापाको सबस्पा पेसो, जो बात एक सममके किये हमेशा के लिये ॥१॥
(२) परम पुरुष, समर, परम शान बार सुनके पाम मिस प्रमुने निनका बान दिया, उसे
सदा प्रणामी॥१॥
(१) बिस बिस प्रकारसे बारमाका पिताम किया हो, म उसी उसी प्रकारसे प्रतिभा-
सित होती है।
विपयापिनेसे महताको प्रापार शकिया जातको बास्माको निस्पता नही मासित ,
ऐसा प्राय हवाई देता है, और ऐसा होता है इमाव पयार्प क्योंकि पनित्य विपक्में
बाप-पुदि होने के कारण उसे मफ्नी मी बनिस्पता मासित ऐव।
विचारमानको भामा विचारवान गती । शून्यतासे भिनन करनेवासको वामा एन
माता अमिस्पतासे पितान करनेवाको बाल्मा मनिस्य गती वर निस्पतासे विवरण
करने पोको बारमा नित्य भगती है।
कर मेरोगीमामा माम मान पायलमानो मले निम्मान ॥४॥
प्रवेगमा निममन्ना परमवा माँ मापने एसिविण ॥५॥
मा माप स्पा ( ममम्मी बार और रकम बार नहीं मा मिनामात ॥4॥
प्रथम रजा देवी मास्योरेपी ईमात्म, योगी नेह! -॥
मानस्थापना साय मार मनताईमपर्चाटेरनी भारम्निमम ॥८॥
माम उल मी, मरिमा र हेमा मानुभव लि। म मिस एम || .n
सेव देनी मा म मा महिला एक मौसमय मेरमात्मा मेष ।' ॥
(१) मम पुरुष प्रम म्ए सम मान न बामा ने नाई मन ना मे मनाम ॥ १ ॥
पर २१.] विविप पत्र मादिसपहसालों पर २२७ रम्हज, माद्रपद १९४७ . है सप सम्पा ! सुनो, जिनपरने इसे ही मान फरा- निस्ने ना-पूर्तीको मी पा लिया, परन्तु परि उमन नौका नहीं पहिचाना, तो यह सब पान ही कहा गया है। इसमें बागम साझी है। ये समम्त पूर्व सीपको विशपम्पसे निर्मम बनानफे लिये करे गये हैं। सब मम्पो ! सुना, बिनबरने इसे दोबान का है॥१॥ धानको किसी प्रयमें नहीं बताया, कविको पनुराका मी बान नहीं कहा, मत्र-तत्रोंका भी ज्ञान मही बताया जान को भाषा मी मही बानको किसी दूसरे स्पानमें मही फहा-पानका धार्मि हो देखो।हे सब मन्यो । पुनो, बिनबरने इमे हो हान का॥२॥ जबतक मागावर 'यह दह' इस प्रकारका मेद माइम मही पड़ा, तबतक पचासाग करनपर मा ठसे मोक्षका हेतु नहीं कराया या निर्मक उपयश पाच जगमें म्या गया है। स्त्र मन्या ! मुनो, जिनपरने इस दीवान सा ॥३॥ न केबस प्रपपर्यस, और न केवस सपमसे ही शान पहिचाना जाता है, परन्तु बानको फेरठ पानसे ही परिमानो । सब मम्यो ! सुनो, जिनकग्ने इस ही शान मा un विशेष शम्मोंको माने या म साने, किन्तु उमो साप चपन स्वम्पका धान करना मना मा पिसास करना, इसे ही बाम करा गया है । इसके लिये समति बादि मय देमो। सब मम्पा ! मुमो, निमकरने इसे पान कहा ॥५॥ यदि धानाके परमामे बार ममितियोंको गान लिया, तो उमे मांझार्यका कारण निमे जाम करा गया है। करउ वानी कम्पनाके बदमे करोड़ों पास रच दना, यह कब मनका नाकार हो। सब मम्यो ! मनो, जिनबरन इसे ही धाम म्हारे ६॥ २२० निरमोशनने सब मम्मा यमय- सराप पूष ममत्र नर पर गबने या नहीं तो करत महान म्म्म माया नाम माँ ए पूषन मार, र कसा निमम निरपरगन ने मम्मम्मे ! मरिच मदिर माधान नई कवि-सानुरी, नाहि मात्रा मन राना मान मरि मायग नरिमन पान मसान माप मार मानी से मिरमसननन म मामा माममा २॥ बाब मान मादर एषा मेरम माता नहीं पालात की स्प नुर्ण भाषा पनपा न पपाचमे मप ये उपाय, मिलकर पान ने इस मामो नामन्य ॥ कमरिसपी समरिमामय पत्र जान पीये मिरपोपान ने मप्पा नाममा पाये स्पियनीत पर बा बाग निमन परा मानव परम मपी मापा मन वा जानन मानिससम्मात भारि स्फमे मिरकोशान हैन न ममोममे ॥ ॥ भाउ समिति भागीर बनना ममापर्णना मान मर्मव्यने, अनुनार से माना नरसरमायात्रा मार मानी भामर्म मिकर प्रशासनमा ममामामे:n २१५ भीमद् रामबग्न [1 २१८, १९५ पार पेर तया पुराण मा र सप मिथ्या है, यह मान, जहाँ सिर मेम वर्णन किया , हो म िमूपमें पौ। ताजानीकोदो, और पहायक बैठना मी है। सर मन्या मनो, जिनररने से दीवान सादे ||00 म कोई म किपा, म प पमाण किपा, भीर म किगो बानुसत्याग दो गि परस्त यागमन देश छो, अणिम आगे जाकर मामधर होगा। उसन वर्मत पगमे ऐदरिया ॥८॥ (२) मिट होनेक बार बाद ना शाम पाई वा कपन हो, पाहोरबन हो, बार पाद जो एपन दाबा प्रापः पहितका कारण नदी पोता। (प्रश्न) साप सी मी! बसोश र म्या पेपयार मेय। प्रथम गार पापी आम्पो ! बते और नशे क्यो। तने पमाय फेम! २२८ मर, मपर १९१० (उचर) बाबर मापदी (माप उप्पपी) सर सपी भरधामपा (भौमत् पुरुषांचममापी), यश रया सद्यापी २२९ पाणीमा, मात बदौ १ भौम १.१० " जान पहा कि महा एक अभिप्राय हो; प्रधश पोहा हो अपना म्या, परन्तु प्राध एकही। शाम बारिके शानसे निस्ताप मह, परतु निस्तारा अनुमचानसे है। पार पर पुगत मारणपणे मिभावना नारदमे मा मेरमना परवानीने तेजान मला एक प्रदेणे निरोशन रोने न मम्ग्रेसमामे.॥ नरि पपासाला नी नरिस्म पलपोईनी, मारपतीपुरोपित माय ई स्म या मनवा ॥८॥ १ मा पम भोर उत्तर ऐनौ मनपान र समप्र मूल प्रम म।। र नालनमलमून महरले मागका एक एक मनमा धामीले । परेमानेपरसभाने-मानेर मनगरमा परी । इस म भन्न प्रकारे पप बनणरण वय नरे एकमे मा समाना पादये। मानक ९पारेर भाग। मनपामते (मन पुरग्रेममय) *वम और कहाँ पापा प्रथम एम नए
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२१५ भीमद् पम्पन्द्र [पत्र २१५ २१५ २१. २३८ २५५ सवार्य नहीं है। सिध्येि कहना योग्य है कि वे प्राप केवळ 'सर' से निमुस मार्गमें ही प्रापि करते हैं। जो उस तर वापरण नहीं करता, यह हमें तो अप्रगट गनकी ही इजा करता है। बापर्यकी बात तो या कि फलिकाम्ने यो समयम परमार्पको फेरकर बनर्पको परमार्प बना दिया है। २३५ बबाणीवा, मानपद पदी ७,१९९७ चिच उदास रहता है। कुछ मी सध्यनरी म्गता और जो कुछ भी माता की यनिक मबर पाता है ही मुनाई देता है, तो वह क्या करें ! मन किमी मी फार्ममें प्रापि नही कर सकता । म कारण प्रत्येक कार्य स्थगित करना पाता है। कुछ मी गोपन, भेसन भयषा बन परिषयमें रुचि नही शेती । प्रचडित मतके मकी बात कानमें पबनेसे हवपमें मृत्युसे मी मधिक बंदना होता है। या तो तुम इस स्पिनिको जानते हो, या निसे इस स्पितिका दनुभम मा पचानता है, वपना हरि मानते हैं। २३६ वाणीमा माद्रपद वदी १० रनि १९४७ जो भारमा रमण कर ये ऐसे निम्न्य मुनि भी निकारण ही भगवान्को भफिमें प्राप गते हैं स्मोकि भगवाम्के गुण पेमे ही है' -भीमद्भागक्त । २३७ बाप्पाचा भाइप गरी ११ सोम १९९७ जबकि बीवको संतका संयोग नही तपतक मतमतांतरम मम्पस्य एमाही मोम्म। २३८ बमाणोजा, मानपद बदी १२ मौम १९९७ बताने योग्य तो मन है कि यो सत्तरूपमें मा स्थिर हो गया है (जैसे ना गाँसुके उपर तथापि उस दक्षाफे वर्णन करमेको सता साभार हरिने पाणीमें पूर्णरुपसे नहीं दी और मेसमें तो उस माणीका मनता माग मी मुस्लिमसे ना सकता है। यह परिम्पिति रम्नेका एकतम कारण पहा कि पुस्पोतमके सम्पमें हमारी और तुमाय वमम्प प्रेम-भकि क्सण यस प्रेम- मधि परिपूर्ण मास होगी पही याचना करते हुए वधिक नहीं मिलता | सरेषा । २३९ बाणीमा भारपद वदी ११ गुरु १९१७ ॐसत् परम भाम सुमाग्य जैसे महात्मा म्पासमोका मा पा, न ही बब हमारा मो हासभाम-दर्शन पाने पर मी म्पासजी वानन्द-सम्पम महाए मेस्पोंकि उन्होंने हरिरस मापसे म गाया था| दमाप भी पत्र २४ ] चिपिप पत्र मावि मंमा-श्श्यों थर्प यही है। परम प्रेमसे बसा हरिरसका असंापनेसे अनुमव करना ममी कहाँसे वा सकता है। और अबतक ऐसा न हो तमतक हमें नगत्में की एक बस्तुका एक अणु भी बन्छ मगनेवाग मही। बिस पुगमें भगनान् म्यामजी पे वा पुग दूसरा था, यह कमियुग है। इसमें हरिसम्प हरिमाम, गौर हरिबन देसनेमें नहीं पाते, सुनने सको भी नहीं जाते; इन तीनों से किसीफी भी स्पति , ऐसी कोई मी पौत्र दखनेमें नहीं पाती। सव सारन कलियुगसे घिर गये। प्राप सभी मीच उन्मार्गमे प्राति पर ये, भपका स्मार्गके सन्मुख घटनेमाले जीन टिगोचर नहीं होते । कही कोई मुमुमु रे मी, परन्तु उने अभी मार्गकी सन्धिकटता प्रास नहीं हुई है। निफपटोफ्ना मी मनुप्पोमसे घसा हीसा गया है स्मार्गका एक भी मच बार उसका सौगोंधश भी किसी मजर महीं पाता, केरख्यानका मार्ग सो सर्वया मिसन ही हो गया। कौन जाने हरिको क्या इच्छा है! ऐसा कटिन का तो बभी ही देखा ।। सर्वपा मा पुष्पबारे प्राणियोंको देसकर परम अनुकंपा उत्पन्न होती है, मार सगकी न्यूनताके कारण पुष्ठ मी वा नहीं उगता । बात बार योपा थोपा करके करा गया है, तो भी ठीक टोक शम्दोंमें कहनसे अधिक स्मरणमें रहेगा, इसलिये करते हैं कि बहुत समयसे किसी के साथ बर्थ-संवत्र भौर काम-सम विउकुस बिछा नहीं ममता । वय तो धर्म सबर और मोझ-मंत्र भी मम्झ नहीं लगता। पर्म सबप भार मोश सबध तो प्राय योगियों को भी मचा उगता है, भौर हम तो उससे मी रिकही गना चाइ । बासमें तो हमें कुछ मी षम नहीं मगता, भार यो पर अच्छा सगवा भी। उसका वत्यन्त वियोग है । मधिक स्पा छिौ । सहन करना ही मुगम है। २४० बवाणीभा भासोन मुरी ६ गुरु १९९७ १ 'परसमप' के गाने बिना 'स्वसमय' नाम लिया , ऐसा नहीं कर सकते। २ परदन्य' के गाने बिना 'स्वाम्प' मान लिया है, ऐसा नहीं कर सकत । २ सम्मदिसूप्रमें प्रीसियसेन Pाकरमे पारिरिकन बबन मार्ग ? उतमे नयबार है, और बिक्ने नयभार है उतने ही परसमप हैं। १ अक्षयमगत कपिने कहा फर्चा मरे वा ऐ कम, ए ऐ मरा ममनना मम । मा से मीर वा फर्चा हरी, मात शिष ता बस्नु गरी । संछो नीष नेतुं ण नाप, एम की मम्न सकपा आय। - परि तानेका मात्र मर बार तो पर्म र ज्यवारमा मम्मन मर्म । पदिन् गोरा र पायर है वो बस मी रूप है। न ही जीव है भौर री माघ । एमपम भत्रा' नाम सरफ मया भीमद् रामवाद [पर २४ २४५ ॥ तुम भेग मी, यो में जानते है उन गति सिमाम अधिक योगोंको, हमें माम, स्थान और गोले बताना नही। एकसे बनत बोजनचीमा एक है। २४४ बपाणीवा बासोब बी५,१०१७ मादि पुरुप सेस सगाकर गरे एक वरमति सिवाय नया पुरामा तो हमारे हो! और उसके सिमने प्रिवना मन काश मी पाँमी तो समी पुस नया है, और समी का पुराना है। २४५ माणामा, नासोज बदौ १. सोम १९९७ (१) परमा-विषयमें मनुम्पोंध फा-पहार अधिक पसता है और हमें का मनुए नही भाव सकरण मापसे उत्तर तो किसे ही नहीं जाते, ऐसी हरिमो वौर में मा मात्र प्रिय मोरे (२) शम्से प्राति है, और यह दशा वमौ मात समपतक रोगी । उस समयका वयानुसार मपि करमा पोम्प समाता है, इसलिये किसी भी प्रसगपर पाबारिकी पॉप मिलने परिनिम्मो नाप गया परंप न पी गाप, मयमा कुरा उत्तर न Pया नाम, है करना पोप ममी, ऐसा निश्चय करके ही हमसे परमभार रखना। तो उसके किये २४६ पहाणामा, वासोम पदौ १९९५ (१) यो स्थिति यही मात्र भोर पो रूप है। भले बाप कम्पमा करके दूसरी र का पति पपा पाहते हो तो सह.. हो। विमंग पान-वन पदनिमें माना गपा है। इसमें मुख्य प्रपोंने सिर्ममार्गका बोध Pपा, उसके सम्यक् होनेके सिपे स्पार मुद्दा वामपकता है। स्यात् मुटा बसमस्थित मामा । राजामको नपेशा सलपस्थित मामा को शिक्षा है -हर-सरे लिये मैं ब्लुमबसे हो करमेमे पछ| (१)स कामें मेरा मन्म ना, मायूँ तो हास्यपको और माने तो एण्यापक मोरे (५) मा कोई पालन नहीं पा जिसे बाँपनको मरत हो। जिसके सगमें पार एका प्रसि पापा कारती मी, ऐसे भाव इस शामें भूनता हो गई है। विकास किरण मारमा परंतु इस तय भमान रस्तो । होममाण। (२) पुनम है- पत्र २४७, २४८, २४१] पिषिध पत्र मावि संपार-२५याँ पप (५) परि रानी दी मोम फर राको ता राम पुन्छ पा माओगे। पिपरो गोगे है। मुझे बमुमय है। सप करता है। यधार्थ पाहता है। निफ मानो । इस सम्पफे मधमें पुन्छ कुछ किसी स्थरमर सि साठा है। २४७ पयाणीवा, भागोम पदी १२ गुरु १०४७ ॐ पूणकामचित्तको नमो नमा भरमा नक्ष-समाधिमें । मम वनमें से एक दूसरेफे नामारमो धनुफामरोद पुछ किया परपी। इस स्थितिम मुग दोनोंक पत्रों का विस्तारपूर्वक और रस्तोपम्प उच्चर फेरो जिम्मा जाप, याम्दी पदो । निमफा धर्ममें दी निपात , पेरोइन समशुमकी दशा वार राति गुगको रमरण, रम्पनी योग्य ६, भीर मनुकरण करमे पोप है। मिरारो पफ समयके लिये मी मिह म दो, इस सरमसे रांगगे दी बनेपा है; परम्त पद तो हरिपाक बाधीन है। फयियुगमें रसगफी परम पानि दा गई है। कंपार अया भा है। इस कारण रगफी अपूर्णताका बीनको पपार्थ भान नदी कोता। धम राब परमार्थ पिपपों की प्रतिम रहते हो, पड सिपना । फिपी एम मही फद हुए परागक विषयमें विस्तार पनि मिलने की इस थी, उरामा मी निरोष फरमा पड़ा है। पद प्रसंग गंभीर होने कारण उराको इराने पातफ दयगे दी समाये । पर उमस है कि करें, परन्तु तुम्हारी सगगारिके मिरने पर करें ता परें । २४८ आणाभा, भागोग पदी १५ शुक्र १०५७ भी समाप भी... विरहको बेदमा में बपिफ रहती । क्योकि पौतगत शिप है। जम्प रंग पहुत उदासीनता है। परत परिठापा भनुसरण परक प्रसंग पाकर मिरगे इना पाता ६, वीर उस इप्डाफो सुम्पायफ मानये है, ऐगा मही है । मतिबार सरांगों रिह रमनेको छ एमापक मानमेमें घमारा Aपार मदी रहता । श्रीहरिको बोधारा विषयमें दग अधिक स्वतंत्र है। २४९ धाःप्यानका प्याम परमेया अपेक्षा धर्गप्यानमें प्रति Bाना, पदी भेपम्फरार निसरे किये भासप्पानफा म्यान फग्ना पाता हो, बहोरी पा तो मनको उठा मुना पादिय, नपा उरा इसको कर राना पाहिय कि विरासे पिरक हुवा पा सके। प्पर पीपक रिय पद्धत महा दोष । पट निराकार हो गया है, उस मार्गका प्रम पाना पात गुरम।
वर्ष २५वों २५७ बागावा, सर्दिक पदौ १९९८ पपपोप बदन सोम करना । समागम होनेपर दो-पार कारण मन मेम्बर वापस बात नहीं करने देवे। वर्मतकालय पि, समागम योगोंही ति और मेक-समा ही प्राय इस कारणच मूष होता है। ऐसी एम प्राप' मे नहीं पता कि ऐसे कारणोस किमी मी प्राणीके उपर ठाम बामे, परम्त हाम्मे मेरो दद्या कोई मी छोकोपर बात करते र त जानी है। वर्षात् मनका कुरा पता नहीं पाता। • परमार्प मौन' मामा कर्म हालमें मी उदयमे है, इससे कनेक प्रकमा मौन मी अंगीकार कर रहा है। वर्षात् वधिकतर परमासंबंधी मातचीत नहीं करते। ऐसा । उपप-कालो। कथित् साधारण मार्गसंबंधी गावात करते है, क्यथा इस विषयमें बामोधरा, या परिचयात मौन वोर शून्यता की प्राण कर रस्सा। सतक मोम्प समागम होकर चित्तानो पुस्पका स्वरूप नही जानता, पाता उपर कोर वाम परण सर्वया र नये, और तबतक 'सर का पपारण मी प्रात नमी होना। ऐसी परिस्पिति हानेका कारण, कमें मेरा समागम होनेपर मौत म्पावहारिक और मेक-समा पुत बात करनेका प्रसग येगा। और उससे मुझे गाव गरिबाप सिके मा पाप मेरा समागम होनेक पथात् इस प्रकारको वास्तमि गुप नॉप, से मैले योम्य नहीं समझा। वानन्द, मगति मदो गुरु १९९८ (पैसा भी ) परमसस्प सच म प्मान करते हैं मगमको सब कुछ समय किये बिना इस कामें गोषका ऐशमिमान मिन्ना समय मोरे, इसलिये हम समानधर्मरूप परमम्पका मिरवर पान करते है। जो सत्य मान करता है, पसप ऐ गावा। २५९ बर्य, मंगसिर १५ भौम १९४८ सत् मीसाइजसमाधि हाँसमाधि है। स्मृति पता है। उपपि निल्यापाग-पति होनेसे गुमात्र मी उपाधि भान सुके, पेली रमा महीनो मी समान करते है। Aपार करके पराको विरोधमाना, मनसे किया प्रियको सभात निाचमम्मी मानना।
२५१ २६२] पिविष परमादि समा -र- बार २७१ शनी किले पर चिपचे दानकर प्रति करनने हो कल्पा-निरो । ऐसार । मुफ ने हमें सदा नहीं है । न टनय स्वन्म जम्म, र वही घnl २६० मई, मनिपी ११ गुर. १९९८ अनुक्रमे सपम सनोनी, पाम्यो सायकमाव रे, सपमभेगी फूलरमी, पूर्ख पद निप्पार है। (माना बनेद पिकास) के एफके बाद एक अनच मनुमा कर कनात (बा पनि विद्या मना) a यो नाक पुत्र, टन निर्मड पर लटको संपनहर मटाने प्रा। बफ वचन पनि गर्मर है। पपा स्मरका पात्र २६१ पन्य, परि १९९८ मनुपम सयम सर्मतीमी, पाम्पो पायमाप र, सपपगी योगी, पूई पद निप्पाप रे । देसन सपना मय प्रेरे, पार रेनिग मारे रे, दिवारी मनने समीरनी, पारा सा पराप रे । दमन म यो नरा, वे भोप नमरन फेरे रे, अष्टि पिराविक नामा, सपछि राष्टिन हरे । पागना पोम पो ग्रो, मिनदर मुद ममी रे, मापाचारम सेरना, माग मुगमा । २६२ पम्प, 50 ५, १९९८ सापिक परिषको स्मरण करत दनक विदांच बार टपकरम्नानघ पर स्मने । बोपमाघ पा लमपोलो उत्तन. २६ २ रन्स एप्लेमपाले सरे मैराने सन । टप म्दा गिर सोनप परे। सनसिनाई। सरसर रिचरkut ममरनिय। ४समें ऐसा नपरे, एमिरप पर स्वानरे, मापामेर र स्वस्से परो, दामना मर्म।
मामा म्याद्रपा २५ , १५१ २५११५१,२५४, २५० बम्बई १९९७ यदि पिकी स्थिरता हो तो ऐसे सम्पमें यहि सत्पुरुषों के गुणोंका चिन्तबन, उनके पप- मोका मनम, उनके चारित्रका रूपन, कान, और प्रत्येक पेयका फिर रिसे मिभ्यासन हो सकता हो, तो इससे ममका निम्म यस्य हो सकता है और मनको नानेकी सपमुष यही कसौटी है। ऐसा होनेसे ज्याम क्या है, या समसमें वा पापगा; परस्तु उदासीनमाषसे निक-स्थिरताके समयमें उसका भूपी माम पवेगी। २५१ बम्बई, १९०७ १ तदपको बष परिणामसे मोगा माय, तो हो उत्तम है। २ दोके में एनेबाम बस्को कितना भी क्यों न में, फिर मी नहीं जाती, पौर भेदनेसे भेदी नही गासी "-~ौम्यापारंग । २५२ बम्बई, १९१७ भारमारे लिये विचार-मार्ग बौर मरिमार्गको बाराधना करना पोम्प है। परन्तु बिसी विचार-मार्गको सामर्प नही उसे उस मार्गका उपदेश करमा योम्म नहीं, स्यादि जो रिसा पर कही। भी स्वामीने केवदर्शनसबंधी साबो शका किसी ससे गोपी है। दूसरी तसी बातें समा नेके का ही उस प्रकारको शंका समाधान हो सकता है, पपका प्राय उस प्रकारको समाने की योग्यता बस्तीहै। हाम्में ऐसी शंकाको सक्षिप्त करके अपना सास्त कर निमेष निकट वाहमार्गका विचार ही पोम्य है। २५३ वाणीमा कार्तिक १ गुरु १९४८ का विपम मा गया है। सर्सका योग नहीं कर पातरगता विशेष है, इसलिये कही मी साता नही मर्यात् मम की मी विमति मही पासा | बनेक प्रकार निरगना तो हमें नहीं है, तयापि निरन्तर समग नही पही सो मा जम्ममा मेक-संग मला माही भगवा । २५४ माणीमा कार्तिक सदी . रवि १९४८ पार यो निया, बप, तप नया शर-मापन करके भी एकहो कर्म सिर करना है, और पए पाहिजगत्ये विस्मृत कर देना, और सबके चरणमें राना। और इस एक ही पके उपर प्रति करनेसे गावको ससे स्पा करना मोम्म है और क्पा करना क्योम्म है, यह बात समझमें मा माती,अपना समहमें गाने माती है।
पर २५५ २५] पिपिप पत्र मादि संभा-२५पों पप इस छलके समुस हुए बिना नप, तप, भ्यान अपना दान किसीकी मी पापोप सिधिनी है, पौर अबतक यह मही तबतक भ्यान वादि फुग मी काम नहीं है। इसलिये इनमेंसे वो जो सावन हो सकते हो उन सबको, एफम्मकी-मिसका उम्छेस हमने ऊपर किया है पानि होनेके लिये, करमा चाहिये । बप, सप बापुस निषेप करने योग्य नाही, तयापि वे सा एकम्झकी प्राप्ति के छिपे ही हैं, वोर इस के बिना जीतको सम्पप-सिद्धि नहीं होती। अधिक स्पा करें ' मितना उपर का उतना ही समानक सिये समस्त शाम रखे गये है। २५५ बाणीचा कार्तिक दी ८, १९४८ किसी भी प्रकारका दर्शन से, उसे महान् पुरुषोंने सम्पदान माना है- ऐसा नए समाना चाहिये । पार्षक पपाप-पोष प्राप्त छनेको ही सम्यमान माना गया है। निमका एक धर्म ही निवास है, नमी उस भूमिकामें नहीं पाये । दर्शन बादिकी अपेक्षा ययार्थ-बोध श्रेष्ठ पदार्थ है। इस बात के करनेका यही अभिप्राय है कि किसी भी तरकी कल्पमासे तुम कोई भी निर्णय करते हुए निरत होगी। ऊपर मो कपना शम्दका प्रयोग किया गया है सवर्यम है कि "हमारे में उस समा- गमको सम्मति देनेसे समागमी छोग बस्तु-वानके सबध बोकुल प्रमपण फरसे में, अयथा बोध करते सी हो हमारी भी मान्यता है, वर्षात् निसे हम सत् करते है, उसे मी हम हमें मौन बनेके कारण उनके समागमसे उस शानका बोध में प्राप्त करनेको ला करते हैं। २५६ नाणीमा, कार्तिक मा ८ सोम १९४८ यदि जगत् वामरूप मानने वाये और नो कुरामा करे यह ठक ही मान में लाये, सरके दोष देसनेमें न वायें, अपने गुणोंकी उतपता सहन करनेमें बाये, तो ही इस ससरमें पना योग्य, प्रकारसे महीं। , वर्ष २५वों २५७ बमामात्रा, कार्मिक सदी १९९८ पपापोम्पदन साधर करना । समागम होनेपर दो-चार कारण मन सोकर बारसे बात नहीं करने देते। मनतकासका ति, समागमी लोगों को रति गौर सकसमा ए प्राप इस कारणका मूछ होता है। ऐसी दशा प्राप मेरी नहीं गया कि ऐसे कारणोस किसी मी प्राणाके पर काम बामे, परन्तु इसमें मेरी दगा कोई भी मेकोचर मात करते हुए कमाता है अपात् मनका कुरा पता मही चम्प । परमार्प मौन' नामका कर्म हा मी उपमें, इससे अनेक प्रकार मौन मी बंगाकार कर रस्सा है बर्षात् अधिकतर परमार्पसबंधी मातात महीं करते। ऐसा उदय-माउ है। मनित् साधारण मार्गसबभी बातचीत करते हैं क्यपा इस विषय, वाणीघरा, पपा परिचपटारा मौन और शून्यता 0 प्राण कर रस्सी है। चक्क पोम्य समागम होकर पित्त बानी पुस्पका स्वस्त माही बानता, तबतक उपर कोए तीन कारण सर्मथा दूर नहीं होते, और तबतक ' सत् का पपा कारण भी प्राप्त मही होता । ऐसी परिस्थिति होनेका कारण, हमें मेरा समागम होनेपर भी बहुत म्यापारिक और मेक-मजा- पुछ बात करनेका प्रसग येगा, और उससे मुझे बहुत वापि ; माप किसीके मी साप मेरा समागम होने के पश्चात् इस प्रकारको बाटो प गाय, इसे मैने मोप नहीं सम्ता । । . , २५८ मानन्द, मगफिर मुगुर १९९८ ( पसा बी) परमसस्प पसका इस प्लान करते हैं भगवान्को सब कुछ समर्पण किये बिना इस काठमें बोलका शामिमान मिटना समर मही, इसलिये हम सनातनधर्मस्म परमस्य निरन्तर ही पान करते है। गो सत्पका पान करता है, पम्प हो गावा। २५९ वर्मा, मगसिर मुदी १४ मन्म १९९८ *सत् मीसहजसमापि या मापि । स्मृति यता है। उपापि निष्पापता । मगधि होनेसे म्णुमात्र मी उपाधि साम हो सके, ऐसी एसा मही है, वे मी सहन परते। विचार करके गरुको फिर दरसे समसना मनसेयर निधो साझा निश्चय ही मानना।
पत्र २५, २११, २९२] , पिविष पत्र मादि संग्रह-२५वाकर्ष शानीद्वारा किये हुए निश्चयको नानकर प्रवृति करनेमें ही करपाण है-फिर तो जैसा नहार । सुधाक लिषयमें हमें सन्देह नहीं है । तुम उसका सम्म समझो, वीर तब ही फल मिझेगा। २६० बमई, मगसिर बदी ११ गुरु १९९८ अनुम्मे संपम स्पर्मतोमी, पाम्यो सायफमाप रे, संपरभणी फूटेमी, पूजू पद निप्पान रे । (मारमाको बभेद विद्यनारूप) संयमके एकके बाद एक फमका अनुमान करके क्षायिकमाल (जब परिणतिका त्याग)को प्रास नो भोसियार्थफ पुत्र, उनके निर्मग चरण-कमलको सयम श्रेणीम्स फोसे पूनता । उपरके वमन बतिशय गमार है। यपार्थबोध स्वरूपका यथायोग्य २६१ बम्बई, पौष मुदा । रवि १९९८ भनुरूप संयम स्पर्मवीमी, पाम्पो सापकमार रे, सयममणी पूसरेनी, पूर्व पर निप्पाप रे । दर्मन सकसना नय गरे, आप रो निग मारे रे, दिवकरी जनन समीरनी, पारा देह पराम रे । दर्भन मे यो जूना, है ओप नमरने फैर रे, घटि पिराविक तहमा, समकित रष्टिने हरे रे । योगना पीम इस प्रद, मिनपर शुद मणामो रे, मारापारम सेवना, मन पग उठाया रे । २६२ बाई, पौष मुरी ५, १९९८ सापिक परिपको स्मरण करते हैं मनक विहाफी मात मन है । फरसनदासका पत्र सममें है। पोपसम्पका यथायोम्प तपणे भरे ये देना ठार मै १५ मनुवारण १ समस्त नागोजपम्पत समाह मौरस निगमायमै मन ये। वप मनुष्यी हिलारीपनाम पायपरमे। हम मित्र मिस न रिपई पाते। पर मोच कर रिना देते IA भार पीन मेर समशिनि । समे योगका पौर प्रवरे, उप मिस एम प्रशाम करे, पारामा भोर मारने उद्वेग रो, बहरीमा प्रातिचा मार्ग है।
भीमन् पम्वन्द्र [पत्र २५५ २५४ । २६३ बर्मा, पौष मुदौ ७ गुरु १९१८ पानीकी मास्माका भरसोफन करते है। और रेस ही हो मात बाप स्पति लपमें है। अपनी इस मी धर्म है। गुस्स्वनुहमाम वो बात लिखी है, मामी सस्पहै। कर्मा उदय मोगमा पाता, मौ सत्य हो। वापको पुन पुनः नवियप से होता है, पर मी मानते हैं। वापको दियोगका भसप ताप राव है, यह मी मानते है । बारा प्रकारसे सग; बना योम्प है ऐसा मानते हैं, तथापि हायमें तो ऐसा ही सहन करमा पोम्प माना। बारे जैसे देश कारमें यथायोग्य यना--पपायोग्य बनेको होइन करमा---पही उपश है।मुम सपने मनको कितनी मी चिन्ता क्यों न लियो तो मौ हमें तुमारे ऊपर से नहीं होगा। बानी मन्पपा नहीं करता कम्पपा रमा उसे सूसता मा मही, फिर दूसरे उपायको इसा मी मी परमा ऐसा निवेदन है। कोई इस प्रकारका उदय है कि अपूर्व पावणगता होनेपर मी म्पापारसकी कुछ प्राति कर सकते है, तथा इस साने-पौनेको प्रति मुस्किम्से कर सकते है । मनचे की मी वियाम नही मिलता प्राप करके पर पहाँ किसीके समागमको इस मही करता । कुश मिसा मही पा सकता । मरिक फरमार्य-पाम्प बोलनेको इम नही होती । किसी के पाए भन्नों के उपर माननेपर भी लिस नही सकते, पित्तका मी वधिक सग नही मारमा वाम-मानसे पती है। प्रति समपमें वनत गुणनिशिश नाममा पता गाता हो, ऐसी दण है। जो प्राय समक्षनेमें मही नाती मपया इस मान सके ऐसे पुस्पका समागम मही है। भोवर्धमानको बारमा सामाकि स्मरणपूर्वक प्राप्त जमा न पा, ऐसा माम्म होता है। पूर्ण बातांगका-सा मोष हमें स्वाभाविक हो स्मरण हो जाता है इसलिये . पाकिम ' पदार्थ को समझो । ऐसा विभानेमे बौर कोई दूसरा वमिप्राम म पा । . . २६४ कई, पौर पदर्श ११ सोम १९९८ स्मस्म स्वमामें है। नाके परण सेवनके बिना समन्तातक भी प्रास न हो सके, ऐसा पर्गम मा है। मात्म-सपमका स्मरण करते यते । पपारूम मौतरागाही पूर्णताकी र करते हैं। हम और तुम हामें प्रत्यक्षरूपसे वियोगमें हा करते है । पर मा पूर्वनिरवनय कोई बम प्रबंध सदमे होने केही कारणसे तुमा माश्म होता है। (२) हम कभी कोई काम्य पद अपचा परण मिसकर मेमें और पदि वाफ्ने सन्मानपत्र पापा नपा मुना मी हो तो मी उनें पूर्व समझें । हम प तो हमें पपायाप ऐसा इस करनेको म करने जैसी दशा नी। मोबोषस्सस्मका पपायोम्म पा २९५, २५५] पिविष पर भावि संप्रह-ओवर्ष २६५ बाई, पौष पदी १ रवि १९९८ एक परिनामके न करता दर दो, दोर परिनाम एक दर्ष न परत है। एक फरवत्ति दो वर्ष कई न करे, दाइ फरवृति एक दर्व न फरत है। मीर पुदगल एक सेव भमगाही दान, अपने मपर्ने रूप फोउ न टरस, मह परिनामनिको करता है पदगठा चिदानन्द पवन समाप आपरत है। (समयसार-नाटक) 1 २६६ बई, पौष कदा ९ रवि १९९८ एफ परिनामक न करवा दरप दोर (१) मस्तु अपने सम्पमें ही परिणती है, ऐसा नियम है। जी जीररूप परिणमा करता है, और या बारूप परिणमा करता है। बीका मुस्प परिणमन पेल्न (शाम ) सम्पद और चाका मुख्य परिणमन बाल सस्प है । औषका जो चेतन परिणाम है किमी मी प्रकारसे ना पाकर मही परिणमता, वीर नाका मो बहस परिणाम है कमी चेतन परिणामस नही परिणमत्व ऐसी बस्तुको मर्यादा है और घेवन, वर्षठन ये प्रकारके परिणाम तो मनुमवसिव है। उम में के एक परिणामको दो द्रव्य मिठकर नहीं कर सकते मर्यात् गीत वीर या मिटकर केबल चेतन परिणामसे परिणम नही सकते, अयमा केपठ बचेतन परिणामस नहरी परिणम सकते। जीम पेतन परिणामसे परिणमता है और या बचेतन परिणामसे परिममता है, ऐसी वस्तुस्थिति है। इसलिये निनमगवान् करते है कि एक परिणामको दो इम्प नहीं कर सके । यो गो ट्रम्प है, पास्म अपनी स्थिति होवा, वीर अपने समान ही परिणमता है। दोप परिनाम एक दर्दन पर इसी तर एक द्रव्य दो परिणामोमें मी नहीं परिणम समता, पैसा बसुम्पिति है। एक गौस म्प पेतम वीर अपेतन इन दो परिणामोसे नही परिणम सकवा, मपण एक पुस दम्प जप- तन पौर पतन इन दो परिणामोंसे मही परिणम सकता के सर्य अपने ही परिणाममें परिणम सकता है। अन्न पदार्पम पेतन परिणाम मही होवा, और चेवन पदार्पमें अपेतन परिणाम नही हराया इसउिप एक प्रम्प दो प्रकारके परिणामोसे नहीं परिणम समता, मर्याद दो परिणामोको पारण महार सकता। एक करवि दोर दर करई न करें इसलिये दो दम्प एक क्रिया कभी भी नहीं करते । दो सम्पांच सणा मिट गाना योग्य म, पोंकि पति दो मर्यो मिउनेसे एक दम्प उपभ होने सगे तो बस्तु अपने सरपना त्याग - प्रीम परवद्र [पार कर दे, वीर ऐसा तो कमी मी हो नहीं सकता कि बस अपने स्वइपका हो या स्पाग कर पब ऐसा नहीं होता तो दो इम्प सपा एक परिणामको प्रास ए बिना एक भी किया। कर सकते हात कमी नही कर सकते। दोइ करवि एकार्य न करतो इसी तप एक इम्प दो क्रियामोंको मी धारण नहीं करवा क्योंकि एक समपमें दो ठा महीरो सकते, सम्पि- भीष पुगस एक सेव-मवगाही दोन माल वीर पुनम्मे काचित् एक क्षेत्रको रोक रस्ता हो तो मी- मानें भपर्ने म पोर न परतुरे कोई अपने अपने स्वबपके सिवाय दूसरे परिणामको प्राप्त नहीं होता, और इसी कारण कहा गया है कि- पर परिनामनिको करता है पुगस देहाविसे गो परिणाम होते हैं, ठमका कर्ण पाठ क्योंकि ये देह बादि पाई। जा परिणाम वो पुनछमें ही होता है । अब ऐसा है तो फिर मार मी नौर-सरूपमें एयर इसमें अब किसी दूसरे प्रमाण की भी बालस्यकता नही ऐसा मानकर करते हैं कि- पिदानंद पेवन प्रमार मापरतुरे कम्पकाकि काने मिप्राय पो कि परितुम इस तय पस्तुस्थितिको समझो । सपी निन-स्वत्पमान गिर सकता है और तो ही अपने स्वरूपका तियेमार प्रगट हो सकत विचार को स्थिति भी ऐसी हो। मात गहन बातो महा संक्षेपमें चिहै। ( पापि ) मिसको यपा पोष है उसे ते मासानासे हो समहमें गा मापगा। इस बावपर कईबार मनम करनेसे बहुत कुल योग ऐ सकेगा। (२)वित प्रापः करके मनमें गता है, वामा तो प्राय मुलस्वरूप जैसी लगती है। रागता विशेष है। अंगारको तय प्रापि करते है।सरोंका अनुसरण मी करते है । नगरसे उदास हो गये है पस्तीस संग वा गये है। दशा किसीसे भी कर नही सकते; करें मौतो ससंग महो। मनको जैसा चाहें पैसा किरा सकते है। इसीसिपे प्राधिमें एसके सिा प्रा रापूर्वक प्राधि म हो सकने सी दशा और ऐसी होनी पती-परिषप म मगता मगदमें साध महोते, त्यापि किये दर कमी मिरा करना है इसरिये निरूपाप। यथार्थ बोपस्वामका पयामोम्प ११ २६७ बम्बई, पीर पदी १० गुरु से बने से सरिचारका परिचप करमेके लिये ( उपानिमें लगे पनेसे) बिससे योम्प र प्राति म होनी हो, उस बातको बानियाँने में रखने पोप गई है।
पा २५०,२५८ ११९ २० पिपिप पत्र मादि संग्रह-त्रो वर्ष दूसरे काममें प्राति करते हुए मा बन्फ्लभावनासे मर्ताव करनेका भम्पास रखना योम्प है। पैरम्पमानासे मषित शामपारस भावि प निरन्तर चिंतन करने पोग्य हैं । प्रमाइमें राम्यको पात्रता-मुमुक्षुताको मद करना योग्य नहीं, ऐसा निमय रसमा योम्प है। भीयोमस्वरूप २६८ बई, माष मुदौ ५ दुष १९९८ मनतकारसे अपने स्वरूपका स्मरण एनेसे चीनको न्यभाषा भम्यास हो गया है। दार्थ- काढतक ससगमें गकर योध मूमिकाका सनम होनेसे यह विस्मरण और अन्यमायका मम्पास र होता है, वपात् क्पमासे ठासीनता प्राप्त होती । इस कासके पिषम होनेसे अपने रुपमें तम- यता पनी कठिन है, क्यापि समगका दीर्घकालीन सेवन तन्मयता प्राप्त करा सकता है, इसमें सन्देश नहीं होता। निन्दगी बप है, और बनात धनन्त है, सत्यात भन है, वौर तृणा भनन्त है माँ स्वरम-स्मृति सभव नहीं हो सफती, परन्तु यहाँ मनात अप है, और जिन्दगी वामत , तथा तृष्णा बम्प है, अपना ही महीं, और सर्वसिदि है, यहाँ पूर्ण स्वरुप स्थिति होमी समग है। सम्प पैसा मा बाम बासन-प्रपत्रसे वाहत होकर पा पला बा गा । उदय बहमान है। २६९ बर्मा, माम मुदौ १३ मुष १९४८ (राग-प्रमाती) मीपे नगि पुग्णसी मैच पुमास फदा, पुग्णसापार नहीं मास रगी, पर वो ईभ नहीं मपर भर्पवा, बस्नुपर्मे करा न परसगी । (भौमुमतिनापनु स्तबम -देवपदवी) २७० बी, माप बी २ रवि १९९८ मस्पन्त ठास परिणामसे बनेगाने पैतम्पको, पानी छोग प्रारिमें होनेपर यी पैसा ही रस्ते है, फिर मी ऐसा कहा गया है:- मापा दुस्तर है, रैती, अणभर मी एक समयके लिये मी-सका लामामें स्थान देना योग्य नहीं, एसो तीन दशा बामेपर बापत समास परिणाम उत्पम होता है और ऐसे उदास परिणामको प्रति (गास्पपमेसे पुरू) भाष-परिणामी का मामे पोग्य है। गे गोग-सबूपमें स्थित है, या मुस्किलसे इस तपकी प्रापि कर सकता है, क्योंकि उसको तो परम पम्य है। विदेशीपनेसे गो रामा नक्की प्रापि थी, पर पम्पन्त ठाम परिणाम के कारण ही थी, प्राय: १६ पानी गिरेगे पत्र में १. (१) मनुमाया २८ [पत्र २. श्रीमान उप समारत मामामसे हुई थी, तापि मायाफे किसी दुरत प्रसंग से समझमें मात्र परिक चित् रोशापमान होती है, जैसे ही परिणामोका रोमपमान होना समय होनेसे, प्रमेक मापाके प्रसंगमें निसकी सपा ठास ववस्या पौ, ऐसे निरगुरु अथपकी धरण साकार करके कारण, मायाको मासानास पार कर सकने योग्य हो सके क्योंकि महात्मा के बारम्बनका ऐसा ही प्रामापी। (२) (१) पहि हप और हम ही सीठिक ठिसे माधि करेंगे वा पिर मोफिक रिसे प्रति घंन करेगा? मामा एको भयमा बनेका कोपा वकर्ण जगत्का ई का है अपना जगत् स्मत ही उत्पम मा है। पारि बातें क्रमपूर्णक सरग होनेपर ही समनने योग्य है। ऐसा समझकर इस रिपपमें इसमें पारा नही मिला। सम्पन् प्रकारसे जाना वा पिसास रसमेका फल निश्चमसे मुति है। संसारसपी तुमें गो गो चिंता है, उन विताओंको प्राप' हम जानते है, और इस विषममें में गो वमुक अमुक विकल्प हा करते है उ मी हम जानते हैं। इसी तब ससगके रियोगके कारण तु परमार्थ-पिता मी या करती है, उसे मी हम जानते है दोनों ही प्रकारके शिल्प होनेसे तो वाकुलता-म्यानुया रहा करती है, इसमें भी बारचर्य महो माझम होता, अपना समक्वा नही माम हाती । कर इन दोनों ही प्रकारोंक लिपपमें जो कुछ मेरे मनमें है। उसे तुरे शामों में नारे मिडनेका प्रयम किपा है। ससारसंबर से तुम्हें पिता, उसे म्पों पोप उपमें बापे, स्पोपों ठसे बेदन करना-सहम परना-पहिये । इस पिताले हानेका कारण ऐसा कोई कर्म महीबिसेदर करने के लिये बानी पुस्पको प्रावि करवे हर बाधा म माये । सबसे पयार्य बोधको पति है, मासे किसी मा प्रकार के सिदि-पोगसे अपना विचार पोगस निवसी बपना परसबपी संसारिक सापम न करनेको प्रतिवा के रस्सी बार यह पार नहीं पड़ता कि इस प्रशिामें पाक एक पठमरके लिये भी मंदवा भाई सुपारी yिa हम जानते हैं, और हम उस पिताके किसी मी मागको जितना बन सके उवना देदन करना चाहते है परन्तु ऐसा वो कमी मा मही र ससेहो।में मी वाय- का ऐसा हो यता लिहा इदि-मोग ल्यमें नही है। प्राणामात्र प्रापा बाहार-पानी पा गाते है, तो पिर तुम जैसे प्राणीको मुटुमके सिपे इससे AR परिणाम मापे पेमा सोचना कदारि पोय महो। मुटुमको बार बारमार बीचमें बाकर जा बागमता पैदा करता है, उसे चाहे तो वो अपना म यो तुम्हारे लिये दोनों । समान | पोति विसमें पाया गपापी उममें तो यो हो सके उसे ही पौरप मानमा, यो पनि सम्पर है। हमें जो निम्पि नामकी समाधि, मामाकी सहम-परिणति य कारण है। भामा सो सर्वपमें ता ममें प्राप' करके निसिपता ही एना संमन, स्पोकि अन्य भागमें मुपान मा यि मी प्राधि नही है।
पा २.१] पिपिच पर मादि संप्रह-२५ पौ वर्ष ૨૮૧ और निस दर्शममें पंच, मोशकी पपार्य म्पपस्या पयार्यरुपसे कही गई है, वह दर्शन निकर मुधिका कारण है और इस यथार्थ म्यवस्थाको करन योग्य हम पर किसीको विशेषरूपसे मानते हैं तो बह मीतीर्यफरदेव ही है। इन वीर्यकरदेवका गो बतर भाशय है, यह प्राय मुम्यापसे परिवानफस फिसीमें, इस क्षेत्रमें हो, तो यह हम ही होंगे, ऐसा हमें मपसे मासता है। पोंकि हमारा जो अनुमय-मान है उसफा फस मीसागता है, और पोतरागका कहा मागो भुतवान है, वह भी उसी परिणामका कारण माश्म होता है, इस कारण हम उसके सबै वास्तविक भनुपापी है-सपे अनुपाया है। किसी भी प्रकारसे बन और पर ये दोनों ही हमारे लिये तो समान है, तथापि पूर्ण गौतराग-भावके लिये वनमें हमें बना अधिक रुचिकर जाता है। मुस्तकी इच्छा मही है, परन्तु बीतगगताको इच्छा है। जगत्के कम्पाणके लिये पुरुषार्थ करनेके विपपमें लिखा, तो उस पुरुषा करनेकी इच्छा किसी प्रकारसे पती भी है, तयापि उदयके भनुसार घटनेका इस आश्माका समान जैसा हो गया है, और क्सा ठ"य-कास हातमें समीपमें माइम नहीं होता; रि उसको उनी पर पैसा कार ले माने सी हमारी दशा नहीं है। " भिक्षा मांगकर गुगर पछा गे, परन्तु मेदसिम न होंगे; शामके बनन्त आनन्दके सामने यह दुमणमात्र है" -सभाशयफा जो वपन लिया है, उसु रचनको हमारा ममस्कार हो । पेमा पचन नाम्तरिक पारपताफे बिना निकलना सभव नही है। (२) "जीम पौनसिक पाप नहीं है, पुद नहीं है, बार उसका पुद्रस आधार नहीं ६, और पर पुरके रंगवाठा मी नहीं है। अफ्नो सम्प-सताके सिवाय यो पुन्य है, उसका यह स्पामी मही है, क्योंकि परका ऐपर्प स-सपमें नहीं होता बस्नुपकी शिसे देउनेपर बह पमी मी परसंगी भी मही है"म तय " जी नयी पुम्गली " भारिपरका सामान्य वर्ष है। मुंबदुसरूप फरमफम नाणा, निएप एक मानदा र, पवनवा परिणाम म पूज, पतन पर निनचदी रे । (बामरम्पम्नान-मानसम) . . पही समापि । पूर्णशानसे पुत सम्पपि पारपार पा' आपा करती है। परमसत्य प्पान करते हैं। यामी पनी । २७१ बाई माघ पुष १.१८ जहाँ पा भार उपारिको गाउा प्रभारित नाही हा ऐम प्रमागमें समारि रहमा परम दुफर है भार पर मान ता परमानी बिना दानी भापत पनि है । दमें भी अधर्ष यता, पनि प्राय मोदी प्रासिलीमा अनुमा। म भोर नगरानी मगना । निभाने का मामलमानो भायीहारीमती भीमद् पाचन [पा २०२, २५ . निसे पपार्ष बाममात्र समझमें वापा है, वौर पर उसे निपट यता, उसे ही या समाधि प्राप्त होती है। हम सम्पदनिका मुस्स पण पीतरागताको मानते हैं। और ऐसा ही अनुमग है। २७२ बर्मा, माघ दो ९ सोम १९९८ पपीत पतन विमानसों उसति माइ, समै पाइ मपनौ धमाष गरि सीनौ है। सपी भो भी मन नौग सो सो सर सीनी है, मो मो त्यागमोग सो सो समरि दीनी है। सैको म सी गैर, स्पागिरिकों नाही और, पाकी का वर्ण पकारनु नगीनी है। संग स्पामि, मग स्पागि, पान परम स्पागि, मन स्पामि, परि स्यागि, मापा एयीनी है। कैस बहुत दशा है। २७३ बर्मा, माघ पदी १. मौम १९४८ विस समय बारमरूपसे मत नामात लक्स्पा यता है, वर्षात् वामा अपने सरूपमें सर्वप जागृत की बाती है, उस समप उसे 'केवमान होता है, एसा काना योम्य है ऐसा पातीकरण बाशय। निस पदार्थको तीर्थकरने "मात्मा का। उसी पदार्थको ठसा स्परपसे मतीति हो-उस परिणामसे मामा साक्षात् भासित हो तब उसे परमार्थ सम्मकत्व', ऐसा भौताफरका ममिप्राम बिसे ऐसा स्मस मासित पाt, ऐसे पुरनोंमें मिसे निकाम भदा है, उस पुरुषक बाम सम्पमत्व' । मिस गामें ऐसे गुण हों कि मिससे ऐसे पुरुषको बाधारक्षित निकम्म मति प्रक्ष हो, पीत 'मागमसारी है ऐसा मनमगवान् श्रते है। हमाप देह के प्रति यदि कुछ मी बमिप्राय है वो मात्र एक धामापक म्येि ही दसरे प्रयो जनके मि म । पदि दूसरे किसी मी पदार्थ म्पेि अमिप्राप हो तो वह बभिप्राय पदार्पके कि महो, परम्तु मामापके सिपे हो। वामार्प उस पदार्पकी प्राति-समातिमें हो, ऐसा हमें मार नही होता। "बामाव' इस बनिमिषाप कोई इस पनि किसो मी पापक प्राण भएस माग करनेमें स्मरण करमे पोम्प महो । निरन्तर वामव बन्ने बिमाउस स्थिति के बिना-मस पुशपल्स uth पत्र २०४, २०५,२५,९४०] पिपिप पत्र मावि मप्रह-२५पों पप २८० २७४ वर्थ, माघ पी ११ पुष १९९८ मुटता रिपार व्याप, मुदवा कहि करे, मुदतामें घिर में अमृतपारा बरसे। ( समयसार-नाटक) २७५ बम्बई, माय गरी ११ शनि १०१८ मत दशाफे काम्पका जो वर्ष डिम्पकर भगा हबद यथार्थ है। अनुमको स्यों ज्यों सामर्थ्य उत्पम हाती जाती है क्यों त्यों ऐसे काम्य, शप, पाय यापातम्यम्पस परिणमत गाते है। इसमें भापर्पफारफ दशाका वर्णन है। जीवको सापुरुषको पहिचान नहीं हामी भार उसके प्रति भी अपने बसी म्पापारिक पम्पना रहती है। नीव या कम्पना फिम उपापसे दूर हो, सो निमना। उपाधिका प्रसग बाट यताह। सगफे बिना जी रहे है। २७६ बमाई, माप की १: रवि १९४८ मी न री ठार, त्यागिरफी नाही मोर, पाही करा उपपा जु, कारण नबीनो है। सम्पका भान होनसे पूर्णकामता प्रास, इसठिये भर किमी मी नगहमें बुरा भी ऐनके लिये नहीं मा। मर्म मा अनि नपका तो कमी भी प्याग करनेकी इच्छा मही करना, भोर पदों आपण सरप-म्पिनिह पहाँ ताकिर मरा कुछ ही महीं; इसरिय पागका मी जमात मदी दी। इस तर मग फि ऐना, दना ये दानों को निहत गपे ता इमरा कोई मौन कार्य कानफे ठिपे रिना दो क्या । अति जैमा दाना चादिये पमा पा गया तामिर मरी "न रेनको अंगाल पर सस्ती है। इसलिये पमा छा गया कि पहा पूर्णकामता प्रान है। - २७७ बर्थ, माप १.५८ एक क्षगा रिये भी कई अधिपसमा नी पादना, नादि पाना पागा, परमान ऐगा शिलादम्मिका निधन आप। अस्मिा ममाविका प्यान भर भी नही मिला नि भनेकाषण परिवारापनाकाले गाल। गमा प्रमर तणामी नापि र ता मना हरिण मामि pre जानता रह गरि भी कारगर सी पाली मान उमेागमारी।
- मीमांसद [पर १०८ इसरोको पारण करके पापि कोई मान् मीमाता महा मोगी, सन्द नाहि पियोंका पूरा वैभव प्राप्त नहीवा, कई विशेष राज्याधिकार सहित Pन मही विताये, अपने नियके गिने नामपाले ऐसे किसी षाम भापमा सेवन नही किमा, और वमी हाम्में तो मुबारस्पाला पहिला भाग हो भारी, पापि से किसीकी हमें वाममारसे कोई ग सत्पन मही होती, या एक बड़ा वारधर्म मान- कर प्रति करते । और इन पापोको प्राति-पाति दोनों समान मानकर पात प्रकारसे बाद- कम्प समापिका दोबनुमय करते है। ऐसा होमेपर मी बारमार बनबासकी याद वाया करती है। किसी मी प्रकारका छोक-परिचय रुचिकर नही माता की ही निरंतर कामना गा करती है और हम बम्पस्थित दशासे उपाधि पोगमें यते । एक वरिकाम्प समापिके सिवाय दूसरा कुम वास्तविक तसे स्मरण नहीं गता, चितम महीं पता, सपि म यती, वपत्रा कार्य मी काम नहीं किया जाता । मोतिप बादि रिचा वपना बणिमा बादि सिदिको माफिक पदार्प चालकर बात्माको इनका पवित् । स्मरण होता है। इनके द्वारा कोई बात मानना भपका सिर करमा कमी मी योग्य माम नही होता, और इस बातमें किसी प्रकारसे हमें पित्तका प्रमेस मी नही या। पूर्वनिधन मिस मिस प्रकार से उदय आये, उस उस प्रकमसे ० अनुक्रमसे बेन करते बागा, ऐसा करना हो पोम्प मगा। तुम मी, ऐसे बनुक्रममें भले ही पोरसे पोरे पंछमें ही प्राच स्पों म एमा पाप तो मी प्राति करनेका बम्पास एगना और किसी मौ कामक प्रस्गमें वधिक धोकने पर नाका बम्पास कम करना। ऐसा करना ना होना यो हानाको कास्पामें प्रवेश करनेका है। तुम किसी भी प्रकारका उपाधिका प्रसंग मिसते हो, या पापि पाँचनेमे तो वाताजी, तपापि उस रिफ्पका ति बरामी थामास न पाने के कारण प्राप उत्तर लिखना मीमही मनवा से भाप पारे दोष मो या गुण परस्त र भमा करने योप।। हमें मी संसारिक उपाधि कोई कम नहो। तपापि ससमें नियफ्ना नहीं य मानेके कारण उससे पारबाट पैा मही ऐती। उस उपाधिके सदस-पास के कारण हामें सम्पपिका पस्तिल गौणसा सा। और उसके सिपे शोक या करता है। बौतरागमारका पपायोम्प २७८ बर्ग, माम दोकास्तक यपा-मोषध परिचय ऐनेसे बोप-बीमकी प्राप्ति होती है, और पर मोप-बीग प्रापा निश्वप सम्पकाल होता है। विमझगवान्ने हो भईस प्रकारके परिपा की उनमें 'दर्शन' परिपह मामात्र मी एक परिणय कहा गया है। इन दोनों परिषदका विचार करमा योम्प है। पर विचार करनेकी , पर २०१] विविष पन भादि सपा-२५वा वर्प २८५ तुम्हारी भूमिका है। अर्थात् उस भूमिका (गुणस्पानक) के विचारनेसे किसी प्रकारसे तुम्हें यथार्य धोरम प्राप्त होना समय है। यदि किसी मी प्रकारसे अपने बाप मनमें कुछ ऐसा संकल्प कर में, कि ऐसी दशामें वा गोप, अथवा इस प्रकारका ध्यान करें तो सम्यक्त्वकी प्राप्ति हो जायगी, तो बह सकम्प करना प्राय (कानीका सम्म समझनेपर) मिष्या है, ऐसा माश्म होता है। यथार्थ-मोष किसे करते है, इसका विचार करके-अनेक बार Rधार करके-पानियोंने वपनी कम्पना मिशत करनेका ही विधान किया है। अभ्यारमसारका पाचन, प्रवण चार है-या अण्डा है।मयके भनेक मार पाँचनेको चिन्ता माही, परन्तु निससे किसी प्रकार उसका दीर्घकासतक अमुप्रेक्षण रहा करे, ऐसा करना योग्य है। परमार्य प्राप्त होने के लिये किसी मी प्रकारकी आकुलवा म्पाकुलता रसनेको 'दर्शन ' परिपद फरते हैं। या परिपा उत्पम हो तो उसकारक है, परन्तु पनि उसको पीरबसे बेन किया गाय तो उससे दर्शनकी उत्पति हाना संभव। तुम्हें किसी भी प्रकारसे दर्शनपरिपती, ऐसा यदि तुमे गारो तो उसका धीरजसे बेदम फरना ही योग्य है। ऐसा उपदेश है । हम जानते है कि तुम्हें प्राय दर्शनपरिपार है। हाउमें तो किसी भी प्रकारकी भाकुलताके बिना पैगम्य-मानासे-पीतराग भारसे-पानी में -सत्तशाम वादि और एसगका परिचय करना हो योग्य है। परमार्थक सबमें मनसे किये हुए सकम्पके अनुसार किसी भी प्रकारकी इच्छा नहीं करनी चाहिये। अर्थात् किसी मी प्रकारके दिम्य-तेमपुळ पदार्थ स्पानि रिपाई देमे भादिकी इच्छा, मन कम्पित म्यान मार, इन सब सफल्पोंकी से बने से निति करना चाहिये । तसुधारसमें कही हुई भाषमा, गौर अप्पारमसारमें कहा बा आमनिधयाधिकार फिर रिसे मनन करमे योग्प है। इन दोनों विशेषता मानना । मास्मा है, या जिस प्रमाणसे जाना जाप धारमा नित्य है, यह सि प्रमाणसे जाना जाप, आमा कर्ता है, पर जिस प्रमाणसे जाना जाय; वास्मा मोय है, पहनिस प्रमाणसे नामा जाप, मोक्ष है पह जिस प्रमाणसे गाना गाया और उसका उपाय है, यह रिस प्रमाणसे जाना जाप-बह पात बारम्बार दिपारमै पोग्य है । अप्पामसार भयरा दूसरे किसी मी प्रत्यमें या बात ना तो चारनेमें बाधा नही है । कम्पनाका न्याग करके ही पधारमा योप है। जनफरिदापी बात दाउमें जाननसे तुरे कर्म फल न होगा । परम मतिमासे- २७९ साई, माघ १९१८ भांत्रिके कारण समय मामित दवाउन समारी प्रमों और प्रकामे अबतक मापयो प्रेम बना है, वनक जीका मन्ने मत्पमा भामिन सना मर्मभर और मसंग माताप भी पापातप्यापसे भासित होना असमर है। उस पर मगारगत प्रेम अर्ममारगत प्रेमल 1 ૧ भीम प्रसचन्द्र [पत्र २८ , १८१ नहीं हो जाता तबतक मिश्पपसे अप्रमत्पनेसे गरमा पुरुषार्थका स्वीकार करना ही योग्य है, या पात तानों कासमें संदररित है, ऐसा मानकर निफामरूपसे सिसा है। २८० बई, फागुन मुदी १ पुष १९९८ वाम मोर परिणाका न्यो यो मोह र होता जाता है,म्पों म्यों उनसे अपनेफ्मका ममिमान मद पाता माताज, स्पों स्पो मुमुक्षुता माती बताई। नतकापसे मिसस परिचय पग वा या ऐसा पह ममिमान प्रत्य एकरम निपच नही हो पाता। इस कारण तन, मन, पन भावि दिनमें अपनापन बा गया , उन सबको पानी के प्रति वर्पण किया जाता है। पानी प्रापः रमें मुछ मरण मही करते, परस्त उममेंसे अपनेपनके पूर करमेका उपदेश देते। वौर करने योग्य भी मही to बारम, परिपाको बारम्बारके प्रसंगमें चार विचारकर अपना होते ए रोकना; तमा मुमुक्षुता निर्मत होती। (२) जारको सापुस्पको पहिचान महा रोती; उसके प्रति मी वपमे समान हो म्यापारिक कम्पना या करती है-बारको पह (शा किस उपापसे दूर हो! इस प्रश्नका उत्तर पयार्पही लिया है। तत्पर बसा है जिसे बानी अपना बानाके वायमें एनेवासा हो मान सकता है, कर सकता है, वपना किस सकता है। मार्ग कैसा ऐना चाहिये, या मिसे मोच नहीं है, ऐसे शाणा- म्पासी पुस्प ठसका पपार्य उत्तर न सके, या मी पपा ही। नयता बारे प्यारे" पदके विपमें फिर कमी मिलेंगे। मंबारामाको पुस्तको संघ बापने विशेप पाँचग करके यो ममिप्राप मिला है, उसके लिपपमें बातचीत होनेपर फिर कमी गे । हमने इस पुस्तकका पावसा भाग देना है, परन्तु हमें उनकी बातें सिमास्तानसे बराबर बैठती महामास होती। और ऐसा हो तथापि उस पुरुषकी पशा बनी मार्गानुसारी पैसी है ऐसा ता कर सकते हैं । मिसे हममे सदान्तिक वपया पपार्ष पान माना है, पो भरपन्त हो सम्म । गौर र प्रत हो सम्मेवाम बान है। विशेष किर । . " मा फागुन सदी म १९४८ •किर कमा निलंगे, फिर कमी मिलेगे ऐसा गावबार र मो लिसा नही जा सका, प्रपमा करमे पोम्पो पोति विक्की स्थिति प्रायः करके निदेही पैसा यती सम्येि कार्यमें मम्ममत्था जाती है। में सा पित-स्थिति में सौ ममुफ समक्तक पसे बिना पटकारा मही। पानी पुस्प पात मदत हो गये। परम्त उनमें हमारे पैसे उपाधि-मसंग और उदासीन- मस्पात उदासीन-चितस्पितिवासे प्रायः पोरे होए। सपाभिके प्रसके कारण वात्मापी जो ।
. २८७ फा २८२] विषिप पत्र मावि संप्रा-रलो वर्ष विचार है ये वसारूपसे नहीं हो सकते, मयका गौणतास गुना करते है, ऐसा होनेके कारण बहुत फालतक प्रपघमें बना पाता है, और उसमें तो बसन्त उदास परिणाम हो जानेके कारण क्षणभरके लिये भी पिच नहीं टिक सकता। इस कारण बाना सर्वस्ग-परित्याग करके वप्रतिस्दापसे विचरते हैं। सर्वसग शाम्दका पार्थ या है कि ऐसा सग पो बहरहमसे मामन्यान अथवा योषको मुस्पतासे न रस सके । यह हमने सक्षेपमें ही मिलानौर इसी क्रमको वापसे और अतरसे मना करते हैं। देह होनेपर मी मनुष्य पूर्ण वीतराग हो सकता है, ऐसा हमारा हिस्सा अनुभव है, क्योंकि हम मौ निमपसे उसी स्थितिको पानेवाले है, ऐसा हमार वाहमा मसारपसे करती है, और ऐसा ही है- वाश्य ऐसा ही है। पूर्ण पीतरागकी परणनन मस्सकपर हो, ऐसा गा करता है। मस्यन्त कठिन गावरगता वस्पत वायर्यकारको तयापि या स्पिति प्राप्त हो सकती है, इसी देहमें प्राप्त हो सकती है, पा निमप है। उसे प्राप्त करनेके लिये हम पूर्ण योग्य है, ऐसा नियम है, इसी देहमें ऐसा हुए बिना हमारी उदासीनता मिट जापगी, ऐसा माझम नहीं होता, और ऐसा होना समय है-अप ऐसा हीहै। प्राप करके प्रश्नों का उत्तर सिसमा न बन सकेगा, क्योंकि पित-स्थिति जैसी कहार सी हो या करती है । हाममें यहाँ कुछ पाँचना, विचारना पार है या नहीं, यह प्रसग पाकर सिखाना। स्यागको इम करते हैं, परन्तु होता महीं, पर स्याग कापिट तुम्हारी पाके अनुसार ही करें, सपापि उतना मी घसमें तो बनमा समय नहीं है। अभिम मोपमयका प्रणाम पर ૨૮૨ बर्थ, फागुन मुदी ११ बुध १९९८ उदास परिणाम बामाको भगा करता है। निरुपायताका उपाप पाठ है। समझने के लिये मो विगत हिस्टी है, पर टीक ह। ये बातें अबतक नीरके समझनेमें नहीं जाती, तबतक पपार्ष उपासीन परिणति मी होना कठिन प्रगती है। सपुस्प पहिचाननेमें नहीं बाते" स्यानि प्रश्नोंको उत्तर सहित लिए भेजनेका चार तो होता है, परन्तु जिसनेमें जैसा चाहिये वैसा पित्त नहीं पता, भौर पर भी अपकाके लिये हो रहता है, इसलिपे मनको बात छिसभेमें नही जा पाती । मामाको उगास परिणाम सम्पम्त मना करता है। एक-भाषी विकास-तिबाछे पुरुषको कम मार नि परिठे एक पत्र मेननेक लिये सिसा पा । बादमें अमुक कारणस पिचके रुप जानेपर बह पर ग्यों का स्पों छोर पा, गा कि भारको पहनके लिये मेगा है। गो वास्तविक हानीको पहिचानते हैं, वे पान आफिी इस मही करत, एसा हमारा अलरग अभिप्राय रहा करता है। जापानाकी हो या करता है, उसे ही पहिचानता भार मनता है, पर पैसा ही हो जाता है, और उस दी उत्तम मुमच जानना चाहिये ।
२८८ भीमा पाचन [पत्र २८५ २८४ १८५ (२) विशेप करके पेराम्प प्रकरणमें, मायाको नो अपने पैरम्यके कारण माम हुए, ये क्वाये है, पिर रिसे विचार करने मैसे। २८३ बाई फागुन मी ११॥ गुरु १९१८ मि के स्वर्गवासकी समर फाकर मेद बा । बो यो प्राणी दो धारण करते है, ये सब देशका स्पा करते है, यह बात हमें प्रत्यक्ष अनुमसिर इसाई देती है। ऐसा होनेपर मी अपमा पित इस देहको बनित्यता विपरकर निस्प पदापी मार्ग, मही पता, इस शोचनीय बावत्र बारम्बार विचार करना योम्प है। मन पारस देकर उदासी मेरे बिना काम नहीं चलेगा । ममी म करते पुए परिबसे उस दुसको छान करना, पहा अपना धर्म है। इसको भी कमी न कमी इसी तण त्याग देना है, यह बात स्मरणमें वाया करती है, बीर संसारके प्रति निक्षेप राम्म या करता है। पूर्वकर्मक बनुसार जो कुछ भी मुम्म प्राप्त हो उसे समानमाषसे देन करमा, यह मानाका विधा पार मा जाती है, सो विसी । मायाकी रचमा गहन है। २८४ बम, फागुन मुदा१३ मुक. १९९८ परिणाममें अपत उदासीनता पण करती है। म्पों पो ऐसा होता है क्यों त्यो प्रापि- प्रसग मी मा करता है । मिस प्राधिका प्रसग ऐगा, ऐसा फरफ्ना मीम की पीर प्रसंग मी प्राप्त ऐ गाया करता है और इस कारण ऐसा मानते कि पूर्वमें पंधि ए कर्म नित होने के लिये शमितासे उदपमें मारे। २८५ पई, फा पुती १०% १९९८ किसीका दाप नहीं। हमने कर्म पि । इसलिये हमारा ही दोप है म्योतिपको बामायवधी गो पोपीसी बातें मिसी ने पी। उसका वाचसा भाग बामते है, तपापि उसमें चित्त जरा मी प्रवेश नहीं करता और उस विषयका पाना मयमा पुनना फराभित चमत्कारिक मौरो तो मी माररूप । माश्म हाता है उसमें जरासी मी मचि मही यो। हमें तो केवल एक पूर्ण सत्केबानमें सिधि पाती है। सय बो कुल मी करनेमें अपना बनुकरण करममें जाता है, प सब नासपासके पंधन के कारण ही करते हैं। हामें गो पुस म्पसार रते है, उसमें देर और मन बाम उफ्योगमें बहाना पाता है, इससे मत जामता वा बाती है। मोफस पूर्वमें अंचन किया गया है उन कति नार होने के स्पि-भोग ने ये- पत्र २८५ २८०, २८८] वियिप पत्र मादि संग्राह-२५याँ पर्प २८९ योरेदी काठमें मोग सेनेके लिये-नम म्यापार नामके म्पावहारिक कामका दूसरेके लिये सेपन कर रहे हैं। इस कामको प्रति फरसे समय मिनी हमारी उदासीन दशा थी, उसमे भी मान विशेष है। कोई मी जोर परमार्थकी इच्छा करे, आर म्पावहारिक सगमें प्रीति सम्मे, और परमार्य प्राप्त हा माय, ऐसा तो फमी हो ही मही सकता । पूर्वकर्म देखते हुए तो इस कामको नितिहारमें ही ऐ गाय, ऐसा रिसाई मही देता । इस कामके पीछे 'त्याग' ऐसा हमने शानमें रेसा था और हासमें भी ऐसा ही पाप निवार्य देता , इतनी भामर्यकी बात है। हमारी पृतिको परमायके कारण अवकाश नहीं है, ऐसा होनेपर मी बहुत कुछ समय इस काममें वितते है। २८६ बमई, फागुन मु। १५ र १९४८ मिस पानसे माफा क्त होता है, उस शानका प्राप्त होना औषको बहुत दुर्लभ है। पापि बह शान, स्वपस तो अत्यन्त ही सुगम है, ऐसा हम मानते है । उस हानक सुगमतास प्राम दोने में निस दशाको बाप पकता है, यह -शा प्रास होनी मी बहुत पहुत कटिन है, और इसके प्रात पानेके जो कारण है उनके मिले विना बीपको अनतकारास भरफमा पहा । इन दा कारणों मिरनेपर मोक्ष होता है। २८७ पई, पाम्गुन वदी १ गुरु १०१८ चितमें अतिउपरपसे पना-ममाथि रमना । उस बातको चिचम निति फरमक लिये आरको डिपी बार इसमें उस गावी बनुफपाके मिप भार पोइ मरा प्रयोजन नहीं है। हमें तो पाइ को कुछ भी हा ता मी ममाधि ही रपनी सता यता । मरने उपर पदि कोई आपर, सिमाना, पराट भपा पेमा ही पुउभा पर ता उस Bय पिमीर दोपरा भाये परनेकी हमारी इच्छा नहीं हामी । तपा उस परमाध-ररिस देम्पनम ता पर गौरा दी र म्यारहारिक ररिमेटेगनेर मही दाने जमा भार बदौनक गोरफा पापहारिफ-रि हानी होंगर पारमा घिरोरा म्यार बाना बहुत इफर । माशा मुग्प फारण जैम मारने पर यम है। विश शिर निर्मगा । २८८ सम्बर पागुमसेनि १०५८ पदा मार-ममारितोहाइम्प-गमारि मान लिपपूरमको निसन दान ना पोर। गमगाउमा परमे वा पिहा! मप ममा' रिम पहन! अपग उग मानो मुग्ग महिपान मरत है। पदी शियि बारपान भीमद् रामबान [पर २८९, २९ २८९ बई, फागुन पदी १० पुष १९४८ उपाधि उइपरूपसे है। जिससे पूर्वकर्म दरत हो नि , ऐसा करते है। (२) किसी भी प्रकारसे ससंग योग बने तो उसे फिसे पना यही करम्प 1, और विस प्रकारसे जीवको कफ्नाफ्न विशेष पूजा करता हो भयका पसा करता हो, तो उस पारसे से बने से संकोच करते राना, पा भी ससग म देनवानी माना है। २९० नम्बई, सोमवती अमावस्या का सोसोम १९९८ हम जानते है कि जो परिणाम मान समयमें प्राह होनेवागदा उसमे पोरे सम्पमें प्राम होनेके सिम ही यह उपाधि-पोग विशेषरूपसे पता। में हम यहाँ मापारिक प्रम दो प्रमाणमें बात करते हैं, उसमें मन मी पूर्ण तयस देत है, तो मी र मन म्पारमें भगता नहीं है। अपने ही विषयमें पता है। इसलिये म्पहार पात बोधात्म यता है। समस्त लोक तानों पर हुमसे पारित माना गया है, और उसमें मी या काउ राता है, यह तो महापम काठहै बौर सपा वितिका कारण करम्परूप जो मौसमग परतो सर्पकाठमें प्राप्त होना दुर्सम हो फिर इस काल में प्राप्त होना गात पात हो तुम हो इसमें कुछ मी भाइबर्य महा । हमारा मन प्राप कोपसे मानसे, मापासे, सोमस स्पसे, रविसे, परतिसे भपसे, साझसे शुगुप्सासे वयमा हाद मारि लिपयाँसे मप्रतिषप पैसा है कुटुमसे पनसे, पुश्से, मासे, मासे अपना से मुक्त जैसा है। उस मना मी समगमें पपन रमना गाव बहुत या करता है। २९१ मई, चैत्र ७२ मुभ १९९८ परमेशस्थिति दी ऐसी कि उसमें सम्पको मापना करना परम कठिन है। समस्त रचना बसपके नामाको मालना करनेवाली है। स्मिति भाविकाक है। पानाको समग-परित्याग करमेक हेतु क्या होगा ! २९२ बर्थ, क्षेत्र सदा ९ पुष १९९८ रिका बिम्ही इसके प्रसामि म्हानि हो वाती है और उसके कारण राम्प मी हा करता है पस्तामा सवा कापान मौर मुख वो ऐसा समझने में माम ऐवा किस समम्मनिका कारण अपना पा २९५, २९४, २९५,] विविप पत्र मादि संप्रह–२५यों यर्प २९१ उपार्मम किया इमा प्रारम्भ है, जिसे भोगे बिना छुटकारा नहीं होता, और उसे समतासे मोगना ही योम्प है। इसलिये मनकी म्मानिको भैसे बने तैसे शान्त करना और जो कर्म उपार्जित नही किये ये मोगनमें नहीं पाते, ऐसा समझकर दूसरे किसीके प्रति दोप-दष्टि करनेकी इतिको बैसे बने तेसे शान्त करके समतासे प्राति करना, यह पोम्प माश्म होता है, और यही जीवका फर्सम्य है। २९३ बई क्षेत्र मुदी १३ शुक्र. १९१८ (१) एक समय के लिये ही प्रमणधाराको विस्मरण नहीं करनेवाम ऐसा वारेमाकार मन बर्तमान समयमें उदयानुसार प्राधिकरता है, और जिस किसी मी प्रकारसे प्राधि होती है उसका कारण पूर्वमें बंध करनेमें मापा हा उत्य ही है उस उदयमें प्रीति भी नहीं बार अप्रीति मी नहीं, समता है, और करने योग्य मी यही है। (२) समकिसकी स्वर्शना कब हुई समशनी भाहिये । उस समय केसी दशा गता है। इस विषयका बनुमा करके लिखना। सांसारिक उपाधिका यो कुछ मी होवा हो उसे होने देना यही कम्प है, और यही नमिप्राय रहा करता है। धीरबसे उम्पका केदम करना ही योग है। (३) प्रतिवमफ्ना दुखदायक। सम्पस्प पयायोग्य २९४ बर्थ क्षेत्र कही १ पुष १९९८ बारम-समारिपूर्णक याग-उपाधि रहा करती है। इस प्रतिवपके कारण हाममें तो कुछ भी मित काम नहीं किया जा सकता। इसी के कारण पाडपम भादि शानिहुँने दार आरके प्राति करनेके मानका मी स्पाग दिया था। समस्पित भाष २९५ गर्मा, पत्रलि १९१८ ससंग होने के समागमको पटा करने में परत उपारि-पागके टदपका मौऐन पिप बिना उपाय नहीं । जगत्में काई से पाय तो में किसी भी पपिके कारण नहीं ये । पुरा सपि या है वह केवल एक सपा प्यान करनेवाले 'सन'के प्रति, बिसमें नामाका वर्णन है ऐसे १२ भीमद् रामचन्द्र [पत्र १९५१. १९८ सत् सान' के प्रति, और परंपामे परमायके निमित्त कारण दान मालिक प्रति रही है । वामा वो स्वार्थ दवा मान पाता। - २९६ गई, क्षेत्रमा ५ मि १९४८ भगवर्क ममिप्राय देखकर नीपने पदार्यका पाप प्राप्त किया है। मानी अमिमायको देखकर नहीं प्राप्त किया । जाभार गानीके अभिपापस पाप पाता है, उस जीपको सम्पन्दन रावा मार्ग हम दो प्रकारके मानते हैं। एक उपदेश प्रासिन मार्ग मोर सप वास्तविक मार्ग । विचारसागर उपश-मासिके लिये निधारने योग्य प्रय है। हम बैन शामोंको बीचनेक ठिप करते १ भैनी होनेके सिपे न करते सदन का माँचमेके लिये प्रवतो वेदांती हामो लिपे नहीं करते। इसी तर अन्य शाखोकी बाँचमेके लिये जो करते हैं तो अन्य हानेके लिये नहीं करते। जो कहते हैं पर केवळ तुम सब मंगाको उपदेश देने के लिये ही करते हैं।समें म मोर हाती बादिके मेदका स्पाग करो| मामा मेसी महा। २९७ गई, क्षेत्र परी १२ १९१८ माँ पूर्व-कामता है, यहाँ समता निस योग-बायको उत्पत्ति हो जाती है उसे सहप-मुस्से परिवति यती है, और निपपके प्रति वाफन दशा हवा है। रिस जीवनमें क्षणिकता है, उसी गीतमें बानियों ने नित्यता प्राप्त की है, या बरसको मात है। यदि चीनको परिपूति न पा करती हो तो उसे वसा बारम-बोध या मही समधना। २९८पर्य, वैशास मी एक १९१८ समय तृतीया मा समाधि । माघ उपाधि है; चो मात्रको गौम कर सके ऐसी पर स्थितिनाम है। तमाम समावि रहता है। हमने यो पूर्ण-कामता विषयमें मिसा मह इस माशपसे म्हिारेकि मिस प्रमाणसे जानका प्रकामा हाता माता है उस प्रमाणसे पम् वाद म्पाशारिक परासि निहता वाती जाती है। माग पुरके कारण परितति यता है। अन्य किसी भी मुसर्थ इज मनी पर पूर्ण जानका प्रण है। शानी बनिस्प बाचनमें निस्यता प्राप्त करता है, ऐसा नो निवास बाशयमे सिवा कि उसे मृत्युसे मा निर्मपता पता है। जिस ऐसा ऐ माप उसे गिर निस्पता यो । पेसा न करें, तो यह बात सत्य हो ।
१] विविध पत्र मादि सप्रह-२ या वर्ष जिसे सबा वारम-मान हो जाता है उसको । मैं अन्य भाषका मक' एमा बोध उत्पन्न होनकी जो अहफ्स्पय-युधि है, उसका विलय हो जाता है। ऐसा ही समुम्बत भारम-भान थारमार हा करता है, तथापि जैसेको इन्ठा करते है पैसा तो नहीं। समाभिलप २९९ पपई, पेशास मुरी ५ रवि १९४८ हासमें तो वनुक्रमसे उपाधि-योग विशेष रहा करता है। बनतकात म्यवहार फग्नेमें पतात किया है, तो फिर उसकी अंगालमें, मिससे परमार्थका निसर्जन म किया जाप उसी सर वर्ताव करना, ऐसा मिसका निश्चय हो गया , उस से ही होता है, ऐसा हम मामत है। बनमें उदासमखासे स्थित योगीवन और सायंकर आदिके मामनकी पार आती है। ३०० बमाई, शाम पुती १२ रपि २०१८ १ मममें बारमार विचारसे निश्चय हो रहा है कि किमी मी प्रफारसे उपयोग किरकर अन्य मात्रमें अपनापन मही होता; भीर भस्वण माम-पान रहा करता है, ऐसी शाम मिकर उपाधि योगका उदय वा चर्यकारक है। हमें तो पोड़े क्षमोकी निहसि मी मुरिनरसे होगती है और प्रवृति कर सकनेका याग्पताबाठा तो चित्त है नहीं, भार हास्में ऐमा प्रति परना यही कपि, तो उदासीनतासे ऐसा करते हैं। मन कही मी मही ख्याता, वार गुरु भी अच्छा मही लगता । २ मिनपम जाम-पान जो तीयकर भाग्मेि पिया पह परम आदर्यकारकहाउस काउमें मी मारक पा । अधिफ क्या कहा जाप । 'बनको मा पठ' की कहावत के अनुमार इस कासमें और इस प्रतिमें हम परे है। ३०१ मम्मा, पेशाम से भीम १०१८ शाम परिफिमी भी प्रकसम पम भारिको पाछा रमपी जाती है, तो जोर दानातरणीय कर्मा प्रति विशेष उपम होता।हामी ता प्राप इस तरह ही प्रावि करता है कि जिसमे भरनेस रिसीमा पमा प्रतिवध महो। जानी भरना उपनाम्न-आनीपिका-भी पूर्वस्म अनुसार ही करना हनिमशानमें प्रति बदता भागे इस तारमी भाचारिश नहीं करता, अपरा इस तार आानिया कगनक प्रमग या मदी फरता, ऐमा मानमे है। निमशासीक प्रति मर्पया निगृह मनि टममे अम्नी १छा पादमदार मी भीमपावन [पत्र १९६२९० १९८ 'सत् शाव' के प्रति, बौर परेशास परमार्थ निमिच कारण 'दाम बार के प्रतियो। वामा वो कता मा जान पाता है। २९६ कई, क्षेत्रको५मि १९९८ जगम्के ममिमापी देखकर मीपने पदार्यका पाप माप्त किया है। मानीके मभिमायो देखकर मही प्राप्त किया। मा जीप भानीके भमिमापसे पोप पावा है, इस जीपको सम्पन्दर्षन होता। मार्ग हम दो प्रकारके मानते है। एक सपोध प्रालिका मार्ग और दूसरा बास्तविक मार्ग। विधारसागर उपदेशा-प्रापिके लिये विचारमे योग्य प्रय है। अब हम जैन शोको दोचमके लिये बत वन भनी होने के लिये नहीं करते। बदति शाख पाँचमेके लिये कहती पोती होमे किये नही पाते इसी तय बम्प शासको बाँचनेके लिये भी करते है वो न्य होने के सिप मही करते । मोपते पर केस तम सा छोगों को उपदेश देनेके म्येि ही हमें मैन मौर बासी माके मेका त्याग करे।बामा सी नहीं है। २९७ बऱ्या, चैत्र नदी १२ सी १९४८ माँ पूर्ण ममवा है, पहा सातार जिसे मोर-मानको उत्पति से गाती है, उसे स्वरूप-सम्से परितति यती है, और विपके प्रति अप्रयत्न दशा गती। गिस बीननमें वापिकया है, उसी गीवनमे शानियोंने नित्पता माल की है, या बपरस्की बात है। पनि जीवको परिवृति ना करती हो तो उसे पता बालपोष मा महा समनना। २९८ पपई शाम मुवी ५ १९९८ मध्य वतीमा माग समाधि है। माल उपाधि नो मामो गौण कर सके ऐसी स्थिविवाग, तथापि समाभि पता है। (२) हमने को पूर्ण कामताक लिपपमें मिया मिस वाशमसे रिहा निस प्रमापसे जानका प्रकाश पाता पाता है उस प्रमाणसे शम्द मारि पाचारिक पशपोसे निस्पृहता माती जाती है। वारम-मुम्के कारण परिवति यत्ती है।प किसी भी समयमा न होनी पर पूर्ण जानका क्षण है। शामा बनित्य जीवन में निस्यता प्राH RAIT, ऐसा जो सितारेयस बायसे लिया। कि उसे साधुसे मी निर्मक्ता पता है। विसं ऐसा हो जाय उसे फिर वनिपता हो । पेसा न दो पपात स्प।
पत्र १९९३ ३१] पियिय पत्र मादि सपद- यो पर्व २५३ मिसे सबा अाम-मान हा बाता है उसी - मैं अन्य भावका मकचा 'पमा भोध उपन होनेकी जो बामन्यय-बुद्धि , उसफा दिल्य हा मासा है। ऐमा ही समुग्मन भाम-मान मारम्बार रहा परता है, सपारि सकी इच्छा करने पसा तो नही। समाधिम्प २९९ बई, पैशान मरी ५ १०१८ दागमें तो अनुरुमसे उपाधि-पग मिशेष रहा करसा । अनतगाउ म्पाहार करनेमें पनीत किया है, ता रि उसकी अंगठमें, निममे परमा रंग विमर्नन न दिया जाप उमी तरह बार करना, ऐमा जिसका निपप से गया ६, उन पेमे की तापसा हम मानत। बनमें उसीनताम धित योगीमन भार पिकर आदिफे आमाको पा' आती। ३०० बम पैशा मा १२ रवि १०१८ १ मनमें बारमार रिचारसे निपय हा रहार कि किमी मी प्रसारम उपयाग रिफर अन्य माग्में अपनाउन मही होता; भीर भगग भाम-पान रहा परता , मी शामें रिस्ट पारि पोगका उदप आपियकारक है। बाग्में ता थारे गोंकी मिसि भी मुहिम मे दी दसी और प्रति फर सम्मेवा पापतागण तो पित है मही भारदा में प्रेमी प्रति पाना पदी पचरा, तो ममीनताम ऐमा करते हैं। मन फी मी नदी टगता, भार कुछ भी अच्छा नही गगता । २ निमपम भाम-पान जो मापार आनि स्पिा ,बर परम भागारफ । उमप में भी भाजपवरक था। कि क्या कदा गायनरी मार्ग कोपन' पी पागतो अनुगार ग फारमें और इस प्रनिमें दम परे । ब सीभार १.५८ नाम परिमी भी प्रग्नग्म ग्न आश्किो सारी रात्री, मो सदनानीर पनि प्रोना राना मार म प्रानि मा किरिममे भगरिमामा प्रतिमा हानी अग उगान-मारिया-~भी पूर्म अनुमामा मिनी जालना मिना सामना भी मन suren रेगा । शिन apr मा भारी117 TEAM भीमद् पाचन [पा १ । से दोष देना नहीं पाता, ऐसे गौरको बानीक वामयसे पौरनपूर्णक घटनेसे भापपिका माशाता मया बापति गुत मद पा जाती है, ऐसा मानते हैं तयापि इस कामें ऐसी धौरव यमा गत कठिन है बार इस कारण जैसा कि ऊपर या मातबार ऐसा परिणाम बानेसे क जाता है। हमें तो ऐसो गाहमें उदासीनता यती है। हमार मीवर विधमान परम सम्पम्पहारनीयौ को कमी मी ही गने देता वोर म्यपारका प्रति तो सारे Rम हो रसमा पागलपमें ऐसा उदय पक्ष या । इसम माझ्म होता है कि पमी सुम्मका है। वान पाँच मास ए तबसे हम जगत्, पर वौर भन्यमान सबसे उपसालम्पसे रहते तथापि पर मात गमौर बनके कारण तुमही लिखो। हम जिस प्रकारसे ईबर भाविक लिपपमें पाशात हो, हमारे सिप उसी वय पावि करना फम्पागकारक है। हमें तो किसी मी तयका मात्र उत्पन न रोनेके कारण सब कुछ जनावरूप है,वर्यात् ईयर बादि कम तासीनता ती। हमारे इस प्रकारक किमानेको पाकर हमें किसी प्रकारसे सनेहमें पाना योम्प नहीं। हामें तो हम 'वस्म से हते हैं, इस कारण किसी प्रकारको जान-मार्ता मीना मित्र कसे परन्तु मोश्च तो हमें सपा निकटसपसे हो या बात तो समशित है। हमारा वित माके सिपाप किसी दूसरे स्पपर प्रतिबर होता ही नहीं, मणमरके ये मी बम्प मात्र स्पर हो यत्ता-सरूपमें स्थिर पता है। ऐसा बो हमारा वापर्पकमक समपर हामें दो स मी मा मही गाता । गत महिने बात मानके कारण में लिमकर सणेय मागे लेते। नमस्कार माँचना । हम मेरित है। - ३०२ मई, शाम की १५ भौम १९४८ निस निरंतर ही जमेर-प्पान हा करता है, ऐसे श्रीबोष-पुस्पा पपायोग्य पाँचना । यहाँ भावनिफ्पक तो समाधि हो पता हो और बायविषयक सपापि-पोग राणा हारे पापे पर जीनों पत्र प्राप्त हुए है, और इसी कारण प्रत्युचर नहीं मिला। इस प्रकी ऐसी विषमता है कि मिसको यात समपतक ससंगध सेवन मा हो, तो मान- वियपक लोक-भावना कम हो सकती अपना रूपको प्रम्त सकती है। माननाके माधरणके करण होगको परमा मानाके प्रति उठास परिणति नहीं होती और जबतक पह नहीं पती पतकोप-यात मनमोहताहै। जो निरन्तर ससंगके सेवन करनेकी सा करता है ऐसे मुमा बानको पातक उस योगका दिख रवी तस्तक स मारसे उस मानताको चासहित प्रत्येक धर्म करते हुए विचारपूर्वक प्राधिकरके अपनको मु मानकर बम्ने देसनेम वाने दोपको निदि पार करके सरम्वासे गर्मान करते पना योरप है। और विस कार्यकार उस भावनाकी उमति हो ऐसौ बान-मार्य अया बाम-उस बपना गपका पक्ष विचार करवे यना योप ।
1 पत्र पिविष पन मादि संप्रा-२५ वर्ष गो बात ऊपर कहा है, उसमें तुम लोगोंको बाषा करनेवाले अनेक प्रसंग वाया करते है। यह हम बानते है, सपापि उन सब बाधा पहुँचानेवाले प्रसगोंमें मैसे बने पैसे सदुपयोगसे विचार पूर्वक प्रकृति करनेको इछा करमा, यह क्रम शमसे ही होने जैसी बात है। किसी भी प्रकारसे मनमें सताप करना योग्य नहीं, जो कुछ पुरुषार्य हो उसे करनेको सत्या रसमी ही योग्य है, और मिसे परमबोध स्वम्मको पहिचान है ऐसे पुरुषको तो निरन्तर ही पुरुषार्पक विषयमें कैसी प्रवृति करते रह मेमें घबहाना योग्य महो। मनतकालमें भी नो प्राम नहीं जा, उसकी प्राप्तिके लिये यदि अमुक फास म्पतीत हो गाय तो मी कोई पनि नहीं है। हानि केवल इसी । कि बनतकाउमें भी जो प्राप्त नहीं हुमा, उसके विषयमें भान्ति हो-मूठ हो। पदि परम पानीका सहप मासमान हो गया है तो फिर उसके मार्ग, मी मनुमसे जीवका प्रवेश हो सकता , यह मासानीसे समझ मा सफने जैसी बात है। निस तय मन ठीक रातिसे चले, इस तबसे वर्तान कये। नियोग है तो उसमें कल्याणका मी रियोग है, यह बात साप है, तथापि परिहानाके विमोगमें मी उसी विषयमें चित्त या तो कम्पाण है। पीरमका त्याग करमा योग्म नहीं । श्रीस्वरूमफा पथायोग्य । ३०३ वर्मा, पेशास नदी ११ पुष १९४८ - . मोहमपीस निसकी अमीहरूप स्पिति है, एसे भी का पयायोग्य " ममके कारण ही पह सब कुछ है," ऐसा गो बबतकका किया हुआ निणय लिम्मा पह सामाम्यम्पसे तो यापातम्य है। तयापि 'मन', 'उसके कारण ही', 'यह सम पुछ', और उसका निर्णप', ये जो इस बाम्पके पार माग होते है, या यात समपके कानसे पधार्थनपसे समसमें वाता है, ऐसा मानते हैं । गिसकी समझमें यह आ नाता , उसके वशमें मन रहता है, यह बात निपपरूप है, तयापि पनि यता है तो भी वह भामस्वरममें हो रहता है। मनके ममें होमका पर उत्तर ऊपर लिखा है, यही सबसे मुम्य है। जो बाप सिसा गपा और बहुत प्रफारसे रिचारने पोम्य है। महामाकी देह दो कारणोंसे विपमान पता -प्रारम्भ कर्मका मोगनके लिये, बार नामक कम्पाणके लिपे, तथापि महरमा इन नोंमें उासरूपसे उस नई प्राधिस रहता है। ऐसा मानते है। प्पान, अप कर, भार यदि इन रिपाक हारा ही हमारे सारा फर हुए वास्पको परम फसा पारण समझते हो बार पनि उसे निपपसे समझने हो ता-पोरसे मुदिर-सहा, शान-समार न माती तो-और घी गई हो तो पा भातिक पर्म गइ, पमा समझदाता-और उम पाम्पको अनेक प्रकारके पौरब विपारनको या दो ताकिमनी लापता । भी इससे विशेषमपसे निमविषयक धारणा फरमके उिपसिना पासक मा माझ्म रोता , तथापि वित्त मापसे नहीं पता, इमरिप बा भिता है उसको मुभ्यास मानना ।
भीम समय [पा ३४ (२) सा प्रकार उपाबि-योगको तो ना करना ही योग्यतयापि यदि उस उपाधि-योगकी प्रसंग आपके लिये ही इण्य की जाती हो, तया पिणही मित-म्पिति समभावसे राती तो उस उपारि योग प्राधि करना अपस्कर। अप्रतिकर प्रणाम - ३०४ कई पैशात १९९८ पारे किलनी ही पिपचिों क्यों न पर, वापि मानीद्वारा सांसारिक फसकी इच्छा करनी पाग्प नही उन्य नापे ए बतरायको सम परिणामसे बेदन करना योग्य है, विषम परिणामसे पन करना पोप नहीं। तुमारी भाजीविकासवनी स्थिति बहुत समयसे मास्म । यह पूर्वधर्मका योग है। जिमे यथार्थ कान है, ऐसा पुरुप बन्पया बाधरण महीं करता, इसलिये तुमने जो बाकुसताके कारण 'ठा प्रगट की है, उसे नित करना हो यौम्य है। परिबानी के पास सांसारिक मत हो तो मी मुमुसुको उसकी किसी भी प्रकारसे हम करना पोम्प नहीं है । प्राय करके पनि हानीके पास ऐसा मय होता है तो मुमुको विपति दूर करने के लिये उपोगी होता है। पारमार्षिक वैमनसे बानी, मुमुनुको सांसारिक फस देनेको इण नही करता स्पोंकि बानी बकम्य नही करते । हम मानत कि तुम्हारी इस प्रकारको स्थिति है कि मिसमें धारण गना कठिन है ऐसा हानपर भी पौरममें एक बाय मी म्यूनता न होने देना, या माय बम्प भार की सपार्य बांच पाने मुख्य मार्ग । हामें ता हमारे पास ऐमा काई सांसारिक सावन महा कि हम उस मार्गसे तुम्हारे उिप NRI कारण रो ममें परन्तु ऐसा प्रसग ससमें रमी बाके दूसरे प्रदान करने योग्य ही नहीं। किमी मी प्रपारका मविप्पका सांसारिक विचार कर वर्तमानमें समतापूर्वक प्रावि करनेका सनिधय करना हो तुम्हें पाया है। भविष्यमें गो होगा देगा होगा, तो बनिवार्य है ऐसा मानर परम पुस्पापही मोर मुगुना हो योम्य है। किमी प्रमासे भी होतानपीस मपक स्पान पेमे मनिप्पको स्मरण करना हो याम्य है। उसकी बिनाम परमार्यमा विस्मरण होता है। और पमा होना महा भापतिकर है। इसलिये इतना ही बारम्बार विधामा पौग्य मे पह भारचिन मापे | बात समपसे बारिश और छोक BHI मर तुम्हारे अतर इसा हो रहा है, इस विषयमें वो निर्भयपमा होगीकार करना योग्य है । जिग्मे कि पही है। पयार्य मारया पही मुख्य मार्ग स्पलमें भूल पाना पौग्य नही हा कामा भार भाका मिप्या है। तुम बारिका ममा रमाग वो भी मोहना होगा विविध पत्र मावि संप्रा-२५औं वर्ष प तो होगा ही। उसमें समता रस्सोगे तो भी जो होना होगा पहोगा साठिये निशकवासे निरमिमानी धेना ही योग्य है-सम परिणाम बना योग्य है, और यही हमारा उपदेश है। या नबतक नहीं होता तबतफ यथार्य गोष मी नहीं होता । ३०५ पाई, शास १९१८ निनागम उपशमस्वरूप ।। उपशमस्वरूप पुरुर्पोने उसका उपशमके लिये प्ररूपण किया है- उपदेश किया । । वा उपशम वारेमापके लिये है, दूसरे किसी मी प्रयोजनके लिये नहीं । बामार्थक ध्येि यदि उसका बारापम नहीं किया गया, वो उस बिनागमका प्रवण बार बाँचन निष्फल जैसा है यह बात हमें तो निस्सदेह पयार्प मास्म होती। दुसकी निति समी बीच पाहते, पौर इस दु सकी निति, निससे दुस उत्पम होता है, ऐसे राग, देप वीर बान बादि दोपकी नियति हुए बिना सभव नही है। उस राग मानिकी निति एक भास्म-सानको छोरकर दूसरे किसी भी प्रकारसे मूतकाठमें हुई नहीं, पर्वमानकासमें होती नहीं, और मषिष्यकाठमें हो नहीं सकेगी ऐसा सब बानी पुरुषों को मासित एला । अतएप भीरके लिये प्रयोजनरूप नो बारम-बान है, उसका सर्वश्रेष्ठ उपाय सद्गुरुके बचनका मरण करना अयषा सत्यालका विधारना ही है। मो कोई गौर दुसको नितिको इछा करता हो उसे इससे सर्वया मुकि प्राप्त करनी हो तो उसे एक इसी मार्गको वाराभना करनके सिवाप भौर कोई दूसरा उपाप मही है। सछिपे गीवको सब प्रकारके मतमविरका, कुल-पर्मका, छोक-सबारूप धर्मका, मोपसहा. रूप धर्मका उदास मानसे सेवन करके, एक वाम-विचार कम्परूप धर्मका सेवन करना ही योग्य है। एक बड़ी मिसपको पात तो मुमुक्षु गौरको यही करमी योम्पा कि ससगके समान कम्पाण जन्य कोई वछपान कारण नहीं है और उस समगमें निरतर प्रति समय निवास करनेकी हग करना, बससंगका प्रत्येक क्षणमें क्पयामात्र विधारना, यही श्रेयरूप है। पात बात करके या पात अनुमबमें छान पैसा। प्रारम्भके अनुसार स्थिति र, इसछिपे यसबाग उपावि-योगसे विषमता नही बातीमयत अरुषि हो नानेपर मी, उपशम-समाधि-यपासप गती है पापि निरंतर हो पिच ससगको माषना हा करती है। ससगका बस्यंत माइम्प जो पूर्वमपमें पेदन किया है, यह फिर किसे स्मृतिमें आ ग्रसावीर निरंतर बमगरूपसे या भाषना पुरित हा करती है। जबतक इस उपावि-योगका उज्य है, तबतक समवस्यापूर्वक उसे निबाहमा, ऐसा प्रारम्भ तथापि नो काउ म्पतीत हाता है पर प्राय उसके स्पागने मालमें ही पतीत होता है। निहति से क्षेत्रमें विचको पिरतापूर्वक पनि हाउमें सूत्रसगस्त्रके भरण करनकी इस हो तो मरण करनेमें कोई पापा नहीं। पर केस और उपचमके लिये ही करना पोम्प है। किस मनको विशेषता है, मीर फिस मतको ग्पूनता है, ऐसे माम ने लिये ना Ham ram nt.
२१८ भीमद् रामचन्द्र [पम ५,५५ ऐसा हमारा नियम है कि बिन पुरमोंने इस प्रस्तांगको रचनाको है वामस्वरूप पुरुप पे। गीतको पा कर्महपी गोश प्राप्त मारे, मकैसे दूर हो।' इस प्रश्नको मुमुक्षु शिष्यके एपमें मत करके, ' बोध प्राप्त करनेसे दूर हो सकता है' या सूत्रातांगका प्रथम पाप है। फिर निष्पको दूसरा प्रम होता है कि यमपन क्या है, और मा क्या माननेसे हो सकता है, तपा उस वषनको पौरस्वामीने किस प्रकारसे कहास प्रकारके वाक्यहारा यह प्रम रक्सा गया है, वर्षाव शिष्पके प्रभमें या बास्य रसकर प्रकार ऐसा करते हैं कि हम में बामस्वरूप ऐसे हावीरस्वामीका कहा इवा पारमस्वत्म करेंगे क्योंकि वास्मस्वस्मके लिये भामस्वस्म पुस्प ही बर्फत प्रवौतिके योग्य है। इसके पचात् मन्पकार बो उस भवनका स्वरूप करते हैं, फिर फिरसे विचार करने योम्प है। तसचात् सपर विशेष विचार करनेसे पकारको याद वाया कि पह समाधि मार्ग नामाके निधपके बिना प्रत नहीं होता, तथा जगदासी गांव जानी उपदेशकोंसे बालका पपा सस्प जानकर-करपाण पपा स्वरूप मानकर-भयपाको ही सप मान बैठे हैं उस निश्चयका मगर विमा-उस नियमें सम्मोह पो बिना--जो समाधि-मार्ग हमने अनुभव किया है, पाउनें किस प्रकारसे मनानेसे कैसे फरमैमूत होगा-ऐसा नानकर प्रयकर करो कि ऐसे मार्गका त्याग करके कोई एक प्रमाण वायण कातपनेसे, बिना बिचारे बम्पया प्रकारसे मार्ग करते इस क्यथा प्रकारके कपनके पश्चात् प्रत्यकार निवेदन करते है कि कई पंचमहाभूतका ही बमितल मानते हैं, और हसि मामाका उत्पम होना मी मानते है। मो ठीक महा मैठता ऐसा काकर मन्पकार बामाको निस्पताका प्रतिपान करते हैं। बिस पीने अपनी मित्पता ही नहीं पानी, तो फिर निर्माणका परम किस प्रयोउनसे करेगा। ऐसा बमिप्राय बताकर निस्यता रिसाई गई। इसके पधार मिम मिम प्रकरसे कम्पित ममिप्राप दिखाकर यथार्थ बमिप्रायका उपदेश करके पपाप मार्गके बिना माय माझी, गर्म दूर नहीं होता, जन्म दूर नहीं होता मरण र मही होता, दुस र ममी होता, मागि, म्पाधि और उपाधि दुरस भी दूर नहीं होती और पैसा हम उपर का मापे। कि ऐसे सबके सा मतबादी ऐसे ही पियोंमें निमत है कि निस्से मम्म, गरा, मरण पारका नाय नही होता इस प्रकार विशेष उपयरूप भावपूर्वक प्रपम वप्पयन स्मात किया है। उसके पश्चात् अनुमसे इससे यह र परिणामसे बाहमापक सिमे उपशम-करपाणका समय दिया है। इसे म्पपूर्वक मना और अपण करना पोपी । कुम्भमके लिये सूत्रागा पाना और मान करमा निफसी। . ३०६ गर्ग, शासही १९४८ श्रीस्वमतापसी निजामुने श्री मोहमपासे वमोहसरूप श्री. का बारम-समान- भारको स्पतिक पयायोग्य पाँचना । रामें यही गाय माविका संपोग विशेषमपसे पता है। दानाका उपार्जन किपे हुए पूर्वधर्म निार करने के लिये और मपी मनुकंपाके किये होगा।
पत्र १७] विविध पन मादि संप्रा-२५पों वर्ष निस माक्से ससारको उत्पति होती है, या भाव विसर्मेसे निच हो गया है, ऐसा शानी मी पाय प्रापिकी निति और सस्समागमके निवासको रछा करता है। जहाँतक इस योगका उदय प्राप्त नहीं होता, यहाँतक नो प्रात स्थितिमें अभिपमवासे गते है, ऐसे हानांके चरणारविन्दको फिर फिरसे स्मृति मा गानेसे हम उनको परम विशिएमापसे नमस्कार करते हैं। हालमें मिस प्रापि-योगमें रहते है यह पात प्रकारकी परेमके कारणसे आते है। बाम ररिकी असातामें इस प्राप्ति-योगसे कोई बाधा नहीं बाती इससिपे उदय बाये हुए योगकी ही वाराषना करते है। हमारा प्रक्-िपोग बिहामुके प्रति कापाण प्राप्त होनेके स्वपमें किसी प्रकार वियोग- रूपसे राता है। निसमें सतरूप पता ह, ऐसे बानी कसहा आदिका त्याग करके चो माषपूर्षक भी वामितरूपसे यता है, पा निकटहपसे कल्याणको प्राप्त करता है, ऐसा मानते हैं। नितिके समागमकी हम पात प्रकारसे इच्छा करते है, क्योंकि इस प्रकारके अपने गगको हमने सर्वपा नित महीं किया। काठका कविसरूम धरहा है। उसमें वरिपमतासे मार्गकी विशासापूर्वक, पाको दूसरे अन्य मानने के उपायों में उदासीनतासे वर्ताव करते हुए मी बो बानीके समागममें यता, रत्पत निकरहमसे कम्पाम पाता है, ऐसा मानते है। नगर ईघर वादि सबधी प्रश्न हमारे बहुत विशेष समागममें समझने पाहिये । इस प्रकार के विचार (कमी कमी)करनेमें हानि महीं है। कदाचित् उसका यथार्य उचर अमुक कास्तक न मिळे तो इस कारण पौरनका साग करनेको उपत होतीाई मतिको रोक खेना योग्य है। यहाँ भविषमतासे वाम-पान गता है, ऐसे । भीरापस्त्र' प्रति फिर फिरसे ममस्कार करके पर पत्र इस समय हम पूर्ण करते है। । ३०७ बर्थ, पैशाधु १९४८ यो मामा हौ राते है ऐसे बानी पुस्प सान प्राप्त प्रारम्प भनुसार ही प्राप्ति करते है। पास्तबमें तो बात यह है कि विस कारमें पानसे पान निपच हुषा, उसी कासमें शानी मुख हो जाता है। देह आदिमें वप्रतिवर बानीफो कई मी भानप भया भासमान महीं है। पौरम प्राप्त होने लिये उसे बरेन्ठा आरि" भाषनामा हाना पोग्प नहीं है। मक्षितको जो कुछ प्राय रोवार उसमें किसी प्रकारफे देशको देखकर तटस्य धीरर इनके लिये यह मावना किसी प्रकारसे योग्य है। पानीको तो प्रारम्प बरेठा मादि सभी बानोंमें एक ही मार-समान ही मार है। उसे साना-असावा फुछ भी किसी प्रकारसे राग-देष आदि कारण नहीं हो पर तो दोनोंमें ॥ उमीन है। यो उदासीन है, पर मूएम्पससमें निराठबन है और मिरासमानमप उसको उसनताको मरेपासे मी पठमान मानते हैं।
भीमर चन्द्र [पर ५८३. - सिरेअ पासको मी वावरसे समसमा योम्प है। सिरेअरूप मानन, यह बाभपस्प ऐसी छिको ही पोम्म ।। निरामय कानीको वो समी कुन समान है। नपत्रा हानी सहन-परिणामी है दर-सरूपी है। मान-समावसे स्थित है। मान-समारसे प्रात उदयको भोगता है। सहन-स्वमानसे होता है सो होता है, जो नहीं होता सो मही होता मा कम्परहित है; कम्पमात्र उसमें पर 7 नावा है इसलिए तु ऐसा जानना चाहिये कि उस मानांके तरूपमें प्रारम्पले उत्यकी सास ति अधिक योम्प। निसने विरेशाके विपपमें किसी प्रकार से इम स्थापित की है, उसे इसामान खना याम्प है।बानी अरहित है या इछासहित, ऐसा करना मी मही बमता, म तो केवल ब-रूप है। ३०८ बाई, म्येष्ठ मुदी १० मि १९९८ स्वर वार के सांप को निभय है, उस विषयमें हमें विचारका त्याग करके सामान्परूप सम्पसार पाना मोग्य । वर्षात् स्वरके वामपसे हमें पौरन यता, मापौरन उसके निकम्पमें पर मानेसे पना कठिन है। नियमसे वकर्चा, वौर म्पहारसे का स्पादि म्यान्माम को समपसारमें है, रविचारमे योग्य है, परन्तु या म्यानपान ऐसे बानीसे समझना चाहिये कि जिसके मोषसपी पोप निरप हो गये। स्वरूप समाने तो योग्प ऐसे जाना है कि जिसे निरिकपता प्राप्त हो गई है। ससाके वापसे जायके रोप न होकर उसकी प्राप्ति होती है, और समसमें माताहै। म मास स्पूर्ण ए सबसे, मिसे पमापके प्रति एक मी विकल्प उत्पम नहीं इमा ऐसे मी को नमस्कार है। . ३०९ बम्पेठ दी १ क १९९८ मिसकी मासिक पथात् मनवग्रसकी मापकवा र रोकर सर्व कासके मिये मपाचवा प्राप्त होती है, ऐसा मो कोई भी हो वो एस इम वरण-वारन मानते हैं-सीको भयो मोब तो इस काम्में भी प्राप्त हो सकता है या होता है, परन्तु उस मुखिका दान करनेवाले गुरुपको प्रष्टि परम गुर्डग है। वर्षद गोल दुर्गम को एस दुभ है। संसारसे वापि प्राप्त किये गए तो बात का हो गया है। पापि बमा संसारका प्रसंग निमाविको प्रास ही शेषा का एक प्रकारका महान् महेश या यता। में तो निर्षक होकर अपनेको भीहरिके सव सौप देते हैं। हमें पोस मी करने के लिये मन नहीं होता और सिखनेके दिम मा मन नही होता कुछ पुस वाणास प्राधिकरते है उसमें मी मम नहीं होता! के भामरूप मौन वीर रसषी प्रसगमें मन यता और संग पो इससे मिल प्रकारका ही पता है।
पर ३१ ११ पिषिष पर मावि संप्रह-पोयप १०१ ऐसी ही ईमरेप्छा होगी। एसा मानकर जैसी स्थिति प्राप्त होता है बसे ही योग्य समझकर से है। मन तो मोसके समधमें भी स्पृहायुत मही है, परस्तु प्रसंग यह पता है। इस प्रसगमें बमको मारी कोपछ ऐमी एक गुजरात देशपा फहात याम्य ही है। शान्ति शान्ति शान्ति । ३१० बई, ग्येष्ठ १९९८ प्रमु-मतिमें मे बने तसे तत्पर रहना, यह मुझे तो मोक्षफा भुरषर मार्ग सगा , बाहे तो मनसे भी स्थिरतापूर्वक बेरकर प्रमु-भति वश्य करना योग्य है। इस समय तो मनफा म्पिरता होनेका मुम्न्य उपाय तो प्रमु-मलि ही समयो । बागे भी बही बार सा है, ता भी इसे स्यूसतामे लिखकर बताना अधिक योग्य लगता है। उत्तरप्यपनमूत्रमें दूसरा इमिगत बप्पपम पाना । बचोसमें बम्यपनकी प्राएमको पौसम गापामें मनम करना। शाम, सोग, निद, नास्पा, और मनुक्या इत्यादि सद्गुणोंसे योग्यता प्राम करमी पाहिय, घोर किसी समय तो महतमाके संयोगसे धर्म मिल ही नायगा । समग, मशान और सदाच, में उत्तम साधन है। (२) या पगास्की प्राप्तिका साधन हो तो उसका दूसरा अप्पयन, तथा उपकारबाग अप्पयन पानेका परिचम रमना । तया उत्तराप्पयनके मातम मैराग्य पारि परिमाउ अम्पयन फाते रहना। मीर प्रमात जग उटनेका परिचय रमना। एकातमें पिर हार भेटमेका परिचय रमना । माया गर्यात् जगत्-मोक का निममें परिक वर्णन फिपा गया है, ऐसा पुनर्को पानको पक्षा, जिनमें सपुरुपके चरित्र अधमा रम्यकपा मोपलपमे रों, पेमी पुम्नकों परनेक माना रएमा । जिसके द्वारा रापची पदि हो ऐमा बाँपन शिपम्पमे एपमा मतमतिरपा पाग करना; और विसमे मतमतिरको गदि हो ऐमी पुस्तकें नहीं पामा। अमसंग वाणिमें उपमहाताई पपिको हटाने का विपार बारपार करना पाग्य है। पम्, म १.५८ ३११ जो रिपारवान पुरुषको माया पाप भामिन दाता है, मे इस समारमें शिपमे आममाम्म जन्म म उनको निधन प्रतिता नीनों कारमें भर इमर पपा इस ममारफा मनप अम्पयामे माममान होना पोग्प नही, भौर पर माममान 4-मा तानों का होना ममप मदी।
भीमद् रामचन्द्र [पा ११ . यहाँ वाममापसे समाधि है । उप-भावके प्रति उपाधि यत। भीतीर्थकरने तयों गुण पालकमें यमेबाळे पुस्पका निम्नमिमित ताप कमाई नाममा हिये जिसने सर्व ससार सात कर दिया है-पर्यात मिसके सब संसारको भावी वडा मिम्द हो गई है, ऐसे निको-पुरुषको तेयो गुणस्पानको समझना चाहिये। ममसमिनिसे पुछ, गवनसमितिसे मुज, कायसमितिसे अच्छ, किसी मी बसुका प्राण पोर स्पाग करते हर समितिसे मुक्त, दौर्ष सका वादिका त्याग करते हुए समितिसे पुछ, ममका सकोष रनेवाग, पचनका कोच करनेवाला, कापाका सकोच करनपाला, इनियोंके सकोचपनेसे प्रधान, उफ्योगपूर्वक रम्नेवाडा, उपयोगपूर्वक सहा होनेपाका, उपयोगपूर्णक बैठनेपाम, उपयोग पूर्वक शयन करनेवाला, उपमोगपूर्वक योजनेवासा, उपयोगपूर्वक वार सनेमाठा, उपयोगपूर्वक बासे- मास पनवासा माँसके एक निमेषमात्र मी उपयोगरहित बावरण न करनेवाला, वपना जिसकी उपयोगरहित एक मौ क्रिमा महो। ऐसे निर्मपको एक समय किपाका भ होता है, दूसरे समपमें उसका पेन होता , तीसरे समयमें कर्मररित हो जाता है, वर्षात् पीपे समपमें उसकी किपा- समधी सर्मपराये निात हो जाती है। तीपर को मा पन्त नियम (अपूर्ण) , ३१२ कमाई बापान पुदी ९ रनि १९१८ जिन पित्त र वाद पाँच विषयोंकी प्राप्ति या सत्यन्त म्पाकुर या करता है, पेसे जोर सो विधेपर से Pमाई देते हैं, ऐसा हुपमा कम्पुिग नामका का। उसमें मौ जिसे परमापक सपमें पिस्ता मही , जिसके पित्तको विप नाइमा, जिसे सगशरा प्राषि-मैद नहीं मा मिसन रिए इस प्रौतिक संबधसे बात नहीं मा रिसका विलास दूसरे कारणोंमें मही या ऐसा गो कोई भी हो तो प इस फासमें दूसरा श्रीराम' है। फिर मी देमार मोहपूर्वक वाचर्य होता है कि इन गुणोंसे किसी वशमें भी सपम अस्प जोर मौरिगोचर महा होते। निशाके सिवाय बाके समपर्मेसे एकाप फेरे सिवाय शेष समप मन, पचन और कापाठे उपारिक योगमें पता है। कई उपाप नहीं है, इसध्येि सम्पपरिणतिसे सदन करना ही योग्य है। महान् पावर्षको प्रक्ष रानेवाले ऐसे क्स, पापु चन्द्र सूर्प, मामि मादि पदाकि गुण माम्प प्रकारसे मी धाम रिमें नहीं माने, वीर माने जोसे पर अपच मोर मी दूसरी किती पानी में किसी प्रसारका मानो मापर्यकारक स्वमप देखकर बइमात्र यता। यह देखकर ऐसा होता है रोगोत्र प्रमादिकसका रमिअम र महीमा । जिससे पार॥ ऐसे उपायमें गौवका बार बान भी नही पत्य, भार उसय पहिचान होनेपर मी सेपासे बात करनेकी दुनि बारम्बार उरित ती तो है, मे बहुतस गाको स्थिति देखकर ऐमा समझो कि पर छोक बमी बनवकावक हमेगा - पिपिप पर मारि संपराधर्ष પ૦પ ३१३ मझ धापार १९९८ सूर्य उदय-अस्त रहित है। पर केषक छोगोंको मिस समय चक्षुकी मर्यादासे बाहर पण जाता है उस समय बस्त, और विस समय चक्षुकी मर्यादाके मीतर रातारै उस समय उरिख माश्म होता है परन्तु पास्तबमें सूर्यमें तो उदय-मस्त कुछ भी नहीं है। बानी भी इसी तरहै, वह समस्त प्रसंगोंमें जैसारे पैसा ही है, परन्तु पात यह है कि केवळ समागमकी मर्यादाको छोड़कर छोगोंको उसका बान ही नहीं पता, इसलिये मिस प्रसगमें मैसी अपनी दशा हो सकती है पैसी ही दशा लोग पानीका मी कल्पना कर लेते है, तथा यह कम्पना भीषको शानीफे परम मारममाव, परितोपमाष, मौर मुक्तमाबको मालूम नहीं होने देती, ऐसा मानना चाहिये। हासमें तो निस प्रकारसे प्रारम्पके कर्मका उदय हो उसी तरह प्रापि करते हैं, श्रीर तय प्रति करना किसी प्रकारसे तो मुगम ही माश्म होता है। यपि हमारा चित्त नेत्रके समान है—नेत्रमें दूसरे वाययों के समान एक रज-कण मी सान नहीं हो सकता । दूसरे खवयोन्स अन्य विच है। मिस चित्तसे हम इसे है प चित्त मेपर, उसमें पाणांका उठना, समझाना, यह करमा नयबा यह म करमा, ऐसा विचार होना यह बहुत मुस्किम्से बन पाता है। बहुतसी किया तो एन्यताको तरा होती है, ऐसी स्थिति होनेपर भी उपाधि-योगका तो बम्पूर्वक वापरन कर । इसका बेदन करमा कम कठिन नहीं माश्म होता, क्योंकि यह बाँसके द्वारा जमीनको रेतको उठाने वैसा कार्य होता है, मिस तर यह कार्य दुमसे- अत्यन्त दु ससेहोना कठिन है, वैसे ही वित्तको उपाधि परिणामरूप होना कठिन है । पुगमतासे चित्र स्थित होनेसे यह सम्यक्प्रकारसे बेदनाका अनुमन करता है- समाधि रूपसे अनुमन करता है । इस बात के मिहनेका बाशय तो यह है कि ऐसे उतए बैगम्यम ऐसे उपाधि-योगके जमुमय करनेके प्रसाहो कैसा गिमा गाय ! और यह सब किसके लिये किया जाता है। नानते हुए भी उसे फ्पों गोर मही दिया जाता। या सब विचार करने योग्य है। ईपरेम सी ऐसी बैसा हो जायगा। रिकाम्प करनेसे सदरोताहै वीर पर तो जबतक उसकी दशा होगी तबतक उसी प्रकार प्रति करेगा । सम राइना ही योम्प है। सौ कुछ मी सहा मही, कोई प्रारम्परुप सा मी मही । साम्प पूर्वमें उपर्षित की ई किसी उपापिम्प सहाको दो अनुक्रमसे सवेदन करनी ही योग्य है। एक सग-मुम्हारे फसगकी पराया करती है भार तो रषिमात्रका समाधान हो गया है। इस मापनप पातको कहाँ कहनी परिये ! बापर्य ऐसा है। यह जो देह मिली है पर यह परिज कमी मी नहीं मिली तो वो भविष्यकाठमें मी या प्रश होनेवाली नही। मम्परूप-तापप ऐसे इसमें उपाधि-योग देखकर समी ग्रेग भूल करें, इसमें बापर्प महीतथा पूर्वमें भो सत्पुरुषको पहिचान मही, तोपर ऐसे हो योगके कारण महो। बभिक मिसना नही सूचता । नमस्कार पामि। समस्तनप भीरापपदका पपायोग्य भीमद पनपन्न [पत्र ११४ १५ १५, 1. ३१४ बई बापार दी १९९८ सम-मास्मपदेश स्पिविसे यपायोग्य पत्र मिले हैं। यहाँ उपानि नामसे मरम्प उदय है। उपाधि निक्षेपीत होकर प्रापि करना, पापाव अत्यंत कठिन है, नो यती म पोपे हो समयमें परिपक समाधिरूप हो पाती है। हाति बाई, बाण मी १९९८ जानको पफ्ना काप माने सिपाय सुटकारा नहीं। तबतक पपापोत्य समाधि नही । या मानने के लिये मुमुक्षुता और बालीको पहिचान उत्पम होने योग्य है। यो बानीको पापोम्यरूपसे परिधानता बानी हो जाता हैकमसे बानी हो जाता है। आनन्दननाने एक स्पम्पर ऐसा कहा है कि- मिन या मिनन मे भारापे, सहि मिनार हो रे, मुंगी सीकाने पटकापे, ते मुंगी बग माग रे । बिन होकर त् िसांसारिकमालसर्वषो मारममाव मागकर यो कई मिनमगवान्की वर्षात विस्यवानांकी-बीतमाकी-बारापना करता है, पर निथपसे निनपर वर्षात् केनस्यपबसे उछ हो माता। एमके लिये भ्रमरी और का प्रस्पक्षसे समझमें मानेबाग त लिया है। पहाँ हमें भी उपाभि योग यता है, पचपि मामें भारममाव उत्पन्न महीं होता और यही मुस्स समाधि ३१६ बम्द मानण पदी १ बुध भास्ममर्दश-समस्पिविसे नमस्कार विसमें जगत् सोता है उसमें डाली जागता है--गिसमें बानी अगवारे उसमे बगत् सोता है। जिसमें जगत् नगता है उसमें बानी सोता है'.--ऐसा मारण है। ३१७ ब भाषण सदो ५ १९९८ जगत् और मोषका मार्ग पे रोनों एक महो। बिसे जगत्की , कवि और मागमा , उसे मोघ वनिच्या समधि और धमाबमा होती , ऐसा माश्म होता है। १ पानिज संभूवाना तस्या मालमी। बस्वा पति महानिनिय परमो मुनेः ॥ म पता. गुमनामो- ममी पपानी मोह। पुथार समागु, बलि मानव हुई। पोबीन्द्ररेष-परमात्मय -४७॥ एच मासाना प्रसारमाधम भी मिला है।
पत्र ११८ ११९] पिपिम पम मावि संप्रा-२५पों वर्ष ३१८ मई, श्रावण सुदी १० बुध १९९८ ॐ नमा निष्काम यथायोग्य निन उपार्मित कर्मोको मोगते हुए भविष्यमें मत समय म्यतत होगा, ये कर्म यदि तीतासे उत्यमे यकर क्षयको प्राप्त होते हों तो वैसा होने देना योग्य है, एसा बहुत बोका सक्स्प है। मिस्से म्पापारिष प्रसगसबधी चारों तरफसे पिता उत्पम हो, ऐसे कारणोंको देखकर मी निर्मपताके वायिठ गना ही योग्य है । माग इसी तरह है। हामें हम कुछ विशेष नहीं लिस सकते, इसके लिये क्षमा माँगते हैं। नांगरमुख पामर नर माणे, मष्ठमसुस म कुमारी रे, मनुमबपिण वेप भ्यानवणं मुख, कोण माणे नर नारी ।। मन महिसा पहासा परे, पीमा काम करंदरे । (२) 'सत् ' एक प्रदेशभर मी दूर महीं है, परन्तु उसके प्राप्त करनमें बनस असराय हा करते है पौर एक एक मंतयप कके बराबर है। चीपका कर्तव्य यही है कि उस सत्का प्रमचतासे माण, मनम, और निदिम्पासम करनेका वसा निथप रक्से । (१) हे राम ! मिस यसरपर जो प्राप्त हो जाय उसीमें स्तोपपूर्णक यमा, यह सत्पुरुषों का कहा एमा स्नातन धर्म है-ऐसा पसिष्ठ करते थे। ३१९ बई, भाषण १० गुप १९५८ पन मरिमार्नु पाठा पर, पीई फाम करंध रे, वेम भुवपर्मे मन स परे गानाक्षेपकर्मव रे । मिस पत्रमें मनको म्पास्याफे विषयमें मिया, मिस पत्रमें पपिठके पत्तेका प्राप्त लिखा है, निस परमें “पम नियम सपम माप कियो" इत्पादि काम्प भारिक विषयमें लिया है, जिस पत्रमें मन बादिके निरोप करनेसे शरीर वादि म्पपा उत्तम होनेके विषपमें सूचना की है, और इसके बादका एक सामान्य पत्र-पेस पत्र मिहै। इस विषपमें मुम्न्य महिमपी इया और मूर्षिका प्रत्यक्ष ऐना, इस बात के संबंध प्रभान पाम्प माँचा है। सक्षम है। इस प्रमके सिवाय बाकांके पोच उत्तर सिमभेका मनुक्रममे विचार होते हुए मोदामें हम उसे समागममें पंछना ही योग्य समाप्तते है, अर्थात् पा बताना हाम योम्प मास होता है। न पर मामरिक मि तुमको पामर मेगा नहीं मान को मारम्परी पनि गुना महान सटी मी वा भनुम ना मी मरमा मार्ग मामन सुन नहीचनले।
ह भीमद् पचन [पm १४ १५ १५, 1. ३१४ बा बापाठ गरी १९९८ सम-मास्मस स्पितिस पचापाग्य फा मिले हैं। यहाँ उपाधि माममे प्रारम्भ उदय है। उपाविमें विश्वपरहित होकर प्राप्ति करमा, या बात मत कटिन है, ओ यता हा समयमें परिपक समानिनप हो जाती है। शति ३१५ समई, भाषण मी १९४८ चौरको माना समप जान मिश्राप पुटकारा नहीं, तबतक पणापाम्प समाधि नही । पर निनके लिये मुमभुता और ज्ञानीको पहिचान उत्पम होने योग्य है। नो कमीको पयायोग्यरूपसे रिचानता माना जाता ह–अमस शानी हो जाता। मानधनवाने एक स्परपर ऐसा कहा है कि- गिन पा निनने में आरोप, वे सहि मिनबर झरे रे, मृगी सीधन परमार व मुंगी जग माग रे । बिन हर बाद सांसारिकमावसंबधी माममात्र स्पागकर गो कोई मिनमगवानको बर्माद सम्पचनाचीतरागो-मारापमा करता है, निपपस जिनपर बाद निम्पप से बुल हो जाता है। इसके लिये भमरी वौर मटका प्रपथमे समातमें भामेवाड़ा कर दिया है। हाँ में मी उपाधि-योग यता पपि बन्प माप बाममात्र उत्पन्न नहीं होता यही मुम्प समाधि । ३१६ गई, माण सुदा १ घुभ १९९८ भास्मपद-समस्थिविस नमरसमा गिसमें जगत् मोता है उसमें पानी मागता -निसमें जानी नागता है उसमें जगत् सोता है। जिसमें जगत् रागना उसमें पानी सोता है-ऐमा आहष्ण प्रते है। बम्बई प्राण शी ५, १९९८ रगत् मार मामा मार्ग य दोनों एक महो। पिसे नगदी इस मथि भार माना है, उस मामय बनिमा परि और अमावना होती है, ऐसा माम होता है। १ मा मियानरम्नास्ता विमी। पापा मम शानि ग A पनो मुनेः " म संचा मुन्ना बरो-यापपरेसा बोडमीह। सीनुमान मिल मगित दुई। बोपानदेष-परमात्म्यप-1 इमरामपपरपम ममिया।
पा ९८ ३१.] विविध पत्र मावि संपा-२५वाँ वर्ष ३१८ सम्पई, ग्राषण मुदी १० पुष १९९८ ॐ नमः निष्काम यथायोग्य निन उपानित कर्माको भोगते हए भविष्यमें प्राप्त समय म्यतीत होगा, ये कर्म यदि तीबतासे उत्यमें गकर धयको प्राप्त होते हों तो वैसा होने देना योग्य है, ऐसा पाहत रांका सकाप है। मिससे म्यावहारिक प्रसगसपी चारों तरफसे चिसा उत्पन हो, ऐसे कारणों को देखकर मी निर्भयताके बाधित रहना ही योग्य है । मार्ग इसी तरह है। हामें हम कुछ विशेष नहीं लिख सकते, इसके लिये क्षमा माँगते । नांगरमुख पामर नब माण, मष्ठमसुख न कुमारी रे, अनुमामिण वेम प्यानवणं सुख, कोण नाणे नर नारी है। पन मदिसा पासा उपर, पीनी काम करत रे । (२) 'सत्' एक प्रदेशमर भी दूर नहीं है, परन्तु उसके प्राप्त करनेमें वनत बतराय रहा करते हैं वौर एक एक नतराय लोकके बराबर है। बीपका कर्जन्य यही है कि उस सत्का अप्रमतासे प्रवण, मनन, और निदिप्यासन करमेका वा निमप रपसे । हे राम 1 मिस मनसरपर जो प्राप्त हो बाप उसीमें स्तोपपूर्वक गमा, यह सपुरुषोंका कहा वा सनातन धर्म है-ऐसा पसिष्ठ करते थे। ३१९ बर्मा, भाषण ती १० पुष १९९८ मन महिसान पासा उपरे, बीमा काम करत रे, वेम भुवपर्मे मन र परे दानाक्षेपकरंत रे । गिस पत्रमें मनको म्पारपाके विषयमें पिसा है, जिस पत्रमें पापडके परेका रयत लिखा है, मिस फरमें "पम निपम संपम माप कियो" स्यादि काम्प बाके लिपपमें सिम्मा है, रिस पत्रमें मन मादिके निरोध करमेसे शरीर वादि म्पया उत्पन्न होनेके विषयमें सूचना की है, और इसके बादका एक सामाप पर सब पत्र मिसे है। इस विपपमें मुम्म भक्तिसबपी एम वीर मर्षिका प्रस्पश्च होना, इस बात के संबपमें प्रधान पास्य पाँच पगमें है। इस प्रश्नके सिवाप बाकीफे पत्रोंका उचर मिसमेका बनुमसे विचार होते हुए भी हमें हम उसे समागममें पूछना ही योग्य समझते हैं भपात् यह बता देना हाउमें योग्य मान होता है। मिन AVR मगर मेगा नये हमर गेम कहाँ जान से मार मार काम्न नापन सी सीपय मनुमा रिना भी मर नारीपानन नुन नहीं पन सम्वे। - भीमद् रामचन्द्र [पत्र १२ पदि कोई दूसरा मी परमार्पर्सी विचार-प्रश्न-उत्पम ऐौर पर उसे मिलकर रख सको पोमिस रसनेका विचार योम्प है। पूर्वमें बाराधमा की हुई, जिसका नाम फेवर उपानि है, ऐसी समाधि उदयरूपसे यती है। एमें यहाँ गाँधम, माण, और मननका साधन किस प्रकार गता है। बानन्दधननाके दो गाय याद मा ये है, उन्हें मिलकर यह पत्र समाप्त करता है। इनविष परसी पन मिसरामी, मिनरर गुण में गार , दीनघुनी मार नगरवी, मानंदपन पद पाने हो। मष्ठिमिन सरक शिम अपगणिपस। मन मरिगनु पाम परे, मीना काम करत । ३२० बई, भाषण पदौ १०, १९९८ मन महिसान महासा परे, बीमा काम करेव रे, म भुवपमें मन र परे, पानाक्षेपकवत रे। पन पन सासन भीमिनबरव । निस प्रघर परसंबपी दूसरे समस्त कार्य करते हए मी पतिव्रता (महिण) मीका मन अपने प्रिय भरमें ही छीन यता है, उसी तय सम्परवि जातका चित्त संसारमें यकर समस्त काकि प्रसगमें प्राति करते पर भी, मनोसे माण किये हुए उपदेश-धर्म हो डीम यताहै। समस्त मसारमें मी और पुस्पके स्नेहको ही प्रमान माना गया है, उसमें भी पुरुपये प्रति मीका प्रेम इससे भी किसी प्रकार विशेष प्रधान माना गया है और इसमें भी पति के प्रति पतिता बोका स्नेह तो सपान गिना गया है। यह स्मेह ऐसा मप्रमान क्यों माना गया है ! इसके उत्तरमें सितको प्रथम दिलाने के लिये इस पतको देनेवाले सिकार करते किहम उस स्नेहको सर्व- प्रमान सौमिप मामते कि दूसरे सब परसंबधी (और दूसरे मी) काम करते पनेपर भी उस पतिवा महिमका विच पतिमें ही सनम्मस प्रेमस्पसे स्मरणरूपसे, पामरूपसे और समरूपसे यवा है। परस्त मितकार पते है कि इस स्लेहका घरण तो संसार प्रत्पपी है और यहाँ तो ससार प्रापपी करने के लिये कारनेच प है। सरिये मिसमें पा स्नेह मनहपसे प्रेमरूपसे, स्मरणरूपसे, भ्पामस्मसे और स्मारपसे करना योम्प है जिसमें पा स्नेह बससार-परिणमनको प्रत करता है- उस उपदेश-धर्मको करते। उस स्लेरको पतिस्ताप से मुमको बानासपी माणस्म उपदेश भाशि धर्मम उसी प्रचारसे करना पोम्प बोर यब यो गीत उसके किये ठसी प्रकारसे बापरण करता है, तब या "ता' नामको सममितसंबंधी शिम स्पित ऐ बावा, ऐसा हम मानते हैं। १त प्रभार पवार मम मम देनेवाले निकाएगान मापनमा दो भानवे मापूर पर पाया।
पा ३२ ] विषिभ पन मादि संग्रह-श्यों व २०७ , ऐसे वसे भरपूर ये दो पद है। पहिण पद मतिप्रधान है, परन्तु यदि इस प्रकारसे ग्रह बाशयसे गोषका निदिध्यासन न हो, तो फिर दूसरा पद ज्ञानप्रपान जैसा मासित होता है, मौर तु मी मासित होगा, ऐसा समझकर उस दूसरे पदका उस प्रकारका मास-बोध-कोनेके लिये फिरसे पत्रके मतमें केवल प्रपमका एक ही पद लिसकर प्रधामरूपसे मकिको प्रदर्शित किया है। मक्तिप्रधान दशासे माचरण करमेस चौरके सम्म वादि दोप सुगमतासे नए हो जाते है, ऐसा हानी पुरुपोंका प्रधान माशय है। ठस भक्मेिं रिस नौवको माप मी निष्काम मकि उत्पम हो गई हो, तो गावातसे दोपोसे र करनेके लिये योग्य होता है। पदान, भयमा बानप्रधान-दशा, ये ममुगम मार्गको वोर, स्यपार वादि दोपकी मोर, अयमा पार्यसबपी भांतिकी बोर के चाते है, प्राय करके ऐसा ही होता। उसमें भी इस कालमें सो पात कास्तक भीवनपर्यंत मी पीसको मतिप्रधान-दशाका दोबारावम करना योग्य है। पानियोंने ऐसा ही निधय किया माझ्म होता है (हमें ऐसा माझ्म होता है, वौर ऐसा हो)। तुम्हारे उदयमें नो मुर्तिके दर्शन करनेको इन्छा है, (में) उसका प्रविष करमेवाम मारा प्रारम्व-स्थिति है और उस स्थिति के परिपक होनेमें बमी देरी है, फिर उस मधिको प्रत्यक्ष- रूपमें तो दामें गृहस्थाश्रम है, और चित्रपट सन्यस्त-आमम है, यह मानका एक दूसरा मुम्प प्रतिबंध है। उस मधिसे उस मारमस्वरुप पुरुषको दशा फिर फिरसे उसके बाक्य भादिके अनुसथानसे विचार करमा योम्य है, और पा उसके एय-दर्शनसे मी महान् पछ है। इस बातको यहाँ सश्चित करमी परवीहै। मृगी ईसीकाने घटकार, के भंगी मग नोने रे या बास्य परम्परागस है। ऐसा होना किसी वर संभव है, तथापि उस प्रोफेसरको गरेपणाके अनुसार यदि मान कि ऐसा नहीं होता, तो मी इसमें कोई हामि नहीं है, स्पोंकि अब प्रान्त पैसा प्रमाष उत्पम कर सकता है, तो फिर सिनिका ही अनुमा अथवा विचार करना चाहिये । प्राय करके इस बात के समय किसीको ही शका होगी, सलिये पा शान्त मान्य है, ऐसा मायम होता है। या डोक्तपिसे मी वनुभवगम्य है, इसठिये सितमें उसकी प्रबसता समझकर महान् पुरुप उस पन्तको देते आये , और किसी तरा ऐसा होना हम समय मी मानस है। काचित् पोपी देरके पिये बह दस्त सिद्ध न हो ऐसा प्रमाणित हो मी गाय, तो मी तीनों काठमें निरापाष-वसिख बात उसके सिमान-परकी वो है। मिनस्वरूप या मिन भाराप, ते सहि मिनार शेष रे भामम्दपनमी क्या पसरे सब हानीपुरुष ऐसा ही करते है। और फिर मिनमगवान् और ही प्रकारसे करता है कि वनम्तबार निनमगवान्को मक्ति करनेपर भी गीवफा कम्याण महीं हुवा। दिन- मगवामक मार्गमें पानेवाले सी-पुरुष ऐसा करते हैं कि ये दिनमगवानी बारापना करते हैं, और वनीकी माराधना करते गाते है, भपका ठमफी मारापमा करनेका उपाय करते हैं, फिर भी ऐमा माम मही सेवा किये बिनदर हो गये तानों का बमारप मित तो यही परिता जाता है, तो फिर यह बात शंका करने योग्य यों नहीं!
भीमद् पसचन्द्र [पा २१ ३२१ धमई, भाषण मदा १९९८ म भुवपमें मन र परे, मानसिपकात रे सिम रिचार-पान विशेपत हो गया है, ऐसा कानाक्षेपकरत'-माम-कस्पाणको एसवठा पुरुष हानीके मुम्से अषण किये गए शाम-कम्पाणनप धर्ममें निश्चय परिणामसे मनको भारण करता है पर उपरक पदोका सामान्य मा। उस निश्चय परिणामका स्वरूप माँ से पटता है, इस मासको पाले ही बता पा है। पर इसी तय पटता ( कि मिस त परके दूसरे काममि प्रति करते हुए भी पतिया बीका मन अपने प्रिय समामा सौन पता है । इस पाका विशेष वर्ष पहिये सा है, उसे स्मरण करके सिदातरूप उपरफे परके साथ उसका अनुसषान परमा योग्य है क्योकि " मा महिमन पसारम उपो" यह पर रोकेशरूम है। परमात समर्थ सिवातका प्रतिपान करते हुए नागके परिणाममें उस सितके ठीक ठाक बैठ जाने के लिये समय रयत हो ना योम्प है, ऐसा मानकर मंपका इस स्पल्पर अगत्में-ससारमें- माप मुख्य, पुस्पके प्रति सोश माहि भालररित जो सोका काम्प प्रेम है उसी प्रेमको सम्पुरमसे प्रवण किये हुए धर्ममें परिणमित करके पे करते हैं। उस सपुरपाय अषण किये हुए बम, बन्प सम फाके प्रति जो प्रेम है, उससे उगम्सीन होकर एक म्पसे, एक स्मरणसे, एक अपीस एक उपयोगसे गौर एक परिणामसे स विमें एनेपाले काम्प प्रेमको हटाकर, पुतधर्मरूप करनेका उपरेछ किया गया है। इस काम्प मेमसे मी ममत गुणनिशिए प्रेम मुतके प्रति करना योग्य है, किर मी प्रांत इसकी सीमा मही बना सक्छ । इस कारण यहाँक त पाँच सका, पीपलका प्रेम करा गया है त तिकी चरम सीमातक नही पहुंच सका। अनादि काम्से मौतको संसाररूप अत परिणति प्राप्त ऐनेके कारण उसे असारस्म किसी मी मरमान मोहै। मानसेवरोध स्पेग मिशनर उस बंश-रिक प्रगटोनेका योग मशि उसे मिठा मी तो इस मिपम स्मार-परिणति कारण उसे पासधश नही मिन्ता । वाकयामा म मिलता तबतक गोलको निमको प्राशिका मानना पोप महीं; और यातक इस प्राधि न हो तबतक पीनदी को सपना पाप नहीं-उसे दुसी करना हो योप है । ऐसा देखकर गिसे कर्पत बनत रुपा प्राप्त है, ऐसा बाम पुरुष, दुग्स दूर करनेके मिस मार्गको उसने माना है, म उस मार्गको पता पा करता है और मविप्प अंगा। मार्ग मोकगिसमें गालका सामा- कि मप प्रगट एवाई-विसमें बाबका साभाविक मुब प्रगट [मा है-ऐसा बानी पुरुष हो उस मान-परिणति भार मते प्रात जो इस्परिणाम है उस्से मामाको स्वाभाविकरूपसे समझा सकनेके पोम्प हैकर सकमेके योग्य है और पाचन मामा के सामाबिक शानपूर्व होता है, इसस्पेि पर उस दुसर कर सकनेमें समर्प है। इसलिये यह धन किसी भी प्रकार से मामले मरण दो उसे गर्वभाषमप बातफर उसमें परम प्रेम पारित हो तो काल ही अपना मकुमसे बामात्र स्वामानि सप प्रगट ऐ सस्ता है।
पर ११२] पिपिप पब मादि सपा-या पर्प ३२२ बई, ग्राषम वदी १९९८ निरन्तर ही मात्मस्वरूप हा करता है, जिसमें प्रारम्बोदयके सिपाप दूसरे किसी भी मयका शका योग नहीं है। इस उदयमें कमी परमार्थ माया कहनेका योग उदय माता है, कमी परमार्प-भाषा सिसनेका पाग उदय बाता है, और कमी परमार्य-भाषा समझानेका योग उदय वाता है । हासमै तो श्य-दशाका योग विशेषतासे या करता है, और वो कुछ उदयमें नहीं पाता उसे हम्में तो कर सकनेकी असमर्थता है। मीसितम्पको केवल उदयाधीन करनेसे-ऐनानेसे--विषमता र हो गई है। तुम्हारे प्रति, अपने प्रति बार दूसरों के प्रति किसी भी तराका बैमाधिक मात्र प्राय उदित नहीं होता, और इसी कारण पत्र आदि कार्य करनेरुप परमार्थ भाप योगसे भयकाश प्राप्त मही है, ऐसा हिस्सा है, यह ऐसा है। पूर्वोपानित सामायिक उदयके अनुसार देहकी स्थिति है वाममानसे उसका नाकारा अस्पत भावरूप है। उस पुरुपके स्मरूपको बानकर उसको मतिने सरसगका महान् फल होता है, जो केवल भित्रपरके पानसे नही मिकता । गो उस पुरुपके सरूपको पानता है, उसे स्वाभाविक अस्पत सुर मारमस्वरूप प्रगट होता है। इसके प्रगट होने के कारणम्त उस पुरुषको जानकर सब प्रकारको असंसार-संसार-कामना परित्याग माप करके परिस्पाग करके-पुर मलिसे उस पुरुप-स्वम्पका विच करना योग्य है। जैसा उपर कहा है, चित्रपटको प्रतिमाके एय-दर्शनसे महान् फस होता है—या बाप पिसवादरहित समसकर मिला है। मन महिसाई पासा पपरे, मीना काम करंव रे इस पदके विस्तृत वर्षको वाम परिणामनप करके उस प्रेम-मविको सत्पुरुपर्म मपतरपसे करमा योग्य है, ऐसा सम तोर्पकरेंने कहा है, तमाममें करते है, और मविप्पमें मी ऐसा ही करेंगे। उस पुरवसे प्राप्त उसको वामपति-स्यक मापा, गिसका विधारमान विपरित हो गया है, ऐसा पुरुष, उस पुरुषको भारमकायाणके सिये बानकर, या भुत (भत्रण) धर्ममें मन (बारमा) को धारण करता है-उस रूपसे परिणाम करता है। परिणाम किस तय करना पोम्प है, इस मासको मन महिगर्नु हाम उपरे, बागा काम करत रे' या त देकर समर्थन किया है। ठीक तो इस तर पटवा है कि यपपि पुरुषके प्रति बीका काम्प-मेम ससारके बम्प मार्योको अपेक्षा शिरोमणि है, फिर भी उस प्रेमसे मनत गुणविशिय प्रेम, स्पुस्पसे प्राप्त वामरूप श्रुतधर्ममें ही करना योग्य है, परन्तु इस प्रेमका स्वरूप नयाँ रतिको उमपम कर जाता है, यहाँ पानका अवश मी, ऐसा समझकर ऐ, परिसीमाभूत सुतपर्मक किये मारके प्रति पीके काम्प प्रेमका त दिया है। यहाँ त सिमांतको चरम सीमातक नहीं पाँचता इसक मागे पाणी पीछे ही परिणामको पाकर यनाता है, और वाम-म्पटिसे ऐसा माम होता है।
भीमद् पम्पन्न [पा ॥ ૩૩ गई, पापण ही ११ गुरु १९९८ मन्म संपन माई ००तमतार्थ जिसकी भात्मस्वरूपमें स्पिति ऐसा जो उसका निकाम स्मरणपूर्वक पयायोम्प बाँचना । उस तरफसे "मायका हायिक समकित महीं होता" पारि सबंधी म्पापानको पाविषपक तुम्हारा मिसा हमा पत्र प्राप्त हुमा । यो मात्र उम उस प्रकारसे प्रतिपादन करते है--उपदेश करते , और उस मयमें नीनोंको विशेपरूपसे प्रेरणा करते हैं वे गाव परि उतनी प्रेरणा-गोषणा-माके कल्याणके विपपमें करेंगे तो इस प्रश्नके समाधान हानेका उने कमी म कमी पाय बासर मिझेगा | उन भावों के प्रति मरि करमा योग्य नहीं है, केवर निफाम झरणासे हो उन बायो देखना पोम्प है। इस संबंधमें किसी प्रकारका पितमें सेर कामा योग्य नहीं, उस उस प्रसगपर गोको उनके प्रति कोष मा करना योग्य महो। कहापित उन गांवोंको सपोश देकर समझानेकी तुम्हें पिता होती हो तो भी उसके लिये तुम वर्तमान दशाक्ये देखते हुए तो प्रचार होणे, इसध्येि वनुकपा-बुद्धि और समवा-बुर पूर्वक उन नौवोंके प्रति समर परिणामसे देखना, सपा ऐसो होइया करना पहिय और यही परमार्थ मार्ग है, ऐसा नियम रखना योग्य है। हाम्म उनेमो कर्मसमधी वावरण है, उसे मग करने के लिये यदि ने स्वयं ही पिता उत्पम हो तो फिर तुमसे अपना तुम जैसे दूसरे ससंगाके मुख्से, उने कुछ भी पारम्पार मरण करने उम्सनधि अपम ; तथा किसी बामसाप सापुरुपके सयोगस मार्गको प्राशि हो परन्तु ऐसा पिता उत्पा होने का यदि उमझ पास साबन भी हो तो हासमें वे ऐसी पेशापूर्वक भाषरण न करें। और यमराक- उस उस प्रकारको गावकी पेय यसो तक वाकर पैसे हानी-पुस्पका पाप भी उसके किम निफर होता है तो फिर तुम मेगोके वात्य निष्का हो और उन या शाप माराम पो, इसमें हुए भी वापर्प नहीं। ऐसा समझकर उपर प्रदर्शित को तरंग मावनासे उनके प्रति मा करना और किसी प्रकारसे मी निस्से ठमें तुमसे मेरा कम कारण उपस्थित हो ऐसा विचा करना, पह मार्गमें पोम्प गिना गपाहै। फिर, एक दूसरा अनुरोध कर देना मी सररूपसे मिलने पोम्प माम होता है, सकिने बिहे दते । पर है कि हमने पहिले म गेगोंसे कहा था कि जैसे बने से हमारे स्वर दूसरे मामोसे कम ही बात करम्य । इस मनुकममें बम्ने म्प पर विस्मृत हो गया हो बम गिरसे स्मरण रखना । हमारे समपमें वीर हमारेवरा कहे गये अपना लिये गये पायोक संगमें ऐसा करना योग्य वौर हामें मवरणोंको तु, स्पर क्या देना पोप न्यो । परन्तु पदि का म्य बनुनमसे बमुसरण करनेमें मसत होता है तो यह दूसरे बाबोधे मा बादिका कारण होता। पा मोबर भापिका पर्चा इस्पादिफे पसे उमारे अनुभवमें वा गया है। इसका परिमाम पर होता है कि कारण चीनको प्राप्त होनसे कम्पाणके कारण हों, उन गानों को उन कारणों की प्राप्ति ममें शेतामाता स्पोकि ये तो बानी मानतासे सच परिचान महीई ऐसे स्पुम्प समें तुम होगोंसे जानी मासे उस सपुस्पके प्रति मिमुख तेरे उसके विपय माहपूर्ण- " पर २२३] विविध पत्र मावि संप्रह-२५याँ पप दूसरी-दूसरी पेठा कल्पित कर छेते है, और फिरसे ऐसा सयोग मिल्नेपर पैसी विमुखता प्राय करके भौर यम्मान हो जाती है। ऐसा न होने देनेक लिये, और इस मवमें यदि उनें ऐसा सयोग पमानपनेसे मिठ मी बाय दो वे कदाचित् मेयको प्राप्त कर सकेंगे, ऐसी धारणा रसकर, अतरगमें ऐसे सत्पुरुषको प्रगट रसकर वामरुमसे गुप्त रसना ही अधिक योग्य है। वह गुमपना कुछ माया-कपट नहीं है, क्योंकि इस तर मताव करना मापा-कपटका हेतु महीं है, पर भविष्य-कापाणका ही है। यदि ऐसा हो तो यह मापा-कपट नहीं होता, ऐसा मानते हैं। मिसे दर्शनमोहनीय उदयमें यम्मानरूपसे है, ऐसे बीपको बपनेहारा किसी प्रकार सत्पुरुप वादिके विषयमें नयापूर्वक योजनेका मबसर प्राप्त न हो, इतमा उपयोग रखकर पटना, यह उसका और उपयोग रस्नेवाले दोनों के कायाणका कारण है। बानी पुरपके विषयमें क्यापूर्वक गोम्ना, तमा इस प्रकारके प्रसगमें उत्साही होना, यह मीवके बनत संसारके मनेका कारण है ऐसा सापकर कहते है । उस पुरुपके गुणगान करना, उस प्रसगमें उत्साही होना, और उसकी मालामें सरल परिणामसे परम उपयोग-पिपूर्वक मना, इसे तीर्थकर मनत ससारका नाश करनेवाला करते है और ये बाप बिनगममें है। बहुतसे मीन इन गायोको अषण करते होंगे, फिर भी मिनोंने प्रथम वाक्यको निष्फल भार दूसरे बायको सफर किया हो, ऐसे बीव तो क्वचित् ही दसनेमें जाते हैं। बीवने मनतबार प्रपम बायको सफल और दूसरे गाम्पको निष्फल किया है। उस तबके परिणाममें मानेमें उसे बिल्कुल मी समय नहीं माता, क्योंकि भनादि कासे उसकी वारमा मोह नामको मदिरा म्पात हो या है। इसलिये बारमार मिचारकर पैसे से प्रसगमें पपाशकि, पपाक्त भौर वीर्यपूर्वक ठार को अनुसार भाचरण करना योम्प ।। कातिर ऐसा मान हो कि ' इस काल्में झापिक समकित नहीं होता,' ऐसा मिम अग ममें स्पष्ट किसा। अब उस जीपको विचार करना योग्य है कि 'वापिक समकितका स्पा वर्ष होता है।' बिसके एक नवकारमत्र बितना भी मत प्रस्पारस्पान नहीं होता, फिर मी वह गाव मनिकसे अधिक तीन मवमें और मही तो उसी भवमें परम परको प्राप्त करता है, ऐसी महाम् जाम्मर्य करने पाछी उस समफितकी म्पास्मा है फिर जब ऐसी पर कौनसी दशा समधनी चाहिये कि जिसे सापिक समकित करा नाय ! ' यदि दीपंकर मगवान्की स प्रथा का माम पापा समकित माने तो उसमयाको कैसी समझनी चाहिये ! बीर मोमया हम समझते हैं पर तो निश्चपसे इस कासमें होती हो महो । यदि ऐसा मालूम नहीं होता कि अमुक दशा वका अमुक अदाको धायिक समकित करा है, वो फिर हम करते है कि जिनागमके शम्दोका केवल यही अर्थ मा कि धापिक समकित होता ही नही । बा पदि ऐसा समतो कि ये सम्म किसी दूसरे भाशयसे ये गये है, अयत्रा किसी पीछे कारके सर्जन दोपसे लिस Pये गये हैं तो मिस गौचने इस लिपपमें नामापूर्वक प्रतिपाम किया हो, पर सीन से दोपको प्राप्त होगा, इसमे करणापूर्वक विचारना योम्प है। में विमें निनसूत्रों के नाम का गाता है, उन सूत्रमें 'धायिक समकित नहीं है। ऐसा स्पर नही टिसा है, वथा परम्परागत वौर दूसरे मी पाससे पयोंमें यह मात पछी बाती ..ऐसासने - भीमद् परवान [पा पहा है, और मुना भी है और यह वाक्य मिथ्या है अपवा मूषा है, ऐसा हमारा अभिप्राय : तपापा माप विस प्रकारसे लिखा है पर एकाच मिप्रापसे । सिमा है, ऐसा मा हमें नहीं। कसाचित् ऐसा समझो किम वाय एकतिस्मसे ऐसा तो मी किसी मी प्रधरसे म्याकुत्र पोग्य मारण कि पर इन सब भ्याच्याजोंको स्पुस्पके नाशयपूर्वक नही नाना तो भभाम्पाये ही सफल नही है। काचित समझो कि इसके स्थानमें, बिनागममें मिला हF कार की तरह पाँच कामें मी पातसे भावोंचे मोश होगा, तो इस पावका भत्रण करना कोई और हमारे लिये कापाणकारी नहीं हो सकता, क्षमा मोध-प्राशिका कारण नही हो सकता, विस दश पर मोक्ष प्राप्ति की है, उसी दशाको प्राप्ति हो रहै, उपयोगी है, और करपाणप रण करमा तो एक मात्र मात्र है, इसी तय इससे प्रवित पाप मी मात्र एक बात ही धोनों ही बातें किसी हों, अपना कोई एक होमिटी, अषमा दोनोंसे एक मी बात न । कई मी व्यवस्था म बताई गई हो, वो भी एप वपना मोक्षका कारण नहीं है। के मध दशा हो बम और मोक्ष दधा ही मोक्ष, क्षायिक दशा ही बायिक का होमपी बो प्रमणमा अपण है, जो मनन हैमा मनन है जो परिणाम है। है, जो प्राप्ति प्राप्ति है-ऐसा सपुस्पका विषय है। जो बंपरा मोक्ष मही. हैप बम नहीबो नोपहो, बो विस स्पिधि है या उसी स्थिति है। निस मंब-गुदि र हुए बिना मोश-जीवन्मुति मानना कार्यकारी नहीं है उसी तर मलामिक सायिक मानना मी कार्यकारी नहीं है। माननेका फर मही, फल केबह दशाका है। सब पर बात है तो फिर जब ममी वामा हामें कौनसी दशामें है, और उस । समकिती बीचको दशाका विचार करने योग्य है या नवपना उससे उत्तरता विपया उससे दिशा विचारको शौच मपाइपसे कर सकता है अपना नही सोच विचार करमा गीतको है। मस्त जनतास मोत गया फिर मी नापने ऐसा विचार नहीं किया | उसे ऐसा पार पोप है एसा उसे मासित मी माहीमा और यह गोल वनंतबार निष्पातास सिद-पाकक Pी उपर कर उस कमको उसने सिा विचारे से किया है विचारपूर्वक विचारसे नहीं किया। जिस प्रकार मोबने पूर्वमें यथार्थ परके विमा हो ऐसा किया है उस परस रचा (पार्थ चारदशा) के बिना वर्तमानमें एसा करता है, पर रखता मागको बालके मामा भान नहीं होगा तबतक मविप्पमें भी इसी तय प्रति करता येगा । पिसा मी महापुम्पर मोगकापना करने तथा वैसे मिप्या उपदेशपर से बोलका बोन- गध प्रान हो गपा है ऐसा जानकार इस विषयमें सापवान होकर परिपा निराकरण होनेका गा सा उपश करनेसे सरेको प्रेरणा बनेसे और बाइक बोलने का अधिक स्पा करें। एक बार मोमोर मी अतिसय मतिराम प्रेरणासे भी पाणी मीनको हो होगी। और उस मौनको प्राप्त होनेके पर ही गौपसे एक मभरका सस्प मोडा राना मी । पागात किसी मी प्रकासे तालों का देह परने पोप नहीं है।
- फा २२४] विषिप पर मादि समारों वर्ष तीर्यकरन मी ऐसा ही कहा है, वौर पर हाफमें उसके भागममें मी है, ऐसा बात है। कदाचित् यदि ऐसे कहा वा वर्ष बागममें नहीं मी हो, तो मी नो शरद ऊपर को मागम ही है- बिनागम हो। ये सम्द राग, देप और ममान इन तीनों कारणोंसे रहित, प्रगटबपसे लिखे गये है, इसलिप सेपनीय है। थोडेसे पापोंमें ही छिस गछमेके लिये विचार किया हुमा यह पत्र विस्तृत हो गया है, और यपपि यह गुत ही संक्षेपमें मिला है, फिर भी गात प्रकारसे भपूर्ण स्थतिसे यह पत्र जब समास करना पाता है। तुम तथा तुम्हारे नैसे दूसरे दिन मिन भाईयोंका तुम्हें समागम है उने, उस प्रकारके प्रसगमें इस परके प्रथम भागको विशेषरूपसे स्मरणमें रहना योम्प है, और बाकीका दूसरा भाग तुमें मौर दूसरे वन्य मुमुल नामोंको पारमार विचारमा योग्य है। यहाँ समाधि है। " प्रारम्बही " । ३२४ वर्मा, भाषण दो ११ रवि १९४८ . ) स्वस्ति श्रीसायम्म प्राम शुमत्याने स्थित, परमार्गक वसा निधया, निफामस्वरूप ( के वारमार स्मरणरूप, मुमुच पुस्पोंस वमन्य प्रेमसे सेवन करमे योम्प, परम सरस, वीर शान्तति ऐसे भी 'मुभाम्प " के प्रति भी " मोहमयी " स्थानसे निफामस्वरूप ऐसे स्मरणम्प म्पुरुषका फिनयपूर्वक पथायोग्य पांचे। जिसमें प्रेम-भकि प्रधान निकामहपसे लिसी है ऐसे तुम्हारे लिए बहुतसे पत्र मनुकमसे प्राप्त हए। भारमाकार-स्थिति और उपाधि-योगल्स कारणसे केवग इन फकी पाच मात्र लिस सका। पहा माई रेवासकरका शारीरिक स्थिति पयापोम्य न यनेसे, बीर म्यपहारसंबपी काम कामके मर जानेसे उपाधि-योग मी विशेष यसा वापा है, और हा करता है इस कारण इस चौमासेमें बाहर निकलना मय हो गया है और इसके कारण तुम्हारा निष्काम समागम मस नही हो सका, और फिर हिमाडीके पहिछ ठस प्रकारका सपोग प्रास होना समय भी मही है। तुम्हारे लिखे हुए बहुतसे पोंमें गार वालि समाव और परमात्रके मानसे प्रस्न लिने हए बाते ये इसी कारणसे उनका मी प्रत्युत्तर नहीं लिखा पा सका। इस बीचमें इससे भी निहासुओंके मातमे पत्र मिरे, प्राय करके इसी फारणसे ही उनका मी उत्तर नहीं लिखा मा सका। बाम गो उपाधि-योग रहता है, यदि उस योगके प्रतिपके त्यागनेका विचार करें तो पाग हो सकता है। क्यापि उस उपाधि-पोगके सहन करनेस प्रिस प्रारम्भको निति होती है, उसे उसी प्रकारसे सहन करमेके सिपाय दूसरी इच्छा नहीं होती; इसलिये इसी योगसे उस प्रारम्पय निाव होने देना पोम्य है, ऐसा समझते हैं, और ऐसी ही स्पिति है। शासों में इस कानको क्रम क्रमसे सीण होनेके पोल्प कहा है धार इस प्रकारसे कम कमस पुजा मी करता है। मुझपरपसे पर मीणता परमार्यसबपी क्षीगता हो कही है। जिस कासम बात कठिनतासे परमार्पको प्राति हो, उस काउने दुपम काम करना चाहिये । यपपि विसमे सकारमें [१३ १४ मीमामाद्र परमार्फको प्रासि होता है ऐसे पुरुषोंका समोग दुभ हो, परन्तु ऐसे काम, तो या मत्यंत दुर्मम हावाको परमादिक्षीण ती ना हो, इस कारण उसके प्रति जानो पुरुषों के उपोप कम ताबावा है, और इससे परम्परा र उपदेश मो क्षोण होता माया- वर्षात् का क्रम कमसे परमाघ-मार्गक म्पस हानेक कार भा रहा। इस कामें, और उसमें मी बामात माझ्ग सौ मोसे मनुष्योंकी परमार्थति यात धाम हो गई है, और या मात प्रत्यक्ष है। सामानदस्तामाके समपतक मनुष्योंमें जो सर सचि पौ, उसमें और बारकी सरगति महान् क्न्तर हो गया है। उस समयतक मनुप्पोको पतिमें कुल का बाकारित, परमापकी इम, और तसा निषयमें पता-पे पाते पैसा पा पैसा वाब महो योस कारण मान तो गुत ही धोणता मा गई है। पापि ममी इस में परमार्थापिका सपा म्पद मला, तपा मूमि भी सपम्पोंसे रात नो, तो मी पा का उस- काको वडा पविक विषम हैात विषम है---ऐसा मानते हैं। इस प्रकार काका सहप देसकर एपमें बहारूपसे महान् अनुकंपा या करता है। किसी भी प्रकारसे जीवोंकी मस्पव दुसकी निाविका उपत्य मो सोज्म परमार्य, पनि उस परमार्पसानी पि समती जाती हो, वो ही उसे सत्पुरुषको पहिचान ऐसी है, नही तो नही पीया ति फिरस मीवित हो, और किसी भी चीनका~यास बालोंको-परमार्थसबषी मार्ग प्रास्त हो, ऐसी बापा बारपसे गा करती है तो भी ऐसा होना हम बहुत दुर्गम मानते है, वौर उसके कारण मी उपर बवा दिये। निस पुस्पका चौपे काबमें मिना दुर्गम पा, ऐसे पुरुषका स्पोग इस काम मा है, परन्तु माबोंकी परमार्थसबषी चिंता सत्पत झाण हो गयी है। वर्षात् उस पुरुषको पहिचान होना सत्यत कठिन है। उसमें मौ गृहवास वाहिके प्रसगमें सस पुस्पको स्पिति देसकर तो पालको प्रति आना भौर मी दुर्षम है ~ अपत ही दुर्भम है और पछि काचित् प्रतालि बा भी गई पो में जो उसका प्रारम्भका कम राता है उसे देखकर उसका निषय यना दुभ है और यदि कयानिट उसका मिथप मी थे बाय तो भी उसका ससग पना दुर्गम , और परमार्थका यो मुम्प कारण है तो यही है, उसे ऐसी स्थितिम देखकर ऊपर बतास पर घरमोंको अधिक बगानमापस देसते, और यह बात देसकर फिर सिरसे अनुकपा मपम बापी। ईबरेनासे मिस किसी बोका मी प्रमाणपतमाल होलारोगा तो उसी व्यहो, और हम इस रिपपमें ऐसा मी मानते है कि यह रेसे मही परस्त इमसे ही होगा । परन्तु हम ऐसा मानते है कि जैसी मा0 पनुपायुठारिस जालोको पैसा क्षमा चार और परमार्ग प्रापित रो मोसा स्पोग हमें सौ प्रकारसे कम होमाराम ऐसा मानते है यदि या दो गंगा पमुना आ प्रधम अपना गुसराव देशमै उत्पल हुई होती- विंगत हुई तो तो या एक समान कमन देता। सपा हम ऐसा मानते है पनि प्रारम्पमें गहमास पाक महोबा वीर अपवर्ष पापमपास होता तो या मोक सरा बगान मारण होता । मालित् गापास बाकी होता बार उपाधि पर १२४] पिविष पत्र मादि सपा-२वा पर्प योगरूप प्रारम्य म होता, तो वह परमार्थका तीसरा वसथान कारण होता, ऐसा मानते हैं। परिसे को ए दो कारण तो हो चुके , इसठिये अब उनका निवारण नहीं हो सकता, फिर भी नमी ऐसा होना बाकी है कि पीसरा उपाधि-पोगरूप प्रारम्प शीप्रवासे निहार हो-उसका निष्काम करुणा पूर्वक बेटन हो। किन्तु पा विच मी ममी योग्य स्पितिमें है, बर्यात् ऐसौ होइअ यती है कि उस प्रारम्पका सहनमें ही प्रतीकार हो बाप, अपना उस प्रकारका उदय विशेष उदयमें बाकर पोरे ही कामें समाप्त हो जाय, तो ही बसी निफाम करुणा ग सकती है। और इन दो प्रकारों में सो हाल्में उदासीनसासे वर्षात् सामान्यरूपसे ही रहना है, ऐसी बारम-मावना है और इस मवपमें बारम्बार महान् चार हा करता है। जबतक उपाधि-पोग समाप्त नहीं होता सबक किस प्रकारके सम्प्रदायपूर्णक परमार्य करना, यह मौनरूपसे और विचार अथका निर्विचारमें हो रहा है अर्थात् हाटमें यह विचार करनेके विषयमें उपस भाव गता। बामाकार स्पिति हो चानेसे प्राप करके चित एक वंश मा उपावि-योगका पेन करने योग्य नहीं है, फिर भी पा तो जिस प्रकारसे साम करनेको मिले उसी प्रकारसे सहन करना है, इसलिये उसमें समाधि है। परन्तु किती बीपोंसे परमार्यसंवधी प्रसग पावा, तो उनें उस उपाधि-योगके कारण हमारी जनुकंपा अनुसार गम नहीं मिलता, और तुमारी किसी को कुछ परमार्यसबनी पात भाती पर मा पिम मुसिम्से ही प्रवेश हो पाती है, क्योंकि हमें उसका उप नहीं है। इस कारण पत्र आदिके प्रसगसे भी तुमारे सिवाय दूसरे मुमुक्ष जालोको इन्डिस अनुकंपासे परमाधि नहीं दी जा सकती, यह बात मी मित्तको मात बार सगा करती है। पिसके वधनपुछ म हो सकनेके कारण, चो चौर ससारके संघमें बी वादिरूपसे प्राप्त हुए है, उन गोषोंकी बनाको भी लेशित करमेको नहीं होती, वर्षात् उसे मी अनुकपास, और माँ बाप पारिक उपकार भादि घरोंसे उपाधि-योगका बयान ऐतिसे सहन करते है। और जिस जिसकी जो कामना है उस उस प्रारम्भक उदयमें जिस प्रचारस मा कामना प्राप्त होनी है, जबतक पर उस प्रकारसे न हो, तबतक निधि प्रहण करते हुए मी गाव उदासीन ही पता है। इसमें किसी प्रकारको हमारी धमना नहीं है, हम तो इस सबमें निफाम ही ई, रि मी उस प्रकारके सपन रखनेरूप प्रारम्भ उदयमें गता है। इसे मा सरे मुमुझुकी परमार्थाति उत्पम करने में हम विनम्प समाप्त है। नबसे तुम हमें मिठे हो तमासे यह बात-यो उपर अनुक्रमम सियो-फानकी इच्छा था, परन्तु उस उस प्रकारसे उसका उदय नहीं था, इसरिये पसा मही बना पा र उत्य बताने पोम्प पा इसलिये इसे सभेपमें कर दिया है, इसे तुम्हें पारम्पार विचारमेके लिये मिला है। इसमें पात पार करके सूरमापसे हलपमें धारण करने योग्य गात निसी है। तुम भौर गोशाके सिपाप इस पत्रके समाचार नानमे योग्य दूसरे गौर हामें तुम्हारे पाम महीं है, इतनी बात स्मरण रमनेफ लिये ही सिम्सी है। किसी बातमें, शादोंके सचिम होनेक कारण, पर कुछ एसा माम दे कि अभी हमें किसी प्रकारको संसार-मुरुमति बाकी 1, तो उस पर्यो रिसे विचारना योग्य मामिषप - प्रीमद् पात्र [ फा १४ परमार्थको प्राी होगी। ऐसे पुरुषोष सपोगा दुईम ही है, परस्तु ऐसे कमें या भस्मत ही दुर्गम हो रहा है। गोही परम्पर्यापि धाण ती ना या, इस कारण उसके प्रति बानी पुरुपोंके उपका कम होता पाता है, और इससे परम्परासे यह उपदेश मा पौण होता मा या अर्थात् मा अम कमसे परमार्थ-मार्गक पाक नका काठ बाया। इस काम्ने, और उसमें भी बायकस ख्यभग सौ वर्षांसे मनुष्योंकी परमार्थति बात काम हो गई है और यह बात प्रत्यक्ष है। सहवालदस्थामांके समपतक मनुप्पोम जो सरल पति पी, उसमें और मानका सरस नि महान् बन्चर हो गया है। उस समयतक मनुप्पोको निमें कुछ कुछ भधाकारित, परमाधम, और तसा निश्चयमें पता-पे बावें नैसी या मैसी मात्र मा रही है। इस कारण मान वो बहुत ही बीणता मा गई है। सबपि ममी इस कालमें परमार्पाचिका सर्वपा म्पसले मही हवा, तया ममि मी पुस्पोंसे रखित नहीं है, तो मी या काल उस- काछकी अपेक्षा अधिक विषम पात विपम है-ऐसा मानते हैं। इस प्रकार कामा काम देसकर पदपमें मासपस महान् मनुकंपा हा करती है। किसी मी प्रफारमै गोगों की मयत दुसको मितिका उपम नो सोंचम परमार्थ, यदि उस परमानषी पति कुछ बाती जाती ये तो उसे स्पुस्पको पहिचान होता है नही तो नहीं होती। यानि फिरसे गावित हो, और किन्दा मी गीतोंहो--तसे गायोंको-परमार्थसबपी मार्ग प्राप्त हो, एसी बनुकंपा वसारपसे यहा करती है, तो मी ऐसा होना हम बहुत दुर्मम मानते हैं, और उसके कारण मी ऊपर बताये। रिस पुस्पका पीपे काठमें मिम्मा एम पा ऐसे पुरुपका संपोग इस कामें मा है, परम्त बासका परमार्थसंगवी चिवा अपत क्षीण हो गमी वर्षात् उस पुस्पकी पहिचान ना करपंत कठिन है । उसमें भी गुरमास मारिके प्रसग उस पुरुपको स्थिति देखकर तो गोषको प्रताति मात्रा वार मी दुर्सम है-- -भपत ही दुर्सम है और पदि कापित प्रतीति मा भी गई तो हमें गे उसका प्रारम्पका क्रम पता है उसे देकर उसका निमप राना दुर्गम है और परिपशाचित् उस निपप मी रो बाप तो मां उसघ ससग यना दुर्गम । वौर परमार्थका जो मुम्प कारण है तो यही है, उसे ऐसी स्थितिमें देखकर उपर बताये हुए चरणोध अधिक बमालापसमत है, मार मापात देवार किरकिरस अनुकंपा उत्पम हो माताहै। विरेणसे जिस सी जीवका मी पाण पर्वमाममें होना होगा तो उस वया, पौर दम इस सिपमें पेग मी मानते है कि वह इस से नहीं परन्तु हमसे ही होगा । परन्तु हम ऐसा मानवे किसी हमारी अनुकपाळ इया, जिससे आपको मा परमार्थ-रिचार मोर परमार्य-प्राप्ति हो मर, क्मा संभाग में मा प्रकारमै कम माम ऐम्रा मानते है सिपहि पारेर गंगा यमुना मारे प्रगम बना गुमरान देशमें उपम होता-होविंगत होती तो माह एक बयान माग्ण हातपाइम ऐमा मानते हैं कि परि प्रारममें गहमासमाको म हाता धीर समचर्य पापमपास वो पर भी गरा बागान कारण मा । राषित् गलास की होता और उपारि फा ३२६, १२.] विषिप पत्र मादि संग्रह वा वर्षे एक क्षणभरक लिये मी इस ससर्गमें यमा अण्डा नहीं जाता, ऐसा होनेपर मी पास समयसे इसे सेवन किय घरे बाते है, वौर अमी अमुक कातक सेवन करनेका विचार रसना पा और तुम मी यही अनुरोध कर देना योग्य समझा है। जैसे बने सैसे विनय आरि साघमसे सफल होकर मस्सग, सशासाम्पास, और बारमविचारमें प्रति करना हो श्रेयस्कर। एक समय के लिये मी प्रमा- करनेकी तीर्थकर सकी बाधा नहीं है। ३२६ पार्थ भाषण बदौ १९१८ बिस पुरुषका दम्पसे, क्षेत्रसे, कासमे और भारसे किसी भी प्रकारको प्रतिबद्धता मही पती, का पुरुष नमन करने योग्य है, कीर्तन करने योग्य है, परम प्रेमपूर्वक गुणगान करने योग्य है, भीर फिर फिरसे विशिए आत्मपरिणामसे म्पान करने योग्य है। मापके मातसे पत्र मिले हैं। उपाधि सयोग इस प्रकारसे पता है कि उसकी निपमानता पत्र सिम्रने योग्य सबका नहीं सता, अथवा उस उपारिको तन्यरूप समाचकर मुम्परूपसे भाराधना फरत हुए, तुम से पुरुषको मी मानसकर पत्र नहीं लिप्सा; इसके लिये क्षमा करें । सबसे पिछमें इम उपावि-पोगकी आराधना कर यहै, उस समपसे जैसा मुकमार यता, सा मुक्तमान मनुपारि-प्रसागमें मी नहीं बता पा, पेमी नपस दगा मगसिर मुदी ६ से पकनाराम चमी भा की है। ३२७ बई मात्रपद मुदी १ मीम १९४८ सत् तुम्हारा बेग्य भारि विमासे पूर्ण एक सविस्तर पत्र करीब तीन नि पहल मिला पा। सीपको मेरम्प उत्पम होना, इसे हम एक महान् गुण मानते । और इसक साप शम, दम, विषक वारि साधनोंका भनुमसे उत्पम होनेम्प योग मिले तो चीनको कापाणको प्राप्ति मुरुम हो जाती है, ऐसा मानते हैं। (व्यरको साइनमें जो योग शए शिवा उसका अप प्रमुग अयमा समग करना चाहिय)। अनत काठस जीप ससारमें परिममण कर पाई, और इस परिभमणमें इसने वर्नत कर, जप, रम्प भारि सापन किये माइम होते हैं फिर भी जिसमे पयार्य काम्याग सिद रोता है, ऐसा एक भी सापन हो सका हो ऐसा माश्म नही होता । मे तप, जप, अपना भैरम्प, जपत्रा मरे साधन केबस संसारमपए है, ऐसा मो एमावर किम कारण हा ! यह बात सिर सिरसे विचारम पोम्प ।(यहाँपर किसी भी प्रकारमे रस, तप, वैराग्य आदि साधन सब निपट, ऐसा घमा अभिप्राप नहीं है, परन्तु ये गो निगल हुए, उसका क्या होगा, यह विचार करने के लिये यह मिया गया । मिसे कम्पागकी प्रालि हा गाती है, से जीतको राम्य भारि सापन तो निपपसे हाने दी)।
भीमद् पसन्द [पत्र १२५ है कि तीनों कारमें हमारे सबध प मास होमा कल्पित ही समझना चाहिये, वर्षात् ससार-सुख- पिसे हमें निरन्तर उदास मात्र हो यता है। ये बाप पा समासकर मही जिसे कि तुमारा हमारे प्रति पुस कम नि भय है, पता पनि होगा वोपनिषदो बापगा इन्हें किसी दूसरे ही से सिसा है। जगत्में किसी भी प्रकारसे बिसको किसी मी बापके प्रति मनटि नही, ऐसे भी.. निम्मान बामस्वस्मय नमस्कार पचि । तासीन म्का वर्य सम मानो। " ३२५ बाई, भाषण १९१८ मुमुभुम्न पनि ससंग में वो निरस्तर उकारिस्त परिमाममें यकर अन्य काममें ही वात्म-साधम कर सकता है, यह बात यथार्थ है । तपा सगर अमाइमें सम परिणति यना कठिन है, फिर मी ऐसे करनेमें हमाम साबम राता है, इससिये पाहे से मिष्या निमित्तमें भी जिस प्रकार सम परिणति भा सके उसी प्रकारसे प्रति करना योम्पपदिशानी के वामपमें निरन्तर बास हो तो पोरे हो साघमसे मी सम परिणति बाती है, इसमें तो कोई मी विचार नहीं । परन्तु मा पूर्वकर्मक पपनसे अनुकूम न आनेबारे निमिवमें बना होता है, उस समय पाहे किसी भी तय, जिससे उसके प्रति रेफाहित परिणाम थे, ऐसे प्रापि करना हमारी ति है, और यही शिक्षा भी है। वे जिस तर सत्पुरुषके दो उपारण मी न कर सकें उस तर पदि तुमसे प्रति करमा बन सकता हो तो कर सहकर मी उस तण वाचरण करमा योग्य है। हमें हमारी में ऐसी कोई शिष्ठा नहीक सिसे तुम्हें उनसे बात तयसे प्रतिछ पम्ना पो। परि किसी बात तमें में तुम्हें परत प्रतिमा समाते र गीतका अनादिका बम्पास है ऐसा गानकर भारत रखना ही बपिक बोम्प है। जिसके गुणगान करमस गीत भव-मुक्त गाव सके गुणगामसे प्रतिक होकर पोपमासे प्रापि करना या गौरको महा दुसका देनेवाग है, ऐसा मानते हैं, और अब पैसे प्रकारमें बार बार फंस जाते हैं दो हम समझते कि बीमो कोई ऐसा ही पधर्मका अपन होना चाहिये । हमें तो इस विषयमें पररित परिणाम हो यत, और उनके प्रति करणा हो वाती है । म मी इस गुण मनुश्मण सरो) पौर निस तय उम गोंको गुणगान करनेके मोम्प सरपके मर्म पर पोस्नेका सर उपस्थित न हो, ऐसा योम्प मार्ग प्राण करो यही मनुरोपी। हम सप उपाषि-प्रसगमें यते बाये है और पहेहै, इसके उपरसे हम स्पा मानते D उस प्रसगर्ने सम्पूर्ण वाममा से प्रति करमा हुर्हम है। इसलिये निम्पानिपूर्ण ब्रम्प, क्षेत्र, काल और मा. सेक्न करना बापक है। ऐसा बानते [ए मी हाम्में तो हम ऐसा ही करते है जिसमे उस उपाधिका पान करते हए निम्मापिका तिसम्म न हो बाप ऐसा ही करते यो । बम हम से मी मसका सेवन करते है तो कर हमें से बसेवनौष ऐ सना है पर बानत है परन्तु हमें तो हम पूर्वकर्मको ही मापे, इसपि तुम्रे एमए मार्ग हम कैसे बताने, पहराम हो गये।
१११, ११२] विषिष पन भादि संग्रह-२५वा पर्व . ३२९ बम्बई, मारप' सुदी १० गुरु १९९८ निस विस प्रकारसे पारमा वाम मात्रको प्राप्ठ करे, में सब धमकी भेद है। निस प्रकारसे रमा अन्य मानको प्राप्त करे वह भेद मन्यरूप ही है, भर्महप नहीं । तुमने हालमें जो वचन मन- के पश्चात् निष्ठा बंगाकार की है, यह निष्टा श्रेयमर है । बह निष्य बानि मुमुमुको स ससग मिल- पर अनुक्रमसे पदिको प्राप्त होकर अम्मम्पिविरूप होती है। बीवका, धर्मको मेवळ अपनी ही कल्पनासे अथवा कम्पमा प्राप्त किसी अन्य पुरुषस श्रवण करना, नन करमा वयषा आरावना करना योग्य नहीं है। जो कार बारम रिपतिसे हो सता , ऐसे पुरुषस ही भास्मा जयबा मारमधर्मका प्रवण करना योग्य है—यातनावन माराधना करमा याम्य । . ३३० बर्प, मादपर मुदा १० गुरु १९४८ स्मार-फारसे सगाकर इस क्षमतक तुम्हारे प्रति किसी मी प्रकारकी अविनय, वमधि, मस- कार अपना ऐसा 0 जन्य दूसरे प्रकारका कोई मी मपराध मन, पचन और कापाके परिणामसे हमा ET, उम सबको बत्पत नम्रतासे, उन सब बपराभोंके अस्पत छप परिणाममप मारमरिपतिपूर्वक, म सब करस क्षमा मागता , बार इसे क्षमा कराने के मैं योग्य हूँ। तुमें किसी भी प्रकारसे उस अपराध पारिका ननुफ्पोग हो तो मी क्यवरुपसे, हमारी किसी भी प्रकारसे सी पूर्वकालसमपी मानना मटकर, इस क्षणमें अस्पतरूपसे क्षमा करमे योम्प बामस्थिति करनेके लिये समुताम्ये प्रार्थमा है। ३३१ बम्बा, मारपद मुर० गुरु १९४८ इस क्षणपर्यंत तुम्हारे प्रति किसी भी प्रकारसे पूर्व बालि काउमें मन नपम और कायाफे योगस यो जो कुछ नपराप वाहिए हों उन सबको मयत भाममावसे विस्मरण करके क्षमा चाहता हूँ। इसके बाद किसी मी काडम तुम्हारे प्रति उस प्रकारके अपराषका हाना अमुमन समप्तता ऐसा होनेपर भी किसी भनुपाग मापसे देापर्यत, परिवह अपराध कमी हा मी जाय ता उम पिसमें भी पहाँ वपत मप्र परिणामसे क्षमा पाहता आर उस क्षमामावरप इस पत्रका विचारते हुए बारमार चिकलन करके तुम मी हमार पूर्वकासके उस सर्व प्रकार के बारावको भूठ जाने योग्य हैं। ३३२ बमई माद्रपद मुग १२ रवि १९१८ परमार्थ गौप्र प्रकाशित हानेके विपपमें तुम दानो मामापूर्ण पचन प्राप हमावया तुमन जो पहार-पिता के विषयमें मिसा, बार उसमें भी सम्ममान निषेन किया, पर मी वाइफ प्राम जादा हमें ता इस सबके सिन कर देनम्प उमौनता ही पता है, बार उम सबको ईपरे मप्रकबापान ही साप देना पोय हा हामें ये दानो बात जबक हम रिमन तबतक निम्मरण ही करने योग्य है।
. भीम परावण [पा ११८ निरंतर हमारे समग एमके संबंध चौपाया, उस विषयमें हमें कुछ लिम सकना असेमवतमाम हवा होगा कि हमारा को यहाँ बना होता है। उपाधिपूर्वक ही होता है, वोर म उपाधि इस प्रकारसे है कि पस प्रसंगमें श्रोतार्यकर जैसे पुस्पके पिपमें मी निर्णय करना हो तो मी कटिन हो जाय, क्योंकि पनादि कारसे गीतको केस मान प्रतिको भयमा मात्र निधिको हो पहिचान हो पा है, और इसीके नापारसे ही पासपुरपको बहपुस्प कम्पना करता बापा है। कदाचित् किसी संगके योगसे यदि गानको ऐसा नामनेमें माया मी मि" या पुरो", वो भी फिर निरंतर उनके सम्म प्रतिरूप योगको देखकर पैसा चाहिये पैसा नियम महा सता, अपना निरवर मदिगत होता एमा भकिमान नहीं पता, बौर पमी पो पार को प्राप्त होकर से सत्पुरुषके योगको त्यागक, निसको के मा निहिी माश्म होती है, ऐस नसापुस्पका समापूर्वक सेवन करने लगता है। इसध्येि निस कामे स्पुस्पस्ने निति-मसंग रहता हो, से प्रसगमें उसके समाय पना, पा बोको हम विशेष हितकर समस्ते हैं-स बात इस समय इससे अधिक दिसा गाना पसमा । यदि किसी प्रसगपर हमारा समागम हो तो उस समप तुम इस विषयमें पंसना, भीर उस समय यदि पुरा निधप ने पोग्य प्रसंग होगा तो उसे कर सकना समय है। मदिदीक्षा मेनेकी बारम्बार इस होती हो तो मी हमें उस प्राधिये शान्ती करना पाहिये । रुपा कम्पाण क्या है और यह किस तय हो सकता है, इसम बारम्बार Aचार मोर गरेपणा करनी चाहिए । इस कममें बनत फासे भूल होती जाती है, इसरिये भापत चारपूर्वक पैर उठाना योग्य है। - ३२८ बर्ष मात्रप सोम १९९८ उदप देखकर दाम नहीं हराना ससारका सेवन करनेके मार्रम काम्स लगाकर बातक तुम्हारे प्रति जाग अविनप, पति और अपार भाग दोष उपयोगपूर्वक अपना बनुपयोगसे हुए हों, उन सको मर्मत मप्रवासे समा भारता। भीतीपंकरने मिसे धर्म-प गिनने याप माना है, ऐसीस वर्षको सकस पतीत । किसी मी नाके प्रति किसी भी प्रकारसे किसी मी काममें बर्मत पदोप भी करना योग्य मही ऐसी बाव मिस परमहरहपसे निषितई, पैसे इस वितको नमस्कार करते है और इस पामको एक मात्र स्मरण रने योग्य ऐसे में ही मिला है। इस बारम्पको तुम निशससे मानवे हो। तुम विचारको पत्र लिगा' ऐसा मिला था परन्तु ही मि सब, पापमा परने पोप है तुमने म्पधार-प्रसंग बिना मधमें गोपा रिमा पा उस बेचनाको विचमें उतारने और Rधारने दम पी, पम्म के बार हो जानेस निफार हो गई और इस समप पुष विमना कर सके ऐसा माश्म नही होता शके लिपे मर्पत मम्रतापूर्वक धमा मंगकर इस पाको समाप्त करता। - .
