Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai

Sachitra Mahabharat Bhasha Tika Ank-iii

Maharishi,vedvyas · 2012/08

PDF Proofread

Front matter

पृष्ठ अध्याय [ख] विषयानुक्रमणिका । विपय विषय अध्याय पृष्ठ २३. जरासन्ध और भीमसेन के मल्लयुद्ध होने का । मनुष्यों को नियत करके यज्ञ करना १६२-१६ ११४-११८ वृत्तान्त । अर्घाहरणपर्य। २४. भीमसेन द्वारा जरासन्ध वध और श्रीकृष्णजी का ३६. राजा युधिष्ठिर का यज्ञस्नान करना और भीष्म सब राजाओं को बन्धन से छुड़ा कर, पाण्डवों जी के कहने से श्रीकृष्ण जी को अर्घ्य देना सहित इन्द्रप्रस्थ को आना और पाण्डवों से विदा होकर द्वारका को चला जाना ११८-१२५ ३७. राजा शिशुपाल का श्रीकृष्णचन्द्र की पूज दिग्विजयपर्व । होते देखकर युधिष्ठिर, भीष्म और श्रीकृष्ण २५. अर्जुन भादि का चारों दिशाओं के राजाओं को जी की निन्दा करना। विजय कर बहुत साधन लाना । १२५-१२६ ३८. राजा युधिष्ठिर का शिशुपाल को समझाना २६. अर्जुन का उत्तर दिशा में अनेक राजाओं को भीम जी का शिशुपाल का तिरस्कार करना जीतकर राजा भगदत्त को युद्ध करके जीतना । १७३-१७५ १२६-१२८ ३९. श्रीकृष्ण जी की पूजा होने पर सब राजाओं क २७. अर्जुन का उत्तर दिशा में आगे जाना और क्रोध करके यज्ञ विध्वस करने की सलाह करन युद्ध करके पहाड़ी राजाओं को विजय करना। और युद्ध के लिये उपस्थित होना १७७-१७८ १२९-१३२ शिशुपालवधपर्व । २८. अर्जुन का सम्पूर्ण उत्तर दिशा को जीतकर ४० युधिष्ठिर का सब राजाओं को युद्ध के लिरे इन्द्रप्रस्थ को आना और युद्ध में जीतकर लाई तैयार देखकर भीष्म जी से उपाय पूछना, औ हुई वस्तुओं का युधिष्ठिर को अर्पण करना। भीष्म जी का श्रीकृष्ण जी की महिमा कहक १३२-१३४ युधिष्ठिर का भय दूर करना । १८०-१८६ २९. भीमसेन का पूर्व दिशा को विजय करना और ४१. राजा शिशुपाल का भीष्म की निन्दा करना चेंदि देश के राजा से कर लेकर आगे जाना । १८१-१८ १३४ -१३६ ४२. शिशुपाल के रूख वचनों को सुनकर भीमसे ३०. भीमसेन का दिग्विजय करके बहुत-सा धन का क्रोध करना और भीम का उसके को लेकर इन्द्रप्रस्थ को लौटना, और सब द्रव्य को शान्त करना। १८७-१८ युधिष्ठिर को अर्पण कर देना । १३६-१४० ४३. भीष्म जी का भीमसेन से शिशुपाल की उत्पति ३१. सहदेव के दिग्विजय का वर्णन । १४०-१४९ और श्रीकृष्ण जी से वरदान पाने का वृत्तान ३२. नकुल के दिग्विजय का वर्णन । १४९ १५२ कहना। १८९-१९ राजसूयपर्व। ४४. शिशुपाल का भीम और श्रीकृष्ण की निन्द ३३ युधिष्ठिर का यज्ञ की सब सामग्री मँगवाकर, यज्ञ करना, और शिशुपाल, भीष्म और सब राजा करने को दीक्षित होना, और सब राजा और का आपस में विवाद होना। १९२-३ ब्राह्मण आदि को निमन्त्रण भेजना १५२-१५९ ४५ श्रीकृष्ण जी का शिशुपाल के सौ अपर ३४. निमन्त्रण पाने पर युधिष्ठिर के यज्ञ में सहसों ब्राह्मणों और राजाओं का आना ।१५९-१६२ होने पर मार डालना। राजसूय यज्ञ की समाप्ति ३५. युधिष्ठिर का पृथक् पृथक कामों पर पृथक् पृथक् । सब राजाओं का और भीष्म आदि आचार्य का स्वनगरों में प्रस्थान । पाण्डवों की अनुमति हमध्याय विषयानुक्रमणिका। विषय पृष्ठ अध्याय विषय पृष्ठ श्रीकृष्णजी का द्वारका को गमन १९७-२०६ युधिष्ठिर का बहुत-साधन हारना २६२-२६६ घृतपर्व । ६२. विदुर जी का धृतराष्ट्र को समझाना २६६-२६८ व्यास जी का युधिष्ठिर से उत्पातों का फल ६३. विदुर का फिर उपदेश करना २६८-२७० कहकर चले जाना और युधिष्ठिर का शोच करना। ६४. दुर्योधन का क्रोध से विदुर जी की निन्दा २०६-२१० करना, व विदुर जी का अनेक हितकारी बातें दुर्योधन का मय सभा को देखना । उस सभा हिना । २७०-२७३ में स्थल को जल जानकर स्थल पर गिर पड़ना, ६५. युधिष्ठिर का जुए में सब राज्य और धन हारना उसपर भीमसेन, अर्जुन और द्रौपदी के किये और पीछे अपन चारों छोटे भाइयों और अपने उपहास से दुर्योधन का अपमानित होना । आप और फिर द्रौपदी को भी हार जाना । २१०-२१५ २७३-२७२ शकुनि का दुर्योधन को युधिष्ठिर पर क्रोध ६६. विदुर का दुर्योधन को उपदेश । २७९-२८१ न करने का उपदेश करना और उसके न ६७. द्रौपदी को लाने के लिये दुर्योधन का प्राति- मानने पर उसे याधष्ठिर से जुआ खेलने की कामी को भेजना। २८१-२८९ मलाह देना। २१५-२१८ ६८. द्रौपदी का वस्त्र हरण । द्रौपदी का कृिष्णनन्द्र दुर्योधन का धृतराष्ट्र के पास जाना और अपने को याद करना । विचार प्रकट करना। २८०-३०१ २१८-२२६ . धृतराष्ट्र और विदुर की बातचीत २२६--२३१ ६०. द्रौपदी का विलाप और भीष्म-वचन ३०१-३०४ दुर्योधन का यज्ञ में आई हुई भेंट का वर्णन ७०. दुर्योधन का द्रौपदी से अपना प्रश्न पाण्डवों २३१- २३५ से ही पूछने को कहना और क्रोधपूर्वक भीमसेन अन्य राजाओं की लाई हुई सामग्री का वर्णन । का उत्तर देना। ३०४-३०६ ७१. भीमसेन का प्रण व कौरवों की अनीति और दुर्योधन का और भी हाल कहना २४१-२४४ उत्पातसूचक गीदड़ों का बोलना, उस सुन धृतराष्ट्र का दुर्योधन को समझाना २४४.२४६ धृतराष्ट्र का द्रौपदी को वर देना और पाण्डवों का . दुर्योधन का प्रत्युत्तर । २४६-२४२ दास-भाव से छुटकारा होना। ३०६--३११ धृतराष्ट्र का जुए के लिये अनुमति देना । ७२. क्रोधित भीमसेन को शान्त करके युधिष्ठिर का धृतराष्ट्र के पास जाना। धृतराष्ट्र का विदुर को युधिष्टिर के पास भेजना। ७३. धृतराष्ट्र का युधिष्ठिर को समझाकर इन्द्रप्रस्थ के लिये विदा करना । .चिदुर का युधिष्ठिर के पाम जाना २५३-२५७ अनुतपर्व । रए के लिये पाण्डवों का प्रस्थान २५८-२६० ७४. दुर्योधन का धृतराष्ट्र के पास जाकर फिर युधिष्ठिर । समा में राजा धृतराष्ट्र, भीमपितामह, से जुआ खेलने के लिये अनुमति मांगना । द्रोणाचार्य आदि का आना तथा युधिष्ठिर ३१६.३२० का कौरवों से जुआ खेरना । २६१-२६२ ७५. गान्धारी का धृतराष्ट्र को समझाना ३२०-३२१ युधिष्टिर का शकुनि से जुआ दोना और ७६. युधिष्ठिर का फिर आकर जुआ खेलना और . करना। . . .

[] विषयानुक्रमणिका। अध्याय विषय अध्याय विषय पृष्ठ उसमें हार जाना। ३२२-३२५ घर ले जाना और द्रौपदी-सहित पाण्डवों का ७७. पाण्डवों का शत्रुओं को मारने के सम्बन्ध में चन जाना। ३३४..३३८ प्रतिज्ञा करके धृतगष्ट्र के पास जाना३२५-३३० विदुर, द्रोण और धृतराष्ट्र का विचार । ७८. युधिष्ठिर का भीष्मपितामह आदि सब बड़ों '३३८-३४५ से विदा मांगकर वन जाना । ३३१-३३३ ८१. पाण्डवों के वन को चले जाने पर धृतराष्ट्र का ७९. द्रौपदी का कुन्ती से विदा मांगना, कुन्ती का बड़ी चिन्ता करना । ३४५.-३४९ विलाप और विदुर जी का कुन्ती को अपने ( सभापर्व की समाप्ति तक कुल पृष्ट संख्या १४२८ हुई) . वनपर्व। आरण्यपर्व । १. हस्तिनापुर से पाण्डवों का वनगमन और नगरवासियों का शोक करना । १४२९-१४३४ २.प्राह्मणों का पाण्डवों के साथ वन को जाने को तैयार होना, युधिष्ठिर का निषेध करना और फिर ब्राह्मणों को वन के जाने का आग्रह करना, युधिष्ठिर का विकल होना और शौनक का ज्ञान उपदेश करना । १४३५.-१४४५ ३. पौम्य ऋषि का युधिष्ठिर को सूर्य की पूजा करने का उपदेश करना । युधिष्ठिर का सूर्य की तपस्या करना और सूर्य का युधिष्ठिर को वरदान देना और पाण्डवों का काम्यक वन में पहुँचना । १४४६-१४५६ ४. धृतराष्ट्र के साथ विदुर का वार्तालाप, धृतराष्ट्र का विदुर को त्यागना और विदुर का युधिष्ठिर के पास जाना। १४५६-१४५९ ५. विदुर का पाण्डयों के साथ भाषण । १४५९-१४६२ ६. पृतराष्ट्र की आज्ञा से विदुर को बुलाने के लिये समय का काम्यक वन में जाना और विदुर का फिर इम्तिनापुर में आना। १४६२-११६५ दुर्योधन, शकुनि और कर्ण की सलाह । पाण्डवों के मारने के लिये इनका जाना। १४६६-१४६८ ८. कौरव सभा में वेदव्यास मुनि का आगमन और धृतराष्ट्र के सङ्ग वार्तालाप। १४६९-१४७० ९. इन्द्र और कामधेनुका संवाद ।१४७०-१४७३ १०. पाण्डवों के पास मैत्रेय ऋषि का आना और दुर्योधन को समझा कर पाण्डवों से मिलाप करने का उपदेश करना, दुर्योधन का न मानना और मैत्रेय जी का दुर्योधन को शाप देना। १४७३-१४७८ किर्मीरवधपर्व। ११. विदुर जी का राजा धृतराष्ट्र से भीमसेन के हाथों किौर दैत्य के मारे जाने का वृत्तान्त कहना। १४७८-१४८७ अर्जुनाभिगमनपर्व । १२. पाण्डवों के दुःख का हाल सुनकर श्रीकृष्ण आदि अनेक क्षत्रिय और राजाओं का वन में पाण्डवों के पास आना, श्रीकृष्ण जी का क्रोध करना, अर्जुन का श्रीकृष्ण जी की स्तुति करना, द्रौपदी का श्रीकृष्ण जी के सम्मुम्ब विलाप करना और श्रीकृष्ण जी का द्रौपदी को धैर्य १४८७-१५०४ देना।

IrumruirinjuUTUGOOroin HINTERumororandravyuTUTUSTRATourneyTTurme सभापर्व । सभाक्रिया पर्व। प्रथमोऽध्यायः ॥ १.! ॐ ॥ नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम् देवी सरस्वती चैव ततो जयमुदीरयेत् ॥ वैशम्पायन उवाच-ततोऽब्रवीन्मयः पार्थं वासुदेवस्य संनिधौ । प्राञ्जलिः श्लक्ष्णया वाचा पूजयित्वा पुनः पुनः॥ १ ॥ अस्मात्कृष्णारसुसंरब्धात्पावकाच दिधक्षतः । त्वया त्रातोऽस्मि कौन्तेय ब्रहि किं करवाणि ते ॥ २ ॥ अर्जुन उयाच-कृतमेव त्वया सर्व स्वस्ति गच्छ महासुर । प्रीतिमान्भव मे नित्यं प्रीतिमन्तो वयं च ते ॥ ३ ॥ मय उवाच- युक्तमेतत्वयि विभो यथाऽऽत्थ पुरुपर्पभ प्रीतिपूर्वमहं किंचित्कर्तुमिच्छामि भारत अहं हि विश्वकर्मा वै दानवानां महाकविः । सोऽहं वे त्वत्कृते किंचित्कर्तुमिच्छामि पाण्डव ॥ ५ ॥ वैशम्पायन कहते है कि अर्जुन और श्रीकृष्ण हो । जाओ मैं तुममे प्रसन्न हूँ; तुम भी मुझमे दोनों का यथोचित मत्कार करके मय दानव ने मदा प्रीति का भाव रखना । मय दानव ने कहा- हाथ जोड़कर मीठी वाणी में कहा है कुन्तीन टन हे पुरुषश्रेष्ठ प्रभा ' तुमने जो कहा वह टीक है, अर्जुन ! आपने कृष्ण के विपम क्रोध और अमि परन्तु मैं प्रीतिपूर्वक तुम्हाग कुछ उपकार करना की भयानक ज्वाला मे मुझको बचा लिया है । इम चाहता हूँ ॥३॥४॥ फारण, मै, बदले में, आपका कुछ उपकार करना मैं शिल्पकार्य में बड़ा चतुर और दानवों का चाहना है ॥१२॥ विश्वकर्मा हूँ, इमी हेतु आप के लिये कुछ करना अर्जुन ने कहा -हे महावीर ! तुमने इतना कहा चाहता हूँ । अर्जुन ने कहा कि तुम मृत्यु के मुँह तो मानों मुझे सब कुछ मिल गया । तुम्हारा भला मे वच जाने के कारण बदले में उपकार करना TOTALIA TAINME TAITHAINMITTETTIME TATTA IMALLITETTLIMITRATTITLTKULE म हा भारत [ सभापर्व Mostomuraru are THENTOrovernormonMETREETCOM M DELIAMAITRILLIONILIALI - अर्जुन पाच-प्राणकृच्छाद्विमुक्तं त्वमात्मानं मन्यसे मया एवं गते न शक्ष्यामि किंचित्कारयितुं त्वया ॥ ६ ॥ न चापि तव संकल्पं मोघमिच्छामि दानव । कृष्णस्य क्रियतां किंचित्तथा प्रतिकृतं मयि ॥ ७ ॥ चोदितो वासुदेवस्तु मयेन भरतर्षभ मुहूर्तमिव संध्यौ किमयं चोद्यतामिति ततो विचिन्त्य मनसा लोकनाथः प्रजापतिः । चोदयामास तं कृष्णः सभा वै क्रियतामिति ॥ ९ ॥ यदि त्वं कर्तुकामोऽसि प्रियं शिल्पवतां वर । धर्मराजस्य दैतेय यादृशीमिह मन्यसे ॥ १० ॥ यां कृतां नाऽनुकुयुर्हि मानवाः प्रेक्ष्य धिष्टिताः। मनुष्यलोके सकले तादृशी कुरु वै सभाम् ॥ ११ ॥ यत्र दिव्यानभिप्रायान्पश्येम हि कृतांस्त्वया । आसुरान्मानुपांश्चैव सभां तां कुरु वै मय ॥ १२॥ वैशम्पायन उयाच-प्रतिगृह्य तु तद्वाक्यं संप्रहृष्टो मयस्तदा विमानप्रतिमा चके पाण्डवस्य शुभां सभाम् ॥ १३ ॥ ततः कृष्णश्च पार्थश्च धर्मराजे युधिष्टिरे सर्वमेतत्समावेद्य दर्शयामासतुर्मयम् ॥ १४ ॥ चाहते हो. मी दगा में में तुममे कोई कार्य वह मभा मी हो कि जिम देखकर पृथ्वी भर रगना नहीं चाहता । किन्तु यह भी मेरी इच्छा म रोई दमरा मनुष्य मी न बना सके और नहीं कि तुम्हारी कल्पना व्यर्थ हो । तुम श्रीकृष्ण निमम दिव्य आमुर और मानी बनावटी की मय गा कोर्ट कार्य पर दो उमी मे मंग प्रत्युपकार हो प्रकार की चतुम्ता दीख पडे ॥११॥१॥ नायगा । अर्जुन की आजा में जब मय दानव ने वंशम्पायन ने कहा है राजा जनमेजय ' वृष्ण यासुदेव में प्रार्थना गरी नब उन्होंने थोड़ी देर तक T आना पारर मय दानर को बड़ी प्रसन्नता हुई। मोनार है गिन्य दम दानर ' यदि तुम्हें उमने महाराज युधिष्टिर रे रिय विमान-महा मंग प्रिय कने बड़ी इच्छा है नो तुम युधिष्ठिर मुन्दर देगनेयोग्य मभा पनाने सा विचार किया। र नियमानी नानुमार पर ममा चना अब श्रीरण और अर्जुन मय दानव को युधिष्ठिर L-HTTTTTTTTAprimarianARTHALALIMIMINALIATILIZEN-MAIL.ना । communior TETTITUTE TIMEIO अध्याय २ महा भारत ३ vommeropanoramod । RITUTTET LOCADAMERADIOLARAMATACTOILLIAMLOOO. तस्मै युधिष्ठिरः पूजां यथार्हामकरोत्तदा स तु तां प्रतिजग्राह मयः सत्कृत्य भारत ॥१५॥ स पूर्वदेवचरितं तदा तत्र विशांपते कथयामास देतेयः पाण्डुपुत्रेषु भारत स कालं कंचिदाश्वस्य विश्वकर्मा विचिन्त्य तु । सभा प्रचक्रमे कर्तुं पाण्डवानां महात्मनाम् ॥ १७ ॥ अभिप्रायेण पार्थानां कृपणस्य च महात्मनः । पुण्येऽहनि महातेजाः कृतकोतुकमङ्गलः तर्पयित्वा द्विजश्रेष्ठान्पायसेन सहस्रशः धनं बहुविधं दत्वा तेभ्य एव च वीर्यवान सर्वर्तुगुणसंपन्नां दिव्यरूपां मनोरमाम् दशकिकुसहस्रान्तां मापयामास सर्वतः ॥ २० ॥ इति श्रीमन्महाभारते मभापर्वणि ममाक्रियापर्वणि मभास्थाननिर्णये प्रथमोऽध्यायः ॥ १॥ के पास ले गये उन्होंने मत्र वृत्तान्त कहकर मय अनुमार म्वम्त्ययन-मङ्गल के उपरान्त शुभ दानव मे उनका परिचय कराया । महाराज युधिष्ठिर दिन में सहस्रों ब्राह्मणों को बार ग्विलाई और ने भय का यथोचित मन्कार किया। उमने वह दक्षिणा दी, फिर दम हज़ार हाथ के घेरे में सभा पूजा म्वीकार करके कुछ समय तक विश्राम किया भवन का स्थान मापा । टमरे पश्चात वह सब और विन्दु मगेवर में वृषपर्वा दानव के यज्ञ करने ऋतुओं में मुग्व देनेवाली सुन्दर सभा बनाने लगा। का वृत्तान्त पायों को सुनाया। इसके अगस्त ॥१११॥ मय दानव ने महात्मा श्रीकृष्ण और पाण्डवों की सभापर्व का पहला अध्याय समाप्त हुआ । । अथ द्वितीयोऽध्यायः ॥3॥ पैशम्पायन पाच-उपित्वा खाण्डवप्रस्थे सुखवासं जनार्दनः । पार्थः प्रीतिसमायुक्तैः पूजनार्दोऽभिपूजितः ॥ १ ॥ दृमरा अध्याय ॥३॥ पाण्टयों के स्नेह और भत्ति पूर्ण प्रजा में प्रसन्न मे रहे। इसके पश्चात पिता के दर्शन करने की कृष्णचन्द्र कुछ ममय तक खाण्डवग्रन्थ में बड़े मुम्ब उन्होंने जाने की इच्छा प्रकट की। जगत् पूज्य MHATRISAnayamamarponamnatamnnamorwATITLEMONETERMITTEE म हा भारत [ सभापर्व 20 Prerna TiruruTurmerumore rouT Trurnaro trimurthirurture । गमनाय मतिं चक्रे पितुर्दर्शनलालसः धर्मराजमथाऽऽमन्त्र्य पृथां च पृथुलोचनः ॥ २ ॥ ववन्दे चरणौ मूर्धा जगद्वन्द्यः पितृष्वसुः स तया मूर्युपाघ्रातः परिष्वक्तश्च केशवः ददर्शाऽनन्तरं कृष्णो भगिनी स्वां महायशाः । तामुपेत्य हृषीकेशः प्रीत्या वाष्पसमान्वितः अयं तथ्यं हितं वाक्यं लघु युक्तमनुत्तरम् उवाच भगवान्भद्रां सुभद्रां भद्रभापिणीम् तया स्वजनगामीनि श्रावितो वचनानि सः संपूजितश्चाऽप्यसकृच्छिरसा चाऽभिवादितः तामनुज्ञाप्य वार्ष्णेयः प्रतिनन्द्य च भामिनीम् । ददर्शाऽनन्तरं कृष्णां धौम्यं चापि जनार्दनः ॥ ७ ॥ ववन्दे च यथान्यायं धोम्यं पुरुपसत्तमः द्रौपदी सान्त्वयित्वा च आमन्त्र्य च जनार्दनः ॥ ८ ॥ भ्रातृनभ्यगमद्विद्वान्पार्थेन सहितो वली भ्रातृभिः पञ्चभिः कृष्णो वृतः शक्र इवाऽमरैः ॥ ९ ॥ यात्राकालस्य योग्यानि कर्माणि गरुडध्वजः कर्तुकामः शुचिर्भूत्वा स्नातवान्समलकृतः ॥ १०॥ पद्मनेत्र, श्रीकृष्ण ने धर्मराज युधिष्ठिर और पृथा वृष्णिवशी श्रीकृष्ण ने यहन का उचित आदर (कुन्ती) को सम्मानित कर अपनी बुआ के पाय छुए । कर द्रौपदी और धौम्य से भेंट की यथोचित पूजा उन्ती ने सिर चूमकर उनको छाती से रगा लिया। कर द्रौपदी को सम्मानित किया और अच्छीतरह इसके पश्चात् भगवान् हपिश सुभाषिणी रहन से समझाया। फिर वे अर्जुन के साथ यहा मे सुभद्रा के पास गये । उनकी आँखों में आँसू भर युधिष्ठिर आदि चारा पाण्टयों के पास गये । इन्द्र आये । उन्होंने यथार्थ, हितरारी, थोड़े गळवाले, जिस प्रकार देवनाओं से धेरै जाते हैं यमे ही यदु अम्बण्डनीय वचनों से बहन को दाइस नंधाया । श्रेष्ठ महापरी श्रीकृष्ण पाच माझ्या मे घरे मुभद्रा ने भी पिना, माता, म्यनन आदि के लिय सहेमा गये ॥७॥ कहकर कृष्ण का पूजन और प्रणाम किया ॥१॥ यानाकार में क्येि जाने योग्य कर्म करने की । SHARMAHATAINDAmATHARAMINIMINATIONALANDALALITANAMANNAINADIANT STATEMAIYATREET LTIMATERIALणा गाITTARTMEN अध्याय २] महाभारत TUTOpeniuomountabu DURUITruOUTDOOT ITrror अर्चयामास देवांश्च द्विजांश्च यदुपुङ्गवः माल्यजाप्यनमस्कारैर्गन्धरुच्चावचैरपि ॥ ११ ॥ स कृत्वा सर्वकार्याणि प्रतस्थे तस्थुषां वरः उपेत्य स यदुश्रेष्ठो वाह्यकक्षां विनिर्गतः स्वस्तिवाच्याऽहतो विप्रान्दधिपात्रफलाक्षतः वसु प्रदाय च ततः प्रदक्षिणमथाऽकरोत् ॥ १३ ॥ काञ्चनं रथमास्थाय ताय॑केतनमाशुगम् गदाचक्रासिशााद्यैरायुधैरावृतं शुभम् ॥ १४ ॥ तिथावप्यथ नक्षत्रे मुहूर्ते च गुणान्विते प्रययौ पुण्डरीकाक्षः शैव्यसुग्रीववाहनः ॥ १५॥ अन्वारुरोह चाऽप्येनं प्रेम्णा राजा युधिष्ठिरः । अपास्य चाऽस्य यन्तारं दारुकं यन्तृसत्तमम् ॥ १६ ॥ अभीपून्संप्रजग्राह स्वयं कुरुपतिस्तदा उपारुह्याऽर्जुनश्चापि चामरव्यजनं सितम् ॥ १७॥ रुक्मदण्डं बृहद्वाहुर्विदुधाव प्रदक्षिणम् तथेव भीमसेनोऽपि यमाभ्यां सहितो वली ॥१८॥ इच्छा से अब श्रीकृष्ण ने म्नान किया और अनेक ! सुशोभित, शीघ्रगामी, सुग्रीव आदि चार घोड़ेवाले प्रकार के गहने पहने । इसके पश्चात् उन्होंने माला, सुवर्णमय रथ पर चढ़कर शुभ दिन, नक्षत्र और शुभ मन्त्र, नमस्कार और नाना प्रकार के मुगन्धित । मुहूर्त में पधारे ॥१४॥१५॥ पदार्थों के द्वारा देवताओं की पूजा की । अब सब । तत्र म्नेह के मारे कुरुनाथ युधिष्ठिर ने सारथी कार्य समाप्त करके, अपने नगर को जाने के लिये से हट जाने के लिये कहा। वे आप रथ पर जा घर से निकलकर कृष्णचन्द्र बाहर की ड्योढ़ी पर बैठे और रास पकड़कर घोड़ों को हाँकने लगे। आय । वहां आशीर्वाद देनेवाले ब्राह्मण दधि भरे | दीर्घमुज अर्जुन मी उमी रथ पर कृष्ण को दाहिनी पात्र, फूल और चावल आदि सगुन की धातुएँ ! ओर बैठकर सुवर्ण-दण्ड-युक्त श्वत चैवर हिलाने हाथ में लिये खड़े थे । वासुदेव ने धन देकर लगे । महापराक्रमी भीमसेन, पुरोहित, ऋत्विज उनकी प्रदक्षिणा की ॥१०॥१३॥ लोग, नकुल और सहदेव सब उनके पीछे-पीछे फिर गदा, चक्र, ग्वड्ग, धनुप आदि अनेक ! चलने लगे । शत्रुनाशी कृष्ण पोछे-पीछे पाण्टव अस्त्रों में मज हुए कृष्णचन्द्र गरुड़ को वजा से | उसी तरह चले जैसे शिष्य लोग गुरु के पीछे -- METIMILAIRamommaNETITION TETHOULTIOLATAYITTONTATOPATIALA म हा मारत [ सभापर्व Torrupurna yurverruireonomoure Tomomdamoure - TOLAST Thapore! wwwmaANEVAGRALEAVELEMEDIEnatantanuTOMERITUTSETTE - पृष्टतोऽनुययौ कृष्णमृत्विक्पोरजनैः सह स तथा भ्रातृभिः सर्वैः केशवः परवीरहा ॥ १९ ॥ अन्वीयमानः शुशुभे शिष्यैरिव गुरुः प्रियः पार्थमामन्त्र्य गोविन्दः परिष्वज्य सुपीडितम् ॥ २० ॥ युधिष्ठिरं पूजयित्वा भीमसेनं यमौ तथा परिप्वक्तो भृशं तैस्तु यमाभ्यामभिवादितः ॥ २१ ॥ योजनार्धमथो गत्वा कृष्णः परपुरञ्जयः युधिष्ठिरं समामन्त्र्य निवर्तस्वेति भारत ततोऽभिवाद्य गोविन्दः पादौ जग्राह धर्मवित् । उत्थाप्य धर्मराजस्तु मूर्युपाघ्राय केशवम् ॥ २३ ॥ पाण्डवो यादवश्रेष्टं कृष्णं कमललोचनम् गम्यतामित्यनुज्ञाप्य धर्मराजो युधिष्ठिरः ॥ २१ ॥ ततस्तेः संविदं कृत्वा यथावन्मधुसूदनः निवर्त्य च तथा कृच्छात्पाण्डवान्सपदानुगान् ॥२५॥ स्वां पुरी प्रययौ हृष्टो यथा शक्रोऽमरावतीम् । लोचनैरनुजग्मुस्ते तमादृष्टिपथात्तदा ॥ २६ ॥ मनोभिरनुजग्मुस्ते कृष्णं प्रीतिसमन्वयात् अतृप्तमनसामेव तेषां केशवदर्शने ॥ २७॥ चलते हैं । उम ममय उनकी अपूर्व शोभा हुई । कहा कि आप लोट जायें और उनके पाय हुए। ॥१६॥२०॥ परों पर पड़े हुए यादवश्रेष्ट कमललोचन कृष्ण को अनन्तर कृष्ण ने अर्जुन को बड़े प्रेम से गले उठाकर युधिष्ठिर ने म्नेह के साथ उनके माथे को एगावर युधिष्ठिर और भीममेन की पूजा की और संपा और उन्हें पर जाने की आज्ञा ठी ।।२१।२४॥ नयुल और सहदेय को भी गले लगाकर प्यार अब पाण्डवों मे अनेक प्रतिज्ञाएँ करके, पट्टी किया । युधिष्ठिर आदि ने भी श्रीकृष्ण को गले फठिनाई से उन्हें लौटायर, अमरावती को जा रहे एगाया। फेयल दोनों माद्री युमारों ने उनको इन्द्र की तरह कृष्ण द्वारका को रवाना हुण । जहाँ प्रणाम किया। इस प्रकार दो कोस चलेन पर तक दृष्टि काम करती थी यहाँ तक युधिष्ठिर आमि शत्रुदमन श्रीकृष्ण ने युधिष्टिर को पुकार कर यह मर भाई बड़े-बड़े रथ की धूल को दम्पते रहे। LATIOTrnama RTOTCOICTITLECTIOLETIONATAIMIMITATIOmmacaITAMBINITION अध्याय २ ] महा भारत MuTITTEFOTUOTomorrour TUUUOTE Tarurotrorancueurs LALITAMAT - 2TITALIMITI, । । HOMNATIONAL क्षिप्रमन्तर्दधे शौरिश्चक्षुपां प्रियदर्शनः अकामा एव पार्थास्ते गोविन्दगतमानसाः ॥ २८ ॥ निबृत्योपययुस्तूर्णं स्वपुरं पुरुषर्षभाः स्यन्दनेनाऽथ कृष्णोऽपि त्वरितं द्वारकामगात् ॥ २९ ॥ सात्वतेन च वीरेण पृष्टतो यायिना तदा दारुकेण च सूतेन सहितो देवकीसुतः स गतो द्वारकां विष्णुर्गरुत्मानिव वेगवान् ।॥ ३० ॥ वेशम्पायन उवाच-निवृत्य धर्मराजस्तु सह भ्रातृभिरच्युतः सुहृत्परिवृतो राजा प्रविवेश पुरोत्तमम् ॥ ३१ ॥ विसृज्य सुहृदः सर्वान्भ्रातृन्पुत्रांश्च धर्मराट् । मुमोद पुरुषव्याघ्रो द्रौपद्या सहितो नृप ॥ ३२ ॥ वैशम्पायन उवाच-केशवोऽपि मुदा युक्तः प्रविवेश पुरोत्तमम् । पूज्यमानो यदुश्रेष्ठरुग्रसेनमुखैस्तथा ॥ ३३॥ आहुकं पितरं वृद्धं मातरं च यशस्विनीम् अभिवाद्य बलं चैव स्थितः कमललोचनः ॥ ३४॥ प्रद्युम्नसाम्वनिशठांश्चारुदणं गदं तथा अनिरुद्धं च भानुं च परिष्वज्य जनार्दनः स वृद्धेरभ्यनुज्ञातो रुक्मिण्या भवनं ययौ मयोऽपि स महाभागः सर्वरत्नविभूपिताम् विधिवत्कल्पयामास सभां धर्मसुताय वे इनि श्रीमन्महाभारते सभापगि ममानियापर्वणि भगवयाने द्वितीयोऽध्याय ॥॥ धारे धीरे ग्थ नजर में गायब हो चला । अपाण्डव वशम्पायन ने कग हे राजा जनमेजय । घर क्या करते - निराश होकर व अंडे कष्ट में अपनी बन्यु-आन्धयां के माथ महाराज युधिष्ठिर अपने नगर नगरी मोरोट ॥२०॥ में पहुंचे मन भाटया और पन्धु-बान्धवा को विदा गरड़ममान बैग मे चरनवाले रथ परदारक को वे द्रोपदी के साथ आनन्द करने लगे । उधर सारी और मात्वत के माथ बटे हुए कृष्ण श्रीध कमरनेत्र केशव भी प्रसन्नता-पूर्वर द्वारका पुर्ग में ही द्वारका के समीप पहुंच गये ॥२०॥३०॥ पहुँचे । उग्रमेन आदि श्रेष्ठ यादवों ने उनकी पूजा PROVODONLINITISETTETuuuuumm । INTIMORRH LammEmauRITHILILLADITLETLILIIIEILITIELTIMILIATI महाभारत [ सभापर्व momurbaruputr TouTuoumitTOULTouctrou । । की । कृष्ण ने वृद्ध पिता वासुदेव जी, यशस्विनी । गद, आनिरुद्ध, भानु आदि पुत्रों को गले से लगाया। माता और बडे भाई बलदेव जी को प्रणाम किया । फिर वृद्धों की आज्ञा लेकर वे रुक्मिणी के भवन । इसके पश्चात् प्रद्युम्न, साम्ब, निशठ, चारदेष्ण, में गये ॥३१॥३६॥ सभापर्व का दूसरा अध्याय समाप्त हुआ । अथ तृतीयोऽध्यायः ॥३॥ बदाम्पायन उवाच-अथाऽब्रवीन्मयः पार्थमर्जुनं जयतां वरम् आपृच्छे त्वां गमिष्यामि पुनरेष्यामि चाऽप्यहम्॥ १ ॥ उत्तरेण तु कैलासं मैनाकं पर्वतं प्रति यियक्षमाणेपु पुरा दानवेषु मया कृतम् चित्रं मणिमयं भाण्डं रम्यं विन्दुसरः प्रति सभायां सत्यसन्धस्य यदासीदवृषर्पवणः आगमिष्यामि तद् गृह्य यदि तिष्ठति भारत ततः सभा करिष्यामि पाण्डवस्य यशस्विनीम् ॥ ४ ॥ मनः प्रह्लादिनी चित्रां सर्वरत्नविभूपिताम् अस्ति विन्दुसरस्युग्रा गदा च कुरुनन्दन निहिता भावयाम्येवं राज्ञा हत्वा रणे रिपून् । सुवर्णविन्दुभिश्चित्रा गुर्वी भारसहा दृढा तीमरा अध्याय ॥३॥ वैशम्पायन ने कहा, कि अनन्तर मय दानव ने बढ़ानेवाली, मन को हर रेनेवालग मर्व ग्नो मे अर्जुन से कहा है महाभाग में आपमे जाने को मुहायनी, बड़ी विचित्र, प्रशमनीय मभा बनाऊँगा। आना चाहता है । अभी लंट आऊँगा। पहले हे कुरुनन्दन ! जान पडता है कि उम विन्दु मरोवर बगा पन के उत्तर तट पर स्थित मेनार पर्यन में एक बड़ी कठोर गदा भी पड़ों है ॥१५॥ निस्ट. नि.दु मरांवर में पाम, दानयो रे यज्ञ राजा यूपपीन लभ गदाओं के ममान यहाभार वग्ने । अवसर पर में जो पिचिर परम रमणीय महने योग्य सुपर्ण विन्दु जटित गनागिनी उम मणिमय मामग्री गया था उममे भने मन्य प्रनिता कठोर गहा मे मनुआ को मारकर उमे यहा गाट पारे दानवराज पपा ममा बनाई थी । यदि रस्या है। गाण्टीव जमे आपके योग्य है या गदा या मामग्री पनी अमीना विद्यमान है तो ममनार भी नही भीममेन में योग्य है। और यरण जी गरने समय उस पाउंगा और भासी या का देवदा नामक यहुन यजनवारा यहा भाग marrmation.TIERTAITRINCETAMITICTETaare अध्याय ३] म हा भारत Turu पायomroomupuraTamumudioTTTTTTTTTTTTTTTETTE । - TIMILAIGuerrarusum सा वै शतसहस्रस्य संमिता शत्रुधातिनी अनुरूपा च भीमस्य गाण्डीवं भवतो यथा ॥ ७ ॥ वारुणश्च महाशंखो देवदत्तः सुघोपवान् सर्वमेतत्प्रदास्यामि भवते नात्र संशयः इत्युक्त्वा सोऽसुरः पार्थं प्रागुदीची दिशं गतः। अथोत्तरेण कैलासान्मैनाकं पर्वतं प्रति हिरण्यशृङ्गः सुमहान्महामणिमयो गिरिः रम्यं विन्दुसरो नाम यत्र राजा भगीरथः द्रष्टुं भागीरथीं गङ्गामुवास बहुलाः समाः यथेष्टं सर्वभूतानामीश्वरेण महात्मना आहृताः क्रतवो मुख्याः शतं भरतसत्तम यत्र यूपा मणिमयाश्चैत्याश्चापि हिरण्मयाः ॥ १२ ॥ शोभार्थं विहितास्तत्र न तु दृष्टान्ततः कृताः । यत्रेष्ट्वा स गतः सिन्दिः सहस्राक्षः शचीपतिः ॥ १३ ॥ यत्र भृतपतिः सृष्ट्वा सर्वांल्लोकान्सनातनः उपास्यते तिग्मतेजाः स्थितो भूतैः सहस्रशः ॥ १४ ॥ नरनारायणौ ब्रह्मा यमः स्थाणुश्च पञ्चमः उपाप्तते यत्र सत्रं सहस्रयुगपर्यये ॥ १५॥ शंग्य भी उस सरोवर में हैं। वह भी नि सन्देह , श्रेष्ठ ! उस स्थान में मर्व भूतों के अधीग इन्द्र जी आपको लाकर दूगा ॥६॥८॥ ने सो महायज किये थे। यज्ञ-कर्म के साक्षी-म्वरूप वह असुर अर्जुन से ऐसा कहकर पूर्वोत्तर दिशा अनेकों माणमय यूप ( खम्भे ) और सुवर्णमय चैत्य को गया । कैलास के उत्तर और मैनाक पर्वत के उस प्रदेश की शोभा बढ़ा रहे हैं। वे कहीं की निकट पहुँचकर मय दानव ने सुवर्ण के शिखरों से । नाल नहीं है । यहीं यन करने मे सहस्रनयन इन्द्र गोभित मणिमय एक ऊँचा पहाड देवा । सुन्दर को सिद्धि मिली है ॥९॥१३॥ विन्दु सरोवर उसी पहाड़ पर है । राजा भगीरथ ने अति तेजम्वी सनातन भूननाथ महादेव सर भगवती भागीरथी के दर्शन के लिये बहुत दिनों लोकों को रचकर उस स्थान में विराजमान होकर तक दमी पर्वत पर रहकर तप किया था। हे भरत- सहस्रों भूतों से पूजे जाते हैं । उस स्थान में नर । UMEHATAMummaNDIDATERMERACTICTIA MINILIYOKALALILIMITI १० म हा भारत [ सभापर्व HTIONARUTTYOUrom TITUALITTuuuuNTOHTTPURayaryana - reOUTUTE यत्रेष्टं वासुदेवेन सत्रैर्वर्षगणान्वहून श्रद्दधानेन सततं धर्मसंप्रतिपत्तये ॥ १६ ॥ सुवर्णमालिनो यूपांश्चैत्यांश्चाऽप्यति भास्वरान् । ददौ यत्र सहस्राणि प्रयुतानि च केशवः ॥ १७॥ तत्र गत्वा स जग्राह गदां शंखं च भारत स्फाटिकं च सभाद्रव्यं यदासीवृषपर्वणः ॥१८॥ किंकराः सह रक्षोभिर्यदरक्षन्महद्धनम् तदग्रह्णान्मयस्तत्र गत्वा सर्व महासुरः ॥ १९ ॥ तदाहृत्य च तां चक्रे सोऽसुरोऽप्रतिमा सभाम् । विश्रुतां त्रिषु लोकेषु दिव्यां मणिमयी शुभाम् ॥ २० ॥ गदां च भीमसेनाय प्रददौ प्रवरां तदा देवदत्तं चाऽर्जुनाय शहप्रवरमुत्तमम् ॥ २१ ॥ यस्य शङ्खस्य नादेन भूतानि प्रचकम्पिरे सभा च सा महाराज शातकुम्भमयद्रुमा ॥ २२॥ दशकिप्कुसहस्राणि समन्तादायताऽभवत् यथा बहर्यथाऽर्कस्य सोमस्य च यथा सभा ॥ २३ ॥ भ्राजमाना तथाऽत्यर्थं दधार परमं वपुः नारायण ब्रह्मा, यम आर रद्र महला युगों के अन्त धन यथ ओर गक्षस रोगी की रखवारी में था उम होने पर यज्ञ किया करते है ॥१४॥१५॥ महामुर ने वहा जाकर वह भा ले लिया । वह मर वासुदेव केगव ने धर्म स्थापन करने के लिये मामग्रा रेफर मय दानव अर्जुन के पास गया और उस स्थान में बहुत चर्को तर सदा श्रद्धा-सहित उस सामग्री के द्वारा अद्भुत अपूर्व तीनों रोको यन किया था और उम म्यान में उन्होंने सुवर्ण में प्रगमित मणिमय सभा भवन बनाने में लग मारा-युक्त युप नमसीले चैत्य और दूसरी महतो गया ॥१८॥२०॥ पनी हुई वस्तु दान दी थी ॥१६॥१७॥ अर्जुन को देवदत्त गस आर भीम को उमने हे भरतनन्दन मय दानव ने वहा नापर गढा दे दी। देवदत्त ग्रह के गल में त्रिभुवन पपर्या की गढा गग्य और ममा बनाने के योग्य गंन उठने थे । दश हजार हाथ के घरेवारी वह जितनी म्पटिन यी मामी थी मर रे हैं। जो ममा देखने योग्य बनी । उमम मान के पंड थे। PIRITATE TITOTALATTIMEITTETMENTATTITUTHORTHAILI -LUTION । TATI म हा भारत अध्याय ३ ] AniruMOTO ranROSCOMEmporiuTGTrumuTINOR । । MammTERSucunaगायब VITAMANDALLANTEANDARA । - अभिन्नतीव प्रभया प्रभामर्कस्य भास्वराम् ॥ २४॥ प्रवभो ज्वलमानेव दिव्या दिव्येन वर्चसा नवमेघप्रतीकाशा दिवमावृत्य विष्ठिता आयता विपुला रम्या विपाप्मा विगतलमा उत्तमद्रव्यसंपन्ना रत्नप्राकारतोरणा ॥ २६॥ बहुचित्रा बहुधना निर्मिता विश्वकर्मणा न दाशाहीं सुधर्मा वा ब्रह्मणो घाऽथ तादृशी ॥ २७ ॥ सभा रूपेण संपन्ना यां चक्रे मतिमान्मयः तां स्म तत्र मयेनोक्ता रक्षन्ति च वहन्ति च ॥ २८ ॥ सभामष्टौ सहस्राणि किंकरा नाम राक्षसाः अन्तरिक्षचरा घोरा महाकाया महावलाः ॥ २९ ॥ रक्ताक्षाः पिङ्गलाक्षाश्च शुक्तिकर्णाः प्रहारिणः । तस्यां सभायां नलिनी चकाराऽप्रतिमां मयः ॥ ३० ॥ वैदूर्यपत्र विततां मणिनालमयाम्बुजाम् पद्मसौगन्धिकवती नानाद्विजगणायुताम् ॥३१॥ पुष्पितैः पङ्कजेश्चित्रां कूमर्मत्स्यैश्च काञ्चनेः चन्द्रमा, अमि और सूर्य की सभा के समान वह लालनेत्र, पिङ्गलनत्र, शुक्तिकर्ण, अम्ब लिये हुए सभा अपने प्रकाश मे मानों सूर्य के तेज को भी आठ हजार किङ्कर नामक भयायने राक्षस मय- फीका कर रही थी। दिव्य प्रभाग से वह दिव्य दानव की आज्ञा से सभा की रखवाली करने और सभा आग के देर के समान प्रज्वलित सी हो रही सामान लाने लगे थे। उस सभा में मय दानव ने थी। यह इतनी ऊँची थी मानों आकाश-मण्डल चित्त को आश्चर्य में डाल देनेवाला, म्वच्छ जल को छू लेगी । वास्तव में सब कार्यों में दक्ष सुमति से भरा, एक वडा सरोवर बना दिया था। उस मय ने जैमी लम्बी चौड़ी अति निर्मल , थकावट सरोवर में मणि जटित सुनहले वृक्ष सुहाते थे और मिटानेवाली मनोहररूपिणी अनेक चित्रो से सुहावनी भाति-माति के पक्षी क्लोल कर रहे थे । सोने की रत्नजटित बहुमूल्य सभा बनाई, वैसी न तो श्रीकृष्ण मछलियाँ और कच्छवे उस सरोवर में थे जिससे की, न ब्रह्मा जी की, न और क्मिी देवता की थी वह बड़ा विचित्र लगता था । चारों ओर विस्तृत, ॥२१॥२७॥ विचित्र, म्फटिक की सीढ़ियाँ देखने से देखनेवालों आकाश में उड़नेवाले महाबली मारी देहधारी के नेत्र और मन मुग्ध हो जाते थे। मोती-सदृश - M TM TIMIMILSINA T TIMILAIMIMILITAMACHARYANA महा मारत । समापन muTOOTOUT rartouTITION narrormTITLonce CILITED LamaapmanAmangananaopammamTWAMIATE चित्रस्फटिकसोपानां निष्पङ्कसलिलां शुभाम् ॥ ३२ ॥ मन्दानिलसमुद्भूतां मुक्ताविन्दुभिराचिताम् । महामणिशिलापट्टवद्धपर्यन्तवेदिकाम् ॥ ३३ ॥ मणिरत्नचितां तां तु केचिदभ्येत्य पार्थिवाः दृष्ट्वाऽपि नाऽभ्यजानन्त तेऽज्ञानात्प्रपतन्त्युत ॥ ३४ ॥ तां सभामभितो नित्यं पुष्पवन्तो महाद्रुमाः आसन्नानाविधा नीलाः शीतच्छाया मनोरमाः ॥ ३५॥ काननानि सुगन्धीनि पुष्करिण्यश्च सर्वश. हंसकारण्डवोपेताश्चक्रवाकोपशोभिताः जलजानां च पद्माना स्थलजानां च सर्वशः मारुतो गन्धमादाय पाण्डवान्स्म निषेवते ॥ ३७॥ ईदृशी तां सभां कृत्वा मासैः परिचतुर्दशैः निष्ठितां धर्मराजाय मयो राजन्न्यवेदयत् ॥ ३८ ॥ इति श्रीमन्महाभारते मभापर्वणि मभाशयापर्वणि मभानिर्माण तृतीयाऽध्याय ॥३॥ जल विन्दुओं से गोमिन उस सरावर में बहुत ही उस सभा भवन के चारों ओर तरह-तरह के म्वच्छ जल भरा हुआ था | चारों ओर का फर्ग, पल फूलवाले, नाले, शीतल छायावाले अनेक भाति मणिमय होने के कारण, अद्भुत शोभा दे रहा के मन हरनेवाले वृक्ष आर सुगन्धित वन तथा हँस था। हँस, कारण्डव, सारम, वगरे, चक्रवाक आदि चकवों से भरे तालाब इधर उधर सुहाते थे । जल में जरचर जीव किनारे और जर के भीतर विचरते उपने क्मरों की तथा स्थल में उपजे कमल विगेप हुए दर्शकों के मन को मोहित कर लेते थे । मोतियों (गुराप) का सर सुगन्ध लेकर वायु, पाण्डवा और रत्ना से पूर्ण होने के कारण कुछ राना आते की सेवा किया करती थी । मयासुर ने चौदह महाने जाते समय सामने देखकर भी ममझ न सक्ते थे में ऐसी अपूर्व अद्भुत रमणीय सभा बनाई और कि यह सरोवर है और इमी कारण उसमें गिर फिर महारान युधिष्ठिर के पास जाकर सभा वनकर भी पड़ते थे ॥२८॥३४॥ तयार हो जाने की सूचना दी ॥३॥३८॥ मभापर्व का तीसरा अध्याय ममाम हुआ । अथ चतुर्थोऽध्याय ॥४॥ यशम्पायन उवाच-ततः प्रवेशनं तस्यां चक्रे राजा युधिष्ठिरः अयुतं भोजयित्वा तु ब्राह्मणानां नराधिपः ProvincarmTUPLEARRECIPE . TUMAntiIUImantra MeaniTimror.TransranamITTER RTHDAMOMMIDTEMATIMILITATIOMMITTomamIITNITIATIMES अध्याय ४ ] महा मारत momsMinGMADRID TRONITOO HamrouTOTTurbur TIHAR - touTMVIII.RLDICIRRIALIZERempeamvir mrtml साज्येन पायसेनैव मधुना मिश्रितेन च भक्ष्यैर्मूलैः फलैश्चैव मांसाराहहारिणः कृसरणाऽथ जीवन्त्या हविष्येण च सर्वशः मांसप्रकारैर्विविधैः स्वाद्यैश्चापि तथा नृप ॥ ३ ॥ चोप्यैश्च विविधै राजन्पेयेश्च बहुविस्तरैः अहतैश्चैव वासोभिर्माल्यरुच्चावचेरपि तर्पयामास विप्रेन्द्रान्नानादिग्भ्यः समागतान् । ददौ तेभ्यः सहस्राणि गवां प्रत्येकशः पुनः ॥ ५ ॥ पुण्याहघोपस्तत्राऽऽसीदिवस्पृगिव भारत वादिर्विविधैदिव्यैर्गन्धैरुच्चावचैरपि पूजयित्वा कुरुश्रेष्टो देवतानि निवेश्य च तत्र मल्ला नटा झल्लाः सूता वेतालिकास्तथा । उपतस्थुमहात्मानं धर्मपुत्रं युधिष्ठिरम् तथा स कृत्वा पूजां तां भ्रातृभिः सह पाण्डवः । तस्यां सभायां रम्यायां रेमे शको यथा दिवि ॥ ८ ॥ सभायामृपयस्तस्यां पाण्डवैः सह आसते आसांचकुर्नरेन्द्राश्च नानादेशसमागताः चौथा अध्याय ॥४॥ यशम्पायन ने कहा, कि अनन्तर राजा युधिष्ठिर है भरतनन्दन उम ममय यह ध्वनि कि ने मधु, घृत, और दूध मिला हुआ अन्न तरह-तरह आज कमा गुम दिन है आकाश में गूंजने लगी। के फल मूल और हिरण, मुअर नादि के माम से तुरश्रेष्ठ युधिष्ठिर के. याजे और पून धूपादि की दम हज़ार वामगों का भोजन कराकर यथायोग्य मन को हर रेनेवारी गन्ध मे देवों की पूजा कर ममा में प्रवेश किया ॥१॥ गमा म पुमन पर यहा माड, नट, मन म्नुति उन्होंने नाना दिशाओं में आये हुए प्राणों गानेगाले अपना अपना गुण प्रकट कर उनकी पो अन, गाम, माम के अंना पान इत्यादि उपामना काने रंगे ॥२८॥ यविधि नापने, चुमने. चाटने, पीने की अपरमिन पांचों पाण्डव पमी भीड़ वं माय म गमा सामग्री कम गहनों में प्रमज किया और सहयों की प्रतिष्ठा कर अमरापनी में बंटे इन्द्र की नगद गी दान दी ॥३॥ पड़े मुम्य मे यहा गने । अनर देगा मे भाये ThmaARDammammarARTONITATUREnarauramma rrror marrestemETITCOMrrorrenmom म हा भारत [ सभापर्य TIGITTEprutruupornrupamorrenTRITIVE Prin Hapornmainaantiatical : असितो देवलः सत्यः सर्पिर्माली महाशिराः । अर्वावसुः सुमित्रश्च मैत्रेयः शुनको वलिः वको दाल्भ्यः स्थूलशिराः कृष्णद्वैपायनः शुकः । सुमन्तु मिनिः पैलो व्यासशिप्यास्तथा वयम् ॥ ११ ॥ तित्तिरिर्याज्ञवल्क्यश्च ससुतो लोमहर्पणः अप्सुहोम्यश्च धौम्यश्च अणीमाण्डव्यकोशिकौ ॥ १२ ॥ दामोप्णीपस्त्रैवलिश्च पर्णादो घटजानुकः मोञ्जायनो वायुभक्षः पाराशर्यश्च सारिका ॥ १३ ॥ वलिवाकः सिनीवाकः सप्तपालः कृतश्रमः जातूकर्णः शिखावांश्च आलम्बः पारिजातकः ॥ १४ ॥ पर्वतश्च महाभागो मार्कण्डेयो महामुनिः पवित्रपाणिः सावर्णो भालुकिर्गालवस्तथा जवाबन्धुश्च रैभ्यश्च कोपवेगस्तथा भृगुः हरिवभ्रुश्च कौण्डिन्यो बभ्रुमाली सनातनः काक्षीवानोपिजश्चैव नाचिकेतोऽथ गोतमः पैङ्गन्यो वराहः शुनकः शाण्डिल्यश्च महातपाः ॥ १७ ॥ कुक्कुरो वेणुजङ्घोऽथ कालापः कठ एव च मुनयो धर्मविद्वांसो धृतात्मानो जितेन्द्रियाः ॥ १८ ॥. हुए राजा और ऋपि पाण्डवों के साथ बैटने थे । सप्तगल, कृतश्रम, जानूकर्ग, निखावान्, आलम्ब, अमित, देवल, मत्य, सर्पिमाली, महागिरा, अर्वा, पारिजानक, महाभाग पर्वत, महामुनि मार्कण्डेय, यमु, मुमित्र, मैनेय, शुनक, वनि, ॥२॥१०॥ पवित्रपाणि, मावर्ण, मालकि, गालय, जंघायन्धु, यक, दालभ्य, धूलगिग, कृष्णद्वैपायन, शुक, रेभ्य, कोपवेग, भृगु, हरिवन, कौण्डिन्य, य माली, सुमन्तु, जमिनि, पल, मेरे सहित व्याम जी के सब मनातन, ॥१३॥१६॥ भिप्य, नितिरि. यामवल्पय पुत्र-महिन लोमहर्पण, फाक्षीवान्, आपिज, नाचिकेन, गौतुम, पैच, अप्मुहोम्य, धाग्य. अपीमाण्डव्य, फौशिक, । वराह, गुनक, महानपम्वी गाण्टिन्य, कुक्कुर, ॥११॥१२॥ येणुजंघ, कालाप और कठ, धर्म के जानकार संय- दामाणीप, अलि, पर्णाद, घटजानुक, मोजायन, तात्मा और जितेन्द्रिय ये मय मुनि और वेद यायुभी, पाराशर्य, मारिक, पलियाफ, मिनीवाफ, वदान्त में पण्डित, धर्मज और पवित्र मरे अनेक SAMITIGERMIRamurranaDremiumumunaTIOmRITERAREE AGRAMICURIOSAN , 2TIRTOTATIOTICTIMIUM TOTMAITALITYMILLIAMMmmar अध्याय ४] म हा भारत TITLEmerpour TESTORISTITUTrwuTIMOOTuuuunmumouTER TUDENT MENUOTuour 1 एते चाऽन्ये च बहवो वेदवेदाङ्गपारगाः उपासते महात्मानं सभायामृपिसत्तमाः ॥ १९ ॥ कथयन्तः कथाः पुण्या धर्मज्ञाः शुचयोऽमलाः । तथैव क्षत्रियश्रेष्टा धर्मराजमुपासते ॥ २०॥ श्रीमान्महात्मा धर्मात्मा मुञ्जकेतुर्विवर्धनः संग्रामजिहर्मुखश्च उग्रसेनश्च वीर्यवान् ॥ २१ ॥ कक्षसेनः क्षितिपतिः नेमकथाऽपराजितः काम्बोजराजः कमठः कम्पनश्च महाबलः सततं कम्पयामास यवनानेक एव यः ॥ २२ ॥ वलपोरुषसम्पन्नान्कृतास्त्रानमितौजसः यथाऽसुरान्कालकेयान्देवो वज्रधरस्तथा ॥ २३ ॥ जटासुरो मद्रकाणां च राजा कुन्ति पुलिन्दश्च किरातराजः । तथाङ्गवाङ्गो सह पुण्ड्रकेण पाड्योण्डूराजौ च महाऽन्ध्रकेण ॥२४॥ अङ्गो बङ्गः सुमित्रश्च शेव्यश्चाऽमित्रकर्शनः किरातराजः सुमना यवनाधिपतिस्तथा चाणूरो देवरातश्च भोजो भीमरथश्च यः श्रुतायुधश्च कालिंगो जयसेनश्च मागधः ॥ २६ ॥ सुकर्मा चेकितानश्च पुरुश्चाऽमित्रानः केतुमान्वसुदानश्च वैदेहोऽथ कृतक्षणः ॥२७॥ अनेक प्रकार की पचित्र कथाए जटामुर. मद्रगज, कुति. विगतराज, पारद, फरकर धर्मगज की उपामना करते थे ॥१७॥२०॥ पुण्टर, अह, य, पाध्य, उण्डगन, अन्धक, इनके अतिरिक्त श्रीमान् महात्मा धर्मनिष्ठ गजा मुमित्र, मनागी त्र्य, फिगनगन मुमना. या मुजरेतु विपद्धन, मग्रामजित. दुर्मुस, योर्यगार्ग नाधिपनि चाणर. देवगन, भोन. भीमरथ, कांग्ग- उग्रमेन, पक्षमेन, अपराजित क्षमक. काम्बोजगज कमठ. गज, श्रुतायुध, मगधनाथ, जयगेन, गुस्मा. चरितान चंड पराक्रमी कम्पन जिन्होंने काय आदि अमुर मागुदमन पुर. फेनुमान. यमुढान, चंदा, गृनक्षम, कुलनाशी वजधारी इन्द्र की नरह अने यल्यान मुधर्मा, अनिरुद्ध, अनियन्यन्न ध्रुनायु, दुष. गरधारी तेजबी यवनी की फाशया था ॥२१॥२३॥ अनुपगड, मुदर्शन, मनित. पुत्र-महिन मिगुगल, RoomrTorruun । ऋषि सत्तमा TRAM म हा भारत [ समापर्व TodavardUNJGIRITUTITrucouTOroinovaround UOTHERMER - । सुधर्मा चाऽनिरुद्धश्च श्रुतायुश्च महावलः अनूपराजो दुर्धर्षः क्रमजिच्च सुदर्शनः ॥ २८ ॥ शिशुपालः सहसुतः करूपाधिपतिस्तथा वृष्णीनां चैव दुर्धर्पाः कुमारा देवरूपिणः ॥ २९ ॥ आहुको विपृथुश्चैव गदः सारण एव च अक्रूरः कृतवर्मा च सत्यकश्च शिनेः सुतः ॥३०॥ भीष्मकोऽथाऽऽकृतिश्चैव युमत्सेनश्च वीर्यवान् । केकयाश्च महेष्वासा यज्ञसेनश्च सौमाकः ॥ ३१ ॥ केतुमान्वसुमांश्चैव कृतास्त्रश्च महावलः एते चाऽन्ये च बहवः क्षत्रिया मुख्यसंमताः ॥ ३२ ॥ उपासते सभायां स्म कुन्तीपुत्रं युधिष्ठिरम् । अर्जुनं ये च संश्रित्य राजपुत्रा महावलाः ॥ ३३ ॥ अशिक्षन्त धनुर्वेदं रौरवाजिनवाससः तत्रैव शिक्षिता राजन्कुमारा वृष्णिनन्दनाः ॥ ३४ ॥ रौक्मिणेयश्च साम्वश्च युयुधानश्च सात्यकिः । सुधर्मा चाऽनिरुद्धश्च शेव्यश्च नरपुङ्गवः ॥३५॥ एते चाऽन्ये च बहवो राजानः पृथिवीपते धनञ्जयसखा चाऽत्र नित्यमास्ते स्म तुम्बुरुः ॥३६॥ उपासते महात्मानमासीन सप्तविंशतिः बुरुपाधिप, वृष्णिवा के कठोर देवरूपी कुमारगण, ' मुधर्मा, अनिरुद्ध, शव्य आदि वृष्णिनन्दनगण और आहुक, विपृथु, गढ, सारण, अक्रूर, कृतवर्मा, पराक्रमी जितने राजकुमार मृगछाल पहने अर्जुन मिनि के पुत्र सत्यक, ॥२४॥३०॥ से अब मीयते थे, वे भी उम सभा में उपस्थित माप्मक, आकृति, वीर्यवन्त धुमत्मन, बडे रहते थे ॥३१॥३५॥ चापपारी फकयगण और मोमक पुत्र यजमेन, केतु इनके उपरान्त अर्जुन का मित्र तुम्बुरु नाम मान, यमुमान जोर अन्यान्य प्रधान-प्रधान क्षत्रिय मा गन्धर्व वहाँ नित्य उपस्थित रहता था । हे भी धर्मराज युधिष्ठिर की उपामना में लगे रहते थे। महाराज! तुम्चुरु की आना मे गाने-बजाने में हे महारान ! प्रद्युम्न, माम्ब, युयुधान, सात्यकि, चतुर, ताल लय में दक्ष निर्मन आदि सचाईम Rupa RCANCELLAIN TIFFEADINTAELVE MULTIMARITTA TETTETTY TITLETELLITE.......

अध्याय ५] म हा भारत MITUTI TurmurartunuTUTORIATuuuurmurtimUHAMATKrnruarunnarninni AIRATuner -- चित्रसेनः सहामात्यो गन्धर्वाप्सरसस्तथा गीतबादित्रकुशलाः साम्यतालविशारदाः प्रमाणेऽथ लये स्थाने किन्नराः कृतनिश्रमाः ॥ ३८ ॥ संचोदितास्तुम्बुरुणा गन्धर्वसहितास्तदा गायन्ति दिव्यतानैस्ते यथान्यायं मनस्विनः ॥ ३९ ॥ पाण्डुपुत्रानृपाश्चैव रमयन्त उपासते तस्यां सभायामासीनाः सुव्रताः सत्यसगराः । दिवीव देवा ब्रह्माणं युधिष्ठिरमुपासते इति श्रीमन्महाभारते सभापीण मभाक्रियापर्वणि मभाप्रवेशो नाम चतुर्थोऽध्यायः॥४॥ समाप्तं च सभाक्रियापर्व।। गन्धर्व और अन्यान्य गन्धर्व, अप्मराएँ और किन्नर देवता ब्रमा की उपासना करत है, वैमे ही उक्त लोग शुद्ध ताल लयवाले म्बर से गीत गाकर पाण्डवों, सभा में स्थित अनेकानेक सत्यवादी ऋषि, नरपति महर्षियों और राजाओं को प्रसन्न करते हुए युधि- और गुणी पुरुष धर्मराज की आराधना करते थे। हिर की उपासना किया करते थे । म्बर्ग में जैसे ॥३६॥१०॥ सभापर्व का चौथा अध्याय ममाम हुआ। ROHNAMUTARANTE 1 - अध पञ्चमोऽध्यायः ॥५॥ वैशम्पायन ब्याच-अथ तत्रोपविष्टेपु पाण्डवेषु महात्मसु महत्सु चोपविष्टेषु गन्धर्वेषु च भारत वेदोपनिपदां वेत्ता ऋपिः सुरगणार्चितः इतिहासपुराणज्ञः पुराकल्पविशेषवित् न्यायविद्धर्मतत्त्वज्ञः पडङ्गविदनुत्तमः क्यसंयोगनानात्वसमवायविशारदः पांश्या अध्याय || चाम्पायन ने कहा- राजा जनाजय! महान्मा पुगणों के जाननेगन-॥१२॥ पाण्टरगण और प्रधान गन्धर्षा उमममा में पेट थे, न्याय और धर्म के नयन,निशा पाण्यासान किमे समय में मय वेद और उपनिगटी के आदि पटंग मामा के अमाधारण मानी, नाना जाननेगने, देवनाओं के पूजनीय, इनिहाग और गानों के पास गिद्ध, विधि यारयों की पाता CCTIHATERMITTERTAImroTTruary महा भारत [ सभापर्व TOUCTIOHIT Torumour Turmur Trumurtrena tanamminathtananam - वक्ता प्रगल्भो मेधावी स्मृतिमान्नयविकविः । पराऽपरविभागज्ञः प्रमाणकृतनिश्चयः पञ्चावयवयुक्तस्य वाक्यस्य गुणदोषवित् उत्तरोत्तरवक्ता च वदतोऽपि वृहस्पतेः धर्मकामार्थमोक्षेषु यथावत्कृतनिश्चयः तथा भुवनकोशस्य सर्वस्याऽस्य महामतिः प्रत्यक्षदर्शी लोकस्य तिर्यगूलमधस्तथा साङ्ख्ययोगविभागज्ञो निर्विवित्सुः सुराऽसुरान् ॥ ७ ॥ सन्धिविग्रहतत्त्वज्ञस्त्वनुमानविभागवित् पाड्गुण्यविधियुक्तश्च सर्वशास्त्रविशारदः ॥ ८॥ युद्धगान्धर्वसेवी च सर्वत्राऽप्रतिघस्तथा एतैश्चाऽन्यैश्च बहुभिर्युक्तो गुणगणैर्मुनिः लोकाननुचरन्सर्वानागमत्तां सभां नृप नारदः सुमहातेजा ऋपिभिः सहितस्तदा पारिजातेन राजेन्द्र पर्वतेन च धीमता सुमुखेन च सोम्येन देवपिरमितद्युतिः सभास्थान्पाण्डवान्द्रष्टुं प्रीयमाणो मनोजवः । जयाशीभिस्तु तं विप्रो धर्मराजानमार्चयत् ॥ १२ ॥ फरनेवाले, वाक्यों को अलग-अलग कर देने और योगवल मे सम्पूर्ण भूमण्डल के प्रत्यक्षदर्मी, इनके एक कर्म में अनेक धर्म मन्निवेश करने के वेदान्त और योग के जाननेवाले, देव और असुरों लिये अधिकार के अनुमार सम्बन्ध निरूपण के को आपस में लाने वाले, सम्पूर्ण सन्धि विग्रह विषय में बड़े पण्डित युद्धिमान् . स्मृतिमान् , नीति- आदि के तन्यन, अनुमान से कार्याकार्य विभाग में साल, कवि, भरे बुरे के अलग करने में ज्ञान अभिन्न, मन्धि विग्रह आदि पद्गुण विधान मे युक्त ग्मनेयाने प्रमाणों मे यन्तुओं के विचार करनेवाले, मय ग्रामों में पण्डित ||६|| प्रतिज्ञा केनु आदि अंगयुक्त वाक्यों के गुण दोष जाननेवार, गृहम्पनि जी की भी पान के उत्तर देनेवाले, और नृत्य गीनादि को चाहनेवाल. किमी मम्पूर्ण धर्मार्थ काम मोक्ष का मार जाननेवारे ॥१५ कार्य मे नित्त को न हटानेवाल, मे ही और दूसरे । HTRanR ... युद्ध ImmorITATITranormTTETTETTEORIAGEmmary TRICur १९ अध्याय ५] म हा भारत UNT TrurmuTITUTE strumouTUTIONSTITUTERUT काIENana तमागतमृर्षि दृष्ट्वा नारदं सर्वधर्मवित् सहसा पाण्डवश्रेष्ठः प्रत्युत्थायाऽनुजैः सह अभ्यवादयत प्रीत्या विनयावनतस्तदा तदर्हमासनं तस्मै संप्रदाय यथाविधि गां चैव मधुपर्कं च संप्रदायाऽयमेव च अर्चयामास रत्नैश्च सर्वकामैश्च धर्मवित् तुतोप च यथावञ्च पूजां प्राप्य युधिष्टिरात् ॥१५॥ सोऽर्चितः पाण्डवैः सर्वैर्महर्वेिदपारगः धर्मकामार्थसंयुक्तं पप्रच्छेदं युधिष्ठिरम् ॥ १६ ॥ नारद उवाच-कञ्चिदर्थाश्च कल्पन्ते धर्मे च रमते मनः सुखानि चाऽनुभूयन्ते मनश्च न विहन्यते ॥ १७॥ कच्चिदाचरितां प्रर्वनरदेव पितामहैः वर्तसे वृत्तिमक्षुद्रां धर्मार्थसहितां त्रिपु ॥ १८॥ कच्चिदर्थेन वा धर्म धर्मेणाऽर्थमथापि वा उभौ वा प्रीतिसारेण न कामेन प्रवाधसे ॥ १९ ॥ सर गुण रखनेवाले, आत्मतत्व हूढनेवाले, बडे तेजम्वी उनको धर्म-अर्थ-काम का उपदेश महर्षि नारद जी ने पारिजात, पर्वत ओर माम्य सुमुग्न | करने लगे । नारद जी ने कहा-हे महाराज ! अर्थ के साथ रोक मण्डर में घूमते हुए पाण्डवों के चिन्तन के साथ ही आप धर्म चिन्तन भी करते दर्शन के रिये प्रसन्नचित्त से उस सभा में आकर हैन ? अर्थ चिन्तन ने आपके धर्म चिन्तन को धर्मरान युधिष्ठिर जी का नय जयकार और पूजा की । दवा तो नहीं लिया ? मुस भोग में रंगे रहकर ॥१२॥ आपने अपने पवित्र मन को तो कलपित नहीं होने मपि को आते देसर सर्व धर्म के जानकार दिया । अपने पूर्वनों के आचरण और वृत्ति के नग्र म्यभागी युधिष्ठिर ने भाटयों के साथ खडे अनुगामी होकर आप धर्म-अर्थ-काम का सेवन होकर प्रीतिपूर्वक मिर झुका प्रणाम कर पाय, करते है न॥१६॥१८॥ अर्य, योग्य आमन, गो, मधुपर्क, बहुत ग्न आदि धन-चैमर का रोभ आपके धर्मोपार्जन की राह से उनकी पूना की । वह भी युधिष्ठिर से योग्य में स्कावट तो नहीं डालता ? अथवा पिरपुर पना पाकर प्रसन्न हुए ॥१३॥१०॥ धर्म के ध्यान में ही लगे रहने मे धन की आमदनी फिर वेद के पारगामी महर्षि नारद जी कुशल में तो वाधा नहीं पड़ने पाती ' काम की रारमा प्रश्न के मिस ANTITIMILITALLEONLITIANITRONITIONAL P २० म हा मारत सभापर्व rammrutruwU RoornturouTOTTomouTurmurarunminarxnnnnnnnr -- - NINAONALAINENKATARRANAATTISTA । कचिदर्थं च धर्म च कामं च जयतां वर विभज्य काले कालज्ञः समं वरद सेवसे ॥२०॥ कच्चिद्राजगुणैः पभिः सप्तोपायांस्तथाऽनघ बलावलं तथा सम्यक्चतुर्दश परीक्षसे ॥ २१ ॥ कच्चिदात्मानमन्वीक्ष्य परांश्च जयतां वर तथा सन्धाय कर्माणि अष्टौ भारत सेवसे ॥ २२ ॥ कच्चित्प्रकृतयः सप्त न लुप्ता भरतर्षभ आढ्यास्तथाऽव्यसनिनः स्वनुरक्ताश्च सर्वशः ॥ २३ ॥ कञ्चिन्न कृतकैर्दूतैर्ये चाऽप्यपरिशङ्किताः त्वत्तो वा तव चाऽमात्यैर्भिद्यते मन्त्रितं तथा ॥ २४ ॥ मित्रोदासीनशत्रूणां कच्चिद्वत्सि चिकीर्पितम् । कच्चित्सन्धि यथाकालं विग्रहं चोपसेवसे ॥ २५॥ कच्चिद् वृत्तिमुदासीने मध्यमे चाऽनुमन्यसे कच्चिदात्मसमा वृद्धाः शुद्धाः सम्बोधनक्षमाः ॥ २६ ॥ में लिप्त होकर धर्म और अर्थ के उपार्जन को तो। ( स्वामी, अमात्य, सुहृत्, कोप, राष्ट्र, दुर्ग, बल) आपने नहीं छोड़ दिया ? हे परोपकारी युधिष्ठिर ! । तो अच्छी दशा में हैं ! आपके राष्ट्र के लोग धनाड्य आप ठीक समय पर धर्म, अर्थ और काम का कामकाजी और प्रभुभक्त है न ? आपको और सेवन करते रहते है न ? ॥१९॥२०॥ । मन्त्री, मित्र, सैनिक, पुरवासी आदि को मृगया, आए सन्धि-विग्रह आदि छ राजगुणों से युक्त मद्य आदि का कोई व्यसन तो नहीं है ? औरों होकर सात उपायों ( मन्त्र, औषध, इन्द्रजाल, । के जासूस लोग तो अपने ऊपर विश्वास पैदा करा- साम, दान, भेद, दण्ड ) का प्रयोग जानते हुए कर आपकी और आपके मंत्रियों की गुप्त सलाह अपने पक्ष और शत्रुपक्ष के बल पर सदा ध्यान को तो नहीं जान लेते ? ॥२१॥२१॥ रखते है न । कृषि, वाणिज्य, किलों की मरम्मत, अपने मित्र, शत्रु और उदासीन पक्ष के लोग पुल बनवाना, हाथियों को चारे की सुविधा की क्या कर रहे है क्या करना चाहते है-इसकी दृष्टि से कई स्थानों में रखना, मोने तथा रत्नों की सूचना तो आपको रहती है ! आप ठीक समय ग्वानों से कर वसूल करना, और नई वम्तियाँ पर सन्धि और विग्रह करने में तो नहीं चूकते ! बनाना, ये आठ राजकार्य आपके द्वारा अच्छी आप उदासीन राष्ट्रों से तटस्थ रहकर अपने कतर्व्य तरह होते रहते है न ? आपकी सातों प्रकृतियाँ का पालन करते रहते है न ? अपने समान, बूढ़े, KINNERA INITIONARIYARITIHAAmATIMIRRORMAyunaamaana महा भारत अध्याय ५ ] TITUTITUTOTTTTITUTE FURNITUTE Tirirmirmirrurame TITIOUTUDIUTITUNITY SARAMMAR । FOUTOURITEMOIRUIRANURUITUTORIT कुलीनाश्चाऽनुरक्ताश्च कृतास्ते वीर मन्त्रिणः विजयो मन्त्रमूलो हि राज्ञो भवति भारत ॥२७॥ कच्चित्संवृतमन्त्रैस्ते अमात्यः शास्त्रकोविदः । राष्ट्र सुरक्षितं तात शत्रुभिर्न विलुप्यते ॥२८॥ कञ्चिन्निद्रावशं नैपि कच्चित्काले विबुध्यसे कच्चिच्चाऽपररात्रेषु चिन्तयस्यर्थमर्थवित् ॥ २९ ॥ कच्चिन्मन्त्रयसे नैकः कञ्चिन्न वहुभिः सह कच्चित्ते मन्त्रितो मन्त्रो न राष्ट्रं परिधावति ॥ ३० ॥ कच्चिदर्थान्विनिश्चित्य लघुमूलान्महोदयान् क्षिप्रमारभसे कर्तुं न विनयसि तादृशान् ॥३१॥ कञ्चिन्न सर्वे कर्मान्ताः परोक्षास्ते विशङ्किताः । सर्वे वा पुनरुत्स्सृष्टाः संस्कृष्टं चाऽत्र कारणम् ॥ ३२ ॥ आप्तैरलुब्धैः ऋमिकस्ते च कच्चिदनुष्ठिताः । कच्चिद्राजन्कृतान्येव कृतप्रायाणि वा पुनः विदुस्ते वीर कर्माणि नाऽनवाप्तानि कानिचित् । कञ्चित्कारणिका धर्म सर्वशास्त्रेषु कोविदाः ॥ ३४ ॥ शुद्ध म्वभाववाले, समझाने में समर्थ, अच्छे वश गुप्त मन्त्रणा प्रकट होकर राज्य में पैर तो नहीं में उत्पन्न और अनुगत पुरुषों को ही तो आप जाती ॥२०॥३०॥ मन्त्री बनाते है न ? क्योंकि मन्त्री ही राजाओं के थोडी चेष्टा से बड़े परदाई कामों के बारे में जय की जड है । इसलिये मत्री श्रेष्ठ होने चाहिए। निश्चय करके उन्हें आप शीघ्र करने लगते है न । सर शास्त्रों में पडित मत्रीगण मत्र छिपाकर भली ऐसे कामों में विन तो नहीं होन पाता। किसान रीति मे आपके राज्य की रक्षा करते हैं 'ন্তু लोग तो आपके परोथ में ठीक यवहार करते है रोग आपका किमी प्रकार का बुरा तो नहीं कर न! आपका उन पर विश्वास है न वे आपको म्नेह की दृष्टि से देखते है न । क्योंकि प्रभु पर आप ठीक ममय पर सोकर ठीक समय पर भक्ति हुए बिना ऐसा होना असम्भव है। किसानों उठा करते है नर पिछले पहर जागकर आप अर्थों पर सन्नी तो नहीं होती । आरम्भ क्येि हुए कायों पर विचार करते हैं न । आप अकरे या बहुत को स्यागना तो नहीं पड़ता अथरा उनका प्रवन्ध रोगों के माथ तो कभी मलाह नहीं करते । आपकी तो नहीं गिड़ता ॥३१॥३॥ LERT TOTRAYANETHEATRIOTINITIOILITHILITY । पाते ? ॥२५॥२८॥ TIMEAronmnmarTTUO AMILLIMALAILOMATLATLILOMIYA २२ म हा भारत [ सभापर्व TATE INorm TUDIO । - PATRADAMUNAADMDMONIA कारयन्ति कुमारांश्च योधमुख्यांश्च सर्वशः कञ्चित्सहस्रमूर्खाणामेकं क्रीणासि पण्डितम् ॥ ३५ ॥ पण्डितो ह्यर्थकृच्छ्रेषु कुर्यान्निःश्रेयसं परम् कच्चिद् दुर्गाणि सर्वाणि धनधान्यायुधोदकः ॥ ३६ ॥ यन्त्रैश्च परिपूर्णानि तथा शिल्पिधनुर्धरैः एकोऽप्यमात्यो मेधावी शूरो दान्तो विचक्षणः ॥ ३७॥ राजानं राजपुत्रं वा प्रापयेन्महतीं श्रियम् कञ्चिदष्टादशान्येपु स्वपक्षे दश पञ्च च ॥ ३८ ॥ त्रिभिस्त्रिभिरविज्ञातैत्सि तीर्थानि चारकैः कञ्चिद् द्विपामविदितः प्रतिपन्नश्च सर्वदा ॥ ३९ ॥ नित्ययुक्तो रिपून्सर्वान्वीक्षसे रिपुसूदन कच्चिद विनयसंपन्नः कुलपुत्रो वहुश्रुतः ॥४०॥ अनसूयुरसङ्कीर्णः सत्कृतस्ते पुरोहितः कञ्चिदग्निपु ते युक्तो विधिज्ञो मतिमानृजुः ॥४१॥ विश्वासी, अलोभी, प्राचीन क्रम के जाननेवाले एक भी मन्त्री यदि बुद्धिमान, शूर, जितेन्द्रिय कर्मचारियों से वह सब किये जाते हैं या नहीं ? और ज्ञानकार होता है तो राजा या राजकुमार लोग आपके किये हुए वा किये जाते हुए कार्यों को श्रेष्ठ ऐश्वर्य का अधिकारी बना देता है । को जान लेते है या नहीं ? हे वीरवर ! जो सब कार्य नहीं हुए है उन्हें तो किसी ने नहीं जाना ? अपने जासूसों के द्वारा शत्रुपक्ष के अधारह सव शास्त्रों में पण्डित आचार्यगण, कुमार और तीर्थों की और अपने पक्ष के पन्द्रह तीर्थों की युद्ध के मुखियों को आप धर्म की शिक्षा देते है ' जानकारी तो आप प्राप्त करते रहते है न ? शत्रुओं या नहीं ? हज़ार मूखों के बदले एक पण्डित को को नहीं मालूम होने पाता, और आप सावधान आप अपने यहां रखते है या नहीं ? ॥३३॥३५॥ रहकर उनके कामों को देखते रहते है न ? आपने क्योंकि किसी प्रकार की विपत्ति पड़ने पर विनयी, इर्ष्या-शून्य, अच्छे वंश में उत्पन्न, बहुश्रुत, चतुर लोग सहज ही उससे बचाव कर सकते है । विद्वान् पुरुष को ही तो सत्कारपूर्वक अपना पुरो- आपके मब दुर्ग ( ) तो धन, अन्न, शस्त्र, हित बनाया है न ॥३९॥४०॥ जल और यन्त्रों से परिपूर्ण रहते है न ' किलों विधिज्ञ, बुद्धिमान् सरल और कार्यचतुर ब्राह्मण में कारीगर और धनुर्द्धर योद्धा सदा रहते है न? को ही भापने अपने यहाँ अग्निहोत्र के काम में HTARTHATANTRARIATIMATERITTHATARIANIMAmrace ॥३६॥३८॥ ।

अध्याय ५] महा भारत २३ TOTTOMUTTOTRIOTICTIOurn KALAMNAMAMAYA .. TIMATERIALAMAAS हुतं च होष्यमाणं च काले वेदयते सदा कच्चिदङ्गेपु निष्णातो ज्योतिपः प्रतिपादकः ॥ ४२ ॥ उत्पातेषु हि सर्वेषु दैवज्ञः कुशलस्तव कञ्चिन्मुख्या महत्स्वेव मध्यमेषु च मध्यमाः ॥ १३ ॥ जघन्याश्च जघन्येपु भृत्याः कर्मसु योजिताः । अमात्यानुपधातीतान्पितृपैतामहाऽशुचीन् ॥४४॥ श्रेष्टा श्रेष्ठेषु कञ्चित्त्वं नियोजयसि कर्मसु कच्चिद् नोग्रेण दण्डेन भृशमुद्विजसे प्रजाः ॥४५॥ राष्ट्रं तवाऽनुशासन्ति मन्त्रिणो भरतर्षभ कंच्चित्वां नाऽवजानन्ति याजकाः पतितं यथा ॥१६॥ उग्रप्रतिग्रहीतारं कामयानमिव स्त्रियः कच्चिद धृष्टश्च शूरश्च मतिमान्धृतिमाशुचिः । कुलीनश्चाऽनुरक्तश्च दक्षः सेनापतिस्तथा ॥४७॥ कच्चिद्वलस्य ते मुख्याः सर्वयुद्धविशारदाः धृष्टावदाता विक्रान्तास्त्वया सत्कृत्य मानिताः ॥१८॥ कच्चिद्वलस्य भक्तं च वेतनं च यथोचितम् । प्राप्तकाले दातव्यं ददासि न विकसि रक्या है ? आपके ज्योतिषी तो ज्योतिर्विद्या- पतित व्यक्ति को जैसे अवज्ञा की दृष्टि से देखते विशारद, राज्याङ्ग-कुशल, उत्पातों के फलाफल के हैं, और स्त्रियाँ जैसे उग्र स्वभाववाले लम्पट पुरुष पूरे जाता है न ? आप कार्य की छुटाई-बड़ाई का का अनादर करती हैं, वैसे ही गासन करनेवाले ग्याल करके ही उन कामों में मनुष्यों को नियुक्त मन्त्री आपको हीन दृष्टि में तो नहीं देग्यते । आपके करते हैं न २ ॥४१॥४२॥ मेनापति उत्तम वश में उत्पन्न, साहसी, शूरवीर, आप प्रधान अनुचरों को प्रधान, मध्यमों को गम्भीर कार्यचतुर और प्रभु-भक्त है न ? सब प्रकार मध्यम और निकृष्टों को निकृष्ट काम सौंपते हैं न' के युद्ध में निपुग, प्रबल पराक्रमी, सञ्चरित्र, साहसी वश परम्परा से नौकर, पवित्र चित, वृद्ध मचिवों मिपाहियों का आप यथोचित रूप से सम्मान करते को ही तो आप श्रेष्ठ कार्य करने का भार देने हैं है न न कठोर दण्ड देकर प्रजा को आपके मन्त्री ठीक ममय पर सिपाहियों को तनख्वाह दे दी शङ्कित या उद्विम तो नहीं करते ? याजक लोग जाती है न । यदि उन्हें ठीक समय पर वेतन नहीं MuTRIMINATANTRA mammypoLAMMOHAMILNDIA TopITORRUTIr न ॥४४॥८॥ TRATONITION २४ म हा भारत [ समापन EnourinrrouTITANI rurtUTTI CtWITUTIOTOurrenouTULTITUTIOTrur TITUTICORITI । कालातिक्रमणादेते भक्तवेतनयो ताः भर्तुः कुर्वन्ति दौर्गत्यात्सोऽनर्थः सुमहान्स्मृतः ॥ ५० ॥ कच्चित्सर्वेऽनुरक्तास्त्वां कुलपुत्राः प्रधानतः कञ्चित्प्राणांस्तवाऽर्थेपु सन्त्यजन्ति सदा युधि ॥ ५१ ॥ कञ्चिन्नैको बहूनर्थान्सर्वशः साम्परायिकान् अनुशास्ति यथाकामं कामात्मा शासनातिगः ॥ ५२ ॥ कञ्चित्पुरुषकारेण पुरुषः कर्म शोभयन् लभते मानमधिकं भूयो वा भक्तवेतनम् ॥ ५३॥ कञ्चिविद्याविनीतांश्च नराज्ञानविशारदान् यथार्ह गुणतश्चैव दानेनाऽभ्युपपद्यसे ॥ ५४॥ कञ्चिद्दारान्मनुष्याणां तवाऽर्थे मृत्युमीयुषाम् । व्यसनं चाऽभ्युपेतानां विभर्ति भरतर्षभ ॥ ५५॥ कच्चिद्भयादुपगतं क्षीणं वा रिपुमागतम् युद्धे वा विजितं पार्थ पुत्रवत्परिरक्षसि ॥ ५६ ॥ कञ्चित्त्वमेव सर्वस्याः पृथिव्याः पृथिवीपते समश्चाऽनभिशङ्कयश्च यथा माता यथा पिता ॥ ५७ ॥ मिलता तो अच्छी तरह काम होना और सहायता तरह पुरस्कार और सम्मान देते है न ? ज्ञानी, मिलना तो दूर रहा, उलटे पग पग पर अनिष्ट । विद्वान् , नम्र और गुणी व्यक्ति सदा आप से धन और विद्रोह होने की आशङ्का बनी रहती है। और मान पाते रहते हैं न ? हे महाराज ! आपके ॥४९॥५०॥ लिये मरने वाले और विपत्ति में पड़ने वाले लोगों के अच्छे कुलों में उत्पन्न प्रधान-प्रधान कर्मचारी पुत्र-स्त्री आदि परिवार का भरण-पोषण आप करते और कुल के लोग आप पर अनुराग रखते हैं न ? रहते हैं न ? हे महाराज ! बल घट जाने पर या वे आप के लिये युद्ध में प्राण देने को तैयार रहते युद्ध में हारने पर जो शत्रु टरकर आपकी शरण में हैं न ? और आपका कहा न माननेवाला कोई आते है उनकी रक्षा आप पुत्र की तरह करते हैं यथेच्छाचारी पुरुष तो सब युद्ध आदि के कार्यों का न? ॥५११५५|| सम्पादन करने के लिये नहीं नियुक्त है ? कोई पुरुष हे पृथ्वीनाथ ! माता और पिता के समान इस यदि अपने पौरुष या उद्योग से आपका कोई काम राज्य की सब प्रजा को आप स्नेहपूर्ण एक दृष्टि से या उपकार करता है तो उसी समय आप उसे अच्छी देखते हैं न ! कोई आप से शङ्कित तो नहीं रहता ? TIMATION MDADOLLANTOPoonam 200DONamomaanandnamaATIONAL २५ अध्याय ५ ] म हा भा र त TotrouTIOTIHTuut GHIMITTER - । । । कञ्चिद्व्यसनिनं शत्रु निशम्य भरतर्षभ अभियासि जवेनैव समीक्ष्य त्रिविधं वलम् ॥ ५८॥ यात्रामारभसे दिप्ट्या प्राप्तकालमरिन्दम पार्णिमूलं च विज्ञाय व्यवसायं पराजयम् वलस्य च महाराज दत्त्वा वेतनमग्रतः ॥ ५९॥ कच्चिच बलमुख्येभ्यः परराष्ट्रे परन्तप उपच्छन्नानि रत्नानि प्रयच्छसि यथार्हतः ॥६० ॥ कच्चिदात्मानमेवाऽग्रे विजित्य विजितेन्द्रियः पराञ्जिगीपसे पार्थ प्रमत्तानजितेन्द्रियान् ॥ ६१ ॥ कञ्चित्ते यास्यतः शनृन्पूर्व यान्ति स्वनुष्ठिताः । साम दानं च भेदश्च दण्डश्च विधिवद् गुणाः ॥ ६२ ॥ कच्चिन्मूलं दृढं कृत्वा परान्यासि विशांपते तांश्च विक्रमसे जेतुं जित्वा च परिरक्षसि ॥६३ ॥ कञ्चिदष्टाङ्गसंयुक्ता चतुर्विधवला चमूः बलमुख्यैः सुनीता ते द्विपतां प्रतिवर्धिनी ॥ ६४ ॥ कञ्चिल्वं च मुष्टिं च परराष्ट्रे परन्तप अविहाय महाराज निहंसि समरे रिपून् शत्रु का मद्य आदि व्यसनों में लिप्त देख, अपने में करके, फिर अजितेन्द्रिय असावधान शत्रुओं को मन्त्र, कोप, भृत्य, इम तीन प्रकार के बल को अच्छी- जीतने की इच्छा रखते है न ? आप युद्ध-यात्रा तरह जांच कर आप शीघ्र ही शत्रु पर हमला कर करने के पहले शत्रुओं पर साम, दान, भेद और देते है न ? जय-पराजय की शक्ति और मैनिकों दण्ट का उचित प्रयोग कर लेते है न ?॥६१६२।। के विचार जानकर, उन्हें धन आदि मे सन्तुष्ट कर, आप पहले अपनी जड़ को कायम करके फिर तथा शत्रु की अन्दरूनी कमजोरियों का पता लेकर, शत्रुओं को जीतने जाते है न ? शत्रुओं को जीत- आप यथासमय युद्ध-यात्रा किया करने है न । कर फिर उनको उनके राज्य में स्थापित करके आप शत्रुपक्ष की सेना में भेद-नीति का प्रयोग करने के उनकी रक्षा करते है न । रथ, घोड़े, हाथी, योद्धा, लिये उस ओर के प्रधान-प्रधान पुरुषों को गुप्तरूप पैदल, कर्मचारी, जासूम, मुख्य कर्म करनेवाले, इन से धन-रत्न आदि आप भेजते रहते हैं न ॥५६॥६०॥ आठ अङ्गों से युक्त, चार बलों से सम्पन्न और आप पहले जितेन्द्रिय होकर, अपने को अपने वश मुशिक्षित सेनापतियों-द्वाग सञ्चालित आपकी चतु. SUMITHILAIMERALDIERTAINMarazomm. । HAIRATIONAL TIATIVITIATI DAANAAMYOTI महाभारत [ सभापर्व PHOTO TIOOTU LOTuouTRUT FORUMUHOTO RTERTURE । । KumArAmravanm कञ्चित्स्वपरराष्ट्रेपु वहवोऽधिकृतास्तव अर्थान्समधितिष्ठन्ति रक्षन्ति च परस्परम् ॥ ६६ ॥ कच्चिदभ्यवहार्याणि गात्रसंस्पर्शनानि च घेयाणि च महाराज रक्षन्त्यनुमतास्तव ॥६७॥ कच्चिकोशश्च कोष्ठश्च वाहनं द्वारमायुधम् आयश्च कृतकल्याणैस्तव भक्तैरनुष्ठितः ॥ ६८ ॥ कच्चिदाभ्यन्तरेभ्यश्च वाह्येभ्यश्च विशांपते रक्षस्यात्मानमेवाऽग्रे तांश्च स्वेभ्यो मिथश्च तान् ॥ ६९ ॥ कच्चिन्न पाने द्यूते वा क्रीडासु प्रमदासु च प्रतिजानन्ति पूर्वाह्ने व्ययं व्यसनजं तव कञ्चिदायस्य चार्धेन चतुर्भागेन वा पुनः पादभागैस्त्रिभिर्वापि व्ययः संशोध्यते तव ॥ ७० ॥ कञ्चिज्ज्ञातीन्गुरून्वृद्धान्वणिजः शिल्पिनः श्रितान् । अभीक्ष्णमनुगृह्णासि धनधान्येन दुर्गतान् ॥७२॥ कच्चिच्चाऽऽयव्यये युक्ताः सर्वे गणकलेखकाः। अनुतिष्ठन्ति पूर्वाह्ने नित्यमायव्ययं तब रङ्गिणी सेना शत्रुओं को जीतने में समर्थ है न ? भाल और रक्षा करते है न ? आप अन्दरूनी और अन्न की फसल काटने और एकत्र करने के समय बाहरी लोगों से अपनी, अपने लोगों से उनकी और पर ही आप शत्रुआ आक्रमण करते है न ? उन दोनों से उन दोनों की रक्षा करते रहते है न ? अपने और पराये राज्य में रहकर आपके बहुत से धर्म का सेवन करते समय नौकर . लोग मद्य, द्यूत, मनुष्य आपके कामों को पूरा करते और आपस में एक | क्रीडा (शिकार आदि) स्त्री आदि के खर्च का दूसरे की रक्षा करते है न ? वे परस्पर झगड़ा करके | हिसाब तो नहीं पेश करते ? आप अपनी आमदनी कार्य को प्रकट तो नहीं कर देते ॥६३॥६६॥ | का आधा, तिहाई या चौथाई हिम्सा खर्च करके ही आपके विश्वासी नौकर ही आपके व्यवहार की अपना निर्वाह करते है न' वृद्ध, सजातीय, गुरुजन, चीज़ों को, वन-आभूषण आदि वस्तुओंको और सूंघने- । व्यापारी, गिल्ली, आ.श्रित, दीन-दरिद्र और अनाथ खाने आदि की सामग्री को सुरक्षित रखते है न ? लोगों को धन-अन्न आदि की सहायता, देकर आप आपके भक्त और ईमानदार आदमी ही कोप,भाण्डार, उनपर अनुग्रह दिखाया करते है न ? हे राजन् ! वाहन, द्वार, शस्त्रगाला और आमदनी की देख- । आमदनी खर्च का हिसाब रखनेवाले हिसावी और - MMMMMMMMITAMINIMUMTARAMMARRIMALIMMITMAND AADHAASIJANAMITRAINITAMATA अध्याय ५ ] महा भारत HINTITUUUUTITrrormone PronTrum MU HIROITTTTTITUTITUTrue 1 । DOTTrianiruvanamadiTURAuTuuuu कच्चिदर्थेषु संप्रौढान्हितकामाननुप्रियान् नाऽपकर्पसि कर्मभ्यः पूर्वमप्राप्य किल्विपम् ॥७४ ॥ कच्चिद्विदित्वा पुरुषानुत्तमाधममध्यमान् त्वं कर्मस्वनुरूपेषु नियोजयसि भारत ॥७५॥ कच्चिन्न लुब्धाश्चौरा वा वैरिणो वा विशांपते । अप्राप्तव्यवहारा वा तव कर्मस्वनुष्ठिताः ॥७६ ॥ कच्चिन्न चौरैलुब्धैर्वा कुमारैः स्त्रीवलेन वा त्वया वा पीड्यते राष्ट्र कच्चित्तुष्टाः कृपीवलाः ॥७७ ॥ कच्चिद्राष्ट्रे तडागानि पूर्णानि च बृहन्ति च भागशो विनिविष्टानि न कृपिर्देवमातृका ॥७८॥ कच्चिन्न भक्तं बीजं च कर्पकस्याऽवसीदति । प्रत्येकं च शतं वृद्धया ददास्यृणमनुग्रहम् ॥७९ ॥ कच्चित्स्वनुष्ठिता तात वार्ता ते साधुभिर्जनैः । वार्तायां संश्रितस्तात लोकोऽयं सुखमेधते ॥ ८०॥ कच्चिच्छ्रराः कृतप्रज्ञाः पञ्च पञ्चस्वनुष्टिताः क्षेमं कुर्वन्ति संहत्य राजञ्जनपदे तव ॥ ८१ ॥ रुखक रोग नित्य दिन के पहल पहर में आपके राज्य में म्यान स्थान पर जल से भरे बड़े बड़े तालान पास जाकर सर हिसार दिखा जाते है न॥६७/७३॥ ' ओर झीरें खुदी हुई हैं न खेती तो केवर वर्षा कार्य करने में चतुर, हित के चाहनेवाले, के सहारे पर नहीं होती। किसानों के यहा बीज प्रिय कर्मचारियों को बिना अपराध के आप उनक । और अन आदि की कमी तो नहीं है । आवश्यकता पद से अलग तो नहीं करते है । उत्तम, मध्यम, होने पर आप किसानों को साधारण सूद पर मण अधम पुरपा की नाँच करक आप उन्हें वैसे ही कमों देते रहते है न ? आपके राज्य में व्यवहार आदि के में लगाते है न ? रोभी, चोर, वैरी या व्यवहार की मुक्दमों का पेसरा भरे म्यभार के न्यायी पुरुष जानकारी में कच्चे मनुष्यों को तो आप अपने यहा करते है न' क्योंकि जिस राना के यहाँ न्याय होता कोई काम नहीं देते । आपसे या चोर, रोभी, कुमार ह वही सुख का भागी होता है । हे राजन् ! क्या और त्रियों की प्रास्ता से राज्य की प्रना को पीड़ा आपके राज्य में शूर और ज्ञानी पाच मनुष्य पुर- तो नहीं पहुँचती : आपके राज्य के क्सिान तो सुखी | वासियों का पारन, दुर्ग पारन, वणिक पारन, कृषी और सम्पन्न हैं न ॥७४।७७॥ का देखना भारना और दुष्टों का सामन इन पाच । । . 2 THANIHARITMAITHIVILMER PM TIMTIMIT THI THPT Trial:

२८ महाभारत [ सभापर्व JanmanormerroriJITanuary TOOure Upreroronomy Twimrosasarswamam .. कञ्चिन्नगरगुप्त्यर्थं ग्रामा नगरवत्कृताः ग्रामवच्च कृताः प्रान्तास्ते च सर्वे त्वदर्पणाः ॥ ८२ ॥ कञ्चिद्बलेनाऽनुगताः समानि विषमाणि च पुराणि चोरा निघ्नन्तश्चरन्ति विषये तत्र ।। ८३॥ कञ्चिस्त्रियः सान्त्वयसि कञ्चित्ताश्च सुरक्षिताः । कञ्चिन्न श्रद्दधास्यासां कच्चिद्गुह्यं न भापसे कञ्चिदात्ययिकं श्रुत्वा तदर्थमनुचिन्त्य च प्रियाण्यनुभवशेपे न त्वमन्तः पुरे नृप कञ्चिद् द्वौ प्रथमौ यामौ रात्रेः सुप्त्वा विशांपते। संचिन्तयसि धर्मार्थों याम उत्थाय पश्चिमे ॥८६॥ कच्चिदर्थयसे नित्यं मनुष्यान्समलंकृतः उत्थाय काले कालज्ञैः सह पाण्डव मन्त्रिभिः॥ ८७ ॥ कञ्चिद्रक्ताम्बरधराः खड्गहस्ताः स्वलंकृताः उपासते त्वामभितो रक्षणार्थमरिन्दम ॥ ८८॥ कञ्चिद्दण्ड्येषु यमवत्पूज्येषु च विशांपते परीक्ष्य वर्तसे सम्यगप्रियेषु प्रियेषु च ॥८९ ॥ कञ्चिच्छारीरमावाधमौषधैर्नियमेन वा कार्यों में नियुक्त रहकर एक मत से तुम्हारे जनपदों करते हो ? उनकी बातों का विश्वास अथवा उनसे के मंगल का प्रबन्ध करते है ॥७८।८१॥ कोई गुप्त बात तो नहीं कह देते। किसी विपत को क्या आपने राजधानी की रक्षा के लिये बड़े आती हुई सुनकर उसकी चिन्ता में चन्दन आदि गाँवों को नगरों के समान और छोटे गाँवों को बड़े । लगाकर अन्त पुर में सो तो नहीं रहते? क्या रात्रि गाँवों के समान समृद्धिशाली और सुरक्षित बना । के दूसरे या तीसरे भाग में सुख से सोकर शेप अंश में रक्या है ? क्या सब नगरों और गाँवों के रहनेवाले | उठकर धर्म-अर्थ की चिन्ता करते हो ? हे पाष्टुपुत्र लोग आप पर भक्ति रखते है ? क्या दलबन्धी के - क्या उचित समय पर उठकर वस्त्र पहनकर समय साथ चोर तो आपके राज्य के सम-विषम स्थानों के जानकार मंत्रियों के साथ दर्शन चाहनेवाले लोगों और नगरों गांवों में किसी प्रकार का उपद्रव नहीं से नित्य भेंट करते हो ? ह'शत्रुमथन ! क्या लाल मचाते ? ||८२१८३॥ । वस्त्र पहने हुए गहनों से सजे लोग, अस्त्र लिये क्या तुम स्त्रियों को ढाढस देकर उनकी रक्षा हुए रखवाली के लिये तुम्हारे दोनों तरफ खड़े रहते AADAMITMLATEST MITTALIMITIATIMITALIRAMung IATIVELAMMAR RANXINSTALLL २९ अध्याय ५ ] म हा भारत TOTTOOTO Turunnerut TITUTRUTTroomraniumintrorouTE AUTIaranMRITUAL मानसं वृद्धसेवाभिः सदा पार्थाऽपकर्पसि ॥ ९० ॥ कच्चिद्वैद्याश्चिकित्सायामष्टाङ्गायां विशारदाः सुहृदश्चाऽनुरक्ताश्च शरीरे ते हिताः सदा ॥ ९१ ॥ कच्चिन्न लोभान्मोहाद्वा मानाद्वापि विशांपते । अर्थिप्रत्यर्थिनः प्राप्तान्न पश्यसि कथञ्चन ॥ ९२ ॥ कञ्चिन्न लोभान्मोहाद्वा विश्रम्भात्प्रणयेन वा । आश्रितानां मनुष्याणां वृत्तिं त्वं संरुणसि वै ॥ ९३ ॥ कच्चित्पौरा न सहिता ये च ते राष्ट्रवासिनः । त्वया सह विरुध्यन्ते परैः क्रीताः कथञ्चन ॥ ९४ ॥ कच्चिन्न दुर्वलः शत्रुर्वलेन परिपीडितः मन्त्रेण वलवान्कच्चिदुभाभ्यां च कथञ्चन ॥९५ ॥ कञ्चित्सर्वेऽनुरक्तास्त्वां भूमिपालाः प्रधानतः । कञ्चित्प्राणांस्त्वदर्थेषु सन्त्यजन्ति त्वया हृताः ॥ ९६ ॥ कच्चित्ते सर्वविद्यासु गुणतोऽर्चा प्रवर्तते ब्राह्मणानां च साधूनां तव नैःश्रेयसी शुभा । दक्षिणास्त्वं ददास्येपां नित्यं स्वर्गापवर्गदाः ॥ ९७ ॥ है ? क्या दण्ट याग्य, पूजा योग्य, प्रिय ओर अप्रिय तुम्हारे पुरवासी ओर राज्यनासी जन विपक्षियों सन का नाचकर यमराज की भाति ठीक ठीक व्यवहार | का धन खाकर मिरकर तुममे कोई विरुद्ध व्यवहार तो करते हो ||८४१०॥ | नहीं करते ? हे युधिष्ठिर ! तुम्हारे दुर्बल शत्रु तुम्हारे हे पृथापुन ! क्या तुम नियम और ओषधि बल से ओर प्रसर तन्त्र वा मन्त्र आर पर दोनों से शारीरिक पीडा और वृद्ध के उपदेश से मानसिक दबे तो रहते हैं? क्या बड़े बड़े भूपार तुम्हारे प्रेमी पीड़ा से बचते हो निदान ओर चिकित्सा में ज्ञानी है और तुमसे आदर पार तुम्हारे मगर के रिये ओर प्रेमी वद्य सदा तुम्हारी रक्षा तो करते हैं । प्राण दे देने को कटिबद्ध रहते है ? तुम सन विद्याओं हे प्रजापारक | ऐसा ता कभी नहीं होता कि वादी में गुण के अनुसार ब्राह्मण और साधुओं को पूजते और प्रतिवादियों के आने पर अभिमान व राम तो हो क्योंकि इनकी पूना तुम्हारे लिये मगलदाई है। मोह से उनके कार्य में उचित ध्यान न देते हो, पुस्षाओं के लिये वे मूलर धर्म कर्म में तुम्हारी भक्ति विश्वास वा प्रेम से तुम्हारी शरण लेते है तुम रोम तो बनी है, वे नैसा करते थे तुम भी वैसा करने का से उनकी वृत्ति तो नहीं छुटाते ? ॥९१।९३॥ प्रयत्न करते हो? गुणशाली ब्राह्मण तुम्हारे सामने PATRIMONDAINTINENTARIETTERTALLICICILIALOENIRAYARI ३० म हा भारत सभाप srunanironmunmunmunremari 2ouTur roommuTMENTURE TerminuTH TWITTAITINATIOnmunia । aansaantamanntorananautari कच्चिद्धर्मे त्रयीमूले पूर्वैराचरिते जनैः यतमानस्तथा कर्तुं तस्मिन्कर्मणि वर्तसे ॥९८॥ कञ्चित्तव गृहेऽन्नानि स्वादून्यश्नन्ति वै द्विजाः । गुणवन्ति गुणोपेतास्तवाऽध्यक्षं सदक्षिणम् ॥ ९९ ॥ कञ्चित्क्रतूनेकचित्तो वाजपेयांश्च सर्वशः पुण्डरीकांश्च कात्स्न्येन यतसे कर्तुमात्मवान् ॥ १०० ॥ कच्चिज्ज्ञातीन्गुरून्वृद्धान्दैवतांस्तापसानपि चैत्यांश्च वृक्षान्कल्याणान्त्राह्मणांश्च नमस्यसि ॥ १०१॥ कञ्चिच्छोको न मन्युयं त्वया प्रोत्पाद्यतेऽनघ । अपि मङ्गलहस्तश्च जनः पार्श्वेऽनुतिष्ठति ॥ १०२ ॥ कञ्चिदेपा च ते बुद्धिवृत्तिरेषा च तेऽनघ आयुप्या च यशस्या च धर्मकामार्थदर्शिनी ॥ १०३ ॥ एतया वर्तमानस्य बुद्धया राष्ट्रं न सीदति । विजित्य च महीं राजा सोऽत्यन्तं सुखमेधते ॥ १०४ ॥ कञ्चिदार्यो विशुद्धात्मा झारितश्चौरकर्मणि । अदृष्टशास्त्रकुशलेन लोभावध्यते शुचिः ॥ १०५॥ दुष्टो गृहीतस्तरकारी तज्ज्ञेईष्टः सकारणः कञ्चिन्न मुच्यते स्तेनो द्रव्यलोभान्नरर्पभ ॥ १०६ ॥ नित्य स्वादिष्ट और गुणकारी भोजन करते वा दक्षिणा और क्रिया की बात कही, क्या तुम्हारी बुद्धि और पाते हैं कि नहीं क्या तुम जितेन्द्रिय होकर एकचित्त क्रिया वैसे ही है । जो ऐमी बुद्धि मे चलते है उनका से वाजपेय और पुण्डरीक आदि यनों को पूरा करते राज्य कदापि नहीं बिगड़ता, और वे राजा सम्पूर्ण पृथ्वी हो । ॥९४११००॥ को जीतकर बड़े मुखी होते है । हे नरश्रेष्ठ! मूखों मे वृद्ध, जाति, गुरु, देवता, तपम्बी, चैत्य, वृक्ष मेल करते हुए अनजान मन्त्री लोभपग होकर क्मिी और प्राणों को नमस्कार ती करते हो । हे अनघ! शुद्धचित्त दोपरहिन श्रेष्ठ जन पर झूठ-मूठ चार्ग का तुम किमी को गोफ या क्रोध तो नहीं उपजात । फरक लगाकर मर लटकर उसको मारते तो नहीं' यया पुरोहितादि मंगलकारी पुरुष तुम्हारे पाम रहकर और ममझ चूझकर किमी मचमुच चोरी करनेवाले म्यम्त्ययन करते है । मने आयु और यश बहान- दुष्ट नोर को चुराये मालमहित पकड़कर उस माल पानी, और धर्म-अर्थ का फल देनेवारी जैमी बुद्धि के लोम में छोड़ तो नहीं देते ! ॥१०१।१०६॥ Sree.comamrTEETTERTILIARMITTEEmaiIATIMITrOSTATENT .