पत्र १२९, ११, ११, ११२] विविध पन भादि सपा-२५पौ वर्ष ३२९ बम्बई, माद्रपद मुदी १० गुरु १९९८ निस निस प्रकारसे मारमा वाम-मावको प्राप्त करे, मे सब धर्मक हो भेद है। जिस प्रकारसे मारमा बन्य भावको प्राप्त करे यह भेद अन्यरूप ही है, धर्मरूप नहीं । तुमने हारमें बो पचम मुन नके पचात् निष्ठा वगीकार की है, वह निष्ठा मेयस्कर है। वह निष्णा वादि मुमुक्षुको यससग मिल- मेपर मनुनमसे बधिको प्राप्त होकर मास्मस्पितिरूप होती है। गीवका, धर्मको केवल अपनी ही कल्पनासे अथवा कम्पना प्राम किसी मन्य पुरुषसे अपण करना, मनन करना अपना आराधना करना योग्य नहीं है। जो केवम भरम-स्थितिसे ही रासा, ऐसे सत्पुरुषसे दो बारमा क्यमा बारमधर्मका श्रवण करना योग्य है-पानीपन माराषमा करमा योग्य है। ३३० पर्य, मानपद सदा १० गुरु १९५८ ससार-कारसे गाकर स ममतक तुम्हारे प्रति किसी भी प्रकारकी अग्निप, चमक्ति, बस स्कार वयचा ऐसा ही अन्य दूसरे प्रकारका कोई मी अपराध मन, पचन बौर कापाके परिणामसे एमा हो, उस सबको अस्पत नमतासे, उन सब भपराभोंके अस्पन छप परिणामहप मारमस्थितिपूर्णक, मैं सब प्रकारसे क्षमा मांगता । और इसे क्षमा करनेके में योग्य है । ठमें किसी भी प्रकारसे उस अपराध वादिका अनुपयोग हो तो भी मस्पतरूपसे, हमारी किसी भी प्रकारसे वैसी पूर्णकाउसबंधी मावमा समझकर, इस क्षण अस्पतरूपसे क्षमा करने योग्य भास्मस्पिति करनेके लिये मुतासे प्रार्थना है। - ३३१ बई, भरपद मुनीरगुरु १९४८ इस क्षणपर्यंत तुम्हारे प्रति किसा मी प्रकारसे पूर्व आदि काठमें मन पचम और कायाके योगसे यो गो फुछ अपराध आदि हुए हों उन सबको अपत वाममावसे विस्मरण करके क्षमा चाहता है। इसके बाद किसी भी कामें हारे प्रति उस प्रकारके अपराधका होना भर्समा समझता है, ऐसा होनेपर भी किसी पनुपयोग भावसे देहपर्यत, यदि यह भपराध कमी हो मी बाप तो उस विषयमें भी पर्चा रयत नम्र परिणामसे क्षमा चाहता है और उस समाभावरूप इस पत्रको विचारते हुए मारमार चिंतन करके तुम भी हमारे पूर्वकालके उस सर्व प्रकारके अपराधको भूम गाने योग्य हो। ३३२ बमा भाद्रपद मा १२ रवि १९९८ परमार्थ शौम प्रकाशित होनेके विषयमें तुम दोनोंका मामपूर्ण वपन प्राप्त हुवा तथा तुमने नो म्यबहार-बिताके पिपयमें रिमा और उसमें भी सकाममात्र निवेदन किया, वह भी भामहपूर्वक प्रात जाहै। हमें ता इस सरके सिनन कर देनेगम उपासीनता ही पता है, और उस सबको ईपरे के माधीन हो सौप देमा पोय है। हाछमें ये दोनों बातें अबतक हम किरसन में तबतक विस्मरण हो परने पोप है।
२२ प्रीमद् पयवाद्र [पर. नाही मी होता, परन्तु निसको बारमा पूर्ण पुस्ता रती है, वह पुरुप तो निधपसे उस पानको पानता -मातरको बानता है। मारमा नित्य है, अनुमवरूप है, बस्तु हैनन स्व प्रकारोके गत्पत- रूपसे सपने किये शाब में प्रसंग करे गये है। पदि किसीको मोवरका स्पए पान न होता हो तो या यह कानेके बराबर है कि किसाको पात्माका स्पर शान भी नहीं होता, परन्तु ऐसा तो महो । मारमाका स्पान ता होता , और मार भी स्पर माइम होता है। वफ्ने सपा परके भव मानमेके शानमें किसी मौ प्रकारका विस- बाद नहीं है। तार्यकरको मिनाके किये जाते समय प्रत्येक स्पानपर सवर्ण-धि यानि होहोहो-ऐसा शायके का नेवाब नही समझना चाहिये। वपना शाम कोए मारपोका या उस प्रकार भर्प होतातोपा सापेक्ष हो।पा बाप अफ-मापाका ही समझाना चाहिये। जैसे यदि किसीके पर किसी सन पुरुषका भागमन हो तो पता 'माय ममृतका मेघ बरसा' जैसे उसका यह काना सापेक्ष है-पपाप है, परन्तु पर शरदके मागास पयार्य है, शब्दके मह वपमें यपाप नहीं है इसी तय तीर्थकर बादिको मिक्षा विफ्प मा।फिर भी ऐसा ही मानमा पोम्पोबारमास्कसपमें पूर्ण ऐसे पुरुषके प्रमाके यम्से पहहोना अस्पत समनित है। ऐसा कामेका प्रयोजन नहीं है कि समय हो ऐसा उभा है, परन्तु कानेका बमिप्राय यह है कि ऐसा होना समय है-ऐसा होना पोम्य है। यहाँ पूर्ण मामस्वरूप है, माँ सर्प मात् प्रभाव योग भामितरूपसे पता है, पर नियामक मातहै--निसन्दोगाकार करने योम्प मात है। गहों पूर्ण बात्मस्वरूप यता है हाँ यहि सर्व महत्-प्रमाण-योग न पता हो तो फिर । दूसरी कौनसी नगह है। पह विचारने पोय है । उस प्रकारका दूसरा तो कोई स्पाम होना संभव नही, तो फिर सर्म- महत्-प्रमात्र योगका ममात्र दरोगा। परन्तु मप पूर्ण बामसम्मका प्राप्त रोना मी नमावरूप नहीं है, तो फिर महत् प्रमाण-पोगका बमान तो कराँस हो सकता है। और यहि काचित् ऐसा कहा नाप कि भारमस्वरूपकी पूर्ण प्राप्ति होना तो योग्य है किन्तु महत् प्रमाष-योगकी प्रासि ऐना पोम्प मी, तो पाना एक पिसवाद पसा करनेके सिखाप और कुछ नहीं करा पा सकता क्योंकि यह करने बामपुर वात्मस्वरूपके मापनेसे मर्पत हान ऐसे प्रमाब-योगको महान् समम्ता है-अंगीकार करता है और पा पेसा सूचित करता है किम पच्छ वामस्वरूप माननेवासा नहीं है। उस वाहमसरुमसे कोई मौ महान् नहीं है । यो प्रमान-पोग पूर्ण बामस्वरूपको मी प्राप्त न हो। इस प्रकार इस सरिमें कोई प्रमा- योग सत्पमहाया नहीं, वर्तमानमें है म), और भागे उत्पम होगा नहीं पम्त स्म प्रमाण-पोगमें बाहमसरूपको कोई प्रापि कर्दम्प नहीं है, यह बात तो यस्म है और पति उसे उस प्रभार-पोगमें कोई करम्प माश्म होता है दो पुरुष मा.मम्बरमा पर्पत मानमे । यता है, ऐसा मानते हैं। करनेका बमिप्राप पर है कि मामरूप महामाम्प तौकरमें सब प्रकारका प्रभात योग होमा पोम्प है होता है। परन्तु उसके एक वराका मा प्रकट करना उनें पोम्प नहीं। किसी सामायिक पुष्पके प्रमासे पुपर्णशि पावि हो, ऐसा करना बसमन मही, वर र वीरपरको बापाकारक भी नहीं। मोतीपंकर बास्मसारसके सिवाय कोई क्म्प प्रमात वादिनी करते, और जो करते हैं ये बामस्म तीवर रे जाने पोम्प नही, ऐसा मानते हैं, और ऐसा ही।
पर ५८] पिषिष पम मादिसंग्रह-२५पाव રી यो निनमगवान्के कराए शान माने जाते है, उनमें कुछ बोके पिच्छिम हो मानेका कपन है, भौर उनमें केवमान आदि दस बार मुत्य है, धीर उन दस यो विधिन ए दिसा- मेका वाशय यही बतानेको किस कामें 'सर्वथा मुछि नहीं होती' ये दस वोग विसे प्राप्त हो गये हों, वयवा निसे इनमेंका एक मी बोळ प्रान हो गया तो उसे परम-शरीप जार करना योग्य है, ऐसा समझकर इस बातको विभेदरूप माना है। फिर भी एकतसे ऐसा ही करना योग्य नहीं ऐसारमें माश्म होता है, और ऐसा ही है। क्योंकि इन पोलोंमें क्षायिक समकिसका मी निपेन है, और यह चरम शरीराके पोहो, ऐसा तो ठीक नहीं, अथवा ऐसा एकांत मी नहीं है। महाभाम्प श्रेणिकके क्षायिक समकित होनेपर भी ये घरमशगरी महीं थे, इस प्रकार उनी निनमगवान्के शामोंमें कपन है। तया निनकल्पी सापुके निहारका म्याद करना मेताम्बरोंका कपन है, दिगम्बरोंका कपन नहीं । 'सर्वथा मोष होना' इस काम समब मही है, ऐसा दोनोंका ही पमिप्राय है। और यह मी भरपत एकातरूपसे नहीं करा पा सकसा । हम मानते हैं कि इस कामें चरम शरीरीपना नहीं है, परन्तु यदि अशरीरी- मानरूपसे बारम-स्थिति है, तो म मावनयसे परम शरिफ्ना ही नहीं किस सिद्धपमा मोहै। और या मशरीरा-भाष इस कारमें नहीं है-पनि यहाँ ऐसा करें तो यापह करके गुस्प है कि हम ही स्पर्य मौसूद नहीं है।विशेष क्या करें ! यह सपा एकांत मही है। काचित् यह एकांत हो मी तो जिसने बागमको कहा है, उसी बाशयो सत्पुरुपारा समझने योग्य है, और यही मारमस्थितिका उपाय है। (२) पुमर्दम है-वस्य है, इसके लिये में अनुभपसे 'हाँ' करनेमें बचत । बा परम प्रेमहम मलिक विमा भान शूम्प ही है। वो अकादमा केवळ योम्पताको कमीके ही कारण बटफा मा है। मानाके पाससे हानका रम करनेकी मपेक्षा वोप-स्वरूप समसकर मटिकोरा करना, यह परम फदायक है। निसपर ईपर कृपा करे उसे कठिपुगमें उस पदार्थको प्राप्ति हो । यह महाकठिम है। , ३३८ बर्मा, वासोग बदौ ६, १९१८ (१) पहाँ बारमाकरता यता है। मामाके वाम-स्मरूपमापसे परिणामके ऐनेको नामाकरता करते हैं। (२) नो कुछ होता है उसे होने देना।म ठासीन होना । न ममुबमा होना।म परमात्मासे रिम करमा, भौर म म्यास होमा । यदि नामात सकावट गमवा रो तो नितमा बने उसको रोकना और ऐसा होनेपर मौ यदि या दूर न होता हो तो उसे ईश्वरके लिये वर्पण कर देना। परम्त दौमता न खाने देना। मागे क्या होगा, इसका विचार मही करमा, मोर गोरो उसे करतेयना] मरिक उप-चुन करनेका प्रपान मही करमा । बाप मी मप नही रमना । जो कुछ करनेका बम्पास हो गया है उसे विस्मरण किपे गना-तो होईपर प्रसन रोगा-चो ही परममकि पानेका फल मिलेगा--तो हमारा भार तुम्हारा संयोग मा पोम्य है।
१२० मीमद् रामचन्द्र ४ ३३३ पई, भाद्रपद बदौ ३ ठक. १०१८ पासि रिसे गए पत्रके तुमे मिम्मेसे होनेवाले मानंदको निवेदन करते हुए, हमने इसमें दोधासबषी सिके झोम प्राप्त करके विषयमें यो हिसा, सो क्षोभ हालमें पोप ही है। कोप भादि बनेक प्रकारके दोपो भय हो गानेपर हो संसार-स्यागहप दौथा सेना पोग्य है, अपना किसी महान् पुरुपके सयोगसे कई पोम्प प्रसग मानेपर ऐसा करना पोग्प है। इसके सिवाय किसी दूसरी प्रकारसे दौमात्र धारण करना कार्यकारी महीं होता और बीच मेसी दूसरी प्रकारकी दावारूप भान्तिसे मस्त होकर अपूर्व कल्याणको पुकता है अपवा बिससे विशेष स्तराप उपस्थित दो ऐसे योगका सपान करता है। इसलिये हमें तो तुम्हारे पोमको हम पोम्प हो समझते हैं। या हम जानते है कि तुम्हारी पो समागममें धानेको विशेष इप्या है। फिर मी में तो उस संयोगको का निरोप करना ही पोम्प है। वर्षात् यह सयोग बनना बर्समा है और इस बातका सुरुम्सा नो प्रपाके पत्र दिया है, उसे तुम पा ही होगा । इस तरफ धानेको इसमें तुमारे बों बादिका मो निरोगी हामे ठप्त निरोषको उठा करनेको इम करना पोय मही। मतामहमें पुद्धिका ठासीन करमा ही योग्य है, और हाम्मे तो गास्थ धर्मको अनुसरण करमा भी योग्य है। अपना हितरूप बानकर अपना समसकर बारम-परिम्हका सेवन करमा पोग्य नही। और इस परमार्यको बारम्बार विचार करके सम्मका पाँचन, भषण, और मनन वादि करना योग्य है। निकाम पपायोम्य ३३४ सर्च, मानपद की ८पुष २०१८ नमस्कार बिस मिस कामे मो मो प्रारम्भ उदय मापे उस सबको सहन करते माना, यो पानी पुरुषों का सनातन नाचरण है और यही बाचरण हमें उत्य या करता है अर्थात् मिस संसारमें स्नेह मही पा, उस प्रसार के कार्यको प्रालिका उदय हता। और उस उदपका मनुकमसे मेदन वा करता है। उसके इस क्रममें किसी भी प्रकारको हानि-नदि करनेकी का उत्पम नहीं होता और हम ऐसा मानते हानी पुरुषोंका मी कहाँ स्नातन बाचरण है फिर मी पिसमें स्नेहनही या, अपना स्नेह रस्नेको मलिन हो गई है अपना निात होने गई है, ऐसे इस संसारमें कार्यरुपसे कारणरूपसे प्रति करनेको इन नहीं हो इस कारण महमा निति हो या करती है। ऐसा होनेपर मा बिससे उसके अनेक प्रकारके सा-प्रसगमें प्रति करमा पो ऐसे पूम किसी प्रारम्पका उपार्यग किया है, मिस हम सर परिणामसे सहन करते है परन्तु वमी मी कुछ समयतका उदयमें है, ऐसा गानकर कमी कमी से होता है, कमी कमी विशेष केद होता है। और उस सेदका कारण विचारकर देसनसे तोर परानुसारूप ही माश्म होता है। हमें तो सस प्रारम्बको स्वामा रिक सपके बनुसार नये बिना परम पम नहीं होगी तपापि उस वपमें हम दूसरे किसीको मुग, हुम रग, देव, मम मौर मममके कारणस्मसे मारम होते । इस माम होनेमें छोक-संगको भित्र प्रति देखकर सेद होता है। मिस एसारमें साथी कके रूपसे माना ।
पर ५५५, ११५ १७] विविप पत्र मादि संप्रह-२५ो वर्ष १२१ , चाता है, उस ससारमें उस साशीसे साक्षीरूप रहमा, धौर कारूपसे भासमान होना, या दुधारी तसपारपर पम्नेके समान है। ऐसा होनेपर भी यदि यह साझी-पुरुप स्रांतियुक लोगोको, किसाको सेट, दुसवार मामका कारण माश्म न पो, वो उस प्रसगमें उस साक्षी-पुरुषको अस्पत कठिनाई नहीं है। हमें तो पस्यत कठिनाईक प्रसगका उदय एता है। इसमें मी उदासीनमाव ही शानीका सनातन धर्म है (यहाँ धर्म शब्द वापरणके अपम है)। एक भार एक तुच्छ सिनकेके दो भाग करनेकी क्रिया के कर सकनेकी शफिका मी उपशम हो, उस समय नो ईपरेमा होगी वहाँ शेगा। माधिस्पदशामास ३३५ वा, वासोय सुदी १ बुध १९४८ चीबके कलस-अकसको समागममें प्राण करके निदिध्यासन करना योग्य है। बनस्पति बादिके सयोगसे पारेका पकर चाँदी वगैय रूप को पाना संभव मी होता, या बात नहीं है। योग-सिद्रिके मेदसे किसी तरा ऐसा हो सकता है, और मिसे उस योगके बाट गों मेसे पाँच वग प्राप्त हो गये है, उसे सिदि-योग होता है। इसके सिवाय कोई दूमय कम्पना करना फेवर मारक्षेपरूप ही है। यदि उसका विचार मी उत्पम हो तो यह भी एक कोनुकलप होt, और कीलक भारम-परिणाम के लिये योग्य नहीं है। पारेका स्वाभाविकरूप पारापन ही है। , सम्बई, भासोग मुदी ७ भौम १९१८ प्रगट वारमस्वरूप अपिपिएमापसे सेवन करने योग्य है। बास्तविक बात तो ऐसी है कि किये हुए कर्म बिना मोगे निमृत होते नहीं, और नहीं किये हए किसी कर्मका फल मिम्ता नहीं। किसी किसी समय मकस्मात् किसाको पर वर्षका शाप देनसे जो शुम अपना अशुम फर मिलता वा देसनेमें वाता है, वह किसी नहीं किये हुए कर्मका पर नहीं है- मी किसी प्रकार से किये हुए कर्मका ही फस है। एकेन्द्रियका एकापतारीपना अपेक्षासे समठने योप है। ३३७ बई वामोर मा १०, १९९८ भगवती बालि मियतोंमें मो किती किती गोषोंके मातरका वर्णन किया है, उसमें कुछ संशय होने जैसी बात नहीं । तीर्थकर ता मग पूर्ण बामस्तनप है परन्तु जो पुरुप का योग, म्यान वादिके बम्पास के यम्से यते हों, उम पुरमोमेक मी पावस पुरुष मतरको भान सकते हैं और ऐसा ऐना फुल कल्पित बात महो। मिस पुरुषको मास्माका निधपामा शान है उसे मनावरका बाम होना योग्य है-होता है। पित् बालके तारतम्य-इयोपशम मे से पैसा कमा ४१ [पन। । IRR भीम प्रसाद माही मी होता, परन्तु बिसको वामा पूर्ण शुद्धता पती, प पुरुप तो निभयसे उस धानको -मातरको मामता है। वारमा निस्य है, मनुमारूप है, बस्तु हैन म प्रकारेके । रुपसे सोनेके पि शाब में ये प्रसंग को गये। परि किसाको भतरका स्परन न होता तो यह यह करनेके बराबर है कि मि बामाका स्परबान मी नहीं होता परस्तु ऐसा तो नहीं । बारमाय स्परबान तो होता है, मातर मी स्पा मालम ऐना है। अपने तपा परके मा जाननेके शानमें किसी भी प्रकारका पाय नही। तोपकारको मिक्षाके किये जाते समय प्रत्येक स्थानपर पुवर्ण-मिइत्पादिहोशीदो-ऐसा शास्त्रके मेका मर्प नही समझना चाहिये । वपना शाम कोएर बाम्पोका पदि उस प्रकारका मर्प होता सापेथए।यह माल्य सोक-भाषाका दो समसना चाहिये। जैसे यदि किसीके पर किसी सनन पु बागमन हो घोडकरताहेक 'बाय बमृतका मेघ बरसा' वैसे उसका यह कामा सापेक्ष है-पप परम् शम्के मालासे की पपार्य है, शारके मूस मर्यमें यथार्थ ही इसी तर तोपकर मा भिक्षाके विपपमें मी है। फिर भी ऐसा ही मानना पोम्पोकि वापसरूपमें पूर्ण ऐसे पुरुपके प्रभारके पाहोना भस्मत संमक्ति है। ऐसा करनेका मानन नहीन ही ऐसा माहै, परन्तु का अभिप्राय पाहै कि ऐसा ऐना समय-ऐसा होना पोय है। वहाँ पूर्ण बामस्वरूप है, पहों प्रमा-पोग बामितरूपसे पता है, यह निमपारमक पातीनि सन्दो बगीकार करने योम्प बाट को पूर्ण बागम्यस्म पता है प पनि सा महत्-प्रभाव-पोग मरता हो तो फिर इसरो के जगाया पर विचारमे पोय है । उस प्रकारका दूसरा तो कोई स्थान ऐना समय नहीं, तो फिर महत्-ममा-पोगका बमान ही होगा। परन्तु जब पूर्ण बामसरपका प्रास होना मी नमानरूप मा दो फिर मार प्रमाल-पोगका मात्र तो कासे हो सकता है और पदि कदानित् पेसा का नाम बामस्तस्मको पूर्ण प्राप्ति ऐना तो योग्य है, सि मात् प्रभात-योगकी प्राप्ति होना पोम्प नही, पा फामा एक सिपाद पेश करनेके सिवाय और 8 मही कहा जा सकता । क्योंकि पा । बाम र मास्मस्थापके मात्पमेसे मर्पत होन प्रभाव-योगको महान् समता है-बग करता है। और या ऐसा सषित करता है कि मा वामपसमय बाननेवाणी। उस मामसरूपसे कोई भी महान् महो। यो प्रमा योग पूर्ण बारमतरूपको मौ प्राप्त न इस प्रकारका इस सलिमे कोई प्रभात-पोग सत्पमामा नहीं, वर्तमानमें है नही, और मागे ठत्पमोगा परन्तु इस प्रभाष-योगमे बामवरूपको कोई प्राधिकरम्प नही पागात वो मास और उसे उस प्रमा--पगमें कोई कर्सम्य माश्म होता है तो पुरुष वारमसम्मके कस्पत महान हो 1 पैसा मानते हैं। पनेका अभिप्राप किनामस्म महामाम्प पीकर सब प्रकारचम पोग ऐना योग्य है-होता है। पात उसके एक बंशका मा प्रकट करमा उनें पोप नही ।। साभाविक पुम्पो प्रमानसे समर्ग:दि स्पादि हो, ऐसा करना समन मी, और पा तापकरप पापसारक मी मोहै।यो परमात्मस्परपणे सिवाय कोई पम्प प्रमाल बादि नहीं । और वो करते है बामास वीर्यकरमाने मोम नाहीमा मत पत्र १५८] विविध पत्र मादि संप्रद-यौं पर्ष ૫૨૫ गो मिनमगमान्के कहे ए शास्त्र माने जाते हैं, उनमें कुछ बोलोंके विभिधम्म हो जानेका कथन है, और उनमें केवबाम आदि दस बार मुख्य है। वीर उन दस मोझेफे मिसिम ए मा- नेका वाशय पही बतानेका है कि इस कालमें सर्पया मुक्ति मही होती'। ये इस घोउ निसे प्रास हो गये दो, पयवा निसे इनमेंका एक मी पोछ प्राप्त हो गया हो तो उसे परम-गरी नीय कामा योग्य है, ऐसा समझकर इस बातको विदम्प माना है। फिर मी एकातसे ऐसा ही फहमा योग्य मही-ऐसा हमें माराम होता है, और ऐसा ही है। क्योंकि इन नोटोंमें क्षायिक समफितका भी निपेध है, भौर पद परम शायरीफ हो हो, ऐसा तो ठीक नहीं, वयना ऐसा एफरत मी नहीं है। महामाग्य श्रेणिकके क्षायिफ समफित होनेपर मी ये परम शरीरी नही पे, इस प्रकार उनी जिममगमान्के शासोंमें कपन है।वया जिनकल्पी साधुके बिहारका प्यार काइना मेताम्पफा ही कपन है, दिगम्बरोंफा कपन मही । 'सर्पया मोश दोना' इस कालमें समय नहीं है, ऐसा दोनोंका ही अभिप्राय है और मर भी जयंत एफनिम्मसे मही कहा मा सफसा । हम मानते है कि इस काठमें परम-शारीरीपना नहीं है, परन्तु पदि बशरीरी- भावरूपसे आरम-स्थिति है, सो मह मावनयसे चरम-शरारीपना ही नहीं विठ सिद्धपना भी है । वीर बह मश-मात्र इस कारमें मही-पर पहों ऐसा फरें तो यह पाह कहने के समय है फि एम ही स्वयं मौजूद मही है । विशेष क्या करें ! यह सर्वपा पमत नहीं है। फरापित् पहण्फत हो मी तो पद, मिसने भागमको कहा है, उसी भाशयी स्मगुरुपारा समधने योग्य है, और यही बामस्थितिफा उपाप है। (२) पुनर्मग्म है-श्य है, इसके लिये मैं बनुभवसे 'हो' फहनेमें नपठ। - - परम प्रेमप मकिके बिना हान शम्प ही है। जो जग्गा पह केस पोग्यतानी पामीकही कारण बटफा रखा है। हाना के पाससे धामका इस करनेफी अपेक्षा बोध-म्पप समझकर भकिफी इपण फरना, यह परम फटायक है । मिसपर विर कृपा करे उसे कलियुगमें उस पार्थफी प्राप्ति हो । पद महाकटिन है। ३३८ नई, आमात्र ६, १९४८ (१) पदो बारमाकारता रहती है।बमाके भारम-सम्पभाषणे परिणाम पानेको आमाकारणा ही (२)जो कुछ होता है उगे होमे रेना।म ददासीन होना । न बमुपमा होना । म परमामासे (छा करनी, और म म्पापुग होना । परि मदमाप रुमार गया होता जितना बने उसको रोपना, और ऐमा होनेपर मी परिद र म होता तो ता उस भिरके ठिय अणि कर देना। परम्तु दीनता म जाने देना। माग गया होगा, इसका पार नहीं करना, और जो दो उसे करते रहना। भगिक उपग-पुन परमेवा प्रपन नही करना । मग मी मप नही गमा । बा कुछ करमफा सम्मान हो गपा से विस्मरण मिगे पना-नो दो पर प्रमम होगा-गो दी परममक्ति पानेका मिलेगा-ता दो हमारा और तुम्हारा सपोग मा योम्प है। - मीमद् रामचन्द्र [पा ५,३४ । वीर उपाधिमें क्या होता है, यह बागे धम्कर देस गे । देस छो-सका मर्ष मात गंमार ।। सस्य हरि समर्थ है। मईत पुस्पोमासे निस मति कम हो गती है। मपि वापके उपाधि-योगी मामा करता है, परन्तु यो का सा है यह सब समाके हो हाप है। और का सत्ता निययसे वाभारित ऐसे बानीको । प्राप्त होती है। जमतक उस सर्मामा हरिको इन्म मसे हो, पैसे हानीको भी बसना, पह वाकित धर्म है। ऊपर गो उपाधि से वहमारके जानेके बचन दिले है, उनके ऊपर वाप पोरे समय विचार को । मापको उसीमें उस प्रकारको दशा हो गाय ऐसी आपकी मनोरचि है। फिरसे निवेदन है कि उपाधिमें जैसे ने तैसे निक बकर उबम करना । बागे क्या होगा, यह विचार छोर देमा । ३३९ बर्मा, पासोम पदी ८, १९१८ सोक-म्पापक बधकारमें बानेशरा प्रकाशित भानो पुरुष यापतप्प देखते हैं। का पण मादि कामनामों के प्रति रेगते हुए मा तयासीन यकर नो केस वफ्नेको हो पररूपसे देखते १, ऐसे हानोको हम नमस्कार करते है, और इस समय इतना ही लिसकर पानसे स्फुरित वाममारको स्प करते हैं। ३४० पई, वासोग १९४८ । (१) जो कुछ उपाधि को गाती है यह बुरा निस्-भावके कारण करनेमें नहीं वाती-उस प्रकारसे मही की माती । पर मिस कारणसे की बाती है, चरण मनुकमसे पेन करने पोप ऐसा प्रारम्प कम है। नो म उदपमें बापे उसका अविसबार परिणामसे न करमा, इस प्रकार यो बानीका गोपप हममें निपठ पता है-अर्यात् हम उसी प्रकारसे पेन करते हैं। परम्त पण वो ऐसी गती कि जम्प कायमें ही एक समपर्म हो-पदिय उदय बसचाको प्राप्त होता हो तो हम म सबसे उठकर घले गाँप-बामामे इतनी स्वतमनाया करती है। फिर भी मिदा-कार, मोगन-काल तपा अमुक बकास-ससके सिमाप उपाधिका प्रसंग रहा करता है और कुछ मिमप नही होता, तो मी रिमी भी प्रसापर भामोपयोग अचानमाम् सपन करते हुए देखा जाता है, और उस प्रसंगपर परपुरे शौकसे मी अधिक शोक होता है, यह बात निस्सन्दा है। ऐसा ऐनके कारण और गायक गहस्य-प्रस्पयो प्रारम्प उदयमें ये तबतक संथा जमा पर माता सेवन दरममें पित्त यने में ही पानी पुस्मोन मार्ग यता है, इस कारण इस उपाधिका सेवन करते है। पर उस मार्गको उपेक्षा करे तो मी हमशाना सराय नाही करते, फिर भी उसकी उपेसा नदी । सम्ता । पर उसकी उपेक्षा करें तो गास्य मापा मी बमवासरूम सक्न हाने मग गाय, पेमा र पम्प हारता है। स प्रकार सर्वपमें उससानका ऐमे हम्मे पदि एएसपता हो तो एक पी सकता . पर १४१,३४१] विविध पम मादि संप्रह-२५ वर्ष ३२५ है कि पूर्वोपार्जित कर्मका समता मापसे बेदन करना और जो कुछ किया जाता है यह उसकि वाधारसे किया जाता है, ऐसी दशा रहती है। (२)हमें ऐसा हो जाता है कि हम ययपि मप्रतिबद्धतासे रह सकते है तो भी हमें स्सारके पाहा प्रसगकी, भतर प्रसगकी, वौर कुटुम भारिक स्नेहके सेवन करनेकी इच्छा नहीं होती, तो फिर तुम मैसे मार्गे छापानको-निसे प्रतिबद्धतारूप भयकर यमका साहचर्य यता है-उसके दिन-रात सेवन करनेका वायत भप क्यों मही एता पानी पुरुपसे सहमत होकर नो ससारका सेवन करता है, उसे तीर्थकर अपने मार्गसे बाहर करते हैं। काधित् नो बाली पुरुपसे सहमत होकर संसारका सेवन करते है, यदि ये सब सार्यकरके मार्गसे बाहर हो को गाने योम्प हो, तो फिर श्रेणिक आदिको मिप्यालका होना समन होता है, और सीर्यकरके बचनमें विसमाद वाता है। यदि तीर्थकरका बचन सिंबायुक हो तो उनें फिर सीकर कहना ही योम्प नहीं। तीर्पकरके करनेका बाशय या कि मोहानी-पुरुपसे सहमत होकर नरममावसे, सार तासे, कामनासे, वनुरागसे, हानीके मधमकी उपेक्षा करके, अनुपयोग परिणामी होकर ससारका सेवन करता है, वह पुख्य तीर्षकरके मार्गसे बाहर है। ." ३४१ बम्बई, बसोग १९१८ हम किसी मी प्रकारके अपने वात्मिक-बघनके कारण समारमें मही रह ये है। मोमी है उससे पूर्वमें बाँधे ए मोग और कर्मको निहत करना है, और वा कुदा है उसका पूर्वमें छिपा हुवा पर्व वापिस देकर निरत्त होने के लिये उसमें रह । वनके लिये, भमके लिये, मोगके सिय, मुमके लिये, ससाफ छिपे क्या बम्य किसी परके भारिमकपनके कारण हम संसारर्म नही रहे हैं। बिस जीतको माक्ष निकतासे म यता हो, मह पाप ऐसे बतरग भेदको कैसे समा सकता है! किसी दुखके भयसे हमने समारमें यना स्वीकार किया है, यह बात भी मही है। मान-अप मानका तो जो पुछ मेद है सब निहत दी हो गया है। ३४२ बर्थ, मासोज १९५८ (१) जिस मकारसे पोंपा गया था, र्षा उससे भी एगमापसे पानक तप लिया है। १ किसी निर्मत पार्प, कि स्थापित करमका अभ्यास करके प्रथम उस पातारहित स्थितिम टाना। २ इस तप पूछ पिरता प्रात हो जानके बाद पाहिली ऑपमे मूर्य और बम पन्द्र धित इस प्रकारको मापना करना । । इस मारनाम्ने तबता बनाना, अबतक कि पर भावना उस पार भायर मारिफ दर्शनको उत्पम न कर दे।
भीम पानन्द [फा १ उस प्रकारको पत्ता पाने के पथात् पत्रको पहिनी मोसमें पीर सूर्पकोई गाँसमें स्थापित करना। ५.इस मामाको पातक Bए पनाना, अबतक पह मापना उस पदार्थक वाकर भादिके दर्शनको ३-पम न कर दे । (पामो दर्शन का है, उसे मास्पमान-दर्शन समश्चमा ।) ६न दोनों प्रकारोंकी सस्टी-साधी मानायक सिम हो मानेपर मकुटीके मध्य मागमे उम दोनोज पिन करना। ७ पहिले इस मितपनको गाँस रोकर करना। ८ उस तिनके बनेक वयसे सहो जानेमा मापद रमकर, उप्त पदार्थक दानी माक्ना करना। ९ उस भाषनासे दर्शनके सो गानेक पथात् आपमें एक अदा कमका पिन करके उन दोनों पदायाँको अनुक्मस स्पापित करमा । १. यमें इस प्रचारका एक भएर कमा माना गया है, परन्तु पर ऐसा माना गया है किम चिमुसापसे यता है, इसलिये उसे सम्मुखरूपसे मर्यात् सोनी नपसे विधान करना । ११ उस वा कम में पहिले पत्रके नये स्थपित रना, फिर सूर्यके तेत्रको स्थापित करना, और फिर म दिम्पाकार ममिको पोति स्थापित करना । १२ उस मारकेस हो जाने के बाद, उसमें जिनका मान, पर्मन और भामचारिण पूर्ण । ऐसे मानीतरागदेवकी प्रतिमा मागोमप लापसे स्तियन करमा । ११ उस परम प्रविमाका म माग, न पुमा बौर नपरस प्रकार निम्मस्वरूपसे पितान करमा। १९ ऐसी मानना करना कि संपूर्ण बान-दर्शन उत्पन्न होनेसे मांगीवरगदेव पही साप समाधिमें सिपमान । १५ ऐसी मायना करना कि सहम-समाधिमें स्थित मातरमा भारमा सरूपमें । तदार। १६ ऐसी मामना करना है उमफे मर्मस्थानसे उस समम फरको पनि निकर दो। १७ ऐसी माना करना कि ठन मावनामों के पो बानेपर बहकार सप प्रकारके पजम्प-नका उपरेशकर या। १८ निस पारके सम्पमासि पोतरामदेवने पावरग-निपाताचे प्रास किया है, ऐसा मान उस उपदेशका प्रस्म है, ऐसा चितवन करते करते पान क्या है, ऐसी भावना करना । १९ उस माक्माके पदो माने पपात उन्होंने दो दम्प बादि पदार्प को है, उनकी माना करके वामा निर सरूपमें किसान करमा-स्वांगसे चितवन करना | (२)पान बोगनेक मेद । । इन सबमें रेष्ठ म्यान तो होना बाता है निसमें भामा मुल्समापसे यती और प्राप परके माममालको प्रातिविना या नाम-म्यानको प्रति महोती। इस प्रभर बामबान या गोषको प्रासिक सिमाप स्पन नहीं रखा । पयार्य गोषको प्रति प्रायः करके कम सम पासे पाको होती है वोर उसका मुख्य मार्ग पोषस्तरुप ऐसे मानो पुस्पन नाम्प बता संग, और उसके पति गुमान-प्रेम।बानी पुरस्का उस उस प्रकारका मंग पत्र ३४] पिविष पर मावि संपा-२५ो वर्ष . - - जीवको क्मतकालमें पास बार हो जुका है, परम् ' यह पुरुप हानी है, इसलिये अब उसका आश्रय माण करना ही कम्य है। ऐसा धान इस बीरको मही इमा, और इसी कारण जीवको परिभ्रमण करना परा , में तो ऐसा सतापूर्वक माझम होता है। (३) पानी-पुरुपको पहिचान न होनेमें प्राप करके गौवके हम तीन महान् दोप मानते हैं (१) एक तो मैं जानता , मैं सममता, इस प्रकारसे जीवको मान यता है, यह माम । (२) सरे, शामी पुरुपके ऊपर गग करनेकी अपेक्षा परिग्रह वादिमें विशेष राग होना । (३) तीसरे, डोक-भपके कारण, अपकीर्ति-भपके कारण, और अपमान-मपके कारण हानांसे मिमुस राना उसके प्रति जिस प्रकार विनयान्वित होना चाहिये उस प्रकार म ऐना। ये तीन कारण मौवको हानीसे भात हो रखते है। बीरकी प्रानीमें मी अपने समान हो कल्पना या करता है अपना कल्पनाके भनुसार ही पानीके विचारका और शासका मी माप किया जाता है, क्योंके पठन भासि पोदा मी शान प्राप्त हो जानेसे, बीपको उसे अनेक प्रकारसे रिसानेको इन्छा गा करती है यानि दोप उपर बताये हुए तीन दापोंमें हो गर्मित हो जाते है। और इन दोनों दोपोंका उपादान कारण ता एक 'सम' नामका महादोष ही है और उसका मिमिच कारण असम्सग है। बिसको तुम्हारे प्रति 'तुम्हें किसी प्रकार कुछ मी परमार्यकी प्राप्ति हो' इस प्रयोजनके सिवाय दूसरी कोई मी पहा नहीं, ऐसा में इस बातको यहाँ स्पट बसा देना चाहता हूँ कि तुम्हें अभी उपर बताये इए दोपोंके प्रति प्रेम पता है। मैं बानता , मैं समझता हू', यह दोष बनेक- बार प्राप्तिमें रहा करता है; असार परिमा बादिमें भी महत्ताको इरा पती-पादियो दोष है, ये पान और शान इन सबके कारणभूत बानी पुरुष और उसकी बाबाका अनुसरण परनेमे बापा राहते है। इसलिये ऐसा मानते है कि से बने से पारमा पनि करके उनके कम रने प्रपन फरना, और भौफिक मावनाके प्रतिबंधसे उदास हाना यही कम्पाणकारक है। (२) शरीरमें पदि पहिले माममावना होती हो तो उसे होने देना, प्रमस फिर प्रागर्ने कामभावना परमा पिर इनिपोंमें बारममा ना करना, फिर संकम्प-विकपम्प परिणाममें नाममानना करना, भार फिर स्थिर बानमें भाममाषना फरना-वही सब प्रकारको बन्प भाडानोंस हित विपति फरना चाहिये। 1 प्राण, सोह पाणी, } उसा पान करना। मनाइदा ३४३ भामाब स १९९८ हे परमारास ! बम, 70, मरण मा मादुर मपस अप करनेबामे ग
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पर ] विविध पत्र मादि संप्रह-२५वाँ वर्ष २२९ कितना को, मिस मिस तर इस राग-दोपका विशेषरूपसे नाश हो उस उस तय वाचरण करना, यही निनपरदेवकी मादा है। ३४७ बम्बई, मासोज १९९८ , निस पदार्थमेंसे निस्प हो विशेष म्पय होता हो और बाप कम हो, तो मह कार्य ममसे अपने फ्नका त्याग कर देता है, अर्थात नाश हो पाता है-ऐसा विचार रसार ही इस म्यवसापका प्रसंग रसना चाहिये। पूर्वमें उपनित किया गया वो कुछ प्रारम्प है, उसके बेटन करनेके सिपाय दूसरा कोई उपाय मही है, और योग्य भी इसी रीतिसे है, ऐसा समझकर मिस मिस प्रकारसे जो कुछ प्रारम्प उदयमें जाता है, उसे सम परिमामसे फेदन करना ही योग्य है, और इसी कारणसे यह म्यबसाय-प्रसंग योग्य है। पितमें किसी रातिसे उस म्पबसापका कन्य नहीं माश्म होनेपर मी, या म्यवसाय केवर खेदका ही है, इस प्रकार परमार्यका निश्चय हानेपर मी, प्रारम्धरूप होनेसे ससग वादि योगका अप्रभानमारसे पेदन करना पड़ता है। उसका वेदन करनेमें इन्ठा-भनिन्म कुछ भी नहीं है, परस्त बास्माको इस मिफल प्रवृतिक संबधको देसकर फेद होता है, और इस विपपमें बारमार विचार हा करता। (२) इन्द्रियक विपपरूपी क्षेत्रको बमानक गीतनेमे तो बारमा वसमर्यता बताती है, बार समस्त पृषीके पास नेमें समर्थताका विचार करती है, यह कैसा आचर्यकारक है। मात्तिके कारण भामा निधिका विचार मही कर सकती, ऐसा कहना केनस एक बहाना मात्र है। यदि यो समयके लिये मी प्राति छोपकर मारमा प्रमाहित ऐकर हमे नितिका हो विचार किया करे, तो उसका बम प्रापिम भी अपना कार्य कर सकता है। क्योंकि हरेक वस्तुफा अपने कम-ज्यादा परके बनुसार ही वपना वफ्ना कार्य करनेका समान है। मिस तय मानक पाय इसरा मुराक के साथ मिग्रनेसे अपने असली स्वभावके परिणमन करनेको नहीं भूस माता, उसी तय शान भी अपने स्वमाषको नहीं भूलता । इसलिये हरेक गोषको प्रमाद रहित होकर, योम्य में निहारिक मार्गका ही निरतर विचार करना चाहिये । (१) प्रतके संपंपमें यदि किसी जातको मत ना हो तो स्परमारसे सरेको साक्षीस ही सुना चाहिये, उसमें पर सेडासे प्रति नहीं करना चाहिये । प्रतमें प सकनेपाली पदि कोई ए रक्सी हो पार किमी कारणविशेषसे यह उस वस्तुका उपयोग करना पर गाय तो वैसा फरमके स्वयं अभिकाय म बनना चाहिये । पानीको भाषाके अनुसार ही आचरण करमा चाहिप नही तो उसमें शिषिमता भा गाठी है, और वा मग हो जाता है।
भीमद् पयवाद [t im, art 1 गावराग पुरुषका मार्ग नाप श्रीमदने मनात रूपा करके मुझे प्रदान किया । इस बनत उपकरके प्रत्युपकारका पता चुकाने के रिपे में सर्वपा वसमर्प ।। फिर भाप भीमद फुल मा छेने म्मेि सपा निस्पर। इसस में मन, पनवौर कापाकी एकमतासे बापके परणारविन्दमें नमस्कार करता है। वापको परममति मौर गीतराग पुरपके मूह पर्मको उपासना मेरे इयमें भवपर्यंत भरपसे बागव पाकरे, इतना ही बाइय, या सफर होवो ! ॐ शान्ति शान्ति शास्ति । . ३४४ विक्रम समत् १९९८ भववासी मूएक्शा रविकै सदोव भस्त होव दिन दिन मवि, अचसी भीषन प्यों पीपन पशु है। का प्रसव पिन फिन दोष न वन, मारकै पमत मानी पठसौ पठतु है। पते परि मस न सोमै परमारपकों, स्मारय हेतु भ्रम मारत व्य है। मगो फिर सोगनिसी पग्लो परै भोगनिसाँ, रिपैरस पोगनिसी नेहन ॥१॥ मैम मृग मच पारिस्पी वपत माहि, हमारत मृपामा कारन भा। से भपपासी मायाहीसौ हित मानि मानि, गनि गनि भ्रप भम नाटक मटा । आगे पुकत पार पी पपरा पा) जैसे नैन न नर मेपरी बनु , से मह पेवन सरुव करतति करे, रोपव सिव फस सोपव लत है।॥२॥ (समपसार-महक) ३४५ बमा, १९९८ संसारमें ऐसा क्या कि मिसले प्रतिवपमें बार बनेको र करता है। समाई, १९९८ ३४६ किंबहुना मामा, रागरोसा बहु पिस्सिमर्मवि, वा वा परिममे, एसा माणा मिणियाणम् ।
पर ३४.] विषिष पर मावि संप्रहापर्ष कितना करें, मिस बिस सब इस राग-दोपका विशेषरूपसे नाश हो उस ठस तरह भाचरण करना, यही बिनेगरदेवकी वाहा। ३४७ स, जासोर १९१८ (१) मिस पदार्थ से निस्प विशेष म्यय होता हो और बाय फम हो, तो यह पदार्य क्रमसे अपने पमका त्याग कर देता है, अर्थात् नाश हो माता है-ऐसा विचार रखकर ही इस म्पासापका प्रसग रमना पाहिये। पूर्वम उपनिय किया जा ची पुछ प्रारम्भ ह, उसके बेदन करनेक सिवाय दूसरा कोई उपाय मही, पोर योम्प भी इसी रीतिसे है, ऐसा समझकर निस निस प्रकारसे मो पुल प्रारम्भ उदयमें जाता है, उसे सम परिणामसे बेदन करमा ही योग्य है, और इसी कारणसे यह म्यवसाप-प्रसंग योग्य है। निसमें किसी रविसे उस म्पत्रसापका कर्मन्य महीं माझ्म होनेपर मी, या म्पबसाय केवल स्वेदका ही हेतु है, इस प्रकार परमार्थका नियय हानेपर मी, प्रारम्भम्प होनेसे मसग वादि योगका अप्रधानमानसे मेदन करमा पाता । उसका बेदन करनेमें इच्छा-अनिम्छा कुछ भी नही है, परन्तु वास्माको रस निम्फळ प्रतिक सबको देखकर से होता है, और इस लिपपमें बारम्बार विचार हा करता। (२) इन्द्रियके विषयरूपी क्षत्रकी नमीनके भावनेमें तो मारमा भसममता बताती है, और समस्त पृषीक जीत नेमें समर्यतामा विचार करती है, यह कैसा भाचर्पारक है। प्राधिके कारण वामा नितिका विचार मही कर सकती, ऐसा करना केवल एक बहाना मात्र है। य-ि पोरे समपके लिये भी प्रति एकर बामा प्रमादरहित होकर इमेशा निचिका हो विचार किया करे, तो उसका बस प्रति मी अपना कार्य कर सकता है। क्योंकि हरेक वस्तुका बने कम म्यादा वसो वनुसार ही अपना अपना कार्य करनेका समाव है। निस तरह माफ पाप दूसरी सुराफके साथ मिमनसे अपने असली समासके परिणमन फरमेको नहीं भूम बावा, उसी तरह पान मी मम्ने स्वभावका नहीं भूसता । इसपिये हरेक जीवको प्रमा' रहित होकर, योग्य काळमें निरतिक मार्गका ही निरतर विचार करना चाहिये। प्रतके संपपमें यदि किसी नीरको मत छेना हो तो स्पामाबसे सरेको साभीम हो सना चाहिये, उसमें कर सेपासे प्राति नहीं करना चाहिये । प्रतमें ए सकनेवाली परि कोई , रम्पी हा भीर किसी घरणविशेषस पदि उस मनुका उपयोग करमा पा गाप तो बेष्ठा करनके मप अधिकारी बनना पाहिये । बामौकी भाशके अनुसार ही वापरम करना चादिपे नदी का उसमें शिविश्वा भा जाता है, और मतका मग हो जाता है। ४२ भीम पण [पत्र in (१) मोह-कपाय हरेक बाकी अपेक्षासे पानाने कोष, मान, माया मोर पोम पर कम रक्या है। यह क्रम इन पार्यो पप होने की बवासे रस्सा है। परिण कपायके आप होनसे कमसे दूसरी पार्योंका सप होता है। तथा वमुक अमुफ बाबाको बफेक्षासे मान, माया, सोम और प ऐसा मोक्रम रमहा गया है यह देश, काळ वौर क्षेत्रको देसफर हो पा गया है। परि पानको अपने मापको दूसरेसे उँचा समधनेसे मान उत्पन्न होता है। फिर उसके सिप एम-कपट परता है, और उससे पैसा पैदा करता , और पैसा करमेमें निम करनेवाले के उपर कोष करता है। इस तबसे कपापको प्रहतियाँ अनुकमसे पती है। जिसमें डोभको तो इतनी प्रबल मिठास है कि गांव उसमें अपने भानतकको मौ भूग जाता है, और उसकी परमारता भी नहीं करता; सम्पेि मामरूपी कपायके कम करनेसे बद्रमसे एसप कपाय भी इसके साप साप कम ऐ गाती है। भास्पा और भवा हरेक गोषको पौनके अस्तित्व से भगाकर मोक्षतककी पूर्णरुपसे ममा रममा चाहिये । इसमें गरा मौका नही रमनी पाहिपे । इस जगह का रसना, या नौके पतित होनेका कारण है, और पर इस प्रकारका स्वामक है कि पासि माचे गिर गानेसे फिर कोई भी स्थिति नहीं पाता । एक तार्तमें सत्तर मोबाकोपी सागरको स्थिति पता है, जिसके कारण बालको मसम्पातों मोमें ममण करना पाता है। चारित्रमोहसे गिरा हवा तो ठिकाने ग मी जाता है, पर निमोहसे गिरा हुना ठिकाने मही म्गता । कारण या कि समसमें फेर होनेसे करनेमें मी फेर होमाता है। बातरूम बानाके पचममें स्पपामाप होना संभव नहीं है। उसके बसपममें गकर मानों बपत हो नि, इस तिसे बयाको मग मी म्यून नहीं करना चाहिये । पामा शकाके उपस्थित होने का प्रसंग उपस्थित छ, तब स भावको विचारना चाहिपे कि उसमें मफ्नो भूग होती है। मिस मतिसे बोतरण पुरुषाने बानको माया मति इस पीवमें है ही नहीं और समाजको मति तो परि शाकमें नमक कम पाए तो इतने मात्र ही एक बाती है तो फिर पावरमाके दानकी मतिका मुकाम तो कर कासि कर सकता है। इस कारण बाय गुणम्पानरके बंक्तक मी जानको बानीका बाग्मन सेना पाहिपे, ऐसा कहा। अधिकारी नेफर मी जो उन सपदेश दिया जाता है, पर इस बारको बनेको पाना और चतुर मान भेमे कारण-उसके मान मर करनेके भरण-को दिया गाया है। मौर मो मायके स्थानकासे बात जाती है, पर मेरा सिरिये कत्रो पाती है पैसा प्रसंग प्राप्त होनेपर मौ बीच नीचेका नाहीये।
- २६षाँ वर्ष ३४८ बाई, कार्तिक मुदी १९९९ जिनागममें इस काकी को 'दु म ' सदा कही है, या प्रत्यक्ष साई देता है, क्योंकि गो 'इससे प्राप्त होने पोम्प ऐ' उसे दुपम करते हैं । उस दुमसे प्राप्त होने योग्य तो मुस्परूपसे एक परमार्प-मार्ग कहा जा सकता है और उस प्रकारको स्थिति प्रत्यक्ष देपनमें बाती है । पपपि परमार्य मार्गको दुरीमता सर्व कालमें है, परन्तु इस काल में तो काठ मी विशेषरुपसे दुरीमताका कारणभूत है। याँ करने का यह प्रयोगन है कि प्राय करके इस क्षेत्रमें वर्तमान कायमें पूर्वमें निसने परमार्थ- मार्गका माराधान किया है, यह दो-मारण नहीं करता । वौर यह सत्य है, क्योंकि परि उस प्रकारके बालों का समूह इस क्षेत्रमें देहधारीरूपसे पता होता, तो उमें और उनके समागममें बानेवाले भनेक मीयोंको परमार्प-मार्गको प्राप्ति पुसपूर्वक हो सकी होती, वीर इससे फिर इस काठको टुपम काम कर मेका कोई कारण न रा माता । इस प्रकार पूर्वाराषक नीयों को मापता श्यादि होनेपर मी वर्तमान काठमें परि कोई भी जीव परमार्प मार्गका वायवन करना चाहे सो पाप हो माराधन कर सकता है, क्योंकि दुमपूर्वक मी इस कार्यमें परमार्थ-मार्ग प्रात तो हो सकता है, ऐसा पूर्वशानिपोंका कथन है। मर्तमान कालमें सब मागोको मार्ग दुपसे ही प्राम हो, ऐसा पकान्त अभिप्राय मही समझना पाहिये परन्तु प्राप करके मार्ग से प्राप्त होता है ऐसा मभिप्राय समाउने योग्य है। उसके बातसे कारण प्रत्यक्ष दिखाई देते है (१) प्रथम कारण यह है वैसा ऊपर बताया है कि प्रायः करके भीवको पूर्णकी नापसकता मही है। (२) सरा कारण यह है कि उस प्रकारको मापकता म होने के कारण वर्तमान दहमें उस भायपक मार्गकी पति मी पहिले न समझनेसे, बनायधक-मार्गको भाग्यक-मार्ग मानफर औषकी प्राप्ति होती है। (३) तीसरा कारण यह है कि प्राय करके ही हो ससमागम अपना सहरमा पोग होता है, और प मी पवित होता है। (1) बीपा कारण पर कि असमग मा? कारणोंसे नारको सहरू बारिकी परिपान होना भी मुस्फर होता है, और प्रापः करके असहरु बादिमें दो सत्य प्रताति मानफर जाम बही एक जाता है। (५) पाँचका कारण पर कि यथित् समागमका संयोग बने वो मी बार्य बारिकी इस प्रकार शिपिलता गती है क्याए मार्ग महण नही फर सध्ता, जया उसे समझ नही सरता, वा अस समागम बारिसे पा मम्मी पापमासे मिप्पामें सस्पनास प्रनाति र सा है। प्राप करफ पर्वमानमें गोपने पा तो शुभ-क्रिपारी प्रधानताने मधमार्गका कम्पना की है, वपरा मान-किपा और मुद म्पपहारतीपाके उापारन परमेमें मोश-मार्ग फरमा पी, अपरा - भीमद् रामचन्द्र पm १४८ अपनी पुरिकी कम्पनासे वभ्यामके प्रपोंको पर कपनमात्र वयाम पाकर मोक्ष मार्गका कम्पना की है। ऐसे कम्पना कर सेनेसे नारो ससमागम बारितु उस मान्यता वामह पापा उपस्थित करके परमार्थको प्रालिम स्तमरूप होता है। गोगा मुफ-क्रियाकी प्रधानता हो मोध-मार्गको कल्पना करते है, उम गोषको तपारस तपदेचा बापार मी या करता है।बान, दर्शन, भारित्र और तप, इस तरह पर तरास मोश- मक को जानेपर मी पहिसके दो पद तो उनके विस्मुक्तम्य हरी हवे है। और चारित्र प्रमका वर्ष बेप तथा केपट काम-विरतिमें ही सम एके समान होता है। तथा तप का अर्थ केवल उपनास बादि का करना मी हि गाय-स्वामें ही समझे एके समान पता है। तया यदि कमी पान दर्सन फर करने मी पर नाम तो पो गरिमाकपनके समान मालोके कपनको शान, और उसकी पति वा उस कामेषामा प्राति हो दर्शन शम्मका मर्प समझे एक समान यताहै। जो जीव गाप-निया (एन वादि) और घर पगार-कियाके उत्यापन करनेको । मोच मार्ग समाते है ये पौष शासकि किसी एक वचनको मासमसीसे ही प्राण करके समस्त है । परि दान बार किया किसी भाकार मामि, मिशन युनिसे, अपमा यहाँ उस प्रकारको किया संभव न हो एसे को गुणम्यान वाति स्पानमें की गाप, वो समसारहीत है, ऐसा धाका मूह वाशप है। परन्तु दान बानि क्रियाक मूम्स को अत्यापन कर राजनेका सामोंका भमिप्राय मही है। इसे पान केवल बफ्नी मतिकी छपमा 0 निषेध करता है। तया पहर दो प्रकारका -एक फरमायमूह म्मबहार और दूसरा म्पहारूस म्पवहार । पूर्वमें इस गांव के वमबार बारमार्प करनेपर भी बारमार्थ नहीप पेसे शायोंमें पास्य हैं। उन पापोंको सकर भाग सपने बापको म्पसारमा बिजुली उत्पापन करनेवाला समक्षा हुमा मान सेता है। परन्तु शाबकारने तो ऐसा कुछ भी नही था । यो म्पसार परमापीतमूह म्पहार मही और केस म्पपातु पवार, UNकारने उसीके रामहका निपेप किया है। निस म्पमा पर पति होवार म्पमार म्पबहार रेत मागा सस्ता है मया मिस म्पबहारसे बारमात्री निमार-दसा र होने योग्य न हो, उस म्मदारको म्पबहायेत म्पमार का जा सकता है, इस शामकारने निमेष किया , और पर भी एक तसे नहीं किया । केस दूराम्हसे अपना उसमें मोल मार्ग माननेपारेको उसे सने म्पसारके ऊपर पाने के लिये इस नियम किपा है। और परमापविमूठ प्यार-म, समेग, शिव, पापा, नास्पा अपवा सद्गुरु स्थान और मन गहन मादि समिति, व गुमिका निषेध मही लिपा । और यदि उसका निषेध करने योग्य होता ये क्ति का सपदेश फरफेक्पा समझाने पैसा य मावा पा गया तिर किन साबमाको झपनेचा उपोश करना बाकीय माता पा विसते धानका उपदेश किया ! मर्पात् उस प्रकार म्पबहारसे परमार्थ प्राप्त किया माता है, मोर मारको उस प्रकारका म्पसार मान्य हो प्रण करना चाहिये, मिससे प परमार्प प्राप्त करे, ऐसा भाषाका बाप । एप्पास्मा अपला ठसक समागमा इस बाप समझे बिना ही उस भारका सत्यापन करणे अपने मार दूसरेको बोषि-दुर्गमता करते हैं।
पत्र ३४९, ३५ ] पिपिप पत्र मावि संप्रह-२६षों पर्प ३३ घाम, सबेग नादि गुणों के उत्पम होनपर अयमा राम्पतिशेय, निष्पक्षता होनेपर, काय भाविक श होनेपर अथवा किसी भी प्रक्षाविशेषसे समझनेकी पोग्यता होनेपर, बो सहरुके पाससे समझने योग्य जन्माम प्रपोंको-बो पातक प्राय करके पास जैस-अपनी कल्पनासे नसे तैसे फाकर निषय करके, उस प्रकारके मंतर्मेदके उत्पन्न हुए पिना ही अपवा दशाके वदछे बिना ही, विमावके दूर हुए बिना हो, वपमे श्रापमें शानकी कल्पना कर लेता है, तपा क्रिया मौर शुद म्यवहाररहित होकर प्रति करता है-या मुक-अम्यामाका तीसरा मेद है। गीयको बगह जगह इस प्रकारका संपोग मिकता वाया है, भयवा धानरहित गुरु या परिम्स नाइएक गुरु, केवळ अपने मान पूजा बादिको कामनासे फिरनेपाछे भीगोंको, अनेक प्रफारसे कुमार्गपर घड़ा देते हैं और प्राय करफे कोई दी ऐसी जगह होती है, यहाँ ऐसा नहीं होगा । इससे ऐसा माश्म होता है कि कातकी दु षमता है। पा को हु पमता सिसी है मह कुछ चौरको पुरुपार्यरहित फरमेके लिये नही लिप्सी, परन्तु पुरुपार्पको बागृषिके लिये ही लिखी है। मनु संयोगमें तो बीवको फुल कम गागति हो सो भी कयाचित् पनि म हो, परतु नहीं इस प्रकारका प्रविछ योग यता हो यहाँ मुमुक्षुको मनस्य ही वधिक नागुख गना चाहिये, बिससे तपानप परामब न ऐ, और वह उस प्रकारके किसी प्रवाहमें प्रवाहित म हो नाप । यपपि पर्वमान काठको टुपम कार कहा है, सिर मी या ऐसा मी है कि इसमें बर्नत भाको शेरकर केवल एक भव वाकी रसनेवाठा एकाक्तारीपमा मी प्रत हो सकता है। इसलिये विपारपान नावको इस लसको रसकर, व्यर को हुए प्रवाहोंमें न पड़ते हुए, पपाशक्ति देयम्प आदिका भाप हो बारापन करके, सहरुका योग प्राप्त करके, कपाप बादि दोपको नए करनेमासे वीर बामसे रहित होनेके सस्प मार्गको प्राप्त करना चाहिये । मुमुक्षु गांवमें नो शम मादि गुण कहे , ये गुण वाश्म समय होते है, षयमा उन गुणोंक मिना मुमुक्षुता ही नहीं कहा जा सकता। निस्प हो उस प्रकारका परिचय रसते हुए, उस उस बातको भनण करते हुए, विचारते ए, फिर किरसे पुस्मार्य करते हुए प मुमुसुता उत्पम होती । उस मुमुभुताके ठरस्म होनेपर वीरको परमार्य मार्ग परस समसमें माता है। ३४९ बर्मा, कार्तिक वदी १, १९४९ प्रमादके कम होने का उपयोग स बीबको मार्गक विचारमें स्पिति कराता है, पौर विचार मार्गमें स्पिति करता है । इस बातको फिर फिरसे विचार करके उस प्रपनको वहाँ किसी भी तरह र करना पोम्प है। यह बात मूखने पोय नही है। ३५० वर्मा, फातिक बदौ १२ पुष १९९० "पुनर्मम है--साय है, इसके लिये मैं अनुमबसे हाँ कहनेमें अचछ । पूर्णभरके किसी संयोगके स्मरण होते समय सिद होनेमे जिला है। जिसको पुनर्जन्म वा भात किया है उस पदार्पको किसी प्रवरसे जानकर हो यह वाक्प लिया गया है। . " या पास्य भीमावाद [पर ३५१ ३५५ ३५३ बा मगसिर ९प्रेम १९९९ (१) उपारिक सहन हरनेके लिये जितनी चाहिये उतनी कठिनाई मेरेमें मही, इसलिये उपापिसे कपंत मिति पानेकी छाया करता है, दिर मी नरपरम जामकर पपयाशति सइन होती है। परमार्या दुस मिटनेपर मी ससारण प्रासंगिक दुम तो या करता है और पास वना म बादिके कारण नही, परत दूसरेको नमुकम्मा तपा उपकार जादिक धरण ही रहता "पौर उस मिरवनामें पित्त कमी कभी विशेष नोगको प्राप्त हो जाता है। इसमे सके उपरसे यह वोग स्पर समझमें मही वा सकता। कुछ अंशमें तुमरे समकमें जायेगा । इस उद्वेगके सिवाय हमें दूसरा कोई मी संसारले प्रसंगका दुसनही माश्म होता । नितने प्रकार के सखारकेपा, पदि उन समें निपाता हो और ठोग रहता हो, तो बहन्यका अनुक्पा अपना उपहार अपना इसी प्रकार के किसी कारणसे रहता है, ऐसा मुझे निपपरूपसे माश्म होता है। स ठोगके कारण कमी तो वाचमि वास मा नाते, और उम सत्र कारों के प्रति प्राधिकरनेका मार्ग बमुफ मश परतंत्र Pसई देवा है, इसलिये समान समासीनता बा भाव। पाला मार्ग निधार करनेपर मास होता है कि यह किसी भी प्रकारसे मर्म करने के पोम्प नही है। उसके इससे इस मामाको शोक करना योम्प नी । बारमाको भाम-भालसे धोक करमेके सिमाप उसे दूसप को शोक करना पोग्य मही है। प्रगतरूपसे पमको समापमें देखनेपर मी विसकी देहमें मजा नहीं पाती, उस पुरुपको नमस्कार है। इसी गावका पितान रमना, पर हमें तुम वौर सबको पोम्य है। देह बारमा नदी है। मामा देह नहीं है। जैसे पोको रेसनेबल पोसे मिमी, इसी तय दोको देखनेपाम, बाननेपाली मामा से मित्र है, बर्षात् पदेह नहीं है। विचार करनेसे यह बात प्रगर बनुमसे सिव होती है, तो फिर इससे मिम देहके स्वाभाविक भप-मशिनस मारि परिणामको रेसर होर युद्ध ऐना किसी भी प्रकारसे पोप मही। और ठरें और हमें उसका निर्धारण करना-नाना-पोम्प है, और पोशाके मार्गको मुख्य पान है। (२)म्पापारमें पदि कोई पाविक म्पापार स्व पड़े तो नामक कुछ नाम ऐना समय है। ३५२ बम्बई, मगसिर मी १५ शनि १९५९ भावसार खुशापाने मदार पट पाच मिनिटके मातर देशको त्याग दिपा । संसारमें समासान यने सिपाप दूसरा उपाय नहीं है। बई, माम म ९ गुरु १९०९ घम सब मुमधयोंके प्रति ममयासे परम्पोम्प पत्रिम निरन्तर हामी पुरुषो सेवालयमा पर ३५४, ३५५] पिपिम पम मादि सपा-२६माँ वर्ष ३१५ करते हैं, परन्तु इस दुपम काउमें तो उसकी प्राप्ति परम दुपम देखते हैं, और इससे हानी पुरुषके भाभयमें गिसकी युद्धि स्पिर है, ऐसे मुमुनुस्नमें सरसगपूर्वक मकिमाक्से बनेको प्रातिको मामाप हम मानते है। फिर मी राममें तो उससे विपर्यय प्रारम्पोय पता है। हमारा म्सगका मन वारमा । यता है, सिर मी उदपाधीन स्थिति है, पर यह हाउमें इस प्रकारचे परिणामसे यती है कि तुम मुमुसुरोंके पत्रकी पहुँचमात्र मी बिउबसे दी जाती है । परस्त किसी मी स्थिति में हमारे मपराध-योग्य परिणाम नहीं है। ३५४ बर्मा, माघ पदी ७ युध १९४९ परि कई मनुष्य हमार विषयमें कुछ करे तो उस गाँतक बम गमीर मनसे उन रमना, इक्ना हो मुम्प कार्य है। यह बात ठीक है या नहीं, यह जाननेके पहिसे काई हप-विपा- भैसा नहीं होता। मे वित्तिके सिपपमें जो कमी कमी ठिसा गाता है, उसका वर्य परमार्थ उपर मना पाहिय, और इस जिसमेका वर्ष म्पबहारमें पुरा मिप्पा परिणामबासा दिखाना योग्य नहीं है। पो ए सम्कारों का मिन्ना दुर्सम होता है। कुछ कम्याणका कार्य हो भषमा पितान हो, यही साधनका मुख्य कारण है, बाकी ऐसा को भी विपय मही कि जिसके पीछे उपानि-तापसे दोन तापूर्वक तफ्ना योग्य हो, अथवा इस प्रकारका कोई मय रखना योग्य नहीं कि जो अपनेका रेप स्मेक-सहासे । यता हो। . ३५५ बर्मा, माघ ११ रवि १९१९ 30 यहाँ माधि- उपसे समाधि ।। प्रभा के विषयमें जो बापक चार राते हैं ये काणामाबके कारण या करते है, पेमा हम मानते हैं। कोई मी जीव परमार्यके प्रति केबस एक वशसे भी प्राप्त हानेके कारणको प्रास हो, ऐसा निष्कारण करणाशीक रुपमरेर बाल तीर्थकरेंन मी किया है। क्योंकि स्पुरुषों के सम्प्रदायको एमी ही सनातन करणास्था होती कि समयमात्रक बनवकाशसे समस्त लोक वामातम्या प्रति समुन्न हो, भारमसमपके प्रति सम्मुम हो, मारमममाभिके प्रति सम्मुश हो भार बम्प बास्पाके प्रति समुप न हो, कप स्वरूपक प्रति सम्मुम न हो, भय वापिके प्रति समुम न हो निस शानस सामस्थ परिणम हावा , पहबान सब जीवोंको प्रगर रो, मनबकाशरूपसे सब नील उस मानके प्रति रविसम्पम रोमा प्रचारका दिप्तका कामाशीठ समाल, सनातन पुरुषोंका सम्प्रदाय है। भारके तकरणमें इसी प्रकारका करमानपिस प्रमाक पपपमें बारम्बार Rधार माया करता है। और वारके विपारका एक वश मी फल प्राप्त हो, मफ्ना उस फक प्राप्त होने का एक वंशमात्र मी धरण उपम रा, वो इस परम कामे वीर्यकरका मार्ग बहुत छोसे प्रगट एनेक बराबर , परन्तु भीम रामद [पा १५५ - ऐसा होना सम्म नहीं, पौर यह स मासि होना योग्य नहीं, ऐसा हमें लगता। मिस्से या समष ऐना योग्य है, नपवा सका मो मार्ग है, में तो प्रतिके उदयमें है, वौर भगतक परम उमर म्यौ म बा बाप, तबतक कोई दूसरा उपाय प्रतिषस्प हो है-नि संशप प्रति- अचस्प होगा यदि वान-परिमामी हो तो मिस तर उस बयानको नियमितरूपसे बायपम करनेसे कम्पाण नहीं है, उसी तय मोररूप मार्ग अपना इस प्रकारका मो इस मोसमी मार्ग है, म मात्र ससार है। उसे फिर पाई मिस माकारमें संसो तो मी या संसार हो। उस ससार परिणामसे पीत करने के न्येि व बससारगत पापीका अस्वद परिणामसे वापार प्राप्त होता है उस समप उस सप्तारका बाकार निराकारताको प्रास होता मावा। बफ्नो पिके अनुसार दूसरा प्रतिबंध किया करते हैं, तया वरना उस पीसे परिवानाके वचनकी मी बाराषमा करें तो कल्याण होना योग्य माझम नहीं होता। सचिमे हम तो ऐसा सिसे कि या तुम किसी मान्माण के कारण के नजदीक होने के उपायकी या करते हो, तो उसके प्रविषधका कम होने का उपाय करणे; और नहीं तो पाणकावणा स्पाग करो । शायद तुम ऐसा समझते हो कि वैसे तुम सप वाधरण करते से पैसे कम्पाण, मात्र यो मम्पकमारो गई , हा एक मकस्माण है। परन्तु पदि ऐसा समझते हो तो पर पयार्प नही है। बास्तबमें गोमाग लापरण है, उससे कश्याण मित्र है, मौर पर तापम नम विस निस पानको उस्त उस प्रकारका मनस्थिति बादि योग समाप , तब तब उसे पा प्राप्त होने योग्य है। समस्त समहमें होमरमाण मानना पोरम मरे और यदि ऐसे कम्याण होवा हो तो उसका फल संसात्यही है। पोंकि पूर्व में इसीसे चीन साय यता बापा है। इसलिये यह विचार तो गा बिसे जाना होगा तावापेगा। हमें तुम अपनी पिके अनुसार वपमा चो तुम भास होता है, उसे कल्याण मानकर प्राति करते हो इस विपपमें सहप हो, किसी प्रकारको मामको इसके बिना साह इमके किना । मेमेश उत्पम करनको इसके बिना ही, मुझे जो कुछ विचमें भगता है उसे कर देवा ।। पिस भार्गस कारपाण होता उस मार्गके दो मुल्य कारण देखने में बाते है । एक तो पाकि बिस सम्प्रदायमै मामापके लिये ही सम्पूर्ण क्सगवापुज क्रिमा हसर किसी भी प्रयोजनको मसे म मार निरंतर ही शान-दशाके उपर जीयोंका विच एताए, उसमें अपप हो कायाप सापन होनेका योग मानते हैं। यदि ऐसा न हो तो पोगका मिना समय नहीं है। यह तो भोग-संज्ञासे, वोप-समासे मानके लिये पूमाके लिये, सके म्हपके लिये पाक मारके अपनेपन के लिये, अपना मी तरके किसी दूसरे परोस जप, तप वादि म्पास्मान वादिक करनेको प्रापि प प परत किसी भी तरह सामाफि लिये मी मामापके प्रतिवषकम हो। इसम्पेि यदि तुम कुछ इन्स करते हो तो उसका उपाप करने के लिये यो सय कारण करते हैं, उसके बसगत साम्य होनेपर किसी समय मी करपाण होना समय है। असगता बाद मास्माके सिमाप संग-पगमें ना पहना-शिप्ण मावि बनाने के कारण ससारके साथियों संगमें बातचीत करमेका प्रमा म खना, शिष्प आदि मानेके लिये गलासी - पर १५१, ३५.] विविध पत्र मावि संप्रार-२६षों पप पेपथालेको साथमें नहीं माना। दीक्षा के के वो तेरा कायाण होगा', इस प्रकारके वास्प तीर्थकरदेव भी नहीं करते थे। उसका हेतु एक या मी पा कि ऐसा कइना मी--उसका दीक्षा लेनेका विचार होनेके पहिले ही उसको दीक्षा देना-कान्याणकारक नहीं है। जिसमें तापकरदेखने मी इस प्रकारके विचारसे प्रति की है, उसमें हम छ म मास दीक्षा लेने का उपदेश चारी रसकर उसे शिप्प बनाते है, यह केवल शिप्पके लिये ही है, वामापक लिये नहीं। इसी तरह यदि पुस्तकको शानको धारा- धमाके सिप, सब प्रकारके अपने ममत्वमारसे रहित होकर रस्सा माय तो ही यामार्थ है, नहीं तो पा मी एक महान् प्रतिवध है, यह मी विचारमे योग्य है। पा क्षेत्र मपमा है, और उस क्षेत्रको रक्षाके लिये पातुर्मासमें वहाँ बनेके सिये वो विचार किया जाता है, यह क्षेत्र प्रतिवध है। तीर्थकरदेव तो ऐसा करते है कि दम्पसे, क्षेत्रसे, काम्से और मापसे-इन पार प्रतिवर्षोंसे यदि बास्माय होता हो, अथवा निर्मपामा नाता हो, तो वा तीर्यकरके मार्गमें नहीं है, परन्तु ससारफे हो मार्गमें है। ३५६ बी, फागुन मुदी ७ गुरु १९१९ बामाको निभाषसे वमकारयुक्त करमेके म्पि मौर समाबमें बनकाशम्पसे बनेके लिये पदि कोई मी मुल्प ठपाप हो तो म मामाराम जैसे हानी-पुरुषका निफाम पुरिसे मलि योगरूप सग ही है। उसे सफल बनाने के लिये निति-क्षेत्रमें उस प्रकारका सयोग मिझना, यह किसी महान् पुण्पका योग , वौर उस प्रकारका पुष्प-योग प्राय इस जगत्में मनेक पतरापोंसे युक्त विसई देता है। इसलिये हम समीप है ऐसा बारमार याद करके मिसमें इस सारकी उदासीनता कशी हो, उसे हारमें माँचो बोर उसका विचार करो । बारमा फेवा भारमरूपसे ही थे ऐस्य चितवन रसना, यही उझ है और शामका परमार्थस्म है। इस बारमाको पूर्वमें मनतका व्यतीत करनेपर मी नहीं जाना, इसपरसे ऐसा माम होता है कि उसके माननेका कार्य सबसे कठिन है; अथवा माननेका तपारूप योग मिझना फ्रम दुर्सम है। नाव बनतकासे ऐसा ही समठा करता है कि मैं अमुकको मानताई नमुकको नहीं जानता, परन्तु ऐसा महो। ऐसा होनेपर मी मिस रूपसे प रूप है उस रूपका तो निरन्तर हो विस्मरण बठा बाता ----पर अधिकाधिक प्रकारसे विचार करने योग्य है, और उसका उपाय मी गात प्रकारसे रिपार करने पोम्पो। । है। ३५७ बर्मा, फागुन मुरी ११, १९१९ निस कामें परमार्थ-धर्मका प्रशिके कारण, प्राप्त होनेमें अस्पतापम हो, उस कासको वीर्षकरेगने हुपम कार का है, और इस काल में यह बात स्पर दिखाई देती है। सुगमसे सुगम ऐसा नो सम्पा- गका उपाय है, मी बीबको इस काठमें प्राप्त होना मर्पत ही फटिन है । मममता समा भीमर पवन [पर १५८ निहाति, मसग वादि सापों को इस कामें परम तुम नामकर, पूर्णके पुस्योने इस कालको 'ग वसर्पिणी' काम कहाौर परमात स्पष्ट मी है। प्रथमके वोन सारमोका सपोग तो कहा मी सो किसी कामें प्राव हो जाना सुगम पा, परन्तु सग तो समी काठमें दुर्बम हो माश्म होता है; तो पिर इस काठमें तोरससंग शसि मुग्म हो सकता है। प्रथम ताम सापनोंको मौ किसी गतिसे जी समसमें पा चाप, तो मी पम्प । काम्वनी तापकरको पाणाको सप करनेके पि हमें इस प्रचारका उदय यता, बौर प समाधिरुमसे न करने पोप है। वारमसरप (२) कई, फागुन वदी १०, १९९९ इसके साप मणिरानमा तपा योगकम्पगुम पाने के लिये मेने है। जो कुछ बधि हुए कर्म २, उनको मोगे बिना कोई उपाय नही है। वितरित परिणामसे जो कुछ उपमें माये, उसे सहन करना, इस प्रकारका मातीपंकर बादि शानियों का उपदेश। बम्बई, चैत्र सुदी १, १९१९ समवा रमवा घरपवा, शायकवा मुखमासा बेदकता वन्यता, ए सब मीनविसास । निस तीपंकरदेखने सरूफ्स्प मारमतरूप होकर, पम्पलपमे-जिस प्रकारसे पर बारमा कमी जा सकती है उस प्रकारसे-उसे मत्पत पपायोम्य कहा है, उस तीर्यकरको दूसरी सब प्रकारको बफेशामोका त्याग करके हम ममस्कार करते है। पूर्वमें बहुत से शाओंका विचार करनेसे, उस विचारके फसमें सत्पुरुषमें किसके पचनसे मति टपमईउस तोपकरके मचनको हम नमस्कम करते । मात प्रकारसे गीतका विचार करनसे, पगार वामरूप पुस्पके मिना गाना गाय, या समन मही, इस प्रकारको निमा अशा उत्पम करके उस तापकरके मार्ग-पोषहम नमस्कार करता है। भिम मिम प्रकारसे उस पीनका विचार करने के लिये उस बालके प्राप्त होने के लिये पोग बारि भनेक सापोंके प्रब परिमम करनेपर मौ मिस प्रतिम हुई ऐमा मागीय, जिसके हरा सहम समाप्त ऐ गाता है-पौनेका विसका नरेश -उस तोपकरके उपदंश-चमको हम ममस्कार (वपूर्ण) (२) इस जगदमें बिसमें बाणासहित विचार-कि मौत ऐसा मनुप-प्राणी स्पागका प्रचार परनेक ये सबसे अधिक पोम है। फिर भी प्राप भागको बनवार मनुष्यता प्राम होने पर भी कर कपाल सिद्ध महीमा, सिमे जन्म-मरण मार्गच आरामन करना पड़ा है। नादि इस टोसमें नाली समया मनत-कोटीउन गानोली प्रति समपात प्रकारको सम्म मरण । पर १५८] विविध पर भादि संग्रह-२१ पौ पप बादि स्थिति होती रती है, इस प्रकारका वनतकार पूर्वमें मी म्मतीत माइन बनतकोटी सीमें निसने वाम-कम्पाणको वाराधना की, या निसे भारम-फरम्माण प्राप्त मा है-ऐसे पौष मस्पत हो यो । वर्तमानमें भी ऐसा है, और भविष्य मी ऐसी ही स्थिति होना समय है-ऐसा ही है। बर्यात् नीबको सौनों फामें कपाणको प्राप्ति होना पर्यत दुर्सम है-इस प्रकारका जो बीती- कर आदि शानका उपदेश है या सम है। इस प्रकारको गौर समुदायको मति बनादि सपोगसे घी नाही? ऐसा ठोक?—ऐसा ही है। यह प्रति मिस कारणसे होती है, उस कारणके मुख्य दो भे माछम होते है --एक पारमार्षिक वीर दूसरा म्पापहारिक । वीर दोनों मेोका एकत्र यो अभिप्राय है वह यही है कि इस चौबको सची मुमुक्षुधा नहीं भाई, चीवमें एक मी सस्प मक्षरका परिणमन नहीं था, चौपको सपुरुपके दर्शनके लिये रुचि नहीई, उस उस प्रकारके योगके मिसमेसे समर्प अंतरायसे नावको का प्रतिश्प पता बाया है, और उसघ सबसे महान् कारण वसत्सगको बासमासे जन्म पामेलामा निम्म् अमात्र वीर मसपर्शनमें सवनिरूप भाति है। किसीका ऐसा अमिप्राप है कि मामा मामका कोई पदार्य ही नहीं है। कोई दर्शमबाले ऐसा मानते हैं कि मारमा नामक पदार्थ के सांपोगिक है। दूसरे दर्शनबाडाका कपन है कि देहके यते पर ही मारमा यती है, देहके नाश होनेपर नहीं राती । बारमा वणु, मारमा सम्पापक, वारमा शून्य है, वास्मा साकार है, बारमा प्रकाशरूप है, मारमा सत्र नहीं है, बारमा कर्ण मही, वात्मा की मोका महा है, वास्मा का मही है मोय है, बारमा कर्जा भी नही मोजा मी मही, पारमा नाद, मास्मा रत्रिम है,पादि मिसके बनत मय हो सकते है, इस प्रकारफे ममिप्रापकी भांतिके कारण नसत्दर्शनके बाराषन करनेसे, पूर्वमें इस जीपने अपने वास्तविक स्वम्पको नहीं जाना । उस समको उपर महे वनुसार एकांत-त्रपयार्यरूपसे नानकर भारमा बपका वामाके नामपर ईघर मारिमें पूर्वमें गोपने नाम किया है । इस प्रकारका जो वरसग, निनवगमात्र, और मिथ्यादर्शनका परि णाम है जबतक नही मिटवा, तबतक यह बीच देशहित मुद बसाय प्रदेशमा मुछ होमेके योम्प नहीं है, और उस बहसंग माईको निहसि करने के लिये समग, पानीको बाधाका अर्पत बगीकार करना, और परमार्पतरूप को मारममाव है उसे जानना पोय है। पूर्वमें होनेवाले तीर्थकर मावि बानी-पुरुषोंने उपर कोई भातिका वर्पत विचार करके, समत एकाप्रतारो सम्मपतरो-गारका स्वरूप विचार करके गौरके समपमें शुम स्थिति की है। उस बारमा और दूसरे सब पदार्पोको सब प्रचरको भातिगत मानने के लिये प्रीतीर्थकर मादिने बापत दुफ्त पुरुषार्थका माराधन किया है। पारमाको एक मी आणुके माहार-परिणामसे पनप भिम करके वने इस देह में साप ऐसी 'बगाहारा मामा'को स्वरूपसे बीमित रहनेवाला देसा है। उसे देसनेबारे कार्यकर मादिशानी सप हो मुद्धामा है, तो फिर उनका भिमलमसे बो देखना ना रे,मयपपि योम्प मही है, मिर मी पाणी धर्मसे ऐसा कहा है। इस तर मर्मत प्रकारसे रिचारनेके बाद मी गानने योग्य नियमन र भीमद् रामचन्द्र [५८ प्रकारसे कहा है, जिसे सुपुरुषसे बानकर, विचारकर, सत्कार करके बोल बपने स्वरूपमें स्थिति करे । ताकर पारिबानीने प्रत्येक पदार्थको मजल्य वीर अबकम्प इस पर दो प्रकारफे म्पद्वार-मर्मपुछ माना है।नो वरळम्परूमसे है प पहाँ ववलम्य हो।बो पक्षम्पापसे गावकापर्म रे, उसे तापकर वादि सब प्रकार से अनेके सिये समर्प है, और यह मानके विर परिणामसे बपना पुरुषसे जानने पोम्प पर नापका धर्म , मोर पो भर्म उस क्षणसे अमुक मुख्य प्रकारसे इस दोहेमें कहा गया है। पाल्या परमापके वापत बम्पारासे अस्पत स्परपसे समझमें जाती है, और उसके समक्ष नेपर वस्पत बास्मस्वरूप मी मगठ होता है, तो मी यपाकाश यहाँ उसका वर्ष मिसा है। समवा रमवा घरपवा, पायकवा मुसमास) मैदावा चैवम्पवा, प सप भीपविलास । मातार्पकर ऐसा करते है कि इस जगत्में इस चीन नामके फ्वार्पको भारे निस प्रकारसे कहा हो, परन्तु पदिय प्रकार उसकी स्थिति के लिपपमें हो, तो उसमें हमारा उदासीनता है। जिस प्रकार निरागार रूपसे उस नाम नामके पार्पधेहमने माना। उस प्रकारसे उसे हमने प्रगटस्पसे कहा है। बिस प्रवणसे उसे हमने का है, पर सब प्रकारसे निर्वाध कम्ने उस पारमाको इस प्रकार माना है, देवा । स्पा बनुमय किया है, और प्रगटरूपसे हम वहाँ वास्मा र भारमा 'समता' माणसे पुछ है। वर्तमान समयमें ना उस मामाकी सम्प-प्रदेशात्मक पस्पिति सम पहिलेके एक, को तीन, पार, दस, संम्पात नमस्मात बौर वनत समयमें पी, बर्तमानमें है, और भविषमें भी उसकी स्थिति उसी प्रकारसे होगी । उसके मम्स प्रदेशात्मकता, पैतन्यता अपिल स्पानि समस्त समान कमी मी छने पोम्प नहीं है। जिसमें ऐसा समपना-समता 'ए बार है। प, पक्षी, मनुष्य मादिको देश और मादिमें मोम रममीपता दिखाई देती है, अपना बिससे प सब प्रगट कृर्तिमुक्त माम ऐसा है-प्रगट पुदरतामुख माश्म होता है- 'रमणीयपना-रमता मिसका माण, मा बीब नामक पदार्थ है। जिस मोबदगाके बिना समस्त गगत् प्रन्यात् मास होता है, निसमें ऐसी रम्पता है -परम्पण निसमें पटता-पानी। कोई भी मानमेवाण कमी मी, किसी मी पदार्पको अपनी गैरमौनवासे पान, पायात होने योग्य महो। परिसे अपनी मौनगी होनी चाहिपे और किसी मी पदार्य प्राण, मग वादि पपना उदासीन हान होनेमें अपनी मौजूदगी ही कारण है। दूसरे पापक बगाकार करनेमें, उसके कपमात्र भी शानमें परि पहिस वपनी मोरगी हो तो होइबान हो सकता है। इस प्रकार सम्से परिवयमेवाला नो पदार्थ है यह नाल हाउसे गौण करके बाद उसके मना 0 यदि कोई एस मी गानना चाहे तो पा समय नहीं है। के ही मुस्प हो तो हम कुछ पाना जा सकता है। इस प्रकार मिसमें प्रगट उता-धर्म'। उस पापको भौतार बार करते है। प्रगट ना पाप और गांव में दोनों पिस भरणसे परस्पर भिम पाते है, पण मायनता' नामका गुम है। किसी भी समय वापरत मासे पर जात-पदार्थ किसान भी बनु २५.] विविष पर मादि समर-२साप नही कर सकता, वौर स बोव नामक पदार्यके सिवाय दूसरे किसी भी पदार्यमें प्रापकता हो सकती । इस प्रकार अस्पत बनुमवका कारण निसमें सापकता' क्षण है, उस पर करने चौष कहा। शम बादि पाँच लिपयसपंधी अपवा समाधि धादि योगस्पषी निस स्पिलिमें सुख होना उसे मिम मिमहापसे देसनेसे बन्तमें केवल उन सबमें मुक्षका कारण एक बार पदा पेत । इसलिये वीर्यकरने जीवका ' मुखमास ' नामका सक्षण का है, और म्यवहार र गरा का प्रगट माइम होता है। निस निग्रामें दूसरे सब पदार्यासे रहिवफ्ना है, पहों मी' में ऐसा बो मन होता है, यह वाकी बचे हुए चीन कार्यका ही है, दूसरा और कोई हो कि नहीं है, वौर निदामें मुसका मामास होना वो अस्पत स्पष्ट है। जिससे भासित होता है पण बीर मामके पदार्पक सिवाय दूसरी किसी मी जगह मही देखा पाता । पर स्वादरहित है, यह मीठा है, या खा है, यह साप है, मैं इस स्थितिमें 1, में प्रमें याई, गरमी पर सौ है, मैं हु सौ , मैं दुमका अनुभव करता हैस प्रकारका गो स्पस अंदमान-वनुमान-अनुभवफ्ना यदि किसीमें मी हो वो मह जाय-पदमें ही है, अपना मह मि क्षण ऐप पदार्थ भी होता है, यही तीर्थकर मादिका अनुभव है। स्पष्ट प्रकारापना-बनतामत-कोटी तेनती दीपक, मणि, स्त्र, सूर्प माविकी काति-नि प्रकाशके बिना प्रगट ऐमे के लिये समर्थ नहीं है। वर्षात् ये सब वपने नापको मवाने अपना पान पोम्प नहीं है जिस पदार्थक प्रकाशमें पैतन्यरूपसे ये पदार्थ गाने माते है-~म्पर मासिव होते है वे पार्थ प्रकाशित होते1-मार्य को कोई तो एक नीव हो । अर्थात् उस चीनका ब्धण–प्रगटरूपसे स्पष्ठ प्रकाशमान अपर निराबाध प्रकाशमान पैन्य-उस जीवके । उपयोग भगानेसे प्रगट-प्रगटर से दिखाई देता है। ये वो क्षण को फिर फिरसे विचार करनेसे बीद निराबापमापसे जाना जाता। मिसके गाननेसे जीव जागा गया है, उन लक्षणोंको तापकर मारिने इस प्रकारसे कया। बम्ब, पैत्र मुदी ६ गुरु १९६ । उपारिश्च योग विशेष गता है। जैसे जैसे नापिके योगको विशेष ण होती जाती से पैसे उपाधिको प्रतिका पोग विशेप दिर्य पाता है। चायें तरफसे उपाधिकी ही भी। ऐसी दिशा इस समय माम नहीं होती कि वो इसी समय इसमेसे कर पसे पाना वो किस बापी न गिने माप । टनका प्रफन करते हुए किसीके मुख्य अपपभमें पकड़ा जाना स्पर सर Paई देता है। भौर पर वर्तमाम समस्पा उपाधि-हितपके मर्पत योग्य है । प्रारम्पको म्यास्पान इसी प्रकार प्रमण किया गया ऐगा। - भीमद् रामबाण [३५ ३६० वई, क्षेत्र सुदी ९, १९९९ (१) भारम, परिमा, यससंग वादि कस्याणमें प्रतिबन करनेवाले कारणों का, जैसे कने से कम परिचय हो, और उनमें उदासीनता प्राप्त हो-यही विचार सम्में मुस्परपसे रसना योग्य है। (२) हमें उस तरफ भापको माविक होनेवाले समागमके सर्वधर्म समाचार पो। उस प्रसगमें बार कपि वपना मरुपि सत्पम नही से श्रेयका कारण मानकर, उसका अनुसरण करके, मिरतर प्राधिकरनेका परिचय करना योम्प है। और उस वसासगका परिचय, पैसे कम हो पैसे, उसको बसाकीम करक बना योग्य है। से बने पैसे सस्सगके संयोगको रम करना और अपने दोपको देखना योग्य है। बा, पैत्र वदी १ रवि १९९९ पार वरपारनी सोहसी बोहसी, पौदमा मिनवणी परणसेवा पारपर नारवा देस बाजीगरा, सेबना-पारपर रोन रेमा । (वानंदघन-बनतमिन-स्तवन) इस प्रकारक मार्गको किस कारणसे कर्पत कठिन करा, या विचारने पोयो। . ३६२ वर्ग, क्षेत्र बदौ ९ रचि १९१९ बिसे ससारसंबंधी कारपके पापो प्राति सलमतासे निरन्तर पुषा करे, और कई गमन न रो, परि ऐसा ई पुस्प है जो उसे हम तापकरणम्प मानते हैं। परन्तु प्रायः इस प्रकारको मुखम प्रालिके योगसे पापको कप फाल्में संसारसे बापत पैराम्प मही वाता और स्पा बामवान सपम नही होता-ऐसा मानकर जो कुछ उस सम्म मासिको हानि करनेवाम संपोग मिमता , उसे उपकार करण नामकर, सुमपूर्वक यना पोम्प है। ३६३ बई पादौ ९ मि १९९९ सेसाय-असे पते पर पैनसी स्थितिसे म्पसार परें सोको, ऐसा कदाचित् मासित हो तो मी उस म्पपारका करना तो प्रारम्पके बापान है। किसी प्रकार के किसी राग, रोष वपना महान कारगसे गो न होता , उसच कारण उदय 0 माश्म होता है। ममें सामातिक शीतता है, परन्तु सूर्य बाहिके तापले संरपसे या वाण घेता या साई पार परम मा को नम फतु या सीमा मनोनीत कामा कम्नि है। पर मोम पम्पर मारपर को हुए सकते। परन प्रमुझे परीस्वाम्म यात्म वो रेटा मेम में महायरस पत्र १५४ १५५ ३५५] विषिष पत्र मादि प्रह-पो वर्ष देता है, उस तापका संबंध पर हो जानेपर ही पर फिर शीतकहो नाता है। बीचमें दो जल शोतम्नासे ररिव माश्म होता था, पर वस तापके सयोगसे ही माइम होता पा । ऐसे ही हमें भी प्रवृत्तिका सयोग है, परम्त हास्में तो उस प्रासिके वेदन किये बिना कोई दूसरा उपाय मी है। ३६४ बर्षा, चैत्र पदौ ९, १९१९ जो मु यहाँ चातुर्मासके लिये वाना चाहते हैं, यदि उनकी मारमा दुसित न हो वो उनसे माना कि उन्हें इस क्षेत्रमें वामा निक्षितप नहीं है। कदाचित् यहाँ उन्होंने ससगको चासे जानेका विचार किया ऐ तो यह संयोग बनना बहुत कठिन है, क्योंकि हाँ हमारा बाना आना बने, यह समब नही है। यहाँ ऐसी परिस्थिति है कि यहाँ उने प्रवृत्तिके बसवान कारणोंकी की प्राप्ति हो, ऐसा समाकर पनि उन्हें कोई दूसरा विचार करमा सुगम हो तो करना योग्य है । हमें तुम्हारी हो कैसी दशा यासह विशेषरूपसे ससगका समागम करमा पोय है। बारमत्थित ३६५ अम्ल, देशास पदी र रमि १९१९ (१) प्रत्येक प्रदेशसे गावके उपयोगको बाकर्षित करमेनाले संसारमें, एक समपके लिये मी वाकाश मेनेको हानी पुरुषोंने ही नहीं कही-स विषयका सर्वपा निषेप ही किया है। उस भाकर्षणसे पनि उपयोग वकार प्राप्त करे तो उसी समप आत्मरूप हो जाता है-उसी समय वारमा पर उपयोग बनम्प हो जाता है। त्पादि अनुम-मार्ग जीवको ससग स नभयके बिना प्रास होनी बायत कटिन है। उस सगको बिसने निषयरूमसे मान लिया है, इस प्रकार के पुरुपको भी इस पम काछमें उस ससंगका संयोग राना अस्पत कठिन है। (२) मिस भिताके उपायसे तुम पकाने हो, उस पिताका उपना कोई शत्रु नही है। प्रेम-भकिसे नमस्कार । बम्बई देशास बदी ८ भाम १९४९ जहाँ कोई उपाय नहीं, हो से करना योग्य नहीं है। ईपरे के अनुसार जोहो इसमें समता रसमा ही पोग्प है। भीर उसके उपापका परि कई विचार सूझ पर तो उसे करते सना, मात्र इतना ही अपना उपाय है। कपिट सारके प्रसगोंमें जबतक अपमेफो नुश्मता या करता है, तबतक उस ससारमा ससम्म विचारकर स्पाग करना योग्य है, पाप इस प्रकारका विचार इयमें जाना कठिन है। स्मारमें जब अधिकाधिक प्रनित प्रसंगोत्र प्रापि आती है, तो कगापित गौरको परिसर परमहोकर पोडेसे मेराय माता, उसके बाद बाम-स्वपमकी सूझ पाया है। और परमामा मीम रवान हमारे समागमका तराप बामकर चिपको प्रमावका बकास देना योग्य नहीं, परस्पर मुमुक्षु मईपकि समागमको सम्पपस्पित योने देना पोम्प मही, मिरिक क्षेत्रके प्रसंगको म्यून होने देना पोम्प नाही, काममापूर्वक प्राति करना उचित मही-ऐसा विचारकर जैसे बने तैसे अप्रमत्तान, परस्परके समागमका, नितिक क्षेत्रका बौर प्राप्तिको उपासानवाघ भारापन करना चाहिये। यो प्रापि यो उदयमें है, मास प्रकारको कि उसे मे किसी मार्गस पानेपर मी कोसी मही गा सकतीर सान हो करने योप है। इसम्पेि ग्सका अनुसरण करते है, फिर भी स्वस्पता तो अम्पावार स्थितिम सीकी तैसी है। बाय परामबाग पत्र मिमते है। इसे हम सब मिजास माईक पारम्पार विचार करनेके म्मेि मिला है। पिएस प्रकार के उदयबाग कमी कमी हो पाई। वाम उस प्रकारका मनुभमसे उदय होनेसे सस उदपके वनमार रिहा है। जब हम मी सगको तया नितिकी कामना रसते है, वो फिर महम सबको रसना पोय हो तो इसमें कोई माचर्य नहीं है। जब हम मी म्पपारमें यते हुए कपारमको और मम्प परिमाको, प्रारम्भ नितिरूपसे पाहते हैं, तो फिर में उस तय बाव करना पोम्प हो, इसमें कोई संशय करना योम्प म । इस समय ऐसा नही सकता कि समागम होनेके सपोगा नियमित समय सिमा गा सके। ३६९ बाई, पेष्ठ मुनी १५ भौम १०१९ जीर पीद सोचना परे । रुप्मने रोप वे करे। भीय मीर शोचना पर रुप्मने कर दोपहर। 'पूर्वमें बागी-पुरुप हो गये। उन शानियों से जाना-पुरुष सिवि-योगवा मा हो गये है, पर जो मैक्षिक कपनी पा समापा एनयह बापका प्रभ है। गौर या सपा मास्म पारे ऐसा नापत्र मिसाय | पा पा साक्षात् देखनेमें नहाता', या वापको निशाना है। कितने ही मार्गानुसारी पुरुष पोर नान-योगी पुरुषोंमें भी सिनि-मोग होता है। प्राप करके सिदि-पोग उनके पित्तको भक्त सरतासे अपना सिदि-पोग बादिको मान-योगसे सरणा प्रदान करमेसे प्राधिकरता है। स्पारि पुस्प-मिनके बीपा गुणस्थान होता है जैसे माना-पुरूष समित सिदि होती है भर पित् सिनि मोवी | मिनके होती है उनको उसके प्रगट करनेछ प्राप' हम मही भार प्राप करके या भ होती है उस समप यती समोर प्रमादके परा हो, और मदि उस प्रकारको छाईयो पर सम्पापसे गिर जाता है। प्रायः पाँच और छो गुणम्यानमें मी उत्तर सिदि-पोग विशेष समान होता जाता है, मौरमा मा यदि प्रमाव पारिके पागसे और सिदिमें प्राधिकरे तो उसका प्रथम गुणत्यानमें बा गाना मिप है। साताबाटने ममें और दश गुणस्पान, मापा करके प्रमारका प्रकाश कम होगी। म्याय गुणस्थान में सिद्धि-योग मेम मित्र होने परण, मासे प्रपन गुणस्पानमें मा जामा मन है। ।
३४७ - पर ३५९३०,] विविप पत्र मादि संग्रह-२या वर्ष पाकी नितने सम्पमतके स्थानक हैं, वौर गतिक आस्मा सम्यक् परिणामी है, तक उस एक मी योग विकास में मी जीवको प्रति होना सभप मही है। सम्पमानी पुस्पोंसे छोगाने चो सिदि-पोगके पमत्कार साने है, ये सब बानी पुरुषारा किये हुए समब नहीं मान होते, वे सिद्धि-योग स्वभावसे हो प्रगटित हुए गते है। दूसरे किसी कारणसे शानी-पुरुपमें बह पोग नहीं कहा जाता । मार्गानुसारी अपना सम्पटि पुरुपके अपत सरस परिणामसे बहुतसी बार उनके फो र पपनके अनुसार बात होनाटी है। जिसका योग बढ़ानपूर्वक है, उसके उस भावरणके उदय होनेपर, महान प्रगट होकर, वह सिद्धि-योग अस्प काछमें ही फर दे देता है। किन्तु हानी पुरुषसे वो पर केवल स्वाभाविकरूपसे प्रगट होनेपर ही फल देता है, किसी दूसरी तयसे महीं। बिस हामीशरा स्वामाविक सिदि-योग प्रगट होता है, मामानी पुरुष, को हम करते हैं उस तबके, पया उसी प्रकार के दूसरे अनेक सरके चारित्रके प्रतिबपक कारणों से मुक्त होता है; मिन कारणोंसे वारमाका ऐश्वर्य विशेष पुरित होकर मन बारि योगमें सिद्रिके सामाक्कि परिणामको प्राप्त करता है। की ऐसा मी मानते हैं कि किसी प्रसगसे जानी-पुरुपाय मी सिदि-योग प्रगट किमा जाता है, परम्त का कारण बस्यंत बम्बान होता है । भौर पर मी सम्पूर्ण शान शाका कार्य मही है। हमने जो पह सिता है, यह बात विचार फरनेपर समसमें मायेगा । हमारी वाबत मार्गानसारीपना नना योग्य मही है। जहान-पोगोफ्ना तो जबसे इस देहको भारण किपा तमासे नहीं है, ऐसा माझ्म होता है । सम्यकपरिफ्ना सो मन्य समय है। किसी भी प्रकारके सिदि-योगको सिद्ध करमेका हमने कभी भी समस्त जीपनमें बम्प मी विचार किया हो, ऐसा पार मी आता, अर्यात् साधनसे उस प्रकारका पोग प्रगट हुमा हो, यह मान्दम नहीं आता । हा, रमाको विशुद्धता के कारण पदि कोई उस प्रकारका ऐचर्य हो तो उसका बमान महीं कहा जा सकता । र ऐप कुछ भागमें संभव है। फिर भी यह पत्र लिखते समय इस ऐश्वर्यकी स्मृति ई है, मही तो पात कामसे या बात स्मरणमें ही मही, वो फिर उसे प्रगट करनेके स्पेि कभी भी भागे, पा नहीं कहा जा सकता, यह स्पट बात है। तुम वीर हम कुछ दुली मही है। बोर्म है तो यमके घीश पके हुसका एक नि मी मही, पापोंके तेरा वर्षा हुसको एक पड़ी भी मही, और गममामारके म्यानकी एक पर भी मी तो फिर हमको इस बापत कारणको कभी मी बताना योग्य मही। शोक मही करमा चाहिये । जो दो मात्र उसे देखते रहो-इस प्रकार नियय रणनेफा चार करा; उपयोग करो और सामधानासे हो । पही उपदेश है। . - ३७० बबई, प्रथम बाप पोरपि १९.. गत मंगसिर महीने में सबसे यहाँ बाना एमा उस समयमे उपाधि-योग उचरापर मिपावर ही होता भामा , और प्राय एक पर सपापिन्याग विष प्रकारके उपपोगमे सदन करना पड़ा।
भीमद् पासवान [१५ १६ ११८ पीकाको चमके अनुसार मुमुक्षु मांरको ये सब प्रसग, मिन प्रसंगौके कारण वाम-साथम सूझता है, मुख्यापक मामने पोम्प है। अमुक समक्तक बनुन प्रसामुक्त ससारमें काचित् यदि सर्सगका समोग वा हो, को भी इस कारमें उससे पैराग्यका वैसा चाहिये पैसा इन होना कठिन है। परन्तु उतकमा यदि कर्म कोई प्रसग प्रतिछ । प्रतिकूम बनता पम बाप तो उसके विचारसे-उसके पमाणपसे सम्म हितकारक र बाता है, यह मानकर बिस किसी प्रतिच्छ प्रसंगको प्राधि थे, उसे वाम-साधना कारणरूप मानकर समापि रसकर जागृत गना चाहिये। फस्पितमा में किसी प्रकारसे भूगाएके समान नहीं है। ३६७ पई, सास का ९, १९१९ भौमहावारदेक्से गौतम मादि मुनिवर मते थे कि पप ! महण प्रमण, मिच और निर्मम साम्दोका क्या अर्थ है, सो हमें करिये। उसके उत्तरमें मौतीपकर इस बर्षको विस्तारसे करते थे। देबनुनमस्ते इन चारों को बहुत प्रकारको पावरमा चस्पाको विरोप-पति विशेषरूपसे परते थे, और सदर पिम्प उस शस्तके मर्पको धारण करते थे। निर्मपको क्मेक दशाम करते समय निर्मपके तापकर 'वारमवाप्रम' इस प्रकारका एक पापद पात । टीकाकार भीमेकाचार्य उस वामपाइप्रात 'शाम्बका बर्थ इस प्रकार काते- । उपपग मिसका क्षण है मसम्म प्रदेशी, संकोच-विकासका मानन, वपन किये हुए कोच मोवा, म्यवस्थासे ब्रम्प-पर्यापलप, निस्प-अनित्पबानित पस्मिक ऐसी वारमाको माननेपाम बाम . । ३६८ पर्व, म्येष्ठ पुदी ११ र १९९९ सब परमार्पके साधनोंमें परम साधन ससा-मुम्पुर राणके समीप निवास। सबसम्में उतको कठिनता है, जोर इस प्रकारके विपम कामें तो पानी पुरुषोंने उसकी मस्पत ही कठिनता मानी है। शामा पुरुपों की प्रापि, प्राति नैसी नहीं होती । जैसे गरम पानी में भमिका मुभम गुण न कहा जा सकता वैसे ही बानीको प्रालि है। फिर मी भाना-पुस्प मी किसी प्रकारसे निरपिको एसा करता है। पूर्वका में भायपन किये हुए निरपिक, मन, उपक्म, पोग समावि और समग पारिबामा पुस्पको प्राप्ति होने पर भी मारम्बार पाद बा माते । फिर मी ती उपप-मात प्रारणका बिनुसरण करते हैं। ससंगको कपि यी है, उसका उस राता है, परन्तु पर मय पहा नियमित नहीं है। कम्पाणविषयक बो चो प्रतिस्प कारण, उनका चौलको बारमार विचार करना पोम्म है। उन सब मोंको बारम्बार AMR रके वर करमा योपो वीर इस माह अनुसरण किये बिना पाणको प्रति महोदवी । म प र महान पे चापक बनानपान दोप है।बानी पुस्खामचनको प्राधि नेपर, उसच यपापम्प पर करनेसे महान निति होती है। उस पण ५. विविध पत्र मादि संग्रह सौ वर्ष ३४२ कानको सतति बलवान होनेसे, ठसका निरोप करनेके लिये और बानी-पुरुपके सपनों का यथायोग्य विचार करनेके लिये, मछ और विशेषको दूर करमा योग्य है । सरमता, इमा, स्व-दोपका निरीक्षण, बस्पारम, परिमर स्पादि ये मल दूर करनेके साधन धाना-पुरुषकी भस्यत माकि यह विक्षेप र करनेका साधन है। पदि कानी-पुरुपके समागमका भतराय यता हो तो उस उस प्रसगमें पारम्बार उस पानी-पुरुपकी दशा, पेय, और उसके बधनोंका सूक्ष्म पैतिसे निरीक्षण करना, उनका याद करना पौर विचार करमा योम्पहै। और उस समागमके वंतरायमें—प्राधिके प्रसंगोंमें—अल्पत सावधानी रखना योग्य, क्योंकि एक तो समागमफा हो या नहीं, धौर दूसरी मनादि सम्पासाठी सानाकार प्राधि यती है, निस्से जीवपर भामरण वा बता है। घरका, जातिका, अथवा दूसरे उस सहके कामोका कारण उपस्थित होनेपर उदासानमावसे उन्हें प्रतिवघरूप चानकर, प्राधि करमा ही योग्य है, उन कारणोंको मुस्त्य मानकर कोई प्राचि करना योग्य नहीं, और ऐसा ए बिना प्रतिसे वकाश नहीं मिलता। मिम मिम प्रकारको कल्पनामाँस मामाका विचार करनेमें, छोक-सपा, बोध-सा और बस रसग ये जो कारण है, इन कारणोंमें उदासीन हुए बिना नि सब ऐसी सकसपी जप, तप वादि क्रियामोमें साक्षात् मोझ महो?-परंपरा मी मोक्ष नहीं है। ऐसा माने बिना नि सम्म असशाम पौर मसद्गुरुको-चो भारमस्वरूपके वापरणके मुख्य कारण है--साक्षात् भाम-पातक गाने बिना चीनको जीवके स्वयप मियप होना बहुत कठिन है—अस्पत कठिन है। जानी-पुरुषके प्रगट बामस्वरूपको करनेवाले पचम भी उन कारणों के समवसे ही नीक सम्पका विचार करनेके लिये समान मही होते। यह निथप फरमा योग्य है कि निसको बामस्वरूप प्राप्त है प्रगट है उस पुरुपके मिना दूसरा कोई उस भारमस्वरूपको यपार्य करनेके योग्य नहीं है, और उस पुस्पसे बापाके पाने बिना दूसरा कोई कम्याणका उपाय नहीं है। उस पुरुपसे नामाके पिना बाने हो मात्माको नान किया है, इस प्रकारको कल्पनाका मुमुक्षु गौवका सर्मया त्याग ही करना योग्य है । उस भारमरूम पुरुपके सम्म निरवर कामना रखते हए जिससे उदासानमारसे लोक-धर्मस्वमसे और कर्मसरपसे ए सके, इस प्रकारसे म्पहार करना चाहिये । मिस म्यबहारके करमेमें बीपको अपनी महज वाकया उत्पम हो, उस म्यबहारका करमा योग्य नहीं है। हास्में अपने समागमका अंतराय मानकर निराशमानको प्राप्त होते हैं, फिर मी पैसा करनेमें ईसरेष्ठा नामकर, समागमकी कामना रहार, निकना मुमभु भाईयोका परस्पर समागम बने उक्ना करना चाहिये नितमा बने उतना प्रापि, परळमात्र रहना चाहिये सम्पुरुपक परित्र और मार्गानुसारी ( संवरदास, प्रीतम, असा, कबीर बादि ) बीचोंक वचन, और मिनका मुस्प वरेस भाम-पिपपक कपन करना है ऐसे (वचारसागर, सदरासके प्रप, मामन्दधनगी, बनारसीएस, बना बार के प्रत्य ) पोंका परिचय रसना) और इन सब साधोंमें मुख्य स्पन मौसपुपके समागमको हो मानना चाहिये ।
भीमा सम्म [पा. हमारे समगमका मंतराप जानकर पिटको प्रमाइका पकाश देना योग्प मही, परस्पर ममा माईयोके समागमको सम्पपस्थित होने देना योग्य नही, निधिक क्षेत्रके प्रसंगको म्यून हाने रेना योम्प नही, काममापूर्वक प्रति करना उचित नहीं ऐसा विचारकर से पने वैसे अप्रमचतार, परस्परके समागमका, निरपिके क्षेत्रका और प्रातिको उपासालाना वाषन करना चाहिये । मो प्रापि यहाँ उदपमें है, यह इस प्रकारका है कि उसे दूसरे किसी मार्गसे चल्नेपर मौ मेसी नही पा सकती-र सहम परमे योग्य है। इसलिये उसका अनुसरण करते हैं, फिर भी स्वस्पता तो मयागार स्थिति बैसीको सीहो। वाम पाम बायों पर किसते हैं। इसे तुम सब विज्ञासु माईति बारमार विचार करमेक किये सिसा है। चिच इस प्रकारके उदयाला कभी कमी हो या है। वान उस प्रकारका मनुकमसे उदप होनेसे उस उदयके मुसार रख। बब हम भी सासगी तथा निधिको कामना रखते हैं, तो फिर यह तुम सबको रसनी पोय हो तो इसमें कोई वार्य नहीं महम मी म्पहारमें खते र मापारमको और वत्स परिपर, प्रारम्प निरनिरुपसे परते, वो फिर तुम उस वय पाप करना योग्य हो, इसमें कोई संशप करना योग्य नहीं । इस समप ऐसा मही सूसता कि सम्प्रगम होनेके सपोगका नियमित समय किसा जा सके। २६९ बम्बई, पेष्ठ भदौ १५ मौन १९९९ जीर पोद सोचना परे । कृष्णने कख रोप वे करे। मीर भीद घोषना परे । रुष्णने कर रोय करे । पूर्वमें पानी-पुरुष हो गये हैं उम शानियोंमें यातसे पानी-पुरुष सिदि-योगमा भी हो गये है, पामो मैचिकनापन है सवा पा एमापा मापका प्रभ और 'पा सपा मम्म पता', ऐसा नायका ममिमाप है। सपा पा साक्षात् देखने महो माता', या भापको विज्ञासा है। कितने ही मार्गानुसारी पुरुष मौर मान-मोगी पुरोम मी सिदि-पोग होता है। प्राप' परफेर सिरि-मोग उनके पिचको मा सरलता से अपय सिरि-योग भादिको माल-मोगसे पुरमा प्रदान करमेसे प्राधिकरता है। सम्यक्पी पुरुष-मिनके चौपा गुणस्पान होता है-से बानी-पुरुषाले पनि सिदि तो और चित् सिति महावा । मिनके होती है, उनको उसके प्रगर करनेकी प्रापरस म और प्रायः परके बस इणब उस समप होतीजब गोप प्रमादके बरा रोम, और यदि उस प्रकारको पाई तो पा सम्पपसे गिर जाय। प्रापा पाव वौर को गुणस्पानमें मी उत्तरोत्तर सिनि-योग विशेष संभव आता माता गौर हो मी पदि प्रभार बादिके योगसे बोल सिदिमें प्रापि को दो उसका प्रपम गुणत्पान वा मामा संभव है। सात, माठ, ममें और दश गुणस्थानमें, प्रापः करके ममाइका साकारा कम होता है। म्यायचे गुणस्पानमें सिद्धि-योगका गेम संभव होने के कारण, बासे प्रथम गुणस्थानमें मा मामा समय है।
पत्र १९३.] पिविष पम मादि संग्रह-२५पा वर्ष माको मितने सम्यक्त के स्थानक है, वौर गातिक वात्मा सम्पपरिणामी है, पहातक उस एक मी योगमें त्रिकामें मी भावकी प्राति होना समय मही है। सम्पमानो पुस्पोंसे लोगोंने नो सिद्धि-पोगके चमकार बाने है, ये सब पानी पुस्पारा यि हुए समय नहीं माश्म होते, ये सिद्धि-योग स्लमाक्से ही प्रगटिव ए पते है । दूसरे किसी कारणसे बानी-पुरुषमें बह योग मही कहा जाता । मार्गानुसारी अपना सम्पादपि पुरुपके वल्पत सरस परिमामसे गुस्सा बार उनके को हुए पवनके अनुसार बात नाटी है। निसका योग बानपूर्वक है, उसके उस भावरणके उदय होनेपर, महान प्रगट होकर, यह सिदि-योग वप काछमें ही फर दे देता है। किन्तु हानी पुरुपसे तो यह केवल सामाविकरूपसे प्रगट होनेपर ही फल देता है, किसी दूसरी तयसे नहीं। विस हानीशय सामायिक सिद्धि-योग प्रगट होता है, यानी पुरुष, गो हम करते है उस तहके, वपा उसी प्रकारके दूसरे मनेक तरके पारिपके प्रतिपक कारोंसे मुक्त होता है, मिन कारणोंसे बरमाका ऐश्वर्य मिशेष पुरित होकर मन मादि योग सिरिके स्मारिक परिणामको प्रास करता है। कही ऐसा भी मानते है कि किसी प्रसगसे बानी-पुरुषाय मी सिदि-योग प्रगट किया जाता है, परम्त या कारण अस्पत सम्बान होता है। बीर बह मी सम्पूर्ण जान-शाका कार्य मही है। हमने जो यह रिसा, या पत पार फरनेपर समझमें मायेगा । हमारी माबत मार्गानुसारीफ्ना काना योम्प मही है। बाान-योगीपना तो सबसे इस देशको धारण किया तमासे नहीं है, ऐसा माम्म होता है । सम्पपटिपना तो अवश्य संभव है। किसी भी प्रकारके सिदि-योगको सिद्ध करमेका हमने कमी मी समस्त जीवनमें अप्प मी विचार किया हो, ऐसा याद नही वाता; वर्षात् साधनसे उस प्रकारका योग प्रगट एमाही, या मादम नहीं होता, मामाकी विमुताके कारण या कोई उस प्रकारका ऐश्वर्य हो तो उसका अमात्र महीं पा गा सकता । मा ऐप कुछ मंशमें समय है। फिर मी पा पत्र मिस्ते समय इस ऐश्वर्यको स्पति हुई है, मही तो मात कापसे या बात स्मरणमें ही मही, तो फिर उसे प्रगट करनेके लिये कमी मी हो, पर नहीं कहा जा सकता, या स्पर बात है। तुम वीर हम कुछ इसी मही है। वो दुम है वह तो रामके पौदा पके हुसका एक दिन मी नहीं, परिपके तेरा कि दुसको एक पदी मी मही, और गमबुमारके पानकी एक पर मी नहीं, तो फिर हमको इस अत्यंत कारणको कभी भी बताना योग्य मह । सरें शोक नहीं करना पाहिये । मोरो मात्र उसे देखते यो-इस प्रकार निपप रखनेफा विचार का उपयोग करें और सापपानासे या। यही उपशहै। ३७० बर्ग, प्रथम मापन गरि १९९० गतबर्ष मगसिर महानमें सबसे यही माना हुमा, उम समपसे उपाधि-योग उचरोवर सिपाघर ही होता जापा, भौर प्राप करके पर उपाधि-योग विशप प्रकारक उपपोगसे सहन करना पड़ा।
भीमद् पसबाट [पत्र १९ हमारे समागमका अवयप मानकर चिनको प्रमा अवकाग देना योग्य नहीं, परस्पर मुमुम माईयाँत समागमको सम्पपस्थित होने देना योग्य नही, मिरिक क्षेत्रके प्रसंगको म्यून होने देना पोप म0, कामनापूर्वक प्राप्ति करना सचिव मही-ऐसा विचारकर जैसे बने वैसे भप्रमवताका, परस्परके समागमका, निवृतिक क्षेत्रका बौर प्रवृत्तिकी उदासीनताका बारापन करना चाहिये। यो प्राति पयों उदयमें है, यह इस प्रकारको है कि उसे दूसरे किसी मार्गसे पसनेपर भी योगी मही जा सकती सहन ॥ करने योग्य है। इसलिये उसम्म बनुसरण करते, फिर भी सस्पता वो बम्पााष स्थिति सीको साहै। भाग माम माठमो पत्र दिसते है। इसे तुम सब मिात्र मईयोंके बारम्बार विचार करने के लिये लिखा है।पित इस प्रकार के उपवास कमी कभी हो पता है। वाब उस प्रकारका जनुकमसे उदप होनेसे उस तरयके अनुसार रिसा। चम हम भी ससगको तया निधिको कामना रखते हैं वो फिर या तुम सबको रखनी योम्म हो तो इसमें कोई वापर्य नहीं है। हम मी म्ममारमें गते र मापारमको भौर कप परिपाको, प्रल नतिरूपसे पाहते है, तो फिर में उस तय पता करना पोग्प हो, इसमें कोई सराप करना योग्य मही । इस समय ऐसा नही हवा कि समागम होनेके स्पोगमा नियमित समय किया जा सके। । - बगई, म्पेष्ठ सुदी १५ मौम १०१९ भीष नीद शोचना परे । रुपने करए पते करा नीय हूँ पीद घोपना पर कृष्णने कई होय ते करे । पूमि मामा-पुरुष हो गये है उन शानिमोंमें बातसे बानी-पुरुष सिद्धि-योगमा मों से गपे , मह जो मैतिक-सपन है पा सका है या ष्ठा'! पह आपका प्रभ है। वारपासचा माश्म होगी , ऐसा नापच मभिप्राप है, तपा 'पा साक्षात् देसनेमें नहीं बता', पहनाएको विज्ञासा है। कितने ही पानसरी पुरुष और बाग पोगी पुरुषों में मौ सिवि-योग होता है। प्राय करके प सिदि-योग उनके पित्तको मत सरस्वासे अपना सिदि-योग बारिको बाम मोगसे करण प्रदान करमेसे प्राधिकरता है। सम्पावि पुम्स-मिनके पौया गुणस्पान होता है-मैसे हाला-पुस्पा कवि सिदि ऐती है, और पित् सिमि नहीं गौ । बिनके ऐती है, उनको उसके प्रगट करनेकी प्रापरण नही होती और प्राय परके बरा होती है तब उस समय वीमा पौष प्रमाइके बस होगा और यदि उस प्रकारको मातोप सम्पक्से गिर जाता है। प्राया पापों और गुणस्पानमें मी सध्यतर सिद्धि-योग नशेष संभव होता जाता है और वहाँ भी पदि प्रमार भाविक पसे गान सिदिय प्राप्ति करे तो उसका प्रपम गुणत्पानमें बा बाना संभव है। साठवें, बाठो नबने और दश गुणत्यानमें प्राप करके प्राइका समय कम होता है। म्पाप गुणस्थानमें सिदि-मोगा मेम संभव होने के कारण, गाँसे प्रपम गुपस्पान मा बाना समय है।
विविप पर मादि संप्रह-२१मा पर्प - वाकी नितने सम्यक्सके स्थानक है, और नहाँतक बामा सम्पक्-परिणामी है, महातक उस एक मी योगमें विकासमें भी बीपकी प्रति होना समय नहीं है। सम्पपानी पुस्पोंसे मोगोंने पो सिद्धि-योगके समस्कार गाने है, ये सब हानी पुस्पधरा किये हुए सभव मी माश्म होते, ये सिद्धि योग समावसे ही प्रगटित हुए गते है। दूसरे किसी कारणसे शामी-पुरुपमें यह योग नही कहा जाता । मार्गानुसारी वफमा सम्पम्दापि पुस्पके अस्पंत सरळ परिणामसे बहुस्सी बार उनके करे हुए पचमके अनुसार पात हो जाती है। बिसका योग बनानपूर्वक है, उसके उस आवरणके उदय होमेपर, बहान प्रगट होकर, यह सिदि-पोग वप कारमें ही फल दे देता है। किन्तु बानी पुरुपसे तो मा केवस स्वामारिकरूपसे प्रगट होनेपर ही फल देता है, किसी दूसरी तरहसे मही। मिस हानीशरा स्वाभाविक सिदि-पोग प्रगट होता है, वा मानी पुरुप, मो हम करते हैं उस तरके, तथा उसी प्रकारके दूसरे अनेक तरके चारित्रके प्रतिबंधक कारणों से मुक्त होता है, जिन कारणोंसे नारमाका ऐश्वर्य विशेप पुरित होकर मन वादि योग सिदिक सामारिक परिणामको प्राप्त करता है। कहीं ऐसा मी मानते है कि किसी प्रसगसे शानी-पुरुपाय मी सिदि-पोग प्रगट किया जाता है, परन्तु यह कारण मस्यत बलवान होता है। वौर पर मी सम्पूर्ण शान-दशाका कार्य मही है।मने जो यह बिसा है, पपात विचार फरनेपर समन्नमें मायेगा । हमारी मारत मार्गानुसारीपना करना योग्य मही है। वहान-योगीफ्ना तो जबसे इस देहको धारण किया तमास नहीं है, ऐसा मायम होता है । सम्पपएिफ्ना वो वप सभप । किसी भी प्रकारके सिदि-पोगको सिद्ध करनेका हमने कमी मी समम्त चीरनमें बम्प भी विचार किया हो, ऐसा पाद मही बावा वर्षात् साधनसे उस प्रकारका योग प्रगट हुभा हो, यह माम नहीं होता । हो, बारमाको विशुद्धता के कारण यदि कोई उस प्रकारका ऐश्वर्य हो तो उसका बमान महीं कहा जा सकता । ऐपर्य कुछ भशमें समय है। फिर मी या पत्र छिसते समय इस ऐशर्यको स्मृति ई, मही तो मात कामसे यह बात स्मरणमें ही नहीं, तो फिर उसे प्रगट करने के लिये कमी मी इयो, पा मही करा ना सकता, या स्पए पात है। तुम और हम कुछ हसी नहीं है। जो दुम है वह वो रामके पौदह वर्षोके हुसका एक दिन मी मही, पापोंके तेरा वर्षाक रसको एक पकी मी नहीं, और गगनकुमारके प्यानको एक पल मी मही; तो फिर हमको इस अस्पत कारणको कभी भी बताना योग्य नहीं । तुम्हें शोक नही करमा चाहिये । जो मात्र उसे देसते रहो इस प्रकार निभय रमानेका चार क्या उपयोग को वीर सापपानासे रहो। यही उपदेश है। । ३७० ब, प्रयम नापारी १९९. गतवर्ष मंगसिर महोमेमें जबसे यहाँ वाना हुआ, उम समयमे उपाधि-पोग उत्तरोत्तर विशेषाकार होता आपा है, और प्राप फरक पर उपाधि-पोग विप प्रभार उपयोगमे सहन करना पड़ा।
३५८ भीमद् रामचन्द्र [पर. क्सकको ताफर वादिने स्वभानसे दीपम काल का है। उसमें भी विशेष करके पचारमें बनताके योम्यमूत्र ऐसे इस प्रमें वो कर कम और भी बम्मानसपसे यता है। गोंको वाम- प्रस्मयके योम्प अति पत मारा ने पैरय हो गई है। इस प्रकारके सब तय हुपम योगमें पर- हार करते ए परमार्पका भूरा पाना पत पुलम है, और परमार्थको पति होना मर्मत सम्मत दुम है । इस धम्की हुपमाको ना विशेषता है मितनी कि मानन्दपनगाने बौदा दिन मगवान् के स्तमममें की और बानन्दधनगी काकी वपेक्षा दो वर्तमान काल और मौरिसेप दुपम परिणामी है। उसमें यहि मारम प्रस्पयो पुरुस्के बरमे योग्य कोई उपाय हो तो देश एक निरंतर विनियम पायसे ससंगकी उपासना करना हो माश्म होता है। निसे प्राप सब कामनाक प्रति सवासानमात्र , ऐसे में मौ या स्म म्पसार और कर मारि, गोते सात साd संसार-समुरसे मुसिम्से ही पार होने देता है। फिर भी प्रति समय उस परियमका बयत सद उत्पमामा करता वोर संताप उत्पनरोकर मसगकप की वस्पतरूपसे तपाया करती है। बोर ही एक दास माश्म दुमा परवा है। ऐसा होनेपर भी इस प्रकार म्पसारको सेवन करते हुए उसके प्रति रेप-परिणाम करमा योगम नए-इस प्रकार को सजानी-पुरुषोडा वमिप्राय है, ए उस म्पारको प्राप समतामानते करता है। ऐसा गा करता है कि पारमा उस लिपपमें मामों पुरा करता ही नहीं। विचार करमेसे ऐसा मी नही भगवा किया मोठपापि तदपमें है, सब प्रकारसे कासपी है। निसस पूोराश्रित प्रारम्ब शाम होता है, उस उपाधि-परिणामको बारम मस्पया करना चाहिये । मममें हमें ऐसा रहा करता है कि बस काम्मे ही पा सपाधि-योग र रोजर मायाम्मर निर्मपत्ता प्राप्त तो वधिक पोम्प है, परम्त यह बात माप का में ये सके, ऐसा नहीं सूझताः पौर जातक ऐसा न हो तबतक उस स्तिका दूर होना संभव नही। पदि वर्तमानमें दूसरा समस्त म्पमार मे दिया, तो पास सकता।तान सरपके म्पबहम इस प्रकारके पते है कि नो भोगनेसे ही मिरचो सकते और इस प्रकार है कप मी उस शेप की स्थितिमस कप कामें नमाम नही चिपा पा सकता इस कारण हम मर्मी तरी इस म्यपार सेक्स किया परते। किसी इम्पमें, किसी क्षेत्रमें, किसी कामें भौर किसी मान स्थिति बाप, ऐसा प्रण मानो की मी माई नहीं देता । राससे केर सब प्रकारका प्रतिसभान होना हो पोम्प , मिर भी दिक्षेत्र, निवि, समंग वास-विचारमें हमें प्रतिबा पि यी है। का योग किसी प्रासे मी मैसे बने ऐसे पोरे ही कामें हो पाप-सी शितनमें रान हादरते।
पत्र ३.१,३७२,५१,] विविध पत्र मादि समर-२५ो वर्ष ३७१ बम बापाल मौर सोम १९९९ निसे प्रीतिसे स्सारके सेवन करनेकी स्पष्ट पछा होती हो, तो उस पुरुपने बानीके सपनों को ही नहीं सुना है, अपवा उसने बानी पुस्पका दर्शन मी नहीं किया, ऐसा तोर्यकर करते है। मिसकी कमर टूट गई है उसका प्राय समस्त बस क्षीण हो जाता है । जिसे बानी-पुरुषके वचनरूप एकीका प्रहार हुमा है, उस पुरुपमें उस प्रकारका संसारमंघी या होता है, ऐसा तीर्थ- कर फाइते है। झाना-पुस्पको देखने के बाद भी यदि मौको देखकर राग उत्पम होता हो, तो ऐसा समझो कि हानी-पुरुपको देखा ही नहीं। बानी-पुरुषके वचनोंको मुननेके पचात् जीका सजीवन पारीर नापनरहित रूपसे मासित हुए बिना न गे, और धन धादि संपति वास्तबमें पृष्पीके विकारपसे मासमान हुए बिना न ये। काना-पुस्पके सिवाय उसकी मारमा दूसरी किसी भी जगह क्षणमर मी टहरनेक सिपे इच्छा नही करती। स्यादि बचनोंका पूर्वमें हाना-पुस्प मार्गानुसारी पुरुपको मोभ देते थे; मिसे नानकर-मुनकर सरक बाब उसे बारमा धारण करते थे। क्या प्राणस्पाग गैस प्रसंग मानेपर मी ने उन पचनोंको अप्रपान न करने योम्प मानते थे, और वैसा ही आचरण करते थे। सबसे अधिक स्मरण करने योग्य बातें तो बहुतसी है, सिर मी ससारमें एकदम उगासीनता होना, दूसरोंके आप गुमि मी प्रति होना, अपने अन्य गुणोंमें मौ कत्यत क्लेश होना, दोपके माश करने में मार्पत पर्पिका स्फुरित होना-पे बातें ससगमें भरा एक शरणागतरूपसे पाममें रसने योम्प है। वैसे बने पैसे निवृत्ति-कास, निति-क्षेत्र, निहन्त्रिस्य मौर निराहि-मानका सेवन करना । खोपकर, गौतम से जानी-पुरुपको मी समोधन करते थे कि 'हे गौतम ! समयमात्र मी प्रमा करना योग्य मही है। - ३७२ सर्प वापा १३माम १९९९ अनुमता-प्रतिकूमता के कारणमें कोई विषमता नहीं है। सगके इशा फरमेवासे पुसको या क्षेत्र लिफ्मतुम्प है। किसी किसी उपाधि पोगका अनुहम हमें मी या करता है। इन दो कार गोको बिस्पति करते हुए भी गो परमें बना है, उसमें कितनी ही प्रतिसता है, इसठिये हालमें छम सर भाईयोंका विचार कुछ स्पगित करने योग्य (पैसा) है। ३७३ बमई, प्रभागात पर मुष २०१९ प्राय करके प्राणी वापसे ही जीते हैं। जैसे जैसे सहा विशेष होती जाती है, से से मिशेष माशाके मम्से बीमित यना होता है। यहाँ मात्र एक नामविचार और मामानय वन भीमद रामचन्द्र [पत्र. होता है, वही सब प्रकारको बाशाको समाधि होकर पावके ससपसे ऑक्ति या जाता है। मिस क्सको कोई मी मनुष्य इम करता है, उसका प्राप्तिको मरिष्यमें होम करता है। और इस प्रासिको एमाप मागसे ही उसकी रूपना बोक्ति एती और काफ्ना प्राय करके कम्पमा हो या सारे । पदि नारवा कम्पना न हो वोर म मी न हो, तो उसकी दुसरण भयकर स्थितिका जापनीय हो माना समय है। सा प्रकारको वाता-चौर उसमें मी मामाके सिताप दूसरे अस्प पापाकी भाशा, समापि किस प्रकारसे प्रम हो, या करा ! - , ३७४ बई, द्वितीप वापर मदी । पुष १९९९ रस्ता हा कुछ पता नही और मेकामा कुछ माता महापस प्रघर परमार्य चार करके किसी के प्रति दलिता करना अपवा विशेषता दिखाना पोतय नही है। समागममें दाममात्र नही बाना चाहिये। ३७५ बई रितीय मापारी, १९१९ मारण बारिकिया सदासीन सौ पौ। जिस पावरले सम्पाप तत्पम ऐ जाय, उसे उसी समप सत्र प्रकारकी सांसारिक किपायें म , या कोई मियम महासे, सम्पकच उत्पम हो जाने मा सांसारिक किपायोका रसहित भाना संभव है। प्रायः करक ऐसी कई मी चिया बस नीकी नही होती बिससे परमार्यमे भाति उत्पन हो। पौर सतक परमामें मति न हो, तमतक सर किपामोसे सम्पपलको बाधा नई बाती । इस मगरके छग सर्पको पूजते है, परन्त के वास्त- लिक पूम्प-पुलिसे उसे नहीं पूजते, कित मपसे एमवे है ~मारसे महा पूजते और देशको मेग अर्पत भावसे पूनते है। इसी प्रकार सम्पनी गांव इस समस्या दो सेवन करता मार्ग देता है, म पूमि पनि गाए प्रारम्भ कर्मस हो दिसर्व वा पावनिक रिसे मारपूर्वक उस संसारमें उसे कोई भी प्रतिय नहीं होता, प फेवर पूलक उदपस्म ममसे हवा । नितने वेपसे मार- प्रतिको उपने वशीही उस बालके सम्पाजपना होता। बनवामधी कोष मात, मापा दौर मेम सम्पावके सिवाय मा ऐमा समन महीरे, ऐसा बोका माग का पपार्य है । संसा पाप बोलको ती स्नेहके बिना कोष, मान माया और म नही होते मिसले बासको प्रसारका वनंत बनुबंध हो। विस बाल संसारी पदामि ताग लेगा पता उसे किसी प्रसंग मानवापी भाषसे दिसाय मी सदप होना समन, वीर अबतक उन पदामि तान्नेहो मोपमा मानही होता । परमार्थ- मार्ग से करते है कि जिसमें मपरमार्थका सेक्न करता हुमा मात्र सब प्रकारसे सुबमें अपना समें कम्पा मा करे । धर्म कापरता ऐमा तो कदाचित् दूसरे गारोको भी सेमन, परत संसार-मुलको प्रातिन भी कापरता ऐना-उस पुसका वम महा भगनाउसमें नारसवा होला- पर परमार्प मागी पुरपके हताहै।
पर..] विविध पर मादि संग्रह-२६वौं वर्ष जीवको उस प्रकारकी मीरसता परमार्यभानसे भपका परमार्पयानी पुरुषके निभयसे होना समम है, दूसरे मकारसे होना समय नहीं । अपरमार्परूप ससारको परमार्थ-शानसे गानकर फिर उसके प्रति तीन कोष, मान, मापा अपवाडोम कौन करे भयका या कसे हो ! निस बस्वका माहाम्प पिसे दूर हो गया है, फिर उस वस्तु के लिये मसत देश मही यता । संसारमें भवितरूपसे गाना एला मण, परमार्पानसे भाति हो भासित होता है, और जिसे प्रति मासित ईहै, फिर उसे बस्तुका स्पा माहात्म्य माझम होगा ! इस प्रकारको माहाम्प-दृष्टि परमार्पनानी पुरुषके निभपयुक बीवको होती है, और इसका कारण मी यही है। कदाचित् किसी बानके मावरणके कारण पात्रको प्याप्छेदक कान न हो, वो मी उसे पानी-पुरुषको प्रशारूप सामान्य ज्ञान तो होता है। यह बान यमके बीजकी तरा परमार्प-रका बौन है । तीन परिणामसे बौर ससार-मयसे रहिस भाषसे बानी-पुरुष अथवा सम्यग्दरि चीनको कोष, माम, मापा वका छोम नहीं होता को ससारके लिये अनुबंध करता है, उसकी अपेक्षा परमार्यके मामसे भांतिगत परिणामसे, यो असद्गुरु, देव और धर्मका सेवन करता है, उस जीपको प्राय करके अनवान- गधी कोष, मान, मापा, होम होता है। क्योंकि दूसरी ससारको क्रियायें प्राय करके वनंत मनुष करनेवाली नहीं है। केवस वपरमार्थको परमार्य मानकर मौष आम्हसे उसका सेवन किया करे, या परमार्पनानी पुरुषके प्रति, देवके प्रति और धर्मके प्रति निरादर है-ऐसा करना प्राय यथार्प है। मह सरगुरु, देव और धर्मके प्रति, भसद्गुरु वादिके भामासे, मिण्या गोषसे, वासातमासे, उपेक्षापूर्वक प्राधि करे, यह समय है । तपा उस मिथ्या संगसे उसकी ससार-पासनाके परिसिम न होनेपर मी तसे परिच्छेदरूप मानकर यह परमार्थक प्रति उपेक्षक ही पता है, पही मनत कोध, मान, मापा और गेमका चिहै। - ३७६ बर्थ,हिमापार मदी१०सोम १९९९ शारीरिक वेदमाको, एका धर्म चानकर मौर बाँधे पर फौका फल स्मपकर सम्यक्झकारसे सहन करना पोग्प है। बात बार शारीरिक पेदनाका विशेष बछ यता है, उस समय जैसे उपर कहा है, उस तर सम्पप्रकारसे भेष्ठ गावोंको मौ स्थिर एना कठिन माता है। फिर मी एयमें बारम्बार उस बातका विचार करते हुए, और मास्माको निस्प बरोध, भमेष, और बरा, मरण आदि धर्मसे रमित भावना करते हुए-विचार करते हुए कितना हो तबसे सस सम्पप्रकारका निधप बाता है। वो पुरुषोंशरा सहन किये हुए उपसर्ग तथा परिपाके प्रसंगोंको बौनमें स्पति उत्पम करके, उसमें समके गनेवाले बसा निसपको लि फिरसे लपमें स्थिर करने योम्प गाननेसे, गावका यह सम्प-परिणाम फलीभूत होता है और फिर पेदना-वेदनाके क्षप-कार के निात रोनेपर-पर वेदना किसी मी फर्मका कारण नहीं होती । रिस समय पर म्याधिलित हो उस समय गौने पदि उससे वफ्नो मिमता समसकर, उसका भनित्य वादि सम्म बानकर, उससे मोह ममात्र मारिका स्मान किया हो, वो पा महान् मेय है। फिर भी यदि ऐसा माआ ऐ तो किसी भी म्पारिक उत्पन श्रीमद् पण [ १०४.५ हाताप मब प्रघरका मामा समानि होकर गांव के सरपसे गावित या गावा। शिम गम्नुको काम मी मनुष्य या फरताह उस प्रालिका मनिप्यमें ही इस करता है और इस प्रामिय इसानप आमही टमय कम्पना नापित पती वार मह कम्पना प्राप करके कम्य होया करती है। परि गीतका यह सपना न ऐ बार शान मी न हा, तो उसको हमधरण मकर स्थितिमा बकपनाप छ गाना मुमब। सब प्रकारको वासा-और उसमें भी कामासे निपप रे बम्प पार्षाडी माशा, समाधि किम प्रथम प्राम , पह करा! ३७४ बई, दितीय बाप ॥ ६ष १९४९ रस्पा हा पता महीं और रा हुमा कुरा माता म0-इस प्रकार परमार्थ दिपार मक रिमीक प्रति दोनवा परना बया विशता रिबाना पोग्य न । समागममें दोनमात्र नहीं जाना चाहिए। - ३७५ बई शिवीप मापा ५,१.१९ मारण पारिको क्रिपा उगमन सौ पी। जिम जारसम्पन उत्पम ये बाप, उस उसी ममत्र सा प्रकारको सामारिक निपायें म गे, पर कोई नियम नहीं, सम्पस्थ तपम ऐनाने के मा प्रमारित शिपाओंच रमरहित बरा गाना सब । प्राप करके ऐसी कोई भी किया उस नापी मी एनी निमम परमार्यमें प्रति उत्सम दो भार बना परमार्थमें मति म हो, तबवा दूमा किपा मप्पानको पारा नहीं बानी । इस गगता सग ससा पूबते है परंतु ये बात कि पृश्य-मुस्मि उपे महा पूजन, मिनु मफ्स पूजन -माम्मे मही पूमते, भौर पर योग जपत भारमै पूजन है। इसी प्रकार सम्पपी जीत इस संमारच नो सेवन करता Tu Pat ला है, र पूर्मि परि र प्रारम्भ कर्मम दीनबाई देता है-बनविक रश्मेि भाव यस संसारमें उमपोर मी प्रनिरंप महीना, केरल पूर्वधर्म उश्याम मपसे होता तिने वश मा प्रतिवर न ही उनन गरम ही उस गातर सम्परीना होता है। वनमानुषी ग्रेप मान, मापा मोर छोमय सम्पापके सिताप नाश हाना समर मही पेसा यो कहा जाता है पपाय है । संमाणे पापोंमें जीवका तर स्महरु बिना भ, मान मापा और मोम नही निमम और ममारय मत गनु हो। मिस र संमारी पाम वीर स्नेह यता हो उमे मिमी प्रमग मी बननानुषी तुमसे रिमान भी उप पाना सेमर है और जातक टन पनि तार मेहरा, तबार और पाप ही परमार्प मार्गवान मही साप परम्पप- मार्ग उसे पल जि शि परमार्था मेन करता गुमा गत सब प्रकारसे उनमें अपरा १ ममें वापर करे। रनमें पापना हाता तो सावित् मर गयो मी संमा, परम्नु मंभार-गुपये प्रन्मिय भी पपरना रोना-उम समय मण्डा महागमा उममें मौरसता होना- परामा-माया परपीडो हो। - विपिप पर मादि समर-२५ो वर्ष मीवको उस प्रकारको मीरसता परमार्थ-धानसे भयमा परमार्पानी पुरुषके निधयसे होना समय है, दूसरे प्रकारसे होना समब नही । भपरमार्थरूम ससारको परमार्यवानसे नानकर फिर उसके प्रति तीन कोष, मान, माया अपना कोम कौन करे भयकामा कडाँस हो। निस पस्तका मागम्य परिमैसे दूर हो गया है, फिर उस बस्तुके छिपे मयत देश नहीं पता। ससारमें भांतिरूपसे गाना हुमा मुम्स, परमार्थ-बानसे भति दी भासित होता है, और मिसे भ्राति मासित , फिर उसे मस्तुका स्पा माहात्म्य मास होगा ! इस प्रकारकी माहात्म्यनष्टि परमाय-मानी पुस्पके निमपयुक्त मागको ही होती है, और इसका कारण मी यहो । कदाचित् किसी बानके मावरणके कारण बीचको म्पनछेक हान न हो, तो मी उसे हानी पुरुपकी मदारप सामान्य शान तो ऐता । यह शान बाके बीजको तर परमार्थाका बीच है। ठीय परिणामसे और ससार-भयसे रहित मासे पानी-पुरुप जपमा सम्पग्र भावको क्रोध, मान, मापा मपत्रा मेम नहीं होता । गो ससारके रिसे मनुबध करता है, उसकी अपेक्षा परमार्यके मामसे भतिगत परिणामसे, मो मसहरु, देव और धर्मका सेवन करता है, उस नीनको प्रापः करके बनतानु- बपी क्रोध, मान, मापा, डोम होता है क्योंकि दूसरी सतारकी क्रिया प्राप करके वर्मत मनुषध करनेवाणी नही है। बस अपरमार्पको परमार्य मानकर पीत मापासे उसका सेवन किया करे, या परमार्ष-शानी पुस्पके प्रति, देवके प्रति और धर्मक प्रति निरादर है-ऐसा करना प्रापः पया है। समगुरु, देव और पर्मक प्रति, वसगर वादिके मापासे, मिष्पा-वोचसे, भासावनासे, उपेक्षापूर्वक प्राति करे, पा समव है। तया उस मिप्या सगसे उसकी ससार-पासनाके परिसिम न होनेपर भी उसे परिभेदरूप मानकर पर परमार्यके प्रति उपेक्षक ही राता है, यही मनंत क्रोर, मान, वीर होभका पिहो। मापा - ३७६ बर्मा, दि भाषा बदौ १०सोम १९९९ शारीरिक वेदमाको दाका धर्म मानकर और अघि हुए फर्माका फल समझकर सम्पप्रकारसे सान करना योम्प है। मात पर शारीरिक बेदनाका विशेष का पता है, उस समप से उपर कहा है, उस त सम्पमकारसे भेष्ठ बीयोंको मी स्थिर गना कठिन हो जाता है। फिर मी दयमें मारमार उस बातका पार करते हए, भौर भास्माको निष्प मठेप, अमेप, मोर जरा, मरण पाटि धर्मी रसित मानना करते हुए-विचार करते हुए-कितना ही तइसे उस सम्पाप्रकारका निश्चय माया है । बडे पुरोधरा सहन किप हुए उपसर्ग वया परिपाके प्रसोको गारमें स्मृति उत्पम करके, उसमें उनके एनेपा असा निधपको फिर फिरसे हइयमें स्थिर करने योम्प जाननेसे, पोका मा सम्पपरिणाम फरगम्त होता है। और फिर वेदना-वेदनाके क्षय-कारके नित होनेपर-या वेदना किसी मी फर्मका कारण नहीं होती । मिस समय शरीर पाविरहित हो उस समय गावने यदि उससे अपनी मिमता समझकर, उसका अनिस्य वादि सनाप बानकर, उससे मोह ममन बादिका त्पाग 'कपा हो, तो पा महान् मेप है। फिर भी परि ऐसा न हुआ हो तो किसी मी म्याधिक उत्तम - [. भीमन् पसचन्द्र होनेपर, उस प्रकारको भावना करते हुए बीचको प्राप निफर वचन नहीं होता वोर महाग्यापिका उत्पविक समय तो जीव देहके ममत्वका बहा त्याग करके, बानी-पुरुष के मार्गका विचारपूर्वक वापरण करे, पर श्रेष्ठ उपाय है। यपि देोका उस प्रकारका ममत्व त्पाग करमा भपका उसका कम करना, पर महाकटिन पाव, फिर मा जिसका पैसा करनेका निभयप यदी या देरमें कमी न कमी आप सास होता है। मातक देर पारिसे भागको वामझाम्पाणका साथम करना बाकी या है, तबतफ उस देश में बपरिणामिक ममताका सेवन करना ही योग्य है। वर्षात् पदि इस देशका कोई उपचार करना परे, तो का उपचार देशमें ममत्व करने की हमसे नहीं करना चाहिये, परम्त बिससे उस देहसे बानी पुस्तके मार्ग बारामन हो सके, इस प्रकार किसी तय उसमें गमेबारे गमके लिये, वौर उसी प्रकार बुद्धिसे, उस शको म्याथिक उपचारमें प्राति करमेमें भाषा मही है। नो कुम ममता पमपरिणामिक ममता है, पर्याद परिणाममें समता सस्म है, परन्तु उस देशको प्रियताके रिम, सांसारिक साधनोंमें गो या प्रपान मोगका खरे, उस प्याग करना पड़ता है। इस प्रकार वार्सम्पानसे किसी प्रकासे मी यस देहमें धुलि म करमा, या हानी पुरुषों के मार्गको शिक्षा गामकर, बारमकल्याणके उस प्रकार के प्रसगमें सक्ष रसना योग्य है। भौतीपंकर जैसेंने सब प्रकारसे मानक पारणमें पुनि रसार निर्मक्ता वीर सदरहित भागो सेकन रनेको शिक्षा है, और हम मी पदो करते हैं। किसी मी कारणसे इस संसारमें मेशित होना योग्य नहीं । विचार और बात, पस लेयों का मोहका और गतिका कारण है। सहिचान और मल्यान बालगतिका कारण है। उसका प्रपम साक्षात् उपाम, हाना-युस्पकी नापाका विचार करना ही माश्म होता है। ३७७ गई श्रारण भदौ । भौम १९५९ जस किसी सामाम्प मुमभु गौपत्र मी इस ससारके प्रसंगमें प्राविसपी बार्य मंद पा जाता तो में बसपची गरिब माता हो तो इसमें कोई माधर्य महो माम होता। फिर मी किसी पूर्ण काल में प्रारम्बफे उपार्जन करमेका इस प्रकारका कर या होगा, मिससे कि उस प्रसंगमे प्रति करना रहा रे, परन्तु वह किस प्रकार या करता है। कम इस प्रकार या करता है कि मो कोई वास रोमार-समय पप्रयुक्त हो उसे मी उस तब करना अनु ममापे । यदि पर बात कर करने पोम्प ही भार बम समानताका ही सेवन करते है सि भी उस कारणसे एक दूसरा और तापम होता है।पर पाकिससग और नितिको भप्रधानता पा करती है, और शिसमें परम पि, इस प्रकार के मामशान भौर मामवार्ताको किसी भी प्रकारको इणारे बिना बबित् पाग बसा ही रसमा परवा मायामोनेसे म्पपता नही होती परमान-निमियांग म्पमता पेश करता है। संमार गमगा देगर रिता मही परना। परि चितामें समता देताना नामचितन वैसी हो।
पर ३०८ ३.१, १८ ] पिविम पड मादि संप्रह-२६पा पर्व ३५५ ३७८ वम्बह, श्रावण मुदी ५, १९९९ (१) गहरी गेग ऐसा मानते है कि यदि एक साधारण सुपारी से उत्सम रगका, पानागार और घाटदार माणिक ( प्रत्यक्ष ) दोपरहित हो, सा उसकी करोगों रुपय भी कीमत गिनें तो मी वा कीमत थोड़ी है। यह विचार करें तो इसमें केवल बाँस्नके टयरने और मन इम्याकी कम्पित मान्यताके सिवाय दूसरी बौर कोई मी मात नहीं है । फिर मी इसमें एक मॉडके यरनेकी पूर्वाके लिये और उसकी प्रासिके दुर्गम होने के कारण लोग उसका बात माहारम्प बताते हैं वार जिसमें आमा स्थिर रहती है, ऐसे अनादि दुर्गम सम्सगरूप साधनमें रोगोंको कुछ भी पहपूर्वक रुचि नहीं है, पर आपकी बात विचार करने योग्य है। (२) बससगमें उदासीन रनेके लिये जब बीचका मप्रमादरूपसे निषय हो जाता है, तमी समान समता जाता है। उसके पहिले प्रास होनेवाल वोपमें बहुत प्रकारका अतराय या करता है। ३७९ बम्बई, भाषण सु१५री १९९९ प्राय करके बारमामें ऐसा ही रहा करता है कि अवसक इस म्पापार प्रसगमें काम-कार करना या करे, तबतक धर्म-कपा मारिके प्रसग धौर भर्मक नानकारके रूपमें किसी प्रकारसे प्रगटलपमें न बाया बाय, पहा क्रम यथायोम्प है। व्यापार प्रसगके एनेपर भी सिक प्रति मकिमान रहा करता है, उसका समागम मी इसी क्रमसे करना योग्य है कि जिसमें वामा बो उपर कहा रामा क्रम या करता है, उस सममें कोई वाधा न हो। विनमगवान्के को हुए मेर वादिके सबध बौर वजोंकी कही हुई यिो आदिफ सबधमें समागम हानेपर बातचीत करना । हमारा मन त उनसान रहता है, और प्रतिबए इस प्रकारका रहा करता है कि जहाँ पह उासमाव सम्पूर्ण गुम जैसा करके सहन न किया जाय, इस प्रकार के प्यापार आदि प्रसगमें उपाधि योग सान करना पड़ता है, यपरि बास्तविक तो मामा समाधि-प्रत्ययी है। ३८० बाई, भाषण बदरी ५ १९१० गतबर्ष मगसिर मुत्री को पहों माना हुआ था, तबसे गाकर भावतक अनक मारमा उपाधि-पोग सहन किया है, मौर या भगतान हो तो इस फाउमें उस प्रकारक उपाधि-योगमें पाके पर सिरका गाना मी पनि हो नाप ऐसा होते हुए बहुत बार देखा है। बार रिमन भाग्म- सदर मान लिया है से पुरुषका भौर इन ससारका मेउ मी न साप, पही अभिर निश्चय हुमा । सनी पुरम मी वर्पत निथप उपपोगमे बर्ताव परते करते मी सचित् में परिणामी रामाप, मी इस समारमा परपसभा बोधका माग तामही हाना, रिमा माम्मरपके पोषके शिव परिणाम प्रति एक प्रकारका बावरण होमम्प उपाधि-पाग दाता। स व उस उपारि-योगसे भी प्रास हो पाया परत है और उस उम पागमे रूपमें और मुगौ मायम स प्रमुख्य नाम रखकर मुरिकससे हो प्राति करक मिरर सकते हैं। परि मम्प ४५ भीमद पवद्र [पर ३८१ मोपविषयक माति प्राप नही होती, पम् बोध के विशेष परिणामका बनववश होता है, ऐसा तो सर दिसई देता है। और उससे बारेमा भनेकवार म्पाटकर पागका सेवन करती पौशिर मी उपानित कर्मको स्पितिको सम परिणामसे, वनितासे, पम्पासतासे सना फरमा, यही हानी-पुरुपोका मार्ग है, और हमें भी उसका ही सेवन करना है-ऐसा स्मृति होकर स्पिरता यता अर्यात् बार बता वादि मालकी होती विशेष पवणाट समाप्त होती थी। जबतक सारे रिन निषिकेही योग काउ म्पतीत हो हबक मुख न मिले-स प्रकारको हमारी स्पिति है। मामा मामा', 'उस विचार', 'शानी पुरुषको सति', उसके महात्म्पकी कयामा', 'उसके प्रति खम्त मचि' 'उनके वनकाश बाम चारित्रके प्रति मोह-पर हमको बमा वार्षित किया हो करता है, और उस शमा सेवन करते हैं। पूर्वकासमें गो गो का पानी पुरुपके समागममें म्पतीत मा है, एका पन्य है। पर क्षेत्र वापत मस्त पन्य उस अममको, मणके कर्वाको वौर उसमें भक्मिायुकगायको निधनात हो । वस वामस्वरूपमें मणि, चिंतन, वाम म्पास्यावाठी पानी-पुरुपको वाणी, अपना गाना शाप भपा मार्गामुरी हाना-पुस्पक सिसको मपूर्णताको हम पति मालिक प्रणाम करते हैं। वसा वाम-भुनको एकतार उस बातचे हमें अमी प्रणापूर्वक सेवन करनेको सपत बातुरता या करती है और दूसच बोरसे यस प्रकारका क्षेत्र, इस प्रकारका रोग-पार, इस प्रकारका उपाधि पोग और दूसरी उस उस क्यको बातों को देखकर विचार को तय बावा है। बरेला । फेमद मधपद की १९१९ १ सिके पाससे धर्म माँगमा उस प्राप्त किपे हुएको पूर्ण चौकसी करनी समस्या स्पर पिचसे चार करना चाहिये। २ जिसके पाससे धर्म मगना, परि उस पूर्ण जातीय पहिचान बीचको तो उस प्रकारफे शानियोका सग करना और यदि सरसग हो बाप तो उसे पूर्ण पुष्पका उदय समम्मा । उस समग उस परम बनाके उपदेश दिये हुए शिक्षा बोषको प्राण फरमा-विस्से का, मतमतांतर, निवासपात और बसपचन स्पादिका तिरस्कार दो-बाद उने प्रण नहीं करना, मत जान पोष देना । बामाका धर्म धामा मामाच-ग्राम पुरुषच उपदेश क्रिमा मा बर्म वाम मार्गस्थ होता है। बाकीचे मावि मतमें नही पाना । ३ इतना होने के बाद सस्सग होनेपर मी पदि नौबसे काम मतमवर बादि घोष मोरे गा सकें तो फिर उनसे छमेकी बासा मी नानी चाहिये । हम सप किसीचे बारेध-पात अर्पत ऐसा करो पा मारते । बारमार मे ये मौ मा बात सतिमें गती है। हमारे संगमें बाये विही भागोको वर्मक मी हमने ऐसा नही कहा किस प्रकार चलो मा पा करो । परि कुस का ऐगा तो रेड शिवानोरके रूपमें हो रहा होगा।
पत्र १८१, ३८२] विपिप पत्र मादि समाह-२५पों य . . हमारा उदय इस प्रकार रहता है कि इस तरको उपदेशकी बात करते हुए वाणी पीछे सिंच जाती है। कोई साधारण प्रश्न तो उसमें वाणी प्रकाश करती है, और उपदेशही बातमें तो पाणी पाछे । सिंच माती है। इस कारण हम ऐसा मानते है कि ममी उस प्रकारका उदय मही है। ५ पूर्ववता वनतहानी पपपि महाज्ञानी हो गये हैं, परन्तु उससे जीवका कोई दोष र नही होता । मर्यात् यदि इस समय बीवमें मान हो तो उसे पूर्ववता धानी करनेके लिये नहीं आते; परन्तु हामें मो प्रश्पक्ष हानी वियनमान हों, वे ही दोपको पताकर दर करा सकता है। उदाहरणके लिये रके क्षारसमुद्रसे योकि पातुरकी कृपा शान्त नहीं हो सकती, परन्तु पर यह कि एक मोठे पानी के कलशेसे ही शान्त हो सकती है। ६ गोल मपनी कम्पनासे कल्पना कर लेता है कि पानसे कन्याण होगा, समाधिसे कल्पाण होगा, योगसे कम्याण होगा, अपना इस इस प्रकारसे कम्याम होगा, परन्तु उससे चौवका कोई कल्याण नहीं हो सकता । मीतका कायाण तो हामी पुस्पके ब्झ यता , और ना परम मस्सगसे हो समधमें जा सकता है। इसलिये पैसे कम्पोंका करना छोड़ देमा पाहिये । ७ गीतको सबसे मुख्य पात विशेष ध्यान देने योग्य पहो कि परि सरसग एषा हा तो सरसगमें भवण किये गए शिक्षा-पोषके निप्पम होनसे, साबमें ही बीतके उत्पम ए कामामा दोष तो एट हो जाने चाहिये, निस्से दूसरे नीयोंको ससंगके मवर्णवादके बोल्नेका प्रसग उपस्थित न । ८ हानी-पुरुपने कुछ करना बाकी नहीं रस्सा है, परन्तु जीवने करना बाकी रस्सा है। इस प्रकारका योगानुयोग किसी समय ही उदयमें बाता है। उस प्रकारकी पॉमसे रहित मामाको मति तो सपा कापामकारक ही होती है परन्तु किसी समप महाप्माके प्रति पनि उस प्रकारको पाँडाई और उस प्रकारको प्राचि हो चुकी हो, वो भी बहीबाँठा यदि वम्पुरुषके प्रति की हो, और उससे जो फल होता है, उसकी अपेक्षा इसका फल शुग ही रोना समय है। पदि सपुरपके प्रति उस कासमें मिकता हो तो कागबानेपर उनके पाससे सम्मानकी प्रामि हो सकती है। एक प्रकारसे में अपने आप इसके लिये बहुत शोक पता पा, परम्नु उसके कम्पाणका विचार करके घोकको निम्मरण कर दिया है। ९ मन पचन बार फापाके पोगसे निसका कबास्पाप मार कर मामार र हो गया है, ऐसे हानी-पुरुषके परम उपशमनाम परणारसिंदको ममस्कार करके, बारम्बार उसका पितवन करक, तुम उसी मार्ग प्राविको इछा करत हो —पर उपश देफर यह पत्र पूर्ण करता है। विपरीत काठमें अम्ले हानेक कारण उम्म111 ३८२ मान भाव १९१९ बनारिकारसे विर्यप पुदि होनेसे, और शाला-गुस्सी भातमी पापें माना-पुरजमोदी गिमाई रेनसे बानी-पुरुषमें रिश्रम बुदि उत्सम हो जाता है अपग जीको दाना-सुम्पर प्रति उस उस पेयका रिकम्प भाषा करता है । परिवाना गुपका इमरी रियोंने यथार्थ निमय दमा दो भीमद् परवद्र [पत्र २८१ तो यदि किसी विश्पको उत्पम करनेवाली मानीको उन्मत मादि मात्रयुक्त वेध प्रापक्ष देखने मापे, तो मी स्यै परिके निमपके पसके कारण पापेश भरिकल्परूम ही होती है। वपमा हानी पुरुषको पेयका कोई जगम्यफ्ना हो इस प्रकारका है कि यह सभी अस्पासे अपना बरे निभयसे गोषको विनम मौर विकम्पका कारण होता है। परमा वास्तविकमप तथा पूर्ण निषय होनेपर प विमम और विकाप उत्तम होने योग्य नहीं है, इससिपे इस बाबको बो हानी-पुरुषके प्रति अभय निचय है, पही इस जीपका दोप। कामा-पुरुप सम्पूर्ण गतिसे बानी पुरुपसे गरूपसे समान नहीं होता, और यदि से तो फिर पानी ही नहीं इस मकारका निपप करमा पानी-पुरुषके निमय करमेन पपार्थ कारण है। फिर मी हानी और पानी-पुरूपमें किसी इस प्रकारसे लिम्क्षण कारणोंका भेद है कि निस्से बानी और पानीका किसी प्रकमसे एकरूप नहीं होता | माना होनेपर मी जो नील जानाका सरूप मनपाता हो उसका लिम्वणवासे निपप किया जाता है इसध्येि प्रथम बानी पुरुषको बिस्वमताका निमप करना योग्य और यदि उस मिषण कारण सरूम मानकर मानाका लिथप होता है, तो फिर कचित् मानांके समान हो जो पानी-पुरुपको पेशा देखने वाली है, उस विषयमें निर्षिक:पता होता है, और नहीं तो पानी-पुरुषको यारा उसे विशेष मात गौर साका कारण ती। प्रत्येक नाच बर्षात् परिबानी-मानी समस्त स्थानोंमें समान हो तो फिर शामी- वयानीका मेद नाममात्रका मेद ए गाता है, परन्तु पैसा होना योग्य नहीबानी बौर बानी पुरपी पपस्य ही विक्षणता होनी चाहिये । बिस विसममताके पपा निप्रय होनेपर मीनको बानी- पुस्प समधमें बाता है मिसन योपासा स्वम्म पहायता देना पाग्य है । मुमुसु औषको पानी और बानी-पुरुषकी निम्मणता, उनकी बर्यात् हामी कहानी पुस्पकी दशारा हो समसमें बाती है। उस दशाको पिरमाणता मिस प्रारसे होती है, उसे बता देना पोम्प है। गांवकी दशाके दो माग हो सकते है-एक मूसा और सरी उत्तरदशा । ૨૮૩ बई मारपद १९४९ पति महानमा गती हो और गरिने भ्रम बादि नरमसे उस ज्ञान-रखा मान हो, तो गरे उस उस प्रभाके दुख पानो प्रसंगोंमें अपना उस तबके से कारणों में जीव देहाती साताको सेवन करनेकी रया परता है और कैसे हो बर्ताव करता है। सबी शाम-दाप हो तो उसे एक दुक-मासिके कारणोंमें लिपमता मही होती और उस उसको दर करनेकी श्वनी अधिक पिता मी नहीं होती। ३८४ बम्बई, मारपदबदी १९९९ रिम प्रकार इस मामा के प्रति शि उस प्रकारको परि गत्को सवामामोके प्रति है। जिस प्रकार से इस मामले प्रति है, रस प्रकारका स्नेहसन मात्रामा प्रति। मिस पण ३८४, १८५ ] विषिष पन मादि संग्रह-२६वा पर्प . प्रकारको इस आरमाकी सहगनद स्थिति चाहते हैं, उसी प्रकार सर्व वारमायोकी चाहते हैं। वो फुल इस मारमाके छिपे चाहते है, मह सब, सव वात्मानके लिये चाहते हैं । जिस प्रकार इस देके प्रति मात्र रहते हैं, उसी प्रकार सर्प देहों के प्रति रसते है। जिस प्रकार सब देहोंके प्रति पर्याव करनेका क्रम रखते हैं, उसी प्रकार इस देहके प्रति प्रम हता है। इस देश में विशेष-बुद्धि और दूसरी देहोंमें विपम-युदि प्राय करके कमी मी नहीं हो सकती । मिम मियों आदिका निजरूपसे सबध गिना चाता है, उन मियों वारिने प्रति जो कुछ स्नेह नादि है सपा समता है, उसी प्रकार प्राय सपके लिये पता है । बामस्वरूप के कार्यमें प्रकृति होनेसे जगल्के सय पदायाँके प्रति निस प्रकारको उदासीनसा यती है, उसी प्रकार निजरूपसे गिने जानेवाले बिर्यों आदि पदाकि लिये पती। प्रारम्बके योगसे नियों आदिके प्रति जो कोई उदय हो, उससे विशेष प्रति प्राय करके बारमासे मही होती ।काचित् कम्णासे कुछ उस प्रकारको प्राप्ति होती हो तो उस प्रकारकी प्रवृत्ति उसी क्षणमें उन उदय-प्रतिष वास्मायोंके प्रति बसी है, अयथा समस्त बगतके प्रति यती है। किसी के प्रति पुछ विशेष मह) करमा, भयका कुछ म्यून नहीं करना, भौर यदि करना हो तो फिर उस प्रकार एक हीधारको माति समस्त जगत्के प्रति करमा--यह बान मारमाको पहुस समपसे स है-निश्पयस्वरूप है। किसी स्पसमें न्यूनता, विपता, अपना ऐसी कोई सम-विषम पेयपूर्वक प्रति दसी नावी हो तो यह वारस एवात्मस्पितिसे पारममुदिसे नहीं होती, ऐसा माइम होता है। पूर्वमें गघि गए प्रारम्बके योगसे उस प्रकार पुछ उम्पमावतपसे होता हो तो उसमें मी समता ही है। किसीके प्रति यूनता या अधिकता वात्माको कुछ मी मष्ठा नहीं गता, माँ फिर दूसरी अवस्थाका विकम्प होना योग्य नहीं है। सबसे वमिम भावना है। जिसकी जितनी योग्यता है, उसके प्रति उतमी हौ भमिम मावको स्कृति होती है । कचित् करणा-बुझिसे विशेष स्वति होती है। परन्तु विषमतासे अपना विषय परिणा बार कारण प्रत्पफ्से उसके प्रति प्रति करमेका आत्मामें कोई सकाय मार्म नहीं होता बनिकाय रूप स्पिति है । विशेष क्या करें ! हमारे कुछ हमरा नहीं है, क्या इसरेका मही, वर्षमा इसरा नहीं है। बसा है पैसा है। जैसी बारमाको स्थिति है वैसी है। सा प्रकारको प्रापि निष्फफ्टमारसे उदयमें है। सम-विषमता नहीं है। सहमामंद स्पिति है । पों मेसा हो यहाँ दूसरे पदार्यमें बास-पुदि योग्य नहीं मोती नही । ३८५ ब, मासोर पुरी १ मोम १९९९ "जानी पुस्पके प्रति गमिम बुद्धि हो, यह कापामा महान् नियम है"-इस प्रकार सब महारमा पुरुषों का अभिप्राय माम्म रोता है। तुम तपा बे-निनन देव हायमें कम्य वेदसे रहता है- दोनों ही मिस तरबानी-पुरुषके प्रति विशेष निर्भरमाबसे बमिमता हो, उस तरहको प्रसंगोपात पात करो; वह पोग्प है। और परस्पर वर्षात् उनके बीर तुमारे बीचमें मिससे निर्म प्रेम यो, पैसे प्रति करनेमें बाधा मही है, परन्तु या प्रेम नस्पतर होना चाहिये । ॥ प्रेम इस तयका न होना चाहिये सा -पुस्पका काम मादि कारणोंसे प्रेम होता है । परन्तु मामा-पुस्पके प्रति मनोका भीमद् पसन्द [पर १८५१० मचिग , इस पर दोनों ही अपनेको एक गुस्के शिष्य समझकर, बोर निरन्तर दोनोध समग य करता है या जानकर, भाई जैसी बुदिसे पर उस प्रकरसे प्रेमपूर्वक या गा तो रमात विशेष योग्य है।शानी पुस्पके प्रति भित्रमाषको सर्पया दूर करना पोग्य है। ३८६ वर्मा, माम्सोन नदी ५ शनि १९९९ वाभाको समाधिस्य होनेके पिये-पामस्तस्पमें स्पिति होमे लियेविस मुल्में सुपरस बरसता है या एक वर्ष मापार है, इसलिये किसी प्रकारसे उसे बोमनात मी कहो वो कोई पनि मारी के इतमा : मद है कि बानी-पुस नो उम्स मागे, या गाननेपाग होना चाहिये कि परबान भारमा। दम्पसे दम्प नही मिठा पा माननेपाका कोई कम्पि नही कमा सकता । परस्त कर किस समप! वह उसी समय या कि स्वदम्पको अम्य, क्षेत्र, माठ मोर भाषसे पपारस्थित समय हेनेफर, साम्य सहम-परिणामसे परिणमित होकर, बम्प दम्पक प्रति सर्वपा वदास होकर, स्तम होमेपर, कुछ कम्पनही पता ऐसा योम्म है, और ऐसा हो। ३८७ बर्ग, बाम्प्रेस २९ पुष १९१९ तुझे पत्रमें सुधारसके पिपपमें प्राप पर हो लिखा पा, उसे गानपूछकर लिसा पा । पैसा पिनेसे उसया परिणाम पानेकाम नही पर मानकर ही विस्य था । इस बावधी अस फुसपी करनेवार और यदिप बात पान वा टोपात उससे सपा निर्धारित रोगाप, पा नही हो सकता । परन्तु पो सकता है कि मिस पुस्मन पे पास किसे है, पर पुस्प किसी वर्ष मार्गका बाला और उसमे इस बातच निरादरम होना मुस्पतासे समय 'यामानकर उसका उस पुस्तके प्रति ए भी माषना उत्पम से । कदाचित् सा मान में कि उसे उस पुस्परिपपक इस इस पान रो गया हो और इस सर सेसक पानेस उसे विशेष बाम होम्न, सप वपने माप हो या पपपर पप गाय, परम्त या मिथप स तय नही पता। उसके मपार्प स्यम्मा मानना उससे महा समता, भौर उम कारण परिवारको विशेषको उपनिदो किया बात किसी प्रकारसे सात पाप तो अपवो उस प्रकार से मा, मिस पुरस्न सिपाहे उसके प्रति उसको मारना गपछिऐना समा। वामरा प्रकार इस पप समसमा पानिपे कि परिसपुरमा बामी सरपसे माडिमा गई दो मा निमे उमका परमार्प-सपुरा रुसंग-यामिनपस नही जा उसे समबना काटिन नाम प्रसर उम पामेराडे कमी मी सर सहाना संभव है। पपरि हमने तो पति मह गिा पा तो मा उरें इस प्रकार पुष समर मान होता है। परम्तमा पेमा साधते ११ मिति सर शिरोता मी पाप कर समझमें महीबाला, मप nिuad समहमें पत्र ३८.] पिमिप पन मादि संग्रह-यावर्ष १९ ता है, और अन्तमें फिर उसे निक्षेप उत्पन होकर सन्मार्गमें भावना होना समय होता है। इस पत्रमें मने इमपूर्वक ही स्पर सिसा था । सान स्वमापसे मी न विचार किया हुआ प्रापः परमार्थक स्वपमें नहीं लिसा गाया, मया ही गोम पाता, नोवपरमार्थरूप परिणामको प्राप्त करे । (२) उस शान के विषयमें हमारा सिसनेका जो दूसरा नाशय है, उसे यहाँ विशेषतासे लिया है। (१) बिस हानी-पुरुपको स्पट भात्माका किसी अपूर्ण पक्षणसे, गुणसे भौर पेनरूपसे नुभव हुवा है, वौर निसको यात्मा तप हो गई है, उस पानी-पुरुपने यदि उस सुधारसका बान रेया तो उसका परिणाम परमार्प-परमार्यस्वरूप है। (२) और यो पुरुप उस सुबारसको होबरमा मानसा है, या उससे उस हानको प्रासिई हो, वो पम्पहार-परमार्थस्वरूप है। (१) बह जान कदाचित् परमार्य-परमार्थस्वरूप हानीने म दिया हो, परन्तु उस हानी-पुरुपने नवको स प्रकार उपदेश किया हो, मिससे वा सन्मार्गके सन्मुट बाकर्षित हो, वौर पर पवाको नपिकर हुवा थे तो उसका बान परमार्थ-म्पपहारस्वरूप है। (१) तथा इसके सिवाय शास मारिका शताबो सामान्यप्रकारसे मार्गानुसारी जैसी उपदेशकी व करे, उसको श्रद्धा करना, यह म्पबहार-म्पहार सरूम है । इस तय सुगमतासे समझने के लिये ये बार प्रकार होते है। परमार्थ परमार्यस्वरूप मोशका निकट उपाय है । इसके बाद परमार्थ म्पपहारवरूप परंपरा सबसे मोधका उपाय है । म्यबहार-परमार्पस्वरूप बहुत कामें किसी प्रकारसे भी मोशके साधनके कारणमूत होनेका उपाप है।म्मबहार-म्पबहारस्वरूपका फल बामप्रापपी होना संभव नही । इस बातको फिर किसी प्रसगपर विशेपटमसे मिलेंगे, इससे यह विशेपरूपसे समझमें भायेगी । परन्तु यति इतने सक्षेपसे विप समझ न पाये तो म्याकुल नहीं होना । निसे पक्षणसे, गुणसे, वीर बेदनसे बारमाका सरूप माश्म हुमा है, उसे भ्यानका पा एकतम उपाय है, निम्स भारम-प्रदेशको स्थिरता होती है, और परिणाम मी स्थिर होता है। मिस्ने सक्षणसे, गुणसे, वौर इनसे बरमाका सरूप महीं माना, ऐस मुमुभुको परिबानी-पुरुषका मतापा हमा हान हो तो उसे अनुकमसे सक्षण वादिका बोध मुगमतासे होता है। मुसरस और उसका उरति क्षेत्र पर कोई वपूर्व-कारणरूप है, मम मिययसे समझना । उसके बारका मामा-गुरुपका मार्ग निसे मारम न हो, इस प्रकार तु गाना मुम्पका समागम हुआ है, इससे उस प्रकारका निथप रखनेफे लिपे का है। यदि उसके बाका मार्ग म होता हो, और परि उसमें किसीको अपूर्व कारणापसे नियम मा हो तो किसी प्रकारसे उस निषयको पाछे हटाना ही उपायस्प है, इस प्रकार हमारी वाहमा म्ममा फरता है। कई कानमावसे पानी स्पिरता करता है, परन्तु भासापासका निरोध करमा उसे कम्पा- मध हेतु नहीं होता । वौर कोई जानीको मात्रापूर्वक भासोवासका निरोध करता है, तो उसे उस भीमा रामचन्द्र [पा २८५ १८. माति-पग है, इस पर दोनों ही अपनेको एक गुरुफे शिम्म समझकर, वौर निरन्तर दोनोंका ससंग या करता है या बानकर, मई जैसी बुनिसे परि उस प्रकारसे प्रेमपूर्वक या भाप को बात विशेष योम्प है। ग्रामी-पुरुपके प्रति मिचमालको नपा र करना योग्य है। ३८६ बमई, वासोन मदो ५ शनि १९९९ बामाको समाधिस्प होने के लिये बारमस्वरूममें स्थिति होनेके सिपे-विस मुसमें अपारस परस्ता है, प एक पूर्व वाषार है। समिप किसी प्रकारसे उसे बीम्माम मी कहो तो कोई पनि नहीं। सावना भेद है कि हानी पुरष गो उससे भागे है, या चाननेवास होना चाहिये कि मान बारमा है। दम्पसे ब्रम्प नहीं निम्ता, पहनामनेवाका कोई कम्यि महाकावा सकता । परन्तु पर किस समयप उसी समय नब कि लपम्पको द्रम्प, क्षेत्र, मह और मानसे यपानस्फित सम्म नेप, स्पम्प स्वरूप परिणामसे परिणमित होकर, बप इम्यके प्रति सपा उदास ऐकर, स्तम होनेपर, फुल पम्प नाही या ऐसा योग्य है, और ऐसा ।। ३८७ मई, वासोच भी ९गुभ १९९ सुले पत्रमें सुधारसके विषयमे प्राप स्पर दो किसा पा, उसे मान भूमकर मिसा था । ऐसा सिसनेस उम्टा परिणाम जानेवाम नही, या मानकर ) मिसा पा । इस बावको पर्चा परनेवाले भातको यदि म गात फामैमें बात तोप बात उससे सपा निर्धारित होगाप, पर मही सकता । परम्पर हो सकता है कि निस पुस्पने ये पाप कि, मा पुरुष किसी अपूर्ण मार्गा जाता है, और उससे इस बातका निराकरण होना मुस्त्यताम्से समर है' या मानकर उस उस पुरुषके प्रति कुरा मी माझ्मा सत्पम हो । काचित् ऐसा मान ली उसे उस पुस्पविषयक कुछ कुछ हाम हो गया हो और इस स्पर सेमके परमेसे उसे विशेष ज्ञान होकर, सप अपमे भाप निपपपर पनि गाप, परन्तु प निधय स तय होवा | उसके यथार्थ स्पन जान ना उससे मत हो सकता, और उस कारणसे यदि गालको विक्षेपकी उत्पति हो कि या बातम्सी प्रकासे गान ही बाप तो कम है। तो उस प्रकारसे मी मिस पुरस्ने निधो उसके प्रति उसका मानना उत्पत्ति होना समय है। तीसरा प्रकार इस तर समझना चाहिये कि 'पदिसपुरुपये पाणी सएकपसे मी लिखी गई तो मी विसे उसका परमार्य-स्पुस्पका समग वितरूपसे महोसा, उसे समझाना कठिन होता है इस प्रकार उस पानेवाले कमी मौसए लोना समय है। पचपि हमने तो बति सर नही मिल पा तो भी उन्हें इस प्रश्न कुछ समझ माश्म होता है। परन्तु हम वो ऐसा समावे कि यदि अति पर मिला हो ये मी पाय रके समधमें महा माता, अपना पित हो समसमें पत्र २८.] विविप पर मारि संपार-धौ पर्प . माता है, और वन्समें फिर उसे विक्षेप उत्पन होकर सन्मार्ग, भावना होना संभव होता है। इस परमें हमने इण्यापूर्वक स्पर लिसा पा। साब स्वमाबसे मी म विचार किया रामा प्रायः परमार्यके संबंध नहीं लिया जाता, मयमा मही पोसा माता, गोमपरमार्परुप परिणामको प्रास करे । (२) उस धान के विपपमें हमारा मिसनेका नो दूसरा वाशप है, उसे यहाँ विशेषतासे टिना है। (१) मिस हानी पुरुषको स्पष्ट मास्माका किसी वर्ष अक्षणसे, गुणसे और वेदनरूपसे मनुभव हुमा है, और निसको मारमा तप हो गई है, उस हानी-पुरुपने यदि उस मुबारसका ज्ञान दिया हो तो उसका परिणाम परमार्थ-परमार्पस्वरूप है। (२) और वो पुरुप उस सुबारसको ही बारमा बानता है, पदि उससे उस पानकी प्रासि हुई हो, वो पम्पहार-परमार्थस्वरूम है। (३)बान कधित् परमार्प-परमार्थस्वरूप बानीने म दिया हो, परम्त उस हानी-पुरुपने जातको इस प्रकार उपदेश किया हो, जिससे यह स्माकि सन्मुस भाकर्षित हो, और पदि का जीवको चिकर हुआ हो तो उसका हान परमार्यम्यवहारस्वरूप है। (१) पा इसके सिवाय शाम बारिका आता जो सामान्यप्रकारसे मार्गानुसारी भैसी परेशको मात करे, उसको भया करना, पा म्पपहार-न्यबहार सरूप है। इस तय सुगमतासे समझने के लिये ये चार प्रकार होते हैं। परमार्प-परमार्थस्तका मोक्षका निकट उपाय है । इसके बार परमार्प म्पसारवरूप परंपरा सर्वपसे मोशका उपाप है। म्पबहार-परमार्पसरप बहुत कमसमें किसी प्रकारसे मी मौसके साभनके कारणम्त होनेका उपाय है।म्पहार-म्पबहारसलपका फल वामप्रत्ययौ होना सभा मही। इस पातको हिर किसी प्रसंगपर विशेफरपसे मिलेंगे, इससे प दिशेपम्पसे समसमें आपेगी । परम्तु पर इतने संक्षेपसे विशेष समम म माये तो म्याकुन्त नहीं रोना । जिसे सणसे, गुणसे, और पेदनसे आमाका सरूप माश्म हुआ है, उसे प्पानका यह एकतम उपाय है, मिसस भाम-प्रदेशको स्थिरता हाती और परिणाम भी स्पिर होता जिसने एक्षणस, गुणसे, और मेनसे मामाका सहप मही जाना, ऐस मुमुभुको परिबानी-पुस्पका बनाया उमा बाल हो तो उसे अनुक्रमसे एक्षण मारिफा बोध पुगमतास होता है। मुम्परस और उसफा उति क्षेत्र या कोई मर्य-कारणाप, पह तुम निषपसे समप्तना । उमस माया माना-पुरुषका मार्ग निमे क्रेशरम न हो, इस प्रकार में पानी-पुपमा समागम हुआ, इससे उस प्रवरफा निपप रहने लिये पाहै। परि उसके मात्र मार्ग यानप राता , भार प•ि उसमें रिमाका गर्व घरणरूपसे निष्प मा दो किसी प्रकारस उस निषयको पाठे राना दो उपापम्प, प्रसार हमार्य भएमा माया करता है। कोई बहानमारसे पानको स्पिरता करता है, परन्तु मामापासा निरोप फरमा उसे पम्पा पर देश नही रोता ! भौर कोई हानीको बामापूर्वक प्रासापामा निरोप करता , उसे उस भीमद् रामचन्द्र [पर ३८८ १८९ कारणसे नो स्पिरता वासी है, बारमाको प्रगर करनेका हेतु होती है। पासोमासकी स्थिरता होना, या एक प्रकारसे बहुत कठिन बात है। उसका सुगम उपाय एकतार मुसरस करनेसे होता है, इसलिये या विशेष स्पिरताका साधन है। परन्तु ॥ सुधारस स्थिरता वानमारसे फागमूस नहीं होती, अर्थात् कम्पाणरूप नहीं होती तथा उस बीम-नानका प्यान मा महानमावसे कायाणरूप नही होता इतना हमें विशेष निधय भासितामा करता है।मिसने पेदनरूपसे भारमाको बान म्यिा है, उस हानी पुरुषको वाहासे यह कमाणरूप होता है, और यह मारमाके प्रगट होनेका त मुगम उपाय है। यहाँ एक सपै भी पूर्व बात किसना सूमता है । भारतमा एक चंदन के समान है। उसके पास नो नो बस्तु विशेषतासे गपो ,ये सब वस्तु उसको मगधका विशेष बोध करती है। नोभषचानके पासमें होता है, उस इसमें पन्दनकी गप विशेषम्मसे सरित होती है। जैसे से पप दूर होता जाता है, जैसे जैसे मुगंध मद होती जाती है और यमुक मायके पचात् मय गवरूप पक्षोंका कन भारंम हो जाता है, भर्थात् उनमें चंदनको मुगध मही या । इसी तय जातक यह बमा विभाग-परिणामा सेपन करता है, तबतक उसे पदन-पक्ष करते है, और उसका सबके साप बमुक ममुक सूक्ष्म बस्तुका सबब है, उसमें उसकी अपाप मुगंध निक्षेप पाती है। निसका जानकी मासे पान होनेसे गाम्मा प्रगट होता। पानकी बपेक्षा भी सुपारसमें वामा विशेष समीर यता है, इसलिये उस बामाको विशेष डापा-सुगंधका प्यान करना योग्य उपाय है। यह भी विशकहमसे समझने योग्य है। ૨૮૮ बमा पासोग पदी । १९४९ प्राप म्यानुसताके समय चित्त म्पाकुम्वाको दूर करमेकी शौनतामें पोय होता है पा नही, इस पातको रसम सालपानी बाचित् मुमुजु जनको भी कम हो जाती है, परन्तु पर बात योग्य तो इस तय कि उम प्रकारक प्रसंगमें पु पोरे समयके लिये चाहे से काम-कानमें उसे मीन समान-निस्किस्यको तरह-कर रासनाम्पाकुरुतको बहुत से समपतक कम्पम यनेबाली समान पेटमा योग्य मीहै। और परिह म्पानुलता बिना पौरनके साम को गाती है तापमापकालीन दोनेपर मी भरिफ काम गनेपाली से गाती है। इसडिपे वारेन और "पथायोग्य' समझकर मौन रहना हो योम्पहै। मौनधन पर करना चाहिये किमयर लिसम्पबीर सत्ताप स्पा करना । ३८९ पई भासप्रेग बही १९१९ भावपमारना मापता, मीर सोफामान ।
पा९ १९१, १९२] विविध पण मावि संपा-२५वों वर्ष ३९० बम्बई, वासोर कदौ १३ रपि १९९९ मापके समपसारके वित्तसहित दो पत्र मिले हैं। मिराकार-साकार घेतनलिपयक करि- तका ऐसा मर्ष न कि उसका मुखरसम कोई सबंध किया ना सके । ठसे हम फिर ठिसेंगे । पयवा विषारे व्यषि, सहवामें केलि फरे, मुखवा पिर मै, ममृतपारा परसै । इस कवितामें सुधारसका जो माहारम्प कहा है, पर फेवर एक पिससा ( सब प्रकार के अन्य परिणामसे रित असल्पात प्रदेशो ममरम्म) परिणामसे सरूपस्प बोर अमृतरप नास्माका वर्णन है। उसका परमार्थ यपार्यरूपसे वयगत है, मो अनुक्रमसे समसमें भायेगा। ३९१ पई, बासोन १९५९ मे मपुरा महाभागा पीरा भसमचसिणो। ममदं वसिं पर सफर पाई समसो ॥ १॥ मे प श्या मरामागा पीरा सम्पत्तदसिणो । मुर्द सि पर अफस पर सम्मसो ॥२॥ उपरको गापाम यहाँ 'सफल' पद हाँ फल' क माश्म होता है, वीर गों भासद हाँ 'सफल' ठीक माम होता है। इसलिये क्या इसमें खेस-दीप य गया है, या पे गापायें ठीक है। इस प्रश्रका समाधान यह कि यहाँ मेस-दोप नहीं है। यहाँ सफल शब्द है को सफल ठीक है, और गहाँ अफस शमी यहाँ वफळ ठीक है। मिष्यापिका क्रिया समस-फलसहित है-वर्षात् उसे पुण्य पापका फस मोगना है। सम्पमापिकी क्रिया मफल-फम्माहित है उसे फल नहीं भोगना है-अर्पात् उसकी मिरा है। एकको (मिप्यारएिको) क्रियाका संसायेद्धक सफलफ्ना है, और दूसरेको (सम्पमारिका) किपाका ससाणेतुक वफम्पमा है- ऐसा परमार्थ समझना चाहिये । ३९२ बम्बई, वासोग १९१९ (१) सरूप समाग्में है। पानीको चरण सेवाके बिना अनत कामतक प्राप्त न हो, ऐसा कठिन मोहै। हम वौर तुम हममें प्रत्यक्षपसे तो वियोगमें या फरते हैं । या मी पूर्व-निवधमक किसी महान् प्रतिपके उदपमें होमे योग्य कारण है। (२) हे पम ! बिस भवसरपर यो प्राप्त जाप उसमें सतोपसे पना, पह सम्पुरमोंका भाषा समावन धर्म है, ऐसा पसिष्ठ करते थे। (१) गोईघरेष्म होगी प होगा । मनुप्पका काम के प्रयत्न करना 0 वीर उमासे वो अपने प्रारम्भमें होगा पा मिल आपगाइसलिये मनमें संक्रम्प-विकल्प नही करना चाहिये ।
" २७याँ वर्ष ३९३ बाई, कार्तिक ९ १९५. "सिपर रागा" इदने पाक्यके मापोह (विचार) से गर्भ-भीमत भौशानिमा, उसी समपसे की वादिक परिपपके स्पाग करमेन प्रारम करते हुए । पर देखकर मीमनामवरे मुम्से बैराम्पके सामायिक भवन म होते हए कि " नित्य प्रति एक एक पोका त्याग करके अनुकमसे बह शामिन बजामो मियोंका स्पा करना चाहता है। इस प्रकार धाश्मिा बत्तास विमतक काम-शिकारीच विश्वास करता है, या महान् मर्य है। पा सुनकर शासिमाको बहिन वीर भनाभयकी पत्नी पनामदके प्रति इस प्रकार सहब वपन करती कि "बाप जो ऐसा करते हो, पपपि का हमें मान्य है, पम् पापको भी उस प्रकारस त्याग करना कठिन है।" यह भनकर चिमे किसी प्रकारसे शिव ए बिना ही भोपनामा उस ही समप स्पागकी शरण मेते हुए, वीर भीग्रासिमासे करते हुए कि तुम किस रिचारस कासका विश्वास करते हो! पा सुनकर, निमा चित्त मामरूप हो गया। ऐसा पौरातिमा मौर पनामा इस प्रकारसे गा माविको छोराकर ससारका त्याग करते हए कि " मानों किसी न उन्होंने अपना स किया ही नहीं।" इस प्रकारके सत्पुरुषके पैरम्पको सुनकर मी पहात पात बपति बाइसे कामा दिलास कर को, मा कौनसे कसे करता होगा-पा विचारफर देखना योम्म है। ३९४ पई मगसिर पुदी १९५० पाणीच स्पम करना थेपरूप है परन्तु म्पहारका सर्वप इस पयस राता परि सर्वपारूपसे उस प्रकारका संयम रमसें तो समागममें जानेबारे गांगोंको पका हो इसम्मेि मात करके पदि प्रमोबनके सिवाय मी सपम रस्सा माय, तो उसका परिणाम किसी तपस्म बाना समय। पोरके झमावका बिर सिरसे प्रत्येक भणमें, प्रत्येक समागममें विचार करनेमें पPि सापानी म एउमेमें पाई वो इस प्रकार को सपोग बना है ममी पारी।। का पौष वदी १०वि १९५ में रिसेपरूपसे नहीं मिला चावा । ससमें उपाधि भपेषा का संमभाव सेप कारणस्म है । (वितको इभासमें सो मानिन्ध संधिप्त हो जाना—यून हो जाना—उसे यहाँ संक्षेपमा पिसा है।) हमने ऐसा अनुभव निपाकहाँनी मी प्रम-दशाहो हो बारेमा जगत्-मत्पपी कामका पत्र २९५, १९.] पिविष पर मादि संमह-२७वा वर्ष वफाश होना योग्य है। वहाँ सर्वया बप्रमचता है, माँ नारमाके सिवाय दूसरे किसी मी मारका वाकाश मही रहता। यपपि सीर्यकर वादि सम्पूर्ण मान प्राप्त कर लेने के बाद किसी तरकी देह-क्रिया सहित दिखाई देते हैं, परन्तु यदि वात्मा इस क्रियाका अवकाश प्राप्त करे तो होगा उस क्रियाको कर सकती है।बान होनेके पचात् इस प्रकारको कोई क्रिया नहीं हो सकती, दौर सा होनों सम्पूर्ण ज्ञान होना योग्य है, यह हानी पुरुषोंका सन्देहीत निश्चय है-ऐसा हमें छगता है। जैसे भर नादि रोगमें विचको कोई स्नेह नहीं होता, उसी तरा इन मामें मौ स्नेह नहीं गया- रूमसे नहीं रहता, और उस प्रकारके प्रतिबंधके रमितपनेका विचार हुवा करता है। । -छामग स्पर कहा था, ३९६ मोहमयी, माप बदौ १ शुक्र १९५० तुम्हारा पत्र मिला है। उसके साथ यो प्रमोंकी सूची उतारकर मेनी है पर मी मिली है। उन प्रश्नोंमें चो विचार प्रगट किये है, पहिले विचार-भूमिका विचारने योग्य है । मिस पुरुपने पा प्रप बनाया है, उसने वेदांत वारि शामके अमुक प्रयके मनछोकनके ऊपरसे ही ये प्रश्न सिसे हैं। इसमें कोई अत्यन्त नायर्यकी बात नही लिसी है। इन प्रश्नोंका तथा इस तरके विचारोंका बास समय पहिले विचार किया था, और इस प्रकारके विचारोंका विचार करनेके लिये तुम क्या को करा था । तथा दूसरे उस प्रकारके मुमुसुको मो इस प्रकारके विचारों के बरसोकन करनेके विषयों षयमा बब मी करते है, बिन पिचारीक करनेसे अनुमसे सत्-असत्का पूरा विवेक हो सके। हामें सात-वाठ दिनसे शरीर मरसे प्रस्त पा, का दो दिनसे ठीक है। नो करिता मेगी पर मिली है। उसमें माठापिकालपमें तुमारा माम बताया है, और कविता करने में जो कुछ विपक्षणता चाहिये, उसे दिखानेका विचार रहा है। करिता टीक है। कविताका करितार्यके लिये मापन करना योग्य नहीं—समय के लिये वाराधन करना पोम्प मही। पदि उसका प्रयोगन भगवान्के मजनके लिये—भारमकल्याणके लिये-हो तो मीनको उस गुणकी क्षयोपशमताका फर मिसता है। मिस विपासे उपशम गुण प्रगट महाजा-विदेफ नही मापा, षयका समाधि महीई, उस पाके विषयमें श्रेष्ठ गीतको वामह करना योग्य महा।। हासमें भव प्राय करके मोतीको भरी पर हो रही है । बो निम्म्यवमे है उनका मी कम कमसे पेच मनेका विचार कर रहा है। यदि यह प्रसग म हाता तो उस प्रसगमें उत्पम हानेवाली मंगाल मौर उसका उपमन न होता । अब यह स्मो नम्पसे अनुमप्रमें नाया है। पर मी एक प्रकारको प्रारम्मच मिचिप है। . ३९७ मोहमपा, माघ वो गुरु १.०० पाकि उपाधि-पसंगमें पुश मिशेष सहनशीलतासे राना पर, इस प्रकारको मौसम होनेफ २५५ भीम परवान [पत्र १९८ १९९४ कारण वारमा गुपको विशेष स्पध्वा पती है। प्राप करके सबसे यदि मने तो नियमितम्ससे कोई ससंगकी बात लिखना। ३९८ बर्थ, फागुन पनि १९५० वारंवार वरपि हो जाती है, फिर मी प्रारम्प-मोगसे उपापिसे दूर नगमा गा सकता । (२) हामें मे-दो महिने हुए सपाचिके प्रसंगमें विशेष विशेपहपसे ससारके सम्मका बेदम मा है। पपपि इस प्रकारके अनेक प्रसगोंका पेदन किया है, फिर मी प्राप' बामपूर्णक केन मही किया । इस ऐहमें और उस पहिलेको पोष-बीम हेतवाली देहमें किया पूषा बेदन मोक्ष कार्यमें उपयोगी है। बई, फागुन मदौ ११ वि १९५० "तीर्पपरदेव प्रमाको कर्म करते है, और अप्रमादको उससे विपरीत मात् बकर्मरूप पारम- स्वबप करते हैं । इस प्रकारके मेरसे बहामी मार हानीका स्वरूप (का) -सूपगग्सू वर्ष-अप्पन । 'मिस में जन्म हला, बोर नील निसके सहपासमें पता है, उसमें परमानी बाग ममता करता है, और उसमें निमग्न गा करता है" (स्यगर-प्रपमा पपन) गो बानी-पुरुप भूतकामें हो गये हैं, और यो हानी-पुरुष मविपकाने होंगे, उन सब पुरषोंने शति (समस्त निमात्र परिणामसे पक बाना-नित हो पाना ) को सब पकत भाधार साहै। जैसे भूतमाको पुप्पी वापरत है, बर्षात् भैसे प्राणीमात्र प्रमाके दो वापारसे पते —प्रथम उनको उसका नाधार होना पोम्प है—से ही प्रणीको तय, मानो मुस्पोने सत्र प्रारके साम्पाणकामाचार शाति किया"--(स्पगा) ४०० बर्मा फागुन मदौ ११ रचि १९५० (१) उपवारको एक पत्र मिगे, नहीं तो रविवारको विस्तारसहित पत्र लिखेंगे, ऐसा सिखा पा उसे जिससे समप चित्त पर मापा पा कि तुम मुमुभुमोको कई नियम वैसी स्थिरता होनी चाहिये, वीर उस पपमें कुछ सिमाना सूझे तो मिलना चाहिये । शिसते समय ऐसा हुमा कि यो एप दिला माता है उसे ससंग समागममें Rस्तारसे करना योग्य है, और पर कुछ फलस्वरूप होने योग्य है। (२) इतभी बात विषय रमना पाम्पानी-पुस्प मी प्रारम्भ कर्मके मोगे बिना नात मही होता, भार बिना मागे नित होने मानांको कोई भी नही होती कि सिमाप से पर४ १,४२,४३]] विविध पत्र मादि संग्रह-२०याँ वर्ष मीयोंको भी इस व्यके पातसे कर्म है, नो मोगनेपर ही निच होते है-मात् वे प्रारम्ब से होते है। परन्तु दोनोंमें इतना भेद है कि खानाको प्रापि तो मात्र पूर्वोपार्मित कारणसे होती है, और इसकी प्राधिका ठरेश भविष्य ससार है। इसलिये हानीका प्रारम्प पुरा ही पड़ता है। इस प्रारम्पका या निश्चय नहीं कि वह नितिसपसे ही उदय वाये । उदाहरण के लिये भीषण बादि बानी-पुरुपके माचिम्म प्रारम्प होनेपर मी उनकी बान-दशा थी, जैसे गहस्थामस्पामें भीतीर्थकर की थी। इस प्रारम्पका निाच होना केवल भोगनेसे ही संभव होता है । जानी-पुरुपको प्रारम्भ-स्पिति कुछ इस प्रकार की है कि वो उसका स्वरूप मानमेके म्येि मीनोंको संरेका तुणे, और उसके लिये जानी-पुरुष प्राय करके मा -मौन-सा रसकर वपने शानापनेको अस्पए रस्ता है। फिर मी प्रारम्बके पश्से पदि मा दशा किसीके पर गाननेमें या बाय, तो फिर उसे उस पानी पुरुषका विभिन्न प्रारम्प सदेहका कारण मही होता । ४०१ बाई, फागुन वदी १. शनि १९५० प्रशिक्षापत्र प्रप बाममे-विचारनेमें घमें कोई बाधा नहीं है। वहाँ कोई शकाका हेतु उपस्थित हे पहा विचार करना, नया कोई प्रम सने योग्य हो तो पूछनेमें करें प्रतिबध नहीं है। सुदर्शन सेठ पुरुफ्त था, किर मी पा रानीके समागममें म्पाकुसतासे गीत था । जापत भारम-पम्से कामके उपशम करनेसे कामेन्द्रियमें मनागृतपना ही समय होता है। और यदि उस समप ग्नीने कदाचित् उसकी देहका सहसास करने की इच्छा मी की होती, तो मी श्रीमुर्शनमें कामको नगृति देखने में न जाती-ऐसा हमें मगता है। ४०२ पई फाल्गुन वदी ११ र १९५० शिधापत्र प्रपौ मुल्य मतिका प्रपोग्न है । मटिके नापाररूप विवेक, पर्य और भाभप इन तीन गुणोंको उसमें विशेष पुष्टि की है उसमें रैर्य और वामपका Aशेष सम्पप्रकारसे प्रतिपान किया है, जिनका दिपार करके मुमुमु गीचको उनें वपमा गुण बनाना चाहिये । इसमें भीषण बादिके नो यो प्रसंग माते हैं, वे इस प्रकार है कि पे शाप सरेर हेतु रों, फिर भी उममें पौष्णके सकपको समझनेका फेर समसकर उपेक्षित दमा ही योग्य है । मुमशुका प्रयोजन के रिमुनिसे बाँचने-विचारनेका होता है। ४०३ बाई, फागुन मी ११ एपि १.५० उपाधि दूर करने के लिये दो प्रकारसे पुस्याप हो सकता है- तो किसी मी म्यागर आदि कार्यस, और दूसरे विषा, मत्र बादि साधनसे । यशी इल दोना पहिले जीत्रको मंतयपके दूर होनेको शपता रोनी चाहिये । परि परिण बताया हुमा पुस्पार्प किमी तय बने तो तमे भीमद् रामचन्द्र [पा ४४ हमें हमें प्रतिबध महाँ है, परस्त दूसरे पुरुपाके विषयमें तो सर्वया उदासीनता ही है, और इसके स्मरणमें वा पानेसे मी चित्त से हो पाता है इस तर उस पुस्पार्थक प्रति अनिच्छा है। बितनी बाफुलता है उतना ही मार्ग निरोध है, ऐसा हाना-पुरुष कर गरे । ४०४ वर्ग, फागुन १९५० ॥ ताकर बारम्बार नाच कसा वा उपदेश करते थे हे जांच ! तुम समझो ! सम्यक्झकारसे समझो ! ममुप्यता मिना बहुत दुर्मम है, और चायें गतियों मपसे म्यात है, ऐसा मानो । कानसे सदियषका पाना कठिन है, ऐसा समझो। समस्त पोक एफरत दुस्से बयाहै, ऐसा मानो । बौर सब गाव नपने वपने कसि विपर्यास मानका अनुमान करते हैं ठसा विचार करो । (सूपगर अध्ययन ७-१२) जिसका सर्व दुससे मुळ होनेका विचार वा रो, उस पुरुषको बारमाको गषेपणा करनी पाहिये, और परिवारमाको गवेषणा करना ये तो यम नियम मादि सब साथमोके मामाको बम पान करके सरंग गवणा एवं उपासना करनी चाहिये । बिसे ससगका उपासमा करना हो उसे ससारको ठपासमा करनेके बाममावका सपा त्याग करना चाहिये । अपने समस्त बभिप्रायका स्वाग करके अपनी सर्व शालिसे उस ससंगको भाडाकी उपासना करनी चाहिये । तीर्थकर ऐसा करते हैं कि मो को उस माहाकी उपासना करता है, पर वनस्प हो समगध उपासना करता है । इस प्रकार जो सरसगकी उपासना करताप मगास हो बामाको उपासना करता है और वास्माको उपासना करनेवाग समोसे मुक्त हो जाता है। (गीका बसणसूत्र )। उप यो उपदेश मिला है, गापा सूपगरमें निम्मरूपसे है।- संपुम्मा वयो माणुस, दळू मर्य बासिसणे पसंमी । पनवदुषले भरिए र सोए, सकम्ममा पिपरिया हो। सब प्रकार की उपानि वाघि और पापिसे पदि मुकमावसे पते हों तो मी संगमें समि- मित्र मषि, हमें रोना कठिन माझ्म होती है। ससगी सर्वोत्तम बर्षवा में दिन-रात रहा करती है फिर मी उदप योग प्रारम्पसे उस प्रकारका बतराप हा करता है। प्रत्य करके हमाय नास्मामें किसी बातका फेर उत्पम नही होता कि मी प्राप करके समवंतरापका से तो रिन-त या करता है। सर्प भूमि सब मनुप्प सब कम्म सब बात-पात वादिके प्रसग, सामानिकरूपसे महार से सर्वथा परके, सदासीन से बरमणीय नमोनकर और रसरशत भासित होते हैं । केस बानी-पुरुष, मुमश्च पुरुष वपना मार्गानुसाच पुरुषोध समग त, निमका, प्रविकर मगर भाकपा और रमतरूप मासित होता है। इस कारण हमारा मम माप करके अप्रतियमताका सेवन करते पर तुम जैसे मार्गे समान पुस्पों में प्रतिबद्धता प्राप्त करता विविप पर मादि संग्रह-२नों पर्व ४०५ पई, फागुन १९५० मुमुक्षु बीचको इस कालमें ससारकी प्रतिकूल दशावोंका प्राप्त होमा, वह उसे ससारसे पार होनेके बराबर है । बनतकासे अम्पसित इस ससारके स्पष्ट विचार करनेका समय प्रतिकूल समागममें बपिक दवा है, यह पात निश्चय करनी योग्य ह । यदि प्रतिकूछ समागम समतापूर्वक सहन किया जाय तो यह बीबको निर्वाणको समीपताका सावन है। म्यावहारिक प्रसगोंकी नित्य चित्र-विचित्रसा है। उसकी ऐसी स्थिति है कि उसमें केवल कल्पनासे हो मुस वार कल्पनासे ही दुम है। अनुकूछ कापनासे यह अनुकूछ भासित होता है, प्रतिकूल कम्पनासे यह प्रतिकूल मासित होता है और धाना-पुरुषोंने ये दोनों ही कल्पना करमेको मना की है। पारपानको शोक करना ठीक नहीं-ऐसा प्रीतीपंकर करते थे। ४०६ बर्प पारगुम १९५० प्रयम पर मनन्य भरणके देनेपास भीसद्गुरुरेनको अस्पत मातिसे नमस्कार दो मिन्होंने शुद्ध भारमस्तपको पा म्यिा है, ऐसे जानी-पुरुषोंने नाच करे ए छह फको सम्पमर्शनके निवासका सर्वोकर स्थानक करार भारमा है। वैसे घट, पट वा पदार्थ है से ही वामा भी है। अमुक पुगों के होने के कारण से पर, पट भागि होने का प्रमाण मिलता ह, से सिमें स-पर प्रकारक पैठप सताका प्रत्यक्ष गुण मौन है, ऐसी आमाके होनका मी प्रमाण मिलता है। इसरा पर - 'मास्मा नित्यो । पर, पर बानि पाप भमुक कामें दो यते है। मारमा विकासमता है। घर, पर बा संयोगवन्य पदार्प है। भामा सामारिफ पदाप ६, क्योंकि उसको उत्पतिके लिये फोई मी संयोग बनुमबमें नहीं बाता | किमी मी संयोगी इम्पसे पवन-सत्ता प्रगट होने योग्य नहीं है, इसठिये बह भनुत्पम है । पर भमपोगी होनसे अरिमाशी है, क्योंकि जिसकी किसी सयोगसे उत्पचि महीं होती, उसका रिसीमें नाश मी मही होता। तीसरा पर –'भामा का है'। सब पार्ष मई-रियासे सम्म है । सभी पदार्थोंमें पुनम पुछ क्रियासहित परिणाम देखनमें भाता है। मामा मी मिपा-सपम है। रिपा-सरम पानेक कारण पए का है। यामिनभगवान्ने इस कारनेका तीन प्रकारसे विरेचम किया है -परमामे भामा समाव-परिमतिसे निजम्मापका क ह । अनुचरित ( अनुमपमें भाने पाप-विशेष मधसमित) पहारसे थामा ट्रम्प-कर्मका कर्ता है । उसबारसे भामा पर मगर भारिया कचा हा पीपा प? -मामा भोच्य है। जो कुछ छिपायें होता है, वे सर किसी प्रपोजमर्पक भीम परवद्र [पर ४॥ हो होता है निरर्यक नहीं होती। गो कुछ मी किया मावा है उसका फर बस मोगनेमें पाया है, पर प्रत्यक्ष अनुमर है। विस तर विप सामेसे विपका फल, मिला सामेसे मिग्रीका फल, वशिके स्पर्श करनेसे अमि-स्पर्शका पल, हिमके स्पर्श करनेसे हिम-स्पर्शका पर मिले निमा मही यता, उसी तय कपाप वादि अपना जपाय मावि बिस किसी परिणामसे मी मारमा प्राधिकरती है, उसका फल मी मिसना योग्य हो, और यह मिलता है। उस क्रियाय कळ होमेसे भामा मोल है। पाँचों पद —' मोक्षपद है'। निस अनुपचरित-म्पमाघरसे गौक्के कर्मका कल निरूपण किया और कल होनेसे मोतृत्व निरूपण किया, या फर्म दूर मी बस होता है। क्योंकि प्रत्पन्न कषाप बारिकी वापता होनेपर मी उसके बनम्पास्से-अपरिचयसे उसके उपशम करनेसे-उसकी मेहता Pसर्व देता है पापोण होने योम्प माइम होता है-झौण हो सकता है। उस सब प-मानके सौम हो सकने योग्य होमेसे उससे रहित नोएर भारमभाव है, ठसम्म मोक्षपद है। छन पद:-~-वस मोघका उपाय है। यदि कषित् ऐसा हो कि हमेशा काँध गप हो बहमा करे, तो उसका निति कमी मी नहीं हो सकती । परन्तु कर्मपसे रिपरीत समावाले जान, दर्शन, समाधि, पैरम्य, मक्कि मादि साधन प्रस्पाप है, मिस साधनके बरसे कर्मभप शिपिण होता है-उपशम होता है-श्रीण होता है, इसम्पेि मे बाम, दर्शन, संपम बादि मोझ पदक उपाय है। समानी पुरुषोंदाय सम्पदर्शनके मुस्प निवासभूत करे गए इन म पदोंको यहाँ सक्षेपमें कहा है। समाप-मुतिगामी मारने स्वाभाविक निधारमें ये पद प्रामाणिक होने योग्य है- जानने पोम्प , उसको वात्मामें उमका सम्पूर्णम्मसे विस्तारसहित कि रोना योग्य है। ये सर पर सहरित ऐसा परम पुरुपने निरूपण किया है। इन न पदोंका विवेक गीतको निवसरूम सम- हने के लिये का। बनार सप्न-वसा के कारण उत्पम ए गौरके मामा-ममत्वमालको दूर करनेके लिये बानी-पुरूपोंने एन ए पोंकी देशमा प्रकाशित की है। एक केबस अपना ही सरूम उस समदशासे रहित । पदि गान ऐसा AIR करे तो पगमात्रमें बागत होकर सम्पम्पसमको प्रास हो; सम्पदर्शनको प्राप्त होकर निग समावस्म मोसको प्रसपरे । उसे किसी विनायो बाम और बम्पमाबमें हर्प शोक और संयोग उत्पम नगे, उस विचारसे निम सरूपमें ही निरन्तर पुरता, सम्पूर्णता, मदिनामिना वर्पत मानन्दपना उसके अनुममें माता है। समस्त विमाव पर्यापोंमें फेर अपने रामप्याससे एकता है उससे अपनी या मिमता है यह मसे स्पर-प्रत्यय--- नस्पत प्रत्यक्ष-अपरोक्ष अमुमन ऐता है। निनाशी अपना बम्म पाक सपोगमें उसे इ-बनिए- मात्र प्राम नहीं होता । जग्म, अग, मरण, रोग बादिको बापाप्मत, सम्पूर्ण माहाम्पके स्थान ऐसे नि-सम्पने गानकर--मनुमत करके-ए सार्थ होता है। दिन निम पुरुषों को इन प पोले समानभूत ऐसे परम पुस्पके पचनसे मामाका निधपमा उम सब पुरषोंने स सहपको पा लिया १२ माथि, प्याधि, उपानि पौर संगस रहित हो गये होते, वीर मविप्पमें मां से होंगे। मिन सपुराने सन्म, जरा धीर मरण नाश करमेबान लग सरूपमें सहम-गरपान होनेय उपश दिया है, उन सपुस्पोंग्रे वक्त मळिसे ममस्कार है। उन सिकारण कामासे -परम मिषरूप विविध पत्र मादि संग्रह-२ज्यों वर्ष - निस्प प्रति निरतर स्तन फरनेसे भी पारम समाप प्रगरित होता है। ऐसे सब सम्पुरुप मौर उनके भरणारविन सदा ही एयमें स्थापित हो । जिसके वचन वगीकार करनेपर, म्ह पदोस सिम ऐसा बारमस्वरूप सहनमें ही प्रगति होता , बिस बारम-सहपके प्रगट होनेसे सर्वकामें नीव संपूर्ण भानदको प्रास होकर निर्मम हो पाता है, उस बनके कहनेपाछे ऐसे स्पुरुषके गुणोंको म्याझ्या करनेकी हममें असामप्प ही है।क्योंकि मिसका कोई मी प्रत्युपकार नहीं हो सकता ऐसे परमात्ममात्रको, उसने किसी मी इमके बिना, केवल निष्कारण करुणासे ही प्रदान किया है। तपा ऐसा होमेपर मी निसने दूसरे मीषको यह मेरा सिप्प है, वपणा मेरी मति करनेवाला है, इसलिये मेरा' इस तर कमी मी नही देखा-ऐसे स्पुरुषको मर्मत मकिसे फिर फिरसे ममस्कार ! निन सम्पुरुषोंने यो सहरुकी मति मिरूपण की है, पर मलि करक शिप्यके कल्पामके लिये हो की। मिस मक्तिके प्राप्त होनेसे सहरको नामाको प्रेशमें पति से, नपूर्ण गुण पिगोपर होकर कम्प समय र ऐ, भौर साबमें बारम-बोध मिले, यह समझकर मिस्ने भतिका निरूपण किया है, उस मलिको भौर उम सत्पुरुपोंको फिर फिरसे विकास नमस्कार हो। पापि कमी प्रगटरूमसे वर्तमानमें केसवानको उत्पपि नहींई, परन्तु रिसके पचनके विचार योगसे केनाम शाहिरूपसे मौजूद है, यह स्पष्ठ चान लिया है-इस प्रकार भवापसे फेवस्थान मा 2-विचार-दशासे केवमान मा है-इस-दशासे केरबान हुमा 2-मुम्स नयके हेतुसे केस- पान यता है, मिसके संयोगसे माप स मम्यागार मुखके प्रगट करमेबारे उस केपमधानको, सरक- मात्र पानेके पोम्प दुधा है, उस सत्पुरुपके उपकारको सोतर भजिसे ममस्कार हो । ममस्कार हो!! (२) सम्पदर्शनप्तरूप प्रीजिनके उपदेश किपे हुए मिस लिखित र पोका माया पानको बति- शायरूपसे विचार करना पोप है। पामा है, क्योकि या प्रमाणसे सिर पर मस्तिपद । बामा नित्य है- पह नित्यपद । वाहमाके सरूपका किसी मी प्रकारसे उत्पम हाना नार निमारा होना समय नहीं। बामा कर्म कर्ण --यह कपि । मारमा फर्मका मोहै। उस भास्माकी मुहिहो सकती है। निनसे मोक्षो सके ऐसे साधन निमित है। ২০৩ गर्ग, त्र मुदी १९५० हासमें पहाँ बाप उपाधि कुछ कम रहता है। तुमारे पत्रमें यो प्रश्न छिमे हैं, उनका समापन मारे मिया, पार करना ।
भीम रामचन्द्र पूर्पकर्म दो प्रकार के है । वषमा गौसे धो नो कर्म किये जाते हैं, वे दो प्रकारसे किये जाते हैं। एक धर्म इस तरके हैं कि उनकी काल बादिको बिस तप स्पिति, उसी प्रकारसे मोगी ना सके । सरे कर्म इस प्रचारफे। कियो कर्म शामसे-विचारसे—नित हो सकते हो। मानके होनेपर मौ निस तबके कौको माप मोगना चाहिये, में प्रपम प्रकार के कर्म कर, चौर नो पानसे र हो सकते है, ये दूसरे प्रकार के कर्म है। केपणानके उत्पन्न होनेपर मी दो रासी । उस देहका एना कोई केसमानाको इमसे नाही, परन्तु मारम्बसे होता है। ना सम्पूर्ण बात यह होनेपर मी उस देशको स्थितिक वन किये बिना केवयानी मी मही घट सकता, ऐसी स्थिति है। पापि उस प्रकारसे छूटनेके लिये कई बानी-पुरम म नहीं करता, परत यर्या करनेका बमिप्राप या कि बानी-पुरुषको मी या कर्म मोगमा पोम्प है।पा प्रताप बादि पमुक कर्मको इस प्रकारको व्यवस्पा है कि पापाना-पुरुषको भी मोगमा पोप है। वर्षात् साना-पुस्प मी उस कर्मको भोगे बिना मिस नही कर सकता । सब प्रकारके धर्म इसी तबके कि वे फीत नाही नाते केमा उनका मालिके ममें ही फेर होता है। एक कर्म तो बिस प्रकारसे स्थिति बराच वष किया है, उसी प्रकारसे भोगने योम्प होता है। सय कर्म पेसा होता है, जो जीवके बाम मारि पुरुषार्थ -धर्मसे निात होता है।मान बादि पुरुषार्थ- धर्मसे निपत होनेवासे कर्मको निति बाला-पुरुप भी करते है, परन्तु भोगने पोय कर्मको शानो-पुस्त सिदि वादि प्रपस्नस निात करनेको इजा न करे, पा समय है। कर्मको पपापोम्पहफ्से मोगनेमें बानी-पुरुपको स्कोच नही पता । कोई मानदशा पनेपर मी गफ्नी शानदशा समझनेवाग पौष काचित् भोगने योम्प कर्मको भोगमा म रहे, तो मी मुटकारा तय मोगमेपर ही होता है, ऐसा नियम है । तपा यदि गोषका किपा मा स्य बिना मोगे हो फरित सा जाता हो, तो फिर नष-मोशकी म्पबस्था मी कासि क्न सकती है! बो पेनाप नादि कर्म हो तो उमें मोगनेकी हमें बनिन नही होता । परि कदापित मनिमम तो ऐ दो पितमें सेव हो कि जीवको देशभिमान उससे उपधित फर्म भोगते ए होता है, और उससे बनिमोती है। मंत्र मारिसे, सिरिसे और दूसरे उस तहके वमुक कारणोंस अमुक चमत्कारका सल्ला असंभव नहीं । फिर भी से हमने उपर बताया है से भोगने माप यो । निपचित कर्म' किसी भी प्रकार से दूर नहीं हो सकते । प्रचित् अमुक शिपिक धर्म' को नित्ति होती है, परन्तु ऐस्म मह उपार्जित करनेवाले के कम किये बिना ना हो जाता है। भारतिके फेरसे उस कर्मका न होता है। कोई एक इस प्रकारका विपिस कर्म होता मिसमें अमुक समप पिक स्पिरता ये तो समाच होनाप । उस तबके कर्म उन मत्र मादिमें स्थिरता संपसे निवत होना संमत है। अपच किमीके किसी ठिामका कोई इस प्रकारका व होता है जो केवल उसकी योगासी हो मासे फलीभूत हो माफ-पा भी एक सिरि पैसा है । तपा परि कोई भमुक मत्र माविक प्रफनमें , भीर ममुक पूर्वावश्यक मय होनेा मसग समीपमें हो, वो मी मन्त्र माहिसे कार्य सिविका ऐना मामा पत्र ४८] विविप पत्र मादि सपा-यावर्ष जा सकता है परन्तु इस बाखमें कुछ योहा मी पिछ होलेका कारण नहीं। यह निष्फल मात है। इसमें बामाले कापाणा कोई मुख्य प्रसग नहीं है। ऐसी कया मुख्य प्रसगकी विस्पतिका ही कारण होती है, इसठिये उस प्रकारके विचारके अपना सोनके निर्णय करमेकी रडा करनेकी नपेशा उसका त्याग करना ही उत्तम है और उसके स्पाग होनेपर उसका सइनमें निषय ो साता है। जिससे वारमा विशेष वाकुलता न हो से एना। मोहोने योग्य होगा यह तो होकर गंगा, नौर वाकुडता करनेसे भी नो होने योम्प होगा या वो अवश्य होगा, उसके साप मारमा मी अपरापी बनेगी। बर्मा, चैत्र बदी ११ भीम १९५० मिस कारणके लिपपमें मिला या, चित्त बमी उस कारणके विचारमें है और नमीतक उस विचारके पिचके समाधानरूप नात् पूर्ण न हो सकनेसे तुम पत्र नहीं लिखा । तया कोई प्रमाद-दोष जैसा कोई प्रस्ग-दोष हा करता है, जिसके कारण कुछ मी परमार्षकी बात सिनके समधर्म विच धाकर सिसते हुए एकम रुक जाता है। तथा मिस कार्यकी प्रवृति यती, उस कार्यकार प्रापिमें वीर अपरमार्थक प्रसगमें मानों मेरेसे पयायोग्य उदासीन का नहीं होता । ऐसा संगनेस, वपने दोपके विचारमें पा बानेसे पा लिसना रुक गाता है, और प्राय करके उस विषारका समापान महोबा, ऐसा बो ऊपर लिखा है, उसका यही कारण है। पदि किसी मी प्रकारसे बने तो इस कररूप ससारमें अधिक म्पक्साय न करना-ससा करना ही पोम्प है। मुझे ऐसा माता है कि नीतको मूखरूपसे देखते हुए पदि मुमुमुता माई हो तो नित्य प्रति उसका सार-यह घटता ही माप । स्सारमें पन वादि सपपिका पटना पा न घरमा तो भनियत है, किन्तु सारके प्रति नीवको मो भावना है मा परि मंद होती पाठी बाप, तो वह वनुक्रमसे नाश होने मोम्य हो। इस कारमें प्राप करके यह बात देसनेमें नही माती । किसी मिम स्वरूपमें मुमुधुको पौर किसी मिमी सम्पमें मुनि बगैयो देसकर बचार वाता है कि इस प्रचारके संगसे जीवको उर्च दशा रोना पोम्प मही, किन्तु वनोदशा होना ही योग्य है। फिर जिस ससगका पुन्छ समागम हुआ, काम-योपसे ऐसे जीवको म्पयस्याको मी पल्टनेमें देर नही म्गती । इस प्रकार स्पर देसकर पिच मेद होता है और अपने पितको म्यवस्था देसकर मुझे मी ऐसा होता है कि मुझे किसी मा प्रकारसे या म्पक्साप करना योग्य नही-पन्य पोम्प मही। बर-भयत बगर–स गाव कुछ प्रमा, नही तो निसे प्रगटरूपसे मान लिया है, ऐसे जारको पानेमें जीवको प्रापि कैसे हो सकता है। वयमा पदि ऐसाम से दो सिर उसमें उदासीन प्रति हो। तो मी उस प्रातिको वब पदि किसी प्रकारसे मी समाति रो तो या होने पोप है,मही तो सार किसी भी प्रकारसे यात्रका हो पाप है। मषिक महा लिसा गा सकता, इससे पितमें खेद होता है। बता तो प्रगट-पसे किसी मुमुमुको, इस गावका रोप मी रित्तनी प्रकारसे बने उतनी प्रकारसे प्रकार करक, मीना उतना वा सेर करना चाहिये, और उस प्रकर दोषी परिसमापिके लिये उसके संगम्म उरकारको दा करना चाहिये ।
१२ भीमद् पयपत्र [पा. मुझे सपने दार के लिये बारम्बार ऐसा भगता है मिस पोरके बटको परमार्यसे देखते हए मैने पर का। परन्तु दूसरे वाधुनिक बांकि दोपके सामने अपने दोषी बयत मन्पता मास होती है, पपरि ऐसा माननेको कोई पका नहीं, फिर मी स्वमासे इस ऐसा ही माझ्म होता है। ऐसा होनेपर मी किसी विशेष अपरानाका तय यातक हम या पार करते हैं ताक पना बास्मामें होमो मेंगे । हम और तुम्हारे सगमें यनेबारे किसी भी मुमुक्षुको यह बात कुछ मी निपारने योग्य माश्य माश्म होठी (२) यह स्पाली मी मही अस्पागो मी नही । पा एणी मी नहीं, बौतरगी मी नहीं । बपना क्रम नियत करो। उसके चारों घोर नित मूमिका रक्सो । या बो दर्शन आता है, स्पा र पा चहा माता का विचार पुनः पुन करते हुए मूर्या वा पाती है। संतोंने यफ्ना कम नहीं होगा विहोंने छोर पिया है, उन्होंने परम समाविको पाया है सवफ्ना अति अति दुर्सम है। बानेके बाद सबका मिटना कठिन है। सतपनेको विकासाबारे अनेक । परम् दुर्गम स्वफ्ना तो दुसम है। । सापोपशमिव बानके निकट होते हुए क्या देर गती! (१) पदि इस मापने उस माविक परिणामको पौण न किया तो प इसी मममें प्रस्पक्ष इसका बेगवेगा। ४०९ बई पैर परी १२ जो मुमधु बार गृहस्पके पबहारमें पता हो उसे पहिले तो मामामें बसा नाविका मूठ स्पारित करना चाहिये। ही वे उपरेश बारिकी निपता ही होता है। दम्प वादि फै। मने बारिम सांगोलंग म्पापसम्म पनेका माम माति है। इस मांतिडे गोपवे हुए प्राण गानेको दशा पानेपर स्पाग म्प सबै सरूपमें प्रगट होते है और यही पारको सपुरम बनके तपा महासके अलत सामर्प, महाप और पस्पको समझाता है और इसे सब सिर्पोर निगमपमे प्रापि परमेका मार्ग सर सिद्ध होता है। माप करके तुमें दश, घर संग भादिका विपरीत पोग यता है। इसलिये बारमार, प्रत्येक पडों और प्रत्येक कार्पम सारपानसे माति नादि धोम प्रति हामा योम्प है। तुमारी तर यो और कम्पागको माधा रखता है और रिसे प्रत्यक्ष सपुरका थप है, उसे प्रपम भूमिमी पर मति परम पार है।मो गौर पेमा मानता है कि उसे सपुस्यका विषय इमा उसमें परि अर दो ईमान प्रातन्य महो भौर प उसमे कम्यागसी पाचना करे, तथा बाल करे, तो पर ४१,४११, ४११, ४११]पिपिप पर मावि संपा-२७यों वर्ष ७५ या निमय केवल सत्पुरुषको ठगनेके ही बराबर है। पपपि स्पुरुष वो मायक्षारहित है, वर्षात उसका सगा पाना संभव नहीं, परन्तु इस प्रकारसे प्रकृति करनेवाले जीव बाप अपराधी रोते हैं। इस वातपर बारम्बार तुम्हारे पा तुम्हारे समागमकी इठा करनेवाले ममक्षुओंको एन रखना चाहिये। परमात पठिनी सरिये नहीं हो सकती, या कल्पना मुमुक्षुमोको महिसकारी और स्पाम्य है। ४१० पई, चैत्रदा ११ शुफ १९५० उपदेशको नाकांक्षा या करती है । उस प्रकारकी आकांक्षा मुमशु गौवको हितकारी है- नागृतिका विशेष त है। मों ज्यों बीतमें त्याग, पैगम्य वौर बामय-भक्तिका बल बहता पाता है, स्पो त्यो सपुरूपके बचनका भपूर्व और बहुत सरूम मासित होता है और बध-निचिके उपाय नमें से सिर हो जाते हैं। यदि प्रस्पा संपुरूपके चरणारषिदका सयोग पुछ समयता रहे तो फिर उसके वियोगमें मी स्पाग, बैराग्य और वामप मक्तिको बाम पारा यती है, महो तो मिथ्या देश, कम, सग बादिके संयोगसे सामान्य प्रतिके नीष, त्याग, वैराग्य बाटिके बसमें नहीं पा सकते, मयमा मद पा जाते है, अथवा उसका सर्वया माश हो कर देते हैं। ४११ बाई, पेशास मुदा १ रवि १९५० पोगवासिष्टके पानेमें घमि नहीं है। वारमाको संसारका सरूप कारामकी तरह बारमार प्रतिक्षप मासित एना करे, या मुमुक्षुताका मुम्ल्स स्मण है। योगवासिष्ठ बार मो मो मय उस मरमके पोषक है, उनके विचार करनेमें हानि नहीं है । मूड पात तो यह है कि गानको राम्प पानेपर भी जो उसकी बायत शिपिता है-दोगपन है, उसे दूर करना, उसे अस्पत कदिन माम्म होता है और बारे विस तबसे मी , प्रपम इसे हार करना योम्प है। ४१२ बई बास सरी ९ म १९५. मिस म्पबसापसे गोषको मान-निदा न परती हो, उस म्पबसायको पनि किसी प्रारम्पले पोगमे परना पाता तो उसे पर फिर पीछे एकर, 'मैं महान् मपंफर हिंसापुत दुए कामको किया करता!', इस प्रकारसे फिर फिरसे विचारकर और ' बाबमें रोपनसे ही प्राप करके मुझे या भतिवध है', पर फिर फिरसे नियप करके, मितना बने उतना म्पसायको कम करते हुए प्रति , तो पोषका सफर होना संभव है। ४१३ बाई, वैशाप सु. रवि १०५० यहाँ उपाधिरूप प्पबहार बता है। प्राप बाम-समापिकी स्थिति यती है ना मी पर रके प्रतिवयसे एमेकी बात बारम्बार स्पतिमें मापा करती है। उस प्रारम्भको निति होनतक तो म्पारका प्रतिबध पना योग्य है, इसलिये समविचक स्पिति पता है।
भीम पत्र [४५ पोगवासिष्ठ बादि ग्रंथका बाँचम होता हो तो हितकारी है। निनागममें 'मिन मिच' वाहमा मानकर परिणाममें मर्मतमात्मा' को और बेदांतमें उसे मिम मिम 'काकर यो सत्र चतन-सवा दिखाई देवी पर एक ही बास्माकी है, और मामा एक हो।'ऐसा प्रतिपादन किया गया है। दोनों ही बाहें मुमुसु पुस्पको महर विचार करने परम वौर पपाशकि इन्हें विचारकर निमय परमा योम्प है, यह मात निसन्देह है। परन्तु यमता प्रथम वैराग्य बौर उपशमका का जीब जरूपसे न बाया हो, तबतक उस विचारसे विध समाधान होने के बदले सभ्य पता ही होती है, धौर उस विचारच निर्णय मही होता । तपा पिच विशित होकर पा में पमार्पहासे राम्प उपचमको पारप नहीं कर सकता । इसलिमे हानी-पुरुपोन यो इस प्रश्नका समाधान किपा कि उसे समष्टनेमिये स बोयो परम्प-उपाम और ससंग बम्बो हामें वो मसाला हो योम्प है-इस प्रकार विचार करके बाबमें पैरमय वादि मानेके सापोंका वारापन करके किये निस्प प्रति विशेष पुरमार्य करना योम्प है। विचारको सपदि दोनेक पचात् वर्षमानस्सामी मैस महात्मा पुरुषने भी फिर किरसे चार किया कि इस बार बनादि काम्से चारों गलियों में बनवान्तबार मना-मरण रोनेपर मी, मी या मम्म-मरण मादि म्पिति धाम नही रोती। उसका वर किस प्रकारसे सप करना चाहिये । और ऐसी कौनसी भूप इस नौवको यती गई है कि मिस भूमका महतक परिणमन होता हास प्रचारसे फिर फिर बफ्त एप्रतासे सबोधके वर्षमान परिणामसे विचार करते करते गो मा मगवान्ने देखी है, निगममें बगर मगह बोहै, मिस भूमको समझकर मुमा गोल उससे ररित हो सके। चारको मूख देख्नेपर हो भनत विशेष लगती है, परन्तु सबसे परिम जीवको सन ममेकी बौसमूत मूम्का विचार करमा पोम्प है मिस मूक पार करनेसे सब मका विचार होता है, मोर बिस मूमे दूर होनेसे सस मूळे दूर होती है। कोई बात कानिट माना प्रकारको मूका विचार करके उस मूम्से फूटना चो पो मी पर करना योग्य है और उस प्रकारको वमेक भूगेसे छूटनेको मात्र हो म्से झूटनेका सारा कारण होता है। सबमें जो बात बताया गया है, शान प्रचारसे विचार करने पोप है एक उपदेश- बाम और दूसरा सिथतिमान । बम्म-मरण बादि नेण्यक इस ससारका स्पा करमा हो पोप है। बनिस्प पामें किसकी पुरषको सपिन रमी बाहिपे। माता, पिता, स्वपन बार सका स्पस्म समय होनेपर मी पा सांप उस जगालका ही माम्प म्पिा करता है, यही उसका बनिक । प्रत्यक्षारसे इस संसार विविध तामस्म माम रोते हुए भी मूर्य भाव उसमें नियंति भारताहै, परिह बारम बार संग पेसा बना हेतु है,स्पादि शिमा उपमान है। बामाका बस्तिव, निस्पता, एक अपना बनेका बबादि मात, मोध, बारमा सब प्रकारको समस्या पदार्प वीर उसको नास्पा स्पादि पातको निस प्रकारसे तोसे सि विमा माता, ति बान है। मुमा बानको प्रपम तो दांत और मिनगम न समानामेसन सपरेशम प्राप्तिके मेहरमा पाहिप क्योति सितमान जिनागम और तमें मिम मिमा दिसाई देता है। और उस मिनताको रेकर ममा मात्र परेशा--0 करता है, और पा शंका विचमें मसमाधि ४१५] विविध पद मादि संप्रह-२च्चों वर्ष करती है। इस प्रकार प्राय होना योग्य हो क्योंकि 'सिद्धांत-बान' वो भावके किसी भस्पत र क्षपापशम शानेपर गौर सहरुके वचनको माराधनासे उस्त होता है। 'सिात-बानका कारण रदेशबान' है । पहिले सद्गुरु षपका स्वाबसे नीवमें इस उपदेश-भानकार होना पोप है, जिस श-पानका फल राम्य और उपशम ह । सग्य और उपशमका मह बनेसे गांवमें सामायिक पशमधी निर्ममता होती है, और यह सहज हमें सिद्धांतमान होनेका कारण होता है। - बीबमें बसंग-दशा आ जाय तो वारमस्वरूपका समधना सपा मुण्म हो जाता और उस ग-दशाका हेतु सम्प-उपशम है, जो फिर फिरसे बिनागममें तथा वेदांत नादि बहुससे बोंमें कहा गया है-विस्तारसे गया है। इसलिये नि सशपहपसे वैराग्य-उपशमके कारण वासिष्ठ वादि समप विघारमे चाहिये । हमारे पास वानमें किसी किसी प्रकारसे तुम्हारे परिषयी श्री “का मन रुकता था, और उस की रुकावट रोना सामाविक है, क्योंकि प्रारम्भके वशसे हमें ऐसा न्यबहारका उदय यताकि नारे विषयमें सान ही शका उत्पन्न हो माप, भौर उस प्रकारके म्यवहारका उदप देखकर प्राय हमने सभी सगमें क्रिक-मोकोत्तर प्रकारसे परिचय महीं किया, जिससे लोगोंको हमारे इस म्पर के समागमका AIR करनेका कम असर उपस्थित होमसे अपना भी " से क्या किसी दूसरे मभुसे यदि हमने कोई भी परमार्पकी मात की हो तो उसमें परमायके सिपाप कोई दूसरा कारण नहीं । इस संसारके सिपम और मर्यकर समपको देसकर हमें उसकी नितिके विषपमें बोध याद, यस मापसे जीप शति भाकर समाधि-ग्याई है वह योग इस जगदमें किसी भगत पुण्यके गसे ही जीवको प्राप्त होता है-ऐसा मामा पुरुष फिर फिरसे कर गय है । इस पुपमाळमें धकार प्रगट कर बोधका मार्ग वापरण-पास होने जैसा हो गया है। उस कासमें हमें देह-योग नडा, इससे किसी तर सेद होता सिर भी परमार्थसे उस पेदफा समाधान किया है। परन्तु स देर-पोगमें कभी कभी किसी मुमुभुके प्रति छोक-मार्गक प्रतीकारको फिर फिरसे करनेका मम हाता विसका सपोग तुम्हारे मार मी के सबमें साल ही हो गया है। परम्नु उससे तुम हमारे पनघे मान्य करा, इस मामहके लिये पुन मी करना नहीं आता। केबस हनफारी मानकर हो उस विका माह पूजा करता , अपना cart-परि इतना ससपे तो किसी तह सगका पर मेना भरते। से बने से जारका अपन दोरके प्रति स करके दूसरे जोर प्रतिनिटि पर माधि करमा और मिससे यापासमका मापन 1 सा घरमा, यह स्मरण करने साम्य महिनी माना (२) एक पम्पमें पद सब सिम सर पता है।
भीमद् परचन्द्र [पर बर्मा शास यी ७, रवि १९५ प्राय मिनागममें 'सबीवरति' साधुको प-समाचार भावि जिसमेकी बात नहीं है, बार यदि सो सनिति मिका बकर मी सामु पत्र समापार आदि बिसना चाहे तो पर अतिचार समान आप । इस पप साधारणतया धासका उपरेश है, और यह मुख्य मार्ग तो योग्य हो मागम होगा। कर मी जिनागमय रचना पूर्वापर वषिम्य माझ्म होती है, और उस अविसरको रक्षाके विपे पर- माचार बाकि हिसनेकी वाचा मी किसी प्रकारसे मिमागममें है। उसे हमारे पिच्के समाधान मके लिये यहाँ संश्चपसे विसवा ।। दिनमगवान्को नो नो मात्रा में ये सब बाबा, मिस तय सर्व प्राणी बत् जिनकी नामाके कम्याणके पि छ । उम सबको, या कस्पाम प्राप्त हो सके, वीर जिससे मा कम्पाण परिगव हो, क्या बिस तब उस फस्याणकी रक्षा की जा सके, उस सर की गई है। परि मिनागममें को ऐसी बाबा की हो कि बाबा अमुक अम्प, क्षेत्र, काठ और मारके सोग न पस सकती ईमात्माको बापक ती पे तो यहाँ उस मावाको गोल करके उसका मिपेप करके--प्रतीपकरने दूसरी बाबा की है। बिस समिति की है ऐसे मुनिको सचिरति करने के समयके कासरपर "सम्माई पाण: बाप पचरसामि, सम्पाई मुसालाप पखवामि, सम्पाई चाणाई पचासामि, सपा मेहुमाई पर सामि सपाई परिग्गा पसमि' इस तश्पके पानीको बोनेके सिप कहा। वर्षात् सब प्राणाविपासे में होता,'सर्व प्रकारके सपापा से मैं निरत होता !" सर्व प्रकार मचायानसे मैं निबच रोता , 'स प्रकार के मैमुनसे मैं निाच होता,' भौर सर्व प्रकारके परिपासे मैं नित होत्य, (सब प्रकारके रात्रि-मोउनसे दपा दूसरे उस उस तरह के कारणों में मित होता इस प्रकार उसके साथ और भी मासे त्यागके कारण समाने चाहिये), ऐसे यो गमन करे ये सर्पविरतिको भूमिका के सण को सिर मी उन पाँच महातों-मैथुन स्पागको गोरकर-महामि पा से मगबन्ने दूसरी वाहा की। जो बाबा पपनि प्रत्पा- रूपसे तो महावको कापित् वाधक माम ऐ परन्तु ज्ञान-पिसे देख्नेसे वो प पोषक है। उदाहरण के लिये मैं सब प्रकार के प्रामात्तिपातसे निात तास तय पासाण होनेफर मी मतीको पार करने से प्राणातिपाझप प्रस्गको बाबा करनी पड़ी है। मिस बाधाका, पदि लोकसमुदायका विशेष समागम करके, साधु बायपन करेगा, वो पच महाक निर्मड होने समय बापगा—पर गानकर भगवान्ने नदी पार करने की बवा दोन मात्रा प्रमझ प्राप्मात्तिपावस्म होनेपर मी पाँच मात्रको रक्षाका अमाप खोनेसे प्राणाषिपातको ननिस्म स्पोधि पाग महावाको खाका खम्म यो कारण है। प्राणातिपातको मिरतिका हो। पपपि प्रागति- पात होनेपर मी नदी पार करने की प्राणातिपातस माता होतीफिर मी 'सब प्रकारले प्रामा- तिपाठसे निरत होता इस पापको एक बार पति पाँचती है। परन्तु या पति फिरसे विचार करनेपर तो रसको विशेष प्रपाले हिये । मास रोती है। तय हो कि रिपे मारे। ।
४१४] विविध पम मादि संप्रा-ज्या वर्ष 'मैं परिग्रहको सर्पपा निधि करता है, इस प्रकारका त होमेपर भी बस, पात्र और पुस्तकका संबंध देखा मावा है- मंगीकार किया हो माता है। उसका, परिणाकी सर्वया निरनिके कारणका किसी प्रकारसे रक्षणरूप होमेसे ही विधान किया है, और उससे परिणाममें मपरिह ही होता ।। मूम-रहित भासे निस्य बाम-दशाको पति होने के लिये ही पुस्तकका बागीकार करना बताया है। सपा इस कामें शरीरफे संहननको हानता देसकर पहिले वितको स्थितिके सममात्र बनेके लिये ही पन, पात्र लादिन प्राण करमा बताया है, बर्षात् जब बाम-हित देखा तो परिमह रखने की बाधा दी है। यपि रियाको प्रतिको प्राणातिपात कहा है, परन्तु भाषकी पिसे इसमें मम्सर है । परिमा दिसे नपत्रा प्राणाविपात बुद्धिसे इसमेंका कुछ भी करने के लिये कमी मगवान्ने माहा नहीं दी । मगवान्ने यहाँ सर्मया निरपि पाँच महातोंका उपदेश दिया है, वहाँ भी दूसरे भाषक हितके लिये ही उनका उपदेश और उसमें उसके स्यागके समान दिखाई देनेगा अपबादको मी नाम-हितके लिये होकना है-वर्षात् एक परिणाम होनसे विसका स्पाग कहा है, उसी क्रियाका प्ररण कराया है। मैपुन-रयागमें गो अपबाद मही है, उसका कारण यह है कि उसका गग-पके बिना मग त्री हो सकता और राग-रेप मामाको अहितकारी है, इससे भगवान्ने उसमें कोई भपवाद नहीं कवाया । नदीका पार करमा राग-रेपके बिना ऐ सकता है। पुस्तकका प्राण करना मी राग-पके बिना ऐना संमत्र है, परन्तु मैथुनका सेवन राग-पके बिना नहीं हो सकता। इसलिये मगवान्ने इस मतको मफादरहित कहा है, और दूसरे प्रोमें बारमाके हितके म्यि ही अपवाद कसा है। इस कारण निस ज्या बीनका-संयमका-रक्षण ऐ उसी तय करनेके छिपे मिनागमकी रचना की गई है। पत्र मिसने अपना समाचार मादि कामेका मो निपेष किया है, उसका भी पही है। निस्से मेक-समागमकी राशि म हो, प्रीति-नीतिक कारणको पशि न हो, सियों भादिके परिचममें पानेका प्रपोजन न हो, संयम शिपिस न ऐजाय, उस उस प्रकारका परिग्रह बिना कारण ही स्वीकत म रो पाप-इस प्रकारके सम्मिलित वर्मत कारणों को देखकर पत्र मारिफा मिपेष किया है, परन्तु मामी अपवारसरित है। पैसे परकम्पमें कना-भूमिमें विचरमेकी मना की है, और माँ क्षेत्रको मर्यादा बाँधी है परस्त पान, दर्शन भौर सयमके कारण यहाँ मी विचरनेका निपान किया गया है। इसी वर्यके उपरसे यह माश्म होता है कि यदि कोई हानी पुरुष र पता हो उनका समागम होना मुरिका हो, और पनि पत्र समाचारके सिपाप दूसरा कोई उपाय न हो तो फिर बारम-हितके सिवाय इसरी सब प्रकारको मुनिका स्वाग करके उस प्रकार के पानी-पुरुपको भातासे मपया किसी मुमा-सरसंगाको सामान्य बाबासा करनेका दिमागमसे निषेध नहीं होता, ऐसा माश्म होता है। इसका कारण पर है कि वहाँ पर समाचारके बिसनेसे बाम-रतका नाश होता हो वही उसका निषेष किया गया है। वपा नाँ फा-समाचार न होनेसे बारम-डतका नाश होता थे, यहाँ पत्र-समाचारका निषेध किया रो, पर मिनागमसे बन सकता है या नहीं, यह भब विचार करने योग्य है। इस प्रकार विचार करनेसे दिमागममें साम, दर्शम भौर सपमकी रक्षाके सिये पर समाचार पारि म्पधारने मी साकार करनेका समावेश होता है। परन्तु किसी काम के लिये, किसी महान् -- । भीम प्रसाद प्रयोमनके छिपे, महास्मा पुरुषों की बाबासे अपना केषर नीयके करपाणके उदेश्ससे हो, उसका किसी पात्रके म्पेि उपयोग बताया है, ऐसा समझना चाहिये । निस्पति गौर साधारण प्रसंगमें पर समाचल पारि प्रहार करना योग्य नहीं है। हाला-पुरपके प्रति उसको बालासे निस्पप्रति पत्र बादि प्यपार करना ठीक है, परन्तु सरे मैषिक बोरके प्रपोगनके पिये तो पापा निसिब हो माम होता है । फिर पास ऐसा वा गया जिसमें इस तय करनेसे मी विषम परिणाम जाना संमब । क मार्ग प्राति करनेवाले साधु यो मनमें या म्पबहार-मार्गका मारा करनेवाला भासमान होना समय है । तथा इस मार्गके प्रतिपादन करमेसे बमुझमसे बिना कारण ही फा-समाचार मादिन चार होना संभव है, जिससे साधारण सम्प-स्पागकी मी हिंसा होने लगे। पा बानकर इस व्यवहारको प्राप मौ' से भी नहीं करना चाहिये, क्योंकि पैसा परमेसे मी म्पक्सायका बाना ही संभव है । परि तुममें सर्व पचासाण हो, तो फिर को पत्र म जिसनेका साधुने पचासाम दिया है पनही दिया जा सकता, परन्तु पदि दिया हो तो मी शनि मही समानी भारिपे । या पचवाण मी पदि दाना-पुस्पको बाणासे रूपांतरित दमा रोता तो हानि न पा, परन्त पह को साधारणस्मसे सपांतरितावा है, पर पोप महाँ एला । या मूस–सामानिक पदासाग- की म्पासा करमेय वासर नही मोर पसाणको बाकसरपरस्तु उसे मी सापारण- वया वफ्नो स्से तो गम्ना योग्य मही-स समय तो इस प्रहमसे ही या विचार रहना चाहिये। मग गुणों के प्रगट होनेके साधनमें विरोध होता , तब उस पचरसाणको पानी-पुरुपको मापासे अपना मुमुक्षु बोको समागमसे सदर सरूपमें फेरफार करके रास्तेपर साना चाहिये पोंकि बिना कारणले छोमि शका पैरा होने देनेको कई बात करमा पोप नहै। ए पामर गांव दूसरे गाक्को बिना कारण हो हितकर होता है-स्पादि बहुतसे कारण समझकर पातक पने पत्र बादि स्मारका कम करना हो योम्प है। हमारे प्रति काचित् भैसा म्पहार करना में हितकर है, इसलिमे करमा पोरम मास हो तो उस पलो मी भी जैसे किसी सससंगीसे अपारी मेगना, मिस्से 'हान पकि सिवाय इसमें कोई दूसरी बात नही,' या उनको साथी मारी बामाको दूसरी प्रपरके पम्पसारको करनेसे रोकनेके लिये संभव हो । मेरे बारके अनुसार इस पात, भी.रोप म समझें । कदाचित् उमें विरोष माश्म होता तो किधी प्रसगपर हम उनी इस सत्रको निर कर देंगे, फिर मी तुमे प्रापः लिप पत्रम्पार करमा पोम्प नहीं। इस नये मना। प्राप शपका वर्ष देशल इतमा,प्रिससे हितकारी प्रसंगमें पत्रका मो कारण बताया गया है, उसमें बाधा न वापे । विशेष पम्पबहार करनेसे यदि प्रशाला गो तो भी डोक म्पपहारमें बनाया मम होगी। केरठ जिस तर प्रसंग प्रसंगपर ओबामनीतापके ये से उसम चिपमा भार उसकी दो बिन्ध करनी पीप हमारे प्रति मिसी पान-सममि पर छिनेकी परिददारी तो मा mir *से जर ही मिामा, निसले में गुम ग्राम बनेर बाला उपस्थित हो। ।
विषिष पत्र मावि संप्रह-यावर्ष H तुपारे श्री को पत्र मिसनेके विषयमें पर्चा, पायपि योग्य नही हुवा, फिर मी में परि ई प्रायविच दें तो उसे हे ना, परन्तु किसी बान-बाकि स्वय लिसमेके बदमे तुम उसे मिलाने में ठिान करना चाहिये, ऐसा सापमें पपापोग्प निर्मठ बंत करणसे काना योग्य है-गो बात फेला रित करनेके सिप ही है। पर्युषण मादिमें साधु दूसरेसे मिसाकर फा-म्यपार करते हैं, जिसमें रित पैसा तो यपपि पोरा ही होता है, परन्तु पापी पठ मानेके कारण डोग उसका मिपेष करते । तुम उसी तर उस रूबीके गनुसार बाचरण रक्सोगे, तो मी हानि नहीं है-मिससे पत्र मिसानेमें वरचन न हो और लोगों को मी संदेह न हो। हमें उपमाको कई सार्थकता नहीं। केवर मारी पित्तको समाषिके म्पि ही में मिसनेका प नहीं किया। बम्बई, शास बदी ९, १९५० सूरतसे मुनिमी का परिने एक पत्र वाया था। उसके प्रत्युचरमें यासि एक पत्र मिला उसके पचात् पाँच म दिन पहिले उनका एक पत्र मिग पा, मिसमें तमारे प्रति जो पत्र किसना पूषा, उसके सबध होमेवाली ठोकपी लिपयक बावसी बातें पी । इस पत्रका उत्तर से मिस दिया है। यह संक्षेपमें इस तर? "प्राणान्तिपात बादि महत सर्वस्यागके म्पेि हैं, वर्षात् सब प्रकार के प्राणातिपातसे मिश्र सब प्रकारके मृपावासे निार होना–स तय साधुके पाँच महारत होते है। और जब सामु बाके अनुसार पसे, तब यह मुनिके सम्प्रदायमें पता है, ऐसा मगवान्ने कहा है। इस प्रकारसे पाँच तोंके उपदेश करनेपर भी गिसमें प्राणातिपात कारण है, ऐसी मौके पार बगैय करमेकी वाचा नेममगवान्मे दी है। इसलिये कि जीवको मती पार करनेसे जो बप होगा, उसको अपेक्षा क्षेत्रमें निवास करनेसे बनाम बध होगा, और परपरसे पाँच महास्तोंकी सानिका असर उपस्पित |-या देसकर-निसमें उस प्रकारका प्रम्प-प्राणातिपात है, ऐसी मौके पार करनेकी माया वनमगवान्ने दी है। इसी तरा कम पुस्तक रसनेसे पयपि सर्वपरिमा-विरमण मत नही ग सकता, मी देहको साता के लिये स्पाग कराकर भारमार्पका साधमा करने के लिये देहको साधनरूप समसकर, स सम्पूर्ण मी दूर नेतक बिनभगवान बनके निस्पृह सबका और विचार-तको दि होने पुस्तकके रसनेका उपदेश किया है । मर्यात सर्वत्पागमें प्राणाविपात तपा परिपाका सब प्रकारसे कार करनेका निषेप रोमेपर मी, इस प्रकारसे गिनमगवान्ने बगाकार करने को मवा दीपा न्य रिसे देसनेफ्र कहाचित् विषम माम होगा, परन्तु निमभगवान्ने तो स्म हो शादोनों पात गावके फम्याणके लिये ही कही गई रे । मिस तव सामान्य बाबका पाण हो से चार Fanपरम्तु इस प्रकारसे मैथुन-पाग प्रवमें नपाद मही करा, क्योंकि मैमुनका सेवन गग- के बिना मा समता, पर जिनमगवान्का अभिमत है। वर्षात् राग-रेपको अपरमार्थतप मानकर अपवाद के ही मैयुम-स्पागका सेवन बताया है। इसी तर गृहकापसूत्रमें नहाँ सायुके मरण मीमद् पम्पन्न [पल ४१५ करनेकी भूमिका प्रमाण काहाँ पारों दिशामों में जमुक नगरतकको मर्यादा बताई है, फिर भी उसके पश्चात् कनार्य क्षेत्रमें मौ द्वान, दर्शन पौर सममकी दिके पि विचरण करने वार स्वापा गया है। क्योंकि वार्य-मूनिमें यदि किसी योगरा हामी पुरसका समापदं विचरमा न हो और प्रारम्प-पहासे बाला-पुरुषका कनार्य-मृमिमें ही चिरना हो, तोहाँ बानेमें भगवानकी प्रतिपादित बाबा भैग मही होती। इसी प्रकार परि साधु प-समाचार बादिका समागम रस्से पो प्रतिबंधको दिशे, सभरण मगणान्ने इसका निवेश किया है। परन्तु मा निषेध बाना-पुरुषके साप किसी उस प्रकार के पार समाचार कारभेमें बवादरूप माश्म होता है। क्योंकि निकामरूपसे बानका बाराधना के लिये ही हानांके प्रति पर समाचारका म्यार होता है। इसमें समा कोई संसार-प्रयोजनच उदेश मही, बल्कि उल्टा स्मार-प्रयोपन र होनेका । उदेश। तपा संसार र करना इतना ही तो परमार्थ है। मिससे बानी-पुरुपी मासे सपना किसी सगी मनकी मासे पा समाचारका कारण उपरिक्त हो तोप संपमके किमी, पा नही कहा था सस्वा । फिर मौ तरें साधुने यो प्रयास्यान दिया पा, उसके मंग मेध दोष तुमारे ही सिरप बापण करना योग्य है। यहाँ परमाणक सस्पका विचार मही करना है, परन्तु तुमने उमें घो प्रगट विश्वास निगया है, उसके मग फरमाया त है। परि उस पचासाणके सेममें तुम्हारा यथायाम्प विच नहीं था, वो तो गाम्ना हो योम्प न था और यदि मसी मेक-दमासे पैसा मा तो फिर उसका भंग करना योगय नहीं और पवि मग करनेका जो परिणाम है प्रमंग न करमेकी पेक्षा मामाच शेप हित करनेवालपो, वो मी ठसे सेना भंग करना योम्म नही। क्योंकि माल रगप वपना भानसे सानवपरापी होता है उसका AIR क्रिया अगा विवादित विचार बालबार विपर्पय होता है। इस कारण तुमने किस प्रकारसे उस पाशाणका मंग किया है, पवमान योम्प, और उसका प्रापयित किसी मी तयम्मा पाप है। परन्तु किसी तराको संसार-दिसे पा कार्य नहीं मा, वीर ससार-मके प्रसंगसे पत्र-समाचारकेम्पपा करनेकी मेरी मही, तपाइयो पत्र बाविध मिसनारामा मात्र किसी जाप मापात्र मातके विषपमें है। और पदि गर न किया गया होता तो मा एक प्रकारसे कापाणरूपी पा, परन्तु सरी प्रकारसे पित्ती म्पमता सत्पन्न होकर बतरमें मेश पोता पा, सम्मेि जिसमें कुछ संसार-प्रपोगन मही, रसा पण सम महकेस बोके हितका ही प्रसंग है-ऐसा समगर इसका बिना एना। मारामके पदयामा पासण मी मेरे इतक छिपे पा मिस्से में किसी संसारी प्रमोग्नमें म पर गाड़ी और उसके लिये वनका उपकार पा । परन्तु मैने संसारिक प्रयोगनसे प कार्प महा दिया है-आपके सपा के प्रति तोक्ने रिपे पर कर्म महाकपा है। तो भी पर एक प्रकारसे मय भूमी या उसे माप साधारण प्रापयित्त देकर घमा करना योम्पो।' पपण मादि पमि साधु ग भातकसे मारको नाम पत्र बिताते हैं उसके सिपप किसी दूसरी वयसे वर प्रतिमा की गत्प, और बाल-पर्धा किलो नाप तो मी बाबा मही स्यादि मार लिया है। तुम मी उसे पा इस फो परफर से श उत्पम म ऐसे करना । किसी मी ४१५] पिपिप पर मादि सपा-२ज्यों व २८१ प्रकारसे मान करना ही भेष्ठ है । ऐसा न बने तो सहब कारणमें होगाच्या शिरूप ही परिणाम बाना समव है। गाँतक बने यदि प्रायधिवका कारण म मने वो म करना, नहीं तो फिर थोपा प्रायपित्त भेने में भी माना नहीं है। यदि प्राययित बिना दिये ही कदाचित् इस बातकी उपेक्षा कर दे तो मी चमारे अर्थात् साधु को पितमें इस बातका इवना पयाचाप करना सो योग्य है कि इस तय करना हायोम्प म पावव इसके बाद सापु भैसेको सममतापूर्वक पाकके पासस यरिको बिसनेवाला तो पत्र जिसचानेमें बापा न पचनी म्यवस्था उस सम्प्रदापमें पला करती है, इससे प्राप मेगनरोप नहीं करेंगे। और उसमें मौ पनि विरोष पैसा माछम हो वो हमें उस बातके लिये मी धौरव प्राण करना हो हितकारी है । लोक समुदायमें क्लेश उत्पम म होहाम्में इस क्षको पुकना पोम्प नहीं है। क्योंकि उस प्रकारका कोई यम्मान प्रयोजन नहीं है। श्री का पत्र पाँचकर सात्तिकर्पाला है। जिस पर मिहासाका सवढे उस तर प्रफन करना यह प्रपम भूमि है। राम्प और उपशमके हेतु योगमासिष्ठ मादि प्रयोंके फ्लनेमें नामा ना है। अनापासीका बनाया गुमा विचमाछा मामका प्रप सकागोकन करने योग्य है। हमार पित्त निस्य ससंगकी ही इच्छा करता है, परन्तु स्थिति प्रारम्बके गाधीन है। तुम्हारे समागमी माईपोंसे मितना बने उतना मन्पोंका भागेका हो, या मप्रमा पूर्वक करने यग्य है। और बिससे एक दूसरेका नियमित परिचय किया जाय उतना कम रकमा योम्प है। प्रमाद स मौका है। बई, पेशास १९५० ४१६ मनका, पचनका तपा कापाका म्यक्साप, गितमा समझते हैं, उसकी अपेक्षा इस समय शेप रहा करता है और इसी कारण तुमे पत्र बादि शिसमा मही हो सकता । म्परसापकी प्रियताको रस नहीं होती, फिर मी ग प्रास गुना करता है, वौर ऐसा माम होता है कि म्यबसाय अनेक प्रकारसे पेन करने योग्य है, जिसके मदनसे फिरसे उसकी उत्पत्तिका सांप र रोगा-निरत होगा | पर काषित् प्रामापसे उसका निरोप किया बाप तो मी उस निरोधहप के कारण, बामा नास्मस्पसे विससा परिणामको तप परिणमन नहीं कर सकती, ऐसा मगता है। इसलिये उस प्पपसापको जिस प्रकारसे वनिमहमसे प्राप्ति ऐ, उसे पेन करमा, पह किसी तए विशेष सम्पन मास्म होता है। किसी प्रगट कारमका मगजमान करविचारकर—परोक्षरूपसे पर बाते हुए सब पुरुषको केका सम्पपश्पिनेसे मी पहिचान छिपा नाप तो उसका महान् पर बौर पदि पैसे न हो वो सपको सब करने कोई मारमसमपी फछ मही, ऐसा अनुभव वाता है। प्रस्पच सर्वत्र पुरुषको मी पदि किसी कारणसे-विचारसे—मार्मजनसे-सम्पादि-समसे मी म माना ऐ तो उसका नाम-प्रत्यपी फल नहीं है । परमार्थसे उसकी सेना-असेबाम्से और कोई ) मे नहीं होता। इसलिये उसे कुछ समय कारणम्पसे धाना पुस्पो स्वीकार मही निपा, ऐसा माम शेवा है। प्राठि ८२ भीमा रामचन्द्र [.. पारसे प्रत्यक्ष पर्वमानों के छपरसे ऐसा प्रगट माश्म होता है कि यह एक विषम वा हुपम वा कपिपुग है। कामको परावर्तनमें दुकान में बनतबमा चुका है, फिर भी ऐसा एपमका कमी कमी हो माता है। बेताम्बर सम्प्रदायमें इस प्रकारका परंपरागत गात कसे बाती है कि 'यसपती पूगा' नामसे मार्यमुक्त ई-पाठ-पस प्रकार के इस पचमकाको ताकर बारिने बतका में मापर्यस्तस्म माना है, प बात हमें बात करके बनुमबमें बात है -साम्बार मामों ऐसी 0 मास होता है। कार ऐसा है। शेष प्रायः बनार्य जैसा है। उसमें स्थिति है । प्रसग, अम्प कार बार कारणसे सरह होमेपर मी योक मारप्से दो गिनने योग्य है । ब्रम्प, क्षेत्र, काग, बोर मारके मा- मन मिना निरापरस्मसे मिस वय माममात्र सेवन किपा आप उस तर पाबामा सेवन करती है, इस्प उपप या ४९७ नित्यनियम *भीमत्परमगुरुम्पी ममः सबेरे सटकर ईपिथिको प्रतिक्रमण करके रात-दिनमें गो पापके मध्य स्थानोंमें प्रापि fo, सम्पकान, दर्शन और पारिवसबंधी मो 8 बाप मा हो किसी भी गानके प्रति किपिमात्र मी अपराम किया । बानकर मा हो अपना मनमानमें हमाहा, उस समो पमा कराने के लिये उसकी निंदा करनेके लिये विशेष निंदा करने के लिये, बात्मा से उस अपरानका विसर्यन र निराम्य होना चाहिये (गनिमें सपन करते समय मो इसी तय करना पीये)। मौसपुरुपके दर्शन करके चार पीके सिपे सर्वसापच म्यापारसे निरत्त होकर एक मास्नपर बैठना चाहिये । उस समपर्मे " परम्गुरु की पाच मग गिनकर समाप मम्पपम करना चाहिये । उसके पपात् एक पकी कायोरसर्ग करके औसत्पुरुषोंके पचनों को कायोत्सर्गम बप करके मापिका पान करना चाहिये । उसके बाद नापी पर भविटी निको पागत करनेवाले पदों (बानुसार ) को बोलना चाहिये । माघी पहा " परमगुरु 'सादको कापोरसर्गरूपसे अपमा पारिप बीर ॥ रेष" मामको पाँच माममें फेरनी चाहिये । [राम मप्पपन करमे पोग्य सास-रम्परातक, त्रिपपरामपाल, हवाधा- रस बप्पामकम्पाम, पौगरिसमुबप, नवल म्याति धर्मरन्प, नकि, मामानुपाम, माननायोप, मोषमार्गप्रकाश, मोशमा, उपमितिमाप्रपंचपा बम्पाममार, मोबानंदमनकी पौत्री- सौमसे मारे स्वचन -१ १,५ ० ८,११,१३, १५, १५, १०, १९, २२ ] सात म्पसन (बा, मास, मदिरा सागमन शिकार, भोप परबी) का स्पा । क्षा मामिप मदिरा दारी, मालेरक पोरी परनारी पण सात विसन इसाई, परिव मूग धरमविर माई।
१८] विविध पत्र मादि समाह-वर्ष रात्रिभोजनका स्याग ! फुलको छोरफर स वनस्पतिका त्याग । कुछ तिथियों में विमा त्यागी स्पतिका प्रतिबंध । ममुक रसका त्याग । बामचर्यका त्याग । परिमा-परिमाण । [ शरीर विशेष । मादिके उपापसे, बेमुषिसे, रामा अपवा देव मादिक बलात्कारसे यहाँ बताये हुए नियमों में प्रति बनेके लिये यदि समय म मा बाप तो उसके लिये पचापापका स्पान समझना चाहिये । उस यममें सेन्ठापूर्वक म्यूमाधिकता कुछ मी फरमेको प्रतिक्षा करना | सपुरुषको बाबासे नियममें फार करनेसे नियम भंग नहीं होता | ४१८ बम्बई, पैशाम्य १९५० मातार्यकर भादि महारमाोंने ऐसा कहा है कि जिसे विपर्यास दूर होकर देह वादिमें होने की वारम-दुखि बौर भरम-मावमें होनेवाली देह-मुद्धि दूर हो गई है अर्यात् गो मारम-परिणामी | गपा है-ऐसे पानी-पुरुपको भी अबतक प्रारम्पका म्पसाप है, तबतक जागतिमें गना योग्य नयोंकि भवकाश प्राप्त होनेपर हमें यहाँ मी मनादि विपर्यास मयका हेतु माश्म माहै। माँ पार मघाती कर्म रिम हो गये है, ऐसे साबस्वरूप परमामामें तो सम्पूर्ण ज्ञान और सम्पूर्ण जागतिम्स विस्था ही यती है-अर्यात् वहाँ वनादि पिपासके नियामपनेको प्राप्त हो गानेसे वा विपर्यास्त सी मी प्रकारसे सदन से हो नहीं सकता, परन्तु उससे म्यून ऐसे मिरति बानि गुणस्थानक यने ले बानीको तो प्रत्येक कार्यमें और प्रत्येक क्षणमें मारम-बागति होना ही योग्य है । प्रमादके कारण बसने पर पूर्वका कुछ मरासे भी न्यून बान प्राप्त किया है, ऐसे हानी-पुरुषको भी मनतकाल रिभ्रमण मा है, इसलिये मिसको म्पहारमें बनासक मुदि है, उस पुरुपको भी यदि उस कारके प्रारम्पका उदय हो तो उसकी क्षम भणमें मितिका चिंतन करना, बोर नन मागको नागवि रस्मी पाहिये। इस प्रकारसे पानी पुरुषको मी महमानी भौतीपंकर आदिमे भनुपम किया है, तो फिर रिसका पर्गनुसारी भवस्पामें मी षमा प्रवेश नहीं हुजा, ऐसे गोषको तो इस सब म्यवसापसे विशेष विशेष नात मात्र रखना और विचार-बागति रसना पोप है-ऐसा बताने जैसा मी नही यता, क्योंकि पतो सामने ही समप्तमें पा सकता है। शानी पुरुषोंने दो प्रकारका बोध बापा–एक सिद्धांत मोप, और दूसरा उस सिदान-मोपके ओने कारणभूत उपदेश-र । पदि उपदेश-बोध गौरके बतरणमें स्थिर न मा तो उसे केषस मिस्त-मोषका मठे ॥ भत्रण हो, परन्तु इसका उ फल नहीं हो सकता । पदार्थक सिसमूत तरूपको सिवि-पोध करते है। पानी पुरुषोंने निष्कर्ष निकाटकर निस प्रकारसे अन्त में पाको नाना-ए जिस प्रकारसे वामाशय का पा सके उस पर पतापा है-इस प्रकारका जो मोम , उसे सिदो-बोध करते हैं। परम्त पार्यो निर्णप करनेके छिपे का मारापाप उसको बना विपर्यास मात्रको प्राप्त बुद्धि, म्पल-पसे वा मप्यतापसे विपर्यास मासे पाके सम्म निथप कर ली है। उस विपर्यास बुद्धिका बन पाने के ठिपे, पपात् पस्नुस्तमप गनने के रिपमें प्रवेश रोनेके लिये, जारको राप मोर उपशम मामके स्पचन पर है। बोर इस प्रकारे १८४ । भीम रामचन्द्र [पर ४१८ नो गो साधन नामको संसारका मयप पाते हैं उन उम साधनसंपी गो उपोश पारे, मह उपदेश-दोष है। पों पचार होना संमप है कि उपदेश-पोषकी अपेक्षा सिसात-बोधको मुस्मता माम होता है, क्योंकि उपदेश-पोष मी उसांके दिये है, वो फिर यदि सिति बोपन ही परिम अगाइन किया हो तो या बौको परिसे हो समतिका है। परंतु पर विचार ऐना मिया है क्योंकि उपदेश-मोपसे ही सिखातोपका सम्म होता है। जिसे पैरम्प-उपशम सबपी उपदेश-पोष नहीं पूषा, उसे बुदिका विपर्यास मात्र या करता है, और मातक दुमिका विपास भार ये बतक सियतका विचार करना मी विपर्याप्त मावसे ही संभव होता है । जैसे पमुमें गितमा मनिता गती है, ठम्मा ही पदार्पको मनि देसी और यदि उसका पटग अस्पत पमान हा तो उसे मूड पार्थ साई नहीं देता तथा निसको चमुच पपावत् सपूर्ण तेन विमान प पदार्थको पपायोम्प देसता है। इसी प्रकार निस भावको गा विपर्यास पुति है, उसे तो किसी मौ तप सिद्धात योष विचारमें मही वा समता । परत रिसको विपर्यास दुधि म हो गई है उसे उस प्रमाणमें सितिका बवगाहम होता है वौर निसने विपर्यास मुनिका विशेषरूपसे आप किमा है, ऐसे जागो विशेषरुमसे सियतका मागाहन होता है। गृह-कुटुमा परिमा वादि मारमें नो मरव-ममता-और उसकी प्राति-भप्राप्तिके प्रसगमें गो राग-रेप कपाप है, पी विपास भूमि है। वीर ब रम्प-उपाम ट्यूत होता है, पाँ मरता-ममता तथा कपाल मंद पर माते अमुकमसे नाश होने योग्य हो जाते हैं। गर-कुटुम्म बावि भावविषयक बनासक पुदि होना पैरमय है और उसकी प्रसि-सपातिक मिमितसे उत्पम होनेवाले कपापमोच में होना उपशम है । वर्षात् ये दो गुण निर्यास मुनिको पर्यापार करके सति पैदा करते हैं और पहावि भान वर्गल भाधि पदार्थको मस्या वैसी माश्म होती है-इस प्रकार सियतका विचार करमा योग्य है। वैसे भु परम बादि भतरपके दूर होनेसे ५ पदार्थको पपावत् देखती है, ससी तय नाता मादि पटसकी महत्ता होनेसे गावको बानी-पुरूपके को एसियत-मात-बाममात-विचार चासे रिसर्व दते हैं । रम्य वौर उपाम बानो प्रस्तासे पिक होता है। गा रम्प-उपशम मान न हो को दियेक पन्नान नहीं होता अपना पपातत्वक मही होता । यो बस नामस्मरूप है ऐसा देवमान मी प्रपम मोहनाप का सपके बार 10 प्रगट होता है और इस मातसे वो मर सिखात मतापापसा समयमें बा बापगा। फिर बानी-पुरुपों लिप शिक्षा बैराम्प उपशमका बोध कामेवाम देसनेमें जाती है। फिन मगवान्के बागमपर परि गम्मेसे यह पात विशेप म्पर गामी मा सकेगी ! सिमोष वर्षात् मिस बागममें पान नमाव पार्षका विशेहपसे स्किना फमन मा है उसकी मपेक्षा विशेषरूपसे वति रिशेपस्पते परम्प मोर उपशमका कपन किमा, पोंकि उसकी सिदि रो मामेके पचाए समें विचार मर्मत होती है और निम्ता सिसिप कपनको सहन ही में अपना पोरे ही परिजमसे बात कर सकता है अर्थात् उसको भी स्वामी सिदि होता है और पर ४१९] विविध पत्र मावि संग्रह-ज्यों व ३८५ वैमा ऐनेके कारण जगह जगा इसी मधिकारका म्पाख्यान किया गया है। यदि गीरको भारम-परि प्राकी विशेष प्रवृत्ति सती हो तो, और वैराग्य भौर उपशम हो, सो उसका मी मर से पाना समय है, क्योंकि भारम-परिमा मौराम्प वौर अनुपश्चमका मूठ है, बैगम्य बीर उपशमका काल है। भीठागसूत्रमें इस बारम बौर परिमाके बको बतानेके पश्चात् उससे निात होना योग्य है, पर उपदेश करने के लिये इस मापसे शिमगी को १ बीचको मतियानावरणीय कबतक होता है। बतक वारम वीर परिणाये तबतक । २ जीपको मुखबानावरणीय कबतक होता है। जबतक मारम भौर परिमारो तबतक । ३ गोषको अवधिदानावरणीय कबतक होता है। जबतक मारम मोर परिमा हो तबतक । . चौवको मन पर्यशानावरणीय कबतक होता है जबतक बारम बार परिसर से तबतक । ५ चौवको केवगानाबरणीय कबतक होता है ! वस्तक मारंभ भार परिमा हो तबतक । ऐसा करकर दर्शम वारिके मेद बताकर उस मासको सप्रामार बताई है कि में भावरण तबतक यते तक भारम और परिणाम होता है। इस प्रकार वारंम-परिमाका बल बताकर फिर वर्षापचिरमसे फिरसे ठसका महीपर कपन किया है। १ नावको मविज्ञान का होता है। बारम-परिमासे मिसच होनपर । २ गोलको भुतान कर होता है! वारम-परिपासे निडर होनेपर । ३ गीवको अवभिशान कब होता है। भारंभ-परिपासे निात होनेपर । . नापको मन पर्यवहान का होता है। भारम-परिमासे निात होनेपर। ५. जीवको केवमान का होता है'भारम-परिमासे निच होनेपर । इस प्रकार सर मेदोंको फिरसे करकर, बारंभ-परिहको नितिका फस, नहाँ पन्तमें केवमान है, माँतक लिया है। गौर प्रापिके फ्ठको समानतकके भावरणच तुमप फरफर, उसका अत्यत सबानपना बताकर, जीवको उससे मिस नेका हो उपश किया है। रिफिरसे हानी-पुरुषों के पचन चौत्रको इस उपदेशका से निपप करमेके लिये प्रेरणा करनेको इणा करते है फिर भी अनार मसासगसे उत्पम ई दुए इस आदि भाषमें मूह मा यह नीर बोर नही मास करता और उन मानोफी निति किये बिना भपका नितिका प्रपन किये बिना ही भेपकी क्या कर गो कमी मी सभव नही हुला, वर्तमानमें होता नही, और मरियमें होगा नही। बई,म्पेष्ठ मा ११ रवि १९५० ४१९ มัน ( विचमें उपार्मिक प्रसंगके छिपे बारम्बार ऐइ हाता है। पर इस प्रयाका उज्य इसमें बहुत समयता या कर तो समापि-दशापूर्ण हो या सुधमन ऐसा हो वामनपसे रममा पो, और मिसमें नर्पत प्रमा' योग रणना पाप है, उसमें समार-पाग जाय ।
मीमद् रामचन्द्र [ कापित पैसा न हो तो मी 'इस ससारमें किसी प्रकार समि-योग माश्म नही होता- प्रपत्र रसणीत स्वस्म रिसाई पाता है। उसमें कमी मी सहिचारवान चापको माप मी सपि मही होती, पा निषप हा करता है। बारम्बार ससार मपस्म भगता है। ममरूप भगनेका दूसराईवरण माम नहीं होता । इसका रेत फेला यही है कि इसमें इस बारमाहपको वप्रधान रणर प्रति होती है, उससे मान का पता है, और मिस्प पुनफाप पाने यया करता है। फिर मी बमा तो नवराय यता और प्रनिए मी या करता है। तथा उसी तराई म भनेक निक- म्पोसेबारे गमेपारे इस संसारमें हम बड़ी कठिमाईसे यथे। (२) बाम परिणामको विशेष स्थिरता होनके लिये उपयोगपूर्वक वाणी और कापाका सफम करना पोप है। । ४२० मोजमया बापा मुदी ६ रवि १९५ पौष और काया पदार्पहपसे कुदे दे । परन्तु जबतक उस दसे बीब कर्म मौगता , बतक ये दोनों सर्मषम्मसे सपा । मौपिनमगवाम्मे बीच और कर्मका सबैप सौर-नारके स पका तप बताया है । इस हेतु मी पो कि यचपि धीर और मौर एन स्पर दिखाई देते परन्तु परमार्पस हुदे दे।पापसे वे मिन बसिका प्रयोग करनेपर में फिर स्पट पुवे दे ऐ भाते है । उसी तय नीष और कर्मका सबगोकर्मा मुस सरूप किसी प्रकारको देवी, पौर नालको इन्त्रिप बानिय किसा करता मा देखकर या नीच है, ऐसा सामान्यरूपसे का माता है। परन्तु वान-शा बापे बिना गान वीर कापाको पो स्पर मिमता मह मित्रता बोलते बाननेमें मही बातीपरन्तु यह मिकता क्षौर-नीरको तयानके सस्कारसे , भिषा एक दम पर दो गाती है । पहाँ ऐसा प्रभावमा गया है कि पदि पानसे गार वौर कापाको मिम मित्र बाम किया है तो रिपेनाका सहन करमा पा मानना किस कारपसे होता है। फिर न होना पाहिये । इस प्रमका समाधान निम्न प्रकारसे से सूर्यसे तपा मा पत्थर सूर्यक वस्त होने के बाद मी बमुक समपतकम यता है, और पासे अपने सम्ममें भाता है। उसी ता पूर्वक काम-संस्कारसे उपार्जित किये हुए वेदमा बानि सापका इस सबसे बध है। पशिान-मासिका कोई कारण मि नाप तो फिर ग्रामका मास पाता है और उससे स्पा होनबाग माली कर्म नाश होता है पन्तु उस मानसे उपहार दनाम कर्मच-उस बालके सूर्यको तय, उसके मस्त होनो पपात्परमा चीनके साप साप पता। यो बापु कि नाव होनेसे में माता होना है। इतना भेद है कि पानी-पापको कपा मामनि मही होती, बार मम्मामें काप-पुीि नहीं रोती-उसके शानमें दोनों स्पास्मसे मिल मिम माश्म पाते है । मात्र से फापरको सूर्पक तापा सब पता ६ उसी तप पूर्वसंमभो पा ४२ ] विविध पर मादि संपा-यो वर्ष बनेसे वेदनीय कर्म मामु पूर्ण होनेतक भविषममालसे सहन किया जाता है। परन्तु उस बेदनाको सहन करते हुए नौबके सस्मपानका मग नहीं होता, वया पदि होता हो उस जीतके उस प्रकारका सहपमान ही सभव नहीं होता । बाम-बान होनेसे पूर्वोपानित वेदनीय कर्मका नाश हो ही माय, ऐसा कोई निपम नहीं है। वह अपनी स्थितिपूर्वक ही नाश होता है। फिर यह कर्म शानको भावरण करनेवाला नहीं है-सम्पावाघमावको ही वावरणम्य है। अपना तबतक संपूर्ण बम्पाबाषपना प्रगत महीं होता, परन्तु पूर्णधानके साप उसका विरोध नहीं है । सम्पूर्ण बानीको बारमा मम्पामाप है, इस प्रकार निबम्पसे भनुम है। फिर मी सबपसे देखते हुए उसका सम्पावावपना वेदनीय कर्मसे अमुक भावसे रुका हुवा है। पपपि उस कर्ममें हानीको वाम बुद्धि न होनेके कारण मम्पावान गुणको भी मात्र सबधका ही वापरण है-साक्षात् बावरण नहीं है। वेदना सान करते हुए जीवको थोड़ा मी चिपमभावका होना, यह वयानका क्षण है, परन्तु जो वेदमा है मामबानका क्षण महीं है-का पूर्वोपार्वित मानका ही फरक । वर्तमानमें वह केवल प्रारम्बमप है, उसको सहम करते हुए बानीको भविषमभाष पता है-मर्यात् जीव और काया मिम मिला ऐसा नो ग्राम-योग है पहबानी पुरुषको निर्वाध ही राता है। मात्र बिना विपममापसे ररितपमा हेपानको वाधक नहीं है, जो विषमभाव है यहाँ धानको बाधाकारको । रिसकी देहमें दह-बुद्धि और पारमा वाम-गुमि मिसे देहसे उदासीनता है और बाहमामें निसकी स्थिति है, ऐसे पानी-पुरुपको वेदनाका उदय प्रारम्पके सहन करमेरूप ही है, वह मये कर्मोका रे मही है। दूसरा प्रश्न यह है कि परमात्मस्वरूप सब जगह एकसा, सिन दौर संसारी जीव एकसे है, फिर सिसकी स्तुति रमेसे क्या कुछ बाधा पाती है।' पहिले परमारमतरुपका विचार करना पोग्य है । म्पापकरूपसे परमात्मस्वरूप त्रिी या नहीं, या बात चार करने योग्य है। सिद और ससारी बीच समान सतायुक सरूपसे मौर, यह बानी-पुरुषोंने बो निधप किया है, पर यथार्य है। परन्तु दोनों में इतना ही मेकि सियोंमें वह सचा प्रगटरूपसे है, और ससारी नायोंमें या सहा केवळ सवारूपसे है। जैसे दोपको वमि प्रगटरूपसे है, और परमक पत्परमें म सत्ताहमसे हैं, उसी तर यहाँ मी समझना चाहिये । जैसे दीपक और धकमक पत्थरमें जो पमि है, परमप्रितपसे समान है-म्पणिरुप (प्रगटहप) से वीर शहिप (सलाम) से मिम है, परन्तु उसमें वस्तुको गतिरूपसे भेद नहीं है, उसी तय सिदके गावमें गो चेतन-सचा है, महो सचा व ससारी नाबोंमें है, मेद केवछ प्रगट-अगटफ्नका है। पिसे बह रेवन सत्ता प्रगट महा ई ऐसे सारी भारको, उस सत्ता प्रगट होनेके हेतुरूप, प्रगट-सत्तायुक्त ऐसे सिनमगवान्का स्पस्म चार करने योग्य है-स्यान करमे योग्य है-स्तुति करने योग्य है। क्योंकि उससे मात्माको निम-सस्मक विचार-म्यान-स्तुति करनेका भेद प्राप्त होता है, जो वश्य करने योग्य है । वामसम्प सिरसरूपके समान है, पह विचारकर गौर वर्तमानमें इस बारमा उसको मप्रगरता है, उसका प्रमाण करने के लिये उस सिर-सरूपच विचार-प्पान-स्तुति करना पोम्प है। पह मे समठार सिकी स्थति परमेमें को मापा नहीं माश्म होती।
- . - ३८८ भीम रायमान [पा ४११ 'बामस्वरूपमें जगत् नहीं है, 'यह बात वेदात कही है, अपना ऐसा योग्य है। परन्तु बास जगत् नहीं है,' मर्प फेक्स नौरको उपशम होनेके लिये हो मानमे योम्य गिमा पा सकता है। इस प्रकार इन तीन प्रभोका सधिस समाधान मिला है, इसका मशेषरूपसे विचार करना । पुस विशेष समाधान करने वाला हो तो किसना। मिस परम्प-उपशमको पनि हो, हमें तो उसी तय करना चाहिये । (२) चैनदर्सन मिसे प्रकाराकता करता है, मेवात उसे म्पापकता करता है। -परमात किसी ४२१ बर्ग, वाचा पुरा म १९५. बबनपियोंका उपशम फरमेके लिये और निधि करनेके लिये पातको अभ्यास सतत बम्पास-करमा चाहिये, पोंकि बिना विचारके, बिना प्रपासके, उन रचियोंका उपम्म वा निधि किस प्रकारसे ऐ सकती है। कारपके बिना कोई कार्य होना समव महा तो फिर यदि इस जानने उन नदियों के उपशम अपना नादि करनेका कई उपाप न किया हो, वर्षात् उसका वमान से तो पर बात स्परस्मसे संभव है। बहुत बार पूर्वकामें पियोंके उपशमका तपा निधिका गोलने भमिमान लिया है परन्त उस प्रकारका कई साधन नहीं किया, मौर अबतक भी उस इममें गांव सपना कोई ठिकाना मही करता-वर्षात् वी मी उसे उस अम्पायमें कोई रस दिखाई नहीं देवा । तपा कापास मारम होनेफ्र मी उस कामासके उपर पैर रपकर, या बीच सपसम-नितिम प्रदेश मही करता । इस बात का इस दुर-परिणामी बानो बारम्बार विचार करना चाहिये- मी तरा विस्मरण करने योग्य नही। मिस प्रकारसे पुत्र बानि परिमें इस बातको मोह होता, ५ प्रकार सर्वपा मारत और निंदनीय है। परि जान जरा मी विचार करे तो स्पट माझ्म हो पाप कि इस गोदने किसी पुत्र- फ्नेको माना करके सपने माहित करने में कमी नही रस्मी वार किसी निवामान मानकर मी पैसा ही किया है और कोई न वातक वो पिता-पुत्र हो सका या देख नही गया । सत्र मते हो करते माते है कि पहसका पुत्र है पा सच पिता है परन्तु विचार करनेसे स्पा मामाल पर बात किसी मी कामें समझ नहीं। वनुपम इस मौषको पुनस्पसे मनमा, अपना उसे मनमानेको गि राना पा स्त्र चीनको पता है। और महता किसी मी प्रधरसे ससकी मिनार गीतको परमा योग्य नही। जो तुमने मोह मादिक मेव निवपमें हिस्सा, पदोनों भ्रमणकालमत्त विनम्नाका है।शाना-पुस्प मी यदि इस तर माचरण करे तो पानके उपर पाल बने पैसा है, पौर र सस प्रकारसे बाल-निद्रास होत है। इस मेवाचार करणे दोनोंको सर मान करना चाहिये । यह बात सापकामें हो गगृत करने योग्य है। मितमा को उतना तुम बपया इसरे मा समुगियोंको निपिका मायना चाहिये, पा भाषको रिलारी। - पत्र ४२२] विषिष पत्र मादिसंप्रह--२ण्यों यर्प ४२२ मोहमया, मापात मुदी ६ रवि १९५० (१) इस बाबने पूर्णकालमें जो जो साधन किये है, वे सब साधन बानी-मुरुपकी यात्रासे किये हुए माश्म नही ते—यह बात शकारहित माश्म होती है। यदि ऐसा हुआ हो तो गोषको ससार-परिम्रमण हो म हो । बानी-पुरुपको जो माहा है यह ससारमें परिभ्रमण करनेके टिये मार्ग प्रतिबंध के समान है। स्पोंकि निसे मात्मायक सिवाय दूसरा कोई प्रपोजन मही बौर मारमार्थ सिद्ध करके मी निसकी देर केस प्रारम्भके पशसे ही मोद पता है, ऐसे बानी-पुरुपको भाडा सम्मुख नानको केवळ बारमार्प, हो प्रेरित करती है और इस गीवने तो पूर्वकाठमें कोई बारमार्थ गाना ही महीपरिक उन्टा भास्मार्प विस्मरणरूपसे ही चम्म वाता है। यदि पवफ्नो कम्पनामाप्रसे वारमार्प साधन करे, तो उसस भारमार्य नहीं होता, बल्कि उन्टा 'मास्मार्थका साघम करता इस प्रकार दुरभिमान उत्पन्न होता है, जो चीनको स्सारका मुस्प हेतु है। जो बात सममें मी नहीं माता, उसे गौर यदि निरथक कम्पनासे साम्राकार सम्सी माम मे तो उससे कल्याण नहीं हो सकता । वपा इस जीतके पूर्वकारसे मन यते ए मी पदि पर अपनी कम्पनामाप्रसे से वात्मार्प मान मी हे तो उसमें सफलता म मिल, पर बात ऐसौगो विकुछ समझ ना सकती है। इससे इतना तो माश्म होता है कि बीचके पूर्वकाशन समस्त मिप्या साधन-कम्पित सारन दूर करनेके लिये अपूर्ण जानके सिवाय दूसरा कोई उपाय नहीं है, और उसका अपूर्ण हमारके मना उत्पम होना समय नहीं है, मार गह भपूर्व चार वर्ष पुरुषकी भाराधना किये बिना दूसरी किस तब गालको प्राप्त हो, पा विचार करते हुए बतमें यही सिद्ध होता कि बानी-पुरुपकी बाका माराधन, पा सिद्धि-पदका सर्वश्रेष्ठ उपाप है और मास इस बातको गीत मानने लगता है, मासे इसरे दोपोंका उपशम होना-नित होना शुरु गाता है। याबिनमगवामने इस औरके वानको नो जो म्यामपा की है, उसमें प्रतिसमय उसे बर्मत पर्मा म्पासापी पहा है, मीर पा बनार काममे बर्गत कर्मका ग करता वा माया , ऐसा कहा है। यह बात पथार्य है। परम्नु यहाँ बापको एक शाई है कि तो फिर उस तरह के अनंत कोक निरव करनके उिपे पाहे जैसा बसवान साधन होनेपर मी अनंत पात्र बीतनेर मी उसमे सम्ममा मही मिस सकता। इसन उत्तर या है कि परि सपा पेसा ही होता वैसा तुमने सिगारे मा समर है। परन्तु बिनमगवान्ने प्रवाइसे जीवको अनंत वर्मा का कहा- अनंतमाम्मे पर्मका कसा वा माता ., ऐसा कसा है। परन्तु पर नही करा कि मा प्रतिसमप, गो बनन कामतक भोगना पो ऐम कर्मको भागामी कालके रिपे उपान करता है। रिमा गौरी मोशामे इस मानाने दूर रमार, विचार करते हुए पेमा पहा है कि सय कर्माका भून जो बहान-माह परिणाम है, ए ममी गरमें ऐसा पमा दीपन MPA, मिस परिणाम्मे उसे वर्नत घातक परिभा मा और या पद परिणाम वमी मी फा [पर ४२१ । भीमद् सवन्द्र करे तो वा मी उस ही तय बनत कातक परिभ्रमण पस्ता पछा नाप। अमिक एक समिमें इतनी सामर्म कि समस्त मेकको जा सकता है, परन्तु उसे वैसा जैसा संयोग मिझता है, पैसे कैसे उसय गुण फळपुक होता है। उसी क्रमान-परिणाममें बाल वनाविकासे मटकता या । तपा संमत है कि अमी बनत कातक भी चौदा गोकमें प्रत्पेक प्रदेशमें उस परिणामसे बनत मन्म-मरण होना समय हो। फिर मी विस तापमाका वमि सपोगके वाधीन है, उसी तरकारके कर्म परिणामका मी कोई प्रति होती है। उत्तरसे उत्तर यदि एक नाव मोहनीय कर्मका पर हो तो सचर कोकाकोपातक हो सकता है, ऐसा निगमगवान्ने का है। उसका हेतु स किया जात वनत काका बंपन होता तो फिर जीनको मोम होम । या बंध यदि वमी निरन एमाणे, परन्तु गमग नाच होने के लिये वापा हो, तो फराचित् उस प्रकारको सो स्थितिका मंच होना समय है, परन्तु इस प्रकार के मोहनीय कर्मो-विसको कास्पिति ऊपर की-एक समपमें वधिक योपना समय नहीं होता। अनुमसे वातक उस कर्मसे निात होने के पहले सप उसी स्थितिका कर्म बाँचे तपा दूसरे के नित होनेके पहिले तीसरा फर्म मेषि, परस्तु दूसरा, वीसरा, पाया, पाँचों का स तब सबके सब कर्म एक मोहनाप कर्मके सर्वपसे उसी स्पितिको बापते में ऐसा नही होवा । पाक मीलको इफ्ना काम नहीं है। इस प्रकार मोहनीय कर्मको स्पिति है। तथा बाप कर्मको स्पिति मशिनमगवान्ने इस वय कि एक बार एक दो यो ए, उस देशी भितनी बापु है उसके तीन मागोमसे दो मप्ता म्यतीत हो जानेपर नागामी ममी वाम गोपता है, उससे पहिसे मही बापता । तपा एक भवमें भागामी कामे दो मोका नाम नही पता, ऐसी स्पिति है। वर्षात् पौषको मान-मालसे का विवरण मा या फिर मी उन उन को स्पितिके कितनी मी Atबमारूप होमेपर, पर्नेत दुसवार मरका ख होनेपर मी मिस मिस गोर उस्से निपए हो उठने वमुक प्रकारको निकाल दनेपर सब अबकाश हो नकारा है। इस बायको पिनमगधन्ने बहुत सूक्ष्मरूपसे भा है उसका विचार करना योम्य; मिसमें नौष मोपका मारा करकर कर्मवर कशा है। पर बात पापको सपमें किसी से फिर रिसे विचार करनेसे पुल समाधान होगा और क्रमसे अपना समागम्से उसका एकदम समाधान हो जायगा । यो ससंगरेप कामके भनेका प्रपा उपाय है। सब जाना-पुराने कामके जोक्नेको अत्यत फटिन हा या सर्नया सिौर म्पों पोशाक बचन बगाइन खोपों त्यों असम करके पाछे हटनेसे मनुमसे मौरावार्य प्रबल होकर बारसे कामको सामर्पको मान्न करवानाने बानी पुस्तके पचन सुनकर कमा सहए दो नही मामा और परि माना होता तो उसकी उस विषयमें सपा मारसस्ता हो गई होती। (२) नमो भिमान मिदमपाण विसय प्रस्पा दशा हो पोषस्म है, उस महान् पुस्पको पम्प है। मिस मतमेरसे पर गान प्रस्त हो हाही मतमेद उसके स्वरूपच मुस्स मारण है।
पा ४२५] विविध पत्र मादिसंग्रह-२मा वर्षे पांतराग पुरुपके समागम बिना, उपासना बिना इस नौवको मुमुक्षुसा कैसे उत्पम हो। सम्पमान कासि हो । सम्यान कास हो। सम्पमारित्र कसे हो । क्योंकि ये तीनों बस्तुएँ बम्प स्पानमें मही होती। है मुमुक्षु । बौतराग पुरुषके मायके समान यह वर्तमान कार है। गावराग-पद पारंवार विचार करने योग्य है, उपासना करमे योग्य है, मौर म्यान करमे योम्प है। . ४२३ मोहमयी, मापार मदी १५ भौम १९५० प्रश्न -भगवान्ने ऐसा प्रतिपादन किया है कि पार गन सोको कायके फरकी तरह सूक्ष्म एकेन्द्रिय नीर मरे हुए है। ये बार इस तबके करे गये। यो जगनेसे वन्त नही, ऐ मेसे रिदते मही भार मारनेसे मरते नहीं। उन गांवों के भावरिक शारीर नहीं होता, क्पा इस कारण उनका वग्नि मादिसे म्पाघात नहीं होता ! नपत्रा गौशारिक शरीर होमेपर भी क्या उसका अग्नि वारिसे म्याघात महीं होता ! तपा यदि वागरिक शरीर हो तो फिर उस शरीरका अनि बादिसे क्यों म्पापात नहीं होता! इस प्रमको पड़ा। विचार के लिये उसका यहाँ सक्षेपमें समाधान लिखा है। उत्तर --एक देहको स्पागकर दूसरी देह धारण करते समय जब कोई गौर यस्तेमें पता है, उस समय अपना अपर्याप्त वस्या उसे केवस तैयस और फर्माण पे दो शरीर होते हैं बाकाफी सा मनस्यामि बर्षात् कमसहित स्पितिमें सब जीवोंको मानिनमगवान्ने फर्माण तेस, तपा वीरिक अपना नियक इन दो शरीरों में से किसी एक धरीरको समानना बताई है। केपट मार्ग, एनेवासे चौरको कार्माण भौर वैबस ये दो शरीर होते है। यत्रा जबतक जानकी मपाम स्थिति तबतक उसका कार्माम मीर तमस परीरसे निर्वाह हो सकता है, परन्तु पर्यत पति उसक नियमस तीसरा पायर रोना समब है । आहार आदिके प्रहण करनेहप टीक टोक सामर्पच रोना, पह पर्यन स्थितिका लक्षण है और इस वाहार वादिका वा पुण मी ग्रहण करना पतीसरे शरीरका प्रारंभ १ पर्यात् बाँसे तीसरा पारीर पुन मा समसमा पाहिये। मगवान्न गो सूक्ष्म एकेत्रिय नीर को है, उनका मानि भादिसे म्याघात नहीं होता । उन जापोंके पर्यात मूगम एफेन्दिप होनेसे पनि उमके तल शर होते है, परन्तु उनके मातामण भौतारिक शरीर १, बह इतना मरम नरगाहमायुक्त . मि उसे शन मात्रि म्पर्श नहीं हो सकता | अमिजामिनो स्पूछा है, भोर पोनिय शरीरका जो सूक्ष्म है पर इस प्रकार मिनिस एक इमरेश सा मीहो सकता । नत् परि ऐसा कहें कि य िउनफा साधारण मुंभ रो, तामा भनि राम मा में जो भाकाश, टस भरकाशमे उन पोलिय गोरोंग गुगमनाम गमनागमन हो सफले के कारण, उन गान मारा सके, अपरा उमद्य म्यागत रामपा उस प्रकारका उपनि , . भीम रावत [पा ४२४ शस मादिका संपन हो, या नहीं होता । यदि तम गोको स्यूट मगाइना हो, वपना ममि बारिका वापत सूक्ष्मना हो, जिससे उनकी मी एकेन्द्रिप योग जैसी सम्मता गिनी बाप, तो ये एकेन्द्रिय गावका प्पाधान करनेमें समर्थ गिने गाय, परतु पैसा तो है नहीं। यहाँ वो मायोका अपत सूक्ष्मत है, और अमि शन्स बाविक अस्पत्त स्पून है, इस कारण उनमें म्यापात करने पोग्य संबध मही होता, ऐस भगवान्ने का है। परन्तु इस कारण वारिक शरीरको बपिनाशी कहा है, यह बात मही है। उसक समावसे भम्पपास होनेसे अपना उपारित किये गए उम पाना पूर्वकर्मक परिणामसे बौदारिक पारीरका नाश होता है। शायर कुल दूसरेसे मारा किया गाप तो हो उसका नाश हो, परम्प नियम नही। यहाँ धसमें म्पापारसमंत्री प्रयोजन यता, इस कारण तरत हो पोडे समपके लिये भी निकर सकना कठिन है, क्योंकि प्रसंग इस प्रकारका है कि बिसमें समागमके गेग मेरी मौजूदगीको मार पक समझते है। उनके मनको पोर न पहुँच सके, अपना उनके काममें यसि मेरे र को गानेसे काई प्रबळ हानि न हो सके, ऐसा म्पसाप हो तो पंसा करके पोरे समयके लिये इस प्रतिसे मा काश का पित है। परन्तु तुमारी तरफ वानेसे अगोंकि परिपपमें वाना जरूर ही संभव होगा, इससिये उस तरफ जानेका पित होना कठिन है। इस प्रकारका प्रसंग पनेपर मी परि ठोगक परिचपमें पर्मक प्रसंगसे वाना पड़े, तो उसे विशेष का योग्य समझकर भैसे मने से उस परिचपसे धर्म-प्रसंगके मामसे विशेषरूपसे दूर बनेका दो पित्त या करता है। जिससे परम्प-उपशमके बझी पहिरो, उस प्रकार ससा-समयका परिचय करमा, पार गोषको परम हितकारी है। दूसरे परिचपको पैसे बने कैसे नाच करना ही योग्य है। ४२४ बर्मा, भाषण सदा ११ र १९५. योगवासिष्ठ बार प्रयोके बोचने-चारमेमें कोई दूसरी बापा नहीं। हमने पहिले शिक्षा पाकि उपदेश-अप समझकर इस प्रकार के प्रयोंके विचारनेसे जीवको गुण प्रगट होता है। प्राब से प्रेम पराम्प और उपशमके रिपे है । म्पुरमसे मानने पोम्प समात-ानको मानकर पीनमें सस्ता, निरमिमानता आदि गुणों या होनेके सिपे योगवासिष्ठ, उत्तरप्पयन, महतांग बारिक चारमेमें बारा नही, इतना स्मरण एम्ना। कभीर मिन- सित इन दोनो बनक प्रशारमे भे। देत एक मतपमे सौ स्थितिको पाता. विमागममें उसमे मित्र होमप कहा गया है। समपमार पाते हुए मा बानसे जाबोकर एक अपको मान्यताप्स सिद्धांत हो गया है। बहुत गमगम नया राय भार उपसमका पर शिपमे पानेसे पचात् सितका पार करमा पाहिप । पतिपमा मरिया गए तो गरमो माम माम्प र रमय और उपशमसे होग यता। पए कपिधार करने में बाधा नही अपरा अनेक मारमा पत्र ४२५, ४२५, ४२.] विविध पत्र मावि संप्रह-२७वों वर्ष करनेमें मी माषा नहीं । तुमें तथा दूसरे किसी मुमुमुका मात्र अपने स्सलपका मानना ही मुम्प कम्य है, और उसके बाननेके शम, स्तोप, विपार मौर ससग से साधन है। उन साधनोंके सिद्ध हो नानेपर वौर परम्प-उपशमके परिणामकी पनि होनेपर हो, 'भारमा एक' है अपना 'वामा भनेक है,' स्पादि भेदका विचार करना योग्य है। - ४२५ मई, प्रावण मुदी ११, १९५० नि सारताको मयतमपसे जाननेपर मी म्पनसायका प्रसग बारम-मीर्यको पुछ मी मदताका ही कारण होता है। यह होनेपर भी उस म्यवसायको करते हैं। मो मामासे सहन करने योग्य नहीं, ससे सहन करते हैं। यही बिनती है। ४२६ बम्बई भाषण मुदा ११, १९५० बिस तय बारम-बल अप्रमादी हो, उस तय ससग-सनाचमका समागम नित्यप्रति करना योग्य है। उसमें प्रमाल करना योम्प नही-अप ऐसा करना योग्य नहीं। ४२७ बर्ग, भाषण पदी १, १९५० जैसे पानीके स्वमारसे मस्तित होनेपर मी उसे यदि किसी बरतममें रखकर नारे अमि नसती हुई रस दी गाप, तो उसकी इच्छा न होनेपर भी यह पानी ठप्ण हो जाता है, उसी तय पाम्यवसाय भी समापिसे शीतल एसे पुरुपके प्रति उष्णताका कारण होता है, यह बात हमें तो स्पर प्रगती है। वर्षमानतामाने गृहमासमें ही पह सर्व म्पासाप मसार है-कम्पनप मही-ऐसा जान दिया था, तपापि उन्होंमे उस गृहबासको स्पागकर मुनि चर्या प्राण की थी। उस मुनिस्समें मौ भाम बउसे समर्प होनेपर भी, उस बड़की अपेक्षा मी मयत भरिक बळकी नमरत है। पेसा जानकर उमोंने मीन भौर भनिवाका सगमग सात बारा वर्षतक सेवन किया है, जिससे पत्रसापम्प अमितो प्राप पैशन हो सके। जो वर्षमानस्थामी गृहबासमें होनेपर मी अमोगी जैसे घे-अपवसायी से पे-नियर थे- पौर सान समावसे मुनि से पे-मामस्वरूप परिणामयुक थे, ५ वर्षमानस्लामी सर्व म्पपसापमें भसा- रता मानकर---मौरस्ता मानकर मार रहे, उस म्पसायको करते हुए मरे जीवन उसमें किस प्रकारसे समाधि रखनेका प्रचार किया है, या चार करने पोम्प है। उसे विचारकर रिफिरसे उस पर्याको प्रत्येक कार्यमें, प्रत्येक प्रासिम, स्मरण करके म्पकमायके प्रमुगमें रहती ई इस रुपिका मा करना हो योग्प है। या एसा म किया जाय तो प्राय करके एमा रगता है कि अभी इस औरको मुमुभु-प में पपापोग्य अभिवारा नहीं हुई, भपता यह गौर मात्र छोर-संज्ञा दी कम्याग हो जाप, इस प्रकारका मारना करना चाहता है। परन्तु उसे कन्पाग फरनेको अभिडारा करना याम्य महा है, क्योंकि दानों गावो एकम परिणाम हों और एक रा, सरेका और न , पेमा निराळमें भी होना पोप नहीं।
भीम रावत [पत्र ४५८ ४११,४१,m ४२८ श्रीमान् मानीरस्वामी जैसोंने मी वसिर पर रखकर गुहपासरूपका बेदन किया, ग्रामससे निहाप होनेपर मी सारे मार (बरस ) से दीर्घ कातक मौन रस्सा, निद्रा मेषकर निपम फ्या सान किये, सका क्या है। और यह गौच इस प्रकार बर्ताव करता है, तपा इस प्रकार कर है, इसका क्या है। यो पुरुष सद्गुरुको उपासनाके किना केवल अपनी कम्पनासे ही वारम-सरपका निएप परे कापस वपने समंदके उदयका मेन करता है-ऐसा विचार करमा योग्य है। नो चील स्परुपके गुणका विचार न करे, बार अपनी कम्पमाके हो भाभपसे पसे, र मौल मनमा मावि सत्पम करता है, क्योंकि मा भमर होनेके स्पेि नहर पाता है। १२९ बाई, पापण बदी ७ १९५० समारी और दूसरे मुमुक्ष गोगोंको विवर्ष दशा माइम को बानी मुरुपोंने अप्रतिवरणाचे ही प्रधान मार्ग का और सम्से मप्रतिवर दशाका सरसकर ही प्राति गती, तो भी सत्संग मादिमें वा में मी प्रतिबद्ध मुनि रस्नेका हो चित्त यता है। हमें हमारे समागमका प्रसग नही है ऐसा मानकर तुम सब माईयोको, निस प्रकारस भावको शांत दातभात उस्त हो, उस प्रामसे गोपन वादिका समागम करना योम्य है यह बात स करने पोम्प है। ४३० बम्बा, पण बदौ ९ शनि १९५. गौवमें मिस तराण त्याग परम्प बोर उपशम गुण प्रगट हो-उरित हों, उस क्रमको व्य रमनेकी जिस कामे सूचना किसी पी, 1 फन प्राप्त मा है। जबतक ये गुण बोमें स्थिर नही होने तबतक बोबसे पपार्परूपसे बारमाहपका रिसेप विचार ऐना कठिन है। बारमा स्मी या मापा' स्मादि किस्पोंका जो उससे पहिले ही विचार किया जाता है छ कम्पना जैसा है। जीवन मी गुण प्राप्त करके पनि शाप हो पाय पे फिर उसे विशेष विचार करना पाहिपे । माम-दर्शन बादि प्रसंग, तीन मुमनुवाके उपभ होनेके पहिरो प्राय करके कम्पितरूपसे ही समसौ बावे विस्से हाम्में इस विषयको सयका सात करता योग्य है। ४३१ म भाषण बदौ ९ भनि १९५ (१) प्रारम्प-मासे प्रमाको पारों विशामोंके दबासे सम्पासामुष्ठ कार्य होते हैं। परत निके परिणामके साधारण प्रसंगमें प्राति करते हुए विशेष संकुचित यमेके पारण, इस प्रकारका का मारि मिसमा कौर नहीं हो सकता, निरासे वषिक नही म्बिा, इसलिये दोनों जमे सम्म करे। (२) इस समय किसी मी परिणामसीमा भ्यान मी।
पर ४११] विषिष पर मादि सपा-ज्या वर्ष बाई, प्रावण वदी १५ गुरु १९५० तुम्हें कुछ शान-पाचक प्रसगमें उपकारक प्रश्न उठते है, उनें तुम हमें निम्नकर सचित करते हो, और उनके समाधानको तमारी विशेष इच्छा रती है। इससे किसी भी प्रकारमे पनि सुम्हें उन प्रश्नों का समाधान लिमा गाय तो ठीक हो, यह सिघार चित्तमें पते हुए भी उदय-योगसे पैसा नहीं बनवा । पत्र लिखने में पित्तको स्पिरसा बहुत ही कम यसा है, अथवा विच उस कार्यम अम्पमात्र आया जैसा ही प्रवेश कर सकता है। मिससे हमें विशेष विस्तारसे पत्र मही उिडा बाता | चितका पति के कारण एक एक पत्र छिमते हुए दस-दस पाच-पाँच बार, दो-दो चार चार छान छिलकर उस फरको वर्षय छोर देना पाया है। क्रिया में रुचि नहीं है, तथा हाछमें उस क्रिया प्रारम्प-पसके मी विशेष उदययुक्त मोनेसे तमें तथा दूसरे मुमुक्षुओंको विशेषरूपमे कुछ हान चर्चा नहीं सिसी सकती। इसके लिये चित्त से या करता है, परन्तु हाटमें तो उसका उपशम करनेका हो पित पता है। हमें इसी तरहको कोई वाम-दशाको स्थिति एती है । प्राप जान-मकरके कुछ करनेमें मही भाता, मर्यात् प्रमाद भारि दोपके कारण यह क्रिया नहीं होती, ऐसा मही माश्म होता । समयसार प्रयको करिसा भादिका तुम गो मुसरससबषी शानविषयक भर्य समझते हो मासा ही है। ऐसा सब जगह है, ऐसा कामा योग्य मह।। पनारसी सने समयसार प्रथको हिन्दी माग परसे हए बहुतसे करित, सपैया वगैरहमें उस प्रकारकी ही बात कही है। और यह किसी तय भीम बानसे मिकती हुई माझ्म होती । फिर भी कहीं कही उस प्रकारके शय उपमारपसे भी जाते हैं। बनारसीयसमे गो समपसार बनाया है, उसमें महाँ यहाँ के शर आपे है वहाँ कहाँ सब गहरे उपमापसे ही है, ऐसा माश्म मही होता; परन्तु बहुतसी जगह ये शरद पसुपसे को है, ऐसा मालूम होता है । पपपि यह बात पुछ बागे चम्नेपर मिल सकती है, अर्थात् तुम गिसे बीम-शानमें कारण मानते हो, उससे कुछ आगे बहती ई बात अयश्य यही बात उसमें विशेष हानसे मंगाकार कोई माम होती है। उनको समयसार प्रयका रवमाझे ऊपरसे माइम होता है कि बनारसीदासफो फोई उस प्रकारका स्पाग बना रोगा। मूल समपसारमें मान-नानके वियपमें इतनी मधिक पर बात की हुई नही माराम ऐती, और बनारसौशासने तो बहुत जगह बस्नुमापसे भार उपमारपसे बह बात कही है। जिसके उपरसे ऐसा माइम होता है कि बनारसी सको, सायमें अपनी मामाके रिपपमें जो कुछ अनुमा एमा है, उन्होंने उसका भी पुरा उस प्रफारसे प्रकाश किया है, जिससे यह बात किया ग बाबके मनुमनको वाधारभूत हो–उसे विशेष स्थिर करनेपाली हो । पेमा मी सगता है कि बनारमीदासने साग भारि मेस औरफा विशप थप किया था, और उस उस एशम वादिके सतत मनन होते रहनेमे, उनके अनुभवमें बाम-सरप कुए तीनपसे मापा है और उनको सम्पत्तपमे माम-सम्पका मी गा मा . और उम सम्पच PIA उन्होंने उस दौरानको गापा । 'अप्पट Py का वर्ष का पद मि पिचमासिक शिवोपनपस माम-रिवार एगे रहनेस, बनारमा गको रिम व परिणाम निम पारा प्रसाई भीम परचम्न [पा ४१२ है, उस मिर्मस माराके धरण अपना निजका यही ब्रम्प है, ऐसा सवपि स्पा पाममेमें महा पापा, तो मी बस्पापसे मर्यात् सामाविफलमसे मी वमकी यात्मा पर छापा मारहमान ई, मौर जिसके कारण या यात समके मुमसे निकल सकी। और मागे बाबरपा बात उमें सहन हो कलम स्पर दो गई हो, प्राप दमको ऐसी दशा उस प्रेपके दिसते समय ही है। भौगरके अंतरमें बोले गता है, किसी प्रकार योग्य और पद प्राप में मी हा करता है, हमारे माननमें है। सपा सरे मी मावस मुमुह बानो इस प्रकारका सद या करता है। पर जानेफ्र मा और 'तुम सबका यह सेद र किया जाय तो को ऐसा मनमें हमेपर भी, प्रारम्भका बेदन करते है। तपा हमारे पिचमें इस विषयमें अस्पत कमान के यता है । यो सेर दिनमें प्राप अनेक प्रसंगोपर पुरित हवा करता है और उसे उपयत करना पहला है। वर प्राप' तुम सोगोंको भी हममे लषरूपसे उस के रिफ्पमें न किसा, अपमा नमो बताया । हमें उसे पताना मी पोम्प नए गा पा । परन्तु हाम्में माइगरके पनेसे प्रसंग पाकर उसे बताना पड़ा है। तुमें वीर रंगरको यो वेद पता है, उस विषयमें हमें उम्से की- म्साव गुणनिशिप मेद यता होगा, ऐसा गया है। कि रिस मिस प्रसापर र मात बारम-प्रदेसमें स्मरण होती है, उस उस प्रसगपर समस्त प्रदेश शिथि से ऐ पाते है, और पानका 'मिल्प स्थमान ऐनेसे, जीव इस प्रकार भेद करते [ मी नाता हैस प्रकार तकप्रद होता है। फिर परिणामांतर होकर पोरे पकाशमें मी उसकी बात प्रमेक प्रदेशमें सुरित होकर निकम्ती है, और सीको पैसा हो रहा हो जाती है। फिर भी मामाघर मापद नि करके उस प्रकारको एल्में तो उपशाव करना ही योम्प है-ऐसा नानकर उसे उपरान्त किया जाता है। मागरके अपना तुम्हारे में परि ऐसा होता हो कि साधारण कारणों के सबसे हम इस प्रकारफी प्रापि नहीं करते, तोपर योग्य नही। पदिय तुमारे मनमें पता हो तो प्रापा पैसा मी है, ऐसा हमें माता है। निस्यप्रति उस बातच विचार करनेपर मी उसके साप मी सम्मान कारणों का सच ऐस गानर मिस प्रकारको तमारा प्रमाषके में , उस पेतुने पन्द करना पाप है। और उसके क्रोधक कारणोंके क्षीण होने देमेमें वाम-मा कुरा मी फगत र सस्पिति में पता है। पारी एमके मनुसार में भी प्रवृत्ति नहीं की गाती, उस लिपपमें मो मम्माम कारण परोपका उनको में शिपापसे बवाने पित्त नहीं होता क्योंकि ममी उनके शिषसफ्से मताने बामाको गाने देना ही पोम्प । गो बसबान परण प्रमाबके हेतुके भरोष, उममें हमारा पुरिपूर्वक इस मा प्रभाव हो ऐसा किसी मी तर संभव नहीं है। तवा बम्मनपसे बात नही माननेपर मी यो गोरसे सारमे मा करता रो, साई प्रमा' हो या मी माम नहीं होता। फिर मी किसी में इस प्रमारको संमत्र समाये हुए मी ठस्से मरोचकता हो, ऐसा मान ऐ सके भावना क्योंकि मामाको निपम पि उसके समुह नही है। बोगोंमें उस प्रातिको करते हुए मानभंग होनेश प्रसंग बाये तो उस मानगपके सामन से सम्मेवेमण प्रमाके की उपेक्षा गाती ऐसा मी नहीं प्राप्य पोंकि उस मना पर४५] पिपिप पत्र मादि संग्रह-२७ वर्ष - मानमें प्राय करके चिच उदासीन जैसा है, नपत्रा उस क्रममें पित्तको विशेष उदासीन क्रिया हो, तो हो सकना संमत है। शाद वादि विषयों के प्रति कोई भी बछवान कारण अबरोधक हो, ऐसा भी माश्म नही होता। पपपि यह कानेका प्रयोजन नहीं कि उन विषयों का संषा क्षायिक माप ही है, फिर भी उसमें अनेफ रूपसे नौरसस्ता भासित हो सीहै। उदयसे मी कमी मरुचि उत्पम होती हो, तो मा मी विशेप समस्या पाने के पहले ही नाश हो जाती है, और उस मंद रुपिका पेदन करते हुए भी मारमा सेन होगता मर्यात् उस रुचिके बापादान होती मानेसे पर भी सवाम कारणरूप नहीं है। दूसरे दौर भी वनेक प्रमाक पुरुप हुए है, उनको वपेशा किसी रसिसे हममें विचार-दशा पादिका प्राय ही होगा। ऐसा माता कि उस प्रकार के प्रभाषक पुरुष बार माश्म मही होते; और मात्र उपदेशकस्मसे नाम बैसी प्रमाक्नासे प्रवर्तन करते हुए कोई कोई हो देसनेमें-सुनने में माते हैं। उनकी विपमानताके कारण हमें कोई बरोधकता हो, ऐसा मी माश्म नहीं होता। - ४३३ बी, मात्र मुदी ३ रवि १९५० मानको शाना-पुरुपको पहिचान होनेपर, तपाप्रकारस बनवानुपी कोष, मान, मापा, मोमका शिपिठोमा पोग्य है, मिसके होमेपर बनुकमसे उस भय होता है । यो ग्यों जीनफो पुस्पकी पहिचान होती है, त्यो त्यो मताभिप्रार, इराण वा मान शिथिल पाने लगते है, वार पपने दोपोंको देसनेकी वोर वित्त फिर गाता है, किया बादि मारमें मीरसता म्गने मगती है, क्या शुगुप्सा उत्पम होता है । जीवको बनिस्य वादि माननाके पितम करनेके प्रति, बख्याक पुरत होनेमें मिस प्रकारसे बानी-पुरपके पास उपदेश सुना है, उससे भी विशेष मन्नान परिणामसे यह पथ विषय बादिमें बनिय बारिमाको स करता है। बर्षात् सपुरुषके मिटमेपर, यह सपुस्प है, इतना गानकर, सम्पुरुपके पाननेके परिसे जिस तद वारमा पनिषप वादिमें भासक पी, उस तब उसके पश्चात् वासच नहीं रहता, भौर अनुमसे जिससे पामासधि-भाष शिपिस पो, इस प्रकारके मैरायजार प्रवेश करता है। नया पुरुषका संयोग होनेके पथात् वामान को दुर्गम महा है, सिर मी म्पुरुपौ–उसके पचनमें -उस बनके माशपमें, पातक प्रीति-मलिनो ताक पारमें वाम-विचार भी प्रगट होना योग्य नाही मोर सत्पुरुपका मीनको सपोग हुवा है, इस प्रकार टोक येक गोषको मासित हमारे सा करना मी कटिन । जोसको सत्पुरपका संयोग मिसनेपर तो ऐसी भाषमा होता है कि अबतक मेरे जो प्रपन कम्पाणके लिये पे, सब मिल थे-पाक विमा छोरे ए बाल सब पे, पर अब सपुरुषका भपूर्व स्पोग मिला है, तो ए मेरे सत्र साधनोंक समय होने त है। मोक-प्रसंगमें ग कर अबतक जो निगाभारित साश्रम सिपे हैं, जब उस प्रकार से सपुरुषके संयोगमें म करते हुए सहर बर-भामा चारकर स परिणाम रसकर, गोको इस सपोगमें-चनमें जागृत होना योप श्रीमद् रामचन्द्र [प]४५,४५ है-वागत गना पोम्प है और उस उस प्रकारसे मावना करके गौवको रद्द करमा चाहिये, जिससे उसको प्रास या सपोग निफस म पण बाप, मोर सब प्रकारसे भामामें यही बहभाना चाहिये इस संयोगसे गानको वपूर्ण फका होना योग्य है। उसमें बतराय करमेना- " में वानवा 'या मेरा अभिमान, कुसमर्म, और रिसे करते हुए परे माते है उस किमान कैसे त्याग किया जा सकता है, ऐसा को-भय, सत्पुरुषको ममि बादिमें मी गैतिक मात्र वार काचित् किसी परिपपाकार कर्मको शालीके सदयमें देसकर उस तयके भाव सर्प मानन करना"-पारिनो मेद, यहाँ बनवानुवपी कोप, माम, माया, लोम है। इस मेरको विशेषरूपसे समपना चाहिये। फिर मी इस समय बितना पिसा जा सका उतना मिला। उपधम, पपोपशम और धायिक सम्यकके किये संधपमें मो पामा बनी पी, उससे मिस्ठी हुई पाल्पा के स्मरणमें है। यहाँ यहाँ इस जान्ने चन्म लिया है-मपके प धारण किपे है, को कहाँ तयाप्रकारके बमि मानसे इस पारने बाचरण किया है-मिस बभिमानको निच किये बिना ही इस गौमे उस उस देश और दहके संवमें आनेवाले पार्थीव त्याग किया है। वर्षात् वातक उस माको सस शान-विचारके द्वारा नए नहीं किया, वो पूर्व स्वायें इस बार वभिमानमें नमी सारसी हो पती पठी बाना-पही इसे समस्त छोकको अधिकरण क्रियाका खहा। ४३४ बर्मा भाष मुरी सोम १९५० कबीर साहबके दो पद और पारिनसागर के एक परको उन्होंने निर्मपतासे कहा, पाये सिमा है उसे पा है। चारिप्रसागरके उस प्रकारके पारसे प पहिसे मा परनेमें माये। सी निर्मम बागी मुमभु जातको प्राप धर्म-पुस्पाम बापान पनाती है। हमारे सप उस प्रकार के परमपना काम्प र प रेसनेको जो हमारी इम उसे हमें उपशात करना योग्य है। पोंकि दाउमें से पाचनविचारने बाबमानेमें उपयोगका प्रवेश नही हो सकता-जपा समान मी प्रदेश नही हो सकता। ४३५ ब भार पुरा १ सोम १९५. पाच रिपमानता प्रसार में जो शेष विशामा है, और परिपातु सत्पथ हो तो हमें रामनार ल ठरापगा उस र विज्ञासा और सौम सभी तमा रित सिएम ममतते है।
विषिष पत्र मावि समा-२७ौबर्ष ---या अनेक जीवोंकी वान दशा देसकर-सपा बीब अपना झाल्याण करते असा वपना कल्याण होगा, इस प्रकारको माक्नासे अयवा इससे, उन वाम-मार्ग प्राप्त करते हुए देसकर--- उसके लिये मस्यंत करुणा होती है, और किसी भी प्रकार से इसे दूर करना ही योग्य है, ऐसा ऐ माता है। वपवा उस प्रकारका मात्र चिचौ पैसाका वैसा ही हा करता है, फिर मी र विस प्रकार होने न्योम्प होगा उस प्रकारसे होगा, वीर मिस समय पर बात होने योग्य होगी उस समय होगी- बात मी चिचमें रहा करती है। क्योंकि उस करणाभावका चितवन करते करते मास्मा बाम माहात्म्पका सेक्न करे, ऐसा होने देना योग्य मही, और बमी कुछ उस प्रकारका मय रखना योग्य प्रमाता है। हाम्में तो प्राय दोनों ही बातें निस्प विचारनेमें जाती है, फिर मी यात समापमें उसका परिणाम वाना समप नहीं मालम होता, सपि सहतिक बना पाक में नहीं मिला अपवा कहा नही है। महारी इजा होमेसे वर्तमानमें वो स्थिति है, उसे इस सांप सक्से किसी और उससे तुम्हें किसी भी प्रकारसे उदास ऐना याग्य मी, क्योंकि हमें वर्तमानमें उस प्रकारका उदय नहीं है, परन्तु हमारा वाम परिणाम उस उदपको बम्प- काममें ही दूर परभेकी वोर है । वर्षात् उस उदयकी काल-स्थिति किसी प्रकारसे अधिक सवासे वेदन करनेस घरती हो तो उसे पानेमें हो यती है । बाम माहारम्पको इछा बरमाको गुत समपसे मी वैसी ही हो गई है। नात् मुनि बाम माहाम्पको प्राय इसा करती ई नही माश्म शेती, फिर मा बाम माहारम्यके कारण, मौष बिससे योगा मी परिणाम-भेद प्राप्त म करे, ऐसौ स्वस्थतामें कुछ म्यूनता कानी योम्प है और उससे जो कुछ मप पता है, वह तो यता हो , मिस भपसे परत ही मुकि होगी, ऐसा माथ्म होता है। (२) प्रभ -पपपि सोनेकी वारुतियों पुती बुरी होती है, परन्तु पदि उन बाकृतियोंको भागमें वाम Pया माय तो ये सब मारुतियों मिटकर एक केवळ सोना ही भोप रह जाता है, अर्थात् सा बारुतियों में गुरे दम्पत्वका स्याग कर देती है, और सब मालतियोंकी भातिको समावीयता होनेसे के मात्र एक सोनेरूप दम्पत्वको प्राप्त होती है। इस तए त लिखकर वात्माकी मुछिदौर दम्पके सितके उपर जो प्रश्न किया है, उस संबधमें सक्षेपमें निम्न प्रकमसे कहना योम्प है। उत्तर:-सोना श्रौपचारिक इम्प है, पर गिनमगवाम्का अभिप्राय है। और जब बहनत परमाणुमोंके समुदायरूपसे पता है, तब मुगोबर होता है। उसके गो जुदा जुदा नाघर पर सफते है, ये सब संपोगसे होनेवाले है, और उनका मो पोरसे एकरप किया जा सकता है यह मा उठा संपोगबम्प है । परस्त यदि सोनके मस सम्मका विचार करते है तो यह गर्नत परमाणुमोका समुदाय है । यो प्रस्पेक बसग वसग परमाणु है, वे सब अपने अपने लवपमें हीयते है। कोई भी परमाणु अपने सरूपको छोरकर दूसरे परमाणुरूपसे किसी भी तण परिणमन करने योग्य मही, मात्र उन सबके समातीय होने के कारण और उनमें स्पर्श गुण होने के कारण उस स्पर्शक सम-विषम सयोग उनका मिझना हो सकता है, परन्तु पर मिलमार्च इस प्रकारका मही कि जिसमें किसी भी परम्ममुने ५०० - भीमद् पनवम्ब [पत्र मफ्ने सम्मका त्याग कर गया हो। करोड़ों प्रकारसे उन बनत परमाणुरूप सोनेके बाकाको पदि एक रसरूप को तो मी ये स परमाण भने ही सरूपमें एते है, वपने इम्म, क्षेत्र, कार और भालको नहीं छोड़ते, पोंकि महोना किसी मी तपसे बनुमबमें नही मा सकता । उस सोनेके भगत परमाणुषोंकी तय सिदोको वनतम गाइना गिनो तो कोई बाधा नहीं है, परन्तु उससे कुछ कोई मी मात्र किसी मौसेरे नौवको साय केरक एकापसे मिल गया है या बात नहीं है। सब अपने अपने माबमें स्थितिपूर्वक र सकते है । जावरूपसे जारी एक गति हो, इस कारण कोई एक गौप वपनापन स्पाग करके दूसरे गानों के समुदापमें मिवार सपा स्याम कर दे, इसका क्या है। उनके नियके वम्य क्षेत्र, काठ, मार, कर्मवप वौर मुकास्पा, में बनारिसे मिश्रा है, और परि किर मीर मुनस्पाने, उस दम्प, क्षेत्र, काल और मानका त्याग कर रे तो फिर उसका बफ्ना सरूम हो क्या गा! उसका अनुमन हो क्या हा! और अपने सहमके मर हो जानेसे उसकी कर्मस मुधिई बना अपमे सम्पसे मुक्ति हो गई ! इस भेदका विचार करना चाहिये । स्पादि प्रकारसे निमम्मतान्ने सपा पकलका निपेभ किपा है। ४३६ वार्यकरने सगको महाभपक्षस कहा, पम्पहै। इस प्रकारको मिझ गुणस्पान मसी स्थिति कातक रसनी चाहिये ! यो पात पिचमें नही है उसे करना बौर को चित है उसमें सदास गना, परम्पबह किस तय ऐ सकता है। स्प-वेपसे और निर्मपमापसे यते हुए फोटाकोटी विचार या करते हैं। वेप बौर उस बेपसबंधी म्पसारको देखकर मेकाशि उस प्रकार से माने पा ौक है, वार निवभारसे बनेबाम चित्त उस म्पपारमें पपार्ष प्रावि मर सके यह भी सप । इसरिमे इस तबसे दो प्रकारको एक स्पितिपूर्वक बात नहीं किया जा सत्य स्पोकि प्रथम प्रकारसे यते एए निर्मपमा से उदास बना परे तो ही पपार्य म्पबारको रक्षा ऐ सकती , और पनि मापसे ये तो फिर ए प्यार चाहे जैसा हो उसकी उपेक्षा करना ही योग्य है। पदि उपेषा न की भाप तो नियमानहानि पर बिना न दे। उस म्यबहारके त्याग किये बिना वपमा मयत माप किये बिना पपा निर्मक्ता प्रो यती, और उदपस्म होनेसे म्हारका त्याग नहीं किया जाता। इस सब विमान-पोगके र ए बिना हमारा पित इसरे सो उपापसे संनेय प्राप्त करे, ऐसा ना भगता। प्रतिमान-योग दो प्रकार एक पूर्वम नियम कसा मा सदपस्तस्म, और दूसरा मात्मनुतिपूर्वक गसमित दिपा गाय हुमा मानस्वरूप । बामभावक मापसबी पोगको उपेक्षा हो भैपस्कर माम होती है। उसका निस्म हो विचार किया जाता है। उस समाररूपसे रनेवाले माममारको मात कुछ परिणाम कर दिया , और नमी मी हा परिणति पारखी।
पा ४१.] विविध पत्र भादि सहयों वर्ष ५०१ उस सम्पूर्ण बिमार-योगके निर किये विना चित्त विति प्राप्त करे, ऐसा नहीं माश्म होता; और इसमें तो उस कारमसे विशेष देश ही सहन करना पड़ता है। क्योंकि उदय तो विभाष- क्रियाका है, और इछा नाममाघमें स्पिति करने की है। फिर भी ऐसा हा करता है कि यति तदपकी विशेष कामता प्राति ये तो बारममा शेप पषत परिणामको प्राप्त होगा | क्योंकि वारममावके विशेष अनुसंधान करनेका मबकाश उदयको प्राधिके कारण प्राप्त नहीं हो सकता, मोर उससे पहवाम्ममाव कुछ शिपिस्ताको प्राप्त होता है। चो नाममात्र उत्पन हुमा है, उस भारममावपर यहि मिशेष लक्ष किया जाय तो जन्प कायम ही उसको विशेष दिए, और विशेष जागृत मवस्पा ठत्पम हो, दौर थोर ही कामें रिकारी उबवाम-दशा प्रगट हो, और पदि उदयकी स्थिसिके अनुसार ही उदय-फालके रहने देनेका विचार किया गाय तो अब बारम-शिपिचता होनेका प्रसग आयेगा, ऐसा गता है। क्योंकि दीर्घ काका भाममात्र होनेसे इस समयतक पाहे जैसा उदय-पछ होनेपर मौ प नाममाष नए नहीं हुषा, परम्त छ उसको वजागृत अवस्था हो जानेका समय वाया है। ऐसा हानेपर भी परि मा केवल उदयपर ही प्यान दिया गापगा वो शिपिळमात्र उत्पन होगा । पानी-पुरुप उदयके वश होकर देहादि धर्मकी निधि करते है । यदि इस तर प्राधि की हो तो अहममान नए न होना चाहिये । इसलिये उस बातका में रखकर उत्पफा दे न करना पोग्य है, ऐसा विमार करना मी मा योग्य नहीं । क्योंकि ज्ञानके तारतम्पको अपेक्षा पनि उदय- बाबासा मा देखनेमें वाये तो यहाँ बानीको मी वरूर जागृत दशा फरनी योग्य है, ऐसा भीसशिने कहा है। पर मस्पत दुपम कार इस कारण, बार हत-पुण्प लोगोंने इस मरत क्षेत्रको घेर रममा है इस कारण, परम मसग, ससग अपना सरल परिमामी नीयोका समागम मिझना मी दुर्घम है, ऐसा मानकर मैसे बन्प कासमें सापपान मा जाप, बैस करमा योग्य है। . ४३७ स्पा मौनदहा धारण करना चाहिये। म्याहारका उदय ऐसा है कि जिस तय यह धारण कोई दशा लोगोंका पायका निमित्त हो, पैसे म्पबहारको प्रवृत्ति नहीं होती। तब क्या उस म्यमारको छोर देमा पाहिये। या मी विचार करनेसे कटिन माश्म देता है। स्पोंकि उस तरहफी पुउ म्पिनिके पेन कर नेका पिटदा करता है, सिर पर चाहे शिपियवासे हो, उपस हा, परेभामे हा वयपा ना सहन दसा'ससे । ऐसा होनेपर भी अन्य कामें म्पयहारक पानेमें ही पिता परम्याहार किस प्रकारसे पापा जा सगा ! स्पोंकि उसका विस्तार विशेषरूपसे दंगनेमें माना है । पापारसम्पम उदा-प्रतिभसे, पुंजायम्पा-प्रतिबधस, दपायपसे विकारम्बलपमे, उपसरपरसदपा पारों पर पपहार पिस्ताररुप माम वारे।
४०२ भीमपचन्द्र [४५८,४९,w,nt मैं ऐसा मानता है कि बब बनतकाम्से अप्रासको वह बारमस्वरूपको ब्यान सम्दान- स्स्ससे वर्ममि । उत्पन्न कर लिया है, तो फिर वर्षमा मासके समयमें इवना या म्या कैसे न निवृत्त हो सकेगा ! उस स्पिति केस गागतिके उपयोगातरसे है, और उस उपपेगके ममा निस्य विचार करनेसे वापसमें पा मग्रार निरसकने योग्य है। तो भी उसी किस प्रकारसे निति करनी चाहिये, यह ममी विशेषरूपसे मुझे विचार करमा पोप है, ऐसा माना ।योंकि पौर्यसेवी दशा कुछ मंद पी है। उस मंद दशाका क्या है। उपके पसे ऐसा परिचप—मात्र परिचय हो-मात मा, ऐन कामे में क्या करें अमा है। उस परिचयको विशेष—अति विशेष बरियता है। उसके होने पर भी परिचय करना पड़ा है। या परिचपका दोष नहीं कहा जा सकता, परन्तु नियका हो दोष मागा सकता है।बपि होनेसे ममास दोप न करकर उदयरूप दोष मा। ४३८ पात विचार करके निम्नस्मसे समाधान होता है। एकात ब्रम्प एकांत क्षेत्र एकांत कार और एकात मावस्म संयमको पापना ये बिना पिचको शांति न होगा, ऐसा माता है ऐसा मिअप या है। उस पोगका ममी फुल र होना संमप है, क्योंकि उदपका पादेखने पर उसके निात मोतिक विप समप मोगा । ४३९ मपि मप्पणो विदेहमि, नापरवि ममाइप --(महात्मा पुस्प) अपनी हमें मी ममल नहीं करते। ४४० काम, मान और मादावामी इन नोंका विशेष संपम फरमा पोम्प है। १४१ जान ! समूत भगवाले इस म्पसापसे भय नातो मात! ग्स म्यवसापके करनेमें बारे बिना मनान प्रारम्बोदय लिई देता तो भी उससे नियत हो, मिरच! पचपि मौसनसमे ऐसा कहा पो गुणस्पानमें एमेवाम मात्र मी प्रारम्प मेल किये बिना मुछ नही हो सकता, वो मी त् उस व्यपका नामपरम ऐनेसे ना दोष मानकर उसका मत तासे विचार करके उससे निचो, मिरच!
पm,m] पिपिप पत्र भादि समाह-ज्यों पप 1 मात्र फेरस प्रारम्भ रो, और दूसरी फर्मदशा न यती हो तो इ प्रारम्प सहर ही निच हो जाता है, ऐसा परम पुरपने साकार किया है। परन्तु य केरम प्रारम्ब उसी समय कहा ना सकता है या प्राणों के ततक मी निष्ठामेद-पाधि म हो, और तुझे सभी प्रसगोंमें ऐसा होता है, इस प्रकार पमतक सम्पूर्ण निषय न हो तबतक यही श्रेयस्कर है कि उसमें स्पाग मुदि करनी चाहिये । इस पातका विचार करके, हे चौव 1 या तू मल्प काल्में ही निवृत्त हो, निरच ! ४४२ हे गार वारा संग-निापिकप कालकी प्रतिमा कर, प्रतिया ! यदि सपा संग-निचिरूस प्रतियाका विशेप वकार देखनेमें वापे तो एफदेश संग निसिप इस म्परसापका त्याग कर। बिस पान-दशा त्याग-अस्पाग कुछ भी समय नहीं, उस बान-दशाको गिसमें सिदि, ऐसा राससग त्याग दशाका पदि माप काठमें ही पेदन करेगा, तो यदि सम्पूर्ण जगत्के समागममें ये वो मी तुझे यह बाधाल्म न हो, इस प्रकारसे वाचरण परनेपर मा साइने निधिको ही प्रशस्त कहा है, क्योंकि अपम वादि सब परम पुरुषोंने यवमें ऐसा ही किया है। ४४३ बम्बई, मार दी १० रवि १९५० पहनाममात्र है मौर या वन्यमान है, इस प्रकार पोप-बौनके वामा परिणमित होनेसे वम्यमानमें स्वामायिक उदासीनता उत्पन होती है, और यह उदासीनता बनुक्रमसे उस बम्पमापसे सर्पया मुछ करती है। इसके पयात मिसने निर गौर परके मानको मान लिया है ऐसे जानी- पुरुषको पर-मावरे कार्यका भो कुछ प्रसंग रहता है, उस प्रसंगमें प्राति करते हुए मी उससे उस बानाका मप एटा ही करता है, उसमें रित-ति होकर प्रतिबंध नहीं होता। प्रतिबंध नहीं होता, यह बात एकांत मही है। स्पोंकि वर्षों बानका शिप प्रावन्य म हो, हाँ पर-माग ग्रेप परिचपका उस प्रतिस्परुप हो जाना मी समज होता है और इस कारण मी भागिन मगबाम्ने पानी पुरपके लिये मी निरा बानस सप रसनेगळे पुरुषार्पा बसान किया है। उसे भी प्रमाद करना पोम्प नहीं, बपना पर-भाष परिचप करना योग्प मही, पोंकि वह मी किसी से मात्म-पापको प्रतिपस्पप्रेगने योग्य है। मलाको प्रमाद गुदि समर मही है, ऐसा यपपि सामान्यरूपसे मौधिन वादि महामाबोंने पाव भी उस पदको पौधे गुणस्पानसे संमर नहीं माना, उसे पागे गाकर ही समषित माना है। निस्से चारपान गीतको तो नाम हो वैसे बने तैसे पर-मारक परिचित कार्यस र यमा- निच ऐना ही पोम्प। प्रापः करके परफान गातको तो समुदती है। Brahmm.
भीमा रामचन्द्र [फर पर-मात्रका परिचय बयानमपसे ददयमें हो तो निम्प धिमें स्पिर पना कठिन है, ऐसा मानकर निस्प ही निपर होने की पुदिकी विशेष माफ्ना करनी चाहिये ऐसा महान् पुरषोंने कहा है। कप कामें बम्यापार स्थिति हमे के लिये तो अस्पत पुरुपार्य करके गायको पर-परिचपसे निश्च होना ही योम्म है। धीमे पामे नित्त होने के कारणोंके उपर मार देनेको अपेक्षा मिस प्रकारसे शौतासे निति हो माय उस विचारको करना चाहिये । और वैसा करते हुए परि साता वादि पापति-पोगध पेदन करना पाता तो उसका बेदन करके मी पर-परिचपसे शमिवासे र होनेच मार्ग प्ररण करना चाहिये यह बात भूब बामे योम्प नही। जानकी मम्मान तारतम्यता होनेपर तो जीनको पर-परिचयमें कमी मी स्वामभुवि होना समन नही, वौर उसको मिति होनेपर मी बान-सम्से दमे एकतरफ्स हो PER फरमा पोम्प है। परत बिसको ठससे निम्र दशा है, ऐसे नागको तो वास ही पर-परिचयका सदन करके ससा करना चाहिये, मिस सगसे सहरी अम्पाबाद स्थितिका अनुमप होता है। बाला-पुरुष-बिसे एकांवमें विचरते हुए मी प्रतिबध समबन्दी-मी मसंग निरन्तर म रखा है। क्योंकि नाचको यदि मन्यावाद समाधिको इभो तो ससगके समान वय ई मी सरस उपाय नहीं है। इस कारण दिन प्रतिग्नि प्रमेक प्रसगमें पात वार प्रत्येक क्षणमैं ससगके बारापन करमेको पीछा गित मा करती है। ४४४ पा, मम्छ यी ५ गुरु १९५ पोगवासिष्ठ भादि गो रो मेठ पुरुषों के वचन है, ये सब बालिका प्रतीकार करके किये । बिस मिस प्रकारसे अपनी भाति कल्पित की गई है, उस उस प्रकारसे उस प्रतियो समाकर क्रोबपी अभिमानको निमत करमा यो सब तात्पर मामामोका कपन है, और उसी वाक्पके उपर बाको विशेषरूपसे स्पिर होना है-विशेष विचार करना है और उसी बायको मुस्पस्मसे मनुषण करना योम्प है—ससी कार्य सिदिक किये ही सब सावन माविबादिक बामे कम, पाप किया अपना बके बाके सिपे सम्प्रताप मानेके हिप अपना पूर्वा भाषा प्राप्त करभेके किने किसी महापुरुषका कोई उपदेश नहीं है और उसी कार्यको करनेको भागो पुरमको सर्पपा बाया है। अपनी पालामें प्रादुर्भूत प्रशसनीय गुमोसे उत्कर्ष प्राप्त करना योग्य नही, परन्तु अपने भाप रोपको मा देसकर फिर रिसे पचाताप करना ही पोम्प है चोर वामाइ मावसे उससे पीछे किरमा । उचित है ५ उपरेश पाना मुरुप पचन सर्व समितिौर उस भावरे माठ होनेके कप और प्राय मादि यो सावन करे। पूर्व लिमित है। गावको उस सामाग्री पाणबना नियामक प्राप्त करने के कारपस्मो परस्त पार पाहा मा समापिसे मात करे तो कमी मी कात्याण म दो। चना पनि गति ससा ससंग पुरु प .५ m] पिपिप पत्र मावि संप्रार-२ज्यों पर्ष सरे माममावस नो माहात्म्य धुद्धि करना योग्य है, उस माहाम्य युरिका न होना, और अपनी पारमाको वहानता हो यती चली बाई है, इसलिये उसको अन्पन्नता–सधुता मघारकर ममाहाम्प पुदि मही करना । उसका ( माहाम्पदि धादिका ) सग-सद्गुरु बारिमें बाराधन नहीं करना मी पचना-युद्धि है। यरि बीच बहो मी समुता धारण न करे तो जीव प्रत्यभूमपस मा-भ्रमणसे मयमांत नहीं होता, यही विचार करने योग्य है । चीनको पनि प्रपम इस मतका अधिक लक्ष हो तो सब शाबार्य मार वामार्थका सहन ही सिद्ध होना समय है। ४४५ घई, बासोब मुटी ११ पुष १९५० निसे स्वपमें मी ससर-मुम्पको इम नहीं दी, धीर जिसे ससारमा सम्पूर्ण सम्प निस्सारभूत मासित हजार, ऐसा हानी-पुरुष मी मारवार वामावस्थाका बारम्बार स्मरण कर करके जो प्रारम्भका उत्प हो उसका पेन फरता है, परन्तु वामावस्थामें प्रमाद नहीं होने देता । प्रमादफे अवकाश-योगमें शानीको मी किसी भशमें ससारस मा म्यामोहका समय होना कहा है, उस समारमें साधारण जीवको रहत हुए, छौकिक मापसे उसके म्यबसायको करते हुए वारम-हितको इणा करना, यह मदाने जैसा ही कार्य है। क्योंकि पाकिक मात्रके कारण यहाँ बारमाको निति महीं होती, वहाँ सरी तबसे हित-विचार होना संभव नहीं । परि एकको निति हो वो दूसरेका परिणाम होना समय है। अहित हेतुभूत ससारसबी प्रसग, छीकिक मार, छो-मेग, इन सबकी संभाउका से बने तसे दूर करक-उसे कम करके प्रारम-रिसको अबका देमा योग्य है। आरम-रितके लिये ससगके समान दूसरा कोई बठमान् निमित माम्म नहीं होता। फिर मी उस सरसंगमें भी बो नीर पाकिफ माक्मे अबकाश महाँ खेता, उसे प्राय पर मिल दो राता है, भोर पदि सहर ससग पछवान हवा हो तो मी पनि विशेष-अनि AT ठोकाश पता हो तो उस फलक निर्मम हो जानेमें दर नहीं उगती । तथा मौ, पुत्र, आरंभ, परिप्रहक प्रसास पदि निज-मुदिको हानेका प्रयास म किया जाय तो ससंगका फसवान दाना मी कसे समय से सकता है ! जिस प्रमुगमें महालानी पुरुष मी संमल संभउपर पमते हैं उसमें रि इस गोषको तो मम्पत वापत समारपूर्वक–यूनवापूर्वक पसमा चाहिये, यह बात की भी भूसन पाग्य नहीं है। ऐमा निमप परके, प्रत्येक प्रसंगमें, प्रत्येक फार्प, भौर प्रस्पफ परिणाममें उसका मन रमकर भिसमे उसस फुटपारा से जाप उसी तय करते इना, यह दमन भीतर्यमानम्पामापी उपम्प मुनिपक रयत पहा था। १४६ बमई मामात्रगुप १०५० 'भगवत् मगपत्की समाल करेगा पर उसी समय करेगा सा गीर गाम्ना मामात्र होर देगा, इस प्रकार को मनोरा पचन , सह मी RR परनस स्विकार है।
पीमर पवन [पm गाँव मीरा (२) एम, रेप और बहानका बापंतिक ममात्र के चो साल पुर वामसरूप स्पित गया है मसल्म हमारे स्मरण करमेके, म्यान करनेके वीर पाने के योग्य स्थान है। सम-पदका पान ज्ये। ४४७ बाई, बासोज मी शनि १९५० सधुरुपको नमस्कार भामापी, गुणाही सांग-पोम्प माई भौमोहनगमे प्रति भी बरकन, श्री बम्बई सिसित गोमुताके क पपपन्द्रका वात्मस्परिपूर्णक पपापोप पनि। मारे मिले एए पत्रमें जो मारमा बार्षिक रिपपमें न, वीर बिन प्रश्नोंकि उतर पाल मी तुमारे पिचम दिशेप मस्तुरता है, उन दोनों के प्रति मेरा सान सारा अनुमोदन है। परत रिस समय तुम पर मुहे मिम उस समय मेरी पिच स्थिति उस उत्तर मि सकने जैसी म पी, और प्राप सा नेका कारण मी पर पाक उस प्रसगमें बायोपाधिक प्रवि शिप रम्प परिणाम प्राप्तो पापा । इस कारण उस पका उत्तर मिलने से काम मी प्रापि ऐ सकना संभव न पा । पोई समयके पचात् उस रम्यमेसे वार कर मौ तपास 44 उपर मिलंगा, ऐसा विचार या पा । परत पासे पैसा होना मी समय हो गया । रे पको परेच मी मो म सिमा पा, पोर इस प्रकार उपर मिस मैगनेमें मोम हमा, इससे मेरे मममें वामा पा, और इसमेंका वमुक माल अबतक भी पा करो। चिट बसरपर रिप करणे पसरमा उस बक्सरपर पा सुनने में पाया कि तुम्हाप पर तरह ही इस देसमें माने है। इस कारण कुछ चितमें ऐसा बापा कि में उपर मिसममें पो विम्ब नाम मी दरारे समागम ऐनेसे विशेष छामकारक रोगा। क्योंकि पाप पतसे उत्तरोका समक्षामा कदिन था, और तुरे कत्रो ठरत ही न मिल सकने के कारण तुकारे विमे भो भातरता पपई, पसमागम होनेपर उत्तरको तुरत हो समय सकने लिये एक श्रेष्ठ हमण मानने पोम्प पारा मासम्म उससे मर समागम हो तब कुछ भी उस प्रकारको बान-बान होने का प्रसंग माने, माहा मार सीपमें दरारे प्रश्नों का उत्तर विमान प्रशोक उचगेका विचार करने में निखर पOAचारकप पम्पासच बापस्वकार उत्तर सक्षेपमें किया गपात कारण तसे समिति होला तो कापित् कटिन ऐगो तो भी मेरे पित्त ऐसा पदक पचनो तुरे कुछ भी मप निवास है, इससे हमें परम ॥ सकेगा, और प प्रभोके पपापेन सपास रोप बक्से परमभूत रोगा, ऐसा मुझे पता है। सारे पामें २७ प्रमा, उमा उत्तर सभेमें मारे PROOF- पर गांधीकि प्रमाणे उचर ] पिविष पर मादि मह-२७वावर्ष १ प्रमा--पारमा क्या है ! क्याप कुछ करती है ! वोर-उसे कर्म दुःस देता है या नहीं। उत्तर -(१) मैसे घट पट बादि ना तय है, उसी तरह भारमा बानसरूप पस्तु। पट मादि वनित्य है–त्रिकालमें एक ही स्वरूपसे स्थिरतापूर्षक य सकनेवाले नहीं है । वास्मा एक स्वरूपसे निकामें स्पिर य सफनेपाली नित्य पदार्प है। बिस पदार्यकी उत्पत्ति किसी भी संयोगसे मो सकती हो पर पदार्थ मिस्य होता है। मामा किसी मी सपोगसे उत्पम हो सकती हो, ऐसा माश्म मही होता । स्पोकि बाके चाहे कितने मी स्योग क्यो म करो तो मी उससे रेतनकी उत्पति महीरो सकती । बो धर्म मिस पदार्प नहीं होता, उस प्रकारके बाबसे पदार्थों को कर मेसे मी उसमें गो धर्म नहीं है, या धर्म उत्पम नही हो सकता, ऐसा सबको अनुभव हो सकता है। नो पट, फ्ट वादि पदार्थ है, उनमें मानलस्म देसनेमें नहीं माता । उस प्रकारके पदार्पाका यदि परिणामावर पूर्णक सपोग किया हो अथवा स्योग वा हो, तो मी र उसी क्यको जातिका ऐता है, पर्याद पर जासरूप होता है, शानलहम नहीं होता । को फिर उस तहके पार्षद संयोग होनेपर वाहमा नपमा मिसे बानी-मुस्प मुन्स 'शानस्वरूप मणमुक' करते है, उस प्रकार (पट पट वावि, पृप्या, पल, बाप, नाकास) पदापसे किसी तरह उत्पम हो सकने पोम्प नहीं। बानस्वरूपल, या मारमाका मुस्स पक्षण है, भौर नाका मुख्य क्षण · उसके बमानस्म । है। उन दोनोंका पनादि सब समान है। ये, तपा इसी तयके दूसरे हजारों प्रमाण मामाको "निरप' प्रतिपादन कर सकते है। सपा उसका विशेष विचार करनेपर निस्परूपसे सहनस्वरूप वामा मनुभवमें मी माती है। इस कारण समास वालि मोगनेवारे, उससे निहत ऐनेबारे विचार करने पा, प्रेरणा करनेपाळे इत्यादि मात्र बिसको विषमामवासे वनुमबमें जाते हैं, ऐसी ह मारमा मुस्य चेतन (बान) क्षणसे पुच है । और उस भावसे (स्पितिसे)म सब काम्में य सकनेवाग 'मित्य पदार्प' है। ऐसा मान में कोई भी दोप वपना बार्श माम नहीं ऐती, बतिक इससे सत्यके स्वीकार करमेकम गुपको प्राप्ति होती है। पा प्रम दपा तुम्हारे दूसरे मातसे प्रान इस तपकि जिनमें विशेष मिसने, काने और समसामेको वामपकता है। उन नोंका उस प्रकारसे उत्तर दिसा गाना हमें कठिन होनेसे मपम तमें पदर्शनसमुचप प्रप मेगा पा, मिसके बाँधने और विचार करमेसे में किसी भी पंश समावाम और इस पत्रसे मी पुस मप ममें समाधान हो सकना समय है। क्योंकि इस सबभौ भनेक प्रश्न उठ सकते हैं, जिनके सिर फिरसे समाधान रोमेसे, विचार करनेसे समाधान होगा। (२) बान दशा-अपने सहममें यपार्य बोरसे उत्पन ईदचामें- -बावामा निगमापर वर्षात् I दर्शन (पपास्थित मिश्रप) और सहन-समाधि परिणामका कर्ण यान दशा कोष, मम, माया, बोम स्पादि प्रहतियोंका कर्ता है, और उस मावके या मोनेस प्रसंगवश प पट वादि पदापोका निमित्तहमसे का है । वर्षात् फ्ट पट बादि पापा मूड इम्पोका पाक महीं, परन्तु उसे किसी बाकारमें पनेरूम क्रियाका हौका है। मोपार पशा की, जैनदर्शन उसे 'कर्म' करता है, वेशदर्शन उसे 'मति ' प्रता, मौर इससे - - - - - भीमद् पवन [ फा याप्रमी उत्तर दर्शन मा इसासे निम्ते बुम्त इसी प्रकार के शम्द करते है। वास्तविक विचार करनेसे वामा पट पट बारिक पपा कोष मादिका पर्चा नहीं हो सकती, प स निनस्वस्म बान-परिणामका का है ऐसा स्पष्ट समसमें जाता है। (२) मानमानसे किए हुए फर्म प्रारम काम्से बीयरूप होकर समयका योग पाकर फारम सके परिणामसे परिणमते हैं। वर्षात् उन मौको मात्माको मोगना पड़ता है। वैसे पारित स्पर्शस उष्णताका संबध होता है और ए उसका स्वामानिक वेदनारूप परिणाम होता है, से ही वास्माको कोप वादि माके कपिनेसे चन्म, जरा, मरण मादि बेवनारूप परिणाम होता है। इस पातका तुम विधपरपसे विचार करना और उस संबममें यदि कोई प्रभ हो तो मिसना । पोंकि इस बातको समककर उससे निपत होनेरुम कार्य करनेपर गौरको मोध दशा प्राप्त होती है। २ प्रमः-श्वर क्या है। यह मगरका फर्क है, क्या यह सच है! उत्तर -(१) हम तुम कर्म बबममें से एनेमा नीमरस जीपका सहनस्वरूप वर्षात् कर्म ररितफ्ना मात्र एक वामताप-बो स्वरूप है, यही ईमग्पना है। जिसमें शान आदि ऐधर्म में पाईबर को जाने योग्य है और यह विरफ्ना बारमाका सहन स्वरूप है। मो समय कर्मक कारण माम मही होता परम्त उस कारणको भम्य स्वरूप बानकर पब मामाकी बोर रएि होती है, तमी बनुनमसे समता वादि ऐवर्ष उसी वारमा माश्म होता है। और इससे विशेष ऐमर्ययुक्त कोई पदार्य- कोई मी फार्ष-देसनपर मी अनुमबमें नहीं जा सकता । इस कारण ईश्वर बारपाका दूसरा पर्यायवाची नाम है। इसे विशेष सत्तामुक कई पदार्य ईश्वर नहीं है। इस प्रकार निभयसे मे वभिप्राप है। (२) बगला पर्वा नहीं, अर्थात् परमाणु वाकाश आदि पदाप निम ही हम समय है, वे किसी मी बस्तु से बनने समय नहीं । काचित् ऐसा मानें कि वे ईबरमेंसे ममेरे तो यह बात भी पोम्प नही मारम ऐती। क्योंकि यदि चिरको घेसन मानें तो फिर उससे परमाण, वापस मौर से उत्पन हो सकते । पाकितनसे पाकी उत्पति कमी संभव ही नही होती । मदि ईथरको बा मामा नाय तो पसान हो क्वान यरता है। पा उससे पीकरूप अतम पदार्थक मपति मी नहीं हो सम्सी । परिसरको जग और चेतन उभयरूप मानें तो फिर जगत् भी चा-बेवम उमफ्लप होना चाहिये । फिर तो पा उसका ही दूसरा नाम ईभर रसम्र मताप रसमे जैसा होता है। प्पा गत्का मान ईपर रसकर सतोत रस ने पेमा जगत्को जगत् करमा हो विशेष पोम्म है । क्यापिर परमाणु मारा मादिको निस्य माने वौर ईश्वरको कर्म बादिके फल देवाश्म पाने, वो मी या बात सिद्ध होती है नहीं मम होती । इस पिप्पर पदर्शनसमुचपमें * प्रमाण दिपे। । प्रमा---मोक्ष स्पा है। उपरा-मिस कोच मादि मानभाषमें ख मादिम वरमाको प्रतिबंध है, उससे सर्वपा मिति दोना-मुचि होना-उसे बानिपनि मोझ-परा। उसका पोकासा विचार करनेसेना प्रमाणभूत माम होता है।
पर गोलीबी प्रकि उन] विषिष पन मादि समह-ज्याँ वर्ष उतर १ प्रमा-मोक्ष मिळेगा या नहीं। क्या यह इसी देह में निमितरूपसे जाना जा सकता है। वैसे यदि एफ रस्साके पातसे यवनोंसे हाय धाँध दिया गया हो, और उससे क्रम कमसे म्पों म्यों मपन सुलते बाते है पो त्यों उस यधनको निचिका बनुमब होता है, और यह रस्सी बहीन होकर खतत्रमावको प्राप्त होती है, ऐसा माश्म होता है—अनुमयमें माता है, उसी तर मात्माको भनानमापके अनेक परिणाममप यधनका समागम मा एमा, मह मंचम म्यो म्पों श्ता बाता है, क्यों स्यों मोक्षका अनुभव होता है। धौर जब उसकी अत्यन्त वत्पता हो पाती है वन सहन ही वारमा निजमाव प्रकाशित होकर बहानमाषरूप बघनसे छूट सकनेका वासर भाता है, इस प्रकार स्पष्ट वनुमय होता है। तथा सम्पूर्ण आममात्र समस्त बवान वादि मापसे निहत होकर इसी देहमें यमेपर मी मारमाको प्रगट होता है, और सर्प सबसे फेफ्ल बपनी मिस्ता ही वनुमवमें माती है, पर्यात् मोक्ष पद इस देहमें मी अनुभवमें जाने योग्य है। ५. प्रम —ऐसा पानेमें माया है कि मनुप्प, देह छोरनेके पाद कर्मके अनुसार बामगरों में सम्म सेवामा पत्पर और नम मी हो सकता है, क्या यह ठीक है। उत्तर --यह छोपने के बाद उपार्जित कर्मक वनुसार ही नीयको गति होती है, इससे पतियंच (जानबर ) भी होता है, वौर पृप्णीकाय अर्थात् पप्पीरूप शरीर मी धारण करता है, पर बाकीको दूसरी पार इन्द्रियों के विना मी जीवको कर्मक भोगनेका प्रसग वाता है, परन्तु यह सर्वपा पत्थर अपना पृषिपी ऐ जाता है, पर बात नहीं है। यह पत्परम्प कापा धारण करता र, वौर उसमें मी मम्पक मानसे जीव जीवहफ्से ही यता है। यहां दूसरी पार इन्द्रियोंका भपक (मप्रगट ) फ्ना होनेसे यह पृष्मीकापरूम बीत्र को नाने पोम्य है । फम क्रमसे ही उस कर्मको मोगकर नीब निच होता है। उस समय केवछ पत्थरका ८० परमाणुरूपसे गवार, परस्तु उसमें जीनका संबध पम माता, इसपिये ठसे बाहार वादि संवा नहीं होती । वर्षात् पौष मर्पया गा–पत्पर चाता है, यह बात नहीं है। फर्मकी विषमतासे चार इत्रियोंका बम्पक समागम होकर केवल एक स्पर्शन इन्द्रिपरूपसे गोबको बिस कर्मसे देहका समागम होता है, उस कर्मके भोगते एयर पृपिली मादिमें जन्म लेता है, परन्तु मा सर्वपा पृषीहप अपना पपररूप महा नाना नानवर होते समप सर्वपा जानबर मी नहीं हो पाता । गो देह है यह जीवका बेपपारीपना है, स्वरमपमा नहीं। ६-७ प्रमोर ~समें प्रमका मी समाधान मा गया है। इसमें सात प्रमका मी समाधान मा गया है, कि केवल पत्पर अपना पृषी किसी कर्मका का मही। उनमें वाकर उत्पम एवा नीच ही धर्मका पर्चा है, वार एमी दूध और पानीको तय है। वैसे भ और पानीका संयोग होनेपर मी दूध पूष रेभार पानी पानी है, उसी तर एकत्रिय आदि पर्मभसे गाया पत्थरफ्नाापना-माझ्म होता है, तो मी पर सीप तर तो चीवरुपसे ही है, और जो भी गवार मप मादि सभापूर्वक ही पता है, यो बम्पक्त वैसी है। ८ प्रमा-बापधर्म क्या है। स्पा सबको उत्पति पे से ही हुई है। " । भीमद् परन्द्र [पत्र पानीमा उम उत्तर --(१)वार्यधर्मकी म्याच्या करते हए सबके सब अपने अपने पक्षको ही बारी- भर्म करना चाहते हैं। मैन जनधर्मको गोद बौदधर्मको वेदांती केदातधर्मको बार्यधर्म को, या साधारण मात है। फिर भी हानी पुस्प तो बिससे भारमाफो निन स्वरुपकी प्राप्ति हो, ऐसा मो वार्य ( उत्तम ) मार्ग है उसे ही वार्यधर्म जाते है, वौर ऐसा ही योग्य है। (२) सक्की उत्पति देवमेंसे होना समय नहीं हो सकता । वेदमें बितना शान कहा गया है उससे हमार गुना बारायपुछ जान भौताकर वादि मशहमाोंने कहा है, ऐसा मेरे मनुमबमें भाता है और इससे मैं ऐसा मानता हूँ कि काप वस्तुमसे सम्पूर्ण मस्तु उत्पम नही हो सकती । इस कारण देवमेंसे सबकी उत्पति मानमा योग्य नहीं है।रों, पणा वादि सम्प्रदायोंकी उत्पति उसके बामपसे मान में कई बाधा नहीं है। जैन बौदके वन्तिम मावीर वादि महामायाक पूर्व देव सिपमान थे, ऐसा मागम होता है। तया वेद बात प्राचीन प्रप है, ऐसा मी माम ऐता है। परन्तु जो कुछ प्रापौन हो या सब सम्पूर्ण ऐ नपमा सस्प हो, ऐसा नहीं कहा जा सकता त्यागे पासे उत्पम दो पह सब बसम्पूर्ण मोर असत्य हो, ऐसा भी नहीं करा पा सकता । बाबी तो बेदके समान अमिप्राप और पैनके समान बमिप्राय भनाशिसे चगवा या सामान बनादि हो, मात्र उनका रूपांतर हो जाता है; सर्मपा उत्पत्ति बयवा सपा नाश नहीं होता था, जैन, पौर दूसरे सबभिप्राय अनादि है, ऐसा माननेमें कोई बाधा नहीं है फिर उसमें किस बातका विवाद हो सकता है। फिर भी हम सबमें वियप यम्मान सस्प बभिप्राय किसका मानना पोम्य है, सम्म हमें में सबको विचार करना चाहिये । ९ प्रम. नेर किसने बनाये ! क्या में मनादि। पदि वेद वनादि हो तो बनाकर । क्या परे। वर्षक मनुसार । उत्तर -(१)ोकी उत्पतिगत समय पहिसे हुई है। (२) पुस्तकस्मसे कोई मी घास वनादि नहीं, और उसमें करे ए समी शाक्नादि हैं। क्योंकि उस उस प्रकारका ममिग्राम भिम मिम गोल मिम मिमरूपसे करते आये हैं और ऐसा ही होना समय है। कोप वारि मात्र भी बनादि और पमा बाहि मात्र मी अनारसा भादि धर्म मी प्रमादि और हिंसा मादि धर्म मी मनादि हैं। के गारको हितकारी पाहै इक्ना विचार करना हो कार्य है। बनादि तो दोनों है, किर भी म्मिाम कम मात्रा बस दोष है और कभी किसीका विशेष माग हो । १ प्रत -पाता किसने बनाई है। ईपराव तो नहीं है। यदि ईमरान हो तो क्या उसका कोई प्रमान है। उपा-अर परे र उचास इसका पास कुछ समाधान हो सकता है। अर्थात् ईसर का मर्प बानी (सपूर्ण ज्ञानी ) करमेसे तो पर चरात रा सकता है, परन्तु निरय मिधिप IA परफे पर तीन प्रनेपर दस प्रकारको पुस्तक मारिको उत्पत्ति होना संमत नामोदय यो मारण कर्ष ,मिसन पर्वत मारमानक ही रोष है-अनादि महावा ।
पm गोपीके प्रमोरे सर पिपिप पत्र मादि सपा-ज्या वर्ष " - गांता बेदम्यासगीको रची पुस्तक मानी जाती है, और महामा भीष्णमे अर्धनको उस प्रकारका घोष किया था, इसरिये मुख्यरूपसे श्रीरण ही उसके कर्ता को गाते है यह बात समय है । प्रय श्रेष्ठ है । उस तबका बाशय मनादि कासे पछा बा या है, परन्तु पेही लोक धनादिसे परे वाते हों, या सभव नहीं है, क्या निष्क्रिय ईपरसे उसकी उत्पति होना मी समय नहीं। वह क्रिया किसी सक्रिय अर्यात् देहषासे ही होने योग्य है, इसरिये भो सम्पूर्ण जानी है ईपर है, और उसके बारा उपदेश किये गए शाम ईयरीय शाब, यह मानने में कोई बाधा मही है। १२ प्रम -पशु वादिके या करनेसे योगासा मी पुण्य होता है, क्या यह सच है। उत्तर -पके पघसे, होमसे मपया उसे थोडासा मी दुसदेनेसे पाप ही होता है, तो फिर उसे पा करो वपया चाहे सोईघरके पाममें बैठकर करो। परन्तु या यो दान वार किया होती है, के कुछ पुण्यकी कारणमूत है। फिर भी हिंसा-मिभित होनेसे उनका मी अनुमोदन करना योम्प मही है। १२ प्रश्न --बिस धर्मको पाप उत्तम कहते हो, क्या उसका कोई प्रमाण दिपा जा सकता है। उचर --प्रमाण तो कोई दिया न जाय, वीर इस प्रकार प्रमाणके बिना ही यदि उसको उत्तम ताका प्रतिपादन किया जाय तो फिर वो भर्प बनर्प, धर्म-अधर्म समाको उत्तम ही कहा जाना चाहिये। परम्त प्रमाणसे ही उत्तम-मनुत्तमको पहिचान होती है। जो पर्म संसारके क्षय करनेमें सबसे उत्तम हो पौर निगस्तमानमें स्थिति कराने में सम्मान हो, यही धर्म उचम और ही धर्म बख्याम है। १३ प्रश्न: क्या वाप सिस्तीधर्मक विषयमें कुछ जानते है ! यहि नामसे है तो क्या वाप अपने विचार प्रगट करेंगे। उत्तर -सिस्तीधर्मक विषयमें मैं साधारण हो बामता । भरतसा महात्माजाने मिस तयके धमकी शोध की विचार किया है, उस तरके धर्मका किसी दूसरे देशके शारा विचार नहीं किया गया, या वो थोडेसे वम्पाससे हो समझ ना सकता है। उसमें (लिस्तीधर्ममें) जीवको सदा परवशता की गई है, और यह दया मोचमें भी इसी तरकी मानी गई है। निसमें बोरके अनार सम्मका पपायोम्प लोपन मही है, जिसमें कर्मबपकी म्पबस्था और उसकी निाति मी जैसी चाहिये सी नही कही, उस धर्मका मेरे अमिप्रापके अनुसार सर्वोत्तम पर्म होना संभव नहीं है। मिस्ती- बममें जैसा मैने उपर कहा, उस प्रकारका भैसा चाहिये जैसा समाधाम देसनेम नहीं पाता । इस पापको मैमे मतमेदके पश होकर महा सिसा । अधिक प्रल्ने पोम्प माश्म हो तो पूछना-ताशेप समाधान हो सकेगा। ११ मन रेग ऐसा करते है कि बाइबल ईघर-प्रेरित है । ईसा ईश्वरका मावार है- प उसका पुत्र गौर था। उत्तर –पर बात तो मदासे हो मान्य हो सकती , पर या प्रमाणसे सिद्ध नही होती । जो बात गीता और वेदके घर-कप्तके विषयमें पिसी है, वही बात माणसमे समपमें मो समझना चाहिये । नो यन्म-मरणसे मुक्त हो, पर पर तार , पर संभव मोक्योंकि रण. । ।
- ૨ भीम परचम्न [पर पोचायक प्रमोद रक्त रेप बादि परिणाम हो बमके हेतु है। ये निस्के मही है, ऐसा ईबर वर धारण करे, पवाव विवारनेसे यपार्थ मी माम होती । 'ए ईसरका पुत्र है और था इस मावको भी यदि किसी सपकके तौरपर विचार करें तो ही यह कदाचित् ठीक बैठ सकती है, नहीं तो या प्रस्पक्ष प्रमाणसे पारित है। मुक ईपरके पुत्र हो, या किस तय माना जा सकता है! वीर पदि माने मी तो उसकी उत्पति किस प्रकार साकार कर सकते है। यदि दोनोंको अनादि माने तो उनका पिता-पुत्र समेष दिस तय और बैठ सकता है। झ्यादि बा विचारणीय है। जिनके विचार करनेसे मुझे ऐसा म्गता है कि परमात पपापोम्प नही माश्म हो सकती । १५. प्रभ -पुराने कपरमें जो मतिप्प कहा गया है, क्या यह सब ईसाके विषयमें ठीक ठीक उपयो उत्तर---पदि ऐसा हो तो मी उससे उन दोनों सामों के विषपमें विचार करना पोम्प है। तपा इस प्रकारका मविष्य मी ईसाको ईश्वराबवार कइनमें प्रवरा प्रमाण महीं है। क्योंकि ज्योतिष पारिसे मी महारमा उत्पपि पानी मा सकती है। अपना म किसी शानसे बात की हो परस्त कर मविप्प-मेशा सम्पूर्ण मोध मार्गका माननेवाला था, पर बात बतक ठीक ठीक प्रमाणभूत न हो, तबतक र मनिप्प बर्गय केषण एक भवा-प्राय प्रमाण हो है, और यह दूसरे प्रमाणोंसे भाषित नणे, पर इरिमें मही वा सकता । १५ प्रश्न –स प्रश्नमें ईसामसीह के पमकारक विषयमें लिप्सा है। उत्तर ---जो गाय कापा से सांया निकम्मर पछा गया। उसी मात्रको पदि उसी कापामें पामिल किया गया हो अथवा पर दूसरे गीषको उसी कापामें दासिक किया हो तोप होना संभव मारा। और यदि ऐसा तो फिर कर्म माविको म्यवस्था मा निमा होहो नाप । बाका योग बाकि सिरिसे बातसे घमार, सत्पम होते है और उस प्रकार पावसे चमत्कार ईसाको र 0 तोपासनपा मिप्या है, अपना समय है ऐसा नहीं करते । उस तबका सिदिषा मामाके ऐधर्यक सामने वन्य-बारमाके ऐपर्पका माल इससे कर्मत गुना है। इस लिपपमें समागम होनेपर एना पोम्प है। १७ प्रश्न -बगे घसकर कौनसा बन्म होगा, क्या इस बातकी इस मरमें भर पा सकरी बपना पूर्वमें कौनसा मम पा इसकी कुछ सबर पा सकता है। उत्तर:- पर हो सकता है । मिसे निर्मठ बान हो गया हो उसे पैसा दोना संभव है। से बाइस त्यारिके विदा उपरसे बरसातरा अनुमान ता से इस मातको इस भरी यो अरसे उसके पूर्ण कारण कैसे होने चाहिये पर मी समहमें मा सकता है-पाई पोरे जियोंसे समसमें पापे । इमी तपपरा भविष्यमें किस परिणामको प्राप्त करेगा, यह भी उसके सरपके उपरस गाना गा सकता है, और उसके विग्रेप AIR करनेपर मरिचमें रिस भरका ऐना संमा, तपा मे कौनसा मा पा र मी मी तर परमें मा सकता है। १८ मभ-मरे माफी मदर मिमे पर सस्ती है। उचर:-मप्रभा उचर पर वा जुधरे।
पर गावामी प्रमोरे ठर] विविध पर मादि संप्रह-२ज्यों व । १९ प्रम -जिन मोक्ष-प्रत पुरुपोंके नामका बाप उसेस करते हो, यह किस माधारसे करते हो। उत्तर--स प्रमको यदि मुझे सास तौरसेक्स करके पूंठते हो तो उसके उत्तरमें यह कहा जा सकता है कि जिसकी सुसार दशा अत्यत परिक्षीण हो गई है, उसके वचन इस प्रकारके समय में उसकी पेय इस प्रकारको समम है, इत्यादि यम्से मी अपनी यात्मामें दो वनुमर हुवा हो, उसके आधारसे उम्हें मोक्ष प्रा कहा जा सकता है और प्राय करके या ययार्य ही होता है। ऐसा माननेमें गो प्रमाण है ये मी शाम वादिसे माने पा सकते है। २० प्रभ -मुद्रदेवने मी मोझ नहीं पाई, यह पाप किस बाघारसे करते हो। उत्तर ---उनके शार-सिबतों के आधारसे । बिस तरसे उनके शास सिद्धांत है, यदि उसी तग उनका बमिप्राय हो तो यह पमिप्राय पूर्वापर-बिरुड भी दिखाई देता है, और यह सम्पूर्ण हानका क्षण नही है। यहाँ सम्पूर्ण बान नही होता यहाँ सम्पूर्ण रग-रेपका नाश होना समय नहीं । माँ कैसा हो यहाँ स्सारका होना ही समय है। इसलिये उने सम्पूर्ण मोक्ष मिली हो, ऐसा मही का ना सकता। वोर उनके करे ए शामोंमें बो वमिप्राय है उसको छोड़कर उनका कुछ दूसरा रा अभिप्राय था, उसे दूसरे प्रकारसे तुमें वौर हमें जानना कठिन पाता है। और फिर मी यदि करें कि पुरदेवका वमिप्राय कुछ सय ही या तो उसे कारणपूर्वक करनेसे मह प्रमाणभूत म समझा नाय, यह बात नहीं है। २१ प्रश्न -दुनियाकी अन्तिम स्पिति क्या होगी । उत्तर – सब भावोंको सपा मोझ हो बाय, अपपा इस दुनियाका सपा माश ही हो जाप, ऐसा होना मुझे प्रमाणमूस महीं मायम होता । इसी तयके प्रवाहमें उसकी स्थिति यती है। कोई भाव रूपांतरित होकर घीण हो जाता है, तो कोई वर्धमान होता है वह एक क्षेत्रमें बाता है तो दूसरे क्षेत्रमें घट पाता है, स्पारि सासे इस सरिकी स्थिति है । इसके उपरसे और बहुत ही गहरे विचारमें उतरनेके पभात् ऐसा करमा समय है कि या सष्ठि सर्पया माश होगाप, अफ्मा इसकी प्रठय होगाप, पहोना सभा नहीं । सएिका वर्ष एक इसी पृथिवीसे मही समयमा पाहिये । २२ प्रम-इस वनौति से सुनौति उस्त होगी, क्या यह ठीक है। उत्तर -स प्रमका उत्तर मुनकर गो बाल पनौतिकी इछा करता है उसके छिपे इस उपरको उपयोगी होने देना योग्य नहीं। नाति-अनौति सन मात्र बना है। फिर भी हम तुम बनातिका माग करके यदि नौतिको साकार करें, तो इसे साकार किया मा सकता , और पही बारमाका कर्रम्प है। धौर सब मालोंकी बपेक्षा वनौति र करके नातिका म्यापन किया नाग, पर बचन मही फरा पा सकता, क्योंकि एकांतसे उस प्रकारको स्पितिका हा साना । समत्र नहीं। २३ प्रम-क्या हुमिपाको प्रठप होती है। उत्तर -प्रख्यका बर्ष पदि सपा मारा होना रिया नाप तो यह बात टोक नहीं। क्योंकि पदार्पा सपा माछ हो माना समय मही है। पदि प्रसमा मर्प सब पदार्पाका ईभर वारिमें भीम पवन [ पापांची प्रमो उस न होना किया जाय तो किसी वमिप्रापसे यह बात स्वीकत हो सकता है, परन्त मुझे यसमा महा गती । क्योंकि सम पदार्थ सब पीर इस प्रकार सम परिणामको फिस सब प्रात कर सकते है, निस्से इस प्रकारका सयोग बने । वौर पर उस प्रकारके परिणामका प्रसा बापे मी तो फिर निपमता मही हो सकती। यदि सम्पजस्पसे बाबमें विषमता और म्यतापसे समताके होमेको प्रथम साकार करें तो मी देह वा स्वपके बिना विषमता किस वापरसे ए सकती है। परि दो वारिका संबध मानें तो सबको एकेनियफ्ना मानमेका प्रसग बामेऔर पैसा माननेसे तो बिना कारण हो सरी गतियोंचा निषेध मामना चाहिए-वर्षात् ऊँची गति के बालको या उस प्रकार के परिणामका प्रसंग दूर होने बापा हो तो उसके प्राप्त होमेन प्रसंग उपस्थित हो, स्पादि से विभार उठते हैं। बाप सर्व बीयोंकी अपेक्षा पम्प छना संभव नही है। २१ प्रश्ना-मनपाको मलि करनेसे मोघ मिस्ती है, क्या पर सच है! उचर -मकिशानका हेतु है।बान मोक्षका खो। जिसे बधरनान महो पदि उसे बनफा ना हो तो वसे मपि प्राप्त होना असंभव है, पर कोई बात नही । प्रत्येक पाल जान-समावसे पुरु। मलिक यम्से शाम निर्म होता है। निर्मशान मोझका देत होता है। सम्पूर्ण जानको बापि हुए बिना सर्वपा मोक्ष दो बाय, ऐसा मुझे माध्म नहीं होता, वौर पाँ सम्पूर्ण पान हसन भाषा-ान समा पाता है या करनेकी मी वाश्यकता महाँ । मानानाम मोषका खरे तपार बिसे न हो उसे वामभान न हो पा कोई नियम नही है। २५. प्रश्न मावतार और रामावतारका रोना क्या ५ सची बात है। यदि हो को कौन थे पे साधात् पर थे या उसके बस स्पा उमें मानमेसे मोस मिती है। उपर -(१) पे ऐनों महात्मा पुरुष थे पर तो मुझे भी नियम है।वामा शेनेसे ईयर थे। परि उनके सर्व मावरण र ो गये हों तो उने सपा मोक्ष मानने में दिवार महा। बाल ईपरका बरा है, ऐसा मुझे नहीं मालूम होता । स्मोकि इसके विरोधी या प्रमाण देखने में वाते हैं। तपा पाक्को ईघरका वंश माननेसे बप मोक्ष सब म्यर्प हो हो मंदिगे । पोंकि फिर तो पर ही बान बादिका कर्ण वा मौर पदि हमान वादिका कर्ता हो तो यह मिर ऐवपररित पर बमपमा निरस्त हो ो पेटे; वर्षात् बोक्का स्वामी होनेका प्रपन करते ए बरको टाटा हानिके सहम करने का प्रसग उपस्पित हो । तपा गायकोईवरा बध माननेक बाद पुस्पा करना जिस पर पोम्प हो सकता है। पोलिया स्वप तो कोई कमर्च सिप हो नही सकता ! स्पादि निरोष बानेसे किसी भीको ईश्वर के शमसे स्वीकार करनेको मा मेरो पुति मोती। ये फिर ण पपा एम पैसे महात्माजोंके साप तो उस समपके माननेको बुदि कसे हो सकता है। पोनों पम्पच बर थे ऐसा मानने पापा महा। फिर मा उनें सम्पूर्ण ऐवर्ष प्रगठ एमा पा पा मही, ५ बाट निमार रने पोम्प है। (२) प्यारमें माननेसे मोक्ष मिस्ती। इस प्रश्न उत्तर सहय। बारके सब मग, और वामपनमा ऐना मर्यात उमसे फूट माने नाम हो मोप। मनिसके उपदेपसे पत्र गांधीजी प्रमाप्रटर] विपिप पर मादि संपा-२७ वर्ष हो सके, उसे मानकर भार उसका परमार्थ स्वरूप विचारफर वपनी भारमा मी उसी सबकी निष्टा रखकर उसी मामाकी आमाके माकारसे (सरूपसे ) प्रतिष्ठान ऐ, तमी मोश होनी संमन है। पाकी दूसरी उपासना सर्वपा मोशका हेतु नहीं है या उसके साधनका होहेतु होती है। यामी निश्चयसे होकी, ऐसा नहीं कहा जा सकता । २२ प्रम-प्रमा, विष्णु और महेनर कौन थे ! उत्तर-सष्टिकेतुरूप तीन गुणोंको मानकर उनके वायसे उनका यह रूप बताया हो, तो या बात ठीक बैठ सकती है, तथा उस प्रकारके दूसरे कारणोंसे उन मामा मादिका स्वरूप समछमें माता है। परन्तु पुराणों में निस प्रकारसे उनका सम्प का है, यह स्वरूप उसी प्रकारसे है, ऐसा माननेमें मेरा विशेप मुकाब नहीं है। क्योंकि उनमें बहुत से रूपक उपदेशके छिपे करे हों, ऐसा मी माझम होता है। फिर भी हमें उनका उपदेशके रूपमें छाम केना, और नया भादिके स्वरूपका सिट करनेकी मालमें न पड़ना, यही मुझे ठीक गता है। २७ प्रश्न -पदि मुझे सर्प काटने वाले तो उस समय मुझे उसे काटने देना पाहिये या उसे मार गलना चाहिये । यहाँ ऐसा मान लेते है कि उसे किसी दूसरी तय हटाने की मुममें शक्ति नहीं है। उत्तर–सर्पको तुमें काटने देना चाहिये, यह काम पपि स्वय करके बतानेसे विचारमें प्रवेश कर सकता है, फिर मी यदि तुमने यह बाम लिया हो कि देर वनिस्प है, वो फिर इस मसारभूत देहको रक्षाके लिये, मिसको ठसमें प्राति है, ऐसे सर्पको मारना में कैसे योम्प हो सकता है! मिसे बारम-दिवकी पाहना है, उसे तो फिर कफ्नी देहको छोर देना हो योग्य है। कदाचित् पदि किसीको मारम-रितकी इस न हो तो उसे क्या करमा चाहिये। तो इसका उत्तर यही दिया जा सकता है कि उसे नरक आदिमें परिभ्रमण करना चाहिये। गर्यात् सर्पको मार देना चाहिये । परन्तु ऐसा उपदेश हम कैसे कर सकते है ! यदि धनार्य-विहो तो उसे मारमेका उपदेश किया गाय, परन्तु यह तो हमें और तुम स्वममें भी न ऐ, यही पा करना पोय है। भब संक्षेपमें इन उत्तरोंको लिप्सर पत्र समाप्त करता है। पहर्शनसमुषपके समानेका विशेष प्रयत्न करमा । मेरे इन प्रश्नोत्तरों के रिसनेके सकोचसे तुरें इनका समधना विशेष बसता बनक हो, ऐसा यदि नरा मी माझ्म हो, तो मी विदोपतासे विचार करमा, और परि कुछ भी पायरा ने योग्य माम दे तो परि पूछोगे तो प्राप करके उसका उत्तर लिगा । विशेष समागम होनेपर समावाम होना अधिक योम्प गता है। सिमित बामस्वरूपमें निस्प निपके देखभूत विचारको बिता गनेवाले रापचन्द्रका प्रमाम । ब, कार्तिक मुटी १, १९५१ ४४८ मविधान पारिक प्रश्नों के विषयमें पारा समाधान होना कटिम है। क्योंकि उपोष बापने या उपर निबनेको बासस प्रति मही हो सकती ।
मीमद् रामचन्द्र [पत्र mपापीर प्रमोच न ऐना किया नाप तो किसी वभिप्रायसे यह बात साहस ऐ सकती है, परन्तु मुझे यह संमन माही प्रगती । पोंकि सब पदार्थ सगाव इस प्रकार सम परिणामको किस तय प्राप्त कर सकते है, निस्से इस प्रकारका सपोग बने ' और यदि उस प्रकारके परिणामका प्रसग वाये मी तो फिर नियमता नही हो सकती। यदि बसतरूपसे मौवमें विषमता और मापसे समताके होनेको प्रम्य साकार करें तो मी देह बादि सबपके विना विपमता किस भापारसे र सकती है। यदि दो मादिका संबध मानें तो सपको एकेन्द्रियपना माननेका प्रसग वाये और पैसा माननेसे तो किमय कारण हो सी गतियों का निषेध मानना भाहिए-वर्षात् ची गसिके यौको यदि उस प्रकार के परिणामका प्रसंग दूर होने वाया हो तो उसके प्राप्त होमेश प्रसंग उपस्थित हो स्वादि गतसे विचार उठते।बतरण सर्व बीचोकी अपेक्षा प्रम्प होना संभव नहीं है। २१ प्रश्न --बनाको मति फरमेसे मोक्ष मिस्ती है, क्या या सच! उत्तर--मलि हानका तमान मोक्षका है। जिसे अपर-वान महो पनि उसे मनपा का ऐ तो उसे भजि प्राप्त होना बसमन है, यह कोई बात नही है। प्रत्येक बार मान-समासे पुक है। भक्तिके बरसे हान निर्म होता है। निर्मशान मौसका ऐता है। सम्पूर्ण कामको पानिए बिमा सर्वपा मोश हो गाय, ऐसा मुझे माम नही होता वोर को सम्पूर्ण जानी या सर्व भाषमान समा गाता है परफरमेकी मी बायकवा महाँ । भापमान मोबात है तथा प मिसे न हो उसे वामनान म हो, पर कोई नियम मही है। २५. परम –नप्पास्तार वौर रामावतारका होना क्या या सी बात है ! यदि हो तो फौन थे । पे साक्षात् पर थे या उसके वंश पेमा उने मान्नेसे मोक्ष मिती है। उत्तर --(१) पे रोमों महात्मा पुरुप थे, या तो मुझे मी नियम है । वामा होमेसे वे ईसर पे। पदि उनके सर्व बावरण र हो गये हों ता उनें सपा मोक्ष माननेमें विवाद हो । जान ईवरका बरा है, ऐसा मुझे नही माझ्म होता । क्योकि इसके विरोपी हगारों प्रमाण देखने माते है । तपा गौरको ईपरका स माननेसे बध मोष सम्पर्प हो हो पायेंगे । क्योंकि फिर तो पिर हो वान वादिका कर्श इमा, वौर पदि यह मान बारिका फर्क तोमर ऐश्वर्यरवित होकर एसपना ईसरल हो यो ठे; वर्षात् गाँवका स्वामी होनेन प्रपाल करते र बरको सस्ता हानिके मान करमेका प्रसमा उपस्थित हो । तपाजीको ईपरका वश मानने के बाद पुस्पा परमा विस क्ण पोम्प हो सकता है ! पोंकि यह सर्म तो कोई निर्ग सिर हो नहीं सकता। स्यादि रोष मानेसे किसी बायको ईपरके वापसे साकार करने की मी मेरो पुनि मही होती। तो फिर तण वपना राम बैसे महामानों के साथ तो उस सबपके मानमेकी मुदि से से सकता है। दोनों सम्यक बिर थे, ऐसा माननेमें पारा मही है। फिर मी उन्हें सम्पूर्ण ऐचर्य प्रार हमा पा या नहीं, पर बात विचार करने पोम्प है। (२) 'स्या म्हें माननेसे मेल मिलता है इस प्रश्नका उचर साम। गायके सब पण, रेप पोर पानका बमात्र ऐना भी उनसे घट गानेश नाम हो मोश है। मरिसके उपोपसे पर गांधीजी प्रमानउत्तर] विविध पत्र मादि सपा-२७यो वर्ष ४१५ । हो सके, उसे मानकर बार उसका परमार्य स्सम्म विचारकर अपनी मारमामें मी ठसा तरकी निष्टय रसकर उसी महारमाकी वात्माके भाकारसे ( सरूपसे ) प्रतिष्ठान हो, तुमी मोक्ष होनी समव है। माको दूसरी उपासना सर्वपा मोसका हेतु नहीं है-ह उसके साधनका होत होती है। यह भी निपपसे हो हो, ऐसा नहीं कहा जा सकता । २९ प्रश्न –प्रसा, विष्णु और महेयर कौन थे ! उत्तर--सुपिफे हेतुरूप तीन गुणोंको मानकर उनके वायसे उनका यारूप बताया हो, तो यह वाव ठीक बैठ सकती है, तया उस प्रकार के दूसरे कारणाम उन नया मादिका सरूप समाधमें वाता है। परन्तु पुराणोंमें निस प्रकारसे उनका सहप कया है, यह स्मरूप उसी प्रकारसे है, ऐसा माननेमें मेरा विशेप मुकाव नहीं है। क्योंकि उनमें पारसे रूपक उपदेशके रिये करे हों, ऐसा मी माश्म होता है। फिर भी हमें उनका उपदेशके रूपमें छाम छेना, और प्रमा भादिके स्वरूपका सिर्वात करमेकी अंजाम न पड़ना, यही मुझे ठीक माता है। २७ प्रश्न:- यदि मुझे सर्प कारने माने तो उस समय मुझे उसे काटने देना चाहिये या उसे मार गम्ना पाहिये ! यों ऐसा मान लेते है कि उसे किसी दूसरी तय हटानेको मुममें शक्ति नहीं है। उत्तर ---सर्पको तुम कान देना चाहिये, यह काम यपि स्वय करके बतानेसे विचारमें प्रवेश कर सकता है, फिर भी यदि तुमने पर मान लिया हो कि देह बनिस्प है, तो फिर इस बसारभूत देहको रक्षाके किये, मिसको उसमें प्रीति है, ऐसे सर्पको मारना में कैसे योग्य हो सकता है। जिसे वारम-दिवकी चाहना है, उसे तो फिर अपनी देरको छोड़ देमा ही पोम्प है। कदाचित् यदि किसीको बास्मरितकी इस न हो तो उसे स्पा करना चाहिये। तो इसका उत्तर मही दिया मा सकता है कि उसे नरक बादिमें परिभ्रमण करना चाहिये; वर्षात् सर्पको मार देना चाहिये । परन्तु ऐसा उपदेश हम कैसे कर सकते है। पदि भनार्य-विहो तो उसे मारनेका उपदेश किया बाप, परन्तु पर तो हमें भौर में स्वाममें मौ न हो, यही इन करना योम्प है। भब संक्षेपमें इन उच्चगेको सिसकर पत्र समाप्त करता है। पदर्शनसमुचपके समझनेका विशेष प्रयत्न करना । मेरे इन प्रश्नोतरों के किसनेके संकोचसे तुमें इनका समझना विशेष बकुसता- जनक हो, ऐसा यदि नरा मी माइम हो, तो भी विशेपतासे विचार करना, और पदि कुछ भी पारा पहने योग्य मारम दे तो यदि लोगे तो प्राय करके उसका उत्तर सिगा। मिशेष समागम होनेपर समाधान होमा अधिक योम्प भगाता है। रिसित बारमसरूपमें नित्य निष्ठाके भूत दिपारकी चिंता बनेगा रापचन्द्रका प्रणाम । . बम्बई, कार्मिक मुदी १, १९५१ ४४८ मतिद्वान भादिके प्रश्नों के विषयों पर समाधान ऐना कटिन है। क्योंकि उन्हें विशेष पाँचमेकी पाउचर जिसनेकी भारत प्राति नहीं हो सकती ।
४१८ भीमद पसबम्य तो ही अनुक्रमसे भानको निति होगी, पोंकि यही निहित उपाय है, और पनि नामकी मित होनेको पुरि। तो फिर वह पान निरापार ही गानेपर किस तरह कर सकता है। एक मात्र पूर्व कर्मक योग सिवाय पहाँ उसे कोई भी वापर नहीं है।तो मिस गालो संग-सपुरपका सपोग मारे, बार जिसका पूर्व कर्मको मिति करनेका ही प्रयोगम है, उसके अमसे दूर हो सकता । ऐसा विचार करके मुमधु नौवको उस पानसे होनेवाम भानुम- प्याकुम्वाको धौरसे सहन करना चाहिये-स तय परमार्थ कहकर परिपाको कापा हमने सुक्षेपमें उन दोनों परिपोंका सहप सिद्ध है। इस परिपहका सरूप मानकर ससग सपुरपके स्पोगसे मिस कानसे सराहा होता है, यह निाच होगी-यह निश्चय रखकर, पपाठदय गानकार भगवान्ने धारन रम्ना को बताया है। परन्तु पीरयको इस वर्षम नहीं करा कि ग सपुरुषो स्पोग होनेपर प्रमार के चरण निम्म करना प धौरन है और उदय है, यह बात मी विचारणाम पीपको स्पतिम रसना पोय है। भीतीर्थकर मादिने फिर फिरसे जालोको उपरेश दिया है परन्तु गाव निशा-मादी ग्रना चाहता है तो फिर माँ कोई उपाय नहीं चल सकता । उन्होंने फिर फिरसे ठोक कर कहा कि परिस गाँव एक इसी उपदेशको समास बाप तो मोक्ष सहन हो, नहीं तो नत उपायोंसे मी मोश नही मिती मौर का समझना मी ई कठिन नहीं है। पोंकि गौरका गो स्वरूप है केस उसे ही मानको समझना है और यह कुछ सरके स्वपकी बात नहीं कि कमी दूसरा उसे छिपा के अपना म बताये, और इस कारण र सममें न पा सके । अपने बापसे अपने मात्र गुप्त यमा मी किस तहरो सकता है। परन्तु निस तय गान मज दशाम बसमाम्प मपनी पात्पुशे मी देखता है, से। मान दशास्म स्वप्नरूप पोगसे या गांव को सर्प निमका नही है, ऐसे मेरे दम्योंमें निगफ्ना मान रहा है। और पा मापता ही स्सार है, यही बयान है, मरक वारि गतिका ख मी पही है, पहा बना मरण है, और यही देह है, यही रोका विकार है। यही पुत्र, पही पिता, पही सम, पही मित्र मादि माक्को कम्पनाका कारण है। मौर में उसकी नियुपियाँ सरम की मोक्ष। तपाइसी निरिके रिपे ससग-सत्पुरुष वादि साधन कर, वीर परि न सापनोंमें भी बीन अपने पुरुषार्पको सिम्पापे और मगाये तो ही सिद्ध है। अधिक स्पा करें। इवना सोप कपन हो यदि मौरको ग बाय तो पास मत पम, नियम, आप यात्रा, भक्ति, घास-नान मादिसे मुख हो पाप इसमें कोई संशप मही। ४५३ बर्ग, कार्तिक पदी. १९५१ रुणदासके पितको म्पमता देखकर तुमारे सबके मनमें से पता है यह होना स्वाभाविक है। पदि बने तो योगवासिष्ठ प्रयको तामे प्रारम उहें माना गयका प्रमण करना) वर मावि वेसे मिस वर बकाश मि तपा सरुग हो, उस तर घरमा । विममें मिससे रेसा अधिक समय परकाश मिझ सके उन्ना व्या स्ना योग्य है । णिसके विचमेसे दिनविकरमा रचित है।
पर ४५४, ४५५] चिपिय पत्र भादि संप्रार-२ण्यों यर्प - ४५४ बम्बई, कार्तिक मुदौ ९ मुघ १९५१ साफ मनसे खुलासा किया जाय ऐसी तुम्हारी इप्य पा करती है। उस इसके कारण ही साफ मनसे खुलासा नहीं किया जा सका, और बत्र मी उस इच्छाके निरोध करनेके सिवाय तुमें दूसरा कोई विशेष कर्तम्प नहीं है। हम साफ चितसे सुखासा करेंगे, ऐसा समझकर बधाका निरोप करमा पोम्प महीं, परन्तु सपुरपके समके माहाम्यकी रक्षा करनके छिये उस इच्छाको शान्त करना पोम्प है, ऐसा विचार कर उसका शान्त ही करना उचित है। सामाफी इच्छासे ही यदि ससारके प्रतिबधके दूर होने की दशाके सुधार करने की ठारहती हो, वो भी हममें उसे दूर करना ही योग्य है। क्योंकि हमें ऐसा उगता है कि तुम यो मारबार जिससे होवा कुटुम्म मोह है, साश परिणाम है, और किसी भशसे असासा सहन न करनेकी ही पुद्धि है। और जिस पुरुपको यह बात किसी मजबनने सिसा हो तो उससे उसका रास्ता बनाने के बाठे ऐसा होता कि जबतक इस प्रकारकी निदानपुदि ये तबतक सम्यस्त्वका विरोष ही एसा है।पेसा निमारकर से ही रोता है। उसे तुमको सिलना पोय नही ४५५ बई कार्तिक एदी १० सोम १९५१ सब गोल बारमरूपसे सममामानी है। दूसरे पार्यौ जीव पर निमपुदि करे सो बा परि भ्रमण दशाको प्राप्त करता है, बार यदि निरके विषयमें निगमुशि हो तो परिभमण दशा दूर होती है। जिसके मिचमें इस मार्गका विचार करना पावश्यक है उसको, जिसकी मारमा पान प्रकाशित हो गया है, उसकी सानु सहमसे जनम्य मति करना ही परम श्रेय है। और उस दासानुदास भक्तिमानकी मति प्राप्त होनेपर जिसमें कोई विपमता नहीं खाती, उस बानीको पम्प है । उतनी साध दशा बबतक प्रगट नई तबतक बामाको कोई गुरारूपसे वारापमा करे तो प्रपम उस गुरुपनेको छोड़कर उस शिप्पमें ही वपमी दासानुदासता करना पोम्प है। (२) है जो 1 स्पिर टिपूर्वक त् अतरंग, देस, तो समम्त पर द्रोसे मुफ तेरा परम प्रसिद सम्प तुझे अनुमबमें बायेगा । हे मी ! वसम्यग्दर्शनके कारण पा सम्म तुझे मासित महीं होता । उस सम्पमें तुझे प्रकारे म्पामोहरे और मय है। सम्पदर्शनका योग मिम्नेसे उस काम मादिको मिति होगी। हे सम्पपर्शनसे मुक्त ! सम्पपारिको ही सम्पदर्शनका फड मानमा मोग्य है, इसरिये उसमें अप्रमत्त हो। नो प्रमचमान उत्पम करता है पहले कर्मपत्रको प्रताविका कारण है। है सम्पचारिसे सुख! बब शिपिस्ता करना पोम्प नहीं। योगात वियप था पह तो बन नियत एमा, फिर वा कतरापरतत परमें किसलिये शिक्षिता करता है।
[पww. ४३ भीमद् पापम मामाक पिचको स्पिरता मी विसमें एना कठिन है, ऐसे दुपमकालमें तुम सबपर वनुपा जाती है पहचारफर छोकके वामेशमें प्रति करते हुए मुझे तुमने जो प्रश्न बानि सिगनेरूप में बकास प्रदान किया, इससे मेरे मनको सतोप एमा। ४४९ बम्बई, कार्तिक पुरी दुध १९५१ भी सत्पुरुपको नमस्कार श्री सूर्यपुरस्थित, परम्पषिप, ससग-योम्प श्री "के प्रति भी मोहमयी ममिसे नामक दवा गुफ श्री का वारमस्मृतिपूर्वक यथायोग्य पाँधे । विशेष स्मिता है कि तुमारे स्नेि र तानों पत्र पोरे पोरे दिमके क्तरसे मिले हैं। यह गांव क्त्यत मापके वावरणसे दिशा-मूह हो गया है, और उस समयसे उसकी परमार्थ- रपि प्रगट मही होती-परमार्थ परमार्पच जबामहो गया है, और उससे बोध प्राप्त होने के समवसे मा मिससे उसम बापका प्रवेश हो सके, ऐसा मात्र स्फुरित नहीं होता, पालिसपसे जौकी विषम रशा करकर प्रमुके प्रति दीनता प्रगट की है कि नाप ! भा मेरी कोई गति ( मार्ग ) मुस मही विधाई देती ।योंकि मैंने सर्वस्व स्टा देमे नैसा काम किया है, और स्वामाविक ऐप होते हुए प्रपन करनेफ मी उस ऐश्वर्यसे विपरीत मार्गका हो मैन वापरण किया है, उस उस सबभसे मे निति कर वौर उस नितिका सोचम सदुपायमूत मो सद्गुरु के प्रति शरण मात्र है, र मिस्से सत्पन हो ऐसौ रूपा कर। इस मारके गौस दोहे निमें "हे प्रमुरे प्रमु! शु का दानामात्य पा प्रपम पाप है। दो यार गे । निस्से इन दोहोंची विशेष अनुप्रेक्षा हो से करोगे तो या विशेष गुणारिका । उनके साप इससे पाठ घटक पदोंकी मनुप्रेक्षा करना भी पोम्प है, जिसमें इस गाँवको स्मा भापरम करना बाकी है और मो मो परमापके नामसे माचरण किया प मातक एसा ही इमा तपा उस पाचरपमें मिप्या बापाको नित करके दिये गो उपोश पादपा भी मनुप्रेक्षा करमेसे गोचको विशेष पुस्पार्थका है। पोगवासिष्ठका पाचन पूरा हो गया तो पाये समय उसने मन्द रहकर वर्षात् भय फिरसे उस गौचना रद करके उचराप्मपनसूत्रका विचार करना । परन्तु उस कुम्सम्प्रामक बापाक मिरच करने किये ही विचार करना। पीरि बीरको कुम्-पोगसे गो सम्माप प्राममा पता परमार्पस्म है या मही ऐसा विचार करनेसे पीबागे नही पदी बौर सहम उसे ही परमार्थ मानकर चौब परमास कमाता है। इसलिये मुमा बार तो यही कम्म किनारको सद्गुम्के योगसे फम्पापको प्राति बप कामें ही होने के साक्मत सम्म मोर उप- शम किये पोगवासिप उत्तरापपन नादिका विचार करना पोम्प । तपा प्रत्यय पुरुपके मनमोका पूरि बबि मात्र माननेके पि विचार करमा पोम्म है। 1 पन १५ ,५१ ४५२] विविध पत्र मादि समाह-२७वा पर्व ४५० पर्थ, कार्तिक मुदी । मुभ १९५१ मीहष्ण चाहे मिस गतिको प्राप्त हुए हों, परन्तु विचार करनेसे स्पर माथ्म होता है कि ये नाममा में उपयोगसहित थे।निन भीषणने कांचनको द्वारिकाका, छप्पन को यादोंके समाका बोर चविषयक बाकर्षित करनेवाले कारणों के संयोगमें स्वामीपनेका मोग किया, उन कृष्णने जब देशको होगा, तब उनका क्या दशा पी, गा विचार करमे योग्य है । और उसे विचारफर इस सीवको सहर जापुस्तासे मुक्त करना योम्प है। कुछका सहार हो गया है, शारिका मस्म हो गई है, उसके शोकसे मिल होकर वे मके बनमें भूमिके उपर सोये।। महाँ अणकुमारने यप पाण मारा, उस समय मी निस्ने पीरचको रमता है, उस पणकी दशा विचार करने योग्य है । ४५१ बम्बई, कार्तिक सुदी १ गुरु १९५१ मुमा मीरको दो प्रकारकी दशा गती है -एक विचार-दशा और दूसरी स्थितिप्रश-दशा । स्पितिप्रा-दशा, विचार-दशाके भगमग पूरी हो जानेपर अथवा सम्पूर्ण ऐ बानेपर प्रगट होती है। उस स्पितिमा-दशाको प्राप्ति होना इस कामें कठिन है; क्योंकि इस काम्में प्रभामतया भारम-परि मामा पापातस्म हो सपोग राता है, और उससे विचार-दशाका स्योग मी सद्गुरके समाके अंतरायसे प्रास नही होता-ऐसे कालमें कृष्णदास विचार-दशा की इस करते है, यह विचार-दसा प्राप्त होनेका मुस्स कारण है। वौर से बीतको भय, चिन्ता, पयमब बादि मावमें निग युधि करना योग्य महीहै। तो भी धोरबसे ठरें समाधान होने देना, पौर विचका निर्भय रसना । पोम्प है। ४५२ बर्ग, कार्तिक मुदौ ७, १९५१ मुमुसु जीपको भर्पात् विचारवान जीपको इस ससारमें बसानके सिपाय दूसरा कोई भी भय मही होता । एक बहानका निधिको इया फरमेरुप बोइया है, उसके सिवाय विचारवान पीरको इसी कोई मीरा न होती, और पूर्व कर्मके मासे कोई पैसा उदय हो तो मी विचारमानके पिचमें 'संसार काममा है, समस्त छोक हु ससे पारित है, मयसे माकु, गगनेपके प्रान फसे प्रमालित है' पर विचार निययसे यता और पान-प्रासिका कुछ पतराय है, इसलिये या कायम संसार मुझे मपका ख है, और मुझे गेकका समागम करना योम्प मही,' एक पही मय चारपानको रसमा योग्य है। महात्मा मोतीपंकरने निर्णयको प्राप्त हुए परिपा सहन करनेका बारम्बार उपरेश Pया है। उस परिपाके सरपका प्रतिपान करते हुए मानपरिषा गौर दर्शनपरिषद इस प्रकार दो परिपोका प्रतिपादन किया है। भर्पात् पिसी उदप-मोगका प्रावत्य से भार सम्ग-मपुस्पका योग नेपर मी पारको मानके कारणोंको र करनेमें हिम्मत म पा सकती हो पाराहट पैदा हो जाती हो, तो मी पोरम रखना चाहिये, रसग-सपुष्पके सपोगका विशेष विशेषरूमसे मापन करना चाहिये- भीमद् पयवाद वो ही बनुक्रमसे वहानको निधि होगी, म्पोंकि या मिरवत उपाय है, और पनि गावकी लिएर होने की पुदि है तो किरहमान निराधार हो मानेपर किस तय मर सकता है। एक मात्र पूर्व कर्मक पोगके सिवाय यहाँ उसे कोई मा वाधार नहीं है।तो मिस पातको ससंग-सत्पुस्पका संपोग हुवा है और विसका पूर्व कर्मकी निति रमेका ही प्रयोजन है, उसके क्रमसे दूर हो सकता है। ऐसा विचार करके मुमुच बीपको उस महानसे होमवाम बापुस- म्याक्षमताको पारजसे साम करना चाहिये--पस तय परमार्प काकर परिपाको कहा है। पहा हमने सक्षेपमें उन दोनों परिपोका स्वस्म मिला है । इस परिपाका सहप मानकर सरसग-सपुरुपये सपोगसे, निस मानसे घारगट होती है पनिहत्त होगी-या निश्चय रपकर, यपाउदय मानकर मगबान्ने पौरन रखना ही बताया है। परन्तु पौरबको इस वर्षमें नहीं करा सरसंग पुस्यके संपोग होनेपर प्रमादके कारण विख्या करना पर पारयो और उदय है, यह बात मी विचारवान गोपको स्मृतिमें रखना योग्य है। प्रीतीर्थकर मादिने फिर फिरसेनीयोंको उपदेश दिया है परन्तु पीर नशा-मादी गना चाहता है तो फिर या कोई उपाय नहीं चल सकता । उन्होंने फिर फिरसे ठोक ठोककर कहा कि यदि पा पौष एक इसी उपदेशको समन्स बाप तो मोक्ष सहर हो। नहीं तो बनत उपापोंसे मी मोक्ष नही मिती गौर वा समाना मी कई कठिन नहीं है। पोंकि नौवन भो सस्प है उसे ही गोषको समझना रे मोर पर कुछ दूमेके सबपका बात मी कि कमी दूसरा उसे दिया अपना न बताये और इस कारण प समझ न पा सके । वपने वापसे वने भापका गुप्त राना मी किस तय सकता है। परम्त रिस ठरा गाव स्वप्न दशा मसमाम्प नपनी मृत्युको मी देता है, वैसे ही महान दशास्म सनरूम योगसे यह गौर को सप निनका नही है, ऐसे दूसरे इम्पोंमें निमफ्ना मान या है। और या मान्यता हो संसार रे यही मान है नरक मादि गतिचा मी यही पही सम्म है, मरण है, मोर पड़ी यही दोका विकार है पो पुत्र पही पित्य, यही पा यही मित्र वादि माक्को कम्पनाका कारण है। मौर वहाँ उसकी निधि वहाँ सगी मोक्ष है । तपासी नितिक सिपे ससम-सपुरुष बादि साधन को है और परिव साधनों भी पाच नपने पुस्यार्पको पिापे और गावे तो हो सिद। बधिक क्या करें। बना सक्षेप कपन हो यदि गौरको ग गाय तो प स त यम नियम बप यात्रा, मलि शासनान वादिसे मुको माप, इसमें कोई संशप प्रो। । ४५३ बम्बई, नातिको १९५१ रफदारक चितको म्पमता देकर हमारे सबके मनमें सदया है, यह होना सामाषिक है। पति बने वो पोगवासिष्ठ प्रश्पको तीने प्रकरणसे उने पाना बपना आपण कराना, भौर प्रापि- से रिस तय नकारा मि तपा सा हो, उस व्य करमा । दिनमें बिससे पैसा बधिक समप मकान मिल सके उसना प रसना पोम्य है।णास वितसे विक्षेपको निरपि हरमा उपित है।
पर ४५४ ४५५] पिषिष पत्र मादि सपा-यो वर्ष . ४५४ बर्मा, कार्तिक मुदौ ९ गुष १९५१ साफ मनसे सुस्पसा किया जाय ऐसी हमारी इछा रहा करती है । उस इमके कारण ही साफ मनसे सुखासा महीं किया जा सका, और बर मी वस इशाके निरोध करनेके सिपाय सुम दूसरा कोई विशेष कर्तम्य नहीं है। हम साफ चित्तसे मुलासा करेंगे, ऐसा समझकर इसका निरोध करमा योम्प नहीं, परन्तु सत्पुरुपके सगके माहाम्यकी रक्षा करनेके लिये उस इम्पको शान्त करना योग्य है, ऐसा विचार कर उसका शान्त ही करमा उचित है। सत्सगकी इप्यासे हो यदि ससारके प्रतिववके दूर होनेकी दशाके सुधार करनेको इन्चायती हो, सो मोलमें उसे दूर करना ही योम्प है। पोंकि हमें ऐसा आता है कि तुम जो बारबार लिखते हो पर कुटुम्ब-मोह है, समझेश परिणाम है, मौर किसी मासे मसाता सहन न करनेकी ही युद्धि है।ौर जिस पुरुषको यह बात किसी मक्तमनने सिसी हो तो उससे उसका रास्ता बनाने के बदले ऐसा होता किनबतक इस प्रकारकी निदानमुदि ये तबतक सम्यक्त्वका विरोव ही बता है। ऐसा निमारकर सेद ही होता है। उसे तुमको लिसना योग्य नहीं है। ४५५ बा कार्तिक मुदी ११ सोम १९५१ (१) सब बीच आरमरूपसे समस्वभावी है। दूसरे पदार्यमें बौन पदि निपुति करे तो बह परि भमण दशाको प्राप्त करता है, बीर पर निनके लिपपमें निबबुद्धि हो तो परिभ्रमण दशा दूर होती है। जिसके पिचमें इस मार्गका विचार करना बावश्यक है उसको, निसको वारमामें यह बात प्रकाशित हो गया है, उसका दासानु सरूमसे जनन्य मति करना ही परम श्रेय है। भौर उस सानुस भक्तिमानकी भक्ति प्राप्त होनेपर विसमें कोई विषमता नहीं भाता, उस पानीको धन्य है । उतनी सशि दशा बनसक प्रगट म यो तबतक वारमाकी कई गुरुरूपसे वाराधना करे तो प्रथम उस गुरुपनेको छोड़कर उस शिप्यमे ही वपनी दासानुसता करना पोम्प है। (२) हेगी 1 स्थिर पिपूर्वक त्मतरंगमें देस तो समस्त पर पोसे मुळ तेरा परम प्रसिद्ध सम्परा अनुमबमें बायेगा। हे ना ! बसम्पम्दर्शमके कारण पा सरूप तुझे मासित महीं होता । उस सहपमें तुझे शका, म्पामोहरमौर मय है। सम्यम्दर्शनका योग मिझनेसे उस भान गादिको निति होगी। है सम्पदर्शनसे पुल ! सम्पचारिकको हो सम्पनिका फल मानना पोम्प है, इसलिये उसमें बममत्त हो। यो प्रमत्तमान उत्पम करता है पा से कर्मभषको सुप्रतीतिका कारण है। है सम्पचारिश्मे सुख ! बब शिपिस्ता करना योग्य नही। गोगात भतराप पाबरतो वा निचवा, फिर तब ब्रतापरहित पदमें फिसठिये शिपिकता करा !
वर्ष २८वों
परमपद-प्राप्तिकी भावना
(अंतर्गत)
गुणमेणीस्वरूप
४५६
मी, कार्तिक १९५१
ऐसा वपूर्ण वक्सर कम प्राप्त होगा। कब मैं बस और बम्पतरसे निर्णय गर्नेगा ! समस्त
सर्वपके वाष्ण बपनको वकर उन में मान् पुरुषोक पपपर विचरण काँगा ! ऐसा गपूर्ण पसर
का प्रास होगा।॥१॥
समस्त मास उदासीन पिरोकर, दो मी के सपमके हो त यो तपाप किसी
कारणसे अन्य कु मी कम्पना न हो, पौर देश में चिन्मात्र मी मामा मये। ऐसा वपूर्ण पसर
कर प्रात दगा॥२॥
पर्धनमोहनीयके नाश होनेसे वो शान सत्पन हो सपा दासे मिन ए कपके डामसे
चारित्रमोहनीयको पीण मा देखें इस तरा र लसपका पान या करे । ऐसा पूर्व पार कर
प्राप्त होगा! ॥n
तानों पोगोंके मंद हो जानेसे मुल्यमसे देपर्यत भारत्म-स्पिरता ये। तपा इस स्पिरताका
पोर परिपइसे अपना वपसगाके मपसे कमी मी बंद न बा सके । ऐसा पूर्व वासर कर प्राप्त
होगा pen
सपमके हेच योग प्राति और भी दिनभगवान्को माता मापान होकर निक
स्वरूपके ससेहो। तपा पर मी प्रतिझण परतो हा स्पिति हो, गोबतमें निग सहममें न
पाय । ऐसा मपूर्ण अपम र प्रास होगा। ॥५॥
पूर्व भारतर एमोक्पो मापणे पार पाए मार नियो!
नगर्नु मन लगाने चांस मत्पुम्पने पंचनामपूर्व ॥
नमसौम्माधिम्य मात्र पसन्तु दोषको
मा पर मापसेमा दोस प्रिपत् मूर्ख नप मोर थे। भपूर्व ॥
एमग्येरम्तीवनपम्पोपोमिटरेट पैदरामान,
मा प्रचारितम् मोबाईपसम्पनु नामपूर्व |॥३॥
भारत मोगली मुहले रोतो।
और परिमारफार्मम्प माती परेपहामिलानो भयो।मपूर्व tvn
एममा प्रममा साटो निम्म्म भापनि।
सनसनी पी पम्पमतस्पर्धनमा ॥५॥
१६ परमपद मासिक माना] विविध पर मादि संग्रह-२८षौ वर्ष ४२१ -1 - पाँच सिपयोंमें राग-रेपका जमाव हो, वौर पचप्रमादके कारण मनमें क्षोम म हो । तया द्रम्प, क्षेत्र, काम और मायके प्रविषम विना हो छोमरहित होकर उदयके वाधीन विचरण करें। ऐसा वपूर्व ववसर कम प्राप्त होगा! ॥ ६ ॥ कोषके प्रति क्रोध समात्र , मानके प्रति सरखवाका मान ये, मायाके प्रति सम्झा-भावका माया ये, और छोमके प्रति उसके समान छोम न थे। ऐसा अपूर्ण अवसर कब प्रास होगा। ७ ॥ बहुत उपसर्ग करनेवासके प्रति मी क्रोध मये, यदि पश्यती मी पदमा करे तो मी मान म देह नाश होती हो तो मी एक रोममें मी माया उत्पन्न न हो, तथा प्रबल सिलिका कारण होनेपर मौ छोम न हो। ऐसा अपूर्व मासर कर प्राप्त होगा। ॥ ८॥ मममात्र, मुडमात्र, स्नानामाव, बदत-धोक्न, स्यादि परम प्रसिद्ध छमणम्प यो ब्रम्पसंपम है वपा केश, राम, नस अपना शरीरका श्रृंगार न करनेहप ओ मावस्यम है, उस ब्रम्प माप सयममय पूर्ण निर्मप भवस्था ये ऐसा अपूर्व मबसर का प्राप्त होगा। ॥९॥ शत्रु-मित्रके प्रति समदर्शिता ये, मान-अपमानमें समभार थे, सीवन-मरणमें म्यूनाधिक मात्र नो, तपा ससार और मोक्षमें पुर सममाव रे । ऐसा अपूर्ण मामर कब प्राप्त होगा। ॥१०॥ स्मशानमें पके सपरण करते हुए, पीतम वाघ सिंहके सयोगमें राते हुए, मनमें क्षोमको प्राप्त न होकर बगेछ भासनसे स्थिर है, और ऐसा समाई कि मानो परम मित्रका हो सब प्रान्स गया है। ऐसा बर्व वसर कर प्राप्त होगा। ॥ ११ ॥ मोर तपश्चर्या में भी मनको मतप न हो, स्वादिए मोनममें मी मनको प्रसता म हो, तपा रम-कणसे कर रैमानिक देवोंकी अधितक समीको एक पुद्रसहप मार्ने । ऐसा अपूर्व अवसर कब प्राप्त रोगा। ॥ १२॥ विपपमा गणोर पिता पंच प्रपरे म मने मननो होम बो। इम्प र नेपाल माष प्रतिपय विमएस तपय पीतयोम कामपूर्व रा॥ गोषण बोप प्रेपलमानता मानाने तो नपमान मान यो; मासाने मापा मारनी प्रेमाचे मही मम जमान थे। मपूर्ण || पारपरस्पे पन मेप नहीं कर पा वापि न म मन थे। देह गाय पर माया पाव म रोमर्मा प्रेम माणे प्रा विनिएन । म .cn नममार मुंहमार बभनानवा मरतपोषन भादि परम प्रत्रिपा प रोम मन ममे गंगार नहीं मान सम्म निप्रय दो। मपूर्ण ॥९॥ मित्रप्रत्येकवे समावि म्यन ममाने र समारो। अमित मरणे नहा म्पूनाधिम्या मा मोच पर एर पर्षे उमम्मर थे। भपूर्व १ . एपी पिरतो में स्मशान परी पर्वतमा बामग, महोत भागना ने मनमा ना गमता परम मिनो या पामा मग थे। मपूर्ण men पोर सपा न मनने पर नहीं मान मानहाँ मनने प्रवाहमा सम्परेचदम्पनि सनी, मापा ३० एक समारोहमा ११ ।
। भीम पमबाब [५६ समपर-प्रसिध माना इस तद पारिप्रमोहनीयत्र परबय करके मागे अपूर्वकरण गुणस्पाम है उस दशाको प्रश्न कर, तपा आपकोणी वास होकर पतिशय शुख म्वमाषका अपूर्व चिंतन करें। ऐसा वपूर्ण बसर कर पास होगा! ॥१५॥ स्वयंभूमणरूपी मोर-समुदको पार करके धीणमोर गुणस्पानमें बाकर , वर यहाँ मतमतमें पूर्ण गीतराग-सबप कर अपने फेरणानके स्थानेको प्रगट कर । ऐसा वपूर्ण पसर का प्रास होगा। ॥१९॥ याँ बार पापाती फौका नाश हो जाता है, नयाँ ससारके पौसका बापंतिक मास माता है, ऐसी सर्पमापको बाता ब्रह्म पुर, कास्य प्रमु, वौर गयो भनत पार्यका प्रकाश पता , उस कास्पाको प्राप्त करें। ऐसा भपूर्व वपसर फल प्राप्त होगा' ॥ १५॥ जॉपर नई रस्सीकी वारतिके समान बेदमीय बादि चार कर्म ही बाकी य गाते हैं। उनकी स्थिति देहको वायुके वाधीन (पौर वायु कर्मका नाश होनेपर उनका मी नारा रोगाता है। ऐसा अपूर्ण असम कब प्राप्त होगा! ॥१६॥ माँ मन, पचन काप, और कर्मको वर्गणारूप समस्त पुनका सबम छूट माता है, ऐसा याँ भयोगकरण नामका ममामाम्प, मुसदायक पूर्ण और बीत गुणस्पान पता है । ऐसा क्पूर्ण बक्सर का प्रास होगा॥१७॥ यो एक परमाणुमात्रकी मौ स्पर्शता नहीं है, जो पूर्ण कर्मकरहित वरोड स्वरूप है, जो प्रया, निरंजन पैतन्यमति, आनन्यमप बगुम्म्मु, ममत और सहचपदरूप है। ऐसा कर्ण सर कम प्रय होगा ! ॥१८॥ पूर्णप्रयोग मारि कारणास बो ऊर्भ-गमन करके सिमासपको प्रत होकर सस्पित होता है, और सारित बमत समापि-मुसमें विराजमान होकर बनत दर्शन पौर मनत बामपुल हो बाता है। ऐसा अपूर्व सर प्राप्त होगा। ॥ १९॥ एम पराम ने बारिखमोनो बाई लामाल पूर्ण मान थे। ली पानी पीने मासावा मन पतिम बतिपय मतमान बेमपूर्व पर मोह स्वयंभूयमय तरीका नेता मा बीसमोर एमपनको मत स्पय तो पूर्नस्तस्म पीतराग मा प्रयापान निमान बो। भपूर्व trl चार मनावी मार सपना पौमतमो मायावक नाब नभन मला पाव ताल प्रमु पीय भमत प्रायो। बपूर्ण ॥१५॥ पेप्नीमावि बार म प गाा, प्रमै सीवरक्त नाही मात्र पर जापान भनी तिमाकुर पूर्व सोपे कियन बो। बपूर्व ॥१५॥ मन पन प्राममी पपा सेयो। पए मोम पुलवानर साब महामाय मुनरमाबामपूर्ण । एक परमाणु माननी के म सांता पूर्ण मावि नहोमसम्पथे मरम पवनापूर्ति मनमर भगुममा मनपरस्पगे। पूर्व ॥१८|| पूर्व प्रयोगाल परचम गरी उमामनाम पात जिथे मनित व समापिनुकमा, मनन कान मवईत थे। मपूर्ण ॥१९॥ ।
पत्र ४५. ४५८ ४५९] विविध पत्र मादि समाह-२८यों व
કરી
इस पदको मौसहने बानमें देखा है, परन्तु भीमगवान् मी इसे कार नहीं सके । फिर इस
सरूपको नम्प वाणीसे तो क्या कहा जा सकता है। यह मान केवउ बनुमक्-गोचर ही बरता है।
ऐसा अपूर्ण असर कम प्राप्त होगा ॥२०॥
बिस परमपरकी प्राप्तिका मैने म्यान किया है, यह इस समय शकि बगैर यपपि केवल मनो-
रयरूप ही है, तो मी यह रायचन्द्र के मनमें निश्चयसे है इसख्येि प्रमुकी बाबासे उस स्वरुपको
अवश्य पाउँगा । ऐसा अपूर्व भवसर का प्रास ऐगा ॥२१॥
४५७
केवस समयस्थित शुद्ध चेतन ही मोक्ष है।
उस सभावका बनुसघान ही मोक्ष मार्ग है।
प्रतीतिके रूपमें यह मार्ग यहाँ शुरू होता है वहाँ सम्पम्दर्शन है।
एक देश वाचरणम्पसे उस वाचरणको पारण करमा यह पचम गुणस्पानक है।
सन वापरणरूपसे उस वापरणको धारण करना यह मा गुणस्थानक है।
पप्रमतरूपसे उस भाचरणमें स्थिति होना यह सप्तम गुणस्थानक है।
अपूर्व बास्म-जातिका होना यह पएम गुणस्थानक है।
सवागत स्यूल कपापोंका बम्पूर्वक निजस्वम्पमें बना यह नायाँ गुणस्थानक है।
सूक्ष्म
दसों
उपशात
म्यागयों
क्षीण
"
"
.
"
"
.
"
" पाया
४५८
पानी पुरुषोंकी प्रतिसमय वनंत सयम परिणामोंको पनि होती है-ऐसा सोने का है,
यह सस्प है।
पासपम, विचारका तीक्ष्ण परिणतिसे तथा प्रमरसमें स्थिर होनेसे प्राप्त होता है।
४५९
एकांत मौनके द्वारा निनभगवान्के समान प्यानपूर्वक में
वाकिचिनरूप पिचरते हुए
कमपास्मसपाका होगा।
बेपरमानी कानमा का एक्या नहीं पर मौम्पवान थे,
सम्पने मम्म पानी से एक। मनुमगोचर म्याप शान । मम ॥२॥
प्प परम्पमासिन मर्नु पान में गगनगर ने हा मनोरपस्स बो,
दो पप नियप पचन मनने गमो प्रमुमागए पते बलाप भो । मपूर्व ॥२१॥
भीमद् रामचन्द्र [१ ९ ४॥ ४६० एकबार विदेष शत हुए बिना भति समाप मामे दे सम्मे योग्य बपूर्व स्पम प्रकट नहीं होगा। फसे, को, स्पिति करें। ४६१ बर्ष, कार्तिक मुदी १५-मौम १९५१ मारणांगप्रकी एक बौमात्र उत्तर पहा सक्षेपमें हिसारे- (१) यो माहमाका तो मात करे किन्तु दूसरेका न करे, या प्रत्येकमुर बफ्या वयोप्पा केवही। क्योंकि ये उपदेश-मार्ग नहीं पाते है, ऐसा प्यार है। (२) यो वाहमाका तो मात नहीं कर सकता किम्त सरेका मत करता है, पर बचरिम- सरीरी भाचार्य है, अर्पात् ससको फुल मव भारण करना वमी और बाकी है।किन्तु उपध मार्गको पारमा परा उसको पहिचान है इस कारण उसके पारा उपदेश पुनकर भोता पाय उसी मबसे इस संसारका मत मी कर सकता है और भाचार्यको उसी मासे मातम कर सकनेके कारण उसे दूसरे मगमें एक्सा है। वपना को चीन पूर्वका में मानायवन कर प्रारमोदयमें मद धयोपशमसे वर्तमान मनुष्प रेड पाकर बिसमे मार्ग मही जाना है, ऐसे किसी उपदेशकके पाससे उपदेश सुनने- पर पूर्व सस्कारसे-पूकि बारापनसे-ऐसा विचार करे कि यह प्ररूपमा मस्स ही मोझका रेख मही है, क्योंकि उपोरा मषफ्नेसे मार्ग प्ररूपणा कर हा अपचा पा उपदेश देनेनाम नाव स्लप बपरिणामी पर उपदेश देगा, यह महामार्प-ऐसा विचार करते हुए उसका पूरापन मागत ठठे, और प उदयका मारा कर मात करे-सीसे मिचाप पण कर ऐसे उप- देशका समास मी इस मगमे किया ऐगा ऐसा मास्म होता है। (३) नो सप मी तरे दौर दूसरों को मौ तारे, वे भी वार्षकादि । (0) गो स्वयं भी तरे महा नौर इसरोंको मी तार न सके ममम्प पा दुर्मम्प पारो। इस प्रकार या समाधान किया हो तो बिनगम निरोधको प्राप्त न । ४६२ बम्बई, कार्तिक १९५१ वापसपी बो तादात्म्पपन है, पताम्पफ्न पदि नाच हो नाम तो सान समासे वात्मा मुख हो। ऐसा मौरमादि वनंत भाना-पुस कर गये हैं। जो सोमकुम उसी रूममें समाया मारे। बी, चर्दिक पदौ १५ मि १९५१ जब प्रारम्भोदप ब्रम्पादिरोंमें निर्यक हो तब विचारमान चारको बिशेप प्रति करना पोग्य माही, बप्पा मासपासको प्रापि मगर समासे करना उभित केवल एक ही गम बसते एकर मपि करमा सपित म।
पा] विषेष पत्र मावि संप्रह-२८या पर्व ४२५ - दुविधाके शरा किसी कर्मको नितिकी इच्छा करते है तो यह नहीं ऐसी, और बार्चम्पान होकर जानकि मार्गपर पा रस्सा गाता है। ४६४ बम्बई, मगसिर मुदी १ क १९५१ प्रम-उसका मम्प मही, वर्ष नहीं, और यह अप तपा ममेष है, स्पादि रूमसे मीगिन भगवान्ने परमाणुकी म्याच्या कही है, तो इसमें बनन्त पर्याय किस तर घट सकती है। मपवा पर्याप या एक परमाणुका हो दूसरा माम है या आर कुछ। इस प्रनसूपक पत्र मिग था । उसका समाधाम इस प्रकार है- उत्तर – प्रत्येक कार्यकी वनन्त पर्यायें (कास्पाएँ) होती हैं। मनन्त पापरहित कोई पदाध हा ही नहीं सकता—ऐसा भानिनमगवान्का वमिमत है, वह यह पयार्य ही माश्म होता है। क्योंकि प्रत्येक पदार्थ समय समयमें अबस्पान्तरको प्राप्त करता एषा प्रत्यक्ष रिसई देता है । जिस तय बामा प्रतिक्षण सकम्प-विकम्प परिणतियाँक कारण मरस्पान्तर गुमा करती हैं, उसी तग परमाणुमें भी धर्म, गध, रस, रूप अबस्पान्तरको प्राप्त होते ग्रत । ऐसी कास्पान्तकी प्राप्ति होनेस उस परमाणुके अनन्त भाग हुए, ऐसा करना ठीक नहीं । पोंकि यह परमाणु अपने एकप्रदेश क्षेत्र अगा- हिलको मेरे बिना ही ठम अवस्थास्तरोंको प्राप्त होता है। एकप्रदेश-क्षेत्र-मनगाहिलके बनम्त माग हो नहीं सकते । एक ही समुद्रमें जिस तर तरगें उठती गती है और ये तरगें उसमें समा जाती है। पुदी वरगोंके कारण उस समुद्रको गुदी जुदी ववस्थाएँ रोनेपर भी मिस तय समुद्र अपने अगा- हक क्षेत्रको नही शेषता भौर म कही उस समुत्रके बनन्त मिम मिम हिस्से ही होते, मात्र अपने ही सपने पापा करता तगित होना पर समुद्रको एक परिणति है यदि जस शान्त हो तो शाम्तवा ठसकी एक परिणति ह—कोई न कोई परिणति उसमें होनी जरूर पाहिए। उसी तय वर्ण, गादि परिणाम परमाणु बदसते आते हैं, किन्तु उस परमाणुके की दुको दो गानेका प्रसंग मही मात्र वस्यान्तरको प्राप्त होते एते हैं। जैसे सोना साकारको मेरकर मुकाकार दोवा है, उसी तब परमाणुकी मी एक समयको बरस्पासे दूसरे समपकी वरस्पामें मुझ क्न्तर रामा करता है। वैसे सोना दोनों पापोंको पारण करनेपर भी सोना ही है, वैसे ही परमाणु भी परमाणु हो यता । एक पुरुष (जीव ) बालकपन छोड़कर बवान होता है, पानी मेहकर पर होता है, किन्तु पुरुप यही पता। इसी तय परमाणु मी पपायोको प्राप्त होता है। माकारा मी बमन्त पर्यापी है और सिर मी मनन्त पर्यापी है—ऐसा निनमगवान्का अभिप्राय है। इसमें विरोध नही माश्म होता । यह बहुत कुछ मेरी समझमें भाया है, किन्तु विशेषम नहीं किसे जा सकने के कारण, जिससे तुमको यह बात विचार करने में कारण हो, इस वय उपर उपर से किसी। मोसमें मेष-उम्मेष यो भवस्था है, उसका पर्याय है। दीपककी हसन चसन स्थिति उसको पर्याप है। बामाको सकल्प-विकास्प दशा बना हाम-परिणति पर उसकी पर्याप है । उसी तयसे वर्ष गंध परिणमनको प्राप्त हों, यह परमायुकी पाप है। परि इस वदका परिणमन न हो तो भावा .
४२१ प्रीमद रामचन्द्र [४५ जगत् इस विचित्रताको प्रप्त नहो सके, क्योंकि यदि एक परमाणु फ्याय म होगी वो समी परमाणुगों में भी पर्याय म होंगी । स्योग, नियोग, एकल, प्रपल स्पादि परमाणुको पर्यापे । और ये सम्प परमा दुओंमें होती है ।निस तर मेर-उम्मेपसे क्षुका नाश नहीं होता, उसी तर पनि भावों प्रति समय उसमें परिवर्तन होता ये तो मी परमाणुका म्पय (नारा) नहीं होता । ॥ ४६५ मोहमयी (पम्प) मगसिर को ८ पुष १९५१ पासि निाच होने बाद बहुत करके वापीवा अर्पाव इस मक्के सन्म पाममें साधारण म्यानहारिक प्रसंगसे गानेकी बरत है। रिचमें मृत प्रकारेसे उस प्रसगक छूट सकमेका विचार करनेसे उससे इटा बा सकता है, पर मौ समय है। फिर मी मातसे चीयोंको वाप कारणमें ही कमी बधिक सोनेछ मी समाना होती है इसलिये वप्रतिबध मात्रको विशेष प करके यहाँ गानेका विचार है।यो गानेपर एक महीने से अधिक समय मग गाना संभव है। कदाचित दो महीने मी सग गॉप । उसके बा फिर यहाँस बोरकर इस क्षेत्रका तरफ माना हो सकेगा, किर मौ गो- तक हो सकेगा पाँवक दो-एक म्हानेका एकान्तमें निति योग मिक सके तो पसा करनेकी पडा है, चौर गा योग बप्रतिबंध मावसे हो सके इसका विचार कर रहा है। सब म्पमास निरत एए विमा पिच ठिकाने नहीं बैठता ऐसे वप्रतिषवस्गभागका निमें बहुत कुछ विचार किया है इस कारण उसी प्रवाहमें बना होता हैकिन्तु उपानित प्रारम्पके ना होनेपर हो सा ऐसफतामा प्रतिवप पूर्णत है मामाकी इस प्रतिबंध महा है। सर्व सामान्य लोक म्पहारको निपिसभी प्रसग विचारको किसी दूसरे प्रसगपर बताने के लिये रसकर इस क्षम्से निच होनेकी विपदा या करती है। किन्तु यह मी उदपके सामने नही बनता । फिर मी रात किन पहा पिम्सम या करता है तो समन कि पोरे समप बार पारी गाय । इस क्षेत्र के प्रति ए मा रेप मात्र नहीं है, तपापि संगका विशेष कारण है । प्रतिके प्रपो- मन बिना पहों गना मामाके कुछ विशेष शामका कारण नहीं, ऐसा गानकर इस क्षेत्रसे नि होमेका विचार या है। पपपि प्रति मी निजबुदिसे किसी भी तय प्रयोगमभूत नही गया है, तो मी उदपानुसार काम करते एनेके के उपदेशको बगीकार कर उदयको मांगने के लिये हमें प्रति-योग केला पारे। मानपूर्वक मारमा उत्पम हुमा पानिपप कमी मी महीपताकि समस्त संग पहा मार्च बामपसे देखते प्रसंसा करते एक समयमाची पद निसभाको मिस्मरण करा देता है, और परमात प्रपत्र देखने में मी बाई माती और पा सकती है। इस कारण यत नास को बापत्रम्म समस्त सगमें उस मात्र यता और पनि प्रतिदिन वाला होगा। इसलिये विशेष परिणामको प्राप्त कर सब संगास निधि हो, ऐसी भपूर्व कारण-पोगसे पाया करता है। समष पर पत्र प्रारंमसे म्पाहारिफ सतपमें लिख गया मायम हो जिसमें पर पान कुल भी नही है। बसगमाये रिपप बाम-मापनाका पोडासा चारपात्र यहाँ मिला है। ।
vi.] पिपिय पत्र मादि सपा -२बावर्ष ४६६ बमई मगसिर बदी शुक्र १९५१ . बानी पुरुषका सत्सग होनेसेनियम होनसे-और उसक मार्गफा माराधम करनेसे जानफा दर्शनमोहनीय कर्म उपप्त हो जाता है नया लय हो जाता है, और कम कमसे सर्वमानको प्राप्ति होकर जीव तस्य होता है यह बात पपपि प्रकट सस्य है किन्तु उसस उपाणित प्रारम्प मी नहीं भोगना पाता, यह सिदांत नहीं हो सकता । जिसे केवलबान मारे, ऐसे पोतरागको मी जब उपार्वित प्रारम्बस्सप चार कर्माको भोगना पड़ता है, सो उसस मीची भूमिकामें स्थित गीको प्रारम्म मोगना ही पड़े, इसमें कुछ भी नापर्य नहीं ह । रिस तय उस सर्वन पौतगीको घमघाती चार कर्माको, उनका नाश हो जानेके कारण, मोगना नहीं पाता है, भीर उन कर्मोके पुन' उत्पब होने के कारणों की स्थिति उस सद्ध पौवरागमें नहीं, उसी तय पानीका निश्चय होने पर महान मापसे नीतको उदासीनता होती है बार उस उदासीमताक करण ही भविष्य मासमें उस प्रकारका कर्म उपार्जन करनेका उस नीवको कोई मुम्न्य कारण नहीं रहता । परिकाचित् पूर्वानुसार किसी जीवको विपर्यप उदय हा पाप, ता मी या उदय क्रमश उपशाव एवं क्षय होकर, गौत्रको बानी के मार्गको पुन प्राप्ति होती है और यह सर्षपुन्नय-परावर्तनमें अवश्य ही समार-मुक हो जाता है। किन्तु समकिती बीपको, अपना सर्व बातरमको, अपवा अन्य किसी योगी या कानीको शानकी प्राप्ति होनेसे उपार्जित प्रारम्ध न मोगमा परे, अपना दुम म हो, पर सित नही हो सकता । तो फिर हमको तुमको यहाँ मात्र ससगका भय हो छाम होता है, यो सब सामरिक दुख नित हो गाने पहिमे-ऐसा मानने सगे तब तो केवउझानानि निरधक होहो नापगे। क्योंफि उपार्जित प्रारम्ब परि बिना मोगे। नए हो माप तो रिसब मार्ग एट ही होगाप। पानी के ससंगत मानांक प्रमगकी चि मुरझा जाता है एक सत्पासम्पका विवेक रोगा? बनन्तानुबधी प्रोपारि सप पाते हैं। और कम कमसे सब राग-रेप क्षप हो जाते हैं यह सब कुछ होना समय है, वार हानीफ निषय- शरा यह अन्पफासमें ही वपत्रा सुगमतासे हो जाता है यह सिदात तो मी नोदुम इस तरहम उपानित किया जा? किनिसका भागे बिना नाश म हो उसे तो भागना ही पड़ेगा, इसमें कुछ भी सह नही। मेरा बान्तरिक मान्यता तो यह है कि परमायके म किसी मुमुक्षु जीपको मेरा प्रसंग हो और यह बाप मुतसे परमार्थक हलुकी दो इष्टा करे वा ही उस कम्पाण हो सफता है। किन्तु यदि दम्पारिकारमको पुरा भी इछाए अपरा बैस म्पबमापका मुप्त उमर ाग पता पख वारमा जाप मनुरुममे मम्नि पामनाको प्राप्त होकर मुमपुनाका नाश परला --पमा मुम निषय है। भार इसी कारण तुम्हारी तरफ्स मा सम्पावहारिफ प्रमुग उिमा बापावर तब तुमा र बार उपाठम देकर दिल मी किया था कि मरे प्रति तुम्हारे ना इस प्रकार म्पपमपम्पकम किया जाप, इसम्म तुम समय ही प्रपन करना। और हमें पर मा रहा कि तुमने म इस सूचना साकार मी को पी, किन्तु तनुमार पोरे समपना दीवाना में मार परसापक संबप नुम टिमने यो रो, ता बार हमारे पर मनन कर पापा उम माग जाप, - [पा. ४२८ भीम परवद्र तुम र देना और यदि निस्प बसी ति रस्सा करोगे तो पहजय हो मारे किये हितकरी हागा । उससे मुझे ऐसा माझ्म होगा कि तुमने मेरो वतिचे उमसित करमेका कारण दिपा है। संगक प्रसंगमें कोई मी ऐसा करे तो मेरा पिच गत दिपारमें पर बायो अपना पण राता है, क्योंकि 'परमाको नाश करनेवाण यह मानना इस गांव के उदममें गाई,' ऐसा भाष, मा चब तुम म्यवसापक साप लिसा करते हो तब तब मुझे प्राय वा करता है। फिर मी बापकी पनि विशेष परिवर्तन होनेके कारण थोड़ी बहुत धारणठ पिच कम हुई होगी । तुमने परमापकी पठाइससिपे इस बावपर हमको बम्प स्पिर होना चाहिये । । ४६७ गई मगसिर दी ११ रचि १९५१ परसोंके न सिसे पुए पत्रमें गो गमोर वाशय किया है वह विचारवान गौनको बामाका परम हितेपी धागा । हमने तुमें पा उपस भनेक बार योगामात किया है किर मी भागारिकाक कारसे उत्पम रेशक कारण तुम पात बार उसे भूल गये हो वा भूम नाते हो । हमारे प्रति मा समान तुपारा भकिमाल है ऐसा मानकर मिसनेमें कोई हानि नही है। सपा दुस मन करनेको वसमर्थता के कारण हमारेसे पैसे म्पहारको याचना हमारे द्वारा दो प्रकार है- एक तो किसी सिद्धि-पोगसे हुए मिठाया जा सके इस मम्सनकी, और दूसरी याचना किसी म्पापार रोजगार बारिकी । इन दोनों प्रकारको तुम्हारी याचनाओं से एक मो हमारे पास करना हमारी मामाके हित के कारणको रोल्नेबाम और बनुनमसे मलिन बासमाका कारण होगा। स्पोकि निस मनिमें गो करना अनुचित है, वोर मरि कोई जीव को उसमें करे ता उस ममिकाथा उसे मात्र हो त्याग करना पडेगा-समें में सन्देह नहीं है। हमारी हमारे प्रति निकाम मकि होना चाहिपे, और तुम कितमा मी दुर क्यों न मा पो फिर मी में उसे पूर्वक ही मान करना चाहिये । परि सा म हो सके तो मी उसके एक वक्षरकी भी सूचना हमको न करनी चाहिसे—पही तुमको सपा मोग्य है। बार तुमको जैसी स्थितिम देसमेकी जितना मे म है और स्तिमा मारा उस स्पितिम हित या पदाण अपना पचनमय हमसे बताया नही गा सकता।किर मी पूर्णम किसी उसी उदयके परण तुम उस बातो मम मासे जिससे तुरे हमको मिसकर सूचित परनेकी पन्छा बनी रती है। उन दो प्रकारको याचनामों में प्रपम का पाचना तो किसी भी निफा-मम्पको करनी योग्य ही मी भपरि काचित् सम्पमात्र हो भी तो उस मुझसे ही काट गम्मा रवित है। क्योंकि पर जायेर मिप्याबका कारण है ऐसा चकराविध निथप वर बमको मी सप्रमाण माश्म होता है।मो प्रकारको पाचना मी करमा पोग्य नहीं, स्मोक्षिा मी हमारे लिपे परिप्रमका कारण।मका म्पप्रारका परिमम देकर म्पहार निमाना पाइस गाव सति बहुत ही मयता Kar | स्पोकि हमारे लिये परिश्रम करक में पारा पण सेना पाता हो तो पतमारे लिप दिनमा और हमारे लिये भी बस दुध मिचयाप नही। ऐमी परिस्पिति होनेपर मो हमारे पर ४५.] विविध पर मारि सपा-२८पों पर पिचमें ऐसाचार या करवाई कि सातक हमसे परिग्रह मादिका झेन देनेका म्यभार उम्पमें हा तबतक सय उस कार्यको करना चाहिये, नपा उसे म्याहारस्वधी नियमोसे करना चाहिय । किन्तु मुममु पुरुपको तसवी परिश्रम कर महाँकरमा चाहिये, क्योंकि उस कारणसे जोपके मछिन पासनामा पैदा हो भामा समय है। कदाचित् हमारा रिच दही य सस्ता हो, किन्तु रि मी काही कुछ ऐसा है कि यदि दम्पसे मी दि रस्में तो दूसरे जीवमें भिषमता फै। भ होन पामे, और मपुर चिवान बाब मा तानुसार वर्सन कर परम पुरुषोंके मार्गका नाश न करे-त्यादि विपारपर मेरा चित्त ध्या रता है। तो फिर मिसका परमार्य-18 अपमा चिच-गुनिमात्र हमसे कम । उस तो अपश्य ही उम मागणाको मजबूत बनाये रखनी चाहिये, याही उसके लिये प्रबछ श्रेप है, और तुम्हारे नसे मुमुख पुरुपका सोमारपसा करना उरित है। क्योंकि तुम्हारा बनुकरम सहन हसरे मुमुमु के हिवाहितका फारण हो सकता है। प्राण मानेकी विषम अस्थामें भी तुमको निष्कामता ही रसनी चाहिये-हमारा यह विचार तुम्हारी आमरिका के कारण चाहे जैसे दु सोफे प्रति अनुक्पा दोनेपर मी मिरता नहीं। किन्त उल्टा और बलवान होता है। इस विपमें विसप हतु देकर तुम्हें मियप करानकी हा भीर बह निथप तुझे हागा ही, ऐसा हमे पूर्ण विश्वास है। इस प्रकार तुम्हारे अपना दूसरे मुमुसु जोकि हित के लिये मुष्ट जो ठीक मगा या सिन्हा है। इतना सिम के बाद मेरे बारमार्षके संबंधों मेरा कुछ दूसरा निगी दिपार है, मिसका सिमुना उचित न था। किम्त तुम्हारी लामाको दुसाने जैसा मैने तुम कुछ किसा है, इसजिप उसफा सिम्सना योम्प मानकर ही उस यहाँ रिसा है। पर इस प्रकार है कि जबतक परिमारिका समा दमा हो-सा म्फर हमारे उदयमें हा, तबतक बिस किसी मी निकाम मुमुमु अपना सपात्र जीवकी अपपा उसकी हमारे द्वारा अनुकपा मालकी जो कुछ भी सेवा-भाकरी, उसको करे बिना ही, की ना सके, उसे हम्पाल पार्यसे मी करनी चाहिय । क्योंकि इस मार्गको रुपम आदि मापुरुषोने भी कहीदी बीपको गुण-निष्पमता के लिये आवश्यक माना है। यह हमारा अपना नियका विचार हमार बसा भाबरण सपुरपके लिये पिद नहीं है, किन्तु किसी प्रकारसे 4 कप उस पिपप या सेवा- पामे उस जीवके परमार्मका निरोष हाना हो गो उसका मा मापुरुषको उपशमन दी करना चाहिये। ४६८ बाई मंगमिर १०५ श्रीजिन आम-परिणामको स्पस्पताध समापि, भR माम-परिणामको अत्तम्घनामा अममापि पाहत है। यह अनुभवनमानसे मनेस परम सप सिद्ध होता। अस्पम्य कार्यको प्रानि करमा भार माम-परिमामा म्पम्प ग्मना, मी सिम प्राधि श्रोतामर से बानीला मी पनना सहित कहा है, तो रि मरे गोरस हारा उम बातय मैमषित कर गिना करिन हो इमम कुछ मी भापर्य महो।
ड भीमद् पयवद्र [पत्र ४६९ किसी भी पर पाक रिपेठाची प्रचि परमा, बौर किसा मी पर फार्थमें वियोग चिन्ता करना, उसे जिन वापपान करते है, इसमें सन्देह करना पोम्प नहीं है। तीन वर्ष उपाधि-योगसे उत्पम र क्षेप मावको मिटानेका विचार यताको प्राधि परम्पचानके पिक्को माषा कर सकती हा प्रत्य पदि कार मेरापवान गोषको कम्पाणके स्मुम न हाने दे तो इसमें कुछ मोबाधर्म महो। संसारमें तिमी परिणतियोंकी सरपंत माना गया है, उतनी ही बाम-मानको म्यूनता मौतोष करन कही। परिणाम पाहाता । ऐसा सिद्धांत नहीं है। पेनचे अंतन परिणाम होता है बार मचेतनको अपतन परिणाम होता ६, ऐसा बिनभगवान्ने वनुमन किया है। परिणाम नपणा पायरहित कर्म मी पशप नही ऐसा श्रीबिनम हार और पम्य है। भोगिनने मो मामानुभष किया है और पापक स्वम्मको सापात्कार कर जो निवपण किया है यह सब मुमुक गोषों को अपने परम सम्पाणके लिये बास ही विचार करना चाहिये। जिन मगबान्द्रारा फक्ति सब कार्यके मात्र पक मारमा प्रकट करनेक लिये और माक्षमागर्म प्राति तोकपट दाकी होती है एक आम-बानाकी और एक मारम-गानाक बामपणामका- पसा भीबिननपदार। की एक मुतिमें कहा गया है कि मामाको सुनना भानिये, रिचारना चाहिये, मनन करना चाहिये अनुमय करना चाहिये मर्यात यदि फेस यही एक प्रगति की माप वा गोल संसार सागरको तैरकर पार पा मप ऐसा लगता है। पाडी तो प्रोताकरके समान मानांके बिना पर किसीको इस प्रतिको करते हुए सम्पानका विचार करना उसका निपप होना तपा मार सस्पत्तास प्रास हाना दुसम है। ४६९ बर्थ मंगसिर १९५१ ईमरेपा बसपान है और पाड मी वा पम है। पहिस ही मानत पे और स्पए बरान पा किनी-पुराणो ससम भावसहित मममेसे मामाका प्रतिबंध होता । और गास पर तो ऐसा परमाप रि मर होकर संसप रि गाती ।शाना प्रति ऐसा पिहोनेसे पुन मुलम-योगिता प्राम होना बरी काटिन बात है ऐसा मानकर कई मी गार सम्म मासे समागम म पर, मी प्रचारपा आचरण हो रहा था। हमने तुमझा तवा भी मादिको इस मार्ग मरेग्में पता था कि हमार सा उपदशाही मति किमी प्रारम्भ पोगस तकार ही उसका ग्रहण गमको ACP पाम ना कभी मी संधी कुछ भी करते थे ता पूपि आपापोंने ऐसा आचरण रिपा -मा प्रारक प्रयुदर दिस जाते च । उन उत्तरोंमे हमारे रिटर्म इसरिये गागा होता था कि पर मम्मनन रसम पर फारण ण्मे मुमुक्षु पुम्पमें मी मादी नदी वा उमरा में मौलामभान पापपरि उस समानानिस तुम परमार्थ परिमारको भूप गानोगे एमा पा. ४०१ ४०२] पिरिष पत्र मादि सपा-२यों पप ४०१ सशय नही होता था, फिर भी प्रसंगानुसार परमार्य रएिके ठिये शिथिलताका कारण होनेको समारमा Pिमार देती थी । किस्त उसको देखते हुए कहा ये तो इसलिये होता था कि इस मुमुधुको पुलुममें सन्मादि विशेष रोगी बीर परमार्य गरि मिट नायगी, सपना उसकी उत्पत्तिको समावना दूर हो जापगी, और इस कारणसे दूसरे बहुतसे जीवों को यह स्थिति परमार्थको मप्रामिमें हेतुमूत होगी। फिर सकाममा से मननेवाडेका रविको पात करमा हमारे रा हाना कटिन मात , इसलिये सफामी जीवोंको पूर्वापर पिरोप मुदि होने अथवा परमार्य-पूज्यमावना र ऐ गानेकी समावना हमें गो निमाई देती थी, वह वर्तमानमें म ।, उसका विशेष उपयोग थे, इसीलिये उसे सामाम्पमापसे लिखा है । पूर्वापर इस बातका माहाल्प समता गाय और दूसरे गोर्चाका उपकार से पैसा विशष छन रखना। ४७० मोहमयी, पाप मुटी १ पुष. १०५१ मिस किसी प्रकार असगवाशरा भाममात्र साम्य हो उसी प्रकारका बाचरण करना, यही मिनमगवान्को बाबा है। इस उपाधिम्म म्यापारादि प्रसगसे एनेफा बारबार विचार या करना , तो भी उसका भप रिपक झाव समझकर उदयके कारण म्पबहार करना पाता है। किन्तु उपार-लिमित बिनभगवानकी आना प्राप विस्मरण मही होती है, और हामें तो हम तुमको भी उसी भाषक दिपार करनके मिये करो। ४७१ बाई पार पुरी१. रवि १९५१ प्रम्यक्ष जम्माना होनेपर भी उसका त्याग करनेकी जमकी या मही हाती, भयमा बह अस्पागम्प शिपिवताको स्पाग नही सकता, अपरा यह स्पाग मुदि होनपर स्पाग करते करत कार यापन करता जाता है-इन सब चारोंको और फैस दूर करे, अन्यकाठमें चैमा करना कसेरा, इम पिपमे हो सके तो पत्र लिखना। ४७२ बम्पई, पाप २, १९५९ +२-२-३मा---१९५१ एफ सध क्षेत्र मारमपी काळ मार उमार *रारम-२-२-३मा-- ५१२पा २गर और मा मात ११ पोरगरी १५१ द्वारपन जान मोरमसनमा म. ८-१एर भोर मार महीने पारिवाना र बरी। १९५१रिला गाव एक परमार एला मामलामा भार ऐसी मि तलम मी उसको अनुसार मान पाना |--अगर VIR श्रीमद् पयवाद [Trul ror उदासीन अम्प-- एकक्ष क्षेत्र - मोहमयी मा-- तपमान प्रारय । ४७३ बम पोम दी १० वि १९५१ (१) विपम संसार पम बोरकर को पस मिकले, उन पुरुषको मनत प्रणाम में पिक्की म्यास्पा पपापोम्प मोनेसे उदय प्रारम्भके सिवाय कप सब प्रकारों में बसगमार रसना ही योम्प माश्म होता है और पाहावक कि जिनके साप मान-पहिचान, उनको भी हाधमें मूस गाँप तो अपनी बात । मोंकि सगसे निफारण हो उपाधि मा करती है और सी उपाधि सहन करमे पोम्प दाममें मेरा पित मही। निस्पापताके सिवाय फसमा म्यपहार करनेको पा माम नहीं होती है। और जो म्यापार म्ममहारकी निस्पामता है, उससे भी नियत होनेकी कितना राश करती है। उसी तर मनमें दूसरेको गोप करमेके उपबुछ मेरो योयता में मुझे महागता, क्योंकि जबतक सब प्रचार के विषम म्पामा समति न हो तबतक पपार्य मामशान नहीं करा गरा सकता और बबतक ऐसा हो तबतक तो निन वम्यासको रक्षा करमापी पोप है और हास्में उस प्रकार की मेरी स्थिति होनेसे में इसी प्रकार यया पापम्प है। क्योंकि मेरे पिच कम्प कोई नहीं है। (२) बेदन गगतको मिया कावा है इसमें असाप ही क्या है। ४७४ बर्मा पौष १०५१ पनि बानी पुस्पके प मापसे सोकर मोश्पद मुडमी तो कर प्रतिक्षण बारमोपपोगको स्थिर करने योम्प प कटिन मार्ग उस काना-पुरुपले पबामपसे होना पुम्म क्यों न हो ! योनि मोइससे चार माहम दोन प्रमा-परमल पास पय मातो! रचय-परान पने। पमाईमस स्पसारा! उचरमेसनहीं माना। ममा-एक और भार मानेका पाव विमापर! रचय-सम्मान -वभव है। उपल-प्रारमा मामा पत्र ..] विविध पर मादि समाह- खों व ॥३ उस उपयोगकी एकामताके बिना तो मोक्षपदकी उत्पति है ही नहीं। हानी-पुरपके बचनका स आमय जिसको हो बाप उसचे सर्व साधन मुर्मम हो जाते है, पेसा मसा निधप सत्पुरुषोंने किया है।ता फिर हम करते है कि इन पियोंका गय करना ही योग्य है । उन सपियोंका अप क्यों नहीं हो सकता ! इतना तो सप है कि इस दुपम कासमें ससगको समीपता अथवा सवाश्रम अधिक पाहिये, नीर वरसगसे अस्पन्त मिति चाहिये तो मी मुमुमुफे लिये तो यही उचित है कि कग्नि से कटिम मारम-साधनकी ही प्रथम इच्छा करे, जिससे सर्व सापम अपकारमें ही फीभूत हो गय । श्रीतीर्थकरने तो इतमातक कहा है कि बिस हानी-पुरुपको ससार-परिक्षीण दशा हो गई है, उस पानी पुरुषके परपरार्मबंध होना सभव नहीं है, तो मौ पुरुपायकाही मुम्प रखना चाहिये, गो दूसरे बीनो लिये मी आत्मसापनके परिणामका देश हो। शानी-पुरुषको माम-मतिबधमप ससार-सेमा होती नहीं कि मारप-प्रतिमपलपमें होती है, फिर भी उसस निषिरूप परिणामको प्राप्तिको हानीकी रीति दया करती है। जिस रतिका मामय करते हुए आन तीन वर्षोंसे मिशेपहपसे बसा किया है, और उसमें बस्यमेव आRम शाको मुगनेका समय ये ऐसे उदपको भी पपाशस्य सममानसे मुहम किया है। पपपि उस बदन काठमें सनसग निति किसी भी प्रकारसे हो बाप तो यही बसी बात हो, ऐसा सब प्याम रहा है। फिर भी ससग मिचिसे वैसी दशा होनी चाहिये, इशा उदपमें रहे, तो कम्पकारमें ही हिप कर्मका निधि हो जाप, एसा मानकर बितना हो सका उतना उस प्रकारका प्रयास किया है। किन्तु मनमें मा यो रहा करता है फि पनि इस प्रसगसे अर्थात् सकल गृहबास्से र म मा गा सके, तो म सही, किन्तु यदि म्यापायी प्रसगसे निच-दूर-ना ना सके तो उत्तम हो । पक्कि माममावसे परिणामका प्रातिमें बानीकी दशा होनी चाहिये, बह दशा इस म्पापार-पाहारसे मुमुधु गोत्रका दिम्बाई मही ती है। इस प्रकार मो लिया उसके विषयमें अमी हायमें कमी कमी विशप विचार तिता है उमा मा कुन मी परिणाम था सा टीक । ४७५ बई, माघ पदापि १.५१ पितमें कोई भी विचाररति परिणमी है, यह जानकर एपमें पान मा । असार पर्व देशम्प आरम परिमहके कार्यमें यत हुए यदि पद जाल कुछ भी निभप अपया अगागृत ह तो बात पर्योक उपासित पैराग्यके मी निप्पम पम नानेकी दशा हा जाता है इस प्रकार निस्प प्रति निधपको याद करके निरुपाप प्रसगमें परमे कारत हुए पिचम अनिकापमपमें प्रम दोना चाहिय-इस पानका मुमुक्षु जीफे प्रपेफ कार्पम क्षण इममें आर प्रत्येक प्रमगमें मप रमन बिना मुमभुना रहनी दुमम । और प्मी का अनुमा किये बिना मुमुभुता मी मुमा नही है। मेरे पित्त दान में यह मुम्प भार सहाह ४ भीमद् पश्चन्द्र [पत्र ४.० ४ . .,४८ ४७६ बई, माघ सुदी ३ सोम १९५१ बिस प्रारम्भको भोगे बिना कोई दूसरा उपाय नहीं है, इ प्रारम्भ हानाको मी भोगना पाता है। शानी बततक मारमार्थको त्याग करनेकी इम्म न करे, इतनी ही मिलता हानामे पती है, ऐसा गो मापुरुोने कहा है, पप्प है। ৪৩৩ माष सुदी ७ शनिवार शिम सबत् १९५१ के मार से वर्ष से अधिक स्पति मही बार उत्तम कामें उसके बारका गोपनका किस तर मोगा बाप, उसका विचार किया जायगा । ४७८ मई, माष सुनी ८ रवि १९५१ तुमने पत्रों को कुछ किया है, उसपर बारबार विचार करनेसे यगति रसनेसे, जिनमें पच चिपमाविका वाचि-सम्पका वर्णन किया हो, ऐसे शादों एवं सत्पुरुषोंके चरित्रीको विचार करनेसे तपा प्रत्येक काम य रसकर प्रत होनेसे जो कुछ मी उदास भागना राना उचित है सोहेगी। ४७९ बाई फागुन । १२ पुष १९५१ विध प्रकारसे गवर्नोसे झूटा जा सके, उसी प्रकारको प्रवृत्ति करना या हितकारी कापरे । पास परिचयको विचारकर निात करमा य इनका एक मार्ग है। गौम इस बातको बितनी विचार करेगा उतना ही हानी पुस्पके मार्गको समाने समप समीप बाता गापगा। १८० बा, फागुन पुदी १०नि १९५१ मशरण इस सारमें निषित गुमिसे मार करना जिसको योम्प म लगता हो और उस म्पहारके सबको निहत करने एप कम करनेमें विशेष का म्पतीत हो पापा करता ऐ तो उस कामको सपकाळमें करनेके लिपे गोषको क्या करना चाहिये। समस्त संसार पस्यु मादि भयो पारण मशरण है शरणका देत हो ऐसी कल्पना करना केवळ पग-तृष्णाके मसले समान है। विचार कर करके भीतीर्थकर पैसे महापुस्पोने मी उससे निात साना— गाना-पाही उपाय है। उस संसारके मुन्स कारण प्रेम-पम तपा सपन सब शानियोंने मौकार किये।। उनकी म्यस्ता कारण मापको निमका पार करनेका बकाय ही प्राप्त नहीं होता है और पर होता भी है तो उस पोगसे उन बंधनो कारण बामबाप प्राति नही कर सकता बौर पर समस्त प्रमाण देखा और बस प्रमारसे गामार-समपकास-मी निर्भय अफ्षा बगागृत यमा पर इस गीतको गतिशप निखता है, वनिकिता है प्राति र वौर उसके दूर करनेमें गति फटिन मोह है। समस्त संसार दो प्रकासे पाया है। प्रेमसे और पसे । प्रेमसे विरक्त पर बिना पसे पत्र ४८१ ४८२] विविप पत्र मादि प्रह-२८याँ पर्ष छ्य नहीं गाता, और प्रेमसे मिरत पुरुपसे सर्भ सगसे विरत हुए बिना म्पपहारमें रहकर अप्रेम उदास ) दशा रखनी एक भयकर कस है। यदि यस प्रेमका त्याग करके म्पबहारमें प्रकृति की जाय को कितने गांवोंकी दयाका, उपकारका एक सार्थका भग करने जैसा होता है, और मेसा विचार कर यदि दया उपकारादिके कारण कोई प्रेमदशा रसनसे विवेकीको चित्तमें नेश मी हुए बिना न राना चाहिये, सो उसका विशेष विचार किस प्रकारसे किया बाप! बर्मा, फागुन मुदी १५, १९५१ पीपीतरागको परम भकिसे नमस्कार मौरिन जैसे पुरुपने गृहमासमें मो प्रविषम नहीं किया, प प्रतिवष न होने के लिये जाना वयवा पत्र लिसना नहीं हो सका, उसक लिये अश्यन्त दीनमापस धमा मांगता है। सपूण गौतरगता म होनेसे इस प्रकार बर्तन करत हुए बसरमें निक्षेप सारे यह निक्षेप मी पात करना चाहिये इस प्रकार हानीने मार्ग देम्सा है। बामाका यो वतापार (अन्तर परिणामकी पारा) है यही बब बोर मोक्ष (कर्मसे अम्माका बन होना तथा उससे आस्माका छट बाना) की म्परस्थाका हेतु है, मात्र शचर पेश च-मोक्षको म्यबस्याका देत नहीं है। विशेष रागारिक संमभसे बानी पुरुपो शरीरमें मी निवसता मदता, म्ठानता, रूप, से, मूळ, गाम-विमम मादि दिखाई देते है, तथापि जितनी शानदार गोमारा बराम्पारा बारमाकी निर्ममता हुई, उतनी निर्ममता होनेपर उस रोगको वर्तपरिणामसे मानी संवेदन करतारे बार सकेम करते ए काचित् बाधस्पिनि ठमत्त दिमाई देती हैं, फिर भी बतर्परिणामके अनुसार ही कर्मबन ममा निति होती है। . ४८२ बमाई फागुन बी५शनि १९५१ मुत्र भाई मोमोहनाबके प्रति, भी रवन । एक पत्र मिला है। म्मों म्पों उपाधिका स्पाग होता नावाद स्पो स्मों समाधि-मुख प्रगट होता जाता है । म्पों म्पों उपाधिका प्राण रोता माता है स्यों स्पों समारि-मुम कम होता जावा । विचार करनेपर यह बात प्रस्पक्ष अनुभवसे सिद्ध हो जाती। पदि इस समारके पापीका कुछ मी विचार किया बाप तो उनके प्रति पम्प उत्पन हुए बिना न रेस्पोंकि अविचारके कारण ही उनमें मोबुष्टि हो रही है। भारमा है वामा निस्प है मामा कर्मका कचा मामा कर्मका मोटा है, इससे बह नित रा सकती है, और निच हो सकनेके सापन है-इन कारणोंको निसने विचारपूर्वक सिदि कर यो । उसको कान नयमा सम्पर्शनको प्राप्ति समय सनी चाहिये, ऐसा मीविनमगवान्ने निरूपण किया है, और उस निवपणका मुमुक्षु जोनको विशपरपस अम्पास करमा चाहिये । पूर्वक किसी विशेष भम्पास मम्मे हो इन ए कारणों का विचार उत्पम होता है, अयना मस गर भाप्रपसे उस रिपारके उपम एनेका योग बनता । .
- मीमद् चन्द्र [ प ८५ वनिम पदाकि प्रति मोदि होनेके कारम मारमा बस्तित, निस्थान, मं बम्मावान समाधिमुस मानमें मही भाता है। उससे मोर दिम पातको ममादिकाम्से ऐसी एकमता नसी मा यो उसका कि करते करते बीतको हारकर पाठे गेटमा परणमौर उस मोह प्रपाको नारा रमेका समपके वानेक पार हो उस क्विकको गोर बेग्नेडा योग पूर्वका में बनेकबार बनायोंकि जिसका अमादिकाम्मे बम्पास पर गया है उस, परपम्त पुमार्य विना क्स्पकरमें हो मेवा मद्राचा समता । सम्पेि पुन पुन' सारंग, समय, और अपनेम सरम विपार दया करके उस विषयमें विशेष मम भरमा योम्प , मिसके परिमाममें निस्प शासन और मुसलरूप वारमशान ऐकर लिय सपना मानित होता है । इसमें प्रथमसे ही उत्पन्न होनेवाग संशय, पैर्य एवं विचारसे शांत हो जाता है। अपर्पस अपना टोमपना करनेसे पौषको केवल अपने प्रितको को त्याग करनेका अबसर बाता? और अनित्य पदार्पका रण यनेसे उसके कारणसे पुन पुनः ससारके भ्रमणका पोग या करता है। कुछ मी बामविचार करनको हम तुमको या करती है—या मानकर बात सन्तोप एमा है। उस स्तोपमें मेरा कुछ भी सार्य नहीं है। मात्र प्रम समाधिके मार्गपर पाना परत , स कारण ससार-से निहाल नेत्र तुमको प्रसंग प्राप्त होगा इस प्रकारकी संभषवा देसकर स्पमानिक सन्तोष होता है-पाही प्रार्थना है। ता. १५-३-९५ मा स प्रणाम। ४८३ बमई फागुन गी५ शनि १९५१ अभिबसे अधिक एक समयमें १ ८ जाल मुच्छ होते । स मेक-स्पितिको दिमागमें स्वीकार किया है और प्रत्येक सम्पमें एक सौ बाठ एक सौ आठ गाव मुक होते कहते है, ऐसा मानें तो इस क्रमस तानों का मितने गांव मोम प्राप्त करें उतने मेवोंकी जा बनत संपमा हो उस संस्थाले मी ससारी सोच की सप्पा मिमागममें बनतगुनी प्रक्ति की गई है। वर्षात् तानों काम नितने गोन मुक्त होते हों उनकी अपेक्षा संसारमें बनतगुन गाव यते। क्योंकि उन परिमाण मा भरिक है। भार इस कारण मोम मार्गका प्रवाह का प्रवाहित पते हुए मी संमार-मार्गका उसे हो गाना कमी समय नहीं , और उससे बम-मोशी म्पत्राचा मी विरोष मही माता । इस विषयमें निक बचा समागम होनेफर करोगे तो कोई बाधा नहीं। गोपन-मोधको म्पत्रस्पाले लिपपमें संक्षेपमें पत्र दिया है। सबकी अपेक्षा दाम्म निचर करन पोम्प बात तो यह उपाधि तो हर र वौर मा सर्वपा संग ये, ऐसा होना स्पेन कदिन है। तथा उपाय करते हुए माम-परिणाम चा न हो ऐसा होना बसंमत्र पैसा है। सर बानाका गम हम सबको दो म बात भरिक सम रहन पोय कि नामामें मितना बसपूर्ण समावि पवा अपय योग सकता है उसका उमेद हो ममा चाहिये ।
प.४८४ ] पिविष पर मादि समाह-२वा वप ४८४ बई, फाल्गुन वदी ७ रवि १९५१ सर्व विमानसे उदासीन बार मयत शुद निब पर्यायको साम्पसे मरमाके सेवन करनेको पानिनने तीन शानदशा की है। इस दशाके माये बिमा कोई भी बीब पचनसे मुक्त नहीं होता, या मो सिमंत भानिनने प्रतिपादन किया रेप असो सस्प है। कोई निरा ही गोव इस गहन दशाका विचार कर सकने योग्य होता है, क्योंकि जनादिसे अस्यत महान दमासे इस बीवने बो प्रकृति की है, उस प्रवृत्तिके एकदम मस्त्य और वसार समसमें आनेसे उसको निति करमेकी बात सूझ, यह होना बहुत कठिन ।। । इसलिए निनमगवान्ने बानी- पुरुषका मात्रय करमेरुप मलिमार्गका निरूपण किया है, विस मार्गक वाराषन करनेमे पुछमतामे शानदशा उत्पम होती है। हानी-पुरुपके चरणमें मनके स्थापित किये बिना मळिमार्ग सिद महीं होता । उससे फिर रिसे मिनागममें बानीकी बाजाके भाराषम करनेका जगह जगह फफ्न किया है। बानी-पुरुपके घरणमें मनका स्थापित ऐना पहिसे तो कठिन पाता है, परन्तु पचनको बपूर्ण तासे उस पचनका विचार फरमेसे तपा बानीके प्रति अपूर्ण हिसे देसनेसे, ममका स्पापित रोमा मुम्भ होता है। पाना-पुरुपके नामपमें विरोध करमेबारा पचविषय मानि दोष है। उन दोपोंके वानके सामनास से बमे से रही गना चाहिये, और प्राप्त साधनमें मी उदासीनता रसनी चाहिये, अपना उन उम साधनों से वासि हटाकर ठने रोगमप समतकर ही प्रति करना योग्य है।ममा दोपका इस प्रकारके प्रसगमें विशेष उदय होता र पोंकि मारमा उस दोपको नए करमेके लिये उसे वपन ममुस हाती है, उसका सरूपांतर कर उसे आकर्षित करती है, मौर गाविम शिपिस करके अपनेमें एकाप बुरि करा देती है। वह एक मुद्धि इस प्रकारको होती है कि 'मुझे इस प्रापिसे उस प्रकारको विशेष पापा नहीं होती में अनुक्रमसे उसे छोर रंगा बौर पहिलेको मपेक्षा नागत गा'। स्पानि भात शाको पर दोष उत्पम करता है । इस कारण जीव उस दोपका संबंध मी ना, अपना ना गेप माता हो जाता है, इस बात का नीमको प्रक्ष महीमा सकता। इस परोपी सापनका दो प्रकारसे त्याग हो सकता है -एक ता उस साधनके प्रसगकी निति करना और दूसरा विचारपूर्वक उसकी तुपमा समझना । विचारपूर्वक तुगता समानेके छिपे प्रपम इस पंचविषय भारिके साधनका निधि करना अधिक योम्प है, क्योंकि उसस विचारका बाकाश प्राप्त होता है। उस पपविषय बादि साधनको सर्पपा निति करनेके लिये यदि जीवका बस न पता तो कम क्रमसे पोहा योगा करके उसका त्याग करना पोम्प है-परिम्प तपा मोगोरमागके पार्यो अप्प परिचप करना पोय है। ऐसा करनेसे अनुक्रमसे ना दोष म परे, वामप-मलि सतया पानी पचन वामा परिणम पर ती शानसा प्रगट कर मार मुछ हो सकता है। जीब पकिमी कभी इस बातका चार करे तो उसम बना मम्पानमा बठ पमा कटिन 1८ मीम सबन्द [Truck ra rao हो बाप परन्तु दिन प्रतिदिम हरेक प्रसंगमें, और हरेक प्रवृप्सेि पर या फिर फिरसे विचार करे तो बनादि सम्पासका का परकर अपूर्ण भम्पास सिदि होनेसे पुम्म भाभय-मातिमार्ग मिस हो सकता है। ४८५ कई फागुन वदी १२ १ १९५१ सम्म गरा मरम वादि दुमोसे समस्त ससार शरण है। मिस्ने सर्व प्रकारसे संसारको बास्पा मेरदोही निर्भय मा, वीर सोने वाम-समाको प्राप्ति की है। पर दशा विचार विमा चीनको प्राप्त महों हो सकती और संगके मोबसे फ्यधीन ऐसे इस बीचको पार विचार प्रास होना कठिन है। ४८६ बर्मा फागुन १९५१ मातक बने तणाको कम ही करना चाहिए । मम्म, बरा मरण किसके होते हैं। यो तणा रखता है उसे ही मम्म, परा वीर मरण होते है। इसम्मेि बैसे बने से तृष्णाको कम हो कर पामा चाहिये। ४८७ मस्तक पपार्य सम्पूर्ण निगस्वरूप प्रकाशित हो, दबतक निनस्वरूपके निमिप्यासनमें स्पिर यमके मिमे बानी-पुरुपके बचन धापारम्त है- ऐसा परमपुरुप तोपकरने को कहा है, पर सत्य है। बाप गुणस्थान: बनेगा मामाको मिदिम्पारसनरूप पानमें भुतधाम वर्षात् मुस्मभूत शानो पोका नाशप का बापारमत है—पा प्रमाण दिनमामि बारंबार पारे। बोपमामात्र प्राप्ति होनेपर मि - णमार्गको यथार्थ प्रताति होनपर मा उस मार्गमें सपास्थित स्थिति होनेके म्येि बानी-पुरुषमा बामय मुन्य साधन है और प टेट पूर्ण दमा रोनेक्क यता नहीं तो मौतको पतित हो गानेका भव है ऐसा माना गया है । तो किर स्वयं अपने बापसे पनारिसे मात गाको सहमो स्योगके बिना निमखरूप मान बना अशक्य ये इसमें सराप कैसे हो सकता है। विसे निजम्मच प नियम पता है का ऐसे पुरुषको मी प्रत्यक्ष जगत्मा म्पार बारंबार भुग देने के प्रसंगको प्राप्त करा देता है तो मिल उत्सव म्यून दशामें मूठ मा गाने में तो भारचर्य होया है। अपने विचार पाक मिसमें संग-स्त्यावर माधार न ऐसे समागममें पा जगत्ता म्पाहार विधेष बोर मारता है और उस समय बारमार मौसष्टम्म माम्य र वामका स्वरूप तथा सार्थकता पर परोस रूप दिवाई देव है।
पत्र४८८४८ ४.] पिविष पम मादि संप्रह-२वाव ४८८ बा, पैत्र सुदी ६ सोम १९५१ भार एक पत्र मिला है। यहाँ कुमालता है। पत्र दिसते लिखते पपना कुछ कारसे कहते बारम्बार पिचकी सप्राति होती है और 'करिपत बावका इतना अविक माहात्म्य ही क्या है। करना फ्याजानमा क्या' सुममा क्या। प्राप्ति कैसी !' स्पादि विक्षेपसे पिचको उसमें मप्र ति होती है और परमार्थक सवधर्म करते हुए, रिसते हुए उससे दूसरे प्रकारके निक्षेपको उत्पत्ति होती है ।बिस निक्षेपमें मुस्य इस तौर प्रतिके निरोपके बिना उसमें-परमार्थ कपनमें—मा समें मप्रापिही श्रेयस्कर भगती है। इस वावत पहिर एक सविस्तर पत्र लिखा है, इसलिये यहाँ विशप गिसमे जैसा कुछ नहीं है। यहाँ मात्र चितमें विशेष स्कृति होनेसे ही यह रिहा है। मोतीके म्यापार वगैयकी प्रकृतिका वधिक न करना हो सके तो ठीक है, ऐसा मो लिसा मह पपायोग्य ह और चित्तको इच्छा मी निस्प ऐसी होगा करती है। गेमके हेतुसे या प्रति होती है या और किसी हेतुसे ! ऐसा विचार करनेपर गेमका निदान माम नहीं होता। मिपय बारिकी शासे मा प्रकृति होती है ऐसा मी माझ्म नहीं होता। फिर मी प्रति तो होता है इसमें सम्दो महीं। जगत् पुस मेनेके छिपे प्राति करता है, यह प्राति देनेके सिप ही होती होगी, ऐसा माश्म होता है। यहाँ का पह माझ्म हाता है, सो या पपार्थ होगा पा ममी' उसके लिये विचारवान पुरुप यो को सो प्रमाण । . - ४८९ बबई क्षेत्र पुस १३, १९५२ हामें यदि किनहीं वेदान्तसबधी प्रपोंका बाँचन अपना भत्रण करना यता हो तो उस मभिप्रायका विशेष विचार होने के लिये पोहसमयके लिये श्रीमापारोग, सूपगोग तथा उत्तराप्पयनका पाँधना-विचारना हो सक तो करना । बेदान्तके सिमात तथा निनगमके सितिमें मिमता है तो मी मिनागमको विशेष मचा- रका स्पड मानकर बान्तका पृथकरण करनेके लिये उम मागर्मोन बाँचना-विचारमा योग्य है। ४९० बाई चैत्र परी ८ युप १०५१ चेतनको पतन पर्याप हाती , मोर गाकी या पर्याप होता है-यही पदार्थक स्थिति है। प्रस्पेक समय जो यो परिणाम होते है ये सब पाप है। विचार करनेसे या बात यपाथ माश्म होगी। डिसना कम हो सकता । इसठिपे तसे विचारों का कहना बन नही सकता । सथा पारसे विचारों के उपशम करनेहम प्रातिका उदप होनेसे किसाचे स्पएनपसे घना मी मही हो सकता । हमें पर इतना अधिक उपाधि नहीं पता तो मी प्रापिप संग होनसे तथा क्षेत्रफ संतापनप होनसे पोरे Pमके लिये पासि निडर होनेफा विचार होता है। पर इस रिपयमें गोरोसा येफ है।
भीमद् रायब [पत्र ४९४ पूर्ण जानी माडपमय मादि पुस्योंको मा प्रारम्वोन्य भागमेपर ही पहुआ? तो फिर हम बसोंको पर प्रारम्मोप मोगना ही पो इसमें कुछ भी संशप नहीं है। सेर केवल इतना ही ताकि हमें इस प्रकारके प्रारम्बोयमें माडपमष मादि जैसी पविषमता ये इतना बस नदी सवीर इस कारण प्रारम्मो पके होनेपर बारबार उससे अपरिपक्व कामे होछूटनेकी कामना हो जाती है कि परिइस निपम प्रारम्पोदयम किसी मी उपयोगका पयातप्पमाल न या तो फिर बाम स्थिरता होते हुए मी कासर रना पड़ेगा, मार पपाखापपूर्षक देह छटेगी-ऐसी भिता पशुत बार हो पाती। इस प्रारमोन्यके दूर इनपर निचिकर्मके देदम करनेहस प्रारम्पका उदय होनेका होम रहा करता है परन्तु परत ही वर्षात् एकसे रेख वर्षके भीतर हो नाप ऐसा तो दिसाई नाही देता, पीर पल पल भी बोसनी कटिन पाती है। एकसे रह वर्ष बाद प्रतिकर्मक दम करनेका साया क्षप हो गापगा-ऐसा मा नही माझ्म होता । कुछ कुछ उदय विशेष मा परेगा, ऐसा भगता है। पामाको कुछ मस्थिरता रहती है । गतवर्षका मातियोंका म्पापार सगभग निबटने पापा है। इस वर्षका मोतियो म्पापार गतवर्षको पेवा गमग गुना हो गया है । गतवर्षको व्या उसका कोई परिणाम भामा कठिन है। पोडे नोंको अपेक्षा हमें ठीक है, और इस पर्व मी उसका गतवर्ष मसा मही तो मी कुछ परिणाम ठीक आयेगा या समय है। परन्तु उसके चारमें बहुत समय म्पतीत होने जैसा हाता है, और उसके लिये छोक होता है कि इस एक परिमहको कामनाकी को सम्मान प्राति सी होती है, उसे शांत करना योग्य है और उसे कुछ कुछ करना पड़े, ऐसे कारण पते है । मन उसे से करके प्रारम्भोदय तुरत । क्षय जाप तो सारे, पसा बहुत बार मनमें वाया करता ।। यही रो बा तपा मोतिपोका म्पापार है उसमेंसे मेरा छटना हा सके नपा उसच बहुत समागम कम हाना संमत्र रो उसका कोई रास्ता भ्यानमें माये तो किसना । चाहे तो इस पिप समागममें विशेषतास कह सको तो कामा । यह बात सम रसना ! मगभग तीन वर्षस ऐसा या करता है कि परमार्पसभी अपना म्पमारसपी का मो गित हुए भनि हो गातार आर लिखते मिलते कम्पित बैसा गनेस पारम्पार सपूर्ण मे देनेवारी मन होता है । जिस समय पित परमार्प एकामवत् हो उस समय यदि परमार्पसपी डिम्पना अपना करना हो सके तो यह पपा का जाप परम्त चित्त पनि अत्पिरमत् हो और पर मामी मा वयना कहा पाप ताप उदारणा जैसा ही होता है। या उसमें अंतिम पापातप्प उपयाग म हामेस र वाम पुरिसे हिसित वा कपित म होनेसे कम्पिवरूप हो या जाना। पिससे तपा उस प्रसारफे नमो कारणों मे परमार्थक सबध मिसमा अयना करना बाल कम हो गया ।इम स्परपर सहन प्रश्न होगा कि बिचके अस्थिरषत् हो वानेशया सारित परमार्पमे सिर पधात् रहता पाउस पिचके परमार्थमें अस्थिरपट दाबाना पुग ता कारण हाना ही चाहिये । परि परमार्थ संशय हेतु माम्म एमा हावा सा पाना संभव , अपचा किमी तपा के मद हानेकप तांत्र प्रारम्भोइसके कासे कैसा हो तम्ता । रा .
पत्र ४९५] विविध पत्र मावि सप्रह-२बाब हेसमोसे परमापका विचार करते हुए, सिससे हुए, अयमा कासे हुए चिचका अस्थिम्वत् रहना समय है। उसमें पहिले कोइए का होना संभव नहीं । केवट को दूसरा हेतु कहा है, वही समय है। मामायके मर होनेम तत्र प्रारम्पोय होनेसे उस हेतुको दूर करनेका पुम्पार्थ होनेपर मी काधेप वा करता है, और उस प्रकारके उदयतक बह पत्पिरता दूर होनी कठिन है, और उससे परमार्पस्वरूप पिचके बिना तत्सबधी सिम्बना या कहना, यह कस्पित भैसा हो साता है । तो भी कुछ प्रसगोंमें लोप स्पिरता यती ।। म्याहारके सबधमें कुछ भी सिसते हुए उसके बसारभूत और साश्चात् भांतिम्प लगनेसे उसके सवपमें कुछ लिसना वरवा करना तुम ही है, वह भात्माको निकलवाका हेतु है, और जो कुछ सिसमा या कहना है, वह न कहा हो तो मी चा सकता है। इसलिये जबतक बसा ये तबतक तो वाश्म मैसा करना योग्य है, ऐसा गानकर बहुतसी म्यानहारिक बातें सिमने, करमे अथवा कानेका बादत नहीं दी है। केवल बिस म्यापार आदि म्यपहार, तौम प्रारम्मोदयस प्राचिवहाँ कुछ कुछ प्रचि होती है। यपि ठसका मी पपार्पता मायम नहीं होती। मानिन पतिरागने उम्प-मान सयोगसे फिर फिर एनेका उपदेश दिया है, और उस संयोगका विघास परम बानीको मौ महीं करना चाहिये, यह नियम मार्ग जिन्होंने कहा है, उन भौजिन बातरागके भरण-कमळमें वस्यत नम परिणामसे नमस्कार है। दर्पण, चरा, दीपक, सूर्य और चक्षुके सम्मके उपर विचार करोगे वो यह चार केबसनानसे फार्म प्रकाशित होते है, ऐसा को कहा है, उसे समझनेमें कुछ कुछ उपयोगी होगा। ४९५ विमानसे पदार्प किस तर दिसाते हैंइस प्रश्नका उतर समागममें समझनेसे स्पर समझमें जा सकता है। तो मी संक्षेपमें नाचे विम्हारे असे या नहीं दीपक होता है, यहाँ हाँ यह प्रकाशवपो होता है उसी तय यहाँ यहाँ बान होता है वहाँकोपर प्रकाशनपसे ही होता है। जैसे दीपकका सारा समाप्त हो पार्यको प्रकाश करनेका होता है, वैसे ही बानका सान समान भी पापोको प्रकाश करनेका है।पक इम्पका प्रकाशक है, और पान ट्रम्प-मार नोंका प्रकाशक है। से दीपकका प्रकाश होनेमे उसक प्रकाशको सीमामें गो कोई पदार्थ होता? या पार्प कुरती हो दिमाई दवा है, उसी तरह बानकी मौनदीम पार्प सामानिकपन दिनाई देते हैं । गिसमें सम्पूर्ण पर्प पापातप्प भार स्वाभाविकरूपसे रिपाई ते है, उसे फेबछवान कहा। पपपि परमार्पमे ऐसा कहा है कि केवउडान मा भनुमपमें तो भाउ आत्मानुमका हो कता है, परम्परहारनपसे हो बोकालोक प्रश्नाको । से "पग, रक और भु पार्षफे प्रकाशफ है, उसी तय धान भी पार्ष प्रकाशक है ।
भीमद् पासवान [पा ४९१ ४९२ १९१ सम्म, चैत्र ८, १९५१ भास्प-पीके माति करनेमें और संकोच फरनेमें गात विपारपूर्वक प्रापि करना पोम्प है। पुमेप स्पन मई के प्रति । उत्त बोर जाने संगममें मारे स्त्रिी परिस्थिति। मिस्से मेगाको सदेह हो इस पयके गाम म्पपहारका उदपी, मीर उस प्रकारके परक साप पमान निपंप पुरुष जैसा उपदेश करना, पर मार्गका विरोध करन जैसा और ऐसा समय कर पा ठमके समान दूसरे कारणों के सम्मका विचार कर प्राय करके जिससे रोगों को सही हो, पैसे समागममें मेरा वाना नहीं होता । कदाचित् कमी कमी कोई समागममें जाता है, और कुछ सामायिक काना-करना होता है। इसमें मौ पिचको इपित प्रति मही है। पूर्वमें पधास्थित विचार किये बिना बाचने प्रति को, इस कारण इस प्रकार के पहारका उदय प्राप्त मासे पात बार विचमें शोक पता है। परन्तु उसे पपास्पित सम परिणामसे स्मन करमा ही पोम्पहै—ऐसा गानकर प्राय' करके उस प्रकार की प्रापि यती है। फिर मौवामासाके विशेष स्थिर होने के लिये वसंगता पक्ष या करता है। इस म्मापन वारि उदय-म्यहारसे यो यो संग होता है उसमें माम करके असंग परिणामी तय प्रकृति होती है क्योंकि उसमें इस सारमत मही मालम होता । परा बिस धर्म-म्याहारके प्रसगमें माना हो, हो उस प्राधिके अनुसार मा मोम्प नही । तथा कोई दूसरा वाशय समसकर माविको पाप तो हाम्मे उतनी समर्पता महापसे उस प्रकार के प्रसंगमें प्राम' करके मेरा षामा कम ही होता है और इस क्रमको बदए देना, पा हमें भिमे नही करता। फिर मी उस बार पाने के प्रसगमें पैसा करन ने मी विचार किया पा परन्तु उस हमको मदम्मेसे मे विषम करणोंका उपस्फित होमा बगे जाकर समम होगा, ऐसा प्रत्यक्ष मायम होनेस बाम करने के साप सिके उपशम करने योम्प मासे सा पास बागपके सिवाय उस मोर म बाने संप चिपमें दूसरा भाशय भी। परन्तु किसी कोर-मा हाररुप कारणस मानेके विफ्पमें विचारको नहीं मेवा है। पिपर गात रवान देकर या स्पिति किसोरे। सपर विचार कर पदि कुछ गायक जैसा माश्म हो तो कमी रतनगामाको मुमसा करमा । मेरे पाने माने लिपपमें पदि किसी मातका कपन न करना समन हो तो रूपम न करनेके लिये हो बिनता है। ४९२ बर्मा क्षेत्र बा १ एफ. १९५१ एक पारा परिणतिक मिलाप इससे विवोंमें पित कम्पपस्पितरूपसे यता र उस प्रकारका बम्पपस्थितपना कम्पहारसे प्रतिक होनेसे कारण सेवन करना रविकर नही माता और साथ हो छोना मी नमो मनता इस समान प्राप करके सारे ही दिम सोदन होता खानेके सबममें पाले सबमें बोम्मे संबंभमें सोनेके मंगमें, जिसके ममें सपा रसो म्पाचारिक पापा के संबंध में पैसा चाहिये पैसे मानसे प्रापि नहीं की जाती और उम प्रसंगी पत्र ४९३, ४१४] विषिष पत्र मादि सपा-२८पा पर्प ४४१ यनेसे बारम-परिणतिका सतत्र प्रगटम्पसे अनुसरण परनमें विपचियाँ वाया करती है, भार इस विषयका प्रतिक्षण दुस ही रहा करता है। निमा वामरूपसे रहने की स्थितिमें ही पितेम यती र, भार उपरोक्त प्रसगोंकी वापतिके कारण उस स्थितिका बहुतसा वियोग या करता है, और यह रियोग मात्र परेशान हो रहा ह, स्वैपाके कारणसे नहीं रहा- यह एक गभीर वेदना प्रतिक्षण वा करती हैं। इसी मबमें वीर योद ही समय पहिले म्यवहारके मिषयमें मी ती स्मृति यी । वह स्मृति मन न्यबहारमें कश्चित ही मरूपसे रहती है । पोरे ही समय पहिले अर्यात् पारे वो पहिले माणी परत बोल सकती पी बकारपसे कुशमनासे प्रवृति कर सकती थी। वह पत्र मदतास वप्पण स्थासे रहती है। योर वर्ष पहिले–पोरे समय पहिरू-सनशकि अति उप पी जोर धाम क्या सिमें, इसक स्मने सूझनेमें ही दिनके रिन भ्यतीत हो जाते हैं, और फिर मी जो कुछ लिसा जाता प, बह इशित भपया योग्य व्यबस्थायुक नहीं लिसा नाता -वर्षात एक वारम-परिणामक सिवाय पूसरे समस्त परिणामोंमें उदासीनता ही रहती है। बार मो कुछ किया आता t, मह पेसा चाहिय वसे मायके समें अशसे भी नहीं होता । ग्यों स्यों कुछ मी कर दिया जाता है। लिसनकी प्रपतिकी मपेक्षा वाणीको प्रति कुछ ठीक है इस कारण जो कुछ वापको रनेकी रम हो-बाननकी इच्छा रो-उसके विषयमें समागममें कहा जा सकेगा। कुंकुवाचार्य और मानन्दघननीका सितिविषयक बान तीन था । कुदकुन्दाचार्यजी तो वात्म-स्पितिमें गत स्पिर थे! मिसे केबल नामका 0 दर्शन सव सम्यग्दानी नहीं करे जा सकते। ४९३ बई, पन बी ११ शुक्र १९५१ ममे निर्मळवा रे रस्न स्फटिकवणी, पन नीपस्मभाव र, वे मिन पीर र धर्म प्रकाभियो, प्रमळ पाप अमाम रे । साम-दम्यके क्यत प्रफाशित होनेपर भर्षात् समस्त कर्माका क्षय होनपर नो बसगता भार मुस-स्वरूपता कही ह, पानी-पुरूषोंका यह पपन अस्पत सुस्प ।। फ्पोंकि उन बचोका ससगर्स प्रस्फ्य-अस्पत प्रगट-अनुमब होता ।। निकाल उपयोगका सस, स्थिरताका परिचय करनसे होता ।।मुधारस, सरसमागम, मशाभ, सविचार वीर राम्प-उपशम ये सब उस स्थिरता है। ४९४ बमा मंत्र वदी १२ रबि २०५१ अधिक विचारका मापन हानक सिये यह पत्र लिखा। १ मि तय रमरक रस्नी निर्मपता हो । उनी मायका समान है। पर निरन प्रहार ममायग्रेसीबर्म प्रकाशित किया।
। भीम प्रसव [४१४ पूर्ण बानी भीरपमदेव आणि पुरुपोंको मौ प्रारम्भोदप मोगनेपर हो आप हुमा, तो किर हम सोको पारम्बोदर मोगमा ही पो इसमें कुछ भी समय नहीं ह । से केस इतना ही होता है कि हमें इस प्रकारके प्रारम्पोपमें मौलपमोग वादि जैसी वपिपमता ये, इसना यह नहीं है और इस कारण प्रारम्बोग्यके होनेपर बारबार उससे अपरिपस कासम होछनेकी कामना हा पाठी है कि परि इस विषम प्रारम्मोत्यमें किसी भी उपयोगका पपातप्पमान न या वा फिर वारम स्पिरता ते ए मीनासर (रमा पड़ेगा बार परमातापपूर्वक देह झटेगी-ऐसौ पिता गुत बार हो माती है। इस प्रारम्बादपके र हानेपर निर्मिक मेदन करनेरूप पारम्पका उदय होनेका हो विचार या करता है परन्तु परत ही अपात् एकसे में वर्ष मातर ऐ गाय, ऐसा तो रिसाई मही देता, वीर पर पर मी गौतनी कठिम पाती । एकसे ग वर्षमा प्राविकर्म न करने का सपा क्षम होगापगा-~-ऐसा भी नहीं माझ्म होता । कुछ कुछ उप विशेष मंद पागा, ऐसा मगता है। बरमाको कुछ वस्थिरता पता है । गतवर्षका मातियोंका म्पापार मगमग निष्टने बाप है। इस वर्षका मोतियोंका म्पापार गतबर्षकी अपेक्षा भाभग दुगुना हो गया है । गतवर्षको तप उसका को परिणाम बाना कठिन है । यो दिनोंको अपशा हमें ठीक है, और इस वर्ष भी उस गत वैसा नही तो मी कुन परिणाम ठीक थानेगा पा समा। परन्तु उसके विचारमें पात समप म्पतीत होने जैसा हाता है और उसके लिये शोक होता है कि इस एक परिमाकी कामनाको यो पवमान प्रति सी होता है उसे शांत करना योग्य है और उसे कुछ कुछ करमा पर, ऐसे कारण यते है । मब जैसे तसे करके या प्रारम्पाय तरत हो अप हो जाय तो गया है, ऐसा बार बार मनमें बाया करता है। पही मो बाहत वपा मोतियोंका म्पापार है उससे मेरा छ्टमा हरा सके मपमा उसका महत समागम कम होना समारो उसका कोई रास्ता म्यानमें बाये तो मिसना । पाहे त्येस पिम्में समागममें विशेषतास कर सको ता घना । पर बात में रखना। भामग तान पर्पस पैसा रहा करता है कि परमार्थसपी वपना म्पहारसाधी कुछ मी विसाए मारि हो जाती पौर विश मिस कम्पित वैसा मानेसे पारम्पार वपूर्ण मेर देने ही मन होता है। किस समय चिरा परमार्थमें एकातर ो उस समय पहि परमार्पसमा पिसना बफया करना हो सके तो पा पार्थ का बाप, परन्तु वित्त यदि वस्पिरबत् । वौर प मार्पसमा मिसा वपना कहा माय तो कल सवारमा पैसा होता।तपा उसमें वति पायातम उपयोग न हनेसे वाम मदिसे रिचित बपना कपित न होनेस कल्पितम्प ही करा गाता है। बिससे तथा उस प्रस्मके दूसरे पारणास परमापक समपमें हिसना नपवा बना मात कोकम ऐ गया है । इस स्पापर सहर प्रश्न होगा कि वित्त मस्थिरमत् हो जाने क्या हेतु tो बित्त परमार्पमें निरोप एकमात् यता पा उस पिक परमार्थमें मस्पिरमत् होगाभेका कुछ तो कारण होना ही चाहिये । यदि परमार्य समपका व माम मातो पैसा ना समज है,अप रिसा तवाविध मामलामा होनेहम तीन प्रारम्बोरमके पससे पैसा हो सस्ता । दो - पत्र ४९५] विविध पत्र मादि संग्रह-२८वों वर्ष ४४ समोसे परमार्पफा विचार करते हुए, सिससे हुए, मथवा करते हुए चित्तका वस्थियत् राना समय है। उसमें पहिले करे हुए हेतुका होना समय नहीं । केवळ गो दूसरा हेतु का है, वही समष है। भाममायके मद होनेरूप तीत्र प्रारम्पोदय होनेसे उस हेतुको दूर करनेका पुरुषार्थ होनेपर मी कामक्षेप एषा करता है, और उस प्रकारके उदयतक यह अस्थिरता दूर होनी कठिन है और उससे परमार्यसम्प पिसके बिना तत्सर्वघी उिसना या करना, यह कस्थित पैसा ही लगता है। तो मी कुन्छ प्रसगोंमें विशेष स्थिरता राती है। म्यवहारके सबघमें कुछ भी लिखते हुए उसके असारमत बौर साक्षात् भातिरूप सगमेसे उसके सवधमें कुछ मिसना अपवा करना तुम ही है, पर बारमाको विकलमाका है और जो कुछ लिसना या काना है, वह न कहा हो तो भी वस सकता है। इसलिये अपतक पैसा येमवक तो माप पैसा करना योग्य है, ऐसा मानकर बहुम्सी म्पासारिक मा मिसने, करने अपना कानेका बादत नहीं दी है। केवल बिस म्यापार वादि म्यवहारमें तीन प्रारम्पोदयसे प्रापि, पहाँ कुछ कुछ प्राति होती है। यपपि उसका भी ययार्पता माश्म नहीं होती। भीदिन भीतरागने ब्रम्प-भाव सपोगसे फिर फिर छूटनेका उपरेश दिया है, वौर उस संयोगका विपास परम शानोको मी नहीं करना चाहिये, या निश्चम मार्ग निम्होंने कहा , उन मोमिन बाँतरागके चरण कमलमें वापत नम्र परिणामसे नमस्कार है। दर्पण, जस दीपक, सूर्य और प के स्वरूपके ऊपर विचार करोगे तो पर चार केवलधानसे पदार्प प्रकाशित होते है ऐसा नो कहा है, उसे समझनेमें कुछ कुछ उपयोगी होगा। ४९५ केवमानसे पदार्य किस तय दिखाई देते हैं। इस प्रमका उत्तर समागममें समझनेसे स्पष्ट समसमें भा सकता है। तो संक्षेपमें नीचे मिसा है से जहाँ गाँ पापक होता है, वहाँ कहाँ पर प्रकाशरूपसे होता है, उसी तब यहाँ जहाँ बान होताहैमबहाया प्रकाशरूपसे ही होता है। वैसे दीपकका सहन समालो पदार्पको प्रकाश करमेका होता है, वैसे ही शानका सार समान मा पोको प्रकाश करनेका है। दीपक ब्रम्पका प्रकाशको मौरान दम्प माल दोनों का प्रकाशक है। जैसे दोपकका प्रकाश होमेसे उसके प्रकारको सीमामें गो कोई पद्यर्थ होता है, प पार्थ कुइरवी ही दिखाई देता है, उसी तरानकी मौवासे पार्थ सामरिकरूपसे रिसाई देते हैं। जिसमें सम्पूर्ण पदार्थ पायातप्प और स्वामाविकापसे दिखाई देते हैं, उसे फेषमान याहै। परपि परमापसे ऐसा करे कि केवयान मी अनुमबमें वो केवग आत्मानुमका ही कर्ता है, परम्पपहारमयसे ही काणेक प्रनाक है। सेर्पण, दीपक और पार्षक प्रकाशक, उसी तरावान मी पर्पका प्रकाशक है।
भामद् रामचन्द्र [पत्र ४ । ४९.४५८ - कमी, पत्र वदी १२ सी १९५१ भीमिन बीतरागर्न द्रम्प मार सपोगसे फिर फिर इनका उपदेश किपा, मोर उम सयोगय पिचास परम मानीका भी नहीं करना पाहिये, या मसर पार्ग जिसने कारे, पैसे धीमिन बीसरागफ परण-कम प्रति यत्पत भकिसे नमस्कार । भाम-सम्मक निश्चय होमेमें गांव ममारिसे मूह होता माती है। समस्त पुतवान सम्म दागमे सबसे प्रपम उपदेश करने योग्य नापारगम्य है । उसके प्रथम भूतस्कममें प्रथम वम्पयनके प्रथम ठहाके प्रथम बाम्पमें गो भौनिनने उपदेश किया र, यह समस्त अंगोंके समस्त मुतवानका सारभूत है-मोचका पौरभूत : सम्यक्त्वमाए। उस दास्यमें उपयोग स्पर होनस जावको मिथप होगा कि पानी पुस्पक समागमकी उपासनाने विना बीब को कुछ सबसे निधय कर पहनेका मार्ग नहीं ह । समी पोषोंका समाच परमात्मबहप है, इसमें सभाप नही तो निर श्री - भनेको परमात्मसम्म माने वा यह बात अमाप नही । परन्तु जबतक वह स्वरप पापातप्प प्रगट म हो तवक मुमधु- विासु-पना हो बनिक उत्तम १, और उस रास्तेसे पपार्य परमारमस्वरूप प्रगट सेवा, पिस मा को शेषकर प्राति करनेसे उस परका मान मही होता सपा मानिन पीतमग सी पुसोच आसावना करनेका प्रति होती है। दूसरा कुछ मत-मद महो। मृत्युका बागमन बाप। ४९७ तुमें तलिपपक मापके बॉयमेका मपमा उस प्रसग बातचीत मरण करनेका समागम हता हो तो जिससे उस गाँधनस तथा प्राणसे बीबम बैराग्य और उपशमको बादि हो ऐसा करना योग्य है। उसमें प्रतिपादन किय हुए सितिका यर निषय होता हो तो करनेमें हानि नही, फिर मग मानी-पुरुष समागमकी उपासना सिसका निपम किये मिना मात्म-रोम ही होना समा। ४९८ समई, चैत्र वदी ११ गुण १९५१ चारित्र--(भौमिनके अभिप्रापो मनुसार चारित्र पाह। यह विचारकर सभपस्थिति होना)- गणाधी वनुमेशा करनसे बीवमें सस्पता उत्पत्र होती है। पापारा उसलाई चारित्र-परिणाम समाप सस्पताक बिमा जान निपल है या मोमिनमगवान्का अमिम पिपायान सपी। हसंबंधी बनुमेधा बहुतबार बनेपर मौ पचस परिणति हेतु उपाधि-योगः तत्र उदय- म्स से पितमें प्राप करणेबसे जैसा यता है और उस मे से शिपिम्ता उसम होकर हा विशेष नी कसा मा सस्ता । मान कुछ ने निवपमें तो विचमें बहुत बार यता है। पद्रो मिनती है।
विषिष पत्र मादि सग्रह-२बों यर्प ४५ बमई क्षेत्र १९५१ विषय आदि इपिछत पार्य भोगकर उनसे निपत होनेको इम रसना और उस क्रमसे प्रति करनेसे भागे घटकर उस विषय-महाका उत्पम होना समग न हो, यह होना कठिन है स्पोकि मान दशाके बिना विपयकी निर्मुसता हाना सभव नहीं। विषयोंका केवम उदय मोगनेसे ही नाश होना सम्भव है, परन्तु यदि बान-शा न हो तो विषय सेवन करमेमें उत्मक परिणाम हुए बिना न ये, और उसस परनित होनेके का उम्टी विषयको पदि ही होना सभव है। बिर्ने बान-दशा है, वैसे पुरुष विषयाकांचासे वथवा विपयका अनुभव करके उससे रिक्त होनेकी इछासे उसमें प्रापि नहीं करते, और यदि वे इस तरह प्रवृत्ति करनेक रिये उषत हों तो जानपर मी बावरण आ चाना समय है। मात्र प्रारम्धसववी उन्य हो, वर्षार छूटा न वा सके, उसासे जानी-पुरुषकी मोग-प्रति है। बा भी पूर्व और पचात्में पचातापयुक्त और मातम परिणाममुक होता है। सामान्य मुमुसु जीवको वैराग्यके उनके लिये लिपयका वारापन करनेसे वो प्राय करके बघनमें पड़ गाना ही समाई पोंकि कानी-पुरुय मी उस प्रसगको बहुत मुश्किळसे जीत सका है। तो फिर निसको केवल विचार-दशा है ऐसे पुरुपकी शक्ति नहीं है कि वह उस पियको इस प्रकारसे जीत सके। ५०० मिस नीयको मोहनीय कर्मल्मी कपापका स्याग करना हो, और अब उसका एकरम त्याग करमेका पार करेगा तब कर सकेगा' इस प्रकारके निमासके ऊपर एकर, जो उसका क्रम क्रमसे स्याग करनेका विचार नहीं करता, तो वह एक म त्याग करनेका प्रसग बानेपर मोहनीय कर्मक पके सामने नहीं टिक सकता । कारण कि कर्मरूप शत्रुको पोरे पोरे निर्वक किये बिना उसे निकाल गाहर करना एकदम मसमप रोता है । बहमाको निर्वछता के कारण उसके ऊपर मोहका प्रावस्य यत, है। उसका बोर कम करमके लिये या मारमा प्रफन करे सो एक पारगी ही उसके उपर जय प्राप्त करनेको पारणामें पा सुगा बाती है। मातक मोहसति ममेके लिये सामने ही मम्ती मातक मोहके बाहोकर वारमा अपनी बात समझती है, परन्तु उस प्रकारको कसौटीका वसर उपस्थित होमेपर नामाको वपनी कम्परता समझमें बा गाती है। "सलिये मैसे बने तैसे पांचों इन्द्रियों को पशमें ना चाहिये । उसमें मी मुत्सवमा उपस्प इद्रियको वश मना चाहिए । इसी प्रकार अनुक्रमसे दूसरा इन्द्रियों (अपूर्ण) ५०१ स १०५१ वैशास सुदी ५ सोमवार के दिन-सापकासे प्रत्याख्यान स १०५१ बैशास मुदी १९ मामबारके Pन भीम परवान्द्र ५०२ बर्थ, शास मुदी ११ रवि १९५१ धर्मको नमस्कार पीवरागको नमस्कार भीसपुरषों को नमस्कार (२) सो पम्मो मस्य दया, सादासा म बस्स सौ देयो, सो एकमो नाणी, मारंभपरिम्महा पिरमो । ५०३ (१) सर्व देशसे और सर्व दुससे मुक्त होनेका उपाय एक बाम-पान है। भारके विमा मामलान नहीं होता और प्रससंग तपा बसप्रसंगसे भागका विचार प्रापि नहीं करता, इसमें किपिग्मात्र मी साय नही। वारंम-परिवारको मापता करनेसे बसम्प्रसगका बर घटता है। एसगके वापसे क्सास- गका बापता है। मम्सगका र पानेसे मात्म-विचार होमेका सपकाश प्राप्त होता है। वाम-विचार रोनेसे नाम-बान होता है। बार बारम-नामसे निब स्वभावरूप, सोश वीर सर्व दुसरित मोक्ष प्रात ती—पह बात सपा सम्प। गो गौर मोह-निमा सो बमुनि , मुनि तो निरंतर बात्म-विचारपूर्वक जागृत ही यते है । प्रमPाको सर्मपा मप है अप्रमादीको किसी तणन मी मप नहीं, ऐसा होमिनने पाहै। समस्त पदाकि स्वरूप पाननेच एक मात्र बालबाम प्राप्त करना है। पदि वामनान म तो समस्त पदाकि डामको निफरता है। जितना बामभान हो उतनी ही नाम समाधि प्रग्र हो। दिसा मी त्यास स्पोगका पाकर बोलको यदि एक भणमर भी बतर्मेद-सागति हो बाप वो उसे मोन रिशेप र महो। अम्प परिणाममें नितमी ताम्माधि उतनी ही मोक्ष र है। पदि कोई वामपेग बन गाय तो इस मनुष्यताका किसी तर मी मूम्प नही हो सकता | प्राय मनुप देहके बिना बामपोग मही बनता—ऐसा मानकर मर्मत निपय फरके इसी देहमें भास्मयोग उपम करना पोपी। रिचारकी निर्ममासे परागौर बन्य परिचपसे पर माप वो उसे सहय-अमी- भामयोग प्रगर बाप । १पौरपाको मध्य ऐक नाबारे चम्नी मोर भारम-परमाते दिव पत्र ५ ] विविप पर मादि संप्रा-२वो वर्ष " बससग समागमका विशेष मिराब है, और यह पीप उससे बनादिकास होनसत्व हो मानेके कारण उससे बरकाश प्राप्त करनेके सिये, अपका उसको निति करने के लिए पैसे बने पैसे यदि मसंगका भाभय करे तो वह किसी तर पुरुषार्प-योन्य होकर विचार-दशाको प्राप्त कर सकता है। निस प्रकारसे इस ससारकी बनिस्पता असारता नस्पतरूपसे मासित हो, उस प्रकारसे माम- विचार उत्पन होता है। इस समय इस उपाधि-कार्पसे इनके लिये विशेष जति विशेष पोका रहा करती है, और यदि इससे छटे बिना वो कुछ मी काठ म्यतीत होता है, वो मह इस बीपी शिथिलता ही है, ऐसा माता है, अपना ऐसा निषय रहा करता है। जनक मारिनो उपापिमें रहते हुए मी बामसमावसे यते थे, उनकी एसे माननके प्रति कमी मी बुद्धि म होती पी। श्रीयिन बैसे ममत्यागी मी बिसे रकर प Pये, ऐसे मयके हेतुरूप उपाधि-योगको निासिको करते करत पदि यह पामर गीर कास म्पतीत करेगा तो बोप होगा, या मय गायक उपयोगर्म रहता है, क्योंकि ऐसा ही कतैम्प है। यो राग-द्वेप आदि परिणाम बाानके बिना समलित नहीं होते, उन पगप बा परिणार्मोके नेपर, जीवन्मुक्तिको सर्भया मानकर, जीव गोपन्मुक्त दशाको मासातमा करता है इस प्रकार प्रापि करता है उन राग रेप परिणामोंका सर्वया पप करना हो करम्प ।। नहाँ अस्पत बान हो, यहाँ अस्पत त्याग होता है। यत पागक प्रगट र मिना अस्पत काम नहीं होता, ऐसा भीतीर्यकरने स्वीकार किया है। बारम-परिणामपूर्णक विवमा अन्य पार्षका वादारम्प-अभ्यास–नित किया जाय, उसे प्रीमिनने त्याग कदा है। उस तादाम्प-अप्यास-निविरूप त्याग होनेक सिये इस बाम प्रसंगका स्पाग मी उपकारक है-कार्यकारी है। बाम प्रसंगके त्यागके लिये भाग नहीं कहा-ऐसा होनेपर भी इस गौरको जापागके लिये गाम प्रसगको नितिको कुछ मी उपकारक मानना योग्य है। हम नित्य एनका ही चार करते है, मौर बैसे बने मिससे यह कार्प तुरत ही निबट बाय सी आप जपा करते है। पपपि ऐसा लगता है कि पापिचार बीर बाप अमी तपारप मही- शिपिका इसलिये अत्यंत पिचार और उम्रतास उस गापके नायभम फरमका जपमाळमें सयोग जुटाना योप है-ऐसा या करता है। प्रसंगपूर्वक कुछ परस्परके सबध बैस बचन इस पर लिखे है। उनक विचारमें एरित होनेसे, उपचारवध रहिके लिये और तुम्हारे गाममे-विचारनेके लिये लिया है। (२) , प्रश, पप्प, संम्पात, बसपात मनंत वारिक विवपमें तया रसको म्पापक ताके विश्यमें मकि समझना योग्य होगा । 1 ७०८ भीमद् पबम्ब [१५ ४५५५५ ५०४ पई, पेशास सुदी १९५१ मो “से मुभारम्बधी मावचीत करनेका हमें अबसर प्राप्त हो तो करना । नो दक्ष पूर्ण युवावस्पामें बार सम्पूर्ण वारोम्पवमुक्त सिई देनेपर मी झममगुर है, उस रोमें प्राप्ति करके फ्पा करें । जगत्क समस्त पापोको पेक्षा मिसके प्रति सोय प्रीति , ऐसा पर देह मा हुसको होता है, ता फिर दूसरे पापम मुसके हेतुको क्या कम्पना करना ! मिन पुरुषोंने, वैसे पर शरीरस मिम । इसी तरवारमासे शरीर मित्र है-पहचान लिया, पुरुप पन्य है। यी दूसरेको पस्तुका अपने द्वारा पहण हो गया हो, तो रिस सम्प या माश्म हो जाता कि यह पस्त दूसरेकी, उसी समय हामा पुरुप उसे वापिस गैटय देत है। दु पम है, इसमें सराय नहीं । तपाबप परमानी बात-पुरुपका प्राय विरह हो। विरही गाव सम्पपिरिमान प्राप्त करें, ऐसा कास-स्थिति हो गई है। यो सहन-सिय-बाम- चारित्र दशा यती है, ऐसा कमान प्राप्त करना कठिन है, इसमें सशम महो। प्राति निभाव नहीं होती निरकमात्र विक यताहै। फनमें सपना एकदमें सार सह- पका मनुमय करती हुई मामा नर्षियय हे, एसा करनेमें ही समस्त या कोई है। - ५०५ बई बैशाख सुदी १५दुर १९५१ शामा अायत सहब स्वस्पता प्राप्त करे, यही मौसनाने समस्त मानका सर कहा है। ममारिकाम्से मे निरतर वस्तस्यताको हो भाराभमा की है जिससे जीवको सस्पताको और पाना कठिन पाता है। प्रीमिनने ऐसा कहा कि 'पपाप्रतिकरण तक जोष बनत बार या पुच्चो परन्तु विस समय प्रपी-मे होनेतक मागमन होता है, उस समप प सोम पाकर पछि ससार-परिणामी हो जाया करता है। प्रयी-भेद रोभेमें गो पार्ष-गति पाहिये उसके हो कि गौनको नित्यप्रति सासमागम सरिचार और समपन्न परिचप निरतररूपसे करना पस्कर है। इस यो मामु प्रत्यक्ष उपाधि योगसे म्पतीत ई मा यही है इसलिय वपत शोक साता और उसका परबत्पचाममें ही उपाय न किया गमा अपि गग भी पोरेदी समरने चाहिय। निसान काम नाश हो उसबानको वापत मधिसे नमस्कार हो। ५०६ बम्बई, पैशास दो १५ पुष १९५१ सबकी अपेक्षा निमम बधिक स्नेह हा करता । ऐसी या पपा रोग भय मारिसे पनी ही बारमाको मम सनाती दो फिर उसमे दूर ऐसे धन मादिसे नाबको तपाइप (पपायोग्य ) मुसमापि हो एसा विचार करनेपर विचारवानको पुषिको माप धोम होना चारिष और उसे किसी सर ही विचार बार बाला पारिय-ऐमा बाना गुस्पों में नो निर्णप या । बापापातमा विपिप पम मावि संप्रह-२८वों वर्ष ५०७ बमई, मैशान की ७ गुरु १९५१ घेदान्त धारिमें वो आत्मसमपकी विचारणा कही है, उस Aचारणाकी अपेक्षा मीनिनागममें दो बारमस्सलपकी पारणा है, उसमें भेद भाता है। सम-विधारणाका फल मारमाका सारा स्वमानसे परिणाम होना ही है। सम्पूर्ण राग-पके धय हुए बिना सम्पूर्ण बारमबान प्रगट नहीं होता, ऐमा नो जिनभगवानने निर्धारण कहा है, यह बेदात वारिको अपेक्षा प्रसवपसे प्रमाणभूत है। ५०८ सबकी अपक्षा वीतरागक वचनको सम्पूर्ण प्रततिका स्थान मानना योग्य है । क्योंकि नहीं राग वादि दोपोका सम्पूर्ण क्षय हा गया ह। वहीं सम्पूर्ण मान-स्वभावके प्रगट होनेके छिप पोम्प निमयका होना समय है। श्रीनिनको सबकी अपेक्षा उत्तए पीतरागताका होना समय है। क्योंकि उनके बचन प्रत्यक्ष प्रमाण है। जिस किसी पुरुपको जितने भशमें गौवरागता होती है, उतने ही वशमें उस पुरुपके माय मानने योम्प है। साल्य मादि दर्शनमें वध-मोक्षकी निस मिस म्पान्याका उप श किया है, उससे प्रपठ प्रमा- जसे सिद्ध म्पास्या भीबिन बीतने की है, ऐसा मैं मानता है। । ५०९ हमारे चित्तम बारम्बार एसा बाता। वीर ऐसा परिणाम स्थिर रहा करता है कि सा भारम कम्याणका निर्धारण मानधमान स्वामीन अफ्ना श्रीडपमदेव भाग्नेि किया ६, बसा निधारण दूसरे सम्प्रदापमें नही बेदाच वादि दर्शनका रस मी बाम-धानकी और सम्पूर्ण मोक्षकी ओर गाता मा देखने में माता है, परन्तु उसमें सम्पूर्णतया उसका पयापम्प निर्धारण मायम मही होता-अगमे ही माझ्म होता है, और कुछ कुछ उसफा मी पर्यायांतर माश्म होता है। यपि पेरतमें मगह जगह माम पर्याफा विरेचन किया गया है, परन्तु पर ची स्परपसे अविस्व है, पेमा भमातफ नही माझ्म हो सका । यह भी होना संभव है कि काचित् विचारक किमी उरय-मसे बेतका भाशप मिमापसे सम्समें माता हो, भार उसमे निराध माश्म होता हा ऐमी भाका माहिर फिरसे वित्त की है, शेष प्रति विशेष आमकार्यको परिणमाकर उस अनिरोधी रेगनेक ये विचार किया गया है किर मी प्रमा माम्म हाना है कि पन्त, दिस प्रकारमे आमम्पम्प कहा उस प्रकारस देत सर्वथा बविरोध मावका प्राप नहीं हा सकता । स्योंकि जिस तरह पा कहतार, भीमद् पवन [पत्र १ मामसरुम उसी तरह नहीं ह-उसमें कोई बड़ा मे दसनेमें माता है, और उस उस प्रकारसे सांस पारि दर्शनों में मी भेद देसा माता है। मात्र एक मौभिनने यो वास्मस्वरूप कहा है। विधपातिविशेष गरिरोषी देसनेमें माता --उस प्रकारसे केदन करनेमें गाता है। बिनमगवान्का का मा बामस्वरूप सम्पूर्णतया वपिरोभा ऐना उचित है ऐसा मासूम होता है। परन्तु यह सम्पूर्णतया बनिरोगी होर, ऐसा भी नहीं कहा जाता उसमा त केवल इतना ही है कि वमी म्पूर्णतया बारमातम्या प्रगट नहीं है। इस कारण नो अबस्या बप्रगट उस सस्थाका बतमानमें वनुमान करते है निम्से उस अनुमानको उसपर बात मार म देने योग्य मानकर पहरिशेपातिविशेष वनिरोगी ,ऐसा कहा भनिरोधी राम पोम्प है, ऐमा भगता है। सम्पूर्ण भामस्वरूप किसी मी तो पुस्पमें प्रगट होना चाहिये -म प्रफर बारमा निधप प्रतीति मात्र भाता है। भौर पर कसे पुरूपमें प्रगट होना चाहिये, यह विचार करमेसे पा बिनभगवान् बसे पुस्पको प्रगट होना चाहिये, या स्पए माश्म होता है । इस सुश्मिासमें पदि किसाम मी सम्पूर्ण वामस्तस्प प्रगट होने योग्य हो तो या सर्वप्रथम श्रीवर्षमान सामीमें प्रगट होने पोप माता ६, सपना उस दशाक पुरुषोंमें सबसे प्रथम सम्पूर्ण बारमस्वरूप (अपूर्ण) :- सम्पूर्ण ५१० बम्बई, शाम बदौ १ सि १ ५१ 'बमा उपारिरमित हानेकी इण्य करनेवासको बाम-परिणतिको किस विषारमें छाना पाप बिससे यह उपारिरक्षित हो सके। ' या प्रश्न हमने सिसा था। इसके उत्तर, तुमने निस्य कि जबतक रगका पनी तक उपाधिरहित नहीं भा गाता बार जिससे पापन वाम परिणतिसे कम पर माय सी परिणति दे तो बन्यकाठमें ही उपाधिरहितहमा जा सकता है-इम हर जो उत्तर सिमा पापपाप है। को प्रनमें इतनी विशेषता है कि पबिठपूर्वक उपारि-पोग प्राप्त ऐना दा, उसके प्रति रगनप बारिपरिमनि कम । उपगि करके पे रिच बारगार मोरयता दो बार उस उपापिफ पाग परनमें परिणाम या करता हरा, पैसा होनपर मौ उपप-पहले पनि उपाधि प्रग रहा ना उसकी किम उपमे निति मा सस्ती इस प्रस्मस पपरु मा यस पर सो उिराना । मागपत्रमा प्रप हमन पहा है। उसमें सम्प्रदायक विकाका कुरा समाधान हो सके, पेमी रपमा की परम्नु तारतम्पम बाबाम्नरिक शासवानकी रचना नही ऐसा मुस भगताई। औरगरने ' मय पुरम पक परम्म" हा साया निपापा : बाचा गरम गमापाय fIT अनुभा परम गापा मी माप फरक छापामा उपश दगनमें मा आर उगग प्रमुरीनिर्गपरिया गा गस्तार और भी जानिणय पिा नाप तारापर गीतमा (गा प्राय परफ में मई। आना | HI पुरुषार्थ-धमरा इन प्रसरफर पत्र ५११ ५१२ ५१३] विविध पन मादि संप्रा-या वर्प माणी अनेक तबसे बख्यान बनाती है, इतना उस माणीका उपकार बहतसे मीलोंके प्रति होना समय है। तुम्हारे बारके पत्रमें मतमें श्रीगरने बो सासी किसाई है-'म्यपहारनी जाळ पादर पदिरे परमळी' -पह जिसमें प्रथम फ है, पायपाप है। यह सासी उपापिसे उदासीन चिपको धीरजका कारण हो सकती है। बा, पेशास व १९ गुरु ११५१ शरण ( आभ्य ) बौर निश्चय कर्तव्य है। अधैर्यसे छेद नहीं करना चाहिये । चिचमें देश बाशि भयका विक्षप मी करना योग्य नहीं। अस्थिर परिणामका उपशम करना योम्म है। ५१२ बम्बई, पेष्ठ पदी २ रवि १९५१ मपारकी तरा ससार-समइसे वारनेपासे ऐसे सद्धर्मका निष्कारण करणासे मिसन उपदेश किया है, उस हानी-पुरुपक सपकारको नमस्कार ! नमस्कार ! मुझे प्राप करके निति मिल सकती है, परन्तु या क्षेत्र स्वभावसे विशेष प्रति इस कारण निति क्षेत्रमें जसे समागमसे वारम-परिणामका उत्कर्ष हाता है, बसा प्राय करके विशेष प्रचिवाले क्षेत्रमें होना कटिन पाता है। कमी विचारवानको तो प्राति क्षेत्रमें सरसमागम विशेप लामायक हो माता है। हानी-पुरुषका मीइमें निर्मल दशा Pमाई देती है। स्पादि निमिचसे मी या विशेष धामापक होता है। पर-परिणातिके कार्य करनेका प्रसग ये और स-परि पतिमें स्थिति रक्से रहना या मानदफ्नामे मो चौदा बिनमगवान्की सेवा कही है, उससे मी विशेप कठिन है। पानी-पुरुपके जिस समयसे नवबाइसे विमुर प्रमचर्प दशा ये, उस समयसे दो सपम-मुस प्रगट होता है, पर अवर्णनीय है । उपदेश-मार्ग मी उस मुसके प्रगट होनेपर ही प्रत्पण करने योग्य है। ५१३ बम्बई, ग्येष्ठ मुटी १.रवि १९५१ बात परे पुरुषों के अधि-योगके सबममें शानमें बात माती है तथा लोक-कपनमें मी वैसी पाते सुनी जाती है, उस विषयमें बाफ्को सशप इता ह, उसका उत्तर संक्षेपमें इस तर:- पए महासिरि वादि नो नो सिदिपा कही है, ''भार जो मप्र-पाग कहा है, वह सम सप्य है। परन्तु नाम चर्पके सामने यह सब है। यहाँ वाम-स्पिरता है, वहाँ सब प्रकारका सिमि-पोग यता है। इस कारमें वैसे पुरुष साई नहीं देते, उसमे पर उसकी अप्रताप्ति होनेका कारण हो जाता है। परन्तु वर्तमान में किसी किसी चीवमें ही उस तपकी स्थिरता देख्ने बानी है। तसे गालोंमें सत्वको न्यूनता पता है, और उस कारणसे वैसे चमकार मानिसई नहीं ते, परम्त , ४१२ श्रीमद् रामचन्द्र [पत्र ५१४ ५१५ ५१५ उनका अस्लिल ही मही यह बात नहीं है। तुम्हें इस बातको शमा रहती है, यह बापर्प माम हाता है । मिसे भारमप्रतीति उत्पम हो गय उसे सार ही इस बातक निशकता होती है। क्योंकि बामा नो समर्पता है, उस समर्पता के सामने सिदि-अम्बिका कोई भी विपता मही। ऐसे प्रश्नोंको बाप कभी कमी दिसते हो इसका क्या कारण है, सो विमना । इस प्रकारके प्रश्नोंकन पारपानको होना कसे समब हो सकता है। । मनमें जो राग देष वारिका परिणाम हवा परता है, उसे समय बादि पर्याय नहीं कहा जा समता । क्योंकि समय अपन्त सूक्ष्म १, बौर मनके परिणामोंको बेसी सूक्ष्मता नही है। पार्या अन्यतसे वस्यत सूक्ष्म परिणतिका दो प्रकार है प समप । रमा-रेप बानि विचारोंका अब होना, या बारके पूर्योपामित किपे हुए कर्मक संघबसे हो होता है। वर्तमान कामें भामाका पुस्पाप उसमें कुछ भी हानि-नादिमें कामणरूप है, फिर भी पर विचार Aधेप गान है। योगिनने गो साप्पाप-कास या, पर यमार्थ ।। उस उस प्रसंगपर प्राण मालिका मुछ समि-भेद होता है । उस समय पिच सामान्य प्रकारसे विशेषका निमित्त होता सामादि योगध प्रग होता है अपना यह प्रसंग कोमा परिणाममें विलम्प कारण होता है, स्पादि फेवामोसे साम्पापका निरूपण किया है। अमुक स्थिरता होनेराक पिप लिना मही बन सकता, तो मी मितना बना उक्ना प्रयास पर ये तीन पत्र लिने है। ५१५ बम्बई स्पेष्ठ पुदी १५ शुक १५१ यह तपारप गमार पाप महा 1, तो मी वाशपक गमीर होनेसे पक छफिक पचन में भारमा गएत पार पर हो माना है। यह बाम्प इस तरह-री रुए, माटी रुप, पण सात मरनारबाग ता मातुन न रपार । पपरि इस बास्यक गंभीर न हमनेसे सिनेमें प्रति न होगी, परम्नु माशपके गमार होनेस भौर अपन विषपमें विभप चार करना दिशा दनके कारण तुमे का मिसनका म्मरण हुमा इसपिप याद नाप सिमा है। इस उपर पपाशात चार करना । ५१६ बा पेठ बी २ १९५१ पिपारपान को देर एनेक संभ -पार करना योग्य नहीं । वामपरिणामका बिमासमा पनि और बड़ी मुम्य मरण | तमाम्ममुमता और उस प्रकारको मापरियो पत्र ५१० ५१८] पिविभ पत्र मादि संप्रह-२बों वर्ष ४५३ यम ग्येष्ठ वदी ५ युष १२५१ सबमें सम-भाषकी इच्छा गती है। ऐ भीपास्नो रासकरवां, गान भमृत रस पुठ्यो रे । मुम । (मायशोविजपनी) तौर पैराग्यवानको, बिस उदयका प्रसग शिपिस करनेमें बहुत वार फलीभूत होता है, जैसे उदयका प्रसग देखकर घिसमें वरयत उसमाव वाला है। यह ससार किस फारणसे परि धप करने योग्य ! तथा उसकी नितिको ला करनेवासे विचारवानको प्रारम्बशसे उसका प्रसग या करता हो ता वह प्रारम्भ किसी दूसरी प्रकार शीप्रतासे पेदन किया जा सकता है मयमा मही । उसका तुम तया श्रीगर विचार करके छिमना । निस तीर्थकरने बानका फल मिरति कया है, उस तीयकरको अप्पत मधिसे नमस्कार हो! इच्छा न करते हुए मी गीपको भोगना परसाई यह पूर्वकर्मके सबपको यपार्थ सिद्ध करता है। ५१८ वी, म्पेठ १०५१ मानीक मार्गक भाषपको उपदेश करनपासे पाप- १ सहम माम्पसे बीपी म्पित्ति होना, इसे श्रीनीतराग मोक्ष करते हैं। २ पार सहन सम्पसे रहित नहीं, परन्तु उस हर सम्पका जीवको केमळ मान नहीं है पर भान होना, पही सहन स्पस स्पिति है। १ सगके योगसे पर गौर सहर स्पितिको मूस गया , सगको निधिमे सहन सम्पका वपरोष मान प्रगट होता है। ४ इसीलिये सम तीर्थकर मावि शानियोंने बप्सगताको दी सोना कहा है जिसमें सब बारम-साधन समिविए हो जाते है। ५ समस्त विमागममें करे हुए बबन एकमात्र बमुगतामें ही समा जातक्योंकि उसीके होनेके लिये ये समस्त पचन को । क परमाणुसे मेमर पोर राम् ककी भौर मेप-उम्मेपसे लेकर रोगी मास्यातककी जो सब कियात्रोंका वणन किया गया है, उनका इसा अमुगताके सममानेके लिये वर्णन किया है। ६सर्ष मात्र महगता होना पर समसे फटिनस करिम सारन और उसके आसपा बिना सिम होना अपर फटिन है-ऐसा रिपारकर श्रीतीकरन संगफी उसका भापार कहा है, जिस एसके सापसे गावको सहब पत्पमूत असगता उत्पन्न होती है। ७ पाएसंग भी जीरको गहुत बार प्राप्त हानेपर भी पमपान नहीं हुमा, ऐमा भीषीन- पगने कहा है। क्योंकि उस मम्सगको परिधानकर इस पीनने उमे परम हितकारी मही समष्ठा- परम पहसे उसकी उपासना मही -भार प्रासको मी अमाम पमपान हाने योग्प समास सोर १मश्रा एन मितने पुरानामनग्न बरना है।
। भीम राबाद [पा ५२. प्रश्नोंपर तुम, मेरामाई तपा माइंगरको विशेष विचार करना चाहिये । वन्य दर्शनमें जिस प्रकारसे केषमान बारिका माप का है और मदर्शनमें उस पिपका यो सम्म का है, ठम दोनों में गुवा मुख्य मे देखने वाता है, उसका सबको चार होकर समाधान हो माप तोपबामा काम्पाणका बगभूत है इसलिये इस पियपर अधिक विचार किया नाम पो बम है। २ वस्ति' इस फसे लेकर सब मात्र वामा मिये ही AAR करने योम्प है। उसमें ये निय स्वयमको प्राणिक है, उसकारी मुस्पतमा विचार करना सोम्म । बौर उस विचारक मि अन्य पदायिक विचारकी मी अपेक्षा पती, उसके लिये उसन भी रिचार करना उचित है। परस्पर दर्शनों में बड़ा मे देखने में बाता है। उन सको तना करके बमुक दर्शन सपा यह निश्चय सब मुमसुमोको होना कठिन ६, क्योंकि उसकी तमना करनेकी पोशमशति किसी किसी गोषको ही होती है। फिर एक दर्शन सा बोंमें सपो मोर दूसरा दर्शन सब में बसप है यह पाय प िविचारसे सिद्ध हो पाप तो इसे दर्शनों के प्रवर्तकको दशा वा िविचारने योग्य है। पोंकि निसका राप उपशाम बसमान है, उसने सर्षया बम्पका ही निरुपण क्यों किया होगा। इस्पात विचार करना योम्प है। किन्तु सब गायोंको यह विचार होना कठिन है मौर पर विचार कार्यकारी मारने पोम्य है परन्तु यह किसी माशाम्यमानी हो सकता है। फिर बाकी गो मोबके इक बार है, उन्हें उस संघमें क्या करना चाहिये, ए मा विचार करना उचित है। सब प्रकारके सबंग समाधान के ए बिना सब कमन्स मुक्त होना वसमत या विचार हमारे पिच या करता है और स्व प्रकारके समाधान होने के लिये पदि वगतका पुस्पार्प करना पड़ता हो तो प्राप करके कोई भी बीच मुघन हो सके । इससे ऐसा माश्म होता है कि वस्पकात में ही उस सब प्रकार के समावाना उपाय हो सकता है। इससे मुमुक्षु गावको कोई निराशाका कारण भी नही। . भाषणमुदी ५-९ का पहसि निदच होना बने, ऐसा माश्म होता है। यहाँ के ना होगी हास्पिति होगी। ५२७ सांस बेदांव न पोग नैयापिक, बीर + + + + + + + + + + , बनित्य परिणामी अपरिणामी साठी सार्व पत्र ५२८, ५२९, ५३ ] पिविष पत्र मावि संप्रह-२८पों पर ५२८ १ सत्यदर्शन यता है कि मुदि बा । पातजस और मेन्तदर्शन मी ऐमा हो कर हैं। जिन न तारेकि पुदि चेतन है। २ तर्शन करता कि वामा एक ही है। बिनदान कहता है कि माम्मा गमती गाति एकरे। सन्यासन भी ऐसा ही करता है। पानवदर्शन भी ऐसा ही करता। ३ दासकन पता है कि यह समस्त मिल पम्पाके पुत्र के समान है, जिनर्शन करत है कि यह समस्त पिश शरबत है। . पातवदर्शन कहता है कि निस्य मुक र एक ही होना चाहिये । सम्पर्शन र बावका निषेध करता है। बिना र्शन मी निपम करता है। ५२९ बर्थ, बाप, बदी ११ गुस् १०५६ मिस विचारवान पुरुपकी सिम समारच पम्प नित्यप्रति शमसूप माममान होता हो सांसारिक मोगोपमागमें विसे नौरसता मी प्रवृति होती हा, ठस विचारणामको दूसरी तरफ लोक स्पबार वानि, ज्यापार वारिका उदय यता हा, ता या उप-प्रतिवप इनियक मुमक डिपे नहा किन्तु बारमहितार्प दूर करनेके सिये हो, तो उसे दूर कर सफने का क्या उपाय करना चाहिये । -सवपमें कुछ करना हो तो करना । ५३० बई मारपदी ११ रबि १०५४ निस प्रकारसे सार ही बन गाप, उस फरनेक निपे परिणति या करती है भयका पन्त पनि कोई उपाप न स तो मछपान कारण जिसमे बारा न पैसा प्राति हावी है।ात समपफ म्पापारिक प्रसुगको वरिके कारण पनि पोर समय मा निक्षिसे फिसी बयानपक्षप्रमें या जाप ता अगा, ऐसा चितम या करता था । तया यहाँ अधिक ममप नमक कारण, जो जन्म निमित्त कारण र म माता पिता बारिके सपनक लिये उनकरिता प्रियताके अधोमम मिये, तया कुछ पुरा म विच अनुप्रचाके लिये भी पान पारस शांशा गानेफा रिचार उपम एमाथा । उन दोनों बातो छिपे कमी सयाग मिल का अठा ऐमा पिपार फरनेसे कुछ पपायाम्प समापान न राठा पा | उसके पेि चारको महत उन विशषतामे दाउमें जो कुछ मसारको मस स्पिरता, उसे तुम्हें बताया था । सब प्रकारके अमग-मशक पिचारका पहमि वामग ममकर र रमकर अन्याय यजमगताका हास पुष चार रम्मा है, पर मी मन ममा से उत्पानुसार ही है। भारत ॥ ११ स माप्रपर मुरी १० क मग तक किमी निधि धत्रमें गला दो तो पैस, पपाशदि उपपको उस म सा रमन प्रति करमा पाहिप पनि शेष मितिका उम्पस पम्प दमनसे प्राम बना काटिन जान पाती है।
[१११११ F नयानय समोर नित्य प्रति मिग्मा प्राविभौण होती रो, यही सवार बस अमुक नसविकी अमुकाम हो सत्पति होती है, वह मनुक समय निमीवी है। सामान्य प्रकार भामके रस-सारको मार्ग नक्षत्रमें तो बाबा मधाबारीमान उपमहाउसकीपितिका समय मीमो मनात नहाँहाकमुसामान्यरसे चैत्र शासवानिमाम्म उपरोनेपा यामकी ही बर्मा मापस मुदी ११ सस्ता । समधाम बुटा प्रसग पार कसा गा सकेगा सो गा करनेको म यती तुर पपापारमानीराम उस बालपरमरिकमके रिचारात काना पाय गमाविर परमा। गोरग, 411 अप्रकारसेमाती मीमद् रामान्य मरादि लिप्या प्रति मी ए न हो तो स्पषशान मी समय नही। २ देकने जो मनुष्पकमें आप, उसे किया जाता समापसात भिमा एसपने नही। ५२१ ૨૨ Pन ON करके Aचार-या हो या करती है। जिसका सभेसे मी सिमना मार ब, वा १. १९४ उमस मे भी रितमाता पिरण एगी। कारपधी ही माप समागम भाने मापा गया है। रामा पनि उनकी कोई उमति करत लासपी सागस उभात tatti ERATO प्रातिपय पिरमा मीनस)। (१) निम पापा Tan RO बिना अनानु मादी until RI1(IR पोगनेमास प्राति लालिमा * 1111 NARitent उम मे उमATAli HARI OR और मोदी उनी REAMIRPSARI मा प्राधिगे 1411 मा Hi fruirur तरी न्य tar जनमानुगार IPAHIY पर ५२४,५२५ २५ पेविष पत्र मावि संप्रा-२८मों वर्ष । इच्छा करते हुए भविनाशी परिणाम कहा है, उस परिणामस प्रहति करते हुए भी बनतानुबाका होना समय है। सभेपमें बनसानुबषी कपायको म्पाम्पा इस तरह माश्म होती है। (२) 'आपुत्र बानि बस्तुएँ छोक सहासे हटा करने योग्य मानी जाती है, उन पस्तुनाफा दु सापक और बसारभूत मानकर-प्राप्त होने वा नाश हो गानेसे इम करने योग्य नही गसी थी, से पापोंको हालमें इस उत्पन होती है, भौर उससे अनित्य मार बैस बनवान हो पसा करनेकी ममिठापा सूत होती है '--इत्यादि जो उदाहरणसहित विसा, उसे बाँधा है। निस पुरुषको हान-दशा स्पिर गने मोग्य है, ऐसे हानी-पुरुपको मा यदि सप्तार-समागमका उदय से तो नागतमपसे ही प्रवृत्ति करना योग्य है, ऐसा वीतरागने नो फहा है, पवन्यथा नहीं है और हम सब जागृत मावसे प्रहाति करममें कुछ शिथिलता रस्से तो उम ससार-समागमसे बाधा होनेमें देर म सगे-या उपरेश इन बचनोंशरा मारमा परिणमन फरना योग्य है, इसमें सशय करना उचित नहीं। प्रसगकी सर्वथा निति यदि अशाप होती हो, तो प्रसगको न्यून करना योग्य छ, मोर प्रमपूर्णफ सर्वपा निरिहप परिणाम गना ही उचित है, यह मुमुक्षु पुरुपका भूमिका-धर्म है। सासग-सशासक सयोगसे उस धर्मका शेपनमसे मारापन सभव है। ५२४ बर्मा, थापा मी ३ गुरुः १९५१ श्रीमद् पीतरागाय नमा (१) केपठानका सस्प किस प्रकार घरता है। (२) इम मरतक्षेत्रमें इस काठमें उसका होना समय हो सकता है या नहीं ! (३) फेपरवानीमें किस प्रकारको बाम-स्थिति होती है। (५) सम्पादन सम्पग्वान भार कसज्ञानके स्वपमें किस प्रकारस मे हो माना है। (५) सम्पग्दर्शनयुक्त पुरुषफी आमम्पिति कैसी होती है। उपर फर दुप चापर पपाशकि रिशप विचार करना योग्य है। इसके सबंध पारा तुमम जो निम्मा ॥ सफे सा सिपमा । पाउमें पही उपाधिकी कुछ म्यूनता है । ५२५ बम्बई बापा बरी२ वी १९५१ श्रीमद् वीतरागो नमस्कार सममागम वार सागरे मामका बाल्मेवाने मुमुभुमोको आरम परिम और रमामार आन्फिा प्रतिक म्पन करना योग्य है ऐमा भीजिन भा-िमहान पुरुषोंने कहा है । जबतक आना TRचारफर उसे कम पग्नरे पि प्राचिनी म एमा नाप बता सपुस्पके फटे हुए मागमा पर प्राम करना करिन है । इम पानर मुमुसु गोरको शिर निधार करना पारिप । ५२६ बमा भारती १० *नमा पीतरागाप १ इम मरमधमें हम मा में फागन गमा है या मह ! पारा प्रम छिग ५, उनके उगरमे तुमार नपा प्रोटगनाईके शिवार, प्रा र पप्रम नियमग मास है। इन भीमद् रामचन्द्र [पर ५१८ दिया है, पेसा का है। यह जो हमने का उमी मातके विचारस, जिसमे हमारी आमा आम- गुण बानित होकर सहन समापिपर्यंत प्रप्स हमा, पेमे ससगका में अर्पत मापत मलिसे नम सार करता है। ८ मास होस गावको प्रथम सम साधनोंको गाण मानकर निर्वाणके मुख्य हेतु ऐसे सासगी ही सर्वाणिरूपसे उपासना करमा योग्य है जिससे सब सापम मुसम होत है-ऐसा हमारा वाम-साक्षात्कार है। ९ उस सम्सगके प्राप्त हानेपर पर इस गौरको करपाण प्राप्त न हो ता अवश्य इस जानका हो दोष है क्योंकि उस ससगके अपूर्ण असभ्य वीर अस्पत दुग्म ऐसे सपोगमे मी उसने उस सासंगके स्पोगको पाश करनेवाले ऐसे मिम्मा कारणों का त्याग मही किया । मिमामा, सावा, प्रमा" और इन्द्रिय विपयोंसे यदि उपेचा न की तो भी ससग फम्यान नहीं होता वका ससगमें एकनिष्ठा कपूर्व मजि म फी हो, तो मी सग 'फसमान मही होता । परि एक इस प्रकारका अपून भफिसे सस्गकी उपासना की हो तो अपकामें ही मिण्यापर वाविका नाश हो और अनुक्रमसे बौन सम दोपास मुफ हो जाय । ११ ससगको पहिचान होना चीनको दुर्गम है। किसी महान् पुण्यके योगसे उसको परि चान होनेपर मिषपस यही एमग-मपुस्प है, ऐसा मिसे साझौमात्र उत्पम हवा हो उस बीचको तो श्य की प्राचिका सकोच करमा चाहिये अपने दोपोंको प्रतिक्षण, हरेक कार्यमै हरेक प्रसंगमें तीत्व उपयोगपूर्वक देखना चाहिये और दसकर उनका धप करना चाहिये, पथा उस ससगळे निपे पनि देह माग करना पड़ता हा तो उसे मी स्वीकार करना चाहिये । परन्तु उससे किसी पाप विशेष मधि- स्नेहाने ना योग्य नहीं । तपा प्रमार मे रम्गारव मा िदोपौने उस ससग के प्राप्त होनेपर पुम्पा धर्म # गण र संग फम्यान नहीं होता पा जामकर पुरुषार्थ-पार्यका गुप्त रसना योग्य नहीं। १२ सरसगका वर्षात् सत्पुस्पको पहिचान होमपर भी यदि पा स्योग निरन्तर न यता हो तो समगसे प्राप्त उपोशको प्रसव सत्पुरुषके तुल्य समसकर उसका विचार तथा वारापन करमा चाहिये निस वाराषनसे गीचको वपूर्ण सम्पर उत्पन होता है। १२ जीपको सबसे मुख्य चौर सपसे बारात्मक पा निश्चय रमना चाहिये कि मुझे यो फुल करना है जो मामाके कम्पाणरूप हो उसे ही करना है और उसीके छिपे इन तीन योर्गोको उदय-बरसे प्राति होती हो तो होने देमा तो मी अन्तमे उस त्रियोगसे रहित स्पिति करनेके किसे उस प्रालिका कोच करते करते मिरासे उसका भय होचाय पी उपाय करना चाहिये। उपाप मिप्या मापदका त्याग सरताय स्पाग प्रमऔर इन्द्रिप-विषयका त्याग या मुन्सी । उसको हांगके सपगमें माश्य ही माराम करते पना चाहिये और समगकी परोक्षवाम तो उसमा माश्य मास की मारापन करते गना चाहिये । साकि सत्सगक प्रसगमें दो यदि जीपको कुछ न्यूनता मी हो तो उसके निवारण होनेका साधन सग मोदी परम्त ससगकी परोसता तो एक बफ्ना मरमर साधन है। यदि मह वाससस सससे प्रक्ष मोषका अनुसरण मरे, उसका वापरण म करे, भामरण करमेमें होनेवाले प्रमावको म छोरे, तो कमी मी गावका सम्पाप न हो।
पत्र ५१९ ५२ ] पिषिम पम मादि सपा-२८वों पप ४५५ सक्षेपमें मिले हुए हानांके मार्गके बाशयको उपदेश करनेवाले इन मास्पोंका मुमुसु गीतको अपनी वारमा निरन्तर ही परिणमन करना योग्य है बिहें हमने अात्म-गुणको विशेष विचारने के किये शम्दरूपमें किसा। वर्मा, ज्येष्ठ पुदी १० रपि १९५१ जानी-पुरुपको जो मुस रहता ह मा निज सभावमें स्थिरताका ही मुस रहता ह । बाम पार्यमें उस मुख-बुद्धि नहीं होती इसलिये उस उस पापसे हानीका मुस-दुःस वादिकी विशपता अथवा न्यूनता नहीं कही जा सकती । यपपि सामान्यम्पस शरीरको सम्पमा आPिसे साता और बारिसे बसता और मवाना दोनों को ही होती है, परन्तु बानीको यह सब प्रसग हर्प- विपाका हेतु नहीं होता अपवा यरिबानकी तरतमतामें न्यूनता हो तो उससे पुछ कुछ हर्ष-विपाद हाता ह फिर मी सर्वथा अमागतमावको पाने योग्य हर्ष-विपाद नहीं होता | उदय-ससे कुछ कुर पैसा परिणाम होता है तो मी विचार जागतिके कारण उस उदयको क्षीण करने के लिए ही बानी पुरुषका परिणाम रासाह। जैसे पायुको दिशा बछ जानेसे नहान दूसरी तरफको चळने म्गता , परन्तु बहाम पानपाठा उस नामको धमार मार्गको भार रखनेके ही प्रयत्नमें गता , उसी तय बानी-पुरुष मन बचन भारि योगको निममात्रमें स्थिति होने की बोर ही भगाता है फिर भी उदयसप मायुके सबसे यत्किचित् दिशाका फेर हो जाता है, तो मी परिणाम-प्रपरन-तो बने । धर्ममें गता है। हाना मिर्धन ही हो बयबा घनबान होस, बार बाानी निर्धन ही हो अपरा धनवान ही हो, यह काई नियम नहीं है । पूर्वमें निप्पन गुम भगुम कर्मके अनुसार ही दोनोंको उदय राता है। पानी उत्यमें सम रातारे वहानको हर्ष-विपाद होता है। महाँ सम्पूर्ण बान है वहाँ तो मियो वादि परिमाका मा प्रसग ।। ठससे म्यून भूमिकाकी शान-दशामें (पाप पाँच गुणम्पानमें बही उस योगका मिलना समय है, उस दशामें ) रामेषाय पानी-सम्पगारिको हो-निया बानि परिमहकी प्राप्ति होती है। (२) पर पास जितने मगमें हर्प-रिवार हा उतना ही जानका तरतम्प कमती हाता है, पसा समाने का। ५२० बई, आपस मुदी १ रवि १०५१ १ सपका मान हानक पापात् मिष्पा प्राचि दूर न हो, ऐसा नहीं हाता । स्योंकि कितने वंशम सरसफा शान हा उतने ही बशमें मि यामात्र प्रकृत्तिका र हाना मुभव ६, यह बिनमगपाका निश्चय ह । मी पूर्व प्रारम्भम पनि बार पारिफा उन्य रहता हा, तो मी मिथ्या प्रतिम तापम्प भीमद् रामचन्द्र [पत्र ५२१ ५२२ ५२३ न हो, या जानका लक्षण । भौर निस्य प्रति मिथ्या मातिषीण होता ये, यही सत्पशामकी प्रवीतिका फर। यहि मिप्या प्रति कुछ भी रन वो सत्पन्न बान मा समय नही। २ देकमेकोले यो मनुष्पमेको भाये, उसे वधिक गेम होता है-स्यादि यो मिसा,म सामान्यरूपसे पिसारे, एकातरूमसे नहीं । मई, बापाल पदी १ मि १९५१ जैसे अमुक बनस्पतिकी अमुक मत ही उत्पति होती है जैसे ही मुक में ही उसकी विकृति मी होती है । सामान्य प्रकारसे वामके रस-सा बा; मात्र विकति होती है। परन्तु मार्या मसबके बाद गो वाम उत्पन होता है, उसको कितिका समप मी वार्वा ममत्र होहो, यह बात माही है। किन्तु सामापरपसे पैशाख मानिमासमें उत्पन्न होनेवाले बामको ही बा; मऋमें मिति होना समय है। ५२२ बई वापार सदी १ रवि १९५१ पिन राव प्राय करके विचार-सा होया करती है। जिसका सभेसे मी विसमा महान सकता। समागममें कुछ प्रसंग पाकर कहा पा सकेगा तो सा करमेकी इच्छा राती, पोंकि उससे हम भी हितकारक स्थिरता हो । कवरिपथी हाँ बाप । उनका समागम करने बारा मही है। तथा यदि उनकी कोई प्रति तु यथायाम्प म लगती हो तो उस बातपर भाविक भक्ष न देते हुए उनके विचार पुल वनुक्रम करना योग्य मो ता विचार करना। जो परम्यान हो उसका समागम अनेक प्रकार से वारम भारको उमति करता। गेकसबपी समागमस विशेप उपास भाव हवा । वषा पोत से पोगके बिना तिनी । प्रषियोका निराध करना नहीं बन सकता । 1 ५२३ नई आपात सदी ११ पुष १९५१ (१) मिस कपात्प परिणामम मनत समारका बच हो उस कयाम परिणामको शिनप्रवचन जनतानुबली संवा कहा है। जिस सपायम तन्मयतासे अप्रशस्त (मिप्या) मालमे दीप उपपोगो मामाकी प्रति हाती यहाँ अनतानुभी स्थानक समय है। मुख्यात गे म्यानक यहाँ का है उस स्पान कर्मे उम कपायको विशेष संमरता है --निस प्रभारसे सदेव सहा भार समर्म मोहता हो उनकी पमा हात हा उपा उनसे विमुन्न मात्र होता हास्यादि प्रातिस तथा असत् दब क्मत् गुरु और भार धर्म सि प्रकार भागा होता तसबी सारयता माम्प हो इत्यादि प्रत्तिसे भापरण' जनतामुली कपास उत्पमहानापना हानी पचममें ती-गुभ धादि मानोंमें जो मर्यादा पमान करते r पत्र ५२४ ५२५ ५२५ वेपिप पर मारि संमह-~२ौंपर्प इभ्य करते हुए अमिना परिणाम कहा है, उस परिणामसै प्रहति करते दर भी बन होना सभव है। सनेपौ बनतानुबनी कपायकी म्पान्या इस तरह माश्म होती है। (२)'बो पुत्र आदि वस्तुएँ जोक-सहासे या करने योग्य मानी जाती है, उन हु सापक गौर क्सारमा मानकर--प्रश्न होने पर माय हो जानेसे करने व्याप्ती मी, कैसे पदापोको हाम्मे छा उत्पम होती है, और उससे बानिस्प मात्र जैसे पैसा करनेकी ममिलापा दत होती है'-इत्यादि गे उदाहरणसहित लिया, उसे गाँचा पुरुपको शान-दशा स्थिर रामे योग्य है, ऐसे जानी-पुस्पको भी यदि ससार-समागमका ठ नागृतरूपसे ही प्राप्ति करना योग्य है, ऐसा भीतरागने को कहा है, पापपा नही है सप जागृत मासे प्राति करनेमें कुछ शिपिळता रम्ने ता उस ससार-समागमसे मापा हो टो-यह उपदेश इन नचोंशा मारमा परिणमम करना पोय है, इसमें सशय करना ठा प्रसगका सर्वया निसि यदि बशय होता हो, तो प्रसगको म्यून करना योम्प, मो सर्वथा नितिरूप परिणाम छाना ही उचित है यह मुमुमु पुरुषका भूमिका धर्म है। सस सयोगसे उस धर्मका विशेषरूपसे आराषन सभव है। ५२४ बम्बई, भाषाद मदी ३ गुर भीमद् पीतरागाय नमः (१) फेबमानका स्वरूप किस प्रकार घटता है ! (२) इस मरतक्षेत्रमें इस कामें उसका होना समय हो सकता है या नहीं ! (२) केवगाना में किस प्रकारका वारम-स्पिति होती है। (१) सम्पग्दर्शन सम्पमान और फेवणानके सस्पमें किस प्रकारसे भेद ये सा (५) सम्यग्दर्शनयुक पुरुपको वात्मस्थिति कैसी होती है। उपर को हुए सपनोंपर पपाशक्ति विशेष विचार करमा योग्य है। इसके सांभमें फ जो मिथामा सफे सो लिसना । हा पहा उपाधिको कुछ मनता है। ५२५ मई, वापा कमी २ भीमद् वीतरागको नमस्कार सासमागम वौर सभाबके छामको बाहमेवाने मुमुमुलोंको बारम परिमा श्री बादिका प्रसियन न्यून करना पोग्य है, ऐसा प्रीजिन नाति महान् पुरुपोंने कहा है। यबर दोपविचारकर उसे कम करने के लिये प्रातिशीस न हुआ जाप, तबतक सरपके को। फल प्राप्त करना कठिन है। इस बातपर मुमुक्षु चीनको विशेष विचार करना चाहिये । ५२६ बाई बापाप बसी र - - भीमद् परचन्द्र [पा १२० प्रश्नोंपर तु, मेरामई तथा मौईगरको विशेष विचार करना चाहिये । बाप दर्शनमें जिस प्रघरसे समान आदिका माप सामोर नदर्शनमें उस पिपका यो स्वरूप कहा है, उन दोनों में गुठ मुस्स भेट देखने में माता उसका सबको प्रचार होकर समाधाम हो बाप तो बाबामाके करण्यामा कंगभूत है इसलिये इस विषयपर अधिक विचार किया जाए तो बाहै। २ बस्ति' इस पदसे मेकर सब माल वारमाकि रिये होRIR करने पोम्प है। उसमें जो मिर खस्मकी प्रामिका है उसका ही मुस्पक्पा Aचार करना योम्प है।और उस चार के लिये अन्य पापक विचारको मी वपेक्षा पती है उसके लिये उसका मी विचार करमा ठपितो। परम्पर दर्शनोंमें बड़ा मेव देसनेमें माता है। उन समको बना करके बमुक दर्शन सबा है, पर निश्पप सब मुममुमोको होना कठिन ६, क्योंकि उसकी तमना करनेकी क्षयोपशमशवि किसी किसी गावो ही होती है। फिर एक दर्शन सब अशोमै सत्पी और दूसरा दर्शन सब व बसल है या गात यदि विचारसे सिद्ध हो जाय तो दूसरे दर्शनोंक प्रबर्वकको दशा बादि विचारने योग्य है। क्योंकि विसका बैगम्प उपशम सम्मान है, उसने सपा बसपका ही निस्मण क्यों किया होगा! स्पावि विचार करना योग्य है। किन्तु सामानों को पाप होना कठिन है भार या विचार कापकारी मी है—करने पोग्य है परन्तु पर किसी माहात्म्पवानको दो हो सकता है। फिर की यो मोधके एक बार है, उन्हें उस समभमें क्या करना चाहिये, या मी विचार करना उचित है। सब प्रकार सांग समाधान के ए बिना सभ कमन्स मुक्त होना वर्समा , पहचर हमारे पिमें या करता है और सब प्रकार के समाधान एनेमिये परिबनतकास पुस्पार्प करमा पाता हो तो प्राय करके कोई मी गौच मुक्त म हो सके। इससे ऐसा माश्म होता है कि अस्पकामें ही उस सब प्रकारके समाधानका उपाय हो सकता है। इससे मुमुक्षु गोरको कोई निराशाका कारण मी नहीं है। .पणमुदी ५-६ के बार यहसि निच होना बने ऐसा माश्म होता है। सर्वाना होगी ही स्पिति होगी। । । ५२७ पोग नैयायिक, बौर निम + + + . + + + परिणामी परिणामी साभी सान-कार्या पन ५२८, ५२९, ५३.] पिपिप पत्र मादि प्रह-२८वों वर्ष ५२८ १ साल्पदर्शन करता है कि पुदि चाहै। पातमक बौर केदासदर्शन मी ऐसा ही कहते ३। बिनदर्शन कहता है कि पुदि चेतन है। २ वेदान्तदर्शन करता है कि मारमा एक ही है। बिनदर्शन कहता कि भास्मा अनत है। गावि एक है । सास्पदर्शन मी ऐसा ही करता है। पातनम्दर्शन भी ऐसा ही कहता है। २ वेदान्तदर्शन कहता है कि या समस्त मिस पप्याके पुत्र के समान है, मिना र्शन करता है कि यह समस्त विश्व शासत है। १ पातम्म्पर्शन करता है कि नित्य मुक ईश्वर एक ही होना चाहिये । सांसदर्शन इस बातका निषेध करता है। मिनदर्शन भी निषेष करता है। ५२९ बम्बई, वाषाय बी ११ गुरु १९५१ निस विचारपान पुरुषको थिम ससारका स्वरूप निस्पप्रति देशस्वरूप मासमान होता हो, सांसारिक मोगोपमोगमें मिसे नीरस्ता जैसी प्रति होती हो, उस विचारपानको दूसरी तरफ डोक- म्पवधर बादि, म्यापार बादिका उदय यता हो, तो यह उदय-प्रतिबध इन्द्रियके मुसके लिये नहीं, किन्तु वामहितार्थ पूर करनेके म्पेि हो, तो उसे दूर कर सकमेका क्या उपाय करना चाहिये। इस -सबंधमें कुछ करना हो तो काना। ५३० बम्बई, पापा की १: रवि १९५२ मिस प्रकारसे सहन हो बम बाय, उसे करनेके लिये परिणति हा करती है वयषा भत्तम यदि कोई उपाय न घले तो सम्मान कारणको निस्से बाधा म हो भैसी प्रवृत्ति होती है। गत समयके म्पापारिक प्रसगकी बाधिके कारण यदि यो समय भी निविसे किसी तपारूप क्षेत्रमें रहा जाय तो बम, ऐसा विच हा करता पा । तया यहाँ अधिक समय गनेके कारण, जो देहके समके निमित्त कारण है ऐसे माता पिता मादिके पचमके लिये, उनके पिचकी प्रियताके मधोमके लिये, तथा फुसफुल दूसरोंके चित्तको नुप्रेमाके लिये भी पोरे दिन वास्ते माणीमा मानेका Aचार उत्पम एमा या । उन दोनों माताकि रिये कमी सयाग मिछ तो वम, ऐसा रिपार करनेसे कुछ यपायोम्य समाधान न होता था। उसके किये बिचारको सान उब्त विशेषतासे हारमें गे कुछ दिपारको मस स्परता हो, उसे तुम्हें बताया था । सब प्रकारके भाग-सक्षके विचारको, यहाँसे प्रसग समस्कर, र रम्फर नाम्पाकी भाप अमगताका हासमें कुछ विचार रमसा मी सास ससमा बसे उदयानुसार ही मारे । भाषण कौ ११ से माफ सुदी १० के मामग तक किसी मिति क्षेत्रमें सपना दो से यपाशति उदयको उपशम अंसा रसकार प्रापि करना चादिप पपपि विशेष निपिनो उदयका सस्म देखनेसे प्राप्त होना कठिन जान पाती है।
भीमद् पाचन [३५११ ५२ रिमा मी प्रसग प्रति करते हुए व्या सिसरो हुए जो प्राप- निप्रिय परिणति गती है, सम परिणतिक कारम हास विचारका बराबर कहना नहीं बनता । सानामतरूपसे पपायोम्प बई वापत नदी १५सोम १०५१ नमा वीतरागाय (१) म प्रतिघस मुक्त हुए बिमा सर्व इससे मुक होना सभत्र नहीं । (२) बमम बिसे मति भुत भार भवधि प तीन शान थे, और वास्माफ्पोगा यग्यदय पी, तथा मसघाउमें भोग-कर्मच क्षीण करके संपमा मरण करते हुए मन पर्यशान प्रस किया था एने भीमर मदारिम्मामी भी पारदर्ग भार साल छह महीमेतक मान रहकर चरते थे। इस प्रकारका उनय जापरण उरा उपमा-मार्गका प्रचार करनमें किसी भी गौरको अल्पतरूपसे विचार करके प्रहास परमा पाप है, ऐसी अगर शिक्षाका उप"रा करता है । तथा निगमगपाम् जैसेने पिस प्रति- पंधफी Aति ठिप प्रयत्न स्पिा उस प्रतिबध भमागृत यने योग्य कोई भी मार नही होता या बतायाभार अनत मामाच उस आपरमस प्रा फिपार-उस नमक प्रतिनिधारमेय सिर परना रहती :-स रपना पाय है। निम प्रसारका पूर्व प्रारम्भ भगनपर निहत्त होने पाम्प , उस प्रारक प्रारम्पका उसनवास रम करना उगपत: बिसम उस प्रचार पनि प्राप्ति करते हुए जो कोई बरसर मस होता, उग उम अपगरपर गगृत उपयाग न होता जीवका समारिकी रापमा हराते हुए देर न हो । म fगा मगभार मापा परिणमा पर जिसने मोग रिना मुटकारा न दो सम, मेरी मांगों प्रतिनिदान ना पापता भी उस प्रपरका परत हुए निमम समाश असगता उत्पमा मगरागान करमा उचित " ममपग मार पानि उग्ण-पानि ' म भेट्स प्रालि रहारती । मुमपाल गहती ८ ।सपास उग पाता मारम्पायर उपमहा सिमम पाय परिणाम मी HIT गरी उरण पति पद पासि पर पदार्थ भार गरम पानी म दीपाधि नमे आमा म दास्यामि गमारि-गोग) गगन भीमा पमा गुना पानार मम पा र दारमें मनपान पर काम कि ममगमम आन आ1ि पुछ भी प्रश्नातर न MEHATANशिन-मानेभाम पारनेरी पयापरा आमा राम करो in-HIT रिना मानानाना पापमा बानपर भी पर जार गण ५३२ एर भाग१५१५१ IMATraula 17 PERITY F F-17 मार भाग में प्रसन' पर ५५ ५१४, ५३५] पिरिप पत्र मादि संग्रह-२८यों ४११ समपतक हानीकी वादापर पैर रखकर प्रति रोना समत्र मही। किन्तु जहाँ मोग मादिमें सीब तन्मयतास प्राति से नहीं बानीको माहाकी कोई अकुशवा समझ नहीनिमपतासे मोग प्रति हो समपित है। जो भविनाशी परिणाम कहा है, वैसा परिणाम रहा है, वहॉ मी मनतानुबपी समय है। तथा ' मैं समझता, मुझे बापा नही है' जीव इसी तरहकी बेहोशीम रहे, तया भोगसे निति समय है' और फिर भी कुछ मी पुरुषार्थ करे तो उस निरिका होना समय होनेपर भी, मिप्या शानसे धान-या मानकर यह मोग बादिमें प्रति करे तो बहो मी अनतानुषधी सभष। मागृत अबस्थामें जैसे जैसे उपयोगको गुरता होती है पैसे से समदशाका परिक्षय होना सभव है। - ५३३ बाणीजा भाषण सुदी १०,११५१ सोमबारको पनि संगमग ग्यारह ममेके बाद मेरे शरा जो कुछ बचन-पोग प्रकाशित हुभा या, बर पनि स्मरणमें पाहो, तो बह पपाशाकि जिला जा सके तो निस्सना । यो पर्याप है, पर उस पापका विशेष सत्य है, इसलिये मन पर्यपानको भी पर्यायाधिक धान मानकर उसे विशेष ज्ञानोपपोगमें गिमा है । उसके सामान्य प्राणरूप रिपयके भासित न होनेसे उसे दर्शनोपयोग नहीं गिना, ऐसा सोमबारको पहरके समय कहा था। तदनुसार चैनदशनका अभिप्राय मी आज देखा है। परमात अधिक स्पर सिमनेसे समधमें वा सकने जैसी है, क्योंकि उसको बहुवसे ररत मारिसे करना योग्य रितु माही वा वैसा एना असमय है। मन-पाक संरचमें गो प्रमग विचार उस प्रसगको पपा फरनेस मानस मही दिया। ५३४ बागाय, भाषण सुदी १२ शुभ १९५१ पहजो निमिठवासी है पद एक सामान्य वपन है । म सग-प्रसासे होती चारही परिणतिक पिपमें ममते प्राय सिदातरूप मास हो सकता है। 1 ५३५ बबाणीमा प्राइम मुली १५ सोम १९५१ वामा लिप विचार-माग और मजि-मार्गकी भागपना करना योग्य है, फिर चार मार्गक पोम्प रिसको समर्प नहीं, उसे उस मार्गच उप पा करमा उपित मही पारा हिसार पा पोय है, तो भी उस रियो बाध्में कुछ मी छिपना विच मही वा सरता। श्री ने फेवमुनि बसमें कोई गोदका रिपी, उसे पड़ी है। इमो अनेक भदोंक समानेके पचात् उस मकारकी एका निारोती है अपरा यह प्रम प्राप फरके समझने पोप दोना।देसी राघव दाउमें कम करक अपना मन करक शेिष निकर प्रेम आमापकर ही विचार करमा पोप है।
V१२ भीमपात [पर ५५५, १. बवाणीला मारण पदावरि १.५१ पहाँ फ्यूपण पूर्ण होनेवक ग्रना संभन शान वादिका क्या इस कामें होना समर है। इस्पादि मन परिसे मि पे उन प्रश्नोपर पधाराफि वनुप्रेक्षा सपा भी "बाल साप परम पदनोचर करमा चाहिये। 'गुणके समापसे मिम गुणाका स्वरूप होना समय है अपना मही!' तुम लोगोंसे हो सो ठो इस प्रश्नक कार विचार करमा | मोको तो बम विचार करना पाप है। ५३७ पाणीमा प्रावणी १९भुन १९५१ पासि प्रसग पाकर लिएर नो पर प्रश्नोंका उचर शिक्षा सो दोचा है। पहिले दो प्रश्नोंक उत्तर सक्षम है, फिर मी यपायोग्य है। तीसरे प्रश्नका उत्तर सामान्यत करे, फिर भी उस प्रथका उत्तर दिशेप सूक्ष्म विचारसे किसने योग्य है। या दसरा प्रश्न इस प्रकार 'गुणो समुदापसे मिम गुमोच्च सम्म हाना समय है वपना नहीं। अपात् 'पा समस्त गुणोंका समुप ही गुणी मर्यात् दम्म है। बक्या उस गुणके समुपके नापारभूत ऐसे में किसीमा ब्रम्पका अस्तित मौन्द है।' इसके उत्तरमें ऐसा सिमा कि वामा गुणी ह उसके गुप बाम दर्शन गरा भिम बस प्रकार गुणी बौर गुण मिया कोपरन्तु को विशेष विषमा करमी योम्प है। यहाँ प्रश्न होता कि फिर हान दर्शन पार गुमसे मिल पायंका वारमात ही क्या रा गाता है। सक्रिय स प्रश्नका पपाशवि विचार करना योग्य है। चोया प्रम हो कि इस काठमें मान होना समय या मही वका उत्तर इस तरा मिसाप्रमाणसे देसनेसे तो पा समन।पा उत्तर भी संझिस है। इसपर पात विचार करना चाहिये। इस पीपे पलके विशेष विचार करने के ये उसमें इतना विशेष वौर सम्मिब्ति करना जिस प्रमापसे चैन वागममें कैनव्यान माना विमा का पारेकमानका सहप पापातप्प होकार- क्पा ऐसा माम होता है या किसी दूसरी पण ! और यदि सा हो मानका सरूप हो ऐसा मागम होता हो तो पसरूप इस काम मी प्रगट ना समय है बपा महीना यो म बागम प्रता। उसके कमेका क्या कोई जुदा हो कारण बोर मा केक्मानका स्वरूप किस इस प्रकारसे होना और सनमा साना संभव है। इस बातपर पपाशतिनुप्रेक्षण करना उचित है। इसी तर मो म प्रमोद मी स्नेक प्रकारसे विचार करने पोम्प पि मनपा पूरन दोनों प्रमोन उपर मिना बने तो सना । प्रथम प्रश्नोंक उपर सोपमें मिले १ में पिपता से मिलना बन सके ता उमें भी मिना । तुमने पाँच प्रभो। उनमें तान प्रनोंका उपर महा संधेपसे मिला। प्रपम प्रमातिम्मरण शनाय मनुप्प पहिले माने किस तय मानवा। उत्तर:--लिप्त ठप परफनमें ई गौन बस्तु मा देशी 0 गौर को होनेपर किसी प्रसंगफर किस समय उन गो गाविसमामा स्मरण रोगा। उस समय उन गार बारिका मापार्ये पत्र ५३.] चिविप पर मादि संपा-२बाप मान होता है, उसी तय गाविस्मरण हानबारेको मी पूर्णमक्का मान होता है। कदाचित् यहाँ यह प्रश्न होगाक' पूर्वमधमें बनुभव किये हुए देह वादिफा जैसा ऊपर कहा है जैसा मान होमा समय t-इस बातको यदि पापातम्प मानें तो मी पूर्वमत्रमें वनुभूत देह वादि अथवा कोई देवलोक भादि निवास स्थान गो बनुभव किये हों, उस बनुमक्को स्मृति ई, बोर पर मनुमन पायातम्य मा है, पह किस वापारमे समझना चाहिये !" इस प्रश्नका समाधान इस तय-अमुक अमुक पेय, गि तथा परिणाम मादिसे अपने बापको उसका स्पष्ट मान होता है, किन्तु दूसरे किसी गौवको उसको प्रतीति होनेके सिये तो कोई नियम नही है। कचित् अमुक देश अमुक गाँवमें अमुक घरमें पूर्वमें दे पारण किया हो, वीर उसके पिश सरे जीवको बतानेसे, उस देश वादिको सपना उसके निशान बारिकी कुछ भी विपमानता हो, तो दूसरे चौबको मी प्रतीतिका कारण होना संभव है, अपवा जातिस्मरम शानबाकी बोधा निसका बान विशेप, उसका उसे जानना समय है। तया निसे नातिस्मरण हान है, उसकी प्राति आदिको माननेवाला ऐसा कोई विचारवान पुरुष भी गान सकता है कि इस पुरुषको किसी पैसे शामका होना समय है, या मातिस्मरण होना समव । अपना बिसे गाविस्मरण बान है, कोई बीच उस पुरुपके पूर्वममें समय में बाया हो-विशेषरूपसे माया हो, उसे ठस सबके बतानेसे यदि कुछ मी स्मृति हो तो भी दूसरे चीनको प्रताति मामा समय है। दूसरा प्रश्न और प्रतिसमय मरता रहता है, यह किस तय समन्चना चाहिये। उत्तर -निस प्रकार मात्माको रघूज देशका वियोग होता है-मिसे मरण का माता - उसी तय स्यूल दोको मापु वादि सूक्ष्म पर्यायका मी प्रतिसमप हानि-परिणाम होनेसे योग हो याह, उससे वह प्रतिसमय मरण कहा जाता है। यह मरण म्यवहारनपसे कहा जाता है। निषफ्नयसे । आमाके सामाविक हान दर्शन मादि गुण-पर्यायी, विमान परिणामके कारण, हानि एला करती है और पानि मारमाके निस्पता मार सत्सको मी पको पती-पर प्रतिसमय मरण करा माता। तीसरा प्रश्न -कासाननमें भूत और मरिष्यकालके पदार्य वर्तमानकात में बतमानम्पस ही रिसाई देते, वफ्पा किसी मरी वए। उत्तर -जिस तरह बर्तमानमें वर्तमान पदाच साई देते हैं, उसी तरह भूतकाळके पार्ष भूतकासमें बिस सतपसे थे उसी पल्पसे वर्तमानकाळमें दिमाई देते हैं, और ये पार्य भविष्यकालमें निम सबसे होंगे उसी स्वरूपसे वर्तमानकाजमें दिएर देते हैं। भूतकाठमें गो गो पर्याय पाने पता ने कारणम्पसे वर्तमान पाप मार है, और भविष्यकाठमें गे गो पपाप ऐंगी, उनको पोम्पता वर्तमान पामें मौन्द है। उस घरणका और योम्पवाका शान वर्तमानकाउमें मी रानाको पपा सरपसे हो सकता है। यपपि इस प्रस्नके रिपपमें से विचार बताना योग्य है।
भीम पत्र ५३८ वाणांबा मारण वदी १२ शनि १९५१ गत शनिबारको सिसा वा पर मिला है। उस पत्रमें मुस्पतया वान प्रन लिसे है। उनका उत्तर निमरूपसे है- पहा प्रश्न-एक मनुष्य प्राणी दिनके समप भारमाके गुणोंशय अमुक मर्यादातक देख सकता है और रात्रिके समप बंधेरेमें कम मी नहीं देख सकता । फिर दूसरे दिन इसी तय देपता है, मार रानिमें कुछ भी नहीं देखता। इस कारण इस प्य एक दिन रातमें, गनिधिमरूपसे प्रबर्तमान आमाले गुप्मके उपर, अभ्यासापके बारे बिना है, क्या नहीं देसनेका वापरम मा गाता ऐगा ! अपना देखना या वास्माका गुण होनी, और सूरबसे हो सब मुरा दिखाई देता है, इसलिये बना मूरजका गुण होने के कारण उसको अनुपस्पितिमें पुल मी साई नहीं देता। और फिर इसी तय सुननेके रातमें कानको यपास्पान न रसनेसे मी सुनाई मी देता, तो फिर बाहमाका गुप से मुठा दिया जाता। उत्तर. पानावरणीय सपा दर्शनावरणीय कर्मका मुफ पोपाम होनेसे इन्द्रियाम्पि उत्पन होती है। इन्द्रियापि सामान्यरूपसे पाच प्रकारको होगा सकती है। पर्यन इन्द्रियसे माप इनियता सामान्यरूपसे मनुप्यो पाँच इन्द्रियोकी समिका अयोपसम हावा, उस पयोपशमकी शक्तिको गाँतक नमुक म्पापका रोमांतक मनुप्प बात देस समय है। देखना पह पट इन्द्रियका गुण परन्त वारसे मपया यस्तुके अमुक दूरीपर होनेसे उसे पदार्थ देसनेमें नही जा सकता पति च पत्रिपच स्पापसम मम्मि उस स्वतक गाकर म गाती है। वर्षात् सामान्यस्मसे बयोपधमकी पना ही शचि। दिनमें मी पनि विशेष वकार हो अपना कोई वस्तु मात अपकारमें रसाणे भपमा नमुक सीमासे दूर तो पप से दिखाई नहीं दे सकता । तपा स्पनियोंकी मी काम सर्वपी पोपशम जिया ही उमके लिपप हम-दर्शनको प्रति है। बमुक म्पापात होने ने स्पर्श कर सकती है संप सकती है, स्वा परिचान सकती है पा सुन सकती है। इम्प प्रयमात्माले मसम्स प्रदेशक समस्त शमी म्पापक होनेपर मा, गाँसके बापरे भागको पुतमासे ही देखा जा सकता है। इसी तय समस्त शरीर अस्पात प्रदेशोंकि मापक योनेपर मी एक होटेसे कानसे हो मना ना सकता है। समुपस्पामसे हो गये परचा रोती है बमुक मगहसे हो रसको पाया होती है। सवारणके लिये मिनी स्वादापोर नही मानते गाम ही बानवी है। मामाले समस्त शायरम समानरूप म्यापक होनेपर मौ नमुफ मागसे होवान होता है, इसका क्या कारण होगा। उत्तर-जीतवान दर्शन पदि पापिक मापसे प्रगर हुए होंगो सर्व प्रदेम्स उसे पा- प्रकारका निवरणपना होनेसे एक सम्पमें सर्व प्रकारसे सर्व मापका शापमान होना समनपरम् याँ बयोपशम मापसे बात दर्शन या मित्र भित्र प्रकरसे बमुक मर्पगमें बापमान होता। मिस गोत्रको मर्मत पान-दर्शन उपोपशम पालि गती । उस गोरचे अपर पनेत माग गितना प्रापकभात हताहै। उससे विशेष क्षयोपशमसे स्पर्शन त्रिपको मिल विविप पर मादिसपा-२वौं पर्प कुछ कुछ विशेप म्पक ( प्रगट ) होती है, उससे विशेष क्षयोपशमसे स्पर्शन नौर रसना इन्द्रियकी सम्मि उत्पन्न होती है, इस प्रकार विशेषतासे उपरोवर स्पर्श, रस, गर, बण मीर शब्दको प्राण करने योग्य पधेन्द्रियसबधी झयोपशम होता है। सिर मी झयोपशम दशामें गुणफी सम-विषमता होनेसे, ससंगसे या पन्द्रियसबधी बाल-दर्शन महीं होता, क्योंकि शक्तिका बसा तारतम्य (सत्त) मही है कि या पौषों लिपप सागसे ग्रहण करे । यपपि धाधि मादि बानमें बैसा होता , परन्तु यहाँ तो सामाम्प अयोपशम चौर यह मी इग्निप-सापेक्ष छपोपशमकी बात है। अमुक नियत प्रदेशमें ही उस इन्द्रियम्भिका परिणाम होता है, उसका हेतु अयोपशम तपा प्राप्तभूत योनिका सपथ है, जिससे निपत प्रदेशमें (अमुक मर्या-मागमें ) जीवको ममुक अमुक विषयमा ही ग्रहण होमा समय है। दोसरा प्रश्न -जब शरीरके बमुक मागमें पीड़ा होती है तो जीव वही सषम हो जाता है, इससे मिस मागमें पीना है, उस भागको पीडा सहन करमेके कारण क्या समस्त प्रवेश नही सिंघ माते होंगे। जगत्में भी कहावत है कि यहाँ पीला हो जीव ही संख्म रहता है। उत्तर -उस पेदनाके सहन करनेमें गतसे प्रसोंपर विशेप उपयोग स्फतार, और दूसरे प्रदेशोंका उस बोर बहुतसे प्रसगोपर सामाविक वाकर्षण मी रोता है। किसी पसरपर थे नाका बारम्प हो तो समस्त प्रदेश मूर्णागत स्पितिको प्रम्स करते है और किसी अपसरपर वेदना वपमा भयकी बाबतासे सर्व प्रदेश पर्याद जारमाके दशम शार आदिको एक स्थानमें स्पति होती है। पर होनेका तु मी यही ह कि कापाकाप मामक जी-समारके तयाप्रकारसे परिणामी महामेके कारम, गायतरायके प्रयोपशमकी बसी सम-विषमता होती है। इस प्रकारफे प्रश्न तसे मुमुभु जीवोंको विचारको शुदिके लिये करने चाहिये, भार बस प्रयोका समाधान बतानेकी पित्तमें चित् सहन इडा मी गती है परम्नु सिमानेमें विशेष उपयोगका एक सकना बहुत मुस्किम्से होता है। - ५३९ पायांबा, प्रारण प ११ सोम १९५१ प्रथम प में ऐमा कहा कि मुममु ! एक भारमाको जानते हुए समस्त ठोकाठोकको गानेगा, मौर सब कुछ गाननेका पठ मी एक माम-प्रसि हो। इसलिय भास्मासे मिम ऐसे दूसरे मानक जाननेको बारंबारको इपासे निहत हो और एक निजम्पम्पमें रि दे, पिस रिस समस्त मरि देपरपसे तुझे अपनेमें रशिगोपर होगी । तत्सम्बरप साम्पमें करे ए मर्गका मी पर तत, पमा तत्त्वानियोंन कहा है, किन्तु उपयोगपूर्ण ठसे पिछमें उतारना कठिन है। यह मार्ग ६, भर उसका सम्प मी पुरा मात्र 'कपन-नानी जैसा प्रतेरे बदमा नही, इमलिये जगह जगह गार स्पा छतापोकि उस भभात अप अगह जगहमे प्रास नहीं हो सकता। मरे पका संतिम वर्ष-रे मुमभु ! पम, नियम बारिमो साधन श्योंमें कहा है। उपरोक अपसे निपस दरेंगे याबात मी नहीं है। स्पोंकि वे मी मिमा कारण पिपे दीर है। परण इस प्रथा है-विसमे भामपान र सके ऐमी पात्रता प्राप होनक लिपे, और निममें - भीमद् राजवन्द्र [पा ५४ ५४१ ५४३ ५४ उसमें स्थिति हो पैसा पोम्पता मोके किसे न कारणोंका उपदेश किया है। इस कारण परवानाने इस ऐसे सामन को परम्त पारका समासमें एक साथ फेर दो बानेसे प उन साधनों ही माकया, वपना उसने उन साधनोंको मा अमिनिवेश परिणामसे रण किया। जिस प्रकार बासको गठीसे कर दिखाया जाता है, उसी तय तामधानियोंने इस तलका सार है।' ५४० मागीया, बाबण बदा १५ सोम १९५१ 'कल्पनेच वफेवा पुवालस्पामे निम-विकार विशेष उत्पन होता है, इसका क्या कारम ऐना चाहिये। ऐसा यो रिया है उसके म्ये संक्षेपमें इस तपपिचारमा योग्य है। उत्तर ----पोपो क्रमसे समस्या पती जाती है त्यों में इन्द्रिय- मी मावा । तपा उस यसको निकारके परमभूत निमित मिलते है, और पूर्व भवमें बसे निकारके संस्कार गते पाये। इस कारण प निमित्त वादि पोगको पाकर विशेष परिणाममुक्त होता है। जिस वरा बाय वपाल्म कारण पाकर प्रसार परिणमता है, उसी तग पूर्वके मागम्त संस्कारों का कमसे विशेषाकार परिणमन पोताहै। ५४१ बमाणावा म सुती ९गुरु १०५१ निमितपूर्णफ रिसे तो निमिपूर्वक निसे शोक होता, मिपूर्वक मिसे इन्त्रिप- मम्प निवपके प्रति बाकर्यप होता है निमित्तपूर्वक बिसे नियके प्रति विषयोंमें देष होत्यारे निमितपूर्वक मिसे उक वाता है लिमिचर्पक ही मिसे कमाय उत्पम होती है, ऐसे मागको यथा- शक्ति उन सब निमितवासी नोमोज संग स्पाग करना योग्य है और निस्यप्रति सरसंग करमा उति के न मिससे उस प्रकारके निमिचसे दूर गमा पोम्प है। प्रतिषण प्रत्येक प्रसंगपर और प्रत्येक निमित्त आफ्नो निराशाके प्रति उपयोग रहना योग्य है। भाबता सर्वमानपूर्वक मा मंगता ।। मनुमनप्रकाश प्रपर्मेसे बापनाराले पति समुम्बेवका कहा हमा बो उपदेश-प्रसग मिला प वास्तनिकरे। वाहप नपि वीर वा निसस्मो ममिन हानले सिवाय स राम दर करनेका मम्य कई उपाय बता-पुम्पनि ना जाना । ५४३ गणपुर (परमतोमा) भछ बदा१५ भौम १९५१ तिम पत्रमें मन सिसे पेमपत्र मा गुग गया माम ऐता है। प्रक्षेपमें निम शिक्षित उत्तर विचार करना । (१) बम्ब इम्प समा-परिणामी होस निपिप को गये है। परमासे ये बम्प भी विदिप पत्र मादि संप्रह-२तवर्ष सहिप है। पहार नपसे परमा, पुष्ट और सजाय पात्र सक्रिय है, क्योकि रे भन्द स्पा सादिसे एक परिमाणको वराह संबद्ध होते हैं। नष्ट होना-शिबस होना-पर पाप पराका पर्म कहा.. ..परमाठि गावादिका पल्मा और स्रुषका पिसवाना ५४४ यापुर, मासोब सदी २ शुक्र कुछ मी बने तो नहीं मान्धर्यकी चर्चा होती हो यहाँ राना माना और प्राग सम्मान करना योग्य है। चार वो जैनदर्शनके तिम्प दूसरे दर्शनको पाम्या होती हो तो विरारक टिपे मना करमा योम्प है। ५४५ मौसमात कारोज सुदी सत्यसरपी उपदयका सार पतको पयार्प स्वरूपसे जैसे सामना-अनुमब करना उसे उसी तय करना है। यह सत्य दो प्रघरका एक परमार्प सप्प और दूसरा म्पहार सय । परमार्य सम्प अर्थात् बानाके मिाप सरा कोई पार्थ वानाका मही हो सक निपप सनसकर मारा बोलनमें स्पाहारसे देह, ही, पुत्र मित्र, पम, पम्प, गृह वादि सबमें मोटनेके पहिले एक आमाका छोरर मा पुन मी मेरा नही पह उपर पाहिये । जम्प आमाफ सब बाट समप उस मानाने गाति टिंग और उस प्रकारक मेर म ऐनपर मी केरठ म्पहारनपसे प्रयोजनके लिये ही उसे सोधित किया जाता है- उपयागपूछ बोला गाय तो वा पारमार्षिक मारा है ऐसा समाना चाहिये। पैसे कोई मनुप मपनी मारोपित दोको परकी मौकी पुत्री अपना मन्य पदा समय बात करता रो, उस समय स्पररूपसे उन सब पापोंसे बोऽनेपाल में मिम मेरे मही इस प्रकार योजनेबारेको समापसे भान हो तो ए सप कहा : विस प्रघर कोई प्रेपकार मणिक राणा और पेटमा रनार न करता हो, तो मामा मे, और केवट भेगिकके मार्ग बरेशास ही उनका तपाजी, पुत्र पन, राज्य सरप था, इस पातके उपमें रसनेके पधात् बोसनेको प्रहचि करे—यही परमार्प सय सपके मापे रिना परमार्प सप्प पवन बोटमा नही हो सकता। मटिये पहर सपोनि - जानना चाहिये- पपहर सप–विस प्रकारसे पशुध सरूप देसनवे, अनुभवमानस, मान कर सचनस में अनुममें बापा , उसी प्रकारस पावप्पास पस्तुघ सरूप घने प्रसगपर पवन मोठन माम म्पहार सय है। जैसे किसीने किसी म्नुपछ सास यो मिक बाप बरे देशा हो, और हिसार स्नेपर उसी तर पाचनप्प बबन पोत - ४१८ मीम रासवान [पा १ म्यभार सम्य है। इसमें मौ यदि किसी प्राणीके प्राणों का नाश होता हो, और तन्मस्तासे पचन बोम गया हो-पपपि या पचन सत्य हो भी का वरपके ही समान है, ऐसा मानकर प्राधि करना पाहिये । जो सस्पसे विपरीत हो उसे वसस्प ना पाता है। कोष मान, माया, सोम, हास्प, रवि बरति शोक, भय पेसा ये बड़ाम बादिसे होगो बाते है। वास्तवमै कोष वादि मोहनीय हो गई। उसको स्पिति एमे समस्त कर्मास वधिक बार सदर कोकाकोल सागरकी है। इस कर्मके य हए बिना बातावरण पादि कर्म सम्पूर्णरूपसे क्षय मही हो सकते । यपि सिद्धान्तमें परिबानारण मारि कर्माको गिनाया है, परन्तु इस कर्मको माया अधिक है, क्योंकि ससारके म्हमूत राग-देपका यह मूस्यान है इसलिये ससारमें भ्रमण करनेम इसी कर्मकी मुन्यता है । इस प्रकार मोहनीय कर्मको प्रस्ता है फिर भी उसका जप करना सरप। अर्यात् जैसे भामाप कर्म भोगे मिना निफर नहीं होता सो बात इस कर्मक विषयमें नहीं है। मोहनीय कर्म प्रतिद्वप क्रोध, मान, माया और प्रेम बानि कपाय तया नोकपापका अनुभमसे समा, ममता, निमिमानता, सरम्ता अदमता, और सतोष बादिको विपक्ष मानमानोंसे, बर्षात् के विचार करनेमात्रसे उपर बसईईकवाय निफर की पा सकती है। नोकशाप भी विचार करमेसे क्षय की जा सकती है, मात् उसके म्येि बाप कुछ नही करना पाता । 'मुनि' या नाम मी इस पूर्पोळ विसे विचार कर पबन मोनेसे ही सप है। प्राप करके प्रपोजनके बिमा मही बोसनेका नाम ही मुनिफ्ना है। रग रेप और बहानके बिना पपास्थित बस्तुका स्वस्म करते आए पा बोलते हुए मी मुनिपना-मानमान-समझना चाहिये । पूर्व तीर्थकर वादि महामार्गांने इसी क्य विचार कर मौन धारण किया था, बार बामग सारे वाय पर्प मौन धारण करनेवाले भगवाम् पार प्रभुने इसी प्रकार के उत्तर विचारपूर्वक वारमार्मेस फिरा निराकर मोहनीय कर्मक संबधको निका बाहर करके केरमानदर्शन मगट किपा पा । जारमा चार करे तो सप मोना कुछ कटिन नी । म्पार सप-मापा बनेकपार बोम्नेमें माती है कि परम्पथ सम्प बोलने नही बाया इसलिये इस भीषको संसारका भ्रमण मिता महो। सम्पन्न दोनो बाद बम्पारसे परमार्प सप बोग का सम्मान और बादमें मोप बम्पासपूर्वक सामायिक उपयोग या करता है। असत्पके बोळे बिना मापा मही सकती। विकासपात करमेका मी असापमें ही समावेश होता है। टेरस्ताव भिमानेको भी असाप मानमा पाहिये । तम्मान मान बादिको माइनासे बाम-पिता करने जैसा डग माना उसे भी बसप समाना चाहिये। कमर सुम्पदान प्राप्त होनो सम्पूर्णरूपले परमार्थ सप परम गाया जा सकता बर्षात् ता हो आमासे माप पापस भिमनप उपयोग होनेसे बचन पति हो सना रापदि कोई पंगे कि म त क्यों छा गया है, तो उसका भरण पानमें रखकर पदिक बोडे ताप सस्पद समय जाप | पर स्प मी दो माग हो सकते हैं-एकपा म्पहार सब गौर सा देश पर रासप । निथप सत्पर उपयोग एपर प्रिय मर्यात मो पचम पो अपना मिसके मेवासे पत्र ५४१ ५४०] विविध पत्र मादि संग्रह-२बावर्ष बोल गया हो उसे प्रीतिकर हो, पप्य और गुणकारी हो, इसी तयके सत्य वचन बोलनेवासा प्राय सर्प विरति त्यागी हो सकता है। संसRके उपर मात्र न रसनेवादा होनेपर भी पूर्वकर्मसे अयना किसी इस कारणसे ससारमें गनेबारे गृहस्थको एक देशसे सत्प बचन पोछनेका नियम रसना योम्प है। वह मुख्यरूपसे इस सर—मनुप्पसममी (न्यासबधी), पशुसपी (गायसवमी), भूमिसवनी ( पृप्पीसमधी), मूठी गवाही, और नीको वर्षात् मरोसे-विलाससे-रसने योग्य दिये हुए दम्य वादि पदार्थको पापिस मंगा सेना, उसके बारेमें इन्कार कर देना-ये पाप स्पूठ भेद है। इन पचनों के मोससे समय परमार्थ सत्यके उपर ध्यान रखकर यथास्पित वर्षात् जिस प्रकारसे वस्तुओं का स्वरम यथार्थ हो उसी तय कानेका, एकदेश प्रत धारण करनेबाछेको जात्य नियम करना योग्य है । इस को हुए सस्यो लिपपमें उपदेशको निधार कर उस क्रममें जाना ही लाभदायक है। ५४६ एवमूत पिसे अनुसूत्र स्थिति कर । अगुसूत्र पिसे एवमूत स्थिति कर । नैगम ररिसे एबभूत प्राप्ति कर । एपम्त गठिसे नैगम विमुख कर । संपाइ रशिसे एषभूत हो । एषभूत घरिस समय विमुद कर । म्यमार रशिसे एवम्तके प्रति ना । एषभूत परिसे म्यवहारको निपत्ति कर । शम्द परिसे एवमतके प्रति वा । एवमत रष्ठिसे शब्द निर्षिकम्प कर । सममिरुन पिस एपमूत वागेकन कर । एवमत रिसे सममिस स्थिति का । एषभूत ररिसे एवमूत हो । एषमूत स्थितिसे एवंमून टिको शमन कर । पति पति शति । ५४७ में बस शुद्ध चतन्यस्वरूप साप निब अनुमक्स्सस्प हूँ। मात्र म्पसार परिसे इस बचनका बच्छ । परमार्थसे तो केक्स मैं उस पचनस म्पजित मूठ बर्यरूप है। तुम्हारे से जगत् मिम । वमिमह मिमामिम ।। मिन, ममिम मिमामिम यह अवकाश-सम्पस महीं।। म्पबहार पिसे ही उसका निस्मण करते है। —अगत् मरमें मासमान होनेस अमिम परन्तु भगत् जगत्मरूप है । मैं निजस्सलप इस घरण जगत् मेरेसे सर्वथा मिम । उन दोनों घरियोंसे जगत् मास मिमामिल है। गुद निर्षिकम्पबतम्य . भीम पवन पर ५४८ ५४९, १५ ,५५१, ५५१ ५४८ गई, वसोब सुदी १२ सोम १९५१ देम्पत यूसी टळे दो सर्प दुम्सनो क्षप वाप- ऐसा स्पए अनुभव होता है, ऐसा होनेपर मी उसी 'साफ दिखाई देनमाली भूम के प्रवाहमें ही और यहा चला जा रहा है। ऐस जीवोंको इस जगत्में क्या कोई ऐसा भाषर किमिस नापारसे- आयसे-वा प्रवाहमें म बो। ५४९ बर्थ, वासोब पुरी १२ १९५१ बदाकर्शन करता है कि वाल्मा असग है। निनदर्शन मी करता परमार्पनपसे वामा असग ही है। इस संगताका सिए होना-परिणत दोना-पा मोश। प्राय करके उस प्रकारको साधात् मसगता सिद्ध होनी क्समम । और इसलिये पानी-पुरमोंने मिसे सब इस सब करमेको इम है ऐसे मुमुखको ससंगकी निस्म । उपासना करनी चाहिये ऐसा जो कहा वह अस्पत सत्य है। बर्मा मासोन मुदी ११ मौम १९५१ समस्त विष प्राप करके पर-कपा और पर-इति या पण गाया है, उसमें राकर स्थिरता कसे प्राप्त हो । पसे वम्य मनुम्पमको एक समय मी पर-पिसे गाने देना पोप महा, और कुछ भी पैसामा करता है, उसका उपाप कुछ विशेषरफ्ते पोजना चाहिये । शामा-पुरुपका निथप होकर भवर न ये तो बाम-प्राप्ति सपा मुग्म इस प्रकार बानी पुकार पुकार कर ए गये फिर मा म माम्म डोग क्यों भूखते है। बर्मा बासोब सुदी १३, १९५१ जो कुछ करने पोम्प कहा हो या विस्मरण न हो माप, इतना उपयोग करके अमपूर मी उसमें बस परिमति करमा पोम्प है। मुमुक्षु गामें स्याग पैरमप, उपशम और मकिके सहा बमानस पि बिना भाम-शा कैसे मारे! किन्तु मायिकतासे प्रमासे यह बात विसत हो जाती है। ५५२ कई मामात्र बदी र १९५१ बनादिसे पिम्न बम्पात पाना हाहै उससे पैरम्प उपशम मादि मानोंकी परिणति कम नदी ऐसी अपना दोनी कठिन परतीमर मी निरन्तर उन मायके प्रति य रस मेस सिरि समय है। परि सममगमन पाग न तो मार रिस प्रशमसे रिंगत हों उस प्रसारक सम्म र मादिको सामना करमी सदशानन परिचप परला योग्य है। सब कार्षको ५५१, ५५४ ५५५, ५५५] विविध पत्र मादि संप्रह-रखावर्ष प्रपम भूमिका को कठिन होती है, तो फिर बनतकासे नम्पस्त ऐसी मुमुक्षुताके म्येि वैसा हो तो इसमें कोई मापर्प नही । सागामस्वरूपसे प्रणाम । ५५३ मोहमयौ, बासोम बदी १२, १९५१ 'समग्या वे समाई रमा' तपा 'समम्पा त समाई गया'-इन मायोका म्पा कुछ भिम अर्थ होता है। तथा दोनोंमें कौनसा बास्य विशेषार्यका बापक माश्म दाता है, तया समझने योग्य क्या है ! बार शान्त किसे फरना पाहिप' तथा समुपय वामपका एक परमार्थ पाहै। या रिचार करने योम्प है-विशेषरूपसे पार करने योग्य है। आर जो चारमें बाये तथा विचार करनेस उन पाम्पों का विशेष परमार्य में माया हो तो उसे मिसना बने तो मिसना । ५५४ मो सुसकी इच्छा न करता हो वह या तो नास्तिक है या सिब अपना ना। ५५५ दु सके नाश करनेकी सब गौत्र इच्छा करते हैं। तु सका भात्पतिक अभाव कैसे हो ! उसे म बवानेसे दुस उत्पन होना संभव । । उम मार्गको दुखसे छुपानेका उपाय जीव समसता है। जन्म, गरा, मरण या मुरूपरुमसे दुभ है। उसका पार कर्म है। कर्मका बीर राग-पहै। अपपा उसके निम्न पाँच कारण है- मिप्याय, अविरति, प्रमा, कराप, योग । पहिले कारणका समान होनेपर दूसरेका अमात्र, फिर वोसोका, फिर चीपेफा, और अन्त में पाँच कारणका अभाव होता है, या मात्र होने कम है। मिप्या मुरूप मोह है। बधिरति गौम मोह। प्रमाद और पायचा अविरतिमें बना हो सकता है । पोग पारीपनेस उत्पन होता है। चाके माशो मानेकर मी पूर्व से पोग हो सकता है । पई, भासोर १०५१ सब को अप्रिय होनेपर भी निम दुमका अनुमा करना पड़ता ६५ दुस समारण रोना चाहिये । इस भूमिकासे मुम्पनया रिचारपान विचारोगी उरित होती है, और उसावरमे कमसे मामा कर्म परटोम, मोक्ष मा िमारोगा साप सिरमा हो ऐमा माश्म होता। बर्तमानमें जो अपनी पमानता है, तो स्तरउमें मी उमी Rपमानता पानी पि और मपिम्पमें मी पमा होना चाहिये । इस प्रकार के विचार माप मुमभुगोरो परना भीमद् राजपाद्र [पर .५० ५.८५.९ उचित है। किसी मा बस्तुका पूर्व-पथात् वस्तिव महतो उसका अस्तित्व मप्पमें भी नहीं होता-- या क्नुमा विचार करनेसे होता है। पतु सर्वथा उत्पत्ति अपना या माश नही हाता-उसका वस्तिन सकालमें है war- परिणाम मा करता पस्तुसमें परिवर्तन नही होता यह निमका गोलमिमता विचारमे पोम्प है। पदर्शनसमुचय का एक गान है वो मी फिर रिसे चार करनेसे उसका बहुत पुरा बोध होगा। मों म्यों मिकी मुदि मौर स्थिरता ती त्यो त्यो हानीक पचनोका निधन पायोप तिसे हो सकता है। संधानका कर मी पारम-स्थिरता होना हो, ऐसा गीतराग पुरुपौने जो करा हैदपत्रांत सत्य है। ५५७ निर्माणमार्ग बगम बगोचर है, इसमें सशप महो । अपनी शक्सि, सहरके माप बिना उस मार्गकी सोम करमा वसंमबर ऐसा बारंबार दिखाई देता है। क्मा ही मही, किन्तु थासहरु- चरण बामपपूर्वक रिसे बाप-बीचको पानि हो, ऐसे पुस्पको मी सास्के समागमका नित्प बाराम फरमा पारिप । जगत्के प्रस्माचे देसनेसे ऐसा माश्म पाता है कि से समागम और मात्रयके बिना निराकर बोषका स्थिर राना कठिन है। सको मिसन पाप किया और माश्यको रस किया ऐस शाना-पुस्पोका माधर्मकारक बनत चर्मपाय-बापांसधा जा सकना समय नहीं। पाती एक पग मी पाछे नही मिठी और न वमम्य , तो फिर समस्त माप स्पितिकी तो बात ही क्या है। एक पझा मी दोन उपयोग या एक अमान्य कौखम को देनेके मफेक्षा मी विशेष निकारक है, तो फिर ऐसौ साठ पकी एक पदाका बन उपयोग करनेसे कितनी हानि होनी चाहिये । इसी तय फहन एक पष्ट एक मम्स एक वर्ष और बमुक्रमस समस्त बाप-स्पितिका हान उपयोग यह कितनी हानि मौर कितने मधेष कारण होना समय है या विचार पर पयसे करनेसे तुरत ही ना सकेगा। पुष और मानन्द सब प्राणिमा सब बातों सब सत्तों वौर म मतोंको निरन्तर प्रियो फिर मी दे डास और वानन्दको मोगते है इसका क्या कारण ऐना चाहिम ! तो उत्तर मिस्ता tR बाम वौर उसके द्वारा मिलगीका ऐन उपयोग होते र रोक्ने कि प्रत्येक प्राणीको इस होनी चाहिये। परन्त किस साधनके ! .
विविध परमादिसप्रार-२वा वर्ष ५६० मिन पुरुपोंको बतर्मुसरि हो गई है, उन पुरुषोंको भी बौनीतगगने सतत मागविरूप दी उपदेश किया है पोंकि मनतकारके अप्पासयुक्त पदार्याका बो सग यता है, हम जाने किस प्रएिको वाकर्पित कर थे, यह मय रसना उचित है। बब ऐसी मूमिछमें मी इस प्रकार उपदेश Pया गया है तो फिर निसको विचार-दशा ६ ऐसे मुमुसु गीतको सतत जागति रसना योग्य है, ऐसा न कया गया हो, तो मी यह स्पष्ट समझा जा सकता है कि मुमुसु जीवको निस विस प्रकारसे पर-अभ्यास होने योग्य पदार्थ बादिका त्याग हो, उस उस प्रकारस बास्य करमा उचित है । पचपि बारम परिमाका त्याग स्यूळ दिसाई देता है, फिर भी मतर्मुमतिका हेतु होनेसे बारमार उसके त्यागका ही उपदेश किया है। .