३६ अध्याय ५] म हा भारत Tummitram rannuTIOTTOMuTunrTHIITTENTITUTr RETAITRINITITTE उत्पन्नान्कच्चिदाढयस्य दरिद्रस्य च भारत । अर्थान्न मिथ्या पश्यन्ति तवाऽमात्या हृता धनैः ॥१०७॥ नास्तिक्यमनृतं क्रोधं प्रमादं दीर्घसूत्रताम् अदर्शनं ज्ञानवतामालस्यं पञ्चवृत्तिताम् ॥ १०८ ॥ एकचिन्तनमर्थानामनर्थज्ञैश्च चिन्तनम् निश्चितानामनारम्भं मन्त्रस्याऽपरिरक्षणम् ॥ १०९ ॥ मङ्गलाद्यप्रयोगं च प्रत्युत्थानं च सर्वतः कञ्चित्वं वर्जयस्येतान्राजदोपांश्चतुर्दश प्रायशो यैर्विनश्यन्ति कृतमूलापि पार्थिवाः ॥ ११० ॥ कच्चित्ते सफला वेदाः कच्चिते सफलं धनम् । कच्चित्ते सफला दाराः कच्चित्ते सफलं श्रुतम् । १११ ॥ युधिष्ठिर उवाच-कथं वै सफला वेदा. कथं वै सफलं धनम् कथं वै सफला दाराः कथं वै सफलं श्रतम् ॥ ११२ ॥ नारद उवाच-अग्निहोत्रफला वेदा दत्तभुक्तफलं धनम् रतिपुत्रफला दाराः शीलवृत्तफलं श्रुतम् ॥ ११३ ॥ वशम्पायन उवाच एतदाख्याय स मुनिर्नारदो वै महातपाः पप्रच्छाऽनन्तरमिदं धर्मात्मानं युधिष्ठिरम् ॥ ११४ ॥ हे भारत ! तुम्हारे मन्त्री लोग रोम में पड़पर धनी वेदपठन, धन, स्त्रीराम और शास्त्रज्ञान ये मब तो और दरिद्र के झगड़ा होने पर अनुचित विचार तो सफर हुए हैं नारद के ये बहुमूल्य वचन मुनकर नहीं करते। नास्तिकता, असत्य, मोध, अनवधानता, युधिष्ठिर ने पूरा-हे तपोधन । वेद,धन, मिया और दीर्घसूत्रता, जानियों से न मिरना, आलस्य, विषय वेदगारों का अनुभव किमतरह सफर होता है। रोलुपता, हर बातों में आमक्ति, अर्थ न जानने ॥१०७/११२॥ वारे रोगों मे विचार करना, समझे बूझे कार्य का नारद जी ने कहा-अमिहोनादि कम करने प्रारम्भ न करना, मलणा न रखना, मगर काय में स वेद सफल होते हैं । दान और भोग करने से हाथ न डारना, और विन समझे वृझे हर काम में धन गार होता है। कामवृद्धि रे ममन में और पुन हाथ डालना, रानाओं के ये चौदह दोष तो त्याग उपनाने से स्त्रीगम सफर होता है, और मुगीलता देते हो। जड़ दृढ़ हाने पर भी राजा रोग इन तथा सदानार राम करने मेवानजान माल होता दोपोंमे बहुधा विगह जाते हैं। हे महारान' तुम्हारा है। वैशम्पायन ने कहा कि महातपम्पी नारद मुनि CHECEIATICHITTEPITALCHITTOPATI [ सभापर्व 1 ग्रामmroreportinuu TumTISTRICurrrror uTUTE TUTER romTTRACT - EHIMIREImanaras । - । ३२ म हा भारत YouTuouTI नारद उवाच-कच्चिदभ्यागता दूराद्वणिजो लाभकारणात् । यथोक्तमवहार्यन्ते शुल्क शुल्कोपजीविभिः ॥ ११५ ॥ कच्चित्ते पुरुपा राजन्पुरे राष्ट्रे च मानिताः । उपानयन्ति पण्यानि उपधाभिरवञ्चिताः कच्चिच्छृणोपि वृद्धानां धर्मार्थसहिता गिरः नित्यमर्थविदां तात यथाधर्मार्थदर्शिनाम् ॥११७॥ कञ्चित्ते कृपितन्त्रेषु गोषु पुष्पफलेषु च धर्मार्थं च द्विजातिभ्यो दीयेते मधुसर्पिषी ॥११८ ॥ • द्रव्योपकरणं किंचित्सर्वदा सर्वशिल्पिनाम् चातुर्मास्यावरं सम्यनियतं संप्रयच्छसि कञ्चित्कृतं विजानीपे कर्तारं च प्रशंससि सतां मध्ये महाराज सत्करोपि च पूजयन् ॥ १२० ॥ कञ्चित्सूत्राणि सर्वाणि गृह्णासि भरतर्षभ हस्तिसूत्राश्वसूत्राणि रथसूत्राणि वा विभो ॥-१२१ ॥ कञ्चिदभ्यस्यते सम्यग्गृहे ते भरतर्षभ धनुर्वेदस्य सूत्रं वै यन्त्रसूत्रं च नागरम् ॥ १२२ ॥ कच्चिदत्राणि सर्वाणि ब्रह्मदण्डश्च तेऽनघ ने फिर धार्मिकवर युधिष्ठिर से कहा-हे महाराज ! सब समय में सब प्रकार के शिल्पियों को चार महीने लाभ की आशा से दूर देश से आये हुए वैपारियों भले प्रकार ठहराये हुए वेतन और बनाने की सामग्री और सौदागरों से कर लेनेवाले राजर्मचारी उनित कर तो देते हो? क्या शिल्पियों का किया हुआ कार्य जान तो ले हैन । यसब व्यापारी ओर सौदागर तुम्हारे लेते हो और उनका सत्कार करते हो ?।११८।१२०। नगर और राज्य में सम्मानित होकर और ठगे न जाकर हे भरतश्रेष्ठ ! हाथी, घोड़े, रथ आदि के शुभाशुभ विक्री की सामग्री तो ला सकते हैं ॥११३।११६॥ लक्षणों के अन्थों का अध्ययन तुम्हारे घर होता है ! हे तुम एकाग्र होकर धर्म-अर्थ का ठीक जान भारतनंदन! धनुर्वेदसूत्र नगर हितकारी यंत्रों की शिक्षा रखनेवाले वृद्ध पुरुषों के, धर्म-अर्थ के बार में उप के सब ग्रंथ तुम्हारे यहां पढ़े जाने है या नहीं ? हे देश मुनते रहते तो हो ! सती, गाय, फल, फल, अनघ ! मन सहित मय प्रकार मास्त्र, वादण्ट धर्म आदि की उन्नति के लिए ब्राह्मणों को घृत-मधु अर्थात् आभिचारिक विद्या और विप देने के मय देकर तुम मन्तुष्ट रखने तो हो ! हे महाराज !तुम उपाय यह सब गवनाशी विषय तो तुम जानते हो ! । mroHANNERATranama NITAMIL CATIONAPRIMIRRORTAL TAmrel ३३ अध्याय ५ ] म हा भारत AuTITUTION SainamIUTI TITUT TUTORITTURE । घायरामा । विपयोगास्तथा सर्वे विदिताः शत्रुनाशनाः ॥ १२३ ॥ कच्चिदग्निभयाच्चैव सर्व व्यालभयात्तथा रोगरक्षोभयाच्चैव राष्ट्र स्खं परिरक्षसि ॥१२४ ॥ कच्चिदन्धांश्च मूकांश्च पङ्गन्व्यङ्गानवान्धवान् । पितेव पासि धर्मज्ञ तथा प्रवजितानपि ॥ १२५॥ पडनी महाराज कच्चित्ते पृष्ठतः कृताः निद्राऽऽलस्यं भयं क्रोधो मार्दवं दीर्घसूत्रता ॥ १२६ ॥ वैशम्पायन उवान-ततः कुरूणामृपभो महात्मा श्रुत्वा गिरो ब्राह्मणसत्तमस्य । प्रणम्य पादावभिवाद्य तुष्टो राजाऽब्रवीन्नारदं देवरूपम् ॥१२७॥ युधिष्ठिर उवाच-एवं करिष्यामि यथा त्वयोक्तं प्रज्ञा हि मे भूय एवाऽभिवृद्धा । उक्त्वा तथा चैव चकार राजालेभेमहीसागरमेखलां च ॥१२॥ भारद उवाच-एवं यो वर्तते राजा चातुर्वर्ण्यस्य रक्षणे । स विहृत्येह सुसुखी शकस्यति सलोकताम् ॥ १२९ ॥ इति श्रीमन्महाभारते मभापर्वणि लोकपालसभाख्यानपर्वणि नारदप्रभमुपेन राजधर्मानुगामने कभिदध्यायो नाम पञ्चमोऽध्यायः ॥५॥ तुम अमि सर्पादि के हिंसक जन्तु और रोग राक्षसों करूंगा। आपके इन यननों को मुनकर मेरी बुद्धि मे उपजे भय से अपनी प्रजा को बचाते तो हो ! हे आर भी परिमार्जित होकर बढ़ गई । हे गजा धर्मज्ञ ! अंधे, गूगे, ल्ले, देहफूट बिन बन्धु और जनमेजय ! राजा युधिष्ठिर ने नारद के आगे प्रतिज्ञा की मन्यामियों को उनके पिता की भाति बनकर पालते और आगे उसी के अनुमार उन्होंने काम भी किये । तो हो ! निद्रा, आलम्य, भय, क्रोध, दिलाई और फल यह हुआ कि थोड़े ही दिनों में ये समुद्र-पर्यन्न दीर्घसूत्रता अनर्थ करनेवाले इन र दोषों को दूर तो पृथ्वी के अधीश्वर होकर मुखी हुए । नारद जी ने किया है ! ॥१२१११२६॥ युधिष्ठिर से कहा-ह महाराज ! जो गना इस तरह यसम्पायन कहते हैं कि तय महात्मा युधिष्ठिर, के आचरणों मे धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष की और ग्राम श्रेष्ठ देवरूप नारद के ये वचन मुनकर, चारों वणों की रक्षा करता है यद इस रोग में उनके पांच टूटकर प्रमलना में बोले हे भगवन् ' मुनी र अन्न को इन्द्रनगर में जाना। भारम उपदेश के अनुमार ही में मय शाम ॥१२॥१२॥ ममापर्य या पागवां अध्याय ममाना । - ३४ मभापर्व म हा भारत DUTUITOURIMURTI TOuve grouTITUTORITTuuuuuuumarTTITUTCurrouminine अथ पठोऽध्यायः ॥६॥ ॥ १ ॥ ॥ २ ॥ - ॥४॥ वैशम्पायन उवाच-संपूज्याऽथाऽभ्यनुज्ञातो महर्षवचनात्परम् प्रत्युवाचाऽऽनुपूर्येण धर्मराजो युधिष्ठिरः भगवन्न्याय्यमाहैतं यथावद्धर्मनिश्चयम् यथाशक्ति यथान्यायं क्रियतेऽयं विधिर्मया राजभिर्यद्यथा कार्य पुरा वै तन्न संशयः यथान्यायोपनीतार्थं कृतं हेतुमदर्थवत् वयं तु सत्पथं तेषां यातुमिच्छामहे प्रभो न तु शक्यं तथा गन्तुं यथा तैनियतात्मभिः वैशम्पायन उवाच-तं तु विश्रान्तमालक्ष्य देवर्णिममितद्युतिम् एवमुक्त्वा स धर्मात्मा वाक्यं तदभिपूज्य च मुहूर्तात्प्राप्तकालं च दृष्ट्वा लोकचरं मुनिम् नारदं सुस्थमासीनमुपासीनो युधिष्ठिरः अपृच्छत्पाण्डवस्तत्र राजमध्ये महाद्युतिः युधिष्ठिर उवाच--भवान्संचरते लोकान्सदा नानाविधान्वहून् ब्रह्मणा निर्मितान्पूर्व प्रेक्षमाणो मनोजवः ईदृशी भविता काचिद् दृष्टपूर्वा सभा क्वचित् । . उठा अध्याय ॥६॥ वैशम्पायन कहते हैं कि राजन् , महर्षि नारद उनके समान जितेन्द्रिय न होने के कारण सोरहीं के यह कह चुकने पर, यथोचित सम्मान करके, आने उनका अनुसरण नहीं कर मकते ॥११॥ उनके प्रश्नों के उत्तर में युधिष्ठिर ने कहा-हे भगवन् ! वैशम्पायन जी जनमेजय से कहते हैं कि महर्षि में आपके बताये हुए इन धर्ममूलक न्यायपूर्ण नारद के कुछ विश्राम कर चुकने पर फिर सभा के उपदेशों के अनुसार ही चलता रहता हू । न्याययुक्त बीच उनका सरकार करके उचित ममय पर युधिष्ठिर और अर्थ-मान काम करते समय, पहले के राजा ने उनसे कहा-है भगवन् ! आप सब जगह जा अपने आचरणों में जो मार्ग दिया गये है उमी सक्त है और विधाता के बनाय लोक-रोकान्तरों में राह पर चलने में, अपनी और में मैं तनिक भी घूमते और उनकी सर किया करते है। में पूछना श्रुटि नहीं होने देना । हे प्रभो ! हम रोग उन है कि आपने कहीं हमारी हम अपूर्व सभा के ममान जितेन्द्रिय पुरुषों के सन्मार्ग पर जाना चाहते हैं, किन्तु । या इममे अच्छी कोई समा दबी है या नहीं! यदि - CDCOMEPTITUT.LMAmwELMANDnoramanumarmy अध्याय ६ ] म हा भारत INDOMAINMILLIOAAAAAAAAAMIRLANDHAMALARIANDLAMAARUIDANLOADINNADIAN tul । । । : इतो वा श्रेयसी ब्रह्मस्तन्ममाऽऽचक्ष्व पृच्छतः॥८॥ वैशम्पायन उवाच-तच्छ्रुत्वा नारदस्तस्य धर्मराजस्य भाषितम् पाण्डवं प्रत्युवाचेदं स्मयन्मधुरया गिरा नारद उवाच--मानुषेषु न मे तात दृष्टपूर्वा न च श्रुता सभा मणिमयी राजन्यथेयं तव भारत सभां तु पितृराजस्य वरुणस्य च धीमतः कथयिप्ये तथेन्द्रस्य कैलासनिलयस्य च ॥ ११ ॥ ब्रह्मणश्च सभां दिव्यां कथयिष्ये गतकमाम् । दिव्यादिव्यैरभिप्रायैरुपेतां विश्वरूपिणीम् ॥ १२ ॥ देवैः पितृगणैः साध्यैर्यज्वभिनियतात्मभिः जुष्टां मुनिगणैः शान्तैदयज्ञैः सदक्षिणैः यदि ते श्रवणे बुद्धिर्वर्तते भरतर्षभ नारदेनैवमुक्तस्तु धर्मराजो युधिष्ठिरः ॥१४॥ प्राञ्जलितृभिः सार्धं तैश्च सर्वर्द्विजोत्तमैः नारदं प्रत्युवाचेदं धर्मराजो महामनाः ॥ १५ ॥ सभाः कथय ताः सर्वा श्रोतुमिच्छामहे वयम् । किंद्रव्यास्ताःसभा ब्रह्मन्किविस्ताराः किमायताः॥ १६ ॥ दगी हो तो उसका वर्णन करके आप हमें कृतार्थ सभा हे उसका वर्णन मै तुम्हारे आगे करूँगा॥२॥१॥ उस सभा में देवता, पितर, मान्य और जिते- यह सुनकर मुसकराते हुए महर्षि नारद ने न्द्रिय-शान्तचिच-वेदपाठी-यज्ञनिरत मुनि रोग रहते मधुर वचनों से कहा- नरश्रेष्ठ | आपके इम है। महर्षि नारद के ये वचन सुनकर भाइयों और मणिमयी अद्भुत मभा की ममता करनेवारी दुमरी ब्राह्मणों महित महात्मा युधिष्ठिर ने हाथ जोड़कर कहा- समा इस मनुप्य रोक में मैने नहीं देग्वी मुनी। यदि हे भगवन् ' आप इन मर सभाओं का वर्णन कीनिण, आप सुनना चाहते है तो मै आपके आग पितृगन में मुनना चाहता है। य ममाएं कितनी लम्बी और यम, बुद्धिमान् वरण, देवराज इन्द्र और क्लामयामी किननी चौड़ी है । इनमें क्या-क्या मामग्री है। इन यथगन कुरेर वीममा सा वर्णन करता है। रोक्कि सभाओं में पितामह वमा, इन्द्र, यमगन, वरण और और अगामि कारीगरियों से भूपित, मय शान्ति र की उपासना कौन रोग करने है। रपया आप और कष्टो मे रहित, विश्वरूपिणी ब्रह्मा की जो दिव्य इन ममाओं का वर्णन करके हमारे कानूदर की दर TITION TWITTER कीजिए ॥५॥८॥ TAINITIOCTODCHID: in TAMATTreat LTE COMMITUATIOTICE ३ म हा भारत [ समापर्व nuterrorouproUruruwronu StreetinYOUTru THURITTENTINUETOOTITATE । पितामहं च के तस्यां सभायां पर्युपासते वासवं देवराजं च यमं वैवस्वतं च के ॥ १७ ॥ वरुणं च कुवेरं च सभायां पर्युपासते एतत्सर्वं यथान्यायं ब्रह्मर्षे वदतस्तव श्रोतुमिच्छाम सहिताः परं कौतूहलं हि नः एवमुक्तः पाण्डवेन नारदः प्रत्यभापत क्रमेण राजन्दिव्यास्ताः श्रूयन्तामिहनःसभाः ॥ १९ ॥ इति श्रीमन्महाभारते सभापर्वणि लोकपालसभाख्यानपर्वणि युधिष्ठिरमभाजिज्ञासायां पष्ठोऽध्यायः ॥६॥ कीजिए । इस प्रकार युधिष्ठिर के प्रार्थना करने पर, मै. एक-एक करके इन सब दिव्य सभाओं का वर्णन उनका आग्रह देख, नारद ने कहा है राजन् ! करता हूं, सुनिए ॥१३॥१९॥ सभापर्व का छठा अध्याय समाप्त हुआ । . नारद उवाच- अथ सप्तमोऽध्यायः ॥७॥ शक्रस्य तु सभा दिव्या भास्वरा कर्मनिर्मिता । स्वयं शक्रेण कौरव्य निर्मिताऽर्कसमप्रभा विस्तीर्णा योजनशतं शतमध्यर्धमायता वैहायसी कामगमा पञ्चयोजनमुच्छ्रिता जराशोकलमापेता निरातका शिवा शुभा वेश्मासनवती रम्या दिव्यपादपशोभिता तस्यां देवेश्वरः पार्थ सभायां परमासने आस्ते शच्या महेन्द्राण्या श्रिया लक्ष्म्या च भारत ॥ ४ ॥ नारद ने कहा- हे कुरुनन्दन ! इन्द्र जी की मङ्गलमयी, बहुमूल्य आसनों और ऊँचे विमानों मे ममा अत्यन्त प्रकाशमान है। उन्होंने अपने किये गोभित है। उस सभा में अत्यन्त मुन्दर वृक्ष लगे एप पुण्यकर्मों के फल से उसको प्राप्त किया है। हुए हैं । वह जहाँ चाहो वहाँ जा सकती है। वह वह अर्क के समान प्राममान दिव्य सभा उन्होंने सभा डद मी योजन लम्बी, मी योजन चौड़ी और म्वयं बनाई है। पर रमणीय. भाकाशचारिणी मभा पांच योजन ऊंची है। उमममा म देवनाथ न्द्र बुदापा, शोक, थकान, चिन्ता आदि व्याधियों को केयर लिग किरीट निर्मल. यव और मुन्दर भारा दर करना है । यह भयरहित, गान्ति के देनेपाली, पहने, अति रूपवान अपनी पनी गनी गाभा मपति Prerinar.rrmuTumAINEMATICERTAINMETARMERITAINEEEEEEncan ३७ अध्याय ७ ] म हा भा र त Trur TTITHTTTTTTTTTTTTTபாகரராயராரரானாயா । VILanuahau.raniEasmRRIGERTAIT विभ्रद्वपुरनिर्देश्यं किरीटी लोहिताङ्गदः विरजोम्बरश्चित्रमाल्यो ह्रीकीर्तिद्युतिभिःसह ॥ ५॥ तस्यामुपासते नित्यं महात्मानं शतक्रतुम् मरुतः सर्वशो राजन्सर्वे च गृहमेधिनः सिद्धा देवर्षयश्चैव साध्या देवगणास्तथा मरुत्वन्तश्च सहिता भास्वन्तो हेममालिनः ॥ ७ ॥ एते सानुचराः सर्वे दिव्यरूपाः स्वलंकृताः उपासते महात्मानं देवराजमरिंदमम् तथा देवर्षयः सर्वे पार्थ शकमुपासते अमला धूतपाप्मानो दीप्यमाना इवाऽग्नयः तेजस्विनः सोमसुतो विशोका विगतज्वराः पराशरः पर्वतश्च तथा सावर्णिगालवी ॥ १० ॥ शङ्खश्च लिखितश्चैव तथा गौरशिरा मुनिः दुर्वासाः क्रोधनः श्येनस्तथा दीर्घतमा मुनिः ॥ ११ ॥ पवित्रपाणि सावर्णिर्याज्ञवल्क्योऽथ भाल्लुकिः । उद्दालकः श्वेतकेतुस्ताण्डयो भाण्डायनिस्तथा ॥ १२ ॥ हविमांश्च गरिष्ठश्च हरिश्चन्द्रश्च पार्थिवः हृद्यश्चोदरशाण्डिल्यः पाराशर्यः कृपीवलः वातस्कन्धो विशाखश्च विधाता काल एव च । करालदन्तस्त्वष्टा च विश्वकर्मा च तुम्बुरु ॥ ११॥ श्री द्युति और कीर्तिगहित परम उत्कृष्ट आमन पर हे पार्थ ' अमल निष्णाप अमि ममान उजाले, विराजमान है। वह मरुद्गण उम मभा में महात्मा तेजस्वी सोम पानवाले, बुद्रापा और शाकमे रहित देव- इन्द्र की सदा उपामना करते हैं। मिद्धगण, साध्य पिंगण और परागर,पर्यन, माणि,गारय,गहनिम्बिन, गण, देवर्षिगण, देवगण और सुवर्णमाला पहने मरु गौरशिग, कापी दुर्वामा, श्येन, दधिनमा, पवित्रपाणि, दण दिव्यरूपवाले गहने पहने अपने-अपने माथियों माणि, यानवलय, भानुकि, उद्दार, नान, के माथ शत्रुदमन महाराज देवराज की उपासना साध्य, माण्डायनि, हविष्मान, गरिष्ठ, गजा हरिचन्द्र, सय, उदम्माण्टिल्य, पागमय (व्याग), परने हैं॥१०॥ Pmnnamromete-CHHOTE ३८ म हा भारत [मभापर्व - rouTERNITUTIYINITIOTTETTINUTRIOTIRTHOUTORIYUDHiummer अयोनिजा योनिजाश्च वायुभक्षा हुताशिनः । ईशानं सर्वलोकस्य वञिणं समुपासते ॥ १५ ॥ सहदेवः सुनीथश्च वाल्मीकिश्च महातपाः शमीकः सत्यवाक्चैव प्रचेताः सत्यसंगरः ॥ १६ ॥ मेधातिथिर्वामदेवः पुलस्त्यः पुलहः क्रतुः मरुत्तश्च मरीचिश्च स्थाणुश्चाऽत्र महातपाः कक्षीवान्गौतमस्तायस्तथा वैश्व नरो मुनिः मुनिः कालकवृक्षीय आश्राव्योऽथ हिरण्मयः ॥ १८ ॥ संवों देवहव्यश्च विष्वक्सेनश्च वीर्यवान् कण्व कात्यायनो राजन्गार्ग्यःकौशिक एव च । दिव्या आपस्तथीयध्याश्रद्धा मेधा सरस्वती ॥ १९ ॥ अर्थो धर्मश्च कामश्च विद्युतश्चैव पाण्डव जलवाहास्तथा मेघा वायवः स्तनयित्नवः ॥ २० ॥ प्राची दिग्यज्ञवाहाश्च पावकाः सप्तविंशतिः अग्नीपोमो तथेन्द्राग्नी मित्रश्च सविताऽर्यमा ॥ २१ ॥ भगो विश्वे च साध्याश्च गुरुः शुक्रस्तथैव च । विश्वावसुश्चित्रसेनः सुमनस्तरुणस्तथा ॥ २२ ॥ कृपीवल, वातस्कंध, विशाख, विधाता, काल, कराल तपा स्थाणु, कक्षीवान् , गौतम, ताय,महर्षि वैश्वानर, दन्त, त्वष्टा, विश्वकर्मा, तुम्बुरु तथा योनिज, अन कालक, वृक्षीय, आश्राव्य, हिरण्मय, सवत, देवह व्य, योनिज, वायु भक्षी, आहुति-भोजी आदि सर्व प्रकार वीर्यवन्त विश्वक्सेन, दिव्य जल और सर्व प्रकार की के देवता उस सभा में त्रिलोकीनाथ इन्द्र की सेवा औषधियाँ विद्यमान रहती है। श्रद्धा, मेधा, सरस्वती, में रहते है ॥१०॥१५॥ धर्म, अर्थ, काम, विद्युत, जलधर मेघ, वायु, बिजली इस सभा में सहदेव, सुनीथ, महातपस्वी बाल् की क्डक, पूर्व दिशा, यज्ञ पूरा करनेवाले सत्ताईस मीकि, सत्यवादी शमीक, सत्यप्रतिज प्रचेता,मेधातिथि, अमि*, अग्मि-साम, इन्द्रामि, मित्र, सविता, अर्थमा, वामदेव, पुलह, पुलस्त्य, ऋतु, मरुत, मरीचि, महा- ! भग, विश्वदेवगण, साध्यगण, बृहम्पति, शुक्राचार्य, * ' प्रदा के अग से उत्तम अजिरा, २ दक्षिणाग्नि, ३ गार्हपत्य, ४ आहानाय, ५ निर्मन्प, ६ वैद्युत, ७ शुर, ८ मवत ९ लौकिक, १० जाठर, ११ विषम, १२ यात्, १३क्षेमवान् , १४ वणव, १५ दस्युमान् , १६ वलद, १७ शान्त, १८ पुष्ट, १९ विभावसु, २० ज्योतिष्मान् , २१ भरत, २२ भद्, २३ स्विष्टकृत, '४ वमुमान् ,२५ केतु ०६ सोम, २७ पितृमान् । WEDDITIOIMMITTEAMSHAMITMIDNIOANTIMIMDAINyMMMMMITRA -- , INVENTANT orne TOTROPITITImrn rammarrianRED । अध्याय ७ ] महाभारत tuigglinh tinh nude यज्ञाश्च दक्षिणाश्चैवं ग्रहास्तोमाश्च भारत यज्ञवाहाश्च ये मन्त्राः सर्वे तत्र समासते ॥ २३ ॥ तथैवाऽप्सरसो राजन्गन्धर्वाश्च मनोरमाः नृत्यवादित्रगतिश्च हास्यैश्च विविधैरपि ॥ २४ ॥ रमयन्ति स्म नृपते देवराजं शतक्रतुम् स्तुतिभिर्मङ्गलेश्चैव स्तुवन्तः कर्मभिस्तथा । २५॥ विक्रमैश्च महात्मानं वलवृत्रनिपूदनम् ब्रह्मराजर्षयश्चैव सर्वे देवर्पयस्तथा ॥ २६ ॥ विमानैर्विविधैर्दिव्यैर्दीप्यमाना इवाऽग्नयः। स्रग्विणो भूपिताः सर्वे यान्ति चायान्ति चापरे ॥ २७ ॥ बृहस्पतिश्च शुक्रश्च नित्यमास्तां हि तत्र वे एते चाऽन्ये च बहवो महात्मानो यतव्रताः ॥ २८ ॥ विमानेश्चन्द्रसंकाशेः सोमवत्प्रियदर्शनाः ब्रह्मणः सदृशा राजन्भृगुः सप्तर्पयस्तथा ॥ २९॥ एया सभा मया राजन्दृष्टा पुष्करमालिनी शतक्रतोर्महाबाहो याम्यामपि सभां शृणु ॥३०॥ पनि श्रीमन्महाभारते मभापर्यणि लारपालमभाम्यानपर्यणि इन्द्रमभायर्गन नाम मतमोऽधायः॥७॥ विश्वापसु, चित्रसेन, सुनन और तरण, मा यन, । चन्द्रमा के जैसे दिव्य विमानों पर चदकर मदा उम दक्षिणा,मन सोमपान, सर नाम नाम के स्तोत्र । सभा में आया जाया करते है । यम्पनि और शुक्र चिोप, और यज्ञों के सर मन्त्र इन्द्र की ममा में यहाँ नित्य रहते है । हे महारान । चन्द्रमा के ममान उपम्पिन रहते हैं ॥१६॥२३॥ मनार कान्नि और ब्रह्माय ममान तेज में अनंगन यहाँ नरह-तरह के नाच, गीत, याने मोरहाम ये रोग, और और मामा रोग, मृगु और मन- परिहाम द्वारा माल म्नुनि मुनार तथा विक्रम ऋपि सदैव वहां आया करते हैं। या इन्द्रका मायमान करके मुन्दरी अप्सरा और विनिन 'पुकर माग्निी' ममा मने पर अपनी आँमा मे गन्धर्व रोग इन्द्रदेव का मनोरान क्यिा करने है। देमी है । भर यमगरवीगमा का वर्णन भी करना दिव्य मा। और यम पदने तजम्मी रिंगण, भमि है. मनिष 2030 के ममान माग्नि, रामणिगण और देवपिंगा मभापर्य पा मानपा अध्याय ममानमा ।। REETorrenTIRTICLemurrencreas । - ४० म हा भारत [सभाप Puru AUTTITUATARIAnmuTuuurmuTIIIII अथ अष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥ । ॥ नारद उवाच- कथयिष्ये सभा याम्यां युधिष्ठिर निवोध ताम् । वैवस्वतस्य यां पार्थ विश्वकर्मा चकार ह तैजसी सा सभा राजन्वभूव शतयोजना विस्ताराऽऽयामसंपन्ना भूयसी चाऽपि पाण्डव ॥ २ ॥ अर्कप्रकाशा भ्राजिष्णुः सर्वतः कामरूपिणी नाऽतिशीता न चाऽत्युष्णा मनसश्च प्रहर्षिणी ॥ ३ ॥ न शोको न जरा तस्यां क्षुत्पिपासेन चाऽप्रियम् । न च दैन्यं क्लमो वापि प्रतिकूलं न चाप्युत सर्वे कामाःस्थितास्तस्यां ये दिव्या ये च मानुषाः। रसवच्च प्रभूतं च भक्ष्यं भोज्यमरिन्दम ॥ लेां चोष्यं च पेयं च हृद्यं स्वादु मनोहरम् पुण्यगन्धाः स्रजस्तस्यां नित्यं कामफला द्रुमाः ॥ ६ ॥ रसवन्ति च तोयानि शीतान्युष्णानि चैव हि । तस्यां राजर्पयः पुण्यास्तथा ब्रह्मर्षयोऽमलाः ॥७॥ यमं वैवस्वतं तात प्रहृष्टाः पर्युपासते ययातिनहुपः पूरुर्मान्धाता सोमको नृगः आठवां अध्याय । नारद जी ने कहा—हे राजा युधिष्ठिर ! अब प्यास कुछ नहीं लगती। और वहाँ के रहनेवालों मै तुम से सूर्य के पुत्र यमराज की सभा का में दीनता, ग्लानि और प्रतिकूलता नहीं होती है । वर्णन करता हूँ; एकाग्र होकर सुनो। हे पाण्डवश्रेष्ठ ! | उस सभा में सब दैवी और मानुषी पदार्थ और भक्ष्य, इन्द्र की सभा के समान वह सभा भी शोभा से पूर्ण भोज्य,लेह्य,चोप्य और पेय आदि बड़े-बड़े प्रिय स्वादिष्ट और कामरूपिणी है। उस सभा को विश्वकर्मा ने खाने के पदार्थ रहते है। और वहां ऐसे-ऐसे वृक्ष लगे बनाया है। और वह तेजमय और सौ-सौ योजन लम्बी हुए है कि जिस फल की इच्छा होये वही फल और चौड़ी है । प्रकाश उस सभा का सूर्य के समान उनमें प्राप्त हो जाता है ॥१६॥ है । उसमें न बहुत गर्मी है न सरदी । यहाँ जाने ठंढा, गरम दोनों प्रकार का जल वहां भरा से मन बहुत प्रसन्न हो जाता है और उसमें रहने रहता है । उस सभा में बड़े बड़ राजर्षि और पवित्र से न शोक होता है न बुढ़ापा व्यापता है और भूख म्वभाववाले ब्रह्मर्षि यमराज की उपासना किया करते SHAREMIUMITHAmommmmmmmmmmaamRAVATATAMIRRITAMILLER ४१ म हा भारत अध्याय ८] UUUTrain yun TOOO Niromrnrnar Tumtarunu । THAARL ITRADuirouTOTTO । manuTERamanriTAMI त्रसदस्युश्च राजर्षिः कृतवीर्यः श्रुतश्रवाः अरिष्टनेमिः सिद्धश्च कृतवेगः कृतिनिमिः प्रतर्दनः शिविर्मत्स्यः पृथुलाक्षो वृहद्रथः वार्तो मरुत्तः कुशिकः सांकाश्यः सांकृतिर्भुवः । चतुरश्वः सदश्वोर्मिः कार्तवीर्यश्च पार्थिवः ॥ १० ॥ भारतः सुरथश्चैव सुनीथो निशठोऽनलः दिवोदासश्च सुमना अम्बरीपो भगीरथः ॥ ११ ॥ व्यश्वः सदश्वो वध्यश्वः पृथुवेगः पृथुश्रवाः । पृपदश्वो वसुमनाः क्षुपश्च सुमहावलः रुपद्रुपसेनश्च पुरुकुत्सो ध्वजी रथी ॥ १२ ॥ आटिपेणो दिलीपश्च महात्मा चाऽप्युशीनरः । औशीनरिः पुण्डरीकः शतिः शरभः शुचिः ॥ १३ ॥ अोऽरिष्टश्च वेनश्च दुष्यन्तः सृञ्जयो जयः भाङ्गासुरिः सुनीथश्च निपधोऽथ वहीनरः ॥१४॥ करन्धमो वाहिकश्च सुद्युम्नो बलवान्मधुः ऐलो मरुत्तश्च तथा वलवान्पृथिवीपतिः ॥ १५ ॥ कपोतरोमा तृणकः सहदेवार्जुनो तथा व्यश्वः साश्वः कृशाश्वश्च शशविन्दुश्च पार्थिवः ॥ १६ ॥ रामो दाशरथिश्चैव लक्ष्मणोऽथ प्रतदनः है। हे राजन् ! ययाति, नहुप, पुरु, मान्धाता, राजा रपट्ट, वृपमेन, पुरउन्म, वजी रथी, ॥७॥१२॥ सोमक, मृग, प्रसद्दम्यु, कृतवार्य, श्रुतश्रया, अग्ष्टि आप्टिपण, दिरीप, महात्मा उनीनर, आगीनरि, नेमी, सिद्ध, कृतयेग, कृति, निमि, प्रतर्दन, शिचि. पुण्डरीक, गर्यानि, गरम, शुनि, अर, रिट, वन, मम्य, पृथुलाक्ष, वृहद्रय, वातं मरत, कुशिक, दुप्यन्त, माय, जय, मात्रामरि, मुनीथ, निषध, साहाय, साति, ध्रुव, चतुरदय, मदम्यामि, कार यहीनर, कम्न्धम, याहिक, मुगु, वर्ग मधु, पर, चार्य, भरन, मुरथ, मुनीय,निशठ,अनन. दिवोदाम, राजा मरत, पानगमा, मृणक, मजदेय, महसया सुमना, अम्परांप, मागीरथ, व्यञ्च, मदश्व. वया, अर्जुन, व्यध, माध, गाव, नगापदुदाय के भुवेग, पृथुभया, पृपदश्व, यमुमना, परवान् क्षुप, पुत्र रामचन्द्र,रम्मत, मर्दन, अर्थ, कामन, गय, - THREE HarmoOTOUCCCCTerrome सभापर्व म हा भारत Thururururam muuuuuuuTutorJUTTAuTUTION rror Controm । । । Funnuarnountrvarmumtuation TAURON NAIXENNARANTI अलर्कः कक्षसेनश्च गयो गौराश्व एव च ॥ १७॥ जामदग्न्योऽथ रामश्च नाभागसगरौ तथा भूरिद्युम्नो महाश्वश्च पृथाश्वो जनकस्तथा राजा वैन्यो वारिसेनः पुरुजिज्जनमेजयः ब्रह्मदत्तस्त्रिगर्तश्च राजोपरिचरस्तथा ॥ १९ ॥ इन्द्रद्युम्नो भीमजानुर्गोरपृष्ठोऽनघो लयः पद्मोऽथ मुचुकुन्दश्च भूरिद्युम्नः प्रसेनजित् ॥ २० ॥ अरिष्टनेमिः सुद्युम्नः पृथुलाश्वोऽष्टकस्तथा शतं मत्स्या नृपतयः शतं नीपाःशतं हयाः ॥ २१ ॥ धृतराष्ट्राश्चैकशतमशीतिर्जनमेजयाः शतं च ब्रह्मदत्तानां वीरिणामीरिणां शतम् ॥ २२ ॥ भीष्माणां द्वे शतेऽप्यत्र भीमानां तु तथा शतम् । शतं च प्रतिविन्ध्यानां शतं नागाः शतं हयाः ॥ २३ ॥ पलाशानां शतं ज्ञेयं शतं काशकुशादयः शान्तनुश्चेव राजेन्द्र पाण्डुश्चैव पिता तव उशंगवः शतरथो देवराजो जयद्रथः वृषदर्भश्च राजर्षिर्बुद्धिमान्सह मन्त्रिभिः ॥ २५॥ अथाऽपरे सहस्राणि ये गताः शशबिन्दवः इष्टवाऽश्वमेधैर्बहुभिर्महद्भिभूरिदाक्षिणेः ॥२६॥ गौराव, जमदमि के पुत्र परशुराम, नाभाग, सगर, सौ राजा, भीम नाम के दो सौ से अधिक राजा, भूरिद्युम्न, महाव, पृथाश्व, जनक, राजा वैन्य,वारिसेन भीम नाम के सौ राजा, प्रतिविन्ध्य नाम के सौ राजा, पुरुजित् , जनमेजय,ब्रह्मदत्त, त्रिगत, राजा उपरिचर, नाग नाम के सौ राजा, हय नाम के सौराजा, पलाश इन्द्रद्युम्न, भीमजानु, गौरपृष्ठ, अनघ, लय, नाम के सौ और काम और कुश आदि नामों के मुचुकुन्द, भूरिद्युम्न, प्रसेनजित् , अरिष्टनेमि, सुद्युम्न, | सौ-सौ दिव्य मनुष्य, राजेन्द्र शान्तनु, तुम्हारे पिता पृथुलाव, अटक, मत्स्यवंग के सौ नरेश, नीपवश । पाण्ड, ॥१३॥२४॥ के और हयवंश के सी राजा, धृतराष्ट्र नाम के सौ उशङ्गव, शतरथ, देवराज, जयद्रथ, धूपदर्भ, राजा, जनमेजय नाम के अम्सी राजा, ब्रह्मदन नाम : शशिबिन्दु और अन्य हज़ारों राजा लोग जो अश्वमेध के सौ राजा, ईरिण नाम के सौ राजा, वीरि नाम के आदिक बड़े-बड़े यन करके वहां गये हैं सब उसी SIMIMIERALDITIWANATIMATERDINDIAHINAMASTIPTIOTTAMIL MITHORA , "पद्म, ४३ अध्याय ८] म हा भारत TOTATUTE Inorbrur - । - MONTHLALTEEATMEETIATALAILATIONINNIA MA: उपyurrouTUrOMMUNITUnourer । -- एते राजर्षयः पुण्याः कीर्तिमन्तो बहुश्रुताः तस्यां सभायां राजेन्द्र वैवस्वतमुपासते ॥ २७॥ अगस्त्योऽथ मतङ्गश्च कालो मृत्युस्तथैव च यज्वानश्चैव सिद्धाश्च ये च योगशरीरिणः ॥ २८ ॥ अग्निष्यात्ताश्च पितरः फेनपाश्चोप्मपाश्च ये स्वधावन्तो बर्हिपदो मूर्तिमन्तस्तथाऽपरे ॥ २९ ॥ कालचक्रं च साक्षाच्च भगवान्हव्यवाहनः नरा दुष्कृतकर्माणो दक्षिणायनमृत्यवः ॥ ३०॥ कालस्य नयने युक्ता यमस्य पुरुषाश्च ये तस्यां शिंशपपालाशास्तथा काशकुशादयः उपासते धर्मराजं मूर्तिमन्तो जनाधिप एते चाऽन्ये च बहवः पितृराजसभासदः ॥ ३२ ॥ न शक्याः परिसंख्यातुं नामभिः कर्मभिस्तथा । असंवाधा हि सा पार्थ रम्या कामगमा सभा ॥ ३३ ॥ दीर्घकालं तपस्तप्त्वा निर्मिता विश्वकर्मणा ज्वलन्ती भासमाना च तेजसा खेन भारत तामुग्रतपसो यान्ति सुव्रताः सत्यवादिनः ॥ ३४ ॥ शान्ताःसंन्यासिनःशुद्धाःपूताःपुण्येन कर्मणा । सर्वे भाखरदेहाश्च सर्वे च विरजोऽम्बराः ॥ ३५ ॥ सभा में यमराज की उपासना क्यिा करते है । के इतने सभासद है कि उनके नामों और कर्मों का २५॥२७॥ वर्णन करके उनकी गिणती नहीं की जा सकती। इस सभा में मूर्तिमान् मृत्यु, अगस्त्य, मतग, चाहे जहाँ जा सकनेवाली उस सौ योजन की लम्बी- काल, यज्ञ करनेवाले कर्म काण्टी, सिद्धगण, योगी चौड़ी मभा को विश्वकर्मा ने बहुत दिनों तक तपम्या लोग, अमिप्वात्ता, फेनप, ऊष्मप, वधावान् ,बर्हिपद करके बनाया है ॥२८॥३३॥ और अन्य पितृगण, कारचक्र, साक्षात् भगवान् अमि, वह सभा अपने प्राग से अमि के समान दक्षिणायन सूर्य में मरे हुए दुष्ट कर्म करनेवाले मनुष्य, चमकती है। उस सभा में उप्रतपम्वी, मुन्दर ग्रनी यमराज के दूत, गिशिप, पालाश, फाश, कुशा आदि और मत्यवादी भात सन्यामी पुष्पकमों के करनवाने सब यमराज की उपासना करते है। पितृपति यमरान और शुद्ध मनुष्य दिव्य देह धारण कसे और उजत MOREAMITRATIMATIMATION - TITLTDTTTTTISTORY ४४ ममापर्व महाभारत . • Muuuuuuuuuuuuuut । चित्राङ्गदाचित्रमाल्याः सर्वे ज्वलितकुण्डलाः । सुकृतैः कर्मभिः पुण्यैः पारिवहश्च भूषिताः ॥ ३६ ॥ गन्धर्वाश्च महात्मानः संघशश्चाऽप्सरोगणाः वादित्रं नृत्यगीतं च हास्यं लास्यं च सर्वशः ॥ ३७ ॥ पुण्याश्च गन्धाःशव्दाश्च तस्यां पार्थ समन्ततः। दिव्यानि चैव माल्यानि उपतिष्ठन्ति नित्यशः ॥ ३८ ॥ शतं शतसहस्राणि धर्मिणां तं प्रजेश्वरम् उपासते महात्मानं रूपयुक्ता मनस्विनः ॥ ३९ ॥ ईदृशी सा सभा राजन्पितृराज्ञो महात्मनः वरुणस्याऽपि वक्ष्यामि सभां पुष्करमालिनीम् ॥ ४० ॥ इति श्रीमन्महाभारते सभापर्वणि लोकपालमभाख्यानपर्वणि यमसभावर्णनं नाम अष्टमोऽध्यायः ॥८॥ उजले वस्त्र बाजूवन्द जड़ाऊ माला और ज्वलित भवन की शोभा बढ़ाया करती हैं । सभा में सहस्रों कुण्डल आदि से भूषित हो-होकर जाते हैं। वहां धर्मात्मा दिव्य रूपवाले महात्मा यमराज की उपासना गन्धर्व और अप्सराओं के गण नृत्य, गीत, हास्य किया करते हैं। हे महाराज! यह मैंने यमराज की सभा और रहस्य किया करते हैं। पवित्र सुगन्ध सबके का वर्णन किया है। अब वरुण की पुष्कर-मालिनी चित्त को प्रसन्न किया करती है । मधुर पवित्र शब्द ' सभा का वर्णन भी मुनिए ॥३४॥४०॥ कानों को तृप्त करते रहते हैं । दिव्य मालाएँ सभा- मभापर्व का आठवां अध्याय ममाप्त हुआ । अथ नरमोऽध्यायः।।९।। नारद उवाच-युधिष्टिर सभा दिव्या वरुणस्याऽमितप्रभा प्रमाणेन यथा याम्या शुभ्रप्राकारतोरणा अन्तःसलिलमास्थाय विहिता विश्वकर्मणा दिव्ये रत्नमयेक्षः फलपुष्पप्रदेयुता नारद जी कहते हैं- हे राजा युधिष्ठिर ! वरुण दिव्य रनमय वृक्ष लगे हुए हैं। वे वृक्ष ममारियों की ममा भी यमराज की ममा के समान सौ योजन और नीले, पीले, सफेद, लाल आदि रत के पली की है । यह बहुत ही प्रकागमान है। उसी दिव्य और फलों मे लदे हुए है । कुम और लता विनान चहारदीवारी है और उसमें पढ़िया फाटक लगे हुए उसकी गोमा बढ़ाते हैं। वहाँ सहसों प्रकार के मधुर विधकमां ने उसे जल के भीतर बनाया है। उसमें बोलियाँ बोल रहे विचित्र पक्षी कलोलें किया करते POETERamananeer REATENEDNEETIMEITIERMEONErro - ४५ अध्याय ९] म हा भारत inuouTINE iiintern TWITTERTAINMEANORTANILumuTIVITIO umanAmAIATIALAMARMATI 1. नीलपीतासितश्यामः सितेलोहितकैरपि अवतानेस्तथा गुल्मेर्मञ्जरीजालधारिभिः तथा शकुनयस्तस्यां विचित्रा मधुरस्वराः अनिर्देश्या वपुष्मन्तः शतशोऽथ सहस्रशः ॥ ४ ॥ सा सभा सुखसंस्पर्शा न शीता न च धर्मदा । वेश्मासनवती रम्या सिता वरुणपालिता यस्यामास्ते स वरुणो वारुण्या च समन्वितः । दिव्यरत्नाम्बरधरो दिव्याभरणभूपितः स्रग्विणो दिव्यगन्धाश्च दिव्यगन्धानुलेपनाः । आदित्यास्तत्र वरुणं जलेश्वरमुपासते वासुकिस्तक्षकश्चेव नागश्चेरावतस्तथा कृष्णश्च लोहितचव पद्मश्चित्रश्च वीर्यवान् ॥ ८ ॥ कम्बलाश्वतरौ नागौ धृतराष्ट्रवलाहको मणिमान्कुण्डकश्चैव कर्कोटकधनञ्जयो पाणिमान्कुण्डधारश्च बलवान्पृथिवीपते प्रह्लादो मूपिकादश्च तथैव जनमेजयः ॥ १० ॥ पताकिनो मण्डलिनः फणावन्तश्च सर्वशः एते चाऽन्ये च बहवः सर्पास्तस्यां युधिष्ठिर ॥ ११ ॥ हैं। उस सभा में जानेवाले को तत्काल एक प्रकार से शोभित आदित्यगण उस सभा में जलेश्वर वरुण का अद्भुत आनन्द प्राप्त होता है । वह सभा न की उपासना करते है । हे महाराज ! वासुकि, तक्षक, तो अत्यन्त ठण्डी है न अत्यन्त गर्म । वह सभा ऐरावत, कृष्ण, लोहित, पद्म, चित्र, कम्बल,अश्वतर, परम रमणीय ओर सब ऋतुओं में आराम देनेवाली है। धृतराष्ट्र, बलाहक, मणिमान् , कुण्डक, कर्कोटक, वह श्वेत वर्ण की है। और उसमें बहुत श्रेष्ठ श्रेष्ठ आसन धनञ्जय, पाणिमान् ,कुण्डधार, प्रहाद, मूपिकाद,जन- बिछे हुए हैं। उत्तम वस्त्र और गहने पहने हुए वरुण मेजय, पताकी, मंडली फणधारी आदि नागगण और देवता अपनी स्त्री वारुणी देवी के साथ उस सभा में अन्य अनेक सर्प आनन्द के साथ उस सभा में एक श्रेष्ठ आसन पर विराजते है ॥१७॥ । उपस्थित होकर नित्य विधिपूर्वक वरुण की उपासना दिव्य मालाधारी, दिव्य चन्दन आदि गन्धद्रव्यों | किया करते है ॥८॥११॥ TWITTLIMARYADAAMRADIOAmeMIRMIRPIRIDAIIMSUTRIENTATULSICIANSLAMITHALINITIAmmaa ४६ म हा भारत [ सभापत्र المتفاقاقلققلللقلاقلتلفاقدالله السلمي । उपासते महात्मानं वरुणं विगतलमाः पलिवरोचनो राजा नरकः पृथिविंजयः ॥ १२ ॥ सह्रादो विप्रचितिश्च कालखाश्च दानवाः सुहनुर्दुर्मुखः शङ्खः सुमनाः सुमतिस्ततः घटोदरो महापार्श्वः कथनः पिठरस्तथा विश्वरूपः स्वरूपश्च विरूपोऽथ महाशिराः ॥ १४ ॥ दशग्रीवश्च वाली च मेघवासा दशावरः टिट्टिभो विटभूतश्च सहादश्चेन्द्रतापनः दैत्यदानवसंघाश्च सर्वे रुचिरकुण्डलाः स्रग्विणो मौलिनश्चैव तथा दिव्यपरिच्छदाः ॥ १६ ॥ सर्वे लब्धवराः शूराः सर्वे विगतमृत्यवः ते तस्यां वरुणं देवं. धर्मपाशधरं सदा उपासते महात्मानं सर्व सुचरितव्रताः तथा समुद्राश्चत्वारो नदी भागीरथी च सा ॥ १८ ॥ कालिन्दी विदिशा वेणा नर्मदा वेगवाहिनी विपाशा च शतद्रुश्च चन्द्रभागा सरस्वती ॥ १९ ॥ इरावती वितस्ता च सिन्धुर्देवनदी तथा गोदावरी कृष्णवेणा कावेरी च सरिद्वरा .॥ २० ॥ किंपुना च विशल्या च तथा वैतरणी नदी हे राजन् ! विरोचन का पुत्र राजा बलि,दिग्वि- । धारी वरुण समीप बैठकर उसकी सेवा किया करते जयी नरकासुर, संवाद, विप्रचित्ति, कालखज नाम के | हैं। अमित धीरता से युक्त ये सब दानव तपस्या दानव, सुहनु, दुर्मुख, मह, मुमना, मुमति, पटोदर, से सिद्ध होकर अमर होने का वर पा चुके हैं । है महापा, कथन, पिठर, विश्वरूप, म्यरूप, विरूप, ! महाराज ! चारों समुद्र, पवित्र जलवाली गंगा नदी, महाशिरा, दशग्रीव,वाली, मेघवासा, दशावर, सिट्टिम, । कालिन्दी, विदिशा, घेणा, बड़े वेग से बहनेवाली विटभून , संहाद और इन्द्रतापन आदि अनेक दैत्य नर्मदा, विपाशा, शतद्रू, चन्द्रभागा, सरस्वती,इरावनी और असुर जो दिल्य पोशाक, कुण्डल, माला और ' वितस्ता, सिंधु, देवनदी, गोदावरी, कृष्णवणा, कावेरी, गुरुट धारण किये हुए हैं और बड़े शूरवीर मृत्यु से मुक्त ॥१२॥२०॥ पंड प्रती और वरदान पाये हुए उम सभा में धर्मपाग किम्पुना, विशल्या, वैतरणी, तृतीया, ज्यष्ठिरा, । HOMDIMDILIMIMMUNITY ४७ अध्याय ९] म हा भारत HurranmarurroranAUTTumUTTTTTITURY TUTITTWIRTAITIONuwannairmirma HARITAMANRAIL HITRAKROACapitACT - तृतीया ज्येष्ठिला चैव शोणश्चाऽपि महानदः चर्मण्वती तथा चैव पर्णाशा च महानदी ॥ २१ ॥ सरयूर्धारवत्या च लाङ्गली च सरिद्वरा करतोया तथाऽऽत्रेयी लौहित्यश्च महानदः ॥ २२ ॥ लवती गोमती चैव सन्ध्या त्रिःस्रोतसी तथा । एताश्चाऽन्याश्च राजेन्द्र सुतीर्था लोकविश्रुताः ॥ २३ ॥ सरितः सर्वतश्चाऽन्यास्तीर्थानि च सरांसि च । कूपाश्च सप्रस्रवणा देहवन्तो युधिष्ठिर ॥ २४ ॥ पल्बलानि तडागानि देहवन्त्यथ भारत दिशस्तथा मही चैव तथा सर्वे महीधराः ॥ २५ ॥ उपासते महात्मानं सर्वे जलचरास्तथा गीतवादित्रवन्तश्च गन्धर्वाप्सरसा गणाः स्तुवन्तो वरुणं तस्यां सर्व एव समासते महीधरा रत्नबन्तो रसा ये च प्रतिष्टिताः ॥ २७ ॥ कथयन्तः सुमधुराः कथास्तत्र समासते वारुणश्च तथा मन्त्री सुनाभः पर्युपासते ॥ २८ ॥ पुत्रपौत्रैः परिवृतो गोनाम्ना पुष्करेण च सर्वे विग्रहवन्तस्ते तमीश्वरमुपासते एपा मया संपतता वारुणी भरतर्षभ दृष्टपूवा सभा रम्या कुवेरस्य सभां शृणु ॥३०॥ इति श्रीमन्महाभारते सभापर्वणि लोकपालसभाख्यानपर्वणि वरुणसभावर्णनं नाम नबमोऽध्याय ॥ ५॥ महानदी शोण, चर्मण्यती, महानदी पर्णाशा, सरयू, वरुण की सभा में बैठकर वरुण की उपासना किया धारयत्या, लागली, करतोया, आत्रेयी, लौहित्य नाम करते हैं । गाने-बजाने में निपुण गन्धयों और महानद, लद्धती, गोमती, सन्ध्या, त्रिस्रोतसी, और- अप्सराओं के झुण्ड के मुण्ड वरुण देव की स्तुति करने और नदियाँ और तीर्थ और सरांवर, कूप, झरना, हुए उस समा में उपस्थित रहते हैं। और यह अंगन तडाग, दिशा, पृथ्वी, सब पहाड़ और सब जलचर उत्पन्न करनेवाल पर्वत भी यहाँ उपस्थित रहकर मा जीव अपने-अपने दिव्य स्वरूपों को धारण किये हुए कथाएँ सुनाकर वरुण देव का मनोरञ्जन पर MULT MIMINATIONAWATIOPERTIEEOIRALArmers FOOTOTRIOTUUUOTATUTOR । ॥ २९ ॥ ना ३८ म हा भारत [समापर्व । । , अपने पुत्र पात्रों और गो नामक पुष्कर के साथ वरुण सभा में जाकर उन सब लोगों को शरीरधारी होकर देव का मन्त्री सुनाभ भी उनकी सेवा में उपस्थित रहता वरुण देव की उपासना करते देखा है । अब तुम है। हे युधिष्ठिर ! मैने लोकों में घूमते-घूमते उस कुबेर की सभा का वृत्तान्त भी सुनो ॥२१॥३०॥ सभापर्व का नयमां अध्याय समाप्त हुआ। अथ दशमोऽध्यायः ॥१०॥ नारद उवाच सभा वैश्रवणी राजञ्छतयोजनमायता विस्तीर्णा सप्ततिश्चैव योजनानि सितप्रभा तपसा निजिता राजस्वयं वैश्रवणेन सा शशिप्रभाप्रावरणा कैलासशिखरोपमा ॥ २ ॥ गुह्यकैरुह्यमाना सा खे विपक्व शोभते दिव्या हेममयैरुच्चैः प्रासादैरुपशोभिता महारत्नवती चित्रा दिव्यगन्धा मनोरमा सिताभ्रशिखराकारा प्लवमानेव दृश्यते दिव्यैर्हेममयै रङ्गैर्विद्युद्भिरिव चित्रिता तस्यां वैश्रवणो राजा विचित्राभरणाम्बरः स्त्रीसहस्रर्वृतः श्रीमानास्ते ज्वलितकुण्डल: दिवाकरनिभे पुण्ये दिव्यास्तरणसंवृते दिव्यपादोपधाने च निषण्णः परमासने दसवां अध्याय ॥१०॥ नारद जी कहते हैं---हे राजा युधिष्ठिर! यक्ष सभी देखनेवालों के मन को मुग्ध बना देनेवाली उस राज कुबेर की सभा सौ योजन लम्बी और सत्तर सभा में अनेक बहुमूल्य रल जगमगाते है, जिससे योजन चौड़ी है । अपने तप के प्रभाव से उन्होंने | उसकी अनिर्वचनीय शोभा देख पड़ती है। श्वेत वह सभा म्वयं प्राप्त की है । कैलास पर्वत के शिखर बादलों के समान वह समा मानों आकाश में चलती के समान उस सभा की उज्ज्वल निर्मल कान्ति हुई सी जान पड़ती है। आँगन में रल की चमक चाँदनी से भी बढ़कर शोभायमान और नेत्रों पड़ने से वह सभा अनेक विजलियों की प्रभा से को आनन्द देती है। उस सभा को यक्ष लोग वहन शोभित सी हो रही है । उसी सभा में मणिमय करते है, कारण वह आकाश में लगी हुई सी कुण्डल, नाना प्रकार के रत्न और आभूपण और पवित्र जान पड़ती है । वह दिव्य सभा सुवर्ण भूपित ऊँचे- श्वेत वस्त्र पहने हुए महाराज कुबेर बड़े दिव्य ऊँचे भवनों से शोभित है । पवित्र गन्ध से पूर्ण और । आसन पर विराजमान होते हैं । उनके आसपास । । -- MALAIMHLTIVAL ImmumIIIIIIMNUARY TIMALLAMMACHHAMATALOTATIUMSTIMAIL अध्याय १० म हा भारत INUT UOTTAMUTATE ITUTIONS UTTUU PORTronmUERYONJETONTENTuter mmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmonainwran ram मन्दाराणामुदाराणां वनानि परिलोडयन् सौगन्धिकवनानां च गन्धं गन्धवहो वहन् नलिन्याश्चाऽलकाख्याया नन्दनस्य वनस्य च । शीतो हृदयसंह्लादी वायुस्तमुपसेवते ॥ ८ ॥ तत्र देवाः सगन्धर्वा गणैरप्सरसां वृताः दिव्यतानैर्महाराज गायन्ति स्म सभागताः मिश्रकेशी च रम्भा च चित्रसेना शुचिस्मिता । चारुनेत्रा घृताची च मेनका पुञ्जिकस्थला विश्वाची सहजन्या च प्रम्लोचा उर्वशी इरा ॥१०॥ वर्गा च सौरभेयी च समीची बुद्धुदा लता एताः सहस्रशश्चान्या नृत्यगीतविशारदाः उपतिष्ठन्ति धनदं गन्धर्वाप्सरसां गणाः अनिशं दिव्यवादित्रैर्नृत्यगीतैश्च सा सभा ॥ १२ ॥ अशुन्या रुचिरा भाति गन्धर्वाप्सरसां गणैः । किंनरा नाम गन्धर्वा नरा नाम तथा परे ॥ १३ ॥ मणिभद्रोऽथ धनदः श्वेतभद्रश्च गुह्यकः कशेरको गण्डकण्डः प्रद्योतश्च महाबलः ॥ १४ ॥ कुस्तुम्बुरुः पिशाचश्च गजकर्णो विशालकः सहस्रो सुन्दर स्त्रियाँ उपस्थित रहती है । आसन के | सहजन्या, प्रम्लोचा, उर्वशी, इरा, वर्गा, सौरभेयी, ऊपर दिव्य कोमल बिछौना बिछा हुआ है, नीचे | समीची, बुख़ुदा और लता आदि नाचने-गाने में पैर रखने को चौकी रखी हुई है । उस सभा में निपुण असवय अप्सराएँ और गन्धों की स्त्रियाँ शीतल और मन को आनन्द देनेवाली वायुमंदार नाच गाकर,बाजे बजाकर तथा अभिनय करके धनपति आदि सुगन्ध देनेवाले वनों और अलका नाम नलिनी की उपामना करती है । किन्नर और नर जाति के और नन्दनवन की. सुगन्ध को लिये हुए. चला गन्धर्व,मणिभद्र, धनद,श्वेतभद्र, गुह्यक,कमेरक,गण्ड- करती है । और वहा अप्सरा और गन्धर्वो के गण कण्डू, महाबरी प्रोत, कुम्तुम्बुरु, पिशाच, गजकर्ण, देवताओंसहित दिव्य तानों से गाया करते है ॥१९॥ ' विशालक, वराहकर्ण, ताम्रौष्ठ, फलकक्ष, फलोदक, वहां मिश्रकेशी, रम्भा, चित्रसेना, शुचिस्मिता, हसचूड, शिखावत,हेमनेत्र,विमीपण, पुप्पानन, पिङ्ग- चारुनेत्रा, घृताची, मेनका, पुञ्जिक्म्यला, विश्वाची, लक,शोणितोद,प्रवालक,वृक्षवासी,अनिकेत, चीरवामा NAAMITUTELIMINEMAILOCrea USALMUALLIE ELCOMEWArunoon म हा भारत मभापर्व UTTUUUUTUOUTUIDO PUTICOTTrut TOTrum ITE - । वराहकर्णस्ताम्रौष्ठः फलकक्षः फलोदकः ॥१५॥ हंसचूडः शिखावों हेमनेत्रो विभीपणः पुष्पाननः पिङ्गलकः शोणितोदः प्रवालकः वृक्षवाप्पनिकेतश्च चीरवासाश्च भारत एते चाऽन्ये च बहवो यक्षाः शतसहस्रशः ॥ १७॥ सदा भगवती लक्ष्मीस्तत्रैव नलकूवरः अहं च बहुशस्तस्यां भवन्त्यन्ये च मद्विधाः ॥ १८॥ ब्रह्मर्पयो भवन्त्यत्र तथा देवर्षयोऽपरे क्रव्यादाश्च तथैवाऽन्ये गन्धर्वाश्च महाबलाः उपासते महात्मानं तस्यां धनदमीश्वरम् भगवान्भूतसंधैश्च वृतः शतसहस्रशः उमापतिः पशुपतिः शूलभृद्भगनेत्रहा ॥ २० ॥ त्र्यम्बको राजशार्दूल देवी च विगतलमा वामनैर्विकटैः कुजैः क्षतजा:महारवैः ॥ २१ ॥ मेदोमांसाशनैरुग्रैरुग्रधन्वा महाबलः ।' नानाप्रहरणैरुग्रैर्वातरिव महाजवैः ॥ २२ ॥ घृतः सखायमन्वास्ते सदैव धनदं नृप प्रहृष्टाः शतशश्चाऽन्ये वहुशः सपरिच्छदाः ॥ २३ ॥ गन्धर्वाणां च पतयो विश्वावसुर्हाहा हूहः आदि हजारों गन्धर्व वहा रहकर कुबेर की उपासना भवानीपति भगवान् शङ्कर, विकट, छोटे आकारवाले, किया करते है ॥१०॥१७॥ कुबडे लाल लाल आखों से भयङ्कर,घोर नाद करनेवाले, हे भरतनन्दन ! उस सभा में साक्षात् लक्ष्मी जी मेदा मास के खानेपाले, अनेक शस्त्र धारण किय,वायु विराजमान रहती है। कुबेर नन्दन नलकूबर, मै, मेरे के समान वेग से जानेवाले असङ्ख्य भूतगण प्रमथगण समान अन्य महापुरुष और ब्रह्मर्षि लोग उम सभा का आदि के मध्य में,महिषमर्दिनी सहधर्मिणी अर्धाङ्गिनी गौरव बढ़ाते है । मासोलुप राक्षस आदि, और महा भगवती के साथ, प्रिय सखा कुबेर की सभा में सदा बल पराक्रमी अन्य गन्धर्व, सभा में धनद कुबेर की विराजमान रहते है ॥१८॥२३॥ उपासना किया करते है । हे राजन् ! महाबली शूल विश्वावसु, हाहा, हूहू, तुम्बुरु, पर्वत, शैलूप, पाणि उप्रधन्वा पशुपति भग-नेत्र-नाशन भूत-भावन चित्रसेन, गीतज्ञ, चित्ररथ आदि गन्धर्व प्रसन्नचित से .. । । . AMILLIAMALINMAMILITAMITRALIANTRIBAIIMARISTOTMARHAANTIANSENIONALLY अध्याय १०] म हा भारत nirinterrumour FOTUOTE nuTune । VIDEO - तुम्बुरुः पर्वतश्चैव शैलूपश्च तथाऽपरः ॥ २४ ॥ चित्रसेनश्च गीतज्ञस्तथा चित्ररथोऽपि च एते चान्ये च गन्धर्वा धनेश्वरमुपासते .. ॥ २५ ॥ विद्याधराधिपश्चैव चक्रधर्मा सहानुजेः. उपाचरति तत्र स्म धनानामीश्वरं प्रभुम् [किंनराः शतशस्तत्र धनानामीश्वरं प्रभुम्] आसते चाऽपि राजानो भगदत्तपुरोगमाः ॥ २७॥ द्रुमः किंपुरुपेशश्च उपास्ते धनदेश्वरम् राक्षमाधिपतिश्चैव महेन्द्रो गन्धमादनः ॥ २८॥ सह यक्षः सगन्धर्वैः सह सर्निशाचरैः विभीषणश्च धर्मिष्ट उपासते भ्रातरं प्रभुम् ॥ २९ ॥ हिमवान् पारियात्रश्च विन्ध्यकैलासमन्दराः मलयो दर्दुरश्चैव महेन्द्रो गन्धमादनः ॥३०॥ इन्द्रकीलः सुनाभश्च तथा दिव्यौ च पर्वतौ । * एते चाऽन्ये च बहवः सर्वे मेरुपुरोगमाः ॥ ३१ ॥ उपासते महात्मानं धनानामीश्वरं प्रभुम् नन्दीश्वरश्च भगवान्महाकालस्तथैव च ॥ ३२ ॥ शङ्कुकर्णमुखाः सर्वे दिव्याः पारिपदास्तथा यक्षेश्वर कुबेर की उपासना किया करते हैं । अन्य और सुमेरु आदि पर्वत भी कुबेर की उपासना करत अन्य सैकड़ों किन्नर तथा भगदत्त आदि राजा उस हैं । नन्दीश्वर, भगवान् महाकाल और शकुकर्ण सभा में रहते हैं । किम्पुरुषों का ईश्वर द्रुम, राक्षसों आदि दिव्य पारिषद, काष्ठ,कुसमुख, दन्ती, तपम्धी का राजा महेन्द्र और गन्धमादन तथा यक्ष गन्धर्व विजय,श्वेत रङ्ग का वृषम,राक्षस और पिशाचगण सदा निशाचर आदि की मण्डलियों के साथ राक्षसराज कुबेर की उपासना करते है । पुलम्त्य ऋषि का पुत्र विभीषण उस सभा में रहते हुए बन्धुराज कुबेर की महात्मा कुरेर सदा यक्षों के साथ शहर के पास उपासना करते हैं ॥२४॥२९॥ जाकर उन्हें प्रणाम करता है और सदा उनका आज्ञा- हिमालय, पारियान, विन्ध्य, कैलास, मन्दर, कारी रहता है । महादेव भी उसके माथ मिग्रभाव मलय, दुर्दुर, महेन्द्र, गन्धमादन, इन्द्रकील, सुनाम, से विनोद करते है । और मुख्य-मुग्न्य धनाध्य शह LALTERNMITIETHOTIOANIMATERIMIXTURKTIRITUATIHARTOOTERESTIOETRas araburam . 1 ५२ म हा भारत [सभापर्व । Fuwaunuwomanrnimurnima mmmmmmmmmmmmmmm TIMIRE MUMMIMIMIMIMIMIM TURMERI काष्ठः कुटीमुखो दन्ती विजया च तपोऽधिकः ॥ ३३ ॥ श्वेतश्च वृपभस्तत्र नर्दन्नास्ते महाबलः धनदं राक्षसाश्चाऽन्ये पिशाचाश्च उपासते ॥ ३४ ॥ पारिपदैः परिवृतमुपायान्तं महेश्वरम्, सदा हि देवदेवेशं शिवं त्रैलोक्यभावनम् ॥ ३५ ॥ प्रणम्य मूर्धा पौलस्त्यो वहुरूपमुमापतिम् ततोऽभ्यनुज्ञां संप्राप्य महादेवाद्धनेश्वरः आस्ते कदाचिद्भगवान्भवो धनपतेः सखा ॥ ३६ ॥ निधिप्रवरमुख्यौ च शङ्खपद्मो धनेश्वरौ सर्वान्निधीन्प्रगृह्याऽथ उपास्तां वे धनेश्वरम् ॥३७॥ सा सभा तादृशी रम्या मया दृष्टाऽन्तरिक्षगा । पितामहसभां राजन्कीर्तयिष्ये निवोध ताम् ॥३८॥ इति श्रीमन्महाभारते सभापर्वणि लोकपालसभाख्यानपर्वणि धनदसभावर्णनं नाम दशमोऽध्यायः॥१०॥ पद्म आदि सब निधियों को लेकर कुबेर की उपासना | देखा है । अब प्रजापति ब्रह्मा जी को सभा का वर्णन किया करते है । हे युधिष्ठिर ! मैने उस मनोहर और करता हूँ, मुनिए ॥३०॥३८॥ आकाश में स्थित अद्भुत सभा भवन को कई बार सभापर्व का दसवां अध्याय समाप्त हुआ ।। अथ एकादशोध्यायः॥११॥ नारद उवाच-पितामहसभां तात कथ्यमानां निवोध मे शक्यते या न निर्देष्टुमेवंरूपति भारत पुरा देवयुगे राजन्नादित्यो भगवान्दिवः आगच्छन्मानुपं लोकं दिक्षुर्विगतक्लमः ॥ २ ॥ ग्यारहवा अध्याय ॥११॥ नारद जी कहते है हे राजा युधिष्ठिर ! अब पहले एक समय सत्ययुग में भगवान् आदित्य मनुष्य- मै ब्रह्मा की उस दिव्य सभा का वर्णन करता हूँ रोक की सैर करने को म्बर्ग से पृथ्वी पर आकर जिसकी कोई उपमा नहीं दी जा सकती; क्योंकि मनुप्यरूप से विचर रहे थे। उन्होंने ब्रह्मा जी की उसके समान दूसरा स्थान जगत् में है ही नहीं। सभा देखकर प्रसन्न और विस्मित होकर मुझसे उसका [एकाग्र होकर उस दिव्य ब्रह्मसभा का वर्णन मुनिए।] वर्णन इस प्रकार किया । हे नारद ! ब्रह्मा की सभा - TIMIMILANATILIUMMANITAMINMALUMIm MMMITAITHUAITAMAMALAUNLOD अध्याय ११ ] म हा भारत ManuarITUAGT.ITruATIUIOUS TOURITOOTOUTUITIOTrmuTITUTORIArmypons -- ITIMIT । - चरन्मानुषरूपेण सभां दृष्ट्वा स्वयंभुवः स तामकथयन्मह्यं दृष्ट्वा तत्त्वेन पाण्डव अप्रमेयां सभां दिव्यां मानसीं भरतर्षभ अनिर्देश्यां प्रभावेण सर्वभूतमनोरमाम् श्रुत्वा गुणानहं तस्याः सभायाः पाण्डवर्षभ दर्शनेप्सुस्तथा राजन्नादित्यमिदमब्रुवम् भगवन्द्रष्टुमिच्छामि पितामहसभा शुभाम् येन वा तपसा शक्या कर्मणा वापि गोपते औपधेर्वा तथा युक्तैरुत्तमा पापनाशिनी तन्ममाचक्ष्व भगवन्पश्येयं तां सभां यथा ॥ ७ ॥ स तन्मम वचः श्रुत्वा सहस्रांशुर्दिवाकरः प्रोवाच भरतश्रेष्ठ व्रतं वर्पसहस्रकम् ब्रह्मवतमुपास्व त्वं प्रयतेनाऽन्तरात्मना ततोऽहं हिमवत्पृष्टे समारब्धो महाव्रतम् ततः स भगवान्सूर्यो मामुपादाय वीर्यवान् अगच्छत्तां सभां ब्राह्मीं विपाप्मा विगतक्लमः ॥१०॥ एवंरूपति सा शक्या न निर्देष्टुं नराधिप अप्रमेय, दिव्य, मानसिक इच्छा से ही निर्मित, सब तो चित को एकाग्र करके एक हजार वर्ष में समाप्त प्राणियों के मन को रमानेवाली है । उसके प्रभाव होनेवाला ब्राह्म व्रत करो; तभी तुम्हारा मनोरथ सफल और प्रकाश का पूरा-पूरा वर्णन नहीं हो सकता । हो सकेगा । हे महाराज ! यह सुनकर मैने उस समा के गुणों को सुनकर उसके देखने की का अनुष्ठान करने के लिये हिमालय पर्वत पर गया। इच्छा से सूर्य से कहा-हे भगवन् ! आपने जिस वहाँ सूर्यदेव की उस बतलाई हुई विधि के अनुसार पाप-ताप-नाशिनी पवित्र ब्रह्मसभा का वर्णन किया, ही मैने वह व्रत आरम्भ कर दिया। उसके समाप्त उसे देखने को मेरा बहुत जी चाहता है । कृपा कर होने पर मैं, सूर्यदेव के साथ, बहुत दिनों से जिसे कहिए, किस तपम्या, किस कर्म या औषध आदि के देखने की लालसा लगी हुई थी उस ब्रह्मा की सभा फल से वह सभा देखने को मिल सकती है । ॥१७॥ में गया ॥८॥१०॥ पहले कभी न देखी हुई उस सभा को अच्छी यह सुनकर सूर्य ने मुझसे कहा-हे तपोधन ! यदि यह सभा देखने की तुम्हारी बड़ी ही इच्छा है तरह देखकर भी किसी उपमा से उसका वर्णन या वाह-व्रत AIMIMILAIMIMIL TARAPARImannanomen ५४ महा भारत [ सभापर्व SANTurannrouTum TITUTITUnrurrrror reOTOURITTINUm । MunonMunmunow ADMIN क्षणेन हि विभर्त्यन्यदनिर्देश्यं वपुस्तथा ॥ ११ ॥ न वेद परिमाणं वा संस्थानं चाऽपि भारत न च रूप मया तादृग्दृष्टपूर्वं कदाचन ॥ १२ ॥ सुसुखा सा सदा राजन्न शीता न च धर्मदा । न क्षुत्पिपासे न ग्लानिं प्राप्य तां प्राप्नुवन्त्युत ॥ १३ ॥ नानारूपैरिव कृता मणिभिः सा सुभास्वरैः स्तम्भैर्न च धृता सातु शाश्वती न च साक्षरा ॥ १४ ॥ दिव्यैर्नानाविधैर्भावैर्भावद्भिरमितप्रभैः अतिचन्द्रं च सूर्यं च शिखिनं च स्वयंप्रभा दीप्यते नाकपृष्ठस्था भर्ल्सयन्तीव भास्करम् तस्यां स भगवानास्ते विदधद्देवमायया स्वयमेकोऽनिशं राजन्सर्वलोकपितामहः उपतिष्ठन्ति चाऽप्येनं प्रजानां पतयः प्रभुम् ॥ १७ ॥ दक्षः प्रचेताः पुलहो मरीचिः कश्यपः प्रभुः भृगुरत्रिवसिष्ठश्च गौतमोऽथ तथाऽङ्गिराः पुलस्त्यश्च क्रतुश्चैव प्रहादः कर्दमस्तथा अथर्वाङ्गिरसश्चैव वालखिल्या मरीचिपाः परिमाण करना सम्भव नहीं। वह क्षण क्षण पर नई । ऊँचे खम्बों का आधार नहीं है, पर फिर भी वह शोभा और रूप धारण करती है । उसके परिमाण प्राचीन सभा कभी अपने स्थान से इधर-उधर नहीं का निरूपण किसी से भी नहीं हो सकता । अधिक होती । उस सभा में दिव्य प्रभापूर्ण अनेक प्रकार क्या कहूँ, मैने वैसी सभा और कहीं नहीं देखी । के अलौकिक भाव देख पड़ते हैं । चन्द्रमा, सूर्य और ॥११॥१२॥ अमि की प्रभा को भी फीकी करती हुई वह सभा उस सभा में जानेवाले का मन सदैव प्रसन्न आकाशमण्डल में स्थित है । उसके तेज के आगे रहता है। वह न तो अत्यन्त ठण्डी है न अत्यन्त सूर्य का प्रचण्ड तेज भी मन्दा प्रतीत होता है। उस गर्म । उस सभा में दाखल होते ही भूख-प्यास, सभा के मध्य में सर्व सामर्थ्य रखनेवाले और अपनी थकान और सब क्लेश तुरन्त दूर हो जाते है । उस देवीमाया से सम्पूर्ण लोकों को धारण करनेवाले ब्रह्मा भवन पर दृष्टि पड़ते ही जान पडता है कि हज़ारों जी बैठा करते है ॥१३॥१७॥ सूर्यमणियों से वह बनाया गया है। उसे चौड़े और IMMMEHANNEMIESMILIMILIMITECRETATIMIMITMETorreTOIES प्रजापति लोग उनकी सेवा में रहकर उपासना अध्याय ११ ] म हा भा र त TA MirruJUITUTITTER PuTIMITrarunmumuTunuTITUTranRITUATI HIRIHITETTE - मनोऽन्तरिक्षं विद्याश्च वायुस्तेजो जलं मही । शब्दस्पर्शी तथा रूपं रसो गन्धश्च भारत ॥ २० ॥ प्रकृतिश्च विकारश्च यच्चाऽन्यत्कारणं भुवः अगस्त्यश्च महातेजा मार्कण्डेयश्च वीर्यवान् ॥ २१ ॥ जमदग्निर्भरद्वाजः संवतश्च्यवनस्तथा दुर्वासाश्च महाभाग ऋष्यशृङ्गश्च धार्मिकः ॥ २२ ॥ सनत्कुमारो भगवान्योगाचार्यों महातपाः असितो देवलश्चैव जैगीषव्यश्च तत्ववित् ॥ २३ ॥ ऋपभो जितशत्रुश्च महावीर्यस्तथा मणिः आयुर्वेदस्तथाऽष्टाङ्गो देहवांस्तत्र भारत ॥ २४ ॥ चन्द्रमाः सह नक्षत्रैरादित्यश्च गभस्तिमान् वायवः क्रतवश्चैव संकल्पः प्राण एव च ॥ २५ ॥ मूर्तिमन्तो महात्मानो महाव्रतपरायणाः एते चान्ये च बहवो ब्रह्माणं समुपस्थिताः ॥ २६॥ अर्थों धर्मश्च कामश्च हो द्वेपस्तपो दमः आयान्ति तस्यां सहिता गन्धर्वाप्सरसां गणाः॥ २७ ॥ विंशतिः सप्त चैवाऽन्ये लोकपालाश्च सर्वशः । किया करते हैं । दक्ष, प्रचता, पुलह, मरीचि,कश्यप, हुए, नक्षत्रोंसहित चन्द्रमा, सूर्य, उनचासों वायु, अत्रि, भृगु, वसिष्ठ, गौतम, अङ्गिरा, पुलम्त्य, ऋतु, सम्पूर्ण यज्ञ, संकल्प और प्राण आदि सब पदार्थ प्रदाद,कर्दम, अथर्ववेदी आङ्गिरस,सूर्य की किरणों को मूर्तिमान् होकर ब्रह्मा जी की उपासना किया करते पीकर रहनेवाले वालखिल्य, मन, अन्तरिक्ष, विद्या, हैं ॥१८॥२६॥ वायु, अमि, जल, पृथ्वी, शब्द,म्पर्श,रूप, रस, गन्ध, धर्म, अर्थ, काम, हर्प, द्वेष, तप, दम आदि पति, महत्तत्व,और सब सृष्टि के कारण महातेजम्बी ' पदार्थ, मूर्तिमान् होकर ब्रह्मा जी की सेवा में लगे अगम्त्य, मार्कण्डेय, जमदमि, भरद्वाज, संवर्त, रहते है। गन्धर्व और अप्सगओं के दल, सचाईम च्यवन, महाभाग दुर्वासा, ऋष्यशृष्ट, महातपयी नक्षत्र,इन्द्रादि,लोकपाल शुक्र, बृहम्पनि,बुध, माल, योगाचार्य भगवान् सनत्कुमार, असित , देवल,तत्त्व- शनश्वर, राहु आदि ग्रह,मन्त्र, रथन्तर साम,हरिमान् जाता जैगीपन्य, जितशत्रु, ऋपभ, महावीर्य, मणि, और वसुमान् नाम के एक प्रकार के विपेश कर्म,अमि- आयुर्वेद अपने आठौं अङ्गोमहित देह धारण किये 'सोम, इन्द्र-अमि, आदि देवताओमहित आदित्यगण, ONLILINTIWITEITILIULILLIINITIVULPWWLILILTIDISTOT LOTU मभापर्व म हा भारत LARKHNAAM -- । - PERMITTESTmrmararmirmpemamTIMronmmmmmmmmmnama शुक्रो वृहस्पतिश्चैव बुधोऽङ्गारक एव च ॥ २८॥ शनैश्चरश्च राहुश्च ग्रहाः सर्वे तथैव च मन्त्री रथन्तरं चैव हरिमान्वसुमानपि.. आदित्याः साधिराजानो नामद्वन्द्वैरुदाहृताः मरुतो विश्वकर्मा च वसवश्चैव भारत ॥ ३०॥ . तथा पितृगणाः सर्वे सर्वाणि च हवींप्यथ ऋग्वेदः सामवेदश्च यजुर्वेदश्च पाण्डव ॥ ३१ ॥ अथर्ववेदश्च तथा सर्वशास्त्राणि चैव हि इतिहासोपवेदाश्च वेदाङ्गानि च सर्वशः ॥ ३२ ॥ ग्रहा यज्ञाश्च सोमश्च देवताश्चापि सर्वशः सावित्री दुर्गतरणी वाणी सप्तविधा तथा ॥ ३३॥ मेधा धृतिः स्मृतिश्चैव प्रज्ञा बुद्धिर्यशः क्षमा । सामानि स्तुतिशस्त्राणि गाथाश्च विविधास्तथा ॥ ३४ ॥ भाष्याणि तर्कयुक्तानि देहवन्ति विशाम्पते नाटका विविधाः काव्याः कथाख्यायिककारिकाः॥ ३५ ॥ तत्र तिष्ठन्ति ते पुण्या ये चाऽन्ये गुरुपूजकाः । क्षणा लवा मुहूर्ताश्च दिवा रात्रिस्तथैव च अर्धमासाश्च मासाश्च ऋतवः पट् च भारत मरुद्गण, विश्वकर्मा, आट वसु,पितृगण,हवि, ऋग्वेद, यिकाएँ, और कारिकाएँ, ये सब मूर्तिमान् होकर सामवेद, यजुर्वेद, अथर्ववेद, सब शास्त्र, इतिहास, ब्रह्मा की महासभा में उपस्थित रहते हैं । बड़े बूढ़ों आयुर्वेद,धनुर्वेद आदि उपवेद वेदों के छ अङ्ग,सब सोम और गुरुओं की पूजा एवं सत्कार करनेवाले महा- पात्र,सब यज्ञ, सोम, सावित्री, दुर्गतरणी,सात प्रकार* पुरुषों को उस लोक में जाने का अधिकार है । की वाणी,मेधा,धृति,स्मृति,प्रज्ञा,बुद्धि,यश, क्षमा, शस्त्र ॥२७३६॥ नामक सामवेद की स्तुतियां,नाना प्रकार की गाथाएँ, क्षण, लव, मुहूर्त, दिन, रात्रि,पक्ष, मास,ऋतु, तर्क-सहित भाप्य ये सब देह धारण किये हुए, पाँच प्रकार का संवत्सर, चार प्रकार के रात दिन नाना प्रकार के नाटक, काव्य कथानक, आख्या [१-मनुष्यों का रात दिन साठ घड़ी का,२-पितरों *दुर्गतरणी वाणी प्रणवरूप है । अकार, उकार, मकार, अर्धमात्रा, नाद, बिन्दु, शाक्त, यह उनके उत्तरोत्तर सूक्ष्म मात प्रकार है। TOTTERYTHIMATIREMEMOIRMIRAIYAmrasmaNERITRATIMILE NCHAYATCYLITERASIYA ५७ इormanumanADOL TOTord । । अध्याय ११] म हा भारत wromrus Twive संवत्सराः पञ्चयुगमहोरात्रश्चतुर्विधः ॥३७॥ कालचक्रं च तद्दिव्यं नित्यमक्षयमव्ययम् धर्मचक्र तथा चापि नित्यमास्ते युधिष्टिर अदितिर्दितिर्दनुश्चैव सुरसा विनता इरा कालिका सुरभी देवी सरमा चाऽथ गोतमी प्रभा कद्रूश्च वे देव्यौ देवतानां च मातरः रुद्राणी श्रीश्च लक्ष्मीश्च भद्रा पष्टी तथापरा ॥ ४० ॥ पृथिवी गाङ्गता देवी ह्रीः स्वाहा कीतरव च सुरा देवी शची चेव तथा पुष्टिररुन्धती ॥४१॥ संवृत्तिराशा नियातःस्मृष्टिदेवी रतिस्तथा एताश्चान्याश्च वै देव्य उपतस्थुः प्रजापतिम् ॥ ४२ ॥ आदित्या वसवो रुद्रा मरुतश्चाऽश्विनावपि विश्वेदेवाश्च साध्याश्च पितरश्च मनोजवाः ॥ ४३ ॥ पितृणां च गणान्विद्धि सप्त वै पुरुपर्षभ मूर्तिमन्तो वे चत्वारस्त्रयश्चापि शरीरिणः ॥ १४ ॥ वेराजाश्च महाभागा अग्निप्वात्ताश्च भारत गार्हपत्या नाकचराः पितरो लोकविश्रुताः ॥१५॥ सोमपा एकशृङ्गाश्च चतुर्वेदाः कलास्तथा एते चुतुपु वर्णेपु पूज्यन्ते पितरो नृप ॥१६॥ का एक महीने का, ३-देवताओं का एक वर्ष का, संगृषि, आगा, नियति, वृष्टि, नि, आदि अनेक -नभा का एक फल्प का],इस प्रकार बारह रागियों- देवियाँ प्रजापति ब्रह्मा की उपामना किया करती है बाला, अक्षय, अव्यय, नित्य और दिव्य कालचमा ॥३७॥४२॥ नया धर्मचक यहाँ नित्य उपस्थित रहते हैं । हे राक्षा आदित्यगण, यमुगण, म्द्रगण, मरण, मात्रय युधिष्ठिर ! अदिनि, दिति, दनु, मुरमा, विनता, इग, गण, विदरदेवा, दोनों अश्विनीमार, मन रेनुन्य पालिका, मुरभी, सरमा, गौतमी, प्रभा, फट्ट न्द्राणी, नग्नेयाले पितर आदि भी मगान प्रयाही मगा थी, लक्ष्मी,भद्रा,पष्ठी देवी, मूर्णिमनी पृथ्वी,गारता, में उपस्थित रहने है । . गना युधिष्टिर निगम दी, म्यादा, कपि,मुरा, देवी इन्द्राणी,पुष्टि,अन्यनी, मान गन हैं। टनमें नारमार्गमार्ग और मानविना TATANEEEETEmpCREDICTorrentral -- । + PAARAMAnantar । - - मभापर्व म हा भारत Οποιοσυστοιχα एतैराप्यायितैः पूर्वं सोमश्चाऽऽप्यायते पुनः त एते पितरः सर्वे प्रजापतिमुपस्थिताः उपासते च संहृष्टा ब्रह्माणममितौजसम् ॥ ४७ ॥ .. राक्षसाश्च पिशाचाश्च दानवा गुह्यकास्तथा नागाः सुपर्णाः पशवः पितामहमुपासते ॥४८॥ स्थावरा जङ्गमाश्चैव महाभूतास्तथाऽपरे पुरन्दरश्च देवेन्द्रो वरुणो धनदो यमः ॥४९॥ महादेवः सहोमोऽत्र सदा गच्छति सर्वशः महासेनश्च राजेन्द्र सदोपास्ते पितामहम् ॥ ५० ॥ देवो नारायणस्तस्यां तथा देवर्षयश्च ये ऋपयो वालखिल्याश्च योनिजाऽयोनिजास्तथा ॥ ५१ ॥ यच्च किंचित्रिलोकेऽस्मिन्दृश्यते स्थाणुजङ्गमम् । सर्व तस्यां मया दृष्टमिति विद्धि नराधिप ॥ ५२ ॥ अष्टाशीतिसहस्राणि ऋषीणामूर्ध्वरेतसाम् प्रजावतां च पञ्चाशदृषीणामपि पाण्डव ॥ ५३ ॥ ते स्म तत्र यथाकामं दृष्ट्वा सर्वे दिवौकसः "प्रणम्य शिरसा तस्मै सर्वे यान्ति यथागतम् ॥ ५४ ॥ शरीर के हैं । अमिप्वात्ता, वैराज और गार्हपत्य, ये | यमराज, उमासहित महादेव आदि श्रेष्ठ देवता वहां तीन पितृगण स्वर्गचारी है । मोमप, एकशृङ्ग, चतुर्वेद | आते-जाते रहते है । हे राजेन्द्र ! कार्तिकेय, नारा- और कला नामक चार पितृगण ब्राह्मण आदि चारों यण,सब देव ऋपि लोग,वालखिल्य ऋपिगण तथा वर्गों में पूजित होते हैं । पितृगण पहले म्वयं तृप्त | योनिज और अयोनिज सव प्राणी उस सभा में ब्रह्मा होकर सोम को प्रसन्न करते है। ये सभी पितृगण जी की उपासना किया करते है । हे राजा युधिष्ठिर ! ब्रह्मा की सभा में रहकर भगवान् प्रजापति की उपा अधिक क्या कहू, चर या अचर जो कोई पदार्थ इस सना किया करते हैं ॥४३॥४७॥ त्रिलोकी में देख पड़ता है सो सब ब्रह्मा जी की सभा इनके अतिरिक्त राक्षस, पिशाच, दानव, गुह्यक, में मैने देखा है ।।४८१५२।। नाग,सुपर्ण,पशु, स्थावर और जगम अन्य महाप्राणी हे पाण्डवश्रेष्ठ ! उस सभा में अट्टासी सहस्र प्रसन्नचित्त से परम तेजम्बी महात्मा पितामह ब्रह्मा | ऊर्ध्वरेता [बालब्रह्मचारी] ऋषि और पचास हजार की उपासना किया करते हैं । इन्द्र, वरुण, कुबेर, | गृहस्थाश्रमी सन्तानवान् ऋपि वहां मैने देखे है । म्वर्ग SINITIANOTHINGur MunnamaANILITALLE ५९ अध्याय ११) म हा भा र त NAMITHAMELAMMADHESHIME TAARAATMIDAaunaaananimal TRTWRITATE! अतिथीनागतान्देवान्दैत्यान्नागांस्तथा द्विजान् । यक्षान्सुपर्णान्कालेयान्गन्धर्वाप्सरसस्तथा ॥ ५५ ॥ महाभागानमितधीब्रह्मा लोकपितामहः दयावान् सर्वभूतेषु यथार्ह प्रतिपद्यते प्रतिगृह्य तु विश्वात्मा स्वयंभूरमितद्युतिः सान्त्व-मानार्थसंभोगैर्युनक्ति मनुजाधिप ॥ ५७ ॥ तथा तैरुपयातश्च प्रतियद्भिश्च भारत आकुला सा सभा तात भवति स्म सुखप्रदा ॥ ५८ ॥ सर्वतेजोमयी दिव्या ब्रह्मर्पिगणसेविता ब्राहम्या श्रिया दीप्यमाना शुशुभे विगतलमा ॥ ५९ ॥ सा सभा तादृशी दृष्टा मया लोकेषु दुर्लभा । सभेयं राजशार्दूल मनुप्येषु यथा तब ॥६०॥ एता मया दृष्टपूर्वाः सभा देवेषु भारत सभेयं मानुपे लोके सर्वश्रेष्ठतमा तव ॥६१ ॥ इनि श्रीमन्महाभारते सभापर्वणि लोकपालमभाख्यानपर्वणि ब्रह्ममभावर्णनं नाम एकादशोऽध्यायः ॥११।। के रहनेवाले सभी जीव इच्छा के अनुसार उस सभा में अभ्यागतों की सदा भीड़ लगी रहती है । उममें में जाते और प्रजापति ब्रह्मा को प्रणाम कर अपने असङ्ख्य ब्रह्मर्पि रहते है। उसका प्रकाश बहुत बड़ा अपने लोकों को चले जाते है । (हे राजा युधिष्ठिर ! है। उसेम जाते ही शरीर और मन का खेद जाता भगवान् ब्रह्मा सब प्राणियों को एक दृष्टि से देखते रहता है । वह दिव्य सभा अपनी अपूर्व आभा मे हैं। उनकी बुद्धि असीम है । वे उग्र तेजम्या,विश्व आप ही जगमगाती हुई बहुत ही सुन्दर है । हे पुरु- योनि, सब लोगों के पितामह और म्ययम्भ है ! वे पश्रेष्ठ ! मनुष्यलोक में जमे तुम्हारी यह ममा सत्र अपनी सभा में आये हुए देव,दानव,नाग, ब्राह्मण,यक्ष, मे बढ़कर है, वैसे ही देवरोक में जमा की ममा अद्वि- मुर्ण, कालय, गन्धर्व, और अप्मरा आदि महाभा- तीय है। मैंने देयक की ममी समाण दम्पी है, ग्यगारी अतिथियों को यथायोग्य मधुर वचनों से परन्तु इम समय मनुष्यरोक में तुम्हारी यह ममाही सादर मन्तुष्ट करके, इच्छा के अनुमार भोग की साम- मयमे यदिया जान पहना ॥५३॥ प्रिया देकर, विशेष रूप से तृप्त करते है। उम ममा मभापर्व या ग्यारहवां अध्याय ममाप्त हुआ। । **Fa 12mmer-ITTENET.ITATION ' म हा भारत सभापर्व ArnarrotruotuouTO TAITrroroTUITUTrouTITUTITIOuTurmummonam अथ द्वादशोऽध्यायः ॥ १२ ॥ युधिष्ठिर उवाच-प्रायशो राजलोकस्ते कथितो वदतां वर वैवस्वतसभायां तु यथा वदसि मे प्रभो वरुणस्य सभायां तु नागास्ते कथिता विभो । दैत्येन्द्राश्चापि भूयिष्ठाः सरितः सागरास्तथा ॥ २ ॥ तथा धनपतेर्यक्षा गुह्यका राक्षसास्तथा गन्धर्वाप्सरसश्चैव भगवांश्च वृषध्वजः पितामहसभायां तु कथितास्ते महर्षयः सर्वे देवनिकायाश्च सर्वशास्त्राणिचैव ह ॥ ४ ॥ शक्रस्य तु सभायां तु देवाः संकीर्तिता मुने उद्देशतश्च गन्धर्वा विविधाश्च महर्षयः एक एव तु राजहिरिश्चन्द्रो महामुने कथितस्ते सभायां वे देवेन्द्रस्य महात्मनः किं कर्म तेनाऽऽचरितं तपो वा नियतव्रत येनासौ सह शक्रेण स्पर्धते सुमहायशाः पितृलोकगतश्चैव त्वया विप्र पिता मम दृष्टः पाण्डुर्महाभागः कथं वापि समागतः किमुक्तवांश्च भगवंस्तन्ममाऽऽचव सुव्रत बारहवां अध्याय ॥ १२॥ यह मुनकर युधिष्ठिर ने कहा-हे कथा कहने आदि का उपस्थित रहना आपने बताया; इन्द्र की वालों में श्रेष्ठ देव ! आपन जिन सभाओं का वर्णन में अससय देवताओं, बहुत से महर्षियों और किया उनमें से यमराज की समा में मय राजाओं के प्रधान-प्रधान गन्धयों के नाम -गिनाये । किन्तु हे रहने का आपने रडग्य किया है । वरुग के सभामद मुनिवर ! इन्द्र महाराज की ममा में सब राजाओं आपने असहय नाग, दानव, नदी, समुद्र आदि को छोड़कर एक गजा हरिश्चन्द्र के ही होने का क्या रतलाये; कुरर की ममा में अमहय यक्षों, गन्धर्यो, .कारण है ! हे भगवन् ! राजा हरिश्चन्द्र ने ऐमा पौन- निगानरों और अप्मगओं के रहने तथा भगवान् मा पुण्यकर्म किया है कि अकेले यही इन्द्र के समक्ष शहर के आने-जाने का रासम्म किया। पितामह ब्रह्मा होकर उनके माथ एक ही जगह पर रहते हैं ! पितृलोक भी ममा में मार्पियों, देवनाओं और तन्त्रों-मन्त्रों : में आपने हमार पिता पाण्डु महाराज को देखा है। Aurammarxism - सभा - CommTEALTIMERLALITIEWTOPATImmTIOm:

अध्याय १२] म हा मारत WITOuनयमन FuTIMIMURTOOTurum - त्वत्तः श्रोतुं सर्वमिदं परं कौतूहलं हि मे नारद उवाच-यन्मां पृच्छसि राजेन्द्र हरिश्चन्द्र प्रति प्रभो । तत्तेऽहं संप्रवक्ष्यामि माहात्म्यं तस्य धीमतः ॥ १०॥ स राजा वलवानासीत्सम्राट् सर्वमहीक्षिताम् । तस्य सर्वे महीपालाः शासनावनताः स्थिताः ॥ ११ ॥ तेनैकं रथमास्थाय जैत्रं हेमविभूपितम् शस्त्रप्रतापेन जिता द्वीपाः सप्त जनेश्वर ॥ १२ ॥ स निर्जित्य महीं कृत्स्ना सशेलवनकाननाम् आजहार महाराज राजसूयं महाऋतुम् तस्य सर्वे महीपाला धनान्याजन्हुराज्ञया द्विजानां परिवेष्टारस्तस्मिन्यज्ञे च तेऽभवन् ॥ १४ ॥ प्रादाच द्रविणं प्रीत्या याचकानां नरेश्वरः यथोक्तवन्तस्ते तम्मिस्ततः पञ्चगुणाधिकम् ॥ १५ ॥ अतर्पयच्च विविधैर्वसुभिाह्मणांस्तदा प्रसर्पकाले संप्राप्ते नानादिग्भ्यः समागतान् ॥ १६ ॥ भक्ष्यभोज्यश्च विविधैर्यथाकामपुरस्कृतेः होगा। उनकी आपस क्या बातचीत हुई ! उन्होंने को जीता था। इस प्रकार से सय पृथ्वी को पहाड़ मुझमे क्या कहने के लिये आपमे कहा है ! कृपा और यनोसहित जीतसर उमने गजम्य या रचा करके ये सब बातें विशेषरूप से वर्णन करके मेरे मन था। उम यज में सय गना रोग धन, अन्न और का कौतूहल दूर कीजिए. ॥१०॥ अन्य अनेक प्रकार उपहार लेसर उमर पाम यद मुनकर नारद जी ने कहा हे गजा युधिष्ठिर' आये थे। ये मर या में ग्रामगों की मेगा में काम आप पड़े वृदिमान ,इन्द्रोक में रहनेगले राजा हरि- में नियुक्त थे 1200 चन्द्र पे बारे में जो पूछने है,गो मै विशेषरूप से वर्णन उम या के अरमा पर निमने जो मांगा,उमे फरना । गजा हरिचन्द्र यहा परवान् और मर गना ने यहा दिया सही नहीं, यमि माँगने मे चागुना. राजाओं का समाद था । ममी राजा उमझ आधीन पंचगुना दान किया। अषि विमान होने के समय रहकर उंग गिर गुमाने थे। उसने मुवर्ण मे मारित गजा ने दर दर में भाग हुए पट वामनों को नहीं स्थर हाम्फे प्रताप में अपू. गुम, मार, अनुमार माने यांना मामान. मान, गाम्मान, गोमेद और पुकर न मागतारों में पान मा भन भार गरि मागुष्ट राया। DAMOMITRAMITriun - [ सभापर्व 1 Y - म हा भारत LATUTITUTIVITIVITTERTAINMENTIRITUTITITITIODuriTATTTTTTTTTTERIOTE रत्नौघतर्पितैस्तुष्टैर्द्विजैश्च समुदाहृतम् ॥ १७॥ तेजस्वी च यशस्वी च नृपेभ्योऽप्यधिकोऽभवत्। एतस्मात्कारणाद्राजन्हरिश्चन्द्रो विराजते ॥१८. तेभ्यो राजसहस्त्रेभ्यस्तद्विद्धि भरतर्षभ समाप्य च हरिश्चन्द्रो महायज्ञं प्रतापवान् अभिषिक्तश्च शुशुभे साम्राज्येन नराधिप ये चाऽन्ये च महीपाला राजसूयं महाक्रतुम् ॥ २० ॥ यजन्ते ते सहेन्द्रेण मोदन्ते भरतर्षभ ये चापि निधनं प्राप्ताः संग्रामेष्वपलायिनः ॥ २१ ॥ ते तत्सदनमासाद्य मोदन्ते भरतर्षभ तपसा ये च तीत्रेण त्यजन्तीह कलेवरम् ॥ २२ ॥ ते तत्स्थानं समासाद्य श्रीमन्तो भांति नित्यशः। पिता च त्वाऽऽह कौन्तेय पाण्डुः कौरवनन्दन ॥ २३ ॥ हरिश्चन्द्रे श्रियं दृष्ट्वा नृपतौ जातविस्मयः विज्ञाय मानुपं लोकमायान्तं मां नराधिप ॥ २४ ॥ प्रोवाच प्रणतो भूत्वा वदेथास्त्वं युधिष्ठिरम् बहुत सा धन पाकर ब्राह्मण लोग बहुत प्रसन्न हुए । लेते हैं वही इन्द्र के साथ सुख भोगते हुए उनके उन्होंने यह घोषणा करदी कि इस समय राजा हरि- समान पद के अधिकारी होते हैं । जो क्षत्रिय राजा श्चन्द्र तेज, यश और ऐश्वर्य में सबसे बढ़कर है। युद्धभूमि में ठहरकर प्रबल शत्रुओं के पराक्रम को अब तक कोई राजा उसके समान प्रतापी नहीं हुआ। देख तनिक भी नहीं डरते, मामने लड़कर मौत को हे राजन् ! यही कारण है कि इन्द्रधाम में, जहाँ जाने गले लगाते है, उन्हें भी इन्द्र सभासदम्यता मिलने के लिये अन्य राजाओं के मन में लालसा बनी रहती पर अपार आनन्द प्राप्त होता है। और, जो लोग है, राजा हरिश्चन्द्र ही विराजमान है । प्रबल प्रतापी अत्यन्त कठोर तपस्या में मन लगाकर गरीर को छोड़ते और पराक्रमी हरिश्चन्द्र का महायज राजसूय कर हैं वे भी वहां रहकर,नित्य अपार सुख-सम्पत्ति भोगने चुकने के याद, सम्राट् के पद पर अभिषेक हो जाने से, के अधिकारी होते है ॥१५॥२२॥ बड़ा गौरव हुआ। हे भरत-नन्दन ! जो राजा लोग हे राजा युधिष्ठिर ! तुम्हारे पिता महाराज पाण्ड बहुत धन के बिना न हो सकनेवाला राजसूय यज्ञ भी राजा हरिचन्द्र के इस अपूर्व मौभाग्य को देख- करके उसे विधिपूर्वक बिना किसी विन के पूरा कर कर चकरा गये है । मुझे मनुष्यलोक में आते देख SHYDERITWARIDDLEONEYMOTHEATRITERINATIOMARATHITESTINCTIONRArcICES

३
अध्याय १२ ]
महा भारत
wriummmunrurmananurrent
arunmunmun Tannuinnrnoimmunior
समर्थोऽसि महीं जेतुं भ्रातरस्ते स्थिता वशे ॥२५॥
राजसूर्य क्रतुश्रेष्ठमाहरखेति भारत
त्वयीप्टवति पुत्रेऽहं हरिश्चन्द्रवदाशु वै
॥ २६ ॥
मोदिष्ये वहुलाः शश्वत्समाः शक्रस्य संसदि ।
एवं भवतु वक्ष्येऽहं तव पुत्रं नराधिपम् ॥ २७॥
भूलॊकं यदि गच्छेयमिति पाण्डुमथाऽब्रुवम्
तस्य त्वं पुरुपव्याघ्र संकल्पं कुरु पाण्डव ॥ २८॥
गन्ताऽसि त्वं महेन्द्रस्य पूर्वैः सह सलोकताम् ।
वहुविनश्च नृपते क्रतुरेप स्मृतो महान् ॥ २९॥
छिद्राण्यस्य तु वाञ्छन्ति यज्ञघ्ना ब्रह्मराक्षसाः ।
युद्धं च क्षत्रशमनं पृथिवीक्षयकारणम् ॥३०॥
किंचिदेव निमित्तं च भवत्यत्र क्षयावहम्
एतत्संचिन्त्य राजेन्द्र यत्क्षेमं तत्समाचर ॥ ३१॥
अप्रमत्तोत्थितो नित्यं चातुर्वपर्यस्य रक्षणे
उन्होंने प्रणाम करके मुझसे कहा था हे महाराज !
सन्देश सुन रिया; अब उनकी इच्छा पूरी करने का
आप कृपा करके मेरे बड़े पुत्र युधिष्ठिर से कहना कि
यत्न करो। जो तुम यह यन कर लोगे तो, अपने
सब भाई तुम्हारे अधीन हैं। उनकी सहायता से तुम , पूर्वजों के साथ इन्द्र की सभा के सभामद होकर,
सहज ही सब पृथ्वी को जीतकर दिधिजय कर सकते परम मुनी हो सकोगे। यह यज्ञ बहुत बड़ा
हो। इमलिये तुम अपश्य राजसूय यज करो। तुम मेरे । इसमें विन भी बहुत मे होते है। और यज्ञ के नाम
पुत्र हो । तुम यदि यज्ञ फर राम के अधिकारी करनेवाले घमराक्षम मढा उममें छिद्र इंद्रा करना है।
होओगे तो में भी राजा हरिश्चन्द्र के समान इन्द्र
यज प्रारम्भ होते ही क्षत्रियों के बीच युद्ध की आग
का सभासद होकर उनके साथ और किमी के अनुभव
जलन रगती हैं। उम युद्ध में ममय-समय पर पृथ्वी-
न आया हुआ आनन्द पार परम मुम्बी और मण्डल की सभी वातुओं के उजड़ जाने की आगश
हो जाती है। तात्पर्य यह है कि कुछ भी दोष हो
जाने पर एकदम मनाया जाता है ॥२७॥३०॥
हे राजन् : तुम्हारे पिता की यह प्रार्थना मुन
कर मैने कहा कि बहुत अच्छा, जो में मनुष्यगेरू इसरिये इन मर यानों पर विचार को जमा
में जाऊँगा तो तुम्हारा सन्देशा तुम्हारे पुत्र मे कह
टनित होयमा क्गे।। गगा गुधिष्ठिर ! तुम नागें
दंगा। हे राजा युधिष्ठिर ! तुमने महात्मा पाण्टु का
यों की रक्षा यही मारधानी गे रग्ने गो। गुमाग
PLETERemergro TELECTETCreomorrormireone,
में
मृतार्थ बनूगा ॥२३॥२६॥

म हा भारत [सभापर्व בתבנשמהההחתמהחברות המתחתרתמההמון INITITamimmunmunmire । भव एधख मोदस्य धनैस्तर्पय च द्विजान् ॥३२॥ एतत्ते विस्तरेणोक्तं यन्मां त्वं परिपृच्छासि आपृच्छे त्वां गमिष्यामि दाशाहनगरी प्रति ॥३३॥ वैशम्पायन उवाच-एवमाख्याय पार्थेभ्यो नारदो जनमेजय जगाम तैर्वृतो राजंतृपिभिर्यः समागतः • ॥३४॥ गते तु नारदे पार्थो भ्रातृभिः सह कौरव राजसूयं ऋतुश्रेष्ठं चिन्तयामास पार्थिवः ॥ ३५॥ इति श्रीमन्महाभारते सभापर्वणि लोकपालसभाख्यानपर्वणि पाण्डमंदेशकथने द्वादशोऽध्यायः ॥१० । समाप्तं लोक्पालसभाख्यानपर्व । अभ्युदय हो । तुम्हें प्रसन्नता प्राप्त हो । ब्राह्मणों को । हे राजा जनमेजय ! नारद जी पाण्डवों से विदा होकर दक्षिणा आदि से सन्तुष्ट करते हुए उनसे आशीर्वाद । उन ऋपियोंसहित जिनके साथ आये थे चले गये । प्राप्त करो। तुमने जो पूछ था सो मैंने विस्तार के साथ उनके चले जानेपर अब राजा युधिष्ठिर अपने छोटे कह दिया। अब मै विदा होता हूँ। मेरा विचार ! भाइयों से राजसूय यज्ञ करने की सलाह करने लगे द्वारकापुरी को जाने का है । वैशम्पायन ने कहा- ! ॥३१॥३५॥ सभापर्व का बारहवा अध्याय समाप्त हुआ । अथ त्रयोदशोऽध्यायः ॥ १३ ॥ वैशम्पायन उवाच-क्रपेस्तद्वचनं श्रुत्वा निशश्वास युधिष्ठिरः : चिन्तयनराजसूयेष्टिं न लेभे शर्म भारत राजीणां च तं श्रुत्वा महिमानं महात्मनाम् । यज्वनां कर्मभिः पुण्यैर्लोकप्राप्ति समीक्ष्य च हरिश्चन्द्रं च राजर्षि रोचमानं विशेषतः यज्वानं यज्ञमाहतुं राजसूयमियेप सः युधिष्ठिरस्ततः सर्वानर्चयित्वा सभासदः तेरहवा अध्याय ॥ १३ ॥ वैशम्पायन कहते है-हे जनमेजय ! देवर्षि नारद दिया । महात्मा राजऋषियों की महिमा, पुण्यकर्म के वचन सुनकर महाराज युधिष्ठिर ने एक लम्बी | करने से यजमानों को श्रेष्ठ लोकों की प्राप्ति और राज- श्वास ली। ये विचार करने लगे कि राजसूय यज्ञ सूय यज्ञ का फल भोगनेवाले राजा हरिश्चन्द्र के स्वर्ग: किस प्रकार हो। इसी चिन्ता ने उन्हें बेचैन कर वास आदि बातों के बारे में विचार करने से राजसूय - - AmpAMINIMIMUnwanSIMILLION: LTATILITANSMILE TAINMALJALAIMIM अध्याय १३] म हा भा र त गाATITUTORurnorrentirn TET MIUICIOUIETumnx ---- matter । प्रत्यर्चितश्च तैः सवर्यज्ञायेव मनो दधे स राजसूयं राजेन्द्र ! कुरूणामृपभस्तदा । आहर्तुं प्रवणं चक्रे मनः संचिन्त्य चाऽसकृत् ॥ ५ ॥ भूयश्चाऽद्भुतवीर्योजा धर्ममेवाऽनुचिन्तयन् किं हितं सर्वलोकानां भवेदिति मनो दधे अनुगृह्णन्प्रजाः सर्वाः सर्वधर्मभृतां वरः अविशेपेण सर्वेषां हितं चके युधिष्ठिरः सर्वेषां दीयतां देयं मुष्णन्कोपमदावुभौ साधु धर्मेति धर्मेति नाऽन्यच्छ्येत भापितम् ॥ ८ ॥ एवं गते ततस्तस्मिान्पतरीवाऽऽश्वसञ्जनाः न तस्य विद्यते द्वेष्टा ततोऽस्याऽजातशत्रुता ॥ ९ ॥ परिग्रहान्नरेन्द्रस्य भीमस्य परिपालनात् शत्रूणां क्षपणाच्चैव वीभत्सोः सव्यसाचिनः ॥ १० ॥ धीमतः सहदेवस्य धर्माणामनुशासनात् वेनत्यात्सर्वतश्चैव नकुलस्य स्वभावतः अविग्रहा वीतभयाः स्वकर्मनिरताः सदा ॥ ११ ॥ यज्ञ करने के लिये उनको उत्कण्ठा प्रबल हो उठी। प्रजा दिन दिन उन्हें अपने पिता के ममान समझकर अब महाराज युधिष्ठिर ने सभासदों का सम्मान करके उनपर अटल भत्ति रखने रगी। उनका अमिय या और उनमे सम्मान पाकर राजसूय यन करने का अनिष्ट की चष्टा करनेवाला कोई नहीं देख पड़ना विचार कर लिया । अद्भुत तेज-प्रताप से अरकृत, था। इसी कारण युधिष्ठिर का नाम 'अजाना पड़ श्रेष्ठ धर्मात्मा युधिष्ठिर ने धर्म करने की चिन्ता में गया ॥१०॥ अपना मन लगा दिया। उनके मन में केवल यही भीममेन अपने यापल मे प्रजा के कष्टों को चिन्ता प्रयल हो उटी कि प्रजा का मरा मि उपाय दूर करते हुए उसकी गहा और पाग्न परने मंगे। से हो सकता है । वे मोध, मत्सर आदि मे वचार. अर्जुन शत्रुओं का नाम करने में और बुद्धिमान् पक्षपात छोड़सर, सभी का उपकार करने रंग। उन्होंने महदेव धर्म के आचरण में प्रत हुए। महामा भने युल का मर दना चुका देने की आज्ञा दे दी। नार म्यामारिक नाता मे मो अग्ने अनुकर मर जगह गय रोग धर्म को और धर्मराज को,माधुपाद बनाने गे।इम पर पानी पानों के यम में मय देने दिमाई पड़ते थे। रगातार धर्म कर्म करने मे मय मजा युद्ध आदि जगहों में पनी गार आनन्द DAR - . न म हा भारत [सभापर्व TOTATOPATITUTrummomummelunwar - IMANITIATELIATTISRADHETHEREITIEILIARYXIImans । निकामवर्षाः स्फीताश्च आसञ्जनपदास्तथा वार्दूपी यज्ञसत्त्वानि गोरक्षं कर्षणं वणिक् ॥ १२ ॥ विशेषात्सर्वमेवैतत्संजज्ञे राजकर्मणा अनुकर्षं च निष्कर्ष व्याधिपावकमूर्च्छनम् ॥ १३ ॥ सर्वमेव न तत्राऽऽसीद्धर्मनित्ये युधिष्ठिरे दस्युभ्यो वञ्चकम्यश्च राज्ञः प्रति परस्परम् ॥ १४ ॥ राजवल्लभतश्चैव नाऽश्रृयत मृपाकृतम् प्रियं कर्तुमुपस्थातुं बलिकर्म स्वकर्मजम् अभिहतुं नृपाः पट्सु पृथग्जात्यैश्च नैगमैः : ववृधे विषयस्तत्र धर्मनित्ये युधिष्ठिरे कामतोऽप्युपयुञ्जानै राजसैर्लोभर्जनैः सर्वव्यापी सर्वगुणी सर्वसाहः स सर्वराट ॥१७॥ यस्मिन्नधिकृतः सम्राड् भ्राजमानो महायशाः यत्र राजन् ! दश दिशः पितृतो मातृतस्तथा पूर्वक अपने-अपने काम करने लगी। नगरों और गाँवों | के लिये प्रजापीड़न, वर्षा का न होना, या अत्यन्त में प्रजा के मध्य में कहीं लडाई झगड़ा नहीं होता था। वर्षा होना, ये उपद्रव राजा युधिष्ठिर के राज्य में न ठीक समय पर जल वर्षता था। सब लोग भरे-पुरे और होते थे । अपने गेनगार के ऊपर बँधा हुआ टैक्स सम्पन्न हो गये। धर्मराज युधिष्ठिर के राज्यकाल में देने के लिये व्यापारियों के आने से और राजा का किसी आवश्यक वस्तु की कमी नहीं रह गई । शासन प्रिय करने तथा उनकी उपासना के लिये कर देने- की उत्तमता से महाजनी, यज्ञ फल, गोरक्षा, पशु- वाले राजाओं के लगातार आने-जाने से राजा युधि- पालन, खेती, वनिज आदि सभी बातों की उन्नति | ठिर की राजधानी और राज की दिन दिन श्री-वृद्धि होने लगी ॥१०॥१३॥ होने लगी। अधिक क्या कहें, उनके राज्यकाल धोखा देकर प्रजा के धन को ठगना या वलपूर्वक सुख सम्भोग-लोलुप और लोभ-मद आदि राजसी छीन लेना,व्याधि-भय,अमि-भय, अकाल मृत्यु आदि वृत्तियों के अत्यन्त वशीभूत विलासी व्यक्तियों के द्वारा का कहीं नाम न सुन पड़ता था। उस समय कहीं यह भी देश की विशेष रूप से उन्नति होने लगी। युधिष्ठिर सुन भी न पड़ता था कि चोर, ठग या राजा के कृपा को सब लोग सर्वन्यापक सब गुणों से अलकृत, सहन पात्र लोग कहीं कुछ अत्याचार कर रहे है। गरीबी, शील, शान्तस्वभाव, जानते और मानते थे। तेजस्वी, के कारण राजा की मालगुजारी बाकी रहना, 'कर' ! महायशम्ची, सम्राट् धर्मराज ने जिन जिन स्थानों पर फumar में , AMMAMALTIMILAIMIMIMIMAMATION WHE ६७ अध्याय १३ ॥ म हा भारत. TIMILM TUVULLTID UTILUXULUKUUMUUTMI ALUMINIONULA KIUCHCOCLEICH ॥ १८ ॥ PUTERATURAIDUNIAL MAITRINITIAL. ॥ २३ ॥ अनुरक्ताः प्रजा आसन्नागोपाला द्विजातयः वैशम्पायन उवाच स मन्त्रिणः समानाय्य भ्रातृ॑श्च वदतां वरः राजसूयं प्रति तदा पुनः पुनरपृच्छत ते पृच्छयमानाः सहिता बचोऽयं मन्त्रिणस्तदा। युधिष्ठिरं महाप्राज्ञं यियक्षुमिदमब्रुवन् ॥ २० ॥ येनाऽभिषिक्तो नृपतिर्वारुणं गुणमृच्छति तेन राजापि तं कृत्स्नं सम्राड्गुणमभीप्सति ॥ २१ ॥ तस्य सम्रागुणाहस्य भवतः कुरुनन्दन राजसूयस्य समयं मन्यन्ते सुहृदस्तव ॥ २२ ॥ तस्य यज्ञस्य समय स्वाधीनः क्षत्रसंपदा साम्ना पडग्नयो यस्मिंश्चीयन्ते संशितव्रतैः दर्वीहोमानुपादाय सर्वान्यः प्राप्नुते ऋतून अभिपकं च यस्याऽन्ते सर्वजित्तेन चोच्यते ॥२४॥ समर्थोऽसि महावाहो सर्वे ते वशगा वयम् अचिरात्वं महाराज! राजसूयमवाप ॥ २५ ॥ अविचार्य महाराज ! राजसूये मनः कुरु अधिकार कर लिया था वहां के ब्राह्मणों से लेकर शूद्र अधिकारी समझा जाता है । राजसूय यज्ञ करने से अहीर तक उनको अपने पिता-माता अथवा उनसे भी । हीराजा सम्राट् कहलाता है । आप में सम्राट् के सब अधिक समझकर उन पर भक्ति और श्रद्धा रखते थे। । गुण विद्यमान है, इसलिये आप राजसूय यज्ञ अच्छी तरह कर सकते है । हम लोग और आपके इष्ट-मित्र बोलने की अरोकिक शक्ति रखनेवाले राजा यह बात मानते हैं कि इस समय आप राजसूय यज्ञ युधिष्ठिर अपने छोटे भाइयों और मन्त्रियों को बुला- करने योग्य है, आप शीघ्र ही इस यज्ञ का अनुष्ठान कीजिए । आपके मित्र भी इसका अनुमोदन करेंगे। कर उनसे अपने राजसूय यज्ञ करने के बारे में बार- बार सलाह करने लगे। यज्ञ करने की इच्छा रखनेवाले इस समय राज्य में किसी प्रकार का उपद्रव नहीं बुद्धिमान् युधिष्ठिर के अर्थपूर्ण वाक्य सुनकर मन्त्रियों है ॥१९॥२२॥ ने एकमत होकर उनसे कहा-हे कुरुश्रेष्ठ ! जो राजा क्षत्रिययल-सम्पन्न होने पर यह यज्ञ सहज ही सार्वभौम नरेश के योग्य गुणों का पात्र होकर अभ्यु- किया जा सकता है। प्रतधारी सामवेदी ऋत्विक दय को प्राप्त होता है वही राजसूय यज्ञ करने का । ब्राह्मण लोग इस यज्ञ में मन्त्रपाठ पूर्वक छः प्रकार प्स्यिास Anmunar IMALLALI ॥१४॥१८॥ . MALAIMIMILIMWALNUMANITAL TIMMUMMITM TURALLO HALIAMINATIONAL [सभापर्व Sunrunmarrunnimunream TITUTINUWARIT TRAITTUUUUTE ॥ २६ ॥ ZEAT.CAMLEELANCIALLAMAALMALE ॥ २८॥ महा भारत Tran इत्येवं सुहृदः सर्वे पृथक्च सह चाऽब्रुवन् स धयं पाण्डवस्तपां वचः श्रुत्वा विशाम्पते । धृष्टमिष्टं वरिष्ठं च जग्राह मनसाऽरिहा ॥ २७॥ श्रुत्वा सुहृद्वचस्तञ्च जानंश्चाऽप्यात्मनः क्षमम् । पुनः पुनर्मनो दधे राजसूयाय भारत ! स भ्रातृभिः पुनर्धीमानृविग्भिश्च महात्मभिः । मन्त्रिभिश्चापि सहितो धर्मराजो युधिष्ठिरः धौम्यद्वैपायनाद्यैश्च मन्त्रयामास मन्त्रवित् ॥२९॥ युधिष्ठिर उवाच इयं या राजसूयस्य सम्राडर्हस्य सुक्रतोः श्रद्दधानस्य वदत स्पृहा मे सा कथं भवेत् ? ॥३०॥ वैशम्पायन उवाच-एवमुक्तास्तु ते तेन राज्ञा राजीवलोचन ! इदमूचुर्वचः काले धर्मराज युधिष्ठिरम् ॥ ३१ ॥ अर्हस्त्वमसि धर्मज्ञ! राजसूयं महाक्रतुम् अथैवमुक्ते नृपतात्विम्भिपिभिस्तथा ॥ ३२ ॥ के अमि की स्थापना करते हैं। राजसूय यज्ञ की चलता रहा कि इस यज्ञ का अनुष्ठान अभी मेरे दीक्षा लेने से और यज्ञान्त में अवभृथ स्नान तथा लिये उचित है या नहीं। इस इतने बड़े यश की राज्याभिषेक होने से अमिहोत्र आदि सभी यज्ञों के | योग्यता मुझमें है या नहीं; परन्तु बार-बार राजसूय करने का फल मिल जाता है । इसी कारण राजसूय यज्ञ करने की ओर ही उनका मन ललक उठता यज्ञ की दीक्षा लेनेवाला सर्वजित् कहलाता है। हे था । इस कारण मन्त्र कार्य में चतुर धर्मराज युधि- महाराज ! आप बडे पराक्रमी और प्रतापी हैं; हम | ष्ठिर फिर अपने भाइयों, मन्त्रियों, महात्मा ऋत्विक लोग भी आपके आज्ञाकारी है। यज्ञ का आरम्भ ब्राह्मणों और धौम्य, व्यास आदि को एकत्र करके कीजिए; शीघ्र ही आपकी इच्छा पूरी होगी । इस- उनसे पूछने लगे । धर्मराज ने कहा-सार्वभौम राजा लिए अब आप अधिक सोच विचार न करके राजसूय | के करने योग्य राजसूय महायज्ञ करने के लिये मेरा यज्ञ प्रारम्भ कर दीजिए । हे राजा जनमेजय ! युधि- जी बहुत चाहता है। मुझे उसके करने की श्रद्धा है । ष्ठिर के मन्त्री, इष्ट-मित्र आदि ने एकत्र होकर और अब तुम लोग बताओ कि किस उपाय से मेरा यह अलग-अलग भी उन्हें यही सम्मति दी ।।२३।२६॥। मनोरथ सफल हो सकता है ॥२७॥३०॥ पाण्डव युधिष्ठिर ने उनकी धर्म-सम्पादक, इष्ट वैशम्पायन कहते है-हे राजा जनमेजय ! धर्मराज और न्याय-सगुन श्रेष्ठ यह सलाह मन ही मन मान युधिष्ठिर के इस प्रस्ताव को सुनकर सबने यह सम- री। किन्तु उनके मनमें यह आन्दोलन बराबर योचित सलाह दी-हे महाराज ! आप व्यर्थ चिन्ता RAINTIMATLALITANIMLIONILTHANI TWINITIATILLMMARWHAATAL अध्याय १३] म हा भारत WYUM AMMrumravranimuTHI TITUTTOURITEUUUUUUNWMTITUMANITYOTIRITTONITORINGr antipurusawari.xnanian DILMILIMLILALURUILMY AUDIOTIRUlondu मन्त्रिणो भ्रातरश्चाऽस्य तद्वचः प्रत्यपूजयन् । स तुराजा महाप्रानः पुनरेवाऽऽत्मनाऽऽत्मवान् ॥ ३३ ॥ भूयो विममृशे पार्थो लोकानां हितकाम्यया । सामर्थ्ययोगं संप्रेक्ष्य देशकालौ व्ययागमौ ॥३४॥ विमृश्य सम्यक्च धिया कुर्वन्प्राज्ञो न सीदति । न हि यज्ञसमारम्भः केवलात्मविनिश्चयात् ॥३५॥ भवतीति समाज्ञाय यत्नत कार्यमुद्वहन् स निश्चयार्थं कार्यस्य कृष्णमेव जनार्दनम् ॥३६ ॥ सर्वलोकात्परं मत्वा जगाम मनसा हरिम् अप्रमेयं महावाहुं कामाज्जातमजं नृपु पाण्डवस्तर्कयामास कर्मभिर्देवसमितैः नाऽस्य किंचिदविज्ञातं नाऽस्य किंचिदकर्मजम् ॥ ३८ ॥ न स किंचिन्न विपहेदिति कृष्णममन्यत स तु तां नैष्ठिकी बुद्धिं कृत्वा पार्थो युधिष्ठिरः ॥ ३९ ॥ कर रहे हैं । आप अवश्य राजसूय यज्ञ करने के नहीं । यह सोचकर धर्मरान ने कर्तव्य का निश्चय योग्य पात्र हैं। काम शुरु कर दीनिए, सहज ही करने के विचार से पुरुषोतम कृष्ण को म्मरण किया। आपकी इच्छा पूर्ण होगी । इस प्रकार भाइयों,मन्त्रियों, उन्होंने विचार किया कि कृष्णच द्र सब मनुष्यों में विजों ओर कापियों को अपनी इच्छा के अनुकूल श्रेष्ठ हैं । वे अप्रमेय, महानाहु, अपनी इच्छा से मनुष्य सलाह देते देखकर जितेन्द्रिय सत्यवादी महाराज | रोक में उत्पन्न साक्षात् नारायण हैं। देवताओं के युधिष्ठिर को बड़ा सन्तोष हुआ। किन्तु इसके पश्चात् | ऐसे कृष्णचन्द्र के विचित्र कार्यों को देसकर धर्मराज फिर वे सोचने लगे कि जो मनुष्य अपनी सामर्थ्य, युधिष्ठिर को निश्चय हो गया था कि पृथ्वीमण्डल में सुयोग, देश, काल, आमदनी और खर्च पर अच्छा ऐसी काई वस्तु या वात ही नहीं निसे कृष्ण न जानते तरह विचार कर किसी काम को शुरु करता है, उसे पीछे हों, ऐसा कोई काम ही नहीं निसे वे सहज ही न पछताना नहीं पडता ! बुद्धिमान् चतुर रोग इन बातों कर सकते हों, ऐसी कोई बात ही नहीं निसे वे सह पर विशेष रूप से विचार किये बिना काम नहीं करते, न सकते हों। कृष्ण के बारे में ऐसा दृढ़ निश्चय कर इसी से उन्हें मुसीबत में नहीं पडना पड़ता॥३१॥३४॥ चुकने पर युधिष्ठिर ने आशीर्वाद और अपना सन्देश केवल अपने ही निश्चय पर भरोसा करके किसी कहने के लिये आना देकर इन्द्रसेन नाम दृत को तरह इतने बड़े यज्ञ के काम में हाथ डारना उचित उसी समय जगद्गुरु कृष्ण के पाम भेना ॥३५॥३०॥ - ANUMANOHITIMILIATE THIVARALETAITHILITARTHI IADEOIMLAILA ७० म हा भारत मभापर PuminumariRTUTITUTIURATU muTumouronmamama गुरुवद् भूतगुरवे प्राहिणोद् दूतमञ्जसा शीघ्रगेण रथेनाऽऽशु स दूतः प्राप्य यादवान् ॥ ४०॥ द्वारकावासिनं कृष्णं द्वारवत्यां समासदत् दर्शनाकाक्षिणं पार्थं दर्शनाकाक्षयाऽच्युतः ॥ ४१ ॥ इन्द्रसेनेन सहित इन्द्रप्रस्थमगात्तदा व्यतीत्य विविधान्देशांस्त्वरावान्क्षिप्रवाहनः ॥ ४२ ॥ इन्द्रप्रस्थगतं पार्थमभ्यगच्छजनार्दनः स गृहे पितृवद् भ्रात्रा धर्मराजेन पूजितः ॥४३॥ भीमेन च ततोऽपश्यत्स्वसारं प्रीतिमान्पितुः प्रीतः प्रीतेन सुहृदा रेमे स सहितस्तदा ॥ ४४ ॥ अर्जुनेन यमाभ्यां च गुरुवत्पर्युपासितः तं विश्रान्तं शुभे देशे क्षणिनं कल्पमच्युतम् धर्मराजः समागम्य ज्ञापयत्स्वप्रयोजनम् ॥ ४५ ॥ युधिष्ठिर उवाच-प्रार्थितो राजसूयो मे न चाऽसौ केवलप्सया । प्राप्यते येन तत्ते हि विदितं कृष्ण सर्वशः ॥४६॥ यस्मिन्सर्वं संभवति यश्च सर्वत्र पूज्यते यश्च सर्वेश्वरो राजा राजसूयं स विन्दति . ॥४७॥ शीघ्र चलनेवाले स्थपर बैठकर वह दूत द्वारका पास जाकर उनके पैर छुए । नकुल और सहदेव ने पुरी में यादवों के मध्य में धैठे कृष्ण के पास गया । शिष्य की तरह उनकी पूजा की और प्रिय मित्र दूत के मुख से सब वृत्तान्त सुनकर, अपने दर्शन की अर्जुन उनके गले से लग गये । इस प्रकार पाण्डवा इच्छा रखनेवाले धर्मराज को दर्शन देने के विचार से, के पास पहुँचकर कृष्णचन्द्र बड़े प्रसन्न हुए।।४०४४|| कृष्णचन्द्र उसी समय उस दूत के साथ चल पडे । जब वह अपनी बुआ कुन्ती से मिलकर कुछ वायु के समान वेगशाली रथ पर बैठकर वासुदेव इन्द्र- देर विश्राम कर चुके तब युधिष्ठिर उनके पास जाकर सेन के साथ इन्द्रप्रस्थ पहुंचे और सभा में जाकर अपना प्रयोजन कहने लगे-हे कृष्ण जी! मै राजसूय युधिष्ठिर से मिले । बुआ के लड़के धर्मराज और / यज्ञ करना चाहता हूँ, किन्तु केवल चाहने से ही राज- भीमसेन ने पिता की तरह म्नेह से कृष्ण का सत्कार सूय यज्ञ नहीं हो सकता । जिस तरह यह यज्ञ सम्पन्न और स्वागत किया। उनके आदर-यत्न से अत्यन्त | हो सकता है सो तुमसे छिपा नहीं है। राजसूय यज्ञ प्रसन्न होकर कृष्णचन्द्र ने अपनी बुआ कुन्ती के | वही कर सकता है, जिसमें सब कुछ सम्भव हो, Jamani WAITIS RIMASTOWWITTER । MRILLIAMADAINIMILAIMERIOTIPOTY ATTENAMITITIVEHIMAED IITUTE TITUAR ॥५१॥ अध्याय १४] महाभारत RINT ENTUTUSUITARITTITUTRITION तं राजसूयं सुहृदः कार्यमाहुः समेत्य मे तत्र मे निश्चिततमं तव कृष्ण गिरा भवेत् ॥४८॥ केचिद्धि सौहृदादेव न दोपं परिचक्षते स्वार्थहेतोस्तथैवाऽन्ये प्रियमेव वदन्त्युत ॥४९॥ प्रियमेव परीप्सन्ते केचिदात्मनि यद्वितम् एवंप्रायाश्च दृश्यन्ते जनवादाः प्रयोजने ॥ ५० ॥ वं तु हेतूनतीत्यैतान्कामक्रोधौ व्युदस्य च परमं यत्क्षमं लोके यथावद्वक्तुमर्हसि इनि श्रीमन्महाभारते सभापर्वणि राजसूयारम्भपर्वणि यामुदेवागमन त्रयोदशोऽध्यायः ॥ १३ ॥ जो सर्वत्र पूजा पाता हो और जो सब पृथ्वीमण्डल । होते हैं जो अपने म्वार्थ के लिये चापलूसी करते है । का चक्रवर्ती राजा हो । मेरे वन्धु-बान्धवों की सलाह है | कुछ ऐसे होते हैं जो उसी बात को प्रिय कहकर कि मै यज्ञ करूँ; यह यज्ञ करने के लिये वे मुझे | उसके करन की सलाह देते है जिसमें अपना भला सब तरह समर्थ समझते और कहते हैं । परन्तु बिना । हो । हे वासुदेव ! इस ससार में ऐसे ही लोगों की तुम्हारी सलाह लिये मैं इस बारे में कुछ निश्चय नहीं सख्या अधिक है। किन्तु ऐसे लोगों की सलाह पर कर सकता । तुम यदि इसका अनुमोदन करोगे तो भरोसा करके कोई काम कर उठाना बुद्धिमान् पुरुष फिर में पूर्णरूप से यह यज्ञ करने का निश्चय कर का काम नहीं । तुम काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, लगा । मैं तुम्हारी सलाह पर ही पूरा भरोसा करता मत्सर आदि नीच प्रवृत्तियों के वशीभूत नहीं हो । है। इसका एक विशेष कारण है। बहुत से लोग इसी से मै तुम्हारी श्रेष्ठ सम्मति सुनना चाहता हूँ । ऐसे होते है जो मित्रता के ख्याल से मित्र के दोष | जैसा उचित समझो वैसा मुझसे कहो ॥४५॥५१॥ या कमी का उल्लेख करना नहीं चाहते। कुछ लोग ऐसे सभापर्व का तेरहवां अध्याय समाप्त हुआ । अथ चतुर्दशोऽध्यायः ॥ १४॥ श्रीकृष्ण उवाच-सवैर्गुणेमहाराज! राजसूयं त्वमर्हसि जानतस्त्वेव ते सर्व किंचिद्वक्ष्यामि भारत ! चौदहवां अध्याय ॥१४॥ युधिष्ठिर की यह बात सुनकर श्रीकृष्ण ने । पात्र है । आप सब जानते है, तो भी आपसे कुछ कहा-हे राजन् ! आप में सभी श्रेष्ठ गुण है । कहता हूँ, मुनिए । जमदमि के पुत्र परशुराम ने इसलिये आप सब तरह गजसूय यज्ञ करने के योग्य पूर्व समय में क्षत्रिय वंश का जड़सहित नाश कर MATIMMMMILL WATRAENIMAmAAIIMILITATION सभापर्व ७२ महा भारत ManUMNUUrOUTUUUIRRUITUN HTRANSumirroruWITTITIromrat PARurarianRImmumornimaITENANT - जामदग्न्येन रामेण क्षत्रं यदवशेपितम् तस्मादवरजं लोके यदिदं क्षत्रसंज्ञितम् ॥ २ ॥ कृतोऽयं कुलसंकल्पः क्षत्रियैर्वसुधाधिप! निदेशभाग्भिस्तत्ते हि विदितं भरतर्षभ ! ऐलस्येक्ष्वाकुवंशस्य प्रकृति परिचक्षते राजानः श्रेणिवद्धाश्च तथाऽन्ये क्षत्रिया भुवि ॥ ४ ॥ ऐलवंश्याश्च ये राजंस्तथैवेक्ष्वाकयो नृपाः तानि चैकशतं विद्धि कुलानि भरतर्षभ ! ययातेस्त्वेव भोजानां विस्तरो गुणतो महान् । भजतेऽद्य महाराज ! विस्तरं स चतुर्दिशम् ॥ ६ ॥ तेषां तथैव तां लक्ष्मी सर्वक्षत्रमुपासते इदानीमेव वै राजञ्जरासन्धो महीपतिः अभिभूय श्रियं तेपां कुलानामभिषेचितः स्थितो मूर्ध्नि नरेन्द्राणामोजसाऽऽक्रम्य सर्वशः ।, सोऽवनि मध्यमां भुक्त्वा मिथो भेदममन्यत ॥ ८ ॥ प्रभुर्यस्तु परो राजा यस्मिन्नेकवशे जगत् स साम्राज्यं महाराज! प्राप्तो भवति योगतः ॥ ९ ॥ तं स राजा जरासन्धं संश्रित्य किल सर्वशः । दिया था। इस समय जो क्षत्रिय कहे जाते है वे सब क्षत्रिय कुल अपने पूर्वजों के राज्य-ऐश्वर्य का पहले के क्षत्रियों की अपेक्षा हीन पराक्रमी और | उपभोग करते आते थे; परन्तु वर्तमान समय में निकृष्ट हैं । उन्होंने एकत्र होकर जो कुलों के नियम | मगध-नरेश राजा जरासन्ध ने अपने बाहुबल से सब आदि चलये हैं उन्हें भी आप जानते है । इस समय राजाओं को वश में कर लिया है । वह इस समय के अधिकाश क्षत्रिय और राजा अपने को इला और । एकाधिपत्य राज्य कर रहा है। जो कोई सब का इक्ष्वाकु की सन्तान कहते है ॥१४॥ प्रभु और अखण्ड पृथ्वीमण्डल का अद्वितीय अधि- इला और इक्ष्वाकु की सन्तानों से सौ कुल पैदा | पति हो वही राजसूय यज्ञ कर सकता है ॥५॥९॥ हुए। उनमें भोजवश के राजा ययाति का कुल ही पराक्रमी शिशुपाल जरासन्ध का सहायक और पृथ्वीमण्डल भर में प्रसिद्ध और श्रेष्ठ है। हे राजन्! सेनापति है । मायायुद्ध करने में निपुण,प्रबल प्रतापी TOTTAROLITIERIALIHEALLLLLLHETAIMERATHOREILALTEETTEE २ । Pाम ॥ WHEAXIYNAMMMITAMIL अध्याय १४] म हा भारत numarmummm.inruuumnurn2 DUTON AMMEATMOn MADIRRITORIA HTTOTRICUTTOTTOOTEREITITUTIOTI राजन् ! सेनापतिर्जातः शिशुपालः प्रतापवान् ॥ १० ॥ तमेव च महाराज! शिष्यवत्समुपस्थितः वकः करूपाधिपतिर्मायायोधी महाबलः ॥ ११ ॥ अपरौ च महावीर्यों महात्मानौ समाश्रितो जरासन्धं महावीर्यं तौ हंसडिम्भकावुभौ ॥ १२ ॥ वक्रदन्तः करूपश्च करभो मेघवाहनः मूर्धा दिव्यमणिं बिभ्रद्यमद्भुतमणि विदुः ॥१३॥ मुरुं च नरकं चैव शास्ति यो यवनाधिपः अपर्यन्तवलो राजा प्रतीच्यां वरुणो यथा ॥ १४ ॥ भगदत्तोमहाराज! वृद्धस्तव पितुः सखा स वाचा प्रणतस्तस्य कर्मणा च विशेषतः स्नेहबद्धश्च मनसा पितृवद्भक्तिमांस्त्वयि. प्रतीच्यां दक्षिणं चान्तं पृथिव्याः प्रति यो नृपः ॥ १६ ॥ मातुलो भवतः शूरः पुरुजित्कुन्तिवर्धनः स ते सन्नतिमानेकः स्नेहतः शत्रुसूदनः ॥ १७ ॥ जरासन्धं गतस्त्वेव पुरा यो न मया हतः पुरुषोत्तमविज्ञातो योऽसौ चेदिपु दुर्मतिः आत्मानं प्रति जानाति लोकेऽस्मिन्पुरुपोत्तमम् । आदत्ते सततं मोहाद्यः स चिहं च मामकम् ॥ १९ ॥ रूप,देश का राजा वक्र, जरासन्ध की सभा में बलशाली आपके पिता के मित्र, यवनाधिपति वृद्ध शिष्य के समान उसकी उपासना करता है । हस भगदत्त भी सदा जरासन्ध के अनुकूल रहते है। और डिम्भक नाम के दो और पराक्रमी राजा जरामन्ध ॥११११५॥ के आज्ञाकारी हैं । वदन्त, करम और मेघवाहन पश्चिम और दक्षिण दिशा के सबसे श्रेष्ठ भी उसके अनुगत है । हे महाराज! लोकप्रसिद्ध अद् शासक, आप पर अत्यन्त स्नेह रखनेवाले, मेह के भुत दिव्य मणि को मस्तक पर धारण करनेवाले, कारण सदा आप की भलाई चाहनेवाले, कुन्तिवंश- मुरु और नरक देश के शासक पश्चिम दिशा में वर्द्धन, गत्रुदमन आपके मामा पुरुजित् भी जरासन्य राज्य फैराकर वरुण के समान राजराज, अमित के अनुगत हैं । चेदि देश में प्रसिद्ध, अपने को ॥ १८ ॥ Publiluuuuumar MMMMITIMILAILS MAMTMLAIMIMILM MEDIES AMRIMAIYAMITIANIML मभापर्य ७४ म हा भारत rammUTTONITIArunu TAMODUUUTTOTATTITTITUTER ट । । - वङ्गपुण्डूकिरातेषु राजा वलसमन्वितः पौण्डूको वासुदेवेति योऽसौ लोकेऽभिविश्रुतः ॥ २० ॥ चतुर्थभाङ् महाराज! भोज इन्द्रसखो बली विद्यावलाद्यो व्यजयत्स पाण्ड्यक्रथकैशिकान् ॥ २१ ॥ भ्राता यस्याऽकृतिः शूरो जामदग्न्यसमोऽभवत्। स भक्तो मागधं राजा भीमकः परवीरहा ॥ २२ ॥ प्रियाण्याचरतः प्रह्वान्सदा संवन्धिनस्ततः भजतो न भजत्यस्मानप्रियेषु व्यवस्थितः ॥ २३॥ ने कुलं न वलं राजन्नभ्यजानात्तथाऽऽत्मनः पश्यमानो यशो दीप्तं जरासन्धमुपस्थितः ॥ २४ ॥ उदीच्याश्च तथा भोजाः : कुलान्यष्टादश प्रभो । जरासन्धभयादेव प्रतीची दिशमास्थिताः ॥ २५ ॥ शूरसेना भद्रकारा वोधाः शाल्वाः पटच्चराः सुस्थलाश्च सुकुट्टाश्च कुलिन्दाः कुन्तिभिः सह ॥ २६ ॥ शाल्वायनाश्च राजानः सोदर्यानुचरैः सह दक्षिणा ये च पञ्चालाः पूर्वाः कुन्तिषु कोशलाः॥ २७ ॥ तथोत्तरां दिशं चापि परित्यज्य भयार्दिताः पुरुषोत्तम कहकर मोहवश सदा मेरे चिहों को धारण | है, तो भी वे हमारी ओर नहीं हुए । वे भी जरासन्ध करनवाला, वङ्ग-पुण्ड्-किरात देशों का अधिपति, की प्रसिद्धि और प्रताप का हाल सुनकर मोहित होकर, मिथ्या वासुदेव, महापराक्रमी पौण्डक भी इस समय कुलपरम्परा से चली आ रही शूरता-वीरता गम्भीरता जरासन्ध के अधीन हो गया है ॥१६॥२०॥ और मान-आत्माभिमान को भूलकर उसके शरणागत चतुर्थांश पृथ्वीमण्डल के अधिपति, भोज और | हुए ॥२१॥२४॥ राजा इन्द्र के सखा, पाण्ड्य क्रथ-कैशिक देश-वि- अठारह भोजकुल, और उत्तर देश के सब राजा जेता, विद्वान् , बली, शत्रुकुलनाशक, परशुराम के जरासन्ध के डर से ही पश्चिम दिशा को चढ़े गये समान तेजस्वी अकृति राजा के बड़े भाई भीष्मक राजा | हैं । शूरसेन, भद्रकार, बोध, शाल्व, पटच्चर, सुस्थल, मी जरासन्ध के भक्त हैं। हम इन भीष्मक के नाते- सुकुट्ट, कुलिन्द, कुन्ति, शाल्वायन आदि वी के दार है, सदा उनका प्रिय करने की इच्छा रखते है, राजा, दक्षिण-पञ्चाल के राजा, और पूर्व कोशल विनय और नम्रता के साथ उन के अनुगत रहते BaramatarnamaATETTIANE राजा भी भाइयों और अनुचरों के साथ अपने अपने ।

७५ अध्याय १४ म हा भारत FORIIIIIIIIAurnarouTITUTIJIRITUALITTINDIATIMAHITIJITTITUTITUTRITIENTI .Unauntino AIRTHDITATION मत्स्याः संन्यस्तपादाश्च दक्षिणां दिशमाश्रिताः॥ २८ ॥ तथैव सर्वपञ्चाला जरासन्धभयार्दिताः स्वराज्यं संपरित्यज्य विद्रुताः सर्वतो दिशम् ॥ २९ ॥ कस्यचित्त्वथ कालस्य कंसो निर्मथ्य यादवान् । वार्हद्रथसुते देव्यावुपागच्छद् वृथामतिः ॥३०॥ अस्तिः प्राप्तिश्च नाम्ना ते सहदेवानुजेऽवले वलेन तेन स ज्ञातीनभिभूय वृथामतिः ॥ ३१ ॥ श्रेष्ठयं प्राप्तः स तस्याऽऽसीदतीवाऽपनयो महान् । भोजराजन्यवृद्धश्च पीड्यमानैर्दुरात्मना ॥ ३२॥ ज्ञातित्राणमभीप्सद्भिरस्मत्संभावना कृता दत्वाऽक्रूराय सुतनुं तामाहुकसुतां तदा संकर्षणद्वितीयेन ज्ञातिकार्यं मया कृतम् हतो कंससुनामानो मया रामेण चाप्युत ॥ ३४ ॥ भये तु समतिक्रान्ते जरासन्धे समुद्यते मन्त्रोऽयं मन्त्रितो राजन् ! कुलैरष्टादशावरैः ॥ ३५॥ अनारमन्तो निघ्नन्तो महास्त्रैः शत्रुधातिभिः न हन्यामो वयं तस्य त्रिभिर्वर्षशतैर्वलम् राज्य छोड़कर, जरासन्ध के डर से कुन्ति देश में हे महाराज ! ऐसा करने से कंस को सब लोग जाकर रहे है । मत्स्य संन्यस्तपाद देश के राजा घृणा की दृष्टि मे देखने और उसकी निन्दा करने भय के मारे दक्षिण दिशा को चले गये है । पाञ्चाल लगे। भोजवंश के वृद्ध क्षत्रिय लोग उस दुष्ट के देश के भी सब राजा जरासन्ध के डर से अपने राज्य अत्याचार को अधिक न सह मके, तब वे जाति- छोड़कर दूर-दूर इधर-उधर भाग गये है ।।२५।२९॥ रक्षा की इच्छा से मेरी गरण में आये । जाति का कुछ समय हुआ, राजा उग्रसेन के पुत्र दानव- हित करने के लिये मैने आहुक की पुत्री सुतनु का राज कंस ने यादवों को जीतकर जरासन्ध की अम्ति विवाह अनूर से करा दिया और बलभद्र की सहायता से और प्राप्ति नाम की दो कन्याओं से विवाह किया था। कंस और मुनामा,दोनों को मारकर जानि का उपकार इस प्रकार जरासन्ध से सम्बन्ध जोड़ करके मूद किया ॥३०॥३४॥ दुष्ट कंस का साहस और भी बढ़ गया । वह अपने यह सुनकर जरासन्ध बड़ा भारी मेना लेकर 'जातिवालों और कुटुम्बियों को बड़ा दुःख देने लगा। हमारे ऊपर चढ़ आया। उसकी सना को देखकर BACCHILLITERAIIMARITRATIMATERTAITHILCITATIOLETERane . . भारMATIL ७६ म हा भारत मभापर्व Aurnaronvurna RAIL TWITTE IROICE Mummy Jammummmmmmm तस्य ह्यमरसंकाशौ बलेन बलिनां वरौ नामभ्यां हंसडिम्भकावशस्त्रनिधनावुभौ ॥ ३७॥ तावुभौ सहितौ वीरौ जरासन्धश्च वीर्यवान् त्रयस्त्रयाणां लोकानां पर्याप्ता इति मे मतिः ॥ ३८॥ न हि केवलमस्माकं यावन्तोऽन्ये च पार्थिवाः । तथैव तेपामासीच्च बुद्धिर्बुद्धिमतां वर ! अथ हंस इति ख्यातः कश्चिदासीन्महान्नृपः । रामेण स हतस्तत्र संग्रामेऽष्टादशावरे ॥ ४० ॥ हतो हंस इति प्रोक्तमथ केनापि भारत ! तच्छ्रुत्वा डिम्भको राजन्! यमुनाम्भस्यमज्जत ॥ ११ ॥ विना हंसेन लोकेऽस्मिन्नाऽहं जीवितुमुत्सहे । इत्येतां मतिमास्थाय डिम्भको निधनं गतः ॥ ४२ ॥ तथा तु डिम्भकं श्रुत्वा हंसः परपुरंजयः प्रपेदे यमुनामेव सोऽपि तस्यां न्यमजत ॥४३॥ तो स राजा जरासन्धः श्रुत्वा च निधनं गतौ । पुरं शून्येन मनसा प्रययौ भरतर्षभ ! ॥४४॥ मैने अपने से छोटे अठारह यादव-कुलों से मिलकर | जब जरासन्ध चढ़कर आया तब हमको हस और सलाह की कि यदि हम, शत्रुओं को नष्ट करनेवाले, | डिम्भक के नाश का एक उपाय सूझ गया। युद्ध में तीक्ष्ण अस्त्रों से लगातार तीन सौ वर्ष तक युद्ध | वलभद्र ने हंस नाम के किसी और राजा को मारा करते रहें ता भी जरासन्ध की सेना का बिलकुल नाश उसको देखकर किसी ने डिम्भक से जाकर कह दिया नहीं कर सकते; क्योंकि देवताओं के समान तेजस्वी | कि हस मारा गया । वह यह सुनकर हंस के बिना महाबली हस और डिम्भक दोनों राजा जरासन्ध के अपना जीना व्यर्थ जान कर यमुना में डूबकर मर पार्श्वरक्षक है । वे अम्र के द्वारा मारे नहीं जा सकते । गया । डिम्भक की मृत्यु जब हस ने सुनी तब वह उन्हें ऐसा ही वरदान है । वेदोनों वीर और तीसरा भी भाई क शोक से विकल हो उठा। उसने भी जरासन्ध मिलकर तीनों लोकों को जीत सकते है। यमुना में कूदकर जान दे दी । हंस और डिम्भक हे राजन् ! यह केवल मेरा ही मत न था, किन्तु की मृत्यु हुई सुनकर जरासन्ध की हिम्मत टूट गई। सब राजाओं का ऐसा ही विश्वास था ॥३५॥३९॥ वह उदास होकर अपने नगर को लौट गया । हम हम लोगों से युद्ध करने के लिये सत्रहवीं वार | लोग भी आनन्द के साथ अपनी मथुरा पुरी में रहने PROTEmmmmmmPIPATITIEWATISHTIMATERIAL - अध्याय १४ ] महा भारत thori Stammu TUNT SOUTUrry । - MALAINTAatmanasaMauryamans TECTEIIIIIMNEIயாடாITIAR ततो वयममित्रन्न ! तस्मिन्प्रीतगते नृपे पुनरानन्दिनः सर्वे मथुरायां वसामहे ॥४५॥ यदा त्वभ्येत्य पितरं सा वे राजीवलोचना कसभार्या जरासन्ध-दुहिता मागधं नृपम् ॥ ४६॥ चोदयत्येव राजेन्द्र पतिव्यसनदुःखिता पतिनं मे जहीत्येवं पुनः पुनररिन्दम ! ॥४७॥ ततो वयं महाराज ! तं मन्त्रं पूर्वमन्त्रितम् संस्मरन्तो विमनसो व्यपयाता नराधिप! ॥४८॥ पृथक्त्वेन महाराज! संक्षिप्य महतीं श्रियम् । पलायामो भयात्तस्य ससुतज्ञातिवान्धवाः ॥४९॥ इति संचिन्त्य सर्वे स्म प्रतीची दिशमाश्रिताः । कुशस्थली पुरी रम्यां रैवतेनोपशोभिताम् ॥ ५० ॥ ततो निवेशं तस्यां च कृतवन्तो वयं नृप ! तथैव दुर्गसंस्कारं देवैरपि दुरासदम् ॥ ५१ ॥ स्त्रियोऽपि यस्यां युध्येयुः किमु वृष्णिमहारथाः । तस्यां वयममित्रन ! निवसामोऽकुतोभयाः ॥ ५२ ॥ आलोच्य गिरिमुख्यं तं मागधं तीर्णमेव च भागकर रैवतक पर्वत से गोभित कुशम्थली नाम की उधर कमल-नयनी कम की स्त्री पति के शोक । रमणीय नगरी में जाकर बसे हैं। वहाँ जाकर और से विह्वल होकर अपने पिता जरासन्ध को बार-बार । किले आदि की मुरम्मत कराकर हमने उसपर अपना यह कहकर युद्ध के लिये उत्साहित करने लगी कि , अधिकार जमा लिया है ॥४६॥५१॥ मेरे पति को जिसने मारा है उससे बदला लो। हम अनेक दुर्गम दुर्गों से रक्षित यह नगरी इस लोगों ने भी जरासन्ध के बल वीर्य को स्मरण कर । समय ऐसी है कि देवता भी महज में उसके भीतर और उसकी चढ़ाई देखकर, पहले की सम्मति के नहीं प्रवेश कर सकते । वीर वृष्णिवश के पुरुषों की अनुसार मधुरापुरी से भाग जाना उचित समझा। शत्रु तो बात ही नहीं, दुर्ग के अन्दर से स्त्रियाँ भी अच्छी- के भय से हम रोग बहुत सी सम्पत्ति वहीं छोड़कर तरह युद्ध करके आत्मरक्षा कर सकती हैं। सब थोड़ी सी आपस में बाँटकर ओर वही लेकर-सजा यादव रोग उस गढ़ की दुर्गमता और उस स्थान तीय, पुत्र, बन्धु-बान्धव आदि के साथ वहाँ से । का सुरक्षित होना देखकर, अपने को जरासन्ध के लगे ॥४०॥४५॥ מוניות מונטיפיורנטועים עממממממממונה ७८ म हा भारत [ मभाप ग TOTrum म । - माधवाः कुरुशार्दूल ! परां मुदमवाप्नुवन् ॥ ५३॥ एवं वयं जरासन्धादाभितः कृतकिल्विषाः सामर्थ्यवन्तः संवन्धागोमन्तं समुपाश्रिताः ॥ ५४॥ त्रियोजनायतं सद्म त्रिस्कन्धं योजनावधि । योजनान्ते शतद्वारं वीरविक्रमतोरणम् अष्टादशावरैर्नद्धं क्षत्रियैर्युद्धदुर्मदैः अष्टादशसहस्राणि भ्रातॄणां सन्ति नःकुले ॥ ५६ ॥ आहुकस्य शतं पुत्रा एकैकस्त्रिदशावरः चारुदेष्णः सह भ्रात्रा चक्रदेवोऽथ सात्यकिः ॥ ५७ ॥ अहं च रोहिणेयश्च साम्बः प्रद्युम्न एव च एवमेते रथाः सप्त राजन्नन्यान्निवोध मे ॥ ५८ ॥ कृतवर्मा ह्यनाधृष्टिः समीकः समितिंजयः कङ्कः शङ्कश्च कुन्तिश्च सप्तैते वै महारथाः पुत्रौ चाऽन्धकभोजस्य वृद्धो राजा च ते दश । वजसंहनना धीरा वीर्यवन्तो महारथाः ॥६०॥ स्मरन्तो मध्यमं देशं वृष्णिमध्ये व्यवस्थिताः । स वं सम्राड्गुणेर्युक्तः सदा भरतसत्तम ! ॥६१ ॥ हाथ से उबरा हुआ समझ कर, बड़े आनन्द से उस । भाई पैदा हुए हैं और आहुक के सौ देवताओं गढ़ में रहते हैं । इस प्रकार प्रबल प्रतापी जरासन्ध के समान बलवान् हैं । यादवों में चारुदेप्ण, के अत्याचार से हैरान होकर हम बलवान् होने पर छोटा भाई चक्रदेव, सात्यकि, मैं, बलभद्र, माम्ब, भी निरे अममर्थ की तरह भागार रैवतक पर्वत के और प्रद्युम्न, ये सात अतिरथी है । इनके सिवाय आश्रय में जाकर टहरे । वह पर्वत इवीस योजन' कनवर्मा, अनाधृष्टि, समीक, समितिझय, कड्न लम्या और एक योजन ऊंचा है और उसमें तीन शकु और कुन्नि,ये सात महारथी हैं;अन्धकमीज के शिम्बर हैं । योजन योजन मर पर सौ-सा सैन्यज्यूह दो पुत्र और वृद्ध राजा उग्रसेन आदि दस महार और मामी द्वार बने हुए हैं। वीर पुरुषों का पराक्रम जिनके गरीर वन के तुल्य है बड़े पराममी है। ही उग गद का प्रधान फाटक है । अठारहों यादव जरासन्ध के विरोधी और हमारे साथी । हे पाण्डव: रगे के योद्धा अप्रिय उस गढ़ के रक्षक हैं ॥५२॥५६॥ आपमें सम्राट के सब गुण विद्यमान है । आप बिना है युधिष्ठिर ! हमार कुल में अठारह महस शिरोध के विशाल साम्राज्य भोग सरेंगे। क्षत्रियों radiamamta : उसका । OrgrorOTECTIMITRAM MAHIMALAYA अध्याय १४] म हा भारत TITUTIOHITTER promoto runruruvartantm 1 । LummIITTER क्षत्रे सम्राजमात्मानं कर्तुमर्हसि भारत! 'न तु शक्यं जरासन्धे जीवमाने महाबले ॥ ६२ ॥ राजसूयस्त्वयाऽवाप्तुमेपा राजन् ! मतिर्मम तेन रुद्धा हि राजानः सर्वे जित्वा गिरिबजे ॥६३ ॥ कन्दरे पर्वतेन्द्रस्य सिंहेनेव महाद्विपाः स हि राजा जरासन्धो यियक्षुर्वसुधाधिपः महादेवं महात्मानमुमापतिमरिन्दम ! आराध्य तपसोग्रेण निर्जितास्तन पार्थिवाः, ॥ ६५ ॥ प्रतिज्ञायाश्च पारं स गतः पार्थिवसत्तम ! स हि निर्जित्य निर्जित्य पार्थिवान्पृतनागतान् ॥ ६६ ।। पुरमानीय वध्वा च चकार पुरुषव्रजम् वयं चैव महाराज ! जरासन्धभयात्तदा ॥ ६७॥ मथुरां संपरित्यज्य गता द्वारवतीं पुरीम् यदि त्वेनं महाराज! यज्ञं प्राप्तुमभीप्ससि ॥ ६८ ॥ यतख तेषां मोक्षाय जरासन्धवधाय च समारम्भो न शक्योऽयमन्यथा कुरुनन्दन ! ॥ ६९ ॥ राजसूयस्य कात्स्न्येन कर्तु मतिमतां वर ! के मध्य आपका सम्राट् होना अत्यन्त आवश्यक है। प्रतिज्ञा पूरी कर चुका है,क्योंकि उसने अनेक राजा- ओं को जीतकर बलिदान के लिये कैट कर रक्सा किन्तु मेरी मति से जब तक राजा जरासन्ध है । दिमिजय के लिये निकलकर वह जीते हुए जीता है नबतक आप राजसूय यज्ञ नहीं कर सकते राजाओं को पकड़ लाकर कैद करने लगा था हैं। सिंह जैसे महज ही हाथियों पर हमला करके ॥६३।६७॥ उन्हें पर्वत की खोह में वन्दकर रक्ख, वैसे ही यह देखकर हम भय के मारे मथुरा पुरी छोड़ जरासन्ध ने बहुत से राजाओं को युद्ध में हराकर । कर द्वारका नगरी को भाग गये । इसलिये हे कुरु- अपने गढ़ के भीतर कैद कर रक्खा है । पूर्व समय नन्दन ! जो आपको राजसूय यज्ञ करने की बड़ी में जरासन्ध ने, राजाओं की बलि देकर यज्ञ करने ही अभिलाषा हो तो पहले दुष्ट दुर्जय जरासन्ध को की इच्छा से, भगवान् शङ्कर की आराधना की थी। मारकर कंद किये गये राजाओं को छुड़ाइए । यह फिर आशुतोष भोलानाथ की कृपा पाकर वह अपनी । किये बिना आपकी राजसूय यज्ञ करने की इच्छा १॥५७/६२॥ । PIMIMITIMIMTMAIYA ८० nirunanumaranTITUTI .. म हा भारत समान TUnrTNILUITML इत्येषा मे मती राजन् ! यथा वा मन्यसेऽनघ!। एवं गते ममाऽऽचक्ष्च स्वयं निश्चित्य हेतुभिः ॥ ७० ॥ इनि श्रीमन्महाभारते मभापर्वणि राजसूयारम्भपर्वणि श्रीकृष्णवाक्य चतुर्दशोऽध्याय ॥ १ ॥ किसी तरह पूरी नहीं हो सकती। यदि रानसूय यज्ञ कारण का विचार तथा निश्चय करक आपकी जो करना आपको बहुत पसन्द है तो पहले मेरी विचार उचित जान पड वह कीजिए ॥६८१७०।। में यही करना चाहिए । अब देश, काल, कार्य और सभापर्व का चौदहवा अध्याय समाप्त हुआ ।।१।। अथ पञ्चदशोऽध्याय ॥ १५ ॥ युधिष्ठिर उवाच-उक्तं त्वया बुद्धिमता यन्नान्यो वक्तुमर्हति संशयानां हि निर्मोक्ता त्वन्नाऽन्यो विद्यते भुवि ॥ १ ॥ गृहे गृहे हि राजानः स्वस्य खस्य प्रियंकराः न च साम्राज्यमाप्तास्ते सम्राटशब्दोहि कृच्छ्रभाक्॥ २ ॥ कथं परानुभावज्ञः खं प्रशंसितुमर्हति परेण समवेतस्तु यः प्रशस्यः स पूज्यते विशाला बहुला भूमिबहुरत्नसमाचिता दूरं गत्वा विजानाति श्रेयो वृष्णिकुलोद्वह ! शममेव परं मन्ये शमात्क्षेमं भवेन्मम आरम्भे पारमेष्ट्यं तु न प्राप्यमिति मे मातः ॥ ५ ॥ पन्द्रहवा अध्याय ॥१५॥ श्रीष्ण वे ये यनन सुनकर युधिष्ठिर ने कहा- क्योंफर कर सकता है । जो रणभूमि में पहुंचकर हे महाराज ! आपकी बुद्धि बहुत ही उज्यर और शत्रु की सेना पर बेधड़क आक्रमण करके उसे हरा तीक्ष्ण है, आपकी वियेस्बुद्धि अगक्कि है। आपके सस्ता है वही प्रशसा का पात्र है। हे वृष्णियगावतम उपदेश का बण्डन नहीं हा मक्ता । आप ही नाना प्रकार के रनी से पूर्ण इस विशाल यमुन्धरा एकमात्र इस जगत् भर के समय को दूर करनेवाले में कोई अमिनता के बिना श्रेय को नहीं प्राप्त कर योगीधर हो। इ7 पृथ्वीमण्डर पर अपने अपने कार्य समता । मेरी ममझ म माग्नि में ही मन भाइयाँ में रंगे हुए अनेकों राना महाराना है, कि तु कोई मिरती है । इमरिय गान्ति की सेवा ही मेरे लिये भी मपाद के पद को नहीं पा मरना । ममा का विधि और मेरा कत्र्य कर्म है । राजमय माया पद मिन्ना अत्यन्त ही दुभ है । जो मनुष्य मरे आरम्भ करके अन्त को परम मुम्पदायक फन पाने के प्रभार को नहीं जानता र यह अपनी यहाई की आगा कसा दुगगामात्र । हमारे या के सर Tirtamachartarr +rainamaidaar maraaaaa HTTurarATIrrit मेंजरासन्धको परास्त कर सकता आर मार सकता ८१ अध्याय १५ ] म हा भारत ImrunMunimmunrmmirmirrrrruary MruITUTE TUM TUTIOurunmins । एवमेते हि जानन्ति कुले जाता मनस्विनः कश्चित्कदाचिदेतेषां भवेच्छ्रेष्ठो जनार्दन ! वयं चैव महाभाग ! जरासन्धभयात्तदा शङ्किताःस्ममहाभाग!दौरात्म्यात्तस्य चाऽनघ!॥ ७ ॥ अहं हि तव दुर्धर्षभुजवीर्याश्रयः प्रभो नाऽऽत्मानं बलिनं मन्ये त्वयि तस्माद्विशङ्किते॥ ८ ॥ त्वत्सकाशाच्च रामाच्च भीमसेनाच्च माधव ! अर्जुनाद्वा महाबाहो हन्तुं शक्यो न वेति वै । ॥ ९ ॥ एवं जानन्हि वार्णेय ! विमृशामि पुनः पुनः । त्वं मे प्रमाणभूतोऽसि सर्वकार्येषु केशव ! तच्छ्त्वा चाऽब्रवीद्भीमो वाक्यं वाक्यविशारदः॥ १० ॥ भीम उवाच-अनारम्भपरो राजा वल्मीक इव सीदति दुर्वलश्चाऽनुपायेन वलिनं योऽधितिष्ठति ॥ ११ ॥ अतन्द्रितस्तु प्रायेण दुर्वलो वलिनं रिपुम् जयेत्सम्यक्प्रयोगेण नित्यार्थानात्मनो हितान् ॥ १२ ॥ कृष्णे नयो मयि वलं जयः पार्थे धनञ्जये राजाओं का भी यही सिद्धान्त रहा है । प्रतीत होता । जो उपदेश करोगे उसके विरुद्ध मै कभी कुछ न है, वे कभी सारी पृथ्वी को जीतकर वश में नहीं करूँगा । आप जिस राह पर चलाओगे उसी पर कर सेक । दूसरे, दुष्ट जरासन्ध के उपद्रव को । चलूँगा ॥१॥१०॥ देखकर मुझे बड़ी शङ्का हो गई है। मुझे सदा आपके यह सुनकर भीमसन ने कहा-हे महाराज ! ही बाहु-बल की आशा और आपका ही भरोसा रहता जो राजा उद्योग को छोड़ बैठता है, अथवा दुर्बल है । फिर जब आपको जरासन्ध के भय से भागना और निरुपाय होकर प्रबल शत्रु से युद्ध करने लगता पहा तब मेरा उसे मारकर राजसूय यज्ञ की आशा है, वह अवश्य ही मर मिटता है। इसके विपरीत जो करना दुराशामात्र है। हे महाबाहो ! आप,बलदेव, बल में हीन राजा मी आलम्य और उपेक्षा के भाव भीमसेन और अर्जुन, इन गरों में से कोई क्या युद्ध को छोड़कर अच्छी नीति के द्वारा प्रबल शत्रु पर आक्रमण करता है, तो यह युद्ध में जय पाता है। है । इस दुष्ट को मारने की मुझे सदा बड़ी चिन्ता हे राजन् ! हमारी मण्डली भर में श्रीकृष्ण से बढ़कर रहती है । आपसे अधिक और मैं क्या कहूँ ! आप ! नीति को कोई नहीं जानता । मैं भी बलवान् हूं, । । । RAVIMMMMMMM RELATEDMITM HOMETRIOSIATIMILIAT ८२ म हा भा र त मभापर्व TuuuuNTrouTuunt TITITIATIC । मागधं साधयिष्याम इष्टिं त्रय इवाऽग्नयः ॥ १३ ॥ कृष्ण उवाच- अर्थानारभते वालो नाऽनुवन्धमवेक्षते तस्मादरिं न मृष्यन्ति बालमर्थपरायणम् जित्वा जय्यान्यौवनाश्विः पालनाच भगीरथः । कार्तवीर्यस्तपोवीर्याद्वलात्तु भरतो विभुः ऋद्धया मरुत्तस्तान्पश्च सम्राजस्त्वनुशुश्रुम साम्राज्यमिच्छतस्ते तु सर्वाकारं युधिष्ठिर ! मन्त्रान्वश्याननुमृशन्नेवमेव सतां युगे निग्राह्यलक्षणं प्राप्तो धर्माप्तिनयलक्षणैः वार्हद्रथो जरासन्धस्तद्विद्धि भरतर्षभ ! न चेनमनुरुध्यन्ते कुलान्येकशतं नृपाः । तस्मादिह वलादेव साम्राज्यं कुरुते हि सः ॥ १८ ॥ रत्नभाजो हि राजानो जरासन्धमुपासते न च तुष्यति तेनाऽपि वाल्यादनयमास्थितः ॥ १९ ॥ मूर्धाभिषिक्तं नृपति प्रधानपुरुषो वलात् और अर्जुन सर्वत्र विजय ही पाते है । इस कारण गुण के अधिकारी होकर सम्राट् हो गये; किन्तु आप तीन अमि जैसे या कार्य को पूरा करते है वैसे ही में तो सभी गुण हैं । आप अपने सम्राट् हो सकने हम तीनों मिलकर अवश्य ही जरासन्ध का काम में क्यों सन्देह करते है ! धर्म-अर्थ और नीति के तमाम कर सकेंगे ॥११॥१३॥ द्वारा प्रतापी जरासन्ध को मारने का उद्योग करना यह सुनकर श्रीकृष्ण ने कहा-हे महाराज ! इम ममय आपका मबसे पहला और मवमे बदकर मूर्म नादान लोग परिणाम का विचार किये बिना कव्य है । विचार कर देगिए, एक मी यंगों के ही फाम में हाथ लगा देते हैं। उसमे शत्रु-जय आदि इतने क्षत्रिय है; उनमें में एक भी जगमन्ध को कोई चाहा हुआ काम पूरा नहीं होता । मैने मुना पराम्न नहीं कर सका; बल्कि यह दुष्ट उन में में ६ पहले युग्नाध के पुत्र (मान्धाना) ने फर लेगा प्रायः सबोहरापर मुमपूर्वक अमण्ड मामाश्य पर पोहकर, भगीय ने प्रजापान करके, पापीर्य रहा है। पश्चर्यशाली राजाओं ने अगर धन-रस देश (महसपा) ने फटोर नर के प्रभाव मे, भग्त ने उसी अधीननाम्बीका की, पर या दुष्ट हयात्री पापन में और मरत ने धन के यन में मान्य बड़ी परनाकर उन्हें आने या कद में दाने है । पापा था। पिगार पर देखिए, ये मर एफ. ही एक ऐमा कोई राजा ही नहीं देख पड़ा, निमंग या tra, Mirr.kr AER:शीन भREnा में है। ramremimaratimemunerrernment - अध्याय १६] म हा भारत raula TERTAITION TITUTTO । । आदत्ते न च नो दृष्टो भागः पुरुपतः क्वचित् ॥ २० ॥ एवं सर्वान्वशे चक्रे जरासन्धः शतावरान् तं दुर्वलतरो राजा कथं पार्थ उपेप्यति ॥ २१ ॥ प्रोक्षितानां प्रमृष्टानां राज्ञां पशुपतेहे पशूनामिव का प्रीति विते भरतर्पभ! ॥ २२ ॥ क्षत्रियः शस्त्रमरणो यदा भवति सत्कृतः ततः स्म मागधं सङ्घये प्रतिबाधेम यद्वयम ॥ २३ ॥ पडशीतिः समानीताः शेषा राजश्चतुर्दश जरासन्धेन राजानस्ततः क्रूरं प्रवय॑ते॥ ॥ २४ ॥ प्राप्नुयात्स यशो दीप्तं तत्र यो विघ्नमाचरेत् जयेद्यश्च जरासन्धं स सम्रापिनयतं भवेत् ॥ २५ ॥ इति श्रीमन्महाभारते सभापर्वणि राजसूयारम्भपर्वणि कृष्णवाक्ये पञ्चदशोऽध्यायः ॥१५॥ जबरदस्ती 'कर' न लेता हो। नीच-जरासन्ध ने उस दुष्ट ने ८६ (छियासी ) राजाओं को पकड़कर अनेक महाराजाओं की दुर्दशा कर रखी है । सब कैद कर रक्खा है । और जो चौदह और राजा रह उससे भय खाते है । धर्मराज, जो आपसे भी बढ़कर गये हैं उनको भी अपने वश में करना चाहता है। निर्बल हैं वे उस नराधम का क्या बिगाड़ सकेंगे ! एक सौ पूरे होने पर वह एक साथ उन सबकी हत्या हे भरतकुल तिलक ! बलिदान के लिये लाये गये करके अपना मनोरथ सिद्ध करना चाहता है। हे राजा लोग पशुओं की तरह बड़े कष्ट से पशुपति के राजा युधिष्ठिर | इस समय जो कोई उस पापी के मन्दिर में कैद हैं। वह दुरात्मा जरासन्ध शीघ्र ही इस निष्ठुर हत्याकाण्ड में विघ्न डालकर राजाओं को उनका बलिदान करदेगा । इसी कारण मैं युद्ध कैद से छुड़ावेगा उसे अवश्य चिरस्मरणीय कीर्ति करने की सम्मति देता हूं। इसके अतिरिक्त इस घोर प्राप्त होगी। जो मनुष्य उसको जीत लेगा वह सम्राट निन्दित कर्म को रोकने का दूसरा उपाय ही नहीं। हो जायगा ॥१४॥२५॥ सभापर्व का पन्द्रहवां अध्याय ममाप्त हुआ ॥१५।। । , अथ पोडशोऽध्यायः ॥१६॥ युधिष्ठिर उवाच-सम्राड्गुणमभीप्सन्वै युष्मान् स्वार्थपरायणः । कथं प्रहिणुयां कृष्ण ! सोऽहं केवलसाहसात् ॥ १ ॥ भीमार्जुनावुभौ नेत्रे मनो मन्ये जनार्दनम् मनश्चक्षुर्विहीनस्य कीदृशं जीवितं भवेत् WWMTUITRADIOINTAINTAIMILAMINATTITIATRAITHILLAIREONLINEERALARATHI सभापर्व म हा भारत anmarrrrryururunruurerm TOUTUUU FouTITUTTINUOUTUrOPTITION । । जरासन्धवलं प्राप्य दुष्पारं भीमविक्रमम् यमोऽपिन विजेताऽऽजो तत्र वः किं विचेष्टितम् ॥ ३ ॥ अस्मिंस्त्वर्थान्तरे युक्तमनर्थः प्रतिपद्यते तस्मान्न प्रतिपत्तिस्तु कार्या युक्ता मता मम ॥ यथाऽहं विमृशाम्येकस्तत्तावच्छ्यतां मम संन्यासं रोचये साधु कार्यस्याऽस्य जनार्दन! । प्रतिहन्ति मनो मेऽद्य राजसूयो दुराहरः वैशम्पायन उवाच-पार्थः प्राप्य धनुः श्रेष्ठमक्षय्यौ च महेपुधी रथं ध्वज सभां चैव युधिष्ठिरमभाषत अर्जुन उवाच-धनुः शस्त्रं शरा वीर्यं पक्षो भूमिर्यशो बलम् । प्राप्तमेतन्मया राजन् ! दुष्प्रापं यदभीप्सितम् ॥ ७ ॥ कुले जन्म प्रशंसन्ति वैद्याः साधु सुनिष्ठिताः । वलेन सदृशं नास्ति वीर्य तु मम रोचते ॥ ८ ॥ कृतवीर्यकुले जातो निर्वीर्यः किं करिष्यति निर्वीर्ये तु कुले जातो वीर्यवांस्तु विशिष्यते ॥ ९ ॥ सोलहवां अध्याय ॥१॥ यह सुनकर युधिष्ठिर ने कहा-हे श्रीकृष्ण ! | यही मम्मति है कि यन करके सम्राट होने का विचार साम्राज्य की इच्छा मुझे इतनी प्रबल नहीं कि मै ) ही छोड़ देना ठीक होगा । मैं आपसे सत्य कहता केवल साहस पर भरोसा करके, अत्यन्त म्वार्थपरता । हूँ, इस विषय का आन्दोलन करने से मै अत्यन्त में मूढ़ होकर, आपको उस प्रबल पराक्रमी दम्यु के | आकुल हो रहा हूँ। प्रतीत होता है कि राजसूय पास भेज दूं। भीमसेन और अर्जुन दोनों मेरे नेत्र यज्ञ करना मेरे भाग्य में लिखा ही नहीं ॥१५॥ हैं; आपको में अपना मन समझता हूँ। मन और वैशम्पायन ने कहा--हे राजा जनमेजय ! नेत्रों से हीन पुरुष का जीवन कमे हो सकता है । खाण्डव वन जाने समय अर्जुन ने अग्नि से राजा जरामन्ध बड़ा बलवान् है, उमको यमराज भी गाण्डीव धनुष, अक्षय तर्फम, दिव्य रथ और ध्वना नहीं जीत सकता है। आप लोग जाकर उसका क्या आदि युद्ध की मामग्री प्राप्त की थी। उन्होंने युधि- कर लोगे। मैं ममझता हूँ कि इस काम में हाथ ष्ठिर के ये वचन सुनकर कहा हे महाराज ! छ डालने से महा अनर्ध होगा। इसी कारण राजसूय धनुष, गस, वाण, पौरुष, म्यपक्ष, राज्य, यश और यज्ञ करना मुझे ठीक नहीं जान पड़ता। अब मेरी Επαναπατριστοτεληνη ταττττττττττττττττττττττττττττττττ चल ये वस्तुएँ अत्यन्त कठिनता में प्राप्त होता है। CersynTruary ।

- ARTUNITUTORoma अध्याय १६ ] म हा भारत EnimmmmmmmmmmmmmmmmmmmmRUIIIIIImmmmmawraneers क्षत्रियः सर्वशो राजन् ! यस्य वृत्तिषिजये सर्वगुणैर्विहीनोऽपि वीर्यवान्हि तरेद्रिपून् ॥ १०॥ सर्वैरपि गुणयुक्तो निर्वीर्यः किं करिष्यति गुणीभूता गुणाः सर्वे तिष्ठन्ति हि पराक्रमे जयस्य हेतुः सिद्धिर्हि कर्म दैवं च संश्रितम् । संयुक्तो हि वलैः कश्चित्प्रमादान्नोपयुज्यते तेन द्वारेण शत्रुभ्यः क्षीयते सवलो रिपुः ॥ १२ ॥ दैन्यं यथा वलवति तथा मोहो वलान्विते. तावुभौ नाशको हेतू राज्ञा त्याज्यौ जयार्थिना ॥ १३ ॥ जरासन्धविनाशं च राज्ञां च परिरक्षणम् यदि कुर्याम यज्ञार्थ किं ततः परमं भवेत् ॥ १४ ॥ अनारम्भे हि नियतो भवेदगुणनिश्चयः गुणान्निः संशयाद्राजन्नर्गुण्यं मन्यसे कथम् ॥ १५ ॥ कापायं सुलभं पश्चान्मुनीनां शममिच्छताम् साम्राज्यं तु भवेच्छक्यं वयं योत्स्यामहे परान् ॥ १६ ॥ इति श्रीमन्महाभारते मभापर्वणि राजसूयारम्भपर्वणि जरामन्धवधमन्त्रणे पोडशोऽध्यायः ।।१६।। किन्तु सौभाग्यवश मुझे ये सब अपनी इच्छा के काम नहीं होता। जहाँ पराक्रम है, वहाँ सब गुण अनुसार प्राप्त हो गई है । विद्वान् लोग अच्छे श्रेष्ठ | आपही आ जाते है । अत्यन्त जी लगाना (उत्साह) वंश में जन्म की प्रशसा करते है, परन्तु मेरी समझ पौरुप और दैव, यही तीन जय-प्राप्ति के कारण है। में बल-वीर्य और साहस की ही प्रशसा होनी चाहिये । अत्यन्त बहादुरी होने पर भी जिसमें एकाग्रता या पराक्रमी कुल में उत्पन्न होकर पराक्रम हीन पुरुप तत्परता नहीं है, वह विजयी तो होता नहीं, उलटा क्या कर सकता है ? इसके विपरीत कमजोर वंश में शत्रुओं से हारकर नीचा देखता है । निर्वल मनुष्य स्त्पन्न पुरुष यदि पराक्रमी और बली है, तो वह में दीनता होना और बलवान् में मोह होना दोनों अवश्य अपने को माननीय बना लेगा ।जो शत्रु को नाशकारक है। इसलिये विजय को इच्छा रखने- जीत सके वही सचमुच क्षत्रिय है । बलवान् पुरुष वाले को इनमे सब तरह बचना चाहिये । राजसूय में यदि अन्य अनेक सद्गुण न हो तो भी वह शत्रुओं महायज्ञ करने के लिये दुरात्मा जरासन्ध को मारकर, को जीत सकता है, किन्तु दुर्बल पुरुष चाहे सब कैद में पड़े हुए राजाओं को छुड़ाकर, कीर्ति प्राप्त अच्छे गुणों की खान हो, तो भी उसके द्वारा कोई करने से बढ़कर हमारा कर्तव्य और क्या हो मकता है? । - । VITLARIMIDWMWMMILLAUMU MWIMWAOTICE MUUTUNAVVY MIVVVVVILLIM सभापर्व म हा भारत RyuTIUITU nuTUTAM UTTITUTITTWITUATREGISTRATOR इस विषय में शांत रहकर युद्ध न करने से लोग हमें समझते है ? शान्ति की इच्छा रखनेवाले साधुओं बल-वीर्य-हीन समझेंगे। हे महाराज ! युद्धचेष्टा से | को गेरु रङ्ग का वस्त्र पहन कर वन में रहना उचित रहित क्षत्रिय को लोग गुण-हीन समझते हैं। फिर । है । हम लोग साम्राज्य की इच्छा से शत्रुओं के साथ आप निःसंशय गुण से निर्गुण होना क्यों अच्छा अवश्य युद्ध करेंगे ॥६॥१६॥ सभापर्व का सोलहवां अध्याय ममाप्त हुआ ॥१६॥ - MINULMIDIUMIUMUDITUTU. अथ सप्तदशोऽध्यायः ॥१७॥ वासुदेव उवाच-जातस्य भारते वंशे तथा कुन्त्याः सुतस्य च । या वै युक्ता मतिः सेयमर्जुनेन प्रदर्शिता न स्म मृत्युं वयं विद्म रात्री वा यदि वा दिवा । न चापि कंचिदमरमयुद्धेनाऽनुशुश्रुम एतावदेव पुरुषैःकार्य हृदयतोषणम् नयेन विधिदृष्टेन यदुपक्रमते परान् सुनयस्याऽनपायस्य संयोगे.परमः क्रमः संगत्या जायतेऽसाम्यं साम्यं च न भवेद द्वयोः॥ ४ ॥ अनयस्याऽपायस्य संयुगे परमः क्षयः संशयो जायते साम्याज्जयश्च न भवेद् द्वयोः ॥ ५ ॥ सत्रां अध्याय ॥१७॥ श्रीकृष्ण ने कहा-हे गजा युधिष्ठिर! अर्जुन | उससे अपने चित्त को संतुष्ट बनाना ही वीर पुरुषों के वचन भरतवंश में उत्पन्न वीर पुरुष के योग्य हो। का काम है । साम-दान आदि के अनुगामी और हैं । कुन्ती ऐसी माता के पुत्र को जैसा साहस, धैर्य क्षय-रहित पुरुप का कार्यारम्भ कभी निष्फल नहीं और विचार करना चाहिए, उसमें अर्जुन ने कुछ हो सकता। ऐसा पुरुष शत्रु पर हमला करने से कसर नहीं की। हम लोग निश्चित रूप से नहीं अवश्य युद्ध में विजयी होता है। किन्तु जो नीति जानते कि कब, दिन को या रात को, मृत्यु आकर और उपाय से रहित है, वह अवश्य युद्ध में नष्ट हम पर हमला करेगी; अर्थात् मौत के लिये कोई । हो जाता है; उसके सब प्रयत्न निष्फल होते हैं । यदि निश्चित समय नहीं है। हमने यह भी नहीं सुना दोनों पक्ष नीति के अनुसार चलते है, तथा दोनों का कि युद्ध न करनेवाला कोई मृत्यु को प्राप्त न हुआ पराक्रम भी एक जैसा होता है, तो भी एक पक्ष का हो । इसलिये क्षत्रिय के धर्म के अनुसार नीति के विजयी होना सर्वथा असम्भव नहीं; क्योंकि एक की अनुकूल कार्य करके शत्रुओं पर चढ़ाई करना और | कुछ श्रेष्ठता और दूसरे की कुछ निकृष्टता बनी ही रहती வாரா अwmarawazrayamani । - TAIMIMHLIMMIATUITINMOMYITIALLIANIMITax TRIANIMATALAYATIMIRATE अध्याय १७] म हा भारत TITI ruirurunrum Purn । MarwInHIRIDIIN । ते वयं नयमास्थाय शत्रुदेहसमीपगाः कथमन्तं न गच्छेम वृक्षस्येव नदीरयाः पररन्धे पराकान्ताः स्वरन्ध्रावरणे स्थिताः व्यूढानीकैरतिवलन युद्धयेदरिभिः सह इति बुद्धिमतां नीतिस्तन्ममाऽपीह रोचते अनवद्या ह्यसंयुद्धाः प्रविष्टाः शत्रुसद्म तत् शत्रुदेहमुपाक्रम्य तं कामं प्राप्नुयामहे एको ह्येव श्रियं नित्यं विभर्ति पुरुषर्षभ ! अन्तरात्मेव भूतानां तत्क्षयं नैव लक्षये अथ वैनं निहत्याऽऽजी शेषेणाऽपि समाहताः । प्राप्नुयाम ततः स्वर्ग ज्ञातित्राणपरायणाः ॥ १० ॥ युधिष्ठिर उवाच-कृष्ण ! कोऽयं जरासन्धः किंवीर्यः किंपराक्रमः । यस्त्वां स्पृष्ट्वाऽग्निसदृशं न दग्धः शलभो यथा ॥ ११ ॥ कृष्ण उवाच-शृणु राजन् ! जराप्तन्धो यद्वीर्यो यत्पराक्रमः यथा चोपेक्षितोऽस्माभिर्वहुशः कृतविप्रियः ॥ १२ ॥ अक्षोहिणीनां तिसृणां पतिः समरदर्पितः है; दोनों की सम्पूर्ण समता हो नहीं सकती ॥११५॥ | क्रमी जरासन्ध, सब प्राणियों के अन्तरात्मा के समान, हम लोग भी नीति का आश्रय लेकर शत्रु के सब राजाओं को जीत कर प्रधानता प्राप्त करके अकेला देश में जायेंगे और उसपर आक्रमण करके उसी ही राजलक्ष्मी का भोग कर रहा है। वह स्वेच्छाचार तरह उसे नष्ट कर सकेंगे,जैसे नदी का प्रवाह किनारे करता हुआ एकाधिपत्य कर रहा है । अपनी जाति के वृक्षों को उखाड़ कर गिरा देता है। अपने दोपों को के राजाओं की रक्षा करने के लिये उसे मारकर पीछे छिपा कर शत्रु के दोषों को देखकर यथासमय आक्र- | उसकी सेना और सहायकों के द्वारा यदि हम लोग मण करने से अवश्य ही हमारा मनोरथ सिद्ध होगा। 1 मारे भी जायेंगे तो अवश्य स्वर्गलोक के भागी होंगे बहुत सी सेनावाले,अत्यन्त प्रबल शत्रु के साथ प्रकट ॥६॥१०॥ रूप से युद्ध करना उचित नहीं। यह पण्डितों की यह सुनकर युधिष्ठिर ने कहा-हे श्रीकृष्ण ! यह सम्मति मुझे भी मान्य है। इसलिये हम लोग गुप्त- जरासन्ध कौन है ! उसका बल और पराक्रम कितना रूप से शत्रु के पास जाकर द्वन्द्वयुद्ध करके उसे मार है ? मुझे बड़ा आश्चर्य हो रहा है कि अमि के समान सकेंगे। इस प्रकार हमारा कार्य पूरा हो जायगा । परा- तुमपर आक्रमण करके वह पतन के समान मस्म होने । - MAMALINMITUALLAVICTIMIMLAILE IMINAINITITUAL IMIMMITAMIJILADI KMAINITALMALAIMMI म हा भारत [ सभापर्व unrintinuourunrern NirouTuuurumuTWITTIMITamunmurary ॥ १३ ॥ - ADIMANYRIMLD TaaraamaanaamTITUATE राजा वृहद्रथो नाम मगधाधिपतिर्वली रूपवान्वीर्यसम्पन्नः श्रीमानतुलविक्रमः नित्यं दीक्षाङ्किततनुः शतक्रतुरिवाऽपरः तेजसा सूर्यसंकाशः क्षमया पृथिवीसमः यमान्तकसमः क्रोधे श्रिया वेश्रवणोपमः ॥ १५ ॥ तस्याऽभिजनसंयुक्तैर्गुणैर्भरतसत्तम ! व्याप्तेयं पृथिवी सर्वा सूर्यस्येव गभस्तिभिः ॥१६॥ स काशिराजस्य सुते यमजे भरतर्षभ ! उपयेमे महावीर्यो रूपद्रविणसंयुते तयोश्चकार समयं मिथः स पुरुपर्पभः नाऽतिवर्तिप्य इत्येवं पत्नीभ्यां संनिधौ तदा ॥ १८ ॥ स ताभ्यां शुशुभे राजा पत्नीभ्यां वसुधाधिपः । प्रियाभ्यामनुरूपाभ्यां करेणुभ्यामिव द्विपः ॥ १९ ॥ तयोर्मध्यगतश्चाऽपि रराज वसुधाधिपः गङ्गायमुनयोर्मध्ये मूर्तिमानिव सागरः ॥ २०॥ विपयेपु निमग्नस्य तस्य यौवनमभ्यगात् से कैसे बच गया? कृष्ण ने कहा-हे महाराज ! जरा वह ऐसा गुणवान् था कि उसके गुणों की प्रशंसा सन्ध के वीर्य, पराक्रम आदि का वृत्तान्त सुनिये। बार पृथ्वी पर इस प्रकार से फैल गई थी जैसे सूर्य की बार उसके अप्रिय और अनिष्ट करने पर भी क्यों हम । किरणें सब स्थानों में व्याप्त हो जाती है । काशिराज लोगों ने उसपर ध्यान नहीं दिया। इसकी भी कारण । की दो यमज (जोडिया) कन्याएँ राजा बृहद्रथ की कहता हू, सुनिए । मगध देश में एक बड़ा प्रतापी रानी थीं । राजा ने उन दोनों रानियों से यह प्रतिज्ञा बृहद्रथ नाम का राजा रहता था। उसके पास तीन | कर रक्खी थी कि मै तुम दोनों को बराबर दृष्टि से अक्षौहिणी सेना थी। वह स्वरूपवान् ,पराक्रमी,श्रीमान् , देलूँगा, दोनों को बराबर प्यार करूँगा। दो हथिनियों युद्ध में देवतुल्य अजेय और सदा यज्ञ की दीक्षा धारण के बीच जैसा हाथी, अथवा गंगा और यमुना के बीच करनेवाला राजा वृहद्रथ इन्द्र के समान प्रजा का पालन शरीरधारी समुद्र जैसे शोभित हो, वैसे ही दोनों स्त्रियों करता था। वह तेज में सूर्य के समान, क्षमा में पृथ्वी । के बीच राजा बृहद्रथ शोभायमान था ॥१६॥२०॥ के समान, ऐश्वर्य में कुबेर के समान और क्रोध में विषय भोग करते-करते राजा का यौवन व्यतीत हो काल-मृत्यु के समान था ॥११॥१५॥ | गया,परन्तु पुत्र की कामना से बहुत यज्ञ आदि करने पर EmmmmROTARAIIRAMANTRIMONITORICORIEDEO MIMMV

८९
अध्याय १७]
म हा भारत
PariwarmarUSIMMITUTITUTITUIII
FOLUTITIOUmuTITIER INTER
॥ २१ ॥
।
ranARADUATLAADuntukamvaawa.TAIATIL
-
।
न च वंशकरः पुत्रस्तस्याऽजायत कश्चन
मङ्गलेवहुभिहोंमेः पुत्रकामाभिरिष्टिभिः
नाऽऽससाद नृपश्रेष्ठःपुत्रं कुलविवर्धनम् ॥२२ ।।
अथ कक्षीवतः पुत्रं गौतमस्य महात्मनः
शुश्राव तपसि श्रान्तमुदारं चण्डकौशिकम्
यदृच्छयाऽऽगतं तं तु वृक्षमूलमुपाश्रितम्
पत्नीभ्यां सहितो राजा सर्वरत्नरतोषयत् ॥ २४ ॥
तमब्रवीत्सत्यधृतिः सत्यवापिसत्तमः
परितुष्टोऽस्मि राजेन्द्र ! वरं वरय सुव्रत ! ॥ २५ ॥
ततः सभार्यः प्रणतस्तमुवाच वृहद्रथः
पुत्रदर्शननैराश्याद्वाप्पसंदिग्धया गिरा
राजोवाच-भगवन् ! राज्यमुत्सृज्य प्रस्थितोऽहं तपोवनम् ।
किं वरेणाऽल्पभाग्यस्य किं राज्येनाऽप्रजस्य मे ॥ २७ ॥
श्रीकृष्ण उवाच-एतत्वा मुनिर्ध्यानमगमत्क्षुभितेन्द्रियः
तस्येव चाऽऽम्रवृक्षस्यच्छायायां समुपाविशत् ॥ २८ ॥
तस्योपविष्टस्य मुनेरुत्सङ्गे निपपात ह
भी उसके वश का चलानेवाला कोई पुत्र उत्पन्न नहीं के लिये कहा । दोनों स्त्रियों के साथ साष्टाङ्ग प्रणाम
हुआ। तब दोनों स्त्रियों सहित राजा बृहद्रथ बहुत करके आखों में आ भरे हुए राजा ने गद् गद् स्वर
ही उदास हो गया। इसके पीछे एक समय ऐसा से कहा-हे महाराज ! मैं बड़ा अभागा हूँ । अब
हुआ कि कशीवान् गौतम ऋषि का बड़ा तपम्ची तक पुत्र का मुख न देख पड़ने के कारण मुझे बड़ी
चण्डकौशिक नाम का पुत्र अपनी इच्छा से उस
चिन्ता और दुख सताये रहता है । निराश होकर
राजा के नगर में आया और एक वृक्ष के नीचे उसने । विषय-भोग को त्यागकर, मैं इस समय दोनों स्त्रियों
वास किया। उसके आने का वृत्तान्त सुनकर राजा
के साथ तप करने की इच्छा से वन को जा रहा हूँ।
अपनी दोनों स्त्रियों-सहित उसके पास गया । पाद्य
मुझे अब वरदान माँगकर क्या करना है ? राजा के
अर्घ्य आदि से सत्कार करके राजा ने उन्हें प्रसन्न दुख भरे दीन वचन सुनकर मुनि को दया आ गई।
ये उसी वृक्ष के नीचे आँखें बन्द करके ध्यान करने
राजा की भक्ति और सेवा से सतुष्ट होकर लगे । राजा के पुत्र न होने के कारण को जानने के
सत्यवादी जितेन्द्रिय ऋपिवर ने उनसे वरदान माँगने । लिये वे ध्यान कर रहे थे कि उस वृक्ष से एक पक्का
MUHUMION MINITIATISTICTIVITIENTIVITATIOman
..
।
।
किया ॥२१॥२५॥

सभापर्व म हा भा र त mumAUTYRIUTrimuTIMIUImuTuiunnJIUITrumuTUTITIOUTimirm ॥ २९ ॥ अवानमशुकादष्टमेकमाम्रफलं किल तत्प्रगृह्य मुनिश्रेष्ठो हृदयेनाऽभिमन्य च राज्ञे ददावप्रतिमं पुत्रसंप्राप्तिकारणम् उवाच च महाप्राज्ञस्तं राजानं महामुनिः गच्छ राजन्कृतार्थोऽसि निवर्तस्व नराधिप ! एतत्वा मुनेर्वाक्यं शिरसा प्रणिपत्य च मुनेः पादौ महाप्राज्ञः स नृपः स्वगृहं गतः ॥ ३२ ॥ यथासमयमाज्ञाय तदा स नृपसत्तमः द्वाभ्यामेकं फलं प्रादात्पत्नीभ्यां भरतर्षभ ! ॥ ३३ ॥ ते तदानं द्विधा कृत्वा भक्षयामासतुः शुभे भावित्वादपि चाऽर्थस्य सत्यवाक्यतया मुनेः ॥ ३४ ॥ तयोः समभवद्गर्भः फलप्राशनसंभवः ते च दृष्ट्वा स नृपतिः परां मुदमवाप ह ॥३५॥ अथ काले महाप्राज्ञ ! यथासमयमागते प्राजायेतां शुभे राजञ्च्छरीरशकले तदा ॥ ३६॥ एकाक्षिवाहुचरणे अर्धेदरमुखस्फिचे हुआ आम का फल उनकी गोद में आकर गिरा । सादर ग्रहण करके राजा वृहद्रथ अपने घर को लौट वह फल न तो सूखा हुआ था और न किसी तोते | आये ॥२६॥३२॥ आदि पक्षी ने उसे जूटा ही किया था। मुनिवर ने उस उन्होंने अपनी पहले की प्रतिज्ञा के अनुसार फल को हाथ में ले लिया। उन्हें जान पड़ा कि वह वह आम का फल दोनों स्त्रियों को दिया। उन फल राजा को पुत्र की प्राप्ति के लिये ईश्वर ने ही स्त्रियों ने भी उस फल को वरावर बाँटकर, खा लिया । दिया है। मुनिवर ने अपने तप के बल से अभिमन्त्रित कुछ समय के व्यतीत होने पर मुनि का कहना पूरा करके वह फल राजा के हाथ में दिया और कहा हो गया। दोनों म्रियों को गर्भ रह गया। स्त्रियों के हे राजन् ! तुम्हारा मनोरथ मफल हो गया। यह गर्भवती होने की सूचना पाकर राजा वृहद्रथ को बड़ा फल अपनी म्मी को खिला दो। तुम्हारे पुत्र-रत्न उत्पन्न : आनन्द प्राप्त हुआ ॥३३॥३५|| होगा । अब तुम वनवास का विचार छोड़कर अपनी हे महाराज ! दस महीने समाप्त होने पर दोनों राजधानी को लौट जाओ। हे महाराज ! मुनि की म्बियों के शरीर से दो टुकड़े अलग-अलग उत्पन आज्ञा पाकर उनके दिये फल और आगीर्वाद को ' हुए । स्त्रियों ने देखा,दोनों टुकड़ों के एक आँख एक ταυτότητα την προτεινετσαντεσταντιντιτρττιταΙια EAUCREDITORIALORAMANENTLOCALLLLLAZELAIME. -- ९१ अध्याय १७] म हा भारत m MITIATIRINTMENT TRINITARINYUR DrumIUITM । TUTOMOMDIVIDY दृष्ट्वा शरीरशकले प्रवेपतुरुभे भृशम् ॥ ३७॥ उद्विग्ने सह संमन्य ते भगिन्यौ तदाऽवले । सजीवे प्राणिशकले तत्यजाते सुदुःखिते ॥३८॥ तयोर्धात्र्यो सुसंवीते कृत्या ते गर्भसंप्लवे निर्गम्याऽन्तःपुरद्वारात्समुत्सृज्याऽभिजग्मतुः ॥ ३९ ॥ ते चतुप्पथनिक्षिते जरा नामाऽथ राक्षसी. जग्राह मनुजव्याघ्र ! मांसशोणितभोजना कर्तुकामा सुखवहे शकले सा तु राक्षसी संयोजयामास तदा विधानवलचोदिता ।। ४१ ॥ ते समानीतमात्रे तु शकले पुरुपर्षभ! एकमूर्तिधरो वीरः कुमारः समपद्यत ॥ ४२ ॥ ततः सा राक्षसी राजन्विस्मयोत्फुल्ललोचना न शशाक समुद्रोढुं वज्रसारमयं शिशुम् ॥ ४३ ॥ वालस्ताम्रतलं मुष्टिं कृत्वा चाऽऽस्ये निधाय सः । प्राक्रोशदतिसंरब्धः सतोय इव तोयदः ॥ १४ ॥ कान,एक हाथ,एक पैर, आधा चेहरा,आधा पेट और | को चौराहे पर पड़े देखकर उठा लिया। उस राक्षसी आधा कटिभाग अलग-अलग है। यह आश्चर्य घटना | ने, आसानी से ले जाने की इच्छा से, दोनों टुकड़ों देखकर दोनों स्त्रियाँ राजा के भय से काँपने लगी । को एक में मिला दिया। मिलाते ही वे टुकड़े आपस उन्होंने परम्पर में यह सम्मति की कि ऐसे खण्डित में जुड़ गये और एक सुन्दर बालक बन गया। और मरे हुए पुत्र होने की सूचना महाराज को देने से विधाता का विधान ही ऐसा था । इसी से वह राक्षसी वे हम पर अवश्य नाराज हो जायेंगे, इसलिये इन दोनों | उधर से निकली; उसने दोनों टुकड़ों को उठाया टुकड़ों को धाय के हाथ बाहर फिकवा देना ही ठीक है। और एक में मिलाया। टुकड़ों के मिलाते ही, सजीव इसी विचार के अनुसार ही कार्य हुआ। दोनों स्त्रियों | होकर बालक बन जाने से उस राक्षसी को भी बड़ा की आज्ञा से उन टुकड़ों को वस्त्र में लपेटकर, गुप्त | आश्चर्य हुआ। उस बालक को बार-बार देख रही रूप से महल के बाहर ले जाकर, चौराहे पर वह उस राक्षसी ने अपनी गोद में उठाना चाहा, पर वह धाय डाल आई ॥३६॥३९॥ पालक पर्वत ऐसा री हो गया । राक्षसी उसे उठा हे राजन् ! मेदा और मास आदि को भक्षण नहीं सकी । भूख से व्याकुल वह पालक लाल-लाल करनेवाली जरा नाम की राक्षसी दैवयोग से उधर से हथेलीयाली मुट्ठी मुँह में डाल कर मेघ के गरजने के आ निकली । उसने उन विचित्र शरीर के टुकड़ों समान गम्भीर स्वर से रोने लगा ॥४०॥४४॥ PITATYATMLMITMETAIMIONLIMITML VIVUNTULUI TOTAL MINIMUMTION सभापर्व ९२ म हा भारत TITUNTUNITY ATTITUTITUTITUUUTTITUDIO TUUUUrOM Trutrerror purTOTTITUTIC । तेन शब्देन संभ्रान्तः सहसाऽन्तःपुरे जनः निर्जगाम नरव्याघ्र ! राज्ञा सह परंतप ! ॥४५॥ ते चाऽवले परिम्लाने पयःपूर्णपयोधरे निराशे पुत्रलाभाय सहसैवाऽभ्यगच्छताम् ॥४६॥ तेऽथ दृष्ट्वा तथाभूते राजानं चेष्टसंततिम् तं च बालं सुबलिनं चिन्तयामास राक्षसी ॥४७॥ नाऽर्हामि विपये राज्ञो वसन्ती पुत्रगृद्धिनः वालं पुत्रमिमं हन्तुं धार्मिकस्य महात्मनः सा तं बालमुपादाय मेघलेखेव भास्करम् कृत्वा च मानुपं रूपमुवाच वसुधाधिपम् ॥४९॥ राक्षस्युवाच-वृहद्रथ ! सुतस्तेऽयं मया दत्तः प्रगृह्यताम् तव पत्नीद्वये जातो द्विजातिवरशासनात् धात्रीजनपरित्यक्तो मयाऽयं परिरक्षितः ॥ ५० ॥ श्रीकृष्ण उवाच-ततस्ते भरतश्रेष्ठ काशिराजसुते शुभे तं वालमभिपद्याऽऽशु प्रस्रवैरभ्यपिञ्चताम् उसके रोने के शब्द को सुनकर महल से राजा रूप धारण कर लिया। बादलों में जैसे सूर्य की और अन्य लोग शीघ्र से निकल आये । उदास, शोमा होती है, वैसे ही उस राक्षसी की गोद म वह दूध से भरे स्तनोंवाली और पुत्र-लाभ से निराश दोनों चालक शोभायमान हुआ । वह राक्षसी उस बालक स्त्रियां भी एकाएक उसी ओर दौड़ी आई। उस दशा को गोद में लिये राजा वृहद्रथ के पास जाकर कहने में नियों को और सन्तान के लिये चिन्तित राजा | लगी-हे राजन् ! मैं तुमको यह पुत्र देती हूँ, ले को, बहुत लोगों के साथ, उधर आते देविकर और लो। एक ब्राह्मण की कृपा से तुम्हारी दोनों स्त्रियों बालक के भी महाबली होने का परिचय पाकर 'जरा' | के गर्भ से, अलग-अलग दो टुकड़ों के रूप में यह राक्षसी सोचने लगी कि मै धार्मिक महात्मा राजा के सुन्दर बालक उत्पन्न हुआ था । दो टुकड़े अलग- राज्य में रहती हूँ और यह राजा पुत्र पाने के लिये अलग देखकर भय के मारे स्त्रियों ने धाय के हाथों बहुत ही चिन्तित है । इस कारण राजा वृहद्रथ के इसे चौराहे पर फिकवा दिया था। इसे देखकर मैने इस पुत्र को मारना उचित न होगा। इसलिये इम जिलाया है ॥४५॥५०॥ यालक को न मारकर राजा के हवाले ही कर दूँ। श्रीकृष्ण ने कहा हे राजा युधिष्ठिर ! उस बालक अब क्या था, टम मायाविनी राक्षसी ने मनुष्य का को देखकर नेह की प्रबलता के मारे स्त्रियों के स्तनों PromEREDITITIOCOMORRUITMMIT mari PROTIVATIMRAPATI अध्याय १८] म हा भारत IRITATION AnimuTurmuTuNTIN ITUTrmanorrururam arenmunTITUNITI -:.- . - ततः स राजा संहृष्टः सर्वे तदुपलभ्य च अपृच्छद्धमग भां राक्षसी तामराक्षसीम् ॥ ५२ ॥ राजोवाच का त्वं कमलगर्भाभे मम पुत्रप्रदायिनी काम-या बेहि कल्याणि देवता प्रतिभासि मे ॥ ५३ ॥ इति श्रीमन्महाभारने सभापर्वाण राजसूयारम्भपर्वणि जरामन्धोत्पत्ती सप्तदशोऽध्यायः ।। १७ ।। से दूध की धारा बह निकली । उन्होंने उसी समय । जरा राक्षसी से कहा-हे कमल-नयनी ! मुझे मेरा पुत्र -बड़े आनन्दपूर्वक बच्चे को गोद में ले लिया । सब देनेवाली तुम कौन हो ? मेरी समझ में तुम कोई वृत्तान्त सुनकर राजा अत्यन्त प्रसन्न हुए । इसके देववधू जान पड़ती हो ।।५११५३।। पश्चात् उन्होंने परम सुन्दर स्त्री का रूप रखनेवाली सभापर्व का सत्रयां अध्याय समाप्त हुआ ॥ १७ ॥ अथ अष्टादशोऽध्यायः ॥ १८ ॥ राक्षस्युवाच-जरा नामाऽस्मि भद्रं ते राक्षसी कामरूपिणी तव वेश्मनि राजेन्द्र ! पूजिता न्यवसं सुखम् ॥ १ ॥ गृहे गृहे मनुष्याणां नित्यं तिष्ठामि राक्षसी गृहदेवीति नाम्ना वै पुरा सृष्टा स्वयंभुवा ॥ २ ॥ दानवानां विनाशाय स्थापिता दिव्यरूपिणी यो मां भक्त्या लिखेत्कुड्ये सपुत्रां यौवनान्विताम् ॥ ३ ॥ गृहे तस्य भवेदवृद्धिरन्यथा क्षयमाप्नुयात् त्वद्गृहे तिष्ठमाना तु पूजिताऽहं सदा विभो ! ॥ ४ ॥ लिखिता चेव कुड्येऽहं पुत्रैर्वहुभिरावृता गन्धपुष्पैस्तथा धूपैर्भक्ष्यैर्भोज्यैः सुपूजिता अठारहवां अध्याय ॥ १८॥ राजा की यह बात सुनकर उस राक्षसी ने कहा- जो कोई स्त्री पुत्र-सहित मेरी मूर्ति दीपार में लगाकर हे महाराज ! मैं जरा नाम की राक्षसी हूं । मै चाहे भक्ति सहित पूजा करती है उसके कुल की वृद्धि जैसा रूप धारणकर चाहे जहाँ आ-जा सकती हूं। होती है । और जो ऐसा नहीं करती उसका कुल मैं तुम्हारे राज्य में समुचित सम्मान के साथ रहती नाश हो जाता है । हे राजन् ! तुम्हारे घर में मेरी पूजा हूँ । सब मनुष्यों के घर में नित्य रहती हूं। ब्रह्मा जी बहुन अच्छी तरह से हुआ करती है। मेरे म्वरूप को ने मुझे ग्रहदेवी नाम से दानव-नाशार्थ उत्पन्न किया है।। भीत पर पुत्रों-सहित लिख लिख कर गन्ध, पुष्प, धूप SATURMERHITIETIENTROMITRATIWARIMITED ।

[मभापर्व म हा मा र त PawarIROINATIOmmmmmmmrammarrormITTERIORAImmuner साऽहं प्रत्युपकारार्थ चिन्तयाम्यनिशं तव तवेमे पुत्रशकले दृष्टवत्यस्मि धार्मिक ! संश्लेपिते मया दैवात्कुमारः समपद्यत तव भाग्यान्महाराज ! हेतुमात्रमहं विह मेरुं वा खादितुं शक्ता.किं पुनस्तव वालकम् । गृहसंपूजनात्तुष्टया मया प्रत्यर्पितस्तव ॥ श्रीकृष्ण उवाच-एवमुक्त्वा तु सा राजंस्तत्रैवाऽन्तरधीयत स संगृह्य कुमारं तं प्रविवेश गृहं नृपः तस्य वालस्य यत्कृत्यं तच्चकार नृपस्तदा आज्ञापयञ्च राक्षस्या मगधेषु महोत्सवम् ॥१०॥ तस्य नामाकरोच्चैव पितामहसमः पिता जरया संधितो यस्माज्जरासन्धो भवत्वयम् ॥ ११ ॥ सोऽवर्धत महातेजा मगधाधिपतेः सुतः प्रमाणवलसम्पन्नो हुताहुतिरिवाऽनलः मातापित्रोनन्दिकरः शुक्लपक्षे यथा शशी ॥ १२ ॥ इनि श्रीमन्महाभारते मभापर्वणि राजसूयारम्भपर्वणि जरासन्धोत्पत्ती अष्टादशोऽध्यायः ॥१८॥ भीर नैवेद्य से तुम्हारी रानियां पूजा किया करती हैं। हूँ । श्रीकृष्ण जी बोले-हे राजा युधिष्ठिर ! इतना इससे तुम्हारा उपकार करने को मुझे नित्य चिन्ता कहकर वह गक्षसी अन्तर्धान हो गई । राजा वृहदय रहती थी ॥१॥६॥ भी प्रसन्नतापूर्वक उस बालक को लेकर अपने घर सो आज तुम्हारे इस पुत्र के शरीर की दोनों आये । अब उन्होंने बालक के जात कर्म आदि संस्कार फॉकों को यहाँ पड़ा हुआ देखकर मैंने उठा लिया और । कराये । फिर उनकी आज्ञा से 'जरा' राक्षसी के नाम दोनों को मिलाने पर देव-इच्छा से यह लड़का हो पर मगध देश में बड़ा भारी उत्सव किया था। जरा गया। हे महाराज ! इस घटना का कारण तुम्हारा राक्षसी के द्वारा मिलने के कारण से उस पुत्र का भाग्य ही है, में तो निमित्त हो गई है। तुम्हारे इम नाम जरासन्ध रक्सा गया। माता-पिता के आनन्द चालक की कौन कहे, मैं तो मुमेरु पर्वत को भी भक्षण को बढ़ानेवाला वह पार क शुलपक्ष के चन्द्रमा के फर मकती हैं। तुम्हारे घर में अपना पूजन होने से, समान बदकर पढ़ा तेजम्बी हो गया ॥७॥१२॥ तुमपर प्रसन्न होकर, यह पुन मैं तुमको फेरे देती मभापर्य या अठारहवां अध्याय ममान हुआ ॥१८॥ TrrecemTICTIrrrrrrrrruarrccreEETITERATINENEMIEEEETErecto TrurtrTOURITY अध्याय १९] म हा भारत HAMARIIIIIIIIIIIIIIITRADITITIRITUTION अथ एकोनविंशोऽध्यायः ॥ १९ ॥ 1 श्रीकृष्ण उवाच-कस्यचित्त्वथ कालस्य पुनरेव महातपाः मगधेपूपचक्राम भगवांश्चण्डकौशिकः तस्याऽऽगमनसंहृष्टः सामात्यः सपुरःसरः सभार्यः सह पुत्रेण निर्जगाम वृहद्रथः पाद्यार्थ्याचमनीयैस्तमर्चयामास भारत ! स नृपो राज्यसहितं पुत्रं तस्मै न्यवेदयत् प्रतिगृह्य तु तां पूजां पार्थिवाद्भगवानृषिः उवाच मागधं राजन्प्रहृप्टेनाऽन्तरात्मना सर्वमेतन्मया ज्ञातं राजन्दिव्येन चक्षुपा पुत्रस्तु शृणु राजेन्द्र ! यादृशोऽयं भविष्यति ॥ ५ ॥ अस्य रूपं च सत्वं च बलमूर्जितमेव च एप श्रिया समुदितः पुत्रस्तव न संशयः प्रापयिष्यति तत्सर्वं विक्रमेण समन्वितः अस्य वीर्यवतो वीर्यनाऽनुयास्यन्ति पार्थिवाः ॥ ७ ॥ पततो वैनतेयस्य गतिमन्ये यथा खगाः विनाशमुपयास्यन्ति ये चाऽस्य परिपन्थिनः ॥ ८ ॥ देवैरपि विसृष्टानि शस्त्राण्यस्य महीपते ! उन्नीमवां अध्याय ।। १९॥ श्रीकृष्ण ने कहा-हे राजा युधिष्ठिर ! कुछ समय बड़ा पराक्रमी और स्वरूपवान् होगा । और इसके के व्यतीत होने पर वही चण्डकौशिक मुनि फिर मगध घर में लक्ष्मी का बड़ा प्रकाश होगा। इसके पराक्रम देश में आये। उनके आने का हाल सुनकर राजा के आगे सब राजा लोग इस प्रकार से अस्त हो जायेंगे वृहद्रथ अपने मन्त्री, पुत्र और रानियों सहित उनके । जैसे गरुड़ के सामने पक्षी हो जाते हैं । और इसके पास गया और पाद्य, अर्घ्य आदि से उनका पूजन सब शत्रु नष्ट हो जायेंगे । जैसे नदी के प्रवाह का करके अपना पुत्र राज्यसहित निवेदन किया । वह वेग पर्वत से टकराकर व्यर्थ हो जाता है, वैसे ही ऋषि राजा की पूजा को अङ्गीकार करके प्रसन्नता- उनके शस्त्र इसके शरीर में लगकर ये-काम हो जायेंगे। पूर्वक बोले कि हमको दिव्य दृष्टि से तुम्हारे पुत्र की | राजसिंहासन पर जिनका अभिषेक हुआ है उन सयका सब व्यवस्था मालूम हो गई थी। यह तुम्हारा पुत्र यह मुकुटमणि होगा । उन लोगों का तेज इसके WRIMPRIMATKARTIMIRTUNITIVECITIOMETRIOTICES - Amarnama । । HITTORY मभापर्व म हा भारत anurunuTuouTUUUUUTTTTTrutruuuum UTUUTIONSuuuNTITUTITUTIHARINDI । - 1 न रुजं जनयिष्यन्ति गिरेरिख नदीरयाः सर्वमूर्धाभिषिक्तानामेष मूर्ध्नि ज्वलिष्यति प्रभाहरोऽयं सर्वेषां ज्योतिपामिव भास्करः ॥ १०॥ एनमासाद्य राजानः समृद्धवलवाहनाः विनाशमुपयास्यन्ति शलभा इव पावकम् ॥ ११ ॥ एप श्रियः समुदिताः सर्वराज्ञां गृहीष्यति वर्षास्त्रिवोदीर्णजला नदीनदनदीपतिः ॥ १२ ॥ एप धारयिता सम्यक्चातुर्वर्ण्य महावलः शुभाशुभमिव स्फीता सर्वसस्यधरा धरा ॥ १३ ॥ अस्याऽऽज्ञावशगाः सर्वे भविष्यन्ति नराधिपाः । सर्वभूतात्मभूतस्य वायोरिव शरीरिणः ॥१४॥ एप रुद्रं महादेवं त्रिपुरान्तकरं हरम् सर्वलोकेष्वतिवलः साक्षाद् द्रक्ष्यति मागधः एवं ब्रुवन्नेव मुनिः स्वकार्यमिव चिन्तयन् । विसर्जयामास नृपं वृहद्रथमथाऽरिहन् ! ॥ १६ ॥ प्रविश्य नगरीं चापि ज्ञातिसंवन्धिभिवतः अभिपिच्य जरासन्धं मगधाधिपतिस्तदा वृहद्रथो नरपतिः परां निवृतिमाययो सामने ऐसे अस्त हो जायगा जैसे सूर्य के उदय है वैसे ही यह भी चारों वर्ण की प्रजा का पालन होने पर सब तारागण क्षीण पड़ जाते । पतरे जैसे करंगा-उनका आश्रय रूप होगा । शरीरधारी लोग आग के ऊपर गिरकर भम्म हो जाते है वैसे ही जैसे,सब प्राणियों के आत्मरूप,वायु के अधीन है वैसे चतुरक्षिणी सेना लेकर इस बालक पर चढ़ाई करने ही मब राजा इमके अधीन होकर इमकी आज्ञा का याले सब राजा नष्ट हो जायेंगे ॥२॥१॥ पालन करेंगे । यह महाबली कुमार महादेव रुद्र के वर्षा में बढ़ी हुई नदियों और नदों के जल को दर्शन पाकर धन्य होगा ॥१२॥१५॥ जमे समुद्र अपने पेट में रख लेता है वैसे ही यह हे महाराज ! राजा वृहद्रथ से यों कहकर चण्ड. पालक मर राजाओं की राजलक्ष्मी को छीन लेगा। फोगिक ऋपि किमी अन्य कार्य के लिये वहां से सप अठों को उत्पन्न करनेवाली समुद्र-पर्यन्न पृथ्वी चल दिये। मुनि से विदा होकर राजा वृहद्रय प्रसन्नता अमे भली और बुरी सब वस्तुओं को धारण करती से अपने नगर को गया। जातिवालों और सम्बन्धियों CommummmmmmmmmmmmmORTER 2

९७
म हा भारत
अध्याय १९
IITTER
IIIIIIIINFO
PURImmunawrammaNDIIIIII
andu
+
AMMADIRALLUMIIRAMIMITINCREAMRATAMITIcon
अभिषिक्त जरासन्धे तदा राजा बृहद्रथः
पत्नीद्वयेनाऽनुगतस्तपोवनचरोऽभवत् ॥१८॥
ततो वनस्थे पितरि मात्रोश्चेव विशाम्पते
जरासन्धः स्ववीर्येण पार्थिवानकरोदश ॥ १९ ॥
वैशम्पायन उवाच-अथ दीर्घस्य कालस्य तपोवनचरो नृपः
सभार्यः स्वर्गमगमत्तपस्तप्त्वा वृहद्रथः
॥ २० ॥
जरासंधोऽपि नृपतिर्यथोक्तं कौशिकेन तत्
वरप्रदानमखिलं प्राप्य राज्यमपालयत् ॥ २१ ॥
निहते वासुदेवेन तदा कंसे महीपतौ
जातो वे वैरनिर्वन्धः कृष्णेन सह तस्य वै ॥ २२ ॥
भ्रामयित्वा शतगुणमेकोनं येन भारत !
गदा क्षिप्ता वलवता मागधेन गिरिजात् ॥ २३॥
तिष्ठतो मथुरायां वै कृष्णस्याऽद्भुतकर्मणः ।
एकोनयोजनशते सा पपात गदा शुभा ॥ २४॥
दृष्ट्वा पौरैस्तदा सम्यग्गदा चेव निवेदिता
गदावसानं तख्यातं मथुरायाः समीपतः ॥ २५ ॥
को एकत्र करके राजा वृहद्रथ न मगध के राजसिंहासन जरासन्ध का मित्र और सम्बन्धी हो गया।] श्रीकृष्ण
पर जरासन्ध का अभिषेक कर दिया। उमको राज्य ने [ हंस, डिम्मक और ] कंस को मार डाला ।
देकर दोनों स्त्रियों के साथ राजा तप करने के लिये [जरासन्ध की कन्याएँ विधवा हो गई ] इसी कारण
तपावन को चला गया। पिता का राज्य पाकर जरासन्ध श्रीकृष्ण से और जरासन्ध से शत्रुता हो गई । जरासन्ध
भी अपने पराक्रम और बाहुबल से सब राजाओं को ने उस वर का बदला लेने के लिये अपनी राजधानी
वश में करके एकच्छत्र राज्य स्थापित करने का उद्योग | से ही एक बड़ी मारी गदा निन्नानवे बार घुमाकर
ज़ोर से फेंकी । वह गदा निन्नानवे योजन पर मथुरा
वैशम्पायन ने कहा-हे राजा जनमेजय ! बहुत के पास आकर गिरी । उस समय श्रीकृष्ण मथुग में
समय तक तप करने के पीछे राजा बृहद्रथ अपनी ही थे [ किन्तु उस गदा से उनका कुछ नहीं बिगड़ा ]
दोनों स्त्रिया-सहित म्वर्गवासी हुआ ! और जरासन्ध । पुरवासियों ने उस गदा को देखकर सब हाल आकर
ने चण्डकाशिक मुनि के कहने के अनुसार सब राज्य
श्रीकृष्ण से कहा । वह गदा जहाँ पर गिरी थी वह
का पालन किया। उसी समय मथुरा का राजा कंम स्थान गदावसान के नाम से विख्यात हुआ।।२०।२५॥
SSETTITUDIOHINDISEETARIDHHOTILAPELAIMIRCTCRIL TOICECENTERTAINMENT
-
करने लगा ॥१६॥२१॥

९८ म हा भारत JMAMMM .. M तस्याऽऽस्तां हंसडिम्भकावशस्त्रनिधनावुभौ मन्त्रे मतिमतां श्रेष्ठौ नीतिशास्त्रविशारदौ ॥ २६ ॥ यौ तौ मया ते कथितौ पूर्वमेव महाबलौ त्रयस्त्रयाणां लोकानां पर्याप्ता इति मे मतिः ॥२७॥ एवमेष तदा वीर ! वलिभिः कुकुरान्धकैः वृष्णिभिश्च महाराज! नीतिहेतोरुपेक्षितः ॥ २८॥ इति श्रीमन्महाभारते सभापर्वणि राजसूयारम्भपर्वणि जरामन्धप्रशंसायामेकोनविंशतितमोऽध्यायः।। १९॥ ममाप्तं च राजसूयारम्भपर्व । जरासन्ध के हंस और डिम्भक नाम के दो | इसी कारण, दुर्बल को सबल का सामना न करना सेनापति जिनकी मृत्यु शस्त्र से नहीं होती थी और चाहिये- इस नीति का ख्याल करके, बलवान् होने पर दोनों मन्त्र और नीतिशास्त्र के परम ज्ञाता थे उनका भी वृष्णि, कुकुर, भोज और अन्धक आदि वंशों के हाल में पहले तुमसे कह चुका हूँ कि वे दोनों तीसरे | यादवों ने जरासन्ध से युद्ध करना उचित नहीं समझा जरासन्ध सहित तीनों लोकों को जीत सकते थे। ॥२६॥२८॥ सभापर्व का उन्नीसवां अध्याय समाप्त हुआ ॥ १९॥ अथ विंशतितमोऽध्यायः॥२०॥ अथ जरासन्धवधपर्व। वासुदेव उवाच-पतितो हंसडिम्भको कंसश्च सगणो हतः जरासन्धस्य निधने कालोऽयं समुपागतः न शक्योऽसौ रणे जेतुं सर्वैरपि सुरासुरैः प्राणयुद्धेन जेतव्यः स इत्युपलभामहे मयि नीतिवलं भीमे रक्षिता चाऽऽवयोर्जयः । बीसवां अध्याय ॥२०॥ श्रीकृष्ण ने कहा-हे राजा युधिष्ठिर ! अब हंस मारा जा सकेगा। मैं नीति का जानकार हूँ, भीमसेन और डिम्मक दोनों यमुना में डूब कर मर चुके और बलवान् हैं और अजेय अर्जुन हमारे सहायक माथी सब साथियों समेत नीच कंम मी मारा गया। केवल है ! तीन अमि जैसे यज्ञ कार्य करते हैं, वैसे ही यह जरासन्ध रह गया है सो इसके मरने का भी समय हम तीनों मिलकर अवश्य दुष्ट जरासन्ध को मारने अब आ पहुंचा है। युद्ध में तो इसको सब असुर का काम पूरा कर लेंगे। हम तीनों एकान्न में जाकर और देवता भी नहीं जीत सकते हैं। इसलिये मेरी उससे युद्ध करने की इच्छा प्रकट करेंगे तो यह हममें सम्मति तो यह है कि द्वन्द्वयुद्ध में यह हराया और से एक से युद्ध करने को अवश्य रानी होजायगा। ECORDIRATANAMITRATEEmiracy - ROHTOLERIrrruRCENTATI वैशम्पायन ने कहा-हे राजा जनमेजय! श्रीकृष्ण तथा अर्जुन को खड़े देखकर युधिष्ठिर ने कहा-हे , सूय यज्ञ भी सकुगल पूरा हो गया ॥८॥१२॥ म हा भा र त • अध्याय २० UNITrom TouTITION Mirrorammam । eamMARAULARITAMINORITAMIRINITIAN । . मागधं साधयिष्याम इष्टिं त्रय इवाऽग्नयः त्रिभिरासादितोऽस्माभिर्विजने स नराधिपः न संदेहो यथा युद्धमेकेनाऽप्युपयास्यति ॥ ४ ॥ अवमानाच्च लोभाच्च बाहुवीर्याच दर्पितः भीमसेनेन युद्धाय ध्रुवमप्युपयास्यति अलं तस्य महावाहुर्भीमसेनो महाबलः लोकस्य समुदीर्णस्य निधनायाऽन्तको यथा यदि मे हृदयं वेत्सि यदि ते प्रत्ययो मयि भीमसेनार्जुनौ शीधं न्यासभूतौ प्रयच्छ मे वैशम्पायन उवाच-एवमुक्तो भगवता प्रत्युवाच युधिष्ठिरः भीमार्जुनौ समालोक्य संप्रहृष्टमुखौ स्थितौ ॥ ८ ॥ युधिष्ठिर उवाच-अच्युताऽच्युत! मा मैवं व्याहराऽमित्रकर्शन ! । पाण्डवानां भवान्नाथो भवन्तं चाऽऽश्रिता वयम् ॥ ९ ॥ यथा वदसि गोविन्द ! सर्वं तदुपपद्यते न हि त्वमग्रतस्तेषां येषां लक्ष्मीः पराङ्मुखी ॥ १० ॥ निहतश्च जरासन्धो मोक्षिताश्च महीक्षितः राजसूयश्च मे लब्धो निदेशे तब तिष्ठतः अपमान,राज्यलोभ और बाहुबल के घमण्ड के कारण | पुरुषोत्तम! तुम यह क्या कह रहे हो ! तुम पाण्डवों यह अवश्य भीमसेन से ही युद्ध करना चाहेगा। सिर | के सहायक और स्वामी हो; हम लोगों को तुम्हारा उठानेवाले घमण्डी आदमी को जैसे मौत मार डालती । ही सहारा है। तुम्हाग कहना सब ठीक है, तुम जो है वैसे ही घमण्डी जरासन्ध को भीमसेन मार लेगा। कहोगे और सम्मति दोगे उसे मैं युक्तिसिद्ध और यदि आप मेरे हृदय की बात जानते है और मुझपर कर्तव्य समझता हूँ। मौभाग्य-लक्ष्मी जिनसे विमुस आपको विश्वास है तो शीघ्र ही धरोहर के तौर पर होती है उनके सहायक तुम कमी नहीं हो सकते । भीमसेन और अर्जुन को मुझे सौंप दीजिए ॥१७॥ मुझे पूर्ण विश्वास है, तुम्हारी आज्ञा पर चलने से मेरा सब कार्य बन जायगा । मै समझता हूँ कि जरामन्ध के वचन सुनकर और अपने सामने प्रसन्नचित्त भीमसेन मर गया, राजाओं को छुटकारा मिल गया और राज- TWITTENTIONERIOMIRRITATINATANTRIECRETOETECTETTEATETTENCERTS - म हा भारत मभापर्व murunmurtTUTImmunuvrut muTourna क्षिप्रमेव यथा त्वेतत्कार्यं समुपपद्यते अप्रमत्तो जगन्नाथ ! तथा कुरु नरोत्तम ! त्रिभिर्भवद्भिर्हि विना नाऽहं जीवितुमुत्महे धर्मार्थकामरहितो रोगात इव दुःखितः न शौरिणा विना पार्थो न शौरिः पाण्डवं विना। नाऽजेयोस्त्यनयोर्लोके कृष्णयोरिति मे मतिः ॥ १४ ॥ अयं च बलिनां श्रेष्ठः श्रीमानपि वृकोदरः युवाभ्यां सहितो वीरः किं न कुर्यान्महायशाः॥ १५ ॥ सुप्रणीतो बलौघो हि कुरुते कार्यमुत्तमम् अन्धं वलं जडं प्राहुः प्रणेतव्यं विचक्षणैः यतो हि निम्नं भवति नयन्ति हि ततो जलम् । यतश्छिद्रं ततश्चाऽपि नयन्ते धीवरा जलम् ॥ १७ ॥ तस्मान्नयविधानझं पुरुपं लोकविश्रुतम् वयमाश्रित्य गोविन्दं यतामः कार्यसिद्धये ॥ १८ ॥ एवं प्रज्ञा-नयवलं क्रियोपायसमन्वितम् पुरस्कुर्वीत कार्येषु कृष्णं कार्यार्थसिद्धये हे जगदीश्वर ! जिस उपाय से यह कार्य शीघ्र । पाकर सिपाही लोग झटपट शत्रु पर विजय पा सकते हो जाय उस तरह सावधानी के साथ आरम्भ कर दो। हैं । विना सेनापति की सेना को पण्डित लोग अन्धे भीम, अर्जुन और तुम, तीनों के बिना में वैसे ही । और जड़ मनुष्य के समान कहते है । [इसलिये जीवित नहीं रह सकना जैसे धर्म, अर्थ और काम नीतिनिपुण पुरुष को ही नेता या सनापति का कार्य से रहित दुःखित रोगी मनुष्य नहीं जीवित रह सकता। सौंपा जाता है। ] क्योंकि चतुर मनुष्य उसको इस मुझे पूर्ण विश्वास है कि अर्जुन के बिना कृष्ण और । प्रकार से ले जाकर अपना अर्थ सिद्ध करते है जमे कृष्ण के पिना अर्जुन नहीं रह सस्ते । ऐमा कोई धीवर लोग जल को उसी राह में ले जाते है जिधर कार्य नहीं जिसे कृष्ण और अर्जुन मिलकर पूरा न निचान अथवा छिद्र होता है । इमी प्रकार महे श्री- कर राफने हों; ऐमा कोई वली नहीं जिमे न जीत कृष्ण ! तुम नीति विधान में चतुर हो । हम रोग सकने हो । यरी पुररों में श्रेष्ठ य, यावी भीमगन, तुम्हारे पीछे-पीछे उसी प्रकार से चलेंगे जिम प्रसर तुम दोनों की सहायता पारर, मय युछ फर मकता से तुम आज्ञा केंगगे और अपने सब कार्यों में तुम हासेनापति की जानकारी और चतुराई की महायताही को आगे रकमेंगे, क्योंकि तुम नीति-बुद्धि और PrecurrirearrangeTMENTERTAINERATAPITCHEECT TRAImummmmmmmmmmhara 1 । - म हा मा र त 7216 अध्याय २० Turnim IFUOTATUM ADEDEMANTRATEEROINTINUTruURNI - ॥ २४ ॥ . एवमेव यदुश्रेष्ठ ! यावत्कार्यार्थसिद्धये अर्जुनः कृष्णमन्वेतु भीमोऽन्वेतु धनंजयम् नयो जयो वलं चैव विक्रमे सिद्धिमेष्यति ॥ २० ॥ वैशम्पायन उवाच-एवमुक्तास्ततः सर्वे भ्रातरो विपुलौजसः वार्ष्णेयः पाण्डवेयौ च प्रतस्थुर्मागधं प्रति ॥ २१ ॥ वर्चस्विनां ब्राह्मणानां स्नातकानां परिच्छदम् आच्छाद्य सुहृदां वाक्यैर्मनोहरभिनन्दिताः ॥ २२ ॥ अमर्यादभितप्तानां ज्ञात्यर्थं मुख्यतेजसाम् रविसोमाग्निवपुषां दीप्तमासीत्तदा वपुः ॥ २३ ॥ हतं मेने जरासन्धं दृष्ट्वा भीमपुरोगमौ एककार्यसमुद्यन्तौ कृष्णौ युद्धेऽपराजितौ ईशौ हि तो महात्मानौ सर्वकार्यप्रवर्तिनी धर्मकामार्थकार्याणां लोकानां च प्रवर्तको ॥ २५ ॥ कुरुभ्यः प्रस्थितास्ते तु मध्येन कुरुजाङ्गलम रम्यं पद्मसरो गत्वा कालकूटमतीत्य च ॥ २६ ॥ गण्डकी च महाशोणं सदानीरां तथैव च एकपर्वतके नद्यः क्रमेणैत्याऽव्रजन्त ते "॥२७॥ उत्तीर्य सरयूं रम्यां दृष्ट्वा पूर्वाश्च कोसलान् । अतीत्य जग्मुर्मिथिलां मालां चर्मण्वती नदीम् ॥ २८ ॥ उपाय के बल से युक्त हो। सो आगे-आगे तुम चलो लिया और अपने जातिवालों के कार्य को विचार कर तुम्हारे पीछे अर्जुन और अर्जुन के पीछे भीमसेन क्रोध के कारण से तीनों का शरीर सूर्य, चन्द्रमा और चलेगा। इस प्रकार से नाति, जय और बल तीनों अग्नि के समान झल्कने लगा। मनुष्यों ने उन दोनों एक जगह होने पर हमारा कार्य सिद्ध होगा । एव रूप कृष्ण और अर्जुन को जो धर्म और काम के कार्यों में प्रवृत्त होनेवाले थे, भीमसेन के आगे-आगे वैशम्पायन ने कहा-हे राजा जनमेजय ! इम जाते हुए देखकर जरासन्ध को मरा हुआ ममझ लिया। प्रकार से सब भाई सम्मति करके भीमसेन और अर्जुन वे तीनों कुरुजाल देश से चलर पद्म मरोबर और श्रीकृष्ण जी सहित मगध देश की ओर चल दिये । कालकूट पर्वत और गण्डकी, माहामोना, सदानीरा, तीनों ने ब्राह्मणों के से वस्त्र पहनकर अपना वेष बदल एक पर्वत की नदियां मरयू , कागला, मारा और USTOTRIPATIDATIONITORISEDIT PrmTTPTYPETITTET के ॥१२॥२०॥ .

म हा भारत [ मभा MINUTEmuTITUTITINuuuunmuTITUTITUTITUTERupornsrमा Annar - . , अतीत्य गङ्गां शोणं च त्रयस्ते प्राङ्मुखास्तदा । कुशचीरच्छदा जग्मुर्मागधं क्षेत्रमच्युताः ते शश्वद्दोधनाकीर्णमम्वुमन्तं शुभद्रुमम् गोरंथं गिरिमासाद्य ददृशुर्मागधं पुरम् इति श्रीमन्महाभारते सभापर्वणि जरासन्धवधपर्वणि कृष्णपाण्डवमागधयानाया विंशोऽध्याय. ॥२०॥ चर्मण्वती आदि नदियों पर होते हुए गगा और शोण पर्वत पर चढ़कर उस नगर को देखने लगें जो बहुत भद्र नदियों को उतरकर पूर्व दिशा की ओर चले गये सी गायें और नाना प्रकार के वृक्षों से सुशोभित हो और मगधपुर के समीप जा पहुचे और वहा गोरथ | रहा था ॥२१॥३०॥ सभापर्व का वीसवा अध्याय समाप्त हुआ॥२०॥ अथ एकविंशोऽध्याय ॥२१॥ श्रीवासुदेव उवाच-एष पार्थ ! महान्भाति पशुमान्नित्यमम्बुमान् । निरामयः सुवेश्माढ्यो निवेशो मागधः शुभः ॥ १ ॥ वहारो विपुल शैलो वराहो वृषभस्तथा तथा ऋपिगिरिस्तात शुभाश्चैत्यकपञ्चमाः ॥ २ ॥ । एते पञ्च महाशृङ्गाः पर्वताः शीतलद्रुमाः रक्षन्तीवाऽभिसंहत्य संहताङ्गा गिरिव्रजम् पुष्पवेष्टितशाखाग्रैर्गन्धवद्भिर्मनोहरैः निगूढा इब लोध्राणां वनैः कामिजनप्रियः ॥ ४ ॥ शूद्रायां गौतमो यत्र महात्मा संशितव्रतः' औशीनर्यामजनयत्काक्षीवाद्यान्सुतान्मुनिः इक्षीसवा अध्याय ॥२१॥ श्रीहष्ण ने कहा-हे अर्जुन ! देखो, मगधदेश हुए और ऊँचे ऊँचे गिर और मुन्दर वृक्षों से की राजधानी की कैसी अपूर्व गामा है। यह देश । शोभित हो रहे है, घिरा हुआ है । रार-सर नये पशुओं से, यथेष्ट जल से और बड़े-बड़े महरों से ' पल्लगोंवारे, मुगन्धित फूले हुए पूलों से मनोटर शोभित है। यहाँ व्याधि आदि बाधाएँ नहीं हैं। कामी पुरुषों को प्रिय ये रोघ्र वृक्षों के वन मानों चारों इस देश में किसी प्रकार का कोई उपद्रव नहीं देख ओर से इस नगरी को छिपाये हुए है ॥१४॥ पड़ता । यह देश चैहार, वृषभ, वराह, मपि और यह देखो, इम म्यान पर गौतम मपि ने चैत्यक नाम पाच पहाड़ों से जो एक दूसरे से मिले औगीनरी नाम की शुद्रा के गर्भ से काक्षीवान HTIOMINETITIMITmummyCIATCHEMITTEE marawunnuaruanimaNawaiiaadimasasanaAamirmireTANTOSHTS । । ..

। murarenmraniaxoratinum-JALDIAnazir . । . अध्याय २१] महाभारत Human amrammaINomamroSDIGITION गोतमस्य क्षयात्तस्माद्यथाऽसौ तत्र सद्मनि । भजते मानवं वंशं स नृपाणामनुग्रहः अङ्गवहादयश्चेव राजानः सुमहावलाः गोतमक्षयमभ्येत्य रमन्ते स्म पुराऽर्जुन ! ॥ ७.॥ वनराजीस्तु पश्येमाः पिप्पलानां मनोरमाः लोधाणां च शुभाः पार्थ ! गौतमोकः समीपजाः ॥ ८ ॥ अर्बुदः शक्रयापी च पन्नगौ शत्रुतापनो स्वस्तिकस्याऽऽलयश्चाऽत्र मणिनागस्य चोत्तमः॥ ९ ॥ अपरिहार्या मेघानां मागधा मनुना कृताः । कोशिको माणिमांश्चैव चक्राते चाऽप्यनुग्रहम् ॥१०॥ एवं प्राप्य पुरं रम्यं दुराधर्ष समन्ततः अर्थसिन्दिं त्वनुपमा जरासन्धोऽभिमन्यते वयमासादने तस्य दर्पमद्य हरेम हि ॥ ११ ॥ वैशम्पायन उवाच-एवमुक्त्वा ततः सर्वे भ्रातरो विपुलौजसः वार्ष्णेयः पाण्डवो चैव प्रतस्थुर्मागधं पुरम् ॥ १२ ॥ हृष्टपुष्टजनोपेतं चातुर्वर्ण्यसमाकुलम् स्फीतोत्सवमनाधृष्यमासेदुश्च गिरिव्रजम् ॥ १३ ॥ आदि पुत्र उत्पन्न किये थे। शूद्वा के गर्भ से उत्पन्न करते हैं। मनु जी ने इस देश को ऐसा बनाया है होने पर भी जो ये राजा राज्य कर रहे हैं, कि यहां सब कालों में वर्षा रहती है । जरासन्ध ऐसे सो इस वंश पर गौतम ऋषि की कृपा ही इस का रक्षित और रमणीय नगर के पाने ही के कारण से कारण है । पहले समय में अंग, वंग आदि देशों" अपने को अर्थसिद्ध मानता है, सो हम आज मिलकर के राजा इस गौतम ऋषि के आश्रम में आकर, | उसके इस घमण्ड को तोड़ डालेंगे ॥५॥११॥ यहाँ की शोभा देखकर, अपार आनन्द प्राप्त करते , वैशम्पायन कहते हैं-हे राजा जनमेजय ! यादव- । वह देखो, गौतम ऋपि के आश्रम के आस श्रेष्ठ श्रीकृष्ण इस प्रकार भीम और अर्जुन को अनेक पास लोध्र और पीपलों के वनों की कैसी अपूर्व स्थान और वस्तुएँ दिखाते हुए नगर के समीप पहुंच शोभा देख पड़ती है। इसी स्थान पर शत्रुदमन, गये । वह नगरी बहुत समृद्धिशालिनी थी। उसमें अर्बुद,शकवापी, खस्तिक, मणिनाग और और नागों नित्य उत्सव हुआ करते थे । वहा चारों के रहने के स्थान हैं, और वे सदैव यहाँ रक्षा किया रहती थी। उसपर कोई शत्रु सहज में आक्रमण नहीं A की प्रजा KALYAMANDLAL LAMOLMAANAMANuri Duntuma -- ALAMRITAMATARAITADAmaranew १०४ महा मा रत मभापत्र TUTORYTIOuTURIUITTI TOM TOTTOMATOL FinarunmummyTUTITLE ततो द्वारमनासाद्य पुरस्य गिरिमुच्छ्रितम् वार्हद्रथैः पूज्यमानं तथा नगरवासिभिः मागधानां तु रुचिरं चैत्यकान्तरमाद्रवन् ॥ १४ ॥ यत्र मांसादमृपभमाससाद वृहद्रथः तं हत्वा भासतालाभिस्तिस्त्रो भेरीरकारयत् ॥ १५ ॥ स्वपुरे स्थापयामास तेन चाऽऽनह्य चर्मणा यत्र ताः प्राणदन्भेर्यो दिव्यपुष्पावचूर्णिताः ॥ १६ ॥ भक्त्वा भेरीत्रयं तेऽपि चैत्यप्राकारमाद्रवन् । द्वारतोऽभिमुखाः सर्वे ययुर्मानायुधास्तथा मागधानां सुरुचिरं चैत्यकं तं समाद्रवन् शिरसीव समानन्तो जरासन्धं जिघांसवः स्थिरं सुविपुलं शृङ्गं सुमहत्तत्पुरातनम् अर्चितं गन्धमाल्यैश्च सततं सुप्रतिष्ठितम् ॥ १९ ॥ विपुलै हुभिर्वीरास्तेऽभिहत्याऽभ्यपातयन् ततस्ते माग, हृष्टाः पुरं प्रविविशुस्तदा ॥ २० ॥ एतस्मिन्नेव काले तु ब्राह्मणा वेदपारगाः दृष्ट्वा तु दुर्निमित्तानि जरासंधमदर्शयन् ॥ २१ ॥ कर सकता था। कृष्ण जी नगरी के फाटक में होकर मारने को इच्छा रमनवाले ये वीर उम चैत्य (मन्दिर) भीतर नहीं गये । राजा और प्रजा जिसकी पूजा करते की दीवार के पास पहुंचे । वह मन्दिर बहुत पुराना थे उस उन्नन और मनोहर नगर चैत्य की ओर तीनों था, चन्दन आदि से उसकी नित्य पूजा हुआ करती धीर शीघ्रता के साथ गये। उस चैत्य में तीन बहुत बड़े थी। इन वीरों ने अपने विशाल बलवान् हाथों मे ही नगाड़े रखे हुए थे। राजा वृद्रय ने माममक्षक अप उस चैत्य को गिरा दिया फिर ये प्रसन्नता-पूर्वक उसी भासुर को मारकर उसकी साल से मदवा कर ये तीनों राह से नगरी के भीतर घुमे ॥१२॥२०॥ नगाड़े यहा पर रग्यवा दिये थे। उन नगाड़ों की फूल इमी अवसर में ब्राह्मणों ने बहुत से दुष्ट मान आदि से नित्य पूजा हुआ करती थी। उन पर नोट देखकर राजा जरामन्ध को दिखलाये, और पुगेहितों पड़ने मे एमा गम्भीर गन्द होता था कि यह महीने ने उसको हाथी पर चढ़ा कर उसके नारों ओर अमि भर तक मुन पड़ना था। इन वीगे ने यहा लाकर फिराकर फेंक दी। और राजा ने उन दुष्ट भरनों पहले टन नगाड़ों को तोड़ दाग। फिर जरामन्ध के पी शानि के लिये दीक्षित होकर उपयाम किया । "V"TITHILOPOLINITELHINDIXITarun TOP FerrroranecrerarTorceCELECTercrorecorrecorcecretre" अध्याय २१ म हा भारत Tren பாதUTறு Arun TRUITSuom TATumy TIMITATTOMUSIC urammaanautiniuTIT .. । पर्यग्न्यकुर्वश्च नृपं द्विरदस्थ पुरोहिताः ततस्तच्छान्तये राजा जरासन्धः प्रतापवान् ॥ २२ ॥ दीक्षितो नियमस्थोऽसावुपवासपरोऽभवत् स्नातकवतिनस्ते तु वाइशस्त्रा निरायुधाः ॥ २३ ॥ युयुत्सवः प्रविविशुर्जरासन्धेन भारत ! भक्ष्यमाल्यापणानां च ददृशुः श्रियमुत्तमाम् ॥ २४ ॥ स्फीतां सर्वगुणोपेतां सर्वकामसमृद्धिनीम् तांतु दृष्ट्वा समृद्धिं ते वीथ्यां तस्यां नरोत्तमाः ॥ २५ ॥ राजमार्गेण गच्छन्तः कृष्णभीमधनंजयाः बलाद गृहीत्वा माल्यानि मालाकारान्महावलाः॥ २६ ॥ विरागवसनाः सर्वे स्रग्विणो मृष्टकुण्डलाः निवेशनमथाऽऽजग्मुर्जरासन्धस्य धीमतः ॥ २७॥ गोवासमिव वीक्षन्तः सिंहा हैमवतो यथा, शालस्तम्भनिभास्तेषां चन्दनागुरुरूपिताः ॥ २८ ॥ अशोभन्त महाराज! वाहवो युद्धशालिनाम् । तान्दृष्ट्वा द्विरदप्रख्याञ्च्छालस्कन्धानिवोद्गतान् ।। २९ ॥ व्यूढोरस्कान्मागधानां विस्मयः समपद्यत इधर स्नातक का वेप बनाये, निहत्थे, केवल बाहुवल आदि पहने ये तीनों वीर, गोशाला की खोज में जा के भरोसे जरासन्ध से युद्ध करने की इच्छा रखनेवाले रहे सिंहों के समान, जरासन्ध के घर की खोज में कृष्ण, अर्जुन और भीम नगरी के भीतर पहुँचे । चले । उन वीरों की भुजाओं में चन्दन और अगुरु राजमार्ग में पहुँचकर उन्होंने देखा, दोनों ओर अनेक लगा हुआ था, वे साखू के लट्टों के समान जान प्रकार की वस्तुओं से भरी हुई दुकानें लगी हुई हैं । पड़ती थीं। शाल वृक्ष के समान ऊँचे डील के,चौड़ी- उनमें खाने-पीने और पहनने के सामान भरे पड़े हैं । चौड़ी छातीवाले,गजराज सहम तीनों वीरों को देखकर तीनों वीर इसतरह नगरी की शोभा और समृद्धि देखते मगध देश के निवामियों को बड़ा आश्चर्य होता था हुए राजमहल की ओर चले ॥२१॥२४॥ ॥२५॥२९॥ एक माली की दुकान पर सुन्दर सुगन्धित फूलों हे महाराज ' ये तीनों वीर, बहुत से लोगों से की मालाएँ रक्खी हुई थीं। इन वीरों ने उससे मालाएँ परिपूर्ण राजभवन की तीन ब्योढ़ियाँ लाँघकर, बिना छीनकर पहन लीं। रगीन वस्त्र, किसी सोच के अहकार का माव दिखाते हुए जरा- ARTMETIMAmaATMLOCTCAMPIONORITTEEONETERMINS TALKURA ALMILalini ..".-५ माला और कुण्डल १ म हा भारत [ सभापर्व Tinyunn TinniniruRTHUTTITUTE ImmuTUTTUITYouTuuuuuuNOToraMOTU । । ते त्वतीत्य जनाकीर्णाः कक्षास्तिस्रो नरर्षभाः ॥३०॥ अहंकारेण राजानमुपतस्थुर्गतव्यथाः तान्पाद्यमधुपर्कान्गिवान्सिस्कृतिं गतान् ॥ ३१॥ प्रत्युत्थाय जरासंध उपतस्थे यथाविधि उवाच चैतान्राजाऽसौ स्वागतं वोऽस्त्विति प्रभुः ॥ ३२ ॥ मौनमासीत्तदा पार्थभीमयोर्जनमेजय ! तेषां मध्ये महाबुद्धिः कृष्णो वचनमब्रवीत् ॥ ३३ ॥ वक्तुं नाऽऽयाति राजेन्द्र ! एतयोर्नियमस्थयोः । अर्वानिशीथात्परतस्त्वया सार्धं वदिष्यतः ॥ ३४ ॥ यज्ञागारे स्थापयित्या राजा राजगृहं गतः ततोऽर्धरात्रे संप्राप्ते यातो यत्र स्थिता द्विजाः ॥ ३५॥ तस्य ह्येतद्वतं राजन् ! बभूव भुवि विश्रुतम् । स्नातकान्ब्राह्मणान्प्राप्ता-श्रुत्वा स समितिंजयः ॥ ३६ ॥ अप्यर्धरात्रे नृपतिः प्रत्युद्गच्छति भारत ! ' तांस्त्वपूर्वेण वेषेण दृष्ट्वा स नृपसत्तमः ॥ ३७॥ उपतस्थे जरासन्धो विस्मितश्चाऽभवत्तदा ते तु दृष्ट्वैव राजानं जरासन्धं नर्पभाः ॥ ३८ ॥ सन्ध के पास पहुंचे। उन्हें देखते ही जरासन्ध आदर के व्यतीत हो जाने पर वह फिर उनके पास आया। का भाव दिखाकर अपने आसन से उठ खड़ा हुआ। हे भरतश्रेष्ठ ! महाराज जरासन्ध का ऐसा नियम था आये हुए तीनों वीरों को आदर-सत्कार के योग्य कि आधी रात्रि को भी यदि स्नातक ब्रह्मचारी आये समझकर जरासन्ध ने आसन, पाद्य, अर्घ्य, मधुपर्क तो यह उसी समय उसके पास जाकर उसका सत्कार आदि पूजन की सामग्री से विधिपूर्वक सत्कार करके करता था। उसका यह नियम सब जगत् में विख्यात स्वागत और कुशलप्रश्न किया । भीमसेन और अर्जुन था। पास जाकर उनके अपूर्व वेप को देखकर जरा- चुप रहे । बुद्धिमान् श्रीकृष्ण ने कहा-हे महाराज ! सन्ध को बड़ा अचरज हुआ। ये तीनों वीर राजा ये हम समय मौनी है, इसलिये नहीं बोलेंगे। आधी जरासन्ध को अपने समीप आया हुआ देखकर भोले रावि के पश्चात् ये आप से बातचीत करेंगे॥३०॥३४॥ कि तुम्हारा कल्याण निर्विमता से हो। यह सुनकर इन तीनों वीरों को यज्ञशाला में टहराकर राजा जरासन्ध ने उन तीनों छलयेप-धारियों को मंठने की जरासन्ध अपने रनिवास में चला गया। आधीरात्रि आज्ञा दी । और वे तीनों इस प्रकार से बैठ गये Janamazzaxxrnmainamainamumaanwar । ATOMAMALAMAALIMITY HIMAMAL MADIRIDHIDIO १०७ अध्याय २१ ] म हा भारत MuTUUUULI OrTITUArurnmamminTUTE TAITRINTWITUTIrouTIVIRUITAITATIII इदमूचुरमित्रताः सर्वे भरतसत्तम! * स्वस्त्यस्तु कुशलं राजनिति तत्र व्यवस्थिताः ॥ ३९ ॥ तं नृपं नृपशार्दूल ! प्रेक्षमाणाः परस्परम् तानववीज्जरासन्धस्तथा पाण्डवयादवान् आस्यतामिति राजेन्द्र ! ब्राह्मणच्छद्मसंवृतान् । अथोपविविशुः सर्वे त्रयस्ते पुरुषर्षभाः ॥४१॥ संप्रदीप्तास्त्रयो लक्ष्म्या महाध्वर इवाऽग्नयः तानुवाच जरासन्धः सत्यसन्धो नराधिपः ॥ ४२ ॥ विगर्हमाणः कौरव्य ! वेपग्रहणवैकृतान् न स्नातकवता विप्रा बहिर्माल्यानुलेपनाः ॥ ४३ ॥ भवन्तीति नृलोकेऽस्मिन्विदितं मम सर्वशः के यूयं पुष्पवन्तश्च भुजाकृतलक्षणैः ॥ ४४ ॥ विभ्रतः क्षात्रमोजश्च ब्राह्मण्यं प्रतिजानथ एवं विरागवसना बहिर्माल्यानुलेपनाः ॥ ४५ ॥ सत्यं वदत के यूयं सत्यं राजसु शोभते चैत्यकस्य गिरेः शृङ्ग भित्त्वा किमिहच्छद्मना ॥ ४६ ॥ अद्वारेण प्रविष्टाः स्थ निर्भया राजकिल्विपात् । जैसे बड़े यज्ञ में लक्ष्मी सहित तीनों अनि स्थापित डोरी की रगड़ के चिह भी देख पड़ते हैं। तुम अपने को ब्राह्मण बता चुके हो, पर मुझे तुम में क्षत्रियों अब सत्यवादी प्रतापी राजा जरासन्ध ब्रह्म के भाव देख पड़ते है। तुम्हारे चेहरों पर क्षत्रियों का चारियों के विरुद्ध वेषवाले इन लोगों की निन्दा सी तेज साफ झलक रहा है। सत्य-सत्य कहो, तुम लोग करता हुआ कहने लगा-हे स्नातक ब्राह्मणो ! मैं अच्छी कौन हो ' राजाओं के सामने सत्य बोलना ही श्रेष्ठ तरह जानता हूँ कि स्नातक व्रतधारी ब्राह्मण गृहस्था- होता है । इससे हमसे सत्य-सत्य क्हो कि तुम द्वार श्रम में जाने से पहले न तो कभी माला पहनते,और छोड़कर चैत्यक पहाड की शिग्वर को तोड़कर राजा के न अपने शरीर में चन्दन लगाते है । किन्तु मैं देखता अपराध से निडर होकर दूमरी राह से क्यों आये हो? हूँ कि तुम लोग रङ्गीन वस्त्र, माला, चन्दन आदि ब्राह्मणों का वचन बलवान् होता है। ब्राह्मणों का कर्म धारण किये हुए हो। तुम्हारी कलाइयों में धनुष की बलवान् नहीं होता है । सो तुम्हारा कर्म मी तुम्हारे 'मुनराम् अस्ति, तत्स्वस्ति' एमा विग्रह कर स्वस्ति शन्द का चिरस्थायी स्वर्ग अथवा माक्ष अर्थ लेना, ऐमा यहा कृष्ण जी का नाता है। इसी आशयगे यह आशीवचन है । इममे 'हम तुम्हें मारेंग' यह सिद्ध किया । MARATHARITMammHETIMADIRMIRITAMITTIVITTIAHINDIMPIONETEL mmmmmmmmmmmIUDI MILAIMAAYUAL HEALULELATERALLULAIMANDULCERuwazumtitonuncatunatura.CURITALLL होती है ॥३५॥४१॥ - KUMAULULE PUR trurn THIRTOOT rumurmuTI TUTITUTTum । में होता है, बननों में नहीं। इसी कारण उनके सभापर्व म हा भारत TATUTTITUNITIE वध्वं चापि वीर्यं च ब्राह्मणस्य विशेषतः ॥४७॥ कर्म चैतद्विलिङ्गस्थं किं वोऽद्य प्रसमीक्षितम् । एवं च मामुपास्थाय कस्माच्च विधिनाऽर्हणाम् ॥ ४८ ॥ प्रणीतां नाऽनुगृह्णीत कार्य किं वाऽस्मदागमे । एवमुक्ते ततः कृष्णः प्रत्युवाच महामनाः । स्निग्धगम्भीरया वाचा वाक्यं वाक्यविशारदः ॥ ४९ ॥ श्रीकृष्ण उवाच-स्नातकान्ब्राह्मणान्राजन्विद्धधस्मांस्त्वं नराधिप!। स्नातकवतिनो राजन्ब्राह्मणाः क्षत्रिया विशः ॥ ५० ॥ विशेषनियमाश्चैपामविशेषाश्च सन्न्युत विशेषवांश्च सततं क्षत्रियः श्रियमृच्छति ॥ ५ ॥ पुण्यवत्सु ध्रुवा श्रीश्च पुण्यवन्तस्ततो वयम् क्षत्रियो वाहुवीर्यस्तु न तथा वाक्यवीर्यवान् ॥ ५२ ॥ अप्रगल्भं वचस्तस्य तस्माद्वार्हद्रथेरितम् स्ववीय क्षत्रियाणां तु वाह्वोर्धाता न्यवेशयत् ॥ ५३॥ तद्दिदृक्षसि चेद्राजन् ! द्रष्टाऽस्यद्य न संशयः । अद्वारेण रिपोर्गेहं द्वारेण सुहृदो गृहान् ॥ ५४॥ प्रविशन्ति नरा धीरा द्वाराण्येतानि धर्मतः कार्यवन्तो गृहानेत्य शत्रुतो नाऽर्हणां वयम् प्रतिगृह्णीम तद्विन्दि एतन्नः शाश्वतं व्रतम् ॥ ५५॥ इनि श्रीमन्महाभारते मभापर्वणि जरासन्धयधपर्वणि कृष्णजरासन्धसंवादे एकविंशोऽध्यायः ॥ २१ ॥ प के विपरीत है। इसके अतिरिक्त मने जो तुम्हारा अविशेष नियम को लेने वाला क्षत्रिय लक्ष्मी पाता है पूजन किया उसे भी तुमने म्बीकार नहीं किया और पुण्य धारण करनेवालों को निश्चय लक्ष्मी की प्राप्ति होती है । इस कारण से हम भी पुण्यधारी गना जगमन्य के इस प्रकार पूछने पर बुद्धि- है । यह मत्य है कि शानियों का पराक्रम भुजाओं मान् श्रीराम ने गम्भीर घर मे कहा--हे महा. राज ! हम साना वामण हैं । यातयन फेवल लिय प्रगमनापूर्ण यनन कहने की विधि नदी । प्राग ही नहीं करते, किन्नु भत्रिय और वैश्य मी विधाना ने अपना पक्षत्रियों के हाथों में है। बने। इनमें में कोई तो विशप नियम और कोई मापन किया । जो तुम टम पनी । ॥१२॥१८॥ -- म हा भारत अध्याय २२] TWITTER पास MIUM - AnupurariinwunTAIAIRTouriIALvranimummon hinmast देखना चाहते हो तो अभी देख रो। हे वृहद्रथ । जाते है । हे राजन् । अपने कार्य के लिये शत्रु के घर नन्दन ! जो धीर वीर पुरुष हैं उनका यही धर्म हे जाकर उसकी दी हुई पूना की सामग्री को म्वीकार कि वे शत्रु के घर में अमली राह से न जाकर दूसरी न करना हमारा कुल परम्परा का नियम है ही राह से जाते हैं, मित्र के ही यहाँ अमरी राह से ॥४९॥५॥ मभापर्व का इक्कीसवा अध्याय ममाप्त हुआ ॥ २१॥ अथ द्वारिंशोऽध्याय ॥७॥ जरासन्ध उवाच-न स्मरामि कदा वैरं कृतं युष्माभिरित्युत चिन्तयंश्च न पश्यामि भवतां प्रति वैकृतम् ॥ १ ॥ वैकृते वाऽसति कथं मन्यध्वं मामनागसम् अरिं वै व्रत हे विप्रा सतां समय एप हि ॥ २ ॥ अर्थधर्मोपघाताद्धि मन समुपतप्यते योऽनागसि प्रसजति भत्रियो हि न संशयः ॥ ३ ॥ अतोऽन्यथा चरल्लोके धर्मज्ञ सन्महारथः वृजिनां गतिमाप्नोति श्रेयसोऽप्युपहन्ति च ॥ ४ ॥ त्रैलोक्ये क्षत्रधर्मो हि श्रेयान्वे साधुचारिणाम् । नाऽन्यं धर्म प्रशंसन्ति ये च धर्मविदो जनाः ॥ ५ ॥ तस्य मेऽद्य स्थितस्येह स्वधर्मे नियतात्मनः अनागसः प्रजानां च प्रमादादिव जल्पथ पाइमवा अध्याय ॥२०॥ जरास ध ने कहा-हे स्नातको! मैंने कर तुम्हारे जो काई क्षत्रियकुर में पैदा होकर और धर्म-अर्थ के साथ गत्रुता की है, सो मुझे स्मरण नहीं । वार वार तत्त्व को जानकर भी निना अपराध के दूसरे के धर्म सोचकर भी मुझे स्मरण नहीं आता कि तुम्हारा या अर्थ की सिद्धि में बाधा डालता है वह इस लोक अपकार मैंने किया है । जब मैंने तुम्हारे साथ कभी म निदा आर कष्ट पार परलोक में नरकगामी कोई शत्रुता का व्यवहार नहीं किया तब फिर तुम होता है । त्रिलोकी में क्षत्रिय धर्म ही सन्मार्गका रोग मुझे शत्रु क्यों कह रहे हो तुम मुझे शत्रु कह प्रवत्तक हे । धर्मन पण्डित रोग इसी कारण क्षत्रिय रहे हो इसका कारण क्या है ? ठीक ठाक कहो धर्म की प्रगसा किया करते है । मैं सदा अपने धर्म क्योंकि सज्जन पुरुष सत्य को ही सब से बढ़क पर स्थित रहता और अपनी प्रजा के धर्म और अर्थ समझते है । देखो, धर्म या अर्थ में किसी के द्वारा में बाधा नहीं डालता हू । फिर तुम मुझे शत्रु क्यों बाधा पड़ने से ही मनुष्य का मन दुखी होता हे । कह रहे हो प्रतीत होता है, तुम प्रमाद या मतिभ्रम LATELLITMETHORSERSITERTILITICALLEDITORINEERINEETI MAHALOTAL.TATOTKOMALAYLIM.M.LAIMIMITALIAMANITLELLNADUINATASAILJITEDIALOOma .

म हा भारत ममा nirunny ourer YOUTUITOUTUNIT - । श्रीकृष्ण उवाच-कुलकार्य महावाहो! कश्चिदेकः कुलोद्वहः वहते यस्तन्नियोगाद्वयमभ्युद्यतास्त्वयि त्वया चोपहृता राजन् ! क्षत्रिया लोकवासिनः। तदागः क्रूरमुत्पाद्य मन्यसे किमनागसम् राजा राज्ञः कथं साधून्हिस्यान्नृपतिसत्तम ! तद्राज्ञः संनिगृह्य त्वं रुद्रायोपहिजीपसि अस्मांस्तदेनोपगच्छेत्कृतं वार्हद्रथ ! त्वया वयं हि शक्ता धर्मस्य रक्षणे धर्मचारिणः मनुष्याणां समालम्भो न च दृष्टः कदाचन स कथं मानुपर्देवं यष्टुमिच्छसि शंकरम् ॥ ११ ॥ सवर्णो हि सवर्णानां पशुसंज्ञां करिष्यसि कोऽन्य एवं यथा हि त्वं जरासन्ध ! वृथामतिः ॥ १२ ॥ यस्यां यस्यामवस्थायां यद्यत्कर्म करोति यः तस्यां तस्यामवस्थायां तत्फलं समवाप्नुयात् ॥ १३ ॥ ते त्वां ज्ञातिक्षयकरं वयमार्तानुसारिणः ज्ञातिवृद्धिनिमित्तार्थं विनिहन्तुमिहाऽऽगताः ॥ १४ ॥ के कारण ऐसा कह रहे हो ॥१६॥ धर्म का आचरण करनेवाले और धर्म की रक्षा करने श्रीकृष्ण ने कहा-हे महाबाहो! कुलप्रवर कोई में समर्थ है । इस कारण जो हम तुम्हारे इस क्रूर एक पुरुष कुल कार्य को वहन करते हैं, उन्हीं की काम में हस्तक्षेप न करें तो हमें भी तुम्हारे किये आज्ञा से हम लोग यहाँ, तुम्हारे पास, आये है । हे इस पाप का भागी होना पड़ेगा। हमने कभी कहीं महाराज ! तुमने वलपूर्वक बहुत से राजाओं को मनुष्य-वलि होते देखा-सुना नहीं है । फिर तुम कैसे हराकर, बलिदान की इच्छा से, अपने यहाँ कैद कर भगवान् शङ्कर को मनुष्यों के बलिदान मे सन्तुष्ट रक्खा है। ऐमा अति कुटिल दोष करके भी तुम करन चाहते हो । हे जरासन्ध ! तुम क्षत्रिय होकर क्योंकर अपने को निर्दोषी समझ रहे हो ? राजा पशुओं की तरह क्षत्रियों की बलि देना चाहते हो। होकर कौन पुरुष, बिना किमी अपराध के, अपने तुम्हारे सिवा और कौन मूद ऐमा करने का इरादा सजातीय भाइयों की हत्या करना नाहेगा ! तुम क्या करेगा ! जो कोई जिम-जिस अवस्था में जो जो कर्म समझकर उन राजाओं को पकड़कर महादेव के करता है, उस-उस अवसा में उसे उन-उन कर्मों का आग उनका बलिदान करना चाहते हो ! हम लोग फल अवश्य भोगना पड़ता है। तुम अपनी जाति Ramerammaruaaasaramrosarmanoramtammam । .

१११ म हा भारत अध्याय २२) טענות המשמשו "PURAAMRURALLIERIAL TOURITTITUTITUTTARIUN TOTUWAITINARUWAHIDIm नास्ति लोके पुमानन्यः क्षत्रियेष्विति चैव यत् । मन्यसे स च ते राजन् ! सुमहान्युद्धिविप्लवः ॥ १५ ॥ को हि जानन्नभिजनमात्मवान्क्षत्रियो नृप! । नाऽऽविशेस्वर्गमतुलं रणानन्तरमव्ययम् ॥ १६ ॥ खगं ह्येव समास्थाय रणयज्ञेषु दीक्षिताः जयन्ति क्षत्रिया लोकांस्तद्विद्धि मनुजर्पभ! ॥ १७ ॥ खर्गयोनिर्महद्ब्रह्म स्वर्गयोनिर्महद्यशः स्वर्गयोनिस्तपो युद्धे मृत्युः सोऽव्यभिचारवान् ॥ १८ ॥ एप हँन्द्रो वैजयन्तो गुणैर्नित्यं समाहितः येनाऽसुरान्पराजित्य जगत्पाति शतक्रतुः ॥ १९ ॥ स्वर्गमार्गाय कस्य स्याद्विग्रहो वै यथा तव मागधैविपुलैः सैन्यैर्वाहुल्यवलदर्पितः ॥ २० ॥ माऽवमस्थाः परान्राजन्नाऽस्ति वीर्य नरे नरे । समं तेजस्त्वया चैव विशिष्टं वा नरेश्वर ! ॥ २१ ॥ यावदेतदसंबुद्धं तावदेव भवेत्तव विपद्यमेतदस्माकमतो राजन् ! ब्रवीमि ते ॥ २२ ॥ का नाश करते हो और हम लोग पीड़ितों की सहा से मनुष्य को इन्द्र का प्रासाद (राजमहल) भी मिलता है और इन्द्र भी इसी से असुरों को जीतकर जगत् तुम अपने मन में यह समझते हो कि मेरे की रक्षा करता है ॥१५॥१९॥ समान संसार में कोई दूसरा क्षत्रिय ही नहीं है, सो सो चाहे जो हो, [हम लोगों से शत्रुता होने यह तुम्हारी बुद्धि की मन्दता का कारण है । भला के कारण ] तुम्हारे लिये स्वर्ग जाने की राह जैसी ऐसा कौन क्षत्रिय होगा जो युद्ध करके स्वर्ग में न सुगम हो गई है वैसी और किसी के लिये न हुई जाना चाहे और जातिवालों को न छुड़ाना चाहे होगी। तुम मगध देश की असमय सेना के बल जो क्षत्रिय युद्धरूपी यज्ञ में दीक्षित होता है वह पर गर्वित होकर सब राजाओं का अपमान करते हो; स्वर्ग में रहकर सम्पूर्ण लोकों को अपने वश में कर किन्तु ऐसा करना तुम्हें कदापि उचित नहीं। मनुप्यों में लेता है । हे राजन् ! वेद पढ़ना, बड़ा यश लेना, एक से एक बढ़कर बलवान् और पराक्रमी पड़े हुए तप करना और युद्ध में व्यभिचार-रहित मरना स्वर्ग है । इस पृथ्वीमण्डल पर तुम्हारे समान और तुमसे की योनि अर्थात् म्वर्ग देनेवाले है। युद्ध में मृत्यु होने बदकर भी प्रपल और पराक्रमी लोग हैं । उन लोगों HORTHANDWADA MmmmmmmmuTERTAIMEDIO । innr यता करते हैं ।।७।१४॥

११२ म हा भा र त मभापर्व ruirirnnarrouTRUITHOUT ITUTOTTONTTTTTTTTTTTTTTA . . । जहि त्वं सदृशेष्वेव मानं दरं च मागध ! मागमः ससुतामात्यः सवलश्च यमक्षयम् ॥ २३ ॥ दम्भोद्भवः कार्तवीर्य उत्तरश्च वृहद्रथः श्रेयसो ह्यवमन्येह विनेशुः सबला नृपाः ॥ २४ ॥ युयुक्षमाणास्त्वत्तो हि न वयं ब्राह्मणा ध्रुवम् । शौरिरस्मि हृषीकेशो नृवीरौ पाण्डवाविमौ अनयोर्मातुलेयं च कृष्णं मां विद्धि ते रिपुम् ॥ २५ ॥ त्वामाह्वयामहे राजन्स्थिरो युध्यस्व मागध! मुश्च वा नृपतीन्सर्वान्गच्छ वा त्वं यमक्षयम् ॥ २६ ॥ जरासन्ध उवाच-नाऽजितान्वै नरपतीनहमादनि कांश्चन अजितः पर्यवस्थाता कोऽत्र यो न मया जितः॥ २७ ।। क्षत्रियस्यैतदेवाहुर्धर्म्य कृष्णोपजीवनम् विक्रम्य वशमानीय कामतो यत्समाचरेत् ॥ २८ ॥ देवतार्थमुपाहृत्य राज्ञः कृष्ण! कथं भयात् । अहमद्य विमुञ्चेयं क्षात्रं व्रतमनुस्मरन् ॥ २९ ॥ .. सैन्यं सैन्येन व्यूढेन एक एकेन वा पुनः के बारे में जानकारी न होने के कारण दिन पर दिन मारने के लिये ब्राह्मण का वेप बनाकर यहाँ आये तुम्हारा अहङ्कार और स्वेच्छाचार बढ़ता जा रहा है। हैं। हम तीनों जने क्षत्रिय है ये दोनों वीर तो तुम्हारा दर्प और स्वेच्छाचार अब असह्य हो उठा भीमसेन और अर्जुन नाम के पाण्डव है, और मैं है । इसी से मैं कहता हूँ कि अपने समान कुल में इनके मामा वासुदेव का पुत्र और तुम्हारा शत्रु उत्पन्न क्षत्रियों से एमे घमण्ड और म्वेच्छाचार का श्रीकृष्ण हूँ। हे मगधराज ! हम तुमको युद्ध करने व्यवहार करना छोड़ दो, पुत्र, मन्त्री सेना सहित के लिये ललकारते हैं । या तो उन सब राजाओं को यमलोक जाने का उपाय मत करो ॥२०॥२३॥ छोड़ दो जिन्हें तुमने कैद कर रखा है, अथवा महावली सहस्रबाहु अर्जुन, उत्तर और वृहद्रथ हमारे माथ युद्ध करके यमपुरी को जाओ ॥२४॥२६॥ आदि महाराज बड़े ही पराक्रमी थे; पर अति घमण्ड के कारण शुभ-अशुभ का विवेक एकदम छोड़ देने को मैं अपने वाहुवल से हरा चुका हूँ उन्हीं की यह सुनकर जरासन्ध ने कहा-जिन राजाओं पर अपनी सेना और अनुचरों-सहित मारे गये । मैंने यहाँ, बलिदान के लिये कैद कर रपसा हाहार मत्य तो यह है कि हम तीनों ग्रामण नहीं हैं; तुमको हुए राजाओं के सिया यहाँ कोई कद नहीं है। और -- HTIDITICLCOHOICTIMITE TITamom गणपET ११३ अध्याय २०] महा भारत DUTT TTTTTTTTTTTTTTTTTTUTTUPUTTUாராபIRIPURA ॥३०॥ THANI - mpaumaanterwomimumbinatinue द्वाभ्यां त्रिभिर्वा योत्स्येऽहं युगपत्पृथगेव वा 'वैशम्पायन उवाच एवमुक्त्वा जरासन्धः सहदेवाभिपेचनम् आज्ञापयत्तदा राजा युयुत्सुीमकर्मभि ॥ ३१ ॥ स तु सेनापति राजा सस्मार भरतर्षभ । कौशिकं चित्रसेनं च तस्मिन्युद्ध उपस्थिते ॥ ३२ ॥ ययोस्ते नामनी राजन्हसेति डिम्भकेति च पूर्व संकथिते पुम्भिर्तृलोके लोकसत्कृते ॥ ३३ ॥ तं तु राजन्विभुः शोरी राजानं बलिनां वरम् । स्मृत्वा पुरुषशार्दूलः शार्दूलसमविक्रमम् * सत्यसन्धो जरासन्धं भुवि भीमपराक्रमम् भागमन्यस्य निर्दिष्टमवध्यं मधुभिम॒धे ॥ ३५॥ नाऽऽत्मनाऽऽत्मवतां मुख्य इयेप मधुसूदनः । ब्राह्मीमाज्ञां पुरस्कृत्य हन्तुं हलधरानुजः इनि श्रीमन्महाभारते सभापर्वणि जराम-धवधपर्वणि जरासन्धयुद्धोद्योगे द्वाविंशोऽध्याय ॥२०॥ पृथ्वीमण्डल पर ऐसा हे ही कौन जो मुझसे युद्ध युद्ध करने क लिये तेय र हूँ ॥२७॥३०॥ कर सके ? हे कृष्ण ! बाहुबल स शत्रु को हराकर वैशम्पायन ने कहा--हे राजा जनमेजय राजा उसे अपने वश में रखना या उसके साथ मनमाना जरासन्ध ने उक्त प्रकार से कहकर अपने पुत्र सहदेव वर्ताव करना ही क्षत्रियों का धर्म है। क्षत्रियधर्म का को राज्याभिषेक करने की आज्ञा दी, और अपने विचार करके महादेव की आराधना के रिय मैंने कौशिक और चित्रसेन नामी सेनापतियों को जो पूर्व जिन राजाओं को अपने यहाँ कैद कर रक्खा है । वर्णित हस और डिम्भक नामी जरासन्ध के सेनापति इस समय कैसे छोड़ सकता के तुल्य थे, याद किया । वृष्णिवशावतस कसनाशन हूँ। मैं तुम रोगों स युद्ध करने के लिये तैयार हूँ । पुरुषसिंह सत्यसन्ध हदव्रत कृष्णचन्द्र यह सोचकर चाहे तुम व्यूह रचनापूर्वक सेना लेकर मेरी सेना से जरास ध से नहीं लड़ कि यादवों के हाथ से उसकी युद्ध करो । चाहे एक दो या तीनों एकत्र होकर | मौत ब्रह्मा ने नहीं लिखी थी, भीमसेन के हाथ से ही अथवा अलग अलग युद्ध करो । मैं सर तरह तुमसे उसकी मौत वदी थीं ॥३१॥३६॥ मभापर्व का याईसवा अध्याय ममाप्त हुआ है। CAMETALLEONLITILITICmundariORTALLPARTICitical । उहें, तुमसे डरकर, TRENNTUNTUNIT LATERALLELEANTARVENIORITYAYATRIKATTARAICTERINImIITERALL IMERCOTATHIYCHITREEES होना भी अच्छा समझा जाता है। यह कहकर जरामन्य भीमसन के सामने जाकर इस प्रकार सहा ITMMELAaLucracy . TAITUUUUTTERTURUITUTrur - . ११४ म हा मारत सभापर्व IPTETTTTTTTTTTTTTTTTTTTTTTTTTIPUR अथ त्रयोविंशोऽध्यायः ॥२३॥ वैशम्पायन उवाच-ततस्तं निश्चितात्मानं युद्धाय यदुनन्दनः उवाच वाग्मी राजानं जरासन्धमधोक्षजः श्रीकृष्ण उवाच-त्रयाणां केन ते राजन्योदुमुत्सहते मनः अस्मदन्यतमेनेह सज्जीभवतु को युधि ॥ २ एवमुक्तः स नृपतिर्युद्धं ववे महाद्युतिः जरासंधस्ततो राजा भीमसेनेन मागधः ॥ ३ ॥ आदाय रोचनां माल्यं मङ्गल्यान्यपराणि च धारयन्नगदान्मुख्यान्निवृतीवेदनानि च उपतस्थे जरासन्धं युयुत्सुं वै पुरोहितः कृतवस्त्ययनो राजा ब्राह्मणेन यशस्विना समनह्यज्जरासन्धः क्षात्रं धर्ममनुस्मरन् अवमुच्य किरीटं स केशान्समनुगृह्य च उदतिष्ठज्जरासन्धो वेलातिग इवाऽर्णवः उवाच मतिमानराजा भीमं भीमपराक्रमः भीम! योत्स्ये त्वया साधं श्रेयसा निर्जितं वरम् ॥ ७ ॥ एवमुक्त्वा जरासन्धो भीमसेनमरिन्दमः तेइसवां अध्याय ॥ २३ ॥ वैशम्पायन ने कहा-हे राजा जनमेजय ! अब यदुकुल-तिलक कृष्णचन्द्र ने जरासन्ध को युद्ध के यशम्ची ब्राह्मण कुल-पुरोहित के म्यग्त्ययन- लिये तैयार देखकर उनसे पूछा हे महाराज! हम , शान्तिपाठ कर चुकने पर,क्षत्रियधर्म को स्मरण करके तीनों मनुष्यों में से किमसे युद्ध करने को तुम्हारा पराक्रमी जरासन्ध युद्ध के लिये तैयार हो गया। जी चाहता है । तुमसे युद्ध करने के लिये कौन उसने अपना किरी -मुकुट उतार डाला और वह तैयार हो! यह सुनकर महावली जरासन्ध ने भीम- बालों को बाँधकर समुद्र के समान मर्यादा के साय सेन [को ही उनमें बरवान और बड़ा देखकर उन] खड़ा होकर भीमसेन से बोला- हे भीमसेन ! आओ, मे युद्ध करने की इच्छा प्रकट को । जरासन्ध को मैं तुमसे युद्ध मंगा, क्योंकि बड़ों के हाथ से पराजित युद्ध के लिये तैयार देखकर गोरोचना, माला, अन्य माल की यग्नु और पीड़ा तथा मू को दूर wickmaNDIRamainamainamastarmovimammarASIAam.samsungaatha.mami.in - आया ॥१॥४॥ PARTIMITEMATOM FUTTITUTOURITERunning । AWAamalam अध्याय २३ म हा भारत STOTTAMInavin TPUTETTTTTTTTTTTTTER प्रत्युद्ययौ महातेजाःशक्रं वल इवाऽसुरः ॥ ८ ॥ ततः संमन्य कृष्णेन कृतस्वस्त्ययनो वली भीमसेनो जरासन्धमाससाद युयुत्सया ततस्तो नरशार्दूलौ वाहुशस्त्री समीयतुः वीरौ परमसंहृष्टावन्योन्यजयकाङ्क्षिणी . ॥ १०॥ करग्रहणपूर्व तु कृत्वा पादाभिवन्दनम् कक्षेः कक्षां विधुन्वानावास्फोटं तत्र चक्रतुः ॥ ११ ॥ स्कन्धे दोभ्या समाहत्य निहत्य च मुहुर्मुहुः । अङ्गमङ्गैः समाश्लिष्य पुनरास्फालनं विभो! ॥ १२ ॥ चित्रहस्तादिकं कृत्वा कक्षावन्धं च चक्रतुः गलगण्डाभिघातेन सस्फुलिङ्गेन चाऽशनिम् ॥ १३ ॥ चाहुपाशादिकं कृत्वा पादाहतशिरावुभी उरोहस्तं ततश्चक्रे पूर्णकुम्भी प्रयुज्य तो ॥१४॥ करसंपीडनं कृत्वा गर्जन्तौ वारणाविव नर्दन्तौ मेघसंकाशी तलेनाऽऽहन्यमानी तु अन्योन्यं कृतवीक्षणो ।. सिंहाविव सुसंकुद्धावाकृप्याकृष्य युध्यताम् ॥ १६ ॥ जाकर पड़ा हुआ था ॥५॥८॥ बाँधना, कक्षामन्ध आदि अनेक दाव पंच करते उधर भीमसेन, कृष्ण जी से सम्मति करके, हुए दोनों चीर परम्पर ऐम ऐमे हाय माग्ने लगे कि स्यात्ययन कर्म के उपरान्त युद्ध करने के लिये जरासन्ध दोनों के शरीगे से चिनगारिया मी निकलने रंगी की और नरां । वे भुजारूपी शम्नों से युद्ध करने और पिजरी गिरने का मा भन्द होने लगा ॥९॥१३॥ पाल दोनों वीर, परम्पर जय पाने की इच्छा से, दो फिर एक दूसरे को पीड़ा पहुँनाने हुए दोनों मिहों के गमान मसनता और उत्साह के माथ भिड़ चार मम्न हाथियों की तरह, गरजवर 'पागल' पर युद्ध परने रगे। दोनों ने पहले परम्पर पाय आदि अनेर सेटों के माय गड़कर 'उगेहान','पूर्ण- हुए, हाथ मिलाय; फिर ये तान और मम टोकर दुग्म' आदि विनित्र युदलीयन दिपाने रंगे। ध्वनि मेरािज भवन कोहिराने मे गे कन्धों पर बार- ! पप्पड़, भीर मे आदि माग्ने, पोप के मारे योप चार हाथ मारकर एक दूसरे के अली से पिटकर रहे, निहों के गमान गरज रहे दोनों वार परम्पर एक दूसरे से भिड़ने लगे। मित्रहम्न अर्थात ही मोप पूर्ण दृष्टि मे देगन और एक दूसरे को मानी । वाहुप्रहरणावुभो Purograceremource म हा भारत मभ که ارفاقد لفقراء 10THOUttar MARRIORATIALA . . अङ्गेनाऽङ्गं समापीड्य वाहुभ्यामुभयोरपि आवृत्य वाहुभिश्चापि उदरं च प्रचक्रतुः ॥१७॥ उभौ कट्यां सुपार्श्वे तु तक्षवन्तौ च शिक्षितौ । अधोहस्तं स्वकण्ठे तूदरस्योरसि चाऽऽक्षिपत् ॥ १८ ॥ सर्वातिक्रान्तमर्यादं पृष्ठभङ्गं च चक्रतुः संपूर्णमूर्छा बाहुभ्यां पूर्णकुम्भं प्रचक्रतुः तृणपीडं यथाकामं पूर्णयोगं समुष्टिकम् एवमादीनि युद्धानि प्रकुर्वन्तौ परस्परम् ॥ २० ॥ तयोयुद्धं ततो द्रष्टुं समेताः पुरवासिनः ब्राह्मणा वणिजश्चैव क्षत्रियाश्च सहस्रशः शूद्राश्च नरशार्दूल ! स्त्रियो वृद्धाश्च सर्वशः निरन्तरमभूत्तत्र जनोधैरभिसंवृतम् ॥ २२ ॥ तयोरथ भुजाघातान्निग्रहप्रग्रहात्तथा आसीत्सुभीमसंपातो वज्रपर्वतयोरिव ॥ २३॥ उभौ परमसंहृष्टौ बलेन वलिनां वरी अन्योन्यस्याऽन्तरं प्रेप्सू परस्परजयैपिणी ॥ २४ ॥ तद्भीममुत्सार्य जनं युद्धमासीदुपप्लवे ओर खींचते हुए घोर युद्ध करने लगे । वे दोनों वीर जवान, बालक, वृद्ध आकर युद्ध देखने लगे। अपने अङ्गों और हाथों से चोट पहुँचाकर, हाथों से उन दोनों के भुजा से भुजा लडाने और निग्रह अर्थात् पेट पकड़कर, कमर और पसली पकडकर इधर-उधर 'ग्रीवा पकड़कर नीचे को दया देना और प्रग्रह अर्थात् और पीछे हटाकर,सिमटकर, झपटकर, ताल ठोककर, 'पट्टे खींचकर चित्त गिरा देना' और-और दावों के 'अतिकान्तमर्याद'-'पृष्टमन'-'सम्पूर्णमू-'-'पूर्ण- करने से ऐसा भयानक शब्द होने लगा जैसा पर्यन कुम्भ'-'तृणपीड'-'पूर्णयोग मुष्टिक'आदि विचित्र युद्ध पर बिजली गिरने से होता है। दोनों ही वीर, बली करके अपना बल और कौशल दिखाने लगे। दोनों और जय की इच्छा रखनेवाले थे; दोनों ही अपने को ही वीर कुश्ती की करा में मुशिक्षित और पल में बचाकर दूसरे पर वार करने का अवसर देख रहे थे। भी बराबर थे ॥१४॥२०॥ वे परम्पर उदास या शान्त न होकर और भी अधिक हे राजा जनमजय ! टम समय यहा ब्राह्मण, रत्माह और प्रसन्नता प्रकट करने लगे। अब यह क्षत्रिय, वैश्य और शुद्र आदि हजागें पुरवामी,त्रियाँ, लोगों की भीड़ वहाँ से दूर हटा दी गई ॥२१॥२४॥ PrammerETTINAMITMacancerroreel । TAMwmumAIMIMASTIVITITUTHILI और म हा भारत अध्याय २३] YuATTERTATUUUTUroen UTUUTOTTURITUTTHURMUSIVITIATIVIDIO ॥ २५॥ runTUTORIEND FINITIOmwm वलिनोः संयुगे राजन्त्रवासवयोरिव प्रकर्षणाकर्षणाभ्यामनुकर्षविकर्षणैः आचकर्षतुरन्योन्यं जानुभिश्चाऽवजघ्नतुः ॥ २६ ॥ ततः शब्देन महता भर्सयन्तौ परस्परम् पाघाणसंघांतनिभैः प्रहारैरभिजन्नतु: ॥ २७ ॥ व्यूढोरस्को दीर्घभुजौ नियुद्धकुशलावुभौ वाहुभिः समसज्जेतामायसैः परिचैरिव ॥ २८॥ कार्तिकस्य तु मासस्य प्रवृत्तं प्रथमेऽहनि अनाहारं दिवारात्रमविश्रान्तमवर्तत ॥ २९॥ तवृत्तं तु त्रयोदश्यां समवेतं महात्मनोः चतुर्दश्यां निशायां तु निवृत्तो मागधः क्लमात् ॥ ३० ॥ तं राजानं तथा क्लान्तं दृष्ट्वा राजञ्जनार्दनः उवाच भीमकर्माणं भीमं संवोधयन्निव ॥३१॥ क्लान्तः शत्रुन कौन्तेय! लभ्यः पीडयितुं रणे । पीड्यमानो हि कास्न्येन जह्याजीवितमात्मनः॥ ३२॥ तस्मात्ते नैव कौन्तेय! पीडनीयो जनाधिपः सममेतेन युद्धयस्व वाहुभ्यां भरतर्षभ ! ॥ ३३ ॥ एवमुक्तः स कृष्णेन पाण्डवः परवीरहा उन दोनों का युद्ध उस रणभूमि में इन्द्र और । और न तनिक विश्राम ही किया। चतुर्दशी की रात्रि त्रासुर के समान होने लगा। कभी आगे कभी पछि को थककर जरासन्ध ने यह युद्ध कुछ समय के लिये कभी तिरछे कभी सामने एक दूसरे को खींच ले बन्द करना चाहा ॥२५॥३०॥ जाता और एक दूसरे को घुड़क-घुड़क कर पत्थर जरासन्ध को थका हुआ देखकर परमचतुर मारने के समान घाँद आदि से प्रहार करता था । कृष्ण ने भीभमेन को निनाते हुए कहा-हं कुन्नी- और दोनों की भुजा मारने का शब्द ऐसा होता था, नन्दन ! थका हुआ शत्रु पीड़ा नहीं दे सकता है और जैसे लोहे के परिवाओं को मारने से होता है । उन बड़ी सुगमता से मारा जा मकना है। इसलिये दोनों का युद्ध फात्रिक वदी प्रतिपदा मे आरम्भ इस समय तुम इममे बराबर युद्ध किये जाओ। हुमा और इसी तरह लगातार दिन-रात होता रहा। श्रीकृष्णचन्द्र के इस प्रकार कहने मे अधिक जिन दोनों में से किसी ने भी न तो पुछ माया न पिया भीममेन ने देखा कि जगमन्ध का माग्ने का यह CITEDurceremyrercurtoPETECurrrrrrrrent M ११८ म हा भारत OURUDDH DubbLULI rurunnin . जरासन्धस्य तद्रूपं ज्ञात्वा चक्के मतिं वधे ॥ ३४॥ ततस्तमजितं जेतुं जरासंधं वृकोदरः संरम्भं बलिनां श्रेष्ठो जग्राह कुरुनन्दनः । इति श्रीमन्महाभारते सभापणि जरासन्धवधपर्वणि जरासन्धक्लान्तौ त्रयोविंशोऽध्याय ॥२३॥ अच्छा अवसर है । तब उसे मार डालने के विचार | किया ॥३१॥३५॥ से भीमसेन ने झपटकर बड़े वेग से उसपर हमला सभापर्व का तेईसवा अध्याय समाप्त हुआ ।। २३ ।। अथ चतु वैशोऽध्याय ॥ २४ ॥ वैशम्पायन उवाच-भीमसेनस्ततः कृष्णमुवाच यदुनन्दनम् बुद्धिमास्थाय विपुलां जरासन्धवधेप्सया नाऽयं पापो मया कृष्ण! युक्तः स्यादनुरोधितुम् । प्राणेन यदुशार्दूल ! बद्धकक्षेण वाससा एवमुक्तस्ततः कृष्णः प्रत्युवाच वृकोदरम् त्वरयन्पुरुषव्याघो जरासन्धवधेप्सया यत्ते दैवं परं सत्वं यच्च ते मातरिश्वनः वलं भीम ! जरासन्धे दर्शयाऽऽशु तदद्य वै ॥ ४ ॥ एवमुक्तस्तदा भीमो जरासन्धमरिन्दमः उत्क्षिप्य भ्रामयामास वलवन्तं महाबलः चौवीसवा अध्याय ॥२४॥ वैशम्पायन ने कहा हे राजा जनमेजय ! तब समय दिगाओ ॥१४॥ जरासन्ध को मार डालने का दृढ़ निश्चय करके भीम श्रीकृष्ण के इस अभिप्राय को समझार भीमसेन सेन ने श्रीकृष्ण जी से कहा-हे महाराज | शत्रु ने ने वायुवेग से झपटकर जगन्ध को पकड़ लिया। अभी तक हार नहीं मानी है, ऐसी दशा में इस पापी फिर वह उसे ऊपर उठाकर येग से घुमाने लगा। सा यो मैं को छोड़ सकता हूँ ' यह मुनकर श्रीकृष्ण वार पर घुमाकर भीमसेन ने जरासन्य को पृथ्वी जे उन्द, जगसन्ध को शाम मारने के लिये, उत्साहित पर पटक दिया और पटना मारकर उसकी पष्ठि की करते हुए कहा-तुममें जो दुरंग देवार है, जो बल । हड्डी तोड़ डारी | फिर गरजते हुए भीमसेन ने उस । तुमने अपने पिना वायु से प्राप्त किया है, यह इम SEPTEMyanmmarytmlammame mammmmramAEEDEEM पृथ्वी पर अच्छीतरह रगड़ चुकने के पश्चात् बीच - से टमकी टांगे चीर डालीं। उस समय भीमसेन के ११९ म हा भारत २४] TITUTTA गा ouTITUTITUTITURUITUTE . भ्रामयित्वा शतगुणं जानुभ्यां भरतर्षभ ! वभञ्ज पृष्ठं संक्षिप्य निप्पिण्य विननाद च करे गृहीत्वा चरणं द्वेधा चक्रे महाबलः तस्य निष्पिप्यमाणस्य पाण्डवस्य च गर्जतः अभवत्तुमुलो नादः सर्वप्राणिभयंकरः वित्रेसुर्मागधाः सर्वे स्त्रीणां गर्भाश्च सुनवुः भीमसेनस्य नादेन जरासंधस्य चैव ह 'किं नु स्याद्विमवान्भिन्नः किं नु खिद्दीर्यते मही इति वे मागधा जजुर्भीमसेनस्य निःस्वनात् ॥ ९ ॥ ततो राजकुलद्वारि प्रसुप्तमिव तं नृपम् रात्रौ गतासुमुत्सृज्य निश्चक्रमररिंदमाः ॥ १०॥ जरासंधरथं कृष्णो योजयित्वा पताकिनम् आराप्य भ्रातरौ चेव मोक्षयामास वान्धवान् ॥ ११ ॥ ते वे रत्नभुजं कृष्णं रत्नार्हाः पृथिवीश्वराः राजानश्चक्रुरासाद्य मोक्षिता महतो भयात् ॥ १२ ॥ अक्षतः शस्त्रसंपन्नो जितारिः सह राजभिः रथमास्थाय तं दिव्यं निर्जगाम गिरिव्रजात् ॥ १३ ॥ यः स सोदर्यवान्नाम द्वियोधी कृष्णसारथिः उसपर बैठकर यहां गये, जहां जरामन्धन सर राजाओं भयर गर्जना को सुनकर सब प्राणी डर गये । राज- को रद कर रक्या था। यहां जाकर उन्होंने टन पानी के मय मनुष्य गय के मारे कांपने लगे और राजाओं को पैद मे छुड़ा दिया। बधन मे छुटकाग स्त्रियों के गर्भ गिर गये । मरते समय जरासन्ध के पाकर उन राजाओं ने मच ग्लों के योग्य स्वामी चिटाने का और भीमसेन के गरजने का शब्द मुनकर श्रीकृष्णनन्द्र को उपहार के रूप में अनफ ग्न अणि सर रोगों को जान पड़ा कि शायद हिमालय पर्वत किये और अपनी कृतज्ञता प्रकट की। इस प्रकार पर गया है, अथवा पृथ्वी फटी जा रही है ॥५॥९॥ शत्रु को जीतकर-गजाओं को हुार-महागार इसके पीछे ये तीनों वीर जरासन्ध के मृतक गरीर फोश्रीकृष्णमानमेन और अर्जुन उन गमाओं को माय दमके घर के द्वार पर दालपर रात्रि में ही बाहर चने ' यि गिरीमन मे पार निकले । तीनों में गये। और उसमय के पनाकामारी रथ को जोतार । वीर के शारीर में पर भी पाय नहीं नगर्न पाया। PrimeTREEEEEEEEEEEEETTERTrrrrrrruram रणाommumorounAmrianindmmmuniCUTTARATIRIDWA.OR.

१२० म हा भारत [ सभा butOULODDOOOOD iu tusunawuuuuuuuul । MILEMAIIMONALIKARAN - अभ्यासघाती संदृश्यो दुर्जयः सर्वराजभिः ॥१४॥ भीमार्जुनाभ्यां योधाभ्यामास्थितः कृष्णसारथिः शुशुभे रथवर्योऽसौ दुर्जयः सर्वधन्विभिः ॥१५॥ शक्रविष्णू हि संग्रामे चेरतुस्तारकामये रथेन तेन वै कृष्ण उपारुह्य ययौ तदा तप्तचामीकराभेण किङ्किणीजालमालिना मेघनिर्घोषनादेन जैत्रेणाऽमित्रघातिना ॥ १७॥ येन शको दानवानां जघान नवतिर्नव तं प्राप्य समहृष्यन्त रथं ते पुरुषर्षभाः ॥ १८ ॥ ततः कृष्णं महावाहुं भ्रातृभ्यां सहितं तदै । रथस्थं मागधा दृष्ट्वा समपद्यन्त विस्मिताः ॥ १९ ॥ हयैर्दिव्यैः समायुक्तो रथो वायुसमो जवे अधिष्ठितः स शुशुभे कृष्णेनाऽतीव भारत ! ॥ २० ॥ असङ्गो देवविहितस्तस्मिन्रथवरे ध्वजः योजनाद्ददृशे श्रीमानिन्द्रायुधसमप्रभः ॥ २१ ॥ चिन्तयामास कृष्णोऽथ गरुत्मन्तं स चाभ्ययात् क्षणे तस्मिन्स तेनाऽऽसीच्चैत्यवृक्ष इवोत्थितः ॥ २२ ॥ भीम और अर्जुन दोनों योद्धाओं और श्रीकृष्ण सारथी श्रीकृष्ण को भीम और अर्जुन के साथ बैठे के बैठने से वह रथ बहुत भला देख पड़ा ॥१०॥१४॥ देखकर मगध देश के निवासियों को बहुत ही वह रथ तारागण के समान चमकीला था । पूर्व आश्चर्य हुआ। उस रथ में वायु के ममान शीघ्र चलने समय में विष्णु और इन्द्र उसी रथ पर बैठकर दानयों वाले घोड़े जुते हुए थे । और एक ध्वजा देवताओं से युद्ध करते थे । इन्द्र ने निन्नानवें वार उस रथ पर की बनाई हुई उस पर बिना आधार के लगी हुई थी। बैठकर दानवों मे युद्ध किया और उन्हें मारा । उस उस ध्वजा की प्रभा विजली के समान थी और वह रथ की प्रभा तपाये हुए मुवर्ण के समान थी । उस एक योजन ( चार कोम ) की दूरी पर से दिखलाई रथ का शब्द यादल की गरज के सदृश था। वह देती थी॥१९॥२१॥ रथ शत्रुओं के नाश करनेवाला और जय का दाता उम ममय श्रीकृष्ण जी ने गरुड़ जी को स्मरण था । वह फिक्षिणीजाल-युक्त रथ मिल जाने मे तीनों किया । म्मरण करते ही वे आ गये। मुख फलार वारों को बड़ा आनन्द प्राप्त हुआ ॥१५॥१८॥ महागन्द करनेवाले भूतगण के साथ, गरुड़ भी PrernamurrearreHOTATICIEEETTIATTITINATIOnemramanarce - ।

कि कोई उनकी ओर ताक नहीं सकता, वैसा ही तेज उस रथ का हो गया ॥२२॥२४॥ यह रथ पहले इन्द्र के पास था। इन्द्र ने वह रथ दिया और वृहद्रथ से राजा जरासन्ध ने पाया था। ध्याय २४ TITUTORIALUATION FuTIM TISTITION ॥ २८ ॥ म हा भारत १२१ ruarITITUTIL व्यादितास्यमहानादैः सह भूतैर्ध्वजालयः तस्मिन्रथवरे तस्थौ गरुत्मान्पन्नगाशनः ॥ २३ ॥ दुर्निरीक्ष्यो हि भूतानां तेजसाऽभ्यधिकं वभौ । आदित्य इव मध्याहे सहस्रकिरणावृतः ॥ २४ ॥ न स सज्जति वृक्षेषु शस्त्रैश्चापि न रिष्यते 'दिव्यो ध्वजवरो राजन्दृश्यते चेह मानुपैः ॥२५॥ तमास्थाय रथं दिव्यं पर्जन्यसमनिःस्वनम् निर्ययो पुरुषव्याघ्रः पाण्डवाभ्यां सहाऽच्युतः ॥ २६ ॥ यं लेभे वासवाद्राजा वसुस्तस्माद् वृहद्रथः वृहद्रथाक्रमेणैव प्राप्तो वार्हद्रथं नृपम् ॥ २७॥ स निर्याय महाबाहुः पुण्डरीकेक्षणस्ततः गिरिव्रजाहिस्तस्थौ समे देशे महायशाः तत्रैनं नागराः सर्वे सत्कारेणाऽभ्ययुस्तदा ब्राह्मणप्रमुखा राजन्विधिदृष्टेन कर्मणा ॥ २९ ॥ वन्धनाद्विप्रमुक्ताश्च राजानो मधुसूदनम् पूजयामासुरूचुश्च स्तुतिपूर्वमिदं वचः नैतच्चित्रं महावाहो ! त्वयि देवकिनन्दने उस ध्वजा के ऊपर बैठ गये । सहस्रों किरणों से । बैठकर श्रीकृष्णचन्द्र गिरिवज देश अर्थात् पहाड़ी पृथ्वी युक्त सूर्य जैस दोपहर को ऐसे प्रचण्ड हो जाते हैं, । से निकलकर ममतल भूमि में आये॥२५॥२८॥ वहाँ ब्राह्मण आदि नगरनिवासियों ने आकर विधि- पूर्वक श्रीकृष्ण आदि का सत्कार और पूजन किया । उम रथ पर की दिव्य ध्वजा न तो वृक्षों में बन्धन से छूटे हुए राजा लोगों ने भी भक्तिपूर्वक अटकती थी और न शस्त्रों से काटी जा सकती श्रीकृष्ण जी की पूजा करके स्तुति करते हुए कहा- थी। इस समय वह मनुष्यों को भी देख पड़ने लगी । हे महाराज ! आपने हम लोगों को, जो दु.सरूपी कीचड़ में फंसे हुए थे, धर्म का पालन करके बाहर राजा बसु को दिया । वमु ने राजा वृहद्रथ को निकाला है, सो यह आपके लिये युछ विचित्र यात नहीं। हे भगवन् ! गिरिमन की पहाड़ी खोह में पड़े उसी दिव्य रथ पर भीमसेन और अर्जुन के साथ | हुए हम रोगों का उद्धार करने से आपका उज्ज्वल WAIIMImanawunnualiSITNARALERanAIRRITATARzaare १२२ म हा भारत HumaulibuBUDURitune. समयलQMARATHISRAEE - HammutamnNTAILYRWITTE भीमार्जुनवलोपेते धर्मस्य प्रतिपालनम् ॥ ३१ ॥ जरासन्धहदे घोरे दुःखपङ्के निमज्जताम् राज्ञां समभ्युद्धरणं यदिदं कृतमद्य वै ॥ ३२ ॥ . विष्णो ! समवसन्नानां गिरिदुर्गे सुदारुणे दिष्टया मोक्षाद्यशो दीप्तमाप्तं ते यदुनन्दन! ॥ ३३ ॥ - किं कुर्मः पुरुषव्याघ्र !शाधि नःप्रणतिस्थितान् । कृतमित्येव तद्विद्धि नृपैर्यद्यपि दुष्करम् ॥ ३४ ॥ तानुवाच हृषीकेशः समाश्वास्य महामनाः युधिष्ठिरो राजसूयं क्रतुमाहर्तुमिच्छति ॥३५॥ तस्य धर्मप्रवृत्तस्य पार्थिवत्वं चिकीर्णतः सर्वैर्भवद्भिर्विज्ञाय साहाय्यं क्रियतामिति ॥३६॥ ततः सुप्रीतमनसस्ते नृपा नृपसत्तम ! तथेत्येवाऽब्रुवन्सर्वे प्रतिगृह्याऽस्य तां गिरम् ॥३७॥ रत्नभाजं च दाशार्ह चक्रुस्ते पृथिवीश्वराः कृच्छ्राजग्राह गोविन्दस्तेषां तदनुकम्पया ॥ ३८॥ जरासन्धात्मजश्चैव सहदेवो महामनाः निर्ययो सजनामात्यः पुरस्कृत्य पुरोहितम् ॥ ३९ ॥ स नीचैः प्रणतो भूत्वा बहुरत्नपुरोगमः यश और भी बढ़ गया । हे पुरुषसिंह ! हम सब राजाओं ने श्रीकृष्ण की इस आजा को सादर म आपके अधीन है। आज्ञा दीजिए, हम सेवक लिया। उन सब ने श्रीकृष्ण जी को रत आपकी क्या सेवा करें । जो आना आप देंगे वह । भेंट किये । श्रीकृष्ण जी ने उन सब राजा अत्यन्त दुप्कर होगी तो भी उसे हम अवश्य पूर्ण । दया करके उनकी दी हुई भेंटों को अशोकार करेंगे॥२०॥३४॥ इसके पश्चात् जरासन्ध का पुत्र बुद्धिमान से सम्पायन ने कहा-हे राजा जनमेजय ! उन भी बड़े-बड़े मोल के ग्लादि पदायों को आ. राजाओं को दिरामा देकर श्रीकृष्ण जी ने कहा कि ' लेकर अपने मन्त्री और पुरोहितों-सहित श्रीकृष्ण राजा युधिष्ठिर राजसूय यज्ञ करके सामाग्य पदवी के पाम नग्रतायुक्त आया । श्रीकृष्ण जी ने उस प्राप्त करना नाहते हैं। मैं चाहता हूँ कि तुम लोग दी हुई भेंट को बीकार किया। फिर ग्रीकृष्ण चनकर इस कार्य में उनकी मदायना फो। गर । की मम्मनि मे मीम और अर्जुन ने महदेव को विधि । - TrammarMEHLIMOTIVALL २४ ] म हा मारन १२३ HTRIALOGorammarTRADITIOMATOGROLLET HINDHIRIT ॥१०॥ - INMENTILTOLLINDUSTANITITICLALITILAILA - । सहदेवो नृणां देवं वासुदेवमुपस्थितः भयार्ताय ततस्तस्मै कृष्णो दत्वाऽभयं तदा आददेऽस्य महार्हाणि रत्नानि पुरुषोत्तमः अभ्यपिञ्चत नत्रैव जरासन्धात्मजं मुदा गत्वेकत्वं च कृष्णेन पार्थाभ्यां चैव सत्कृतः ॥ ४२ ॥ विवेश राजा द्युतिमान्वार्हद्रथपुरं नृप ! अभिषिक्तो महावाहुर्जारासंधिर्महात्माभिः ॥४३॥ : कृष्णस्तु सह पार्थाभ्यां श्रिया परमया युतः । रत्नान्यादाय भूरीणि प्रययौ पुरुपर्पभः ॥४४॥ इन्द्रप्रस्थमुपागम्य पाण्डवाभ्यां सहाऽच्युतः । समेत्य धर्मराजानं प्रीयमाणोऽभ्यभाषत ॥४५॥ दिष्टया भीमेन वलवाञ्जरासन्धो निपातितः राजानो मोक्षिताश्चैव बन्धनान्नृपसत्तम! ॥ ४६॥ दिष्टया कुशलिनौ चेमौ भीमसेनधनंजयो पुनः वनगरं प्राप्तावक्षताविति भारत ! ॥४७॥ ततो युधिष्ठिरः कृष्णं पूजयित्वा यथार्हतः भीमसेनार्जुनौ चैव प्रहृष्टः परिषखजे ॥४८॥ ततः क्षीणे जरासन्धे भ्रातृभ्यां विहितं जयम् । पूर्वक मगध देश की राजगद्दी देकर राज्याभिषेक प्रतापी राजा जरासन्ध को मार डारा और उसके कर दिया । श्रीकृष्ण की कृपा और राज्य पाकर यहा जितने गजा कैद थे उन्हें वन्धन से मुक्त कर महदेव अपनी राजधानी में गया ॥३५॥४३॥ दिया । आपके सोभाग्य से भीम और अर्जुन दोनों हे राजा जनमेजय ! इस प्रकार प्रपर प्रतापी भाई शत्रु को मारकर उभरतापूर्वक पर रोट आये थी। सन्ध को मारकर, राजाओं को छुड़ाकर और हैं। उनके शरीर में कहीं तनिक मा घाव भी नहीं श से मेंटों का बहुत सा धन रेकर श्रीकृष्णचन्द्र, , हुआ ॥४४॥४७॥ भीमसेन और अर्जुन लौटकर इन्द्रप्रस्थ नगर में पहुँच ! भाओं के लिये दुर्जय महावीर जरामन्ध के मरने का वृत्तान्त मुनकर और श्रीवप्ण जी के माथ गय । महाराज युधिष्ठिर से मिलकर प्रसन्नता प्रकट अपने भाइयों को मकुशल रौट आये देखकर धर्म- करते हुए श्रीकृष्ण ने कहा हे महाराज ' बड़े भाग्य भी बात है कि महापरी भीमसेन ने बाहुयुद्ध में राज युधिष्ठिर को अपार आनन्द प्राप्त हुआ। उन्होंने -- ए . - TILAIMOTORATE LYNITOAILMYMYKNITET NUNC MOTOR Mundar । TAMUDRAMANIRALAVAanaamanarapanua - .. । १२४ म हा भारत [सम mentation. अजातशत्रुरासाद्य मुमुदे भ्रातृभिः सह ॥४९॥ यथावयः समागम्य भ्रातृभिः सह पाण्डवः सत्कृत्य पूजयित्वा च विससर्ज नराधिपान् ॥ ५० ॥ युधिष्ठिराभ्यनुज्ञातास्ते नृपा हृष्टमानसाः जग्मुः स्वदेशांस्त्वरिता यानरुच्चावचैस्ततः एवं पुरुषशार्दूलो महाबुद्धिर्जनार्दनः पाण्डवैर्घातयामास जरासंधमरिं तदा ॥ ५२ ॥ घातयित्वा जरासन्धं बुद्धिपूर्वमरिन्दमः धर्मराजमनुज्ञाप्य पृथां कृष्णां च भारत ! ॥ ५३॥ सुभद्रां भीमसेनं च फाल्गुनं यमजौ तथा धौम्यमामन्त्रयित्वा च प्रययौ स्वां पुरीं प्रति ॥ ५४ ॥ तेनैव रथमुख्येन मनसस्तुल्यगामिना धर्मराजविस्मृप्टेन दिव्येनाऽनादयन्दिशः ततो युधिष्ठिरमुखाः पाण्डवा भरतर्षभ ! प्रदक्षिणमकुर्वन्त कृष्णमक्लिप्टकारिणम् ॥ ५६ ॥ ततो गते भगवति कृष्णे देवकिनन्दने जयं लब्ध्वा सुविपुलं राजां दत्त्वाऽभयं तदा ॥ ५७ ॥ संवर्धितं यशो भूयः कर्मणा तेन भारत ! उचित रूप से श्रीकृण जी की पूजा की और अर्जुन | कुन्ती, द्रोपदी, भीमसेन, अर्जुन, नकुल, सहदेव और भीमसेन को छाती से लगाया। इसके पश्चात् और धौम्य पुरोहित से यथायोग्य मिलकर युधिष्ठिर महाराज युधिष्ठिर ने जरासन्ध के यहां की कंद मे के दिये हुए उसी रथ में बैठकर, जो मन की गति टूटकर आये हुए राजाओं को, उनकी अवस्था के के समान शीघ्र चलनेवाला था, द्वारका पुरी को चले। 'अनुमार पूजा और सत्कार-द्वारा प्रसन्न करक अपने- चलते समय पाण्डवों ने श्रीकृष्ण जी की प्रदक्षिणा की। अपने घर जाने की आज्ञा दी। युधिष्ठिर की आज्ञा फिर पहियों की घरघराहट से दसों दिशाओं को पाकर ये राजा लोग प्रमन्नता से रथों और वाहनों पर प्रतिध्वनित करते हुए भगवान् श्रीकृष्ण द्वारकापुरी नदकर अपने अपने स्थान को चल दिये ॥४८॥५१॥ को गये। इसप्रकार प्रयल प्रतापी राजा जरामन्ध इस प्रकार से है राजा जनमेजय ! श्रीकृष्ण जी को मारकर, बलिदान के लिये लाये गय राजाओं को अपने गा जरासन्ध को पाण्डवों से मरवाकर युधिष्ठिर, छुटकारा दे देने से, धर्मराज युधिष्ठिर की पीचिं चारों ExemageywEREDMmmmmmmmmmmmmmarrirror । HTRITION १२५ म हा भारत अध्याय २५] TITUTESTITUTARISTITTARIUMOTIGERurrennr STMini SATIRITTHUTM द्रौपद्याः पाण्डवा राजन्परां प्रीतिमवर्धयन् :॥ ५८ ॥ तस्मिन्काले तु यद्युक्तं धर्मकामार्थसंहितम् तद्राजा धर्मतश्चक्रे प्रजापालनकीर्तनम् ॥ ५९ ॥ इति श्रीमन्महाभारते मभापर्वणि जरासन्धवधपर्वणि जरासन्धवधे चतुर्विशोऽध्यायः ॥२४॥ समाप्तं चेदं जरासन्धयधपर्व । ओर फैल गई । हे भरतकुल-तिलक ! अब भाइयों- पूर्वक प्रजा का पालन करते हुए बड़े सुख से रहने सहित महाराज युधिष्ठिर द्रौपदी को प्रसन्न रखते हुए लगे ॥५२॥५९॥ धर्म, अर्थ, काम का सञ्चय करने लगे। वे न्याय- सभापर्व का चौवीसवा अध्याय ममाम हुआ ॥२४॥ - अथ दिग्विजयपर्व। अथ पञ्चविंशोऽध्याय ॥२५॥ वैशम्पायन उवाच-पार्थः प्राप्य धनुःश्रेष्ठमक्षय्यौ च महेपुधी रथं ध्वज सभां चैव युधिष्ठिरमभापत अर्जुन उवाच-~-धनुरस्त्रं शरा वीर्यं पक्षो भूमिर्यशो वलम् प्राप्तमेतन्मया राजन्दुप्प्रापं यदभीप्सितम् तत्र कृत्यमहं मन्ये कोशस्य परिवर्धनम् करमाहारयिष्यामि राज्ञः सर्वान्नृपोत्तम ! विजयाय प्रयास्यामि दिशं धनदपालिनाम् तिथावथ मुहूर्ते च नक्षत्रे चाऽभिपूजिते ॥ १ ॥ वैशम्पायन उवाच-धनंजयवचः श्रुत्वा धर्मराजो युधिष्ठिरः स्निग्धगम्भीरनादिन्या तं गिरा प्रत्यभाषत पच्चीसवा अध्याय ।। २५ ॥ वैशम्पायन ने कहा-हे राजा जनमेजय ' उत्तम वस्तुओं को पाकर अब मैं अपना कर्त्तव्य यही --धनुष, अक्षय तरकस, दिव्य रथ, सभा और घजा प्राप्त समझता हूँ कि राज्य का कोप बढ़ाऊँ । मैं इस समय होने से अधिक साहसी होकर अर्जुन ने एक दिन राजा दिग्विजय के लिये जाकर सब सजाओं से 'कर' वसूल युधिष्ठिर से कहा-हे महाराज ! श्रेष्ठ धनुष, शस्त्र, वाण, करूंगा। मैं शुभ मुहूर्त, गुम तिथि, और शुभ नक्षत्र यल, श्रीकृष्ण जैसे सहायक, दुर्ग और सेना, ये सब में दिग्विजय के रिये उत्तर दिशा को जाऊँगा ॥११॥ अपने दुर्रभ अभीष्ट में प्राप्त कर चुका हूँ। इन अर्जुन के ये यचन मुनकर महाराज युधिष्ठिर MILALUMUVA - MYMNMAL IMILIANIMLIMIT WITHmmammmmmmmmmmm म हा भारत لالالالالايدنفالكالرعد ياباني المتنقل اتعلما WALLULLUMIONLINE LITERNATIHam-gainst rattharatram स्वस्ति वाच्याऽर्हतो विप्रान्प्रयाहि भरतर्षभ ! । दुहृदामप्रहर्षाय सुहृदां नन्दनाय च विजयस्ते ध्रुवं पार्थ प्रियं काममवाप्स्यसि इत्युक्तः प्रययौ पार्थः सैन्येन महता वृतः ॥ ७। अग्निदत्तेन दिव्येन रथेनाऽद्भुतकर्मणा तथैव भीमसेनोऽपि यमौ च पुरुषर्षभौ संसैन्याः प्रययुः सर्वे धर्मराजेन पूजिताः । ... दिशं धनपतेरिटामजयत्पाकशासनिः भीमसेनस्तथा प्राची सहदेवस्तु दक्षिणाम् प्रतीची नकुलो राजन्दिशं व्यजयताऽस्त्रवित् ॥ १०॥ खाण्डवप्रस्थमध्यस्थो धर्मराजो युधिष्ठिरः आसीत्परमया लक्ष्म्या सुहृद्गणवृतः प्रभुः ॥ ११ ॥ इति श्रीमन्महाभारते सभापर्वणि दिग्विजयपर्यणि दिग्विजयसंक्षेपकथने पञ्चविंशोऽध्यायः ।। २५॥ ने स्नेहपूर्ण गम्भीर म्बर से कहा-हे भाई ! अच्छी पश्चिम दिशा और सहदेव दक्षिण दिशा को बहुत बात है । पूजनीय ब्राह्मणों से म्यम्त्ययन पाठ कराकर, सी सेना साथ लेकर चल दिये। अर्जुन ने उत्तर दिशा उनके आशीर्वाद लेकर, शत्रुओं को दुखी और मित्रों को, भीम ने पूर्व दिशा को, सहदेव ने दक्षिण दिशा को सुखी बनाते हुए तुम दिग्विजय करने जाओ । को और अस्त्र-विद्या के पण्डित नकुल ने पश्चिम तुम अवश्य ही विजय प्राप्त करोग और तुम्हारी प्रिय दिशा को दिग्विजय में जीना। धर्मराज युधिष्ठिर अपनी इच्छा पूर्ण होगी। यह सुनकर अर्जुन बड़ी सेना ! राजधानी में मन्त्रियों और मित्रों के साथ श्रेष्ठ ऐश्वर्य को साथ लेकर अग्नि के दिये हुए दिव्य रथ पर का भोग करते हुए प्रजा का पालन करने ले. पेटकर उत्तर दिशा को चल दिया । इसी प्रकार से ॥५॥१२॥ युधिष्ठिर से प्रोत्साहित होकर भीमसन पूर्व दिशा, नकुल मभापर्व का पच्चीसवां अध्याय ममाम हुआ ॥२५॥ .. अथ पइविंशोऽध्यायः ॥२६॥ जनमेजय उवाच-दिशामभिजयं ब्रह्मन्विस्तरेणाऽनुकीर्तय न हि तृप्यामि पूर्वपां शृण्वानश्चरितं महत् 'यशम्पायन उयाच- धनंजयस्य वक्ष्यामि विजयं पूर्वमेव ते ॥ EETALLIONIONLYMOOMIDLmmmmroprime १२७ म हा भारत PITAITINGue TIMINTOTTITUTITINGU योगपद्येन पार्थहि निर्जितेयं वसुन्धरा पूर्व कुलिन्दविषये वशे चक्रे महीपनीन् धनंजयो महावाहुर्नातितीत्रेण कर्मणा आनन्किालकूटांश्च कुलिन्दांश्च विजित्य सः । सुमण्डलं च विजितं कृतवान्सहसैनिकम् स तेन सहितो राजन् ! सव्यसाची परंतपः । विजिग्ये शाकलं द्वीपं प्रतिविन्ध्यं च पार्थिवम् ॥ ५ ॥ शाकलद्वीपंवासाश्च सप्तद्वीपेषु ये नृपाः अर्जुनस्य च सैन्यस्तैर्विग्रहस्तुमुलोऽभवत् स तानपि महेष्वासान्विजिग्ये भरतर्षभ! तैरेव सहितः सर्वैः प्राग्ज्योतिपमुपाद्रवत् तत्र राजा महानासीद्भगदत्तो विशांपते ! तेनाऽऽसीत्सुमहद्युद्धं पाण्डवस्य महात्मनः स किरातेश्च चीनैश्च वृतः प्राग्ज्योतिपोऽभवत् ।, अन्येश्च बहुभिर्योधैः सागरानूपवासिभिः ॥ ९ ॥ ततः स दिवसानष्टो योधयित्वा धनंजयम् छब्बीसवां अध्याय ॥२६॥ यह वृत्तान्त सुनकर राजा जनमेजय ने वैशम्पायन इसके पीछे उसने आनत, कालकुट, युलिन्द और जी मे कहा-हे महाराज ! आप गरों दिशाओं के | सुमण्डल देश के राजाओं पर चढ़ाई की और इन विजय करने का वृतान्त विस्तार महित वर्णन कीजिए। सबको सेना-सहित जीत लिया । उपगंत यह उन मेरा चित्त पाण्डवों के चरित्र को मुनने मे तृप्त नहीं सय जीते हुए राजाओं सहित गाकल द्वीप आदि मान होता है यह सुनकर वंशम्पायन ने कहा-ई द्वीपों में गया और वहां के प्रतिविन्ध्य आदि पड़ राजन् ! चारों पाण्डव एक साथ दिग्विजय करने निकले धनुर्धारी राजाओं से तुमुल युद्ध करके मयको जीत थे-एक माथ ही उन्होंने दिमिजय किया था; ! लिया। फिर उन मयको माय लेकर अर्जुन ने पर मैं मय से पहले अर्जुन के दिग्विजय का वृतान्त माग्योतिषपुर पर चढ़ाई की। यहां के राजा महायनी कहता हूँ। बाहुबल और अम्मविद्या में अद्वितीय भगदत्त थे। उन्होंने किरान, चीन और ममुद्र के अर्जुन पहले कुलिन्द देश में गया और वहां के राजा किनारे पर रहनेवारी अन्यान्य अनेक जानियों की को उमने बड़ी सुगमता से अपने वश में कर लिया : मना को माथ लेस आठ दिन तक अर्जुन मे युद्ध - TIMIRTOILETITICLETITICTCOIRIT १२८ म हा भारत मभापर्व IntroTUTITUTIO arurumuTITUTIONVRUTTITUTUIII ॥१०॥ - प्रहसन्नब्रवीद्राजा संग्रामे विगतक्लमम् उपपन्नं महावाहो! त्वयि कौरवनन्दन! पाकशासनदायादे वीर्यमाहवशोभिनि ॥ ११ ॥ अहं सखा महेन्द्रस्य शक्रादनवरो रणे न शक्ष्यामि च ते तातं! स्थातुं प्रमुखतो युधि ॥ १२ ॥ त्वमीप्सितं पाण्डवेय! ब्रूहि किं करवाणि ते यद्वक्ष्यसि महाबाहो तत्करिष्यामि पुत्रक ! ॥ १३ ॥ अर्जुन उवाच-कुरूणामृपभो राजा धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः धर्मज्ञः सत्यसन्धश्च यज्वा विपुलदक्षिणः तस्य पार्थिवतामीप्से करस्तस्मै प्रदीयताम् ॥ १४ ॥ भवान्पितृसखा चैव प्रीयमाणो मयापि च ततो नाऽज्ञापयामि त्वां प्रीतिपूर्व प्रदीयताम् ॥ १५ ॥ भगदत्त उवाच-कुन्तीमातः ! यथा मे त्वं तथा राजा युधिष्ठिरः । सर्वमेतत्करिष्यामि किं चाऽन्यत्करवाणि ते ॥ १६ ॥ इति श्रीमन्महाभारते सभापर्वणि दिग्विजयपर्वणि अर्जुनदिग्विजय भगदत्तजये पड्विंशोऽध्यायः ॥ २६ ॥ किया ॥१॥१०॥ याज्ञिक है। वे राजसूय यज्ञ करके, औरों के लिये तव भी अर्जुन को न थकते देखकर भगदत्त दुर्लभ सम्राट् का पद प्राप्त करना चाहते है । हँसते हुए उनके पास आये और कहने लगे हे उन्हीं की अनुमति से दिग्विजय करने निकला हूँ। अर्जुन ! तुम इन्द्र के पुत्र हो, इस कारण युद्ध में उन्हें आप 'कर' दीजिए। आप मेरे पिता के मित्र ऐमा बल और पराक्रम प्रकट करना तुम्हारे योग्य हैं और मुझ पर प्रसन्न भी हुए है। मैं आपको आजा ही है । मैं भी इन्द्र का मित्र हूँ, परन्तु अब मेरी । नहीं देता, आप अपनी प्रसन्नता से 'कर' देकर मुझे मामध्ये तुम्हारे साथ युद्ध करने की नहीं है । इसमे ' अनुगृहीत कीजिए। भगदत ने कहा-हे कुन्तीनन्दन जो कुछ तुम्हारी मनोकामना हो सो कहो, मैं वह । तुमको में जैसे स्नेहपात्र समझता हूँ, वैसे ही राज फरने के लिये तैयार हूँ। तुम मेरे पुत्र ममान । युधिष्ठिर को भी। मैं 'कर' अवश्य दूंगा। इसके हो । यह मुनकर अर्जुन ने कहा-कुरुवंश में श्रेष्ठ अतिरिक्त और बनाओ; मैं क्या तुम्हारा प्रिय कर महागज युधिष्ठिर धर्मात्मा, हदवन, सत्यवादी और ॥११॥१६॥ ममापर्य या उच्चीमयां अध्याय ममाप्त हुआ।॥२६॥ ROADITITIN. SUPRETIRINITIAYDERIODIMAILRAMPERATINI AT PERATAPrera OTONUANTI TITIATEL HTRIOTIVATISTIRIDIYO MUNALVILLS' THEME -- अध्याय २७ ] म हा भारत १२९ TuorumUNITORITINATIOniwvirai अथ मप्तविंशोऽध्यायः ॥ २७ ।। वैम्पायन उवाच-एवमुक्तः प्रत्युवाच भगदत्तं धनंजयः अननैव कृतं सर्वं भविष्यत्यनुजानता तं विजित्य महाबाहुः कुन्तीपुत्रो धनंजयः प्रययावुत्तरां तस्माद्दिशं धनदपालिताम् अन्तर्गिरिं च कौन्तेयस्तथैव च बहिगिरिम् तथैवोपगिरिं चैव विजिग्ये पुरुपर्पभः विजित्य पर्वतान्सर्वान्ये च तत्र नराधिपाः तान्वशे स्थापयित्वा स धनान्यादाय सर्वशः ॥ ४ ॥ तेरेव सहितः सर्वैर नुरज्य च तान्नृपान् उलूकवासिनं राजन्वृहन्तमुपजग्मिवान् मृदङ्गवरनादेन रथनेमिस्वनेन च हस्तिनां च निनादेन कम्पयन्वसुधामिमाम् ॥ ६ ॥ ततो वृहन्तस्त्वरितो बलेन चतुरङ्गिणा निष्कम्य नगरात्तस्माद्योधयामास फाल्गुनम् ॥ ७ ॥ सुमहान्सन्निपातोऽभूद्धनंजयवृहन्तयोः न शशाक बृहन्तस्तु सोढुं पाण्डवविक्रमम् सोऽविपद्यतमं मत्वा कौन्तेयं पर्वतेश्वरः मत्ताईसवा अध्याय ।। २७ ।। वैशम्पायन कहते हैं-हे राजा जनमेजय ! अर्जुन मृदंग बजाता, रथों की झंझनाहट और हाधियों राजा भगदत की वह बात सुनकर अर्जुन ने उत्तर को चिंघार से पृथ्वी कपाता हुआ उन्क देश के दिया कि इतना करने से ही मानों आप हमारा मय राजा वृहन्त के पास गया ॥१६॥ कुछ प्रिय कर चुके । इस प्रकार भगदत्त को जीत गजा बृहन्त ने चतुरिणी सेना माय लेकर कर वहां से अर्जुन उत्तर दिशा की ओर बढ़ा। उमने ' अर्जुन से यड़ा भारी युद्ध किया; किन्नु ये अर्जुन के अन्तगिरि, पहिगिरी और उपगिरि आदि सब म्थानों पराक्रम को नहीं मह सके । नय उमको दुर्भय को जीता । पहाड़ो म्यान के भीतर, बाहर और । ममझकर राजा यूहन्न ने युद्ध यन्द कर दिया । आमपास रहनेवाले सब राजाओं को जीनकर, उनसे ! अनेक ग्न लेकर वे अर्जुन के पाम आये । यहां में बहुत सा धन लेकर और उन्हें अपने साथ लेकर, । वृहन्त को साथ लेकर अर्जुन ने मेनाबिन्दु राजापर ADVANIMALINICITATIOETITICTETTmmarrma. - TETOOT । . १३० महा भारत सभापर्व MEHRARITRINTRIETAITRITITIONAUTIVITIERITUTRITruarrammar उपावर्तत दुर्धर्यो रत्नान्यादाय सर्वशः स तद्राज्यमवस्थाप्य उलूकसहितो ययौ सेनाबिन्दुमथो राजनराज्यादाशु समाक्षिपत् ॥१०॥ मोदापुरं वामदेवं सुदामानं सुसंकुलम् उलूकानुत्तरांश्चैव तांश्च राज्ञः समानयत् तत्रस्थः पुरुपैरेव धर्मराजस्य शासनात् किरीटी जितवान्राजन्देशान्पञ्चगणांस्ततः ॥ १२ ॥ स देवप्रस्थमासाद्य सेनाविन्दोः पुरं प्रति 1, वलेन चतुरङ्गेण निवेशमकरोत्प्रभुः ॥ १३॥ स तैः परिवृतः सर्वैर्विष्वगश्वं नराधिपम् अभ्यगच्छन्महातेजाः पौरवं पुरुषर्षभ ! ॥ १४ ॥ विजित्य चाऽऽहवे शूरान्पार्वतीयान्महारथान् । जिगाय सेनया राजन्पुरं पौरवरक्षितम् पौरवं युधि निर्जित्य दस्यून्पर्वतवासिनः गणानुत्सव*सङ्केतानजयत्सत पाण्डवः ततःकाश्मीरकान्वीरान्क्षत्रियान्क्षत्रियर्षभः व्यजयल्लोहितं चैव मण्डलैर्दशभिःसह ॥ १७ ॥ ततस्त्रिगर्ताः कौन्तेयं दार्वाः कोकनदास्तथा चढ़ाई की । उसे गद्दी से उतारकर अर्जुन ने उत्तर पहाड़ी लोगों की सेना थी । अर्जुन ने उन पहाड़ियों उलूक देश के मोदापुर, वामदेव, सुदामा, सुसंकुल को और विष्वगश्च को भी जीत लिया। फिर पर्वतों आदि राजाओं को सहज ही अपने वश में कर लिया। पर रहनेवाले, उत्सव संकेत नाम की लुटेरी म्लेच्छ जाति फिर उनकी सहायता से पंचगण नाम के देशों को के, सात दलों को अर्जुन ने जीता । अब अर्जुन काश्मीर विजय किया । इसके पश्चात् उसने राजा सेनाविन्दु देश में पहुँचा। वहां उसने दस सामन्त राजाओं के देवप्रस्थ नाम के नगर को जीता और वहां सहित लोहित नाम के राजा को जीता ॥१७॥ से सब राजाओं को साथ लिये हुए पुरुवशी राजा आगे बढ़ने पर त्रिगर्त, दारुक और कोकनद आदि विप्वगध के सम्मुख गया ।विष्यगश्व के पास महावीर | देशों के क्षत्रिय लोग पहले से ही बहुत धन-रत्न • स्त्री पुरुषों के परस्पर प्रीति-मूलक उत्सव होना यही 'रत्यर्थ-सक्त' जिन गणों में होता है । अर्थात् विवाह-सरकार न होने से पशुतुल्य अभ्यवस्थित रति जिनमें है, उन्हें 'उत्सव संकेत' कहते हैं। PremiDMINISTRUTULIVUYVUMINEUTMUSTREITU NINTMUTANTIN MININTATTITU? Arrammarrusotiroresamosamunmummraula .