रस्मा था २९वाँ वर्ष ५६१ बई, कार्तिक १९५२ बारमभारपको LEHRE OFFAI नाम समझना है। तया उससे अन्य विकल्पसे खत उपयगर माम शान्त समारे। स्तुत: दामों एकही। अंसा बेसा समन्स समस उपयोग मिगतरूपमें समा गया, चौर वामा समाबम्प हो गई--पाइ 'सममीने प्रमा 'इस प्रथम बापका वर्ष। अन्य पापक सपोगों को अभ्यास हो या पा, वौर उस कम्पासमें गो वामान मान पा अम्पासरूप अहंभाव शान्त हा गपा-यह 'सममीने थमाई गपा' इस मरे पास्यका वर्षा पर्यायान्तासे इनका मिम मर्प रा सकता है। वास्तवमें तो दोनों पापोंका एक परमार्थ चार बरने पाम्य है। रिस सिम समन्स मिया उम सम्मे मेरा', 'तेरा'श्पादि कामाव-मानभान-शान्त पर दिया। स्पोकि सा बाई मी मिजस्थमाव देखा नहीं गया और निमस्तमानको तो पचिप अम्पासप सपा मिमोसा इसलिये व कुरा उसामें समाविष्ट हो गया । वामा सिमाप पर पदार्यमें या मित्र मान्यता थी, उसे र करके परमार्थसे मीनभान हुवा । तपा माणीहारा पा इसका पारि काम करनेलपम्पबार, पचन वादि पोगके यनेतफ कचित् या मा किन्तु भारमासे यह मरा यह दिकम्प सर्वया शत नागपा-सा है से अभिप मानुभप गोगा फरमें मानता हो गई। परनो गाम्प जो छोक मायाम म्पल एप भाम-मापास बाप ।। जो उपर मा तानुमार पिसमे शान्त मही किपा प समसा मी नही-स तर इस मारपत्र सारभूत TAIT अपना मितने मे बिमने शान्त रिया उत्तन ही शॉस उसने समष्ठा इतना मिम अप हो सकता। सिर मी मुम्प में ही उपशंग हाना उचित है। बनतपासे पम मियम शाम्यातसोस्न बार्मि करनेपर मी समझ लेना और शास्त परमा म मा बामा मापा नही और उसमे परिममगकी नातिनी । रामपाने और रात मेरा एका कोप सामा-पदमें रहे-उसम्म परिममण मिस साप । हामा चिरे बिना मागे उस परमार्गको पाना मही और पानमे प्रति राठ बासंग समद विचारको निगल या मी विससे समाना और IF कामाइन नोरा चरण म एमा-पहभप प्रसिद है। पदको भार पर 4 आर आरो भूमिकाकी उपाममा रे वो जोर समसार शास्त माप, म मर नही।
पर ५५२ ५५५, ५६४ ५..] विविष पर मादि समार-२९पौष मनत पानी-पुरुषोंका मनुमब किया मा यह शामत गम, माक्षमार्ग गौरके छममें नहीं माता, इससे उत्पन ए सेसहित मार्यको मी यहाँ शान्य करते हैं । ससग सद्विचारसे शान्त करनेतकके समस्त पद अस्मत सत्य है, मुगम है, मगोचर है, सहव है वौर हरमित ५६२ बई कार्तिक मुटी ३ सोम १०५२ प्रीवेदाम्तमें निमपित मुमुनु चौवका उक्षण तथा प्राविनाय निरूपित सम्पति जीरका क्षण मनन करने योग्य है ( यदि उस प्रकारका याग न हो तो बाचने योग्य है) विपरपसे मनन करने योग्य है-मात्मामें परिणमाने योम्य है। अपने क्षपोपशम-बलको कम नानकर, आई ममता वादिके परामर होनेके लिये निस्प अपनी म्यूनता देखना चाहिये -विशेप सग-प्रस्गको कम करना चाहिये। ५६३ वई कार्तिक सुती १३ गुरु १०५२ (१)बात्म-तभूत सगके सिवाय मुमुक्ष जीवको सर्वसगका घटना ही योग्य । क्योंकि उसके 'बिना परमार्पका बारित होना कठिन है और उस कारण श्रीबिनम या म्यबहार-द्रम्मसपमरूप साधुत उपदेश दिया है। सहयात्मस्वरूप (२) तळश्यको तय हास्में जो पति वर्तन करती हुई दिखाई देती है यह उपकारक है और पा ति क्रमपूर्वक परमार्यको यथार्थतामें विशेष उपकारक होती है। हमें सुदरासमाके प्रय अधा मोयोगमासिष्ठ बाँचना । भौसीमाग पही। १८९५ (३) निसदिन नैनमें नीद न आय, नर वपरि नारापन पाये । -मुंगसनी ५६४ पई मगसिर मुदी १० मग १९२ निस मिस प्रवरसे परदम्म ( बस्तु)क कार्यको सम्पता हो नियके दोषोसनेमें सक्ष रो, र ससमागम सत्याबमें मती हुई परिणतिमे परम भकि रहा फरे उम प्रकारका नाममाल करते हुए तया बानीके बपोका विचार करनेसे शा-विशेष प्रास करते हुए गा पा समात्रिको पोम्प का, एसा ब्झ रसना-पह कहा था। ५६५ शुभेम, विचार दान [पारि सब भूमियभामें सर्वमंगका परित्याग बबन उपकारी, पर समाकर पानी-पुरुषोने अनगाराला निमाण किया है । पपपि परमार्थन सबमग-परिम्याग पपार्य बोध होमेपर प्राप्त होना समय है यह गानत दुए मौ यदि निस्प समगम ही निवास होता UN भीम प्रसाद [पा ५५ ५९० ५५८ ५५९ पैसा समय प्राप्त हो सकता है, ऐसा बानकर पानी-पुरुपौने सामान्म तिसे बाम सर्वसंग-परित्याग उपदेश दिया है, बिस निति संयोगसे मुमेनपान गाव गुरु स्पस्प और रसायको यथा- योग्य उपासना कर पयार्य योषको प्रास करे। ५६६ बर्मा पौप १९५२ दो मिनिवेशोंके मार्ग-प्रतिबंधक यनेसे चोर मिष्याला त्याग महीं कर सकता । वमिनिवेश दो प्रकारके है-एक किक और पूसरा शामीप । क्रम कमसे ससमागमो सो गसे बीच यदि उस मिनिवेशको छोड़ दे तो मिपालका त्याग होता है-स प्रकार सामा-पुस्पोंसे शाम वाविवारा बारम्बार उपदेश दिये जानेपर मी पात्र ठसे मेमने के प्रति क्यों उपेक्षित होता है। यह बात विचारने पोयी। ५६७ मात्र मूस सपोग (संभष) है, ऐसा शामत तकरोमेशा है। समस्त गाना-पुरुषोंने ऐसा देखा है। स्पोग मुख्यरूपसे वयसे कहा है-तरसंगी वीर बापसपी रवंतर्सपोगका विचार होनेके लिए बामाको बाघ संयोगच्च मपरिचय करना चाहिपे, मिस परिभपको सपरमार्प न्म पानी-पुरोने भी की है। ५६८ अंदमान समारो वौ पण, मो नपि माप पमायो रे। बम्प वर रपम वे पामे संयम गम भो नापो रे । मापी है, गायो, भसे पीर भगत् गुरु गायो । ५६९ बर्गा पौन पुरा ८ मौम १९५२ मात्मायक सिवाय विस मिस प्रकारसे जीने शाम मा पता करके स्वार्यता मान सी, प सब भाजीय भमिनिवेश है। साता तो दरमहा और ससमागमका संयोग प्राप्त हो गया है, उस पोगमें मी स्वताके निर्वाह के लिए शावके किसी एकचनको गो गुपचमके समान बताया है सपा रासाये मुस्स सापन ऐसे ससमागमके समान करता है सपना उसपर उससे मी बधिक मार देता है उस गीचे मी मप्रशस्त मालाप भमिनिमेश है। १MR मनफर भी त्याबमा मुख रोनेपर भी प्रसारण मान नहीं हुमा तो प्रापसिउपमये प्राव वा।
५.१ ५०२] विविप पर मादि संपा-२९षौ वर्ष ४७ मामाके समानेके लिए शाब उपकारा है, मौरये मी स्वन्द रहिस पुस्यों को ही है- श्वना मन रसकर यदि सशाम्बका विचार किया जाय तो या पासीय मिनिमेश गिने जाने योम्प महीहै। सक्षेपसे ही लिखा है। मोहमयी क्षेत्रसबषी ठपाविका परित्याग करनेके अमी बार महीने गौर दस दिन बाकी, और उसका परित्याग होना समय है। सरे क्षेत्रमें उपानि (म्यापार) करनेके वमिमापसे मोहमयी क्षेत्रकी उपाधिके स्पाग करनेका विचार या करता है, यह बात नहीं है। परन्तु बतक ससंग-परिमागरूप योगका निराकरण न हो, तबतक वो गृहापम ये, उस गृहाम्रममें भाग म्पतीत करनेके बिषयमें विचार करमा पाहिये क्षेत्रका विचार करना चाहिये मिस म्यवहारमें रामा है, उस म्पहारका विचार करना चाहिये । क्योंकि पूर्वापर अविरोध भाव म हो तो गना कठिन है। ५७१ अम मू- स्थापना मुर-- प्रमाण ध्यान योगबल स्पायु-स्थिति मारमयस ध्यान योगबस निम्रय बारम्प्रदाय निरूपण भू स्थापना मुस सौदर्शन अपिरोष ५७२ माहारका मय निद्राका जय बासनका जय पाक्सपम निनापदिए बामप्यान मिनोपरप्ट वामप्यान किस तय हो सकता है! बिनोपरिए शान अनुसार मान हो सकता है, इसठिये धानका तारतम्य बाहिय । क्या विचार करते हुए, क्या मानते हुए स्पा दया रते हुए चौपा गुणस्थानक या नावाह! किसके द्वारा चौपे गुणम्पानम्मे रोए गुणस्थानमें आते हैं।
श्रीमान् गायन [१५.१ ५.५ ५७३ पई, पोय मी १०५२ योग मसल ने निन कमा, परमात रिदि दाम्मी । नरपद मन मागमा, आवमराम ए सास्ती रे॥ भाभीपाउराम 1 ५७४ गृहमा प्राविक पोगसे उपयोगका प पंचम गहना संभव है, एसा बानकर परम पुरुष सर्वसंग-परिस्पागका उपदेश करते हुए। ५७५ बम् पापणी २, १९५२ सब मकारके भयक निकास-स्पानरूप इस संसारमै माम एक पराम्प ही भमपी मान् मुनियोंका मी गो बरम्प-शा प्रम्स होनी दुराम है, मेराग्प-शा तो प्राय मि गावाप्सम हो यती थी ऐसे श्रीमहावीर अपम आदि पुरुष भी पागले प्रहण करके पर छोकर पठे गये पही त्यागको उारुपता बताई गई। गबतक गृहस्थ पनि प्पाहार ये तबतक बारमशान म हो वा निसे मामशान से उसे गृहस्प मादि म्यपाल म ए एसा नियम नहीं है। वैमा होनेपर भी पानाचे मी परम पुरुषोंने म्पमारके पागका उपवेश किया । क्योंकि स्पाग वाम ऐचर्यको स्पए म्पछ करता है । उससे भौर छोकको उपचारमत बोनके कारण त्पागको अकर्मन्य-ससे करना चाहिये इसमें सन्देह नहीं है। निमसरूपमें स्पिति होनेको परमार्प मपम का है। उस स्पमके परमभूत ऐसे क्य निमि- जोको प्राण करनेको म्पबहार संयम कहा है। किसी मा हानी पुरुपने उस संपमका निपेभ मही किपा । किन्तु परमार्थकी उपेक्षा (बिना सके) से मो म्पहार संपममें ही परमार्थ सपमको मान्यता रस्ते, उसका वभिनिवेशा दूर करके ही लिए उसकाम्पहार स्पमका निषेप किया है। किन्तु म्पहार संपममें पुष मी परमार्थका निमित्त मही-एसा हामी गुरुपाने महीं कहा। परमापके कमणम्न म्पबार पमको मी परमार्थ संपम कहा है। १ श्रीपाम्पसमै निसरो पच दरम्प विt- मा सम्मानी सम्मारिणी एसी रे । सिम नमपर भी कामे मापमपम गली ॥ सोग गठममिमा नरपर सम्म पालो रे । ण प मापने भावमधान सम्पारे। भा-लिम्प प्रतिमा मात्म मार बाठ सिमका सम्पूर्वा परम पिचाई या उत्ती ज्य गयो म म परमै । समान्य परिषरकी बात मनमामानने को बसाव पोप मनम इस मक्रने मुल जमाना चाहिये । मतएप इस नकारनामसे ये सामान पत्र ५०६ ५.० ५.८] पिविष पत्र मादि मंग्रह-२९ों व प्रारम्ब है', ऐसा मानकर हानी उपाधि करता है, ऐमा माश्म नही हाता । परन्तु परिणतिसे छूट नानेपर मी त्याग करते हुए बाम कारण रोकते हैं इसलिये शानी उपाधिसहित दिखाई देता है, फिर मी उसको निातिके पक्षका निस्प सपन करता है। पई, और बनी ९ गुरु १०५२ शामिमानरीत सत्पुरुषोंका अस्पन भक्तिप्स पिकास नमस्कार से बानी-पुरुषोंने बारमार भR'म-परिमाके त्यागकी उपमा कही है और फिर फिरसे उस 'पागका उपदेश किया है, भार प्राय' करके स्त्रय मी ऐमा । आचरण किया है, इमलिये मुमुक्षु पुरु- पचे वपश्य ही उसका वरता करना चाहिये, इसमें सदेह नहीं है। कौन कौनसे प्रतिबधसे गाँव वारम्भ परिमाका स्पाग मही कर सकता, और यह प्रतिबध किस तरह दूर किया जा सकता है, इस प्रकारसे मुमुधु जीवको अपने विचमें विशेष विचार अकुर उत्पम करके कुछ भी तपाइप फर छाना योग्य है । यदि पैसे न किया जाय तो उस जीवको मुमुमुवा नही है, ऐसा प्राप कसा मा सफता है। भारम्म बीर परिपाका स्पाग होना किस प्रकारसे महा माप इमझा पहले विचार पीछेमे उपरोक विचार पुरको मुमुमु जीवको अपने पाकरणमें अवश्य उत्पन्न करना योग्य है। ৩৬ बई पाप १३ मे १९५२ उरए साधिके स्थान यो वस्ती आPि पर है उन सरमा मनिष्प मातार विचारवान पुरुष उन्हें छोपकर पा दिये हैं अपना प्रारम्बोग्यमे याद उनका बार उसने हा मी ताहोंने अनाग पसे उमीनमापसे उसे प्रारम्पान्य समाकर हो बाबरण किया है और पाग करने का ही उस रस्या है। ५७८ महरमा बुद (गातम) अण, दारिद्रर र मार माप इन चारों, पफ बामदानके रिना अन्य सर उपापोंसे बनेप स्माकर, उनका ठरति हेतुन ससारका छोर पर जाने पर। भीम आर्मत बानी-शुरुषोंन भी इमी उपापरी उपना भार सरीमा उस 31- पका उपाया है। उस मामपानका प्राय दुर्गम पर निधारण करणागी उन सउने भक्ति-मार्गमा प्रकार किया जो सब मगरमरम निमा शरण और सुगम ।
४८. - भीमद् रामचन्द [पत्र ५.१ ५८ ५७९ बर्थ, माघ व १९५२ बग बामस्वरूपको ससंगका संयोग मिस्नेपर सबसे मुडम काना योग्य है, इसमें मपनी है। स्वामी पुम्पाने बाविशयरूपसे मो ससंगका महालय का पपा है। इसमें विचार मामको किसी तयका निकम्प करना उचित नहीं है। गई फस्न पुदी १, १९५२ समुष्मसाद शानाका सब महार फ्रमा मूम होता है, तो भी मिस न उदप मी मारमाकार प्रापि करेगा, उस दिनको कपारे। सर्व दुसस मुक्त होनेका सोतास उपाप मो वारम्बाम घाट परासी-पुरुषों का वचन सपा-बस्पत सन्मा। जबतक पापको तपारूप भारमशान महो तमक भास्पतिक नको नाति होना समा मही इसमें सर्शय मही है। उस बालबानक होनेक मानो मचिमान पारमा लस्म' गुमपत्र बामप निरन्तर मनश्य ही करना चाहिये, इसमें संम्प नही है। अब उस बाम्पा नियोग होता निस्प ही बाप माना करनी चाहिये। उदपके पोगसे तपाइप मामबान होनेके पूर्व पनि उपदेश कार्यकरमा पाता तो प्रभारणाम मुमा परमार्य मार्गके बमुसुरण करनेके तमूत पसे सपुरमकी माफि, मपुरके गुणगान, सम्पुम्पो प्रति प्रमोवमानना और सत्पुरुषके प्रति मविरोध मावनाका मेगोंको उपदेश देता है सि तामा मनावरका ममिमिवेश रणे और सत्पुरुषके पान प्राण करमेकी ममाविरो, पैसा करता है। वर्तमान कामे उस कमही विशेष पनि होगा, ऐसा समझकर हानी पुरषोंने स्व कायो दुधमकार मा और सा प्रत्पप दिखाई देता है। सस कार्यो कम्पबामा हैया मावना ममा गालको मित्य करनी चाहिये। ५८१ कई फागुन सदा १० १९५२ ॐसमसाव (१) हमें विस्तारपूर्वक पत्र लिसना नहीं लेता उससे वित्तमें पैराम्प उपसम मादिक शिव प्रदीत यनेमें सरासको हो एक विशेष बाभारम्त निमित समनाकर मौसुदरवास वादिके प्रपोच पोसतो दोसे पार पतक बिससे मिपमित वाचना-मनाऐ पैसा रनेके बिर मिला पा । मोरखासमाते प्रका वादि र मततक हाम्में सांप अनुप्रेमापूर्वक विचार करने के लिए मिलता है। (२) कापाले यनेतक मामा (बर्षात् पाप नादि ) संभव ये ऐसा भी को भाता है मभिप्राय माप (बात परदे) तो पार्य है। वो भी किसी पुरुष पत्र ५८२ ५८३,५८४] विविध पत्र मादि सपा-२९वों वप ४८१ 1 विशेपमें सपा-सा प्रकारको सम्बस्न मादि कपाका वमाव होना समय माश्म होता है, नौर उसके समान हो सकनेमें देह नहीं होता । उससे कापाके होनेपर मी कपायरीवपना समय है-मात् सर्वथा राग-देवहित पुरुप हो सकता है। यह पुरुप राग-प्रेपरमित , इस प्रकार सामान्य चार बाय पेयसे पान सकें, या समय नहीं । परन्तु इससे यह पुरुष रुपायरहित-सम्पूर्ण मौतयग- न हो, ऐसे यमिप्रापको विचारमान सिद्ध नहीं करते । स्पोंकि बाघ पास मात्म-दशाको स्थिति सर्वपा समाधम वा सके, यह नहीं कहा जा सकता। (२) भीमदरदासने पात्मनागृत-दशामें 'स्यतन बंग' कहा है, उसमें विशेष उल्लासित- परिणविसे धरमौरताका निरूपम किया है मारे काम कोप गिनि सोम मौह पीसि गरे, इन्द्रीक तस करी फियो रजपूतो।। मार्यो महामन्च मन मार्यो माकार पीर, मारे मर मर , ऐसो रन स्वीहै। मारी मासा वृष्णा सोक पापिनी सापिनी दोऊ, सबको मार करि निम पा पानी। संवर काय पेसो साधु कोक स्रपीर, मैरी सक मारिके निर्षित इमूतौ है। मीमुरदास—सून बंग ११ करत ॐ नमः सव जिन बीतराग सी मा-रेपका वायत झप हो सकता है। मानक प्रतिवपक राग-परे । धान, गीतका समूत धर्म है। गौष एक वर्सर सम्पूर्ण दम्प होनेसे उसका शान सामl-सम्पूर्ण है। ५८३ सा-पर बारमार प्रवण करने योग्य बांधने योग्य, विचार करने योम्प, न करने पोग्प और सानुमा-सिद करने योग्य है। ५८४ सहदेव निमेष गुम सगाव निर्मप उपशममम धर्म ..
८२ श्रीमद् रामाय [पत्र ५८५ १८६५८. समान सवादेव निमय गुरु निर्भय गुरु सितमू धर्म निनादामह धर्म सताका सरप निर्मपका स्वरूप धर्मका स्वरूप सम्यक क्रियावर ॐनमः प्रश सम्प परमाणु } पोवन पर्याय ५८६ बमाई फागुन पुदी ११ रवि १९५२ भी सद्गुरु प्रसाद यपा शान उत्पन होनेके पहिले जिन नौगोंको उपरेशापना पता हो उन मीमोंको म्सि प्रफरसे मेराम्य उपसम वीर मलिकय समो, उस प्रकारसे समागममें बाये गए माबोंको उपदेश देना योम्प है और जिस त उन्हें माना प्रकारक बस भाका तथा सर्वया वेप म्पमा बारिका अमिनिवे। कम दो उस प्रकारसे उपदेश फीमूत । से बाहमार्य विचार कर काना योग्य है । कम मसे मे मीच बिससे पपार्थ मार्गके सम्मुख ऐसा यथाशति उपस करना चाहिये । ५८७ मई फागुन यी ३ सोम १.५२ दापारी पोनपर मी भी निराकरण मानसहित राते हैं, ऐसे महापुरुषोंको मिकाप ममसार हो देह होनेपर भी परम पानी मुरूपमें सर्व कपापा ममात्र होमा सभव है पानो हमने सिमा सो उस प्रसंगमें अमात्र सम्पका बर्ष पप समप्रसर ही भिसा है। प्रश्न -बगत्वासी जमको गरेप नाश हो गानको सार मही पाती। मार मा महान पुरुप है गान है कि इस मामा पुस्यमें एग-पका समाष अपना उपशम रहता है-ऐमा विपकर मामे शका की कि वैसे मामा पुस्पको जाना-पुस्प बपास मुमुक्षु माल माम मेते हैं उसी तय जगत्के गोत्र भी क्यों नहीं जानत । उदाहरण के लिये मनुप्प वादि प्राप्णिपोंको रेनकर जैसे जगत् पासी गांव मानते हैं कि पे मनुप्प बादिई उमा तय महामा पुरुष मी ममुन्य वार को मानत है इन पा ५८८] विविध पत्र मादि संग्रह-२पों पप उत्तर । गायों को देखनेसे दोनों ही समानरूपसे जानते है, और प्रस्तुत प्रसगमें ता जाननेमें भेद पाया जाता है, उस मेदके होनेका क्या कारण है, या मुस्त्यरूपमे विचार करना योग्य है।' मनुष्य बारको यो गत्वासी नीव गानसे हैं ये दैहिक सम्पस क्या दैहिक पेपसे ही जानते हैं । एक दूसरेकी मुदामें आकारमें और इन्द्रियोंमें ना मेद है उसे चमु वादि इन्द्रियोंसे जगत्वाती जौष मान सकते हैं, और उन नामों के कितने ही अमिप्रापोंको भी जगत्वासी जीन बनुमानस मान सकते है, स्पोंकि यह उनक मनुमयका विषय है। परन्तु जो शानदशा अथवा पीतराग दशा, या मुख्यमपसे दहिक साप तथा दैहिक चेयका विषयमही है-बाबतमस्माका ही गुण है । और धतराममात्र बाप नीबोके वनुमत्रका विषय न होनेसे, तया जिने तपाइप अनुमान मी हो ऐस जगत्वासी बयोको प्राप करके पैसा सम्कार न होनेसे ये बानी अपवा बौतरागको नहीं पहिचान सकते । कोई कोई जीव ही ससमागम सयोगसे, साज गुम कर्मफे उत्यसे और तपादप कुछ सरकार प्राप्त कर कानी अपना वीतरागको यपाकि पहिचान सकते हैं। फिर भी सची सपी पहिचान सो स मुमुमुताके प्रगट होनेपर तथाप सत्समागमसे प्राप्त उपदेशका अबधारण करनेपर, गौर अन्तररम-ति परिणमित होनेपर ही जीव, बानी अथवा वीतरागको पहिचान सकता है। भगत्गासी वर्यात् जो जगत्सपिजीर में उनकी ररिसे शानी वपना पीतरागकी सपी सौ पहिचान कासि हो सकती हसे बन्धकारमें परे ए पापको मनुष्य धनु नहीं रेस सकसी, उसी तय देहमें रानेवाळे बानी अपना पीतरागको जगत्-शि जीव नही पहिचान सकता। बस अषकारमें परे हुए पदार्यको रेसनेने पिये प्रकाशकी अपेक्षा रहती ह उसी तय जगत्-णि जीवोंको बानी अथवा बीत रागकी पहिचानके रिपे विशेष शुम सस्कार और सरसमागमकी अपेक्षा होमा योग्य । यदि पर स्पोग प्राप्त न हो तो बसे भवकारमें पाएमा पाप गौर भधकार दानों ही एकरूप मासित होते है उनमें भेट नाही मासित होता--उसी रारह तपारप योगक बिना कानी अथवा अन्य ससारी नावों की एकाकारता मासित होती है-उनमोह आदि शास प्राय करके भेद भासित नहीं होता । ना देहषारी सर्व कान और सर्व करायरहित हो गया। उस देहधारी महारमाको विकास परममधिसे नमस्कार से ! नमस्कार हो! ए म्यामा नहीं पता है, उस दरका, भूमिको घरको, मार्गको भासन आणि सम्को नमस्कार हो! नमम्कार ! ५८८ बाई चैत्र मुदौ १ मे १९५२ प्रारम्पादयसे सि प्रकारका म्पहार प्रसग यता है उसके प्रति पि रमते हुए स पत्र वावि मिसनेमें अस्पतासे प्रतिपाती बैसा अधिक योग्य है—पह अभिप्राय प्राय करके यहा करता है। वास्माके वास्तविकरूपसे उपकारम्न ऐस उपश करने बानी-पुरुप मध्यभावसे बर्मा म करें, ऐसा प्राय कर रोना समय है।रि मी निम दो कारणोंगरा बानी-पुरुष मी उसी प्रकारसे प्रालि - श्रीमद् रामचन्द्र [पब ५८ (१) उस उपोषाका निशान बीच में निस तर परिणमन हो ऐस स्पोगोंमें यह नियम पाल यता हो, वपया उस उपदेशक विस्तार करनेपर भी उसमें उसक म्हण करनेको तपास पोम्पता हो, तो बानी-पुरुष उन गीचोंको उपश करनेमें अल्पमाबसे प्रति करता है। (२) वपना वनेको बाप म्पबार ऐसा उदय हो कि या उपोश बिासु भोपको रिणमन होनेमें प्रतिवररूप हो भपता वषारूप कारण के बिना बैसा मर्ताव कर यह मुस्प-मार्गक रोपम्प वपमा सशयके वरूप होनेच कारण होता हो तो भी हानी-पुरम उपदेशमें कम्पमा से । प्राधिकरता बपना मौन राता है। (२) ससंग-परिपाग कर बसे गामेसे मी मीन उपाधिरहित नहीं होता। क्योंकि मक्तक बर्ष रेणतिर पि न हो और तथारूप मामि प्रापि न हो, तबतक सर्पसंग परित्याग मी माम मात्र ही है। और से अबसरमें भी मतपरिणतिपर परि देनेका भान जीवको बाना कठिन है। तो फिर से गृह-म्पसारमें गैकिक मभिनिवेशपूर्वक रहकर अतर्परिणतिपर रस सकना कितना तु साम्भ होना चाहिये उसपर भी विचार करमा योम्प है। वपास न्पपहारमें राकर गोलको अन्तरिणतिर फेतना मग रसना उापितमा मी विचारना चाहिये, और मास पैसा करना चाहिये । अधिक स्पा मिले। जितनी अपनी शक्ति हो उस स शाहिसे एक ब रसकर, मैतिक मभिनिमेशको बम्प कर कमी पूर्व निरावरणफ्ना विराई नही देता, इसध्येि केबल अभिमान हो इस प्रकार पातको समझाकर जिस प्रकारसे मार न दर्शन और चारिमें सवत गागत हो उसीके करनेमें पत्ति गाना और रात दिन उसी तिनमें प्राति करना यही विचारवान जीवका कम्य है। और उसके लिये स्म्सग, सत्याल बौर मरम्ता मावि निरगुण उपकारभूत है ऐसा चारफर उसका मामय करना उचित है। जबतक मीनिक ममिनिषेश बर्षात् दम्पादि मेम, तणा दैहिक मान, कुख, नाति बाविसी मोर मप ममप मान हो उस बात स्पाग न करना हा, बपनी मुविसे-पेमसे-अमुक गम बादिश्च भामर रमना हो तबतक बाको पूर्व गुण कैसे उत्पन्न हो सकता है। उसका विचार सुगम है। हसमें बनिक वध गा सके इस प्रकारका पहाँ उज्य महो। तपा अधिक किसना अपा माना मी लिसी किसी प्रसंग ही होने देमा योम्म है। तुहा विशेष मिशासासे प्रारम्पोवफफा बेदन करते हुए योग लिया जा सकता पा उसको अपेशा मी कुछ कुछ उरिणा करके शेष ही लिखा है। समस मेध सर्व क्षेत्र मुदा २ सोम १९५२ रिममें पण मरमें हर्ष और क्षण भरमें शोक हो बारे ऐसे इस म्पलहारमें मो शामी-पुरुष सम दयामे पते है उमें वर्पत मठिम पम्प मानते और सर मुमुक्षु गोको इसी दसाकी उपासना पमा पदिय ऐमा निथप समसार परिणति करना योग्य है।
पत्र ५९ ] विषिष पर मादि संग्रह-२९ों व . ५९० वाई, चैत्र सुदी ११, १९५२ सदगुरुपरणाय नमः निस शानमें देह वादि बभ्यास दूर हो गया है, मौर दूसरे पदार्थम आसा-ममता नहीं रहो, तपा उपयोग निग स्वभावमें परिणमता है, अर्थात् मानस्वरूपताका सेवन करता है, उस बानको 'निरापरण-बान' कहना चाहिये। २ सब बालोंको अर्यात् सामान्य मनुष्पोंको बानी-मानीकी वाणीका मेद समझना कठिन है, पा बात यपार्य है। क्योंकि बहुसस गुप्फडानी शिक्षा प्राप्त करके पनि हानी पैसा उपदेश करें, तो उसमें बचनकी समानता देसनेसे, सामान्य मनुप्प गुप्फहानीको मी जाना मान में, और मद-दशाबाले मुमुसु जीवोंको मी उन सपनोंसे भांति हो जाय । परन्तु उत्कर दशावाले मुमुझ पुरुषको, पुषवानीकी वाणीको शम्दसे कामाको पाणी जैसी समसकर प्राय भांति करमा योग्य नहीं। पोंकि बाशयस, शुत्रानीकी बाणासे कानीकी वाणीको तुम्ना नहीं होती। जानाको वाणी पूर्वापर बविम्द, मामार्प-उपदेशक वीर वपूर्व वर्षका निरूपण करनेवाली होती र वौर अनुमक्सहित होनेसे पा मारमाको सतस बागृत करती है। गुफयानाकी बाप्पा तपारूप गुण नहीं होते। सबसे उतर गुण गो पूर्वापर भनिरोषमात्र है मासुकानाको वाणीमें नहीं य सकता, क्योंकि उसे यथास्थित पार्यका दर्शन नहीं होता, भार इस कारण जगह जगह उसकी पाणी कल्पनासे पुक होती है। इस्पादि नाना प्रकारके भेदोसे शामी और शुष्कबानीको बाणाको पहिचान तस्कर मुममुको ही हो सकती है। बानी-पुरुषको तो सहर समासे ही उसको पहिचान हे पोंकि र सय मानसहित है और मामसहित पुस्पके विमा इस प्रकारके बाशयका उपदेश महीं दिया जा सकता, इस बातका र सारही मानता है। बिसे शान वौर मानका भेद समसमें वा गया है उसे बानी बोर हानीका मेद सहरमें समझमें भा सकता है। जिसका वजनके प्रति मोह शान्त हो गया है ऐसे जाना-पुरुषको शुष्पग्रामीके बचन किस तय भाति उत्पन्न कर सकते है! हाँ सामान्य चोपोंको वपमा मदरशा और मप्यम- दशके मुमुक्षुओंको शुकवानाके पचम समानरूप दिसई देनेसे दोनों ही मानांके पचन है, ऐसी माति होना समय है। हम ममुहको प्राय करके पैसी भांति समझ महीं, क्योकि उसे पानीके पचनको परीक्षाका बछ शेषरूपसे स्थिर हो गया है। पूर्वकालमें भो भनी हो गये हों और मात्र उनको मुस-मामी हो पाको यो हो, तो मी क्तमान काळमें पानी-पुरुष या चान सकते है कि या पाणी पानी-पुरुपकी । क्योंकि रात्रि बसो मेइको तय वानी और पानीको वापीमें भाशपमा भेद होता है, और भारम-दशाके तारतम्पके अनुसार भाशपयुक्त पानी बानी-पुरुपको ही निकलती है। माशय ठसकी पाणके उपरसे 'वर्तमान हानी पुरुष'को स्वाभाविक ही परिगोचर होता और करनेवाले पुरुषको दशाका तरतम्य में माता है। यहाँ मो वर्तमान पानी पुरुष' लिखा है, या किसी विशेष प्रभात प्रगट-गोप-वीरसहित-पाप - ५ भीमद् ण्वन्द्र सदकेही वम किया है। पानाके पचनको परीक्षा पदि सब नामका पुग्म होती व निर्माण मी मुरुम ही हो जाता। ३ मिनगममें जानके मति मुन बार पाँच मेट को है।बानके मेट सब-उपमालाचक नहीं है। कवि मन पर्यन वारिबान वर्तमान काममै म्यान्म सरीले माम हवे है। उमक उरसे ठन बानोंको उपमाबापक समन्ना योग्य नही। ये बान मनुष्य जीवोंको चरित्र पर्याय नपुर तारतम्पसे उत्पन होते हैं। वर्तमान कायमें ए विशुख तारतम्य प्राप्त होना कान है। पोंकि इस प्रत्पश्च सरूम चारित्रमोहनाप वादि प्रकृतियों के विशेष पम्साहित प्रानि करता ला देखनमें माता है। सामान्य वारमचारिख भी किसी किसा गारमें ही बना सभव है। पमेकाम्में उस कानाको सम्मि म्पा सी हो गाय तो इसमें कई बार्य नहीं है। इसम उस हालको उपमानापक समझना योग्य नहीं । भरमसम्मका विचार करते हए तो उस जानकी कग मी असंभक्ता विवर्य नहीं देती। जा समी गानोंकी पिनिका क्षेत्र मान्मा है तो फिर पनि मन पर्पर मानिशाना क्षेत्र बारमा हो इसमें सम्प करना जैसे उचित है! यपि शासक पपास्थित परमार्थमे भाग रिस प्रकारस म्पास्मा करते है यह प्याल्या विरोधयुक्त हो सकता है किन्तु परमापसे उस ज्ञानका होना समर । जिनागमम उसकी जिस प्रकार के बाशयमे पारसा कही हो पात्मा बीर बहानी और पारापके बिना बाने जो म्याल्या करे उन दोमोमें महान् मेद हो तो इसमें बाधर्य नहीं बार उस मेदक कारण उस्त शामके निफ्यमें सदा होना पाप है। परन्तु वारमाएसे देखमेसे पा सोहक स्थान नही। १ कामका मामसे सूक्ष्म दिमाग समप' है। स्पी पाच सुम्मसे सम्म विभाग 'परमाणु' है, वीर वरूपी पार्यका सूक्ष्मसे सूक्ष्म त्रिममा प्रश' है। पे तीनों ही ऐसे सूक्ष्म है कि पन निर्मम जानकी स्पित्ति ही उनके सम्पको मरण कर सकती है। सामापरूमसे ससारी मानाचा उपपोग वसमात समपाता। उस उपयोगमें सम्मात्म्समे एक सम्पका हान संमा नागा परमा उप- पोग एक-समपवती और शुर हो तो उसमें साक्षात्म्पस समय बान हो सकता। उस उपपोगका एक समयपर्तिच कपाप बारिकममासे होता है। पाकिस्पाप बारके मागसे उपयोग माता बानि परम करवातपा बसम्मान समपतिपको प्राप्त करता है। उम कपाय बाविक मापसे उफ्पोगका एक समपठिन होता है। वर्षात् कपाप बारिफे संबधसे उसे बसपात समयमे एफ एक समयको मामा रमेकी सामर्थ्य नही पी उस पाप बाद ममामे पद एक एक समयको बग करक क्वगाइन करता है। उपयोगका पक-सम्पत्ति पापरहितफ्ना हकबाद होता है। इसलिये एक समप एक परमाणुन और एक प्रदेशका रिसे शान हो उस कमयान प्रगट होता ऐमा बो राम रुप है। कपायरीवपके पिना पब्बान होना मभव नहीं। बौर कपापरहितपनेके स्निा उपयोग एक समयको साक्षात्कम्स पर नहीं कर सम्मान मिये याबह एक सम्पको पण करे उस समय स्पत कपापरहितपना होना चाहिये। और हो भपत कपापका वभाष । पासमान होत है। सदिये पर कहा है कि एक मपप एक परमाणु भार एक प्रदशन जिसे बनुभव हो उस ।
४८७ । . ५ ५९ ] | विविध पत्र मादि संग्रह-ौ वर्ष केवमान प्रगट होता है। गोषको विशेष पुरुषार्थक लिये इस एक सुगम साधनका बानी-पुरुपने उपदेश किया है।समयकी तरह परमाणु मार प्रदेशको सूक्ष्मता होनसे सोनों को एक साप प्राण किया गया है। वतबिचारमें प्रवृति करनेके म्पेि बानी-पुरुषोंने बसस्पात पग कर, उ के बीचका एक यह विचारयोग' भी कहा है ऐसा समझना चाहिये। ५ शुमेन्छामे लगाकर सर्व कर्मरहितपनेस मिनस्वरूप-रिपति होनेतक बनेक मूमिका । बोगो बारमापा जीव हो गये है मार उनमें विस मिस बरसे बागथा उत्पमई, उस उस दशाके भेदसे उनोंने वनक भूमिकामाका बाराधन किया है। श्रीकबीर मुदरदास बादि साधुबन वामाथी गिने नाने योग्य है और शुभेन्चासे उपरको भूमिकाओंमें उनकी स्थिति होना समय है। अपत नियस्वरूप स्थितिके लिये उनको मागवि भार बनुमत्र भी मुझमें जाता है। इससे विशेष स्पष्ट मभिप्राय हामें देनेको पछा नहीं होती। ६ कपमानके स्वरूपका विचार कठिमी, भौर श्रीगा उसका एकान्स कोटीसे निश्चय करते है, उसमें यबपि उनका वमिनिवेश नहीं है, परन्तु मा उमें मासिन होता है इसलिये वे कहते है। मात्र एकान्त को दी और मन-मविष्यका कुछ मी शान किमीको होना समष नहीं ऐसी मान्यता ठीक महीं है। मत-मावस्यका पयार्य हान हो सकता है परन्तु पर किसी बिर पुरमोंको ही वीर का भी मधुर धारिक सारतम्पसे ही होता है। इसलिये यह सारूप भगवा है, क्योंकि सी विजुद चारित्रको तरतमता समानमें नहीं वैसी ही गती है। वर्तमानमें शामवेत्ता मात्र शम्दपोषसे नो फेवयानका वर्ष खाते हैं, यह यथाप नहीं ऐसा यदि आगरको रगता हो तो पा समव है । तपा भूत-भगिप्प बाननेका नाम ही केकयान 1, पा म्पापल्या शाबकारने मी मुस्परूपस मही कही । हानके वयं पर होनेको हो बानी-पुरुषोंने फेवान कहा और उस शानमें वारम-स्थिति और बारम-समाधि हो मुझपत कही है। जगत्का शान होना इत्पादि यो का गण है, वह सामाग्य मोबासे अपूर्व विषयका प्रण होना वसमष नानकर हो कहा गया है क्योंकि मगत्के शानके ऊपर विचार करते करते आत्म सम्म समझमें मा सकती है। भागर महामा श्रीसपम वारि के विषयमें एकास कोटी म काते हो दौर उनके माता पर्तियों (*से महावीरस्वामाके दर्शनमें पाँचसौ मुमुक्षुओंन कारमान प्राप किया ) को यो पान कहा है उस केवमानको एकान्त कोटी करते हो तो यह बात किसी तय योम्परे। किन्तु फेवनानका प्राइगर एकात निपा करें तो पवारमा केही निपध करनेक बराबर है। लोग हाल में दो केशानकी म्पाच्या करते। बह केवमशानको म्यात्या नियेमा माइम होता है, ऐसा उनें माता हो तोय मी संमब ।। पोंकि वर्तमान प्ररूपणामें मात्र जगत्नान ही केसम्- पानका विषय कशा नाता है। इस प्रकारक सभागानक दिसते समप भनेक प्रकारका निरोप ररिंगोचर होता है। भार उम निरोपोंको साकर उसका समाधम सिपना हममें तुरत बनना वसमव । उसमे सपसे ही समागम मिला है। समाधानका समुगप्पा इस तय है "बामा विस समय अस्पत मुशान-स्थिनिय मन करे, उसका नाम मुस्यत के भान है। सब प्रकारक रमा-रेपका बमा होनेपर बस्यद शुशान-स्थिति प्रगट हो सकती है। उस ।
८८ भीमद् रामचन्द्र [पा ५९१ ५९२ ५९१ पतिमें दो पुस जाना जा सके, मा फेवमान । वौर यह ग करने योम्प महो। मगर । एकान्त कोटी करते है, पर मी महावीर स्वामी के समीप यनेबा महापती पावसौ केली पैसों समें हिना समय है। भगक्के शानका मन मेनकर मो शुर मालवान है, यही फेरमान —ऐसा विचार करते ए वात्मशा विशेषमाता सेवन करता है" स तय स मनके सम्प- निका सक्षिम वाशप है। से बमे से बगानका विचार कर पिस तय सम्मान हो, से समान भार होनेके म्पेि पुरुषार्थ करना चाहिये । नगरके शान होनेको मुस्याहपसे फेरणाम मानना म्य महीं। मगरके गांवों का विशेष भक्ष होने के लिये पारम्पार जगतकै पानको सायमें छिपा , और कुछ कस्मित है, यह बात नहीं है। परन्तु उसके प्रति मिनिवेश करना योग्य नहीं है। इस पलपर विशेप सिनेमा होती है और उसे रोकनी पड़ती है, तो मा संक्षेपमें फिरसे किसते है। पारमास सस प्रकारका मन्य बप्पास र होकर स्फटिकी तरह भामा अस्पत बताका फेवन करे-पही केरमान, पौर मारम्बार उस रिमागममें जगत्के हानकमसे कहा है उस माहापसे मपि नाव पुस्पा प्रापि करें, यही उसका है। बई पत्र बदी ७ रवि १९५२ मुस्समागमकबमायके वासरफर तो विशेष करके वारंभ परिमहसे पि म्यून भरनेका बम्पास रहकर ग्निमें त्याग-पप वादि परमार्प-साथमका उपदेश किया है जैसे प्रप गाँवमेका परिचप करना चाहिये और अप्रमतमासे अपने दोषोंच बारम्बार रेशमा ही पोम्म है। ५९२ मी, चक्दो १० रवि १९५२ मम्प पुरुपकी रपिम, नग म्पबहार पलाय । दावन बब मम मही, म्पपहार बवाय । -विहार दिन ५९३ बई, पैशाख मुदी १ मौम १९५२ परने के प्रति पत्ति नही समय पर पण मर मी मिस करना मासित नहीं होता और परमेसे उत्पम होनेपाल फरने प्रति मिसकी उदासीनता है साथ बात पुस्प तपारूप प्रारम-योगसे परिषद सपोग बादिमें प्रति करता [मा देखा जाता हो और मिस तव पुरुष प्रापि करे उपम को पैसे कार्पसहित बात करते हुए देसनेमें माता हो तो उस पुस्प बान-दसा पाकिस तय माना जा सकता है। वर्षात् या पुरुष मास-परमार्थक किसे प्रतीति करने योग्य नपानी ई पप किस भगसे पहिचाना जा सकता है। स्वामित् किसी मुमसको दूसरे किसी पुरुष संसपोगटे - 4. ५१४] पिविध पत्र मादि सपा-२९वा पर्व ४८ यह जाननमें वाया भी हो, तो निस्से उस पहिचानमें भ्रांति हो, मैसा म्यहार जो उस सत्पुरपमें प्रत्यक्ष रिपाई देता है, उस भांतिके निरास होनक लिये मुमा गोषको उस पुरुपको किस प्रफारसे पहिचानमा पहिये, निससे उस उस तरफे म्पहारमें प्रति करते हुए भी शान-स्वरूपता उसक लझमें रहे। सर्व प्रकारसे जिस परिणा वादि सपोगके प्रति उदासीन माल यता है, अर्थात् जिसे सपाम्प सपोगों में महता ममतामाय नहीं होता, मपवाया मात्र जिसका परिक्षीण हो गया है, ऐस माना-पुरुपको 'अनतानुबधी प्राविस रहिस मात्र प्रारम्धके उदयसे ही बो म्पबहार रहता हो, परम्पबहार सामान्य दशाके मुमुक्षुको भएका कारण होकर उसके उपकारम्त होने में निरोधरूप होता हो, उसे यह हानी- पुरुष बानता है, और उसके लिये भी परिग्रह सपोग वादि प्रारम्बोदय म्यबहारको क्षीणताकी ही इमा करता है जैसा होनेसक उस पुरुपने किस प्रकारसे वार किया ह।, तो उस सामाग्य मुमुभुके उपकार दोनमें हानि न हो। ५९४ बवाणाजा, शाम्ब नदी ६ र १९५२ बार्प श्रीमाणेकचद मारिके प्रति, मीस्तमार्य श्रीसुरसारके पैशास वीर को देह को देनेकी वो सबर मिली है, यह गोची । अधिक समयका मौदगीके बिना ही पुवावस्थामें अकस्मात् देह देनेके कारण, उसे सामान्यरूपसे पहिचान मेवाले मोगोंको भी उस बात से खेल हए बिना म ये, तो फिर मिसन कुटुम्म मा सम्बपके महसे उसमें मून की हो जो उसके सहबासमें हा हो, निसने उसके प्रति भावय-भावना रस्सी हो, उसे मेर हुए बिना कैसे र सकता है। इस संसारमें मनुष्य-प्राणीको जो से नफपनीय प्रसग प्राप्त होते है, उही वकपनीय प्रसगोमा यह एक महान् सेदकारक प्रसग है। उस प्रसगमें पपार्य विचारणाम पुरुषोंक सिवाय सभी प्राणी विशेष सेम्पो प्राप्त होते हैं, और यथार्प विचारपान पुरुषोंको विशेष रुप होता है-उमें संसारको मशरणता, अनित्यता और भसारता पशेष स होती है। विचारपान पुरुषोंको उस सेदफारक प्रसगका मूर्णामारसे सेद करना, यह मात्र कर्म-मका हेतु भासित होता है। और वैराग्परूप सेदसे कर्म-सगका निधि मासित होती है, और यह सस्प है। मपी- मापसे सेद करनेसे भी विस सभाका योग हो गया है उसको फिरसे प्रामि नहीं होती, और मो मी होवा पर मी अविचार दशाका फस है ऐसा रिपारकर विचारमान पुरुप उस मू भाषप्रापयी मेको शान्त करते हैं, अपना प्राप करके पैसा ऐ उन्हें नहीं होता। किमी मी तर उस का हितकारी- पना देखने में मही माप, और आकस्मिक घग्ना डेका निमित होती है, इसलिये से भवरपर विचारवान पुरुषोंको, गीरको हितकारी ' हा रस्म रोता है । सगझी बारणता, भगता, मानस्पता, भौर माता तया अध्यात्वरमा देखकर भरने भापको विशेष प्रमिबोध रोवार किन जीप । उसमें कुछ मौइस संसारविषयक उप मा मात्रमे मा रहती हो तो उसे स्वाग कर उस गम्छामा कुए मी पाठ नही है । उस समारमें कमी मी दारणाम मा मात्र मास हानेबाठा मही, और अरिचारमा के बिना उस समारमें मोह होना योग्य नहीं जो माह बना नग्म मरण और प्रम्प रोका हेतु है, ए और सा पान १, रम शत फर—उसका क्षप फर।बार इसके "पाग कर, . - मीमा पत्रकार [पर ५५५ बिना कोई मरा हितकर उपाय नहीं है'श्यारि, पवित्र मामासे Aचार करनेपर राम्पको गुर और निषठ करता है। वो कोई जीव पार्थ विचारसे देखता है, उसे इसी प्रकारसे मासूम होता है। इस जीवको देर-सवय हो मानेके बा पदि मृत्यु न होता, तो इस ससारके सिवाय एसप भार उसकी पिके गानेकी इसम हो न होती । मुस्यतया मृत्यु के भयसे ही परमार्यरूप दूसरे स्थानमें पोक्ने तिको प्रेरित किया है, वौर पर मी किसी निरहे पारको हो मेरित है। मासे गानों को तो बाब निमित्से मृत्यु-मयके ऊपरसे पाप पणिक पैराग्य प्रास होकर, उसके विशेष कार्यकारोए मिना दी, बपि नाश हो जाती है। मात्र किसी किसी चारपान अपना सुषम-गोपी पाम्पुकमा जीवको दी उस भयक उपरसे अविनाशी नि प्रेयस पदके प्रविवि होती है। मृत्यु-मप होता, तो मी परि मृत्यु नियमितरूपसे परावस्पामें ही प्राप्त होता, तो मी मितने पूर्णमें विचारपान हो गये, उक्ने न होते; मर्यात् सरावस्थातक तो मत्यु-मय है ही नहीं, ऐसा समझकर मार प्रमा सहित दो पाति करता । मृत्युध मास मागमन देसकर, उसका वनियक्रुमसे वागमन देसकर, इस प्रसगके प्रप्त होनेपर स्वमन बादि सबसे वपना बरक्षण देसकर, परमार्पक विचार करने में मप्रमचमान हीरतकर माम हुआ है और समग महितकार माम मा । विचारपान पुरुषों को यह निश्चय निसन्देह सत्य है-पीनों का सप। मर्ममात मका त्याग कर विचारपानको बसगमान- प्रस्पयो मेद करना चाहिये। पनि इस ससारमें इस प्रकार के प्रसंग नामा करते, बपनेको वपना परको रेसे प्रसोका बासि रिसाई दी होती, मशरण आदि मात्र न होता, तो पलिपम्के मुस-सापनकी मिन प्राप ए मी म्यूनता न पी पेसे भोपमदेव बाद परमपुम्प, और मरत जैसे परत वादि उसका स्पा पाग करते ! एकाठ भसगमालका किस कारणसे सेवन ते! रेवार्य मामेकर बादि ! पपा विचारको म्यूनता के कारण, पुत्र बादि मालकी कापना और मुभमके कारण तुमें कुछ मी विशेप से प्रास होना समन है, तो मी उसका दोनोको फुस मी हितकारी फळ म होनेसे मात्र बसमग विचारके बिना किसी दूसरे पापसे हितकारीफ्ना माही , ऐसा विचारकर होते गए सेदको यथामति विचारसे शानो पुरुपों के पचनापक्से, पपा साधु पुरुपके भानप समागम बारिसे वौर निरपिसे पसंत करना हो तम्प है। ५९५ महमपी तिवाय म्पेष्ठ मुदी र शनि १९५२ निस दसे मात् शापरिक रोगनिशेषके करण तुमारे निपम छट पी, र रोगविशेष यता है, इस उस को प्राण भरते हुए महाका मग अपना भतिभम ऐना समय माँ । क्योकि पाप निपम उसी प्रकारसे प्रारंभ मा था। यही कारणविरोष होनेपर मी परिचपनीमसे उस घटका माण करना हो तो भाका मग अपना बतिक्रम रोना संमा। सर्व प्रकारफे बारम तथा परिबके सभके मध न करने के लिये समर्प बमवर्ष परम सावन है।
पत्र ५९६ ५९.] पिरिम पत्र मावि संग्रह-२९पाँव ससारका मो बशरण मादि भाव मिसा है मह पयार्य है। पैसी परिणति बसा ये तोही नौय सरकार पराम्पको पाकर निजस्वरूप-धानको प्राप्त कर सकता है। मी कमी किसी निमिवसे पैसे परिणाम होते है, परन्तु उनको मिस करनेवासे सग-प्रसगमें भीवका निवास होनेसे बह परिणाम असा मही यता, और ससारके प्रति ममिरुचि हो जाती है । इससे मत परिणतिक इच्छापान मुमुक्षुको उसके लिये निस्प समागमका भाग्य करनेकी परम पुरुपने शिक्षा दी है। जबतक चारको र सयोग प्राप्त न हो तबतक कुछ मी पैसे वैराग्यको वापारफे हेतु तथा अप्रतिका निमिचरुप ऐसे मुमुक्षु बनका समागम तपा सत्शामका परिचप करना चाहिये । दूसरे सग प्रसंगसे र गनेकी गारम्बार स्मृति रसनी पाहिये, और उस स्पतिको प्राचिम्म करना चाहिये- पारम्बार चीन इस वातको भूग नाता है, और उससे इच्छित सापन क्या परिणामको प्राप्त मही करता । ५९६ बबई, दितीय पेष्ठ बदी ६ गुरु १९५२ 'वर्तमान कामें इस क्षेत्र निर्माणको प्राप्ति नहीं होती, ' ऐसा मिनागममें कहा है मौर वेदात बादि दर्शन ऐसा करते हैं कि इस काम में इस क्षेत्र निर्माणको प्राप्ति हो सकती है। पर्तमान काळमें इस क्षेत्र से निर्वाणको प्राप्ति महीं होती, इसके सिबाप दूसरे मी मदुतसे मानोंका मिनागममें तथा उसके बाभयसे लिसे गये पाचापोशरा रचित पात्रोंमें विमा बाहै। केवग्यान, मन पर्पज्ञान, विज्ञान, पूर्वहान, यपात्यात चारित्र, सूक्ष्मसापराय चारित्र, पविारविधि पारित, क्षायिक समक्ति और पुछाकम्धि ये मान मुसापसे विगो माने गये है। वर्तमान कामें इस क्षेत्र मामार्पको कौन कौम मुम्न्य भूमिका ठहर अधिकारीको मास से सकती है, और उसके प्राप्त होनेका क्या मार्ग है।' इन प्रभोके परमापके प्रति विचारका स रपना। ५९७ बमई आपात मी २ रवि १९५२ मान किया मोर भफियोग पत्पुके साप मिसको मित्रता हो, अपना पापुस मागकर गोष्ट सम्वा, भपका ' में नही महेंगा' ऐसा मिसे निषय हो, वह मसे ही मुखपूर्वक साये-(पीतापंकर-एह जीपनिकाप मप्पयन)। पान-मार्ग कटिनवासे वापान करने योग्य है।परमावगा-या पामेके पहिले उस मार्गस युव होनेके वनेक स्थान है। संदर, विकम्प, सन्ता, बतिपरिणामाम्ना श्यादि कारण औषको बारपार उस मार्गसे पुत रोनेके हेतु होते है, अपना पे हेतु ठम् भूमिका प्राप्त मही होने देत। किपा-मार्गमें बसद् बमिमान, म्यबहार आमर, सिदि-मोर, पूग सकार मारि योग, और दैहिक-चिया वारमनिष्ठा मा-िदार संमद हैं। किसी किसी मामाको शेषकर बाकस विचारपान गोंने उम्ही कारणामे मार-मार्गका मीमद् पमपान [पत्र ५९८ भामप लिया है और वादायितमात्र नपा परमपुरुष सममें सर्पिण-स्वाधीनमारको सिरसे बदीप माना है, और जैसे ही प्रवृत्ति की । शिा सा योग प्राम होना चाहिये, नही तो बिसच्चा चिंतामणिके समान एक एक समप है, एसी मनुप्प-दोका उम्टा परिभ्रमणको सानिका ही देशोना संभव है। ५९८ । भी के बभिप्रापपूर्वक तुम्हारा मिसा वा पत्र तपा मी का लिसा मा पा मिम है। भी के पमिप्रापपूर्वकी ने लिसा कि नियम बौर म्पबहारको अपेपासे ही जिनागम क्या वेदात भाटि दर्शनमें वर्तमान काम्में इस क्षेत्रस मोक्षका निपप तपा विमानका कहा माना समय है- पर विचार विशेष अपेक्षासे यपार्थ दिखाई देता है और "ने लिप्सा है कि वर्तमान कायमै सघपण भारि के होन पेनेके कारणसे केवमानका जो निषेष किया पर भी अपेक्षित है। यहाँ निरोपापक क्षमें मानेके सिपे गत पत्रके प्रश्नको जव स्पररूपसे विभवे जिस प्रकार मिनागमसे केपमानका बर्ष वर्तमानमें, वर्तमान नसभा में प्रचमित है, उसी तराका उसका नर्व में यथार्थ माश्म होता है या कुछ इस वर्ष माश्म होता है ! सब देश का मारिका जान फेवणानीको होता है, ऐसा मिनागमका वर्तमानमें सरि-वर्ष। दूसरे दर्शनोंमें या मुस्पा नही और मिनागमसे पैसा मुस्म वर्ष होगों वर्तमानमें प्रचलित है। परिबर्दा गाना मर्थ हो तो उसमें गतसा निरोप दिखाई देता है। उस सबको पो मिल सकमा नहीं बन सकता । तपा बिस बिरानको विसाद उसे भी विशेष विस्तारसे मिसमा नहीं बना । मोंकि उसे यपासर हो मिसना पोप मास होता है। जो मिसाप उपकार पिसे सिसा, यह म रमना । योगघारीपना वर्षात् मन पचन वर कापासहित स्थिति होनेस, वार वादिके लिये प्राचि हाते समय उपयोगातर हो जानसे, उसमें कुछ मौ पतिका बर्षात् उपयोगका नियम ऐना समग है। एक समयमें किसाको दो उपपोग नहीं यते गा या सिद्धांतो तो महार बारिकी प्रवृत्तिके उपपोग- में यता मा केपमानाका उपयोग के मानकोपक प्रति राना समय नही और यदि ऐसा होतो केवमानको मो बालित कहा है प प्रतितावा माना जाप । पहाँ कदाचित् ऐसा समाधान करें जैसे दर्पणमें पदार्थ प्रतिविम्मित होते है जैसे ही फेषमानमें सर्प देश का प्रतिनिमित्त होते वया केवलाना उनमें उपयोग मगाकर उमें जानता है पर बात नहीं है किन्तु सहर समापसे ही के फार्य प्रतिमास्ति मा करते है, इसम्मेि भाहार मारिमें उपयोग यते ए सहन स्वमारसे प्रतिमासित ऐसे फेवनानका मस्तिव यपाप है तो यहाँ प्रभ । सकता है कि दर्पण, प्रतिमासित पदार्यशा बान दर्पणको नही पता और पाहो तो ऐसा कहा है कि केपणानाको उन पाका शान होता है। पा सफ्पोगके सिमाप मामाका ऐसा कौनसा दूसरा स्वरूप है कि बन पाएर बारिमें उपयोग यता हो तब उसने समानमें प्रविमास्ति होने पोम्भ देयको मारमा बान सके ।
पर ५९९१.] विविध पत्र मावि मप्रह-२"पों पर परि सर्व दा फास भारिपा हान बिस बसीफो हो उस कास्ट्रको सिद' मानें तो यह समय माना जा सकता, क्योंकि उस योगधारीपना नहीं कहा। किन्तु इसमें भी यह समझना चाहिय किमिर मी यागपारीको अपेक्षासे सिदमें से केवधानको माम्यसा हो तो यागरहितपना हानसे उसमें सब देश काय आरिफा बान समय से सकता है-तना प्रतिपारन फरमक डिपही यह लिम्मा है, किन्तु सिदको बैसा बान होता ही है, इस अर्यका प्रतिमान फरनके लिय नहीं लिसा । यपरि मिनागमके म्की-मर्पक बनुसार दखनेसे तो 'देहधारी करछी' और 'सिद' में केवख्यानका मे नही हाता-नोंको ही सर्प दश काल वारिका सम्पूण धान होता है, यह रुदी-मर्य है । परन्तु दूसरी अपेक्षासे बिनागम देसनेसे कुछ मिम ही मादम पाता है। मिनागममें निम्न प्रकारसे पार देसनमें भाता है "केवरधान दो प्रकारका कहा ह–सपोगीमवस्थ-केवउझान भोर भयोगीमपस्प-केपटान । सपोगी केवलज्ञान दो प्रकारका कहा है-प्रयमसमप अर्थात् उत्पम हानेक समयका सयोगी वेबनान, और अपमसमप अर्पात् पयोगी होनेक प्रमश समयके पहिलेका काठशान । इसी वर पोगीमत्रम्प फरहान मी दो प्रकारका पहा है-प्रथमसमपका फेवनान आर वप्रथम अर्थात् सिम होने पहित अन्तिम समयका कपडान । स्या- प्रफारमे करसवानके मे बिनागममें को है, उसका परमार्थ म्या पाना चाहिये । पापित् यह समाधान करें कि बान कारणकी अपेशामे मगलनानक ये भेट बताये ई, तो यहाँ पसी शका हो सकती है कि वहाँ पुग मी पुरपार्थ सिर म होता हो, और जिसमें विफम्पस अबकाश म हो उसमें भ' फरनेकी प्रवृत्ति बानी बबन ममा नदी है । प्रपमममय-ऐक्सशन और मप्रथमममप पासवान इस प्रकारफा भे फरमेमे पफरमानका तारतम्य पता बता दोवाइ भेद समय, परम्नु तारतम्पमें तो सा होता मही ताहिर मा परनेका स्पा पारण..!-पाभि पहा हाते हैं, उनक उपर भीर प्रथम पत्रके उार पधादि विपार करना चाहिय । हेतु भरतम्य ! पप रिस तरह पर्पवमान हा सरना अपग दादी नहीं। परदासपना की पमा पा किमी हग सिर दाताहै। ६०० समिनि-भानामी-पार 7 उमा समान' उमर पथात् मागेरगरए प्रति मोमगर मानिस नियम पर्नमानमें (P) मि तद प्रति परना उचित है।
भीमद् पाषाण ६०१ वानों काम मा बस्नु नायतर न हो, उसे ग्रीनिन दम्य करते हैं। कोई मी दम्प पर परिणामसे परिणम्न नही करता-अपनेपनका पाग नही कर सकता । प्रत्येक प्रम्प (ब्रम्प, क्षेत्र, काठ, भानसे ) स-परिणामी । पदमपत बनादि माशम्पसे यता है। गो बेतनी रकमी भवेतन नहीं होता, नो अचेतन है पाकमी रेतन नहीं होता। ६०२ हे माग, ६०३ चेन्नई उत्पपिक कुछ मी सांग रिसाई नहीं देते, इस कारण तम अनुपम है। उप्स पतनके नाश होने का ई बनुमक नहीं होता, इसचिप र नविनाशी निस्प बनुभषस्तत्म होनेसे पा नित्य है। प्रति समाप परिणामांतर प्रास करनेसे वह बनिस्परे। नियमानमा स्पा करनेके लिये मसमर्प होनेसे का मूड दम् ।। ६०४ सबकी अपेक्षा पौवाग वचनको सम्पूर्ण प्रतातिका स्पान काना पाप है, पोंकि गाँ राग बानि दोषो सम्पूर्ण रुप हो वहाँ सम्पूर्ण जान-ममान निपम प्रगट होने पोम्प है। माधिनको सबकी अपेमा उत्तर गोवरगवा होना समन ।। उनके पचन प्रस्प प्रमाण इसलिये जिस किसी पुस्पको मिल्ने जप्समें बौतरण समय है, उतने बछमें उस पुरुषापाम माननीय। स्पस बार दर्शनाम बंध-मोनको मो मो म्पारमा सो उससे प्रपा प्रमाण सिम्पासा भौदिन बीतामने कहा है ऐसा मानता है। शा -मिस मिनमगवान्ने रेतका निरूपण किया है बामात्र सर मम्मका तय बताया है, का मोय करा और मोहम्प समारिके बतयपमें मुसम कारण हो ऐसी पार्षकी माम्या का है उस दिनमगवान्को शिक्षा प्रबक प्रमाणसे Ra। ऐसा कैसे खा जा सकता है। के भीत भौर सहन पम्प समाविक कारणमूल ऐसे मेदान्त वारि मार्गका उसको अपेपा मम्म हो विशेष प्रमाणसे सिद्ध होना समय है। उपर.-एक बार से हम यते हो से परि मान भी हैं, परन्तु सप दर्शनोंको शिक्षाको पत्र ५,६ विपिप पर मादि संप्रा-२५ वर्ष अपेक्षा दिनमगवानकी कडीई पब मोझके मरूपको शिक्षा नितनी सम्पूर्ण प्रतिमासित होती है, उतनी दूसरे दर्शनोंकी प्रतिभासित नहीं होती, और यो सम्पूर्ण शिक्षा र यही प्रमाणसे सिद्ध है। शका -परि तुम ऐसा समझते हो तो किसी तरह मी निर्णयका समय नहीं मासकसा, स्पोंकि सब दर्शनोंमें, जिस निस दर्शनमें निसको स्पति है, उस उस दर्शन के लिये सम्पूर्णता मानी है। उचर –पदि ऐसा हो तो उससे सम्पूर्णता सिद्ध नहीं होती, जिसकी प्रमाणारा सम्पूर्णता रो पहा सम्पूर्ण सिख होता है। प्रम-मिस प्रमाणके द्वारा सुम बिनभगवान्की शिक्षाको सम्पूर्ण मानते हो, उस प्रकारको तुम कहो; धार निस प्रकारसे भेदात मादिकी सम्पूर्णता हमें समव माश्म होती है, उसे भी कहो। - ६०५ मात्यक्षसे अमेक प्रकारके दुखोंको देखकर, दुसी प्राणियोंको देसकर तथा जगतकी विचित्र रचनाको देखकर, से होनेका हेतु क्या है। उस दु सका मूळम्मरूप क्या है और उसका निधि किस प्रकारसे हो सकता ह! तया जगत्को विचित्र रपनाका क्वसम्बप क्या । इन्यादि मेदमें मिसे विचार-यशा उत्पम है ऐसे मुमुक्षु पुरुपने, पूर्व पुरुषोशरा ऊपर को हुए चारोंसबरी जो पुरए अपना समाधान किया था क्या माना या, उस विचारफे समाधानके प्रति मी ययाति भाठोधमा की । उस पासोचना करते हुए विविध प्रफारके मतमतांतर तपा अभिप्रायसाची यया- शील विशेष विचार किया । तया नाना प्रकारके रामानुन गादि सम्प्रयोंका विचार किया। तथा वेदान्त वादि दर्शनका विचार किया । उस बालोचनामें बनेक प्रकारसे उस दर्शनके सरूपका मन किया, और प्रसग प्रसगपर मपनकी योग्यताको प्राप्त ऐसे मैनदर्शनके सवधर्म अनेक प्रकारसे जो मपन हुआ, उस मपनसे उस दर्शनके सिर ऐनक लिये, जो पूर्वापर विरोध जैसे माइम होते है, ऐसे मारे किसे कारण Pाई दिये। ६०६ धर्मास्तिकाय, बधर्मास्तिकाय और वाफाशास्तिकापके नापी होनपर भी ये कपी पार्षको सामर्प प्रदान करते है, और इन तीन दम्पोको समाबसे परिणामी कहा है, तो पे पापा ऐनपर मी ममीको कैसे सहायक हो सकते हैं। धर्मस्तिकाप और मपर्मास्तिकाप एक क्षेत्र मगाही, और उनका समाव परस्पर विरद है, फिर भी उममें गतिशील परके पति स्पिति-सहायतारपसे भौर स्थितिशील बस्तके प्रति गति-सहा- पतालमसे पिरोप क्यों नहीं जाता। बस्तिश्प, अपर्मास्तिकाप और एक भामा—ये तीनों बसपात प्ररेशी है, इसका क्या को सप हो यस्प। पर्मास्तिकाय नपर्मास्तिकापका बरगाहना अमुफ साकारसे-ऐसा होने में क्या पुछपस्प है।
भीमद् रामचन्द्र छोकसम्यानके सा एक स्वरूपस यनेमें क्या कुम रम्प है ! एक ताय मी घर-बर नहीं होता, ऐसी बना स्थितिको किस कारणसे मानना भाहिये ! घामतता पाल्या क्या है। पारमा अथवा परमाणुको कदाचित् शाहलत मानमेमें मूस बम्पर कारण है। परन्तु तारा, पन्द्र, मान जादिमें मेसा क्या कारण है। ६०७ सिम-पारमा छोकाडोक-प्रकाशक ह, परन्तु ठोकासोक म्यापक नहीं है, म्यापक तो वपनी ब- गाहना प्रमाण हो?-जिस मनुष्य से सिरि प्राप्त की, उसका तीसरा भाग कम पन-प्रदेशाकार है। बर्मात् बारमत्रम्प सोकागेक-म्पापक नहीं, किन्तु मेकासोक प्रकाशक वर्थात् छोकासोकशापको। मेकामेकके प्रति वारमा नहीं चावी, मोर अकाडोक मी बारमामें नही वाता, सब अपनी अपनी वगाहनामें अपनी अपनी सासे मौन्द है, पैसा रोनेपर मी भामाको उसका बान-दर्शन किस तरा होता। महाँ परिपत पिया बाय कि किस तरणमे मस्तु प्रतिविम्मित होता है, से हो बामा मा मेकाशक प्रकाशित होता है-प्रतिबिम्बित होता है, तो यह समापान मी पविरोधी Pसई नहीं देता, क्योंकि वर्षममें तो विससा परिणामी पुनमाशिसे प्रतिबिम्ब होता है। बामाका भगुस्सषु धर्म रे उस भर्मक देखते हुए आरमा सब पापको मानती है, क्योंकि समस्त दम्पोंमें बगुम्म्मु गुण समान है--ऐसा करने वाता है, तो वगुरम्भु धर्मका क्या वर्ष समयमा चाहिये। ६०८ वर्तमान कामकी वय या अगत् सर्मका में है। म पूर्णकालमें न हो तो वर्तमान कामें मी उसका मस्तिस्य न हो। परबतमाम में है वो मनिप्यका मी उसका भरपत नाश नही हो सकता । पदार्थमा के परिणामी हानेसे यह संगत् पप्पान्तररूपसे परिगोचर होता है, परस्त मूह. समावसे उसकी सही विमानता है। ६०९ मो बस्तु समयमाके ठिये है, पसंकायके लिये है। यो मात्र ए मौज्दा जो माल नही मौगद नहीं। रो प्रकारका पदार्थ समान लिमाषपूर्वक पर दिखाई देता है सासमान वर चेतन समार। ६१० गुणविशपता किसे करते है। उसका किस तरह मारापन किपा जा सकता है! मित्रानमें विशपता क्या है! वीर्षफरमें अतिशयता स्पानिपत क्या है।
पर ५११, ६१२ ५१३] विषिष पन मादि संप्रह-२५ वर्ष ४१७ यदि दिनसम्मत केसहानको मेकाोकनायक मानें तो उस फेवमहानमें भाहार, निहार, विहार वादि क्रियायें किस सपो सकती है। पर्तमानमें उसकी इस क्षेत्रमें प्राति म होनेका क्या है। ६११ मति, श्रुत, अवधि, मन पर्पर, परमावधि, केस , . ६१२ परमावधि धानके उत्पम होने के पश्चात् केपलधान उत्पम होता है, या यस्प विचार करने पाम्प है। बनादि वनत काका, बनत वोकका गणितसे मतीत अथवा वसंपावसे पर ऐसे चीन समा, परमाणुसम्र के धर्नत रोनेपर ममतपनेका साक्षात्कार हो उस गणिताततपनेके होनेपर-साश्चात् मनतफ्ना किस तर नाना ना सकता है ! इस विरोषका परिवार उपर कोए यस्पसे होने योग्य मागम होता है। तपा केपमान निर्विकल्प है, उसमें उपयोगका प्रयोग करमा पाता नहीं। सहन उपयोगसे । पर शान होता है। यह यस्य मी विचार करने योग्य है। क्योंकि प्रथम सिर काम है। प्रथम बीम-पर्याय कौनसी है। प्रथम परमाणु-पर्याप कौनसी है। यह केरमान-गोपर होमेपर मी मनादि ही मारम होता है। वर्षात् फेब्वान उस भाको मही प्राप्त बौर केवमानसे कुछ छिपा मा मी नहीं है, ये दोनों पाते परस्पर विरोधी हैं। उनका समा- पान परमारपिके विचारसे तया सहन उपयोग के विचारसे समझमें जाने योम्प रशिगोचर होता है। करता, ६१३ कुछ मी है। क्या! किस प्रकारसे है। क्या यह मानने योम्प है। जाननेका फल क्या है। मयका तुपा है। बंध पुरके निमिवसे हैमपणा सारके दोसे है! मिस प्रकार से समझते उस प्रकार बम नहीं टापा बासमता, पेमा सिर वापसम्पेि मोस-परफी नि होती है। उसका नातिय यरता है।
भीमद् रामचन्द्र [पा १४ अमर्तता कोई वस्तु है या माता । पर्वता यदि कोई वस्तु है तो या कुछ स्पो पा नहीं' मूर्त पुलका और बमल गानका संयोग कैसे हो सकता है। धर्म अधर्म और बीच ब्रम्पका परम्पापिस मिस प्रकारसे मिनमगवान् करते है, उस प्रकार माननेसे वे दम्प उत्पम-समानीको तय सिर होते हैं, पोंकि उनका मध्यम परिणामाफ्ना है। धर्म वर्म और बाकाम इन पदार्पोको द्रम्पम्पसे एक गति, और गुणरूपसे मिम मिय नाति मानना ठीक है, अपना दम्पसको भी भिम मिम मानना ही को। मम्य किसे करते हैं। गुण-पर्यापक बिना उसका दूसरा क्या सहम है। करणान पछि सर्व दम्प, क्षेत्र, हा मालका सापक परे तो सब वस्तुएँ निफ्त मर्यान में या नाप-उनकी बनतता सिब न हो क्योंकि उनका अनंत-अनादिफ्ना समझमें मही माता वर्षात कपमानमें उनका किस रीतिस प्रतिमास हो सकता है। उसका विचार बयार ठीक कामही बैठता। बनदर्शन रिसे सप्रिकाशकता करता है, मेदान्त उसे साम्याफ्कता करता है। रए पसके ऊपरस पाएका विचार सोग करने योग्य है। बिनमगवाम्के बमिप्रापसे आRमाको स्वीकार करनेसे पहा बिते हुए प्रसंगों के उपर गमिक विचार करना चाहिये १ असम्सात प्रदेश मूह परिमाण २ सकोप- विसबाग जो मामा स्वाधर को, यह संकोचलिनस क्या मरूपा होसकता सपा पर किस प्रकार हो सकता है! १ निगोर मास्थाका क्या कुछ विशेष परण है। १ स इम्म क्षेत्र बादिकी नो प्रनाराकता है, बाहमा ल्प केवमान-स्वभावी, या निक- सहममें स्थित निमहानमय दो केवमाम है। ५ वामा पोगसे विपरिणाम है, स्वमानसे परिणाम है। लिपरिणाम बामाको । सता है योगी सता। उस सपाका नसा दम्य मूग कारण। ६ चेतन मारिक मास्पाको मास में, उसमें क्या कुछ विशेष कारण है। निन स्मारका। पुद्रक स्पोगच बपना उससे कुरा मिन हो। ७ निस तए मोम-पदमें बाममात्र प्रगट हो उस तर मग इम्म मानें, तो मारमा रोक म्पापक-प्रमाम न होनेका क्या कारण है। ८ बान गुण और महमा गुमी है इस सिातको अग्रते हुए बामाको बालसे कपंचित मिन सि मपेवासे मानना चाहिये । पालमासे अपना पकिसी गुगका मफेवासे!
पत्र १.६१५६१०१८,१११] विषिष पत्र मादि संप्रह-२९ौ पर्व
९ मध्यम परिणामबाग बस्तुको निन्यता किस तय संभव है।
१० गुद चेतनमें अनेककी सयाका भेद कैसे परित होता है।
६१५
सामान्य चेतन
सामान्य पैतन्य
विशेष चेतन
विशेष चम्प
निर्षिशेष चेतन
(चैतन्य )
सामाफि बनेक बारमा ( चौब )-निर्मन्प
सोपाधिक अनेक वास्मा (जी) वेदान्त
पभु अप्राप्यकारी
मन अप्राप्यकारी
घेतनका बाम बागमन (गमन न हामा)
६१७
बानी-पुरुषों को समय समयमें बनत सपम परिणाम दिगत होते हैं, ऐसा नो सर्वधने कहा
पा सम्पहै। सयम विचारकी तीपण परिणतिस तथा प्रमरसके प्रति स्थिरता करनसे उत्पम होता है।
६१८
घीवार्यकर आत्माको संकोच-विकासका भाजम यागदशा मानत है पर सियात विशपम्पसे
विचारणीय है।
६१९
बई वापर पुदी १ मौम १९५२
मंगेपनी जुक्ति ता सपै भागिय, समीप रो पपा शरीरनो नहीं सग ना;
एकति पसई रे, एकम आसने, मम पर ता पर भमनपो मंग ना ।
मोपरगी भषय सापन कर।
१मम (रासिक पूमनेवाले गमान वर्ग ) सादुमा सोमना गानो ममम
गनपर मी उपरता संग नही गया । परनु जो पाहिएतमें एक ही माननार रेग्ना पारिये
पर भून पिता मम्नमें गया ना उमा है। माप, म बाप उन फोनस नापनी
सीम !
भीमद् रामचन्द्र [पा २ ६२० बमाई बापाल पुदी ५दुध १९५२ - . प्रभ --'मौसामान के बपनामृतम बामस्वरूपके साप महर्निश प्रत्यक्ष मगवान्की मति करमा, और उस मकिको स्पर्ममें रहकर करना इस तब भगा जगह मुसहपसे बात भाती है।मा पदि सपर्म 'धम्का बर्ष बामस्वमान' वा 'वारमसल्स' होता हो तो फिर स्पर्मसहित मणि करना, यह बने क्या कारण है!' ऐसा वो तुमने मिसा उसका उत्तर पाँ मिसा है उत्तर -सपर्ममें यकर मछि करना ऐसा मो कहा है, स्वधर्म शम्फा वर्ष वर्णाममबम है। निस मामण वादि वर्णम देो उत्पम हुई हो, उस वर्णकी मुति-स्पतिम को हुए मर्मका बावरण करना पाहवर्णधर्म और प्रमचर्य मादि बाममके क्रमसे आचरण करने यो मर्यादा अति स्पतिमें की गई। उस मर्यावासहित उस सस वामममें प्रति करमा, पह बाबममर्म है। प्रापण पत्रिप पैश्य गौर शह पे चार वर्ण । तपा समचर्य, ग्रहस्प, वानप्रस्थ और सम्यस्त पे चार वामम है। प्रमण वर्णमें वर्ण-धर्मच आचरण इस तय करना चाहिये, ऐसा मो मुति-स्पतिमें करा , उसके अनुसार प्राधण भाचरण करे तो पतधर्म कहा जाता है और पPिउस प्रकार बाबरण न करते हुए पक्षण, सत्रिय वारिके वाचरण करने योग्य पर्मका बाचरण करे तो पा परपर्म कहा जाता है। इस प्रकार निस बिस वर्णमें देह पारण की हो, उस उस वर्णको अति- स्पति को ए धर्मके अनुसार प्राति करना या सधर्म का नाता है और पीसरे वर्णक धर्मका वाचरण किया जाय तो यह परधर्म या जाता है। यही मात भाममवर्म विषमें मी है। जिन वर्णोको इति-स्मृतिम मचर्य मादि वामम- सहित प्राति करने के लिये कहा है उस वर्णमें प्रपम चौमास पर्षतक गहस्पामममें पना तापवाद कमसे मानप्रस्प जोर स्पस्त वामममें बाबरण करना इस तरह बासमका सामान्य क्रम उस उस नाममम माचरण करमेश मर्माहाके समपर्म परि कोई दूसरे बाबमके माधरणको प्राण करे तो का परधर्म या जाता है। और यदि उस उस नाप्रममें उस सस वामम धर्माय बापरण करे तो पतपर्म कहा जाता है ।म तय वेदाभित मामि वर्णाममधर्मको सधर्म कहा है। उस परम धर्मको हो सब शप्पस समझना चापपे, मर्यात् सहनात सामीने महापर्वाममधर्मको सधर्म पादसे कहा। मतिपपान संप्रदायों में प्राप भाप्रति करना मर्म है ऐसा प्रतिपादन कप परन्तु पो ग्स ममि सपर्म शब्दको महा करा। स्पोकि मटिका समर्ममें पकर ही करना भारिपे ऐसा माहै। इसलिप सधर्मको मुशरूपसे रण किया है और उसे वर्णाबमबमक ममें होमण किया। चौरका समर्म मलि पर मवाने मि तो मतिसम्म बालेषित् होइन संप्रदायोंमें मपर्म शमका प्रयोग किया गया और मामामानन्दक वचनामृतमें मजिके बदले पर्म र सं-पापासे मी प्रयुक्त मही प्रिया, छोरो मापनमापार्यने तो या प्रयोग किया। है पत्र १२१, २२, ६१५] विविध पत्र मादि प्रह-२९पो वर्ष ५०१ ६२१ बई, बापान बरी ८ रवि १०५२ समाके द्वारा नो स्वयंभूमण समको विर गया, तेरत है भार नैरंग, चन सत्पुरुपोंको निष्काम भक्सि पिकास नमस्कार । एक पारासे वेदन करने योग्य प्रारम्बके सहन करते हुए, कुछ एक परमार्थ म्यबहारम्प प्रति त्रिम जैसी सगती है, मार उन कारणोंसे पॉपमात्र मी नहीं टिम्माधिको यो सहन ही अबसरन है, उसे खीम एनसे आर्तमान होगा, ऐसा जानकर उस दयाफे प्रतिबरसे इस पाका रिमाई । सूक्ष्मसगम्प और बायसगमप दुस्तर स्वर्पममण समुद्रको गो वर्षमान मा पुरुष मुगासे तिर गये है, उन्हें परममधिमे नमस्कार हो । प्युत दामफे भपफर स्पानको सावधान रहार, तपारप सामर्प विस्तृत करक निसने सिसिको साधा है, उस पुस्पायको पार करके रोमापित, मनंत और मौन ऐसा माधर्प उत्पम होता है। ६२२ प्रारम्पम्प दुस्तर प्रतिबध रहता है, उसमें कुछ सिना अपना कहना त्रिम असा माश्म होता है, और उससे हमें पत्र आदिको पाँचमार मी नही लियो। बातस पत्रोंफे शिये पैसा ही माद, इस कारण चित्तको सिप म्पापुलता होगी, उस विचारम्प दयाके प्रतिबधसे यह पत्र टिम्मा है । आरमाको जो ज्ञानसे पठायममान पर डाले, ऐसे प्रारम्पका पन फरत दुए एसा प्रतिबंध उस प्रारम्पके उपकारका हेतु होता है, भौर किसी किसी पटिन अपसरपर कमी ता बह मामाको मुबानके मन करानताका स्पिनिको प्राम करा दता है, पेमा समझकर, उसम सरकारी आचरण फरमा योग्य है। यह विचारपर पत्र बारिकी दप मही rिi उसे क्षमा परनको मप्रता सदित प्रार्थना है। भहा । जानी-पुपका भाप, गेमारता, धारर और उपयम । महा 1 !! बारम्बार मो! ૬૩ बम्ई भाल१५माम १.५२ तुम् सपा मरे सिमा समुपासको निष्टा भाईपोका इमार उपागमको अमिण फरता है, पद बात माननेमें है, परन्तु उम तिपक अमु कारले विरार फाने र प्रति मी दी। प्राप पित मा रहा करना किदार अरिक मागम मी र मुम्ने पोप ा मही । प्रथम दोन प्रसारका रिपार हा बरला पा, भार वारिपार अमि धरमर गगाया। नु उपशम ममम माइयोन ममागम होना प्रमग मा निमे पर प्रराम प्रतिर हान 'रमा ममता पा, और दामें कुछ मी मामा मागम हा है। वर्तमान म र गुमना प्रवित होने देने पम्प मना मुघ ममति नदीपा गगन पुण् पुण्य पाना ति।
भीम रावत [पत्र १४ इस अम्मामें गुणका विशेष प्राकट्य समझकर, तुम सम किन्ही मुमुक्षु मईयोंको मलि रहा हो an मी उससे उस मकिकी योम्पता मेर पिपपमें समय है, ऐसा समझने की योम्पा मेयै नहीं। पही एक प्रापना कर देना योग्य है कि इस मामामे तुमे गुण प्राष्ट्रप भासमान मार उससे अलरमें मवि पती हो तो उस मतिका पपापोग्य विचारकर बैस में योग्य माश्म पेसा करना पाप है। परन्तु इस मारमा सवपमें हमें बाहर किसी प्रसगको पर्चा दाने देना योग्य नहीं। क्योंकि बधिरविनप र प होनसे गुणका प्राकट्य हो, तो भी बह होर्गोको भासमान हाना कठिन पो, भौर उससे उसकी तपना हानेका कुसमी कारण होना संभव है, तथा इस भामाश महापुरूपके प्रमका सान करनके समान कुछ मी प्रइटिका समक्षा बामा समय है। ६२४ नई भाषण मा ५ शुक. १९५२ १ प्रभ ---दिनागममें धर्मास्तिकाप भारिप बम्प को गये है, उनमें शाहको मी इम्प या भीर अस्तिकाप पाप करे, कासको अस्तिकाय मही कहा-सा स्पा कारण दोमा चाहिये । कदाचित् कासका भम्तिमाय न करनेमें यह हेतु सकता है कि भर्मास्तिनप भारि सके समान और पुपु-परमाय भी वैसी ही यापनानाग इम्प है, बार का पैसा मही है। मात्र एक समयप है उससे पाठको अस्तिकाप नही कहा | पहाँ ऐसी आशंका होता है कि एक समपके पार मारि ताम0 इस तरह समपा पारा चल्ती ही रहती है, और उस पारा, बारमें भामाशा मही हाता उससे एक दूसरे समपका सपा अपना समहामकपमा ऐना समा ६, जिममे का भी अम्निमप या गा सकता है । तपा सका तीन पटका हान हताहै ऐसा जो फदा., उसम भी ज्मा माइम हाना कि सत्र काम-सम्ह ज्ञान-गावर दाता , और सर्व सम्र बान-गापर EPIतारका अनिकाम हाना समर ह, भर बिनाभम उसे अस्तिथा माना मही। उत्तर -निगम पर पगा है कि पार भागरिकम्प सामागम मही। जापौ+ निकायमा मुग्पमपम उन बर्नमा नाम होकार है। उम वर्गमा मत नाम पप भी । म निराप पा समयय अमेयान प्रशा मन माझम हाता है पमै सार गम मप। माम नदी दाता । र गमप गरर मरतावर मरा समय राम बताRAमारा मामम माय मग गमकान ना मा जापरा: उमा गुम्प अप ताकि उई पटनगर tirn F THAT HAI नाम । कोईराला हा गया ICC मम में मरा भी मपामा1 है और भूमापा मागमा नही मला मी मार दाता मानतमानरानदीपा गार।
पत्र १२५ ६२१] विविध पम मावि संपा-२९यो पर्व ५०३ - - - सव मूतकारको ' उत्पम होकर नए हो गाने ' बार मावीकाठको, ‘भाग अमुक सय होगा'क रूपमें देखते हैं। परन्तु मूतकाळ द्रम्पमें समा गया है, धार मात्र काल सतारपसे सनिविष्ट है, दोनोममे एफ मी वर्तमानरूपसे मही है, मात्र एक समयरूप ही पर्तमानकाय यता है, इसम्मेि सर्वहको शानम भी उसी प्रकार भासमान होता है। से किसीने एक घलेको ममी देसा हा, उसके बार महसरे समयमें नाश हो गया है, मोर उस समप यह घोलपसे विषमान नहीं है, परस्तु देखनेवारको बह घड़ा जैसा था वैसा ही शानमें भासमान होता है। इसी तरह इस समय मिडीका कोई सिपाहुआ है, उसमेंसे थोड़ा समय बीतनेपर एक बड़ा उत्पम होगा, घानमें एसा मी मासमान हा सकता है, फिर भी मिसका पिर वर्तमानमें पुर घरपसे नहीं यता । इसी तय एक समयमें समसको निकास-मान होनेपर भी मर्तमान समय सो एक है। सूर्यके कारण मा दिन और रात्रिरूप काछ समझा जाता है, यह म्यबहारकाल है, क्योंकि सूर्य स्वाभाविक दम्प नहीं है। दिगमर कालके वस्त्यात मणु स्वीकार करते है, परम्म उनका एक दूसरेके साप साह, ऐसा उनका अभिप्राय नहीं है, और इससे उन्होंने कासको गस्तिकायमपसे स्वीकार नही किया । २ प्रत्यक्ष सासमागममें भादि पैराग्य भासि साधनसहित मुमुनुको, सहरुको आनासे दम्पा- नुयोगका विचार करना चाहिये । ३ श्रीवपतमीम मिनन्दम मगवान्की स्तुतिका प- डिसकर बो उसका बर्य पूरानापा है, उसमें—'पुरमभनुमव त्यागयी, करपी ज ४ परवीव '—ऐसा जो लिखा है, वह मूमपर नही है । मूलपर इस तरह है-'पुसमनुमप स्यागपी, फरगी नमु परतीत '- बर्यात् वर्ण गघ बानि पुनम्-गुणके अनुमबका बर्षात् रसका त्याग करनेसे, उसक प्रति उदासीन होनेसे, नस'वर्यास् जिसकी (वामाकी) प्रतीति होती है। . . ६२५ निस बनादिनीव बनादि है। पुस-परमाणु अनादि । बीब वीर कर्मका सबध बना संयोगीमानमें साम्प-अभ्यास-कोनसे मार सन्म-मरण बाशि मोका वनुमय करता है। ६२६ पाँच मस्तिकापनप छोक मर्यात् विश। बैतन्य पक्षण नीव है। वर्म, गंध, रस और स्पशयुक्त परमाणु है, पर समय सम्पमे नहीं, बिमानस | भीम पम्पन्न [पा ११.२८ ६२७ कॅम्मदम्मे सर्म, समोमी भी होई जीपस्स | सो पो गायमो, तस्स पियोगी मनमोक्सो । ६२८ बर्मा भाषण १९५२ पंचस्तिकायन सक्षित स्वरूप का मीर पुद्रस, धर्म वर्म बौर वाकाथ ये पाँच गस्तिकाप को जाते है। मस्तिकाप अर्थात् प्रदेशम्मरमक मस्तु । एक परमय प्रमाण अमूर्त वस्तके मागको प्रदेश करते है। जो पस्तु भनेक प्रदेशरमक हो उसे अस्तिकाप करते हैं। एक नीष पसन्यात प्रवेश प्रमाण है। पुद्र परमाणु पपपि एक प्रदेशात्मक है परहदो परमाणुमोंसे भगाकर अमात, बनत परमाणु एका दो सफत है । इस तब उसमें परम्पर मिम्मेकी अति पनेसे यह बात प्रदेशमा प्राप्त कर सकता है, जिससे पा मी वस्तिकाय को पाने पोग्य है। धर्म प्रम्प सम्मात प्रदेश प्रमाण, वधर्म व्रम्प बससात प्रदेश प्रमाण, और नाकाश इम्म भनत परेश प्रमाण होनेसे रे मी भस्तिकाय है । इस तर पोच वस्तिकाय न पाच बस्ति- कामके एकमेकल्प समानसे इस गेषको उत्पपि वर्षात् मेक इन पाँच बस्तिकापमय है। प्रत्येक गाव बससात प्रदेश प्रमाण है। चीन वनत। एक परमाणुके समान वनंत परमाणु ।।दो परमाणुओं के एक मिनेसे मनव रि-मणुकसा होते है, तान परमाणु के एकत्र सम्मिमित होनेसे बर्नव नि-मणुक स्कम ते ।।चार परमाणुमोक एका सम्मिमित हानेसे क्मत बार-गणुक स्कंग होवे । पाँच परमाणुगोंक एका सम्मिलित होनेसे बनव पाच-समुक कप होते है। इसी तय म परमाणु सात परमाणु, बाठ परमानु, नी परमान, दस परमाणु मोके एकत्र सम्मिलित होनेसे ऐसे बनत स्कर होते है। इसी तरह पाय परमाणुसे सौ परमाणु, पात परमाणु मसंम्पात परमाणु, तया बनत परमाणुषोंसे मिकर बभे हुए ऐसे मर्मत धर्म इम्म एक है, परस्पात प्रवेश प्रमाण कम्पापक है। अधर्म इप्प एका मी पर्ससात प्रदेश प्रमाण गेक-प्पापक है। भाकाश दम्प एक है, पजमा प्रदेश प्रमाम है, पोचम्पापकाक प्रमाण भागय समयात प्रामक है। बोरगाव प्रेम दोनेको र मार रोग होने मोमवे।
पत्र १२९] विषिष पर मादि संमा-१९ो वर्ष ५०५ फास द्रम्प इन पाँच बस्तिकार्योकी भर्तना पर्याय है, अर्थात् यह मौपचारिक दम्य है । वस्तुत तो यह पर्याप ही है। धौर पल अपडसे गाफर पर्षादि पर्यंत जो काल सूर्यकी गतिकी ऊपरसे समझा जाता है, मह म्पावहारिक काल है, एसा घेताम्बर माचार्य करते है । Pगमार थापार्य भी ऐसा ही करते है, किन्तु मे इतना विशेष करते हैं कि काकाशक एक एक प्रदेशमें एक एक काणु विधमान है, वो भवर्ण, गध, बरस बार मस्पर्श है, वगुरुच्यु समापसे युक है। ये काणु वर्तना पर्याय और म्यावहारिक काउके निमित्तोपकारी कामगु दम्य कहे जाने पोग्य है, परन्तु नस्तिकाप करे गाने योग्य नहीं । क्योंकि एक दूसरेसे मिटकर वे अणु, क्रियाकी प्रकृति नहीं करते, मिससे बाप्रशारमक न होनेसे काछ द्रम्पको अन्तिकाप कहना क मही, बौर पचास्तिकायके नि घनमें मी उसका गाण स्वरूप कहा। नाफाश बनत प्रदेश प्रमाण है। उसमें समयात प्रदेश प्रमाणमें धर्म अधर्म दम्य म्पापक । धर्म बम बम्पका यह समान है कि गांव वौर पुनर उसकी सहायताके निमिचसे गति और स्पिति कर सकते है, मिससे धर्म वर्म दम्यकी म्यापक्वातक ही बीर गौर पुत्रसको गति-स्पिति है, और उससे ठगेककी मर्या होती है। जीव, पुनर, पर्म, अधर्म वौर द्रम्पप्रमाण भाकाश ये पाँच द्रम्प यहाँ पापक है, पर मेक कहा जाता है। ६२९ बमई, मारण १९५२ (१) दुर्गम मनुष्य देर मी पूर्वमें बनतबार प्राप्त हुई तो भी कुछ भी सफलता नहीं हुई, परन्तु स्वार्यवा तो उसी मनुष्य देहफी है कि जिस मनुष्य देहमें इस गाने हानी-पुरुषको पहिचाना और उस महामाग्यका बामय किया । जिस पुस्प नाप्रयसे भनेक मिप्या प्रकारके बाह मानकी माताई उस पुरुपके भाभयस पर दो एट नाप, पही सार्थकता है । बग्म, मरा, मरण वारि को माश करने पाछा बारमझाम मिसमें गता है, उस पुरुपका वामय ही गोरो जन्म, गरा, मरण मालिका नाश कर सकता है, कि बही पपासमा उपाय है । सयोग सबसे इस देहके प्रति इस बीचको गो प्रारम्भ होगा, उसके निवत हो जानेपर उस देहका समागम निात होगा। तपा उसका कमी म कमी तोरियोग नियम, पिस्तु बाभपपूर्वक देर रे यही माम सापक , बिस वामयको पाकर जोर उसी मबमें भया महिप्पो पोरे ही कामे निमसम्ममें स्पिति कर सके। (२) तुम पा भीमुनि प्रसगवश .. के यहाँ जाते राना । प्रातपर्य, भपरिवारको पपाधि धारण करमेकी उन्हें समावना माश्म हा तो मुनिको पेसा करमेमें प्रतिरंच मही। (१) प्रीसद्गुस्ने फाा है कि ऐसे मिश्यि मार्गशमा हो भाप या में दर मादि स्परप महो! भार देह, पी, पुत्र नादि कोई भी मरा मही । में पुर चैतन्यसप गपिनासी भास्मा है। इस तर वाममापना करते हुए रग-पर धपाना संभव है। tv भीमद् सब ६३० काविन यापण १९५२ शारीर किसक्यो। मोहका है। इसलिये मसग माझ्ना रसना योग्य है। एका, भावण को १५ पनि १९५२ मौका १ प्रभ अमुक पार्थक गमनागमन भाविक प्रसगमे भास्तिकाय बादिक अमुक प्रधमें किया होताबार पशि इस तरा हो तो उनमें दिमाग होना समय, सिसे समयकी तए मस्तिकाय नहीं करेगा सकते। उत्तर -निस तर पस्तिकाप मादिके सर्व प्रदेश एक समपमें वर्तमान है, गीत नपान है, उसी तरह कालके स समप कुछ एक समयमें विधमान मही होते, गौर फिर दम्पये वर्तना पो पके सिवाय काम्का कोई दम्पत नहीं है, रिससे उसका पस्तिकाप होना संभव हो । वमुक प्रदेशमें धर्मास्तिकाप वादिम क्रिया हो, वीर अमुक प्रदेशमें न हो, इससे कुछ उसके बस्तिकाप होने भैग मी होता । पम्प केवल एक प्रदेशात्मक हो और उसमें स्मात्मक होनेकी पोपता म हो, तो उसके वस्तिकाय एनेका भंग हो सकता है बत् तो आप बस्विाप मी कराया सकता । परमाणु एक प्रदेशात्मक है तो मी उस तबके दूसरे परमाणु मिलकर पर समझामरूप होता है, इसध्येि र बस्विचाप ( पुगणस्तिकाप ) मा पायो।तपा एक परमाणु मा कमत पर्यापारमकपना है, और काम्के एक सम्पमें पुनर्मत पर्यापात्मकपना महाँ है, क्योंकि पल हो बर्तमान एक पापाप है। एक पापस्म होनेसेस इम्परूप नहीं बरता, तो फिर से बस्ति- हम माममेका विकल्प करना भी संमत्र नही है। २ मूह कापिक गोषोंका समर मर्पत सूक्ष्म होनेसे, सामान्य हानसे उसका विशेषरूपसे कान होमा कठिन है ता मी पनिसमुखप म्पमें, यो हामें ही प्रसिब मा, १११ से १७३ प्रस्तक उसका कुछ स्वरूप समझापा गया है। उसका विचारना हो सो चार करमा । १ बमि अपना इसरे पमान शबसे बयापिक मूळ चानोंका नास हो गाना समय है ऐस्म समक्ष बाग । पहसि माप मादिम्म होकर जो पानी व्यर वाकाश बास्ससे एकति होता है माप पादिरूप होनेसे मषित माझ्म पता है, परन्तु बादलहम होनेसे पशिरसे सपिच हो गावा। बारिसपसे जमीनपर पामेपर मी र सचिचो नावा। मिती बादिके साप निक- मेसे मी या सपिच प सकता है। सामान्यरूपसे फिी अनिके समान पान शाम नहीं है, इसधिये सा होतो मी उसन सचित पमा समन। . बोर गबतक गोपे बानेसे उगनेको योम्पवा रखता है तबक्छ निगार महीरोवा, व माल दो हा पाता है। बमुक माषिके पचात् बर्षात् सामान्यस्मसे बोर (नय बारिध) ताम पातिक समत य सस्ता है। इसके बीच में उससे गाव भुत मी सकता है, परतु उस मार्मिक 1 विविध पम मादि संप्रह-२माँ वर्ष पौतनके पथात् उसे निबीच मर्यात् नियि ऐनाने योग्य कहा है। काचित् उसका गान जैसा बाकार हो, मी परम्त पर मोनेसे उगमेकी याम्पसारहिस हो जाता है। समा योगको वधि सीन पपकी नही होती, कुछ ही बीनोंकी होती है। ५ च विद्वानद्वारा सोन किये हुए पत्रकी विगतके बारेमें यो समाचार मेवा है, उसे पापा है। उसमें उस पत्रका जो 'बामाके देसनेका यत्र' माम रस्सा है, पर यथार्य नहीं है। ऐसा किसी भी दर्शनकी म्यास्यामें वरमाका समावेश नहीं हो सकता । तुमने सय भी उसे भारमाके देसनका पंप्रमही समझा है, ऐसा मानते है । तथापि 'उससे कार्माण षयमा तेमस शरीर दिखा दे सकते है, मपया कोई दूसप कान से सफता है, यह बामनेकी तुम्हारी मिशासा माझम होती है। परन्तु कार्माण मपया तेजस शरीर मी उस वयसे नहीं देखे जा सकते। किन्तु पशु, प्रकाश या पत्र, मरने बाछेको देश, और उसकी छाया अपना किसी वामासविशेफ्से पैसा होना समय है। उस पत्रविषयक अधिक विवरण प्रसिद्ध होनेपर, यह बात पूर्वापर अधिकतर जानने में जायेगी। हवा के परमाणुमोके दिसई देमेके लपपमें मौ उनक लिएनेको वयमा देसे हुए सबपकी म्पाझ्या करने में कुछ कुछ पाय-मे माश्म होता है । हमासे गमन करनेवाले किसी परमाणु स्करका (म्पापहारिक परमाणु-कुछ एक विशेष प्रयोगसे गो पटिगोपर हो सकता हो) पिगोचर होना समय है, बी उमकी बपिक कति प्रसिद्ध हानेपर विशेष समाधान करना पाप माश्म होता है। ६३२ राहा, भाषण पदी ११ रवि १९५२ विचारवान पुरम वो फैसस्पदधा होनेतक मृत्युको निस्प समीप समनकर ही माधि करते है प्राय उत्पम किये हुए कर्मको यस्पास मति मृत्युके समय ही होती है। दो प्रकारके मात्र हो सकते हैं एक तो पवित, पोत, परिचित हानेपर परमार्यम्प माष मोर दूसरा नित्य परि पित निन कम्पमा भादि मापसे रूति-धर्मका प्रणरूप मान । सदिचारसे यथार्थ भारमरि पथमा पास्ताविक उपसामता तो सब जीवसम्झको देख्नेपर, किसी किसी पिरसे जीवको 0 कपिट कानिट हात बौर दूसरा बो बनावि परिचित मात्र है, ही प्राप सब बीपोंमें देखने माता है, और देहांत होने के प्रसार मा उसीका प्रारम्य देखा जाता है, ऐसा मानकर मुस्पुके समीप आनेपर विचारवान पुरुप तयारूप परिणति करमेका AIR छोड़कर पहिसे ही उस ममें गया है । तुम मप मी पाप क्रियाक बिरि-मिषेपके बापाको मिसनबत् करके, अपया उसमें तपरिणामस उदासीन होकर देश और तरिपपक सापका पारम्पारका विक्षेप गोड़कर पयार्थ भाममात्र विचार करनेका सपमें रासा तो हो सापकता है। अन्तिम अवसर मानपर बनाम बादि संस्तर माविमा मझेन । प्रति किया छरित बनें या न मी ग्ने त मा यो नाचको उपर कहा है, ५ मा रिसके उसका सम्म समम । और या इमसे नि प्रेयसको प्राप्त होगी। साम भीमद् पात्र [पर ॥ तुमको चाप किया नारिके कितने ही कारगोस विशेष विधि-निपेपका क्ष देसकर हमें पैद होता था कि इसमें काउ म्यतीत होनस मामातम्या कितना सहपस्थितिको सेवन करता है, और पर किस पयार्प सप चार कर सकता है कि तुम्हें उसका इतना मधिक परिपय से का कारण मालूम नहीं होता । सागमात्र हो निसमें उपयोग लगाया ताबा किसी तर ठीक कहा जा सस्ता है, परन्तु उसमें गो मगमग गागति-कामा मधिक माग म्पतीत होन सा होतापलस निये ! गौर उसत्र क्या परिणाम है।यह यों हमारे प्यानमें मही जाता ! इस विपरमें धपिर कुछ प्रेरणा करनेकी म मेरे पिन्ट तमारी तयारूप पि और स्पिति म देखनेस प्रेरित करते करते चिको समषित कर लिया ।ममी मी तुम्हारे बिचमें इस बातको आश देने योग्य असर है। मंग बनेको विचारमान बरमा सम्पपशि समझे, कास उसासे कश्याण नहीं है, जपा पार म्पबहारफे अनेक Aभि निपेत्र करमके माहाम्पमें मी पुड पाम नहीं है ऐसा हमें वो भगवा है। पापुछ गतिक पिसे सिसा बत्रा इसमें और कोई रेतु है, इस बिचारको मेकर गे कुछ उन बचोसे बात समापि होने की प्रेरणा हो उसे करने विचार रसना सुविचार-शि। 'मेक-मुगाय को मम्म होनेगा नही अपवा सुवि-निन्नाके प्रफलके रिपे चारपानको इस देहको प्राति कर्सम्य नाहै। माप किपाको वतर्मुसाविक बिना विधि-निपेत्रमे दुछ मी पास्तविक कम्याण नहीं है। गण बादिके मेदका निर्वाह करमेमें, नाना प्रकार के निकम्प सिद्ध करनेमें, नामाको मावरण करने के बराबर है। बनेकतिक मार्ग मी सम्यक् एकात निवपदको प्राप्ति कराने के सिपाप दूसरे किसी मम्प से उपकारक नही ।' ऐसा समझकर को पिसा है पाकेट बनुकंपा मुदिसे, मिय- प्रासे निफपरमासे परममासे, पौर रितके लिये दो सिसा -पदि तुम पपा चार करोगे तो हरिगोचर होगा और यमन के प्राण अपना प्रेरणाके होनेका कारण हा । ६३३ राकन मसपर सदा ८ १९५२ १ प्रम -प्राप करके समी मामेिं मनुप्पमबको मोमध एक साधन मानकर उसका गत मसान किया है, और जीवको मिस वरण प्राप्त हो वर्षात् बिसस उसको मि , उस तय प्रादसे मार्ग में उपदेश किया मालूम होता है। मिनोळ माम मैसा उपदेश किपा माश्म नही ऐता । रोण मार्गमें बपुत्रको गति नहीं होती स्पादि कारणोंसे वपा पार भागमोपमा पूर्ण विचार करनेसे जिससे मनुपश्य पनि । पैसा उपदेश किपा मा दिगोचर होता है। मिमेत मर्ग, उससे उम्टय हो देश जाता है अर्थात् मा न तेर, या कमी मी मौरको पराम्प से नाप तो संसारका त्याग कर देना चाहिये-ऐसा उपदेश रेसनेमें वापससे गुस्से म्ोगों गृहस्थाश्रमका प्रण किये बिना ही त्यागी ये गाना बार उससे मनुप्पो दिसा माना समा। क्योंकि उनके बयागसे वो कुछ उनके समानापतिती समारमा यो वाम एगी और उसने पंसके माय ने बैसा बामगा। इससे दुर्गम मनुष्यमा यो मोशका सामनम्प मामा , उसकी शादी कगाध, इसपिपे बिनमगधम्य पैसा मामिप्राप कसे ये सकता है।
पत्र ५१५] पिपिप पत्र मादि संपा–२९पों वर्ष - "उचर -ौकिक और बमैकिक (लोकोत्तर) इष्टिमें महान् भेद है, क्या ये दोनों रष्ठियों हो परस्पर विरुख स्तमाक्याग । गैफिक रएिम म्यवहार ( सांसारिक कारण ) की मुख्यता है, और मगैकिक छिमें परमार्थकी मुस्यता है । इसलिये बगैकिक दधिको शैकिक दृष्टिके फालके साप प्राप' (बहुत करके) मिला देना योग्य नहीं। जैन बौर दूसरे समी मा!म प्राय मनुष्य देहका जो बिशेप माइारम्य बताया है, अर्पात् मोक्षके साधनका कारणरूप हानेमे उसे चो पितामणिके समान कहा है, यह स्म। परन्तु पदि उससे मोक्षका साधन किया हो, तो ही उसका यह माहात्म्प है, नहीं तो पास्तविक उठिसे पशुके देह नितनी मी उसकी कीमत माश्म नहीं होती। मनुम्प वादि मशको द्धि करना, यह विचार मुख्यरूपसे लौकिक इष्टिका है परन्तु उस देहको पाकर वक्प मोक्षका साधन करना, मपत्रा उस साधनका निपय करना, मुत्परूपसे यही विचार अगकिक परिका समझना चाहिये । मौकिक रिमें मनुष्य बादि बराकी समिकरमा यह नो मही क्वाया है, उससे उसमें मनुष्य मादिके नाश करनेका बाशप है, ऐसा न समझना चाहिये ।गकिक रहिमें तो भुद वादि बनेक प्रसंगोंमें हवा मनुष्पोंके नाश हो बानेका समय आता है, और उसमें बातसे गेग बयरहित हो जाते है, किन्तु परमार्थ मर्यात् अछौकिक परिमें पैसा कार्य नहीं होता, जिससे प्राप वैसा होनेका समय बाने । वर्षात् इस जगह कौकिक इशिसे निरता, अविरोध, मनुष्प वादि प्राणियों की रक्षा पौर उमके पशकी मौमूदगी, या स्वस ही बन गता है गौर मनुष्प आदि वंशको पनि करमेका मिसका हेतु है ऐसी छौकिक पि, उल्टी उस बगह पैर, विरोध, मनुष्य मादि प्राणियोंका भाश चौर उन्हें बवाहित करनेवाली होती है। क्गकिक ररिको पाकर, वयला यौकिक रएिके प्रमावसे, कोई मी मनुष्प छोटी बरस्पा त्यागी तो उससे निसने गहस्थामम प्राण न किया हो उसके पशका, मघवा मिसने गास्थामम प्राण किया हो भौर पुप्रकी उत्पत्ति न हो उसके मशका नाश होनेका समय बाना समय है, और उतने ही मनुष्योंका फम उत्पन्न होना समब है, जिससे मोम-सापनके हेवभूत मनुप्प दोहको प्राप्ति के रोकने मैसा हो गाय । किन्तु यह गैकिक शिसे ही योम्प हो सकता है, परमार्थ रिसे वो हर प्राप करके काफ्नामात्र होता है। कम्पना करो कि किसीने पूर्वमें परमार्थ मार्गका बाराधम करके यहाँ मनुष्पमा प्राप्त किया हो, और उसे रोटी मबस्पासे हो त्याग-परम्प तीनतासे उदयमें बाते हों तो ऐसे मनुष्पको सतानको उत्पपि होने के पथात् स्याग करनेका उपश करना अपना उसे वाममके क्रममें रसना या यपार्थ नहीं माइम देता। स्पोंकि मनुष्य दो तो केवल माप रिसे अपना वपेचारूपसे ही मोधको साधनभूत है, मगरूपसे तो पदार्थ स्यागरम्य ही मोधका साधम समझना चाहिये । और से कारणों के प्राप्त फरमेसे मनुष्य देहकी मोक्ष- साधकता सिद्ध नहीं होती, सिर उन कारणों के पास होनेपर उस देहसे भोग भादिमें पानेका मापता रहना, यह मनुष्प देशको मोसके साधनरूप करने के बराबर का जाप, मपत्रा उसे ससरके साधनम्प करनेके बराबर का जाप, पह विचारणीप है। हो जाम, ।
भीमद् सवन्द्र [पा ॥ होळ मार्गम बो चार वाममोकी पदस्था की है, यह एकातरूपसे नहीं है। पामप, एकरेष, पाभरतमी स्पानि वामम मम पिना हो स्पागलपसे परे है। निमसे वैसा होना मशक्य हो, रे परिणाममें पपार्थ त्याग करनेच म्भ रसकर बाममपूर्वक प्रति करें ता या सामान्य प्रतिसे का है, ऐसा मा मा सकता है। परन्तु मामुको ऐसौ क्षणभंगुरता है कि सा क्रम मी किसी रिरहेको ही प्राम होनेका बसर भाता है। कदाचित् पैसा वायु प्राय दई मी, तो पैसी पिसे बात से परिणामसे पपार्प पाग हो सके, ऐसा सच रस्कार प्राधि करना तो किसी किसीसे ही बन सकता है। निनोप्य मार्गका मी ऐसा एकात सिकात नहीं कि चाहे निस स्पा पर जिस मनुम्पको पाग कर देना चाहिये । तपास ससग और मगुरुके योग होनेपर, उस वामपसे किसी पूर्ति मस्कारपाठा बर्षात् विशेष राम्मवान पुरुष, गारपाममके प्राण करनेके पहिरेही त्याग कर है, तो उसने पोप किमा है, ऐसा बिनसिमान्य प्राय' करता है। क्योंकि मर्प साधनोंक प्राप्त होने पर भी भोग मादिके भोगनेके विचारमें पाना, वौर उसकी प्राप्तिक लिये प्रफन करके, आपनेको प्राव मात्म-साधनको गमा देमे वैसा करना, और बपनेसे वो सतति होगी। जो मनुष्यदेह पाचगी पदेह मोझा सापनरूप हेगी, ऐसी मनोरपमात्र फरफ्नामें पड़ना, यह मनुष्पमतको उत्तमत्व र करके उसे पावत् करनेके । समान। दियों नादि निसको त नहीई, और माना-पुस्पको पि यो वमी स्पाग करने पोम्प नही, ऐसे किसी मर नपा मोह-परम्पवान नाचको त्याग ऐमा प्रशस्त है, ऐसा निनमित कुछ एकत- रूपसे नहीं पा प्रपमसे ही मिसे सत्तम सस्कारपुछ राप न हो, पा पुरुप काचित् त्यागका परिणाममें प रस्कर भाममपूर्वक वापरण करे, तो उसने एकादसे मूब हो और उसने लगा ॥ किया वा उत्तम पा, ऐसा मी मिनसिहति महो। केप मोपके सापनका प्रसंग प्राप्त होनेपर उस बमको गुमा न देना चाहिये यही निममगवानका उपदेश है। उत्तम Bस्कारमा पुरस गइस्पामम किये बिना ही स्पा कर में तो उससे मनुष्पकी पति कफ और वस्से मोज-सापनके कारण मी रुक गाय या पार करमा वस्प रिसेही मोम्प मारम हो सकता है। किन्तु तपाहप त्याग-पैरापा योग प्राप्त होनेपर मनुम्प सफलता होने के लिये उस पोगका प्रमत्तसपसे, बिना किसके गम प्राप्त करना पर विचार तो पूर्वापर वपिम्प मौर परमार्थ परिसे ही सिसा पा सकता है। वायु सम्पूर्ण होगी और वपने संतति में तो साधन करेंगी पा नियम कर सपा सतति होगी ही यह मानकर और पीछेसे ऐमेका ऐसेही वाग प्रकाशित होगा ऐसे भविष्यको कम्पना कर भाभम्पूर्वक प्रति करनेको न विचारवान एतस्मसे पोम्प सममेगा! बतएव अपने पैराम्पमें मिसे मरता न हो और जाना-पुरुष बिसे स्पाग करमे योप समन्वे हो उसे दूसरे मनोरथमात्र कारपोफे सपना अनिश्चित करणों के विचारको मेरकर, निमित पौर प्राप्त उत्तम कारणोध बाप करना, पहा उत्तम है और यही मनुप्पभक्को सार्पकता है। बाकी दिबारिश तो हम्पनामात्र है। सो मोके मार्गका नाग कर मात्र मनुष्य पर मेको कम्पना करने जैसा में दो या होना सकते। पा रिस तप में पुत्रोत्पपिके लिये स एक पुरुपको सना परे से हो उसे ( होम गाप, असर मोक्षता विषिप पत्र मादिसंपा-२५ो पर्व पुत्रको ) मी रुकना पो, उससे तो किसीको मी तर त्यागरूप मोच-साधनके प्राप्त हानेका संयोग न जाने देने वैसा ही होता है। तया नब किसी किसी उसम संस्कारवान पुरुषोंकि गृहस्पाश्रमके पहिसके त्यागसे वशादिके रोक- नेके विचारको लेते हैं, तो वैसे उत्तम पुरुषके उपदेशसे, अनेक गोन बो मनुष्य मादि प्राणियोंफा नाश करते हुए नहीं ररते है, ये उपदेश प्राप्त करके पर्वमानमें उस तबसे मनुष्य माविका नाश करते हुए क्यों नहीं रुक सकते, तया मुमति प्राप्त करनेसे फिरसे से मनुप्पमत्र क्यों नहीं प्राप्त कर सकते । बौर इस रीतिसे तो मनुष्यको रक्षा और दि होना ही समय है। बगैफिक ररिमें तो मनुष्यको हानि-नादि वादिका विचार मुख्य मही है, कश्याण-कन्याणका विचार मुत्स है। जैसे कोई गया पति मगकिक ररि प्रास कर तोहमपने मोहसे हगारों प्राणि पोके पुरमें नाश होनेके हेतुको देसकर, मात पार बिना कारण हो से पुर न करे, निस्स बहुतसे मनुष्योंका चाल हो चौर उससे बाकी पनि होकर गावसे मनुष्य बढ़ बॉय, पर मी दचार क्यों नहीं किया जा सकता। इत्पादि भनेक प्रकारसे विचार करनेसे लौकिक मि दूर होकर बौकिक शिसे विचारको बागृति होगी। (स्यादि भनेक कारणोंसे परमार्प परिसे नो मोध किया है, वही पोग्य माश्म होता है। इस प्रकार के प्रमोउमि विशेष करके उपयोगको प्रेरित करमा कठिन होता है, तो मी संझपमें जो कुल मिसना बना है उसे उदीरणाकी तह करके किसाहै।) ममता बने तबतक बानी-पुरुयके वचनोंको सौकिक भाशयमें न उतारना चाहिये । अपना अगैफिक रहिसे ही विचार करना पोम्प है। और जबतक बने तबतक मैफिक प्रमोटरमें भी विशेष उपकारके बिना पाना योग्य नहीं, वैसे प्रसंगोंसे कितनी ही बार परमार्थ हरिके सोम प्राप्त करने पैसा परिणाम माता है। २ सके वफल बपना पीपसकी पोरमको कुरा ठमके शकी पालिके करने से, उनके रक्षणके वसे, उन्हें समक्ष कहा है, ऐसा नहीं समामा चाहिये । किन्तु उनमें कोममता ऐit, इसध्येि उनमें बनतकप्रयका होना समय है, क्या उसके बारे इस बहुतसी बीस निमापरूपसे या ना सकता है, फिर मी उसीके भगीका करनेको म रसना, या तिकी तुणता होती है, इस कारण ने पमन का, या पपार्प माझ्म होता है। ५ पानाची विलुमें वसासात नौलो यह बात ठीक है। किन्तु उपर कहे अनुसार जो बाके पास गयके कारण है कारण इसमें न है, इस कारण उसे बमस मही। पति से पानी के काम मेनकी भी वाहा है, ऐसा नहीं कहा और उससे मी ममुक पाप हाना ही समय है, ऐसा उपदेश किया है। १ परिखके पत्रमें बोगके सचित-अपिलके संबबमें समाधान मिला है, उसे किसी मधेष से [१४ भीमद् पवचन्द्र स किया परंपरा ही वनुसार मिला है फिर मी उसमें जो कुछ कुछ विशेष भेद सममें है उस नही मिला । जिसने पोग्प न गनेसे उसे नहीं किया । पोलिद मे पार और उसमें कुछ उस तयका उपकार गर्मित उमा मही जान पाता । ५ नाना प्रकारके मानोत्तरोन या एक मात्र बारमार्पर लिये हो, तो वामात्र बहुत उपकार प्रम हो। तपा ६३४ स्वमताके पास माया मम्र.११गुरु १९५२ मनामसम्म पपापोम्प पधि । तीम पत्र मिरे । 'कुछ मी ति रोकते पर विशेष अभिमान पता है। तथा 'हणारे पम्नेसे उसमें मर जाते है मौर उसकी गतिक रोकनेकी सामग्र नही पती, हानि क्षमापना मोर ग राक्षसीके योगवासिष्ठके प्रसगी, गत्का भ्रम दूर होनेक किसे, शेषता' रिसी, उसे पड़ी है । हाम्में जिसनेमें विशेष उपयोग न य सकता, इससे पर भी लिनेसे ग माती है। सशेपम उन पत्रों का उत्तर मिसरूपसे विमारमे योग्य है। १ विवादिको 'पूनता ममिमामपूर्वक होती तो करना पोम्प है। विशेषता इमा सबमिमानपर निरतर के रखना सके तो क्रमपूर्वक बधि बादिका म्यूनवा हो सकता है जसपी बमिमानका मी म्यून होना समब है। २ वनेक स्वापर विचारपान पुरुषोंने ऐसा कहा है कि बात होनेपर काम, क्रोध, तुणा माल निर्मूल हो बाते दम्प है। फिर मी उन पनों ऐसा परमार्थ महा किमान । पूर्ण के गर न पो अपना कम न हो । पपपि उनका सम्म दम ता मानके आग को होता है मातक कपाप भातिको मंदत्ता वा म्यूनता न हो तबतक प्रायः करके शान उत्पम ही नही पान प्राप्त होने विचार मुस्स साधन है। वौर उस विचारके बैरम्प (भोगके प्रति ममा ) तपा उपद्यम (कपाप भाविको बाफन्त महता, उसके प्रति लिप सेद) ये दो मुस्स बापार ऐसा पानकर उसका निरन्तर ब्य रस्कर सौ परिणति करना योग्य है। पुस्पके पचनके पपार्य माण किये बिना प्रायः करके विचारध उस नहीं होता। और सके पचनका पपा रण-सपुरुपकी प्रवति यह कम्पाम होनेमें सोका निमित से बनम्प बामप-मजि परिणमित होनेसे होता है। प्राप करक पे दोनों परस्पर सम्पामपके है।करी सोको मुस्पता है, और जो किसी मुस्मता है, फिर भी ऐस तो बनुम में वाता यो सबा प्रमुख से उसे स्पुस्प वामपमणि, महमान नाविध न करनेके लिये और समें विवादशाके मममूत हानेके लिये उत्तर कारणाम होती है। मोगमें बनासपि हो तपाकिक विशेषता दिखानेकी मुवि कम की तो गावी है। परिमंत्रिक मान पारिको तुवा समसमें ना माप तो उस पिता माम बार उससे उसका या स्परमाणाप, ऐसा पपा मम ताठ हो दणा निर्ष .
पत्र १५, ११] पिपिप पर भादि संमा-२९ वर्ष कठिनतासे बानीविका चन्ता हो तो मी मुमुसुको पा पात है । क्यों विशेषका कुछ पाश्यक उपयोग (कारण) नहीं है—ऐसा बसक निश्चय न किया जाय, तबतक कृष्णा नाना प्रकारसे बाररण किया करती है। सौकिक विशेषतामें कुछ सारभूतता नहीं ह, यदि ऐसा निधय करनेमें षा माप, वो मुस्किम्से वागनिका मितना मिलता हो तो मी दसि प सकती है । मुकिससे बार्गविका नितना नही मिलता हो, तो भी मुमुक्षु नीव प्राय करके वाप्यान होने नहीं देता, अपना रोनेपर उसपर विशेष सेद करता है, वोर मार्माविकामें निराश होता मा भी यथाधर्म उपार्जन करनेकी मैद कल्पना करता है, प्यादि प्रकारसे बवि करते हुए कृष्णाका परामव क्षीण होने पोम्प माश्म होता है। ५ प्राय वाम्पारिमक शाम मी स्पुरुषके वचनको मारमदानका हेतु होता है, पोंकि 'परमार्य वारमा' शासमें यती नहीं, सत्पुरुपमें ही रहती है। यदि मुमुक्षुको किसी सत्पुरुषका बाश्य प्राप्त हुमा हो तो प्राप शानकी याचना योग्य नही, मात्र तपारूप ग्य, उपशम वादि प्राप्त करनेका उपाप करमा ही पोग्य है । उसके योग्य प्रकारसे सिद्ध होनेपर हामीका उपदेश मुखम होता है, वौर यह पपा विचार तपा शानका होता है। १ नबतक कम उपाधिपुछ क्षेत्रमें नामीविका वस्ती हो तबतक विशेष प्राप्त करमेकी मन्मनासे मुमुक्षुको, किसी एक विशेष मठोकिक के किना, भभिक उपाविपुल क्षेत्रमें जाना योग्य मही, क्योंकि उससे बात सी सदतिया मद पा जाती है, नपका विंगत ही मही होगी । ५. पोगमासिएके पहिलेके दो प्रकरण और उस प्रकारके पोंका मुमुक्षुको विशेष करके पक्ष करना योग्य है। " ६३५ मामरा भा िमें होनेवाले शानके पिपपमें प्रथम बर्थ पर मिला था। में उस रिपपकी विगतका यह दूसरा पर मिला है। वह सब शान होना समत्र है ऐसा पानेमें कुछ पुछ समझ मे मे प्पास्पा भे होता है। श्री का तुममें समागम , ता उनके द्वारा उस मार्गका पपाशकि विशेष पुरुषार्थ होता हो तो करने योग्य है। पर्तमानमें उस मार्गक प्रति हमारा विशेष उपपाग पता नहीं। तपा पत्रधरा उस मार्गफा प्राप दोष छापा मा सस्ता मही । पामापी दुरा उमटताफे लिये उसका भस्विप तथा माहाम्प मामतातिमें मानेक डिप, तपा मारम्बानफे अधिकारी के लिये का साधन उपकार्य है । इसक सिपाप प्राय दूसरी तरह उपधरी नहीं, इना मन माप रगुना पोग्य है। ६३६ राग, मादप १.५२ चैन र्शनको पतिस देशपमेपर सम्पार्शन, वीर स्वर्ग परतिमेगनेर में फेयमान समर।
भीमद् रामचन्द [पर नर्मममें चोकमानका सरूम टिसा है, उसे उसी तय सममाना मुसि होता है। फिर वर्तमानमें उस घामका उसमें निषेध किया है, मिस्से तासांनी प्रयत्न करना मी समय माम होता । चैन समागममें हमाप मपिक निवास बारे, तो किसी भी प्रकारसे उस मार्ग रसार हम सौके परा विशेषरुपसे हो सकता है, क्योंकि वसा सस्म निशेपासे समझने कामा, स्पादि । वर्तमान में नियम इवमी अधिक मम्यवस्थित वा विपरीत स्पितिमें देसमेमें बात उसमेस मानो मिनमगवान्का* x x x पम गया है, मोर भेग मार्ग प्ररूपित करते हैं। पर मापापची बातमका दी है, और तमार्ग का प्रायः विशेर बसा हो गया है। मेरोळ मार्गमें वो दोसौ पारसौ बस को कोई महान् बाबार्प ए मौ देसनेमें भाते है, जिससे हासों मनुष्योरे वेदोळ परतिको बागृति पया सापारमरूपसे कोई कोई वाचार्य नपत्रा उस माकि माननेपाछे मे पुरुष इसी तय होते यते है और नमामि परत माँस सा गुमा माश्म नही होता । नमामि प्रग मी मदत पोपी ही बाकी हो, और उसमें भी सैकड़ों मेद । नाही ना, कित मूसमार्गके सम्मुख होने की बात भी उनके काममें म0 पाती, मौर पर उपदेशक मी म्पमें नही-ऐसी स्पिति हो दी। इस परण चित्तमें ऐसा बाया करता है कि जिससे उस मार्ग पनिक प्रचार हो तो वैसा करना नहीं तो उसमें पनेगाडी सम्परको मापसे प्रेरित करना । पर आम बात कठिन है । तपा नमार्गको सप पित्तमें उतारना तथा समझना कठिन है। उसे विचमें उतारते समप बहुतसे चरम मार्ग-प्रशिकवक गॉप, ऐसी स्थिति है । इसलिये मैसी प्रा तिको करते हुए र माम होता है। उसके साप साप पर मी होता है कि पदि यह कार्य रस कामें हमारेसे कुछ मी बने तो बन सकता है नहीं तो हमें तो मूहमार्गक स्मुख होनेके सिये किसी इसका प्रपान काममें बाये, ऐस्य मम नहीं होता। प्राप करके मूळमार्ग दूसरे किसीके उमे नही है। पथा उस के तपूर्वक उपदेश करनेमें परमभुत पारि गुण माश्यप । इसी तर पाल्ने अतरंग गुणोंकी मी बायापकता है। पहाँ मौर, ऐसा सरूपसे मारम होता। इस गतिसे पनि मुबमार्गको प्रगतसमें मना हो तो प्रगट करनेवासासगमा परिपाग करना योम्य है क्योंकि उससे वास्तविक समर्थ उपकार होने का समप मासकता है। वर्तमान दशा देखते हुए सत्ताले कमेपर पर राते हुए, कुछ समय पश्चात् उसका उइसमें बाना समर है। में स्वर-सरूप नाम है जिससे पग-साधनको इतनी बफेशा न होनेसे उत्तम प्राति नही तपामा सर्वसंग-पपिपागमें वपया विशुर देश परियागमें साधन करने पोत्यससे ग्रेगोका मात उपयर होता है, पचपि वास्तविक उपकारका भरण तो बाहममानके ना सय कुनहो । हाल्में तक तोप योग-साधन मरोहमसे उइसमें वाले पैसा दिसई नही देता । इस कारण इसके बारके समपी मापना की बाती है, और तानसे चार वर्ष उस मार्ग म्पती हरनेमें बारें ये ३६ में न समग-परिपागा अपरेसला ममप मा सस्ता और गोवा कम्पाण होना रो तो मारो । गोर पर ५५५,५५] विविध पम मादि सपा-२९या वर्ष छोटी उममें मार्गका उद्धार करनेके संबध भाभिगा पी। उसके पचात् शान-दशा बाने रकमसे प उपशम गैसी हो गई ! परम्तु कोई कोई मोग परिचयमें लाये, उन्हें कुछ विशे- ता माझम होनेसे उनका कुछ मूरमार्गपर म्य पाया, और इस बार वो सफलों वौर एबारे मनुष्य मागममें भाये, जिनमेंसे कुछ समझनाले तथा उपदेशकके प्रति वास्याबारे ऐसे सौ-एक मनुप्प नेकगे । इसके उपरसे यह देसनेमें भाया कि छोग पार होनेको इण्या करनेपाछे तो पास है, परन्तु म्हें पैसा सयोग नहीं मिलता । यदि सबै सचे उप शक पुरुषका संपोग मिले तो बहुतसे चीन मूल- गर्गको पा सकते है, और दया मादिका विशेष उपोत होना समय है। ऐसा माश्म होनेसे कुछ पेचमें माता है कि यदि इस कार्पको कोई करे तो महै। परम पर हमनेसे वसा को पुरुप पानमें ही बावा । इसलिये कुछ सिवनेबाने को बोर हो पि माता है, परन्तु मिसनपाठका मरमसे ही क्ष इस तबका या है कि इस पदके समान एक मी चोप्सम-मरा पद नहीं है, भौर होसक उस कार्यकी, अपनी जैसा चाहिये वैसी योग्यता न ये, यहाँतक उसकी इडामात्र मी म करमी, धौर राम्य अबतक ठसी तण प्राति करनेमें गई। मार्गका पोग बात सरूप मी किसी किसीको समझाया है, फेर मी किसीको एक व्रत-पपरसाणतक-मी Pिया महाँ, अपना तुम मेरे शिष्य हो, मीर हम गुरु है, पर भेद प्राप मार्शित किया नहीं। कहनेका वाभिप्राय यह कि सबसग परिस्पाग रोनेपर उस कार्यको प्रति साग-समावसे उत्यमें पाये तो करनी चाहिये, ऐसी ही मात्र कम्पना है। (२) उसका सचा सवा बार नहीं है, मात्र धनुक्पा बातिया शान-मभाव रहता है, इससे कमी कमी बचि उठता है, अपवा अन्यायसे ही भगमें माचि है, फिर भी यह स्वाभान है। हम समझते है कि या ठस तराससग-परित्याग हो तो हमारों मेोग उस मूसमार्गको प्राप्त करें। और हमारों सोग उस सग्मार्गका मारापन कर सङ्गप्तिको पारें, ऐसा हमारेसे होना समय है। हमारे संगमें स्याग करनेके सिय अनेक गावाकी पति हो, ऐसा भगमे स्पाग है। धर्म स्थापित करमेका मान पहा है। उसकी स्पृहासे मी कपित् ऐसी रति यसकती है, परन्तु बारमाको अनेक बार देखनेपर उसकी समत्रता, इस समयी दशा में कम ही माम्म होती है। और यह मुछ [ सत्ता हो होगी तो यह मौ क्षीण हो सायगी, ऐसा वास्प माश्म होता है। क्योंकि जैसी चाहिये वैसी पोग्पताके बिना देर छट गाय, बैसी ल कल्पना हो, तो मी मार्गका उपदेश करमा नहीं, ऐसा बारम- नियम निस्य एता।एक इस बसपान कारणसे ही परिह मादिक त्याग करनेका दिपार हा करता है। मेरे मममें ऐसा यता है कि पदि बेटोक धर्मका प्रकाशन करना अपना स्थापित करना हो तो मेष दशा पथायोग्य है, परम्त मिनोक धर्म स्थापित करना हो तो ममी इतनी पोम्पता नहीं, तो मी विशेष योग्यता है, ऐसा माश्म होता है। , । (१) नाय! पाता पर्मोमति करने पर सहरमाबमे समाधान हो, ऐसा हा बाप, नपा परछा अवश्य फार्पनप परिणत होगाप!
११६ भीमन् पसबष्ण [ ५८ उसका कारण ऐना बस्य पात तुफर माइम होता है। क्योंकि छोटी छोटी बातों में मा पात मतभेद है, और उसका मग बहुत गहरा है। मङमार्गसे होग छानों प्रेस दूर है । इल्मा हो मही, परत ठने परि मूरमार्ग निबासा उत्पन्न कराना हो, तो मौ बात काका परिचय होनेपर भी, माहोनी कठिन पो, ऐसी उनकी दुरा वादिसे मप्रधाम दशा हती है। (२) उमतिके साधनोंको स्पति करता - गोपनीयके सरपका निरूपण मुम्मार्गक वनुसार भगा भगह हो। मगह जगह मतभेदसे कुछ भी सम्याण नहीं, यह मात करे। प्रत्यक्ष सहरुको वाहासे ही धर्म है यह बात हमें बाये । इम्मानुपोग-मात्मनिपाका-प्रकाश हो । स्पाग राम्पको विधेफ्तापूर्वक साधु कोग करें। साधुपर्मप्रकाश बायकपर्मप्रधश स्तवार्थ-विचार. पाए बोंकी बनेक गोषोंको प्राप्ति नवलप्रकाश ६३८ परवा भरपद मुदा १५ सेम १९५२ (जानकी बफेशासे) सम्पापक सचिदानन्द ऐसा में मामा एक-ऐसा विचार करना-- ध्यान करना। निर्मल, अत्यन्त निर्मस परम पुर पैतापपन, प्रगट वामस्वरूप है। सब कुरा पटाते पटाते रो बाम गनुभव पता है, वही बामा है। मो सपो चामतीरवारमा है। जो सर भाषाका प्रश करता है वात्मा। उपपोगमप बामा है। भम्पावाप समाधिसम्पबामा है। भारमा है ।बमा बत्पात प्रगट है क्योति पसरन प्रगट अनुभवमें है। मनुस्म्म और ममधिनस्ताप होनेसे पामा निस्य है। भानिमपसे परमार है। उसरे पर भोजमान होनेपर समान परिणामी है। सपा समारपरिणाम पर मारे I सहर समग सराव, सरिचार और संपम मादि उसमे साबन'। बामाले भविसे गाकर निर्माणकरके पद सपे है-अयंत सो है, स्योंकि वे प्रगट अनुमा भरते है।
कम १, १९९] विविध पम मावि संपा-२५वर्ष ५१७ . प्रातिरूपसे मारमा परमावका फर्चा होनेसे नुमान्नुम कर्मकी उत्पति होती है। कर्मके फल- जहोनेसे उस शुमानुम कर्मको बारमा मोगता है। इसलिये उस्कृष्ठ शुमसे उप अशुमतक नाधिक पर्याय भोगनेहप क्षेत्र माश्प है। निमस्त्रमान शानमें फेल उपयोगसे, तग्मयाकार, साम-समावसे, निर्विकल्परूपसे जो मारमा रिणमन करती है, यह केरगान है। सपारम प्रतीतिमावसे चो परिणमन करे, यह 'सम्पात' ।। निरन्तर यही प्रतीति या करे, उसे 'पायिक सम्यवस्व' कहते हैं। काधिस् म', कपित् चीन, कचित् विस्मरण, कचित् स्मरणम्प इस तर प्रतीति ये, उसे क्षयोपशम सम्परत्व' करते है। उस प्रतीतिको चबतक सजगत भावरण उदय नहीं थापा, तबतक उसे ' उपशम सम्पात' करते हैं। . बास्माको मन बावरण वश्य भारे, तब या उस प्रताविस गिर पाती है, उसे · सास्वादन मम्पस्स्व 'कासे है। वापत प्रतीति होमेके योग्य यहाँ सत्तगत अल्प पुद्गडका बेदन करना बाकी रहा है, उसे । बेदक सम्पत करते हैं। वषारूम प्रतीप्ति होनेपर अन्य भावसंबधी मामल बादि हर्ष, शोक, कम फमसे क्षय होते । मनरूप योगमें तारतम्पसहित मो कोई चारित्रको बाराधना करता है, पर सिद्धि पाता है और दो स्वस्प-स्थिरताका सेवन करता है, वह समान स्थितिको प्राप्त करता है। निरन्तर स्वरूप-गम, सरूपाकार उपयोगका परिणमम स्यादि स्वभाव, अन्तराप फर्मक सय होनेपर प्रगट होते हैं। यो फेरठ समाल-परिणामी हान है, यह फेबउझान है। ॐ सविदागदाप नम । । ६३९ बानद मात्र परी १२ र १९५२ पत्र मिम।" मनुष्प मारि प्राणियोंको पनि" के समयमै तुमने जो मम विसा था, मा प्रम निस कारणसे लिसा गया था, उस कारणको प्रश्न मिडने के समय ही मुमा या।ऐसे प्रश्नसे रिशेप वारमार्थ सिर होता महीं षयमा नपा काब्क्षेप पैसा ही होता है। इस कारण बारमार्थक प्रति कम होने के ठिये, में, हम उस प्रकारक मानके प्रति वर्षमा उस ठपके प्रसंगोंके प्रति उदासीन पना ही योग है, पर सिहा पा । तपा यहाँ उस तबके प्रश्नके उत्तर किसने जैसी प्राप पर्वमानमें दशा यती नहीं, ऐसा लिया था। बनिपमित भौर बाप वायुबाली इस देहमें मामापका मन सबसे प्रयम करना पोग्य है।
[पर५४ ५१८ भीमर्यवान ६४० एस, भावपन १९५२ गौर, नैयापिक स्प, जन और भौमासा ये पाँच मास्तिक वर्षात् बप-मोश भारि मात्र सोसार परमेबारे दर्शन है । मैपामिक ममिप्रायक माम पिफोंका अभिप्राप, सपने समान हो पागका अभिप्राय है-इनमें पोका ही मेद है, इससे उन दमोंका भष्मा चार मही किया । मोमोसाके पूर्व और उत्तर इस तय दो भेद पूर्णमीमांसा और उत्तरमामासाने विशेष विचार-भेद है, फिर भी मीमांसा शब्दसे दोनोंका बोप होता है। इस परण यहाँ मौमासा ससे दानों हो महमे चाहिये । पूर्णमीमांसा मिनाय और उत्तरमीमांसा शाम्त मामसे मी प्रसिद्ध है। बौद्ध और जैनदर्शन के सिवाय बाकीके दर्शन को मुल्य मानकर होते हैं, इसठिये ये दाभित दर्शन करने मेगाको प्रकाशित कर अपने दर्शन स्थापित करनेका प्रश्न करते है। पौर पर जनदर्शन पदक मामित नहीं-समय दर्शन है। वामा लामाको न साकार करनेवाला चमक नामका उन दर्शन है। मौसम मुन्य चार भे-- १ सौचक्कि, २ माम्यमिक, २ घम्पबादी और १ विज्ञानवादी । २ मिम मिम प्रकार माधम्पास्या स्वीकार करते है। नदर्शनके योो दो प्रकारतरसे दो मद-दिगम्बर मोर भवम्बर । पाँच मास्तिक दर्शन जगत्को मनादि मानते है । र, सांस्य, श्रम मोर पूर्णमीमामाले मठा- मुसार सुपिका का ईपर नहीं है। मैयापिकों के मनुसार ईबर स्परूपसे का है । मेहन्तके मतानुसार मात्मामें जगत् विरूप बर्षात् कम्पित पसे भासित होता है, और उस तिस तसभ भिरको भी कन्फ्तिरूपसे ही कार्ता स्वीकार किया। योग पमिप्रापके अनुसार ईथर निपचास्मसे पुस्पपिशेष है। गौम मतानुसार विधा और पस्तुतस्प मामा म-पाणिक है। शून्यवादी बोलके मता- नुसार परिबानमात्र है, और चिानवादी बोरके मत के अनुसार इस बार तल । उनमें मिल स्कप क्षणिकस्मसे माया है। नैयाम्पिको मतके मनुसार सम्पापक मसभ्य गावर मी सम्पाता है। बामा मारिका मनके सामिप्यसे शाम उत्पम होता है। सास्यके मतानुसार सम्पापक सस्य बारमाय मिप वपरिणामी मौर निमात्र सस्म है। १ एकरी पोर हो ममम मायातको वकार पर प्रल मममिक इन सभामक मोर एमवारी रोना एक मित्र मन मोमबार मर नस्म कि सभी माना। राणा शासनमा तीन महीपणे मारी और।
पा(४१ विविध पत्र मादि संप्रार-२ पर्प 1 चैनके मतानुसार बनत द्रम्य बामा है । प्रत्येक मरमा मिन मिन है । धान दशन बाद पेतनास्वरूप, नित्य वौर परिणामी प्रस्पेक वामाको असल्यास प्रदेशी सरायर-अवगाहणता माना है। पूर्वमीमांसाके मतानुसार मीच मसत्य है, घेवन है। उपरमीमांसाके मतानुसार एक ही मारमा सर्पम्पापक सचिदानन्दमय त्रिकामवाप्प है। ६४१ बानद, बासोम १९५२ मास्तिक मूस पाँच दर्शन भारमाका निरूपण फरते हैं, उनमें चो मेद देसनेमें बाता है, उसका पा समाधान है। Pन प्रतिदिम जैनदर्शन क्षीण होता हुमा देसनेमें जाता है, और वर्धमानस्वामीके होनेके पपात् पो होममें उसमें नाना प्रकारके मेद ए साई देते है, उन सबके स्पा कारण है। हरिमन भादि भाचार्याने नवीन योजनाको सरह नाधानको उमति की माश्म होती है, परन्तु पोक-समुदायमें मैनमा का अधिक प्रचार हुआ दिखाई नहीं देता, क्या तपारप अतिशय- स्पन धर्मप्रवर्तक पुरुषका उस मार्ग में उत्पम होना कम हो माई देता है, उसके क्या कारण है। वर्तमानमें क्या उस मार्गकी उमति होना समय है। और यदि हो तो किस तर दोना समय है, भर्यात् उस बातका फासि उत्पम होकर, किस रीतिसे, किस रास्तेसे, कैसी स्पितिमें प्रचार होना संमवित मान पड़ता है। फिर जाने वर्षमानस्वामीके समपके समान, वर्तमान काळके योग भाविके अनुसार यह पर्म प्रगट हो, ऐसा क्या दीर्घ-रपिसे समब है। मौर पर समय हो तो किस किस कारणसे समबरे गो नसूत्र दासमें निपमान है, उनमें उस दर्शनका सम्पप बहुत मपूरा सिसा पुजा देखनेमें भाता है, यह नियम किस सय दूर हो सकता है। उस दर्शनकी परपरामें एसा कहा गया है कि वर्तमानकामें केपमहान नही होता आर केपणानन पिय समस्त काळमें मोकामेकका द्रम्प-गुण-पर्यायसहित जानना माना गया है, क्या पर पथार्थ जान पड़ता है ! बया उसके सिपे विचार करनेपर स्पा कुछ निर्णप हो सकता है। उसकी म्पास्या में क्या कुछ फेरफार दिखाई देता है । और मुठ म्याम्न्याके भनुसार यदि कुछ दूसरा नर्थ होता हो तो उस वर्षक मुसार वर्तमानमें विख्यान उपम हो सकता है या नहीं। बार उस उपरश दिया जा सकता है सपना नहीं ! तथा दूसरे शानोंको यो प्याश्या की गई है, क्या हमी कुरा फेरफारसाठी माझ्म होती है। भौर पर किन कारणोंसे ! पर्मास्तिकाप, पर्मास्तिनप इम्प मम्पम बागाही, सकार-विकासको मानन मामा, महा- विदेश वादि भत्रको म्यामपा– कुछ मपूर्व पतिसे अपना काही दुई तिसे मम्फन्त प्रबष प्रमाणसहित सिर होने योग्य मान पाते हैं या नहीं।
भीमद् बन्द [m. गण्डके मतमतान्तर मन ही छारे होट विषयोंमें प्रबउ भामही होकर मिम मिमहपसे दर्शन मोहनापके घरण हो गये है। उसका समाधान करना कठिन है। क्योंकि उन गेगोंकी मटिम, पिसेप मापरणको प्रत किये बिना ॥ इतन अप कारणोंमें बलवान माना होना संभव नहीं। पपिरति, देशपिरति, सविरति, इममेके कौनसे आममबारे पुरुपसे विशेष उपति होनी समा। समिति बहुतसे कारणोंमें प्रतिष के कारण प्राति कर सकता नहीं । देशनिति और पपिर विकी तथाम्प प्रतीति होना मुस्किा और फिर जैनमार्गमें मी उस मातका समावेश कम है। यह सिकम्प हमें क्यों उठता है! भार उस शमन कर देनेका रिच है, उसे समय किये देते। ६४२ जिनाप नमः (१) मगवान् जिनके पाएगेकसम्पान भारि मात्र मायामिक पिसे सिर हो सकते है। पासा बारिका रूप मा माप्यामिक रिस समसमें वा सकता। मनुष्यको उचाईक प्रमाण माहिम भी ऐसा हो । कायमाण भारि मी उसी तय पाते। निगोद बादिमी उसी तब घर सकते है। सिवस्वम्प भी इसी मासे मनन करने पम्प मास्म होता है। डोकशमका मर्य बनेकांत शम्बन्ध बर्ष मायामिक है। राष्ट्रका समहाना गात गा है। धर्मकवानप चरित नाम्यात्मिक परिभाषासे मनात माझ्म होते है । बम्हौर माविका वर्णन मी वाप्यात्मिक परिमायसे निपीत किया माम होता है। (२) बन्दिप शानके मिनमगवामने तो मे मताप है -प्रमश वार सन प्रत्यक्ष देश म्यश्चके दो मे-आदि और मन पर्यन स्मिारपस काणेकम करत हुए नामाथे, पति यक मापन पिना ही अमुक मशिने बानीको बारिखते हैं। अमिरिमापसे मानसिक RH बिर बससे मानने को मन पर्पत्र प्रते हैं। सामाम्प विशेष तप मारमश्मि परिनिष्ठित पुन बान सब प्रस्पक्ष (१) मोरिनमायाम्के में हुए मात्र सम्पारम परिमापामप होनेसे समप्रमें बाने कठिन हैं। परमपुस्पका सपोग प्रस होना चाहिये । म परिमाया चार पपापचय निमारम करमा पोप है।
काबिठा, भाषण पदी २,१९५२ ६४३ * उपदेश-छाया मी, पुत्र, परिग्रह वादि मापोंके प्रति महान एनेके पचात् यदि ऐसी भावना ये कि 'जब मैं चाहूंगा तब इन वियों मारिके समागमका त्याग कर समगा,' तो यह मानके ही मन कर देनेकी बात समझनी चाहिये, बर्यात् उससे मूळहानमें पपपि भेद नहीं पड़ता, परन्तु पर वार रणरूम हो जाता है। सपा शिप्य मादिभपना मछि करनेवाले मार्गस युक्त होमागे वपत्रा घटक मागे, ऐसी मालनासे पदि बानी-पुरुप मी वाचरण करे तो बानी-पुरुपको मी निवारणवान वारणरूप हो जाता है चोर उससे ही वर्धमान मादि दाना-पुरुष भनिदापूर्वक साढ़े बाद वर्पतक थे। उन्होंने नया संगताको ही श्रेयस्कर समझा एक शम्दके मी उधारण करनेको पयार्य नहीं माना और सर्वपा निराकरण, योगरहित, मोगरक्षित और मपररित बान होनेके बाद उपदेशका कार्य वारम किया । इसलिये इसे इस तय करेंगे तो ठीक है, अपच इसे इस तर न या बाप तो मिप्या है, इत्यादि विकल्पोंको साषु मुनियों को न करमा चाहिये । वायफसके समपमें मनुप्योकी कुछ मासु तो मीक पास पठग नाती है, कुछ निद्रा पठी पाती है, कुछ में भी पाती है, और बो कुछ पोपीसी बाकी हती है, उसे गुरु ष्ट से । वर्षात् मनुप्प-मब निरर्थक हो पा जाता है। (२) भाषण बदी प्रश्न -केवबहानाने जो सिद्धांतों का प्ररूपण किया है या 'पर-उपपोग' या 'स उपयोग! शासमें कहा है कि केपानी स-उपयाग ही रते हैं। सीकर किसीको उपश दें वो इससे पुल पर-उपयोग' मही कहा जाता । '. उपपोग' उसे कहा पाता है कि रिस उप पाको करते हुए रति, परति, हर्ष वौर मरकार होते हो। शानी-पुरुषको तो तादात्म्प संप होता मही, निससे उपोश करते हुए उसे रति वरति नहीं होते। रति-वरतिका होना पा' पर-उपयाग' कहा जाता है। पदि ऐसा तो केवली कागेको चानते १-देसते र मी 'पर-उपपोग' का नाम | परन्तु पर बात नहीं है, क्योंकि उनमें रवि-अरतिमाघ मही है। सिदातको रचनाके पिपमें यह समझना चाहिये कि परिवानी मुदि न पाप, तो इसमेरे वचन बसत्, ऐसा करना चाहिये । पोंकि जिसे तुम असत् कहते हो, उसे तम परिसे शासे ही नर बनीच करना सी हो । भर्यात् उन्हीं शामक वाधारसे हो, तुम नो दुछ पानत हो उसे उन्न् १९५९परम-मयपरम्प नमै श्रीमायावनमानसमागन पारिन पणा पाषाभारिपामे मारिरमिये थे। उस समय उनम्मीखाती माई अंगार ममनी स्मभिम श्रीमझे उपरे विचार गजामात्र ए मई, तो बापारले उनि उन मित्र मिप तर परत मपून भार मापन माम सिव मिल पा । वही खर यहाँ उप-चापाके ममें रिपाई।-मनुपदर .
५२२ [४५ - भीमद् रामबाण तुमने नामा , सो फिर सई वसत् करना, या उपकारके मते रोप करनेके बराबर हो यि नायगा । फिर शामके किनेवाले भी विचारवान थे, इस कारण ये सिक्के विषयमें मारते थे। सिात महापौरस्वामी के बहुत वर्ष पसात् सिमे गये हैं, इसलिम उमें बसत् काना रोष गिना गायगा। हामीको बाबासे चल्नेमा मधिक मुमुक्षु बानो, यदि गुम्ने 'एचके पालने गर्थात् वियों मादिक समागममे न पानेको' बक्षा की हो, जो उस पचनपर म विश्वास कर, रमी उस उस स्पानको नहीं नाता जबकि निसे मात्र वाप्यामिक शाल वादि पाँचकर ही मुमुक्षता हो गई, उसे ऐसा बरकार या करता है कि इसमें उसे गीतमा हो क्याहै।' एस ही पागम्पमके कारण उन लियों बारिके समागममें जाता है। कदाचित् उस सममसे एक-दो बार मा मात्र मी वाय, परम्त पीसे उस पदार्थको बोर एि करते हुए 'क' ऐसे करते करवे उसे उसमें मानन्द बाने गता है, और उससे यह सिपोका सेवन करने गता। मोठामाम पोम तो पानीको मात्रानुसार | वाचरण करता है अर्थात् पर दूसरे विकम्पोको म करते हुए पैसे प्रसंगमें कमी मी नही पाता । इस प्रकार निस बोरको, इस स्थानझमें बारा मोम्प नही ' ऐसे पानी के सपनोंच प निवास पर प्रपचर्य में ग सकता है। वर्षात गह इस नकापो प्रात नही होता जब कि गिसे पानीको बाबाकारिता नहीं, ऐसे मात्र माध्यामिक पत्र गोचकर होनेवासे मुमुक्षु परमें किरा करते हैं, और समझा करते है कि इसमें उसे पासना होय ।' ऐसी मा पताको कर पा चार प्युत हो जाता है और बागेम नहीं सकता । या यो क्षेत्र हैर निसिवाम है, किन्तु निसे मिति उसे हो तो। पपा को स्वामीउसके सिमाप दूसरा कामचर्यक परा न हो पर केस कपनमात्र है। वैसे रिसे निरति मही उसे प्रथम तो ऐसा होता है पर क्षेत्र श्रेष्ठ है पॉपमा पोम्पो परम्त किर ऐसे करते करते विशेष प्रेरणा रोनसे पि क्षेत्राकार हो जाती है। किसानोति क्षेत्राकार नही होती, पोंकि एक तो क्षेत्र निविवागी, और मे उसने स्वयं मौ नितिमान प्राश किया है, इससे दोनों योग बनु । अम्मानिपोंको प्रथम तो ऐसा ही बभिमान यानता है कि इसमें गौना हो पा है। परस्त पा से पारे धीरे भिपों बानि पदामि फंस जाता है, जबकि सोहानाको पैसा नहीं होता। हातमें सितोको गो रखना देखने में माती है उन्ही मरों में मुकमसे तोपकरने उपदेश रिपा पपई बात ममी है। परन्तु से किसी समय किसाने वाचना प्रपना, पयर्तमा, पनुप्रेक्षा और वर्णप्रपा सिएएम पंछ को उस समय एसएपी पर बताई कि लिसले समर्मजागा, किसन प्रचारक सोया कि चार प्रकारकी --माक्षेपणी रिशेपणी, निदणी, सरगयी । इस इस पण जब बातें होती हो वा उनके पास गो गणपर होते है उन बातो ध्यानमें सोते । भोर भनुम्मसे उनकी रचना करते हैं। से पहा मी कोई मनुप कई बार करनेसे ध्यान में रसबर अनुभमसे उसकी रचना करता है। बाकी ताकर मितना में उतना पुरा सबध सा उनके पानमें मा पारेरठ मित्राप । प्यानमें पता है । तया गणर मी मुविमान थे, इसठिपे उन वोपमा परे ए बाम कुछ रनमें नहीं माप, पर बात माना।
, - । २४१] उपदेश-प्रपा ૨૨ सिवातों के नियम इतने अधिक सख्त है, फिर भी यति छोगोंको उससे विस्थ आचरण करते हुए देखते है 1 उरणके लिये कहा गया है कि सामुभको तेन राना मही चाहिये फिर मीने लोग गमते है। इसमें कुछ बानाको वाणीका दोष नहीं है, किन्तु गायकी समझने की शकिका ही दोप है। मोबमें समादि म हो तो प्रत्यक्ष योगमें भी उसको उल्ट्य माश्म होता है, भार पPि सादि हो तो सौपा मासित होता है। प्राप्त = थानप्रास पुरुष । वात = विपास करन योम्प पुरुष । मुमुखमात्रको सम्पमणि नीव नहीं समच छेना चाहिये, औषके मूस्फे स्थानक वनेक हैं। इसलिये मिशेष विशेष जागति रसनी चाहिये। म्याकुस होना नहीं पाहिप, मरता म करनी चाहिये, पुस्पार्य-धर्मको वर्धमान करना चाहिये । जीपको सत्पुरुषका संयाग मिलना कठिन है। बफ्ना शिष्य यदि दूसरे धर्ममें घसा नाय तो अपारमार्थिक गुरुको भर पा भाता है। पारमार्षिक गुरुको 'पर मेरा शिष्य है। यह मात्र होता मही। कोई गुरु-आश्रित बीच गोत्रके प्रवण करनके लिये कभी किसी सहस्के पास गया हो और किर यह अपने उसी पुगुरुके पास वाये, तो वह कुगुरु उस गोरको बनेक विचित्र विकल्प मैा देता है, जिससे और फिरते मगुरुके पास गाता नहीं । उस विचारे नीमको तो सत्-असत् पाणीकी परीक्षा मी नही, इसलिये वह टगा नाता है, और सग्मार्गस म्पुत हो जाता है। (३) राष्ब शाषण परी ६ शनि १९५२ मक्ति या सात मार्ग । मक्सेि बहकार र होता, पण माश होता है, भार साथै मामि गमन होता है, भम्प रिकन्प र रोते हैं-ऐसा यह मलिमार्ग भष्ठ है। प्रश्न -बामा किसके अनुममें गाई कही जानी चाहिये। उचर -रिस तरह तबारको म्पानमसे निकासनेपर प उससे मिल माश्म होती है, उसी तब जिसे भारमा देहसे स्पर भिम माश्म होती है, उसे अामाका भनुमत्र एमा करा पाया है। मिस तर म भौर पानी मिले हुए है उसी तर आ'मा भौर ने मिठे हुए है। और पानी क्रिया करनसे जा भिन्न भिन्न हा जाते है तब से मिल कर पाते हैं। उसी तय मारमा बौर देवपासे मिम हो सानेपर मिम मिम को बाते हैं। जबतक पकी बार पानी पानीको पायको प्राम न फर मे तक क्रिया माननी पाहिये। परि मामाको गगन शिया हो तो सिरक पर्यापसे मगार समस्त निनस्पनप सककी भांति होती मही । वरना दोष कम दो बारण रहो, सोही समझना चाहिये निबानीक वचन सोहै। हमें भम्प अमम्पको रिता म रमते हुए, समता जिससे उसकार हो ऐस मामय धर्म-म्पावार करना चाहिये । ान उसे कहते है यो हर्ष-शोरके समपमें उपस्थित रहे। मथात् जिसमे हर शोर न हों। सम्पाशिल गोकमारिके समागममें एकाकार होता नहीं । उसके भरत परिणाम दास नही। अदान मार मा बि पर जानते ही उसे तुरलगा देता है। मात दी जागति सी। मप भयानक ही है। जैसे कोर सिंह पठा मा पाहा और उसमे सिंहनाको मप माता नही, मिन्त उसे ५१५ भीमा पचान्द्र [४॥ मास्म होगी कि मानो कई कुवा हो चला वा या उसी तए पौशिक पोगको पानी एममता है। रम्पके मिल्नेपर वाद होता । वो पान है। बानीको दशा गुव ही बहुत । पापातम्प पम्पाण यो समसमें पापा माहा, उसका कारण पचमको भावरण करनेवाम दुरामामात्र-कपाप है। दुरामामातो कारण निमाल क्या है समसमें बाता नहीं । दुरूपाको मेब दें तो मिष्याच पूर मगने पगे । कम्पाणचे अकरपाल वोर मम्याणको कम्पाण समसमा मिप्पाल है। यह मादि मारके कारण औषको कपाणका स्मम बतानेपर मी सममें माता नहो । कपाप दुरामा वादिको छोड़ा न बाप तो फिर वह विशेष प्रका- रसे पोका देसा है । कयाप सत्तास्मसे मौत या है, और अब निमित्त बाता है न पसीको जाती तबतक पकी होती नहीं। प्रम –पा पार करनेसे सममान बात है। उर-विचारमानको पुनरमें रामपता-तादात्म्यमात--होता मही बानी पदि पौराणिक संयोग सर्पका पत्र पाँच तो उसका रेरा प्रम्म विसई देने भगता है, और पनि भयन पत्र बषि हो उदास हो पाता। स देसार जब बारमामि मपका कारण उपस्थित हो उस समय तादाम्पमाल पापाता है। बिस मयता हो उसे ही हर्ष-शोक होता है। मोनिमिचोरबपना कार्पये बिना माहीयता । मिष्याणिक मध्यमें साक्षा (जानपी ) महा। देवर बाहमा ऐनों मिम मिन है, ऐसा हानाको भेद मानके मभने साधा है। शान पर जागृति हो पा शान के पैगसे जो यो मिमि मि उमें पाछे हटा सकता है। SON स विमान परिणाममें ये उसी समय कर्म पाना है, और यब स्वमान परिणाममें से उस समप कर्म भावता नहीं। सपा रहे दो ही मोल होती है। सहरको नया बिना वाहमापा जानके पासोमासके मिपाप इसरा पुरा भी नही हो सकता ऐसी बिनभगवानकी माता। पाँच इन्द्रियों किस तर पश होती है ! उत्तर -~-पार्षकि उपर तम्मान पनेसे । कि मुखानेसे उनकी मगधि पोरे ही समाप- तक पर मारा पे गाती है क कुमम गाता है, और उम्स कुरा सोप ऐवा मही । इसी तर र मात्र मानेसे इदियों के लिफ्पमें हष्मता होती ही। पाँच इत्रिपोंमें निहाइदियो वश करनेसे बाकीको पार इनिपो सान वश हो जाती है। प्रमा-पिप्पमे जाना-मुस्पसे प्रश्न या के बाद सपांग तो गत गहन है और इससे मे समझमें नही मा सो इसध्येि स्पा करके बाद मंगोका सार बताइये कि जिसके अमुसार माचरण करतो मेरा कम्पालो गाय । एजाम भीमा पानी गुम्दी भाजे नोटम पोषक ममलम लग मा मायने मम्फो -सम्मातिमा बापत हुए मई मेयम माँ बाप मिपाकी मामी। अनुसार प्रम- .
१४.] उपदेश-छाया ५२५ उत्तर -सहमने कहा -पतियोंका अप करना हो बारह ठगोंका सार है। पे पतियों दो प्रकारकी कही गई है -एक वाप और दूसरी बासरग । वाणाति अर्थात् मात्मा से बाहर माचरण करमा । तथा वात्माके भीतर परिणमन करना, उसमें समा बाना, वह वत तिहै। पदार्पकी तुम्ता मासमान वो भवापि र सकती है। मिस तण पोपासी काम- तके मिझोके घोके झट मानेपर, बादमें उसका त्याग करते हुए मारमातिमें झोभ होता नही, कारण कि उसमें तुम्छता समय रस्सी है, इसी तर बानीको संगतके सत्र पदार्थ तुल भासमान होते हैं। आनाको एक रुपयेसे गाकर सुबर्ण श्पादितक सव पशोम सर्पया मिहीपना ही मासित होता है। बी पा-माँसका पुतळा है, यदि यह स्पर मान मिया है, वो इससे उसमें विचारवानकी सिमें सोम होता महीं। तो मी साधुको ऐसी बात्रा को है कि नो हलायें देवांगनामोंसे मी पायमान न हो सके ऐसे मुनिका मा, जिसके नाफ-कान काट दिये हों एसी सौ बरसकी पूरा मौके पास भी एना नहीं चाहिये। स्पोंकि यह पिको मुम्भ करती हो, ऐसा ज्ञानाने नाना है । सया साधुको इतना ज्ञान नहीं किया उससे घसमयमान न हो सके, ऐसा सोचकर ही उसके पास बनेको माहा नहीं की। इस बपनके उपर सर्य हानीने विशेष मार दिया है, इसलिये यदि पतियों पापमि क्षोमको प्राप्त करें, तो उमें तुरत ही वापिस गीचकर उन पास पतियोंका क्षय करना चाहिये । मो बौदा गुणस्पानक मतापे है, बश वशसे बरमाके गुम बताये है बार जन्में में किस तबके है, यह बताया है। मिस वय किसी हीरेको परिचौर की बनामो, तो वनुकमसे उसमे से विशेष बति विशेष कान्ति प्रगट होती है वोर पोर कली बमा नेपर बन्तमें होरेको सम्पूर्ण कान्ति प्रगट होता है। इसी तय सम्पूर्ण गुणोंक प्रगट होनेसे वास्मा सम्पूर्णरूपस प्रगट होती है। चोर पूर्वपारी वहसि (ग्पादों में से ) मो पीछे गिर माता है, उसका कारण प्रमाद है। प्रमादके कारणसे पा ऐसा मानता है कि 'भव मुझे गुण प्रगट हो गया है। ऐसे पमिमानसे यह प्रथम गुणस्थामकमें ना पड़ता है और उसे बनतकालका भ्रमण करना पड़ता है । इसलिये नीत्रको वाश्य गांगत गना चाहिये कारण कि पियों ऐसी प्रसता है कि मा हरेक प्रकमसे टगती है। गौच म्याद गुप्मस्पानकोसे पुत हो पाता है उसका कारण यह है कि रतियाँ प्रपम तो समझती है कि इस समय या शूरतामें है, इसकिय अपना बह बस्नेबाठा नही है 'भीर इस कारण परोस रहता है। परन्तु पिपाने नहीं समझा कि पिसे मा म्मी नही प्रॉपगा, मानसे मी ठगी नहीं मॉपगी, तपा मायाका र मी पसनेवाम नहीी', हाँ तुरत । मेम उदयौ वा गाता है। उस समय मेरेमें फसी इदि सिदि भार ऐधर्य प्रकट हुए है, ' मी रवि शेनेपर, उसका काम हो जानेस जीप पसि पुत हो जाता है, मोर पहिसे गुणस्थानमें जा पाता है । इस कारणसे इत्तियों को उपशम करनेको भपेशा उनका क्षय ही करना चाहिये जिससे फिरसे उबूत हो म सके। रिस समय शानी-पुरुष स्याग करने के लिये करे कि इस पदार्यको त्याग दे, तो ति गारिस दो गावी है कि यह में दो रिन पपा त्याग करगी। पति इस वयके पोमेमें प्रा बाती किर समाप्तता, पडो ठीकामा, माधुक समयका मचाएमा सो पर्प जाता है। .
[६॥ ' . भीमद् बान्द्र इतनेमें ही यहां शिपिस्तो कारण मिरे कि पियाँ पा करकर ठग तो इसके त्याग करनेसे रोगके कारण उत्पन गे, सविम इस समय नए परन्तु फिर कमी त्याग करेंगी।' इस वगसे बनारिकारसे बीच ठगाया पाया है। किसीकर पीस वर्पा पुत्र मर गया हो तो उस समय तो उस गोलको ऐसी समझट म्ाती है कि यह ससार मिप्यारे। किन्तु ऐसा क्या है कि सरे ही दिम स विचारको पार पिया करफर मिस्मरण करा देवी पुत्र कस का हो जायगा, ऐसा तो होता 0 वाता है किया क्या पाप।' परत या मही होता मिस पर पुत्र मर गया है उस तरह मैं मी मर पाउँगा । इसलिये समझकर रम्य छेकर पम चा तो पन्छा है-ऐसी चि नहीं होती। बाँपि गमेती। पाच ऐसा मान बैठता है कि मैं परित है, शावका पेचा होशियार !, गुगवान , मेग मुझे गुणवान खाते है' परम्त पर उसे ठन्ध पदार्थका सपोग ऐता है, उस समय तुरत ही उसकी पपि उस बोर सिंच पाता है। ऐसे बीवको पानी कावे कि तू गय विचार तो सही कि पप फापको मतको अपेक्षा मी तेरी कीमत तुम है। जैसे एक पाईको पर बीबी मिती -वर्षात् पात्र पर्वको एक एक मौन - उस पाका यदि तो म्पसन हो मौर बर्सानों परन अषण करता हो, तो पर यहाँ भी करीसे बीमाकामा बा गया हो तो ते मामा मो मा निकराने गया और हानीके बचपरसे प्रेम जाता यता है ।बम पैसे पदार्पमें, उसकी मिया पिके मान होनेसे पालिका धोम नाव होता नहीं ! जब पान पाईकी बायसे मी ऐसा ऐ जाता है तो फिर सनकी कीमत तो उससे माता-एक एक परी चार धार मान्मा हुई। सम्पेि हरेक पदार्थ मात्र विचारकर रविको बार बाते हुए पेन्नी चाहिये और उसका पप करना चाहिपे। मनापासनाने का एक महानी रोए अमिमाप है, और करोर शानि- याँका एक ममिमाय है। उचम बाति, माथित उचम और सग स्यादि प्रचारसे बाम-गुण प्रगट होते है। दम जैसा मानते ऐसा बारमाका मग स्वभाव नही है। इसी तय बामाको कर्माने कुछ सर्वपा पार कर नही रक्सा । मामाका पुरुषार्प मर्मत्र मार्ग तो नपा सुमावा है। बागरे और गेकि एक पानेको पदि एक मस पर्वतक रस छोका हो (तमे दिनों मा सर्व पापगा यह बात हमारे मानमें) परन्तु यदि उसे पानी मिमी बाका संभोग म मिले तो उसच उगना समय नही सो यससंग बौर चार स्पोग म मिले तो बात्मा गुण प्रगट ऐता महो। गिक रामा मरफ है परन्तु सममासे, समकिती है सम्मेि उसे डास नही है। चार सका तरा बाल मा चार प्रकारके होते है:- कोई पार मारे गहमें गये । पहिले पहिस सबने धीमा उठा जास मागे पछने पर चंदन बापापोतानने तो दन किया और उनमेंसे एकपने लगा कि कि इस समय उरिया बिगी पामही, इसम्मेि मुझे तो हर महीना है। इस मो रोग मेते है, माम नही १] उपदेश छाया - मुझो केही सफडियो बीर।' मागे पडनेपर चादी-सोना थापा । उन तीनमेंस दो जनोंने भन्दमको फेंक दिया, और सोना-चांदी छ लिया। एकने सोना चाँदी मही लिया । यहाँसे बागे चळे किमिन्तामणि रस्न वाया। इन दोमसे एकने सोना फेंककर पितामणि रान उठा लिया, बार एकने सोनेको हो पने दिया । १ यहाँ इस तर त घटाना चाहिये कि मिसने केवल छाड़ियों की सी, और दूसरा पुछ भी म लिया था ऐसा एक तहका बीच होता है। निसने अलौकिक कार्योको कर ए जानी-पुरुषको पहिचाना नहीं, दर्शन भी किया नही । इससे उसका बग्म, गरा, मरण मी र हुमा मही, गति मी पुपरी नही। २ मिसने बदन उठा लिया और एफपियोंको फेंक रिया- इस तरह हर्यत पटाना चाहिये कि बिसने पोपा मी जानाको पहिचाना, उसके दर्शन किये, वो उससे उसको गति श्रेष्ट हो गई। २ जिसने सोना मादि प्रहण किया, मात इस तर पाना चाहिये फि त्रिसने बानीको इस प्रकारसे पहिचाना उसे देवगति प्राप्त हुई। १ रिसने पितामणि रन लिया, उस व्य॑वको इस तरह पटाना चाहिये कि नीषको पानीको यथार्थ परिचान ई कि जीप भत्रमुक एला। कल्पना करो कि एफ बन है। उसमें बातसे माहारम्पपुष पार्थ है। उनकी जैसे जैसे परिपान होती है, उतमा । उनका माहारम्प माश्म देता है, और उसी प्रमाणमें मनुष्य उनको माग करता है। इसी तरह बानी-पुरुषसती बन है। उस शामी पुरुषका मारम्प अगम बगावर है। उसकी जितनी नितनी पहिचान हाती है, उतना ही उसका माहारम्प माइम होता है, और उस उस प्रमाणमें मीरका प्रत्याण होता है। सांसारिक सदके कारणोंको देखकर, और काबाइट माश्म होनेपर भी यह मैराग्यके कार पौर रखकर वसा जाता है, किम्त रेराम्यमें प्रापि करता नही। सोग मानीस मोक-शिसे देखें तो उठे पहिचानते नही । माहार मा में मीशानी-गुरुपकी प्रति बाघ रहती है। किम तए । से किसी का मौको पानामें सरे हफर, पानी परिरमार, माग साभकर उपर टंगे हर पाका मन करता रहता है। छोग बोसमाचते है कि वेपन करनेवासी पाना है जिनमानसमें रेमा जाप तो उस मा माको पोफा पेपन करना इसडिप उसपर उस करनेफ बाम्ते, पेपन करनाडीको सिमामा हो रहता है। इसी तप हानाही पहिवाम किसी रिवारमानको दी दी है। समयप करना कि बाहर गाती विपोन सप करना पादिये-जाप क्षप परमा पादिये पीहानीको मात्र। राध प्रतिम संसार करनेडी तो हो समझना चाहिये कि पानी-पुरको देमा दी महो। विस तर प्रथम संगारमें रसरदिन मापरण परना हो उस पप, जानीय संपोगोनेर किर भापरणरे-पही जानासम्म । भीमर पवन [१४॥ शानीको शान-रि-परिस-रेसनेके पधात् मोको देखकर गग उत्तम साता महो। पेकि पानाच स्वरूप विषम-मुसको कम्पनासे पुरा । पिसम बनन्त पुसको साम क्रिया हो उसे राग होता नहीं, और जिसे एग होता नही, उसाने बानीको देसा, बौर उसोको प्रना-पापा दर्शन करने पमा पीका समान शरीर बावनस्पसे मासित ए बिना पता नही । मोति उसने बानी पचनोको पयार्प विसे सत्प गाना है। निम्ने बानीके समाप, दो और जापाने मिम-प्रपा पृपा-बान म्यिा है, उसे दो और वास्मा भिम मिम मासित होते है, उम्से बीका शरीर और मामा मुरादा माम होते हैं। उसमे मौके परो माँस, मि, ही बाविका पुतमा ही समझा है, इसम्पेि उसे उसमें रग उत्पम होता नहीं। समस्त शरमका उपर नीचे पा कमर के ऊपर ही पता है। निसी कमर हट गई। उसका सब का नर हो गया है। लिपप भादि गोको तृष्णा है। संसारकमा शरीरका का इस विषय बारिरूप कमरके ऊपर हो रस्स्य गुमा। पानी-पुरुपके बोरो गनेसे निपय बाविस्म पर मग रोमाता है, वर्षात् विषय वाठिक तय माझ्म होने माती, और उस प्रकारसे संसार पर पठता है, वर्षात् बाला-पुरमके बोपमें ऐसी सामर्प । महामारस्वामाको संगम मामके देवताने मात । ऐस ऐसे फ्पा ये कि जिनमें प्राण-पाग होते हए मी देर न म्गे। हा सी बात समता रक्सी 1 उस समय उनाने विचार किया कि जिसके दर्शन करनेसे कम्माण होता हो, माम स्मरण करनेसे वायाप्प होता हो, उसीके समागममें बाबर स पाँचको मनन्त संसारको विका कारण होता है। ऐसी अनुरूमा बामेसे मौसमें वासू मा गये । केसी बहुत समता है। दूसरे की दया किम तय वरित पे मिकर्म पी ! उस समय मोहराने पर परा होपस्का गापा होता तो तुरत होताधकरफ्ना संम्त म यता और कुछ नही तो देखता तो माग हो मा । बिसने मोहनाप मा मम्से नाम कर पा र वर्षात् मोहको पात स्पिा है, पर मोह कैसे कर सकता। प्रामास्वारस्वामी के पास गोशाम पाकर दो साधुवाँको मण सम उम समप उमाने पनि परा भी सामग्रपूर्ण सापुमो रक्षा की होती तो उनमें वार्धकरपनेको फिरसे करना पड़ता । परन्तु जिसे 'मैं गुरु , पर मेरा शिप्प है। ऐसी मानना होगी। उसे सामी करना नहीं पाता। सनहोंने ऐसा विचार किया के रक्षणका दाOR महा के मा-उपशापयामर । पदि में इनकी रमा कहें तो मुझे गोशालाकी मी रक्षा करनी चाहिये स्पा समस्त जगत होता परनी सवितामात वीर्षकर ऐसा ममत्व करते ही नहीं। दामें इस कामें चरमरारी होना बाहै। निमगवान्के मतानुसार इस कामें एकान्तारी बाल होते है । पार्ण पोषी बात नहीं है, क्योंकि इसके पश्चात् इस मोक्ष होनेमें बारिक और मानी नही । पोड़ाहो पात्र यमाता और बो पता है फिर सहरमें रहो बाता है। ऐसे पुस्पली दमा सिपा-कैसी होती है। नाविध पसी पिपा सात यो। और नी माविक शान्ति पता है कि रागरेप सब नारा होने पोम्प होगा --उपशात गाते है।
२४.] उपदेश-प्रया सठियों के उत्पम होनेफ लिये गो जो कारण-साथम-बताये होते हैं, उन न करनेको शानी कमी करते हो नहीं । वैसे रात्रि भोजन करना हिंसाका कारण माश्म होता है, इसलिये बानी कमी भी वादा नहीं करते कि पत्रिमें भोजन कर । परन्तु मिस निस वाभाषसे भाषरण किया हो, और रात्रिमाजनसे ही अपना 'इस जमुक्से 0 मोक्ष होगी, क्या इसमें ही माशी' ऐसा दुरापासे माम्य किया हो, तो वैसे दुराहको छपानेके म्येि पानी-पुरूप करते हैं कि इसे छोड़ दे पानी-पुरुषोंकी बाबासे पैसा (रात्रिभोजन-स्पाग मादि) कर' पौर पैसा करेगा तो कम्पाण हो पापगा। बनादि कारसे दिनमें और रातमें मोमन किया है, परन्तु गीतको मोक्ष नई नहीं! इस कामें माराधकता के कारण घटते जाते है, और वियरकताफे पक्षण बढ़ते जाते हैं। फेशीस्वामी परे थे, और पानाप स्वामीके शिष्य पे, दो मी तम्हनि पाँच महारत स्वीकार किये थे। फेशीस्वामी और गौतमस्वामी महारिपारवान थे, परन्तु केशीस्वामीने या नहीं कहा कि मैं दाला बाससिपे तुम मेरेसे पारित्र प्राण करो' विचारवान और सरत बीवको, निसे तुरत ही कम्पाणपुक हो गाना है, इस प्रकारकी बातका भाप्रद होता नहीं। कोई साधु निस्ने बान-अबस्थापूर्वक भाचार्यपनेसे उपदेश किया हो, और पीसे उसे माना-पुरुपका समागम होनेपर, पाशानी-पुरुप यदि साधुको माझा करे कि जिस स्थानमें ले भाचार्य- पनेसे उपरेश किया , नही गाकर सबसे पीछे एक कोनेमें बैठकर सकोगोंसे ऐसा कर कि 'मैंने पानमानसे उपश Pिपा है, इसरिये तुम लोग मूछ साना नहीं' दो साधुको उस तर किये बिना छुटकारा नहीं है। पदिया साधु या करे कि ' मेरेसे ऐसा नहीं हो समता, इसके बारे यदि पाप कहो तो मैं पछाके उपरसे गिर पाउँ, अपना बन्य जो कुछ कहो सो करें परम्तु पाँवो में महीमा सफता'-वो पानी कहता है कि 'काचित् र सास बार मी पर्वतके उपरसे गिर गाय तो मी किसी कामका मही है। यही तो परि रेसा करेगा तो ही मोक्षकी प्राप्ति होगी। सा किये मिना मात्र मही है। इसलिये परिपाकर क्षमा मागे तो हो तेरा कम्न्यामहो सस्ता है। गौवमस्वामी पार इनफे पारक । मानन्द प्रापक उनके पास गया । मानन्द प्रारको कहा कि मुझेशान उत्पम हो गया है। उत्तरमें गौतमप्तामाने का कि नहीं, नहीं, इतना सर इसलिपे तुम धमापना गे'। उस समप मानन्द भाषने विचार किया ये मेरे गुरु संभ, इस समप ये मूछ परते हो, ता भी आर मूठ करते हो', पर करमा योग्य नहीं । पे गुरु इसलिये इनसे शान्ति हो बोसना टीक है। पर सोपरि मानम भापपने कहा कि महाराज! सस्तावना मिपामि दुसर' भयका असतापनका · मिामि दुपा। गातमने हा कि वतापनका ही 'मिच्छामि दुका' होता है। इसपर मानन्द भारफन पहा कि मादागर में मिणामि दुर'ने योग्य महीनेमें गौतमम्पामा यहाँस पर गये और उनान गाझर मदागरमामी पू । पपी गौतमलामी सर्प उसका समाधान कर सकते थ, परम्नु गुरुमीमा पते पर पेस करना टीम मरा, इस कारण उन्होंने ममारिताडि पाम पार पा । मही सकता, - । . भीमद्रासन [१४१ सा गाव र दी। महावीरताम/ने कहा, 'हे गौतम ! हाँ, धानर पैसा समझता (tal और तुम्हारी भूम है, इसध्येि तुम वामदके पास जाकर क्षमा मागो' गौतमस्वामी विधान' पकर घमा माँगनेके छिपे चल दिये । यदि गौतमस्यामाने मोइ नामा म्यामुझको फ्यमा न लिया होता तो येहाँ माते ही महावीर कदाचित् ऐसा कहते कि 'महाराण! वापसे वो इतने सम शिप्प , उनकी मै चाकरी कर सकता , पर हाँ वो मैं म गाउँगा,' तो यह बात सोय पोखा । गौतमस्वामीन स्वपदा पाकर हमा माँगी । सास्वामसमकित ' वर्षात् नमन किया धमा समकित्त-अर्थात् जो परीभाई पी, रासस यदि वावरण वा जाम तो मी मियाव और समलितको कीमत वसे मिम मिल माइम होता है। से असे पहिले मासनको निकाल नेपर पास उसे मण् गरें, तो माम मौर म पहिले से एकमेकप से एकमेक वे फिर नहीं होते उसी तय सममित मिष्मावको साप एकमेक होला नही । वपना बिसे रिमणिकी कीमत हो गई हो उसके सामने यदि मोरका टुका माने तो उसे हीरामणि साक्षात् पनुमत्रमें बाती है-पाहत भी पारी पटता है। सार सब वौर की प्रापित ए धर्मको सम्परत या, परन्तु सत्देश और केवली ये दोनों सरगुरमें गर्मित हो जाते हैं। निर्भय गुरु बर्षात् पैसे रक्षित गुरु मही, परन्तु मिसका प्रपि-मेद हो गपा है, ऐसे गुरु। गुम्की परिभान हरोमा पपारसे प्रन्धि-भे रोनेन उपाय है। वैसे किसी मनुपने खिोरपणे छुकमा कर विचार किया मेरे पास बस मणि है, ऐसी हो भी मिलती नहा।' बाद उसने जब किसी चतुर बारमारे पास मार मा कि 'मेरी मणि वसा, वो उस पर बाबमाने उससे मी भात परिपा बहिया परिक पिक कामतको मणिया बताकर का देस इनमें का फरक माश्म देता है। बराबर देश । उस मनुष्यने नवाब दिया कि हाँ इनमें फरक हो माम पाखा है। इसके बाद उस पर पुराणने साफ फन्म बताकर कहा कि एक तेरी सी मणिया तो हजारों मिकता है। समसाप फरमूम दिखाने के पचात् अब उसे उस पुरुपने बससी मणि बताई तो उसे उसकी ठीक टोक कीमत माम पड़ी और उसने उस मणि मि समझकर फेंक दी। बादमें फिर किसी दूसरे बारमीने मिम्मेपर सेमा किने मिस मणिको असम मच रसम है, मैन मणिया तो पात मिकती है। वो स प्रकारके भावरणसे पाम वा मानेसे गांव मूठ पाता पम्त पारसे उसे पाठा ही समानता है-मिस तय की कीमत दो उसी क्यसे समझता है- तुरत हो पागृतिमें माता है कि बसी बात होती मी बर्षात् भावरण तो होता है, परमा परिका गो पहिचान र म माती नही । इसी प्रकार विचारवान मगुरुच संमोग होनेपर तत्व-प्रतीति होती है परन्तु में मिप्पासिंगसे भावरण वा पानेसे उसमे शंका हो पाती है। पितात. प्रतीति मा मी हो मासीक उसे बारण मा माता का नाम साप्तादनसम्पत है। फगुरु मौर मसद्गुरमें रात दिन बितना बन्चर है। एक गोरी पा । उसके पास म्यापार में अधिक मुकसान हो पानेसे मी इम्प मापा नही। पर मरमेध समप मम्हाला पाँचा, वो पानी बोच विचार करने या कि मेरे - . . उपदेश-या पास कुछ भी तो ट्रम्प नही हैकिंतु पदि ममी इस बातको कर तो छाका छोटी उमरका है, इससे उसकी देह छ नावेगी । मीने सामने देखा वोर पंख कि कुछ कहना चाहते हैं ! पुरुपने कहा 'पा करें।' बोने कहा कि निस्से मेरा और पोंका उदर-पोपण से ऐसा कोई माग बताइये, चौर कुछ कहिये । उस समप उस पुरुपने सोच विचारकर कहा कि घरमें बपाहयतके म्यूकमें कीमती नगकी एक रिविया है। उसे, जब तसे पाहत नरूरत पो, तो निकायकर मेरे माफि पास जाकर विकता देना, उससे तठे बहुतसा ट्रम्प मिठ बापगा। इवना काकर प पुरुष काम-धर्मको प्राप्त एमा। पुछ दिनों बाद बिना पैसेके उदर-पोपणके लिये पीड़ित पुमा मागका, मपने पिता के को हर उस बगाइयतके नगको एकर अपने काका (पिताके मई जौहरी) के पास गया, वार का कि काकानी मुझे इस नगको बेचना है, उसका वो पैसा बारे उसे मुझे दे दो। उस मोहरी मार्दन म, इस नगको बेचकर तुझे क्या करना है।'मकेने उत्तर दिया कि उदर मरनेके लिये पैसे की चम्पत है।' इसपर उस बौहरीने कहा 'यदि सौ पचास रुपये चाहिये तो मेरे, रोग मेरी हुकामपर था, और सर्व ता य । इस समय इस नगका पने दे।' उस छ,केने उस बाहरी काकाकी बातको कबूल कर दिया, और उस गबाहरातको वापिस ले गया। तत्पपात् यह साका रोग गौहरीकी दुकानपर चाने मा, और धीरे धीरे जौहरीके समागमसे हीरा, पमा, माणिक, मौसम सम्मकी परीक्षा करना सांस गया, और उसे उन सबकी कीमत माइम हो गई। बा उस गौहरीने कानो परिवपने जवाहरातको अपने छापा पा उसे छा, उसे अब बेच देंगे।' इसपर साकेने परसे पफ्नी पवाहरातकी रिबिया कर देसी तो वह मग नकली माम Pपा, इससे उसने उसे तरत हो फेंक दिया । जब उस गौहरीने उसके फेक दनेका कारण ठा, वो भने नबाब दिया कि होविन्मुस नकली था, इसलिये फेंक दिया है। देखो, उस गौहरीने पदि उसे पहिसे ही नकली बताया होता तो साफा मानता नही, पस्तु जिस समय अपने वापको पस्तुकी कीमत मातम हो गई और नकलाको नकसीरूपसे समष्ठ किपा, उस समय जौहरको ना मी पदा नहीं कि या नकली है। इसी तय वपने मारको सद्गुरुकी परीक्षा हो बानेपर पनि बसगुरको मसद मान लिया तो गोत्र वस गुरुको छोरकर सद्गुरके चरणमें मा परवा है। मर्यात् वपने बापने कीमत करनेको शाकि बानी पाहिये । गुरुके पास हर रोग गाकर या नीब एकेन्द्रिय मादि जीवोंके सबमें भनेक प्रकारको शकाय पौर कापना करके प्रण करता है, परम्तु किसी न मी पर उता नही कि एफेन्द्रिय लगाकर पत्रिपको माननेका परमार्थ क्या है! एकेन्द्रिय आ जाासपी अपनाओंसे गुरु मिपावरूपी प्रपाका छेदन होता नहीं। एफेत्रिय मारिनीका स्वरूप माननेका हेतु तो दयाका पालन करना है। मात्र प्रय करनेके लिये सी बातें करमेका कोई फठ मही। मास्तविकमपसे तो समफित प्राप्त करना हो उस ससा फल है । इसलिये गुरुके पास गाकर म्पर्धक प्रश्न करनकी भाषेचा गुरुको कारमा चाहिये कि मात्र एकेत्रिय बादिकी बात बाय गान छौ। वब उस गावको भाप कसके पिन न करें, किन्तु समफितको परस्पा करेंस तर कडे या किसी दिन निस्तारा हो सकता है। परम्त रोग रोव एशिप मादिको मापापपी करे तो इस गीत कम्पाग का होगा। ।
५० प्रीमद् परवद्र [1 सब बात कर दी। मारस्वामीने या हे गातम ! हाँ, वामद बसा सममता रम हो और तुम्हारी मूग, इमठिये तुम बानरक पाम गाकर क्षमा मांगो'। गौतमसामी 'ह' एकर क्षमा माँगनक लिये पाये ! यदि गौतमम्मामीने माह नामक महामुमको परामा न मिय हाता तो यहाँ बाते ही नहीं, वौर काचित् ऐमा करते कि महाराज वारके गो इने सर शिष्य में उनकी म चाय कर सकवा । पर या तो मैं न गाउँगा,'तो पगात स्वार होता । गौवमस्वामान रूप पाँगाकर घमा माँगा । सासा समष्ति' वपात् नमन किया हुशा समरित-अर्पात् जो परमाई पा, उसस पनि मारण मा गाय तो मी मिप्यार और समपितको कीमत उसे मिञ मिञ मास होती है। वैसे ग्राम्से परिस मासनको निवास नेपर पीछेस उसे छामें राजें तो मस्खन और मा पहिले जैसे एकमेकप मे एकमेकसि नहीं हो उसी तय समयि मिपानको साप एकमेक हाय नहीं । षपका रिसे होगमणि कामत हो गई हो उसके सामने परि निहोरका टुका वारे तो उसे हरामणि सायात बनुमसमें पाती- पात मी यहाँ पटवा है। स्पर सरेम और केवली के प्रति किये हुए धर्मको सम्पात का परन्तु सदन और कामे पे दोनों सम्में गर्मित पे गाते है। निय गुरु मात् पैसे पत गुरु नही परम्त बिसका प्रपि मेर हो गया है ऐसे गुरु! मगरको पहिचान हाना म्पपहारसे प्रन्थि भेद होने का उपाय है । जैसे किसी मनुप्पने रिकार्ड टुकड़ा लेकर विचार किपा मेरे पास बस मणि है, ऐसी को भी मिलती मी।' बादमें उसने मा पिसी चतुर मा पनि पाम गार कहा कि 'मे ममि मसती है, तो उस चतुर भाइमामे उम्भे मी पाठ बनिया यदिपा बरिष पिक कामवको ममिया बताकर कहा कि देश इनमें कुछ फरक माम्म देता है। बार देखा उस मनुप्पमे मबार Pा कहाँ इनमें फरक हो माश्म पान है। इसके बाद उस चतुर पुरफ्ने सामान्म बताकर ना किसी सी ममियों को बनायें मिलती है। समाज फल्म रिसाने पचात् बा उसे उस पुस्पने क्स मनि बताई तो उसे उसकी टीच अंक कीमत माश्म पही वौर उसने उस मणिको बिलकुल ना समझकर के दो । गरमें किर किसी से मामाने मिडनेपर उससे मारने मिस मणि बसग समय राता है, मणियाँ तो बहुत मिलती है। इस प्रकारक वापरणसे गम वा जानेसे गाल मूह माय फ्रस्तु पौरस उसे हटा होममहना-मिस तर बसमधीमता हो उसी वयसे समझता है- पुरत हो मागनिमें बाता है कि वसी बात होती नही । वर्षात् वारण तो होता है परन्तु पत्रिका गो पहिचान र मी बाय नी । इसी प्रकार विचारवान सदगुरुप सपोग होनेपर पर प्रतीति दावी परनु बाग्में मिम्पात् मासे बाबरण बा बानसे उसमें शका हो वाटी । स्वपित प्रनत भए नही होगा कि उसे बाबरण बागावा है । इस नाम सम्पादनसम्मत है। मगर मोर मसद्गुम्मै रात दिन रिवना मम्वर है। कर पा । उसके पास स्पागारमें मरिक नुकसान हो मानेसे कुछ मी व्रम्प बाकी का महो। जब मरनेका समय ना बा पचा वोपी बोच विचार करने गा र मेरे [४] उपदेश-छापा ५॥ - . प्रम-उदयकर्म किसे करते हैं। उत्तर -ऐचर्यपद प्रास होते समय उसे धका मारकर पीछे निकास पाहर करे, कि यह मुन्छ पाहिये नही मुझे इसका करना क्या" कोई राना यदि प्रधानपद दे तो भी स्स्य उसके भनेको रन करे नहीं। इसका मुझे करना क्या है। घरसंची उपाधि हो तो यही बात है'स तय उस पदको मना कर दे । ऐमर्यपदको अनिष्म एनेपर मी राना फिर फिरसे देमेकी दया करे, और इस कारण मा उपर वापसे, तो उसे विचार होता है कि 'देस, यदि तेरा प्रधानपद होगा तो पावसे गायोंकी दया पटेगी, हिसा कम होगी, पुस्तकालय सुग्गी, पुस्तकें छपाई गागी' इस तय पर्मक गतसे कारणोंको समझकर पैराम्य मावनासे बेदन करमा, उसे उदय कहा जाता है। रासहित तो मांग करे, वौर ठसे उदय बताये तोप शिफ्रुिता और ससारमें मटकनेका कारण होता है। पावसे गाल मोहनगमित राम्पसे और बहुत से दुस्मगर्मित बैराग्यसे दीक्षा के मेते हैं। दीक्षा मेनेसे बच वच्छे मगर बौर गाँवों में फिरनेको मिलेगा। दीक्षा मेनेके पचात् बन्छे बछे पार्थ सानेको मिगे । बस मुस्किल एक इतनी ही है कि गरमीमें भगे पैरों पन्ना पोगा, किन्त इस तरातो सापारण किसान अपना पटेल सोग मी गरमीमें मगे पैरों पर है, तो फिर उनकी तय या मी वासानासे हो हो बामगा। परन्तु वार किसी दूसरी तरहका दुस नहीं है, और कम्पाण Ot'- ऐसी मावनासे दीक्षा केनेकर नो राम्पो मोह-गर्मित बैगम्प है। पूनमफे रिन बहुतसे लोग राकोर गाते हैं, परस्तु कई पह विचार करता नहीं कि इससे मफ्ना कम्पाण क्या होता है। पूनम के दिन रणछोरनीके दर्शन करमेके लिये उनके बाप दो बाते थे, इसलिए उनके हाके यो मी माते हैं। परन्तु उसके हेतुका विचार करते नहीं। यह मी मोहनगमित बैराग्यका मेद है। यो सांसारिक तुमसे संसार-त्याग करता है, उसे दुस-गमित बैगग्य समझना चाहिये । पाँ नामो यहाँ कल्पाणको ही पनि हा, ऐसी प पुदि करनी चाहिये । कुम-गशके बायको सुसाना, यही संगके माहारम्पके सुननेत्र प्रमाण है।ममतर भाति, धर्मके पो बो भनतानुबपी पर्वतके फाटपको तर कमी मिलते ही नाकामा करना नहीं और यो कदा करा ऐतो उसे पौरमसे समझाकर छुपा देना तो ही समस्नेका फल है। अनवानुबंधी मान, म्याण ऐनेमें बाप स्तमाप कहा गया है। गौ नहाँ गुणा मनुप्प हो बहा रहा विचारपान मात्र उसका सग करने के लिये करता है। माना म्मण लौकिक मारके होते हैं । ही नहाँ दुयमा रो उस उस बगहसे ना चाहिये । ' इसकी मुझे भाग्यकता नहीं, ' पही समझना चाहिये । (.) राम भादप सुरी ६ शनि १९५२ प्रमारसे योग उत्पम होता है। आनाको प्रमाद है। योगसे बहान उत्पन होता हो, वो नहा काना मी समय है इसठिये पानीको माग होता है, परन्तु प्रमार होता नहीं। 'स्मामें पमा ममापसे छना, यही मुम्प बात समाप्सने की है। मानायक समझने के लिये पानी-पुरुषोंने सिद्धान्तों के मदे मागच वर्णन किया है। । । ।
। . કર ग्रीमद् पसवान समुद्र सारा है । एकम तो उसका सायपन दूर होता महो। उसके र करमेश उमप यो कि उस समुद्रसेंसे एक एक असा प्रवाह कर उस प्रभारमें, जिससे उस पानाच बन रहे और उसमें मिठास-या बाप ऐसा सार राना पाहिए । उस पान के मुसामे दो उपाय - सूर्पका ताप गौर दूसरी बमौन । इसलिय प्रयम यमौन प्यार करना चाहिये और गारमें नालियोबार पानी के गाना चाहिये और पीसे सार राना पाहिए, जिससे उसका साराफ र ो गाममा इस व्य मिप्पावरूपी समुद्र है, उसमें का मादिरूप मारापन है, इसठिये फुलमर्मसी प्रकार योम्पतास्म जमीनमें से जाकर उसमें दोपहमी भार रामाना चाहिये-ससे सपुरपसी ठप. सारापन दूर होगा। दुर्मस देोने मास उपवासी, मो मापारग २, दो पण गर्भ मनवा सभे, पासे बीच भगरे । + गितना पान्ति बरिफ उतना ही अधिक मिप्याप । सबसे बड़ा ऐमा निम्मान । जा स सपर्या करना पर तन उस सबसे न करना, परंपरसे न र रोगों के लिये न करना । गीतको बो कुछ करना है उसे सबसे न करना चाहिये। में होशियार ' पर यो मान रखना, प किस भोपे ! होशिपार मही', इस नए सिने समान लिया मोक्षमें गया है। सबसे मुख्य विन सद। बिस दुरामका दम हो गया है, पर मेगोंको भी प्रिय होता है-कार दिया है तो सरे गोंको भी प्रिप है। इसध्येि फाफे मे देनेसे सब पर मिलना संभव है। गौतमस्वामीने महामारस्वामास सबभी पन पूछे। उन प्रश्नोंच, जिसने सब पोप अप कर दिया है ऐसे उन मारितामीने करत देकर समाजाम (स ) कर बताया। सरेको उब गुणोंमें माना चाहिये किन्तु किसाको निन्दा करनी मही। सो समय तासे दु० मा पना नही । इस करमे योम्प हो तो भाकारीत मासे हो पाना चाहिये। परमार्थ रिस परि पानोप पट गये हों तो ही फापक, पोंकि म्पपारसे तो भो गयी भी रागनप परे हुए यते । परन्तु परमासे मारेप मापा हो तो समस्याका कारण है। महान् पुस्पोंकी रिसे दम्नेसे सब दर्शन एक्से ।नदर्शनमें बीमारी मतमताको पोरानीकी पिसे भेदाभेद होता नहीं। मिस गोषको अमानुषीका उदप है, उसे सचे पुरुषकी बात मी विकर दोगी मही, वार सरे पुस्पको मात मी सुमना उसे मागता नहीं। मिप्यानकी गो मन्दिर उसकी सात प्रतिमा है। मान लाने तो सातो साप साप माती । उसमें मनतानुबाको चार प्रातियाँ पकवता समान है। मसी मी तय प्रपिसे निकलने देव मही । मिप्यात रमवाम (सपा) है। समस्त अगत् उसका सेवा बारा रा है। •पुरमा एक एक मारम उपज पर बरसम्म बातो मी मर्म पाप प प पूरी ममम मा मय है। + मूल्यम्मा हम्मदी-बी प्रासपणे देवपारे। -मुपरफ ६.] उपदेश-भपा होम हवन वादि बातस लौकिक रबानोको प्रचलित देसकर तपिकरमगवानून अपने समयमें दयाका भात ही सूक्ष्म विसे वर्णन किया है। जैनदर्शनके समान दयासपी विचार कोई दर्शन वषषा सप्रदायवाले मेग नहीं कर सके। क्योंकि पैन छोग पचेन्द्रियका पात ता करते हो मही, किन्तु ठम्होंने एकेन्द्रिय बादिमें भी गोषके बस्किलको विशेष मतिविशष स करक, दयाके मागका वर्णन लिया है। इस कारण चार वेद मठाय पुराण बादिका बिसने वर्णन किया है, उसने बहानसे, स्वासे, मिथ्यात्वसे और सरायसे ही किया है, एसा कया गया है। ये पचन बहुत ही मारी मिले हैं । यहाँ बहुत अधिक विचार कर पीछेसे वर्णन किया है कि अन्य दर्शन-वेद धादि--के गो पो ठने यदि सम्पमरि गौर बार तो सम्यक् प्रकारसे परिणमन करता है, और निनमगवान्के बवा चाहे विस सराके मौके पर मिप्याटि गार करे तो या मिथ्यावरूमसे परिणमन करता है। गोषको शानी-पुरुपके समाप उनके वपूर्व पचोंके मुननेसे मपूर्ण उठास परिणाम बाता है, परन्तु बादमें प्रमादी हो बानसे वपूर्ण ठहास माता महो । मिस तरहम यदि वरिकी सिगरीके पास बैठे हों तो साता नहीं, और सिगासे दूर चले जानेपर फिर ठं म्गने लगती है, उसी तरा बानी-पुरुषके समीप उनके वपूर्व पचोंके प्रवण करनेसे प्रमाद नादि ना हो जाते हैं, और उवास- परिणाम वाता; परम्त पासे फिर प्रमाद वादि उत्पन्न हो जाते है । यदि पूकि सस्कारसे वचन वतर्फ रिणामको प्राप्त करें तो दिन प्रतिदिन उम्पस परिणाम बहता हो नाप बोर यथार्प रातिसे भान हो बहानके र होनेपर समस्त भूगर हो जाती है-सरूम बागृतिमान होता है। बाहरसे पचोंक सुननेसे अन्तपरिणाम होता नहीं, तो फिर पिस तय सिगरसे र पके गानेपर फिर बम्न माती है, उसी तरा उसका दोष पता नहीं । केसीस्यामाने परदेशी पनाको बोध देते समय जो उसे 'जा सा' 'मूर्ख नैसा' कहा था, उसका कारण परदेशी रामामे पुरुपा गागत करमेका पा। रवा-हता-के र करनके लिये ही या उपदेश दिया है। मानांके बचन वर्ष परमार्थको मेहकर दूसरे किसी कारणसे होते मही। माटी ऐसी बाते किपा करते है कि प्रत्यभावसे ही केशीस्वामीने परदेशी गगाके प्रति से पचन को पे; परन्तु यह बात नही । उनकी वाणी परमापके कारण हो निकामै पी। या पदार्पको मेनेसनेमें उम्मा से प्रति करे तो उसे वसपम छा। उसका कारण पाक मम्दबायासे सेने-रहने बामाका उपयोग घूमकर तन रम्पमार पाया। इस कारण उपयोगके पूक याने बसपम का है। भाकारसे वाचार्यमाल पारण कर दंम रक्से और उपोश दे तो पाप म्ाता है। बारमावि रसनेक लिये ही उपयोग रखना चाहिये । मौजापाग में का कि चो मात्रा परितवा' और यो परिसरा दे माना है।' जो मात्र पानीको मोक्षय रोता है, और जो सररेहसार होनेपर मी भानीको पका हेतु होता है-ऐमा स्परमसे माहै। उसका कारण हानामें उपयोगको मागति करना है, और यह माना है नहीं।
५४ भीमद् परबम्ब किसीके उपर रोप करमा मही तथा किसीके उपर असम मा महाँ । ऐसा परमेसे एक शिप्पको दो पड़ाम समान प्रगट होनेका शाखौ वर्णन भाता है। नितना रोग होता है, उतनी ही उसकी दषा मनी पड़ती है। बावको समाधना होणे साग ही मचार प्रकट होगाप परम्त मिप्याबरूमा महान् रोग मौजूद है इसरिये समझनेमें बात का पत्र होना चाहिये । शाब में जो सोम रोग को है, सब इस गोषको मौजूद है, ऐसा समझना चाहिये । चो साघम बताये है, वे सपा मुग्म है। समासे, याकारसे, मेक-अरसे अपनी महमके लिये तपश्चर्या करनी नही-चामापक कम होकरनी । तपश्चर्या पाय प्रकारको का है। बाहार न लेना वानि ये बारा प्रकार है । सापन करनेके म्येि बो कुरा बताया हो उसे सपुरले पायसे करना चानिये । मने बापसे प्रति करना हो सक, ऐसा का है। सद्गुरुध मायाले मिमा वासासास मिपाके बिना बम्प कुछ मी करना नहीं। सापुको समुशका मी गुस्से पूछकर हो करमा पाशिये, ऐसी बानी-मुरमोंकी नमा। सामाचारसे शिष्य बनाना हो तो साधु बाड़ा माँगता नहीं, मपा उसको कम्पना होकर येता है । मोपकार करनेमें मिथ्या कम्पना पा करती हो और जैसे ही कोक लिम्पोचाय को सण गोरे मही पानी वास्माको गित करता है। वषा पसी तय सा बातोंका सपन करता है, वौर परमाके रास्तेका उम्पन कर माणी बोता है।पोवनी होशियारी, और से हो सर कहा गया है। बाल प्रतको मधिक मेमेसे मिष्यानका नाश कर देंगे- ऐसा गाव विचार करे, तो पा समय मही। क्योंकि जैसे एक मैसा मोहगारों पर-बापरेके पूरे पूरे गपाहै एक सिमोसे गरता मी उसी तय मिप्यास्वरूपी भैसा, जो पूछेहमी बनतानुबंधो कमायसे बनतो चार सा गया है। या तिनरूपी बाप तसे कैसे र सकता है! परभु बैसे मसको यदि किसी बपनसे पॉप में तो परामें हो माता, सो मिप्याम्पा सेंको नामापासे पॉप देनेसे कब मा हो गाताबर्थात् जब बारमाका मा बहता तो मिष्याम घटता है। मनारिके कान माण जितना प्यतीत एमा, उतना काल मोल होने के लिये चार माही । कारण कि पुस्पार्यका बस कमीको बरेमा वनिक । कितने ही जब दो घरमें माम पर गमे । सम्पमारि किसी भी तय हो बामाको ठो बाता है-त् सम्पाल नामकर जापति पर जाती। मिप्यादि समकितीक बनुसार ही अप तप मार करता है, ऐसा होनेपर भी मिथ्यानिक जप तप बार मोके पारगमन होते मी संसारके ही कारणमूत होते । समकिताव हो पता बादि माश घरणमूत होते है। सममिती ठने म रहित करतापनी मामाको ही निरा करता, और कर्म के कारणों से पटायरनेसे उसके नाम वादि स्वाभाविक KA 0 पट जाते है।माना समस्त मप तापमान करते है, और सारके अनशामा पारेकि हभिया उत्पन्न होती है। वीर बेहदान सम्मसे जाते भाग १ परम्ा इस बात तो दानों ही बने मूल करते है इसापे पर समय सभामा साधी देता है उौ सपप मामा उठास-परिमाम बाता है।
. ४] उपदेश-पया इस पापको साप राग-रेप लगाए हैं। गीर यपपि व तहान-दर्शनसहित है, परन्तु राग देयके कारण पा उससे रहित ही है, यह बात गौरके प्पानमें माती नहीं। सिदको राग-रेप नही । सा सिदका स्वम्म है, वैसा ही सब गायोंका मी सरूम है। चापको केवल बनानके कारण यह म्यानमें बाता मही। उसके हिम मसारवानको सिरके स्वरूपका विचार करना चाहिये, जिससे वपना स्वरूप समझमें या बाप । वैसे किसी मनुष्य होपमें चिंतामणि रान पाया है, और उसे उसकी (पहिचान) है तो उसे उस रानके प्रति परत को प्रेम उत्पन्न होता है, परन्तु रिसे उसकी सबर ही नहीं, उसे उसके प्रति कुछ मी प्रेम उत्पन होता नहीं। इस नीबकी अनादिकालकी चो मूल है, उसे दूर करना है। दूर करनेके किये गानको बससे बड़ी भूग क्या है। उसका विचार करना चाहिये, और उसके मूहका छेदन करने की बोर मक्ष रसना चाहिये । अबतक मूछ यती है तबतक या बढ़ती ही है। 'मुझे किस कारणसे सपन होता है। और ' किससे दूर हो सकता है। इसके पान नेके म्पि शाम रच गये है, गोंमें पुबनेके लिये शाब नही रखे गये। इस मौवका स्वरूप क्या जबतक गौरका स्वरूप जाननेमें न मारे, तबतक वमन्त सन्म मरण करने पड़ते हैं । बारको क्पा भूगो! पवमातक प्यानमें जाती महो। बीका श नष्ट होगा तो भूल दूर होगी। निस दिन मूग दूर होगी उसी दिनसे साधुपना करा बायेगा । यही यात यावापने के लिये समधनी पाहिये । कर्मको र्गणा गीतको म वौर पानीके संयोगको तय है। बानिके संयोगसे वैसे पानीके बछ जानेपर दूध गाको र बाता है, इसी तर बामस्मी ममिसे कर्ममर्गणा नए हो पाता है। दहमें वामान माना हुमा है इस कारण गोषको भूल दूर होती नहीं। गौष देहकी साप एकमेक हो गानेसे ऐसा मानने गता है कि ' मैं बनिया , ' 'मायण ,' परन्तु पुर रिपारसे तो उसे ऐसा अनुभव होता है कि मैं उस सरूपमय' । मामाका नाम ठम्म कुछ मी नहीं है- नीच इस तय विचार करे तो उसे कोई गाली बगैर दे वो मी उससे उसे कुछ भी पता नहीं । यहाँ यात्री बाब ममत्व करता है हाही ठसकी भूक है। उसके दूर करनेके छिपे । शाह रपे गये। चाहे कोई मी मर गपा ऐ ठसका यदि विचार करे तोर पैराग्य है। गों नहाँ पर मेरा माई पन्यु इत्यादि मारना है, माँ हाँ कर्म-अषका कारण है। इसी तएको मावना पदि साधु मी अपने मेके प्रति रक्से तो उसका बाचार्पपना मारा हो जाय । यह बदमता, निराकारता को तोबारमाका कम्पाण हो सकता है। पाँच इन्द्रियाँ किस तर पश होती है ! यस्तयोंके उपर तुप माष छानेसे । वैसे शव पदि सुगंभ हो तो उससे मन सवय होता है, परस्त र सुगम पोड़ी देर बकर नए गाती है, वौर पस पुमा नाता है, फिर मनको कुछ भी स्तोष होता महो। उसी तए सब पामि तुमान .
भीमद् पसराव [ उपयोग दा प्रपरके को-१ इम्प उपयाग २ मात्र उपयोग जैसी सामर्म सिनमगवान्की है, सी सब बीचको हो सकती है। केवल मानके कारण। पर पानमें वाती महो। वो चारवान चीन हो उसे तो नित्य ही तसा विचार करना चाहते। गार ऐसा समावा है कि मैं को किया करता इससे मोन है। क्रिया करना या है, परम्त उसे परमे सासे परे तो उसका फल मिस्ता नहीं। पैसे किसी भाइमा राप तामणि रल वा गया हो किस्तु यदि उसे उसको र महो तो पर मिफल होछा नाता। और यदि सबर हो तो ही उस पर मिम्ता है। क्य परिवारको पानाकी सची सबी मार पो तो ही उसका फल है। चौवको बना कसे मूड बम बाती । उसे समझने के लिये चौक्की गो उसका मूखसे ही छेदन करना चाहिये । पदि उसका मूलसे छेदन किया जाय तो या फिर बस्ति होती नाही, मापया मह फिरसे बारित हो जाती है। जिस पर पृषीमें परि सापक मा बाको प रो तो रिसे उग जाता है। इसलिये नौवको वास्तपिक मन क्या है, उसका विचार विचार कर उससे मुक होना चाहिये। मुझे किस कारणसे वाम होता है किस तर राम '! पा विचार पर करना चाहिये । पनि मौरन करनेसे नाम्स-प्रमाद उत्पम होता है, मागृति होती नही, विचार जवानी इस्पानिनेक प्रकारक दोष रात्रि भोगनसे पैश होते है । मैथुन करने परचात् भी बक्से रोम टापन होते हैं। कोद हरिपाशी दिनारवा तो पहमसे देखा जा सकता ही पपा मामा उजनता प्राप्त करे तो बात ही मनुपा बुदि यती है। मानमें साधा ही भासित होता है, उल्टा मासित नहीं होता । मानी मोहको प्रवेश करने देखा मही । उसके बागृत उपपोग होताना दिसताच परिणाम हो वैसा बानाको र्य होता है । तथा मिस तरह मानाका परिणाम दो पैसा दो बानका कार्य होता है। पम्ना सौपा बोम्मा सौपा और सब कुछ सोपा होता है। वहानाच सप कुछ वटा कला हैबनके रिकम्प होते है। मोशा उपाय है। मोर-मास हबर रोगी बिपतमापसे प्रतीतिबारेगी। माना सपनो वासे काम प बारिते।हामी उसम्मम है। हानके दापसे पारिप्र प्राप्त तो मोह दो बाप । मानी गो गो त सब स्तर गार पार उतारनेवाले। समवित मानेक पथात बारमा समात्रिको प्रात करेगी, क्योंकि माप सदी गह। मादपर मुरी १९५२ प्रश्न-पानसे धर्मको निर्यग्र होती है क्या पर! उत्तर.-सार मानमेवान प्रते है और सार मसानको माहम मिमी मी पामे निमपस कम्पादिपरमार्थको समसार करमा चाहिये। अदंरदिन सोमवादित भामा प्रातिपरका माम निर्गय है। -- उपदेश-या प्रम- प्रम --अरमा एको मयबा बनेक! उचर – यदि बारमा एक ही हो तो पूर्वमें चो रामचन्द्रची मुक्त हो गये है, उससे सबको मुक्ति हो जानी चाहिये । अर्थात् एककी मुक्ति ई हो तो स्वकी मुक्ति हो जानी चाहिये, और तो फिर इसरोंको स्त्शाब सहरु मादि साधनोंकी भी वाश्यकता नहीं। -मुक्ति होने के पश्चात्, क्या जीव एकाकार हो गाता है! उत्तर-पदि मुक्त होने के बाद बीव एकाकार हो जाता हो तो स्वानुमत्र वानन्दका अनुमब करे मही। कोई पुरुष पोषाफर बैठा, वौर म विदेश मुक्त हो गया। मामें दूसरा पुरुप यहाँ भाकर बैठा, पर मी मुफ हो गया। परन्तु इस तरह तीसरे चौघे सबके सब मुक्त हो नहीं जाते। बारमा एक है उसका नाशप यह है कि सब वारमायें वस्तुस्मसे तो समान है, परन्तु स्वतत्र है, स्वानुमब करता है। इस कारण पारमा मिम मिम है । "वरमा एक है, इसलिये तुझे कोई दूसरी भांति रसनेकी पारस मही! जगत् फुल चीन ही नहीं, ऐसे मन्तिीत भारसे पर्तन करनेसे मुक्ति है"- ऐसा मो कहता है, उसे विचारना चाहिये कि तब तो एकको मुक्तिसे बहर सबकी मुकिहो जानी चाहिये । परन्तु ऐसा होता नहीं, इसलिये वारमा मिन मिम रें। बगत्की भांति दूर हो गई इससे ऐसा समझना नहीं कि पत्र सूर्य वादि उपरसे नीचे गिर पाते हैं । इसका नाशप यही है कि वारमाकी विपक्से भान्ति दूर हो गई है। सदिसे कोई कल्याण नहीं । बारमाके गुर विचारको प्राप्त किये बिना करपाण होता नही। माया-कपटसे धूठ बोसनेमें गात पाप है। यह पाप दो प्रकारका है। मान और धन प्राप्त करनेके किये झूठ बोले तो उसमें बहुत पाप है । वामीविकाके म्येि मूठ मोना पड़ा हो, और पापाप करे तो उसे पहिलेको अपेक्षा कुछ कम पाप माता है। बाप स्वयं पचास बरसका हो और उसका मौस बरसका पुत्र मर बाप तो रामाप उसके पास गो मामूषण होते ने निकाल लेता है। पुत्रके देहान्त-क्षणमें जो राम्य पा र स्मशान पैराम्य था! भगवान्ने किसी मी पदार्थको सरेको देनेको मुनिको बाड़ा दी नहीं। देहको धर्मका साधन मानकर उसे निबाहने के लिये वो का बाका दी, उनी ही बारा दी है। माको दूसरेको कुछ भी देनेकी अमादी नहीं। माता दी होती तो परिणाकी पनि ही होती, और उससे वनुक्रमसे कम पान पादि साकर कुटुम्का मपणा दूसरोंका पोपण करके यह बड़ा दानवीर होता । इसरिये मुनिको विचार करना चाहिये कि तीर्थकरने यो का रसनेको महा दौरे पर केवल तेरे अपने लिये दो और र मी गैकिक मि मकर सपममें मानेके पिये ही दी है। को मुनि गृहस्पके घरसे म णया , और उसके दो बानेसे पर उसे वापिस न दे, तो ठसे तीन उपवास करने चाहिये-ऐसी ज्ञानी-पुस्पोंकी वादा है। उसका कारण यही है कि मुमि सपपोगशम्प यहा। पदि इतना अधिक बोझा मुनिके सिरपर न रस्सा नाता, तो उसका दूसरी वस्तुओंके मी भनेका मन होता, वौर वह कुछ समय बाद परिवारको नि करके मुनिपनेको हो गुमा बैठता । बानीने इस प्रकारके जो कठिन मार्गका प्ररूपण किया है उसका यही कारण है कि वह मानता है कि यह बात पिसासका पात्र मही है। कारण कि मा भान्तिकागो । परि पुछ छ्ट दो । श्रीमर्पमचन्द्र [५४४ छानेसे इन्द्रियको प्रियता होती मही, और उससे कमसे इन्द्रिों पशमें होती है। सपा पाच वियों मी गिमा इन्धिपश करमेसे वाकांक बार इन्द्रियों स्वर हो मा हो जाती है। हर बार करना चाहिये । किसी रसपा पदापनी बार प्रेरित होना नही । बलिष्ठ महार करना नही। जैसे किसी बरनमें सून, माँस, दही, ममदा, मौर्य, मय, और मूत्र ये सात भारी पड़ी हुई, और उसकी बोर कोई देखनेके म्पिको तो उसके उपर वापि होता है, और एकातक मी मी पाता उसी तरा मी-पुरुष के शरीरकी रचना है। परन्तु उसमें उपर उमरसे रमनीपता देखकर मारोमो होता है और उसमें यह दणायक प्रेरित होता है। मानसे गौर मूछता है-पैसा विचार कप समसार, पाक मर मरधिमात गाना चाहिये । इसी तरहकपको तछता समझना चाहिए। इस तर समझकर मनका निरोप करना चाहिये । तार्यकरने उपवास करनेको बाबा की, माइनियोको परा करने के लिपे हो। मक उपनासोरमसे इनिर्षों पा हाता महा, परन्तु पदि उपयोग होतो-विचारसटिव हो यो-म होता है। बिस तय म्वहित बाण म्यर्प होम गावा, उसी व्य उपपागरीत उपवास बारमार्पके लिये होता महीं। अपनेमें कोई गुण प्रगट हुमा हो, और उसके सिप पदि कोई वपनी स्तुति करे, और मी सससे अपनी मान्मामें बांकार उत्पन्न हो सो म प ट पाती है। अपनी मारमा निधन मां बम्पतर दोप मारे नहीं, तो गीत मैकिक मातमें चम्म माता है, परन्तु पदि सपने रोयोश्च निरीक्षण को वफ्नो नामाचा निन्दा करे, वरमावसे दित होकर विचार करे, वो सपरफके बामपसे बारममक्ष हाताहै। माकि पानमें बनन्त मन्वयम है। उनमें फिर मैंने किया। पासा मुन्दा किया ' इस प्रकारका बमिमान होता है। मन का मी निमा होमी 'पाधि रहनेसे ही प अमिमान दूर होता है। मैटिक और वगैलिक इस प्य दो माल होते है। मकिनासे ससार वीर बगैकिससे मोग होती है। मा इन्द्रियों ने पच किया हो तो पपुस्प वापसे तम्म हो सकता है। इस कारण पास इन्द्रियोंको पश परमा श्रेष्ठ है। बाप इन्द्रियों में गोप वोर मापुरपका नाम न हो तो विक्रमाबमें गाने समावना गती है। उपाय किये बिना को रोग मिन्ता नहीं । इसी क्रमालको होमस्मी गो रोग। उसन सपाप निमे बिना गार होता नहीं । ऐसे रोपके र फरनेो ये गाल परा मी उपाय करत नही । पर उपाय करे तो बाप में हो माग गाम । कारणको नाम ये तो ही कार्य होता है।प्रण बिना कार्य मही होता। सचे उपापको गौब सोबता मही । गाव मानो पुस्पके वचनोंको भषण करे तो उसका एवममें प्रताति पता नही । मधे गेम मेहना है, ऐसा मागमूत माना हो तो दोष दूर होकर बनुमसे बीम-वान प्रगट होता है। - उपदेश-छाया ५३९ - प्रम-मारमा एकोमयबा बनेक। उचर -यदि बारमा एक ही हो तो पूर्वमें चो रामचन्द्रची मुक्त हो गये है, उससे सरको मुक्ति हो जानी चाहिय । अर्थात् एककी मुक्ति हो तो सबकी मुक्ति हो जानी चाहिये, चौर तो फिर इसरोंको सत्चार सहर वादि साधोंकी भी वावश्यकता नहीं। प्रम-मुजि होनेके पमात, म्या जीन एकाकार हो जाता है! उत्तर–पदि मुक्त होने के बाद बीप एकाकार हो पाता तो म्वानुमत्र वानन्दका अनुमत्र करे नहीं। कोई पुरुप यहाँ वाकर बैठा, धौर मा विदेह मुफ हो गया । बादमें दूसरा पुरुष यहाँ आकर बेठा, वह भी मुक हो गया। परन्तु इस तए तीसरे चौघे सबके सब मुक्त हो मही नाते । बारमा एक है उसका नाशप यह है कि सब मरमा बस्तुमसे तो समान है, परन्तु स्वतन है, स्वानुमन करता है । इस कारण वास्मा मिम मिम है । "भारमा एक है, इसठिये तुसे कोई दूसरी भांति रखनेका जरूरत नहीं। गत् कुछ पीर ही नहीं, ऐसे मन्तिरमित मापसे वर्तन करनेस मुकि"- ऐसा बो कहता है, उसे विचारना चाहिये कि तब तो एकको मुतिसे असर सबकी मुलि हो मानी चाहिये । परन्तु एसा होता नहीं, इससिप वामा मिम मिम हैं । जगत्की भ्रांति दूर हा गई, इससे ऐसा समझना महो कि चन्द्र सूर्य वादि ऊपरसे नीचे गिर पाते हैं। इसका माशय यही है कि पारमाकी विषयसे भान्ति दूर हो गई है । हमसे कोई कन्याण नहीं । वरमाक गुर विचारको प्रत किये बिना फत्पाण होता नहीं। मापा-कपटसे झूठ बोसनेमें बात पाप है। मह पाप दो प्रकारका है। मान और धन प्रात करनेके सिय छ बोडे तो उसमें बात पाप है । वानीविका के लिये झूठ बोलना पका , और पमायाप करे ता उसे पहिरकी पपेक्षा कुछ कम पाप गता है। माप स्वप पभास परसका हो, और उसका बीस बरसका पुत्र मर गाय से मा माप उसके पास चौ बामूषण हाते में उन्हें निकाल देता है ! पुत्रके देवन्त-क्षणमें पाराग्य या, मह स्मशान वैराम्य पा! मगवान्ने किसी भी पार्षको सरेको देनेको मुनिको बाजा दो नहीं । देशको धर्मका साधन मानकर उसे निबाने के लिये गो कुछ मात्रा दी है, उतनी ही वाज्ञा दी है। बाकी दूसरेको फुछ भी देनेकी माता दी महो। आज्ञा दी होती तो परिपाको गदि ही होती वौर उससे अनुक्रमसे अप पान मादि छाकर पुदमच वयमा सरोका पोषण करके इसा दानवीर हाता । इसम्येि मुनिको विचार करना चाहिये कि वार्षकरने जो कुछ रचनेको मात्रा दौरा केस तेरे अपने लिये हो भौर पर मौकिक पर पाकर संपममें भगन लिये ही दी है। को मुनि गृहस्पके से मई माया हो, और उसके सो गानेसे पर उसे वापिस न दे, वो उसे तीन उपनाम करने चाहिये-ऐसी जानी-मुरूपोंको नागा है। उसका कारण यही है कि पर मुनि उपयोगशून्य या है। यदि इतना अधिक बोसा मुनिके सिरपर न रमणा बाता, तो उसका यसरी वस्तुमकि मी मनेका मन होता, और पर कुछ समय बाद परिप्रहको पनि करके मुनिपनेका हो गुमा बैठता । बानाने इस प्रकारक बो कठिन मार्गका प्ररूपण किया है उसका यही कारण है कि पा मानता है कि यह गांव स्लिासका पात्र महा है। कारण कि प भान्तिवाला है। परिसर 1 ।
ܢܝܝܙ भीमरायचन्द्र देगी तो कायमसे उस उस प्रकारमें विशेष प्रापि होगी या पानकर हानाने हैं जैसी निगल बाके संबपमें भी इस पर माचरण करनेकी वाचा।का पर तो या बात सपारण है। परन्त बानाको रप्रिमें उतनी ५ मा नसम्म्से नाश कर सके इतनी बड़ी माझ्म हाती है। अपभदेवीके पास वान पुत्र पारनेके वभिप्रापस वापे थे कि हमें एन प्रणाम परो।' दाँ वो अपमदेवने उपदेश देकर बानके महानोको ही मर लिया । देणे महान् पुस करणा। केशीस्वामी बौर गौतमस्तामा कैसे समापे ! दोमोने ही एक मार्गको बाननेसे पाच माणत पाण किये थे। मानक के समयमें दोनों पक्षों का एक होना हो तो या न बने । वागमडिय पोर तप्पा, तथा हरेक बुदे संपाका इजा होना हो तो रन बने उसमें कितना होकार म्पतीत को पाप । पपपि ठसमें है फुग मी नहीं, परन्तु मरम्ता के कारण र समन ही नहीं । सपुरुष कुछ सत् अनुष्ठानका त्याग कराते नहीं, परन्तु यदि उसका मामलामा होता है बापा दूर कराने के लिये उसका एक बार त्याग कराते हैं। वाया दूर होने के बाद पासे उसे में प्रवण करनेको करते। चक्रपती राजा मैस भी नम होकर परे गये है। कोई चलता रामा हो उसने राम्पका माग कर दोश्या प्राण की हो और उसकी कुछ मूग हो गई और कोई ऐसी बात हो कि उस बामदार एम्पकालय पासीका काई पुत्र उस भूसको सुधार सकता हो, तो उसके पास गाकर, चक्ररताको उसके कपनके प्राण करमेकी नासा की गई है। पदि उसे उस दासीके पुत्र पास माते समय ऐम हो कि मैं दासी पुरके पास कैसे गार्ड' तो असे मटक माफकर मरना है। ऐसे कारणों के उपस्थित होने- पर मेर-पारको मेयनेका 0 उपदेश किया है। वर्षात् गा यात्माको उपले मानेका कोई असर से हो सोक-छाम महीं मानी गर । परम्त कोई मुमि विषय इणसे पेयाके पर पाप और कई गाकर उसे ऐसा हो कि मुझे छोग देशमगे तो मेरा निन्य होगी, इसपिये पहासे पाक्सि औठ माना चाहिये तो यहाँ बोक-साम रसनेका विधान है। क्योंकि ऐसे स्थानमें गेसका मप सामेसे अपचर्य पता है मो उपचारक है। रित क्या है रस समझना चाहिये । वाठमको तबारको विपिके लिये करना मह, परन्तु हरियाणा के रक्षणके छिपे ही सिपि पानी चाहिये । हरिपाके मणके छिपे बाध्य मा सिपि कही गई है विधिक लिये वाम वादिको कामही । सम्मेि वाटम वादि सिपिरेसाहको दूर करना चाहिये । यो कुल का कामहके फरनेके मेि का मही। बामाको पुदिसे शितना करो उतना रितकारीरितमा बारिसे करोगे उतना ही मस्तिका है इसलिये पुस्तापूर्वक समतका सक्न करना चाहिये । में तो प्रमग, यव पाहो ॥ सब समान ही कोई बैन कहा जाता हो और मनम प्रतो तोप अहितकारी, मतरहित हितकारी। सामापिक शाप्रकारमे विचार किया कि यदि कामाये स्थिर रसमा होगी, तो पीछेसे विचार करेगा; निपम नही बाँधा रोज मरे काममें पा जायगा मा समझकर उस प्रकारका निपम बागा।
उपदेश-प्रपा जैसा मनका परिणाम हो वैसा ही सामायिक होता है। मनका घोका दौपता हो तो फर्मवध होसा है। मनका घोड़ा दौरता हो और सामायिक किया हो तो उसका फल कैसा हो! कर्मवधको थोड़ा पोगा छोडनेकी इस करे तो छ । जैसे फोई कोठी भरी हो, और उससे कण कण फरके निकाण गाय तो मह मतमें साठी हो जाती है। परन्तु बासे कर्मोको छोपना हो सार्थक है। वावश्यक स प्रकार है--सामायिक, चौधीम्यो, पदना, प्रतिक्रमण, कापोरसर्ग वोर प्रपाम्यान । सामायिक अर्थात् सावप-योगको निति । पाचना (बाँचमा) पृष्ना (म्ना), परिवना (फिर फिरसे विचार करना ) और धर्मकया (धर्मविषयक कया करनी ), ये चार प्रम्प है, वीर अनुप्रेशा ये भाव है। यदि अनुप्रेक्षा म जाये तो पहिले चार द्रम्प है। नहानी लोग वामकल केवयान नहीं है, मोध नहीं है' ऐसी हीन पुरुषार्पकी बातें करते है।बानीका बमन पुस्पार्थ प्रेरित करनेवाग होता शनी शिपिक, इस कारण पर ऐसे पौन पुरुपाके पचन करता है । पचम काझी, मनस्थितिकी मया वायुको वातको मनमें मना नहीं और इस तराकी वाणी मुनना नहीं। कोई हीन-पुरुपाया पातें करे कि उपरान कारणकी क्या जरूरत है। पूर्वमें पशोप्याकेबली रोही गये हैं। तो ऐसी बातोंसे पुरुषार्थ-हीन म होना चाहिये । मसंग और सत् साबन के बिना का भी कात्याण होता नहीं। यदि अपने आपसे ही कल्याण होता हो, सो मिट्टी से स्स्य ही घका उत्पम हो पापा करे । परन्तु मरों वर्ष म्पतीत हो जाये फिर मी मिझीमसे घना स्वय उत्पम होता नहीं। उसी तय उपादान कारणके बिना कम्याण होता नहीं । अबका मचम है कि तीर्थकरका सपोग इजा वीर फिर भी कायाप्प नहीं जा सका कारण पुरुषार्थ-रहितपना ही है। पूर्वमें तो जानाका सयोग मा पा फिर भी पुरुपाके बिना बैसे पर योग निफ चम गया उसी तय जोहानीका योग मिमी, और पुस्पार्थ न करो तो पह योग भी निष्फल हो बम बापगा । इसलिये पुरुपार्य करना चाहिये और तोही कास्पाम होगा। उपादान कारण अप्ठहै। ऐसा निश्चय करमा चाहिये कि सत्पुरुषके कारण-निमिसे-अनत गौच पार हो गये। कारणके बिना कई बीब पार होता नहीं। बशोप्पाकेपछीको वागे पाठ सा संयोग मिम होगा। सससंगके बिना समस्त जगत् खही गया है ! मीरामई महामकिसान थी। पुदर बाचरणवा मुम्दर समागमसे समता आती है। समताके रिचारके म्पि दो घडी सामायिक करना कहा।सामायिक मनक मनोरथको ठग सीपा पिंधन करे तो कुछ मी फउ महो। सामापिकका मनरे दौरते पर बोडेको राकनेके लिये प्ररूपण किया है। एक पश, संक्सर पिसमुची पीपको तिधिका वाह करता है, बार दूसरा पक्ष पाँचमको वियिका आग्रह करता है। मामा करनेबारे दोनों ही मिप्यात्मा है। हनी पुस्पोने तिषियोंकी मर्यादा मारमाके सिये हो की है। क्योंकि य िकोई एक दिन निश्चित न किसा होता प्राश्यक विधियों का निपम पता नहीं।वामापके लिये विधिको ५४ - भीमद् रामचन [४५ मर्मादाका ठाम ऐना चाहिये । बाकी विपि-विपिके मेदको मेरो मा चाहिये । ऐसी ब्ल्पना करना नहीं, ऐसी भगनाउमें पाना नहीं। वानन पननीने कहा- फल भनेकांत घोषन म देखे, पर अनाव किरिया करी बापग, रहबरे पार गतिमादि सेसे । बत विस किमाके करनेसे मनेक फल हों या क्रिया मोशके सिये महा। अनेक प्रिपा- भोका फल मोत्र ही होना चाहिये | मामाके मोके प्रगट होनेके सिपे बिपाशा वर्णन किया गया है। यदि क्रियामोंका या फल न हुवा हो तो सब प्रिया ससारको हीत हैं। 'निदामि गरिहामि कपाण योसियमि' ऐसा मोना है, उसका हेतु पापको विस्मरण करानका । परन्तु छोग तो बिचारे एकदम मामाको हो मिस्मरण कर देते है। सीको देवगतिको मोके सुलभ, और भन्म उस तयको कामनाकारमा म रम्ना चाहिये। पषमासके गुरु कैसे होते हैं उसका एक सन्यासाच्या रसान्त --- कोई संन्यासी अपने शिम्पके पर गया । र त पापी पी । मोमन करने ठमेके समय शिष्यने स्नान करनेके लिये कहा, तो गुम्ने मनमें विचार किया कि बहुत पयो? और इसमें स्नान करना पागा , पE Aचार कर स्पासाने करा कि मैंने तो शान-गगाममें स्नान कर रिपा शिष्प पुद्धिमान् था र समप्त गया और उसने ऐसा रास्ता साविम्से गुस्तो कुछ शिधा मिले । शिप्पने गुरुगको मोशन करने के लिये मानपूर्वक युग कर ठमें भोजन कराया । प्रसार सेनेके मार गुरु महाराज एक कमरेम सो गये । गुस्माको यस प्यास लगी तो तोंने शिप्पसे अठ मगा। इसपर शिप्पन तुरत हो यमाय दिपा महार माप बाम-गगार्मेसे ही यह हैं। मा शिष्पने ऐसा काटिन राम्ता पका वो गुम्ने सीकार किया है। मेरे पास वान नही है। देशको सम्वारे लिये आमने स्नान करमेके लिये पेसा कराया था। मिप्पारिक पूर्वक जप-तप अमावक भी एक मम्महितार्पके लिये हुए नहीं! बहमा मुम्परपमे मान्मममानसे वाचरण करे पर 'बम्पामयान। मुस्मापसे सिमें आमाका वर्णन किया हो पर मप्पामास । अधर (घ) अप्पामाका मोश होता नहीं। या गुण बराम कडे गये है वे गुण परि वामा में तो मोश्च होगाप। सपुरमोंमें मामपाम प्रगर रहता है। काम बागीके सुननेक लिये हो जो पचनोंको मुने उसे शम्द-अप्पानी पदना चाहिये । बाप-बप्पामा छोग वप्पारमको बातें करते है और महा ममकारक मापरण पर है । इस कारण उन सोको बान-दान करना चाहिये । पसे सम्माभियोंको धुप और मानी समष्ठना पाहये। बानी पुस्पापी मूरे प्रगर दोनेके पपात् सो सम्पामो पुप्फ रातिसे बाबरण करते नदी के माम्-अप्पा ममें ही प्रगटपसे पते । वामा समे सधे गुणों के उपम होने के बाद मोच शेती ।इस आ दम्प-अप्पास्मी हाय मत है । म्य-अपामा देवा मार कलशको शामा समान है।
(४५] उपवेश छापा मोह मादि पिकार इस तबके । कियो सम्यम्दृष्टिको मी पायमान कर गलते है, इसलिये तुम तो ऐसा समझना चाहिये कि मोश मार्गक प्राप्त करनेमें से अनेक विन है। वायु तो थोकी, और कार्य महाभारत करना है । जिस प्रकार नौका तो छोय हो बौर बड़ा महासागर पार करना हो, उसी तय वायु तो योनी और ससाररूपी महासागर पार करना है। जो पुरुष प्रमुके मामसे पार ए हैं, उन पुस्पोंको धन्य है। कहानी जीवको सबर नहीं कि अमुक जगह गिरनेकी है, परन्तु यह बानियोंशरा देसी। महानी दम्प-अप्यारमीकाते हैं कि मेरेमें कपाप नही। सम्पारि पैम्प-सपोगसे ही है। कोई मुनि गुफा प्यान करनेके लिये जा ये ये।हाँ एक सिंह मिझ गया। मुनिके हापमें एक सकसी पी। सिंहके सामने यदि तकनी उठा बाय तो सिंह भाग बायगा, इस प्रकार मनमें होनेपर मुनिको विचार भाया कि ' मैं बारमा बनर यमर , दास प्रेम रसना योग्य माहीं। इसठिये हे गौर । यहीं समा म । सिंहका गो मय ही बान है। देश में मुकि कारण ही भय है, इस प्रका- रकी मावना करते करते में दो पीतक नहीं सोये, कि इतनेमें केपमान प्रगट हो गया । इसलिये विचार चार दशामें बहुत ही अन्तर है। उपयोग नीबके बिना होता नही । स और चैतम्य इन दोनोंमें परिणाम होता है। दोषारी चीवमें मध्यवसायकी प्राप्ति होती है, सकल्प-विकल्प उपस्थित होते, परस्तु निकम्पपना हानसे हो होता है। वप्पवसायका ज्ञानसे घय होता है। यही प्यानका त है। परन्तु उपयोग गना चाहिये। धर्मप्यान मौर शुझम्मान उत्तम की बाते। मार्ग और रोखप्पान मिथ्या करे बाते है। पाप उपाधि ही अप्पासाप है । उचम म्या हो तो पान या गाता है, वौर बारमा सम्प परिणाम प्राप्त करता है। माणेकदासी एक वेदान्ती पे । ठमोंने मोशको अपेक्षा ससगको हो नविक यार्प माना है। उनोंने कहा है निम एदनस ना मिसे, हीरा पहुंठ पाम | सकपासे पाईये, सो हरि सबसे गम । गुरु और कहानी पापडियोंका इस कारमें पार नहीं । बोबो परपोपा बदाये, और द्रम्प सर्व करे--यह सब ऐसा जानकर कि मेरा स्पाण होगा । ऐसा समझकर हजारों रुपये सर्व कर रास्ता है। एक एक पैसेको झूट बोग बोसकर तो का करता है और एक ही साप हग रुपपे सर्व कर देता है। देखो, गोषका किसमा अधिक धान ! पुरा पार हीन भावा! वामाका वैसा स्वरूप है उसके उसी सहरको 'पपासात चारित्र' कहा है। मय वानसे है।सिका मप सिंहिनीका होता नहीं। नागका भप नागिनीको सेता नही । इसका कारण पहारे उनका बयानर हो गया है। यबतक सम्पन्न प्रगट न हो तबतक मिप्यान है और बर मिन गुणस्यानकका नाश हो अप्प तब सम्पपल कहा जाता है। समस्त बहामी पहिले गुमस्पानकमें है। - [१४१ . । मीमा रामचन्द्र संशाला-सद्गुरके वापसे गो सयम होता है, उसे ' सरागसपम' कसा माता । मिति पनि विस्थानका क्र परे तो सम्गसंपमसे । बोगस्पम पैदा होता है। उस नियति अनिधि दोनों ही बराबर है। सासे पना ऐना भान्ति । या तो इस समय स वय होगा' इस प्रकारका मात्र शंका है। समझने के स्पि विचार करके पूछनेको 'बाका पते है। . अपने बापसे गे समझमें न भाये, एमाशका मोहनीय है। सवा गाम मिया हो वोर फिर मी सबा सथा मात्र न बावे, यह मी नाशका मोहनीय है। वपने वापसे मो समझमें न बाने उसे ना चाहिये । ममस्वरूप माननेके पचात् सचर विषयके समय पर मिस व्य होगा, इस प्रकार मानने से निसको माक्षिा हो उस सम्यकप नर होता नही वर्षात् म पतित होता नहीं। मिष्पा भ्रान्तिका होना शंका है। मिप्पा प्रतीति बनतानुबषीमें ही गर्मित से गाती । मास- मसीसे दोपका देखना मिथ्याल । क्षयोपशम वर्षात् रूप और उपशम हो पाना । (६) राम बाप प्रदेश बाके नीचे दोपरके दो बजे पदि शान-मार्गका मारापन करे तो रास्ते चमते हुए भी ज्ञान हो जाता है। समय का गाय तो वामा सहममें ही प्रगट बाप, नहीं तो पिन्दगी बात जाम तो मी प्रगट न हो। केवळ मालाम्प समझना चाहिये । निकाम मुनि गोर भजि चाहिये । यतकरणको प्रति हो तो शान स्मता को उत्पन्न हो जाता । पदि हानाका परिचय हो तो जानकी प्राप्ति होती है। परि किस बीमचे पोम्प देखें तो हानी उसे करता है कि समस्त कम्पना मेब देने वैसी । पानीको मात्र पहिलोप-स्वासे परिचाने तो यपा बाल होता नहीं। मबहानाका त्पाग-पत्पाग-बाले वर्षात् जैसा चाहिये पैसा यपार्थ त्याग करमेको बानी करे, तो मापा मुसा देती है इसध्येि बराबर मागृत ग्रमा चाहिये और मायाको र करते पना बाहिप । कानाके त्याग-पानीके बताइए त्याग- सिप कमर कसकर लेप्पार एना चालिये। अब संग हो तब मापा दूर पता है । मोर संगका संयोग र हुमान मिर कैप्पा- र तप्पार मोहै। इसलिये बाप उपाधिको कम करना चाहिये । इससे विशेष समंग होता है। इस चरणसे पार पाग करना श्रेष्ठ है। हानाच दरमा महामाये ही दुास है। समाधि करनेके ये सहावरणका सेवन करना चाहिये । जो नकसी रंग पर तो नली होमसग रंग ही सदा यता जानीरे गई, वर्षात् ए धारण करना नहीं पता, ऐसा समझना चाहिये । सानो पचन प्रथम तो पहरे माते , परतु पीछेसे माश्म होता है कि पाना-पुरूप संसार अनन्त इनो दूर करता है। जैसे औरण ही तो होती है, परन्तु र दीपकके रोगको दूर परेती। 1 मिनके पधाव . . उपदेश छाया स्यागके उपर हमेशा ण्य रसना चाहिये। त्यागको शिथिल मही रसना पीये। प्रावकको तीन मनोरथ तिमन करने चाहिये । सस्यमार्गको बाराधना करनेके लिये मापासे दूर गना चाहिये । त्याग परत ही नाना पाहिये । माया किस तय मुग देता है, उसका एक प्रान्त - एक सम्पासी करा करता था कि ' मैं मायाको पुस्नेतक मी न दूँगा, में नम होकर विचाँगा'। मायाने कहा कि मैं तेरे बागे वागे पागी'। सपासीने कहा कि 'मैं बगठमें अकेला निचगा'। मापाने कहा मैं सामने वा गाऊँगी'। इस तहमा सम्पासी जगसमें रहता, और 'मुझे कसा और रेत दोनों समान है। यह कहकर रेतपर सोया करता । एक दिन उसने मापासे पूंम कि पोल पर कहाँ है। मायाने समच लिया कि इसे गर्व बहुत पा रहा है, इसलिये उसने उत्तर दिया कि मेरे आनेकी जरूरत क्या है। मैं अपने दो पुत्र माकारको तेरी खिदमतमें मेम हो चुकी है। माया इस सय रगती है। इसलिये बानी करते है कि में सबसे न्यारा, सर्पया स्यागी हो गया , अपपूत हूँ नम , वपर्या करता । मेरी बात वगम्य है। मरी दगा पातही श्रेष्ठ । माया मुझे रोकेगी नहीं' ऐसी मात्र कम्पनासे मायाशरा उगाये गाना नही चाहिये। सम्छ में बाकार है । जबतक राग-रेप दूर होते मही तबतक तपपर्या करनेका फस हो क्या है। जनकविहीमें बिहीफ्ना हो नहीं सकता, यह केवळ कम्पना है। ससारमै निदेहीफ्ना पता नही,' ऐसा विचार नहीं करना चाहिये । भपनापन दूर हो जानेसे उस तरह या जा सकता है। मनकरिकी दशा उचित है । जब बसिष्ठमाने रामको उपरेश Pया, उस समय राम गुरुको राम्प वर्पण करने सगे, परन्त गुस्ने राम्प लिया ही नहीं । शिष्य और गुरु ऐसे होने चाहिये । महान दूर करना है । उपदेशसे कफ्नापन दूर हटाना है। जिसका बन गया उसका हुस पम गया। धामी गृइस्यावासमें बान उपदेश त देते नहीं। यो गृहस्यात्रासमें दो ऐसे परमशानी मार्ग साते मही, मार्ग पकानेकी गतिसे मार्ग पगले महीस्वप भविरस गफर मत माण करते मही, क्योंकि वैसा करनेसे बहुतसे पारणोंमें विरोध जाना संभव है। सकाम मकिसे हान होता नही । नाफाम मालिसे हान होता है। ज्ञानांके उपरेशमें पुतता है। अनिष्ठामासे उपदेश देते हैं, पारहित होते हैं । उपोश जानका माहाम्य है। माहाम्पक कारण बनेकजीवबोध पाव। आनीका सकाम उपदेश होता है, ओ संसारके फतका कारण है । जगदमें अहानीका मार्ग अधिक जानीको मिप्पामार धप हो गया । वर्षमात्र र हो गया है। इसठिये उसके सम्म्प अपन मिकरते हैं। बास-जीरोमो जानी-मानीको पहिचान ती नहीं। भामार्पाने बायोको समावस प्रमाण जानकर, दादा तीन तीन निके अन्तरसे नियम पाउने भाश की IAधियोंके लिये मिष्यामा म रम उम छोड़ना चाहिये। कामद सुपाने यि तिथियों बनाई है पाम्नु उमझे बदसे उसी PF का पड़ता है। हायमें पान नाम पपूपणमें लिपिपोंकी भान्ति पग करती है। विधिपोझ निपमों मर तररार घरमा मोश जान राता मही । रचित् परिमय नि न पाय गाप, और कई पनि पाठे ।
[१४॥ मीमद् रामचन्द्र और मामा कोमम्ता हो तोहफामदायक होता है। जिससे वास्तबमें पाप गता है, उसे रोना वपने हापमें है, या अपनेसे बन सक्ने जैसा है, उसे भीष रोकता नहीं वौर दूसरी विपि परिक्ष पोही फिक्र किया करता है। बमादिसे काम्द, रूम रस, गप और स्पर्श मोर गवा बापा उस मोहका दूर करना है। बड़ा पाप माना है। निसे वविरतिके पापको चिता होती हो उससे यहाँ गाही कैसे आ सकता है! स्क्य त्याग कर सकता नहीं और पाना बनाते कि मुझे क्न्तराम बहुत है। धर्मका प्रम वा तो करता 'ठायो' ! 'उदय उदय' या करता है, परन्तु कुछ कोमें गिर पता महो। गावांमें बैठा हो और गहा बा गाये तो मानमें समझकर चस्ता है। उस समम उदयको भूग माता है। वर्षात् मफ्नी तो शियिता हो, उसके बदले उदयका दोष निकालता है। गैकिक वीर कोचर विचार जुदा दुरा होता है। उदयका दोष नियना या कि विचार है । वनादि कामे कर्म तो दो पड़ीमें नाश हो जाते है इसमिये कर्मका दोष निकामना पारिने नाही मास्माको हो निन्दा करनी चाहिये । धर्म करनेको पात वा तो बान पूर्ण कर्मके दोपको बातो मागे करता है। पुरुषार्प करना ही श्रेष्ठ है । पुरुषार्थको पहिले करना चाहिये | मिप्पास, प्रभाव और वधुम योगका स्पाग करना चाहिये । ककि दूर किये बिना फर्म दूर होनेवाले नहीं । नेके मिये । शानियोंने शामों की रचना की है। शिपिक होनेके साधन मही यतापे । परिणाम उधे बाने चाहिये । कर्म उदयमें बायेगा, या मनमें ये तो कर्म उदपमें जाता है। बाकी पुस्पार्य करे तो कर्म र माय। निस्से उपकार हो पही प रमना चाहिये। (७)वापा स्परे ११ बरे भावफ मुदी १ गुरु १९५२ कर्म गिन गिनकर माश किसे नहीं जाते। बानी-पुस्प तो एक सप ही सबके सब इको कर नाश करता। विचारवानको सूरमे वासंबन मेकर जिससे मारमा पुस्पार्पका बप हो पैसा बालपन सेना चाहिये । कर्मबचन मामन महीना चाहिये । मामा परिणाम होम वनुषा । नि पो मनको सता है परन्तु जब देर पक कुम्हार वानिको में तमी तो । इसौ न्य मामा मिम्पिो उमे सद्गुरु मानका साधन मिले तो ही मामबान उत्तम होता है । यो गान एमा सपा पूर्वकामन शानियोंने जो बान सम्पान किया है उसके साप और वर्तमानमें गोहान शानी-गुम्पोने सम्पादन किया है उसके साप पूर्वापर समय होना चाहिये, नहीं तो महानको हो जान मान लिया। पेमा कहा गपगा। शाम से प्रकारक-एक बागमत हान वार इसरा हपभूत ज्ञान । प्रतिसे दोनों ही समान है उनमें भेद नही । भूत-मुरंपा निराकरण बानो तो उसी मनसे मोक्ष । माप और पागम्त शान सेवा में पत्रा मइमें मोप । मामा जम्मा भात् ५ वर्ग गम्भ रस और सारदित बस्तुहै-अरस्तु महो । हमने पानीमा नमामिनीशा अपयोगरपा।
६४१] उपदेश छापा षष मनक अपेक्षावोंसे होता है, परन्तु मय प्रकृतियों वाठ है। कर्मको बाटोको उपानके लिये भाठ प्रकारको कहा है। वायु कर्म एक ही मवफा घता है। अधिक भवको वायु ईंधती नहीं । यदि मधिक मक्की आयु पिता किसाको भी केवख्यान उत्पम मो। जाना-पुरुप समतासे कल्याणका नो सस्प बताता है, या उपकारके छियेही बताता है। जानी-मुम्प मार्ग में मूठे मटके हुए गौवको सीधा रास्ता बताते हैं। जो हानीक मार्गसे पछे उसका कस्याम हा बाय नाके मिय होनेक पभार बहुत काल पछा पानेसे वर्यात् मधकार हो गानेसे कानकी मचि हो जाती है, और नानी-पुरुपोंके पचन समहमें नहीं बासे । इससे छोगोंको उम्टा हो भासित होता है। समझमें न जानेसे लोग गमके भेद बना मेते है। गछके भेद शानियोंने बनाये नहीं | बानी मार्गका रेप करता है।शानी हो तो मार्गका उपोत करता है। माना बानाके सामने होते हैं। माकि स्मुस होना चाहिये । बाप बोर बानी बीब छोटी छोटी बात में भेद बना लेते हैं। सिबक वोर मुंहपची मंगैरह के वामहमें कस्याण नहीं । महानीको मतमेद करत ए देर छगती नहीं । बानी-पुरुप सरि-मार्गके मरने शुद्ध-मार्गका प्ररूपण करते हो तो ही चीनको जुदा भासित होता है, वोर मा समता है कि यह वफ्ना धर्म नही। जो भीष कदापीत हो मा मुख मार्ग सादर करता है। विधारमानों को तो कल्याणका मार्ग एक ही होता है। महान मार्गक बनन्त भेद है। जैसे अपना मका कुरामा हो और दूसरेका ठपका पतिरूपवान हो, परन्तु प्रेम वपने परके पर ही होता है, और यही मममी स्गता है उसी सर जो कुस-धर्म अपने वाफ्ने स्वीकार किया है, या चाह फैसा मी पणयुक्त हो, वो मी यहाँ सम्पा मगाता है। पेणम, बौद, मेताम्बर, Pगमार नैन बादि चाहे कोई मी हो परम्तु जो करापारीत भावसे मुर समतासे वापरणोंको फागा उसोका कम्पाण होगा। (कायाकी) सामापिक कापाके रोगको रोकता है। वारमाके निर्मम करनेके लिये कायाके पोगको रोकना चाहिये । रोकनेसे परिणाममें पम्याण होता है। कापाकी सामायिक करमेको वपेक्षा एकबार तो बामाको सामायिक करो । बानी-पुरुपके बचन सुन सुनकर गाँठ बाँधो तो मामाको सामापिक होगी। मोशका उपाय अनुमत्रगोचर है। से बम्पास करते करते बागे बाते है, वैसे ही मोक्षके पिये भी समसमा चाहिये । पर बारमा कोई भी क्रिया न करे तब वर्षष का गाता है। पुस्पार्प करे तो कर्मस मुल हो । वनन्तकालके फर्म हों और परि गार पपार्य पुरुषार्थ करे, वो कर्म पर नहीं करता कि मैं महीं गाता । दो पड़ामें अनन्त कर्म माश हो पाते हैं। वरमाको परिचान हो तो कमात्र मात्र हा गाप । प्रश्न -सम्पल फिससे प्रगट होता! उत्तर -पारमाका यथार्य क्ष हो उससे । सम्पक्स दो तरका-१ म्पहार वीर २ [ । . भीमद् पवन परमार्थ । सहरके पपनों का मनमा उम पचनाका विचार करमा, उनकी प्रताति करमा, प्रभार सम्परव'।बामाको पहिचान होना परमार्य सम्पाव' है। चन्तकरणको अनिके बिना मोर पसर फरता नहीं, इसलिये प्रपम तकरणमें कोमाता जानी चाहिये। म्यमार बौर निपय स्यानिकी मिप्या चमि वापारीत गना चाहिये-सपास मातसे पना चाहिये । मामाके स्वमालका यो बापरण है, उस हानी 'कर्म' करते है। र सात प्रकृतियाँका म्प हो उस समय सम्पप प्रगट होता है। अनवानुबी चार काम मिप्याबमोहनीय, मिममोहनीय समकितमोहनीय, पे सात प्रतियों या आप हो माप उस समय सम्यात प्रगट होता है। प्रभ -कपाय पाहै! उत्तर -पुस्प मिम्नेपर बीचको बताते है कि जो विचार किये बिना करता यता , उसमें पाण ना, फिर मी उसे करमेके लिये भी दुरामा रसता है, वह कपाम है। उन्मार्गको मोक्षमार्ग माने, और मोक्षमार्गको उन्मर्ग माने या 'मिप्पाच मोहनीय है। उम्मानसे मोश्च होता नहीं इसलिये मार्ग कोई दूसरा होना पालिसे-ऐसे मारको ' मिभ मोवनीच' मामा पा होगी' ऐसा बान होना 'सम्पत मोहनीय'।'वामा है-ऐसा निमयमात्र सम्पाप है। नियमसे पौत्र कोमल होता है। दया वाती है। मनके परिणाम उपयोगसहित होटो कर्म कम उगें। और पदि उपपोगरहित में तो मपिक में ।बत करणको कोमल करने के लिये-पुर करनेके लिपे-त बार करनेका विधान किया है। स्वार-युमिको कम करनेके दिम निपम करना पारिये । पुम्-धर्म या गहाँ देखते ही वहाँ रास्तेमें जाता है। (८) बाबा भारपद परी १५पानि १९५२ सौकिक रधिमें रुप मक्तिमा र पुरुषार्थ करमा मौर सम्म गतिस माचरण करना भान माता नही। उसे तो प्रेग मूठ हो गये हैं। सोना गा परसात बातो पानी टंकी मरकर रस से हो मुमधु गोर इतना इतना उपस पुनकर उसे जरा भी प्रखरता मही पर एक बाथर्प है। उसका उपचार मिस वयो। शानियोने दोपके पाने से बनुमयके वचन रे, इसम्येि से पलोंका परम कर पी में समा उनका मान-मनन -- सायही माहमा उपपल दो बाप । पेसा करने पुण्याल मेहमत नहा। उन सपनोच चार मकरे तो कमी मी दोष को नही। सदाचार सेवन करना चाहिये । हानी पुरपामे पा सम्प, काजदान प्रमचर्प परिमा परिमाण Munापार हानियोन मिनचाच सेवन करना बताया है, २ पपार्थ 2-मेग्न करमे पोप । मिना सासक बीमको पात-नियम परने चाहिये मही। सिप मार दिगो विकास आशय दया भारि मी बाले मही तो सिर १] स्परेशा-अपा ५४९ गहन मारायपाले दया बगह तो कहाँस बा! विषय कपायसदिस माझ नाते नहीं। तकरणकी शुद्धिके बिना माहमवान होता महौं । मति सय टोपोंका क्षय करनेवाम है, इसठिय प सोता है। जोक्को किम्पका म्यापार करमा चाहिये नहीं। विचारबानका विचार बार नकाप करते हुए क्षोम होता है । वकार्य करते हुए रिसे मोम न हो वा बविचारगान है। अकार्य करते हुए प्रथम नितना कर राता उतना कर दूसरी बार करते हुए पता नहीं। इसरिये पहिसे ही वकार्य करनेस स्कना चाहिये—ा निमय कर कार्य करना चाहिय नहीं। सम्पुस्प उपकारक छिय गो उपदेश करते है, उसे अषण करे भार उसका विचार करे, तो भाय । चौबके दोप परें । पारस मणिका सपोग मा, और पापरका सोना म बना, तो पा तो वसम्मै पारसमणि ही मही, या बसठी पत्पर ही नहीं। उसी तरह मिसक उपदेशसे बाPमा सुवर्णमय न हो, या सा उपदेय ही सत्पुरूप नहीं और या उपदेश केनेवालाही पोग्य जीव नहीं। जीप पोग्य हो बौर सत्पुरुप सपा हो तो गुण प्रगट ए बिना नहीं में। गौकिक मामपन कमी करना ही नहीं चाहिए । गोब स्वय मागत हो तो समस्त विपरीत कारण दूर से जाप । वैसे कोई पुरुष घरमें नीदमें पड़ा सो रहा है उसके घरमें पुरे विकी गय घुस कर नुकसान कर गोय, गोर बा में नागनेके बाद वा पुरुष नुकसान करनेवाले कुने मादि प्राणियोंका दोष निकाले, किन्तु अपना दोष निकाले नहीं कि में सो गया था इसीलिये ऐसा हमारे इसी तय जीव अपन दोपोंको देखता नहीं। स्लप बागृत गता हो तो समस्त विपरीत कारण र रो गॉप, इसलिये समय जागृत गना चाहिये । गौन ऐसा करता कि मेरे तृष्णा, मईफार, गेम धादि दोप र हाते नहीं। वर्षात् पीब सपने रोष निकालता नहीं चोर दोपोंके ही दोष निकालता है। वैसे गरमी बहुत पायो हो और इसलिये बाहर न निकल सकते हों, तो चीन सूर्यका दोप निकासता है, परन्तु यह एतरी धीर ते भो मूर्पक तापसे बचने के लिये मताय में उनका उपयोग करता न। पानी-पुस्पाने गैकिक भाष छोड़कर मिस विचारसे अपने दोप घटाये है नाश किये है-उन विचारोंको वीर उन उपापाको शानिमि उपकारके सिये कहा। उने प्रबण कर जिससे मामा परिणाम हो सा करना चाहिये । किस तरासे दोप कर सकता है। बीच डौकिक माोंको तो किये बगा माता है, और दोष मों पटते नहीं एसा कहा करता है। मुमुमुलोको मागत वति मागत होकर बैरम्पका गाना चाहिये । पुरुपके एक पपनको सुनकर पदि मानेमें दोपकि एनके कारण बहुत ही सेद करेगा, वीर दोषको पायेगा तो ही गुण प्रगट होगा । मसंग-समागम बाम्पकता है । माको म्पुस्प तो, जैसे एक मागदर्शक दूसरे मार्ग दवाकर रास्ता बताकर चला जाता। उसी तर रास्ता बताकर पग पाता है। शिप्प बनानेको सत्पुरुपकी प्य नही । जिसे दुराणा र उमा उसे बारमात्र मान रोता है। भान्ति दूर हो तो तुरत हो सम्पास उत्तम हो जाप । बाहुबरियाको, जैसे केरमान पासमें ही-बतरमें हो-या कुछ बाहर न पा, उसी तय सम्पमत अपने पास है।
५५० भीमद् पत्र [0 गौर वाकर रसता है, वसत् पचम मोहता है, भान्ति रमता है, उसका उसे मिट से मान नहीं । इस मानक ए विना निस्तारा होनेवाण नहीं। घरदार बचोको दूसरा एक मोमवन महो पहुँचवा । गौरको सपुम्पका कशाम को समसमें मही गापा । पापम काट सम्वा हो तो उसे छोड़ देना चाहिये । काम में रित नहीं । हिम्मत करके मानकापसेर यमा चाहिये, परन्तु विरोध करना चाहिये हो। सब बाना-पुष होते है, ता मतमेद शाम पता देतेनी अनुकंपाके किये मर्मत बोध करता है । महानी कुगुरु भगा अगा मतभेदको बढ़ाकर मामाको सतर्क कर देते हैं। सबै पुरुष मिमें और ये मो कम्पाणका मार्ग बता उसीके वनुसार चीन भाचरण करे, के सरप कायाण हो राम । मार्ग निधारमानसे ना चाहिये । सपुरपके वामपसे भेष्ठ माचरण करम चाहिये । सोटी बुद्धि साधे हैरान करनेवामी, या पापको करनेवाली। हो ममल होदा मिप्पा । भावक सब दपास होते हैं। करपाणका मार्ग एक होता है, सौ दोसी नही हो। मौतरका दोष नास होगा, और सम परिणाम बायेगा तो ही करपाण होगा। ओ मतमेरका ऐन करे यो सपुस्प है। नो सम-परिणाम प्रस्में पहले ही ससग है। विचारणानका मार्ग मेद मा। हिन्दू और मुसलमान समान मही है।दिनोंके धर्मगुरु जो धर्म-बोध कर गये थे, उसे बात उपकार छिपे व गये थे । पैसा मोष पौराणा मुस्टमानोंके शामि नहीं । मारमापेवासे मनिप मुमहमान कुछ मी नहीं है । उस भैर शिसे पर हो गया नदी र भे भासित होला, ही जमादिको मूब है। कुपवार के अनुसार गो सचा मान मिया यही कषामहै। प्रभा-मोक्ष मिसे मत है। उत्तर --माय बापत पुरता पानसे श बाना, सब कौस मुछ ऐना मोड है। यापातप्प ज्ञानके प्रगट होनेपर मोध होता । पातक भान्ति ये तबतक मामा जगत्में पता है। बना कामका जो घेवन ई उसम समात्र जाननापान- फिर भी जोर पो मूग गाताप क्या है ! माननेमें म्यूनता है। पाभावप्प मान महा। न्यूनता किस तय र ! उस गान भए समावको मूल न जाप उसे वारंवार स करे तो म्यूनता दूर हो सकती है जाना-गुम्पक पोका मालपान मसे बात होता है। या साधन है ने उपचार है। मधिकारना एपरपके नामपसे से तो सापन उपम्परके हेतु । सम्पुस्तका चरिसेन्स शाम होता है। पुरुष के बचोंक वाममें निप्पम हानेपर मिप्यात पात प्रमार मालुम पोग इमाममान दार नुक्रम शिपिठ पर गाते हैं। मान पारनेसे दोष माश होते हैं । माप पुखर पुकारक ह गया है। परन्तु और तो तार-मागमें पापना और डोकावर मला है। और दोर म्यों रहते नही रस पमा ही करते रहना । साम्या भर १ अपना सामान पुनमानी एक Hke भौर मुनगमान गनी मनुसती हो। माग मा पा मारा १० मा मा नामक एक माँग गाँवोयराती मी-अनुसार उपदेश-प्रपा छोरकर सत्पुरुषों के वचनोंको वास्मामें परिणमन करे, तो सब दोष दूर हो जाय । नीमको अपनापन पाना हो न चाहिये । पाई और महत्ता को बिना बारमा सम्पक्सके मार्गका परिणाम होना कठिन है। वेदातशात वर्तमानमें स्वसदवासे पानेमें बाते है, और उससे मुकता पैसा हो जाता है। पदर्शनमें मगन नहीं, परन्तु मारमाको केवल मुछ-पिसे देखनेपर तीर्थकरने या विचार किया है। मूल धाम होनसे जो गा बळामों (सत्पुरुषों) ने कहा है, या यथार्थ है, ऐसा माश्म होगा । मात्माको कभी भी विकार उत्पम न हो, तया राग-रेप परिणाम न हो, उसी समय केवलज्ञान कहा जाता है । पदर्शनवार्कोने को विचार किया है, उससे बारमाका उनें मान होता है तारतम्प माव मेद पाता है । पदर्शनको अपनी समससे बैठा तो कमी मी बैठे नहीं । उसका बैठना सत्पुरुपके वापसे ही होता है। निसने धारमाझा असग निषिय विचार किया हा, उसे मान्ति होती नहीं-संशय होता मही, भास्माके मस्तित्व के स्वपमें शका पता नहीं। प्रम --सम्पप कैसे माइम होता! उचर-बब मातरसे दशा बदगे, तब सम्पमत्वकी सबर सय ही पाती है । सदेव पर्यात राग-रेप बार बहाम बिसके क्षय हो गये हैं। सनुरु कौन कहा जाता है ! मिप्यावकी प्रन्धि बिसको किम हो गई है। सहरु वार निम्रप । सर्भ वर्षात् जानी-पुरुषोशरा बोच किया हुवा पर्म । न सानों तत्वोंको यपार्य गतिसे बाननेपर सम्परतत एमा समझा गाना चाहिये । महान दूर करनेक किये कारण (सापन ) बताये हैं। जानका सरूप जिस समय गान मे उस समय मोक्ष हो जाय । परम पी सहर मिले चौर उपदेशरूपी दवा भारमा ग तो रोग दूर उस दगाको नीच यदि अन्तरमें न सतारे, तो उसका रोग कमी मी दूर होता नहीं । मीर सधे सपे साधनोंको करता नही । जैसे समस्त कुटुम्बको पहिचानना हो तो पहिले एक भावाको मानमेसे सपको पहिचान हो पाती है उसी तब पहिले सम्पमत्वको पहिचान हो तो मामा के समस्त गुणोकपी उम्मको पहिचान हो जाती है । सम्यान सर्वोरस साधन बताया है। बाम पियोंको कम करके नाच वतर्परिणाम करे तो सम्पावका मार्ग वाये । चम्ते पस्ते ही गाँव वाता है, बिना पसे गाँव महीना जाता । मीषको पपार्य सत्पुरुषोंको प्रवाति ई नहीं। महिररमा से प्रस्तरारमा होमेके पचात् परमारममाव प्राप्त होना चाहिये । जैसे दूध पौर पानी पुदा शुगो उसी वय स्पुरुपके बायसे-प्रतातिसे—देह मोर वरमा शुदा पुरा, ऐसा मान होता है। अन्तरमें वपने वामानुमनपसे, असे र भोर पानी जुदे पुरे होते हैं, उसी तरह देह बार वात्मा गब मिम मास हो उस समय परमाममात्र प्राप्त होता है । जिसे सम्माका विचारलपी प्पान है--सतत निरतर प्यान, रिसे वारमा सप्तमें मी पुरा हो मासित हाती बिस किसी मी समप मामाको भारित होती ही नहीं उसे ही परमारममाल होता है। मम्तरमा निरन्तर पाय आदि र करनेक सिये पुस्पार्य करती है। चौदा गुणस्पानतक पार विचारस किपा एती है। बिसे रम्य-उपशम यता हो, उसे ही विचारपान करते हैं। मामायें मुष्ट ।
मीमद् रामचन्द्र [. होनेके फरबार सारमें वाती महौ । बारमा स्वानुमा-गोचर है, पर पभुसे रिसाई देवी गी; त्रिय खान उसे मानता है। मो मारमाके उपयोगका मनन करे प मम ममता के कारण मन मित्र करा जाता है। सम्पदिकम्प त्याग देनेको उपयोग करते समय वारण करनेवाग निकापित कर्म बिस्ने म बाँधा हो उसे सपुरुपका मोप भगत है। मामुष बबहाने पर स्कता नहीं। नौवने बान पका सका है, इस कारण उपदेश माता मही । स्पोरि वापरमके मा म्गमत्र कोई रास्ता ही नहीं । मक्तकोक अमिनिवेशको फापना करते यो तबतक बाम 30 उठती नही और तस्तक कस्याण मी होता नही । बक्से वीर सपुस्पके मोपको पुनठे है, परस्त उने विचार करनय पोग बनता महो। इन्द्रियों के निपाका न होना कु-धर्मका भामर, मान-अपाली कामना, बम पस्पमात्र या काय? उस कसको रोग अबतक नहीं छोड़ता तबतक पाण होता नहीं । मन पूर्वी पा को मी जोर मका ! और एक सक जाना परन्तु देहमें यनेपाली वामाको म परिचाया, इस कारण भटका! हामी पुस्प समस्त शोध निवारण कर सकता है। परन्तु पार होनेच सापन तो सपुरपी पिसे चम्ना ही है, वीर तो होस नाश होता है। मात्र मी बीच यदि पुस्पार्प करे दो बामपन हो बाप । पिसे बात्मनान महीं उससे स्याण होता नहीं। प्पहार जिसका परमार्थ , से नाम-पानीको मालासे चलनेफर बामा म्पमें जाती है-- प्रपाण होता है। माम्यान साव नहीं। पंचीकरण, विचारसागरको पकर कपनमात्र माननेसे शान रोजा मही। जिसे बनुभव माहै ऐसे नुमा वामयसे उसे समहकर उसकी बाशानुसार बावरण करे तो जान से । समझे बिना रास्ता पात विकट है।ौरा निकाम्नेके सि मानके सोरमे। तो मेहनत है पर हरेके सेनेमें मेहनत नहीं। उसी तय मामाची समसचा वाना पुर्णम ६ मा तो मात्मा कुछ दूर माँ मान नहीं इससे पर माथ्म होती । गौनको कम्पाम करने । करनेत्र मान ही है, और अपनेपनी रय करनी है। पाप गुणस्थाममें प्रपि-मे होता है। नो ग्यापमस पाता है उसे उपम सम्पपला बाप है। गेम पारिश्के गिरानेवाग है । चौथे गुणस्थानमें पशम चौर मायिक दोनों होते है। उपशम बर्याद सतावावरणका पना । कम्पाणके सुन्ने सने पारण गार विचारमें नही । गो घाब पिको "सून में नहीं पतिको संकुचित करें नहीं परम्त ठाटी उसकी दिही करें से शाममि न्याय कस ऐ सकता है। मत देनेवाले और तम्बाके दोनों को दो विचार तया उपयोग रखना चाहिये । उपपोग रमले नहीं और माR रस्ते तो मिकापित फर्म च । 'कम करना परिमाको मर्पा करनी जिसके मनमें से पशिपिक कर्म पापा । पाप करनेपर कोई मुधि होता महो। के एक प्राको कर गो धानको पूर करना चाहता है ऐसे गानो बान पकिरे कितना हो पारिश में पा गया । उसमें या तापा बड़ी बात है। - उपदेशनाया ५५ यो साघम कोई पता, ये साधन पार होनके साघम हों तो हो मे ससाधन है, बाकी दो सम निष्फ साधन । म्यमहारमें मनन्त पाषा वाती है तो फिर पार किस तर परे। कोई नादमी मन्दी मन्दी बोठे तो मह कपायी कहा जाता है, और कोई धीरमस बोले तो उसमें शान्ति मासूम होती है, परन्तु तर्परिणाम हो सो ही शान्ति कही ना सकती है। निसे सोनेके लिये एक बिस्तर पर चाहिये, पर दस घर फासतू रस्से तो उसकी पि का संकुचित होगी ! वो पति रोके उसे पाप महीं । वात्से गोत्र ऐसे हैं जो इस तयके कारणोंको इका करते है कि जिससे पि न सकेससे पाप नहीं रुकता । भाद्रपद मुदी १५, १९५२ चौदा राम् छोककी नो काममा है पाप है, इसलिये परिणाम देखना चाहिये । काधित् ऐसा कहो कि बौदा राम् गोकको तो सबर मी नहीं, तो मी निवनेका विचार किया उपना वो निमित पाप हवा । मुनिको एक तिनकेके प्राण करनेकी मी छूट नहीं | गृहस्प इतना प्राण करे तो उसे ठवन हो पाप है। चा और बास्मा तन्मय नहीं रोवे । सूतका बोटी सूतसे फस खुदी मही होती, परस्त बाटो सोलने में कठिनता है, यपि सूत घटता पता नहीं है। उसी वर बारमामें बाँटी पर गई। सम्पुस्प वौर सत्याल पा म्यहार कुछ कल्पिष्ट नहीं । सहरू-सासरूमी म्पबारसे बम निव-सरूप मुख हो चाप, तब फेवयाम होता है। निम-स्वरूपके चाननेका नाम समकित है। सत्पुरपके बघनका समना दुर्बम है, प्रदान करना दुईम है, विचार करना दु:म है, तो फिर बनुमन करना दुर्गम ऐ, इसमें नमीनता ही क्या है ! उपदेश-ान भनादि काम्से चला जाता है। अकेली पुस्तकसेबान महीं होता। यदि पुस्तकसे शान होता हो तो पुस्तकको ही मोक्ष ऐ गाप ! सहरुको वामानुसार पटनेमें से नाप तो पुस्तक केवळ समानरूप है। पैतन्यमान सत्यमें वा माप तो चेतमता प्राप्त चाप, पेतनता वमुमगोचर है। सगुस्का पचन मवण करे, मनन करे और उसे बारमामें परिणमाने तो कम्पाण हो बाप। पान और अनुभव हो तो मोभ हो पाप ! म्यबहारका निपेष करना मही चाहिये । बकरे म्यवहारको गे यना नही चाहिये। भारम-जानकी बात, मिससे पा सामान्य हो नाप–स तय करनी पोम्प नही । नाम-मानकी बात एकसमें करनी चाहिये । वामाका बस्तिम विचारमें भावे तो मनुमबमें माता है, मही तो उसमें शका होती है। जैसे किसी बादमीको अधिक पटर होनेसे PAई नहीं देता, उसी तय नावरणको समाता के कारण मारमाको दिखाई नहीं देता । मादमें मी बारमाको सामाम्फरपसे जागति गती है । वामा सम्पूर्णरूपसे सोती नहीं, उसे बाबरण बा गाता है। मास्मा हो वा पान ऐना संभव है। बाहो तो फिर बान किसे । वपनेको मफ्ना मान ऐमा-अपनेको वपना हान होना-पीएमुजरोना है।
[. भीमद् रामचन्द्र परचात् संसारमें वाती नहीं । वारमा सानुमक-गोचर है, वह झुसे दिखाई देती नहीं, इनिसे मित हान ही उसे जानता है। जो मारमाके उपयोगका मनन करे पर मन संम्मताने मम मन मिम कहा जाता है। संकाप-विकम्प पग देनेको उपयोग करते है।हमा बारम करनेवाण निकाचित कर्म बिसने न बोपा हो ससे स्पुमन बोप गता है। भाबुक होते परकता नही। जीने बान पका रहा है, इस कारण उपदेश प्रगता नहीं। क्योंकि बाबरणके कारण भगनका कोई रास्ता ही नहीं। जबतक कके वमिनिवेशको फत्पमा करते यो तबतक महमा उठती नहीं और तबतक कम्पाण भी होता नहीं । बाक्से बात समुरुपके बोषको धनते है, फ्ला ठमें चार करने योग बनवा नहीं। इन्धियोंके निम्मका न होना, कुल मर्म मामा, मान-प्रपाको कामना, बमप्पस्पमात्र या कदापारे । उस कामाले गोल मतक मही पता तबतक करपाण होता नहीं । नप पूर्णको सा तो मी गोल मटका ! पोदरा य मक पाना परस्तु देहमें बनेपाम बारम्पको न परिवार, इस कारण भरघ! हानी-पुरुष समस्त शकालोक्य मिनारण कर सकता है। परन्तु पार होनेका सापन तो सपुस्पको रपिसे बना है और तो ही दुस नाश होता है। वाम मी बार पी पुरपाई करे तो वामशान हो गाय । जिसे वात्मनान नही उससे सम्माण होता नही। म्पबार मिसन परमार्थ है, वैसे मामवाना मासे चम्नेपर बामा मामे मा -- कल्याण होता है। भास्महान पर नही। पंचीकरण, विचारसागरको सफर कफ्नमात्र माननेसे बान होग नाही। जिसे बनुमा एबा है, ऐसे अनुमपीके मापसे उसे समठकर उसकी मात्रानुसार बावरण करे तो शान हो । समझे बिना रास्ता पाव विकट है। हीरा निकाम्मे के लिये चमके सोद वो मेहनती पर होरेके केनेमें मेहनत मही। उसी तय परमासमयी समसका वाना तुम है, मो तो मारमा कुछ र नहीं मान नही इससे पा र माश्म होती है। गीतको म्याण करमे म करनेका मान मोरे, और अपनेपनकी रक्षा करना है। पापे गुणस्पानमें प्रपि-मे होता है। जो ग्यारमिस पाता है उसे उपशम सम्पमतमा गाता है। होम चारित्रके गिरानेवाला है । पाये गुणस्पानमें उपशम और धायिक दोनों ।। उपशम बर्षात् सवा बावरणका पना । कपाणके सन्ने सचे कारण गांव के विचार नही । जो विका म्यून रे नही इरिका समुचित को हो परन्तु सम्टो उसकी पति करें, पैसे शामाम पाप करसो सम्वा है। का देनेवाले और बत स्नेबारे दोनोको विचार तथा उपभोग रखना चाहिये । उपफेग रम्य मसी और मार सो तो निषित कर्म । 'कम करना' परिपाका मदिरा करनी का निसके मनमें दाम शिपिए कम मानता है। पार करने पर कोई मुक्ति होती मही। केवल एक तमे मेर जोखाना र परमा पाहता से गरमजान तामा पाशि में न गप्प। उसमें पह ता क्या की बात है !