म हा भारत अध्याय २७] TITUTTuuuNTAL rinTRAIIMantram ॥ १८ ॥ DirrrrrruIATTururn - பாவாரானாகாரORE. क्षत्रिया.वहवो राजन्नुपावर्तन्त सर्वशः अभिसारी ततो रम्यां विजिग्ये कुरुनन्दनः 'उरगावासिनं चैव रोचमानं रणेऽजयत् ॥ १९ ॥ ततः सिंहपुरं रम्यं चित्रायुधसुरक्षितम् प्राधमलमास्थाय पाकशासनिराहवे ॥ २० ॥ ततः सुमांश्च चोलांश्च किरीटी पाण्डवर्षभः सहितः सर्वसैन्येन प्रामथत्कुरुनन्दनः ॥ २१ ॥ ततः परमविक्रान्तो वाहीकान्पाकशासनिः महता परिमन वशे चक्रे दुरासदान् ॥ २२ ॥ गृहीत्वा तु वलं सारं फाल्गुनः पाण्डुनन्दनः दरदान्सह काम्बोजैरजयत्पाकशासनिः ॥ २३ ॥ प्रागुत्तरां दिशं ये च वसन्त्याश्रित्य दस्यवः निवसन्ति वने ये च तान्सर्वानजयत्प्रभुः ॥ २४ ॥ लोहान्परमकाम्बोजानृपिकानुत्तरानपि सहितांस्तान्महाराज! व्यजयत्पाकशासनिः ॥ २५ ॥ ऋपिकेष्वपि संग्रामो वभूवाऽतिभयंकरः तारकामयसंकाशः परस्त्वृपिकपार्थयोः ॥ २६ ॥ स विजित्य ततो राजन्नृषिकान्रणमूर्धनि लेकर अर्जुन के समीप चले आये, उन्होंने विना युद्ध महादली वाहीक देश के राजाओं को जीता । चुनी के ही आत्म-समर्पण कर दिया। फिर अर्जुन ने हुई सेना साथ लेकर अर्जुन ने दरद और काम्बोज अभिसारी नाम की नगरी जो बड़ी रमणीक थी, उसके । के राजाओं को, पूर्व-उत्तर दिशा में रहनेवाले म्लेच्छों राजा को जीता; उरगावासी और रोचमान नाम के को तथा जगली जानियों को हराकर अपने वश में राजाओं को भी परास्त किया । और वहां से सिंहपुर कर लिया ॥१८॥२४॥ नाम नगर में जाकर,जो चित्र आयुधों से रक्षित था, फिर उमने रोह, परमकाम्बोज, पिक और युद्ध किया और वहां के राजा को जीत लिया । उचर आदि देशों के मिलकर लड़नेवाले राजाओं आगे पढ़कर सेना-महित पाण्डवश्रेष्ठ अर्जुन ने मुख को अपने बल से जीन लिया । सपिक देश के और चोल देश के राजाओं को अपने वश में कर रावा मे मर्जुन का प्रदों के युद्ध के गमान युद्ध लिया । थेर योदा धनन्जय ने यहा मारी युद्ध फरक हुआ। अन्त में प्रापिक देशी राजा हार गये, और - MMITMTATEMMITM १३२ म हा भारत सभापर्व ImanjummuTurnimamurumurarunmunaaron TUUTARITUTITUTI ॥ २७॥ -- शुकोदरसमांस्तत्र हयानष्टौ समानयत् मयूरसदृशानन्यानुत्तरानपरानपि जवनानाशुगश्चैिव करार्थं समुपानयत् ॥ २८॥ स विनिर्जित्य सङ्ग्रामे हिमवन्तं सनिष्कुटम् । श्वेतपर्वतमासाद्य न्यविशत्पुरुषर्षभः ॥ २९॥ इति श्रीमन्महाभारते सभापर्वणि दिग्विजयपर्वणि फाल्गुनदिग्विजये नानादेशविजये सप्तविंशोऽध्यायः ॥ २७॥ अर्जुन ने उनसे आठ घोड़े जिनका वर्ण तोते के | में हिमवान् और निप्कुट आदि पहाड़ी स्थानों को उदर के समान था,और बहुत से मोर का वर्ण रखने- । जीतकर श्वेत पर्वत पर आकर अपनी सेना का पडाव वाले थे 'कर' में लिये । इसके पीछे अर्जुन ने युद्ध डाल दिया ॥२५॥२९॥ सभापर्व का सत्ताईसवां अध्याय ममाप्त हुआ॥२७॥ अथ अष्टाविंशोऽध्यायः ॥ २८ ॥ वशम्पायन उवाच-स श्वेतपर्वतं वीरः समतिक्रम्य वीर्यवान् देशं किंपुरुपावासं द्रुमपुत्रेण रक्षितम् महता संनिपातेन क्षत्रियान्तकरण ह अजयत्पाण्डवश्रेष्ठः करे चैनं न्यवेशयत् तं जित्वा हाटकं नाम देशं गुह्यकरक्षितम् पाकशासनिरव्यग्रः सहसैन्यः समासदत् तांस्तु सान्त्वेन निर्जित्य मानसं सर उत्तमम् । ऋापकुल्यास्तथा सर्वा ददर्श कुरुनन्दनः सरो मानसमासाद्य हाटकानभितः प्रभुः गन्धर्वरक्षितं देशमजयत्पाण्डवस्ततः अट्ठाईमयां अध्याय ॥२८॥ वैशम्पायन कहते है-हे राजा जनमेजय ! कर हाटक नाम के देश को, जो यक्षों के द्वारा अर्जुन श्वेत पर्वत को लाँधकर किंपुरुपावास देश में सुरक्षित था, सामनीति से जीत लिया। और वहां से पहुँचा। वहां महाराज हुम के पुत्र राज्य करते थे। वहां मानससरोवर पर पहुँचकर अनेक ऋपि-कन्याओं के के बड़े भारी युद्ध में अनेक वीर क्षत्रियों का विनाश दर्शन किये ॥१॥४॥ हुआ। इसके पश्चात् वे अर्जुन के अधीन हो गये। वहां से हाटक देश के आसपाम गन्धवों से उन्होंने 'कर' देना म्वीकार कर लिया। आगे चल सुरक्षित देश को जीता । गन्धवों से उसे 'कर' के TAMILYILITICALCITAXCIVIDUNICITITITA । - RIMMI पणEOITORITICAITREETurmCECONCHI १३३ अध्याय २८] म हा भारत TITUTITUTITUTITUT ARTISUMITRuTRUJI TITUTUUUUTITUTUTIT AN TOTTARITRAATOLERenamus - तत्र तित्तिरिकल्मापान्मण्डूकाख्यान्हयोत्तमान् । लेभे स करमत्यन्तं गन्धर्वनगरान्तदा उत्तरं हरिवष तु स समासाद्य पाण्डवः इयेप जेतुं तं देशं पाकशासननन्दनः ॥ ७ ॥ तत एनं महावीर्या महाकाया महाबलाः द्वारपालाः समासाद्य हृष्टा वचनमब्रुवन् पार्थ ! नेदं त्वया शक्यं पुरं जेतुं कथंचन उपावर्तस्त्र कल्याण ! पर्याप्तमिदमच्युत ! इदं पुरं यः प्रविशेद् ध्रुवं न स भवेन्नरः प्रीयामहे त्वया वीर ! पर्याप्तो विजयस्तव न चाऽत्र किंचिजतेव्यमर्जुनाऽत्र प्रदृश्यते उत्तराः कुरवो ह्येते नाऽत्र युद्धं प्रवर्तते प्रविष्टोऽपि हि कौन्तेय ! नेह द्रक्ष्यमि किंचन । न हि मानुपदेहेन शक्यमत्राऽभिवीक्षितुम् ॥ १२ ॥ अथेह पुरुषव्याघ्र ! किंचिदन्यच्चिकीर्पसि तत्प्रब्रूहि करिष्यामो वचनात्तव भारत ! ॥ १३॥ ततस्तानब्रवीद्राजन्नर्जुनः प्रहसन्निव रूप में तितरी, कल्माप और मण्डूक आदि नामोवाले तुम्हारा साहस देखकर हम बहुत प्रसन्न हुए है । तुम - श्रेष्ठ घोड़े प्राप्त हुए । जय की इच्छा रखनेवाला । यहाँ तक दिग्विजय कर चुके, यही वहुत हो गया। अर्जुन वहां से उत्तर हरिचर्य को गया ॥५/७|| यहां पर जीतने की कोई वस्तु नहीं है। यह देश उत्तर- उस देश के भीतर पैर रखते ही महावीर्य, कुरु देश कहलाता है । यहां युद्ध नहीं हो सकता । . महाकाय, महावली, प्रसन्नमुख, द्वारपालों ने अर्जुन यहा प्रवेश करने पर भी तुम मनुष्य-दृष्टि से कुछ न के पास आकर कहा-हे अर्जुन ! इस देश में देख सकोगे । मनुष्य यहां की कोई वस्तु नहीं देख घुसने का व्यर्थ उद्योग क्यों करते हो। इस राज्य । सकता है । हे अर्जुन ! जो और यहां तुम्हारा काम को तुम किसी तरह नहीं जीत सकते । लौट जाओ, हो तो हमसे कहो, हम तुम्हारे कहने से उसे अवश्य इस स्थान में मनुष्य नहीं आ सकते । यहां तक पूरा कर देंगे ॥८॥१३॥ तुम आ गये, इतना ही बहुत है । इस गन्धर्व नगर हे राजन् ! यह सुनकर अर्जुन ने हंसकर उनसे में प्रवेश करनेवाला मनुष्य जीवित नहीं रह सकता । कहा-मैं श्रीमान् धर्मराज युधिष्ठिर का अखण्ड साम्राज्य MMITMEMATERIAL Eum PATRIMIMITATIMILAIMIMILAILY १३४ म हा भारत सभापर्व TION anmunrerru Unirurrurn unuturinn । - - - पार्थिवत्वं चिकीमि धर्मराजस्य धीमतः ॥ १४ ॥ न प्रवेक्ष्यामि वो देश विरुद्धं यदि मानुषैः युधिष्ठिराय यत्किंचित्करपण्यं प्रदीयताम् ततो दिव्यानि वस्त्राणि दिव्यान्याभरणानि च । क्षौमाजिनानि दिव्यानि तस्य ते प्रददुःकरम् ॥ १६ ॥ एवं स पुरुषव्याघ्रो विजित्य दिशमुत्तराम् संग्रामान्सुवहून्कृत्वा क्षत्रियैर्दस्युभिस्तथा ॥ १७ ॥ स विनिर्जित्य राज्ञस्तान्करे च विनिवेश्य तु धनान्यादाय सर्वेभ्यो रत्नानि विविधानि च ॥ १८ ॥ हयांस्तित्तिरिकल्मापाशुकपत्रनिभानपि मयूरसदृशानन्यान्सर्वाननिलरंहसः वृतः सुमहता राजन्वलेन चतुरङ्गिणा आजगाम पुनर्वीरः शक्रप्रस्थं पुरोत्तमम् ॥ २० ॥ धर्मराजाय तपार्थो धनं सर्वं सवाहनम् न्यवेदयदनुज्ञातस्तेन राज्ञा गृहान्ययौ इति श्रीमन्महाभारते सभापर्वणि दिग्विजयपर्वणि अर्जुनोत्तरदिग्विजये अष्टाविंशोऽध्यायः ॥ २८ ॥ स्थापित करने की इच्छा से दिग्विजय करने निकला क्षत्रियों से अनेक संग्राम करके,सब राजाओं से 'कर' हूँ। तुम्हारे इस स्थान में प्रवेश करने का यदि | वसूल करता और फिर उन्हें उनका राज्य देता हुआ, मनुष्यों को अधिकार नहीं है, तो तुम लोग महाराज बहुत सी चतुरङ्गिगी सेना साथ लेकर श्रेष्ठ पुरी युधिष्ठिर के लिये केवल कुछ 'कर' दो। मैं लौट इन्द्रप्रस्थ को लौट आया । तीतर, मोर और तोते के जाऊँगा । द्वारपालों ने अर्जुन पर प्रसन्न होकर दिव्य रङ्ग के विचित्र, वायु के समान वेग से चलनेवाले वस्त्र, रेशमी और ऊनी कपड़े, बढ़िया गहने आदि घोड़े, रत्न, धन आदि सब लेकर अर्जुन ने युधिष्ठिर सामग्री 'फर' के रूप में उसे दी । पुरुषसिंह अर्जुन को अर्पण कर दिया। फिर उनकी आज्ञा लेकर ये इस प्रकार उत्तर दिशा भर जीतकर, म्लेच्छों और अपने महलों को गये ॥१४॥२१॥ सभापर्व का अट्ठाईसवां अध्याय समाप्त हुआ। २८ ।। अथ एकोनत्रिंशोऽध्यायः वैशम्पायन उवाच-एतस्मिन्नेव काले तु भीमसेनोऽपि वीर्यवान् । धर्मराजमनुज्ञाप्य ययौ प्राची दिशं प्रति , EिAMINATIMAMI MITTIT TITTTTTTIIT HTTrmTTATTITTTTTImm.iPTITITITITIT T Famom १३५ अध्याय २९] म हा भारत TITUTitutnumanuTRICT UITUTITIATRITamuTMAITHITTERTAITHUNITED FASTHuawinawimminaury महता वलचक्रेण परराष्ट्रावमर्दिना हस्त्यश्वरथपूर्णेन दंशितेन प्रतापवान् ततो भरतशार्दूलो द्विषच्छोकविवर्धनः स गत्वा नरशार्दूलः पञ्चालानां पुरं महत् पञ्चालान्विविधोपायः सान्त्वयामास पाण्डवः । ततः स गण्डकाञ्शूरो विदेहान्भरतर्षभ! विजित्याऽल्पेन कालेन दाशार्णानजयत्प्रभुः तत्र दाशार्णको राजा सुधर्मा लोमहर्पणम् कृतवान्भीमसेनेन महाद्धं निरायुधम् भीमसेनस्तु तद् दृष्ट्वा तस्य कर्म महात्मनः अधिसेनापतिं चके सुधर्माणं महाबलम् ततः प्राची दिशं भीमो ययौ भीमपराक्रमः ॥ ७ ॥ सैन्येन महता राजन्कम्पयन्निव मेदिनीम् सोऽश्वमेधेश्वरं राजन्रोचमानं सहानुगम् जिगाय समरे वीरो वलेन बलिनां वरः IRATRACTRICT से उन्तीसवां अध्याय ॥२९॥ वैशम्पायन कहते है हे राजा जनमेजय ! | सेन ने उसको जीत लिया । और उसके बल को दिग्विजय के लिये जिस समय अर्जुन उत्तर दिशा देखकर उसे अपनी सेना का एक प्रधान सेनापति को गया था, उसी समय बलवान् भीमसेन युधिष्ठिर बनाया ॥१७॥ आज्ञा पाकर अपने साथ बड़ी भारी हाथी, घोड़े इसके उपरान्त भीमसेन पूर्व दिशा की ओर गया और रथों-सहित सेना को लेकर पूर्व दिशा को गया । और अश्वमेध देश के रोचमान नाम राजा को,अनु- था । वह पहले पाञ्चाल देश की महानगरी में गया। चरों और सैनिकों सहित, विजय किया। उसको अनेक उपायों से अपने सम्बन्धी पाञ्चालराज को जीतने के पीछे भीमसेन ने सम्पूर्ण पूर्व दिशा को अनुगत बनाकर, उनसे 'कर' लेकर, वह गण्डक बड़ी सुगमता से विजय कर लिया । और वहां से और विदेह देश में पहुँचा । थोड़े ही समय में उन्हें ! दक्षिण की ओर जाकर पुलिन्द नामी बड़े नगर को. अपने अधीन बनाकर भीमसेन ने दशार्ण देश पर और सुमित्र और सुकुमार नामी राजाओं को वश चढ़ाई की। उस देश के राजा सुधर्मा ने बिना ' में किया । इसके पश्चात् महावीर भीमसेन चेदि देश रास्त्र के भीमसेन से बड़ा युद्ध किया ! परन्तु भीम- । के महापराक्रमी राजा शिशुपाल के पास पहुँचा । HITYMILYHUDIO LIMIMEANINDMOIRAVINATALA म हा भारत [मभाप runninre urrin e Minnie MIT WILTU । SIMILIMLAIMEINwnTTARDaunmaummaNIRTAINE । स तं निर्जित्य कौन्तेयो नाऽतितीव्रण कर्मणा ॥ ९ ॥ पूर्वदेशं महावीर्यो विजिग्ये कुरुनन्दनः ततो दक्षिणमागम्य पुलिन्दनगरं महत् ॥ १०॥ सुकुमारं वशं चक्रे सुमित्रं च नराधिपम् ततस्तु धर्मराजस्य शासनाद्भरतर्षभः शिशुपालं महावीर्यमभ्यगाजनमेजय ! चेदिराजोऽपि तच्छुत्वा पाण्डवस्य चिकीर्पितम्। उपनिष्क्रम्य नगरात्प्रत्यगृह्णात्परंतपः तौ समेत्य महाराज ! कुरुचेदिवृपौ तदा उभयोरात्मकुलयोः कौशल्यं पर्यपृच्छताम् ॥ १३ ॥ ततो निवेद्य तद्राष्ट्रं चेदिराजो विशांपते ! उवाच भीमं प्रहसन्किमिदं कुरुषेऽनघ ! ॥ १४ ॥ तस्य भीमस्तदाचख्यौ धर्मराजचिकीर्पितम् सच तं प्रतिगृह्येव तथा चके नराधिपः ततो भीमस्तत्र राजन्नुपित्वा त्रिदश क्षपाः सत्कृतः शिशुपालेन ययौ सवलवाहनः इति श्रीमन्महाभारते सभापर्वणि दिग्विजयपर्वणि भीमदिग्विजये ऊनटिंगोऽध्यायः ॥२९॥ धर्मराज युधिष्ठिर की अनुमति से दिग्विजय के लिये धर्मराज के राजसूय यज्ञ करने का वृत्तान्त कहकर निकले भीमसेन के इरादे को जानकर शिशुपाल शिशुपाल से 'कर' देने के लिये कहा । राजा शिशुपार पहले से ही उसे लेने के लिये पहुँच गया। कुरुवश ने उसे आदरपूर्वक 'कर' दे दिया । भीमसेन तेरह और चेदिवश में परस्पर नातेदारी थी। उन दोनों दिन चेदि देश में रहकर, शिशुपाल के किये आदर- ने मिलकर आपस में कुशल पूछी । अपना राज्य सत्कार से प्रसन्न होकर, अपनी सेना सहित आगे। और धन सब कुछ अर्पण करके राजा शिशुपाल ने बढ़ा ॥८॥१६॥ भीमसेन से उसके आने का कारण पूछा। उसने मभापर्व का उन्तीमवा अध्याय समाप्त हुआ ॥९॥ अथ त्रिंशोऽध्याय ॥ ३० ॥ वगप्पायन उगाच ततः कुमारविषये श्रेणिमन्तमथाऽजयत् कोसलाधिपतिं चैव वृहद्वलमरिन्दम ! STATERMEDITMEETIATIVEmmTATERVICTHEATERTATIOPOLICE । -X*x- TIMATLAB

UMIDIOAMRATANTRIUIDADIMANTITUTILATIMIREMIUM
IIIII
TITUTO
TumaunimuTELEATHER.
अध्याय ३०
महा भारत
LATEGIRROWINITORImuTITUTINITIATI
अयोध्यायां तु धर्मज्ञं दीर्घयज्ञं महावलम्
अजयत्पाण्डवश्रेष्ठो नाऽतितीव्रण कर्मणा
ततो गोपालकक्षं च सोत्तरानपि कोसलान्
मल्लानामधिपं चैव पार्थिवं चाऽजयत्प्रभुः
ततो हिमवतः पार्श्व समभ्येत्य जलोद्भवम्
सर्वमल्पेन कालेन देशं चक्रे वशं बली
एवं बहुविधान्देशान्विजिग्ये भरतर्षभः
भल्लाटमभितो जिग्ये शुक्तिमन्तं च पर्वतम्
पाण्डवः सुमहावीर्यो वलेन वलिनां वरः
स काशिराजं समरे सुवाहुमनिवर्तिनम्
वशे चक्रे महाबाहुर्मीमो भीमपराक्रमः
ततः सुपार्श्वमभितस्तथा राजपतिं कथम्
युध्यमानं वलात्संख्ये विजिग्ये पाण्डवर्षभः
ततो मत्स्यान्महातेजा मलदांश्च महावलान् ॥ ८ ॥
अनघानभयांश्चैव पशुभूमिं च सर्वशः
निवृत्य च महावाहुर्मदधारं महीधरम्
तीसवा अध्याय ।। ३०॥
वैशम्पायन ने कहा-हे राजा जनमेजय ! इसके
बहुत
से देशों को जीतकर भीमसेन
पश्चात् भीमसेन ने कुमार देश में जाकर श्रेणिमान् ने अपना साम्राज्य फैलाया। फिर महावरी भीमसेन
राजा को हराया; कोशल देश के राजा बृहद्दल को । ने सम्पूर्ण भल्लाट देश को और शुक्तिमान् पर्वत के
भी परास्त किया । फिर अयोध्याधिपति धर्मज्ञ,याज्ञिक रहनेवाले पुरुषों को जीता । सुपार्श्व देश के राजा
महाबली दर्षियज्ञ नाम के राजा को उसने सहज में ही क्रथ को बलपूर्वक युद्ध में परास्त करके भीमसेन ने,
अपने अधीन कर लिया। आगे चलकर गोपालकक्ष। किसी से युद्ध में विमुम्ब न होनेवाले, काशी के राजा
और उत्तर कोशल और मल्ल देश के राजाओं को सुनाह को भी अपने अधीन बना लिया। वहा से आगे
भीमसेन ने परास्त किया। इसके पश्चात् हिमवान् ' बढ़कर पाण्डव श्रेष्ठ भीमसेन ने मत्म्य, महावली मलद,
के निकटवर्ती जलोद्भव देश में पहुँचकर उसने थोड़े अनघ, अभय आदि देशों के राजाओं मे 'कर' लेकर
ही समय में वहा के सा राजाओं से 'कर' प्राप्त पशु भूमि को अपने अधिकार में कर लिया। फिर मद-
धार, महीधर, सोमधेय आदि को जीतने के उपरान्त
numauviral
इस प्रकार
RDRIVITATIITOMUSAHIL
किया ॥१४॥

TAN TOurn UNITUTIM rwuTutoT PALJANDA. ASTRA । । १३८ सभापर्व म हा भारत PornmRINITITIVE सोमधेयांश्च निर्जित्य प्रययावुत्तरामुखः वत्सभूमिं च कौन्तेयो विजिग्ये बलवान्बलात् ॥ १० ॥ भर्गाणामधिपं चैव निषादाधिपतिं तथा विजिग्ये भूमिपालांश्च मणिमत्प्रमुखान्वहून् ॥ ११ ॥ ततो दक्षिणमल्लांश्च भोगवन्तं च पर्वतम् तरसैवाऽजयद्भीमो नाऽतितीव्रण कर्मणा ॥ १२ ॥ शर्मकान्वर्मकांश्चैव व्यजयत्सान्त्वपूर्वकम् वैदेहकं च राजानं जनकं जगतीपतिम् ॥ १३ ॥ विजिग्ये पुरुषव्याघो नाऽतितीत्रेण कर्मणा शकांश्च बर्बरांश्चैव अजयच्छद्मपूर्वकम् वैदेहस्थस्तु कौन्तेय इन्द्रपर्वतमन्तिकात् किरातानामधिपतीनजयत्सप्त पाण्डवः ॥ १५ ॥ ततः सुह्मान्प्रसुमांश्च सपक्षानपि वीर्यवान् विजित्य युधि कौन्तेयो *मागधानभ्यधावली ॥ १६ ॥ दण्डं च दण्डधारं च विजित्य पृथिवीपतीन् तैरेव सहितैः सगिरिव्रजमुपाद्रवत् ॥ १७॥ जारासन्धि सान्त्वयित्वा करे च विनिवेश्य ह । भीमसेन उत्तर मुख को घूम पड़ा ।५।९।। ॥१०११॥ उधर उसने वत्सभूमि, भर्गराज, निषादपति और वेदेह देश में ही टहरकर भीमसेन ने इन्द्रपर्वत मणिमान् आदि बहुत से राजाओं को अपने अनुगत के पास रहनेवाले किरात जानि के सात राजाओं को बनाया। वहां से दक्षिण मल्ल देश और भौगवान् पर्वत । जीत लिया। वहां से मुझ और प्रमुझ देश के राजाओं के राजाओं को महल में ही परास्त करता हुआ वह को उनके सहायकों-सहित जीनकर महाबली भीममेन आगे बढ़ा। गर्मक और वर्मक राजा आप ही उसके मगध देश में पहुंचा । वहां दण्ड,दण्डधार आदि राजा- अधीन हो गये । पुरुषमिह भीमगेन ने विदेह देश के ओं को जीतकर उनको अपने साथ लिये हुए गाममेन राजा जनक मे अनायाम ही 'कर' पाकर उन्हें अपने गिरिमज में पहुना । वहां जरामन्ध के पुत्र सहदेव को अनुगत पनाया ! आगे यदकर उसने नीति-कागल. दादम बंधाकर, और उमे कग्द राजा बनार, अधी- पूर्वक शक और वर जातियों को अपने अधीन किया नन्थिन मर राजाओं को माध रिय हुए भीमसन ने • मग सगब मालिकों को 'भो, एमा कहा। CrimITORITERPREETTEPTorrrrrEPTErrrrrrent म हा भा र त अध्याय ३०] IMINISTITUTION ॥ १८ ॥ STETRINGTOURIOTITUTrum Tamanner.chut FITORI CONTanurroudMm तैरेव सहितः सर्वैः कर्णमभ्यद्रवदली स कम्पयन्निव महीं चलेन चतुरङ्गिणा युयुधे पाण्डवश्रेष्ठः कर्णेनाऽमित्रघातिना स कर्ण युधि निर्जित्य वशे कृत्वा च भारत! । ततो विजिग्ये वलवान्राज्ञः पर्वतवासिनः अथ मोदागिरों चैव राजानं वलवत्तरम् पाण्डवो वाहुवीर्येण निजघान महामृधे ॥ २१ ॥ ततः पुण्ड्राधिपं वीरं वासुदेवं महाबलम् • कोशिकीकच्छनिलयं राजानं च महौजसम् ॥ २२ ॥ उभौ बलभृतो वीरावुभौ तीवपराक्रमौ निर्जित्याऽऽजी महाराज ! वङ्गराजमुपाद्रवत् ॥ २३ ॥ समुद्रसेनं निर्जित्य चन्द्रसेनं च पार्थिवम् ताम्रलिप्तं च राजानं कवटाधिपति तथा ॥ २४ ॥ सुह्मानामधिपं चैव ये च सागरवासिनः सर्वान्म्लेच्छगणांश्चैव विजिग्ये भरतर्षभः ॥ २५ ॥ एवं बहुविधान्देशान्विजित्य पवनात्मजः वसु तेभ्य उपादाय लोहित्यमगमद्वली स सर्वान्म्लेच्छनृपतीन्सागरानूपवासिनः करमाहारयामास रत्नानि विविधानि च ॥ २७॥ चन्दनागुरुवस्त्राणि मणिमौक्तिककम्बलम् काञ्चनं रजतं चैव विद्रुमं च महाधनम् ॥ २८॥ अङ्ग देश के राजा कर्ण के ऊपर चढ़ाई कर दी। युद्ध में मार डाला। अब पुण्डू नरेश वासुदेव, कौशिकी- कच्छ ( जलप्रायदेश) के राजा, वङ्ग देश के समुद्रसन चतुरङ्गिणी सेना के बोझ से पृथ्वी को कॅपाते और चन्द्रसेन, ताम्रलिप्त नरेश, कर्वट देश के राजा, हुए बलवान् भीमसेन ने युद्ध में कर्ण को भी जीत- मुलाधिप और समुद्रतट के निवासी अनेक म्लेच्छों कर वश में कर लिया। फिर उसने कई प्रबल पहाड़ी को जीतता हुआ भीमसेन लौहित्य देश में पहुँचा राजाओं को परास्त किया। आगे बढ़कर मोदा-पर्वत ॥१९॥२५॥ पर जाकर, उसने वहां के बहुत ही वली राजा को बाहुः इस प्रकार मब देशों को जीनते आ रहे भीमसेन ACamzUmrauent .. WITUTTARAICH ॥१५॥१८॥ - IMIT Bria INTUNTAIMIMMATIOMANITY RTICTIVITAMINIMINIMITIVATIONAL समापर्व महाभारत ournrammarmunmuTurmmmmmunmunnamrunmummmmmmmmmmar rerroririr ते कोटिशतसंख्येन कौन्तेयं महता तदा अभ्यवर्षन्महात्मानं धनवर्षेण पाण्डवम् ॥ २९॥ इन्द्रप्रस्थमुपागम्य भीमो भीमपराक्रमः निवेदयामास तदा धर्मराजाय तद्धनम् ॥३०॥ इति श्रीमन्महाभारते सभापर्वणि दिग्विजयपर्वणि भीमप्राचीदिग्विजये त्रिंशोऽध्यायः ॥३०॥ ने समुद्रतट के सब म्लेच्छ राजाओं से 'कर' के रूप पदार्थ प्राप्त किये । पूर्व दिशा को अच्छी तरह में विविध विचित्र रत्न, चन्दन, अगुरु, वस्त्र, मणि, | जीतकर भीमसेन इन्द्रप्रस्थ को लौट आया । उसने मोती, कम्बल, सोना, चांदी, मूंगे आदि बहुत से वह सब धन युधिष्ठिर को अर्पण कर दिया ॥२६॥३०॥ सभापर्व का तीसवां अध्याय समाप्त हुआ ॥ ३०॥ - । - अथ एकत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३१ ॥ वैशम्पायन उवाच-तथैव सहदेवोऽपि धर्मराजेन पूजितः महत्या सेनया राजन्प्रययौ दक्षिणां दिशम् ॥ १ ॥ स शूरसेनान्कात्स्न्येन पूर्वमेवाऽजयत्प्रभुः मत्स्यराजं च कौरव्यो वशे चके वलाङ्कली ॥ २ ॥ अधिराजाधिपं चैव दन्तवक्त्रं महावलम् जिगाय करदं चैव कृत्वा राज्ये न्यवेशयत् सुकुमारं वशे चक्रे सुमित्रं च नराधिपम् तथैवाऽपरमत्स्यांश्च व्यजयत्स पटच्चरान् निपादभूमि गोशृङ्गं पर्वतप्रवरं तथा तरसेवाऽजयद्धीमाञ्छ्रेणिमन्तं च पार्थिवम् इकतीमवां अध्याय ॥ ३१ ॥ वैशम्पायन ने कहा-हे राजा जनमेजय ! | देने का निवध करके फिर उस राजसिंहासन पर अब हम सहदेव के दिग्विजय का वृत्तान्त कहते बैठा दिया और सुकुमार, सुमित्र नामी राजाओं और है, जो महाराज युधिष्ठिर की आज्ञा से चतुरक्षिणी पटवरों-सहित मत्स्यों को विजय किया। वहां से चलकर सेना लेकर दक्षिण दिशा को गया था। उसने पहले महदेव ने निषादभूमि-गोशंग पर्वत और राजा श्रेणिमान् शूरमेन और मत्स्य देश के राजाओं को युद्ध करके को पराजय किया । फिर नरराष्ट्र देश को जीतकर यश में किया। फिर राजा दंतयक को, जो मय यह भीघ्र राजा कुन्तिभान के देश में पहुँचा । राजाओं का अधिपति घा, जीना। और उममे 'कर' कुन्तिमोज ने बड़ी प्रममता मे 'कर' देकर उसकी HTTrrrrrrrrrrrrrrenouTECremarareerCreacticurrencreacterest - १४१ अध्याय ३१] म हा भारत ETANA TAITIFam TururupurTUTITUTITUTRUTTITUDUTUITAITINITIATIMES -noimarAARimiri PALAPostmunANTAR - பாகனாகாரகாராயை नरराष्ट्रं च निर्जित्य कुन्तीभोजमुपाद्रवत् प्रीतिपूर्वं च तस्याऽसौ प्रतिजग्राह शासनम् ॥ ६ ॥ ततश्चर्मण्वतीकूले जम्भकस्याऽऽत्मजं नृपम् ददर्श वासुदेवेन शोपितं पूर्ववैरिणा ॥ ७ ॥ चक्रे तेन स संग्राम सहदेवेन भारत ! स तमाजौ विनिर्जित्य दक्षणाभिमुखो ययो ॥ ८ ॥ सेकानपरसेकांश्च व्यजयत्सुमहाबलः करं तेभ्य उपादाय रत्नानि विविधानि च ततस्तेनैव सहितो नर्मदामभितो ययौ विन्दानुविन्दावावन्त्यौ सैन्येन महता वृतो ॥ १० ॥ जिगाय समरे वीरावाश्विनेयः प्रतापवान् ततो रत्नान्युपादाय पुरं भोजकटं ययौ ॥ ११ ॥ तत्र युद्धमभूद्राजन्दिवसद्वयमच्युतम् स विजित्य दुराधर्ष भीष्मकं माद्रिनन्दनः ॥ १२ ॥ कोसलाधिपतिं चैव तथा वेणातटाधिपम् कान्तारकांश्च समरे तथा प्राकोशलान्नृपान् ॥ १३ ॥ नाटकेयांश्च समरे तथा हेरम्बकान्युधि अधीनता स्वीकार कर ली। फिर वह वहा से चलकर महदेव का सामना किया। उन्हें भी जीतकर उनसे चर्मण्यती (चंबल) नदी के किनारे पहुंचा ॥१॥६॥ बहुत से रन आदि लेकर वह भोजकट नाम नगर वहां पहुंचकर जम्भक राजा के पुत्र के साथ को गया ॥७॥११॥ उसने बड़ा भारी युद्ध किया। पहले के वैरी श्रीकृष्ण ने | वहा दो दिन बराबर युद्ध करके उमने मीप्मक पहले ही युद्ध करके उसका बल घटा दिया था। उसे राजा को परास्त किया । वहा मे कोशल-नरेश वेणा जीतकर सहदेव और आगे दक्षिण दिशा में बढ़ा । मेक नदी की तटभूमि के गजा और कान्तारक लोगों को और अपरसेक देशों के राजाओं को जीतकर उनमे जीता। फिर प्रायोगल,नाटकेय, हेरम्यक, मारुष आदि 'कर' में सहदेव ने अमित धन और असहय श्रेष्ठ राजाओं को युद्ध में पराजय किया। इसके पश्चात् रममाप्त किये। फिर उन सबको साथ रेकर वह सहदेव ने बलपूर्वक रम्यग्राम पर चढ़ाई की । वहां नर्मदा नदी के किनारे पर पहुँचा । अवन्ती देश के भी विजय पाकर वह आगे बढ़ा। और नाचीन, अचुक राजा विन्द और अनुविन्द ने बहुत सी सेना लेकर आदि जाली राजाओं को युद्ध में हराकर उमने १४२ म हा भारत सभापर्व FromrusainamurturnjunuTuINITUTION TUTUITTTTTTTorrrrrrorum ॥१४॥ | LETTIIIMMITMENTARNIRMALMANIAMMIMUMMYAMINATANDINITIAMITIHINTAIL sarduaaptarnamrinkertuxxxsaxmamilimvita - मारुधं च विनिर्जित्य रम्यग्राममथो वलात् नाचीनानवुकांश्चैव राज्ञश्चैव महावलः तांस्तानाटविकान्सर्वानजयत्पाण्डुनन्दनः ॥ १५ ॥ वाताधिपं च नृपति वशे चक्रे महाबलः पुलिन्दांश्च रणे जित्वा ययौ दक्षिणतः पुरः युयुधे पाण्ड्यराजेन दिवसं नकुलानुजः तं जित्वा स महावाहुः प्रययौ दक्षिणापथम् ॥ १७ ॥ गुहामासादयामास किष्किन्धां लोकविश्रुताम् । तत्र वानरराजाभ्यां मैन्देन द्विविदेन च युयुधे दिवसान्सप्त न च तौ विकृतिं गतौ ॥ १८॥ ततस्तुष्टौ महात्मानो सहदेवाय वानरौ ऊचतुश्चैव संहृष्टौ प्रीतिपूर्वमिदं वचः गच्छ पाण्डवशार्दूल ! रत्नान्यादाय सर्वशः अविघ्नमस्तु कार्याय धर्मराजाय धीमते ॥ २० । ततो रत्नान्युपादाय पुरीं माहिष्मती ययो तत्र नीलेन राज्ञा स.चक्रे युद्धं नरर्पभः ॥ २१ ॥ पाण्डवः परवीरघ्नः सहदेवः प्रतापवान् अपने वश में कर लिया; आगे चल कर राजा वाताधिप । हम तुम्हें 'कर' के रूप बहुत से श्रेष्ठ रन और पुलिन्द लोगों को वश में किया॥११११५॥ देते है। इन्हें लेकर तुम आगे जाओ। उनसे रन फिर एक दिन घोर युद्ध करके पाण्ड्य देश लेकर महदेव आगे बढ़कर माहिष्मती पुरी में पहुंचा। के राजा को अधीन बनाकर सहदेव दक्षिण दिशा में उस नगरी के राजा पराक्रमी नील के साथ सहदेव और आगे बढ़ा । वहां से वह लोकप्रसिद्ध किष्किन्धा । को घमासान युद्ध करना पड़ा । वहां के घोर युद्ध गुफा के समीप पहुँचा, और वहां पर वानरों के मैद में असंख्य सेना का नाश हो गया। प्राणों के लिये और द्विविद नाम राजाओं से सात दिन तक युद्ध संशयजनक उस युद्ध में भगवान् अग्नि राजा नील हुआ । सहदेव का शौर्य, वीर्य, साहस आदि देखकर के सहायक थे । अग्नि का कोप होने से सहदेव की वे वानर बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने सहदेव से कहा सेना के रथ, घोड़े, हाथी, पैदल और उनके फवन हे पाण्डुनन्दन ! हम धर्मराज युधिष्ठिर के कार्य में जलते हुए चारों ओर दिखाई पड़ने लगे। यह देखकर विम डालना नहीं चाहते ॥१६॥२०॥ । महदेव ने बहुत आश्चर्य माना । बहुत विचार करने में । ATTITIWITWARITICTomarAmAATEELATEDITORmuraram लेकर इस कारण से बैठा करता था, कि जबतक वह कन्या अपने होठों से पूँक नहीं मारती थी, तबतक .- நாடாாாாாாாா । अध्याय ३१] म हा भारत १४३ ImmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmuTIITTORIES ततोऽस्य सुमहद्युद्धमासीद्भीरुभयङ्करम् ॥ २२ ।। सैन्यक्षयकरं चैव प्राणानां संशयावहम् चक्रे तस्य हि साहाय्यं भगवान्हव्यवाहनः ततो रथा हया नागाः पुरुषाः कवचानि च प्रदीप्तानि व्यदृश्यन्त सहदेवबले तदा ॥ २४ ॥ ततः सुसंभ्रान्तमना वभूव कुरुनन्दनः नोत्तरं प्रतिवक्तुं च शक्तोऽभूजनमेजय ! ॥ २५ ॥ जनमेजय उवाच-किमर्थ भगवान्वह्निः प्रत्यमित्रोऽभवद्युधि सहदेवस्य यज्ञार्थं घटमानस्य वै द्विज ! ॥ २६ ॥ वैशम्पायन उवाच-तत्र माहिष्मतीवासी भगवान्हव्यवाहनः श्रूयते हि गृहीतो वै पुरस्तात्पारदारिकः ॥ २७॥ नीलस्य राज्ञो दुहिता बभूवाऽतीव शोभना साऽग्निहोत्रमुपातिष्ठद्वोधनाय पितुः सदा ॥ २८ ॥ व्यजनैधूयमानोऽपि तावत्प्रज्वलते न सः यावच्चारुपुटोप्टेन वायुना न विधूयते ॥ २९ ॥ ततः स भगवानग्निश्चकमे तां सुदर्शनाम् नीलस्य राज्ञः सर्वेषामुपनीतश्च सोऽभवत् ॥३०॥ पर भी उस समय उसे इस आपत्ति से बचने का पंखे की भी वायु से अग्नि नहीं जलती थी। अग्निदेव कोई उपाय न देख पड़ा ॥२१।२५|| उस कन्या के म्वरूप को देखकर ऐमे कामासक्त यह सुनकर राजा जनमेजय ने वेशम्पायन जी । हो गये कि सुन्दर ब्राह्मण का रूप धारण कर उस पूछा-हे महाराज ! सहदेव तो अग्नि में ही कन्या से इच्छापूर्वक रमण करने लगे ॥२६॥३०॥ यज्ञ करने के लिये यत्न कर रहा था, फिर किस कारण जब अमिदेव राजा का अनादर करके उनके यहां से अमि ने सहदेव की सेना को जलाया और अन्य नगरवासियों के यहां भी जाफर मनमाना मुनकर वैशम्पायन जी बोले-मुना जाता है कि आचरण करने लगे और राजा को यह सूचना मिली, राजा नील की एक परम रूपवती सर्वाङ्ग-मुन्दरी कन्या तब धार्मिक राजा ने कुपित होकर ब्राह्मण का रूप थी। राजा उसको अग्निहोत्र के समय अपने पास धारण करनवाले अमि को, शास्त्र की विधि के अनु- सार, दण्ड देने का उद्योग किया । इससे रुष्ट होकर अमिदेव प्रलयकाल के समान भयानक रूप लेकर NETITImmmmmmmmmmmuTETTER unit war nur ArnTRIART AT ART MITTITUT ROTATI से ? यह -- १४४ म हा भा र त सभापर्व irrornraruramERITTENTITUTTuomonymnuTINITIATIMES worsmaraNamasan ततो ब्राह्मणरूपेण रममाणो यदृच्छया चकमे तां वरारोहां कन्यामुत्पललोचनाम् ॥३१॥ तं तु राजा यथाशास्त्रमशासद्धार्मिकस्तदा प्रजज्वाल ततः कोपाद्भगवान्हव्यवाहनः ॥ ३२ ॥ तं दृष्ट्वा विस्मितो राजा जगाम शिरसाऽवनिम् । ततः कालेन तां कन्यां तथैव हि तदा नृपः ॥ ३३ ॥ प्रददौ विप्ररूपाय वह्नये शिरसा नतः प्रतिगृह्य च तां सुभ्रं नीलराज्ञः सुतां तदा ॥३४॥ चक्र प्रसादं भगवांस्तस्य राज्ञो विभावसुः वरेण च्छन्दयामास तं नृपं विष्टकृत्तमः ॥ ३५ ॥ अभयं च स जग्राह स्वसैन्ये वै महीपतिः ततः प्रभृति ये केचिदज्ञानात्तां पुरी नृपाः ॥३६ ॥ जिगीपन्ति वलाद्राजस्ते दह्यन्ते स्म बहिना तस्यां पुर्यां तदा चैव माहिष्मत्यां कुरूद्वह ! ॥३७॥ वभूवुरनतिग्राह्या योपितश्छन्दतः किल एवमग्निवरं प्रादास्त्रीणामप्रतिवारणे ॥ ३८ ॥ स्वरिण्यस्तत्र नार्यों हि यथेष्टं विचरन्त्युत राजा के राज्य में प्रज्वलित हो उठे। यह आश्चर्य । हो ॥३१॥३६॥ घटना देखकर राजा डर गया । वह अग्नि की शरण 'ऐसा ही होगा' कहकर अमिदेव अन्तर्द्वान हो में आया और दण्डवत् प्रणाम करके उन्हें शान्त गये । हे राजन् ! उस समय से जो कोई राजा बिना करने की चेष्टा करने लगा। राजा ने ब्राह्मण-रूपधारी जाने उस पुरी को जीतने की इच्छा से जाता था उस आमि के साथ उस कन्या का विवाह कर दिया । को सेना-सहित अग्निदेव भम्म कर देते थे। [ इसी उस कन्या को पाकर, अमिदेव बहुत प्रसन्न और कारण जय की आगा से कोई राजा माहिष्मती-पुरी शान्त हुए और राजा नील पर कृपा करके कहने लगे पर चढ़ाई करने की हिम्मत नहीं करता था। कि जो कुछ इच्छा हो सो वरदान मांगो। यह सुनकर नील राजा की कन्या से अग्नि का विवाह हो चुकने राजा नील ने कहा-हे महाराज ! कोई भी गत्रु पर स्त्रियाँ, अग्नि के वरदान से स्वेच्छाचारिणी हो मुझपर चढ़ाई करके मेरा कुछ अनिष्ट न कर सके। गई। तब से वहां की स्त्रियां स्वरिणी रहती है और किसी शत्रु से मुझे और मेरी सेना को कोई भय न । राजा लोग अग्नि के भय से उस पुरी को विजय करने ImamaliaTRITTvamracarone -- -- EARNar.arroraram TITUDITIOVImmumoMgroMINATAPGrammarArmource १४५ अध्याय ३१] म हा भारत TAITAR MONITY Prernmun - ITCOITOTO ORIRITUITION वर्जयन्ति च राजानस्तत्पुरं भरतर्षभ ॥ ३९ ॥ भयादग्नेर्महाराज तदा प्रभृति सर्वदा सहदेवस्तु धर्मात्मा सेन्यं दृष्ट्वा भयादितम् ॥ १०॥ परीतमग्निना राजन्नाऽकम्पत यथाऽचलः उपस्पृश्य शुचिर्भूत्वा सोऽब्रवीत्पावकं ततः ॥२१॥ सहदेव उवाच-त्वदर्थोऽयं समारम्भः कृष्णवर्त्मन्नमोऽस्तु ते मुखं त्वमसि देवानां यज्ञस्त्वमसि पावक ! ॥ ४२ ॥ पावनात्पावकश्चाऽसि वहनाद्धव्यवाहनः वेदास्त्वदर्थं जाता वै जातवेदास्ततो ह्यसि ॥४३॥ चित्रभानुः सुरेशश्च अनलस्त्वं विभावसो स्वर्गद्वारस्पृशश्चाऽसि हुताशो ज्वलनः शिखी ॥ ४४ ॥ वैश्वानरस्त्वं पिनेशः प्लवङ्गो भूरितेजसः कुमारसूस्त्वं भगवान्रुद्रगर्भो हिरण्यकृत् ॥४५॥ अग्निर्ददातु मे तेजो वायुः मे पृथिवी वलमादध्याच्छिवं चाऽऽपो दिशन्तु मे॥ ४६ ॥ अपांगर्भ ! महासत्त्व ! जातवेदः ! सुरेश्वर ! देवानां मुखमग्ने ! त्वं सत्येन विपुनीहि माम् ॥ ४७ ॥ को नहीं जाते हैं । सो हे राजा जनमेजय! अपनी सेना | विभावसु, आकाश को स्पर्श करनेवाला, हुताशन, को अग्नि में जलती हुई देखकर सहदेव तनिक भी ज्वलन, शिखि, वैश्वानर, पिंगेश, प्लवङ्ग, भूरितेजा, विचलित नहीं हुआ, किन्तु शुद्ध होकर आचमन कार्तिकेय कुमार का उत्पत्तिस्थान, भगवान् रुद्रगर्भ करके अग्नि की स्तुति करने लगा।॥३७॥४१॥ और हिरण्यरेता आदि नामों से लोग पूजते है । मुझे हे अग्निदेव ! यह दिग्विजय का उद्योग यज्ञ करके आप अमिरूप से तेज, वायुरूप से प्राण, पृथ्वीरूप से आप की ही आराधना के लिये किया जा रहा है । वल और जलरूप से कल्याण दीजिये। हे भगवन् ! आप देवताओं के पवित्र मुख हैं । यज्ञ भी आपका जल की उत्पत्ति आप से ही हुई है । आप महासत्त्व ही रूप है। आप का नाम पवित्र होने के कारण से और श्रेष्ठतत्त्व हैं । आप देवताओं में श्रेष्ठ, देवताओं पावक और हव्य को धारण करने से हव्यवाहन है । वद | का मुख और पवित्र रूप हैं । आप सत्य के द्वारा. आप ही (यज्ञ) के लिये उत्पन्न हुए है,इसी से आप का , मुझे पवित्र कीजिए। ऋषि, ब्राह्मण, देवता और असुर नाम 'जातवेदा है। आपको चित्रभानु, सुरेश, अनल, आदि नित्य हवन करके आप की आराधना करते हैं। प्राणं ददातु । MIMIMMIMIMILANMAIL LADAULI ALTIMILAIMEREmmmmIOAMIRSITIMADIDI सभापर्व म हा भारत SumnimunrumATTATU muTUNTURIm TUTruron MIUITUITUTITUTIOuturn - MInMummon -- Pahatamann.com.mammimran.mummunisms ऋषिभिर्ब्राह्मणैश्चैव दैवतैरसुरैरपि नित्यं सुहुत ! यज्ञेषु सत्येन विपुनीहि माम् . ॥४८॥ धूमकेतुः शिखी च त्वं पापहाऽनिलसंभवः सर्वप्राणिषु नित्यस्थः सत्येन विपुनीहि माम् ॥ ४९ ॥ एवं स्तुतोऽसि भगवन्प्रीतेन शुचिना मया तुष्टिं पुष्टिं श्रुतं चैव प्रीतिं चाऽग्ने ! प्रयच्छ मे ॥ ५० ॥ वैशम्पायन उवाच -इत्येवं मन्त्रमाग्नेयं पठन्यो जुहुयाद्विभुम् ऋद्धिमान्सततं दान्तः सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ ५१ ॥ सहदेव उवाच-यज्ञविघ्नमिमं कर्तुं नार्हस्त्वं हव्यवाहन ! एवमुक्त्वा तु माद्रेयः कुशैरास्तीर्य मेदिनीम् ॥ ५२ ॥ विधिवत्पुरुषव्याघः पावकं प्रत्युपाविशत् प्रमुखे तस्य सैन्यस्य भीतोद्विग्नस्य भारत ! ॥ ५३॥ न चैनमत्यगावहिर्वेलामिव महोदधिः तमुपेत्य शनैर्वह्निरुवाच कुरुनन्दनम् ॥ ५४ ॥ सहदेवं नृणां देवं सान्त्वपूर्वमिदं वचः उत्तिष्ठोत्तिष्ट कौरव्य ! जिज्ञासेयं कृता मया ॥ ५५ ॥ वेद्मि सर्वमभिप्रायं तव धर्मसुतस्य च धूमकेतु, शिखी, पापनाशक, वायु से उत्पन्न, सब महाराज युधिष्ठिर के यज्ञ में विश डालना आपको प्राणियों में नित्य स्थित आदि नामों और गुणों से उचित नहीं। पुरुपसिंह सहदेव कुशासन बिछाकर सब लोग आपकी स्तुति करते हैं । आप सत्य के डरी और घबराई हुई अपनी सेना के आगे अमि द्वारा मुझे पवित्र कीजिए । हे महाराज ! मैं प्रीति- के निकट ही बैठ गया। यह देखकर अमि आग को पूर्वक आपकी स्तुति करता हूँ। आप मुझे वृद्धि, | इस प्रकार से नहीं बढ़ी, समुद्र अपनी प्रीति, ज्ञान और मुख दीजिए ॥४२॥५०॥ से आगे को नहीं बढ़ता है ॥५१॥५४॥ पैशम्पायन ने कहा- हे राजा जनमेजय! सहदेव और फिर अग्निदेव ने उसके पास आकर ने इस आमेय मन्त्राष्टक से अमि की स्तुति की 1जो मांत्यपूर्वक धीरे से कहा कि हे सहदेव ! उठ खड़ा मनुष्य जितेन्द्रिय होकर इन मन्त्रों से अगि में हवन हो । मैं तेरे और महाराज युधिष्ठिर के अभिप्राय को करता है, उसके सब पाप दूर हो जाते है । स्तुति जानता हूँ । परन्तु इस पुरी की रक्षा करना मुझको करने के पीछे सहदेव अमिदेव से पाला-हे अनिदेय! टम समय तक अवश्य है, जब तक राजा नील का । । - मयांदा - 'MOTIOHDIMmmumouTOTUWWIDTIOD RECTOmPORTI १४७ अध्याय ३१] म हा भारत PuTUNTUUUT TUTITUTITICIUITTuuuN TruINXIIATIO OtnuarurUTY गयाmaiamIINITIERRIEN मया तु रक्षितव्येयं पुरी भरतसत्तम ! ॥ ५६ ॥ यावद्राज्ञो हि नीलस्य कुले वंशधरा इति ईप्सितं तु करिष्यामि मनसस्तव पाण्डव! ॥ ५७ ॥ तत उत्थाय हृष्टात्मा प्राञ्जलिः शिरसा नतः । पूजयामास माद्रेयः पावकं भरतर्षभ! ॥ ५८ ॥ पावके विनिवृत्ते तु नीलो राजाऽभ्यगात्तदा पावकस्याऽऽजया चैनमर्चयामास पार्थिवः ॥ ५९ ॥ सत्कारेण नरव्याघ्र सहदेवं युधां पतिम् प्रतिगृह्य च तां पूजां करे च विनिवेश्य च माद्रीसुतस्ततः प्रायाद्विजयी दक्षिणां दिशम् ॥ ६०॥ त्रैपुरं स्ववशे कृत्वा राजानममितौजसम् निजग्राह महावाहुस्तरसा पोरवेश्वरम् ॥ ६१ ॥ आकृति कौशिकाचार्यं यत्नेन महता ततः वशे चक्र महावाहुः सुराष्ट्राधिपतिं तदा ॥ ६२ ॥ सुराष्ट्रविषयस्थश्च प्रेषयामास रुक्मिणे राक्षे भोजकटस्थाय महामात्राय धीमते ॥६३ ॥ भीष्मकाय स धर्मात्मा साक्षादिन्द्रसखाय वै । यहाँ वंश रहेगा। तू उठ, मैं तेरी मनोकामना को अधीन किया । फिर पौरवेश्वर को जीतकर सुराष्ट्र पुरा करूँगा। यह सुनकर सहदेव बड़ा प्रसन्न हुआ देश के राजा कौशिकाचार्य आकृति को उसने बड़े और हाथ जोड़कर नम्रता से अग्नि का पूजन किया युद्ध के उपरान्त अपने अधीन किया । सुराष्ट्र देश में ही ठहरकर सहदेव ने भोजकटपुर के राजा रुक्मी अग्नि के शांत हो जाने पर, उनकी आज्ञा और राजा भीप्मक के पास जो इन्द्र का मित्र था, अनुसार, राजा नील ने सहदेव की अधीनता अपना दून भेजा । अपने पुत्र रुम्मी-सहित भीष्मक स्वीकार कर ली। वह उससे आर मिला और 'कर' ने प्रमन्नतापूर्वक युधिष्ठिर की अधीनता स्वीकार कर के रूप में अनेक रत्न और धन देकर उसने वीर- ली, और 'कर' के रूप में अनेक श्रेष्ठ रत्न अर्पण श्रेष्ठ सहदेव की पूजा की। सहदेव विजय पाकर और किये । उनके इस प्रकार अधीनता स्वीकार कर लेने आगे बढ़ा । दक्षिण दिशा में स्थित त्रिपुर-राज्य में का कारण यह भी था कि उनकी कन्या रुक्मिणी पहुंचकर वहां के बड़े पराक्रमी राजा को उसने अपने , वासुदेव को व्याही थी ॥६०।६६॥ । சாராராராரா) ॥५५/५९॥ म के MUMHANIMLMMITML MUMMYe WEREDATALATHMAND १४८ म हा भारत समान Tuutnumarimmun ATMrudurerouTIN WUTTITTONITORITERATUUNTEERUT ॥ ६४॥ । .. - - स चाऽस्य प्रतिजग्राह ससुतः शासनं तदा प्रीतिपूर्व महाराज! वासुदेवमवेक्ष्य च ततः स रत्नान्यादाय पुनः प्रायायुधां पतिः ततः शूर्पारकं चैव तालाकटमथापि च वशे चक्रे महातेजा दण्डकांश्च महाबलः सागरद्वीपवासांश्च नृपतीन्म्लेच्छयोनिजान् निषादान्पुरुषादांश्च कर्णप्रावरणानपि ये च कालमुखा नाम नरराक्षसयोनयः कृत्स्नं कोल्लगिरिं चैव सुरभीपट्टनं तथा द्वीपं ताम्राह्वयं चैव पर्वतं रामकं तथा तिमिनिलं च स नृपं वशे कृत्वा महामतिः ॥ ६९ ॥ एकपादांश्च पुरुपान्केरलान्वनवासिनः नगरी संजयन्ती च पापण्डं करहाटकम् ॥ ७० ॥ दूतैरेव वशे चक्रे करं चैनानदापयत् पाण्ड्यांश्च द्रविडांश्चैव सहितांश्चोण्डूकेरलैः ॥ ७१ ॥ अन्ध्रांस्तालवनांश्चैव कलिङ्गानुष्ट्रकर्णिकान् आटवीं च पुरी रम्यां यवनानां पुरं तथा ॥ ७२ ॥ यहां से आगे बढ़कर शूर्पारक, तालाकटक, दण्डक ! केरल जाति के लोगों, सञ्जयन्ती नगरी के राजा और आदि के पास जाकर उन्हें महावली सहदेव ने अपने पापण्ड देश तथा करहाटक देश के राजा को सहदेव अधीन बनाया । फिर समुद्र के टापुओं में और ने अपने अनुगत बना लिया । पाण्ड्य द्रविड़, उण्डू किनारे पर रहनेवाले म्लेच्छ राजाओं को, नर-मांस केरल, अन्ध्र, तालबन, कलिग, उप्ट्रकर्णिक, आटवी सानेवाले निपादों को और कर्ण-प्रावरण, नाम रम्यपुरी और यवनों की नगरी में दूत भेजकर आदि मनुष्यरूप-धारी राक्षसों को भी जीतकर उन्होंने । उनसे भी अनायास कर ले लिया ॥६७/७१॥ वश में किया। सम्पूर्ण कोलगिरि सुरभीपट्टन, ताग्राहय- समुद्र तट के कच्छ देश में पहुंचकर सहदेव ने द्वीप, रामपर्यंत आदि अनेक स्थानों पर अपना अधि- पुलम्त्यवगी राजा विभीषण के पास अपना दूत भेजा। कार जमाते हुए महदेव ने तिमिशिल नाम के राजा महात्मा विभीषण ने प्रसन्नतापूर्वक युधिष्ठिर के गामन को जीता, और उम से 'कर' लिया । उपरान्त दूतों को स्वीकार कर लिया और 'कर' के रस में अनेक यो ही भेजकर एफ-पाद पुरषों, वन के रहनेवाले । रल, चन्दन और अगुरु की सुगन्धित नाड़ियां तया - कालमुख MOTIVATCHITISITORITAMmmm IHITIOMMIDINAMANTIMILAIIMILIMDIVITMMM १४९ अध्याय ३२] म हा भारत TUITIEI TOTUITINUOTERINTER GUTITUTGUUVITIEI AwarmouTIOUTA stuturuwar.x..mmmmmm. । दूतैरेव वशे चके करं चैनानदापयत् ततः कच्छगतो धीमान्दूतान्माद्रवतीसुतः ।। ७३॥ प्रेपयामास राजेन्द्र ! पोलस्त्याय महात्मने विभीपणाय धर्मात्मा प्रीतिपूर्वमरिन्दमः ॥ ७४ ॥ स चास्य प्रतिजग्राह शासनं प्रीतिपूर्वकम् तच्च कालकृतं धीमानभ्यमन्यत स प्रभुः ॥ ७५ ॥ ततः संप्रेषयामास रत्नानि विविधानि च चन्दनागुरुकाष्ठानि दिव्यान्याभरणानि च ॥ ७६ ॥ वासांसि च महाहाणि मणींश्चैव महाधनान् । न्यवर्तत ततो धीमान्तहदेवः प्रतापवान् ॥ ७७॥ एवं निर्जित्य तरसा सान्त्वेन विजयेन च करदान्पार्थिवान्कृत्वा प्रत्यागच्छदरिंदमः ॥ ७८॥ धर्मराजाय तत्सर्वं निवेद्य भरतर्षभः कृतकर्मा सुखं राजन्नुवास जनमेजय ! ॥ ७९ ॥ इति श्रीमन्महाभारते मभापर्वणि दिग्विजयपर्वणि सहदेवदक्षिणदिग्विजये एकत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३१ ॥ दिव्य आभरण एवं बड़े कीमती वस्त्र भेजकर सहदेव धन और श्रेष्ठ सामग्री उसने धर्मराज युधिष्ठिर को का सत्कार किया । हे महाराज ! पराक्रमी सहदेव अर्पण कर दी । धर्मराज ने प्रमन्न होकर उनका इस प्रकार वीरता और विनय के द्वारा दक्षिण दिशा उचित सत्कार किया । इसके उपगन्त सहदेव अपने के सब राजाओं को जीतकर इन्द्रप्रस्थ को लौट आया । भवन को गये ॥७२॥७९॥ वहां आकर जय के द्वारा प्राप्त हुआ सब अपरिमित सभापर्व का इकतीसवा अध्याय समाप्त हुआ ।। ३१ ॥ - अथ द्वात्रिंशोऽध्यायः॥३०॥ वैशम्पायन उगाच नकुलस्य तु वक्ष्यामि कर्माणि विजयं तथा वासुदेवजितामाशां यथाऽसावजयत्प्रभुः वत्तीसवां अध्याय ॥ ३२॥ वैशम्पायन ने कहा-हे राजा जनमेजय! अब यार वासुदेव श्रीकृष्ण ने पश्चिम दिशा के राजाओं नकुल के दिग्विजय का वर्णन करता हूँ। एक । को जीत लिया था । राजा युधिष्ठिर से विदा होकर में MOTI १५० म हा भा र त [सभापर्व onruruALITYUUUTU ITTUUMITIOUTHTTTTTTTTTTra निर्याय खाण्डवप्रस्थात्प्रतीचीमभितो दिशम् । उद्दिश्य मतिमान्प्रायान्महत्या सेनया सह सिंहनादेन महता योधानां गर्जितेन च रथनेमिनिनादैश्च कम्पयन्वसुधामिमाम् ततो बहुधनं रम्यं गवाढ्यं धनधान्यवत् कार्तिकेयस्य दयितं रोहीतकमुपाद्रवत् तत्र युद्धं महच्चाऽऽसीच्रैमत्तमयूरकैः मरुभूमि च कात्स्न्येन तथैव बहुधान्यकम् शैरीपक महेत्थं च वशे चक्रे महाद्युतिः । आक्रोशं चैव राजर्षि तेन युद्धमभून्महत् तान्दशार्णान्स जित्वा च प्रतस्थे पाण्डुनन्दनः । शिवी स्त्रिगानम्वष्ठान्मालवान्पश्च कर्पटान् ॥ ७ ॥ तथा मध्यमकेयांश्च वाटधानान्द्विजानथ पुनश्च परिवृत्याऽथ पुष्करारण्यवासिनः ॥ ८ ॥ गणानुत्सवसङ्केतान्व्यजयत्पुरुषर्षभः सिन्धुकूलाश्रिता ये च ग्रामणीया महाबलाः ॥ ९ ॥ बहुत सी सेना साथ लिये हुए अब नकुल उसी उनसे भी 'कर' लेकर नकुल ने दशार्ण, शिवि, पश्चिम दिशा की ओर चला। उसकी सेना में योद्धाओं त्रिगर्त, अम्बष्ठ, मालव, पंचकर्पट, मध्यमक क्षत्रियों की गरज और रथों की झंझनाहट से बड़ा भयानक और वाटधान ब्राह्मणों को जीतकर उनसे 'कर' लिया। शब्द होता था। वह पहले बहुत धन-धान्य से पूर्ण, | फिर नकुल ने पुष्कर वन में पहुँचकर उत्सव समेत बड़े रमणीय, गाय आदि पशुओं से सम्पन्न और नाम की म्लेच्छ जातियों को परास्त किया । समुद्र भगवान् कीर्तिकेय को प्रिय रोहीतक पर्वत पर पहुंचा। के किनारे रहनेवाले महाबली ग्रामणीयं लोगों को वहां पड़े ही शूरवीर मत्तमयूर जाति के लोगों से नकुल और सरम्बती नदी के आसपास रहनेवाले शूद्रों और का बड़ा युद्ध हुआ । अन्त में उमने उन दोनों को अभीरों को उसने जीता। मछली पकड़कर और मरुभूमि, शरीपक और महेत्य आदि पहाड़ों के निर्वाह करनेवालों को और अन्य पहाड़ी जातियों राजाओं को अपने अधीन करके उनसे लिया। , को भी हराकर नकुल ने उनसे 'कर लिया। इसके इसके पीछे राजर्षि आक्रोश के साथ उन्हें घोर युद्ध पश्चात् उसने सारे पंचनद अर्थात् पंजाब देश को, करना पड़ा ॥१६॥ । अमर पर्वत के निवासियों को, उपर ज्योतिष देश EmDATOPPOIMEROAImmmmmurCROmummercerammam iii.aliinadimanNTARIANTRaamanarta । उनसे - पहुंचा। वहा नकुल के मामा शीनगरी थी। मद्र देश IMILMITRONIMATIMILOMATICICINEMMITMLC अध्याय ३२] म हा भारत PUSTATIATOTTITUTATUTTOTHEITTTTTTTIrrernmuTIATIMEnwrmuTORITITIONARY । EmataramanumanJunarniraTOILETana Guuuuran.aruarainine शूद्राभीरगणांश्चैव ये चाऽऽश्रित्य सरस्वतीम् । वर्तयन्ति च ये मत्स्यैर्ये च पर्वतंवासिनः ॥ १० ॥ कृत्स्नं पञ्चनदं चैव तथैवाऽमरपर्वतम् उत्तरज्योतिपं चैव तथा दिव्यकटं पुरम् ॥ ११ ॥ द्वारपालं च तरसा वशे चक्रे महाद्युतिः रामठान्हारहणांश्च प्रतीच्याश्चैव ये नृपाः ॥ १२ ॥ तान्सर्वान्स वशे चक्रे शासनादेव पाण्डवः तत्रस्थः प्रेषयामास वासुदेवाय भारत ! ॥ १३ ॥ स चाऽस्य यादवैः सार्धं प्रतिजग्राह शासनम् । ततः शाकलमभ्येत्य मद्राणां पुटभेदनम् ॥ १४ ॥ मातुलं प्रीतिपूर्वेण शल्यं चक्रे वशे बली स तेन सत्कृतो राज्ञा सत्काराहों विशांपते ! ॥१५॥ रत्नानि भूरीण्यादाय संप्रतस्थे युधां पतिः ततः सागरकुक्षिस्थान्म्लेच्छान्परमदारुणान् ॥ १६ ॥ पहवान्वर्वरांश्चैव किरातान्यवनाञ्च्छकान् ततो रत्नान्युपादाय वशे कृत्वा च पार्थिवान् ॥ १७ ॥ न्यवर्तत कुरुश्रेष्ठो नकुलश्चित्रमार्गवित् करभाणां सहस्राणि कोशं तस्य महात्मनः ॥ १८॥ को, दिव्यकट और द्वारपाल नाम के नगरों को भी. | की राजधानी शाकलनगर में पहुँचकर मामा शल्य जीतकर उनके राजाओं से 'कर' लिया । आगे बढ़- को भी नकुल ने अपने अधीन कर लिया । नाल पर नकुल ने रामठ, हारहूण आदि पश्चिम देशी । को शल्य ने बड़े आदरपूर्वक अनेक श्रेष्ठ रत्न दिये राताओं को केवल आजा देकर ही अपना अनुगत ॥१४॥१६॥ वहा से चरकर नकुर ने समुद्र के भीतर फिर वासुदेव के पास नकुल ने अपना दूत भेजा। टापुओं में रहनेवाले दारुण म्लेच्छों को, पहर,वर, उन्होंने भी यादवों के साथ युधिष्ठिर के शासन को किरात, यवन और शक आदि जातियों को पराम्न सादर म्वीकार कर लिया। वहा से यह मद्रदेश में किया, और उनसे अनेक प्रकार के रन्न और बहुत सा धन प्राप्त किया। इस प्रकार मम्पूर्ण पश्चिम । । पना रिया ॥७॥१३॥ TROCITrrature महा मारत UURUILD" - । RAIL ऊहुर्दश महाराज ! कृच्छ्रादिव महाधनम् इन्द्रप्रस्थगतं वीरमभ्येत्य स युधिष्ठिरम् ॥ १९ ॥ ततो माद्रीसुतः श्रीमान्धनं तस्मै न्यवेदयत् । एवं विजित्य नकुलो दिशं वरुणपालिताम् प्रतीची वासुदेवेन निर्जितां भरतर्षभः ॥ २०॥ इति श्रीमन्महाभारते सभापर्वणि दिग्विजयपर्वणि नकुलपतीचीजये द्वात्रिंशोऽध्यायः ॥ ३२॥ समाप्तं च दिग्विजयपर्व। दिशा को जीतकर दस हज़ार ऊँटों पर रत्न आदि ! को अर्पण किया। उन्होंने बहुत प्रसन्न होकर उसका को लादकर नकुल इन्द्रप्रस्थ नगर को लौटा। सत्कार किया ॥१७॥२०॥ हे महाराज ! सब धन लाकर नकुल ने धर्मराज युधिष्ठिर सभापर्व का बत्तीसवां अध्याय समाप्त हुआ ।। ३२ ॥ अथ राजसूयपर्व । अथ त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३३ ।। वैशम्पायन उवाच-रक्षणाद्धर्मराजस्य सत्यस्य परिपालनात् शत्रूणां क्षपणाञ्चैव स्वकर्मनिरताः प्रजाः वलीनां सम्यगादानाद्धर्मतश्चाऽनुशासनात् निकामवर्षी पर्जन्यः स्फीतो जनपदोऽभवत् ॥ २ ॥ सर्वारम्भाः सुप्रवृत्ता गोरक्षा कर्पणं वणिक् । विशेषात्सर्वमेवैतत्संजज्ञे राजकर्मणः दस्युभ्यो वञ्चकेभ्यो वा राजन्प्रति परस्परम् राजवल्लभतश्चैव नाऽश्रूयन्त मृपा गिरः अवर्ष चाऽतिवर्ष च व्याधिपावकमूर्च्छनम् तेतीसवां अध्याय ॥ ३३ ॥ वैशम्पायन ने कहा-हे राजा जनमेजय ! अब । अन्न उत्पन्न होता था। उसके कारण से उसके राज्य महाराज युधिष्ठिर,बड़े यत्न के साथ,शत्रुओं का विनाश में बड़ी वृद्धि हुई । लोग गौओं की रक्षा, खेती और करके प्रजा की रक्षा और सत्य का पालन करने लगे। व्यापार आदि सब काम अच्छी तरह करने लगे। उनकी प्रज्ञा भी तन-मन से अपने कर्म करने लगी। धर्मराज युधिष्ठिर ने ऐमा राज्य किया कि ठग, डाक न्यायपूर्वक 'कर' लेने और धर्म के अनुसार शासन चोर और राज-कर्मचारी आदि भी असत्य बोलने करने से समय पर भरपूर वर्षा होती थी, और सूर्य | आदि निकृष्ट कामों से घृणा करने लगे ॥१४॥ । MINUUTTIITTIMOTAVNIMITTELTOTIEIMWI म हा भारत अध्याय ३३] namruta MPIOUTLI Junrupurn minum THMANTRArmymain NDI । MAHIMSTUDIO सर्वमेतत्तदा नासीद्धर्मनित्ये युधिष्ठिरे प्रियं कर्तुमुपस्थातुं वलिकर्म स्वभावजम् अभिहर्तुं नृपा जग्मुर्नाऽन्यैः कार्येः कथंचन ॥ ६ ॥ धम्यैर्धनागमैस्तस्य ववृधे निचयो महान् कर्तुं यस्य न शक्येत क्षयो वर्षशतैरपि खकोष्ठस्य परीमाणं कोशस्य च महीपतिः विज्ञाय राजा कौन्तेयो यज्ञायेव मनो दधे सुहृदश्चैव ये सर्वे पृथक्च सह चाऽब्रुवन् यज्ञकालस्तव विभो ! क्रियतामत्र सांप्रतम् अथैवं ब्रुवतामेव तेषामभ्याययो हरिः ऋपिः पुराणो वेदात्माऽदृश्यश्चैव* विजानताम् ॥ १० ॥ जगतस्तस्थुपां श्रेष्ठः प्रभवश्वाऽप्ययश्च ह भूतभव्यभवन्नाथः केशवः केशिसूदनः ॥ ११ ॥ प्राकारः सर्ववृष्णीनामापत्स्वभयदोऽरिहा बलाधिकारे निक्षिप्य सम्यगानकदुन्दुभिम् ॥ १२ ॥ उच्चावचमुपादाय धर्मराजाय माधवः उनके राज्य में वर्षा न होना अथवा अत्यन्त । तब उन्होंने यज्ञ करने का विचार किया। तब उनके वर्षा होना, रोग-व्याधि, आग का लगना, अकाल- | इष्ट-मित्रों ने अलग-अलग, और मिलकर भी, उनसे मृत्यु आदि किसी अशुभ घटना का नाम तक कहीं कहा-हे महाराज ! अब यह आपके यज्ञ करने के न सुन पड़ता था। राजा लोग युधिष्ठिर के पास लिये ठीक समय है । इसलिये शीघ्र ही राजसूय 'कर' देने, अथवा उनका प्रिय कार्य करने, या पास । यज्ञ आरम्भ कर दीजिए । इस प्रकार सब लोग बैठने को आया-जाया करते थे। कभी कोई राजा धर्मराज युधिष्ठिर से कह ही रहे थे कि इसी समय युद्ध आदि की इच्छा से नहीं आता था, और धर्म यज्ञेश्वर श्रीकृष्ण युधिष्ठिर के पास आये । सब के से लाये हुए धन से युधिष्ठिर का ग्वज्ञाना इतना बढ़ अन्तर्यामी, सब प्राणियों में आत्मारूप से स्थित, गया कि सैकड़ों वर्षों में भी वह खर्च नहीं हो समदर्शी, दयालु, चराचर जगत् में सबसे श्रेष्ठ, सकता था। जब महाराज युधिष्ठिर ने अपने कोष पुराण ऋषि, वेदरूप, ससार की सृष्टि और संहार को धन-धान्य और वस्त्रों से इतना बढ़ा हुआ देखा, के कारण, भूत-वर्तमान और भविष्य इन तीनों कालों अविज्ञातं विजानता विज्ञातमविजानताम्' इस श्रुति के अनुसार परमात्मा को ज्ञान का विषय समझनेवालों को अगम्य । . IMAXIMMITMTIMTML MUSIMITATIVNDIMUNDELMISTRIMUMMY AMRUITML १५४ म हा भारत सभापर्व Minutemap धनौघं पुरुषव्याघ्रो बलेन महता वृतः तं धनौघमपर्यन्तं रत्नसागरमक्षयम् नादयन्रथघोषेण प्रविवेश पुरोत्तमम् ॥१४॥ पूर्णमापूरयस्तेषां द्विपच्छोकावहोऽभवत् असूर्यमिव सूर्येण निवातमिव वायुना कृष्णेन समुपेतेन जहृपे भारतं पुरम् तं मुदाऽभिसमागम्य सत्कृत्य च यथाविधि ॥ १६ ॥ स पृष्ट्वा कुशलं चैव सुखासीनं युधिष्ठिरः 1. धौम्यद्वैपायनमुखैर्ऋत्विग्भिः पुरुषर्षभः भीमार्जुनयमैश्चैव सहितः कृष्णमब्रवीत् ॥१७॥ युधिष्ठिर उवाच-त्वत्कृते पृथिवी सर्वा मद्वशे कृष्ण ! वर्तते धनं च बहु वार्ष्णेय ! त्वत्प्रसादादुपार्जितम् ॥ १८ ॥ सोऽहमिच्छामि तत्सर्वं विधिवद्देवकीसुत ! उपयोक्तुं द्विजाग्रयेभ्यो हव्यवाहे च माधव ! ॥ १९ ॥ तदहं यष्टुमिच्छामि दाशार्ह ! सहितस्त्वया अनुजैश्च महावाहो! तन्माऽऽज्ञातुमिहाऽर्हसि ॥ २० ॥ के नियामक, केशव, केशी दैत्य को मारनेवाले, | से जैसे मनुष्यों को अपार आनन्द प्राप्त होता है यादवों की रक्षा करनेवाले आपत्तिकाल में अभय वैसे ही शत्रुओं के गोक को बढ़ानेवाले श्रीकृष्ण के देनेवाले, शत्रुनाशन, पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण द्वारका पुरी आने से पाण्डवों को और पुरवासियों को बड़ी की रक्षा का भार वसुदेव जी को सौंपकर महाराज प्रसन्नता हुई ।।५।१६॥ युधिष्ठिर को भेंट देने के लिये असङ्ख्य धन-रल राजा युधिष्ठिर ने बड़े आनन्दपूर्वक श्रीकृष्ण की लेकर इन्द्रप्रस्थ नगर में उपस्थित हुए । उनके अगवानी की, उनका सत्कार किया। कुशल-क्षेमप्रश्न साथ बहुत सेना भी आई। अपने स्थ पहियों के उपरान्त जब श्रीकृष्ण सुखपूर्वक बैठ गये,तब धौम्य, की घरघराहट से दशों दिशाओं को प्रतिध्वनित करते व्यास आदि ऋत्विजों और भीम, अर्जुन आदि हुए श्रीकृष्णचन्द्र ने जय खाण्डवप्रस्थ में प्रवेश किया, ' भाइयों के बीच विराजमान महाराज युधिष्ठिर ने उनसे तब सब लोग उन्हें देखकर अत्यन्त ही प्रसन्न हुए। कहा-हे श्रीकृष्ण जी ! आपकी कृपा से अव सर जहां सूर्य के दर्शन न होते हो,वहां सूर्योदय होने से, पृथ्वी मेरे वश में है; मेरे खजाने में बहुत सा धन और जहां वायु का नाम तक न हो, यहां वायु चलने । भी इकट्ठा हो गया है। हे देवकीनन्दन ! अब मै maramananmumraamaaruaaTeasammTIDARIA । WIL NEODIMIMITIMINTITUMUTUOTTWTIMETUDIO १५५ अध्याय ३३ ] म हा भारत Tinhtinh Furruunnrorerunmun TAITRImurenTOTTE AnomanamaATOR पायTIRamt. MINIATICIAnumournimate TanuriatuunCLAOTAL तद्दीक्षापय गोविन्द ! त्वमात्मानं महाभुज! । त्वयोष्टवति दाशाह ! विपाप्मा'भविता ह्यहम् ॥ २१ ॥ मां वाऽप्यभ्यनुजानीहि सहेभिरनुजैविभो ! अनुज्ञातस्त्वया कृष्ण! प्राप्नुयां ऋतुमुत्तमम् ॥ २२ ॥ वैशम्पायन उवाच-तं कृष्णः प्रत्युवाचेदं बहूक्त्वा गुणविस्तरम् त्वमेव राजशार्दूल ! सम्राड) महाक्रतुम् ॥ २३ ॥ संप्राप्नुहि त्वया प्राप्ते कृतकृत्यास्ततो वयम् यजस्वाऽभीप्सितं यनं मयि श्रेयस्यवस्थिते नियुक्ष्व त्वं च मां कृत्ये सर्व कर्ताऽस्मि ते वचः॥ २४ ॥ युधिष्ठिर उवाच-सफलः कृष्ण ! संकल्पः सिद्धिश्च नियता मम । यस्य मे त्वं हृषीकेश! यथेप्सितमुपस्थितः ॥ २५ ॥ वैशम्पायन उवाच-अनुज्ञातस्तु कृष्णेन पाण्डवो भ्रातृभिः सह ईजितुं राजसूयेन साधनान्युपचक्रमे ॥ २६॥ ततस्त्वाज्ञापयामास पाण्डवोऽरिनिवर्हणः सहदेवं युधां श्रेष्ठ मन्त्रिणश्चैव सर्वशः ॥ २७॥ यह सब धन राजसूय यज करके ब्राह्मणों को और तो उससे हम भी कृतकृत्य हो जायेंगे । मै आपका अमिदेव को सन्तुष्ट करने में लगाना चाहता हूँ । मै कल्याण चाहनेवाला हूँ, इसी लिये मै आप के पास तुम्हारी सहायता के भरोसे पर अपने भाइयों के साथ मौजूद है। आप अपनी इच्छा के अनुसार यज्ञ का राजसूय यज्ञ करना चाहता हूँ । उसके लिये तुम मुझे आरम्भ कीजिए । जो कुछ कार्य करना हो उसे करने आज्ञा दो । हे महाबाहो ! मेरी इच्छा तो यह है कि की आज्ञा मुझे दीजिए आपकी आज्ञा का पालन करने तुम ही दीक्षा लेकर यह यज्ञ करो। आपके यज्ञ करने को मैं तैयार हूँ। यह सुनकर युधिष्ठिर ने कहा- से मेरे सब पाप दूर हो जायगे। अथवा मुझे ही भाइयों हे श्रीकृष्ण ! तुम मेरे स्मरण करते ही यहा आकर के साथ इस यज्ञ की दीक्षा लेने की अनुमति दो । उपस्थित हो गये, इसी से मेरा सकल्प सफल हो तुम्हारी आज्ञा होने से मुझे विश्वास है कि यह यज्ञ गया और मुझे कार्य सिद्ध होने का पूर्ण विश्वास हो गया ॥२३॥२५॥ यह सुनकर श्रीकृष्ण जी ने युधिष्ठिर की प्रशसा वैशम्पायन ने कहा-हे राजा जनमेजय ! इसके की, और कहा-हे महाराज ! अब आप सब राजाओं उपरान्त श्रीकृष्ण जी से आज्ञा पाकर राजा युधिष्ठिर में श्रेष्ठ सम्राट हैं। आप में सब प्रकार से यह महायज्ञ यज की सव वस्तुएँ एकत्र करने लगे । धर्मराज करने की योग्यता है । आप इस महायज्ञ को करेंगे । युधिष्ठिर ने छोटे भाई सहदेव को और मन्त्रियों को । ठीक-ठीक हो सकेगा ॥१७॥२२॥ । STMALAMILMCOM AIMIMALAIMom JUNLIMIMINIMUMS १५६ 'सभापर्व म हा भारत munuternmuverunimurururonour DOETROLUTITUTORatorrenning MARRIAL । अस्मिन्क्रतो यथोक्तानि यज्ञाङ्गानि द्विजातिभिः । तथोपकरणं सर्वं मङ्गलानि च सर्वशः ॥ २८॥ अधियज्ञांश्च सम्भारान्धौम्योक्तान्क्षिप्रमेव हि । समानयन्तु पुरुषा यथायोगं यथाक्रमम् ॥ २९॥ इन्द्रसेनो विशोकश्च पूरुश्चाऽर्जुनसारथिः अन्नाद्याहरणे युक्ताः सन्तु मस्त्रियकाम्यया ॥३०॥ सर्वकामाश्च कार्यन्तां रसगन्धसमन्विताः मनोरथप्रीतिकरा द्विजानां कुरुसत्तम! ॥३१॥ तद्वाक्यसमकालं च कृतं सर्वं न्यवेदयत् सहदेवो युधां श्रेष्ठो धर्मराजे युधिष्ठिरे ॥ ३२ ॥ ततो द्वैपायनो राजन्नृत्विजः समुपानयत् वेदानिव महाभागान्साक्षान्मूर्तिमतो द्विजान् ॥ ३३॥ स्वयं ब्रह्मत्वमकरोत्तस्य सत्यवतीसुतः धनञ्जयानामृषभः सुसामा सामगोऽभवत् ॥ ३४ ॥ याज्ञवल्क्यो वभूवाऽथ ब्रह्मिष्टोऽध्वर्युसत्तमः पैलो होता वसोः पुत्रो धौम्येन सहितोऽभवत् ॥ ३५ ॥ एतेषां शिष्यवर्गाश्च पुत्राश्च भरतर्पभ! बभूवु)त्रगाः सर्वे वेदवेदाङ्गपारगाः आज्ञा दी कि ब्राह्मणों की आज्ञा के अनुसार और यज्ञ जाकर कहा कि आपकी आज्ञा का पालन हो गया। के अगम्वरूप अन्य कमों की सब सामग्री सेवकों । हे राजा जनमेजय ! शरीरधारी वेदों के समान तेजसी से मँगवाकर, ऋषि धौम्य की आजा से, यथास्थान ब्राह्मणों को ऋत्विक् बनाकर सत्यवती के पुत्र व्यास और यथाक्रम रखवाओ। और इन्द्रसेन, विशोक जी ने ब्रह्मा का वरण लियाधनझयगात्री मुमामा और अर्जुन के पूरु नाम सारथियों को आजा दी कि ऋषि सामवेद गानेवाले उद्गाता हुए। ब्रह्मनिष्ठ यात्रः तुम अन्न, रस और गन्धमय चारों प्रकार के भोजन ' वल्क्य ऋषि अपर्यु हुए । यमु के पुत्र पल ऋषि जो बामणों को अच्छे लगते है, इकट्टे करो ॥२६॥३१॥ और धौम्य ऋषि ने होता का काम प्रहण किया ! युधिष्ठिर की आज्ञा की देर थी; सहदेव ने उमी इन सब के पुत्र और शिष्य होत्रगाता हुए। वे भी समय सर मामग्री एकत्र करा दी और धर्मराज मे सब वेद-वेदाङ्गों के पूरे ज्ञाता थे ॥३२॥३६॥ STREETTEITTTTTTAMINETITITTATRITIMEINATEMEDIOmernal مولاناداتعلماء اهالدخلسعال आ । सहदेव ने महाराज की आज्ञा पाकर उसी देश देशान्तरों मे आये हुए ब्राह्मणों ने राजा युधिष्ठिर १५७ अध्याय ३३] म हा भारत UTTouTIGITTE AnARImainTUUUmmm. ARUTITUTITION - TOTRinmamirma.reir rumama samund वैशम्पायन उवाच- . ते वाचयित्वा पुण्याहमूहयित्वा च तं विधिम् । शास्त्रोक्तं पूजयामासुस्तद्देवयजनं महत् ॥ ३७ ॥ तत्र चारनुज्ञाताः शरणान्युत शिल्पिनः गन्धवन्ति विशालानि वेश्मानीव दिवौकसाम् ॥ ३८ ॥ तत आज्ञापयामास स राजा राजसत्तमः सहदेवं तदा सद्यो मन्त्रिणं पुरुषर्षभः ॥ ३९ ॥ आमन्त्रणार्थं दूतांस्त्वं प्रेपयस्वाऽऽशुगान्द्रुतम् । उपश्रुत्य वचो राज्ञः स दूतान्प्राहिणोत्तदा ॥४०॥ आमन्त्रयध्वं राष्ट्रेषु ब्राह्मणान्भूमिपानथ विशश्च मान्याञ्शूद्रांश्च सर्वानानयतेति च च-समाज्ञप्तास्ततो दूताःपाण्डवेयस्य शासनात् आमन्त्रयाम्बभूवुश्च आनयंश्चाऽपरान्द्रुतम् तथा परानपि नरानात्मनः शीघ्रगामिनः ॥ ४२ ॥ ततस्ते तु यथाकालं कुन्तीपुत्रं युधिष्ठिरम् दीक्षयाञ्चक्रिरे विप्रा राजसूयाय भारत! ॥४३॥ दीक्षितः स तु धर्मात्मा धर्मराजो युधिष्ठिरः सब ऋषियों ने स्वम्ति-पुण्याहवाचन-शान्तिपाठ के अनुसार दूतों को बुलाकर उनसे कहा-तुम लोग के उपरान्त शास्त्र की विधि के अनुसार देवताओं का शीघ्र जाकर हमारे साम्राज्य के ब्राह्मणों,क्षत्रियों,वैश्यों और यज्ञभूमि का पूजन किया। शिल्पविद्या जानने- | और श्रेष्ठ शूद्रों को निमन्त्रण देकर अपने साथ ले आओ वालों (कारीगरों) ने महाराज युधिष्ठिर की आज्ञा से उस विशाल यज्ञमण्डप के आसपास बड़े बड़े देव- । राजा युधिष्ठिर की आज्ञा से वे सब दूत [शीघ्र. ताओं के स्थानों के सदृश सुगन्धित स्थान बनवाये । गामी रथों पर चढ़कर ] अनेक देशों और देशान्तरों थे। [ उन स्थानों में फलं, मिठाई, जल आदि रक्खा को गये । और वहा से निमन्त्रित लोगों को अपने हुआ था । ] इसके उपरान्त धर्मराज युधिष्ठिर ने साथ लेकर उचित समय पर लौट आये। [फिर राजा सहदेव मन्त्री को बुलाकर आज्ञा दी कि दूत लोग | युधिष्ठिर ने भीष्म,द्रोण,पृतराष्ट्र ,विदुर,कृपाचार्य और गोमती के साथ चारों ओर भेज दिये जायँ, वे शीघ्र ! दुर्योधन आदि भाइयों को निमन्त्रण देने के लिये नकुल चलनेवाले वाहनों पर चढ़कर लोगों को निमन्त्रण दे | को हस्तिनापुर भेजा !] इसके पीछे समय के आने पर, परायाmahanuma..il ॥३७॥४१॥ MUMNY JAATENTIALLAHILIATIMADIECXOCCURRECORRECORATIENTRE १५८ महाभारत [सभापर्व mymamniruramIISITrumrumATTITUTORIANITITTWITTUTIIIIIIIIIRE ॥ ४४ ॥ । ImmmmmHANUMANIT जगाम यज्ञायतनं वृतो विप्रैः सहस्रशः भ्रातृभिर्जातिभिश्चैव सुहृद्भिःसचिवैः सह क्षत्रियैश्च मनुष्येन्द्र नादेशसमागतैः ॥ ४५ ॥ अमात्यश्च नरश्रेष्ठो धर्मो विग्रहवानिव आजग्मुाह्मणास्तत्र विषयेभ्यस्ततस्ततः ॥ ४६॥ सर्वविद्यासु निष्णाता वेदवेदाङ्गपारगाः तेषामावसथांश्चक्रुर्धर्मराजस्य शासनात् ॥४७॥ वह्वन्नाच्छादनैर्युक्तान्सगणानां पृथक्पृथक सर्वर्तुगुणसम्पन्नाशिल्पिनोऽथ सहस्रशः ॥४८॥ तेषु ते न्यवसन्राजन्ब्राह्मणा भृशसत्कृताः कथयन्तः कथा वह्वीः पश्यन्तो नटनर्तकान् ॥ ४९ ॥ भुञ्जतां चैव विप्राणां वदतां च महास्वनः अनिशं श्रूयते तत्र मुदितानां महात्मनाम् ॥ ५० ॥ दीयतां दीयतामेपां भुज्यतां भुज्यतामिति । एवंप्रकाराः संजल्पाः श्रूयन्ते स्माऽत्र नित्यशः ॥ ५१ ॥ गवां शतसहस्राणि शयनानां च भारत ! को यज्ञ करने के लिये दीक्षा दी । दीक्षा लेकर वह एक ऋतु में आराम मिलता था। महाराज युधिष्ठिर यज्ञ-शाला में पधारे । अपने भाइयों, इष्ट-मित्रों, से सत्कार, पूजा पाकर ये सब ब्राह्मण लोग उन्हीं मन्त्रियों, अनुचरों, हजारों ब्राह्मणों और देश-देशा- | भवनों में रहने लगे। कोई तरह-तरह की कथाएँ न्तरों से आय हुए क्षत्रियों और राजाओं के बीच | कहते थे, और कोई नट आदि नाचनेवालों के कृत्य शरीरघारी धर्म के समान राजा युधिष्ठिर की गोमा | अर्थात् तमाशा देखते हुए रहने लगे ॥४७॥४९॥ हुई ॥४२॥४६॥ । भोजन कर रहे और शास्त्रार्थ में लगे हुए प्रसन्नचित्त साम्राज्य के चारों ओर से विद्वान्, वेदपाठी । ब्राह्मणों का बड़ा भारी शब्द दिन-रात मुन पड़ता था। अनेक ब्राह्मण यज-शाला में आने लगे। उनके रहने ' "इनको दो, उनको दो, भोजन करो" इत्यादि शन्द के लिये फारीगरों ने पृथक् पृथक् असंग्न्य निवास-म्यान यहां हर समय गरों और सुन पड़ते थे। राजा बनाये थे । उन भवनों में तरह-तरह की साने-पीने ! युधिष्ठिर ने हरएक निमन्त्रित को अलग-अलग सैकड़ो की सामग्रियों और सब सुखदायक पदार्थ भी पड़े हजारों गायें, सुवर्ण की शम्याएँ, और दाम-दासियों थे । उन भवनों में गर्मी, जाड़ा, परमात आदि हर दी । देवलोक के ग्वामी इन्द्र के समान महाराज - . arrrrr-TETTERemamTILDHOOTINDImmurari अध्याय ३४] म हा भा र त TOURGUICTI TIMITATUTITUTroRITITIVATIMINETITIUIIIII । - . रुक्मस्य योपितां चैव धर्मराजः पृथग्ददौ ॥ ५२ ॥ प्रावर्ततेवं यज्ञः स पाण्डवस्य महात्मनः पृथिव्यामेकवीरस्य शक्रस्येव त्रिविष्टपे ततो युधिष्ठिरो राजा प्रेपयामास पाण्डवम् नकुलं हास्तिनपुरं भीष्माय पुरुषर्षभः ॥ ५४ ॥ द्रोणाय धृतराष्ट्राय विदुराय कृपाय च भ्रातृणां चैव सर्वेषां येऽनुरक्ता युधिष्ठिरे इति श्रीमन्महाभारते सभापर्वणि राजसूयपर्वणि राजादिनिमन्त्रणं नाम त्रयस्त्रिंशोऽध्याय ॥३३ ।। युधिष्ठिर का यज्ञ इस प्रकार आनन्द और उत्साह । चार्य और सब भाइयों को हस्तिनापुर जाकर लाने के साथ होने लगा। इसके पश्चात् महाराज युधिष्ठिर । की आज्ञा दी ।।५०/५५|| ने नकुल को भीष्म, द्रोणाचार्य, धृतराष्ट्र विदुर,कृपा सभापर्व का तेंतीसवां अध्याय समाप्र हुआ ॥ ३३ ॥ अथ चतुस्त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३४॥ वैशम्पायन उवाच-स गत्वा हास्तिनपुरं नकुलः समितिंजयः भीष्ममामन्त्रयाञ्चके धृतराष्ट्रं च पाण्डवः सत्कृत्याऽऽमन्त्रितास्तेन आचार्यप्रमुखास्ततः । प्रययुः प्रीतमनसो यज्ञं ब्रह्मपुरःसराः ॥ २ ॥ संश्रुत्यै धर्मराजस्य यज्ञं यज्ञविदस्तदा अन्ये च शतशस्तुष्टैर्मनोभिर्भरतर्षभ ! द्रष्टुकामाः सभां चैव धर्मराजं च पाण्डवम् दिग्भ्यः सर्वे समापेतुः क्षत्रियास्तत्र भारत ! ॥ ४ ॥ तीसवां अध्याय ॥ ३४ ॥ वैशम्पायन ने कहा है राजा जनमेजय ! राजा सब कौरव, ब्राह्मणों को आगे करके, प्रसन्नता के साथ युधिष्ठिर की आज्ञा पाकर नकुल शीघ्र ही हस्तिनापुर यज्ञ-शाला को चले । राजा युधिष्ठिर के यज्ञ का को गया । वहां जाकर यथोचित सम्मान,सत्कार और निमन्त्रण पाकर अनेक देशों और देशान्तरों से राजा विनय के साथ उसने भीष्म, धृतराष्ट्र, आदि [ कुरु- लोग, भेंट में देने के लिये अनेक प्रकार के रस लेकर वंशियो] को और कृपाचार्य, द्रोणाचार्य आदि आचार्यों खाण्डवप्रम्य में पहुंचने लगे । यज्ञ का मण्डप,ऐश्वर्य, को यज्ञ में चलने के लिये अनुरोध किया। तब सभा और धर्मराज युधिष्ठिर को देखने की उन्हें M MISTRITI MMMIT MATIOJAANT AXIMUMMITML १६० म हा भारत [ सभापत्र । Torrorummoneymurunmarrrrrrrrrurromrnmnmrunromanumminramyanmun TOTUITOUNTM -- + - POEELAMOTIXIIVITATIL । । समुपादाय,रत्नानि विविधानि महान्ति च धृतराष्ट्रश्च भीष्मश्च विदुरश्च महामतिः दुर्योधनपुरोगाश्च भ्रातरः सर्व एव ते गान्धारराजः सुवलः शकुनिश्च महाबलः अचलो वृषकश्चैव कर्णश्च रथिनां वरः तथा शल्यश्च बलवान्वाहिकश्च महाबलः सोमदत्तोऽथ कौरव्यो भूरिभूरिश्रवाः शलः अश्वत्थामा कृपो द्रोणः सैन्धवश्च जयद्रथः यज्ञसेनः सपुत्रश्च शाल्वश्च वसुधाधिपः प्राग्जोतिपश्च नृपतिर्भगदत्तो महारथः स तु सर्वैः सह म्लेच्छैः सागरानूपवासिभिः । पार्वतीयाश्च राजानो राजा चैव बृहद्बलः पौण्ड्रको वासुदेवश्च वङ्गः कालिङ्गकस्तथा आकर्पः कुन्तलश्चैव मालवाश्चाऽऽन्ध्रकास्तथा ॥ ११ ॥ द्राविडाः सिंहलाश्चैव राजा काश्मीरकस्तथा कुन्तिभोजो महातेजाः पार्थिवो गौरवाहनः ॥ १२ ॥ वाहिकाश्चाऽपरे शूरा राजानः सर्व एव ते ।। विराटः सह पुत्राभ्यां मावेल्लश्च महाबलः ॥१३॥ राजानो राजपुत्राश्च नानाजनपदेश्वराः बड़ी इच्छा थी ॥१४॥ के राजा भगदत्त महाराज युधिष्ठिर के यज्ञ में राजा धृतराष्ट्र, भीष्म, विदुर, दुर्योधन आदि निमन्त्रित होकर आये । राजा बृहद्दल, पाण्डक धृतराष्ट्र के सौ पुत्र, गान्धार-राज सुबल, महाबली वासुदेव,श और काल देश के राजा आकर्ष और शकुनि, अचल, वृषक, महारथी कर्ण, शल्य, वाहीक, । कुन्तल देशों के राजा, मालब, और अन्ध्र देशों के सोमदत्त, भूरि, भूरिया, गल, अश्वत्थामा, कृपानार्य, : राजा, द्राविड़ और सिंहल देशों के राजा, द्रोणाचार्य,राजा जयद्रय,अपने पुत्रों-सहित राजा द्रुपद, का राजा, राजा कुन्तिभोज, राजा गारवाहन, बाहीक शाल्प, समुद्र के किनारे के रहनेवाले म्लेच्छों और देश के अनेक शूरवीर राजा, दोनों पुत्रों सहित राजा पहाड़ी जातियों को साथ लिये हुए प्राग्ज्योतिपनगर विराट, राजा मावेष्ट, राजकुमार सहित महापराक्रमी SrrorerammarrrrITTENSIDEmain काश्मीर में मापे महाराज युधिष्ठिर की आनासे इन अभ्यागन १६१ अध्याय ३४] म हा भारत STAUTY IPEDIAWKWAmarrton TRAINMETRIGITAHARITRAIL ॥ १४ ॥ 1 Marwarminine शिशुपालो महावीर्यः सह पुत्रेण भारत! आगच्छत्पाण्डवेयस्य यज्ञं समरदुर्मदः रामश्चैवाऽनिरुद्धश्च कङ्कश्च सहसारण: गदप्रद्युम्नसाम्बाश्च चारुदेष्णश्च वीर्यवान् उल्मुको निशठश्चैव वीरश्चाऽङ्गावहस्तथा ॥ १६ ॥ वृष्णयो निखिलाश्चाऽन्ये समाजग्मुर्महारथाः । एते चाऽन्ये च बहवो राजानो मध्यदेशजाः ॥ १७ ॥ आजग्मुः पाण्डुपुत्रस्य राजसूयं महाक्रतुम् ददुस्तेपामावसथान्धर्मराजस्य शासनात् ॥ १८ ॥ बहुभक्ष्यान्वितान्राजन्दीर्घिकावृक्षशोभितान् । तथा धर्मात्मजः पूजां चक्रे तेषां महात्मनाम् ॥ १९ ॥ सत्कृताश्च यथोद्दिष्टाञ्जग्मुरावसथान्नृपाः कैलासशिखरप्रख्यान्मनोज्ञान्द्रव्यभूषितान् ॥ २० ॥ सर्वतः संवृतानुच्चैः प्राकारैः सुकृतेः सितैः सुवर्णजालसंवीतान्मणिकुट्टिमभूपितान् सुखारोहणसोपानान्महासनपरिच्छदान् स्रग्दामसमवच्छन्नानुत्तमागुरुगन्धिनः ॥ २२ ॥ राजा शिशुपाल और अन्य अनेक राजा तथा राजपुत्र भरनों में बड़े-बड़े म्यादिष्ठ सनि पीने के पदार्थ मरे महाराज युधिष्ठिर के यज्ञ में निमन्त्रित होकर आय पड़े धे। उनमें कुएँ सुदे हुए और नाना प्रकार के थे । महाराज युधिष्ठिर ने स्वयं टन पलभद्र, अनिरुद्ध, मारण, कार, गद, प्रद्युम्न, आय हुए. राजाओं का यथोनित सरकार किया । माम्य, पराक्रमी चारुदेष्ण, उल्क, निशठ, अमा- इसके पश्चात् सय रोग अपने अपने लिये निर्दिष्ट यह और अन्य अनेक गृष्णिवंशी महारथी यादव भी डेरों में जाकर ठहरे ॥१५॥१९॥ पक्षधान में आये । इनके अतिरिक्त अनेक मध्यदेश उन राजाओं के मरने के नियेा भवन बने के राजा-महाराजा महाराज युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ थे,ये एक मे एक मिले हुए थे। ये मन काम के शिमर के ममान, इनने ऊंचे थे किनारोम से निमप्रित राजाओं के सत्कार और रहने के रिय नियाम अच्छी प्रकार दिम्गाई देते थे । इन मानों में अनेक मानों का पहले से ही प्रबन्ध कर रबमा था। उन प्रकार माने-पीने के सामान मरे पर थे। ये भयन weremorimmunmarram TEEEETamam LELC2254 । वृक्ष लगे ॥५॥१४॥ ।

म हा भारत [ सभापर्व BETTERTrnmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmERITTE . हंसेन्दुवर्णसदृशानायोजनसुदर्शनान् असंवाधान्समद्वारान्युतानुच्चावचैर्गुणैः ॥ २३ ॥ बहुधातुनिवद्धाङ्गान्हिमवच्छिखराणि च विश्रान्तास्ते ततोऽपश्यन्भूमिपा भूरिदक्षिणम् ।। २४ ॥ वृतं सदस्यैर्वहुभिर्धर्मराज युधिष्ठिरम् तत्सदः पार्थिवैः कीर्ण ब्राह्मणैश्च महर्षिभिः भ्राजते स्म तदा राजन्नाकपृष्ठं यथामरैः ॥२५॥ इति श्रीमन्महाभारते सभापर्वणि राजसूयपर्वणि निमन्त्रितराजागमने चतुस्त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३४ ॥ श्वेत रङ्ग की ऊँची दीवारों से घिरे हुए और सुवर्ण गरियां उनके बनाने में दिखाई गई थीं। उनके बनाने के जालों से अलकृत थे; उनमें मनोहर मणिमय में जगह-जगह अनेक धातुओं का उपयोग किये जाने स्थान थे और सुख के साथ चढ़ने योग्य सीढ़ियाँ थीं। से वे हिमवान् पर्वत के चित्र-विचित्र शिखरों की तरह वे खिले हुए फूलों की मालाओं मे विभूपित थे । अँचते थे। उन भवनों में विश्राम कर रहे राजा लोग अनेक प्रकार के चन्दन, अगुरु आदि पदार्थों से | वहीं से पीताम्बर पहने हुए, दीक्षा में स्थित, सदस्य सुगन्धित वे भवन कैलास पर्वत के शिखगें को भी ब्राह्मणों की मण्डली से घिरे राजा युधिष्ठिर के दर्शन मात कर रहे थे। उन भवनों के भीतर बढ़िया आसन पाते थे । अपार दान दक्षिणा के कारण सुप्रसिद्ध उस पड़े थे। उनका रग हंस और चन्द्रमा के समान श्वेत | राजसूय यज्ञ में आए हुए ब्राह्मणों और क्षत्रियों से था। वे भवन तक न थे । उन सब के द्वार एक से वह सभा-मण्डप इस प्रकार शोभित हो रहा था जिस थे। और भी अनेक प्रकार की छोटी-बड़ी कारी प्रकार देवताओं से स्वर्ग की शोभा होती है ।।२०।२५।। सभापर्व का चौंतीसवां अध्याय समाप्त हुआ।। ३४ ॥ अथ पंचत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३५॥ वैशम्पायन उवाच-पितामहं गुरुं चैव प्रत्युद्गम्य युधिष्ठिरः अभिवाद्य ततो राजन्निदं वचनमब्रवीत् भीष्मं द्रोणं कृपं द्रौणिं दुर्योधनविविंशती अस्मिन्यज्ञे भवन्तो मामनुगृह्णन्तु सर्वशः ॥ २॥ पैतीसवां अध्याय ॥ ३५॥ वैशम्पायन ने कहा-हे राजा जनमेजय ! धर्मराज | द्रोणाचार्य, कृपाचार्य, अश्वत्थामा, दुर्योधन, विविंशति युधिष्ठिर ने आगे से जाकर भीष्म पितामह और आदि का स्वागत-सत्कार करके महाराज युधिष्ठिर ने द्रोणाचार्य को लिया और उन्हें प्रणाम किया। भीष्म, । कहा-आप लोगों के शुभागमन से मैं कृतार्थ हो गया। MINULMINIMIMITATILLIONAL TOVUMMX MISSUTRITING MAnurnimurd TITUATuuuNTURI -- Aasuuunirammar - अध्याय ३५] म हा भारत १६३ Tod इदं वसु महच्चैव यदिहाऽस्ति धनं मम प्रणयन्तु भवन्तो मां यथेष्टमभिमन्त्रिताः ॥ ३ ॥ एवमुक्त्वा स तान्सर्वान्दीक्षितः पाण्डवाग्रजः । युयोज स यथायोगमधिकारेष्वनन्तरम् भक्ष्यभोज्याधिकारेषु दुःशासनमयोजयत् परिग्रहे ब्राह्मणानामश्वत्थामानमुक्तवान् राज्ञां तु प्रतिपूजार्थं सञ्जयं संन्ययोजयत् कृताकृतपरिज्ञाने भीष्मद्रोणौ महामती हिरण्यस्य सुवर्णस्य रत्नानां चाऽन्ववेक्षणे दक्षिणानां च वै दाने कृपं राजा न्ययोजयत् ॥ ७ ॥ तथाऽन्यान्पुरुषव्याघांस्तस्मिंस्तस्मिन्न्ययोजयत् । वाह्निको धृतराष्ट्रश्च सोमदत्तो जयद्रथः नकुलेन समानीतः स्वामिवत्तत्र मिरे क्षत्ता व्ययकरस्त्वासीद्विदुरः सर्वधर्मवित् ॥ ९ ॥ दुर्योधनस्त्वहणानि प्रतिजग्राह सर्वशः चरणक्षालने कृष्णो ब्राह्मणानां स्वयं ह्यभूत् ॥ १० ॥ सर्वलोकसमावृत्तः पिप्रीपुः फलमुत्तमम् इस यज्ञ में आप लोग सब तरह मुझ पर कृपा करें। या नहीं, यह देखने-भालने का काम बुद्धिमान् भीम यह सब मेरा धन आप ही लोगों का है। आप लोग । और द्रोणाचार्य को मिग । सुवर्ण, रन आदि के कृपा करके मेरे कार्य में सहायता दें, यही मेरी प्रार्थना । रखने और दक्षिणा देने का काम कृपाचार्य को सौंपा है । यज्ञ की दीक्षा लिये हुए महाराज युधिष्ठिर ने गया । इन कामों में इन लोगों की महायना करने अब उन लोगों में से प्रत्येक को उसके योग्य कार्य के लिये भी बहुत मनुष्य नियुक्त हुए । वाहीक, धृतराष्ट्र, सोमदत्त और जयद्रय आदि बड़े बूढ़े भक्ष्य-भोज्य आदि खाने-पीने की सामग्री वाटने । लोगों की सेवा और सरकार का प्रबन्ध नकुल ने काकाम दु शासन को दिया गया। ब्राह्मणों की सेवा ऐमा किया कि वे रोग स्वामी की तरह रहकर मय और सत्कार का काम अश्वत्थामा को सौंपा गया । : प्रकार के मुग्य भोगने लगे ॥१०॥ राजाओं के सत्कार का काम सन्जय को मिला । सय मय घमों के जानकार, नानिक अद्वितीय पण्डित पामों का प्रबन्ध ठीक समय पर ठीक-ठीक होता है | विदुर के हाथ से सब तरह का सर्व होता था। परद ENTERTEGREETITIODDITATEITTER 2. maruaaTamie सौंप दिया ॥१४॥ MOTTTTTTTTTom म हा भारत सभापर्व TOTuurmannmenmaAT INTUTILATI TITUTITUTEmon - . द्रष्टुकामः सभां चैव धर्मराज युधिष्ठिरम् न कश्चिदाहरत्तत्र सहस्रावरमहणम् रत्नैश्च बहुभिस्तत्र धर्मराजमवर्धयत् ॥ १२ ॥ कथं तु मम कौरव्यो रत्नदानैः समाप्नुयात् । यज्ञमित्येव राजानः स्पर्धमाना ददुर्धनम् ॥ १३ ॥ भवनैः सविमानाप्रैः सोदकर्बलसंवृतैः लोकराजविमानैश्च ब्राह्मणावसथैः सह कृतैरावसथैर्दिव्यर्विमानप्रतिमैस्तथा विचित्रे रत्नवद्भिश्च ऋद्धया परमया युतैः राजभिश्च समावृत्तैरतीव श्रीसमृद्धिभिः अशोभत सदो राजन्कौन्तेयस्य महात्मनः ऋद्धया च वरुणं देवं स्पर्धमानो युधिष्ठिरः पडग्निनाऽथ यज्ञेन सोऽयजद्दक्षिणावता सर्वाञ्जनान्सर्वकामैः समृद्धः समतर्पयत् अन्नवान्वहुभक्ष्यश्च भुक्तवज्जनसंवृतः ॥ १८ ॥ रत्नोपहारसम्पन्नो चभूव स समागमः राजा लोग जो-जो भेंट लेकर आते थे, उन्हें लेकर, था, और दूसरी ओर भेंट में आये हुएधा और रनों ठिकाने से रखने का काम राजा दुर्योधन को मिला। से भरता जाता था ] मब सामान से भरे भवनों से, भगवान् वासुदेव, सब से श्रेष्ठ फल प्राप्त करने की आकाग में यज्ञ देखने के लिये उपस्थित देवताओं इच्छा से, आये हुए ब्राह्मणों के पाँव घोने का काम और इन्द्र आदि लोकपालों के विमानों से, यज्ञशाला फरने लगे। धर्मराज युधिष्ठिर और उनकी समा देखने के आसपास बने हुए ब्राह्मणों के निवास-भवनों और को जो लोग आये उन में ऐसा कोई न था, जो एक । राजाओं के विमान-तुल्य रत्नखचित डेरों से महाराज हजार स्वर्णमुद्रा (मोहरों) से कम भेंट लाया हो । युधिष्ठिर की सभा की बड़ी अपूर्व शोमा हुई प्रत्येक राजा मानों इस तरह का विचार करके कि ॥१०॥१६॥ मेरे ही दिये रख-धन से महाराज युधिष्ठिर के यज्ञ का [असहय रनों की प्रभा से प्रकाशमान] ऐश्वर्य- खर्च पूरा हो जाय, असहय धन और रल ला लाकर सम्पन्न सभा-मण्डप के बीच बैठे हुए महाराज युधिष्ठिर उन्हें अर्पण करने लगा । [धर्मराज युधिष्ठिर का अपने वैभव से राजराज कुबेर और महागज वरुण खजाना एक ओर दान-दक्षिणा मे खाली होता जाता के समान जान पड़ने थे। छ: अमियों की स्थापना PREDICTIOmeetuREMOTIVATIOwmorrowIORLD अध्याय ३६] म हा भारत DU TUTORITERT.ITTITLE FDMRITTTTTITUTIINITITUTITITION marmummati nhutmummunmura.12107 इडाज्यसोमाहुतिभिर्मन्त्रशिक्षाविशारदैः तस्मिन्हि तत्पुर्दवास्तते यज्ञे महर्षिभिः यथा देवास्तथा विप्रा दक्षिणान्नमहाधनैः ततपुः सर्ववर्णाश्च तस्मिन्यज्ञे मुदान्विताः ॥ २० ॥ इनि श्रीमन्महाभारते सभापर्वणि राजसूयपर्वणि यज्ञकरणे पञ्चत्रिंशोऽध्याय ॥ ३५ ॥ समानं च राजसूयपर्व हो जाने पर राजसूय यज्ञ किया गया । युधिष्ठिर ने । यज्ञ में वैदिक, कर्मकाण्ड में निपुण, मन्त्रशिक्षा के यज्ञ की पूर्णाहुति होने के समय ब्राह्मणों को खूब , पूरे पण्डित महर्षियों ने मन्त्र पढ़कर-आज्य और सोम दक्षिणा दी। जो कोई जिस इच्छा से गया, उमकी | की आहुतिया छोड़कर देवताओं को अच्छी तरह तृप्त वह इच्छा युधिष्ठिर ने पूरी कर दी। अन्न के ढेर के कर दिया । सब देवता, ब्राह्मण और अन्य वणों के देर लगे हुए थे। राखों रोग तरह-तरह के स्वादिष्ट । अमय रोग आहुति, दक्षिणा, अन्न धन-रन आदि भोजन कर रहे थे । रल लुटाये जा रहे थे । उस के द्वारा परम प्रसन्न और तृप्त हुए ॥१७॥२०॥ सभापर्व का पैतीसवा अध्याय समाप्त हुआ ।। ३५ ॥ अथार्याहरणपर्व। अथ पत्रिंशोऽध्याय ॥३६॥ वैशम्पायन उवाच-ततोऽभिपेचनीयेऽह्नि ब्राह्मणा राजभिः सह अन्तर्वेदी प्रविविशुः सत्कारार्हा महर्षयः नारदप्रमुखास्तस्य मन्तवेद्यां महात्मनः समासीनाः शुशुभिरे सह राजर्पिभिस्तदा ॥ २ ॥ समेता ब्रह्मभवने देवा देवर्पयस्तथा कर्मान्तरमुपासन्तो जजल्पुरमितोजसः इदमेवं न चाऽप्येवमेवमेवं न चाऽन्यथा प्रत्युचुर्वहवस्तत्र वितण्डावादिनो द्विजाः ॥ २ ॥ छत्तीमया अध्याय 11 ३६॥ वैशम्पायन ने कहा है राना जनमेजय ' अभि ऐम मालूम होने थे, मानों बना जी भग्न में देवता पेच अर्थात् याम्नान के दिन सत्कार के योग्य ब्राझग और देवमपि पेठे हुए है । जब यहम्नान हो चुका, और राजा रोग जो महासपि थे, अन्तर्वेदी नाम के नय ग्रामण गंग आपम में मात्र पर विचार करने समामण्डप में गये । उस ममय नारद आदिमपि रंगा"यह पान मे ही है", "यह पात कभी ऐमी रोग टन राजप्रापियों के समीप अन्तर्वेदी में बैठे हुए नहीं है", "यह गान पेमे दी है, अन्यथा कभी नही ARITANDINITIATICADAI . PLETRIOSITIODTETTE १ ६ समापर्व LF म हा भारत TraruuuuuurumIUM TUTION PURPORATIONOTaruniaTRAN - कृशानस्तितः केचिदकृशांस्तत्र कुर्वते अकृशांश्च कृशांश्चक्रुर्हेतुभिः शास्त्रनिश्चयः अर्थ मेधाविनः केचिदनुमानैः प्रपूरितम् विचिक्षिपुर्यथा श्येना नभोगतमिवाऽमिषम केचिद्धर्मार्थकुशलाः केचित्तत्र महाव्रताः रेमिरे कथयन्तश्च सर्वभाष्यविदां वराः सा वेदिर्वेदसंपन्नैर्देवद्विजमहर्षिभिः आवभासे समाकीर्णा नक्षत्रै?रिवाऽऽयता न तस्यां सन्निधौ शूद्रः कश्चिदासीन्नचाऽव्रती । अन्तर्वेद्यां तदा राजन् ! युधिष्ठिरनिवेशने तां तु लक्ष्मीवतो लक्ष्मी तदा यज्ञविधानताम् । तुतोप नारदः पश्यन्धर्मराजस्य धीमतः अथ चिन्तां समापेदे स मुनिर्मनुजाधिप ! नारदस्तु तदा पश्यन्सर्वक्षत्रसमागमम् सस्मार च पुरावृत्तां कथां तां पुरुपर्पभ ! अंशावतरणे याऽसौ ब्रह्मणो भवनेऽभवत् ॥ १२ ॥ देवानां संगम तं तु विज्ञाय कुरुनन्दन! है" इत्यादि तर्क-वितर्क करते हुए विद्वान् लोग | लोग जिनमें कोई-कोई धर्मार्थ और कोई भाष्य वितण्डावाद करने लगे। बहुत से ब्राह्मणों ने अनेक हेतु । आदि के जाननेवाले थे, मात्र विनोद करते रहे दिखाकर और शास्त्र का प्रमाण देकर साधारण अर्थ और वह वेदी उन सब से और महाऋषियों से को असाधारण और असाधारण अर्थ को साधारण ऐसी प्रकाशमान हो गई जमे आकाश तारागणों के कर दिसाया ॥१॥५॥ निकलने से हो जाता है । महाराज युधिष्ठिर की उस याहुत से विद्वान् पुरुष दूसरे के कहे हुए विषय समावेदी के पास न कोई शूद्र बैठा था और न को उस तरह बीच से ही ले भागते थे, अर्थात् उसका कोई वन-विहीन अपवित्र पुरुष उपस्थित था ॥६॥२॥ बण्टन करने रगते थे, जिस तरह फाग में यज्ञ के अन्त में श्रीमान् युधिष्ठिर का यह अपूर्व उड़ रहे बाज पक्षियों में एक के मुंह से छूटे हुए ऐश्वर्य और यज्ञ करने से पास प्रताप देसकर नारद लोथड़े को दूमरा पृथ्वी तक पहुंचने नहीं देता, जी बहुत प्रमा हुए। हे महाराज ! उस सभा में बीच से दी से भागता है। इस प्रकार से ये वाशय मर दात्रियों का ममागम देम्पकर, नारद जी को उम RADITIOHDIOCEDUCEcomonTATIOurumorcel १६७ म हा भारत अध्याय ३६] TION TouTIM UITUTITITUTILITUTIOur TIMITATISTIATTI -- । नारदः पुण्डरीकाक्षं सस्मार मनसा हरिम् •॥ १३ ॥ साक्षात्स विबुधारितः क्षत्रे नारायणो विभुः प्रतिज्ञा पालयंश्चमां जातः परपुरंजयः ॥ ११ ॥ संदिदेश पुरा योऽसौ विवुधान्भूतकृत्स्वयम् अन्योन्यमभिनिघ्नन्तः पुनर्लोकानवाप्स्यथ ॥ १५ ॥ इति नारायणः शम्भुभंगवाञ्जगतः प्रभुः आदिश्य विवुधान्सर्वानजायत यदुक्षये क्षितावन्धकवृष्णीनां वंशे वंशभृतां वरः परया शुशुभे लक्ष्म्या नक्षत्राणामिवोडुराट् ॥ १७ ॥ यस्य वाहुवलं सेन्द्राः सुराः सर्व उपासते सोऽयं मानुपवन्नाम हरिरास्तेऽरिमर्दनः ॥१८॥ अहो वत महद्भूतं स्वयंभूर्यदिदं स्वयम् आदास्यति पुनः क्षत्रमेवं वलसमन्वितम् ॥ १९ ॥ इत्येतां नारदश्चिन्तां चिन्तयामास धर्मवित् हरि नारायणं ज्ञात्वा यज्ञैरिज्यं तमीश्वरम् ॥ २० ॥ तस्मिन्धर्मविदां श्रेष्ठो धर्मराजस्य धीमतः ममा का म्मरण हो आया, जो पहले ब्रह्मलोक में भग "तुम लोग, जाकर पृथ्वी पर जन्म लो। तुम लोग वान् के अंशावतार के सम्बन्ध में विचार करने के लिये फिर परस्पर लड़-झगड़कर फट-मरकर अपने लोकों हुई थी। उन्हें वे क्षत्रिय और ब्राह्मण लोग, ब्रह्मलोक को चले आओगे" । इस प्रकार सब देवताओं को में आकर जमा हुए देवताओं के समान ही जान | आज्ञा देफर वही मगयान् नारायण पृथ्वी पर यदुवंश पहते थे । उस ममय देवर्षि नारद मन में कमलन के पृष्णिकुल में उत्पन्न हुए हैं ॥१०॥१५॥ यन विष्णु भगवान् का स्मरण करने लगे। नारद जी और नक्षत्रमण्डली के बीच चन्द्रमा के समान मन में कहने लगे कि देव-शत्रु असुरों का नाश यादवों में विराजमान हैं। इन्द्र आदि देवता जिनके करनेवाले भगवान् नारायण ही पृथ्वी का भार उतार- बाहुबल का आश्रय दिने हैं, यही हरि इस समय ने को अपनी प्रतिज्ञा पूरी करने के लिये क्षत्रियया मनुष्यलोक में मनुष्यलीला कर रहे हैं । इन महा. में धीरप्य रूप में प्रकट हुए है । सब प्राणियों की बली असंग्ज्य दात्रियकुलों का संहार भी इन्हीं के राष्टि करनेवाले इन्ही नारायण ने पहले प्रभगक की द्वाग होगा। इस प्रकार कृष्ण को नारायन जानकर, जम समा में सर देवताओं को आशा दी थी कि , मन ही मन उनकी महिमा का वर्णन करते हुए PEDImmmmmmmroPREE EmaiIA - ।

१६८ महा मा र त सभापर्व onunmunnunmunmun TUMAnuTururraimi STATURTHATANTrerrorrurumuTune ॥ २१ ॥ महाध्वरे महाबुद्धिस्तस्थौ स बहुमानतः ततो भीष्मोऽब्रवीद्राजन्धर्मराज युधिष्ठिरम् क्रियतामहणं राज्ञां यथाहमिति भारत! ॥ २२॥ आचार्यमृत्विजं चैव संयुजं च युधिष्ठिर स्नातकं च प्रियं प्राहुः पडाहन्नृिपं तथा ॥ २३ ॥ एतानानभिगतानाहुः संवत्सरोषितान् त इमे कालगस्य महतोऽस्मानुपागताः ॥ २४ ॥ एषामेकैकशौ राजन्नर्घ आनीयतामिति अथ चैषां वरिष्ठाय समायोपनीयताम् ॥ २५ ॥ युधिष्ठिर उवाच-कस्मै भवान्मन्यतेऽधमकस्मै कुरुनन्दन ! उपनीयमानं युक्तं च तन्मे ब्रूहि पितामह ! ॥ २६ ॥ वैशम्पायन उवाच-ततो भीष्मः शान्तनवोबुद्धया निश्चित्य वीर्यवान् । वार्णेयं मन्यते कृष्णं पूजनीयतमं भुवि ॥ २७ ॥ एप ह्येषां समस्तानां तेजोवलपराक्रमैः मध्ये तपन्निवाऽऽभाति ज्योतिपामिव भास्करः॥ २८ ॥ असूर्यमिव सूर्येण निर्वातमिव वायुना भासितं हादितं चैव कृष्णेनेदं सदो हि नः ॥ २९ ॥ नारद जी उस सभा में विराजमान थे ॥१६॥२०॥ । चाहिये, किन्तु इस अभ्यागत मण्डली में जो सर से सब लोग जब उस सभा में बैठ गये, तब भीष्म श्रेष्ठ और समर्थ पुरुष हों उन्हें सबसे पहले अर्घ्य पितामह ने राजा युधिष्ठिर से कहा है महाराज ! ! दिया जाय । युधिष्ठिर ने पूछा-हे पितामह ! आप अब तुम इन आये हुए राजाओं का यथायोग्य पूजन | इन योग्य पुरुषों में किन महात्मा को सब से पहले और सत्कार करो। आचार्य, ऋत्विक, स्नातक, ! अर्घ्य देना ठीक समझते है । यह प्रश्न सुनकर भीम सम्बन्धी, मित्र, और राजा ये छ अर्घ्य पाने के ने कुछ देर तक सोचकर यदुकुरावतंस श्रीकृष्ण को अधिकारी कहे गये हैं। इनके अतिरिक्त जो अभ्या ही सब में श्रेष्ठ और पहले अर्घ्य पाने के योग्य गत रोग एक साथ चर्पमर रहते है, वे भी अ पाने टहराया ॥२१॥२६॥ के योग्य माने गये है । न्योते में आये ये उन्होंने कहा-इन सब महापुरुषों की मण्डरी रोग यहां हमारे साथ बहुत दिनों से नियाम कर रहे में तेज, बल, पराक्रम आदि माता में श्रीकृष्ण ही है। इस कारण इनके लिये भी एक एक अर्घ्य मैंगाना श्रेष्ठ हैं। इस लिये पहले इनका पूजन होना उचित है। IHArmaamanartmanawrniamrowmmamaARAaroom .. PICTIMIMICOTTLITTAMATrrrrrr Timirm Trural १६९ अध्याय ३७] महा मारत TARA TITTA wanTORITUTTARIUITMENTROHITATIAAVanant TIMIRImuTUTITIVE reinsan तस्मै भीष्माभ्यनुज्ञातः सहदेवः प्रतापवान् उपजह्वेऽथ विधिवद्वापर्णेयायाऽर्धमुत्तमम् ॥ ३० ॥ प्रतिजग्राह तत्कृष्णः शास्त्रदृष्टेन कर्मणा शिशुपालस्तु तां पूजां वासुदेवे न चक्षमे ॥३१॥ स उपालभ्य भीष्मं च धर्मराजं च संसदि अथाऽऽक्षिपद्वासुदेवं चेदिराजो महावलः ॥ ३२ ॥ इति श्रीमन्महाभारते सभापर्वणि अर्घाहरणपर्वणि श्रीकृष्णार्घदाने पत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३६ ।। इन सब के बीच में श्रीकृष्ण जी अपने तेज और परा- ! होता है। इसके पीछे भीष्म जी की आज्ञा से सहदेव कम से इस प्रकार से प्रकाश कर रहे हैं, जैसे ज्योतियों ने उठकर श्रीकृष्ण जी को विधिपूर्वक अर्घ्य दिया में सूर्य प्रकाश करता है। और यह हमारी सभा उनक और श्रीकृष्ण जी ने उसको अङ्गीकार किया। परन्तु यहां होने से ऐसी प्रकाशित और प्रसन्न है, जैसे सूर्य इस बात को चेदिराज शिशुपाल न सह सका । और और वायुरहित स्थान में रहनेवाला मनुष्य अकस्मात् वह महाराज युधिष्ठिर और भीष्म पितामह के पास सूर्य के प्रकाश और वायु के म्पर्श हो जान से प्रसन्न | आकर श्रीकृष्ण जी की निन्दा करने लगा ॥२७॥३२॥ सभापर्य का छत्तीमवां अध्याय ममाम हुआ ॥ ३६॥ अथ सप्तत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३७॥ शिशुपाल उयाच-नाऽयमर्हति वार्णेयस्तिष्ठखिह महात्मसु महीपतिषु कौरव्य ! राजवत्पार्थिवाहणाम नाऽयं युक्तः समाचारः पाण्डवेषु महात्मसु यत्कामात्पुण्डरीकाक्षं पाण्डवाऽचितवानसि ॥ २ ॥ वाला यूयं न जानी,धर्मः सूक्ष्मो हि पाण्डवाः!। अयं च स्मृत्यतिक्रान्तो ह्यापगेयोऽल्पदर्शनः ॥३ त्वादृशो धर्मयुक्तो हि कुर्वाणः प्रियकाम्यया मैतीमयां अध्याय ॥३७॥ शिशुपाल योला-हे युधिष्ठिर ! इन महात्मा राजाओं हे पाण्डयो ! तुम धर्म की सूक्ष्म गति को नहीं जानत। के आगे कृष्ण किसी प्रकार राजाओं की तरह पूजा इस बारे में अभी तुम पारक ही हो। इस गंगा के पाने के योग्य नहीं है। पाण्डव! जो अपनी इच्छा पुत्र भीष्म को युद्धावस्या के कारण गाम का मिद्धान्त मे तुमने सबसे पहले कृष्ण की पूजा की, सो यह किसी म्मरण नहीं रहा है । हे भीम! नुमको अब तक तरह महात्मा पाण्डवों के योग्य काम नहीं हुआ। रोग धर्मश और धर्मान्मा ममझने थे। तुमने कृष्ण MARADHETRIODHAmimmorerenTrrerrrrrrrrrrom १७० म हा मारत सभापर्व unrurumuraruuntITTUnrumunt TITUTUTITUTIOmuTERIOUTrouTITUATI ! - भवत्यभ्यधिकं भीष्मो लोकेष्ववमतःसताम् ॥ ४ ॥ कथं डराजा दाशार्हो मध्ये सर्वमहीक्षिताम् । अर्हणामहति तथा यथा युष्माभिरर्चितः अथ वा मन्यसे कृष्णं स्थविरं कुरुपुङ्गव ! वसुदेवे स्थिते वृद्धे कथमर्हति तत्सुतः अथ वा वासुदेवोऽपि प्रियकामोऽनुवृत्तवान् । द्रुपदे तिष्ठति कथं माधवोऽर्हति पूजनम् ॥ ७ ॥ आचार्य मन्यसे कृष्णमथ वा कुरुनन्दन द्रोणे तिष्ठति वाष्र्णेयं कस्मादर्चितवानसि ऋत्विजं मन्यसे कृष्णमथ वा कुरुनन्दन ! द्वैपायने स्थिते वृद्धे कथं कृष्णोऽर्चितस्त्वया ॥ ९ ॥ भीष्मे शान्तनवे राजन् ! स्थिते पुरुषसत्तमे । स्वछन्दमृत्युके राजन्कथं कृष्णोऽर्चितस्त्वया ॥१०॥ अश्वत्थान्नि स्थिते वीरे सर्वशास्त्रविशारदे ! कथं कृष्णस्त्वया राजन्नर्चितः कुरुनन्दन ! दुर्योधने च राजेन्द्रे स्थिते पुरुषसत्तमे कृपे च भारताचार्ये कथं कृष्णस्त्वयाऽर्चितः ॥ १२ ॥ का प्रिय करने के लिये यह जो अनुचित काम कराया | मौजूद है । हे युधिष्ठिर! यदि तुमने आचार्य मानकर है, इससे सज्जन अवश्य ही तुम्हें अनादर की दृष्टि । कृष्ण की पूजा की है, तो द्रोणाचार्य के आगे वह से देखेंगे; साधु पुरुष तुम्हारी निन्दा करेंगे । कृष्ण पूजनीय नहीं हो सकता । यदि तुमने ऋत्विक जान राजा नहीं है। फिर सब राजा-महाराजाओं के बीच कर श्रीकृष्ण की पूजा की है, तो भी वृद्ध द्वैपायन इस तरह सबसे पहले वह कम पूजा पाने का अधि- व्यास के आगे कृष्ण की पूजा कैसे ठीक कही जा कारी हो सकता है । अथवा तुमने वृद्ध समझकर ' सकती है । हे युधिष्ठिर ! मृत्यु जिसके अधीन है,उस सब से पहले कृष्ण को अर्घ्य दिया है, तो उसके पुरुषश्रेष्ठ भीष्म को छोड़कर तुमने पहले कृष्ण की वृद्ध पिता वसुदेव के आगे उसकी पूजा को तुम कैसे पूजा कैसे की ॥१॥१०॥ ठीक समझते हो ! जो कृष्ण को तुमने अपना प्रिय हे कुरुनन्दन ! वीर अश्वत्थामा जो सब शानों फरनेवाला समझकर पूजा है,तो भी उसकी पूजा होनी में पण्डित और श्रेष्ठ है, उसको छोड़कर तुमने पहले नहीं चाहिये, क्योंकि राजा द्रुपद तुम्हारे सम्बन्धी कृष्ण को अर्घ्य देना क्यों ठीक समझा ! पुरुषरेष्ठ EnerEANIECPERMECREAMPIECECENTERTAINMENTORIEEEEEEEEL .

म हा भारत अध्याय ३७] TITUTLium TAITATURTI - TITIENUINETTITIUUUUUTITIUITS Sansar द्रुमं किंपुरुषाचार्यमतिक्रम्य तथाऽर्चितः भीष्मके चैव दुर्धर्षे पाडुवत्कृतलक्षणे ॥ १३ ॥ नृपे च रुक्मिणि श्रेष्ठे एकलव्ये तथैव च शल्ये मद्राधिपे चैव कथं कृष्णस्त्वयाऽर्चितः ॥ १४ ॥ अयं च सर्वराज्ञां वै वलश्लाघी महावलः जामदग्न्यस्य दयितः शिष्यो विप्रस्य भारत! ॥ १५ ॥ येनाऽऽत्मवलमाश्रित्य राजानो युधि निर्जिताः । तं च कर्णमतिक्रम्य कथं कृष्णस्त्वयाऽर्चितः ॥ १६ ॥ नेत्विनैव चाऽऽचार्यों न राजा मधुसूदनः । अर्चितश्च कुरुश्रेष्ठ ! किमन्यत्प्रियकाम्यया ॥ १७॥ अथ वाऽभ्यर्चनीयोऽयं युष्माकं मधुसूदनः किं राजभिरिहाऽऽनीतैरवमानाय भारत! ॥ १८॥ वयं तु न भयादस्य कोन्तेयस्य महात्मनः प्रयच्छामः करान्सर्वे न लोभान्न च सान्त्वनात् ॥ १९ ॥ अस्य धर्म प्रवृत्तस्य पार्थिवत्वं चिकीर्पतः करानमै प्रयच्छामः सोऽयमस्मान्न मन्यते राजगन दुर्योधन और भरतवंग के आचार्य कृपाचार्य आचार्य, न युद्ध है और न राजा ही, फिर तुमने को छोड़कर, तुमने पहले कृष्ण की पूजा क्यों की' क्यों इम मय मे श्रेष्ठ माना और मय से पहले इसकी किंपुरुष कुल के मुखिया महाराज द्रुम और महाराज पूजा की' इम से प्रतीत होता है, कि नुमने नातेदारी पाण्ड के तुल्य गौरवशाली राजा भीमक को छोड़ार के कारण मुहद् समझकर, उमे प्रमस पान के लिये तुमने पहले कृष्ण की पूजा करना क्यों उचित समझा' यह अनुचित कार्य किया है । हे पाण्डव ! जो तुम नपनियों में श्रेष्ठ मम्मी, एकलव्य, मद्र नरेश गल्य इम तरह रण की पूना करना ही चाहने थे, तो आदि के रहते, तुमने क्या समझार पहले कृष्ण को देश-देशान्तगें मे इन राजाओं को, अपमानित करने अर्य दिया ! हे युधिष्ठिर ! मय गजाओं से बढ़कर के शिये, क्यों युगया था हनन नुमको 'कर' युष्ठ पत्यान् , युद्ध में अपने पल मे राजाओं को जानन· तुम्हारे भय या गेम या तुममे माम अर्थात् सुन्द पाले दम परशुराम के प्रिय शिष्य को छोड़ा मने ये रिये नहीं दिया था, पर नुम्दामीनि नम्ने पहले कृष्ण की पूजा क्यों की ॥११॥१६॥ में और तुमको गर्म-गार्ग में प्राय जानपर दिया हे पाय ! गृष्ण न तो मालिक है, और न थामा तुमने हम सर में मेराभान मान. PERHITERACTEREDEO ॥ २० ॥ .

म हा भारत TuuunrounenntrunanuuuN Turrow tour JuTUSIMILITAINTI । यदि तपम्वी पाण्डवों ने भय और कृपणता के कारण तुमने पूजा के अयोग्य होने पर मीइन कृपण पाण्डों मभापर्व १७२ किमन्यदवमानाद्धि येदेनं राजसंसदि अप्राप्तलक्षणं कृष्णमर्पणाऽर्चितवानसि ॥ २१ ॥ अकस्माद्धर्मपुत्रस्य धर्मात्मेति यशो गतम् को हि धर्मच्युते पूजामेवं युक्तां नियोजयेत् ॥ २२ ॥ योऽयं वृष्णिकुले जातो राजानं हतवान्पुरा जरासन्धं महात्मानमन्यायेन दुरात्मवान् ॥ २३ ॥ • अद्य धर्मात्मतां चैव व्यपकृष्टा युधिष्ठिरात् . । दर्शितं कृपणत्वं च कृष्णेऽर्घस्य निवेदनात् ॥ २४ ॥ यदि भीताश्च कौन्तेयाः कृपणाश्च तपस्विनः । ननु त्वयाऽपि बोद्धव्यं यां पूजां माधवाऽर्हसि ॥ २५ ॥ अथ वा कृपणैरेतामुपनीतां जनार्दन ! पूजामनहः कस्मात्त्वमभ्यनुज्ञातवानसि ? ॥ २६ ॥ अयुक्तामात्मनः पूजां त्वं पुनर्वहु मन्यसे हविपः प्राप्य निःस्यन्द प्राशिता श्वेव निर्जने ॥ २७ ॥ न त्वयं पार्थिवेन्द्राणामपमानः प्रयुज्यते त्वामेव कुरवो व्यक्तं प्रलम्भन्ते जनार्दन ! क्लीवे दारक्रिया यादृगन्धे वा रूपदर्शनम् कर कृष्ण की पूजा की है। भला इस अपमान से : अर्घ्य देने से युधिष्ठिर को लाभ यही हुआ,कि संसार बढ़कर और क्या अपमानजनक होगा,कि सब तिलक : में धर्मात्मा कहकर लोग जो इनकी प्रशंसा करते धारी राजाओं का तिरस्कार करके एक ऐसे मनुष्य । थे, वह नष्ट हो गई । हे युधिष्ठिर ! तुम्हारी दीनता की पूजा उन्हीं राजाओं में की,जो राजनिहों से अत्यन्त और मूर्वता जगत् में विख्यात हो गई । हे माधव । हीन था ॥१७॥२१॥ हे युधिष्ठिर ! संसार में तुम्हारा यश तो यह । से ऐसा किया ही था, तो हे कृष्ण ! तुमको यह हो रहा है, कि युधिष्ठिर बड़ा धर्मात्मा है, परन्तु अब समझना उचित था, कि मैं इस पूजा के योग्य है या यह धर्म कहाँ गया। भला ऐसा कौन धर्मी होगा, जो नहीं ॥२२॥२५॥ कृष्ण की पूजा करेगा। वृष्णिवंश में उत्पन्न दुरात्मा कृष्ण ने अन्याय से महात्मा जरासन्ध की हत्या से अपनी पूजा क्यों कराई है ! तुम्हारा ऐसा अयोग्य फरवाई है। ऐसे पुरुष को सब में उचम मानकर परना ऐमा है, जैसे निर्जनम्यान में हविष को पुणे MITRADITrummHINDIMEROrirampurane । ॥ २८ ॥ --- - महाभारत अध्याय ३८]] VrUTUnrnmumATRITING RITTITUATIONS CIATINUTRITITUTITUTTAR ! Tumia - अराज्ञो राजवत्पूजा तथा ते मधुसूदन ! ॥ २९ ॥ दृष्टो युधिष्ठिरो राजा दृष्टो भीप्मश्च यादृशः वासुदेवोऽप्ययं दृष्टः सर्वमेतद्यथातथम् ॥३०॥ इत्युक्त्वा शिशुपालस्तानुत्थाय परमासनात् निर्ययौ सदसस्तस्मात्सहितो राजभिस्तदा ॥३१॥ इति श्रीमन्महाभारते सभापर्वणि अर्घाहरणपर्वणि अर्घाहरणे शिशुपालक्रोधी नाम सप्तत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३७ ॥ का निडर होकर खाना। इस से तुम यह न समझना ! नहीं है, उसको राजा के समान पूजना । युधिष्ठिर, कि राजाओं का अपमान हुआ है, पाण्डवों ने पूजा । भीष्म और तुम तीनों को देख चुके । 'ये तीनों जैसे के बहाने से यह तुम्हारी हंसी की है। यह तुम्हारी के तैसे है'। यह कहकर शिशुपाल सभा में से उठ- पूजा होना इस प्रकार से है, जैसे नपुंसक का विवाह कर अपनी पक्ष के राजाओं सहित बाहर चला गया। करना, अन्धे को कुछ दिग्वाना । और जो राजा ॥२६॥३१॥ सभापर्व का सैंतीसवां अध्याय समाप्त हुआ। ३७ ।। 1 अथ अष्टात्रिंशोऽध्यायः ।।३८ ।। वैशम्पायन उवाच-ततो युधिष्ठिरो राजा शिशुपालमुपाद्रवत् उवाच चैनं मधुरं सान्त्वपूर्वमिदं वचः नेदं युक्तं महीपाल ! यादृशं वै त्वमुक्तवान् अधर्मश्च परो राजन्पारुप्यं च निरर्थकम् न हि धर्म परं जातु नाऽवबुध्येत पार्थिवः भीष्मः शान्तनवस्त्वेनं माऽवमंस्थास्त्वमन्यथा ॥ ३ ॥ पश्य चैतान्महीपालांस्त्वत्तो वृद्धतरान्वहून् मृप्यन्ते चाऽहणं कृष्णे तद्वत्वं क्षन्तुमर्हसि ॥ ४ ॥ अडतीमयां अध्याय ।। ३८॥ वैशम्पायन ने कहा-हे राजा जनमजय ! शिशु- नहीं कहे जा सकते। उनमे तुम घोर अधर्म के भागी पाल के उठकर चले जाने पर राजा युधिष्ठिर उसके हो सकते हो। ऐमे कठोर वचन कहना, यड़ा अपर्म पाम गये और नम्रतापूर्वक कहने लगे-हे शिशुपाल! और निरर्थक है । तात्पर्य यह है, कि उन यचनों सोचकर देखो [ इस तरह बिगड़कर मभा से चल से भीष्म आदि का कुछ नहीं बिगड़ सकता, केवल देना क्या तुम्हारे योग्य काम है ! जो कठोर वचन तुम्हारी ही जयान गराय होनी है। महात्मा शान्तनु हमने भीष्म आदि महात्माओं को सुनाये हैं, ये टीक के पुत्र भीष्म के लिये यह कहना कि टन्हें धर्म का - TRAT MOEMYTICTO TTORNET १७४ म हा भारत [सभापर्व romanirurture MuTITUTUTTrumurrrrrrrrrr । . । EDIATIMARATHnamama वेद तत्त्वेन कृष्णं हि भीष्मश्चेदिपते ! भृशम् । नह्येनं त्वं तथा वेत्थ यथैनं वेद कौरवः भीष्म उवाच - नाऽस्मै देयो ह्यनुनयो नाऽयमर्हति सान्त्वनम् लोकवृद्धतमे कृष्णे योऽर्हणां नाऽभिमन्यते ॥ ६ ॥ क्षत्रियः क्षत्रियं जित्वा रणे रणकृतां वरः यो मुञ्चति वशे कृत्वा गुरुर्भवति तस्य सः अस्यां हि समितौ राज्ञामेकमप्यजितं युधि न पश्यामि महीपालं सात्वतीपुत्र ! तेजसा न हि केवलमस्माकमयमय॑तमोऽ ऽच्युतः त्रियाणामपि लोकानामर्चनीयो महाभुजः कृष्णेन हि जिता युद्धे बहवः क्षत्रियर्षभाः जगत्सर्वं च वाष्र्णेये निखिलेन प्रतिष्ठितम् तस्मात्सत्स्वपि वृद्धेषु कृष्णमर्चामि नेतरान् एवं वक्तुं न चाऽर्हस्त्वं मा ते भूवुद्धिरीदृशी ॥ ११ ॥ ज्ञानवृद्धा मया राजन्बहवः पर्युपासिताः ज्ञान नहीं है, कभी तुम्हारे लिये उचित नही । लोक में वृद्धतम हैं, नहीं देख सकता है। जो क्षत्रिय उनका अनादर करना बिलकुल अनुचित है । देखो, युद्ध में क्षत्रिय को जीतकर छोड़ देता है, वह हारे तुमसे भी बड़े बड़े वृद्ध राजा लोग यहां बैठे हुए | हुए का गुरु अर्थात् बड़ा होता है । सो मै इन सब है । इन में से कोई भी सब से पहले कृष्ण की बैठे हुए राजाओं में से एक को भी ऐसा नहीं देखता पूजा होते देखकर असन्तुष्ट नहीं हुआ। तुमको | हू, जिसको श्रीकृष्ण न जीत सकें । ये श्रीकृष्ण भी, इन्हीं की तरह, कृष्ण के सम्मान से सन्तुष्ट अच्युत है । इनका पूजन करना केवल हमको ही होना चाहिये । हे चेदि नरेश ! अच्छी तरह समझ उचित नहीं है, किन्तु ये तीनों लोकों को भी पूज्य हैं । बूझकर ही पितामह ने श्रीकृष्ण को सब से श्रेष्ठ ठह- श्रीकृष्ण जी ने बहुत से श्रेष्ठ क्षत्रियों को रण में राया है । श्रीकृष्ण को और उनकी महिमा को पितामह जीता है और सम्पूर्ण जगत् इन्हीं के शरीर में व्याप्त बहुत अच्छी तरह जानते हैं। वे श्री कृष्ण को जितना | है ॥१॥१०॥ जानते हैं, उतना तुम नहीं जानते । अब भीष्म ने इसी कारण से हमने इनको सब से श्रेष्ठ जान फहा-हे युधिष्ठिर! यह सान्त्व वचन कहने के योग्य कर, इनकी पूजा की है । तुमको ऐसा कहना तुम्हारी नहीं है, क्योंकि यह श्रीकृष्ण की पूजा को, जो | बुद्धि के योग्य नहीं है। हे राजन् ! हमने बहुत से iraniraminARAar -- TAMILIATIMILARIODIOCTOmant ITMITTTTTTTT IMM mmrurCE अध्याय ३८] म हा भारत TirrormEROIN UCTION JIRITUATIHARITRITIIIIIIIIIam ॥१२॥ - RTIYOGITRO तेषां कथयतां शौरेरहं गुणवतो गुणान् समागतानामश्रीपं घहुन्वहुमतान्सताम् कर्माण्यपि च यान्यस्य जन्मप्रभृति धीमतः बहुशः कथ्यमानानि नरैर्भूयः श्रुतानि मे न केवलं वयं कामाञ्चेदिराज ! जनार्दनम् ॥ १४ ॥ न संवन्धं पुरस्कृत्य कृतार्थ वा कथंचन अर्चामहेऽर्चितं सद्भिर्भुवि भूतसुखावहम् यशः शौर्य जयं चाऽस्य विज्ञायाऽर्चा प्रयुज्महे । न च कश्चिदिहाऽस्माभिः सुवालोऽप्यपरीक्षितः॥ १६ ॥ गुणैवृद्धानतिक्रम्य हरिरर्यतमो मतः ज्ञानवृद्धो द्विजातीनां क्षत्रियाणां चलाधिकः १७ ॥ वैश्यानां धान्यधनवाञ्शूद्राणामेव जन्मतः पूज्यतायां च गोविन्दे हेतू द्वावपि संस्थितौ ॥ १८ ॥ वेदवेदाङ्गविज्ञानं वलं चाऽप्यधिकं तथा नृणां लोके हि कोऽन्योऽस्ति विशिष्टः केशवाहते ॥ १९ ॥ दानं दाक्ष्यं श्रुतं शौर्यं हीः कीर्तिवुद्धिरुत्तमा । ज्ञानी पुरुषों का सग किया है । उन रोगों के मुँह बालक भी ऐसा नहीं, जिसको हम अच्छी तरह न से वासुदेव के अनेक गुणों का वर्णन सुना है । जन्म जानते हों, या जिसकी परीक्षा हम न कर चुके हों। से लेकर अब तक उन्होंने जो उत्तम और अलो- | अच्छी तरह सोच-विचारकर गुणों में सब से श्रेष्ठ किक कर्म किये है, उन्हें भी हमने अनेक बार बहुत । जानकर ही बड़े बूढ़ों को छोड़कर कृष्ण की पूजा लोगों के मुँह से सुना है । हे शिशुपाल | श्रीकृष्ण की गई है। ब्राह्मणों में अधिक ज्ञानी, क्षत्रियों में हमारे नातेदार हैं या इन्होंने हमपर अनेक उपकार अधिक बलवान् , वैश्यों में अधिक धनी और शूद्रों किये हैं इस कारण, अथवा अपनी इच्छा से ही हम में अधिक आयु रखनेवारा पूजने योग्य होता है। इनकी पूजा नहीं करते, इस पृथ्वीमण्डल पर सब सज्जन सो श्रीकृष्ण जी को हमने दो गुणों के कारण से इन्हे सब प्राणियों को सुख देनेवाले श्रेष्ठ पुरुष जानकर, , पूज्य माना है, एक तो श्रीकृष्ण जी सत्र से बलवान् इनकी पूजा करते हैं। हम लोगों ने इनके यश, शूरता, है। दूसरे सब वेद और वेद के अङ्गों को जानते हैं। पराक्रम और विजय आदि गुणों को जानकर, इन्हीं इनसे बड़ा मनुष्य संसार में है ही कौन ' इनमें धन, के कारण इनकी पूजा की है। इस सभा में एक चतुराई, शास्त्र, शूरता, लज्जा, कीर्ति, उत्तम बुद्धि, 1 பாாபாரUTURES IMIMIMITUATI SIMITM सभापर्व १७६ म हा भारत EMAurnvrANTAmrunrn TrmuTRUnrn UiTUNTUNIMITTITTITION - । । संनतिः श्रीधृतिस्तुष्टिः पुष्टिश्च नियताऽच्युते ॥ २० ॥ तमिमं लोकसंपन्नमाचार्य पितरं गुरुम् अयमर्चितमर्चाहँ सर्वे संक्षन्तुमर्हथ ॥ २१॥ ऋत्विग्गुरुर्विवाह्यश्च स्नातको नृपतिः प्रियः सर्वमेतद्धृषीकेशस्तस्मादभ्यर्चितोऽच्युतः ॥ २२ ॥ कृष्ण एव हि लोकानामुत्पत्तिरपि चाऽप्ययः कृष्णस्य हि कृते विश्वमिदं भूतं चराचरम् ॥ २३ ॥ एप प्रकृतिरव्यक्ता कर्ता चैव सनातनः परश्च सर्वभूतेभ्यस्तस्मात्पूज्यतमोऽच्युतः ॥ २४ ॥ बुद्धिर्मनो महद्वायुस्तेजोऽम्भः खं मही च या । चतुर्विधं च यद्भूतं सर्व कृष्णे प्रतिष्ठितम् ॥ २५ ॥ आदित्यश्चन्द्रमाश्चैव नक्षत्राणि ग्रहाश्च ये दिशश्च विदिशश्चैव सर्वं कृष्णे प्रतिष्ठितम् ॥ २६ ॥ आग्निहोत्रमुखा वेदा गायत्री छन्दसां मुखम् । राजा मुखं मनुष्याणां नदीनां सागरो मुखम् ॥ २७ ॥ नक्षत्राणां मुखं चन्द्र आदित्यस्तेजसां मुखम् । पर्वतानां मुखं मेरुर्गरुडः पततां मुखम् ॥ २८ ॥ उर्ध्व तिर्यगधश्चैव यावती जगतो गतिः सदेवकेषु लोकेषु भगवान्केशवो मुखम् ॥ २९ ॥ नम्रता, लक्ष्मी, धृति, पुष्टि और तुष्टि आदि सब उत्पत्ति का कारण, अविनाशी, चराचरमय, अव्यय, गुण विद्यमान् हैं ।।११।२०॥ सनातन और सब से परे है । बुद्धि, मन, वायु, तेज, इससे इनको चाहे तुम गुरु समझो चाहे आचार्य जल, आकाश और पृथ्वी और चारों प्रकार के जीव और पिता ये सब प्रकार से पूजने के योग्य है । ओर सूर्य, चन्द्रमा, नक्षत्र, ग्रह, दिशा और विदिशा तुमको इनके पूजने में शंका करना उचित नहीं है । सब इन्हीं की शक्ति से स्थित हैं। वेदों में अग्निहोत्र, मात्विज, गुरु, स्नातक, ब्रह्मचारी, राजा और मित्र वेद के छन्दों में गायत्री, मनुष्यों में राजा, नदियों सबकी सम्भावना इनमें हो सकती है, इसी से इनकी में समुद्र, नक्षत्रों में चन्द्रमा, तेजों में सूर्य, पर्वतो पूजा प्रथम की गई है । ये श्रीकृष्ण जगत् की ! मे मेरु, पक्षियों में गरुड और जगत् की ऊची-नीची । HINHAmarnITRITAITERATUITELLITIVATIMADI IMIMILMMAR १७७ म हा भारत अध्याय ३९] TUTIOnTrammarrumIITOR TO TWITTATRETITTER animDuuu...JOINIINTERTAITarunmpany अयं तु पुरुषो वालः शिशुपालो न बुध्यते सर्वत्र सर्वदा कृष्णं तस्मादेवं प्रभापते ॥ ३० ॥ यो हि धर्म विचिनुयादुत्कृष्टं मतिमान्नरः स वै पश्येद्यथा धर्म न तथा चेदिराडयम् सवृद्धवालेप्वथवा पार्थिवेषु महात्मसु को नाऽहं मन्यते कृष्णं को वाऽप्येनं न पूजयेत् ॥ ३२ ॥ अथैनां दुष्कृतां पूजां शिशुपालो व्यवस्यति दुष्कृतायां यथा न्याय्यं तथाऽयं कर्तुमर्हति ॥ ३३ ॥ इति श्रीमन्महाभारते सभापर्वणि अर्धाहरणपर्वणि भीष्मवाक्य नाम अगानिशोऽध्याय ॥ ३८ ॥ और तिरछी गति और देवताओं और गेकों में की होती है । वाल्क, बूढ़े, जवान रोगों में, या श्रीकृष्ण जी प्रधान है। सो यह शिशुपार अपने महात्मा राजाओं में ऐसा कौन है, जो श्रीकृष्ण को अज्ञान के कारण से ऐसा कहता है, यह नहीं जानता पूजा के योग्य नहीं समझना, या श्रीकृष्ण की पूजा है, कि श्रीकृष्ण सर्वंयपी हैं ॥२१॥३०॥ नहीं करेगा ' शिशुपाल यदि श्रीकृष्ण की पूजा को इसकी बुद्धि की गति धर्म के देखने में उतनी अनुचित ममझता है, तो जो कुछ इसके किये हो नहीं है जितनी बुद्धिमान् और धर्म के जाननेवाले सकता हो, सो करे ॥३१॥३३॥ सभापर्व का अड़तीसवा अध्याय समाप्त हुआ ॥ ३८॥ DAMILTOTT वैशम्पायन उवाच अथ एकोननत्वारिंशोऽध्याय ॥ ३९ ॥ एवमुक्त्वा ततो भीप्मो विरराम महावलः व्याजहारोत्तरं तत्र सहदेवोऽर्थवढचः केशवं केशिहन्तारमप्रमेयपराक्रमम् पूज्यमानं मया यो वः कृष्णं न सहते नृपः ॥ २ ॥ सर्वेषां वलिनां मूर्ध्नि मयेदं निहितं पदम् उनतालीमवा अध्याय ॥ ३९ ॥ वैशम्पायन ने कहा है राजा जनमेजय ' महायरी की पूजा जिनको अमर हुई हो, उन बरयानी के माम इतना कहकर चुप हो रहे । अब सहदेव ने माथे पर मैं यह अपना पाँर रम्बना है। यदि किसी मोध से कहा-हे राजा लोगो केशी दैत्य को मारने में शक्ति हो, तो वह आगे पढ़कर मेरी हम बात का वारे केशव श्रीकृष्ण का यल अपार है। श्रीकृष्ण जी उचित उत्तर दे। जो बुद्धिमान् और मले-बुरे का हमारे परम पूजनीय है । इन परम पूज्य केशव जी पिनार करने में समर्थ है, वे महानुभाव कभी श्रीकृष्ण KARNATANTOANTrainine ..ca THECrnamaAAAAWAJ TOmom १७८ महा भारत सभापर्व O । - । एवमुक्ते मया सम्यगुत्तरं प्रब्रवीतु सः स एव हि मया वध्यो भविष्यति न संशयः । मतिमन्तश्च ये केचिदाचार्यं पितरं गुरुम् अय॑मर्चितमामनुजानन्तु ते नृपाः ततो न व्याजहारैषां कश्चिद् बुद्धिमतां सताम् ॥ ५ ॥ मानिनां बलिनां राज्ञां मध्ये वै दर्शिते पदे । ततोऽपतत्पुष्पवृष्टिः सहदेवस्य मूर्धनि अदृश्यरूपा वाचश्चाऽप्यनुवन्साधु साध्विति आविध्यदजितं कृष्णं भविष्यद्भूतजल्पकः सर्वसंशयनिर्मोक्ता नारदः सर्वलोकवित् उवाचाऽखिलभूतानां मध्ये स्पष्टतरं वचः कृष्णं कमलपत्राक्ष नाऽर्चयिष्यन्ति ये नराः जीवन्मृतास्तु ते ज्ञेया न संभाष्याः कदाचन ॥ ९ ॥ वैशम्पायन उवाच-पूजयित्वा च पूजार्हान्ब्रह्मक्षत्रविशेषवित् सहदेवो नृणां देवः समापयत कर्म तत् तस्मिन्नभ्यर्चिते कृष्णे सुनीथः शत्रुकर्षणः आतिताम्रक्षणः कोपादुवाच मनुजाधिपान् जी की पूजा का विरोध नहीं कर सकते । वे अवश्य समान है। उनसे कभी बात तक न करनी चाहिए। मेरे इस काम का अनुमोदन करेंगे। इतना कहकर, | वैशम्पायन जी बोले-हे राजा जनमेजय ! इसके उपरान्त सहदेव ने गर्व के साथ पांव उठाकर पृथ्वी पर रख सहदेव ने सब पूजा योग्य ब्राह्मण और क्षत्रियों की पूजा दिया। यह देखकर अभिमानी, बली और बुद्धिमान् । करके उस कर्म को समाप्त किया ॥१॥१०॥ राजाओं में से किसी ने सहदेव के इस कथन का उत्तर उस समय श्रीकृष्ण जी की पूजा होना देखकर नहीं दिया । तब सहदेव के ऊपर आकाश से फूलों | राजा शिशुपाल क्रोध के मारे कांपने लगा और लाल- की वर्षा हुई । देवगण आकाश से "साधु-साधु" | लाल आँख करके राजाओं से कहने लगा-हे महाबली कहकर उनको धन्यवाद देने लगे। उस समय नारद राजाओ ! कहो तुम सब लोगों की अब क्या इच्छा है ! जी ने, जो संशयों को दूर करनेवाले और सर्व लोकों मेरी समझ में तो यह आता है, कि हम सब मिलकर को जाननेवाले थे, कहा-जो मनुष्य कमलनयन पाण्डवों और यादवों से युद्ध करें और इन के यज्ञ श्रीकृष्ण जी की पूजा नहीं करता, वह जीते ही मरे के ! को विध्वंस करें । महायली राजाओं को उत्साहित IMTELLOMMAHILMuTILIMATIALA TRANULIORAIPULMUARMER १७ महा भारत अध्याय ३९] TATAIIMIMI InAnmmmmmm MunnirAARADIT MOTI स्थितःसेनापतियोऽहं मन्यध्वं किंतु सांप्रतम् । युधि तिष्ठाम संनह्य समेतान्वृष्णिपाण्डवान् ॥ १२ ॥ इति सर्वान्समुत्साह्य राजस्तांश्चेदिपुङ्गवः यज्ञोपघाताय ततः सोऽमन्त्रयत राजभिः ॥ १३ ॥ तत्राऽऽहूता गताः सर्वे सुनीथप्रमुखा गणाः समदृश्यन्त संक्रुद्धा विवर्णवदनास्तथा युधिष्ठिराभिषेकं च वासुदेवस्य चाऽहणम् न स्याद्यथा तथा कार्यमेवं सर्वे तदाऽवन् निष्कर्षान्निश्चयात्सर्वे राजानः क्रोधमूर्छिताः । अत्रुवंस्तत्र राजानो निर्वेदादात्मनिश्चयात् सुहृद्भिर्वार्यमाणानां तेषां हि वपुरावभी आमिपादपकृष्टानां सिंहानामिव गर्जताम् तं वलोघमपर्यन्तं राजसागरमक्षयम् कुर्वाणं समयं कृपणो युद्धाय बुबुधे तदा ॥ १८ ॥ पनि भीमन्महाभारी सभापर्वणि अहिरणपणि अर्याहरण ममाप्तिांग ऊन गत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ३९॥ ममाप्तं न अादरणपर्य। करके, राजसूय यज्ञ में विट डालने के लिये, राजा युद्ध करने को कटिबद्ध (तैयार हो गये। मिही गिगुपाल उन सब राजाओं के माथ अरग जाकर के मुंह मे उनका शिकार छिन जाने पर गये मम्मति करने नगा। उसके अनुगामी राना लोग गरजते हुए भयानक हो जाते है, यही दमा मोष से भोप के मारे युद्ध करने को तैयार हो गये। उन विपन हो रहे टन गनाओं की हुई। उन के इष्ट-मिय पी यात किसी ने नहीं सुनी, यह देखकर क्षोभ के उन्हें बेगान करने के लिये समझा रहे थे, पर उन्होंने मारे उनके चेहरे फीके पड़ गये । वे लोग आपग में उनका पहा न माना । बीकानेटने गमाभी का सम्मान परफे पदने रंग, कि इम ममय हम गंगों रा-नर देयरममा ग्यिाशिये युद्ध यिनयार की यही काम करना चाहिये, जिम में युधिष्ठिर का है। उन राजाभी की मेना गमुद्र के ममान मगर या और कृष्ण की पूना न होने पार। मन ही भी ॥१॥१८॥ मन भन्पन्न विगड़े गये राना गेग मिमियार भापमा नयादीमपां अभाय ममामा ॥३९॥ *RacerERHITErmarrccerrrrent १८० सभाप म हा भारत nararuRIORTUNTUTIONJIVANITORINTruaryanvroommmmmuTRADER अथ शिशुपालवधपर्व। अथ चत्वारिंशोऽध्यायः॥४०॥ । PohtoxoxomwwwRImanan.ammamatmasashanammadamam ॥ ४ ॥ वैशम्पायन उवाच-ततः सागरसंकाशं दृष्ट्वा नृपतिमण्डलम् संवर्तवाताभिहतं भीमं क्षुब्धमिवाऽर्णवम् रोपात्प्रचलितं सर्वमिदमाह युधिष्ठिरः भीष्मं मतिमतां मुख्यं वृद्धं कुरुपितामहम् बृहस्पतिं बृहत्तेजाः पुरुहूत इवाऽरिहा असौ रोपात्प्रचलितो महान्नृपतिसागरः अत्र यत्प्रतिपत्तव्यं तन्मे ब्रूहि पितामह ! यज्ञस्य च न विघ्नः स्यात्प्रजानां च हितं भवेत् । यथा सर्वत्र तत्सर्वं ब्रूहि मेऽद्य पितामह ! इत्युक्तवति धर्मज्ञे धर्मराजे युधिष्ठिरे उवाचेदं वचो भीष्मस्ततः कुरुपितामहः मा भैस्त्वं कुरुशार्दूल ! श्वा सिंहं हन्तुमर्हति ? । शिवः पन्थाः सुनीतोऽत्र मया पूर्वतरं वृतः प्रसुप्ते हि यथा सिंहे श्वानस्तस्मिन्समागताः । भषेयुः सहिताः सर्वे तथेमे वसुधाधिपाः वृष्णिसिंहस्य सुप्तस्य तथाऽमी प्रमुखे स्थिताः । भपन्ते तात संक्रुद्धाः श्वानः सिंहस्य सन्निधौ ॥ ८ ॥ चालीसवां अध्याय ॥ ४०॥ वैशम्पायन ने कहा-हे गजा जनमेजय ! धर्म- । श्रेष्ठ ! तुम डरो नहीं। कुत्ते भी कहीं सिंह को राज युधिष्ठिर उस क्रोध से भरे हुए सागररूपी मार सकते है ! मैंने तुम्हारे कल्याण की राह पहले राजमण्डल को युद्ध के लिये प्रतिज्ञा करते हुए ही से विचार रक्खी है। हे भाई ! पराक्रमी सिंह देखकर, अपने कुल के वृद्ध पितामह भीष्म जी से इस । को सोया हुआ देखकर जैसे आये हुए कुत्ते भौंकते प्रकार पूछने लगे, मानों इन्द्र धृहस्पति से पूछते हैं, हैं, वैसे ही ये गजा लोग शान्तभाव से स्थित यादव कि हम को अब इस समय क्या करना उचित है, । श्रेष्ठ श्रीकृष्ण के सामने क्रोध प्रकट करते हुए चिल्ला जिससे हमारा यज्ञ विध्वंस न हो और सब प्रजा | रहे हैं । जब तक सोये हुए सिंह के समान श्रीकृष्ण का भला हो। यह सुनकर भीष्म जी बोले-हे पुरुष- शान्त है, तभी तक इन राजाओं का यह भाव देख DADAATMILITARAYATIONALLIAM ymulyamulumMIRRIMILLION -- Hairwain अध्याय ४१] म हा मारत १८१ AGARILADIETITLETTINEnwariTAMITTISTORITTIVATramanorammar नहि संवुध्यते यावत्सुप्तः सिंह इवाऽच्युतः तेन सिंहीकरोत्येतान्नृसिंहश्चेदिपुङ्गवः पार्थिवान्पार्थिवश्रेष्ठः शिशुपालोऽप्यचेतन: सर्वान्सर्वात्मना तात ! नेतुकामो यमक्षयम् ॥ १० ॥ नूनमेतत्समादातुं पुनरिच्छत्यधोक्षजः यदस्य शिशुपालस्य तेजस्तिष्ठति भारत ! विप्लुता चाऽस्य भद्रं ते बुद्धिर्बुद्धिमतां वर ! । चेदिराजस्य कौन्तेय ! सर्वेषां च महीक्षिताम् ॥ १२ ॥ आदातुं च नरव्याघ्रो यं यमिच्छत्ययं तदा तस्य विप्लवते बुद्धिरेवं चेदिपतेर्यथा चतुर्विधानां भूतानां त्रिषु लोकेषु माधवः प्रभवश्चैव सर्वेषां निधनं च युधिष्ठिर ! ॥ १४ ॥ वैशम्पायन उवाच-इति तस्य वचः श्रुत्वा ततश्चेदिपतिर्नृपः भामं रुक्षाक्षरा वाचः श्रावयामास भारत! ॥ १५ ॥ इति श्रीमन्महाभारते सभापर्वणि शिशुपालवधपर्वणि युधिष्ठिराश्वासनं नाम चत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४० ॥ पड़ता है। जब तक श्रीकृष्ण जी को क्रोध नहीं आता, की और इन राजाओं की बुद्धि भ्रष्ट हो गई है। ये तभी तक यह दुष्ट शिशुपाल इन राजाओं को उत्ते कृष्ण भगवान् जिमका नाश करना चाहते हैं, उसी की बुद्धि, इस शिशुपाल के समान, भ्रष्ट हो जाती हे युधिष्ठिर ! तुम निश्चय जानो, शिशुपाल | है। हे युधिष्ठिर ! तीनों लोकों में जो चारों प्रकार के के कहने पर यदि ये राजा लोग चलेंगे तो अवश्यमेव । जीव हैं, उन की उत्पति और मंहार का कारण यही इन की मृत्यु हो जायगी। जिम तेज के बल पर यह नारायण कृष्ण है। वैशम्पायन ने कहा- राजा शिशुपाल तड़प रहा है, उसे कृष्ण भगवान् अवश्य हर जनमेजय ! परम पराक्रमी भीष्म के ये वचन सुनकर लेना चाहते हैं । हे बुद्धिमानों में श्रेष्ठ ! तुम्हारा राजा शिशुपाल मोध के मारे और भी आपे से बाहर मला हो। इस में सन्देह नहीं कि इस गिशुपाल होकर उन्हें कठोर घचन मुनाने लगा ॥१०॥१५॥ मभापर्व का पालीमयां अध्याय ममाम आ॥४॥ जित कर रहा है ॥१९॥ शिनुपाल उवाच- भन्दा अथ एकमत्वारिंशोऽध्यायः ॥४१॥ विभीपिकाभिर्वह्वीभिर्भापयन्सर्वपार्थिवान् न व्यपत्रपसे व स्मादृद्धः सन्कुलपांसनः PROMITMINISTIOHITEmercramreesrcecrearrrrrrrre १८२ महाभारत सभापर्व HumayunnrTRUITATIRTAITEmpurTIArrrrruiremenamuraru - Ashori.sarmananmmmmmuid.marrinaar - MONALILATIOKARAN युक्तमेतत्तृतीयायां प्रकृतौ वर्तता त्वया वक्तुं धर्मादपेतार्थं त्वं हि सर्वकुरूत्तमः नावि नौरिव संवद्धा यथाऽन्धो वाऽन्धमन्वियात् । तथाभूता हि कौरव्या येषां भीष्म ! त्वमग्रणीः॥ ३ ॥ पूतनाघातपूर्वाणि कर्माण्यस्य विशेषतः त्वया कीर्तयताऽस्माकं भूयः प्रव्यथितं मनः ॥ ४ ॥ अवलिप्तस्य मूर्खस्य केशवं स्तोतुमिच्छतः कथं भीष्म ! न ते जिह्वा शतधेयं विदीर्यते ॥ यत्र कुत्सा प्रयोक्तव्या भीष्म ! वालतरैनरैः तमिमं ज्ञानवृद्धः सन्गोपं संस्तोतुमिच्छसि ? ॥ ६ ॥ यद्यनेन हतो बाल्ये शकुनिश्चित्रमत्र किम् ? तो वाऽश्ववृषभौ भीष्म ! यौ न युद्धविशारदौ ॥ ७ ॥ चेतनारहितं काष्ठं यद्यनेन निपातितम् पादेन शकटं भीष्म ! तत्र किं कृतमद्भुतम् ॥ ८ ॥ वल्मीकमात्रः सप्ताहं यद्यनेन धृतोऽचलः तदा गोवर्धनो भीष्म ! न तच्चित्रं मतं मम इकतालीसवा अध्याय ॥ ४१ ॥ शिशुपाल ने कहा हे भीम ! तुम कुल के नाश तुम उनके अगुआ हो । कृष्ण के पूतना राक्षसी करनेवाले हो । तुमको वृद्ध होकर राजा लोगों को की हत्या आदि कर्मों की बड़ाई करके तुमने सचमुच बहुत से डर दिखानेवाली बातें कहते हुए रजा मेरे अन्त करण को बड़ी व्यथा पहुचाई हे। हे भीष्म! नहीं आती है ? तुम तो कौरवों में सब से उत्तम तुम बड़े घमण्डी और मूर्ख हो, और इसी से ईश्वर हो, इस तीसरे पन में तुमको ऐसी अधर्म की बात कहकर] कृष्ण की स्तुति कर रहे हो । कृष्ण की कहना उचित नहीं है । तुमने जन्म भर नपुसक । स्तुति करनेवाली तुम्हारी इस जीभ के सैकडो टुकड़े का सा जीवन बिताया है, इस कारण तुम यदि | क्यों नहीं हो जाते ॥१५॥ नामों की तरह ऐसीधर्मविरुद्ध बातें कहो, तो आश्चर्य जिस कृष्ण की निन्दा बाल्को को भी करना ही क्या है। जैसे नाव में बधी हुइ दूसरी नाव उचित है,उसकी प्रशसा तुम वृद्ध ओर ज्ञानी होकर बिना मल्लाह के हो, या जैसे अन्धों को ले चलने करते हो ? इसने जो बालकपन में बकासुर, केशी वाला अन्धा हो, वही हाल कोरवों का है, क्योंकि | और बृपासुर देत्यों को, जो युद्ध करना नहीं जानते । MAATANHAIMIUTAIMIMHINDIMIMumnu MULTUMIMITIIVIVUNNITLEMNYIMLOCIT MUUT SALANCELLULATOS Miminimuant अध्याय ४१] महा मारत mmuTRIRIDummaNALITTITUTITranmarrouTITUTILITTER भुक्तमेतेन वह्वन्नं क्रीडता नगमूर्धनि इति ते भीष्म ! शण्वानाः परे विस्मयमागताः ॥ १० ॥ यस्य चाऽनेन धर्मज्ञ ! भुक्तमन्नं वलीयसः स चाऽनेन हतः कंस इत्येतन्न महाद्भुतम् ॥ ११ ॥ न ते श्रुतमिदं भीष्म ! नूनं कथयतां सताम् । यद्वक्ष्ये त्वामधर्मज्ञं वाक्यं कुरुकुलाधम ! ॥ १२ ॥ स्त्रीपु गोपु न शस्त्राणि पातयेबाह्मणेषु च यस्य चाऽन्नानि भुंजीत यत्र च स्यात्प्रतिश्रयः ॥ १३ ॥ इति सन्तोऽनुशासन्ति सज्जनं धर्मिणः सदा । भीष्म ! लोके हि तत्सर्व वितथं त्वयि दृश्यते ॥ १४ ॥ ज्ञानवृद्धं च वृद्धं च भूयांसं केशवं मम अजानत इवाऽऽख्यासि संस्तुवन्कौरवाधम ! ॥ १५ ॥ गोनः स्त्रीनश्च सन्भीष्म! त्वद्वाक्याद्यदि पूज्यते। एवंभूतश्च यो भीम ! कथं संस्तवमर्हति असौ मतिमतां श्रेष्ठो य एप जगतः प्रभुः ॥ १६ ॥ संभावयति चाऽप्येवं त्वद्वाक्याच्च जनार्दनः थे, मारा है, उसमें क्या आश्चर्य की बात है। और । जानते, इसी से मैं तुम को यह धर्मशास्त्र का उपदेश जो इसने अपने पाँव मे छकड़े को, जो जड़पदार्थ करता हू, सुनो । सज्जन और धर्मात्मा पुरुषों का है, गिरा दिया, उसमें क्या अद्भुत बात इसने की। उपदेश है कि स्त्री, गाय, ब्रामण, अन्नदाता और इसने जो वल्मीक के समान पहाड़ को उठाकर गरण में आये हुए पर शस्त्र नहीं चलाना चाहिये पर सात दिन तक अपने हाथ पर धारण किया है, उसमें तुम तो इसके विरुद्ध इन्हीं कुकर्मों के करनेवाले कृष्ण तुमको क्या विचित्र वात जान पड़ती है । और जो की बड़ाई कर रहे हो । तुम कौरवों में नीच हो, इसने बालकपन में गोवर्द्धन पर्वत पर बहुत सा अन्न बार-बार कृष्ण को वृद्ध और ज्ञान-वृद्ध कहते हो, खाया है, उसमें कौनसी बात आश्चर्य की है ? हे मानों मै कृष्ण को जानता ही नहीं हूँ॥१२॥१५॥ धर्मज्ञ भीष्म ! जिस बलवान् कंम का अन्न खाकर हे भीष्म ! यह कृष्ण गौ अर्थात् वृपासुर और यह पला, उसी अपने मामा को इस कृतघ्न ने मार म्त्री अर्थात् पूतना का मारनेवाला है। इसकी तुमने डाला । भला यह कौनसी वीरता है । ॥६॥११॥ ऐसे खोटे काम करने पर यह पूजा के हे भीष्म ! तुम धर्म का मर्म कुछ भी नहीं , योग्य क्योंकर हो सकता है । तुम इस कृष्ण को RELIMITEDIDImmmmmmmmmIUMMITTING 1 . पूजा की IMMITATIMMIUITMVILLME सभापर्व १८४ म हा भा र त amanterruunuTOTAITRINATrrernmULTURN TWINTOUTUU WATU । LAMICANCIENTITANYATILIATANYAAMIRMALENDALINIKITSVILLADITECENTRANSLAMAHILAULACIXITIALALI - एवमेतत्सर्वमिति तत्सर्वं वितथं ध्रुवम् न गाथा गाथिनं शास्ति बहु चेदपि गायति । प्रकृति यान्ति भूतानि भूलिंगशकुनिर्यथा ॥१८॥ नूनं प्रकृतिरेपा ते जघन्या नाऽत्र संशयः अतः पापीयसी चेपां पाण्डवानामपीप्यते येषामय॑तमः कृष्णस्त्वं च येषां प्रदर्शकः धर्मवांस्त्वमधर्मज्ञः सतां मार्गादवप्लुतः ॥ २० ॥ को हि धर्मिणमात्मानं जानज्ञानविदां वरः कुर्याद्यथा त्वया भीष्म ! कृतं धर्ममवेक्षता ॥ २१ ॥ चेत्त्वं धर्म विजानासि यदि प्राज्ञा मतिस्तव अन्यकामा हि धर्मज्ञा कन्यका प्राज्ञमानिना । अम्बा नामेति भद्रं ते कथं साऽपहृता त्वया ॥ २२ ॥ तां त्वयाऽपहृतां भीष्म ! कन्यां नैषितवान्यतः । भ्राता विचित्रवीर्यस्ते सतां मार्गमनुष्ठितः ॥ २३ ॥ दारयोर्यस्य चाऽन्येन मिषतः प्राज्ञमानिनः तव जातान्यपत्यानि सज्जनाचरिते पथि ॥ २४ ॥ बुद्धिमानों में श्रेष्ठ और जगदीश्वर कहते हो और | से पाण्डवों को भी बुद्धि पाप करनेवाली हो गई है यह भी तुम्हारे कहने से अपने को वैसा ही समझता । ॥१६॥२०॥ है। किन्तु तुम्हारे ये स्तुति-वाक्य सर्वथा मिथ्या है। तुम अपने को धर्मात्मा प्रसिद्ध किये हुए हो, स्तुति करनेवाला कितनी ही बढ़-चढ़ कर स्तुति क्यों पर धर्म का तुम्हें कुछ भी ज्ञान नहीं; तुम तो सजनों न किया करे, किन्तु वह स्तुति स्तुतिकर्ता का कुछ के मार्ग से भी भ्रष्ट हो । ऐसा कौन ज्ञानी होगा, भी नहीं कर सकती; जिस तरह से भूलिङ्ग पक्षी । जो अपने को धर्म का अधिकारी जानकर ऐसा काम यद्यपि अपने मुँह से कहा करता है कि "साहस मत करे, जैसा तुमने धर्मदर्शी होने पर किया है । यदि करो।" किन्तु वह स्वयं इतना साहस करता है, कि | तुम्हें धर्म का ज्ञान है और तुम बुद्धिमान हो, तो सिंह की दादों में लगे मास को निकाल कर खा लेता । काशिराज की पुत्री अम्या को, यह जानकर भी कि है, इसी तरह मनुष्य अहिंसा का ढोंग करके हिंसा ' वह दूसरे को गहती है, क्यों स्वयम्बर से हर लाये करता रहता है । हे भीष्म ! तुम्हारी प्रकृति बड़ी थे धर्मज्ञ और ज्ञानी पुरुष कहीं ऐसा निन्दित कर्म ही नीच और बुद्धि अशुद्ध है । तुम्हारे ही सत्संग MAMImmmmmmmmmICTIOMETIMATICIDIOLENTINE कर सकता है ! तुम्हारे भाई विचित्रवीर्य बड़े धर्मात्मा - ।

की सेवा नहीं की है। यज्ञ करना, दान देना, १८५ अध्याय ४१] महा मा । त Immmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmwami TONELLITELLLLLLLLLLLLBULL . TAITHIROZAnt को हि धर्मोऽस्ति ते भीष्म ! ब्रह्मचर्यमिदं वृथा । यदारयसि मोहाद्वा क्लीयत्वाद्वा न संशयः ॥ २५ ॥ न त्वहं तव धर्मज्ञ ! पश्याम्युपचयं क्वचित् न हि ते सेविता वृद्धा य एवं धर्ममत्रवीः ॥ २६ ॥ इष्टं दत्तमधीतं च यज्ञाश्च बहुदक्षिणाः सर्वमेतदपत्यस्य कलां नार्हति पोडशीम् ॥ २७॥ व्रतोपवासर्वहुभिः कृतं भवति भीष्म ! यत् सर्व तदनपत्यस्य मोघं भवति निश्चयात् ॥ २८ ॥ सोऽनपत्यश्च वृद्धश्च मिथ्याधर्मानुसारकः हसवत्त्वमपीदानी ज्ञातिभ्यः प्राप्नुया वधम् ॥ २९ ॥ एवं हि कथयन्त्यन्ये नरा ज्ञानविदः पुरा भीष्म ! यत्तदहं सम्यग्वक्ष्यामि तव शृण्वतः ॥ ३० ॥ वृद्धः किल समुद्रान्ते कश्चिद्धंसोऽभवत्पुरा धर्मवागन्यथावृत्तः पक्षिणः सोऽनुशास्ति च ॥ ३१ ॥ धर्म चरत, माऽधर्ममिति तस्य वचः किल और सज्जनों के मार्ग पर चलेनेवाले थे, इसीसे उन्होंने वेद पढ़ना, बहुत दक्षिणायाले यज्ञ करना आदि तुम्हारी हर लाई हुई कागीराज की कन्या अम्बा सय पुण्य-कर्म पुत्र उत्पन्न किये बिना निष्फल ही की ओर आख उठाकर देखा तक नहीं । तुम्हारे हैं । ये सब पुण्य पुत्र उत्पन्न करने की सोलहवीं ज्ञान का क्या कहना है । तुम्हारे सामने ही कला के भी समान नहीं है। हे भीम ! जिस के तुम्हारे भाई की स्त्रियों में नियोगविधि से, दूसरे पुत्र नहीं है, उसका बहुत से व्रत-उपवास आदि करना ने पुत्र उत्पन्न किये । हे मीम ! इसी से मैं कहता व्यर्थ है । मिथ्या धर्म के फेर में पड़कर तुम इस हूं, कि तुम्हारा यह धर्म का ढोंग और यह ब्रह्मचर्य वृद्धावस्था को पहुँचने पर भी अब तक पुत्र-हीन हो। प्रत सब वृथा है। क्योंकि इस ब्रह्मचर्य व्रत को मुझे पूर्ण विश्वास है, कि तुम भी हंस की तरह अपनी तुमने क्लीर और मोह होने के कारण धारण कर ही जातिवालों के हाथ से मारे जाओगे ॥२६॥२९॥ ज्ञानी लोगों ने पहले जो एक हस का वृतान्त मुझ को तुम में धर्म का लेशमात्र भी होना कहा है, उसे मैं तुम्हारे आगे कहता हू-सुनो। नहीं दिखाई देता है, और तुम्हारे इस प्रकार से पहले समय में समुद्र के किनारे पर एक धर्म का धर्म के कहने से जान पड़ता है, कि तुमने वृद्धों उपदेश करनेवाला हंस रहता था। वह पक्षियों को तो उपदेश किया करता था, परन्तु आप उसके विपरीत धर्म रक्खा है ॥२॥२५॥ MINMETICOTAMMAM KAIMULA TAM KULLUNILCOLLULL HArumernamrurUTUnrutionyuri म हा भारत [सभापर्व IMAnnrnmmmmmmmARIIIIIII पक्षिणः शुश्रुवुर्भीष्म ! सततं सत्यवादिनः ॥ ३२ ॥ अथाऽस्य भक्ष्यमाजहरुः समुद्रजलचारिणः अण्डजा भीष्म! तस्याऽन्ये धर्मार्थमिति शुश्रुम ॥ ३३ ॥ तेच तस्य समभ्याशे निक्षिप्याऽण्डानि सर्वशः। समुद्राम्भस्यमजन्त चरन्तो भीष्म ! पक्षिणः ॥ ३४ ॥ तेपामण्डानि सर्वेषां भक्षयामास पापकृत् स हंसः संप्रमत्तानामप्रमत्तः स्वकर्मणि ॥३५॥ ततः प्रक्षीयमाणेषु तेषु तेवण्डजोऽपरः अशङ्कत महाप्राज्ञः स कदाचिद्ददर्श ह ॥३६॥ ततः स कथयामास दृष्ट्वा हंसस्य किल्बिषम् । तेषां परमदु खार्तः स पक्षी सर्वपक्षिणाम् ॥ ३७॥ ततः प्रत्यक्षतो दृष्ट्वा पक्षिणस्ते समीपगाः निजघ्नुस्तं तदा हंसं मिथ्यावृत्तं कुरूद्वह ! ते त्वां हंससधर्माणमपीमे वसुधाधिपाः निहन्युीष्म ! संक्रुद्धा पक्षिणस्तमिवाऽण्डजम् ॥ ३९ ॥ गाथामप्यत्र गायन्ति ये पुराणविदो जनाः भीष्म! यांतांच ते सम्यकथयिष्यामि भारत! ॥४०॥ अन्तरात्मन्यभिहते रौषि पत्ररथाऽशुचि अण्डभक्षणकर्मतत्तव वाचमतीयते ॥४१॥ इति श्रीमन्महाभारते सभापर्वणि शिशुपालवधपर्वणि शिशुपालवाक्ये एकचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४१ ॥ चलता था, उसके मुख से पक्षी सदैव यह सुना | थे,उनके अण्डों को खा लिया करता था ॥३०॥३५॥ करते थे, कि धर्म करो, अधर्म मत करो । वे पक्षी जब बहुत अण्डे क्षय होने लगे, तब उन पक्षियों उसको धर्मोपदेश के कारण भक्ष्य और भोजन लाकर में से एक चतुर पक्षी को संदेह हुआ, और उसने दिया करते थे । एक समय ऐसा हुआ, कि वे सब एक दिन छिपकर उस हस के खोटे कर्म को देख पक्षी अपने अण्डों को उस हंस के पास छोड़कर चले | लिया । उसने तब वह हाल दूसरे पक्षियों से कहा। गये, और चलते-फिरते समुद्र में डूब गये । तब वह जब उन्होंने भी उसके मिथ्या चलन को देख लिया, पापी हंस उन पक्षियों के अण्डों को खा गया । इसी तव सब ने मिलकर उस पापी हंस को मार डाला। प्रकार से वह हस जब पक्षी चले जाते, या नष्ट हो जाते यह कथा समाप्त करके राजा शिशुपाल ने कहा-हे STAHILIVARILALITATISTIANRALLELANABELECTRATIMALLAHINITIOrTEELLIT memorninArIrintlndwwIGNITIATEGRANAMAnantar MAMA १८७ महा मारत अध्याय ४२] IMIRRUITாராராராராமUAL mum inuRANTEDArtram ५५ भीम ! जिस प्रकार उस ढोंगी हंस को पक्षियों ने पक्षी ! तू अपनी हत्या होते देखकर रो रहा है । मार डाला था, इसी प्रकार से तुम भी सब जातिवालों किन्तु तेरा वह अण्डे खा जाने का नीच कर्म ऐसा है, के हाथ से मारे जाओगे। पुराणों के जानकार पण्डित कि जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता"॥३६॥४१॥ लोग इस विषय में एक गाथा कहते हैं कि "हे पापी सभापर्व का इकतालीसवां अध्याय ममाम हुआ ॥४१॥ Animun ராாயானாரகா । । अथ द्वाचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४२ ॥ शिशुपाल उवाच-स मे बहुमतो राजा जरासन्धो महावलः योऽनेन युद्धं नेयेप दासोऽयमिति संयुगे केशवेन कृतं कर्म जरासन्धबधे तदा भीमसेनार्जुनाभ्यां च कस्तत्साध्विति मन्यते ॥ २ ॥ अद्वारेण प्रविष्टेन च्छद्मना ब्रह्मवादिना दृष्टः प्रभावः कृष्णेन जरासन्धस्य भूपतेः येन धर्मात्मनाऽऽत्मानं ब्रह्मण्यमविजानता नेपितं पाद्यमस्मे तद्दातुमग्रे दुरात्मने भुज्यतामिति तेनोक्ताः कृष्णभीमधनंजयाः जरासन्धेन कौरव्य! कृष्णेन विकृतं कृतम् यद्ययं जगतः कर्ता यथैनं मूर्ख! मन्यसे कस्मान्न ब्राह्मणं सम्यगात्मानमवगच्छति इदं त्वाश्चर्यभूतं मे यदिमे पाण्डवास्त्वया ययालीसवां अध्याय ॥४२॥ शिशुपाल ने कहा-हे भीम ! तुम लोग ईश्वर । किया, और जरासन्ध के पास जाकर अपने को समझकर जिस की पूजा करते हो. उसी कृष्ण को ब्राह्मण बतलाया । राजा जरासन्ध ने जम पाच अर्घ्य दास समझकर महाबली जरासन्ध ने उससे युद्ध नहीं आदि देना चाहा, तब इस दुरात्मा ने अपना नामण किया था। राजा जरासन्ध मेरे प्रिय मित्र थे। कृष्ण, होना अस्वीकार कर लिया । जरासन्ध के पराक्रम भीम और अर्जुन ने जिस उपाय से राजा जरासन्ध को यह अच्छी तरह जानता था ॥११॥ की हत्या की है, उसे स्मरण करके किस धर्मात्मा महामति जरासन्ध ने जब इस से और भीमसेन पुरुष को दुःख न होगा ! इस छली कृष्ण ने तथा अर्जुन से भोजन करने के लिये कहा, तब इसी दरवाजे से न जाकर दूसरी ओर से नगरी में प्रवेश ने उस में रुकावट डालकर अपने साथ भीम और - . TVNITIOUSANJITAMILat MMMMMMUML MOTAMIL १८८ म हा भारत सभापर्व noonamurramrentirinaruwarmirmirmanarmuni TITUTITICIETirrruary अपकृष्टाः सतां मार्गान्मन्यन्ते तच्च साध्विति ॥ ७ ॥ अथ वा नैतदाश्चर्य येषां त्वमसि भारत ! स्त्रीसधर्मा च वृद्धश्च सर्वार्थानां प्रदर्शकः वैशम्पायन उवाच-तस्य तद्वचनं श्रुत्वा रूक्षं रूक्षाक्षरं बहु चुकोप वलिनां श्रेष्ठो भीमसेनः प्रतापवान् तथा पद्मप्रतीकाशे खभावायतविस्तृते भूयः क्रोधाभिताम्राक्षे रक्ते नेत्रे बभूवतुः ॥ १० ॥ त्रिशिखां भृकुटी चाऽस्य ददृशुः सर्वपार्थिवाः । ललाटस्थां त्रिकूटस्थां गङ्गां त्रिपथगामिव ॥ ११ ॥ दन्तान्संदशतस्तस्य कोपाद्ददृशुराननम् युगान्ते सर्वभूतानि कालस्येव जिघत्सतः ।॥ १२ ॥ उत्पतन्तं तु वेगेन जग्राहैनं मनस्विनम् भीष्म एव महावाहुमहासेनमिवेश्वरः ॥ १३ ॥ तस्य भीमस्य भीष्मेण वार्यमाणस्य भारत ! अर्जुन को भी भोजन नहीं करने दिया। शिशुपाल भृकुटी के टेढ़े होने से उसके ललाट (मस्तक) पर तीन ने भीष्म से फिर कहा-हे मूर्ख ! सुनो, यदि कृष्ण रेखा ऐसी पड़ गई, जैसे त्रिकुट पहाड़ पर गंगा जी को तुम जगत् का रचयिता समझते हो, तो यह फिर तीन धारा होकर बहती है। उस समय भीमसेन क्रोध अपने को ब्राह्मण मानने में क्यों डरता है ? तुम इन | से अपने दांतों को पीसने लगा । और उसका मुख पाण्डवों को उस राह पर चलने की सलाह देते हो, ऐसा सब को दिखाई दिया, मानो प्रलयकारक काल जिसकी साधु लोग निन्दा करते हैं, और वे भी उसी है। इस प्रकार से भीममेन क्रोधित होकर शिशुपाल उपदेश को धर्म समझते है, यही मुझे अत्यन्त आश्चर्य | को मारने को दौड़ा, परन्तु उसको भीष्म ने जल्दी जान पड़ता है । अथवा जब तुम ऐसा वृद्ध और से इस प्रकार मे पकड़ लिया,जैसे देवताओं का ईश्वर नपुंसक इनका अगुआ और सब कामों में सलाहकार | (महादेव) महासेन (कार्तिकेय) को पकड़े, और अनेक है, तब इनका ऐसा होना विचित्र नहीं ॥५॥८॥ प्रकार के मधुर और श्रेष्ठ वचन कहकर उसके क्रोध वैशम्पायन ने कहा-हे राजा जनमेजय ! शिशुपाल को शांत किया ॥९॥१२॥ के ऐसे कठोर कड़वे तिरस्कार के वचन सुनकर प्रचण्ड और उठी हुई लहरों से पूर्ण अथाह महाबली भीमसेन फ्रोध के मारे कॉपने लगा। कमल समुद्र जैसे, वर्षाकाल न रहने पर भी, अपने किनारे के समान उसकी दोनों आंखें लाल हो गई, और | की भूमि को लांघ नहीं सकता, वैसे ही भीमसेन भी PARTIALITIVATIMILAIMIMILLERYPTERANDRINKITIVALOTRIPATHARATRAVEL RCRAreminaraurnimurrorayamanurmusuntaATRIORTI .. ANTT TILMIn १८९ अध्याय ४३] महा मारत arernmirmIIIIIIIIII VIIIIIIIIIII INTIFTTARTITIOM Tranturn ॥१४॥ COLLANEOPLETECRUMALLARABLEDTUTIOLLELEN ImawwwLamaAIDAImat गुरुणा विविधैर्वाक्यैः क्रोधः प्रशममागतः नाऽतिचक्राम भीष्मस्य स हि वाक्यमरिंदमः । समुवृत्तो घनापाये वेलामिव महोदधिः शिशुपालस्तु संकुद्धे भीमसेने जनाधिप ! नाऽकम्पत तदा वीरः पौरुषे खे व्यवस्थितः ॥ १६ ॥ उत्पतन्तं तु वेगेन पुनः पुनररिन्दम ! न स तं चिन्तयामास सिंहः क्रुद्धो मृगं यथा ॥ १७ ॥ प्रहसंश्चाऽब्रवीद्वाक्यं चेदिराजः प्रतापवान् भीमसेनमतिक्रुद्धं दृष्ट्वा भीमपराक्रमम् ॥ १८ ॥ मुञ्चैनं भीष्म ! पश्यन्तु यावदेनं नराधिपाः मत्प्रभावविनिर्दग्धं पतङ्गमिव वह्निना ततश्चेदिपतेर्वाक्यं श्रुत्वा तत्कुरुसत्तमः भीमसेनमुवाचेदं भीष्मो मतिमतां वरः ॥ २० ॥ इति श्रीमन्महाभारते सभापर्वणि शिशुपालवधपर्वणि भीमक्रोधे द्विचत्वारिंशोऽध्यायः ।। ४२ ॥ पितामह के वचनों का उल्लचन नहीं कर सका। देखते-देखते यह मेरे प्रभाव से इस प्रकार भस्म हो भीमसेन के क्रोध को देखकर शिशुपाल तनिक भी जायगा,जैसे अमि में पता जल मरना है। शिशुपाल नहीं डरा,और उसको अति क्रोध से बार बार उछलते के ये गर्व-भरे वचन सुनकर भीष्म जी भीमसेन से हुए देखकर हंसकर कहने लगा, कि हे भीष्म ! तुम कहने लगे ॥१३॥२०॥ इम को छोड़ दो, आने दो, अभी सब राजाओं के । मभापर्व का ययालीसवा अध्याय ममाप्त हुआ।॥ १२ ॥ अथ त्रयश्चत्वारिंशोऽध्यायः॥४३॥ भीष्म उयान---चेदिराजकुले जातरूयक्ष एप चतुर्भुजः रासभारावसदृशं ररास च ननाद च तेनालीमयाँ अध्याय ॥४३॥ भीष्म ने कहा-हेभीमसेन ! यह शिशुपाल राजा देखकर और मयानक शब्द सुनकर मपरिवार माना. वैदिराज के वंश में जब उत्पन्न हुआ था,तब इसके चार पिता ने डर के मारे इसे त्याग दंन का विचार पिया। मुना और तीन आस थी । उत्पन्न होते ही यह गधे स्त्री, मन्त्री और पुरोहिन के साथ चेदिराज चिन्ता सीतरह चिल्लाने और रोने रगा। इसकी मिचित्र सूरत में डूब रहे थे, इसी समय भाशवाणी दुई, कि काmarwarsimarnataravaaom -- 1 KEEarரானா म हा भारत सभापर्व Sunninmannamrurimmunmunmunroinwwwmurraramantainm - । - तेनाऽस्य मातापितरौ त्रेसतुस्तौ सवान्धवौ वैकृतं तस्य तौ दृष्ट्वा त्यागाय कुरुतां मतिम् ॥ २ ॥ ततः सभार्यं नृपति सामात्यं सपुरोहितम् चिन्तासंमूढहृदयं वागुवाचाऽशरीरिणी एप ते नृपते ! पुत्रः श्रीमाञ्जातो बलाधिका तस्मादस्मान्न भेतव्यमव्यग्रः पाहि वै शिशुम् ॥ ४ ॥ न चैव तस्य मृत्युर्वे न कालः प्रत्युपस्थितः । मृत्युहन्ताऽस्य शस्त्रेण स चोत्पन्नो नराधिप ! ॥ ५ ॥ संश्रुत्योदाहृतं वाक्यं भूतमन्तर्हितं ततः पुत्रस्नेहाभिसंतप्ता जननी वाक्यमब्रवीत् येनेदमीरितं वाक्यं ममैतं तनयं प्रति प्राञ्जलिस्तं नमस्यामि ब्रवीतु स पुनर्वचः याथातथ्येन भगवान्देवो वा यदि वेतरः श्रोतुमिच्छामि पुत्रस्य कोऽस्य मृत्युभविष्यति॥ ८ ॥ अन्तर्भूतं ततो भूतमुवाचेदं पुनर्वचः यस्योत्सङ्गे गृहीतस्य भुजावभ्यधिकावुभौ पतिष्यतः क्षितितले पञ्चशीविवोरगौ तृतीयमेतद्वालस्य ललाटस्थं तु लोचनम् राजन्, तुम पुत्र-जन्म होने से प्रसन्न न होकर अका. में उठा लिया । इसकी मृत्यु का हाल सुनने से रण क्यों इतना डर रहे हो ? इस बालक से तुम्हारा घबराकर उसने,उसी आकाशवाणी को लक्ष्य करके कुछ भी अनिष्ट होने की सम्भावना नहीं । तुम्हारा कहा-जिसने मेरे पुत्र के बारे में ये वचन कहे यह पुत्र बड़ा वली और श्रीमान् होगा । इसलिए हैं, उसे प्रणाम करके मैं इतना और पूछती हूं, कि हे महाराज ! तुम चिन्ता छोड़कर यत्न के साथ इस बालक की मृत्यु किसके हाथ से होगी ? यह इसका पालन करो । इसकी मृत्यु और काल नहीं मैं विस्तारपूर्वक सुनना चाहती हूं । तर फिर है। इसका मारनेवाला केवल महाकाल है, और वह आकाशवाणी हुई--जिसकी गोद में जाने से इस पालक संसार में प्रकट हो चुका है । आकाशवाणी सुनने के दो हाथ और एक आँख गायब हो जायगी, वही पर इसकी माता ने स्नेह के वश होकर, इसे गोद | इसे मारेगा ॥१॥१०॥ mummmmPOHORImmamIMADIRMITAL TIMADIMAMITIYATANTRIEEOIRECE CuTOLOVIN . । अध्याय ४३ म हा भारत १९१ STIANITATIாயானானனாயாாாாாாாHITTTTTTTTTTTTTTTLEERE निमज्जिष्यति यं दृष्ट्वा सोऽस्य मृत्युभविष्यति । व्यक्ष चतुर्भुजं श्रुत्वा तथा च समुदाहृतम् पृथिव्यां पार्थिवाः सर्वे अभ्यागच्छन्दिदृक्षवः । तान्पूजयित्वा संप्राप्तान्यथाह स महीपतिः ॥ १२ ॥ एकैकस्य नृपस्याङ्के पुत्रमारोपयत्तदा एवं राजसहस्राणां पृथक्त्वेन यथाक्रमम् । ॥ १३ ॥ शिशुरके समारूढो न तत्प्राप निदर्शनम् एतदेवं तु संश्रुत्य द्वारवत्यां महावलो ततश्चेदिपुरी प्राप्तौ संकर्पणजनार्दनी यादवी यादवीं द्रष्टुं स्वसारं तो पितुस्तदा ॥ १५॥ अभिवाद्य यथान्यायं यथाश्रेष्टं नृपं च ताम् कुशलानामयं पृष्ट्वा निपपणौ रामकेशवी साऽभ्यर्च्य तो तदावीरोप्रीत्या चाऽभ्यधिकं ततः। पुत्रं दामोदरोत्सङ्गे देवी संन्यदधात्वयम् ॥ १७ ॥ न्यस्तमात्रस्य तस्याङ्के भुजावभ्यधिकावुभौ पेततुस्तच्च नयनं न्यमज्जत ललाटजम् ॥ १८॥ इसके पीछे यह सूचना देश-देश में पहुंची । बैठ गये ॥११।१६।। कि राजा चंदेरी के एक ऐसा पुत्र हुआ है, जिसके उस समय इसकी माना ने उन दोनों अपने चार मुजा और तीन नेत्र हैं और उमन उत्पन्न भतीजों का विशेप आदर-सत्कार करके श्रीकृष्ण जी होते ही गधे के समान शब्द किया था। यह सुन की गोद में इसको बैठा दिया । पैठाते ही शिशु. सुनकर मय देशों के हजारों राजा लोग इसे देखने । पाल के दो हाथ गिर पड़े, और एक आंख गायर को आये । और इसके पिता ने उन मय का आदर- हो गई । यह देखकर शिशुपाल की माता ने मय- सरकार करके इसे प्रत्यक को गोद में बैठाया, परन्तु । भीत होकर श्रीकृष्ण जी मे कहा-दे श्रीकृष्ण ! तुम रिसी की गोद में बैठने से इसकी न भुजा गिरी, भय से डरे हुए मनुष्यों को अमय और आसरा न नेत्र यंटा । इसके पीछे इस चान्त को मुनकर देनेयाले हो । मैं मी मय में दुमी छ, इममे मुतो यलदेय जी और श्रीकृष्ण जी अपनी फूफी अर्थात् जो मैं यर मांग सो दो। यह मुनार श्रीकृष्ण ने इसकी मां को देखने को आये,और विधिपूर्वक अपने कहा है की ! तुम डरो मन । मुभमे तुमको क्मिी एका अर्थात् हमके पिता को दण्डवत् प्रणाम करके प्रकार का मय नहीं पहुंच सस्ता है। क्या यर भाauru - TION १९२ म हा भारत सभापर्व inmenTUITIOmATuuuN TAITRISATIRITTAmarrrrrrrnrum तद् दृष्ट्वा व्यथिता त्रस्ता वरं कृष्णमयाचत । ददस्व मे वरं कृष्ण ! भयाव्या महाभुज ! ॥१९॥ त्वं ह्यार्तानां समाश्वासो भीतानामभयप्रदः एवमुक्तस्ततः कृष्णः सोऽब्रवीद्यदुनन्दनः मा भैस्त्वं देवि धर्मज्ञे न मत्तोऽस्ति भयं तव । ददामि के वरं, किं च करवाणि पितृष्वसः ! ॥ २१ ॥ शक्यं वा यदि वाऽशक्यं करिष्यामि वचस्तव । एवमुक्ता ततः कृष्णमब्रवीद्यदुनन्दनम् ॥ २२ ॥ शिशुपालस्याऽपराधान्क्षमेथास्त्वं महाबल! मत्कृते यदुशार्दूल ! विध्धेनं मे वरं प्रभो ! ॥ २३ ॥ श्रीकृष्ण उवाच-अपराधशतं क्षाम्यं मया ह्यस्य पितृप्वसः! पुत्रस्य ते वधार्हस्य मा त्वं शोके मनः कृथाः ॥ २४ ॥ भीष्म उवाच--एवमेष नृपः पापः शिशुपालः सुमन्दधीः त्वां समाह्वयते वीर ! गोविन्दवरदर्पितः ॥ २५॥ इति श्रीमन्महाभारते मभापर्वणि शिशुपालवधपर्वणि शिशुपालवृत्तान्तकथने त्रिचत्वारिंशोऽध्यायः ॥४३॥ + ! क्या करूँ? चाहे हो सकता हो, और चाहे न हो ने कहा-हे बुआ जी ! तुम्हारा पुत्र यदि मार डालने सकता हो, परन्तु मै तुम्हारा कहा अवश्य करूंगा। के योग्य अपराध भी करेगा तो मैं वैसे सौ अपराधों यह सुनकर शिशुपाल को माता ने कहा-हे पुत्र ! तक कुछ नहीं कहूगा, बराबर क्षमा करता जाऊगा। तुम यदुकुल के सहस्रा वीरों में श्रेष्ठ और उनके | तुम वृथा शोक न करो । सो है भीमसेन ! यही मुखिया हो । तुम से मेरी यही प्रार्थना है, कि यदि कारण है, कि यह मन्दबुद्धि शिशुपाल श्रीकृष्ण जी शिशुपाल कभी तुम्हारा कुछ अपराध करे, तो तुम के वरदान से गर्वित होकर तुमको युद्ध करने के बुरा न मानना, क्षमा कर देना । तब श्रीकृष्ण जी | लिये ललकार रहा है ॥१७॥२५॥ सभापर्व का तेतालीसवां अध्याय अमाप्त हुआ। ४३ ॥ dear- अथ चतुश्चत्वारिंशोऽध्यायः ॥४४॥ मीप्म उवाच-नेपा चेदिपतेर्बुद्धिर्यया त्वाह्वयतेऽच्युतम् नूनमेप जगद्भर्तुः कृष्णस्यैव विनिश्चयः PRITHEIRTYPERTRAITATTERTAITUTORITTORYENTERINEETITLEVOTINCTICE . OMSUTRITAmrrian FuTuTITUTITUTI LATALLLLLLLLL । अध्याय ४४] म हा भारत १९३ FORimmmmmmIENT को हि मां भीमसेनाऽद्य क्षितावहति पार्थिवः । क्षेप्तुं कालपरीतात्मा यथेष कुलपांसनः एप ह्यस्य महावाहुस्तेजोंऽशश्च हरेधुंवम् तमेव पुनरादातुमिच्छत्युत तथा विभुः येनेष कुरुशार्दूल ! शार्दूल इव चेदिराद् गर्जत्यतीव दुर्बुद्धिः सर्वानस्मानचिन्तयन् ॥ ४ ॥ वैशम्पायन याच-ततो न ममृपे चैद्यस्तद्भीप्मवचनं तदा उवाच चैनं संक्रुद्धः पुनर्भीष्ममथोत्तरम् शिशुपाल उवाच-द्विपतां नोऽस्तु भीष्मैप प्रभावः केशवस्य यः यस्य संस्तववक्ता त्वं चन्दिवत्सततोत्थितः संस्तवे च मनो भीष्म ! परेषां रमते यदि तदा संस्तौपि राज्ञस्त्वमिमं हित्वा जनार्दनम् ॥ ७ ॥ दरदं स्तुहि वाहीकमिमं पार्थिवसत्तमम् जायमानेन येनयमभवद्दारिता मही वङ्गाङ्गविषयाध्यक्षं सहस्राक्षसमं वले स्तुहि कर्णमिमं भीष्म ! महाचापविकर्षणम् ॥ ९ ॥ यस्येमे कुण्डले दिव्ये सहजे देवनिर्मिते कवचं च महाबाहो बालार्कसदृशप्रभम् ॥ १० ॥ चवालीसवां अध्याय ॥४४॥ भीष्म ने कहा हे वृकोदर ! शिशुपाल यह वैशम्पायन जी बोले- राजा जनमेजय ! अच्छा नहीं करता है, जो जगन्नाथ श्रीकृष्ण जी की शिशुपाल भीष्म जी की उक्त यान को सुनकर सहन निन्दा करता है, और ऐमा कौनसा राजा पृथ्वी पर सा, और अत्यन्त क्रोध करके कहने लगा, कि होगा, जो काल के यश में होकर मेरी निन्दा इम भीम : जिम श्रीकृष्ण की स्तुनि तुम बंदीजनों की मकार से करे, जैसे कुल-कल शिशुगल करता है। तरह करते हो, उमका जो पुछ प्रभाव हो, मो मुन परन्तु कारण इसका यह है, कि यह श्रीकृष्ण जी का द्वेष करनेवाले पर प्रकट होये, मेरा क्या कर सकता अंशद, और श्रीकृष्ण जी इसको अपने में लय करना है। यदि तुम दूसरे की नुनि ही करना अच्छा चाहते है। और इसी कारण से यह दुवुद्धि हम सब की रगता है,नो तुम हमकृष्णमोहोरर अन्य गजाओं निन्दा निर्भय होकर कर रहा है ॥१४॥ की स्तुनि बगे। गना दरद, गजा पाईर, निमक aamaariindaiam ।

१९४ म हा भारत सभापर्व OmmentaruninnrurmutnurinnromrunmurninrTHYRIMInnonrnporanrnmy TOTAL । mammi CARE । वासवप्रतिमो येन जरासन्धोऽतिदुर्जयः विजितो बाहुयुद्धेन देहभेदं च लम्भितः द्रोणं द्रौणिं च साधु त्वं पितापुत्रौ महारथौ स्तुहि स्तुत्यावुभौ भीष्म ! सततं द्विजसत्तमौ ॥ १२ ॥ ययोरन्यतरो भीष्म ! संक्रुद्धः सचराचराम् इमां वसुमती कुर्यान्निशेषामिति मे मतिः द्रोणस्य हि समं युद्धे न पश्यामि नराधिपम् । नाऽश्वत्थाम्नः समं भीष्म!नच तौ स्तोतुमिच्छसि १४ ॥ पृथिव्यां सागरान्तायां यो वै-प्रतिसमो भवेत् । दुर्योधनं तं राजेन्द्रमतिक्रम्य महाभुजम् जयद्रथं च राजानं कृतास्त्रं दृढविक्रमम् द्रुमं किंपुरुषाचार्य लोके प्रथितविक्रमम् ॥ १६ ॥ अतिक्रम्य महावीर्यं किं प्रशंससि केशवम् । वृद्धं च भरताचार्य तथा शारद्वतं कृपम् ॥ १७ ॥ धनुर्धराणां प्रवरं रुक्मिणं पुरुषोत्तमम् . अतिक्रम्य महावीर्य किं प्रशंससि केशवम् ॥ १८ ॥ भीष्मकं च महावीर्यं दन्तवक्त्रं च भूमिपम् । भगदत्तं यूपकेतुं जयत्सेनं च मागधम् ॥ १९ ॥ उत्पन्न होने पर पृथ्वी फट गई थी, और राजा कर्ण जगत् में जिनका सामना करनेवाला कोई नहीं है, जो इन्द्र के समान बलवान् और कुण्डल कवच सहित व प्रबल प्रतापी राजा दुर्योधन,परम पराक्रमी अस्त्रविद्या उत्पन्न हुआ था, और जिसने मल्लयुद्ध करके जरासन्ध में निपुण राजा जयद्रथ, लोकप्रसिद्ध द्रुम और भरतकुल को प्रसन्न किया था,स्तुति करने योग्य है ॥५॥११॥ के आचार्य, शरद्वान् के पुत्र कृपाचार्य आदि बड़े-बड़े इनके सिवाय ये दोनों द्विजोत्तम और महारथी द्रोणा- वीर क्या तुम्हारी दृष्टि में कृष्ण से कुछ हीन है ! चार्य तथा अश्वत्थामा जो सब संसार को चर और फिर क्यों कृष्ण की ही प्रशंसा करते हो? धनुर्द्धर पुरुषों अचर जीवों-महित नष्ट कर सकते है, और जिनके में श्रेष्ठ रुक्मी को छोड़कर कृष्ण की क्यों बढ़ाई कर समान कोई राजा पृथ्वी तल पर बलवान् नहीं है,स्तुति रहे हो ? राजा भीमक,राजा दन्तवक्त,राजा भगदत्त, क्यों नहीं करते हो? ॥१२॥१४॥ राजा यूपकेतु, राजा जयत्सेन,राजा विराट, राजा द्रुपद, । IMIMAMTAmanawunlIIIIIIMILAIMIMILAIMIMILMAKAL MuTI निदेशक राजा, गना दाम्य और भार पाहुन में ॥ Mariamondkiawaamwamimarcom अध्याय ४४] महा भारत १९५ PRITAIIIIIIIIIIIIIIIITYLE marianRIATTRATIVIRAamrammar विराटद्रुपदो चोभो शकुनिं च वृहवलम् विन्दानुविन्दावावन्त्यो पाण्ड्यं श्वेतमथोत्तमम् ॥ २० ॥ शहं च सुमहाभागं वृपसेनं च मानिनम् एकलव्यं च विक्रान्तं कालिङ्गं च महारथम् अतिक्रम्य महावीर्य किं प्रशंससि केशवम् ॥ २१ ॥ शल्यादीनपि कस्मात्त्वं न स्तोपि वसुधाधिपान् । स्तवाय यदि ते बुद्भिर्वर्तते भीष्म ! सर्वदा ।। २२ ॥ किं हि शक्यं मया कर्तुं यद् वृद्धानां त्वया नृप!। पुरा कथयतां नूनं न श्रुतं धर्मवादिनाम् ? ॥ २३॥ आत्मनिन्दाऽऽत्मपूजा च परनिन्दा परस्तवः अनाचरितमार्याणामिति ते भीम !नः श्रुतम् ।। २४ ।। यदस्तव्यमिमं शश्वन्मोहात्संस्तापि भक्तितः । केशवं तच्च ते भीष्म ! न कश्चिदनुमन्यते ॥ २५ ॥ कथं भोजस्य पुरुपे वर्गपाले दुरात्मनि समावेशयसे सर्व जगत्केवलकाम्यया ॥ २६ ॥ अथ चेपा न ते बुद्धिः प्रकृति याति भारत! । मयेक कथितं पूर्व भूलिङ्गशकुनिर्यथा ॥ २७॥ गानी, राजा वृहदन, अनि देश के राजा किन्द और ' यह कृष्ण तो रिमी प्रकार में तुनि पाने के योग्य अनुपिन्द, गनापागजात, गजा उत्सम, महा. नहीं है। यदि तुमामी प्रभमा अरने मोर मा गति माग गरगना वृपमेन,राजा विमान्न, राना एकरण्य, मेने दो,मर्श अमानी पर माना। गजा पमनाकर, गोमा पानपारे दुगनापन मार्ग और महारथी गजाग जो यहोटदुए को जगद्गुर और जगन्ग निकालने इन गरको हार गुग पेयन य काययों गुमरोनानिक भी गारदी टी२१२॥ मारहो! ॥१५॥२२॥ मिरामगर काग मनुभाग मेोपाग मानी गुम टपाप नही', नि या पुदि दिने नहीं भा मे मागा. गुना और लोकोशिनीमनीम गुम ही मनम:माग्य पाटीमा भरा पार Giv + " " I s? ? ?FR If परमा भारी मनुनी मामीर मा MRRET R"EY TrearrrrrrrrTTTTTTTTTTTxxx १९६ म हा भारत सभापर्व UUUUUUUUN uuutituuuuuuuuuuuuuuuuuuuunt - AEEEROmaaraurammarATaurus भूलिङ्गशकुनि म पार्श्वे हिमवतः परे भीष्म ! तस्याः सदा वाचः श्रूयन्तेऽर्थविहिताः॥ २८ ॥ मा साहसमितीदं सा सततं वाशते किल साहसं चाऽऽत्मनाऽतीव चरन्ती नाऽवबुध्यते ॥ २९ ॥ सा हिमांसागलं भीष्म! मुखासिंहस्य खादतः। दन्तान्तरविलग्नं यत्तदादत्तेऽल्पचेतना ॥३०॥ इच्छतः सा हि सिंहस्य भीष्म ! जीवत्यसंशयम् । तद्वत्त्वमप्यधर्मिष्ठ ! सदा वाचः प्रभापसे ॥ ३१ ॥ इच्छतां भूमिपालानां भीष्म ! जीवस्यसंशयम् । लोकविद्विष्टकर्मा हि नाऽन्योऽस्ति भवता समः ॥ ३२॥ वैशम्पायन उवाच-ततश्चेदिपतेः श्रुत्वा भीष्मः स कटुकं वचः उवाचेदं वचो राजश्चेदिराजस्य शृण्वतः ॥३३॥ इच्छतां किल नामाऽहं जीवाम्येषां महीक्षिताम् । सोऽहं न गणयाम्येतांस्तृणेनापि नराधिपान् ॥ ३४ ॥ एवमुक्ते तु भीष्मेण ततः संचुक्रुशुर्नृपाः केचिजहृपिरे तत्र केचिद्भीष्मं जगहिरे ॥ ३५॥ केचिदूचुर्महेष्वासाः श्रुत्वा भीष्मस्य तद्वचः पापोऽवलिप्तो वृद्धश्च नाऽयं भीष्मोऽर्हति क्षमाम् ॥ ३६ ॥ स्वयं सिंह के मुँह के भीतर से, चोंच से, मांस की | नहीं है । वैशम्पायन जी बोले-हे राजा जनमेजय ! बोटी खींच लाता है ॥२७॥३०॥ भीम जी शिशुपाल के उक्त कड़वे वचनों को सुन- सिंह की कृपा से वह पक्षी जीता है । उसे नासमझ, कर कहने लगे कि जिन राजाओं की इच्छा से तुम साधारण प्राणी समझकर सिंह कुछ नहीं बोलता। हम को जीता हुआ बताते हो, उन सब को हम हे भीष्म ! जैसे वह पक्षी दूसरों को तो साहस न तिनके के बराबर भी नहीं समझते हैं ॥३१॥३४॥ करने का उपदेश करता रहता है, और आप सिंह की यह सुनकर सब राजा क्रोध से आग-बबूला डाढ में से भी मांस निकालने का साहस करता ह; | हो उठे। उनमें से कोई-कोई तो हंसने लगे, कोई तैसे ही तुम्हारे भी वचन है । तुम अब केवल इन भीष्म जी की निन्दा करने लगे, और कोई-कोई यह राजाओं की ही इच्छा से जीते हुए बैठे हो। तुम्हारे कहने लगे कि यह वृद्ध भीष्म विषयों में लिप्त हो रहा है, घरावर दुष्ट कर्म का करनेवाला इस संसार में कोई | क्षमा करने के योग्य नहीं है। इसको हम सब मिलकर HARIMIMMEDIATIMImmuMITIGIMAINTENTIRTUPEECH MAHOTSHATHAN म हा भारत अध्याय ४५] uminantarmuTRINA TITUTITUTOR TumurwITTITUN हन्यतां दुर्मतिर्भीष्मः पशुवत्साध्वयं नृपाः सर्वैः समेत्य संरब्धै दह्यतां वा कटाग्निना ॥३७॥ इति तेषां वचः श्रुत्वा ततः कुरुपितामहः उवाच मतिमान्भीष्मस्तानेव वसुधाधिपान् ॥ ३८॥ उक्तस्योक्तस्य नेहान्तमहं समुपलक्षये यत्तु वक्ष्यामि तत्सर्वं शृणुध्वं वसुधाधिपाः ॥ ३९ ॥ पशुवद्धातनं वा मे दहनं वा कटाग्निना क्रियतां मूर्ध्नि वो न्यस्तं मयेदं सकलं पदम् ॥ ४० ॥ एष तिष्ठति गोविन्दः पूजितोऽस्माभिरच्युतः । यस्य वा त्वरते बुद्धिर्मरणाय स माधवम् कृष्णमाह्वयतामद्य युद्धे चक्रगदाधरम् यावदस्यैव देवस्य देहं विशतु पातितः इति श्रीमन्महाभारते सभापर्वणि शिशुपालवधपणि भीष्मयाक्यं नाम चतुश्चत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४४ ॥ पशु की तरह मार डालें, और अग्नि में जला दें, सिर पर यह पाँव रखता है, जिसके किये जो हो सके, सो करे । यह श्रीकृष्णचन्द्र हमारे और सब जगत् कुपित राजाओं के ये वचन सुनकर महागति ! के पूज्य बैठे हुए हैं । जिमका अन्तकाल निकट आ भीष्म ने कहा-हे राजाओ ! तुम वृथा क्यों कोला- गया हो, यह इन चक्र और गदाधारी को युद्ध के हल और यकयाद कर रहे हो ! मुंह से मुँह नहीं लिये बुलावे । हम जानते हैं, कि जबतक ये श्रीकृष्ण मानना, यात बढ़ती ही जाती हैं। मैं जो तुम से इस शिशुपाल को मारकर इसके तेज को अपने में फदता है, सो मुनो । तुम लोग नाहे मुझे पशु की लय नहीं करेंगे, तबतक ये राजा लोग नहीं गानंगे तरह मारो, चाहे अमि में जला दो; मैं तुम सब के सभापर्व फा पयालीमवां अध्याय ममाम हुआ ॥४४॥ - ॥३५॥३७॥ ॥३८॥४२॥ - अय पम्पत्यारिंशोऽध्यायः ॥४५॥ पेमप्पायन उयान-ततः श्रुत्वेव भीष्मस्य चेदिराडुरुविक्रमः युयुत्सुर्यासुदेवेन वासुदेवमुवाच ह आइये त्वां रणं गच्छ मया साधं जनार्दन! । यायदय निहन्मि त्वां सहितं सर्वपाण्डवः ॥ २ ॥ TRAT PRELECTammerrrrrrcerimeterreiraucrerror १९८ म हा भारत ब CHUULA ARULAGAINDI सह त्वया हि मे वध्याः सर्वथा कृष्ण! पाण्डवाः । नृपतीन्समतिक्रम्य यैरगजा त्वमर्चितः ये त्वां दासमराजानं बाल्यादर्चन्ति दुर्मतिम् । अनर्हमहवत्कृष्ण ! वध्यास्त इति मे मतिः ॥ ४ ॥ इत्युक्त्वा राजशार्दूलस्तस्थौ गर्जन्नमर्पणः एवमुक्ते ततः कृष्णो मृदुपूर्वमिदं वचः उवाच पार्थिवान्सर्वान्स समक्षं च वीर्यवान् ॥ ५ ॥ श्रीभगवानुवाच--एप नः शत्रुरत्यन्तं पार्थिवाः ! सात्वतीसुतः सात्वतानां नृशंसात्मा न हितोऽनपकारिणाम् ॥ ६ ॥ प्राग्ज्योतिपपुरं यातानस्माज्ञात्वा नृशंसकृत् । अदहद् द्वारकामेप स्वस्त्रीयः सन्नराधिपाः ! क्रीडतो भोजराजस्य एप रैवतके गिरौ हत्वा वध्वा च तान्सर्वानुपायात्स्वपुरं पुरा पैंतालीसवा अध्याय ॥४॥ वैशम्पायन ने कहा-हे राजा जनमेजय भीष्म | बडो वचन कहकर क्रोध के मारे गरजने लगा॥१४॥ के ये वाक्य सुनकर महारली शिशुपाल ने, कृष्ण उस शिशुपाल क ऐसे क्टुवे वनन मुनकर से युद्ध करने के लिए उद्योग करते हुए, कहा पाण्डवा के समीप, सन राजाओं के आगे, श्रीकृष्ण हे कृष्ण ! आगे बढ़ो। मै तुमको युद्ध के लिए अत्यन्त कोमल म्वर में उनसे कहने लगे-हे नर- सरकारता है। आज अवश्य ही पाण्डवों समेत तुमको पतियो ! यह शिशुपाल यद्यपि यादवकुल की माता मारकर सब नेश मिटा दूगा । तुम्हारी गिनती । से उत्पन्न है, परन्तु यादवों से द्वेष रखता है, और राजाओं में नहीं है, तो भी पाण्डवों ने सर राजाओं हिंसक है । हग रोगों ने की इसके साथ यद्यपि का अनादर करके तुम्हारी पूना की है। इमी कारण कुछ बुराई नहीं की, तो भी यह दुराचारी गदा तुम्हारे साथ पाण्डयों को भी मैं यमरोक को पहुना | हमारा बुरा करने की धुन में लगा रहता है। हमारे दूंगा । हे दुर्मति वासुदेव । तुम दास होकर क्सिी | प्राग्ज्योतिपपुर में जाने की सूचना पाते ही यह दुष्ट तरह पूना के योग्य नहीं हो। तुम्हारे निन्दित जाकर दारका पुरी को जरा आया । पहले गा आचार-व्यवहार, रीनि नानि और अपम्या का हार भोज रैवतक पर्वत पर विहार कर रहे थे, तब इस' जानार भी पाण्डवों ने तुम्हारी पूजा की है, इस दुष्ट ने कहा जारर उनपे युछ अनुनरों को मारा । कारण ये मारे जाने के योग्य है । चेदि देश का पिर यह उनको और उन युछ अनुचरों को माप- रामा महाया निशुपार हम तरह अनेक प्रकार के | पर अपने नगर में रे गया ||५४८॥ -- . TETAIATurmucursadnaTranmarTTI म हा भारत ४५] muTurn TUITION AMITION auranMERIAnamsamrarium अश्वमेधे हयं मेध्यमुत्सृष्टं रक्षिभिर्वृतम् पितुमें यज्ञविघ्नार्थमहरत्पापनिश्चयः सौवीरान्प्रतियाता च बभ्रोरेप तपखिनः भार्यामभ्यहरन्मोहादकामां तामितो गताम् एप मायाप्रतिच्छन्नः करूपार्थे तपस्विनीम् जहार भद्रां वैशाली मातुलस्य नृशंसकृत् ॥ ११ । पितृष्वसुः कृते दुःखं सुमहन्मर्पयाम्यहम् दिष्टया हीदं सर्वराज्ञां सन्निधावद्य वर्तते ॥ १२ ॥ पश्यन्ति हि भवन्तोऽद्य मय्यतीव व्यतिक्रमम् । कृतानि तु परोक्षं मे यानि तानि निवोधत ॥ १३ ॥ इमं त्वस्य न शक्ष्यामि क्षन्तुमद्य व्यतिक्रमम् । अवलेपाद्वधार्हस्य समग्रे राजमण्डले ॥ ११ ॥ रुक्मिण्यामस्य मूढस्य प्रार्थनाऽऽसीन्मुमूर्पतः । न च तां प्राप्तवान्मूढः शूद्रो वेदश्रुतीमिव पेटाम्पायन उयाच-एवमादि ततः सर्वे सहितास्ते नराधिपाः वासुदेववचः श्रुत्वा चेदिराजं व्यगर्हयन् इसके पीछे हमारे पिता का अश्वमेध यज्ञ विध्वंस देख ही रहे है। यह दुष्ट समय-समय पर हम लोगों (फरने को, राक्षसों को मारकर घोड़ा हरकर ले गया। के साथ जैसा बुरा बर्ताव करता रहता है, सो मैन मय तपम्बी पनु की स्त्री जय सीवीर देश को जा रही थी, राजाओं को मुना दिया । अपनी प्रतिज्ञा के अनुमार तय इस नीच ने, रास्ते में आक्रमण करके,बलपूर्वक में इसके मो अपराध क्षमा कर चुका । आज यह उसका सतीत्य नष्ट किया। यह निष्ठुर पापी नि सोच नराधम किमी तरह जीता नहीं पच सरता; आज होकर कारप-राज की पोशाक पहनकर, कारूप-रान मेरा यह कोष व्यर्थ नहीं जा RTHI | यह मूर्म ऐमा से जिसका विवाह होनेवाला था, उस विनालापुरी के अनानी और मोह मे अभा हुआ हुआ है,किपिना राजा (मामा) की कन्या मदा को धीम्या देकर उड़ा किमी मोन के रुक्मिणी का विवाहने के लिये तैयार लाया । इम पापी ने यहुत मे घोर पाप किये हैं। हो गया था किन्तु शुद्र के येद पाने के यमकी फूफी की बात मान लेने से ही मैंने इसके इन अत्या तरह इसका यह उद्योग निफल ही दुआ ॥९॥१५॥ पारों को क्षमा किया, और हमे नहीं मारा। इस ममय । यशम्मायन ने कहा कि जर भीम ने उक्त जो यह मेरी बुराई कर रहा है, मो आप रोग मन्या , रीति में पहुन सी पार्ने फही, तर मय राजा शिशुगल C M २०० म हा भा र त TurnituRUR TITUTrururu INUTRITITUTIOTuuuuilsoninsuran । augamiththixnutwanttijar - तस्य तद्वचनं श्रुत्वा शिशुपालः प्रतापवान् जहास स्वनवद्धासं वाक्यं चेदमुवाच ह ॥ १७ ॥ मत्पूर्वा रुक्मिणी कृष्ण ! संसत्सु परिकीर्तयन् । विशेषतः पार्थिवेषु व्रीडां न कुरुपे कथम् ॥१८॥ मन्यमानो हि कः सत्सु पुरुषः परिकीर्तयेत् । अन्यपूर्वा स्त्रियं जातु त्वदन्यो मधुसूदन क्षम वा यदि ते श्रद्धा मा वा कृष्ण! मम क्षम। क्रुद्धाद्वापि प्रसन्नाद्वा किं मे त्वत्तो भविष्यति ॥ २० ॥ तथा ब्रुवत एवाऽस्य भगवान्मधुसूदनः मनसाऽचिन्तयच्चक्रं देत्यवर्गनिपूदनम् ॥ २१ ॥ एतस्मिन्नेव काले तु चके हस्तगते सति उवाच भगवानुच्चैर्वाक्यं वाक्यविशारदः ॥ २२ ॥ शृण्वन्तु मे महीपाला ! येनैतत्क्षमितं मया अपराधशतं क्षाम्यं मातुरस्यैव याचने दत्तं मया याचितं च तद्वै पूर्ण हि पार्थिवाः! । अधुना वधयिष्यामि पश्यतां वो महीक्षिताम् ॥ २४ ॥ एवमुक्त्वा यदुश्रेष्ठश्चेदिराजस्य तत्क्षणात् की निन्दा करने लगे, और शिशुपाल उसको सुनकर ' शत्रु-सेना का नाश करनेवाले सुदर्शन ना को याद खिरखिलाकर हँस उठा और कहने लगा, कि हे कृष्ण! | किया । याद करते ही वह तीक्ष्ण चक्र कृष्ण के हाथ " तुम मुझको रुक्मिणी का पहला पति बतलाते हो, में आ गया। तब उन्होंने बड़े गम्भीर म्वर से कहा- तुमको ऐसी बात कहते लज्जा नहीं आती है । ऐसी हे राजाओ ! मैंने इसकी माता को यह वरदान दिया सभा में तुम्हारे सिवाय कौन ऐमा निर्लज होगा, जो था, कि मैं तेरे पुत्र के सौ अपराध तक क्षमा काँगा। दूसरे मनुष्य को अपनी स्त्री का पहला पति बतावे। सो अब ये सब अपराध पूरे हो गये। अब में इसको तुम जो फूफी अर्थात् हमारी माता का हाल कहते मारता हूँ ॥२१॥२४॥ हो, सो हमको उसकी कुछ परवाह नहीं है। तुम चाहे यह कहकर श्रीकृष्ण जी ने मोध करके चनः क्षमा करो, चाहे क्रोध, तुम्हारे क्षमा और झोध करने को छोड़ दिया और उससे शिशुपाल फा शिरपट से मेरा घुछ भरा या बुरा नहीं हो सकता है।।१६।२०॥ कर पी पर गिर पड़ा । तब उस राजा का शरीर गड़े हुए शिशुपाल की ये बातें मुनकर श्रीकृष्ण ने इस प्रकार में पृथ्वी पर गिर पड़ा अमे रिजरी के ॥ २३ ॥ . mrememorrecruETOOTEREarcOCareracroreca PC २०१ 7216 म हा भारत अध्याय ४५] TUOTE Ani MarauntinumarAINITION । REGITIGuaratarumaushinen... WITATTUCTATATATATU व्यपाहरच्छिरः क्रुद्धश्चक्रेणाऽमित्रकर्षणः ॥ २५ ॥ स पपात महावाहुर्वजाहत इवाऽचलः ततश्चेदिपतेर्दैहात्तेजोऽग्न्यं ददृशुर्नृपाः ॥ २६ ॥ उत्पतन्तं महाराज ! गगनादिव भास्करम् ततः कमलपत्राक्ष कृष्णं लोकनमस्कृतम् ववन्दे तत्तदा तेजो विवेश च नराधिप! तदद्भुतममन्यन्त दृष्ट्वा सर्वे महीक्षितः यद्विवेश महावाहुं तत्तेजः पुरुषोत्तमम् ॥ २८॥ अनभ्रे प्रववर्ष द्यौः पपात ज्वलिताऽशनिः कृष्णेन निहिते चैद्ये चचाल च वसुन्धरा ॥ २९ ॥ ततः केचिन्महीपाला नाऽब्रुवंस्तत्र किंचन अतीतवाक्पथे काले प्रेक्षमाणा जनार्दनम् ॥ ३०॥ हस्तैर्हस्ताग्रमपरे प्रत्यर्पिपन्नमर्पिताः अपरे दशनेरोप्टानदशन्क्रोधमूञ्छिताः ॥ ३१ ॥ रहश्च केचिद्वार्ष्णेयं प्रशशंसुर्नराधिपाः केचिदेव सुसंरब्धा मध्यस्थास्वपरेऽभवन् ॥ ३२ ॥ प्रहृष्टाः केशवं जग्मुः संस्तुवन्तो महर्षयः ब्राह्मणाश्च महात्मानः पार्थिवाश्च महावलाः ॥ ३३ ॥ गिरने से पहाड़ गिरता है । उसके शरीर में से सूर्य के उनकी बुद्धि ही इस मामले में कुछ काम न करती समान चमकता हुआ तेज निकलकर श्रीकृष्ण को थी। कोई-कोई शिशुपाल के नातेदार राजा, उसके पन्दना करके उन्हीं के शरीर में लय हो गया। यह मारे जाने से, क्रोधान्ध होकर हाथ से हाथ मलने तमाशा देखफर सय राजारोग आश्चर्य करने लंगे । और दांत पीमने लगे। कुछ राजा मन ही मन श्रीकृष्ण उस समय आकाश में से विना बादल के वर्षा होने की यड़ाई करने लगे। कोई कुपित हुए, कोई प्रमान गी, बिजली भी पृथ्वी पर गिरी, और पृथ्वी कॉपने हुए और काई मध्यम्य भाव में नमाया देखने रहे। लगी। यह देखकर अनिष्ट की आशका मे मर राजा समा के म्यान में बड़ा कोलाहल मच गया । प्रमन्न- चित्त ऋपि संग मन ही मन केशव की प्रशंसा करके, ऐसे अचरज को देखकर पोई-कोई राजा तो स्तुनि करने के उपरान्त, अपने-अपने म्यान कोचन चित्र में लिखे से चुपचाप कृष्ण की ओर ताक्ने लगे। दिये। महारमा प्राक्षण और मय राजा रोग प्रीकृष्ण - दर गये ॥२५॥२९॥ GURJAROADICIRECOOLTOLETTER 2TIMNEERUTRITTETTE - । । - कारण आपने साम्राज्य-पद पाया है। महाराज! unrinaya TWIDTUITIMIMIMIUIIMIMMUSLIMTATIVIDIOIUMMIUM २०२ म हा भारत सभापर्व STOTRAFTTTTTTTTTTTTTTTTTTTTIMITTTTTTTTTTTTTTRIOTIRARTERE शशंसुर्निर्वृताः सर्वे दृष्ट्वा कृष्णस्य विक्रमम् ।। पाण्डवस्त्वब्रवीद्भातृन्सत्कारेण महीपतिम् ॥ ३४ ॥ दमघोपात्मजं वीरं संस्कारयत मा चिरम् तथा च कृतवन्तस्ते भ्रातु। शासनं तदा चेदीनामाधिपत्ये च पुत्रमस्य महीपतेः अभ्यषिञ्चत्तदा पार्थः सह तैर्वसुधाधिपः ॥३६॥ ततः स कुरुराजस्य क्रतुः सर्वसमृद्धिमान् यूनां प्रीतिकरो राजन्स बभौ विपुलौजसः ॥ ३७॥ शान्तविघ्नः सुखारम्भः प्रभूतधनधान्यवान् अन्नवान्वहुभक्षश्च केशवेन सुरक्षितः ॥ ३८ ॥ समापयामास च तं राजसूयं महाऋतुम् तं तु यज्ञं महावाहुरासमाप्तेजनार्दनः ररक्ष भगवाञ्च्छौरिः शाईचक्रगदाधरः ॥ ३९ ॥ ततस्त्ववभृथस्नातं धर्मात्मानं युधिष्ठिरम् समस्तं पार्थिवं क्षत्रमुपागम्येदमब्रवीत् दिष्टया वर्धसि धर्मज्ञ ! साम्राज्यं प्राप्तवानसि!। आजमीढाऽऽजमीढानां यशः संवर्धितं त्वया ॥४१॥ कर्मणैतेन राजेन्द्र ! धर्मश्च सुमहान्कृतः जी के पराक्रम को देखकर आनन्द के साथ धन्य रूप से यज्ञ को समाप्त होते देखकर, युधिष्ठिर को बड़ा धन्य कहने लगे ॥३०॥३४॥ आनन्द हुआ ॥३५॥३८॥ इधर पाण्डवों ने, धर्मराज युधिष्ठिर की आजा शाई धनुप, गदा और चक्र धारण किये हुए से, शीघ्र ही दमघोप के बेटे शिशुपाल के शरीर को भगवान् श्रीकृष्ण समाप्ति तक यज्ञ की रक्षा करते ले जाकर, उसका अन्त्येष्टि संस्कार किया। आये हुए रहे । फिर अवभृथ मान हो चुकने पर राजाओं ने सब राजाओं के साथ धर्मराज युधिष्ठिर ने चेदि राज्य धर्मात्मा युधिष्ठिर के पास जाकर कहा-हे राजा के सिंहासन पर शिशुपाल के पुत्र को बिठा दिया। युधिष्ठिर ! आप अजमीढ़वंश के रत्न हैं । आप ने इस फिर पाण्डुवंश के मुखिया युधिष्ठिर ने उस महासमृद्धि- धर्मकार्य का अनुष्ठान करके सारे अजमीढ़-वंश को शाली, धन और धान्य मे पूर्ण राजसूय महायन का यात्री बना दिया । आपकी जय हो । प्रारम्भ मचा हुआ काम समाप्त किया। इस प्रकार निर्वि - - के महा मारत DAMAMLILAITICS . स TUTTISTA ANOTAAT UITTROTS. - अध्याय ४५] TAITRINTINMEITIEINDIATTERIWITTARINITIATITISHITTTTTTTTTTARRETARELUE आपृच्छामो नरव्याघ्रं सर्वकामैः सुपूजिताः ॥ ४२ ॥ स्वराष्ट्राणि गमिण्यामस्तदनुजातुमर्हसि श्रुत्वा तु वचनं राज्ञां धर्मराजो युधिष्ठिरः ॥४३॥ यथार्ह पूज्य नृपतीन्भ्रातृन्सर्वानुवाच ह राजानः सर्व एवैते प्रीत्याऽस्मान्समुपागताः ॥ ४४ ॥ प्रस्थिताः स्वानि राष्ट्राणि मामापृच्छ्य परंतपाः।- तेऽनुव्रजत भद्रं वो विषयान्तं नृपोत्तमान् ॥ ४५ ॥ भ्रातुर्वचनमाज्ञाय पाण्डवा धर्मचारिणः यथार्ह नृपतीन्सर्वानेकैकं समनुव्रजन् विराटमन्वयातूर्णं धृष्टद्युम्नः प्रतापवान् धनञ्जयो यज्ञसेनं महात्मानं महारथम् ॥४७॥ - भीष्मं च धृतराष्ट्रं च भीमसेनो महावलः द्रोणं तु ससुतं वीरं सहदेवो युधांपतिः ॥४८॥ नकुलः सुवलं राजन्सहपुत्रं समन्वयात् द्रौपदेयाः ससौभद्राः पार्वतीयान्महारथान् ॥४९॥ अन्वगच्छंस्तथैवाऽन्यान्क्षत्रियान्क्षत्रियर्पभाः एवं सुपूजिताः सर्वे जग्मुर्विप्राः सहस्रशः हम लोग जैसे सम्मान के साथ निमन्त्रण पाकर आये तुम इनके साथ जाकर अपने नगर की सीमा तक थे, वैसे ही आप के यहा आदर सत्कार पाकर और इनको पहुँचा आओ। आज्ञा का पालन करनेवाले यज देखकर हमें बड़ी प्रसन्नता हुई। अब हम लोग पाण्डव, बड भाई की आजा को शिरोधार्य करके, अपने अपने देशों को जाना चाहते हैं । कृपा करके राजाओं को पहुचाने के लिए उनके साथ गये । हमको जाने की आजा दाजिए ॥३९॥४४॥ धृष्टद्युम्न राजा विराट के साथ, अर्जुन राजा द्रुपद के राजाओं के ऐसे विनीत और न्यायसङ्गत वचन साथ, भीम ओर धृतराष्ट्र के साथ भीमसेन, सहदेव, सुनकर महारान युधिष्ठिर ने उन सब का यथोचित द्रोणाचार्य ओर अश्वत्थामा के माथ नकुल, राजा सुबल सस्कार किया । फिर अपने भाइयों से कहा-ये सब और उसके पुत्र के साथ द्रौपदी, और सुभद्रा के पुत्र राना रोग निमन्त्रण पाकर बड़ी प्रसन्नता से राजसूय पहाड़ी राजाओं के साथ और क्षत्रिय रोग दूसरे यन देखने आये थे । अब ये रोग विदा होकर क्षत्रियों के साथ जा-जाकर सत्र को राज्य की सीमा तक अपने अपने नगरों को जाना चाहते है । इसरिये पहुँचा आये । इसी प्रकार से सहस्री ब्राह्मण रोग जो .. PraLUTIT AuTWITTORITTTTTTTTOTUITarunmunayAMITrahe AAMTIMIM MIRIDIUMINAR ALLECRUIRECTORATOMIAMOLEDIGIMAILOYEAR २०४ म हा भारत myranamani murrarurrenumanmnnrnmunmun ImmuTIOLICmmmmmunnSTATEE Fredifornar . YCrerCOM गतेषु पार्थिवेन्द्रेपु सर्वेपु ब्राह्मणेषु च युधिष्ठिरमुवाचेदं वासुदेवः प्रतापवान् ॥५१॥ आपृच्छे त्वां गमिष्यामि द्वारकां कुरुनन्दन! । राजसूयं ऋतुश्रेष्ठं दिष्ट्या त्वं प्राप्तवानसि ॥ ५२ ॥ तमुवाचैवमुक्तस्तु धर्मराजो जनार्दनम् तव प्रसादाद्गोविन्द ! प्राप्तः क्रतुवरो मया क्षत्रं समग्रमपि च त्वत्प्रसादाद्वशे स्थितम् उपादाय बलिं मुख्यं मामेव समुपस्थितम् ॥ ५४ ॥ कथं त्वद्गमनार्थं मे वाणी वितरतेऽनघ ! 1. न ह्यहं त्वामृते वीर ! रतिं प्राप्नोमि कर्हिचित् ॥ ५५ ॥ अवश्यं चैव गन्तव्या भवता द्वारकापुरी एवमुक्तः स धर्मात्मा युधिष्ठिरसहायवान् अभिगम्याऽब्रवीत्प्रीतः पृथां पृथुयशा हरिः साम्राज्यं समनुप्राप्ताः पुत्रास्तेऽद्य पितृष्वसः ॥ ५७ ॥ सिद्धार्था वसुमन्तश्च सा त्वं प्रीतिमवाप्नुहि । अनुज्ञातस्त्वया चाऽहं द्वारकां गन्तुमुत्सहे ॥ ५८ ॥ अनेक-अनेक देशों से आये थे,चले गये॥४५।५०|| होते, तब घड़ी भर के लिये भी, मै मुखी नहीं रह सब राजाओं और ब्राह्मणों के चले जाने पर सकता । तुमको क्या कहकर मैं विदा करें ? मेरे श्रीकृष्ण जी ने युधिष्ठिर से कहा-हे कुरुकुल-तिलक! मुख से तो इस बारे में कोई बात ही नहीं निकलती । बड़े सौभाग्य की बात है, कि राजसूय यज्ञ को क्या करूं? द्वारकावासियों को ही तुम्हारे पास रहने निर्वित समाप्त करके आपने साम्राज्य पद को प्राप्त के सुख से कैसे यञ्चित रक्खू ! ॥५१॥५६॥ कर लिया है । अव मै भी द्वारका को जाना धर्मराज युधिष्ठिर के इस प्रकार कह नुकने पर चाहता है। यह सुनकर युधिष्ठिर ने कहा-हे श्रीकृष्ण! श्रीकृष्ण, उनको साध लिये हुए, कुन्ती के पास गये तुम्हारी कृपा से मेरा यह यज्ञ निर्विन रूप से समाप्त ! और प्रसन्नतापूर्वक कहने लगे है फूफी ! तुम्हारे. हुआ है । तुम्हीं सब यज्ञों के ईश्वर हो । तुम्हीं की पुत्र महायज्ञ करके अब साम्राज्य पद प्राप्त कर चुके कृपा से सब क्षत्रियों ने मेरे वश में होकर मुझको है। इस समय तुम्हारी कृपा से बहुत धन और फर के रूप में अनेक प्रकार के रन, धन आदि भेंट असीम ऐश्वर्य प्राप्त हुआ है । तुम प्रसन्न रहो । अब में दिये है । हे निणार ! जब तुम मेरे पास नहीं। मुझे द्वारका पुरी को जाने की आज्ञा दीजिए । इस । PHOTODETITIODAIVITTEmmMOTIVALICATIOmmaro म हा भारत अध्याय ४५] TAITITIHATTIMmmmmrutanumming PunaramIDIUITM । Frimummmmmniwww...natmATRE OTOINTIMAnnamr सुभद्रां द्रौपदी चैव सभाजयत केशवः निष्क्रम्याऽन्तःपुरात्तस्माद्युधिष्ठिरसहायवान् ॥ ५९ ॥ स्नातश्च कृतजप्यश्च ब्राह्मणान्स्वस्ति वाच्य च ततो मेघवपुःप्रख्यं स्यन्दनं च सुकल्पितम् ॥ ६० ॥ योजयित्वा महाबाहुर्दारुकः समुपस्थितः उपस्थितं रथं दृष्ट्वा तायप्रवरकेतनम् प्रदक्षिणमुपावृत्य समारुह्य महामनाः प्रययौ पुण्डरीकाक्षस्ततो द्वारवती पुरीम् ॥६२ ॥ तं पद्भयामनुवत्राज धर्मराजो युधिष्ठिरः भ्रातृभिः सहितः श्रीमान्वासुदेवं महावलम् ॥ ६३ ॥ ततो मुहूर्त संगृह्य स्यन्दनप्रवरं हरिः अब्रवीत्पुण्डरीकाक्षः कुन्तीपुत्रं युधिष्टिरम् ॥६४ ॥ अप्रमत्तः स्थितो नित्यं प्रजाः पाहि विशांपते !। पर्जन्यमिव भूतानि महाद्रुममिव द्विजाः ।। ६५ ।। वान्धवास्त्वोपजीवन्तु सहस्राक्षमिवाऽमराः कृत्वा परस्परेणैवं संविदं कृष्णपाण्डवो अन्योऽन्यं समनुज्ञाप्य जग्मतुः खगृहान्प्रति । गते द्वारवती कृष्णे सात्वतप्रवरे नृप ! ॥६७॥ एको दुर्योधनो राजा शकुनिश्चापि सौवलः तस्यां सभायां दिव्यायामूपतुस्तौ नरर्षभौ ॥६८ ॥ इति श्रीमन्महाभारते मभापर्वणि शिशुपालवधपर्वणि शिशुपालवधो नाम पञ्चचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४५ ॥ ।। समाप्तं च शिशुपालवधपर्य ।। प्रकार युन्ती से विदा होकर श्रीकृष्ण द्रौपदी और गड़ के चिह्न की ध्वजा रगी हुई थी,प्रदक्षिणा करके सुभद्रा के पास गये । उनसे भी यथोचित बात चीत- चंढ औ द्वारका पुरी की ओर चल दिये । युधिष्ठिर करके और विदा होकर श्रीकृष्ण महल से बाहर आये आदिक सर माई उनके साथ साथ पैदल हो लिये। यह देखकर श्रीकृष्ण ने अपने रथ को रोक रिया फिर नान करके और ब्राह्मणों से सस्तिवाचन । और युधिष्ठिर से कहने लगे-है महाराज ! तुम सुनकर दारुक मारथी के राये हुए रथ पर जिसमें सावधानी से प्रजा की रक्षा करते रहना । पर्जन्य जमे raaman ॥५७१५९॥ TOTATAWATOTTINNITAT RADIDINAND miRIGITMuranTHMARATHI TIMITTE TrumurarunrunmuTurmal - २०६ म हा भा र त मभापर्व mummmmmmmrnternmuynone सब प्राणियों की जीविका के आधार है, वृक्ष जैसे ! चीत हुई। फिर दोनों एक दूसरे से विदा होकर पक्षियों के आश्रयस्थल है, देवराज इन्द्र जैसे देवताओं अपने अपने नगर को चल दिये । उनके चले जान की रक्षा करते है, वैसे ही तुम बन्धु बान्धवों तथा पर, उस युधिष्ठिर की सभा में केवल दुर्योधन और प्रजा की रक्षा करना, उन्हें आश्रय देना । राह में राजा सुवल के पुत्र शकुनी, ये दोनों पाण्डवों के साथ श्रीकृष्ण और महाराज युधिष्ठिर की इसप्रकार से बात कुछ दिन के लिये और ठहर गये ॥६०।६८॥ सभापर्व का पैंतालीसवा अध्याय ममाप्त हुआ ॥४५॥ अथ द्यूतपर्व। अथ पट्चत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४६॥ वैशम्पायन उवाच-समाप्ते राजसूये तु क्रतुश्रेष्ठे सुदुर्लभे शिष्यैः परिवृतो व्यासः पुरस्तात्समपद्यत सोऽभ्ययादासनात्तूर्णं भ्रातृभिः परिवारितः पायेनाऽऽसनदानेन पितामहमपूजयत् ॥ २ ॥ अथोपविश्य भगवान्काञ्चने परमासने आस्यतामिति चोवाच धर्मराज युधिष्ठिरम् अथोपविष्टं राजानं भ्रातृभिः परिवारितम् उवाच भगवान्व्यासस्तत्तद्वाक्यविशारदः दिष्ट्यावर्धसि कौन्तेय! साम्राज्यं प्राप्य दुर्लभम् । वर्धिताः कुरवः सर्वे त्वया कुरुकुलोद्वहः! आपृच्छे त्वां गमिष्यामि पूजितोऽस्मि विशांपते! । एवमुक्तः स कृष्णेन धर्मराजो युधिष्ठिरः छियालीसवां अध्याय ॥ ४६॥ वैशम्पायन ने कहा-हे राजा जनमेजय ! उम बैठ गये, तब आज्ञा पाकर धर्मराज युधिष्ठिर भी और दुर्लभ राजसूय यज्ञ के समाप्त होने पर पाण्डवों के पास आसन पर बैठे । भाइयों-सहित उनके बैठ जाने पर व्यासदेव जी अपने शिष्यों सहित आये। उन्हें देख- , व्यास जी ने कहा है कुरुकुल-तिलक ! सौभाग्यवश फर धर्मराज युधिष्ठिर भाइयों सहित जल्दी से आमन तुम्हारे दुर्लभ असीम साम्राज्य पद पा जाने से पुरु से उठ खड़े हुए। फिर अपने भाइयों के साथ देश की बड़ी उन्नति और श्रीवृद्धि हो रही है ।।१।५।। प्रणाम करके उन्होंने पाद्य,अर्घ्य, आसन आदि सामग्री तुमने अपने वंश का मुख उज्ज्वल कर दिया। से अपने पितामह का पूजन किया । व्यास जी जर हे क्षत्रियों में श्रेष्ठ ! मै निमन्त्रण पाकर तुम्हारे यन्त्र धर्मराज युधिष्ठिर के दिये हुए सुवर्ण के आमन पर में आया था, अब तुम से पूछ कर अपने आश्रम - ADAMITAMILYMPITITIVE पाणTERTILITIEOmancer २०७ महा भारत अध्याय ४६] Tru AIIMS TOURITre PuriNUTRAINITITUTITA MATERIOWWWS GANGUARANTIXITHI अभिवाद्योपसंगृह्य पितामहमथाऽब्रवीत् युधिष्ठिर उवाच-संशयो द्विपदां श्रेष्ठ ! ममोत्पन्नः सुदुर्लभः तस्य नाऽन्योऽस्ति वक्ता वै त्वामृते द्विजपुङ्गव!। उत्पातांस्त्रिविधान्प्राह नारदो भगवानृषिः ॥ ८ ॥ दिव्यांश्चैवाऽऽन्तरिक्षांश्च पार्थिवांश्च पितामह !। अपि चैद्यस्य पतनाच्छन्नमौत्पातिक महत् वैशम्पायन उवाच-राज्ञस्तु वचनं श्रुत्वा पराशरसुतः प्रभुः कृष्णद्वैपायनो व्यास इदं वचनमब्रवीत् ॥ १० ॥ त्रयोदश समा राजन्नुत्पातानां फलं महत् सर्वक्षत्रविनाशाय भविष्यति विशांपते ! त्वामेकं कारणं कृत्वा कालेन भरतर्षभ ! समेतं पार्थिवं क्षत्रं क्षयं यास्यति भारत ! दुर्योधनापराधेन भीमार्जुनवलेन च ॥ १२ ॥ स्वप्ने द्रक्ष्यसि राजेन्द्र ! क्षपान्ते त्वं वृपध्वजम् । नीलकण्ठं भवं स्थाणुं कपालिं त्रिपुरान्तकम् ॥ १३ ॥ उग्रं रुद्रं पशुपति महादेवमुमापतिम् को जाना चाहता हूँ। यह सुनकर युधिष्ठिर ने व्यास चीतने पर, सब क्षत्रियों के कुल का नाश होगा । जी को उठकर दण्डवत् की, और फिर पास बैठकर और तुम को कारण बनाकर दुर्योधन के अपराध कहा-हे महाराज ! मुझे बड़ा भारी सेन्देह हो गया से सब राजा लोग इकट्ठे होकर भीमसेन और अर्जुन के है । आपके सिवाय मेरे इस सन्देह को और कोई यल से मारे जायंगे। और आज रात्रि के अन्त में तुम को दूर नहीं कर सकता है। मैंने नारद जी मे मुना है ग्यम में वृपञ्चज नीलकण्ठ शिवजी के दर्शन जो कि तीन उत्पात बड़े भारी होते हैं । एक दिव्य अर्थात् भव, स्थाणु, काली, त्रिपुरांतक, उग्र, रुद्र, पशुपति, यमपात आदि, दूसरा आन्तरिक्ष अर्थात् घूमकेतु महादेव, उमापति, हर,राव,प,शूली, पिनाकी, और आदि, और तीसरा पार्थिव अर्थात् मूकम्प आदि, सो कृचिवास', आदि नामों से विख्यात हैं, नन्दी पर ये तीनों उत्पात शिशुपाल के मारे जाने पर हुए थे, दक्षिण की ओर देखते हुए होंगे। सो तुम उनके होने का क्या फल है ॥९॥ इस बात का कुछ संदेह मत करो, क्योंकि इस मंसार यह सुनकर व्यास जी बोले-हे राजन् ! इन में काल का उलंघन कोई भी नहीं कर सकता उत्पातों का फल यह है, कि आज से तेरह वर्ष के है। अब तुम सावधान रहकर मजा का पालन करो,और - " सवार, IMPOYTML.COM maratmarg MMITMLAIMIMI MOHINIMIMIRECITY २०८ म हा मा र त [सभापर्व TurmuTurnimurenTruurmurransm Trimurrammmmmmmmmmmmmmons ॥ १४॥ an.mrriamremRRiaramIIIIIImmm - हरं शर्वं वृपं शूलं पिनाकिं कृत्तिवाससम् कैलासकूटप्रतिमं वृपभेऽवस्थितं शिवम् निरीक्षमाणं सततं पितृराजाश्रितां दिशम् ॥ १५॥ एवमीशकं स्वप्नं द्रक्ष्यसि त्वं विशांपते ! मा तत्कृते ह्यनुध्याहि कालो हि दुरतिक्रमः ॥ १६ ॥ खस्ति तेऽस्तु गमिष्यामि कैलास पर्वतं प्रति । अप्रमत्तः स्थितो दान्तः पृथिवीं परिपालय ॥ १७॥ वेशम्पायन उवाच-एवमुक्त्वा स भगवान्कैलासं पर्वतं ययौ कृष्णद्वैपायनो व्यासः सह शिष्यैः श्रुतानुगैः ॥ १८ ॥ गते पितामहे राजा चिन्ताशोकसमन्वितः निःश्वसन्नुष्णमसकृत्तमेवाऽर्थं विचिन्तयन् ॥ १९ ॥ कथं तु दैवं शक्येत पौरुषेण प्रवाधितुम् अवश्यमेव भविता यदुक्तं परमर्पिणा ॥ २० ॥ ततोऽब्रवीन्महातेजाः सर्वान्भ्रातृन्युधिष्ठिरः श्रुतं चै पुरुषव्याघ्रा ! यन्मां द्वैपायनोऽब्रवीत् ॥ २१ ॥ तदा तद्वचनं श्रुत्वा मरणे निश्चिता मतिः सर्वक्षन्त्रस्य निधने यद्यहं हेतुरीप्सितः ॥ २२ ॥ कालेन निर्मितस्तात! को ममार्थोऽस्ति जीवतः। एवं ब्रुवन्तं राजानं फाल्गुनः प्रत्यभापत ॥ २३ ॥ मा राजन्कश्मलं घोरं प्राविशो बुद्धिनाशनम् । मुझको जाने की आज्ञा दो। म कैलास पर्वत पर मनुष्य के उपाय से नहीं रुक सकती है ।न्यास जी जाना चाहता हू । वैशम्पायन ने कहा जो कह गये हैं, वह अवश्य होगा ॥१०॥२०॥ जनमेजय! व्यासदेव जी इस प्रकार से कहकर शिष्यों इसके पश्चात् उन्होंने अपने भाइयों से कहा- सहित फैलास पर्वत को चले गये। उनके चले जाने हे भाइयो ! व्यास जी जो कह गये हैं, सो सर तुम पर धर्मराज युधिष्ठिर शोक और निन्ता में मग्न लोगों ने भी सुना है । उनके कथन को सुनकर मैंने होकर बार-बार गरम-गरम श्वास लेकर विचारने लगे, अपने प्राण दे देने का विचार कर लिया है। क्योंकि कि यह भावी अर्थात् होनहार किसी प्रकार से ΣΩΣανταρττττττττοττττττττττττττττττττττττττττττττττατα काल ने मुझको क्षत्रिय कुल के नाश होने का हेतु दा-दे राजा २०९ म हा भारत अध्याय ४६] uTuuuN ArraranRUITORHIT DITUTITATIOuTIOuruinnrTTOTRAMAurt ॥ २४ ॥ TrairiATTERIFIERRIALAnirmilarATEXT uAITRImantarima...- संप्रधार्य महाराज! यत्क्षमं तत्समाचर ततोऽब्रवीत्सत्यधृतितॄन्सर्वान्युधिष्ठिरः द्वैपायनस्य वचनं तत्रैव समचिन्तयन् ॥ २५ ॥ अद्यप्रभृति भद्रं वः प्रतिज्ञा मे निबोधत त्रयोदश समास्तात को ममाऽर्थोऽस्ति जीवतः॥ २६ ॥ न प्रवक्ष्यामि पुरुषं भ्रातृनन्यांश्च पार्थिवान् । स्थितो निदेशे ज्ञातीनां योक्ष्ये तत्समुदाहरन् ॥ २७ ॥ एवं मे वर्तमानस्य स्वसुतेष्वितरेषु च भेदो न भविता लोके भेदमूलो हि विग्रहः ॥ २८॥ विग्रहं दूरतो रक्षन्प्रियाण्येव समाचरन् वाच्यतां न गमिष्यामि लोकेषु मनुजर्षभाः ! ॥ २९ ॥ भ्रातुर्येष्ठस्य वचनं पाण्डवाः सन्निशम्य तत् । तमेव समवर्तन्त धर्मराजहिते रताः ॥३०॥ संसत्सु समयं कृत्वा धर्मराड् भ्रातृभिः सह पितृस्तर्प्य यथान्यायं देवताश्च विशांपते ! ॥ ३१ ॥ कृतमङ्गलकल्याणो भ्रातृभिः परिवारितः गतेषु क्षत्रियेन्द्रेषु सर्वेषु भरतर्षभ ! ॥३२॥ निर्माण किया है, मेरा अन जीना व्यर्थ है । यह समान न्यवहार करूगा। तन मेरे द्वारा भेदभाव, जो सुनकर अर्जुन ने कहा-आप शोक को छोड़कर जो सब रड़ाई झगड़ों की जड़ है, उसके उत्पन्न होने करना उचित है, वह कीजिए । क्योंकि सोच करने का सटका न रह जायगा । मित्रों में भेदभाव पड़ने से बुद्धि जाती रहती है । यह सुनकर महाराज से ही युद्ध की आग जल उठती है। मैं देश को युधिष्ठिर व्यास जी की बात को स्मरण करके कहने , एकदम मिटाकर ऐसे ही काम करूगा, जो सब को रगे,कि मेरे जीने से अब कोई अर्थ नहीं है।२१।२५॥ प्रिय होंगे । ऐसा करने से मुझे रोक-निन्दा का पात्र इससे आज से मैं यह प्रतिज्ञा धारण करता न बनना पड़ेगा। मकर की इच्छा रखनेवाले भीमसेन ६. कि तेरह वर्ष तक कभी अपन भाई या दूसरे आदि भाइयों ने धर्मराज युधिष्ठिर के हम कथन का राजाओं से कठोर वचन नहीं कहूगा । और अपने अनुमोदन किया ॥२६॥३०॥ स्वजातियों की आज्ञा मानकर उनकी सेवा करूगा। सप अभ्यागतों के चले जाने पर महाराज पुत्र, मजा, पड़े भौर छोटे, सभी रोगों के साथ युधिष्ठिर इस प्रकार श्रेष्ठ समा में बैठकर देवता, पितृ- .. TIMILAIL MPMummi MHATTILATI २१० म हा.भा र त सभापर्व मायाmurarimromanmommmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmuTIMITE युधिष्ठिरः सहामात्यः प्रविवेश पुरोत्तमम् दुर्योधनो महाराजः शकुनिश्चाऽपि सौबलः सभायां रमणीयायां तत्रैवाऽऽस्ते नराधिप ! ॥ ३३ ॥ इति श्रीमन्महाभारते सभापर्वणि द्यूतपर्वणि युधिष्ठिरसमये पद्गत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४६॥ गण और ब्राह्मण आदि की पूजा तथा प्रजा का धर्मराज अपनी नगरी में आये। दुर्योधन और शकुनि पालन करने लगे । यज्ञ के उपरान्त सब कामों से दोनों, धर्मराज के साथ, सुखपूर्वक उनकी सभा में छुटकारा पाकर, कल्याण-कर्म करके,भाइयों के साथ | वैठकर आनन्द मनाने लगे ॥३१॥३३॥ सभापर्व काछियालीसवां अध्याय समाप्त हुआ।। ४६।। अथ सप्तचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४७ ।। वैशम्पायन उवाच-वसन्दुर्योधनस्तस्यां सभायां पुरुषर्षभ ! शनैर्ददर्श तां सर्वां सभां शकुनिना सह तस्यां दिव्यानभिप्रायान्ददर्श कुरुनन्दनः न दृष्टपूर्वा ये तेन नगरे नागसाह्वये स कदाचित्सभामध्ये धार्तराष्ट्रो महीपतिः स्फाटिक स्थलमासाद्य जलमित्यभिशङ्कया स्ववस्त्रोत्कर्षणं राजा कृतवान्बुद्धिमोहितः दुर्मना विमुखश्चैव परिचक्राम तां सभाम् ततः स्थले निपतितो दुर्मना वीडितो नृपः निःश्वसन्विमुखश्चापि परिचक्राम तां सभाम् ॥ ५ ॥ सैंतालीसवां अध्याय ।। ४७ ॥ वैशम्पायन जी बोले हे राजा जनमेजय! युधिष्ठिर लिये । उसका चित्त उदास हो गया। आगे चलते- की सभा में रहने पर दुर्योधन और शकुनि धीरे-धीरे | चलते वह एक जगह जल भरा हुआ समझकर, बचने सभा को घूमकर देखने लगे, और उन्होंने उसमें, | लगा, तो स्थल पर गिर पड़ा। [क्योंकि वहां तो जल ऐसी-ऐसी दिव्य वस्तुएँ देखीं, जिनको उन्होंने पहले था ही नहीं ] इससे वह बहुत ही लज्जित हुआ कभी हस्तिनापुर में नहीं देखा था । धृतराष्ट्र का फिर वह उठकर दुखी मन से गरम सांस लेता हुआ बेटा दुर्योधन इसी तरह एक दिन सभा-मण्डप में सभा में घूमने लगा | आगे बावड़ी मिली, उसमें धूम रहा था । घूमते-घूमते वह बिल्लौर पत्थर के बहुत ही स्वच्छ जल भरा हुआ था। दुर्योधन ने फर्श पर पहुंचा, तो उसे वहां निर्मल जल भरा मालम उसे भी पहले का सा फर्श समझा । ज्योंही उसने पड़ा। तब उसने अपने वस्त्र समेटकर ऊपर कर आगे पाव रक्खा, त्योंही वह धम से उसमें जा पड़ा। HIMALARIOTIONAMASTAmarAINITAMARHTDATLAMINER NautamnnamaAITRINTIMATER । ।

२११ म हा मारत ध्याय ४७] TITUTIOurmuTummarAmurNTUmmanmirm LINITIRTMEarnuman -1 - - - munani ततः स्फाटिकतोयां वैस्फाटिकांबुजशोभिताम् । वापी मत्वा स्थलमिव सवासाः प्रापतज्जले जले निपतितं दृष्ट्वा भीमसेनो महावलः जहास जहसुश्चैव किंकराश्च सुयोधनम् वासांसि च शुभान्यस्मै प्रददू राजशासनात् तथागतं तु तं दृष्ट्वा भीमसेनो महाबलः अर्जुनश्च यमौ चोभौ सर्वे ते प्राहसंस्तदा नाऽमर्षयत्ततस्तेषामवहासममर्पणः ॥ ९ ॥ आकारं रक्षमाणस्तु न स तान्समुदैक्षत पुनर्वसनमुत्क्षिप्य प्रतरिष्यन्निव स्थलम् आरुरोह, ततः सर्वे जहसुश्च पुनर्जनाः द्वारं तु पिहिताकारं स्फाटिक प्रेक्ष्य भूमिपः प्रविशन्नाहतो मूर्ध्नि व्याघूर्णित इव स्थितः ॥ ११ ॥ तादृशं च परं द्वारं स्फाटिकोरुकपाटकम् विघयन्कराभ्यां तु निष्क्रम्याऽग्रे पपात ह ॥ १२ ॥ द्वारं तु वितताकारं समापेदे पुनश्च सः तवृत्तं चेति मन्वानो द्वारस्थानादुपारमत् ॥ १३ ॥ उसके कपड़े भीग गये । दुर्योधन को जल में गिरते दुर्योधन ने मानों कूदने के लिये कपड़े समेट लिये। देखकर, साथ में जो नौकर-चाकर थे,उनसे भी हँसी यह देखकर फिर सब लोग हँस पड़े ॥१०॥ रोकी न जा सकी । यह तमाशा देखकर भीमसेन एक स्थान पर बिल्लौर का एक ऐसा द्वार जोर से हँस उठे; किन्तु युधिष्ठिर ने उसी समय लगा था, कि यह सुला जान पड़ता था। उस बन्द अनुचरों को सूखे कपड़े लाने की आज्ञा दी। उन द्वार को सुला समझकर, ज्योंही आगे यहा, त्योंदी कपड़ों को दुर्योधन ने पहन लिया। उसके गिरने के | माथे में ऐसे जोर से टघर लगी, कि वह चार खाकर समय केवल भीमसेन ही नहीं, बल्कि अर्जुन, नकुल, गिर पड़ा। आगे चलने पर फिर उसे एक मुला हुआ सहदे। आदि समी हम पड़े थे। इससे दुर्योधन को द्वार मिला । उसे चन्द जानकर पया देने के लिये, बड़ा मोध चढ़ आया, पर उसने अवसर न देखकर ज्याही दुर्योधन आगे यदा, त्योंही जोर से गिर पड़ा। उम अपने भाव को छिपा लिया। आगे पढ़ने पर उमको पड़ी भारी चोट आई। समा में घूमते समय दूमरी जगह फिर फर्श कोजल-भरा कुण्ड समझकर, इस तरह बार-बार पोखा माकर दुर्योधन बहुत ही PITMEMOCCEPAL JMOUVE NELOUTDO'DITIMIT DOMITI सभापर्व ने २१२ म हा मारत nonnnnnnnnnnnnnnnnnnnnnnnnnnnnnnnnnn ONTTINNA TRENTOUTTET REAKISLEMIII - एवं प्रलम्भान्विविधान्प्राप्य तत्र विशांपते ! पाण्डवेयाभ्यनुज्ञातस्ततो दुर्योधनो नृपः अप्रहृष्टेन मनसा राजसूये महाक्रतो प्रेक्ष्य तामद्भुतामृद्धिं जगाम गजसाह्वयम् ॥१५॥ पाण्डवश्रीप्रतप्तस्य ध्यायमानस्य गच्छतः दुर्योधनस्य नृपतेः पापा मतिरजायत ॥ १६ ॥ पार्थान्सुमनसो दृष्ट्वा पार्थिवांश्च वशानुगान् । कृत्स्नं चापि हितं लोकमाकुमारं कुरूद्धह ! ॥१७॥ महिमानं परं चापि पाण्डवानां महात्मनाम् दुर्योधनो धार्तराष्ट्रो विवर्णः समपद्यत ॥ १८ ॥ स तु गच्छन्ननेकाग्रः सभामेकोऽन्वचिन्तयत् । श्रियं च तामनुपमां धर्मराजस्य धीमतः ॥ १९ ॥ प्रमत्तो धृतराष्ट्रस्य पुत्रो दुर्योधनस्तदा नाऽभ्यभाषत्सुबलजं भापमाणं पुनः पुनः ॥ २० ॥ अनेकाग्रं तु तं दृष्ट्वा शकुनिः प्रत्यभापत दुर्योधन ! कुतो मूलं निःश्वसन्निव गच्छसि ? ॥ २१ ॥ लज्जित और व्यथित हुआ। इस कारण उस अद्भुत राजा लोग गुणों के कारण पाण्डवों के अधीन होकर सभा की शोभा देखना उस के लिये प्रसन्नता का कारण प्रसन्नता से सदा उनकी भलाई में लगे रहते हैं- न होकर, दुःख का ही कारण हुआ। इसके पश्चात् , उनके शुभचिन्तक हैं । बालक, बूढ़े, जवान, सभी धर्मराज युधिष्ठिर की आज्ञा लेकर वह शकुनि के | उनकी कृपा की चाह रखते हैं । इसी चिन्ता के साथ हस्तिनापुर को चल दिया ॥११॥१५॥ मारे वह गहरे विषाद के समुद्र में गोते खाने लगा। राह में जाते-जाते पाण्डवों के अपार ऐश्वर्य, राह में जाते समय दुर्योधन उस अनुपम सभा की सौभाग्य और अभ्युदय का विचार करके, दुर्योधन | शोमा और युधिष्ठिर के वैभव के विषय में चिन्ता अत्यन्त व्याकुल और खिन्न हो उठा । किस तरह करता हुआ, यहां तक बेसुध, था, कि मामा शकुनि पाण्डवों का सर्वनाश हो, उनका यह ऐश्वर्य न रहे, | के बार-बार बातचीत करने पर भी कुछ उत्तर न यही सोचते-सोचते उसकी बुद्धि नीच वासनाओं के | देता था ॥१६॥२०॥ कारण अत्यन्त मलिन हो उठी । वह विचार करने उसके चित्त को ठिकाने पर न देख उसके लगा, कि पाण्डव बहुत ही प्रसन्न रहते हैं; सभी मामा शकुनि ने कहा-हे भाई दुर्योधन ! तुम किस - . " २१३ महा मारत अध्याय ४७] TAN MIUITUTITUTRITITIRIYARITALIRAMITITIVAT TIMITTE Tum aurAIRMALA दुर्योधन उवाच-दृष्ट्वेमां पृथिवीं कृत्स्ना युधिष्ठिरवशानुगाम् जितामस्त्रप्रतापेन श्वेताश्वस्य महात्मनः ॥ २२ ॥ तं च यज्ञं तथाभूतं दृष्ट्वा पार्थस्य मातुल! यथा शकस्य देवेषु तथाभूतं महाद्युतेः ।। २३॥ अमर्पण तु संपूर्णो दह्यमानो दिवानिशम् शुचिशुक्रागमे काले शुष्येत्तोयमिवाऽल्पकम् ॥ २४ ॥ पश्य सात्वतमुख्येन शिशुपालो निपातितः न च तत्र पुमानासीत्कश्चित्तस्य पदानुगः ॥ २५ ॥ दह्यमाना हि राजानः पाण्डवोत्थेन वहिना क्षान्तवन्तोऽपराधं ते को हि तत्क्षन्तुमर्हति ॥ २६ ॥ वासुदेवेन तत्कर्म यथाऽयुक्तं महत्कृतम् सिद्धं च पाण्डुपुत्राणां प्रतापेन महात्मनाम् ॥ २७ ॥ तथा हि रत्नान्यादाय विविधानि नृपा नृपम् । उपातिष्ठन्त कौन्तेयं वैश्या इव करप्रदाः ॥ २८ ॥ श्रियं तथागतां दृष्ट्वा ज्वलन्तीमिव पाण्डवे अमर्पवशमापन्नो दह्यामि न तथोचितः ॥ २९ ॥ . एवं स निश्चयं कृत्वा ततो वचनमब्रवीत् कारण रम्बी साँसें रेते हुए घर को चर रहे हो। कार नहीं किया ॥२१॥२५॥ यह सुनकर दुर्योधन ने कहा-मैं सब पृथ्वी को भरा ऐसा कौन होगा जिससे ऐसी बातें सही अर्जुन के शस्त्र के प्रताप से युधिष्ठिर के वश में, ' जायेंगी, श्रीकृष्ण का यह सर्वथा अनुचित काम और देवताओं के बीच में जैसे इन्द्र यज्ञ करे, उसी , पाण्डवों के ही प्रताप मे मिद्ध हुआ। देखो, यज्ञ के प्रकार से युधिष्ठिर को राजसूय यन करते, देखकर, अरमर पर आये हुए सच राजाओं ने अगम्य यर 1 अप्रसन्न हुआ इ । क्रोध और ईपी दिन-रात मुझ मूल्य रत्न आदि, भेंट के रूप में, देकर पाण्डया पो जाते है, और उनके कारण से मैं इस प्रकार का सजाना गर दिया है । दिनों दिन पद रदी से सम्वता जाना है, जैसे गरमी के दिनों में जर पाण्डयों की मौमाग्य लक्ष्मी देमकर मेरी ईपी धीर दिन दिन सूगता चला जाता है । देखो, श्रीकृष्ण धौर परल और प्रचण्ड होती जा रही है। मामा! ने शिशुपार को मार डाग, हय राना उसयो देखने यही मताप मेरे शरीर को दिन दिन मुबाता और रदे, परन्तु किसी ने पाण्डों के भय मे उमका पनि । हदय को जगता जा रहा है ॥२६॥२९॥ -- - 1 TOTTISEMJIWwroCOLLTIETTER IIIIIIIIIIICE २१४ म हा भा र त सभापर्व rurunmun ruarruta Terrunt IIIUITUUTUUUUUTTITUTANATLLAMMATITIATI AKADuTMARATUTTA । पुनर्गान्धारनृपतिं दह्यमान इवाऽग्निना ॥३०॥ वह्निमेव प्रवक्ष्यामि भक्षयिष्यामि वा विपम् । अपो वापि प्रवेक्ष्यामि न हि शक्ष्यामि जीवितुम् ॥ ३१ ॥ को हि नाम पुमाँल्लोके मर्पयिष्यति सत्ववान् । सपत्नानृध्यतो दृष्ट्वा हीनमात्मानमेव च ॥ ३२ ॥ सोऽहं न स्त्री न चाऽप्यस्त्री न पुमान्नाऽपुमानपि । योऽहं तां मर्पयाम्यद्य तादृशीं श्रियमागताम् ॥ ३३ ॥ ईश्वरत्वं पृथिव्याश्च वसुमत्तां च तादृशीम् यज्ञं च तादृशं दृष्ट्वा मादृशः को न संज्वरेत् ॥ ३४ ॥ अशक्तश्चैक एवाऽहं तामाहर्तुं नृपश्रियम् सहायांश्च न पश्यामि तेन मृत्युं विचिन्तये ॥३५ ।। दैवमेव परं मन्ये पौरुपं च निरर्थकम् दृष्ट्वा कुन्तीसुते शुद्धां श्रियं तामहतां तथा ॥३६॥ कृतो यत्नो मया पूर्वं विनाशे तस्य सौबल ! तच्च सर्वमतिक्रम्य संवृद्धोऽप्खिव पङ्कजम् ॥३७॥ तेन दैवं परं मन्ये पौरुषं च निरर्थकम् धार्तराष्ट्राश्च हीयन्ते पार्था वर्धन्ति नित्यशः अव मै इस दुःख को सह नहीं सकता हू, निश्चय कर लिया है,कि पौरुष अर्थात् उपाय निष्फल या तो जल में डूब मरूँगा, या अग्नि में जल मरूंगा, । है, और दैव अर्थात् प्रारब्ध श्रेष्ठ है, क्योंकि मैने नहीं तो विष खाकर सो रहूंगा। क्योंकि न मै स्त्री पाण्डवों के नाश करने के लिए अनेक प्रकार के हूं, जो मै पराधीन होकर रह । न अस्त्रज्ञ हूं, जो शत्रु, उपाय किये, परन्तु कोई भी कारगर न हुआ। और को जीतूं। न पुरुष हू,जो शत्रु के अस्त्रों को सह सकूँ। उसके बदले में वे लोग ऐसे बढ़ गये है, जैसे जल और न नपुंसक हूं, जो शत्रु की लक्ष्मी को देखकर । में कमल बढ़ता है । हम लोग दिन पर दिन कम ईर्षा न करूं । मला ऐसा कौन होगा, जो पाण्डवों होते जाते हैं, और पाण्डवों की दिन प्रति दिन के ईश्वरत्व धन और यन्न को देखकर दुग्बी न होवे। बढ़ौतरी होती जा रही है । इससे और क्या समझा इसलिए मैं ऐसी लक्ष्मी को इकट्ठा करने को अपनी | जावे, सिवाय इसके कि पारब्ध पीरुप से प्रपल है। सामर्थ्य न देखकर मरना चाहता हूं॥३०॥३५॥ इसके सिवाय पाण्टयों की समा में नौकरीनाकरी युधिष्ठिर की लक्ष्मी को देखकर मैंने यह भी तक ने मेरी हंसी की । वह हंसी मुझको दिन-रात . . MOTMuMOVIE muTOCTOMATIATvat TWITTLINIC अध्याय ५८ ] म हा भारत २१५ प्रमIDImanMAILY -- सोऽहं श्रियं च तां दृष्ट्वा समां तां च तथाविधाम् । रक्षिभिश्चाऽवहासं तं परितप्ये यथाऽग्निना ॥ ३९॥ स मामभ्यनुजानीहि मातुलाऽद्य सुदुःखितम् । अमर्ष च समाविष्टं धृतराष्ट्र निवेदय ॥४०॥ इति श्रीमन्महाभारते सभापर्वणि शूतपर्वणि दुर्योधनसंतापे सप्तचत्वारिंशोऽध्यायः ।। ४७ ॥ अग्नि के समान जलाती रहती है । इसलिए हे | चाहता हू । और तुम मुझको मरने की आज्ञा दो मामा ! अब तुम हमारे पिता धृतराष्ट्र से जाकर कह ॥३६॥४०॥ दो, कि मैं क्रोध के कारण से अपने प्राण छोड़ना सभापर्व का मैंतालीसवां अध्याय समाप्त हुआ। ४७ ।। अथ अथाऽधाचत्वारिंशोऽध्यायः॥४८॥ शकुनिरुपाच-दुर्योधन !न तेऽमर्पः कार्यः प्रति युधिष्टिरम् ! । भागधेयानि हि खानि पाण्डवा भुञ्जते सदा ॥ १ ॥ विधानं विविधाकारं परं तेषां विधानतः अनेकैरभ्युपायैश्च त्वया न शकिताः पुरा आरब्धापि महाराज ! पुनः पुनररिन्दम विमुक्ताश्च नरव्याघ्रा भागधेयपुरस्कृताः तेलब्धा द्रोपदी भार्या द्रुपदश्च सुतैः सह सहायः पृथिवीलाभे वासुदेवश्च वीर्यवान् लब्धश्चाऽनभिभूतार्थः पित्र्योऽशःपृथिवीपते! । विवृद्धस्तेजसा तेपां तत्र का परिदेवना अड़तालीमवां अध्याय 112८ ।। दुर्योधन की इस बात को मुनकर मनि ने भाग्य से बनने दी रहे हैं। माग्य से ही उन्हें कहा-हे गाई दुर्योधन ! युधिष्ठिर से ऐमाद्वप रखना द्रौपदी सी परम सुन्दरी मी मिर्ग है । पुत्रों-रादित तुम्हें उचित नहीं । सोनकर देखा,पाण्डव गेग गदा दुपट राजा और श्रीकृष्ण की Pहायना में उन्होंने अपने भाग्य से ही मुख भोग रहे हैं । तुमने उनके प्रयीमण्डल का एकच्छर राज्य पाया है। अपने मारने के लिए अनेक प्रकार के उपाय किये, परन्तु पतृक धन का कुछ ही हिम्गा पाकर, उन्होंने आने कोई उपाय नहीं चरा । वे अपनी प्रारब्ध मे जीने बायल में टमे इतना बड़ा लिया । इस कारण रहे । चार-पार तुम्हारे अनेक यन्न करने पर भी, ये उन पर काना किमी नगद तुम्ही योग्य काम MITRARIOTATORIALSINASLILaai.aire NICODEDA २१६ म हा भारत [सभापर्व TaruniorraryanvruariuTITUTTATRIOTMUNITTITUTORIArram. emainergrouTIRIT - धनंजयेन गाण्डीवमक्षय्यौ च महेपुधी लब्धान्यस्त्राणि दिव्यानि तोषयित्वा हुताशनम् ॥ ६ ॥. तेन कार्मुकमुख्येन वाहुवीर्येण चाऽऽत्मनः कृता वशे महीपालास्तत्र का परिदेवना ? अग्निदाहान्मयं चापि मोक्षयित्वा स दानवम् । सभां तां कारयामास सव्यसाची परंतपः तेन चैव मयेनोक्ताः किंकरा नाम राक्षसाः वहन्ति तां सभां भीमास्तत्र का परिदेवना? ॥ ९ ॥ यच्चाऽसहायतां राजन्नुक्तवानसि भारत तन्मिथ्या भ्रातरो हीमे तव सर्वे वशानुगाः ॥१०॥ द्रोणस्तव महेष्वासः सह पुत्रेण वीर्यवान् सूतपुत्रश्च राधेयो गौतमश्च महारथः ॥११॥ अहं च सह सोदर्यैः सौमदत्तिश्च पार्थिवः एतैस्त्वं सहितः सर्वैजय कृत्स्नां वसुन्धराम् ॥ १२ ॥ दुर्योधन उवान त्वया च सहितो राजन्नेतैश्चाऽन्यैर्महारथैः एतानेव विजेष्यामि यदि त्वमनुमन्यसे ॥ १३ ॥ नहीं ॥१५॥ तहां ले जा सकते है। यह देखकर तुम क्यों अकारण अर्जुन ने अग्निदेव को प्रसन्न किया, और कुढ़ रहे हो ? ॥६।९।। उनमे गाण्डीव धनुष और दो ऐसे तर्कस, जिनके और तुमने जो अपने असहाय होने की वाण कभी कम नहीं होते हैं, पाये हैं। उसने उनके बात कही, उस पर भी मै विश्वास नहीं कर सकता, और अपने बाहुबल के से राजाओं को जीत- क्योंकि तुम्हारे सब छोटे भाई तुम्हारे वश में हैं। कर अपने वश में किया है । तुमको उसे देखकर इनके सिवाय महावीर द्रोणाचार्य, उनके पुत्र महारथी खेद करना क्योंकर उचित है ? प्रतापी अर्जुन ने अश्वत्थामा, सूत-पुत्र कर्ण, महारथी कृपाचार्य,अपने मय दानव को अग्नि में जलने से बचाया था, और भाइयों सहित मैं, राजा सोमदत्त के पुत्र आदि सब उस उपकार के बदले में उसने युधिष्ठिर को ऐसी मदा तुम्हारे भले की इच्छा और यत्न किया करते अद्भुत् समा बना दी है, कि असंख्य किंकर नाम है। [फिर तुम अपने को सहाय-हीन कहकर क्यों के राक्षस उसकी आज्ञा से उस सभा की रक्षा और सन्ताप करते हो !] इन सब की सहायता से तुम देख-भाल किया करते है । उस सभा को जहाँ चाहें । भी सारी पृथ्वी को जीतकर अपने वश में कर WIDIOWIREDRIDEOHINICHECDOORT Tamannasana . . प्रताप । DnymAIMIHIRAMOMMIUIDAY २१७ म हा मारत अध्याय ४८] TANTANULATAN anno TITUTITUTITUTIUNITE TrntvIII ITTumrti TAURATHI - एतेषु विजितेष्वद्य भविष्यति मही मम सर्वे च पृथिवीपालाः सभा सा च महाधना ॥१४॥ शकुनिरुवाच-धनंजयो वासुदेवो भीमसेनो युधिष्ठिरः नकुलः सहदेवश्च द्रुपदश्च सहात्मजैः नैते युधि पराजेतुं शक्या देवगणैरपि महारथा महेष्वासाः कृतास्त्रा युद्धदुर्मदाः ॥ १६ ॥ अहं तु तद्विजानामि विजेतुं येन शक्यते युधिष्ठिरं स्वयं राजस्तन्निवोध जुषस्व च ॥ १७॥ दुर्योधन उवाच-अप्रमादेन सुहृदामन्येषां च महात्मनाम् यदि शक्या विजेतुं ते तन्ममाऽऽचक्ष्व मातुल !॥ १८ ॥ शकुनिरुवाच-द्यूताप्रियश्च कौन्तेयो न म जानाति देवितुम् । समाहूतश्च राजेन्द्रो न शक्ष्यति निवर्तितुम् ॥ १९ ॥ देवने कुशलश्चाऽहं न मेऽस्ति सदृशो भुवि त्रिपु लोकेषु कौरव्य ! तं त्वं द्यूते समाह्वय ॥ २० ॥ तस्याऽक्षकुशलो राजन्नादास्येऽहमसंशयम् राज्यं श्रियं च तां दीप्तां त्वदर्थं पुरुपर्पभ! ॥ २१ ॥ सकते हो। शकुनि के इन वचनों से उत्साहित | तो क्या सामर्थ्य है, देवता भी नहीं जीत सकेंगे। होकर दुर्योधन ने कहा-हे मामा ! यदि आप उचित । क्योंकि ये सब बड़े धनुषधारी और अस्त्रज्ञ हैं। परन्तु समझें और आज्ञा दें, तो मैं आपकी और अन्य | युधिष्ठिर को सहज में जीतने का उपाय मैं जानता महारथियों को सहायता से, पहले प्रधान शत्रु , हु । उसे सुनो और जो यह तुमको रुचे, तो उसी पाण्डवों को ही जीतने का उद्योग करूं । उनको , को करने की धुन में लग जाओ। यह सुनकर जीत लेने पर सारी पृथ्वी, सब राजा और वह सब दुर्योधन ने कहा-हे मामा ! जो ऐमा कोई उपाय समृद्धियों से पूर्ण विचित्र सभा,सव पर मेरा अधिकार ' निकल आये, कि हमारी सेना और मुहदों में से कोई हो जायगा ॥१०॥१४॥ न मरे और पाण्डव हमारे अधीन हो जाय, तो क्या यह सुनकर शकुनि ने उपर दिया, कि जिस ही यात है । आप ऐसे उपाय को मुझ से अवश्य समय श्रीकृष्ण, अर्जुन, भीमसेन, युधिष्ठिर, नाल, कहिये ॥१५॥१८॥ सहदेव, राजा द्रुपद और दृपद के पृष्टद्युम आदि गदुनि ने कहा-युधिष्ठिर को जुआ सेग्ने का पुत्र युद्ध करने को ऑरेंगे, उस समय उनको तुम्हारी । यड़ा व्यसन अर्यात् गौक है, उसको जुमा मेलना । ITAARAATRAM MORMA MUMMMMMM MMITTIMIL TONMMMMMC [सभापर्व RWAITRE २१८ म हा भारत ponrmmmmmmmYINATIMmmn marwminuTHUIImuTIMIMurarir इदं तु सर्वं त्वं राज्ञे दुर्योधन ! निवेदय अनुज्ञातस्तु ते पित्रा विजेष्ये तान्न संशयः ॥२२॥ दुर्योधन उवाच-त्वमेव कुरुमुख्याय धृतराष्ट्राय सौवलं ! निवेदय यथान्यायं नाऽहं शक्ष्ये निवेदितुम् ॥ २३ ॥ इति श्रीमन्महाभारते सभापर्वणि सूतपर्वणि दुर्योधनसंतापे अष्टचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४८ ॥ तो आता नहीं है, परन्तु जो कोई उसको जुआ खेलने सभा आदि सब कुछ जीत दूँ । किन्तु पहले तुम को बुलाता है,उससे वह अवश्य खेलता है और खेल से अपने पिता के पास जाकर उनसे सब हाल कहो। निवृत्त नहीं होता है । और मैं जुआ खेलना बहुत | उनसे अनुमति प्राप्त कर लो, तो फिर मैं युधिष्ठिर का अच्छी तरह से जानता हूँ । इस खेल का जाननेवाला । सर्वस्व जीतकर तुमको दे सकता हूँ। यह सुनकर मेरे बरावर तीनों लोक में नहीं है । इस कारण तुम दुर्योधन ने कहा-हे मामा ! आप ही पिता जी के जुआ खेलने के लिये धर्मराज को शीघ्र बुलाओ। पास जाइए और यह सब हाल कहकर उनकी अनुमति हे भाई ! मैं बाज़ी लगाकर कह सकता हूँ, कि जो ले आइए। मैं उनके आगे यह बात नहीं कह सकूँगा तुम युधिष्ठिर को मेरे साथ चौसर खेलने को प्रसन्न ॥१९॥२३॥ कर लो, तो मैं तुमको उनका साम्राज्य, वैभव और सभापर्व का अड़तालीस अध्याय समाप्त हुआ ॥४८॥ अथ एकोनपञ्चाशोऽध्यायः ॥ ४९ ॥ वैशम्पायन उवाच-अनुभूय च राज्ञस्तं राजसूयं महाक्रतुम् युधिष्ठिरस्य नृपतर्गान्धारीपुत्रसंयुतः प्रियकृन्मतमादाय पूर्व दुर्योधनस्य तत् प्रज्ञाचक्षुपमासीनं शकुनिः सौबलस्तदा ॥ २ ॥ दुर्योधनवचः श्रुत्वा धृतराष्ट्रं जनाधिपम् उपगम्य महाप्राज्ञं शकुनिर्वाक्यमब्रवीत् ॥ ३ ॥ शकुनिरुवाच-दुर्योधनो महाराज ! विवर्णो हरिणः कृशः दीनश्चिन्तापरश्चैव तं विद्धि मनुजाधिप ! उनयासयां अध्याय ॥४९।। वैशम्पायन कहते हैं-हे राजा जनमेजय ! गकुनि । जो अन्धा और ज्ञानी था, गया और कहने लगा- युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ से लौटकर, दुर्योधन की हे महाराज ! दुर्योधन अत्यन्त दुर्बल और पीला पड़ प्रति के कारण से, उक्त अध्याय में कही हुई रीति : गया है । न जाने उसको क्या चिन्ता है। और से दुर्योधन से सलाह करके, राजा धृतराष्ट्र के समीप, किस शत्रु के प्रकट होने के कारण से यह ऐसा दुःसी । :॥ ४ ॥ . - TUJHUMIIIIIIIIIMMMMMMITMLOMMITM THORuruNTOAMIT २१९ म हा भारत अध्याय ४९] Timi TamanTrammarTITIXIINDImmarwWAIIANTIDAIIMITRAINIRWATI VIDMRIMADIRAILWARA NRNRNRTnnnnnnnnnnnn ! न वै परीक्षसे सम्यगसह्यं शत्रुसंभवम् ज्येष्टपुत्रस्य हृच्छोकं किमर्थं नाऽवबुध्यसे धृतराष्ट्र उवाच-दुर्योधन ! कुतोमूलं* भृशमार्तोऽसि पुत्रक ! श्रोतव्यश्चन्मया सोऽर्थों ब्रूहि मे कुरुनन्दन! ॥ ६ ॥ अयं त्वां शकुनिः प्राह विवणं हरिणं कृशम् चिन्तयंश्च न पश्यामि शोकस्य तव संभवम् ॥ ७ ॥ ऐश्वर्य हि महसुत्र ! त्वयि सर्वं प्रतिष्ठितम् भ्रातरः सुहृदश्चैव नाऽऽचरन्ति तवाऽप्रियम् ॥ ८ ॥ आच्छादयसि प्रावारानभासि पिशितोदनम् आजानेया वहन्त्यश्वाः केनाऽसि हरिणः कृशः ॥ ९ ॥ शयनानि महार्हाणि योपितश्च मनोरमाः गुणवन्ति च वेश्मानि विहाराश्च यथासुखम् ॥ १० ॥ देवानामिव ते सर्व वाचि बढे न संशयः स दीन इव दुर्धर्पः कस्माच्छोचसि पुत्रक दुर्योधन टयाच-अनाम्याच्छादये चाऽहं यथा कुपुरुषस्तथा है । आपका यह ज्येष्ठ पुत्र है, आप भी उसके मन | वान्धव मी तुम्हारा प्रिय कार्य करने को प्रस्तुत रहते की चिन्ता को नहीं पूछते है ॥१५॥ है। इसके मिवाय पहनने को उत्सम वर, खाने-पीने यह सुनकर पृतराष्ट्र ने दुर्योधन को बुलाकर को म्यादिष्ठ यस्तुण, चढ़ने को मुन्दर गुन्दर घोडे, कहा-हे पुत्र ! तुम अत्यन्त दुखी हो, इसका कारण सोने को टम गयन, विहार करने को युवनी मिया, क्या है। यदि मेरे आगे यह हाल कहने में कुछ रहने को दिव्य महल और मौदा करने की अनेक रापट न हो, तो रिशेप म्प से सब हो । आज पीड़ा के म्यान मौजूद है । माजा देत ही मर यातुएं गयुनि के मुंह से मैंने मुना है, कि तुम दिन पर दिन तुम पा जाने हो । पिर नुम्हारे इम मानसिक दुम दुन और पीने पड़ते जा रहे हो । में यदुन मोर और चिन्ना का कारण क्या है । तुम्हारा ऐधर्य और कर मी तुम्हारे हमदुम्ब और चिन्ता या युछ कारण प्रमुना अमीम।कही, नारे इस संसार का पया निषित नहीं कर पाता । दमो, यह विमान राज्य पारण है ॥६॥११॥ और ऐकार्य मुम्हारे हाथ में है । माइग में कोई ऐमा पा, मुनार दुर्योधन ने पहा- नहीं, जो गुम्दाग पहना न मानता हो । मर या. की भाति भोजन नो पर स्नाआर यम भी पान माम रिमाप । ! Tumcा.! हो, में गुपुर rrrrrrrrrrrrrrorepareEROTECreprenTrrrrrrrrrrrrect २२० म हा भारत सभापर्व HOTrum Foruminumruary roommiumurenTISUTRImmuTORE IMAIIMIMINARMY ANIMAR वै अमर्ष धारये चोग्रं निनीषुः कालपर्ययम् अमर्षणः स्वाः प्रकृतीरभिभूय परं स्थितः क्लेशान्मुमुक्षुः परजान्स पुरुष उच्यते ॥ १३ ॥ संतोपो वै श्रियं हन्ति ह्यभिमानं च भारत! । अनुक्रोशभये चोभे यैर्वृतो नाऽश्नुते महत् ॥ १४ ॥ न मां प्रीणाति मद्भुक्तं श्रियं दृष्ट्वा युधिष्ठिरे । अतिज्वलन्तीं कौन्तेये विवर्णकरणी मम सपत्नानृध्यतोऽऽत्मानं हीयमानं निशम्य च अदृश्यामपि कौन्तेय ! श्रियं पश्यन्निवोद्यताम् ॥ १६ ॥ तस्मादहं विवर्णश्च दीनश्च हरिणः कृशः अष्टाशीतिसहस्राणि स्नातका गृहमेधिनः ॥ १७॥ त्रिंशदासीक एकैको यान्विभर्ति युधिष्ठिरः दशाऽन्यानि सहस्राणि नित्यं तत्राऽन्नमुत्तमम् ॥ १८ ॥ भुञ्जते रुक्मपात्रीभिर्युधिष्ठिरनिवेशने कदलीमृगमोकानि कृष्णश्यामारुणानि च ॥१९॥ काम्बोजः प्राहिणोत्तस्मै परार्ध्यानपि कम्बलान् । लेता हूँ, परन्तु मुझको ऐसा भयानक क्रोध हो रहा देखो, युधिष्ठिर अट्टासी हज़ार गृहस्थाश्रमी मातक है, कि उसके कारण से अब केवल अपने समय को ब्राह्मणों का पालन करता है। उप्तने प्रत्येक बामण की ही पूरा कर रहा हूँ । संसार में वही मनुष्य पुरुष सेवा के लिये तीस-तीस दासियां नियुक्त कर रक्खी हैं। कहा जाता है, जो शत्रु के वश में होने पर भी शत्रु इनके अतिरिक्त और भी दस हज़ार ब्राह्मण बड़े से निडर होकर, अपनी प्रजा को उस भय से छुड़ाने सुख से सुवर्ण के पात्रों में नित्य भोजन किया करते का प्रयत्न करे । जो मनुष्य संतोप, दया, गर्व और हैं। काम्बोज देश के राजा ने भेंट के तौर पर युधिष्ठिर भय करता है, उसको लक्ष्मी प्राप्त नहीं होती है। के पास कदली जाति के मृगों के चित्र विचित्र सायर, मैं नित्य सुन्दर पदार्थों को भोगता हूँ, परन्तु युधिष्ठिर । बड़े कीमती कम्बल,तीन सौ ऊँट और सैकड़ों दासी, के वैभव के टाह से वह भोग मुझ को गुण नहीं हाथी, खचर आदि भेजे है और सब राजाओं ने करते हैं और शत्रुओं की वृद्धि और अपने को हीन उसके स्थान पर आ-आफर अनेक रल मेंट किये हैं। देव देख कर, दिन प्रति दिन दुबला हो होकर पीला तात्पर्य यह है, कि राजसूय यज्ञ में बड़ा भारी ऐश्वर्य पड़ता जाता हूँ॥१२॥१७॥ पाण्डवों के हाथ लगा है। यज्ञ में आये हुए राजाओं । Hom.iRIDWNisaamanamam . सा TT PAPEEM अध्याय ४९] म.हा भारत २२१ ATMummiumAnnuTHILITORIमाधOTEILAN REITUTTARगाराममायar ॥ २०॥ Ramaummmmmmmmar ILMMUMILLLLLLLL - गजयोपिद्वाऽश्वस्य शतशोऽथ सहस्रशः. त्रिशतं चोष्ट्रवामीनां शतानि विचरन्त्युत राजन्या चलिमादाय समेता हि नृपक्षये ॥ २१॥ पृथग्विधानि रत्नानि पार्थिवाः पृथिवीपते ! आहरन्तुमुख्येऽस्मिन्कुन्तीपुत्राय भूरिशः ॥ २२ ॥ न क्वचिद्धि मया तादृग्दृष्टपूर्वो न च श्रुतः यादृग्धनाऽऽगमो यज्ञे पाण्डुपुत्रस्य धीमतः । ॥ २३ ॥ अपर्यन्तं धनौघं तं दृष्ट्वा शत्रोरहं नृप !. शर्म नैवाऽभिगच्छामि चिन्तयानो विशांपते ! ॥ २४ ॥ ब्राह्मणा वाटधानाश्च गोमन्तः शतसंघशः त्रिखर्व वलिमादाय द्वारि तिष्ठन्ति बारिताः ॥ २५॥ कमण्डलूनुपादाय जातरूपमयाञ्छुभान् एतद्वनं समादाय प्रवेशं लेभिरे न च ॥ २६ ॥ यथैव मधु शक्राय धारयन्त्यमरस्त्रियः तदस्मे कांस्यमाहाद्विारुणं कलशोदधिः ॥ २७ ॥ शङ्गप्रवरमादाय वासुदेवोऽभिषिक्तवान् शैक्यं रुक्मसहस्रस्य बहुरत्नविभूपितम् ॥ २८ ॥ दृष्ट्वा च मम तत्सर्व ज्वररूपमिवाऽभवत् ने जिन मूल्यवान् रनों के देर लाकर युधिष्ठिर को भीतर न जाने पराये । और वरुण देवता ने कांवड़ अर्पण किये हैं, वैसे रखों को मैने कभी देखा मुना में अमृत रूपी जल से भरा हुआ काँस का पात्र, जो तक नहीं ॥१८॥२३॥ बहुत से रनों से भूपिन था, रखवाकर युधिष्ठिर को हे महाराज ! पाण्डवों को इस प्रकार अपार भेंट करने के लिये भेज दिया । उसमें यह अमृतम्सी ऐधर्य का अधिकारी होते देखकर ही मेरे हृदय में जल युधिष्ठिर के लिये इस प्रकार से मरा हुआ था, जमे ऐमा कोलाहल मच गया है और मेरी धुरी दशा हो गयी इन्द्र के लिये सम्र्पूण औषधी अमृतरूपी रम धारण है। देखो, सती करनेवाले ब्रमण, गौ पालक वैश्य किये रहती हैं। उन रमों में से श्रीकृष्ण ने शान और से कहो और मनुष्य उस यज्ञ में तीन पर्व धन से लिया और उससे यह जल मर-मर कर युधिष्टिर का भेंट के लिये देने को हाया में सुवर्ण के कला लिये अभिएक क्यिा ॥२४॥२८॥ हुए द्वार पर पड़े रहे, परन्तु इतनी मेंर राने पर भी उमी ममय कांवड़ में पूर्व,पशिम और दक्षिण के RADXin inni । 2EROTECreamPALCIMorce.THATAmercremercercarrrrrrr.a सभापर्व २२२ महा मा रत unrounnerrarurrenirurreniouTurtruuuuuunioritrunmuTITUTORG rintrouTITUTOTARUIT गृहीत्वा तत्तु गच्छन्ति समुद्रौ पूर्वदक्षिणी ॥ २९॥ तथैव पश्चिमं यान्ति गृहीत्वा भरतर्षभ ! उत्तरं तु न गच्छन्ति विना तात ! पतत्रिणः ॥ ३०॥ तत्र गत्वाऽर्जुनो दण्डमाजहाराऽमितं धनम् । इदं चाऽद्भुतमत्राऽऽसीत्तन्मे निगदतः शृणु । शतसहस्रे तु विप्राणां परिविष्यताम् ॥३१॥ स्थापिता तत्र संज्ञाऽभूच्छहोमायति नित्यशः । मुहुर्मुहुः प्रणदतस्तस्य शङ्खस्य भारत ! ॥ ३२ ॥ अनिशं शब्दमश्रौषं ततो रोमाणि मेऽहृषन् । पार्थिवैर्वहुभिः कीर्णमुपस्थानं दिदृक्षुभिः ॥ ३३ ॥ अशोभत महाराज ! नक्षत्रैद्योरिवाऽमला सर्वरत्नान्युपादाय पार्थिवा वै जनेश्वर ! यज्ञे तस्य महाराज! पाण्डुपुत्रस्य धीमतः वैश्या इव महीपाला द्विजातिपरिवेषकाः ॥ ३५॥ न सा श्रीदेवराजस्य यमस्य वरुणस्य च गुह्यकाधिपतेर्वाऽपि या श्री राजन्युधिष्ठिरे समुद्रों का जल मंगवाया गया। और उत्तर के समुद्र का से शुशोभित हो जाता है, उसी प्रकार से यज्ञशारा जल भी जिसको देवताओं के सिवाय और कोई नहीं के निकट के स्थान देश-देश के राजाओं से शोभित ला सकता है, उसी कांवड़ में युधिष्ठिर के लिये लाया हो गये थे। वे राजा लोग युधिष्ठिर की सेवा में गया । इन सब बातों को देखकर मेरे शरीर में शोक वैश्यों की तरह असंख्य धन-रन ले आये थे और रूपी ज्वर हो आया। इसके सिवाय अर्जुन उत्तर : नौकरों की तरह सब काम कर रहे थे । ब्राह्मणों को दिशा को विजय करके बहुत सा धन और रन ले भोजन परोसना आदि सभी काम वे कर रहे थे। आया । और यह एक बड़ी अद्भुत बात थी, कि हे महाराज ! वर्णन करके सौभाग्य तथा लक्ष्मी का उस यज्ञ में एक लाख ब्राह्मण परोसने वाले थे और और अधिक परिचय आपको क्या दूं। मुझे जान उनकी संख्या शंखध्वनि से मालम जाती थी। पड़ना है कि वैसा वैभव इन्द्र के यहां,यनराज के यहां उस शंख के शब्दों को सुन-सुनकर मेरे रोयें खड़े । वरुण के यहां और कुवर के यहां भी न होगा। हे हो जाते थे ॥२९॥३३॥ पिता जी! पाण्डवों का ऐसा सौभाग्य देसकर मेरी छाती और जैस निर्मल आकाश तारागणों के निकलने फटी जाती है, कलेजा जला जाता है। इस कारण Post-pawarwarninrnamaArmaaoratinARTARA । 10 7 अध्याय ४९] म हा भारत २२३ AnamruNNUIITTTTunriym mruuuuutraTUTATION HINGiruNTRA IATIN -- - aummaranimuraramzunmanduIAGRIII तां दृष्ट्वा पाण्डुपुत्रस्य श्रियं परमिकामहम् शान्ति न परिगच्छामि दह्यमानेन चेतसा ॥ ३७॥ शकुनिरुवाच-यामेतामतुलों लक्ष्मी दृष्टवानसि पाण्डवे तस्याः प्राप्तावुपायं मे शृणु सत्यपराक्रम ! अहमक्षेष्यभिज्ञातः पृथिव्यामपि भारत ! हृदयज्ञः पणज्ञश्च विशेषज्ञश्च देवने ॥ ३९ ॥ द्यूतप्रियश्च कौन्तेयो न च जानाति देवितुम् । आहूतश्चैष्यति व्यक्तं यूतादपि रणादपि. ॥४०॥ नियतं तं विजेष्यामि कृत्वा तु कपटं विभो । आनयामि समृन्दिं तां दिव्यां चोपाह्वयस्व तम् ॥ ११ ॥ वैशम्पायन उवाच एवमुक्तः शकुनिना राजा दुर्योधनस्ततः धृतराष्ट्रमिदं वाक्यमपदान्तरमब्रवीत् ॥ ४२ ॥ अयमुत्सहते राजच्छ्रियमाहर्तुमक्षवित् द्यूतेन पाण्डुपुत्रस्य तदनुज्ञातुमर्हसि ॥ ४३ ॥ धृतराष्ट्र उवाच-क्षता मन्त्री महाप्राज्ञःस्थितो. यस्याऽस्मि शासने। तेन संगम्य वेत्स्यामि कार्यस्याऽस्य विनिश्चयम् ॥४४॥ में किसी तरह शान्ति नहीं पाता ॥३४॥३७॥ लिये बुलाओ । में कपट से उसे जुए में हरा दूंगा दुर्योधन के ऐसे वचन सुनकर शकुनी ने और उसका सर्वम्ब छीन लँगा। उसका सब राज्य फिर कहा-हे भाई ! इस लक्ष्मी की प्राप्ति के | और धन तुमको मिल जायगा । तुम जुआ खेलने लिये एक उपाय तो में जानता हूँ, कि मुझको के लिये युधिष्ठिर को शीघ्र बुलाओ ॥३८१४१॥ जुआ खेलना बहुत अच्छी तरह आता है ।मेरे बराबर वैशम्पायन कहते हैं-हे राजा जनमेजय! शयुनि इस काम में तीनों लोक में कोई नहीं है। मुझे पांसों के इन वचनों से उत्साहित होका दुर्योधन ने उसी को बनाकर फेंकना,उनके अनुसार दाँव लगाना और समय धृतराष्ट्र से आज्ञा मांगते हुए कहा-हे पिता देश काल के अनुसार चाल को चलना बहुत अच्छी जी! मामा ने जो कहा वही उपाय करने से में पाण्डवों तरह से आता है । मैं जानता हूँ कि युधिष्ठिर को की सीमाम्य-लक्ष्मी पा सकता हूँ। आप मुझे पाण्डवों जुए का व्यसन अर्थात् शौक है, परन्तु उसे खेलना को जुआ खेलने के लिये बुलाने की आजादीजिए। नहीं आता है । पूत या युद्ध के लिये पुराने से उसे धृतराष्ट्र ने कहा-हे पुत्र ! विदुर मेरे मन्त्री हैं। उन आना ही पड़ेगा। इसलिये तुम उमे धूनकीड़ा फे से सम्मति लिये पिना मैं किसी तरह इस बारे में HorromurITreazMDREtmannRammarARARIAAI 1020mmODIDIOCOTICUDwareCoimrozcEOCTOmEO TOTLE २२४ सभापर्व महाभारत SamrTM ruary ruarunmarrrrrrrRIJRAMImmmmmmmmmunmunrunnr TIMATLILIMIMILIATIUM स हि धर्म पुरस्कृत्य दीर्घदर्शी परं हितम् उभयोः पक्षयोर्युक्तं वक्ष्यत्यर्थविनिश्चयम् ॥४५॥ दुर्योधन उवाच-निवर्तयिष्यति त्वाऽसौ यदि क्षत्ता समेष्यति । निवृत्ते त्वयि राजेन्द्र ! मरिष्येऽहमसंशयम् ॥४६॥ स त्वं मयि मृते राजन्विदुरेण सुखी भव भोक्षयसे पृथिवीं कृत्स्ना किमया त्वं करिष्यसि ॥ ४७।। वैशम्पायन उवाच-आर्तवाक्यं तु तत्तस्य प्रणयोक्तं निशम्य सः । धृतराष्ट्रोऽब्रवीत्प्रेष्यान्दुर्योधनमते स्थितः ॥४८॥ स्थूणासहस्रैर्वृहतीं शतद्वारा सभां मम मनोरमां दर्शनीयामाशु कुर्वन्तु शिल्पिनः ॥ ४९ ॥ ततः संस्तीर्य रत्नस्तां तक्षण आनाय्य सर्वशः। सुकृतां सुप्रवेशां च निवेदयत मे शनैः ॥ ५०॥ दुर्योधनस्य शान्त्यर्थमिति निश्चित्य भूमिपः धृतराष्ट्रो महाराज ! प्राहिणोद्विदुराय वै ॥ ५१॥ अपृष्ट्वा विदुरं स्वस्य नासीत्कश्चिद्विनिश्चयः द्यूते दोषांश्च जानन्स पुत्रस्नेहादकृष्यत ॥ ५२॥ आज्ञा नहीं दे सकता । विदुर से सम्मति करके मैं | भोग सकेंगे ॥४२॥४७॥ पहले निश्चय कर लें, कि इस बारे में करना क्या वैशम्पायन कहते हैं-हे राजा जनमेजय ! है, क्योंकि विदुर वही सम्मति देंगे, जिससे दोनों धृतराष्ट्र ने दुर्योधन की इस पीडायुक्त और नम भात पक्षों का भला हो और मेरा अभीष्ट भी यही है। यह को सुनकर उसके दु ख को दूर करने के लिये दूतों मुनकर दुर्योधन ने कहा-हे पिता जी ! पाण्डवों | और कारीगरों को दुराकर आज्ञा दी, कि तुम रोग को जुआ खेरने के रिये चुराने की सम्मति विदुर | बहुत जल्दी एक रमणीक सभा,जिसमें हजार खम्भे आपको कमी न देंगे। उनसे सम्मति करके यदि और सौ द्वार हो, बनाओ। सब लोगों के मन को आप इस बारे में कुछ निश्चय करेंगे, तो मेरा मनोरथ | हरनेवारा वह सभामण्डप स्थान स्थान पर अमूल्य पूरा न होगा। वे आप को इस काम से रोक सकते रनों से सुशोभित किया जाय । भवन तैयार हो जाने हैं। इस बारे में यदि आप मुझे आज्ञा न देंगे,तो मैं | पर मुझे सूचना दो ॥४८॥५०॥ अपने प्राण दे ,गा । मेरे मरने पर आप विदुर जी दुर्योधन के सन्तोष के रिए नौकरों को यह के साथ अच्छी तरह आनन्दपूर्वक पृथ्वी का राज्य आज्ञा देकर धृतराष्ट्र ने विदुर को चुरा राने के FuwanaKERamananmininamaina " UTOMA TUTTITCDT UITTONNEDTUDITIMIPUUTMIMINO अध्याय ४९] म हा मारत २२५ SUVALGYTASTROFERDINTTI TUTTI ITTINTI TITTAT MUDDINTAY carceaerracinamaRamanumaunimamarnatarawa तच्छ्रुत्वा विदुरो धीमान्कलिद्वारमुपस्थितम् । विनाशमुखमुत्पन्नं धृतराष्ट्रमुपाद्रवत् ॥ ५३॥ सोऽभिगम्य महात्मानं भ्राता भ्रातरमग्रजम् । मंधी प्रणम्य चरणाविदं वचनमब्रवीत् विदुर उवाच-नाभिनन्दामि ते राजन् ! व्यवसायमिमं प्रभो!। पुत्रै|दो यथा न स्याद् यतहेतोस्तथा कुरु धृतराष्ट्र उवाच - क्षत्तः पुत्रेषु पुत्रैमें कलहो न भविष्यति यदि देवा प्रसादं नः करिष्यन्ति न संशयः ॥ ५६ ॥ अशुभं वा शुभं वाऽपि हितं वा यदि वाऽहितम्। प्रवर्ततां सुहृद्यूतं दिष्टमेतन्न संशयः ॥ ५७॥ मयि सन्निहिते द्रोणे भीम त्वयि च भारत!। अनयोर्दैवविहितो न कथंचिद्भविष्यति ॥ ५८॥ गच्छ त्वं रथमास्थाय हयैर्वातसमेजवे खाण्डवप्रस्थमयैव समानय युधिष्ठिरम् न वाच्यो व्यवसायो मे विदुरैतब्रवीमि ते देवमेव परं मन्ये येनैतदुपपद्यते ॥ ६०॥ लिये गनुप्य भेजे। क्योंकि उन्होंने विदुर की मम्मति उमका में अनुमोदन नहीं कर सकता। जिस काम रिये बिना अभी तक कोई भी काम नहीं किया था। के करने से पुत्रों में परम्पर विरोध पैदा हो, उमे धृतराष्ट्र जानते थे, कि यूत-गोडा सर दोषों की खान करने की आज्ञा देना पड़े लोगों को उचित नहीं है। उस समय केवल पुत्र मह क मारे उन्होंने वैसी ॥५१॥५५॥ आजा दे दी थी। तात्पर्य यह है कि ये पिदुर से धृतगष्ट ने कहा-दे विदुर ! माग्य पदिहमारे सम्मति लिय बिना कोई काम करना नहीं चाहते । प्रतिकूल न हो, तो भाइयों में क्यों शिरोध उत्पन्न थे। इसी कारण उन्होंने यिदुर को चुराने के लिये होगा । न अशुभ हो या शुभ, हितकारक हो या दूत भेजा । उममे सर वृत्तान्त मुनकर विदुर ने अहितकारक, तुम इमकी चिन्ता न परो । सुम्दोर सोना, कि मंग और पूट का मैदान खुन गया,सर्व और भीष्म तथा द्रोणानार्य के पैटने पर,कोई अनीति नाश की जड़ निकल आई। ये सीन से धृतराष्ट्र के देव की रची हुई मी न होने पारगी । तुम बन्दी पाम पहुँने । उनके पाव टूर विदुर ने कहा- 'चन्नेवाले घोड़ी को रथ में जोतार आन ही इन्द- महाराज ! आपने जिम काम की आशा दे दी है। य यो जाओ और युधिष्ठिर को अपने सायरने Annikararen --- । ECRETITIVECIRCarroractTDCLEE का वृतान्त मुनने की इच्छा यदि यरत ही प्रवन २२६ मभापर्व म हा भारत summramremiuTREENETITIOmmmmmmmmarrrrroremaiTRIES इत्युक्तो विदुरो धीमान्नेदमस्तीति चिन्तयन् । आपगेयं महाप्राज्ञमभ्यगच्छत्सुदुः खितः इति श्रीमन्महाभारते सभापर्वणि द्यूतपर्वणि दुर्योधनसंतापे एकोनपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ४९ ॥ आओ । हे विदुर ! इसे तुम मेरा विचार या इच्छा कौरवों और पाण्डवों का सर्वनाश होगा । यह मत समझो। यह घटना दैव की प्रेरणा से हुई है। विचार कर महात्मा विदुर दुखित होते हुए बुद्धि- यह सुनकर विदुर ने मन ही मन में कहा, कि अब मान् वृद्ध भीष्मपितामह के पास गये ॥५६॥६१॥ सभापर्व का उनचासवां अध्याय समाप्त हुआ ।। ४९ ॥ अथ पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५॥ जनमेजय उवाच-कथं समभवद् द्यूतं भ्रातृणां तन्महात्ययम् यत्र तद् व्यसनं प्राप्तं पाण्डवैर्मे पितामहैः के च तत्र सभास्तारा राजानो ब्रह्मवित्तम! । के चैनमन्वमोदन्त के चैनं प्रत्यषेधयन् विस्तरेणैतदिच्छामि कथ्यमानं त्वया द्विज! मूलं ह्येतद्विनाशस्य पृथिव्या द्विजसत्तम ! सौतिरुपाच--एवमुक्तस्ततो राज्ञा व्यासशिष्यः प्रतापवान् आचचक्षेऽथ यद वृत्तं तत्सर्वं वेद तत्ववित् वैशम्पायन उवाच- शृणु मे विस्तरेणेमां कथां भारतसत्तम! भूय एव महाराज ! यदि ते श्रवणे मतिः विदुरस्य मतं ज्ञात्वा धृतराष्ट्रोऽम्बिकासुतः पचासवां अध्याय ॥५०॥ यह सुनकर अब जनमेजय ने कहा-हे ब्रह्म कहकर मेरे चित्त को शांत कीजिए । पृथ्वी भर के शानियों में श्रेष्ठ ! जिस जुए के प्रभाव से पितामह क्षत्रियों के नाश का कारण यही धूत था । मूत-पुत्र पाण्डवों की ऐमी शोचनीय दशा हुई. भाइयों में सब ऋपियों से कहते है, कि राजा जनमेजय का फूट पड़ गई और उसमे बड़ा भारी अनर्थ उठ खडा आग्रह देखकर सब वेदों और वेढागों के ज्ञाता, हुआ, यह जुआ किम तरह हुआ था । उस चूत व्याम के शिष्य वैशम्पायन विस्तारपूर्वक सब जांत सभा में स्मि-फिस ने उम सेल का अनुमोदन किया कहने लगे ॥१४॥ था, और किन-किन महात्माओं ने घुन-कीड़ा का गम्पायन ने कहा-हे राजन् ! उस यून मीड़ा विरोध किया था। कृपा करके यह मय वृत्तान्त TODDLE PREPARAMAYATIMAmarmurrianre a.orntarawaer.comamaramatarnaani.asrammar । ।