उपदेश-णापा - बाया मही, तो फिर मरणका मय क्या है ! जिसको देशकी मूमर्म पग गई है उसे पारम-पान एमा कहा जाता है। प्रभ-मोपको किस तय बाय करना चाहिये। उत्तर --बिस तर सासंगके योगसे वात्माको शुद्धता प्राप्त ए उस तय । परन्तु सरासस गका योग नही मिलता । नौवको योग्य होनेके लिये हिंसा नहीं करना, सम्य बोलना, विमा दिपा एषा नहीं मेमा, अमचर्य पारना, परिमहको मर्यादा करनी, गनिमोजन नहीं करना-त्यादि सदाचरणको, शानिपोने शुर बस करणसे करने का विधान किया है।मामी यदि बारमाका छन रसकर किया जाता हो तो उपकारी है, नहीं तो उससे केस पुष्प-पोग ही प्राव होता है। उससे मनुप्पम मिलता है, देवगति मिस्तो र, रान मिस्ता है, एक भवका पुस मिलता है, और पाछेसे पाणु गतियोंमें मटकना पड़ता है। इसलिये शानियोंने तप नादि वो क्रियायें पामाके उपकारफे ठिये, भाकारीत माक्से करनेके लिये कही है, उने परमानी सय मी जगत्के उपकारके लिये निधपरूपसे सेक्न करता है। महावीरसामीने केवमान उत्पम होने के बाद उपचास नहीं किया, ऐसा किसी भी मामाने नहीं किया। फिर भी लोगोंके मनमें यह न हो किवान होनेके पमात् साना-पीना सम एक-सा है—वनेके रिप ही वन्तिम समप तपकी वामपकता बताने के लिये उपपास किया दानके सिम करने के लिये दीक्षा मेनेके पहिये सर्य एकवर्षीय दान दिया । इससे मगत्को दान सिम कर रिसापा, माता-पिताकी सेना सिरफर दिसाई । दीक्षा को छोठी गयौ न मी या भी उपकारके लिये ही, नहीं तो अपनेको करना न करना दोनों ही समान है।यो साथम को, वात्मा करने के लिये है। परफे उपकार दिये बानी सदाचरण सेवन करता है। हामें मैनदर्शनमें बात समयसे वम्यात रकी तरह जातरम मा गया है, कोई हामी-पुरुप मही है। कितन हो समयसे को शामी नहीं इना, बन्पपा उसमें इतना अधिक कदापा नहीं हो माता । इस पंचमकाममें सम्पुरुषका माग मिल्ना दुर्गम है, और उसमें हारमें वो निशेप दुर्गम देखने में बाता है। प्राप पूर्वक सम्का नील देसनेमें बाते नहीं । गतसे नीमोंमें कोई कोई भी सपा मुमुक्षु-विकास-देखनेमें भाता है। पाकी तो तीन प्रकारके सीव देखनेमें वाते है, जो माला पिसे पुज- १ किपा करना नहीं चाहिये क्रिपासे बस देवगति मिलती है, उससे क्स एप प्राप्त नही होता । जिससे चार गलियों का भ्रमण र ऐ, हो सस्प है'-ऐसा कहकर सावरणको फेमस पुष्पका हेतु मान उसे नहीं करते, और पापके कारणों का सेवन करते हुए मटकते नहीं । ऐसे लोगोंको कुछ करना ही नही है, और बस की बड़ी बातें करना है। इन चीजोंको 'बमानवादी' रूपमें रक्ख या सकता है। २ एकप्त छिया करना चाहिपे उससे फापाण होगा, -इस प्रकार माननेवाले एकान्त म्पबारमें कम्पाण मानकर का मही गोइते । ऐसे गानोंको ‘क्रियावा'पा 'क्रियामा' समझना चाहिये । निया-जाने बामाय प नहीं होता। ।
भीमा चन्द्र पैतन्म एक हो तो पान्ति किसे गई सनसनी चाहिये । मोक्ष किसे नई समानी चाहिये ! समस्त मैतम्पकी नाति एक है, परन्तु प्रमेक चैम्पका स्वतत्रहपसे मुदा पैल्यो । पैसा समान एक है । मोक्ष सानुमा-गोचर है। निराकरणमें भेद नही । परमाणु एकत्रित न , वर्षात बामा बौर परमाशुका संबंध न होना मुखि, परस्पसपमें मिलनेन नाम मुक्ति नहीं है। कम्पाण करने म करने का तो मान नहीं, परन्तु नीयको अपनापन रसमा ।मंच का होता! बोल पैतन्य न हो तबतक । एकेद्रिय बावि पोनिमें मी सका हान-सयत सपास न हो पाता, शसे सण हो यता है। अनादि कासे भाष भामा । निराक- रण होने के पश्चात् पता नहीं। मैं मानता।' ऐसा मो बभिमान है ही सम्पनी भारत्त है। इस नगल्में बप और मोक्ष न होता वो फिर भतिका उपदेश किसके लिये होस ! बाहमा स्वमालसे सर्पपा निक्रिय है, प्रमोगसे सक्रिय है । पिस समय निकम्प समाभि होता है से समप निधिपता है। निविदरूपसे बेदान्तके विचार करमेमें बापा नही । बारमा - पाच विचार करे तो त हो बाप । सिवपदका बार करे तो सव हो पाप । बापाका विचार करे वो मापाप हो भाप । उपाध्यायचा विचार करे तो उपापाप हो भाय । पाल्पक विचार करे तो मामा भी हो पाया बर्षात् बामा निस स्वरूपका विचार करे ताप मायामा हो जाती है। बामा एक है अपना बनेक 1, इसको चिन्ता नहीं करमा । हमें तो इस विचारको वस्त है कि मैं एक । गत्मरको गा करमेको क्या पदरी एक-बनेकका विचार मात र दणके पांचमेके पसात् करना चाहिये । जगत् और बारमा स्फममें मी एक मी मानना । बामा अपst, निराकरण है। वेदान्त सुनकर मी मामाको पहिचानना चाहिये । बाम्य सम्पापा बा वाहमा देह-मापक है, यह अनुमत्र प्रमक्ष मनुमवगम्प है। सब धर्मोका तात्पर्य यह है कि बारमाको पहिचानमा चाहिये । सरे यो सम साधन है ये दिन जगर पाहिपे (पोम्प १), उने हाक माहापूर्वक उपयोग करनेसे अधिकारी गोरको पर होता है। दया भारि वामा निर्म होने के सापम है। मिथ्यात्व, प्रमार, मात, पशुम पोग, ये अनुभमसे दूर हो बाप तो रूपम्पका बथन मामा प्रवेश करे। उससे समस्त दोष अनुमसे नाश हो बाप | ORATन विचारसे होता है। सपुष दो पुश्वर पुकार कर न गये है। परन्तु गौष शेक-मार्गमें पाया है और उसे छोकोतर मर्ण मान पाहै। इससे किसी भी तय दोष र म) होता। मेकका मय छोड़कर सपुरुषों के पचन भामा प्रवेश करें तो सब दोष दूर होगाप जीवको भागना मा चाहिये । मान-बाई मोर मम्मो बिना पम्पमार्ग वामा प्रवेश नहीं करता । अनचर्य के विषय:--परमापके कारण मी उतरने के लिये मुनि ने पानीको बादादी, परत मागचर्पी बना नहीं और उसमे मियाद किस बाहार करमा, उपास करना, एर रमा, भौर मम्तमें जहर पाकर मर याना, परमा प्रयचर्य भंग नहीं करना । मिसे की पूर्ण उसे कापाण किस तय माताहै। सर्प पाट लाय और मगन हो तो समझना बाम प्रगट मामा बरबर है। ३' मरमे
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॥ भीमद् परवद्र १, 'हमको बारमान है। मामाको भान्ति होती ही नहीं, मामा फर्ग मी नहीं, और मोळा मी मही, सम्पेिर पुन मी नही'स प्रकार मोम्नेवाले 'शुफ मम्यारमा' शून्य हामी होकर बनाचार सेवन करते हुए स्कवे मही। इस तर हामें वान प्रकारके चीर देसनेमें वाते हैं। गौरको बोगकरमा पनामाके उपचार शिपे ही करमा है—पा मात ये भूल गपे है। हमें चनोंमें चौरासीसे सौ गारो गये है। उन सबमें कदामा हो गया है, फिर माये सब करते है कि बैनधर्म हमारे'। परिमामि, नितामि' बादि पाठका मोक, गर्तमानमें ऐसा वर्ष हो गया माश्म होता कि मैं मामाको विस्मरण करता मर्यात् मिसका मर्प---उपकार-करना है, उसीको–बामा- को दी-विस्मरण कर दिया है। वैसे पारात पर गई हो, और उसमें वय तहके मब बगेय सब कुछ परन्तु पदि एक पर न हो तो बारात शोमित मही होती, पर हो तो प्रोमित होती है। उसी तय किया रम्य बाधि, पछि वास्माका बान शेठो शोमाको प्राप्त होते, नहीं वो नही हो । जैमि हासमें बामाको रिस्पति हो गई है। सूत्र बौदा पूर्वीच वान मुनिपना, भानपना, मारों तरफ सदाचरण, क्पपर्ण वान यो गो सापन, यो यो मेहमत, जो दो पुस्पार्प को ये सब एक वाहमाको पहिचाननेके पिये। पर प्रफान पदि वास्माको पहिचानने के लिये-सोर निकाल्नेके लिप-यात्मा के लिये हो तो सफल t, नही तो निफर है। पबपि उससे बाल फल होता है, परन्त चार गतियोंका नाय रोव नहीं। सपुरपका पोग मिर, और पहा तोप पाच सहममें ही योग्प रो जाप, भौर गारमें परि सनुको बास्या हो तो सम्परत्व उत्पम हो । शाम कोष बारिका कस पर बाला। सग मोपमा सिवाय कप किसी इन्सका न ऐना । निद-मसारसे पर जाना—ससरसे बटक बाना । नास्पा-सपे गुस्की—सगुम्की-वास्था होना । अनुकसाब प्राणियोंपर समभान रसमा र बुरि रमना । ये गुण एमपिता मानमें स्वामालिक होते है। प्रथम सो प्रस्ताव परिचान तोगारमें ये पर गुम पाते है । दात्त विचार करने के लिये पट् सपत्तियों पता। कि रम्प नादि सहण प्राप्त होने के बार बार योम्प-मुमुक्षु-मा पाता है। समकिय बोमरेशाधारित है एक देशसे केसमान है। शायमें इस मामें मोक्ष सम्पा निषेप नहीं। बेस रेग्गाके रास्तेसे घर मा पर मादा पाँच जाते और पैरने रास्ते देरमें पांचते ८ उसी तग इस काम में मोशका रास्ता पद के रास्ते के समान हो और इससे पनि पाँच समें यह कोई बात नौ। मन्दी पहें तो गरी पाँच पॉप-स्ता सम है। इसी तय मोघमारे, उसका नाश मनी । मानी मापाणके मामि कम्पाण मान पद कम्पना पर बालोंका पर सेना बंद कर देता है। माना एगी मोमारे बचानाके को बनुसार पस्ते । ॥
५४१] उपदेश-प्रपा । वौर उस प्रकार के कर्मसे मधि ए दोनों कुगतिको प्राप्त होते हैं । ऐसी मुश्किल मैन छोगोंमें विशेष हो गई है। - - - - मय भारमाके समझने के लिये को है, परन्तु नीव तो नयबादमें ही गुप पाते हैं । मामाको सम्बावे हुए नपमें गुप गानेसे का प्रयोग उस्टा ही हो गया। समकिनधि नामको केवमान भाबाता है। उसे वर्तमान में माम दुला है, इसध्येि ' देश-केवलान ' कहा भाता है। बाकी तो बामाका मान ऐना ही फेसमान है। यह इस वर का पाता-समकितपरिको मग वात्माका मान हो तब उसे फेलबानका मान प्रगट एमा; और अब उसका भान प्रगट हो गया, वो केसमान वास ऐना चाहिये, सहिये इस अपेक्षासे समक्तिपीरको केवमान करा है। सम्यक्त्व वा मर्यात् बाम मोतकर बीन बो दिया; दक्ष हुआ, फक याये, फा पोके ही साये, और साते साते थायु पूर्ण ग गई, वो फिर अब सरे ममें फर मारेंगे । इसलिये क्याम' इस कामें नहीं-नहीं, ऐसा विपरीत मान महीं भेना, और न करना । सम्परम प्राप्त होनेसे जनवमय दूर होकर एक भव की ए पासा है, इसध्येि सम्पक्स उत्तर । मारमामें केवम्यान ह, परस्त भावरण र होनेपर समान होता है। इस काठमें सम्पूर्ण पादरण र मही होता -एक मष वाकी यमाता मर्याद निवना देवयानावरणीय दूर हो, उतमा हो फेवसान होता है। समकित मानेपर, मातरमें-अतरमें- दश कर जाती है। क्षेत्रणानका वोग प्रगट होता है। सद्गुरु बिना मार्ग नही, ऐसा महान् पुरनि हा। पर उपदेश बिना कारण नही किया । समकिती बर्षात् मिप्याबसे मुक्त विमानी वर्षात् चारित्रावरणसे सम्पूर्णरूपसे मुफ, बोर सिख वर्षात् देह धादिसे सम्पूर्णरूपसे मुज । -कर्म किस तय कम होते! सचर:-कोर म करे, मान न करे, माया न करे, सोम न करे—उससे कर्म कम होते हैं। गाय क्रिया करूँगा तो मनुष्य जन्म मिया, भौर किसी दिम सत्पुरुष संयोग होगा । प्रता-त-नियम करने चाहिये पा नहीं ! उत्तर'त-नियम करने चाहिये । परन्तु उसकी साप सगा, करम, पके बचे, भौर परमें मारामारी नहीं करना चाहिये । ॐधी दशा पानेके लिये ही प्रव-नियम करने चाहिये । स्पे-रहेकी परीक्षा करनेके ऊपर एक सो भजका प्रान्त एक रामा पात मजिवाता था। पर मोंकी बहुत सेवा किया करता था । मापसे मोको बम-बम आदिसे पोपण करनेके कारण तसे मळ को हो गपे । प्रधानमे सोचा कि राना विचाप मोला है और मन मेग ठग है। इसखिये इस बातकी रामाको परीक्षा कयनी पाहिय । परन्छ स समय तो पगाये इनपर मात प्रेम है, इसलिये यह मामेगा नहीं, इसरिपे किसी दूसरे भासरपर बात काँगा । ऐसा विचार समम सरफर किसी बासरके मिख्नेपर उसने गगासे कहा-बाप मगत समपसे सब मों की एक सौ सेवा चाकरी करते हैं परन्तु उनमें कोई बड़ा होगा और कोई रोटा ऐगा। इसलिये समकी परीक्षा करके ही भक्ति करना चाहिये ।' एमाने इस बातको साधर किया और णा कि तो सिर क्या करमा चाहिये । रामाको भाडा टेकर प्रभानने को दोनारमझ पे उन सबजे प्रमा- - भीमद् रामचन E या करके करापापाकि बाप सब गेग रसायके बाहर बा, क्योंकि रामको देसकाबहरत इसलिये माय मच्छरोड निम्ना है। तुम सब गेग पनि राणाके मार-मसाले पा दे दो, तो बार रामाका इतना काम हम वाश्य करना चाहिये । जब माने, पाणी गठकर तेल कायनेको मात सुनी तो सबके सब माग गये वीर ममय हो गपे । उनमें एक सबा मक्क पा, उसने चार किपा कि रामका नमक साया है तो उसकी नमसरामी कैसे को पा सकती है। मामे परमार्य समाजकर बम दिया है, इसलिये पमा चाहे कुछ मी करे, उसे करने देना चाहिये । यह विचार कर पामार पास पाकर उसने कहा कि मापको महरेक निकालना हो वो निकालिये 'प्रधानने गगासे डा-देखिपे बाप सब मोकी सेवा करते थे, परन्तु भापको सबे-टेको पशा म यौ'। ऐसो, इस तय सम्बे गाव तो विरसे ही होते है, और पैसे विरले सबै स्पस्की भक्ति मेफ्स्कर है। सबै सहरका मति मन पचन और कपासे करनी चाहिये । पक बात परतक समक्ष म वारे तबतक दूसरी बात सुनना किस कामको ' मुमे इएको भूलना नहीं। जैसे एक बार जो मोजन किया है, उसके पत्र पिना दूसरा मोमन माँ करमा चाहिये । पर बगैर करमा को महाभारत बात नहीं, इसलिये तप करनेपालका कार करना नही मारिये । तप या मेटेमें मेरा हिस्सा है। मूसे मरना और उपचास परमेका नाम तप माँ । भौतरसे पुर तकरण ये तो तप पा गाता है और वो मोमगति होती है। बान्य प शससे होता है। प म प्रकरकारे -१तपि होना, २ एक बासनसे कापाको बेटाना, ५ कम बार करना, १ नारस बागर करना और सचिोका समुचित करना, ५ संडीनता और वाहमा त्याग । सिपिके लिये उपवास नही करमा, परन्तु वामाके ये उपास करना चाहिम । पाप प्रपरका तप धा। उसमें बER न करना इस तपको निमा इनियको पश करनेका उपाप समझकर कहा। विदा इन्द्रिम परा को तो समस्त इन्द्रियोंके पशमें होनेका निमित्त है। उपवास को तो उसकी बात बाहर म करो इमेको निदान करो, भोप न करो। यदि इस प्रकार के दोष कम दो महान् मम हो । उप मावि मामा डिमे ही करने चाहिये-कोकके विमान किये नहीं । कपके घटनेको तप मा।किक पिको भूरा पाना चाहिये । सपणे सामापिक करते हैं और करते लोकानी ANR करे सप। समकित रोगा पा नही उसे मी पशि बानी साकार करे तो सभाहै। परन्तु की क्या साकार करे! मानात साकार परमे जैसा ही हमारा सामापिक, प्रत और समषित है। वर्षात् पास्तविक सामापिक क्त और समषित हमारे मही। मन बन पौर कश्या म्पबार-समधाम स्पिर , पर समकित हो। से मारमें स्पिर योग माम होता है फिर मी वस्तुतः या स्थिर मारे और इस कारण प आमता मी माहीहै। मन पचन और कापा जाब पुणस्पान- कहो , मन पर्प किये बिना पैठता हो नही। मी मनयोग पाहोच परन्तु मामा पानी होती। बहमा पापे गुणस्पानमें एक ऐती, परन्त नपा महाँ । गान गात् नामाको पायातप्प भानना। दर्शन 'वर्षात् वामी पापावाप प्रवीति ।
, सपवेश-प्रया चारित्र' नाद गारमाका स्थिर होना। मारमा और सद्गुरुको एक ही स्मासना चाहिये । यह पास्त विचारसे महण होती है। विचार यह कि देई भयबा दोहके समान दूसप मात्र स गुरु मही, परत गुरकी वारमा ही गुरु है। निसने बामस्वरूप पक्षणसे, गुणसे, गौर वेदनसे प्रगट वनुमत किया है, पौर ही परिणाम विसकी आमाका हो गया है, वह वारमा और सद्गुरु एक है, ऐसा समझना चाहिये । पूमि को वहान का किया है, मार से तो बानीको पूर्ण मी समझमें बाये। मिम्पावासमा धर्मके मिथ्या स्वरूपका सम्धा समसमा । वप नादि मी बानका कसौटी है। सावा-शीठ बाबरण रक्सा हो और वसाता था माप तो ज्ञान मद से नाता है। रिचार बिना इन्द्रियाँ पश नहीं होती । विचारसे इन्द्रियों दौड़ती है। निचिके सिपे उपपास रमा बताया है। हमें बहुतसे बचाना बौष उपवास करके दुकानपर बैठते हैं, और उसे पौषध पाते हैं। ऐसे कल्पित पौषप पोपने बनाधिकाससे किये है। उम को हानियोंमे मिफा बाया है। चा स्त्री, घर, वाम-माये भूत माप, उसी समप सामायिक किया कहा जाता है । म्पधार-सामायिक भारत निषेष करमे पोग्य नहीं, पपपि बीनने म्पबहाररूप सामापिकको एकदम ना बना रहा है। उसे करनेवाले गानोंको समर मी नहीं होता कि इससे कल्याण क्या ऐगा ! पहिले सम्पन्न बाहिपे । विस मचनके पुननेसे मामा स्पिर हो उस पुरुषका पचम मगण हो तो पीछेसे सम्पपल ऐता है। सामान्य विचारको लेकर इन्द्रियों वश करनेके छिपे र कायका बारम कायासे न करते हुए नग पि निर्मठ होती है, तब सामायिक हो सकता है। मवस्पिति, पचमकाठमें मोक्षका मात्र मादि शकामोंसे नापने पाय ति कर रही है। परत पदि गौर ऐसा पुरपार्य करे, और पंचमकार मोक्ष होवे समय हाप पकाने बाये, तो उसका पाप हम कर गे ।पा उपाप कई हाया नहीं, वपमा बाबापमान बमि नहीं। मुफ्तमें ही बीको माय रमसा है । जीवघे पुरुषार्थ करना मरी, वौर उसको लेकर बहाना तुना है । इसे अपना दोप समझना चाहिये । समताको राम्मकी बातें मुनमी मार Aधारनी चाहिये । माय बातोंको पैसे बने पैसे छोड़ देमा चाहिये । गौर पार होमेका अभिशापी हो, और सनुरुको मायाने प्राति करे ये समस्त वामनाय दूर हो गप । सहस्की मात्रा में सब साधम समा गये है। वो गीत पार होमेके भभिसापी होते है, उनमें सब पासनाकोका माश हो जाता है। वैसे कोई सौ पचास कोस र हो, वो वा दो चार दिनमें घर भार मिल सकता है, परंतु गो हासों कोस दूर हो पा एकदम पर पाकर कैसे मिल सफता है। उसी पपा गीत म्याणमास पोमार हो तो पाकमा कम्पाण प्राप्त कर सकता है, परन्तु पनि म एकदम हो उठे पोतोकासि पार हो सकता है। देह नारिका नमार होना—पूर्णाका माश ऐना- मुकि । जिसका एक मन वाया से उसे देह इतनी अधिक पिता उचित महो । मबान दूर होने के पश्चात् एक ममको पुछ कवित मामलो मा बसे गये तो मिल एक मग तो फिस हिसाबमें है।
५. [ भीम परवान किसीको हो तो मिप्पाच भोर माने पहा-सातवाँ गुणस्थानक, तो उसका क्या करना । पौष गुणस्पान स्थिति कैसी होती है। गणधरके समान मोक्षमार्गकी परम प्रतीति बारे (ऐसी)। पार होनेा ममिठापी होम मिनटकर देते ए पीछे मही पटता। गो शिपिस ऐप यो पोरे कुलश्मण हों उमें मानही मेड़ सकता । पोखम भी रिस पचनको करते हुए रे है, उसे खानी सन्तासे करता है, तो पकिर कैसे देगा। महापारस्वामीफे दीयाके परपोरेका पातमा स्वरूप यदि विचारें तो रम्प हो। पर बात बहुत है। भगवान् वप्रमाी । उने पारिश्र पता था, परन्तु मिस समम उन बास पारित प्रहण किया, उस समय ये मोन गये । मविरवि शिप हो तो उसका वादर सस्कार से किया जाप ! कोई राग-रेप नाश करमेके प्रिये निकले और उसे तो ममें ही किया, तो गरेप करसि र रो सकते हैं। जिनमगवान्के भागमका जो समागम होगा वपने म्योपशमके वनुसार होता है, परतुप गुरुके अनुसार नहीं होता। सद्गुस्का पाग मिल्नेपर को उसकी भावानुसार पण, यसका पग-रेप सचमुच र हो गया। गभीर रोगके दूर करने के लिये मसग दवा तुरत ही पर देवी है। पर तो एक होको दिनमें दूर हो जाता है। मार्ग मोर उम्मार्ग परीक्षा होनी चाहिये । 'पार होनेका बमिगपी' इस शम्दका प्रपोग करो तो बमम्पका प्रश्न ही नही उठता । बमिमपामें भी मेद है। प्रम -सपुस्पको किस तय पक्षा होती है। उपर:-पुस्प अपने व्याँस पहिचाने पावे। सपुरुषोंकि क्षण- पूर्वापर वपिरोप होता , कोरका मो उपाय बताये, उससे कोष र हो जाता है, मामका बो उपाय बताये, उससे मान र ो बाता है। हाना पाणी परमार्परूप से होती है। पूर्ण है। पानीको मामी सो बानीको पाणी उपर उपर ही है। बतातो पाणी पुनी माही तबतक सूत्र मी नारस जैसे माम होते हैं। सारु वौर बसरको पक्षा, सोने और पातककी पीकी फ्रक्षाका तय होनी चाहिये। यदि पर होनेका मिनपी हो, और सार मिळवाय तो कर्म दूर हो जाते हैं। सहरु कर्म र करनेछ कारण है। कर्म बावने के कारण मि तो धर्म परते, और कर्म दूर होमेके चरण मि ये कर्म र हो। यो पार होने ममिअप हो पा मनस्थिति बाविक वामपनको मिप्पा मारे। पार होने वमिमी किसे का माप ! मिस पदार्पनेपाली मार करें उसे गार समसफर मेरे और हानाही माझाच बागपन करे, उसे पार होनेका वभिण्या या गाता है। उपदेश सुनने के लिये समनफे बमिकमाने कर्मक्स गुतीपा मोर पसी, उससे उपदेशरूप सो महो गती । त्या गो पार होने ममिगी। उसने बोरूप में मोर रमले है, इसते रम्पर उपरेशरूम सकसी नादिमें मम परती में बमम्पके वरनेसे पार से गाम, ऐसा न। चौमगाम र नर्थ महा।।विसामोंके परमय नामल मुनिमे इसकी च की है। -चमकी पाणी उपदेश-पायां * स्वप वो पार [मा नहीं वौर दूसको पर उवारसा है, इसका नर्थ अभमाग मवाने जैसा है। इस प्रकारका मिप्पा धावन देते है! जम्मूझाप्राप्ति नामक जैनसूममें ऐसा कहा है कि इस काउमें मोन नहीं । इसके उपर समझना चाहिये कि मिप्पास्त्रका दूर होना और उस मिप्यास्वके दूर होनेम्प मी मोश नहीं है। र होनेरूप मोक्ष है, परन्तु सर्वथा अर्थात् आयतिक देहरषित मोक्ष नही है। इसके उपरसे यह सम्वा है कि इस कामें सब प्रकारका क्षेत्रमान नहीं होता, परन्तु इसका मर्प यह नहीं है कि इस सम्पब मी न होता हो। इस कालमें मोझके न होनेकी ऐसी बाते कई करे ता उन्हें सुनना म सम्पुरुपकी बात पुरुषार्थको मद करनेकी नहीं होती-पुरुषार्थको उपचन देमेकी ही होती है बहर भौर अपत दोनों समान है, ऐसा शानियोंने कहा ,तो यापेक्षित ही है। ना बतको समान करनेसे कुछ चहरका प्राण परमा बताया है, यह बात नहीं । इसी तरह मभुम कियाजोंके सबममें समझना चाहिये। शुभ मौर बाम कियाका निपेर किया हो मोशको बारेमासे हो । किन उससे शुम मौर बाम दोनों किया समान है, यह समाधम क्रिमा भी नहीं करमा बहिये-ऐसा हानी-सुस्पका कपन कमी भी मही होता । सत्पुरुपक कमी वधर्ममें धर्म स्पापन रनेका नहीं होता । यो किया करना उसे बदमफ्नेसे, निरहंकारपमेसे करना चाहिये-क्रिमाके फलकी । महा रसनी चाहिये । शुम क्रियाका कोई निषेप किया ही नहीं, परन्तु वहाँ जहाँ के बाप मोध सीयर किया ही उसका निपेन किया है। शरीर ठीक है, पर मी एक तबकी समावि है। मन ठीक रहे, या मी एक तरह की है। साग-समाधि मर्यात् गाय कारणरहित समाभि । उससे प्रमाद वादिका भPा होता है । मि समाधि पाती है, उसे कोई बास रूप दे तो मी उसे बानन्द नहीं होता, अपवा उससे को जार्दस्वी जीन से तो मी उसे से मही होता । जिसे सात असावा दोनों समाम है, उसे समाधि कही गई है। समकितरिको नम हर्प, बम्प शोक कमी हमी नाप, परन्तु पाठे शात भाता । उसे वगका हर्प नही बता बिस तर उसे मेोपा उस पर उसे पास देता है। यह विधारता कि इस तय होना योग्य नहीं', वीर बह मामाकी निन्दा करता है लोक हों तो मी उसका ( समक्तिन) मूड माश मही होता । समविशिको रासे प्रताविक होनेसे सो समाधि रहती है। पतंगको रो0 से हापौ यती है, उसी तर सर रिकी विरूपी गेरी उसके हायमें ही रती है। समकितपरिवारको सहम-समाधि है। सवा कर्म बाकी रहे रों, उसे सिर मी सम्पनि हो। वसे मान कारणों से धमानि नही, किन्तु भरमामे मो मोह र हो गया हो र है। मिप्याटिक में रोनरी, इससे यह बाम कारणमि पराकार होकर उसएको नाता समकितरिको पान दुस जानेपर भी मत नहीं होता । यविर मी इडा मही फर रोग नापे । परस्त रोग बानेपर उसके ग य परिणाम नहीं होते। सोबास तीन गार पानभरममा प्रमे। -मनुपरक । .
भीमद् सनद घरीरके धर्म-रोग नादि कैडीके भी होते हैं क्योंकि वेदमीप कर्मको तो सबको मोगना हो पाता है। समकित बापे बिना किमाी सापसमाधि होती नहीं । समकित होनेसे ही सार समाचि होती है। समषित होनेमे सहरमें हो बासळिमार दूर हो जाता है । उस दशामें वासति- मारके सहन मिषेध करनेसे बच यता नहीं । स्वरूपके अपम अनुसार- उसको वातानुसार- मो पर उसे अंशस समकित हुवा है। इसरे सब प्रघरको कम्पना छोपकर, प्रमच म्पुरुषको बाचासे उनकचन सुनना, उनकी सपी मदा करना, मौर में वामा प्रवेश करना चाहिये, तो समकिन होता है। धन कहाई महावीर स्थामाकी नपानुसार चल्नेवाले नौब वर्तमानमें नहीं । इसठिय प्रात्पनशानी चाहिये । कास पिकण्ठ है। मुगुरुगोने मेकको मिपा मर्ग बठाकर मुम दिया है—मनुष्यमा ए लिया है तो फिर मी मामि किस ए बा सकता है। यपि गुरुषोंने सूर तो लिया है परन्तु उसमें उन विधान रोप नही पोंकि उमें उस मार्गको खबर ही नही ।। मिग्यालरूपी विजीको गाँठ मोठ्य है, इसलिये सब पाठोप्रॉस र हो सकता । जिसकी प्रपि हिम गई है, उसे साग समाधि होती है। क्योंकि जिसका मिष्पाप नए हो गया है, उसकी मम गाँठ ही नए रो गा, और उससे फिर कप गुण माश्य ही प्रगट हो जाते हैं। सत्पुरपका मोष प्राप्त होमा या अमृत प्राप्त होनके समान है। यानी गुस्मान बिचारे मनुप्पोको म लिया है। किसी गावको गम्हा वापर कराकर, किसीको मतका मामा कराकर जिससे पार न हो सके, ऐसे श्रामबन देकर सब कुछ हटकर प्यार कर रहा है-मनुष्प मा दीप मिपा है। समवसरणछे मगवान्को पहिचान होती है इस सब मापापाका रमेश देना चाहिये । मस समपसरप हो परन्तु परिवार न से तो कापाग नहीं होता बान हो तो कम्पास होता है। भगवान् मनुष्प जैसे ही मनुम्म पे। वे सते, पाते उठते और बने थे-म बारोंमें फेर नही है। केर कुछ सयो । समवसरम भाविक प्रसंग गरिक-मावना है। मगवान्का स्वरूप ऐसा नहीं है। मगमान्य स्वरूप---सपा निर्मठ बामा-सम्पूर्ण शान प्रगट होनेपर प्रगट होता है। सम्पूर्ण काम प्रगट हो माप यही मगवान्का स्वरूप है। वर्तमानमें मगवान् होता तो तुम उसे भी न मानते । मगमाघ माहाम्प जान है । मगवान्के स्वरूपका चितवन करनेसे वामा मानमें बाती है, परम्त मगवान्की देहसे मान प्रगट नही होता । मिसके सम्पूर्ण ऐचर्य प्रगट होगाप उसे मगाम् करा बाप है। बसे परि मगवान् मोर हाते और वे में बताते तो तुम उ मी म मानव इसी तए वर्तमानमे हानी मौन्द हो तोप मा मही मामा माता । तपा सभाम पांचोके मा छोग करते कि ऐसा पानीमा नहीं। और पास ता होग उस प्रतिमाको पूमते है परनु पर्तमानमें उम्पर प्रीति भी नहीं पाते। गांवो बानीको पहिचान पर्वमानमें हाती नहीं। समतिका सवा सवा चार कर तो नौ समपमें जान से बाप, महीनो एक मामें मान होता है, और अन्तमें पदरचे मासे तो केपमान हा ही माता है इसरिपे समषित सदर पुरा RIR-मेको मामा मम होनेके लिये कहा है, परन्तु भेदमें मात्मा पुग्ने माही कस।ऐकमें परमार्प होना चाहिये।
५४.] उपदेश-छाया ५६॥ - समकिताको केवग्यानकी इच्छा नहीं। आनी गुरुओंने लोगोंको कुमार्गपर चहा दिया है, उम्टा पकवा दिया है, इससे छोग गछ, स, बादि लौकिक भावोंमें तदाकार हो गय है । महानिर्योने छोकको एकदम मिष्या हो मार्ग समझा Pया है। उनके सगसे इस काछमें अधकार हो गया है। हमारी कहाई हरेक-प्रत्येक बासको पार कर करके विशेषरूपसे पुरुषार्थ करना चाहिये। गठ आदिके कदामाको छोड़ देना चाहिये । चौल बना फारसे भटक या है। यदि समकित हो तो सान ही समापि हो माय, और अश्वमें फम्याण हो। नील सत्पुरुषके आभयसे यदि बाराका सम्चा सम्पा माराधन करे, उसके उपर प्रतीति मो, तो अप ही उपकार हो । एक मोर तो चौदह राज ठोकका मुसहो, और दूसरी ओर सिरके एक प्रदेशका मुसहो, तो मी सिबके एक प्रदेशका सुप्त मनतगुना हो जाता है। पति पाहे किसी मी तयो रोकना चाहिये, हान-विपारसे रोकना चाहिये, बोगसामसे पकना चाहिये, उपयोगसे रोकना चाहिये किसी मी तय हो गतिको रोकना चाहिये । मुमुक्षु को, किसी अमुक पार्षक बिना म से एसा नही रसना चाहिये । चीन नो अपनापन मानता है, वही दुस, क्योंकि वहाँ अपनापन माना और पिता कि बर से होगा! बन कैसे करें ! पिता को स्वरूप हो जाता है, वही वहान है। बारके शय, मानके द्वारा देसा गाय तो माश्म होता कि कोई अपना नहीं । यदि एककी चिंता करो तो समस्त जगत्को हो विंधा करनी चाहिये । इसलिये हरेक प्रसंगमें अपनापन होते हुए रोकना चाहिये, तो ही पिता-पपना- कम होगी। तृष्णाको नैसे बने कम करना चाहिये । विचार कर करके तुष्णाको कम करना चाहिये । इस देहको कुछ पचास-सौ रुपयेका तो सर्व पाहिये और उसके बाले पर हमारी सोंकी चिंता कर पमिसे सारे रिन जग करता है। वाप उपयोग सृष्णाझी इमि होनेका निमित है। जीव मान-सहाकि कारण तुप्माको बहाता है, उस मान-भाइको रखकर मुक्ति होती मही। वैसे बन से मान-गई, तृष्णाको कम करना चाहिये । निर्भन कौन है ! गो धन मंगि-नकी दया करे निर्णन है। जो न माँग यह धनवान है। जिसे समीकी शिप तृष्णा, उसको दुविधा, पौड़ा है, उसे जय मा सस नही। छोग समझते हैं कि भीमत लोग सुसी है, परन्तु पम्त उमके तो रोम रोममें पीड़ा है, इसलिये कृष्णाको घटाना चाहिये । वाहारी मात मर्यात् सानेके पापोंकी बात तय है, उसे करना नहीं चाहिये । बिहारका बर्गत् कोषाको बात बहुत कुछ है। निहारकी बात भी बहुत तुन्छ । शरीरको साता और दीनता ये सब तन्मताको बातें करमी नहीं चाहिये । माहार विश है। विचार करो कि खानेके पॉश मय हो नाती है । विथ गाप साती है तो दूर हो जाता है। और मेवमें साद सामनेने मनाय हो जाता है। वर उत्पम हुए बनामके माहारको विशनुम्प समाध, उसकी पर्वा न करना चाहिय । पहा माती। सामान्य गीतोंसे सपा मौन नहीं हा माता, और परि में मी तो मवरको कल्पना दूर होती मी और सातक कन्यमा रे तबतक उसके लिये कई यस्ता निकालना ही चाहिये । इसलिये पार वे निकर कम्पनाको बाहर निभाते हैं। परमार्थ गाममें मोना चाहिये । म्पपार कानमें । ।
. - श्रीमद् रामचन्द्र [. प्रयोजनके मिना म्पर्पकी बातें करनी नहीं । यहाँ मापापी होती हो यहाँसे र बना पाहिपे-- पति कम करनी चाहिये । कोर, मान, माया, टोमको मुछे कम करना है, ऐसा सब स होगा-सा उसन पोषा पोहा मी छत्य किया जायगा-तप मा में पसरा हो पायगा । वरमाको भावरण करनेबारे दोष सब माननेमें मा भाप तब उने र भगानेका वम्पात करना चाहिये । क्रोम बादिक पोरे पोरे कम होने के बाद सम सानो जापगा । बादमें उन्हें नियममें मेनेके पिप से बने बम्पास रखना चाहिये। और विचारमें समय बिताना चाहिये । किसीके प्रसंग कोष बादिक उत्पन्न होनेन निमिच हो तो उसे मानना मही चाहिपे क्योकि जब स्वप ही शेष करें तमी को होता है। जिस सम्प अपनेपर । कोष करे उस समय पचारमा चाहिये कि ठस चारेको हाम्मे उस प्रकृतिका उदय है। यह स्वय हो कोदो पा शांत हो गायगा । इसशिप जैस यमे वचार पर सर्य स्पिर रहमा चाहिये। कोष मादि कपापको हमचा विचार विचारकर कम करना चाहिये । तृप्या कम करनी चाहिये । पोकि या एकांत म्यापी है। जैसा उदप होगा पैसा होगा, इससिपे तृप्माको भरय फम फरमा चाहिये । पान मसंगोंको से बने पैसे कम करमा चाहिये । पेस्तीपुत्रने किसीका सिर काट मिया पा। बा में रानीको मिग, और करा कि मोक्ष दे, मी वो तेरा भी सिर काट गगा। इसपर बानीने कहा कि क्या तू बैंक काता। विवेक (सपेको सबा समसना) शाम (सबके उपर सममाष रसना) और उपशम (पियों को बाहर न गाने देना और भततिरसना) को विशेषातिविशेष बारमामें परिणमानेसे आत्माको मोश्च मिती है। कोई सम्मापबाछा करता है कि देवतियोंकी मुदिको अपेक्षा–स भम-दशाको अपेक्षा- तो पार गतियों को भेष्ठ है। इनमें अपने पापको सुप सच अनुमप तो पता है। सिदमें संबर नाही कशा बाता, क्योंकि यहाँ कर्म वाले मही, इसछिये फिर उनका निरोग भी मारी होता । मुतमें एक गुणसे-शसे-गाकर सम्पूर्ण शोहक सभा O रहता है। सिपा सभाषमुप मगट हो गया है के बावरण दूर हो गये है तो फिर मा संबर-नि किसे मंगे। योवान योग मी नही होने । मिप्यार मात, प्रमा', कपाप, योग इन सबसे मुच उनको काँमा आगपन नहीं होता। इसरिय उनके काका निधेष मी मोहता। मैसे पफ हमारको रकम हो, और से पोही पोही पूरी कर देता या बंद हो जाता है। इसी तप पर जो पोबारग थे, उनमें सारी से जमा कर Pया इसडिपे पाच कारणोन्मी माता बंद हो गया, भात् पारि पौसे किसी भी तर प्राममही हाता। धर्मसम्पासम्मोष मान मापा, छोम बा दोरोग्य सेन करना । गौरता सावित होहमिसी समय भी सोतामीवपा मरता नही–मरमा उसन मभा महरी । समाग्मे सब जोर जोषित हो । असे गसौपयासके बिना कोई और देखने में माता मदी, उसी तारानसम्पपश्यफे विमा कोई और नही है। भारपायनियरमा बाहिर बार ऐमागेर पाना पाहिये जिसमे राम्प उत्पन हो- मंसार मा पास हो। चाहे भी पर गप पर रिसको में भाम् 47 प-संसारको ६४३] उपदेश-पापा ५१५ मसार मान सम्म, जरा, मरणको महा मपकर समाप्त पैराग्य प्राप्त कर वासू वा जोप–इ उत्तम है। वपना पुत्र मर नाय वीर रोने लगे, ता इसमें कोई विशेषता मही, या तो मोहका कारण है। बामा पुरुषार्थ करे तो क्या नहीं हो सकता । इसने दो यो पर्वतके पर्वत काट ग है, और कैसे कैसे विचारकर उनको रेतयेके काममें लिया है। या तो फेवा बाहरका काम है, फिर मी विजय प्राप्त की है। भारमाका विचार करना, या कुछ पाहरको बात नहीं । जो बहान है उसके दूर होनेपर शान होता है। अनुमपी मैप दया देता है, परन्तु यदि रोगी उसे गमें उतरे सो हो रोग मिटता है। उसी वय सद्गुरु बनुमषपूर्वक धानरूप दवा देता है, परन्तु उसे मुमुक्षु प्रहण करमरूप गळे उतारे पो हो मिथ्यात्वरूप रोग दूर होता है। दो पड़ी पुरुषार्थ करे तो केवलान हो जाय- -ऐसा कया है। रेसो झ्यादि, चाहे कैसा मी पुरपा स्पों न करें तो मी दो घड़ी में तैयार होती नहीं, तो फिर केवगान किसना सुसम है, पसका विचार तो करो। मो पाते चौरको शिथिल कर राती है—प्रमादी कर गम्ती । सी बातें सुनना मही। इसके कारण नीव अनादिकाससे मटका है। मा-स्थिति काल वादिका भासबन भेना नहीं । ये सब महाने है। जीवको सांसारिक बासक्न-विडम्बना छोड़ना तो है नहीं, और एमिप्या भासवन डेकर कावा है कि कर्मक दल मौजूद है इसलिये मेरेसे कुछ बन नहीं सकता । ऐसे वाळमन लेकर गोर पुरुषार्थ करता नही । यदि बद पुरुपार्य करे दौर भवस्थिति अपना काठ रुकावट गहें तो उसका उपाय हम पर गे, परन्तु पहिले तो पुरुपार्य करना चाहिये। सम्पुरुपकी भाषाका बारापन करना मी परमार्थरूम ही है। उसमें डाम ही है। यह म्यापार समका ही है। निस वादमीने गमों रूपोंके सामने पीम फिरकर देखा नहीं, पाषा बो हमारके म्पापारमें माना निकामता उसका कारण यही है कि नवरसे बास्मार्पी इच्छा नहीं है। जो वरमापी गया है या पीछा फिरकर देखता मही- तो पुस्पार्प करके सामने मा नाता है। शास्त्रमें का? कि वारण, स्वमाल, मवस्पिति का पकवी है । वो करते है कि जब पुस्पार्थ करे । पाँच कारण मि बाप तो मुक्ति हो मायाने पोनों कारण पुरुपार्थ, भन्तहित है। जमत भौये मारे मिस गोप, परम्तु यदि सर्प पुरुषार्थ करे तोही मुक्ति प्राप्त होती है। जीवने ममत काबसे पुरुषार्थ लिया नहीं। समस्त मिप्या भावानोंको स्कर मार्गमे विल गछे है । कास्पाम पि उदित हो तब मवस्पिति परिपक समझनी चाहिये । शूरता हो तो वर्षका काम दो पार्मि किया जा सकता है। -म्पकारमें चौपे गुणस्थानमें कौन कौन प्यबहार गग रोता है! शुर प्यार या प्रभ बार को। उत्तर --उसमें दूसरे समा म्यपहार मागू होते है । उदयसे गुमाम म्पसार होता है, और परिगतिसे शुर म्पहार होता है।
भीमद्रासचम [६४ - परमासिकपुर का कहा जाता है। प्रत्यास्मामी भास्यास्पानीको सपा लिया है, इसलिये या उन म्पबहारका कर्वा । समकितीको बार म्यवहार र करमा है। समकिता परमासे पुरा है। नपके बनेक प्रकार है, परन्तु निस प्रकारसे मामा उँधी वारे, पुमार्प पर्वमान हो, रसी प्रकार विचारना चाहिये । प्रत्येक कार्य करते हुए अपनी भूमके ऊपर प रसना चाहिये । एक पवि सम्यक् उपयोग हो तो बनेको वनुमय हो बाप कि कैसी अनुमत्र-दशा प्रगट जती है। ससग हो तो समस्त गुण सागर्म हो गॉप । दया, सत्प, वातान, अमचर्य परिमा-मांदा भादि काररहित करने चाहिये । गोको बतानेके लिये कुछ भी करना नहीं चाहिये । मनुष्पमा मिका है, और सदाचारका सेग्न न करे तो फिर पौड पम्ताना होगा। मनुष्यभषमें सपुरपके पवनके सनमेका-विचार करनेका-सपोग मिना है। सम्प बोकना, या कुछ मुक्ति महा-विराट सार। मो म्मापार वारि सम्पते रोते हो उमें ही करना चाहिये । परि म महीनेतक इस तर भाचरण किया जाय तो फिर सपका मोना सरत माता है। सस्प बोलनेसे कदाचित् प्रपम तो पोरे समयतक पोका मुकसान भी हो सकता है, परन्तु पीर बनत गुमको धारक वात्मा जो तमाम छठी बायोपटवार हो जाती है। सप बोभेसे धीमे धीमे हम रोजाता है और पहोने के पश्चात् सतना चाहिये- बम्पास रसना चाहिये, क्योंकि उता परिणामाम बास्मा कई विरण होती है। गौरने पदि मेकित मपसे मप प्राप्त किया हो, तो उससे न मी मही पता । मेक बारे से बोडे उसकी परवा न करते पर, मिस्से भामरत हो उस सावरणध सेवन करना चाहिये । हान को काम करता है त है। सत्पुरपके पचनके बिना विचार नही माता । विपारके विना मेम्प नी माता-बैरम्पके बिना हान नही माता । इस कारण सत्पुरुपफे मचनोंका मारवार विचार करना चाहिये। पास्तविक नाशका दूर हो जाम तो पत-सी मिराहो पाती।गार परि सापुस्तका मार्ग जानता , उसका उस बारंबार बोष होता हो तो बहुत कम हो। यो सात बपना गर्नत नप सब एक बारमार्थक किये है, भार मामार्प ही एक सपा पानयका परमार्थ गावमेंसे निका नाप हो पछ होता है-अन्त में उपशम मले तो फरस होता है। नही पो बारको माहान गाम्प दो गाव, और या फिर बाकार ममेका स्थान होता है। सपुरुपके मामपसे पा मार हो गाता है। म्याम्पानमें कोई मंगवाठ राग (सर) निकायबर सुनता है परम्नु उसमें बाहमाल नही । परि पुरुप बाबपसे कपाय वादि मदरो र सदाचार सेवन करके मकार रहित जामो, तो हमारा और मरेका प्रित सकता है। भरक्षित मामासे माचार सेवन करमा चारये, विससे उपकार । साप जमीन हो और उसमें वर्ग होतोयस काममें जा सकती। उसी तय तक देसी स्थिति हो कि मामाम प रा रा न करे, तबतक पकिस समझा । जातक परेरा-मार्ता मामा प्रवेश नारे पर उसे किरदिर मनमरना और रिचारमा पारिये उसका पीणा मेला उपपेश छापा 0- नही चाहिये-कायर होना मही चाहिये-कायर हो गाय तो मरमा उची नहीं जाती । बानका वम्पास बिस तद बने पदाना चाहिये--सम्पास रसमा चाहिये--उसमें कुटिम्वा अथषा वाकार नहीं रखना चाहिये। भारमा वनत शानमय है। जितना सम्यास यो उतना ही कम है। दरविकास मादिके फनेका वम्यास रखना चाहिये । गच्छकी अपवा मतमतिरकी पुस्तकें हापमें नहीं लेना । परम्परासे मी कदामह वा चाय तो जीव पीछेसे मारा जाता है इसलिये कामइको बावोंमें नहीं पड़ना । मतोंसे यम बना चाहियेपूर एना चाहिये । मिस पुस्तकसे पराम्प-उपशम हो, वे समक्सिशिकी पुस्तकें । मैराग्यकी पुस्तकें पाना चाहिये । दया सस्प बादि मो साधन है, वे पिमानको त्याग करने के साधन है।तस्पर्शस विचारको कसा वामय मिकता है। अबतकके साघम विमाषके आधार-स्वम ये ठमें सो सारनोंसे पानी-पुरुष दिला ग है। रिसे कल्याण करना हो उसे सस्प-साधन अप करमा चाहिये । सरसमागममें जीव भाया और इन्द्रियोंकी सम्धता न गई, तो यह समागममें गाया ही नही, ऐसा समझना चाहिये । नमतक सस्य मोठे महा तबतक गुण प्रगट नहीं होते । सत्पुरुप हापसे पकवार मत दे तो गे। पानी-पुरुष परमार्पका ही उपदेश देता है। मुमुक्षुजोंको ससाधनोंकर सेमन करना योग्य है। समकिसके मूछ बारा तो-स्यूल प्राणाविपास, स्थग मृपाबाद, स्थल कहनेका हेतु०- शानीने बारमाका और ही मार्ग समझाया है। प्रत दो प्रकारके -समकितके बिना मान प्रवद। चौर समकितसहित मर्मत है। समकितसहित बारह प्रोका परमार्थ समछमें मानाय वो फल होता है। बासमत वतसके लिये है जैसे कि एकका भक सिखानेके लिये सकारें बनाई जाती है। पापि प्रथम तो करें करते हुए एकका अफ टेवा मेड़ा हो जाता है, परन्तु इस तरह करते करते पीसे गामक ठीक ठीक बन गता है। पावने मो नो फुल श्रवण किपा है, पह सब मिप्पा ही प्राण किया है। ज्ञानी विचारा क्या करे। सिवना समन्ना मा समधानेको प्रतिसे ही तो समझाता है। मार कटकर समझानेसे वो मामझाम हाता म।। पहिरे नो नो प्रत वादि किये रे सब निष्फल हो गये, इसलिये बा म्पुस्पको रिसे परमा समझकर करो। एक हो तो, परन्तु यह मिष्पाधिको अपेक्षासे बर है, और सम्पादपिकी अपेक्षासे निर्यण है । पूर्वमें जो न बादि निष्कर गये, उमें मा सफर करने योग्य स्वरुपका योग मिला है, इसलिये पुरुषार्थ करना चाहिये । सशचरणका बामपसहित सेवन करमा चाहिये--मरण वानेपर पोछे एना नहीं चाहिये । पानी के पचम भाण होते नहीं-मनन घेते मही, मही तो दशा बदसे दिना कैसे रह सकती है। मारंभ-परिमाको म्यून करना चाहिये । पाने में चित्त नबगे तो उसका कारण मौरसता मास रोती है। जैसे कोई नामी नौरस बाहार कर छे तो फिर उसे पीछेसे मोमन अप्य मही गता। शानियोंने गो ग्राहै, उससे और विपरीत ही चलता है, फिर सपुरषको पाणी कासिम सकती है। मेक-झाव मादि राम है। इस फल्पके कारण गोत्रका पामी चमकता नरा। उस शापपर - । - भौम परचम्द यदि सत्पुरुषके बचनरूपी टोकोसे दराम पर पाप तो पानी चमक उठे । गोषका शाप हवा मिके बातिपयके कारण दूर नहीं होगा परन्तु ससगा सयोग पदि एक महानेतक मी हो तो पार हो नाप, और जीव रास्तेसे पा गाय । गतसे मुकमा ससारी गालोंको पुत्रके उपर मोर करते ए बितना खेद होता है उतना मी पर्तमानके मातसे साधुमोको शिप्पके उपर मोह करते हुए वा नहीं। तणावाम गाव सदा मिसरी सतोपला जीव सदा सुखी । सचे तेवकी, सबै गुरुकी, स्ये धर्मको पहिचान होना पगात मुनिक है। सबै गुम्की पहिचान हो, उसका उपरेश हो, तो देव, सिर, धर्म इन सबको पहिचान हो जाय । समका सरूप सहम्में समा जाता है। सवे देव यांत, सबै गुरु निम्त्य, मौर सो हरि राग-रेप सिके र हो गये है । परमिव वर्षात् गाठीत । मिप्पाच वर्षन्यिो। परिण मा प्रन्थि है। मूमें बम्पतर प्रपि हिम महो वातक पर्मका सहप समझ मही वाता । विसकी मन्धि नर हो गई है, पैसा पुरुष मिले तो सभमुत्र काम हो पाया और उसमें पदि समागम ये तो विशेष कन्माण हो । निस मूस गाँठका झाव न करना कहा है, उसे स्त्र भूग गये है, और बाहरसे अपवर्षा करते है। दास सहन करनेसे मी मुहि होती नहीं क्योंकि हर दम करने का कारण यो वैराग्य है, गान उसे भूए गया है। दुसम्मानका। मदरसे मुठे तमी बाहरसे स्टता है, अरसे छुटे बिना बारसे छूटता नही । केवल बाहर बाहरसे मेड देनेसे काम नहीं होता । बाम सापनके बिना कम्पाण होता नहीं । बाम मोर भतर बिसे दोनों साधन , पठातर पुरुष है और इसध्येि प्रमेष्ठ है । मिस सायुके पसे बर्गुण प्रगट हो उसय सग करना चाहिये । कर्ण और गादीके सफ्पे दोनों समान मही कोनाते । कम उपर सिका मा दो फिर भी उसकी रपयेकी कीमत नहीं होती और चोरी होये उसके उपर सिमा म मावो जो मी उसकी कीमत कम नहीं होगाती । उसी तय यदि गात्प समस्पा समकित हो तो उसकी कीमत कम नहीं हो जाती। सब करते है कि हमारे धर्मसे मोश है। मात्मामें पातीपक मास हानेपर पान प्रगट होता है। चाहे वहाँ बैठो और चाहे रिस स्पिति रो मोम हो सकती है। परन्तु पाप नाऐतमी हो । मियाल और महंम नाश र बिमा में रामपाट मेरदे की तर सूरा बाप, किर मी मोक्ष मही होती । मिप्याल माय बनके पचात् होम सापन स । इस परम सम्पदर्शन श्रेष्ठ है। ससारमें मिसे मोह, बी-फमें अपनापन रोपा, वौर कपापका को मरा जमा है, पर पनि भोग्न न करे दो मी मारावा! जब मिप्पाल पग बाय वमो उसका सर होता है। हालमें चैनधर्म नितने साधु किरते हैं उन समाये समकिता नही समयमा उमें रान देने में हानि नहीं पर रेहमाप कम्पान नहीं कर सकते । सम्पाण नहीं करता । यो सामु फेक पाप मिपाय पिानता है उसमें बान नहीं। जान तो कम जिससे पास इति र माता-संसारपरसे सबी प्रति पट जाती है- सबैको सवा समस्ने गता। मिससे बारमा गुम प्रगट होपान ।
11 उपदेश-णयां मनुष्यमव पाकर मटकनेमें मौर बी-पुत्रमें वदाकार होकर, यदि बारम-विचार नहीं किया, मफ्ना दोष नही देसा, भरमाको निन्दा नहीं की, तो पर मनुष्यमब-पितामणि एनरूप देह-पा ही घग चाता है। नीव कुसगसे मोर बसद्गुस्से मनादिकालसे मटका है, इसलिये म्पुरुषको पहिचानमा पाहिये । सपुरुष कैसा है ! सत्पुरुष तो वह है कि जिसका देके उपरसे ममत्व दूर हो गया है- मिसे बाम प्राप्त हो गया है। ऐसे हानी-पुरुषको वाहासे आचरण करे तो अपने दोप कम हो जाय, कषाप पाटि मा पर गाय और परिणाममें सम्परता उत्पन्न हो । कोष, मान, माया, गेम ये वास्तविक पाप हैं। उनसे पास कर्मीका उपार्जन होता है। हमार पर्ष तप किया हो परन्तु यदि एक-दो पड़ी मी कोर कर लिया तो सब तप निफर पण बाता है। म सका भोळा मी रम्प मेषकर पा गया, और मैं ऐसे अप व्यवहारमें बाप्पन और वाकार कर बैठा । जीप ऐसा क्यों नही विचारता । बायुके इतने पर्प म्पतीत हो गये, तो मी छोम फुछ पा नही, और म कुछ हान ही प्राप्त हमा । चाहे कितनी मी तृष्णा हो परन्तु सब आयु पूर्ण होती है उस समय यह जरा भी काममें माती नारी और कृष्णा की हो तो उस्टे उससे कर्म ही रते है। यमुक परिमाको मर्यादा की रो-उदाहरणके लिपे दस इनार रुपयेकी- तो समता आती है । इतना मिस मानेके पथात् धर्मप्यान करेंगे, ऐसा विचR रमसे तो मी नियममें मा सकते हैं। किसीके उपर क्रोध नहीं करना । जैसे रात्रि-मोनिका याग किपा है, वैसे ही कोच मान, मापा, गेम, नसम्म बादि गोग्नेके लिये प्रफन करके उनें मद करमा पाहिय । उनके मद पर गानेसे अन्त में सम्यक्त्व प्राप्त होता है। बीच विचार करे तो बनतों कर्म मद पर बॉय, गौर परि विचार न करे तो बनतों कमौका उपार्जन हो। वा रोग उत्पम होता है तब मी, माकपचे, माई वपना दूसरा कोई मौ रोगको से नहीं सकता ! सतोपसे धर्मप्पान करना चाहिये, उपकेनों बगैर किसीकी आमाश्पक चिंता नहीं करनी चाहिये । एक स्थानमें बैठकर विचार कर, सत्पुरुपके सासे, कानाके पचन ममनकर निघारफर धन मादिकी मर्यादा करनी चाहिये । मामधर्मको पापातम्य प्रकारस तो कोई विरा ही नीव पाठ सकता है, तो मी कामसे मी समचर्यका पान किया जाय तो यह उत्तम है। मिप्पाल र ऐ गया हो तो पार गति र दो गाती है । समकित म माया ये भौर पस पर्पका पान करे तो देखक मिलता है। गोत्रमे बाप, बामण, पशु पुरप, बी बादिको कम्पमासे में वैश्य , भामण , पुरुष, जीपशु-ऐसा मान रस्सा है परन्तु मी विचार करे तो पालय उनमें से कई मी मही। 'मेरा' समतो उससे पुरानी। सूर्यके उपोतको तरा दिम पीत गाता है, तपा मालिके मम्मी तरह भायु पौत जाती है। निस तपकी भासे काटी जाती है, वैसे ही वायु म्पतीत हो पाती है। तो मी मूर्म परमान साथम नहीं करता भौर मोहके रेरको इफया किया करता है। २ -- भीमद् रामचन्द्र [४॥ पानी निकराती है। किसी नौकको ऐसा नहीं करते कि रोमा से। सार्यकरने पूमि को धर्म कपि, उनका दम करने के लिये वे दूसरे मौयोंका कन्याण करत , नही वो ठने उदयानुसार दया यता है। क्या निफारण ह, तथा उमें दूसरे निगसे मपमा करपाण नहीं करना है उमका कस्पाग ता हो हो गया है। तीन मेकका माप तो पार होकर होठा है। पुरुष अपना समनिताको भी ऐसी ( सकाम ) उपदेश देनेकी इप्स नहीं होती। मी मिपारण दयाके पास्ते ही उपोप देता है । महावीरस्वामी गृहलासमें गते हुए मी स्मागी मैसे पे। गारों का सम्मी मी मैसा परम्प महा रस सकता, पैसा पैराग्य भगवान्का था। वर्ष यहाँ मगवान् यवे, यहाँ वहाँ सा प्रभारका उपकार भी पता है। उनकी मामी उदयके अनुसार पातिपूर्वक परमाईं हेतुसे निकम्तो है बात् उनको बाणी कस्याणके छिपे ही होती है। उने सन्मसे मति, भूत, अपि ये तीन शान थे। उस पुस्पके गुणगान करनसे बनत निर्यो। पानी माय गम्प है। उनका अभिप्राय माननेमें मही भाता । पानी-पुरुपको सबी सूत्री यो कि उनने मनाहिसे दूर न होनेवासे गगरेर मौर माानको मिमिम कर गया है। इस मगवानकी पनत छपा है । उ पचीसप्तौ पर्ष हो गये, फिर भी उनकी दया आदिवाकर भी मौख । यह उनका बनत उपकार पानी मारम्पर Pसाने के लिये म्पहार करते महीने सहम खमानसे उदासीन मासे पते। मामी दाबके पास जाकर दोपका दम कर गमता है, कि मथानी मार दोपको घोष नही सकता बात बहुत है। गामें कन्याण मही है।बालाका बाद रोता है। जैसे फत्पर स्वयं महाँ तैरता वीर सरेको मी पही तैरता उसी तय बानी है। मांतरागका मार्ग मनाविध मिसके रग रेप और कान रो गपे उसका कम्पाण हो गया ! परन्तु यानी को कि मेरे पर्मसे करपाण है, तो उसे मानना नहीं । इस तर कात्याण होवा न लियाना ववादपना माना हो तो पाय बहती है। वप्पा लियाके साप हा हो तो पाप पाता है और यूलिया वप्पा के साथ बैठे तो काप भती है पर्ने बानी समाना बानिये। दोनों ही समझे बिना थापा बानकर कर्म उपार्जन कर मरम्ने फिरते है।मोहरेको नायकी परारे मताप्रा पयो बैठे हैं। मुहपत्ति वादिके बापाको मेर देना चाहिये । ममार्ग पाण्ण रेप दौर बानका नाश हो जाना। मबानी साने मोठे गायको समझाकर उने मार राममे जैसा कर दिया है। यदि प्रथम सप विचार करे कि मेरा दोष कोनसा कम पण (बोग) इसमम बर्मन एक पल मनुपानी मानी एक बाब होती । परिप गरम लिए पतये एमए मुसम्मनल एम- समय की मामी को यो गोरा मेग प्रामामामा बालदील बने ये भेगीभी पेश करना पता नही करते। इमो पर्मगुरु ग्रमीच प्रमान प्रस्व कपरकी पोय पापा मार मार पासप पापा पोम मा मात्रा को पानीपानने औरपरले 'गो पाम रोमियार होम को मामो मजाक तो पागम के इमाम होय से नाप और पूरे पती-चोरी-प्रेम प्रकाशमापापानका मिसाल दर रस्ती हो पात्रो पोकाका परत पाणबीने समाचार बार पाकर बैठने मे भया। ममे नाको से सामरा। -मनुबारक Vima १४.] उपदेश-पापा है, तो मादम होगा कि मैनमर्म तो मेरेस वर हो या है। जाप उम्टी समझसे अपने कन्याणको भूल कर दूसरेका कल्याण करता है । तप्पा दियाके साघुको, भौर इडिया तप्याके सापुको बाम-पानी न देने के लिये अपने अपने शिष्योंको उपदेश करते हैं। कुगुर छोग एक दूसरेको मिठने नहीं देते। पदि ये एक दूसरेको मिटने दें तो कपाय कम हो गाय -निम्दा पट जाय । जो निपक्ष नहीं पता । यह मनादिसे पक्षमें पड़ा इला है, और उसमें एकर कम्पाण भूत बावा है। बाद कुलकी मो गोचरी कही है, उसे बहुतसे मुनि नहीं करते । उनका फरसे मादि परिमाका मोर र हुमा नहीं । एक बार आहार मेनेके लिये कहा है फिर मी ये दो मार खेते है। मिम शाना- पुरुषके वचनसे आरमा उस दशा प्राप्त करे या सवा मार्ग हा अपना मार्ग है। सबा धर्म पुस्तकमें मामा गुण प्रगट न हो तबतकमकुछ फल नहीं देता । 'धर्म अपना। एसी एक कम्पना हो नापर्म -- जैसे महासागर क्सिीका नहीं, उसी तर धर्म मी किसीके पापका मही है। जिसमें हो, उसे को पाछो । वह किसीके वारका नहीं है। पापनादिकासका है-शत है। पाली कि धर्म अपना है। परन्तु शाबत मार्ग क्या है। शायत मार्गस सब मोक्ष गये गोरी रुपची या कपड़ा को बारमा महीं। कोहरेकी नारेकी तर मीच पक्षका मामा एमी नापका मूड़ता है। अपने जनधर्मके शामोंमें सब कुछ, शान अपने पास न बीब कर बेटा है। तथा कोष, मान, माया और छोमनपी पार जो गत मि टका उसे मान नही। का मार्ग सपा है। अम्पमें कौड़ौतक मी रसनेफी आश मही। णयोंके कुलधर्मके गुर मोरे बिना ही लोगोंक पाससे छपमा प्रहण करते हैं, भीर उस तबका तो एक म्यापार । साय अग्निमें बसते हैं, तो फिर उनसे दूसरोंकी वमि किस तर शान्त हो सकती प परमार्थ सथे गुस्से समझना चाहिये । विस गुरुको सार्थ हो वह अपना मान्याण उससे शिष्यों का मी अकम्पाण होता है। धारण कर बीर भगतों पार मकाबामबती लिंग धारण पर विफ म्पब म मटका है ।इस जगह पर जैनमार्गका निषेध करता नह) । अतरगसे जो मितना सपा वैम है। मही ता बना मासे गोलन झटेका सपा माना है, भार पहा को साथकता तमा नब कि मिप्पा आमद-दुराप्रह-गोदकर फन्याग होता हो। int | जब मामान प्रगर से उसी समय अाम-वानीपना मानना चाहिये- ग्रम मापना उसे मानना यह भूल । पाइरानकी कीमत जानन पालिके बिना जीना मानना मही पानी मिष्याको सपा नाम दकर बादाबादता है । प सदी पहिचान रानो रिमी ममय तो सम्पका क्षण क्षेगा। अग' मा पर १५ मगर यो गार पाने मुमुभु मानता हो, पार हानका मनिपाय मानता हरा भार उमे रमे रेगने सप मामा म्यापता होता हो, तो उस समय पिसार करना चाहिए कि वे मुमुसुना-दोशियारी- EPF . - 1 मार्ग ।
[४ भीमद् रामद सबकी अपेक्षा में संवमें बना हो गई। ऐसे वापन के प्राप्त करनेको एष्णाम, पाच नियमों रमन मधपापाय तह, प्रग-राणाके के समान, ससारमें जीत्र भ्रमण किया करता है और कुम्, गाल और गलियोंमें मोहके नधानेसे नापा करता! रिस तय कोई पा रस्साको बटवा गाता है, और यहा उसे माता माता है, उसी तय मातीका प्रिया निष्फर पी जाती। • मैं कर्ण , मैं करता , में कैसा करता 'झ्यादि गो विभाव है की मियाल है। माकारसे ससारमें मनात दुस प्राप्त होता है-पारों गठियोंमें मटना होवा ! किसी पिया माया ही नाता किसीका किया हुमा लिमा नहीं बाता; गोत्र म्पर्पक परफ्ना करके ही मटका करता । पिस प्रमाणमें पान उपाम किया हो उसी प्रमाण जाम, ममम, मायु, साता मसाता मिलते हैं। अपन मापसे या लिया ना नाता। गांव बोकारसे मैंने इसे मुस दिया, मन दुस या मेने बम Pया' ऐसी मिथ्या मालमा किया करता है और उसके कारण कर्म उपान करता है। मिप्यास्वमेवपरात धर्मका उपार्जन करता है। जगत्में यह मका पिता है या इसका पुत्र है, ऐसा म्पबहार होता है, पन्त कोई मी किसीका मना। पूर्व कर्मक उन्यसे ही सब बना है। वाकारसे को ऐसी मिप्याबुद्धि करता है, या मूण मा १- चार गतियोंमें भटकता है, और दुर भोगता है। धमाधम पुस्पके सण -पुस्पको देखकर बिसे रोप उत्तम होची, उसके सपन सुनकर जो उसकी निंदा करता है-मोटी हविवाग से सधिवासेको देसकर रेप करता है-सरको मूल प्रवा, मोनिय करे उसे पनका सुशामती करता है, पाँच बन्धियों बिसने वश हो उसे माभ्यान करता है सबे युषमानो देसका पेप करता है, जोबो-पुरुष में समर्थन गौ-ऐसे बाब पतिको प्रप्स होते हैं। गांव कर्मक कारण अपने स्वरूपानसे बंध उसे बानको साबरमहा है। एक नाम लिए-मेरी माफ रहे तो बडा -ऐसी म्पमाके कारण बीब वफ्मी शूरवीरता दिखाने के लिये नईम उतरता है -पर माकच तो रामहोबानेवाली। रेर कैसी है। रेतके पर सौ । स्मशानकी ममी वैसी। पतिको गुफाके समान देह वयो। चमहाले कारण उमर उयरसे सुदर माझ्म होती है। देह महगुणका घर तथा मापा बौर मक्के पर स्पान है। हमें प्रेम रसके कारण गांव मटका यो मनिरप है, मामी मान है। मसमें मोह एमनेसे पान चार गतियाँम मटका है।सतरा मठाता। भारको तय। पाँचपर पी पाँचता है, पम्मे मार्ग उस तंग होकर बना पाता , टनको रम होनेपर मी म छूट नही सकता भूससे पीमित रोनेपर मीरा सकता, पासोमास पा भिराबतासे से नहीं सका । उसको तय बीत मी फ्यपान है । यो संसारमै प्रति करता है, प इस प्रकार सदन करता है। बुमे से कयो परिनकर बाइबर रचते है, परतु मे तब मारा गानेवाले है। वासाय न मापाडे कारण रप हुमा गरे। ।
५४५] उपदेश-माया - . जो बीत्र भारमेच्छा रखता है, वह पैसेको नाकके मैठकी तरह स्याग देता है। जैसे मक्खियों मिठाईपर चिपटी रहती है, उसी तरह पे अभागे जीव कुटुमके मुसमें सवलीन हो ये हैं। द, युना, पाएक-ये सब ससारमें डूबे गए है-काठफे मुसमें है, ऐसा भय रखना चाहिये । उस मयको रस ससारमें उदासीनतासे रना चाहिये । सौ उपवास करे, पस्तु जबतक भीतरसे वास्तविक दोष दूर न रों तबतक फल नहीं होता। श्रावक किस करना चाहिय ! निसे सतोष वाया हो, कपाप मिसकी मद पर गई हों, भीतरसे गुग उदित हुए हों, सस्सग मिला हो-उसे मायक कहना चाहिये । ऐसे जीको बोध छगे तो समस्त सि वदछ जाप-दशा पक्षमाप । ससंग निम्ना यह पुण्याय योग है। बीब अविचारसे भूछे गए हैं। नए कोई कुछ कह दे तो तुरत ही युरा ग नाता है, परम्त विचार मही करते कि मुझे क्या है वा करेगा तो उसे ही कर्म वध होगा । सामायिक समताको कहते है । बीर बहकार कर वाप-क्रिया करता है, अहकारसे माया मर्ष करता है पुगति के कारण है। सत्गके बिना या दोप नहीं घटता । नौवको अपने मापको होशियार कहलवाना बहुत बण्ठा गता है । मह मिना युगये दोशियारी फरके गाई भेता है। जिस जीवको विचार नहीं, उसके बनेका सात महीं । पजाब विचार करे और स्मार्गपर पसे तो नेका अन्त मारे । भत्कारसे मानसे विम्य प्रगट नहीं होता । वह बड़ा दोपहर जबानमें गो की कल्पना यता है। मारपहियाने विचारा कि मैं अकुशता, इसलिये (११) मार्नर, मात्रफ वही १५ सोम पदरा मेसे मो सिर कहा है, उसका कारण यह है कि निसका रग देप भौर पान मए हो गया है, उसका पाहे मिस बेपमे, चाइ बिस स्थानसे भीर चाहे जिस लिंगसे कम्पाप्म हो जाता। सत् मार्ग एक ही है, इसलिपे मारह मही रखना । अमुक दिया अमुक तपाई, ऐसी श्यमा नहीं रखना । दमा सप आP सावरण मुक्तिके मार्ग है इमणिपे साधरण सेवन करना चाहिये। मौच परना किस लिये कहा है ! पारीरकी ममताकी वह परीक्षा है। (सिरमे बार होना ) पह मोर मनेका कारण है। उससे स्नान करमेका मन होता है, पण सेनेफा मम हाता है, उसमें मुर दगनेका मन होता है, भौर इसमे फिर उनक साधनों के लिये उपानि फरनी पाती है। इस पारण शानियोने पशो करने के लिये पहा है। पात्रा फरनेफा एक तो कारण यह है कि गृहमासको उपापिसे निति मिठ सका इसरे सौ दासी के आरगे म् भार कम हो सके तथा परदेश देशान करने से कोई म पुरुसोते गगबने मिउ नाप तो पाणगापाल कारगौसे पाग परना पनाया है। मासपुरुप सरे जीनको उपस देवर पम्याग बनाते हैं, उन स्तुरमोंघे तो भलात साम प्राममा है । सपुम मर जार मान फागार मागर है । वागी उदप अनमार म 1 1 - ।
[ भीमपत्रबद्र पहावर्ग गई। जो पार ने अमिछापा हो तो दोको बसार समप्तता दोधे मापसे निम मानता है-उसे बाकुटता बानी चाहिये ही नहीं । देवकी समान करते हुए मा समाली मातीन), क्योकि पारसी क्षण नाश हो जाती है उसमें एणभरमें रोग, णमरमें काना हो जाती है। यह मास देश दुसदेता है, इसलिये माकुलता-पानुसत्ता होती है, वही भान है। शाम प्राण कर रोग ऐप पुमा है कि देर बारमासे मिम इ -क्षणभंगुर है, परन्तु क्षेचे परि देना हो तो यहगत रागरेष परिणामसे शोर-गुग मचाता है तो फिर, देश भणमगुर है, या तुम शासमें मुममे गावे किस छिपे हो। तो हमारे पास है तो मनुमत्र रो देर सर मि जैसी है- रस्साई रक्सी मही ना सम्वी । पदनामदन परते हुए कोई उपाय चमता नहीं। वा फिर किसच्च समाठ करें। कुछ भी नहीपन समय । इस तरहका प्रत्पन्न अनुमत्र होता तो फिर उस ममता करक क्या करना ! रोका प्रगट अनुभा कर शाम पाकिया बनिस्प है हमें मूर्म करना पोप नही । जावा में मारमभूमि र न हो तक सम्पत नहाता । पात्रको सपाई कमी गई नही परिवाई होता तो मोश हो जाती । मजे ही सापुपना, धारकपना अपना बाहेमा सीकर कर सो, परन्तु सचाई बिना सब स्वपन पारे ।देह जामत्रुमि र करने के यो साधन पवा बेसाथम, देरमें अPमपुरि दूर हो जाम सभी सन समझे जात हैं । हमें भावामझुरि हुई है उसे दूर करनके लिये अपमेपमको त्यागनके लिये साधम फरने भाव पक। यदि पार न हो तो साफ्ना ध्या सपना, शानमरण अपना उपदेश सब पुछ जरपणेदन के समान है। मिस या भमरगया है, हो साभाचार्य और यदी हामी है। जैसे कोई अमृतम्घ भोजन करे तोर पिआरमा मही यता, उसी हाद भतिका रहामा निसीसे डिगामा यता म। लोग कहते हैं कि समति दयामरी, उसे क्षेत्रमदानी गाने । परन्तु गोस्लप वामा । उसे पो नही मानती! मामा पुए गार तो बसा ही मही गई । अपार समकिन हमारे से शाम सपी मानना है । बसे किमी पापी मानेपर या अपना कर देता है, उसी वरण समरियर भर भान्ति राजानेपर रसग साम्य सर्व ही जान हनन फटकोकान देता ही पाक मा पार्थ मान एगर अनुमार देता हो । भारमा-मस्तरमैसे--कर्म गरेको सेणार र ा उसमे जलेश गबर पो म परे! अात् गार पाती । सम PHinा दिनी मही पती । पशिश गमति गान माममा पासो गमकी Mममाम। समरिन माता रे भारतिपक्षी मोर ममममोर, र 24 नुमरी पाग मे माम मुधि रहनादात्म मानेर निसे ATTER 15 उमे मिपा समगना पादि। गिनाई, मग पाmth| उगमे गमत Sannगो।रिम 1112 उगा रामपुर मर गार नोभी मेरा I HIT नेगेशियाती है और निगाना ARE THIR मारा लि हामी प-मान are al EHI 1 - उपदेशापा धारमाको पुत्र मी नहीं होता और पिता भी नहीं होता । गो इस तरहकी कम्पनाको रूप मान बैठा है या मिथ्यात्वी है । कुर्सगसे समझमें नहीं बासा, इसलिये समकित नहीं भाता । सत्पुरुषके संगसे योम्प गीर हो तो सम्यक्त्व होता है। समकित और मिथ्यात्वकी तुरत ही समर प भाती है। समकिती और मिप्यावीकी नाणी घड़ी पामें सुनी पाती है। पानी की बाणी एक ही धारायुफ पूर्मापर मिलती चली जाती है। चब भतरग गाँठ सुले उसी समय सम्यक्त होता है। रोगका चान , रोगको दमा जान छे, पप्पको जान से और दन्सार उपाय करे तो रोग दूर हो जाय । रोगके माने बिना अहानी नो उपाय करता है उससे रोग मता ही है। पप्य सेवन करे और दमा फरे नहीं तो रोग कैसे मिट सकता है ! पर्यात् नहीं मिट सकता । तो फिर यह सो रोग कुछ और है, और दवा कुछ और है। कुल शाम तो ज्ञान कहा नहीं माता | शान तो उसी समय कहा जाता है जब अतरगसे गाँठ दूर हो जाय । तप सपम बारिके लिये सत्पुरुपके सपनोंका प्रवण करना बताया गया है। हानी भगवान्ने कहा है कि साधुओंको बचित्त बाहार भेना पाहिये । इस कयनको तो बक्से साधु भूल ही गये है । दूध का सचिव भारी मारी पदार्योका सेक्न करके बानीकी आबाके उपर पाँव देकर पम्ना कम्पाणका मार्ग नहीं । लोग करते है कि यह साधु है, परन्तु बारम-दशाकी मो साधना करे बही तो साधु है। नरसिंहमहेवा करते है कि बिनाविकाम्से ऐसे ही चम्ते पस्ते काठ मीत गया, परम्त निस्वारा हवा नी । यह मार्ग नहीं है, क्योंकि अनादिकाम्से पते बस्ते मी मार्ग हाप गा ना। यPि मार्ग यही होता तो अबतक कुछ मी हापमें नहीं बाया—ऐसा नहीं हो सकता था। इसलिये मार्ग फुट मिल ही होना चाहिये । तृष्णा किस सरह घटती है। छौकिक भावमें मान-भाई स्पाग दे तो । मुझे करमा हो क्या ! लोकमें चाहे नैसे हो, परन्तु मुझे तो मान-बाईको मेगकर चाहे किसी मी प्रकारसे, निससे राणा कम हो पैसा करमा ।'—ऐसा विचार करे तो तृष्णा घट गाप- धर-कुटुम्म बारिका परमाया सपका अभिमान कैसे घट सकता है। त्याग करनेका उपयोग रसनेसे । 'मुझे यह मिमान क्यों रोता है'स प्रकार रोग पार करनेसे वभिमान में पड़ेगा। पानी पता है कि चीन यदि कुंगोमा बानकर विचार करे तो सामरूपी वाम सुरु नाप-कितने ही सारे खुल गाय । पदि कुनी हो तो वाण सुस्ता है, नहीं तो पौदी मारनसे तो प्राग टूट ही गावा है। कायाण न जाने क्या होगा ऐसा गातको बहम है । यह कुछ रापी घोड़ा तो महीं। मालको ऐसी ही प्रन्तिके कारण कायाणकी नियों समझमें नहीं माती । समधमें मा नाप तो सब धगम है। बीकी भान्ति दूर करने के लिये बगतका वर्णन किया है। पर गान हमेशा अपमार्गसे पापाप तो मार्गमें भा पाप ।
भीम प्रसाद शानी यो परमार्प-सम्पप–ो उसे ही करते हैं। पाय घटेपही कपाग है। गोको राग, रेप, बान दूर हो नॉप तो उसे कम्पाण करा नाता है'-ऐसा तो योग करते हैं कि हमारे गुरुजी करते है, तो फिर सत्पुरुष मिम हो क्या बताते है! ऐसी उम्टा-सोषी कल्पना करके बीषको वपन दोनोंको दूर करमा मही है। मामा भानरूपी पपरसे दब गई है। पानी ही मामाको ऊँचा उठायेगा । मामा दब गई रेससिपे कम्याण सूक्षता नहीं । बानी गो सरिधाररूपी सर फनियोंको बताता है या ताको स्मगती। मानके मातरसे बनार्ण र रो बाप तो वपत वागे उसी तर प्रतिस्पी मनाने दूर होनेपर ही करपाण हो सकता है। परन्तु पौषको तो महाली गुरुने महका रस्सा है, फिर भातिरूप पणि दूर कैसे हो सकता है। वानी गुरु नानके बदले तप बताते हैं, तपमें हान बतात है-स तय उस्टा तम्टा बतास है, उससे मौको पार होना बहुत कासाप्प है। बाकार मारिणित मासे तप वादिकरमा चाहिये। कवामा मेरकर नीच विचार करे तो मार्ग पुरा हो । समकित सम्म है, प्रत्यक्ष, सरण है। नौब गाँवको मेरकर दूर पण गपा है, तो फिर यब या पीछे फिरे गाँव वा सकता है। सम्पुरुषोंके पोका बास्पासहित अषण मनन करे तो सम्पाल भाता है। उसके उत्पम होने के पचार त पवाराण भाते है और तत्पपात् पाँचयाँ गुणस्पानक प्राप्त होता है। सचाई समसमें बाफर उसी नास्पा माना हो सम्पपल है। जिसे सब-मूठेकी कीमत हो - मेद निसका दूर हो गया है, उसे सम्पाव प्राप्त होता है। असद्गुम्से सद समक्ष ही पाता । दपा, सम्प, बिना दिया था न लेना स्पादि साभार पुरुषके समीप मानेके सत् साधन है। सम्पुरुष को करते रेप के सिमान्तका परमार्प है।हम वनुमवसे प्रते है-अनुमक्से शंका दूर करनेको कर सकते । मुमत प्रगट दीपक है, और सूत्र कामाबमें किया एषा दीपकरे। सिपापना बयका तप्पाफ्ना किया करो, पम्तु उससे सममित हमेगाम नही । यदि वास्तविक सबा वरूप समतमें मा बाप-मौतरसे दशा पर पाप, तो सम्पान उत्पम होता । परमाम प्रमार बर्षात् भरमामेसे नाम ति | पातिकर्म उसे करते परत करे। परमाणु वामासे निरपेस परमामुको पचपात नही है। उसे मिस रूपसे परिणमा पठसौ रूपसे परिणमता है। निकाधित कर्ममें स्पिति हो तो बराबर बर वा। स्थिति-काम हो और विचार करे पया तासे झामका संचार परे तो उसनमा होता है। स्पिति का हो तो भोगमेपर पुटकारा होता है। प्रेम बारिशरा दिन कौसा उपाठन किया हो उनका भोगनेपर हो मुटकारा होता है। सप मानेपर मोगमा हो चाहिये । यो समता एक्से उसे समताका फहोता है। सबको अपने अपने परिणाम अनुसार धर्म भोगने पाते। मानो बाबमें पुस्पलमें एक समान है।ान भरमाका ।
r] विषिमपत्र मादि सप्रह-२९ो वर्ष ६४४ मन पर्पमान किस तर प्रगट होता है। साधारमतया प्रत्येक नीयको मविज्ञान ही होसा है। उसके माध्यभूत मुहानमें पर हो उस मविवानका बस पाता है। इस वर मनुक्रमसे मविहान के निर्मक होनेसे वात्माका संपममार कर सयममात्र उत्पम होता है, और उससे मन पर्यनाम प्रगट ऐता है। उसके सबसे मा सोफे अभिप्रायको चान सकती है। किसी उपरके बिहके देखनेसे सरेके चो कोष हर्ष मादि भाव नामे बात है, या मतिजाम निपप है। वपा उस तयका शिम होनेपर मो मात गाने गाते हैं, पर मन पर्यवधानका विपप । बानन्द, बासोग पुदी १, १९५ ६४५ मलमार्गरस्य श्रीसहरुमरणाप ममा नपदि पूना मादिको कामना न हो, भतरका ससारका दुध प्रिय मो, तो बस पिने सम्मुख करके जिनमगवान्के मूहमार्गको एमो ॥ १ ॥ विमसिदान्तका शोषन कर जो कुछ मिन-चनको तुम्ना की है, उसे केवछ परमार्थ-हेतु मना है। रसके यस्पको कोई मुमुक्षु ही पाता है। मिनभगवान के मसमार्गको पनो ॥ २॥ एकस्म और भविस्म यो बान दर्शन और पारिप्रकी मुस्ता है, यही परमार्पसे विनमा है, ऐसा परितमोंने सितमें कहा है। दिनभगवान्के मळमार्गको सुना ॥ ३ ॥ यो चारित्रके किंग और भेद को ये सब इम्म, देश, काठ लागिको अपेक्षाके भे से 0 पतु जो बान मारिका शुरता है तो तीनों का में भेदित है। निममगवानके मूत्रमार्गक सनो ||2॥ वा हान दर्शन नाशिदोंका संक्षेपसे परमार्थ पुनो । उसे समाप्तकर निशेपत्य विपारने देवम बारमार्य समछमें पायेगा। जिनमगवान्के ममार्गको मुनो ॥५॥ मूस मारग सामने मिननो रे च मना स्नान भोप गादिनी को पाना रे, मोप पाठ मत माल । मूत्र १० पौगोपननी तुम्नागे को गोपिने मिननियत । मूल मात्र मारप सुपरे पमे मार ॥२॥ सान एन परिवनी परवा एरो मन मारिए । मूल निमारग से परम्परा एम म मिाने पुर। मुम ॥1॥ मिप भने मेरो सपनारे इमरेश पामीर पराभूब परारितारे तोकोकलेजमा । मन nxn - भीम जयन्द्र [४५ समास मात्मा, देो वादिसे मिम है, उपयोगमप है, सा वक्निाशी,इस तर सटाके म देश पालने का नाम बान का है। जिनमगवान्के मदमार्गको सनो ॥६॥ यो नाय जाना है, उसका वो मुर प्रतीति यता है, उसे भगवान्ने दर्शन प्रा। उसव सरा नाम समक्ति भी है। निनमगवान्के म्ममार्गको पुनो।७॥ बाकी जो प्रवन्ति --उसे जो सबसे मिम बसंग समझा-उस स्पिर समारो वापस होनेको भारित करते हैं उसमें सिंगका मेड नहीं है। निगमगमान्के भूत्रमार्गको समो॥ ८॥ नहीं ये तीनों बमे परिणामसे यते । मामाका स्वरूप है। उसने निगमगवान्के मार्गको पा लिया है, अपना उसने निमसरुमको ही पा लिया है। जिनमगवानके मूहमार्गको पनो ॥९॥ ऐसे मूलान वादिक पानेके लिये, मनादिका च पूर होने के लिये, सम्म उपदेय पाने लिये, समर और प्रतिबंधको दूर करो । दिनमगवान्के मूत्रमार्गको इनो ॥ १ ॥ स तय सिमेनोपने मोक्षमार्गच पुद सहप कशा है। उस पग ममनों के हित के लिये सोपसे सस्म का। मिनमगवानघ मममार्गको मुनो ॥ ११॥ ६४६ मी मामा, मासोग सदा २ गुरु १९५२ में सदरमसाव मौराम सम्मामाको बमाई ई वासपोप मामको पुस्तक मराठी माषामें है। उसका गुमराठी मातर मकर प्रगट हो गया है। इस पुस्तकको पाँचने-विचारनेके किपे मेगी। वाले प्रथम वो गणपति बाधिको स्वति की। उसके पापात् गरे पयामाका भामरूपसे वर्णन करके उपशा किपा है। पाश्में उसमें वेदान्तको मुस्यताका वर्णन किया है। उस सबसे पुरु मी मप मापते पर, पपना का न करते पर, मन्यककि मामार्थविषयक विचारेच बगाइन करना योम्प है। मारिणी मिस मायरे पोगो सपनाए । मूग एकबालउपरेरा कान टु नाम "" बेमतेम पानी परम्प । न पई पनि रन लेन पनु बीई नाम सम | म भारी मानिनीय पालो उप मिस मग मम दोन तावरे नाम पारिष से मनाया ॥८॥ अमेत् परमामयी मार पर भापत्म । मन रम्परप मिनी पामतीत पोलिस्म । भूव ॥१॥ पागनारे पापबनेरा मनामि पर परमो धमका,ममतने प्रतिया ॥१॥ पनिी मरे मेहमायमर्नु रसमापूर ममनोना निमाले समससा ।
tr] विपिपपत्र मावि संप्रह-२९ो वर्ष वारमाके विचारमेमें उससे क्रम क्रमसे मुख्मता होती है। श्री' को यो म्याम्यान करना होता है, उससे जो आभाष भारिका भय रहता है, वह समय है। जिसने सद्गुरुविषयक तथा उनकी दशाविषयक विशेषता समाप्त छी है, उसको उस तरह के प्रसंगके समान दूसरे प्रसगोंमें प्राप करके आंमात्र उदय नहीं होता, वयमा पर तुरत ही शान्त हो जाता है। उस महमानको पदि परिव चारफे समान समझा हो तो यह पूर्वापर कम समय होता है। पपा शर्ववरमें चातुर्य बादि मापसे, सूक्ष्म परिणतिसे मी, उसमें मिठास रमसा हो तो वह पूर्वापर विशेषता प्राप्त करता है। परन्तु वा गार ही है-निचपसे गार होई-स्पर कापट बार है, इसमें किसी वए भी संशय नही और यदि सशय हो तो सशय मानना नहीं, उस समयको मान समझना चाहिये'—ऐसी तीन सारश कर गडी हो ता पानामात्र प्राप 46 महीं कर सकता । कापित् उस ईभारके रोकनेस निरईभाप हुमा हो तो मी उसफा रिसे महमान हो जाना संमष है। उसे मी पहिल्से पार, वौर जारही मानकर प्रति का हो तो वारमार्थको मापा नहीं होता। . ६४७ श्रीआनन मासोर, मुत्र ३ शुक्र. १९५२ भारमापा माई मोहमठासके प्रति सरवन, तुम्हारा लिसा राजा पत्र मिठा पा । पहाँ उसका संक्षिप्त उचर लिखा है। गाम पाता है कि नेटाछमें बनेसे तुमारी यासी साविपोंमें विशेषता का गई है । परम्तु उसमें हाय उम तय प्रति करनेको उत्तर या कारणभूत है। रानकोरको गरेक्षा नटार ऐसा क्षेत्र रबर है कि नो बहुतसी बातों में तुमारी इतिका उपकारक हो सकता है, पर मान में हानि नहीं है। पपोंकि तुमारी सरमवाफारसा फरममें जिससे निजी विमाका भय रह सके, ऐसे प्रपंच अनुसरण करनेका बाप नेटाउमें विशेष परफे नहीं है। परन्तु बिसफो सहतियों विशेष बलपान न हों अपना निर्मठ हों, और उसे रंगठा आनिदेशर्म स्वतंत्रतासे गना तो उसे नमा भासिंधी दार उग सकता है, सा माम होता है । स तु नैटाउ क्षेत्रमें प्रपंघका शिष सपोग न होनेसे, तुम्हारी सदातियों विरोरखाको प्राम है, से परफोट जैसी जगहमें होना पटिन हो, या पपार्ष माम होता है। परम्त किसी श्रेष्ठ मानमें समग बारि पोगमें तुम्हारी तिपाका नेटाठो परेशमी वा प्राप्त रना संभर है। तुम्हारी सिवाको दराने दर गठ तुम्हे भनार्प धर वमर कर सके, प्राप: मी मेरी मान्यता मही । परम्नु पर्दा ससंग ना योगको शेिर करके प्रति न होनेगे कुछ माम निणरण म दोनेम्पदानि मानना पुरा विशेष योग्य उगता है। पहतो को मार्प मापार-चार' के सुरक्षित एनके माप गिया पा, उसय मार्ग पर --आर अति मुग्परपसे दया सप, एमा भारि गुमोश भापरग बाना और सिर सपा मुगलपमे मामाका मतिर निप्पर, पर्ममानगर उग सान, नपा उगभामऔर मानमनिक पारा उस पारगोधनानि और रेगा हम जम्पागप नाना मातारित निरा में मना दिनान पनि पाना। इस पर समे दर उनani भीमद् रामचन्द्र [. पर्णामम मादि-गांभ्रम आदिपूर्वक भाचार-पा साचारके बगमूतके सम्पन है। विशेष पारमार्पिक हेतु नऐ तो वजन बारपूर्वक वर्तन करना हो पोम्म है, ऐसा विचारसे सिद। पारि पर्णामम धर्म वर्तमानमें गात मिठ स्पितिको प्रास हो गया है, तो मी हमें तो, अबतक हम उत्तर स्या दशको म प्राप्त करें वर सतक शासम्में वास हो, तबतक तो सरूप वर्णवर्मका अनुसरण करना ही योम्योपोंकि उसमें अमन भादि रण करनेका म्यधर नही ।यहाँ ऐसी बासंका हो सकती है कि मापा ग मी उस तय पाचरण करते है तो फिर उनके बम बाहार वा मरण करनेमें क्या हानि है!' तो इसके उत्तरमें इतना कर देमा उपित होगा कि बिना कारग उस रिचयको बदरूना मी योग्य नहीं। क्योंकि उससे, गादमें, इमे समागममासी बपना किसी प्रसंग बारिमें बने रीति-रिवामय अनुकरण करनेवासे, यह समझने गेंगे कि किसी भी वर्णक यहाँ मोबन करमेमें हानि न | सहाणाके पर मम बाहार प्राण करभेसे वर्णधर्मको हानि महायोती, पंत मुसलमानों पर वम मावर प्राण करते हुए दो वर्णधर्मको मोप हानि होती है और मा पर्मपर्मक तोप करनेके दोपके समान है।बपी किसी लोकके उपकार पादि कारणसे सौ प्रापिहोवा -यपि रसम्मता इपिसे पैसी प्राति न होती होतो मी वफ्ना मा माधरण ऐसे निमित्त रो नाता है कि दूसरे गेग उस हेतु समझे बिना ही प्रापः वसका अनुकरण करते है, और वटमें बमक्ष वानिक प्रण करनेमें प्रापि करने माते । इसीलिये उस तर वापरण म फरमा वाद मुस्लमान वारिका कम बार बावि मम मह करना या उत्तम है। हमारा छिको तो पात कुछ प्रवीति है परन्तु पदि किसीक उसमे उतरतीति हो तो उसका अमन बादि बार संपोगसे प्राप. उस मार्ग से गाना समय है । इसलिये इस समागमसे जिस तबर या गाम उस तप विचार करना करम्प है। दयाको मागमा ग्रेप रखनी ये तो मो इसाफे स्पालक, तपा से पाप गा सरोदे गाते है, जो यमेके अपना गाने बाने के प्रसंगको न बाने देना चाहिये, नहीं तो प्रापा सी पापिये देसी दपाको माना मी एती । तपा कम उपर गति म गाने देने के लिये वोर उस मार्गका उनविन अनुमोम करने के लिये, अमल मारि पण करनेवासेका बाहरवारिक विक्रम परिषय रणना चाहिये। भानमरिसे देखनेसे तोति मादि भेसी निक्षेपता बाद मामला होता परन्तु मामले भेरा तो यहाँ मी प्रचार करना चाहिये और उसके विपे मुस्पस्मसे इस पतिका रहना ही उत्तम है। एक्से कार्य ऐसे होते उनमें कोई प्रत्यक्ष दोष नहीं होता, अपना उनसे कोई अन्य ऐप माही धगता परतु उसके बरसे सरे दोषोंको माप मिता, उसका मा चारमानको मस रखा अभिव। नटारके नगर उपकार के लिये काचित् सा ऐसी प्रापि होती है, ऐसा भी मिपपही समझा गया। परि सरे किसी मा सम्पर सामाचरण करते हुए पापा भास हो, और भाचरण पानाम भने दोपतु माता मा सका। तथा उन गोंकि उपचार के लिये पैसा बापरणमा चाहिये ऐमा पिचारनेमें मी पुण्य तुम्हारा समोर तो होगी पेसा गा करता है। तुम्हारी समापि प्रala है इसलिये इस विषयमें भरिक मिसना योग्य मी गात पाना । बिसमय पर और सदिचारण बारावन से पैसा भाषणामा पोम्म।
५४, १,५ विविधपत्रमादि संप्रह-२ौ वर्ष दूसरी नौच नातियों वपया मुसम्मानों वादिके किसी से निमत्रमोंमें मम बार बादिके पदो, म पकापे र फमहार वादि नेसे उन मोगोंक उपकारकी रक्षा संभव हो, तो उस तय भाचरण करना पोम्यो। - ६४८ गोवको म्पापकता, परिणामीपना, कर्मबंध, मोक्ष-क्षेत्र में किस किस प्रकारसे घट सकते है। उसके विचारे बिना तपाइप समाधि मही होती। गुण और गुणीका भेद समझना किस प्रकार योम्म है। नावको म्यापकता, सामान्य-विशेपारमकता, परिणामीपना, ठोकामेक-हायकता, कर्मसंभ, मोश क्षेत्र, या पूर्वीपर पविरोषसे किस तर सिर होता है। एक ही बीव नामक पदार्थको उदे उदे दर्शन, सम्प्रदाय और मस मिम मिम सरूपसे करते । उसके कर्मसवपका और मोषका भी मिम मिम स्वरूप करते हैं, इस कारण निर्णय करमा कठिन स्पो नही है। ६४९ भास्मसापन एक, मसग , सर्व परमानसे मुक्त है। क्षेत्र --में असत्पात मिन-वगाहना प्रमाण । काल में मनर, अमर, शासत है। सपाप-परिणामी समयात्मक है। भाग –में मुख चैतम्पमात्र निर्विकम्प मध। सम्पमें ६५० पचन सयम- मनो सयम- बचन सपम मनो संपम काय रुपम काप संपम- वासन-स्थिरता, सोपयोग पपासूत्र प्रालि पचन संपम- ममो सयम- काय संयम- काय सपम- इन्द्रिप-संक्षेप, दनिय स्थिरता, पचन संपम- मौन, पचन संक्षेप, मनो एपम- मनो संक्षेप, बामपितन, सोपयोग यपासूत्र प्रापि, पचम-गुणातिशयता मन स्थिरता [१५१, ५५२, १५३ भीम् पचन्द्र दम्प, क्षेत्र, काम और मार- संपमके कारण निमिचस्प ब्रम्प, क्षेत्र, काठ और माप इम्प-संपमित दो खे--- मिलिाग क्षेत्रमें स्पिति-पिार का-पपासूत्र काम माल-पपास्त्र निति-साधन-विचार अनुमय - ६५२ ध्याम ध्यान-पान पान-प्पाग-ध्यान मान-पान-पान-याम प्यान--पास--ध्यान-ध्यान-मान पाम-पान-पान-पाव-पान-प्पाम म्पान-पान-पान--प्यानपान-मान-पान ६५२ निपाउमप, परमशत, मांग, एकाम, एक समानमप, स्मात प्रदेशप्रमक, पुस्पार, विसरफ्ना पान करी। का बामविक बमा । प्रदेशसभ-प्रास पूर्व मिल सवप्रस, उदयप्रास, उदारणाप्रास ऐस बार मा. गो मा और नीमच मेदन करनेसे पिसे मनबमार हो गया ऐसे पसरूम विन पिमधि मेरोर-मासक चमचार पान है। म पचानालागरमावरीष बोमोमा साना नाम) गोर मा १५४,५५५, १५५, ६५.] विपिम पम मादि समर-२१पौ पर्प ५८० ६५४ सोर (भापर्यकारक ) महापुरुषोंने गरेपणा की है। फस्पित परिणविसे चीवका विराम लेना जो इतना अधिक कठिन हो गया है, उसका देत स्पा ऐना पाहिये ! मारमाके प्यानका मुख्य प्रकार कौनसा का मा सकता है। उस प्यामका समरूप किस तरह है। केवहानका निमागममें जो प्ररूपण किया है मा यपायोग्य है! अथवा पेशन्तमें नो प्ररूपण प्रियायपायोग्य है। - प्रेरमापूर्वक स्मए गमनागमन क्रियाका वारमा सत्यात प्रदेश प्रमाणलके लिये शेप विचार करना चाहिये। प्रम-परमाणुके एक प्रदेशात्मक और वाकायके मनत प्रदेशात्मक माननेमें गोहे, या ख वामाके वसंस्पात प्रदेशस्वके ये यापातप्य सिद्ध नहीं होता। क्योंकि मध्यम परिणामी बस्तु अनुपम देसनेमें मही माती । उत्तर ६५६ भयको क्या म्पास्सा है। जनतालको क्या मास्सा है। वाकाराका परगाहकधमत्व किस प्रकार है! मामका नप पदि भान न होता तो पप बनारसे कैसे हो सकता है। समार इस प्रकार जपपा किस तय माना जा सकता है! भोप बारिमाप जीवमें परिमामारपसे हैं या निविकासे! पदि ठमें परिणामीहफ्से करें तो ये स्वाभाविक धर्म रोगाप, वौर स्वामाविक धर्मका दूर होना सी भी मनुमबमें भावा नहीं। पनि उनिहनिपसे समझें तो रिस प्रकारसे जिनमगवान्ने साशात कहा, उस पि मामनेम निरोप भाना समय है। - ६५७ बिनमगान्के अनुसार फेसन, और शास्तके भनुमार अन इन दोनोंमें क्या मे।
भीम पसवान [१५, १५१, १५॥ इम्य, क्षेत्र, कार और मार- संपमके कारण निमितरूप इम्प, पत्रकार और माल इम्प-सयमित दे क्षेत्रमिनिबाट क्षेत्रमें स्थिति-भिार, काम-पपासूत्र का माष-मपासून निति-सावन-विचार चनुमष ६५२ ध्यान ध्यान-पान ध्यान-ध्यान-पान थान-व्यामध्मान-पान यानपान-पान-पान-प्यान ध्यान-पान-प्पान-ध्यान-ध्यान-पान भ्पाम-पान पान-पान-पान-पान-पान ६५३ चिधातुमप परमात, माग, एप, एक समावमप, बसात प्रदेशामक, पुरपालन, चिदानम्मानच म्यान करें। भ बापतिक मात्र । प्रदेशसच-मस, पूर्व निगम, सचमत, सदपमान सदारणाप्राव ऐसे चार मा० गोगा और वेदमापान परमेस बिसे नाममाल होगा ऐसे प्रताप मिन विमसि सोलाप्रेमामकारबाप। म बन्पानापानावरमदानापलीबायोसारमा मामामा गोर प्रकार वन्पपा क्सितरा माना पा सकवाद! 1५४,१५५, १५५, १५.] विविध परमादि संपर-२१वा प - ६५४ सोश (मायर्यकारक ) महापुरुषोंने गवेषणा की है। कल्पित परिमतिसे गावका विराम ना मो इतमा अधिक कठिन हो गया है, उसफा हेतु क्या . होना चाहिये। मात्मा म्पानका मुख्य प्रकार कौनसा करा पा सकता है। उस थामका स्वरूप किस तय है। समानका मिनागम, मो प्ररूपण किया है वह पपायोप है ! मयना वेदान्तमें वो प्ररूपण - ज्यिा पयायोग्य है! प्रेरणापूर्वक कारमा पाहिये। ६५५ स्पर गमनागमन क्रियाका बामाके असंन्यात प्रदेश प्रमाणपके लिये विशेष विचार प्रना-परमाणुके एक प्रदेशात्मक और वाकाशके धनत प्रदेशामक मामनेमें गोरेत है, पर बामाके असंन्यात प्रदेशका पापा न त । क्योंकि मध्यम परिणामी वस्तु परम देखने में महाभावी। ६५६ अमूलत्वको क्या प्याश्या है। जनसत्वको क्या म्यास्या है! मायाका गाहक-बर्मन किस प्रकार है। ममितका बंध यदि मान मी तातो बनादिसे कैसे हो सकता है। वस्तुस्लमाष इस कष मादि मात्र मागमें परिणामौरूपसे । या मिनिहासे । पदि उन्हें परिणामीसफ्से करें तो ने सामासिक धर्म हो योप, वौर स्वामाविक धर्मका र रोगा मी बनुमबमें वाता महो । पदि उने निचिपसे समझें तो मिस प्रकारसे विनमगमानने साक्षात् पप कहा है, उस प मामले में विरोष वाना समय। ६५७ मिनमगवान्के अनुसार सम्दान, और बेदात नमुस mr.
भीमपात [५५० ५५८,५९ मिनके अनुसार- वामा अस्पात प्रदेशी, संकोच-विकासको भावन, बल्ली, मोकपमाम प्रदेशारमक है। मिन- मम्मम परिमाणको नित्पता, कोष वारिका पारिमामिक मात्र (पे बात्मा किस तरह पाते हैं। कर्म-संवा तु मामा है! पुर। या दोनों है। अपना इससे मौ कोई मिल प्रकार है। मुठि बामा पन-मरेश किस तय है। इम्पको गुणस मिमता किस तय है। समस्त गुण मिसकर एक दम्प होता है, या उसके बिना इम्पचण सय विशेष सम्म। सर्व द्रम्पके पस्तुल गुपको मिस कर विचार करें तो पाएकोपा किसी दूसरी तरा। बामा गुणी है, शान गुम है, यह बानेसे मामाका कपित् बान-विपना ठीक है या नहीं ! परिपामा शाम-हितपना स्वीकार करें तो इबा हो सापगी। उसमें परिचारित्र पार्य वादि गुण मानें तो उसको हानसे मिमता होनेसे या मा हो बापगी, उसका समाधान किसय करना चाहिये। बमम्पल पारिणामिक मागमें किस तर पर सकता है! धर्मास्तिकाप, बमर्मास्तिकाप, बाफाश और गानको द्रम्प-रिसे देलवोपएकप पामह। इम्पाल क्या है। बस्तिकाप, बर्मास्तिकाप और पात्रका पिशप सस्म किस तप प्रतिपादित हो सकता है! मेक बसम्म प्रदेशी है, और प समुत्र सन्सातों रेस्पादि निरोपका किस तय सम्मान हो सकता। भामा पारिपामिकता किस वयो। मुछिमें भी सब पापोका बान किस न्योता। बनावि-मानतका मान सि वय हो सकता है। एक मामा बनादि मापा पम-मोक्षका प्रतिपादन, पहबो तम करते ऐकामही फट सकता। भामर और बसपमें प्रापिलोमीने यो विरोधमा उसनक्या समाधाम है। उपका पपापम्प समात्रामात देने में महाभाग। मामा माना माने किना-मोश ही नही सकप और पोतो रूप ऐसा होनेपर मी रसे स्थित करनेसे पोस बाद कार्य करने पोम्प मही यावा ।
मास्मासिदि ५८५ ६६० श्री नरियाद, वासोच वदी १ गुरु १९५२ श्रीआत्मसिद्धिशास्त्र भीसद्गुरुपरणाय नमः मे स्वरूप समम्पा पिना, पाम्पी दुल अनव । सममाम्' के पद मई, भीसद्गुरु भगत ॥१॥ गिस नामस्वरूम के समझे बिना, भूतकामें मैंने बनत दस भोगे, उस सरूमको सिस्ने समझापा-वर्षात् भविष्यकाठमें उत्पन होगे योग्य निन मनंत इनोंको में मात करता, उसका बिसने मूग ही नष्ट कर दिया–ऐसे श्रीसगुरु भगवानको मैं नमस्कार करता । पर्चमान मा काठमा, मोलमार्ग पर सीप । रिचारपा मास्मापिने, मास्म्पो मन अगोप्प ॥ २ ॥ इस पर्तमानकालमें मोश-मार्गका पात हो ोप हो गया है। उस मोक्षके मार्गको, मारमापी जीयक विचारमेक लिये, हम यहाँ गुरु-शिष्य के सबाररूपमें स्पएहमसे कहते हैं। कोई क्रियामर पा रमा, शुप्फशाना कोह। माने मारग मोसनो, करुणा उपने गोद ॥३॥ कोई तो क्रिया में मगे गए है, वौर कोई शुफबानमें को हुए है, और इसी सपने मोक्ष मार्गको भी मान ये-उने देसकर दया बाती है। पाम फ्रियामा रापता, अवर्मेद न कांह । शानमार्ग निपेपर्वा, दरक्रियामा आहि॥४॥ नो मात्र मास क्रिया हो रपे परे है, बिमके भवरमें कोई मी भेद उत्पन्न नहीं हुआ, और बोधाम-मार्गका निपेष किया करते हैं, उसमें यहाँ क्रिसा-या कहा है। पंप मोस कल्पना, माल पाणीपादि। पर्चे मोहापेपमा शुष्करानी है माहि॥५॥ बस वोर मोक्ष के कल्पना मात्र स निश्श्रय पायको जो केवस ग्रमीसे ही माला करता है, और व्याप दशा पिसको हुई नहीं और गो मोहके प्रमाबमें ही पता है, उसे यहाँ अपमानी का। • भीम राममनाने भात्मचिदि पप-मद रफ्ना भी गेमाप की भषा भारि मुमच, पप सम्प लिस्टिक मिनीपा निम पते परिव होता है- श्रीमाप भने भीमा मारि मुणकार। उचमपरिवारले कम्मो मोर मुलपय॥ भास्मतिरिके इन पौध समित पिरेचन माई मद्यपानने किया। भीमदी में भा । वन मिती किती पपा से विस्तृत विवेचन रियर-भाने पोप स्पर समपरमिताबा।-मनुवारण 4 भीमद् सवय पैराम्पादि सफर दो, मो सा मावमान । वैमन मावमधामनी, पातिवां निदान ॥६॥ पैराप त्याग वादि, पदि साप मारमान होवोस, वात् सोही मोक्ष की प्राप्तिके tौर नहीं माम्बाम मोयहाँ मी यदि उन बहमानके लिये ही विपा पावा हो तो मी मात्म्मानको माप्ति कारण है। सम्प, त्याग, दया भावि गो तरंगकी क्रिया है, उमा साप यदि बारमशान हो हो । समात् तो हो रे ममके भूगका नाश करती हैं । वपमा गम्प, स्पाग, या बारि माहमालको प्राप्ति के कारण है। वर्षात् पानमें प्रपम न गुणों के बानेसे उसमें सद्गुरका उपदेश प्रवेश करता है । उमा वंतकरणके बिना सद्गुम्बा उपदेश प्रमेश नहीं करता । इस कारण या कहा है कि राम्प वादि वामान प्रासिके साधम है। पहा, नो पार किया-बा, उ, ऐसा उपदेश किया है कि केक कापासा रोकना ही कुछ मात्मानको प्रातिश्च कारण नहीं । यपि राम्प बादि गुण मामशान प्राप्तिके खरे, सहिये तुम उन रियामाका नवगाहन नोक परम्त उन क्रियामोंमें ही उम्झे हमा पोय महोपोनिमाम- जानके बिना ये किपायें भी संसारफे मूळ हेदन नही कर सकती । इसलिये मामानकी प्राप्तिके लिये उन राम्म बादि गुणोंमें प्राति करो, और फायझेशमें—गिसमें फपाय वारिका तपास्म कुछ मी क्षीणवा नही—म मोप-मार्ग रामह म रक्सोपा उपदेश किया थाको Pपा है। वपा बो एक्वानी माग रम्प मादिरहित है-केत पचनमानी-उने ऐसा क गपाल राम्य बाडि गो सावन है मामामय प्रापिके कारण बहर बताये है। परम्त कारमको बिना कार्य की उत्पत्ति होती नही और तुमने दब एम्प बाविको भी नहीं माप्त किया तो फिर माम- जान तोम कासि प्राप्त कर सकते हो ! ठसका मय वाहमामें विचार दो करो। ससारके प्रति मात उदासीनता, देहको पूर्णकी बप्पता, मोगर्म बनासधि, या माम मादिको रुपता पावि गुमा गिना तय मामशान फर्मम्त होता ही नहीं, और बामदान प्रान करने नेपर तो ये गुण मर्पतष दो गाते, पोलिस माममानस्म दो महीप मास हो गया है। वपा उसपर तो तुम ऐसा मान ये हो कि हमें पावान है, परन्तु वामा तो मोग बादि कामना बामि नगर, पूमा सवार भाविकी कामना बाबर करित होती है, पोपीसी बसावा ही महत पापुरता म्याकुलता ऐ बाती है। दिर पर क्यों हमें बता नही कि ये मामबानके शप्प महा है। मैं केवल मान मारिको सामनासे हो बनेको नामबानी कामावा' पर बो तुम्हारी समसमें नहीं बाप उसे स्मोपोर प्रपम तो रम्प बादि सापनोंको बारमा सत्पम करो मिससे गामडानका स्मुखता सके। स्पाग पिराग मरिचमा, पाप न देने शान । मटक स्वाग निरागा, वो म निममान | रिस विप त्यागपबा साधन उपम न हुए हों उसे शाम को होगा और जो पागसम्पमें समता एकर मामवान बाबा महारस्वर पाना मात्र मूग गाता है- ।
मास्मसिदि - पर्यात् पमानपूर्वक स्पाग-वैराग्य वादि होनेसे, पूना-सत्कार वादिसे परामर पाकर बारमार्पको ए मूठ गाता है॥ जिसके वंसकरण, त्याग-पैराग्य वादि गुण उत्पम नहीं हुए, ऐसे गौरको बारमशान मही होता। क्योंकि जैसे मछिन बत करणरूप दर्पण, वात्मोपदेशका प्रतिविम्म पाना समप मही, उसी पण केवट स्पग-पैराग्यमें रचा-पचा यकर नोरतार्यता मानता है, या मी अपनी पारमाका मान मूग चाता है। वर्षात् आत्महान न होनेसे उसे वहानका साहचर्य रहता है, इस कारण उस स्याग-पराम्प मारि मान उत्पन करने के लिए, और उस मानके लिये ही, उसकी सर्व सपम बादिको प्रति हो बाती है, निस्से ससारका उच्छेद नहीं होता। वह केवल उसीमें उम्त माता अर्थात् प मानवानको मास महीं करता । स तय क्रियानको साधन—त्रिया-और उस साधनको मिस्से सफलता हो, ऐसे मामामका उपदेश किया है, मौर शुष्कतानीको त्याग-वैराग्य मादि सापनका उपदेश करके केवळ पचनमानमें कम्पाण नहीं, ऐसी प्रेरणा की है। ग्यांच्या मेने योग्य हैं, वहाँ समनई वेह। त्पां स्पा से ते माचरे, मास्माी मन ए ॥८॥ वहाँ यहाँ नो योग्य है, वहाँ पहाँ उसे समझे और हाँ वहाँ उसका वापरण करे, पह बारमाया पुरुषका लक्षण है। मिस बगह मो योग्य है मर्यात् माँ स्पाग-राग्य मादि योग्य हो, यहाँ जो स्याग-राम्प यदि समानता है, और गोवामान योग्य हो वहाँ बारमजान समसता –स तर जो हाँ योग्य है उसे को समानता है, और यहाँ तदनुसार प्रति करता है -या बाहमापा जीत है। बाद जो कोई मवायाँ भपया मानापा होता है, ना योग्य मार्गको प्राण नहीं करता । अपपा क्रिपामें बिसे रामह हो गया है, उपमा शुकवानके भमिमानमें हो जिसने शानापना मान लिया है, वह स्याग- मेरम्प भारि साधनको ममा भारमानको प्रहण नही कर सकता । जो बारमाया होता है, पर यहाँ नहीं गो गो करना पोग्य है, उस सबको करता है, और जहाँ जहाँ गो गो समसमा पोम्प। उस सबको समझता है। अपना या नहीं जो जो समतना योग्य है, जो उस समको समझता है, और गाँ गो गो भाचरण करमा योग्य है, उस सबका बापरण करता है-- वामापा का माता। पहाँ • समधना' और 'भाचरण करना' सामाप पर है। परन्तु यहाँ दोनोमस मग का कामेका पहमी भाप है कि जो गे नहाँ हाँ समाना योग्य है उस सबको समठनेछ, और गेमो वही माचरण करना योग्य है उस सको वहाँ भाबरण करनेको निसी कामना है-परमीभामाची कहा जाता है। सेरे सर परणने, स्पागी द निमपस । पामे है परमार्पने, निमपत्नी मे सात ॥९॥ मापने पक्षको प्रेरकर जो सम्पुरके चरण सेवा करना है, ए परमार्पो पाता है, और उसे बायपास होताtn । भीमद परचम वाका'तसोको क्रियामा यी और मातप्सोको सुप्फनानापमा पवा है, उसका क्या कारण होना चाहिये ! सम्बान दो बपने पक्ष वर्षात् मतको मेरपर सद्गुरके परणको सेवा मताप फार्थको प्राप्त करता है, मोर निनपदका वर्षात् वाम समावका म्ब रण करता है । बर्षात माताको यो क्रिया-हता पती है, उसका हेतु यहा कि उन्होंने, गो मारमशान और वाहमायके साधन नहीं जानता, ऐसे बसद्गुरका माभय के क्या है। इससे पसारु उमें, यह बपने भो मात्र किपा-पताके पर्यात् कापडेशके मार्गको मानता, उसी मा मेता है, और पुस-धर्मको । कराता है। इस कारण उने सद्गुरके पोगके निम्ने वाकांक्षा मी मही होती, वपया पैसा योग मिटनेपर मी ठर्ने पक्षको पासमा सदुपदेशके स्मुस नहीं होने देती, इसम्मेि क्रिया-पाव दूर महोती, वौर परमार्थकी प्राप्ति भी नहीं होती। तपा नो पुकमानी। उसने मी गुम्ने परमका सेवन नहीं किया और फेवल मामी मतिका फापनासे दो सदरमसे महमकेप पा लिये है। अपया किसी मुकवानाके पाससे पैसे च सपा बचनों को सुनकर क्पनेमें पानीफ्ना मान लिया है और पानी मनबनेके पदका गो एक प्रकारका मान है, उसमें उसे मिठास पती वाई, और यह उसका पक्ष हो हो गया है। पना किसी विशेष कारणसे शास्त्रों में दपा, दान मौर रिसा, पूमा यो समानता की, उन बचनोको, उसत्र परमार्थ समज बिना हो, सपने मेकर, फेस वपमेोहानी मनपाने के लिये, और पामर मीकि तिरस्कारके किये, उन पचनों उपयोग करता है। परन्तु सन पवनोंको किस असे समझनेसे परमार्थ होता है, मा माही वानवा । तपा से दपा दान बादिको शाबोंमें निममता कही है, उसी तय नक्यूपतक का मेनेपर मी नझर बठे गये—स तप बानकर मी निममताहार-और या दो पुष-जाना निपेष है। ऐसा होनेपर मी उसे उसका यहोवा महायोंकि पपा पानेको मानता इसलिये उसकी मामा मत्रताको प्रत ऐ गई है, इस कारण उसे विचारका बकाश ही मही या । स तय क्रिया मा वपना एकनानी दोनों ही मूसे हुए है और ये परमार्थ पानेकी इस रखते है, मपका रे प्रते कि हमने परमार्प पा लिया है। पर कर उनका दुरामा पा प्रत्पश्च माइम होता है। पति सद्गुरके चरणका सेवन किया होता तो ऐसे दुराम में एक बानेका समय न माता, मार बाम-सामनमें प्रेरित होता तपादप सापनसे परमार्य प्राशि करता, और निरपरके भो प्ररण करताबात् उसकी पि बाहमारे मुरु हो जाती । वपा मगर बगर एकाकीहमसे विचरमेका जो निषेध है, और सद्गुरको ही सेवामें रचरनेका गो परेश किया है, इससे मी पो प्रमझमें बाता हो गीतको हितकार्य वीर मुस्स मार्ग है। वपा बसगुस्से मी पापाण होता है, ऐसा प्रना तो तीर्थकर मादिकी-बामाकी-जासारना करनेके ही समान है। क्योकि फिर ये उनमें मौर बसष्टुरमें कोई मा भेद नहीं यार तो जम्माघमें और भात घर निर्मठ बापाले में पुल पूनाभिकता मय। तया मीटरगामी पौभगी प्राण करके कई पेमा करे फि मम पठा पार रिमा लामो पार हो गाता है तो पाचन मा तो पापात' जैसा ही है। पोज पहा तो मनमें अगमे या पाठ होम और गो पार .
मास्मतिदि इस तरी.. . सिसका शम्दार्थ इस प्रकार है । उसका विशेपार्थ टीकाकारने इस पर किया है । उसमें किसी गह यह नहीं कहा कि वमम्पका पार किया हुवा पार होता है, और किसी टयामें किसाने मो यह बचन सिता है, पर उसकी समसको मरपार्यता ही माश्म होती है। कदाचित् कोई इसका यह मर्य करे कि बो अमम्प कहता है यह यपार्य नहीं ऐसा मासित रोमेके कारण यपार्यक्ष होनेसे गीव स-विचारको प्राम कर पार हो पाता है, तो किसी तय समय है । परन्तु उससे यह नहीं कहा जा सकता कि । वमम्पका पार किया हमा पार हो माता है। पर विचारकर बिस मार्ग से मनत गांव पार हुए हैं, पार हाते हैं और पार होंगे, उस मार्गका पागाइन करना, और ससकल्पित मर्पका मान भारिकी रक्षा कर स्याग करना ही भेयस्कर है। पदि तुम ऐसा कहो कि मीत्र अमम्पसे पार होता है, तो इससे तो अपइप निश्चय होता है कि सद्गुर पार करता है, इसमें कुछ मी सम्दो नहीं। वया यशाप्पा-केसीको, मिनाने पूर्वमें फिसीसे धर्म नहीं मना, किसी तपाप वापरणके अप होनेसे धान उत्पम मा है, ऐसा जो शाममें निरूपण किया है, यह धारमाके माहात्म्यको बता- मेके छिपे, और मिसे सद्गुरका योग म दो उसे मापत करने के लिये और उस उस भनेकन मार्गका निरुपण करमेके लिये ही प्रर्शित किया है । उसे कुछ सद्गृहमी भावासे प्राप्ति करने के मार्गको उपेशित करने लिये प्रदर्शित नही किया। क्या यहाँ तो उन्हें उस मार्गक उपर ष्टि बनेके लिये ही उसे बधिक ममनूत किया है। किन्तु वयोध्या-फेडी वर्षात् पशोप्याकेटीक इस प्रसगको सुनकर किसीसे नो शाररत मार्ग पग वाता है, उसका निषेध परनेका यही नाशप म0, ऐसा समझना चाहिये । किसी तीन पास्मापीको कामित् ऐसे सहरुका योग न मिला , भौर उसे मानी तीर मामना मनामें ही निम-रिपारमें पा गनेसे, अपना तीर बामापके कारण निम-रिचारमें पर गानेसे नामसान हो गया हो सो सद्गुरुके मार्गको उपधा न कर, और 'मुचे सरसे मान नहीं मिला, इसलिये में गमा, 'ऐसा मात्र म रस, विचारवान चीत्रको जिसमे शासन मोक्षमार्गका रन 0, ऐसे बचन प्रकाशित करन पाहिपे । एक गारसे सर गाँवमें जाना दो बार निसने उस गौरका मार्ग मोगा हो, पगु रिमा पाम बरसो पुस्पको मी-पपपिए पापों गाँव ग मापा हो -उस मार्गको पबर मही पाती। रिससे पूछनेपर ही उसे उस मार्गको गदर पाती है, नही तो पर मूठ मा गाता है। बार पनि उग मार्गध चाननेवाला कोई इस बरस बालक मी ठसे उम मार्गको नपा दे ता उमस पद पर स्थानपर ---पद बात भाफिक पारमें भी प्रसा है। इसलिये नाबामापी सनपा निमें भारमार्पच छादा उमे मरके पागमे पार हानेक मभिठारी और निमम एप्पा राम मार्गच टार कला योग्य माही क्योंकि उसमे सहाना पुरुषों की मात्रा सा करने जमा हो। बारांश -'मि सहरका योग तो भनक पार Ent, रि मी नीरस कम्पा मा पाप समय- - बारामा पीमा पसवान एमा। इससे सहस्के उपदेशकी ऐसी कोई विशेषता दिखाई नहीं देता।' इसन उत्तर दूसरे पदम मा। उपराको अपने पक्षको त्यागकर सङ्करके चरणी सेना ता है, म परमार्य प्राय करा बर्षात् पूर्व सरगुरुके योग हानेको तो गाव सत्प है, परन्तु यहाँ नापने उस सद्गुरको गाना ही नहीं, उसे परिचाना मही, उसकी प्रवति ही नई की, और उसके पास अपना मान मोर मत मेगा ही ना, और इस कारण उसे सद्गुरका उपस भगा नहीं, और परमार्थको प्राप्ति मही। बार इस वय परि अपने मत अर्थात् सर पर भर्म वा दूर कर सदुपदेशके प्राण करनेका भिमपामा होता तो क्याय हो परमार्पको पा माता । पहा सहस्से परापे हुए दोषसे अपना माम बारिकी dR कामनासे यह मा बाधक हो सकता है कि कितने ही पानोंका पूर्नमें कम्पाण मा है, और उसासे चरणो सेवा किये बिना ही कन्याणको प्राप्ति हो गई है। पपया वसगुम्से मी कायापक प्राठि dt । वसनरको मरे स्पर्य मार्गको प्रवीति न ऐ, परन्तु पा सरेको उसे प्रश्न करा सकता है। वर्षात् दूसरा कोई उम्ध उपदेश सुनकर उस मौकी प्रीति करे, तो परमार्यको पा सकता । सकिए सद्गुरक परणाको सेवा लिये बिना मी परमार्पच माति हो सकती है। उत्तर - पवपि कोई बार सम Rचार करते हुए मोनो प्राप्त हुए हैं ऐसा शास्त्र में प्रसंग जाता है परन्तु कही ऐसा प्रसंग मही बात कि अमुक नीचने वसम्स्से मोष प्राप्त किया है। पर, किसीने स्वयं विचार करते हुए मोष प्राप्त किया है ऐसा बोकमारे, उसमें घावोंके काने पर बभिप्राय म कि सद्गुरको मासे पानसे गीला कपाण होता है, ऐसा हमने को कहा। बात पपार्प नहीं। ' वपना सहरको नाममा भीषको कोई भी कारण नहो, यह करने के लिये मी पैसा न करा । तपा बागाने वपमे बिचारसे स्र्प हो बोप प्राप्त किया है, ऐसा यो कण, सो उन्होंने मी पापि वर्तमान में अपने विचारसे नपला बोगसे होan मास शिल्पा , परत पूर्वमें यह विचार पपना मोच सामने से उनके मुस किया , और उसासे वर्तमानमें उस फरित होभा समय है। सपा पाकर बारिको गो स्वर्पर का है, सो उन्होंने मी पूमि तीसरे मामे सगुम्से मिथप समकित प्राच किया है, ऐसा बताया है। वर्षात् गो सपना कहा तमाम देशप मपेनासे होता है, उस सद्गुरुके पदका निषेध करनेके छिपे उसे महा कहा। और परि गम् पदका निषेध करें तो फिर वो 'सदेव स्वरवीर समर्मको प्रतिति बिना समकित न होता' हजो पतापामा कफ्नमात्र होगा। मा विस सालको तुम प्रमाण करते हो, पशाच सनर बिनमगवान्का पनामा, इस कारण उसे प्रामाणिक मानना चाहिये । अपना किसी असावमामास कारण उसे प्रामापित मानमा पारिपे ! परि बसगुस्से शाडौंको मी प्रामानिक माननेमें बाधा न है तो शिर माल पर पा-पके सेवन करनेसे मी मोझ हो सकता है, पर करनेमें मी पापा नर- पापमपाय।
११.] मारमसिदि ।क्यापार वाचागसूत्रमें कहा है प्रपम भूतस्कंघ, प्रथम अध्ययनके प्रथम ठरेशका यह प्रथम बास्यो. चौर पूर्विस भापा है, पश्चिमसे नापा है, उचरसे पाया है, दक्षिणसे मापा है, उसे बाया है, या मभिसे वाया है, अपना किसी दूसरी ही विधासे भाया है ! वो पा नहीं जानता पर मिष्यामि है बो बानता है । सम्परिइसके बाननेके निम्म तीन कारण है (१) सापकरका उपदेश, (२) गुका उपदेश, पौर (१) मातिस्मरण शान । याँ नो गातिस्मरण शान का है प मी पूर्वक उपदेशके संयोगसे ही कहा है, बर्षात् पूर्वमें उसे बोष होनेमें सद्गुरुको बसंभाना मानना पोग्य नहीं । तपा मगह जगह बिनागममें ऐसा कहा है गुरुणी दाणू पच-गुरुप मात्रानुसार चकना चाहिये । परकी भावानुसार पम्नेस वर्मत पार सिदो गये है, सिद्ध होते है और सिए होंगे । तया किसी पारने मा भपने विचारसे वोप प्राप्त किया है, उसमें भी प्रायः पूर्वमें सद्गुरुका उपदेश ही कारण होता है। परन्तु क्याचित् महाँ बस्य न हो को भी उस मका निस्प बमिकापी रहते हए, सविचारमें प्रेरित होते हुए ही, उसमे सविचारसे बारमशान प्राप्त किया है, ऐसा करना चाहिये । अपना उसे किसी सगुरुको उपेक्षा मी, भार नहीं सद्गुरुकी उपेक्षा यती है, हो मान होना समय है, और यहाँ सद्गुरके प्रति मान हो वहाँ करपाण धामा सा है, वर्षात् उसे सरिचार के प्रेरित करनेका वामगुण कहा है। उस तयका माम बालगुणका काप घातक है। बावरिया भनेक गुण विधमान ऐसे ए मी 'अपमेसे छोटे मान भाईयोको वंदन करमेमें अपनी पुता होगी, इसलिये यही भ्यानमें स्थित हो माना को-ऐसा सोचकर एक वर्षतक निराहाररूपसे मनेक गुणसमुदायसे वे पानमें भर स्थित थे, तो मी उमें भात्मशान महीवा। बाकी सब हरेक प्रकारको योग्यता होनेर भी एक इस मानके दो कारण होम स्का इजा था। जिस समय श्रीसपमा बसे प्रेरित सामी और सुंदरी सति- पौने नरें उस दोपको निवेदन किया और तमें उस दोपका भान हमा, तथा ठस दोपको उपेक्षा कर उहोंने उसको बसारता समझौ, उसी समय उन्हें केवमान हो गया। समान हो यहाँ पार पन- भाती कर्माका हो या पातमा बाए बारह महीनेतक नियहारस्मसे, एक असे, एक मानसे, बहमविचारमें एमेगा ऐसे पुस्पको इतनेसे मानने उस तपकी बाण महीने की दशाको स म होने दिपा, वर्षात् उस दशासे मी मान समझ म पापा और जब सद्गुर पौडपमरे बने सूचना की A. मान , तो यह मान एक मुहूर्तमें होना ऐ गया । पर मी सरकाही माहाम्य मवाया है। तथा सम्पूर्ण मार्ग हानीकी ही वाला समाविए दो बाता है, ऐसा बारंबार कामाचा सूत्रमें या कि ..। मुधर्मास्वामी सम्पूस्लामीको उपदेश करते है कि समस्त जगत् का निसने दर्शन किया है, ऐसे महावीरमगवान्ने हमें इस तण या है। गुरुके वाधीन होकर पम्नेवाले ऐसे धनम्त पुरुप मार्ग पाकर मोक्ष चले गपे।। उत्तप्पयन, सूपगग मात्र में जगह अगर यही का।
मीमद् रामचन्द्र समागम मिल्नेपर भी, उसमें परोक्ष बिनभगवाम्के बचो को अपेक्षा मी महान् उपचार समापा या है,'स बातको मही समयता, वतन उसे भारम-विचार उत्पम नही होता । सनुस्ना उपोषण, सममाय न मिनम्म। समल्याण सपकार घो! समरपे मिनसाप ॥ १२ ।। सहस्के उपदेश विना बिनका स्वास समझौ मही माता, और उस स्वस्म के समय बाते विमा उपस मी क्या हो सकता है। पदि बार सारुके उपदेशसे मिनका स्वस्म समय बाप तो समझनेपाका बामा मतम विनोदशाको प्रा करे ।। सामना उपदेशपा, सममे मिनर्मु म । तो ते पामे निवदशा, किन मामस्वरूप । पाम्या पसलमावने, बिन तेपी पूग्य । समबो मिनस्वमाल तो, नाममाक्नो गुम्प ॥ सास्के उपदेशसे वो बिनका सल्म समास पाता है, या अपने स्तरूपकी दशाको प्राप्त कर पता है, क्योंकि पुर बामभाव ही मिनका स्वरूप है। वपा र रेप और महान यो जिनमगाम- न्में मही हो र बामपद है, और पर पद तो सत्तासे सब गानोंको मौमू ।। सपुर-गिनके पक्कानसे बौर निममगवान्के तरूपके पपनसे मुमा गोरको समसमें वाता है। भास्मादि मस्विस्वना, मा निस्सा पास। मस्पप्स सम्योग मही, स्पा मापार सुपात्र ॥ १३॥ यो बिनागम बादि भारमा बस्तिबके तपा परोक बादिक बस्तिपके सपदेश करने पर माय मी यो प्रश्पत साम्य योग न हो वहीं सपात्र भारको नापारस्म है; परन्तु उरे सहरके समान भ्रांति दूर करनेवा महीमा बा सकता । मपमा सरुए पा, मवगाहम काम । निस्प विचारपा, रीमावर स्पाम ॥ १० ॥ अपना पनि समुस्ने ठन शाओं मचारने ममा दोरो तो उन शानो मतांतर वर्षात उपर सर्पक करके व पारि भान्तिको बोरकर, क्षेत्रका बात्माक मिपे निम Rषा- रना चाहिये। रोके पौष सद वो, पामे भगाय मोप्त। पाम्या एम बनेट मारम्प निम निर्दोष ॥ १५ ॥ बोलबमारिकासे को अपनी चतुरसे और अपनी मासे पता था या इस माम स।परिया समरको एमे तो या जरूर मोहो पा बाप और इस तप भूतकल्में बत मानि मोझ पापा है-ऐसा राग रेप और मानसे बिनके एक मी टोप मी. ऐसे निदाच बीवपणने कहा है। ।
१] मारमतिमि मस्पक्ष सद्गुरुयोगपी, स्मद से रोकाप । मन्प सपाय फर्या वकी, प्राये पमणो पाय ॥ १६ ॥ प्रस्पस सहस्के योगसे पर स्पद रुक जाता है, नहीं तो अपनी इच्छासे इसरे वनेक उपाय करनेपर मी प्राय करके यह गुना ही होता है। सय मत मात्रा वनी, पर्चे समक्ष । समकिव वेने मासि, कारण गणी प्रत्यक्ष ॥ १७ ॥ स्वर सपा अपने मतके भाको छोरकर जो सहरके म्पसे चम्ना है, उसे समक्तिमा प्रपा कारण समझकर गीतरागमे 'समकित 'कहा। मानादिक पा महा, निमदे न मराय । नावा सरुचरणमा, अस प्रयासे नाप ॥ १८ ॥ मान और पूना-सकार बादिका छोम स्पादि वो महाशत्रु है, वे अपनी चतुराईसे पम्नेसे माय नहीं होते, वौर सहरुको शरणमें जानेसे वे योवेसे प्रयलसे ही माश हो जाते हैं। मे सद्गुरतपदेपयी, पाम्पी कैमरमान । गुरु रमा पपस्प पण, पिनप करे भगवान ॥ १९ ॥ बिस सनुस्के उपदेशसे निसने केवणानको प्राप्त किया ऐ, और पा सद्गुरु नमी समस्प ही हो, वो भी बिसने केवमान पा लिया है, ऐसे केवगे भगवान् भी वपने छपस्य सन्नुम्का पा- इम्प करते हैं। पो मार्ग रिनप वणी, मारम्पी भीनीवराग । मन हेतु ए मार्गनो, समझे कोई मुमाग्प ॥ २० ॥ इस तर मोमिनमगवान्ने दिनपके मार्गका उपदेश दिया है। इस मार्गका मो मूह है- वर्षात् उससे वारमाका क्पा ठपकार होता है उसे कोई हो बर्षात् पुछम-मोमी भयमा मापन बीत समझ पाता है। मसार ए बिनपनी, गम कोनो काइ। महामीदिनी कर्मयी, रे भपमा माहि ॥ २१ ॥ पर दो दिन मार्ग कहा है, उसे शिष्य नाहिसे करानेको इगसे, जो कोई भी असर अपमें साम्य स्पापना करता है, महामोहनौप कर्मका उपार्जन कर मवसमुदमें पता है। पोय समप भीर, समने पर विचार । होय मवाी भीष, अपने से निरि ॥ २२ ॥ यो मोक्षापा गार होता है तो इस दिनप-मार्ग बारिक विचारको समठ मेता है, किन्तु नो karपी रोता है उसका उटाहो निधय करता है।मात् या तो पर सर्प उस विनयको किसी शिष्य पारिसे करता है, आपका बसहरु सद्गुरी भांति रस स्वप इस दिनप-मार्गका उपयोग करता है।
मीमापन मात्मशान समदर्भिवा, पिचरे सयमयोग । अपूर्ण माणी परमभूव सहस्ससग पोग्प १ ॥ यामशानमें निमको स्पिति है, पर्याद परमावको से वो हित हो गये है, तया भ, मित्र, हर्ष, शोक, नमस्कार, तिरस्कार वादि मानके प्रति मिन समता यती है। रेस पूमि उत्पाए को उदयके कारण हो दिनको विचरण मादि क्रिया है, जिनकी वाणी महानोसे प्रत्यक्ष मिम ॥ और यो पदर्शनके शापर्पको मानते हैं- उचम सद्गुरु स्वरूपस्पित इमरीत विचरे पूर्णप्रयोग। वपूर्ण पाणी परमात सगुरुपक्षण योग्य ।। पामस्वरूपमें विसको स्थिति है, विषप और मान पूगा वादिकी इससे बो रहित ६ और केका पूर्वमें तत्पन हए कर्मके उदयसे ही नो विचरता है, वर्ष बिसको वाणी-वर्षात् विसका उपदेश निन अनुमषसहित होने के कारण बानाकी वाणीको अपेक्षा मिम पाता है और परमव वर्षात् पदर्शन पपारूपसे जो बानकर - योग्य सद्गुरु है। पहाँ सरूपस्थित' हो पा प्रपम पद घा, उससे शान रक्षा करो।पामो इस्मानितफ्ना' फबा, उम्से चारिकदशा की है। गोष्णाशित होता है यह किस तप विचर सकता है इस वाशकाको पा करकर निधि को पूर्णप्रयोग गर्मात् पूर्वक बभे हए प्रारम्भसे विभरता -विवरण बादिको उसे अमना बाकी नहीं है। अपूर्व वाणी' करनेसे पत्रमातिश्पता भी है, क्योंकि उसके बिना मुमुनुका उपकार नहीं होता । 'परमात ' प्रनेसे उसे पट्यानिके वपि वा मानकर कहा है इससे अबानको विशेषता रिसाई है। बाका - वर्तमानकर में स्वरमस्थित पुरुप मही होता इसरिये बो सरूपस्थित विशेषण सार कराए मारकर होना समय नही। समापान:-वर्तमानका में पावित् ऐसा ना दो वा ठसा वर्ष यह हो सकता है कि फेरक-मूमिका के स्वबमें ऐसी स्थिति बर्समब है, परन्तु उससे ऐसा महीमा ना सकता कि भाम बाम ही न होता और वो बाहमहान है ही सहपस्थिति है। मासका: वामान हो ये वर्तमानसमें भी मुजि होनी चाहिये, और मिनागममें तो इसका निपच किया है। सम्मान-समचनको कदाचित् एतसे स्सी तय मान मौतो मी उससे एकावा- पनेका निषेप नही ऐसा चौर एकापवाफ्ना मामानके बिना प्रास होत नाही। बाय-पाग-बैरम्प बारिकी पतासे हो उसप एका तापना करा होगा। समाधान -परमापसे उमर त्याग सपके बिना एपपताना होताहीमा पर सित। और वर्तमानमें मी चौपे पाच मोर ग गुणस्पानका भी निपम नही और चौपे गुणस्पामते माधान संभव है । पोचमें विशेष सम्मास्थिति होती में बात मासे सहपस्थिति होती १६] भास्मसिदि या पूर्वप्रेरित प्रमादके उदयसे इस योगसी । प्रमाव-दशा मा माती है, परन्तु र बारमधामको रोपक माहा, पारित्रको पिक है। भाधका-यहाँ वो 'सस्मास्थित पदका प्रयोग किया है, पौर स्वरूपस्पिति तो तेयो गुण- स्पानमें से समप । समाधान --सहमस्थितिकी पराकामा तो चौदह गुणस्पानके पातमें होती है, क्योंकि माम गोत्र मान घार मौका नहाँ नाश हो जाता है। परन्तु उसके पहिले केपलीके चार कर्माका संग यता है, इस कारण सम्पूर्ण स्वरूपस्पिति तेरावें गुपस्थानमें भी कही जाती है। वाशका -यहाँ नाम नादि कर्माकै कारण वम्यावाच स्वरूपस्थितिका निपेष करें तो यह ठीक है। परन्तु सहमस्पिति तो केवमानरूप है, इस कारण यहाँ सस्पस्थिति करनेमें दोष नहीं है, और यहाँ वो पौ मही, इसरिये पो तस्मस्थिति कैसे की जा सकती है। समाधान --केरमानमें सतरूपस्पितिका विशेष तारतम्म है और भौये, पोप, छो गुण- स्थानमें मह उससे बल्प है-ऐसा का माता है, परन्तु यहाँ सहपस्थिति ही नहीं ऐसा नहीं करा पा सकता । चौथे गुणस्थानमें मिथ्यावरहित दशा होनेसे बारमसमावका बाविर्भाव है और सरूप स्थिति है । पाँच गुणस्पानको एकदेशसे चारित्र घातक कपार्यो निरोष हो जानेसे, पीयेको अपेक्षा बामस्समावका विशेष आनिर्मान है। और ममें कपापोंके विशेप निरोप होनेसे सर्व चारित्रका उदय है, उससे हा मारमसमावका मौर मी विशेष पामिबि बातमीही बात है कि यो गुणस्पानमें पूर्व नियमित कर्मक उदयसे पवित् प्रमत्त दशा पता है, इस कारण यहाँ प्रमत्त सर्वचरित्र' कहा जाता है। परन्तु उसका सत्पस्थिति से विरोध नहीं है, क्योंकि वहाँ भामस्वभावका माहुल्पनासे पानिर्माण है। तथा बागम भी ऐसा करता है कि चौथे गुणस्पानकसे वेदो गुणस्थानतक वामप्रीति समान "है-पों के शामके तारतम्पका ही मे। यदि चौये गुणस्पानमें जरासे मी स्वरूपस्पिति म हो तो फिर मिप्यान नाश होनेका फस हौस्या एमा। नर्यात कुछ मी नहीलामो मिप्पाचन हो गया होगामसमासका वाषिर्माव , और पही सम्मस्पिति । यदि सम्पमत्से उस नम सम्पस्पिति म होती, तो श्रेणिक आदिको एकातापना कैसे प्राप्त होता है यहाँ एक मौ रत-परमाणतक मी मही पा, और यहाँ भग ती बस एक ही पाचहा-ऐसा जो बाप ससारीफ्ना मा यहाँ सहाम्पितिथप समकितका बहो। पाँचवें और को गुणस्पानमें पारित्रका विशेष पछी, और मुस्पतासे उपरेशम गुणापान तो या वीर तेरा हैं। मालीके गुणस्पान सपोशको प्राति कर सकमे योग्य नहीं है। वर्षात् तेरहवें और हो गुणस्पानमें से पा सहप यता है। अस्पक्ष सहर सम नहीं, परोक्ष मिन उपकार । एगो सा पपा पिना, मग न आत्मरिचार ॥ ११॥ जबतक श्रीरको पूर्वकागन गिनतीर्थकरोको यातपर होमक्ष हा करता है, मार यह उनके उपकारको गाया करता है, और मिससे प्रत्यक्ष अाम-भतिका समाधान रो सके, ऐसे सरका भीम रामचन्द्र समागम मिमनेपर मी, वसमें परोक्ष बिममगवान्के चोंकी बया मी मान् सपनार सपा मारे,' इस बातको नहीं समझ पातक उसे बारम-विचार सपन मही होगा । सनुस्मा पोपपण, सपमापन मिमम । सपण्यापण पार पी समम्ये मिनसम्म ॥ १२॥ साम्के उपदेशक बिना मिमा स्वास समसमें नही बाता, मौर उस स्वरूपके समक्ष माये विमा उपकार मी क्या हो सकता है! पवि गोल समुसले उपदेशसे मिनका स्वरूप समझ गार तो समझनेपाली पात्मा पन्तम दिनको दशाको ही प्राप्त करे ॥ साम्ना उपदेशपी, समये गिननु रूप । तो ते पामे निमरणा, बिम से भामस्वरूप । पाम्पा मुदस्समारने, किन तेपी पूम्प । सुमनो जिनस्वभाव तो, नाममाघमो गुम्प । सगुनके उपदेशसे सो निमका स्वरूप समाई गाता है, प वपने स्वस्मकी दशको प्राप्त कर मेवा, स्पोकि पद नाममात्र दो मिना खस्म है। अथवा मग रेप बार बाम गो बिनमगा- नमें नहीं, जी एस मामफ है और यह पर तो सपासे सब गायों को मौजूद है । वह स्फुर-विमके पम्पनसे और विनमगमनके सम्मो कपनसे मुमुसु मात्रको समाधौ वाता है। भास्मादि मस्विस्लमो मे निस्सक पास। प्रस्पा मारयोग नहीं, स्पा मापार एपार ॥ ११ ॥ यो मिनागम बादि वाहमा बस्तिष तथा परलोक बादिके बस्तिता के उपदेश करने भासय मी माँ प्रत्यक्ष साम्य पोग न हो हो पात्र बीतको माधररूप , परन्तु की साम्के समान भाति दूर करनेवासा नही था ना सकता । मपरा सरए कमा, मे मपगाान धम । निस्प पिपारवां री मर्यावर स्पाम ॥ १५ ॥ सपना पनि गुम्ने ठम साबोके चारने बाबा से, ये उन शाओंभे मातर बर्षद कुमर स्पर्पक करने हेतु वादि भातिको मेहकर और परमार्थक सि ॥ निम मिचा- रमा पारिपे। मीब पण दो, पामे मपम पोस। पाम्या एम मनव b मा मिन निर्दोष ॥१५॥ पाव बनारिफर से जो अपनी बास और अपनी इमसे पम्ता मा पासा नाम लापदि स समरको एक तो प पहर मोजो पा माप, धौर इस तय भुक्कामे बनत नामोंने मोष पाया है ऐसा राग रेप पोर पानसे विमचे एक मी दोरना। ऐसे Pॉप बायण मा।
६५ ] मास्मसिसि अस्पक्ष सरपोगयी, स्वछंद वे रोकाप । अन्य उपाय कर्या यकी, माये पमणो पाय ॥ १६ ॥ प्रस्पक्ष सनुस्के योगसे पा सानंद सक जाता है, नहीं तो अपनी इच्छासे दूसरे अनेक उपाप करनेपर मी प्राय करके पर हगुना ही होता है। सम्न म आग्रह बनी, पर्चे सहस्पक्ष । समकित देने मालिप, फारण गणी प्रत्यक्ष ॥ १७ ॥ सम्म तपा वपने मतके भाप्रहको छोरकर वो सहरके मनसे पम्मा है, उसे समकिता प्रत्यक्ष कारम समझकर बीतपगमे 'समकित' पानादिक भु महा, निमदे म मराय । जावा सामवरणमा, अस्प प्रपासे भाप ॥ १८ ॥ मान बौर पूना-सकार बादिका मेम झ्यादि यो महारानु, पनी चतुराईसे रम्नेसे माप्त नहीं होते, और सहरको कारणमें जानेसे रे पोडेसे प्रफरमसे ही नाश हो जाते हैं। मे सनुरुउपदेशपी, पाम्यो फेरझान । गुरु रमा पस्य पण, पिनय करे भगवान ॥ १९॥ मिस सगुरुके उपदेशसे बिसने केवनानको प्राप्त किया हो, और यह सहर बमी छमस्थ । हो, वो मी निसने केवसान पा छिया है, ऐसे केवठी मगवान् मी मपमे एपस्प सारुका पा- त्य करते। एमो मार्ग पिनप दणा, माम्प्पी भीपीवराग । मन त प मार्गनी, समझे कोई सुमाग्य ॥ २० इस वय मीनिममगवान्ने दिनपके मार्गका उपरे पिया है। इस मार्ग को मन देत है- वर्षा उससे वामाका क्या उपकार होता है उसे कोई ही माग्यशाली वर्षात् मुम्भ-गोपी पका मापकीर समझ पाता है। मसद्गुरु ए पिनपनी, माम मरे जो काह। महामोदिनी कर्मपी, पूरे भपमा माहि ॥ २१ ॥ पर जो विनय मार्ग का है, उसे शिप्प भारिसे करानेको इपासे, जो कोई मी मसाल मनमें सनस्की स्थापना करता है, महामोहनीप कर्मफा उपार्जन कर मत्रसमुदमें रखता है। पप मुसा जीप से, सममे एर पिसार । प मनायी जीप से, मरगे निर ॥ २२ ॥ जो मोक्षाया गौर होता है तो इस पनप-मार्ग बाकि विचारको समन्ध एता है, किन्तु को मनापा होता है उस उटाहनिमय करना।वर्षात् या तो पसर्प उम निपको मिमीशप्प मानि कराया है, वपचा नमुहम्में सारसी भांति रण सप इम पिनप-मार्गका उपयोग करता है।
५९१ भीम पचम्द्र होय मतापी वेने, पाय न मावममक्ष । वह मवापिसाणा, महीना निर्पस ॥२३॥ यो मताचा नीष होता है, उसे बारमशाना झ नहीं होता । ऐसे मतापी धोबो यों नपा होकर सक्षम है। मवापीक लक्षणा- माम स्याग पण शान नहीं, वे माने एरु सस्प । भपमा निमन्पर्मना, वे मुस्मा म ममस्व ॥ २४॥ जो केवल माझसे हो स्पागी दिखाई देता है, परन्तु बिसेबाम्यान मी, और उपम्हमसे पिसे बतरंग स्पाग मी नहीं, ऐसे गुरुको यो सहर मानता है, मपया वपने कुलपर्मका चाहे कैसा मी गुरु हो, उसमें ममल रस्ता है- मवापी है। में मिनदोममाणने, समवसरणादि सिरि। वर्मन समभे निनस, रोधी रो निमबुद्धि ॥ २५ ॥ बिनभगवान्को देश पारिनो वर्णन है, जो उसे बिना वर्णन समता पर सपने मुखपक देव है, सम्पेि मामापके मस्ति पगसे बो उनके समक्सरण पारि मायाको हो गाया करता है, और उसमें वफ्नो दुरिको रोके पता है-अर्यात् परमार्पाकाप ऐसे शिवका जो मानने योम्प बतरग सरूम है उसे गो नहीं जामता, तपा उसे भाममेका प्रफरम मी मार करता बौर के समक्सरण आदिम 0 मिनका स्मास बताकर मशाम मस्त पापा मतापी है। मस्पस सद्गुरुपोगमा बर्षे रएि रिसस । मसरुने र करे, निममामा मुरुप ॥ २६ ॥ प्रपा सदरच कमी योग मि मी तो दुरणा वादिक मास करमेवारी उनको पाणी मन- कर, गो उससे उम्टा ही पता है, वर्षात् उस हितकारी माणीको गो प्राण नहीं करताऔर 'मास सबा स मुमुसु है इस मानो मुम्यहमसे प्राप्त करने के लिये ही मसारक पास जाकर, प्रविपना रिशेष बल बताता है- मताया है। देवादि गति मैगा, में समने अवदान । मान निम मतरपना, मापा सकिनिदान ॥२७॥ रेस मरफ वा गतिरे मग' वारिध को सहम किसी शेष परमार्पर से का, उस मे निसने मी मामा और उस मैगमाघे हो यो भुवान सममता, पासपने मतका-- पष-बाब रसनेको हो मुलिका कारण मानता है- मतापी है। साई सरूप न पनि प्र प्रव अमिमान । प्रामही परमार्पन सेगा मौषित पान ॥२८॥ पिप सम्म पाहै। उसे मी गे नही मानता और प्रमाणे ऐसा अभिमान निम्न धारण कर मा। सपा परि कमी परमाकि उपदेशका योग बने मी, तो छोकमे को बना और हासकार भारिपचन नायगा अपना मान मारि किरपा से प्राप्त न रंग'-- ऐमा समटकर, जो परमाको प्रमाण नहीं करताप मनापा। जो सय उसके मान
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उपदेश-पाया
मयमा निश्चयनय आहे, मात्र अपनी मांय ।
सोप सदम्पपदारने, सापनरहित पाप ॥ २९ ॥
अपना समयसार या पोगवासिष्ठ वैसे प्रयोको बाँधकर यो फेस मिश्वयमपको हो।
है। किस तरह प्रण करता है ! मान कपनरूपसे प्राण करता है। परत मिसके
वपाप गुणकी कुछ मी स्पर्धना नहीं, और जो सहर, सयाम तथा मेराग्य, विवेक वादि सर
और करता है तथा अपने भाको हामी मानकर मो सापनरहित भाचरण करता हैाम
मानदशा पाम्या नहीं, सापनशा न काई ।
पाये नो संगमे, पुढे मर पाहि ॥ ३० ॥
बीच बान-दशाको नहीं पाता, मौर सो गए यम्प मा सापम-वधा मी
११स कारण ऐसे मीत्रका यदि किसी दूसरे चीयको सपोग हो जाय तो यह बाग मी मा
हर पाता।
र पण मीम मवायमी निभमानादि काम ।
पामे नही परमार्थने, अनपिकारि ज ॥ ३१ ॥
पर नीच मी मसाप ही बता है। क्योंकि उपर करे बमुमार श्रीरको बिस वर
पारिसे मतार्यता गती है, उसी तण इसे भी अपनेको बानी मनवाने के मानकी इस अप
मवाय माय गता है। इसलिये यह भी परमार्थको मही पाता, और इस कारण यह भी बन
वर्षात् जिसमें बान प्रदेश होने योग्य नहीं, ऐसे गायोंमें गिना जाता है।
मही पाप सपनावता, नी अपराम्प ।
सरम्पर्ण न मध्यस्पता, ए पापी दुर्भाग्य ॥ ३२ ॥
निस कोप, माम, माया धौर कोमलप पाप रश नही पा दिसे तस्याय
माही ना मिसे मारमा गुण प्राण करनेष्य सरता नही है। सपा सप सपकी
करनेको निसे पनपावरहित रहि मही, पमतापा जीव माम्पहीन है। अपार सम्म
मरणका ऐश्न करनेवाले मोक्षमार्गक प्रास करने योग्य उसका माग्प दो मही, पेसा समन्धमा ।
मरण, मा. पाली मार्ग साप पर।
से कई मास्माना, पात्य-मर्य पुग्नसान ॥ ३३ ॥
इस तर मापा औरफे सक्षण कहे । उसके कहनेका यही है कि रिसम में
धमताप राबब मामाचा गर सण कहते हैं। क्षण मे है ! किन
बप्पाबार मुखको सामान हेतु ।
मारमादि सपण-
मात्पशन स्पा मनिपर्ण, ६ सापा एम दोप।
पाची गुम कारपरा, मारमाची मी भोप ॥ ३५॥
- भीमद् पवन महा। सर्मति पासर मीणंति पासा-नो समकिस मर्यात् बामशान है मुनिका समझो, ऐसा माभागसूत्रमें कहा है। भर्पात् मारमायाँ गोल ऐसा समझता है कि जिसमें बागवान रोपही सबा गुरु है। धौर नो मारमझानसे रहित हो ऐसे मम्ने कुझके गुरुको सहर मानमा-मार कल्पना है, उससे फुरा संसार नाश नहीं होता। मस्पम सद्गुरुमाप्तिनी, गले परम उपकार । मणे पोग एकत्तपी, पर्वे मातापार ॥ ३५ ॥ या प्रत्यक्ष सारुध प्राप्तिका महान् उपकार सममता है; मर्यात् घास मादिसे गो समाधान मही हो सकता, और जो रोप सही मात्रा पारण किये बिना दूर नहीं वे, उन माग योगसे समाधान हो जाता है, और ये दोष दूर हो जाते है। इसलिये प्रपत्र सनुरुप यह मान् उपर समझता है और उस सहलके प्रति मन पचन बार कापाकी एकतासे बाधापूर्वक वस्ता है। एक होय प्रम काठमा, परमारपमा पंथ । मेरे ते परमार्पन, ते म्पपार समंव ॥ ३६ ॥ तीनों भाव में परमार्पका पंप वर्षात् मोधका मार्ग एक ही होना पापिये दौर सिसे प परमार्थ सिदो मा हार गानको मान्य रखना चाहिये, दूसरा नहीं। एम रिपारी मंदरे, भोप सद्गुरुयोग । काम एक मास्मार्प, भीमो मही मनरोग ॥ ३७॥ इस तरह भतरम बारा मो सारके पोगको शोष करता है। केवल एक बारमार्गको पा रखता है, मान पूगा पादि प्रमि-सिद्धिको कुरा मी इला नहीं रहता—पा ऐग जिसके मनमें महा-परमात्मापा। पापनी पाववा, मात्र मास-ममिणप । मर स्लेव माणी दया, स्पा मास्मा निवास ॥ ३८॥ कपाप यहाँ क पा , बग एफ मोक्ष पदके सिप मिसे दूसरे किसी परको बमिलाप म्ही सारपर मिसे परम्प पता है और प्राणीमानके उपर मिसे क्या है ऐसे पौतमें बात्मार्पण निष्पस ताहै। दपा म पपी पासपी, मीप सो नहीं नोम्प । मोसमाम पामे नहीं, मटे न भवम ॥ ३९ ॥ बमक ऐसी योग-दशाको माल नहीं पाचा, तबतक उसे मोश्चमार्गको प्राशि नहीं होता, मोर माम माविस्म बनत सात वर-पग नहीं मिटता । मारे पपी दमा, सलोप मुहाय । पोपे सपिचारणा, स्पा ममटे मुखदाप ॥४ ॥ याँ पैसो रहा रोगी। पहाँ सहमत्र मोष शोमाचे प्राप्त होता है फौमूत होता है, और उस मोरके पीमत होनेसे सम्मापक सनिवारय प्रगट होती है।
.] मास्मसिदि . न्यां मगरे मरिघारणा, त्पा मगटे निममान । म माने क्षय मोह पई, पामे पद निर्वाण ॥ ४१ ॥ वहाँ सपिचार-दशा प्रगट हो, वहीं भात्मशान उत्पम होता है, और उस पानसे मोएका क्षप कर बारमा निर्माण-परको प्राप्त करता है। उपमे से सुपिपारणा, मोक्षमार्ग समनाप । गुरुचिप्पसंपादपी, भालुं पद्पद भारि ॥ ४२ ॥ जिससे पुविचार-दशा उत्तम हो, भौर मोश-मार्ग समझमें बा नाय, उस विषयको पहा पट् पदरूपसे गुरु-शिप्पके समाररूपमें करता हूँ। पदपदनामकपन- मास्मा , निस्प है, ऐ कर्वा निमकर्म । ऐ मोक्का, पळी मोल छ, मोल उपाय सुपर्म ॥ १३ ॥ वारमा है', 'या भारमा निस्प है', र बारमा अपने कर्मको कर्ण', 'पा कर्मको मोळा है', 'उससे मोक्ष होती है', वार 'उस मोक्षका उपापम्प सधर्म है। पदस्यानक संसपा पदार्शन पण सा । सपमावा परमार्पने, को मानीए पर ॥४४॥ पेशा स्यानक भयत्रा र पद पा सक्षेपमें को हैभार विचार करमेसे पदम मी पो है। परमार्थ समझने के लिये बानी-पुरुपने पे या पद कहे। ११-शिप्प उबाप- शिम्प मारमाके अस्तित्वाप प्रपम स्पानको विषयमें शका करता है- नपी रष्टिमा आरवा, मपी गणातु रूप । पीमो पण मनुमर नहीं, वेपी न जीपसरूप ॥ ५५॥ परमिमें नहीं माना, और उसका कोई म्प मी माइस मही रोता । तया स्पर्श बासिर अनुमासे मी उसका दान नहीं पता, इसलिये गाएका निबनप नही १, अर्थात् जीप नहीं है। मयरा दाज मावमा, मपमा इन्द्रिय माण । मिम्पा ज्दा मानो, नहीं नई एंपाण ॥१६॥ अयमा यो देही यामा अपना को दिया है हो मामा पश अम्माप्रयास मामा वर्षात् पे सब एक एक परक देसाप में इमडिपे मामारो सिम मानना मिप्पा है। क्योकि उसका कोई मौ मिम पिद दिलाई मही दता । राम्पारणीने सम्पासना परसम्म्नी या मान गुगतामा पोर MAHATM निगारय समासो परीमानकर गप AIR- मन्दिा बानिया रण भुन्धर पुलमाला। मस्व पुलिसवा लोपामो म परा •मरिना सिनसिनो ४. - भीमर्पसबाम - मी मी मावमा होस वो, मणाय वे नहीं म । मणाय मी ते होप वो, परपट मादि प्रेम ॥४७॥ और पदि मामा हो तो हमाराम पो महीं होती ! जैसे पट पट मावि पदार्प मौन और ये माश्म होते हैं, उसी तय परिवारमा हो ये कामों माइम मही होती। माटे ऐ नही पावमा, मिथ्या मोमपाप । ए मेवर कावणो, सममाको सदुपाप |॥ १८ ॥ मतरप बामा नौर बारमा नहीं, इसध्येि उसके मोक्ष मिस पाप करना भी पर्ष है इस मे भरी शकाच कुछ मी सदुपाय हो तो कृपा करके मुझे समझाइये-अर्थात् इसका कुछ समापान होतो कहिये। समापान--सद्गुरु ग्मा- स्पर समाधान करते है कि मारमा बस्तिल है:- मास्पो देवाप्पासपी, मात्मा देसमान । पण वे बम मिम , प्रगटसक्षणे मान ॥ १९ ॥ देशाम्पारसे वर्षात् वनादिकाल के पानके कारण का परिचय दोहा, इस कारण बने बामा देह बैसी बर्षात् मात्मा देह हो मासित होती है। परन्तु मामा और देह पोनों मिम मिक, पोकि दोनों मिम मित्र म्भपूर्वक प्रगट देसमेमें वाते हैं। मास्पी देशप्पासपी, मात्मा दोसमान । पण है पम मिम, मेम मसि ने म्यान ॥५०॥ बमाकिसके महान चरण देहके परिचपसे हो मामा मासिव, अपना हो समान मामा भासित है। परन्तु जिस तप तप और म्यान रेनों एक म्यामरूप मास ने रि मी ऐनों मिम मिम है, उसी तरह मामा और वह दोनों मिम मिम ।। प्रारएिनी, जमाण सि । मवाप्प मनुपर, नीरसस्प ॥५१॥ मारमा, वित् मापसे कैसे दिगई दे सकती है। मोर उम्टा भामा बासको रेग्नेगरी यो स्पून मूक्ष्म बाकि सरपको मानता है। और सबमें कित्ता न किसी प्रकार की नपा बाती है पर मिसमें किसी भी प्रसारको मापा महीमा सस्तो ऐसा गोभनुमा हो बोरा ताप इन्द्रिप मरपान, निम निम पिपपर्नु मान । पौष इन्दिना रिपपत्रे, पण मारमाने मान ।। ५२ । मा मन्त्रिपम सुमा गता है उम बपि गलती है, उसे निप मही नामती और ओपो देगा माता मेलदिप मही नामती । मद सा इन्दिपोका माने जाने Pratant, महिपोकीन माह और मामामाता पारो इन्द्रियों के ...] मास्मसिदि विषपका धान होता है वर्षात् जो उन पाँच इन्द्रियोंसे महण किये हुए विषयको बानता है, वह भारम वर ऐसा को कहा है कि मास्माक बिना प्रत्येक इन्दिप एक एक विषयको प्राण करती है, फस उपचारसे ही कहा है। - दान माण देहन, मागे न इन्द्रिय माण । मास्मानी सचापर, ते पर नाण ॥ ५३ ॥ उसे न तो देह धानती है, म इन्द्रियाँ बानता है, भौर म भासोसासरूप प्राण उसे मानत है। सब एक मामाकी पचासे ही प्रति करते है, ना तो पापही पो रहते-ऐसा समय सर्व अरस्थाने पिपे, न्पारो सदा जणाप । मगटस्प पैवन्यमय, ए एपाणे सदाप ॥ ५४॥ मात स्वम और निद्रा नबस्थामोंमें पनेपर मी या उन सब भवस्था से मिन या करता है, और उन सभवस्थानों के बीत जानेपर मौ उसका मस्तित्व पता है।पा उम सब स्थानों को गाननेवाला प्रगटस्वरूप बैतन्यमय है, अर्थात् जानते रामा हो उसका स्पए समान है, और उसका पर निशाना सा ही यता है-उस निशामाका कमी मी नाश नहीं होता। पट पर मादि माण, वेयी सेने मान । माणनार व मान नही, पहिय कई शान? ॥ ५५॥ पर पट वादिको सप ही जानता है, और द समझता है कि वे सब मौजूद है, तथा जो पर फर वारिका जालमेपास है, उसे मानता मही--तो उस हानको फिर फसाया पाप । परमपुटि रुप देशपा, स्पून देर मति पत्र । देर होय मी भावमा, पर न माम रिकल्प ।। ५६ ॥ पुछ देहमें तीक्ष्ण पुति भौर स्पष देहमें बल्प पुनि देखनमें जाती है। परिदे ही भारमा होतो इस शका-विरोध-के उपस्पित होनेका वासर दोनही बा समपा । जर पवननो मिम, करन मगर स्मभार । एकपर्ण पाप नही, प्रण कार दय भार ॥ ५७ ॥ किसी का भी जिसमें बाननेका स्पमाष नहीं रजा, मोर गोसाही मानमे समारम मुकरे यार चेतन है-इस तरह दोनोंका सर्वया भिन्न भिम समान और पर किसी भी प्रकार एक नहीं सकता। तीनों काछमें गवारपसे और पनन बेननलपसे दो यता है। इस तरह दोनो ही मिम भिम दैतभाव स्पर अनुमत्रमें आता है। भास्मानी मंझा कर, मारमा पाते माप । इंधना करनार, भपरन पर समाप || ५८ ॥ •अम्मा सय हो नास्माको पात्र बरती । परम्नु जो राम परनेशठा दबदो मामा -- इस बातो मामा जामती नदी पह एक भसाम बापर्य है। एमापारी भी मारमारे मस्तियों की प्रमि युनि- म मामातम् ती म मामस्मादि । पEAM तक सरगम्। मानोरकर (nearth) ने भी पोnिath argum-lum because I aint-मर्थ मास में मोदर ।। .
भीमद् पचन्द्र [५ २च-विम्य पाप- शिष करवा किनारमा नित्य महा- मास्मामा मस्वित्वना, मपि कसा प्रकार । समय नो पाप , सवर् करें विचार । ५९ ।। मात्माके वस्तिवमें बापने यो नो बातें की, उनका बवरगमें विचार करनेसे म मस्तिन तो समय माम होता है। पीबी पंत पाप स्पा, मास्मा मरी मविनाप । दोयोगपी स्पने, देहपियोगे नाश ॥ ६ ॥ परन्तु इसी का पोता है कि परिवारमा है तो मी या भक्मिाशी वर्षात् मिस्प मही काममें रहनेवाण फार्प ग्री, ए केवल देके स्पोगसे तत्पम होती है और उसके वियोगसे उसका माश ऐजाता है। मपरा बस्तु सपिक्षमे सणे पम्दाम । ए मनुमबषी पन नहीं, मास्मा निस्प बणाय ।।६१ ।। अपना वस्तु पण क्षणमें बदम्ती देखने में बाती है, इसलिये सब वस्तु क्षणिक है, और अनुमबसे देसनेसे भी भामा निस्य मही माश्म होती। समापान-सहर पाच- गुर समाधान करते है कि मामा निस्प है।- देर मात्र संपीम परी मरम्मी एप । पवनना पत्पचि सय, कोना मनुभव पाप । ॥ ६२ ॥ समस्त देर परमाणु के संपोगसे पनी मला सपनगसे दबामाले साप उस संबंध है। तथा बा देह या रूपी वौर प वर्षात् दूसरे किसी यो बाननेष विषय है। इसलिये पर या बपने नापको मी नहीं मानता तो फिर चेतनको उत्पत्ति पर नाशको तो पाकसि जान सकता है। उस देश के एक एक परमाणुचा विचार करनेसे मी पाही समतमें बाती है। इस कारण उसमें तम तापविमो सकती और सब उसमें उसकी उत्पत्ति नही हो सकती तो उसके साप देताका माश मी नहीं सकता । वषा बा देह रूमी बर्षात् स्पा बादि परिणामनाम , और कम प्रयो फिर उसो पोगसे रेती उत्पति स तरह हो सकती है।मौर उसके साप उस मास मी कैसे रोसमता या देहमसे घेतम उम होता है और उसके साथ ही पनाश हो जाता है पाबात किसके अनुमतक भाषान है। अर्थात् इस बात को कौन मानता है। क्योंकि माननेवाले चेतनको उत्पपि बरसे मपम तो ऐची मी मोर नाश तो उससे परिवही हो जाता वोरिपा मनुमा किसे हो। माका ---जीवका तहमा बपिनाशी बात् नित्य विमानता होना संभव नगर मोगस मर्पत रके उम्मके साप हो पा जाता है और देहके मपोग साद देहके नारा होमेपर या मास जाता है।
५.] मास्मसिरि १०॥ समाधान -देहका नौनके साय मात्र स्योग सबष है। वह कुछ नबिके मूस सरूपके उत्पम नेका कारण महाँ । अपचा गो देह है वह केस संयोगसे ही उत्पम पदार्थ है; तपा यही वर्षात् मह किसीको भी नहीं बामती, और बम मा मपनको ही मही मानती वो फिर दूसरेको तो पर क्या बान सकती है । तपा देह रूपी है-रया बादि समापयुक्त है, और पशुका विषय है। जब स्वयं देहका हो ऐसा सरूप है तो वह सनकी उत्पति और नाशको किस तर चान सकती है। वर्षात् यब यह वामेको ही नहीं मानती तो फिर ' मेरेसे पा चेतम उत्पन्न हुआ है,' से कैसे बान सकती है। पौर 'मेरे छ्न जानेके पचात् यह चेतन मी छूट पायगा—माश हो चापगा'-इस मतको बा देह कैसे चान सकती है। पोंकि माननेवाला कार्य हो तो जाननेवाला यता है-देह तो कुछ बाननेवारी हो नहीं सकती, तो फिर चेतमकी उत्पति गौर नाशके मनुमबको किसके वाधीन करना चाहिये । या वनुमय देहके बापान तो करा ना सकता नहीं। क्योंकि या प्रत्यक्ष नाहै, और उसके घरवको बाननेवाला उससे मिल कोई दूसरा हो फार्थ समझमें वाता है। काचित् यह करें कि पेतमकी उत्पत्ति वौर माशको पेतन ही मानता है, तो इस बात के बोने में ही इसमें बाबा भाती ह। क्योंकि फिर तो बेतनकी उत्पति और नारा बाननेवा के रूपमें चेतना अंगीकार करमा पहा बर्मात् पाचन तो मात्र अपसिनातरम वौर कपनमा गमय । पैसे कोई करे कि मेरे मुहमें जीम नही,' उसी तय यह कपन है कि ठनको उत्पत्ति और नासको पेतन जानता है, इसलिये चेतम निस्य नहीं'। इस प्रमाणको कैसी पयार्पता है, उसे वो तुम ही विचार कर देखे। मना मनुमय पश्य ए, उत्पम पपर्नु शान । विवेषी जूदा पिना, याय न केमे भान ॥ ६ ॥ गिसके पनुमपमें इस उत्पत्ति और नाशका कान राता है, उस बानको उससे मिम माने बिना, पाम किसी मी प्रकारसे समप नही। पर्याद रेतनको उत्पति चौर माल होता है, यह किसी भी बनुमबमें नहीं मा सकता ॥ पोको उत्पपि वीर दशके माशा हान रिसके अनुभवमें पता है पर उस देहसे यदि गुदा म हो तो किसी मी प्रकारसे देहकी उत्पत्ति मौर नाशका शान नही हो सकता । वपना जो जिसको उत्पत्ति और माशको मानता और उससे जुदा ही होता है, और फिर तो वह सय उत्पति और नाशप न यय, परन्तु उसके माननेवाम्म होय । इसलिये फिर उन दोनोंकी एकता कैसे हो सकती है। में संपोगो देखिपे, ते मनुमप रप । सपमे नहीं संयोगपी, मास्मा निस्प मस्पक्ष ॥ १४॥ जो यो सपोग हम देखते है, वे सब अनुभवल्म मामाके म होते है, मर्यात् बाहमा उन्हें यामती है, और उन सपोगों के सम्मका विचार करमेसे ऐसा कोई मी संपोग समझमें मती बात मिसेस वाहमा उत्पम होती हो। इसलिये भारमा संयोगसे अनुपम १ बर्षात् पर मसायोगी है- स्मारक पदार्प-सबियेप पर निस्प' समाठमें जाता है| गो गो देह मारि सपोग दिखाई देते हैं वे सब मनुभात्ताप अस्माके होप है, अर्थात् - भीमद् सचम्म बात्मा हो उमें देसने वीर भामनेवाला है। उन सब संयोगका विचार करके देखो तो तुम किसी मी सपोगसे बनुभवसरूप मामा उत्पन हो सकने पेप्टप माइम न होगी। कोई मौ सपोग ऐसे मही गो मे बानते , और तुम तो उन सब संयोगोंधे बानवे हो, इससे तुम्हारी उनसे मिमता, बार वर्मयोगीफ्नाउन संयोगोंसे उत्पम म होना–सान ही सिर होता है, पौर बनुममें भाता है। उससे किसी मी सयोगस-मिसकी उत्पति मही हो सकती, कोई मी सपोग मिसका उत्पषिके लिये मनुमबमें नहीं पा सकता, पौर बिन स्पोगोंकी हम कम्पमा करें उससे यो वनुमत्र भिम-सपा मिल कर उसके बातारूपसे यता है, उस मनुभमस्वरूप वामाचे तुम निस्प स्परहित-रिसने उम सपोगकि भाषस्म स्पर्शको प्राव मही किया-समझो । भरपी घेवन पि, पवनवी भायाप । एगो गनुभव कोनि, परि कदी न पाय ॥१५॥ यासे बेदम उत्पन होता है और चेतमसे पर उत्पन पता है, ऐसा किसीको कमी मौ बनुमक नगी होता। कोर संयोगोपी मही, मेनी उत्पचि थाप । नासम वैनो काईमा, वेपी निस्प सवाय ॥ १६ ॥ मिसको उत्पति किसी मी सपोगसे नही होती, उसका नाश मी किसी के साप नहीं होता समिये बास्मा भिड मिस्य ॥ गो किसी भी सपोगसे उत्पम महुवा हो वर्षात् अपने समापसे हो भो फ्वार्थ सिम हो, उसन मास दूसरे किसी मी पदार्पक साप मही होता। और यदि दूसरे पदार्पके साथ उसका नारा होता है प्रथम उसमेंस उसकी उम्पत्ति होमा वापरफा थी ना तो उसके साथ उसकी मासरूम एकता मी महो सकती। इसलिये भामाचे वनुपम और पविनासी समसकर यही प्रतीशि करना योग्य । किपा नित्यो। क्रोमादि वरतम्यता, सादिकनी माप । पूर्वमम्म-संस्कार , नीव निस्पता स्पाप ॥१७॥ सर्प नादि प्राणियोंमें प्रोष बाद प्रतियों को विशेषता भन्मसे ही देखने में बाती है- पर्तमान में उन्होंने पर बम्पास किपा महो । या तो उनके मम्मसे है। पर पूर्ण सन्मका सम्कार । पर पूर्वमन्म चीरका नित्यता सिद्ध करता है। समि नमसे गोषको विशेषता दसनेमें जाता है। कस्तरमें अनासे हो मरिसकनाति देखने माती है। मम्मी मावि तुओंको परमेपर उन पकानेसे हास होता है, भप संज्ञा उमफे अनुमबमें परिम्से दो पता है और इस कारण हो माग गाने प्रपन करते है। इसी तय किसी प्राणाम ममसे ही प्रीति, किसमें समताको किसी निर्ममताको किसीमें गमौरताको किसी परोप भप सा किसीम श्रम वादिके प्रति बरंगवकी और किप्ती माहार वादिम ममविक सम्पतकी पिता देखने में बाती है।स्यादि यो मेद वर्षात् कोष बादि बाकी यो म्यूनाधिनता है, तपाउन सब प्रातियोधयो सतर्प । पामो सम्मसे ही साप देखने में माता सधरण पूर्ण संस्कार करें। काचित् रखें कि गर्भ कार्प मौर रेस गुणके सपोगसे उस उस परके गुग उत्पन भास्मसिदि होते है, उनमें कुछ पूर्वबम कारण नहीं है, तो यह कहना मी ययार्थ नहीं । क्योंकि चो मा-वाप कम-वास्नामें विशेष प्रीसियुक्त देखनेमें बाते है, उनके पुत्र मापनसे ही परम वीतराग वैसे देसे बाते है। वधा दिन माता पिताओंमें क्रोषको विशेषता देसी माती है, उनकी सततिमें समताको विशेषता पनि गोचर होतीहै-यह सब फिर कैसे हो सकता है। तथा उसमर्पि-रेतसके पैसे गुण नहीं होते, क्योंकि गोर्पनेसस स्वप चेतन नहीं है, उसमें सो चेतनका संचार होता है-वर्षास् उसमें चेतन सय देह धारण करता है । इस कारण वीर्य और रेखसके नामित क्रोध वादि भाव नहीं माने जा सकते-पेतनके बिना माल की मी अनुभवमें नहीं जाते । इसलिये ये केवल पेतनके हो वामित है, वर्षात् से वीर्य बौर रेससके गुम नहीं । इस कारण वीर्यकी न्यूनाधिकताकी मुख्पतासे कोष मादिको न्यूनाधिकता नहीं हो सकता । घेतनके न्यूनाधिक प्रयोगसे ही क्रोष वादिको म्यूनाविकता होती है, जिससे ये गर्मस्थ पार्ष-रेतसके गुण नहीं को चा सकसे, परन्तु वे गुण चेतनके हो वामित हैं; धौर या म्यूमाधिकता उस घेतनके पूर्वके बभ्याससे ही सभव है। क्योंकि कारणके बिना कार्यको उत्पति नही होती । यदि भवनका पूर्वप्रयोग उस प्रकारसे हो तो ही र संस्कार पता है, मिससे इस देह बादिके पूर्वक सम्काका अनुभव होता है, वौर पे सस्कार पूर्व-अम्मको सिद्ध करते हैं, तपा पूर्व-जन्मकी सिदिसे वात्माको निस्यता सहम ही सिम हो जाती है। आस्मा इम्पे निस्प , पर्याये परम्दयप । पागदि पय प्रम्प, पान एकने याप ।। ६८ ॥ वारमा वस्तुपसे नित्य है, किन्तु प्रतिसमय बान बादि परिणामके पलटनेसे उसकी पपा- पमें परिवर्तन होता है। वैसे समुद्रमें परिवर्तन नहीं होता, केवल उसकी मरोंमें परिवर्तन होता है। उदाहरण के लिये बास पुषा वौर पर ये जो सीन अवस्था है, ये बारमाको सिमाव-पर्याय है। बाल मास्थाके पते हुए मारमा बाक माम होता है। उस पार भवस्याको छोड़कर अब वामा पुवावस्था धारण करती है, उस समय पुवा माझ्म होता है, और युवावस्था कर पा सावरपा पारण करती है, उस समय हर माध्म होती है । इन तीनों भवस्पायोंमें बो भेद है वह पर्यायमेही है। परन्तु इन तीनों अबस्थानों में मारम-बम्पका मेद नहीं होता। वर्षात् फेयस अबस्याओंमें दो परिम वन होता है, मामामें परिवर्तन मही होता । बास्मा इन तानो अबस्यायोंको मानती है, और उसे उन तीनों भवस्था की सति है। इसलिये पनि तीनों क्षारपाओंमें एक बाम्य थे तो ही यह होना समय है। यदि मारमा क्षण क्षणमें पदम्ती यती हो मा वनुमा कमी भी नहीं सकता। मयमा शान सणिकन, ने माणी पदनार । बदनारो से क्षणिक नहीं, कर मनुमय निर्पार ॥ ६९ ॥ तथा वमुक कार्य क्षणिक है जो ऐसा मानता है, और पणिकता कपन करता , पर अपन करनेवाम अर्थात् जाननेवाग क्षणिक नहीं होता ! क्योंकि प्रथम सममें निसे अनुमत्र मा उसे ही दूसरे सण या धनुमन हुला कहा जा सकता है और यदि दूसरे क्षणमें पमहान वो फिर उसे यह अनुमन सि कहा जा सकता है। इसलिये इस अनुमत्से भी वाया कि तय नियप कर। - भीमद् पसवय पारे कोई वस्तुनी, कमल हाय म नाम । पवन पामे नाश वो, मां मने तपास ॥ ७० ॥ तपा किसी मी बस्तुका किसी मा काठमें सपा माश नहीं होता केवल मास्थातर ही होता है, प्रिये चेतनध मी सर्पपा नाश नही होता । तया पदि चेतनका समस्यांवरमप नाश होता है किसमें मिल जाता है!बपना प किस प्रकारक अवस्थांतरको प्राप्त करता।इसकी तूसोग कर। मादि पदार्थ नग टूट-फट गाते हैं तो लोग करते हैं कि धा नप हो गया है परन्तु कुछ पोका नाश नहीं हो जाता । पा मिमिम होकर पनि उसको अस्पम्त बारीक पूडो चाप - मी या परमामुषोंके महरूममें वो मौन यता है उसका सपा नाश नहीं हो पाया र उसमें एक परमाणु भी कम नहीं होता । क्योंकि मनुमपसे देखनेपर उसका बस्पांतर तो हो कता परत पदार्थका समूस माश हो सकना कमी भी समय नहीं। इसगिय पहिचेतनका नारा वो मी उसच सर्पपा माश तो कमी करा ही नहीं जा सकता, या मारा केवल वयस्तरकप ही । मायगा । जैसे पपा टूट कर कर मनुकमसे परमामुमोके समासममें सण है, उसी तख ने तनका अस्पांतर नाश मानना हो तो वह किस स्पिति र सकता है। अपना बिस तब के परमाणु परमाणु-समामें मिस नाते है उसी तय वन किस बस्तुमें मिझ सकता है। इसी ोग कर । वर्षात् इस तर पदि मनुमन करके देखेगा वो तो मारम होगा कि चेतन- हमा—किसीमें मी नही मिझ सवा वा पर-स्वरूप में उसन अपस्पांतर नहीं हो सका। प्र-पिप्य बाप:- शिप्प कहत्यबामा कर्मकी का नहीं है:- कर्चा भीष न धर्मनी, कर्म न कर्म । अपरा सहम समाप का, कर्म नीपनो धर्म ॥१॥ गौत्र कर्म कर्ण नही कर्म ही कर्मका का है। अपना कर्म बनायास को यते हैं। दि ऐसा न हो वीर मानो उसका कर्ता कहो तो पिरगावका धर्म हो खरा, और या सका धर्म है सलिये उसी कभी मी निति नहीं हो सकती। भास्मा सदा मसंग ने, करे महाविप । मपणाचर प्रेरणा, वेपी भीर मपंप ॥ ७२ ॥ बापमा परि ऐसा न रोता या मानमा चाहिये कि वामा सशसा है, और सल बाद मयुत प्रतिया हो कर्मका बप करती । पर ऐसा मौ न मानो तो फिर यह मानना चाहिये गतको कर्म करने की प्रेरणा ईभर करता है इस कारण ईपरेमपर निर्भर होनेसे बौनका उस कर्मस अचमानना चाहिये। माटे मोम पापनो, ईमौतुमणाय । पर्मवर्नु पिणे, नहीं को नहीं माय ॥३॥ इसधिमे बार किसी तय कर्म कर्चा नहीं हो सका, बोर न तब मोशके उपाय करमेका कोई कारण मास होता है। इसपि पा तो गीतको कर्म कर्ण हो म मामना चाहिये और परि उसे फर्ण मानो वो उसकापसमा निसा मी म्प मारा नही हो सकता।
१६] भारमसिदि १७ वन- समापान-सहरु सपाना- सहर समापान करते है कि मामा कर्मको कर्ता किस तरी होप न पवन प्रेरणा, कोण ग्रोवो कर्म ।। मरसमाप नहीं प्रेरणा, हुमो विचारी पर्म ॥ ७४ ॥ चारमा की प्रेरणारूप प्राति न हो तो कर्मको फिर कौन हण करेगा! क्योंकि नायलमाव तो कुछ प्रेरणा करनेका है महीना और वेतन दोनोंके धोको विचार करके देखो। यदि चेतनको प्रेरणा न हो तो कर्मको फिर कौन प्राण करेगा' प्रेरणास्मसे प्राण करामेरूप समाब कुछ माका तो मही । वौर पर ऐसा हो तो घर पर वादिका मी क्रोध वादि भाषमें परिणमन होना चाहिये, और फिर तो उमें मी कर्मको प्राण करना चाहिये । परन्तु ऐसा सो किसाको कमी मी अनुभव होता माहीं । इससे सिद्ध होता है कि पेतन-जीव-ही कर्मको रण करता है, और इस कारण उसे ही कर्मका कर्चा करते है इस तर मीच हो कर्मका कर्ता सिद्ध होता है। इससे 'कर्मका कर्वा कर्म ही कहा नायगा या नहीं। तुमारी इस शंकाका मी समाधान हो जायगा । क्योक्ति ग कर्ममें प्रेरणास्प धर्म म होमेसे यह उस तर कमकि प्राण करमेको बसमय है इसलिये कर्मका कफ्नि नापमें है, क्योंकि प्रेरणाशति उसीमें है। मो पेवन करनु नपी, यो नयी वो कर्म । देवी सहन स्पमार नही, तेमम नहीं जीपमर्म ।। ७५ ॥ पदि बाहमा कर्मको म करती तो पाकर्म होता मी मही इससे यह करना योग्य मही किया कर्म साग समानसे-बनायास होपो नाता है। इसी तए मानका पधर्म भी नहीं है पोंकि समापका तो नाश होता नही । तथा यदि वाहमा कर्म म करे तो कर्म होता मी मही, भात् या मार दूर हो सकता है, इसम्पेि मारमाका यह स्वामाविक धर्म मही । केप व मसंग मो, भासत वन न केम। मसग , परमार्यपी, पण निममाने दम ।। ७६ ॥ पदि माहमा या बसंग होती वर्षात् उसे कमी मी कर्मका कर्यापन न होता, तो फिर सर्य पवे ही परमात्मा पहिम्से ही पों म भासित होती ! पपपि परमास तो बारमा वसंग हो, परम्त पातो जब हो सकता है कि सहपका भान हो माप । का चिर को महीं, ईनर शुद समार। मपमा भैरफ से गम्पे, पर दोषममार ॥ ७ ॥ जगत्का अपना मीयोंके कर्मका का कोई ईघर नही है। क्योंकि बिसका पुर नामस्मात प्राट हो गया है वही ईमर है, और पदि उसे प्रेरक अर्थात् कर्मका कर्ण मानें तो उसे मी दोषका प्रमात मानमा चाहिये । इसध्येि जीवके कौके कर्चाफ्नमें रिकी प्रेरणा भी नहीं हो पा सकती ।। ब तुमने जो कहा कि वे कर्म मनापास हो हात यते हैं, तो यहाँ बनापासका क्या अर्थ होता। (१)क्या कर्म बरमाकेरा बिना विचार हो हो गये।
१०८ मीमद् परमात्र [॥ (२) या बात्माका कर्वल न होनेपर मी फर्म हो गये। (१) पासर बार किसाकेगा देनेसे कर्म हो गये। (१) या प्रहरिके समर्पक सबप हो बानेसे कर्म हो गये ! इस पर मुस्स चार विमपोंसे बनापास कपनका विचार करना पोम्य है। प्रथम पिम्प पीकि 'बारमा जाप बिना विचारही कर्म हो गये परन्तु परि ऐसा होता होतो किर कर्मका मरण करमा होनही गया और वहाँ कर्मका प्राण करना न हो पा कर्मका अस्तित्व मानसी हो सकता । परन्तु बीच तो उसका प्रत्यक्ष रितमन करता , और उसका प्राणायाम करता है, ऐसा अनुभव है। तपा जिनमें गौर किसी मी तव प्राति नहीं करता ऐसे कोप वादि मान उसे कमी मी प्राम मही होते; इससे मान्म होता है कि भारमाके विमा विचारे हुए अपना बहमासे न किये हर कोन इण बारमाको नहीं हो सकता । मर्यात् इन दोनों प्रकारोंस पनापास कर्मका प्राण सिख महो बोता। तीसरा विकल्प पर ईसर मादि किसीके कर्म गा देनेसे मनापास हो कर्मका प्राण होता है'-या मी ठीक नहीं । क्योंकि प्रथम तो इमरके सहपका नयय करना चाहिये। पौर स्व प्रसगको भी विशेष समझना चाहिये । फिर मी यहाँ पर क्या विष्णु मानिको किसी तया का सीकर करके उसके उपर विचार करते। यस्विर मादि कर्मधामगा देनेवाग हो वो किर तो बीचमे कोई गांव नामका पदार्प होम या। क्योंकि विग प्रेग्णा भरि धर्मसे जो मह मस्तित्व समझमें माता था, वे प्रेरणा मादि वो स्वर इस बारे; अपना लरकी मुगाबरतोकिर नया बाकी र गमा भिमसे उसे बीब-मामा-मामा सके। वर्षात् कर्म बरसे प्रेरित नहीं है, किन्तु वे वर्ष भामाके । किये गए हो सकते हैं। तपा 'प्रहति बाटिके बसूर्वक कर्म ग बानेसे कर्म बनापास ही चौपा विकम्प मी पपार्प नहीं है। क्योंकि प्राति मावि, सपा बामा हो प्राण मकर तो वे उससे किस तए सम हो सकते । अपना दम्पत हो इस नाम प्रति है। सपिपे पर तो कर्मो को कर्मक कार्य करने के बराबर या गौर इसका तो पूमि निपेपर चुके हैं। पत्रिो कि प्राति म हो तो बत कारण पनि यो कर्मको प्रण करते है उससे मामा कर्तत्व सिद्ध होता है तो मी एकांतसे सितमही हो सकता । स्पोंकि बन्त करण बादि मौ मन्तरण बारिरूपसे चेतमकी प्रेरणा बिना पति घर । प्रसि सक है । पोंकि बेसन कम संताय मनन करनेके मिय यो अवलंबनता है से बात करण करते हैं। इसलिमे परि बन उसन मनन न करे तो स्वय उस समतामें मनन करमेश धर्म महीपा तो केरा बा। चेतन चेतमको प्रेरणासे उसका वमन मेकर कुछ प्राण करता पनेका भारोप होता है, परन्तु मुस्पनमसे तो प्रचेतन धर्मका पर्व है। पही पदि दात बादि पिसे विचार करोगे तो हमारे पे पाप किसी भातिपुत पुस्पकमाए मास होगे । परन्तु मिस प्रकार से मांचे सारे उसके समझनेसे तु, उन पास्पोको यपार्पधा माम होगी और पाति र होगी। पाते-- उससे उसमें पर्ण- मारमसिदि पदि किसी मी प्रकारसे भारमाको फर्मका कर्तृत्व महो तो या किसी भी प्रकारसे उसका मोठा मौन हो सकता और पदि ऐसा तो फिर उसे किसी मी तरके हुसोको समाषमा मी म माननी चाहिये । वया पदि भारमाको किसी भी तबके हुसकी सिकुछ मी संमानना न हो पोकिर वेदान्त मादि चाव सर्व दु सोसे छटनेके मिस मार्गका उपदेश करते हैं, उसका ये किसहिपे उपाय देते है। मेदान्त वादि दर्शन करते हैं कि 'बबतक भामधाम न तबतक दुसकी मात्पन्तिक निति नहीं होती'-सो पदि दुमका हा सर्वपा अमाव हो तो फिर उसकी नितिका उपाय मी क्यों करना चाहिये ! तया यदि मारमामें काँका कर्तृत्व न हो तो उसे दुमका मोक्तृत्ल मा बसि हो सकता है। यह विचार करनेसे मामाको कर्मका कर्तत्व सिम होता है। प्रमा-भान यहाँ एक प्रम हो सकता है और तुमने मी वा प्रम किया है कि यदि बामाको कर्मको कर्ण मानें तो रबारमाका पर्म भरता है, और बो सिका धर्म होता है, उसका की मी तोद महा हो सकता, बर्षात् पह उससे सर्वपा मिम नहीं हो सकता । जैसे बमिका वक्ता और उसका प्रकाश उससे मिच नहीं हो सकते, इसी तय पदि कर्मका कल बामाका धर्म सिरोवो उसका नास भी नहीं सकता।' उचर -पर्म प्रमाणाशके स्वीकार किये बिनाए यह बात सिद हो सकता है, परस्तु नो रिचारपान होता है। किसी एक प्रमाणशको स्वीकार करके दूसरे प्रमाणशिका उच्छेद नहीं करता। उस भागको धर्म कल नही पता' और पहिले तो उसका प्रतीति नही हो सकती' मादि प्रमोंके उपरमें पालको कर्मका कर्ण सिख किया गया है। परम्तु बारमा यदि कर्मको कर्ण थे तो उस कर्मका मात्र हो मो-पर कोई सिति नही। क्योंकि प्राण की हुई बससे प्राण करमेवामी मतको सर्पपा एकता कैसे ऐ सकती है। इस कारण नाव यदि भनेसे प्राण किये गये द्रम्प-कर्मका स्पाग करे तो परो सकना समय है। स्पोंकि पर उसका सरकारी स्वमात्र हो—सार समान माही । वपा उस धर्मको मैंने हमें बनादिका भ्रम करा वर्षात् उस कर्मका काफ्न जानको महानसे ही प्रतिपादित किया है। इस कारण मौरफर्म ना हो सकता है-यह बात सापमें समझनी चाहिये । जो मो मम ऐता है, यह सब बस्तुको ठम्य स्थितिको मापतास्म ही होता है, और इस कारण यह नित किया जा सकता है। वैसे पगमम्मस जम्मुनि । पहनेका बभिप्राय पाहै कि पति वानसे भी बाहमाको कपना नसे, तो फिर हुए मी उपदेश बादिका गबण विचार और जान बाहिके समझने कोई मी हेतु नही पता । कर पा जानका परमार्पस यो कफ्नि है, उसे करते है- पवन मो निममाना, कर्वा मापसमाप । पर्चे मी निगमानर्मा, कार्मममान ८॥ मात्मा पदि बपने एस चैतम्प आदि समानमें से दो पर बपने उसी समावका का, वर्षात या उसी सम्पमें स्पिन पती है। और परिप शुर पैन्य बादि समातके मानमें म पता हो, तो पर्ममापा | मीमद् पयवाद अपन तस्मक मानमें बामा अपने समाप वर्षात् पैताप बादि समावको का है, पप किसी मी कर्म बादिको का मही, गौर अब बाहना बपने स्वरूप मानमें नहीं पती, तो उसे फर्ममा कर्ण का। परमास वो गांव निक्रिपOt, ऐसा पेदात वादि दर्शनोका कपन है। और गिन-प्रपत्र मी सिट बाद पुर बामाको निक्रियताका निरूपण किया है। फिर भी, यहाँ पर सहो सकता है कि हमने पापाको सुवालस्पा कर्ण नेसे सक्रिय क्यों कहा। उस मोकी निधि इस पर करनी चाहिपे -सहमा, परपोगको परमानको वौर निमावको कर्ण महो, इसलिये कब निविण करी पाने योग है। परतु पदि ऐसा को कि मामा पैतल्प वादि समानको भी कर्ण नही, तो फिर उसका कुछ सरूप दोनहाय माता । इस कारण मामाको योग-क्रिया न होनेसे पा मिकियो, परम्त सामाविक पैतन्य आदि समानरुप लिया होनेसे मह सदिय मा है । तपा बैलपासमान, सामान सामाविक गुण है, इस कारण उसमें एकत्ररमरूपसे हो वात्माका परिणमन होता है और उससे वो परमार्पनपसे मी वारमाको सप्रिय शिषण नहीं दिया ग सकता । परम्त निर समाव परिणाम किया होनेसे हर वामाको निब समावका कर्यापन है। इस कारण उसमें सर्वथा पुन समर्म मेसे उस एपमापसे परिणमन होता है इसरिये उसे सक्रिय करनेमें मी दोष नही है। निस विचारसे सत्रियता पौर निफिफ्ताका निरूपण किया है, उस विचारके फरमाको प्राण करके सक्रियता और मिफिपता करने में कुछ मी दोर माही। १५-विप्प पापा- माम्य प्रवाहै कि गार कर्मका मोष्ट नही होता नीर का कहो, पण भोका मही सोप । समन भाकर्म, फळपरिणामी दोप! ॥ ७९ ॥ पनि गीतो कर्मका कर्ज माम मी से तो मी गात उसका मोका मही यरता । क्योंकि जा कर्म इस बात को क्या समह सकता है उसमें फल देने शकि! फदमध पिर गम्प मोक्तापणे सपाय । पम को परव, चिरपणु म माप ॥ ८॥ परि फल देनेवाले दिनोईपरणे माने ता मोस्तृतको सिर कर सकते है। मत् गीतको ईका न भीगाना,प्य माने तो गार कर्मका मोठा सिर होता है। परन्तु इसमें सिर पर मौ पिरोप बाजा पिबरको मोकोल देने वादि प्रापियुठ माने तो उसत्र ईपरत ही मही रहता ॥ रिक सिर दिना-कमी पर देने भा िमें रिमा माइपरके सिवाए बिना-जगत प्यमवाट Poमा संभव हो -इस संबध निहलपमे चार करना चाहिये परिबर्मचारस काम माने ताहाचाचरत मी तापोंकि मो देने बामे प्रति करते हुए, वो देश मारि भनेक प्रचारका संग होना मार और उममे उमी पपाप पुस्तापभा मे मुन्न और प्रिया, वर्षात् असे वह परमार मारिष लामो पर परमाधिर्ना तोरि उसे समारो प्रति हामी पारिया - मात्मतिथि उसी दए पदि ईयर मी पूसरेको फल देने मादिरूप किया प्रापि करे तो उसे मी परमात्र वादिके कर्णफ्नेका प्रसग बाता है, और मुल बीचको अपेक्षा उसकी न्यूनता ही बरती है-ससे तो उसका चरण ही उच्छेद करने बैसा हो पाता है। तया मौष वौर ईसरका समाप-मेद माननेसे मी मनेक दोष मासे हैं क्योंकि यदि दोनोंको ही वन्य-स्वभाष माने तब तो दोनों ही समान धर्मक कर्ता हुए। फिर उसमें ईघर तो जगत् बादिको रपना करे नपका कर्मक फल देनेकप कार्यको करे, और मुछ गिना माप तथा गीच एक मात्र देह पारि सरिको ही रचना करे, और वफ्ने कमौका फल पानेके सिपे ईश्वरका बामप, वपा घनमें कर समझा बापयह बात पथार्थ नहीं माझ्म होती । पर विषमता किस तराचे सकती । तपा मीवकी वपेक्षा यदि ईयरकी सामर्य विशेष मानें, तो भी विरोष पाता है। क्योंकि ईश्वरको पदिएर चैतन्यस्वरूप मानें तो फिर तुर बैतन्य मुछ बीनमें वौर उसमें कोई भेद हो म होना चाहिये, और फिर घरमारा कर्मका फल देना बादि कार्य मी न होना चाहिये, वथना मुक्त पानसे मी यह कार्य होना पीये। वीर पदि ईश्वरको बार चैतन्यस्वरूप मानें तो फिर वह भी स्मारी मोके ही समान ठारेगा। हिर उसमें सब बादि गुण कासि हो सकते है ! वपना यदि देहपारी साकी वर उसे 'दहमारी सध चर' मानें तो भी समझोंके फस देनेरूप बो विशेष समारोपईघरमें कौनसे गुणके कारण माना गायगा । तपा देह तो विनाशक, इस कारण ईपरकी देह मी माश गायगी और ए मुळ होनेपर कर्मका फल देमेवाण न देगा, स्पादि वनेक प्रकारसे ईघरको कर्म पाता भनेमें दोप माते है, और ईश्वरको उस स्वरूपसे माननेसे उसका ईबरस्प हो उत्पापन करनेके समान होता है। ईचर सिर यया पिना, मगनियम नहीं रोप । परी शुमाशुम फर्ममा, भोग्पस्पान नहीं कोय ।। ८१॥ का ऐसा फन्दावा कोई ईमर सिर मही होता, वो फिर जगत्का कोई नियम मी नही पता, शुम बाम कर्मक भोगनेका स्थान मी कोई नहीं मरता-तो चौबको फिर कर्मका बौर मोस्तुल मी कहो या सपापान-सनुर उबापा-- सद्गुर समापान करते कि मी वपने किये हुए कर्मको भोगता है मारकर्म निमम्सना, माटे पेतमरूप । भीपपीपनी फरणा, प्राण करे जप ॥ ८॥ गोषो मार-कर्म अपनी प्रतिसे हो, इसलिये पर उसे तमरूप मान याचौर उस भाविध वनुसरण करके हो जायका पी सरित होता है, इस कारण या द्रम्प-कर्मको वर्गणा पण करता है। भाकिया-कर्म तो पारे, तोप पा समय सकता है कि इस गीतको मुझे इस तर म देना है, अपचा उस सापसे परिणमन करना है। इसलिये गौर कर्मका मोठा महो सकता। -गौष वपने सम्मके बहानसे दो कर्मका कर्ण है।तपा 'यो बानमा पत- समाधान भीमद् पवन मस्म है, पापानको निमी कम्पना है, और उस कल्पनाके मुसार ही उसके पार्य-समान तति होती है, क्या उसके मुरूम हो उसको सामका परिणमन होता है, और इस कारण प सम्पर्मइस पुलकी वर्गमाको प्राण परता है। पर सपा समने नहीं, मीच साप फर पाप । एम अमानुम कर्म, मोकापर्प नणाय || ८३ ॥ बार और बपत स्वर्य नही जानते कि हमें इस पापको फल देना है, तो भी यो गोत्र ठमें भाता है उसे उनका पर मिला है। इसी क्यम-मसुम धर्म पापि यह नही चानते कि हमें इस चीनको पर फर देना है, ये मी प्रण करनेवाम गौर पार मार बस्तके फम्मी तय कर्मच फल प्राप्त करता है| पार वर बसत स्वयं या महीं मानते कि हमें सानेपाको पस्प और मि मिती है, परत से उने प्रण करनेवाको समाक्से ही उनका फल मिक्ता है, उसी तय बातमें पुम-बम कर्मका परिणमन ऐता है, और उसका प्रा मिन्ता है। इस तर पार कर्मका मोका समतले मात्र है। एक रोकी एक भूप, ए मादि में भेद । घरण बिना न कार्प , एन गुमाश्म प ॥ ८ ॥ एक रको और एक पणा ,स्पावि प्रकार से मारता, उपता, फुलापता, मुरूमवा वादि पासी विचित्रता देख पाता है, और इस प्रकारका मो भेद है सबको समाम नही हता-पाही पाकको फर्मका मोस्कृत सिर करता है। योनि कारण के बिना कार्यको उत्पति मही होती ।। पदि उस भुम-अशुभ कर्मका फर न होता तो एक की और एक रानापारियो भेद है, हम होना चाहिये । पोजि गांवल पर ममुप्पल वो सम्म समान है, तो फिर सबको समास मी समान ही होना चाहिये । इसशिप मिसके कारण ऐसा विचित्रवाये माश्म ऐतरे ही पुभामुम फर्मस उत्पम मा मेद है। क्योंकि करमके बिना कार्पको सपनि महाँहोती । इस तरा पुम बौर बाम धर्म मोगे पाते। फन्दावा चरवनी, एमा मयी बम । पर्म समारे परिमम, पाप मोगपी र ॥ ८५॥ इसमें साताबरको कुछ मी बरत नापार और मतको तय मागम कर्मका मी समातसे ही मिला दौर से मार और मस्त निसल हो बानेपर, फल देनेसे लिए हो पाते है। उसी प म गएम कर्मके भोग नेसे कर्म भी निःसन हो पानेसे निशान हो जाते है। पर भरमसे पर देता है और अमृत पतस्मसे फल देता है। उसी तय नाम कर्म माम स्मसे पर देता है और एम कर्म गुमापसे देता है। इसलिम गोल से पैसे बम्पसा- पसे बर्मको मरण करता ६ से पैसे पिाकससे कर्म मी पर देता है।वपा जैसे कार मोर करत फा देनेके पार ARो गावे , सौ तप कर्म मी मोगसे रो पाते हैं। ।
मास्मसिद्धि से मौम्प विषेषना, स्पानक द्रम्प समाप । गान पाव छे शिष्य मा, कही संसपे साप ॥ ८६ ॥ उकर तुम अभ्यासाय ठकर शुभ गति है, और उप मशुम अभ्यासाय ठरहाट मशुम गति है, प्रमानुम वप्पपसाय मिन गति है। वर्षात् उस जीपके परिणामको ही मुन्सरूपसे गति कहा गया है। फिर भी उत्कृष्ट शुम दम्पका तर्षगमन, उतर बशुभ दम्पका वयोगमन, धुम-बसुमको मप्य स्थिति, इस तर सम्पन्न विशेष समाव होता है। तपा उन उम कारणोंसे वैसे ही मोम्पस्पान मी होने चाहिये । रे शिष्य ! इसमें बरतनके स्तमाल संयोग बादि सूक्ष्म स्वरूपका पावसा विचार समा गाय सम्पेि पायात गहन है, तो भी उसे बापत सोपमें कही। शका -पदि ईयर कर्मका फल देनेवाग न ऐ वषषा उसे जगत्का की म मानें, तो मी मोगनेके विशेष स्थानक-नरक मादि गति आदि स्थान—कसि हो सकते है ! क्योंकि उसमें तो ईमरके फलस्वको भावश्यकता है। समाधान -मुन्यरूपसे तो उलए शुभ वप्यपसाप ही उहए देवगक है, उकस बानुम बम्प- साप ही उतर नरक है, पुम-बम बम्पसाय ही मनुप्प-निर्यच मा गतियाँ है। व्या स्थान विशेष-उलोकमें देवगति-स्यादि जो मेद है, वे मी बीचोंके कर्मदम्पके परिणाम-विग्रेप ही है। पर्पत में सब गतियाँ जायके कर्मक परिणाम विशेप आदिसे हो समय है। या गात गात गहन । स्पोंकि अधिनस्य गीन-चार्य बौर मचिस्प पुद्र-सामर्पके संपोग- विशेषसे होकका परिणमन होता है। उसका चार करनेके लिये उसे वधिक विस्तारसे प्रता चाहिये । परन्तु पाँवो मुम्परूपसे बारमा कर्मका मोय है, इक्ना मक्ष करानेका अभिप्राय होनेसे । सपनको भयंत सक्षेपसे कहा है। ५५का-सिप्प समापा- शिप्प करावा है कि जावको उस कर्मसे मोह नहीं है:- कर्चा मौका मीर हो, पण देनी नहीं मोक्ष । पीस्पो कास मनंत पण, वर्षमान दोप ॥ ८७॥ गौर कर्ण और मोळा मठेही, परस्तु उससे उसका मोश हो सकता है, यह पत महा है। क्योकि वनका बीत गया तो मी नमी बार कर्म करनेहप दोष विपमान 01 शुम करे पळ मोगरे, देवादि गवि माप । माम करे मरमादि फन, कर्मरहित म बाप ॥ ८८ पदि गौर एम कर्म करे वो उससे गा देव वादि गतिमें उसके शुम फसका मोग करता है, पौर परि माम धर्म करे तो मानरक मारि गतिमें उसके माम प्रसका मोग करता है, परस्त दिमा मी नगह पार कर्मपदित नहीं होता । समापान-सहर पपाषा- मगर सपापान करते हैं कि उस कमसे गौरको मोश ऐ सकती है- सकता है, और भीमद् पस्चर मेम शुमाशम कर्मपद, माम्यां सफर ममाण । देम निरपि सपळवा, माटे मौस मुबाम ॥ ८९ ॥ मिस वप ले चापको गुम-मनुम कर्म करने के कारण गीतको कोका कर्म, बौर पर्चा होमेसे उसे धर्म मोळा समधा है, उसी तय उसे म करनेसे वपमा सस कर्मको निधि करमेसे उसको निति मी होना समय है। इसठिये उस नितिका मी सफम्वा वर्षात् मिस तय शुम्माम कर्म निपस नहीं माता, उसी तर उसको मिति मा निधार नहीं जा सकती। इसलिये विपक्षण या विचार कर कि उस निविस्म मोक्ष है। पीस्पो कान मन, कर्म शुमाराम माप । वेर मुमाराम दवा, उपमे मोम समाप ॥९॥ कर्मसहित नो वर्नतका पीत गपा—ा सब सुमाग्नुम कर्मके प्रति गौरको मासक्केि करम हो पाता है। परन्तु उसपर उसीन होनेसे उस फर्मक प्रमका सेवन किया उससे मोम-समार प्रगट हो सकता है। देशदि संपोगनो, मास्पैविक पियोग । सिद मोम शासवपदे, निम मर्मत पुलमोग ॥ ९१ ॥ देशवादि संयोग मनुस्म्स नियोग तो होता होता है, परन्तु पनि उसप ऐसा रियोग रिया बाप कि फिरसे प्राण न हो, तो सिदतरूप मोश-समाष प्रगट हो, और हालत परमें अनंत वास्मानन्द मोगनेको मिले। ६का-पिप्प पापा- शिष्य करता है कि मोषका उपाय नहीं है- होप कदापि मोसफ्द, मही मनिरोप पाप । फर्मों पर मनवना, भावी पो बाप । ॥१२॥ कदाचित् मोध-पद मी परम्त उसके प्राप्त होनेका कई वतिरोषी बार मिस्से पापातप्प प्रवन्ति हो, ऐसा कोई उपाय मात्राम नही क्योंकि बनतका के गो पर्म बाप मायुको मनुप-गस फैसे परम किये जा सकते हैं! अपना मत दर्सन पा, को पाप ममेर। देपा मव सानो कपी बने म पर पिफ ॥ ९३ ।। अपका सावित मनुप ऐदको काप बापु संगैहली शंका छोर मोरे, तो भी ससारमें अनेक मत और दर्शन और मासके भनेक उपत्य खते हैं। वर्षात् को पता है और कई कुरा वारि उममें नप्ता मत समाविक होना कठिन है। फपी माविमा मौसकपा पा मोस! पनी निपप मा बने, पणा मेद प दीप ॥ ९॥ प्रामण भारि मिस पानिमें मोशी, पपना किस से मोक्ष है, इस मिथप ऐना + मास्मसिदि कठिन है । क्योंकि से मदुतसे भेद है, और इस दोपके कारण मी मोसका उपाप प्राप्त होने योग्य रिपाई नहीं देता। वेपी एम जणाय ऐ, मळे न मोस उपाय | मीनादि नाण्यातणा, मो उपकार म याय ॥ ९५ ॥ इससे ऐसा मालूम होता है कि मोक्षका उपाय प्राप्त मही हो सकता । इसलिये जोर आदिका साप माननेसे मी स्पा उपकार हो सकता है! अर्थात् मिस पदके लिये इसक नाननेको बावश्यकता है, उस फ्का उपाप प्राप्त होना असंभव दिखाई देता है। पचि चचरपी ययु, समापान सोग । समर्नु मास-पाय धा, उदय उदय साग (ग्य ) ॥ ९६ ॥ बाफ्ने गो पाँच ठर को, उमसे मेरी शकामोंका सांग--सम्पूर्ण सपसे--समाधान रो गया है। परन्तु यदि में मोशका उपाय समक्ष हूँ तो मुन्ध सम्झाम्पका उदय-मति उदप-हो । (यहाँ ' उदय' 'उदय' शर जो दो बार कामा पाँच उतरॉके समाधानसे होने बाम मोशपरकी निवासाकी तीब्रता दिमाता)। समापान-सद्गुरु उमाप:- सार समापान करते है कि मोशका उपाय है- पांच चरनी ी, मात्मा निपे प्रतीत । पाचे मोक्षोपापनी, सान प्रवीव ए रीत ।। ९७ ॥ विस वय तेरो बारमा पाँच उत्तरों की प्राति हुई है, इसी तर मोशके उपायकी मी तुझे सरहा प्रताति हो जापगी । याँ होगी' और ' सार ' ये दो घरद यो समुम्न फहे हैं, वे इसठिये करें रिसे पाँचों पोको शका निच दो गई है, उसे माशा उपाप समझाना पुए भी फटिन मही है, तथा उसमे शिष्यही विशेष शिवाप्सामहिके कारण उसे ममय मोशोरायका ठाम होगा-पर सारके पानमा वाशप है। कर्मभाष अमान 0, माझमार निमपास | मंपकार ममान सम, मारा मानपारा ॥२८॥ यो कर्ममात है वही जातका बानी और गो मौनमार है बड़ी मात्र निय समपमें स्थित साना है। वासका समाव पारफे समान है। इस कारण जिस तरद प्रकाश हारर दान अपघर होनेपर मी नाश हो माता, उसी तरहशनका प्रकाश हानेर भान मी मर दो गाता है। मेनपारण पिना, रबपना पप । वारण पदक दवा, पाप भरभम् ॥ १९॥ गोजो एम-परणार रे सा पर्मनरके मार्ग ३ भार उन मा पारतोय टेन रने योग दही मोशाय -माया। .
ता विमाष ममादिमी, मान पा र पाय ॥११॥
Komमौनीनेभरममारमान शिवा३और उसरकारमा पर
पवरकी शोधमें बताए।
उस विशाम भीषको पदि साम्का उपसमिमा बम
मा और दमिका बामद छोपकर नो समको मर्म रममा
पहा बाम-समाषका अनुभव पौर प्रतीति रहतीसा
बस समफित, ममता भारासे हास्य शोकवादियो करबापाने
सदय पार पारिबना, पीवरामपद पास । ११२॥
रना उसे र करवा और उससे समान-समाधिरूप पारिका व पेज
पोसबाभारास व बारम-समानामसंड-जो कभी मौसतिरोप
करियरमान देदर एका मिपाम ॥ ११५॥
भाशप-ऐसाजान गवारे, उसे केवमान प्रतेस क्षेत्रमा प्रतिमा
पमान पमेश मी सार औषमुळ साप निर्माण पहीपर मनुममें पायी।
कीटि पर्नु स्मप्न पण, नायव पर्वा माय।
गेरोगसम मीसितब जापत होनेपरवरती धागो,
१-२८मापार को दिरोगापाताल
m-भावजाममा परिबाबामे माना गाया मारोग
मी रामान
मस वर्षन आमा वनी, पचें सामा।
सो शुद्ध समकिया है, या भेद न मम ॥ ११
करता है जिसमें कोई मी भेद और पथ नही।
पर्व निमसभागनो, मनुभव सा बतीत ।
पि पो निममापी, परमा समीत ॥ १११ ॥
पर्पमान समकिन ई, यो मिप्यामरस ।
मगदेबके सरप पौतगपदमें स्थिति होती है।
पिन निमसभापत, मसर पर्चे गान ।
होती. ही परमार्यसे सममित्त होता है।
मोबाPRITHVANITnd tो माता।
राप्पास तो, महीपर्चा दुर्म।
मी पाना मी, ए, पर्मनी मर्म ।। ११५॥
* मो0- धर्मपम ।
पसी पोnbian
बामप्रसापि मम॥१६॥
भारमसिदि
करना
.
रवको रोकना है, यह वर्म-दशाफा मार्ग है। यह मार्ग परलोकमें नहीं परन्तु यही मनुमय वाता
है, तो इसमें फिर क्या सोर
गरी मत दर्शन वणी, मारह सेम सिफस ।
कामो मार्ग मा सापभे, जन्म होना अस ॥१०५॥
यह मेरा मत है, इसलिये मुझे इसी मसमें ब्गे गना चाहिये; भयमा यह मेरा दर्शन है, इस
किये चाहे निस तरा भी हो मुझे उसीकी सिद्धि करनी चाहिये—इस वाणा अयमा विकम्पको
मेहकर, ऊपर कहे हुए मार्गका नो साधन करेगा, उसके उत्प ही भव बाकी समझने चाहिये ।
यहाँ 'मन्म' शम्दा चो पशुगमनमें प्रयोग किया है, वह पही बताने के लिये किया है कि
भित् वे साधम अप्रे ये हो भपता उनका जघ्न्य या मध्यम परिणामोस बागमन हुमा हो, तो
समस्त कर्मा य न हो सकनेसे दूसरा बम होना समय है, परन्तु ये मम बात नहीं बहुत ही
पाा वेग । इसलिये 'समकित होनके पचात् पदि बादमें नीव उसे बमन न करे, तो अधिकसे
भबिक उसके पन्दय भव होते है, ऐसा बिनमगवान्ने का, तया ' शो उकएतासे उसका
बापनम करे उसकी उसी मबमें मोच होगाती २'–पहाँ इन दोनों बातोंमें विरोध मही है।
पदपदना पसभ में, पूछपा करी विचार ।
है पदनी सोगवा, मातमार्ग निरपार ॥ १०६ ॥
हे शिष्य ! दने को विचार कर र पदके एस प्रश्नोंको पूँण है, सो उन पदोंकी सांगता हो
मोश्मन है, ऐसा निश्चय कर । अर्थात् इनमें किसी भी पदको एकातसे अपना भविषारसे उत्पापन
-
करनेसे मोधमार्ग सिर मही होता ।
मावि अपनो मेद नहीं, कपो मार्ग भा होय ।
साप से मुक्ति मा, एमा भेद न कोय ॥ १०७ ।।
यो मोशन मार्ग कहा है, पदि यह मार्ग हो, तो चाहे किसी मी आति अपना बेपसे मोक्ष हो
सनी है, इसमें कुछ भी मेद नहीं । जो उसकी सामना करता है, यह मुष्टि पदको पाता है। क्या
समोश दूसरे किसी भी प्रकारका मना मादि भेद नहीं है। मपणा या मो पचन कहा है
उसमें दूसरा काई मेर-फेरफार नहीं है।
कपायनी रपसावता, मात्र मोत-अमिसाप ।
मसे सद भवर दया, से फरिप मिमास ॥ १०८॥
कोष बादि कपाप मिस मन्द हो गई है, मारमामें केवल मोन होने के सिचाप त्रिसको
बर्ष मी त्या नरा, और सारक मागप्रति मिसे सीनता गती है, क्या अतरंग
प्रानिपोके आर पिसे यया यता, उसमा मोशमार्ग मामु कहते हैं, अर्थात् यह बात
मर्ण प्रान करने योग्य है।
६ मियाम मीरन, पाय सहुरुषोप ।
वो पामे समावन, प अंतोप ॥ १०९ ॥
1 भीमदत्यचन्द्र [१॥ राग देप महान ए, मुस्प कर्मनी प्रेप । पाय निधिपापी, वेज मोसमी पंप ॥ १..॥ मा रेप पर मानही एकता हो की मुख्य गोठ । इसके बिना बर्मका बप नही होगा। उस निति निस्से दोपही मोक्षका मार्ग है। मात्मा सन पैन्पमप, सीमासररिव । भवी पर पामिपे, मोमपंप के रीव ॥ १०१॥ 'सत्'- अविनाशी, पम्पमय-समारने प्रश करमेस्म समानमयअदि म सर्पविभाष और दो मारिय सभोगके वामाससे रहित, तपा केरा-बायको प्रत करना, उसकी प्राप्तिके लिपे प्राप्ति करमा, यहां मोगका मार्ग है। कर्म मनः मकारना, वैमा गस्प भार । मा मुस्प मादिनीय, हणाप है कई पाठ ॥१.२॥ कर्म बनत प्रकारके , परन्तु उनमें पानातरण माहि मुस्स वाठ भेद होते है। उसमें भी मुरूप कर्म मोहनाप कर्म है। जिससे पा मोहनाप कर्म माश लिमा गाय उसका उपाय करता। कर्म मोरनीय भेद , दर्शन पारिभ नाम । हने बोय मीतरामवा, मचूक पाप माम ॥१०॥ उस मोहनीय कर्मके दो मेर। एक दर्शनमोहनाप और दूसरा चारित्रमोहनीय । परमार्थ पपरमार्प मुनि और भरमापम परमार्थ विकनिमोहनीय का है और तपारूप परमार्थप्रे परम्म मानकर मामस्वमानमें जो स्पिरता हो, उस स्पिरवाको निरोप करमेबारे पूर्व सत्ताकपा और मोकपापको पारिश्रयोदलाप । नामयोग दर्शनमहिनापका बार मौतरगता चारित्रमोहनापका मान करते हैं। ये उसके मक उपाय है । पोकि मिप्याबोध दर्शनमोहमीप । र उसका प्रतिपक्ष सम-बालबोध । तथा पारिश्रमोहनाप मी पण मा परिणाम सम प्रतिक मतगमार है। पर्चा मिस तय प्रकाशके दो से पका नए दो नागा है- रामा मनूक उपाप है-उसी गण बोर और मावा ग्नुमसे दर्शनमोहनीय और चारित्रमोहनापल्मकार र परमेमें प्रश सस्म । इसलिये में उसके बाद उपाय। कर्मयोपादिपी, एम क्षमादिर। मस्पम भनुमप सपने, एमा सो सन्दर। ॥१०॥ शेष बादि मासे और भाMR HIGH नाश हो गया है। भर्षात् पम्प रखनेस ग्रेप ऐसा सो सरासे माया को पा सकती है, सोपसे प्रेम पेन गा सकता है। इसी तर ति मति मारिक प्रतिषसे में सब दोष के सकते है। की का विष , और को समाप है। या इस बात का सपो प्रपञ्च अनुमा ।। का समसामादि कसे पाया है, और जो कर्म के 11 भारमसिरि बध रोकना है, वह कर्म-दशाका मार्ग है। या मार्ग परोक नहीं परन्तु यही वनुमममें माता इसमें ति क्या सह करना ! छोरी पद दर्शन वणो, मारह वेम सिकल्प । कसो मार्ग मा साप, मन्म देहना अस ॥ १०५॥ यह मेरा मत है, इसलिये मुझे इसी मतमें छोयना चाहिये, मथवा यह मेरा दर्शन है, इस लिये चाहे किस तरा भी हो मुझे उसीकी सिद्धि करनी चाहिये-इस थापा अपवा विकल्पको मोरकर, ऊपर कहे हुए मार्गका जो साधन करगा, उसके मप ही मन बाकी समसमे चाहिये । यहाँ 'जन्म' शब्दका नो गावचनमें प्रयोग किया है, वह यही बताने के लिये किया है कि पवित् वे साधन बने ये अपया उनका मान्य या मध्यम परिणामस भागधन हुआ हो, तो समस्त कर्माका धप न हो सकनेस दूसरा नम होना समप है, परन्तु ने भन्म बहुत मही-पात ही पात्र होंगे । इसलिये 'समकित होनेके पपात् यदि बादमें बीब उसे बमन म करे, तो अधिकसे वधिक उसके पन्दप भा होते हैं, ऐसा जिनमगवान्ने का', तथा · जो ठकपतासे उसका यमन करे उसकी उसी मवमें मोक्ष हो जाती है। यहाँ इन दोनों बामि बियेप नहीं है। पट्पदना पसभ , पूछो फरी रिचार । वे पदनी सोगवा, मोक्षमार्ग निरपार ॥ १०६ ॥ हे शिष्य ! तूने जो विचार कर स पदके स प्रोंको का है, सो उन पदोंको सांगवामें हो मोबम्पर्ग है, ऐसा निमय कर । अर्थात् इनमें किसी मी पदको एकातसे वयका मविचारसे उत्यापन करनेसे मोशमार्ग सिए नहीं होता। मावि वेपनो मेद नहीं, यो मार्ग मो सेप । साप वे सक्ति गो, पा भेद न कोप ॥ १०७ ॥ मो मोशका मार्ग कहा है, परि या मार्ग हो, तो माहे किसी मी माति नया बेपसे मोक्ष से सकती है, इसमें कुछ मी मेद नही । जो उसकी साधना करता है, यह मुछि-प को पाता है । तथा उस मोमें दूसरे किसी भी प्रकारका ऊंच-नीच मादि भेट नहीं है । वयमा यह नो बधम कहा है उसमें रमय कोई मेर-फेरफार-मही है। कपायनी उपांववा, मात्र मोक्ष-अभिसाप । मर सद भंवर दया, से फरिय निमास ॥१०८॥ प बादि पाप निसको मन्द होगा, मामा का मोश होनफे सिप निमकी सप कोई मी रडा महीमा समगोकप्रति मिसे वासीनता एती है, तथा मतरंगमें मानियोके उपर रिसे दया HINोधमाका काम ते है, अर्थात् मार र्णध प्रसकामे पोम्प है। व निमासु मीरन, पाप सनुरुषाप । हो पाम समावने, पर्चे भवराप ।। १०९ ॥
भीमा रामचन्द्र उस मिाम मौवको यदि सहरका उपरे मिक माय तो वह समक्तिको पा गातार बोर बतरकी शोभमें पता। मव दर्षन माना वमी, पर्च सहरुसक्ष सो शुख समफिन वे, मेमा मद न पस ॥ ११० ।। मत और दर्शनका वामा मेहकर वो सगुरो सक्षम रस्ता है, पर शुम समतिको प्राम करता है, जिसमें कोई भी मे वर पक्ष नहीं है। बचें निमस्तमापनी, मनुमर सक्ष मवीव । पचिपा निगमाषमा, परमा समीत ॥ १११ ।। वहाँ वात्म-समारका मनुभव मध और प्रतति यती है, तथा वाम-समाव पति प्रचारित होती ही परमार्थ समविस होता है। पर्षमान समषित , यो मिप्यामास । दप पाय चारिमनी, पीवरागपद पास ॥ ११२॥ मा समफित बहता पारास हास्प शोफ मादि यो कुछ बारमा मिप्या मामास माश्म एषा है उसे दूर करता है, और उससे स्वमान-समारिम्स चारित्रका उदय होता जिससे समस्त राग-नेपफेसपस्वरूम वीतरागफल्में स्थिति होती है। देवळ निमस्समार, नर्सर पर्चे भान । कहिये फेममान वे, का निर्माण ॥ ११३ । यहाँ सन लामाससे रहित बारम-स्वमाक्का असरबो कमी मी संहित महो- नाश न हो-प्सम बान यता है, उसे केवमान करते है। इस केपणानके प्राप्त करनेसे, शके नियमान बनेपर मी उत्तम सातामुछ दवाइप निर्माण पहीपर बनुभम भाव। कोटि पर्प साप्न पण, मानव पर्चा पमाप । वैम पिमाष मनादिनी, शाम पा र पाय ॥ ११ ॥ करोगों का स्वप्न मी मिस तय नामत ऐनपर हरतो शन्त हो जाता है, उसी तय गो बमादिप तिमात्र हैमा मामानके होते ही दूर हो जाता है। से देशप्पास तो, नहीं फर्चा दर्म। नहीं मीका दानी, एम धर्मनो मर्म ॥११५॥ हेमीप दो मोबाने नाममा मान मिा और उसके कारण -पुत्र बाद सममें जो सामान-मनमान-पता है पर मरममात्र परमात्मा हो माना गाया बोर गोपशामास है हमें बाम-गुदि भार भारमा रेहपुति है-र हो बापत् कर्म का मी महाँ, और मो मी नाही –ी धर्म मर्म है। एक पर्मपी मोम मे मीससस्म । मनद दर्शन शाम , मम्पावाप सम ॥ ११९ ॥ - - मद महो- १. ] भारमसिरि इसी धर्मसे मोझ है और तू ही मोक्षस्वरूप है, मर्यात् शुद्ध बारमपद ही मोक्ष है। गर्नबान दर्शन सपा चम्पावाघ सुसस्वरूप है । शुद्ध मुद्ध सन्पपन, स्वपज्योति मुलपाम | बीमु कहिये फेटलं कर पिचार वा पाम ॥ ११७ ॥ व देह बादि सब पदार्थोसे जुदा है । वामद्रम्प न किसी दूसरेमें मिस्ता भौर न बात्मद्रव्यमें ई मिठता है । मास एक ब्रम्प दूसरे दम्पसे सदा मिम है, इसलिये तु शुरबोध स्वरूप है- कैप-प्रशामक है-स्वप-योति है तेरा कोई मी प्रकाश नहीं करता-तू खभावसे ही प्रकाश सरूप है, और कम्पाबाध मुसका घाम है । अधिक कितना करें। बधिक क्या करें ! सक्षेपमें इतना रते है कि यदि विचार करेगा, तो तू उस पदको पावेगा। निमय सर्ने हानीनो, मागी मम शमाप । परी मौनवा पम कही, सहनसमापि माय ॥ ११८॥ सब बानियोंका निश्चय इसी भाकर समा जाता है—पा करकर स्मुरु मौन धारण करके- पचन-योगका प्रवृत्तिका त्याग करके साम समाधिमें स्थित हो गये । कपन-- सद्गुरुना उपदंशयी, भाम्पु अपूर्ण भान | निमपद निम माही सा, दर पर्यु भान ॥ ११९ ॥ शिष्यको सद्गुरुके उपदेशसे अपूर्ण-यो पूर्वमें कमी मौ प्राप्त न हुमा हो -भान एमा उसे निवका स्वरूप वपने निबमें बैसाका सा मासित हुमा, और हमें बारम-पुद्धिरूप उसका बहान दूर शिम्प-गोपनीम-प्राप्ति गया। मास्य निमस्मरूप से, गुद चेतनास्म । मगर भमर भविनाशी ने, देशातीत स्मरुप ॥ १२ ॥ एमपना निजका सहप शुद, वन्यस्वरूप, धनर, अमर, अविनाशी वौर देहसे स्पर मिम मासित मा। की मौका कर्मनी, पिमाष पर्चे ज्याप । चि नही निममाषमा, पयो मार्चा स्पाय ।। १२१ ॥ हो निमाव-मिप्पात-पाता है, वहीं मुस्पनपसे कर्मका कापन वीर मोठ्यपन है, भाम समाबमें प्रति प्रवाहित होनेसे तो पानी भकर्ता भाता है। भपमा निमपरिणाम ने, शुब पवनास्प । का भोका बानो, निकित्सस्सस्प ॥ १२२ ।। अपना घर तपस्सम गो बारम परिणाम. पी. ठसका निर्षिकम्प सरपसे का और मोहै। मोस कमी निमशुदवा, ते पामे वे पंप । सममाम्पो सोपा, सकर मार्ग निर्मन्प ॥ १९३ ।।
भीमद् रामचन्द्र वात्मा यो एस्पद है यही मोक्ष और मिससे पर मोच मात्र किया बाप प्रमोशन म्पर्ग है । मौसागुरूने रूपा करके निर्मन्यके सकल मार्गको समझाया है। मो! मही! मीसहर, करुणासिंघु अपार । या पामरपर प्रा फर्यो, मही! महो! पपकार ॥ १२ ॥ महो! बो! काणाले धपार, समुदस्वरूप, भात्म-ममीसे पुठ सद्गुरु ! बाप प्रमुने इस पामर पापफर वाम्मर्पबमक उपकार किया है। शंभर परणकने पर! मास्मापी सौ पनि । देवी प्रसप मापिपा, गर्नु परणापीन ॥ १२५ ॥ में प्रमुके घरगोंके समय क्या रस्त ! (गुरु तो पपपि परम निकाम है--एकपात्र निकारण करणारे ही उपरेयके देनेबारेपरत शिप्पने शिष्यधर्मसे ही पापचन करा)। बगत्में बितनेमर पाप , वे सा वामाको अपेक्षासे तो मत्पन हो। फिर उस बात्माको । निसने प्रतान किया है उसके परमोंके समीप में दूसरी और क्या मेंट रम् । में केवळ उपचाप्से इतना ही करनेको समर्प ! कि मैं एक प्रमुके परोक ही वापीन । मा दादि आमपी, बर्षो मसभापीन । दास दास दास, देह प्रसना दीन ॥ १२६ ॥ इस येह वादि शम्से वो कुछ मेरा माना जाता है, या बायसे सार प्रमुक बाधीन यो। में उस प्रमुका दास-दास-दौन दास है। पद स्पानक सममापीन, मिम पवाम्मी माप । म्पानवकी वरपारपत् , प उपकार ममाप ।। १२७ ॥ हे गुरु देव ! म स्पानोंको समसार, मिस तण कोई म्पानसे मारको कम्ग निहार' बताता है उसी तय बापने देह बादिसे बारमाको स्पर भिम बताई है। इसलिये वाफ्ने मेरा वसीम उपकार किया है। उपसंहार- वर्षम पटे धमाप , मा पट् स्पामक मांदि । विचारा पिस्वारपी, सनपरोन कार ॥ १२८॥ मों दर्शन न न स्पानों में समाविको गाते हैं। इसका निरोपल्मसे विचार करनेसे इसमें किसी मा प्रकारका सेशप नहीं बनाता। भास्माविसम रोम नहीं, सनुर पैप समान ! घरमाकासम पप्प नहीं, भोपप रिचार ध्यान १२९॥ बात्माको यो अपने लिय स्वरूप मान नहीं के समान दूसरा कोई मी रोग नहीं, सहरके समान उसच कोई भी सवा नपा निपुण + मही, सटरको बाधापूर्वक चम्के समान दूसरा कोई मी पप्प नही और चार तपा निरिम्पासनके समान उसकी दूसरी कोई मी वायपि मा। जो इण परमार्प दो, परी सत्प पुरुषार्ष। मास्पिति मावि माम मग, दो नहीं बारमार्य । १३.p मास्मसिदि , पदि परमार्पकी इच्छा करते हो तो स्वा पुरुषार्प मये, और मवस्थिति पारिवा नाम वामाका छेदन न करो। निधयवाणी समिळी, सापन वनपा नोय । निमय राखी समां, सापन करपा सोय ॥ १३१ ॥ बामा बध है, मसग है, सिर है, इस निषय-प्रधान बाणाको मनकर सावाँका करना योग्य नहीं । परन्तु तपादप निमयको पक्ष रसकर साधन जुटाकर उस निश्चय सर प्राप्त करना चाहिये । नय निषय एकोपी, मामा नयी कोछ । एकदि म्पनहार नही, बो साय रोस ॥ १३२ ॥ यहाँ एकतिसे निश्चयनयको नहीं कहा, वका एकांतसे म्याहारनयको भी नहीं करा । यो याँ नहाँ निस विस तरह घटते है, उस तय साप रते हैं। गामवनी के फरसना, वे नहीं सहयवहार । मान नहीं निमम्पन, निषय नहीं सार ॥ १३ ॥ गा-मतको यो कस्पना है, पर साबणार नही, किन भारमापकि सण को जामौर मोशाके उपायमें निवास के गे भक्षण भादि को , हो सापपार है, उसे सोपसे बानीको अपमे स्वहसका तो भान नए-मिस तप देश भनुमपमें माती है, क्यवारमाका अनुमत्र तो पुमा नहरी-बकि दहापास ही पता है और यह राम्प माद साप प्रत लिपे बिना ही मिश्रय मिपय पिलाया करता है, किन्तु पानिधय सारमूठ ना है। बागल मानी पी गया, पर्चमानमा होप । पाच काळ मरिष्यमा, मार्गमद मी कोय ॥ १२४ ॥ भवका में गोशानी-पुरुष हो गये है, वर्तमामकामें नो मौरी वीर मरिचका में कोई उना किसीका मा मार्ग मित्र नहीं होता, मात् परमासे उन सबका एक ही मार्ग है। भौर पदि मार करने योम्प पशरको, उसी परमार्थक साभकरूपसे देस काल मादिके कारणमे पूर्णक। हो, तो मी पर एक ही फको उत्पम करनेवाण है, इसलिये उसमें परमार्थ भेद महा। सर्प भीम सिद्सम, मे सममे के यार। सहरुमागा मिनदया, निमिच फारण माय ॥ १५ ॥ सब बायोमे सिब-सा समान है, परन्तु वो उसे ही प्रगट होती जो उसे समझना उसके मगट होने में सहरुका मासे प्रति करना चाहिये, तपा सहरसे उपदेश को हुई निम विचार करना चाहिये होनों ही निमित कारण है। पादाननं नाम , ए में तमे निमित्त । - नतिरियत १२१ भीमद् रामचन्द्र उसके उपादान कारण है-ऐसा शाब में कहा है। इससे उपाानका नाम लेकर मो कई उस निमिपच स्पाग करेगा सिदत्वको नहीं पा सकता, और पा भन्तिमें ही या करेगा। स्पोंकि वाममें उस उपाशन म्पास्मा सो निमिचके निपेश करनेके लिये नहीं की। परन्तु शासकारीबी Tई उस म्पासात पही परमार्पक उपर नके बमाप्रत रखनसे सवा निमित्त मिस्नेपर मी काम मोगा, इसध्येि निमिव मिझमेपर उस निमित्त बान सेकर उपा नको म्मुन्न करना पाहिये, और पुष्पार्थहीन न होना चाहिये । मुखपी शान कपे पन, मंवर एमओ म मोह। ते पामर प्राणी करे, माम मानीनो द्रोह ॥ १३७ ॥ यो मुससे निश्चय-प्रधान बचनोंको काता , परन्तु बरसे जिसका अपना मोर क्या नही, ऐसा पामर प्राणी मात्र केवमानी सम्पानेको कामयासे हो सानी पुरुपका मन करता है। दपा प्राति समवा क्षमा, सस्प स्पाग बैराम्प । हीप समपद्यपि, पर सदाय मुमाग्य ॥ १३८ । रया, शांति, समता सम्प त्याग, गौर रैम्प गुण मुमुमुके पटमें सराहो मानव पते पारस गुणोंके बिना तो मुमुक्षुफ्ना मी नहीं रोता । मोहमार मय होय ज्यो, मपया होप मात । कहिये शानी दमा, बाकी कार्य भ्रांत ।। १३९॥ यहाँ मनभावका सय हो गया , अपना यहाँ मोह-दशा श्रीण हो गई हो, उसे पानीको दण करते है और नही तो बिसने अपने में हो जान मान लिया हो प तो केवल भाति हो। सफल नगत् एप, मनपा समसमान । हे करीये शानीवशा, पाकी गावापान ॥ १० ॥ समस्त जगदको बिसने उभिए समान समया है, अपना बिसके शानमें जगत् सप्नके समान माझम होता है, पानीको दशा बाकी तो सब फेमस पचनमान मात्र कपन बम-। सानक पांच विपारीने, पर्चे मा। पामे स्पाना पाई, एमा नहीं सदेह ॥ १५१॥ पात्रों को दबारकर गो गो प में प्राप्ति करता है-यो मोषके उपाय उपरो, उनमें प्राधिकरता है-प पाँचों स्पानक मोक्षपदको पाता। दहमा भनी दवा, बचें देहावीत । वेदानीमा परणा, रोदन नगमिव ॥ १२ ॥ मिसे पूर्ण प्रारम्पक पोगसे देह एनेपर मी विसकी सा उस से बतात-देह मारिधी सामनाणीव-भामामय पता है, उस माना-पुरुष के परफ-कम में बगपित बार रन ऐश्म हो! भीमाापरणार्पणमस्तु ।
विपिप पम मावि सभा-या पर्व ६६१ चौरको बसमके मुल्प दो हेतु है-ग और देष । एमके अमावसे उपका बमार होता है। एम मुस्प है। रागके कारण ही मारमा सयोगमें दमय रहता है। भी मुस्परूपसे कर्म है। ग्यो म्यों माप मद होते है पो स्पों कर्म-ध मी मद होता हैऔर म्याग्यों राग-द्रप तौर होते यो स्यों कर्मबंध मी तीन होता है। मोराग-रेपका धमाल है यहाँ कर्मभका सापरायिक ममा है। राग-रेप होनेका मुख्य कारण मिप्याय-अमुम्यग्दर्शन है। सम्पग्णानसे सम्यदर्शन होता है, उससे भसम्यानिकी निति होती है। उस चीत्रको सम्प- चारित्र प्रगट होता है। वही पीतरागदशा है। सम्पूर्ण पावरागदशा बिसे पता है, उसे हम घरमशरारी मानते हैं। ६६२ परिहाण विमुके, दिम सिरिसदमाणमिणपदं । xसिरिवीरमिणं दिम, कम्मपिमार्ग समासमो पुछ। कोई मिपण हेमति, भर्ण तो मम्मए कर्म ।। +कम्मद समं, संमोगा मा होई मीपस्स । सोपी णायमो, वस्स पियोगी मप मोक्म्पो॥ ६६३ नदिपाय, बासोम वदी १• शनि १९५२ (१) १ श्रीसमरेबके मनु से पहाँ समाधि है। २ इसक साप एकातमें अवगाहन करनेक सिपे बामसिदिशा मेगा है। हमें को वगाहन करने पोम्प। ३ भी "वषषा श्री को पति निमागमक चारनेकोम ऐ वा वाचायग, सूप- गोग, दशवासिफ, उत्तराम्पपन और प्रयम्पाकरण विचार करने पोम्प है। • पर सम्पूर्ण सवा निमाप 11- चिनियममुकाम सिमानामा परमाद: समातभा पवामिल। मापन गर्म-गरम रकमान पत मोरपनाम ममतार परे मवि मावि चौदा मार्गदा पाप से ४माचारमिनको नमस्तार से सबसे पवित्र मामक प्रत्यको गंपा। पेपर पिती परिया पवादसे कर्म करो। +भपीमिरेटोमेक ६१०॥ पसमिरमेप।
प्रीमद् पेम्वन्द्र
[११९.
वहाँ सम्पर्शनसहित विपपारमको मिशिग रेपका धमाल-हो पाता है, यहाँ समापिका
सदुपाप जो मुहावरण है यह प्रकट होता है ||५||
वहाँ इन तानोंके अमिन समापसे परिममन होनेसे वामपस्म प्रकट होता है, वह निश्पसे
अनन्य सस्थापक पूर्ण परमपरकी प्राप्ति होतीtn ९॥
जीब वर्गव पदार्य, सपा पुष्प, पास बाप, बंग, संवर, निर्भय ये साठ तत्व मिलकर नौ
पश्चर्य हा ॥७॥
गौष मनीवमें इन नी तत्वोंका समाश हो जाता है। बावका विशेषरूपसे दिपार करने के
लिये महान् मुनियोन हें मिम मिम प्ररूपित किपाtn८॥
६६९
बमाणीमा कार्तिकी २ क १९५१
शानिने मनुष्यमबको तामणि रानके समान कहा है, इस पर विचार करो तो यह प्रत्यक्ष
समधमें मानेवाली बात है। शेष विचार करनेसे तो उस मनुष्पमका एक एक समय मी मितामामि
एनसे परम माहाम्पत्रान मौर मम्पकान मालूम होता है । तपा यहि मनुप्पभव देहार्प, ही पतात
हो गया तो पर एक भी कौमको कौमतका मी न पा निस्सन्देश माझ्म होता है।
६७०
पाणीमा कार्तिक १५पुर. १९५१
ॐसर्वज्ञाप नम
तक देहका बौर प्रारम्पका उदय बनाम हो तबतक देहर्सभी मुलुम्मा-विसका मरण
पोषण करनेका सच म छ सकनेका रो अर्याद ग्रहवासपर्यत निसन मरण-पोपण करमा चित्त
हो-पदि मरण-पोषण मात्र मिता हो, तो उसमें मुमुसु गौच सतोष करके मामहिता विचार
और पुरुषर्य करता है। पर दे। गौर देहसबधी कुटुमागे माहाम्प नारिके किये परिणा वादिका
परिणामक स्मृति भी नही होने देता। क्योंकि वे परिसह पारिक प्राति बादि ऐसे कार्य है कि
बात करके मामदितो मासरको ही प्राप्त नहीं होने देते।
६७१
जाणीवा मगसिर पुदी १ शनि १९५६
ॐसर्वज्ञाय ममा
अन्य मापु मतिपत मामि बसीम माम-बमसंग प्राप करके पूर्वको ममापकता, बसपार्यक
सना-नवारणीसे रहिल नही मिरहम हो जोर होगा ऐसे इस सम्में पूमि कमी मी न
मामा मा मनात न किय मा भारापन म रिमा एमा और समावसे बसिर ऐसा मार्ग प्रश्न
तपाम मनि गोमा मामाघरबल समान पाल समाधि पर
ने अमितभार समौ मातम माप परमात समम्म कुनामा
मर्म पराय, पुजाभावाचामर AI मश पत्तम मार..
स नो सो नगरेप
पारो मित्र म्पनामात निपर ॥८॥
पर १०२,01,10] पिषिष पन मादि संपा-३०वों पप करना कठिन हो तो इसमें कुछ वामर्य महीं है। फिर मी मिसने एक उसे ही प्राप्त करनके सिवाय इसरा कोई मी लक्ष नहीं रखा, यह इस कारमें मी बक्य हो उस मार्गको प्राप्त करता है। मुमुक्षु गाव नैफिक कारणोंमें अधिक हर्ष-विपाद नहीं करता। ६७२ पाणीआ मगसिर मुरी गुरु १९५३ यौमाणेकचन्द्रको दोके छट जानेके समाचार मालूम हुए । सर्व देहमारी नीव मरणके समाप धारणरहित है। निसने मात्र उस देहका प्रथममे ही यपार्य स्खलप मानकर उसका ममस्व मए र, निन-स्थिरताको वपना हानीके मार्गको यथार्थ प्रतीतिको पा दिया है, वही गौर उस मरण-समयमें शरणसहित होकर प्राय रिसे देह धारण नहीं करता, अपना मरणकालमें देहक ममस्वभावको अापता होनेसे मी यह निर्भय बना है। हके एनेका समय अनियत है, इसध्येि विचारवान पुरुप अप्रमामावसे पहिसे ही उसके ममलके निहत करनेके मविरोधी उपायोच्य साधन करते है, और इसीका में और हमें सबको सच रम्ममा चाहिये । परि पति-धनसे मे होना समय है, परन्तु इसमें क्या कोई उपाय न होनेस, उस से को वैराग्यम्पसमें परिणमन करना है। विपारपानका कम्य है। ६७३ पवाणीमा, मगसिर मुनी १० सोम १०५२ सर्पज्ञाय नमः योगवासिष्टके मारिके दो प्रकरण, पीकरण, दासबोध तया विचारसागर ये पंप तुम्हें शिवार करने पोप । इनमेसे किसी को पनि तुमने पहिले बाँचा तो मी उमें फिरसे गाँधना और विचारमा पोम्प है। प य न परतिक नहीं है, पर बानकर उन प्रयोश्च विचार करत हुए क्षाम प्रकिक एशिमें जो गो बातें अपना पस्तुये-जैसे शोमापुछ गृह पनि भारम, अप्रकार P परिमा, योक-परिक विचक्षणता, पाकमान्य धर्मको भदा-मापनकी मानी जाती है उन मर गानों और भोग्य प्रण करना प्रत्यारना, सातको पथार्थ सम नाम उन्हें पारण करते रोम SHOBHET Etal आरभमें उन बातों भोर बाजुओफ प्रति बारारि वागा कटिन समारनपुरणार्प काना ही उचित है। प्रम करना उचित नहीं। ६७४ बामाता मगमिर ए १२, १०॥ सर्वज्ञाय नमः १ मरमसिटिक टीकाके पृष्ठ मिठ । २ परि ससा मार्ग समझ ना पाप ता इस ममुप्पणका पक एक समय मी समगार पिम्पमगि है, इसमें साप नहीं ।
. भीमद पाचन्द्र [१५५४,५ वारमासिनिशाना -भागे भरकर भगाहल करना विशेष रिती पानकर, उसे हायमें मात्र श्री को दो वगाहन करनेके सि सिसा है। मी पहि को हमें विशेष वाकोमा यती हो तो उ, मी प्रपन सपुस्पके समान मेघ किसाने मी परम उपम नहीं किया, ऐसा क्या निपप बामा कर, और इस दो भविष्य पानन मा यदि में उस बर निभयको छोरो मने बामार्थ हो माग दिपा, बोर सो उफ कारक उपकारके विम्मरण करनेका दोष किया, ऐसा ही मानेगा पौर नित्य पुरुषको मात्रा पने ही मामाका कल्याण-नस ता मिभमासे खत, कोकरपी प सा प्रकरणी कापना कर, मिषय मा, मी मुनिक सात्पमें इस प्रयके गाइन करने में हमें मी पापा महो। उससे पासी कालो समाधान हो सकेगा। (२) पुस्पको यात्रा पम्नेका पिसका पनिमय यता, मोर को उस समयको बाराधना करता है, उसे मान सम्पन प्रकारसे फौमूत होता है या बात मामाया मीनको मय व्य रगना योग है। हमने यो पावन भाद, उसके बानी-पुरप साधी है। विस प्रकारसे से मुनियों को भी रम्य उपचम और विकको Rो, उस उस प्रकारसे की तथा मी “को ठमें पधापछि पुनाता गोर बापरण कराना मोम्प है। इसी तय बम्म बीच भी नामापर समुसहरों, पानी-पुरुपको नाबाके निरसपको प्राप्त करे, रित परिणामको प्राप्त करें, ता रस बादिको म्यता में करें, स्यादि प्रकारसे एक मामाक किसे ही उपदेश करमा पोत्य। बनैतार देहके किसे नामाको म्पतीत किया है। देवामार्थक म्पि म्पतीत का नागी, उस को माम-विचात पाने योम्प समाचार सर्व देवर्ष कम्पना र एक मात्र नामा ॥ उसका उपयोग करमा मोरय है, पनिधय मुमक्ष गोको मास करना चाहिये । मौसनामाम ६६४ मधिपाद, बासोन की १२ सोम १९५२ पिर धौपितामी! बाईसे इस मोर गाने में केवळ एक मिति त परको मापासे इस बार माना महीना है। पापको पास पामममि रोगके उपद्रव के कारण बाप तथा रेवाकर मारवाशेनेसे इस बार विशेष स्थिरता, उस स्थिरता, मामाको विशेष निति सदी है। मे बाई रोगको मात शति । सम्पूर्ण शविरो मानेपर उस बोर मानेका विचार है, और जो पाने के पश्चात् मात करके भाई मनसको नाक तरफ पोरे समय के लिये मेबने, निससे मेरी मावेघरी मनको मोबस मोगा। भारले प्रतापसे पैसा पेश करने का ये गावकरके मेम-मही , किन्तु मामा परम कायाम करनेको पाई। मे0 माठेघरको पापमान पाँचे । बाब स्पाका रात् । मरियार पासोग पदी १५ १९५२ यो बान हा निकाल होता है प्रान मनधिका बाप मानेस प्राप से बाहिर देता। ६६५ ३०वों वर्ष ६६६ क्वाणीवा, कार्षिक सुदी १० शनि १९५३ मातेसरीको मर वा बानेसे, क्या कुछ समयसे यहाँ मानेके सबंधौ उनको विशेष बाशा नेसे, गत सोमबारको यासि आधा मिनेसे, नरियादसे मगठवारको रवाना हुआ था। यहाँ पवारको पहरका वाना मा है। नब शरीरमें वेदनीयका बसातारपसे परिणमन गुभा हो, उस समय विचारवान पुरुष शरीरके न्यथा समावका विचार कर, उस शरीर बार शरीरके साप संपघसे प्राप्त मी पुत्र बानिका मोह ना देते हैं, वयमा मोहके मद करनेमें प्रति करते हैं। धारमसिदिशासका विशेप विचार करना चाहिये । ६६७ पाणीमा, कार्षिक मुदी ११ रवि १९५१ गवतक पौष लोक-परिका बमन न करे और उससे अति म छ्ट गाय, तक नी परिका माहम्म्य छनमें नहीं वा सकता, इसमें सहाय नहीं। ६६८ पाणीबा, कार्तिक १९५६ *परमपद पप अपना पीवराग वर्मन गीति जिस प्रकार परम तिरागमे परमपदके पपका उपदेश किया है, उसका अनुसरण कर, उस रमुको मजि-रागसे प्रणाम करके, उस पंपको पहाँ कहेंगे ॥१॥ पूर्ण सम्पग्दर्शन पान और चारित्र ये परमपरके मूल कारण है। माँ ये तीनों एक स्माबसे परिणमन करते है, यहाँ घर परिपूर्ण समाधि होती है ॥ २ ॥ मुनीन्त्र सबने मिस प्रकार मा और चेतन मार्यो मनसोकन किया है, वैसा तर मास्था नगट आनेपर परोंने उसे दर्शन का ॥३॥ सम्यक् प्रमाणपूर्वक उन सब भावोंक पानमें भासित होनेको सम्पपान करा गया है। पर संधप निमम और मोहका नाश हो जाता है ॥१॥ । पच परमार पोप्या, और प्रमाले परम पौवामे | हे मनुष्र पाए मामीने हे प्रमु मलि गमे || मूर परमपर भरण उम्पदरान पान परम पूर्ण । मनमे एक सम्पर पर समापिय परिपूर्भ | के फेवन मा यो प्रोमा मुनील की । मी भर भात्य प्रमापे दर्शन को ॥३॥ उमर प्रमाणपूर मा मन A माते । लाहान ममम मा साना nrn • किसी का ५ पतियों की पारी की गुम गई है। पर इस मार मीति राम।
मीमद् सपन
[पर (१९.१
यहाँ सम्पदर्शनसहित विपयारमको नासिगरेपका बमाल-दो जाता है, याँ समाविका
स्नुपाय
नो सुरापरण है यह प्रकट होताtn५॥
वहाँ इन वानोंके वाभिम समारसे परिममन होनेसे बरमवरूप प्रकट होता है, यहाँ निययसे
बनम्य सुम्यापक पूर्ण परमपदको प्राप्ति होती है ॥ ६ ॥
बीच अवि पदार्थ, तपा पुष्प, पाप, वामप, बघ, सबर निरा ये सात दस मिडकर मौ
पाहाते हैं ॥ ७॥
मीच अजीबमें इन नी तत्वोच्च समावेश हो जाता है। बस्तुका विशेषरूपसे विचार करनके
किसे महान् मुनिरागमे इन्हें मिम मिम प्रमपित किया tn८॥
६६९ पडामाबा, कार्तिक बदी २ एफ १९५५
शानियोंने मनुष्यभवको चितामणि रानके समान का है, इसका पनि विचार करो तो या प्रत्यक्ष
समाळमें बानेवाली बात है। शेपचार करनेसे तो उस मनुष्पमयका एक एक समय मी चिंतामणि
एनसे परम माम्पमान मोर मम्पवान माम होता है । तपा पदि या मनुप्पमत्र देशामें हो म्मतीत
ऐ गया, तो पा एक स्टी कौड़ीकी कीमतका मी नए या निस्कदो माम होता है।
६७०
सामीमा अतिकबी १५एक १९५२
ॐ सर्वज्ञाय नम
जबतक देहका वौर प्रारम्पका ठदप बसमान हो तबतक हसवंची कुटुम्मको-विसच मरण
पोपण करने का सबब म श सकमेबाठा हो अर्थात् गृहपासपर्यत जिसका मरण-पोषण करना उक्ति
हो-पदि भरण-पोषण मात्र मिझता हो तो उसमें मुमच गौव स्तोप करके बामहितका होमवार
और पुरुषार्थ करता है। पाह और देवसबपी कुटुम्मो मसारम्प वारिक लिये परिमा बारिको
परिगामपूरक स्पतिको मी नहीं होने देता। क्योंकि वे परिणा मादिको प्राप्ति मादि ऐसे कार्प है कि
पाव करके मामहित मासरोही प्रास नहीं होने देते।
६७१
साणीया मंगमि सुदी १ शनि १९५१
&सर्वज्ञाप नमः
मम्प भामु मनियत प्राप्ति बसौम-अण्णान-बसरसंग, प्राय फरके पूर्वको बनारापकता बन्नीर्यको
होनता-म कारणोंसे रहित हाँ कोई निरम ही नाम होगा ऐसे सकामें पूर्वमें कमी भी न
पाना एमा प्राति न किया एला बापमान न किपा भाषा और समापसे मसिद ऐसा मार्ग प्राप्त
भिषयाम निधि पमोनो समय पात्र । वीव सम्मान पापान वा समानुपान ५ ॥
से ममि लम्पो परिचमी मामलस्पन्द मार । पूर्व परमारमा समेत मन्मम॥
और मन परा पुन पर माता तथा मोडलमा नब पराभव..