२२७ म हा मा र त अध्याय ५० ] NITIATTITUTUITRururunnnnxnz SwammarnummarysneermuTWIRTUNITUITINDI VIIIIIIIIMATERIAL, arun दुर्योधनमिदं वाक्यमुवाच विजने पुनः अलं द्यूतेन गान्धारे विदुरो न प्रशंसति न ह्यसौ सुमहावुद्धिरहितं नो वदिष्यति हितं हि परमं मन्ये विदुरो यत्प्रभापते क्रियतां पुत्र तत्सर्वमेतन्मन्ये हितं तव देवर्षिर्वासवगुरुर्देवराजाय धीमते यत्प्राह शास्त्रं भगवान्वृहस्पतिरुदारधीः तद्वेद विदुरः सर्व सरहस्यं महाकविः स्थितस्तु वचने तस्य सदाऽहमपि पुत्रक! विदुरो वाऽपि मेधावी कुरूणां प्रवरो मतः उद्धवो वा महावुद्धिर्वृष्णीनामर्चितो नृप ! तदलं पुत्र ! द्यूतेन द्यूते भेदो हि दृश्यते ॥ ११ ॥ भेदे विनाशो राज्यस्य तत्पुत्र! परिवर्जय पित्रा मात्रा च पुत्रस्य यदै कार्य परं स्मृतम् ॥ १२ ॥ प्राप्तस्त्वमसि तन्नाम पितृपैतामहं पदम् अधीतवान्कृती शास्त्रे लालितः सततं गृहे ॥ १३ ॥ हो, तो सुनो । विदुर के अभिप्राय को अच्छी तरह । श्रेष्ठ हैं, उसी प्रकार से उद्धव भी अपनी बुद्धि के जानकर महाराज धृतराष्ट्र ने दुर्योधन को फिर एकांत । कारण से वृष्णिवंगियों में पूनित रहते हैं और सब में बुलाकर कहा-हे पुत्र ! विदुर को यह यूत- उनकी सम्मति के अनुसार काम करते हैं । ये इम फ्रीड़ा बिलकुल नापमन्द है । इसलिए इमकी आव. जुए के खेल को अनिष्ट का कारण यतलाकर मना श्यकता नहीं । बुद्धिमान् विदुर हमारे अहित की करते हैं, इमलिये जुआ खेलने की आवश्यकता यान कभी न कहेंगे । इमलिए हे पुत्र !में अनुरोध नहीं । जुए का खेल मित्रों में-आत्मीयों में-फूट पैदा करना हूं.कि तुम विदुर की मम्मति मान लो॥५॥८॥ कर देता है। फूट पैदा होने मे अममय में ही मय हे पुत्र ! असाधारण बुद्धिमान् और नीतिज्ञ राज्य और ऐश्वर्य मिट जाता है । इसलिए तुम गृहम्पति जैसे इन्द्र को कभी कोई खोटी सलाह नहीं जुआ बलने का विचार छोड़ दो ॥१॥१२॥ देते, चमे ही नीतिन विदुर कभी मुझे खोटी मलाह पुत्र के प्रति माता-पिता का जो काव्य है, न देंगे। जिस प्रकार विदुर जी सब शास्त्रों के मन उसे में बराबर करना आया हूं । बालकपन मे पंद्र को जानने के कारण से बड़े बुद्धिमान और कौरवों में यत्न और म्नेह के माय नुम्हारा पालन किया, तुम्हें ! TIMOTION mTTTTTEDIOS 20CTOILDIO २२८ म हा भारत ममापर्व auxantamanAmAGEMINI onmummy DITIONARITAwarTwwmarathe EMAITANAAKAL 1 EnimmunMummmmmmmmmmmmmmmmm BRILLITERRORAT भ्रातृज्येष्ठः स्थितोराज्ये विन्दसे किं न शोभनम् । पृथग्जनरलभ्यं यद्भोजनाऽऽच्छादनं परम् तत्प्राप्तोऽसि महावाहो कस्माच्छोचसि पुत्रक! । स्फीतं राष्ट्रं महावाहो ! पितृपैतामहं महत् नित्यमाज्ञापयन्भासि दिवि देवेश्वरो यथा तस्य ते विदितप्रज्ञ ! शोकमूलमिदं कथम् समुत्थितं दुःखकरं तन्मे शंसितुमर्हसि दुर्योधन उवाच-अनाम्याच्छादयामीति प्रपश्यन्पापपूरुषः नामष कुरुते यस्तु पुरुषः सोऽधमः स्मृतः नमांप्रीणाति राजेन्द्र लक्ष्मीःसाधारणी विभो!। ज्वलितामेव कौन्तेये श्रियं दृष्ट्वा च विव्यथे ॥ १८॥ सर्वां च पृथिवीं चैव युधिष्ठिरवशानुगाम् - स्थिरोऽस्मि योऽहं जीवामिदुःखादेतद्ब्रवीमि ते ॥ १९ ॥ आवर्जिता इवाऽऽभान्ति नीपाश्चित्रककौकुराः । कारस्कारा लोहजचा युधिष्ठिरनिवेशने ॥ २० ॥ पदाया-लिखाया। मैंने तुमको बुद्धिमान् और विद्वान् भाव में अपना पेट पालता रहता है । विद्वानों ने जानकर सब पुत्रों में बड़े होने के कारण, युवराज कहा है, कि शत्रु की बदौतरी देखकर भी उसके की गद्दी भी दे दी। और पहनने को उत्तम वस्त्र, प्रतिकार का उपाय न कर, केवल विषय भोग में डूबे और ग्वाने को उत्तम भोजन, और संसार में ऐसे रहना, बड़े ही कायर का लक्षण है । मैं यदि तेज अलभ्य पदार्थ, जिनका मिलना दूसरे को दुर्लभ है, मे हीन कायर न होता, तो फिर युधिष्ठिर की राज- तुम्हारे लिये भोगने को भी मौजूद है,फिर तुम यथा लक्ष्मी को जगमगाते देखकर भी कुछ उपाय क्यों मोन क्यों कर रहे हो ! अब तो तुम्हें चाहिये, कि न करता ! दिन पर दिन सारी पृथ्वी पर युधिष्ठिर चाप-दाद के विशाल राज्य के स्वामी होकर और का साम्राज्य बढ़ता जा रहा है, यह देखकर मुझे अपने माहु-पल मे उसे बढ़ाकर इन्द्र की नरह प्रजा जीने की बिलकुल चाह नहीं है। हृदय अत्यन्त का पालन करने रहो ॥१३॥१६॥ कठोर होने के कारण ही में अभी तक जीवित हूं 'बिना के रह चुक्ने पर, दुर्योधन कहा ॥१७११९|| "पिना जी! मैं अत्यन्त नगधम हूं। इसी कारण दम्बिए, युधिष्ठिर के भवन में कदम्ब, चित्रक gi का अभ्युदय देखकर भी अत्यन्त निम्तेज- कौर, कारम्पर, और लोहजार आदि बहुमूल्य - 20- Li.........TIP'CILICOTTIMILLIORTHEASTIMIMIC Torrum INTONTROTATISTITUTIO 2010TITUTION - - २२९ म हा भारत अध्याय ५०] TUTORITUTORROWTITUTITATIOTTER हिमवत्सागराऽनूपाः सर्वे रत्नाकरास्तथा अन्त्याः सर्वे पर्युदस्ता युधिष्ठिरनिवेशने ॥ २१ ॥ ज्येष्ठोऽयमिति मां मत्वा श्रेष्ठश्चति विशांपते ! । युधिष्ठिरेण सत्कृत्य युक्तो रत्नपरिग्रहे ॥ २२ ॥ उपस्थितानां रत्नानां श्रेष्ठानामघहारिणाम् नाऽदृश्यत परः पारो नाऽपरस्तत्र भारत ! ॥ २३ ॥ न मे हस्तः समभवद्वसु तत्प्रतिगृह्णतः अतिष्ठन्त मयि श्रान्ते गृह्य दूराहृतं बनु ॥ २४ ॥ कृतां विन्दुसरोरत्नैर्मयेन स्फाटिकन्छदाम् अपश्यन्नलिनी पूर्णामुदकस्येव मारत ! वस्त्रमुत्कर्षति मयि प्राहसत्स कोदरः वर्जितम् शत्रोद्धिविशेषेण विमूढं र. तत्र स्म यदि शक्तः स्यातयेऽहं वृकोदरम् । ॥ २७॥ यदि कुर्यां समारम्भं भी हन्तुं नराधिप ! तेः स्यान्नाऽत्र संशयः । शिशुपाल इवाऽस्माकं मां दहति भारत! ॥ २८ ।। सपत्नेनाऽवहासो मे सभा के बीच मयदानव ने, म्वच्छ जल से भरे हुए विचित्र वृक्ष, आज्ञाकारी की तरह, खड़े हुकर, सरोवर का धौंग्वा देनेवाला, एक ऐमा फर्श बनाया पाण्डव युधिष्ठिर ने मुझे ज्येष्ठ और श्रेष्ठ सकरने है, कि वहा पर सचमुच मुझे तालाब का भ्रम हो बड़े सत्कार के साथ, आये हुए रत्नों को आये गया। मैने वहा यह समझकर, कि जल भरा हुआ का काम सौंपा था । वहां इतने अधिकी थी। ' है, अपने कपड़े समेट लिये । यह देखकर भीममेन थे, कि उनकी गिणनी नहीं की जा सटें लाये बड़े जोर से हँसने लगा। उसने ऐमा भाव प्रकट अनेक देशों से आये हुए राजा लोग इक गया । थे, कि उसे खजाने में रखते-रखते *ाट देखनी किया, जैसे में शत्रु की समृद्धि देखने से मूढ हो बहुत लोगों को द्वार पर खड़े रहकर२४॥ रहा हूँ और मैने कभी रन नहीं देखे हैं.। लाचार होकर मुझे भीमसेन का किया यह उपहास मह पड़ी, कि मैं आकर उनसे रत्न लं ॥२॥जो बड़े लेना पड़ा। उस समय मुझे जैसा क्रोध चढ आया हे पिता जी ! मयदानव, बिन्दु सरोवभा-भवन था, उसी के अनुसार यदि मैं भीमसेन को मारने की अद्भुन रन लाया था, उन्हीं को उसने या है। चेष्टा करता, तो मुझे भी शिशुपाल की तरह अकाल चनाने ममय, उसमें स्थान स्थान पर ल TRATIMILAIMIMIMONITION L.MODILM TRAINMILITY २२८ म हा भारत मभापर्व SwimminawiMITRAMMITTERT troner TWITTAROTONITORITEmainmes Inmarriana ATMINTOTDDINTUVOTTUTTU! भ्रातृज्येष्ठः स्थितो राज्ये विन्दसे किं न शोभनम् । पृथग्जनरलभ्यं यद्भोजनाऽऽच्छादनं परम् ॥ १४ ॥ तत्प्राप्तोऽसि महावाहो कस्माच्छोचसि पुत्रक! । स्फीतं राष्ट्रं महावाहो! पितृपैतामहं महत् नित्यमाज्ञापयन्भासि दिवि देवेश्वरो यथा तस्य ते विदितप्रज्ञ ! शोकमूलमिदं कथम् समुत्थितं दुःखकरं तन्मे शंसितुमर्हसि ॥ १६ ॥ दुर्योधन उवाच-अनाम्याच्छादयामीति प्रपश्यन्पापपूरुषः नामर्ष कुरुते यस्तु पुरुषः सोऽधमः स्मृतः नमांप्रीणाति राजेन्द्र! लक्ष्मीः साधारणी विभो!। ज्वलितामेव कौन्तेये श्रियं दृष्ट्वा च विव्यथे ॥ १८ ॥ सर्वां च पृथिवीं चैव युधिष्ठिरवशानुगाम् । स्थिरोऽस्मि योऽहं जीवामिदुःखादेत ब्रवीमि ते ॥ १९ ॥ आवर्जिता इवाऽऽभान्ति नीपाश्चित्रककौकुराः । कारस्कारा लोहजङ्घा युधिष्ठिरनिवेशने ॥ २० ॥ पदाया-लिखाया । मैंने तुमको बुद्धिमान् और विद्वान् भाव से अपना पेट पालता रहता है । विद्वानों ने जानकर सब पुत्रों में बड़े होने के कारण, युवराज कहा है, कि शत्रु की बढ़ौतरी देखकर भी उसके की गद्दी भी दे दी। और पहनने को उत्तम वस्त्र, प्रतिकार का उपाय न कर, केवल विषय भोग में डूबे और खाने को उत्तम भोजन, और संसार में ऐसे रहना, बड़े ही कायर का लक्षण है । मैं यदि तेज अलभ्य पदार्थ, जिनका मिलना दूसरे को दुर्लभ है, मे हीन कायर न होता, तो फिर युधिष्ठिर की राज- तुम्हारे लिये भोगने को भी मौजूद है,फिर तुम यथा लक्ष्मी को जगमगाते देखकर भी कुछ उपाय क्यों सोच क्यों कर रहे हो ! अब तो तुम्हें चाहिये, कि न करता ! दिन पर दिन सारी पृथ्वी पर युधिष्ठिर पाप-दादे के विशाल राज्य के म्यामी होकर और का साम्राज्य बढ़ता जा रहा है, यह देखकर मुझे अपने बाहु-बल से उसे बढ़ाकर इन्द्र की तरह प्रजा जीने की विलकुल चाह नहीं है । हृदय अत्यन्त का पालन करते रहो ॥१३॥१६॥ कठोर होने के कारण ही में अभी तक जीवित हूं पिता के कह चुकने पर, दुर्योधन ने कहा ॥१७॥१९॥ है पिता जी ! मैं अत्यन्त नराधम हूं । इसी कारण देखिए, युधिष्ठिर के भवन में कदम्प, चित्रक, शत्रुओं का अभ्युदय देखकर भी अत्यन्त निम्नज- कोकर, कारस्कर, और लोहनह आदि यहुमूख्य wwwwwunnadiaWN TIMRITITIONARY . - , . Porn.....THEWINODIVISITCOIRIDICTIONARASITE:

म हा भारत अध्याय ५१ ] TTEN FORIANDINITITIIITTORITY TITITION दरवाजा . more...www.mrathituanianarmanaram IIIII.mera से कहा-हे राजा धृतराष्ट्र के पुत्र ! इधर से नाम भी नहीं सुने थे । इम लिये हे पिता जी ! इन है। इसके मिवाय मैंने उस सभा में ये रन देखे, जिनके मय कारणों से में अत्यन्त दु.पी हो रहा हूँ॥३२॥३६॥ सभापर्व का पचामयां अध्याय समाम हुआ ॥५०॥ अथ अथकपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ।।५।। दुर्योधन उवाच-यन्मया पाण्डवेयानां दृष्टं तच्छृणु भारत ! आहृतं भूमिपालेर्हि वसु मुख्यं ततस्ततः नाविदं मूढमात्मानं दृष्ट्वाऽहं तदरेर्धनम् फलतो भूमितो वाऽपि प्रतिपद्यस्व भारत ! ॥ २ ॥ और्णान्लान्वार्पदंशाञ्जातरूपपरिष्कृतान् प्रावाराजिनमुख्यांश्च काम्बोजः प्रददौ वहून् ॥ ३ ॥ अश्वास्तित्तिरिकल्मापांत्रिशतं शुकनासिकान् । उष्ट्रवामीस्त्रिशतं च पुष्टाः पील्लुशमीदेः ॥ १ ॥ गोवासना ब्राह्मणाश्च दासनीयाश्च सर्वशः प्रीत्यर्थ ते महाराज! धर्मराज्ञो महात्मनः त्रिखर्व वलिमादाय द्वारि तिष्ठन्ति वारिताः ब्राह्मणा वाटधानाच गोमन्तः शतसवशः कमण्डलूनुपादाय जातरूपमयाञ्च्छुभान् एवं बलिं समादाय प्रवेशं लेभिरे न च शतं दासीसहस्राणां कासिकनिवासिनाम् ॥ ७ ॥ इक्यायनयां अध्याय ॥५॥ दुर्योधन ने कहा- पिता जी : पाष्टयों की अन-अन्छ यम और छाल, तीतर पक्षी के समान ममा में मने शिम-किम देश के राजा को क्या क्या निनकर तथा शुक्ला नापान नीन मी बाई, या गारमेंट में देने दसा, मो कहता है. और पील, शमी तथा इगद के गृक्षों के पत्तों को मुनिए । हे महाराज ! शत्रु का बट धन देकर मग माने क कारण में पुष्ट तीन मामलों की भी II युरि बाती रही और में अपने को भून गगा; अब , महाराज जागे गीगया गंगन मामा मा मनिष, कि माकिम देश मे स्निना धन भाषा । और गद. धर्मगज पुधिष्टिरकोपमा पर कपि, भााकाबान देश के गजाने भेड़, एक और मिट्टी मीन मयं उपार भाप में भार पड़ी मादक मार के गेमों सपने, गुयगंजाल में मो. अगणिन, गार भीतर पुम न माने के कारण बाराही गर ErrestEEEEEEEEEEEEEEEEmmercers - -.

२३२ म हा भारत मभापर्व ExhinnnnnYNITITINUTTuuuuuuu... Fuuuuuuuul - - TIMEILMAITVORIALALADImamuDMAAMIRPIOImmuzMITADIUMLWAMDAILY श्यामास्तन्व्यो दीर्घकेश्यों हेमाऽऽभरणभूषिताः। शूद्रा विप्रोत्तमार्हाणि राङ्कवाण्यजिनानि च बलिं च कृत्स्नमादाय भरुकच्छनिवासिनः उपनिन्युर्महाराज! हयान्गान्धारदेशजान् इन्द्रकृष्टैर्वर्तयन्ति धान्यैर्ये च नदीमुखैः समुद्रनिष्कुटे जाताः पारेसिन्धु च मानवाः ते वैरामाः पारदाश्च आभीराः कितवैः सह विविधं वलिमादाय रत्नानि विविधानि च ॥ ११ ॥ अजाविकं गोहिरण्यं खरोष्ट्रं फलजं मधु कम्बलान्विविधांश्चैव द्वारि तिष्ठन्ति वारिताः ॥ १२ ॥ प्राग्ज्योतिपाऽधिपः शूरो म्लेच्छानामधिपो वली। यवनैः सहितो राजा भगदत्तो महारथः ॥ १३ ॥ आजानेयान्हयाञ्च्छीघानादायानिलरंहसः बलिं च कृत्स्नमादाय द्वारि तिष्ठति वारितः अश्मसारमयं भाण्डं शुद्धदन्तत्सरूनसीन् प्राग्ज्योतिपाऽधिपो दत्त्वा भगदत्तोऽव्रजत्तदा ॥ १५ ॥ थे । खेती आदि करनेवाले, गौ पालनेवाले सैंकड़ों । पानी से खेती होती है, तथा जिन देशों में कुए- ब्रामण घी से भरे सुवर्ण के घड़े हाथ में लिये, राह नहर आदि की सिंचाई मे खेती होती है, उन देशों न मिलने के कारण, बाहर ही खड़े हुए थे । समुद्र के रहनेवाले वैराम, पारद, आभीर, कितव आदि तट के निवासी राजाओं ने आकर कार्यासिक देश | जातियों के लोगों ने भी नाना प्रकार के रत्न, सुवर्ण, की, सोलह वर्ष की अवस्थावाली, श्यामवर्ण, सूक्ष्म भेड़, बकरी, गाय, ऊंट आदि पशु, फल-फूल,फूलों अङ्ग अर्थान् पतली देह की,बड़े-बड़े बालोंवाली,सोने का शहद और मूल्यवान् कम्बल आदि सामग्रियां के महनों से अलत हजारों दासियां लाकर अर्पण लाकर भेंट की । इन लोगों को मी, मीड़ के कारण, की; ब्राह्मणों के पहनने योग्य रंकु नाम के मृग की भीतर घुसने का अवसर नहीं मिला; मब द्वार पर खालें और गान्धार देश के विचित्र रगवाले घोड़े ही खड़े थे। इनके सिवाय माग्ज्योतिषपुर का राजा ॥५॥१०॥ भगदत जो म्लेच्छों का अधिपति और मदारथी है, समुद्र के उस पार या किनारे पर रहनेवाले ययनों को साथ लिये हुए आजानेय जाति के बड़े अन्य जाली लोगों ने और जिन देशों में वर्षा के भीम चलनेवाले घोड़े आदि अनेक प्रकार की भेट maamironm.mawmalaARRIA । लाकर OurumIIMyanmartAMOUTHOLOGIMITROLMEROLOVINECTIOLLIER Trmentarnam - : । aarurwirmware Aarmalinurtune.....-TATTORRENTITaranarya अध्याय ५१ ] म हा भारत २३३ rurTWITUTITIOTTTTTTTTTTIREDITORINTINETRITERTA यक्षांस्यक्षाल्ललाटाक्षान्नानादिग्भ्यः समागतान्। औप्णीकानन्तवासांश्च रोमकान्पुरुपादकान् एकपादांश्च तत्राहमपश्यं द्वारि वारितान् राजानो बलिमादाय नानावर्णाननेकशः ॥१७॥ कृष्णग्रीवान्महाकायान्रासभान्दूरपातिनः आजन्हुर्दशसाहस्रान्विनीतान्दिक्षु विश्रुतान् ॥ १८ ॥ प्रमाणरागसंपन्नान्वक्षुतीरसमुद्भवान् वल्यर्थं ददतस्तस्मै हिरण्यं रजतं बहु ॥ १९ ॥ दत्त्वा प्रवेशं प्राप्तास्ते युधिष्टिरनिवेशने इन्द्रगोपकवर्णाभाञ्च्छुकवर्णान्मनोजवान् ॥ २० ॥ तथैवेन्द्रायुधनिभान्सन्ध्याभ्रसदृशानपि अनेकवर्णानारण्यान्गृहीत्वाऽश्वान्महाजवान् ॥ २१ ॥ जातरूपमनयं च ददुस्तस्यैकपादकाः चीनाञ्च्छकांस्तथा ओड्रान्वर्वरान्वनवासिनः ॥ २२ ॥ वार्णेयान्हारहणांश्च कृष्णान्हैमवतांस्तथा नीपानूपानधिगतान्विविधान्दारवारितान् ॥ २३ ॥ वल्यर्थं ददतस्तस्य नानारूपाननेकशः ले-लेकर आया परन्तु राह न मिलने के कारण वह . पड़ते थे । वे काली गर्दनवाले, लम्बे-चौड़े डील के, भी द्वार पर खड़ा था ॥११॥१४॥ दूरगामी, सुशिक्षित दस हज़ार खच्चर भेंट लेकर आये द्वार पर भारी भीड देख विवश होकर भगदत्त थे । वंक्षु नदी के किनारे रहनेवाले लोग भेंट के ने मूल्यवान् जड़ाऊ गहने तथा सोने और हाथी- लिये बहुत सा सुवर्ण,चांदी आदि लाये थे ।।१५।१९|| दाँत की मूठ लगी हुई उत्तम तलवारें भेज दी और एक पैरवाले लोग बीरबहूटी के रङ्ग के, गुलाबी, म्वयं अपने देश को चला गया । हे महाराज ! इनके श्वन, इन्द्रधनुष और सन्ध्याकाल के मेघ के रङ्ग के अतिरिक्त और बहुतेरे राजाओं को मैने भीड़ के तथा अन्य विविध रगों के, वायुगामी जङ्गली घोड़े कारण बाहर द्वार पर ही खड़े देखा है। दो आखों- और बहुत सा सोना भेट में लेकर आये थे । चीन वाले, तीन आग्वोंवाले, माथे पर आखवाले,आप्णीक, शक, ओ, बर्बर, बनवामी, हारहूण, कृष्ण-हिमा- अन्तवासी, रोमक और नरभक्षक तथा एक ही पैर चलवामी, नीप और अनूप देशों के मनुष्य महामूल्य वाले, विचित्र आकारवाली जातियों के लोग भी देख रल लेकर युधिष्ठिर की सेवा में आये थे । वे भी ILUMIIY INIM STYTTIILIWW.ITI MAnwarwwwUROIDWAIIMITRA .. । SITETIT WILLVELIMU TUDJUUMUM WURM २३४ महा मा र त [सभापर्व EmmmmmmmmmmHOTTITUTIONMITTorrTRADITORImuTITIVunmanari ॥ २४ ॥ UnamARLormstonmamtarbasnuamastonian कृष्णग्रीवान्महाकायान्रासभाञ्च्छतपातिनः अहाघुर्दशसाहस्रान्विनीतान्दिक्षु विश्रुतान् प्रमाणरागस्पर्शाढ्यं वाहीचीनसमुद्भवम् और्ण च राङ्कवं चैव कीटजं पट्टजं तथा कुटीकृतं तथैवाऽत्र कमलाभं सहस्रशः ॥ २६ ॥ श्लक्ष्णं वस्त्रमकार्पासमाविकं मृदु चाजिनम् निशितांश्चैव दीर्घासीनृष्टिशक्तिपरश्वधान् ॥ २७ ॥ अपरान्तसमुद्भूतांस्तथैव परशूञ्च्छितान् रसान्गन्धांश्च विविधान् रत्नानि च सहस्रशः ॥ २८ ॥ वलिं च कृत्स्नमादाय द्वारि तिष्ठन्ति वारिताः । शकास्तुपाराः कङ्काश्च रोमशाः शृङ्गिणो नराः॥ २९ ॥ महागजान्दूरगमान्गणितानबुंदान्हयान् शतशश्चैव बहुशः सुवर्णं पद्मसंमितम् ॥३०॥ वलिमादाय विविधं द्वारि तिष्ठन्ति वारिताः आसनानि महार्हाणि यानानि शयनानि च ॥ ३१ ॥ मणिकाञ्चनचित्राणि गजदन्तमयानि च कवचानि विचित्राणि शस्त्राणि विविधानि च ॥ ३२ ॥ सभा के द्वार पर रोके जाने के कारण से खड़े रहे। शक, तुषार, कङ्क, रोमश और सींग रखने- वे काली गर्दनवाले, बड़े-बड़े, सौ कोस तक दौड़ने वाले अनेक देशों के मनुप्य, बड़ी-बड़ी दूर जाने- वाले दस हज़ार खच्चर, राकच नाम मृगचर्म, रेशमी वाले गजराज, अर्बुद घोड़े और सुवर्ण आदि अनेक दुशाले, उत्तर देश के बने हुए अनेक प्रकार के वस्तुएँ लेकर युधिष्ठिर के यहां आये थे, परन्तु भीतर रेशमी गुच्छ लगे हुए चित्र-विचित्र ऐसे चिकने वस्त्र, जाने की उन लोगों को भी आज्ञा न मिली, द्वार पर जिनमें सूत की वनावट मालम नहीं पड़ती थी, भेडों ही खडे रहे । पूर्व देश के राजा लोग महामूल्य के रोम के बने हुए कम्बल, सावर, तीक्ष्ण धारवाली सवारिया, आसन, पलंग, पोगाक, यहुमूल्य मणियों बड़ी-बड़ी तलवारे, दुधारा खड्ग,गक्ति, परश्वध,पश्चिम और मोतियों से गोभित हाथी-दांत के बने विचित्र देश के बने हुए फरसे, अनेक प्रकार के रस और कवच, विविध शन, मुशिक्षित घोड़ों से युक्त और यहुत से रत्न से लेकर आये थे, परन्तु भीट के कारण माने तथा व्याघ्रचर्म से गोभित स्थ, विचित्र हाथी. बाहर द्वार पर ही खड़े रहे ॥२०॥२८॥ कम्बल, बहुत से रत्न, नाराच वाण, अद्धनाराय MIRAINRILITARAHIMIRENIAMmmmm - . , . VICTOGONILTMOTO.TILLITI TITOIMUMCULUM LULU २३५ म हा मारत . अध्याय ५२] TriUTRITMurrention MAINTINGITI ImhiromanimuTUTITISH MAXIMITTINTIITTI रथांश्च विविधाकाराञ्जातरूपपरिष्कृतान् हयैर्विनीतैः संपन्नान् वैयाघ्रपरिवारितान् ॥३३॥ विचित्रांश्च परिस्तोमान् रत्नानि विविधानि च । नाराचानर्धनाराचाञ्च्छस्त्राणि विविधानि च ॥ ३४ ॥. एतद्दत्वा महद्र्व्यं पूर्वदेशाधिपा नृपाः प्रविष्टा यज्ञसदनं पाण्डवस्य महात्मनः ।।३५॥ इनि श्रीमन्महाभारते सभापर्वणि रातपर्वणि दुर्योधनसतापे एकपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५१ ।। वाण,और अन्य अनेक प्रकार की श्रेष्ठ वस्तुए लेकर । भीड़ के मारे घुस न सक्ने के कारण बाहर ही खडे धर्मराज युधिष्ठिर की सभा में उपस्थित हुए थे और थे ॥२९॥३५॥ मभापर्व का इक्यावनवा अध्याय समाप्त हुआ ॥५१॥ अथ द्विपञ्चाशत्तमोऽध्याय ॥५॥ दुर्योधन उवाच-दायं तु विविधं तस्मै शृणु मे गदतोऽनघ ! यज्ञार्थं राजभिर्दत्तं महान्तं धनसंचयम् मेरुमन्दरयोर्मध्ये शैलोदामभितो नदीम् ये ते कीचकवेणूनां छायां रम्यामुपासते ॥ २ ॥ खसा एकासना ह्यर्हाः प्रदरा दीर्घवेणवः पारदाश्च कुलिन्दाश्च तङ्गणाः परतङ्गणाः तद्वै पिपीलिकं नाम उधृतं यत्पिपीलिकेः जातरूपं द्रोणमेयमहापुः पुञ्जशो नृपाः कृष्णाल्ललामांश्चमराञ्च्छुक्लांश्चान्याञ्च्छशिप्रभान् । हिमवत्पुप्पज चैव स्वादु क्षौद्रं तथा वहु - TATERIAnanyiARCLE बावनवा अध्याय ॥५०॥ दुर्योधन ने कहा-हे महाराज | उन लोगों के रोग जो मेरु और मन्दर पर्वतों के बीच में यहने- सिपाय ओर जिन जिन राजाओं ने 'कर' के रूप में वाली शैलरोदा नदी के दोनों किनारों पर कीचक युधिष्ठिर को यज्ञ के लिये बहुत सा धन और रत्न और वेणु नाम वाँसों की छाया में रहते हैं, नम्रता- राकर दिये, उनका भी वृत्तान्त मैं कहता हू,सुनिए। पूर्वक युधिष्ठिर को भेंट करने के लिए एक द्रोण सम, एकासन, अर्ह, प्रदर, दीर्घवेणु, पारद, कुलिंद पिपीरिका सचित सुवर्ण और काले तथा लाल रङ्ग तगण, परतगण आदि नाम के पहाड़ी देशों के राजा के चवर और शुक्ल आदि मणि, जिनका प्रकाश । MUKHIMIRE IIIIIIIMom. TUMITINITIONAL म हा भारत सभापर्व SummemouTuouTuommmmuTITUUUUUUITOUSTOMATAARETTurmer asangmarathmonthroatiauntiaNMAMMINImmar - SALA emararumauRRIERHIFammamawoman उत्तरेभ्यः कुरुभ्यश्चाऽप्यपोढं माल्यमम्बुभिः उत्तरादपि कैलासादोषधीः सुमहावलाः पार्वतीया वलिं चाऽन्यमाहृत्य प्रणताः स्थिताः । अजातशत्रोर्नृपतेारि तिष्ठन्ति वारिताः ये परार्धे हिमवत्तः सूर्योदयगिरौ नृपाः कारूपे च समुद्रान्ते लौहित्यमभितश्च ये फलमूलाशना ये च किराताश्चमवाससः क्रूरशस्त्राः क्रूरकृतस्तांश्च पश्याम्यहं प्रभो! चन्दनाऽगुरुकाष्ठानां भारान्कालीयकस्य च चर्मरत्नसुवर्णानां गन्धानां चैव राशयः कैरातकीनामयुतं दासीनां च विशांपते ! आहृत्य रमणीयाऽर्थान्दूरजान्मृगपक्षिणः ॥ ११ ॥ निचितं पर्वतेभ्यश्च हिरण्यं भूरिवर्चसम् वलिं च कृत्स्नमादाय द्वारि तिष्ठन्ति वारिताः ॥ १२ ॥ कैराता दरदा दर्वाः शूरा वै यमकास्तथा औदुम्बरा दुर्विभागाः पारदा वाह्निकैः सह काश्मीराश्च कुमाराश्च घोरका हंसकायनाः शिवित्रिगर्तयौधेया राजन्या मद्रकेकयाः ॥ १४ ॥ चन्द्रमा के समान था और हिमालय पर्वत के पुष्पों चमड़े के वस्त्र पहनते हैं और क्रूर शनधारी तथा के मधु,उत्तर कुरु देश से जलवाहित विचित्र मालाएं क्रूरकर्मा कहलाते हैं,उनको भी मैंने देखा, कि चंदन और कलास पर्वत के उत्तर ओर की बड़ी बल करने. अगुरु, कृष्णागुरु आदि काप्ठों के भार और चर्म, वाली औषधियां और अन्य बहुत प्रकार की वस्तुएँ । ग्ल, मुवर्ण, अनेक प्रकार के सुगन्ध देनेवाले पदार्थ, लेलकर आये और रोके जाने के कारण से मय पदार्थ दस हजार दासिया, दूर-दूर के मृग, पक्षी और लिये द्वार पर खड़े रहे ॥१७॥ अनेक प्रकार के पहाड़ी पढाथों को लिये हुए युधिष्ठिर हिमालय पहाड़ के परार्द्ध और उदयाचल,कारुप के द्वार पर खड़े हुए थे ।।८।१२।। देश के समुद्र तट के निवामी और लीहित्य पर्वत के और किंगन, दाद, द,गर, यमक, आदुसर, पास रहनेवाले राजा लोग जो फल और मूल खाने, दुर्विभाग, पारद, याहाँक, काश्मीर, कुमार, पारक, । NOTIREmmmmmmmmIELTOIRTHDET.PDEOurrDOTam.currenciet २३७ अध्याय ५२] महा मारत EnarnirmIITTIMINATIONAUTITUNAUDIUITUTITUTri PINTUNTINUnr HimuuiTARTUNATIuVIIIMINUTE अम्बष्ठाः कौकुरास्ताा वस्त्रपाः पह्नवैः सह वशातलाश्च मौलेयाः सह क्षुद्रकमालवैः पौण्डूकाः कुक्कुराश्चैव शकाश्चैव विशांपते ! अङ्गा वङ्गाश्च पुण्ड्राश्च शाणवत्या गयास्तथा ॥ १६ ॥ सुजातयः श्रेणिमन्तः श्रेयांसः शस्त्रधारिणः अहार्पः क्षत्रिया वित्तं शतशोऽजातशत्रवे ॥ १७ ॥ वङ्गाः कलिङ्गा मगधास्ताम्रलिप्ताः सुपुण्डूकाः । दौवालिकाः सागरकाः पत्रोर्णाः शैशवास्तथा ॥ १८ ॥ कर्णप्रावरणाश्चैव वहवस्तत्र भारत ! तत्रस्था द्वारपालेस्ते प्रोच्यन्ते राजशासनात् कृतकालाः सुवलयस्ततो द्वारमवाप्स्यथ ईपादन्तान्हेमकक्षान्पद्मवर्णान्कुथावृतान् शैलाभान्नित्यमत्तांश्चाऽप्यभितः काम्यकं सरः ॥ २० ॥ दत्त्वैकैको दशशतान्कुञ्जरान्कवचावृतान् क्षमावन्तः कुलीनाश्च द्वारेण प्राविशंस्तथा ॥ २१ ॥ एते चान्ये च बहवो गणा दिग्भ्यः समागताः । अन्यैश्चोपाहृतान्यत्र रत्नानीह महात्मभिः ॥ २२ ॥ राजा चित्ररथो नाम गन्धर्वो वासवानुगः हंसका यन, शिबि, त्रिगर्त, यौधेय, मद्र, केकय, युधिष्ठिर ने उन सब को एक-एक करके द्वारपालों अम्बष्ठ, कोकुर, ताय, वस्त्रप, पहव, वशातल, के हाथों से बुलवाया । वे लोग भेंट में पहाड़ ऐसे मौलेय, क्षुद्रक, मालव, पौण्डूक, कुक्कुर, शक, ऊँचे, लम्बे दातों और सुनहरी झूलों से शोभित, अह, वङ्ग, पुण्ड्, शाणवत्य और गय आदि देशों अच्छी जाति के मदवाले एक हजार हाथी देकर के कुलीन और शत्रधारी क्षत्रियों ने सैकड़ों प्रकार बारी-बारी से भीतर जाने पाये। वे हाथी काम्यक के धन ला-लाकर युधिष्ठिर को भेंट किये ॥१३॥१७॥ सर के समीप देश के थे, और उनपर कवच पडे वग, कलिङ्ग,मगध,ताम्रलिप्त, पुण्ड्क, दौवालिक, थे। कहा तक कहूँ, इसी तरह असंख्य राजा-महा- सागरिक, पत्रोर्ण, शैशव और कर्णप्रावरण आदि देशों राजा श्रेष्ठ और मनोहर भेंट वस्तुएँ ले-लेकर के राजा लोग युधिष्ठिर के द्वार पर आकर खड़े रहे। यज्ञशाला में आये थे । ॥१८॥२२॥ THMIRRIPTESTIHIMALAYARITAMARITTENIMDISTRAPATIRITERNETICLERTILATVARATRATIMES ज्यTITUALS .

२३८ महा भारत सभापर्व ErnimammarwmmunirurammarATITUTITUTrant TOHTOTHRITTENTIES KARNamroSAIRATRamam - MunaTUNImantan शतानि चत्वार्यददद्धयानां वातरंहसाम् ॥ २३ ॥ तुम्बुरुस्तु प्रमुदितो गन्धर्वो वाजिनां शतम् आम्रपत्रसवर्णानामददद्धेममालिनाम् ॥ २४ ॥ कृती राजा च कौरव्य ! शूकराणां विशांपते !। अददद्गजरत्नानां शतानि सुबहून्यथ ॥ २५॥ विराटेन तु मत्स्येन वल्यर्थं हेममालिनाम् कुञ्जराणां सहस्रे द्वे मत्तानां समुपाहृते ॥ २६ ॥ पांशुराष्ट्राद्वसुदानो राजा पड्विंशतिं गजान् अश्वानां च सहस्त्रे द्वे राजन् ! काञ्चनमालिनाम् ॥ २७ ॥ जवसत्त्वोपपन्नानां वयस्थानां नराधिप ! वलिं च कृत्स्नमादाय पाण्डवेभ्यो न्यवेदयत् ॥ २८ ॥ यज्ञसेनेन दासीनां सहस्राणि चतुर्दश दासानामयुतं चैव सदाराणां विशांपते ! ॥ २९ ॥ (अददद्गजरत्नानां शतानि च वहनि च) गजयुक्ता महाराज ! रथाः पविशतिस्तथा राज्यं च कृत्स्नं पार्थेभ्यो यज्ञार्थं वै निवेदितम् ॥ ३० ॥ वासुदेवोऽपि वार्णेयो मानं कुर्वन्किरीटिनः हे महाराज ! इनके अतिरिक्त इन्द्र के सखा ने छब्बीस हाथी और कांचन माला धारी दो हजार गन्धयों के राजा चित्ररथ ने चार सौ ऐसे घोडे, जो घोड़े, जो जवान और बलवान् और शीघ्रगामी थे, वायु के समान चलते थे, दिये । तुम्बुरु नाम गन्धर्व युधिष्ठिर को भेंट किये । उस यज्ञ में राजा द्रुपद ने एक सौ घोड़े जिनका रग आम्र के पत्तों के सदृश उपहार के तौर पर चौदह हजार दास-दासी,स्त्रियों- था, और प्रत्येक घोड़े के गले में एक-एक सुवर्ण का सहित दस हजार सेवक और असंख्य हाथी-घोडे हार पड़ा हुआ था; युधिष्ठिर को भेंट किये । शूकर । और हाथियों सहित छब्बीस रथ युधिष्ठिर को दिये देश के राजा ने कई सौ उत्तम गजराज दिये। मत्म्य और कहा कि पाण्डयों के यज्ञ के लिये मैं अपना देश के राजा विराट ने दो हजार मम्त हाथी, जिनके सब राज्य देता हूँ। और अर्जुन का मान रखने के गले में सुवर्ण की माला पड़ी हुई थी, देकर युधिष्ठिर लिये उसके परम मित्र श्रीकृष्ण ने भी चौदह हजार को प्रमल किया ॥२३॥२६॥ मन्त गजराज दिये । वास्तव में श्रीकृष्ण की अर्जुन हे पिता जी ! पांशु देश के वमुदान नाम राजा के साथ ऐमी गहरी मित्रता है, कि जो अर्जुन कहें MOREOVERDANATOPINCODEITERATIONEPENDIETIE .. - ने २३९ म हा भा र त अध्याय ५२ ] TUTITUTITUTIT TITIOHINDIITRINumuTITULY TITLIATTITUTORIGINIm can mu ITUDE TITATTITUTIINTIMO - अददद्गजमुख्यानां सहस्राणि चतुर्दश ॥ ३१ ॥ आत्मा हि कृष्णः पार्थस्य कृष्णस्याऽऽत्मा धनंजयः। यद्यादर्जुनः कृष्णं सर्वं कुर्यादसंशयम् ॥३२॥ कृष्णो धनञ्जयस्याऽर्थे वर्गलोकमपि त्यजेत् तथैव पार्थः कृष्णार्थे प्राणानपि परित्यजेत् ॥३३॥ सुरभीश्चन्दनरसान्हेमकुम्भसमास्थितान् मलयाटुंगच्चैव चन्दनाऽगुरुसंचयान् ॥ ३४ ॥ मणिरत्नानि भास्वन्ति काञ्चनं सूक्ष्मवस्त्रकम् । चोलपाण्ड्यावपि द्वारं न लेभाते युपस्थितौ ॥ ३५ ॥ समुद्रसारं वेदर्य मुक्तासंघांस्तथैव च शतशश्च कुथांस्तत्र सिंहलाः समुपाहरन् संवृता मणिचीरैस्तु श्यामास्ताम्रान्तलोचनाः । तान् गृहीत्वा नरास्तत्र द्वारि तिष्ठन्ति वारिताः॥ ३७ ।। प्रीत्यर्थ ब्राह्मणाश्चैव क्षत्रियाश्च विनिर्जिताः उपाज-हुर्विशश्चैव शूद्राः शुश्रूपवस्तथा ॥ ३८॥ प्रीत्या च बहुमानाच्चाप्युपागच्छन्युधिष्टिरम् सर्वे म्लेच्छाः सर्ववर्णा आदिमध्यान्तजास्तथा ॥ ३९ ॥ वह बात श्रीकृष्ण अवश्य करेंगे । अर्जुन के लिये वस्तुए वैडूर्यमणि, मोतियों की लडिय और श्रेष्ठ श्रीकृष्ण म्बर्ग का राज्य भी छोड दे सकते हैं और कम्बर आदि उपहार लेकर यज्ञ देखने आये थे। कृष्ण के लिए अर्जुन अपने प्राण तक अर्पण कर सैंकड़ों राजा लोग ऐसी मूल्यवान् सामग्रिया लाने पर भी, द्वार पर ही रोक लिये गए थे और वहीं खडे मलयगिरी और दर्दुर पर रहनेवाले चोलराज थे ॥३४॥३७|| और पाण्ड्यराज ने सुगन्धित चन्दन के रसों से भरे अधिक क्या कह, उपहार देनेवालों में मुझे हुए सुवर्ण के कलग, तरह-तरह के चमकीले मणि ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य आर शूद्र, नारों वर्गों के लोग रत्न, अगुरु और चन्दन के मार, सुनहरे तारों से देख पड़ते थे । प्रीति और सम्मान के साथ म्लेच्छ चुने हुए महीन कपड़े युधिष्ठिर को भेंट किय, परन्तु जाति के राजा भी 'कर' रेकर युधिष्ठिर की समा भीड के कारण वे द्वार पर भी न पहुचने पाये । में आये थे । सब जातियों और सब देशों के राजा सिंहल देश के क्षत्रिय, समुद्र में उत्पन्न होनेवारी रोगों के आने से ऐमा जान पड़ता था, कि सारा FUWAGRIHIRIDADIMMINETINORINCILITARAMAYA WILLILULUUTUUDECLAVMTUCULUDULLUTULOT MUTITI TIMEutumowin.-- सकेत है ॥२७॥३३॥ TAMINIMILLIANITMMATOLOR २४० म हा भारत मभापर्व Arunnr TUTITUUUUUUTION Tuntinuoutuurmerrururunmuuuururotraumurt TITTITTUTTINார்ரானாராTTT THE नानादेशसमुत्थैश्च नानाजातिभिरेव च पर्यस्त इव लोकोऽयं युधिष्ठिरनिवेशने ॥ ४० ॥ उच्चाऽवचानुपग्राहानराजभिः प्रापितान्वहून् शत्रूणां पश्यतो दुःखामुमूर्षा मे व्यजायत ॥ ११ ॥ भृत्यास्तु ये पाण्डवानां तांस्ते वक्ष्यामि पार्थिव!। येपामामं च पक्वं च संविधत्ते युधिष्ठिरः ॥ ४२ ॥ अयुतं त्रीणि पद्मानि गजारोहाः ससादिनः रथानामधंदं चाऽपि पादाता वहवस्तथा ॥४३॥ प्रमीयमाणमामं च पच्यमानं तथैव च विसृज्यमानं चाऽन्यत्र पुण्याहस्वन एव च ॥१२॥ नाऽभुक्तवन्तं नापीतं नाऽलंकृतमसत्कृतम् अपश्यं सर्ववर्णानां युधिष्टिरनिवेशने ॥ ४५ ॥. अष्टाशीतिसहस्राणि स्नातका गृहमेधिनः त्रिंशदासीक एकैको यान्विभर्ति युधिष्ठिरः सुप्रीताः परितुष्टाश्च ते ह्याशंसन्त्यरिक्षयम् ॥ १६ ॥ दशाऽन्यानि सहस्राणि यतीनामूर्ध्वरेतसाम् संसार मानों एक ही जगह पर सिमटकर आ गया है, और कहीं भोजन करनेवालों के आगे परोसा है । अनेक देशों और दिशाओं से राजाओं ने आकर जा रहा है। चारों ओर ऐसा कोलाहल हो रहा है,कि जो धन-रन का ढेर लगा दिया, उसे देखकर मुझे कान नहीं दिया जाता । सब जगह पुण्याहपाठ हो, इतना दुःख हुआ कि मै मुर्दार हो गया हूं ॥३८॥४१॥ रहा है । मैंने युधिष्ठिर के घर में किसी वर्ण के किमी हे पिता जी : अब मैं युधिष्ठिर के नौकरों- मनुष्य को ऐसा नहीं देखा, जिसने भोजन न किया चाकरों का और यहां के खाने-पिलाने के प्रबन्ध का हो, अथवा जो वस्त्र-आमपण आदि पहने न हो। वर्णन करता हूं-मुनिए । उसके यहां तीन पद्म सभी का सत्कार किया जा रहा था । युधिष्ठिर अयुन हाथियों और घोड़ों के सवार हैं। एक अर्बुद नित्य अट्टासी हजार म्नातक, गृहम्ध प्रामगों को रथा और पैदल सेना तो इतनी है कि उसकी भोजन देता था और उनकी सेवा को प्रत्येक के गिनती करना बहुत ही दुष्कर है । मैंने देखा, यज्ञ लिये तीस-तीस दामियां नियत कर रखी थी। के स्थान में कहीं खाने-पीने का कया सामान तोल- ये लोग भी मेया, भोजन, दक्षिणा आदि से सन्तुष्ट तोलकर दिया जा रहा है,कहीं अन्न पकाया जा रहा होकर नित्य युधिष्ठिर को शायुओं के नष्ट होने का PRASHAREnasaramruthanirmaananaswimsamuduxurraswasuraan - । Lumca.TOTREm.. -- DIRTDCUTTLDDDLDINUIMTIDLLTOTTLTTUULFILT Turarar MODIUM NUMAILIMoreTTAvirant ॥४७॥ - TESTIMMUTTIL UTTI TIM अध्याय ५३] म हा भारत २४१ TWITTITTER भुञ्जते रुक्मपात्रीभिर्युधिष्ठिरनिवेशने अभुक्तं भुक्तवद्वाऽपि सर्वमाकुब्जवामनम् अभुजाना याज्ञसेनी प्रत्यवैक्षद्विशांपत ! ॥४८॥ द्वौ करौ न प्रयच्छेतां कुन्तीपुत्राय भारत ! सांवन्धिकेन पाञ्चालाः सख्येनाऽन्धकवृष्णयः ॥ १९ ॥ इति श्रीमन्महाभारते सभापर्वणि द्यूतपर्वणि दुर्योधनसंतापे द्विपञ्चाशत्तमोऽध्याय ॥ ५ ॥ आशीर्वाद देते थे ॥४२॥४६॥ यह देख-भाल कर रही थीं, कि कोई लूला-लंगड़ा दस हजार ऊर्ध्वरेता यति लोग, जो ऊपर को तक भूखा नहा तो नहीं रह गया है यज्ञ में ऐसा वीर्य रखते हैं, युधिष्ठिर के घर में नित्य प्रति सुवर्ण कोई राजा न था,जिमने युधिष्ठिर को 'कर' न दिया हो। के पात्रों में दिव्य भोजन करते थे। द्रौपदी म्वयं कुछ । हा एक राजा द्रुपद ने सम्बन्ध आर कृष्ण ने मित्रता खाये-पिये बिना, वडे यत्न और परिश्रम के साथ । के कारण से तो अलबत्ता'कर' नहीं दिया ॥४७॥४९॥ सभापर्व का वावनया अध्याय समाप्त हुआ ॥ ५० ॥ OUTUITMAL । अथ त्रय पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥५३ ।। दुर्योधन उवाच-आर्यास्तु ये वै राजानः सत्यसन्धा महाबताः । पर्याप्तविद्या वक्तारो वेदान्ताऽवभृतप्लुताः धृतिमन्तो ह्रीनिपेवा धर्मात्मानो यशस्विनः मूर्धाभिषिक्तास्ते चैनं राजानः पर्युपासते दक्षिणार्थं समानीता राजभिः कांस्यदोहनाः आरण्या वहुसाहस्रा अपश्यंस्तत्र तत्र गाः आजन्हुस्तत्र सत्कृत्य स्वयमुद्यम्य भारत ! अभिषेकार्थमव्यग्रा भाण्डमुच्चाऽवचं नृपाः वाह्रीको रथमाहापर्षीजाम्बूनदविभूपितम् तिरपनवां अध्याय ॥५३॥ दुर्योधन ने कहा-हे पिता जी ! बहुत से श्रेष्ठ, कासी के घने एक एक दोहने के पात्र और हजारों सत्यवादी, दृढ़वत, विद्वान् , श्रेष्ठवक्ता, अवभृथ नाम गौ और अभिषेक के लिये छोटे-बडे पात्र लाते और यज्ञस्नान के करनेवाले,धीर,तथा मर्यादावान् , धर्मात्मा । युधिष्ठिर को भेंट देते हुए देखा है ॥१४॥ और यशस्वी राजा लोग युधिष्ठिर की सेवा किया करते राजा बाहीक ने सोने की आभा से जगमगा रहा, है । मैंने उन लोगों को दक्षिणा में देने के लिये सुसज्जित रथ लाकर खड़ा किया। राजा सुदक्षिण ने ATTRIBUTSAGAR WORDINIOMHIDIMUSIMITRADEDERINEERITUTIONIOman २४२ म हा भारत सभापत्र RurururunmannmorronouTINUOUTrurum nerunomorrrrrrrroraMITTERTURError COMeanBINDAMERITaxcamkareer । - सुदक्षिणस्तु युयुजे श्वेतैः काम्बोजजैहयैः सुनीथः प्रीतिमांश्चैव ह्यनुकर्ष महाबलः ध्वज चेदिपतिश्चैवमाहापीत्स्वयमुद्यतम् दाक्षिणात्य. संनहनं स्त्रगुष्णीषे च मागधः वसुदानो महेष्वासो गजेन्द्रं पष्टिहायनम् ॥ ७ ॥ मत्स्यस्त्वक्षान्हेमनद्धानेकलव्य उपानहौ आवन्त्यस्त्वभिषेकार्थमपो बहुविधास्तथा चेकितान उपासङ्गं धनुः काश्य उपाहरत् असिं च सुत्सरं शल्यः शैक्यं काञ्चनभूपणम् ॥ ९ ॥ अभ्यपिञ्चत्ततो धौम्यो व्यासश्च सुमहातपाः नारदं च पुरस्कृत्य देवलं चाऽसितं मुनिम् ॥ १० ॥ प्रीतिमन्त उपातिष्ठन्नभिषेक महर्षयः जामदग्न्येन सहितास्तथाऽन्ये वेदपारगाः ॥ ११ ॥ अभिजग्मुर्महात्मानो मन्त्रवद्भरिदक्षिणम् महेन्द्रमिव देवेन्द्रं दिवि सप्तर्षयो यथा ॥ १२ ॥ अधारयच्छत्रमस्य सात्यकिः सत्यविक्रमः धनञ्जयश्च व्यजने भीमसेनश्च पाण्डवः ॥ १३ ॥ श्वेत रग के काम्बोज देश के घोड़े लाकर भेंट किये । लाकर राजा युधिष्ठिर को दिये। फिर महातपस्वी धौम्य, महाबली सुनीथ राजा अनुकर्षण अर्थात् रथ के नीने वेदव्यास, नारद, देवल और असित मुनि राज्या- की लकड़ी ले आये । चेदि देश के राजा ने ध्वजा भिषेक का कार्य करने लगे ॥५॥१०॥ लाकर दी । दक्षिण के राजा ने दृढ़ कवच, मगध जहा अभिषेक हो रहा था, वहीं पर सब महर्षि देश के राजा ने माला और पगड़ी, राजा वसुदान प्रसन्नचित्त से बैठे ने जवान हाथी, राजा मत्म्य ने धन से भरे हुए। वेदपाठी महात्मा रोग मत्र पढ़ते हुए अभिषेक करने छकड़े, राजा एकलव्य ने [मणिजटित] जूते, अवन्ती के लिये धर्मराज युधिष्ठिर के पास गये । जैसे सप्त- देश के राजा ने अभिषेक के लिए अनेक प्रकार के ऋपि देवलोक में इन्द्र के पास जाते हैं, वैसे ही जल, राजा चेकितान ने तरकस, काशिराज ने धनुप महात्मागण उम यज में आने लगे । अभिषेक के और राजा शल्य ने एक तलवार जिसकी मूठ बहुत समय सात्यकि ने युधिष्ठिर के ऊपर श्वेत छत्र लगाया। मुन्दर थी, और सुनहरी भूषण युक्त शिक्य घृत पात्र अर्जुन और भीमसेन पंखा हिरा रहे थे । नकुल MicromartArAm । | परशुराम और अन्य - .Unautam kuu TIL UUTUUDTNT TUDUTUT.COM TournTM LCMCI'McLar* २४३ म हा भारत अध्याय ५३] பாராராரFITNாயாாாாாTATITய anRUOTE : चामरे चापि शुद्धे द्वे यमौ जगृहतुस्तदा उपागृह्णाद्यमिन्द्राय पुराकल्पे प्रजापतिः ॥ १४ ॥ तमस्मै शङ्खमाहापीद्वारुणं कलशोदधिः शैक्यं निष्कसहस्रेण सुकृतं विश्वकर्मणा ॥ १५ ॥ तेनाऽभिषिक्तः कृष्णेन तत्र मे कश्मलोऽभवत् । गच्छन्ति पूर्वादपरं समुद्रं चाऽपि दक्षिणम् ॥ १६ ॥ उत्तरं तु न गच्छन्ति विना तात ! पतत्रिभिः । तत्र स्म दध्मुः शतशः शङ्खान्मङ्गलकारकान् ॥ १७ ॥ प्राणदन्त समाध्मातास्ततो रोमाणि मेऽहपन् । प्रापतन्भूमिपालाश्च ये तु हीनाः स्वतेजसा ॥ १८॥ धृष्टद्युम्नः पाण्डवाश्च सात्यकिः केशवोऽष्टमः सत्त्वस्था वीर्यसंपन्ना ह्यन्योन्यप्रियदर्शनाः ॥ १९ ॥ विसंज्ञानभूमिपान्दृष्ट्वा मां च ते प्राहसंस्तदा ततः प्रहृष्टो वीभत्सुः प्रादाद्धेमविपाणिनाम् ॥ २० ॥ शतान्यनडुहां पञ्च द्विजमुख्येपु भारत ! न रन्तिदेवो नाभागो यौवनाश्वो मनुर्न च ॥ २१ ॥ न च राजा पृथुर्वेन्यो न चाऽप्यासीद्भगीरथः । और सहदेव एक-एक चंवर हाथ में लिये पास खड़े उन शलों की मङ्गलसूचक ध्वनि सुनकर मेरे रोयें थे ! पूर्वकल्प में प्रजापति ब्रह्मा ने जो शड्स इन्द्र खड़े हो गये । उस समय जो राजा लोग तेज और को दिया था,वही वारुण शव कलशोदधि से(समुद्र से) साहस से हीन थे, मूच्छित हो-होकर गिर पड़े और युधिष्ठिर को प्राप्त हुआ । अब श्रीकृष्ण ने विश्वकर्मा के धृष्टद्युम्न, पाचों पाण्डय,सात्यकि और श्रीकृष्ण जी ये बनाये बहुमूल्य कावड से युधिष्ठिर का अभिषेक आठों मेरी और उन गिरे हुए राजाओं की गति को किया। यह सब देखकर क्लेश के कारण से मै मूच्छित | देखकर हंसने लगे ॥१७॥२०॥ इसके पश्चात् अर्जुन ने पाच सौ बैल जिनके हे पिता जी ! मनुष्यों की गति पूर्व, पश्चिम सींग सुवर्ण से मढे हुए थे, ब्राह्मणों को दिये । और दक्षिण दिशा में ही है, उत्तर दिशा में पक्षी इसलिए हे पिता जी ! महाराज हरिश्चन्द्र की तरह ही जा सकते हैं। परन्तु पाण्डव वहा भी चले गये धूमधाम से राजसूय यज्ञ समाप्त करके, राजा युधिष्ठिर और वहा से सैंकड़ों मङ्गलसूचक शड्डू ले आये हैं । की जैसी अपूर्व गोमा हुई और उन्हें जैमा ऐश्वर्य Comcategore हो गया ॥११॥१६॥ , TRAILERIOUTUIIMLALALITYAMEVEAL TAINYMAILO HEATRAPALIRATRADAMITRALCITATAMIL २४४ म हा भारत मभापत्र immorrorma TIPUTRITTrnimuTOTrurimurraiwan FOXATELLITIRIYAASPIRITUTELIMIMRITTARAIL ALSpamaamanarwavimaasan ययातिनहुपो वापि यथा राजा युधिष्ठिरः ॥ २२ ॥ यथाऽतिमात्रं कौन्तेयः श्रिया परमया युतः राजसूयमवाप्यैवं हरिश्चन्द्र इव प्रभुः ॥ २३ ॥ एतां दृष्ट्वा श्रियं पार्थे हरिश्चन्द्रे यथा विभो! । कथं तु जीवितं श्रेयो मम पश्यसि भारत ! ।। २४ ॥ अन्धेनेव युगं नद्धं विपर्यस्तं नराधिप ! कनीयांसो विवर्धन्ते ज्येष्ठा हीयन्त एव च ॥ २५ ॥ एवं दृष्ट्वा नाभिविन्दामिशर्म समीक्षमाणोऽपि कुरुप्रवीर ! । तेनाहमेवं कृशतां गतश्च विवर्णतां चैव सशोकतांच॥२६॥ इति श्रीमन्महाभारते सभापर्वणि घृतपर्वणि दुर्योधनसंतापे त्रय पञ्चाशत्तमोऽध्याय ॥५३॥ मिला, उसका वर्णन नहीं किया जा सकता । राजा बाधे तो वह जैसे प्राय उलटा पुलटा ही हो जाता रन्तिदेव, नाभाग, यौवनाश्व, मनु, वेन के पुत्र राजा । है, वैसे ही विधाता भी मानों अन्धा होकर सब काम पृथु, भगीरथ, ययाति और नहुष भी युधिष्ठिर की करना है। तभी तो बड़े घटते जाते हे और छोटों बराबरी नहीं कर सकते है और की तो किन में गिनती की बढ़ौतरी होती जाती है । इसलिये हे पिताजी ! है। राजा युधिष्ठिर महाराज हरिश्चन्द्र के समान क्या कहू, इन्हीं बातों को देव मुनकर मुझे दमभर सत्यवादी होने का यश इस लोक में प्राप्त कर चुके भी चैन नहीं पड़ता । यही कारण है कि मै दिन हैं, यह देखकर डाह के मारे मर जाना ही मुझे श्रेष्ठ पर दिन मलिन, दुर्बल और शोक मे व्याकुल होता लगता है। अन्धा मनुष्य हल चराने के लिये 'युग' जा रहा हू ॥२१॥२६॥ मभापर्व का तिरपनवा अध्याय समाप्त हुआ ॥ ५३॥ अथ चतुप्पश्चाशत्तमोऽध्याय ॥ ५४ ।। धृतराष्ट्र उवाच-त्वं वे ज्येष्ठो ज्येष्ठिनेयः पुत्र!मा पाण्डवान्द्विपः । द्वेष्टा ह्यसुखमादत्ते यथैव निधनं तथा अव्युत्पन्नं समानार्थं तुल्यमित्रं युधिष्ठिरम् । JINDANAMITRATORRORA चव्यनवा अध्याय ॥५४॥ दुर्योधन की यह बात सुनकर धृतराष्ट्र ने कहा को केश पहुँचाना कभी अच्छा नहीं कहा जा सकता। हे पुत्र ! तुम मेरे बड़े लड़के और पड़ी रानी के पेट विचार कर देम्बो, कपट और द्वेष का नाम भी धर्मान्मा में पैदा हुए हो । पाण्डवों का सौभाग्य देम्वकर, पिना युधिष्ठिर नहीं जानते। उनकी समृद्धि देग्वार अत्यन्त किसी कारण के ईर्षा के कग होकर, अपनी आत्मा पत्रु की तरह उसे न मह मरना, क्या तुम्हें सोहता CIUTUDUDDIVIDILTOTTUCITRITTCLMDC Trimer TrITUTTTTTTT ।

२४५ म हा भारत अध्याय ५४ ] NOUTUITM Orient IRMITTIIIIIIIIIIIIITY HTTTTTTTTTournamaina ॥ २ ॥ । ANITATUTIMILAILAIMILARITUNI - अद्विपन्तं कथं द्विष्यात्त्वादृशो भरतर्षभ ! तुल्याऽभिजनवीर्यश्च कथं भ्रातुः श्रियं नृप! । पुत्र! कामयसे मोहान्मैवं भूः,शाम्य, मा शुचः ॥ ३ ॥ अथ यज्ञविभूतिं तां काङ्क्षसे भरतर्षभ ! ऋत्विजस्तव तन्वन्तु सप्ततन्तुं महाध्वरम् आहरिष्यन्ति राजानस्तवापि विपुलं धनम् प्रीत्या च वहुमानाच्च रत्नान्याभरणानि च अनार्याचरितं तात ! परवस्पृहणं भृशम् वसंतुष्टः स्वधर्मस्थो यः स वै सुखमेधते अव्यापारः परार्थेषु नित्योद्योगः स्वकर्मसु रक्षणं समुपात्तानामेतद्वैभवलक्षणम् ॥ ७ ॥ विपत्तिप्वव्यथो दक्षो नित्यमुत्थानवान्नरः अप्रमत्तो विनीतात्मा नित्यं भद्राणि पश्यति ॥ ८ ॥ वाहूनिवैतान्मा च्छेत्सीः पाण्डुपुत्रास्तथैव ते । भ्रातॄणां तद्धनार्थं वै मित्रद्रोहं च मा कुरु पाण्डोः पुत्रान्माद्विपस्वेह राजंस्तथैव ते भ्रातृधनं समग्रम् । है। तुम तनिक चित्त को स्थिर करके सोचो, तो धन की इच्छा न करना, अपने काम का उद्योग तुम्हें जान पड़ेगा, कि तुम्हारी सम्पत्ति और तुम्हारे करना और शरणागत को पालना ये तीनों वैभव के सहायक युधिष्ठिर से कम नहीं है। फिर तुम अत्यन्त लक्षण है ॥१७॥ लोभी अर्थ-पिशाच की तरह क्या भाई का ऐश्वर्य हर जो मनुष्य चतुर, विनीत, नित्य प्रसन्न और लेना चाहते हो । यदि तुम्हारी यज्ञ करने की इच्छा | आपत्ति में दु ख को नहीं मानता है, उसका सदैव प्रवल हुई है,तो इच्छा करते ही पुरोहित लोग तुमको कल्याण होता है । सोचकर देखो, अपने शरीर में सप्ततन्तु महायज्ञ की दीक्षा देंगे। तुम्हें भी राजा लोग लगे हुए हाथों की तरह पाण्डव लोग तुम्हारे है इसी तरह प्रीति और सम्मान के भाव से बहुत सा और तुम्हारे सहायक है। इस कारण उनके धन को धन और रत्न भेंट करेंगे । परन्तु पराये धन के लेने प्राप्त करने की इच्छा मे उनके साथ पैर बढ़ाने में की इच्छा करना नीचों का काम है। इस ससार तुम्हारा कुछ लाभ तो है नहीं; परन्तु उससे भाइयों में वृद्धि उसी मनुष्य की होती है, जो धर्म से रहता से बिगाड़, मित्रों से बिगाड़, बड़े भागे झगड़े और है और अपने ही धन में सन्तोष करता है । पराये युद्ध आदि के द्वारा वश के नाश की ही आशका EDITATIOMETRIOTICLETIMIMIRE MLIYONITORITIES TIMITMLILAM २४६ म हा मारत (सभापर्व IrnameTTIAHITWITTE TITUTru Drurunmun Uurun JuTum TIMONITI मित्रद्रोहे तात! महानधर्मः पितामहा ये तव तेऽपि तेषाम् ॥१०॥ अन्तर्वेद्यां ददद्वित्तं कामाननुभवन्प्रियान् क्रीडन्स्त्रीभिर्निरातङ्कः प्रशाम्य भरतर्षभ इति श्रीमन्महाभारते सभापर्वणि हातपर्वणि दुर्योधनमंतापे चतुष्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥५४॥ है । इसलिए मै तुमको बार बार समझाता हू, कि- तुम भी पाण्डवों की तरह यज्ञ आरम्भ करके तुम पाण्डवों से ईर्पा या शत्रुता मत करो । मित्रों बहुत से धन-ग्ल ब्राह्मणों को दो, उनकी इच्छा से द्रोह करना अनर्थ की जड़ है । तुम और पाण्डव ' पूरी करो, बेखटके माला-चन्दन-उत्तम स्त्री आदि एक ही पितामह के वंश में उत्पन्न हुए हो । हे विषयों के भोग में लगकर बुरे विचारों को मूल तुम्हारा चित्त बहुत ही चञ्चल हो उठा हो, तो सभापर्व का चव्वनवां अध्याय समाप्त हुआ ॥ ५४॥ 1 -- -* - amnnar अथ पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥५५॥ दुर्योधन उवाच-यस्य नास्ति निजा प्रज्ञा केवलं तु बहुश्रुतः । न स जानाति शास्त्रार्थ दर्वी सूपरसानिव जानन्वै मोहयसि मां नावि नौरिव संयता स्वार्थे किं नावधानं ते उताहो द्वेष्टि मां भवान् ॥ २ ॥ न सन्तीमे धार्तराष्ट्रा येषां त्वमनुशासिता भविष्यमर्थमाख्यासि सर्वदा कृत्यमात्मनः परनेयोऽग्रणीर्यस्य स मार्गान्प्रति मुह्यति पन्थानमनुगच्छेयुः कथं तस्य पदानुगाः राजन् ! परिणतप्रज्ञो वृद्धसेवी जितेन्द्रियः CADEMADHUBALLIAMERAMINETVULD पचपनवा अध्याय ॥ ५५॥ दुर्योधन ने कहा-हे पिता जी ! जिस मनुष्य नाव में बी हुई छोटी नाव की तरह, मुझे क्यों में अपनी कुछ चुद्धि नहीं होती है, केवल सुनी हुई रोक रहे है ! म्वार्थ के साधन में यहा तक आप पातों को जानता है, वह शास्त्र के अर्थ को इस उदास हैं अथवा मेरे अनिष्ट की चेष्टा ही इस समय प्रकार से नहीं जान सकता है जैसे चमचा क्सिी आपका प्रधान उद्देश्य है । आपकी आना के अनुमार भोजन के पदार्थ के बाद को नहीं पहचानता है। काम करने से इस समय हमारा उयार नहीं दंग आप विशेष रूप से सब जान-बूझकर भी, यही पड़ता । जुए के खेल में शत्रु का मर्यच हर रेने ESTNUMMEUMIA TITUITMEKORT LIETOTCOwocorrecce Turlar:

२४७ म हा भारत अध्याय ५५] TIMImrnvi TANNONTIWITIWTTATRICE EINDIATIMIMIT IIITTER - - KULMIMINUUTUU MUTTUIN TUTIN प्रतिपन्नान्स्वकार्येषु संमोहयसि नो भृशम् लोकवृत्ताद्राजवृत्तमन्यदाह बृहस्पतिः तस्माद्राज्ञाऽप्रमत्तेन स्वार्थश्चिन्त्यः सदैव हि ॥ ६ ॥ क्षत्रियस्य महाराज ! जये वृत्तिः समाहिता सवै धर्मस्वधर्मो वा स्ववृत्तौ का परीक्षणा? ॥ ७ ॥ प्रकालयेद्दिशः सर्वाः प्रतोदेनेव सारथिः प्रत्यमित्रश्रियं दीप्तां जिघृक्षुर्भरतर्षभ ! प्रच्छन्नो वा प्रकाशो वा योगो योऽरिं प्रवाधते । तद्वै शस्त्रं शस्त्रविदां न शस्त्रं छेदनं स्मृतम् शत्रुश्चैव हि मित्रं च न लेख्यं न च मातृका । यो वै संतापयति यं स शत्रुः प्रोच्यते नृप! असंतोपः श्रियो मूलं तस्मात्तं कामयाम्यहम् । समुच्छ्रये यो यतते स राजन् ! परमो नयः ॥ ११ ॥ ममत्वं हि न कर्तव्यमैश्वर्य वा धनेऽपि वा को आप भावी अनर्थ का कारण बतलाते हैं। जो लोग विमुख होने का क्या प्रयोजन है ! सारथी जैसे पथ-प्रदर्शक होकर भी स्वयं औरों के उपदेश मान चावुक मारकर सब तरफ घोड़ों को चला सकता है, कर चलते हैं, उन्हें पग-पग पर विपत्ति की आशङ्का | वैसे ही जय की इच्छा रखनेवाला मनुष्य बिना हो सकती है । ऐसे अगुआ का पीछा करना, या रोकटोक के सभी मागों का आश्रय ले सकता है। उसका कहना मानना, किसी तरह बुद्धिमान् का भीतरी हो, या बाहरी, जिस उपाय से शत्रु का दमन काम नहीं । हे पिता जी ! आपकी बुद्धि विवेक से ! किया जा सके, उसी उपाय को काम में लाना, जय पक चुकी है, आपने बड़े-बूढ़ों की सनत की है, की इच्छा रखनेवाले पुरुष के लिये शास्त्र-सम्मत है। आप जितेन्द्रिय भी हैं। फिर न मालम, आप क्यों । यही 'उपाय' सच्चा हथियार है, कुछ यही हथियार हमारा टत्साह मिटाने की चेष्टा कर रहे हैं । वृह नहीं है, जिससे कि मार-काट हो सके । हे महाराज! पनि जी ने राजाओं की वृत्ति को संसार की वृत्ति शत्रु और मित्र की पहचान का कोई नियम नहीं से मिन्न कहा है । इससे सावधान राजा को अपने लिखा है। जिससे जिसको सन्ताप पहुंचे, वही टसका कार्य का विचार सदैव करना उचित है ॥१६॥ शत्रु माना जाता है । हे राजन् ! सम्पति की बढ़ती जय प्राप्त करना ही क्षत्रिय का प्रधान धर्म है।। का मूल कारण असन्तोप ही है ।।७।१०॥ इसलिए चाहे धर्म हो, चाहे अधर्म, कर्तव्यपालन से इसलिये मैं यही कलंगा, जिममें असन्तोष पद SECTCHENTITIVATEDMIYEDITATTONEETTERTIFICIRRIED ।

२४८ महाभारत सभापर्व HammemumnommraITTOURITUTIO morrorimirearITION ॥ १२ ॥ । tumtammanmaratipatitatuuttyImatluntaintyanatrumUDY पूर्वावाप्तं हरन्त्यन्ये राजधर्म हि तं विदुः अद्रोहे समयं कृत्वा चिच्छेद नमुचेः शिरः शक्रः, साऽभिमता तस्य रिपौ वृत्ति सनातनी ॥ १३ ॥ द्वावेतौ असते भूमिः सर्पो विलशयानिव राजानं चाऽविरोन्द्वारं ब्राह्मणं चाऽप्रवासिनम् ॥ १४ ॥ नास्ति वै जातितः शत्रुः पुरुषस्य विशांपते ! । येन साधारणी वृत्तिः स शत्रुर्नेतरो जनः ॥ १५ ॥ शत्रुपक्षं समृध्यन्तं यो मोहात्समुपेक्षते व्याधिराप्यायित इव तस्य मूलं छिनत्ति सः ॥ १६ ॥ अल्पोऽपि शरिरत्यर्थ वर्धमानः पराक्रमैः वाल्मीको मूलज इव ग्रसते वृक्षमन्तिकात् ॥ १७ ॥ आजमीढ ! रिपोर्लक्ष्मीर्मा ते रोचिष्ट भारत ! । एप भारः सत्ववतां नयः शिरसि धिष्ठितः ॥ १८ ॥ जन्मवृद्धिमिवार्थानां यो वृद्धिमभिकाङ्क्षते एधते ज्ञातिपु स वै सद्यो वृद्धिर्हि विक्रमः नाऽप्राप्य पाण्डवैश्वर्यं संशयो मे भविष्यति । अवाप्स्ये वाश्रियं तांहि शिष्ये वा निहतो युधि ॥ २० ॥ क्योंकि नीतिकार कहते हैं, कि जो उन्नति की चाह में रहनेवाले जीवों को सर्प अस लेता है ॥११॥१४॥ रखता है, वही सचमुच नीति-कुशल है । धन या हे महाराज ! जाति का विचार करने में तो ऐश्वर्य में कभी ममता न करनी चाहिये, क्योंकि कोई किसी का शत्रु नहीं हो सकता। जब दोनों उन्हें दूसरे लोग छीन सकते है । इस प्रकार बल का उद्देश्य, या जीविका-विषयक निश्चय एक ही होता पूर्वक शत्रु पर आक्रमण करके उसके सर्वम्व छीन है, तभी आपम में शत्रुता पैदा होती है। जो राजा लेने को शास्त्रकारों ने गजा का धर्म माना है। मोह से अपने शत्रु के पक्ष की बढ़ोतरी चाहा करता देखिए, इन्द्र ने नमुचि दैत्य से मित्रता करके उसके है, उसकी जड़ इस प्रकार से कटती जाती है, जैसे मिर को काट डारा था। आजतक भत्रु जीतने रोग के बढ़ने से दिन पर दिन भरीर क्षय होता को वही सनातन वृति चली आती है । शत्रु से चला जाता है। और जो शत्रु छोटा सा भी है, परन्तु विरोध न करनेवाले राजा और देशों में न घूमनेवाले पराक्रम में बढ़ गया है, तो वह भी इस प्रकार से विद्वान् को पृथ्वी इस प्रकार से ग्रस लेती है, जैसे दिल जड़ काट देता है, जैसे जड़ में लगी हुई दीमक auworn inactreatmirahmumm.nwlawTANT , HTTARAIIITiaRTAITRILITRADITIONARRIAntonarrirammar २४९ म हा भारत अध्याय ५६ ] MITINDWA ManmraniurmuTIMIRumari । FormernamenuTIVITAmlesma है । । एतादृशस्य किं मेऽद्य जीवितेन विशांपते ! .वर्धन्ते पाण्डवा नित्यं वयं त्वस्थिरवृद्धयः दनि श्रीमन्महाभारते मभापर्वणि द्यूतपर्वणि दुर्योधनसंतापे पञ्चपश्चामत्तमोऽध्यायः ॥ ५५ ॥ और पास के वृक्षों को भी खा जाती है । इस कारण । कारण हैं । इस लिये पाण्डवों की लक्ष्मी को देखकर से हे पिता ! आप को भी शत्रु की लक्ष्मी की वृद्धि में अत्यन्त दुखी हूँ। मैं या तो उनके ऐश्वर्य और चाहना उचित नहीं है । जातिवालों में वृद्धि सौभाग्य को प्राप्त करूँगा, या युद्ध ठानकर प्राण दे उसी मनुष्य की होती है, जो अपने अर्थ की बढ़ौतरी । दूंगा । हे पिता जी ! क्या जानें, हमारी उन्नति होगी इस प्रकार से किया करता है, जैसे जन्म होने के या नहीं ? किन्तु पाण्डव लोग तो नित्य बढ़ रहे पीछे मनुष्य का शरीर दिन पर दिन बढ़ता हैं । यह देखकर मुझे अपना जीवन भार सा मालूम संसार में पराकम और उद्यम ही अभ्युदय के मूल पड़ रहा है १५/२॥ सभापर्व को पचपनवां अध्याय ममाप्त हुआ ।। ५५॥ अथ पट्पञ्चशत्तमोऽध्यायः ॥५६॥ शकुनिरुवाच-यां त्वमेतां श्रियं दृष्ट्वा पाण्डुपुत्रे युधिष्ठिरे तप्यसे तां हरिष्यामि द्यूतेन जयतां वर ! आहूयतां परं राजन्कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः अगत्वा संशयमहमयुद्धा च चमूमुखे अक्षान्क्षिपन्नक्षतः सन्विद्वानविदुषो जये ग्लहान्ध,पि मे विद्धि शरानक्षांश्च भारत ! अक्षाणां हृदयं मे ज्यां रथं विद्धि ममास्फुरम् ॥ ३ ॥ दुर्योधन उवाच-अयमुत्सहते राजञ्च्छ्यिमाहर्तुमक्षवित् द्यूतेन पाण्डुपुत्रेभ्यस्तदनुज्ञातुमर्हसि छप्पनवां अध्याय ॥५६॥ दुर्योधन की यह बातें सुनकर शकुनि ने कहा- । युधिष्ठिर जुआ खेलना नहीं जानते । इसलिये मै हे दुर्योधन ! जिस युधिष्ठिर की लक्ष्मी को देखकर उन्हें अवश्य जीत लूंगा । इस युद्ध में दांव लगाना तुम इतने दु.खी हो रहे हो, उसको मैं जुए में जीत- ही मेरा धनुष है, पाँसे ही मेरे बाण हैं, पांसों की कर तुमको दे सकता हूं । तुम युधिष्ठिर को चौसर विद्या ही मेरी प्रत्यच्चा है, और पांसे फेंकने की खेलने के लिये शीघ्र बुलाओ। अभी तुम्हारा मनो- | जगह ही मेरा रथ है ॥१॥३॥ रथ सफल हो जायगा । युद्ध करने की आवश्यकता यह सुनकर दुर्योधन ने कहा-हे पिता जी! ही न रहेगी । मैं पांसा फेंकने में बड़ा विद्वान् ह । ये पांसों के खेल में चतुर मामा जी पांसों के खेल webel TWINTOWIEDARBIUTEU TIMULTUMUUSIINILICALEMITTATAVILUMIVULUYUNUM । imaERITAITE minimumamnun. Hamriknam । । २५० म हा भारत सभापर्व REETITISTIIMIRRITORIT TRITTHI TOMATinyurmuTurmeric धृतराष्ट्र उवाच-स्थितोऽस्मि शासने भ्रातुर्विदुरस्य महात्मनः । तेन संगम्य वेत्स्यामि कार्यस्याऽस्य विनिश्चयम्॥ ५ ॥ दुर्योधन उवाच-व्यपनेष्यति ते बुद्धिं विदुरो मुक्तसंशयः पाण्डवानां हिते युक्तो न तथा मम कौरव ! ॥ ६ ॥ नारभेतान्यसामर्थ्यात्पुरुषः कार्यमात्मनः मतिसाम्यं द्वयोर्नास्ति कार्येषु कुरुनन्दन ! भयं परिहरन्मन्द आत्मानं परिपालयन् वासु क्लिन्नकटवत्तिष्ठन्नेवावसीदति न व्याधयो नाऽपि यमः प्राप्तुं श्रेयः प्रतीक्षते । यावदेव भवेत्कल्पस्तावच्छ्यः समाचरेत् धृतराष्ट्र उवाच-सर्वथा पुत्र ! वलिभिर्विग्रहो मे न रोचते वैरं विकारं सृजति तदै शस्त्रमनायसम् अनर्थमर्थ मन्यसे राजपुत्र ! संग्रन्थनं कलहस्याति याति। तद्वै प्रवृत्तं तु यथाकथंचित्रसृजेदसीनिशितान्सायकांश्च ॥ ११ ॥ दुर्योधन उयाच - द्यूते पुराणैर्व्यवहारःप्रणीतस्तत्रात्ययो नास्ति न संप्रहारः । के द्वारा पाण्डवों की सव सम्पत्ति और राज्य हर वह सदैव पीड़ा पाता है, जैसे वर्षा में चटाई भीग जाने रेने की बात कह रहे हैं । इसलिये आप इसका से गल जाती है । मनुष्य को उचित है, कि जनतक अनुमोदन कीजिये । आप यदि आना दे देंगे. तो साम-र्य होय तबतक अपने कल्याण का उपाय करे। हमारा मनोरथ सफर हो जायगा । यह सुनकर यह मुनकर धृतराष्ट्र ने कहा-हे पुत्र ! अपने से धृतराष्ट्र ने कहा-पहरे मैं अपने बुद्धिमान् भाई विदुर बर पान् मनुष्य के साथ झगड़ा करना मुझे किमी से सम्मति कर ल , तर कुछ आजा दगा । दुर्योधन तरह नहीं रचता । देसो, शत्रुता ही विकार पैदा ने कहा-हे पिता जी ' विदुर जी जैमा पाण्डवों को कर देती है, और विकार यह शस्त्र है, जो रोहे का चाहते है, वैसा मुझको नहीं चाहते। इस कारण वे बना हुआ न होने पर भी, बहुत जल्द विश्वम कर अवश्य इस बारे में सम्मति देने मे आप को रोकेंगे। देता है । हे पुन ' यह जुआ झगड़ और घोर अनर्थ किमी मनुष्य को कोई काम दृमरे के आश्रित होकर की जड़ है । उसी को तुम अर्थमाप्ति का माधन करना उचित नहीं है, क्योंकि दो मनुष्यों की एक समाते हो। जुए में प्रवृत्त होने पर अवश्य तीक्ष्ण जैसी बुद्धि कभी नहीं होती है ॥१७॥ पाणों और तरवारों के बार की नौबत आ जायगी जो मनुष्य भय से बचकर ही अपना पालन करता है, ॥११॥ HDLOCAL EmmammyLOPED WIDEmmercenamrutcril २५१ म हा भारत अध्याय ५६] TA ITUOTENTISTIMUHURITI MinuTIT INTORITOTTOMUTTTTOURTOTOHI musrouTERLETER FILIMIMIT तद्रोचतां शकुनेर्वाक्यमद्य सभां क्षिप्रं त्वमिहाज्ञापयस्व ॥ १२ ॥ स्वर्गद्वारं दीव्यतां नो विशिष्टं तद्वर्तिनां चापि तथैव युक्तम् । भवेदेवं ह्यात्मना तुल्यमेवं दुरोदरं पाण्डवस्त्वं कुरुष्व ॥ १३ ॥ घृतराष्ट्र उवाच-वाक्यंन मे रोचते यत्वयोक्तं यत्ते प्रियं तक्रियतां नरेन्द्र!। पश्चात्तप्स्यसे तदुपाक्रम्य वाक्यं न हीदृशं भावि वचो हि धर्म्यम् ॥ १४ ॥ दृष्टं ह्येतद्विदुरेणैव सर्वं विपश्चिता बुद्धिविद्यानुगेन तदेवैतदवशस्याभ्युपैति महद्भयं क्षत्रियजीवघाति ॥१५॥ वैशम्पायन उवाच-एवमुक्त्वा धृतराष्ट्रो मनीपी दैवं मत्वा परमं दुस्तरं च । शशासोच्चैः पुरुपान्पुत्रवाक्ये स्थितो राजादेवसंमूढचेताः॥ १६ ॥ सहस्रस्तम्भां हेमवैदूर्यचित्रां शतद्वारां तोरणस्फाटिकाख्याम् । सभामग्यां क्रोशमात्रायतां मे तद्विस्तारामाशु कुर्वन्तु युक्ताः ॥ १७ ॥ श्रुत्वा तस्य त्वरिता निर्विशङ्काः प्राज्ञा दक्षास्तां तदा चक्रुराशु । सर्वव्याण्युपजन्हुः सभायां सहस्रशः शिल्पिनश्चैव युक्ताः ॥१८॥ कालेनाऽल्पेनाऽथ निष्ठां गतां तां सभांरम्यां बहुरत्नां विचित्राम् । चित्रहमैरासनैरभ्युपेतामाचख्युस्ते तस्य राजः प्रतीताः ॥१९॥ यह सुनकर दुर्योधन ने कहा-हे पिता जी! | पहले ही ज्ञानदृष्टि से देखकर कह चुके हैं, कि क्षत्रियों जुआ खेलने में नाश और युद्ध होने की कोई बात नहीं का नाश करानेवाला यह घोर कर्म है । मुझे जान है। नल आदि पहले के राजाओं ने भी जुआ खेला था। पड़ता है, तुम मोहवश होकर यह अनिष्ट किये बिना इमसे अब आप शकुनि की बात को अङ्गीकार कीजिए न मानोगे ॥१२॥१५॥ और एक विशाल सभा-मण्टप के बनने की आजा वैशम्पायन ने कहा-हे राजा जनमेजय ! राजा दीजिए । जुआ खेलना सुख का द्वार है, जो खेलता | धृतराष्ट्र ने दैव को ही प्रबल और दुम्तर समझा। है,उमको बड़ा सुख होता है। इससे हम को पाण्डवों के। उन्होंने दुर्योधन की प्रार्थना के अनुसार सेवकों को साथ जुआ खेलना योग्य है। यह सुनकर धृतराष्ट्र आज्ञा दी, कि तुम लोग कोसभर के घेरे में एक श्रेष्ठ ने कहा-हे पुत्र दुर्योधन ! तुम्हारे कहे ये वचन सभा-भवन बनवाओ । उममें हजार खम्भे और सौ मुझे नहीं रुचने । अब तुम्हें जो अच्छा लगे वह द्वार हों। सुवर्ण और वैडूर्य आदि मणियों से विचित्र करो; किन्तु जो मेरा कहा न मानोगे, तो तुम्हें पीछे उस सभा-भवन में म्फटिकमय तारण वनवाये जायें। पश्चात्ताप करना पड़ेगा । तुम्हारा यह विचार धर्म के धृतराष्ट्र की आज्ञा पाते ही हजारों कारीगर प्रसन्न- अनुकूल नहीं है । बुद्धिमान् और विद्वान् विदुर । चित्त होकर, सब सामग्री एकत्र करके, शीघ्रता से TOURT । । ITUTINUTANDITIIMUDIES TILITISAIRATIVIII & UTVUTITVTIVITETIT.TUMU २५२ महा भारत मभापर्व TiamudraamTITLamanariomaanamam CONTAITLEmmerULList ENDONAITIATMayTC.COMMITHUIMAND antaranRRASTR Sam ततो विद्वान्विदुरं मन्त्रिमुख्यमुवाचेदं धृतराष्ट्रो नरेन्द्रः युधिष्ठिरं राजपुत्रं च गत्वा मद्वाक्येन क्षिप्रमिहाऽऽनयस्व ॥२०॥ सभेयं मे बहुरत्ना विचित्रा शय्यासनैरुपपन्ना महाहैः सा दृश्यतां भ्रातृभिः सार्धमेत्य सुहृद्यूतं वर्ततामत्र चेति ॥२१॥ इति श्रीमन्महाभारते सभापर्वणि गूतपर्वणि युधिष्ठिरानयने पट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५६ ॥ सभा-भवन बनाने लगे । थोड़े ही समय में बहुत कर कहा-हे भाई ! तुम मेरी आज्ञा से शीघ्र इन्द्रप्रस्थ रत्नों से भूपित, विचित्र सुवर्णमय आसनों से अलंकृत को जाओ। और वहां से युधिष्ठिर को अपने साथ वह रमणीय सभा बन गई । तब अनुचरों ने आकर ल आओ। वे आकर अनेक रत्नों से भूपित, विविध धृतराष्ट्र को समा के बन जाने की सूचना दी। अब शय्या और आसनों से अलंकृत सभा-भवन को राजा धृतराष्ट्र ने अपने मुख्य मन्त्री विदुर को बुला- देखें और भाइयों के साथ चौसर खेले ।१६॥२१॥ सभापर्व का छप्पनयां अध्याय समाप्त हुआ ॥ ५६ ।। अथ मप्तपश्चाशत्तमोऽध्यायः ।। ५७ ॥ वैशम्पायन उवाच-मतमाज्ञाय पुत्रस्य धृतराष्ट्रो नराधिपः मत्वा च दुस्तरं दैवमेतद्राजंश्चकार ह अन्यायेन तथोक्तस्तु विदुरो विदुषां वरः नाऽभ्यनन्दद्वचो भ्रातुर्वचनं चेदमत्रवीत् विदुर उवाच नाभिनन्दे नृपते !प्रैपमेतं मैवं कृथाः कुलनाशाद्विभेमि। पुत्रैभिन्नैः कलहस्ते ध्रुवं स्यादेतच्छके द्यूतकृते नरेन्द्र !॥ ३ ॥ धृतराष्ट्र उवाच-नेह क्षत्तः! कलहस्तप्स्यते मां न चेद्देवं प्रतिलोमं भविष्यत् । धात्रा तु दिष्टस्य वशे किलेदं सर्व जगच्चेष्टति न स्वतन्त्रम् ॥ ४ ॥ तदद्य विदुर ! प्राप्य राजानं मम शासनात् क्षिप्रमानय दुर्धर्षं कुन्तीपुत्रं युधिष्ठिरम् इति श्रीमन्महाभारते मभापर्वणि धूतपर्वणि युधिष्ठिरानयने मतपञ्चासमोऽध्यायः ॥ ५७ ।। मशावनयां अध्याय ॥५॥ शम्पायन ने कहा-हे महाराज ! अपने पुत्र हे महाराज ! आपकी यह आना मानने को किमी दुर्योधन का अभिप्राय जानकर और देव को प्रबल तरह मेरा जी नहीं चाहता। आप अत्यन्त मोहया मानकर धृतराष्ट्र ने विदुर से कहा, कि तुम शीघ्र होकर इस काम के लिये अनुमति दे रहे है। मुंग इन्द्रमाय को जाओ । यह सुनकर विदुर ने कहा पूर्ण विश्वास है कि इस कार्य में गई-बन्धुओं में ಒಯಥಾವವನಾತಾವಧಾನವತವ immeEUROm.0001911993wE0901129202DEOHD २५३ अध्याय ५८] म हा भारत AIRATRImmumMITUTOMATOREDICTIRITATTIMRAPATTIMI TIK KuwITITIVATITIATIVITMITRA पृट पडेगी और अन्त को कुल का नाश हो जायगा।! करनेवाले विधाता ही के नियम से चेष्टित हो रहा धृतराष्ट्र ने कहा-हे विदुर ! यदि देव विरोधी न है । इसलिये मेरे शासन से आज तुम कुन्तीकुमार बने, तो बिगाड से भी मुझको दुख नहीं पहुचेगा। अजेय राना युधिष्ठिर के पास जाकर उनको तुरन्त देखो, यह विक्ष म्वाधीन नहीं ह, दैववश स्थापित ले आओ ॥२५॥ मभापर्व का सत्तावनवां अध्याय ममाप्त हुआ ॥ ५७ ॥ "+se+ अथाापञ्चाशत्तमोऽध्याय ॥ ५८ ॥ वैशम्पायन उवाच ततःप्रायाद्विदुरोऽश्वेरुदारैर्महाजवैर्वलिभिः साधुदान्तैः। वलान्नियुक्तो धृतराष्ट्रेण राज्ञा मनीपिणां पाण्डवानां सकाशे ॥ १ ॥ सोऽभिपत्य तदध्यानमासाद्य नृपतेः पुरम् प्रविवेश महावुद्धिः पूज्यमानो द्विजातिभिः ॥ २ ॥ स राजगृहमासाद्य कुवेरभवनोपमम् अभ्यागच्छत धर्मात्मा धर्मपुत्रं युधिष्ठिरम् तं वै राजा सत्यधृतिर्महात्मा अजातशत्रुर्विदुरं यथावत् । पूजापूर्व प्रतिगृह्याऽऽजमीढस्ततोऽऽपृच्छद्धृतराष्ट्रं सपुत्रम्॥४॥ युधिष्ठिर उवाच-विज्ञायते ते मनसोऽप्रहर्षः कन्चित्क्षत्तः! कुशलेनागतोऽसि ? । कच्चित्पुत्राः स्थविरस्यानुलोमा वशानुगाश्चापि विशोऽथ कच्चित् ? ॥ ५॥ विदुर उवाच-राजा महात्मा कुशली सपुत्र आस्ते वृतो ज्ञातिभिरिन्द्रकल्पः । प्रीतो राजन्पुत्रगुणैर्विनीतो विशोक एवात्मरतिदृढात्मा ॥ ६ ॥ इदं तु त्वां कुरुराजोऽभ्युवाच पूर्व पृष्ट्वा कुशलं चाव्ययं च । अट्टावनवा अध्याय ॥ ५८ ॥ वैशम्पायन ने कहा-हे राजा जनमेजय ' राजा ने उनसे पुत्र सहित महाराज धृतगष्ट्र की कुगल के धृतराष्ट्र से आना पाकर विदुर जी गीघ्र चरनवाले बारे में अनेक प्रश्न किये ॥१॥४॥ रथ में सवार होकर पाण्डवा का मिलने गये और ब्राह्मण फिर विदुर के आकार में विलक्षणता अर्थात् आदि वर्गों से पृजित होकर नगर म हाते हुए उनके चेहरे पर उदासी देखकर युधिष्ठिर ने पूछा- युधिष्ठिर के महलों में, जो कुबेर के भवनों के सदृश हे चाचा जी । आपका चेहरा मलिन क्यों देख पडता पने हुए थे, गए । धर्मात्मा राजा युधिष्ठिर ने भक्ति है ? आप कुगरपूर्वक तो यहा आये हैं न : दुर्योधन और श्रद्धा के साथ विदुर जी की पूजा की । विदुर | आदि भाई महाराज घृतराष्ट्र के साथ कोई बुरा जी के आराम से उत्तम आसन पर बैठते ही युधिष्ठिर । व्यवहार तो नहीं करते : सब प्रजा और अन्य POLITIER II TIMmmmmmIENTITAMIT र - "LCULAMMARALLUMAN २५४ म हा मा र त मभापर्व wmummer HIRUARYmIIITTITUTIOHINITaururururuwareronormeramanaras Sumika MARUJALAMAUSMDM Mia.GratixnxxamRAT.sarKINGTONERALGES इयं सभा त्वत्सभातुल्यरूपा भ्रातृणां ते दृश्यतामेत्य पुत्र !॥ ७ ॥ समागम्य भ्रातृभिः पार्थ! तस्यां सुहृद्यूतं क्रियतां रम्यतांच। प्रीयामहे भवतां संगमेन समागताः कुरवश्चापि सर्वे दुरोदरा विहिता ये तु तत्र महात्मना धृतराष्ट्रेण राज्ञा । तान्द्रक्ष्यसे कितवान्सन्निविष्टानित्यागतोऽहं नृपते ! तज्जुषस्व ॥ ९ ॥ युधिष्ठिर उवाच-द्यूते क्षत्तः! कलहो विद्यते नःको वैद्यूतं रोचते बुध्यमानः। किं वा भवान्मन्यते युक्तरूपं भवद्वाक्ये सर्व एव स्थिताःस्मः ॥ १० ॥ विदुर उवाच-जानाम्यहं द्यूतमनर्थमूलं कृतश्च यत्नोऽस्य मया निवारणे। राजा च मां प्राहिणोत्वत्सकाशं श्रुत्वा विद्वञ्च्छ्रेय इहाचरस्व ॥ ११ ॥ युधिष्ठिर उवाच के तत्रान्ये कितवा दीव्यमाना विना राज्ञोधृतराष्ट्रस्य पुत्रैः। पृच्छामि त्वां विदुर! ब्रूहि नस्तान्यर्दीव्यामः शतशः संनिपत्य ॥ १२ ॥ विदुर उवाच-गान्धारराजः शकुनिर्विशांपते ! राजातिदेवी कृतहस्तो मताक्षः। विविंशतिश्चित्रसेनश्च राजा सत्यव्रतः पुरुमित्रो जयश्च ॥ १३ ॥ क्षत्रिय राजा लोग तो उनके आज्ञाकारी और अधीन के लिये मै तुम्हारे पास भेजा गया हूँ, कि तुमको है न ? विदुर ने कहा-हे राजन् ! इन्द्र के तुल्य वहाँ ले चलूँ । अब तुम राजा धृतराष्ट्र की आज्ञा का प्रतापी महाराज धृतराष्ट्र पुत्रों-सहित बडे आनन्द पालन करो ॥५॥२॥ में हैं । दुर्योधन आदि सब पुत्र उनकी आज्ञा मानते युधिष्ठिर ने कहा-हे चाचा जी ! द्यूतक्रीड़ा है और सब प्रजा उनकी आज्ञा को गिरोधार्य सम क्लेश की जड़ है । यह जान-बूझकर कौन बुद्धिमान् झती है। वे नीरोग और शोक शून्य होकर मदा पुरुष जुआ खेलेगा? कृपा करके बतलाइए, इस बारे अपनी उन्नति के कामों में लगे रहते है । इम समय में आपकी क्या सम्मति है। हम सर आप की आजा तुम लोगों की सब प्रकार की कुगल के बारे में पूछ का पालन करने को तैयार है । विदुर ने कहा- कर जो कहने के लिये उन्होंने मुझे तुम्हारे पाम अच्छी तरह जानता हूँ, कि जुए को पण्टिी ने भेजा है, सो कहता हूँ, मुनो । धृतराष्ट्र ने कहा है सब अनों की जड़ माना है। इसी कारण गने हे युधिष्ठिर : तुम भाइयों के साथ यहाँ आकर अपनी बार वार धृतराष्ट्र को यह विचार छोड़ देने की सलाह सभा के सदृश यह सभा देखो, और दुर्योधन के साथ दी थी; किन्तु महाराज धृतराष्ट्र ने मेरे कहने का मित्रभाव से जुआ खेल।। तुम लोगों के समागम से खयाल न करके मुझे तुम्हारे पास भेजा है। तुम मुझे बड़ी प्रमन्नता होगी। हे राजन् ! महाराज जो टीम ममझा वही करो । युधिष्ठिर ने पूछा- धृतराष्ट्र ने जिन धून जुआरियों को उस सभा में रखने विदुर जी! दुर्योधन आदि धृतराष्ट्र के पुत्रों के मिवाय का विनार किया है, उनको तुमने यहाँ देम्वना ।इमी और कौन-कौन धून बहुत सा धन रफ्रे हुए. वहाँ EveremEDITOREADLINESIRELIERPETITTELATYACECRUIREDICIAL .

२५५ महाभारत अध्याय ५८] TUTITUTATTIRITarurmarate ZINITIATurmuTIONTINUDURATI Azeem LEELLwया סובאומנויות חרוזים युधिष्ठिर उवाच-महाभयाः कितवाः संनिविष्टा मायोपधा देवितारोऽत्र सन्ति । धात्रा तु दिष्टस्य वशे किलेदं सर्वं जगत्तिष्ठति न स्वतन्त्रम् ॥ १४ ॥ नाहं राज्ञो धृतराष्ट्रस्य शासनान्न गन्तुमिच्छामि कवे ! दुरोदरम् । इप्टो हि पुत्रस्य पिता सदैव तदस्मि कर्ता विदुरात्थ मां यथा ॥ १५ ॥ न चाकामः शकुनिना देविताहं न चेन्मां जिष्णुराहयिता सभायाम् । आहूतोऽहं न निवर्ते कदाचित्तदाहितं शाश्वतं वै व्रतं मे ॥ १६ ॥ वेशम्पायन उवाच एवमुक्त्वा विदुरं धर्मराजः प्रायात्रिकं सर्वमाजाप्य तूर्णम् । प्रायाच्छ्वोभूते सगणः सानुयात्रः सह स्त्रीभिर्दीपर्दामादि कृत्वा ॥ १७॥ दैवं हि प्रज्ञां मुष्णाति चक्षुस्तेज इवाऽऽपतत् । धातुश्च वशमन्वति पाशैरिव नरः सितः ॥ १८॥ इत्युक्त्वा प्रययौ राजा सह क्षत्रा युधिष्ठिरः । अमृप्यमाणस्तस्याऽथ समाह्वानमरिन्दमः ॥ १९ ॥ वाह्नीकेन रथं यत्तमास्थाय परवीरहा परिच्छन्नो ययौ पार्थो भ्रातृभि सह पाण्डवः ॥ २० ॥ राजश्रिया दीप्यमानो ययौ ब्रह्मपुरःसरः धृतराष्ट्रेण चाहृतः कालस्य समयेन च ॥ २१ ॥ पर है, जिनके साथ खेल होगा ॥१०॥१२॥ न करूगा । यही मेरा सदा का नियम है ।।१३।१६।। विदुर ने कहा-हे महाराज ! जुए वैशम्पायन ने कहा हे राजा जनमेजय ! युधि- चतुर गान्धार का राजा शकुनि, राजा पिविंशति, प्टिर ने विदुर जी से इस प्रकार से कहकर यात्रा चित्रमेन, सत्यवत, पुरुमित्र और जय,ये सब धूर्त वहा की सामग्री करने की आज्ञा दी और प्रात काल होते खेल के लिये तुम्हारे आने की राह देख रहे हैं । यधि- ही सब भाइयों ने सेवकों और द्रौपदी आदि स्त्रियों- ष्ठिर ने कहा-हे विदुरजी! अब क्या करना चाहिए जो सहित हस्तिनापुर को यात्रा की । देखो, मनुष्य को हो,सभी जगत् देव के आधीन है,कोई म्वाधीन नहीं है। जब देवगति प्राप्त होनेवाली होती है, तब उसकी धृतराष्ट्र की आज्ञा के अनुसार जुआ खेलने के लिये मेरी | बुद्धि ऐमी दब जाती है, जैसे बिजली के सामने प्रवृत्ति नहीं होती; किन्तु आप कहत है, इसी कारण मै नेत्र का तेज दब जाता है । और पांगों से बंधे जुआ खलंगा। यदि जीतने की इच्छा से मुझे कोई न हुए मनुष्य की तरह वह ईश्वर के आधीन रहता बुलाता,तो अपनी ओरस मै कभी शकुनि के साथ जुआ है। इमी कारण से युधिष्ठिर ने भी धृतराष्ट्र के न खेलता,परन्तु खेलने के लिये बुलाये जाने पर मैं नहीं | बुलाने को स्वीकार कर लिया और विदुर जी के TETHLICENVIROHLILTODYLILADIECRETRIECIACANCELCITATISTIANEELORAMITALLURINEET में बड़ा ।

२५६ म हा भारत सभापर्व CrurammarANTITUTITUTTUTrurnim PUTTITUTIOTTOURITANTRATUTTPercumruta Mar TIGHTTEROIDuTITLAniru स हास्तिनपुरं गत्वा धृतराष्ट्रगृहं ययौ समियाय च धर्मात्मा धृतराष्ट्रेण पाण्डवः ॥ २२॥ तथा भीष्मेण द्रोणेन कर्णेन च कृपेण च समियाय यथान्यायं द्रौणिना च विभुः सह ॥ २३ ॥ समेत्य च महाबाहुः सोमदत्तेन चैव ह दुर्योधनेन शल्येन सौबलेन च वीर्यवान् ॥ २४ ॥ ये चाऽन्ये तत्र राजानः पूर्वमेव समागताः दुःशासनेन बीरेण सर्वैर्भ्रातृभिरेव च ॥ २५ ॥ जयद्रथेन च तथा कुरुभिश्चाऽपि सर्वशः ततः सर्वैर्महावाहुर्भ्रातृभिः परिवारितः ॥ २६॥ प्रविवेश गृहं राजो धृतराष्ट्रस्य धीमतः ददर्श तत्र गान्धारी देवी पतिमनुव्रताम् स्नुपाभिः संवृतां शश्वत्ताराभिरिव रोहिणीम् ॥ २७ ॥ अभिवाद्य स गान्धारी तया च प्रतिनन्दितः । ददर्श पितरं वृद्धं प्रज्ञाचक्षुपमीश्वरम् ॥ २८॥ राज्ञा मूर्धन्युपाघातास्ते च कौरवनन्दनाः चत्वारः पाण्डवा राजन्भीमसेनपुरोगमाः ॥ २९ ॥ ततो हर्षः समभवत्कौरवाणां विशांपते ! तान्दृष्ट्वा पुरुषव्याघान्पाण्डवान्प्रियदर्शनान् ॥३०॥ विविशुस्तेऽभ्यनुज्ञाता रत्नवन्ति गृहाणि च साथ-साथ भाइयों सहित बाहीक के दिये हुए रथ गये । यहां जाकर उन्होंने गान्धारी को दण्टयत् की, पर चढ़कर हस्तिनापुर पहुंचे ॥१७॥२१॥ और उससे आशीर्वाद पाकर उस वृद्ध अन्धे गजा और वहां धृतराष्ट्र, भीष्म, द्रोणाचार्य, कर्ण, धृतराष्ट्र के पास गये । राजा धृतराष्ट्र ने उनको गले अश्वत्थामा, मोमदत्त, दुर्योधन, गल्य, लगाया, और सब कौरव कुल के मनुष्य उनको देस- शकुनि, दुःशासन, जयद्रथ और अन्य राजा लोग कर प्रसन्न हुए । इसके उपरान्त सब मे आज्ञा लेकर, माई-बन्धु तथा कौरव कुल के लोगों से विधिपूर्वक महाराज युधिष्ठिर अपने रहने के लिये बनाये गये मिलकर भाइयों सहित धृतराष्ट्र के महल के भीतर भवन में गये ॥२२॥३०॥ MarwadMANIINutrimazawazawazwazurammarAIRBARIES - कृपाचार्य, VICUITIDIOMONTTIDUTTROTTEIT UNICORUMLULUMMICILIA २५७ म हा भारत अध्याय ५८] TUNTURNITUTITIOLITICTIHINITIATIIIIIIIIGIONar TANTwiuanturivuATTITUTER COTITIWTIMEDIA । ददृशुश्चोपयातांस्तान्द्रौपदीप्रमुखाः स्त्रियः याज्ञसेन्याः परामृद्धिं दृष्ट्वा प्रज्वलितामिव स्नुपास्ता धृतराष्ट्रस्य नाऽतिप्रमनसोऽभवन् ॥ ३२ ॥ ततस्ते पुरुषव्याघ्रा गत्वा स्त्रीभिस्तु संविदम् । कृत्वा व्यायामपूर्वाणि कृत्यानि-प्रतिकर्म च ॥ ३३ ॥ ततः कृताह्निकाः सर्वे दिव्यचन्दन भूपिताः कल्याणमनसश्चैव ब्राह्मणान्वस्ति वाच्य च मनोज्ञमशनं भुक्त्वा विविशुः शरणान्यथ ॥ ३४ ॥ उपगीयमाना नारीभिरस्वपन्कुरुपुङ्गवाः अनन्तरं च तत्प्राप्य प्रीताः परपुरञ्जयाः ॥ ३५ ॥ जगाम तेषां सा रात्रिः पुण्या रतिविहारिणाम् । स्तूयमानाश्च विश्रान्ताः काले निन्द्रामथाऽत्यजन्॥ ३६ ॥ सुखोपितास्ते रजनी प्रातः सर्वे कृताहिकाः सभा रम्यां प्रविविशुः कितवैरभिनन्दिताः ॥ ३७॥ इति श्रीमन्महाभारते सभापर्वणि शूतपर्वणि युधिष्ठिरसभागमने अष्टपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५८ ।। दु शला आदि राजकुमारियां और धृतराष्ट्र की पाठ कराया। फिर उत्तम भोजन करने के उपरान्त बहुए द्रौपदी के अलौकिक रूप सौन्दर्य और जड़ाऊ वे विश्राम करने लगे । सायंकाल को मनोहर गाना- गहनों की अद्भुत शोभा देखकर प्रसन्न होने के बजाना सुनकर वे सुख की नींद सोये । रात्रि भर बदले अप्रमन्न ही हुईं । आई हुई आत्मीय स्त्रियों विश्राम कर चुकने पर, रात्रि के पिछले पहर में से बात-चीत करके पाण्डवों ने नियमानुसार व्यायाम आकर, ग्तुति-पाठ करते हुए, बन्दीजन उन्हें जगाने किया, म्नान किया और फिर सन्ध्या-चन्दन आदि लगे । पाण्टयों ने उठकर प्रात काल के आवश्यक नित्य कर्म समाप्त किये। अङ्गों में चन्दन-अङ्गाग काम किये । फिर प्रसन्नता-पूर्वक धृतराष्ट्र की सभा आदि लगाकर, उन्होंने अमूल्य वन और आभूषण में सब भाई पहुंचे धूर्त शकुनि आदि ने वहां पहने । इस प्रकार प्रात काल के काम करके उन्होंने ' उनका खूब आदर और अभिनन्दन किया ॥३१॥३४॥ ब्राह्मणों को बहुत सा धन दिया और उनसे स्वस्ति- सभापर्व का अट्ठावनवा अध्याय समाप्त हुआ ॥५८॥ MAam.-- । - IIVILLUMIIIIIMLIMIUITUTION AMILLERATOMATOMARIMINATORamIIIIIIIIIII -, Raasanna - २५८ म हा भारत ममापर्व can umrraanduranimuTURINITISTOTTWITUTRITITTWITTNAGITATIrrorammarrrrra अथ एकोनपष्टितमोऽध्यायः ॥ ५९ ।। वेशम्पायन उवाच-प्रविश्य तां सभां पार्था युधिष्ठिरपुरोगमाः समेत्य पार्थिवान्सर्वान्पूजानिमिपूज्य च यथावयः समयाना उपविष्टा यथार्हतः आसनेषु विचित्रेषु स्पर्ध्याऽऽस्तरणवत्सु च तेपु तत्रोपविष्टेषु सर्वेष्वथ नृपेषु च शकुनिः सौबलस्तत्र युधिष्ठिरमभाषत शकुनिरुवाच-उपस्तीर्णा सभा राजन् ! सर्वे त्वयि कृतक्षणाः। अक्षानुप्त्वा देवनस्य समयोऽस्तु युधिष्ठिर! ॥ ४ ॥ युधिष्ठिर उवाच-निकृतिर्देवनं पापं न क्षात्रोऽत्र पराक्रमः न च नीतिधुवा राजन् ! किं त्वं द्यूतं प्रशंससि ? ॥ ५ ॥ न हि मानं प्रशंसन्ति निकृती कितवस्य हि शकुने ! मैवं नो जैषीरमार्गेण नृशंसवत् शकुनिरुवाच-यो वेत्तिसंख्यां निकृतौ विधिज्ञश्चेष्टाखखिन्नः कितवोऽक्षजासु । महामतिर्यश्च जानाति द्यूतं स वै सर्वं सहते प्रक्रियासु ॥ ७ ॥ अक्षग्लहः सोऽभिभवेत्परं नस्तेनैव दोषो भवतीह पार्थ ! उनसठवां अध्याय ।। ५९॥ वैशम्पायन ने कहा-हे राजा जनमेजय ! युधि- की जड़ है। न इसमें क्षत्रिय का पराक्रम है और ष्ठिर आदि पांचों पाण्डव सभा में जाकर यहां उप न यह नीति के ही अनुसार है । फिर तुम क्यों स्थित राजाओं से मिले । उन्होंने बड़ों को प्रणाम जुए की प्रशंसा कर रहे हो ? कपट करनेवाले धूर्त किया, बराबरवालों को गले से लगाया, और छोटों जुआरी का मान भी नहीं होता । इसलिए हे को म्नेहपूर्वक आशीर्वाद दिया । इसके पश्चात् वे | शकुनि ! तुम नीचों की तरह अन्याय और धूर्तता सब मूल्यवान् बढ़िया आसनों पर विराजमान हो गये। से, हमें जीतने का विचार छोड़ दो। शकुनि ने सबको वैठे देखकर राजा सुवल के पुत्र शकुनि ने कहा-हे महाराज ! आप जुआ खेलनेवाले को कपटी युधिष्ठिर से कहा-हे महाराज ! सभा में मब लोग | और गट कहकर, निन्दा करते हैं; किन्तु मेरी समझ आ गये हैं। ये चौसर का खेल आरम्भ होने की में, तो इस जुए के खेल को जाननेवाला पुरप बड़ा राह देख रहे हैं। अब आप पासे फेंककर, दाँव बुद्धिमान होता है, क्योंकि वह चालों को और लगाकर, खल आरम्भ कीजिए। यह सुनकर युधिष्ठिर | चौसर की गिनती को जानता है । जय और पराजय ने कहा-हे राजन् ! यह जुआ छलरूप और पाप का विचार कर सकता है, तथा सहनशील होता है। FDMEMBEDDIMANDARDDED TO HTTAMRIDHYARTHIJADAMPIRIDHENDEES : । , २५९ अध्याय ५९] म हा भारत UTTTTTTTTENTITUTITTITUTRUTruarpurTARAIITTARAIMIMIT TIME OriIn TurouTROUR manommWHER ART दीव्यामहे पार्थिव ! मा विशङ्कां कुरुष्व पाणंच चिरं च मा कृथाः ॥ ८॥ युधिष्ठिर उवाच-एवमाहाऽयमसितो देवलो मुनिसत्तमः इमानि लोकद्वाराणि यो वै भ्राम्यति सर्वदा ॥ ९ ॥ इदं वै देवनं पापं निकृत्या कितवैः सह धर्मेण तु जयो युद्धे तत्परं न तु देवनम् ॥ १० ॥ नार्या म्लेच्छन्ति भाषाभिर्मायया न चरन्त्युत । अजिह्ममशठं युद्धमेतत्सत्पुरुषव्रतम् शक्तितो ब्राह्मणार्थाय शिक्षितुं प्रयतामहे तद्वै वित्तं माऽतिदेवीर्मा जैपीः शकुने ! परान् ॥ १२ ॥ निकृत्या कामये नाऽहं सुखान्युत धनानि वा । कितवस्येह कृतिनो वृत्तमेतन्न पूज्यते ॥ १३॥ शकुनिरुवाच-श्रोत्रियः श्रोत्रियानेति निकृत्यैव युधिष्ठिर ! विद्वानविदुषोऽभ्येति नाहुस्तां निकृतिं जनाः ॥ १४ ॥ अक्षैर्हि शिक्षितोऽभ्येति निकृत्यैव युधिष्ठिर ! । हे महाराज ! पांमा पड़ना भाग्य के अधीन है,अपनी रहते हैं; उससे ब्राह्मणों का और प्रजा का विशेष इच्छा से कपट करके जय-पराजय कोई नहीं कर उपकार होता है । तुम लोगों के साथ कपट का सकता । इसलिए तर्क-वितर्क करना छोडकर आइए, जुआ खेलें, तो तुम हमारा यह सब धन जीत लोगे। हम लोग चौसर खेलें । कुछ, किसी बात की शङ्का 'दमलिए लोकोपकार में खर्च होनेवाले धन को घूर्तता न कीजिए । देर न करके दाव लगाइए, और पांसे के माथ, जुए में जीत लेना तुम्हें उचित नहीं। इसके फेंकिए । यह सुनकर युधिष्ठिर ने कहा-असित और अतिरिक्त में जुआ खेलकर उससे धन प्राप्त करना देवल आदि बड़े-बड़े ऋपियों ने कहा है कि छलियों या मुख-भोग करना भी नहीं चाहता। तात्पर्य यह के साथ छल से जुआ खेलना बड़ा पाप है युद्ध करके है कि जुआ खेलनेवाले धूर्त की इस लोक में कही जीतना ही श्रेष्ठ हे ॥१॥२०॥ प्रशसा नहीं होती और जुआ खलना कोई श्रेष्ठ काम श्रेष्ठ मनुप्य न तो म्लेच्छ-भाषा में बात-चीत भी नहीं है ॥११॥१३॥ कात है, और न छल-कपट करते है । क्रूरता और यह सुनकर शकुनी ने कहा-हे युधिष्ठिर ! यदि धूर्तता से बचकर युद्ध करना ही सज्जनों का काम आप जुआ खेलने में छल बताते है तो ऐसा कान है। देसो, हम लोग यथाशक्ति अपने सब धन को सा काम है जिसमें छल नहीं है। देखिए, अश्रो. ब्राह्मणों के उपकार और शिक्षा के प्रचार में लगाते , त्रियों के आगे श्रोत्रिय लोग, तत्त्वज्ञान मे हीन पुरुषों EPHERDAMPIRICIROMOTIOETITIOEMECORDIENTERTREETECTIECCCE aurIKHET.Cre मभापर्व म हा भा र त TuuuTOOTIOTIOICTIOmmunism TITUTIHAmuniruruImanurमया - । TAITHIMITrimurmuTERT: LALCUT.PIZMAD । विद्वानविदुषोऽभ्येति नाहुस्तां निकृति जनाः ॥ १५ ॥ अकृतास्त्रं कृतास्त्रश्च दुर्बलं बलवत्तरः एवं कर्मसु सर्वेषु निकृत्यैव युधिष्ठिर ! विद्वानविदुषोऽभ्येति नाहुस्तां निकृति जनाः ॥ १६ ॥ एवं त्वं मामिहाऽभ्येत्य निकृति यदि मन्यसे । देवनाद्विनिवर्तस्व यदि ते विद्यते भयम् ॥ १७ ॥ युधिष्ठिर उवाच-आहूतो न निवर्तेयमिति मे व्रतमाहितम् विधिश्च वलवानाजन्दिष्टस्याऽस्मि वशे स्थितः॥ १८ ॥ अस्मिन्समागमे केन देवनं मे भविष्यति प्रतिपाणश्च कोऽन्योऽस्ति ततो द्यूतं प्रवर्तताम् ॥ १९ ।। दुर्योधन उवाच-अहं दाताऽस्मि रत्नानां धनानां च विशांपते!। मदर्थे देविता चाऽयं शकुनिर्मातुलो मम ॥ २०॥ युधिष्ठिर उवाच-अन्येनाऽन्यस्य वै द्यूतं विषमं प्रतिभाति मे एतद्विद्वन्नुपादत्स्व काममेवं प्रवर्तताम् ॥ २१ ॥ इति श्रीमन्महाभारते सभापर्वणि रातपर्वणि युधिष्ठिरशकुनिमंवादे एकोनपप्टितमोऽध्यायः ।।५।। के पास तत्त्वज्ञानी लोग, मूर्ख पुरुषों के निकट यह सुनकर युधिष्ठिर ने कहा-हे शकुनि ! विद्वान् लोग, दुर्बलों के समीप बलवान् लोग और यह तो मेरा सदा का व्रत है कि किसी काम के अस्त्र-विद्या न जाननेवालों के आगे अस्त्र-विद्या जानने- लिये यदि कोई मुझे बुलायेगा, तो मैं उससे विमुख वाले लोग जय की इच्छा से जाते हैं और कपट यां न होऊँगा। होनी बड़ी प्रबल होती है; मैं उसी चतुराई से उनको जीतते है । इस व्यवहार को कोई होनी या दैव के अधीन है। तुम लोग जुए के लिये बुरा नहीं समझता । इसी प्रकार से जुए में भी जो मुझे बुलाते हो, तो मैं नाही,नहीं कर सकता; उसका मनुप्य पांसों के फेंकन की गति को अच्छी तरह फल चाहे जो हो। अच्छा, अब यह बताओ कि से जानता है, वह न जाननेवाले को जीत लेता है। इस सभा में मेरे साथ कौन खेलेगा ! इसका निश्चय इसमें छल का क्या काम है । और जो छल है, तो करके खेल शुरु हो । यह सुनकर दुर्योधन ने कहा- सभी बातों में छल है । इसलिये यदि आप खेलना हे महाराज ! दाँव लगाने के लिये रन और धन तो नहीं चाहते हैं, और खेलन को छल समझकर भयभीत में दूंगा और हमारे मामा जी आपके माय बेलेंगे हो रहे है तो जाने दीजिए, न खलिए ॥१४॥१७॥ ॥२८॥२१॥ मभापर्य या उनमठयां अध्याय समान हुआ ॥ ५ ॥ Erumaana.Di.. - apradana minा.पा.GACCATMIKAROCUMEWALCC.ar ० ] - - wiMHTTRATHISTARAIAIIMITIMAHITATE अध्याय महाभारत २६१ mIT TITORITIENTIVITITIERRIMITTrimurram TITUTIHARITRWImmm अथ पष्टितमोऽध्यायः ॥ ६॥ वैशम्पायन उवाच-उपोह्यमाने द्यूते तु राजानः सर्व एव ते धृतराष्ट्रं पुरस्कृत्य विविशुस्तां सभां ततः भीष्मो द्रोणः कृपश्चैव विदुरश्च महामतिः नातिप्रीतेन मनसा तेऽन्ववर्तन्त भारत ! ॥ २ ॥ ते द्वन्द्वशः पृथक्चैव सिंहग्रीवा महौजसः सिंहासनानि भूरीणि विचित्राणि विभेजिरे शुशुभे सा सभा राजन् ! राजभिस्तैः समागतः । देवैरिव महाभागैः समवेतैत्रिविष्टपम् सर्वे वेदविदः शूराः सर्वे भास्वरमूर्तयः प्रावर्तत महाराज ! सुहृद्यूतमनन्तरम् युधिष्ठिर उवाच-अयं बहुधनो राजन्सागरावर्तसंभवः मणिहारोत्तरः श्रीमान्कनकोत्तमभूषणः एतद्राजन्मम धनं प्रतिपाणोऽस्ति कस्तव येन मां त्वं महाराज ! धनेन प्रतिदीव्यसे ॥ ७ ॥ दुर्योधन उवाच सन्ति मे मणयश्चैव धनानि सुबहूनि च मत्सरश्च न मेऽर्थेषु जयस्वैनं दुरोदरम् वैशम्पायन उवाच-ततो जग्राह शकुनिस्तानक्षानक्षतत्त्ववित् जितमित्येव शकुनियुधिष्ठिरमभाषत इति श्रीमन्महाभारते सभापर्वणि ग्रूतपर्वणि द्यूतारंभे पष्टितमोऽध्याय. ॥६॥ वैशम्पायन कहते हैं-जुआ खेलने का निश्चय गर्दनवाले, अति तेजम्बी, राजाओं के एकत्रित होकर हो जाने पर सब राजा लोग अपने-अपने स्थानों पर अनेकानेक विचित्र आसनों पर अलग-अलग और जा बैठे । महागज धृतराष्ट्र राजसिंहासन पर विराज एक-एक में दो-दो के बैठने पर उस सभा की वैसी मान हुए। हे भरतनन्दन ! भीष्म, द्रोणाचार्य,कृपाचार्य ही शोभा हुई । उन विचित्र सिंहासनों पर बैठे हुए और महामति विदुर अति अप्रसन्नचित से उनके ये गजा लोग सभी शूरवीर, तेजम्वी और वेद-वेदात पीछे बैठे । महाभाग देवों के एकत्र मिलित होने से, के पण्डित थे । इस प्रकार देखनेवालों से समा भर स्वर्ग की जैसी शोमा होती है, उन सब सिंह समान जाने पर माई-भाई में जुआ होने लगा । युधिष्ठिर ने LALITIDINICOLANHAIYE ॥ साठवा अध्याय ॥६०॥ FORICARRITATO amr.umrar EMILOMITANULUTUUWI NAVIIMNICY AUTIVITIME LEANLIMILIUNILULL । महा मारत [सभापर्व FEMIXEIVITRIEVENINEMIERTAINMITORIAYIENTERTAINMMITTARITERATIATIVE दुर्योधन से कहा-समुद्र में उत्पन्न उत्तम मणियों मेरे पास बहुत सी मणियाँ, महामूल्य रल और अतुल का बना हुआ, सुवर्णमण्डित यह मूल्यवान् हार धन है । उस आप जीत लें । धन की हानि को मै मैं दाँव पर लगाता हूँ। इसके बदले में तुम क्या कुछ नहीं समझता । वैशम्पायन ने कहा-हे राजा लगाते हो ? तुम भी वह धन दिखाओ जिसकी बाज़ी जनमेजय ! इसके पश्चात् शकुनि ने पासे हाथ में लेकर लगाकर मुझसे खेलना चाहते हो। दुर्योधन ने कहा फेंके ओर कहा-यह दाँव मैने जीत लिया ॥१९॥ सभापर्य का साठवां अध्याय समाप्त हुआ ॥६॥ अथ एकपष्ठित्तमोऽध्यायः ॥६६॥ युधिष्ठिर उवाच-मत्त ! कैतवकेनैव यज्जितोऽस्मि दुरोदरे शकुने ! हन्त दीव्यामो ग्लहमानाः परस्परम् ॥ १ ॥ सन्ति निष्कसहस्रस्य भाण्डिन्यो भरिताः शुभाः। कोशो हिरण्यमक्षय्यं जातरूपमनेकशः एतद्राजन्मम धनं तेन दीव्याम्यहं त्वया वैशम्पायन उवाच-कौरवाणां कुलकरं ज्येष्टं पाण्डवमच्युतम् इत्युक्तः शकुनिः प्राह जितमित्येव तं नृपम् ॥ ३ ॥ युधिष्ठिर उवाच--अयं सहस्रसमितो वैयाघ्रः सुप्रतिष्ठितः सुचक्रोपस्करः श्रीमान्किङ्किणीजालमाण्डितः ॥ ४ ॥ सहादनो राजरथो य इहाऽस्मानुपावहत् जैत्रो रथवरः पुण्यो मेघसागरनिस्वनः अष्टौ यं कुमुदच्छायाः सदश्वा राष्ट्रसंमताः वहन्ति नैपां मुच्यत पदाभृमिमुपस्पृशन् इकसठया अध्याय ॥६॥ युधिष्ठिर ने कहा हे शकुनि ! कपट और कहा कि मैंने यह भी जीता ॥१३॥ छल का सहारा लेकर जीत जाने से इतना अहकार शकुनि को वह दाँव भी जीत लेते देखकर क्यों करते हो ? मैं और दाँव लगाता हूँ, आओ धर्मराज ने फिर शकुनि से कहा-यह जड़ाऊ रथ खेगे। मैं बार-बार दाँव लगाफर तुमसे खेलेगा। जिम पर हम चदकर आये है, और जो हजारों रयों मेरे यहाँ सहस्रों सुवर्ण-मुद्राओं से भरे हुए पड़, के ममान, न्याम के चर्म से मदा हुआ, घटालियों अक्षय मम्पति मे भरा हुआ ग्वजाना और असंग्न्य मे युक्त, और आठ श्वत रस के बहुत श्रेष्ठ पाड़ों में मणिनन हैं। इस मम्पत्ति का मैं दाव पर लगाता जुना हुआ और जिसके चलने में झनझनाहट मेष हैं। यह सुनकर शनि ने फिर पासा फेंका और की गरजना के समान होती है, मैं दाँप पर रगाता -- STATISTITATE armromanimumminsRIRRRRImaanar. - POTCOILETAILammercroreareCETI २६३ म हा भारत अध्याय ६१] TOMUTTOM TINGUITOINTITUTTON TWITTER EmmuTIMITTTTTTTTTTHI ROCITIATRALI innnnnnnnnnnnnnnnnn वैशम्पायन उवाच-1 DURALAMUITMITHATRAM एतद्राजन्धनं मह्यं तेन दीव्याम्यहं त्वया वैशम्पायन उवाच- एवं श्रुत्वा व्यवसितो निकृतिं समुपाश्रितः जितमित्येव शकुनियुधिष्ठिरमभाषत युधिष्ठिर उवाच-शतं दासीसहस्राणां तरुण्यो हेमभद्रिकाः कम्बुकेयूरधारिण्यो निष्ककण्ठ्यः स्खलंकृताः ॥ ८ ॥ महार्हमाल्याभरणाः सुवस्त्राश्चन्दनोक्षिताः मणीन्हेम च विभ्रत्यश्चतुःषष्टिविशारदाः अनुसेवां चरन्तीमाः कुशला नृत्यमामसु स्नातकानाममात्यानां राज्ञां च मम शासनात् । एतद्राजन्मम धनं तेन दीव्याम्यहं त्या -एतच्छ्त्वा व्यवसितो निकृति समुपाश्रितः । जितमित्येव शकुनियुधिष्टिरमभाषत ॥ ११ ॥ युधिष्ठिर उवाच-एतावन्ति च दासानां सहस्राण्युत सन्ति मे । प्रदक्षिणानुलोमाश्च प्रावारवसनाः सदा ॥ १२ ॥ प्राज्ञा मेधाविनो दान्ता युवानो मृष्टकुण्डलाः । पात्रोहस्ता दिवारात्रमतिथीन्भोजयन्न्युत एतद्राजन् ! मम धनं तेन दीव्याम्यहं त्वया ॥ १३ ॥ हूँ । वैशम्पायन कहते है-हे राजा जनमेजय यह फेंके और कहा कि यह भी मैने जीता ॥८॥११॥ सुनकर शकुनि ने फिर पाँसा फेंका और कहा कि दासियों को हार जाने पर युधिष्ठिर ने कहा- मेरे सदा वर पहने हुए, कुण्डलधारी, कार्यदक्ष, रथ हार जाने पर युधिष्ठिर ने कहा-मेरी एक लाख अनुकूल, प्राज्ञ, बुद्धिमान और जितेन्द्रिय सैकड़ों जगान दासियाँ मेरी आजा से सातक ब्राह्मण, मन्त्री अल्प अवस्थावाले दास है, वे प्रति दिन हाथों में और राजा लोगों की सेवा करती हैं और माला, पात्र लेकर अतिथियों को भोजन कराते है । उन्हें कंगन, धुंधरु आदि अनेक मणिजटित सुवर्ण के गहनों मै दाव पर लगाता हूँ । यह सुनकर शकुनि ने फिर और सुन्दर-सुन्दर वस्त्रों से अलकृत हैं और चौसठ पासा फेंका और कहा कि मै जीता ॥१२॥१४॥ कला और गाने-बजाने में बड़ी चतुर है, उनको मै अब धर्मराज युधिष्ठिर ने कहा- मेरे पास दाव पर लगाता हूँ । वैशम्पायन ने कहा-हे राजन् ! हज़ारों मतवाले हाथी सुनहरी झूल और माला धारण उस छली शकुनि ने उक्त दांव को सुनकर पासे किये हुए अच्छी तरह सिखाये हुए राजाओं की MANTRAINMETRIOTISMmmmmmWAMITREETITIERWISTORIES Month NTAR NA मैं जीता ॥४७॥ ।

२६४ म हा भारत सभाप MUSICHATTERITRIRIDIYIONITIATION Anantarance amarrARAAmanTATRA - वैशम्पायन उवाच-एतच्छ्रुत्वा व्यवसितो निकृति समुपाश्रितः । जितमित्येव शकुनियुधिष्ठिरमभापत युधिष्ठिर उवाच-सहस्रसंख्या नागामे मत्तास्तिष्ठन्ति सौवल ! हेमकक्षाः कृतापीडाः पद्मिनो हेममालिनः सुदान्ता राजवहनाः सर्वशब्दक्षमा युधि ईपादन्ता महाकायाः सर्वे चाऽष्टकरेणवः सर्वे च पुरभेत्तारो नवमेघनिभा गजाः एतद्राजन्मम धनं तेन दीव्याम्यहं त्वया ॥ १७ ॥ बैशम्पायन उवाच-इत्येवंवादिनं पार्थं प्रहसन्निव सौवलः जितमित्येव शकुनियुधिष्ठिरमभाषत युधिष्ठिर उपाच-रथास्तावन्त एवेमे हेमदण्डाः पताकिनः हयैर्विनीतैः संपन्ना रथिभिश्चित्रयोधिभिः ॥ १९ ॥ एकैको ह्यत्र लभते सहस्रपरमां भृतिम् युध्यतोऽयुध्यतो वाऽपि वेतनं मासकालिकम् । एतद्राजन्मम धनं तेन दीव्याम्यहं त्वया ॥ २० ॥ वैशम्पायन उवाच-इत्येवमुक्ते वचने कृतवैरो दुरात्मवान् जितमित्येव शकुनियुधिष्ठिरमभापत ॥ २१ ॥ सवारी के योग्य युद्ध में किसी शब्द से न डरने कार में रहता है । इन रथी सैनिकों को, चाहे युद्ध वाले आठ-आठ हथिनियों से युक्त और मेघ के करना पड़े और चाहे न करना पड़े, हर महीने हजार समान गर्जनेवाले है और जिनके शरीर बड़े-बड़े और मुद्रा की वृत्ति मै देता हूँ। ये रथी और रथ मेरी दात लम्बे-लम्बे है, उनको मैं दाव पर लगाता हूँ। सम्पत्ति है । मैं इन्हें भी दाव पर लगाता हूँ। वैशम्पा- वैशम्पायन कहते है-~हे राजन् ! शकुनि ने हँसकर यन कहत है---हे राजन् ! यह सुनकर उस दुष्ट फिर पामे फेंके और कहा कि मैने यह भी जीत और वैर रसनेवाले शकुनि ने पांसे फेंककर कहा लिया ॥१५॥१८॥ कि मै जीता ॥१९॥२१॥ युधिष्ठिर ने कहा-मेरे यहा इतने ही सुर्वण युधिष्ठिर ने फिर कहा-मेरे पास जो तीतर वर्ण मण्डित, विचित्र ध्वजाओं से शोभित रथ भी है। के, गन्धवों के देश के सुनहरी माला पहने हुए सी उनमें मुन्दर सिखाए हुए घोड़े जुतते हैं। हर एक घोड़े हैं, जिनको चित्ररथ गन्धर्ष ने युद्ध में जीते रथ एक-एक विचित्र युद्ध करनेवाले, योद्धा के अधि- जाने के कारण से अर्जुन को प्रीतिपूर्वक दिये थे, mmmmmmmmmmm BRITIYADLODPAREImmumruartmenceTREE:

म हा भारत nuTUNT । १ अध्याय ६१] २६५ rammmmator போப்பா युधिष्ठिर उवाच-अश्वास्तित्तिरिकल्मापान्गान्धर्वान्हेममालिनः ददौ चित्ररथस्तुष्टो यांस्तान्गाण्डीवधन्वने ॥ २२ ॥ 'युद्धे जितः पराभूतः प्रीतिपूर्वमरिन्दमः एतद्राजन्मम धनं तेन दीव्याम्यहं त्वया ॥ २३ ॥ वैशम्पायन उवाच- एतच्छ्रुत्वा व्यवसितो निकृति समुपाश्रितः । जितमित्येव शकुनियुधिष्ठिरमभाषत ॥ २४ ॥ युधिष्ठिर उवाच-रथानां शकटानां च श्रेष्ठानां चाऽयुतानि मे युक्तान्येव हि तिष्ठन्ति वाहैरुच्चावचैस्तथा ॥ २५ ॥ एवं वर्णस्य वर्णस्य समुच्चीय सहस्रशः यथा समुदिता वीराः सर्वे वीरपराक्रमाः ॥ २६ ॥ क्षीरं पिवन्तस्तिष्ठन्ति भुञ्जानाः शालितण्डुलान्। पष्टिस्तानि सहस्राणि सर्वे विपुलबक्षसः एतद्राजन् ! मम धनं तेन दीव्याम्यहं त्वया ॥ २७ ॥ वैशम्पायन उवाच एतच्छ्वा व्यवसितो निकृति समुपाश्रितः जितमित्येव शकुनियुधिष्ठिरमभापत ॥ २८ ॥ युधिष्ठिर उवाच- ताम्रलोहैः परिवृता निधयो ये चतुःशताः • पञ्चद्रौणिक एकैकः सुवर्णस्याऽहतस्य वै ॥ २९ ॥ जातरूपस्य मुख्यस्य अनर्येयस्य भारत ! एतद्राजन्मम धनं तेन दीव्याम्यहं त्वया ॥ ३० ॥ वैशम्पायन उवाच-एतच्छ्रुत्वा व्यवसितो निकृतिं समुपाश्रितः जितमित्येव शकुनियुधिष्ठिरमभापत ॥ ३१ ॥ इति श्रीमन्महाभारते सभापर्वणि हातपर्वणि देवने एकपष्टिनमोऽध्याय ॥ ६१ ।। उनको मैं दाव पर लगाता हू । वैशम्पायन कहते अच्छे वाहन भी हैं । नित्य चावल और दुग्ध का है-हे राजा जनमेजय! यह सुनकर उस छली शकुनि भोजन करके शक्ति बढ़ाते रहनेवाले, चौड़ी छाती- ने पांसा फेंककर कहा, यह भी मै जीता ॥२२॥२४॥ वाले, साठ हज़ार वीर पुरुष भी मेरे यहां हैं। मैं तत्र युधिष्ठिर ने कहा-मेरे यहा दस हजार यह सब सम्पत्ति दाव पर लगाता हू । [गबुनि तो बढ़िया रथ और छकड़े हैं। उनमें जुतनेवाले अच्छे. कपट के पासों से खेल ही रहा था 1] उसने फिर RTE AND TYLORDITIOGRAMDEHATIOMINETITICS TIMIREMATOGATIRITUTIOHITranm.w.marmananTUATAm म हा मारत समापर्व rammar । InmunarmananuTIranimummmmmmmmm भी बेखटके पांसे फेंके और कहा कि जीता। हुआ है, रक्खे हुए हैं। उनको मै दांव पर लगाता हूं। यह दांव भी हार जाने पर युधिष्ठिर ने कहा-ह वैशम्पायन कहते है-हे राजन् ! शकुनि ने हंसकर शकुनि ! मेरे पास तांबे और लोहे के चार सौ निधि फिर पांमे फेंके और कहा कि मै जीता ॥२५॥३१॥ जिन में पांच पांच द्रोण (१६ सेर) उत्तम सुवर्ण भरा सभापर्व का इकसठवां अध्याय समाप्त हुआ ।। ६१ ॥ rarue.marantraEARADAINImnainamummunrnmmmmm. MATTINTL. UN TAD NATION अथ द्विपटितमोऽध्यायः ॥ ६॥ वैशम्पायन उवाच एवं प्रवर्तिते द्यूते घोरे सर्वापहारिणि सर्वसंशयनिर्मोक्ता विदुरो वाक्यमब्रवीत् विदुर उवाच-महाराज! विजानीहि यत्त्वां वक्ष्यामि भारत! । मुमूर्पोरौषधमिव न रोचेताऽपि ते श्रुतम् यद्वै पुरा जातमात्रो रुराव गोमायुवद्विस्वरं पापचेताः । दुर्योधनो भारतानां कुलप्तः सोऽयं युक्तो भवतां कालहेतुः॥ ३ ॥ गृहे वसन्तं गोमायुं त्वं वै मोहान्न बुध्यसे दुर्योधनस्य रूपेण शृणु काव्यां गिरं मम मधु वै माध्विको लब्ध्वा प्रपातं नैव बुध्यते । आरुह्य तं मज्जति वा पतनं चाऽधिगच्छति सोऽयं मत्तोऽक्षयूतेन मधुवन्न परीक्षते प्रपातं बुध्यते नैव वैरं कृत्वा महारथैः यासठवां अध्याय ॥ ६२॥ वैशम्पायन ने कहा-हे रोजा जनमेजय ! जय का सा शब्द किया था, उसका फल अब आन उक्त रीति से घोर जुआ होने लगा, तब सब संशयों पहुंचा है, यही आप सब लोगों के कार का हेतु को दूर करनेवाले विदुर जी बोले-हे राजा धृतराष्ट्र! होगा । आपने इस दुर्योधन को मोह से अपने घर मैं आपसे कहता हूँ, उसको समाप्रिये । मैंने | में पुत्र नहीं किन्तु गीदड़ पाला है, अब इसके विषय आप से पहले भी वही कहा था,पर मेरा कहना आपको में जो कुछ करना उचित है यह मै शुक्र जी की अच्छा नहीं मालम हुआ । सच है, कि जब रोगी कही हुई नीति के अनुमार कहता हूं ॥१॥४॥ असाध्य जाता है तब उसको कोई दवा गुण नहीं शुक्रनीति में लिसा है कि मधु अर्थात् शहद करती है। अपने निश्चय समझ लिया कि जो का व्यापार करनेवाला मनुप्य गदद लगा हुआ दम. इस पापी दुर्योधन ने उत्सन होते ही गीदड़ के रोने । कर वृक्ष पर उसे लेने को न जाता है; उमे यह DroprammHDTARPRAVEEDEDIUINTHULEKDMCHORDERDParner EMARRIALHITr.Guara.com जो कुछ ।

IN Farmeshu PATIALAM . अध्याय ६२] म हा भारत २६७ awaimamimom TIWIXOITITIOmmmmmmmmmuTIPomorrrromanm.intory विदितं मे महाप्राज्ञ! भोजप्वेवाऽसमञ्जसम् । पुत्रं संत्यक्तवान्पूर्व पौराणां हितकाम्यया अन्धका यादवा भोजाः समेताः कंसमत्यजन् । नियोगात्तु हते तस्मिन्कृष्णेनाऽमित्रघातिना ॥ ८ ॥ एवं ते ज्ञातयः सर्वे मोदमानाः शतं समाः त्वनियुक्तः सव्यसाची निगृह्णातु सुयोधनम् । निग्रहादस्य पापस्य मोदन्तां कुरवः सुखम् काकेनेमांचित्रवर्हाञ्च्छार्दूलान्क्रोष्टकेन च क्रीणीष्व पाण्डवान्राजन्मा मज्जीः शोकसागरे ॥१०॥ त्यजेत्कुलार्थे पुरुष ग्रामस्यार्थे कुलं त्यजेत् ग्रामं जनपदस्यार्थे आत्मार्थे पृथिवीं त्यजेत् ॥ ११ ॥ सर्वज्ञः सर्वभावज्ञः सर्वशत्रुभयंकरः इति स्म भापते काव्यो जम्भत्यागे महासुरान् ॥ १२ ॥ हिरण्यष्टीविनः कांश्चित्पक्षिणो वनगोचरान् गृहे किल कृतावासाँलोभाद्राजा न्यपीडयत् ।। १३ ॥ .स चोपभोग लोभान्धो हिरण्यार्थी परन्तप! । विचार नहीं होता कि इतने ऊंचे से गिरूंगा तो जाने पर सब म्वजातीय प्रसन्न हुए । अब ये सब जीता न वचूंगा । परिणाम यह होता है कि वह बड़े आनन्द से रहते हैं। इसी प्रकार से आप भी गिर पड़ता है। वैसे ही यह नीच दुर्योधन, धन अर्जुन को आज्ञा दे दीजिए, कि वह दुर्योधन को पान की इच्छा से, जुए में मदवाला मा हो रहा निग्रहण अर्थात् गिरिफ्तार कर लेवें। ऐसा करने मे । इन महारथी पाण्डवों से वैर करने में होनेवाले सब कौरयों को बड़ा आनन्द होगा ॥५॥ अपने नाश का इसे जान ही नहीं। हे राजन् ! आप इस से हे धृतराष्ट्र ! आप को उचित है, कि पर बुद्धिमान् है कुछ विचारिए तो सही। पूर्व इस कौए और गीदडम्पी दुर्योधन के बदले में इन समय में किसी भोजवंगी राजा ने अपने पुरवासियों मयूर और शार्दूल रूपी पाण्डवों को मोल ले रेवें के हित के लिये अपने पुत्र को, जो अयोग्य था, त्याग और अपने को शोक के ममुद्र में न दुगावे, मनुष्य दिया था। उस पुत्र का नाम कंस था। सब अन्धक के कुलं के लिये एक आदमी को, माम के लिये यादव और भोजवंशियों के हित के लिये त्याग करने एक कुल को, देश के लिये एक ग्राम की, और पर श्रीकृष्ण जीने उमे मार डारा और उसके मारे । अपनी आत्मा के लिये- पानी भर को त्याग देना "ECRETREEEETINDEEDOSTOP TREE DrememEEEEEEEEEEEESee ताणERIATIC २६८ म हा भारत समापर्व SALA Umultimultitute आयतिं.च तदात्वं च उभे सद्यो व्यनाशयत् ॥ १४ ॥ तदर्थकामस्तद्वत्वं मा द्रुहः पाण्डवान् नृप! मोहात्मा तप्स्यसे पश्चात्पत्रिहा पुरुषो यथा ॥ १५ ॥ जातं जातं पाण्डवेभ्यः पुष्पमादत्व भारत! । मालाकार इवाऽऽरामे स्नेहं कुर्वन्पुनः पुनः वृक्षानगारकारीव मैनान्धाक्षीः समूलकान् मा गमः ससुतामात्यः सवलश्च यमक्षयम् ॥१७॥ समवेतान्हि कः पार्थान्प्रतियुध्येत भारत! मरुद्भिः सहितो राजन्नपि साक्षान्मरुत्पतिः इति श्रीमन्महाभारते सभापर्वणि गूतपर्वणि विदुरहितवाक्ये द्विपष्टितमोऽध्यायः ॥६२॥ उचित है। देखो, शुक्र जी ने जो सर्वज्ञ और सब हे राजन् ! माली जैसे स्नेह और यल के साथ के चित्त की वृत्ति के जाननेवाले हैं, असुरों से कहकर, वृक्ष-लता आदि में पानी सींचता है और पी. जब कि यह पुत्र तुम सब का शत्रु और सब को भय वे फूलते हैं, तब उनसे ढेर के ढेर फल पाता है, येसे दिलाने वाला होगा, जंभासुर को त्याग करवा दिया। ही आप भी पाण्डवों को स्नेह-जल से सींच कर इसी प्रकार से आप को भी इस दुर्योधन का त्याग अपनी भलाई के फूल प्राप्त कीजिए। कोयला बनाने- देना उचित है । किसी राजा ने मांस और सुवर्ण के । वाले व्यापारी लोग, जैसे वृक्षों को काट कर जरा लोभ से एक पक्षी को, जो वन में अपने घोंसले में डालते हैं, वैसे पाण्डवों को जड़ से उखाड़ कर उन्हें रहता था और नित्य सुवर्ण उगलता था, मार डाला। जला डालने का उपाय न कीजिए । पाण्डवों को ऐमा करने से, उस राजा के यह लोक और परलोक अपने बुरे वर्ताव से क्रोधित करके पुत्र, मन्त्री सना दोनों नादर हो गये । दम लिये अप भी पाण्डवों से , आदि के साथ यमपुर जाने का यह मत कीजिए। मैं द्रोह न कीजिए, नहीं तो आप को भी उस पक्षी के सत्य कहता हूं, जो इन्द्र भी मरुद्गणों सहित पाण्डकी मारनवाले राजा के समान दुःख होगा ॥१०॥१५॥ से युद्ध करे, तो वह भी नहीं जीत सक्ताहै ॥१६॥१४॥ मभापर्व का वामठयां अध्याय समाप्त हुआ ॥ ६ ॥ amaramanaraunam Hamannaanmaina Hirat.LtionTERPRINDER .. अथ त्रयःपप्टितमोऽध्यायः ।। ६३ ॥ विदुर इवान यूतं मूलं कलहस्याऽभ्युपैति मिथो भेदं महते दारुणाय । तदास्थितोऽयं धृतराष्ट्रस्य पुत्रो दुर्योधनः सृजते वैरमुग्रम् ॥ १ ॥ प्रातीपेयाः शान्तनवा भीमसेनाः सवाहिकाः । दुर्योधनापराधेन कृच्छू प्राप्स्यन्ति 'सर्वशः FEErimminPROMPriceDHEEEEEEEETIRLINEE ।

२६९ म हा भारत अध्याय ६३] TUTITIATITUTTAmarnamanumanrararamaan Anasturnimur TiLalnirmanRLAHITAL: दुर्योधनो मदनैप क्षेमं राष्ट्रादपोहति विपाणं गौरिव मदात्स्वयमारुजतेऽऽत्मनः यश्चित्तमन्वेति परस्य राजन्वीरः कविः स्वामवमन्य दृष्टिम् । नावं समुद्रे इव चालनेत्रामारुह्य घोरे व्यसने निमज्जेत् दुर्योधनो ग्लहते पाण्डवेन प्रीयायसे* त्वं जयतीति तच्च अतिनर्मा जायते संप्रहारो यतो विनाशःसमुपैति पुंसाम् ॥ ५ ॥ आकर्पस्तेऽवाक्फलः सुप्रणीतो हृदि प्रोटो मन्त्रपदः समाधिः । युधिष्ठिरेण कलहस्तवाऽयमचिन्तितोऽभिमतः स्ववन्धुना ॥ ६ ॥ प्रातिपेयाः!शान्तनवाः शृणुध्वं काव्यांवाचं संसदि कौरवाणाम्। वैश्वानरं प्रज्वलितं सुघोरं मा यास्यध्वं मन्दमनुप्रपन्नाः यदा मन्यु पाण्डवोऽजातशत्रुर्न संयच्छेदक्षमदाभिभूतः वृकोदरःसव्यसाची यमौ च कोऽत्र द्वीपः स्यात्तुमुले वस्तदानीम्॥ ८ ॥ महाराज ! प्रभवस्त्वं धनानां पुरा द्यूतान्मनसा यावदिच्छेः। तिरसठवां अध्याय ॥ ६३॥ विदुर जी ने फिरकहा-हे राजा धृतराष्ट्र ! यह जुआ आप यह जानकर प्रसन्न होते हैं, कि मेरा पुत्र फलह की जड़ और आपस में फूट डालनेवाला है। आप जुए में जीतता जाता है, परन्तु इस समय तो यह का पुत्र दुर्योधन जुआ नहीं खेलता है,किन्तु वैर की जड़ आप को विनोद दीख पड़ता है, और इसके अन्त जमा रहा है। इसके अपराध से प्रातीपेय,शान्तनव और में यही जुआ युद्ध रूप होकर मनुष्यों का नाश वाहकिवंशी सव मनुष्य वीरसेना वाले होने पर भी महा करेगा। आपने तो सब भाइयों की सम्मति के अनुसार फष्ट भोगेंगे। मदोन्मत्त बैल जैसे आप ही पहाड़ से अपने यह निश्चित किया था, कि हम पाण्डवों से अब सींग भिड़ाकर तोड़ लेता है, वैसे ही यह दुष्ट दुर्योधन विरोध न करेंगे । फिर आप इस कलह के मूल जुए अपनी भलाई और राज्य को अपने हाथ से मिटाना को क्यों कराते हैं ! हे प्रतीप और शन्तनु के वंश और खोना चाहता है । हे महाराज ! पालक जिसका के लोगो ! तुम तो सब दीर्घदशी हो । मैं शुम जी कर्णधार (महाद) हो उस नाव पर बैठकर समुद्र के पार की कही हुई नीति को कहता हूं, उसको मुनो और जानेवाला मनुष्य जैसे पोर मंकट में पड़ता है, वैसे मन्द बुद्धियों की मति पर चलकर अपने को पार पुरुष की भी बुरी गति होती है, जो स्वयं वीर भमि में मत जलाओ ॥५॥७॥ तथा बुद्धिमान होकर अपनी बुद्धि से काम नहीं लेता मला यह तो पनन्याओ कि हम जुए के मद से और दूसरे का मन रखना चाहता है ॥१३॥ मतवाले होकर युधिष्ठिर,भीमसेन,अर्जुन, नकुट और प्राधातासान्तस्य हितासाची स्विमार । PORNPITEptomsummerchantumeeecrrrrrrrrerecordLCEMLEELETECrearerarel २७० महा भारत सभापर्व ImmunmuTOTouTuuuN TAMITTARITUTORamuTurmare बहुवित्तान्पाण्डवांश्चेजयस्त्वं किं ते तत्स्याद्वसु विन्देह पार्थान् ॥ ९ ॥ जानीमहे देवितं सौवलस्य वेद द्यूते निकृतिं पार्वतीयः यतः प्राप्तः शकुनिस्तत्र यातु मा यूयुधो भारत! पाण्डवेयान् ॥ १० ॥ इति श्रीमन्महाभारते सभापर्वणि घृतपर्वणि विदुरवाक्ये त्रिषष्टितमोऽध्याय. ॥ ६३॥ सहदेव क्रोध को न रोककर तुमुल युद्ध करेंगे तब और पाण्डवों को ही अमूल्य धन समझ कर स्नेह तुम रोगों की कौन रक्षा करेगा ? हे राजा धृतराष्ट्र! से अपनाइए । राजा शकुनि को मैं अच्छी तरह से जुए के बिना भी आप बहुत सी सम्पत्ति प्राप्त कर जानता हूँ । चौसर के खेल में, पासों की चाराकी सकते है । आप के पास कुछ कम एश्वर्य नहीं है। में, इसके समान चतुर कोई नहीं है। इसलिये इससे पाण्डवों का धन जीत रेने से आपका कोई लाभ नहीं कहिए, यह अपने नगर को चला जाय । आप पाण्डवों मै सभापर्व का तिरसठवा अध्याय समाप्त हुआ ।। ६३ ।। अथ चतु पप्टितमोऽध्याय ॥४॥ दुर्योधन उवाच-परेपामेव यशसा श्लाघसे त्वं सदाक्षत्तः! कुत्सयन्धार्तराष्ट्रान्। जानीमहे विदुर! यत्प्रियस्त्वं वालानिवाऽस्मानवमन्यसे नित्यमेव ॥ १ ॥ स विज्ञेयः पुरुषोऽन्यत्रकामो निन्दाप्रशंसे हि तथा युनक्ति जिह्वा कथं ते हृदयं व्यनक्ति यो नज्यायसः कृथा मनसःप्रातिकूल्यम् ॥२॥ उत्सङ्गे च व्याल डवाऽऽहितोऽसि मार्जारवत्पोपकं चोपहंसि भर्तृघ्नं त्वां न हि पापीय आहुस्तस्मात्क्षत्तः! किं न विभेपि पापात्॥३॥ जित्वा शत्रून्फलमाप्तं महद्वै माऽस्मान्क्षत्तः परुपाणीह बोचः । चौंमठवा अध्याय ॥ ६४॥ तर दुर्योधन ने कहा-हे विदु सदैव प्रकट करती है । परन्तु हम को बड़ा आश्चर्य या हम रोगों की निन्दा करके दूसरों की बड़ाई किया है, कि जो मनुप्य द्वेष भी रखता है,वह भी रोक रजा करते हो । हम अच्छी तरह जानते हैं कि तुम दृमरों से उस द्वेष को प्रकट नहीं करता है, परन्तु तुम को ही के हित में अनुरक्त रहते हो। तुम हम बारक | रोक रज्जा भी नहीं है। तुम सर्प के समान गोद समझकर सदा हमारा अनादर किया करते हो । जो में और बिल्ली की तरह हमारे घर में रहकर हमारा मनुष्य अपने स्वामी की निन्दा और दूसरों की पढ़ाई ही गरा काटते हो। स्वामी के साथ द्रोह करना परता है, उसको समझना चाहिये, यह अपने स्वामी बड़ा पाप है, परन्तु आश्चर्य है, कि तुम पाप को नहीं चाहता है । तुम्हारी निहा (अयान) ही मे नहीं डरते हो। हमने तो अपने शत्रुओं को जीत तुम्हारे मन और अत करण (दिर)की द्वेपता को कर परम पुम्पार्थ या जीवन का पर प्राप्त किया art-rammi auramaadimanaananmamimaraHIKARuruRemiutaraa तुम , TourLr1319'D'UTITY'UTTUMITELT TASUTUSTIT(T!

२७१ म हा भारत अध्याय ६४] TITIATIDINTRONITIATRI TNTTINDINDITOTITOTTINETTAD STATET.CT. Incr.CTURaashin.........Cr.amaramanararamatar rarurtarraamanasonam द्विपद्भिस्त्वं संप्रयोगाभिनन्दी मुहुद्देपं यासि नः संप्रयोगात् ॥ ४ ॥ अमित्रतां याति नरोऽक्षमं ब्रुवन्निग्रहते गुह्यममित्रसंस्तवे तदाश्रितोऽपत्रप! किं नु वाधसे यदिच्छसित्वं तदिहाअभिभापसे ॥ ५ ॥ मा नोऽवमंस्था विद्म मनस्तवेदं शिक्षस्व वुद्धिं स्थविराणां सकाशात् । यशो रक्षस्व विदुर ! संप्रणीतं मा व्याप्तः परकार्येषु भूस्त्वम् ॥ ६ ॥ अहं कर्तेति विदुर ! मा च मंस्था मा नोनित्यं परुपाणीह वोचः। न त्वां पृच्छामि विदुर! यद्धितं मे खस्ति क्षत्ता तितिक्षिणु त्वम् । ७। एकः शास्ता न द्वितीयोऽस्ति शास्ता गर्भे शयानं पुरुपं शास्ति शास्ता । तेनाऽनुशिष्टः प्रवणादिवाऽम्भो यथा नियुक्तोऽस्मि तथा भवामि ॥ ८ ॥ भिनत्ति शिरसा शैलमहि भोजयते च यः धीरेव कुरुते तस्य कार्याणामनुशासनम् यो बलादनुशास्तीह सोऽमित्रं तेन विन्दति । मित्रतामनुवृत्तं तु समुपेक्षेत पण्डितः ॥ १० ॥ प्रदीप्य यः प्रदीप्ताग्निं प्राश्चिरं नाऽभिधावति । है, तुम हममे सोटे वचन मत कहो । तुम को हम । क्या प्रयोजन है । हम तुम से कुछ हित की सलाह से मित्रता करके शत्रु से मिलाप रखना ओर अन्त नहीं पूछते हैं । इस लिये तुम हम को बार बार करण में हम से द्वेष मानना उचित नहीं है ॥१४॥ दुःख मत दो। इस संसार में मामन करनेवा। जो मनुष्य क्षमा के अयोग्य वनन कहता है, एक ईश्वर ही है, दूसरा कोई नहीं है । यही उमको शत्रु समझना चाहिये । शत्रु की बड़ाई करने गर्भ में भी बालक को शासन करना है और उमी तुम्हारा छिपा हुआ वैर ठीक ठीक प्रकट होता । की इच्छा से मैं भी यह फर्म कर रहा है। देखो, । तुम को लज्जा नहीं आती है, कि हमारे पिता जो मनुष्य माप को पिलाना और पहाड़ की चोटी के आधित होकर, हम मे जो नाहे मी कह रहे पर चढ़कर चोरी कोही गिराता है, यह भी तो हो ! अब तुम हमाग अपमान मत कगे । हम तुम युद्धि रखता है। जो दूसरा कोई उममा युद्धि का प्रेरक को अच्छी तरह जानते हैं, वृद्ध मनुष्यों के पास बैठार न हो, नो क्या यह यह नही जान मनाई.किमांप चुदि मांगो। अपने उम या की रक्षा करो, जो को मिराने से मार काट मायगा और पहाड़ पर तुम को प्राप्त हो चुरा है । शत्रु के हित के कामों से गिर पहंगा । अनी रोग अपने पापन करनेवाले में अपने को मन रगाओ। करनेवाला नो में , को कभी शिक्षा नहीं करते है और जो कोई मनुस्म्य माग भामान करने और कटोर पनन पोरने मे, तर में आग रगा दे और नीम टम आग को #. TITTERTAmmm...mreparrrrrrrierrezermer CL.artiLGRICT . -- २७२ महा भारत सभापर्य ForwarmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmuTuuumaonirmwarananmranimurti । . paparinewz - भस्मापि न स विन्देत शिष्टं वचन भारत ! ॥ ११ ॥ न वासयेत्पारवयं द्विषन्तं विशेषतःक्षत्तरहितं मनुष्यम् । स यत्रेच्छसि विदुर! तत्र गच्छ सुसांविता ह्यसती स्त्री जहाति॥ १२ ॥ विदुर उवाच-एतावता पुरुष येत्यजन्ति तेषां सख्यमन्तवद् ब्रूहि राजन् ! । राज्ञां हि चित्तानि परिप्लुतानि सान्त्वं दत्त्वा मुसलैर्घातयन्ति ॥ १३ ॥ अबालत्वं मन्यसे राजपुत्र ! वालोऽहमित्येव सुमन्दबुद्धे ! यः सौहृदे पुरुषं स्थापयित्वा पश्चादेन दूषयते स वालः ॥ १४ ॥ न श्रेयसे नीयते मन्दबुद्धिः स्त्रीश्रोत्रियस्येव गृहे प्रदुष्टा। ध्रुवं न रोवेद्भरतर्षभस्य पतिः कुमार्या इव पष्टिवर्षः ॥ १५॥ अतः प्रियं चेदनुकाङ्क्षसे त्वं सर्वेषु कार्येषु हिताहितेषु स्त्रियश्च राजञ्जडपणुकांश्च पृच्छ त्वं वै तादृशांश्चैव सर्वान् ॥ १६ ॥ लभ्यते खलु पापीयान्नरो नु प्रियवागिह है अप्रियस्य हि पथ्यस्य वक्ता श्रोता च दुर्लभः ॥ १७ ॥ यस्तु धर्मपरश्च स्याद्धित्वा भर्तुः प्रियाप्रिये बुझाने का यन न करे तो,उस कपूर की उसको फिर सुहृद माने और पीछे उसी में दोष लगाकर उसकी राख भी नहीं मिलती है ५.११॥ बात का विश्वास न करे । जो मनुष्य मन्दबुद्धि इसी प्रकार से जो मनुष्य अपना शत्रु और होता है, वह किसी प्रकार से कल्याणकारी काम द्रोही हो, उसको अपने पास वसा कर कपूररूपी नहीं लगाया जा सकता है, जैसे वेदपाठी के घर कल्याण में आग लगवाना उचित नहीं है । इससे दुष्ट स्त्री होने से योग्य कर्म नहीं करती है। तुम अब तुम हमारे यहां से चले जाओ और जहां चाहे को हमारा हितकारी उपदेश इस प्रकार से अच्छा तहां रहो । दुर्योधन के ये वचन सुनकर विदुर जी नहीं मालूम होता है, जैसे कुमारी मी साठ वर्ष ने कहा-जो मनुष्य इतनी ही बात पर दूसरे को के पति को नही चाहती है ।१२।१५|| त्याग देता है, उसके साथ मित्रता सदैव नहीं रहती यदि तुम हित और अहित के सभी कामों में है । अब निश्चय हो गया कि राजा लोगों के चित्त प्रिय बात ही मुनना चाहते हो, तो स्त्री, जड़, द्वेष से भरे हुऐ रहते है । पहले तो ये मिल कर मित्र लँगड़े आदि से ही सम्मति लिया करो । संसार में, चना लेते हैं और पीछे से उसी को मूसलों से मारते हैं। भीतर के बुरे, पर प्रिय वचन बोलनेवाले, सुशामदी तुम मुझको अज्ञानी जानकर अपने को पण्डित समझते मनुष्य बहुत से मिल जायगे; परन्तु अप्रिय होने है। परन्तु अज्ञानी वही है, जो पहले तो किसी को पर भी हित की यात कहनेशले और मुननवान EHELKIRDERCITTEERTALCIALCHArcITCOINTMATERACTIODITORIEEEEEE में में ।

२७३ महा भारत अध्याय ६५] RGERamaximurmuTIMROTE INITIADIGARMINIANILIATTAuran EMAntantra अप्रियाण्याह पथ्यानि तेन राजा सहायवान् ॥ १८ ॥ अव्याधि कटुजं तीक्ष्णमुष्णं यशोमुपं परुपं पूतिगन्धिम् । सतां पेयं यन्न पिवन्त्यसन्तो मन्युं महाराज! पिय प्रशाम्य ॥ १९ ॥ वेचित्रवीर्यस्य यशो धनं च वाच्छाम्यहं सहपुत्रस्य शश्वत् यथा तथा तेऽस्तुनमश्च तेऽस्तु ममापिच स्वस्ति दिशन्तु विप्राः ॥ २० ॥ आशीविपान्नेत्रविपान्कोपयेन्न च पण्डितः एवं तेऽहं वदामीदं प्रयतः कुरुनन्दन ॥ २१ ॥ इति श्रीमन्महाभारते सभापर्यणि घृतपर्यणि विदुरहितवाक्ये पतु पप्टितमोऽध्याय. ।। ६४ ॥ रोग बहुत ही दुर्रम है । राजा की सहायता वही महारान धृतराष्ट्र का और उनके पुत्रों का यश और मनुष्य कर सकता है, जो राजा के प्रिय-अप्रिय काम धन पढ़े। मैं तुमको प्रणाम करता है । जिस तरह को करने के भय को छोड़कर और धर्म को श्रेष्ठ तुम अपने यश और धन की वृद्धि का होना समझो, मागर परिणाम में हित करनेवाले कडवे वचन उस तरह यही काम करो। मैं प्रामणों से प्रार्थना पड़ता है १६१८॥ फरता हूँ, कि वे मुझे कल्याण का भाशीर्वाद दें। असे कोई रोगी मनुष्य कडवी, तीक्ष्ण और फिर मी हे युरुनन्दन ! मैं तुममे यही कहता है, कंपनी औपधियों को पीकर आरोग्य हो जाता है, कि पण्डित पुरुष को उन पिले सपों को कुपित न इसी प्रकार से तुम भी हमारे कटुये, तीक्ष्ण, पेले, करना चाहिये, जिनकी दृष्टि में दारण विषदी आग या परनेवारे और मुम्ब देनेवाले औषध कसरी मन्त्र रहती है । तात्पर्य यह है कि तुम पाण्डवों को अपने को पीकर इस फरमप म्सी रोग को गान्त करो। अनुनिन व्यवहार से झोप न दिलाओ ।।१९।२१॥ में मदा यही चाहता है, कि विचित्रवीर्य के पुत्र मभापर्य पा चीमठवां अध्याय ममान हुआ ॥४॥ HamarapatwauniaTGza....... अथ पशुपष्टितमोभ्याय ॥५॥ गनिरयाच-यहु वित्तं पराजेपीः पाण्डवानां युधिष्टिर ! आचक्ष्व वित्तं कौन्तेय! यदि तेऽस्त्यपराजितम् ॥ १ ॥ युधिष्ठिर उवाच-मम वित्तमसंग्न्येयं यदहं येट सोयल ! पाटया अध्याय 1॥६५॥ भागनिने युधिष्ठिर में कहा-दे युधिष्ठिर' पुधिष्ठिर ने कहा- गजा मुरर पुगपनि भाव जुर में पाया यहुन मा पन हार पुर्व मेरे पास अभी पान मा धन, जिम में जानता है। भार पनि भाग पाममा पुरा गावि भोर मन के मरे में क्यों पूछने हो । मण, रो. विममे भर ममी सर नती हारे, सोमनाइए। अब मेरे पास जो भपुत,पपुर, महिमा, भद, २७४ महाभारत समा arrymaruanmuTIOINTITYour INTIMATERITUTrmiraramaramananml examrarunaravad । अथ त्वं शकुने ! कस्माद्वित्तं समनुपृच्छसि? ॥ २ ॥ अयुतं प्रयुतं चैव शकुं पद्मं तथाऽर्बुदम् खर्वं शङ्ख निखर्वं च महापद्मं च कोटयः मध्यं चैव परार्धं च सपरं* चात्र पण्यताम् एतन्मम धनं राजंस्तेन दीव्याम्यहं त्वया वैशम्पायन उवाच एतच्छ्रुत्वा व्यवसितो निकृतिं समुपाश्रितः । जितमित्येव शकुनियुधिष्ठिरमभापत युधिष्ठिर उवाच-गवाश्वं बहु धेनूकमसंख्येयमजाविकम् यत्किचिदनुपर्णाशां प्राक्सिन्धोरपि सौवल ! एतन्मम धनं सर्व तेन दीव्याम्यहं त्वया वैशम्पायन उवाच-एतच्छुत्वा व्यवसितो निकृतिं समुपाश्रितः । जितमित्येव शकुनियुधिष्ठिरमभापत युधिष्ठिर उवाच-पुरं जनपदो भूमिरब्राह्मणधनैः सह अब्राह्मणाश्च पुरुपा राजन् ! शिष्टं धनं मम एतद्राजन्मम धनं तेन दीव्याम्यहं त्वया वैशम्पायन उवाच-एतच्छ्रुत्वा व्यवसितो निकृतिं समुपाश्रितः । जितमित्येव शकुनियुधिष्ठिरमभापत युधिष्ठिर उवाच-राजपुत्रा इमे राजञ्छोभन्ते यैर्विभूपिताः रास, पद्म, महापद्म, कोटि, मध्य और परार्ध और । पर्णागा नदी और समुद्र के पास हैं, उन सब को इससे भी अधिक जितना धन है, सब को दांव पर दांव पर लगाता है । वैशम्पायन ने कहा-हे राजन् ! लगाता हूँ, तुम पांमा फेंको । वैशम्पायन ने कहा- । उस छली शकुनि ने यह दांव सुनकर पांसे के हे राजा जनमेजय ! उस छली शकुनि ने यह सुन- । और बोला कि मैं जीता । युधिष्ठिर ने कहा- -नगर, कर पांमा फेंक दिया और बोला, कि मैं यह सब देश, पृथ्वी, ब्राह्मणों के धन के मियाय सम वर्गों धन जीता ॥१५॥ का धन और वाग्मणों के मिवाय सब मनुष्यों को तर युधिष्ठिर ने कहा -अब मेरे पास जो पैल में दांव पर लगाता हूं, तुम पांसे फेंको । वैपायन पोडे, गौ और असम्न्य भेड़ और यकरियां यहां और ने कहा- राजन् ! यह एली पुनि रक्त दांव .मर गाधि परार्धा दप्यधिसमिमः । ४ धेन्ना (धदापागार ममी नुर दोरामाम् । उImaanmamta । OTTmr.wwwmwwmummmmmTIONur.comUTTREETICIATI Turmusunny TUATIOmmunimunR MATinnarin TITUTINE armanari Blutu.0- अध्याय ६५] म हा मारत २७५ Imrnm कुण्डलानि च निष्काचं सर्व राजविभूपणम् । एतन्मम धनं राजंस्तेन दीव्याम्यहं त्वया ॥ १०॥ वैशम्पायन उवाच-एतच्छुत्वा व्यवसितो निकृति समुपाश्रितः । जितमित्येव शकुनियुधिष्ठिरमभापतं ॥११॥ युधिष्ठिर उवाच-श्यामो युवा लोहिताक्षः सिंहस्कन्धो महाभुजः। नकुलो ग्लह एवैको विधयेतन्मम तद्धनम् ॥ १२ ॥ शकुनिरुवाच-प्रियस्ते नकुलो राजनराजपुत्रो युधिष्ठिर ! अस्माकं वशतां प्राप्तो भूयः केनेह दीव्यसे वैशम्पायन उवाच-एवमुक्त्वा तु तानक्षाशकुनिः प्रत्यदीव्यत जितमित्येव शकुनियुधिष्ठिरमभापत ॥ १४ ॥ युधिष्ठिर उवाच-अयं धर्मान्सहदेवोऽनुशास्ति लोके ह्यस्मिन्पण्डिताख्यां गतश्च । अनर्हता राजपुत्रेण तेन दीव्याम्यहं चाऽप्रियवत्प्रियेण ॥ १५ ॥ वैशम्पायन उवाच-एतच्छरुत्वा व्यवसितो निकृतिं समुपाश्रितः । जितमित्येव शकुनियुधिष्ठिरमभापत ॥१६॥ शकुनिरुवाच-माद्रीपुत्री प्रियौ राजंस्तवेमौ विजितौ मया गरीयांसौ तु ते मन्ये भीमसेनधनञ्जयो ॥ १७ ॥ को सुनकर प्रसन्न हुआ और पांसा फेंककर चोला फेंकते ही नकुल को जीतकर कहा --हे महाराज ! कि मैं जीता। इसके पीछे युधिष्ठिर ने कहा-ह आपके प्यारे भाई नकुल को मैंने जीत लिया। अब शकुनि ! ये सभा में उपस्थित सब राजपुत्र जो आप दाँव पर क्या लगाते हैं ! ॥१२॥१४॥ कुण्डल आदि आभूषण पहने हुए बैठे है, उन सब युधिष्ठिर ने कहा-हे शकुनि ! अब मैं अपने को मैं दांव पर लगाता हूँ। वैशम्पायन ने कहा-हे प्यारे माई सहदेव को, जो धर्म का उपदेश करने- राजन् ! उस छली शकुनि ने यह सुनकर पासे फेके याला और पण्डित है, दांव पर लगाता हूँ, यद्यपि और कहा में जीता ॥६॥११॥ यह इस योग्य नहीं है । वैशम्पायन ने कहा- तब युधिष्ठिर ने कहा- मैं अपने नकुल नाम राजन् ! वह छली शकुनि यह मुनकर और पांसे माई को, जो श्याम वर्ण और जवान है,नेत्र जिसके फेंककर चोला. कि मैं जीता । सहदेव को जानकर राल-लाल, कन्धे सिंह के से और यहि लम्बी-लम्बी शकुनि ने कहा-हे महाराज ! अपने प्यारे माई है, दाव पर लगाता हूँ । वैशम्पायन ने कहा-हे माद्री के पुत्रों को तो आप हार गये, अब भीर राजा जनमेजय ! शकुनि ने पहले की तरह पासे क्या लगाइएगा ! शायद मीममेन और अर्जुन को SERIELDENTIREPMOTIRTHIRTEETTER CMMADHMMLALAM. । TOPercry २७६ म हा मारत समापर्य anmunmunmunninnrum nundrrian IntunurunmunnmunAnurnnarurnmaram muurvarxraaaaaaaaaaaaaaa युधिष्ठिर उवाच-अधर्म चरसे नूनं यो नाऽवेक्षसि वै नयम् यो नः सुमनसां मूढ ! विभेदं कर्तुमिच्छसि ॥ १८ ॥ शकुनिरुवाच-गर्ते मत्तः प्रपतते प्रमत्तः स्थाणुमृच्छति ज्येष्ठो राजन्वरिष्ठोऽसि नमस्ते भरतर्षभ ! ॥ १९ ॥ स्वप्ने तानि न दृश्यन्ते जाग्रतो वा युधिष्ठिर ! । कितवा यानि दीव्यन्तः प्रलपन्त्युत्कटा इव ॥ २०॥ युधिष्ठिर उवाच-यो नः संख्ये नौरिव पारनेता जेता रिपूणां राजपुत्रस्तरस्वी । अनर्हता लोकवीरेण तेन दीव्याम्यहं शकुने! फाल्गुनेन॥ २१ ॥ वैशम्पायन उवाच-एतच्छुत्वा व्यवसितो निकृतिं समुपाश्रितः । जितमित्येव शकुनियुधिष्टिरमभापत ॥ २२ ॥ शकुनिरुवाच-अयं मया पाण्डवानां धनुर्धरः पराजितः पाण्डवः सव्यसाची। भीमेन राजन्दयितेन दीव्य यत्कैतवं पाण्डव! तेऽवशिष्टम् ॥ २३ ॥ युधिष्ठिर उवाच-यो नो नेता यो युधि नः प्रणेता यथा वजी दानवशत्रुरेकः । तिर्यक्प्रेक्षी संनतभ्रूर्महात्मा सिंहस्कन्धो यश्च सदाऽत्यमर्षी ॥ २४ ॥ वलेन तुल्यो यस्य पुमान्न विद्यते गदाभृतामग्य इहाऽरिमर्दनः । अनर्हता राजपुत्रेण तेन दीव्याम्यहं भीमसेनेन राजन् ! ॥ २५ ॥ आप दांव पर न रख सकें क्योंकि वे आप को इन दिखाई नहीं देती हैं । यह सुनकर युधिष्ठिर ने कहा-हे दोनों भाइयों से अधिक प्यारे हैं । यह सुनकर शकुनि ! अच्छा, हम अपने भाई अर्जुन को जो युधिष्ठिर ने कहा-हे नीति को न जाननवाले मूढ़ ! हम सब को युद्ध में नाव की तरह पार उतारनेवाला तू हम भाइयों में, परस्पर सम्मति देखकर, ' फूट और शत्रुओं को जीतनेवाला है, उसको मैं दांव पर डलवाना चाहता है। निम्सन्देह यह तेरा घोर लगाता हूँ, यद्यपि यह इस योग्य नहीं है। वैशम्पायन अधर्म है ॥१५॥१८॥ ने कहा-हे राजन् ! उस छली शकुनि ने इस दांव शकुनि ने कहा-हे महाराज ! आप पाण्डवों के बड़े को सुनकर पामा फेंका और कहा कि में जाता और माननीय हैं । इस लिये मैं आपको प्रणाम करके ॥१९॥२२॥ कहता हूँ, कि धन में चित लगाकर अधर्म करनेवाला और उसको जीतकर कहने लगा,कि मैं पाण्डवों मनुष्य नरकगामी या स्थावर योनियों में पैदा होता है के बड़े धनुषधारी अर्जुन को तो जीत चुका । अब और जिन-जिन बातों को मतवाले जुआरी लोग कहते आप के पास भीमसेनरूपी धन और रह गया है। दें, ये बातें स्वम अथवा जाग्रत अवस्था में भी यहां उसको भी दांव पर लगा दीजिए । यह धन भी RamanaranMATERIAL । IMILTODAImuTIDIOMOOMAVATumcmCECTOURICom TITUThilm unmunninimirriAnnnnnnim अध्याय ६५] म हा भा र त ২ও৩ mmmmmmmmmmxnima वैशम्पायन उवाच-एतच्छुत्वा व्यवसितो निकृति समुपाश्रितः । जितमित्येव शकुनियुधिष्ठिरमभापत ॥२६॥ शकुनिरुवाच-बहु वित्तं पराजैपीतश्च सह यद् द्विपान् । आचक्ष्व वित्तं कौन्तेय! यदि तेऽस्त्यपराजितम् ॥ २७ ॥ युधिष्ठिर उवाच-अहं विशिष्टः सर्वेषां भ्रातृणां दयितस्तथा कुर्यामहं जितः कर्म स्वयमात्मन्युपप्लुते ॥ २८॥ वैशम्पायन उवाच-एतच्छ्रुत्वा व्यवसितो निकृतिं समुपाश्रितः । जितमित्येव शकुनियुधिष्ठिरमभापत ॥ २९॥ शकुनिरुवाच-एतत्पापिष्ठमकरोर्यदात्मानं पराजयः शिष्टे सति धने राजन्पाप आत्मपराजयः ॥३०॥ वैशम्पायन उवाच-एवमुक्त्वा मताक्षस्तानलहे सर्वानवस्थितान् । पराजयं लोकवीरानुक्त्वा राज्ञां पृथक्पृथक् ॥३१॥ शकुनिरुवाच-अस्ति ते वे प्रिया राजनलह एकोऽपराजितः । खिलाड़ियों से जीतने के योग्य है । यह सुनकर | कहा-हे शकुनि ! मैं सब भाइयों का प्यारा और युधिष्ठिर ने कहा-हे शकुनि ! दानवों के शत्रु, इन्द्र। इस जुए में हारनेवाला शेष रह गया हूँ, सो में अपने के समान बली और प्रतापी, युद्ध में हम लोगों के आप को दांव पर लगाता हूँ । वैशम्पायन ने कहा- अगुआ का काम करनेवाले, सिंहस्कन्ध,परम क्रोधी, हे राजन् ! उस छली शकुनि ने यह सुनकर पांसा भौहें टेदी करके तिरछी दृष्टि से देख रहे इन भीमसेन ' फेंका और कहा कि में जीता ॥२७॥२९॥ को मैं दांव पर लगाता हूँ। पृथ्वी पर बल में जिनकी युधिष्ठिर को भी जीतकर शकुनि ने उनसे बराबरी कर सकनेवाला कोई पुरुष नहीं है,गदायुद्ध कहा-हे कुन्तीपुत्र ! आप ने यह बड़ा नीच काम में जो अद्वितीय हैं, उन शत्रुदमन राजपुत्र भीमसेन किया, जो धन के शेष रहने पर अपने आप को हार को भी में दांव पर लगाता हूँ, यद्यपि वह इस योग्य दिया। धन शेष रहने पर अपने को हारना पाप नहीं है विशम्पायन ने कहा-हे राजन् ! यह मुनकर का हेतु होता है । वैशम्पायन ने कहा- रामा शनि ने फिर पांसा फेंका और कहा कि मैं जीता जनमेजय ! पामे हाथ में लिये शकुनि ने इस प्रकार कपट के जुए में अलग-अलग प्रसिद्ध और अद्वितीय गनि ने फिर कहा-हे महाराज ! बहुत से वीर पाण्डयों को जीत चुकने पर कहा, महाराज मणि, रन, धन, हाथी-घोडे, रथ और भाइयों को अमी आप की एक सम्पति गंप है, रमे आप नही भी आप हार गये । अब ऐसा कुछ धन आप के पाम हारे हैं।। अप आर पाशाली दोपदी को दांव पर हो जिसे आप न हारे हों, तो बताइए । युधिष्ठिर ने लगा दीजिए । जो इम पार माप की जीत हुई तो . ॥२३॥२६॥ . REMENT PTEMEETTEEReprerarmacarrcrerrerrererence २७८ म हा भारत सभापर्व Forumniumintinumanumanmrunmunmunia SurATTAmruramminnrrrrring । TOTRAM पणस्व कृष्णां पाञ्चाली तयाऽऽत्मानं पुनर्जय ॥ ३२ ॥ युधिष्ठिर उवाच-नैव ह्रस्वा न महती न कृशा नाऽतिरोहिणी । नीलकुञ्चितकेशी च तया दीव्याम्यहं त्वया ॥ ३३ ॥ शारदोत्पलपत्राक्ष्या शारदोत्पलगन्धया शारदोत्पलसेविन्या रूपेण श्रीसमानया ॥ ३४ ॥ तथैव स्यादानृशंस्यात्तथा स्याद्रूपसंपदा तथा स्याच्छलिसंपत्त्या यामिच्छेत्पुरुषः स्त्रियम् ॥ ३५ ॥ सर्वैर्गुणैर्हि संपन्नामनुकूलां प्रियंवदाम् याहशीं धर्मकामार्थसिद्धिमिच्छेन्नरः स्त्रियम् . ॥ ३६ ॥ चरम संविशति या प्रथमं प्रतिबुध्यते आगोपालाविपालेभ्यः सर्वं वेद कृताकृतम् ॥ ३७॥ आभाति पद्मवद्वक्त्रं सस्वेदं मल्लिकेव च वेदीमध्या दीर्घकेशी ताम्रास्या नातिलोमशा ॥ ३८ ॥ तयैवंविधया राजन्पाञ्चाल्याऽहं सुमध्यया ग्लहं दीव्यामि चार्वङ्गया द्रौपद्या हन्त सौवल! ॥ ३९ ॥ वैशम्पायन उवाच-एवमुक्ते तु वचने धर्मराजेन धीमता धिग्धिगित्येव वृद्धानां सभ्यानां निःसृता गिरः॥४०॥ आप दासत्व से छुटकारा पा जायँगे ॥३०॥३२॥ पीछे सोती है; और गोपाल आर मेपपाल आदि तक यह सुनकर युधिष्ठिर ने कहा-जो न बहुत के कामों की देख-भाल रखती है । उसका कमल- छोटी है और न यहुत लम्बी; न बहुत मोटी है और तुल्य मुख पसीना निकलने से मल्लिका के फूल के न पहुत दुबली; जिसके नील कुंचित केश हैं। जिसके समान देख पड़ता है। उसके शरीर में बहुत गएँ नेत्र शरद ऋतु के फूले हुए कमलों के समान हैं; नहीं है। उसकी कमर पतली और बाल लम्बे हैं। जिसके शरीर में कमल की मुगन्ध निकलती है। यद्यपि उस सर्वाङ्गसुन्दरी द्रौपदी को दांव पर लगाना जिसके हाथ में कमल का फूल शोमा बढ़ाया करता बड़े दुःख की बात है, परन्तु मैं उसे भी दाँव पर है, उसके गुण, आज्ञा का पालन, मीठा बोल, और लगाता हूं । वैशम्पायन ने कहा-हे राजा जनमेजय ! धर्म-अर्थ और काम की सिद्धि को देखकर ऐमा युधिष्ठिर के मुख से यह सुनते ही वृद्ध लोग भार कोई मनुष्य नहीं है, जो उसे न चाहे ॥३३३३६|| सय समासद धिकार है, विकार है, कहने लगे वह सब से पहले सोकर उठनी और सबसे ॥३७॥४०॥ RAATOLTARATTIMEGHAGRAATARRIER - TUCIONTTINDI DUVETASTATUTO DuoMTCTCorororerorcm* २७९ अध्याय ६६] म हा मारत RAATRAINITADAmmarAThImaramanumaantar STORImmuTuirroranturariOTORATRIOTurm - TRICTARAT - चुक्षुभे सा सभा राजनराज्ञां संजज्ञिरे शुचः भीष्मद्रोणकृपादीनां स्वेदश्च समजायत ॥४१॥ शिरो गृहीत्वा विदुरो गतसत्व इवाऽभवत् आस्ते ध्यायन्नधोवस्त्रो निःश्वसन्निव पन्नगः ॥४२॥ धृतराष्ट्रस्तु तं हृष्टः पर्यपृच्छत्पुनः पुनः किं जितं किं जितमिति ह्याकारं नाभ्यरक्षत ॥ ४३ ।। जहर्ष कर्णोऽतिभृशं सह दुःशासनादिभिः इतरेषां तु सभ्यानां नेत्रेभ्यः प्रापतज्जलम् ॥४४॥ सौवलस्त्वभिधायेवं जितकाशी मदोत्कटः जितमित्येव तानक्षान्पुनरेवाऽन्वपद्यत ॥ ४५ ॥ इति श्रीमन्महाभारते सभापर्वणि शूनपर्वणि द्रौपदीपराजये पञ्चषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६५ ॥ उस समय सब राजा लोग शोक करन लग और क्या जीता है ! क्या जीना है ? उस समय कर्ण, भीष्म, द्रोणाचार्य, कृपानार्य की देह में से पसीना दुःशामन आदि हँसने लगे और समा में बेठे हुए निकलने लगा । और विदुर जी सिर पकड़ कर नीचे । मनुष्यों की आंखों से आंसू गिरने लगे। इसके पीछे को मुम्ब किये हुए सर्प के समान श्वास लेने लगे। उस छली शकुनि ने द्रौपदी को दांव पर घरा हुआ उस समय धृतराष्ट्र अपने मन के भाव को नहीं छिपा सुनकर पासे उछालिये और फेंक कर कहने लगा सके । वे प्रसन्न हो-होकर बार-बार पूछने लगे- कि मैं जीता ॥४१।४५|| समापर्व का पैसठयां अध्याय समाप्त हुआ ॥६५॥ । ITALLL - विदुर उवाच- अथ पट्पष्टितमोऽध्यायः ॥६६॥ दुर्योधन उवाच-एहि क्षत्तोपदीमानयस्व प्रियां भार्या समतां पाण्डयानाम् । संमार्जतां वेश्म परेतु शीघ्र तत्रास्तु दासीभिरपुण्यशीला ॥ १ ॥ दुर्विभाष भापितं त्वादृशेन न मन्द ! संवुध्यसि पाशवद्धः प्रपाते त्वं लम्बमानो न वेत्सि व्याघ्रान्मृगः कोपयसेऽतिवेलम् ॥ २ ॥ छामठयां अध्याय ॥ ६॥ युधिष्ठिर के सर्वम्व हारने पर दुर्योधन ने विदुर हमारे घर की बुहारी दिया करे 1 यह सुनकर विर जी से कहा है विदुर ! तुम अभी जाकर पाण्डवों जी ने कहा है मन्द मुंद ! नून ये जो कटार की प्यारी म्पी द्रौपदी को सभा में ले आओ । यह वचन रहे हैं उन्हें कोई पुरष, जो मनुष्य होने का अध्यशीरा (अमागिन) दासियों के साथ रहकर अभिमान रमता होगा, नहीं देगा ।तू पास-पान Eureremonymsuhammmmumerentirror AWATION.A AriannAY TW 09.01.566.7 २८० म हा मारते [समाप Imminimutuamrunuwanrmmunmurariummmumm purTOTHIGrammarnment आशीविषास्ते शिरसि पूर्णकोपा महाविपाः मा कोपिष्ठाः सुमन्दात्मन्!मागमस्त्वं यमक्षयम् ॥ ३ ॥ न हि दासीत्वमापन्ना कृष्णा भवितुमर्हति अनीशेन हि राज्ञैषा पणे न्यस्तेति मे मतिः ॥ ४ ॥ अयं धत्ते वेणुरिवात्मऽऽघाती फलं राजा धृतराष्ट्रस्य पुत्रः द्यूतं हि वैराय महाभयाय मत्तो न बुध्यत्ययमन्तकाले नाऽरुन्तुदः स्यान्न नृशंसवादी न हीनतः परमभ्याददीत । ययाऽस्य वाचा पर उद्विजत न तां वदेदुपतीं* पापलोक्याम् ॥ ६ ॥ समुच्चरन्त्यतिवादाश्च वक्त्राद्यैराहतः शोचति रात्र्यहानि परस्य नाऽमर्मसु ते पतन्ति तान्पण्डितो नावसृजेत्परेषु अजो हि शस्त्रमगिलत्किलैकः शस्त्रे विपन्ने शिरसाऽस्य भूमौ। निकृन्तनं स्वस्य कण्ठस्य घोरं तद्वद्वैरं मा कृथाः पाण्डुपुत्रैः ॥ ८ ॥ न किंचिदित्थं प्रवदन्ति पार्था बनेचरं वा गृहमेधिनं वा। तपस्विनं वा परिपूर्णविद्यं भपन्ति हैवं श्वनराः सदैव ॥ ९ ॥ द्वारं सुघोरं नरकस्य जिमं न बुध्यते धृतराष्ट्रस्य पुत्रः । तमन्वेतारो बहवः कुरूणां द्यूतोदये सह दुःशासनेन ॥ १० ॥ में बँधा हुआ है, इसी से कुएँ में पाँच लटकाकर वाला है । इस जुए में बड़ा भारी वैर उत्पन्न हो गया भी अपने पतन को नहीं जान पाता । तू मृग होकर और दुर्योधन अन्त समय आने के कारण से मतदारा व्याघों को क्रोध दिला रहा है । हे दुरात्मा ! नियम हो रहा है। मनुष्य को कठोर वचन बोरना,ममों को का उल्लङ्घन न कर । हे नीच बुद्धिवाले दुर्योधन ! | छेदना, नीच कर्म से शत्रु को वश में करना और दूसरे विपैले सर्प कुपित होकर तेरे सिर पर बैठे हैं; उनको , को जलानेवाली ओर उद्वेग करनेवाली बात कहना, अब अधिक कुपित करके तू यमपुर जाने की तैयारी उचित नहीं है । ऐसा करने से मनुष्य नरकगामी होता मत कर । दीपदी कभी तेरी दासी नहीं हो सकती। है। जो मनुष्य मर्यादा के विपरीत ऐसे वचन दूसरे से क्योंकि युधिष्ठिर ने पहले अपने को हारकर फिर कहता है, जिनके कारण से दूसरे को दिन रात सोच द्रौपदी को दाव पर लगाया है। अपने हारने पर रहता है, उसका फल कहनेवाराही मागता है। दूसरे युधिष्ठिर द्रौपदी का ईश नहीं रहा । मुझे दीखता है, का उससे कुछ विगाड़ नहीं हो सकता। जो पण्डित हैं, कि यह दुर्योधन राजा येणु की तरह शीघ्र नष्ट होने- वे ऐसे वचन दूसरे से कभी नहीं कहते हैं। एक • उपना दाहिका, सतमिति पाठान्नरम, भरयाणामिति तदर्थः। - VIDOETITIETomrawructerrararamNLOPMEAmreeramoELECri २८१ महा मारत अध्याय ६७] HTTURTANTurammarAILamraparoramma BHARATruRIGuTDEVUNT - मज्जन्त्यलावूनि शिलाः प्लवन्ते मुह्यन्ति नावोऽम्भसि शश्वदेव ! मूढो राजा धृतराष्ट्रस्य पुत्रो न मे वाचः पथ्यरूपाः शृणोति ॥ ११ ॥ अन्तो नूनं भविताऽयं कुरूणां सुदारुणः सर्वहरो विनाशः वाचः काव्याः सुहृदां पथ्यरूपा न भूयन्ते वर्धते लोभ एव ॥ १२ ॥ इति श्रीमन्महाभारते सभापर्वणि शूतपर्वणि विदुरयाक्ये पट्पष्टितमोऽध्यायः ॥ ६६ ॥ बकरे ने कहीं पड़े हुए एक शस्त्र को निगल लिया । है । और दुःशासन आदि बहुत से मनुष्य इस धूत था । इमसे उस बकरे का गला कट गया, अन्त में , आदि कामों में उसके साथी हैं । ये सब डूबना वह मूर्व बकरा मर गया । इसी तरह हे दुर्योधन! चाहते हैं और मेरे पथ्यरूपी वचनों को नहीं सुनते । तू पाण्डवों से वैर करके अपने हाथों अपना नाश अब इस दुर्योधन के कारण से सब हरण और मत कर । पाण्डव लोग कभी वनवासी, गृहम्थ, विद्वान् कुरुवंशियों का नाश होना चाहता है । सब मुहदों तपम्ची, किसी में ऐसे कठोर और बुरे वचन नहीं । को पथ्य के समान जो हमने शुक्र के कहे हुए कहते। नीच और कुत्ते की प्रकृतिवाले लोग ही ऐसे वाक्य सुनाये हैं, उनको यह लोग नहीं सुनते हैं खोटे वचन कहते और भौंकते हैं । नरक का बड़ा और अपने लोभ को यदाते जाते हैं ॥१॥१२॥ द्वार कुटिलता है। दुर्योधन इस बात को नहीं जानता मभापर्व का चमठयां अध्याय ममाप्त हुआ ॥६६॥ PHOG अथ मतपप्टितमोऽध्यायः ॥ ६ ॥ वैशम्पायन उवाच धिगस्तु क्षत्तारमिति ब्रुवाणो दर्पण मत्तो धृतराष्ट्रस्य पुत्रः । अवेक्षत प्रातिकामीं सभायामुवाच चेनं परमार्यमध्ये दुर्योधन उयाच वं प्रातिकामिन्द्रोपदीमानयस्व न ते भयं विद्यते पाण्डवेभ्यः । क्षत्ता ह्ययं विवदत्येव भीतो न चास्माकं वृद्धिकामः सदेव ॥ २ ॥ प्रातिकामी स सूतः प्रायाच्छीघं राजवचो निशम्य । सदसठवां अध्याय ॥६७ ॥ वगायन ने कहा-हे राजा जनमेजय ! दुगत्मा नहीं है । ये विदुर पाण्डवों के भय से ही मुझे ऐमे दुर्योधन ने विदुर जी को बार-बार धिक्कार देकर क्टोर वचन सुना रहे हैं । विशेषकर ये हमारी मानिकामी की ओर देखा । वह उस मरी सभा में यदीतरी नहीं चाहते, इसी कारण सदा हमारा विरोध मानिकामी मे कहने लगा-हे प्रातिकामी ! तुम इमी किया करते हैं । वैशम्पायन ने कहा है राजन् ! ममय जाकर द्रौपदी को इस सभा में ले आओ। वट सारथी प्रातिकामी दुर्योधन की मात्रा पाकर इन होर हुए विवश पाण्डवों से तुम्हें कुछ भी भय पाण्डवों के रहने के स्थान में इस प्रकार मे घुम ०प्रनितमीसम्ममान्त इसमय । FREETTEERIAGE DETERMEEraserrrrrECREECErrerarareer PULATIERamniron पैशम्पायन उवाच एवमुक्तः २८२ महा भारत मभापत्र ImrnmmmmmmmmmmmmmmmmmmitramanTTTTTTTTTTTISTITLinuumrrrrnar प्रविश्य च श्वेव हि सिंहगोष्ठं समासदन्महिषी पाण्डवानाम् ॥३॥ प्रातिकाम्युवाच युधिष्ठिरो द्यूतमदेन मत्तो दुर्योधनो द्रौपदि ! वामजैषीत् । सा त्वं प्रपद्यस्व धृतराष्ट्रस्य वेश्म नयामि त्वां कर्मणे याज्ञसेनि!॥ ४ ॥ द्रौपद्युबाच-कथं त्वेवं वदसि प्रातिकामिन् ! को हि दीव्येद्भार्यया राजपुत्रः । मूढो राजा द्यूतमदेन मत्तो ह्यभून्नाऽन्यत्कैतवमस्य किंचित् ॥५॥ प्रातिकाम्युवाच यदा नाऽभूत्कैतवमन्यदस्य तदाऽदेवीत्पाण्डवोऽजातशत्रुः । न्यस्ताः पूर्व भ्रातरस्तेन राज्ञा स्वयं चात्मा त्वमथो राजपुत्रि! ॥ ६ ॥ द्रौपायाच-गच्छ त्वं कितवं गत्वा सभायां पृच्छ सूतज!। किं नु पूर्व पराजैपीरात्मानमथवाऽपि माम् एतज्ज्ञात्वा समागच्छ ततो मां नय सूतज ! । ज्ञात्वा चिकीर्पितमहं राज्ञो यास्यामि दुःखिता ॥ ८ ॥ वैशम्पायन उवाच-सभां गत्वा स चोवाच द्रौपद्यास्तद्वचस्तदा युधिष्ठिरं नरेन्द्राणां मध्ये स्थितमिदं वचः कस्येशो नः पराजैपीरिति त्वामाह द्रौपदी किं नु पूर्व पराजैपीरात्मानमथवाऽपि माम् ॥ १० ॥ युधिष्टिरस्तु निश्चता गतसत्व इवाऽभवत् गया, जैसे कुत्ता सिंह के भवन में प्रवेश करता है। कहा-युधिष्ठिर जुए में सब राज्य और धन हार अब पाण्डवों की पली, द्रोपदी के पास जाकर उस गये। अन्त में जब कुछ न बचा, तब उन्होंने पहले प्रातिकामी ने कहा-हे द्रौपदी ! युधिष्ठिर जुए अपने भाई और अपने को हार दिया और पीछे के मद में मतवाले हो रहे हैं, उन्होंने तुमको हार तुमको भी हार गये । द्रोपदी ने कहा-अच्छा, तू दिया है और दुर्योधन ने तुमको जीता है । इमलियं में जाकर राजा मे पूछ, कि उन्होंने पहले मुझ तुम अव दुर्योधन के भवन में चलो और वहां दासियों को हारा है, या अपने को ? उनके उत्तर को सुनकर के साथ काम-काज करो ॥१॥४॥ फिर तेरे साथ चलेंगी, यद्यपि इस में मुझ को बड़ा यह सुनकर द्रौपदी ने कहा-हे प्रातिकामी ! दुःख है ॥५॥८॥ ऐसा कौन राजपुत्र मूद जुए के मद से मतवाला वैशम्पायन कहते हैं-द्रौपदी की बात को सुन-- होगा, जो स्त्री रूपी धन से जुआ खेलेगा ! तू यह : कर प्रातिकामी सभा में गया और युधिष्ठिर से पूछने क्या कह रहा है ! क्या युधिष्ठिर के पाम जुआ लगा, कि आप से द्रौपदी ने पूछा है, कि खेलने को और कुछ धन नहीं है !.प्रातिकामी ने । पहले किस को हारा है, मुझ को, या अपने को ! - सभा आप ने मारANTCOILMHIVY HIATRICTWITMurenTECEMALEECRECENCE २८३ म हा मारत अध्याय ६७] TituRIAnimanirary CAUTIOITTI ATTIRTITITIONPUUTTTT. -~~mritTRAL न तं सूतं प्रत्युवाच वचनं साध्वसाधु वा दुर्योधन उवाच-इहैवाऽऽगत्य पाञ्चाली प्रश्नमेनं प्रभाषताम् इहैव सर्वे शृण्वन्तु तस्याश्चैतस्य यद्वचः ॥ १२ ॥ वंशम्पायन उवाच-स गत्वा राजभवनं दुर्योधनवशानुगः उवाच द्रौपदी सूतः प्रातिकामी व्यथन्निव ॥ १३॥ प्रानिकाम्युयाच-सभ्यास्त्वमी राजपुत्र्याह्वयन्ति मन्ये प्राप्तः संशयः कौरवाणाम् । न वै समृद्धिं पालयते लघीयान्यस्त्वां सभा नेप्यति राजपुत्रि!॥ १४ ॥ द्रीपयुवान-एवं नूनं व्यदधात्संविधाता स्पर्शावुभी स्पृशतो वृद्धवालो । धर्म वेकं परमं प्राह लोके स नः शमं धास्यति गोप्यमानः ॥ १५ ॥ सोऽयं धमों माऽत्यगात्कौरवान्वे सभ्यान्गत्वा पृच्छ धयं वचो मे। ते मां ब्रूयुनिश्चितं तत्करिष्ये धर्मात्मानो नीतिमन्तो वरिष्टाः ॥ १६ ॥ श्रुत्वा सूतस्तद्वचोयाज्ञसेन्याः सभांगत्वा प्राह वाक्यं तदानीम् । अधोमुखास्ते न च किंचिदूचुर्निर्वन्धं तं धार्तराष्ट्रस्य बुध्वा थैमाग्पायन उवाच-युधिष्ठिरस्तु तच्छुत्वा दुर्योधनचिकीर्पितम् द्रौपद्याः संमतं दृतं प्राहिणोद्भरतर्षभ! ॥ १८॥ एकवस्त्रा त्वधोनीवी रोदमाना रजस्वला यह मुनकर युधिष्ठिर ने अच्छा अथवा बुरा कुछ यह विधाता का ही विधान है । बूढ़े और पालक उत्तर नहीं दिया । तब दुर्योधन ने प्रातिकामी मे सभी उसी विधाता के विधान के अनुसार मुख या -द्रोपटी यही आकर, जो कुछ पूछना हो सो दुख पाते हैं । संसार में धर्म ही सब मे पढ़कर धर्मराज मे पूछ । इम मभा में ही सब लोग द्रौपदी है, मुझे निश्चय है, मेरा धर्म ही मेरी रक्षा करेगा। थी और इनकी यात-चीन मुंने ॥२॥१२॥ इम रिये तू अब फिर मभा में जार मय नीति बाप्पायन ने कहा- राजा जनमेजय ! वह प्राति- जाननेवाले और गुणवान् श्रेष्ठ ममा में बैठे हुए कामी दुर्योधन की आना पाकर फिर द्रौपदीके पास गया मनुष्यों से कह दे, कि कौरवों को अपना धर्म छोड़ना और कहने लगा-हे गजयुमारी : मभामद लोग तुमको उचित नहीं है। मुझ निश्चय करके ठीक-टीक पर ममा में ही युलाने । मुझे जान पड़ता है कि अब दें, उत्तर पाने पर जमा ये पहेंग वैमादी करेंगी काग्यों नाम होने का समय आ गया ।दुर्योधन ॥१३॥१६॥ अग्नी पद्धि अब नहीं चाहता है, इसी कारण में तुम वैशम्पायन कहने १-यद मुनगर या प्रानि. को यदी युनाता है। द्रोपदी ने कहा- मन पुर! फामी फिर ममा में गया और जो छोटी ने - कहा- T.TTET TOUR 4E1::":...... HELL.Tunt.:"

२८४ महा मारत सभापर्व Aurminut amzoranREDIRECEREDura Erraneaonrrantramumravran antrunnr rurrrrrrrrrrrrrrr arunarnirmirritanurorer. सभामागम्य पाश्चालि ! श्वशुरस्याऽग्रतो भव ॥ १९ ॥ अथ त्वामागतां दृष्ट्वा राजपुत्रीं सभां तदा सभ्याः सर्वे विनिन्देन्मनोभिधृतराष्ट्रजम् ॥ २० ॥ स गत्वा त्वरितं दूतः कृष्णाया भवनं नृप न्यवेदयन्मतं धीमान्धर्मराजस्य निश्चितम् ॥ २१ ॥ पाण्डवाश्च महात्मानो दीना दुःखसमन्विताः । सत्येनाऽतिपरीताङ्गा नोदीक्षन्ते स्म किंचन ॥ २२ ॥ ततस्त्वेषां मुखमालोक्य राजा दुर्योधनः सूतमुवाच हृष्टः । इहैवैतामानय प्रातिकामिन्प्रत्यक्षमस्याः कुरवो ब्रुवन्तु ॥ २३ ॥ ततः सूतस्तस्य वशानुगामी भीतश्च कोपाद् द्रुपदात्मजायाः । विहाय मानं पुनरेव सभ्यानुवाच कृष्णां किमहं ब्रवीमि॥ २४ ॥ दुर्योधन उवाच दुःशासनैप मम सूतपुत्रो वृकोदरादुद्विजतेऽल्पचेताः । स्वयं प्रगृह्याऽऽनय याज्ञसेनी किं ते करिप्यन्त्यवशाः सपत्नाः ॥ २५ ॥ ततः समुत्थाय स राजपुत्रः श्रुत्वा भ्रातुः शासनं रक्तदृष्टिः । प्रविश्य तद्वेश्म महारथानामित्यव्रवीद् द्रौपदी राजपुत्रीम् ॥ २६ ॥ कहा था, कह सुनाया, परन्तु पाण्डवों ने उस इसके पीछे दुर्योधन ने पाण्डवों का मुख देख कर दुर्योधन के हठ को जान कर कुछ उत्तर नहीं दिया, प्रसन्न होकर प्रातिकामी को आज्ञा दी, कि तू द्रौपदी नीचे को गर्दन झुकाये हुए बैठे रहे। वैशम्पायन को यहीं ले आ। यहां सब कौरववंशियों के सामने, ने कहा, कि के पश्चात् राजा युधिष्ठिर ने उस जो कुछ उसको कहना हो, सो प्रत्यक्ष कहे । यह मुन- पात को सुनकर जो दुर्योधन किया चाहता था, । कर उस सूत ने द्रौपदी के कोप से भयभीत होकर द्रौपदी के पास दूत भेज कर कहला भेजा, कि तू । और दुर्योधन की आजा को तिरस्कार करके समा. यद्यपि रजस्वला और एक वत्र ही पहने हुए है। वाले मनुष्यों से पूछा, कि मैं द्रौपदी से क्या जाकर परन्तु अब यहां आकर अपने श्वसुर राजा धृतराष्ट्र कहूँ ! यह सुनकर दुर्योधन ने दुःशासन को आज्ञा के सम्मुख खड़ी हो जा। यह सुनकर वह दूत द्रौपदी दी, कि यह मेरे सूत का बेटा भीमसेन से डरा हुआ फे पास गया और जो कुछ युधिष्ठिर ने कहा था, है, तेरा अब शत्रु कुछ नहीं कर सकते हैं, तु, आप पद मुनाया ॥१७॥२१॥ जाकर द्रौपदी को पकड़ सा ।।२२।२५।। म समय पाण्डयों ने दु.सी दीन और मत्य यह माना पाकर दुःनामन सभा में से स्टार से पूर्ण होकर लज्ञा के मारे कार को दृष्टि नहीं की। टन मदारथी पाण्डवों के पर के भीतर चल गया ccHD2018RDOIEDOD.DDDDDDDDUDompMR.RRECren

२८५
अध्याय ६७]
म हा भारत
WIMMITTran
INTENTIN
PournuTUTIO
TOTIC
ParsmJWHWRomaxmTITUREMIUIDAIAD
एह्येहि पाञ्चालि!जिताऽसि कृष्णे!दुर्योधनं पश्य विमुक्तलज्जा ।
कुरून्भजस्वाऽऽयतपत्रनेत्रे! धर्मेण लब्धाऽसिसभां परैहि ॥ २७ ॥
ततः समुत्थाय सुदुर्मनाः सा विवर्णमामृज्य मुखं करेण ।
आर्ता
प्रदुद्राव यतः स्त्रियस्ता वृद्धस्य राज्ञः कुरुपुङ्गवस्य ॥ २८ ॥
ततो जवेनाऽभिससार रोपादुःशासनस्तामभिगर्जमानः ।
दीर्धेषु नीलेष्वथ चार्मिमत्सु जग्राह केशेषु नरेन्द्रपत्नीम् ॥ २९ ॥
ये राजसूयावभृथे जलेन महाक्रतौ मन्त्रपूतेन सिक्ताः ।
ते पाण्डवानां परिभूय वीर्यं वलात्प्रमृष्टा धृतराष्ट्रजेन ॥ ३० ॥
सतां पराकृष्य सभासमीपमानीय कृष्णामतिदीर्घकेशीम् ।
दुःशासनो नाथवतीमनाथवञ्चकर्ष वायुः कदलीमिवाऽऽर्ताम् ॥ ३१ ॥
सा कृप्यमाणा नमिताऽङ्गायष्टिःशनैरुवाचाऽथ रजस्वलाऽस्मि
एकं च वासो मम मन्दबुद्धे सभां नेतुं नाऽर्हसि मामनार्य ॥ ३२ ॥
ततोऽब्रवीत्तांप्रसभं निगृह्य केशेषु कृष्णेषु तदा स कृष्णाम् ।
और द्रौपदी से कहने लगा-हे पांचारी ! हे कृष्णा ! ! राजसूय यज्ञ में अवभृय नाम लान में मन्त्रों के
आओ-आओ। तुम्हें जुए में कौरवों ने पाण्डयों जल से सींचे गये थे, उन्हीं को दुःशासन ने पाण्डवों
से जीत लिया है । अब लज्जा छोड़कर सभा में चलो के पराक्रम को कुछ न समझकर पकड़कर मरोर
और दुर्योधन को देखो। हे कमल नयनी ! अब
डाला । हवा से हिल रहे केले के समान कॉपती हुई
तुम कौरवों की सेवा करो, क्योंकि हम लोगों ने | और सनाथ होने पर भी अनाथ हो रही, बड़े-बड़े
तुमको धर्म से जीतकर प्राप्त किया है। अब पालोयाली द्रौपदी को खींचता हुआ दु शासन सभा
[ दुरात्मा दुःशासन के लाल-लाल नेत्र देखकर के पास ले आया। तप अपने को खींच रहे दु शासन
और उसका बलपूर्वक ले जाने का विचार जानकर ] मे द्रोपदी ने धीमे से कहा हे मन्दबुद्धि ! हे नीच !
द्रौपदी अत्यन्त दुखी हुई । वह अपने उदाम चेहरे में इस समय रजस्वला हूँ और एक ही वम पहने
पर यह रहे आँसुओं को हाथों से पोंछती हुई आर्त हुए है। इमलिये तू मुझे गुरुजनों के आगे समा
भाव से रनियास की ओर भागी, जहा धृतराष्ट्र के मैं मत ले चल, किन्तु दु गामन को कुछ दया न
पर ही स्त्रियाँ थी। नीच दुचामन भी क्रोध के आई । इसके पश्चात् "हे कृष्ण ! हे अर्जुन ! हे
मारे गरजता हुआ द्रोपदी के पीछे दौड़ा, घोड़ी ही हार! नर ! मेरी रक्षा को ऐमा शोक द्रौपदी
दूर पर उमने द्रौपदी के शोभायमान गारों को पकड़
करने लगी। इतने में दुशामन ने और भी जोर से
चाल पारकर सींचते हुए. द्रौपदी से कहा-दे पाचाग!
देम्वा ईश्वर की क्या गति है, कि जो पाल , चाहे तुम रजम्यग हो, या एक या दो अथवा वस-
REPREMEDIETORIEDmmeRTIEl
TICLETITML
निया ॥२६॥२९॥

२८६ म हा भारत मभापर्व Ammiumm.nummyurmummmmmmmmmmrogrammerinanimal LADIGITamiREANINITIONARIES कृष्णं च जिणुं च हरिं नरं च त्राणाय विक्रोशति याज्ञसेनी ॥ ३३ ॥ दु शासन उवाच-रजस्वला वा भव याज्ञसेनि ! एकाम्बरा वाऽप्यथवा विवस्त्रा। द्यूते जिता चासि कृतासि दासी दासीपु वासश्च यथोपजोपम् ॥ ३४ ॥ वैशम्पायन उवाच प्रकीर्णकेशी पतितार्धवस्त्रा दुःशासनेन व्यवधूयमाना । हीमत्यमर्पण च दह्यमाना शनैरिदं वाक्यमुवाच कृष्णा॥ ३५ ॥ द्रौपापाच इमे सभायामुपनीतशास्त्राः क्रियावन्तः सर्व एवेन्द्रकल्पाः । गुरुस्थाना गुरवश्चैव सर्वे तेपामग्रे नोत्सहे स्थातुमेवम् ॥ ३६ ।। नृशंसकर्मस्त्वमनार्यवृत्त ! मा मा विवस्त्रां कुरु मा विकाीः । न मर्पयेयुस्तब राजपुत्राः सेन्द्रापि देवा यदि तेसहायाः॥ ३७ ॥ धर्मे स्थितो धर्मसुतो महात्मा धर्मश्च सूक्ष्मो निपुणोपलक्ष्यः । वाचाऽपि भर्तुः परमाणुमात्रमिच्छामि दोपं न गुणान्विस्मृज्य ॥ ३८ ॥ इदं स्वकार्य कुरुवीरमध्ये रजस्वलां यत्परिकर्षसे माम् । न चापि कश्चित्कुरुतेऽत्र कुत्सां ध्रुवं तवेदं मतमभ्युपेतः ॥ ३९ ॥ धिगस्तु नष्टः खलु भारतानां धर्मस्तथा क्षत्रविदां च वृत्तम् । रहित ही क्यों न हो, जुए में जीती गई हो, अतएव हे दुष्ट । इस समय महात्मा युधिष्ठिर धर्म के दासी बनी हो, दासियों को स्वामी की इच्छा के विचार में है, जो कि बडा सूक्ष्म हे । उस धर्म को अनुसार वस्त्रादि दिया जाता है ॥३०॥३४॥ वही लोग जानते है, जिनकी बड़ी सूक्ष्म बुद्धि होती वैशम्पायन कहते है-हे राजा जनमेजय । तब । इस लिये मै उस युधिष्ठिर में मियाय गुणों के वह द्रोपदी, जिसके शरीर पर से आधा वस्त्र गिर दोष तो यत्किचित् भी नहीं देखती हूँ । हाय, गया था, बाल फैल गये थे ओर दु शासन के खींचने तू मुझ रजम्पला जानकर भी कोरव नीरों के के कारण से काप रही थी, क्रोध करके धीरे से आगे बलपूर्वक सींच रहा है, यह बड़ा भारी वर्म बोली इस सभा में सब बड़े यूढे गुरु के समान, हे, पर इन सभासदों में से कोई इस कार्य के लिये सब शास्त्र जाननेवारे बैठे हुए है, उनके आगे इस तेरी निन्दा नहीं करता । जान पडना है, तेरे हाथों प्रकार से मैं क्योंकर जा सकती ह ? हे नीच ! हे मेरा अपमान होना सब को पसन्द हे । धिकार है, निर्दयी । तू मुझे नही क्यों करता हे और क्यों मो वार धिक्कार है । अहो, आज भरतपय वालों का खींचता है। यदि इन्द्र भी देवताओं पहित तेगे धर्म और क्षत्रियों का चरित्र नष्ट हो गया क्योंकि । सहायता करेगा, तो भी इन राजपुत्रों के मोध करने समा में बैठे हुए सर कौरव ऐमे आचरण को देख पर तू नहीं बचेगा ॥३५॥३०॥ रहे हैं, जो कौरव वश के धर्म के विरद्ध है। [तृ धर्म EWWIILTELUTNUTILI TILATTULITAITOTELIT CLUTCHLINITE LaharBAFLADIGInm ManITRINASIALSTATrming ។ M"TIOIL M २८७ म हा मारत अध्याय ६७] TRA NomanummmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmumoromNDAIDArt ARRECTIOt यत्र ह्यतीतां कुरुधर्मवेलां प्रेक्षन्ति सर्वे कुरवः सभायाम् ॥४०॥ द्रोणस्य भीष्मस्य च नास्ति सत्वं क्षत्तुस्तथैवाऽस्य महात्मनोऽपि । राज्ञस्तथा हीममधर्ममुग्रं न लक्षयन्ते कुरुवृद्धमुख्याः ॥४१॥ वैशम्पायन उवाच-तथा ब्रुवन्ती करुणंसुमध्यमाभर्तृन्कटाक्षःकुपितानपश्यत् । सा पाण्डवान्कोपपरीतदेहान्संदीपयामास कटाक्षपातैः॥ ४२ हृतेन राज्येन तथा धनेन रत्नेश्च मुख्यैर्न तथा बभूव । यथा त्रपाकोपसमीरितेन कृष्णाकटाक्षेण वभूव दुःखम् ॥ ४३ ॥ दुःशासनश्चापि समीक्ष्य कृष्णामवेक्षमाणां कृपणान्पतीस्तान् । आधूय वेगेन विसंज्ञकल्पामुवाच दासीति हसन्सशब्दम् ॥ ४४ ॥ कर्णस्तु तद्वाक्यमतीव हृष्टःसंपूजयामास हसन्सशब्दम् । गान्धारराजः सुवलस्य पुत्रस्तथैव दुःशासनमभ्यनन्दत् ॥ ४५ ॥ सभ्यास्तुये तत्र बभूवुरन्ये ताभ्यामृते धार्तराष्ट्रेण चेव । तेपामभृद्दुःखमतीव कृष्णां दृष्ट्वा सभायां परिकृप्यमाणाम् ॥ १६ ॥ भीष्म उवाच-नधर्मसौम्यात्सुभगे ! विवेक्तुं शक्नोमिते प्रश्नमिमं यथावत्। की और अपने कुल की मर्यादा का उलधन कर दुम्वित हुए, जितने कि सारा साम्राज्य और धन- रहा है, किन्तु कोई कुछ नहीं कहता1] ममझ गई, रन हाथ से निकल जाने से भी नहीं हुए थे। दीन भीम, द्रोणाचार्य और महात्मा विदुर में अब पुरुषार्थ दशा में पड़े हुए पाण्डवों की ओर द्रोपदी को नि- नहीं रहा । तभी तो ये मत्र कुरुवंग के बड़े बूढ़े रोग हारते देख दुरात्मा दु.शासन उमे और भी जोर गजा के इस भयर अधर्म को घटे देख रहे हैं और से खींचने और 'दासी' कह कहकर, हमने लगा। बुश कर नहीं सकते। ॥३८॥४॥ यह देखकर कर्ण भी जोर से हमने और दुःनामन वैशम्पायन न पहा-हे राजन् ! इस प्रकार की बड़ाई करने लगा। गान्धार-गज युनि मी करुगाजनक भेद-पूर्ण वचन कहकर द्रोपदी मन ही वैसे ही भाव मे दु गासन की बड़ाई परंन रगा। मन क्रोध मे जल रहे पाण्डवों की और मोघ पूर्ण दुर्योधन, कर्ण, शकुनि और दु गागन को छोडर दृष्टि से देम्पन लगी। मानों वह अपने कुटिल कटाक्षी और जो रोग उस मभा में थे, ये मम ममा में से टनके शोध की आग को और भी प्रयलिन द्रौपदी को इस प्रकार में मानी जाती देसार, महुन ने को नष्ट करने लगी। मांध के मारे द्रोपदी का ही दुम्मित हुए। ॥४२॥१६॥ मसर कर रहा था । पाण्डव रोग द्रौपदी के इन उस समय भीम जी ने टौपदी मरा- तर यनों में, विशेषकर कुटिल कटाक्ष से, इतने मुन्द ! धर्म की गति मूक्ष्म होने के कारण तुम्हारे "ErrenHILESEDDEDEners Ourrrrrrrrrrrror २८८ म हा भारत सभापर्व vibiomumtuisit . wuuuuuuuuuuuuN MARWwuuuuul TADARASIMONTITUTTARAI अस्वाम्यशक्तः पणितुं परस्वं स्त्रियाश्च भर्तुर्वशतां समीक्ष्य ॥ ४७ ॥ त्यजेत सर्वां पृथिवीं समृद्धां युधिष्ठिरो धर्ममथो न जह्यात् । उक्तं जितोऽस्मीति च पाण्डवेन तस्मान्न शक्नोमि विवेक्तुमेतत् ॥४८॥ द्यूतेऽद्वितीयः शकुनि रेषु कुन्तीसुतस्तेन निसृष्टकामः न मन्यते तां निकृति युधिष्ठिरस्तस्मान्नतेप्रश्नमिमं ब्रवीमि ॥ ४९ ॥ द्रौपद्युवाच आहूय राजा कुशलैरनार्यैर्दुष्टात्मभिनॆकृतिकैः सभायाम् । द्यूतप्रियैर्नातिकृतप्रयत्नः कस्मादयं नाम निसृष्टकामः अशुद्धभावैनिकृतिप्रवृत्तखुध्यमानः कुरुपाण्डवाग्यः संभृय सर्वेश्च जितोऽपि यस्मात्पश्चादयं कैतवमभ्युपेतः ॥ ५१ ॥ तिष्ठन्ति चेमे कुरवः सभायामीशाःसुतानां च तथा स्नुपाणाम् । समीक्ष्य सर्वे मम चापि वाक्यं विद्रूत मे प्रश्नमिमं यथावत् ॥ ५२ ॥ वैशम्पायन उवाच-तथा ब्रुवन्ती करुणं रुदन्तीमवेक्षमाणां कृपणान्पतींस्तान्। दुःशासनः परुपाण्यप्रियाणि वाक्यान्युवाचाऽमधुराणि चैव ॥ ५३ ॥ इस प्रश्न पर विचार करके उसका ठीक-ठीक उत्तर सकता ॥४७॥४९॥ मै नहीं दे सकता । स्वयं हारा हुआ मनुप्य, किसी यह सुन कर द्रौपदी ने कहा-कपटी, दुरात्मा, का स्वामी न होने के कारण, पराये धन को दाँव अनार्य, द्यूतप्रिय लोगों ने द्यूत की चालबाजी को पर लगाकर हार नहीं सकता और इसके साथ ही स्त्री... न जाननेवाले, धर्मगज युधिष्ठिर को बुलाकर जुआ सदा पति के अधीन है । इसी के कारण मैं तुम्हारे खिलाया है। धर्मराज की जुआ खेलने के लिये प्रश्न के बारे में ठीक-ठीक विचार नहीं कर पाता। न तो वैसी इच्छा थी और न उन्होंने इसका उद्योग देखो, महात्मा युधिष्ठिर सम्पूर्ण पृथ्वी के साम्राज्य ही किया था। फिर आप कैसे कहते हैं कि उन्होंने को सहज ही छोड़ सकते हैं, पर धर्म को नहीं जुआ खेलकर सब कुछ हार दिया है ! धर्मराज छोड़ सकते । मेरा यही विश्वास है । वे स्वयं अपने यह नहीं जानते थे, कि मन में चुग इरादा रखने- मुख से तुम्हें हार जाना स्वीकार कर चुके हैं । इस ! वाले, क्रूर, कपटी लोग उन्हें बुलाकर जुए में चाल- लिये मैं तुम्हारे प्रश्न के उत्तर का कुछ निर्णय नहीं बाजी से उनका सब कुछ हर लेंगे। [ महात्मा कर सकता । इस मनुष्य-लोक के बीच द्यूतक्रीड़ा युधिष्ठिर तो बड़े सत्यवादी हैं और, और लोगों को में शकुनि अद्वितीय है। युधिष्ठिर को उसने जीत भी वैसा ही समझते हैं । यही कारण है, कि ] वे लिया है। युधिष्ठिर दाँव लगा-लगाकर सब कुछ हार इन दुष्टों के जाल में फंस गये और सब ने मिल गये हैं। इसी से तुम्हारी यह दशा हुई है । इस कर चालबाजी से उनका सब धन जीत लिया। कारण से मैं तुम्हारे इस प्रश्न का उत्तर नहीं दे , इस समय सभा में बहुओं और बेटोंवाले सब कुरु- । GmmDIWALPADMmmuniLIMELINITITIVAHARIETYave measurect २८९ म हा मा रत . अध्याय ६८] FrrarunmundarITTERTAITINITORIUWAITITION ITAamrUTIONSITYTOnmurnirurnimati re WANITA तां कृष्यमाणां च रजस्वलां च त्रस्तोत्तरीयामतदर्हमाणाम् । वृकोदरः प्रेक्ष्य युधिष्ठिरं च चकार कोपं परमार्तरूपः ॥ ५४ ॥ इति श्रीमन्महाभारते ममापर्वणि द्यूतपर्वणि द्रोपदीप्रश्ने सप्तपप्टितमोऽध्यायः ॥ ६७ ।। वश के बड़े-बूढे बैठे हैं, मै सब से प्रार्थना करती हूँ, | की ओर देखकर, करुण खर से रोने लगी। उस कि वे मेरे इस कथन पर अच्छी तरह विचार करके समय दुष्ट दुःशासन फिर अप्रिय और कठोर वचन मेरे प्रश्न का ठीक-ठीक उत्तर दें। [ वह सभा कहकर उसे सताने लगा। भीमसेन ने देखा, रजस्वला ही नहीं, जहाँ बूढ़े लोग न हो । वे बूढ़े ही नहीं द्रौपदी को दुःशासन बार-बार खींच रहा है । ऐसी हैं, जो धर्म की बात न कहें । वह धर्म ही नहीं, दुर्दशा के अयोग्य द्रौपदी का वस्त्र गिर जाने से जिस में सत्य का अश न हो । और वह सत्य ही आधा शरीर नङ्गा हो गया है । इससे भीमसेन को नहीं, जिस में छल का लेश हो । ] ॥५०॥५२॥ क्रोध चढ़ आया। वे धैर्य धारण करने में असमर्थ वैशम्पायन कहते है-हे राजा जनमेजय ! द्रौपदी । होकर युधिष्ठिर की ओर देखने लगे । ॥५३॥५४॥ 'यों कहकर, दीनभाव को प्राप्त हो रहे अपने पतियों सभापर्व का सड़सठवां अध्याय समाप्त हुआ ॥ ६ ॥ अथ अष्टपष्टितमोऽध्यायः ।। ६८ ॥ भीम उवाच-भवन्ति गेहे वन्धक्यः कितवानां युधिष्टिर ! न ताभिरुत दीव्यन्ति दया चैवास्ति तास्वपि ॥ १ ॥ काश्यो यद्धनमाहापीद द्रव्यं यच्चाऽन्यदुत्तमम् । तथाऽन्ये पृथिवीपाला यानि रत्नान्युपाहरन् ॥ २ वाहनानि धनं चैव कवचान्यायुधानि च राज्यमात्मा वयं चैव कैतवेन हृतं परैः नच मे तत्र कोपोऽभूत्सर्वस्येशो हि नो भवान् । इमं त्वतिक्रमं मन्ये द्रौपदी यत्र पण्यते अड़सठवां अध्याय ।। ६८॥ भीमसेन ने कहा-हे युधिष्ठिर ! जुआरियों के ने छल से आप से जीत लिया है, जुए में दाँव पर पर में जो कोई दासी भी होती है, तो उस पर भी दया लगाते हुए देखकर मुझ को कोष नहीं हुआ, क्योंकि करके उसको जुए में दाँव पर नहीं लगाते है । आप इन सब के ईश है, परन्तु आप ने जो द्रौपदी काशिराज आदि ने जो-जो धन-रल और-और द्रव्य को दाँव पर लगाया, यह बड़ा मर्यादा के विपरीत भेंट किये थे, उनको और सब वाहन, शम, राज्य काम किया । इस दुर्दशा के अयोग्य पाचातरी आप और हम सब और अपने आप को, जिन को इन छलियों के ही कारण इस समय नीच,नृशंस,क्षुद्र कौरवों के CELETECTIMITINCONSECTOGHATRAPATIENTIALIVERMATOETAITTERLOTTER பாரா ruaramanracanamaALE २९० म हा भारत सभापर्व rabinduDES FunreamIImmmmmummrTTTTITIONAurturmrTTTTTTTTTTAROTICTIRITaruntr. RiRCCE एषा ह्यनहती वाला पाण्डवान्प्राप्य कौरवैः 1 त्वत्कृते क्लिश्यते क्षुद्रैर्नृशंसैरकृतात्मभिः अस्याः कृते मन्युरयं त्वयि राजन् ! निपात्यते । वाहू ते संप्रधक्ष्यामि सहदेवाऽग्निमानय अर्जुन उवाच-न पुरा भीमसेन ! त्वमीदृशीर्वदिता गिरः परैस्ते नाशितं नूनं नृशंसैधर्मगौरवम् न सकामाः परे कार्या धर्ममेवाऽऽचरोत्तमम् । (भ्रातरं धार्मिक ज्येष्ठं कोऽतिवर्तितुमर्हति आहूतो हि परै राजा क्षात्रं व्रतमनुस्मरन् दीव्यते परकामेन तन्नः कीर्तिकरं महत् भीमसेन उवाच-एवमस्मिन्कृतं विद्यां यदि नाहं धनञ्जय ! दीप्तेऽन्नौ सहितौ वाहू निर्दहेयं बलादिव ॥ १०॥ वैशम्पायन उवाच-तथा तान्दुःखितान्दृष्ट्वा पाण्डवान्धृतराष्ट्रजः क्लिश्यमानां च पाञ्चाली विकर्ण इदमब्रवीत् ॥ ११ ॥ याज्ञसेन्या यदुक्तं तद्वाक्यं विवृत पार्थिवाः अविवेकेन वाक्यस्य नरकः सद्य एव नः ॥ १२ ॥ भीमश्च धृतराष्ट्रश्च कुरुवृद्धतमावुभौ हाथ से घोर ग्लेश पारही है। द्रौपदी के इस अपमान होगा, जो धर्मात्मा और शीलवान् बड़े भाई को और क्लेग को देखकर मुझे बड़ा क्रोध चढ़ आया छोड़ कर, जैसा मन में आवे वैसा करे । और जो है । हे गजन् ! उस क्रोध को मैं आप पर उतारूंगा। शत्रु के वुराने पर राजा ने क्षत्रियों का धर्म विचार [जिन हायों से आप ने वेढा जुआ म्ला है ] कर यह जुआ खेला है, वह भी कीर्ति का करनेवाला उन्हें मैं अभी आग से जला दूंगा । हे सहदेव ! है। भीमसेन ने कहा हे भाई अर्जुन ! यह मैं जानना नीन आम ले आओ । ॥१०॥ हैं। जो महाराज ने क्षत्रिय-धर्म का पालन करने के यह सुनकर अर्जुन ने कहा- मीममन । रिये यह काम न किया होता, तो में अब तक कर आप ने ऐसे वचन, जैसे अन कहे है, कभी नहीं का जलनी हुई आग में इनके हाथ जरा चुक्ता कहे थे । हम जानते हैं, कि इन निर्दयी शत्रुओं ने ॥१०॥ आप के धर्म और गौरय को बिगाड़ दारा है। यशम्पायन ने कहा-दे गना जनमेजय ! इस आप को धर्म पर रहना उनिन है। भला ऐमा कौन प्रकार पाण्टयों को दुखित और दुःशासन के हाथ FEEDETPeronTELEVOUTruarrercamerrrrrrareer .PITMEERICErrrrrrrre

२९१
म हा भारत
अध्याय ६८]
HITama.T.TTIRTourismnara Anurmernamaramitramnath dur
mamaAITarumIIIIIIIIrammam
RECERLETTERTIENTIRHITTWITTENTITARPRETITIALITITIIIIIIIIIIII. LATTurmeri
समेत्य नाहतुः किंचिद्विदुरश्च महामतिः ।। १३ ॥
भारद्वाजश्च सर्वेपामाचार्यः कृप एव च
कुत एतावपि प्रश्नं नाऽऽहतुर्द्विजसत्तमौ ॥ १४ ॥
ये त्वन्ये पृथिवीपालाः समेताः सर्वतो दिशम् ।
कामक्रोधौ समुत्सृज्य त त्रुवन्तु यथामति
यदिदं द्रौपदी वाक्यमुक्तवत्यसकृच्छुभा
विमृश्य कस्य कः पक्षः पार्थिवा! वदतोत्तरम् ॥ १६ ॥
एवं स बहुशः सर्वानुक्तांस्तान्सभासदः
न च ते पृथिवीपालास्तमूचुः साध्वसाधु वा ॥ १७ ॥
उक्त्वाऽसकृत्तथा सर्वान्विकर्णः पृथिवीपतीन् ।
पाणी पाणिं विनिप्पिप्य निःश्वसन्निदमब्रवीत् ॥ १८ ॥
विब्रूत पृथिवीपाला ! वाक्यं मा वा कथंचन
मन्ये न्याय्यं यदत्राऽहं तद्धि वक्ष्यामि कौरवाः॥ १९ ॥
चत्वार्याहुनरश्रेष्टा व्यसनानि महीक्षिताम्
मृगया पानमक्षाश्च ग्राम्ये चैवाऽतिरक्तता
॥ २० ॥
एतेषु हि नरः सक्तो धर्ममुत्सृज्य वर्तते
से अपमान होने के कारण, द्रौपदी को गोक-विहल जगह से आकर यहां इकटे हुए हैं, काम और क्रोध
देम्बकर, धृतराष्ट्र के पुत्र, धर्मात्मा विकर्ण ने बड़े ऊँचे को छोड़ कर, अपनी बुद्धि में विचार कर, जैसा
म्बर से ममामदों से कहा-हे सभासदो ! आप लोग उचित हो वैमा उत्तर दीजिए । देखिए, इस द्रौपदी
विचार करके, पक्षपात छोड़कर, द्रौपदी के प्रश्न का न आप से बार-बार इस प्रश्न को किया है, मो आप
टीक-ठीक उत्तर क्यों नहीं देते। हम लोग यदि को विचार कर उसका उत्तर ही देना उनित है। इस
विवेक से द्रौपदी के प्रश्न का ठीक ठीक उत्तर न
प्रकार से विकर्ण ने बहुत सी याने उन राजाओं में
देगे, तो अधर्म भागी होने के कारण नरगामी कहीं, परन्तु किमी ने बुरा या भर। कुछ उपर नहीं
दोगे । हमारे कुल में जो वृद्ध रोग, भीष्म पितामह, दिया । तब विकर्ण श्वाम ले-लेकर और दाथ मल-
गृतराष्ट्र और विदुर जी हैं, उन्होंन और हम सब
मलकर करने लगा ॥१५॥१८
के गुरु द्रोणाचार्य और कृपाचार्य ने कुछ उत्तर नहीं
है, राजाओ' आप रोग कुछ उत्तर दो, या न
दो, हम बारे में मुझे जो कुछ उनिन और न्याय.
इम से जो आप सब गजा रोग, जो जगह मान प्रतीत होता , मो में कहता है। मामागे
BLED Commerce tarcrenummerTM worecurrentecco.com
।
-
दिया ॥११॥१४॥

२९२ महा मारत [ समापर्व EumntADUNImunmurarianmutrriuTuURUTTINY UIIIIIIIIIIIIIIIIIIRIDITY । - तथाऽयुक्तेन च कृतां क्रियां लोको न मन्यते ॥ २१ ॥ तदयं पाण्डुपुत्रेण व्यसने वर्तता भृशम् समाहूतेन कितवैरास्थितो द्रौपदीपणः ॥ २२ ॥ साधारणी च सर्वेषां पाण्डवानामनिन्दिता जितेन पूर्व चाऽनेन पाण्डवेन कृतः पणः ॥ २३ ॥ इयं च कीर्तिता कृष्णा सौवलेन पणार्थिना एतत्सर्व विचार्याऽहं मन्ये न विजितामिमाम् ॥ २४ ।। एतच्छ्रुत्वा महान्नादः सभ्यानामुदतिष्ठत विकर्ण शंसमानानां सौवलं चापि निन्दताम् ॥ २५ ॥ तस्मिन्नुपरते शब्दे राधेयः क्रोधमूच्छितः प्रगृह्य रुचिरं वाहुमिदं वचनमब्रवीत् ॥ २६ ॥ कर्ण उवाच-दृश्यन्ते वै विकर्णेह वैकृतानि वहून्यपि तज्जातस्तद्विनाशाय यथाऽग्निररणिप्रजः ॥ २७ ॥ एते न किंचिदप्याहुश्चोदिता ह्यपि कृष्णया धर्मेण विजितामेतां मन्यन्ते द्रुपदात्मजाम् ॥ २८ ॥ त्वं तु केवलवाल्येन धार्तराष्ट्र ! विदीर्यसे ने शिकार खेलना, मदिरा पीना, जुआ खेलना और । लगा दिया। इन्हीं कारणों से मै कहता हूँ, कि द्रौपदी अत्यन्त स्त्री-सम्भोग करना, ये चार राजाओं के व्यसन नहीं जीती गई ॥२२॥२४॥ कहे हैं। इन व्यसनों में फंसा हुआ मनुष्य धर्म का विकर्ण के ऐमे न्याय सात वचन सुनकर सभा विचार नहीं रखता, इसी कारण कोई उसके किये में कोलाहल सुन पड़ने लगा । सभा में बैठे हुए काम को ठीक नहीं मानता ॥१९॥२१॥ मनुप्य एकमत होकर, विकर्ण की प्रशंसा और शनि इस खेल में युधिष्ठिर को जुआरियों ने खेलने की निन्दा करने लगे। जब कोलाहल शान्त हो गया, को युगया था, अपने आप युधिष्ठिर खेलने नहीं तय कर्ण क्रोधित होकर, विकर्ण का हाथ पकड़ कर माये और जिस समय युधिष्ठिर खेल में मर्वम्ब हार । कहने लगा-हे विकर्ण ! इस समय यहां मभा अपने आप को भी भाइयों-महित हार गये, बहुत मे बुरे लक्षण देख पाते हैं। जान पड़ता है, उस समय उम जुए की आग में टन्होंने गकुनि जैसे अकाष्ठ से अग्नि उराश होकर उसी काष्ठ आदि खिलाड़ियों की प्रेरणा मे द्रौपदी को, जो को जला देती है, उमीप्रकार साधारण मात्र पांचों पाण्डवों की पनी है, दांव पर , में उत्पन्न हुए हो, ठमी को नाश करना चाहते दो। terrorepareeTOREPAREEMEDIDIOMETIMADIRADITIERREEDOM PEC..3.acamundrainararameteranasiumarammaur aormatural.tamashuaaranataram.a.xx.ar - - - तुम मीजिम पुन - २९३ महा भारत अध्याय ६८] WITTAMATTERTAINM18 MAMTAR ROYACTOTA TRAIIHama marantipur - 410Timroun.mmm AIRomanirammarriarrerance यद्वीपि सभामध्ये वालः स्थविरभापितम् ॥ २९ ।। न च धर्म यथावत्त्वं वेत्सि दुर्योधनावर ! यद्वीपि जितां कृष्णां न जितेति सुमन्दधीः॥ ३० ॥ कथं ह्यविजितां कृष्णां मन्यसे धृतराष्ट्रज ! यदा सभायां सर्वस्वं न्यस्तवान्पाण्डवाग्रजः ॥ ३१ ॥ अभ्यन्तरा च सर्वस्वे द्रौपदी भरतर्षभ ! एवं धर्मजितां कृष्णां मन्यसे न जितां कथम् ! । ३२ ॥ कीर्तिता द्रोपदी वाचा अनुज्ञाता च पाण्डवैः । भवत्यविजिता केन हेतुनेपा मता तव ॥ ३३ ॥ मन्यसे वा सभामेतामानीतामेकवाससम् अधर्मणेति तत्रापि शृणु मे वाक्यमुत्तमम् ॥ ३४ ॥ एको भर्ता स्त्रिया देवैर्विहितः कुरुनन्दन इयं त्वनेकवशगा वन्धकीति विनिश्चिता ॥ ३५ ॥ अस्याः सभामानयनं न चित्रमिति मे मतिः - ! जीनी गई है ॥२५॥२८॥ हमी से तुम ऐसा युग भाव दिखा रहे हो । यहां धर्म से जीती हुई द्रोपदी को, न जीती हुई कमे पर अनेक राजा और बड़े बूढ़े बैठे हैं। द्रौपदी के कहते हो ! ॥२१॥३२॥ बार-बार पूछने पर भी, इन्होंने कुछ नहीं कहा; तुम कहते हो कि शकुनि ने पहले द्रौपदी को पयोंकि ये सब जानते हैं, कि द्रौपदी धर्म से ही दांव पर रखने के लिये कहा था; किन्तु युधिष्ठिर यदि अपने मुख से द्रोपदी का नाम लेकर उसे दांय दे विकर्ण ! तुम लड़कपन के मारे हम लोगों पर न लगाते और सब पाण्डव चुप रदका उमे मीकार में फूट का, पालक होने पर भी वूद्रों की तरह, इस न कर लेते, तो हम की द्रौपदी को जीनी हुई ममाम ममा में ऐमी यान कह रहे हो । तुम अभी धर्म को कर उस पर अधिकार करने के लिये तैयार न अशी तरह नहीं जानते; इमी मे द्रौपदी को जीती होते 1 फिर तुम दोपदी को न जीनी हुई, यस्त दुई न पनाकर, अपनी बुद्धि की हीनता का परिचय कमे कहते हो। दोपदी को एक वान पहनने की दे रहे हो । जब ममा के याच युधिष्ठिर ने दाय में दशा में समा के पांच लाने की जो गुम अपर्म पहने समामा आना मर्यपहार दिया है, न तुम द्रौपदी हो, तो उसका टसर भी मुनी । है नन्दन ! पिना बानी हुई को समझते हो द्रोपदी भी देवताओं ने मी का पनि एक ही कदाई । जोग नो युधिष्ठिर के सम्बक भीतर आ गई। इस प्रकार एक पति से दूमा पनि भी करती है, या वेश्या TELETROUDrecarepucccccccrrorecorrrepresencreucrooner .

२९४ महाभारत सभापर्व rnIorminuTIOnmmmmuTUNITIOnTrumIrrhivrगागामा ॥ ३६ ॥ MMITMYAMUNMUDIAITADIMEDIOn । एकाम्बरधरत्वं वाऽप्यथवाऽपि विवस्त्रता यच्चयां द्रविणं किंचिद्या चैया ये च पाण्डवाः । सौवलेनेह तत्सर्व धर्मेण विजितं वसु ॥ ३७॥ दुःशासन ! सुवालोऽयं विकर्णः प्राजवादिकः । पाण्डवानां च वासांसि द्रौपद्याश्चाप्युपाहर तच्छुत्वा पाण्डवाः सर्वेस्वानि वासांसि भारत! अवकीर्योत्तरीयाणि सभायां समुपाविशन् ॥ ३९ ॥ ततो दुःशासनो राजन्द्रौपद्या वसनं वलात् सभामध्ये समाक्षिप्य व्यपाक्रष्टुं प्रचक्रमे वैशम्पायन उवाच-आकृष्यमाणे वसने द्रौपद्या चिन्तितो हरिः । गोविन्द ! द्वारकावासिन् ! कृष्ण ! गोपीजनप्रिय ! ॥ ४१ ॥ कौरवैः परिभूतां मां किं न जानासि केशव ! । हे नाथ ! हे रमानाथ! ब्रजनाथाऽऽर्तिनाशन! । कौरवार्णवमग्नां मामुद्धरस्व जनार्दन ! १२ ॥ कृष्ण! कृष्ण! महायोगिन् ! विश्वात्मन् ! विश्वभावन ! । प्रपन्नां पाहि गोविन्द ! कुरुमध्येऽवसीदतीम् ॥ ४३ ॥ कहलाती है । सो द्रौपदी तो अनेक पतियों से रमण कर अलग रख दिये । अब पापी दुशासन सभा के करती है, इसका सभा में लाना और एक वस्त्र बीच में द्रौपदी के वस्त्र को बलपूर्वक उतारने लगा पहने हुए होना, तो कुछ बात नहीं है। यदि इमको ॥३७॥४०॥ नहीं भी किया जाये तो भी कुछ आश्चर्य की बात वैशम्पायन ने कहा-हे राजा जनमेजय ! अपने नहीं है ॥३३॥३६॥ ऊपर यह विपत आते देखकर द्रौपदी अत्यन्त करुण शकुनि ने इन मय पाण्डव और द्रौपदी को म्यर से कृष्ण काम्मरण करके कहने लगी-हे कृष्ण सब धन-सहित धर्म से जुए में जीता है । इसलिये हे करुणा के समुद्र ! हे दीन-वन्धु ! हे जगदीश्वर ! हे दु शामन ! यह विकर्ण अपने को बुद्धिमान् सम हे गोपीजन-प्रिय ! क्या तुम नहीं जानते हो कि झता है, परन्तु अभी इसकी बुद्धि यालकों की मी कौरवों ने मेरा अपमान किया है ! हे नाथ ! है १; इसलिये तुम इन पाण्डवों के और द्रोपदी के ग्मानाथ ! हे व्रजनाथ ! हे द्वारकानाथ ! हे दु.स. यम्त्रों को भी उतार लो। हे राजा जनमेजय ! कर्ण नागन ! हे जनार्दन ! कौरवों के भयानक समुद्र में के ये वचन सुनते ही पाण्डवों ने अपने वम्त्र उतार डूबी जा रही है। हे मधुसूदन ! मेरी रक्षा परी । 1.Gonor । - MOTIRLIAMARVALITERAMDHODTDrurcurreDEORArruaamere.

म हा भारत
अध्याय ६८]
ATTITUM7777 minni
TAINMITRIBASINITIATI
SUVILWWWDOTTI TINNITUTIN
LIMILIACTUALLULE
rammanawimmITIER
..
इत्यनुस्मृत्य कृष्णं सा हरिं त्रिभुवनेश्वरम्
प्रारुदद्र दुःखिता राजन् ! मुखमाच्छाद्य भामिनी॥ १४ ॥
याज्ञसेन्या वचः श्रुत्वा कृष्णो गह्वरितोऽभवत् ।
त्यक्त्वा शय्यासनं पद्भयां कृपालुः कृपयाऽभ्यगात् ॥४५॥
कृष्णं च जिष्णुं च हरिं नरं च त्राणाय विक्रोशति याज्ञसेनी।
ततस्तु धर्मोऽन्तरितो महात्मा समाकृणोद्वै विविधैः सुवस्त्रेः ।। ४६ ॥
आकृष्यमाणे वसने द्रौपद्यास्तु विशाम्पते !
तद्पमपरं वस्त्रं प्रादुरासीदनेकशः ॥४७॥
नानारागविरागाणि वसनान्यथ वै प्रभो!
प्रादुर्भवन्ति शतशो धर्मस्य परिपालनात् ॥४८॥
ततो हलहलोशब्दस्तत्राऽऽसीद्धोरदर्शनः ॥४९॥
तदद्भुततमं लोके वीक्ष्य सर्वे महीभृतः
शशंसुद्रौपदी तत्र कुत्सन्तो धृतराष्ट्रजम्
शशाप तत्र भीमस्तु राजमध्ये वृहत्स्वनः
क्रोधाद्विस्फुरमाणौठो विनिप्पिष्य करे करम् ॥ ५१ ॥
भीमसेन उवाच-इदं मे वाक्यमादध्वं क्षत्रिया ! लोकवासिनः !।
हे कृष्ण ! हे कृष्ण ! हे योगीश्वर' तुम विश्व के प्रताप से और कृष्ण की कृपा से द्रौपदी का वस्त्र
आत्मा और ब्रह्माण्ड के रक्षक हो । कौरवों के बीच बढ़ने लगा । द्रौपदी को नही करने के लिये दुष्ट
में कष्ट पाती हुई मैं आप की शरण में हूँ। हे गोविन्द! दुशासन जितना ही वस्त्र खींचता था, उतना ही
मेरी रक्षा कीजिए । हे राजा जनमेजय ! इस प्रकार
उमी रक्ष के और और अनेक रत के यन्त्र निकलते
से जगदीश्वर कृष्ण को पुकार कर, दोनों हाथों से चले आते थे । वस्त्रों का ढेर लग गया, पर द्रौपदी
अपना मुख आच्छादित ( ढाँप) करके, सुन्दरी नगी नहीं हुई ॥४५॥४८॥
उम समय चारों ओर से पड़ा कोलाहल भन्द
द्रौपदी के करुण विलाप को सुनते ही श्रीकृष्ण- होने लगा और सब राजा लोग द्रौपदी की प्रशंसा
चन्द्र शय्या छोड़कर, द्रौपदी की लाज बचाने के और दुर्योधन की निन्दा करने लगे। वत्र खींचते.
लिये, पैदल दौड़ पड़े। कृष्ण ! जिष्णु ! नरनारायण खींचते जब दु.गासन थक गया, तय लजित होकर
आदि नाम लेकर ज्योंही द्रौपदी ने पुकारा, त्योंही बैठ गया । यह देखकर भीमसेन से नहीं रहा गया।
धर्म यन्त्र बनकर बढ़ने लगा हे महाराज ! धर्म के क्रोध के मारे उनके होट फड़क रहे थे। वे हाथ
PERIERSPIRMIRICINEHETINITIATIODTATEEATINDIANRAILexrorani
-
।
दापढी सभा में रोयी ॥४१॥४४॥

म हा भारत মমাথ । । areasanaMIATIammmxamzor - CONTINUANTATTITANINMITTITUITI OTTIMITATIT MOT a2m while नोक्तपूर्व नरैरन्यैर्न चाऽन्यो यद्वदिष्यति ॥ ५२ ॥ यद्येतदेवमुक्त्वाऽहं न कुर्यां पृथिवीश्वराः ! पितामहानां पूर्वेषां नाऽहं गतिमवाप्नुयाम् अस्य पापस्य दुर्बुद्धेर्भारतापसदस्य च न पिवेयं बलाद्वक्षो भित्वा चेद् रुधिरं युधि ॥ ५४ ॥ वैशम्पायन उवाच-तस्य ते तद्वचः श्रुत्वा रौद्रं लोमप्रहर्षणम् प्रचक्रुर्वहुलां पूजां कुत्सन्तो धृतराष्ट्रजम् यदा तु वाससां राशिः सभामध्ये समाचितः । ततो दुःशासनः श्रान्तो ब्रीडितः समुपाविशत् ।। ५६ ॥ धिक्शब्दस्तु ततस्तत्र समभूल्लोमहर्षणः सभ्यानां नरदेवानां दृष्ट्वा कुन्तीसुतांस्तथा ॥ ५७ ॥ न विब्रुवन्ति कौरव्याः प्रश्नमेतमिति स्म ह सुजनः क्रोशति स्माऽत्र धृतराष्ट्रं विगर्हयन् ॥ ५८ ॥ ततो वाहू समुत्क्षिप्य निवार्य च सभासदः विदुरः सर्वधर्मज्ञ इदं वचनमब्रवीत् विदुर त्याच-द्रौपदी प्रश्नमुक्त्वैवं रोरवीति त्वनाथवत् से हाथ मलते हुए [गम्भीर म्बर से] कहने लगे- के वस्त्रों का ढेर हो गया और दु शासन धक कर हे पृ.पी पर रहने वाले क्षत्रियो ! आप सब रोगों के और लज्जित सा हो कर बैठ रहा, इस प्रकार पाण्डवों आगे यह प्रतिज्ञा करता हूँ, कि यदि मैं युद्ध में इस को देखकर सब सभासदों के मुख से धृतराष्ट्र पुत्र नीच पापी दु शासन का हृदय चीर कर इसका लोहू को घिधार है, ऐसा महाशब्द निकला । धृतराष्ट्र न पिऊँ, तो मुझे अपने पूर्व पुरुषों की गति न प्राप्त की निन्दा करते हुए सब सभासद कहने लगे, कि हो । मेरी ऐसी घोर प्रतिज्ञा न पहले किसी ने की द्रौपदी के प्रश्न का उत्तर कौरव लोग क्यों नहीं देत है और न आगे ही कोई करेगा। मैं यह प्रतिजा ' हैं ॥५५/५८॥ पूरी किये बिना न रहँगा ॥४०॥५४॥ तब हाथ उठाकर सब सभासदों को निवारण वैशम्पायन ने कहा-हे राजा जनमेजय! भीम. करके सब धर्मों में श्रेष्ठ विदुर यह बोले-रे सभा- सेन की भयानक प्रतिज्ञा को सुनकर सब गजा लोग सदो ! द्रौपदी प्रश्न करके अनाथ के समान रोती उसकी प्रशंसा और धृतराष्ट्र के पुत्र की निन्दा करने है, तुम लोग उत्तर नहीं देते। इससे धर्म का अनादर लगे। इसके उपरान्त जब सभा के बीच में द्रौपदी होता है । ममा में प्रज्वलित अमि के ममान जो LETruecamercracicalHITECTLCITORICurrealnanathurnimarvCTURE Tarai । -- DURATIENJLNELCIALAYAuttrava २९७ म हा भारत अध्याय ६८] TWITTE NUTTINTIMITETITTIT NITTIRENDIMA IITOTTOTTOMATINITION STURINITIRUITOTRAINTrainim न च वित्रूत तं प्रश्नं सभ्या! धर्मोऽत्र पीड्यते।। ६० ।। सभां प्रपद्यते ह्यातः प्रज्वलन्निव हव्यवाद् तं वै सत्येन धर्मेण सभ्याः प्रशमयन्त्युत ॥ ६१ ॥ धर्मप्रश्नमतो ब्रूयादार्यः सत्येन मानवः वित्रूयुस्तत्र तं प्रश्नं कामक्रोधवलातिगाः ॥ ६२ ।। विकर्णेन यथाप्रज्ञमुक्तः प्रश्नो नराधिपाः! भवन्तोऽपि हि तं प्रश्नं विनुवन्तु यथामति यो हि प्रश्नं न विव्याधर्मदर्शी सभां गतः अनृते या फलाऽवाप्तिस्तस्याः सोऽधं समश्नुते ॥ ६४ ।। यः पुनर्वितथं ब्रूयाद्धर्मदर्शी सभां गतः अनृतस्य फलं कृत्स्नं संप्राप्नोतीति निश्चयः अनाऽप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् प्रह्लादस्य च संवादं मुनेरागिरसस्य च ॥ ६६ ॥ प्रह्लादो नाम दैत्येन्द्रस्तस्य पुत्रो विरोचनः कन्याहेतोरागिरसं सुधन्वानमुपाद्रवत् अहं ज्यायानहं ज्यायानिति कन्येप्सया तदा । प्रश्न उपस्थित होता है, उसे सत्य और धर्म से युक्त उसको मिथ्या बोलने का पूरा-पूरा पाप लगता उत्तर देकर सभ्य लोग शान्त करते हैं । यही सनातन ॥६३॥६५॥ नीति है । आर्य पुरुष को चाहिये कि धर्म के अनु. इस विषय में पौराणिकों ने प्रहाद और आलि. सार काम, क्रोध और बल की परवाह न करके उस रस मुनि के संवाद का एक इतिहाम कहा है, सो प्रश्न का उनर दे ॥५९।६२॥ मैं कहता हूँ । दैत्यराज प्रहाद का एक पुत्र था । हे नरपतियो ! जैसे महात्मा विकर्ण ने अपनी उसका नाम विरोचन था। एक कन्या के पीछे असि बुद्धि के अनुमार द्रौपदी के प्रश्न का निर्णय किया के पुत्र सुधन्वा ऋपि और विरोचन के बीच झगड़ा है, वैसे ही आप लोग भी निर्णय करके उस प्रश्न उठ खड़ा हुआ । दोनों ही श्रेष्ठ बनाकर, अपने को का उत्तर दें। जो सभा में बैठनेवाले धर्मदी मनुप्य उम कन्या के योग्य कह रहे थे। इस बारे में अपने किसी प्रश्न का म्पष्ट उत्तर नहीं देते हैं, उनको झूठ प्राणों की बाजी लगाकर ये दोनों, निर्णय के लिये, घोलने का पार लगता है। और जो मनुष्य धर्मदर्शी प्रहाद के पाम गये । इम झगड़े का निर्णय करने होर सभा में बैठकर धर्म-विपरीत बात कहता है, के लिये उनसे अनुरोध करते हुए दोनों ने पूछा- RTINITEDREITOCHODommamrTNTEGRITERATEmernetriCurre DDIRNAR.DMRIT - २९८ म हा मारत सभाप Enantaraarirarunmunirunirmirrrrrrrrrroranimurdergrorarurrararatr" - .. तयोर्देवनमत्राऽऽसीत्प्राणयोरिति नः श्रुतम् ॥ ६८ ॥ तयोः प्रश्नविवादोऽभूत्प्रह्लादं तावपृच्छताम् ज्यायान्क आवयोरेकः प्रश्नं प्रब्रूहि मा मृया ॥ ६९ ॥ स वै विवदनाद्भीतः सुधन्वानं विलोकयन् तं सुधन्वाऽब्रवीत्क्रुद्धो ब्रह्मदण्ड इव ज्वलन् ॥ ७० ॥ यदि वै वक्ष्यसि मृपा प्रह्लादाऽथ न वक्ष्यसि शतधा ते शिरो वजी बज्रेण प्रहरिष्यति ॥७१ ॥ सुधन्वना तथोक्तः सन्व्यथितोऽश्वत्थपर्णवत् । जगाम कश्यपं दैत्यः परिप्रष्टुं महौजसम् ॥ ७२ ॥ प्रहाद उवाच-त्वं वै धर्मस्य विज्ञाता दैवस्येहाऽऽसुरस्य च । ब्राह्मणस्य महाभाग ! धर्मकृच्छ्रमिदं शृणु ॥ ७३ ॥ यो वै प्रश्नं न विब्रूयाद्वितथं चैव निर्दिशेत् के वै तस्य परे लोकास्तन्ममाऽऽचक्ष्व पृच्छतः॥ ७४ ॥ कश्यप उवाच-जानन्नविब्रुवन्प्रश्नान् कामात्क्रोधाद्भयात्तथा सहस्रं वारुणान्पाशानात्मनि प्रतिमुञ्चति ॥ ७५ ॥ साक्षी वाऽविब्रुवन्साक्ष्यं गोकर्णशिथिलश्चरन् । ठीक ठीक बतलाइए, हम दोनों में श्रेष्ठ कौन है ? महात्मा कश्यप जी के पास इस बारे में सम्मति लेने अमत्य न बोलिएगा । उस झगड़े से डरकर प्रहाद गये । प्रहाद ने कश्यप के पास जाकर पूछा-हे सुधन्वा की ओर देखने लगे । उनको कुछ उत्तर न महाराज ! आप देवताओं और असुरों के धर्मों को देते देख, सुधन्वा ने क्रोध के मारे ब्रह्मदण्ड के समान अच्छी तरह जानते है। मै इस समय ब्राह्मण के आग बबूला होकर प्रहाद से कहा-हे दानवराज ! और अपने पुत्र के झगड़े के कारण, अपने पुत्र का पक्ष लेकर यदि तुम असत्य बोलोगे, फँस गया हूँ। आप कृपा करके बताइए, कि जो कोई अथवा कुछ भी उत्तर न दोगे, तो इन्द्र वज्र के प्रश्न का ठीक ठीक उत्तर नहीं देता अथवा जान- प्रहार से तुम्हारे सिर के सौ टुकडे कर देंगे। बूझकर असत्य बोलता है, उसे मरने पर कौन रोक ॥६६७१॥ प्राप्त होते है । ॥७२१७४॥ मुधन्वा के यों कहने पर प्रहाद डर के मारे कश्यप ने कहा-हे प्रहाद ! जो कोई क्रोध या इस प्रकार से कांपने रंग, जैसे वायु से पीपल का डर के मारे जान बूझकर प्रश्न का उत्तर नहीं देता, पण हिलता है। वे मुधन्या से कुछ समय मागकर अथवा झुट बोलना है, वह मरने पर, परोक में EURMIDWEETOOTamuTISERITTENTIONERIORITIENDLETRIEEEEEEEEEE. ISMETAILanwururammarwachonouremaramanarts.ca धर्म-सकट में दाने और बरे को वगन कहने के कारण में २९९ म हा भारत अध्याय ६८] TOTTITYD INTOTDTNT ndanin UNMITTITTIT TUTDU TOITTI HTDANLAILALLA HERRIDOREImmunmun - सहस्रं वारुणान्पाशानात्मनि प्रतिमुञ्चति तस्य संवत्सरे पूर्णे पाश एकः प्रमुच्यते तस्मात्सत्यं तु वक्तव्यं जानता सत्यमञ्जसा विद्धो धर्मो ह्यधर्मेण सभां यत्रोपपद्यते न चाऽस्य शल्यं कृन्तन्ति विद्धास्तत्र सभासदः॥ ७८ ॥ अर्ध हरति वै श्रेष्ठः पादो भवति कर्तृपु पादश्चैव सभासत्सु ये न निन्दन्ति निन्दितम् ॥ ७९ ॥ अनेन भवति श्रेष्ठो मुच्यन्ते च सभासदः एनो गच्छति कर्तारं निन्दाहों यत्र निन्द्यते ॥ ८० ॥ वितथं तु वदेयुर्ये धर्म प्रह्लाद ! पृच्छते इष्टापूर्त च ते नन्ति सप्त सप्त परावरान् ॥ ८१ ॥ हृतस्वस्य हि यद दुःखं हतपुत्रस्य चैव यत् । ऋणिनः प्रति यच्चैव स्वार्थाद भ्रष्टस्य चैव यत् ॥ ८२ ॥ स्त्रियाः पत्या विहीनाया राज्ञा ग्रस्तस्य चैव यत्। अपुत्रायाश्च यद् दुःखं व्याघ्राघातस्य चैव यत् ॥ ८३ ।। अध्यूढायाश्च यद् दुःखं साक्षिभिर्विहतस्य च । सहस बारुण पागों से बाधा जाता है। अथना जो आधा पाप सभापति को, चौथाई पाप करनेवाले को साक्षी, गवाही देते समय, गाय के कान की तरह और चौथाई सभा में बैठनेवालों को लगता है। और दोनों ओर दुलता है, अर्थात् मत्य न कहकर, दोनों जिस सभा में बुरे को चुरा कहकर निन्दा करते हैं, पक्षों का जी रखने की चेष्टा करता है, वह भी अन्त उस सभा के चैटनेवाले पाप से टूट जाते है और ममय मद्दस वारुण पागों से बांधा जाता है । एक- वह पाप केवन करनेवाले ही को लगता है ॥७८/८०॥ एक वर्ष के पश्चात् उसे एक-एक पाग से छुटकारा इम लिये हे प्रहाद ! धर्म मे सम्बन्ध रमने- मिलना है। इस लिये जो कुछ सत्य मालम हो वही याला प्रश्न उपस्थित होने पर, जो कोई पक्षपात मे असत्य बोलना है, उसके मय पुण्य तो नष्ट दो दी निम सभा में धर्म की पात को अधर्म की यानों जाते हैं; माथ ही उसके पहले की सान पीढ़ियां में और की और कह देने हैं, उस सभा के ठने और आगे होनेवारी सात पीढ़ियां नरक में गिरती वाले,अधर्म को दान करने के कारण से पाप के भागी है। देवता रोग इन नीचे लिम्मे हुए दुनों को एक माही जानते हैं । जगे-जिमका पन जाता रहा है, CELL UTODEODTED:12 DAMOWEREDATEre ETHERE । कहना चाहिये ।।७५/७॥ । ।

HIMAMTARIAALIMIMUMMMAMITHUWATAMIL म हा मारत समाप errummamimarar.ITIETARITRITITIVIDurin.unia Maur एतानि वै समान्याहुर्दुःखानि त्रिदिवेश्वराः ॥८४ ॥ तानि सर्वाणि दुःखानि प्राप्नोति वितथं ब्रुवन् । समक्षदर्शनात्साक्षी श्रवणाच्चेति धारणात् तस्मात्सत्यं ब्रुवन्साक्षी धर्मार्थाभ्यां न हीयते । कश्यपस्य वचः श्रुत्वा प्रह्लादः पुत्रमब्रवीत् ॥८६॥ श्रेयान्सुधन्वा त्वत्तो वै मत्तः श्रेयांस्तथाऽङ्गिराः । माता सुधन्वनश्चापि मातृतः श्रेयसी तव विरोचन ! सुधन्वाऽयं प्राणानामीश्वरस्तव ॥ ८७॥ सुधन्वायाच-पुत्रस्नेहं परित्यज्य यत्वं धर्मे व्यवस्थितः अनुजानामि ते पुत्रं जीवत्वेष शतं समाः ॥ ८८॥ विदुर उवाच--एवं वै परमं धर्म श्रुत्वा सर्वे सभासदः यथाप्रश्नं तु कृष्णाया मन्यध्वं तत्र किं परम् ॥ ८९ ॥ वैशम्पायन उवाच विदुरस्य वचः श्रुत्वा नोचुः किंचन पार्थिवाः । कर्णो दुःशासनं वाह कृष्णां दासी गृहान्नय ॥ ९० ॥ तां वेपमानां सव्रीडां प्रलपन्तीं स्म पाण्डवान् । दुःशासनः सभामध्ये विचकर्प तपस्विनीम् ॥ ९१ ।। इति श्रीमन्महाभारते मभापर्वणि गृतपर्वणि द्रौपद्याकर्षणे अष्टपष्टितमोऽध्यायः ॥ ६८ ।। जिसका पुत्र मर गया है, जो ऋणी है, जिसका बिगड़ता है |८११८६॥ काम बिगड़ गया है, जिस स्त्री का पति मर गया है, कश्यप जी को उक्त बात को सुनकर, महाद जिम को राजा ने ग्रस्त अर्थात् गिरफ्तार किया है, ने अपने पुत्र विरोचन से कहा-हे विरोचन ! मुन्वा जिस स्त्री के पुत्र नहीं है, जिम का व्याघ्र ने घर तुम से श्रेष्ठ है । मुझ से अगिरा श्रेष्ठ है और तुम्हारी लिया है, जिम बी के सौत है और जिसको साक्षी माता से सुधन्या की माता श्रेष्ठ है। अब ये मुमन्या ने टगाया है। मो, जो मनुष्य असत्य बोलता है, तुम्हारे प्राणों के म्यामी है । यह मुनार मुधन्याने उमको ऊपर लिखे हुए सम्पूर्ण दु ग्व प्राप्त होने हैं। कहा-हे प्रहाद ! तुमने पुन के म्नेह को छोड़ कर और साक्षी अर्थात् गवाह दो प्रकार के होते है एक धर्म से सत्य को नहीं छोड़ा, इस से अब मैं आशा तो आम्ब से देम्पनेवाले, दुसरे कान से सुननेवाले । देता हूँ, कि तेरा यह पुत्र सौ वर्ष तक जिये । मैं, इस कारण मे मामी को सदैव सत्य ही योगना हारने के कारण से इसको नहीं मागा। इस प्रकार चाहिये। मत्य बोलने से उसका धर्म भार अर्थ नहीं प्रहाद और अहिरा के संवाद को सुना करफ पिचर DOT100TD'D'O'DO!DCUDU'D'OD'O'TIYTY**ITECTITE Terrra'mi: 17.