म्स बारे मे पपनो समोस । पलुस, मिट प्रोमा ममान नएम ॥ ८॥
पप ७२६.१,६४४] विपिप पभ मावि संग्रह-३०यों व ६२७ करना कठिन हो तो इसमें कुछ वापर्य नही है। रिमा निसने एक उसे ही प्राप्त करनके सिपाप इस कार्य मी राक्ष मही रस्सा, यह इस काठमें मी अस हो उस मार्गको प्राप्त करता है। मुमुसु जीव रौकिक कारणोंमें मधिकर्ष-विपा नहीं करता। । ६७२ बपाणीत्रा मगसिर मुरी ६ गुरु १९५३ प्रौमाणेकचन्द्रकी देरके छूट जानेके समाचार मालूम हुए। सर्व पारी बीब मरणके समीप शरणरहित है। जिसने मात्र उस देहका प्रयमसे ही यथार्थ सप मानकर उसका ममत्व मय पर, निज-स्थिरताको अथवा धानीके मार्गको यथार्य प्रतातिको पा निय है, पो गर उस मरण-समयमें शरणसहित होकर प्राप किरसे दह पारण नहीं पाता अपना भरणामें देहके ममत्वमावकी अम्पता होनेसे मी या निर्मय रहता है। छानेका समय मनियत है, इसठिये विचारवान पुरुष प्रमाभाव परिरसे ही उसके ममबके निरत फरनेके अविशेषा पापोंका सामन करते वीर इसीका में और हमें सत्रका पक्ष रखना चाहिये । यति माति-वपनसे से होना समय है, पर इसमें अन्य कोई उपाय नहानेमे, उससे को राज्यमा परिणमन परना ही विचारवानका कम है। ६७३ बमाणात्रा मगमिर पुस १. सोम १०५३ सर्पशाप नमः योगवासिष्टक मादिके दो प्रकरण, पचीकरण, दासबोध तथा पारसागर पे पंप तुम विपार करने योग्य है । इनमें किसी प्रपको परि तुमने पहिसे बचा सेतो मी उने रिसे बाँचना और विचारमा योग्य है। ये प्रपन परतिक नहीं है, पर मानकर उन प्रपोका चार करते हुए धाम प्रान करना उचित नहीं। डारिक परिमें जा जो बातें अपरा सु-मे शोमापुछ गृह नादि भारंभ असकार बा. परिमा, सोम-परिकी विचक्षणता, छोकमान्य धर्मको प्रदा-मानी मानी जाती है उन सब बातों और पसोका माण फरमा प्रत्यक्ष नारका ही प्रहण फरमा है इस बातको पया समाते दिना हो तुम उम्दे धारण करते हो, इससे उस रिका एश नहीं होता। भारंभमें उन बातों और बम्नुमोफ प्रति बहर-शिबाना काटिन समार अपर न होने पर पुस्पाप परना ही उरित। ६७४ बागांमा मगमिर मुरी १२,१०५३ सर्यनाप नमः (नामभिरिको टोकाके पृष्ठ मित। • पदि सामाचा मार्ग रामसमें भा गप का हम मनुष्परा र मुमय पी मागर सिमी, इममें सराप नदी ।
१२८ भीम पनपत्र [पा १.५,५.६६.६७८५.९ ६७५ माणीवा, मंगसिर सुदी १२, १९५५ सग-परिस्पागके प्रति परिका तपारूप या एनेपर मी जिस मुमुभुको प्रारम्पविशेषसे सस पोगका अनुदप पा करता है, और अनुमा मारिके प्रसंग तथा वामीविका वादिके कारण विसको प्रति यदी-यो पापपूर्णक करनी परती है, परन्तु उसे स्पागके उपयको प्रतिबंधक समझकर गो से सेदपूर्वक ही करता है, ऐसे मुमुक्षुको यह विचारकर कि पूर्वोपार्मित सुमाग्नुम कर्मानुसार ही बायोतिका बादि प्राप्त होगी, मात्र निमिचरस प्रयत्न करना उचित है किन्तु भयते वाकुल कर पिता वपना पापका स्पाग करना उचित नहीं क्योंकि यह तो केवल म्यामोह है। शुम-बम प्रारम्भ वनुसार प्राति होती है। प्रयत्न तो केवल म्यापारिक मिमित है, सम्पेि उसे करना उचित है, परन्तु चिता तो मात्र बाम-गुणका निरोप करनेवाग है, इसकिने उसका शरत करना ही मोय है। ६७६ पाणीचा, मंगसिर यो ११ बुप १९५५ बारम तथा परिमाको प्रापि भारहितको अनेक प्रकारसे रोकनेवागरे पपणा सस्समागमके योगमें एक विशेष भवरापका कारण समझकर जानी-मुरुप्रैने उसके पागरूपसे गाय सपमा उपदेश किया है जो प्राप तमें प्राप्त है । तपा तम यथार्थ मान-संपमको विकाससे प्रति करते हो, सकिने मालप बसर प्राप्त हवा समाम कर सारुपोंके बचोकी भनुप्रेमाशय, सत्यास प्रतिषता बोर निसको एकापताको सफर करना उचित है। - ६७७ माणामा, मगसिर पदी ११ पुष १९५१ राम्य और उपशमको विशेष मानके लिये माननाघोष, पोगवासिष्ठके बारिके दो प्रकरण, पंचाकरण इत्यादि पोंका विचारमा यम्प है। मानमें प्रमाद विशेष ससिपे मामार्पक कार्यमें गाको नियमित होकर भी उस प्रमाएको र करमा चाहियेयाश्य दूर करना चाहिये । ६७८ वाणाचा पौष मुरी १ भौम १९५६ विषम मालके निमिकि बम्बानरूपसे प्रास होनेपर मी गो पाला-पुरुप अश्विम उपयोगमे ये है, यते। वीर मलिपमें मंगै उन सबको बारम्बार नमस्कार है। सत्तरसे साहरात उतरसे रहम तप तपसे उत्तर नियम, वापसे उतरा सम्धि, उपरपसे ठाय ऐस-पे मिसमें सब हो समा गते। ऐसे निरपेक्ष बनिपम उपयोगको ममस्कार हा! पहा प्पान है। ६७९ पमानामा पौप सदी ११ १५ एगपके पक्ष बसपान निमित प्राप्त होनेपर मी विसवमात्ममा मिचिम्मान भी धोमको प्राप्त होता, उस नाके शान पार करनेसे मी महा नि हो, इसमें संशप नहीं ।
पा ५८,५८१,९८१ ९३,४] पिपिप पर मारि सपा-याँ वर्ष ६८० माणीमा, पौष वदी १ शुक्र १९५६ बार्रम मौर परिपाका इच्छापूर्वक प्रसग हो तो पा मारम-छामको विशेप पातक, मौर बारम्बार वस्पिर और प्रशस्त परिणामका तु है, इसमें तो सशप नहीं। परन्तु नयाँ मनिमसे भी उदयके किसी योगसे यह प्रसग यता हो हो मी वारममावको वातरताको बाषक वीर वाम स्थिरताको पतराय करनेवाले उस वारंम-परिमका प्राय प्रसग होता है। इसलिय परम पाल बाना-पुस्पोंने स्पागमार्गका मो उपदेश रिया है, यह मुमुमु गौरको एक शासे और सर्मदेशसे अनुकरण करने योग्य है। ६८१ मोरबी, माघ मुदा ९ पुष १९५३ इम्यसे, प्रसे, कासे और भानसे-इन चार तरसे, बारममावसे प्रति करनेबारे निर्णयको चो मप्रतिपमान कहा है - विशेष अनुप्रेक्षण करने योम्प है। ६८२ मोरगी, माघ सुदी ९ बुध १९५३ (१) कोई पुरुप सय । विशेप सदाचारमें वीर सपममें प्राति करता हो, तो उसके समा- गममें वानकी इच्छा करनेवाले नालोंको, उस परसिके भरोकनसे वैसा सदाचार तथा सपमका छाम होता है, पैसा गम प्रायः करके विस्तृत उपदेशसे मी नहीं होता, यह उसमें राना योग्य है। (२) मात्मसिसिका विचार करमेसे क्या कुछ भारमासमी गनुप्रेश्मा सती है या नहीं। (३) परमार्य-ररि-पुरुषको मारप करने योग्य ऐसे समागमके हममें किस्परुप तय कम्प नहीं है। सहाय मम । ६८३ मोरया, माघ की रवि १९५३ (१) संसातका परिचप न हो तो करना । (२) निस तय अन्य मुमुसु गायोंके बिचमें बौर वंगमें निर्मठ मावको दिए, उस तय प्राति करना चाहिये । विस तए निपमित प्रवण किपा माप, वीर यह बात विचमें पहो माप कि मारम-परिमाके सम्पको सम्पन्न प्रकारसे समझनेसे निचि और निर्ममताके बहुत से प्रतिबंधक मौद, तथा उस तरा परस्पर जानकपा हो वैसा करना चाहिये । ६८४ मोरबी, माघ वदी १ मि १९५१ (१) सकन संसारी इन्द्रिपरामी, पनि गुण मावपरामी । मरुपपणे भावमरामी, ६ फरिय निकामी रे ॥ स्बर मुख दरमच परतेपारे । मोर मा निम्न ही मारमपमा । नियते मातमपी पतेसही निकामी मा बाय है।
भीमद् पत्रचन्द्र अपसाय -श्या परिणामको कुरा स्पारूपसे प्रति । सकाप -प्राति परमेका कुन निर्धारित बप्पसाय । विकल्प -प्राति करनेका कुमपूर्ण, वनिर्धारित, गमक अभ्यासाय । स्मा -बगे पगिकी कुछ विशेष पियनशलि अपवा स्मृति । परिमाम असके द्रवप समातकी तर दम्पको कषषित् भास्पातर पानेको दो साल ठस भरपातर विशेष भारा–बा परिणति । मान-मिप्यानसहित मविज्ञान वपा भुवयान । निमगवान -मिपावसहित अतान्त्रिय ान । - शेषकान। भर पैम्प शुर चैतन्य पुर चैतन्य सहायकी प्रतीति-सम्पम्दर्शन अनारमपद बानको सीमा कौनसी है। मिवरण जानकी क्या स्पिति! क्या मौत एकातसे घटता है। ध्यान और अध्ययन । स० बप. मैनमार्ग १-सम्पान २ धर्म वधर्म वाका अम्म १ मपम इपमादि काल ५. उस उस में मारत बानको स्पति, मनुष्यका साई माविका प्रमाण । ६ सूक्ष्म निगोद ४दो प्रचारफे बाप-मम्य और अपम्म ८ परिणामिक मापसे विभाष दशा ९. प्रदेश और समय-उसञ्चाय म्पापारिक पारमार्थिक तस्म १ गुण-समापसे इम्मका मिशन ११ प्रदेश-समुपचापमान १२ कप रस गर और सम परमाशुश्री भिमता विपिप पर मादि संपा-३०षों पप १५ प्रदेशका सोच-विकास १. उससे घनल या सम्मान १५ वस्पर्शगति १६ एक ही समयमें यहाँ और सिरक्षेत्रमें अस्तित, पथमा उसी समयमें डोकांत-गमन १७ सिदसमषो अवगाह १८ चापको सपा मय पार्थकी अपेक्षासे अवधि मन-पर्यव भौर केवमानको मुम म्पावहारिक पारमार्पिक म्यात्मा 'उसी प्रकारसे मति-सुतकी मी मारूपा १९ फेबहानकी कोई अन्य म्याख्या २० क्षेत्रप्रमाणकी कोई बाप म्याझ्या २१ समस्त विसका एक अवताचपर विचार २२ केसानके बिना किसी अन्य घामसे जीरके सहपका प्रयक्षमपसे प्राण २३ बिमावका उपादान कारण २१ तथा उसका समाधानके पम्प कोई प्रकार २५ इस कामें दस मोके म्याद होनेका कोई भन्म यस्य २५ केवळानके दो भेद पानभूत केवगान और सम्पूर्ण विमान २७ बर्षि बादि भरमा गुणोंमें पेतनता २८ बानसे मामाकी भिमता २९ वर्तमानकायमें बालके स्पट अनुभव होनेके भ्यानके मुख्य भेद ३. उनमें मी सरकार मुख्य मेद २१ मतिशयका स्वरूप २२ (पाठसा ) मधिया ऐसी मानी जाती हैं मो बीततत्व माननेसे सिम होती है ३१ मेक-दर्शनका बर्तमानकासमें कोई सुगम मार्ग २१ देशव यर्शनका पर्वमानमा सुगम मार्ग १५ सिपस्व-पर्याम सादि-जनत, मोक्ष वनादि-अनत. २६ परिणामी पार्प पदि निरंतर साकार परिणामी होतो मी उसका सम्मास्फ्ति परिमामा- फ्ना तया नो मनादिसे पर केवणानमें मासम्पन हो-ये पशुपम किस तरफ सकते हैं। (.) १ कर्मम्पवस्था २ समाता ३ पारिणामिकता . नाना प्रकारफे विचार और समाधान भीमद् सपन्द्र [पत्र.९९ ५. जम्यसे म्यून परामब १ नहाँ माँ अन्य सब विकहाँ कहाँ या अधिक है। तपा बों पर अविकत रिसाई देता है, वही बम्प किसाकी पवित् परिकसता एसौ है, मन्पपा नही । बर्मा, भाषम १९५० (१) १ मिस पर्वमें प्रापच प्रामपका साप मिसा मह पत्र यो मिगहै। मुमुसु जारको परम मचिसदित वस सस्पको उपासना करनी चाहिये । २ गो सत्पुरुप पोग-वनसहित-जिनका उपश गवसे नागोंको पोरे हो प्रयाससे मोपका साधनम्म हो सके ऐसे अतिशयसहित होता है, र रिस समय उसे प्रारम्बफे बनुसार उपदेशा- म्पबहारका उदय प्राप्त होता र उसी समप मुफ्परूपसे प्राप उस मक्तिरूप प्रत्यक्ष-बाभम-मार्गको प्रकाशित करता है बसे उदय-योगके बिना यह प्राप उसे प्रकाशित मही करता । ३ सत्पुरुष नो प्राय दूसर किसी म्पहारके योग, मुस्पत्रपसे उस मार्गको प्रकाशित मही करते तो उनका फरमा-वमात्र है । जगत्के बांका उपकार पूर्णपर विरोधको प्राप्त न हो वपना मात्से गायोंका उपकार हो स्पाक्नेक कारणों को देसफर मम्य म्पबहार प्राधिकरते समय, सत्पुरुप से प्रत्पा-बामपरूप-मार्गको प्रकाशित नहीं करते । प्राय करके ता अन्य पहारके उसमें के बप्रकट हो यते ।बपना किसी प्रारम्पविरोप वे सपुष्परूपसे किसीके चाननेमें वामे मा हो, तो मी उसके पूर्वापर मेपका विचार करके, महातक बने गाँतको किसी विशेष प्रसगमें नहीं बाते | सपा में बहुत करके अन्य म्पबहारके उदयमें सामाम्प मनुप्प तय चिरते है। १ तथा मिस्से उस तर प्राति को बाप बेसा प्रारम्भ हो तो वहाँ कोई उस उपदेशका अबसर प्रास होता है, यहाँ मी प्राय करके में प्रत्यक्ष मामय मार्गका उपदेश माही करते । कचित् प्रत्पा-बामपमार्गक स्पानपर 'बाप-मार्ग इस सामाम्प शुष्पसे अनेक प्रकारका देखकर ही कुछ पते पात् उपग-म्यमारके चनेके लिये उपदेश नहीं करते। (२) प्राय करके दो किमी मुमुसुबोको हमारा समागम मा है उनको हमारी शाके समपमें पोई पावरस माति है। फिर मौ यदि किसीको मौ समागम न मा होता तो अधिक योग्य था। पों को कुछ पपहार उइयमें यार या पगार मादि मनिप्पमें उज्यमें माने पोरम है, ऐसा मानकर, रमवक तपाउपशम्पहारका उम्प प्राप्त न पाहो बतक हमारी दशाके विपर्मे तुम गोंको गो सा समसमें पापा से उसे प्रकासित न करमेके लिये काम, पही मुम्स कारण पा और मोरे पात्रको ३.परंमणमा।
५९२ मानन्दकन पानीसी-विरेचन] विषिष पत्र भादि समा- -३०षाँ बप ६९२यो वाणीवा मोरबी, कार्तिकसे फागुन १९५३ भीमानन्दघमजी पौपीसी विवेचन (१) ऋपम मिनेवर मीवम माहरो रे, भोर न पाहु रे कंव। रीयो साहिल सग न परिरे रे, मांगे सादि मनं ॥ अपम० ॥ नामिरामाके पुत्र प्रीऋषमदेवया तोर्पकर मेरे परम प्रिय है। इस कारण में अन्य किसी भी स्वामीकी इन नहीं करती । ये स्वामी ऐसे है कि नो प्रसन्न होनेपर फिर कमी मी सग नहीं होते। मेय इनका सग हवा है इसलिये तो उसकी बादि है, परन्तु मह सग वटत होनेसे बनस॥१ दिशेचार्य --यो सस्प-विशाम पुरुपों में बिन्होंने पूर्ण शुद्ध सरूपको प्राप्त कर मिया र ऐसे भगवान्के सरूपमें ममी पिको तन्मय करते हैं । इससे उनकी स्वरूपदशा मागत होती पाती है, और यह सोकर पयासात पारिवको प्राप्त होता है। जैसा मगवान्का सरूप हैसा ही सुरनयकी अपेक्षा बारमात्र मी स्वरूप है। इस बारमा बौर सियभगवानके स्वरूपमें केपट मोपाधिक भेद है। यदि स्वामाविक सवपसे देखते है तो बास्मा सिडभगवान्के ही दम्य है। दोनों में इतना ही मेर है कि सिवमगवान्का बप निराकरण है, वौर वर्तमानमें इस मामाका स्वरूप भावरणसहित है। बस्तुत इनमें कोई मी भेद नहीं । उस वावरणके क्षीण हो बानेसे वास्माका सिखस्त्रम्प प्रगट होता है। तपा जबतक यह सिवस्वरूप प्रगट नहीं एषा तबसक निम्होंने सामाविक पुर स्वरुपको प्राप्त कर दिया है ऐसे सिसमगवानकी उपासना करमा हो योम्प है । इसी तरह बईत्मगवान्की भी उपासना करनी चाहिये क्योंकि ये मगवान् सपोगी-सिर है। पपपि सपोगरूप प्रारम्बके कारण में दोषारी, परस्त में भगवान् सरूप-समवस्पित है । सिनमगवान् और उनके पान, दर्शन, चारित्र अथवा पार्यमें फुल भी मे महा है। अर्थात् वामगवान्को उपासनासे मी या बारमा स्वरुप वन्मयताको प्राप्त कर सकती है। पूर्व महामामोंने त्रा- मे माग मरिराते, दमाणपजयीय । सो नाणा निप मप्पा, मोही सह गाइ वस्स सर्प । --जो वतमगवान्का स्वरूप, इम्य गुण और पर्यायसे बानता है, अपनी बारमाके स्कसपको बानता, और निमपसे उसका मोह नाश हो जाता है। उस भगवान्को उपासना गायों किस अनुक्रमसे करनी चाहिये, उसे प्रोमानेदमनमी नौ स्वनमें कानेगा, उसे उस प्रसगपर निस्वारसे करेंगे । मगवानसिरके नाम, गोत्र वेदनाप और बायु इन फोका मी वमात्र रहता है। मगवान् सपा कमसि रहित है । तपा मगवान्मतको केस बामवरूपको बावरण करनेवास कामात पप । परन्तु उने पर कोए चार कर्माका–दम करके बोग करनेपर्पत-पूर्णबध गती इस कारण ये परमरमा साकार-मगवान् को गाने योग्य है। उन बातमगवान्में, निम्होंने पूर्णिमें तीर्थकर नामकर्म शुभयोग उत्पम किपा है, तोपर मगणान् को गाते हैं। उनका प्रताप उपदेश १० मानि महत्पुण्यपोगके उदयसे माधर्मकारक शेमाको प्राप्त होता।
भीमद् पमपत्र [१९२ मानमन गोस भरमें वर्तमान अवसर्पिणीका में भाजपमध्यसे गाकर श्रीवर्धमानतक ऐसे पोस तापकर हो गये है। पर्तमानकालमें वे मगवान् सिदाम्पमें स्वरूपस्थितमानसे बिग्रनमान है। परम्त मूब प्रज्ञापमाप नपसे उनमें तीर्थकरपरका उपचार किया जाता है। उस औपचारिक नयराष्टिसे उन चौपास भगवानक स्तबमस्मन चौबास स्तबनोंकी रचना की गई। सिनमगवान् सपा वमूर्तपदमें स्थित है इसपि वनका सहम सामान्यरूपसे चितवन करना कठिन है। तया तभगवान्का सरूप मी मनारिसे वितान परमाणे बैसा कठिम है, परन्तु स्पोगी- पदके बरमनपूर्वक पितान करनेसे प सामान्य नामोंकी भी पतिक स्थिर होनेका एक सुगम उपाप है। इस कारण तमगवान्के स्तनसे सिरपरका स्तवन हो मामेपर मौ इतना विशेष उपकार समा- कर मावानवपनमाने पोलीस तीर्षकके स्तनहप इस चौबीसीकी रचना की है। नमस्कारममे मी प्रपम भातफरके रसनेका पोत कि उनका हमारे प्रति विशेष उपकारमान है। भगवान्चे स्वरुपका चितवन करना पर परमार्थपियुक पुरुषों को गौमवासे मिगलरमका होलिन करना है। सिरप्राप्त कर भारिस सिदसो, वारिस सहापो सम्ममीणाम । वमा सिदेवी, पापम्मा भमानी ।। --वैसा सिहभगवान्का वामस्वरूप है, सा ही सब भीयोंको वामाका सस्म है, इसलिमे भाप बायोको सिदत्वमें सपि करना चाहिये । सी तय मादेवचन्नास्वामाने मालासपूम्पके स्तनमें कहा है। मिनमा रे निमपूमना--पदि यपार्भ मूमरिसे देखें तो निगमगवान्को पूगा । नाम- स्वरूपका पूजन है। स तय स्वरूपको वासा रखनेपा मारमा योने मिनमगवाम्य और सिनमगवान्को उपासनाको तस्मकी प्राप्तिका हेतु माना है। क्षीणमोह गुणस्पानतक सस ससपका पिताम करना भारको प्रबह बक्सन है। सपा मात्र बजे पारमस्वरूपच विततन चीको म्पामोर पैदा करता , मातसे पानापन पुका प्राप्ता क्या सेमचारिता उत्पम करती वपमा उन्मत्त प्रठाप-वहा उत्पा करता है । तपा मगवान् सरूपके मानके वातानसे मणिपाल शि होती है और मामी गौम ऐतारे इससे मुकता, सेवारिता और उम्पत्त-प्रमपित महीला । वामदशा प्रारोमेसे लाभानिक मापात्मनानता होती , मामा ठप गुणों का सेवन करती । वर्षात् शुकता बानि दोष समय नहीं और मधिमार्गक प्रति मी युगुप्सा नही होती पथा सामानिक बामदशा सम-निताको प्रभ करती जाती है। यहाँ बात मारक सरूपके मानके सम्मनके बिमा परि पामाध्मता सेवन करती माँ २ मानम्दन पीसी रिशचन] पिपिप पत्र मादि सपा-बों वर्ष ६२७ व (२) वीतरागियों पर ऐसे अपमदेवभगवान् मेरे स्वामी हैं। इस कारण वा मैं किसी दूसरे कतको । नहीं करती। क्योंकि में प्रभु यदि एक बार भी रोह जाय तो फिर छोरते नहीं हैं। उन प्रमुका प्रास होना पह उसकी वादि, परन्तु मा योग कमी मी नित नहीं होता, इसम्येि पावनत है। चैतन्पाति बो बगरके भावोंसे उदासीन होकर, पुचतम्य-स्वमानमें समबस्थित भगमानमें युक हो गई है, आनदघनना उसके हर्पका प्रदर्शन करते हैं। अपनी अदा नामकी ससीको मानदघननीकी चैतन्याति कहती है कि हे ससि ! मन अपमन पानको साथ उन किया है और यह मगवान् मुस सर्वप्रिय है। यह मगवान् मेरा पति हुआ है, मेये भर में अन्य किसी मी पतिकी कमी भी इच्छा न करेगी। क्योंकि अन्य सब जीव बग्म नरा, । आदि दुमोस माफुल म्याकुल-क्षणभरके ठिये मी मुसा नहीं है। एसे सीमोंको पति बनानेस मुस कसे हो सकता है। तया मगवान् अपमदेव तो वनन्त वम्यानाभ मुस-समाभिको प्रत हुए इसलिये यदि उनका बाप प्राण करतो मुछ मी उस वस्तुको प्राप्ति । सकता है। वर्तमानमें योगके मिसनेसे, हे सति ! मुझ परम शीतसता हुई है। दूसरे पतियोंका तो कमी बियोग मी है, परन्तु मेरे इस सामीका ता कमी मी वियोग हो ही नहीं हो सकता। सबसे पर स्मामी म हवा तमासे पा कमी मी सग नहीं छोड़ता । इस स्वामी के योगके स्वमालको सिमांतमें 'सादि कहा है, वर्षात् उस योगके होने की भादि हो है, परन्तु उसका कभी भी रियोग होनेवाडा 1, इसछिपे र गमत है। इस कारण वा मुझे कमी मी उस पतिका पियोग नहीं होगा ॥१॥ हे सति ! इस जगत्में पतिका वियोग म होमके लिये सियाँ मो नाना प्रकारके उपाय करती पे उपाप पपार्य उपाप नहीं है, और इस तरह मेरे पतिकी प्राप्ति नहीं होती । उन उपायों को या बताने के लिये उममेंसे पोरेसे उपापोंको तुझे काती! - कोई भी तो पतिको साप का बउ बानेकी पा करती है, मिससे सा हो पतिको साप ये। परन्तु वह मिठाप कुछ समत्र नहीं है क्योंकि या पति तो अपने कर्मानुसार यहाँ उसे जाना हो चला गया और जो भी सती होकर पतिसे मिसनेकी इण्या करता है, वह मी भी मिसाके प किसी पिता जसकर मरनेकी ही इशा करती है, परन्तु उसे ता वपन फर्मामुमार की देह रण करमा है। दोनों एक ही जगह देह धारण करें वौर पति-पत्नीरफ्मे सबर होकर निरतर मुमका मानदफनगाव भीकरममिन-साबन पाँच पप निम प्रकार है:- काम निवा प्रीतम मारये भोर न साईरे । मोखरियरंग न परिदोरे भांग गरि मनाम ॥१॥ प्रेरत कारण समारो मन पहने पाप । ए मैन्य नबिरिप नपरे मनमे राम म यस || कपम ॥२॥ फोर पतिरम्न मतिपणुन प्रेरे पतिरन बनवार । ए पतिरम्न में नपिनि परे रेन बानुमत्सर || बाम ॥३॥ पोई बंधारे महान भात पनीरे तन र मन माण। रोप लिने वा नरि परे मना पिमान काम ||४|| पिच प्रकपरे पूमन परे पूय मनीत एर। परीत पई माम-भरपतारे, मानरस्सर । काम ॥५॥-मनुसार . भीमद् यसबम्यू [६९२ माननम्न पनि मोग करें, ऐसा कुछ नियम नही ।बर्षात् निस पतिका वियोग हो गया, और बिसका प्रयोग भी बब समझ नहीं पाऐस पतिका को मिगसर से मैंने मिष्या समझा है, क्योंकि उसका माम टिकामा म नही। वया प्रपम फ्का पर वर्ष मी हावा है-परमेघरमप पतिको प्राप्तिके मिपे कोई काठका माण करता है, वर्मात् पयाम्मिको मनी जगकर उसमें काष्ठ होमकर, कोई उस बक्षिा परिपा स्मान करता है, और इससे ऐसा समझता है हम परमेश्वरनप पतिको पा मगे, परन्तु यह समाना मिया है। क्योंकि उसका तो पचामि तपने ही प्राप्ति यती है। उस पतिका सम्प मानकर, उस पतिके प्रसा होने के कारणोंको बानकर, कुछ उन कारणोंकी उपासना मही करता इससिपे फिर प परमेश्वररूप पतिको कस पायेगा । यह तो उसको मतिका मिस ससमाषमें परिणमन मारे, असा हो गतिधे पायेगा इस कारण उस मिश्रपका कोई मा नाम ठिकाना नही ।।। २ ॥ हे सति ! कोई पतिको रिझाने के लिये अनेक प्रकारके तप करता है, परन्तु के शरीरको सता देता है। इसे मैंने पसिके प्रसन्न करनेका मार्ग नही समसा । पतिके बन करमे के लिये तो दोनोंच पातुजोश मिसाप हाना पाहिये । कोई चाहे कितने ही करस तप करके अपने पतिक रिक्षानेको इभमा करे, तो मी जबतक व मी बफ्नो प्रकृतिको पतिको प्रतिक मबभावानुसार म कर सके, तबतक प्रकृतिको प्रति- सताके कारण र पति कभी मी प्रसन्न नहीं होता और उसको मात्र मापन धरारमें सुपा पारि सतापच माप्ति होती है। इसी तय किसी मुमुकी थपि भगवानको पतिरूपसे प्राप्त करनेकी हो तो पर मरि भग- मान्के सरूप मनुसार प्रति न करे, वौर मप स्वरूपमें इपिमान होते हुए, अनेक प्रकारका तप करके करका सेवन करे तो मार भगवानको प्राप्त नहीं कर सकता। क्योंकि सिम्य पविपरमांका सबा मिलाप बार सपी प्रसफवा पानुरे एनमें हो। उसी समरे समिमगवान्में इस पवित्र पवित्र स्थापन करके ससे परिवारमना हो तो उस मगवान्की साप पाल-मिलाप करना ही योग्य है। मर्यात् उन भगवान्ने यो पुरय पारुममे परिणमन किया है, सी इस पाविर नेस हो उस पानसे प्रति समानके नित होनस ऐक्य होना समय । वौर उसो पालो मिडासे उस भगवान्नप पतिकी प्राप्सिका कमी मा रियोग नही होगा | हे समि । कोई गिर ऐसा करता है कि पा जगत् ऐसे मगवानको नठानिसके सम्मको परिधान करमेका सभी महीरो सकता और मममम मगवान सरकार पूर्ण करता हैइस कारण इस जगत्को भगवानको ठोठा मानकर उस समससे उस मगवान्की महिमा गान करमेये हो पानी का पूर्ण होगी-~-भगवान् प्रसन्न होकर उसमें संमाता करेंगे-एसा मानता है। परन्तु या निप्पा है। क्योकि यह मामा सम्पका जान म होमेमे ऐमा पता है। मग मगान् मर्मत हान-दर्शनमय सानस पुत सपनिमय है मगरम् समगधर्म सिवय हो ममता ! भार उसमे मारपरण प्राति किस तरह से सती की मालितो मोमे दो भागो पूर्ण हावा कुरा मा मनही परवता मगन ननरपन पौषीसी-विरन] विविध पत्र मादि संपा-यो वर्ष अम्पावाध मुससे पूर्ण है। उनमें अन्य कोई कस्पना फासिवा सकती है। व्यासांठगकी उत्पत्ति इपिसे होती ह और पैसी कुछ धितो बान-मुसको भारिपूर्णतासे होती है। तया मगवान् मुस दोनोंसे परिपूर्ण है, इसलिये उनकी प्रति रगत्को रचनेरूप सौगाक प्रति कमी भी नहीं । सथा यह सीसा तो दोपका मिठास है और 4 सरगांके हो समबहै। सथा जो सरागी रेपसहित होता है। और जिसे ये दोनों होते हैं, उसे क्रोष, मान, माया, छोम आदि सब ना मी समा है । इस कारण ययार्य दृष्टि से देसनेसे वो लीला दोपका ही मिठास ययरता है, ताप-विलासकी ता इन्ठा नमानी ही करता है । नव विचारवान मुमुमु मी ऐसे दोप- विसको करते, ता फिर अनत बानमय भगवान् ता उसकी इच्छा कैसे कर सकते है ! इस कारण मगमान्के तरूपको मंगाक मिावसे समझता है यह भान्ति है, बार उस भ्रान्तिका करके बो भगवान्के प्रसन्न करनके मार्गको ग्रहण करता है, यह मार्ग भी भान्तिरूप ही है। उसे उस मगवानरूप पतिकी प्रामि नहीं होती ॥१॥ ससि। पतिके प्रसन्न करनके तो बनेक प्रकार हैं। उगहरणके लिये अनेक प्रकार के पार के भोगसे पतिकी सेवा की जाती है। परन्तु उन सबमें पित्तकी प्रसता ही सबस उत्तम और यह ऐसी सेवा । जो कभी मी सरित नहीं होती । कपटीत होकर बारमसमर्पण की सेवा करनेस बस्यन्स वानदके समूहकी प्राप्तिका भायोग्य होता है। मानरूप पतिको सेनाके भनेक प्रकार है-जैसे द्रव्यपूजा, भावपूमा, बाबापूजा। प्रम्पपूगाके मेव है। उनमें सर्वोतए पूना तो चित्तको प्रसमता-उम भगवान्में पैम्पतिका परम को प्राप्त करना-दी है। उसमें ही सव सारन समा बात है । यही समरित पूना है, P चित्त भगवान्में छान हो तो दूसरे योग मी चिपके नापीन होनेसे से भगवान्को है और यदि भगवान्मेंसे पित्तकी छीनता दूर म हो वा हो बगतक मालोंमें उदासीनता भौर उसमें प्राप्म-स्पागरूप निकम्प नहीं रहते । इस कारण वह सबा वसा ही पता है। तिक चित्तमें अन्य कोई मार से तबतक पर इस बातका प्रर्शन किया जाप कि तुमारे । दूसरे किसी कोई मी मात्र महो', ता बापा है और यह कपर है, भार बबटक है तबतक मगवान्के परणमें भरमसमर्पण कहाँस हो सकता है। इस कारण जगत्के प्रति नियम प्राप्त करके सिको घर बन्यभावपुक करनेसे ही, उम सिमें अपमान कारण, मृति पुर कही जाती है और उसे ही निपपर करते हैं। ऐमा पतन्याति टीन की माप तो नही आग्मसमर्पणता यो नासी है। चित्य मादि सब कुछ भगवान्फो अर्पण कर Pपा हो, परम्नु पनि भाग्मसमर्पण म किया हो, । पारमाफी इतिका मगपानमें न न की हा, तो उस धन पात्य आरिका वर्पण करना है। क्योंकि मर्पण परमेवाची मामा भपका उसी तिता किसी दूसरी जगह सीन । तथा गो सय सर्प अगा सीन है उसा मर्पण किये हुए दूसरे ग पाप मगवान्में र सस्ते हैं। इसलिये भगगनमें विधिको मौनता दो मामगर्मागता है, मोर पन-पदको रसा मर्पत् परम भम्पाबा मुममप मोशप की निशानी है । भात निसे प्राप्ति हो गाय पर परम बामपनस्तनप मोनका प्राप्त होगा। पर एक्षण हो सबालपण इति प्रोपभनिन-स्तवन ।
भीमद पवाद [५९२ मानमपन भौमि प्रथम स्तम्नमें मगवान्में पिके लीन होमेरूप को बताया है, परन्तु कह सपि मसं वीर पूर्णरूपसे प्रेम हो तो ही भानदफ्न-पदको प्रति हो सकता है। इससे उस पिको पूर्णताकी इम करते ए मी मानधनगी दूसरे तीर्थकर औवनितनापासवन करते है। मो पूर्णताकी इभा है, उसके प्राप्त होनेमें नो नो विन समझे हैं, उन्हें मानदघनमी भगवान्के दूसरे स्तवनमें सक्षेपसे निवेदन करते है और मफ्न पुरुषत्वको मद देसकर दसिम होते है स तय ऐसा मानाय चितवन करते । बिससे पुरुषच बापत थे। रे ससि ! दूसरे तोर्पकर बबितनाथ भगनान्ने यो पूर्ण मनताके मार्गका प्रदर्शन किया है- गो सम्यक् चारित्रस्य मार्ग प्रकाशित किया है-उसे जब में देगती ! तोय मार्ग वमिती-मेरे समान निर्मठ इपिके मुमुक्षुसे अमेम है। क्या मगवान्का नो भनित नाम है पर सस्प है, क्योंकि जो यो पो पराक्रमी पुरुप को पाते हैं, उनके द्वारा भी जिस गुण पामरूप पंपका मम नहीं मा, उसका भगवान्ने वय किया है। सम्मेि मगवान्का अमित माम सापक ही है, और बनत गुणोंके मामलप उस मार्गक गीतनेसे मगवान्का गुणोंका पाम का गाना सिम है। ससि । परन्तु मेरा माम मो पुरुप कसा जाता है सस्य मही 1 तथा भगवान्का नाम सो बरित है; जिस तब यह माम तप गुणों के कारण है, उसी तर मेरा नाम जो पुरुष है यह तद्रूप गुणों के कारण मही। स्पोंकि पुरुप तो उसे कशा गाता है जो पुरुषार्पसे सहित होस्वपराक्रमसे सहित हो, परन्त में तो पैसा नही । इसम्मेि में भगवान्से करता कि मगन् । उमारा नाम जोममिता पार्व है, बोर मेरा नाम बो पुरुष है ५ मिथ्या है। क्योंकि पग रेप, मान, क्रोध, मान, माया, मेम मादि दोपोंका तुमने जप किया । स कारण तुम अमित को जाने योग्य हो, परन्तु उन्हा दोपौने तो मुझे गीत लिपाई सम्पेि मेरा नाम पुरुप कसे कहा जा सकता है। ॥१॥ ससि ! उस मार्ग पानेके लिये दिम्प नेत्रोंकी वापसकता है। चर्मनसे देखते र तो समस्त ससार भूमीमा है। उप्त परम तत्वका विचार होने के सिप बिन शिम्प मेत्रों की माश्यकता है उम Pप्प नेत्रोंका निपपसे पर्तमामकाउमें वियोग हो गया है। रेससि ! उस परितमगवान्का ममित होने के लिये प्राण किया इमा मागे कुछ इन धर्मचनुमोंसे रिसाई नही पाता । योपि प मार्ग रम्प है, और उससा तरामापिसे होगा मोदन किया जा सकता है। जैसे एक गावसे इसरे गामें गानेके म्पेि पित्रीपर साफ वगैरा मार्ग हति । उस तप यह बाप मार्ग नहीं है अपना बर्मचासे सभेपर विसाई पानेवाला मार्ग मारे पुण धर्मपमुझे व मतान्त्रिप मार्ग दिसई नही देता ॥ २ ॥- -मपूर्ण मातरमल ममिनार खान पर मप्रसते - पंचो निरासरीपनि मोरे मनि मभित गुमनाम | बारे पनि पुरा रिसरमाम || पो ॥१॥ पारसमरिम बेतारे एमोसमन्दर । बिबरने भरमारय व्यरिती परिलपियो RH १९४] विविध पत्र मादि सप्रा-पाँवर्ष ६९३ देशातपुत्र मगवन् ! काकी पनिारी है। इस मारतके पुण्यहीन मनुष्योंको वेरा सत्य पौर पूर्वापर विरोधीत शासन कहाँस प्राप्त हो सकता है उसके प्राप्त होनेमें इस प्रकारके विन पहुए हैरे उपदेश दिये हुए शानों की कल्पित वर्षस विराममा को, कितनोंका वो समूह न कर दिया, ध्यानका कार्य और सस्पका कारणरूप बो सेरी प्रतिमा है, उससे कमरिसे गेग फिर गये, वौर सेरे बादमें परपरासे मो वाचार्य पुरुष हुए उनके बचनोंमें और तेरे मौ शका गल दी-एकान्तका उपयोग करके तेरे शासनको निन्दा की। हे शासन देवि ! कुछ ऐसी सहायता कर कि निससे मैं दूसरोंको कल्याण-मार्गका बोध कर सक्- प्रदर्शन कर स-उसे सचे पुरुष प्रदर्शित कर सकें। सर्वोत्तम निर्मन्य प्रवचनके पोधको मोर ठमें इन बारम-विरोधक पोसे पीछे सींचनेमें सहायता प्रदान कर | समाधि और बोधिने करना तेरा धर्म है। ६९४ ॐ नमः . ममत प्रकारके शारीरिक और मानसिक दु सेंसे लाकुछ म्याकुल बापोंकी, उन दुसोंसे गहरा बहुत प्रकारसे इच्छा होनेपर भी वे उनसे मुक मही हो सकते-इसका क्या कारण पर प्रश्न अनेक मानोको इवा करता है, परन्तु उसका यथार्थ समाधान तो किसी रिसे हो होता है । बबतक इसके मूल कारणको यपार्परुपसे मनाना हो, तबतक उसके दूर पि पाहे कितना भी प्रयत्न क्यों न किया गाय, तो मी दुपका अप नही हो सकता और सके प्रति पाहे कितनी मी असाचे भप्रियता और बनिम्म क्यों न हो, तो मी उन्हें वह करना हो पाता है। पवास्तविक उपायसे यदि उस दु सके र करमेका प्रयत्न किया माप, और उस प्रयानके बस क करनेपर मी, उस दु सके र म होनेसे, दुख दूर करनेकी इणा करनेवाले मुमुमुको म्पामोह हो जाता है, अपना हुवा करता है कि इसका क्या कारण है। पासपों शेता ! फिसी मी तब मुझे उस इसकी प्राप्ति इट न होनेपर मी, सप्नमें मी उसके प्रति ति न होनेपर मी उसकी ही प्राप्ति हुआ करती है, भौर में गो गो प्रयत्न करता ! उम नफर दो मानेसे मैं दुसरन ही अनुभव किया करता , इसका क्या कारण है। क्या यह दुर किसीका मी दूर नहीं होता होगा ' क्या दुखी होना ही जीवका समार क्या कोई जगत्का का ईपर होगा, जिसने इसी तय करना पोग्य समझा होगा। क्या यह वेदम्पताके भाषीन होगी: मया या कुछ मेरे पूर्णिम किये हुए अपराधोंचा फल होगा! अनेक प्रकारके विकापोंको मनसहित देहपारी गौर किया करव है। वीर यो मात्र मन ने कम्यक्तरूपसे दु सत्र मनुमन करते हैं, वीर थे वम्पतम्पसे ही उन दुयोंके दूर हो इम्म किया करते हैं।
भीम पत्रचन्द्र [१४ इस बगत्में प्राणीमात्रको म्यक मपया बम्पकाइन्स भी पहो कि मुझे किसी भी तरसे हुन न हो और सपा मुन हो मुरा हो, और उनका प्रपरम मो इससिप है फिर मी पास क्यों र नहीं होता ! इस तरह के प्रश्न यो योनिचारवान माबोको मौ भूतकाळमें हुए थे, वर्तमानकाळमें मौ होते है और भविष्यका में भी होंगे। तपा उम बनतात विचारणानों से वनंत विचारवानों को ता उसका पपार्थ समाधान भी हुमा है और दुससे मुछ हो गये है। वर्तमानका में भी दिन विचारवानों को उसका पपा समाधान होता है, भी तयारूप फरक प्रास करते है और मविप्पकामें मी मिन दिन विचारपानों को पार्य समाधान हेगा ये सब क्यारूप पसका पारेंगे इसमें सक्षम नहीं है। शारीरका रास पदि केवल औपन करनेसे ही दूर हो नाता, मनका दु सपदि धन बार के मिसनसे हो माग बाता, धार माम ससर्गसबभी हु म पनि मनको कुछ मी मसर फैश न कर सकता, तो सु सके र करनेके लिये दो चा प्रयत्न किये जाते है ये सब, सभी गायोंको सफल पावे। परन्तु या या होना समय PAK न Pया, तमी विचारवानों को प्रश्न उठा कि दुख दूर होने के लिये कोई दूसरा ही उपाप होना चाहिये । सया मा नो पुरा उपाय किया जाता है क्या है, और पा सम्पूर्ण भम पाहै इससिपे उस दुसका यदि पपा मूल कारण मान लिया जाप और तदनुसार उपाप किया बाप तो हो दुसर होना संभव है महाँ तो वह कमी मी दूर नही हो सकता । यो विचारमान तु सके पथार्प मूस कारणको विचार करने के लिये तकटित हुए हैं, उनमें भी किसी किसीको ही उसका यथार्प समाधान मा है और यातसे तो पदार्प समाधान न होभेपर भी मति-म्पामोड मानि कारणोंसे ऐसा मामने कि हमें पपा समाधान हो गया है, और ये तदनुसार उपश मी करने मगे है तथा ममेक मेग उनका अनुसरण मौ करने गे है। गर्म मिम मिम बो धर्म-मत देखभेमें वाते है, उमय उस्पतिका मुख्य कारण यो। विचारपानोको विशेषत पी मापता है कि धर्मस एस मिट जाता है। परन्तु धर्मके सरस समाधमेमें वो एक दूसरमें बहुत स्तर पर गया है। इस तो अपने मूग विषपको ही भूल गये हैं, और बद्तसोने उस विषयमें अपनी दुरिक पक मानसे अनेक प्रकारसे नास्तिक बादि परिणाम बना लिये। इसके मूल कारण मौर उनको किस किस तर प्रति इसके संबबमें यहाँ पोरेसे मुस गमिप्रायोघे संक्षेपमें कहा पाता। (२) पर क्या है। उसके मूछ कारण क्या है। और यह हु सक्सि तय दूर हो सकता है। उसके सबमें भिनमगवान् वीतरागने लफ्ना नो मत प्रदर्शित किया है, उसे पा सक्षेपसे करते है बब, पपपा । पाही, उसप बगेकन करते- - ११४] विविध पत्र मादि समाह-यों वप ६॥ दिन ठपापोंका प्रदर्शन किया है, वे उपाय सम्यदर्शन सम्पमहान पौर सम्पचारित्र में, बवा उन सौनों का एक माम सम्पमोक्ष ' है । उन पीतयगियोंने अनेक स्योंपर सम्पदर्शन सम्यग्नान गौर सम्यक्चारित्रमें सम्पम्दशनकी होमुत्पता कही है। यधपि सम्पमानसे ही सम्यग्दर्शनको पहिचान होती है, तो मी सम्पग्दर्शनको प्राप्ति के बिना बान, ससार-दुखका कारणभूत है इसलिये सम्पग्दर्शनकी ही मुस्मता यताई है। स्पो म्पो सम्यम्दर्शन मुद होता जाता है, क्यों स्यों सम्पचारित्रके प्रति बार्य उल्हासित होता बावा है; और क्रमपूपक सम्यकभारिप्रकी प्राप्ति होनेका समय वाता है। इससे बारमामें स्थिर समात्र सिर रोता जाता है, मौर क्रमसे पूर्ण स्थिर समान प्रगट होता है और भामा निनपदमें लीन होकर सर्व कर्म-कामसे रहित नेसे, एक शुर वारमस्वभावरूप मोझमें-परम पम्यावा मुसके वनुमन समुद्रमें स्थित हो जाती है। सम्पग्दर्शनकी प्राप्ति होनेसे गिस तर बान सम्पास्वभावको प्रास करता है पर सम्पग्दर्श मका परम उपकार है-से ही सम्यग्दर्शन कमसे शुद होकर पूर्ण स्थिर स्वभाव सम्पचारित्रको प्रास होता है, उसके लिये उसे सम्यमानके वळकी सबी वापसकता है। उस सम्यगानकी प्रालिका उपाप गौवरमानुठ और उस भुवयतका उपदेय महारमा पुरुप है। वीतरागभुक्के परम यस्पको प्राक्ष वसग धौर परम करणाशीय महामाका संयोग मिलमा अतिशय कठिन है। महान् भाग्मोन्यके योगसे ही यह योग प्राप्त होता है, इसमें सशप मही है। तमा रुपाणं समणाणे- उन भमण महात्माबोंके प्राति-मक्षणों को परम पुरुपने इस तए कहा है - सन महारमानों के प्राति-धोंसे सम्पन्तरदशाके मिलोंका निर्णय किया जा सकता है। पापि प्राधि-सक्षणों के अतिरिक अन्य प्रकारसे मी अम्पतरदशानियमक निषप होता है परन्तु किसी पुर चिमाम मुमुमुको हो उस बम्पन्तर पाकी परीक्षा होती है। ऐसे महामाभोंके समागम और बिनपको क्या बापकता है । तपा चार पैसा मी पुरुप से, पातु मो बची तरह शाम फाकर सुनाता हा ऐमे पुरुषसे मी जोर कन्याणके यथार्थ मार्गको यो मही पा सकता । इस जाशकाका समाधान किया जाता है- ३४२ भीमद् पसषद [५९४ ऐसे महात्मा पुरुषों का योग मिझना पन्त पन्त कठिन है। पर श्रेष्ठ देश काठमें मी ऐसे हम्मान योग हाना कठिन है, तो ऐसे दुार-प्रधान काळमें वैसा हो तो इसमें कुछ करना ही नहीं पता | का भी - यपि उस म्यामा पुरुषका पोग कधित् मिम्ता मौो तो भी यदि कोई मुद गतिमान मुमुमु प हो तो वह उस मर्तमात्रके समागममें हो वर्ष गुणको प्राप्त कर सकता है। मिन महामा चम्पोके वचनोंक प्रतापसे पाती राबा मी एक माहूर्तमात्रमें ही अपना रामपाठ छोरफर मर्पकर कनमें पपर्या करने के लिये चमे नाते थे, उन महारमा पुरोक पोगसे वपूर्व गुण क्यों प्राप्त नही सकते है भेष्ठ देश कासमें मी कचित् ही महत्माका पोग मिलता है। क्योकि ये तो वप्रतिबद-विशय होते । फिर ऐसे पुम्योंका निस्प सग प सकना तो किस तय कर सकता है जिसस मुममु धीच सर्व दासोका क्षय करनेके वमन्य कारणोंकी पूर्णरूपसे सपासना कर सके ! उसके मार्गको भगवान् बिनने इस तय गोकन किया है। निम ही उनके समागममें वादाचीन यार प्राधि करनी चाहिये, और उसके म्पेि पार बाम्पतर परिमाप स्पाग करना ही योग्य है। जो उस त्यागको सर्वथा करनेमें समर्प नहीं है, उन उसे निम प्रकारसे एकससे करना उचित है। उसके स्वरूपच स तय उपदेश किया है उस महामा पुरुषले गुणोंगी बतिरुपतासे सम्पर भाचरणसे, परम शानसे परम पिसे, परम निपिसे मुमा बारको बाम चिों परजत होकर शुम समानको पाकर निजस्वरूपके प्रति मुख रोती पाती। उस पुरुपके धन स्पपि भागमतरूप है तो मी बारंबार सपनेसे पचन-मोगको प्रापि १९४] विषिष पत्र मावि संमा-२०वाँ वर्ष न होने के कारण, निरतर समागमका योग न बननेके कारण, उस बधनका उस तयका प्रवण स्मरणमें न गनेके कारण, मातसे मानोंका स्वरूप माननेमें आर्सनकी नावस्यक्ता छनेके कारण, तया बनुप्रेक्षाके पल्की पनि होनेके छिए, बीतरागत-पीतरागशाल—एक बयान उपकारी साधन है। यपि प्रपम तो उस महामा पुस्पारा हो उसके रहस्पको मानना चाहिये, परम्त पाइमें सो विशुर रष्टि हो जानेपर, यह शुत महामाके समागमके बतरायमें मी बग्वान उपकारक होता है। वर्षमा वहाँ उन महामार्मोका र्मया सयोग ही नहीं हो सकता, यहाँ मी पिनुम् रहिवासको बोतरागवत परम उपकारी है, और इसीलिये महान् पुरुषोंने एक स्मेकसे म्गाकर हादशगतककी रबमा की है। उस दशांगके मूह उपदेय सर्वज वीतराग है। महारमा पुरुप उनके सकपका निरतर प्यान करते है और उस पदकी प्राप्तिमें ही सब कुछ गर्मित है, या प्रतीतिसे अनुमवमें वाता है। सर्वत्र पोतरागके बचनको धारण करके ही महान् बाचार्योने बादशांगको रथमा की थी, पौर उनकी वाहामें गनेबाने महात्मामोंने वन्य अनेक निदोष शाखों की रचना की है। द्वादशांगके नाम निम प्रकारसे (१) बापाएंग, (२) सूत्रातांग, (३) स्थानांग, (०) समवायग, (५) मगवती, (१)बाताधर्मकपाग, (७) उपासकदांग, (८) मतदशग, (९) मनुचौपपातिका (१०) मश्नम्याकरण, (११) पिाक धौर (१२) शिषाद । उममें इस प्रकारसे निरूपण किया है। कामदोपसे उनमेंके भनेक स्पड तो बिस्सत हो गये है, और केवल पोरे हो स्पस बाकी गोल्प स्पस बाकी बचे है, उन्हें वेतापरावार्य एका श बगके नामसे कहते हैं । गम्मर इस सम्मत नहीं है और में ऐसा करते है दिसंबा अपना मताको पिसे तो उसमें दोनों सम्प्रशप सर्वपा मिम मिम मार्गको तर देसममें बाते है, परन्तु जब दीपशिसे देवतो उसका कुछ और ही कारम समझ पाता है।
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भीमद् राबचान
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चाहे जो हो परन्तु इस तर दोनों पात पासमें बा चाते हैं
विषाके बनेक स्पड तो प्रयोगनशून्य जैसे हो और ये मी परोक्ष हैं ।
पात्र मोठाको दम्पानुयोग वानि भाषके उपोश करनेसे, नास्तिक वादि मानों के उत्पम
होनेका समय माता है, वपना पुकाानी होनेका समप वाता।
क्षय, इस प्रस्तावमा जे पहाँ संक्षिस करते है और बिस मारमा पुरुपने
(वपूर्ण)
पदि इस तय भी तय प्रतान्ति हो आप वो
•सारहिमी पम्मो, महारस दोसविरहियो देवी ।
निर्माचे पमपणे, सारने ऐई सम्मच ॥
तथा
जायको या तो मोक्षमार्ग है, मही तो उन्मार्ग है।
स हुसका पप करनेवाम एक फ्रम स्तुपाप, सर्म जीवोंको हितकारी, सहसकि भपका
एक वाल्पविक उपाय परम सदुपापरूप वीतरागदर्शन है। उसको प्रतिसे, उसके अनुकरण,
उस बााके परम मनमसे, बान भर-सागरसे पार हो जाता है। समवायंगसूत्रमें माता-
बामा क्या है। कर्म मा! उसका कौन है। उसका उपादान कौन है। निमित्त
कौन है। उसय पति तिमी तक किसके हायपास परिमाणमें कर्म बाप सकती है।
स्पात मात्र का स्वरूप पैसा निर्मप सिवात स्पर सूक्ष्म दौर सकडमा प्रा सा किसी भी
दर्शन नहीं है।
(मपूर्ण)
• गितारित भयादव ए और ARARI माममा सम्मान-मापारक
३१४ नम्मम पिक] पिविप पत्र मादिसप्रह-२०पों पर जैनमार्ग विषेक वफ्न समाधान के लिये यथाशळि नो जैनमार्ग समझा है, उसफा यहाँ पुछ सचेपसे विचार करता - - पनमार्ग, बिस पार्यका बस्तिष है उसका अम्तिाल और निसका अस्तिप नहीं है उसका मास्तिव स्वीकार करता है। पर कहता है कि बिनका नम्तिव है ऐसे पदाप दो प्रकारके है चीप बोर अगा। ये पदार्प स्पर मिन मिमकोई मी किसीके स्वभावका त्याग नहीं कर सकता । जीव की और वरपीके भेसे दो प्रकारका है। जीव मनस है। प्रत्यक मात्र तीनों कालमें जुग पुगो । जीब जान दर्शन यानि मासे पहिचाना जाता है। प्रस्पेक जीव मसम्मात प्रशकी अवगाहनासे पता है, सकोप-पिकासका मागन है। बनारसे कर्मका प्राहक । यथार्थ सापको जाननेसे, उसे प्रतातिमें छानेसे, घिर परिणाम होनेपर उस कर्मको निति होती है । मनपसे नीच वर्ण, गध, रम और स्पर्शी रहित वनर, बमर भार शापत बस्तुहै (अपूर्ण) -- मोक्षसिद्धान्त मगवान्को परम मदिसे नमस्कार करके मनत बम्पानाच मुममप परमप की प्रामिक लिये, मगान् सजदारा निरुपण किये हुए मोच-सिदांतको ना - मम्यानुयोग, कारणानुयाग, चरणानुपोग बौर पमपानुपोगके महानिधि पतियग-मरपनको नमस्कार करता है। कर्मनपारीका परामप करनेवा अहतमगवान्को शुद चैल्पप में मिसालपमें विपरमान सिदभगवान्को; ज्ञान दर्शन पारिब, तप आर कार्य इन मोधक पचापागेका पालन करमबारे, और दूसरे माप जीवोंको बाबारमें गानेवास यापार्यभगवान्को दाग भम्पासी और उस भुत, शद, पप और रहस्पसे बम्प मम्प गयोका अप्पयन कराना आम उपाप्यायमगवानका क्या मोक्ष- मार्गका बामगतिपूर्वक साधन करनेपाडे एम साधुमगवान्का में परम मलिसे नमस्कार करता है। भाउपमनसे भीमहावीरपर्यंत मरतभेषक वर्तमान चौवीस तारोके परम उपकार में मार मार स्मरण करता है। पर्नेम्पनश्चमक परम तर भीमान् धमानदिनी जिसमे दो वर्तमान में मोशमागका मलिन मामर है। उनके इस उपकारको सुधारित पुस्प बारम्बार बामबर्गमप मम है। काउके दोषमे भरार भूत-सागरका पटुनमा भाग पिम्मत स गया है और वर्तमानमें केरल सिम्दुमात्र भपका अपमान हो बासी बरा है । मना रडारे बिम्पन हो जालमे, भार भनेक स्पोमें - भीमद् पयवन्द्र [१९४ महामान स्पून निरूपण यनेके कारण, बर्तमान मनुष्योंको मिर्मन्यमगवान्के उस भुतका इस क्षेत्रमें पूर्ण मम महाँ मिकता। भनक मतमतांतर भादिके उत्पन्न होने व मी यही है, भौर इसी कारण निर्मम भारमा पके अम्पासी महामाओंकी मी मापता हो गई है। सुतके मल्प य नानेपर मौ, बनेक मतमातातरों के मौमुद्र गनेपर मौ, समाधान मानते साधौके परोक्ष होनेपर मी, महामा पुरषोंके कचित् कचित् मौजूद पनेपर मो । मार्पनमो । सम्पयन, मुतका यस्पभूत परमपदका पंथ, मरमानुभवका हेतु सम्पधारित्र और विश्व वाम प्मान नाम मी विमान है-या परम हर्षा कारण है। वर्तमानकालका नाम पम का। इस कारण भनेक पतरायकि होनेसे, प्रतिकता होमेस और सामनोंकी दुर्समता होनेसे, मोक्षमार्ग प्रामि एपसे होती है, परन्तु वर्तमानमें कुछ मोधन मार्ग होमिल हो गया है पर विचार करना उचित नहीं। पचमका में नेपाले महर्पियोंने मी ऐसा किया है। तदनुसार पर्यों करता है। सूत्र वीर बम पनेक प्राचीन भाचा का अनुकरण करके रोए अनेक शाप निपमान है। सबोरिव पुरुषोंने तो उनको हितकारी पुनिसे होरपना की है। इसम्पेि पदि किती मतवादी, नाही और शिथिलताके पोपक पुरुपक स्य रचीई कोई पुस्तके, उन सूर्ये वपणा निमाचारसे म मिलता d, मोर प्रपोजनको मर्यादा से बाल हों, तो उन पुस्तकोंके उदाहरण देकर मनमौर ममा लोग प्राचीन बोषित मापाकि वचनों के उत्पाफ्न करनेका प्रपन नहीं करते। परन्तु पर समझकर कि उससे दपकार होता है, उनका पात मान करते ए में उनका फ्यायोग्य सदुपयेोग करते हैं। चिनदर्शनमें गमर और लेताम्बर ये दो मुम्म भेद है । मतपिसे वा उनमें मान भतर देसनेमें पाता है । परम्तु मिननिमें तावारिस मा विशेष भेद मुश्मापसे परोग है। उनमें कुछ ऐसा भेद नहीं है कि नो प्रत्यक्ष कार्यकारी समता हो । इसलिये रोनों समायोंमें मरम होनेवाले गुणान पाप सम्पनधिसे ही देखते है और नित तय प्राविध अवयप कम हो पैसा वापरण करते है। नामासे निकले रे मनेक मतमतांतर मारें । उनके सरपका निरूपण करने पर मी रति सकुचित होती है। जिनमें मूग प्रयोयनका मी भान नही। इतना ही मही परस्त गो मूल प्रपोजमसे RE पति होलबनते है, में मुनितम सम भी कम हो सकता है। पोलियो मह प्रयोगमको मूहकर देशमै परे पर और अपनी पुस्पता माविके लिये मागेको परमार्थ-मार्गम भतराप करते। २ मुनिचागि मी पारण नहीं करते, क्योकि सोमपनासे । उनको स प्राति पता है। निगम चपा वाचार्यको परमादेस माममात्र हो उनके पास बात तो ये उस्मे परामुपौ। रसी और कोई और सो अम्प बस्तुके समरमाग वापसे मिम भिक मर्ग २९४ इम्पप्रभा] पिविष पम मादि सप्रह-व्या वर्ष पगता है, वीर तीर्थका मेद पैदा करता है, ऐसा महामोहसे मूड बीप लिंगामासपनसे वाज मी पोतरगदर्शनको घरफर मैठा हुवा है-पही असपतिपूना नामका वापर्य माश्म होता है। महात्मा पुरुपोंकी मन्प मी प्रति सस भार परको मोझमार्गक सम्मुस करमेवासी सोहै। निंगा- मासी नीव अपने बसको मोक्षमार्गसे पराङ्मुख करनेमें प्रपर्तमान देखकर हर्पित होते हैं, और यह सब, कर्म-प्रकृति में बहते हुए मनुमाग भौर स्थितिबपका ही म्यानक है, ऐसा मैं मानता (अपूर्ण) (५) द्रम्पप्रकाश प्रम्य वर्षात् मस्तु-वल-पार्य । इसमें मुख्य तीन अधिकार है। प्रथम मनिकारमें गांव और वीष द्रम्पके मुम्न्स मेद करे हैं। दूसरे अधिकारमें नीव भार भनीयका परस्पर संबप और उससे पौवका क्या हिवाहित पता ८ उसे समझाने के लिये, उसका रिशेप पापम्पसे पाप पुष्प भादि दूसरे सास तत्वोंका निरूपण किया है। ये सातों तल नीव वीर बाब इन दो तत्वोंमें समाविष्ठ हो पाते हैं। तीसरे परिकारमें ययास्थित मोशमार्गका प्रान किया है, मिसको सेकर ) समस्त बानी- पुरुषोंका उपदेश। पदार्थक निषेचन वौर सिमंतपर निमकी नीव रक्सी गई है, और उसके द्वारा जो मोश्चमार्गका प्रतियोप करते हैं, ऐसे दर्शन करें--(१) बौद, (२) न्याय, (२) सम्पि, (.) पेन, (५) मीमांसक भौर (६) शेषिक । पदि पैशेषिकदर्शनका म्पायदर्शनमें अवर्माण किया जाय तो मास्तिक विचारका प्रपादन करनेवाला छम पाकदर्शन बग गिना जाता है। प्रश्न -न्याय, पैशेषिक, सांस्य, योग, उत्तरमीमांसा और पूर्वमीमांसा ये के परिमापामें यह दर्शन माने गये हैं, परन्तु पहा तो बापने इन दर्शनोंको मुद्दा परक्सेि ही गिनाया है । इसका क्या कारण है। वेद-परिमापा मतापे हुए दर्शन मेदको मानते हैं, इसलिये उन्हें उस ररिसे गिना गया, भौर उपरोक कम तो विचारकी परिपाटीके मे से बताया है । इस कारण यो मम योम्प है। पम्प और गुणका गो अमन्यत्व-ममेर—बताया गया र प्रदेशमे -तिपना ही है-क्षेत्रभेद-शितपना नहीं। पके नाशसे गुणका नाप्त होता है वौर गुमके मास इम्पका ना होता है, इस तण दोनोंका ऐल्पमान है। दम्प और गुणका नो मे कहा, पास अपनी अपेक्षा है, वास्तविक परिसे महीं । पदि सस्यान और सम्पाविरोपके मैदसे शान और मनाका सया भेद तो फिर दानों बचेतन से गाय-या सह वीतरागका मिति है। बारमा हानको साथ समबाप सवपसे हानी नहीं है। समातिको समवाय प्रत। वर्ण, गंध, रस दौर सर्ग-परमाशु, दम्पके गुण है। समाधान (अपूर्ण) पर भयंत सुप्रसिद्ध है कि प्राणीमात्रको दुम प्रतित और अप्रिय है, क्या मुस बनुझ्य और प्रिय है। उस दुससे रहित होने के लिये और मुरकी प्राप्तिके रिपे मागीमात्रका प्रयान या।।
५. मीमद्रासचन्द्र : प्राणीमात्र या प्रस्न होनेपर मौ, ये दुमका ही अनुभव करते हए रिगोचर होते हैं। पथपि करा की कोई सुम्का वश यो किसी किसी प्राणीको प्राप्त इमा दिसई देता मौ है, तो पर भी दुको बाहुस्पतासे ही देखने जाता है। शंका ---प्राणामारको सवप्रिय होनेपर मी, तथा उसके दूर करनेके म्मेि उसका सहा प्रयत्न गमेपर मी, या दुःस र महीं होता, तो फिर इससे तो ऐसा समझमें बाता है कि उस हुसके दूर करनेका कोई उपाप हो नहीं है। क्योंकि जिसमें सबका प्रयत्न निफर हो भम्म गाता हो कर बात तो निम्पाप ही हानी चाहिये। समाधान'- सके स्वरूपको पपार्थ न समझनेसे, तपा उस दुःसके होनेके मूल कारण क्या है, और ये किस दरार हो सकते हैं इसे यथार्थ न समझनेसे तपा दाल र करनेत्र गोषोंका प्रपन समापसे दो भपपार्द होनेसे, र दुःस दूर नहीं हो सकता । हुास स्वपि समीके मनुममें वाता है, तो भी उसके स्पाइपसे प्यानमें वाने के लिये उमा या पोडासा म्पास्यान करते है:- प्राणी दो प्रकार के होते है- (१) एक सबौर दूसरे स्थावर । उस उनें करते वो सप भय मादिका कारण देखकर भाग गावे हो और यो पम्ने-फिरने बादिको शळि रसते । (२) स्पार उमें राते है कि नो, मिस मगा दो पारण को ससा बगा गते हो और बिनमें मप बादिके कारण समठकर माग नामे बगैराकी समसमाधि न हो। अपना एकत्रियसे भगाकर पाँच इनियतक पाँच प्रकार के प्राणी होते है। एपीय प्राणी त्पावर को गाते, और । इन्द्रियबास मामिपोस गाकर पाँच इन्द्रियोतको प्राणी स कडे गाते किसी भी प्राणीको पाँच इन्द्रियासे अधिक इन्द्रियों नहीं होता। एकेन्द्रिमके पाच मेर-पिषी, मा बाम, बाम और पनपति । पनस्पतिका बीमत तो साधारण मनुप्पोको मी कुछ वनुमानस समसमें जाता है। पपिपी, गस, वमि, और मायुमें बीना मस्तित्व बागम प्रमाणसे और विशेष विचारमसे कुछ समसमें मा सकता है-पबपि उसका सर्मपा समछमें माना तो प्रभाव। मनि मौर गायकवयिक बीच कुछ कुछ गतिपुछ देसनेमें वाते है। परन्तु पर गति बफ्नी निमको शधिको स्ममपूर्वक मही होता, इस कारण उन्हें मी स्थावर हो या माता है। पपि एकत्रिप बालों में बनस्पतिमें पीच पासिम है, फिर मी इस प्रपमें अनुमसे उसके प्रमाण बारेंगे । पूपिनी, बछ ममि बौर मायुमें निम प्रकारसे गावकी सिदि की गई:-(पूर्ण) (७) पौषकेशण- गीतका मुस्प सप तप, परोके प्रमाण है, पिविष पर मादि समार-३०पों वर्ष यह वसम्न्यात प्रदेश प्रमाण है, वह पर्सरूपात प्रदेशस्य लोक प्रमाण है, मह परिणामी है, अमूर्त है, मनत भगुरुछपुगुणसे परिणमनशील द्रम्प, सामाविक दम्य है, की, मोका है, मनादि संसारी है, मम्पत्व सम्धि परिपाक बारिसे या मोम-सापनमें प्रति करता है, उसे मोक्ष होता है, वह मोक्ष सपरिणाममुक्त ह, समार-भवम्यामें मिप्यास, विरति, प्रमा, पाय वौर योग उत्तयेचर बपके स्थान है। सिदानस्याम योगका भी बमा, मात्र पैतन्यस्वरूप बामदम्य ही सिदपद है, निमात्र परिणाम भाषकर्म है। पुद्रम्पय दम्यकर्म- अपूर्ण) (८) भाग-पानाबरणाप बादि कर्माका पुनसके सबसे गो प्राण होता है, उसे दम्पासर मानमा चाहिये । निनभगवाम्ने उसके वनेक मेद करे। बन -जीब निस परिणामसे कर्मा वंष करता है यह माना है। प्रदेश, परमाणु और जानका क्पोम्प-प्रवेशम्पसे सबप होना द्रम्पप है। प्राति, स्पिति, अनुमाग बौर प्रदेश इस तर पार प्रकारका मप है। महति वीर प्रदेश योगसे होता है। स्पितिवार बनुभाग कपापसे होता। समर--नो नामका निरोध कर सके वा पतपस्वमाल मातबर , वीर उसमे जो द्रम्पा बमका निरोष करना पर दम्पसबर है। समिति गुप्ति, धर्म अनुप्रेश्मा वौर परिणा-नप इस तप बारके नो वनेक भेद है उनें मावसबरके ही मेद पानना चाहिये । निरा-तपपर्याशरा मिस काळमें कर्मके पुत रसको भोग आते हैं, पर माननिय है, पया उन पुनर परमाणुओका बारमप्रदेशसे सा गाना दम्पनिर्मरा है। मोश – सब कौक पप एलप वात्मस्वमात्र मात्रमोश है। कर्म-वर्गणासे मामद्रम्पका पृपत् हो गाना इम्पमोन है। इम मेमिका भार्गव रामपाकी सपमान मनुषार या पारे।
। , प्रीमद् परबम्ब [५९४ पुष्प वौर पाप'-जावको शुम और अघुम भारके कारण ही पुण्य पाप है । साता, गुम माप, शुम नाम और उप गोत्रम रेत पुस्प है। उससे उल्टा पाप है। सम्पनि, सम्पदाम भौर सम्पचारिप ये मोशके कारण हैं । म्पहारनपसे ये तो मण मा। निपपसे वारमा होइन दोनों है। वामाको घोकर ये तीनों रत्न बम्प किसी भी दम्पमें नही रते, इसलिये मामा म नामों रूप है, और इस कारण मोक्ष कारण भी वारमा हो। माप वारि तत्वोंकी बास्यानप बारमस्वभाव सम्पादर्शन है। मिप्या बापासे रहित होना सम्पवान है। सशप पर्पय वीर भतिसे परित यो मामला मौर परस्परपको पपास्मसे प्रण कर सके वा सम्पमान है। उसके साकार उपयोगरूप क्नेक भेद है। नो मानों के सामान्यस्कलाप उपयोगको प्राण कर सके पर दर्शन है। दर्सन शम प्रशारे अपमें भी प्रपुछ होता है, ऐसा मागममें का। उपत्यको पहिले दर्शन वौर पीछे बाल होता है। केवीमगवानको दोनों साप साप होते हैं। मशुम मापसे निरपि बार नाम मातमें प्रति होना चारित्र है। म्पनहारनपसे चावीतपगियोंने उस चारित्र मतको समिति-गुतिरुमसे प्रा। ससारके मूह हेतुओका विरोध नाश करनेके लिये पानी गुरुपके गो बाम और अंतरग किया निरोप देना है, उसे पौतगियोंने परम सम्पधारित्र श्रा। मुनि पान के 10 मोसके कारणम्त इन दोनों पारिको वक्ष्य प्राप्त करते है, उसके लिये प्रपत्नबाल बिसे न्यानच रच्म अम्पास करो। पदि तम स्थिरताको दा करते हो तो प्रिय बप्रिय बस्तुम मोह न करो, एग न कणे, रेष नपरो । बनेक प्रकार के मानकी प्राप्तिके शिये , सोम, म, पाँच, चार, रो और एक परमेप्रपा के मापक यो मत्र है उनका अपपूर्वक ध्यान करो । इस विशेष लक्ष्म मास्के उपरेशसे जानना चाहिये। नमा सदुखेंचा मार्पतिक नमान और परम सम्पानाच पुसकी प्रालि ही मोल, औरही परमदित है। बीतपग स्मार्ग रस्सा सहपाप है। इस स्मार्गका सहित विवेचन इस तरी. सम्यादर्शन सम्पमाल और सम्पबारिकी एकता को मोलमार्ग है। समाके में भासमान तत्वोको सम्पक प्रवाति ना सम्पदान है। उस पाबोध ऐना सम्यवान है। उपादेप टाका भम्पास होना सम्पचारित है। बामपदस्वस्म तिगामें स्पिति ना, तामाकी एक्यो।
मिषिप पत्र मादि संग्रह-यो वर्ष ६५३ सर्वदेव, निर्भय गुरु और सोपदिए धर्मको प्रतातिसे तत्तका प्रतीति होती है। सर्व बानापरण, दर्शनापरण, सर्व मोह, भौर से वीर्य मादि बतण्पका क्षय होनेसे वामाका सहीतरम-समान प्रगट होता है। निर्मपपदके मम्पासका उत्तरोतर क्रम उसका मार्ग है । उसका यस्प सोपदिए धर्म है। (१०) संग-कपित उपदेशसे वामाका स्वरप गानकर उसकी सम्यक् प्रकार प्रतीति करके उसका ध्यान करो। म्यों म्यों म्यानको विशुद्धि होगी स्यों स्यों शानावरणीयका क्षप होगा । यह म्याम अपनी कल्पनासे सिर नहीं होता। मिनें मानमय बारमा परमोहए मावसे प्राप्त हुई है, और मिनहोंने समस्त पर ब्रम्पका स्पा कर दिया है, उस देवको नमस्कार हो ! नमस्कार हो! बार प्रकारके निदामरहित वपसे, राम्पमानासे माणित और महमासे रहित हानीके हो काँकी निरा होती है। का निर्मग मी दो प्रकारको समम्मी चाहिये -सकाम्प्राम भार तपपूर्वक । परिण निरा चारों गतियोंमें होती है। वौर दूसरी पारीको ही होती है। ग्यों पों उपशमको पनि होती है स्यों त्यो प्यों तप करमेसे कर्मको वधिक निर्मगती है। उस निर्जराके कमको करते हैं । मिथ्यादर्शनमें रते हुए मी बिसे पोो समयमै उपचम- सम्पम्दर्शन प्राप्त करना है, ऐसे जीवको अपेक्षा बस्यत सम्पमपिको यसप्यात गुण निर्भय होती है, उससे बसम्मात गुण निर्मग देशविरतिको होती है, उससे मसाल्यात गुण निरा सर्वपिरति बानीको होती है। उससे (अपूर्ण) (११) (१९ हे चौष इतना अधिक स्पा प्रमाद ! र वाम पदको प्रति म्पेि पोतराग मार्गको उपासना करनी चाहिये । सपादेव पेपर वास्मारि होनेके नाबम है। सिप गुरु } दयामुम्य धर्म घागुम्से सारा मनुभूत ऐसे मुद वारमप्राप्तिके ठपापको समसकर, उसके यस्पको प्यानमें मेकर मात्मप्राप्ति करो। समिति-धर्म पपागाति और यपागि है। देशविरतिपर्म माय प्रचारका है। स्मस्मारि होते हुए दम्पानुपोग सिम होता। मिार-पाति मात करते हुए परमानुपोग सिम होता है। प्रताविपुल परि होते हुए करणानुपोग सिम होता है। पम्प्रेषक को समझाते हुए धर्मकपानुपोग सिख ऐता है।
भीमद् रामचन्द्र [१९४, ५९५,९९९ (१२) मोधमार्गच बस्तित्व गुरु धर्म धर्मको पोग्यता निर्मरा प्रमाण मय मोक्ष बनेकांत पान होक दर्शन बगेक चारित्र बहिसा सत्य म्य बसय गुण प्रापर्य पर्याय अपरिह संसार वमा एकेन्द्रियका मस्तित्व म्पबहार (२) बागम सपम बर्तमानकाम गुणस्थान दम्पानुयोग करमालपण परमानुयोग धर्मपानुपोग मुनित्व गापर्म परिण उपमा पुण्य पाप ६९५ ॐनमः मुहम्प शामता प्रम्प और मीच पर्याय वशाधत है अनादि नित्य पर्याप:--मैरूपादि ६९६ ममो भिमार्ग मित्रमाण बिनतत्व-संक्षेप बाराशनंत है। उसमें पातनात्मक विच सपिपिए है। विषको मर्पण रोजमूर्त मम्मोसे है मिमें धर्मास्तिकाप और मर्मास्विप कावे। पौर और परमाणु-मुद्रा ये दो इम्प सक्रिय है । सब इम्प इम्फारसे पास है। याच बर्नत। परमाणु-पग बनतामत है। धर्मास्किाप कर्मास्तिफाप एकहै। पाकाशास्तिकाप एकका प्रापेक गौर मिश-प्रमाण वामगार कर सकता है।
विषिष पर भादि सपा -यो वर्ष ६९७ (१) ॐ नमः सब पीर सुसकी इच्छा करते हैं। दुम सबको बप्रिय है। सब बीब तुमसे मुफ होनेको इशा करते हैं। उसका वास्तविक सरूप न समझनेसे दुम्स दूर मही होता। उस दुःसके स्पतिक ममावको मोन करते है। मस्पत गीतराग ए पिना मोल नहीं होती। सम्पमानके बिना वीतराग नहीं हो सकते । स्म्यग्दर्भनके बिना हान असम्पा कहा जाता है। बस्तुको निस स्वमानसे स्थिति है उस समापसे उस वस्तुकी स्थिति समझनेको सम्पमान करते है। सम्पदर्शमसे प्रतीत वास्ममाक्से बापरण करना चारित है। इन तीनोंकी एकतासे मोक्ष होती है। चीव पाभाविक है। परमाणु स्वामाविक है। नीष बनत है। परमाणु बनत है। जीन और पुद्रसका संयोग अनादि है। अबतफ गोवको पुसका संबंध है तबतक गोव कर्मसहित हा पाता है। भाषकर्मका का नाम है। मापकर्मका दूसरा नाम मात्र हा माता है। माफर्मक कारण और पुठको प्राण करता है। इससे तैयस बार शरीर और बौदारिक मा िशरीरका सपोग होता। भारकर्मसे विमुख हो ता निवमात्र प्राप्त हो सकता है। सम्पानिके पिमा गार पास्तविकरपसे मारकर्मसे पिमुम नहीं हो सकता। सम्पादन होनेमा मुम्य बिमानसे तत्वार्थमें पति होना है। (२) ॐ नम पि ममानि। बामाश सम्पापक है। उसमें छोक समिहिर है। मा पेतनस सम्पूण टोफ भरपूर है।
[१९८५११,
भीमद् ण्यचन्द्र
धर्म, वधर्म, वारा, काम और पुगए पे दम्प पर है।
जीव दम्प पेतन है।
धर्म, अपर्म, वाफाश, काप ये चार दम्प वमूर्त है।
मखत कार नौपचारिक ब्रम्प है।
पर्म, वधर्म, और वाकाश एक एक दम्प है।
फाप, पुगत धौर गाव नंत इम्प है।
दम्प, गुण वौर पप्पलक है।
६९८
एकात वास्मति
एषत बारमा
एकमात्मा
केक एक बारमा ही
कैमा मात्र वाहमा
केपट मात्रमात्मा हो
एर बारमा
मात्मा हो
स निर्षिफम्प सप्यातात सायस्वरूप मामा "
६९९
में असग पर कम । ।परमातात निर्विकल्प एकाव एव नुमरारूप ।
मैं परम पुर बम विदात है।
बचित् पातुके स्योग रसके इस मामासको तो देखो।
बावर्षपद बापर्यरूप, पटना है।
आप किसी भी निकम्पका बसस महा।
स्पिति मी ऐसी है।
• पाति]
पिषिप पत्र मादि सपा-३म्पों वर्ष
७००
*सर्वशाय नमः -नमा सहरये
पचास्तिकाय
शत इन्द्रोभरा कदनीय, तीनों गोकाको न्याणकारी, मधुर बार निर्मक जिनके नाम्य है,
धनंत निनके गुण , ससारको बिगहोंने चीत लिया है, ऐसे सर्वच गोवरगको नमस्कार ॥१॥
नीषको चारों गतिमि मुक्त करके निर्वाण प्राप्त करनेवाले ऐसे बागमको नमस्कार कर,
सक महामुनिके मुम्से उत्पन अमृतरूप इस शाखाको फरता , उसे भवण करो ॥२॥
पाच मस्तिकायोंके समूहमप मय-समपको सर्पण गौवरागदेवने सोक कहा है। उसके पथात्
बनत भाकाशरूप मात्र अठोकरी महाक
गोष, पुनस्सह, पर्म, अधर्म तया वाकाश पे फाथ नियमसे अपने वस्तिनमें होते है,
ये मपनी सबसे अमिम है, और अनेक मशरमक ॥ १ ॥
भनेक गुण पोर पापोंसे सहित बिसका बस्तिल-समार है उसे भस्तिकाप करते, उससे
प्रेगेस्प उत्पन होता है॥५॥
ये मस्तिकाप तानों का मावरूपसे परिणमन करते हैं । तया इनमें परिवर्तन पणनाले
कामदम्पके मिला देनेसे सदम्प हो गाते हैं ॥६॥
पे दम्प एक दूसरेमें प्रवेश करते हैं, एक दूसरेको भाकाश देते हैं, परस्पर मिल जाते है,
मौर फिर जुराहो जाते है, परन्तु फिर मारे अपन अपने सभागका त्याग नहीं करते ॥ ७ ॥
सत्तास्वरूपसे समस्त पाप एकरूप है ।बर सचा वर्नत प्रकारके समावपाली है, पर उत्पाद
म्पय धौम्पसे मुकर वो सामाप-विशेषारमक है ॥ ८॥
एम्पका पक्षण सत् है पर उत्पाद प्यप और प्रीपसे पुछ है। गुण-पापका मामपमत है-
ऐसा सप्रादेवने कहा ॥९॥
दम्पकी उत्पति और विनाश मही होते । उस समार हो
बस्ति'। उत्पाद म्पप
भोर धौम्प, ठसकी पर्यापको लेकर ही हाते हैं ॥१०॥
दम्प अपनी सीप पर्यापोको प्राप्त होता है उस उस भाषसे परिणमन करता है-मठिये
उसे दम्प पाते हैं, यह अपनी सबसे अभिम है ॥ ११ ॥
पापसे परत इम्प नहीं होता, और इन्परहित पर्याप मही होतीनों ही मनम्पमारसे
एते, ऐसा महामुनिपान करा रे ॥ १२ ॥
दम्पके रिना गुण महरी हाते, और गुर्गोंके बिना इम्प नहीं होन-इस कारण दोनोंय (प्य
और गुणा ) सप अभिमरे ॥ १३॥
स्पात् अग्नि, स्पात् मास्ति, स्थात् अस्ति मास्ति, स्पात् भरकम्प, स्यात् पनि मरक्षम्य,
पात् नास्ति मान्य, स्पान् मन्ति माति पातम्य-न को लेकर इम्पके सात
मग वे ॥१४॥
। भीम पवन [• पंचारिसमा मावका कमी माश नहीं होता, दौर बमाको उत्पति नहीं होती । उत्पाद और म्पप गुण- पायके समापसे ही होते है ॥ १५॥ गाल वादि सपा है। जानका गुण तम्प-उपयोग है । देव, मनुप्प, नारक, विधि बादि उसकी अनेक पर्याय है ॥ १९ ॥ मनुप्प-पर्यापसे मरण पानेवान पोष, देव अपना अन्य किसी स्पानमें तत्पम होता है । परन्तु दोमों जगह पावन तो पुष ही पता है। उसका नाश होकर उससे भन्य कुल उत्पम नही होता ॥१७॥ गो गान उत्पनामा पा, उसी नौनका नाश होता है। वस्तुत तो पर जीप म तो तत्पर होता है और म उसका नाश होता है। उत्पन वीर नारा तो देव नार मनुप्प पर्यापका ही होता है॥१८॥ इस वर सदका विनाश और बसत् जीवको उत्पत्ति होता है। जीपको चो देव मनुष्प मादि पर्याप होती है गतिनाम कमसे ही होती हैं ।। १९ ।। मानने बानापरणीप मादि कर्ममापोंको पुखरुपसे- भविष्य गाइरूपसे-गॉप रमस्य है। उनका ममाव करनेसे नमूतपूर्व सिरप निम्ता॥ २ ॥ इस तर गुरु-पर्यापसहित जोर माप, अभाव, मावामान वीर वमानभावसे संसारमें परिभमण करता ॥ २१॥ गौष पुद्रम्समा, पाकाश तया वाकीके बस्तिकाप किसीक भी बनाये पर नहीं सस्पसे होमस्तिक-समाप, मोर छोटके कारणमूव ॥ २२ ॥ सता स्वमामाले मात्र बौर परम परिवर्तनसे उत्पम बोकार है, उसे निमपाक कहा॥२३ पर कार पाँच पर्ण पाँच रस, दो गप, और बाठ स्पर्शसे परत है, गुम्म्मु गुणसे सहित है, बम है और बना सणसे पुको ॥ २० ॥ • समप, निमेष काय, कठा माली, म, पिस रात्रि, मास इतु, वौर सकसर बादि कासम्पपारफा २५॥ कासक किसी भी परिमाण (माप) के बिना पाकार और बम्पकाका भेद नहील सकता । क्या उसकी मर्यापुनम द्रम्पके बिना नहीं होती, इस कारण कायका पुत्र इम्पसे सत्पर होना कहा जाता है॥२६॥ बोरामपुक जाता उपयोगसहित, प्रमु, कर्ण भोय, देोके प्रमाण, नियमनपसे बमूर्त और कावस्थामें मूर्त ये गावके क्षण २७ ॥ धर्म मनसे सर्व प्रकारसे मुक्त होनेसे उर्मीको मतको प्राप्त होकर, या सर्व सामान इनिपसे पर नतमुखको प्राप्त करता है ॥२८॥ मरगति पने पासपमुनिना में मातम परी सते तव पाने समयमै मेरे पर गने तपोमस्या समीप एक निमेर दोषा रा मियो एक प्रम ली है। बौन प्राममोग एकसम रोग है। भाजपाल गोही एक नाजी मा परिन रोग है। सपास एकमना है। टोल शाम एक तिपय रोग है।-बार
पशास्तिमप]
विषिष पत्र मावि सपा-यो वर्ष
अपने स्वाभाविक माबों के कारण पास्मा सर्वद वौर सर्पदशा होती है, और अपने कर्मोसे मुळ
होनेसे बनत मुसको पाती है ॥ २९ ॥
कछ, इन्द्रिय, वायु वौर सासोवास इन चार प्राणोंसे गो मूतकाछमें बीमित था, वर्तमान
काममें जीवित है, भार मविप्पकाठमें चौवित रहेगा, पहनी है ॥ १० ॥
मनत मगुरुण्मु गुणोंसे निरन्तर परिणमनशील बनस बीव है। पे जीव वसल्पात प्रदेश
प्रमाण है। उनमें कितने ही नीयोंने गोक-प्रमाण अवगाहनाको प्रास किया है ॥३१॥
कितने ही बीमोंने उस बगाइनाको प्राप्त नहीं किया। मिप्यादर्शन कपाप और योगसहित
धनत ससारी जीव है। उनसे रमित बनत सिम्जीव है । ३२॥
निस प्रकार पभराग मणिको दूधमें सब देमेसे वह पके परिणामको तर भासित होती है,
उसी तरह देह में स्थित पारमा मात्र देह-प्रमाण ही प्रकाशक है, मर्यात् बारमा देह-म्पापको ॥१३॥
मिस तय एक काया सर्व वनस्पायमि बहीका वही गार हवा है, उसी तर सर्वत्र सहार
परस्पानोंमें भी नहीका यही सीव गता है । बम्परसापविशेपसे ही कर्मरूपी रगोमलसे का बीप
मकिन होसा॥३१॥
निमके प्राण-धारण करना बाको मही हाई-निमके उसका सर्पपा वमान हो गया है-
वे दोसे मिन बार पचनसे बगोचर सिर और ॥ ३५॥
मास्तबमें देखा गाय तो सिद्धपद उत्पम नहीं होता, क्योंकि यह किसी दूसरे पास उत्पम
होनेवाला कार्य नहीं है। इसी तरह किसीके प्रति कारणम्त मी नहीं है, क्योंकि उसकी कम्प
किसी विषसे प्रति मही होती ॥ ३३ ॥
पदि मोघमें जीपका वस्तित्व ही न हो तो फिर शायत, अशत, मम्प, बमम्य, शून्य,
पन्य मिान वौर वरिझान से मार को किसके हों ॥२७॥
कोई गाल फर्मक फरका बेदन करते हैं। कोई और कर्म समपके कम्पका बेदन करते है,
पौर कोई नाम मात्र छड कानो स्वभावका बेदम करते है-इस तर पेरकमावस भालोक
तीन भेद ॥ १८ ॥
स्पावरकायिक नीव वपने वपमे किये हुए क्रमांक फलका मेदन करते है। प्रसपान कर्मषप
पेतनाचा बेदन करते है और प्राणोंसे रहित बीन्द्रिय मीच पुरधान घेतनाका बेदन करते हैं ॥२९॥
पान मौर दर्शनके मेदसे उपयोग दो प्रकारका है। उसे मोबसे न कामें अमिम
समसमा चाहिये ॥ १० ॥
मति, भुत बधि मन पर्पच, वौर केपसके मेदसे शानके पोच मेद । फुमति, कुमुव और
निमग ये वडानके तीन भेद है। ये सब बानोपयोगके मेद ॥२१॥
चमुर्शन, बबभुदर्शन बषिदर्शन और बबिनासी बनत केवदर्शन ये दर्शनोपयोगके
चार मेद ॥१२॥
मात्मा कु हान गुणके समपसे बानी है, पर बात नहीं है। परमापसे वो दोनोंकी
अमिमवा हौ॥१३॥
६१. भीमद् पसवान पचारिस पवि दम्प मिम ऐ और गुण मिन हो, तो एक द्रम्पके वर्नत ब्रम्प हो गाय, मा इम्प- काही बमार हो बाप nou मम्प वौर गुण वमिमरूपसे पते है-रोमि प्रदेशमेद नहीं है। उनमें ऐसी एकता है कि दम्पके नाशसे गुणध मारा पे गाता है, और गुणके नाशसे द्रम्पका माध हो जाता है ॥१५॥ प्पपदेश (कपन), सस्पान, सम्या और निपम इन पर प्रकारका विवक्षामोंसे ब्रम्प और गुणके वनेक मेद हो सकते है, परन्तु परमापनपसे दोन पाका बमेद हो॥ १६॥ बिस तय किसी पुरुषके पास पदि षन हो तो वा पमबाग कहा जाता है, उसी तय पारमाको शान होमेसे वह मानवान को गाती है। इस तर तत्ता पुरुष भेद-बमे सस्मको दोनों प्रकारोंसे मानते हैं ॥१७॥ परिवारमा बौर बाना सर्वपा भेद थे तो फिर दोनों बचेन हो बाप-पहावरण समय सिद्धान्त ॥१८॥ पदि ऐसा मानें कि हानका संबंध होनेसे हो बामा हानी रोती है, तो फिर वामा और खान (बस्व ) दोनों एक ही पायगे ॥१९॥ समाविको समाप करते हैं। पर वयक्त और क्युतसिन है, इसरिसे बीवरागिने इम्म वीर गुणके सबंधको वपुतसिद का॥५०॥ परमाणुके वर्ण, रस पंप दौर स्पर्श पे चार गुण पुनब्दम्पसे अमिन । म्याहारसे ही पुस दम्पस मित्र को पाते ॥५१॥ इसी पय दर्शन दौर भान मी गारसे वभिन्न । म्पहारसे 0 उमका बामासे मेर मा माता.n५२॥ बामा (पतरूपसे ) अनादि-वनंत है और स्तान अपेक्षा सादि-सात सौ वय या सादि-मनंत मी । पाँच माषाको प्रपानतासे हो सब मग होते है। सवारूपसे तो और इस ममतः॥५॥ इस तय सङ्घ विनाश और असत् नीमच उत्पाद परस्पर विस्व होने पर मी, मिस तय भनिरोपरूमसे सिर होता, उस तय हवातराने या॥५१॥ नारक तिच, मनुष्य और रेस ये मामकर्मकी महवियों सदका विनाश वीर बसलमानका मपाकरता ५५॥ उदय क्षयोपशम बीर पारिणामिक मागोसे मारके गुणों का बहुत स्किार है॥५५॥ बम्पर्म मिमित पाकर सदप बाट मात्र बीत परिणमन करता है और भापकर्मचानिमित्त पाकर इम्पर्म परिणमन करता है, ममात्र कर्म एक दूसरे मायके का मह, सपा में किसी कि दिना ही होते ॥५॥ सा माने अपने समाके की है, उसी तय नामा मीनपने ही मात्र कर्ण, मामा पापी-पे वीतरागके बाप समधने चाहिये ॥५८ ॥ उपशम पप .. चास्तिकाप] षिविप पत्र मादि संप्रह-यावर्ष ६६५ यदि कर्म को कर्मका कर्ता ऐ, और बारमा ही बामाको कर्ण हो, तो फिर उस कर्मके फसका भोग कौन करेगा और कर्म अपने फसको किसे देगा। ॥ ५९॥ कर्म अपने सभावके मनुसार यथार्थ परिणमन करता है, वौर नीम अपने स्मारके बनुसार मारकर्मका कर्चा है॥१०॥ सम्पूर्ण ठोक पुद्रम् समोस- सूक्ष्म वौर गावर पिविष प्रकारके बनत स्कोंसे-अतिशय गारुमसे मरा वाहै॥ ६१ ॥ बारमा जिस समय अपने मावर्मबप समावको करती है, उस समय वहाँ रहनेवाले पुगर- परमाशु अपने समायके कारण प्रन्यकर्मभावको प्राप्त होते है, तया परस्पर एकक्षेत्र ममगाहरूपसे वविशय गारुप हो जाते हैं॥ १२ ॥ फर्म का न होनेपर भी, निस तर पुद्दम्पसे अनेक कोंकी उत्पति होती है, उसी तय पुनस्यन्म कर्मरूपसे स्वामाविकरूपसे ही परिणमम करता है, ऐसा मानना पाहिये ।। ६३ ।। नौर और पुद्गम्-समय परस्पर मममूतहमसे सबद है। यथाकार उदय बानेपर उससे जीन मुस-दुसरूप फलका बेदम करता है॥६१ ॥ इस कारण गार कर्ममापका का है, और मोळा मी वही है। पेदकमानके कारण पर कर्मफलका बनुभव करता है॥६५॥ इस वह वास्मा वपने भाषसे ही कला और मोक्का होती है। मोहसे चारों बोरसे बारित या चीन ससारमें परिभमण करता है। ६६ ॥ (मिप्याब ) मोहका उपञ्चम होनेसे अपना क्षय होनेसे, गीतराग-कथित मार्गको प्राप्त पीर पुरहानाचारबत बीष निर्वाणपुरीको गमन करता है॥१७॥ एक प्रकारसे दो प्रकारसे, तीन प्रकारसे चार गतियों मे से, पांच गुणोंफी मुस्ल्पतासे, ग्य कापके मेदसे सात मोके ठपयोगसे, पाठ गुण अपया बाठ कौक मेसे, नर तलोक मेदसे पौर दश स्थामकसे गोषका निरूपण किया गया है ॥ १८-१९ ॥ मतिबंध स्थितिषष, वनुमागवध और प्रदेशपस सर्पया मुळ एनसे गीर कागमन करवा है। ससार अपना कर्मावस्याम जी निशाको छोड़फर अन्य रिशाभोंमें गमन करता है ॥ ७ स्कंप, स्कपदेश, कपरेश भौर परमाणु इस तर पुनस-अस्तिमायके चार मे जानन पाहिये ।। ०१॥ सकल समस्त क्षमाको स्वभ, उसके मारे मागको देश, उसके भाचे भागको प्रोप, और विसका कार्य माग न हो सके, उस परमाणु कहते है ॥ ७२ ॥ बार बार सूक्ष्म परिणमनको प्राप्त स्कोंमें पूरण (बइमा ) भौर गगन (कम होना) समात होने के कारण परमाणु पुटके नामसे कहा जाता है । उसके एप भै है, उससे प्रेोय उत्पन होवा॥७३॥ सर्व कंपोंका नो सबसे अन्तिम मेद कहा है वह परमागु है। सद, पसद, एफ, मरि माग बौर मर्द होता है ! . ॥
भीमद् चय यो समयम्से मूर्त है और चार भातमाका कारण है, उसे परमाणु समझमा पारिपे । परिणमन-समापसे मुक सर्य शाइरहित है परन्तु शम्दा कारण है ॥ ७५ ।। कंपसे शम्द उत्पन्न होता है । बनत परमाणुभोंके मिशप (सपात ) के सम्इको कम करने है। न कों परस्पर स्पर्श होमेसे (सपर होनेसे ) निषपसे शम उत्पम हाता है॥७६॥ र परमाणु नित्य है, मपने रुप मानि गुणोंको वाफाश (आमय) मान करता है, सर्प एकप्रवेशी होनेसे एक प्रदेश के बाद काकाशको प्राप्त नहीं होता, दूसरे ब्रम्पको (बाकायको क्य) भाकाय प्रान नहीं करता, कंपके मेका रण है, रूपक भाका कारण , कभका कर्जा ? पौर काम्के परिमाण (माप) बौर सम्मा (गणमा) का है ॥ ७ ॥ चो एक रस एक वर्ण, एक गंध पौर दो स्पर्शसे युक्त है, प्रदको उत्पत्तिका कारण है एक प्रदेसात्मक प्रदरहित , बिसका स्वरूप परिणमन होनेपर मानो उससे मिम है, उसे परमश समन्ममा पानिये ।। ७८॥ जो इन्द्रियोंघरा उपमोम्यो तपापा मन और कर्म मारि को नो वनंत वमूर्त पवार, उन सबको पुनमम्प एमझना चाहिये ॥ ७९ ॥ भस्तिकाय इम्य बरस, वर्ण, वगम, वशम्द बौर यस्पर्श है, सफर क-प्रमाण है, तपा पर विस्तीर्ण और बसम्पात प्रदेशमक ॥८॥ पर निरंतर करत गुरुग्भु गुणरूपसे परिगमन करता गति-छियापुछ पदार्थोको कारणभूत है, सर्प कार्यरत वर्षात् यह दम्य किसीसे भी उत्पम महीता ॥ ८१॥ मिस तय मम्मको गमन करनमें अ० उपकारक रोगग। उसी तय गो पाच मोर पुन प्रम्पकी गतिय उपकार करता है, उसे धर्मास्तिकाय समझना चाहिये ।। ८२ ॥ पैसे पमस्तिकाय दम्य है, उसी तय अवर्मास्तिकम्प मी सतत्र ब्रम्प राय प्रणाली तय स्पिति-किपाबुल पांच और पुनको कारणमत है ॥ ८॥ धर्मास्तिकाप गौर बधर्मास्तिकापसे लोक मोकका विभाग होता है। ये धर्म बोर अधर्म रम्प अपने सपन प्रयोकी अपेमा दे देक्य हम्म चम्न क्रियासे रीवा, और छोक प्रमाण ॥ ८ ॥ बर्मास्तिकाय अबान और पुनको स्वये घशाता है, या बात नगी । परन्तु गोल पुरा सर्य दी गति करते हैं पाउने फेवर सहापकमात्र होता है । ८५॥ यो सब पापोंचो और शेन पुगेको सम्पूर्ण मारा प्रान करता है उसे मोकाय करते ॥ ८ ॥ मोर प्रसाद, पर्म बौर बमर्मवम्य कसे बमिम , बत् ये कमें कोको शहर मही है। बाकाश मेकसे मौ बाहर है और यह बनता है उसे वठोक करते ॥८॥ यरिबकाश गमन और स्थितिका कारण होता तो धर्म और वधर्म सम्मके मानके कारम सितमगवान्का बगेकमें मी गमन हो जाता ।। ८८॥ सभरण सच पोरगदेवने सिनमगवान्ध स्पान कहकके क्तमें बताया है। इस धरण बाकाको गफन और सानका कारण नहीं समाना चाहिये । ८९॥
पचाविकाय] विविध पन मादि संप्रह- पो पर्प यदि गमन षयमा स्थानका हेतु बाकाच होता, तो बगेकको हानि हो पाती गौर लोकके अतकी पदि हो जाती ॥ ९ ॥ इस कारण धर्म बौर अधर्म दम्य ही गमन वौर स्थितिके कारण है, वामान मही। इस सय सतह वीतयगने प्रोता बीपोको गेमके स्वमायका पणन किया है॥९१ ॥ धर्म, अधर्म बौर मेकाकाश अपृथक्मत (एक क्षेत्रागाही ) मीर साय परिणामपाले । ये सीनों दम्प निषपसे पृपक् पृथक् उपपम्प होते हैं, और अपनी अपनी सपासे यते। इस वय इनमें एकता भार अनेकता दोनों है ॥ ९२ ॥ वाकाश, काग, नीव, धर्म और अधर्म प्रम्य भमर्स है, और पुनर दम्प मूर्व है। उनमें भाव दम्य रेवन है ।। ९३ ॥ जिस तर जीव और पुद्गर एक दूसरेको क्रियाके सहायक है, उस तय मे दम्प सहायक मही। जीन पुनमग्यके निमित्तसे क्रियावान होता है । माडके कारण पुगर भनेक कपरूपसे परिणमन करता ॥ ९ ॥ चौबका बो इन्द्रिय-ग्राम विषय है यह पुनवदम्य मूर्व है, बाकीके सब ममूर्त है। मन अपने विचारके निमितरूपसे दोनोंको जानता है ।।९५॥ काल परिणामसे उत्पन्न होता है। परिणाम कासे उत्पन्न होता है। दोनोंका ऐसा समान है। निश्याब्से क्षणभगुरकार होता है ॥ ९६ ॥ कास शा भपने मस्विका बोधक है। उसमें एक नियो और दूसरा उत्पाद और म्पयवाग॥१७॥ फार, आयश, पर्म, अधर्म वौर पुगत सपा गौष इन सबकी दम्प संवा है । काठकी मस्तिकाप संसा नही ॥१८॥ इस प्रकार निर्मथके प्रवचनके इस्पत इस पचास्तिकापके सरपके संझिम विरेचनको पपार्परूपसे नामकर, जो राग-देपसे मुक होता है पर सर्व दुमसे मुझ से बाता है ॥९९ ।। इस परमार्थको मानफर जिसने मोडका माश कर पा है, निसने एम-ट्रेपने शत कर पा है, जीप ससRकी वीर्य परम्पराका मारा करके पुर मरमप में बीन हाता है ॥१.०॥ इति पपास्तिकप प्रथम बप्पाप ॐ जिनाप नमा-नमः मीसदगुरये मोक्षके कारण श्रीभगवान्महावीरको मधिपूर्वक नमस्कार करके उस भगवान्फे को हुए पापा मेरूप मोइके मार्गका कावा ॥१॥ दर्शन हान तपा एमपरहित पारिख, भौर सम्पन्दि पिसे मात एमे मम्प गोलको मात्रमार्ग होता।।२।। तत्तार्यकी प्रति सम्पम उन मात्रा बानमा पान है और रिय-मार्गके प्रतिशत मारामाणि.
।
॥
भीमन् पत्रपन्द्र
चीन, भयान, पुष्प, पार, वाभव, सपर, निर्नय, बामौर मोश ये नौ पर्या
नाव दो प्रकार के होते हैं। स्मारी और वसंसाए। दोनोंका झण बन्पोपयोगी। ममी
नाल दासहित और ससारी देहरहित होते ॥५॥
प्रविधी गम, अग्नि, वायु और बनस्पति से जीवोस पुष । इन गायोंको मोहका प्रमकता
पता है, और उनें स्पर्शन इन्दिपके विषय बान मौज रहता है |
उममें तीन प्रकार के बीच स्पाबर है। मप योगनासे ननिकास वोर मापुत्राय जीव स है।
उन सको मनके परिणामसे रिव एकेन्द्रिय गान समझना चाहिये ॥ ७॥
पे पौधों प्रकार के पार मन-परिणामसे रहित और एनिप है, ऐसा सधन का है ॥ ८॥
निस तण मणे पश्चाका गर्म मवा है, निस तय मनुप्यके गर्मम मागत वस्पा होनेपर
मी गावस्व मौर, उसी तरह एकेन्द्रिय जायोंको मी समझना चाहिये ॥ ९॥
सूक, पास, सौप कृमि इमानि जो जीव रस भौर स्पर्शको जानते है, तो लिप बार
समझना चाहिये ।
५, मकी, चीटी, बिन इस्पादि, और वनेक प्रकारके दूसरे मी चो श्री रस स्पर्म और
गरको बानते है, उन्हें तीन इन्द्रिय पाच समझना चाहिये ॥ ११ ॥
गैस मन्म, मासी भमरी, ममर, फ्ण स्पादि यो सम, रस गप पौर स्पर्श नागवे
है, उनें चार इन्द्रिम गौष समठना चाहिये ॥ १२ ॥
देव मनुप्प नारफ, तिर्यच (उचर, स्पाचर और सेपर ) ये वर्ण, रस, सर्ग, गंध
और धमको चानते हैं। ये पान पाँच इन्द्रियोंबा चीन ॥ १३ ॥
देवताओंके भार निकम्प होते है। मनुष्य कर्म बौर वर्मभूमिके मेइसे दो प्रकारके है।
तिपंच कनेक प्रकारके रे। नारकी नौषोंको गितनी प्रपिा-योनिया है, उतना ही उनकी जातियाँ है॥११॥
में दोषी हुई वायुके क्षीण हो जानेसे मीच गति नामकर्मक पण बायु र मेयाके
परा होकर दूसरी देशमें गाता है ॥ १५ ॥
स तप देहावित पीकि सम्मके पिचारका निर्णय किया । उनके मापौर बमम्पके
भेवसे भेद । देखत सिमगवान् ॥ १५ ॥
गो सब कुछ मानता है देता है, इस माश करके उपकी रम करता है पुम और
पएम कर्म करता है और उसके फमको भोगता है, और ॥१७॥
माकरण, कार पुस मौर धर्म मधर्म द्रम्पमें नीकल गुण नही। उने गरेवन करते है।
और गीतको सचेतन प्रते॥१८॥
सम्मुकावेदन दिमें प्रति, मरिमें मौति ये वालों का निसे नहीं है, उसे सपा
महामुनि बाल काते हैं ॥ १९ ॥
सत्पान संभात, वर्ण रस स्पर्श गए पौर पद इस वय पुत्रम्पसे उत्पम होनेवाली
अनेक गुण-पर्याप ॥२॥
..पचाविकार] विधिम पम मादि साह-वाँ वर्ष बरस, मरूप, वर्गध, मशब्द, वनिर्दिए सस्थान, भौर मचनके गोघर निसका पैतन्य गुण दीर॥२१॥ जो निमपसे संसारमें स्थित जीव है, उसके दो प्रकारके परिणाम होते है। परिणामसे कर्म सत्पम होता है, और उससे पचा और पुरी गति होती है ॥ २२ ॥ गतिकी प्रासिसे देह उत्पन होती है, देहस इन्द्रियों पार इन्द्रियोंसे लिपप प्राण होता है, और उससे रग-रेप उत्पन्न होते है ॥ २३ ॥ ससार चक्रपाठमें उन मासे परिभ्रमण करते हुए पीमि किसी बीनकर समर बनादि-सांत है, वौर किसीका मनारि-अनत है-ऐसा भगवान् समाने का २०॥ मिसके मामि जवान, राग, देप और चित्तको प्रसमता रहती है, उसके पुम-अशुभ परिणाम ॥२५॥ भावको म परिणामसे पुण्य होता है, और बम परिणामसे पाप होता है। उसमे मुमा- भ्रम पुनसके प्राणरूम फर्मावस्पा प्राप्त होती है॥ २६ ॥ दपातुरको, सुधातुरो, रागीको सपथा वस्प किसी इसी वित्तमा गीतको, उसके इस र करनेके उपापकी क्रिया करनेको अनुकपा कहते ॥ २७ ॥ चीनको कोष, मान, माया, और लोमकी मिठास सुमित कर देता है, और यह पाप मात्रकी उत्पति करती है ॥२८॥ बहुत प्रमादबाजी क्रिया, चितकी मसिनता, इन्द्रियके विपोंमें उम्धता, दूसरे गामों को दुःस देना, उनकी निन्दा करनी इस्पादि वापरोसे बीन पापान करता है ॥ २९ ॥ पार समायें, रण बादि तीन पायें, इनियाभौनय, वात बौर पर पान, और दुष्टमामाली मियामोंमें मोह होना–पा मालपापमय है॥३०॥ चीनको इन्द्रियों कयाप और सहाका जप करनेवाला कम्पामकारी माग बिस झापमें यता है, उस कारमें जामको पापामगरूप छिपका निरोन हो जाता है, ऐसा मानना पाहिये ॥ ३१॥ शिसे किसी मी दम्पके प्रति राग हेप भौर अजाम मही राता, ऐसे मुम्भममें समारिके सामी मन्यि महामाको धम-सन्तुम वामब मही होय ॥ ३२ ॥ पोगका मिरोध करके नौ तपचर्या करता है, वह निमपसे बहुत प्रफारके को निय करता है॥ ३३॥ जिस संपमाको रिस समप योग पुष्प-पारको प्राति नहीं होता, उस समय उसे भुम और पशुम फर्म कर्वतका भी संसर-निरोध-रो बाता॥१०॥ गो मामाका साधन करनेवा, सरयुक्त होकर, बामपसका गनर प प्पान करता है, पर महामा साधु कर्म रजको छाप मग ॥ ३५॥ देप, मोद और पोगका पार नहीं यता, उम घुम्म पर्मश्चे जगार मम्म पर देनेवाली ध्यानमा बम प्रगर होती है। . बिसे राग, भीमरायचन्द्र गो, दानमानसे भरपूर और क्य द्रम्पके ससर्गस रहित ऐसे भ्यानको, निराके से करवा है, पर महात्मा समावसहित है।॥७॥ जो संघरयुक्त होकर सर्व कर्माको निर्मग परतावा मेदनीय और बायुमस पित होता है, प महात्मा उसी मनसे मोक्ष पाता है।॥ १८ ॥ सो समार मप्रतिशत हान-दर्शन है। उसके मिस्तस्म वाचरण करनेको (पुर नियममप स्थिर समाबको ) सब गौतमगदेवने निर्मठ चारित्र कहा ॥ १९ ॥ पखत बास्माका स्तमात्र निर्मम ही है, परन्तु गुण वौर पर्याप्पुक्त होकर उसने पर-समय परिणामसे मासि परिणम्न किया है, इसलिये ह निर्मम है। परिवारमा स-समपको प्राप्त कर तो कर्म-पिसे रहित बाप ॥१०॥ जो पर-बम्पमें शुम नपपा बसुम रण करता है, ए नौब स चारित्रसे भा होता है, और पए पर परिपका भापरण करता है, ऐसा समझना चाहिये ॥ ११॥ निस मात्से बहमाको पुष्प और पाप-आप्रवकी प्राप्ति हो, उसमें प्रति करनेवाम मामा पर पारिवमें भाचरण भी है, ऐसा तिरमा सधने कहा है ॥ १२ ॥ पो सर्व सगसे मुळ होकर, मिमस्मसे परम समाव पित, निर्माता है, या जीप पारित्रका वापरण फरमेषामहै।। १ ।। परसम्यमें मानसे रहित, निकम्प -दर्शनमय परिणामकुछ यो बामा है, चारित्र भापरण।।१०॥ दिसे सम्परत बारम्बान, राग-रेपसे रहित चारित्र और सम्यगुमि प्राप्त हो गई है, ऐसे मप्प गौरको मधमार्ग होता ॥१५॥ तत्तार्पम प्रतीति होना सम्पा। पतार्यका हान होना शान है,और विपके मोमुठ मार्गक प्रतिशतमात्र होना चारित्र॥ ११ ॥ धर्मास्तिकाप मादिक सरपको प्रतीति होना सम्पत है, पाय मंग और बौदा पूर्णका जानना बान, तपा पपा बागि में प्राधिकरमा म्पहार मोप्रमा॥ १० ॥ जहाँ सम्यान राधिसे एरममावध माल मामा, एक महमारे सिचाय बम्प पुरा मी माही परती, एक अभिष मारमामय ही पती, हाँ सह बीतरागने निथप मधमार्ग कहा ॥१८॥ मो भामा बाम-समारमय हान-दर्शनका अमेसपसे पाचरण परती है, यसर्प ही निपपान दर्शन और पारित है॥ १९॥ मोहण सबको मानेगा और देगेगा प सम्पामा पत्र अनुभव करेगा । इन भाषा प्रनानि मम्पो होती है बमध्य नही होती n५.॥ मातार पारि र मोधमार्ग है। उस सेल करनेसे मोभित और (बमा पारणमे ) उसमे र मी होता है, मा मुनियों ने धारा ११ ॥ पात, मिर, रेप प्रसन, गग और कालो महिमाम और गल पुस्यका उरान करता पर मोच पप नही करता ५२ ।। .
.१, २] विविध पत्र मादि समह-१०पा पर्व निसके दयमें पर-ब्रम्पके प्रति वणुमात्र मी राग यता, या यदि सप वागमोका मानने पहा हो वो मी पर स्व-समयको नहीं जानता, ऐसा गानना चाहिये ॥ ५२ ॥ इससिप समासबोस नित होकर नि:सग मौर निर्ममल होकर यो सिस्वरूपकी भकि करता है या निर्माणको प्रात होता है ॥ ५९॥ परमेष्ठीपदमें बिसे सत्तार्पको प्रतातिपूर्वक मार्क, वौर निसको बुद्धि निर्मप प्रवनमें पि- पूर्वक प्रमिएई, तपा गो सपम-उपसहित माचरण करता है, उसे मोक्ष कुरा मा पूर महो५५॥ मो मोदकी, सिवकी, पैत्यको और प्रमचमकी मचिसहित तपश्चर्या करता है, पानिपमसे देखोकको प्राप्त करता है॥ ५६ ॥ इस कारण इअमात्रको निति करो। कही मी किंधिन्मात्र मी राग मत करो। क्योंकि गावराग मन-सागरको पार गाता॥ ५७ ॥ मैने प्राचनको मठिसे उत्पम प्रेरणासे, मार्गको प्रमानाके पिये, प्रवचनके गस्पभूत पंपा. स्तिकापके सपहरूम इस शासकी रचमा की है।॥ ५८ ॥ इति पचास्तिकाप समात ७०१ मागोजा, फागुन वदी ११॥ मंगल १९५६ संपत् १९५३ को फागुन वदी १२ भौमबार- दिन मुप्स माचार्य सित पदति धर्म घरस पर्दसा मुस्स किंगादि म्पबहार मिनमुद्रा-सूचक मांतर समावेश धावरस प्रमान मिन वापकत्र धर्ममाति छोकवादि सहम- सशपको निति-समाधान जिन प्रतिमा कारण कुछ गृहम्पपहारको शांत करके परिगृह मादि कापस मिहत होना चाहिये। अप्रमत गुणस्पानतक पहुँचना चाहिये । सपा मुमिपाच सहमपरिणामी प्यान- ७०२ वाणीमा, नगुन पदी १२ मौम १९५५ भीमद्रासचन्द्र-स आस्मशा प्रकाश बाइस दिनको पम्प, मोगपूर्व शान्ति गात ईहै। इस परको भास्था पर पारा उठसित और उप-कर्म गर्न र हो गया । बाइस मिधे पाप ॥१॥ पसरत भाभो पपी रेमपूर्व सतरा गाय, बोर मनी पर Pun
प्रीम पवचन्द्र
संवत् उमौससौ इकतागसमें पर्व कम प्राप्त हवा और उमीससौ बिमाधिसमें बहुत रम्प-
धारा प्रकाशित हई। महा। इस दिनको धन्य है ॥२॥
समत् समाससौ सेवामसमें कुमुद समतिका प्रकास हुमा कुतका अनुभव, बस्ती दमा
और निजस्वरुपका मास मा बहा 1 इस दिनको पम्प है॥३॥
इस समय एक ममानक उदय माया । उस उदपसे परिमा-कार्यके प्रमें पाना पला । मों
म्यों उसे पका मारकर भगाते पे, पोपों पर ठम्य पाताबता पा और रथमात्र मी कम म
होता पा। बा । इस दिनको भन्म है ॥१॥
इस तम या दशा कमसे बहती पगरी गई। इस समय यह र पीप मारम होती है। मनमें
ऐसा मासित होता है कि प कमसे कमसे रहो मायगी । महा ! इस दिमको पन्प है॥५॥
जो कारणपूर्वक मनमें सयभक उदार करनेका भान है, या इस दोहसे मश्य होगा ऐसा
निथप हो गया है। वहा! इस दिनको धन्य है॥६॥
महा! यह केसी बपूर्ण गति है इससे अप्रमत्तयोग होगा, और गमग केवभूमिकाको
स्पर्श करके दोका पियोग होगा। भा। इस दिनको धन्यौ।। ७ ॥
का नो भोग बाकी या है, उसे वास ही मोगमा सकारण एक ही देश पारण
करके नमस्म निनदेशको गाउँगा । बास दिनको धाप है॥८॥
७०३ पवामीमा, क्षेत्र पुदी । म १९५५
रहस्पष्टि अपवा समिति-विचार
परममतिसे स्तुति करनेवाले के प्रति भी निसे राग मही, वौर परमपसे परिपा-चपर्ण
करनेवाले प्रति बिसे रेप मही, उस पुस्पम्म भगवान्को बारम्बार नमस्कार !
पररत हतिसे प्रापि करना पोय पारर रम्ना चाहिये ।
भोमनाव मे एमाले भामो मपूर्णबमुखर
भोमनी ने वाले भा वम पाराम ।।
भोगली ने गुम्वा सममित प्रभसरे
म भनुमा पनी पण निमास भवमटरे। म ॥३॥
साबारे सरकारमी परित्रा का प्रच,
मरामपम खेरी एकपकिय
पर एम पाने और भई
बमारे विनी, सपनो मा
बऐ बसर मा गरी एमपी रिमाम..
भारी माप मरे को भामच देवरे
पालाम्य भयन सिग्रेगरे।"
मार वर्मनी मेगनासीरभर
रीताले सतरेपराम॥८॥
०३ यस्ता] पिविष पर मादि सपा-३०यो वर्ष , (१) शका-मुनि को बाचाग पाते हुए शकाई कि साधुको दाशका मादि मणोंमें मी बात सम्स मार्गका प्रहमण देखने में माता, वो ऐसी ऐसी जाप क्रियाओंमें म-सनी पधिक सख्ती (सनेका क्या कारण होगा। समाधान - सतत वन्सर्मुस उपयोगमे स्थिति रसना ही निर्भयका परम धर्म है।-एक समय सी उस उपयोगको पहिर्मुस न करना चाहिये, यो निम्रपका मुम्स मार्ग है। परन्तु उस सयमके ये जो देशमादि साधन बताये है, उनके निर्भर के लिये सहन हो प्रधि मा होना समित है । तपा उस वरकी कुल मी प्राति करते हुए उपयोग गहिर्मुस होनेका निमित्त हो जाता है। इस कारण उस प्राधिके इस तग प्रहण करनेको बाधा दी है कि जिससे पा प्राति बन्तर्मुस उपयोगके प्रति गा रे । यपि कप और सहर बन्तर्मुल उपयोग तो मुल्यतया केवभूमिका नामके. तेयो गुणस्पानमें ही होता है, किन्तु बनिर्मक विचारपायको प्रवक्तासहित वतर्मुस उपयोग वो सावों गुणस्यान में भी होता है। यह उपयोग प्रमादसे स्थगित हो जाता है, और यदि मा उपयोग कहाँ विशेष भामें सचित हो जाय तो उपयोग के विशेष गहिर्मुस से जानेसे उसकी बसपम-मारसे महति होती है। उसे म होमे देनक लिपे, और देह वादि सापक निर्वाहको प्रति भी एती है बो दी नहीं बा सकती इस कारण, मिससे यह प्राति अन्तर्मुस उपयोगसे हो सके, ऐसी बहुत सकलनासे उस प्राधिका सपदेश किया है। इसे पॉप समिति के नामसे कहा जाता है। मिस म्प मावा की है उसका भाषाके उपयोगपूर्वक पम्ना परे तो नम्ना, मिस तयवाहा की है उस तय बापूर्वक बोना परे तो बोमना, बिस वह बाधा को उस तय माहा उपयोग पूर्वक माहार वादि महण करना जिस तय मात्रा को है उस तर वाघाके उपपोगपूर्वक बस बारिको सेना रसना, जिस तर वादा की है उस तर वानाके उपयोगपूर्वक दीका बानि स्याग करने योग्य घरीरके मका त्याग करना--पस प्रकार प्रातिए पाप समितियों छी। सयममें प्राति करनेके मो मो दूसरे प्रकारोंका उपदेश दिया है, उन सबका इन पाच समितियोंमें समावेश हो बाप है । गत् को कुछ नियको प्राति करमेको मात्रा को मनिस माविका पाग करना वास्प है, उसी प्रतिको करनेको वधा की है। और इस प्रकारसे की है कि मिस ए मुहर देखणो वतर्मुस उपयोग है उसमें वत्सचित माष थे। पर इसी वय प्रापि की जाय तो उपयोग सतत मापन ग सकता है, वौर बिस रिस समय गोही बितनी सिवनी शान-शकि और नार्प शदि। परसबभप्रमत ए सकती है। दोपर्शका वादि किसानोंको करते हुए मा मिससे बप्रमत संपमापरि मस्त म हो जाय, इसडिपे ठन सन्त निसाभाका उपदेश किया है, परन्तु वे सपुरुपका रवि बना समझमें नी । पर यस्पयि संक्षेपमें बिसी है, उसपर अपिधषिक विचार करमा वारिसे । किसी भी किया प्रापि करते हुए इस रएिको स्मरणमें रसनेका स रखना योग्य है। यो यो हानीकी बनाम क्रियायें है, उन सा नियामि परि पासप मालसे प्रति की नाप तो यह मामय उपयोग होनेछ साधम है। इस माशययुक इस पत्रका व्यों ग्यों RTI AR कगे, पोपों वर्षअपका उपदेश मिगा।
मीमद् पसवान [. (२) हमेशा अमुक शाखाप्ययन करनेके पचात् इस पत्रके विचार करनेसे स्पर पान हो सकता है। (१) कर्ममयका बाचन करना चाहिये । उसके पूरे होनेपर उसका फिरसे माइविपूर्णक वनप्रेक्षण करना पोम्प है। ७०४ बमाणामा, पैम मुदी १, १९५१ (१) १ एकेन्द्रिय गानको बो अनुछ स्पर्श वादिको बम्पत्तस्मसे प्रियता है, पर मैथुनखा है। २ एकेन्द्रिप जारको यो देह और देशक निमादि सापनोंमें वम्पक मूर्म, प परिमा समा। बनस्परिकापिक एकेनिप नीनों में यह सवा कुछ विशेष म्पत है। (२) (१) तीनों प्रकार के समकिससे चाहे किसी भी प्रकारका समक्खि मानिर्भूत हो, तो भी पाकि से अधिक पपय भवमें मोक्ष से पाती है। और यदि समकित होनेके परमात् बीच उसका बमन कर रे तो उसे बनिकसे अधिक वर्षपुरा-पावनतक ससारमें परिभ्रमण गोकर मोक्ष हो सकती है। (२) तीर्थकरके निर्मप, निप्रथिना, मात्रक और माविका न बचे ना-पानका बाम पा) पसमिप उन समलित काणे, यह पात मही है। उनमेंस गम्से गायोको पोकसबे बतरग मासे तोपरी पौर उनके उपदेश दिए ए मार्गको प्रतीति पी, इस कारण मी ठने समलित का। स समनिसके प्राप्त करनेके परमात् मारने पदि उसे यमग न किया हो तो अधिकसे अधिक उसके फ्रण मम होते हैं । सिमांतमें अनेक स्पपर पयार्थ मोक्षमार्गको प्रात सत्पुम्सकी पपार्य प्रतिसे हो समषित कराई। इस समरिसके उत्पम ए बिना पानको प्रायः जीव वार वाला पपा बाम मी नही होगा। बाल बौर बालकेशन प्राप्त करने मुख्य मार्ग पहो। (1) मतिजान मुबान अमिशान, मनापर्यपान, केम्मान, मति माग, अत बसान मोर विमंगलान, इन बाको पावके उपपोगसम्म होनेस बसपी मा।बान और बाान एम दोनों इतना । मुख्य पर कि मो शान समकिससहित पचान, पर मोबान मिग्मासहित कानपतदोनों ही शत। (0) इानावरणीय कर्म गौर बान दोनों एक महीपानावरणीय कर्म शानको बालरफ- स्लस्म । मोर वान हनावरणीय कर्मके स्पोपशमस्वरूप वर्षात् बावरण र नेरूप है। (५) महान समका वर्ष साधारण माषामें रक्षित होता है-उदाहरणके रिपे या पानसे शिव का बाता है। परन्तु निर्मप-माषामें दो मिप्यावसहित बानका नाम माल भर्पाद उस पिसे नहानको मम्मी पाई। (५)पाँगा ये सस्तो पर बसान मरूपी हो तो फिर इसमें भी होना पारिपे । उतच समाधान स प्रकार है:--मिम्मालसहित इनको दोशन । उसले मिपान मर रोगानेसे कान पाक पर माता है। शान सम्पूर्ण असतासरित सिमावान्में पता पिविष पर मादि सपा-बीयप १७१ है। सिरका केसमानीका और सम्मारिका बाम मिथ्यावरहित है । मोबको मिप्यास्त्र प्रतिस्वरूप है। उस मांतिके यपार्थ समझमें बा गानेफर उसकी निषि रो सकती है। मिय्याच दिशाको प्रतिरूप है। समाधान:- शान गीतका स्वभाव है इसठिये पमहमा है, बोर शाम अबतक विपरीतरूपसे जानने का कार्य करता है, तबतक उसे बहान हो करना चाहिये, ऐसी निर्मपकी परिमापा है। परन्तु यहाँ ज्ञानके सरे नामको हो वान समझना चाहिये । -पदि बानका हो दूसरा माम वाम हो तो जिस तर बानसे मोक्ष होना कहा है, उसी तमा कामसे मी मोक्ष होनी चाहिये । तया बिस तर मुळ गायोंमें जान बसाया गया है, उसी क्य उनमें वधान मी काना चाहिये । जैसे कोई रोग गाँठो पानेसे उममा इबा और गाँठके सुग मानेसे ठण्मन- ररित कहा जाता है, पपपि देसा गाप तो मेरे दोनों ही है, फिर भी गाँठके पहने और सुर मानेको पपेक्षा ही उने उखमा एमा और उन्धनरहित कहा जाता है। उसी तय मिप्मात्यानको बान' और सम्पमानको हान' कहा गया है। परन्तु मिप्यावाम गबारे भौर सम्पवान चेतम, या बात नही। मिस तय गोठमाछा गेरा और बिना गाँठका गेरा दोनों ही परे है, उसी तय मिप्यावहानसे संसार-परिभ्रमण और सम्पमहानसे मोक्ष होती है। जैसे यहाँसे पूर्व दिशामें दस कोसपर किसी गाँवमें बामेके म्पि प्रस्थित कोई मनुष्य, पदि दिशाके भमसे पूर्वके बदले परिचम दिशा पछा गाप, तो पूर्ण दिशाताले गाँवमें मही पॉप सकता; परन्तु इससे यह नहीं कहा जा सकता कि उसने कुछ पम्मे- रूप ही क्रिया नहीं की, उसी तय देह और बाहमाके मिम मिम होनेपर मी, निसने दो मौर बामाको एक समय लिया है, पर जीव दो-मुनिसे ससर-परिभ्रमण करता है, परन्तु उससे पहनी कारा पा सकता कि उसने कुछ माननेहप कार्य मा किया। उक्त गौर नो पूर्णसे पश्चिमको बोर गपा–पर मिस तय पूर्वको पश्चिम माम मेनेरूप मम है उसी तय देर और वरमाके मिम मिम होने पर भी दोनोंको एक मानना मम हो। परन्तु पधिमकी भोर गावे हुए-बराए- विस तर पसनेरुप समाव तो पता ही है, उसी तय देह और वारमाको एक समाप्सनेमें मी गाननेरुम समान तो यत्व हो । मिस वर यहाँ पूर्वको नगर पचिमको ही पूर्ण मान स्नेहप बो प्रममा भ्रम, तपारूल सामग्रके मिटमेसे समझमें वा मानेसे या पूर्व पूर्ण समसमें वाताई पौर पचिम पथिम समठ पाता है, उस समय दूर हो जाता है, वौर पयिक पूर्णकी मोर पम्ने जगता है। उसी वय मिसने देह भौर भास्माको एक मान रस्सा है, मह सहा-उफ्रेश वादि सामीके मिन्मेपर, पब या बात पपार्थ समझमें भा गाती कि वे दोनों मिम मिम है, उस समय उसका भ्रम र होकर बामाके प्रति सानोपयोग होता है। नसे भममें पून्नेि पश्चिम बौर पश्चिमको पूर्व मान लेने पर भी, पूर्व पूर्व हो पा और पश्चिम पश्चिम हो पा रेषछ भमके कारण हो पा विपरीत मासित होता पा, उसी तय बहानमें भी, देह देह और भारमा वाहमा होनेपर मी ने उस तय मासिव महोरात, यह विपरीत शान है। उसके पयार्प समझनेमें बानेपर, अमके निात हो गानेसे हे देह मासित घेती और बारमा प भीमद् पावन पामा मासित होता है और मो माननेन्प स्वमात्र विपरीत-मात्रको प्राप्त होता था, वामा सम्पमतको प्राप्त होता है । जिस तर बास्तबमें विशा-भ्रम फुल मी बस्तु नहीं है, और गमनरूप मिसे घर गोपको प्राप्ति नहीं होती। उसी वह मास्तबमें मिप्यात मी कोई भीम मही है, वौर उसके साथ माननस्प समात्र मी यता है परन्तु मात इतनी है कि सापमें मिम्पलरूप भ्रम होगसे निक सरपभाबमें परम स्पिति नहीं होती । दिशा-भ्रमके दूर हो नामेसे इशित गॉवकी भोर फिरने के बाद मियान भी दूर हो जाता है, और निजस्वरूप पर नरमप में स्पिति हो सकती है, इसमें किसी भी सम्देहको कोई वफाश नहीं है। . ७०५ बमामामा, क्षेत्र मुरी ५ १९५९ वानों समक्तिमेसे किसी भी एक समफितको प्राप्त करनेसे चाप बधिकसे वधिक पदरा मममें मोच प्राप्त करता है। वौर कमसे कम उसे उसी भामें मोक्ष होती है और परि र उप्स समकितका मन कर दे तो पावधिकसे अधिक वर्षपुत्रम्-परावर्तन कातक ससार-परिभमण परके मोक्ष प्राप्त करता है। समकित प्राप्त करनेक पचात् अधिकसे अधिक पुस-परामर्तन ससर होता है। पति क्षयोपशम अपना उपशम समक्ति हो तो बीच उसका बमन कर सकता है, परन्तं परिक्षामिक समकित हो तो उसका बम्म महीं कमा पाता। भाषिकसमक्तिी पात्र उसी मासे मोक्ष प्राप्त करता है यदि पिक मन करे तो तीन भव करता है, और किसी भी पेया तो कभी चार मग मी होते हैं। पुगम्पिोको पायुके ष होनेके पचात् पदि पापिक समवित सत्पम मा हो सो चार मय होने समय-पाय किसी नाचको ही ऐसा होता है। भगवान्के वायकर निर्भप मिपिनी, मानक बोर बालिकाको कुरा सबका । पानीका जान पा, बौर इस पण उन्हें समफित कहा है, पर शाहका अमिप्राप नही है। उनमें से मात्से गानोंको तो, तोपकर सो पुरुप । स्पे मोक्षमार्गक उपदेच, और मिस तप पर मोक्षमार्ग उसी तय ऐसा प्रतीतिसे ऐसी सपिसे प्रांतीकारके मापसे और निरपसे समकित करा गया है। ऐसी प्रतीति, ऐसी रुपि वौर ऐसे बायका तथा ऐसी बाबाका गो निमय मी एक वरासे गाल क्यानपान हो। पुरुष सबै मिले और उनकी प्रति मी ऐसी सबारे विस क्र से परमापास करते है, मोक्षमार्ग ठसा तय है—मोक्षमार्ग उसी ज्य ऐ सकता है। उस पुरुपके रक्षण मार मी पौतरगवाी सिदि करते है।तपा मो वीतराग होता है पपुरुप पपार्प पच्य होता है और उसी पुरुषका प्रतीप्तिस मोबमार्ग साधर किया जा सकता है' ऐसी परिधारणा मी एक तबसे गौणरूपसे गौर-पगावका कान है। उस प्रतिसे उस पिसे और उस बामपसे बादमें गोवाका स्पर विस्तारसहित गर्नु कमसे शान है। पारूप पुम्पको वा उपासना करमसे मायका मम होकर बावराग- दशा होता है । वाम सपुस्पा प्रत्पक्ष पोग हुए बिना व समलित ऐना पठिन है, उस पुस्पले पचनरूप शान से पूर्व, बारामक किसी बात को समकित होना सभी सपना को कई भाचार्य प्रपतस्पसे उस परमपसे किसी मोनको समकित प्राप्त कराते हैं।
पर...] विविध पत्र मादि समार-पाँवर्ष ६७५ ७०६ बवाणीमा, क्षेत्र मुनी ६ पुष १९५९ शम्पामें उपरको चटक-मटक न रसते हुए योग्य सादगीसे बना हो वाम है। पटक- मटक रसनेसे कोई पोचसौके वेतनके पाँचसौ एक नहीं कर सकता, और योम्य सादगीसे गनेसे कोई पाँचसौके पारसी निन्यानवें महीं कर सकता । (२) धर्मका लौकिक पापन, मान-महत्वको इच्छा, यह धर्मका दोहरूप है। धर्मक बहाने बनार्य देशमें गाने मपया सूत्र बादिके मेननेका निपेष करनेवासेनगारा बनाकर निपेष करमेवाले वहाँ अपने मान-महत्व परप्पनका सवाल माता है यहाँ, इसी धर्मको ठोकर मारकर, सी धर्मपर पैर रसकर इसा निषेधका निषेध करते हैं, या धर्मद्रोह ही है। उनै धर्मका महत्व तो केवर हानेरूप है, और सार्पसबमी मान वादिका माग ही मुख्य समान है --पहधर्मोह है। पीरपद गांधाको विगपत मेबने बादिके विपपमें ऐसा होगा। चन धर्म ही मुस्प रग हो तब बहोमाम्प है। (२) प्रयोगके बहाने पपुवर करमेवाग, या रोग-दास-को दूर करे तो तबकी बात तो तब यही, परन्तु इस समप तो पर विचारे निरपराधी प्राणियोंको पोका पपाकर महानतावश कर्मका उपार्जन करता है! पत्रकार मी विवेक-विचारके बिना ही इस कार्यकी पुष्टि करने के लिये निमारते हैं। ७०७ माणीला, क्षेत्र सुदी १० सोम १९५५ १ वौषध वादि, मिस्नेपर, शुक्से रोग आदिके उपर बसर करती है। क्योंकि उस रोग बादिक रेतका कुछ कर्म-अप हो उस तराका होता है। वौषध बारिक निमिउसे या पुगसमस्वारसे फैसकर गया दूर होकर वेदनीयके उदयके निमितको छोड़ देता है। यदि उस रोग वारिका उस वय मिश्र होने योग्य कर्म बंध न हो तो उसके उपर भोपप आदिका वसर मही होता, अथवा भौषम मादि प्राप्त नहीं होती, वपणा वौषम मिळे मी तो सम्पन बीपप गादि प्राप्त नहीं होती। २ भमुक कर्म-ब किस प्रकारका है, उसे पपाय हानाशिक बिना मानना कठिन है । वर्षात् बोपल मादि प्यारको प्राधिका एकांतसे निपेप नहीं किपा गा सकता । परन्तु पर अपनी दोके संघपमें कोई परम माम-शिबाग पुरुप उस तय मापरण करे, बर्षात् यह वौषध गादि प्राण न करे तोप पोप है। परन्तु दूसरे सामाम्प बात मी पर उस तर पस्ने मर्गे ताप एकतिक रवि होनेसे कितनी ही शनि पांगानेपाछा है। पर उसमें भी अपने नामित जीके प्रति अपना दूसरे किन्ही गायों के प्रति पेग वादि कारणोंमें उस तयका उपचार करनके पारमें प्राणिक जा सकती है, फिर मी पदि कोई उपचार मान के भरनेकी उपेक्षा करे तो बा अनुकपा-मार्गको छोड़ देना जैसा ही होता है। क्योंकि कोई भीब चाहे कितना ही पीडित सकिर मी पनि उसे मा देने तथा औषध बादि देनेके म्पबारको न किया गाप, पोप उसे भाम्पालके देख होने जैसा गाता है। गृहस्य-म्पपारमें एसी एपातिक सि करनेसे मात दिरोष arti मीमद् पान [पर - ३ त्याग म्पबहारमें मी हानीने एकातसे उपचार मादिका निषेध नही किया । मिपको परि सम-परिहात शसमें रोग मादि हा मॉप, तो वौपच भादिके प्राण घरभेके सवपमें ऐसी माना है कि ममता भाभ्यान उत्पथ न होने पोम्प रिये, तबतक बोध बादि प्राण न करना चाहिये। और परिमापय प्राण करनेका कोई विशेप कारण दसई दे तो निरपप वौषध बादि ग्रहण करमेसे भावाका अतिकम नहीं होता, अपना पयागुम वौषष मादि प्राण करनेसे बाहाका अतिक्रम नरो होता । तथा दूसरे निर्मपको यदि शरीरमें रोग भादिमा हो तो जहाँ उसको क्याप बारिके कर नेका क्रम प्रदर्शित किया है, माँ मी उसे इसी तब प्रार्शित किया है कि मिससे कुछ विशेप अनुपा बादि पशि थे। बाद इससे या बात समझमें भा जायगी कि उसका गास्प-म्पचारमें एकातसे स्याग करमा वसमत है। ये वीपष नादि यदि कुछ भी पाप-कियासे उत्पन गई, वो बिस तब अपने वौपष बादिके गुपको बिना दिखाये नहीं पती, उसी वय उसमें रोनेवाली पापकिया मी पपने गुणो विमा विसापे नहीं रहती । वर्षात् निस तय बौपष मादिके पुनर्गमें पेग बारि पुनर्गके परामल परनेका गुण मौजूद है, उसी तर उसके लिये की पानेवारी पाप-नियामें मी पापरूपसे परिणमन करमेका गुण मौजूर। वीर उससे कर्म धन होकर पपानसर उस पापीयाका फस उदयमें जाता है । उस पाप क्रियानाम बीपप गारिके करनेमें, करानमें भौर बनुमोदन करनेमें, उस प्राण करमेना गाको बेसी देह मादिके प्रति मर्म है, जैसी मनकी बाकुरता पाहता है, वैसा मार्तप्पान है तथा उस गौपच मादिको बैसी पाप-श्मिा रेस क्पने अपने स्वमानसे परिप्पान कर पपासा फल देते हैं। जैसे रोग मादिका कारणरूप कर्म-अध, जैसा अपना समाप्त होता है उसे मैसा ही प्रदर्शित करता है, गौर से गोपभ मादिके पुसपने स्वमालको रिसाते हैं। उसी तरा बीपष बादिको उत्पति वारिमें होनेवाम दिया उसके काकी शान बादि पि, तथा उसके प्राण करनेवाले से परिपाम ६ उसन सा शान मावि है, कि यनुसार उसे अपने समानका प्रदचित करमा योम्प है। तपारूप पुम गुमसरस्से और नाम वामस्वरूपसे फल्यापकता है। ५. गास्प-पसारमें भी बनी दोहमें रोग वादि हो जानेपर लिक्नी मुस्मनामधी व सके उनी रहनी चाहिये, वीर यदि पोन्प रिसे देखनेसे अवश्य ही मापानका परिणाम पाने पोप रसाई दे तो, नया बातम्मान सत्पम एवा मा दिई दे तो मौष नादि म्पसारको प्राण करते हुए निरषय (निपाप ) औषध वारिको पि रखनी चाहिये | तपा पवित् मने पास के लिये अपना अपने नामित अपना मनुकपायोग्य किसी दूसरे गाने पे पदि सावध मौषध वाविध प्राण हो तो पास रसना उचित है कि उसका सातवफ्ना निर्षस-घर-परिणामळे हेतुके समान, बपना अपर्म मार्ग पोषण करनेवाग न होना चाहिये । ( सब गालोको हितकारी ऐसी जाना-पुरुषको वाणासी मी पतशिसे प्राण करके उस बहिवकारी बच न उतरनी चाहिये इस उपयोग निरंतर स्मरणमें रहना उचित है।
पर . ] विविध पत्र मावि संप्रह-पों वर्ष . ७०८ बवाणीला, चैत्र मुदौ १५ शनि १९५३ १ नो बौषध वेदनापके ऊपर मसर करती है, वह वापत वास्तवमें नायक बधको ही नित कर सकता है ऐसा नहीं कहा है। क्योंकि यह वौषध यदि फर्मरूप वेदनापका नारा करमेवाण हो तो फिर बधुम कर्म ही निष्फरोजाय, मयना स्वप मौषम ही शुम कर्मरूप कहाँ बाय । परम्त यहाँ पर समाना चाहिये कि मा शुम पेनीयकर्म इस प्रकारका है कि उसका कम्ययामात्र होनेमें बौषध वारि निमि-कारणरूप हो सकती है। मद अपना मध्यम और गुम वा बशुम बधको किसी समातीप कर्मक मिनेसे वा ठकर बप भी हो सकता है। सपा मिस तर मद मपया मप्पम बधि हुए किसने शुम बपका किसी बग्नुम कर्मविशेषके परीभवसे बम परिणमन होता है, उसी वर उस वाम बषका किसी शुभ कर्मके योगसे सम परिणमन मी होता है। २ मुख्यरूपसे तो वष परिणामके अनुसार ही होता है। उदाहरणके लिये यदि कोई मनुष्य किसी मनुम्पका तषि परिणामसे नाश करनेके कारण निकाषित कर्म पंधि, परन्तु पातसे बचाव के कारणोंसे चौर साक्षी मादिके ममावसे, ग्मनीतिक नियोके भनुसार, उस फर्मको करनेवाग मनुप्प यदि एट बाप, तो या नहीं समझना चाहिये कि उसका पप निकाचिस नहीं होता । क्योंकि वस्फे विपाकके उदयका समय दूर होने के कारण भी ऐसा हो सकता है। तया गुतसे अपराधोंमें राजनीतिक निप मानुसार जो दर होता है यह मी कर्चा के परिणामके मनुसार ही होता हो, या एकोविक बात नहीं है। पषमा या दर किसी पूर्वमें उत्पम किये गए भभुभ कर्मके सदयसे भी होता है, और वर्तमान कर्म- बन सवा पा राता , यो पपायसर विपाक देता है। १ सामान्यरूपसे वसस्प बादिको अपेक्षा हिंसाका पाप विशेष होता है। परस्त विशेषरूमसे वो हिंसाको मपेक्षा बसस्य बादिका पाप एकांवरूपसे कम है, पह नहीं समाना चाहिये अमापा परिक ही है, ऐसा मी एकतसे म समझना चाहिये । हिंसाके उन्म, क्षेत्र, मान फकि क्षेत्र, कास चौर मावका अपनन मेकर हो कर्ताको उसका प होता है। इसी तरह बसस्प भादिक संबध में भी यही समझना चाहिये । फिसी अमुक हिंसाको अपेक्षा किसी वमुक वसाप बारिका फर एकगुना दोगुना अपना वर्नतगुना विपतक होता है। इसी वय किसी भसत्य मारिका अपेक्षा किसी हिंसाका फल मी एकगुना दोगुना क्या बनतगुना विशेषतक होता है। १ पागको बारम्बार विशेष विज्ञासा रोनेपर भी, स्सारके प्रति विरोप उ सानता होनेपर मी, किसी पूर्वकर्मक प्रावत्पसे गो गोब गृहस्पावासको नहीं हो सकता, पर पुस्प गृहस्पाबासमें कुटुम्म बादिके निरके रिपे जो कुछ प्रति करता है उसमें उसके जैसे जैसे परिणाम यते है, उसे क्दनुसार हीप बादि होता है। मोहके होनेपर मी अनुकंपा माननेसे, अयमा प्रमाद होनेपर मी उदय मामनेसे कर्म-पंच पोसा मही माता । उसका तो परिमामके यमुसार ही होता है। कर्मके सम्म भेदोंका यदि बुद्धि विचार न कर सके तो मी पुम और मशुम फर्म तो फमसहित ही होता है, इस निमयको गौरको भूगमा नहीं चाहिपे । ५. बदके प्रत्यक्ष परम उपाय होनेसे तथा उनके सिवपदके प्रल्पक होने के कारण मी सिदको नरेभा भादको । प्रपम ममस्कार किया है। का वीर उसके , प्रीमद् रामचन्द्र ७०९ मामीमा क्षेत्र बदौ ५, १९५१ मापके स्वम्मकी मी सत्पुरुपकी से प्रीति करनेसे बोर विचारनेसे शाम ही होता है। ' यह नार किस शासे वाया है, इस बास्पसे शामपविलम्ययनका बारम किया है। खासे मुपसे उस पारम-चाम्पके बारापको समानेसे समस्त प्रांगोका यस्प समझना मोम्प है। हाम्में तो ओ वाचाग पारिका बाँपन फये, उसप बधिक अनुप्रेक्षण करमा । मह बहुसे उपदेश-पोंकि उपरसे सारमें ही समधर्म जा सकेगा । सब मुमुक्षुमोको प्रणाम पनि। ७१० सापभ, शास सदी १५, १९५१ मिपाल, वरिति, प्रमाद, कपाप और पोग पे फर्मर्वपके पाँच कारण है। किसी स्पापर प्रमादको बार बार के चार ही कारण बताये हों, वो वहाँ प्रमादक तार मिष्पारन अभिति वीर कयायमें ही किया गया है। शासका परिमापानुसार प्रदेशबंधच वर्ष निम्नरूपसे है -परमाणु सामापरूपसे एक प्रदेश- लागी । उस एक परमाणुके प्राण करनेको एक प्रदेश कहा जाता है। गांव कर्म-बसे बर्नव परमाशुओंको प्राण करता है। ये परमाणु यदि फैले में तो कनवप्रदेशी हो सकते है, इस कारण बनत प्रदेशों का मन कहा जाता है। उसमें भी मह बनत पारिसे भेद माता है, बाद कहा पास प्रदेशवष कसा हो नहाँ परमाणु तो नंत समझने चाहिये, परतु उस बनतको सफलताको काम समाना पाहिये । तपा पदि उससे विशेष पिक निरोप म्यि तो मनताको सपन समधनी चाहिये । पण मी म्माकुरा म होते हुए भाविसे ततक कर्मपका याचना विचार करमा पोम्प है। ७११ रि, पैशास बदौ १२ मुक. १९५२ तपास्म ( पपार्ष) वातका-मोक्षमार्गक छिये मिसके विश्वासपूर्वक प्राति को पा सके ऐसे पुरुषका-चीनको समागम होने कोई पुष्पा देत हो समझते हैं। तपा उसकी परिपान ने मी माान् पुण्य ही समझते है और उसकी मात्रा मठिसे बाचरण करनेमें वो महान् माम् पुम्भ समझते 1-ऐसे जाना जो पचन सो। म प्रपत्र वनुमबमें माने जैसी बात है। पबपि तपारूप मामपुस्पो बभात पैसा पर कार पहा, तो मी बामापी गोषको सप्प समागमको इमरते हुए उसके बमानमें भी वक्ष्य हो विरिस्पानको बम्पासका ब्ध करमा चाहिये। ७१२ सर, शाल पदौ १२४. १९५६ सपा निराशोमानेसे पातको ससमागमका प्रातमागम भी शिपिगोमाता। ससमाग बमाक्य उद रखते हुए भी जो समानाम मा । पह परम पुष्पका योग मिग । सकिने सर्वा पागका पोग बननेता माल गृहस्यावास गना पता उस प्रातिको मौलिक पर १५] विविध पम मादि संप्रा-धों वर्ष साप साप, कुछ सावधानापूर्वक, परमार्पमें पति उत्साहसहित प्रापि करके निसिस्थानका निष्प ही मम्पास करते गना चाहिये | बा, म्मेष्ठ पुदी १९५२ ७१३ स्वमाप-जाप्रतदशा पिप्रसारी न्यारी परमक न्यारौ सेन न्यारी, पादरि भी न्यारी दाँटी मेरी पपना । मवीत अपस्या सैन निद्रापाहि फोन पे न, विषमान पसक न पाम अब एपना । स्वास भो मुपन दोक निद्राकी मसंग इम, सौ सप भंग ससि भावम दरपमा । स्पागी भयौ पतन अपेतनवा मार स्पागि, भासे चष्टि सोसि समासे स्प अपना । (२) भनुभव-उत्साहपशा मेसो निरभेदस्म निरपे मवीव हुनौ, वैसी निरभेद भव भेद कौन कौगो । दीसे फर्मररिव सरिव सुख समापान, पायो निमयान फिर पारिन बोगी ।। काई कदापि अपनी समाम स्पागि करि, राग रस राषिक न परवस्तु गरेगी । ममगन भान विपमान परगट भयौ, याही भाति भागम अनवकास रोगी । स्पितिषशा एक परिनामके न करता दरख दाइ, दोइ परिनाम एक दर्म न परत है। एक करदावि दो वर्ष काम करे, दो करति एक दर्द न करता है। मीप पुदगम एक खेव-मममाही दोग, बपर्ने मपर्ने स्प दोर कोउ म टरत है। नए परिनामनिको करवा रे पुदगम, चिदानन्द पेवन समाप भावास है। (१) ॐ सर्वज्ञ वारमा सन्यमापसे रहित है, जिसे सपा इसी तयका बमुमन हतार मुहै। निस जम्प सब इम्पसे, क्षेत्रसे, कासे वीर मानसे सर्पपा मसगता रहती है, मामुळहै। घटस अनुभवस्वरूप बाहमा गासि सब इम्पोसे प्रत्यक्ष मिन मासित हो महास मुख्दशा एतीय पुरुप मौन हो जाता है, यह पुरुप वप्रतिवर हो जाता है, पर पुप बसंग हो जाता है, मा पुरुप निर्विकल्प रो गाता है, मौर या पुस्प मुफ हो गाता है। मिमोंने इस वराकी मसंगवया उत्पम की है कि तीनों कार में देर बारिसे अपना कोई मी संपन था, उन मगवानुरूप स्थापोंको नमस्कार । विपि मादिक रिकस्पको छोड़कर निन विचारमें माचरण करमा कम है। पुरा स्मर मामलरूप [प.१४.५ भीमद् पसबाट ७१४ पपई, स्पेष्ठ मा ८ मौम १०५१ मिसे किसी प्रति राग मोर देख नहीं रहा, उस महास्माकी नमस्कार ! १ परमपोगी मोडपमय मानि पुस्प मी मिस देशका रक्षम नहीं कर सके उस देश में एक विशेषता यह है कि सबक गौरको उसका संबंध येतातक जीप बसगा-निर्मोहापना-माम करके, भवाण अनुमषरूप निमसरूपको जानकर मन्य सब मासे पापच (मुफ) होगा चाहिपे, जिससे रिसे जन्म-मरणच नावागमन म थे। २ उस देश मेरते समय बितने बरापसगता-निर्मोहीपना-पपार्य समरसमात्र यता है, उतना ही मोक्षपद पास यता है, ऐसा परमाता पुस्पा निधय है। ५ स देश में करने योग्य कार्य को एकोकि किसीके प्रति किचित् मी राग और रेप म पे-सव सम-शा पे-पकी कम्याणक मुल्स निमय है। १ सभी मन बबन मोर कापाके योगसे पाने या बिना माने कोई वपराभ हुमा उसकी विनफ्पूर्णक धमा माँगता --वापरत मनमानसे क्षमा मागता ।। बोसो बम्बई, म्यग गरी रवि १९५६ परमपुरुष पशा-वर्णन १ कोपसौ फमक माई नीचसौ नरेस पद, मीपसी मिवाई गरमाई माकै गारसी । भारसी नोग-मावि कारसी करामावि, पारसी रौस पुदगम-निणरसी ॥ भाससी नग-विगस माससौ पनपास, कामसौ दुपकाम सोक-साम सारसी । सीठसौ ममम माने बीउसो पस्वत मामै, ऐसी भाकी रीवि वाही बदव बनारसी ।। मोकचनने चिपके समान मानसा है, जगदीको नापपरके समान समझता है जिससे मित्रता करनेको मागके स्माम समझता है यापनको मानेके गोकरके समान मानता है, कामिया बादिको मो गरके समान गिनता है सिनि मादि ऐबर्षको गो वसाताके स्माम सममता , म में पूम्पदा होने मानिकी विसको बनर्पक समान गिनता पुगको सबि ऐसी बौदारिक पारि अपाको रात के समान समझता है अगटके मोग-विलासको गल्के समान मानता गापासको भालके समान समझता है अनुमो धर्मको काम-मृत्यु के समान गिनता में गाय माने THIो मुराकी गरके मान समझता है कीरिकको नाफके मैसले समान समता, मौर पुष्पके दपको यो विपके समाम समााता है-ऐसी विसको गति है उसे बनारसोबास ममत्कार करते। २ किसमे साविकम्प न करते र बसंगमान होना । मो मो ने ससमो पचों प्रति बगे पो न्यो उसकी मातापूर्वक उनको मस्पि-ममा रंगी बापगी, स्पो त्यों से सम बपि बाम-पागचे गमवाले प्रश्न करेंगे-समें हमारे।
विधिप पत्र मादि संपा-यो वर्ष ६९ सधे बत करणसे विशेष सरसमागमके वाप्रमसे नीवको नष्ट दशा मी गुत पारे समयमें ही प्राप्त हो जाती है। ३ म्यबहार गया परमार्पसबषौ यदि कोई मी नीवकी गति हो तो उसे शमन करके, सर्वथा बसग उपयोगपूर्वक वयमा परम पुरुषको उपरोक दशाके मवमानपूर्वक, वारमा स्पिति करना चाहिये, यही निवेदन है । स्पोंकि अन्य कोई भी विकल्प रसना उचित नहीं है। मो को सबत करणसे सत्पुरूपके पचनको ग्रहण करेगा पा सत्यको पापेगा, इसमें कोई सशय मही, और शरीरका निर्वाह पादि म्पबहार सबके अपने अपने प्रारम्बके अनुसार ही प्राम होना योग्य है, इससिपे तस्सर्वपी कोई मी विकल्प रसना उचित नहीं। उस विकल्पको यपपि तुमने प्राप शान्त कर दिया है तो मी निथपकी प्रबलता के लिये यह लिसा है। . सब पीयोंके प्रति, सब माफि मति, बसा एकरस मीतरगदशाका रसना 0 सर्व शासका वास्मा, गुरचैतन्य गन्म जरा मरणरीत बसगस्वरूप है। इसमें सर्प शानका समावेश हो माता है। उसकी प्रतिम सर्व सम्यग्दर्शमका समावेश । नाता है। वामाको बसगरूपसे गो स्वमाशा गना है, पर सम्पमारित्र उत्तर सपम वौर बीतरागदशा है । उसकी सम्पूर्णताका फल सदसोका क्षय रोगाना है, यह बिलकुल सदरहित है--विवाछ मदहरहित है।यो प्रार्थमा है। बाई, ज्येष्ठ पदा १२ शनि १९५३ मार्य यासोमागक मरणके समापन पाकर बात सेदावा । ग्यों ग्पों उनके बनेक बात गुणोंके प्रति सपि नाती, स्पों स्पों अधिकाधिक से होता है। जीवने देहका सबप इसी तरसे है। ऐसा होनेपर भी जीत मनाहिसे देहका स्पाग करते समप से प्राप्त किया करता है, और उसमें प मोइसे एकमात्रकी तय रहता है। यही जन्म मरम वादि संसारका मुस्प मोय । मीसोमागने ऐसी देहको छोड़ते हुए, महान् मुनियों को मौ दुर्सम ऐसी निमा गतासे निर उपयोगमय दशा रमकर षपूर्व हित किया है, इसमें सशप मही। उनके पूम्प होनेस, उनका तुम्हारे प्रति बहुत उपकार होमेसे, तपा उनके गुणोंकी वहस्ताके कारण, उमका विपोग तमें पविक खेदकारक हुमा है, और होना योग्य मोहै। तुम उनके प्रति सांसारिक पूम्पमायके सेदको विस्मरण कर, उन्होंने तुम सबके लिय गो परम उपकार किया रो, तपा उनके गुणोंकी ना तुमें अनुक्ता मारम हुई, उसका बारमार स्मरण करके, उस पुरषका नियोग ऐ गया है, इसका मतरमै खेद रसकर, उन्होंने वाराधना करम पोग्य गो गो वचन और गुण रतापे हो उनका स्मरण कर, उसमें अम्माको प्रेरित करनेके रिपे हो तुम सबसे प्रार्थना है। समागममें बाये गए मुमुमुषोंको मीसोमायका स्मरण सहन ही वधिक समयता रमे मोम्प है। रिस समप मोहके कारण के उत्पम हो उस समपमें मी उनके गुणों की मठवतातो स्मरणमें मकर, उपम होनेवाले सेवको शान्त कर, उनके गुणेको मतताका वियाग हो गया है, इस तरह पर करना पोम्प है। .
श्रीमद् पासवान्द्र इस क्षेत्रमें इस काम में मौसोमाग से पुस्प पिरो मिस्ते मा इसे बारम्बार मासित होता है। धारमपूर्वक सघाँको सदका शान्त करना, और उनके ऋव गुणों वौर उपकी सपनों वामम ना ही पोप है । पीसोभाग मुमनुषोशरा रिस्मरण किये जाने योग्य नहीं है। जिसने ससारके सस्पधे स्परपसे नाम किया है, उसे उस स्थRके फापकी प्रति अपन मप्राधिसे हर्प-चोक होना योम्प नहीं है, तो भी ऐसा बान पाता है कि अमुक गुणस्थानक उसे मी सत्पुरुपके समागमक प्रतिसे सर्प, और उसके वियोगसेस सेवघे सकता है। मारमसिद्धि प्रपके विचार करने की इच्म तो विचार करना । परस्तु उसके पहिए पर वोर बहुतसे पचम भोर समपोंका विचार करना बन सके, तो मामसिदि प्रम उपकारका रख देग, ऐसा मारम होगी। मोसोमागकी परम्ता, परमार्थसपी निषप, मुमुमुबोंके प्रति परम ठपकारित वादि गुण बारम्बार दिपार करने पोम्म । शान्ति प्रति शांति ७१७ बर्थ, मापात मुदी । रवि १९५६ भीसोमागको ममतार १ पासोमा मुमुक्षदशा तपा बानाके मार्गक प्रति उनका का निधय बारम्बार स्पतिम माया करता है। २ सब गाव मुख्यम करते हैं, परन्तु कोई विरगही पुरुप उस पुरके पपार्प सस- पको समस्ता है। सम्म मरण पदि बनत द्वा वापंतिक (सपा) अप होनेका पाप, पौषको बना काल्स माननेमें नही पापा। गार परि उस उपापके मानने गौर करने वीणा उत्पन होनेपर सपुपके समागम ममको मस करे तो यह उस उपापको समय सम्प, और उस उपापकी उपासना करके सबसे मुक्त हो जाता है। जैसी सदी रम भी प्रापा र गालको सपुस्प समागमसे ही प्राप्त होती है। बेसा समागम, उस समागमको पहिचान, बताए हुए मार्गको प्रताति और उस व्याधरण रनेकी प्रापिहोमा जीरो परम दुर्गम है। मनुप्यता जामौके पचनोका कण मिना उसकी प्रति होना, और उनके द्वारा को rए मामि प्राधि होना परम दुर्सम है पर उपप प्रीपर्वमानसामाने उत्तरप्पपलके वासरे गाम- पनमें किया है। प्रत्पश्च सपुरपच समागम और उसके बाभयमें विचरण करनेबा मुमुक्षुमोको मोवर्सी समस्त साधन प्रापा (पात परके)भस प्रयाससे और बाप ही कामें सिरोगते है। परन्तु उस सम- गमय योग दिममा बहुत शुभ है । मुमधु गौतम विच निरन्तर बसी समागम पोगमें गया है। पापा योग मिलना ये गये स्त्र का दुर्गम है। उसमें भी ऐसे समकालमें तो पत्र.१.१८,१९]] विविध पत्र मादि संप्रा-बों वर्ष का योग रचित् ही मिस्ता है । सत्पुरुप विरले ही विचरते हैं। उस समागमका अपूर्व छाम मानकर चौवको मोक्षमार्गकी प्रतीति कर, उस मार्गका निरन्तर बारापन करना योग्य है। नब उस समागमका योग म ऐ तब वारम परिमाकी बोरसे सपिको हटाना चाहिये, और सशासका विशेषरूपसे परिचय रखना चाहिये । यदि म्यापहारिक कार्योकी प्राप्ति करमी परती वो मी मो जीव उसमेंसे रविको मद करनेकी इस करता है, पर जीत उसे मद कर सकता है, गौर का सत्यायके परिपके लिये अधिक सकाश प्राप्त कर सकता है। मारंभ-परिमाके उपरसे बिनकी शचि सिम हो गई है, अर्थात् उसे नसार समझकर गो नीष उस्से पीछे हट गपे है, उन जीयोंको सत्पुरुषोंका समागम भौर शासका भत्रण विशेपरूमसे हितकारी होता है। तथा निस चौवको बारम-परिमाके उपर विशेप पति यती हो, उस चीवमें सत्पुरुपके पचनोंका और सत्शासका परिणमन होना कठिन है। पारम्परिमाके उपरसे रविको कम करना पर सवालके परिचयमें रुचि करना प्रपम वो कठिन मारम होता है, क्योंकि नीमका बनादि-मास्तिमाव उससे मिम हो, तो मी निस्ने पैसा कर नेका निधय कर पिया है, वह उसे करनेमें समर्थ वा है। इसठिये विशेष ठस्साह रसकर उस पर विको करमा चाहिये। सब मुमुक्षुओंको इस मातका निषय और नित्य नियम करना पोम्प है। प्रमाद और बनिय- मितताको दूर करना चाहिये । ७१८ सो पानफे बिना और सबै चारित्रके बिना नागका करपाण नहीं होता, इसमें देह नहीं है। सपुरपके बचनका मरण, उसकी प्रतीति, और उसकी भाषासे पन्नेबाले बार पारित्रको प्राप्त करते हैं, यह निस्सन्देह गनुभव होता है। पाधि योगवासिष्ठ पुस्तक भेजी है, उसका पाँच-सात बार फिर फिरसे पापन बोर पारम्बार विचार परना योग्य है। ७१९ ई, बापा १ गुरु १९५३ (१)मेमसे भगाकर धोसीकरणवक मिस पानीको सम क्रियाचे मान्य है, सबानीके पचम स्पराम्पका निषेध नहीं करते । इतमा ही नहीं, किन्तु स्याग पैराम्पका साधन मत नो पहिले स्पाग-राम्प बाता, शनी ठसका मी निपेष मही करते । (२) कोई पा-क्रिया प्रापि करके जानाके मार्गसे विमुख हवा हो, वयसा मुनिको महताके कारण उपदशाको प्राप्त करते हुए एक पाता हो, अपना पिम्ने बसत् समागमसे मति-म्पामो मत परके बन्पया स्याग-राम्पको ही सबा पाग-रगम मान किया हो, तो परि उसके निपेप करनेके दिये बानी पोम्प मनसे कम्णा बुझिसे उसका पवित् निषेध करता हो, तो म्पामाइयुल न ऐकर उसका सख समतकर, पपार्य स्पाग-नराम्पको बतर तपा नाम किया प्रापि करना उचित है।
भीम पारपत्र
[पर २ .११.२२,२५
७२०
बम्बई, मापा १ गुरु. १९५१
* सकन ससारी इदियरामी, सनि गुम भावमरामी रे,
मुरूपणे मे बावमरामी, पीये निकामी रे।
(२) मुनियो! हमें वार्प सौमागको अंतरदशाको बौर देर-मुछ समयको दशा,
बारम्बार वन्प्रेक्षा करना चाहिये।
(३) मुगियो ! तु दम्पसे, मेसे, फारसे वोर माक्से-बसगभाषसे-विचरण करने
सतत उपयोगको सिम करना चाहिये ! बिसने जगत्के पुसको दशाको छोड़कर बानाके मार्गका
बामप माण किया है, पबश्य उस बसग उपयोगको पाता है। निस पुतसे वसंगता सित
पो उस मुतका परिचय करना पोग्य है।
.
७२१ बम्बई, नापास दी ११सी १९५५
परम संपमी पुरपोचे नमस्कार हो
सारभूत म्यभारको सारभूत प्रमोसनको तय करनेका उदय मौवद पनेपर भी यो पुरुष
उस उदयसे क्षोम न पाकर सहनमान-समर्मम निपलमानसे ये 1, उम पुरुषोंके माम-अप
हम बारम्बार स्मरण करते है।
७२२ व प्रावण मरी वि १९५१
(१) परम सत्तर स्पम दिनके सपमें निरन्तर र करता है, उन सपुरोक समागमका
निरंतर पान ।
(२) प्रतिमित (निर्मप)म्पमालकी ही की मिशासासे मौ वर्मतगुण विशिष्ट निवासा
पता है। उदयके सम्मान दौर मेइन किये बिना बटा होनेसे, बतरग सेवन समतासहित बेदम
करते है। काम्को भापत्तनापमानमें गाने के पानमें बर्तन करते हैं।
(३) पपा उपकारी पुरुषो प्रत्यक्षतामें एकलमावना बामपुसिको हात करती है।
७२३ मई मारण सदा १५ गुरु १९५३
(१) बिसझी दफाचस्पति है, उसे सपाको स्थितिम छाकर मे कोका
पप विमानन महात्माचे ममस्कार है।
(२ माचरण मप और सामागममें प्रभार नही करना चाहिये ।
मो८४
पा १४, २५, २६.२.] विविध पत्र मावि संप्रा-बाँ बर्ष ७२४ पाई, भाषण सुदी १५ गुरु १९५३ (१) मोक्षमार्गप्रकाश प्रथका मुमु बीचको विचार करना योग्य है। उसका अवलोकन करते हुए पदि किसी विचारमें कुछ मतांतर जैसा माश्म हो वो म्यापुल न होकर उस स्यम्को मनिक मनन करना चाहिये, जयवा उस स्पङको सम्समागममें समझना चाहिये । (२) परमोसार सपममें स्थितिको वात तो दूर रहो, परन्तु उसके सम्मका सिपार छना मी कठिन है। . ७२५ बर्मा, प्रारम भदौ १५ गुरु १९५२ 'क्या सम्यमरि बमम्प वादार कर सकता 'स्यादि को प्रभ मिले। उन प्रमोंकेतको विचारनेसे करना योग्य होगा कि प्रथम प्रश्नमें किसी को मेकर जीनको पुर परिणामको हानि करनेके ही समान है। मतिको वस्पिरतासे सीव परिणामका विच मही कर सकता। यपपि किसी जगह किसी अपमें भेणिक बादिके सबध ऐसी बात कही है, परन्तु पर किसीके द्वारा माचरण करमेके लिये नही कही तपाप बात उसी तय यथार्थ है, यह मात मी नहीं है। सम्पाधि पुरुपको बम्पमात्र मी ब्रत नही होता, तो मी सम्यग्दर्शन होनेके पचात् उसका पदि भीष पमन न करे तो पर गपिकसे वधिक पन्दर मममें मोक्ष प्राप्त कर सकता है, ऐसा सम्यग्दर्शनका बळहै-इस से कही बातको कम्पयालपमें न से जानी चाहिये । पुरुषको पाणी, विषय पौर कपापके अनुमोदमसे अपना राग-रेपके पोषणसे रमित होती है पर निधप राना चाहिये। वौर पर कैसा मी प्रसग हो उसका उसी पिसे वर्ष करना उचित है। . ७२६ मई, मारण पो ८१ १९५५ (१) मोमुद्गर और ममिस्नमासा इन दो पुस्तकोंका हमें बाँचनेका परिचप रखना । म दोनों पुस्तकोंमें मोहके सहपके वया मारम-साघमके पडक्से उच्म मे पता है। (२) पारमार्पिक करणाइपिसे निप्पक्षमासे कल्याणके साधनके उपदेश पुरुषका समागम, सपाम्ना और उसकी बाबा मारापन करमा पाहिये। सपा उस समागमके योग ज्यामका बुदि-बनुसार परिचप रसकर सदाचारसे प्राचि करना ही पोम्प है। ७२७ सम्र्प, भाषण की १० मि १९५५ मोशमार्गप्रकाश अवम करनेकी बिन निशामुमोको पभिगया है, उनको उसे भत्रण कराना-- अधिक परीकरणपूर्वक और पौरपसे ग्राम कराना । भोताको यदि किसी स्पउपर मिशेष संशप होतो उसका समाधान करना उचित है। तथा किसी स्थानपर पदि समाधान मा बसमा जैमा मास हो तो उसे किसी महामाके संपोगसे समझने के लिये करकर अषणको पेटमा नहीं चाहिये। तया उस संगपो किसी मामाके सिगप कप किसी स्थानमें पूछनेसे या विष भमच ही कारण होगा, और भीमद समद्र [पा.२८.२ उससे निस्सन्देह अषण किया इमा भरणका गम म्पर्य हो पा जायगा । मा परि यदि बोताको हो बाप तो पावधिक मतभी हो सकता है। ७२८ वा, भाषण यी १२, १९५६ १ सर्वांना मूमिकामें स्थिति नेतक, मुबानकच बळजन कर स्पुरुष मी कामाने स्पिर र सकते है, ऐसा बो दिनमगवान्का बमिमत है, ए प्रस्पा सम दिसाई देता है। २ सोए भूमिपर्फत मुबान (मना पुरुपके सचम ) का अपवन गम यब मंद पाता, तब तब स्पस्प मी कुछ कुछ स्थिर हो जाते है, तो फिर सामान्य मुमा गोर बना दिन विपरीत समागम-निपात भुत वादि ववन-पते मापे है उमें दो बारम्बार विशेष वति विशेष अस्थिरता हामा संभव है। ऐसा होनेपर भी गो मुमुक्षु, सरसमागम साचार और पशाबके रिचारमप वाम्नमें प निवास करते है, उमें सोनम भूमिकापर्यंत पर गाना कठिन नहीं है कठिन होनेपर मीटिन नही है। ७२९ मर्य, प्रावण बदौ १२ दुप १९५१ इम्पसे, सेपसे, काम्से मोर मानसे मिन पुरोको पविरंप नहीं, पन सत्पुरुषोंको नमस्कार ! ससमागम सम्वार और शबारमें सनिवास होना पह वाणा होनेन प्रबह गाम्न है। पपि ससमागमका योग मिना दुमि है तो मा मुमुलोको उस योगको तोर बिनसा रखनी चाहिये और उसकी प्राप्ति करना चाहिये । तपा उस योगके वमानमें तो गीतको मनस्य ही साल रूम चारफेमसम्पनसे सदाचारको नागति रमनी पोप है। ७३० बर्व मधपद मुदौ ५ गुरु १९५१ परम पाठ पम्प मौपिवागी! जामता मैने पापको कुछ मी बपिनय नमवि पचा पराव किपे हैं, तो में दोनों आप गोकर मला नमार सुबन्ताकरमसे समा मगिता ।पा करके बात क्षमा प्रान करें। अपनी मातेश्वरासे मा में इसी तय मा मंगता है। इसी प्रकार अन्य दूसरे सापियोंके प्रति भी मैंने परि किसी मी प्रमच पण अपवा अभिनय-बाने या बिना गाने से हों, तो उनकी मी पर तरणसे समा मागता । स्पा करके स्वधमा करनामी ।
प०११,११,११,१४] पिविप पत्र मादिसप्रह-बाप ६८१ ७३१ वई, मापद मुदी ९ रवि १९५३ १ मायक्रिया और गुणस्थान गादिम एनेवाग त्रिपाके सरूपकी पर्चा करना, हमें प्राप' अपने वीर परके लिये उपकारी नहीं होगा । २ इतना ही कम्प है कि तुच्छ मतमतांतरपर पि न राते हुए, वसतिका नियेष करने के लिये, जारको सत्शामके परिचय और विचारमें स्थिति करनी चाहिये । ७३२ बई, भाद्रपद बदौ ८ रवि १९५५ चीनको परमार्थक प्राप्त करमैमें वपर बतराय है, उसम मी इस काळमें तो बतरापोंका वर्ण माप बस यता है । शुभेच्छासे भगाकर कैनापपर्यंत भूमिकाके परचनेम नगर जगह ये बयप देस- नेमें माते है, और ये मतराय बीचको बारम्बार परमार्थसे मुक्त कर देते हैं। बावको महान् पुष्पके उदयसे पदि सरसमागमका पूर्व अम हा करे, तो पह निमितया कैवल्यपर्यत मूमिकाको पहुँच भाता है। समागमके वियोगमें बीसको आरमबठको विशेष नामत रखकर सस्शाम दौर शुभेच्छा- सपम पुरुपोंके समागम हो रना उचित है। ७३३ बई, भावप वदी १५ मि १९५९ १ घर बादि बरके घग्नेसे सब मनुष्योंसे सपा Pगमरणचिसे रहते हुए चारित्रका निर्वाह मही हो सकता इसलिये मानकर से कामें चारित्रका निर्वाह करने के लिये, भानाशय पोश किया हवा मर्यादापूर्वक घेताम्बरापिसे गो पाचरण है, उसका निषेध करना उचित नहीं । क्या इसी वय बसका वास रसकर दिगम्बरातिका एकति निषेध करके पा-मूर्दा मानि कारणोंसे चारित्रमें शिपिस्ता करना भी उचित नहीं है। दिगम्वरत्व और भेतामायन, देश काठ और अधिकारीके सपसे ही उपकार के कारण है। माद यहाँ बानाने मिस प्रकार उपदेश किया है, उस वय प्रापि करनेसे वारमा ही होता है। २ मोश्चमार्गप्रकाशम, भेताम्बर सम्प्रदायकाय माम्प समान निनगमका जो निषेप किया है, या निषेप पोम्प नही । यपपि वर्तमान भागोमें अमुफ स्पट बधिक हाम्प, परम्नु सम्पुस्पकी शिसे देसनेपर उसका निराकरण हो जाता है, इसठिये उपशमापिस उन मागमोफे भोकम करने में सक्षम करमा पित नहीं है। ७३४ वर्ग, मासोर मा ८ रवि १९५६ (१) पुणौके बगार गमार स्पमो नमस्कार !
भीम राजन [पा.१५.१५ (२) अविनम परिणामसे मिन्होंमे काट को पो छिया है, ऐसे मौसम बार परम पुरमाको नमस्कार ! (१) जो परिणाममें तो आपत है, परन्तु प्रारमिक दशामें वो काट विपकी तर प्याकुर कर देता है, ऐसे मौसपमको ममस्कार हो। (.) उस मानको उस दर्शनको और उस चारित्रको बारम्बार ममस्कार ! (२) निनको मलि निकम है ऐसे पुरुषों का ससग सपना दर्शन महान् पुष्परूप समाना चाहिए। (१) (२) पारमार्थिक परिशेप्से पत्र वादिका भिमना नहीं हो सकता । (२) यो पनित्य है, यो क्सार है और वो मशरणरूप है, इस जानकी प्रतीतिया चरण क्यों होता है। इस बातका रात-दिन विचार करना चाहिये । (३)कारि वार बानीको रिको पूर्व वौर पपिम नितना तर बानाकी पी प्रपम तो निम्म्मम ही होती है, या मचि उत्पम नहीं करती, और चीनको प्रातिको बनार माझी वाती और इस कारण बाल उस सिम रुपियुक्त नहीं होता । परन्तु निम बाबोंने परिवा सहम करके पोरे स्मयतफ मी उस रहिका बारापन किया है, उन्होंने सर्व हु के प्रयरूप निर्माणको प्राप्त किया है उन्होंने उसके उपायको पा लिया है। जात प्रमाइमें नाहिसे रति, परन्तु उसमें रति करने योम्प तो कुछ दिखाई देता मा। , ७३५ बम्बई सोग पुरी ८ रवि १९५५ (१)स मीकि प्रति हमारी तो धमारपिहो। (२) पुस्पा पोग तपा सत्समागमका निम्ना मत कठिन है इसमें सदर नो। प्रेम के तापसे तस प्राणीको मन्तिस को प्रपाको तय, मुमा बारको सिरपा पोम तपा ससमागम उपारी । सब शाखा उप्स योगका मिमा दुर्गम से कहा गया है। (३) समपारस और पोगाणिसमुचय प्रपोच हासमें विचार करमा । ७३६ म बसोग पदी ८ वि १९५६ (१)शेष उप मित्रको प्रम मुमुक्षुमोको मी सपुरोध योग नपा समागम बापार भूत है इसमें संदेह महो। निधिमान इण, क्षेत्र, मस वीर मार पोग बमनसे बात उपरोपर उप भूमिपये प्राप्त करता है।
पर 2010 विषिष पभ भाषि समारोप (२)निधिमान मार-परिणाम-मोनेके लिये जीको निधिमान प्रम्प क्षेत्र यी प्रास करना उचित है। सुर मुविसे रहित इस पीपको किसी भी योगसे अमेया-कल्या इसा-प्रास ऐ, वौर निस्पृह परम पुरुपका योग मिरे, तो ही इस चीनको भान मा सा उसके पियोग उसे सत्यास भोर सापारका ही परिचप करना चाहिये-जाप करना 4 ७३७ बम्बई, वासोन नदी ७, (१) उपरकी भूमिकाओंमें मी बरकाश मिस्नेपर मनादि बासनाका सक्रमण हो धौर पर बारमाको बारम्बार वाकुल-म्याकुल बना देता है । बारमार ऐसा ही मा करता है ऊपरको भूमिकाको प्राप्ति होना हुम ही है, और पर्वमान भूमिकामें मी उस स्थितिका कि दुर्टम है। जब उपरकी भूमिका मी ऐसे बसस्य बत्तराप-परिणाम होते है, तो । रा वादि भूमिकामें पैसा हो, तो यह कुछ माचर्यकारक नहीं है। (२) उस बत्तरायसे खेद न पाकर भरमापी चापको पुरुपाप-परि करमी पा| हिम्मत रखनी चाहिये हितकारी दम्प क्षेत्र वादि पोगको सोत्र करनी चाहिये, सशाम परिचय रसकर बारम्बार हटपूर्पक मी मनको सविधारमें प्रबिर करना चाहिये । तया मम माकुस-याकुल म रोकर पैसे सरिपारके पप, नानेका उपम करते हुए अप होफर भूमिकाकी प्राप्ति होती है, और मनिक्षेपमान होता है। ३ पोगारिसमुषप बारमार अनुप्रेझा करमे पोम्प है। ७३८ बबई, बासोग ब) १९ रवि मोहरिमापार्यने पोगररिसमुबप नामक प्रयकी संस्तवमें रचना की है । साहों पिम्दु नामके योग दूसरे प्रसको भी बनाया है। हेमचन्द्रावाने योगशास मामक प्रप. भौरिमाात योगापिसम्बपना अनुसरण करके भोपशोपिनपनीने गुम्पती भाषा (पना की है। उस अपमें, गुमेपासे छगार निर्माणपतळ भूमिधाने मुम गारो बारबार म पोप चार करने योग्य और स्पिति करने पाप भाशपस पोर-तारतम्य तपा परिस वारतम्य प्रकाशित किया है। यमसे मामर सम्पत्रिपर्यंत मग योग से मा. पारिका निरोपम्प बोर मा आममामा-परिणामन्य। योगनिसमुपयमें मामतमा परिमामय पोगका ही मुस्प पिप है। उसफा पारम करमा पारिसे।
३श्यों वर्ष
७३९
ब, अधिक १९५१
बमतभारमद्रम्प
केवमान स्वरूप
तिहमसे
मिसे सम्पूर्ण प्रगट ऐ गपा है, तया प्रगट होनेके
मार्गको बिन पुरुषोंने प्रत किया है,
उन पुरुषों को बायत मदिसे नमस्कार है।
७४०
बम्ब, कि दो १ दुध १९५१
गोमार्य इस समय सम्म क्षेत्रमें रिहार करने बाममौ । उनको, विस क्षेत्रमें अंतर
प्रधान पिणे, निमिान इम्य क्षेत्र कार और मावका लाभ मिले, पैसे क्षेत्रमें विचरना उचित है।
७४१ बर्ग, कार्तिकदी परवि १९५१
.
सर्वथा वतर्मुखोने के लिये सपुरपोच मार्ग सब मोके भय ऐनेछ उपाय है, परन्तु
किसी किसी गाना ही समठमें जाता है। मायुप्पके योगसे, विपुर युनिसे, तौम सम्पसे और
सत्पुरुष समागमसे उस उपापको समाधना ठापित है।
उसके समझने का असर एकमात्र या ममुप्प हो, और मौ ममियमित कारने
मपसे प्रस्त है, और उसमें मी प्रमाद होता. यासे और मारपर्य है।
७४२
बर्मा, कार्तिकमी १२ १९५०
मात्माको प्राप्त कर यो निईनमसे प्रारम्पक मनुसार विचरते है, ऐसे महामार्गाका
गोलको सपोग मिमा दुर्गम है।
ठपा उस पोगके मिम्नेपर गोको उस पुस्पकी परीक्षा मी होती, और पपार्य परीवार
बिना उस महामाके प्रति बाम्प नहीं होता।
ज्या मक्तक मामय बन ऐतबतक उपदेश नहीं गवा, मोर उपदेशके गे विमा
सम्पवनय योग महीनता ।
फ४,४४,४५,४] विपिप पम मादि सप्रार-पौ यर्प तथा सम्पमशनकी प्राप्तिके बिना बन्म मादि दुसकी वास्पन्तिक निवि नही हो सकती। ऐसे महरमा पुरुषका योग मिलना ता दुर्छम है, इसमें संशय नहीं, परन्तु वामापी नीचोंका मी योग मिझना कठिन है, तो मी कचित् चित् पर्वमानमें यह योग मिल सकता है। ससमागम बार सभासका परिचय फरमा पाये। ७४३ बई, मंगसिर मुटी ५ मि १९५१ 3A १ क्षयोपशम, उपशम, क्षायिक, पारिणामिक, पिक और सामिपातिक इन प मावोंको एक्षमें रखकर, आत्माको उन भास अनुप्रेक्षण करके देखनेसे सद्विचारमें शेष स्पिति होगी। २ जान दर्शन और पारिन नो आमसमाषमप है, ठरें समझने के लिये उपरोक मात्र विशेष जालंबनके कारण है। ७४४ बर्मा, मगसिर मुरी ५ रवि १९५४ ने म फरते हुए, हिम्मत रमकर, हामीफे मार्गसे बसनेसे मोक्ष-नगरी मुसम हो। जिस समप विषप कपाप वा विशेष विफार उत्पम करके निसतो जोप, उस ममय रिचार पानको भपनी निर्यिता देखकर बहुत ही मेद होता है, और पर अपनी बारम्बार निरा करता है। यह हिर किरसे अपनेको तिरस्कारको सरिसे सकर, मिरस महान् पुरुषोंके परित्र बार पायो वाठन प्रादण कर, बरमा शौर्य उत्पम कर, उन विषय आकि विरुद्ध बापत र करफ, उन्हसा देता है तबतक पर हिम्मत हारकर नहीं बैटना, सपा बद फेवल दो मेर करफ भी नहीं सक जाना। लामापी गोषोंने इसी प्रति अपर्डबमका ग्रहण किया है, और बसमें उन्होंने इमामे जप प्राम की है। इस बातको सब मुमुक्षुओको मुम्पमार्गसे रपमें पिर करमा पाहिये । ७४५ पमई मगमिर मरी५ १९५४ (१) फोनसे गुणोंक भगमें मानस पपापापम मागानुसारग्ना पदा जा सका है। (२) बोनस गुगोरे भगमें भानम पापमपसे सम्पारिमा का मा सम्मा (३) पीनमे गुगोस भागमें भानमे धुतदान केनगन हो ममता है। (१) तथा कानमा त मानेम सरहान यथार्थमारमा पहा मासा ! पेस पारपाना दिससारी। ७४६ सम्मा पाएगी १.५१ "म शमा माँगर निगम भाग्मे गालि बारा जिनामा उस माम्म आरम पर Five म नही पाया भीम पत्रम [परw.neurs ऐगी, बर्षात् यस्ता पम्पावहारिक पियेगी, तबतक पर समाहना कपमामरिकन दिने समान प्रतिबंध और स्वममें मी उस प्रतिवपमें नया बाप, इस मातका म्स रसमा । हममे मो यह अनुरोध किया है, उसके ऊपर तुम पयागळि पूर्ण विचार रमा मेर उस रतिक मानो हो तरसे सर्मपा निात कर देना । पपा समागमका पाम मिना मसमप। यह बात शिपिमातिसे नहीं परन्तु सत्सापिसे मस्तकपर पानी उपित है। ७४७ वानन्द पौन वदी १५ गुरु १९५१ (१) मोसोमागकी मौदगीमें एक परिम्से सूचित करना पा, और में पैसा नहीं बना- पसी किसा मी कारिम गाना उचित नहीं । ( २ ) पविषमभावके बिना में मौ बताये किये दूसरा कोई अधिकार हो । मौन यना ही पोय मार्ग। ७४८ मोरवी माघ मुदी ग १९५१ प्रमेच्छासे गाकर धौणमोहतक सत्सव और ससमागमका सेवन करना हो या प है। कामें स्त्र साधनको चाकको कठिनता है। उसमें किर पदि इस तरके कामे मा कठिनता से, तो - हुममक और गवसर्पिणी नामका वावर्परुप नुमसे प्रत्यक्ष परिगोचर होता है। बाम कापाणके बाफ पुरनको उससे सोम न पाकर, बारम्बार उस योगपर पैर रखकर, समुव सत्समागम और सात्तिको सम्मान बनाना उचित है। ७१९ मोरबी मार दी १ पुष १९५१ मामलमा मिर्मता होनेके लिपे मुमक्ष बारको साधनों का बाप की सेवा करना चाहिये:--एक सवार दसरा सामागम | प्रापयर पुरुषोंका समागम गोषको कमी कमी हो प्राप्त होता है, परन्तु भार पदि सस्मिान हो तो पसात बहुत समपके सेक्नसे होनेवाले प्रमको, प्रत्यक्षम्यम्पक समागमसे पातको अपसमें प्राप्त कर सकता है। पोलियो प्रत्यक्ष गुणातिधरपान निर्मक चेतन प्रमालपुक पचन बोर विक सनिपवा पता है । औषधे मिससे वस समागमत्र पोग मिले उसमा विशेष प्रफल करमा चाहिए। रस पोगके बमान समतका माय बाप परिचय ममा चाहिये । बिसमें शातरम मुरूपता है, शायरसने हेतुसे मिसन समस्त उपदेश है और जिसमें समस्त रस शातिरसगर्मित है-ऐसे मा परिचफ्लो समुतन परिचय ।
पिविष पत्र मादि समाह-पों पर्प ७५० मोरगी, माघ मटी १ मुघ १९५१ (१) समुतका परिचय गारको वयस्य करना चाहिये । (२) मा निक्षेप वीर प्रमाद, उसमें बारम्बार ताप उत्पम करते हैं। क्योंकि उनका पाकासे परिचय है, परन्तु यदि निमय करके उनके परिचय करनेकी प्रापि को नाप तो पाना संभव है। (१) यदि मुख्य प्रवरय हो तो पहनीयका बनिधय है। (२) १ भारमतरूपके निर्णय होनेमें मनाहिसे गोषको मूछ होती मादी है, इस कारण प भूठ बम मी हो, वो इसमें भापर्य नही माश्म घेता। २ भास्महानके सिवाय सर्व शसि वौर सब दुमोंसे मुफ होनेका दूसरा कोई उपाप मही है। सदिपारके बिमा सरमदान नहीं होगा, वौर बससगके प्रसगसे गोत्रका विघR-ठ प्रापि न करता, इसमें बरा मी सशय नहीं है। १ वाम-परिमामको सस्पताका भौतापकर समापि करते हैं। वास्म-परिणामको जस्तस्पताको श्रीवाकर बसमाधि करते है। नाम-परिणामकी सहन-सहपसे परिणति होनेको भीतीपंकर धर्म करते हैं। बारम-परिणामको कुछ मी पर प्रति होमेको भौतापकर कर्म करते है। १ भागिनतीपंकरने पैसा बंग और मोक्षका निर्णय किया है, वैसा निर्णय दात बादि दर्शनों में हिगोचर नहीं होता। तया श्रीनिममें औसा यथार्य-वस्तृत्व देखने वातास पपाप पाल किसी कप दर्शनमें देखने में नहीं माता | ५ मामाके बंतापारके (शुम गम परिणामबार) मनुस्पर गम-मोक्षको म्पबस्या है, प शारीरिक चेयके अनुसार मही है। पूर्वम उपार्जित वेदनीय कर्मक उदपक मनुसार रोग बार उत्पम होते , और तदनुसार निर्मग मे, म्मान, उष्ण शीव बादि शरीरको पेय होती है। ६ विशेप रोगके उदयसे अपना शारीरिक मा पम्से हानीका शरीर कम्पित हो सकता है, मिठ सकता है, मान हो सकता है, म से समता है, और माश्म हो सकता है, नपा उसे मम वादिका उइप भी हो सकता है, परन्तु रिस प्रमाण, गोमें मोच और पैगम्पको बामुना दुई है, उस प्रमाण जौष उस प्रस्गमें प्राय करके उस पेगका पेदन करता है। . किसी मी जीतको अपिनाशी देहको प्राप्ति हुई0-पा कमी देमा नही, जाना नहीं और ऐसा समय भी नहीं और मृत्युका बागमन तो अवश्य होता है-पर वनुमर ता प्रस्पक्ष सहमत है। ऐसा होनेपर भी यह गौर उस कावको फिर रिसे मूह जाता है, यह वार्य है। ८ मिस सह पौतराग मनंत सिदिपा प्रगट हुई थी, उस वीतरागने मी इस दरको मनिप्प समता है, तो फिर दूसरे गीत तो इस देशको किस तय मिस्प बना सकेंगे ! 4 भीमद् रामचन्द्र [पत्र ०५१.५१.३ - ९ श्रीविनका वमिमत है कि प्रत्येक व्रम्प मर्मत पर्यापोंसे पुछ है। गोको वनंत पर्याप है। परमामु मी अमत पर्याय है। जीवके घेतन होने के कारण उसको पर्याय मी कम है, पौर परमाणुफे वचेतन पनेस उसको पर्याय मी बचेतन है। बोरको पर्याय असन नमी, गौर परमाणुको पर्याय सचेतन मऐसा प्राचिनने निश्चय किया है, तथा पैसा की योम्प मी है। पोंकि प्रस्पक्ष फ्याका सम्प मी विचार करमेसे पैसा ही प्रतीत होता है। ७५१ पाणीया, माप बदी ? गुरु १९५१ इस गोषको उचापनाका महत क्या है तथा उस निवि क्यों नहीं होती और र निति किस तर रो सकती है। इस प्रश्नका विशेषरूपसे विचार करमा योम्य-अतरमें उतरकर विचार करमा योम्प है। जबतक इस क्षेत्रमें यमा हो तबतक को मरिकप बनाकर प्रालि करना चाहिये । ७५२ मोरयो माघ वदी १५ १९५१ बिस तय मुमचापि प बने उस तय करे । हार जाने वपना मिस होमका कोई कारण नही । ना नानको दुर्गम योग हो मिस गया तो फिर पोरेसे प्रमाके मेर देनेमें उसे परामे जैसी मयमा नियम होने जैसा पुग मी बात कही है। ७५३ +म्पास्पामसार १ प्रथम गुणत्पानको मो प्रपि है उसका मेदन किये बिना, नामा मागेके गुणस्पानकमें मारी जा सकती। कभी योगामुपोगके मिझनेसे गाल अामनिर्भर करता हमा बागेमा और मंपिभेद करनेके पास बाता है। परम्नु पहाँ पिको इतनी मनिक प्रबम्ता है कि भार या मंपिमेद करनेमें शिपिठ होकर-असमर्प हो जाने के कारण पारिस सौर जाता है। हिम्मत करके मागे पाना चाहता है, पम्त मोहनीयके कारण विपरीताप समझमें मानेसे प ऐसा समझता कि सप प्रपिमेद कर या किन्तु उम्टा प उस क्य समसनेहप माइके कारण पिडिता हो करता है। उसमें से कोई मात्र दो योगानुयोग प्राप दानपर अकामनिर्भर करते हुए, गति बलवान होकर, उस प्रधिको शिक्षित करके अपना बयान करके मागे बसता है। या अविरतसम्पारि मामक चौपा गुणस्पाना है। मोधमकी समतौति होती है। इसका दूसरा माम पोधीन माहै। यहाँ बारमाके बनुभवको मुस् बात होती. अर्थात मोश होनेके वीरका यहाँ सरण होता है। २ इम बोरगीर गुणत्पानक (चौपा गुणम्पानक) से तेरो गुणस्थानकता बरमानुमा •म गमने मामान मन् १९५४ में मात्र महाने र ममिक व संवत् १९५५५ बावामार एक ना मानो ने RAI | तार इस मानि विवि रामपरिक्षा नियमाप्रमा। -अमुचाक ।
.५१ मसानसार] पिपिप पत्र मादि संग्रह-याँ बर्ष - एकसा गया है। परन्तु पानापरणीय कर्मकी निरापरणता के अनुसार झानकी कम ग्यादा रिता होती है, और उसके प्रमाण हो अनुमकका प्रकाश होना कहा जा सकता है। ३ पानावरणका सब प्रकारसे निराधरण होना केपलमान-मोश-है। यह कुछ पुझियम्से कामे नही माता, पह बनुभवके गम्य है। ' पुसिषसे निश्चय किया हवा सिद्धांत, उससे विशेप मुसिषर मना सके धारा कदापित बदल भी सकता है, परन्तु वो बस्तु अनुमवगम्य (अनुभक्से सिद) हो गई है यह तीनों कालमें मी महीद सकती। ५ पर्तमान समयमें नैनदर्शनमें वपिरतिसम्यग्दृधि नामक चतुर्य गुणस्पानकसे वप्रमच नामके सातवें गुणस्पानातक बाहमानुभक्को स्पष्ठ स्वीकार किया है। ६ सातसे स्योगकेवली नामक तेरहवें गुणस्थानकतकका समम वतमालका समय है। वेग गुणस्पानकका समप कदाचित् छया मी होता है। यहाँतक वात्मानुभव प्रतीतिस्म राता है। ७ इस कालमें मोक्ष नहीं, ऐसा मानकर गौच मोक्षकी कारमभूत क्रिया नहीं कर सकता। और उस मान्यताके कारण नायकी प्राप्ति कन्यपाहपसे ही होती है। ८ निस सर पिबमें बद किया इषा सिंह पपपि पिचरेसे प्रत्मक्ष भिम रोता है, तो मी पर महर निकम्मेकी सामसि रहित , उसी तयं पल्प वायुके कारण अपवा समनन बादित्य साधनोंके अमापसे भारमानपी सिंह कर्मन्बपी पियरे से बाहर नहीं वा सकता---पदि ऐसा माना जाय तो या मानना सहारण है। ९स बसार ससारमें चार गतियों मुस्स पे कर्म-अपसे प्रश्न होती है ।पके बिना ने गतियाँ प्राप्त नहीं होती । बषरहित माक्षस्थान, बंसे होनेवाले बतुर्गतिरूप सारमें नही। पर तो नियत है कि सम्पकत्व मपया चारप्रसे बघ मी होता, तो फिर पाहे किसी भी कामें सम्पनत्व वपमा पारित्र प्राप्त करें, पहाँ उस समय बप नहीं होता और वहाँ बम नहीं को संसार मी नही है। १. सम्यक्त भौर चारित्रमें बारमाको मुर परिणति गती है, किन्तु उसके साय मन बचन पौर परीरका शुम योग यता है। उस सुम पोगसे शुम बप होता है। उस संपके कारण देश मारि गतिरूप ससार करना पाता है। किन्तु उससे विपरीत माझ्या सम्पमत और पारिन मितने बोम प्रास होते हैं, उत्तमे ही अशोसे मोध प्रगट होता है। उनका फळ केश देव नादि गतिका प्राप्त होना ही महा। तया जो देव नादि गति प्राप्त हो तो उपर को ए मन पचन और शरीरके योगसे हो गई है और जो पपरहित सम्परत और चारित्र प्रगट हुना है, पर कायम पर, उससे फिर मनुप्पभर पाकर-फिर उस मागसे संपुट होकर-पोक्ष होता है। ११ चाहे कोई भी कारो, उसमें कर्म मीरा रहता है-उसका बंप होता है, और उस बपकी निर्मम होती है और सम्पूर्ण निराका नाम ही मोक्ष है। १२ निर्मराके तो मर--सकामनिर्भय वर्षात् सातु ( मोशको कारणभूत ) निर्जरा, और बामनिरा बर्षात् विपापनि ।
भीमद् रामचन्द्र [.५ मसावक १३ वकामनिय बौदपिक मापसे होती है। इस निर्मराको गाने बनताबार लिया । और पाकर्म-पकी ही कारण है। १. सकामनिर्भप बायोपशमिक मालसे होती है। यह कर्मक वाधका कारण है। मितभे मंगो समामनिर्गय (बायोपशमिक मावसे ) होती है उतने ही वोंमें भारमा प्रगट होती है। परि बकाम (विपाक) निर्बरा हो तो मोदयिक मासे होती है, और व कर्म-पका कारण है। यहाँ मी कर्मकी निर्भरा तो होती है, परत उससे वारमा प्रगद मही होती। १५ धर्ममार चारित्र प्राप्त करनेसे बो मिराई, वो पिक मासे (गो मान बपरहित मा)ी मायोपत्रमिक मानसे महोई। पदि पक्षापोपशामिक मापसे हुई होता, तो इस तण भटकना म पड़ता । १५ माग दो प्रकारके -एक गैविक मर्ग वौर दूसरा कोचर मार्ग । पे दोनों एक दूसरेसे निम्न है। १० किक मासि निम्न छोपेतर मार्गक पाम करनेसे उसका फर गैनिक नहीं होता। पैसा हल्प होता सा हो उसका फल होता है। १८ इस संसारमें बीमों को सम्मा भनत कोटी है। पयार मादि प्रसग बर्मत गौच कोष बादिसे प्रति करते है। पता रामा मादि क्रोष मादि मागासे समाम करते है, और बालों मनुष्पोंच पात करते हैं, तो मी उनमेसे किसी किसोको तो उसी कामें मोक्ष है। १९ोप, माम, मापा पौर गेमको पालनको कपापके नामसे कहा जाता है। पसार बापत झोपादिवाश्म है। यदि वमत कमाप स्सारका कारण होकर बनतालमापी कपाप होती हो, किर चारता लादिने बर्नत ससद होनी चाहिए, और इस हिसामसे तो बनत संसार म्पतीत होनेके परिणे उमें किस तरा मोल हो सकती है। पर बात विचारने योम्प है। २ प्पा मिस क्रोध नादिसे बनत संसारको विपी बनतानुषी कषाय है पर भी निस्सो। इस हिसाबसे व्यर ए कोष बारिको बनतामुखी नही माना सकता । सकिने बनतानुभाको चौमासा बन्य प्रकारसे ही होना समय है। २१ सम्पासान दर्शन वर चारित्र न तानों को एकताको मोक्ष यते।। प सम्पमान पनि चारित्र, गौतगगहान दर्शन पारित उसासे बनत संसारसे मुलि होती है। यह गीत पान की अपका धरण है। बोतराके मासि पम्ना अपना उनकी मात्रामसर पम्ना भी मापक ही कारण है । रसके प्रति यो कोष बाद कपाप हो उनसे निमुछ ऐना, पाही बनत संसारसे मर्मतस्मसे मुक होना है। वर्षात् पही मोक्ष है। जिससे मोबसे विपरीत ऐसे बर्मत संसारको पनि होती है, उसे मर्मवानुमी मा माला और बात मी ऐमी ।। मासे और उनकी भावानुसार पम्नेगका प्रमाण होता है, ऐसा जो पानसे गारोको सम्पाणकारी मार्ग है, उसके प्रति शेष बादि मार (यो महा रिक्तताके परनेवा) होमर्मतामुगधी कपाप। २२ प भारि मात होगमें भी मिपा नहीं गाते, तपा उनसे मातरागण्य प्रस्क्ति पांतरणानका मोवर्मन सपा सत्पर्मका न करना, अपना उमके प्रति तो म मारि से ०५ पासाबर] पिविष परमादि समा-पाँच मासे झोप आदि मान होते हों उन मावोंसे, बनतानुबधी कपायसे बम होकर मषिष्यमें मी बनत ससारको पविती है। २५ मनुमवका किसी काय ममात्र महाँ है। परन्तु मुहिक्म्से निषित की गई नो मप्रत्यक्ष वाव है, उसका कचित् अमात्र मी हो सकता है। २९ स्या केसान उसे करते है कि जिसके द्वारा कुछ मी जालना क्षेप नही रावा! भपपा बामप्रदेशोंका चो स्वमाव है, उसे फेवमान करते है!- (ब) वास्मासे उत्पम किया एला विमावपरिणाम, वौर उससे चा पदार्यक सयोगहमसे होनेवाले वावरणपूर्वक जो कुछ देखना और जानना होता है बह इन्द्रियों की सहायतासे हो सकता है। परस्त तापी यह विधन नहीं है। या विवचन तो करणानसामी है। (वा) विमावपरिणामसे होनेवाला वो पुनास्तिकापका समय है, या मारमा मिमा है। उसका, पपा निवना पुनका समोग हवाई उसका, न्यायपूर्वक बो शान-अनुभव होता है पर सब बनुभवगम्पमें ही समाविय होता है, और उसको लेकर मो समस्त छोकके पुद्गलोका इसी तयका निर्णय होता है, पर पुनिषसमें समापिए होता है। उदाहरणके छिपे बिस बाकाशके प्रदेशमें क्या उसके पास गो बिमा युक बारमा स्पित है, उस भाकाशके प्रदेशके उपने मागका लेकर नो वरप बमेप मनुभव होता है, पर बनुमबगम्पमें समापिए होता है, और उसके पपात् बाकीके वाकाशको गिसे सब पणानीने मी वनत-विसका बंत माही-कहा है, उस बनत वाकाशका मी तदनुसार हो गुण होना चाहिये यह बुद्रिाम्से निर्णय किया जाता है। (३) बारमझान उत्पन्न हो गया रे अपना नामधान हो गया है-यह बात अनुमवगम्प । परन्तु उस मामपानके उत्पम होनेसे भारमानुमत्र होने के पचात् क्या क्या होना चाहिये, या जो कडा गपा, बुखियम्से ही कहा है, ऐसा समझा जा सकता है। (६) इन्द्रियों के सपोगसे जो कुछ देखना नानमा होता है, उसका पति बनुमरगम्पमें समावेश हो जाता है, या ठीक है, परन्तु यहाँ तो बारमतत्तविषी अनुमवगम्पको बात हो यहाँगो गिसमें इन्द्रियोंको सापता अपया संमपकी वापकता नहीं, उसके अतिरिक किसी दूसोफ सापकी । बात है। षण्वामी समग ही देश मोर नान ये है, अर्थात् उन्होंने मोकके सब पोका पनुमण फिपा-ऐसा गो का नाता है, सो उसमें उपयोगका सबम रातार । कारण कि धानात १३याँ गुणस्पानक वीर १५ो गुणस्थानक इस तरह दो दिमाग किये गये हैं। उनमें १२ गुम- स्थानमा कपमानक योग पता है, परस्पर है और वह यह बात है यहाँ उपयोगको सास गहरवार नहीं उपयोगको लास बात , यहाँ मुखिकर है, यह करे विमा परमही सकता। वया हाँ यह बात सिर होती है, वहीं वनुमको साथ साथ बुदिषठ मी सिर वा। (उ) स प उपयोगके सिद्ध होनेसे बाहमाके पासमें गे वा पार्य है, उसका तो अमुमन रोता है, परन गे पदार्थ पासमें नहीं है-विसका संगम नहीं है-उसका अनुमा कारनमें कठिनाई वाती पोर उसकी साथ ही 'मी पार्प बनुमपगम्प नहीं है, ऐसा करनेसे केसरदानके प्रचलित - प्रीमद रामचम पर्पविरोध जाता है । इस कारण यह सिल हो कि वहाँ दुनिषसे सब पदार्याका, सन प्रकारसे, सब काका हान होता है। २५ एक कामे कम्पित यो मनठ समय, उमके कारण वर्मतकास का माता है। तथा उसमें वर्तमानका पहिले यो समप म्पतीत हो गपे, फिरसे गैठकर वाले नहीं यह बात न्याययुत, फिर यह समय अनुभवगम्य किस तमो सकता है। यह विचारणीय है। २५ नमुभवगम्य जो सम्प हो गये है उनका यो सरूप है, उस सहपको छोड़कर उनप कोई इम्प सम्म नहीं होता और इसी तरह बनादि अनतकालके नो दूसरे सम्प है उनका मी पैसा तिरूप है—पा मुखियम्से निणीत मा माश्म होता है। २७ स काठमें शान कोण हो गया है, और जानके क्षीण हो जानेसे बनेक मतमेद हो गये है। मो मो बान कम होता है पो त्यों मतमेव मते । वौर म्मो ग्यों शान सता है त्यो स्यों मतमेद कम होते है। उदाहरण के लिये, म्ों म्ों पैसा पटवा है पो त्यों श दता है और यो पैसा पठा किश कम हो जाता है। २८ शामके बिना सम्पमका विचार नहीं सूझता। मतमेव मुच उत्पम नहीं करमा , यह बात जिसके मनमें , ए गोकुल बांधता वीर पुमताप सब उसको फदायक होता है। मतभेद मानिक कारणको रेकर शास-प्रवण मादि फम्यापक नहीं होते। २९ पैसे रास्तों पर हुए किसी मावीके सिर पगडी फोटोमें उस गाय, और उसके मुसाफिर नमी बाकी यी हो तो पहिले तो गाँतक ने उसे फोटोको इटमा चाहिये किस परि कोटीछे दूर करना संभव न हो तो उसके लिये बहाँ पारकर, एवमर पी न बिता देनी चाहिये। परन्तु पापीका मा मेहन्न भागे बठमा चाहिये । उसी तय निनमार्गक रूप और उसके हस्पको समझे बिना मपपा समविचार किये बिना टी छोटो शंका के लिये ही बैठ गाना और भागे मसमा उषित महाँ । निनमार्ग वास्तनिक प्रविसे रेसनेसे वो जौको फोकस करमेश उपाय है, परन्तु गौच तो गले मतमें मुंपा इजा। २ गान प्रथम गुणस्पानसे निकलकर प्रयिमेद होनेतक बनतबार पापा, वौर बसि पा फिर गपा है। ११ जानको ऐसा मान यता कि सम्पकत्व नापास हो या माता होगा, परन्तु यह तो प्रयास (पुस्पार्थ) बिना प्रास नही होता । १२ कर्म प्राप्ति १५८ है । सम्पावके वाये बिना उनसे कोई मी प्रति सम्स अप माही होती । गरि मनासि निरा करता है परन्तु मुमसे तो एक मी प्रति पय नहीं होती ! सम्पाव ऐसौ सामर्प प प्राप्तिको मूससे दो पय कर देता है। प इस तए कि अमुक प्रति ध्य रानेके परमात् पाता है और गौर यदि बदमान होता है तो प पोरे पोरे सब प्रतियोध पपाता। १५ सम्यान सबका माम्म दो बाप पर बात नहीं है। इसी तरा बदकिसीको मा मास म पर पह बात भी नही । रिचारपानको मा मारम पा जाता है।
०५३ मापानकार] विविध पत्र मादि सपा-पाँ पप । २९ नीषको समझ वा बाय तो समझ बानेके बाद सम्परख पात सुगम हो जाता है। परन्तु समास वाने के लिये जीबने बानतक सबा सबा पक्ष नहीं दिया । औषको सम्यक्त्व प्राप्त होनेका मय अम योग मिला है, तब तब उसने उसपर बराबर प्यान नही दिया । कारण कि मीरको भनेक मतपय मौजूद हैं। उनमें मतसे अन्तराय तो प्रत्यक्ष है, फिर मी ने बाननेमें नहीं पाते । यदि कोई उनें बतानेवाण मिल पाय तो मी क्तयपक योगसे उनका पानमें मना नहीं बनता । तया बहुतसे वताप अम्पत है, जिनका प्यानमें वाना भी मुस्किल है। २५ सम्यक्त्वका ससप पर बचनयोगसे हो कहा बा सकता है। यदि यह एकम कहा माय तो उसमें गोत्रको उल्टा हो भान माश्म होने लगे, तया सम्यक्त्वक ऊपर उल्टी वापि हो चाय । परन्तु यदि यही स्वम्म अनुभमसे ज्यों उपों दशा बढ़ती जाती है, क्यों स्पों का गाय, अपना समझाया गाय तो मह समसमें वा सकता है। ३६ इस कामें मोक्ष ह-या दूसरे मार्गामें कहा गया है। यपि सैममार्गमें इस कामें यमुक क्षेत्रमें मोक्ष होना नहीं कहा बासा, फिर मी उसमें यह करा गया है कि उसी क्षेत्रमें इस कालमें सम्परत्व हो सकता है। ३७ शान दर्शन और चारित्र ये तीनों इस कारमें मानद है। प्रयोमनम्त पदार्थोके नान नेको बान करते है । उसकी सुप्रतीतिको दर्शन करते है, और उससे होनेवाम गो नित्या है उसे चारित्र करते हैं। यह पारित इस काम ममामि सम्पपल होनेके माद सात गुणस्पानतक प्रास किया जा सकता है, यह स्वीकार किया गया है। २८ कोई सातवेंतक पाँच चाय तो मी नसी बात है। ३९ पनि कई सातसक पच गाप तो उसमें सम्पात समाविष्ट हो जाता है, और यदि कोई पतक पहुँच बाय तो उसे विपास हो जाता है कि भागेकी दशा किस तराकी है। परन्तु साततक पषि बिना बागेकी बात म्यानमें नहीं पा सकती। १० यदि मती हुई दशा होती हो तो उसे निषध करनेको महरत नहीं, बोर यदि मताई दया न तो उसे माननेकी जरूरत नहीं । निपेष किये बिना ही बागे बढ़ते गामा पाहिये । ११ सामायिक मौर बाठ काटिका विवर गोड़ देनेके पचात् नरकोटि बिना नही हाता, मोर बम्तमें नमकोटिसेमी इति मे विमा मोम मह है। १२ म्पाय प्रावियों आप किये बिना सामापिक नहीं वाता | मिसे सामायिक होता है उसकी दया वो मत होती है। वहसि नाप को सात भौर बाठ गुणस्थानमें नाता है, भार पासि दो वाम मोक्ष हो सकता है। १३ मोझमार्ग सम्पारको पारफे समान है, अर्थात् ए एकवाय-एकप्रपाइप-है। दोनों का मो एकधारासे बर्यात् एक समान ये हो मोनमार्ग में प्राइमें पो बसाई पही मोखमार्गहै। ११ पहिले दो बार कहा मा चुका है फिर मी पर तीसरी बार या माता है कि कही मी मीमन् पसन्द [०५५ मापन बाबर और गाय क्रिया निषेध नही किया गया । कारण कि हमारी भास्मामें यह भाव मी मी सम मा अपम नही हो सकता। १५. स्वत्वाली गाठ मिप्यात अपया कमायका सूचन करनेवाम क्रियायोके संबभौ करा- चित् किसी प्रसगपर कुछ कहा गया हो, सो वो किमाके निषेध करने के लिये तो कुछ भी नही पना गया है। फिर मी पर पर कफन किसी दूसरी वय ही समधमें वापा हो तो उसमें समाने- पामेको वफ्नो सुबकी हो गई समझनी चाहिये । १९ मिस्ने पायमावका छेवन कर आग है, पर ऐसा कमी भी नही करता जिम्से कपापमापका रोक्न हो। १७ बबतक हमारी तरफसे ऐसा नहीं कहा गया हो कि अमुक किया करनी चाहिये, तबतक या समधना चाहिये कि पा सकारण ही , और उससे या सिर नहीं होता कि निसा करनी चाहिये। १८ शाळमें यदि ऐसा कहा नाप कि अमुक किया करनी चाहिये और पछिसे देश फरो अनुसार उस कियाले दूसरे प्रकारसे करनेके ये मा भाप, तो इससे श्रोताके मनमें शंका ऐ सकता है कि परि तो सरी तरह कहा जाता पा वोर मा सरी तबका नाता है परन्तु ऐसी सय करनेसे उसका प्रेप रोनेके बदले मय ही होता है। ०९ पाय गुणस्थानके पन्त समयतक मी जानीको बाहानुसार चम्ना पड़ता है। उसमें सन्मभाव माश हो जाता है। ५० सभासे निशान करमेसे पालियों शान्त नहीं होता, उम्टी उम्मत ही होता है, और उससे पुत होमेका समय माता । धौर म्पो म्यों मागे पानेके परमात् पत्न होता है स्पों त्यों उसे मोरको पटक गती है-इससे माय वधिक गहरमें माता है वर्षात् ह परिस्में पाकर पाता है। श्वना हमही किन्तु उसे जोरको पटक भनेके कारण उसेनापत समपतक पो पाना पल्प ५. यदि बमी मी शाका करना हो तो करो परन्तु इतना ये निरणपसे प्रशाम करना चाहिये कि गौबसे ज्याकर मोहतक के स्थामक मौसदी और मोक्षका उपाय भी है, इसमें कुछ भी समय नही । पद निर्णय करने के पश्चात् उसमें तो कमी मी शकाम करना चाहिये, और इस प्रकार निर्णय हो मानेके पपात् प्राप शका मही होती । पदि क्यापित् शंका हो मी तो या एक- देश हो पाका होतीरे मोर ठसका समाधान हो सकता है। परन्तु यदि में ही बर्षात् जोसे मेकर मोशतक स्पानको हो अपना उसके पापों का हो तो एकदेश शाका नही, परस्तु सविस का है और उस शकासे प्राप पतन हो हावा है और पतन इम्ना वधिक बोरसे रोता है कि उसकी बात मोरको फरक स्मगती है। ५२ या महा दो प्रकारको -एक बोध और दूसरी रिचारपूर्वक । ५१ मतिनाम और भुवमानसे बो कुम माना जा सकता है उसमें अनुमान सापमें यता । पम्त उससे भाग और बनुमान बिमा हो पुस्लपसे रानमा पह मन पर्मशाना पप है ।त् मम्में तो मति मुत और मन पर्पमान एक है परम्त मन-पर्वनमें मनुमान के बिना भी मतिको निर्मम्तास पुरस्मसे जाना जा सकता है।
। . मासानसार] पिविष पर मावि सपा -बों व ५१ मसिकी निर्मम्ता सयमके बिना नहीं हो सकसी । गतिको रोकनेसे सपम होता है, और उस सपमसे मतिको शुखता होकर अनुमानके बिना शुद्ध पायको नाननेका नाम मन पर्यशान है। ५५ मतियान किंग-चिह-से जाना आ सकता है, और मन पर्पवधानमें लिंग भयवा चिहको भावश्यकता नही राती । ५६ मविज्ञामसे जाननेमें बनुमानकी बावश्यकता यती है, वौर उस बनुमानी सहपतासे गोहान होता है, उसमें फेरफार मी होता है। परन्तु मन पर्पज्ञानमें पैसा फेरफार मही होता। क्योंकि उसमें अनुमानकी सहायताको नहरत मही है । शरीरको पेशसे वेष आदिको परीया हो सकती है, परन्त मिस्से कोषादिका मगसरूप ही माश्म न हो सके, उसके लिये पदि विपरीत घेश की गई, सो उसके ऊपरसे कोष वारिका परीक्षा करमा कठिम है। वथा यदि शरीरको किसी मी तरकी पेय म की गई हो, तो पेशाके मिळकुछ देले विना हो क्रोध वादिका मानना बहुत कठिन है, फिर मी उसका साक्षात्कार हो सकना मन पर्यमशानका विषय है। ५७ लोगोंमें भोपहबासे प्रचसित रूके अनुसार यह माना जाता है कि 'हमें सम्यम्ल है या नही इसे तो केपी नाने निधय सम्पन्न होनेकी बात तो केवगैगम्प हो' परन्तु बनारसीदास मौर उस दशाके वन्य पुरुप ऐसा करते हैं कि "हमें सम्पत्य हो गया है, यह हम निपपसे करते है।" ५८ शम्समें वो ऐसा कहा गया है कि निथप सम्पकचर या नहीं, उसे कपी पाने' सो यह बात अमुक नयसे ही स्पो । तथा केरमानीसे मित्र बनारसीदास कराने भी जो अस्प- रूपसे ऐसा कहा है कि "हमें सम्पत है, मस्सा हमें सम्यक्त्व प्राप्त हो गया है, या कपन मी सम्पहै । कारण कि मो नियप सम्यक्त्व है उसे तो प्रत्येक यस्पको पर्यापसहित केटी हो जान सकते हैं, नपत्रा यहाँ प्रत्येक प्रपोमनमत पापक व बहेको सम्पूर्णरूपसे केसीके सिवाप बन्य कोई दूसरा नहीं मान सकता, पहा निभप सम्पमत्वको फेवलौगम्य कहा है। तथा उस प्रयोमनमूत फ्यापक सामान्य वपना स्परपसे हेतु यतका समझ सकना मी समय है, और इस कारण बनारसी- यास वगैराने वपनेको सम्यक्व होना कहा है। ५९ समयसारमें बनारसी सकी बनाई हुई कवितामें कहा कि हमारे लयमें मोपनीय उत्पन हो गया है,' अर्यात् उनोंने कहा है कि हमें सम्पत है। ६० सम्मान प्राप्त होनेके पपात् अधिक से अधिक पदय मबके मातर मुक्ति होपाती है, और परि मीब पति भ्युत हो जाता है तो अर्धपुरम्परावर्तनमें मुक्ति होती है । पर इस कामो वर्ष पुन-परावर्तन गिना नाम तो मी यह सादिसातके भगमें वा नाता है पर बात शंकाररित है। ११ सम्यक्त्व म्हण १ कपापको मदवा, पपणा उसके रसको ममता । २ मोषमार्गको मोर पि। १ ससारका धमनपाना या उसका सारा अपना महारूप माइम होगा। सब प्राणियों के कमर दयाभाव; उसमें विशेप करके कपमा मारमाके उपर दयामात । ५. सरदेष सत्पर्म मौर सहरके ऊपर बास्था । - o । - भीमद् रामबाद १२ वामझान मपपा बामसे मिधर्मस्वरूम वच्या पुनसास्तिकाय बगैरका नो भिघ मिब प्रकारसे, मिम मिन प्रसगपर अत्यन्त सूक्ष्ममे सम्म और बसि विस्तृत सम्पबार प्रकाशित हुवा है, उसमें कोई हेतु गर्मिती या मही! भौर पर गर्मित है तो वह कौनसा है। उस समय विचार करनेसे उसमें सात कारण गर्मित माम पाते है-सहतार्यप्रकारा, उसका विचार, उसकी प्रवति, गौ-सरक्षण बगैर । उन सात हेतु का फस मोचकी प्राप्ति होना है। तपा मोसो प्राप्तिका नो मार्ग है यह इन ऐसि सप्रतीत होता है। ६३ कर्मक बनत मे । उममें मुस्स १५८ हैं । उममें मुख्य पाठ कर्म प्रातियों का वर्णन किया गया है। इन सब कौमें मुम्न्स कर्म मोहनीय है। इसकी सामर्प दूसरों की अपेक्षा बर्पत है, बार उसकी स्पिति मी सबकी अपेक्षा गरिक है। ६१ पाठ कमम चार कर्म पनघाती है। उम चामें मी मोहनीय भत्यात प्रारूपसे पन- पाती है। मोहनाप कर्मके सिमाप मोबाकीके सात कर्म है मोहनीय कर्मके प्रतापसे हो प्रबह होते हैं। यदि मोहनाप दूर हो गाय तो दूसरे कर्म मी निर्मल हो जाते है । मोहानायके दूर होनेसे सरोका पैर नहीं टिक सकता । १५. भवपके चार प्रकार है-प्रतिवष, प्रदेशपय स्पितिवध वीर रसमा । उनमें प्रदेश स्थिति मोर रस इन तीन मोड ऐक्यका नाम प्रविष रक्स्ट गया है । वामाके परे सोको साप पके जमाव-संयोग-को प्रदेशवम करते है।पो उसी प्रवकता नहीं होती उसे ए करना चाहें वो दूर कर सकते है। सपा मोहके कारण स्थिति और रसका बंच पाता है, और उस स्थिति तपा रसका बोल। उसे गीत परिवाना पाहे तो उसका पदसा गा साना मसमय है। ऐसे मोरके कारण इस स्पिति वीर रस प्रममता है। १६ सम्यक पोजिसे अपना पण बताता है मुझे प्राण करने के बाद पति मरण करमेवाली इसा न हो तो भी मुझे उसे बम्पूर्वक मोक्ष के ही गाना पाता है। इसछिपे मुझे महण करने पहिले पारिबार करना चाहिये कि पदि मोक्ष मानेकी पाये बदम्ना होगा तो मोप छ काम बानेपानी नहीं। स्पोंकि मुझे मरण करके पचाव मारे समयमें मुछ उस मोक्षमें पहुंचाना ही चाहिये। यदि प्ररण करनेगम सापित शिकिहोगाप, मी सके तो उसी मपमें मोर नही तो परिकसे अधिक पाय मोंमें मुझे उसे मास मोड़ पाँचाना चाहिये । पर काचित् र मुझे मेहकर मेरेसे पर वाचरण करे अपना पत प्रमा मोदको पारण कर ले, तो मी अर्थपुटम-मपनतमके मौतर तो मुझे बसे वारस मेक्ष पाँचाना चाहिये ही--पर मेरी प्रतिया। बर्षात् यहाँ सम्पनही माचा बताई है। ५७ सम्पन वानसे प्रता में इलमान र सकता कि चोरो मोक परमार, और न उससे पर विशेष कार्य मही दर सरता । तो फिर तेरे मुकार मुक्त सि बानको म्यूनता है। इतना ही नहीं भिन्तु उठे प्रातरनेमें मेरा सरत गती है।
.१ मामास] विषिष पत्र भादि सपा-यों व ७० उस २८ किसी प्रम आदिका वाचन गुन करते हुए, पहिले मगलाचरण करना चाहिये, और प्रथको फिरसे बाँचते हुए अपवा चाहे काहीसे मी उसका योचन शुरू करनेके पहिसे मगलाचरण कर नेकी शामपरति । ठसका मुख्य कारण यह है कि वाह्मासिसे भारमाधि करना है, इसलिये पैसा फरमेमें प्रपम शतमात्र करनेकी जरूरत है, और तदनुसार प्रथम मगाचरण करनेसे शांतमान प्रवेश करता है । बाँचन करनेका जो कम हो उसे ययाति कमी मौ न तोड़ना चाहिये । उसमें जानाका प्रत मेनेकी जरूरत नहीं है। ६९ वामानुम-गम्य अपवा बास्मनित सुस और मोक्षमस ये सब एक ही है। मात्र शाद शुदा हुदा है। ७० शरीरके कारण वत्रा इसरोके शरीरको अपेक्षा उनका शरीर विशेषतावाण देसनेमें वाता है, कुछ इसलिये केवमानी केवमानी नहीं करे बासे । तपा केवब्यान मुन्छ शरीरसे का राजा है, यह बात भी नहीं है । यह तो वास्माद्वारा प्रगट किया गया है। इस कारण उसको शरीरसे विशेषता समन्चनेका कोई हेतु नहीं है, और विशेषतावाला शरीर ठोगोंके देसनेमें नहीं पाता, इसलिये रोग उसका एस माहारम्प मही बान सकते । ७१ बिसे मविवान वौर मतहानकी भशसे मी सवर नहीं, यह जान पर केवमानके स्वरूपकी गानभेको इच्छा करे तो यह किस तरा बन सकता है। वर्षात् एमी बन सकता। ७२ मलिक फरापमान होनेसे गो शान उत्पन्न होता है वह मतिबान है और प्रबण होनेसे जो बान उत्पन होता है या बुताान है वौर भूतानका मनन होकर जा उसका अनुमा होवाम पौठे मविज्ञान हो माता वपना उस युतझानका अनुमप होने के बाद यदि पा सरेको कहा जाप, वो उससे कानेवालेको मन्तिहान मोर मननेवासको भुवान होता है । तथा युवान मतिके विना नही हो सकता, और यही मतिपूर्वक भुत समझना चाहिये । इस सरा एक सरेका कार्यकारण सबध है। उनके अनेक मे है। उन सम मेको मैले चाहेये वैसे हेसपूर्वक वो समझा नहीं- पोंकि हेतुपूर्वक जानना समझना कठिन है, तथा इसके पतिरिक वागे पम्फर समी पाको जाननेपाछे बनेक भेदयुक्त बाधिकानको, और रूपी पदायोंको बामनेपामे मन पर्यशामको बानमे समसमेकी जिसकी किसी वसे मी शाकि नहीं, ऐसे मनुष्प पर और अरूपी पदाकि समस्त मापसे मानमेवा केवमानो विषयमें माननेका-समझनेका प्रश्न करें, तो वे उसे किस क्प समझ सकते। बर्यात् नही समझ सकते। ७५ हानीके मार्गमें चम्नेपाडेको फर्मबंध नहीं है । तथा उस पानीको वातानुसार पने- बायको मौ कर्मवप नही होता | पोकि क्रोष, मान माया, डोम बारिका यहाँ ममाल है और उस ममात्र कारण कर्मवध नहीं होता । तो मौ परियापप' में जम्नेसे पानीको हरिपापय' को क्रिया रोती है, और पानीको वातानुसार पम्नेवासेको मी मा क्रिया होता है। ७१ मिस पिचासे भाव कर्म भापता है, उसी विधासे गोब कर्म छोपवा मारे। ७५ उसी विवाका सांसारिक हेतुके प्रयोम्नसे विचार करनेसे नीव कर्मच करता है, और मोर मा उसी का इम्पके सरूपको समझने के प्रमोमनसे विचार करता हैसकर्म गोवता। .
भीमद परन्द्र [.५१मानकर क्षेत्रसमासमें क्षेत्रसंबधी योनी बातें है उन्हें धनुमानसे माननी चाहिये । उनमें अनुमान माही होता । परन्तु उन सबका कारण ही वर्णन किया जाता है। उसकी विपासपूर्वक या रसना चाहिये । मग प्रदा फेर हो गानेसे वागे पककर समसनेमें ठेठतक मूग बी याती।। जैसे गमित्रमें यदि पहिस्से मूस हो गई हो तो या भूग मन्ततक ची नाती है। ७० शान पाँच प्रकारका है। शान यदि सम्पकत्वके क्मिा, मिप्यावसहित हो तो पति भबान भुव मान दौर काधि भयान कहा जाता है।उने मिपाकर जानके गुम वाठ मेद होते हैं। ७८ मति अव वीर अपपि यदि मिपावसहित हों तो महान है, और सम्पमतसहित तो बान हैं। इसके सिवाय उनमें कोई वमय मेद नहीं। ७९ जाल एग मारपूर्वक जो पुस मी प्रति करता है, उसका नाम फर्म है। पुम अपना पशुम अप्पासापपासे परिमानको कर्म करते। वौर शुम बम्पबसायमान परिणमन धर्म नही किन्तु निर्मरा है। अमुक वाचार्य ऐसा प्रते है कि दिगम्बर मापापीको मान्यता है गालो मोश नही होता, किन्तु मोश्च समझमें भाती है। यह इस तय कि भीम प्रसस्वरूपपास है, इसम्मि मा उसे बंप ही नहीं इला, तो फिर उसे मोश कासि हो सकती है। परन्तु बौने पा मान रस्सा है: ' में पाया है। यह मान्यता शुलवहम समझनेसे मही यती-मात् मोश समहमें मा गाता।' परन्तु यह बात पुरनयको बपना निमयनयको हो। पदि पापारिक नपपास नसमें संम्म यर वाचरण रें वो उमें मटक मटक कर मरना है। ८१ टगांगसूत्रमें कहा गया है कि बीब, अनार, पुष्प, पाप, मालप, संगर, निर्मग, र और मोच ये पार्थ सद्भात है, अर्थात् उनका अस्तित्व मौजूद है उनकी कुछ कल्पना की गई हो पागात नही। ८२ दात पुरनप-आमासी है। मुझनपामास मतमा निमपनपके सिधप किसी दूसरे मयको-म्पहारनमको-सी मानते । निनदर्शन ममेकास्तिक है-स्पा है। ८५ कोई मरतलोंकी कई फ्लम्पों की, कोई पट्पदोंकी और कई दो पतिकी बात करता है, परम्नु र सा और भाव इन दो राशि-दो तलोंमें दो इम्पोंमें ही गर्मित हो जाता है। ८१ निगोदमें मनन्त गार पतेरे इस मातमें तमा रमममें साध मोक वितने सूक्ष्म माग अनंत गौर राते हैं इस बातम, शका मही करना चाहिये । हमने जैसा सकस देला सा ही पा। पर गौर, यो पूस के प्रमाण होकर पता है, और किसे नमी मी अपना नियका सम्प समझ महा पापा उसे ऐसा माम मातें समझ न बा तो या सरहै । परन्तु उसमें बामा करनेका कोई परण नही है। इस बात से इस तरह समझना चाहिपो- मामेरे समय मा गौरके माय मागमे जो पातसी हरपालन में माता है, उस पोमा तरपाग भी जर मर्मत गर हारपरि इस तपोबनेर गानाधिारतो गत संसार प्रम्पगप बनुमा न होनेपर मो समय विकासे विचार करनेसे उसन जर्मतमा .५१मासानार] विविध पत्र मारि सपा-१ौ पर्प - समय हो सकता है । कदमूठ मादिमें मनसपना समय है। दूसरी हरियालीमें नर्मवफ्ना समव नहीं, परन्त कदमूहमें भनतपना घटता है। तथा कदमुलके यदि पोरेसे मागको मी काटकर भगाया पाय तोप उग पाता है, इस कारण भी उसमें गीयोका वाभिस्य यता है। फिर भी यदि प्रतीतिम होती हो तो बात्मानुभप करना चाहिये । परमानुमब होनेसे प्रतीति होती है। मातक पारमानुमष मही होता, तबसक उस प्रतीतिका होना मुस्किल है। इसलिये यदि उसका प्रतीति करना तो प्रथम बारमाका भनुमबी होना चाहिये । ८५ जबतक जानावरणीयका क्षयोपशम नहीं आ, तबतक सम्पमत्वकी प्राप्ति होनेका दया रखनेवालेको उस बातकी प्रतासि रहकर वासानुसार ही चम्ना चाहिये । ८६ चीनमें सकोच-विस्तारको शक्तिरुप गुण रहता है, इस कारण वा सूक्ष्म स्यूछ शरीरमें दोके प्रमाण स्थिति करता है। इसी कारण यहाँ पोरे बकाश, मी वा बिग्रेपरूपसे सकोगफ्ना कर सकता है, यहाँ बीच सकोषपूर्वक यता है । ८७ ज्यों म्यों मौष कर्म-पुलकों को अधिक ग्रहण करता है स्यों स्पों पर अधिक निविय होकर वनेक दोहोंमें सत्ता है। ८८ फाम अचिस्प शक्ति है। कोई भी पार्थ स्पने धर्मका त्याग नहीं करता। एक एक बीमें परमाणुरूपसे प्राण किये गये अनत कर्म है । तपा ऐसे बनत मोब, बिनको साप धनवानव कर्मरूपी परमामु सद, निगोरके वायसे पोरेसे अबकाशमें एते हैं याबास भी पाका करने योम्प नही । साधारण गिनतोके अनुसार तो एक परमाणु एक भाकाश-प्रदेशका परगाइन करता है, परन्तु उसमें मचिप सामर्प है। उस सामर्थ्य-सभालके कारण पोरेसे नाकाशमें मी ममत परमाणु गते । बैसे किसी दर्पणके स्मुस यदि उस दर्पणसे किसी बात बड़ी बस्तुको रक्सा चाप, तो मी उसका उतना पाकार उस दर्पममें समा जाता है तथा जैसे यपपि मॉस एक छोटीसी बस्त, फिर भी उस छोटीसी बस्तुमें सूर्य चन्द्र वादि यो बरे पदार्थीका सरूम Pसई देता है। इसी तर वाकाश पपपि एक बड़ा विश क्षेत्र है, फिर भी पर मौसम रश्यरूपसे समा गाता है, तपा गाँस जैसी छोटीसी बस्तु गोबरे तसे पको देख सकता है। यदि योड़ेसे वाकाश मचिस्प सामग्रंक कारण बनत परमाणु म समा सकते हों, तो फिर बॉससे उसके परिमाण मितना ही मस्त दिखाई देनी पाहिये, उसमें उससे अधिक मोटा मग म दिखाई पाना चाहिये । स्था दर्पण मी तसी घर मावि मसी नगे बस्तोंका प्रतिबिम्ब नहीं पा सकता । इस कारण परमाणुकी बरिस्प सामर्थ्य है, और इस कारण पोरसे बाकाय मी मानत परमाणु समा सकते हैं। ८९ इस तर परमय बादि प्रम्पोंका चो सूक्ष्ममावसे निरूपण किया गया है, पर पपपि परमावत विरेचन है, फिर मी सकारण है और ना हेतुपूर्वक ही किया गया है। ९. चित्तके स्पिर करमेके डिप, अथवा पतिको बार म जाने देकर उसे अतरंगमें से गाने पे, परम्पके सहपका समाना उपयोगी है। ९१ परम्पके सरूपका विचार करमेसे बपि बाहर न गाकर बतरंग हो यती , और भीम शम्मान [.५३ मालानपान मिनस्वरूप समास लेने के पश्चात्, उससे प्रादुर्भुत बालसे उसका वही विषय हो धानेक कारण, स्पना ससे वमुक बध समटनेसे उसका उतना ही विषय एनेके कारण, पि बम्पूर्णक बाहर निकाकर परपदार्पोमें रमण करनेके लिये दौर जाती है। उस समय बाने पर परम्पच फिरसे सम्ममा से समानते गए लिको फिरसे अंतरगर्मे गना पाता। वीर इस तर से बतरगमें खानेके पथात् उसका विशेपस्पसे स्वरूप समासनेसे, मानके शरा उसका फेरठ उतना ही विषय ऐ जानेके कारण, फिरसे बाहर दौरने भगती । उस समय बितना समसा हो उससे भी विशेष सूक्ष्मभावसे फिरसे विचार करते ए पि फिरसे बरगमें प्रेरित होता है। इस तप करत करते तिको बारम्बार अतरंगमाबमें खाकर शत की जाती है और इस तर पिको बतरंगमें गवे साते कदाचित् बास्माका अनुभव भी हो जाता है, और यब पह अनुभव हो जाता है तो पति फिर बाहर नहीं पाती; परस्त मारमा हमुद परिणतिरूप होकर परिणमन करती है और तदनुसार परिणमन करनेसे गप पर पोका दर्शन साग हो माता है। इन कारणोंसे परखम्मका विशेषन उपमोगी वया देवमूत होता है। ९२ जीवको बाने बापको जो वस्फान होता है उसके द्वारा पर को बोडेय पारित सहपको माननेको इम करता है, सो या कैसे हो सकता है। माद नहीं हो सकता । यस जीबको प्रेम पदार्थोके सरूपा हाम नहीं हो सकता, तो यहाँ पर अपने कम्पबानको उसे न समा सफनेका कारण न मानता एखा, नपनेसे बोप पामें दोप निकाता है। परन्तु सीधी तबसे इस अपनी पताको, उसे म समझ सको कारण नहीं मानता । ९३ गांव जब अपने ही सम्मको नहीं जान सकता तो फिर पामो परके स्वरूपको जाननेकी रथा करता है, उसे तो पह किस तय गान समझ) सकता है। और पबतक र समाम नही माता तबतक यहाँ पा सकर रोमपमान मा करता । श्रेयकारी निगलबमका बान बतक प्रगट नहीं किया तबतक परम्पय बाहे कितना मी बान प्राप्त कर लो फिर मी या किसी कामका नी । इसध्येि उत्तम मार्ग तो दूसरी समस्त बातोको जोगबर अपनी मामाको पहिचाननेका प्रपान करना हो। जो सारमूत है उसे देखने के लिये, 'सर बारमा समापारी, कर्मको फत्ता' और उससे (कर्मस) ठसे पप होता है, 'ष किस तय होता है,'' मिस तरह पित्त सस्तार और उस बंधसे निश्च हो माना ही मोश है -क्यारिके विपमें बारम्बार और प्रत्येक क्षणमें विचार करमा योग्य है। और इस तद बारम्बार विचार करनेसे विचार विंगत होता है और उसके कारण निजत्वरपक्षा वश असे अनुभव होग। म्ों म्पों निया तत्पका बनुमा ऐना स्यों स्पो इम्पको भचिन्त्य सामर्द जातक बनुममें भाती गावी है। ससे उपर बताई। राधमाके (उदाहरणके ये पोरसे बाफाशमें भनत समाज समा पाना अपना उममें बनत पुष्टम परमागुभोंका समामा ) करने का मही पता, और उसकी पपार्पण समझमें भाती है। यह दोमेपर भी यदि उसे न माना जाता हो क्या उसमें शका करमेका कारण हवा हो तो ज्ञानी करते हैं कि उपम बने हुए पुरुषार्थ करनेसे बनुभक्स सिम ऐगा। •. और गो फर्मवर करता है या देस्थित नाकाश गनेवाले सम्म पुठोमेसे माल कर रखा हार बाहरसे समर कमौको नही पता ! . - .५५ मारमानवार] विपिप पत्र मारि समहौं वर्षे ७०५ ९५ माकाशमें चौर राज् लोकमें पुद्ग-परमाणु सदा भरपूर है, उसी तरह शरीरमें गनेवासे वाकाशमें भी सूक्ष्म पुग-परमायलोंका समा मरा हा है। जीव कसे सम्म पुरतों को प्राण करके कर्मवध करता है। ९६ पहाँ ऐसी शका की जा सकती है कि यदि वापरसे दूर-बात दूर-नेपा किसी पदार्थक प्रति बीर राग-रेप करे, यो कि पुद्गल ग्रहण करके भी काम करता है, यह किस तय करता है। उसका समाधान यह है कि यह राग-शेप परिणति तो बारमाकी निमावरूप परिणति है, वोर उस परिणतिके करमेनागे वारमा है, और यह शराममें यकर ही उसे करती है। इसठिये शरीरमें एनेमारी को मारमा है, वह निस क्षेत्रमें , उस क्षेत्रमें रहनेबारे पुन-परमाणुओंको ही प्रण करके र उनका पप करता है -यह उन प्रहण करनेके लिये कहीं बाहर नहीं जाती। ९७ यश-अपयशकीर्ति नामकर्म-नामकर्मसंघ जिस शरीरको मेकर, यह शरीर महावक सतारे-बहीवक पता है, वहाँसे आगे नहीं चलता। बीब अब सिमावस्थाको प्राप्त हो जाता है वयमा निरतिमालको प्राप्त कर लेता है, उस समय यह संपघ मही पता । सिदास्यामें एक बारमाके सिवाय सरा कुछ मी नहीं है, और मामकर्म तो एक तराका फर्म है, तो पिर बों यश-अपयश वादिका समप किस सय घट सकता है। तथा अविरतिमानसे नो कुछ पापक्रिया होती है, म पाप तो चार रहता है। ९८ विरति मर्यात् 'मुहाना', अपपा भो रतिसे विरूद है उसे विरति करते हैं। अविरविमें तीन घम्द -++ रवि मही + वि = विरुद्ध + रति = प्रीति-मोह, मात् नो प्रोतिसे-मोरसे-विम्य नहीं गए विरति है। बारिरति बार प्रकारको है। ९९ पॉप इन्द्रिय, 10 मन, तया पाँच स्पायर नीय, और एक प्रस गौर पे सर मिठकर उसके बाण मेद होते हैं। १.० सिमान्त याक कर्मके बिना जीवको पार नहीं हगता । उस कर्मको मतफ मिति नहीं की तबतक अवितिमात्रका पाप लगता है–समस्त पौर राम् छोकमसे उसको पाक्रिया पाहपती है। १.१ कोई जो किसी पार्पका पार करके मरणको प्राप्त हो जाप, और उस पर्यशा इस प्रकारका हो कि पाविचार किया हमा पदार्थ जबतक रहे, तबतक उससे पापविया मादकरती हो, तो तबतक उस बौनको नपिरतिमारकी पापक्रिपा पार रहता है । पपरि गोपने इस पर्याप पारम फरनेके पहिली पायके समय, निस लिस पदाथका रिचार किया है, उसी उसे सबर नहीं है तो मी, तपा वर्तमानको पयापके समपमें नए और उस रिचार किपे परी दिया नही करता वो भी, गौतक उसका मोहमा निरनिमारको प्राम मीमा तक उसी अपनपसे किया पाइदो रहती है। १. इसडिपे वर्तमानको पर्यापके समपमें उसे उमझी वानिमाका यम नही मिल सकता । मनीपसमासना परिपेयाकिास पासवानरानी हिवागलापम दगी बनक तसरी - रिपार ।
७.८ मीमद् रामबाद [.५१ मसाल ११९ एक गुडफे सत्यात माग--40 प्रदेश--एक वगुरमें बसपात होते है। मोकरे मी वयात प्रदेश राते हैं। उन्हें चाहे किसी मी शिको सममेणास गिनो रे बसम्मान हो होते हैं। इस तर एकके बाद एक सप तीसरी समग्रेणीच पोग करनेसे गो योगफल जाता है। एकगुना, दोगुना, तीमगुना, पारगुना होता है परन्तु सत्यातगुना नहीं होता। किन्तु एक सम- भेणी-यो असम्यात प्रदेशपाठी है उस समश्रेणीको दिशामाठी समस्त समवेणियोंको-यो बसे स्पातगुणा है--हरेकको सम्पातसे गुणा करमेसे; इसी तय इस विधाको समभेणीका गुणा करनेसे, और इसी तय तक प्रतिसे तीसरी निशाको समश्रेणीका गुणा करनेस असम्पात होते है। म मसमपातके भागोंका बता परस्पर गुणाकार किया जा सके, तबतक वसपास होते हैं। बोरगा उस गुणाकारसे कई गुणाकार करना बाकी न थे, तब असत्यात पूरे हो नानेपर उसमें एक मिला देनेसे सफ्याटियम्य बनत होते है। १२ मय प्रमाणका एक शौ। जिस मयसे या धर्म करा गयारेको वखना ही प्रमाण है। इस नपसे जो धर्म कहा गया है उसके सिवाय, पस्तुमे गे सरे और धर्म है उनका निषेध मारा किया गपा । पोंकि एक ही समय पाणीसे समस्त धर्म महीं करे ना सकते । तपा मो मो प्रसंग होता है, उस उस प्रसंगपर यहाँ मुस्पल्या पो धर्म कहा जाता है। उस उस स्फम्पर उस उस मपसे प्रमाण समठना चाहिये । १२१ मपके स्वरूपसे र पाकर वो कुछ पा जाता है या मय मही; परन्त नपामात है, और नहीं मपामास है या मिपाल यरता है। १२२ मप सात माने हैं। उनके उपनप सातसी, और रिशेप भैस बनतो भर्पात् मितने परम १२ सब नप हो । १२१ एकछत परण करनेका सहा गोको मोपपसे होता है, और एक माण करनेसे मान्तिकमा होता है। उसे न होने देनेरे पे इस नपा सत्पपा गया है। इसके समक्ष जानेसे गार पधनमारको प्राम करता हुवा कार मप्यत्य हवा, और मध्यस्थ यनेसे मास्तिकताको आमा मही मिल सकता। १२१ मप रो करने में माता सो मप तप कोई बस नही है। परन्तु बस्तु सरूप समम्ने सपा उसम्र मुप्रतीति न पिये केवळ प्रमाणका है। १२५ परि जमुम मपमे कोई बात प्रो सम्प, तो इससे पह सिराहा कि दूसरे मपसे प्रतीत रानाडे धर्मग अस्तिरहीमही है। १२६ समान अर्थात् मात्र शान इमरे मिराप मरा बुरा मदी। उसमें म्य का भी गमित नही होता | बाणा सर्व प्रभरमे रग-वेपसप हो जाप उप्ती समप केसान या रातारापदि किमी रामे रागा बह परिजमोनापर कारण हो। गा तिरे भरागे एगी। वहां उन्हो म मातम कारण केवलानमें गर्मित मही मनोभात् रे सजान मही हो।रे पर मक प्रतिभागोमान रहा गरेमी पपा गौ राग-दोरेशान है। ।
.५३ मामानबर] पिविष पत्र मावि संग्रह-पाँ ७०९ १२७ गुण और गुणी एक ही है । परन्तु किसी कारणसे ये भिम भी है। सामान्य प्रकारसे जो गुणोंके समुदायको ही गुणी करते है, वर्षात् गुण गुणी एक ही, भिम मिभ वस्तु नहीं । पीसे गुण मिन नहीं हो सकत । जैस मिथ्रीका टुकड़ा गुणी और उसकी मिठास उसका गुण मिम नही ऐ सकते । गुणी मिश्री और गुण मिठास दोनों साप साय ही रते हैं, मिठास उससे कुछ भिम ही होता । तथापि गुण वौर गुणी किसी मशसे मिम मी है। १२८ फेबमानीकी धारमा मा दाम्यापक क्षेत्रमें वषगाहयुक्त है। फिर भी पा छोकाठोकके समस्त पदार्पोको मौ, यो देहसे दूर है, एकदम नान सकती है। १२९ स्व और परको भिम करमेवाग मोशान हैमही बान कहा जाता है। इस हामको प्रयो- चममूत कहा गया है। इसके सिवाय पाकीका सब हान महान है। जिनमगवान् शुर आत्म शाप स्त हैं। उनकी प्रतीप्तिको जिन-प्रतिविम्व सूचन करती है। उस शस्त दयाको पाने के लिये चा परि मति, अनुकरण, नवा मार्ग है उसका नाम मैनमार्ग है। इस मार्गपर चम्नेसे नैनत्व प्राप्त हाता है। १५. यह मार्ग वात्मगुणका रोकनेवाग नहीं, परन्तु उसका पोषक है-अर्यात् यह वास्मगुणको प्रगट करता है, इसमें कुछ मी सराय महीं । यह बात परोक्ष नही, किन्तु प्रत्यक्ष है। प्राति करनेकी इच्छा रखनेवाको पुरुपार्य करनेसे सुप्रतीति होकर यह प्रत्यक्ष अनुभवका विषय होगा। १२१ सूत्र और सित ये दोनों पुदा है । सिद्धान्तोंका रक्षण करने के लिये उन सूत्ररूपी सलूकमें रखा गया है । देश-काका वनुसरण करके सूत्रों की रचना की गई है। और उनमें सित पे गये है। रे सिमांत किसी मी काय वौर किसी मी क्षेत्रमें मही बदसते, वयमा सरित मही होते; और या सरितो बाप तो सिमान्त मही है। १२२ सिवात गणितको तर प्रत्यक्ष है, इसलिये उनमें किसी तरहफी भूख अथवा अपूराफ्न नहीं पता । अधर यदि कान-मात्रहित हो पो मनुष्प उन्हें सुभारकर बाँच सकता है, परन्तु पनि कोको मूठ हो जाय, तो फिर रिसाव हो गस्ती हो माता है। इसलिये अफ कान-मात्राहित नहीं होते। इस प्रान्तको उपदेशमार्ग और सियतमा पर घटाना चाहिये । ११२ सिदाल, चाहे विस देशमें चाहे विस भाषा, और पाहे बिस काठमें लिखे गये हो तो मी ने असिमात नहीं होते । उदाहरणके म्पेि दो और दो पार ही होते हैं । फिर चाहे थे गुन पता, संस्कृत, प्राक्त, चीनी, वरती, परशियन और इगलिश किसी भी भापामें क्यों न लिने गये । उम कोको पारे किसी भी नामसे बोला गाय, तो मी दो वौर दोका मोह पार होता है, या पात प्रत्यक्ष है । पैसे मौको नौसे गुणा करनेसे किसी भी देशमै, किसी मी भाषा, सके ममें अपना वपेरी रातमें कमी मी गिनो ८१ ही होते हैं कमी मी ८० अपषा ८२ नही रोवे इसी पप सिदतके विषपमें मी समासना चाहिये । १२१ सिात प्रत्यक्ष कामाके भनुमत्रक रिस्प है। उसमें अनुमान काम नही माता । अनुमान तर्फका विपप है, और तर्क बागे बानेपर कितनी ही बार मुटी मोहो बाती है। परन्त प्रश्पन्न जो मनुमगम्प है उसमें कुछ मी भूल नहीं होती। - भीमद् रामचन्द्र [.५९मारकर पापक्रिया पार पेगी । उस विचार किये हुए पदार्यस पम्पहरूपसे भी होनेवाग नियासे पर मुक्त होमा हो तो मोहमाल छोड़ना चाहिये । म मेरनेसे मर्यात् पिरतिमान करनेसे पापनिसा बंद हा बाटी है। उस विरतिमाएको पनि उसी ममें प्राण किया जाय तो यह पापनिया, बस जीत मितिमात्रको प्राण करे, तमासे बाती रुक जाती है। यहाँ नो पाक्रिया छातीमा चारित्रमोहनापर्क कारणसे होती है। बोरा मोहमायके पप होनेसे वाती हुई रुक नाती है। १०१ किया दो प्रकारको होती है-एक म्पक भर्पात् प्रगट, और दूसरी अम्पक मात बप्रगट । सम्पतरूपसे हानेपाली क्रिया पपि सम्पूर्णरूपसे महा मानी जा सकवी, परन्तु इसलिये प्र होती ही नहीं, यह बात मही है। ११ पानीमै यो भरे-शिलारें-उठता है यम्यक्तरूपसे मासूम होती है। परम्तु उस पानीमें पदि गषक अपना करवी गादी हो धौर प पानी शस्त चस्पा हो तो भी उसमें दो गवक अपमा कस्तुरीको किया है, यह पपपि सई नही देती तथानिय उसमें सम्परूपसे मौन्द्र यतोही ।स तय बम्पतरूपसे होनबाठी किपाका पवि भान म किया जाय और केवग म्पएम क्रियाका हो मान हो तो निसमें बरिरतिरूप क्रिया नहीं होती ऐसे बानीको क्रिमा, गौर नो म्पळल्मसे कुन मी किपा नही करता ऐसे सोते पुए मनुष्पकी क्रिया, पे दोनों समान ही हो गोपगा। परन्त पास्तमें देखा जाय तो या बात नहीं । सोते हुए मनुम्पको सम्यक क्रिया यती हो, तपा सी वयनो मनुष्य (गो बाल ) चारित्रमोहनापको निद्रा सो गा है, उसे बम्पक क्रिया म यती हो, पा पाव नहीं है। पर मोहमालका अप हो गाय पो हो पिरतिरूप पारित्रमोहमीप पा र होती है। उससे पहिने पहा नहीं होती। विमासे होनेवाम बंघ मुस्पतमा पाँच प्रकारका है बपिरति योग १२ २५ १५ १५ अबतक मिपातकी मौम्दगी हो तबतक वविरतिमा निर्मग मही होता-माल नही होता । परन्तु यदि मियानभाव र रो माय तो अपितिमात्रको र होना ही चाहिये इसमें स्मो न। कारण क मिम्मानसहित पिरतिमापका प्रण करनेसे मोबभाव र नही होता । तपा ममतक मोहमान कम्पम है तबतक बम्पतर मिरतिमात्र नहीं होता है और मुस्यरूपसे बनेपाले मोहमालके नास ऐनेसे बर्पतर अविरतिमाल नहीं रहता, भौर पपपि बाल बमितिमालका प्रण न किया गया होतो मी गो बम्पतरमा साम ही बाहर ना बाता है। १६ बम्पत्तर मिरविमारके मास होने पथात् उदपाचीन बापमापसे कोई विरविमाका प्राण न कर सके तो भी मा उत्यकार सम्पूर्ण हो बाप उस समप सामोरतिमान यता है। क्योंकि गम्यंतर विरलिमाल तो परिम्से से प्राप्त है। इस कारण अब बनिरतिभाल नही है, जो बनिरतिमारकी किया कर सके। १ ७ मोहमालको कर ही मिथ्यात्व है। मोहमालका एप हो गानेसे मिप्पामा प्रतिपक्ष एम्पकमान प्रगट होता है। इसपि यहाँ मोहभाष कैसे हो सकता है। वर्षात् मही होता । । पाप प्रमर .५१ मामानमार] विविध पत्र मादि संग्रह-याँ वर्ष १०८ यहाँ ऐसी शका की जा सकती है कि यदि पाँच इन्द्रियों बार छा मन तपा पाँच स्थावरकाप और छडा प्रसकाय इस तर बारह प्रकारसे पिरनिका प्रहण किया जाय, तो लोकमें एनेबाजे जीव वा मोर नामकी राशिर्फ नो दो सम्परे, उनमेंस पाँच स्थावरकाप और छा असुकाय मिटकर जीराशिको तो विरति हा गई परस्तु गोकम मरकानेवाली वा अनीपराशि है, जो जॉबसे मिमी, जगतक तमके प्रति प्रीतिकी इसमें निापि नहीं जाता, सबतक उसे विरति किम तर समझा ना सकता है ! का समाधान यह है कि पाँच इन्द्रियों और ए' मनसे यो मिरति करना है, उसके विरतिमारमें पीपराशिकी भी विरति आ जाती है। १०९ पूर्वमें इस जीवने बानीको वाणीको निथयसपसे मी मी नहीं मुना, भपवा उस बाणीको सम्प प्रकारसे सिरपर पारण नहीं किया ऐसा सर्वशनि कहा है। ११० सहस्राप उपरिए ययाक सपमको पाउते हुए—महरूमी आहासे घसते हुए--पापसे मिति होती है, और जीप बमप ससार-समुद्रसे पार से बाताह । १११ बस्तुम्वरूप कितने ही स्पानकोंमें भाहासे प्रतिष्ठित है, मौर कितने ही स्थानकोंमें यह सविचारपूर्वक प्रतिष्ठित है। परन्तु इस दुपमकाष्टको इतनी अधिक प्रसता है कि इससे लागेके क्षणमें मी विचारपूर्वक प्रतिष्टित हानेके लिये और किस तय प्रति करेगा, पर जानने की इस काठमें शाति मही मादम होती; इसलिये हो माहापूर्वक ही प्रतिष्टित पना योग्य है। ११२ जानीने कहा कि 'समझो ! क्यों समाते मही! फिर पमा भामर मिलना दुर्मम है।' ११३ सोफमे भितन मी पाप है, उनके धर्मोफा, रेवानिवन, अपने घाममें मासित होने के कारण, पपाथ वर्णन किया है। पार्थ कुरा ठन पोसे बाहर गाकर नहीं रहत । अर्थात् जिस तरह पानामहारानने उन्हें प्रकाशित किया , उसमे मिल प्रकारसे वे नहीं पते। इस कारण म पानीको वापनुसार ही प्रयतते , पसा कहा है। कारण कि दानीने पाथका जैसा धर्म पा से उसी तब कहा है। १११ काउ मूठ उम्प नहीं है, यह औपचारिक द्रम्प है भीर र गौर तपा बजार ( वयोरमें मुम्पतया पुनमानिकायमें विशपग्रसे ममहमें माता) में उत्सम होता है। अपना गीताबरको पाप-अचम्पा ही फार है । हरेक दम्पके जनन धर्म है। उनमें ठानिपप और लिप- मथप मामले मी दो धम, और का निर्यस्यचय मही है, उसमें पपम उप्यापय हो । ११५ कार्यप्रचपसे पामें जो धर्मका उद्भव होता है, उस धर्ममा निर्यसपपस मिर उसी समाश हो जाता है । काठक समपा निर्पपचप नही ६, इस पारण सो समप पठा गया र हि पांडे मही आता । ११९ गिमरमतफे मनुमार काम्पफे 8ोध्में असम्यान मा। ११७ हरेक दम्प के अर्मत पम है। उनमें कितना ही धर्म पड है, दिलने हो वप्पट, तिने ही मुम्प है, कितने ही सामान्य है और दिनने दी हैं। ११८ सम्यानको अमुम्पान गुग परनेपर मी मम्म्यात दी, अदि माया- उस ममम्यात मे।
भीमद् रामबाण [.५३ नाममा ११९ एक बगुम्के सम्मात माग—अश-प्रदेश--एक वाछमें वसपात होते है। डोकके मी बससात प्रदेश होते है। ठमें चाहे किसी मी पराको समस्रणीसे गिनोरे असंमपात हो होते हैं । इस तर एकके बाद एक दूसरी तीसरी समभेगीय पोग करनेसे बो योगफर पाता है एकगुना, दोगुना, तीनगुना, चारगुना होता है, परन्तु बसस्पातगुना नहीं होता । किन्तु एक सम श्रेणी-को बसमपात प्रदेशबाकी है -उस समणीको शिबाग समस्त समप्रेमिपोंको- पातगुणी है-हरेकको असल्यातसे गुणा करनेसे इसी तय इस विद्याकी समभ्रेणीला गुणा करनेसे, बौर इसी तण उक्त रीतिसे तीसरी निशाकी समभेणीका गुणा करमेस बसमपात होते हैं। म मसम्मातके मागोंका तक परस्पर गुणाकार किया जा सके, तबतक वसल्यात होते है और मग उस गुणाकारसे कोई गुणाकार करना गाडी न ये, तब वसत्पात पूरे हो बानेर उसमें एक मिम देनेसे बन्यातिनन्य नंत होते है। १२ नप प्रमाणका एक बरा है। मिस नपसे गो धर्म कहा गयारेको उतना ही प्रमाण है। इस नपसे जो धर्म छा गया है उसके सिमाप, वस्तुमें गे दूसरे और धर्म में उमका निषेध नही किपा गया । क्योंकि एक ही समप पाणीसे समस्त पर्म नई को गा सकते । तथा यो नो मांग होता है, उस उस प्रसगपर यहाँ मुस्पतमा यही धर्म करा पाता है। उस उस स्पम्पर उस उस नपसे प्रमाण समझना चाहिये । १२१ मपके समपसे र बाकर जो कुछ कहा जाता है मानप नहीं है, परन्तु नयामास है और यहाँ ममामास रेप मिप्पाल यरता है। १२२ नप सात माने है। उमके उपमप सावलौ है, और विशेष भेदोसे वनव र्षात् बितने पचन सब मय हो । १२१ एकांत प्रण करनेका सन गाको विशेषम्पसे होता है और एक्त माण करनेसे नास्तिकमाव होता है। उसे न लेने देमेके मि इस मपका स्वरूप प्रा गया है। इसके सम्म मानेसे गौच एकतमानको प्राण करताामा मकर मप्यस्प यवा है, और मम्पस्प यनेसे नास्तिकताको अपकाध मह मिसकता। १२९ नप गो कामे माता सो नप सर्य कोई वस्तु नही है। परन्तु पस्तुका सरूप समाने या उसकी उप्रतीति ने दिप पा के प्रमाणका बयो। १२५. परि गमुक नपसे में बात की माप वो इससे पा सिर नहीं होता कि दूसरे मपसे प्रतीत होमेबारे धर्मका अस्तित्व ही मही है। १२६ केरमान वर्षात मात्र जान हो इसके सिवाय दूसरा कुछ नहीं । फिर उसमें कम कुए भी गर्मित नहीं होता । बसपा सर्व प्रकारसे पग-पन्न भप हो नाप उसी सम्प केरमान पमा गाता है। पर किसी परासे एगरेप हो तो पचारित्रमोहनापो कारणसे होते। माँ मितने मासे पग रेप मा उल्ने हो बसे महान है। इस कारण र समानमें गर्मित मही हो सकते; वर्षात् वे केवगानमें नहीं होते। एक सरेके प्रविधी हैं। माँ केरान है माँ पाप नाही, अपना यो रग-नेप माँ केवमान नहै।
मासानन्धर] बिपिप पत्र मावि मप्रदोर्प ७०९ १२७ गुण चौर गुणी एकही। परन्तु किसी कारणसे से भिन्न मी है। सामान्य प्रकारसे के समुशायको हो गुणी करते हैं, अर्थात् गुण गुणी एक ही हैं, भिम मिम बसु नहीं । गुण मिम नहीं ह सकत । जैस मिग्रीका टुकड़ा गुणी भौर उसकी मिठास उसका गुण भिम | सकते । गुणी मिश्रा और गुण मियस दोनों साथ साप हो यते हैं, निगम उससे कुछ भिन्न सो । तयापि गुण भौर गुणी किसी वासे मिम भी है। १२८ करसङ्गानीकी मामा भी देहम्पापक क्षेत्रमें अबगाइयुक्त र फिर मी बह पोका पार्योको मी, जो देहसे दूर है, एकम जान सकती है। १२९ स्व भर परको भिम करनेवाला जोशान ६ वही शान कहा जाता है। इस धानको प्रया- कहा गया है। इसके सिपाप बाकीका सब जान बहाम है। जिनमगवान् शुर वामगाए है। उनकी प्रतिको दिन-प्रतिविम सुचन करती है । उस शस्त दशाको पानके पि जा परि अनुकरण, वयमा मार्ग है उसका नाम भेनमार्ग है। इस मागपर पस्नेसे नैनस्व प्राम हाताहै। १३. यह मार्ग आमगुणका रोकनेवाला नहीं; परस्त उसका बोरक हो 2-अपात् यह णको प्रगट करता है, इसमें कुछ मी सशय महीं। यह बात परोध नही, किन्तु प्रत्पर है। करने की इजा रमानेकालेको पुस्पार्य करनेसे सुप्रतीति होकर पर प्रपा अमुमनका विपप । १३१ सूत्र और मिटात ये दोनों मुश है। सिदान्तोंका रक्षण करमेक ठिये उमें मूत्रम्पी में रममा गया है। देश-कालका अनुसरण फरके सूत्रों की रचना की गई है और उनमें सिदान परे । सिद्धांत किसी भी पाठ और किसी मी क्षेप्रमें नही पाउत, भयका मारत नहीं होते। परिसरित हो गाय ताये सिसात मही है। १३२ मिदात गगितको तर प्रत्यक्ष है, इमडिपे उनमें किसी तरहफी भए अपना अधूरापन पता । अभर या कान-मात्रारित हों तो मनुप उन्हें सुधारकर बाँच सझना, परन्तु परि को ही भूम हो बाप सा सिर हिसाब हो गठन हो जाता है इसलिये अफ कान-मात्रारदित ते। हम यतका उपगमार्ग बार मितमार्गपर पाना चाहिय । ११५ सिमान, चाहे प्रिसपा पार जिस मागमें, और पाह निम पारमें कि गय हो, अमित नहीं हाते । उगाहरण के उिय दा भार । चार हात है। रिर पारे गुन । सम्पत, प्रारत चीनी, बरगी पतिपन भौर इगलिश क्मिी मी मापा पो न निगम उन भाको चाहे किमी मी नामसे बाग गाय ता मी । आर का राह पार होता है, पात प्रम्पक्ष है । म मौका नाम गुगा करनेम किमी मी गमें, रिमी मी माग, मानमें परी रातमें, कभी भी गिमा ८१ हान-भी मी ८. मग ८२ मही तो मी सिमा शिपमें भी समसना चाहिय। ११ मिटान प्रयभरे-पानी वनुमा निसय । उममें बनुमान काम नहीं आता। सान तरंच रिप है, और नई माग गनर तिनी बार से मादा माती धोबनुमागम है उममें दुरा मा मन नहीं होती। ।
भीमद् रामबाण [.५५ मारना १३५ मिसे गुणा और गोषका हान हो गया है, प करता है कि नौको नौसे गुणा करनेसे ८१ होत हैं। परन्तु निसे नो मौर गुणाका शान नहीं पासपोपशम नहीं हुवा अनुमानसे वपया तर्कसे यह ऐसा करे कि 'नौज नौसे गुणा करनेसे काचित् ९८ होते हों, तो उसको कौन मना कर सकता है!' तो इसमें कुछ वापर्य महो। स्पोकि उसे जान म होने के कारण पर ऐसा करे तो या स्वामाविक ही है। परम्त पनि उसे गुणाकी तिको मरूग अम्ग करके, एकसे नौतक का बताकर नौ बार गिनापा बाय, तो उसे वनुमबमें ना गानेसे ९४९८१ही होते है, यह सिर हो माता है। कयाचित् उसका धयोपशम मद होनेसे गुणाकी मपमा योगको फातिसे ०४९-८१ होते हैं, या उसे समझमें न भी माये तो मी मौका नौसे गुणा करनेपर तो ८१ होते, इसमें कुछ मी घरफ नी । इसी तर यदि सियात मी बावरणके कारण समसम न वा, वो सित पति- शांत नहीं हो जाते-इस बातकी निषय प्रतीति रसना चाहिये । किर मी पनि प्राति करने को बहरत हो तो सितके को वनुसार पम्नेसे प्रतीति होकर प प्रापक्ष अनुभवका लिफ्प होता है। ११९ जबतक म बनुमवका विषय महो तबतक उसकी सुप्रतीति रमनेकी पसरत है, और मुमतीतिसे कम क्रमसे पवनुमबमें बा बावा है। ११७ सितके मत (१) 'एम-पसे पर होता है।' (२)षिका षम होनेस मुधि होती है। परिस सिवाती मति करना हो तो राग रेल रोको । यदि सब प्रकारसे रागनीपट जॉप तो बामी सब प्रकारसे मोक्ष हो जाती है।वामा अपमके भरण मुक्त नहीं सकती । हाँ मषन इटा कि मा मुज हो । बबन होने के कारण गग-रेप है। महाँ रागोप सब प्रकारसे स्टेक मरमाको बस छुटी ही समझनी चाहिये । उसमें कु० मा प्रम वपमा शव नहीं पाती । १५८ मिस सम्प निसके राग-नेप सपा सप हो जाते हैं, उसे दूसरे समपमें 0 केसान हो पाता है। १३९ बौर पहिले गुणस्थानक से भागे नही चाता--भागे मानेका विचार नहीं करता। वपा परिसे भागे किस तय मा बा सकता । उसका क्या उपाय किस तय पुरुषार्प दरमा चाहिये ! उसका परिवारता मी नहीं करता, मौर जब बातें करने देता है तो ऐसी ऐसी बातें करता है कि इस क्षेत्रमें इस कामें तेरा गुणस्थान प्रश्न नहीं होता । ऐसी ऐसी गहन बातें जो अपनी सविक बाहरी उमें वह किस तर मल सकता है। वर्षात् विना अपमेको अपोपशम ऐ उसके बादको बातें पदि कोई करने बैठे तो कमी मी समझमें नहीबा सकती। यो पहिले गुणस्पानकमें प्रपि। उस मेइम परफे बागे माकर ससारी और पाप- तक नही पापा। कोई कोई मोर निरा परनेसे टच मावोंमें बाते हुए, परिमेंसे निकल्ने विचार करके प्रदिभेदके समीप माता है, परन्तु कॉपर उसके उपर प्रपिका इतना अधिक मोर होता है किर प्रयिमेद परमेमें शिपिक पर रख नापा , और सतय शिविरमापिस मा गाड मासानसार] पिविष पन मादि संग्रा-१को वर्ष सवरा मीर बनतोषार प्रथी-भेदके पासमें माफर बापिस फिर गया है। कोई मीत्र ही प्रबस करके निमित कारणोंका योग पाकर, पूर्ण शक्ति गाकर प्रथिमेद करके मागे बहता है, और पर प्रपिमेद करके वागे बड़ा कि यह पौयेमें था नाता है, और जहाँ चौथैमें पाया कि उस ने ऐसी छाप पाती है कि बागे पीछे मोझ हो ही बापगी । १११ इस गुणस्पामकका नाम अविरतसम्यग्र है यहाँ विरतिमावसे रहित सम्यमान होता है। ११२ करनेमें तो ऐसा जाता है कि इस काठमें इस क्षेत्रमे तहला गुणस्थानक प्राम नहीं परन्तु पा करमेवाले पहिले से मौ निफरते नही । यति में पहिसेमेसे निकलकर चौयेतक वौर कहाँ पुरुषार्थ करके सात भप्रमत्ततक गुणस्थानक पहुँच जाय, ता मी यह एक मासे पी है। सातवेंतक पनि मिना उसके बादको सुप्रतीति हो सकना मुश्किल है। ११३ बारमा चो प्रमादरहित नामदशा है मही साता गुणस्पानक है। वहाँ तक पहुँच । उसमें सम्यक्त्व समाविप हो जाता है। मीत्र चौपे गुणस्पानको बाफर नहाँसे पाँच देशनिरत, विरत और सातवें वप्रमचरितमें पहुंचता है।गों पचनेसे आगेकी दशाका वशसे धनु अथवा उसकी सुप्रीति होती है। चौथा गुणस्थानकषामा जीव सात गुणस्थानको पहुँचनबारकी का यदि विचार करे तो उसको किसी मंशसे प्रतीति हो सकती। परन्तु यदि उसके पहिरोके पानकराठा मोर उसका विचार करे तो उसकी किस तरह प्रतीति हो सकती है। कारण कि का साधन जो वावरणरहित होना है, मा पहिसे गुणस्पानपाके पास नहीं होता । १११ सम्यक्त्व प्राप्त बीमकी दशाका स्वरूप मिम ही होता है । पहिसे गुणस्पानवासे दशाको पति भयवा मात्र है, उसकी अपेक्षा चौपे गुणस्थानको प्राप्त करनेपालीकी दशाकी स्थिति भपया मिम ही देसनेमें बाते भत् दोनों मिम भिम दशाका वाचरण देसनेमें माता है। ११५ पहिसको शिपिछ करे तो भौमें बा गाप, पह केवल कपनमात्र है। चौथेमें वानेमें र्तन है, पर विषय विपारणीय है। ११६ पहिले १, ५, ६ वौर ७ गुणस्यानकी नो बात कही गई है, पर कुछ कयनमात्र भवणमात्र ही है, यह बात नहीं, उसे समझकर उसका बारमा पार करना योग्य है। १७ यथाशस्य पुस्पार्य करके मागे पाना भाव यक है। १९८ प्राप्त करनेमें कठिन ऐसा पौरब, सहनन, बापुका भपूर्णता झ्यारिके नमारसे, कहा- सातमें गुणस्थानकके उपरका विचार न मी मा सके, परम्त उसकी मुमतीति तो हो सकती है। ११९ जैसे सिंहको पर मोहेके किसी वस्त मिरेमें बद कर पिया जाय तामह सिंह तर वपनेको मातिर बदामा समानता है-अपनेको पियरेमें बद समझता हूँ-बार प को भूमिको मी देसता , केवट गोडेके मजबूत साकबाकी बाइके कारण ही वह बाहर नही स सकता, उसी तय सात गुणस्पानका उपरके विचारको प्रमाति हो सकती है। १५. या हो मानेपर मी मतमे बारिक करण पटककर जीव मागे नहीं पा सकता ।
। भीमद् रामचन्द्र [.मामाकन १५१ मतमे वपमा स्वीकार निर्माण बातें है, मर्यात् सनमें मोघ मही है। इसलिये सो प्रफारसे सम्पको प्रतीति करने को भापकता है। १५२ धमाधम पौर मुरार परिणामोंके उपर समस्त भाभार राता है। मेटी मेय बातोंमें मी यदि दोष माना बाप तो हो मोष नही होती। कोक-सी अपना होम्पसार पा राजा बार जो मोमततका यस्प ना मान सकता, उसका कारण पहा है कि उसमें समिप माप मेसाका माहात्म्म मौजूद है। इससे पादर क्रियाका निपेप महा किया जाता । चो मी म करते पर एकम बनर्थ बर्य किया करता है उसके लिये वादर दिपा उपयोगी है।तो मी उससे परानका मी बमिप्राय महो किबादर प्रियास मागे न मना चाहिये। १५१ गोषको बभौ चतुर्व पोर मरबीके अनुसार चम्ना मनको प्रिय गता है, परन्तु या गायका मुरा परनेवाण बहस दोपके दूर करनेके सिपेशनाचा उपदेश है कि प्रथम किसी सपोश नहीं देना चाहिये परन्तु पहिसे तो स्वयं ही उपदंश सेनेकी बसरत है। किसने रागीप म हो, उसका सग ए बिना सम्पात प्राप्त नहीं हो सकता । सम्पाल प्राप्त होने से पा माt-वयं दशा म माता । वर्षात् वा प्रतिक हो तो बतुक हो माता है। मिनमगवान्दो प्रतिमा (तमानक लिये ) का दर्शन करनेसे सामने गुणस्थानमें रहनेपाल जामीको मो शनिशा है, उसकी प्रवीति होती है। १५. जैनमार्गमें वर्तमानमें अनेक गड प्रचलित है। शाहरणके लिये पगम, बस गठ, कागछ, सरतरगण स्पारये प्रस्मेड ग मासे भिन परमालेको मिम्माली समाते है। इसी तरह पूसरे मकोटि वाठकोटि स्पादि पो दिमाग है, वे सब मानेसे मित्र कोटिपायो मिमाली मानते हैं। वास्तव में देखा जाय तो नौकोटि चाहिये | उसमे सिवनी कम हों उतमा ही कम समाना चाहिये, और यहि उससे मी मागे गाय तो समझम पावा नाटिक मी मेरे बिना रास्ता है। १५५ तोपर पारिने यो मार्ग प्राप्त किया पर मार्ग पामर मही। सच्चा पोहा मी मग रेना पा करमत कठिन माता है तो फिर महान् पर महामारत मोधमार्गका किस तय प्रण पर सकेगा। पाविचारणाम है। १५६ मिपाल प्रातिके क्षप किये बिना सम्पमत्व महाबाता से सम्पब मास हो जाप उसकी पपा बहुत पती है। महति ५ १७और ८३ में पावर यो पामे मोक्ष सdt है। एक सम्मकसके प्राप्त करनेसे सा मह म मन माता है। इससे सम्पालका कमाल अपना उसका माम्प किसी मरा समहमें जा सकता है। १५० धर्भर पुरुषास प्राप्त करने पोग्य मोहमार्ग बनायास ही प्रामही हो पाता | बाल शाम नपा मोश्चमार्ग किसीके शाक्स मप्रस नहीं होते वा पिसा मागास प्रास नहीं हो जाते 12 पुस्पापक अनुसार ही होते है इसरिये पुस्पार्पको यस्मत है। १५८ सूत्र-सिमाव- पुस्य उपदेशक पिना परमही देते । यो फेरफासीमाम .५३म्पासानसार] विविध पम मादि सपा-वर्ष । - हार मार्गमें हो। मोधमार्ग तो फेरफाररहिस है यह एक ही है। उसे प्राप्त करनेमें शिपिस्ताका मिपम किया गया है। हिम्मत रसनी चाहिये । बीचको मूममरहित करना ही जरूरी है। १५९ विचारवान पुरुषको म्पबहारके फेरफारसे म्याकुल न होना चाहिये। १९० उपरको भूमिकावाम मीपेकी भूमिकाबाछेकी बराबर मही है । परन्तु नीचेकी भूमि कायालेसे महक है।बीन स्वर मिस म्यबहारमें हो, उससे यदि दूसरेका म्पहार उपादेसनेमें बाये, तो उस उप म्पबहारका निपेप नहीं करना चाहिये । क्योंकि मोक्षमार्गमें कुछ भी फेरफार नहीं है। तीनों काठमें किसी मौ क्षेत्रमें नो एक 0 समाम ये वही मोक्षमार्ग है। १९१ नपसे आप निति करनेमें भी बीपको ठा माश्म होती है, तो फिर सी वर्गत प्रासिमोसे वो मिप्पात्र होता है, उससे निति प्राप्त करना या कितना दुर्धर होना चाहिये। मिप्यालकी नाति ही सम्यमत्व है। १६२ चीपाजीवको विचारस्पसे तो प्रताति की न गई हो, और कपनमात्र मौनामान है-यह कहना सम्परस्प नहीं है । सौर्यकर भादिने भी इसका पूर्वमें मारापम किया है, इसस गर्ने पहिम्से ही सम्पपल होता है। परन्तु इसरों को कुछ अमुक एम्में, ममुक नाविमें, अमुक वर्गमें अपना षमुफ देशमें बसार सेनेसे कमसे ही म सम्पन होता है, यह बात मही है। १६५ निधारके बिना भान नहीं होता । शानके बिना मुप्रतीति अर्थात् सम्पन्न नहीं होता । सम्पपलके बिना पारित्र मही होता और अबतक पारित न हो तबतक जीव फेवनान प्राप्त नही करता, मौर बबतक नीव केवगान नहीं पाता तबतक मोच नहीं यह देखनेमें माता है। .१५१ देशका वर्णन । तप । औरका सम्प | १५५ कर्मरूपसे बनेपा परमाणु फेवणानाको स्य होते है, इसके अतिरिक उनके लिये और कोई निम्मित नियम नहीं होता । परमावधिबाडेको मी उनका रूप होना समय है, और मन पर बानाको उनका वमुक देघस स होना समय है। १९५ पाम बनत धर्म-गुण-आPि मौग्छ यते है। उनका मनवाँ माग पचनसे कहा मा सकता है। और उसका अनताँ भाग सूत्रमें उपनिबर किया जा सकता है। १५. पपाप्राधिकरण, अनितिकरण भौर अपूर्वकरणके बार पुग्नकरण चार गुणकरण होते है । पुमनकरणका गुणकरणमे क्षय किया जा सकता है। १५८ पुननकरण भपात प्रातिको योगन करना । तपा वात्माका गुण मोबान , उससे दर्शन, और दर्शनसे पारित्र हाना गुणकरण है। इस गुणकरणसे युजनकरणका क्षय किया जा सकता है। अमुक अमुक प्राति गो भरमगुणकी निरोधक है उसका गुमकरणसे आप किया जा सकता है १६९ कर्मप्राति, उसके मूमसे सूक्ष्म माव, भार उसके बप, उदय, उदारणा, संक्रमण, सा, पार क्षयमासका यो वर्णन किया गया है, उसका परम सामर्पक बिना वर्णन मरी किया जा सकता। मका वर्णन करनेवाला कोई प्रावकोरिका पुस्प नही, परम् ईपरमारिका ही पुरुष होना चाहिये, पर मुप्रतीप्ति होती है। पर माम्पमा खान मुलगा मोसमा-भनुवार 1 भीमद् रामचन्द्र [.५५माम्न लिस किस प्रहतिय किस रससे भय होना पाहिये ! किस प्रकृति में सच! किसमें अदप होता है। कौन सक्रमणसे है। स्पादिका रचनाको करनेवाने, ऊपर को वनुसार 'प्रकृति के सरूम माप तोमर को'स उनको परम्बानकी बावको यदि एक मोर रसखे मी, या तो नियम होता है कि पर कपन करनेवाम ईश्वरकोटिका ही पुस्प होना चाहिये । १७१ गाविस्मरमान मतिदानके पारणा नामक मे में गर्मित होता है।पनिको मरो पान सकता है। जबतक पि भवमें सपना म माया हो, बवा बागे चल सकता है। १०२ (१) तापकरने वाला म दी हो, और योग बफ्नी पस्तुके सिवाय परवस्तुका यो मरण करता है, तो यह परका किया जा वीर बदती गिना नाता है। उस पदचसे वीर्षकरने परवस्तुको वितनी परम करनेको छ हो, उसको परवस्तु नहीं गिना गाता । (२) गुरुको समानुसार किये गये पाचरण के समय में बदल मी गिमा माता। १७५ उपदेशके मुख्य पार मे। (१) इम्पानुपग (२) चरणामुपोग (३) गणितामुयोग बौर (१) धर्मकपानुपोग (१) को खनेका म्य, उनका स्वरूप, उनके गुण, धर्म, रेत मोत, पाय मा मनंतानत प्रकारोका रिसमें वर्णन है, पर प्रम्यानुयोग है। (२) सम्पानुपोगका स्वरूम समझमें बानेके बार, बिसमें आचरणसम्बन्धी वर्णन हो पर परमामुपेोग है। (१) दम्पानुपोग सपा परणानुपोगकी गिनत प्रमाणका, तपा डोको गनेपा पार्य, मान, क्षेत्र का आदिको गिनाते प्रमाण मो वर्णन है गणितानुयोग है। (2)सत्पुरुपौर धर्म-परित्रको कपा-निमय माप मेनेसे में गिरमेपाले गोरको का समानकारी होती है-धर्मकपानुयोग है। १०१ परमामु यमेवाहे गुण प्लमा बाशि तो कापम यते , और पापमें फेरफार रोगा है। उदाहरण के लिये पानीमें बनेगा शीत गुणमें फेरफार मही पता, परतु पानीमें गो तरंगें उठती है, उन्हाम फेरफार होता है। वर्षात् ने एक बार एक उटकर उसमें सम्पती पती। इस तय पर्यपारस्पाका हो मास्तर हुआ करता है पर इससे पानी में पनेबाली शीतता अपना सब पानी में परिवर्तन महीना ने तो अपम हो यो है। और पर्यापटप रंगोंमें 0 परिवर्सन या करता है । वपा उम् गुमा हानि दिनप गे रिफरोप भी पर्याय हो । उसके बारसे प्रालि, प्रतिसे स्पाग, और त्यागसेशान होगा। १०५. वेमस और कार्माण शरीर त्यू देर के प्रमाण है। वैसस शरीर गरमी करता है, मौर बर माधारके पचानेका काम करता है। परफे मुरूममुक भगो परम्पर रगानेसे गोरे गरम मास है, सो वेबसके परण हो मास हातेहै। वपा सिर पर मृत वादि गार शरा परीधा करमेकी मी गोन्दी प्रचारित है, उमा बर्ष मी दी। किराम स्पूछ पास अपरामहरी ! वर्षात् पराम स्यूम शरारमें गाको तह सम्त शरीरमें पता।
.५१ मामानवार विषिम पत्र पारिसमा-पौ वर्षे १७९ कार्माण शरीर मी इसी सरह है। तैमसको अपेक्षा सूक्ष्म है। प भी है तरा राता है। स्पूछ शरीरके मौतर बो पोका होती है, वपत्रा यो कोष मादि होते है, सी शरीर है। कार्माणसे कोष वादि होकर तेगोरेश्या वादि उत्पन्न होती है। यपपि वेदनाका , गाव ही करता है, परन्तु जो वेदना होती है, यह कार्माण शरीरके कारण होती है। कार्माण गौरका अपम है। १०७ ऊपर को ए पार पनुपोगों तथा उनके सूक्ष्म माबोंके स्वरुपका नीमको । करमा योग्य है समझना योग्य है । यह परिणाममें निर्मराका देत होता है, अपना उससे । होती है। चितकी स्थिरता करमेके लिये ही या सब कहा गया है। कारण कि गौरने परि र सूक्ष्म स्वरूपको कुछ समहा हो तो उसके लिये वारवार विचार करना होता है, और उस करनेसे बीबकी बाणापि न होकर, विचार करनेतक मौतरकी मौतर ही समाई राती। १७८ यदि जीवको मतर्विधारका सापन न हो तो गीतको चि गाम बस्तके उपर म उसते तर तबके घाट घो जाते है। क्योंकि जीवको कोई अनमो चाहिये । उसे सात पना ठीक नहीं पाता, उसे ऐसी ह। बादव पड़ गई है। इस कारण पनि उक्त पदार्पोका शान हो तो उसके विचारके कारण, सपिचति बाहर निकलकर गानेके बदले, मौतर ही समा बौर ऐसा होनेसे निरा वो। १७९ पुनव-परमाणु और उसका पर्याप वादिका सूक्ष्मताको, मितना पहनका निप सकता है, उतना कहा गया है। पर इसलिये कि ये पार्ष मचिमान है- अमर्धिमान मही मसिमान होनेपर मी इतने सूक्ष्म है कि उनका बारमार विचार करनेसे उनका सबप समसमें । है, भार उनके उस तर समझमें मानस, उससे सूक्ष्म बरूपी बहमासंबपी शान करनेका सरस हो जाता। १८० मान और मतामा मे मार्गप्राशिम स्तमरूप है। समका त्याग नहीं किया मासा और इस कारण समझ मी नहीं पाती । तपा समक्ष मानेमें विनय मक्तिको पहिले जरूरत परती वपा पह मक्ति मान-मतामयके कारण प्राण नही की गा सकती। १८१ पाँचना, पंछना, बारम्बार पिचारमा, पिघमें निपय मना और पक्या । बेदा मी अषण मनन और निविष्यासन ये मेद बताये है। १८२ उत्तग्रम्पफ्नमें धर्मक मुस्स चार कंग को :- (१) मनुष्पता ( २ ) सपुष्पके बचोका भरण ( १ ) उसको प्रतान्ति चौर ( १ ) ध पाचरण करना-पे पर बस्तुयें दुर्लभ है। १८३ मिप्यातक दो भे-म्पक और पम्पक । उसके तीन मे मा किपे गये है उता मध्यम और नफ्स्य । जबक उत्तर मिप्याल राता है तबतक बार पहिले गुणम्पानक बाहर नहीं निकसता । तपा जबतक उरए मिप्यार होता है, वबतक प मिथ्यात्र गुणस्पानक मादी माना जाता । गुणस्पानक औषके वापसे होता है।
७११ धीमर्पणवत [..मामान - १८१ मिग्यासबके डारा मिप्पात में पाना है, बोर इस कारण नहीं नरा बागे चले कि चौर पुरत ही मिथ्या गुणास्थानको भा जाता है। १८५ गुणम्पानक वामाके गुणको ठकर ही होता है। १८६ मिप्पाचमेस जीव एकदम न निकला हो, परन्तु यदि पोदा मी निकल गया हो, तो भी उसमे मिप्पा मंद पड़ता है। यह मिपान मी मिप्यापक रामद होता है। मिप्यार गुमापानको मी मिपासका पश नो कपाय होती है, उसबसे मी मियालमसे मिप्पाल गुण स्यानफ एमापा जाता है। १८७ प्रपोग्नभूत बालके म्हमें पूर्ण प्रतिम-उसी तयक मिलते गुरुते य मार्गी समाताके भरासे सातारप प्रतीति हाना मिमगुणस्पानक है। परन्तु वमुक दर्शन सप है, और अमुक दर्शन मी सम है, इस तरह दोनोंके उपर एफसी प्रताति रममा मिभ नही, किमिप्यात गुमस्पानक है । तपा अमुक दर्शनस समुच दर्शन अमुक बशमें समान है-पार करने में सम्पन्न पापा मही जाता । कारण कि यहाँ तो अमुक नको मरेनको साय समानता करनेमें पहिला न ही सम्पूर्णपसे प्रतनिरप होता है। १८८ पहिले गुणम्पानसे मरेमें मही मात, परम्नु पास पीछे शिरते हुए मा पहिसमें जाना रहता है, तब बीचमा अमुक भाउ दुमप गुणस्पामक कहा गया है। उसे परि चौपके या पापना गुगप्पानक मामा जाप, तो वीयसे पोचमें पर मापा और यो तो सम्मानको चौथी पतित एमा माना गया है। भर्पान् बा मारे उत्तरता मादा है, उसे पागों माही पाया सकना इमरिये उमे इमरा दीपना टीक। १८. भागम मौर पर मानता मोरहित ।। बता पर भार Pपर दोनों सोपान । परन्तु भापरणको साथ लेकर कथन करनेमें एक दूसरे कुए योगामा में आता है। गियर करते है कि साल मुबामपमे मी, परन्तु शहिलपमे रहता है। १.१ परि राता और सानिका मापाप अर्प की, परम्त शिवार्पी दिमे उसमें उउयोपामा । १.२ समयमे भोप मापामे RARपूर मायाममै चिरसहित भास्पा'। १. तपमा मे मी गंमार शाम र सपरि सामी परिमी उपग परनेही सकिर भाप गीतको मा करनेमिनाप रेमे पुकारा। रामना। " मग । प्रसार और मरा अर्पनर । बार लाग भापर रामा(पागर मार पर भी ममिति रिस ला पोनिरी पिग)। १.५. गादेगा मामा र रामशा और सलग करने पार REET र मांगा पर माममा मामे भरा होमिनमा रेमा FARPापा, नमोनमा बोर ना सिर देगा गम माता और .५५ प्रमानवR ] विविध पत्र मादि संग्रह-३१षों पप ७७ शिथिस-परिणामी होकर मर पा जाता ह । इसलिय धीरे धीरे इस बातकी जॉप और परिचय करना पाहिये कि त्याग करते समय परिणाम कैसे शिथिल हा गाते है! १९६ बाँस गौम आदि इन्द्रियोंकी एक एक अंगुस जगह गौवनी भी पिसे मुश्किल हो माती है, अथवा उसका मौतमा असमत्र हो गाता है, उसे यदि महान् पराक्रम करनेका वपना महान् क्षेत्र बीतनेका काम सौंपा हो तो यह किस तरा बन सकता है। इसलिये 'जब एकदम त्याग करनेका समय भायेगा तबकी बात तब हो' 'स विचारको ओर मझ रसकर, हालमें तो धीरे धीरे पागको कसरत करने की हो बहरत है। उसमें मी प्रथम शरीर भौर शरीरके साय संबंध रखनेवाले सगे सवधियों की जाँच करनी चाहिये और शरीर मा प्रथम बाँस नाम र उपस्थ इन तीन इन्द्रियों के विषयको देश देशसे त्याग करनेको मोर मय करना चाहिये, और उसके बम्पाससे स्पाग एकदम मुगम हो जाता है। १९७ इस समय नाँच करनेके तौरपर वश बरासे नितमा विवना स्पाग करना है, उसमें मी शिथिलता न रसमा चाहिये । तपासीका अनुसरण करके स्पाग करमा मी ठीक नहीं। कुछ स्पाग करना या शिपिछतादित धार-दरखानेपित करना चाहिय, क्या पर कुछ पर-दरवाये रखने की जरूरत हो तो उनें मी निमितरूपमें सुड़े हुए रखना चाहिये । परम्तु उन्हें इस तर म रसना चाहिये कि उसका मिस सम्प जैसा नर्थ करना हो पैसा पर्प सके। नित समय मिसको नरूरत पर, उस समय उसका अपनोरणानुसार अप हो सके, ऐसी अवस्था ही त्यागमें न रसनी पाहिये । यदि इस तयको म्पवस्या की वाप किमनिभितरूपसे मर्यात् जब बबर पो ता मना- छित वर्ष हो सके तो गोल शिपिल-परिणामी होकर माग किया हुआ सब कुछ निगा, गमता है। १९८ यदि षशसे मी त्याग करना हा तो उसकी पहिसेस ही निपपरपमे ग्याम्पा पॉपकर साक्षी राकर त्याग करना चाहिये। सपा स्याग करने के बाद मपनेका मनयमित जय मही करमा चाहिये । १९९ संसारमें परिभ्रमण करनेवाली क्रोध, मान, माया भीर खोमकी चौकीलप कपाय है। उसका सरूप मी समझना चाहिये । उममें मी चो मनतानुवर्मा कपाप पर बनत संसारमें मट कानेवाली है। उस कपापके प होनका क्रम सामान्य प्रतिसे इस तप है कि पहिले प, सिर मान, रि माया और फिर छोमका क्षप होता और उसके उदय होनेका कम सामान्य सेविसे इस तय कि पहिले मान, और फिर क्रमसे छोभ मापा और पा ठाय होता है। २.. इस कापके संपात भेर है । जिस मपमें कपाय होती है उसी रूपमें गार संसार परिभमणके लिये कर्मांध करता है। कपायोंमें मासे पाबप भननानुबंधी फयापकागो पतर्मतम सत्तर कोकोही सागरको आयुको बॉरती है, उन बनवानुवधीका साप मी वामन है। इस वय कि कोर, मान, मापा और ठोम पे पार, मिप्पासमोहल्ला रामाने बराबर मात्र पानी सपके मन्य माग एपफर उसकी रक्षा करते है और विस समप जिसकी बरत होवार उस समय बह बिना पुमापे ही मिपालमानीयको सेवामान गुर पाता है। इसके पपात् उसरा मोनापाप मा परिवार है। पर पापके अपमाग एकर मिपातमाहनीपको माला कारता है, परन्तु पर मर रासाठी करते हुए मी मही जैसी करापय दो काम करता है। मकाने ७१८ भीम पासवान [.५३ मापानबर बाली तो कयाय ही है, और उस कपायमें मी वनतानुषी कपापके चार पोदा त बहुत ही मार साल नेपा । इन चार योगायोंके मीच कोप समात्र दूसरे प तीनकी बपेषा कुछ नन्दो मासूम हो माता है। क्योंकि उसका स्वरूप समकी परेशा यादी हो माश्म हो सकता है।स तप पर किसीका स्वरूप मादा माश्म हो जाय, ता उस समय उसकी साप साई करनेमें, कोपीको प्रति हो बानेसे, मनेकी हिम्मत होती है। २.१ पमपाती चार कर्म-मोहनीय, भानावरणीय, दर्शनारपीय बौर बताय-बो बामाले गुणों को पावरण करनेवाले हैं, उनम्ध एक तप धप करमा सरस मी है। पपा मेदनीय बानि कर्म पपि मनपाती महीं है, तो मी उनका एक तरह से आप करना दुफर है। इस तय कि पब मेदनीय फर्मका उदप माने तो उसका अप करने के लिये उसे मोगना ही चाहिये। उसे न भोगने दम हो तो मी महाका निरपयोगी होकि उसे दो मोगना हो भारिपे) भौर परिवानावरगाया उदय हो तोप प्रयत्न करनेसे भय हो जाता है। उदाहरणके सिपे, कोई श्मेक पदिानावरमापक उदयसे पार न पता हो तो उसे दोबार भारवार, वाळवार, सोमवार, मासबार, चौसठयार, सौबार, वर्षात उसे अधिकार पाद करनेसे पानावरणायका क्षयोपशम अपना पप एकर प सोक पा रहा है। बर्षात् परबान होने के कारण पानावरणीपका उसी मत्रमें अमुक अंग अप किया पा सकता है। यही मात दमिवरणीय कर्मक संबंधों मी समझनी चाहिये। महापमान मोहनाप कर्म भी इसी तण शिपिड होता है उसका तुरत ही क्षय किया जा सकता है। जैसे वसच मागमन-प्रमार-मानेमें पर्यस्तो उसी तय मदोसे र मी हो सकता है। मोहनीय कर्मचा तोब पंप होता है, तो मी प्रदेशप म होनेसे उसका तुरत होप किपा पा सकता है । तपा नाम भामु वादि कर्म यो प्रवेशच रोता है, केवमान उत्पम होने पचात् मन्तक भोगना पड़ता माल मोहमीप बादि चार कर्म उसके परिठे ही पप हो जाते है। २२ उन्मत्ता पर चारित्रमोहनीयको विशेष पर्याप है। पापित् पास्प, कचित् शोक, पित् रति रुधित् मति, पवित् मप, वौर कचित् शुगुप्साहपसे माम होती है। अगले उसका कानावरगापर्मे मा समावेश होता है। स्वममें विशेषरूपसे बानावरणाप-पप्प हो मालूम हो। परबानका माग है । परन्तु परिपासना मेमप्रतिमे गर्मित देती है। माहारका बेदनीपमें गर्मित होती है, और मयसमा मपप्रतिमें गर्मित होती है २०१ बर्नत प्रकार के मुस्स बाठ प्रकारसे प्रति नामसे कर बाते हैं। बसवय नि ममुह अमुक प्राति बमुक अमुक गुणस्पाभकतक होती है। इस तब माप तोमर शमविकने दूसरे के समझाने के लिये स्पसमास उसका विचन दिया है। उसमें से कितने ही तय कर्म मात् धर्मप्राति का समावेश होता र्पात् बिस प्रकृति के नाम कर्मपमें नहीबाते कर प्रतिस्पर पतई प्रतिको विशेष पप्प है, बपना प उपर बताई । प्रतिमें गर्मित हो गाती है। २५ लिमाका बर्ष विम्यमान नग्रा किन्तु उसका बर्ष विशेपमान होता है। आत्मा को बामासासे परिणाम प्रतीमात पा समान है । तपा पानामा भौर परफा स्पोग सा - .५३ (१)] पिविष पर मादि संग्रह-याँ बर्ष होनेसे वारमा समाषको छोपकर बागे गाकर विशेषमापसे परिणमन करती है, पर विमान है। इसी ज्य नरके किये मी समझना चाहिये । २.६ कामे मणु होक-प्रमाण असत्यात है। उस वणुमे रुम मचा स्निग्ध गुण नहीं है। इससे एक मणु दूसरेमें नहीं मिल माता, भौर हरेक मुदा चुदा यता है। परमाणु के पुनसमें प गुण होनेसे मूलसत्ताके मौमूद गनेके कारण उसका—परमाणु-पुत्रका रूप होता है। (२) उत्पाद यह माप एक पस्में एक समयमें है। शुष जीव भौर परमाणुमोका म्यय h चीन परमाणुमान मान परमाछ संयोग | कोई नीव एकेन्द्रियरूपसे पर्यापी दो इन्द्रियरूपसे है तीन इन्द्रियरूपसे है वर्तमानमाल पार इन्द्रिपरूपसे , पाँच इन्द्रियरूपसे " " " " वर्तमानमार सिमा पर्याप्त वपक्ष वहानी मिप्यार सम्पानि एक मरा शेष पावत मनतमश कोष भर्तमानमात्र वर्षमानमात्र पर्तमानमाल भीम पत्रचन्द्र [.५३ (१) प्रश्न:- 1 । वारम्यान समदर्शिता, विचरे उदमप्रपोग, वपूर्वाणी परमभुत, सहक क्षण पोम्प । (१) सनुस्के माप ये पक्षण मुख्यतया कौनसे गुणस्पानको समय। (२) समदर्शिता किसे करते है ! उत्तर - (१) सम्झे पोम्प नौ इन पलों को बताया है,वेक्षण मुस्पतया--विधपरूपसे- उपदेशक अर्थात् मार्गप्रकाशक सहलके ही शव को तपा उपवेशक गुणस्पानक का वीर वेग है। बीचके सातसे पाहतको गुणस्पान सपकासमता , भात् उनमें उपदेशक प्राचि संमत मही है। मार्गोपदेशक प्राति से बारम होती है। को गुणस्थानक, संपूर्ण मौतरगदसा और केवमान नहीं है, तो तेयमें पौर पपानत् मागोपदेशकल तो तखो गुणस्पानमें यनेबारे सम्पूर्ण गावराग और कम्पपम परम्सवर मी गिनवाकर वार में हो पाता है। पापि मे गुणस्थानमें पनेपाल मुनि, यो सम्पूर्ण मौतरगया और कम्पासाका उपासक है मिसको उस दशाके किये ही प्रति-पुरुषार्थ-राता , जिसने उस वशाको पथपि सम्पूर्ण रूपसे नहीं पाया फिर भी जिसमे उस सम्पूर्ण दशा पानेके मार्गसाधनको, सप परम सहर भौताकर वादि बासपुस्पके माय-चनसे जामा है-उसको प्रतीति की अनुमन किया है वोर स मार्ग-साधनको उपासनासे मिसको प उपेपर दया विशेष प्रगट होती जाती है। वा निसके निमित्तसे मागिनतीर्पकर बाशि परम सनुमय और धमके स्वरूप परिचान होता है- उस सहरमें मी मार्गोपदेशकब बनिरोपहपसे पता है। उम्से नाचेके पांचवें और चौपे गुणस्थानमें तो मार्गोपदेशका समय मही । क्योंकि हो मनको, महमात्र, तत्वको गौर जानकी पहिचान नहीं, प्राति नौ, तपा सम्पविरति ममी और पर पहिचान–प्रचस्ति-और सम्यविरति न होनेपर भी उसकी प्ररूपणा करना, उपरेशक ऐना पर प्रगट मिप्पाल गुरूपना मोर मार्गका विरोषरूप है। चौथे पांचों गुणस्पान, या पहिचान-मशि-गती है, और यो वामशान मावि गुण मंशसे होयते । मोर पाच देशपिरतिभावको कर पचपि पौषकी पेवा विस्ता है, तथापि यहाँ सरितिके मितमी निधि नही। बामशान समदर्शिता वादि गोषण रतापे । उमें मुस्मतासे संपतिधर्ममें स्थित, पांतरण दशकि सापक, उपदेशक गुणस्पानमें एनेवाले साम्भोग करके ही बताया है। और उनमें से गुण परा पर्योमे पते भी हैं। सपापि माण ससंपूर्णरूपसे-तो तेयो गुणस्पानमें यमेवाले सम्पूर्ण गावरग मोर केवलपम्पमा भीषण्मुक्त स्यागकेवमै परमसद्गुरु भौमिन मयत तीर्थकरमें होपते है। क्योकि उनमें बहम्मान अर्थात् सम्पस्पिति संपूर्णरूपसे पती को उनकी शानदया अर्थात् सानातिशया मूबन करता है। या उनमें सम-शिवा सम्पूर्णरूपसे रहती है, जो उनकातराण चारित्रमा मात् अपायागमातिशपको सचित करता है । तपा में सम्पूर्णमासे इस्मरक्षित है इसशिप उन विचरने मादिको बिक भादि पोगविपा पूग्रारम्भका देदन करनेके ये पर्वात हो, पत्र.१५(३)] विविध पत्र मादि संपा-याँ वर्ष VR? इसलिये “ विघरे उदय प्रयोग " ऐसा कहा है। सम्पूर्ण निव अनुभवरूप उनकी वाणी, महानाको मागीसे मिलक्षण और एकांत वामार्पको मोधक है, इस कारण उनमें वाणीको अपूर्णता कहीरे, पो उनके पचनातिशयको सूचन करता है । मागीपर्ममें रहनेवाम शुत मी उममें ऐसी सापेक्षवासे यता कि निस्से कोई मी मय सरित म हो, यह उनके परमभुत गुणको सूचित करता है, और जिनमें परमगुप्त गुण हता है, ये पूमनाय है, इससे उनके पूमातिशय गुणका सूचन ऐता है। पे मोमिन बगित तीपकर, परमसद्गुरुको भी परिचान करानेवाले विपमान सर्वविरति सद्गुरु है, सध्येि मुख्यतया इन सद्गुरुको एम्प करके ही इन माणों को बताया है। (२) समदर्शिता अर्थात् पदार्यम इयनिएषुधिरहितपमा, इमारहिवपना और ममत्वरहितपना । समर्शिता चारित्रदशाका सूचन करती है । गग-रेपहित होना या पारिप्रदशा है। इयनिराति ममत्त भीर माषामाका उत्पम होना राग-रेप है।' यह मुझे प्रिय है, यह मुझे वय माता है, या मुझे अप्रिय है, यह मुझे क्या नहीं गा '—ऐस भान समदर्श मही होते । समाशा बास पदार्पोको बोर उनकी पर्यायोंको, वे पार्य और पर्याप विस मावसे सटे है, उनै उसी मावसे देखता है, चामता है और करता है, परन्तु वह उन पदामि अपना उनकी पर्यापोंमें ममप वपना इयमियमुनि नहीं करता । मारमाका स्वामाविक गुण देसना-बानना है, इससिमे बह देय पार्यको देसती मानती है। परन्तु मिस मारमाको समदर्शिता प्रगट हो गई है, वह बारमा उस पर्पको देसते जानते हुए मी, उसमें ममत्वबुद्धि तादाम्पमार मौर इयनिस्मुदि नहीं करती । शिपमारि मरमाको दो पार्यम वादाम्पापिहोती-समाधि वाहमाको महोती। कोई पदार्थ काठा हो तो सम-शा उसे काला ही देखता बानता वोर फावा है। कोई पदार्थ सर हो तोगा उसे वैसा ही देखता मानता और करता है।कई पदार्य गभित हो तो उसे पासा ही देखता जानता भोर कहता है, कोई दुर्गचित हो तो उसे गए मैसा ही देता मानता और प्रता है। कोचा हो, कोई नीचा हो, वो उसे वह वैसा ही देखता जानता और करता है। सर्पको सरका प्रहतितपसे देसता जानता वौर करता है और मापको बाघकी प्रातिपसे देखता नामता पौर कहता है । स्पादि प्रवरसे बस्तुमात्र विस सपसे रिस मासे होती ६, समगा उस उसी रूपसे, उसी मारसे देखता मानता और करता है। वह हेय (छाने योग्य ) को देपलपसे दसता चानता बार पता और उपाय (प्राण करने योग्य) को उपादेपरपसे देसवा मानता और करता है। परस्तु समाशा-जीर उन सबमें अपनापन, स्यनिएपुनि और राग-रेप नहीं फरता । मुर्गभ देगार बद उसमें प्रिपता नहीं करता, दुर्गध देमकर वह उसमें भप्रियता-ग-मही फरता । म्याहारमें कुछ म गिना जाता मा देशकर, 4 ऐसी इमाबुद्धि (पग-रति ) मही करता कि पर मुछ मिठ साप ता टोकदै । तपा म्यबहारमें कुछ सब समझा जाता मा देसार, यह ऐसी पनि प्राधि (अरति ) नहीं करता कि या मुप्त म मिठे तो टोक है। माप स्थितिमें संपोग;--, पाण-प्रविस, इयनिएपदि, माकुरता म्पायुतता न करते हुए, उसमें समादिसे, मर्यात माने निर समासे, गोपरित मारसे दमा ही समानता है।
भीमद् पचन्द्र [7.५१ (१).१४ सावा असाता, मोक्न-पायु मुगम-दुर्गव, मुत्तर-दुसर सप-अप, सौर-उण वादिौ - पोक, रति-मरति, शानिएडुनि और बातम्पान न यना ही सपर्शिता है। समदशा में हिंसा वसस्य पान मैथुन वार परिका त्याग वश्य होता है। पर बहिसानि ब्रत न तो समर्शिता समन नहीं समशिवा और परिसादि मनोज कार्यकरण, वपिनामाषी वीर पोत्यामपसबर है। पदि एक न तो रसय नहीं होता, और यदि दूसरान हो तो परिक्षा नहीं होता। समविदो तो वसा बाहित होते है। सममिता न तो परिसा मानिसमा होते। महिसा बारित न हों तो समर्शिता महाँ होती। बहिंसा वा प्रतहों तो समदशिता होती है। तिने मंच समतशिवा होती है, उतने ही बम बरसा बादि प्रत होते हैं, और बिस्ने बोंमें हिंसा मादि मत होतेसतने ही पशमें समर्शिता होती है। सहरमोम्प सक्षणहम समन्तिा वो मुस्मतमा सपिरति गुपस्थानको होती । मादक गुणस्पानकों में बा उत्तरोत्तर वर्षमान होती जाती है-रिशेप प्रगट होती जाण । तपा मालपोह गुणस्थानमें उसकी पराकाया, और माह में सम्पूर्ण बौतरगता होती है। समयभिताच बप मौसिमावर्मे समानमात्र बभेदमाग, एकसमान पुनौर निशिभफ्ना नही बर्षात्कोर और हरे दोनों को एकमा समधना, अपना सभुत और बससमें समानमाल मानमा, अपना सर्म चौर बसाममें अमेर समझना अपना सपुर और वसाम्मै एकासी बुनि रसना, मपा सदेव और असदेबमें नितिनमान निर्यात् ऐनोंको एकसमान समाना पारि समनपिको समदर्शिता मही करते, या तो मारमाको ममता, विनय पता, और विचिकता है। समदा सत्को सत् बनता है सत्य बोध करता। मसत्का बसत् मानता है नसत्या निषेध करता है, समुतको समुत समझता है उसका पोच करतो तो मानता है, उसका निपेण करता है सार्मरे सधर्म मानता र ठसका बोध करता है बसमको वसधर्म बानता है, उसका निपेन करता है। सहरको सहक समझता है उसच बोध करता है बसाम्को क्सहरु समता उसका निपथ पर है। सदेषको समेत समut उस मोष करता है,मसोमको बसरेर सम्बत है, उसका निपेच करता है स्पादिगो वैसा होता है जो उसे पैसा देता है बामवा है उसका प्ररूपण करता और उसमें गोप इमिणमि नहीं करता, उसे समन्या स्पमना चाहिये । ७५२ मोरबी + दा १२वि १९५४ (१)धर्मपप गोप्पटसार शासबादिसे विचारने योग्य । (२) पमकामा प्रमा राम्प विद्यमान है। तो मी बाग निश्चपसे सम्पुरमको बाबा पनि गाकर, यो पुस्प बगुम बोसे सम्पदान दर्शन और बारिकी उपासना परमा पाते हैं बरें परमतिय मार्ग ममी मी प्राप्त सकता है।
सब पर राहत .५५.५०.५८] पिपिम पम मादि सपा-पों वर्ष ७५५ नमः एकज्ञान फेपरज्ञान- पर सवलम्व है सर्व क्न्य मायक सससि रहित एकति शुझान निराबरण है म दम्य क्षेत्र काम मात्रका सव प्रकारसे एक भेदरहित है उस फेरबानका हम प्यान करते हैं पर मिसमानरूपी सर्वमाषका उलए प्रकाशको समयमें पान ७५६ मैं विख्यानस्वरूम है- --पह सम्पन प्रवत होता है। से होमेके छ पुप्रतीत है। सर्व इन्द्रियों स्पम कर, सर्व पदासे निनस्वरूपको पाइच कर, योगको मपम कर, उपयोगसे उपपोगको एकता करमेसे केवहान होता है। ७५७ आकाशवाणी सप फो। तप करो । मुख पैतन्यका प्यान करो । सब रैतन्यका पान करो। ७५८ एक , गर्म परमास मुक्त है। मैं वसन्यात प्रदेशामक निन बनगाहमा प्रमाण है। में बसन्म, मबर, ममर, शठ हूँ। मैं सश्याप-परिणामी समपामा । घर चैतन्यस्वरूप मात्र निर्षिकम्प प्रण। जार स्वरूपसे कस विमा रोगसे बभाग पैतन्य अतर EMP ૪૨૧ भीमद् पवन [प ४.१५ ७६४ बम्बई, बापत महा ११ गुरु १९५९ बनत मंतराप होनेपर भी पार राफर मिस पुस्पने अपार मोहपात्रको पार किया, उन श्री भगवान्हो ममकार है। वर्नतकारी जो शान ससारका हेतु होता था, उस बालको एक समपमात्र बायतर परफे, निसने उसे भवनिचितप किया, उस स्याणमूर्ति सम्पादनको नमस्कार है। निवृतियोगमें ससमागमको पति रसना पोम्य है। ७६५ मोहमपी, भाषण मा १५ सोम १९५१ १ मोक्षमार्गप्रवरा प्रपके विचारनेके बाद प्रप विचारनेसे मनु परेगा। २ गमार स्प्रदायमें दम्पपलको बाठ पासीका मातार सम्प्रदाय ठप्प पातकी विशेष पर्चा नहीं की। योगशासमें उसके अनेक प्रसा। समागममें उसका सरुम जानना उगम हो सकता है। । ७६६ फपिठा, भाषण प १२ शनि १९५१ ॐनमः तुमने अपनी वि दाउमें समागममें मानेके सबमें प्रगट की, उसमें तुमें अंतराप वैसा मा पोंकि इस पत्रके पचनेके परिठे हो गगों पपणन प्रारंभ मा समझा जायगा । इस कारण तुम पर इस मोर मानो को गुण-गुणध चार किये बिना ही मतामही होग निदा करेंगे, और उस निमित्तको मापकर, के पानसे गोगोंको उम निम्दा परमार्थको प्रामि होनमें ताप उत्पम करेंगे। इस कारण विससे पैसा ना उसके पे, तुम्हें हारमें वो पप्पणमें बाहर म निकसमेसंग्मी डोरमतिको दी रक्षा करना चाहिये। राम्पराना भान पनपीवीसी, मारनाशेष बादि पुस्तकों का शिवमा बाँधना विचारना बन, सतना माविका प्रम ठेगा । प्रमा' और छोक्पति हो पा सपा पा गुमा रेना या मुमुक्षुगीर भुण नही। (२) (१) मा सम्पाप ममी करते। सप पभिपाप करें तो इस बगरमें परसात शिम रिपोर मर्प सिके ये प्रकाशित गारापु किसके लिये ग्रेगी। (२)बामा कमी बर्ष यमुहै। उपना रहती है- तो परमात 1- TR मी साता। मामा पारे समान है। तन निकल जाता है और शरीर मुर्न गाभार यह गाने उगता है! (१) मा गायिका पुस्ता पहिये।मल पामेक बार उसमेंगे ( सलामे-पाप ने किया तो ममगार्ग ना माना।
पत्र ५५,७१-] विविध पत्र मादि सपा-पों वर्ष ७.७ । (0) पुण्य पाप गौर मासु ये एक दूसरेको नहीं दिये जा सकते । उनै हरेक अपमे वाप ही मोगता है। (५) सरसे, वफ्नी मतिकी कापनासे वौर सनुस्की मात्रा विना प्यान करना रंग स्मवीर उपदेश म्पारपान करना नमिमानरूप है। (१) देहधारी बास्मा पपिक है, और देह है। इस देहरूपी पक्ष (इसके नीचे) जीवस्मी पथिक-पस्तागिर-विम्रान्ति ने बैठा है। वह पथिक यदि हमको ही अपना मानने लगे तो यह कैसे बम सकता है। (७) संदरपिठास संदर-श्रेष्ठ-प्रय है। उसमें चाँ कही कमी-मूह उसे हम मानते है । उस कमीको दूसरेको समझाना मुश्किल है। उपदेशके म्येि या प उपकारी है। (८) र दर्शनोंके उपर सान्त - भिम मिम पोंकी दुकान छपी है। उनमें एक पैप सम्पूर्ण स्पा है और यह सब रोगोंको उनके कारणों को और ठमके र करनेके उपार्योको बामता है। तया उसका निदान चिकित्सा संबी होनेसे रोगीका रोग निर्मल हो जाता है। मेष कमाता मी बचा है। यह देसकर इसर पाँच कुच मी अपनी अपनी दुकान सोमते है। परन्तु मतिक उनके पास सबै पके घरकी दवा होती है, गतिक तो वे रोगीका रोग दूर करते हैं, पौर जब वे अपनी अन्य किसी कम्पनासे अपने घरको दगा देते है, तो उससे उम्टा रोग यह नाता । तया ये सस्ती दवा देते हैं, इससे मेमके मारे छोग उसे नेके लिये शुत समाते, परम्त उससे उने उम्टा नुकसान ही होता है। इसका उपनय पाए कि सपा व बौतरगदर्शन है। मो सम्पूर्ण सत्यस्वरूप है।यह मोहरिपप मानिको राग-देपको और रिसा भाविको सम्पूर्णरूपसे दूर करनेके लिये करता है जो बात पराधीन रोगीको महगी परती-पग नही माती । तथा नो भय पाँच प है, मुदर्शन है। याँतक पातरागके परकी बातें करते है, पातक तो उनको रोग दूर करनेकी बात ठीक है, परत साप साप में गो हंसा मादि धर्मक माने, मोहका संसर-रिकी वौर मिप्पालकी बातें करते हैं, पर उनकी अपनी निजी कम्पनाकी ही बात है, और यह स्साररूप रोग दूर करमेके बदरे उसको दिया तो कारण होती है। पिपपमें रचे-पये पामर ससाराको मोहकी बातें मीठी गती है-सस्ती पाती है। इसरिये वा कुनैपकी तरफ भाकर्षित होता है, परन्तु परिणाममें या अधिक ही रोगी पावा। पीतरागदर्शम विपके समान है :- रोगीको दूर करता है, निरोगीको रोग ने किये दबा देता नहीं, मोर मारोग्यकी पुष्टि करता है। वर्षात् पर मौवका सम्पर्शनसे मिष्याच दूर करता है, सम्यगानसे गोषको रोगका भोग होनेसे बचाता है, और सम्यक्पारिजसे सम्पूर्ण मुख तमाम भारोम्पको पुषि करता है। ७६७ यसो (गुजरात), प्रयम बाब पुदी पुष १९५१ १ मौमत् गीतराग मगवताका निश्चित किया हुवा वपिनप चिन्तामणिस्वरूप परम हित- मीमद् पयचन्द्र ७५९ बमाणीमा म्पेष्ठ १९५० १ दोसे मिम स्परप्रकाशक परम ज्योतिलस्म ऐसी स बाहमा निमम रोगो । हेबानो ! वतर्मुस होकर, स्थिर होकर, उस पात्मामें हो यो, तो वर्मत पार मानना मनुमब करोगे। २ सर्व गत्के बाद कुछ नए पाकर मुस पानेको होइन्स करते । ममान् पर पता रामा मी मातेर मन मोर परिमाके सकम्पमें प्रयानपाड यते है और में उसके प्राप्त कर मेमें दो मुस समझते हैं। परन्तु वो शानियोंने तो उससे विपरीत हो मुसका मार्ग निर्णय किया है कि किचित् मात्र मी रण करना पहा मुसका नारा है। ३ विक्पसे मिसको इन्द्रियों ना, उसे शीतस वाममुस- मामलसि प्रतान्तिम मा सकता। १ परमधर्मस्म पन्द्र के प्रति ण से परिमासे अब मैं विरक्ति लेनेकर हो रहा करता है। हमें परिणाम क्या करना हमें उसका कुछ भी प्रयोगम नहीं। ५ नयाँ मोतर शुदिहा सोकर सिमि'–रे वार्परनो ! म इस परम बाम्पका बारमरूपसे वनुमन करो। ७६० बाणीमा म्पेठ पुरा १ शनि १९५५ १ सर्वदम्पसे, सर्व क्षेत्रसे, सर्व कापसे और मापसे गो सर्व प्रकारसे वप्रतिक्य होकर निमस्सलपमें स्थित हो गये उन परम पुरुषों नमस्कार हो । २ रिसे पुन्छ प्रिय मही, मिसे कुछ अप्रिय नहीं, जिसका कोई नु नरी; मिसका कोई मित्र नहीं निसने मान, अपमान, गम भठाम,ल शाक, चरम, मधु भादिकपाका अमात्र कर, मुर पैतन्यस्वलपमें रिपति पाई पाता है और पायेगा उसमा बति उत्तर पाम बागदसहित अपर्प उत्पन करता है। ३के प्रति पैसा कमका संबध है, जैसा ही मारमाके प्रति जिसने के सर्वपको पातप्प गग से म्यानके प्रति तपारका सबब है जैसा के प्रति जिसने मामा के संबंधको रेन्ट । तया निसने मामाको भाद-सर-अनुमान किया है उन महान पुरुषों को जान और मरच नो समान है। " जो मरिम्प इम्पी पुषितिसमए पति, परम प्रगट होकर उसे पधिप करता है, पर रिनप इप्प सदा सामारिक निमनप ऐसा निधप निम परम स्ना सपुरुषले प्रशित किया उसका अगर उपसर है। ५. चन्द्र मित्र प्रकाश करता है-उसरी किरणोंगी पति के प्रभारी समस्त भूमि क्षेत समा, परन्तु पर भी मी भूमिमप नहीं होता। इसी तर समस्त सिसका प्रकारा भामा कभी भी लिए ही हानी - चतन्यमय ही रहती है। और गे कि मामलापही पान्ति है।
पर ०६१ ०६२, ..] विविध पत्र मादि सपा-३१याँ वर्ष ४२५ निस तय नाका विश्वका प्रषेश मही-बाकाश मालोंकी वासनासे रहिस ही उसी तय सम्यमधर पुरुषोंने, सर्प द्रोसे मिम, सर्व अन्य पर्यापोंसे रहित हो वामाको प्रत्यक्ष " देख है। ७ विसकी उत्पति बम्प किसी भी न्यसे नहीं होती, ठस बारमाका नाश भी कहसि हो स्पता: ८ वानसे और निवस्वरूपके प्रति प्रमावसे, नारमाको फेवठ मत्युकी भांति हो। उस मान्तिको निच कर, मुदचैतन्य निनम्नुमय प्रमाणस्वरूपमें परम बापत होकर, शानी सानिर्भय गता है। इसी सपहपके मनसे सब चानाक प्रति साम्पमात्र उत्पन होता है, वौर स परदम्यासे पिको पार कर, मात्मा शारहित समाधिको पाता है। ९ परमसुखस्वरूप, परमोबए शांत, अरपतन्यस्वरप समाधिको निसमे सर्व काल के लिये प्राप्त किया, उन मगवान्को नमस्कार हो! उस पदमें निरंतर पक्षरूप जिनका प्रवाह है, उन सापुस्पोको नमस्कार हो। १० सम्से सब प्रकारसे में मिम , मैं एक केछ शुदपैतम्यस्वरूप, परमोतार अभिस्यमुस- सरप, मात्र एकांत पुरणनुभवरूप हैं। फिर यहाँ विश्प क्या ! निकम्प क्या ! मप स्या में कपा ! सरी नवस्या क्या ! मैं शुद्ध पुर प्राए पुर परमशात चैतन्य हैं, में मात्र निर्विकम्प निमस्तस्समय उपयोग करता है तन्मय होता है। शांति शांति शांति । ७६१ पपामीमा ग्पेष्ठ पुरी ६ गुरु १९५१ महान् गुणनिष्ठ स्यचिर मार्य भीइंगर म्येष्ठ पुती । सोमबारको रात्रिको नौ बजे समाधिसहित दो-मुक हो गये। ७६२ मई ग्पेष्ठ की बुध १०५१ ॐनम जिससे मनको पिपुर और स्थिर हो, ऐसे सत्समागमका प्राप्त होना बहुत दुर्घम । तथा उसमें मी या दुपमाठ होनेसे जौषको उसका विशेष मस्तयय है । विस जोषको प्रत्पन्न ससमागमा विशेष साम प्राप्त हो र मइत्पुण्यवान । समागमके रियोगमें सशानका सामारपूर्वक परिचय माप करना चाहिये। ७६३ बर्प, म्पप्ठ ११ शनि १९५९ नमो वीतरागाय मुनियोंके समागममें अनपर्यात हण करनेके सर्वपमें पयामुग प्राचि फरमा, प्रतिबंध नहीं। मुनियोंघे बिनस्मरण पर।
श्रीमद पस [प.५४ १५ ७६४ बमई, बापाल परी ११ गुरु १९५९ बनत बतरप होनेपर मी पौर यकर विस पुरुषने पार मोहगारको पार किया, उनी मगयाम्को नमस्कार ! वनंतकाम्मे चोहान संसारका हेतु होता था, उस बानको एक समपमा मात्र करो, जिसने उसे भवनिाहिस किया, उस कम्पाणमूर्ति सम्यग्दर्शनको नमस्कार है ! निापियोग; ससमागमकी वृत्ति रखना पोम्प है। ७६५ मोहमपी, भाषण सरी १५ सोम १९५० १ मोक्षमार्गप्रका पके विचारमेरे बाद कर्मप्रप विचारनेसे अनुन परेगा । २ गिपर सम्प्रदाप वम्यमनको वाठ परिरीका का वापर सम्प्रदायमें उस बातको विशेष पर्चा नहीं की। योगसाममें उसके बनेक प्रसग । समागममें उस स्सस्म जानना मगम हो सकता। ७६६ कारिठा, प्राण । १२ शनि १९५१ ॐनमः तुमने अपनी पति हमें समागमर्म मानेके समय में प्रगट को उसमें में बतएप पैसा हमा स्पोकि इस पत्रके पाचनेके पहिले होगोंमें पर्युषण प्रारम मा समचा बापगा । इस चरण तुम यदि इस मोर भागो, वो गुण-अवगुणका विचार किये बिना ही मतामही ग्रेग निया करेंगे, और उस निमितको प्रग कर दे तसे गानों को उस निन्दाद्वारा परमार्थको प्राप्ति होनमें वयम उत्पा करेंगे। इस कारण निससे पैसा न ऐ उसके लिये, तुझे हमें तो पर्युपममें बाहर न निकसनेसमी गेकपतिको हो पा करमा चाहिये । पैराम्पशतक, वानरपाचौबासी, भानायोप वादि पुस्तकों नितना पाँधना विचारमा बने, उतना निधिका सम लेना । प्रमाद और गेमरतिमें ही कासको सपा एषा गुमा देना पर मुमुक्षुबारका पण नही। (२) (१)मपुप पाप नही रो। स्युम्प पदि पाप करें तो इस मगरमें बरसात सिमो डिमे पागी ! सूर्य किसके लिये प्रकाशित होगा ! स सरे किसे पेगी ! (२) बामा केसी सर्व वस्तुहै! बसतक पर पती-महोम बायें वर्ष --पक भार नही साता । वामा पारेके सम्पन है। चेतन निकल जाता है और बार मुर्भ हो जाता है और यह सहने ध्यता है। (1) और जाति और पुसा पाहिपेपर पामे मा उप्तमेंसे ( सहमेसे-उदप मानेडे पहिले) एना हो तो ममापाशा पूर्ण रोनेतक या मा समता है।
पर.१६,..] विविप पत्र मादि संप्रह-१ौं पर्प । . - (१) पुष्प पाप गौर बापु ये एक दूसरेको महाँ दिये गा सकते । उने हरेक अपने भाप ही भोगता है। (५) स्वच्छइसे, अफ्मी मतिकी कल्पनासे वीर सहरको बाबाके बिना पान करना परग- रूप, वौर उपदेश म्यानपान करमा बभिमामरूप है। (६) देधारी मामा पथिक है, और देश म ।। इस देहरूपी सममें (नसके नारे) मौतरूमी पफिक प्रस्तागिर-पिप्रान्ति मेने बैठा है। यह पथिक यदि रखको ही अपना मानने मे दो या कैसे बन सकता है। (७) मुदररिगस मुदर-श्रेष्ठ-अप है। उसमें यों कही कमी-मूम्- उसे हम मानते है। उस कमीको दूसरेको समझाना मुश्किल है। उपदेशके लिये यह प्रत्य उपकारी है। (८) म दर्शनों के ऊपर प्रान्त - भिन्न मिम मैचोंकी दुकाम गौ है। उनमें एक प सम्पूर्ण सबा है, और पप सब रोगोंको, उनके कारणोंको और उनके पूर करनेके उपार्योको जानता है। तपा उसकी निदान चिकित्सा सबी होनेसे गंगाका रोग निर्मम हो पाता है। वैप कमाता मी मष्ठा है। यह देखकर दूसर पॉप च मी अपनी वपनी दुकान सोते हैं। परन्तु नातक उनके पास सधे औपके परकी दवा होती है, यहाँतक तो वे रोगीका रोग दूर करते हैं, और चव ने अपनी बम्य किसी कम्पमासे अपने घरकी दवा देते हैं, तो उससे उम्टा रोग या जाता है। तया ये सस्ती दवा देते हैं, इससे होमके मारे छोग उसे मेनेके लिये बहुत पहचाते , परन्तु उससे उने उम्टा नुकसान ही होता है। इसका उपनप या फि सबा मैप मौतरगदर्शन है। दो सम्पूर्ण सरपसरप है।बह मोहतिपय माविको राग-रेपको और हिंसा नाशिको सम्पूर्णम्मसे दूर करनेके लिये करता है, जो बात पराधीन रोगीको महगी पाती है-यम नही माती। तथा नो पम्प पाप औप है, ये दर्शन है। माँतक बीतरागके परकी बातें करते है, हातक तो उनकी रोग र करनेकी बात ठीक है, परन्तु साप साप से नो रिसा वादि वर्मक कहाने, मोहका ससार-सादिकी और मिप्पालकी बातें करते है, पर उनकी वफ्नी निमी काफ्नाकी ही बात है और यह समारम्प रोग दूर करनेके पर उसकी मिका ही कारण होती है। विषयमें रखे-पचे पामर ससाका मोहकी बातें मी माती है सस्ती पाती, सहिये । पकी तरफ बाकर्षित होता है। परम्त परिणाममें ना किसी रोगी पाता। वीतरागदर्शन विपके समान है या पेगोको दूर करता है, निरोगीको रोग होने के लिये दवा देवा नहीं, और पाऐयको पुरि करता है। वर्षात् पर गौरका सम्पा मिसे मिप्पाल र करता है, सम्पगानसे जीपको येगका मोग होनेसे बचाता है, और सम्पचारित्रसे सम्पूर्ण मुर तमारप भारोपकी पुएि करता है। . ७६७ ५सो (पुरात) प्रपम बामात्र मी पुष १९५४ १ भीमत् गीतराग माताका निषित फिपा हुमा मचिनप चिन्ताममिस्सनए, परम रित- ૨૮ भीमदरचय [..१८ कारी, परम भमुत, सर्प का नि.सशप पातिक आप परमेवाम, परम अमृतपस्म ऐसा स- तर शामत धर्म नपर्वत पर्चा, विकास चपबत । २ उन प्रीमत् बनत चनुण्यस्पित मगर्वतका मौर उस नपर्वत धर्म माभप सदैव करना चाहिये । मि सरी कोई साममही, ऐसे बदुध पोर मराज मभुमि मी उस नामपके परसे परम उसके हेतु बहुत फलको पापा, पाते हैं और पायी । इसलिये उसका थप और बाम्प बचप ही करमा चाहिये, वीरमद नही करना चाहिये। १ वित्तमें देश मादि मपत्र ष भी करमा ठपित मही। जो पुरुष देशादि सर्वचार-विपा मही करते, ने पुस पूर्ण शशांगको मधेपमें समझे है-ऐसा समझो । पही रशिकरम्प है। १ 'मने बम पापा नाही, में धर्म कैसे पाउँगा !' इस्पादि सेद म करते हुए, बारा- पुरुषोंका धर्म देहानिसबरी हर्फ विपाद तिको रफर मामा बसग हर कपवरूप है' ऐसी को पति उस निधप बीर मामप प्राण , उसी हानि का रसना और ग म पनि होती हावरगपुस्पोंकी दशाच स्मरण करना, और उस यात परित्रपर र प्रेरित कर सिको अप्रमच करना, या सुगम बोर सोवन उपचारक तपा कम्पाणसहप है। निम्पि ७६० मौरसो मासोग मुश ७ १९५१ ७-१२-५४ १२-११-२२ इस वय पम्पतीव होने देना पौम्प नही । प्रत्येक समय पास्मोपपोगको उपकारी कार निधिहोने देमा उपित। महो इस देहको रचना ! बो चेतन! को उसकी सामर्थ! भहो हानी। को उसी गोषणा ! यो उमका भमान । महो उनको समाधि! यो उमा स्पम! हो उनका नाममा मार! वो उम परम भागृति ! मनो उनका वीतरागस्वभाष! मो उनका निराम शान! बो उनके योगमा शनिबो वचन बादि योग उत्प हे भारमन् ! यह सब तो सुपौत हो गया फिर वाममात्र पों! मर प्रयत्न क्यों । माप मर जागृतिस्पों! शिपिकता पों। घबरबट स्पों ! ववरापच खम्पा' भप्रमच ऐ, वप्रमत्त हो। परम बापत समावको मम परम मामत स्वभावको म। m-१९५४ मर्ग नरम पो मन मोर ५ मार-मार्क भालेय मुन १९५४ | पा-११-१२ बर्ष या न ११यो माल और १५ लि-मई माहोम • र १९५४ समर या ११ भोर २१ शित। -मनुपात .६९.] पिपिच पर मादि मप्रह- पप ७६९ तीन मैराम्प, परम जाम, बाधाम्पतर त्याग याहारका जप वासनका जय निद्राका जय सपप्यान वारमा बामोपयोग मूत भारमोपयोग अप्रमच उपयोग केस उपयोग पोगका चप बामपरिमपिरति, प्रसवपके प्रति निवास एकविस वर्यगयोग केबस मारमा अचिन्स्प सिदस्वरूप विनतम्पप्रतिमा सर्वागसपम एकांतस्पिरसंयम एकतशुदसपम केपट बाघमावनिरपेक्षता भारमतत्वविचार. जगत्तत्वविचार मिनदर्शनतलविचार पार्शनवलविचार धर्ममुगमता पदति समाधान पचास्थित पुर सनातन सर्वोस्कर नयक्त धमका उट्प गेकानुपम H -इस बोम्नाका ठोस यह मालूम होता है एकांतपम " एमपरकम भोर "मामिला" पूर्णक मागबम मात, उज्य निसमाविमास्प" रोकन, भवान् मो मारमात्य पाम, स्पले गावकि पम्पबामि मर्यत् मामले पुनर्गवार मे प्रति करना पदये। बाबो चि परदि"मोर एममारे ६ो उनमें प्रपम पिसा" इले उपम माममा tir सम्परिपत एवं सनाउन होकर पक्व धर्मन उप प्रना पर। उसे रिटेकरना चाहिये ! इने चरम मा गालिमको बम मुफमा रो और मेकाना मी " बाद इस चि मोर पारिन परिवाम सा रोमा! इस 'समापान में पाया to बारमालविचार, समाजसपिचार, निरनि पापविचार मोर ममापनयतीचार"ब लागे का समाधान ना। मक... (मी)मा माth पण्या पामकारमाचि से पुए मी प्रथम सम्पमप्रतिमा होमिनप्रतिमा हो"- मासे मी या बात नाक जी। माँया पर भीमन् गम्कनकी गुमाता मारपिके सणेषा भीममालाई पनी मावर मोसमाचार नामा।
10 भीमद् रामचन्द्र [...१.४ ७७१ सपर परमोपकारक परमार्थमप सस्पपर्म अपव बों वामपघा मेद पर गये हैं। सपियरें। सम्पूर्ण करनेके साथम कठिन मास्म होते है। सस प्रमाबमें महान् तरप है। देश-कास वादि पर प्रति । गौतयोंकन मव लोक-प्रतिक हो गया है। स्वासे भो प्रेग उसे मानते हैं, उनके में भी पा प्रतीत मास नहीं हवा मपचाये बन्पमतको ही बीतरागोका मत समाचार प्राधिकरते हैं। यार्थ पतरौके मत समझने उनमें पोम्पवाको पाव कमी है। निएका प्रकस राज्य विमान। अपमादि म्पबहारम बी विरम्बना पर बीच मोक्षमार्गका पम्प कर बैठा। आप पामर पुरुष विरामक पिके गत मप्रमाग गते है। मित् स्प बाहर जाते हुए भी उन्हें प्रापोंक घात होने के समान दुस माम होता है, ऐसा दिखाई देता है। फिर तुम किसधिये उस धर्म ठरा करना चाहते हो! परम फारम समापसे उस समर्मक प्रति परम मजिसे ७७३ पराममा परमप्रारम्पति करते हुए मी मपम पैतन्पमिनमविमा हो, वन्पमिनमविमा हो क्पा पैसा हो। उसमें निर्षिफाप हो। मा पैसा क्षेत्र योगरे। सोया । क्पा पैसा पराकमा प्रमच शूएपीर बन । क्या उवमा वायुमा । या क्या करें। मन्स उपयोग करके देश। शति शांति शांति ७७४ कामो मानसिगउदय ! हेपबर्गणा 1. मोदी मोहदया!
six,.,.५, ...] पिपिप पत्र मावि संप्रा-१यों पर्प हे शिपिछता ! तुम क्यों बतण्य करता हो। परम वनुपा कर बम वनुकूल हो! मनुक हो! ७७५ हे सोहा मुसके मूत सम्यम्दर्शम ! तुझे अपत महिसे ममस्कार हो। इस बनादि वर्मत संसारमें बनसानत जी रे मामय बिना मनतानत दु सका अनुभव करते हैं। तेरे परम मनुप्रासे निगलरूपमें रुचि होकर, परम वीयरमण समाबके प्रति परम निधय हुमा, स्तरस्य होनेका मार्ग प्रण हुआ। हे गिनतयग ! तुममें नस्पत भक्तिसे नमस्कार करता हूँ। तुमने इस पामरके प्रति बनतानत उपकार किया है। फुदकुछ बादि वाचार्यो ! तुम्हारे पचन भी निजस्वरूपकी सोय करमेमें इस पामरको परम उपकार ए, इसलिप मैं तुझे अतिशय भकिसे नमस्कार करता है। हे ग्रासोमाग ! सेरे ससमागमके अनुपासे वामदशाका स्मरण इथा, इसलिये मैं तुझे नम- स्कार करता हूँ। ७७६ बिस तय भगवाम् गिनने पदापोका सल्म निरूपण किपा है, उसी तय सब पार्षीका सस्प है। मगवान् बिनके उपदेश किये हुए नामाके समाधिमार्गको नौगुरुके बमुपासे मानकर, उसकी परम प्रपानसे उपासना करो । ৩৩ত मोबसो, मासोम १९५९ योगसूत्रमें नीचे बताया इमा सूत्र क्या उपकार होने के लिये मिसा है, उसका Aबार करो। *एगे समणे भगर्म महापीरे इमीसणे (इमीए) मोसप्पीपीए परमीसाए विस्पपराणं परिम तिस्पयरे सिबे पुरेसचे परिनिम्नुढे (गाय) सम्पदुसपहीणे। (२) काट कराकइस भावसर्पिणी कासमें चौबीस ताफर र । उममें बन्तिम तीर्थकर प्रमण भगवान्महामार दीक्षित मी अकेले ए ! उन्होंने सिदि भी अकेले ही पई ! परन्तु उनका भी अपम उपदेश निपस गया! बम मपामार एकस भावी मै पोलीस मग मन्तिम तीर, मिपुर मुका प्रति भार उनके सर्व हाल परिमार मरे है।-अनुपात भीमर्रासपम्द्र उपापसहित समस्त पदों को, मोमप्रात मोलको, तयार बनी वादि सब वालोंधे स्कार किया है। मोक्ष पंपकी वपक्षा रखता है। क्या च बरके प्ररण मात्र, पुण्य-पाप कर्म, धौर बनेराम निस्य अपिनाची मामाकी, मोक्षका, मोक्षके मार्गकी, संकरमा, निवौर बंप कारणाक करनेरुप उपापचे अपेक्षा रमवासिने मार्ग देखा पाना और धनुमब किया है, या नेता हो सकता है। बाद मोसमार्गका मेवा' पर उसे परिमाप्त ऐसे सर्वत्र सर्वशी बातमको सांहार किया है । इस तर मोक्षमार्गक नेता ' इस विशेषणसे गौर सलबादि महल, द्रम्प, बारमा बस्तिय वादि पर, और मुक मामाको सोमपा गया है। मोठमार्गकि उपरेश करनेका उस मार्ग से गाने कार्य हमारी साकार मुक्त पुरण होकर सकता है, हमेत निराकार बीच नहीं कर सकता। पर करार पर सूचित किया है कि मामा साप परमात्मा हो सकती है-मुक हो सकती है। तया इसस यह सूचित किया कि ऐसे दापाय मुज पुस्प ही बोर कर सकते हैं इससे दारीत बपौरपेय बोरघ लपेप किया गया। 'कर्मवपी पति मेश्न करमेवाम 'बर पर सूषित किया है कि कर्मप पर्वतीक भेदम करनेसे मोपोतो, वर्षार गारने कर्मक पर्वतोंका सपार्य करा पारीरूपसे मेदन किया और उससे पापामुक होकर मोषमार्गका नेता-मोक्षमार्गका बयानपालाएमा । इससे पा सूचित किया है कि बार बार देर पारण करनेका बम-मरणरूप संसारण कारण यो कर्म है, उसके समूह भेवन करनेसे--माश करनेसे-पाको कर देशका मारण करना नही पता । इससे पर बवापा कि मुक मात्मा फिरसे भतार मही शेती। नियतलका हाता -समस्त इम्पपप्पामक मेकाोकच-विसका पागनेवाला- कापर, मुक वाल्माका गा सपर सायकपना बताया है। इससे पह एरित मिया कि मुक माम्प समरूप हो। यो इन गुमासे सहित है, उसे उन गुणोंकी प्रासिके लिये मैं परन करता है'-पाका कर प सचित किया। परम बाप्त मोधमाक पे निवास करने योग्य वन करने पोग्य, मलि फरमे मोम्प तपा बिसको बासापूर्वक चम्नेसे ही सशप मोड प्रश्न होती है उनको प्रगाए गुणों की प्राप्ति होती है गुण प्रगट ऐवे-ऐसा बो कोई मौत मैं उसे बदम करता है। इससे या सपित किपा है कि उक्त गु से सहित मुख परम वास बानो योप है उन सपा मा वा मोक्षमार्ग है और उनकी मजिसे मोक्षको प्रति होता, तथा उनकी भाषापूर्वक बनेपाले भविमानको उनको यो गुण प्रगट एके गुण प्रगट होते हैं। बतरागके मार्गध उपासना करनी चाहिये । ७८० वनक्षेत्र उत्तरहराम बासोरदी९पि१९५४ मा मो मिणरिसामग्मा, रिची साइम देसिया। मोक्ससारमोस्स, साहस पारणा ॥
.८१,१] विविप पत्र मावि संप्रह-रो पर्ष - --भगवान् बिनने मुनियाँको नारचर्यकारक निपापति (बाहाराण)का उपोश किया है ( मी किसहिये ।) केवल मोक्षसाधनके लिये-मुनिको नो देशको मावश्यकता है उसके धारण करने के लिये, (दूसरे अन्य किसी भी हेतुस उसका उपस नहीं किया )। मही णि दरो कम्म, सपनिमा ममि । भाम सज्जासमा विची, एगमच प मोपणं ॥ सर्व बिन मगाने मारपर्यकारक (बहुत उपकारमूत) दपकर्मको निस्य ही करने के रिपे उपदेश किया है। (मर इस तय कि ) संपमफे रक्षण के ठिये सम्पतिसे एक समय नहार लेना चाहिये। -दशकारिकसूत्र प्रयारूप मसंग निर्मपपदके वम्मासको सतत बहावे यना । प्रश्नम्पारण दशकारिक और भारमानुशासनको हामें सम्पूर्ण पक्ष रसकर विचार करना । एक शाखको सम्पूर्ण पाँच नेपर इम्प पारना। ७८१ बनक्षेत्र, लिबासोग म १, १९५१ ॐनमः सनिकम्पोका, तर्कका त्याग करके मनका जप करके कापाका इनियका वारका निदाका निर्षिक परपसे वंतर्मुसति करके बामप्यान करना चाहिये । मात्र नियमाप अनुमवस्वरूपमें छीनता होने देनी चाहिये। सरी कोई चिंतनाम करना चाहिये। चो चोकवादि उठे, उनै पर्म कातक न करते हुए शान्त कर देना चाहिये । ७८२ बाम्पतर मान क्यपूत, किसीबत, बिनकम्पावत, स परमात्र और मानसे म्या, नियतमारके मानसहित, बरबत् , विदेहरित, निकम्पारद सिरत हुए पुरष मगनाम् सम्पका पान करते है।
७३२ भीमद् प्रयन्त्र [.०८ ७७८८ १ बो सर्व बासनाप धप करे या स्पासी । बो इद्रियोंको पशमें रस्से पगोसई । या संसारसे पारणेपर यत्ति (पति)। २ समकिता को बाठ मदों से एक मी म नहीं होता । २ (१) वपिनप (२) मरकर (३) वर्षदग्धता-अपमेने शान न होनेपर भी मा- मेको पानी मान बैठना, और (१) रससम्पता-पन पारसे जिसे एक मी दोष हो, उस गीतको समनित महो ऐता, ऐसा माठाणगसूत्रमें कहा है। . मुनिको यदि म्यान्मान करना परवाणे, तो ऐसा मात्र रम्फर म्पास्मान करना चाहिप कि सर्प समाप ( स्पाम्पाप ) करता है। मुनिको समेरे सन्मापको बाबा र मनमें की पाती है। उसके बदले म्यामपानरूप ससापको, उचे सरसे मान, पूना, सत्कार, बाहार मादिको अपेक्षा बिना, केयर निष्काम पिसे बाहमापक ये ही करनी चाहिये । ५ क्रोध वादि कनापन अब उदप हो, तब उसके सामने होकर उसे बताना चाहिये कि दो मुझे स्मादिकास दान किया है। मैं इस तयार न चल्ने दूँगा । देस, में अब तेरेसे पुर करने बैठा। ६ निदा बादि प्रति और कोष वादि बनादि रोके प्रति मत्रिपमाक्से बना चाहिये, सनका अपमान करमा चाहिये । यदि में फिर भी न मानें, तो हमें दूर होकर उपयंत करना चाहिये । पदि फिर भी ये म मानें, तो उन्हें सपाऊमें ( उपयोग ) रखकर, समप पानेपर उन मर राना चाहिये । इस तव पूर परिपस्वमासे पना चाहिये विस्से पैरीका परामय होकर समाधि पुस प्राप्त हो। 0 प्रमुभी पूामें पुप पापे पाते हैं। उसमें मिस गृहस्पको हरियाल पिम मही मफ्ने कारपसे उनका उपयोग कम करके प्रमुको घर बना सकता है । पागो मुनिको तो पुष्प चदाने मपला उसके सफदेशका सर्पपा निषेध दी है। ऐसा पूर्ण चापाका प्रवचन है। ८ कोई सामान्य मुमुक्षु मई-पान साधन लिफ्पमें पूछा तो उसे पे साषम बताने चाहिये (१) सात म्पसमा स्पाग (१) सनादेश गौर 'परमगुरको (२)रपाका स्पाग पाँच पाँच मालमों की जाप (१) कादम्य स्पाग ७) मठियस्प दोहाका पठन-मनन (१) बमपका पाप (८)xक्षमापनाका पाठ (५) रात्रिमोसनका त्पा (९) सुसमागम और सशाम सेवन सिम्मति ' युग्मति, मुक्ति परिणिमापति' और 'सम्पदुस्थानमा करेंति इस शौक गस्यका चार करना चाहिये । सिन्ति वात् सिम होते हैं। उसके बादमें बुम्मति मात् बोधसहितानसहित-होते है। वहमारे सिर होनेके मार कोई उसकी १४ xमेममाथा५नुसार ७.१] पिपिप पत्र भादि प्रह-पों पर्प ७३३ शूम्प (बानगीत ) दशा मामते है, उसका मुख्शति से मिपेभ किया गया है। इस तर सिद और मुर हानेक गाद ' मुबति' वर्षात ये सर्पकमसे पीत होते हैं, और उसके पश्चात् परिणिमा- यति ' वर्षात् ने निर्माण पाते हैं-कर्मरहित होमेस वे फिरसे बा-अवतार-पारण न करते। मुक गोत्र कारणमिशेषसे मरतार धारण करता है'स मतका 'परिणिमाति' करार निषेध किया है। कारण कि ममक कारणभूत कर्मसे जो सपा मुफ हो गया है, यह रिस मा धारण मही करता) पोंकि कारणके विना कार्य मही हाता । इस तय निर्माण प्राप्त जीव ' सम्पदुक्साणर्मत करेंति'-वर्या सर्व इसोका क्त करते हैं उनके दुसका नया वमान हो बावा है- मान सामाषिक पुस मानन्दका बनुमष करते है पर करकर ' मुक्त वामानोंको फेस एल्पता हो, मानन्द नही' इस मतका निषेध किया है। ७७९ + इणमेम निग्गर्य पारपणं सर्व मणुचरं फैनसिप परिपुष्णं संमद अयाज्यं सहा- वर्ण सिटिमर्ग मचिमग निजाणमर्ग निमाणमगं अपितामसंदिर्द सम्पदुक्खापहीणमर्म । एवं ठिपा जीपा सिझति पुति सपंति परिणिम्मावि सम्पदुमलाममा रवि । मा- गाए बरा गछामी वा घिद्वामी वा णिसीपामा वहा सुमामो परा मामो वा मासामा वा अमाहामो वा रसाए उमाचि पाणार्ण भूपार्म जीपाण सपाणं सममेगसममामाचि (२) १ भानतिमिराम्पानो सानामनामसाकया । नेममुन्मीसित पेन वस्मै भीगरसे नम ॥ --जो बहानरूपी तिमिर (वकार ) से भरे, उनके मेत्रोंको मिसने शानरूपी अमनको सलाईसे सोडा, उन भीसगुरुको नमस्कार हो । २ मोक्षमार्गस्प नैवार मेचारं कर्मस्मृताम् । मातार विनवत्याना दे दुगसम्पये ॥ - मोसमाकि नेता ( मोश्चमार्ग सामेवा ), कर्मरूपी पर्वतके मेवा ( मेदनेपाले ) वीर समम तत्वोंक हाता ( जाननेवाले ) को, मैं उम गुभोंकी प्राप्ति के लिये ममस्कार करता है। या ' मोधमार्गके नेता ' काकर, बामाके अस्तितसे लगाकर उसके मोक्ष वार मोरे + या निमयप्रावन पाए भनुपर-मसि पूर्ण ! म एमपिन को पाने में चार न दिम मार्ग है सुतिका मर्म . भावगमनपल नेम मार्ग मार्ग मरिण और सर्व हरिएर प्रोन मार्म है। इस मार्ग सिट और पित पोल मत मुख हे न पाते। मरममता मापी गरम गीय उपखो । उत्पनेने रख तय हो । सी वरा मेमन उसी वप पोलो । उटी कप तापमानात प्राधि ले और उसी कप उटवे । तमा उत तय उम्मे हुए मिले प्रच-मस-र- परिण न हैऐत संगमहा मापन -मनुपए भीम परवद्र [.. उपापसहित समस्त पोको, मोमपात भातको, उपा गौर भाव वादि सब लोको साकार लिया है। मोक्ष की पेशा रखता है, सपा बर बपके कारण भामा पुष्प-पाप धर्म, और संभमेवाम निस्प बानिमाची बारमाती, मोशकी मोशके मार्गकी सबरकी मिराको और अपके काममा र करमेरुम उपायको अपेक्षा रखता है। किसने मार्ग देसा गाना गार वनुमत्र किया है, मेवा हो सकता है। अर्पात् ' मोनमार्गका मेवा' काकर उसे परिपास ऐसे सम सर्व-शामातगो साकर किया है। इस पर मोक्षमार्गक नेता'स पिरोपणसे गौर अमाल बाद नरवत म इम्प, मामात्र बस्मिल बादिर पर, मोर मुख मामाको स्वीकार किया गया है। मोक्षमाकि उपोध करनेका उस मामि जानेका कार्य पारी साकार मुछ पुरुष होकर सकता है, दाररत निराकार गौच मी कर सकता। यार या सूचित किया है कि मामा स्वयं परमात्मा हो सकती है मुच हो सकती है। सपा इसस पर सुमित किया है कि ऐसे दोषारी मुळ पुस्प हो योर कर सकते हैं, इससे देशयीत वपीरपेस बोपका लिपेप किया गया है। कर्मरूपी पति मेग्न करने ग्रम' पर पा सूचित किया है कि कर्मस्प पतिक भेदम हामेसे मोक्ष होता है। वर्षात् भागमे कर्मरूपी पर्वतोंका समर्प रा देहसारुमसे मेदन किया, पौर उसस या गाम्मुक्त कर मोझमार्गका नेता-मोक्षमार्गका बतानेपामामा से यह सूषित किया है कि मार मार देर पारण परनेछ बम-मरणहम ससारका कारण मो धर्म है, उसके सा मदन करनेसे-नाश करनसे-पीबको फिर देहका पारण करना मही पता । इससे मारता है कि मुठ बारमा फिरसे वरतार महोती। निषका हाता'-समस्त इम्पपर्णपात्मक होकारोक्का-विसका-जानमेषाग- करकर, मुछ बाराक बता सपर अपकपना बापा है। इससे यह सूचित किया कि मुक कामा समानरूप है। मा इन गुणांसे सहित है, उसे उन गुणोंच प्रासिक पे में बदन करवा'पहर कर पित किया कि परम पाप्त मोक्षमाके किये पास करने पोम्प रन परमे पोम्प, मधि करने पौम्प तथा विसरबागापूर्वक चल्नेसे निःसंशप मोस प्रास होती है उनको प्रगट ए गुणोंध प्राप्ति होती है- गुण प्रगट ऐते हैं-ऐसा कोई मी हो, मैं उसे बेग्न करणा से या पित किया है कि उस गुणों से सरित मुच परम बास कदम के पोप है-उमद्या बापा पुमा प मोधमार्ग है, और उनकी मतिसे मोक्षको प्रासि होती है। सपा उनको नापाक नेपाले महिमानको उनको यो गुण प्रगा ये गुण प्रगद रोवे । ३ मार मार्गकी उपासना करना चाहिये । ७८० बरक्षेत्र उत्तरराम बासोपारसी १९५४ ॐ ममः मा निरिप्रसाबरमा, रिची साइम रेसिया। मोगमसागोगरम पास्म भारणा ॥
.८१,...] विपिप पत्र मादि संग्रा-रयाँ वर्ष ७.५ --मगवान् बिनने मुनियाँको वारपर्यकारक निप्पापापि (माधारण)का उपरेश किया है (पा भी फिसखिये !) केपछ मोक्षसाधनके पिये-मुनिको मो देहका बापकता है उसके पारण करनेके लिये, (सरे अन्य किसी भी उसे उसका उपदेश नहीं किया )। महो णि सो कम्म, सम्पमिण पण्मियं । माय बनासमा विची, एगमर्च व भोयर्ण ॥ सर्व दिन भगवाने माश्चर्यकारक (अनुत उपकारमूत)वपकर्मको नित्य ही करनेके रिपे उप किया है । (रह इस तर कि) सयमके रक्षण के लिये सम्पालतिसे एक समप बाहार सेना पाहिये । -दसवैकालिमसूत्र वयाम्म बसग निर्मपपदके सम्पासको सतत बहाते बना । प्रलन्याकरण दशकालिक वीर भारमानुशासनको हाम्में सम्पूर्ण पक्ष रसकर विचार करना । एक शामको सम्पूर्ण गोप नेपर सरा विचारमा। ७८१ मन्त्र, वासोज मी १, १९५४ ॐनमः सर्व विकम्पोंका, तर्कका त्याग करके मनका पचनका कायाका जय करके निदाका निर्षिकपरूपसे वतर्मुसापि करके भारमम्मान करना पाहिये। मात्र निरामा बनुमवस्वरूपमें सीनता होने देनी चाहिये। सरी कोई रितनान करना चाहिये। मो गोतई बार उठे, उन दोर्म कातक म करते हुए शान्त कर देना चाहिये । ७८२ वाम्येतर मान भवन, विदेहविक, निनकम्पोचव, सर्व परमार और रिमावसे म्पाय, नियतमा मानसरित, भरपनाए, शिसत्, दिनसम्परित विकले पुस भगवान् तरुपका प्यान करते हैं।
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पत्र .१३,.५४] विविष पत्र भादि संग्रह-३२षौ पर्प ७३९ पार घातियोंका धर्म भरमाके गुणका पाठ करना है, अर्यात् उनका धर्म उठ गुणको वापरण करनेका, उस गुणके मऊ-मार्यको रोकनेका, भयगा उसे निकल कर देनेफा है; और इसठिये उस प्रह- विको पातिसबा दी है। जो मारमाके गुण हान और दर्शनको बावरण करे, उसे वनुमसे पानावरणीय दर्शनावरणीय माम दिया है। मंसराय प्रकृति इस गुणका भाकरण नहीं करती, परन्तु गा उसके भोग उपमोग वादिको-- उसके पार्य-वठको-रोकती है । इस जगह भरमा मोग आदिको समझती है, जानती-देखती है, इसलिय उस भावरण नहीं बता । परन्तु उसफे समझते हुए भी, ५ प्रति भाग आनिमें मिल- अंतराय-करती है, इसलिप उस आवरण म कहकर भवराप प्राति कहा। इस तरह धाममाविको तीन महतियों हई । घातिकी चौथी प्राति माइनीय है । यह प्रति बावरण नहीं करती, परन्तु बारमाको ममित कर-मोहित कर-उसे विफल कर देता है बान-दर्शन होनेपर मी-पतराय म होनपर मा-मामाको पप कमी मी किस कर देती है, वा पा बमा देती है, म्पाकुस कर देती है, इसलिये इसे मोहनीय कराई। इस तरह ये चारों सर्वपातिकी महतियों कही। दूसरी चार प्रवियों, यमपि मारमा प्रदशोंके साथ समय है, ने अपना काम किया करती है, भौर उदयानुसार बेदम की जाती है, क्यापि वे उस मारमाके गुणको आवरण करमेरुप, अपना वराप करनेरुप, मपा उसे रिकस फरनेवप घातक नहीं, इसलिये उन्हें माविको ही प्रावि कहा। ७९३ मोरबी, फागुन सुरी १ रवि १९५५ अनम (१) नारूप निम्ता-इस परणका वर्ष पीतरागमुका भूपफ ।। सपाडणेकर परिसे स्थिरता प्राप्त होनेपर सकपालकिन मि मी मुगमता होता है।दशनमोहका बमुभाग पानेसे सम्पासोकन पति होती है । मइस्परुपोंका निरन्तर अपमा विशेष समागम, चौतरणभुतचितान, और गुण-विज्ञासा, ये दर्शनमाहके भनुमाग घटनेफ मुम्य हेतु है । उससे सम्पादि सइनमें होता। (२) गौष पदि शिथिलता पाने का उपाय तो पर सुगम है। बीतरगतिका अभ्यास ७९४ बागीमा, फागुन पदी १० दुध १.५५ शामायाको बाप का फलीमन को सम्मा है, इस मान स्पिर विवमे रिपारना पाहिये, र नमुक असलियोन प्रपम बमय हो निरोध करना चाहिये । इस निरोधक हेतु पनामे अनुसरण करना चाहिये। उसमें प्रमाद करना योग्य नही | ७५८ भीम परवान [पर .८८,(..).. (31) .११ ७८८ ईरय, मगसिर दी १५ गुरुवारको समरे १९५५ क्नस्पतिसपी त्यागौ, अमुक ससे पाच नस्पतियोंकी रामें छह रसकर, बाकी दूसरी पनस्पतियोंसे रिक्त होनेस बाबाका पतिकम नहीं। सऐप, सद्गुरु, सत्याचको मति बममतरुपसे उपासनीय । में पक्ष निज अनुममस्वरूप इसमें सशम हो क्या' उस अनुमबमें को विपरिषफक न्यूनाधिकता होती है, यह परिर हो नाप तो केवल असंगार स्वानुमप स्पिति थे। अप्रमच उपयोग कैसा हो सकता है। अप्रमत्त उपयोग होनेके के प्रतीत है। उस तप पर्तन किया नाता है, पर प्रश्न समताव है। बेसी वविपिन पाप ग्रे, तो मुत बानसस्प बनुमन सुस्पर समपस्थित रहे। ७९० ईम पोप फ्दा १५ गुरु १९५५ (१) सोमें प्राण किपे हुए मिपमानुसार को हरिया पिरतिमापसे बापरण करना चाहिये । रोगों के पार करने के नियमको शागरिक उपविशेषके बिना मेधा निशाना चाहिये। गेमोर पाको शारीरिक हेवसे प्राण करनेमें बाबाका वतिकम नहीं। (२) परि सदोष भा गया तो उसका प्रापपित stor- पोप है। (१) मुमसुमोको उम मुनियों के समाप नियमादिका प्रहम करना चाहिये । 'मुनि वादि समाप मा ७९१ प्रातिके कम्पोंके प्रति मिति । संग और स्लो-पारो तोड़ना (बतिसप कठिन होते हुए भी उसे बोला, क्योंकि दूसरा को उपाय म। मासंका-या अपनपर स्नेह रखता है, उसके प्रति एसी कर शिसे न करना, क्या रुसमय अपया नियता नहीं है। समाधान:- मोरबी माप बदौ ९ सोम (रात) १९५५ मकी मूह प्रातिपा माठ वनमें चार पातिकी और और चार नमाविको कहा जाता है। ७९२ पा ११,७९४] पिषिष पर भादि सपा-३२पौ पर्प चार घातियोंका धर्म मारमाके गुणका घात करना है, अर्यात् उमका धर्म उस गुणको बावरण करनेका, उस गुणके बम-मार्गको रोकनेका, मपवा उसे विकास कर देनेका ह, वौर इसलिये उस प्रा- सिको धातिसबा दी है। यो भारमाके गुण पान और दर्शनका बावरण करे, उसे अनुकमसे हानावरणाप दर्शनावरणीय नाम दिया है। तराय प्राति इस गुणका बावरण नहीं करती, परम्तु वह उसके भोग उपभोग आनिको-- उसके वीर्य-सको रोकती है । इस जगा वरमा मोग बादिको समनती , मानती-देसाती है, इसलिये उसे वापरण नहीं राता । परम्तु उसके समझते हुए भी, यह प्रति भोग आनिमें मान- अंतराय करती है, इसलिये उसे भावरण न कहकर भतराय प्रहवि कहा है। इस तरह धामपातिकी तीन प्रातियों हुई । पाविकी चौपी प्राति मोहनीय है। यह प्रकृति पावरण नहीं करती, परन्तु बारमाको मश्रित कर-मोहित कर उसे किस कर देती बान-दर्शन होनेपर भी-भतराप न होनेपर मी-आत्माको यह कमी मौ विकर कर देती है, यह उम्ला फा बा देता है, म्पापुल कर देती है, इसध्येि इसे मोहनीय कछौ। इस तर पे चारों ससंघातिको प्रातियों कही। दूसरी पार प्रातियों, पयपि मामाके प्रशोक साप सकर है, ये अपना काम किया करती है, और उदपानुसार मेदन की जाती है, तथापि ये ठस बारमाके गुणको बावरण करनेहप, बमा बतराय करनेत्म, मपा उसे विकारनेरुप घातक मही, इसठिये ठमें वनाविकी ही प्रावि कहा। ७९३ मोरबी, फागुन सुदी १ रमि १९५५ नम (१) नाम निरान्ता--इस चरणका वर्ष बीवयगमुगका सूचक है। सपापोकन रिसे स्थिरता प्राप्त होने पर सहरावलोकन प्टिमें भी भुगमता होती है। दर्शनमोहका बनुमाग पटमेसे सम्मानकोकम रहता है। मापुरूषोंका निरन्तर वपत्रा विशेष समागम, पांतरभुतषितान पौर गुण-विासा, ये दर्शनमाइक क्नुमाग पटनेफे मुरूप हेतु है। उससे सम्पटि मायमें ही होती है। (२) बीच परि शिपिलता पटाने का उपाप करे वो पर सुगम है। वीतरागपिका बम्पास ७९४ जाणामा, फागुन वदी १०नुष १९५५ मामायीको पोध का फर्गस्त हो सकता है, इस मावको स्थिर चितसे Aधारना चाहिये, पर मुस्मस्म है। अमुक ममातियोंका प्रथम बनस्प ही निरोध करना चाहिये । इस निरोषके देवका पतासे अनुसरण करना चाहिये, उसमें प्रमा करना योम्प मही।
Go भीमद् पसपन्द्र ७९५ बयाणांमा फागुन वदी १५ १९५५ xपरमापर्व हो परमकरण वमा, ममपरिगति परिपाक रे । दाप टने ने रष्टि सुखे मसी, मापति प्ररचनबाफ रे ॥१॥ परिचय पाविकपात साधु, अषस भपचय घेत रे । अंप मध्यावम मरण मनन करी, परिधीग्न नप हेव ॥२॥ एग्प सुगम फरी सरन सस्वय, सरन भगम मनूप रे । देमी कदापित सरफ पापना, मानंदपनरसम्म रे ॥ समबधिम-स्तवन ॥ -आनन ७९६ पाणीभा क्षेत्र सुदी १, १९५५ उपसंतस्सीममोहो, मग्गे निणमासिदम समुरगदो। णापाणुममापारी, निमाणपुरं पजदि पीरो ॥ -निसका दशनमोह उपशात मयका माग हो गया है, ऐसा पीर पुरुप पावरगोश प्रदर्शित मार्गको अंगीकार कर, शुद्ध चैतन्पसमाव परिणामी होकर मोधपुरीको माता ।। ७९७ पापामा म मुदो ५, १९५५ सम्पानुपोग परम गमार और सम्म , निर्मच प्रबचमका यस्पौर उम्प्पाना मनाप कारण है। सपानसे केवणाम समुपम होता । महामनपसे हो उस प्रप्पानुपोगकी प्राप्ति होती है। दमानमोडका बनुभाग पटनेसे अपना नाश होनेसे बिपयोंके प्रति उदासीनतासे, बीर महान् पुरुषाके परम-कमयको उपासनाक बसे तम्पानुपाग फल देता है। पों म्या सपम पर्षमान होता है, त्यो स्पो ट्रम्पानुयोग पपा फल देता है। सम्मको पिका कारण सम्पदर्शनको मरता है। उसका कारण मी प्रम्पानुयोग होता है। सामाम्परपम इम्मानुपोगही पोम्पता प्राप्त करना दुर्गम है। भारमाराम परिणामी, परम वगग विभौर परममग ऐसे मारमा पुरुष उसके मुम्प पार। मे (मष भोर मनर माय) HRA प्रमनपरनेमा मन्तिम यो पता है उसे असम मपूर्व भोर मनाति मामो परमरले. भोर मालिका परिणाम। भी नमम पर होने। रमपीपरी चम्पपीता मो पास माग गनेबारे साधु भाषा परिचय पने रित्तो भनुमानमा मापाचो। तप ऐप रोने जगार मनन मगम चरस र मागाडे समरमराती मनमा मारममाम्पमानिtun मे बोग भगवासी समानुपम नमार उमरा सेन सानुमा राधे मागम मौर माय । नियमान रनणारा सम्मान माना!बापामाtun पर ०९., (.९९)] विपिन पर मारि संग्रह-श्यों पर्ष ७४२ किसी महापुरुषके मननके रिये पमानिकायका सशिन ममप किया था, उसे मनन करनेके लिये इसके साथ भेजा है। हे वार्य ध्यानुयोगका फल सर्वमानस रिराम पानरूप मपम है-इस पुरुषक इस बपनका कमी मी अपने वतरणमें शिविष्ठ न करना । अधिक स्या' समाधिका गम्प यही है। सर्व दुसोंसे मुक्त होने का उपाय यही है। ७९८ पवाणीला, क्षेत्र २ गुरु १९५५ हवार्य ! वैसे रेगिस्तान उतर कर पार हुए, उसी तरह भव-स्वयभूरमणका तर कर पार होगा। ७९९ सपर उपकारके महान कार्य अब कर । चीप्रवासे कर ले ! अप्रमत्त हो -अप्रमत्त हो। स्या बार्पपुरुषोंने कालका क्षणमरका मी मरोसा किया है। हे प्रमार !! जर तू बा, गा! हे प्रापर्य! बाप्रसम हो, प्रसन हो। हे म्यमधरोदय ! वर प्रसता उदय बाकर मी पति हो, यत । हे दीर्घसूबता ! सुविचारके, धीरनके और गमारताके परिणामकी क्यों इस करती है। हे गोमगीय ! त् भस्पत हस्वामसकात् प्राधिकर, प्राति कर । है बाम ! मब दुर्गमको भी सुगम समाबमें गफर रस ! चारित्र | परम बनुमा कर, परम अनुसार! रे योग ! तुम स्पिर होमो, स्थिर होगो ! हे पान ! निजस्वमायाकार हो निमसमावकार हो। हे म्पपता ! तर हो बा होगा । हे कप अयका मप्प पम्प कपाप ! बा तुम उपशम हरायो ! मीण हामो ! हमें तुम्हारे प्रति को धि महा यो! रेसहपद ! यपार्प सुप्रतीतिरूपसे एयमें प्रवेश कर। हे वसग निग्रंथप सामाविक म्यगाररूप । हे परमकरणामप सन परम दितके मूम बौतमगधर्म ! असम हो, प्रसन्न ! भामन् ! तू निनस्वभावाधार हरिमें ही अभिमुम्स हो, ममिमुख ! हे पपनसमिति को कापस्थिरता रे एतबास ! और वसगा | तुम भी प्रस्म हाबो, प्रसम दोनो। सत्रग मचाती हई गो बाम्पवर वर्गणा है, या तो उसका बम्पतर ही बैन कर मेना चाहिये, मपया उसे सा पुट देकर उसका उपयम कर देना चाहिप । म्पो म्पों मिला बम्पान हो, स्पों खो प्यान मठमान हो सकता है, कार्य यसबान हो सकता है।
भीमद् रागवान [पत्र ८०० मोरया चैत्र १७, १९५५ (१) विशेष हा सके तो बच्छा। बानियोंको समाचरण मा प्रिय है। विकल्प करमा ग्य मही। (२) 'बाविस्मरण' हो सकता है। पूर्णमा जाना मा सकता । बाविहान है। (२)विपि पालना चाहिये । (१) जैसेको तैसा मिकता है। जैसेको तैसा बचा भगता है। • पार पधर वे पदने, मधुकर मासवी मोगी रे। विम मपि सहनगगे होमे, उत्तम निमिचसमोगी रे ॥ (५) x परमार हो परमफरम तपा, ममपरिणति परिपाकर। दोप टने ने घष्ठि ससे मति मसी, मापति प्रमपनराकरे ॥ ८०१ मोरमी, चैत्र नदी ८, १९५५ (१) पानसमुखप वौर तलास्त्रका बाग करना। योगशिसमुपप (सम्माप) को मुसाम कर विचारना यौम्प है । पे गियो बामदशा-मापक (धर्मामीटर ) पत्र। (२) समसको माल समझनेवासे मूस करते हैं । शास अर्थात् शास्ता पुरपके वचन । इन चनों समक्षनेके सिप रधि सम्पा चाहिये । ' में बान 1, मैं मम । ऐसा मान मनसे, ऐसा विमनसे, दूप नही हो जाते । वधूप होनेके लिये स्याल बारिका सेवन करमा चाहिये । (३) सदुपयाको पात बहरत है। समुपदेयको बात गत्पत है। (0) पाँचसो-गार सो कठस्प करनेसे परित मही बन जाते । फिर मी घोड़ा गान- कर गुरुका ढोग करनेवाला पंडिताच टोटनही है। +(५) नुको समिपातमा है। ८०२ मोरबी, क्षेत्र पड़ी ९ गुरु १९५५ (१) नामरित पति दुर्सम -देमा जानकर विपारवान पुरुष उसकी अप्रमत्तमानसे उपासना करते हैं। (२) माचाएंगम्बके पद पापके सर्वपमे पर्चापन भादि हैं। पात परके योगे दिनोंमें किमी की तससे उसका समान प्रकट होगा ! र पपत्रे पाना है ममम मातमको चासारख सय माप रचम लमind जरी xमामी... + १९५९ मारनामा-अनुचरम विविप पत्र मादि संप्रह-३२यो पर्व (२) पदि परमसत्को पोका पाँचती हो, तो स विशिए प्रसगके उपर देयता गेग पण करते हैं, प्रगटरूपसे मी बात है। परस्तुगत हो योरे प्रसगोपर । पोगी अपना क्सी विशिए शजिवाला उस प्रसगपर सहायता कर सकता है, परन्तु बहानी तो नहीं है। चीनको मतिकल्पनासे ऐसा माश्म होता है कि मुझ देवताके दर्शन होत , मेरे पास देवता माता है, मुझे उसका दर्शन होता है। परन्तु देवता इस तय दिसा माही देते । ८०३ मोरबी, चैत्र वदी १०, १९५५ (१) सरेके ममकी पर्याय जानी ना सकती है। परन्तु यदि अपने मनको पर्याय चानी गा सके, तो दूसरेके मनकी पर्याय चानना मुधम है। किन्तु अपने मनकी पाप गानमा भी मुश्किल है। पदि खमम समझमें वा चाय तो पवश हो सकता है। उसके समझने के लिये सविचार और सतत एकाप उपयोगकी नसरत ।। (२) बासमजपसे (स्थिर बास्न र करनेसे ) उत्पानातिका उपशमन होता है उपयोग पपसतारहित हो सकता है निदा कम हो सकती है। (३) सूर्य प्रकाशमें जो वायफ बारीक सूक्ष्म रबके समान माम होता है, वणु नहीं, परम्तु से बनेक परमाणुभोंके बने हुए कम है। परमाणु चक्षुसे नही देखा जा सकता । वह पभु इन्द्रियम्बिके प्रकार क्षयोपरामपाले मात्र भएका देशीलम्पि-सफा योगी अपना केलीको दो दिखाई पा सकता है। ८०४ मोरबी, चैत्र पदौ ११, १९५५ १ मोघमासा हममे सोम परस पाप मासको कास्था वौन दिनमें बनई पी। जे पाठके उपर स्याही गिर पानसे, उस पाठको फिरसे सिमाना पड़ा था और उस स्थानपर 'पा पुष्पफेरा पुरपी' इस समय तालिक निधारका काम्य सिखा पा। २ ठसमें जैनमार्गको पपार्प समधानेका प्रयास किया है। उसमें मिनोळमार्गसे कुछ मी भ्यूनारिक नहीं करा | मिससे पीतांगमार्गपर वावाणयको रुचि हो, उसका समप समझमें मारे, उसक बीमफा लपमें रोपण हो, इस हेतुसे रसका बाममोपन्य योजना की है। उस शेगता इस गोपत्र अनुसरण करनेके लिये यह एक नम्ना उपस्पित किया है। इसका प्रशालाप मामफा माग मिम है, उसे कोई बनायेगा। ३ इसके अपने विमा होनेसे प्राहकोंकी माकुलता दूर करने के लिये, उसके बार माश्नापोष पकर, उसे प्रारको उपहारस्वरूम दिया था।
भीमद् यज्ञान [पत्र ८ ६ P कोण ! यी पयो ! समय से मा स! कोना सबपे कळगणा ! गर्नु के ए पदिल' इसपर भी विचार करे, तो उसे नौ तत्वोंका-तरमशानका-सपूर्ण पाप प्राप्त हो जाता है। इसमें तमानका सम्पूर्ण समावेश हो पाता है। इसका शांतिपूर्वक किसे विचार करना चाहिये | ५ बाट यो ठी सेससे कुछ जानकी-विदचाकी तुलना मही होती । परन्तु सामापरपसे जीवों को इस तुम्नाका चार मही। ६ प्रमाद का शत्रु है। हो सके तो जिममरिरमें निपमित पूजा करने जाना चाहिम । स्तमें मोजम न करना चाहिये । बदरत हो ता गरम दूमा उपयोग करना चाहिये। ७ काम्प, साविप वपना सगीत मा कम पदि वामार्प लिये न हों, तो वे पित हैं। कम्पित वर्मात् निरर्पक-बो सार्पक न हो - जाली कम्पनामात्र है।मो मणि प्रपोबम रूप अपना बारमापक सिपे न हो पा सर कल्पित ही है। . मोरबी, चैत्रवौ १२, १९५५ प्रश्न -भीमद् भान दफनजाने श्रीमवितनापीके स्तवनमें कहा है-तरतम योग र वरतम पासमा रे, मासित पोप मापार । पंपरी -सच क्या मर्प है। उत्तर --ज्यों म्पों पोगकी (मन बचन कायाकी) तरतमता वर्षात् अधिकता होती है। (पो त्यों पासना मी अधिकता होती है-पतरतम योग रे तरतम बासना रे' का मर्प है। मात् यदि कोई पुरुप सम्मान योगमासा हो उसके मनोबल बचनबस बार खान हों, और कर किसी पपको पाता हो परन्तु जैसा सम्मान उसका मन पचम बारि योग है उसकी सीमान अपोको मनानेकी पूमा कराने मान सत्कार म बारिकी वासना , वो उस पासमानाका बोष पमित बोप हुवा-पाययुठ बोपामा-- विपप गारिको छाम्सापान पोप एमा- मानके लिये बोन हवा-वात्मापके लिये पबोच न मा । मामानंदपनगी मीभावितप्रमुक स्वा करते हैं कि प्रमो ! एता बापारम्प बो मासित बोनोप मुझे मही चाहिये । मुझे तो कपाप- बित मामासपम वीर मान मा बासनात बोपसरत है। ऐसे पपकी गवेषणा में कर हा। मन पचन वालि समान योगबाले पुरे उदे पुस्प बोषका प्ररूपण परते बास्मे । और प्ररूपण करते। परन्तो प्रमो ! बासनाके कारण का बोध पारित है, और मुझे तो बासनारहित मोपको पसरतोसनावियप माप मार बावनेपा मिन बावरण अमितन ! ऐसा योग तो देश हो । उस तेरे पपका में सोम या!-दर या। यह माघार मुझे चाहिये । (२) बाना पनवासी पीसीसी परम्प करने पोग्य है । उसका बर्ष पचनपूर्वक लिखने पोम्प है। सो जिमना। मनन माँ भाग , मान्य लमला। मिल मासेमा यो शम्दम पर.पर.
पर विपिप पत्र मादि संग्रह-३२पां वर्ष ८०६ मोरपी पत्र परी ११, १९५५ ॐ श्रीहेमचन्द्राचार्यको हुए बाय्सी मरस हो गये। ग्रीमानंदपननीको दोसौ बरस हा गये। श्रीमचन्द्राचार्यने ठोकानुग्रहमें बामसमर्पण किया। भीवानदघननीने वारमहित-सावन-प्रतिको मुस्प बमाया । मीहेमचन्द्राचार्य महाप्रमाक बलवान अयोपशमबारे पुरुष थे । वे इतने सामर्थ्यवान् पे कि चाहत तो एक जुग ही पप पठा सकते थे। उनोन तीस हजार घरोंफो प्रावक बनाया। तीस हजार घर अर्थात् सपा छाससे गलास मनुष्यों की समस्या हुई। मौसानानन्दगीके सम्प्रदायमें कुन एक पास माइमा होंगे । जब एक मारके समइसे सहनानदबीने अपना सम्प्रदाय पथया, दो मोहेमचन्द्राचार्य चाहते तो ग लास वनुयायियों का एक गुदा ही सम्प्रदाय पा सकत थे। परन्तु श्रीहेमचन्द्रामार्पको म्गा कि सम्पूर्ण गीतराग सर्पह तापकर ही धर्मप्रवर्तक हा सकते है। हम ता केस उन तीपंकरको मायासे चमकर उनके परमार्यमार्गको प्रकाश करने के लिये प्रपल करनेवास है। मीहेमचन्द्राचार्पने बीतरगमार्ग परमार्थका प्रकाश करनेरुप छोकानुग्रह किया । पैसा करनेकी जय रत मी पी । बतिरागमार्गक प्रति विमुखता और पम्पमार्गकी तरफसे विषमता या आनिमारंभ ऐ पुके थे। ऐसी लपमतामे छोगोंको बीतरागमार्गकी बोर निराम्ने, गकोपकार करने तथा उस मार्गक रमण करनेको उमें जमरत माझ्म हुई। हमारा चाहे कुछ भी हो, इस मार्गका रक्षण होना ही पाहिये । इस तर उनहोंने अपने पापका अर्पण कर दिया । परन्तु इस वय उन जैसे ही कर सकते है- से भाग्यवान, महारम्पपान, आपापसमबान होकर सक्त है। पुरा गुगा दशनोंको ययात् तोमर नमुक दर्शन सम्पूर्ण सस्पस्वबप है जो ऐसा निश्चय कर सके, ऐसा पुस्प होछोकानुमा पर मार्पप्रकाश बार बारमसमर्पण कर सकता है। भीमकदाचार्यने बात किया । माआमग्नबी उनके छहसी बरस बा में हुए । इस सी परसके भीतर से दूसरे हेमचन्द्राचार्यकी मृारत पी । विषमता प्राप्त होती गा यो पी। काउ उम रूप धारण करता जाता था । मौषष्ठमाचायने गारपुर धमका प्रन्पण किया । गोग गंगारपुक धर्मको मोर हिरे—उस भोर आकर्षित हुए । पौतरागपके प्रति सिमुलता बढ़ती गइ । गगन मनादिसे ही शृंगार बादि निमाणमें मर्ग प्राप्त कर पा है। उसे वैराग्पके स्मुस होना मुश्किल है। यहाँ फिर पर उसके पास भगारको हो धर्मम्पसे रम्मा जाप तो फिर यह रम्पकी घोर किस तर मिर सकता है। इस तरह वीतरागमार्गको विमुस्ता बहो । यहाँ किर प्रतिमा प्रतिपक्ष समाप हो नधर्म, महा हो गया। उसम, प्पानका कार्य बार स्तम्पका पारण ऐसी दिन-प्रतिमाके प्रति सामों एग रि-विमुख हा गप | पीतरागान कथित मधमे विरामित दूर-कितने तो समूह हो संरित किये गये । इस तद इस एहमी बरसफ वरळमें बौनयगमार्गके रक्षक दूसरे हेमवाप्राचार्यको नमरत पी। बापाय तो वन्य मी बातम ए १ परन्तु व मोहमवानाचार्य वैस प्रभावशाली नहीं हुए मर्यात् में मिताके सामने नही कि सके । विपमता बढ़ती गइ। उस- समप दोसौ बरस पूर्व भीमानदफ्नोए। भावान-पनीने सपर-बितमुधिसे छोपकार-प्रकृति भारम की। उन्होंने हम मुम्स प्रातिम मामरितको गांग किया, पर वीतरागधर्म-विमुगता-पिपमना-बानी अधिक बा गई पीक - - ६५८ भीमद् राजपा [८११,(८१९) ८१५ (८१४) ८१५ बारमगुणों के प्राप्त करने का अधिकार उत्पम होता है। परि इस प्रथम नियमझे उपर म्पान रस्सा नाय, वीर उस नियमो ममप सिद्ध किया जाय तो कषाय बासमासे म- पाने योग्य हो जाती है, भपा बानाका माग बाम परिणामी होता है। उसके उपर प्यान देमा योग्य है। ८११ हर, वैशायरी २ मगठ १९५५ उस क्षेत्रमें परिनितिका Aशेष योग हो, तो सियामुषाका बारपार निरिम्पारसन करमा चाहिये-ऐसा मुनिमाको विनयपूर्वक कहना योग्य है। निन वायाम्पतर संगता प्राप्त है, ऐसे महारमानोंको संसारका जा समारो-सस निसदहमानाका निधय है। ८१२ सर्व चारित्र वशीभूत करनेके लिये, सर्व प्रमा दूर करने के लिये, बारमा अपंगति बनेके रिम्पे मोसपी सब प्रकारके सापनों का जय करनेके लिये, 'प्रमचर्य' व अनुपम सहकारी है, अपना मूगभूत है। ८१३ र, हाच पदी १. धनि १९५५ ॐ किसन सास्त क्रियाकोषमामक पुस्तक मिसी होगी । उसका मादिसे भगाकर ततक जम्पयन करने वात् गम मापामें एक परिपपा निवप सिनेसे Rशेप अनुप्रेधा होगी और बसी सिपाका माधरण भी सुगम -यह सस्ता होगा, ऐसा संभव है। रामनगरमें परम तत्ताधि प्रसंगोपात उपदेश एका पा; उसे अप्रमत विचसे बारबार. एकत- पोगमें स्मरण करना उचित है। ८१४ नमः सस पीतरागदेव म :प्प क्षेत्र पर भारम्न म प्रारम सामनेवाला और रग रेप भादि स मा निसके गरोगपी बह ईयर। बड पर ममुप्पटा पात हो सकता।मो सम्पूर्ण पतिराग होकर सम्पूर्ण ना होता है। सम्पूर्ण बातगग भाग सकता है, पेमे हेतु सुप्रतीत होते है। मीपार पेठ १९५५ पानं भांपए मही, नपी पाप पमाप । पीनरागाणी पिना भवर नई पाप ॥
८१५८१०८१८,८१९८९ विविध पत्र मावि सप्रह-- -पौवर बम्बई, म्येष्ठ १०५५ में अहो सत्पुरुषके वचनामृत, मुदा बार एसमागम ! सपम चेतनका नाप्रत करनेवाले पतित होती हुई पतिको स्थिर रमनेबाजे दर्शनमात्रसे मी मिप वपूर्ण समारके प्रेरक सम्प प्रतीति, वपमस सयम और पूर्ण गीतराग निर्षिकस्य स्त्रमाके कारणभूत, वीर मन्तमें बयोगी समान प्रगर कर, धनत अभ्याबाप ससलपमें स्थिति करामेबारे । पिकास जयत बों शान्ति शान्ति ८१७ मर्मा, पेष्ठ मुदी ११ भौम १०५५ (१) मरि मुनि बम्पपन करते हों तो योगप्रतीप प्रषण करना । कात्तिकसानुप्रेक्षाफा योग में बात करफ मिलेगा। - (२) मना फार वे किंकरी रपी, मृगतृष्णामस साक ।। नीम्प पन्म तानु । दासी माशा पिशाषी या सी, कापनाप की सा ।। नीम्पु० । दीसे म्बावा पीता पोसा, नित्से ७ निर्गमन निराकार || नीम्प० । जाणे सव ससाणा तान, मेन होय एसा अवतार || मीम् । मगपासनकर वे भवता, मन्य मावउदरना मार ॥ जीपुं० । तेन पौद लामा पिपरवा, अंदराय काप नर पाप ॥ नीम्यु। रिपिसिपिमो दासिया यह रही, प्रामानव वन समाप ।। मीम्पु० । ८१८ बर्थ म्पेठ गरी २ रवि १९५५ जिम विषयको पर्चा बसती है पर शान है। उसके साथ ययारपुरेप । ८१९ कई ग्पाबरीमुक १०५५ म्याहार-प्रतिषध विक्षेप न पार,पैर्य रखकर उत्साहमान बार्य सम्पनिष्ठ रचि फरना योग्य है। ८२० माहमपी मापदी ८ रवि २०५५ १ इससे सर मा क्रियाकोर नहीं । विशेष वामान करनस सयर्य होगा। - Rो गया है और मोर मयपाले सो ममान मातम ! उनम रीना सभाणम् णिधिनी रानी मोर प्रम पनि नदीपम उमाना है। अपवार नाम पता मोर रोश्वा महिलाई तारे पर Anमन मोर नियम माना म॥ उन महीना मगनी भोर या मा मानव उमा नाम समन पाय पत्रि परी मरायो पाली माता उदरक मारम्न ही उसप बीना म॥ उमेश मेर रिचरण प्रो दुए दी मैं मंदरार महासेठा उमाना ॥ उमरी सस नाम, मोर पसार नाँचमाश, माना है।
भीम मियम [ पत्र | . मेग धर्मको भपमा मानदफ्नयाको पहिचान न सके समक्षम सके। मन्तमें भीवानवधननीकोख्या कि प्रमापसे म्पास मिषमताके योग कोपकार, परमार्थप्रकाश करममें असरकारक नहीं होता, वौर बामहित गौण होकर उसमें पापा बाता है। इसलिये मामहितको मुस्प करके उसमें ही प्रापि करमा पोम्प है। इस विचारणासे बम्तमें दे फसगो रकर नमें पर दिये । पनमें विपरसे मी ने अप्रगटरूपसे राम्र पौलासप वादिक परागेकोपकार तो कर हो गये हैं। निफरण छोकोपकार या महापुरुषोंका धर्म है। प्रगटरूपसे ग मानंदपनगीको पहिचान न सके । परन्तु मानदफ्नगी मप्रगट यकर उनका शिव ही करते थे। इस समय तो भीमान पनगाके समय अपेक्षा भी भरिक विषमता-पोतरागमार्ग विमुपया-पास हो हो। (२) भीमानंदघननीको सिमातियोष सीज बा । सेताम्बर सम्प्रदायर्मे थे । यदि पूरणि भाष्य मम निर्पकि, रचि परंपर मनुमय रे स्पादि पांगीका नाम उमके मानमिनापनी के स्तवनमें नवाया होता, तो पह मी सबर म परती कि सेताम्बर सम्प्रदाय के थे या रिगम्बर सम्प्रदायक! . प्रभा- - ८०७ मोरबी की १५, १९५५ 'इस भारतवर्षकी बमोगति जैनधर्मस - ऐसा महीपतराम पाम करते थे—किसते थे। करीब दस बरस र उमा बहमदावार में मिगप मा वो उनसे प्रण प्रश्न --माई । मधर्म स्पा हिंसा, सत्य, मेठ, म्पाप, नीति, भारोम्पप्रद माबार पान, बम्पसन, मौर उपम बादिका उपदेश करता है। उत्तर. - ( महीपतरामने उत्तर दिया )। --भाई। जैनधर्म क्या हंसा, असम, चोरी र, पाप, पनौति, निरुत मजार- बिहार, विषपामासा, बाम्स-प्रमाद बादिका निषेध करता है। महफ्तरमा प्रभ –देशका मधोगति किससे हावी या हिंसा सप, मेग, पाप, नौति, तपा को मापेम्प प्रदान करे और उसकी रक्षा करे ऐसा एक सादा बारार-पान, और सम्यसन उपम मारिस देशका भोगति होती है। मपका ठस्से विपरीत Rसा असाय, व पाय, बनीति, तथा जो भारोपको विगारे और शरीर-मनको मशक करे ऐसा विस बाहार-भिार, पौर म्यसन, मास-प्रमा' बादिष्ट देशको वषगति रोती है। उत्तरासरेसे) बर्षात् पिरत हिंसा भरप, र, प्रमाद यादिसे ! प्रभ तो कर पा इनसे उल्टे बरिसा, सत्प, मेए बम्पसन, उपम भादिस रेराकी उमति होती! उत्तरा। प्रभा-सोपा मैनधर्म सा उपदेश करता कि शिससे देशको अधोगति । पा र ऐसा उपदेषा करता कि जिससे देशकी उमति हो। मौग शौर, ८ ८ ८१,८१ ] विविध पत्र मादि समाह-३खों वर्ष उचर ---भाई ! मैं कच्छ करता है कि जैनधर्म ऐसे सावनोंका उपरश करता है जिससे देशकी उमति ।। ऐसी सूक्ष्मसासे विवकपूर्वक मैने विचार नहीं किया या। हमने सा बालकपनमें पादरियोंकी पाठशालामें पासे समय पर सस्कारसि, बिना विचार किये ही एसा कर दिया था- जिस मारा था। महीपतरामने सरमतासे कम किया । सस्य-शोधनमें सरलताको अरूरत है। सत्यका मर्म मेने के लिये दियेकपूर्वक मर्ममें उतरना चाहिये । मोरबी, वैशाख पुरी २, १९५५ ग्योतिपको कस्पित समझकर उसको हमने त्याग गया है। छोगोंमें मारमार्थता पाव अम हो गई है- महीकी तर गगई है। इस सबधमें सार्थक तुसे छोगोंने हमें कर देना शुरू कर दिया । इसलिये बिससे बारमार्थ साप्य म हो ऐसे इस पियको कल्पित-असार्थक समसकर हमने गौण कर दिया, उसका गोपम कर पिया । २ सोग किसी कार्यको तथा उसके काकी प्रर्शसा करते हैं, यह ठक। यह सब कायका पोषक तपा उसके फत्तकि उत्साहको बढ़ानेवाग है । परन्तु साय सायमें इस कार्प, मो कमी दो उसे मी विवेक और बभिमानरहितमावसे सम्पतापूर्वक बताना चाहिये, जिससे फिर कमीका अवकाश न ये, और यह कार्य म्पूनवारहित एकर पूर्ण हो जाय । केवठ प्रशसा गान करनसे ही सिदि नही होगी। इससे तो उम्टा मिप्यामिमान ही बढ़ता है। पचमानके मानपत्र पारिमें या प्रथा विशेष है।यिक पारिपे । ३ परिमापारी पत्तियों का सम्मान करनेसे मिष्पापको पोपण मिताह-मार्गका विरोष होता है। दाझिम्प–सम्पता की मी रक्षा करनी चाहिये । मीनको स्पाग करना नया मही भगता, इम करना मना नहीं पाता, और उसे मिप्या होशिपारी होशियारीकी माते करना है, मान छाना मही उससे वारमार्थ सिद्ध नहीं होता। ८०९ मोरवी, देशास मुरी ६ १०५२ ॐ प्यान चुतके उपकारक साधनका चाहे विस क्षेत्रमें चातुर्मासको स्थिति हानेस भाषाका भतिकम न -पेसा मुनिमी भादिको सविनय काना । निस समुतको बिासा है, यह एभुत पोरे दिनोंमें प्राप्त होना समय है-ऐसा मुनियाको निबेदन करना। पांतराग-समार्गी तपासनापोर्पको तत्सम पुछ करना । पाणीसा पैशाम मुदा ७ १९५५ * गुहलासन रिसे उत्प यता र पदि किसी मी गुमपानको प्रामिको इवा करया हो, तो उसके मूह मूत बमुफ सदाचरणपूर्वफ एना पोप है । उस अमुक निपम 'न्यापसमम आगी विकादि म्पसार ' इस पहिले नियमको साम्य करना पोम्प है । इस नियमके साम्प होनेसे पतसे ५५८ भीम राजधम्म [ ८९१ (८१२) ८५ (८१४) ८१५ बामगुणों के प्राप्त करनेका भषिकार उत्पन हाता है । यदि इस प्रपम नियमके उपर पान रस्सा माय, वौर उस नियमको वपश्य मिद किया गाय तो काय माह स्वभावसे मह परने योम्प हो पाती है, वपमा प्रानाका मार्ग नाम-परिणामी होता है। उसके उपर ध्यान देमा योग्य है। कर, सास दी ६ मगर १०५५ उस क्षेत्रमें पवि निहारिका विशेष पोग हो, तो कार्तिकेयानुप्रेक्षाका बारम्बार मिदिम्पारसम करना ये-ऐसा मुमिनाको विनयपूर्वक कहमा योम्प है। चिनोन पायाम्पतर क्सगता प्राप्त की। ऐसे महामाजको ससारका वत समाप देसा निस्सन्दोवानीका निमप है। ८१२ सर्व चारित्र पामत करके किये सर्व प्रमाद र करके रिपे, वाहमा बसंगति गमेके किये मोबसवपी सब प्रकारके साधनोंका बय करने न्येि, 'प्रपपर्य' बहुत अनुपम सारी बपला मूगभूत है। ८१३ हर वैशाख पदी १० शनि १९५५ ॐ किमनदासबोहत झिपासोप नामक पुस्तक मिग होगी । उस मारिसे गाकर शतक अप्पयम करने के पश्चात् पुगम माषामें एक तद्विषपक निबध सिसनेसे निमेष मनुप्रेसा ऐगी, वीर सी किया माचरण मी मगम है-या पता होगी, ऐसा समय है। रावनगरमें परम तत्वारिका प्रसंगोपात उपदेश वा था उसे वप्रमच पिसे वारवार एकात- योगमें स्मरण करना उचित है। ८१४ नमा सा पीवरागदेष सर्प दम्प क्षेत्र यस भाषा सर्व प्रकारसे चाननेपाम, और मग देव बास विमान मिसके मौण हो गपे। पपईयर है। पापा मनुष्यसमें प्राप्त हो सकता है । यो सम्पूर्ण पातरा हो पर सम्पूर्ण सा होता है। सम्पूर्ण पौतराग पुश मा समता है ऐसे ऐत प्रतीत होते है। मपिपार पेष्ठ १९५५ मैच दंत्र मौपप नहीं, मेथी पाप पसाप । दीवरागाणी पिना भवर न पाई पाप ॥
८१५८१०८१८,८१९ ८१ विविध पा मादि सह-३श्वौ वर्ष पई, ग्येष्ठ १९५५ ॐबहो सत्पुरुपके वचनामृत, मुदा बौर सासमागम ! साम चेतनको बापत करनेवाछे, पतित होती चिको स्पिर रखनेवाले दर्शनमासे मी निर्दोष वपूर्ण स्वमारके प्रेरक सरूप प्रतीति, अप्रमत्त सयम और पूर्ण वीतराग निर्षिकरुप समायके कारणमूता और वन्तमें मयोगी स्वभाव प्रगट कर, अनत अम्यागाष स्वरूपमें स्थिति करामेबारे। त्रिकाठ चपर्वतों!शान्ति शान्ति ८१७ पर्मा, म्येष्ठ सुदी ११ भौम १०५५ (१) यदि मुनि बम्पयन करते हो तो योगप्रदीप प्रवण करना । कार्तिकेयानुप्रेक्षाका योग तो बहुत करके मिलेगा। • (२) मेनो फाळ ते किंकर यह रपो, मृगतृष्णामस सोक ।। मीम्म प प वाई । दासी मारा पिशाषी पा सी, कामकोप है फेदी साफ ॥ मीम्पु० । दीसे सावां पीवो पोसा, नित्से छे निर्गमन निराकार ॥ मीम् । माणे संत ससोणा तेहने, मेने होप ऐसी अपवार ॥ भीम्यु०। मगपापनकर वे भरतो, मन्य मावन्दरनी मार ॥ मीम् । तेने पौद मीका विचरवां, मंतराप कोये नम पाप ॥ मीम्पु० । रिपिसिपियो दासियो पारसी, प्रमामद हे न समाप | मीयु । ८१८ बम्बई, पेष्ठ बली २ मि १९५५ सिविषयको चर्चा चल्तीमान है। उसके साप पपावसरोदय । ८१९ वई म्पेष्ठ बदौ ७ पुक्र १९५५ म्पमार-प्रतिवमसे निक्षेप न पाकर, भैर्य रखकर तस्सहमान बीर्यस स्वरूपनिष्ठ रति करना योम्प है। ८२० मोहमपी, माप मीटर १९५५ १ इससे सर दूसरा किपाकोष नहीं । विशेप वरमोकन करनेसे स्पार्प होगा। •जिला परि दो मपा है, और किले मेक ममत्रपारे बतो समन मम होना है उसका ना मतिको मायामा रिणपिनी पची और काम मेच तिने पीपेग उपना पम्प है। अब सवा पीग मोर गोदामा रिहाई रेखा , मन्तु पे नित्व निरंकन और निराकार उसनगीना पर उठे तमैना न बानो मार गतका पर भारुम मा उसका मीना पम्प है। उसने बमरमे पार मेरे कि मस्तार किया है। पीले गरे मारन हो। उतच मैना कम से पोरा मेम्म मिले हुए रिती में भवराव महाँ होध उतम ना कर है। उसी की सिविन पडयों होगा, मोरगत समयानन मा समाचा, सम भी कम है।
भीमद् रामचन्द्र [८११ ८२२ ८२३ २ शुख वारस्पिति के परमार्षिक मुन और इन्द्रियनय ये दो मुस्स परम्मन है। उनकी मुस्तापूर्णक उपासना करनेसे उनकी सिदि होती है। हे वार्य ! निराणाक समय मारमा पुरुपोका बहुत पारित्र स्मरण करने योग्य है। उमासित पौर्यमान, परमवत्तका उपासना करमेका मुख्य अधिकारी। ३ वप्रमत समावका पारमार स्मरण करते हैं। शान्ति - ८२१ बम्बई, मापात दी ८ रवि १९५५ मुमुक्षु तपा दूसरे जीवों के उपकारके निमित्त यो उपारशीस माम प्रतापको सूचमा- य की है, पर अपना दूसरे कोई कारण फिसी मपेक्षासे उपधारशील होते । हसमें से प्राषि-सभा के प्रति उपशांत चिहै। प्रारम्पयोगसे बो बने पदमी पर समायके अनुसमानपूर्वक ही होना पोय है। मारमाोंने निष्करण करुणासे परमपदका उपदेश किया है। उससे पर माम होता है कि उस उप शका कार्य परम महा है। सब गांवों के प्रति पार दया भी बप्रमय राने रिसके पोगका समान है, उसका बामस्वमात्र सम नो परमपदके उपदेशका वाकर्षक हो-सी निफारण करणालामा यपा। ८२२ बर्थ, बासस) ८ रवि १९५५ नमा बिना मफ्त पाने मही, बिना मपनी बात इस मापका मुस्प हेतु बारमारिसबनी है। यह पाप स्वामाविक उत्सपिके छिपे है। समागमके पोगमें इसका सय समझमें वा सकता है। पा सरे प्रश्नों के समाधान के लिये हासमें बहुत ही कप मति पता है । ससमागमके योगमें उमका समग ही समाधान हो सकता है। 'बिना नपन बादि गाम्पत्र अपनी नियमापनासे पुरा मी विचार न करते मिस्से मुर पैतन्यायिक प्रति यो तिमपि प्राप्त न करे, इस तय वापरण करना चाहिये । कर्मिफेयानुप्रेचा भपता से सशाब मात करके पोड़े समपमें मिगे । उपम पाल बायु बाप है, ससमागम दुर्गमी मामामोंके प्रत्यक्ष पाप परण और भाडाका योग मिना पठिन है। इस कारण बठमाम बप्रमच प्रमाल करना चाहिये । कति एपमा ८२३ बम्बई प्रावण पयो । १९५५ " परमपुरुषको मुम्प मवि ऐसे सदाचरणसे प्राप्त होती है जिससे उतचर गुनासो दिए। परणप्रतिपति (पुरमापरणकी उपासना ) प सावरण बानाय मुस्प बाा है। जो माना परमपुरुपये मम्प मदि।
पत्र ८२४ ८२५ ८२५] विविप पत्र मादि संपर-साँव ७५१ उत्तरोतर गुणों की एदि होने ग्रहमासी बनोंको सदुषमरूप वापिका म्यबहारसहित प्रति करना योम्पहै। पातसे शास्त्र मौर बास्योंका अम्यास करते हुए मौ, चीन यदिशानी-पुरुपोंकी एक एक बाबाकी उपासना करे, तो गतसे धागोंसे होनेवाण फर सहबमें ही प्राप्त हो पाय । ८२४ मोहमयी क्षेत्र, भाषण मुदी ७ १९५५ ॐौफ्मनन्दि शासकी एक प्रति, किसी भच्छे बादमीके हाप, निससे क्सो क्षेत्रमें मुनिमाको प्रश्न हो, ऐसा करना। पमान निविषा दम्य क्षेत्र भादि योगमें उस शारका सुम बारम्बार मनन वोर निदिध्यासन करना । प्रतिमा इम्प क्षेत्र मादिर्म उस शासको बाँचना पोग्य महौं । जब तीन पोगकी अल्प प्राति हो का मी सम्यक् प्रापि हो-तव महान् पुरुपके बचना मृतका ममन परम श्रेपके मूगको प्रकरता है-या क्रमसे परमपदको प्रास कराता है। चिको विक्षेपरमित रसकर परमशत भुतका अनुप्रेक्षण करना चाहिये । ८२५ मोहमयी, माषण मुदी ७, १९५५ मगम्प होनेपर मी सरस ऐसे महान् पुरुपोंकि मार्गको नमस्कार ! १ महान् मायके उदयसे अपवा पूर्वक बम्पस्त योगसे मीनको सभी मुमुक्षुता उत्पम होती है जो पति दुर्गम है। एसबी मुमुसुता प्राप महान् पुस्पोक चरणकमको वपासनासे मास होती है, नपा सी मुमुक्षुतावाली बारमानो महान् पुरुषके पोगसे बात्मनिष्ठमाल होता है-सना- तन ममेत हानी पुरुषोशप उपासित सत्मार्ग प्राप्त होता है। सबी मुमुक्षुता बिसे प्राप्त हो गई हो, उसे भी हानीका समागम और बाधा, वामपयोग करते हैं। मुख्य मोधमार्गका कम इस तय माश्म होता है। २ पर्वमानकामें ऐसे महान् पुरुषका पाग पति दुर्सम है। क्योंकि सचम भासमें मी उस पोगकी दुभता होती है। ऐसा होनेपर भी निस सबी मुमुमुवा उत्पन हो गई हो, रात दिन बाम करपाण होमेका तपासप तिन या करता , पैसे पुरुषको पैसा योग प्राप्त होना मुम्म है। ३ बात्मानुशासन हायमें मना करने पोम्प है। शान्ति ८२६ मई, माइपर मुदी ५ ि१९५५ ॐ मिन बपनोंको बाशा, प्राय पोरे समयमें प्रास होंगे। इनिपानिपके बम्पासपूर्वक समव दौर समागमकी निरंतर उपासना करनी चाहिये। क्षीणमोहपपत हानाकी भावान मादन परम हितकारी है। माय दिनतक तुम्हारे प्रति क्या तुमारे समीप एनेपाली बाईयों बौर भाईयों के प्रति योग के पती- मीमद् पम्पन्न [47 ८२. (२) नो बनबासी-शाब (ी पानन्दि पचर्षिशति ) मेना है, म प्र मिषिके योगमें संपत इन्द्रियम्मसे मना करने से अमृत है। ८२७ मी, वासोग, १९५५ बिनबानी-पुरुयोका देहामिमान र हो गया है, पथपि उमें कुछ करना बाकी मही या, तो मी गर्ने सर्वसंगपरित्याग मावि सम्पुरुषार्पताको परमपुरुपने उपकारम्व का है। (२) भी के प्रति पत्र विसवाते हुए सूचित करना सिर करके वामबाबाद स्थिति करमेमें ममको कोई मय, तोग अपना धोम ना परत हितबुनिसे निपार करनेसे हमारी समि या बावा है कि हाम्मे उस क्षेत्रमें स्पिति करना योम्प नहीं । यदि बार करेंगे तो उसमें बामहिको स्पा बापा होती है, इस बातको विनित करेंगे और उसके लिये भाप करेंगे तो उस कामें ममागममें बायेंगे । वामदाबा का पत्र पर भाप ग्रेगों को कोई मी लोग अपना क्षोम न करना चाहिये-समभाग भी रखना चाहिये । किसनेमें पदि कुछ मी बनममात्र या दो तो पमा करना ।" पदि तरत ही उनका समागम होनेवालाहो तो ऐसा माना कि "बामे पार करनेके संगम नो सिसा सो उस निपयमें वापसा समागम होनेपर वैसा बाप कहेंगे वैसा करेंगे "और समागम होनपर काना कि 'पा की बया परि सपममें पिता की हो ऐसा नापको मारम होता तो बाप उसे बता मिससे उसकी निति की जा सके और पनि बाको पैसा म माम होता होता हो, तोपिर पदि कोई बीच विषममायके वापान होकर वैसा करे, पो उस बात के प्रति न गाकर, बाम भाषपर ही जाकर, प्राधि करना पोम्प है। ऐसा मानकर शामें बामदाबाद क्षेत्रमें मामेको ति हमें पोम्प नही गती । स्पोंकि (१) रगरिपुत माल के पत्रको प्रेरणासे, और (२) मामको एमाले रिमे उस क्षेत्रमें गामे वैसा होता है जो पात वारमा परितको कारण है । राषित् माप ऐसा समावे हो कि जो लोग मसमम बात करते हैं उन गोंके मनमें उमको मफ्ना निमको मूग माइस पोग्ग, पौर धर्मको हानि होती हुई म गावेगी, तो पर एक हेतु ट। परन्तु उसके गाण करमेके किसे परि उपपेक दो दोष न बाते हों तो सापेमासे गोको भूम दूर करने किये शिार करना उपित है । परन्तु एक बार तो भविषमभाषसे उस पातको सहन करणे, नुक्रमसे सामालिक हार होते होते उस लमें बाना बने और किती गोंको नाम हो तो किससे हम निहत हो वाय, ऐसा करना चाहिये । पम्त रागारिवानपोको प्रेरमासे तपा मानकी (माके लिये अपना भविष मय न पनेसे उसे मेकको भूत मिटानेच निमित्त मानमा, ए मामहितकारी नी । इसटिपे रानमें इस बावको उपधत कर मार बताभो कि वित् बगैर मुनियोंकि छिपे किसीने पारो, तो उससे ये मुनि रोपके पात्र महा। मके समागम, मानेसे निगोंको पैसा सह होगा, पा सहन होत हो बापगा अपपा किसी समसको रसे संशो पा सकों पत्र ८१८ ८111 पिपिए पत्र मादि सपा-३२ वर्ष " पक्षके मानके लिये सदेह उपस्पित करे, तो वह विषम मार्ग इस कारण रिचारवान मुनियोंको यहाँ समदशा ऐना ही योग्य है । में पित्तमें कोई क्षोम करना उचित नहीं भाप ऐसा करेंगे तो हमारी वास्माकर, तुमा मामाका, और धर्मका रक्षण होगा । इस प्रकार से उनकी धिमें बैठे, पैसे मोगमें बातचीत करके समाधान करना, और हासमें जिससे वहमदाबाद क्षेत्र में स्पिति करना न मने, ऐसा कपेग तो यह मागे परकर विशेष उपकारका है। पैसा करते ए मी यदि किसी भी प्रकारसे "म माने तो आमाबाद क्षेत्रको भी विकार कर गाना, और उपमके उपयोग, सापचेत एकर भाचरण करना । तुम बविषम राना। , ८२८ मोहमयी क्षेत्र, कार्तिक सदी ५वान पचमी १९५५ १ परमात शुवका मनन निस्प नियमपूर्वक करना चाहिये । शान्ति । २ परम वीतरागोंधरा मारमस्य किसे हुए पपाल्यातचारिसे प्रगट ईवसगताको निर तर म्पधन्यतस्मस स्मरण करता हूँ। ३ इस पमकाळमें सस्समागमका योग मी बति दुर्गम है। वहीं फिर परम सत्संग मोर परम बसगताका योग कासि बन सकता है। १ परमशांत धुतके विचारमें इन्द्रियनिम्हपूर्वक बामप्रापि रसनेमें स्वरूपस्थिरता वापसे प्रगट होती है। समागमका प्रतिबंध करनेके लिये कोई करे, तो उस प्रतिवनको न करनेको इपि बताना, पर योग्य है-पथार्थ है। तदनुसार वर्तन करना । ससमागमका प्रतिबंध करना योग्य नही । तपा सामान्परपसे बिससे ऐसा बर्तन छ कि ठमकी साय सममान पे, पैसा हितकारी है। फिर से उस सगमें विशेप माना म हो, ऐसे क्षेत्रमें चरना योग्य है-विस क्षेत्रमें बहमसाधन पुछमतास हो सके।...ार्या बादिको यथाशकि गो उपर कहा, प्रपन करना योग्य है । शान्ति । । मोहम्पी, कार्तिक मी ५, १०५६ में प्रापिम्पहार ऐसा है कि जिसमें पतिका पपातमा राना मसमय मैसा है। कोई मिण हो बानी इसमें शत सरूप नैष्टिक य सकता इतना बहुत कठिनवासे बनना समा ।। उसमें बम्प मयषा सामाम्प मुममुनिक गीत शत र सके, सरफ्नैष्ठिक र सके, पेसा पयाम्प नहीं, परन्तु अमुक परम्से मी होमेके लिये, विस कम्पासप वामनको भावस्पकया है, उसका समधमें माना, प्रतीति होना और वमुक समावसे मामा स्पिति हाना मी कठिन है। पहिसा कोई पोग बने तो, भार और पदि शुद्ध मैष्ठिक हो तो, इतिका मार्ग प्राप्त हो सकता है, या निधय है। प्रमत समान जप करनके लिये प्रपाम करमा योग्य है। इस संसार-णभूमिमें स्पमकायाप प्रीमके उदपके पोगका पेम न करने की स्थितिका मिरसे नीब ही बम्पास करते हैं।
प्रीमद् पवन [पर ८५ ८३० मोरमयी, कार्तिक सुदौ ५, १९५५ विससे अक्रोिष और एकवा ये पैसा करना प्राहिये और इन सबका उपकारका मार्ग समय है। मित्रता मानकर प्रापि करनेसे बीच सम्टा चम्व।मास्तवमें तो वमिमता है—एकता है--समे सहम समसका फेर होनेसे हो तुम मिमता समझते हो, ऐसी उन बातोंको पदि शिक्षा मिले, तो सन्मुसाति हो सकती है। चमतक परस्पर एकताका म्पपहार ये तबतक पार्मथा करीम्प है। ८३१ मोहमयो क्षेत्र, कार्तिक मुदौ १० गुरु १९५५ हामें में बमुक मासपर्यंत पहाँ बनेका विचार रसता । अपमेसे बनता मान रंगा । अपने मनमें निचित पना। केस ममपख हो तो भी बात है। परन्तु म्पमाप्रतिक्म मनुष्पको कुछ सपा कारण पोरा गात पाहिपे, इसमिप या प्रयत्न करना पड़ा है। सकिये धर्मकीमिपूर्वक पा स्पोमा घातक उदयमान हो तबतक गितमा बन परे उतना बात है। राममें मानसिक पिसे बात ही प्रतिम मार्गमें प्रयास करना पारे। मापसे और शत भामासे साम करनेमें वर्ष मानता । शान्ति । (२) ईर, पीप १९५५ मा सम्भर मा रखामा दुस्सा शनिामस्पेस । पिरमिणमा पिच रिपिचमाणपसिदीए ।। पनतीससीखएप्पणपगमेग घ भवा पाएर । परमहिनापपा मन प एसएसेज ---पशि तम स्थिरताको हम करते हो तो प्रिय अपच अप्रिय बस्तुमें मोर म करा, रगम करोरेपन करो। भनेक प्रकारके प्पानको प्रासिके लिये पैतीस, सोय, प, एक-स तय परमेछापके पाचक मोका अपर्णक पान करो। इसका विशेष स्वस्म भीगुरुके उपदेशसे समष्ठमा चाहिये। +किपिरि पिसी मिरीपपिची रपे भदा सा । मद्णय एयच पदा सस्स मिप सार्म ।। -म्यान एकामावि सर यो साधु निस्थानातिमान् वर्षात् स प्रकार इस रित होता दरसे परमपुरण निथप प्यान कार है। पाँच बार, ३३वाँ वर्ष ८३२ (१) पई, कार्तिक पूनम, १९५६ १ गुरु गणपर गुणपर भपिक, मपुर परंपर और । प्रवतपपर वनु मगनपर, पदो प सिरमौर ।। २ बगद, विपयके विक्षेपमें सहपरिमातिसे विधान्ति मही पाता । ३ बनत अम्पावाप मुसका एक बनम्प उपाप सरपस्य होना ही है। यही हितकारी उपाय पानियोंने देखा है। भगवान् निनने शारगीका इसीलिये निष्पण किया है, और इसी उहएतासे पर पमित है, जयबत है। . बानीके वामपके असणसे उम्मसित हुमा चीन सम-नाको यथार्परपसे मिमस्वकप प्रतीत करता रअनुमत्र करता है—अनुक्रमसे सस्पस्थ होता है। ययावस्थित गनुमा होनेसे यह सहपम्प हो सकता है। ५. दर्शनमोहका माश होनेसे शानी के मार्ग परममति उत्पम होता है-उत्प्राति सम्पन्न पसे उत्पम होती है। ६ तलप्रवीतिसे पुर पतम्पके प्रति टिका प्रभार फिर गाता है। ७ पुर पैतापके अनुमबके लिये पारिप्रमोहका माश करमा योग्य है। ८ पारिजमोह पैतन्यकेनामी-पुरुपक-सुमार्गके नैष्ठिकभाषसे नाश होता है। . मसंगतासे परमारगार वनुमा हो सकता है। १० मार्य मुनिरो । इसी भसंग शुर पैतम्पके ठिये वसंगयोगको वहर्मिनाया करते है। मुनिबरो । जसंगका अभ्यास क्णे। ११ यो महामा बसग पैतन्यमें न हुए है, होते हैं मोर होंगे, उन्हें नमस्कार ! शास्तिः। (२) है मुनियो । बहतक फेरठ समत्रम्पानाप सहरस्थिति सामाणिक न से सम्प, तबतक तुम प्पान और साप्पापमें सीन हो! जोर जब केरल सामाविक स्पिनिमें स्थित दो गाप, ता यहां कुछ रमा बासी नही पा। गो गोरके परिणाम वर्धमान-रीपमान हुआ करते। गौ पान करना चाहिये । वर्षात् पानमें टीनमासे मर्म पानाप्पके परिचपसे विनि पासर निसरफेस एना उचित है। उदपके पवेमे बद प्यान जब जबगप, तब तब उसका मन मे अनुसंधान परमा चाहिये।
N भीमन् पसचन्द्र [८१ बोचके मकारामें स्वाध्यायमें गनता करनी चाहिये । स पर मोमें एक समय मौ उपयोग सगको न पाले, बन ऐसी दशाका मौष सेमन करता है, तब केवमान सत्पम होता है। परम गुणमय चारित्र पारिपे । बम्मान बसंग बार स्वमार परम मिर्दोष बुन परम प्रतीति १ मा विशेषता २ माकि प्रारंमसे माकर ततककी मत सकामना। २ निर्विवाद- १ मुनिधर्म प्रकाश ५ गास्पधर्म-प्रकाश निय परिमानानिधि असमुद्र-प्रदेशमार्ग परम पाकम परम इनिफ्म्य ८३३ (१) वीतरागदर्शन-संक्षेप माणवरण-पद पदको नमस्कार. ममित्र -मोलप्रपोजन उसके दूर होनेरे लिये मिन भिन्न मतोत्र पृथकारण रके देखनेसे उसमें पौत्तराग- पनि पूर्ण और गरिस, ऐसा सामान्य कपमा उस दर्शनका सम्म उसकी गारो बप्राप्ति, मोर प्रतिसे बनास्था होने के कारण मोश्वामिगती गोलो चस दर्शनको से उपासमा करनी चाहिये । बास्पा-उस बास्पारे प्रकार वौर देत विचार-उस विचारफे प्रकार और गिरि [उस विएतिके प्रकार गौर त मम्पस्य बनेके स्पानक उसके कारण बौरमके स्थानक उसके कारण के स्थानक उसके कारण पतित होने के स्थानक उसके करण उपसंहार पापको भपिपता पुतिम म्यापोर, कार नत्र ८३४,८३५] विविध परमादिमा-शों वर्ष (२) स्वरूपोष पोगनिरोप सर्वधर्म-स्वाधीनता धर्ममति सर्व प्रदेश सपूर्ण गुणरमकता स्वांग सपम लोकके प्रति निष्कारण अनुपा ८३४ बई, कार्तिक बदौ ९, १९५६ (१) अवगाहना अर्थात् बागाहमा । वगाहनाका मर्य कर-आकार-नही होता । कितने । तत्तके पारिमापिक शम्द ऐसे होते है कि बिनका मर्य दूसरे शब्दोंसे म्पक नही किया जा सकता। नके अनुरूप दूसरा कोई शब्द नहीं मिम्सा, तपा को समझे तो आ सकते हैं, पर म्यक नहीं केये मा सकते। बगहना ऐसा ही शन्द है। बहुत बोपसे विशेष विचारसे पर समझमें ना सकता है। वगाहना क्षेत्रको अपेक्षासे है। जुरा बनेपर भी एकमेक होकर मिठ गाना, फिर मी पुग पना-स तय सिदारमाको जितना क्षेत्र-म्यापकता है पर उसकी अपगारना कही है। (२) जो बहुत मोगा जाता है, पर बात क्षीण होता है । समतासे कर्म भोगनेपर उनकी निग होती है क्षीण होते हैं । शारीरिक विषय मोगते हुए शारीरिक शकि क्षीण होती है। (१) बानीका मार्ग मुसम होनेपर मी उसका पाना कठिन है। पहिले सपा शामी चाहिये। उसे पहिचानना चाहिये, उसय प्रवाति जानी चाहिये । पर में उसके पचनपर असा रखकर निशक पासे पम्नेसे मार्ग मुग्म है, परन्तु दानीका मिम्मा और उसकी पहिचान होना विकट :- -दुर्सम है। बर्ग, कार्तिक पदौ ११ मगर १९५६ • जाने पम्प ने द्रम्प तो स्त्रमात्र मिम सप्रतीतपणे बने चैने सममाप है; समाप घेन निगमा छे सर्वधमात्र, मया यपण (म) पररन्याय है। एक मनुभवनो प्रकाश उहासित पयो, नापी उसी सेने मामहति पाप ; कापानी निसारी मापा सरपे धामापा एका निर्मपनो पप मा भवनो उपाप । • मोर शप ऐनो समाप दिल मित्र है।इस रोनोगे मुन्नति रोजरी मयत माने वा भासमान । मोर गरेर सम्परा नामले पर इम्पम गरि इस मनुमपम भि प्रभा मालित दुमा। उसी गाने उजन चिसा भामा चिसो मग विमपरगेमगन हो यो । ऐने Aषकमर भर पनपन भीमद् परचय [८५ (२) xदे बाल एकापे मासे मान बरे, क्रियानी प्रति पण तेपी तेम पाप के जीवनी उत्पति बने रोग शोक तुम मृत्यु, दोनो समान नारदमा पणाप छ । एलो वे पनादि एकहानो मिप्पालमान, शानिनो मन यो र ई गाप ; मासे गा पैतम्पनो प्रगट समान मिम, बने ब्रम्प निब निबहपे स्थित पाप । * अगम बरा मे मृत्यु मुल्स हुयना हेतु । कारण तेमा ये का एगझेप भणोतु ॥ (१) + बचनापत दौतरागना परम शतरस मछ। मौषम में मनरेगा, कापरने प्रतिकूळ । (५) प्राणीमात्रका रक्षक, वन और हितकारी, पवि ऐसा कोई उपाय हो वो पापीतरागधर्म हो। संतजनो ! बिनपने क मादिगो समप वर्णन किपा, रतिक मावा पोगाम्पास और ठोक बादिके स्वरूपका निरूपण है। पूर्ण पोगाम्पासके बिना भानगोचर नही हो सकता । इसलिये तुम वपने वपूर्ण जानके माधारसे पतिरागके पास्पोका विरोध करनेवाले मही, परम्त योगध बम्पास करके पूर्णतासे ठस सरूपकाता होगा । ८३६ बम्बई, कार्तिक दी १२ १९५५ (१)ोमुझेशन—महामारीका टीका । टोकेके नामपर देखो गस्टरों ने यह वफान सहा किया है विचार गोवारिको टीके के ग्रामे वेवासे मार खाते हैं, हिंसा करके पापका पोपम करते है-पाप उपार्जन करते है। पूर्वम पापानुबया नो पुष्प उपार्यन किया है उसके योगसेही वर्षमानमें पुम्पको मोगते । परम्त परिणाममें वे पाप होना करते है--सको विचारे साटो पर मी मही है। टीका लगानेसे वा रोग दूर हो नाप तमको वाव तो मया, परन्तु इस समय वो उसमें किसा प्रगट है। टोकन भगानेसे एक रोग दूर करते हुए दूसरा रोग मौजा हो जाता है। xमार व बानो माम मन्दिरमा मचिमीवीराम मच भौर ऐपणे त मानुसाबो पत्र समरमा मानवे परम माम ऐच।। पेण ये मनप्रीमच और दो पल मानने मिनाली मापनीके पनरोपवाय रव समना मौर पम्पतालमा समय मिल मान्म शेने माप और रोना मनसे नीलामम •समयकामालाप मारमा मौत काल + पीचयापचनापत रम सावरलेस मोनी मौरव कास पुगको प्रतिमा।
......] विपिप पर मावि संप्रह-श्या पर्य (२) प्रारम्म वीर पुरुषार्थ शम्द समझने योग्य है। पुस्पार्थ किये बिना प्रारम्पकी सबर fi पा सकती । वो प्रारम्धमें होगा पो ऐगा, यह कहकर मैठे गनेसे काम नहीं पता । काम पुरुषार्थ करना चाहिये । प्रारम्पको समपरिणामसे बेदन करना-भोग ना-या गया स्या है। सामान्य जीव समपरिणामसे निकल्परहित होकर यदि प्रारम्पका बेदन न कर सके, तो पम परिणाम भाता ही है। इसझिये उसे न होने देनके ठिये-कम होनेके स्पेि-उपम करना हिपे । सममान और विकल्पीभाव सरसगसे वावा और पाता है। ८३७ मोहमयी क्षेत्र, पोष कयौ १२ रवि १९५६ महरमा मुनिषक परणका, संगकी उपासना वोर सशतका अध्यपन मुमुखोंकी मारम- को दिका सदुपाय है। यो म्पों इदिय-निमा होता है, म्पों म्यो नितियोग होता है, पों स्पों का सत्समागम र सशात अधिकाधिक उपकारी होता है। शान्ति शान्ति शान्ति । धर्मपुर, क्षेत्र पदी १ रवि १९५६ • पन्प वे सनिबरा मे पास सममाने, मानव प्रानि मळवा वनमनरपने सापा । द्रव्यमाप सपा ने मासे साची मिननी पापा, पन्य के मनिपरा न चासे सममाने । (२) बाप वौर कतर समाषियोग आता है। परम शान्ति । (३) माननासिनि ८३९ श्रीधर्मपुर, क्षेत्र पदी १ पुष १९५६ समस्त ससारी चीन कर्मपशसे सावा वार मसाताके उदपको अनुमत्र किया ही करते है। उसमें मी मुख्यतया तो वसाताका ही उदप अनुभवमें वाता है। चित् अपना किसी किसी देश संयोगमें पचपि साताका कप मषिक भनुमपमें माता दुवा माम होता परन्तु पस्तुत ही मी पर ही प्रमन्तिावा करती है । पूर्णशानी मी निस वसाताका वर्मन कर सकने योम्प पथम योग पारण नहीं करते, सी बनतान्त बसाता इस बीचको भागनी है, और यदि ममी भी उनके कारणों का नाश न किया पाय तो मोगनी परेंगी ही, या सुनिम्चित है-ऐसा चानकर चारवान उत्तम पुस्प उस वरूप साता भार बापायंतर साहेश-अमिनपसे प्रमवित वसाताका वास्पतिक • राम मनिलये समभावपूर्वक पते हैं। ये सर्प मानव और शनि मिच्ने । मिरे मन न भोर कार बेतवा से गम भाव को पानी बोले। मनमानी पी माint| म मिपा पम्मी ममापूर्वक पवे ।।
भीमद् परब [पा ८५९ स्यिोग करके मार्गको गवेषण करनेके लिये तत्पर हुए, और उस मार्गका गोषण कर, प्रती- तिकर, उसका यथायोम्प पापपन कर, वप्पालाप साप मारमाके समन शुर समाचम्म परम पमें न हो गये। साता असताका उदय भयका अनुमब प्राप्त होने के मूड करमोंकी गोषणा करनेवाले ऐसे उम महान् पुरुषोंको ऐसी सिक्षण सानद बारचर्यकारक पनि व्यत होती पी कि सरकी अपेक्षा असाताका उदय प्राप्त होनेपर, और उसमें मा तामास उस उदपके प्राप्त होनेपर, उनका बाम विशेष रूपसे प्राप्त होता पा, उमारित होता था, मौर यह समय अधिकतम्रो कम्पाणकारी समझा जाता था। कितने ही चरणविशेषके योगसे म्पबहारदरिस, रे प्रण करमे पाम्प भौषध मादिको बाममर्यादा हकर प्राण करते थे परम्त मुल्यतया ये उस परम उपशमको हो सोकर बौपषस्मसे उपासना करते थे। (१) उपयेाग म्पमसे सनातन स्फारित ऐसी बाहमाको देहसे (मस और फार्माण सरीरस) भी मिम बमबोकम करमेकी रमिको साप्म कर (२) तम्याामक स्वमान-अस्मा-निरतर देवक समाया होनेसे मापदशाको बक्तक प्राप्त न हो, तबतक साता असातास्म बनुमणका बेदन ए बिना यमेवामा नहीं यह निश्चय कर, (१)निस गुमागम परिणाममात्यकी परिणतिसेयर सप्ता बसाता बब करती है उस पाराके प्रति उदासीन होकर; (१) देश बाविसे मिम और सरूप- मर्यादा पमेगासी उस बारमा बो पर समानरूप परिणाम पाय है, उसका भापतिक नियोग करनेका सम्मान प्राण र, (५) परम पुर पैक्म्पतमाम प्रकाशमय पर मामा कर्मयोगसे जो सकर्मक परिणाम प्रदर्शित करता है उससे सपाम प्राप्त कर मिस तय उपशमयुतमा गाप उस उपयोग और ठस स्वरूपमें स्पिर या गाय पणा पाप, ही म्ब, विपना और यो सहर परिणामरूप समान करना उचित है। मामानों की बारम्बार यही शिया है। उस समार्गको गोषणा करते ए, प्रतीति करमेक इम करते हुए, उसे प्रस हरनेकी इम करते र, बाहमापी जनको परमातरमगतरूप देव, स्वरूपनैष्ठिक मिस्ड निर्मपरूप गुरु, फ्रमदपाय धर्मम्पबहार बौर परमातरम यस्पयाम्पमप सच म्माधि सम्पूर्णता होनेतक, परम मफिसे उपासना करने योम्प में मोबामाके कस्यामा परम करण। मीसम नरयाए, दिरियाप देवमणुपगाए । पचोसि विमादुम्स, भापरि मिणमावणा नीम ॥ -भयकर नरकगतिमें विपंचगतिमें बौर कुव तपा ममुप्पगतिमें रे गोदने दाग एमको पापा, इसपिप बबत दिनमा नाका (बिनभगवान् को परम तिरसस परिणमकर सम्मस्प एए उस परमावस्वरुप विताना ) मात्र नपर-विलन कर (विससे उन बर्मत दुबोध भास्पतिक योग होकर परम बम्पाबाप मुस-सम्पति प्राप्त हो)। शांति शति यति । (२) गाँ बनाति बसचित मासे संमत्र रोची और यहाँ मिारिके योग्य विशेष कारण हो ऐसे भो महान् पुरको हिार पातुर्मासरूम स्पिति करनी चाहिये । पाति । की भावना, पत्र ८१९] विषिष पत्र मादि समा-पोव ११ ॐनमः - १ उपशमश्रेणीमें मुख्यरूपसे उपरामसम्यक्त सभव है। २ बार धनघाति कोका झप होनेसे मतण्य कर्मकी प्रविका मी क्षय होता है, और उससे दानावराय, हासराय, पीयांतराय, भोगांतराय मौर उपमोगतिराय इस पोच प्रकारके चतरापका क्षय होकर, अनंत दानम्धि, वमत सामयि, वर्नत पौर्यलम्धि नौर जनत मागठपमेगसम्म मत होती है। इस कारण मिसका या वसराय फर्म अप हो गया है, ऐसा परमपुरुप बनत दान वालि देनेको सम्पूर्ण समर्प है। तयापि परमपुरुप पुनरु द्रम्मरूपसे इन दानारि लम्भिोंको प्रति मही करता। मुम्म्यतया वो उस सम्भिको प्राति मी वामाकी स्वरूपभूत ही है, क्योंकि यह प्राप्ति क्षायिकमावसे होती है, मौपिकमाइसे नही इस कारण पवारमस्वमालकी स्वरूपभूत ही है तथा को मारमा मनत सामर्थ्य ममादिसे शकि- रूपसे मौम्ट थी, उसके म्पत होनेसे मारमा उसे निजस्वरूपमें ला सकती है-तप पुर समापसे पर उसे एक समावसे परिणमा सकती है-उसे वनंत दामउम्धि करमा चाहिये । इसी तब बनत बारमसामर्पकी प्रापिमें किंमित्मानं मी वियोगका कारण मही या, इसलिपे उसे मनत सामान्य कहना चाहिये । तया बनत वास्मसामर्पको प्राति सम्पूर्णरूपसे परमानंदस्परूपसे अनुममें माती है। उसमें भी विचित्मात्र मी वियोगका कारण नहीं हा, इस कारण उसे बनत मोगउपमोगाम्धि करना चाहिये। इसी तप अनत बारमसामग्रंकी प्राप्ति पूर्ण होनेपर, जिससे उस सामपके अनुमबसे भारमशकि पक नाप, उसकी सामर्यको म उटा सके, पान न कर सके, अपना उस सामर्पको किसी भी प्रकारके देशकासका मसर होकर, किंचित्मात्र मी म्यूनाधिकता करावे, ऐसा कुछ भी बाकी नही रहा, सस समामे बनेको सम्पूर्ण सामर्प विकास सम्पूर्ण बससहित पना है, उसे वनंत पौर्यसमि समठना चाहिये। क्षापिकमावको गिसे देखनेसे उपर करे बनुसार उस एन्धिका परमपुरुषको उपयोग यताद। दपा पे पौष सधियों हेतुविशेषसे समताने पास्ते ही भिम भिम बताईमही तो बनम्ती मधिमें मी उन पांचोंका समावेश हो सकता है। भामामें ऐसी सामर्ण्य है कि पा सम्पूर्ण पार्यको प्रात रोनेसे, इन पोगों सब्धियोन पुस द्रम्पकपसे उपपोग कर सकती है, वपारि पतास्य परमपुरुषमें सम्पूर्ण पीतका सभाष होने चरण का उपयोग सेमर नही और उपरे। बाकि दानम्पसे जो उस वाप परमपुस्पको प्राधि है, यह पोगाधित पूर्णपरके उप हानेस ही है, मामलमारके पित् मी शितमारसे मदी। इस तर संमें उचर समधना । नाचिराग मनमुर प्राप्त कर अधिकाधिक मनन करन रोप समाधान और निर्याती। सोहारा विमानाकी अनुप्रथा करमसे बरस कम भय रोवान्ति हान्वि शान्ति: ।
भीमद् राजपत्र पर ८४ , ८४१, ४१ ॥ ८४० महमदाबा भीममाय वेशास सुदी ६, १९५६ (१) आयशा वार के समय में जो कहा है, और मांगारोपण किया है, उस खार मत राम्ना सफल होगा। (२) एक शोक पाते हुए हमें हगारों शामका मान होकर उसमें उपयोग किर जाता है। (२)'चतुरंगत गसे मिस-पा बागे जाकर समझमें बायेगा । ८४१ मोरया, पेशास मुदौ ८, १९५६ भगीतामें पूर्वापर-विरोध है, उसे देखने के लिये उसे मेगा है। पूर्वानर-विरोध स्या है पर बोकम करनेसे मागम होगा । पूर्वापर-भनिरोज दर्शन और पूर्वापर प्रतिरोष बबन तो मौतरगा। मगमता कमर विषारण्य स्वामी, कामेमरी वा वनेक माध्म-टीका रखी गई है। हरेक कोई भपनी मनी मापताओके ऊपर गये हैं। पिपासीबाणी टीका गो तो मेनी है, पनधिक स्पर। मणिसास नमुमाईने (गताके उपर) सिंचनन्दप टीका करते हुए गत मिश्रण कर पाt- सिपी बना दी विद्वत्ता और बानको एक नहीं समझना चाहिये- एक नहीविचारों सकती है फिर भी शान म हो। सबी बिश्ता तो पारेपो वास्माके ये हो जिससे बाहमार्य सिणे, नामतत्व समझमें मारे-पा प्राप्त हो । यहाँ अामा रोताका कान होता है, काँ विरचाहो मा सकती है माही मी। मणिमई (पदर्शनसमुचपको प्रस्तावना ) करते है कि हरिमनिको मेदांतको कार म पौ। म उनमें प्रान्तको सबर होती तो ऐमी मुशा-दिमा हरिमारि चैनवर्धनको बोरसे अपनी गतिको निराकर पेदाती पर गाते' । मणिमाकि पे पचन गत मठाभिनिवेशासे निकले है।रिमवमूरिको वेदांतको भार पो पा नही-स बातको मणिमानि पदि परिमनपरिको पर्मपाणी देसी होती तो उनें सबर पा बाती । हरिमात्रिको वेदांव बादि समस्त दर्शनोको सबर पो ! उन समस्त दर्शनों पर्यापमापूर्वक हो ठहोंने बैनदर्शनको पूर्वापर-विरोध प्रतीति की पौ । या लोकनसे माम परेगा। पयनिसमापके मापातरमें दोष होनेपर मौ मभिमाईने मावर ठीक किया है। पा सुमार वा सकता। प्रीमोरबी, चार पी. १९५५ ॐ समानकामें परोग निरोप भापौर माता जाता है इसका मुस्स फमण प्रामधर्मी कमी भावस्प और निफ्प बादिकी बासदि। परोगा मुस्प उपाय पत्र सेवन, धम सात्तिक मार-पान और नियमित बनो। ८४३ पपाणीवा शाल १९५६ छपपार्य बामदशा सम्पपशा मौर उपादसाये तो गो पपा मुम पुस्पले समागममें मा0 मानता है।
१४.] पिविष पत्र मावि संग्रह-यों व . . उतर- बिनके उपदेशसे पैसी दशाके भश प्रगट हुए 0, उमकी अपनी निनकी दशामें मे गुण उत्तर गने चाहिये, उसका भिचार करना मुगम है, और जिनका उपदेश एकांत नयात्मक हो, उससे सी एक भी दशा प्राप्त होनी समष नहीं । पुरुषको पाणी स नपारमा गती। २ दूसरे प्रश्नों का उपर (१) प्रश्न'-क्या बिन-बाधा-बारावफ साप्पाय ज्यानसे मोक्ष या और किसी सय । उत्तर – तपास्म प्रत्यक्ष सहरुके योग अथवा किसी पूर्वके घ माराधनसे अव मिनाशा पपार्थ समझमें जाता है, उसकी यपार्य प्रतीप्ति होती है, और उसको यथार्थ माराधना होती, तो मोक्ष होता है, इसमें सदेह नहीं । (२) प्रश्न मान-प्रबासे सर्व वस्तुमोंको बानकर, जो प्रत्याख्यान-प्रशासे उनका परमसाण करता है, उसे परित कहा है। -पह यथार्थ है। मिस शानसे परमावके मोहका उपशम अथवा क्षय नएमा हो, उस बानको मान ही करना चाहिये। वर्षात् शानका रक्षण परभावके प्रति उदासीन होना ही है। (३) प्रश्न या एकांतवान मानता है, उसे मिप्पाची कहा है। उत्तर ---40 यपाएं। (1) प्रश्न --जो एकातक्रिया मानता है, उसे मिष्पापी करा है। उत्तर ---यह पपार्थी। (५) प्रश्न ---मोक्ष जानेके चार कारण करो। तो क्या उम चारमेंसे किसी एक कारणको छोरकर मोक्ष पाते हैं, वयवा चारोंके स्योगसे मोक्ष गाते हैं ! उत्तर --म, दर्शन चारित्र और सप ये मोक्षके चार कारण है, उनके परस्पर बाविरोधमासे प्राप्त होनेर ही मोक्ष होती है। (२) प्रस्न -समक्ति बप्पाहमको शैडो किस तरह। सत्तर --पपार्थ समझमें मानेपर परमाक्से वात्यंतिक निति करना यह वयाममा है। नितमी जितनी निति होती है, उतने ठसने ही सम्यक् षश होते हैं। (७) प्रश्न -प्रससे रावो रो-स्पादिका क्या मर्प है। उचर --पुहम्में बासक्ति होना मिप्पालमान है। (८) प्रस्न -बतरस्मा परमामाका प्यान करे 'स्पादिका क्या है। उत्तर -अतरारमहपसे वो परमात्मस्वरूपका प्पान करता है, पर परमारमा हो जाता है। (९) प्रश्नामें कौनसा पान रहता है। स्पादि । उत्तर --सहरके रचनको बारम्बार विचार का, अनुप्रेसण कर, परमाणसे लामाको असा करमा। (१०) प्रश्न-समकित माम रखा कर, विषम माविको बाशा और पुद्रष्माके सेवन करने में कोई मापा नहीं, गौर में बंध नही है-ऐसा को कहता है, क्या यह पपार्थ करता है। उत्तर -पानीके मार्गको रिसे देसनेसे तो पह मात्र मिथ्या कपन करता है।क्योंकि पुस- भीमद् रामचन्द्र [पन ४ ४५ मारसे दो मोग करते अामा बौर कामा किबामाको फर्म गते नहीं, वो पानीको सरिका बचा माही-पर केवल बचन-बानाही बघन है। (११) मन -जनदर्शन करता है कि पुनम्मायके कम होनेपर बामप्पान फर्म होगा, तो क्या यह ठीक है। उत्तर --पा मपार्य करता है। (१२) प्रश्न -स्वमानशा सा फल देती है। उत्तर --- पारप सम्पूर्ण हो तो मोव होती है। (१३) प्रश्न -विमादसा क्या कर देती है। उत्तर --चम्म, चरा मरण मा संसार । (१०) प्रश्न यतिराग बाबासे यदि पोरसाको स्वाप्याप करे तो उससे क्या फल होता उत्तर -तपास्म हो तो यावत् काल मोक्ष शेती। (१५) प्रश्न वीतरागको बालासे पर xपोरसौका पान करे तो क्या करता है। उचर -- तपाइस हो तो पावत् का मोक्ष होती है। -स तय मारे प्रश्नोंका संक्षेपसे उत्तर विभवा । १ किमाष मेकर, पचनहान भेजकर कल्पित भिनिषेपका पागकर, जो भी प्रत्यक्ष पानीको मात्र बाराषम कप, तपारूप उपदेश मेकर, तपास्म मास्मार्पमें प्रपि करता उसनप कम्पाण होता है। निमकम्पनासे पान दर्शन चारित्र भारिप स्वरूप पर मिस वय समझकर, नपा निष पामक यो सासकर, गो सदम्पमारके गेप करनेमें प्रापि करे, उससे बाहमाका कम्पास होना सम महो। बया कम्पित म्पबारके एम्पमें एके सकर, प्रापि करते हुए मी बावका कापाल होने समष मही। - ग्याम्पा मे पोप में दो समन ह। स्पांपते बापरे बरमापा जन एर।। एकस किया-गरसमें नया एकांत पुफाानसे जोपका कायाण नही होय । ८४४ सालीबा, पेशा पदी ८ मग १.५ ॐ प्रमत मर्पत प्रमठ ऐसे भारफल गौर, भौर परमपुलन बप्रमत्तमें सह मामति करो। इसलिमे उस रोधके शत होनेके हिपे परमपुरुपका समागम-परमध पोग- परम हितकाम्पहै।शान्ति ८४५ सापामा शासपदी तुप १९५ से मोघमागमें प्रदातर वपन प्रसंगनिरोपमें कोई वास्यावर करनेको गति हो तो हरना उपोदा मादि रिसने पिहोवो दिखना । बारमचरित्र पति उपशत करमा । पएस प्रभर परिण है। इसमें प्रथम मा मोम भारमान सिमाना ग्रसित पा ४५,८.] विषिष पम मादि समा-पों पप उपादातसे पाचकको, श्रोताको, मार बम्प मातरको दृति विस्मृत होकर, निस्से पानी पुरुपोंके बारमस्वभावरूप परमधर्मक विचार करनेको स्फरणा हो, ऐसा सामान्पत छम रसना | यह साम सूचना है। शान्ति । ८४६ पाणीमा, बैशाख वदी १५ शनि १९५९ ॐ वहाँ बात विरोधी गृहमासीमन वपया यहाँ बाहार बादिका बनसाहका सकोषमात्र यता हो, पाँचातुर्मास करना योग्य नहीं, मही तो सब क्षेत्र भेयकारी ही है। मात्मापाको निक्षेपका क्या हो सकता है। ठसे तो सब समान ही है। वामभाषसे विचरते हुए ऐसे कार्य पुरुपोंको धम्प है। शान्ति । ८४७ वाणीमा, वैशास वदी १५ सोम १९५९ में वार्य मुनिबकि रिये पनि पभाव संभव है। बिनयमति यह मुमुसुमोका धर्म है। बनाधिसे चपळ ऐसे मनको स्पिर करना चाहिये । प्रथम पर वापतहमसे सामने होता हो तो इसमें कुछ बाथर्प नही । क्रम क्रमसे उस मनको महामार्योन स्थिर किया है-पात किया है- आप किया है-यह सचमुच पाश्चर्यकारक है। (२) -सायोपशमिक असंख्प, शायक एक मनप-अप्यारमगीता मनन और निदिप्यासन करमेसे, इस पास्यसे गो परमार्य अतरस्माधिमें प्रतिमासित दो, उसे पपाशचि जिसमा पोम्पा शान्ति में पपार्यरूपसे देखें तो शरीर बेनाकी मूर्ति है। समप समयपर जाप उसके दारा मारा होगनुभव करता है। चित् साता मौर मही ता प्राप पर बसावाफा होपेन करता है। मानसिक वसावाको मुस्यता होनेपर माया सूक्ष्म सम्पारिको मारम हो जाती है। शारीरिक बसाताको मुस्पता त्यूम रविानको मी माश्म से जाती है। गो बेदना पूर्वमें मस धनसे नौतन बाधा, उस वेदनाके उदय रोनेपर उसे इल, पन्द्र, नागेन्द्र पा मिनेन मी ऐकमको समर्थ नही । उसका उदप चारकोपेन करना चाहिये । महामष्टि और उसका सेस पेदन करें, तो मी कुछ पह मा पटती मही, अपना होती हरकती महो। तपा सस्पारिवान गौर पसिन तमात्रसे पेन करें, तो पावेदमा वा नही गावीत, यह नवीन वर्षका छ मही होती-उससे की बडसन निगहोती है। मामापीको पही पम्प है। बारामा मरमसंस रोके, मनु रिमाप एक और मनमोराati ४ भीमद् रागवान [पत्र men मारसे तो भोग करते गाना भौर छाना कि वामाको कर्म गते नही, तो माना रएिका वचन महा-प केपट बचन-नानीका ही पचन है। (११) मन बनदर्शन करता है कि पुगठमाके कम होनेपर बात्मम्मान फलीमूत होगा, तो क्या हो! उत्तर --या यथार्थ करता। (१२) प्रश्न -समारसा क्या फल देती है। उत्तर - तपास्म सम्पूर्ण हो ये मोश होती है। (१३) प्रश्न -विमापदशा क्या फल देती। उत्तर ---साम, मरा मरण बादि संसार | (१५) प्रश्न -पीतरागको वापसे पा पोरसाको स्वाप्पाय करे तो उससे क्या फळ हो! उचर तपारूप हो तो पावत् का मोम होती है। (१५) प्रत–तरागकी बाबासे यदि xपोरसौका पान करे तो क्या फल होता है ! उत्तर - तयारूप हो तो पावत् का मोक्ष होती है। -इस सब मारे प्रश्नोंच संक्षेपसे उचर मिलता। १ मौकिकमात्र मेरकर, पचनशान छोपकर, कम्पित विधिनिषेपका स्पागकर, नो माल प्रापप गानाको वाडाका वाराधन कर, तपारूप उपोशडेकर, तपाइप मारमा प्राति करता उसत्र माप कायाण होता। नियकम्पनासे बान रनि चारित्र माविका स्वरूप बरे बिसव्य समठकर, अपना निय- पामक मोड सीतकर यो दम्पहारफे मेप करनेमें प्रापि करे, उससे बामात्र कल्याण होना समन महो। नपना कपित म्पबहारके दुरुमा रके एकर, प्राति करते हुए मा गोमा कस्पाम होगा संम्स नही। •म्पोम्पाने में पम्प , वह एमा तेह। स्प त्यस ते बाचरे, बाहमापी बन रह ।। एव निया-सप्तमें सपा एकांत गुप्यानसे गोलका कम्पाम मही दावा । ८४४ स्वामीमा शाल दी ८ मंगळ १०५६ ॐ प्रमत्त वापत प्रमत्त ऐसे बाबालके बोल है, बौर परम्पुरमेन वप्रम सहम बामप्रतिमा। सदिये उस निरोपके शांत होनेके लिये परमपुरुष समागम-परणका पोग-की परम हितकारी।शान्ति ८४५ मागीमा पैशाव पदी शुष १९५६ ॐ मोघमाम शम्दातर मला प्रसगरिशेपमें कोई पापावर पानेको ति हो तो करना । ठपोबाट बादि भिकमेध इति हो मिसमा । बाचनपरिकको पनि उपयत करना । x पर प्रधान पर है।म प्रथम प्रहला मेमरन म मा वा। •भामम पर ८१,८०२,८५५ ८५४] पिपिप पर मावि संप्रर-शायर्प समयके अनुसार मनुप्यकी प्रकृति न हो तो मनुष्यका बबन नहीं पाता । मया पननरहित मनुष्य इस जगत्में किसी कामका नहीं । वपनेको मिग हा मनुष्यदेह मगवान्की मति और मछे काममें म्पसीत करनी चाहिये । ८५१ बाणीषा, म्येन यी १०, १९५६ ॐ पत्र मिला। शरीर प्रकृति सस्थास्सस्प यती , विशेष करमा योग्य मही। हेवार्य । बर्मुस घनेका वम्यास करो । शतिः । ८५२ बमाणीक्षा, ज्येष्ठ नदी १५ पुष १९५६ परम पुरुपका भभिमत सम्पवर मार पाय दोनों सयमका उष्ठासित मक्तिस नमस्कार! मोक्षमालाक सबध बसे तुम मुम हो रेसा करो । मनुष्यता, मार्यसा, चानाके वचनोंका श्रवण, उसके प्रति वास्तिस्यमार, सयम, उसफ प्रति वीर्यप्रवृत्ति, प्रतिकूल योगोंमें भी स्थिति होना, बतपर्यंत सम्पूण मागए समुद्रका पार हो जाना—पे उत्तरोत्तर दुळम और वायत कठिन है इसमें प्रदेश नहीं । भारीर-याति पषित टीक देम्सनेमें भाती है, भौर कचित् उससे पिपरीत मी देखने में बाती है। इस समय कुछ बसाताको मुमयता देखनमें जाती है। शान्ति (२) ॐ पात्रताकी समस्त सपचिकी अपेक्षा मी विसफा एक समयमात्र भी शिप मूम्पवान है, एसी इस मनुष्योहकर, भौर परमार्थको अनुन पाग प्राप्त होनेपर यदि जन्म मरणसे रहित परम- पाच पान न रहा, तो इस मनुप्पप्रन्मका अभिष्टित इस मामाको जनतबार विहार ।। पिहोंने प्रमाका जय किसा, उन्होंने परमपरका जय किया । पति शरीर प्रातिको अनुएल-प्रतिकूलताक आपीन उपयोग करना उचित नहीं । शान्ति ८५३ जिसमे ममपिता प्राप्त हो, उठ मगिको चितामगि डा। या यही मनुप्परक निस देहमें पोरगमें-भापनिक सनक अप करनेका तिन किया हो ता पार पाती। निसका अधिस्य माहाम्प है, ऐमा मसंगरपी कम्पार प्राम होनपर भी गौर दरिद्र बना दे, ये इस नगदमें यह ग्यारहमा जापर्य। ८५४ बागीमा बासर मुरीगुरु १.५६ ॐदो समप उपदेशा बार एक समय माहार-पदा, तया निहारे समरका पार पापाका भीम रावत [पर ८४८ १९८५ मैं शरीर नही, परन्तु उसमे मिम हापक भास्मा , मार निस्प शवत । या वेदना मात्र पूर्णकर्म, परम्नु या मरा सम्प ना करनेच समर्थ नहीं। इसलिए मुझे और नही करमा चाहिये-समय वास्माका अनुप्रेक्षण होता है। ८४८ पवाणीचा ग्येष्ठ पुरी १२, १९५५ आप निमुवमके अन्य समयमें शापिसे देहोसर्ग करनेको लार मुमी। सुपौल मुमुमुने अप स्पान ग्रहण किया। गावर विविध प्रकारचे मुम्न्य स्थान है। दरको इन्द्र त्या सामान्य प्रतिशत् नादि स्थान हैं। मनुप्पोपों पकवती पामुग, बाप, तपा मानिक मानि । तिपंचोंमें मी कहास मोगम्मि बार स्पान है। उन सम स्पानोको चीन छोरगा इसमें स्सा नही। ये गाति, गोती और मधु मादि इन सपा मारत बनिय बास । शान्ति ८४९ पाणीमा, ग्पेष्ठ पुरी ११ सोम १९५६ (१) ॐ मुनियोंमे पातुर्मासमंत्री सदा सफता है। पि क्षेत्रको सि भिसे बारे सिका ता कोई सबब ही नही। निर्णय मामाओंका दर्शन और समागम मुक्तिको सम्पर प्राति कराते हैं। पारस महामाों पक धार्प पचनका सम्पाप्रकारम मापारण मानसे यावत् काउ मोक्ष होती। ऐमा श्रीमान् वारने का बह पपाप है। इस जीवमें तपाAY पापनाशनासम्ता शान्ति । (२) पप्र भार समयमारको प्रति मिली। पुरावापान समयसार मच गई। इस स्पसचा गुन और प्रथम पिय भा उमप उत्तम । मा त्रिभुवनकी सामग बरमकी गबर मिग उममे गो माप पपाप है। पमे का मार्ग विमान मे मुमति है। दिन प्रतिम तापामे बसही मा सर-मस्ति दासी यानी पीकता गुमनाम NिR कर, लिप्पिामन कर बामा सनुपापी परिणतिका दिगम मिरा- उमा मापस पा। उसकी शिपापुदाती तो र मुमा पारिक muीम परमोनियमास प्राधिकरता। सति पनि पनि । ८५० सागागा देश गु. १.५९ पमा पानेगा भार निपयो गनगे मपम । पगरमे पपासा माग नरमात न मम पर होगताराम महार और परोपमा एक साता।
पर ८५५, ८५०, ८५८] पिविध पत्र मादि सप्रह-यो वर्ष पपनन्दि, गोम्मटसार, भारमानुशासन, समयसारम्छ श्यादि परमात मृतका मम्पयन होता होगा। वारमाके मुद स्वरूपका स्मरण करते हैं । शान्ति मोरपी वापस मुरी १९५६ १ मसमरसनिमर्ष पटियुग्मं प्रसन, पदनकमप्लमा कामिनीसंगभून्पः । करयुगमपि यो शससरंपवाय, सदसि नगवि देवी पीठरागस्त्यमेव ॥ -तेरे दो मेत्र प्रशमरममें डूबे हुए है-परमशत रसका अनुमब कर ये । तेरा मुसकमठ प्रसम-उसमें प्रसमवा म्पाप हो। तेरी गोदी जीके सगसे रहित है। तेरे दोनों हाय शमसे गत है, पर्यात् तेरे हाथोंमें शम महीं है-स तद देव ! जगत्में ही बीतराग है। देव कौन' वीतराग | दर्शनयोग्य मुद्रा कौनसी ! बो बीतगगता सूचन करे । २ स्वामीकार्तिकेयानुप्रेक्षा बैराम्पका उत्तम प्राप है। ब्रम्पको-वस्तुको-पपावत् सभी रसकर, इसमें मैराग्यका निरूपण किया है। गतवर्ष मद्रासको वोर माना हुमा था। कार्तिकस्वामी इस मूमिमें मात बिघरे है । इस बोरफ माम, भम्प, उसे और वगेट जिसे सो इए पहाा देसकर, स्वामी कार्तिकेय मादिकी बहोस रम्यमय दिगम्बरपत्ति याद माती यो । नमस्कार दो उम स्वामी घरिय माविको! ८५७ मोरनी ग्रावण बदी . मगछ १९५६ ॐ संसारके भम्पासके पोगके सबध लिसा परन्तु गबतक मारमा मुज प्रतिजा प्रकृति नफरे तबतक बाबा करनी मफकरो। निम नियोंमें अतिचार बार सगे हों, उनका पास भीमुनियोंसे पानिधि प्रापचत सेकर वारमादि करना उचित नही तो मा मयकार तौर पका है। निपममें सेण्टाचारसे प्रवर्तन करनेकी वपेशा मरना मेयस्कर है-ऐसी महान् पुरुषों को वहाका कई मी विचार नहीं रखा तो फिर ऐसा प्रमाद भारमाको मपकर क्यों न हो। मारको माषण M५ पुष १९५६ ॐ पाभित् यदि निति-मुफ्स स्पको स्थितिके उदयका बतराप प्राप्त हो, तोरेगा । तुम भाषण पदी ११ से भायपर मुदी १५ तक सा सपनप परम निधिको इस तरह सेवन करना कि जिससे समागमतासी मुमुसुमोको तुम विशेष उपकारक रोगो; और ब सब नितिभूत सन्निपोका सेवन करते हुए समान-सम्पपन बादिमें एकाप हों, पपाशकि मन निपम गुणके द्रण करने हों। शरीर-प्रातिमें सबठ बासातमाके उदपसे परि निषि-मुस स्पडका मतराप मास रोगा, तो पास प्राय तुम्हारे अप्पयन मनन वादिके लिये योगशाम पुस्तक मेथेंगे, जिसके चार प्रकाश पूसरे मुमा मईपोको मा भनम करानेसे परम ठाम होना संभव है।
- ute प्रीम पवाद [पा ८५५ पराश मुस्तपा वाम-विचारमें, पामन्दि नादि शायोंके मोकनमें, और पारमम्मानमें पतात करना उचित है। कोई गई पा मई कमी कुन प्रस्न मादि करें तो उनका उचित समाधान करना चाहिये, बिसने उनको नामा शांत थे। वपर निसाके निरेपक पपन उपदेशरूपसे न कर पाए, मिस तय पर निपामै मेगा सचिब, उसय क्रिया कराते गना चाहिये। उदाहरण के लिये, पैसे को मनुष्य क्पमी मोके वनुस सामायिकमन करता है, तो उस निपेण न करते हुए, जिससे उसका र समप उपदेशके प्रवणमें, सरायके वन्पयनमें अपना कम्पास म्पतीत हो, उस तय उसे उपदेश करना चाहिये । विपत्मात्र मामासस्पसे भी सामा- विकमत माविका निपेष दयमें मी न बाने, उसे ऐसी गंमीरतासे पुत्र किमाको प्रेरमा करनी चाहिये। स्पर प्रेरणा करते हुए मा क्रियासे रहित होकर गांव तम्मत हो जाता है सपना हमारी पर किया बराबर नही'-तमा कामेसे मी में दोष देकर प उस क्रियाचे मोह देवा-ऐसा प्रमत या स्वभाव है और गंगों को गरिमें ऐसा बावा है कि हमने ही क्रियाका निपेष किया है। किम मतमेवसे र एकर, मध्यस्यात् गकर, अपनी वामाका हित करते हुए, ग्यों म्यों इसकी बामाका हित हो, स्पों त्यो प्रापि करनी चाहिये और शानो मार्गका, बाग-विपाच समन्वय स्थापित करना चाहिये यही निर्मराका सुन्दर मार्ग है। स्थापरितम बिससे प्रमाद न हो वौर सरेको परिपमासे मास्तिस्यापि नि, पैसा वसका भवण हो, निपाको दि हो, तपा कम्पित मे नम हो, और अपनी बौर परको वामाको शति हो इस तय प्रति करानेमें उनामित तिरसना | PIN प्रति बिससे सरियो पैसा करना । शान्ति (२) १ x माटे चमा र मोरी, मिनबर माग करिये रे । समयचरण सेवा गुद देगो, मेम मानापन परिये र॥ २ मुमक्ष भईयो मिस तय मोक्तीस म हो उस तय क लिये गमन करनेमें बाबतिकम नहीति ८५५ मोरवी, बापानमा र १९५६ १ सम्पर प्रकारसे मेदना सहन करनेसम परम्पुरषोने परमधर्म का है। २ ताला परनाला अमुमन मते सहम अंमधिन ऐ यही हर पारिक मार्ग है। २ उपशम जिस धानका मत है उस पानम तारण मेना परम निर्जरा मासने पोम्प शान्ति (२) मापार पूर्णिमस्तक चातुर्माससर्वची यो बिपित् मा भयप वा , उस ममतासे षमा मागता। मनोज ८५ ८५१,८५१] विविध पम मादि मप्राद-पयाँ वर्ष योग्य है। ज्ञानीके मार्गको प्रतातिम बिससे नि मशयमा प्रान हा, भौर उत्तम गुणत, नियम शोड धर्मपी मतिमें पाप परम उप्ठामित दोसर बन करे, ऐसौ मुलता करनी योग्य है, और बही परम मगटकारी। ३ यहाँ स्पिति करा वहाँ अपना पसा बर्थन रमना कि जिससे समागमपासिपोको जानके मार्गको प्रतीति मुरर हो, और रे अप्रमत्तमाणसे मुशीठको दि फरें । ॐ शान्ति ८६१ मोरगी, श्रावण १०, २०५६ ॐ आर योगशाम प्रत्यको गरमे भेगा दिया । मुमुक्षयों के अध्ययन और प्रवण मननके लिये धापग गरी ११ से माप मुरी १५ तक नियम भौर आर निति-पगपणताके से इस प्रन्यका उपयाग करना चाहिये। ममत्तमारसे इस जीपका पुरा करनेमें कोई म्यूनता नही रम्मी, तयारि इस जीवको निव दिवका उपयोग मही, पहा कारक है। हा । दाउमें उस वप्रममावको उष्टासिन बौर्यसे मारके सुशालमदिठ सयमा मप्यपन पर निहरिसे वारममावशा पोरण करना। ८६२ मोरबी, धारण गरी १०, १०५६ श्रीपप्पण आरापन १ एफस्त पागस्पग्में प्रभातमें-(१) गुरुफी उफाट मनितिमे भतरामाझे पान दो पामे पार पहनक उपगनत (२) भूत-पप्रति भावप्पयन, प्राग मध्याह-(१) पर पी उपसात मत (2) भत-कर्मपर अपन, भाा मुरितिगि । आश्किा पोरा उम्पयन मसार-(१) माग्नास पार (२)दो पो उन (३) करिव मानपर्ण मर प्रसारक परमारन माग | सफ ा म मिना गमय अगरना पसमा नि दोष, हा मी साग | THE लिलामो मरना। पा म्याग (म)। पप-निपाने भरपूर मम .
प्रीम बसम्म [१८५९८५ हे मार्य ! पवायुमारे दुपमकासमें प्रमाद करमा योप मही) तयापि बारावक गानों को पगत् मम उपयोग यता। भास्मशानवास पत्र लिसा।शान्ति ८५९ मोरबी, भाषण दी ८ १९५१ (१) पादर्शनसमुच्य, पोगरपिसमुचपका मातर गुजरातीमें करना पोग्य है, सो परना । पदर्शनसमुच्या मातर का है, परन्तु उसे सुघारकर फिरसे करमा उचित है । पर धीरे होगा करमा । बानरफ्नचौबासीका वर्ष मी विवेपमके साप सिना । (२) नमी दुरिरामादिपरिपारमिपारिने । गति पोगिनापाप मापीराम वाभिने । भीमानाचार्म योगशाची रचना करते हुए मगचरममें बौतरगसा बखित योगिनाप माचारको सुतिस्मसे नमस्कार करते है। बो रोके कमी सकते, बिनका रोना बात बहुत मुस्किर , ऐसे रागरेप कानरूपी भने स्माको मिसने ऐका-जीता-जो पीतरग सपाया पोतराग सभाकर जो बाद पुननीय हवा मौर गोतराग बईत होकर, बिनय मोसके लिये प्रपन है ऐसे मिम भिम पोगियों को नाप वा और इस तय नाप रोबर नोगत्का नाय–तात-~-मातामा, ऐसे महावीरको नमस्कार दो। यहाँ सदेनके पापापगमातिश्य, सामासिएप, पचनाविश्य और पूमातिशयका सूचन किया है। इस मगम्मतिम सम्म योगशाम्ब सार समाविश कर दिया है, ससा निरूपण किया है, समम पस्तुस्वरूप-तत्यामका समावेश कर लिया है। कोई न करनेवाम चाहिये । (१) मैकि मेले में सिको च करनेवाले प्रसंग विशेष होते हैं। सबा मेसा तो सगा। ऐसे मे में पतिको पक्षमता कम होती है-र ऐता है। सलिप बानियोंने ससंगके मेका पराम दिया है-उपदेश किया है। मोरबी मालण दी. १९५२ ॐ जिमाप नमा १ (१) परमनितिका मिरम्तर सेवन करना चाहिसे हो पानीको प्रधान बना है। (२) पारूप पोगमे वसमर्पता हो, तो नितिका सदा सेवन करना चाहिम अपना (१) साताको सिमा मिना, मिरामा बने उक्ना नाति सेपन करने योग्य पसर प्रास कर, मामाको अप्रमत करना चाहिये हो गया । मम्मी चतुर्दशी मावि पतिपिपोंमें ऐसे बाराफ्से मनिपमित पनसे प्राति करने बाप की गई है। २ मिस स्पडमें पक समता, हाँगाम कही ११ से भरपर पूर्णिमालक स्थिति परता पर ८५१,८५२] पियिष पप भादि मप्रार-३यों पर्प योग्य है । मानौके मार्गी प्रतीतिमें विसमे नि मशपमात्र प्रास हो, और उत्तम गुणवत, नियम पास बार देय गुरु धर्मफी भक्ति में वीर्य परम उप्यामित होरर बर्थन करे, ऐसी मुसता करनी योग्य है, और यही परम मगरकरी है। ३ जहाँ स्थिति करा हो अपना पसा बन रमना कि जिससे समागमवासियोंको पानी मार्गको प्रताति मुरा हो, भौर ने अप्रममावसे मुशीयको गदि फरें । ॐ शान्ति ८६. मोरबी, मावण परी १०, १९५६ आन योगशाम प्रत्यको राफम भेजा Pया है। मुमुभु भम्पयन और प्रवण मननफे लिये धापण बी ११ से मादप' सरी १५ तक मत, नियम और भार निवृत्ति-परायणता हलुमे इस प्रन्यका उपयाग करमा पाहिये । ममतमावसे इस जीतका बुरा करनेमें कोई न्यूमता मही रम्मी, पारि इम को निन दितका उपयोग नहीं, यही सेपारफ है। हे वार्य । दाउमें उस मग्रममावका उष्ठासित पोर्पसे मा करके मुशाउसहित सप्तका सम्पपम पर निरिसे भाममा पोषण परमा । ८६२ मोरबी, भाषण M१०, १०५६ श्रीपयूपण आरापन १ त पागस्पग्में प्रभातमें-(१) देव गुरुपी टर मसिथति बारामाझे पान दो पीस पार पक उपशात (२) भूत-पमननि मामिम्पपन, प्रमा मभ्याइमें-(१)पार पड़ी उपलबत (२) मत-धर्मपापका अन्यपन, प्राग मुगिरगिी आमिरा पारा पप्न माका में-(१) मान्नार पार (२)पी उIn (३) बमरिक नपर्ग • गा प्रसारक रात्रिमाउन माग गफ मो मा मिस पर भरना पगार मि, प, नसीरा मी पाग | रग nिा निनादो गरे ATIगग। --(भागेनि)। -दिने भमरमम, भीम पापम्द ८५ मामानतार-प्रमसम्पयन 0 ८६३ xम्पास्पानसार और प्रभसमापान मोरया, भाषा सुदी १ र १९५६ १बन रम्यके साप, गौर बैगम्य मानके साप होता है-अरेम नही होता। २ राम्प शृंगारफे साथ नहीं होता, और भंगार पैरम्पके साप नहीं पता। ३ बातम्ग-पचन के पसरसे रिसे इत्रिप-मुख निरस ना, उसे हानीके वचन कानमें पो नहीं, ऐसा समयमा चाहिये । ५ हामीके वचम विषयके विरेचन बरामेवा । ५ उपस्प बर्थात् वावरणयुक्त । ६ औशीकरण (र-पति+शिमहान् पतमि महान् मेरके समान बचा जग | ७ बर्षप गुणबाप मन पचन फापाळे योगको स्थिरतामाग ८ मोक्ष मारमा बनुमका यदि मारा होता हो तो फिर मोक्ष किस कामका ! वामान्य कर्षवमान बदनुसार पारमा प्रपम उपी गावी गौर कदाचित व सिदशिणातक भटक जाती है, परन्तु कर्महमी योहा होनेसे या फिर माचे वा गाती जैसे एमाएमा मनुष्प माला सेनेसे एकवार उपर बाता है, परन्तु फिर नाचे ही चहा गाा (२) बापाल सुदा ५ सोम १९५६ १ चैन बरमाका स्वरूप है। उस सकपके (धमक) प्रवर्तक भी मनुष्य । सवारणो लिये वर्तमान मसर्पिणीकारमें अपम बादि धर्मके प्रवर्तक पे। इससे कुल में बनादि वाहमधर्मका विचार न पा-या बात न दी। २ गमग दो हगर पर्षस अधिक हुए चैनपति शिखररि बाबार्यन मोंको अत्रियों सप मिटा दिया। सकर मपकर्प और संभमण ये सत्ता पनेबाम प्रालिके हो सकते है-उपमें गईई प्राटिके नहीं हो सकते । . बापुमका मिस प्रारस पप होता है उस प्रकारसे देशस्थिति पूर्ण होती है। ५ पोसाक बोरपाक गातिके रामपूत ।। ५ वो म रेजना, या एकांत दर्शनावरणाप फर्म मा राता, परम्त में गर्गमा- परणीय भा गाता है । मस्य मित और तेबसन्म भार ठसाको लेकर होता है। ४ दर्शनके स्नेपर शान रह पाता। सपचे माननेके पिहानको साना चाहिये । जैसा बन बैसे ही बा। x१९५५ मत समय मा यमन देताम, उस पर न मालान सिस मारनाम एक भवन ममा पनि मत मापा, सलीका पास कराया है।
८५४ मास्पानचार-प्रमममापान] विविध पत्र मादि सप्रार-पों पर ९ नसे परमाणुकी शक्ति पाप प्राप्त करनेमे सती जाती है, उसी तर पैतन्यदम्पको शाति बिगुताके प्राप्त करनेसे पाती माती है । काँच, परसा, दुरबीन भा पहिसे (परमाणु) के अनुसार और अधि, मन पर्यष, केपठान, सन्धि, ऋदि वगैरह मरे (पतन्यदम्प) के अनुसार है। बापत मुदी ६ माम १०५६ १ यापशमसम्पत्तिको पेदफसम्यक्स्व भी कहा जाता है। परन्तु धयोपराममेमे शापिफ होनको सपिके समयका जो सम्यक्त है, वही वास्तविक गति के कसम्पान है। २ पाँच स्थायर एफेन्द्रिय पार और सूक्ष्म दोनों हैं। बनस्पतिके मियाप पाकीके चारमें भसम्पात मूरम कहे जाते हैं। निगोद सूक्ष्म अनत है, और वनस्पति के भी सून मनत है, बदी निगा में मुश्म बनस्पति घमी है। ३ धाताधकर ग्यारह गुणस्पानका पर्श नहीं करते, इसी सब ये पहिल, दूसरे तपा तीसरेका मी स्पर्श नही करते । ५ पर्धमान, हीपमान और स्थित ऐसी जो तीन परिणामोंकी धारा है, उसमें दीपमान परिणामको सम्पत्यसबंधी (दर्शनसभा) पारा चीतार्थकरपको नही होमी; और पारिश्रमबंधा पाएको ममना हामी है। ५ जहाँ क्षापिकचारिप बही मोहनापका अमार है और नहीं मोहनीपका नमार दी पहिला, दूसरा, तीसरा और पारहा इन चार गुणस्थानोको सर्शनाका मार । ६ उज्य दो प्रकारका-पफ प्रशाप और दूसरा रिकोप । विशेप पास (गिता ई) तिरो भदन रिया जाता है, और प्रदेश प मातरमे रेग्न दिया जाता। ७ मायुफर्मका बप प्रातिके बिना नहीं होता, परन्तु येनीपका हाता है। ८ आयुप्रति एक हो मनमें पेम की जाती है । इमरी प्रानिपी उस भयमें और दूसर मामें भावेन की जाती। • र विस भएकी मायुप्रातिका भाग करता है, पर राम माध माति। उस बंधप्रारिम्प प्रदौसे आयुका भारम मा मे गिना जाता है । इमारत म भग भागुपति उपमें उगमें मम्मा, उत्कर्ष बरफ आदी गरन । १. भापुर प्राति मरे भने नही मोगी गाती । ११ , गति, लिनि, भागार (शरीरममा1) और ] अमुकामे अमुर प्रप में भाग भार भाम र Pि रिमी मनुपमा माय उप और उममें समा गै भापुरे पर रारागि नागरम भोग ग ! पोलिस नि, सी, मिन र Hamri1- माम पता पारग महोदर मानगिगिमा पल उम टग मे 11 min र भाना मानगाल, पामारी गला श्रीमन् पापा [८६४ म्पासानसार प्रमतमान १२ सक्रमण अपकप उत्कर्ष वादि करणका नियम, अबतक वायुकर्मवर्गणा सत्ता हो, तब तक लागू हा सपना है। परस्त उत्यका प्रारंभ होने के बाद यह जगू नहीं पा सकता। १५ मायुकर्म पृषी समान है; और दूसरे फर्म नसके समान है। यति पुमा हो तो नब होता है। १. वायु दो प्रकारको-सोपक्रम कौर निरुफक्रम । इसमेंसे बिस प्रकारको बायु गाँधी हो, उसी तराकी वायु मोगी जाती है। १५ उपशमसम्पाल पोपशम शेकर पारिक होता है। स्पोंकि तपशम सत्ता है इसलिये उदय बाकर षय होता है। १५ प दो प्रकारको होती है चानचक्षु और बर्मचा। वैसे धर्मचक्षुसे एक वस्तु निस स्वरूपसे दिखाई देती है, पर बस्तु दुरीम सूक्ष्म-दर्शक बादि यत्रोंसे मिम सम्पसे ही दिखाई देती है। जैसे ही चर्मरसमे पा मिस स्वरूपसे दिखाई देती है, पानचक्षुसे किसी मिमलपसे । दिसई ती और उसी तरह की पाती है। फिर मी ठसे वफ्नी होशिपारीसे-हमालसे-न मानना, यह पोय नही। बापान दी ७,पुष १९५६ १ मीमान् पदकुद नाचायने वापार (वायत) की रचना की है। प्रारोड मेव दर्शनप्रापत बानप्रापत चारित्रप्राप्त स्यादि । दमप्रापतमें मिनमानका सरूप बताया है। गायकरी करते है कि आप मागोंको हमने, मने और देवानिदेषोतकने पूर्वमें सेवन किया है, और उससे कार्य सिम नहीं वा । इमम्पेि बिनमाके सेक्न करनेको जम्परत है। या विमभाव शांत है, बारमाका धर्म है और उसके सेवन करनेसे हो मुजि होती है। २ चारित्रप्रापत १ यहाँ प्रम्प और उसकी पर्याय मही माने गावे हा उसमें पिकम्प होनेसे सम्मन हो बाता है। पर्यायोंको न माननेका कारण उक्ने को नही पांचना हो। • प्रम्पका पायो यपि पर सांस किया गाता है परन्तु पाँम्पका स्वरूप समसमें विकम्प बनेके कारण उमान हो जाती है और उससे । मटकना होता है। ५ सिसफ्ट इम्प नहीं है परन्तु महमा एक पुर पाप है। प पर पहिले पब मनुष्य पा देवपद था, उस समय यही पाय पी । इस तय इम्म सात एकर पापातर होता है। ५ शतमात्र प्रास करमेसेबान भावा। ० वामसिलिके किये सांगाच काम करते आए यात समप पग गाता है कि एक मात्र मतमायके एवन करनेसे पर तुरत ही प्राप्त हो जाता है। ८ पापका स्वरूस सम्बने के लिये मौतर्विकरदेवने विपद (उत्पाद म्यप और धीम्य) समसामे हैं। म्म पुग-समातम-4 पाप म्पावम्प्युल। ।
८५४ मास्मान्तार-प्रसमान] पिपिम पत्र भादि सपा-यो वर्ष ० ११ को दर्शन एक नर्शनमें समाविष्ट हो गासे है। उसमें मौ चैन एक दर्शन है। पौर-मणिकवादी-पर्यापरूप सत् है । वेदान्त-सनातन-दम्यहमसे सत् है। पाकि-निरी- इवरवा - नमतक नामाकी प्रतीति नहींई तबतक उसे पहिचाननेसप सत् है। १२ (वारमा ) पर्यायके दो भेद -जीवपर्याय ( ससायबस्पामें ) और सिपपर्याय । सिदपर्याप सौ टनके सोनेके समान है, और चीवपर्याय सोटसहित सोनेके समान है। १५ म्पननपर्याय ११ मर्यपर्याप० १५ विषयका माश (बेटका अमाव) क्षायिक चारित्रसे होता है। चाये गुणस्थामको विपक्की मरता होती है, और नममें गुणस्थानकातक वेदका उदय होता है। १६ मो गुण अपनेमें नहीं है, ये गुण वफ्ने ?-ओ ऐसा करता अपना ममबाता है, उसे मिप्याटि समप्सना पाहिये। १७ मिन और बैन शनका अर्थ पट पर अंतर मिन पसे, पट पर मंवर जैन । मति-मदिराके पानसी, मतमारा समुझे न ॥ ( समपसार) १८ बारमाका सनातम धर्म शांत होना-विराम पाना है समम्त सादगीका सार मी नही है। वह पदर्शनमें समा बाता है, पौर पर पदर्शन चैनदर्शनमें समाविष्ट होता है। १९ वीतरागके वचन लिपयका विरेपन करानेबारे । २० जैनधर्मका बाशय, गबर तया खेसामार वाचायोका भानप, और शशांगीकर वाशय मात्र वाल्माका समातम धर्म प्राप्त करानेका है और सौ सारनप है। इस बावमें किसी प्रकारसे शानियोंको विकास नही । ही वीनों का में हानियोका कपन है, पा, बोर होगा। २१ बाध लिपपोंसे मुक्त होकर म्यों अपों उसका विचार किया जाय, स्पों सों बारमा पिरत हाती नाती है-निर्मक होती गाती है। २२ भगमा पाना मी पाहिपे । मात्र मामाको शतिका विचार करना योम्म है। २३ बानी छोग यपि सोको तय हिसाबी होते हैं (पैश्योंकी वय कसर न सानेपान होते है-अर्यात् सूक्ष्मरूपसे शोपनकर तत्वोंको स्वीकार करनेवाले होते हैं, तो मी वास्तिर तो साधारण गंगों से ही गेग (किसान मारि-एक सारभूत बातको ही पकाकर रसनेबारे) होते है। वर्षात् पन्तमें चाहे कुछ मी थे बाप परन्तु एक शांतमालको नहीं छोड़ते और समस्त मशगका भार मी कहा है। २१ बाली उदयको मानता है, परन्तु यह साता बसावामें परिणाम नहीं करता । २५. इन्द्रियोंके मोगसे मुक्ति नही । नाँ इत्रियों का भोग है गौ संसार है और वहाँ ससार हैहाँ मुक्ति नहीं। २६ बाय गुणस्थानककहानीच बामप छेना चाहिये-जानाको बबासे वर्तन करमा पाहिये। ।
भीम रामचन (मासानसार-पमहमापान ८५४ २७ महान् मापाप और बामियोंमें दोप तपा में नहीं होती। अपनी समसमें नहीं, वाता, इसलिये हम उसे भूत मानते हैं । तपा जिससे अपने को समझमें बाबाय पैसा अपनेमें शान नही, इसलिये पैसा हान प्राप्त नेपर मोबानाका भाशय मूख्माण भगता है, यह समझ मा गापगा, ऐसी मालना रणनी चाहिये । परस्पर बाचापोंके विचारमें यदि किसी जगह कोई भेद देसनेमें बाये तोप क्षयोपशमके कारण ही समय है, परन्तु वस्तुतः उसमें निकाप करना योग्य नही । २८ बानी भोग बहुत बार पे । वे दिपप-मुस भोगना जानते थे । पाँचों द्रियों उनके पूर्ण पी (पाको इन्द्रियाँ मिसके पूर्ण हों, वही बाचार्य-पदवीके योम्प होता है, फिर भी इस समार और त्रिय-मुरले निर्मात्य मानेसे तथा बारमा सनातन धर्ममें प्रेप माम होनेसे, रे विषय-मुखसे विरत होकर बाहमाके सनातनधर्ममें संख्म हुए हैं। २९ नंतकाम्से बीच मटकता है, फिर मी उसे मोक्ष नहीं ; बब मिनामाने एक बमें ही मुधि बताई। १० गान हानीको मात्रानुसार तमानमें घरे तो बतमाम मुळ दो भाता है। ३. वमुक परत म्पबछेद हो गई, ऐसा करने में माता। परन्तु उसका पुरुषार्प नही किया माता, और इससे पा कसा बाता है कि वे परकर हो गई। यदि उसका स्था (पैसा चाहिपे पैसा ) पुरुषार्प दो तो गुष्प प्रगट हों, इसमें संशय महो । बोंने उपम किया तो कागिरी तपा प प्रास किया, और दिनुस्वानवाने उबम म किया तो वे उसे प्राप्त न कर सके से विया (पान)का म्पमोद होना नहीं जा पा सकता। २२ विषय य मी ए, फिर भी ओ गाव अपनेमें वर्तमानमें गुण मान ठे, उन गांकि समान भमणा न बरते हुए उन विपर्योक पप करनेके म्पेि ही ध देना चाहिये । (५) बापत सुदी ८ गुरु १९५६ १ धर्म वर्ष काम और मोष इन चार पुस्पामि मोक्ष पहिले तानसे मारी। मोक्षके छिपे हो पायके वानों है। २ मास्माका धर्म सरूप है, ऐसा प्रतीत होता है। पर सोनेके समान हो। ३ फसे मुसहक साम करते हुए मी परिभा तपान करमे तथा उसके रक्षण करनेका स प्रपन्न करते हैं । सब मुडको चारते है, परन्तु ये परवप्र । तपा परतत्रता प्रशंसनीय मही है। १ का मार्ग (मोस) रामायकी नाराषमासे सब कमीफा अप होनेसे पास होता है। ५ नारा निरूपण किये हुए तापोका पपा घोष होमा सम्पमान है। ६ गौर, नगर मामलसबर निर्मग, 4 और मोम पे तपा(पहाँ पुष्पपापको मामबमें गिना है)। . बारके दो मेन -सि और संसारी- सिद-सिरको जनता दर्शन पा र एस पे समान समान है। फिर मी वनतर परंपर होनेरूप उगई पत्रा भेट सिम से कम है।- ८५४ मास्पानसार प्रमतमापान] विविध प मारिसमा-षौ वर्ष - (१) वीर्य, (२) अतार्य, (३) तीर्थकर, (१) अतीपंकर (५) सययुन, (६) प्रत्येकयुद, (७) मुरबोभित (८) बोरिंग, (९) पुरुपरिंग, (१०) नपुसकलिंग, (११) धन्यडिंग, (१२) मणिग, (१३) गृहस्पलिंग, (११) एक, और (१५) बनेक। ससारी - ससारी चीव एक प्रकार, दो प्रकार स्पारि वनेक प्रकारसे करे।। सामान्यहफ्ते उपयोग क्षणसे सर्व ससारी जीप एक प्रकारके हैं। अस स्थापर, अयमा म्पबहारराशि मम्यबहारराशिके भेदसे चीन दो प्रकार है। सम्म निगोदमेंसे निकलकर मिसने कमी प्रसपर्याय प्राप्त की है। व्यवहार राशि है। तया बनादिकाम्से सूक्ष्म निगोदर्मेसे निकलकर, निसने कभी मी प्रसपाय प्राप्त नहीं की, पवम्पबहारपशि है। स्थत बसपत और सपसासपत, मनाली पुरुय वौर नपुंसक इस तए नीमके तीन प्रकार ।चार गतियोंकी अपेक्षा चार भेद । पाँच इन्द्रियोंकी कपेक्षा पाँच मेद है। पृथ्वी, वा वेनस्, मायु, पनस्पति भौर प्रस इस तर म भेद ।हण, नास, कापोत, तेच, पप, गुरु मौर परेशी ( यहाँ पौदा गुणस्थानबाछे मौन मेने चाहिये, सिर म लेने चाहिये, क्योंकि यह संसारा गोलको म्यास्मा है), इस तर बीवके सास मेद । बाब, पोतम, चरायुन, स्पेदन, रस्म, मूर्धन, उदिम भौर उपपादके मेदसे गीपके माठ भेद समझने चाहिये । पाँच स्थावर, तीन विकग्विय और पवेत्रिय इस तर बीवके नौ प्रकार समधने चाहिये । पाँच स्थापर, तीन विकन्दिप और स्त्री तथा बसही पवेन्द्रिय स तण बीवके दस भेद समाप्सने चाहिये । सूक्ष्म, बादर, तीन निकलेन्द्रिय, पीर पंचेन्द्रियोंमें जकचर, पलपर, नमबर, तया मनुप्प, देव वौर मारकी इस तर बीतके ग्याय मेद समझमे पाहिये । प्रकापके पर्याप्त और अपर्याप्त इस वर जीवके गार भेद समझने चाहिये । उक्त सम्पपहारिकले बार मेद, तपा एक असम्पपहारिक (सूक्ष्म निगोदका ) मिगकर देय मेद होते। पौवा गुणस्पानोंके मेदसे, वा सम्म बादर, तीन विकछेत्रिय तया सहा बससी इन साकि पर्याप्त और कपासके मेदसे मानके पौरा मेद होते हैं । इस पर पुषिमान पुरुषोंने सिखातका अनुसरण कर जीपके भनेक मेद (विपमाम माषोंक मेद) को। भाषात मी एक. १९५६ १ गाविस्मरण शानके रिफ्यमें दो शका यती है, उसका समाधान निम प्रकारसे होगा:- पैसे पाल्पाचस्पा को कुछ देश हो मथमा अनुभव किया हो, उसका पातसोको सावत्या स्मरण होता है और एक्सोको महीं होता। उसी तण गावसोंको पूर्वमषका मान यता है और मातसोको मी यता । उसके म एनेका कारण पाहै कि पूदिहको मेरते हुए जीत बाम पदामि सम्म होकर मरण करता है, और नई र पाकर पर उसमें मासळ रता है। इसे उन्टी गतिसे पम्नेबारेको ( मिसने बसकाश पसा हो उसे ) पूर्वमय बनुमबमें माता है। २ मातिस्मरण शान मतिदानका मेद है । पूर्वपर्यायको छोड़ते हुए पेदमाके कारण, मई देह पारण करते हुए गर्मावासके कारण बाणावस्पामें माता के कारण, और वर्चमान देहमें छानता के कारण, पूर्वपापको स्मृति करमेका वाकाश ही नहीं मिता | तपपि मिस वण गर्मागास वोर बाल्यावस्पा सविमें महीपते,स्स कारण के होते ही नहीं, यामही कहा जा सकता, उसी तर उपर्युक करणको भीमद् रामबन्द मामानमार यमरम्पपान ६४ २७ महान् भाचार्य और हानियोंम दोष तपा में नहीं होता। बानी समझमें नही, बाता, इसलिये हम उसे मूछ मान लेते हैं । तया बिससे अपनेको समक्ष मा माप पैसा बापनेमें शान न इसलिये कैसा हान प्राप्त होनेपर यो बानीका माण्य मूग्णाला गता है, ना समझमें आ गायगा, ऐसी भावना रमनी पाहिये । परस्पर बावापों के विचारों पर किसी पगा कोई मेर देना में भाये तो पासपोपशमके कारण हो समन है, परन्तु वस्तुतः उसमें विकास परमा पोग्य नहीं । २८ पानी डोग मात चतुर । २ विपप-मुस मोगना पानते थे। पात्रों इन्द्रियों उनके पूर्ण पी (पाँचों इन्द्रियों बिसके पूर्ण हों, यो बार्मि-प-बीके योग्य होता है, फिर भी इस संसार और इन्द्रिय-मुसके निर्मात्य गनेसे तपा मारमाके सनातन धर्ममें भेय माझ्म होनसे, रेमिपम मुससे रिक होकर बामाके सनातनभम सम्म हुए । २९ अर्मतकाम्से नाग मटकता है पिर भी उसे मोक्ष नही जब किमानाने एक बता ही मुक्ति पता है १० नाग हानीको मात्रानुसार शांवमान चरे तो ममम मुच हो जाता है। १५ अमुक वस्तु व्यवछेद हो गई। ऐसा करने में बाता है, परन्तु उसका पुस्मार्य नाही मिपा बाता मोर इससे यह का गाता है कि ये परोद हो गई है। पदि उसका सचा (जैसा चाहिये पैसा ) पुरयार्प हो तो गुण प्रगट हों, इसमें संघय नहीं । बने उपम किया मगरी ठया राम्प प्राप्त किया, पर हिन्दुस्तानवाने उबम म किया तो उसे प्राप्त न कर सके। इससे लिया (बान ) म्पयद हामा मही कहा बा सकता। १२ विपय अपनी ए, सिर मी नो गौष मानेमें वर्तमानमें गुण मान है उम गानोंके समान भ्रमणाम करते हुए उन विषयों पप करनेके ये दोक्ष देना चाहिये । (५) बायत मुदौ ८ गुरु १९५६ १ पम वर्ष काम गौर मोशन पार पुस्पामि मोक्ष पहिले तानसे मार। मोक्ष २ बास्माका धर्म पुसम्म है ऐसा प्रतीत होता है। सोनेके समान पर है। ३ कर्मसे मुसद्द म सहम करते हुए मा परिपा उपार्मन करने तपा मसो रक्षण करनेका सब प्रपन करते । सब सुखको चारते है, परन्तु ये परत । तपा परतता प्रसनीय नो। १ प मार्ग (मोक्ष) रामायको बारपनासे स्व कमका षय होनेसे प्राप्त होता है। ५. हामी निरुपण किये हए तत्वोंधा यथार्थ बोध होना सम्पमान है। ६ मौष वव बामन संबर मिर्षण, र मार मोक्ष पे पल (पही पुष्पपापको मामसमें गिना)। ७ पोरके दो मेट-मिव भौर संसारी- सिया--सिमको बनबान दर्शन पार्य और उस पे समान समान है। फिर भी नंतर परंपर होनेरूप उनके क्या मेर निम प्रकारसे करे-
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Ve भीमद् रामयम्द्र [८५४ मासानसार-यमनमाधान मेकर पूर्णपाय स्मृतिम नहीं हो, इसठिये प होती ही नहीं--पर मही कहा जा सकता। निस पर बाम मादि सोको कसम की जाती है, तो उसमें पदि सानुइमता होती है तो होगा प्रगती है रसौ तर पदि पूर्णपर्यापको स्मृति करनेको सानुकुम्वा (पम्यता) हा तो जातिम्मरण शान होता है। पूर्वसहा पपम होनी चाहिये । पर्साका मा पा जानेस जातिस्मरण पाम नही होता । ३ मामा मामा नित्य है। उसके प्रमाण -- (१) पाठकको दूध पीते हुए क्या थुक नुक' पद करना कोई सिखाता है! यह तो पूर्ण जम्पास हो। (२) सर्प दौर मोरका हापी वीर सिंहका भो मार बडोका साभाविक और है । उन्हें उसे कोई भी नए सिसाता । पूर्वमबके बैरको सामाषिक संगा है-पूर्वहान है। . निमगता पा पनवासाचा पय-ऐसा शानियोंने कहा, सत्य है। जिसमें दोनों म्यया (सांसारिक और बसारिक) होते हैं, उससे नि संगता ही होगी। ५ संसारके छोर विना मप्रमत्त गुणस्पानक मही। मप्रमत्त गुणस्यानककी स्थिति मतको है। ५ हमने समझ स्पिा म शान्त'-एसा को करते है रे ठगापे पाते। - ससारमें पकर सात गुणस्पानके उपर नहीं पा सकते इससे संसारो गोरको निराध म ऐना चाहिये--परन्तु उसे थाममें रहना चाहिये । ८ पूर्व पति पाई हुई पस्तुको फिर शांतमानसे पार करे तोप पयास्थित पार पाती। ० प्रपिके दो भेद है-एक दम्प–वासमन्धि (चतुपर, रिपद अपर क्यादि ) सरी माप-बम्पतरपि (नाट कर्म इत्पादि)। सम्पन प्रकारसे भो दोनों प्रषियोंसे निहत्त रो, मा निर्मप है। १ मिप्यान पान, विरति बादि माल बिसे छोषमे ही नहीं, उसके पसका माग हो, तो मी पारठौकिक कपाण क्या करेगा। ११ सक्रिप बारको मन वनुष्यन हो ऐसा कभी मनता ही नहीं । ( क्रिया होनेपर कपप गुणस्पानक नहीं होता। १२ मा भादि दोषोंका अपहोनेसे उनके सहकारी कारपोका पय होता है मतक वनका सम्पूर्णरुमसे प्य न्या होता तबतक मुमानु गीत सोप मानकर मी पैठता । १५ मा नादि दोष और उनके सरकारी कारणों के समान होनेपर पप न होता । एग पादिके प्रपोगसे कर्म होता है। उनके धमाधमें सब जगह का मभाव समाना चाहिपे । १५ पुकमी-- (ब)पवर्तनःनिशेष पम्फा हो तो कर्म पोरे हो में देवन किया जा सकता इसका कारण पूर्णका सा को इससे बस प्रहारसे उपमें जाता है-मोगा माता है। (मा)' गया शब्दका बर्ष मावसे मोग से भाग होना' करते है, परन्तु उसका बर्ष पैसा नही ।निस पय फर्ग न गपा समय बर्ष पर्ग उतर गया-कर्मा र रिया होता है, उसी तप बापु टूट गई' शमका मारय समाना चाहिये। - - ६४म्मामानसार-पसमाधान] पिषिष पन मादि संप्रा-षों वर्ष (३) सोपक्रम-शिपिम्-विसे एकरम भोग लिया जाय । (६) निरुपम निकाचित । देव, नरक, युगछ, तरेसठ शाकापुरुष और परम- शरीरीको होता है। (उ) प्रदेशोदय-प्रदेशको मुसके पास छ गाकर मेन करना, वह प्रदेशोप है। प्रशोपसे बानी कर्मका क्षय वतमुर्तमें कर देते हैं। (3) अनपवन बौर अनुरणा-इन दोनोंका गर्य मिलता हुवातथापि दोनोंमें बार यह है कि उदारणा बारमाकी शधि है, और मनपवर्तनमें कर्मकी शक्ति है। (ए) भामु घटती है, भर्यात् यो काम्में भाग ली जाती है। १५ वसताके उदपमें जानकी कसौटी होती है। १६ परिणामकी पारा परमामीटरके समान है। (७) जापान पुती १. शनि १९५५ १ (१) असममस्ता-अनिर्मउ मात्र (अस्पता) (२) विषम वैसे तैसे (१) वार्य उत्तम । मार्य शम्द मीनिनेपरके, मुमुसुके, तपा नार्यदेशके यमेवाक लिये प्रयुक्त होता है। () निक्षेप प्रकार, मे, विभाग | २ मपण-भपसे पार फरमेबाम गरण देनेवाला । ३ हेमचन्द्राचार्य पधुकाके मोह मेश्य थे | उन मामाने कुमारपाल राजासे अपने कुटुमके लिये एक क्षेत्रतक मी न मांगा था । तपा स्वप भी राम-समका एक प्रासतक मी न लिया था-पद गाव माकुमारपासने उन महरमाके मामिदाह के समय कही पी। उनके गुरु देवचन्द्रसरि थे। (८) वापार पुदी ११ रवि १९५६ १ सरस्वती मिनबाणीको धारा २ (१) बॉपमेवा, (२) अधिनेके , (३) धन बार (१) बनके फलसे समस्त संसारका प्रपंच इता है, ऐसा भनिनेन्द्र ने कहा है। ३ जनारसीदास मीभागराके दशाम्रीमाप थ। वापाइ सदा १२ सोम १९५६ १ मीपशानिजपनीने योगारि मन्थ- कान्तारि' में बताया है कि मौतमगारपके बिना कही मी म्पिरता मही हा सकती, वीतरागमुमके मिपाय मा सष मुम नि सम्म एगता है-- भारमरमर मगता है। पाचची 'पिराधि' में बताया है कि बीवरागमुम प्रियकर गया। वाया पगारि में बतापा है कि परमागसम्पास होता ही केसमान होता है। २ पातमाग कर्ताको सपत प्राम मही मा पा, परन्तु हरिमारिने उमें मागा- मुमारी मामा है। ३ हरिमरिने उन टिपोन मण्यापम सप्तनमें पर्गन रिपा मोर उमर परमे पोरिमपनी मसरामन उदासपस गुजराना नि है| .
भीमद् पंजाब [८५४ मारतानसार-प्रमवापान । मेकर पूर्वपर्याय पठिम महाँ पती, सठिये ए होती ही नहीं पा नहीं कहा जा सकता । जिस तरह बाम पारियोंको कम्म को नाती है, तो उसमें पदि सानुइमता होती है तो हो र गती है। उसी तय पदि पूर्वपापको स्मृति करनेकी सानुकता (योग्पता) हो तो चातिस्मरण बन होता है। पूर्वसहा कायम होनी चाहिय । ममत्राका भव वा पानेस नातिस्मरण बान मही होता। ३ बहमा है। भारमा निस्प है। उसके प्रमाण- (१) बायको प पाते हए या 'थुक मुक' शम करना कोई सिख्या ।ह तो पूर्ण बम्पास है। (२) सर्प और मोरका हापा और सिंहका घरे और मिठौका स्वाभाविक और है । उनें उसे कोई मी नहीं सिखाता । पूर्वमाके बैरकी स्वाभाविक संहार-कान है। • निासगता पर पनवासाचा विषय है-ऐसा शानिने या है, सस्प है। मिसमें दोनों म्पपर (सांसारिक मोर बसारिक) होते हैं, उससे नि सगता नहीं होती। ५ ससारके मेरे बिना अप्रमत्त गुणत्पानक नहीं। मप्रमत्त गुणस्थानककी स्थिति वतर्माकोरे। ६ 'हमने समन्स किया है, हम शान्त ? -ऐसा को करते है ये गाये जावे। ७ ससारमें यार सात गुणस्थामके ऊपर नहीं पा सकते इससे ससारी बारको निराश न होना चाहिपे-परतु उसे प्पानमें रखना चाहिये । ८ पूर्वमें पति बाई मस्तु फिर शावमारसे पाद करे तोया यथास्पिट याद पाती। ९ प्रधिके दो मेदी-एक इम्प-वामपन्धि (पाप, विपद वा स्पानि) इस मान-सम्यंतरमंपि (बाट कर्म इत्पा)। सम्यक् पकारसे वो दोनों मंथियोंसे निवत हो या निर्पण है। मिप्यात मान, भविरति आदि भाव मिसे छोड़ने ही मही, उसके बबका त्याग हो, तो भी पा पारठीकिकाम्पाण स्पा करगा। ११ सक्रिप गोषको भयका अनुष्ठान हो ऐसा कभी बनता हो नी । ( क्रिया होमेपर मांच गुणस्थानक नहीं होता )। १२ पग बादि दोपका पप होनेसे उनके सहकारी कारपोज अप होता है, जबतक उमा सम्पूर्णसास भप महा होता, तबतक मुमुक्षु गोर संतोष मानबर महाँ बेटता । १५ पग भारदोष और उनके साकारी रोके बमात्र हानेपर 4 मही होता । मग पारिक प्रयोगस कर्म होगा। उमके अमानमें सब जगह का अमात्र ही समसमा चाहिये। ११ मापुकर्म (1) वाम-मशेर कामनदो दोपकर्म पो हो कालमें इन किया जा सकता है। इमरा कारण पूरा सा है इससे इस प्रसरसे उपमें भाता है-मोगा बात है। (मा) ह गपा' का मप मानस लोग 'दो माग होना' करते है। परन्तु उसका अप मा महो । जिम तद वर्ग र गपा' एक अप कर्म उतर गपा-कर्म दे दिया 'ना है, मी तरह भायु टूट गई 'दाम भाराप समष्ठना चाहिये।
१४ मारपनमार-मनमाषान] विषिष पन मादि संप्रायों वर्ष (३) सासक्रम-शिपिल-जिसे एक्दम मोग लिया जाय । (६) निस्पकम निकाचित । दस, मरफ, युगम, तरेस शलाकापुस्प भौर परम- शरीरीका होता है। (3) प्रशो परेशको मुसके पास छ माकर वेदन करना, पर प्रदेशाध्य है। प्रशो'पसे पानी फर्मका सय भतमुहमें कर देत है। (3) बनपवर्मन और अनुरणा-इन दोनों का अर्थ मिसता एमा। तपारि दोनोंमें वतर यह है कि उदारणाम बारमाको शक्ति है, और अनपवर्तनमें कर्मकी शक्ति है। (ए) वायु घटती है, भर्यात पारे कारमें भोग भी मासी है। १५ वसावाके उपयमें शानकी कसौटी होती। १९ परिणामकी पारा परमामानरके समान है। (७) बापत मी १. शनि १९५५ १ (१) समयसता निर्मठ मात्र (अस्पता) (२) विषम से तैसे (३) मार्य-उत्तम । आर्य शब्द प्रीमिनेघरके, मुमुभुके, तथा कार्यदेशके यनेबाठोंक लिये प्रयुक्त होता है। () निक्षेप- प्रकार, भेद, दिमाग । २ भययण-मयमे पर फरमेवाम शरण नेवासा । ३ हेमचन्द्राचार्य घधुकाके मोह वैश्प पे | उन महामामे कुमारपाठ पगास वपने मुटुमके उिपे एक अप्रतक भी म माँगा पा । त्या स्वप भी राम भमका एक प्रासतक मी न लिया या--पर बाव पीकुमारपालने उन महात्माके अमिाह के समप कही थी। उनके गुरु पाचन्द्रसरि पे। " । (८) वापार मुदी ११ रवि १९५६ १ सरपती-जिनवाणीको धारा २ (१) बॉमनेमाला, (२)भिनेके छ (३)बंधन पोर (१) बनके मम समस्त ससारका प्रपंप हता, पेमा भीधिमेन्द्रमे फदा है। २ बनारसीस भीआगराक दशाभीमासी वैश्य पे। बापा ॥ १२ सोम १९५६ १ मौपशामित्रपत्रीने योगशिपमें-तारि' में लाया है कि गीतरागसपके मना कही भी परवा नही हा सकती। बीतयगमुना मिवाय मरा सब पुप नि मस्त गता है- बामरम्प उगता है। पापी 'म्पिगशि में बताया कि पौनरागमुग पिपपर ध्यता वाली 'पयामि' में बताया कि परमा-गासम्पप रोता है। यहाँ केपमान होता है। २ पानापागके कर्वाका सम्पप प्राप्त महा माया, पर परिमदरिने उन्हें मागा- मुमारी माना है। १ हरिमटग्नेि उन सियोंम बप्पामराम भरानमें वर्गम दिपा है, और उमा कामे परिवी महारान उपम गुजराना डिगा है।
७८० - प्रीमद् पचन्द्र [८५४ मापानवार-भवमाधान . योगरिमें यों भावोंध (ौरपिक, औपशमिक, बायोपामिक, धापिक, पारिणामिक और साविपातिक ) समावेश होता है। ये म भाव बोरके सतलभूत है। ५ बबतक पपार्प शान न हो तबतक मौन एनाही टपक है। नहीं तो मनापार पोर माता है। इस विषयमें उत्तपन्ययनसमें बमाचारनामक अधिकार है। ६ हानीके सियतमें फेर नही हो सकता । ७ सूत्र बास्मात्र स्वधर्म प्राप्त करने के लिये बनाये गये है परन्तु उन पस्म पपाप समसमें मसी बाता, इससे फर माश्म होता है। ८ दिगम्बरमतके ताजपचोंके कारण मुश पस्प समाचौ वा सकता है । वामरमतको शिपिम्ताके कारण रस होता गया । ९ शामसिएप या शद मरफमें बसाता बताने के लिये प्रयुक्त होता है। सविरके ससे मिम्ता अम्ता होता है। भासे संसार-मारमा उस पस्प है। बामा परमापस (वप्पसाप छोपर) मदनबमके समान है। १० मिनभवा दो प्रकारको हैकापोत्सर्ग और पपासन | प्रमार दूर करने के लिये दूसरे भनेक मान किये गये न्ति मुस्मत ये दो ही वामन है। ११ मधमरसनिमर्म पटियम प्रप्तम पहनकमसमंक कामिमीसगशून्यः । करसुगमपि यचे धावसंघर्षप, तदसि नगवि देगो बीवरामस्स्पमेव ।। १२ पैम्प क्ष करनेवालेको पहिारी। १३ तार्प-पार का मन । ११ अपनाप प्रमुकी स्तुति महामा बागदपनीने की। मीवानदममनीका सरा नाम सममानद पाने तपगछमें हुए है। १५ वर्तमानमें गोगोंको हान तपा पति के साप सबभनी या मताचार्पने मार राम है। १६ x मापय मानंदपनवनी, मवि गंमीर मदार । पासमार पसारि मिम परेपपिपिस्वार । १७ बिरल तीन प्रकारसे माना जाता है-(१) मा मापसे यब है। (२) बैतन्प-संसारी बाल-विमानरूपसे पते । (३)सिरपुर तपमानसे पते ।। वापाल पदी १५ मौम १९५६ १ भगक्तीमारापना सी पुस्तके मध्यमार-मारके महात्मामों के तपा मुनियों योम्प है। ऐसे प्रपोको उससे कम पापी ( पोम्पत्ता ) मा सानु मायकको देनेसे स्वमता होती है। सरें उससे उस्टय मुकसान होता है। सबै मुमुसुबोको हो पा ममकम्प। २ मोक्षमार्ग अगम्य तपा सरक। बगम्प - मात्र विमानशाके रण मतमेव पर बानेसे किसी भी जगह मोक्षमार्ग ऐसा मही या गो समहमें ना सके) और इस धरण परमानमें पगम्य । मनुम्पके मर पानेक परमार अरमन मारण मति अमेर मार नसलमी दिपानमार भाप सिख स्यीय प्रा।
मामानार-प्रमउमापान] पिपिप पत्र मादि संप्रा-पों पर्प मानशारा मादी पकाकर दवा करनेके फसकी मराबर हो मतमेद पानेका फस हुआ है, और उससे मोधमार्ग समसमें नहीं माता । सर -मतमेदकी मायापचीको दूरकर, यदि भामा चौर पुगएका पृपकरण करके शांतभावसे अनुमक किया जाय, सो मोक्षमार्ग सरल है, मौर मार नहीं। ३ मनेक शाम है। उनें एक एकको वाचनेके बाद, यदि उनका निर्णय करनेके म्येि बैठा माय, ता उस हिसावसे पूर्वमादिका बान और विज्ञान कमी भी प्राप्त न दो, अर्थात् उसको कमी भी पार न पो, परन्तु उसकी सकसना है, और उसे प्रागुरु बताते हैं कि महरमा उसे बतमम हो पास कर लेते हैं। १ इस नौमने नवपूर्वतक हान प्राप्त किया, तो मौ को सिदि महोई, उसका कारण विमुष्ठ दशासे परिणमन करना हो। यदि बीच सन्मुसदशासे धन होता तो मा तरक्षण मुक्त हो जाता । ५. परमशांत रसमय भगवतीमाराधना मैस एक मी शासका यदि पछी तर परिणमन मा होवोस। ६ इस बारे (काल) में सपपण मछे नहीं, वायु कम है, और दुर्मिक्ष महामारी जैसे सपोग परमार भाते है, इसलिये वायुको कोई नि चपपूर्वक स्थिति नहीं, इसलिये जैसे बने से मामहितकी पाव तुरत ही करनी चाहिये । ठसे स्थगित कर देनेसे बीच मोठा मा बैठता है। ऐसे कटिन समपमें तो मया ही कठिन मार्ग (परमशांत होना) को प्राण करना चाहिए । उससे ही उपशम, अयोपशम और क्षायिक भाव होते है। ७ काम वार कमी कमी कीमपनेसे हार मानते हैं मही तो पात बार तो ये अनेको होपपर मार देते हैं । इसलिये गाँतक हो, जैसे बने पैसे, वरसे उसे मेनेके सिप मप्रमाी होना चाहिये- विस वय नसे मा भाप उस तरह होना चाहिये । शूरवीरतासे पैसा तुरत हुभा जा सकता है। ८ पर्तमानमें रिरागानुसारी मनुष्य विशेषतपस है। ९ पर सवे पकी प्राप्ति तो दहका धर्म सहरमें हो औपनिक द्वारा विधर्ममसे निकलकर सधर्म पकर हता है। उसी तह पनि सचे गुस्की प्रापि हो तो मारमाकी शांति त हो मगमतामे और सारमें ही हो गाती है। क्रिया परमेमें तत्पर वर्षात् अप्रमादी होना पाहिये।प्रमाग उम्टा कापर मदाना पाहिये। ११ सामायिक रुपम । प्रतिक्रमणमामाकी क्षमाफ्ना-बाराधना । पूना-भक्ति १२ दिनपूग, सामायिक, प्रतिरमण मा किस वनुमसे करमे पाहिप--पार करनेसे पकके मा एक प्रश्न उठते है, और उनका किसी वय पार पानबाडा नहीं । जानीरी भावानुमार, शानीराय करे अनुसार, पाहे गाव फिसा मी क्रिया प्रकृति करे तो मी ५ मोशो मागम हो। १५ हमारी भावास चरनेसे प-ि पाप टगे, तो उसे हम अपने सिरपर वार हो । कारण कि वैसे में कॉट पर हो तोपमा मानकर कि किमी लगेगे, मार्ग नाता मा फर्द मामी उन्हें गहमे ठयाकर, किमी देसी रमा एक जगहमें गोमियाँ पे किमाको न छणे, तो पुरा पर एम्पन्न गुनाह नहीं कहा जाता, उमी तय मोशात मार्ग बताने से पार रिम तर या सकता है।
भीमद् रामचन्द्र [८५४मानवार-यातमापन ११ बानाको नामाक पो ए बानी-गुरुमे क्रियाको पचास, अपनी याम्यवानुसार किमीकी कुछ बताया हो, और किसाको कुछ बताया हो, तो उससे मार्ग बरकता नही है। १५ पपार्य सम्मके समझे बिना, अपका 'नो सर्प बामता है, यह परमार्थ पपाप है बपत्रा मही,' इसके माने बिना समझे बिनायो बका होता है, यह धनत समार माता है, इसलिये यहाँतक पा समभनेको शकि न हो पातक मौन एना ही उत्तम है। १९ बका होकर पक मी बायको पपार्य मार्ग प्राप्त करानसे तार्यकरगोत्र पता है, और उससे तण्टा करनेसे मयामोहनाप कर्म पता है। १७ पपपि हम इसी समप तुम सबको मार्गमा दे, परन्तु मरतनके अनुसार है। वो बस्तु रम्सी माती । नहीं तो निस तय हल्के परतममें मारी बस्तु रख देनेसे बरतनका नाश हो बाल है ठसा तप यहाँ भी की बात होगी । १८ में किसी तर सरने जैसी बात नहीं है। कारण कि तुमारे साथ हमारे पैसे हैं। का मन मार पुस्पार्पक वापान पदि तुम पुरुपार्प करा तो मोक्ष पोना दूर नहीं निहोंने मोश्च प्राप्त किया वे सब ममामा परिसवपने से मनुष्य ही थे और समान पान के बाद मी (सिम होने के पी) देह दोनोपही राता । वो फिर अब उस पासेसे उन महामामोंने क्या मिका राम पर समसकर हमें भी उसे निकास राम्ना है। उसमें रर किसका माविबाद वपना मतमेव किसका! मात्र मतमापसे यही उपासनीय है। (११) बापात सदी १० युष १९५५ १ प्रथमसे मापुधको बाँधना बार उपयोगमें बना सौरे से, तो ससा समप काम भाता है। उसी तय मपमसे हो पा राम्पदशा प्राप्त की हो, वो मा बबसर खानेपर काम गाती है-बारावना हो सकता है। २ पशोलिजपनीने प्रय सिसते हए तमा व उपयोग रम्मा पा को प्राप किसी नगर मी न मूठे पे । जो मी उपस्थ मलस्थाके कारण मेसोगापा स्तफ्नमें से सांगसूत्रकी गो शासा दीपा मिलती नहीं, प भीमगक्तानी पान शतको पप रके दो माश्म होती है। इस बगह वर्षकाने रासमति घमर्प परम्प गिना है, परन्तु उसय वर्ष ऐसा नहीं । रासम- ति र्पात् जैसे गरेको ग शिक्षा दी हो दो मी नातिस्लमानके कारण प्रा देखकर उसका होट बानेच मन हो जाता है उसी तय पर्वमानकामें बोलते हर मनिप्पकामें करने की बात बोकी बावी है। ३ मगमतीमारापना में रेश्मा बरिकारमें हरेकको स्पिति और पली तय बताई। १ परिणाम पनि प्रकार है-ौपमान, वर्षमान और समबस्थित । प्रपमके दो अनस्पये होते है और मन्तिम समबस्पित (बामास रेशीकरण ) केरलानालो होता है। ५व्य गुणत्पानको छम्मा तथा पोगका पम्पमालकिर हो सम्बस्थित परिणाम किस क्या हो सकता है। उसका नायः-सक्रिय गानको बांध बनान नहीं होता।
८५४ म्पाम्मानमार-प्रमणमामान पिविष पत्र मारि सपा-३ वर्ष क्रिया नहीं करता, तेय गुणस्थानफमें केवळीको मी योगके कारण सक्रियता है, और उससे बंध है, परन्तु न बघ धबध पघ गिना जाता ह । चौदावें गुणस्पानकमें धारमाके प्रदेश अमल होते हैं। उदाहरण के लिये, निस तय पिमरेमें रस्ता दुधा सिंह बाठाको सर्श नहीं फरसा, मा स्थिर होकर बैठा राता है, और कोई उसी सह यहाँ भात्माके प्रदेश भक्रिय राते हैं। वहाँ प्रदेशकी वपछता है महाँ बक्रियता मानी जाती है। ६ बळ सोपे [पो-योगका चापमान हाना बघ है। योगका स्पिर होना नबध है। ७ बब ववष हो उस समय नीष मुफ पुषा कहा बाता है। ८ उसर्गमार्ग अर्यात् यथाख्यातचारित्रको निरतिचार है। सर्गम तीन गुम्सियों गर्मित होती है। मपमादमें पांच समितियों गर्मित घेती है । उन बक्रिय है। नपमा सक्रिय है। उत्सर्गमार्ग उत्तम है, और उससे जो उतरता हुमाह नपबाद है। पौदहा गुणस्थान उस्सर्ग है उसस नीचे गुणस्थान एक दूसरेको अपेक्षा वपसार है। . मिप्यास्य, वविरति, प्रमाद, कपाय, और योगसे एकके बाद एक बनुक्रमसे बघ पाता है। १० मिप्यात मात् मो ययार्य समझमें नहीं माता । मिप्यालसे पिरतिमात्र नहीं होता। पिरतिके वमान कपायसे होती कपापसे योगको चपलता होती है। योगकी पचमता वानव, और उससे उस्टा स्वर है। ११ दर्शनमें भूस होनेसे शानमें भूछ होता है। जैसे रससे बानमें मूग होती है, वैसे ही मात्माका वीर्य स्फुरित होता है, और उसी प्रमाण र परमाणु प्राण करती है, वौर वैसा ही पप पाता है और उसी प्रमाणमें विपाक उदयमें भाता है। उँगसीमें उँगली गल देनेरुप-भेटीलप- उदय है और उनको मरोडनेप भूर है, उस भूससे दुम होता है, मर्यात् बघ पता है। परन्तु मरोजमेरूप भूस दूर हो गानेसे उनकी परस्परकी वटी सहनमें विपाक देकर घा नाती है, पौर मया बंध नहीं होता। १२ दर्शनमें भूस होती है, उसका उगाहरण -जैसे मका बापक शानमें तया सरेकेबानमें देोको अफेक्षा एक ही है भन्यया नहीं परन्तु बाप उसे बो अपना Bाका करके मानवा है वही भूत है।पही दर्शनमें भूस, और उससे यपपि धाममें फेर नहीं तो मी यह मूस करता है, और उससे उस को बनुसार बप पाता है। १५ परि उदयमें मानेके पहिसे रसमें माता कर दी माय, सो बामप्रदेशसे धर्म सिरकर निर्मग हो बाप, पपा म रससे उदय बाते। ११ पानी सोग नई भू मही करते इसलिये पपरहित हो सकते है। १५ शानियोंने माना है कि देह मपनी महापरानेपाली मी नहीं कमी म कभी उसफा नियोग तो होमेकाला है- मेद विज्ञानको ठेकर मानो हमेशा नगारा बर या हो, इस तर कानांके कम्नमें सुनाई देता है, और बालीके कान बहरे होते हैं इसठिपे पर उसे जानता महरा। १५ दानी देहको नापमान समझकर उसका पियोग हमिपर उसमें खेद नहीं करता । परन्तु निस तय किमीको यस्तु छौ हो, और बादमें बारिस देमी परे, उसी तरहये परामसे पो सौंप देता है-अर्पाट पर हमें परिणति नहीं करता । , मीमद् पनवम्द [८५४मासानवर-प्रमतमान १७ देह और मामाच भेट करना मेयान है। पाका तेगाव, उस तेगासे देर भौर वाहमा नुदा हुदा ऐ सकती है। उस मकान के होने के लिये महामाोंने समस्त शाब रखे है। जिस तय तेगासे सोना और उसका सोट बा मण्यो बाते है, उसी तरह बानाके मेव शिानरूप तेमासे स्वामाविक मारमदम्प भगुम्म्मु समालबाग होकर प्रयोगी दम्पसे का होकर सपर्म वा पाता। १८ सरे उदपमें वाये हुए फाँका वामा पाई मिस तब समाधान कर सकती है, परन्त बेनीय कर्ममें पैसा नही हो सकता, और उसका पारमप्रदेशास वेदन करना ही चाहिये और उसका देवन करते हए कठिनाईका पूर्ण अनुमष होता है। यहाँ पनि मेदान सम्पूर्ण प्रगट न गारो तो वामा देशमसे परिणमन करती है बर्यात् देशको अपना मानकर बेहन करती है और उसके कारण मात्माको पति मग हो जाती है। ऐसे प्रसग मिमें मेवहान सम्पूर्ण हो गया है ऐसे शानियों को असावादका पेदन करनेसे गिरा होती है, और यहाँ कानाको कसौटी होती है।ससे बम्प दर्शनबारे याँ उस तय नहीं P सकते और बाती इस तय मानकर टिक सकता है। १९ पुन्नमाम्पको अपेक्षा रस्सी पाप, तो मी पर कमी न कमी तो नाश हो जानेबाला है हो। पौर भो मफ्मा नहीं, मा बना रोनेपाम नहीं; इसलिये लाचार होकर दीन बनना किस धमका ! २. भोगापपरिपदेसा-योगसे प्रति भौर प्रदश बंध होते है। २१ स्पिति स्पा बनुमागलप कापसे पते हैं। २२ बाठ तपसे, सात तरसे, म तयसे, मौर एक तरसे बच बाषा बाता है। (१२) वापत मुदी १५ गुरु १९५६ १ शानदर्शन पर यपाल्पात चारित्र, ससका फल निर्माण, और उसका फरमम्पाबाम मुसहै। (११) वापारी १शुक्र १९५५ १ देवागमस्तोत्र यो महामा सर्मतमाचार्यमे (विसका शब्दार्थ होता है कि मिसेम्पाम माम्प ) बनाया और उसके उपर विगमार और सेताम्बर मात्रापनि टीका है। ये महामा विगाराचा पे फिर मा उनका मनापा मा तह स्तोत्र खेताम्बर मापापोको मी माप है। इस स्तोत्रमें प्रपम रोल निम प्रकार है- देवागमममापानचामरादिपिस्तपः । मापारिपपि रस्ते नावस्वमसि मा महाम् । इस शोकका मानार्प पर कि देवागमन (देक्वायोका बागमन होता हो), बाकारागमन (वाम गमन होवा हो) घामादि तिमति (चामर गय विधि होती हो समयसरण ऐयो स्पादि)-ये स्त्र मापारियोंमें भी देश पाते । (पे मायासे बर्षात् इपिसे मौ हो सकते है। इसलिये उतने मासे हो बाप हमारे माचम मह (उतने मानसे वार्यकर वषा मिनेन्द्रदेशका मस्तित्व मा! माना वा सकता । ऐसा विमति माविका हमें कुछ मी प्रयोजन नहीं। हमने तो उसवत्याग कर दिया है) इस भाचार्य मानो गुमासे निकम्तेर ठाकरशहाप पास उपकनिरपेचमाक्से वचन पे पर माशप पहाँ पताया गया है।
८५३ मास्पानसार-प्रफ्नसमाधान विधिप पर मादि संप्रह-पों वर्ष ७८५ सरमूख मर्य अनुभव किया है- २ माठ के अयपा परमेपरके सक्षण कसे होने चाहिये, उसक स्वपमें तपास्त्रकी टोकामें परिटी गापा निमारपसे है. मोसमार्गस्प नेवार मेचारं कर्मस्मृताम् । मावारं पिश्यतस्वाना मंद वगुणसम्पय ॥ - मोक्षमार्गस्य नेवार '-मोक्षमार्गको के गाने पाठा-या कानसे मोक्षका वस्तित्व, मार्ग, मौर से बानेपामा इन तीन बातोंको स्वीकार किया है। यदि मोश है तो उसका मार्ग मी होना चाहिये, और यदि मार्ग है जो उसका द्रश्य मी होना चाहिए और बो द्रश्य होता है की मार्ग में बा सकता है । मार्ग मे बानेका कार्य निराकार नहीं कर सकता—साकार कर सकता है। पर्याद मोधमार्गका उपदेश, साकार ही कर सकता है; साकार उपदेश ही-निसने स्थितिसे मोक्षका -उसका ठपश कर सकता है । ' मेतार कर्मम्मताम्-कर्मनप पर्वतका मेन करनेपाछापर्यात् कर्मरूपी पतिाक भेग्न करनेसे मोन हा सकती है, अर्थात् जिसने देह स्थितिसे कर्मरूपी पर्वतोंको मेदन किया है, ना साकार उपदेश है। पैसा कौन है। मो वर्तमान देहमें जीत प्रमुख है यह। जो कमलपी पर्वतोंको तोडकर मुक हो गया है, उसे फिरसे कर्मका नस्विप'महा इसलिये मैसा पातसे मानते हैं कि मुक्त होने के बाद गो देह धारण करे पहनीमुक्क, सो ऐसा गौचमुक्त हमें नहीं चाहिये । हावार वियतत्वाना 'विपके पत्तोंको गानमेगाठा-कानसे पह बताया कि बात कैसा चाहिये कि जो समस्त विश्वका माता हो । 'बंदे समयम्पये '-उसके गुणों की प्राप्तिके लिये मैं उसे बदन फरता है - जर्यात् जो इन गुणों से युक्त हरा रही बात है, और यही पदनाप है। ३ मोक्षप समस्त पैम्पोंको ही सामान्यमापसे चाहिये, एक बीवको मपेशा से नहीं है, मर्यात् या पेतम्पका सामान्य धर्म है । पर एक सीवको हो हो और दूसरे नानको म हो, ऐसा नीता। १ भगवतीभारापनाके उपर क्षेतामार वाचापाने नो टीका की, हमी उसी नामसे ५. करणानुपाग भयना दम्पानुपोगमें गिपर मोर सेताम्बरों के बीच कोई नम्तर नहीं, मात्र बाब म्यारमें ही अन्तर है। करणानुयोगमें गणितमपसे सिवात रस्मे गये हैं। उसमें फेर होना समज नहीं । ७ कर्मन्य मुम्पम्पसे करणानुपागमें गर्मित होता है। ८ परमा मप्रकाश Pगम्बर वाचार्यका नाया हुमा है । उमक उपर टीका है। ९ निगाहता मुहै। सफम्प गुन। १. काप तप करते हुए मी महामुनिको निराकुलता भात् सम्पठा देखनमें वानी है। माछा यह कि रिसेप बाकी भावश्यकता है, और उसमु वह ता मा कापासश करवाई, रि मी पाहतारम्पइशारा मनुमन करता , जो सिर रिसे कापसश करना बाकी नहीं पा में सिवमगवान्से निराकुलता कैसे ममत्र महाँ! ११ देहको अपना विम्य विमुल पर है। जैसे देशमार्म देसनेमें माता , मे हो : P4, परन्तुनौयाम मसार पाय- "नया मह मार्गिय नही किर "प्रज्म परदीपुर मातम दिनकर नाम परामरका सापमपाक-me- मन्या पान, धुन Pra"शा मान गए। TIPमा मानना - म दशा महारTM -रिपाकार पोरे लेयरपरगया trm.गशाापी आप न प्रकारका N-10 शिमगुणर्म देकनार- सदरार दूसरे इम्पके सपोगम भरनगन - १२ चैम्पयन १५ मिपा, मना र समानता ११ पूराचन्यमान १५. मन मा म १६ यमर" १० अनेक प्रश्न अनुष्का पन मनोम ने पाप यएन। तर एम्य बरीच उरत होगना पाए। १.मि.71 मप्रिनी PM बार पर इसके उमन (FEEर रमन , ने यम पम्पनर मा मगर गना पन म्पार, मो mnt लगे मनुमार मम नही Pा याबासाहको म. rogy in नात है, >ur-पापमपा पन्द्रिमा इति ममोरिसर .
८५५ म्पाफ्यानसर-प्रनसमापान ] विविध पम मादि सपा-वाँ वर्ष . । . २ भास्माको मतीतिके लिये सकलनाके प्रति प्यन्त -न्द्रियोंमें मन नविष्टाता है, वौर पाकीकी पाँच इन्द्रियों उसकी भावानुसार घसनेवाली है। धौर उनकी सामना करनेकाम मी एक मन है। यदि मन न होता तो कोई भी कार्य न बनता । पास्तवमें किसी इन्द्रियका कुछ भी नहीं पस्ता । मनका ही समाधानका होता है। यह इस तय कि कोई पीर मॉससे देसी, उसे पाने के लिए पैरोंसे पम्ने लगे, वहाँ जाकर उसे हायसे उठा ली और उसे सारी इत्यादि । उन सम क्रियाओंका समाधान मन ही करता है, फिर भी इन सबका माप करमाके ही ऊपर ह। । निस प्रदेशमें पेदना अधिक हो, उसका पर मुख्यतया पेदन करता है, वौर बाकीफ प्रदेश उसका गौणतया वेदन करते है। १ जगत्में बमम्य जीव बनतगुने है। उससे वमतगुने परमाणु एक समयमें एक मील प्राण करता है। ५ दम्य, क्षेत्र, काठ और मानसे बाघ और वय॑तर परिणमन करते हुए परमाणु, जिस क्षेत्रमें पेनापसे उदयमें माते है, यहाँ इको होकर वे यहाँ उस रूपसे परिणमन करते हैं, और यो मिस प्रकारका बध होता है, प उदयों माता है । परमाणु पदि सिरमें इको हो औप, तो वहाँ सिरके दुसाने के बाकारसे परिणमन करते है, और वॉसमें पालकी मेदनाके भाकारसे परिगमन करते है। ६ बांका यही चैतन्य भीमें बीहपसे और पुरूपमें पुरुषरूपसे परिणमन करता है, और सुराक मी तयाप्रकारके नाकारसे हो परिणम कर पुएि देती है। ७ परमाणुको परमाणुके साय शरीरमें खाते हुए किसीने नहीं देखा, परन्तु उसका परिणाम- विशेप जानने वाता है। जैसे गरकी दवा बरको रोक देती है, इस बातको हम माम सकते हैं परन्तु मौतर क्या क्रिया हुई, इसे नहीं गान सकसे—पस राक्से कर्म होता हुमा देसनेमें नही भारता, परन्दा ठसका विपाक देखनमें बाता है। ८ भनागारबिसे बतमें वपना नहीं । ९ बमगार परहित । १० समिति-सम्पन् प्रकारसे सिसकी मर्याश है उस मर्या सहित, पथास्थितमानसे प्रति करनेका बानियोंने जो मार्ग कहा है, उस मार्गके अनुसार माफ्नोलसहित प्रति करना। ११ सवागत-उपशम । १२ भ्रमणमगवाम् साधुभगवान् अथवा मुनिमगवान् । ११ अपेक्षा प्रसरता । १५ सापेश-सरा कारण-हेतुकी बसरतकी इडा करना । १५ सारेभव भयरा अपेक्षासेपर सरेको छेकर । (१५) मापार बदी ३ रवि १९५२ , पाथिप्पान्यो सत्तासे राजा से। २ अनुपमयो समय नहीं; सिर म दान पोप । ।
भीमद् जाट [८६३ मामानार-मनम्मान पनि भरमगुमपर्म देखनमें मारे, तोरेरके उपरका राग ही नए ऐ नाय-भारमापि विसर होकर दूसरे दम्पके सपोगसे वामा देहरूपसे ( विमासे ) परिणमन करती ईमाम हो। १२ बैतन्यका क्यन्त स्थिर होमा मुक्ति है। १३ मिप्याच, अविरत, पाय वौर योग के बमानसे अनुमसे योग स्पिर होता है। १९ पूर्वक सम्पासके कारण वो सोका वा नाता प्रमाद है। १५ योगवाकर्षण करनेवाग न रोनेसे वह स्वय ही स्थिर हो जाता है १६ मा वीर प यह वाकर्षण ह। १७ संक्षेपमें बानो या कहना है कि पुम्से चैत्यका वियोग करानापर्षात् गगरेप्से भाकर्षणको दूर हटाना है। १८ गाँतक बप्रमच हुवा चाप पतिक नामत ही गना चाहिये । १० जिनपुग मादि अपच मार्ग है। २ मोहनापकर्म मनसे मौता गाता है परन्तु वेदनीयकर्म ममसे नहीं बीता नाता । वोपकर बादिको मौ उसच वेदन करना परता, पौर पर दूसरोके समान कठिन मी मगता । परन्तु उसमें (वात्मधर्मम ) उनके उपयोगकी स्थिरता होकर उसको निर्मग दाती है और सरेको- मानाको पाता है। मुभा दवा पर मोहमीप ना, कि मेदनीप फर्म है। मी पुमान परपन रे, सी यपरापी भा। जो मपमो पन म्यौहरै, सो पनपति पा॥ औबनारसीदास २२ पपनसाणेदार प्रपतीसरे मागमें गिनकम्पका वर्णन किया है। पा सेताम्बरोप पहै। उसमें मारे किस कम्पको सापमेवाको निस गुणोंबाम महारमा होना चाहिये - १ संपपण, २ परिब, २ भुत, १ पौर्य और ५ बसगा। २१ दिगम्बर सिमें यह दा साठ गुणस्थानवता भावकी है। दिगम्बर पिके अनुसार स्थपिरफापी और जिनकपी पे नग्न होते हैं और वामके बनुसार प्रथम भात् स्थपिर नम नही ते। इस कम्पको सापनेबाछेका मुखबार इतना अधिक तपान होना चाहिये कि उसका पति मुतखानाकार हो बानी नाहिये-विषयका चि न होनी चाहिये । दिगम्बर करते है नाम दशा मासेपही मोक्षमार्ग है मात्र तो सब उग्मत मार्ग-मममो निमोपसमग्गा शेषा य समाया सम । तथा मानो ए बार शारथी मायो र्यात् नम बारसे मी मनिफ बढ़कर है--स कहावतके अनुसार यह दशा बादशाहो मी पूम्प २१ चेतमा तीन प्रकमको 1-1 कर्मपसचेतना एफेत्रिय योग बनुमा करत । २ कर्मचकना-कोत्रिम तथा पन्द्रिय अनुभव करते हैशानपेना-सिरपाप धनुमय करती है। २५ मुनियोको पि बमैकिक हानी पाहिपे, परन्तु यसक महामे मा गैकिक रेसनेमे बाटो । मापन सौ २ शनि १९५१ १ पाठोधन-~एक बस तर विचार करना। । - 1 ८५५ म्मामानगर-मानसमाधान ] विषिष पत्र मादि सप्रह-वों वर्ष -- . २ वास्माको प्रतीसिके लिये सकलनाके प्रति यन्त पन्द्रियोंमें मन वपिष्टाता है, और वाकाको पाँच इन्द्रियाँ उसको भावानुसार पस्नेवासी है, और उनकी सफम्ना करनेवासा मा एक मन हो। यदि मन न होता तो कोई भी कार्य म पमता । वास्तवमें किसी इन्द्रियका कुछ भी नहीं पम्ता । मनका ही समाधानका होता है। यह इस तरह कि कोई पाम बोससे देखा, उसे पानके लिए पैसे चम्ने लगे, यहाँ नाफर उसे हायसे उठा की और उस हा सी इत्यादि । ठन सब क्रियाओंका समाधान मन ही करता है, फिर भी इन सवका बाघार बात्माके ही ऊपर है। ३ निस प्रदेशमें वेदना वधिक हो, उसका वह मुख्यतया पेदन करता है, और बाकी प्रदेश ठसका गौणतया बेदन करते हैं। १ जगत्में अमम्प गौर भनतगुने है। उससे बनतगुने परमाणु एक समयमें एक गोष ग्रहण करता है। ५ दम्य, क्षेत्र, कास वोर मानसे गाय और मम्यंतर परिणमन करते हुए परमाणु, मिस क्षेत्रमें वेदनारूपसे उदयमें पाते है, यहाँ को होकर ये वहाँ उस सूपसे परिणमम करते है, और यहाँ निस प्रकारका बध होता है, या उदयों माता है। परमाणु पर सिरमें इको हो नाय, तो वहाँ सिरके रुसानेके बाकारसे परिणमन करते हैं, और मॉमें मौसको पेदनाके वाफारसे परिणाम करते है ६ बांका ही पैन्य भीमें बीबपसे भौर पुरुपमें पुरुषरूपसे परिणमम फरता है, वौर मुराक मी तथाप्रकारके धाकारसे ही परिणम कर पुष्टि देती है। ७ परमाणुको परमाणुके साथ शरीरमें समते हुए किसीने मही देम्डा, परन्तु उसका परिणाम- लिप रानमेमें भाता है। भैसे परकी दवा परको रोक देती है, इस बातको हम मान सकते हैं परन्तु भातर क्या क्रिया हुई इसे महा मान सकते—इस COPEकर्म घेता या देखनमें महा माता, परन्तु उसका विपार देखनमें माता है। ८ अनागार निसे तमे अपना नहीं । ९ भणगार-घररहित । १० समिति सम्पन्न प्रकारसे जिसकी मर्पतो उस मर्याशसमित, ययास्थितमारसे प्रावि करनका पानियोंने गो मार्ग का उस मार्गके अनुसार मापयोगमहित प्रवृत्ति परना। ११ सचागत-उपशम । १२ श्रमणमगवान् साधुमगवान जपचा मुनिमगवान् । १३ बरेना-प्रारत-पूछा। ११ सापेभ-मरा कारण-हेतुकी जमानका डा परमा। १५ सारेसन नपा पोशाक सरेको हेर । (१५) भाषा परी १९५६ १ पापिया मुलासेमा दो। २ अनुपपमा समप नही, मिरमान योग्य ।
भीमद् पचम [८१बामनवम-प्रनम्मापन, राति भारफकी बफेवासे परस्पा और बम्य मतके सबमें--- १ जातक मृषा और परमीका स्याग म किया गाप, तबतक सब किपा निफर तबतक भारमा अल कपट हानेसे धर्म फलीभूत नहीं होता । २ धर्म पाने का यह प्रथम ममिश है। ३ जबतक समात्याग और परम्पाग गुण न हों, तबतक बचा था श्रोता नही हो सकते। १ मषा र जानेसे मातसा वसाप प्रति कम होकर, मितिका प्रसंग पाता है। उसमें साइन बातचीत करते हुए मी विचार करना परवा है। ५ भूषा बोम्नेसमम होता है, ऐसा कोई मयम महो। यदि ऐसा होता तो सप पोग्नेमाको अपेक्षा अगदमें नो बम्प बोम्नेमाडे मात होते है उनें अधिक मम होना चाहिये परन्त पैसा कम पस्ने मही वाता। तपा बसप योजनेसे काम ऐ तो फर्म एकदम गो ऑप और शल मी बोटे पर माप । ६ सपका ही है। उसमें प्रपम तो मुक्तिका भास ऐया है, परन्तु पारी सायका प्रमाण होता है, और उसका सरे मनुप्प वपा सर्वधर्म भानेपा के उपर क्सर होगा। ७ समसे मनुम्पकी वारमा स्फटिकके समान हो पाती है। वापाड पदी. सोम १९५५ १ गिमार स्प्रयाप पता है कि मामा केयान शषिरुपसे आता है। २ ताम्बर सम्प्रदाय मध्यानको सत्तारूपसे बनेको स्वीकार करता है। ३ शति शम्पका र्प सत्तासे अधिक गौण होता है। १ मतिमसे। वर्षात् मारणसे का हुवा महो । म्यो ग्यों शक्ति बढतो गतीमात् उसके ऊपर म्यों म्पों प्रयोग होता गाता है यो पो हाल विशुर होकर केवबान प्रगट होता है। ५. सवा वर्षात् पावरणमैं , ऐसा का माता है। २ सचामें कर्मप्रश्नति हो वोर मा ठइपमें नारे, पर शजिरूप नहीं करा पाता । ७ सपा केरान दो और वावरणमें न हो ऐसा मही होता । मगमतीमारापमा देसमा । ८ कान्ति, पति, शरीरका गन्ना सुरात पचना सूनका फिरना, उपके प्रदेशोंका ना भाना, नाचेका उपर जाना (मशेष धारणसे समुद्रात भारि बोना) रहता पर बाना पे सब तैमस परमाणुको निमाय है। तथा सामान्य प्रतिसे नामाले प्रदेश नो पे नाचे गामा करते -पाप- मान यते हों पा मावस परमशसे ही होता है। ९ कार्माण शरीर उसी जगा वामप्रदेशों को अपने वातरण समासे बताता है। १. बामाके माठ सबक प्रदेश बना स्थान नए बदम् । साम्प प रतिसे स्यूमनपसे पे बाट प्रदेश भाभिकेचे पाते सम्मम्मसे जहाँ ससात प्रदेश को पाते है। ११. एक परमाणु एकमा नेपर मी म दिशाजोको स्पर्श करता(बार रिशा तपा एक सर्प और एक बयो ये सब मिटर मदिशायें होती।
८५५मासानसार-मासमाधान षिविष पर मादि संप्रह-३श्यों पप , १२ नियागु वर्षात् निदाम १३ बाठ कर्म सब मेदनीय है, क्योंकि उन सबका वेदन किया जाता है, परन्तु उनका बेदन मोक-प्रसिब न होनेसे, गेफ प्रसिद मेदनीय कर्मको अम्ग गिना है। १. कार्माण, सबस, माहारक, क्रिपक और बौदारिक इम पाँच शरीरके परमाणु एक जैसे हो भर्पात् एक समान है, परन्तु वे मारमाके प्रयागके अनुसार ही परिणमन करते है। १५ अमुक अमुक मास्तिष्फकी नसें दबानेसे क्रोष, हास्य, उममता उत्पन हाते हैं । शरीरमें मुख्य मुख्य स्पछ मीम, माक स्पानि प्रगट माश्म होते है, इससे उनै हम मानते है, परन्तु ऐसे सूक्ष्म स्थान प्रगट माश्म नहीं होते, इसठिये हम उन्हें नहीं मानते, परन्तु मे है जबर । १६ वेदनीयकर्म निराहप है, परन्तु दमा इत्यार उससे दिमाग कर देती है। १७ बानीने ऐसा कहा है कि बहार मेते हुए मो हु स होता हो और छोड़ते हुए मा दुम होता रो, सो यहाँ ससेसना करनी चाहिये । उसमें मी वपबाद होता है । शानियोंने कुछ मामपात करनेका उपदेश नहीं किया । १८ जानीने अनंत वौषपियों बनत गुणोंसे सयुक देसी । परन्तु कोई ऐसी नौपपि देसनेमें मही वाई मो मौतको दूर कर सके । वैप मौर वोपधि से केवट निमितरूप है। १९ बुरदेवको रोग, दरिद्रता, सवस्था और मौत इन पार बाकि ऊपरसे रम्य उत्पम खा था। (१८) भाषाढ वदी ५ भीम १९५६ १ चक्रवतीको उपदेश किया गाय, तो बह एक घडामरमें राम्पफा स्पाग कर दे। परन्तु मिभुकको बनत तणा होनेसे उस प्रकारका उपदेश उसे मसर नहीं करता । २ पदि एक बार जामा अतापि स्पर्श कर बाप, तो वह वर्षपुद्रम्पमानितक यता है, ऐसा तीपंकर बारिने डा है। बताईतिज्ञामसे होती है। मत दि होनेका बामास सर्प रा (लमानसे (1) मामामें होता और सा होने की प्राति मी स्वाभाविक होता है। वर्षात् वारमा परमामगरके समान है। बर होनेकी और उतर जाने की माँच परमामीटर कराता । पपपि यरमामीटर गरको भारति नहीं बताता किर मी उससे उसकी जाँच होती है। उसी तब भईत्ति होनेकी भारुति मा इम नहीं होती, फिर भी बतईति है ऐसी भारमाको पाँच से गाती है। वैसे बाप सरको किस तर उतारती है, इस बातका म नहीं बताती, फिर मी भोपपसे मर र दो गाता है-पसी आँच पाती है। इसी तय ईचि होनेकी सप हो नाच होता है । यह प्राति परिणामप्रताति'है। ३ नायक १ निराका बसम्पातगुमा उपरोसर कम है। जिसने सम्पर्शन प्राम मही रिया, म मिपाशि गौत्रकी भरेशा सम्पशि वर्नतगुनी निरा करता है। +गानमारनार पर्मी समान प्रामि भन्मालपरत्र परलो होने पर अपरे मतपनन म पलसमें भीमने मम्मामTRAIR रनो सिपा-mm- भीमद् पदम [८५मारपानवर-ममतावान ५ वाकर बारको गृहस्थामममें एनेपर मी गत वयषा वगाल सम्पत होता है। ६ गार क्षमा अगा, एक करा गाता है। कासीको परमाबगार सम्पन्न होता है। ८ बपि गुणस्पानमें गर अपना मागम सम्पमस होता है। ९ पाकिसम्पत्र अपना गाय सगान एम्पात एक समान है। १ देव गुरु, तलवयमा धर्म अपना परमार्थको परीक्षा करनके तीन प्रकार है-पडे पोर ताप | इस तय तीन प्रकारको सोग होती है। यहाँ सोनेको कसौटीका यात सना चाहिये (पर्मबिन्दु मय है)। परिज और दूसरा प्रकार किसी दूसरे मी मिल सकते हैं। परस्त सरको पिपुर कसौटीसे नो मुम गिना बाय, या देव गुर और धर्म सथा गिमा जाता है। ११ सिप्पको मो कामियाँ होती, निस उपदेशको प्यान नहीं पाती उसे उपदेशकर्ण न समयमा चाहिये । बाचार्य एस पाहिये मो सिप्प सम्पदोषको भी मान सके वार उसका यथा- समय बोध मी सकें। १२ सम्पारि गरस्य ऐसा चाहिये रिसको प्रति बुमन मी करें-ऐसा शामियोंने कहा है। वापर्य यह है कि ऐसे मिकरक धर्म पाम्मेवार भाहिये । रात्रि १ अविवान और मन पर्यशान क्तर । २ परमाणविज्ञान मन पर्पानसे भी चा भाता है और या एक अपवादरूप है। (२) वापन M७ तुष १९५९ १ माघमा होमेके लिए समस्त मुतवान है और उस बाराधनाका वर्णन करनेके म्मेि मुतकसी भी वास्प है। २बाम ठस्थि ध्यान दौर समस्त बारापनामा प्रकार मी ऐसा है। १ गुणकी वतियता ही पी और उसके साधीन पम्मि सिदि पारि र चारित्र सय करना या उसका पिवि। । दसबकासिकको पहिर्म गापा-- + पम्मा मगसमषिद, मीसा मयमो तरो। देवापि नसति, बस्स पम्मे सपा सभी । समें सस विधि गर्मित हो जाता है। परन्तु अमुक Aनि ऐसी नही कही गई, इससे पा समहमें बाता है कि स्पररूपसे विपि नही बताई। सामोर-भवमान मोर मनमानी मन परम उन्ले मिजान मप- मायमाम ऐला भीमाने भा। परम ( मणिर)को न हाँसम्म म्याचे पुनस्थलमै मौज्यामेर ममता माता सविच पूल्य (म्म पसरल पल मनी पावसायी प्रवरिपरमपर एक मिदमोके समान है। मोर मामामान्या है-पात उनि मुन मुमबहर गये। +---मारना संगम और ता-सामाजिव म मन्तर मन उसे देख मी नमस्कार मनुवारक .६५मारतानमार-प्रसमापान ] यिविध पत्र मादि मप्रह-या वर्ष । ५ (भामाके ) गुणातिशयमें ही चमत्कार ह । ६ सोरुप शान्त समाव करनेसे परस्पर बरखासे प्राणी अपने पैरमायको छोड़कर शान्त हो करते है। एसी प्रीतीथकरका अतिशय है। मो कुछ सिदि लम्ब स्यादि है ये बामाके नामतमानमें मर्यात् धामाके वप्रमच स्खमाबमें है। समस्त शकिया मारमाके वाधीन है। वामा बिना कुछ नहीं । इन सबका मूल सम्यम्झान दर्शन और पारित है। ८ अन्यत प्रश्मापुदि होने के कारण परमाणु भी पुर होते है, यहाँ सालिक असालिक रामके नीचे बैठनेसे जानेवाले असरका एणन्त मेना चाहिये । २ मि सिदि सीरवीर में निरपेक्ष महरमाको प्राप्त होती है—बोगी रागी वैसे मिप्यालीको प्रत नहीं होती । उसमें मी बनत प्रकारके अपवाद है। ऐसी शक्तिया महामा प्रगट नहीं माते-सा बताते मी नहीं । जो जैसा करता है सा उसके पास नहीं होता। १० छम्धि क्षोमकारी वार चारित्रको शिपिठ करमेवाली है। मम्मि मादि मार्गसे प्युत होने के कारण है। इससे हानोको उनका तिरस्कार होता है। बानोको नहीं म्धि, सिदि वादिस मुत होना सम्स होता, माँ बह अपनस विशेष बानाके वायकी शोर करता है। ११ मामाकी पोग्यताके बिना यह शक्ति नहीं माती | बारमाने अपना अधिकार बडा नसे बाबाती। १२ जो देह नती है यह पर्याप छूट जाती है, परन्तु मारमा मात्माकारसे अमर वस्थित यती है उसका अपना कुछ नहीं जाता; जो जाता है अपना मही-जबतक ऐसा प्रत्पक्ष जान न हो, तबतक मृत्युका भय म्गता है। गुरु गणपर गुमपर भपिफ (सफर), मजुर परंपर भार । प्रववपपर वनु नगनवर, मंदी पप सिरमौर ॥ - स्वामीकार्तिक । * प्रभुर-अलग भग निरहे । इप-प्रम | सिरमौर मित्र मुफुट । ११ मबगार-मन्त । परमागाउहरूपसे मजबूत । मगाह-एक परमाणु पोशको रोके--म्पास हो। भाषक-कानीके सपनोंका भोता-पानीके नफा प्रवण करमेवाडा । दर्शन प्रानके बिना क्रिया करते हुए भा, भूतदान बाँचते हुए मी, मालक साधु नही हो सकता । आपिक- भाषसे ही पालक सापु कहा जाता है, पारिणामिकमापसे मही कहा जाता । स्पविर स्थिर-न १५ स्थपिरकम्पमा सार हो गये हैं उनै गायकी मर्यादासे वर्सन करनेका-चम्का- धानियोंशय मुकर किया हुमा–बाँधा हुआ—निमित किया हुआ दिनमार्ग या नियम । १५ दिनसम्पएका चरनेवाले साधुओंके लिये कन्पित किया हुमागाँधा हुमा-मुकर्रर किपा मा निनमार्ग पा मिपम । (२१) बाराका ८ गुरु १९५६ १ सब धर्मोझी मपेशा नपर्म उक्य त्याप्रणीत है। जैसा ग्यास्त्र स्पारन उसमें किया * प्रपुरका प्रतिर मई बहुत रोग है और अपच न न रोता है।
- भीमद् पमचन्द्र [८५३म्मानसर असमापन. गया है, पैसा किसी से धर्ममें मही है। मारने'शोही मर गम्नेकोख छाप वीपकाने यामामें - माहै। इस जगह उपदेशने पचन मी बारमा सरकर वसर करते । प्राधिनी गावामें मानो नापदिसाके परमाणु ही न हो, ऐसा मीनिनका अहिंसाधर्म है। गितमें दया नहीं होता, रे त्रिम नही हो । नोंके छपसे सून होनेकी पटमा मी प्रमाणमें गोमो बैन रोता या क्सप नही बोसता। २ चैनधर्मके सिवाय दूसरे धोके मुकाव परिसा बदपर्म मौ चा पाता है। माध्मणों को यह मासिक-प्रियाओंन मारा मी बीविनने और बुखने ही किया रे यो बचतक फापम है। ३ मामयोंने पा बादि सिक धर्मबारे होनेसे अधिनको तथा मौसको सपत शम्दों का प्रयोग करके विस्फारामह पपा है। १ प्रमोंने सार्पपुदिसे पर Rसक मिपा दासिल की। मोबिनने तपा प्रौबुझ्ने सप बेभवका त्याग किया पा। इससे उन्होंने निस्वार्थ बुझिसे दाधर्मका उपदेश कर, सिक-क्रियाका विभोर किया । जगत्के पुसमें उनकी पस न पौ। ५ हिम्दुस्पान भाग एक समय किसी विधानवम्पास इस तर मेर देते हैं कि उसे फिरसे प्राण करत हुए व अरचि हा जाता है। योरपियन छोगों में इससे सस्टी हो पात है। वे एकरस उसे या नहीं देते, परन्तु बाहरी रमते है । हो, प्रालिके कारण म्यादा कम चम्पास हो सकता हो, पह बात बगहै। (२२) १दनीय कर्मको समय स्थिति बारह मुर्तको है। इस कारण कम स्पिविका मन मोकपा- यके बिना एक समपका पाता है, दूसरे समय केदन होता है, और तीसरे समप निर्माण भावी है। २ या पिको किपासम्मेकी क्रिया । १ एक समपमें प्रत वपना भाट प्रालियोंका पहोवा पाँमुराम तथा विश्का पन्त मेना पाईप । बिस तप पुराम एफ मगइसे ड) बाती है, परन्तु उसम्म रस हरेक दिपको पर चला है और हरेक हप अपनी मनी शक्ति अनुसार उसे प्राणार उस एमे परिणमन करता है। उसमें बनर नही पाता, उसी तह पदि कोई लिगअपना किसीको सर्प काठ हे तो वा किया तो को जगा दो, पर उसका असर विपनपसे हरेक इत्रिय हुदे उसे प्रकारसे समस्त पारमें ना है। इसी तप कर्म करते समय मुम्म्प उपयोग तो एक ही प्रावित होता है। पर उसका असर भपात पाप हम सब प्रातिपकि परम्मरे सपग्रेटेर हो मिला है। भैसा रस सा ही उसम पदम है। शिम माग सईस हो, दम मा परिवार गग जाप, दो पाउमा तगर प िप्रानिकाएपहिया गाय सोपा एमासमोर उसके कारण गरी प्रतिमे पाना मा क मा | गेम्म प्रयोगसे पहा मावि पारिस उan ८५३म्पास्मानवार-मम्माषान] पिपिप पर मादि सपा-बों वर्ष - । चाता है, उसी तय प्रातिका रस मद फर दिपा नाय, तो उसका बल कम हो जाता है। एक पति बप करती है और दूसरी प्रहतियों उसमसे माग लेती है-एसा उनका समान है। १ मूठ प्रातिका भय न हुआ हो और उत्तर कर्मप्रतिका बर-विभो गया हो, तो मी उसका बप म्ह प्रतिमें यनेमासे रसके कारण पा सकता है --यह भाषय नसा है। ५ बनतानुबपी कर्मप्राविकी स्पिति पाठीस कोडाकोनीकी, और मोहनाप (दाममोहीप ) को सत्तर कापाकोहीकी है। (२५) धापार बरी ९मुक १९५६ १ आरमा, वायुका बप एक बागामी भवका ही कर सकती है, उससे अधिक मोका बम नहीं कर सकती। २ कर्मग्रन्थके अपचको बो वाठो कमप्रवियों बता है, उनकी उचर प्राणियों एक गौरकी अपेक्षा, अपमाके साय, बघ उदय बादिमें हैं, परन्तु उसमें मायु नपादनपसे है। इस वह कि मिप्याल गुणस्पानबती गोषको यमौ चार मापुको प्राविका (वपमाद) बताया है। उसमें ऐसा नही समप्सना चाहिये कि बीच मौजूद पर्यायमें चारों गतिकी वायुका बन करता है, परन्तु इसका अर्थ यही है कि वायुका बप करनेके लिये वर्तमान पापमें इस गुणस्पानकवता नीवको चारों गलियों सुठी है। उसमें बह चारमेंसे किसी एक गतिका ही बघ कर सकता है। उसी तय नौर जिस पर्यायमें हो उसे उसी अायुका उदय होता है। मक्सत्र पर कि पार गठियों से बर्तमान एक गतिका उदय हो सकता है, और उदारणा मी उसीको हो सकती है। ३ गो प्रति उदपमें हो, उसके सिवाय दूसरी प्रतिको दीरणा की जा सकती। भौर टतने समय उदयमान प्रकृति रफ गाती है, और पर पागेसे उदपमें जाती है। १ सचर कोकाकोषीका मामे बड़ा स्पितिवध है। उसमें वसम्पादों मर होते है। तथा बादमें मेसेका वैसा ही क्रम क्रममे बच पाता गाता है। ऐसे बनतबरकी पेचाम्से जनतों मत्र को नाते हैं, पर मबका बम पहिछे कई भनुसार ही पाता है। (२) बाद १० शनि १.५६ १ रिशिष्ट मुम्पतया मुन्समावका वाचक शम्द। २ जनावरणाप, दर्शनावरणीप, और बताप ये तीन प्रतिया उपासमाबमें कमी नही सम्ती- पाशममाषसे ही हैं। ये प्राति पद उमाममा में हो तो जामा नापत् हो जाय और किया मी म कर सो भपका उसमे प्रति मी म हा सके । शानका काम जाननेका, दर्शनच पाम देखने का है, और पीयका नाम प्रवर्तन करने है। पोर्प दो प्रकारसे प्रति कर सकता है-१ ममिमपि . अनाभिमार। बभिमधि-वामारी प्रेरणा पर्मिको प्रति होना । बनभिमरिमापाप बाकी मापिरोना। जाननमें भून नही हात ! परम्नु उत्पभाषमे पाठ दर्शनमाइके कारम मूल होनस मर्याद औरका और माश्म होनेसे, पोपको प्राति विपतमामे हमारे परिद सम्मानसे तो गार । भीमद् बन्द [मामानवसामसमाधान सिपाय पा राम । बारमा कमी भी किसाफे बिना नहीं हो सकता । जबतक योग गते हैं तबतक भामा पो किया करती है हवपनी पोर्पशहिसे ही करता है । छिया देसनेमें नहीं बाती, परन्तु पप परिणाम के उपरसे बान में बाती है। जैसे सई खुराक निग्राम पच मातीहै-या सबेरे उम्नेसे मात्म होता है। यदि कोई करे ननिदा वधी माई पा, तो पा होनेगारी किया समसमें बानेसे होबा नाता है। उदाहरणके पिये किसाको पछि पास बरसका उममें एक गिनमा बाने, तो इससे या नहीभागा सकता है कि उससे पहिले बकाये हो नहीं । इसना पीका पापगा कि उसको उसका शान न पा । इसी तय बानदर्शनको समझना चाहिये । बारमा बनदर्शन और पार्य पोरेमात मी मुळे गनेसे वामा क्रिया प्रापि कर सकता है। वार्य हमेशा वापर हा करता है।कर्मप पाँचमेसे विशेष पर होगा । इतने मुगसासे मात ठाम होगा। १ पीकलमातरमेशा पारिणामिकभालसे है। इससे गाल गोत्रमावसे परिणमन करता है, और सियल वापिकमास होता है। स्पोंकि प्रतियों के क्षय करनेसे हो सिदपर्याय मिकती है। १ मोरनीयकर्म बौदायिकमावसे होता है। ५ प ग कानमाचारहित बक्षर लियते है परन्तु कोको कानमाचारित नही मिलते उन तो महत स्पररूपसे मिलते है। उसी तय कथानुयोगमे शानियोंने कानिट का काममात्रापरत सिम्हा हो तो मोदी परन्तु प्रतिमें निश्चित ही मिले। उसमें परा मी मेष मीबाने दिया। (२५) बापार बदी ११ व १९५६ गेरा पिवई ई सी समान है-ऐसा उचयम्पयनसूत्रमें कहा है। जिस तय रोग सिस सोई नहीं बाती, उसी तरहान रोमेसे ससारमें पोसा महाँ खाते । (२५) मापद पदी १२ सन १९५६ १ प्रतिधारशपिंकरका धर्मराम्पर मतानेवाण । प्रतिहार परवान । २ मिस तय स्परसायम्भूग, उससे मी स्यूम, यूप, रसे दूर, उससे मी र पदापोका पान पोत उसी तय सूक्ष्म सम्मसे सम्म बादिका शान भी किसी को होना सब ऐ सकता है। २ नमधाममम। १ उपा-माप गया । अनुपातमाही मारा गया । उपामगन्यापारमूख विनिप्रेम बो पस्नुपर्म का गा सके । पाठान्तर-एक पाठको बगा (सरा पाठ । मातर-कानेका ख बदर माना । दिनपयो पभायोग्य मोफेरफारपाक-कम मादा। मामयम्प पर सामापरिशेप उमपामक सत्तालाम। सामाप घेवनपणा दर्शन है। सनिरोप मसपाबान है। ५. सपासमुतनसम्पक प्रचारसे सत्ताका उदयमूव होगा-प्रकाशित होना, एफरिस ऐना-मासना। ६ पर्शम अगत्के किसी मी पदार्पका मेदाए रसगपति निराकार प्रतिविम्मत रोना उसका पति मान्म होना निम्पिरूपसे । इस तर भारसा समयके समाम साममेके पदार्यप भास ऐना, पनिर सम्प ऐता पहाँ बान रोयो।
८५५म्पास्मानछार प्रमसमाधान ] विपिप पर भावि संप्रा-पों पप ७ दर्शनावरणीय कर्मक वापरणके कारण दर्शनके बगलपसे माइत होनेसे चेतनमें मुहता ऐ गई और यहाँसे शून्यवार आरम्म हुआ । ८ वहाँ दर्शन रुक जाता है यहाँ पान भी रुक गाता है। ९ दर्शन चौर बानका दिमाग किया गया है। शानदर्शनके कुछ टुकड़े होकर ये पुदे दे पर सबसे हो यह बात नहीं है । ये आमाके गुण है । जिस तरह एक रुपयेमें दो अठमी होती है, उसी पर भाट वाना दर्शन और माठ माना हान होता है। १. तीर्थकरको एक ही समय दर्शन पान दोनों साप होते हैं, इस घर गमर मसके अनुसार दो उपयोग माने है, शेताम्बर मतके अनुसार नहीं । १२ में गुणम्पानको शामावरणीय, दर्शनावरणीय मौर बतराप इस तरह सीन प्रवृतियों का एक साथ ही क्षय होता है, भौर उत्पम होनेवाली हानि मी सापमें ऐसी है। यदि पे एक ही समयमें न होते हों, तो उनका मिम मिम मातियोंसे बनुमत्र रोमा पाहिये । खेताम्बर करते हैं कि बान सत्तामें समा चाहिये, क्योंकि एक समयमें दो उपयोग नही होते । परन्तु दिगम्बरोंकी उससे जुदी मान्यता है । ११ शून्यवाद-कुछ मी नहीं' ऐसा माननेवाला यह बौधर्मका एक मेद है। मायतन= किसी मी पदार्पका स्फ-पात्र । कूटस्प-अपलको चापमान न हो सके। वटस्थ-किनारेपर- उस स्यम्में । मध्यस्थ-पाच । (२७) वापार बदौ १३ भौम १९५६ १ योपचपयाना बाना । परन्तु प्रस्गवश उसका वर्ष वाना पाना-मनागमन रोता है। यह मनुष्पके गमनागमनको र महीं परतावासोमास स्पादि सूक्ष्म क्रियाको ए मगू परताहै। पविषय-याना बाना । २ मामाका दान सब चितामें रफ गावा है, उस समय नपे परमाणु प्राण नही सकते, और जो होते हैं नए हो जाते है, उससे शरीरका पान घट जाता है। ३ भीवाधारंगसूत्रके पहिले शासपरिक्षा वप्पफ्नमें वौर भौपदर्शनसमुचयमें मनुप्प और क्नसतिके धर्मको तुम्ना कर बनस्पदिमें वाल्माका अस्तित्व सिद्ध किया है। पर इस पर कि दोनों उत्पन्न होते है, दोनों ही बहते है, वाहार लेते हैं, परमाणु छेते है, छोरवे , मरते स्यादि । (२८) भाषण मुनी रवि १९५६ १ सापु सामान्परूपसे गृहवासका स्यागौ मूम्गुणोंका धारक । पति-पानमें स्पिर होफर भेमा माग्मेवाला । मुनि=मिसे भवधि मन पर्यशान तया फेरगान होता है। अपि-यो पात अरिधारी । पिके चार भेदों , बन, देव और परम । रानर्षि दिवाला । मनवि-महान् अमिमाम । देवर्षि आकाशगामी देव । परमपि केवमानी। (२९) प्रावणमुरी १० सोम १९५६ १ नमभ्य मान वर्षात् जो मीच उत्कट रस्से परिणमन करे और उससे कर्म बाना करे मोर मिसे उसके कारण मोक्ष न हो सके। मम्प मर्यात् जिस जीवन बीर्य शांतरससे परिममन को और उसने नपा कर्मबध न होनेसे जिसे मोक्ष हो चाप । रिस जातको पि ठाकर रससे परिणमम परवी । भीम प्रसाद [८५५ मामानवलपमम्माधान सिम्पर्याप पा बाप । वामा कमी भी क्रिया के बिना नहीं हो सकती । अबतक योग रहते तबतक मामा को किया करता है प मफ्नो पार्यशजिसे करती है। क्रिया देखनेमें मही माती, परम्त पर परिणामो ऊपरसे माननेमें वाता है। जैसे सई सुराक निद्रा पच नाती है-पा सबेरे उठनेसे माम होता है। यदि कोई कहे कि निद्रा मन्त्री माई पी, तो या होनेवाण किपाके समसमें बानेसे कहा जाता है। ठहरणके सिपे किसीको पदि पासीम बरसकी उपमें बक गिनमा माने, तो इससे पर नहीं कहा जा सकता है कि उससे पहिरे वो नही । इतना ही कहा बायगा कि उसको उसका पान न पा । इसी वय वामदर्शनको समझना चाहिये । बात्मामें शानदर्शन पर मौर्य पोरे पात मी मुरे पनेसे बहमा किया प्रति कर सकता है। बोर्म हमेशा चलाधर या करता ।।कर्मपीचनेसे विशेष स्पा होगा । इतने मुखासासे बात हम ऐगा । १ जीवमात्र हमेशा पारिणामिकमासे है। इससे पीत नापमापसे परिगमन करता है, और सिनव धायिकमास होता है। पोंकि प्रकृतियोंके छप करनेसे सिदपर्याप निम्ती है। १ मोहनापकर्म बौदापिकमावसे होता है। ५ स योग कानमात्रारमित मर मिसते हैं, परन्तु कोको कानमात्रादित नहीं सिखते) उने तो बात स्पररूपसे किससे है। उसी तर कपानुपोगमें शानियोंने कदाभित् पुल कानमात्राररित सिमा तो मरे हो परन्तु कर्मप्रतिम पे मिमित ही बक सिम्तेहै। उसमें जरा भी भेद मही पाने शिपा। (२५) बाबार बदी ११ रवि १९५६ जान गेरा पिप कि समान है-ऐसा उत्तराम्पपनसूत्र में कहा बिस वरह गरा पिरेमा सोई मही माती, उसी तण बान होनेसे संसारमें पोहा महासाते । (२) बापत दी १२ सोम १९५६ १ प्रतिहारजापंकरका धर्मराम्पत्य बतानेवाला । प्रतिहार-इमान । २ जिस तरह स्पू, बापापुल, उससे मास्क, दूर, रसे र, उम्से भी र पापोका मान होता है। उसी क्य सूक्ष्म, सम्मसे सूक्ष्म भारिका जान मी किसानो होना सिर हो सकता है। ३ माथामनग्न । १ पातमाग गा । अनुपश्त-ग) मारा गया । उपरमम्म्प वापरभूत विभिषेपन मा पस्नुभम कहा जा सके । पायमस्तर-एक पारी जगह दूसग पा । वातर कामेश्वरेट पर पाना । विषय-यो पयायोग्प महो-फेरफारपाटा--कम म्पारा । वामप्प पर स्त्रमा पविशेष उमपामा सवानाम है। सामस्प घेतनसमा दान है। समय चेतनसणारे। ५ सतासमुत-सम्पर प्रकार सत्ताध उपभूत होना-प्रकाशित होना, रत दोना-माम होना। दर्शन-सगढे दिसा मी पाश मेदाए रसगभररित निराकार प्रतिनिपात रोमा उसमा बस्ति माश्म राना निरिणम्पसे कुछ इम पर भारसाफी अहमके समान सामने पख मास ऐना, दर्शन है। यही सिपाही शान हो।
८५मासानसार-प्रमसमापान] पिपिप पत्र मादि संप्रह-पापों । ७ दर्शनावरणीय कर्म वावरणके कारण दर्शन के बवगतरूपसे बात होनेसे पेवन मूहता हो गई और वहाँसे शून्यवाद भारम्म हुभा । ८ भहाँ दर्शन रुक नाता है यहाँ धान रुक जाता है। ९ दर्शन और फ्रानका दिमाग किया गया है । हानदर्शनके कुछ टुकड़े होकर वे गुदे गुरे पर सफ्ते में यह बात नही है। ये बरमाके गुण है। निस तय एक रुपयेमें दो वठमी होती है उसी तद बार बाना दर्शन और माठ वाना हान होता है। १. तीर्थकरको एक ही समय दर्शन प्रान दोनों साप होसे है, इस तर दिगम्बर मतके वनुसार को उपयोग माने है, शेताम्बर मतके अनुसार नहीं । १२ में गुणम्पानको भानावरणीय, दर्शनावरणीय और मतराय इस तरह तीन प्रतियोका एक साप हो आप होता है, भार उत्पन होनेवाली सन्धि भी सापमें होती है । यदि ये एक ही समयमें न होवे रों, तो उनका मिम मिम महतियोंसे बनुमष ऐना चाहिये । सेताम्बर करते है कि हान सत्ता यना चाहिये, क्योंकि एक समयमें दो उपयोग मा। होते । परम्त दिगम्बरोंकी उससे जुदी मान्यता है। ११ शून्यवाद= कुछ भी नहीं' ऐसा माननेवामा या बौधर्मका एक भेद है। जापवन किसी भी पदार्पका स्पा-पात्र । टस्प अचम्चो पापमान न हो सके। तटस्प मारेपर- उस स्यळमें | मप्यस्यबीच । (२७) वापान पी १३ भौम १९५६ १ चयोपचय-बाना बाना । परम्त प्रसगवध उसका वर्ष बाना बाना--गमनागमन होता है। पा मनुष्पके गमनागमनको भाग नहीं पड़ता—सासोनस पानि सूक्ष्म त्रिपाको 0 अभय पड़ता है। परिचय-याना बाना । २ पाहमाका बान पर पितामें कफ जाता है, उस समय नये परमाणु महण नए सकते। और जो होते है ये नए हो जाते हैं, उससे शरीरका गमन का नाता है। ३ श्रीमापागसूत्रके पदिश शासपीखा वप्पफ्नमें वीर धौपदर्शनसमुख्यमें मनुष्य और परस्पतिके धर्मको पुसमा पर बनस्पविमें वाहमाका अस्तित्व सिर किया है। वह इस तप कि दोनों उत्पन होते है, दोनों ही मते है, बाहार लेते हैं, परमाणु छेते हैं, छोड़ते है, मरते है इस्पादि। (२८) श्रावण मग रवि १९५६ १ साधु-सामापरूमसे गृहमासका स्पागी मूरगुणोंका पारक । पति-पानमें स्थिर होकर घेणी माग्नेबाम्म । मुनि-निसे माधि मन पर्यशान तया केशान होता है। पियो मात पादिधारी।पिके घर मे. --एम्प प्रक्ष, देव बौर परम । यसिविधाम । अमर्पि-महान् प्रदिपाश्म । देवर्षि-आकाशगामी देव । परमपिसवानी । (२९) भाषणमुद्री १० साम १९५१ १ बमम्प गाल बर्यात् यो गाव ताफर रसमे परिणमन करे वोर उससे कर्म गोपा करे, वीर मिसे उसके कारण मोच म रो सके । मम्प मर्यात् मिस गोत्रका वीर्य शांतरसमे परिणमा को पौर उससे नया कर्मवध म होनेसे जिसे मोक्ष हो माप | जिस गावी इति उत्कट रसमे परिणमम करती १ भीम राम [८॥मामानव- प्रमापान हो, ससका गौर्य उसी प्रमाण परिणमन रता है। इस कारण बानाके शानमें बमम्म दिस दिये। भामा परमशति दशासे मोश और उत्कट दशासे बमोष होता है। जानीने ब्रम्पके समाको अपेक्षा मम्प बमम मेद करे। जीपका गौर्य टाकर रससे परिणम्न करते हुए सिवपर्याप नही पा सकता, ऐसा मानिने का है। मनमासे होती है-पोती भी नहीं भी होती। पपक- मन, बचन कायाले) ठगमेवाश। (२०) भाषम पदासनि १९५५ कम्मदग्नदि सम, संमोमी मोहोई मोबस्स । सोपी गापमो, वस्स वियोगी भरे मोपली ॥ -कर्म दम्पका वर्षात पुनर वप्पका साप बारका संगम रोना बंध। तथा उसका नियोग दो गाना मोह है। सम-बम तय सर्वप होना-भास्वरिक रीतिसे समय होना पों त्यों कम्पनासे सप रोना भी सम्स मेना चाहिये । २ प्रदेश और प्रतिबंध, मन बधम बौर पाके मोगसे होता है। पति और अनुभाग पप मापस होता ५ विपाक वर्षात् नमागसे पलको परिपकता होना । स कमौका मूग बनुमान है। उसमें पैसा तास, वीरतर, मंद, मन्तर रस पाहै पैसा उदयमें माता है। उसमें फेरफार बना मूग महोती । पाँ निवासी मुहियामें पैसा, सफ्पा, सोमेकी मोहर मादिक रहनेका रान्त लेना चाहिये। जैसे सीमिका मिपा गुत सम्म पदिय स्पया, पैसा, सोनेको गोबर सोदो, तो उसे गिस साप निकामे पर उसी जगह उसी बामपसे निरसती है धसमें जगाका और उसकी स्पितिध फेरफार नहीं होता बर्षात् पैसा पपा नही हो पाता, वौर स्पपा पैसा नही हो पाता उसी प्रय माया फर्म दम्य, पेर का और भावके पनुसार उपमें जाता है। बारमारे मस्तित्व में रिसे शक होमपाका पाता है। ५ तेरा गुणस्पानको वीर्षकर वादिका एक समयका मंच एता है। मुस्पतया पापित ग्यारे गुणत्पानमें पापीको मी एक समयका बम रो सकता है। १ पान पाना निर्मकता मग नही कर सकती, परतु उसे पमपमान कर सकती है। उसी तय बात्माले जानम कुछ निर्ममता कम नही होता, परम्त भो पोशाकीचमता है, उससे रसो पिना एक समयका बरहा। ७ पपि कपाका रस पुष्प वा पापस्म, तो मा उसका समान काया। ८ पुण्य मी समासे से होता है। पुष्पका बौठाणिया रस महोते, मोंकिपा एकांत म्याच टप मह)। कपापके दो मे:-प्रमस्वरमा धौर मप्रशस्तराग । पापके बिना अंध जापानका समावेश मुस्मतमा क्यापमें हो सकता है। प्रमादाय चारित्रमोहमें वोर मोगका मामि समावेश हो सस्ता। १. बाम पामरके समान है। मामला और बाबा है।
१८मामानास्प्रमसमापान] विविध पत्र मादि समा-पों वर्ष - ११ मनन करमेसे माप बैठ गाती है, मौर निदिध्यासन करनेसे प्राण होता है। १२ अधिक भषण करनेसे मननशक्ति मद होती हुई दसनेमें वाती है। १३ प्रास्तम्प मर्यात् लौकिक वास्प-नानीका बाय नहीं। १. वारमाके प्रत्येक समय उपयोगयुछ रोनेपर मी, बरकाशको कमी जपवा कामके बोके कारण, उसे मारमसम्बनी विचार करनेका समय नही मिल सकता—ऐसा करना प्रान्तमन्य शैकिक बधन है। जो साने पामे सोमे इस्पादिका समय मिठा वौर उसे काममें ठिया-बब पह मी वारमाके उपयोगके बिना नहीं हुआ, तो फिर मो सास मुसकी नाश्यकता है, वौर जो मनुप्पयन्मका कम्य है, उसमें समय न मिला, इस बधनको हानी कमी मी सपा नहीं मान सकता । इसका मर्थ इतना ही है कि दूसरे इन्द्रिय वादि मुखके काम तो कसरतके लगे हैं, मौर उसके बिना दुसी होनेके परका काफ्ना यती है, तथा 'वारिमक मुसके विचारका काम किये विना वनों काल दुस मोगना पड़ेगा, वीर बनत संसारमें भ्रमण करना पड़ेगा'पा पात जरूरी प्रगती नहीं ! मतम यह कि इस चैम्पको कृत्रिम मान रस्सा है, सपा नहीं माना। १५ सम्यग्रधि पुरुष, मिसको किये बिना म परे ऐसे उदयके कारण कम्पपहारको निर्दोष रूपसे साबित करते हैं। प्रापि करते पाना चाहिये, उससे घुमानम जैसा होना होगा पैसा होगा, ऐसी र मान्यता के साप, प उपर ऊपरसे ही प्राति करता है। १६ दूसरे पदार्थोके उपर उपयोग दें तो वारमाको शक्ति बानिर्भूत होती है । इसलिये सिदि छबि वादि शका करने योग्य नही। जो प्राप्त मही होती उसका कारण पर किनारमा निरा- बरण नहीं की जा सकती। यह शक्ति सब सवा है। पैतन्यमें चमत्कार चाहिये। उसका शुस रस प्रगट होना चाहिये । ऐसी सिदिपाः पुरुष वसताको साता कर सकते हैं। ऐसा होनेपर मी उसकी अपेक्षा नहीं करते । देवेदन करमर्म ही निर्मरा समझते हैं। १७ तुम नीलोंमें उछासमान कार्य भएषा पुरुषार्प नहीं। तथा यहाँबाप मंद पापा उपाप मही। १८ या वसाताका उदय नऐ तब काम कर लेना चाहिये-ऐसा हानी पुस्पोने चीनको वसामर्थ्य देखकर कहा है, जिससे उसका उदय भानेपर उसकी पार म बसाने । १९ सम्यमरि पुरुपको नहायके कमाणरको तय पान रुट होनेसे जहाबको फिराकर रास्ता बदलना पाता है, उससे थे ऐसा समाते है कि स्वयं प्रमण किया एला मार्ग सबा न।। उसी तय मानी-पुरुष उदयविशेपके कारण म्पहारमें मी अंतरात्माऽपि नहीं चूकते । २. उपाधि उपापि रखनी चाहिये । समाविमें समाधि रसना पाहिये। मोंकी वय कामके समय काम, और वारामके समय बायम करना चाहिये। एक दूसरेको परस्पर मिला म देना चाहिये। २१ प्यपहारमें वारमकर्षम्य करते यना पाहिये । पुस दुस, पनकी प्राप्ति वप्राप्ति यह शुभाशुभ तपा छामांतरापके उदयके उपर वापार रसता है। पुमके उदपी साप पहिसे वमुमके उदयको पुस्तक मोची हो तो शोक नहीं होता। अमके उदयके समप शत्रु मित्र हो पाता है, और वानुमके उदपके समय मित्र नुहोगाता है। मुसका सपा कारण कर्म है। कार्तिकसानुप्रेनाम कहा है कि कोई मनुप कर्ज लेने माने तो उसे कर्य का देनेसे सिरपरसे गोमा कम हो गानेसे ७२८ श्रीमद् पापा [प ८५४ जैसे होता है, उसी वय पुद्रा इम्पस्मा मुमागुम कर्म, मिस काठमें उदय मा बाप, तप्त कामें उसे सम्पन् प्रकारसे वेदन कर चुका देनेसे निर्गय हो जाता है, और नपा का नौ रोता । स्तरिमे पानी-पुरुषको कमसे मुछ रोनेके पियुष मापसे सैम्पार पमा चाहिये । पोंकि उसके जुकाये बिना पुरमा महा। २२ मम स नो इम्म क्षेत्र का मानमें उदय वामा हो, उसमें इन्द्र बानि पी फेरपार करने में समर्प महो। २६ प्रणामुयोगमें बानीने बंता मारमाय वप्रमच उपयोग माना है। २० भरणामुपोगमे सिमान्तका समावेश होता है। २५ चरणानुयोगमें से प्यारमें वापरण किया बाय उसका समावेश किया है। २६ सर्मविरवि मुनिको पचवतकी प्रतिया बानी देता है, परणामुयोगको अपेवासे है। करणानपोग अपेक्षासे नही । स्योंकि करमामुयोगके अनुसार नमें गुणस्पामको वेदो यका रूप हो सकता है-बतक नही सकता । ८६४ पहाण कैम्प मापदपदी १९५६ (१) मोधमायके पाठ हममे माप माप कर किसे है। पुनराधिक सर्वनमें जैसे पुरा दोसा करना । पायोकि मांचे (नार गाइन) पनि की, पैसा करमा बही नहीं। गोवा-पाचकको पपावधि अपने बमिप्रापपूर्वक प्रेरित न करमेका क्ष रखना चाहिये । मोता-मात्रको रूप ही मभिप्राप स्पम होने देना चाहिये। सामसारके तोमन करनेको गायक प्रोताके सुरके उपर मेप देमा चाहिये । हमें उन्हें प्रेरित कर उने सर्प सत्पम हो सकनेगा, वभिप्रायको कम देना चाहिये। प्रभावबोध भाग मोक्षमारे १.८राने को मारेंगे। (२) फम समुतके प्रचाररूम एक पोगमा सोची। उसका प्रचार होनसे परमार्प मार्गका प्रयशोगा। (२) भीपीसमासा प्रभावीपमागकी कमाना १ पाचको प्रेरणा ८ प्रमायके स्वम्पयशिप १. महामानकी पर्सगता. पिचर १५. सोय सिदि ९तम मनोरण १६ बनेयतका प्रमाणता . बाबा परमधर्म चार मुराराप्पा १७ मनमति ५.सामणल ११ म्पारिक नामोंके मेन मोगादि बार माना १२ तमगामाये " मम्पति २ निया मसामसपा पर ८५४] विविध पत्र मावि संप्रा-श्वो वर्ष २१ भारभ परिमहकी निरपिके उपर कानाशरा दिया जा मार २२ दान २३ नियमितता २१ मिनागमस्तुति २५ नपतत्वका सामाम्प सक्षेप १० तारिय सम्पपन ११ सयोगकी अनिस्यता १२ महरमावोंकी बनत समता १३ सिरपर न चाहिये १५ (धार) उदयादि भग १५ निममत मिराकरण १६ महामोहनीय स्थानक ४७ सीर्यफरपद प्राप्ति स्थानक १८ मत्या ४९ परिपावय ५० बीररल ५१ सहरस्तुति ५२ पच परमपदविषयक विशेष विचार ५५ पविरति ५४ मध्यात्म २९ सार्वजनिक ग्रेप २७ सगुण ६१ कर्मके नियम १२ महापुरुषोंकी मनस दया ६२ निर्जराक्रम ६१ वाकांक्षा स्थामको किस तर राना चाहिये। ६५ मुनिधर्मयोग्यता ६६ प्रत्यक्ष वौर परोक्ष ६७ उम्मचता ६८ एक वतर्मुहूर्त ६९ दर्शनस्तुति ७० विमान ७१ रसास्वाद ७२ वसा और समंदता ७१ सापशिषिमतासे महा- दोपका मन्म ७१ पारमार्षिक सस्य ७५. वामभावना ७९ दिनमात्रमा ७७-९० महत्पुरुप परित्र ९१-१०. (माग; मि) ११-१६ हितार्य प्रभ १०७-१.८ समान पसर. २८ देशमर्मविषयक विचार २९ मौन शरीर ३१ पुमर्जम्म २२ पंपमाहातविषयक विचार २५ देशोप २. प्रसस्तयोग ३ ५५ मंत्र ३६ निरमिमानापना २७ ममपर्यको सर्वोत्तरता ५६ पट्पद निमय ५७ मोक्षमार्गकी पिरोषता ५८ सनातन धर्म ५९ सूक्ष्म तत्वप्रतीति ६ समिति गुनि ३९ समानिमरण .. अपच भातमीमांसा रची। तत्वार्पसूकने मगलाचरणी दौरा करते ए पर स्तोत्र (देवगम) मीमद् पगबन्द [पर ८५५ ८५ ८. ३४या वर्ष ८६५ कठमाण कैम्प, कार्तिक मी ५रवि १९५० ॐ पर्वमान दुपमकाल यता है। मनुप्पो मन भी हुपम ही देसनेमें पाता है। प्राय के परमार्थसे एक वत करणवासे परमापका साब करके सेपासे भाचरम करते है। ऐसे समपमें किसका संग करना, किसके साथ कितना काम निकालना, किसकी साथ कितना ना, और किसकी साप वपने कितने कार्य म्पबहारका सरूम व किया जा सकता है--परमा समें रसने का समय है। नहीं तो स्वविधान् गोक्को ये सब कारण रानिकारक होते हैं। शान्ति । ८६६ बई मानुगा मगसिर १९५५ माशांतपारसका भी फिरसे विवेचनरुप मापातर करना योग्य है, सो करना । ८६७ बई शिव, म्गासिर को १९५० देपागमनमोपानपामरादिपिस्वपः। मापाविष्यपि रम्पत मावस्वमसि मो महान् ।। स्वतिकार मौसमतमसरिको वीतरागदेव मानो करते कि हे समतमव ! इस हमारी का विवार्य बादि निमतिको त रेस-हमारा महत्व देख । इसपर, मिस तय सिंह गुफार्मेसे गमोर फरसे र निकम्मर गईना करता है, उसी तय नौसमसमरि गर्नना करते हुए करते हैं - देवताओंका बागमन, बाघसमें विचरण चामर वादि वितिका मोग करना, चामर बाद मनसे रोग पाना-पा तो मापानी गायेि भी बता सकते है। तेरे पास देवोत्र वामन सा, सपना तू बाकाय विचरता है, अपना र चामर छत्र वावि विमतिका उपमोग करता t, क्या इसम्मेि ए हमारे मनको महान् है ! नही मही, कमी नहीं। कुछ इसध्येि हमारे मनको मान् मा । सतमेसे ही सेरा महल म । ऐसा महत्त तो मापाती माविमा मी दिखा सकते हैं। तो फिर देषका वास्तविक मल त्या है। तो करते है नवरागता । इसे पे मौसमतमसरि वि स सरी स्वाम्पिमें हुए पे। वे ताम्बर दिगम्बर दोनोंमें एक सो सम्मानित है । उसोने देवागमस्तोत्र ( उपर मो में पति इस स्तोत्रका प्रथम पद) है, और उसप भम्सहती टोल तपा चौपसी हजार स्कप्रमाण गपहस्तिमहामान्य जो बताते है। बिगपा ८०१ पा ८५८, ८५.] पिविष पन मावि सग्रह- वर्ष मोसमार्गस्प नवारं भेचार कर्मस्मृवाम् । हातारं विश्ववस्वाना दि वगुणसम्पयं ।। यह इसका प्रपम म्गलस्तोत्र है। मोशमार्गके नेता, कर्मस्मी पर्वतके मेवा (भेदन करनेवाल) मार विश्व (समम) तपाता (माननेवारे) को, उन गुणोंकी प्राप्तिके लिये में मदन करता है। बातमीमांसा, योगबिन्दु गौर उपमितिमषप्रपघकयाका गुजराती भाषांतर करना। योगविम्लुका मापांसर सपा है उपमितिमवप्रपचका होगा । परन्तु उन दोनोंको फिरसे करना योग्य है, उसे करना । धीमे धीमे होगा। छोक सम्पाण हितरूपी वीर बह कर्तव्य है। अपनी योग्यताको म्यूनवासे और जोसमदारी म समय सकनेसे अपकार महो बाप, या मी म्म रखना चाहिए । ८६८ बई शिव, मगासिर ८, १९५७ ॐ मदनरेशाका अधिकार, उत्तराम्पयनके ममें वप्पयनमें जो नमिरान हायिका चरित्र दिया है, उसकी टीका है। प्रपिमपुत्रका अधिकार मगरतासूत्रके शतकके ठरेशमें पाया है। पे दोनों बधिकार वपया दूसरे से पासे अधिक मारमोपकारी पुस्पके प्रति पदमा वादि मतिका मिरुपण करते है। परन्तु बनमायके कल्याणका विचार करते हुए बैसे लिपयकी चर्चा करनेसे तुममें दूरगना पोय है। वसर मी पैसा हो। इसलिये तुमें इन अधिकार बारिकी पर्चा करमेमें एकरम शान्त राना चाहिये । परन्तु दूसरी तय, बिस तरह उन लोगोंको तुम्हारे प्रति उत्तम प्रगम बयमा मानना , पैसा पर्जन करना चाहिए, नो पूर्वापर वनेक गायक हितका ही होगा। जहाँ परमापके बिाम पुरुषोंका मेल हो यहाँ प्रसप्रमाण बादिको पर्षा करना योयो मही तो प्राय ठससे प्रेय नहीं होता । पा मात्र छोटी परिपा है। योग्य उपापसे पर्चन करना चाहिये । परन्तु उसयुफ पित्त न रखना चाहिये। . ८६९ बाबाण कैम्प, फागुन मुनी ६ मि १९५७ ॐ यो अधिकारी ससरसे विराराम पाकर मुनिमाके चरणकमलके सपोगमें विचरनेकी इच्छा करता है, उस बभिकारीको दौशा देनेमें मुनिमाको दूसरे प्रतिवभका कोई नहीं। उस बधिकारको अपने मोंका संखोप संपादन कर माना ग्रास करनी पोप है, जिसमे मुनि मौर परमकमउमें दीक्षित होनमें इस क्षेपमहे। इस अपपा सरे किसी वधिकारीको ससारमे ठपण्माधिई हो, बार ए बारमापको साधक है, ऐसा माश्म होता हो, तो उसे रोक्षा देनेमें मुनियर अधिकारी। मान स्पाग ऐनेपालेको और त्याग देनपाटेको भेया मार्ग दिमान ये, ऐसी पिसे यह प्राति करनी चाहिये।
८. भीम रावद [ प ८५५ ८५५, ८. ८६५ याप्प कैम्प, कार्तिक सुटी ५ १९५७ ॐ वर्तमान दुपमकार गता है। मनुष्योंका मन मी दुपम ही देसनेमें बाता है। प्राप' करके परमापसे एक मत करणयामे परमार्थका रिसाव करके चासे वाचरण करते है। ऐसे समपमें किसका रंग करमा, किसके साथ कितना काम निकासमा, किसको साप किराना बोलना, और किसी साथ अपने प्रितमे कार्य म्पगार लस्म विदित किया जा सकता है-पासक समें रहने का समय है। मही सो म्यतिमान मौषको ये सब कारण हानिकारक होते हैं। शास्ति' । ८६६ बर्गा माटुगा मगमि १९५७ भीतमघातसा मी फिरसे विवेचनरूप मापातर करना योग्य है, सो करना । ८६७ बई शिव, मंगासिर बी १९५० देयागमनमोपानघामराविपिस्वयः । मापाविष्वपि स्पन्दे नावस्वमसि मो महान् ।। तिकार मौसमतमसरिको योगदेष मानो पते को समतमद 1इस इमारी का माविहार्य मा विमतिको र देस-मारा मात्र देख । इसपर, जिस तय सिंह गुफामेसे गमोर पसे बाहर निकलकर गर्जना करता है, उसी तय मोसमतमाप्ति गर्नना करते हए करते हैं। देवतालोन वागमन, माकाशमें विवरण, चामर भादि तिमतिका मोग परमा, भामर बारि मासे ठोम्म गाना-पा तो मापानी लगालिये मी बता सकते है। तेरे पास मौका बागम्म होता है, अपना दू बाकाशमें विचरता है, अपना त् बामर पत्र वाशि नितिका उपभोग करता 1, स्पा सारिप ए एमारे मनको महान् है। नहीं नहीं, मी मही। कुछ इसरिये हमारे मनको मान् मही । सतमेसे ही तेरा महत्त नहीं । ऐसा महल तो मापाती माविया भी दिखा सकते है। तो फिर देवा पास्तविक मात क्या है! तो करते है पोतरगता । इसे भागे बताते हैं। पे मौसमतमबसूरिन में दूसरी शतामिमें गए थे। वे येताम्बर दिगम्बर दोनोंमें एक सरीसे सन्मानित । उनोने देवागमस्तोत्र ( उपर सो स्पति इस स्वेत्रका प्रथम पद है) अपना बातमीमांसा रची है। तत्तापाले मामाचरप्पको टोकन करते ए पर स्तोत्र (देवागम) मिसा गया है, और उसपर असरमा टोन तपा बोम्सी हमार सोकप्रमाण पास्तिमहामाप टोकन रची गई। न रिसम्बरमर सिमोनाम लाम मतदमे यमस्य साना त्याचा मना मध मि मोनोर यमाने नाममा भी यो मारनी की पम्नमा म मात्र पालाको पर ना तो पूरे सिम्स के मम होगा । हामिणेर ने मम्मे लामो समेत- परिचा १५-२४५ में पानी पी रेम 40 सामनमानी पम्पन पलायमानी पारितो . मम्मा तारली एम्पीमामा ५-४१ ८०१ पत्र ८५८, ८५.] विषिष पत्र मादि समा-बों वर्ष मोसमार्गस्य नेवारं भचारं कमस्मृवाम् । मातारं विश्ववस्वाना मंद वलुणसम्पये ॥ यह इसका प्रपम मगठस्तोत्र है। मोक्षमार्गके नेवा, कर्मम्मी पर्वतके मेचा (भेदन करनेवाले) मार विश्व (समप्र) तलके माता (माननेवाले ) को, उन गुणों की प्राप्ति के लिये मैं चंदन करता है। माप्तमीमांसा, योगविन्दु धौर उपमितिमवप्रपचकयाका गुजराती मापातर करना । पोगविलुका मापतिर वारे उपमितिमवप्रपचका हो रहा है। परन्तु उन दोनों को फिरसे करना योग्य है, उसे करमा । पामे पामे होगा। पोक-मस्याण दिसस्म और वह करम्प है। अपनी योग्यताकी म्यूनतासे और मोसमदारी न समझ सकनेसे नपकार महो वाय, यह मी म रसना चाहिए । ८६८ पई शिव, मगासिर पदी ८, १९५७ ॐ मदमरेसाका अधिकार, उपसम्पयनके नबमें भम्पयममें मो ममिराम ऋषिका परित्र या है, उसकी टांका है। प्रापिमनपुरका अधिकार मगरामूत्रके शतकके उदेशमें वाया है। ये दोनों अधिकार वपना दूसरे से पावसे अधिकार वामोरकारी पुरुपके प्रति वदना मादि मतिका निरूपण करते है। परन्तु जनमाडके कात्याणका विचार करते हुए पैसे विपपकी पर्चा करनेसे तुझे दूर ही रामा पोग्य है। वसा मी पैसा हो। इसलिये हमें इन अधिकार नारिको पर्चा करभेमें एकदम शान्त रहना चाहिये । परन्तु दूसरी तया, जिस तर उन लोगोंको सहारे प्रति उत्तम मगन भयका मानना हो, जैसा पर्तन करना चाहिए, जो पूर्वापर बनेक नामों के हितका ही हेतु होता है। यहाँ परमापके विशाम पुरुषों का मास हो गया धाचप्रमाण बादिको पपा करमा योम्य है। नही तो प्राय उससे श्रेय नहीं होता। पर मात्र छोटी परिपा है । पोग्य उपापसे वर्णन करना भाहिये । परन्तु उदेसयुष् वित्त म रखना चाहिये। ८६९ मवाण कैम्प, फागुन मी शनि १९५७ ॐो परिकारी संसारसे विराम पाफर मुनिमाके चरणकमठो सपोगमें वरनेकी न्या करता है उस अधिकारीको दौमा देनेमें मुनिमीको इसा प्रतिस्पन कोई देख मही। एस अधिकारीचे कपने बयान सतोर सपा न कर वारा प्रास करनी पोप है जिसमे मुनि और परमरूमधमें दौशित होनेमें इमरान न थे। इस बपना दूससे किसी अपिाको ससारसे उपरामापिई हो, और पद वामापसी साधक, ऐमा माश्म होता हो, तो उसे दीक्षा देनमें मुनिवर मधिकारी । मात्र त्याग एनेपाडेगे और त्याग देनेवालेको मेयका मार्ग दिमाग से, ऐसी सिमे पर प्रापि करनी चाहिये। ,
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परिशिए (१) परिशिष्ट (१) 'भीम राजचन्द्र में आये हुए अन्य प्रन्पकार भावि विशिष्ट शम्पोंका संक्षिप्त परिचय मकार- वायरका पूरा नाम बपुर फतेह अमीन मुहम्मद वकवर या । इनका मम्म सन् १५१२ में बमरकोट खा पा । सन् १५५६ में वकबरको एम-सिंहासन मिछा । वकबर बात उपमशाल और बुद्धिमान वा शाह था। उसने अपने कौशसे धीरे धीरे भफ्ना राम्य गात मा म्यिा, और पतसे गोगों को अपना साथी बना लिया था। उसने वनेक पुर भी किये, जिनमें उसे सफलता मिर्ग। मकबर बात सहिष्णु ये । ये गोमांस इत्पादिसे पर करते थे। बकबरमे हिन्दु धौर मुसम्माम होमोंमें ऐस्प वौर प्रेमसम स्पापित करनेके लिये 'दीनागही धर्मको स्थापना की थी। इस धर्मके हिम्दु और मुसम्मान दोनों ही अनुयायी पे । कवरमे यमुफ दिनों गोपरिसा न करनेकी मी अपमे राम्यमें मनाई कर रस्सी पी। अकबरको बिवाम्पासका बहुत शौक था। उन्होंने रामायण महामारत पानि प्रपोंके फारसा बनुनाद कराये पे । कारकी सभामें हिन्दु विशनोंको भी गत सम्मान मिलता था । मकवर म्यों म्पों पर होते गपे, त्यों क्यों उनकी विषय-छोएपवाका हास होता गया। वकपर सोते भी वात कम थे। कहते है दिमत मिला कर के कुल तीन घटे सोते थे। मकवर मात मिताहारी पे । २ दिनमें एक ही बार मोबम करते थे, और उसमें भी अधिकतर दूष, भात और मिठाई होते थे। बकारका पुत्र सुगम हिन्दुरानी गोपाबाकि गर्मसे पैदा एमा या । रामपम्बनीने वकारफे मिताहारका उप्लेस किया है। भखा- बसा गुमराती साहित्यमें एक अद्वितीय मध्यकालीन कपि माने जाते हैं। इनका जन्म सन् १६१९ में बहमदामा में सोनी गान्तिम [मा या। पे बक्षपमगतके मामसे मी प्रसिद्ध है। बमाको बोधप्रमान कविताका बड़ा माग सातसौ छियालिस गप्पा है, निसके सम मिलकर मालीस वग है। पाके वतिरित, वयाने बरसेगीवा, बनुमबनिम्तु, कैसगाता, पिचविचारमा पंचीकरण, गुरुशिप्पसवाद तथा मातसे पा वारिको मौ रबमा की है। मसाको दम पौर. पासा के प्रति मापत तिरस्कार पाताने शासके गण सिद्धान्तोको कपन्त र मापामें पिसाबसा एक बनुमची विचारधारा चतुर कार पे | होने ससंग, सहरु, प्रमरस बादिको जगह जगह महिमा गई है। मसानी माणी' नामक पुस्तक 'मस्तु साहित्य-वर्षक कार्याल्प'से सन् १९२१ में प्रकाशित ई है। इनके अन्य प्रत्य तया पर काम्यहोइनमें छपे । रामचन्द्रयाने वयाका मार्गानुसारी बताते ए उनके प्रयोक मनेका गनुरोध किया है। उन्होंने नसाके पर भी उदात किपे । मध्यास्यास्पदुम- मम्मामलप्पाम बैरम्पका बहुत उत्तम प्रय है। इसके कत्ता स्वेताम्बर मन् मुनिसुरमरि है। मुनिसुरसरि सालापानी थे। कहा जाता है कि तपके प्रमावसे पपावती बानि देवियों 1 ८०२ भीमाबाद [पा०८.१,400 प्राप करके बाग रामकोट गाना होगा। प्रपचनसार पंप किसा पाया है, पर यपालसर प्रास रो सकता है। शान्ति । ८७० परकोट, फागुन दो शुक १९५० बहुत लगसे प्रवास पूरा करना पा। बीच सहराका मरुस्था वा गया। सिरपर बहुत योसा पा, उसे प्रारमतीस मिस तय नपका बेदन कर सिपा चाप, उस तर म्यगाथा ते पर पनि मिमित उदयमान सिमाम प्राण किया। जो स्वरूप हैरन्यपा नहीं होता, पो मत बापर्य है। पम्पावाप स्थिरता है। प्रति उदपानुसार कुल बसावाका मुस्मत वेदन कर साताके प्रति।शान्ति । ८७१ रामकोट फागुन १३ सोम १९५७ *सरसबी दूसप बार बाम मप्रास्त कम एस धमा। शानियों का सनातन समार्ग अपत नों। ८७२ गरकोट, बैत्र सुदी २ एक. १९५५ में मनंत पविमति चन्द्रसमसामी ममो नमः पेदनीयको तपारूप सदयमानपनेसे बेदम करनेमें शोक क्या! धान्ति । ८७३ एमकोट, सुदी १, १९५० मंतिम संदेश परमार्पमार्ग बक्या तुम बामपयप्रकाश भीमिनपरमात्मने ममा (१)विस बनत मुबसस्मात्री पोगानन राम करते हैं, या मूगर वामपद सपोगी निमसम॥१॥ प्रबास्मस्तमाल अगम्प है, मारमाना बापार है। उस समसके प्रकारचे मिमपरसे बताया गयाk॥२॥ दिनपद और निमपर दोनों एक है, इसमें कोई भी ममात मही। उसके माहोनेके कि सिन्दापक पास रचे गयेtun मन्तिम समेण (1) रामनवमलम्म । मार मी विस्म ॥an मामलमलमयम्ब मन भादर । निरपग्रेवल सर ||३|| निस एण्य मेरमा नाकाबनोमा पEn॥ "
८५ मंतिम ]
विषिय पर मादि संप्रार-पाँवर्ष
८०३
निन प्रबधन मात दुर्गम है, उसे प्राप्त करनेमें दुधिमान योग मी यक माते हैं। श्रीसद्गुरुके
चपळयनसे हो सुगम और मुसको सान then
यदि मिनमगवान्के चरणों की अतिशय मजिसहित उपासना हो, मुनियोंकी संगविमें संपम-
सहित बत्मत्त रति हो-॥५॥
यदि गुणोंमें वतिशय प्रमोद ये मौर वतर्मुस योग ये, वो भीसगुस्से बिनदर्शन समझा गा
सहवा॥६॥
मानो समुह एक विन्दुमें ही समा गया हो, इस तग प्रवचनकपी समुद्र पौदह पूर्वकी सम्मि
सप विन्दुमें समा जाता है|
बो विपप निकारसहित मतिके योगसे यता है, उसे परिणामोंकी विषमता रहता है, और
उसे योग मी वयोग हो पाता है॥८॥
मंद विपम, सरम्ता, भाषापूर्वक मुविचार तपा करमा कोमरता नादि गुण या प्रथम
मूमिका है।॥९॥
मिसने शम्द मादि विषयको रोक लिया है, वो स्यमके साधनमें राग करता है, जिसे मारमाके
रिये जगत् इस मही, या महामाम्प मम्मम पात्र है॥१०॥
रिसे जीनेकी तृष्णा नहीं, बिसे मरणके समय कोम नहीं, या मार्गका महापात्र है, वह परम
पोगी है, वौर उसने ओमको जीत लिया है॥ ११ ॥
निस तय नब सूर्य सम देशमें वाता है दो छाया समा जाता है, उसी तय खमानमें
मानेसे मनका स्वरूप भी समा जाता है॥१॥
पा समस्त स्तार मोइमिकापसे उत्पन्न होता है। अतर्मुस पिसे देसनेसे इसके नाश घेते
एए देर नही गती ॥२॥
(३) बो बनत सुसका धाम , विसको सन लोग इशा करते है, जिसके म्यानमें वे दिन
रात डीन यते चो परमसाति, बनत मुपामय है --उस पदको प्रणाम करता है, यह ग्रेप
है, उसकी अप हो ॥१॥
समाप्त
मि प्रकचन दुर्गम्पत्य बारे मति मदिमान । अपचन मोमगुरु नुपम मने मुलताय ।।४॥
अपना मिरपनी मतिराव मरमात । मुनिजन यति विमपि सेपम योग पर्यत ॥५॥
गुपप्रम्बेर मतिएप ये पे मैवर्मुल पोप । प्रति पीसगुरको निर्णन ममुपोप ॥६॥
प्रकपन समातिएम्प गाती (उज्य) भाषे एम । पूर्व पोस्नी बबिन सारण पर देम || ||
वित विकासदीत गा माना होगा परिचामनी विषमय देने योग बोम ॥4॥
मेर पिम्पने सळता प्रमाण माविचार करा कोमम्वारि गुग मपम मम्मिन पार ॥९॥
ऐसा मारक पिर बम धवन एप | बपवनही भाम्मी मपया मामाच॥१॥
नही पा सम्वनी मप याम नहीं म । महायवे मार्गना परम योग शिम ॥११॥
(२) मामे पशु सम्रेशमा मग बाप समय । बामे ऐम समावर्मा मन तार पर बाई ॥१॥
उपमे मा मिसपी उम्पमा पR | गर्मुख मबोरा पिय पवा नपार ॥३॥
(१) मुखपम मानव सतेज पनि थप ये सरप्पानमग्री।
पाद मनंत मुकामय मां पर रा॥१॥
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परिशिए (१) । परिशिष्ट (१) 'भीमद् राजपन्द्र में भाये हुए अन्य प्रन्पकार मावि विशिष्ट शम्दोका संक्षिप्त परिचय मकार- वारका पूरा नाम बबुर फतेर नछामीन मुहम्मद मकबर पा । इनका जन्म सन् १५४२ में अमरकोट मा पा । सन् १५५६ में नकवरको राप सिंहासन मिला। अकबर पात उपमशाल बौर मुद्धिमान पादशाह पा । उसने अपने कौशब्से घीरे धीरे अपना पम्प मात पड़ा सिपा, बोर बातसे छोगोंको अपना साया बना लिया था। उसने बनेक युग मी किये, जिनमें उसे सफलता मिर्ग। नकार यात सरिणु थे। वे गोमस श्यादिसे परहेज करते थे। मकबरने हिन्दु बौर मुसम्मान दोमोमें ऐक्य और प्रेमसपंध स्थापित करनेके किये 'दीनालाही धर्मकी स्थापना की थी। इस धर्मक हिम्मु पोर मुसम्मान दोनों ही अनुयापी पे । नकारने अमुक दिनोंमें पीहिंसा म फरमेकी भी वपमे राम्पमें मनाई कर रस्सी थी। यकबरको मिचाम्यासका पात शौक था । ठमोंमे रामायण महामारत भादि प्रोके फारसा अनुवाद कराये पे । मकबरको समामें हिन्दु विशनोको मी सम्मान मिम्ता पा । कबर म्यों म्यों पर होते गये, त्यो त्यो उनकी विषय-सोलुपताका हास होता गया। वकबर सोधे मी बात कम पे । करते दिनरात मिडा कर मे एल वान घटे सोते थे। मकर पात मिताहारी थे । वे दिनमें एक ही बार भोजन करते थे, और उसमें मी वधिकतर दूष, मात और मिर्च हो लेते । मकबरका पुत्र सीम हिन्दुरानी बोधाबाईक गर्भसे पा एमापा । रामचन्द्रमाने मनपरके मिताहारका उस किया है। मस्सा- पसा गुबराती साहित्पमें एक वरितीय मध्यकालीन कपि माने जाते हैं। इनका जम्म सन् १९१९ में वामदाबादमें सोमी गातिमें शुमा पा । बापमगतके मामसे मी प्रसिदी। क्साको बोपप्रपान कविताका पका माग सातसौ सिपाछिस एप्पा है, जिसके सब मिछाकर पचास भग । एप्पाके अतिरिक, वक्षाने बसेगाता, वमुमबबिन्दु, गीता, पितविचारसनाय, पंचीकरण, गुरुशिप्पसबार तपा बहुतसे पर माकी मी रचना की है। मसाको दम और पाखी के प्रति अस्पत तिरस्कार या ।होंने शाम गा सिमान्तोंको कपन्त सरल भाषामें मिला है। वहा एक मुमची विचारशीस चतुर कार पे |तने ससग, सशुरु, प्रमरस वादिको बगह जगह महिमा गई है। 'सानी पाणी' नामक पुस्तक 'सस्त साहित्य-वर्षक कार्याम्पसे सन् १९२१ में प्रकाशित । सके मम्प प्रन्य दपा पर काम्पोरनमें छपे । रामचनयाने मात्रा मार्गानुसारी बताते पए ठमके प्रयोक पानेका अनुराम किया है । उन्होंने वसाके पर मी ठान किये हैं। मप्पास्मफरपदुम- पप्पामकम्पम राम्पका बहुत सचम प्रन्प है । इसके कर्ता शेताम्बर विशन् मुनिमदरहि है। मुनिसंदरसूरि सहसावधानी पे। ना नाता है कि आपके प्रमापसे पालत वादि देवियों प्रीमद् पाप यक्ष दर्शन दिया परती यो । मुमिसंदरसूरिमे पपने गुम्नेष मदरसूत्रिकी सेवामें एकसौ भार सय या एक कितिपत्र भेगा था, मिसमें उन्होंने माना तयके सफलों चित्र वीर नारों काम्प लिये । मुनिमदरसरिने सोपा चिसहित उपदेशरत्नाकर, भयानंद चरित्र, शकिरस्तात्र वादि बनेक योच रचमा परे। मुनिसुदररि सेताम्बर वानापमें पत प्रस्पात कमि गिने जाते है। ये • १५.१ में सर्गस्प हए । बभ्यानकापगुममें सोम वधिकार हैं। मम्पका विस्तृत गुगपती देचम मोतीपद गिरधरमत कापरिपाने किया है, जो बैनधर्मप्रसारक सभाको बोरसे सन् १९११ प्रकाशित एमा। प्यास्मसार (देशो पशोपिम्प) नायदासमी- माझम बावा कनापदास कोई यात बरे कम्ती, पे। शोमे गुजराती निधारमाला मिक पप बनाया है। इस प्रपके ऊपर टीका मीहै। बचाननीने इस प्रथा काठोकन करनेके पे सिसा है। उपदेशमपामें मनापासीका एक पधन मी गंगवाने उड़त किया है। बमबमकाप ( पक्षपातीत अनुभवप्रकाश )- इस प्रपके कर्ण विश्वानन्दमीने गास्पायमके त्याग करनेके पचात् त समयतक चाटन किया, वौर तत्पश्चात् ये पाकेशमें वाकर गने को। ये सय मत पुरुषोंके समागममें पते ए प्रमविपारमें मम गते पे । मिभुमानपनाने पाकेश दार नाना प्रकारके फर उठापे । लोने समचाके सेठ सूर्यमम्माको प्रेरित कर पांच समवेत्र बादि मौ स्थापित किपे, जिससे पाँ इमेवाले सत सापोंको पात बाराम मिम । लिपुराभन्दगीको किसी धर्म या पके लिये का नाम 1 पा । ये केवल दो कमी रमते थे। मनुमनप्रकाशका गुजराती भाषांतर सन् १९२७ में बम्स पष्ट हमारे । एसमें पाठ सर्ग , मिनमें मेवातविषयका पर्णन है । प्रहादवामान ताप समि जाता। ममपाहमार (देयो प्रस्तुत प्राप, मोक्षमाम पाठ ५.-१२) मवाराममी- xपापमयी और उनकी पुस्तकले सांप रागनगी रिसते हैं-" हमने इस पुस्तकका पाक्सा माग देवा । परन्त में उनकी बा सिदान्तहानसे बरबर बैठती ई नही मात्रम होती। और ऐसा । तपापि उस पुस्पी दशा मष्ठी है। मार्गानुसारी बैसी है ऐसा तो कर सकते है।' वपा " धर्म ही जिनका निवास है, बमा ठस भूमिकामे नही मापे ।" भपयवापार- इनके बापाचस्पामें मोक्ष प्रा करनेका रामचम्गाने मोक्षमाला वठस किया है। इनकी कपा भगरतीमत्रमें बाती है। मएफ (देसो परिय) मापार (रेलो पदफाद) जमान पुनमसराम मरवर नवा एक मातम गुप्ते मम्ममारिका । ।
44 परिधर (१) पटसासी- पिपानन्दस्वामीको बासमासापर पिसी हुई टोकाका माम बरसाती है। इस मप बात प्रौदताके साप चैनदर्शनके स्पासाद सितिका प्रतिपादन किया गया है। वरसामाके उपर सेताम्बर विशन् उपाध्याय पशोपिनपनीने मम्पन्यायसे परिपूर्ण टोका मा मिसौहै। विमानन्द भादिमें मायण पे। उमका मीमांसा बोर वादि दर्शनोंका पास वा बम्ययम था। अपने समयके एक गाव पच्छे कुशल पादी गिने माते पे । विपानन्दबीने वाचार्यसूत्रके उपर तत्वार्पोकसारिक नामकी दार्श- मिक टीका मी लिसी है, जिसका बैनसाहित्पमें उबस्थान है। इसके अतिरिक्त इन्होंने बापरीक्षा पत्रपरीक्षा भादि दौर मी महत्वशासी अन्य लिखे हैं। नासपरीक्षामें विरफल वादि सिद्धांतोंका विद्वतापूर्ण विवेचन किया गया है। इनका समय ईसवी सन् ९ वीं शताम्दि माना जाता है। मायक- बयापक समतिके गर्मस उत्पम हुए थे। इनके पिताका नाम कहोर था। एक दिन भरावक जा गर्ममें थे, कोष अपनी पत्नी के पास बैठे हुए वेदका पाठ कर ये थे। बेदपाठमें उनकी की मूह हो गई, मिसे गर्मस्थ शिशुमे बता दिया । इसपर कोरको पास कोष माया, वौर ठनोंने गर्मस्प शिनुसे कहा कि अब सेरा समाव बमोसे इतना पा है, तो बागे जाकर न माझ्म तू क्या करेगा। बतएप मा, मैं पके शाप देता । कि त मम्वक होकर मम गृहण करेगा । कहते हैं इसपर शिनुका शरीर बाठ नगरसे टेढ़ा हो गया, और उसका नाम अबक्र पद । बादमें पम्फर इनके पिताने परापासे प्रसन्न होकर इनें समगा नदीमें स्नान कराया, मिससे बयणक्रकी वक्रता तो दूर हो गई, पर नाम इनका फिर मी नही हा । भयका जनकके गुरु थे। उन्होंने गो समकको उपदेश दिया, पर बयलगतामें दिया है। मापारांग (वागममय)-इसका राजघराने ननेक स्पमेंपर उल्लेस किया है। स्मसिदिमास (देखो प्रस्तुत प्रय प ५८५-१२२ ) बास्मानुशासन- मामानुशासनके का दिगम्बर सम्प्रदापमें गुणभद्र नामके एक गात प्रसिद विद्वान हो गये है। ये वादिपुराणके कर्ता मिनसेनस्थामा लिप्य पे। ये दोनों गुरु शिष्प अमोपार्ष महरायक समकान पे । गुणमा सामाने उत्तरपुराणको मौ रपना की है, जिसे उनाने शक संवत् ८२० में समान किया था। गुणमा म्याप काम्प बादि विपर्योक मात वच्छे विशन पे । भारमानुशासनकीर्ष टीकाप मी। इनमें ५० टोडरमनीकी हिम्दी टीका पदुत प्रसिद्ध है। इसका गुमराती अनुसार मा एमा है। इस सप्यात्मके प्रपको दिगम्बर मोर स्वेताम्बर दोमों भात पावसे पाते है। मानन्द भारक- बानन्द प्रावकको कथा उपासनदशासूभमें बाती है। एक बारकी बात कि गीतमस्सामा मिक्षा के लिये जाये थ। मने एना कि महादारफे शिष्य बानम्म्ने मरणान्त सरेसमा सीकार की। गौतमने बानरको देसमेका विचार किया। मानम्म्मे गौतमलामाको नमस्कार करके पूण कि मगवन् ! पा गृहस्थावस्पामें अभिज्ञान होता है। गौतमने या 'ह' हाता है। इसपर बानदने ८०८ म्पक धीमायण कहा कि मुझे इतना सामर्पका महिनो गया है कि मैं पोमसौ पोबनतकके कमी पदार्थको पान सकता है । गौतमस्वामीने इस बातका निपेश किया, और मानन्दको मालोचना फरमेको कहा। बादमें दोनों महापरके पास गये । गौतमको अपनी मूस माश्म भार उम्होंने पानमसे क्षमा माँगी । मानंदपन- भामरपननी एक महान् अप्पामा योगी पुरुप हो गये हैं। इनका दूसरा नाम छामार्मर पा । सने दिनी मिमित गुरपती पोलीस बिममगमानव स्तुविरुप पानीस स्तनों रखना की, नो पानदपनचीबासी नामसे प्रसिद्व है। मानादफ्नयाकी सब सहर रचना वामपन पोरी बानंदफनमात्र बाणी मार्मिक चौर वनुमानसे परिपूर्ण है। इनकी रचनामोसे माम होता है कि ये चैनसिद्धांतो एक बरे अनुभवी मर्मच परित पे । मानन्दपनी गच्छ मत स्पानिका बहुत विरोध करत पे। होने पदर्शनों को दिन भगवान्का बग बताकर प्रमों दर्शनोंका सुन्दर समनप किया है। बामन्दपनी मामानुमकी मस्त दशमें निधरण किपा करते थे। मानन्दपमनीका पोलिमपीसे मिठाप मी मा पा, पातको पशोनिमयमामे अपनी बनाई गई वापसमें रामचन्द्रमा बानापासीको पात मानको पिसे देखते हैं। उन मुदकुन्द वीर हेमचम्प्राचार्यको कोरिमें पाकर रखते हैं। मानन्दपमाको रेमचम्मापासे तुलना करते ए निसते - मावानंदपमनाने लपर-तमुनिसे होकोपकार-प्रापि बारम की । उनोंने इस मुस्प प्रतिमें वामहितको गौण किया । परस्त वीतरागमर्म-मुस्वा-विषमता--तमी मा गई पी नि मेग मोबपना बानदफ्नीको परिधान म सके-समझ न सके। बन्तमें मानवमानाको मगा कि प्रबाहपसे म्यास विषमताके योग पत्र, परमार्य-प्रकाश करने में असरकारक मही होता, मौर वात्महित गौण होकर ठसमें बाधा बाती इसलिये बामहितको मुरूप करके उसमें दी प्राति करना योग्य है । सविचारणासे मन्तमें ये मेकमाने कोषकर बनमें पछये । बनमें विचरते हुए मारे वप्रगटस्मसे एकर पीस पद धादिक पण लोकोपकार तो कर हो गये। निकारण गोपकार पर महापुस्पोट धर्म है। राबादमीने बानदपम चौमासीका वचन मी मिना बारम विमा था, मोर १९२ में म्पा है। ईसामसीए- ईसामसीह ईसम्पर्मक माविसस्पा पे। में कुमारी मरियमके गर्भप्टे तापमाए थे। ईसा बचपनसे हो गर्मप्रपोक पप्पयन करनेमें साप समय बिताया करते थे। ईसा पूर्व मस्तान और मरण नादि देशों में पौधर्मका प्रचार पा) 0 प्रमेग धर्म हाने को मनमाने बस्पायर किया करते पे समके निमम ईसामसीहमे प्रवण भादोन मचाया । सामसारपर परदिपोंने र बालमण से, जिससे परे चैम्सलेम माग गाना पड़ा। पापर मी इनपर कर पिसे गपे । नियोने में पाकर मद कर लिया, और इसे कॉोका मुकट परनाकर सूपर ष्टया दिपा । रिस समप इनके हाथों में का ठोकी गई उस समय मा इमका मुख प्रसनतासे वि या पौर ये बफ्ले बच करनेवागीमामताको समा करनेके लिये परमेश्वरसे प्रार्पना परिशिए (१) । करते येसाने अपने धर्मम सेना, प्रेम, दया और सहानुभूतिपर अधिक मार दिया है। ईसाई गेग ईसाको ईपरका मवतार मानते है । वापिसमें उनके उपदेशोंका समाह है। ईसाके चमत्काका गाविमें वर्णन वाता है। रामचन्द्रयाने ईसाईधर्मका विशेष सप्ययन नहीं किया था । महरमा गांधी प्रमोंका उत्तर देते हुए रामचन्द्रमीने पश्चक १९७ में ईसाईभर्मके विषयमै धपने विचार प्रकट किये हैं। आप्तमीमांसा (देखो सर्मवमन) इन्द्रियपरामयशवक- यह मैराग्यका बस्युचम भेटासा प्राक्तका प्रत्य है । पके कर्ण कोई खेतामार मिशन है। इसके उपर सं० १६६१ में गुणविनय उपाप्यायने सस्कृत टीका लिया है । इसका गुजराती मापानर हमारे। हिन्दी फ्यानुसार मुखात धावमने किया है, यो बम्बईसे प्रकाशित पुआ। इन्दिप परामयशतक प्रफरणस्नायरमें मी छपा है । रामचन्द्रनाने इस प्रपके पानेका अनुरोध किया है। उपराप्ययन (मागममन्य )- इसफा रामचंद्रयाने अनेक स्थगेपर उस किया है। उचमनिमय- उत्तमविषय त्रेताम्मर माम्नायमें गुजरातीफे परे पनि हो गये हैं। इनके सपमश्रेणी- स्वपनमेंसे रामचन्द्रमीने दो पद उदत किये है। उस स्तान प्रकरणरनाकरमें प्रकाशित एमा। उपमिसिमममपंमा कपा- उपमितिमवप्रपंचा झपा भारतीय साहित्यका सस्तफा एफ विशाउ सपक अप (allegory) माना जाता है। यह ग्रंप साहित्यको रिसे बहुत उब कोटिका है। इस प्रपफे बनानेवाले सिर्पि नामफे एफ प्रतिष्टित नाचाप हो गये है। सिदर्षि हरिमरिकी बहुत पम्पमावसे मुक्ति करते है। ये हरिमयसूरि सियर्पिको धर्मबारके देनेवाले थे। सिपि प्रारत और सप्ततके बहुत भो विशन् थे। उन्होंने उपदेशमासा वादि प्रास्तके प्रपोपर सहत टीफायें मिली है। मोंने सिद्धसेन दिवाकरके म्पापायतारपर भी टीका मिली है। सिमर्पिका रिम्तृत वर्णन प्रभावकारितमें भाता है। उपमितिभवप्रपचा फपाको सिदपिने सं० ९५२ में समाप्त किया पा । इस मपक अनुसार करने के लिये रामचन्दीने किसी मुमभुको लिया था। . सामु रामाफा बणन महाभारतमें आता है ।" पुरागर्म हम पाके पुन पाने तानसे रिगुणाम साम स्पिा पा । पुसम्पपुत्र निशप इनके शिष्य पे । ५ अतिशय फाराम थे। ताने पत्रके रप और मागणको शोभित किया था, जिसस सानुर कर रन इनफे माता पुन पापन मनन फिया "-णि रासागर । "मु रामाने कटयर तर करके परमारमाफा मापन रिया । परमामाने रसे देवपाक रूपमें दर्शन Pपे, और पर माँगनके ठिप कहा । सर अनु रामाने पर मोगा कि मगन् । मापने गरेमा राम्पससी मुझे दी ३, र रिपुम भी टनदी । परि मेरे उपर तरा बनुमा दामो पर पर मि परिसपफी साधनगर इम राम्पलामी. लभपरा बाप गास्ने वाधार नही सिमसारमतरत गपे।" ८१. भीमद् सन्द्र का फिरसे मुझे हम मी म हो । परमामा भाचर्यचकित होकर पात' करफर सपामको पयार -भीम रामचन्द्र' पृ २११ प्रपिमपुत्र--- सिमपुत्र वाणमिका मगरीके बनेगाले थे।पे ममोपासक थे। इस नगमें और मी पातसे प्रमणोपासक गते पे । एक बार उन अमलोपासकॉम रेगों स्पितिसंबंधी कुछ पर्चा पही। अपिमपुत्रने वासपी ठीक ठीक मात प्रमणोपासकोंको कहाँ। परम्तु उसपर कप प्रमणोपासने मा न , और उन पोगोने महार भगवान्से इस प्रश्नको फिर नाकर पून । भगवान् महापरिने कहा कि नो अपिमा करते है, सपोर सुनकर में प्रमणोपासक अपिमनपुश्के पास पाये, वौर उन सबमे अपने दोपोंकी क्षमा मांगी । ये प्रतिमापुत्र मोधगामी पौष पे। पर कपन भगता- सूत्रके ११ शतक के १२ में ठदेसमें बाता है। कपिस (सनि ) (देशो प्रस्तुत प्रप, मो प्रमाण पाठ ४६ १८) प्रपिस (प्रापि)- फपिस प्रापि सम्ममतके माधप्रणेता को गाते हैं। कपिको परमर्षि मी करते है। इनके समपके लिपपमें मिहानोंमें बात मतमेद है। कपिल भव-रेविहासिक म्पति माने जाते है। कबीर मार साहका जन्म सनत १९५५ में पुमा पा। ये पुमोथे। कहा जाता है कि ये विधवा मणके गर्मस उत्पम हुए । बार स्वामी रामानंदके शिष्य पे। कबीर मापनस ही मो बर्मपरायण थे। पर मिले तो न थे, परन्तु वनोंने ससग पार किया पा! उमके इसमें रिपु-मुसम्मान किसी के लिये हेपमात्र न था। बाबका मी हिन्दु मुसम्मान दोनों ही कबारपपके क्नुपापी पापे गाते है । कबीर साहम्ने सप कोई पुस्तक मही स्थिी । ये सामी बार भबम बनाकर या करते थे कि उनके बेटे कठप कर किया करते थे। कतार मम्पूिमाके कार निरोपी थे। कार पातिपतिको म मानते थे। एक पर हुए पानी पे। गकी मापा विविध मापाकि शाद मिळते । भारका पाणा जगाच कान मौरी शिक्षा म। रिवी साहित्पमें कबीर साहसका स्पान बात &चा माना जाता है। कबीरने स १५७५ में देहत्याग किया । रियर रवीन्द्रनाप कबीर व मसिक को नामियोंका कोनी और फारसा मी अनुपादावा।। मौरको गमवानगीने मार्गानुसाप पा । उमको मजिक विपमें रिहते है- महात्मा पौर पपा भरस्म्र मेहताको मति बनन्य बौकिक, वहुत बार होता पी; ऐसा होनेपर मी पर नियर पी।पेसा दुसी स्पति होनेपर मी उनीने स्पप्रमें भी नामविपके लिप-पबहारके किये-- परमेवरके प्रति दानता प्रकट नहीं की । पपरि पानता प्रध किये बिना हरेपणानुसार म्पहार पम्ता गाउपापि उनकी दरिदात्या बाजतक बगप्रसिर है भार पपी उनका सा माहाम्पहै। परमा भामे न परषा पूरा किया है और इन मोंकी इलाके विम माकर किपा है। क्योकि सी मोर महा ऐवी, और यदि ऐसी इच्छा हो तो उरें भकिने यस्प- परिशिए (१) . . कर्कटी राससी- कर्कटी रापसी हिमाग्य पर्वतके शिखरपर या करती थी। एक बार उसको इशाई कि मैं बीपके सपूर्ण नावोंका माण करके तृप्त हो। यह विचार कर यह पर्वतको गुममें एक टॉगसे सो हो, मुगोंको ठचा कर, बॉयोको बाकाशको बोर स्थिर कर तप करने एगी । इस दशामें उसे बार वर्ष बीत गये। तब वहाँ प्रमागी आये और उन्होंने उससे बर माँगनेको कहा। रामसीने का कि मैं चाहती है कि मैं सोहेको वर माविका हो, बौर मीलोंके पश्यमें प्रवेश कर सई । पानीने या बरदान स्वीकार किया, और कहा कि दुराचारियोंके इपमें तो प्रवेश कर सकेगी, पर गुणमानोंके हश्यमें तरा प्रवेश न होगा । तदनुसार कटीका सरी सूक्मातिसूक्ष्म होने भगा । इस प्रकार वह राक्षसी कितने ही पोतक प्राणीमध करती हो। परन्तु इससे राक्षसीको गाव दुसजा, बार वह अपने पूर्ण शरीरके लिये बहुत बात पधाचाप करने संगी। ठसन फिरसे वप करना आरम किया और उसे फिर मार वर्ष घोर तप करत हुए हो गये । इससे सात क वसापमान हुए। इसपर प्रमाजीने फिर कर्कटीको दर्शन दिये, और बर माँगनेका कहा। ककटीने उधर दिया, 'यब मुझे किसी भी बरकी कामना नहीं बत्र में निर्षिकस्य शांतिमें स्थित हो गई है। स्पर प्रधानीने उसे राक्षसीके शरीरमें ही मीन्मुक होकर विचरमका वरदान दिया, वौर का कित् पापी बालोंका भक्षण करती हुइ विचर, बार फिरसे पूर्ण शारीरको प्रान कर | कुछ समय बाद कटी हिमायफरसे उतर कर किस्तदेशमें पहुंचा, भौर उसने यहाँ किरात शके राणाको अन मत्री भौर पौफ साय यात्राके किये जाते हुए दमा। उसने सोचा कि ऐसे मृतु वधानियोंको मक्षण कर पाना हो येक है, स्पोंकि इससे गेककी रक्षा होती है। बस राशमा उने देख गर्नना करने सगी, और उसने ठरें अपना मोम्प बनाने के टिपे स्कारा । इसके बा- किरायके गया मंत्री भार राक्षसांके पातसे प्रस्मात्तर इए । रामसी परम पति और उमभे जोप-पका त्याग किया । यह पर्गन पोगवासिष्टक उत्पतिप्रकरमके ६८ौर ७७-८३ साम आता है। धर्मग्रन्य- जा मत गिम्मर सम्प्रदायमें गाम्मरसार बा सिवयोंका है, वही महरा वापर मामापमें कमप्रम्पका है। इस मम्पके फर्मविपाक कर्मस्तत्र बरसामिन, पानीतिक शतक और समविका ये छ प्रफरण हैं। ये क्रमसे पहप, सरा, तीसरा चाया, पाषा और एट्य कमान्य माम प्रसिदकमपके कता प्रतापर मम् देवेन्द्रमूरिहैं। इनफा सम्म गमग म. १२७५ में हुआ था । रेसबमति नगमके प्रखरता और मत प्रातक अमापारण पनि प। इनके गुरम्य नाम जगपन्त्रमूरि था। नामे मादग्निापम्माति, मिदपचाशिकाप्रावि मुर्शन परिज बार बनेफ पोंकी रपना 1 चम्दाने पत्रक ११७ में मुरादति कमान्य'' पानेके लिये किसी मुमुक्षो वनुरोध किया है। माइम हा इसमे उनका तापय मूल समापसे होt+रानचन्द्रमाने अनेक म्पोंपर फर्मप्रपा पठन-मनन करना उम्लेम्प किया। + मापुन रमानुनमा मामीरा र परल रिच पर एमिनो - मामी भन्ना पर ये मुम्ने नी भाराम यादीमय राना पारे । स्नगाली नयापम परित परिषप 'पावसामान परमेशामा उमाने (परमाने) मात्र नेपालमा गा। -मा भीमद् पाचन कामदेव भापक (रेगे प्रस्तुय प्रय, मोझमाग पाठ २२) कारिकेपानुपेमा- या पाहमा मप दिगम्बर विद्वान् स्वामी कार्तिकेय (कार्तिकस्वामी) र बनाया जा है। ये का हो गये। बौर का यनेपा पे स्पादि मायका पुछ ठीक मेक फ्ता मा पम्वा । रामचन्द्रमा मिt-"गठवर्ष मद्रासको मोर साना ला पाकिस्सामी इस भूमिमें बहुत विचरे ।। स भोरके मन मम्प, और और भोप विसे सोए पहाई देसार सामी कार्तिकेय माविको बहोस राम्पमय दिगम्बर पि याद वाताहै। ममस्कार हो ठग कार्तिकेय भाको ।" कियानुप्रेक्षाके उपर ई टीका मौ ।। या अन्य प० वयचन्द्रगीको पनिकासशित बसे म्पा है। अपनीने दिगम्बर विशन् मुमचनीकी संसहत टोकाले भाषरसे या निका भिसा । रामचगने कार्तिकेयानुप्रैषाने मनम-निरिप्यासन करनेका कई जगाउलेख किया है। पिसनदास (सिंह) (देशो किपाकोप) हरी (देखो प्रस्तुत पंप मालनाबोर प १९८) अम्बुन्द वाचार्य Pगम्बर मामाप पात माप छिन् हो गये हैं। कुन्दकुन्दका स्प माम पामन्दि मा था। इनके विपपमें तब तराको दम्तकयामें प्रचमित है। इनके समय विपपमें भी विधानों में मतभेद है। साधारणत मुदमुल समप ईसमी सको प्रपम धवान्दि माना बाता है। इन्दपुर वाचार्यके नामसे पासे मप प्रचलित है, परम्त ग्नमें पचास्तिकाय प्रवचनसार xसमपसR दौर मरपार ये पात प्रसित है। इनमें बारिक खान कुन्दकुन्द पाके मामसे प्रसिद्ध है। वानाको बमृतकवाचार्यो सतत टोपा मी लिखा है। ल प्रयोंपर और मी निराध सात-ीिनी टीका है। हिन्दी टोकायोंमें समपसारके ऊपर बनारसीदासमोध बिन्दी समपसारमाटक पत र है। ताने बमृतचन्दके समपसारकाशा पापारसे हिन्दी करिता रिसाहै। सक्क तीनों ही प्रप बम्पारप सब कापि माने गावे। मुन्दादको ८५ पार (प्राम) का मी पर्वा माना जाता है। इनमें दर्शन, भारित्र, सूत्र दोष, भाष मोष सिंग बोरशोर नामक बाट पाएर छप चुके हैं। रामचन्द्रनाने प्रस्तुत पंपों पर स्पानपर सिवमापतका उशकिपा और उसकी एक गापा उस्त है। मह मियामत तक मार- पाबुरासे मित्र है। पर पापमपदके मप्रसिद्ध पाइरोमेसे को पार होना चाहिये । रामचन्द्रमाने फुपु प्रपोका तूब मर्मपान किया पाणदबादि बाचादि प्रति रुवता प्रकाश करते हए परम्दगी लिखते हैं- रेशमादि वाचार्यों 1 हारे गरम मा निजत्वरूपकी बोग कर में इस पामरधे परम उपकार्य हुए हैं इसपि मैं तुम्हें अतिशय मधिसे नमस्त्रर करता है। गाचीन पचामित्रपका भातर भी किया। मो वा. में दिया गया है। सम्पर ना मला मागरिक विम भी कम नाम RANA नाले मासे भियसना पाने समाधि पालो " परिशिप (1) । इमारपास (देसो हेमचन्द्र) फन्त्रीस्वामी- केशिगौतमीप नामका अधिकार उत्तरम्पपनस २३ में अधिकारमें बाता है। फेशी भगवान् पार्थमायको परम्पराको मानमेवाडे पे, और गौतम गणधर महापारको पराम्पराके उपासक थे। एक मार दानोंका प्रावस्ती नगरीमें मिगपशुआ। एक ही धर्मक अनुयायौ दोनों सघोंके मुनियोक शिष्य मिम मिम प्रियाओंका पान करते पे । या देसकर फेशीमुनि बौर गौतम गणपरमें बातसे लिपयों- पर परस्पर चर्चा , और पाका समाधान के बाद कशीमुनि महावीर मगवान्को परपरामें दीक्षित से गये । केशीमुनिकी अपेक्षा यपपि गौतम ोटे पे, फिर मी केशामुनिने परिणामोंकी सरसताके कारण ठनसे दीक्षा प्राण करनेमें कोई सकोच म किया । प्रियाकोप- रियाकोपके कर्ता किन्नxि सांगानेरके एमेवाळे सणेमाल थे। किपाकोष स० १७८५ में रपा गया है। इसकी रचना छन्दोमन ।। किसनसिनीने मचाचरित्र बोर रात्रिमोनमकपा नामकी बम्प पुस्तकें मी रिसी है। क्रियाकोष चारित्रका मन्य है । इसमें मामाचारसमषी क्रियावोंका मा विस्तारसे वर्णन है। यह य म्न् १८९२ में शोठपुरसे प्रकाशित वा गममुमार (देखो प्रस्तुत प्रप, मोसमाम पाठ १३) गीता- गीता बेदम्यासको रचना है । इसमें रणमगवान्ने पर्जुनको कर्मयोगका उपदेश दिया है। इसके सतत, हिन्दी वप्रेमी भादि संसारकी प्राप समी मापायोंमें बनेफ अनुवाद विचन बाहिर है। गीताके कर्तबके विषयमें रामचन्द्रगीने जो पिपार प्रकट किये है, रे महात्मा गांधी के प्रमोंके उपमें पाक ११७ में छपे । गोतामे पूर्वापरवियप होनेका रामचन्द्रमाने बक ८११ में उस किया है। गोड़सपरित्र- पा को परिप्रप्रय मालूम होता है । इसका उम्म्म पर्शक १० में किया गया है। गम्मिटसार- गोम्मन्सार कर्मन्यका एक उप कोटि गिमारीय प्रध। इसके गोबर बीर मामा दो बिमागरे, बिममें श्रीन वार कर्मच मैनपतिसे विस्तृत वर्णन किया गया है। इसके कर्ता मेमिचन्द्र सितिपक्रया है। नेमिचन्द्रने गम्बिसार, पपणासार, नियोक्सार बार अन्य मी सितियों की रचना की है। नेमिचान बरने लिएपके मसाधारण विरान् थे, गणितशासरे तो रे पणित पं । इनके पिपमें मी पावसी विवस्तियां प्रसिद्ध है। नमिचन्द्र ने अपने शिष्य चामुणरायके उपदेशक ठिपे गोम्मरसार बनापा था। गोम्मटसारका दूसरा नाम पचसह मी है। गोम्मटमारके x पने मनधिो स्पनर पिलमान मामका टोप मिा पर साकारली सिनसिनाला ८१७ - भीमा पम्वन्द्र उपर कई दिगम्बर निदानोंको टीका है। मेमियनका समप ईसाकी ११ वी शताम्दि माना जाया है। रामचन्द्रमाले गोमारफे पन करने का मुमुक्षुषोंको अनुरोध किया है। गौशाम- नशाबोके बमुसार मंसलिपुत्र गोशास महापौर मगवान्के शिम्प पे । किसी बात कोकर गोशाक और महापारमें मतभेद हो गया । गोशाने महापारके सपको छोर दिया और तम्होंने अपना निजी सप स्थापित किया । गोशाल वपमेने नि' कहा करते थे। एक बार मापारके किसी धिप्पमे महापार मगवान्सेमा कि गोशाल वनेको किन करते हैं। महामारने का गोशाक दिन महो। बस वातको गोठाको सवर गौ तब दे पात कोभित हए, और उनहोंने महावीरको मपन्त बाक्रोशपूर्ण पचन को। सानुभूति और पुनपत्र नामके मुनियोंने गोशाकको पात समसाया, पर उन्होंने उन दोनों को अपनी तेगोम्यासे या गण । गोशाकमे भगवान् महामारके उपर मी आफ्ना गोपाल प्रयोग किया पा । गोशालका विस्तृत मर्मन भगवताके १५ हातको १५ उदेशमें Pया है। गौषम (कवि)- गौतम पनि म्पापदर्शनके पापप्रमेता माने जाते । म्यायसूम के बनाये गए हैं। म्पापसूत्रों की रचनाकार के लिपपमें विशनों में बात मतभेद है । कुछ रोग सची एन्के पूर्णका रचना मानते , और इस रोग म्यापसूको ईसमी सन्के बादका किसा हवा मानते हैं। गौवम मपपर-गौतम इवन्ति महापारफे ११ शिष्यों से मुरूप विप्प पे। ये पारिमें मानण पे । इनमें गौतम इन्द्रन्ति और सभीको मोरकर भाकोके गणधरोम म्हावीर भगवान्की यौमदगीमें लप्प पापा था । नाम गौतम गपघरका माम जगह जगह वावा है। गौतम गणपरके शिप्पोको क्षेत्रमान प्राप्ति हो गई पीर परत स्वयं गौतमको, मगवान् महातारके ऊपर मोह यनेके कारण फेवामान महीमा--पार कपन मोक्षमा वाता है। पारिपसागर- पर पदप मथ मास होता है। इसका ठोस पत्रक ११. में है। चिदानन्द- चिदानन्दगीका पूर्ण नाम पिवप पा । पे संवेगी साधु थे। इनके विषपमें मतसी किस्म रिपो एनी पाती हैं। विदामादमी काई यो मान् भापत्यासी म पे मितु ये एक मारमानुमपी बमामा पुरुष पे। पिसन्दगीने निम हिन्दी भाषा बस्यामातियों बनाई है। विदामदगीने स्तरोश्यानकी मी रचना की है। इसकी माषा हिन्दीमिमित गुमराती है। इस प्रपमें का कोई विशेष टोपटाप महा है। परमें दो पाँच पटक पचन होवी है यह परन मिस तप, का निकलती है और किसके कासि निकल्नेसे क्या फर होता है, स्पादि सरसबपी बोध समेट्य- बानमें वर्णन है। भीम परवाने सपेरपानावेचन मिना बारम किया था । उसका मो भाग निस्तारण प्रस्तुत प्रप के नीचे दिया गया है। समते १ चिम्मन्दगी ।
परिशिए (१) . " सवत् १९०५ तक मौन्द्र थे। उनकी रचना मनुमवपूर्ण और मार्मिक है । रामचन्द्रगी चिदानन्दगीके सबध पिसते है-" उनके जैनमुनि हो पाने के बाद अपनी परम निर्विकन्य दशा हो जानेसे उमें बान पहा कि वे वर क्रमपूर्वक द्रम्म, क्षेत्र, काल, मावसे यम नियमोंका पाछन न कर सकेंगे। सत्यानियों की मान्यता है कि मिस पदार्थको प्राप्ति हानेके लिये यम नियमका प्रमपूर्वक पालन किया माता है, उस पस्तुको प्राप्ति होने के बाद फिर उस भेणीसे प्रति करना अपना म फरमा दोनों समान हैं। जिसको निर्मप प्रमचनमें वप्रमच गुणस्थानी मुनि माना है, उसमें की सर्वोपम नातिक रिये कुछ भी नहीं कहा जा सकता । परस्तु के उनके वचनोका मेरे मनुमनामके कारण परिचय होनेसे ऐसा कहा जा सका है कि ये प्राय मध्यम अप्रमत्त दायमें थे । फिर उस दशाम यम-नियमका पालन करना गौणतासे मा जाता है । इसलिये अधिक वात्मानदके लिये उनहोंने पह दशा स्वीकार की । इस समयमें ऐसी दनाको पहुंचे हुए बहुत ही पारे मनुप्पोका मिलना भी बड़ा कठिन है। इस अबस्थामें अप्रमचताविषयक बातकी असमावमा वासानीसे हो बाफ्गी, ऐसा मामकर उन्होंने अपने बावनको पनिमतपनेसे वार गुप्तरूपसे विवाया । यदि ये ऐसी ही दशामें ये होते तो पासे मनुष्य उमके मुनिपनेकी शिथिलता समझते और ऐसा समझनेसे उनपर ऐसे पुरुपको ठण्टी ही छाप परवी । ऐसा हासिक निर्णय होनेसे उन्होंने इस दशाको स्वीकार की। पैसावीपुम- पतीपुत्रका जीव पूर्वमबमें यादेव नामका मामण था। र चारित्रकी मुगुप्साके कारण रानगामें पनाह सेठकी पिठाती नामकी दासीके यहाँ पैशावा, पिसावीपुत्र (गतीपुत्र ) पा। पेडातीपुत्रको पूर्वमनको सीने मी पनाह सटके पर उसकी कम्पारूपसे चम्म लिया। छातीपुत्र सेटको कन्याको बहुत प्यार करता पा । एक दिन सेटमे पेसाती- पुत्रको मफ्नो हकीके साथ कापसे कुषेय करते देस उसे पासि निकाल दिया । पर दासीपुत्र चोरोंकी माली ना मिग, वीर गोरोंफा वधिपति बनकर बने सगा । एक दिन वह अपने साथ चोरोक साप पनावर सेटके घर मापा । पोर पातमा पन वीर सेठको कम्पाको लेकर परत सर पर उसके कर्मचारियोंने चायका पीछा किया । घेवातीपुर सेटको कन्याका सिर काटकर उस सिरका छेफर भाग गपा । उसने बागे जाकर एक मुनिको देखा वोर मुनिसे उपदेश माँगा । मुनिने रिचार किया कि यपपि यह जीव पापिठ है रि मा या उपदेश हो सकता है। यह एकर मुनिन करा--"तु उपशम, विवेफ और सबर करने चाहिये ।" यह सुनकर पेठातीपुत्रको मात्र पा पा, भार पर ही कायोत्सर्गम स्थित हो गया । चेसातीपुप्रने बदल दिम कोर तप रिया भीर पर मरकर देवलोक गया । पर फया उपरेशमाग नादि बैन कपायोम माता। टम- होम शानो पुरुष थे। पे गुमरातके एक मक परि माने जाते हैं। इनका नाम पेसाइये पास सोनिश्च प्रामममदर्शक स. १८५८ में माथा । योग्य बाल सरठ भीर बात प्रा थे। मान अपरा प्रेमको भाशा मोर पो हो नी ।होंने गेम्मसिरिमें मानेको कभी भी पर और उसका माम - भीम राबवन्द्र की । छोटम गत कम बोलते, और कम वहार करते थे । छोटम बारमामपारी थे । होने फ्ना समस्त मोक्न अपात्ममें हो म्पतीव किया पा । भेटमने प्रयमम्मी मामले सापुत्रं वपना गुरु नाया बा । मेटमने अनेक प्रपोच रचना की है। इनमें प्रमोचरस्नमाध्म, धर्ममकिया-पान, अपितामणि, सउपमिपसार, शास्तविचार वादि मुन्य है। छोटम ७३ वर्षको परस्पा माधिस्य हुए। एमरत- एक समय रामा मरत मोके किनारे बैठे हुए बोकारका गाप कर ये पे।यों एफ मिणो हरिणा पानी पीने के लिये बई । इक्ने यो सिंहके गर्मनका शम्द पुनाई पड़ा और हरिमाने रके मारे नदीको फाँद याने प्रयत्न किया । फर यह मा कि उसका गर्म नदीमें गिर पवा बार र नदी के उस पार पहुंचते ही मर गई। एमर्षि भरत मी किनारे बैठे बैठे या पटमा देस ये ।। मरतनाका मय दयासे म्याकुल हो उन । वे वठे और पगशावकको नदीके प्रवाहमसे निकाल र बपन नाममको गये । वे नित्पप्रति उस पन्चेको सेप-समूषा करने भो । समप बार रतनाको उस हरिणके प्रति बस्फत मोह हो गया । एक दिन पर मृग ठमक पारसे कही माग गया और अपने मुडमें गा मिम । इसपर मरतमाको अस्पत शोकमा, और इबरारापनासे भर हो गये । इस मापन्त पगमासनाने कारण मरतमीको दूसरे मम्ममें मृगका शरीर धारण करना पड़ा। नरतगीको पगमन्ममें अपने किये हुए कर्मपर बात पश्चाताप गुमा, भौर के पात बसंगभाषसे पने यो । उपनाव पर्षि मरत मृगके शरीरको त्पनाकर मामणके पर तत्पलाए। मरतमाता यह अन्तिम सरीर पा और इस घरीरको मेमने के बाद से मुछ हो गये । मरतग अपने पहिले भोको मूसे न पे समिये दे बसंगमावसे हरिमधिपूर्वक वपना गोक्न बिताते थे । साधारण मेग मरतमी को गा गंगा पा पधिर समसकर उनसे बेगार गय कराते थे, और उसके परे नमें सहा सूख न दे देते पे । या गहमरतका वर्णन मागपतके भाठ-मबमें पप्यायमें बात।" मुझे समरत पौर निदेही बनकको रया मात्र होमो "-'माम रामचन्द्र १२१ नन- जनक सानुराम एमा निमिके पुत्र थे। ये मिपिणो ण्मा पे । राजा जनक अपने समय- एक मरे पोगी थे, और वे संसारमें मछकमको तरा निर्मिस पते थे । पनक बर्पि' और विश भामसे मी को गाते थे । कनक केवल पोगी ही नहीं, परन्तु परमशानी और मायके मच मी पे । पि पारम्प इनके पुरोहित तपा मंत्र पे। सपा मुकदेव बाद बनेक इपियोंने बनारसे से सपा लिया पार गीता मी मनको निकाम कर्मयोगी प्रशंसा की गई है। जनकी पुत्री सौताका विवाद रामचनमासे प्रभा पा । बमकका पर्गन भगत, महामारत रामायण मादि मयोंमें मिलता है। मम्मदीपमप्ति- अपूर्णपास भेतामर साहित्यके १२ उपोमिसे इन उपग माना गाता है । इसमें उम् का नारसे पन किया गया है। पद न भूगोवियपक मप है । इसमें रामा भरतकी कपा ।
परिनिए (१) पिम्तारसे वाती है । इसपर न माचार्याने वनेफ टीका पिगियों टिगी है। इस प्रयमें इस मामें मार न हानेका उम्ग बाना है। नम्पसामी-- उम्म्म्वामी Pिर मार भेसापर दोनों प्रायोंमें नन्तिम फेवठी हो गय हैं। महापौर मामी निवागके पमात् गातम, सुपा बार उम्पूसामी इन वान फाठियोका होना दोनों ही सम्प्र- दापोको मान्य है । इसके बाद ही दोनों सम्प्रदायोंकी परम्परामें भेद टिगोचर होता है। दिगम्बर और भवायर दोनों विशनोंने समात, गुनरानी वोर हिटीमें उम्स्वामीफ बनेफ चरित रास वारि लिने है । प्रतापर विधाोम हमसम्द्रमूरि और अपशेषरमूरि, और गिमरोंमें उत्तरपुपणक कर्क गुणममूरि और परित रानमड मारिफा नाम ATI उठेमनाप है। पं० राममयका उम्मूस्वामी- परित भभी दाउमें इस गुफारा संगारित होकर माणिकपन नैनयमाला समईकी बोरसे प्रकाशित हुआ। ठाणांग (बागमय)-इसका परचढाने अनेक स्पोवर उल्लेग स्पिा है। रंसी गापाका स्तपन (देशो पशोविजय) वलार्यम्म- वस्वार्यसूत्रमें जैनधर्मके सिद्धांतों सूत्रोम उिमा गया। मान दंगको मैनसाहित्पमें यह प्रपम होरपना उपतम्भ होती है । इस प्रयके कई उमास्तावि है, को निगमर और खेताम्मर दोनों से समापोंगरा पूम्प माने जाते हैं । तवापसूत्रका मी दोनों सम्प्रदायोंमें समान बादर है, पौर दोनों ही वामापोंके बिछन् इस सारगर्भित मेपको टीका टिप्पणियों जिसमेमें प्रेरित हुए है । सेवामा परम्परा के अनुसार उमास्वातिने तत्लार्पसूपके उपर सय भाप्पको मौ रचना की है, मिसे गिपर शिन् नी मानते । खेतापरोके भनुसार उमापाति प्रशमरति मारकमाप्ति बादि प्रपोक मा कर्ण करे जाते हैं। उमासाति पाचकमुम्पके नामसे परे नाते है। दिगमार साहित्पमें नका नाम समास्यामि मी वाताहै,मौर पे कुदाद भाचापक शिप्प वपना पशम माने जाते हैं। मध समप ईममी सन् मपम शताब्दि माना जाता है । वत्तास्त्रक मंगलाचरणका पमपन्द्रीमे वचन किया है। पिपासफी- पिपोसम्मधर्मको मूलप्रवर्तक मैडम जैोटकाका मम सन् १८३१ में भमेरिकामें गमा पा। इनका सिर १० वर्षको नाम्पा वमेरिकामे एक गवर्नरके साप एमा। बादमें पार म्केट्स्कीने इस संबंध मछेद कर दिया, नौर देशाटमके विचारसे रम्दुस्तान बाई । सोने तिम सास मादि देशोंमें मी भ्रमण किया | छोट्स्कीने कर्नेट बासकट साइमको मन्दसे सम् १८०१ में पियोमफिकल सोसापटीको स्थापना की। ये सन् १८०९ में फिर हिदुस्तान वर्ष, और बोबो शहरों में गाकर अपने सिताका प्रचार करने गी। पिपोसमीधर्म सब पोका समय करता है, और प्रत्येक वर्मक महान् पुरुपोंको पूम्पारिसे देखता है। दिल, मुसम्मान, पारसी ८१८ भीमद् विषय बादि समी सोग इस धर्मक वनुपापी । ट्स्कीफे बाद श्रीमती एनौबिसेन्टने इस सोसायटीको उपविके लिये गात सयोग किया । पियोसफोका गीताका गुरगती विवेचन पियोसरिफर सोसायटी पम्पसे सन् १८९९ में प्रकाशित हुला है। दसरेकासिक ( बागमप )- दकामिको कुरा गापावोका रामचन्द्रनीने अनुवाद किया है, यो का ३१ में ज्या। दयानन्द--- सामी दयानन्दका बन्म स १८८१ में मोरपी सम्पके अन्तर्गत कारा गाँवक एक पनी घराने में आ पा । स्वामी दयानन्दके पिता एक पर प्रामण पे । दपानन्द स्वामी बारमसे ही स्तवन दुषि थे और मिप्या का धाविका विरोध किया करते थे। वर स्वामीमी गाईसकेर तो उनके दिमाहक बातचीत । विवाहको सब प्यारियों मा हो गई, पर दयानन्द इस समाचारको धनते ही की माग गये, मोर गेरसे रंगके पस पहिनकर बने गे । दयानन्दगीको स्टुम्की तागशमें पर उपर पान मकाने पक्षात् पनावमें सलामी विरजानन्दजाके दर्शन इए। दयानन्दमे अपने गुरुके पास बाई बरस गकर संस्कृत और दोध सूत्र बम्पास किया । विचाम्पपमके पश्चात् स्वामी दयानन्दने प्रशिकमर्मका दूर दूर पमकर प्रचार किया । काशीमें भाकर होने कि परितोंसे भी शाखा लिया । सामानीको प्रतिमा और असाधारण पुलिफौरान देखकर पातसे ोग ठमके गम्- पापा होन बगे । स्वामी दयानन्दमे सं १०३२ में बम्म बार्पसमायकी स्थापना की। स्वामीमी ने उदयपुर, एदौर, पापरा वादि रियासतोम मा प्रचार किये प्रमण किया । तमे रे पोषपुरके मनाराणाके या पने को। यो कुछ गेग उनके मात विरोधी हो गये, और समके रमोरयेसे उने विप हिलाकर मरवा राम । स्वामामाने संवत् १९१ में दिवाली के दिन देहत्याग किया। इसके बाद सामी महानन्द सावा ममपतराप मारिने बार्पसमाबका काम किया। स्वामी दयानन्दमे हिन्दी में सम्पार्यप्रकाश मामक पुस्तक लिखी है, मिसमें सब धर्मो का समापना की गई। दयाराम- करि दयारामका मम सन् १७०७ में आ पा । सने देवनागरी लिपिके वधिरित बम मर्य विपि न भाती थी । इहोंने गुजराती, हिन्दी पमानी, मराठी, संस्मत और फारसी मापा करितायें है। उनके एक शिप्पके कपनामुमार दपारामने सब मिनार ११५ मा रथमा औहै। इसके अतिरिक्त सनोंने गुस्से पद मामी बगैर मी निरादपाराम कृष्णके गत मच थे, और इसने पणा पातसे सिक पद पगण मिसे है। पापमने गोल, मधुरा, काशी शक्न प्रौनापी बालि सत्र पामोश्ये सात बरस धूमकर यात्रा को पी। इनके सिन्प (पारामको नरनि मेहता आतार मानते थे । इमका मरण सन् १८५२ में हवा । राजपागाने इनके पद उदृत दिये। दासीप (देमो रामराम ) देवपदमी- सपनोफा मन मारणाबमें संवत् १०१५ में मापा। सपनगी सेवामार बाम्नायों । ।
परिशिप (1) ८१९ एक पास गरे बम्पारमवेत्ता कवि हो गये है। होंने स्वेताम्बर साहित्यके विशाल अप्पयनक साप साय गोम्मटसार वादि दिगम्बर प्रन्योंका भी कमा सम्यास किया पा । देवचन्द्रगाने सस्कृत, प्राकृत, मम और गुजराती मापा बनेफ कम्तियां बनाई। नहोंने दस बर्षको अवस्थामें दीक्षा के छी थी, पौर बीवनपर्यत प्रमचारी राकर साहित्य सेवा को । देवचन्द्रनीफी रचनाओंमें द्रन्यप्रकाश, नयचक्र, जानमगरीटीका, विचाररस्नसार, वयात्मगीता, चतुर्विधतिमिनस्तबन वादि प्रत्य मुख्य है। रामचन्द्रबीने वन्यात्मगीता पौर चर्षिशतिनिनस्तवनके पच उदृत किये हैं। देपचन्द्ररि (देखो हेमचन्द्र) देवागमस्वोप (देखो समतमन) पारी (देसो प्रस्तुत प्रप, भावनायोष पृ ११९-२०) पनामद-शासिमद्र- पनामद शाहिमदको कथा घेताम्बर साहित्यमें पात प्रसिद है। यह कया स्त्रयोंमें भी जाती है। स० १८५५ में बिनकोटिरिने सरात धन्यचरित्रमें यह कपा विस्तारसे दी। इस सस्कृत चरित्रके उपरसे प० दिनविनय महाराबने सूरतमें एकर भमाशारिमद्रका रास लिसा है। यह यस पार वालमें है। चौथी ठासमें पनामद और शासिमनके सयम प्राण करनेका उल्लेस है। घनामद गौर शानिमद्र मोक्षगामी गौर पे । उळ रासको मामलिंद मागेकने सम् १९०७ में प्रकाशित किया है। xपरमधी (परमसिंह) मुनि-- घरमशी मुनिका बम नामनगरमें हुवा था । इनके गुरुका नाम गिवनी ऋषि था। पेगेंका- गमा शिपिसाचार देसकर उससे क्सग हो गये पे, और सबत् १६८५ में उन्होंने दरियापुर- सम्प्रदापकी स्थापना की थी। ये भवपान मी करते थे। परमशी मुनिने २७ सूत्रोंपर 'तम्मा' की रचमा की है । इनोंने बौर भी मप लिसे है। इनका विशेष परिचप “मैनधर्मनो प्राचीन सक्षिप्त प्रतिहास" पुस्तकमें है। यह पुस्तक स्थानकवासी जैन कार्पाप महमदाबा से प्रकाशित हुई। धर्मचिन्द (देसो हरिमद ) पर्मसंग्राणी (देवो हरिमन) नदिमन (भागमपन्य)-इसका पदमीने एक स्थळपर कवितामे उहेग किपा है। ममिरामर्पि (देखो प्रस्तुत प्रप, भावनाोध प १०३-% नरसिंह (सी) मावा- नरसिंह मेहता गुजरात के उप कटिके मक करि माने जाते हैं । इनका जन्म नागा मापा। इनका जन्मफाल संवत् १५५० से १६५ के मवर माना जाता है । इनकी हारटीया, परवर्समाम, पसटी भादि रचना गुजराती साहिस्पमें बहुत प्रसिर । मरमिह मेहता मणके बापत मळ पे। उनकी करिता सरस, कोमल और मकिभारमे परिपूर्ण है । सोफार्चा है कि ममिह मेदवारो प्रमु * पर सूना मते मेरे मित्र पुत्र रमन मानसीपने ।-कार - भीमद् रामचन्द्र प्रत्यक्ष दर्शन दिया करते थे, तपा सकटके समय सयं कृष्ण मगमान्ने इनकारी कई पी । मा गावा है कि नरसिंह मेहताने स्व मिणाकर स्वागस पद बनाये है। मरसी मेहता पौर कारका निस्पृट् मक्षिका रामचन्द्रनीने गात गुणगान किया है। मपवण- नवतावप्रकरमका घेताम्बर सम्प्रदायमें बहुत प्रपार है। इसमें चौदह गापामों में ना तलाक स्वरूपा प्रतिपान किया है। नवतलके कर्वा देनगुमाघार्य है। नोने सवत् १०७३ में ममतात- प्रकरणको रचना है। नपतावप्रकरणके उपर बमयदेवरिने माप्प मिला है। इसपर और मी बनेक टीका टिप्पणियों है। नारदमी (देखो नारदमणिसूत्र ) नारद (देसो प्रस्तुत प्रय, मोक्षमाग पाठ २१) नारदमकिन- नारदमतिसूत्र महर्षि मारदनीकी रचना है। इस प्रथमें ८१ सूत्र है । प्रपकारने इसमें मणिका सोतया प्रतिपादन किया है, और उसके सिये कुमार, पेदम्पास, एकदेव जाति भति-भाभापाको साठी दी। प्रपकारने बताया है कि मतोंमें पाति कुरा बादिका कोई भेद मही होता, वीर मलि {गेको स्वादका तह निर्वाचनीय होती है। इसमें प्रबगोपियोंको भक्तिको प्रभसा की गई है। म छोग परनों की तरह मक्तिको सातों दर्शन मामते । रक्त पुस्तक हनुमानप्रसाद पोपरके निक पनसहित गावा प्रेस गोरसपुरसे प्रकाशित ईमारवयीने मारता मारवस्पति वादि कम्प मी प लिसे। -निसानन्द- निमुखानदानी सामानापण सम्पपके सापु थे। इनके गुमराठी भाषामें बहुतसे काम हैं। ये काठियावास पते थे, और सं १८७७ में मौद पे। निफुलानन्दगीके पूर्व भाभमका माम छाडमी पा । इन कविताका मुस्म ग राम्परा पनि महचिन्तामणि उपदेशचितामणि, पौरमासान, निकुम्मनन्द काम तपा बम्प अनेक फोकी रचना की है। सपनाम निकुहान दके पौरगापानमें से पर उस्त किपे है। नीराव- मौत मळ मातिसे पास थे। इनका मरण सन् १८९१ में मुतारास्पा, हुमा पा। इसकी पिता नेम्बान और रणमलिक उपर है। ये तुम्सी मरहर पूर्णिमा सोर वाय करते थे। परते हैं एक बार पहें पस्तेमें कई मुसम्मान मिठा, और उसने प्रा6 र यो तेरे ममी, हाप तुपसी कर उसे क्या रखा हरता है।' इसपर मारतको भान उत्पम हुमा और बनाने मुसम्मान गुरुको प्रणाम किया। उसके वा उमच दातको भार बपि पुकार हमा और उनका माम्यान उपरावर गाता गा। गाने (नने योगी (परम पोग्यतापण) ।
परिशिए (१) ८२१ - नेपोसियन- नेपोम्पिनका जन्म १५ अगस्त सन् १७६९ में कार्सिका दौफ दुवा था। इन्होंने १६ वर्षको अवस्थामें मेस्टिनेंटका पद प्राप्त किया । नेपोरिपनने मस, वास्ट्रिया और इगडाके साय पास समक्तक वफ्न देश मांसको रक्षाके लिये युद्ध किया, और विनयी होकर मफ्नी असाधारण प्रतिमा और मीरताकी समस्त बिनके उपर छाप मारी । नेपोलियन असाधारण पार था, उसमें साहस तो झट कूट कर भरा हुवा था । पाकरा करता था कि कोपर्मेसे वसमत्र' शब्दको हो निका रासना पाहिये, स्पोंकि उपमके सामने कोई मी काम कठिन मारी। परन्तु मनुष्पकी दशा सा एकसी मही गती । सन् १८१४ में इगड, सस और वास्ट्रियाको संगठित सेनाके सामने इसे हार मानमी पी, और इसे एस्लामें जाकर रहमेको वा हुई। मैपोलियन दुर महीने एस्वामें यहा। बादमें इसने पहसि निकसकर फिर मांसपर अधिकार कर लिया । परिणाम पाया सन् १८१५ में इसे फिर समस्त युरोपके सम्मिसित एका सामना करना पड़ा । इस समय इसे इसके साथियोंने घोसा दिया । फठत नैपोलियनकी बाटरस्के युरमें हार ईवीर समाद नेपोलियन सदा के लिये सो गया। नेपोलिम्पनने मागकर वप्रेमी हडेकी शरण छौ। यहाँ इसे बरी कर लिया गया और इसे सैंट हेसनामें सदा के लिये निर्वासित मीषन म्यतीत करनेको भाडा । यहाँ पोस्लिपमने पाच वर्ष जतीच काटप वास्पामें मिताये । यहाँ उसके साय अस्पत मन्याय वीर नाचतापूर्ण बर्ताव किया गया। क्तमें मैपोलियन धीरे धीरे मत निट हो गया, वीर उम पीर सैनिकने ५ मई सन् १८२१ में अपने प्राणोंका रयाग किपा । " पर सपा मस्त हो तो नपोलियन बोनापारको दोनों स्पितिसे स्मरण कर "-' श्रीमद् राजपन्द्र' २ पर्वमलि- पोगाचार्य पतंजलि कब हुए और कहकि पनेबारे पे, इस्पादि बातोंके समंध कोई निमित पता नहीं गता। पछि भाधुनिक पोगोंके म्यवम्यापक माने जाते हैं। कुछ विद्वानोका मत है कि पाणिनापम्याकरणफे महामान्य मौर परकसरिताके रचयिता मी ये ही पालि है। इन विधानों के मतमें पतनलिका समप इसवी सन्के पूर्व १५० वर्ष माना जाता है। पातजम्पागमापर बनेक माप्य टीका वादि है । इनके सबमें परचन्द्रनी शिमो ३-" पातयोगफ क्या सम्पन्न प्राप्त महीमा था, परन्तु हरिमद्रमरिमे उन्हें मार्गानुसारी माना है।" पपनन्दिपपरियतिफा- इस प्रयके फर्ण पमनन) आचार्य है। जैन सप्रापमें पपनन्दि नामके भनेक विद्वान् से गप है। प्रस्तुत पसनगम्पर जैन न् पे। इन्होंने अन्य प्रयोकी मी रचना की है। पपना प्रानके बहुत पंडित पाहोंने इस प्रपमें पौरनन्दाको ममम्बार किया है। इनके समपा पुरा निपत पता नो एणना । पानन्दिपभर्विशति चैन समाबमें गत मारगे पहा नाता है। इस मपम पम प्रकरण है। रमपमा पदमपुरम प्रप है। इस प्रप का हम्मानित सात टीम भी है। इस यो परन करमका पाप वाले पई नगद उम्ण किया।
सम्पामपम ये यते पे | बन्दमें प्रो पतिक माह पे बारों मान रोकर बनेको २२५ भीमद् राजपत्र वारंभ किया, और अपने सात मित्रों की सहायतासे पूर्ण किया था। कहते है कि पर मोममाय अपने मामा वाके ठाकुरको पुत्री सुबनमाके साप प्रेम हो गया था, इस प्रेम इन रोमन भत समयतक निबाहा । प्रवीणसागरमें राजकुमारी गुमनवा ( प्रण) ने मोरामणी (सागर) पे सबोधन करके, और मरेरामणगने परकुमायको सपोधन करक कवितायें उिमा है। रागनी सिसते हैं.-" प्रमाणसागर सम्भपूर्वक पा माप तो पह दयता देनेपाल पंप है, ही तो पर पप्रशस्त रागरंगोंको बानेपामा प्रप है"। मसादनी (देखो अनुभवप्रकाश) प्रभम्याकरण (बागमय)-इसका ई जगह यमदनीने उष्टेस किया है। महापना (बामप्रप) सच मी प्रस्तुत प्रपमें टछेय भाता है। प्रीतमदास- पे मत कति मार बातिके थे, और ये सन् १७८२ में मौजूद थे। पे साधु-संतान समागममें बात का बताते थे । इन करिता मी बम्प मध्येकी तरहान्तबान और प्रेममजिसे पूर्ण है । प्रीतमदासको 'चरोतर ' का एन कहा जाता है। इनके यो पप गीता और मागा ११ स्कंध है । इसके अतिरिक्त प्रीतम सने बन्प मा बासे फ्द गरमी पाहि कसे हैं। प्रीतमदानो को ' गुवरातीमें बहुत प्रसिह । श्रीमद् जघन वने मोसे इसे पपने लिम कहा करते थे। उनोंने प्रोतमको मार्गामुसाय कहा। प्रीतमदासने गोरिदमयी नामक सापुत्र बात समपतक सहपास किपा, और उनें अपना गुरु बनापा पा । फरते है कि प्रीतमदास स्त समय बरे हो गये थे । पे उस समय मी फा-रचना करते थे। गुमयती साहित्यमें इनकी करिताबों नारसीदासमी नागराके पनेवाले भीमा पत्य थे। इनच कम सं० १५४३ में मौनपुरमें हमा पा । बनारसीबाप्तमीका मूछ नाम लिकमायात था। इनके पिता पार्बमापके ऊपर मार्फत प्राति पौ, इसलिये वनाने इनका नाम बनारसोरस रमसा पा । नारसोवासगीको पौवन का रस बामाका दात सौक हो गया पा । Fोंने शृगारके ऊपर एक प्रप भी मिसा पा, जिसे बाइमें होने गोमती नदीमें बहा दिया पा । नारसीवसमाको बास्थामें पीरे धीरे पगुत परिपन ला गया । ले कुर्छन वाचापक बप्पाहमरसके प्रप पानेको मिरे और ये निअपनपको मोर हो । निमपनपको पुष्ट करनेवाली बानपचासौ श्यामवासी पप्पाहवयसी पारि पतियोंकी रचना की । नारसीदासमी बदमाग, उदपकरण, पानमम्मी गादि बने मित्रसहित मुनि मान कर का करते थे। इसी कारण भावक जोग बनारसीदासको बोहरामती करने में समारसीदासाकी यह पददशा सं १९९२ तक हो । बा में इनको इस शापर मात के बा, और इनका पट उर गया । इस समय पे नागरा रूपचन्द्रो समागममें पाये, और बात बाबर है। बनारसीदास- -
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भीमद्रासन मुख दोनों समकालीन थे। दोनों होने अपने धर्मका विहार प्रातसे प्रचार बारम किया ।पुर मगरामके देशी विदेशी भाषामोंमें वनेक नोक्नचरित्र मिसे गपे हैं। भातरम- पूहकाप सदस्यों में एक सूत्र माना जाता है। इसके कता मदवासामी है। एलर- पर मेक टीप पिपिया है। सूत्रोंमें साधु साभियोंके वाचार किया भाविक सामान्य नियम-मागति प्रतिपादन के साथ साप, रम्प क्षेत्र मा मात्र तासर्ग अपपाद मादि मार्गीच मी समपा- नुस्पर बनो। इसम्मेि पे वस्त्र अपवादमार्गक सूत्र माने जाते है । परकम्पमें उरे शक हैं । इस सूत्रों साधु साथियों के मामRका वर्णन है। इसमें बा कार्य कर्मकि रेत और सपने बाधक, उमा निषेध करते हुए, संयमके साषक स्थान, म, पात्र माविका वर्णन किया है। इसमें प्रापरिषद वारिका मा वर्णन है। । मदत्त पाणी पाएक समयकी बात है कि एक प्रामणने भाकर प्रपन्त पसि कालोपसी ! नो मोबन तू सक्स साता है उसे मुझे मी सिमाम्मदउने प्रामणको सत्तर दिया मेरा मोबन मात गरिष्ठ बार ठामा कार्य । परम्त प्रामणने ना पापण वादि पासि निमय, तो मदउने प्रामणको कुटुंगसहित वपना मोमन सिमपा। मोजन करनेके पथात् गरिये पाषण दौर उसक पुटुबको म्हा उन्माद आ, और पायम मने पुत्रसनिस माता बन चामि सबक साप पकी क्रा रमण करने गा । अब पुनहा तो मायण और उसके गानोको माया माइमा प्रामणको अपदस कि उपर बात क्रोध वापा मार मापसे पासे निकल पड़ा। कुछ दूरपर मासपने एक गरियको पाप पोंपर करें फेंककर पोको फमते हुए देसा । मासणने गपरिपेसे कहा कि यो पुस्प सिपर घेत छत्र और घमर पारण करके गमेन्द्रपर मैठकर पासि निकले, र उसकी दोनों बाँसको कार फोरम गरियेने दिमागकी वोहमें सोकर हापीपर बैठकर गावे ए सदसकी दोनों मा फोर दी। बाम पापीको माझम हमाउसी प्राधणने इस इनस्पको कराया है। सदत्तको बामण गतिक व्यर बहुत रोष भाया । उसने उस मणको उससे पुत्र, धु और मिसरित मरमा बाबा । कोषान्ध प्रसाद बाचन भने म सब माधणोंको मारकर उनके नेत्रोस विशाल पाक मरकर अपने सामने लानेको बाबा दी। मने मात फा पास मरकर पनारे सामने रक्ट । ब्रह्मवत उस पामें पहुए फरमेको नेत्र समसकर उन्हें पार बार झापसे स्पर्श करता और बहुत पितावा करता था। तमें सामापी परिणामोसे मरकर सातमें भरकमें गया । य कमा विपरिशणकापुरमचरित वादि पापोंमें वाती है। भगमवीप (बागमप्रप)-सका गमकवाने वनेक स्पानोपर केस किया है। भगवतीमारामना- पा प्रत्य दिगम्बर सम्प्रदायमें पात प्राचीन प्रथ माना जाता है। पं मापूपममा प्रेमा करना है कि सो पा च मम माम वापस पा शिषकोटि पा । बाक्से मेग इम परिशिए (१) ८२७ मुनिधर्मका प्रत्य है, वौर सकी मनेक गापा घेताम्बर प्रन्योंमें भी मिलती है। इस प्रपके ऊपर चार दिगम्बर विद्वानोंकी सस्कृत टीकायें मौ है। वभीतक इसके ऊपर कोई बेताम्बर विवान्की टीका देसनेमें नहीं पाई। प० सदासुसगीने गो साम्बर टीकाका उल्लेख किया है, सो उन्होंने अपरचितसूरिकी गिम्बर अकाको । श्वेताम्बर टीका समसकर उल्लेस किया है। माश्म होता है कि सदामुसबीके इस कयनके उपरसे ही रामचन्द्रग्रीने मी भगवतीमाराधनापर खेताम्बर विहान्की टीका पाये मानेका उल्लेख किया है। इस प्रयके कर्णक समयके विषयमें कुछ निमित नहीं है, फिर मी यह अन्य गास प्राचीन समधा बाता है। मरव (देसो प्रस्तुत प्रन्य, मोक्षमाग पाठ १७, तपा मानाबोध पृ १०८-१११) महरि- ये उनके राचा मित्रमादिस्पके सौरोले मई थे। महरिको अपनी एनीको दुधरिश्ता देखकर पैरम्प ऐ गया । महरि महान् पोगी माने गाते हैं। पहोंने शूगार, नौवि बौर वैरम्य इन तीन शतकोंकी रचना की है। इनका घ, लेटिन, पफ्रेनी बौर जर्मन भाषामोंमें मी अनुवाद हो पुपुका है। इस शतकों में पैराग्यशतक पास सुन्दर है। यग्यशतक गुजरावी लौर हिन्दी पचानुवाद सहित सन् १९०७ में वामदामादसे प्रकाशित हुला है। महरिके पैराग्यशतकके वतिरित जैन विधान पपानन्दकवि बौर धनरान (धनद) मे भी पैराग्यशतक मामक मय जिसे है। पमानन्द कनिका रम्यशतक काम्पमाग ससम गुको प्रकाशित पुषा है। माम होता है रामचन्द्रमाने मरिके पैराम्पशतकका हो अगेकन किया था । मागपत्र- मागवतका हिन्दु समाबमें मस्पन्त बादर है। बावफल भी बगह चगा भागपतमी कथानोंका पाचन होता है। भौमवागक्तको पुराण, वेद वौर उपनिषदोंका सार कहा जाता है। इसमें पोको गह विषयोंको पात समतासे रखा गया है। इसमें पैरमयके वर्णनमें मी मगवतिको ही मुख्य मानकर उसकी पुएि का है। इसमें स्पान स्पानपर । सका प्रतिपादन किया गया है। भागवतके गुमरवा हिन्दी वादिनुवाद हो गये हैं। मागक्तके क; म्पासगी माने जाते है। इसमें पार कर है। मागरतमे रुण वौर अबगोपियों का विस्तृत वर्णन है। इसका रामचन्द्रवीन सूप वाचन किया था। मारनामोप (देसो प्रस्तुत पंप पू ९१-१२०) मावार्यमकार-- यह प्रन्य किसका बनायामा है, किस मापाका इस्पादि बातों का कुछ पता नही पा सका। इस मपके विषयमें रामचन्द्रचीने हिस्सा है-" उसमें सम्प्रदापके विवादका कुछ कुछ समाधान हो सके, ऐसी रचना की है। परन्तु तारतम्यसे ए पास्तविक दानपानका रपना नहीं, ऐसा मुझे भाता है। मोना-- मोगा भगवत्र सम्म कारिपात्राइमें बेहपुर के पास मुनवौ बानिमें सन् १७८५ में हवा पा। मोगा भगतके वापसा गुनयतीमें बहुत प्रसिद्ध है। मोगरा भगत पाटियावादी थे, इसठिये उनकी मात्रा गुजयतीसे कुछ मिल पाती है। उनकी काम्पसमधी सतियाँ मिम भिम प्रकारको है । माप उमका भीमद् मात्र दुम दोनों समकालीन थे। दोनों होने अपने धर्मका विर प्रान्तसे प्रचार वारंम किया । युर भगवान् की विदेशी भाषाओं में अनेक पौरमचरित्र लिखे गये है। परकम्प मसूत्रों में एक सूत्र माना जाता है। इसके कचा मास्वामी है । काम- पर क्फ टीका टिप्पणियों है । इन प रस्त्रों में साधु सापियोंके वाचार क्रिया मादिके सायाम निपम-मागकि प्रतिपादन के साथ साप, द्रव्य क्षेत्र काम मात्र उम्सर्ग वपमा वादि मार्गीका मी समया- मुस्पर बगान है। इसलिये ये सस्त्र अपवादमाक सूत्र माने जाते है।पाकम्पमें या उरे शक । इस सूत्रमें साधु साथियों के वाचारका वर्णन है। इसमें पा पदार्ग धमके और सपमके पापक है, उनका निपेष करते ए, सपमके सापक स्पान पर, पात्र मादिका वर्णन किया है। इसमें प्रापरिपच बादिका मी वन है। ममदच- ममदच पाता पा । एक समपकी वात र कि एक प्राक्षणमे वाकर सदच पक्रासि कालोपकाचा बो भोपन र स्वर्य माता है उसे मुझे मी सिमा समदत्तमे मामणचे उत्तर दिया कि मेरा मोबन गत गरिष्ठ बार उन्मावकारी । परन्तु माधपने का पोपण वादि शापासे विकाय, तो मदच्ने बापणको मुटुवसहित वपना मोनन सिमपा । मोमन करनेके पचात् पत्रि पापण और उसके पुट्रीको म्दा उम्माद एमा, बार या मापण मफ्ने पुप्रसहित माता मन वादि सबके साप पकी तरह रमण करने या । नब सवाईवो प्राथम और उसके गानों को गया मास्म प्रामणको ममतपकि उपर मात कोष वाया भौर मापसे भरसे निकापा। सरफर प्राममने एक गगरियेको पीपलके पोंपर करें फेशकर पाको फाइते हुए प्रामणने गारियेसे कहा कि नो पुस्प मिपर भेव और घमर पारण करके गमेन्द्रपर बैठकर पासि निको, व उसकी दोनों का कसे फोहगा। गारियने दिवाझी बोटमें सोकर हापापर बैठकर माते हुए अपदसकी रोनों पा फोड़ दी। पादमें पारीको माइम मा किसी प्रामणने इस दुकम्पको कराया है। ब्रमदत्तो प्रामण नाविक पर पहुव कोष मापा । उसने उस माधपको उसके पुर, वौर मित्रसरित मरमा साम। कोषाव ममदत चारताने अपने मत्रीको सब सामों को मारकर उनके मेरोसे विशाल पास मरकर अपने सामने छानेको बाधा दी। मान लेप्माक से पाल मरकर रानाके सामने रम्य । प्रदत्त उस पा रासे हुए फरमेंको मेत्र समभर उन्हें बार बार हापसे स्पर्श करता मोर बहुत हर्षित वा करता था मन्तम सिनामी परिणामोसे मरकर व साव परकमे गपा । पा वा नियरिमाकापुस्पचरित वादि कथाप्रपोंमें बाडी है। ममवतीसूत्र (बागमपन्य)-इसका गानबीन वनेक स्पानोपर उस दिपा है। ममवतीमारापना- पप गम्पर उपदापर्ने मात प्राचीन प्रप माना आता है। प नाममा प्रेपीका मानारे कसके प्रपत्र सम नाम भापशिल या शिवकोटि पा । वसे मेग इनको समंताबापाका शिम्प मानते है परन्तु यह टोक मही माम होता । म् मप प्रभामतमा परिधिए (१) में उत्पनामा था, वहाँ वापापा म नरेस्लाको उसके पुत्रसे मिलानके वास्ते से गया । मदनरेसाके का नाम ममि पा । ये ममि ही बागे पळकर नमिरान हुए। बादमें मनरेखाने मी Pशा प्राण की। हीपतराम रूपराम- ये गुजरातके प्रसिद्ध साहित्यकार हो गये हैं । महीपतराम रूपराम मफ्नै समयके बहुत अच्छे घारक थे । इनाने गुगमतीमें पातसी पुस्तकें जिम्नी है । एकवार इनका साथ राजतनाका का पाबादमें मिलाप वा । उस समय 'स्या मारतवर्षको अधोगति सैनमाई!' इस वियपपर जो निमें प्रमोचर एपे व ८०७ में Pये गगे। मनोहरदास मनोहरदास गाविसे नागर प्रामण । पे भाषनगरके यनेवाले थे। इनोंने फारसीका मा (म्पास किया पा, और प्रथम फारसीमें ही उपनिपकि बनुवादको पकर उपनिपदोंका शान मास किया बादमें इन्होंने म्याकरण वौर म्यापको भी अच्छी योग्यता प्राप्त की । सात् १८९५ में मनोहर सिगाने चतुर्ष पाश्रम स्वीकार किया, वौर मफ्ना माम बदलकर सचिदानन्द जयतीर्थ रक्सा । स समय होम बहातबस्प-गमित एकाध सप्तसत प्रपोंकी भी रचना की। मनोहरदासनीने निहरपरकी गुजराती और हिन्दी पोमि रचना की है। इन पगेमें कुछ पोंके क्तमें 'मनोहर' और पुम्से भन्दमें 'सचिनन्द प्राम' नाम मिरता है। इन पमि मनोहर समाने पैराम्पपूर्वक परमतिका निमपण करते आए पार और टोंगका मार्मिक वर्णन किया है। मनोहर सनीने हामारत के कुछ माग पौर गौताके ऊपर मी गुजराती में टीका बार मिली है। मोने पुरातन कपा वौर पचकापामा गए प्रोंकी मी रचना की है। ये प्रन्य वमी प्रकाशित नहीं हुए। रनोहरदासगी सबत् १९.१ में देहमु ए । रानपत्रचीने मनहरपरके कुछ पा उत किये हैं। राणेष्वास- ये कई भागती थे । इनका एक पर पनपनीने उदत किया है, जिसमें समगकी महिमा गई। मीरापाई- मौरमाई गोधपुर मेहताके राठौर रतनसिंहचौकी इकलौती बेटी पी। इनका सम संक्त १५५५ के ष्णमग माना जाता है । संवत् १५०३ में इनका बिबाद हुवा । पे दस परसके भीतर ॥ विषमा हो गई। मापन के पर्चासे पता लगता है कि रैदासका वफ्ना गुरु मानती थी। मीराबकि एप गिरिधर गोपाल के प्रति यही मति पा से उनके प्रेममें मतपय गती थी, और पपने फुलको काम छोडकर साधु संतोंकी सेना करती थी। मग मागबईच मन वि म या तब भन्दापन परी गई । पसि फिर घर पणे गई । मौराबाईकएपमै अगाध प्रेम और कि मकिपी । मौरपाई सकस मा बामती पी। उन्होंने गावगोपिनकी मातारपमें टीका कमी है। मरसौगाका मायरा और रामगोपिद भी उनके रपे हुए कहे जाते हैं। मागगर्दी कविता रामपूतानी बोडी मिमित हिन्दी माया है। गुमराती मी मौयाईने मपुर कवित्व लिया है।
८२८ भीमद् पयाद्र कविता बोधज्ञान भधिक पाया जाता है। मोनाने सन्मानी और बगुझे मोका सब उपहास किया है।मोगा भगत वफ्नो मछि वीर योगशक्षिके लिप बात प्रसिर थे। इनका मनुमर वीर पत्रक बात ती थी। इन्होंने ६५ पर्षकी बास्था देसाग किया। मणिरस्नमासा- मणिग्नमाण तुम्साशासमाको सतय रचना है। इसमें मूर मे कुछ ३२ है। ये पचास स्मेक प्रश्नोत्तररूपमें से गये है। मणिरानमागके उपर गुमरातके जगजीवन नाम मामणका संवत् १६७२ में रचाई टोन मी मिती है। इसमें वनामा और वास्माका बात पर मतिपादन किया गया है। यह प्रप मेरम्पप्रधान है । मणिरनमाछाका एक लोक निम प्रकारसे है को पा दरियो BAशस्तृष्ण मामरिच ने पस्प समस्ति तोप' । जोक्मृतो कस्तु निरूपमो य. को वामृता स्पारमुपदा निराशा ॥५॥ वर्ष-दरिद्धी कौन है ! मिसको तृप्मा A। मीमान् कौम है बो सतोपा है । गीते दूर मी पत कौन है । यो निरुपमा है। मस्तके समान मुख्यापक कौन है । निण्या । पणिमास मरमाई- मरियाद के बनेपाले थे। मणिशास ममुभाई गुग्गतके व साहित्यकार से मपे। इन्होंने पार्शनसमुनय बादि यों बनुमा किये हैं, वीर गौतापर सिंचन स्सिा है। इसके पर निसमुपपके वनुवारकी बौर गीताके चिनको रामचन्द्रमाने समालोचना की है। पुरान- गपातिमें इनके तोका संपर प्रकाशित एमा। परनरेसा- मनपुरफे मणिरप गया भुभाता पुगवाह पाक माम मदमरेसा पा। मदनरेसा मत्यात संन्री पी । उसके वनुपम सौदर्यको देसकर मणिरय उसपर मोहित हो गमा, और उसे प्रसन्न करने लिपे प नाना प्रकार के पपुप वादि मेबने मा । मश्नरेसाको जब परमात माश्म ई तो उसने रामामो बहुत निमारा, पर इसका ममिरपपर कोई असर नामा । वामा राग किस तय भने डोरे माई मदनरेमाके पति पुगवाह मर गम्मेको पातमें पने गा । एक दिन मदनरेता और पुगवार होनों उपान का करने गये हुए थे। मपिरप मी बम हाँ पापा । धुगवाहुको जा अपने बस मईके गाने समाचार मिले पा उससे मिन्ने बापा । मुगामे कफर मईक परपोका स्पर्श किया इसी समप ममिरयमे उसपर सहमहार किया। मश्नरेखाले पतिको मरमासम गर उसे धर्मा पा । पतिथे मर गानेसे मश्नरेखाने मरने ज्येष्ठ भोरसे मत मप मा। म मरेला गर्भग्नी थी। पर उमा एमप किसी गमें निकलकर परी गई, और उसने बानी को पुत्र मर किपा । नमि ५ मिनी विपापरक साप पकी । पर भी उसपर मोरित होफर उसे अपनी सी बनानी पण करने गा । मदारमाने रिपावरसे उसे मंथर बनेको कडा जवाहर जिला मुनिन रिपारको सदारसंतीरत प्राण पापा ।लनेमें मदनरेण पतिधार मरकर परिचिए (१) ८९ - पशोभियपनीका चम्म सबत् १९८० के लगभग आ था। यशोपिनयनाने सपद-पठार पर्पतक विपाम्यास करके गीष्मपर्यंत साहिस्पसर्वनमें ही अपना समय म्पतीत किया। बापने न्याय, योग, बम्याम, दर्शन, कयापरित, धर्मनीति बादि समी विषयोंपर वफ्नी प्रौड़ छेसनी पई है। यशोपिवयीने पैदिक बौर पौरप्रयोका गहन बम्पास किया पा । नोंने चैनदर्शनका न्य दर्शनों के साथ समन्वय करनेमें मी पप्पत भ्रम किया है। पशोषिजयकी कृतियों बार भी मात-सी मनुफ्ठम्य है, फिर मी जो कुछ उपरम्प, यशोविनयनीका नाम सदा के लिये वमर रसनेके क्मेि पर्याप्त है । उन्होंने संस्कृतमें मप्पामसार, उपदेशवस्म, शामवासिमुपपटीका पाय- सरनसाप, चैनतर्कपरिमापा बादि पारसे प्रथ लिखे है । गुवरातीमें होने पसौ गापाका स्वपन, योगप्रष्टिनी समाय, भोपामरास, समाधिशतक बादि प्रप बनाये है। यशोपिवयीने हिन्दीमें भी कवितायें लिसी है। ये स० १७१३ में लगस्प हुए । रामचन्द्रमाने पशाविजपजीके अप्यास्मसार, सौ गापाका स्तबन और योगाधिना समापन उठेस किया है, तथा उपदेशरहस्प, पोगरटिना सहाय, सीपाखरास, समाधिशतक बगैरके मनेक पप भादि उपत किये हैं। पशोनिनपीके उम प्रशसक होनेपर मी राबधदमीने एक स्पायर उमको उमस्य बास्पाका दिग्दर्शन कराया है। योगकरपदुम- यह कोई मेदान्तका प्रय माश्म होता है। इसके पटन करनेका रावणानाने किसी मुमुक्षुको अनुरोप किया है। इसका एक ३५७ में उद्धेस है। योगप्टिसमुचप (देखो हरिभव) योगष्टिनी सम्माप (देशो यशोविनय ) पोगमदीप (देखो एरिमन ) योगबिन्दु (देसो परिमा) योगवासिष्ठ- मारतीय साहित्यमें पोगवासिष्ठ बिसे महारामापण मी का बाता है, का स्थान परत पा है।पोगवासिष्ठके कर्चा वसिष्ठ अपि माने जाते हैं। पोगवासिपमें वीस हजार शोक है, जिनमें नाना फया उपकथाहारा बारमविपाका वस्पस्त सुन्दर वर्णन किया है । इस प्रत्यके या प्रकरण , वीर हरेक प्रकरणमें कई अम्पाय है। योगवासिष्ठके बनेक मस्करण प्रकाशित ए| मी एक सोषित संस्करण निर्णयसागरसे प्रकाधित हो या है। इसक हिनी गुबपती बार में भी वनुवार हुए हैं। मनीमें एक विवपूर्ण म्पासा माननीय प्रो० मिक्सममा बाप एम० ए०, गै० छिट्ने मिली है। पोगवासिष्ठको रचनाके समयके विषयमें किसानोंमें बहुत मतमे है। प्रो० बाय इस मथको रथमा समप सभी सन्छ छठी शतारि मानते हैं। रामनगीने योगमासिएका सूप मनन वोर निविष्यासम किया पाकिसते है-- उपाधिका पर शमन करनेक लिये पर भीतर चंदन है। इसके पाते ए भाषि-म्पाधिका बागमम समय महीं। पपदयाने बनेक स्पठोपर योगवासिष्ठको भैरम्प मोर उपशमय कारण बताकर उसे पुन पुन पानेका मुमुभुओंको अनुरोध किया है। योगवासिष्ठ के पराम्प और मुममु नामके वारिदा प्रकरण वरण भी प्रचशिताए ।
८. भीमन् पाचन्द्र मुक्कानन्द- ये काठियावारफे गनेगा साधु थे। मुहानन्दनी सं. १८६४ में मौनद पे । होने उस्माता, धर्मास्यान, धर्मामृत तथा बहुतसे फ औरही रचमा की है। रामपन्द्रमाने उरक गौताका एक पर सस्त किया है। पगापुत्र ( देखो प्रस्तुत पंप, माक्माबोध पृ ११२) मोइसनर- मोहमार स्वामी शकराधार्यका बनाया मा है। या पराम्पका बापुचम प्रन्य है। इसमें मोहके स्वरूप बोर नामसाधनके महुतसे उत्तम मे मताये है। यह प्रप देवधर्मसमा पर्माको बोरसे गुरराती टीकासहित सन् १८०४ में प्रकाशिव हमारे । रामचन्द्रगौने इस प्रपसे कार एक वरण उसत किया है। इसका प्रपम भोक निम प्रकार है- मूह हरि घमागमता कुरु तनुबुदे मनसि निता । पहमसे निनकर्मोपात्त विच न मिनोदय विचम् ।। - तु ! पमप्राशिको सृष्णाको छोड़ो कम बुनिमाले ! ममको सृष्णाररित कर । तपा मो धन अपने कर्मानुसार मिने, उससे पित्तो प्रस्न रह । मौसमार्गम- मोक्षमार्गप्रका के रमपिता टोडरमयी है। ए० टोडरममनी माधुनिक कामे Pगम्बर निशानों में बहुत बछे निशान हो गये हैं । सय मम सत् १९०५ के गमग जयपुर पुमा पा। ५० टोरमसनी चैनसितके एक गत मार्मिक परित गिने जाते है। सोने मैमिचन्द्र सिचवताक प्रसिद पप गोम्मटसार, थिसार, पपणम्सार पौर किलोकसरपर विस्त हिन्दी पनिका किसी है। इसके अतिरिक माने बात्मानुशासन पुस्पासिमिठपाप बादि प्रपोपर मी वपन दिया है। मोसमार्गप्रकार टोडरमनीका सतत प्रय। पामरा है। इसका शेचा भाग हमारी गौतमप्रसादनाने विसकर पूर्ण किया है। इस अपमें टोडरमायने नपर्मी प्राचीनता, क्म्य मोका न, मोशमाका मरूप बादि विपाँच पात सरस माषा वर्मन किया है। ५० टोडरमती निगमर वैन बिशनों हरिम्प समझे जाते है। टोडरमनी १५-१५ की बम्पासे ही अपरचना करने मे पे। पं. टोरमम्मीने सेताम्बरोदारा मान्य परीमान शिनागममा निषेप किया है। इस विषय गमरवरी भिसते है- मोश्चमार्गप्रकाश सेवामा समापदाय माम्प रर्तमान शिनगमका जो निपट रिपार निषेप पोम्प ! पपपि पर्तमान भागममें अमुक स्थठ मरिक संशाप है, परन्तु सपसी रिसे देरानेपर उसमनिरामण से बात है। मयि उपसम-रिसे उन भागो मागेका कामे सराप करना उरिव मही। पासमासा (देगो प्रस्तुत प्रेप १ १.५). पारिजप- पोरियप पोतमा परपरामें अपने समपके एक महान् प्रतिभाशाली प्रगर RP हो गये हैं। इन रचनायें रामात प्रान गुममा भर मिली चा मागों मिमी रे। त्यशिशिरोमणि । "
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८२ भीमद् पत्र योगमास (देसो हेमचन्द्र) रानेमि-रामीमवी- गनमि पपा बरिनेमि समुत्रवियप रागाके पुत्र पे। उन विवाह समसेनको पुत्री रानी- मतासे माना मिचित हुवा था । एनेमिने ना माने गाजेके साप वपने सम्पुर-गृहको प्रस्पान किया, तो गस्तेमें गाते हुए उन्होंने बख्से घि हुए पठ पचियों का माक्दन मुना । सारपासे पूग्नेपर उनें मारम एवा किये पशु वायतके अतिपियों किये पर करने के लिये एकत्रित किये गये है। इसपर भेमिनापको मात परम्प को माया, मौर उननि उसी समय दीक्षा धारण करनेका निश्चय किया। उपर सब मामतीके पास मेमिनाय दीक्षाका समाचार पहुंचा तो या मर्पत म्याग, वीर उस्ने मी नेमिनापकी अनुगामिनी हो मानेका निश्चय किया। दोनों दीमा भरण र रिनार पर्वतपर तपाचरण करने गे। एक बारको पात है, मेमिनापने रामीमतीने नग्न अवस्था देसा, और उनका मन गंवायोत हो गया । इस समय रानीमवीमे वयत मार्मिक बोष देकर मेमिनापको शिरसे स्पममें स किया। पर कया उत्तरप्पपनके २२ में रपनेमाप वप्पफ्नमें बात है। रानीमती पैसा सम्प प्राप्त होमो।"-माम राना '१२९ रामदास- स्वामी समर्थ राम बम बोरगाबाद विमें सन् १९०८ में वा पा । समर्थ रामास पहिसे हो पा वीर वासुदि थे। अब ये बाया पकाए तब इनके बिमाइकी बातचीत हाने म्गी । इस सरको सुनकर रामास माग गये पौर पात दिनोंतक छिपे थे। मोटी मास्पा 0 रामदासमान कोर तपस्पा की। बा में पे देशाटनके लिये निकले और काशी प्रयाग, पानाप, रामेबर बादि वर्पित्यानी यात्रा की । शिवानी रामदास माना फरम गुरु मानते थे, और इनके उपस वौर प्रेरणासे हो सब काम करते थे।सन् १६८ में जब शिवाको पपुई तो पमहासको बहुत दुसमा । श्रीसमर्प फेबऊ यात बरे बिछन् गौर महामा दोनये, परम् पे रानीति, कति और बछे अनुमणी मी थे । उनको विविध विपोभा यात समय बान पा । उनमे बाक्से पंप मनापे है। उनमें दासबोध मुस्म है। या प्रत्य मुस्पत भयामसपी है, पर इसमें म्पापारिक गायोंका मी गात मुन्दर दर्शन कराया गया है। इसमें पिघमानाने सपर सून मार दिया है। मूह प्रत्य मरायी है । इसके हिन्दी गुनरावी अनुवाद मी हो गये हैं। रामानुग--- रामानुस भाचार्य प्रौसम्प्रदापके वाचार्य माने पाते हैं। इनका जन्म इसी सन् १०१. में कार्णको एक मणके पर हवा या। समानुमने १६ वर्षी बास्पामें दोबारों के काम पर किये । इस समय रामानुग्न निमारकर दिया गया । रामानुमने म्पारण, म्याप, यात वादि सिपा- मोम पुषता प्राप्त की थी। इन साप समात गार पा सपिये होंने उसे उसके पिता म पाँचाकर सप संपास पारण कर दिया। रामानु सामाने गाव दूर दूरत देशों की यात्रा की पीने मरतके प्रधान पार्यम्पानोंमें अपने मठ स्थापित किये और भन्मिार्गका प्रचार प्रसा। फ्मानुस मशियायके संस्थापक मामे गाहोंने देशवसूत्रोंपर प्रौभाग्य, दन्तप्रदीप, बेदान- ।
परिधिए(१) सार, गोवामाप्य मादि मन्पोंकी रचना की है। रामानुनने बहुतसे शावार्थ मी किये । नाने १२० वर्षकी बलस्थामें देहसाग किया। बफ्नससपती- यह स्मशती स्लप रामचन्द्रनामे मिली। इसमें साससौ बचनोंका समा है। पर सपा हेमचन्द्र टोकरशी मेहताको श्रीमद् रामचन' की पाँचवीं गुजराती भारतिके प्रथम भागके ८३ पृष्टपर दिया गया है। स्वयम्द्रनामे पचनसप्तशतीको पुन पुनः स्मरण रसने के लिये सिसा है। बनसामी (प्रस्तुत प्रप, माक्नावोन पृ ११९ ) बलम- मनभाचार्य पुटिमार्ग (पुशत) के प्रविष्वा एक मछन् बाचार्य हो गये हैं। इनका भन्म संवत् १५२५ में षा पा । होंने वनेक दिग्गज विवानोंको शामार्षमें माता और वाचार्य पदमी प्राप्त की । बहमने रामेश्वर वादि समस्त सौकी यात्रा की यो। दोंने सं० १५५६ में सबमें मी- मापनीको मुनिको स्थापना की । यह मूर्ति मब मेपारमें है, और इसके सिमे मोगमें छारो रुपया वार्षिक म्यय होता है । मारतवर्पक प्राप सभी तीर्प और देवस्थानोंमें पाठमाचार्यको बैठके है । बह- मामामे भागवतपर सबोधिनी टीका, मामसूत्रपर वणुमाम्प, गीवापर टीका तया बन्य प्रन्पोंकी रचना को है। मत समप बलमाचार्य काशीमें वा गये थे, वौर ये सबत् १५८७ में मगपत्पामको पधारे । समसम्प्रदायके अनुपापी विशेषकर गुजरात, मारमाल, मयुरा चौर सदावनमें पापे धाते है। पशिष्ठ (देसो योगवासिष्ठ) बामदेव- पामदेव एक वैदिक ऋपि हो गये हैं। ये अम्मेदके पीपे मण्डलके वधिवंय सूतके प्रय थे। ये वैदिक परम्परामें एक रात बरे तत्त्वानी माने जाते हैं। इनका वर्णन उपनिषदोंमें जाता है। पास्मीकि- पास्मीकि अपि वारिकाम्य रामायणके कर्ता है। बाम्मीकिले २१ हजार मोफोमें रामापणको रचना की है। कहा जाता है किलोंने उत्तरकाणमें जो कुछ टिस दिया पा उसके अनुसार रामचन्द्रमाने सब काम किये । मम्मीकि रामा बनकसे माईका नाता मामते पे, और गमा दशरयसे भी उनकी मित्रता पी। बात्माकिनीने समस्त रामापणको रामचन्द्रमाको समे तीस दिनमें गाफर सनई पी। बामकि पिके समझानेपर ) रामचन्द्रमाने का और कुश्श नामके अपने पुत्रोंको अंगीकार किया या । पाश्मीकि अथिको मग्मभूमि प्रयागके पास बताई जाती है। इनके वाममके निकट बनेक मुनि अपने बार बोसहित पर्णशाग बनाकर रते थे। एमापण संमतका बहुत सुन्दर काम्प माना गावा। विक्टोरिया- एमी विक्टोरिया नन्म सन् १८१९ में एक मास केन्टकी पत्नी मेरी मात्रा गर्भसे हमा पा । विक्टोरियाको बारमसे हो उन शिक्षा दी गई थी। सन् १८१० में विक्टोरियाने मिन्स एपर्टस शादी। लिस्टोरियाने बहुत दिनोतक गम्प किया। उन्हें धन, प्रभुता, साग, भीमन् पसन्म MIS सन् १८७७ में विक्टोरियाको मसीन्द PORNमिसकी प्रेरणासे मी रफरिनने मारतमें जमाने मोरारकाले १७१८० पौन वार्षिक मेवन मिस्ता पा। मास्मथा कि पानी परमसन् १९१ में रहताया। Arvwwयाप माना जाता है। इसकेका निश्चम्पासा पम सागामाया था। मिश्चमवासनाने बात सम्पतक काशीर्म पर रासरी कामे प्रपमें दायुनीको गुरस्मसे स्मरण करते हैं।ताने पौर mwwनिरनिरपदाम्बीकी असाधारण विचासे मुग्ध होकर दीक 1 मकर रस्सा और सनका मत बदर सकार किया था। रामाती जैसा सम ARMIR महासद्धि प्रसिद प्रत्याशा गाता किसने संवमें स्थामा समricामा समन गुरुचर' में कामी विधमान पतापापाता aurNTी और चपसातच मी कोई प्रय बनाया है। नत्र या १९५ मईपी।समें वास्तको मुम्स मुन्स प्रक्रिपामोल पात At परम्प दिम्दाम है। इसके गुजराती, पंगाम अंग्रेजी रामदासनीने PAVार। निश्चदासबी ७० वर्षको यस्पा किम समाधिस्पर) wwn से एसपनीमे मुमाबोंने वनेक स्पर्गेपर अनुरोध किया है। (मायास) को मार माधि माने भागिर पोवामी, शिस्त और परं । पान मया मफ्ना मत्री अमापा । पे महामारतके पुरमें पाया / पनि पठणको मति मनाई और उन्होंके साथ बनने पो गये, और दलत वर्णन महामारक्षम वाताई। IAतम पुरसे सो सके।"-भीमद पवाब' ५. सपनामांके समयके विषपमें फू निश्चित पता नहीं चलता । विशनोपबनुमान है कि योगशान (देसो मित्र रानमिसागौमती- यनेमि अपना मासे ऐमा निता तो राममें गाते हुए ट मेमिनाथको पात रार उमर मर गीमतीले उसने भी मैमिमापक पर्वतपर तपश्चरण मौर उनका मन । फिरसे स्पममें 1 रामदास- पहिस ही पर पगी। इस पर रामेपर बादि। उपेश और और बछेब बना है। पुस्प नितुरके बतुसार ऐसा मात्र मी मूकप म रामान- से १९९१ क बीचमें सामान थे। विचारण्यस्मामाने भेटी समस्या प्रमास न देणेव म्यच, तपप गादि प्रमणमयोंके भाष्य, उपनिषदों को टीका गोता, 1 रिलिप पचनी मावि ममेक महत्वपूर्ण प्रपोंकी रचना की है। विभारम्प- महान् पण्डित थे । शनि मौतमतका मामा प्रकारको इणि प्रषियोस धन्दर पर पत्न पारे। and J - 1 पे। इस बाम निए परिशिः (१) पारचन्द गांधी- पौरपद गोपीका जन्म काठियावामें सन् १८६१ में पूषा पास होने भारमारामनी सरिके पास नतत्यानका अध्ययन किया वोर विकागो, सन् १८९१ में मरनेवाण विसमर्म परिपर्दो जैनधर्मक प्रतिनिधि होकर भाग लिया था। वीरचद गांधीको उक्त परिषदमें नो सफलता मिल्म, उसकी वमेरिकन पनि मी प्रशसा की थी । पौरपद गांवीको कहाँ सर्णपदक मी मिसे थे। अमेरि कासे छोटकर बीरचद गांधीने इगसमें भी पनपर्मपर म्यानपान दिये । पादमें भी पीरपद गांधी दो मार अमेरिका गये । नान बमेमी भाषा बैन फिलासफी बादि पुस्तकें भी मिली है। पीरबन्द सन् १९०१ में स्वर्गस्य हए । पौरपद गांधीको निहायत मेमनेका कुछ लोगों ने मिरोग किया था | उसके सपधर्म राजचन्द्रमा मिसते है--"धक बहाने बनार्य देशमें आमे अपमा सूत्र बादि मेयनेका मिपेप करनेवाले–मगारा पाकर निपेष करनेवाले यहाँ अपने मान पाईका सपास पाता है, वर्षों इसी धर्मको ठोकर मारकर, इसी धर्मपर पैर रसकर इसी निषेधका निषेप करते हैं, मह धर्मदाह होरे । उनै धर्मका महत्व तो केवल हानेरूप है, और सार्यर्सवपी मान वारिका सवाल ही मुख्य समार। पौरपद गाँधीको विलायत मेजने वादिफे विषयमें ऐसा का है। पैराग्यशतक ( देसो भहरि ) म्पासदम्पास- म्यास महर्पिक नामसे प्रसिद्ध है। ये पेदविषामें पारंगत थे, इसठिये इन्हें दम्पास भी कहा मापनका दूसरा माम बावरापण मी है। ये हीरणोपायनफे मामसे मी करे बावे है। प्यासनीने पारों वेदोंका समर करके उनें भेणीवर किया था। म्पसगी यो मायै नमानी, इतिहासकार, सूत्रकार, भाष्यकार और पतिकार माने नावे है। इनके चैमिनी मैशम्पायन वादि २५००० शिष्य थे। महाभारत, भागवत, गीता, मौर भातसूत्र तो म्यास पिके रपे हुए माने गाते है । म्पास हपिका माम हिन्दुपयोंमें बात बधिक सन्मानके साय लिया चाता है। करापार्य- शकराचार्य बरतमतके स्पापफ महान् भाचार्य थे। इनका भन्म केरक प्रदेशमें एक प्रामणके मावा पा सकरापार्यमे पाठ वर्षको अवस्थामें स्म्यास पारण किया, और ये मादि निपामोंका बग्यपन किया। मानाचापम बोबो शभापोंमें विजय प्रानकर सनातन धर्मको चारों चोर गया । शंकाराचार्यले बपने मतके प्रचारके म्पि मारतवर्षको चारों दिशाओमें चार बरे वो मठ स्थापित किये थे । शंकराचार्यने समसूत्र, दस उपनिषतोपर भाप्प, गौतामाप्य वादि प्रप किसे है। इसके अतिरिय शंकराचार्यको विवेक प्रगमणि मोहमगर बादि अनेक हतियों भी बहुत प्रसिख हैं। मो के. पी. पाटकके मतानुसार पराभार्य इसवी सन् ८ मी दाम हुए है। शकराचार्य २२ वर्षध पस्या समाधिस्थ हुए। कराचार्यीको रामचन्द्रयाने महारमा करकर समोधन किया है। पावसपारस- पातमपारसके का निपतिनपी, हारपियय सरिक चिप्प कालिपिम्पके शिष्य थे। दिन- मियपनी संतापरवानापमें एक प्रतिभाशाली बिशन गिने जाते है। मिनिममीने मस्ति और - ।
Ch भीमद् पयवद्र , . स्तति, स्वास्थ्य बादि स्व कुछ प्राप्त पा । ईसवी सन् १८७० में विक्टोरियाको रोमिन्द (Empreon of India) का सिताब मिम । नको प्रेरणासे ग रफरिनने भारतमें जमाने मस्पताल सोडे थे । विक्टोरियाको इंगम राबकोशसे १७१८०. पैर वार्षिक वेतन मिलता था। विक्टोरियाका बसजिम बानेके कारण सन् १९ १ में देहान्त हुमा । विषारसागर- विचारसागर मेदान्तशाबका प्रवेशाप माना जाता है। इसके का निश्चम्बासका कम पबाबमें स १८१९ में बाट भातिमें जमा था। निरपासनाने गत समपतक काशी एकर विचाम्पास किया । निरपरदासगी अपमे प्रथमें दादुमाको गुरुहम्मे स्मरण करते हैं।होंने और मुरदासीन दाहुपयको पात पति की । निरपदासदाको बसाधारण विश्चासे मुग्ध होकर सार रागा रामसिमे उनें वपने पास मुगाकर रक्सा और उनका बहुत बार सत्कार किया था। विचारसागर बार तिप्रभाकर मिश्वम्यासांके प्रसिद्ध प्रपोसा माता है कि सोने सम्भातमें ईशावास्प उपनिषत्पर भी टीम किसी रे, भौर कशावक मी को प्रप नापा है। इनका सहस्तके २७ अक्ष भोकोंका किया एमा समय इनके गुस्वार में मत्र मी विधमान बताया माता है। विचरसागरको रचना सवत् १९ ५ में ईपी। इसमें वेदान्तको मुम्स मुफ्स प्रक्रिया का बात सरमवापूर्वक प्रतिपादन किया है। यह मान्य हिन्दीमें है। इसके गुप्ता, गाडी, बादि मापायोंमें भी बनुमाए । निरपण्यासगी ७ वर्षको स्पा, निमें समाधिस्थ हए। मिपारसनगरके मनन करनेके लिये रामचन्द्रगाने मुमुमोको मनेक स्पयेपर अनुरोप किया है। विचारमासा (देखो बनायास) गिर- विवर एक बात पर भारी मीधि माने बा । विदुर यो बानी निरान् और चतुर पे। महापम पाए तपा प्रत्यड्ने क्रमशः नें मपमा मत्री बनाया । ये महामारतके पुरमें पलों की बोरसे मे। बत नोने पतराको मन्ति सुनाई, वौर उन्होंके साप नको परे गये और माँ वमिमें चम मरे । नका विस्तृत वर्णन महामारत माता है। सत्पुरुप विदुरके को बनुसार ऐसा एल्प करना कि एतमें पुमसे सो सके। —'भीम रामचन्द्र' पृ ५ रिपारम्पस्सामी- निवारण्मस्थामा समयके विषयमें निश्चित पता नहीं पता । विशनों वनुमान है कि सन् ११ से १३९१ केबमें विद्यमान थे।रिपारण्पस्थामा भेटी गवस्था ही सपास मिपा पा । ने पेशे माप्प, शपथ मादि सफा पाने माष्प उपनिकाको टीका, ममता, सर्वदर्शना शकरदिम्बिय पदणी मावि बमेक महत्वपूर्ण प्रपोच रचना की है। विधारणप- सामी सर्व शा मान् पणित थे । होम वीतमा नाना प्रकार पुतिमपुसिमोसे सदर प्रतिपान किया है। विहार न्दाबन- एका मन्त्रीने एक पर उपत किया है । इसके लिपपमें मधेप बात नही सका। ।
नवरस्पाम समाधिस्थ हुए। शंकराचार्यगीको गरीने महारमा करकर सबोपन फिया है। पदोहोरे। धर्मका महाल तो केवल महामेरुप है, और सार्थसंबधी मान वारिका म्यानच दूसरा माम बादरायण मीहै। येही हप्तापायनके नामसे मी कडे जावे । से बाते।म्पास पित नाम हिनुमत्पमि बहुत अधिक सन्मानके साप दिया जाता है। पक्न किया। शंकराचार्यन बगो शासापोंमें वियप प्रासकर सनातन धर्मको चारों वोर पपा । शंकाराचार्पन अपने मतके प्रचारके लिये मारतवर्षको चारों दिशाम चार बोबो मा -पस्ति किये पेशकण्यापन नमसूत्र, दस उपनिपोपर माप्य गीताभाष्य वादि प्रप सिमे। के अतिरिक शंकराचार्यकी विभागमणि मोहमदर बादि अनेक पवियाँ भी बहुत प्रसिद्ध है। नी.के बी. पाठकके मवानुसार शंकराचार्य स्त्री सन् ८ सदाम ए शंकराचार्य ३२ सपना वापर बाम्नापमें एक प्रतिमाशाठी महान् गिने हो। मिनपपिनपनीने भक्ति और स्वमुपारसके निपत्रिपना, हारपिवय सरिके शिम्प काचिपिम्पके शिप्प पे । विनय- परिशिप (1) रचन्द गोपी- परिक गोपीका बम्म काठियावाइमें सन् १८६१ में पुमा पा । इन्होंने वारमारामगी सूरिके मानतत्यानका अध्ययन किया वोर विकागोमें सन् १८९२ में मरनेवाची स्विमर्म परिपर्दो नवर्मक प्रतिनिधि होकर भाग लिया था। पौरपद गांधीको उक परिपमें जो सफलता मिली, सबमेरिकन पत्रोने भी प्रशसा की थी। बीरपद गांधीको वहाँ स्वर्णपदक मी मिले थे । अमेरि से औटमर वीरपद गांधीने में मी बैनधर्मपर पाल्पान गये । यादमें मी पौरपद गांधी पर वमेरिघ गये । सोने वप्रेमी भाषामें मैन मिासको बादि पुस्तके मी लिसी है। पीरचन्द २ १९०१ में स्वर्गस्य हुए। पौरपर गांवीको विकायत भेजनेका कुछ ओर्गाने विरोव किपा । उसके सवधर्मे रामचन्द्रनी मिलते हैं-"पर्मक यहाने अनार्य देशमें गाने वपना सूत्र मादि व निषध करनेवाले–मगारावर निषेध करनेवाले यहाँ अपने मान बहाईका सवाल ध, को इसी धर्मको ठोकर मारकर, इसी धर्मपर पैर रसकर इसी निपेषका निषेध करते हैं, ही मुस्य समान है। पौरपद गावीको विडायस भेजने वादिके विषयमें ऐसा होना है।" प्पास वार्पिके नामसे प्रसिद्ध है। मे पेदभिषामें पारगत पे, इसतिपे से बेदम्यास मी कहा माने भारी वेदोका संसा करके में भेजावर किया था। म्यासमी को मारी प्रमज्ञानी, आमकार, स्त्रकार, माप्यकार बार स्मृतिकार मामे गाते हैं। इसके जैमिनी वैशम्पायन बार शिष्य पे । महामारत, मागवत, गीता, भौर क्वान्तसूत्र इही म्पास पिके रपेहए शकराचार्य वरतमत के स्पापक महान् बाचार्य थे। इनका कम केरठ प्रशमें एक प्रामणके माया । शकरापाने वाट वर्षकी अवस्था में सम्पास पारण किया, पौर के मावि विपाचौंका सम्पमतक (देसो महरि) पस-पदम्पास- ५. रापार्य- न बातमुपारस- मीमा पचन्द्र पैराम्पका पात मुन्दर वर्णन किया है। दिनपरिमयीने शासनुषारसको संपत् १७२३ में लिखा है। इसके अतिरिक बापने मेकप्रकाश, नमणिन, कल्पसूत्रय टोत्र, सोपा टोकासहित हेमरभुप्रक्रिया वादि अनेक प्रयों की रचना की है। दिनपविश्यमाने भोपामायाका एस मी गुमरावामें मिसा।। पर राम गुबराती माषाका एक पुरर काम्पाप माना जाता है। लिमपविभप इस एसको वपूर्ण हो छोरे गये, और बादमें पोनिनयमाने इसे पूर्ण किपा । रामचन्द्रमाने मापासाससे कुछ पद उदृत किये ।। पचम्बनीने तमुपारसके मनन करमेका कई जगह मुमुमुमोको अनुरोध किया है। इसका मौयुत् मनमुराम करवपदारा किया वा गुजराती मोचन बमी डॉ० भगनास मनमुसामने प्रकाशित किया है। पाविनाप- तिनाप भगवान् ब्रोंके १५ में तार्यकर माने जाते हैं। पूर्वमपमें मेघरप राबाके गौर पे । एजार मेघरप पौपन कर ए थे। इनमें उनकी गोद में एक कबूतर पाकर गिरा। उन्होंने उस निरपराप पसीको मासान रिया । इतने में यहाँ एक पान वापा, और उसमे मेपरपसे सपना कबूतर पापिस माँगा । रामामे पानको पात उपदेश दिया, पर या न माना । बन्त मेपरप राना स्वर जितना अपने शरीरका माँस देनेको हैप्पार हो गये । कोटा मगाया गया । मेपरप बम माँस काट काट कर तम्म रसने लो, परन्तु कबूतर मननमें माता गया । यह देखकर यहाँ उपस्पित सामंत रोगोंमें हाकार मच गया। इतने में एक देश प्रगट मा और उसने कहा, महापब में इस दोनों पक्षियोंमें अविष्टिय होकर भापकी परीक्षाके किये वापा पा । मेप पराम पमा फरें । ये । मेपरप एना बागे गाकर तिनाप इए । या या विषशिवाकापुरमचरित ५३ पकि ऐ सममि बात है। पाविसकाप- ममा गाता है कि रानकारीके समप स्पानकमासियोंकी बोरसे शालिमकाध नामका कोई पा निकम्ता पा। सासिमन (देचे पनामम) पिसरपरि- रामचन्द्रगने प्रस्तुत प्रपौ १ ७७२ पर बैमपति शिवरहरि नाचार्यका रस किया है, मिनि मगमग दो हजार पर्ष पहिले यो क्षत्रियदि साप मिम दिया था। परन्तु बायसे दोबार बर्ष पहिले शिवरस्मि नामके किसी बाचाक होनेका उस पानेमें नए मापा ।, एनप्रमापा मामके तो एक माचो गये। शिक्षापप--- परम्प सम्प्रदापमें अर्पत प्रमिस प्रत्प, ११ पत्री, मोहरिरापाने सपने घुमाता गोपेश्वरवीको सतहमें किस पे। हरिएपमा रेणपसम्प्रदायमें पात बजे महात्मा हो गपे ।म पफ्ना समस्त पौषम उपदेश और मगरसेवामें गापा पा। पे महास्मा सदा 0 मुसाफिरी करते थे और कभी किसी गांव या शहरवे मावर मुकाम भरणे परिशिए (१) 40 पे। सदा मगप्रतिकार भगवविचारमें ही गन इसे थे। गोपेसरजीने इस प्रन्यकी टीका की है। पा प्रप पुष्टिमार्ग मपावर्णमें सन् १९०७ में पड़ोदासे प्रकाशित हवा है। पीसांकसरि- शीमकरि सेसापर सम्प्रदायमें एक बछे प्रौर मिशन हो गये है। इनाने सं०९२५ में दश हगार लोकप्रमाण प्राकमें महापुरुपचरिय नामका प्रप बनाया है। शीमकप्रिने बाघारंग वार सूत्र- यंग सूत्रों के उपर सस्कतात्तिकी रचमा की है। इसके वतिरिक, कहा नासा है कि शौकिरिने वाकांके नौ सूत्रोपर मी टौका मिसी पी। ये विभिन्न हो गई, और बादमें वमपदेवरिने इम सूत्रोंकी नीन टीकाये किलो । शीर्मक आचार्यन लौर भी बनेफ बनायें की है। शेताम्बर विश मोंने शीर्षक भाचार्यका गुररानके गुरु और चारों विपाओंका सर्मनकार उसार कवि कहकर उस किया है। शुकदे- मुकदेवी वेदव्यासबीके पुत्र थे । ये बाम्यावस्थामें ही सम्पासी हो गये थे। इन्होंने वेद-वेदांग, पविदास, योग वाविका सूब वम्यास किया पानाने रामा ननकके पास जाकर मोक्षप्राभिकी सापना सीसी, और बादमें जाकर हिमालय पर्वतपर कठोर तपस्या की । पुरेपनी बहुत परेशान योगी माने जाते हैं। दोंने रागा पीक्षितको शाफ्काम भागवतकी कथा सुनाकर उपदेश दिया पा। इफदेवनी बीवन्मुक्त भौर पिरजांनी महापुरुप माने बाते हैं। भीपापरास (देसो विनयविनय वीर पशोविनय ) भमिक- मेणिक पमा नैन साहित्पमें बहुत सुप्रसिद्ध है। इन्होंने मैनधर्मको प्रभावना के लिये पास कुछ किया है। इनके अनेक चरित मावि दिगम्बर और सेताम्वर विशोमे लिये है । एक श्रेणिकचरित मामका महाकम्प मेताम्बर विवान् निमप्रभत्रिने लिखा है। इसका गुजराती अनुवाद गर्म मिपाप्रसारक वर्ग पारिताणासे सम् १९०५ में प्रकाशित हुआ है। परवर्मनप्समुचप (देशो हरिभद्रसूरि ) सम्मविवई (देसो सिदन)- सनस्कमार (देडो मोक्षमाठा पाठ ७०-७१) समपसार (देणे कुन्दपुद और पनारसीस) सपरापांम (भागमम्रप)-सका रामचम्बगीने प्रस्तुत प्रयमें उस किया है। समन्दमन- सामी समंतभदका माम दिगमर सम्प्रदायमें बात मासका है । मैमे सिरसेन घेतामा सम्प्र- आपमें, पैसे हो समसमा गियर स्प्रापमें मारितिकार ने जाते है । समतमदने बातमीमांसा (देवागमस्तोत्र ), एनकरण्डभावकाचार, गृहातपमम्वोत्र मादि महासपूर्ण प्रन्योंकी रचना की। सरसेन भोर समतमदको पतिपोंमें कुछ सोफ समानापसे माँ पाये जाते हैं। प्राप ममतमः मनसेन समकान माने जाते हैं। सर्मतमरि जाने समपझे एक प्रमड फि थे । इन्होंने मायसी- रिसा फरक नपर्मको धमापताका फहराई पी। ये परीक्षापपानी थे। MARो मतभपका माम अमृत महमके साप लिया जाता है। रामचद्राने MANTRधोपन पिसा है, और उसके मापातर करमेका किसी मुमुसुको मनुष Keticा हरिरामदाभाम्प टीका विषयमें देसो पृ ८०० का फरना। IRATIOस्थापक सामानंद स्वामी अपने समयके महान पुम्पोंमें गिने गाते है। गाnt 10८१ मे एका पा, श्वान सन् १८५० दोस्याग किया। इनके गुरुका माम स्वामी CARTOON तफ गुमरस्त, भठियावार और काम पृम घूमकर दि-मारिदु समस्त PlantN एनाया । वान पिचारिक उपर सबसे बपिङ्ग मार दिपा, और छोगों मागमचर्यका पारुन, याम साका निपेष, त सयमका पान स्यादि र गुमापिर पड़ाया। सपनानन्द सामीकी शिक्षापत्री, धर्मपत और ParkhARA। इनमें शिधापत्री बरिक प्रसिप है। शिक्षापभीम २१२ मोक भोपाल सप, PNषा, प्रमचारी, साधु भारिक कम्पधर्म बाविका विचम किया है। वरनाय संप्रदाय के सपर किशोरावा मशरूपाळाने गुबस्तीम पुस्तक मिले। समापममूवफा समय गुजराती मापन एक न माना पाता।सामानन्द AMERIमर सेताम्बर वाम्मापमें प्रमाणशाबके प्रतियता एक महान् बाचार्य हो गये। सर मासके उप टिके सत्ता प्रातिके माचार्य पनि उपयोगवाद, मार BREA अमभर्मको पचलित माम्पतास भिमापसे ही स्थापित किया था। सिवन पत्र KM गी बात सम्मानको परिसे देखे जाते हैं। सिरसेनमे सम्मतितक, पापा पतरूप निकात्रिविध बादि प्रोकी रचना कर मैमसाहित्यको महान् सेवा चिर1RRURANकामे पहोंने मेद, शेरिख, सांस्य बादि दर्शनोपर निशिफापे रचकर सब MANया।सियसेन दिवाकरके संबंध बनी सिदन्तिपी प्रसिधाका समय विना ताम्दि माना जाता है । सम्मतितर्फ म्यापक यात उत्तम प्रप। सपर वर्षपdिो।सअपका शिशचापूर्ण सम्पादन प र वौर पेचरदासपीये सिया (सो मोधमाम पाठ १) भीमदासवान वापीठसे निकला है। रामचन्द्रनाने सम्मतितका पोकन किपा था। - द मे स THI हिसाप के विपद्य पं. टेकचन्दनौ दिगम्बर विशन हो गपे। एनिस १८१८ में भत्र सपने मुको मिसन स्माल किया था। पाणितगिणा ४२ प, मिममें मपनि मिरातको ऐ गये। भागमे यात की तय समठाया गया है। इस प्रपो पौर स २१५० में मा ममें प्रकाशित किया है। ।
परिशिए (१) - संगम- सगम देवताने चो महावीरस्वामीको परिपह पिये, उनका वर्णन हेमसम्मके विपटिशलाका- पुरुषचरित (१०मा पर्य) वादि क्योंमें बाता है। मदरदास- मरदास गातिके पनिये थे । इनका जन्म स० १६५३ में जयपुर राम्पमें जा था। एफ सम्य पदयाउ इनके गाँवमें पधारे । प उनके शिप्प हो गप पर उनकी साप रहन प्यो। मासमी उमीस बरस काशीमें रहकर सम्मत, वेतन, पुराग भारिका अप्पपन करते रहे। मुरलसीका स्वमार बहुत मधुर वार भाकपस पा । बाउफोंसे ये बहुत प्रेम फरसे ५। ये बामनचारी थे । समताको ये बहुत पस' करते । सरासमीकी फरिवाफा हिंी साहित्यमें मत म्मान है। इनकी कवितासे प्रकर हावा है कि ये अप्ठ हानी आर पाप-पासाके मर्मज्ञ थे। होने वेतपर मछी कविता की है। हॉने पुरविलास, मुटर बरक, ज्ञानविठाम भारि सब मिलाकर १० प्रयोंकी रचना की है। मुमपासपीने सं० १७१६ में मांगानेरमें शारीर-स्याग किरा । रामजन्दगीने पुसासजीके पप उस्त किये हैं। रामचन्द्रवी उनझे पपमें टिगते हैं- " भौमबार मुदणाम बाट साधुजन आमाथी गिने गान योग्य है, और शुभेच्छारा उपरफ ममिफाओंमें उनकी स्थिति साना सम"। संदरी ( मोसमाग पाठ १७) मुम्म ( माशमाछा पाट २५) मुपगररंग (आगमनप)-सफा राजपत्रमान पर जगह उष्टेग रिया | परिमा- हरिमासूरि भताम्बर सन्यायमें उप कोरिके एफ मार्मिक शिरा गये हात मोर प्रातमें वनफ उत्तमाम दानिफ वीर धार्मिक प्रयोगी रपना की इन पर नि समुपपमें दो दर्शनोको निपश समारोपना की है। हरिभदरिफा गादिस्य परत हि पदोंने प्राय रेफ वियपर पु म पुछ गिमा ही है । अनेकता परेन, मनानाग, परम्पारण, TER मार्गसमुपप, पहनिगमुपप, धर्मम्ति धमर्गा पागपिन्द्र योगादिगमुपग, मान, आरतरपनिणप सम्ममासमा, गमागमा आइना मुष्प परिभणी पान गरस और साम्पातिर गिन् परेननर रिपोरा भी पहन समान र स्मरण ने दरिमा नाम न पगमें वनेक मि हो गये है। प्रानुन पारिना कामाय मौसी माय माना गया है। पपीन अगस, मन्दुि धर्म-t, SPIRIT मीद, योगागिरामुगप, और पदानसम्परा मान प्रा में 3 'गिमुपय गरनई गाविधान मी मनाप गुजराती 18| गरम rr. रयर पनिसमुपपय रिमे माता नरा रिमी मुनपुरम अनुसार पद- ऐसचन्द र परम्परा र भाग it RE IPL सम्म भyn ए मर जाति १.७८ में उन पुरमा नाम 1 Puri
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परिशिर (२) परिशिष्ट (२) 'मीमद राजचन्द्र में भाये हुए उद्धरणोंकी वर्णानुक्रमसूची पृष्ठ लाम xमसे (से) पुरुश (ख) एफ बरसो (१)। [ एक सवैया ] १५०-२८ भमाहोतयं (वर्यएव्य) [शतपपलामण ! २७-२२ गपुरे बसम्पमि संसार (र) मि दुरूत (क्स ) पठरार । कि नाम दुप्पतकम्मप (ब फम्म) बेणा दुग्गई (६) नगठेम्पा (म गझिम्मा) [उचराभ्ययन ८-१] ९९-१ अनुक्रमे सपम स्पर्शतोगी पाम्यो क्षायफभाव रे । सयममणी मुकरेगी पून पद निप्पाल रे॥ [सपमश्रेणास्तवन १-२ पडित उचमनिययजी प्रकरणरनाकर भाग २ प ६९९] २७५-१,११ न्य पुरुपको परिमें नग म्पहार मसाय । परापन नब जग मही कौन (को) म्फ्याहार बताप ! [विहार सम्दापन ] १८८-१९ वाम नाम घुनी छगी गगनमें मगन मया मन मेरानी। मासन मारी मुरत दृढपारी दिया बगम पर डेरामी ॥ दरम्पा पम्स देदारानी । [छोटम-वप्यारममननमाछा पद १२१५ १९, कहानी पर्मसिंह बम्बई, १८९७] २२६-१९ बपि वप्पणोनि देहमि नापरति ममार्य । १०२-१८ वार्निश बधिको प्रेम माने जोगानक घटमाहिं (मदि) मगाये। कल्पाहार भासन नपरे नयनयको निद्रा पपरे ॥ [ स्वरोदयवान ९८, २१ विदानन्दगी मामसिंह माणेक बर्च १९२१] १२९-९ यो विणहिसाबरमा विधि (पी) साए (E) ण देसिर्प (या)। मोस (स) साहण्ठस्स सादहस्स पारणा ॥ [दशवकाधिकसूत्र ५-१-९२ प्रो वम्पकरणारा सम्पादित १९५२ ] ७३१-२१ यो नि (णि) तो कम सम्पनिणेहि पनि (णि) ५ । पात्र (प)म्मासमा विधि (चौ) एगमर्च व मोयम ॥ [दशकालिकास्त्र १-२१] ०१५-१ मानतिमिराभाना बानाबनशमकया । मम पुस्प एक है। मम यस्मानाने मन्योतन' पाठ र है। बस पाठ रखना चाहिये । बारमको पास। . CHRY । भीम प्रसाद हेमचन्द्र पाण् विपाभोंके समुद्र पे, वौर ने कश्मिामा भामसे प्रस्मात पे । करा बादाम हेमचन्द्र वाचार्यम सब मिमकर सो वान कोष कोकी रचना की है।हेमचनने मातरम, वर्क, साहित्य, मद, मोग, नीति वादि विविध विषयोंपर पनी मेम्नी पणकर पैन साहित्यके गौरपको बताया है। हेमचन्द्रने गुनयतको रामपानी बणशिपुर पारणमें सिदराब अपरिहको समामें मात सम्मान प्राप्त किया था, वोर सिवरानके वापसे गुजरात के म्येि सियोमशम्दामुशासन मामक माकरणको रथमा को पौ। सिदरानके उपराधिकारी राना कुमारपामशेमचन्द्रको प्रमगुरको तय मानते थे। रामचन्द्रमा मिसते हैं " माहेमचन्द्राचार्य महाप्रमापक बम्माम क्षयोपशमनारे पुरुप थे। ये इतने सामर्पवान् पे कि पाहते तो एक मुदा हो पप पा सकते थे। उनोंमे तीस हजार पणको मापक यनापा । वास हजार पर बर्यात् सबा पारसे से पास मनुप्पोको संख्या है। पौरागमन्दनीके सम्प्रदायमें कुछ एक गाय वामी होगे । अब एक करके समासे सागानदीने अपना सम्प्रदाय बमया तो मोहेमचन्नाचार्य चाहते तो ग म भनुपापियों का एक दा हो समाप चम सकते पे । परन्तु मोहेम चन्द्राधाको भगा कि सम्पूर्ण पोतरा सा ताकर धर्मप्राक हो सकते हैं। हम तो बस उन तीपंकरों की मालासे पपकर उनके परमार्पमार्गको प्रकाश करनेफे लिये प्रफान परमेवाले है। माहेमभद्राचार्पन बावरागमार्गक परमार्थका प्रकाश करनेहप कानुमा किया, 'पसा करने को मारत भी पी। बीतरागमार्गके प्रति निमुसता वीर पम्पमार्गक परफसे त्रिपमता या भागाम हो पुरे पे । ऐसी विषमता गोंको गीतराग मार्गको बोर किराने, मेोपकार करने तथा उस मार्गके रक्षण करनेको उनें बरत मादम हई । हमारा पर भी हो, इस मार्गका रसप्प होना ही चाहिए। इस तर उन्होंने वपने बापको चर्पण कर दिया । परन्तु इस व्य उन जैसे ही कर सकते हैं जैसे माफ्नान महापान, अयोपशमनान हो कर सकते ३ । गुना मुदा दर्शनोंको पपान नोकर नमुक दर्शन सम्पूर्ण सत्यस्वस्मरे, पो ऐसा निथप कर सो, पेसा पुरुष ही मेकानुपा परमार्यप्रकाश वार नामसमर्पण कर सकता है।" मामले रेमसमाके योगशस्तके मगावरण सिंचन मी दिपा है। समसमास-- क्षेमामासो र सेतामर समाप पैनसितके प्रसर निसन् निनमनगणि धमाझमण है। इनन भन्म स ६.५ में इला था। महोंने निशेपावत्यकमाप्य मिशणवा बादि बनेकमालपूर्ण मपोको रचना है। मिनमदगणिक रोप्रामासके उपर मम्पगिरीको टोका। प्रकरमरानाकरमें एनशेमसरित उपुशेम्समास भातर सहित उपा है। जानपरी- हानपर मारामा म सं १९३२ में मापा । इनके पिताने संम्पासी होकर पामें गरस्थानम धारण किया पाबानेपर महाराबने मानापतिमा मामक मण्टामें गीताको माया मिसाद, गोदशिणमें मान उप श्रेणी मामी आती है। पर प्यास्पान गौतहानसे पूर्ण है। ने मारने इस प्रयको १५२ मे मिला है ।समेघरमे अमृतानुमष मामका एक देशका प्रपमा लिा है। सके अतिरिक एबोने पम्प अमेक परममंग भासिनेपरने २१ सभाम्पा तिन पापि सोनेरी गावात हि गुनपनी अपार भी है। - परिशिर (२) - परिशिष्ट (२) भीमद् राजघन्द्र में आये हुए उदरणोंकी षर्णानुक्रमसूची पृष्ठान xक्से (0) पुरुश (स ) एक वरसो (है)। [ एक संवैया ] १५०-२८ स्ववाहोत्तम्प (बर्यष्ठम्यं) [पातपयग्रमण !] २५-१३ वधु वसास्यमि ससार (रं) मि दुस्स (स) पठराए । कि नाम दुपतकम्म्य (ज कम्म) मेणाह दुग्गा (६) नगछेप्या (म गम्मिा) ॥ [उचराप्पपन ८-१] ९९-१ वनुक्रमे सपम स्पर्शतोगी पाम्यो सापकमाव रे । सपममणी समेगी पून पद निपात्र रे ।। [स्पमास्तम्न १२ परित उत्तममिनयनी, प्रकरणग्नाकर मा २४ ६९९]२७५-१,११ कम्प पुरुषको अप्टिमें जग म्पहार साय । पदावन नब नग नहीं कौन (को) म्पबहार बताय । [विहार इन्दावन] १८८-१९ वरस नाम धुनी मी गगममें मगन मया मन मेरागी । मासन मा पुरत स्तधारी दिपा वगम पर रेसमी । दरश्या बछम देदापनी। [छोटम-वप्यारममननमाग पद १५२१ १९, कहानजी धर्मसिंह पमई, १८९७) २२६-१९ पनि गप्पणोषि देइमि नापति ममाइप । १०२-१८ वार्निश वधिको प्रेम गाये जोगानए फरमारि (महि) बगाये । वपाहार बासन ल घरे मपनपको निद्रा पदरे ॥ [स्वरोदयशान ९८, पृ २६ चिदानन्दगी; भीमसिंह माणेक बई १९२४] १२९-९ महो मिदिमागमा पिति (1) साहु (इ) प रेसिपं (या)। मोस (क्स ) साहणजेठस्स सादस्स धारणा ॥ [दशकाछिपसूत्र ५-१-९२ प्रो बम्पकरारा सम्पति १९१२] ७१४-११ बहो नि (गि) व तो कर्म सम्ममिति बमि (ग्गि) ये । चार (य) सानासमा मिति (नौ) एगम च मायण ॥ [दापनिमसूत्र ५-२३] ०१५-१ पानतिमिरम्पान जानबिनमाकया । पृट उपन ४ माप पुस । ममे रामानने 'मसाप' पर रिपोपा रनमा पारिसमा با - R भीमद् पश्चन्द्र पृष्ठमान मेमुग्मि (म्मी) मितं येन तस्मै श्रीगुरवे नम ॥ ७३३-१८ [पर मेक दिगम्बर सेताम्बर दोनों संप्रदायाँके क्योंमें बात है। दिगम्बर मन् मानसेन रिषदेवमे कात्रको टीका इस श्लोकको मगमरमरूपसे Pपा] बागाए पम्मी वागार को [ उपदेशपद-परिमद्रसर ]x२२८-१३ माधममातना मालत गाव जान रे [ # [मुखवा दुवो पाम वाया बनने, बोद निष्काम सकाम रे। वान पो पाठक ठम्या 0] वायु सौने ते मापाम रे n [पौरगारपान करयु ५५ निपुस्मनन्द--कायदोहन २ १ ५९२ २०८-१७ वालय बालदषमतणो मति गम्मार उदर । बाकर पसारीमे ( पसारि बिम) को उदपि विस्तार । (पानदफन चौमासाके मन्तमें शानविमरिका बाप जैनधर्मप्रसारक समा १ १९२ ] ७८०-२२ णमेव निगप्प ( माप) पारयण सर्प मणुचरं विडियं परिपुण (ण) समर पाठयं सतर्ण सिदिममा मुत्तिमा बि (न) मागमा निमाणमा भविठामसंवि) सम्पास्वप (प)ोणमा । एप्पं (4) लिया बीना सिमति कार्य (म) वि मुति परिमिना (म्बा) पति सम्म दुल्ला (ग) गर्मत कर (३) ति । तं () माणाए तदा गममो हाविमो तहा मिसि ( सौ ) यामो बा एपामो ( पाामो ) बा मुंबमोजा मासामोसा बम (म्म ) प्रमो त मार डोमोति पाणार्ण मूयाणे बाजाम सवाणे सम्मेण सममामोदि । [ सूत्रातांग २-.-११ १ १२५-७ वाईवमतप्रमाकर पूना १९२८] ०११-१२ मरेपपिहानेन सत्र समचतसा । मगपाठिमुछेन प्राता मागमती गति ॥ [भागवत ३-२९-१७ म्यास] २०८-१ इनिध परपी मन मिसरामी गिनवर गुण मे गाये रे । निबंधुनी मोर मबरपी भागदपन पर पाये ऐ॥ [बादमधीमासा महिनापमिनस्तवन ११, १ १० ] समाधमो बतर नयी समस्या ते पाम्पा साति। [ मातम ! ] २०९-२० उपमेय ( ठप्पो वा) निम्मेवा (विगमे पा) पुसा (एमा)। [भागम] ८५-२९२. उमस्तसागमोहो मम विषमासिवन (ण) समुगाशे। पाणापमाचारी निबाण पुरै (निम्मापुर ) प्रगति (कमरि) पाये। [पचास्तिकाय. १ १२२ एयरवनशत्रमाग वर्ण, से १९.२] ४५नावमा । + मामला: बा पर ततापमम' मनापी सम्परत परिशिए (२) पृष्ठ छाइन रुपम मिनेयर प्रीतम माहरो , वोर म पारे करत । झियो (रोस्यो ) साहिव संग न पहिरे रे, मग सादि बनत ॥ अपम० । [वानन्दन चौमासी उपभदेवनिमस्तवन १, पृ १] ६१५-१ एक बबानीना फोटि अभिप्रायो छे, बने कोटि बानीनो एक अभिप्राय है। =एक बहानीके करोष बमिप्राय है, धौर करोष शानियोंका एक अभिप्राय है। [बनाथदास ] ५२५-२० एक देसिये बानिये [रमि रहिये इकठौर । समत बिमछ म निधारिये पी सिदि नहि और ॥] समपसारमाटक गोवार २०, पृ ५०- बनारसीदास, बैनान्यरत्नाकर कार्याम्प, बम्बई २११-१० एक परिनामके न करता दर (4) दोय (दोर) दोप () परिनाम एक दर्व (4) न घरत है। एक करवति दोई ) दर्य (क) काहों के म करे दोई () करसूति एक दर्द (M) म करतहै। श्रीव पुदगठ एक सेत-अवगही दर्द (उ) वपमे अपने म्प (सम) दोठ कोउ न ट। था परिनामनिको (को) करता है पुदगछ विदानद घेतन समाप वापरतु ।। [समपसारनाटक ककर्मक्रियाशर १. ९१ ] २००-२ ६७७-१८१ एगे सममे मगर्न महावीरे इमीगे (हमीर)उसप्पि (बोसप्पीगीर चठमीस (पटम्वासाए) वियपरार्ण परिमतित्यपरे सिमे पुरे मुछे परिनिपुरे (पान) सम्पदुम्स (क्स) प (प) होणे । [ प्रमोगसूत्र ५५ १ १५, भागमो यसमिति ] ७५१-२२ एन स्वमे जो दर्शन पामे रे मुं मन न पढे बोरे मामे रे पाप रणनो देश प्रसंग रे तेने न गमे समारनो संग रे॥१॥ इसव रमत प्रगट हरी देईरे माह गो सफळ तन मुरे। मुख्नदनो नाप विहारी रे भोपा बालनदो वमारी रे॥२॥ [उदबाता ८८-२-३ ८७-७-मुग्नदस्वामी; महमदाबा १८९१] २१६-१२ [ निगपारिय परिस्सामि ] एष पुचा (पुचो) मासुई। [सम्मापिठलं पणुमामो चार महिं बो] ॥ [उचराप्पयम १९-८५]११५-१ [छोको रे मुस साहिब जगतनो हो।] ए भोपाळमो यस करता बाल अपवरस पुल्यो ( यूटो) २॥ मुर । [ भोपाम्पस, १८५-दिनपतिस्प-यशोविनय ] १५२-३ भीमद् पत्रमा ५००-२ [ पृष्ठमा कम्मरमर सम्म (म) संगोगो मोहोई मौनस्स । सो यो ना (णा) पम्मो सम्स नियोगो मब () मोसो (क्सो) ॥ १२५-१७ ] ७९६-७ करमा फकीर (4) क्या मिगीरी सदा मगन मन ये (O मामी। [या पद भेटमहत रतनमामामें पृष्ठ १२ पर दिया हमा] २२७-२ का मटे तो छ्टेम ए ई मा मननमो मर्म । पोतु बाब तो कर्ण बरा बोशित यो बस्तु सयै। छो गासने उसे माय एम की बसे घटस्पा बाप । [य] २६७-२६ किमामा समाबारगाशेवा या विसर्मति (रागोसानिलिम्पति)। वहा स्टोवर (पपरिव ) एसा पामा चौण (मिणि)राणम् ॥ [ उपदेशवस्प पशोविनयरी] १२८-२८ कोचसो (सौ ) कनक बाके (६) मीच सो (सौ ) नरेश (स) पद मौचसी मिला (ता) { गर (1) मई बार (के) गारसी । परसा बोग-वानि (लि) बरसा पराम (मा)लि पारसी स (हौस) पुदगम्मामी (B) छारसी । गासो (सी) बग-विमस मारो (सौ ) मुक्नमास काम्सो (सौ ) टुंगधार मेकमा पारसी । सौटसो (सौ) पुरस गाने को (क) म्सो (सी) बसत माने ऐसी गाको पत्ति नही र (4)दत बनारसी n [समपसारनाटकबार १९, २५१-५] ९०८-११ कोई समरसना मोगी कोई समरसना मोगी। माणे कई निरम बोगी कोई समरसना भोगी ॥ [संभव है या पर सप परचन्दबीने कमाया हो। २५१-३० गुरु गणपर गुणपर मधिक प्रबुर परपर और । त पर तनु मगनप (त) र बदीप सिरमो (मौ)॥ [सामी परिपानुप्रेक्षा- पपचन्द्रस्त मनुवाइका मंगलाचरण । ०५५-५० चैनपानावर कार्यालय बबई १९.] गुरुणा गुपच (शगुपचि) ] ५९१-११ +लमा कुनामा एक परापर है।-जमान वेपोमे भारत्नपी [ परिशिर (२) । घट घट वर मिन बसे (से) घट घट बतर बैन । पृष्ठ लाइन मत (ति)-मदिरके पानसे (सौं) मतधारा समनै (समुहै) म ॥ [समयसारनाटक मपसमाप्ति वौर मन्तिम प्रशस्ति ११, ५३८ ] ७७५-१५ परमात हो चरमकरण तया मबपरिणति परिपाक रे। दोप टळे म (6) टि खुल्छे () मग प्रापति प्रवचमवाफ रे ॥ १ ॥ परिचय पात (वि) कपासक साधुषु कुशल वपचय घेत रे प्रय वयातम अपण मनन करी परिशाम्न नय हेत रे ॥२॥ मुगध (ग्ष) सुगम करी सेवम छेसवे सेक्न बगम बन्प रे । देनो कदाचित सेवा पापमा वामदफ्नरसरूप रे ॥३॥ ७००-२॥ [वानदफ्नचौमासी समबनाप निनस्तकम ३, १, ६, पृ १६, १७, १९] ७१२-९) धर्म सो बंधे (धो) [ मगवती!] ७८३-१ चाहे पकोर ते चदने मधुकर मालती भोगी रे । म (तिम ) भनि सहगुणे होणे उत्तम निमिचसमोगी रे ॥ [ माठ योगाग्मिी स्वाभ्याप १-१५, १ २३१] ७१२-७ पिसारी म्पारो परचक म्पारो (रों) सेन न्यारी पादर (R) मी न्यारी होन (५) ही मेरी पफ्ना । बतीत धास्था सेन मिदा यही (मिडालादि) कोउ फैन (पै म) विपमान फ्रम न पा (मैं)बर छपना । वा (स्वा) सबौ मुफ्न दोउ (3) मिदाको वग मुझे (मू) सबै सब बंग सी (सि) बातम दरपना । मागी मयो (यौ) वेतन बचेतनता मात्र त्यागी (गि) मासे () रवि सोभि (क) मा (0) रूप मपना । [समयसारमाठक निराधार १५, १७६-७] ६७७-५ माम्य पूर्णि (धर्मि माम्प सूत्र नियुक्ति), पछि परंपर अनुमब रे । [वानदपनपौवीसी नमिनापगिनस्तान ८, १ १६१] ७१६-१२ बब बनणं दिसं या तरतण तग दिर्स मपरियो । [ मानाग ! ] १९८-२ चहि समांत) नव(पेतन) स्मिाषसौ(सौं) उमटि गापु समो(म) पर्य() वफ्नो(नौ) पुमान गरि कालो(नी) है। तबहिते (तमहात) मो मो मेन गोग सो सो सब होतो (नौ) यो यो त्यागनोग सो सो सब सजि) दोनोरनी) है। से (गे) को (क) म ही टो (टी) र स्पायडो (2) माही और पाने का सपों (य) कारर () मानो ( मानी) है। - भीम रामचन्द्र सग स्पगी (ग)ग स्पागा (1) पचम तरंग त्यागी (गि) मन त्यागी (ग) बुधि त्यागी (1) वापा पु (साद कोनो (नौ) है॥ [समपसारनाटक सर्मविभुविद्वार १९, पृ २७०-८] २८२-५ पारिस सिपसाचो वारिस सहायो सम्पनीधाम । मा सिबत कापया मबगीn [सिरप्रामत-कुन्दकुप १३९-१० मिन ई (1) बिनने से भागषे ते म्हो (R) मिनवर होने रे। म () गाईमकाने चटकाने ते म (गी मग बोले रे ॥ [पानंदपाचौबीसी-नमिनायविनस्तान , पृ १६०] १३ ७-१८ निनपूणारे ते नियपूमना [रे प्रगटे बन्नपशति । फामानंद निवासी मनुमवे रे देवभन्न पद म्पत्तिमा [नामपूम्पस्तपन ७-देवचरनी] ५२६-१८ मिसने बारमा जान छी उसने सब कुछ नान किया । [ एर्ग बाण से सम्म गार्ण ] [ नाचग १-१-१-१२२] १ -१ पार (मन) चोद शोपना घरे । कृष्णने फरषु होय से करे । गाव (चिच) साद शोचना परे । रुपने कई होप ते करे । [ दयाराम पद १०, प १२८, दपारमात महिनाविकाम्यसपहबहमदाबाद १८७६] २०५-१६ गौर मनि पुग्गर्ग नै पुग्गम या पुम्गमधार मही तास रंगी। पर तोच मीपर ऐतर्पता मस्त पर्मे कदा न परसगी n [मुमतिबिनस्तक्न ६ देरचनामी२७९-१५ नो (41) वामिय मदिरा दारी बा (2) टक चोयै परनारी । पति (६) साम्पसन ( सात सिम ) ह (हु) दुरित मूग दुर्गवि (पुरगति ) के माई ( मर्प)॥ [ समपसारनारक साम्पसायकवार २०५ १२४] १८२-1. मै दयुमा महाभागा पौण बसमपसिणो । पर तेति (B) परमात सह सयसो ॥ १ ॥ जे प बुरा महामागा पौण मसिनो। मुर तेति परतं मर से सम्बसो ॥२॥ [सूत्राग १-८-२२,२११ १२] १५१-१. (३) पर्ण पा से सम बाप। जे सम्म गा से पर्ग बाणा [भाषाएँग १-३-१-१२२] १५१-१.
परिशिए (२) ८७ पृष्ठ सम्म ये ना (३) वयिते दमगुणफम्महि य । सो वाणई (1) नियवपा मोझो अस मईय (ब) तस्स रूप ॥ [प्रमचनसर १-८. पृ १०१-दफुरदाचार्य रायचयनशास्त्रमाग १९१५]६३५-२२ नेनो काळ ते किंकर थई यो मृगवणाम प्रमेक (लोक) ॥ गौM धन्य तेज । दासी बाशा पिशाची पई यो कामक्रोम ते फेदी मोक || सीपु० । (दीसे ) सत पौवा बोलता नित्ये निरवन निराकार ॥ नौम्पुं० । गाणे सत सक्षणा ( समेणा ) सेहने जेने होय छेलो (डो) अपवार ॥ मीम्म । बगपानकार ते आमतर्या आप मावठवरमो मार || नीव्यु० । वेने पौद कमा विचरतराय कोईए ( कोये ) मा पाप ॥ गोम्पु० । पिन (घि) सिदि ते (पियो ) दासियो पई ही प्रमानद दे म समाप ॥ नौम्पु० ॥ [ ममारपद पर १५-२९, ३१, १६, ३७, २८, २९, १ १५--मनोहरवासात, सस्त साहित्पवर्षक कार्याम्प, म स १९९९ ] ७५९-२ मे (मो) प्रमान परधन रे सो अपराभि (घी) छ। चो मानो (नौ) धन विधर (प्पोहरे ) सो धनपति धर्म ॥ [समयसारनाटक मोक्षधर १८, ५ २८५] ७८२-१६ बेम निर्मळता रे रान स्फटिकतमी रोमन नौवस्वमाव रे । से मिनीरे रे धर्म प्रकासियो प्रवळ कपाय अमाव रे ॥ [ नपरस्प धीसौमधरनिनस्तमन २-१७५ २११-पशोविजय ] १११-१९ जैसे कभुकम्पागसे विनसत नही मुमग । ऐस्यागसे गांव पुनि सें रात बमग ।। सरोदयशान २८९१९२-चिदानन्दी] १२८-२५ जैसे मग मच पाहित्यको सपति (1) माही (B) तपात भूपावर कारण (न) बटन है। से मामासी मायाहीसों (सौ )रित मानि मानि अनि ठानि भ्रम भूमि ( प्रम ) नाटक नठतु है। मागेको (बागैको) है (घु) त पाप () पा (पी) बहरा पराप (पए) जैसे ग् ( मैन ) होन नर गरि (4) ट है। चेतन शे () () सत फल सोबत बटन है। [समयपरनाटक पार २५, २०२] १२८-१५ *सो (सी) निरभेदरूप निहले (4) मतीत मुंती (द्रुती) सोHिA........./1ोगी। से मस्त करवति करे भीमद् रामचन्द पृष्ठ मात सग त्यागी (गि)का स्पागो (ग) पचन तरग त्यागा (गि) मन त्यागी (गि) मुदि त्यागी (गि) मा सो कोनो (नौ) है। [समपसारनाटक सतिनिशर १ ९, पृ १७०-८] २८२-५ बारिस सिदसहामो तारिस सहामो सम्बनीमाण । तमा सिस्तई फापमा ममगावnि [सिरप्रापत-मुकुन्द ] ६२५-११ निन पई (इ) चिनने बारा ते सही (ति) बिनबर होये रे। में (4) गो मकाने पटकाने ते में (सभी बग बोले रे [ वामदनबाबासा-ममिनापनिनस्तक्न ७, पृ १९०] 1२०७-१८ जिनपूमा रे निगपूबना [रे प्रगटे क्मपछि । परमानंद विकसी मनुभो रे देवचन्न पदम्पति ]n [पासपूरपस्तबन ७-देववनी] १९५-१८ बिस्ने वरमा पान की ससने सब स मान लिया । [ने एग बार्ग से सर्व मार्ग] [ वाचाग १-३-१-१२२ ] १०-१ गोल (मन) शौर घोचना भरे । रणने करतुं होप ते करे। गोब (वि) सीद शोचना भरे ! रणने पशुऐप ते करे । [दयाराम पर ३०, १२८ दयारामकत महिनौतिकाप्पसमा वामाबाद १८०९] १९६-१५ गोल नाल पुगठी नैव पुमा कदा पुगणधार न तास रगी। मतमो शिमर पर ऐसर्यता बस्तु धर्मे कदा म परमपी n [समतिविनस्तम्म ५ देवचम्दगी ] २.९-१५ सूचे (मा) बानिय मदिरा बरे (से) टक चोरी परमाए । की (६)सम्पसन ( सात मिसन ) (इ) दुरित मूठ दुर्गति (दूरगति) गई (म)। [समपसारनाक साप्पसापकर २७ १ १४४] १८२-२० ने बदुवा माभागा मारा समचसियो । बमुरं देसि (स) परतं सोई सम्पसो ॥१॥ पपुरा महाभागा र सम्मपदसियो । परदेसि परबत मार्ग होरसमस ॥२॥ [स्वास्तांग १-८-२२२११ १२] ३५१-१. () पर्ण गाई से सम्म गार्ग। ये स्मं गार्ग से एगं बाई । [ भाषामा १-३-१-१२२] १५१-१.
परिशिप (२) पृष्ठ ठाम चे नाणई (३) वयिते दम्मगुणफम्बरहि य । सो नार्मा (1) नियश्या मोहो सह गाईप ( गइ) तस्स य ।। [प्रवचनसार १-८० पृ १०१-मन्दकुन्दाचार्य, रापचन्द्रनशाखमाला १९३५] ६३५-२२ नो काळ ते किंकर पई रयो मृगतृष्णानस ठोक (लोक) ॥ नौम्यु घन्य वेदनु । दासी वाशा पिशाची पई यो कामकोष से फेदी मेक ।। माम्पुं० । (दीसे ) साता पनि बोलता नित्ये ३ निरंचम निराकार ॥ गौL० । बाणे सत सलाणा ( सगेणा ) तेहने ने ऐप ऐडो (डो)मवतार ॥ नौम्पु । चगपावनकर ते वववर्या वन्य मावठदरमो मार ॥ बीमु० । वेने गोद मेकमा विचरत वतराप कोईए (कोये) मा पाय ॥ सौम्पु० । रिधि (पि) सिदि ते ( थियो ) दासिपो पई यही प्रमानद ले म समाप || बाम्पु० ॥ [ ममहरपद पर १५-२९, ३१, ३५, ३७, १८, १९, पृ १५–मनोहरदासात, सस्त साहित्यवर्धक कार्याम्प, बाई सं १९९९] ७९९-२ ने (बो) पुमान परमन हरै सो वपराधि (पी) वा। नो वफ्नो (मौ ) धम विवहरे (म्पोहरै ) सो धनपति धर्मा [समपसारनाटक मोक्षधर १८, ५ २८२] ७८६-१६ नेम निर्मळता रे रस्न स्फटिकतणी सेमय चौबम्पमाव रे । वे मिनपरि रे धर्म प्रकाशियो प्रबळ कपाय ममान रे ॥ [ मपयस्य श्रीसीमपरमिनस्तान २-१७ पृ २१४-पशानिमय ] १०१-१९ जैसे कचुकण्यागसें बिनसत नहीं मुनंग । देहत्यागसे नाच पुनि सें यत बमग । सरो पचान ३८६४९२-पिशनन्दन] १२८-२५ जैसे रंग मच पादिस्पको पति () मही (ह) तपात मृपामठ कारण (न) घटा है। वैसे मकवासी मापाहीसों (स) हित मानि मानि ठामि अनि भम भूमि ( प्रम ) नाटक मटा है। मागेको (बागैको) (Y) कस पाप (६) पा (पी) ऐ बारा घराप (चार) वैसे ग् (नैन ) होन नर परिव (ब) है। वैसे मह चेतन सात फरवति करे पे (ये) व (1) सत फल पोषत सटा है। [समपसारमाफ पार २७, १ २९२] २२८-१६ सो (सी) निरमेइलप निर (4) अतीत वो (हुती) कैसे (सी) नरमेइ मा भेदकोन (मेद कौन) ग (क)२() गो (गौ)।
४८ भीमद् रामचन्द्र पृष्ठान दोसे (0) कर्मयो (R) मी (R) पुस समाधान पापो (पौ) निरपान किन बाहिर (बाइरि) न बहेगे (गो)। फा (३) कदापि वपनो (नौ) समाउ (4) त्याग कर राग रस राधिके (*) न परपसा गहेगो (गहुँगो)। बमान बान विपमान परगट मयो (पौ) याहि (ही) मति बागम बनतका ग्रेगो (दैगी) । [समयसारनाक सर्वविविध १०८, १ ३७६-७] ६०-१२ पो (यो) गा फ्पडिपपेशा (पोसा) [दि मनुमागा सायदो होति ] [न्यसह ] ७८१-१५ जकिपिति चितवो पिण्डरिची हवे गा सा। मदनप एपच तास तस्स लिन्डप (लिवयो गाण (सारण) दम्पसार ७५९-२५ जगममा गुति तो में नागिपे समीप ये पण शरीरनो महाँ सग यो । एकरी पसारे एकर बासमे भूस ( मेस 1) पडे ता पडे मननम् भंग गो॥ भोगवनी बबळा ते मापन न करे ।। [ बोपनीने संदेसो गरवी ३-1-पुनापास गई, सं १९५१ ) १९९-२. समति पासा (1) मोमति पासा (0)। [ज मोति पासदा त सम्मति पासा । ] [वाचाग १-५-१] ५९८-१ [ मर सिन्ध पभरो निणसासगे ब्यविर विपपरो] मगार (णमो ) मास (निमोस्ट ) मम्मो शेषा (सेमा) उमगपा समे॥ [सामना समय सूत्रप्राप्त २१-कुन्दपुत्दा माणिक प्रपम्प्रय बम] ७८९-२५ तरतम पोगरे तरतम बासना रे बासित बोग वापर । पयो । [बान-मचारीसी बबितनाथस्तवन ५,१ १२ ] तमा सार्ण सममार्ण [ मगन्ती ] ६.३-१८ [ पम्मिन्न्तगि भूताम्यामाभूमिमामत ] उप्र का मोदी क शोरः एकमनुरयत ॥ [ ईशावास्य उपनिषत् ७४ २३३-२१ मारे उमा कर जोरी बिनसर बाग पहिये। रामपपाण सा घर देशो म बानापन दिये। [ भान परभौगमी ममिमापरिमानान ११ १ १९४) ७९८-२." संग सरमा नप मई मारमिबमारे। दिनपरी मने सीम्नानातिर परे॥ [47 योगागियी थाप्पाप १-22 २३ । गुमाहित] २०५-१६ परिशिष (२) [ ] ८००- -- [ - [ दर्शन ने पया पूजवा ते बोच नगरमे फेरे है । पृष्ट धरि चिराविक सेहमा समकित पनि हेरे रे ॥ [साठ पोगरिनी स्वाम्याप १-५, ३ पृ ३३.] २७५ दसव मूझ टळे तो सर्प दुसनो क्षय थाय । देवगमनमोयान चामरादिविभूतप । ७८१- मापाविपपि प्यते नातस्वमसि नो महान् ॥[बातमीमांसा १-समंतमा ] देहामिमाने गमिते बिहाते परमात्मनि । पत्र पत्र मनो यान्ति तत्र तत्र समाप ॥ २१२. दूट देने मास उपचासी गो मायारग रे । तो पण गर्म वनवा सेशे यो पोल ग रे । धम्य ते मुनिपराचे चारे सममा हामवत शानिनु मळ वनमनपपने साचा । दम्पमात्र सुधा से मासे साधी बिनमी वाचा धन्य ते मुनिबरा ये बाडे सममान ॥ [सितियस्प सीमपरीवनस्तान १५-३, पृ २८३- पोलिसपमा ] मम्मो मगध्मुकिा बरिसा सपमो तयो । देवावि ते नमसंति बस्स धम्मे सया मणौ ॥ [दशकाठिकसूत्र १-१॥ प्रो मम्पकरारा सम्पारित १९३२ ] धार दरवारमी सोही दोरण बौदमा मिनतणी परणसैना। धारपर माचटा देस बाजीगरा सेवना पारपर दै म देवा । [भानदघमचौबीसी वर्मतनापविनस्तकम १, पृ८६] १७२- नमो मिणाण विभवाम x [से स्थानकासियों के स कोटिके 'ममोयुम में बोलने की परम्परा) २५१-२ नमो दुरयगारिरिवारनिवारिणे । मति योगिनायाप महावीप तायिने ।। [ योगशाम १-१, हेमचन्दाचार्य; जैनधर्मप्रसRक समा भाषनगर १९७१ ] माकेरुम निहाळता 1 ७१०- मागरम पामर मी (4) गाणे म पुस म कुमारी । वनुमतिम तेम म्यानता मुम कोण गाणे नर नारी रे ! [पाठ मोगरिमी स्वाध्याय ७-१, ५ ३३९] ३०५- मिनमनमें मा मिले हीरो छ धाम | स्तरपा पाईप सो हरि सबसे ठाम ॥ निगामि गयिामि वपार्ण मोसिरामि । [ प्रतिष्मणसूत्र] ५१२. ७७० [ [ माणेकास ] ५:३- भीमद् पसबद्र [णि सेवा मामा या समा मुहम्मान समाग से 1 पृष्ठान मिमाणसेठा (ा)य समयम्मा [म मापपुचा परमपि नाणी ] n [सूप्रस्तांग १-५-२०] १००-१ निदिन नैनमें मीरम वाले मर कमी मारापन पाने । [ सरदास ] १७५-१८ पो पारा पाममो मिटे म मनको वाच (पदी पार करो पारनो (1) मिटमो न मनको पार) मौ (ो ) कोमुषों (कोलके) देण्इं (कको ) पर है (0) कोश हार । [ समानियतक ८१ ५ १७१-पयोवियफ्नी, गुर्नरसाहित्यसंपद प्रथम विमाग मुर्प सं १९९२] २५०-२१ पक्षपातो न मे पोरेनषा कपिमधि । पुतिमा चनं यस्य तस्य भार्या परिण । लोकतालनिर्णप २८-रिमरि ] १५२-२१ [पु नामुषु बनी वारो पमिर्मदन रस रीति हो मित ] पुरा पनुमप त्यागपी करपी बध (B) परतत हो। (वमिमन्दनदिनाति १--देशभमानी ) ५१-१९ पुम्से तो ये। [ ] ०६१२१ प्रमु मयो नाति समो पख्ने परोपकार । प्रभमरसनिमर्म रिपुम्म प्रसनं पवनकमसर्मक कामिनागम्य । फरपुगमपि यो शवमयं तदसि गति देना बोगस्वमेष । [पनपाठ] ७८०-१५) फळ बनेकांत मेषम मदेसे पळ बनेकाव किरिया बरी पापम मरे चार गतिमति मेरे। [वानंदमनचौबासी ममतनापविमस्तक्न २, ८७] ५०२-१ बमिाणपिमुक दिन सिरियामाणमिणपदं । [ईई इस समासबो बरसामि ॥] [कर्ममप वासय १– देशसरि नागरा ] २२१-११ मासण मरफ्गा ए तिरिमगड () ए देवमापद (ए। परोसि तीब (सिम्म) दुस मावति निममालणा पार । [ फ्ट्मास्थासम्म माप्रापत ८ १ १२२ ] ७५०-२१ मोनो रोगमर्थ फुले पुतिमपं दिवे सुपामाप । माने दैम्पम बो पुिमय से तम्पा मय । शामे पाइम गुणे समय कम्पे स्तपूर्य सं बस्तु मपावित मुलि नुणे मेरम्पमेधमप! [महरिशराम्पसक १०-मरीरि९५-२२ [ ७५९-१) परिशिए (२) पृष्ठ जान मन महिलानु महाला उपरे बौना काम करत रे । ३०५-१२,२१॥ म सुतर्मे मन छ घरे हामाक्षेपकवत रे ।। २०६-९,११ [ बाठ योगएिमा सापाय ६-१ ३३८ ] २०९-२०J मत्र बौपध नहीं मेयी पाप पसप । पौवरागवाणी बिना बबर म कोई उपाय | [वगाससे प• गुणमदनी सूचित करते है कि यह पप स्स्य रामचन्द्रमीका है ] 0१८-२८ मा मुसा मा रम्नह मा दूसर (तुस्सा) इनिायो (त्ये)। पिरमिछदि () वा वित्त विपित्तशाण (धाण ) पसिधीर ॥ पणासमोसमप्पणचवदुगमेग च मम मा हा)। परमेहिवाचयाण वप्प गुरूपरसेण ।। [इम्पसमाह ] ०५१-१७ मारे काम कोष स्म (मिनि) होम मोहे पीसि बारे पनि (बाऊ ) तटकरी कियो रगतो (तो) है। मार्यों महामच मन मारे (मार्यो) बहकार मार मारे मद मम ( मन्म) । ऐसो रमरु (रू) तो है। मा वाशा (सा) तृष्णा पुमि ( सोठ ) पापिनी सापिनी दोउ (6) सबको प्रहार करि निज पद ( फ्य) पूती (पात्रो)। सदर करत ऐसो साधु को (क) (स) पौर औरि (4) स्व मारिके निर्षित होई (६) स्तो (तो)। [ संदरक्सिास शूरातनको बंग २१-११ सदरदास, बम्बई, १९५१] १८१-९ मोक्षमार्गस्प मेला मेल कर्मभूस्ताम् । ७५२-२२ शातार विनतत्वाना देतहणम्पपे ।। [ तत्वार्पश्टीच ७८५-३ । पोग बसंभ ये जिम का पटमी (R) रिम दासी रे । भवपद वेमय माणमो बातमराम से सासी रे । [पप सकल समृधिनी पठमावि की दासी रे।] तिम नवपद इति वाणो मातमाम ऐ साली रे ॥ योग बसम्म मि कमा मषपर मुस्य ते सामोरे । १ तमे वरमने वावमम्यान प्रमाणो रे ॥ [भापास चतुर्पसा नियविनय-पशोभिनयमा । १८५-५ मामसिह माणिक बबई १९०६ १७८-२ भीमद् सबम्य [र्दिम सेप असचमा पा समा सहम्मा व समाण सेघ ] । पन लिम्बागसेठा (सेना) यह समयम्मा [म नापपुचा परमरिय मामी ] !! [सूत्रमग १-६-२४] १ -१ निशदिम नैनमें मारम बारे मर तबहि नागफन पारे । [मुददास ] १०५-१८ पटे पार कहाँ पामयो मिटे न मनको वाट (पही पार का पालनो (!) मिटपो न मनको पार ) म्यौं (यों ) कोयुकों (कोसके ) बेण्डु (छको ) पर हि (0) कोश हगार । [ समाविष्टतक ८१ १ १०१-पशोपिनयमो गुरसहित्पसमा प्रपम विभाग मुंबई स १९९२] १५०-२१ पम्पो म मे वीर मरेप पिकारिय। युधिमाधम यस्प तस्य कार्य परिकालनिर्णय १८-परिमारि १५२-२१ [स्पु गाणु मुं बनी वालो वमिनदन रस पति हो मित] प्रमठ बनुभव त्यापी पापी मध (स) परतीत हो। (बभिमन्दनविमहाति १---देवचन्द्रनी ) ५ ५-१९ पुत्र रातो । J७५५-२१ प्रमु मयो नति समो परठो परोपकार । ] ९९-२१ प्रसमरसनिमम रिपुम्म प्रस बनकमम्मक कामिनासंगरन्य । करयुगमपि पचे शवरिषप्य तदास माति देवा तणगस्त्यमेव ॥ [पनपास] ७८०-१५) फळ बनेरत मोबन न देसे फळ बनेकत किरपा री बापग रामो चार गतिमहि । [ मानवमन चौमासी वमतनापनिमस्तवन २, ५ ८७] ५१२-१ पक्षिाणपिमुक दिव सिरिसमापविणर्द । [गईमई दुई समासबो बसामित्त ।।] [ कनाप तीसरा १ रेवेन्द्रसमा बाग] १२१-११ मौसम नरपगार निरिफ्गा ए मुदेवम्शुपगा ( ए| पचोसि टीम (विम्म) मा विष्णम्पमा बाला [ पट्मास्ताविसंघ मा प्रामत ८ प १२२ ] मोरो रोगम के अतिम निचे उपासम्म । माने दैम्पमर्ष यो रिएमय से वरूपा मप । पदमर्य गुणे मर्य का संतपर्य समस्त मयान्वित मुनि नृा राम्पमेवामपा [महरिभकरम्पमतक १४-मारिए -२२ -- ७६ -२१ परिशिए (२) पृष्ठ छन सिरिवार निण पदिन फम्मविवाग समासबो दुष्छ । कोई मिएण हेठी बेण तो मण्णए कम्म ॥ [प्रथम कर्मपन्य १-देवेन्द्रसरि, बागरा १९१८] ६२१-१५ [सौमें विपाद वसै विधामै विवाद बसै कायामै मरन गुरु बनमै मता । सचिम गिठामि बसै प्रापति हामि वसे में हरि दर दसामै छवि जनता || रोग से मोगमै सबोगमैं वियोग बसै गुममें गरब बसै सेवामहि दीनत्य और बग ति नेती गर्मिस वसावा सेती] ससकी सहेली () बकेग उदासीनता। [समयसम्माटक प ११५-६] १६०-२५ वम्पास्मनी बननी उदासीनता । [यह पद स्वयं गपचन्द्रनाका बनाया हवा हो सकता है] १६०-२५ सपदुः(सस्प करमफह बाणो निश्चय एक वानदो रे । घेतनता परिणाम न चूके चेतन को निनघदो रे ।। [वानदफ्न चौबीसी पाठपूम्पविनस्तवन १, पृ ७७ ] २८१-२२ मसना सिंषु पौसानानंदनी नगमि (जी) मके (') जगवदगी । धरणागतना सदा मुसकंदनी परमस्नेही मे () परमानरमी । [पीरबाल्पान १-निफुलानन्द काम्यदोहन माग २, ५ ५३९] २५९-२९ सहगोग फ्यु (1) मार्रमी, बसस्नोर्ग पद (1) पवापरमी पयरमा तदुमपारमा । [भगवती] १९१-२१ [गोई बिग ग्यान बरनावममें मैठि ठौर भयौ निरदौर पर वस्तुको म परसै ] 8 (1) अता निमारे पाच (स) इतामें केली करे (१)। (B) तामें पिर से (2) अमृतधारा बरसे (बरसै)। [त्यागि वन करस्पर पर करमको कर पाम मा मए रै गौर करसे होती निकम्प किगई वम्मका महि त्यागी मौ विमाम निरवानप परस ] ૨૮૨ [समयसारनाटक ' ३८२] १६१-४ सो धम्मो नय्य (त्प) दया वसादोसा न बस्स सो देवो । सो गुरु () गो माणी वारंमपरिमगड (रिवो ॥ [ ] १९६-७ स्वास (3) बाबतो माणुसच दल (ए) मय बारिसेण षडमो । एव पुरो (से) परिए म गोर सकम्म (म्मु ) मा विपरिपास विवि (विप्परिपा सो) । [सूप्रहांग १-०-२२, १ १९] १९९-२० ८५२ श्रीमद् जयन्द्र पोगा भौम प्रहे विनर र प्रणामो रे । भाषाचार सेवमा मव उद्वेग मुममो रे ॥ [पाठ योगप्टिमो स्वाप्पाप १-८,५ ५२१] २७५-१० ररिक () उपो (यो) तमस्त दो दिन Pन प्रति अमुष्ठीके (के) जीवन व्यों (म्यौ ) बीवन घटा (क)। कालो () प्रसत भि लिन होत कौन सन पौरके ( पारेकै ) पम्त मानो कारो (सौ) का। एते परि मूरस म साने परमारपो (क) सारपके ()भम मरत कटतु (त) है। सम्पो (गो) फिर सौगनिसा ( सौं) पम्पो (ग्यो) परि (प) मोगनिसों ( सौं) विपरस मोगनिसों (सी) नेकु न हटत ॥[समपसारनाटक मेबार २९, ५२१११२८-८ ग म माय सर पण सात मरतारवाय तो मोईन न उघारे । [ोकोकि] १५२-२१ की (नेका) म यो ये (ठार पागवेको (त्यागि ) मार (0) और। पार कहा तबो (पी) का नफनो (मानी) tn [समपसारनाक सविविधर १०९, १ ३७७-८] २८३-१२ [पुरिमा उम्मुमग ठ ] क (4) बग प पबिमा (परिमा)। [ मधिमा सबुपचामो तेण धम्मो दुराको ।। ] [उत्तराष्पपन २१-२५] म्पसारनी बाळ परे परिरे परगो । १५१-३ अहवाल पाठोपम यो मवि बाप पमायो रे । प्पतरू उपम ते पामे सपम ठाण नो मायो रे ॥ गापोरेगापो मर जगत गुरु गापो । [सम्ममणास्तवन १५-4 सत्मनिरपी प्रकरणानाकर भाग २, पृ.१०] »t-१९ सकस सारी इनियरामा मुनि गुण वासमरामा रे । ५२९-२५० मुन्सपमे ये बातमरामा ते कीये निष्कामोरे ॥ [बालदपमानासा मेपासनापविनस्तान २, ५ ७० समता रमता (ठ) पता बायकवा हमास । १५८-१00 कैदकता पैतापवा एसब बाणिस ॥ [समपसारमाटक तत्वामिका २६ प २१] ३१०५) समन्या ते कमाई गया रुममा धमर्थ या। ८ [सगो या भोसवितुर पोचे विध पमाणर। एवं म्मुपाम सनियं] समर्प गोपम मा पमापर ॥ [ उत्तमपम १-२ ] ५१-११ ] ९८२-२७ [ परिशिप (२) पृष्ठ मन सिरिमाविण गदिम सम्माविवाग समासत्रो दुश। कोर्ष विएण हे मेण तो मण्णए फम्म । [प्रथम कर्मपन्य १-देवेन्द्रप्रि, वागरा १९१८] १२१-१५ [सौमें विपाद बसै बिपाम पिपाद बसै कायामैं मरम गुरु पर्जनमें हीनता । मुचिम गिमनि बसे प्रापतिमै पनि बसै मैं घरि मुदर दसामै छपि छौनता ॥ रोग से मोगमैं समोग, रियोग बसे गुममै गरव बसे सेवाहि दीनता पौर ग राति देती गर्मित वसावा सेवी] सुम्सकी सहेली (0) के उदासीनता। [समयसम्नाटक १३५-६] १६०-२५ पप्पास्मना मनमी ते उदासीनता । [यह पद सय स्पचन्द्रवीका बनापा ना हो सकता है] १६०-२५ समदु ( सरुम फरमास माणो निश्चय एक वानदो रे । पेक्नता परिणाम न के पेवन करे मिनदो रे ॥ [वानदमन चौमासी वामपूम्पनिनस्तान १, ५ ७७] २८१-२२ मुन्ना सिंधु श्रीसमानदमी जगमि (मी) बनके (!) भगवनी । घरमागतना सदा ससमी परमस्नेही छो () परमानन्दनी ॥ [पीरगारमान १-निफुलानाव, काम्पदोन माग २, ५ ५१९] २५१-२३ सानोग पदु (क)बणारंमी, सरोग पतु (1) पनापार्रमी परारमा तदुमपारमी । [मगवती] १९५-२१ [गोई निग म्पान परमातमम मैठि र भयौ निरौर पर वस्तुको न परसै ] 8 (8) सवा विचार पनि छ (स) अता देवी को (१)। प() रखा पिर पे (2)अपूतपारा परसे (बरसे) ॥ [पागि तन का सपट पर करमकी की पान मा भर कर गौर कास सोचो विकाय विर्य कपकार महि त्यागी मी विधान निरवान पर परसे ] [एमपसारनाटक ! २८२ ) २९१-१॥ सो पम्मो नप्य (त्प) दपा इसारोमा म बस्स सो देवो । सो गुरु (क) यो नाणी मारमपरिग्गड (7) रियो । स्वास (म) मतमो मानुसार बद्ध (पं) मर्प बाधिर्म मर्मभो । एर्गतु इसे (2) अरिए पोए सकम्म (म) णा विपरियाव मिति (पिपरिया हो । [माग १-१-२२, १ ३९] १९९-२० ૨૮૩ J१५६-०
भीम प्रसाद
]
पृष्ठान
हम परदेशी पसी साधु, वीर देशके भाई रे। [
२५९-२
पंसा रहियो (९) धम्मो (म्मे ) वारस दोप (स) विमलो (मथिए) देवो (३)।
निर्णये पमपमे सपरणे (ण) हो। (६) सम्मत (च)।
[ पट्प्राप्तासि मोक्षप्रास्त ९०, १२९७ ]
२०५०
[भकिमी गतप्रसमचरम् तानाबममतिशपचपलम् । ]
क्षणमपि सम्पनसतिरेका मतति मतान्तरणे नौका ॥ [मोहमदर ७-शकराचार्म] २०३-४
क्षायोपशमिक वसम्म सापक एक बाप (वनुम)।
[ अप्पामगाता १-41. ११ देवबन्दी, वप्पामबहानप्रसारसमण १९७५] ७६५१९
८५५ परिशिए (३) परिशिष्ट (३) भीमद् राजपन्द्र के विशिष्ट शब्दोंकी वर्णानुक्रमाणका पति मानरस्म पृष्ठ पृष्ठ पति म ४ १ (मम मात्र) . १० २५ मयम काममा १ ४५ ५४१ . । पपरासी मिप्रमा मार १ " om ru मानरफ्नवीनीची यमी . ५ गा (मास) ५११ w४ १५ भार मापक भासमीमाप्त १५} प प । १५ मायुर समस्या रेख (खमीर) ११ १५ १ ४१ १८ 48 २ 1 2. (७ १ 11४ १५३ रे" १५ २४ ..
भीमद् पसन्द
]
हम परदेशी पसी साधु, और देशो नानि रे। [
हिसा सियो (ए) पम्मो (मे) पारस दोप (8) पिरयो (पमिए) देवो (
निम्न पापणे साणे (प) हो() सम्मत (1)
[ पद्मापताविसण म्ोक्षप्राप्त ९०, १ ३९४ ]
[ महिनावमगतयातर तानीवनमतिपमपमम् । ]
क्षणमपि सायनसगतिरेका माति भवार्णववरणे मौका || [मोहमवर ७-शकराचार्य] :
भापोपशमिक संम्प सम्यक एक मनाप (बनुष)।
[बप्पामगीता १-६ १. ११ देवकन्दगी, बम्पत्यानप्रसारकममा १९७५] ५
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प्रीमद् पमबद्र पति गमसमार पृष्ठ पंकि पृष्ठ मच्यमान ४५ १४ १८ १ १ हदिममपंचकपा . } १११ ३० २४३ ४१ १४ अपिम्पुष ७ १५५ योबरिष योम्मर ५ कबीर गोमा पोतम प्रय गौवम ममम ५२ “ २४५ १९ ४८. २९ १९ ११४ ९ चारित्रव्यगर रानी ५ १४ । ११८ ५१४ ४१ १५१ ११४ । मेग्म १८ ५ . ५१ बम्लामी १ १ १४५ कामदेव भात सांप १४ १ त्म्यि . Sr.. ४४ ५ १ १ . von रेपो याचनम ५१५ १ सन "} परिशिए (३) पृष्ठ पंकि पूर पति प्रभावित पर्वत - 11 पुद्रा परिणत १२४ एएनसामी पुपरीक पंचास्विकार । १५ (५. ४१ रुपमामी ५५१ १२८ रेमामयोग समा ४ -- प्रपोषक प्रसक्नचार प्रवचनचरोसर मबीपसागर ५ पम्मी मनि १ } माहारी प्रमाण २२ २२ .६१ नमियार्षि १२ नक (बि) मेवा ८" २४५ प्रमारना प्रीतम बनारवरान २५ . २८१ नागरी पावतिष नितम रोमन रोनापार ។ १५ १ २ . -पतममीमा मपवान् १५५ १५. २ १ १ ... ..१ १ प्राय ११ ११ भीम रामचन्द्र पृक्ष पृष्ठ उचामस्म १२ . " Y ११ 10 उपप्रमतिमसम्पपप . परवा ८१ १४ ५ ४१ ४११ -१२ १५ गेकपरिष योम्मरमर . पेशाम गोठमपि १८ गौतम मनम 3-in-2073-12-- ११४ ४८. सामी मेयसी १५८ - पारिषदायर बिहानरब पस्तीपुत्र मोनिकालनमापन ४ ४९१ . ११४ ५१ ११४ ५११ १ १ ठाबपि s १ कषिरवामी ११ vv ५ ११ -R v गलोर ये पावाप्रदान साक्दा ५१५ ५४ पिया परिशिए (३) पति पृष्ठ पंक्ति सोरगी १८ पृष्ठ २५२ ७.२ एमटी १२५ १२५ १४] शाकिर पिसरसी शिक्षापत्र धीमांकाचार्य एकोष एमारी सामु १०४ २११ एमासामी " ४५३ पपनसावी ४९५ १२२ भीपक भोषिक २ ७४५ । २६४ १२३ ३२५ ta पम्मेव पार स्पेरिया पाणपर ९८ २१ ६८५ पदर्शनवम्बर ९९२ २ ४८ ४१५ ४०२ १ रिचारमाम ५५२ ५२. २८१ ५ .१२ DYR ។ १ रचारपत्लामी वन यापी पप्प .. ०१५ . २८२ उनबम्पर सम्पतिवर्ष १ ९८ ૨ ૮ २४१ १ २६३ २५० २.. . स्मयगर " १ २१२ १३ पार्म ५९० १ प सतमुवात समता २ ०६१ .८४ ८ ६॥ १८२ १८५ ८ सम्पापांग सदरमम ५ ? पसिनाप पणि १६ सिर
भीमद् रामबद्र
पृष्ठ
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सूपमा
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परिशिए (४) परिशिष्ट (४) 'प्रीमद् रामचन्द्र में आप हुए मन्प और ग्रन्पफारोंकी वर्णानुक्रमणिका पृष्ठ पृष्ठ पंति मानरफ्न मम्पसमम (एनिमुदरती) १८२ बमामधर (सोविजप) २८५ १८२ ११ २ ६२ ०४५ मानरफ्नोनीती (मानरम) १८२ ११ २ ૨૬ Or ११ मय- ८ ५२६ अनुपम (मिनर) १ ૨૮૫ मार (एरियर माया(स्म) .४ मरस (विचार) ८ पारग (भापम्प) १०५ ૨૨ ४.९ v भारतमीमांग (मतमा) इभिक्यमण्ड़ (देवामर १८२ उपप्पन ( मागमय) भार) १ “ 1 १ १ ૧૨ १९२ १४ १०॥ ४१ .९५ पाम (गर) १ २४ १२३ १८ प्रमाणन (ना) १ १८२ ..५ १ .८ बरन १ २८१ पमितिमप्रपा (मार्षि) ८. १८२ 1} ९८ १४५ २४८ १५ In ९८ ४८. मामाको भोक मोगीमा पर मा पनि गोल मवायममी मारको ना, मेरी-उन्मारक A૨ भीमद्रामचन्द्र पष्ठ पछि मन (सार) पृष्ठ ४२ तत्वाध ( उमास्पति) १ । पएचकित (भाव) १४ .२२ ०२१ २८ १५ (२३ एज्योष (स्मर्ष रामान) १५ कामियाना (पतिस्मामी) ८ ८ ४९ .६९ १८ १ .४८ १५ १ ममा .३१ १ २ ऐसगमन्तोष-भाशमीम्बन (समता) परमपी मुनि धर्मपितु (परम्मापूरि) } ४८ निय (निस) मीन (मास) बयानी (हरिम्सूर ) नरसी मेहता २२ ४१ गोपीका ] बोम्मरतार (मिवासियत -२२ २९} नपताल (देवगुत) माराय नाराजपून (नाम्सी) नियंत पोल नदिन (मापमोच) परच-पामायके की २ १ ९ परिणाम रामद पचनन्ति (फानन्द भाषा) . २२२० २ . बाबत (मायमर) खबाम (नायम्ब) २१४ परमात्मप्राय (गोमीरेष) v८५ पचाविकार (F) * Animati.' Y Ylv माल (पोपमगुरु) ५५२ १ २१ . १२ -- प्रयोगक वचन (र) यसबार मिमिकमती) .८६ स्नेबाराम (परिम) ८. .
परिशिप (1) पछि पृष्ठ पति २१ २४ २३ पृष्ठ मपिरानमाम (स्तीपत) १० भगवर ( मोरामपये) १५२ प्रमाकरण (मागमय) २२६ १२३ ०३५ मममा (मायमप्रप) मापत्मक नमुमाई महापवराम स्पराम मापेमात मौरपाई मुठानम मोरमार (चार्य) मोघमाम (पमा) १४१ २ २० ५ पारस २९ ३ ૧૮ २६ २८२ .ru ७०९ २ २ २१ म २ १ । म्यमार्गप्रम (मेरमल) ३८२ ४७९ एप्स (मापमप) ०२१ २२ १ बसिर २१ पाना (भापम्प) २४ पोगप्पडम [ १८ पामा मुबप (परिमा) १८१ २१ ८ १८५ १८.१६,१. or १२ .. योगीनामाप (पोषिया) बोगर (हरिभवति) योगस्ति (समानार) १८० ८१ माटीमायना (सिरि) ८. २. २८" योगनिर (पति) १०॥ माम २ ३ १ मदमात (पास) १२१ ४४ १४॥ २६ . मार (गर) १२ २७॥ ४१८ - मराम मयपत्र ] १ - ८१४ भीमद् परन्द्र पंकि पिलरहरि १८ पियप (परम) पृष्ठ पृष्ठ १२. ५२८ २८१ १८. ग्रेगपाधि (पति) प्रेषण (मकर) २ पापस (निविय मणेवियर) पाराममुबर (रिमा) . ४८ एमएसस्समा १.८ ४१५ १२२ ५ पपनायी (यमका १ २१ १५ सम्मति (सिन) ९६ २६ ९८ १८१ हमपवार (नारतारा).. साम्पम (मनाव) ARRER (A) ३ ५५२ ५ १८ १९५ ५ ५ विचारपसामी बारपार पायी राम (मल) १ समवन्ध . ८ १८९ .२५ } समवाय (भागमय) १८ २१) 11४ .४५ सिमामत (म) भित्र (पं मकर)..१ पाषा (मिनिस) १९ २) ४८ ४८१ ४८. १८५ ८ दरममाव (रणा) परिशिए (५) पंक्ति पृष्ठ पृष्ठ स्मता-समाग (नागमप्रन्प) १९ २२८ स्वरमहान (पिरानन्द) परिम्स ४ ५११ १०० २१८ . १६४11,१४,५ १४ २ १ २४ देसमा (मिनमागाण) मानेपरी (मनेर) १ परिशिष्ट (५) भीमद् राजधन्द्र में भाये हुए मुमुनुभोंके नामोंकी सूखी ' पए पनि मोनमय (गोपीबी) मनराव ४14-१८ २३४-२१ २८८-4 खनमा रेवाकर सामाई मुफ्त .414२२ मेराम ४८९-१४ ४५ -८ ४५1-1 सोमाय (नुभाग) ४८-११८२७ १८-११॥ ५८२-४ पपसंपा मपमा पर माम नपा निमपरिवाम नक्सा नभनय को भषमा मतान पना भीमन् पसबन परिशिष्ट (६) भास्मसिदिके पोंकी षर्णानुकमाणका यसंख्या धर्मभर भवन ११म भनत प्रकारना कम्पपीवी धर्म मनीष मेह ६१च्याफ्नी सातवा १४ पापना समस्या सलमावर्नु २१ षम होत मरगये ११४ कोई मियारा १३४ नेपोपी नहीं १४ारिसमस पारे कई पलुनो १२. चार वरणम्यता ४१ मनामी कल्पना पर भादिमाग चेन्नबो निम्मानमा ५९२ गापास तो 14 भगवा व्यग्रम्पमा अपयशान पनि भएनिफ्नो भरा महोणार भायमानीबई गया मात्मवान मुनिपर्नु मात्मशान समता मात्ममानितम ऐगनी भाममाल्पि भारम भस्वित्वा मात्मा अमेखि . ११५ बारमानी नरे भात्मा तम्ममय मा रेशीमारी ईम मिलना सपने मरिपरला उधम नाम एक न एकप पकमलप्रमा एयधर्मपी मो. मग मानल्यो बा पेठनमो मि १२. बापरेन रुपले ४ पावनो मेहनी ८१पकामो ४१ मिना ममाग्ने १५६माणमा चनो २१मा मम्म पाप १ मम नचापी एमपिनको पीपलमा मेरो पईकप्रेम पर्चकनमो सर्च मेचकमनो चे मेमरहो ३१ भगुरम्परेच ३. बोपोरोपिये बेसम्म समामा बिना १४वेदन पाईन बोरसे परमागे भान्पोम. १११ प्रपोरिचारमा ८. रजसो मही .
परिशिप (1) मारे नही भावमा ४८ १८ १२५ २ हेम्बिनु बने मोम्म विश्रा देसी एम बाप स्पाम पि न विचमा गानिसमा पम्प रन परेशमान पमान एकीय सुची परि मात मंगमा मनोरण परम थाने गम्पर मोग पालगनो गणेशमा माक्वो नवनिमय एकातरी मापार उपपता Aबरपनी सामान्य निशानीनो मामी परेचर पप पारे उनीबई मनामनो प्रसपम्पपी मसा परमोगमा मला मुरम नहीं भरवाईसर पने पण्यखणी मामला पता पसाग पान मी बाबाप स्मा १९ ८६मारे मोशउपायनो ९५ | मानारिका मरा - मुलीशान कसे भने ११८ | मोहमाय पस होगमा १२८ । मोर को निगामा "यपदेश महान ए २. श्रीव सन्रो १४२ ई स्वप न चिर्नु ५२ मणमा महापाना १२ पर्चमान मात्रामा ११ निम्तमायनो ४५ म्न समरित पई १५पनी भावमा ऐप तो १२ बायोम भनेत १७ गम्पादळ दो ११८परखम्पन्न ५. प्रमोद मोगरे प्रमुपपनेवर ९. पपहना परमभ १५ पदत्याना समयलीने १५ परवानक सिमा YO ९ - १० ८८ ४ ८ ४ " गुम्ना मदेश पर सर्व भावाने पि ८५ साना उपदेगी सर्वमिसम २४ से सद्गुरु परपने रवाना परिवाराने सदर मत भामही २ रोपारारिमोधर ४१ होगमन प्रेरणा रोष मनाने १२ दोष मनु और सनरा पम्पो मरी २ माम मरममा म्योगामारपी पासागामालकी मनिम्तम्पवे मारन मामाती ।
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संघीपन मोर परिवहन मान १९९-११मध्ये १११-इलेमप 11.-11,11मई इते बारमा भा समागमेगा फिदिमस्तव १४- उसका उपाय बता देगा v-वास्तव १५१ १५, पौकि ११४१ उस एसेपर ज्य १५१ममा १५९-१ यहाँ पाना चाहता १४-१एक परमे १४. योग्य का गया 11११ भन्ठ (निासी मपवारके उसकी निम्ता नहीं हो सकती मपत्र ठसे रसानेग्री फारे माम रस्सा मटर कोहोरकर भालकेमारा १.१-महार बाना याना यारपर भपापी निरफ्यपी पर उबरके हमने पना उ न... m-विश्व 11- मेसी १०-२म १-पनवे १०-११ पेय 1-माविमा माय काम -रय समन १०-रपाई ४५-५मा 14+बामो 161-प १- दुस्खी समशन पान मी महा यती किबीरमौर मुछिदिव। भवा देगा मुजरे पी और ममत्र विपारमा मेम ९ माय मेएम सफरोपमा अपनेचे म करनेका मकर मिल गयो १५५-नटी २९१-11ममारवा चारणा मौर में मापके बचपर रखना मही पाय माते WHोई भामर रामपाय मशाधन और परिवर्तन मगुव समान -१४पर ८-नार ८-धर्मसिना गमगेम" मन सी. गरमागर मार RAFirmium वर पmti पुलता ८-मुषम १-मतिमा १-पतरा ११-१८मा ११-१राम २१-१ रेय मायर १५- १४-१५ १५-२५ स्निापरा सोना मानी AM रा का पिना Ima रोमागर ५१-५ एमारा -१ .-२सपास मेटोमी भारी मम मान को ४-१५ मगरम •r-८ सम्पनेमि भपाते मम्मामि ८.-1 -११ चिममा.....at उसधि पम्पले मारपुष्प काममा होबाने मीमा वाम। १नी बर्ष कमी ८५-1बनकर ८५-१बमा पवर 1-1एयरमें २१-१ब माम संशोधन मौर परिवर्तन पर शुय इसे धारण करके सम्वगा पिदिवस । मनुस्म प्रमान १९९-१२ १११-१६ इसके कारण १.-11,५ मई १५४-१-4 im- उसका उपाय बता देगा १४८-४ पिहिमास्टर १५२-१५ पास १५-1 उठ परसेपर उवा १५५-मया १५-१ माँ पाना बारम १५४-१ एक पचमै १९४१ योग्य कहा गया १९५-११मनत ११-२१ बिना किसी भपवार १-१२ भने १.१-१ इत्परते देकर जाना उस्त्री निवा महाँ दो दी भरपत्र उसे बनेगी इमाई एक बाते मम्मरस्य पुण्मेहर पापमय 14-1न..... १४-म 17-११ उम्मेसी बाना पादर भपानी है निरपम्पनी पर उपर हमने उस 11-नवे १४-५६ पेक्षा १४-माधिका माष १४-मित काम राती समय १८५-1 रया। १८५-२६मति १५-१६मो १८६-वेप 141- सी सी सम्माता महका मी महाँ यी किचव भोर मुधिषित। खा पेगा 1 चाची और मस्प भाने म करने भरस मिस गा! १-५पनेम १ -१७मार मेरामो गया १९९-नती १९४-१माकेब.बाव १९४-मरण १९५-५ मिन्नई मौर में भारके नाप रेन पर रखना नहीं पाएका 4. भीमद् रामचन्द्र बाती हमी कासारे भार मान २-२१मानी २-माप १५-११हात्र २८-४ ममापती २११- नमो २१५-१५मार २१५-१६स्मा २१-बोधाषि.. हमारे २१-मशानी मपाठी मुमकदा मारपोरेसमा हम्परे भाव बारेख रिही किसी ममाथिका बुराम मीण पारिलानेत्री १. मुत्तम वचत ११९-रिसी २१५-१.शायय 11-17 (उपयार पापी माना चाहिये) १११-चमरियम... २१२-12हा ११२-१५ चार १५१-२४ीनाले ऐलेन २२१-१६मौरव १९५-11नि नमानसमा १४-१५लदिल २१४-१५ मापन ११-1 उपपरियो भौर तेजी सान औरया भनुम्ब मभी शिवधिमा समूचा नारिवलापूर १३४-पीना टो १९-मोन्य २४१-११ती होनी बात शिष १८-१४ .......तो चारो मारो समाजमा और रेय नेमील सरसे मानमोगरीमार संघोपन और परिवर्तन मय भार १५८-२,२७ मफ्ना दगार प्रिोमार २५--1बनेकसान गुमये २५१-१५ बरि पिटी भी बाब तो ९५१-१, माम्ब सातक २५१-१५ विशेष पाये विचाटना पेटेनीपोय हीरे कमरमें समाहित होते है। भनेक मापना की बार बीमा काम्मे बार मौरजन वन है। हैदर * भौर मोट बा पवन संपोगते भार पर स्या की तक मारमा भपने सामने मपन मही यता परमात्माने तो भने तमापका लाग किया। विशेष शाकि भनके साथ मी पदि मफ्नी भात्मान सस्माना भरना उसे ये मनसे मामय मावो किन हीरादि साम अनी पुस्यो नि सम्प- मानस्म ऐका यहीं (मान) पामे, तुम मुझे मौर इम सबने कौनस मारमै पनि शेना कराने मस नहीं हो पात्र ६-२पन पेशानी मी है एनपी - माप मारम हो 100-८ पता होना ११-१२ ऐवकरायमा १८.५ोस १८२-१२ १८५-११ नही रेसने ११.-१९भमाविष 10-१५मायम २९५-२. मोर नई ममम्मि भौर मिनी मी निगा उन सी भपेम मिनु सके मिकामसम: विचार स्माना प्रमाणावर ११-१५ भोर मामस्मयते । १८-१८लिपना १५-१४ मापना ११२-१.१८ प्रमरमोममै १५-१६म मान ५२५-10 मही १५-11भीहै १४-1 उपाधि ३१.-२१ भमैदिक माँ पापले विपक्षम प्रेत ॥३-११ परमावर २२१-१६माने परमाणे माहार विधान करनेषम बनाम नेवाग Mt ७२ श्रीमद् पाबन्द्र पायोम रोनेपर मी मयर प्रधान १५-१६ ११॥-10पूरपणा २५-१ मिठो 11- मरवारम २५-इम्परे १५-१६मना ar.-ब पाप -मसम्मेि मिल्ने बीमायम मरने भवहार्य औष पपको इमान्य m-मने २४१-१८ गुलाम ३५१-फान २५३-14 ठरावन १५४-१५ मापमा उत प्राप्त रिस की पण मोर मापना हो, उसको धर्म मास मानहाश्तवारी 11- मासे बारले, एक पामीराम ठरपपरपो पिचमा ती प्रश्चिम ५-१५पर मी 1-गसमें होने योग है 10-11... शक्ति 11- अपि १५-अप १९-11मपूर्ण २.१-२मागायन 1८1-1 गुरसे परमानों संचार भपूर्व पल्या गुम्दै परनामों ना 101-1-1ोरे करना .-14 कीपरोपा भौर लसरह ४१-14ah १५-पपर ४१९५पसम्म सपनाम 1-1 गोपाल पानी पीने यो बेला पाय। माराम ५.1-11पि मेरा सप सशोधन मौर परिपन भार प्रभात ४१४१५ गौम me (0) + १८-२(1)" 11-२ा उस २प्रमाणसे परा + मे M-18 मझमाके 1-1 भारिणी तपसे पदार्थ सेवर्तमान पार्ष ते रिसाई दे भारमानी मागि Y४कना होना कार १५-२५भरम उन बिसीमास्ते मौसमको किस बरम्य जनारसी १-८गुप 11-मो भारिता ५१-१७पाती 11-२३ मर ५४-10 मामले बरनेवति मर पोवामा मूर्तिका ५५-२४ पदरी ५५५-१ बाण 19-मबमार्म बनाता मग मात्र यो ऐना है। मेरमा किराती पर ५-१४ा ५४४-३३ ५८९-१८ 11.-सा Im-मानुयोग रगोय पगारे १५.-नेमा १.१-५
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- और - - पहिरिन सम्पपापद्वारका मर्य, प्रमाणामुम प्रमाणपत्रानेष प्रपोजन, प्रमापके पामेर अनुमानभवन, प्रत्यक्षका ममाम्दम, महानोरे मा भासिमि, पाम्पमामा पताम, पशुमान भौर कार्यपधध पामाम्य पण प्रयाघ्र पगारवरूपमे निस्पन पाईययन मसानुमानका रचन, पहा पसम, परम्र प्रयोगपीमरन परमारोप ममिररिय और मनमामिल सपा सुपारमुखानदेश प्रमाण मण प्रपोपहार मार सैनो विमोचन क्षमै सानो दम्मपि धर्म स्मृतनमको भोर गापामा बर्मानुभमतिका मापावनार मूभी तूपी । पावसामादकरा पी एम ए. हि मूस्प ११) पोरम) १पा ११औरतनबार सयोग ११ माघ विप्रपामाचे नभाचीने नाममप्रसार म मर दिया। प्रोमा में भाग सपपन्द्रीनशासमासाके २ नबीम सम्योंका महत्त्वपूर्ण प्रकाशन सम्राट विक्रमादिस्मकी समाके ० रनमिमे क्षपणक मामक रन माम्रापतिरसेमविचारात १ न्यायावतार मीभित्रपिंगपिकी स्कार्यकाका हिन्दी-मामनुवार । मनुगमता विवयमूर्ति शामाधाय (अनाशन) एम, ए (न सतत)। स्थापन समिद प्रथम रिभो (क)में पाय-यामक मुमप मुम्स्प किसानोरा सरप wala, MUNICATE माना, रण लाम्पसमा म पारमाप्रिया सम प्रमाण या प्रतिपादन प्रमार में नपके विमा try मुदर मममून दिली। मम्प ५) पोोग) प्रायम्बतार- रमेश सिपिका पादेव पिणी समित । मोमशान-तस्वामसूमके कत्ता भीउमाम्पामितिका २ प्रशमरतिप्रकरण भी रिमनमकिन या मोर नादिस्याचा माजी शाली प्रोफेसर मैनाटेर पोत (मस्ट) -i-। पमा बा जीन और बीमारमा भाचान मोटामो समय साप सारे र पाका वर्णन HORIRAHUAAIHITHARASHTRA RAN कर गया माठ ५ विशिम विषय । भाउ मरस्थान भाषा ८ माबमा शिविर १ पारिष १५ो मम पान भनी मोमोन ARRE से २० पिकाम पनि है। सबसे कम भावर मात Preeti मनमा में । पोको बानुमसे मेल | Tata v मम yि yal) मामकी बात-- सापा ११) १ ) में 21 1) गावाटोको राम रोजगार पत्र । ) रा ) TRI-) अपने तर मनभार मबना पारिसमभाग मेगानेपाड ) मो. ९) पर। सामना पूरी तो पो गया इस Anti- 4) MARRI)-1-11-) १४ u) १५ ) ...) मेमन मेरे बा I मामाको मायाम और सामने MAR RAHMANTHS नाय भोर भागात मिले। दाम भामर बदन्ते में पिना र मनमो से मावा मागोमा एम पी मैने । ती रेप मम पिता १ मात्र