३०१ अध्याय ६९] म हा भारत 7216 TIMITWITTPUTrmerama ITITIO TAITWINTERVITRIOTI , दो ॥८७५८९॥ ने कहा-हे राजाओ । इसी प्रकार से तुम सब भी द्रौपदी अब दासी है, इसको अपने महलों में ले धर्म के अनुसार द्रौपदी के प्रश्न का ठीक-ठीक उत्तर | जाओ । सभा के मध्य में, लज्जा के मारे मिर नीचा करके, डर से कांपती, पाण्डवों को वकती-झकती वैशम्पायन ने कहा-हे राजा जनमेजय ! विदुर और विलाप करती हुई, तपम्विनी द्रौपदी को ले जाने जी की बात को सुनकर किसी ने कुछ उत्तर नहीं के लिये नीच दुःशासन बलपूर्वक खींचने लगा। दिया । इसके पीछे कर्ण ने दु.शासन से कहा ॥९०१९१॥ सभापर्व का अड़सठवां अध्याय समाप्त हुआ ।। ६८ 11 अथ एकोनसप्ततितमोऽध्यायः ।। ६९ ।। द्रौपद्युबाच-तावत्प्रतीक्ष दुष्प्रज्ञ ! दु शासन ! नराधम ! पुरस्तात्करणीयं मे न कृतं कार्यमुत्तरम् विह्वलाऽस्मि कृताऽनेन कर्पता बलिना वलात् । अभिवादं करोम्येषां कुरूणां कुरुसंसदि न मे स्यादपराधोऽयं यदिदं न कृतं मया वैशम्पायन उवाच-सा तेन च समाधूता दुःखेन च तपस्विनी पतिता विललापदं सभायामतथोचिता द्रौपद्युवाच-स्वयंवरे याऽस्मि नृपैदृष्टा रङ्गे समागतैः न दृष्टपूर्वा चाऽन्यत्र साऽहमद्य सभां गता यां न वायुर्न चाऽऽदित्यो दृष्टवन्तो पुरा गृहे । उनहत्तरवां अध्याय ।। ६९॥ द्रौपदी ने कहा-हे दुष्ट दु शासन ! तनिक ठहर हो रही द्रोपदी उस झटके से पृथ्वी पर गिर पड़ी। जा । मैं पहले ही करने योग्य काम करना भूल गई सर्वथा इस दुर्दशा के अयोग्य द्रौपदी सभा के बीच है। इस कौरवों की सभा में बैठे हुए वृद्ध पुरुषों गिरकर, इस प्रकार विलाप करने लगी-हाय ! मुझको को और सभासदों को मैं प्रणाम करती हूँ । इस केवल स्वयम्वर में ही राजा लोगों ने देखा था, दुष्ट ने बलपूर्वक खींच कर, मुझे विहल कर दिया , उसके पहले और पीछे किसी ने भी किसी स्थान था। इसी कारण से मैं पहले प्रणाम नहीं कर सकी। पर नहीं देखा था। सो अब मैं सभा में पड़ी हुई हूँ। इस अपराध का कारण यही दुष्ट है; मैने जान बूझ- हाय ! मुझको कभी सूर्य और वायु ने भी घर में नहीं देखा था, अब मुझको सभा में सैकड़ों मनुष्य वैशम्पायन कहते हैं हे राजा जनमेजय! दु शामन देख रहे हैं । ये पाण्डव, मुझे वायु भी म्पर्श करती ने फिर वर पूर्वक द्रौपदी को खींचा। दुख से विहल थी, तो नहीं सह सकते थे। हाय ! अब वे ही पाण्डव MADE THEORTEmmummyamasranamunmunavaracancy ACCURATUTTARomanMTIALADEITIECENIRVANITLABETICLALDATELATEDEOENDER AIMERAUTARIAnaranis - कर ऐमा नहीं किया ॥१२॥ POLITILITTLY महा मारत सभापर्व . RurmarareluruTITUTITUTTOURDURATIOPTITORITUUUNPORTAINowuToilai SIMIMLAITUNWAVATMADIRottomur - साऽहमद्य सभामध्ये दृश्याऽस्मि जनसंसदि ॥ ५ ॥ यां न मृष्यन्ति वातेन स्पृश्यमानां गृहे पुरा स्पृश्यमानां सहन्तेऽद्य पाण्डवास्तां दुरात्मना ॥ ६ ॥ मृष्यन्ति कुरवश्चेमे मन्ये कालस्य पर्ययम् स्नुपां दुहितरं चैव क्लिश्यमानामनहतीम् किं न्वतः कृपणं भूयो यदहं स्त्री सती शुभा । सभामध्यं विगाहेऽद्य क्व नु धर्मो महीक्षिताम् ॥ ८ ॥ धयां स्त्रियं सभा पूर्वे न नयन्तीति नः श्रुतम् । स नष्टः कौरवेयेषु पूर्वो धर्मः सनातनः कथं हि भार्या पाण्डनां पार्वतस्य स्वसा सती । वासुदेवस्य च सखी पार्थिवानां सभामियाम् ॥ १० ॥ तामिमां धर्मराजस्य भार्या सदृशवर्णजाम् बेत दासीमदासी वा तत्करिष्यामि कौरवाः ! ॥ ११ ॥ अयं मां सुदृढं क्षुद्रः कौरवाणां यशोहरः क्लिभाति नाऽहं तत्सोढुं चिरं शक्ष्यामि कौरवाः!॥ १२ ॥ जितां वाऽप्यजितां वापिमन्यध्वं मां यथा नृपाः। इस दुरात्मा के हाथ से मेरी ऐमी गति देस रहे साथ सभा के वीच लाई गई ! इस से बढ़कर अनर्थ हैं ॥३॥५॥ और क्या होगा! हे कौरवो ! मै धर्मराज की सवर्णा हाय ! मै इन कौरवों की पुत्रवधू हूँ, और इम भार्या हूँ। आप लोग बतायें, मै दासी हुई हूँ, या दुःख को सहने के योग्य नहीं हूँ। सो ये कौरव भी नहीं ? आप लोग जो कहेंगे, यही मानकर मैं उसके काल की विपरीतता से मेरी यह गति अपनी आंखों अनुसार कार्य करूँगी ॥६॥१०॥ से देख रहे है । इस से और क्या बुरी बात होगी, हे कुरुवंश के लोगो ! यह कुरुवंश के यश कि इस सभा में मुझ को चारों ओर से सब मनुष्य को मिटानेवाला दुष्ट दु.शासन बलपूर्वक खींच कर देख रहे है । हाय ! इन राजाओं का धर्म कहां मुझे लश दे रहा है । अब अधिक समय तक मुझ गया ! पहले धर्मात्मा लोग स्त्री को सभा में कभी से यह क्लेश नहीं महा जायगा । हे सभासदो और नहीं लाते थे ! हाय ! कौरवों का मनातन धर्म नष्ट कौरयो ! आप लोग मुझे जीती हुई, अथवा जमी समझते हो गया है । मैं पाण्डवों की धर्मपली, धृष्टद्युत की हैं, सो कह देवें । आप रोग जो कहेंगे, यह करने पद्दन, और कृष्ण की सम्बी, इस प्रकार अपमान के के लिये में तैयार है ॥१२॥१३॥ . . है ETITIRLPremRIMILAREERITALIANCATImmununiCOMDELHI अध्याय ६९] म हा भा र द गाFUNNIDINAMAIIMITUDISATTA TOTO THEHRIDAmarATTITION MALAYTIME TRAVA तथा प्रत्युक्तमिच्छामि तत्करिष्यामि कौरवाः !॥ १३ ॥ भीष्म उवाच-उक्तवानस्मि कल्याणि धर्मस्य परमा गतिः लोके न शक्यते ज्ञातुमपि वितर्महात्मभिः वलवांश्च यथा धर्म लोके पश्यति पूरुपः स धर्मों धर्मवेलायां भवत्यभिहतः परः ।। १५ ।। न विवेक्तुं च ते प्रश्नमिमं शक्नोमि निश्चयात् । सूक्ष्मत्वाद्गहनत्वाच्च कार्यस्याऽस्य च गौरवात् ॥ १६ ॥ नूनमन्तः कुलस्याऽस्य भविता न चिरादिव । तथा हि कुरवः सर्वे लोभमोहपरायणाः ॥ १७॥ कुलेषु जाता कल्याणि ! व्यसनैराहता भृशम् । धान्मार्गान्न च्यवन्ते येषां नस्त्वं वधूः स्थिता ॥ १८ ॥ उपपन्नं च पाञ्चालि! तवेदं वृत्तमीदृशम् यत्कृच्छ्रमपि संप्राप्ता धर्ममेवाऽन्ववेक्षसे एते द्रोणादयश्चैव वृद्धा धर्मविदो जनाः शून्यैः शरीरैस्तिष्ठन्ति गतासव इवाऽऽनताः युधिष्ठिरस्तु प्रश्भेऽस्मिन्प्रमाणमिति मे मतिः । अजितां वा जितां वेति स्वयं व्याहर्तुमर्हति ॥ २१ ॥ इति श्रीमन्महाभारते सभापर्वणि शतपर्वणि भीष्मवाक्ये एकोनसप्ततितमोऽध्यायः ।। ६९ ।। द्रौपदी के ये करुणाजनक वचन सुनकर बुद्धि- है। इस कारण अभी तक तुम्हारे इस प्रश्न पर मान् महात्मा भीष्म ने कहा-हे द्रौपदी ! मैं पहले विचार करके मी में कोई सिद्धान्त निश्चित नहीं कर ही कह चुका हूँ, कि धर्म की गति बड़ी सूक्ष्म है । सका। तो भी कौरवों के लोभ और मोह की अत्यन्त समय समय पर अनेक शास्त्रों के ज्ञाता पण्डित लोग अधिकता देखने से मुझे जान पड़ता है, कि इस कुल भी उसके बारे में कुछ निश्चय नहीं कर पाते । धर्म का नाश शीघ्र ही होनेवाला है। हे द्रौपदी ! तुम के वल मे बली पुरुष धर्म के अनुसार ही चलते हैं। जिस कुल की बहू हो, उस कुल के लोग धर्म के परन्तु समय-समय पर धर्म की गति सूक्ष्म होने के । ऐसे अनुगत हैं, कि घोर कष्ट पड़ने पर भी धर्म के कारण, उन्हें भी अधर्म के मार्ग में पांव रखना पड़ता । मार्ग से नहीं डिंग सकते ॥१५॥१८॥ है । वाम्नव में तुम्हारा प्रश्न अत्यन्त सूक्ष्म और हे पाञ्चाली ! तुम्हारा यह आचरण तुम्हारे गहन है और यह कार्य भी बड़े भारी विचार का , योग्य ही है, कि ऐसे सकट में, ऐसी शोचनीय दशा 'மமமமம்மமமமமாயாபராமாயமாயமாயமா LUE. NuruLuLuulnu LIMITUATAmretaree ॥ २० ॥ MMITTIAns । - ३०४ म हा भारत समाप SinmensummuTITUATTITUTITTAMUOTom muTOurMRITI में, पड़कर भी तुम धर्म को ही देख रही हो । । मेरी समझ में ये धर्मात्मा युधिष्ठिर ही तुम्हारे इस देखो, ये द्रोणाचार्य आदि वृद्ध लोग, जो धर्म को प्रश्न का निर्णय कर दें । वही वतायें कि तुम जीती जाननेवाले है, नीचे को मुख किये हुए, मुरदे के गई हो या नहीं। इस बारे में उन्हीं का कहना सब समान बैठे हुए है, कहते कुछ नहीं है । इस से से अधिक प्रामाणिक माना जायगा ॥१९॥२१॥ सभापर्व का उनहत्तरवां अध्याय समाप्त हुआ ।। ६९॥ . --980- - अथ मप्रतितमोऽध्यायः ॥७॥ वैशम्पायन उवाच-तथा च दृष्ट्वा वहु तत्र देवी रोख्यमाणां कुररीमिवाऽऽर्ताम् । नोचुर्वचः साध्वथ वाऽप्यसाधु महीक्षितो धार्तराष्ट्रस्य भीताः ॥ १ ॥ दृष्ट्वा तथा पार्थिवपुत्रपौत्रांस्तूष्णीभूतान्धृतरापूस्य पुत्रः स्मयन्निवेदं वचनं वभापे पाञ्चालराजस्य सुतां तदानीम् ॥ २ ॥ दुर्योधन उवाच-तिष्ठत्वयं प्रश्न उदारसत्वे भीमेऽर्जुने सहदेवे तथैव । पत्यौ च ते नकुले याजसेनि ! वदन्त्वेते वचनं त्वत्प्रसूतम् । ३ ॥ अनीश्वरं विब्रुवन्त्वार्यमध्ये युधिष्ठिरं तव पाश्चालि ! हेतोः । कुर्वन्तु सर्वे चाऽनृतं धर्मराजं पाश्चालि. त्वं मोक्ष्यसे दासभावात्॥ ४ ॥ धर्मे स्थितो धर्मसुतो महात्मा स्वयं चेदं कथयविन्द्रकल्पः । ईशो वा ते यद्यनीशोऽथवैप वाक्यादस्य क्षिप्रमेकं भजस्व ॥ ५ ॥ सर्वे हीमे कौरवेयाः सभायां दुःखान्तरे वर्तमानास्तवैव न विब्रुवन्त्यार्यसत्त्वा यथावत्पतींश्च ते समवेक्ष्याऽल्पभाग्यान्॥ ६ ॥ मत्तरवां अध्याय ॥७॥ वैशम्पायन ने कहा- गजा जनमेजय : द्रौपदी युधिष्ठिर किमी के स्वामी नहीं है और वे मिथ्यावादी अत्यन्त विलाप करती रही, परन्तु किसी राजा ने हैं, तो तुम दासीभाव से छुटकारा पा मकती हो। दुर्योधन के भय से कुछ उत्तर नहीं दिया । सय मुझे पूर्ण विश्वास है कि इन्द्र के समान प्रतापी महात्मा राजाओं को चुपचाप बैठे देखकर हंमता हुआ दुर्योधन युधिष्ठिर धर्म को नहीं छोड़ सकते । ये म्वयं कह द्रौपदी से कहने लगा-हे पाश्चालि ' तुम भीमसेन, दें, कि वे तुम्हारे स्वामी हैं, या नहीं । वे जो कहें, अर्जुन, नकुल, सहदेव और अपने पनि युधिष्ठिर मे ही उमी पर तुम्हारा दासी होना या न होना अवरचित. यह प्रश्न करो। वे तुम्हारे प्रश्न का उत्तर दें। यदि है। हे द्रौपदी ! तुम्हाग करुणाजनक विराप देख- अर्जुन, भीमसेन, नकुल और महदेव इम ममा मुनकर, सभी कारव अत्यात दु.ग्वित हो रहे हैं। में इन लोगों के सामने तुम्हारे लिये यह कह दें कि विशेषकर तुम्हारे अभाग पतियों की दुर्दशादमर SUREDEEPORTRAININDvDINWTORITEMAAYITEMBEncuencurrearl nkadasisavianus.timinatidasi טופIUיששששששטייטעטן!ישפטי מיישוב म हा मारत अध्याय ७०] TAITADITISTIRDIDATAT : TOMOTIVATIONAL - TELUNTOTAND TIITTEITOTTI QUINTET TIDNOTWITTINEN वैशम्पायन उवाच-ततः सभ्याः कुरुराजस्य तस्य वाक्यं सर्वे प्रशशंसुस्तथोच्चैः चेलावेधांश्चापि चक्रुर्नदन्तो, हाहेत्यासीदपिचैवाऽऽर्तनादः॥ ७ ॥ श्रुत्वा तु तद्वाक्यमनोहरं तद्धर्पश्चासीत्कौरवाणां सभायाम् । सर्वे चासन्पार्थिवाःप्रीतिमन्तः कुरुश्रेष्ठं धार्मिकं पूजयन्तः ॥ ८ युधिष्ठिरं च ते सर्वे समुदैक्षन्त पार्थिवाः किं नु वक्ष्यति धर्मज्ञ इति साचीकृताननाः किं नु वक्ष्यति वीभत्सुरजितो युधि पाण्डवः भीमसेनो यमौ चोभौ भृशं कौतूहलान्विताः ॥ १० ॥ तस्मिन्नुपरते शब्दे भीमसेनोऽब्रवीदिदम् प्रगृह्य रुचिरं दिव्यं भुजं चन्दनचर्चितम् ॥ ११ ॥ भीमसेन उवाच-यद्येप गुरुरस्माकं धर्मराजो महामनाः न प्रभुः स्यात्कुलस्याऽस्य न वयं मर्पयेमहि ॥ १२ ॥ ईशो नः पुण्यतपसां प्राणानामपि चेश्वरः मन्यते जितमात्मानं यद्यप विजिता वयम् न हि मुच्येत मे जीवन्पदा भूमिमुपस्पृशन् । मर्त्यधर्मा परामृश्य पाञ्चाल्या मूर्धजानिमान् ॥ १४ ॥ पश्यध्वं ह्यायतौ वृत्तौ भुजौ मे परिघाविव सब लोग दु ख के समुद्र में इतने डूब गये है, कि को क्षमा न करते ॥१२॥ बात तक नहीं निकलती ॥१६॥ हमारे धर्म-कर्म और प्राणों के भी म्वामी युधि- वैशम्पायन ने कहा-हे राजा जनमेजय ! दुर्योधन ठिर यदि अपने को, द्रौपदी को दाव पर लगाने से की बात को सुनकर सब समा के मनुष्य ऊँचे म्बर पहले, जुए में हारा हुआ समझते हैं, तो हम चारों से दुर्योधन की प्रशंसा करने लगे और प्रसन्न होकर भाई भी नि सन्देह जीत लिये गये। यदि म्वाधीन पाण्डवों की ओर देखने और कहने लगे-देखो, अब होता, तो द्रौपदी के बालों में हाथ लगानेवाला मनुष्य युधिष्ठिर, भीमसेन, अर्जुन. नकुल और सहदेव क्या पृथ्वी पर कहीं भी भाग कर क्यों न जाता, परन्तु उचर देते हैं । जब वह कोलाहल कुछ कम हुआ मेरे हाथ से जीता न बच सकता । लोहे के पेलन तर महापराक्रमी भीमसेन हाथ उठाकर कहने लगे- ऐसे दृढ़ और फैले हुए मेरे इन हाथों को देखो यदि धर्मराज युधिष्ठिर हमारे स्वामी न होते, तो हम इनके बीच में पड़कर इन्द्र भी जीता नहीं यच सकता कमी कौरवों के अत्याचार को और उनके अपराध था। पर क्या करूँ,मैं धर्म के बन्धन में पड़ा होने से ALLY किसी के मुख से 4 MUNDIDIDII-IPL समापर्व Bimurarururammarror C THERERNMarrorrorani TTITUTIOES म हा भारत rrorrormanentrTIENTIREnarrarurrrrrrrranouTHE नैतयोरन्तरं प्राप्य मुच्येताऽपि शतक्रतुः धर्मपाशसितस्त्वेवं नाधिगच्छामि सङ्कटम् गौरवेण निरुद्धश्च निग्रहादर्जुनस्य च धर्मराजनिसृष्टस्तु सिंहः क्षुद्रमृगानिव धार्तराष्ट्रानिमान्पापान्निष्पिपेयं तलासिभिः वैशम्पायन उवाच-तसुवाच तदा भीष्मो द्रोणो विदुर एव च क्षम्यतामिदमित्येवं सर्व संभाव्यते त्वयि ॥ १८॥ इति श्रीमन्महाभारते सभापर्वणि ग्रूतपर्वणि भीमवाक्ये सप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७० ॥ और युधिष्ठिर के गौरव और अर्जुन के रोकने के विह्वल भीमसेन के ये वाक्य सुनकर भीष्म, द्रोण कारण से इस सङ्कट से पार नहीं हो सकता हूँ। और विदुर ने उन्हें शान्त करते हुए कहा-हे भाई यदि धर्मराज आज्ञा दे दें, तो अभी मै सिंह जैसे भीमसेन ! क्षमा कगे। तुम्हारा कहना ठीक है। तुम दुर्बल मृगों का शिकार करता है, वैसे ही इन धृतराष्ट्र सब कुछ कर सकते हो ॥१३॥१८॥ के दुष्ट पुत्रों को पकड़ कर पीस डालूँ । क्रोध में सभापर्व का सत्तरवा अध्याय ममाप्त हुआ ॥ ७० ॥ - - अथ एकसप्ततितमोऽध्यायः ।। ७१ ॥ कर्ण उवाच- त्रयः किलेमे ह्यधना भवन्ति दासः पुत्रश्चाऽस्वतन्त्रा च नारी । दासस्य पत्नी त्वधनस्य भद्रे हीनेश्वरा दासधनं च सर्वम् ॥ १ ॥ प्रविश्य गज्ञः परिवारं भजस्व तत्ते कार्य शिष्टमादिश्यतेऽत्र । ईशास्तु सर्वे तब राजपुत्रिभवन्ति वै धार्तराष्ट्रा,न पार्थाः ॥ २ ॥ अन्यं वृणीष्व पतिमाशु भामिनि ! यस्माद्दास्यं न लभसि देवनेन अवाच्या वै पतिषु कामवृत्तिनित्यं दास्ये विदितं तत्तवाऽस्तु ॥ ३ ॥ पराजितो नकुलो भीमसेनो युधिष्ठिरः सहदेवार्जुनौ च इकहत्तरवां अध्याय ॥ ७१ ।। कर्ण ने कहा-हे भद्रे द्रौपदी ! ये तीन व्यक्ति दुर्योधन के घर में जाकर जो काम मिले, सो करो। निर्धन होते है; दास,पुत्र और पराधीन म्त्री । नियम । अब तुम्हारे स्वामी धृतराष्ट्र के सब पुत्र है, पाण्डव है,कि दास की स्त्री हीन पतिवाली और दास का सब नहीं । हे भामिनि ! तू दूसरा पति कर ले, जिससे धन ये दोनों स्वामी ही के होते है। हे राजपुत्रि ! राजा | दासी का दुख प्राप्त न हो; दास-भाव में स्त्रियों MUVINITY DILLIMILITAUIVADLO UNIUNIUATTUOLITE UTIT POUUTIMITI ।

पENNECTA Turnima mun Tamil 41 . अनुगत और धर्म-पाश में बंधे हुए होने के कारण अध्याय ७१] म हा मारत ३०७ PERMITTTTTTTTTTTTTrey दासीभूता त्वं हि वै याज्ञसेनि ! पराजितास्ते पतयो नैव संन्ति॥ ४ ॥ प्रयोजनं जन्मनि किन मन्यते पराक्रमं पौरुप चैव पार्थः पाञ्चालस्य द्रुपदस्याऽऽत्मजामिमां सभामध्ये यो व्यदेवीद् ग्लहेषु॥५॥ वैशम्पायन उवाच-तदै श्रुत्वा भीमसेनोऽत्यमर्षी भृशं निशश्वास तदाऽऽर्तरूपः । राजानुगो धर्मपाशानुवद्धो दहन्निवैनं क्रोधसंरक्तदृष्टिः ।। ६ ।। भीमसेन उवाच-नाऽहं कुप्ये सूतपुत्रस्य राजन्नेष सत्यं दासधर्मःप्रदिष्टः । किं विद्विषो वै मामेवं व्याहरेयुर्नादेवीस्त्वं यद्यनया नरेन्द्र ! ॥ ७ ॥ वैशम्पायन उवाच-भीमसेनवचः श्रुत्वा राजा दुर्योधनस्तदा । युधिष्ठिरमुवाचेदं तूष्णीभूतमचेतनम् भीमार्जुनौ यमौ चैव स्थितौ ते नृप ! शासने । प्रश्नं वृहि च कृष्णां त्वमजितां यदि मन्यसे ॥ ९ ॥ एवमुक्त्वा तु कौन्तेयमपोह्य वसनं स्वकम् स्मयन्निवेक्ष्य पाञ्चालीमैश्वर्यमदमोहितः ॥ १० ॥ कदलीदण्डसदृशं सर्वलक्षणसंयुतम् गजहस्तप्रतीकाशं वज्रप्रतिमगौरवम् अभ्युत्स्मयित्वा राधेयं भीममाधर्पयन्निव को पतियों में कामवृत्ति अशक्य है । यह तुम्हें मालम गये । वे इस प्रकार युधिष्ठिर की ओर देखने लगे है, कि नकुल, भीमसेन, अर्जुन, सहदेव और युधिष्ठिर मानो उनको जला कर मम्म कर डालेंगे । अब भीमसेन सब हार गये । हे याज्ञसेनि ! तुम दासी हो गयी ने युधिष्ठिर से कहा-हे महाराज ! में सूतपुत्र कर्ण और ये पराजित पाण्डव तुम्हारे पति नहीं रहे क्या के ये वचन सुनकर उस पर क्रोध नहीं करता, क्योंकि कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर जन्म में प्रयोजन पराक्रम और हम सचमुच हारकर दास हो चुके हैं और कर्ण जो पुरुषार्थ को नहीं मानते, जो पाञ्चालराज द्रुपद की कह रहा है, वह दास-धर्म ही है । परन्तु हे राजन् ! पुत्री को जुए में लगा दिया ॥१॥५॥ मुझे कोप आपके ऊपर है; क्योंकि जो आप द्रौपदी वैशम्पायन कहते हैं-कर्ण के ये वचन सुनकर को दांव पर रखकर जुआ न खेलते, तो शत्रुओं की अत्यन्त क्रोधी भीमसेन आर्तभाव धारण करके बारंवार क्या सामर्थ्य थी कि ऐसे दुर्वचन कहकर हमारा लम्बी सांसें लेने लगे। क्या करते, राजा युधिष्ठिर के अपमान करते ॥६॥७॥ वैशम्पायन ने कहा-हे राजा जनमेजय ! कुछ नहीं कर सकते थे। उनके नेत्र लाल हो । भीमसेन के ये यचन मुनकर, अचेत से हो कर चुप STARTUP TIMEmmmmmmucoriteSTITURMERECEPTIONILeartml RituREMEDIE .. ये वे

३०८
म हा भारत
[मभापत्र
KHAIRATNATraininarun
PriRILIONIRepurammmmmHTTENANTITUTERISTITrearraimaarak mmsin
द्रौपद्याः प्रेक्षमाणायाः सव्यमूरुमदर्शयत् ॥ १२ ॥
भीमसेनस्तमालोक्य नेत्रे उत्फाल्य लोहिते
प्रोवाच राजमध्ये तं सभां विश्रावयन्निव
पितृभिः सह सालोक्यं मा स्म गच्छेद् वृकोदरः ।
यद्येतमूलं गदया न भिन्द्यां ते महाहवे
क्रुद्धस्य तस्य सर्वेभ्यः स्रोतोभ्यः पावकार्चिषः ।
वृक्षस्यव विनिश्चेरुः कोटरेभ्यः प्रदह्यतः
विदुर उवाच-परं भयं पश्यत भीमसेनात्तबुध्यध्वं पार्थिवाः ! प्रातिपेयाः! ।
देवेरितो नूनमयं पुरस्तात्परोऽनयो भरतेपूदपादि
॥ १६ ॥
अतिद्यूतं कृतमिदंधार्तराष्ट्रा यस्मात् स्त्रियं विवदध्वंसभायाम्।
योगक्षेमौ नश्यतो वः समग्रौ पापान्मन्त्रान्कुरवोमन्त्रयन्ति ॥ १७ ॥
इमं धर्म कुरवो जानताऽऽशु ध्वस्ते धर्मे परिपत्संप्रदुष्येत्
इमां चेत्पूर्व कितवोऽग्लहीप्यदीशोऽभविष्यदपराजितात्मा ॥ १८ ॥
स्वप्ने यथैतद्विजितं धनं स्यादेवं मन्ये यस्य दीव्यत्यनीशः
गान्धारराजस्य वचो निशम्य धर्मादस्मात्कुरवो माऽपयात ॥ १९ ॥
दुर्योधन उवाच-भीमस्य वाक्ये तहदेवार्जुनस्य स्थितोऽहं वै यमयोश्चैवमेव ।
बैठे हुए. युधिष्ठिर से राजा दुर्योधन ने कहा-हे हो उठे। वे लाल-लाल नेत्र निकाल कर दुर्योधन की
महाराज ! ये चारों भाई अर्थात् भीमसेन, अर्जुन, ओर देखते हुए मय राजाओं को सुनाकर, ऊंने म्बर से
नकुल और सहदेव तुम्हारे आज्ञाकारी हैं, इममे तुम कहने लगे-हे दुर्योधन ! मैं प्रतिज्ञा करता हूँ, कि
द्रौपदी के प्रश्न का उत्तर दो, कि तुम उसको जीती यदि मैं युद्ध में गदा से तेरी यह जाप न तोड़ डार
हुई मानते हो, या नहीं युधिष्ठिर से यों कह कर तो मुझे मरने पर अपने पितरों के लोक न प्राप्त हों।
ऐश्वर्य के मद मे मोहित दुर्योधन ने मुम्कराकर कर्ण उस समय भीममेन के कान, नाक आदि स्थानों
की ओर देखा । फिर केले के खम्भे के समान, मय में से मोध की अमि इस प्रकार से निकलने लगी.
श्रेष्ठ लक्षणों से युक्त, वन के समान हद, हाथी की जैसे जलते हुए वृक्ष के कोटर अर्थात् छिद्रों में से
सूट के गमान यनी हुई चाई जाप पर से यन्त्र हटा अमिनिकनी है ॥१३॥१६॥
कर उमने द्रोपदी की और दग्ना और पृणित सहन इसके पीछे विदुर जी ने कहा-हे. प्रतापसी
राजाओ! यह देखो, भीमगन ने भयानक प्रनिशा
यह देखकर भीममेन आग के गमान प्रज्वलित की है। इसमें मंदेह नहीं किदव की प्रेग्णामही
SUNCEM'TIO '19D'O'TT'ULTTU DOTACLemon TL'lrrrrrrmoner,
दिया ॥८॥१२॥

३०९ म हा भारत अध्याय ७१ MATOGETrumIRATIOATTATRITIATIMERAMAIमाग मा.....भC । वैशम्पायन उवाच- युधिष्टिरं ते प्रवदन्वनीशमथो दास्यान्मोक्ष्यसे याज्ञसेनि ! ॥ २० ॥ अर्जुन उवाच ईशो राजा पूर्वमासीद ग्लहे नः कुन्तीसुतो धर्मराजो महात्मा । ईशस्त्वयं कस्य पराजितात्मा तज्जानीध्वं कुरवः सर्व एव ॥ २१ ॥ -ततो राज्ञो धृतराष्ट्रस्य गेहे गोमायुरुच्चाहरदग्निहोत्र तं रासभाः प्रत्यभापन्त राजन्समन्ततः पक्षिणश्चैव रोद्राः॥ २२ ॥ तं वे शब्दं विदुरस्तत्त्ववेदी शुश्राव घोरं सुवलात्मजा च । भीष्मो द्रोणो गौतमश्चापि विद्वान्स्वस्ति स्वस्तीत्यपि चैवाहुरुचैः॥ २३॥ ततो गान्धारी बिदुरश्चापि विद्वांस्तमुत्पातं घोरमालक्ष्य राखे । निवेदयामासतुरार्तवत्तदा नतो राजा वाक्यमिदं वभापे ॥ २४ ॥ धृतराष्ट्र उवाच-हतोऽसि दुर्योधन ! मन्दबुद्धे ! यस्त्वं सभायां कुरुपुंगवानाम् । स्त्रियं समाभापसि दुर्विनीत! विशेषतो द्रौपदी धर्मपत्नीम् ।। २५ ॥ एवमुक्त्वा धृतराष्ट्रो मनीपी हितान्वेपी वान्धवानामपायात् । कृष्णां पाञ्चालीमत्रवीत्सान्त्वपूर्व विमृश्येतत्प्रज्ञया तत्त्ववुद्धिः ॥ २६ ॥ धृतराष्ट्र उवाच-वरं वृणीष्व पाञ्चालि! मत्तो यदभिवाञ्छसि । दुर्योधन आदि ने अन्याय करके यह अनर्थ उत्पन्न मे पहले द्रौपदी को दांव पर लगा देने, तो अवश्य किया है। मुंग जान पड़ता है, कि यह कुरुवंग नष्ट तुम लोग जीती हुई वस्तु ममझकर द्रौपदी को ले हो जायगा । हे दुर्योधन ! तुमने सभा के बीच में सकते थे, किन्तु धर्मराज पहले म्ययं हार गये हैं, घीको लाकर घृत-धर्म के भी विरुद्ध कर्म किया है। इम लिये इन्हें द्रौपदी को दाव पर लगाने का कोई मभा में म्बी को लाकर उसके लिये यों झगड़ा अधिकार नहीं रहा । जो जिस वस्तु का म्यामी टानना किमी प्रकार से अच्छा नहीं कहा जा सकता। नहीं, यह उसे वदकर हार जाय, नो उम हारी हु इम कर्म और अत्याचार से तुम लोगों के पूर्वो. वस्तु पर जीतनेवाले का वैसे ही अधिकार नहीं है। पार्जिन मय धर्म-कर्म नष्ट हो गये। कसे शोक की यान सक्ता, जैगे म्बान में जीने हुए धन का कोई पा नहीं है, कि पुरम के मय लोग इस कुमन्त्रणा के पृष्ठ- माता । इसी मे में कहना है कि दुष्ट गनिक बन रहे है । हे युरूवगियो ! ममा के बीच पाने में उन्मय होकर धर्म को न छोड़ी। यह में बिमा नगद का अधर्म होने से मय मभासदों की मुनकर, दुर्योधन ने कहा- पापारी ! मैं भीमसेन, दोप लगता । दुर्योधन और दुमामन ! तुम अर्जुन, नाल और महदेय के ऊपर इस पान का में मैं इस समय भी प्रार्थना करता हूँ. मेरी बात पर जरना है। ये कह दें,रि युधिष्टिरहमारे सामी नहीं न दो। महागज युधिष्ठिर यदि अपने को हाने हैं, तो तुम दामीभाव से गुटकारा पा सम्ली हो । TELLITEL LArt:RCLEE TATAErvrrrrrrrrrrrrrrrreturtcrth पीपक ३१० म हा मारत [ सभापर्व QUNnm morTiNUTTITOR ArrarUTIXIrruartun ॥ २७ ॥ । WIDHHOTIMIMJunmathunuITIATINITION - वधूनां हि विशिष्टा मे त्वं धर्मपरमा सती द्रौपद्युवाच-ददासि चेद्वरं मह्यं वृणोमि भरतर्षभ ! सर्वधर्मानुगः श्रीमानदासोऽस्तु युधिष्ठिरः ॥ २८ ॥ मनस्विनमजानन्तो मैवं ब्रूयुः कुमारकाः एप वै दासपुत्रो हि प्रतिविन्ध्यं ममाऽऽत्मजम्॥ २९ ॥ राजपुत्रः पुरा भूत्वा यथा नाऽन्यः पुमान्क्वचित् । राजभिर्लालितस्याऽस्य न युक्ता दासपुत्रता धृतराष्ट्र उवाच-एवं भवतु कल्याणि यथा त्वमभिभाषसे द्वितीयं ते वरं भद्रे ददानि वरयस्व ह मनो हि मे वितरति नैकं त्वं वरमर्हसि द्रौपद्युवाच-सरथी सधनुष्कौ च भीमसेनधनञ्जयौ ॥ ३२ ॥ यमौ च वरये राजन्नदासान्खवशानहम् धृतराष्ट्र उवाच-तथाऽस्तु ते महाभागे यथा त्वं नन्दिनीच्छसि ॥ ३३ ॥ तृतीयं वरयाऽस्मत्तो नासि द्वाभ्यां सुसत्कृता । ॥१६॥२०॥ तव गान्धारी और विद्वान् विदुर ने राजा धृतराष्ट्र से यह सुनकर अर्जुन ने कहा- धर्मराज युधिष्ठिर ने जब उन घोर उत्पातों का वर्णन किया । अमाल की हमको दाव पर लगाया था, तब वे अपने को हारे आशका से सब लोग कांप उठे ॥२१॥२४॥ नहीं थे, इस लिये हम सब के स्वामी थे। जब वे यह सुनते ही महाराज धृतराष्ट्र दुर्योधन अपने को बदकर हार गये, तब भला किस के म्यामी कहने लगे हे दुर्बुद्धि दुर्योधन ! इसमें सन्देह नहीं रह सकते हैं । कुरुवंश के सर लोग इस पर विचार कि तूने अपने हाथों अपना नाश कर लिया । तू कर देखें । वैशम्पायन ने कहा-हे राजा जनमेजय ! सभा में पाण्डवों की धर्मपत्नी द्रौपदी से ऐसी अनु. सभा में इस प्रकार बातचीत हो रही थी कि महाराज चित यात कर रहा है । भरतवंश की बहू के साथ धृतराष्ट्र के यज्ञम्धान में घुसकर गीदड़ ऊँचे म्बर से ऐसा व्यवहार कर रहा है ! तुझे लज्जा नहीं आती ! रोने लगा। साथ ही बहुत से गधे और भयानक वैशम्पायन ने कहा-हे राजा जनमेजय ! बुद्धिमान अशुग पक्षी भी घोर गन्द करने लगे। इन अमल प्रजाचक्षु धृतराष्ट्र ने विचार कर दुर्योधन के काम शब्दों को बुद्धिमान् विदुर, गान्धारी, मीम, द्रोण, को बन्धुओं के नाश का कारण समझा और द्रौपदी कृपाचार्य आदि सब ने मुना। भय से व्याकुल होकर, को पास बुलाकर कहा-हे द्रोपदी ! तुम अपनी धर्म- सय रोग "कल्याण हो, कल्याण हो" कहने लगे। बुद्धि के कारण मेरी सब बहुओं में श्रेष्ठ हो। तुम imagesmTIOHDHEADEDDTDADAPNIL MAVSAIGHTDAVITAIMImments STUJTONSDALENDRID INT. Rinnnnnn - मे ३११ अध्याय ७२] म हा मारत HTTACTRENDuram manTTramm mumar HITUTION PRITHMANTITITITIOTI - nraru त्वं हि सर्वस्नुपाणां मे श्रेयसी धर्मचारिणी ॥ ३४ ॥ द्रोपद्युवाच-लोभो धर्मस्य नाशाय भगवन्नाऽहमुत्सहे अनहीं वरमादातुं तृतीयं राजसत्तम ! एकमाहुर्वैश्यवरं द्वौ तु क्षत्रस्त्रियो वरी त्रयस्तु राज्ञो राजेन्द्र ! ब्राह्मणस्य शतं वराः ॥ ३६ ॥ पापीयांस इमे भूत्वा संतीर्णाः पतयो मम वेत्स्यन्ति चैव भद्राणि राजन्पुण्येन कर्मणा ॥३७ ॥ इति श्रीमन्महाभारते मभापर्वणि घृतपर्वणि द्रौपदीवरलाभे एकसप्ततितमोऽध्यायः ।। ७१ ॥ वही पतिव्रता हो । मै तुम पर बहुत प्रसन्न हूँ । भीमसेन, अर्जुन, नकुल और महदय दाम-भाव से तुम्हारी जो इच्छा हो, वह वर मुझ से मागो । यह जायें और उनको उनके रथ और धनुप दे दिये सुनकर द्रौपदी ने कहा- हे महाराज ! यदि आप जावें। धृतराष्ट्र ने यह वरदान भी दिया और कहा- प्रसन्न होकर वर देना चाहते है, तो मैं आप से यही हे द्रौपदी ! अब तुम तीसरा वर मुझ से और मांगो। मांगती हूँ, कि महाराज युधिष्ठिर दासभाव से छुटकारा तुम्हें दो वरदान देने से मेरी तृप्ति नहीं हुई है, पावें, और मेरे पुत्र प्रतिविन्ध्य को कोई दास-पुत्र क्योंकि तुम धर्मचारिणी और मेरी मय बहुओं में न कहे । प्रतिविन्ध्य पहले राजकुमार था । जिसका श्रेष्ठ हो । यह सुनकर द्रौपदी ने कहा-हे महाराज ! लालन-पालन राजाओं ने किया है, वह दास-पुत्र होने बहुत लोम करने से धर्म का नाग होता है, इससे मैं अब तीसरा वर मांगना नहीं चाहती हूँ। शास्त्र महाराज धृतराष्ट्र ने ऐसा ही होगा' कहकर में लिखा है कि वैश्य को एक यर, क्षत्रिय की : यह वर दे दिया और फिर कहा-हे द्रौपदी ! यह को दो वर, राजा को तीन वर और ब्राह्मण को सौ वर तो मैंने तुमको दे दिया; अब तुम दूसरा वर घर तक मांगने और लेने का अधिकार है । हे मुन्न मे मांगो, मैं प्रसन्नता से दूंगा। तुम एक वरदान महाराज ! ये मेरे पति अब दाम-माव से टूट कर के योग्य नहीं हो । द्रौपदी ने कहा-हे महाराज ! शुभ कर्म करके यहुन कल्याण पायेंगे ॥३१॥३७॥ मभापर्व का इकहत्तरवां अध्याय समाप्त हुआ।। ७१ ।। TATARAITLIMia छूट --- । योग्य नहीं ।। २५/३० ॥ अथ द्विसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७ ॥ - वर्ण उवाच-या नः श्रुता मनुष्येषु स्त्रियो रूपेण संमताः । तासामेतादृशं कर्म न कस्याश्चन शुश्रुम क्रोधाविष्टेषु पार्थेषु धार्तराष्ट्रेषु चाप्यति द्रौपदी पाण्डुपुत्राणां कृष्णा शान्तिरिहाऽभवत् ॥ २ ॥ "OBIOMETRPERTOMDECEmaceurcromancremiumen { सभापर्व । INDIWMJIMATI म - ३१२ म हा भारत ETREETorraimamrouTEGITrrrrrrammarIHIROIrrarentinuternmaraa अप्लवेऽम्भसि मनानामप्रतिष्ठे निमज्जताम् पाञ्चाली पाण्डुपुत्राणां नारेषा पारगाऽभवत् ॥ ३ ॥ वेशम्पायन उवाच-तद्वै श्रुत्वा भीमसेनः कुरुमध्येऽत्यमर्पणः स्त्री गतिः पाण्डुपुत्राणामित्युवाच सुदुर्मनाः ॥ ४ ॥ भीम उवाच-त्रीणि ज्योतीपि पुरुप इति वै देवलोऽब्रवीत् । अपत्यं कर्म विद्या च यतः सृष्टाः प्रजास्ततः ॥ ५ ॥ अमेध्ये वै गतप्राणे शून्ये ज्ञातिभिरुज्झिते देहे त्रितयमेवैतत्पुरुपस्योपयुज्यते तन्नो ज्योतिरभिहतं दाराणामभिमर्शनात् धनञ्जय ! कथं स्वित्स्यादपत्यमभिमृष्टजम् अर्जुन उवाघ-न चैवोक्ता न चाऽनुक्ता हीनतः परुषा गिरः । भारत ! प्रतिजल्पन्ति सदा तूत्तमपूरुषाः स्मरन्ति सुकृतान्येव न वैराणि कृतान्यपि सन्तः प्रतिविजानन्तो लब्धसंभावनाः स्वयम् ।। ९ ।। भीम उवाच-इहवैतानहं* सर्वान्हन्मि शत्रून्समागतान् वहत्तरयां अध्यायः ॥७२॥ कर्ण ने कहा-हमने आज तक जितनी म्वरूपवान् सन्तान, शुभकर्म और विद्या यही तीन वस्तुएँ पुरुष स्त्रियां सुनी हैं, उनमें से ऐसा कर्म किमी स्त्री का नहीं की सहायता करती हैं। पुरुष जब मरने मे अपवित्र सुना है। इस द्रौपदी ने पाण्डव और घृतराष्ट्र के पुत्रों हो जाता है और जातियाले भी उसे त्याग देते हैं, के क्रोध को शान्त करके पाण्डवों को महादुःम्वरूपी तय इन्हीं तीन वस्तुओं से जीवधारी को सहायता समुद्र में से नौका रूप होकर निकाला है ।।१।३|| मिलती है । हमारी धर्मपत्नी को छूकर दु.गासन ने वैशम्पायन ने कहा-हे राजा जनमेजय ! अत्यन्त अपवित्र कर दिया है। इसी कारण उनके गर्भ से उत्सन्न मोधी भीमसेन, कौरवों की सभा में, कर्ण के ये वचन सन्तान भी अपवित्र हो गई समझनी चाहिये ॥४७॥ मुनकर बहुत ही दुखित हुए और कहने लगे कि अर्जुन ने कहा-हे भीमसेन ! जो अच्छे पुरुष "हाय ! मी ने पाण्टयों को उयारा!" फिर उन्होंने होते है ये नीच आदमी से यात नहीं करते हैं, अर्जुन से कहा-हे अर्जुन ! देवल ऋषि ने कहा है चाहे वह कुछ कहे, या न रहे । और मत्पुरुष मरे कि तीन वस्तुओं से पुरुष को सद्गति मिलती है। के किये हुए उपकार को जानकर मदेव मान ही हैन र माग्नात नीलकण्ठोम्पाम्यात: पाद: 1 सूग मायामपः । सभी साम्योरपूटिसिमिदम् । HIDIEODOARDPRERDOPPPIPROPEDIOPIEDOI:08: PIRATIOTATUnaukmanirunnTruuuuunt Srastramudanamamanasamadamarimmanduurmamerama arrotsexam TITUTNERUT namuTournamrutrumIGITALILAL अध्याय ७२] म हा मारत ३१३ SERIANTERALLumia अथ निष्क्रम्य राजेन्द्र ! समूलान्हन्मि भारत!॥ १० ॥ किं नो विवदितेनेह किमुक्तेन च भारत! अद्यैवैतान्निहन्मीह प्रशाधि पृथिवीमिमाम् ॥ ११ ॥ इत्युक्त्वा भीमसेनस्तु कनिष्ठेतृभिः सह मृगमध्ये यथा सिंहो मुहुर्मुहुरुदेक्षत ।। १२ ।। सान्व्यमानो वीक्ष्यमाणः पार्थेनाऽक्लिष्टकर्मणा । खिद्यत्येव महावाहुरन्तर्दाहेन वीर्यवान् ।। १३ ॥ कुद्धस्य तस्य स्रोतोभ्यः कर्णादिभ्यो नराधिप! । सधूमः सस्फुलिङ्गार्चिः पावकः समजायत ॥ १४ ॥ भृकुटीकृतदुष्प्रेक्ष्यमभवत्तस्य तन्मुखम् युगान्तकाले संप्राप्ते कृतान्तस्येव रूपिणः ॥ १५ ॥ युधिष्ठिरस्तमावार्य वाहुना वाहुशालिनम् मैवमित्यत्रवीच्चैन जोपमाखेति भारत.! ॥ १६ ॥ निवार्य च महावाहुं कोपसंरक्तलोचनम् पितरं समुपातिष्ठद्धृतराष्ट्रं कृताञ्जलिः ॥ १७॥ इति श्रीमन्महाभारते सभापर्वणि वृतपर्वणि भीमक्रोधे द्विसप्ततितमोऽध्यायः ।। ७२ ॥ का स्मरण करते हैं और किये हुए वैर को कभी देखकर दुःखित हुआ और क्रोध के कारण से उस हृदय में नहीं आने देते है। तब भीमसेन ने कहा- के कान, नाक आदि छिद्रों से ज्वाला निकलने लगी हे युधिष्ठिर ! यहां वृथा यात करने की क्या आव- । और प्रलयकाल के रुद्र म्वरूप के सहा उसका श्यकता है ! आप कहें तो मैं अभी बाहर निकल मुख, भौं आदि के चढ़ाने से ऐमा भयानक हो गया, कर इन सब शत्रुओं को जड़मूल से नष्ट कर टालें। कि उसके सम्मुख मनुष्य नहीं देख सकता था । आप निष्कंटक होकर पृथ्वी का शासन कीजिए तब युधिष्ठिर ने उसके ऐसे म्वरूप को देखकर हाथ पकड़कर कहा-हे भाई! ऐमा मत करो, मान्त यह कहकर भीमसेन वहां भाइयों-सहित इस हो जाओ । इम प्रकार भीमसेन को शान्त करके प्रकार मे देखने लगा जैसे मृगों में मिह देखता है। हाथ जोड़े हुए महाराज युधिष्ठिर अपने चाचा उस समय भीमसेन युधिष्ठिर के शान्त स्वरूप को धृतराष्ट्र के पास गये ॥१२॥१७॥ सभापर्व का यहत्तरवां अध्याय ममाप्त हुआ ।। ७॥ HTrandiaLLimयामा - ८.११॥ POMTITUDIEODTATERTIEETranTCHECEITECRETTErrrerh [ सभापर्व ३१४ म हा मारत FeamronmmmmmmmmmmmmmmmunuwarrantITTrammmmmmmmmorrorminaraurana अथ त्रयःसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ३ ॥ युधिष्ठिर उवाच-राजन्कि* करवामस्ते प्रशाध्यस्मांस्त्वमीश्वरः!। नित्यं हि स्थातुमिच्छामस्तव भारत! शासने ॥ १ ॥ धृतराष्ट्र उवाच-अजातशत्रो ! भद्रं ते अरिष्टं स्वस्ति गच्छत । अनुज्ञाताः सहधनाः स्वराज्यमनुशासत ॥ २ ॥ इदं चैवाऽवबोद्धव्यं वृद्धस्य मम शासनम् मया निगदितं सर्व पथ्यं निःश्रेयसं परम् वेत्थ स्वं तात! धर्माणां गतिं सूक्ष्मां युधिष्टिर! । विनीतोऽसि महाप्राज्ञ ! वृद्धानां पर्युपासिता ॥ ४ ॥ यतो बुद्धिस्ततः क्षान्तिः प्रशमं गच्छ भारत ! । नाऽदारुणि पतेच्छस्त्रं दारुण्येतन्निपात्यते नवैराण्यभिजानन्ति गुणान्पश्यन्ति नाऽगुणान् । विरोधं नाऽधिगच्छन्ति ये त उत्तमपूषाः स्मरन्ति सुकृतान्येव न वैराणि कृतान्यपि सन्तः परार्थं कुर्वाणा नावेक्षन्ते प्रतिक्रियाम् ॥ ७ ॥ संवादे परुपाण्याहुयुधिष्ठिर ! नराधमाः तिहत्तरवां अध्याय ।। ७३ ।। युधिष्ठिर ने कहा-हे महाराज ! मेरे लिये क्या बुद्धिमान् मनुष्यों में सदैव क्षमा रहती है, इस भाज्ञा है ! मै आप ही की आज्ञा में रहना चाहता से तुम भी अब शान्त होकर हो । देखो, शान हूँ। यह सुनकर धृतराष्ट्र ने कहा-हे अजातशत्रु पत्थर आदि कड़ी वस्तुओं पर नहीं चलता है और युधिष्ठिर ! अब तुम निर्विघ्न और कल्याणपूर्वक अपने | जो वस्तु नरम होती है उमको काट डालता घर को जाओ और धन-सहित आनन्द से राज्य महापुरुष वैर को अपने मन में नहीं रखते हैं और युद्ध हूँ, भलाई के लिये मैं जो कहता हूँ, न विरोध करते हैं, किन्तु गुणों पर ही ध्यान करते उसे सदा स्मरण रखना । तुम सब प्रकार के धमों हैं । शत्रु के किये वैर को भूलकर उसकी की हुई की सूक्ष्म गति को विशेष रूप से जानते हो और भलाई पर ही सज्जन ध्यान रखते हैं । परोपकार का बड़े ही बुद्धिमान हो । तुम जानी, नम्र और वृद्धों स्वभाव रखनेवाले सजन, बुरा करनेवाले शत्रु से भी की सेवा करनेवाले हो ॥१४॥ फभी बदला लेने का विचार नहीं करते ॥५/७।। • 'करवामः' इति लोट उत्तम पुर महुवचने सलोराभाव आपः। * भरिष्ट सर्वतोम निनिमित्यर्थः । FarmereITITIODITIONARYTIMITEDLOODramari - -- । करो। CE numminuintronrmm MaPEDIEmirari THRITIIIIINTER है - को नहीं छोड़ते। इस सज्जनों के समागम. में तुमने अध्याय ७३] म हा मारत ३१५ प्रत्याहुर्मध्यमास्त्वेतेऽनुक्ताः परुपमुत्तरम् न चोक्ता नैव चाऽनुक्तास्त्वहिताःपरुपा गिरः । प्रतिजल्पन्ति वै धीराः सदा तूत्तमपुरुषाः स्मरन्ति सुकृतान्येव न वैराणि कृतान्यपि सन्तः प्रतिविजानन्तों लब्ध्वा प्रत्ययमात्मनः ॥ १० ॥ असंभिन्नार्यमर्यादाः साधवः प्रियदर्शनाः तथाऽऽचरितमार्येण त्वयाऽस्मिन्सत्समागमे ॥ ११ ॥ दुर्योधनस्य पारुष्यं तत्तात ! हृदि मा कृथाः मातरं चैव गान्धारी मां च त्वं गुणकाङ्क्षया । उपस्थितं वृद्धमन्धं पितरं पश्य भारत ! ॥ १२ ॥ प्रेक्षापूर्वं मया यूतमिदमासीदुपेक्षितम् मित्राणि द्रष्टुकामेन पुत्राणां च बलावलम् ॥ १३ ॥ अशोच्याः कुरवो राजन्येषां त्वमनुशासिता । मन्त्री च विदुरो धीमान्सर्वशास्त्रविशारदः ॥ १४ ॥ त्वयि धर्मोऽर्जुने धैर्य भीमसेने पराक्रमः शुद्धा च गुरुशुश्रुषा यमयोः पुरुषाग्ययोः हे युधिष्ठिर ! नीच अधम मनुष्य ही बातचीत भी उसी सज्जनों के धर्म का पालन किया है। हे में कठोर वचन कहते है। जो लोग कठोर वचन के | पुत्र ! तुम आर्य कुल के भूपण हो । दुर्योधन ने जो उत्तर में आप भी कटोर शब्दों से काम लेते हैं, वे ' तुम्हें कठोर वचन कहे हैं और तुम्हारे साथ अनुचित मध्यम कहलाते हैं । किन्तु जो उत्तम पुरुष हैं, वे व्यवहार किया है, उसे तुम भूल जाना ॥८॥११॥ किसी के कहे कठोर वचनों को सुनकर शान्ति से मैं तुम्हारा चचा युद्ध और अन्धा हूँ। तुम सह लेते हैं। उन्हें यदि कोई कठोर वचन कहता अपने गुणों की ओर, मेरी और गान्धारी की ओर है, तो वे उनको उसी घड़ी भूल जाते हैं। और 'देखकर,अपने हृदय में वैरभाव को स्थान मत देना। यदि उस कठोर वचन कहनेवाले ने कभी कुछ उनके मुझे यह घूत क्रीड़ा बिलकुल पसन्द नहीं थी। केवल साथ उपकार किया है, तो वे उस उपकार को सदा मित्रों की परीक्षा के लिये और पुत्रों का पलावल स्मरण किया करते हैं। जिनके दर्शन सबको प्रिय जानने की इच्छा से ही मैं कुछ नहीं बोला और घूत- होते हैं, वे साधु लोग कभी आर्य पुरुषों की मर्यादा मीड़ा को उपेक्षा की दृष्टि से देखता रहा ।।१२।१४।। हे राजन् ! निम्सन्देह हमारे मन्त्री विदुर भी STMAITRINEETITIOTICIPATTITUTORRENCECIDEnema anuaRavaraniaanwunnmanaamaadimanr-- ।

म हा मारत [ समापर MITTERTrurnrTOT AuToharraimarwarimirrormarATCAREETI अजातशत्रो! भद्रं ते खाण्डवप्रस्थमाविश भ्रातृभिस्तेऽस्तु सौभ्रानं धर्मे ते धीयतां मनः ॥ १६ ॥ वैशम्पायन उवाच-इत्युक्तो भरतश्रेष्ठो धर्मराजो युधिष्ठिरः कृत्वाऽऽर्यसमयं सर्व प्रतस्थे भ्रातृभिः सह ते रथान्मघसंकाशानास्थाय सह कृष्णया प्रययुर्हष्टमनस इन्द्रप्रस्थं पुरोत्तमम् ॥ १८ ॥ इति श्रीमन्महाभारते सभापर्वणि गतपर्वणि धृतराष्ट्रवरप्रदानपूर्वकमिन्द्रप्रस्थं प्रति युधिष्ठिरगमने त्रयःसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७३ ।। समाप्तं च द्यूतपर्व । बड़े पण्डित और बुद्धिमान् हैं और तुम धर्मात्मा, । चुकने पर महाराज युधिष्ठिर ने सभा में बैठे हुए अर्जुन धैर्यवान् , भीमसेन पराक्रमी और नकुल और | सब लोगों से मिलकर, शिष्टाचार और बातचीत सहदेव बड़ों की शुश्रुषा करनेवाले हैं । ईश्वर करे करके, द्रौपदी और भाइयों के साथ खाण्डवप्रन्थ के तुम्हारा कल्याण हो । तुम्हारी बुद्धि धर्म में लगी , लिये यात्रा कर दी । पांचों पाण्डव मेघतुल्य रथों पर रहे और दुर्योधन आदि भाइयों से तुम्हारी प्रीति चढ़कर प्रसन्नतापूर्वक अपनी राजधानी को चले । रहे । अब तुम खाण्डवप्रस्थ को जाओ। वैशम्पायन ॥१५॥१८॥ ने कहा-हे राजा जनमेजय ! धृतराष्ट्र के यों कह । सभापर्व का तिहत्तरवां अध्याय समाप्त हुआ ।। ७३॥ ॥ अथ अनुबूत पर्व ॥ अथ चतुःसप्ततितमोऽध्यायः ।। ७४ ।। जनमेजय उवाच-अनुज्ञातांस्तान्विदित्वा सरत्नधनसंचयान् पाण्डवान्धार्तराष्ट्राणां कथमासीन्मनस्तदा वैशम्पायन उवाच अनुज्ञातांस्तान्विदित्वा धृतराष्ट्रेण धीमता राजन्दुःशासनः क्षिप्रं जगाम भ्रातरं प्रति चौहत्तरवां अध्याय ।।७४ ॥ राजा जनमेजय ने वैशम्पायन जी से पूछा-हे कहिए । वैशम्पायन ने कहा-हे राजा जनमेजय । महाराज! जय धृतर ष्ट्र के पुत्रों को यह प्रतीत हुआ, बुद्धिमान् धृतराष्ट्र की आज्ञा पाकर पाण्डवों को इन्द्र कि धृतराष्ट्र की आज्ञा पाकर,पांचों पाण्डव सब रत्न प्रम्थ जाते देख, दुःशासन को बड़ा दुःख हुआ। धन आदि लेकर द्रौपदी के साथ इन्द्रप्रस्थ को चले वह शीघ्रता से वहां पहुंचा, जहां दुर्योधन अपने गये, तप उनके मन की क्या दशा हुई ! कृपा करके । मन्त्रियों-सहित बैठा हुआ था। उसने जाकर दुर्योधन EXCITITIETIECTUPECIMUTTPOTOINTRIEVEDICTIVITIECTETTINDIAremonal onstaTamam - wARTINANTOT - ॥ कि अपने अहितकारी रात्र को युद्ध और पराक्रम अध्याय ७४ ] म हा भारत ३१७ IITORIWITORIERTAINITIATTITTER AMITTITIENERATurmarurariinaraney दुर्योधनं समासाद्य सामात्यं भरतर्षभ ! दुःखा? भरतश्रेष्ठ इदं वचनमब्रवीत् दुःशासन उवाच-दुःखेनैतत्समानीतं स्थविरो नाशयत्यसौ शत्रुसाद्गमयद् द्रव्यं तद् वुध्यध्वं महारथाः! ॥ ४ ॥ अथ दुर्योधनः कर्णःशकुनिश्चाऽपि सौवलः मिथः संगम्य सहिताः पाण्डवान्प्रतिमानिनः ॥ ५ ॥ वैचित्रवीर्य राजानं धृतराष्ट्रं मनीषिणम् अभिगम्य त्वरायुक्ताः श्लक्ष्णं वचनमब्रुवन् दुर्योधन उवाच-न त्वयेदं श्रुतं राजन्यजगाद बृहस्पतिः शुक्रस्य नीति प्रवदन्विद्वान्देवपुरोहितः सर्वोपायनिहन्तव्याः शत्रवः शत्रुसूदन पुरा युद्धाद्वलाद्वापि प्रकुर्वन्ति तवाऽहितम् ते वयं पाण्डवधनः सर्वान्संपूज्य पार्थिवान् यदि तान्योधयिष्यामः किं वै नःपरिहास्यति ॥ ९ ॥ अहीनाशीविषान्क्रुद्धान्नाशाय समुपस्थितान् · कृत्वा कण्ठे च पृष्ठे च कः समुत्स्रष्टुमर्हति ॥ १० ॥ आत्तशस्त्रा रथगताः कुपितास्तात ! पाण्डवाः । से कहा-हे महाराज ! बड़े यत्त से हमने जो धन करने के पहले ही, जिस उपाय से हो सके, मार शत्रुओं से प्राप्त किया था, उसे बूढ़े राजा ने पाण्डवों डाले ॥५॥८॥ को देकर हमारे हाथ से खो दिया । यही सूचना हमारी इच्छा थी, हम पाण्डया के धन से सब राजाओं को अपने वश में कर लें। ऐसा करने यह सुनकर दुर्योधन, कर्ण, शकुनि तीनों र, जो पाण्डवों का हम से युद्ध भी होता, तो हमारी पाण्डवों से बदला लेने के लिये शीघ्रता से महाराज कुछ हानि नहीं थी। भला ऐसा कौन मनुष्य होगा धनराष्ट्र के पास पहुँचे। वहां पहुंचकर नम्रतापूर्वक जो विषधारी साँपों को, अपने आप को नाश करने दुर्योधन ने कहा-हे पिता जी! आपने, जो शुक्र के लिय, अपने कन्धों और पीठ पर छोड़ेगा। इस की दी हुई नीति, वृहम्पति जी ने देवताओं से लिये हे पिता जी ! यदि हम पाण्डयों को छोड़ देंगे कही थी, वह नहीं सुनी है। मनुष्य को चाहिये, तो ये लोग हाय में शम लेकर, रथ पर चढ़कर, कुपित साप की तरह हमारे वंश मर का नाश कर HILIr.crazruarttimomraman देने में आपके पास आया हूँ ॥१४॥ पर, mmmmIDEOCTODurat ITML ३१८ म हा मारत [सभापर्व Immmmmm Innnuman ImmuTUTE nnnnnnnnnnnnnnnnnnnnn! - । निःशेष वः करिष्यन्ति क्रुद्धा ह्याशीविषा इव ॥ ११ ॥ संनद्धो ह्यर्जुनो याति विधृत्य परमेषुधी गाण्डीवं मुहुरादत्ते निश्वसंश्च निरीक्षते ॥ १२ ॥ गदां गुर्वी समुद्यम्य त्वरितश्च वृकोदरः स्वरथं योजयित्वाऽऽशु निर्यात इति नः श्रुतम् ॥ १३ ॥ नकुलः खड्गमादाय चर्म चाप्यर्धचन्द्रवत् सहदेवश्च राजा च चक्रुराकारमिङ्गितैः ते त्वास्थाय रथान्सर्वे बहुशस्त्रपरिच्छदान् अभिनन्तो रथवातान्सेनायोगाय निर्ययुः न क्षस्यन्ते तथाऽस्माभिर्जातु विप्रकृता हि ते । द्रौपद्याश्च परिक्लेशं कस्तेषां क्षन्तुमर्हति पुनर्दीव्याम भद्रं ते वनवासाय पाण्डवैः एवमेतान्वशे कर्तुं शक्ष्यामः पुरुषर्षभ ! ते वा द्वादश वर्षाणि वयं वा द्यूतनिर्जिताः प्रविशेम महारण्यमजिनः प्रतिवासिताः त्रयोदशं सजनेन* अज्ञाताः प्रतिवत्सरम् डालेंगे । देखो, अर्जुन चलते समय रथ में बैठकर, । जो उत्पात किये है और द्रौपदी को जो क्लेश दिये तरफसों को बांधकर, नार-पार गाण्डीव धनुष को है, उनको वे कभी न सह सकेंगे ॥१३॥१६॥ उठाता था और चारों ओर श्वास ले-लेकर देखता इस लिये मेरी इच्छा यह है, कि हम लोग था ॥९॥१२॥ । वनवास का दाँव लगाकर फिर उनके साथ चौसर और भीमसेन भी अपनी भारी गदा को उठाकर खेलें । इस प्रकार खेल में हराकर हम उन्हें अपने रथ को जोतकर शीघ्रता से चल दिया । नकुल, कर सकेंगे । अव की पार हम यह दांव सहदेव और युधिष्ठिर भी दाल और तलवार लिये, लगावेंगे, कि हम में से जो कोई हारे, वह बारह एक दूसरे की ओर देखकर इशारे करते गये हैं। तक मृगछाला पहनकर वन में रहे और तेरहवें वर्ष उनकी चेया से ऐमा जाना जाता है, कि वे रयों को अज्ञातवास करे । अज्ञातवासवाले वर्ष में छिपकर दौड़ाते हुए सेना लेने को गये हैं । सेना लाकर रहना होगा। उस वर्ष जो पता लगा लिया जायगा, अवश्य उत्पात करेंगे क्योंकि हमने उनके साथ जो तो फिर बारह वर्ष वन में रहकर उसी नियम पर • सजनेन रामानननेत्यर्थः । AUT'DULUIUDICIUM CITATUM D'UNITED'OIDIDMIDTTUCCORREPEL | பெமயமாாாாாாாபாகைமானாாாபானானனாமா - - वश वर्ष - . - - अध्याय ७४ ] म हा भारत ३१९ UTTER TITHILULLIRUTITUTராராராTTTTTTTTTTராாாாாாாாாாாா Nare ज्ञाताश्च पुनरन्यानि वने वर्षाणि द्वादश ॥ १९ ॥ निवसेम क्यं ते वा तथा घृतं प्रवर्तताम् अक्षानुप्त्वा पुनर्पूतमिदं कुर्वन्तु पाण्डवाः ॥ २० ॥ एतत्कृत्यतमं राजन्नस्माकं भरतर्षभ ! अयं हि शकुनिर्वेद सविद्यामक्षसंपदम् ॥ २१ ॥ दृढमूला वयं राज्ये मित्राणि परिगृह्य च सारवद्विपुलं सैन्यं सत्कृत्य च दुरासदम् ।। २२ ।। ते च त्रयोदशं वर्ष पारयिष्यन्ति चेद व्रतम् जेप्यामस्तान्वयं राजन् ! रोचतां ते परन्तप! ॥ २३ ॥ धृतराष्ट्र उवाच-तूर्णं प्रत्यानयस्वैतान्कामं व्यध्वगतानपि आगच्छन्तु पुन तमिदं कुर्वन्तु पाण्डवाः ॥ २४ ॥ वैशम्पायन उवाच-ततो द्रोणः सोमदत्तो वाहीकश्चैव गौतमः विदुरो द्रोणपुत्रश्च वैश्यापुत्रश्च वीर्यवान् ॥ २५ ॥ भूरिश्रवाः शान्तनवो विकर्णश्च महारथः मा द्यूतमित्यभापन्त शमोऽस्त्विति च सर्वशः ॥ २६ ॥ अकामानां च सर्वेषां सुहृदामर्थदर्शिनाम् अकरोत्पाण्डवाहानं धृतराष्ट्रः सुतप्रियः ॥ २७॥ इति श्रीमन्महाभारते सभापर्वणि अनुयूतपर्वणि पुनयुधिष्ठिरप्रत्यानयने चतुःसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७४ ।। एक वर्ष अज्ञातवास करना पड़ेगा। जब तक अज्ञात कर आवेंगे, तो उतने काल में हम सब मित्रों को वश वाम का वर्प पता लगाए बिना ही व्यतीत न में करके और बहुत सी सेना को आदर-सहित इकट्टी किया जा सके, तब तक इसी प्रकार पुन पुन बारह । करके हाथों हाथ उनको युद्ध में जीत लेंगे। इस वर्ष वनवास और एक वर्ष अज्ञातवास करना पड़ेगा। लिये हे पिता जी हमारी इस बात को स्वीकार इस तरह का दांव लगाकर चौसर खेलने के लिये कर रीजिए; क्योंकि इसी में आपके पुत्रों की भलाई आप हमें आज्ञा दे दीजिए 1 इस समय अपनी हो सकती है । यह सुनकर राजा धृतराष्ट्र ने कहा- भराई के लिये हमें इसी उपाय का आश्रय लेना अच्छी बात है । शीघ्र पाण्डवों को बुलाकर, हे पड़ेगा । मामा शकुनि पांसों की विद्या को अच्छी वे आधे ही राम्ते में पहुंचे हों, इस शर्त पर फिर जुआ खेरो। वैशम्पायन कहते हैं-हेगना जनमेजय ! और यदि पाण्डव तेरह वर्ष का ग्रत पूरा भी धृतराष्ट्र की यह मम्मति मुनकर द्रोणाचार्य, सोमदत, PORATEmerCHAmar.coCECRECTIEEEEEEErrent तरह से जानता है ॥१७॥२१॥ mummmmm { सभापर्व mmamnimunmunmunnnnnnnnnnnnratna uTILATIANE ३२० म हा मारते mrarmnamannamIImmMERIES बाहीक, कृपाचार्य, विदुर, अश्वत्थामा, युयुत्सु, भूरि-' नहीं थी, पर धृतराष्ट्र ने उनका कहा न माना पुत्र श्रवा, भीष्मपितामह और विकर्ण आदि ने उसका का प्रिय करने की इच्छा से पाण्डवों को बुलाने के विरोध किया और कहा-हे महाराज ! अब जुआ । लिये दूत भेज दिये ॥२२॥२७॥ खेलना उचित नहीं है । यद्यपि सब मित्रों की इच्छा सभापर्व का चौहत्तरवां अध्याय समाप्त हुआ। ७४ ।। अथ पन्चसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ५॥ वैशम्पायन उवाच-अथाऽब्रवीन्महाराज! धृतराष्ट्रं जनेश्वरम् पुत्रहार्दाद्धर्मयुक्ता गान्धारी शोककर्शिता जाते दुर्योधने क्षत्ता महामतिर भाषत नीयतां परलोकाय साध्वयं कुलपांसनः ॥ २ ॥ व्यनदज्जातमात्रो हि गोमायुरिव भारत ! अन्तो नूनं कुलस्याऽस्य कुरवस्तन्निबोधत मा निमज्जीः स्वदोषेण महाप्सु त्वं हि भारत ! मा वालानामशिष्टानामभिमंस्था मतिं प्रभो! ॥ ४ ॥ मा कुलस्य क्षये घोरे कारणं त्वं भविष्यसि वद्धं सेतुं को नु भिन्द्याद्धमेच्छान्तं च पावकम् ॥ ५ ॥ शमे स्थितान्को नु पार्थान्कोपयेद्भरतर्षभ ! स्मरन्तं त्वामाजमीढं स्मारयिष्याम्यहं पुनः शास्त्रं न शास्ति दुर्बुद्धिं श्रेयसे चेतराय च पचहत्तरवां अध्याय || ७५ ।। वैशम्पायन कहते है-हे राजा जनमेजय ! यह आप विदुर के वचनों को सत्य समझ कर वह उपाय सूचना पाकर पुत्रों का हित चाहनेवाली धर्मपरायण कीजिए, जिस में वंश का नाश न हो । अपने दोष गान्धारी गोक से व्याकुल होकर धृतराष्ट्र के पास से आप अपने को विपत्ति और शोक के समुद्र जाकर कहने लगी-हे महाराज ! कुलामार दुर्योधन मत डुबाइये । हे प्रमो ! इन बालकों की यातों में ने जन्म लेने के समय गीदड़ के रोने का सा शब्द मत आइये ॥१४॥ किया था। तर महामति विदुर ने कहा था, कि कुल अपने कुल के नाश का कारण मत पनिए । के लिये यह बालक कला होगा, इसलिय इमे अभी आप को इस कुल के नाश होने का कारण बनकर मार डारो; क्योंकि यह जीता रहा, तो किमी ममय ये हुए पुल को गिराना और बुझी हुई अति को इसके कारण कुरकुल का नाश होगा। हे महारज! जलाना उचित नहीं है। गला ऐमा कीन मनुष्य Parasammaanaamsan.mommARHarsamaasrmilimamtarunraamsarmaatr । में ! , אינפיניטיסנפיניטייטמנג'טיטיסטיטמינסטיטיפסשנימנג'טמ' מיברפני ३२१ म हा मारत अध्याय ७५] anumanmuniaHIUTARITARITATIY TITUTITUTUUUrm minaruRISTITUTIO IIIIIIIIITara ॥ । TULLLLLLLL न वै वृद्धो वालमतिर्भवेद्राजन् ! कथंचन वन्नेत्राः सन्तु ते पुत्रा मा त्वां दीर्णाः प्रहासिषुः। तस्मादयं मद्वचनात्त्यज्यतां कुलपांसनः ८ ॥ तथा ते न कृतं राजन् ! पुत्रस्नेहान्नराधिप ! तस्य प्राप्तं फलं विन्द्वि कुलान्तकरणाय यत् ॥ ९ ॥ . शमेन धर्मेण नयेन युक्ता या ते बुद्धिः साऽस्तु ते मा प्रमादीः। प्रध्वंसिनी क्रूरसमाहिता श्रीमृदुप्रौढा गच्छति पुत्रपौत्रान् ॥१०॥ अथाऽब्रवीन्महाराजो गान्धारी धर्मदर्शिनीम् । अन्तःकामं कुलस्याऽस्तु न शक्नोमि निवारितुम् ॥ ११ ॥ यथेच्छन्ति तथैवाऽस्तु प्रत्यागच्छन्तु पाण्डवाः । पुनर्वृतं च कुर्वन्तु मामकाःपाण्डवैः सह ॥ १२ ॥ इति श्रीमन्महाभारते मभापर्वणि अनुतपर्वणि गान्धारीवाक्ये पश्चसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७५ ॥ होगा, जो शान्त हुए पाण्डवों को फिर कुपित करके है । वह दुष्ट अपने दुराचार से सारे वंश का नाश अपना नाश कराना चाहेगा ! हे महाराज ! आप कराने पर उतारू है । आपकी बुद्धि पहले जैसे सब कुछ जानते हैं, तो भी मैं फिर आपको म्मरण शान्ति, धर्म और न्याय से युक्त थी, वैसी ही वनी कराये देती हूँ । जो दुवुद्धि पुरुष हो, उसको शास्त्र रहे । आप अपनी बुद्धि को असावधान न कीजिए। भी ठीक राह पर नहीं लगा सकता; शास्त्र पढ़ने पर देखिए, कितने कष्ट उठाने से और युद्ध आदि क्रूर भी उसे भले या बुरे और हिताहित का ज्ञान नहीं कर्म करने से राजलक्ष्मी प्राप्त होती है; परन्तु बहुत होता । वृद्ध पुरुष को कमी बालकों की बुद्धि में न ही साधारण मूल मे वह हाथ से निकल जाती है। लगना चाहिये । आप ऐसा उपाय करें, जिसमें आप बुद्धि से काम करने पर ही वह राजलक्ष्मी पुत्रों और के पुत्र आपकी आज्ञा के अनुसार चलें । ऐसा न पौत्रों तक बनी रहती है । गान्धारी के वचन मुनकर कीजिए, जिससे ये आपको त्याग दें और मनमाना धृतराष्ट्र ने उनपर ध्यान नहीं दिया। उन्होंने कहा- कार्य करें । पुत्रों के और वंश के भले के लिये आप है प्रिये ! यदि वंश का नाश होना ही लिखा है, कुलाहार दुर्योधन को त्याग दीजिए ॥५॥८॥ तो हो । मैं दुर्योधन को हटा नहीं सकता । दुर्योधन उस समय पुत्र के स्नेह के कारण आपने विदुर आदि पुत्र जो चाहते हैं, वही हो । पाण्डव फिर का कहा नहीं माना, उसी का फल यह सामने आया आकर मेरे पुत्रों के माय जुआ म्बेलें ॥२॥१२॥ सभापर्व का पचहसरवां अध्याय समाप्त हुआ ॥७५।। rero TITLEMOTIOCOCCCT TOParamrempareCEwATrurere [ ममापर्व ३२२ म हा भारत TITIVITIRATYUTTwwxnmxrornmrrormmmmmuTITTERIOMMITTARAILERHITMENTAL अथ पद्सप्ततितमोऽध्यायः ।। ७६ ॥ . वैशम्पायन उवाच-ततो व्यध्वगतं पार्थ प्रातिकामी युधिष्ठिरम् । उवाच वचनाद्राज्ञो धृतराष्ट्रस्य धीमतः उपास्तीर्णा सभा राजन्नक्षानुप्त्वा युधिष्ठिर ! । एहि पाण्डव दीव्यति पिता त्वाहेति भारत! ॥ २ ॥ युधिष्ठिर उवाच धातुर्नियोगाद्भूतानि प्राप्नुवन्ति शुभाशुभम् । न निवृत्तिस्तयोरस्ति देवितव्यं पुनर्यदि ॥ ३ अक्षयूते समाह्वानं नियोगात्स्थविरस्य च जानन्नपि क्षयकरं नाऽतिक्रमितुमुत्सहे वैशम्पायन उवाच-असंभवे हेममयस्य जन्तोस्तथापि रामोलुलुभे मृगाय ।। प्रायः समासन्नपराभवाणां धियो विपर्यस्ततरा भवन्ति ॥ ५ ॥ इति ब्रुवन्निववृते भ्रातृभिः सह पाण्डवः जानश्च शकुनेर्मायां पार्थो द्यूतमियात्पुनः विविशुस्ते सभां तां तु पुनरेव महारथाः व्यथयन्ति स्म चेतांसि सुहृदां भरतर्षभाः छिहत्तरवां अध्याय ॥ ७६ ॥ वैशम्पायन कहते है-हे राजा जनमेजय ! तब मै अवश्य जुआ खेलंगा ॥१४॥ बहुत दूर गये कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर से, बुद्धिमान् राजा वैशम्पायन ने कहा-हे राजा जनमेजय ! विपत्ति धृतराष्ट्र की आजा से प्रातिकामी सूत ऐसा कहने । जब आनेवाली होती है, तब प्राय मनुष्यों की बुद्धि II-हे महाराज ! आपके पिता ने ऐसा कहा है विपरीत हो जाया करती है । देखो, सोने के मृग कि सभा लगी हुई है, यहां आओ और पासे फेंक का होना असम्भव जानकर भी रामचन्द्र जी उसे कर जुआ खेलो। युधिष्ठिर ने कहा, कि प्रारंब्ध के मारने के लिये उसके पीछे गये थे। महाराज युधिष्ठिर बल से पुरुष शुभ और अशुभ सब को प्राप्त करता यह कहकर, शकुनि के छल को जानकर भी, फिर है, यदि फिर हमको जुआ खेलना हो, तो यह निश्चय द्यूतक्रीड़ा करने के लिये, अपने भाइयों के साथ है, कि पुरुष शुभ और अशुभ कर्म से निवृत्त नहीं । लौटकर दुर्योधन की समा में गये। उन महारथियों हो सकता है । यदि राजा धृतराष्ट्र ने फिर जुआ को फिर जुआ खेलने के लिये आते देखकर उनके खेलने के लिये बुलाया है, तो उसे नाश और अनर्थ मित्रों को बड़ा दुख हुआ। सब संसार का नाश का कारण जानकर भी मैं राजा की आजा को करनेवाले महाभारत युद्ध का आरम्भ करने के लिये अस्वीकार करना नहीं चाहता। जो होगा सो होगा, । देव ने प्रेरणा की और पाण्डव जुआ खेलने को ImmmmmmDIDIODMRADIODICTIOMOTIONummerceORATEER - ३२३ महा मा र त [ध्याय ७६] UIDINTODAIRGINITIOmarATRALLOTA rnTITUTION mAINSIDEIO .. -- onzalman यथोपजोपमासीनाः पुनर्वृतप्रवृत्तये सर्वलोकविनाशाय देवेनोपनिपीडिताः ॥ शकुनिरुपाच-अमुश्चत्स्थविरो यद्वो धनं पूजितमेव तत् महाधनं ग्लहं त्वेकं शृणु भो भरतर्षभ ! वयं वा द्वादशाब्दानि युष्माभि तनिर्जिताः । प्रविशेम महारण्यं रौरवाजिनवाससः त्रयोदशं च सजने अज्ञाताः परिवत्सरम् ज्ञाताश्च पुनरन्यानि वने वर्षाणि द्वादश अस्माभिनिर्जिता यूयं वने द्वादश वत्सरान् । वसध्वं कृष्णया सार्धमजिनैः प्रतिवासिताः ॥ १२ ॥ त्रयोदशं च सजने अज्ञाताः परिवत्सरम् ज्ञाताश्च पुनरन्यानि वने वर्षाणि द्वादश ॥ १३ ॥ त्रयोदशे च निवृत्ते पुनरेव यथोचितम् स्वराज्यं प्रतिपत्तव्यमितरैरथवेतरैः* ॥ १४ ॥ अनेन व्यवसायन सहाऽस्माभियुधिष्ठिर ! अक्षानुप्त्वा पुनद्युतमेहि दीव्यस्व भारत ! अथ सभ्याः सभामध्ये समुच्छ्रितकरास्तदा अपने-अपने आसन पर जा विराजमान हुए ॥५॥८॥ सकें । जो उस वर्ष में हमारा पता लग जायगा तो उन सब के बैठ जाने पर अब शकुनि ने कहा हम फिर बारह वर्ष तक बनवास करेंगे। ऐसे ही हे महाराज! बूढ़े राजा ने जो आपको आपका हारा जो आप हम से हार जायँगे, तो आप लोगों को भी हुआ धन लौटा दिया, सो अच्छा किया । अब हे द्रौपदी-सहित बारह वर्ष तक बनवास करने के पश्चात् मरतश्रेष्ठ ! एक सब सम्पत्ति से बढ़कर, दाव लगाकर एक वर्ष तक अज्ञातग्रम करना पड़ेगा। यदि आप हम लोग चौसर खेलेंगे। शर्त यह होगी, कि हम का पता लग जायगा,तो फिर आपको बारह वर्ष वन रोग हार जायेंगे, तो मृगछाला पहन करके बारह वर्ष में रहना पड़ेगा। इस प्रकार समय पूरा होने पर आप तक वन में रहेंगे और फिर एक वर्ष तक इस तरह लोग या हम लोग अपना राज्य पा सकेंगे। आइए, हम अज्ञातवास करेंगे, कि आप लोग हमारा पता न पा रोग इसी शर्त के अनुसार पासे फेंकें ॥९॥१५॥ * एकेन 'इतरे' इसनेन पाण्डवा परामस्य ते । अपरेण 'इतरै' इत्यनेन धार्तराष्ण. परामृश्यन्ते । mATIRUPTEINTEREMOIRMATIOCRECENurers anmamiditomrunanimahraarouTIEneraansannnniumineraMainment . PammaNITARIALHAIRAImmitment ! TATARAIIAण ! RADASTU । ३२४ महा मारत समापर्व HDmaranamaraGNITORITTETTrummISTERITTENITIALD.aurari ऊचुरुद्विग्नमनसः संवेगात्सर्व एव हि सभ्या ऊचुः-अहो धिग्वान्धवा नैनं बोधयन्ति महद्भयम् बुद्ध्या बुद्धयेन्नवा बुध्येदयं वै भरतर्षभ ! ॥ १७ ॥ वैशम्पायन उवाच-जनप्रवादान्सुवहूञ्च्छृण्वन्नपि नराधिपः हिया च धर्मसंयोगात्पार्थो द्यूतमियात्पुनः ॥१८॥ जानन्नपि महावुद्धिः पुन तमवर्तयत् अप्यासन्नो विनाशः स्यात्कुरूणामिति चिन्तयन् ॥ १९ ॥ युधिष्ठिर उवाच-कथं वै मद्विधो राजा स्वधर्ममनुपालयन् आहृतो विनिवर्तेत दीव्यामि शकुने ! त्वया ॥ २० ॥ शकुनिरुवाच --गवाश्वं बहुधेनूकमपर्यन्तमजाविकम् गजाः कोशो हिरण्यं च दासीदासाश्च सर्वशः ।। २१ ॥ एप नो ग्लह एवैको वनवासाय पाण्डवाः ! यूयं वयं वा विजिता वसेम वनमाश्रिताः ॥ २२ ॥ त्रयोदशं च वै वर्षमज्ञाताः सजने तथा अनेन व्यवसायेन दीव्याम पुरुषर्षभाः ! ॥ २३ ॥ समुत्क्षेपेण चैकेन वनवासाय भारत ! प्रतिजग्राह तं पार्थो ग्लहं जग्राह सौवलः जितमित्येव शकुनियुधिष्ठिरमभापत ॥ २४ ॥ इति श्रीमन्महाभारते मभापर्वणि अनुभूतपर्वणि पुनर्युधिष्ठिरपराभव पट्सप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७६ ।। शकुनि के ये वचन सुनते ही सब सभासद नहीं। उन्होंने सब कुछ जानकर भी फिर जुआ उद्विम होकर, ऊपर को हाथ उठा-उठाकर, कहने खेलना स्वीकार कर लिया। वे समझ गये, कि कौरवों लगे-अहो, इन भाई-बन्धुओं को धिकार है । यदि के नाश का समय अब समीप आ गया है । युधिष्ठिर धर्मराज अपनी बुद्धि से नहीं समझते, तो ये लोग ने कहा-हे शकुनि ! मेरे समान पुरुष अपने धर्म वर्तमान महाभय की सूचना देकर, उन्हें क्यों नहीं का विचार करके, किसी के बुलाने पर, जुआ खेल्ने रोकते ! वैशम्पायन कहते हैं-हे राजा जनमेजय ! से कैमे विमुम्ब सक्ता है! आ आ, मैं जुआ अपने हितचिन्तक बन्धुओं के ये वचन सुनकर भी खेलने के लिये तैयार हूँ ॥१६॥२०॥ धर्म और लोक-लाज के विचार से धर्मराज युधिष्ठिर रुके । शकुनि ने कहा-हे पाण्डव ! गायें, घोड़े, मेह HDDREDDDDDDDDTAMROPARDARDNETRIEVEHIRECurrector MLACMCALMAlver Exczers.comcEEPecarvecVATEver - HAMIGARAirrian נשמההההההההההההההההההשדהזהבהמהפרוורמן LUMINITTIMMEDITTOMTATOUADITIDU TITUITIUUாாாாாாாITTEnrar DALUM NomurvarcmMIDAur urUVADINSURANULOLLICUMULILIYE । सब कुछ हार कर भारी विपत्ति में पड़ गये हैं। देवताओं ने सब ओर से हम पर कृपा की, जो आज हम अपने शत्रुओं से गुणों में अधिक और श्रेष्ठ हो अध्याय ७७ ] म हा मारत भैसे, हाथी, सोना, रन, दास, दासी, साम्राज्य आदि दाँव लगाकर हम लोग फिर खेलें। युधिष्ठिर ने शकुनि सब कुछ छोड़ कर, हम केवल बनवास की गर्त पर की शर्त स्वीकार कर ली, तब शकुनि ने पाँसे फेंके यह दाँव लगाते हैं। हम या आप जो हारे वह बारह, और कहा-मै जीत गया ॥२१॥२४॥ वर्ष वनवास करके तेरहवें वर्ष गुप्त रहे। आइए,यह सभापर्व का छिहत्तरवां अध्याय समाम हुआ।। ७६ ॥ अथ सप्तसप्ततितमोऽध्याय ॥ ७ ॥ वैशम्पायन उवाच-ततः पराजिताः पार्था वनवासाय दीक्षिताः अजिनान्युत्तरीयाणि जगृहुश्च यथाक्रमम् अजिनैः संवृतान्दृष्ट्वा हृतराज्यानरिन्दमान् प्रस्थितान्वनवासाय ततो दुःशासनोऽब्रवीत् ॥ २ ॥ प्रवृत्तं धार्तराष्ट्रस्य चक्रं राज्ञो महात्मनः पराजिताः पाण्डवेया विपत्तिं परमां गताः अद्य देवाः संप्रयाताः समैवम॑भिरस्थलैः गुणज्येष्ठास्तथा श्रेष्ठाः श्रेयांसो यद्वयं परैः नरकं पातिताः पार्था दीर्घकालमनन्तकम् सुखाच्च हीना राज्याच विनष्टाः शाश्वतीः समाः॥ ५ ॥ धनेन मत्ता ये ते स्म धार्तराष्ट्रान्प्रहासिषुः ते निर्जिता हृतधना वनमेष्यन्ति पाण्डवाः सत्तहत्तरवा अध्याय ।। ७७ ।। वैशम्पायन ने कहा-हे राजा जनमेजय । पाण्डवों गये ॥१४॥ ने सर्वस्व हार कर वन को जाने के लिये मृगचर्म ले अब पाण्डव बहुत दिनों तक नरक भोगेंगे । उस समय उनको राज्य-हनि और मृगचर्म और सुख और राज्य से हीन होकर नष्ट होकर लिये हुए बन को जाने के लिये तैयार देखकर दुशा- । किरेंगे। ये ही पाण्डव थे, जिन्होंने धन के मद से सन कहने लगा-आहा, अब महाराज दुर्योधन ही धृतराष्ट्र के पुत्रों की हसी की थी। देखो, अब इस पृथ्वी के चक्रवर्ती राजा हुए। पाण्डव लोग जुए धन और सर्वम्व हार कर वन को जाते हैं। अब इनके शरीर से विचित्र कवच, सुन्दर कपड़े और गहने उतार कर इन्हें मृगछाला पहना दो । ये लोग पहले समझते थे, कि पृथ्वी पर इनकी बराबरी करने - लिये - . NOIDAIJAADITDAD, ३२६ म हा भारत [ सभापर्व nirmirmIITRImmunimurraruramurarormirrorammarn.rururammar runninHAKIMLAIMIMUDHux - चित्रान्सन्नाहानवमुञ्चन्तु चैषां वासांसि दिव्यानि च भानुमन्ति । विवास्यन्तां रुरुचर्माणि सर्वे यथा ग्लहं सौवलस्याभ्युपेताः ॥ ७ ॥ न सन्ति लोकेषु पुमांस ईदृशा इत्येव ये भावितबुद्धयः सदा । ज्ञास्यन्ति तेत्मानमिहाऽद्य पाण्डवा विपर्यये षण्ढतिलाइवाऽफलाः॥ ८॥ इदं हि वासो यदि वेदृशानां मनस्विनां रौरवमाहवेषु अदीक्षितानामजिनानि यद्वदलीयसां पश्यत पाण्डवानाम् महाप्राज्ञः सौमकिर्यनसेनः कन्यां पाञ्चालीं पाण्डवेभ्यः प्रदाय । अकादै सुकृतं नेह किंचिक्लीवाः पार्थाः पतयो याज्ञसेन्याः ॥ १० ॥ सूक्ष्मप्रावारानजिनोत्तरीयान्दृष्ट्वाऽरण्ये निर्धनानप्रतिष्ठान का त्वं प्रीति लप्स्यसे याजसेनि ! पतिं वृणीष्वेह यमन्यमिच्छसि ॥ ११ ॥ एते हि सर्वे कुरवः समेताःक्षान्ता दान्ताःसुद्रविणोपपन्नाः।। एपां वृणीप्वैकतमंपतित्वे न त्वां नयेत्कालविपर्ययोऽयम् ॥ १२॥ यथाऽफलाः षण्ढतिला यथा चर्ममया मृगाः । तथैव पाण्डवाः सर्वे यथा काकयवा* अपि ॥ १३ ॥ किं पाण्डवांस्ते पतितानुपास्य मोघः श्रमः पण्डतिलानुपास्य एवं नृशंसः परुपाणि पार्थानश्रावयधृतराष्ट्रस्य पुत्रः तद्वै श्रुत्वा भीमसेनोऽत्यमी निर्भस्त्योः संनिगृह्मैव रोपात् ।। वाला कोई नहीं । इस समय इनका अभिमान दृट से हीन होकर मृगछाला ओढ़े हुए आप ही दीन हो गया है। अब ये सार-हीन तिलों के समान पराक्रम रहे हैं। इससे तू हम सब कौरवों में से, जो क्षमावान्, हीन हो गये हैं । इनके ये मृगछाला के वस्त्र यज्ञ जितेन्द्रिय और धनवान हैं, जिसको चाहे अपना पति में दीक्षित होकर पहनने के नहीं है। किन्तु ये मृगचर्म कर ले, जिसमें तुझको वन का दुख न उठाना पड़े। अदीक्षित मनुष्यों के से है ॥५॥९॥ अब ये पाण्डव ऐसे है,जैसे सार-हीन तिलों को बटोरने राजा द्रुपद तो बड़ा बुद्धिमान् था। टसने से कुछ लाभ नहीं होता है, इसी प्रकार से इन यह काम अच्छा नहीं किया, जा द्रौपदी मी मुन्दर पतित पाण्डयों की सेवा करने से तुझको कोई सुम्प कन्या को इन नपुंसक पाण्डवों को व्याह दिया । नहीं मिलेगा । भीमसेन उस दयाहीन दुशासन हे द्रौपदी ! इन पाण्डवों के माय वन के एक परुष वचनों को सुनकर मोध से भर गया तुझको क्या सुख मिलेगा! ये विचारे धन और स्थान आर उसके पास जाकर उमे इस प्रकार से पकड़ जाकर • कास्यवा-ग्रादि क्षेत्र प्रदिभि: मह उत्पन्न नि:मार तृणधान्यम् । ETUDD'U'LLTIL TO'crmir entrierenecmTD'DITTUCCITTCTT) म हा मारत अध्याय ७७] True UNITARIRTUNITIATICumarima DROINTUUU nnnnnnnn ALLUMMME Mira उवाच चैनं सहसैवोपगम्य सिंहो यथा हैमवतःशृगालम् ॥ १५ ॥ भीमसेन उवाच-कृरं पापजनैर्जुष्टमकृतार्थं प्रभाषसे गान्धारविद्यया हि त्वं राजमध्ये विकत्थसे यथा तुदसि मर्माणि वाक्छरैरिह नो भृशम् तथा स्मारयिता तेऽहं कृन्तन्मर्माणि संयुगे ॥१७॥ ये च त्वामनुवर्तन्ते क्रोधलोभवशानुगाः गोप्तारः सानुवन्धांस्तान्नेताऽस्मि यमसादनम् ॥१८॥ वैशम्पायन उवाच-एवं ब्रुवाणमजिनैर्विवासितं दुःशासनस्तं परिनृत्यति स्म । मध्ये कुरूणां धर्मनिवद्धमार्ग गोर्गोरिति ह्याह्वयन्मुक्तलज्जः ॥ १९ ॥ भीमसेन उवाच-नृशंस! परुपं वक्तुं शक्यं दुःशासन ! त्वया । निकृत्या हि धनं लब्ध्वा को विकथितुमर्हति ? ॥ २० ॥ मैव स्म सुकृताँलोकान्गच्छेत्पार्थो वृकोदरः यदि वक्षो हि ते भित्त्वा न पिवेच्छोणितं रणे ॥ २१ ॥ धार्तराष्ट्रान्रणे हत्वा मिपतां सर्वधन्विनाम् कर, जैसे सिंह किसी मृग को पकड लेवे, कहने लगा के अनुरोध से भीमसेन कुछ प्रतिकार न करके उस समय वचनों से ही उसे डाटने और उसका तिरस्कार हे दुष्ट! शकुनि के कपट से तू फूला नही करने लगे। निर्लज्ज दु शासन जानता था,कि धर्मपाश समाता और इस राजसभा के बीच में पापियों के में बंधे रहने के कारण भीमसेन प्रहार न करेंगे। इसी योग्य अनुचित बातें कह रहा है । इसका फल तुझे । से वह अत्यन्त उच्छृङ्खल होकर सब के सामने नाचने युद्ध के मैदान में अच्छी तरह दिया जायगा। जैसे ' और मटकने लगा और भीमसेन को "बैल, बैल" यहा पर तू वचन रूपी वाणों के प्रहार से हमारे मर्म- कहने लगा । इससे भीमसेन का क्रोध और भी स्थानों को छेद रहा है, वैसे ही मै भी युद्धभूमि में प्रचण्ड हो गया। उन्होंने कहा-हे निर्लज्ज ! तू ही तुझे मारते समय इन बातों की याद दिलाकर पीड़ा कपट के जुए में धन पाकर ऐसे कठोर शब्द कह पहुँचाऊँगा । देख, तू जिनके बल पर कूद रहा है सकता है और ऐसा अहङ्कार कर सकता है। और और जो लोग क्रोध और लोभ के वश होकर तेरे किसी मनुष्य से ऐसी निर्लज्जता नहीं हो सकती। पिछलग्गू हो रहे हैं, उन्हें भी मैं जीता न छोडूंगा। । म प्रतिज्ञा करता हूँ, कि यदि युद्ध में तेरी छाती फाड़ कर मै लोहू न पी लें, तो मुझे वे लोक न प्राप्त वैशम्पायन ने कहा-हे राजा जनमेजय ! धर्म हों, जिनमें पुण्यात्मा लोग जाते हैं। मैं सब के सामने ॥१०॥१५॥ । । । ॥१६॥१८॥ OUNHIYARI OVID TOITUTANIL.CTTIITLI MUUTUVITAVAT OTTOLINI . ३२८ म हा भारत [ सभापर्य ExamnirurmanantmannmamrTTITrrrrrrrrrrrr mamiATETrumnranamanrmurarurtal शमं गन्तास्मि न चिरात्सत्यमेतद्ब्रवीमि ते ॥ २२ ॥ वैशम्पायन उवाच-तस्य राजा सिंहगतेः सखेलं दुर्योधनो भीमसेनस्य हर्षात् । गतिं स्वगत्याऽनुचकार मन्दो निर्गच्छतां पाण्डवानां सभायाः ॥ २३ ॥ नैतावता कृतमित्यब्रवीत्तं वृकोदरः संनिवृत्तार्धकायः शीघ्रं हि त्वां निहतं सानुवन्धं संस्मार्याऽहं प्रतिवक्ष्यामि मूढ ! ॥ २४ ॥ एवं समीक्ष्याऽऽत्मनि चाऽवमानं नियम्य मन्युं बलवान्स मानी । राजानुगः संसदि कौरवाणां विनिष्क्रामन्वाक्यमुवाच भीमः ॥ २५ ॥ भीमसेन उवाच-अहं दुर्योधनं हन्ता कर्णं हन्ता धनञ्जयः शकुनिं चाऽक्षकितवं सहदेवो हनिष्यति ॥ २६ ॥ इदं च भूयो वक्ष्यामि सभामध्ये बृहद्वचः सत्यं देवाः करिग्यन्ति यन्नो युद्धं भविष्यति ॥ २७ ॥ सुयोधनमिमं पापं हन्ताऽस्मि गदया युधि शिरः पादेन चाऽस्याऽहमधिष्ठास्यामि भूतले ॥२८ ।। वाक्यशूरस्य चैवास्य परुषस्य दुरात्मनः दुःशासनस्य रुधिरं पाताऽस्मि मृगराडिव ॥ २९ ॥ अर्जुन उवाच-नैवं वाचा व्यवसितं भीम! विज्ञायते सताम् । कहता हूँ, कि युद्ध में शीघ्र ही धृतराष्ट्र के पुत्रों का के वश में थे । किन्तु सभा से निकलते निकलते नाश करके अपने इस क्रोध को शान्त करूँगा। भीमसेन ने यह अपनी प्रतिज्ञा ऊँचे म्वर से सन को ॥१९॥२२॥ सुना दी ॥२३॥२५॥ वैशम्पायन कहते हैं-हे राजन् ! इसके पश्चात कि मैं स्वयं युद्ध भूमि में नीच दुर्योधन को वनवास के लिये जाने को जब पाण्डव लोग सभा मारूंगा, अर्जुन कर्ण को मारेंगे, पांशों के एली से निकलने लगे तब राजा दुर्योधन, सिंह के समान शकुनि को सहदेव मारेंगे। फिर सभा के बीच में गतिवाले भीमसेन की चाल के समान चाल से, चलने कह देता हूँ, कि गदायुद्ध में इस पापी दुर्योधन को लगा। भीमसेन ने तिरछा होके कहा-हे गूद ! इस मारकर मैं इसके सिर पर पांव रक्तूंगा और कठोर से क्या दोना है, शीघ्र ही तुझे साथियों के सहित वचन कहनेवाले, वचनवीर इस दुष्ट दु.शामन के मारकर म्मरण कराऊँगा । हे राजा जनमेजय ! हृदय के रक्त को में, सिंह की तरह गरजता हुआ भीमसेन ने अपना अपमान देसफर भी उम ममय अवश्य पिऊंगा । देवता लोग नीम ही मेरी यह झोप को रोक लिया, क्योंकि वे महाराज युधिष्ठिर प्रतिना पूरी करेंगे ॥२६॥२९॥ Homcominecretreturnimamermiremi - .

- -- wmninunuar यमलोक में पहुँचाऊँगा । जो आज से चौदहवें वर्ष को मिटानेवाले दुष्ट शकुनि । ये पासे, जिन के बल अध्याय ७७] म हा मारत ३२९ DIVIDEom Jn: Himaniammanm dinimumnonmaiIATIMATALATuranasia ॥ ३० ॥ PARImmuTIVIT mummyyuurmeramareAamera इतश्चतुर्दशे वर्षे द्रष्टारो यद्भविष्यति “मिसेन उवाच-दुर्योधनस्य कर्णस्य शकुनेश्च दुरात्मनः दुःशासनचतुर्थानां भूमिः पास्यति शोणितम् ॥ ३१ ॥ अर्जुन उवाच-असूयितारं द्रष्टारं प्रवक्तारं विकत्थनम् भीमसेन ! नियोगाते हन्ताऽहं कर्णमाहवे ॥ ३२ ॥ अर्जुनः प्रतिजानीते भीमस्य प्रियकाम्यया कर्णं कर्णानुगांश्चैव रणे हन्तास्मि पत्रिभिः ये चाऽन्ये प्रतियोत्स्यन्ति बुद्धिमोहेन मां नृपाः । तांश्च सर्वानहं बाणैर्नेतास्मि यमसादनम् चलेद्धि हिमवान्स्थानान्निष्प्रभः स्यादिवाकरः । शैत्यं सोमात्प्रणश्येत मत्सत्यं विचलेद्यदि ॥ ३५॥ न प्रदास्यति चेद्राज्यमितो वर्षे चतुर्दशे दुर्योधनोऽभिसकृत्य सत्यमेतद्भविष्यति ॥ ३६ ॥ वैशम्पायन उवाच-इत्युक्तवति पार्थे तु श्रीमान्माद्रवतीसुतः प्रगृह्य विपुलं वाहुं सहदेवः प्रतापवान् ॥ ३७॥ सौवलस्य वधं प्रेप्सुरिदं वचनमब्रवीत् इसके पीछे अर्जुन ने कहा-हे भीमसेन ! सज्जनों में यह नीच दुर्योधन हमारे राज्य को हमें न देगा, का यह नियम है, कि वे जो कुछ करना चाहते तो नि सन्देह मै इन सब यातों को सच करके है, उसे करने के पहले अपने मुख से नहीं कहते । | दिखाऊँगा । चाहे हिमालय पर्वत अपने स्थान से आज से तेरह वर्ष पूरे होने पर, चौदहवें वर्ष जो कुछ हट जाय, चाहे सूर्य प्रभा-हीन हो जाय और चाहे होगा, उसे सब लोग आप ही देख लेंगे। भीमसेन , चन्द्रमा की शीतलता जाती रहे, परन्तु मैं अपनी ने फिर कहा-उस समय पृथ्वीदेवी दुर्योधन, कर्ण, ' प्रतिज्ञा से नहीं हटूंगा ॥३०॥३६॥ दु शासन और शकुनि इन चारों दुरात्माओं का वैशम्पायन ने कहा-हे राजा जनमेजय । इसके रक्त पियेगी । तब अर्जुन ने भीमसेन को प्रसन्न पीछे प्रतापवान् सहदेव क्रोध से लाल-लाल आँखें करने की इच्छा से प्रतिज्ञा की, कि मैं तुम्हारी आज्ञा किये हुए और साँप की तरह श्वास लेता हुआ से इस नीच और कुबुद्धि कर्ण को और इसके साथी शकुनि को मारने की इच्छा से, अपनी मुजाओं को सब गजाओं को, जो मेरे सन्मुख आयेंगे मारकर । पकड़ कर कहने लगा-अरे गान्धार-राजकुल के यश ३३० म हा भारत [ ममापर्व HORImrammarathimurareITITUTTournamunairmanenarmummy ॥३८॥ rcaenraat in IIMUDHAIYALAYARINAMULimumXIMALS क्रोधसंरक्तनयनो निःश्वसन्निव पन्नगः महदेव उवाच-अक्षान्यान्मन्यसे मूढ ! गान्धाराणां यशोहर!। नैतेऽक्षा निशिता बाणास्त्वयैते समरे वृताः यथा चैवोक्तवान्भीमस्त्वामुद्दिश्य सबान्धवम् । कर्ताऽहं कर्मणस्तस्य कुरु कार्याणि सर्वशः ॥४०॥ हन्तास्मि तरसा युद्धे त्वामेवेह सवान्धवम् यदि स्थास्यसि संग्रामे क्षत्रधर्मेण सौवल ! ॥४१॥ सहदेववचः श्रुत्वा नकुलोऽपि विशाम्पते दर्शनीयतमो नृणामिदं वचनमब्रवीत् ॥ ४२ ॥ नकुल उवाच-सुतेयं यज्ञसेनस्य द्यूतेऽस्मिन्धृतराष्ट्रजैः यैर्वाचः श्राविता रूक्षाः स्थितैदुर्योधनप्रिये तान्धार्तराष्ट्रान्दुर्वृत्तान्मुमूर्पूकालचोदितान् गमयिष्यामि भूयिष्ठानहं वैवस्वतक्षयम् ॥४४॥ निदेशाद्धर्मराजस्य द्रौपद्याः पदवीं चरन् निर्धार्तराष्ट्रां पृथिवीं कर्तास्मि न चिरादिव ॥४५॥ वैशम्पायन उयाच-एवं ते पुरुषव्याघ्राः सर्वे व्यायतवाहवः प्रतिज्ञा बहुलाः कृत्वा धृतराष्ट्रमुपागमन् ॥ ४६॥ इति श्रीमन्महाभारते समापर्याण अनुद्यूतपर्वणि पाण्डयप्रतिज्ञाकरणे सप्तसप्ततितमोऽध्यायः ।। ७७ ॥ तू नाच रहा है, पांसे नहीं हैं, किन्तु ये तेरे प्राण को वचन सुनाये हैं, मैं युधिष्ठिर की आज्ञा से मारकर नाश करने वाले तीक्ष्ण वाण हैं । जो तू क्षत्रियः यमलोक में पहुँचाऊँगा और द्रौपदी को प्रसन्न करने धर्म को छोड़ कर युद्ध से भाग न जायगा, तो जैसी के लिये पृथ्वी पर धृतराष्ट्र के पुत्रों का बीज नाश भीमसेन ने आज्ञा दी है उसी प्रकार से मैं तुझको तेरे कर दूंगा। वैशम्पायन ने कहा है राजा जनमेजय! भाई बन्धु और साथियों सहित मारूंगा।॥३७॥४१॥ महाबाहु पुरुषसिंह, पाण्डव इस प्रकार शत्रुनाश इसके पीछे सहदेव की प्रतिज्ञा सुनकर नकुल की कठिन प्रतिज्ञा करके राजा धृतराष्ट्र के पास गये ने कहा-इन धृतराष्ट्र के पुत्रों को जिन्होंने काल से ॥४२॥४६॥ प्रेरित होकर मरने की इच्छा से द्रौपदी को कठोर सभापर्य का मतहत्तरयां अध्याय ममाप्त हुआ ॥ ७ ॥ FarmumNDARILADAWODODARPALEEPCmmercerymarecreamerreetkarerera अध्याय ७८] म हा मारत IIITrimumArCIATIMITrummunmuTIRITUAnnamaAIRamnuunamannatanta.ir अथ अष्टसप्ततितमोऽध्यायः ।। ७८ ॥ - Ramnavammumairmanamunamam युधिष्ठिर उवाच-आमन्त्रयामि भरतांस्तथा वृद्धं पितामहम् राजानं सोमदत्तं च महाराजं च वाह्निकम् ॥ १ ॥ द्रोणं कृपं नृपांश्चान्यानश्वत्थामानमेव च विदुरं धृतराष्ट्रं च धार्तराष्ट्रांश्च सर्वशः ॥ २ ॥ युयुत्सुं संजयं चैव तथैवाऽन्यान्सभासदः सर्वानामन्य गच्छामि द्रष्टास्मि पुनरेत्य वः ॥ ३ ॥ वैशम्पायन उवाच-न च किंचिदथोचुस्ते हिया सन्ना युधिष्ठिरम् ।। मनोभिरेव कल्याणं दध्युस्ते तस्य धीमतः विदुर उवाच-आर्या पृथा राजपुत्री ! नाऽरण्यं गन्तुमर्हति । सुकुमारी च वृद्धा च नित्यं चैव सुखोचिता ॥ ५ ॥ इह वत्स्यति कल्याणी सत्कृता मम वेश्मनि । इति पार्था विजानीध्वमगदं वोऽस्तु सर्वशः ॥ ६ ॥ पाण्डवा ऊचुः-तथेत्युक्त्वाऽब्रुवन्सर्वे यथा नो वदसेऽनघ ! त्वं पितृव्यः पितृसमो वयं च त्वत्परायणाः यथाऽऽज्ञापयसे विद्वंस्त्वं हि नः परमो गुरुः अठहत्तरवां अध्याय ।। ७८ ।। युधिष्ठिर ने धृतराष्ट्र की सभा में जाकर कहा- सयों ने मन में पाण्डवों को आशीर्वाद दिया॥१४॥ में भरतवंश के सब लोगों से विदा होता हूँ। वृद्ध इसके पीछे विदुर जी ने कहा-हे युधिष्ठिर ! पितामह भीष्म, राजा सोमदत्त, राजा बाहीक, आर्या कुन्ती राजकुमारी हैं । वे वृद्ध है और सदा द्रोणाचार्य, कृपाचार्य, अश्वत्थामा, अन्य राजा लोग, सुख में रही हैं। इस लिये उनका तुम्हारे साथ यन विदुर, राजा धृतराष्ट्र और उनके सब पुत्र, युयुत्सु, को जाना उचित नहीं। कल्याणी कुन्ती मेरे यही मैं आप लोगों से घर में, आदर-सत्कार के साथ रहेंगी। तुम लोग विदा होकर वन को जाता हूं। वहां से लौट कर यह बात स्वीकार कर ले। जामओ, सुम लोगों का फिर आप लोगों के दर्शन करूँगा । वैशम्पायन ने मदा, सब जगह, सब तरह मला हो । यह मुनकर कहा-हे राजा जनमेजय ! युधिष्ठिर की पात को पाण्डवों ने कहा-आप हमारे पचा और पिता के मुनकर किसी ने कुछ उत्तर नहीं दिया, लज्जा से समान हैं। हम लोग सदा आप के अनुगत है। सर नीचे को मुस किये हुए पेठे रहे। परन्तु उन आप हमारे परम गुरु हैं। इस लिये आप ने जो - . समय तथा सब सभामदगण, । ביטויימlענניווטינטימפומניעמוד ציטוט שינוי נייטי סנטר महा मारत [ सभापर्व Durammarnamannarrammarrimirrrrrmanmramavtarrant urmirmins । यच्चाऽन्यदपि कर्तव्यं तद्विधत्स्व महामते ! विदुर उवाच-युधिष्ठिर ! विजानीहि ममेदं भरतर्षभ ! नाऽधर्मेण जितः कश्चिद्वयथते वै पराजये त्वं वै धर्म विजानीपे युद्धे जेता धनञ्जयः हन्ताऽरीणां भीमसेनो नकुलस्त्वर्थसंग्रही ॥ १० ॥ संयन्ता सहदेवस्तु धौम्यो ब्रह्मविदुत्तमः धर्मार्थकुशला चैव द्रौपदी धर्मचारिणी अन्योन्यस्य प्रियाः सर्वे तथैव प्रियदर्शनाः परैरभेद्याः संतुष्टाः को वो न स्पृहयेदिह ? ॥ १२ ॥ एष वै सर्वकल्याणः समाधिस्तव भारत ! नैनं शत्रुर्विषहते शक्रेणाऽपि समोऽप्युत ॥ १३ ॥ हिमवत्यनुशिष्टोऽसि मेरुसावर्णिना पुरा द्वैपायनेन कृष्णेन नगरे वारणावते ॥ १४ ॥ भृगुतुङ्गे च रामेण दृषद्वत्यां च शंभुना अश्रौपीरसितस्याऽपि महर्षेरञ्जनं प्रति ॥ १५ ॥ कल्माषीतीरसंस्थस्य गतस्त्वं शिष्यतां भृगोः । कहा, वह हमें स्वीकार है । आप और भी जो कुछ कामों में निपुण हैं और धर्म में निष्ठा रखती है । हमारा कर्त्तव्य समझते हों, उसका उपदेश कीजिए तुम सब एक दूमरे को प्यारे हो । तुमको देखकर ॥५॥८॥ सब लोग प्रसन्न होते है। तुम लोग सन्तोषी हो, यह सुनकर विदुर जी ने युधिष्ठिर से कहा- इस लिये शत्रु लोग तुम लोगों में फूट नहीं डाल हे भरतकुल के यश को बढ़ानेवाले ! देखो, अधर्म सकते । तुम्हारे मन को स्वस्थ रखनेवाले ये नियम के द्वारा जीता गया पुरुष कदापि अपनी हार से सब प्रकार कल्याणदायक हैं। इन्द्र के समान प्रबल व्यथित या खिन्न नहीं होता। तुम धर्म के मर्म को शत्रु भी तुम्हारा कुछ नहीं बिगाड़ सकते ॥९॥१३॥ विशेष रूप से जानते हो । अर्जुन सदा युद्ध में पहले हिमाचल पर मेरुसायणि ऋपि ने, वारणा- विजय प्राप्त करते हैं । भीमसेन अपने बल से शत्रुओं वत नगर में व्यास जी ने, भृगुतुल पर्वत पर परशुराम का नाश करते हैं । नकुल धन के संग्रह में अद्वितीय जी दृपद्वती नदी के तट पर शिव जी ने तुमको हैं । सहदेव सयमी हैं । तुम्हारे पुरोहित धौम्य ब्रह्म ज्ञान और धर्म की शिक्षा दी है। तुमने अन्जन ज्ञानियों में श्रेष्ठ है। पतियता दीपदी धर्म-अर्थ के पर्वत पर मदपि असित के मुख से उपदेश सुना है। SammmmRODAMITIOCLIPARDHUrECORITERMITIOmEareCTICETIMEGEcreer - . ।

३३३ महा मारत अध्याय ७८] PETALIAT IUSTOMIZADO TITIGIDIUTIANMUNOTTATOMOTIVE TIGUITTIGTITIINIQar. TERRITRNATI 5 1 amannara - द्रष्टा सदा नारदस्ते धौम्यस्तेऽयं पुरोहितः मा हासीः साम्परायेवं बुद्धि तामृपिपूजिताम् । पुरूरवसमैलं वं बुद्ध्या जयसि पाण्डव ! ॥ १७॥ शक्त्या जयसि राज्ञोऽन्यानृपीन्धर्मोपसेवया ऐन्द्रे जये धृतमना याम्ये कोपविधारणे तथा विसर्गे कौवेरे वारुणे चैव संयमे आत्मप्रदानं सौम्यत्वमद्भयश्चैवोपजीवनम् ॥ १९ ॥ भूमेः क्षमा च तेजश्च समग्रं सूर्यमण्डलात् । वायोर्वलं प्राप्नुहि त्वं भूतेभ्यश्चाऽऽत्मसंपदम् ॥ २० ॥ अगदं वोऽस्तु भद्रं वो द्रष्टास्मि पुनरागतान् । आपद्धर्मार्थकृच्छ्रेषु सर्वकार्येषु वा पुनः ॥ २१ ॥ यथावत्प्रतिपद्येथाः काले काले युधिष्ठिर ! आपृष्टोऽसीह कौन्तेय !स्वस्ति प्राप्नुहि भारत!॥ २२ ॥ कृतार्थं स्वस्तिमन्तं त्वां द्रक्ष्यामः पुनरागतम् । न हि वो वृजिनं किंचिद्वेद कश्चित्पुरा कृतम् ॥ २३ ॥ वैशम्पायन उवाच-एवमुक्तस्तथेत्युक्त्वा पाण्डवः सत्यविक्रमः भीष्मद्रोणो नमस्कृत्य प्रातिष्ठत युधिष्ठिरः ॥ २४ ॥ प्रति श्रीमन्महाभारत सभापर्वणि अनुगूनपर्वणि युधिष्ठिरवनप्रस्थाने अष्टमप्ततितमोऽध्यायः ।। ७८ ॥ करमापी नदी के तट पर भृगु महर्षि ने तुमको तुम चन्द्रमा मे शान्ति, जल से परोपकार की अपना शिष्य बनाया है। देवर्षि नारद सदा तुम्हारी वृति, पृथ्वी से क्षमा, सूर्य से तेज, यायु से पल देरेम्स रखते हैं। इनके अतिरिक्त महर्षि धौम्य और सब प्राणियों से आत्म-सम्पति प्राप्त करो। तुम्हारे पुरोहित हैं। हे पाण्डव ! ऋपियों के दिये तुम्हाग भला हो । कुल-देवता तुम्हें नीरोग रक्खें । हुए पूजनीय उपदेशों को, सबट या संग्राम के समय फिर लौट कर जब तुम आओगे तब हम तुमको मन मूलना। तुम बुद्धि में पुरुरवा से, धर्म के देखेंगे; क्योंकि आज तक तुमने कुछ अधर्म नहीं आचरण में प्रापियों से, सन्तोप में इन्द्र से, शक्ति किया है । वैशम्पायन ने कहा-दे राजा जनमेजय ! मोघ के रोकने में यमराज से, युधिष्ठिर उक्त पातों को सुनकर और 'ऐमा दी उदारना और दान में कुरेर से, तथा इन्द्रिय मंयम होगा' कह कर भीष्म, द्रोणाचार्य को प्रणाम करके में यरुग से भी यदकर हो ॥१४॥१८॥ चल दिये ॥१९॥२४॥ "IPREETIMADISODramaritram mommunUIDuOIDRDEm INDIAunासमा में स राजाओं महा मारत [ समापर्व ARI'DILTODANTIDIMONERMANENDALITY orrent mimamimamtamnormommunamurtvumanmulmanuunanimatinuinmanand अथ एकोनाशीतितमोऽध्यायः ॥ ७९ ॥ वैशम्पायन उवाच-तस्मिन्संप्रस्थिते कृष्णा पृथां प्राप्य यशस्विनीम्। आपृच्छद् भृशदुःखार्ता याश्चाऽन्यास्तत्र योषितः॥ १ ॥ यथार्ह वन्दनाश्लेपान्कृत्वा गन्तुमियेष सा ततो निनादः सुमहान्पाण्डवान्तःपुरेऽभवत् ॥ २ ॥ कुन्ती च भृशसंतप्ता द्रौपदी प्रेक्ष्य गच्छतीम् । शोकविह्वलया वाचा कृच्छ्राद्वचनमब्रवीत् वत्से शोको न ते कार्यः प्राप्येदं व्यसनं महत् । स्त्रीधर्माणामभिज्ञाऽसि शीलाचारवती तथा न त्वां संदेष्टुमर्हामि भर्तृन्प्रति शुचिस्मिते ! । साध्वी गुणसमापन्ना भूपितं ते कुलद्वयम् सभाग्याः कुरवश्चेमे ये न दग्धास्त्वयाऽनघे! । अरिष्टं व्रज पन्थानं मदनुध्यानबृंहिता भाविन्यर्थे हि सत्स्त्रीणां वैकृतं नोपजायते गुरुधर्माभिगुप्ता च श्रेयः क्षिप्रमवाप्स्यसि सहदेवश्च मे पुत्रः सदाऽवेक्ष्यो वने वसन् • यथेदं व्यसनं प्राप्य नाऽयं सीदेन्महामतिः नन्नासीवां अध्याय ॥ ७९॥ वैशम्पायन ने कहा-हे राजा जनमेजय ! पाण्डवों हे पुत्री 1 दुःख में पड़ने के कारण से शोक को वन में जाने के लिये तैयार देखकर, उदास द्रौपदी से अत्यन्त अधीर न होना । तुम साध्वी, सुशीला यशस्विनी कुन्ती के पास गई। वहां कुन्ती को और और पतिव्रता हो। तुम धर्म को जानती हो और अन्य कुल की स्त्रियों को प्रणाम करके, उनसे विदा सदाचारिणी हो। तुमने अपने गुणों से पिता के और होकर, द्रौपदी जब पतियों के साथ जाने लगी, तय पति के कुल को उज्ज्वल किया है। पति के साथ पाण्डवों के महल में बड़ा भारी रोने का शब्द सुन स्त्री को कैसा व्यवहार करना चाहिए, यह तुम्हें बताने पड़ने लगा। द्रौपदी को नाने के लिये तैयार देख- की आवश्यकता नहीं । देखो पुत्री ! कौरवों का कर, कुन्ती शोक से विहल और अचेत सी हो गई। कोई बड़ा भारी पुण्य और अनिर्वचनीय सौभाग्य बड़े कष्ट से अपने को सम्माल कर उसने द्रौपदी था, जिस से अभी तक तुम्हारे क्रोध की आग में से कहा-॥१३॥ पड़कर भस्म नहीं हुए। द्रौपदी ! मैं सदा तुम्हारे RAIL.G ImmuTOP0LCDMOUNTERDINDIRTISTICWIRECeremorru म हा मा र त IALITAmudrrituter FELLUMIOLATITUTIMILONLINICIMULT अध्याय ७९] AUNTITAMINOTநாபோனாதானா TUTராசா, யாம் ரானா டIE तथेत्युक्त्वा तु सा देवी स्त्रवन्नेत्रजलाविला शोणिताक्तैकवसना मुक्तकेशी विनिर्ययो तां क्रोशन्तीं पृथा दुःखादनुवबाज गच्छतीम् । अथाऽपश्यत्सुतान्सर्वान्हृताभरणवाससः रुरुचर्मावृततनून्हिया किंचिदवाङ्मुखान् परैः परीतान्संहृष्टैः सुहृद्भिश्चाऽनुशोचितान् ॥ ११ ॥ तदवस्थान्सुतान्सर्वानुपसृत्याऽतिवत्सला स्वजमानाऽवदच्छोकात्तत्तद्विलपती बहु ॥ १२ ॥ कुन्युवाच-कथं सद्धर्मचारित्रान्वृत्तस्थितिविभूपितान् अक्षुद्रान्दृढभक्तांश्च दैवतेज्यापरान्सदा ॥ १३ ॥ व्यसनं वः समभ्यागात्कोऽयं विधिविपर्ययः कस्याऽपध्यानजं चेदमागः पश्यामि वो धिया ॥ १४ ॥ स्यात्तु मद्भाग्यदोपोऽयं याऽहं युष्मानजीजनम् । दुःखायासभुजोऽत्यर्थं युक्तानप्युत्तमैर्गुणेः ॥ १५ ॥ मङ्गल की इच्छा करती हूँ। तुम प्रसन्नता से अपने बाल सुले हुए थे, यह कहकर कि ऐसा ही होवे' पतियों के साथ जाओ। राह में तुम पर कोई विपत्ति रोती हुई महल से बाहर निकली। उसके पीछे-पीछे न आवेगी । समी स्त्रिया यह जानती है, कि ! शोक से विहल कुन्ती भी बाहर तक आई। यहां होनहार टल नहीं सकती। हे पुत्री ! तुम भी यही | उसने अपने पुत्रों को, जिनके सब वस्त्र और गहने समझकर, सदा धर्म-मार्ग में चलती रह कर, पतियों उतार लिये गये थे, देखा ॥४॥१०॥ की मलाई में अपना समय व्यतीत करती रहो । कुन्ती ने उन सब को मृगछाला पहने हुए, ऐसी दशा का विचार करके अपने आत्मा को श और लज्जा से नीचे को सिर झुकाए हुए देखकर न पहुँचाना । धर्म और गुरुजन सदा तुम्हारी रक्षा सब को छाती से लगाया और महादुःखी होकर, करेंगे। तुम्हारा कल्याण शीघ्र होगा। हे पुत्री ! विलाप करती हुई कहने लगी-हाय, कमे बुरे दिन तुमसे और अधिक क्या कहूँ ! देखो, सहदेव अमी आ गये हैं, जो भूलकर भी अधर्म की राह पर पर पालक ही है। इस लिए तुम सदा उसकी देख- नहीं रखते। सदा यज्ञ, देवताओं की पूजा आदि भाल और रक्षा करना । यह अपनी दुर्दशा का धर्म-कर्म करने में ही अपना ममय व्यतीत करने हैं, विचार करके कभी दुःखित न होने पावे। यह सुन मक्ति और सदा के माथ जो देवनाओं की और कर दौपदी. जो रजम्बना थी और जिसके सिर के गुरुजनों की पूजा करते रहते हैं, उन्ही उदारसमाय, । TUTO । OMOTIODTerry RECTODDDDITORIADPCIPE AUDI HUMOVDO MAHARASTARAHTELIAMTADIUSMRITUATATHIONm समापर्व म हा मारत SHADImummerriamrrrrammar, कथं वत्स्यथ दुर्गेषु वने ऋद्धिविनाकृताः वीर्यसत्त्ववलोत्साहतेजोभिरकृशाः कृशाः यद्येतदेवमज्ञास्यं वने वासो हि वो ध्रुवम् शतशृङ्गान्मृते पाण्डौ नागमिष्यं गजाह्वयम् ॥१७॥ धन्यं वः पितरं मन्ये तपोमेधान्वितं तथा यः पुत्राधिमसंप्राप्य स्वर्गेच्छामकरोत्प्रियाम् धन्यां चातीन्द्रियज्ञानामिमां प्राप्तां परां गतिम् । मन्ये तु माद्री धर्मज्ञां कल्याणी सर्वथैव तु. ॥ १९ ॥ रत्या मत्या च गत्या च ययाऽहमभिसन्धिता । जीवितप्रियतां मह्यं धिड्यां संक्लेशभागिनीम् ॥ २० ॥ पुत्रका! न विहास्ये वः कृच्छूलब्धान्प्रियान्सतः। साहं यास्यामि हि वनं हा कृष्णे! किं जहासि माम् ॥ २१॥ अन्तवत्यसुधर्मेऽस्मिन्धात्रा किं नु प्रमादतः ममाऽन्तो नैव विहितस्तेनाऽऽयुर्न जहाति माम् ॥ २२ ॥ सधरित्र पुरुषों में प्रधान पाण्डवों की ऐसी दुर्दशा ' यहां कभी न आती । हे पुत्रो ! तुम्हारे पिता धन्य क्यों हुई ! हाय ! मैं इस समय किसे अपराधी , हैं, क्योंकि वे वर्ग का सुग्व भोग रहे हैं और उनके ठहराऊँ ! मैं अत्यन्त अभागिन और पापिन हूँ। साथ स्वर्ग को जानेवाली मादी भी धन्य है। मेरे ही भाग्य के दोष से यह मय कुछ हुआ है। इम अमागिन की तरह उसे न महने योग्य प्लेश ॥११॥१४॥ और कठिन यातना नहीं भोगनी पड़ी। मैं अत्यन्त हाय पुत्रो ' तुम क्यों इस अभागिन के पेट अभागिन और पापिन हूँ। मेरे जीवन को विकार से पैदा हुए थे। तुम बड़े गुणी और ज्ञानी पुरुषों है। ॥१५॥२०॥ में श्रेष्ठ हो; केवल इस अगागिन के गर्भ से उत्पन्न पुत्रो ! तुम मुझको अकेली छोड़ कर कहाँ होने के दोष से ही इतना लग पा रहे हो। हाय जाओगे ! मैं तुम्हारे साथ चलेंगी। तुम्हें छोड़कर मैं पुत्री ! तुम लोग असाधारण बलवान् और वीर्यवान् किसी तरह जीवित न रह सकूँगी। हाय! पुत्री द्वीपदी होकर किस तरह घोर वन में अत्यन्त हीनवीर्य तुम भी क्या मुझे छोड़कर चली जाओगी ! क्या पुरुष की भांति समय बिताओगे । हाय ! जो मुझे विधाता ने मेरे शरीर का अन्त नहीं लिखा है, जो ऐसा मालूम होता, कि तुमको यनयाम होगा, तो ऐसी विपत्ति में भी मेरे प्राण नही निकलते हैं। शतशृंग पर्वत पर से महाराज पाण्ड के मरने पर कृष्ण ! हे परदेव जी के छोटे भाई। इस समय तुम rrepreneuriareturnerecreuerrecrementare eccentric eft । ! क्योंकि -- महा मारत अध्याय ७९] PuuutamTIONORMITTorrouTOTTTTTuminiummunmunaraurammarary , 1 - हा कृष्ण! द्वारकावासिन्क्वाऽसि संकर्षणानुज !। कस्मान्न त्रायसे दुःखान्मां चेमांश्च नरोत्तमान् ॥ २३ ॥ अनादिनिधनं ये त्वामनुध्यायन्ति वै नराः तांस्त्वं पासीत्ययं वादः स गतो व्यर्थतां कथम्॥ २४ ॥ इमे सद्धर्ममाहात्म्ययशोवीर्यानुवर्तिनः नाऽहन्ति व्यसनं भोक्तुं नन्वेषां क्रियतां दया ॥ २५ ॥ सेयं नीत्यर्थविज्ञेषु भीष्मद्रोणकृपादिषु स्थितेपु कुलनाथेषु कथमापदुपागता 11 २६ ॥ हा पाण्डो !हा महाराज! क्वासि? किं समुपेक्षसे? । पुत्रान्विवास्यतः साधूनरिभिर्चुतनिर्जितान् ॥ २७ ॥ सहदेव ! निवर्तस्व ननु त्वमसि मे प्रियः शरीरादपि माद्रेय ! मां मा त्याक्षीः कुपुत्रवत् ।। २८ ।। वजन्तु भ्रातरस्तेऽमी यदि सत्याभिसन्धिनः । मत्परित्राणजं धर्ममिहेव त्वमवाप्नुहि ॥ २९॥ वैशम्पायन उवाच-एवं विलपती कुन्तीमभिवाद्य प्रणम्य च पाण्डवा विगतानन्दा वनायैव प्रवबजुः विदुरश्चापि तामाता कुन्तीमाश्वास्य हेतुभिः । कहा हो, जो मेरी और इनकी इस दुःख से रक्षा महाराज पाण्टु ! तुम नहीं जानते, कि तुम्हारे प्रिय नहीं करते हो। यह वात विख्यात है, कि जो कोई पुत्रों की कैसी दुर्दशा हो रही है । शत्रु लोग तुम्हारे तुमको आदि और सनातन जानकर तुम्हारा ध्यान निरपराध पुत्रों को कपट के जुए में हराकर निकाले करता है, उसको तुम अपना दर्शन देकर उसके दुख दे रहे हैं । हे माद्री के पुत्र सहदेव ! तुम वन को दूर करते हो, अब क्या कारण है, जो सहायता न जाओ । तुम मुझको अपने शरीर से भी अधिक नहीं करते । हे द्वारकावासी ! ये पाण्डव बड़े ही प्योरे हो। कुपुत्र की तरह मुझे दु.ख देकर मत धर्मामा, महात्मा, यशस्वी और पराक्रमी हैं, दुस जाना । तुम्हारे ये मय भाई सत्यप्रतिज्ञ हैं । इसमे सहने के योग्य नहीं हैं। इन पर अपनी दया तुम इनको ही जाने दो। तुम यहीं रहकर मेरे जीवन की रक्षा करो। यही करने से तुमको श्रेष्ठ धर्म प्राप्त हे मीम ! हे द्रोण ! हे कृपाचार्य ! तुम्हारे होगा। वैशम्पायन ने कहा-दे राजा जनमेजय । रहंत पाण्डवों पर ऐमी विपति से आई ' हाय कुन्ती इस प्रकार विराप करने लगी। उमको प्रणाम WETTPSmIDIOHIBLINDormummRCTCREETICOTTEELCOME moWISDOTTI TUDIDATUUMIDTDMITITATTUTTDTTI. . .. को कीजिए ॥२१॥२५॥ CIATICO । .

( ममापर्व TETIரரரராசாாாாாாராET UND devacrania.omm.गार...ai.ka. - ३३८ म हा मारत wammammarwmmmmmmmmmmmmmmroomramerammarAIL IMARATORS प्रावेशयद गृह क्षत्ता स्वयमाततरः शनैः धार्तराष्ट्रस्त्रियस्ताश्च निखिलेनोपलभ्य तत् ।. गमनं परिकर्ष च कृष्णाया द्यूतमण्डले रुरुदुः सुस्वनं सर्वा विनिन्दन्त्यः कुरून्भृशम् । दध्युश्च सुचिरं कालं करासक्तमुखाम्बुजाः ॥ ३३ ॥ राजा च धृतराष्ट्रस्तु पुत्राणामनयं तदा ध्यायन्नुद्विग्नहृदयो न शान्तिमधिजग्मिवान् ॥ ३४ ॥ स चिन्तयन्ननेकाग्रः शोकव्याकुलचेतनः क्षत्तुः संप्रेषयामास शीघमागम्यतामिति ॥ ३५ ॥ ततो जगाम विदुरो धृतराष्ट्रनिवेशनम् तं पर्यपृच्छत्संविग्नो धृतराष्ट्रो जनाधिपः इति श्रीमन्महाभारत सभापर्वणि अनुघूतपर्वणि द्रौपदीकुन्तीसंवादे एकोनाशीतितमोऽध्यायः ॥ ७९ ॥ करके पाण्डव वन को चल दिये । ॥२६॥३०॥ को गई है, व्यथित होकर, कौरवों की निन्दा करती महामति विदुर जो स्वयं दुखी थे, शोक से हुई रोने लगी । अपने पुत्रों के अन्याय पर विचार विहल बनी कुन्ती को तरह-तरह के विश्वास दिलाने- करने से धृतराष्ट्र का चित्त भी बहुत चञ्चल हो उठा। वाले वाक्यों से धैर्य बँधाते हुए अपने घर ले गये । उन्होंने शोक और मोह के वश होकर, अब चैन न राजा धृतराष्ट्र के महल की स्त्रिया भी घूतसभा में पाई तब विदुर जी को बुला कर वे उनसे आगे के द्रौपदी की वैसी दुर्दशा होने का वृत्तान्त सुनकर कर्तव्य के बारे में पूछने लगे ॥३१॥३६॥ और यह जानकर, कि द्रौपदी भी पाण्डवों के साथ वन मभापर्व का उनासीवां अध्याय समाप्त हुआ ॥ ७९ ॥ अथ अशीतितमोऽध्यायः ।। ८० ॥ वैशम्पायन उवाच-तमागतमथो राजा विदुरं दीर्घदर्शिनम् साशङ्क इव पप्रच्छ धृतराष्ट्रोऽम्बिकासुतः पृतराष्ट्र उवाच-कथं गच्छति कौन्तेयो धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः भीमसेनः सव्यसाची माद्रीपुत्रौ च पाण्डवी ॥ २ ॥ धौम्यश्चैव कथं क्षत्तापदी च यशस्विनी श्रोतुमिच्छाम्यहं सर्व तेपां शंस विचेष्टितम् ॥ ३ ॥ .. TUTTUMTUDTAMATUTUTODIMMWETCDTMccrterecenraTITI EDDDTDOOLTD.Croccm ३३९ अध्याय ८०] महा मारत SAIRHATTISTRITIEmirawarananmitrama COMINATITImeramanarraimimirm विदुर टवाच-वस्त्रेण संवृत्य मुखं कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः वाहू विशाली संपश्यन्भीमो गच्छति पाण्डवः ॥ ४ ॥ सिकता वपन्सव्यसाची राजानमनुगच्छति माद्रीपुत्रः सहदेवो मुखमालिप्य गच्छति पांसूपलिप्तसर्वाङ्गो नकुलश्चित्तविह्वलः दर्शनीयतमो लोके राजानमनुगच्छति कृष्णा तु केशैः प्रच्छाद्य मुखमायतलोचना । दर्शनीया प्ररुदती राजानमनुगच्छति धोम्यो रौद्राणि सामानि याम्यानि च विशांपते!। गायन्गच्छति मार्गेषु कुशानादाय पाणिना धृतराष्ट्र उवाच-विविधानीह रूपाणि कृत्वा गच्छन्ति पाण्डवाः । तन्ममाऽऽचक्ष्व विदुर ! कस्मादेवं व्रजन्ति ते ॥ ९ ॥ विदुर उवाच-निकृतस्यापि ते पुत्रैर्हते राज्ये धनेषु च न धर्माच्चलते बुद्धिर्धर्मराजस्य धीमतः योऽसौ राजा घृणी नित्यं धार्तराष्ट्रेषु भारत ! । निकृत्या भ्रंशितः क्रोधान्नोन्मीलयति लोचने ॥ ११ ।। अस्सीवां अध्याय ॥ ८॥ वैशम्पायन कहते हैं-ह गजा जनमेजय ! अत्यन्त टन मन्त्रों को पढ़ते हुए, जिनके देवता यम भीर भय से व्याकुल धृतराष्ट्र ने विदुर को आया हुआ रुद्र हैं, जा रहे हैं । युधिष्ठिर सर के आगे हैं और जानकर पूछा-हे विदुर ! पाण्डव लोग दोपदी और युधिष्ठिर के पीछे और मम हैं ॥१८॥ धौम्य के साथ वन को किस तरह जा रहे हैं ! यह मुनकर धृतराष्ट्र ने पूछा-पाव लोगदम विदुर ने कहा-हे महाराज ! युधिष्ठिर अपने मुम्ब प्रकार से नाना प्रकार के स्प बना कर क्यों मारदे को कपड़े से ढके हुए, भीमसेन अपनी भुजाओं को है : विदुर ने कहा- राजन् ! यपपि आप के पुत्रों देखना हुआ, अर्जुनपाको वारकता ने युधिष्ठिर का धन और राज्य कर लिया हुआ, महदेय मुम्ब पर भम्म लगाता हुआ, नकुल है, परन्तु युधिष्ठिर अपने धर्म को छोड़ना नहीं चादते मापने शरीर में पूल मलता हुआ, द्रौपदी अपने खुले हैं। इससे उन्होंने तुम्हारे पुत्रों पर दया करके हम दुए पानों में मुम्ब को टके हुए और रोती हुई, और विनार मे कि जो में अपनी कोष मरी हुई ऑमें भोग्य पुरोहित हाथ में कुशा लिये हुए सामवेद के पोल दूंगा, सो पोर कम करनेवाले दुयोधन आदि Premcencrore TerraceTQUTOURICULAMML'ooletel'l'l'Utarania । auritere ३४० म हा भारत [ समापर्व mammimaraornmuTIRITTENTIATTENEmammarriomamaruaarimaharararuaar CUMENTUDDIMAITADIUDAY retu । NAINumAAVAImummmmus नाऽहं जनं निर्दहेयं दृष्ट्वा घोरेण चक्षुषा स पिधाय मुखं राजा तस्माद्गच्छति पाण्डवः यथा च भीमो ब्रजति तन्मे निगदतः शृणु ॥ १२ ॥ बाह्वोर्वले नास्ति समो ममेति भरतर्षभ ! वाहू विशालौ कृत्वाऽसौ तेन भीमोऽपि गच्छति ॥ १३ ॥ वाहू विदर्शयन्राजन् ! वाहुद्रविणदर्पितः चिकीर्षन्कर्म शत्रुभ्यो वाहुद्रव्यानुरूपतः प्रादिशञ्च्छरसंपातान्कुन्तीपुत्रोऽर्जुनस्तदा सिकता वपन्सव्यसाची राजानमनुगच्छति असक्ताः सिकतास्तस्य यथा संप्रति भारत ! | असक्तं शरवर्षाणि तथा मोक्ष्यति शत्रुषु न मे कश्चिद्विजानीयान्मुखमद्येति भारत ! मुखमालिप्य तेनासौ सहदेवोऽपि गच्छति नाहं मनांस्याददेयं मार्गे स्त्रीणामिति प्रभो! । पांसूपलिप्तसर्वाङ्गो नकुलस्तेन गच्छति ॥१८॥ एकवस्त्रा प्ररुदती मुक्तकेशी रजस्वला शोणितेनाक्तवसना द्रौपदी वाक्यमब्रवीत् यत्कृतेऽहमिदं प्राप्ता तेषां वर्षे चतुदर्श भस्म हो जायेंगे, अपने मुख को कपड़े से ढक लिया बहुत ही सुन्दर पुरुष हैं; राह में उनको देखकर है ॥९॥१२॥ स्त्रिया मोहित न हो जायें, इस विचार से बन जाते भीमसेन यह सोचकर कि "माहु बल में मरे समय उन्होंने सारे शरीर में मिट्टी लगा ली है। समान और कोई नहीं है" युद्ध में घोर कर्म करने लोह से भरी हुई, एक ही वस्त्र पहने, गेती हुई के इरादे से पार चार भुजाओं को ताकते जा रहे हैं। रजस्वला द्रौपदी दु शामन के पकड़े हुए बालों को भर्जुन जो बाल उड़ाते जा रहे हैं, उसका अभिप्राय खोले यह कहती जा रही है, कि जिनके कारण मुझे यही है कि वे युद्ध में उसी तरह शत्रुओं पर वाणों यह दुख प्राप्त हुआ है उनकी स्रियां चौदहवें वर्ष की वर्षा करेंगे । सहदेव ने इस लिये मुख पुत्र, पति, -धुजन आदि के मरने से गोक मे लगा ली है, कि उन्हें कोई पहचान न सके। नाल पीड़ित और लोह से तर होकर, मिट्टी से भरी हुई, FREEDOMWWHETRITTEmmmarMEETIDIATIMITEDmmummtvNEETITI - TITUTINATIONAINIUIITTISTDinar imanumanre अध्याय ८०] म हा मारत WIDIUINCANTATTITISOITIANETITION हतपत्यो हतसुता हतवन्धुजनप्रियाः ॥ २० ॥ बहुशोणितदिग्धाङ्ग्यो मुक्तकेश्यो रजस्वलाः एवं कृतोदका भार्याः प्रवेक्ष्यन्ति गजाह्वयम् ॥ २१ ॥ कृत्वा तु नैर्ऋतान्दर्भान्धीरो धौम्यः पुरोहितः । सामानि गायन्याम्यानि पुरतो याति भारत ! ॥ २२ ॥ हतेषु भरतेप्वाजौ कुरूणां गुरवस्तदा एवं सामानि गास्यन्तीत्युक्त्वा धौम्योऽपि गच्छति॥ २३ ॥ हा हा गच्छन्ति नो नाथाः समवेक्षध्वमीदृशम् । अहो धिक्कुरुवृद्धानां चालानामिव चेष्टितम् ॥ २४ ॥ राष्ट्रेभ्यः पाण्डुदायादाँल्लोभान्निर्वासयन्ति ये अनाथाः स्म वयं सर्वे वियुक्ताः पाण्डुनन्दनैः ॥ २५ ॥ दुर्विनीतेषु लुब्धेषु का प्रीतिः कौरवेषु नः इति पौराः सुदुःखार्ताः क्रोशन्ति स्म पुनः पुनः॥ २६ ॥ एवमाकारलिङ्गैस्ते व्यवसायं मनोगतम् कथयन्तश्च कौन्तेया वनं जग्मुर्मनस्विनः ॥ २७॥ एवं तेषु नराग्येषु निर्यत्सु गजसाह्वयात् अनभ्रे विद्युतश्चाऽऽसन्भूमिश्च समकम्पत ॥ २८ ॥ बाल खोले, मेरी तरह रोती हुर्ह, भाई-बन्धुओं को हैं । कुरु वश के वृद्ध लोग चुपचाप यह देख रहे तिलोदक देकर हस्तिनापुर में जायेंगी ॥१३॥२१॥ हैं । अहो उन बालकों की सी बुद्धि रखनेवाले वृद्धों पुरोहित धौम्य ननाय कुशा हाथ में लिये को धिक्कार है । महाराज पाण्डु के उत्तराधिकारियों भयकर याम्य साम पढ़ते जो जा रहे हैं उसका को लोभ के कारण राज्य से भ्रष्ट करनेवाले कौरवों को. अभिप्राय यही है कि कौरयों के मारे जाने पर उनके चार बार धिकार है । पाण्डवों के वियोग से हम लोग पुरोहित भी, इसी तरह, घोर साम-मन्त्रों का पाठ अनाथ हुए जा रहे हैं । लोभी और घमण्डी कौरवों करते हुए आगे-आगे चलेंगे । सब नगर के रहने पा हमे तनिक भी प्रेम नहीं है । हे महाराज! नगर- वाले अत्यन्त दु:खित होकर आपस में कह रहे हैं वासी लोग इस तरह कहकर विलाप कर रहे हैं। कि हाय, देखो, हमारी रक्षा करने वाले पाण्डवों को वे पाण्डव उक्त रीति से अपने मन की बात को क्पट से कौरवों ने राज्य से भ्रष्ट कर दिया है। रूप ओर चिह्नों से दर्शाते हुए वन की ओर चले पाण्डव लोग उनके अन्याय से वन को चले जा रहे , गये । हे राजा धृतराष्ट्र ! पाण्डवों के हस्तिनापुर से HTTAMIL MITMmmmmmmmmmmmmmm Sannnnn.matmund IITTYYPYITDAGINUUTTOPORTTITOMTO atmanmmmmIITUITIANITamamzamam - CTULATORATO ADMITTIMIMITED ३४२ म हा भारत [ समापर्व RuwanrmmiuminaruruminumarATIOmnirurunmunrarururumaunrrrrr HTRANYTHATAINEDARDIEORULAIMEANINAINAMM mamurarthanam राहुरग्रसदादित्यमपर्वाण विशांपते उल्का चाप्यपसव्येन पुरं कृत्वा व्यशीर्यत ॥ २९॥ प्रत्याहरन्ति कव्यादा गृध्रगोमायुवायसाः देवायतनचैत्येषु प्राकाराहालकेषु च ॥ ३०॥ एवमेते महोत्पाताः प्रादुरासन्दुरासदाः भरतानामभावाय राजन् ! दुर्मन्त्रिते तव वैशम्पायन उवाच-एवं प्रवदतोरेव तयोस्तत्र विशांपते ! धृतराष्ट्रस्य राज्ञश्च विदुरस्य च धीमतः ॥३२॥ नारदश्च सभामध्ये कुरूणामग्रतः स्थितः महर्षिभिः परिवृतो रौद्रं वाक्यमुवाच ह ॥ ३३ ॥ इतश्चतुर्दशे वर्षे विनयन्तीह कौरवाः दुर्योधनापराधेन भीमार्जुनबलेन च ॥ ३४ ॥ इत्युक्त्वा दिवमाक्रम्य क्षिप्रमन्तरधीयत ब्राह्मी श्रियं सुविपुलां विभ्रद्देवर्षिसत्तमः ततो दुर्योधनः कर्णः शकुनिश्चापि सौवलः द्रोणं द्वीपममन्यन्त राज्यं चास्मै न्यवेदयन् ॥ ३६ ॥ अथाऽब्रवीत्ततो द्रोणो दुर्योधनममर्पणम् निकलते ही विना बादल के आकाश से पानी की थे उसी समय उन कौरवों की ममा में नारद जी वर्षा हुई, पृथ्वी में भूकम्प हुआ, राहु ने बिना पर्व महाऋपियों को साथ लिये हुए आये और कहने के सूर्य को प्रस लिया और नगर के दहिनी ओर लगे, कि आज से चौदहवें वर्ष में दुर्योधन के अपराध उस्कापात हुआ। और देवताओं के मन्दिर, अटारिया के कारण से भीमसेन, अर्जुन के बल से सब कौरवों और यज्ञस्थान की सीवों के वृक्षों पर मास खाने का नाश होगा। यह कहकर नारद जी मामी कान्ति वाले गृद्ध और काग आदि पक्षी और गीदड़ बोलने को धारण किये हुये शीघ्र आकाशमार्ग में जाकर लगे । इसलिय हे राजा धृतराष्ट्र ! ये सम्पूर्ण उत्सात अन्तर्धान हो गये । उनके ये वचन सुनकर दुर्योधन, तुम्हारे खोटे मंत्र के कारण से भरतकुल के नाश कर्ण और शकुनि बहुत ही भयभीत हुए । दुर्योधन होने के निमित हुए हैं ॥२२॥३१॥ ने द्रोणाचार्य को ही अपनी रक्षा करनेवाला समझ वैशम्पायन ने कहा-हे राजा जनमेजय ! जिस फर, यह सत्कार आदि से उन्हें सन्तुष्ट रखने की समय विदुर जी धृतराष्ट्र से उक्त प्रकार से कह रहे । चेष्टा करने रगा ॥३२॥३६॥ Τοτσττιττιτατταταττατιτε τττττιτεντατιτταΙτατευναση .marRTAINDudinniv.WAMInamasaapan ।

३४३ महा मारत अध्याय ८०] SHAmarwanamurmmomaraIMITHumsummammumarimmunaruwaura Lear DITIOm.ornwapnand mmaram.saramnaaTRACTIAimur.. दुःशासनं च कर्णं च सर्वानेव च भारतान् अवध्यान्पाण्डवान्प्राहुर्देवपुत्रान्द्विजातयः अहं वै शरणं प्राप्तान्वर्तमानो यथावलम् गन्ता सर्वात्मना भक्त्या धार्तराष्ट्रान्सराजकान्। नोत्सहयं परित्यक्तुं दैवं हि वलवत्तरम् ॥ ३९ ॥ धर्मतः पाण्डुपुत्रा वे वनं गच्छन्ति निर्जिताः । ते च द्वादश वर्षाणि वने वत्स्यन्ति पाण्डवाः ॥ ४० ॥ चरितब्रह्मचर्याश्च क्रोधामर्षवशानुगाः वैरं निर्यातयिष्यन्ति महद् दुःखाय पाण्डवाः ॥ ४१ ।। मया च भ्रंशितो राजन्द्रुपदः सखिविग्रहे पुत्रार्थमयजदाजा वधाय मम भारत ! ॥ ४२ ॥ याजोपयाजतपसा पुत्रं लेभे स पावकात् धृष्टद्युम्नं द्रौपदी च वेदीमध्यात्सुमध्यमाम् ॥४३॥ धृष्टद्युम्नस्तु पार्थानां श्यालः संवन्धतो मतः पाण्डवानां प्रियरतस्तस्मान्मां भयमाविशत् ॥४४ ॥ ज्वालावर्णो देवदत्तो धनुष्मान्कवची शरी तब द्रोणाचार्य ने दुर्योधन, दु शासन और किया था, तर बदला लेने के लिये मैंने भी उन्हें कर्ण और सब भरतयाशियों से कहा ब्राह्मणों का अर्जुन के द्वारा हराकर राज्य से प्रष्ट कर दिया था। कहना है, कि देवपुत्र पाण्डव अवध्य हैं, किन्तु में इस पर फुपित होकर राजा द्रुपद ने मुझे मारनेवारा पतिज्ञा करता है, कि मैं शरणागत धृतराष्ट्र और पुत्र पैदा होने की इच्छा करके एक पोर यज्ञ किया। उनके पुत्रों को नहीं जेड़ सकना । मैं यथाशक्ति याज और उपयाज ऋपियों की तपस्या के प्रभाव गजमक्ति से विमुख न होऊँगा । परन्तु होनहार बड़ी से द्रुपद के पुत्र हुआ। अमिकुण्ड से एक पुत्र पृष्टपुत परवान् है; जो होना है सो अवश्य होगा। धर्म से और एक कन्या द्रौपदी निकली। भृष्टार पाण्डवों जीते गये पाण्डव धर्मपालन के लिये वन को चले का साला है। उमे पाण्डय रहुत प्यारे हैं। उमी बा रहे हैं । ब्रह्मचर्य धारण करने वे से मुझे भय है । उमका रह भामि की ज्याला या बन में रदेंगे । इसके पश्चात् जब लौटेंगे तय इस पैर ऐसा है । वह देवनाओं का दिया हुआ पृष्टपार पदग अवश्य रंगे ॥३७॥४०॥ कवच, धनुष, माण आदि रिये हुए पैदा हुआ है। दमो, मेरे मित्र राजा द्वाद ने जय मेरा अपमान मनुष्यमार मृत्यु मे पर नहीं सकते। मैं भी मनुष्य FROID PHONESSPATROTEEmmrawrerrerana पारद वर्ष तक - ३४१ म हा मारत [ममापर SumanamaAnamimmunn intamannmannmmarAND - TAMIGRATNAMANIRUNaRTINITராராராரோ) - मर्त्यधर्मतया तस्मादद्य मे साध्वसो महान् ॥ ४५ ॥ गतो हि पक्षतां तेषां पार्षतः परवीरहा रथातिरथसंख्यायां योऽग्रणीरर्जुनो युवा ॥ ४६ ॥ सृष्टप्राणो भृशतरं तेन चेत्संगमो मम किमन्यद् दुःखमधिकं परमं भुवि कौरवाः! ॥ ४७ ॥ धृष्टद्युम्नो द्रोणमृत्युरिति विप्रथितं वचः ।' मद्वधाय श्रुतोऽप्येप लोके चाऽप्यतिविश्रुतः ॥ ४८ ॥ सोऽयं नूनमनुप्राप्तस्त्वत्कृते काल उत्तमः त्वरितं कुरुत श्रेयो नैतदेतायता कृतम् ॥४९॥ मुहूर्त सुखमेवैतत्तालच्छायेव हैमनी यजध्वं च महायज्ञैर्भोगानश्नीत दत्त च इतश्चतुर्दशे वर्षे महत्प्राप्स्यथ वैशसम् द्रोणस्य वचनं श्रुत्वा धृतराष्ट्रोऽब्रवीदिदम् ॥ ५ ॥ सम्यगाह गुरुः क्षत्तरुपावर्तय पाण्डवान् यदि ते न निवर्तन्ते सत्कृता यान्तु पाण्डवाः । सशस्त्ररथपादाता भोगवन्तश्च पुत्रकाः ॥ ५२ ॥ इति श्रीमन्महाभारत समापर्वणि अनुनपर्वणि विदुरवृतराष्ट्रद्रोणयाक्ये अशीतितमोऽध्यायः ॥८॥ हूँ, अतएव मुझे पृष्टद्युत के हाथ से अपनी मृत्यु का मृत्यु लिखी है तो यह भी सत्य होगी हे दुर्योधन दर है । यह बात प्रसिद्ध है कि धृष्टद्युम ट्रोणाचार्य तुम्हारा यह राज्य और मुख-सम्पचि सब शीतगाल का काल है । वह पाण्डवों की आर स अवश्य युद्ध की ताड़ के पेड़ की छाया के समान है। तुमने करेगा, इमलिये तुम सब मावधान हो जानी। देखा, अपने हाथों अपना नाश कर दिया है। अच्छा, मर्जुन का नाम महारथी और रथी पुरुषों में सबसे अब तुम या करो, दान दो और सुम्प मोगो। भर पदले लिया जाना है । वह मुझे प्राणों से भी अधिक में तरह मर्ष व्यतीत होने पर तुम्हारा नाश हो जायगा ! प्रियद, किन्तु तुम्हारे लिये मुझे म अर्जुन से भी यह मुनकर धृतराष्ट्र ने कहा- विदुर ! भावार्य युद करना पड़ेगा, इससे पढ़कर दुःम की पान टीक कहते हैं । तुम जल्दी से आकर पाटयों को और क्या हो मफती है । तथापि में तुम्हारे रोरा सभी। और यदि यन से शटने के लिये रिसे युद्ध बरंगा और भृष्टपार के हाथ में यदि Rमस नातीपा आदिदेर उनका मार PHOTOS:00120-120101121115TOTREATUTITLETTITTERTara अध्याय ८१ ) मदा मारत ३४५ WAY TUTTO TO JTITUT. TUTTOSTOTO.TITNOTTOTUUSUTTIT TIMOD TIMOTATIVOS करो और हाथी, घोड़े, पैदल हथियारबन्द मिपाही मिले ॥ ४११५२॥ आदि उनके माथ कर दो, जिसमें उन्हें कुछ कष्ट न मभापर्व का अस्मीवां अध्याय समान हुआ ॥ ८॥ - tuveen we cuEATREETECTercrorewerecence .. । । Trxmmm..res.inmit अथ एकाशीतितमोऽध्यायः ।। ८१ ।। वंशम्पायन उवाच-वनं गतेषु पार्थेपु निर्जितेषु दुरोदरे धृतराष्ट्र महाराज ! तदा चिन्ता समाविशत् ॥ १ ॥ तं चिन्तयानमासीनं धृतराष्ट्रं जनेश्वरम् निःश्वसन्तमनेकाग्रमिति होवाच संजयः ॥ २ ॥ माय उवाच-अवाप्य वसुसंपूर्णा वसुधां वसुधाधिप ! प्रव्राज्य पाण्डवान्राज्याद्राजन् ! किमनुशोचसि?॥ ३ ॥ धृतराष्ट्र उवाच-अशोच्यत्वं कुतस्तेषां येषां वैरं भविष्यति पाण्डवेयुन्दशौण्डैर्हि वलवद्भिर्महारथैः ॥ ४ ॥ मञ्जय उवाच-तवेदं सुकृतं राजन्महद्वेरमुपस्थितम् विनाशो येन लोकस्य सानुबन्धो भविष्यति ॥ ५ ॥ वार्यमाणो हि भीप्मेण द्रोणेन विदुरेण च पाण्डवानां प्रियां भार्या द्रौपदी धर्मचारिणीम् ॥ ६ ॥ प्राहिणोदानयेहेति पुत्रो दुर्योधनस्तव सूतपुत्रं सुमन्दात्मा निर्लजः प्रातिकामिनम् ॥ ७ ॥ इक्यामीयां अध्याय 11 ८१ ॥ वैशम्पायन ने कहा-दे राजा जनमेजय ! उधर यह मुनकर धृतराष्ट्र ने कहा-महारथी, पल्यान् पर फे जुए में हार कर, पाण्डव वन को गये, और और नतुर पाण्डयों के माय जो शगुना पर पुका {पर पृतराष्ट्र अत्यन्त मिनहार अकेले में वठा १, यह क्योंकर निधिान भीर मुमीदो माना। मी माम सने लगा। यह गहरी चिन्ता में हरा माय ने कहा है महाराज ! तुम्हारी रामे पुमा था। इसी ममय उसके पाम ममय आया इम घोरापना का मारम्भमा है। यदि सम और दाय जोरकर कहने लगा-हे राजन् ! पाण्डवों इम पूनमाराका अनुमोदन न रत. नो कमी या में पनपाम देकर इस समय तो तुम ममुः पर्यन्न नि आनी ] पारडयों के माय शत्रता करने सपी के अस्लिीय यामी पन चुरे हो। अर तुम का फर यही होगा, कि मग मी लिम पाठ पारिता कर रहे हो ! ॥१॥३॥ गोरे डाग | देमी, गुम्दार नित्र भोर मन्दमुदि 31710:28.5mATTE - ३४६ महा भारत [समापर्व ETournamruirmwinAmmmmmmunyanrmmmmmmmmmmmmmamiserarm எயமாயமானவையான காைலமைகனைனான ommmmwwrernmenrewanSRCLEARN : यस्मै देवाः प्रयच्छन्ति पुरुषाय पराभवम् बुद्धिं तस्यापकर्षन्ति सोऽवाचीनानि पश्यति ॥ ८ ॥ बुद्धौ कलुषभूतायां विनाशे समुपस्थिते अनयो नयसङ्काशो हृदयान्नाऽपसर्पति ॥ ९ ॥ अनर्थाश्चाऽर्थरूपेण अर्थाश्चाऽनर्थरूपिणः उत्तिष्ठन्ति विनाशाय नूनं तच्चास्य रोचते न कालो दण्डमुद्यम्य शिरः कृन्तति कस्यचित् । कालस्य वलमेतावद्विपरीतार्थदर्शनम् आसादितमिदं घोरं तुमुलं लोमहर्पणम् पाञ्चालीमपकर्षद्भिः सभामध्ये तपस्विनीम् अयोनिजां रूपवती कुले जातां विभावसोः को तां सर्वधर्मज्ञां परिभूय यशस्विनीम् ॥ १३ ॥ पर्यानयेत्सभामध्ये विना दुर्दूतदेविनम् स्त्रीधर्मिणी वरारोहा शोणितेन परिप्लुता एकवस्त्राऽथ पाञ्चाली पाण्डवानभ्यवेक्षत हृतस्वान्हृतराज्यांश्च हृतवस्त्रान्हृतश्रियः विहीनान्सर्वकामेभ्यो दासभावमुपागतान् पुन दुर्योधन ने भीष्म, टेपिएचार्य और विदुर जी चालें सुझाता है । सभा में पतिता, धर्मपरायणा के मना करने पर भी प्रातिकामी को भेजकर धर्म द्रौपदी को खींच लाकर दुर्योधन आदि ने यह चारिणी द्रौपदी को सभा में बुलवाया । सत्य है, भयानक अनर्थ खड़ा कर लिया है ॥९॥१२॥ जिसको देवता लोग नष्ट करना चाहते हैं, उसकी दुष्टमति, जुअरो नीचों के सिवा, और कौन बुद्धि पहले ही से हर लेते हैं ॥४॥८॥ अयोनिजा, रूपवती, अमिकुण्ड में से प्रकट हुई और जब नाश का समय सिर पर आ जाता है, और सब धमों को जाननेवाली यशस्विनी द्रौपदी को तय बुद्धि के पापरूप हो जाने से अनीति ही नीति इस तरह बाल पकड़कर सभा में घसीट लाने का जान पड़ती है । और हित अनहित और अनहित : साहस कर सकता है । इसके सिवा, जब वह द्रौपदी हित दिखाई देता है, और वही उसको अच्छा जान अपने रजम्वला धर्म में रुधिर से मरा हुई, एक बल पड़ता है । कार, दण्ड ठाकर, किसी के सिर को पहने हुए अपने पतियों को, जो धन, राज्य और नदी फोड़ता। काल का बल यही है कि वह विपरीत वमों को हार जाने के कारण से, दास होकर धर्म FammamrememummomhironiummenaramrpreECE

महा मारत
WritiranLITELLITE
अध्याय ८१
३४७
SOTRACTIVIRATIOrTERIOUSILTITWITTITITIOINTMLINITIATIMITTru TITLE
धर्मपाशपरिक्षितानशक्तानिव विक्रमे
क्रुद्धां चानहती कृष्णां दु:खितां कुरुसंसदि ।
दुर्योधनश्च कर्णश्च कटुकान्यभ्यभाषताम्
इति सर्वमिदं राजन्नाकुलं प्रतिभाति मे
धृतराष्ट्र उवाच-तस्याः कृपणचक्षुभ्यां प्रदह्येतापि मेदिनी ॥ १८ ॥
अपि शेपं भवेदद्य पुत्राणां मम संजय!
भरतानां स्त्रियः सर्वा गान्धार्या सह सङ्गताः ॥ १९ ॥
प्राकाशन्भैरवं तत्र दृष्ट्वा कृष्णां सभागताम्
धर्मिष्ठां धर्मपत्नी च रूपयौवनशालिनीम् ॥ २० ॥
प्रजाभिः सह संगम्य ह्यनुशोचन्ति नित्यशः ।
अग्निहोत्राणि सायाहे न चाऽहूयन्त सर्वशः
ब्राह्मणाः कुपिताश्चाऽऽसन्द्रौपद्याः परिकपणे
आसीनिष्ठानको घोरो निर्घातश्च महानभूत् ॥ २२ ॥
दिव उल्काश्चाऽपतन्त राहुश्चाऽर्कमुपाग्रसत्
अपर्वणि महाघोरं प्रजानां जनयन्भयम् ॥ २३ ॥
तथैव रथशालासु प्रादुरासीद्धताशनः
ध्वजाश्चापि व्यशीर्यन्त भरतानामभूतये ॥ २४ ॥
पाग में बँधे होने के कारण से, पराक्रम भी प्रकट
हो जायगा । देखो, जब सय भरतवंश की बिया
नहीं कर सकते थे,देख रही थी। उस समय दुर्योधन गाधारी-सहित उस धर्मिष्ठा, युवति, धर्मपत्नी और
और कर्ण ने उस दुखिया से, जो अनादर करने के म्वरूपवती द्रौपदी को सभा में आई हुई देखकर
योग्य नहीं थी, कड़वे वचन कहे । हे महाराज ! रो रही थी, और ब्राह्मणों ने उसके सभा में राने को
मुझे तो ये सब कौरों के नाश के ही लक्षण देख । देखकर क्रोध किया था और सार्यकाल को अमिहीन
भी नहीं किया था, तब प्रचण्ड आंधी चरने रगी,
यह सुनकर धृतराष्ट्र ने कहा- हे सञ्जय !
वज के गिरने का सामन्द हुआ, दिन में उल्कापान
हम सत्य कहते हो, कि वह द्रौपदी अपनी शोधभरी
होने रगे, और पर्व न होने पर भी राहु ने सूर्य को
हुई आंखों से देखकर पृथ्वी को
प्रस रिया । इसी प्रकार में स्थगाराओं में अपने
सकती है । मुझे जान पड़ता है, कि मेरे पुन मी
आप आग लग गई ॥१८॥२३॥
इस गुफर्म का फल अवश्य भोगेंगे-उनका नाम ।
ध्वजाएँ हट हट कर गिरने लगी, और दुर्योधन
TurerLOCALITCOTTOITUTT TerterLcrrorecerror
Trianminthaliuminummmmmmm
LOECCOTALITOOLTICEL ETOTALYUTITUUTOTUTE TOMOI'ALT OCULIN
ITSITATIS
परते हैं ॥१३॥१७॥

३४८ म हा मारत [ सभापर्व FinaITIMAHILWImani - TWITTYTT.TWITOIHITTTIIIVITIDITD. - luroralianwRinar Hd Tor unlimilartha दुर्योधनस्याऽग्निहोत्रे प्राक्रोशन्भैरवं शिवाः तास्तदा प्रत्यभाषन्त रामभाः सर्वतो दिशः ॥ २५ ॥ प्रातिष्ठत ततो भीष्मो द्रोणेन सह संजय ! कृपश्च सोमदत्तश्च वाहीकश्च महामनाः ॥ २६ ॥ तनोऽहमब्रुवं तत्र विदुरेण प्रचोदितः वरं ददानि कृष्णायै काङ्कितं यद्यदिच्छति ॥ २७ ॥ अवृणोत्तत्र पाञ्चाली पाण्डवानामदासताम् सरथान्सधनुष्कांश्चाऽप्यनुज्ञासिपमप्यहम् .॥ २८ ॥ अथाऽब्रवीन्महाप्राज्ञो विदुरः सर्वधर्मवित् एतदन्तास्तु भरता यद्वः कृष्णा सभां गता ॥ २९ ॥ यैषा पाञ्चालराजस्य सुता सा श्रीरनुत्तमा पाञ्चाली पाण्डवानेतान्दैवसृष्टोपसर्पति ॥ ३० ॥ तस्याः पार्थाः परिक्लेशं न क्षस्यन्ते ह्यमर्षणाः । वृष्णयो वा महेष्वासाः पञ्चाला वा महारथाः ॥ ३१ ॥ तेन सत्याभिसन्धेन वासुदेवेन रक्षिताः आगमिष्यति बीभत्सुः पश्चालैः परिवारितः ॥ ३२ ॥ की यज्ञशाला के पास सियार बड़े भयानक शब्द से निश्चय समाझिए कि भरतवंशियों का अन्त यहीं से बोलने लगे, चारों ओर गधे कठोर म्बर से रेंकने आरम्भ हुआ। देखो, पाश्चाली पाण्डवों के साथ वन को लगे। यह देखकर भीष्म, द्रोणाचार्य, बाहीक, जा रही है। इसके ऐसे अपमान और क्लेश को पाण्डव सोमदस और कृपाचार्य आदि धर्मात्मा लोग सभा में कभी नहीं सह सकते ॥२४॥३०॥ उठकर चल दिये, तव विदुर जी के कहने से मैंने द्रौपदी के अपमान को महारथी राजा द्रुपद द्रौपदी से वरदान मांगने के लिये कहा। पतिव्रता और वृष्णिवशी लोग सहन करने के नहीं । पाण्डवों द्रौपदी ने शस्त्र-सहित पाण्डवों को दास-भाव से के रक्षक तथा सहायक स्वय श्रीकृष्ण हैं। जिस छुटकारा ही मुझसे मांगा और मैंने वह वर उसे समय अर्जुन पाचाल देश की सेना लेकर आयेगा, दे दिया। इसके पश्चात् मय धर्मों के ज्ञाता विदुर और मीमसेन उस सेना में अपनी गदा को घुमाता ने मुझसे कहा था--हे राजन् ! पाचालराज की | हुआ युद्ध के लिय खड़ा होगा, उस समय कोई पुत्री साक्षात् लक्ष्मी है । वह समा में इस तरह राजा अर्जुन के गाण्डीव धनुष के शब्द को सुनकर, लाई गई और उसका अपमान किया गया । इसमे भीमसेन की गदा के वेग को न सह सकेगा । इसलिये SAHIBDOTUWULODWIDOW TOmmHILDRIPTIDHADODAIDES ANSITITNuTEG. . NEERUAE ३४९ महा मारत अध्याय ८१] DImmmmmmmmyालापाणEINowIVISAMICHAamculour DIWALIVAJILE HD காமாாைககாரகடி तेषां मध्ये महेष्वासो भीमसेनो महाबलः आगमिष्यति धुन्वानो गदां दण्डमिवाऽन्तकः ॥ ३३ ॥ ततो गाण्डीवनिर्घोपं श्रुत्वा पार्थस्य धीमतः गदावेगं च भीमस्य नालं सोढुं नराधिपाः ! ॥ ३४ ॥ तत्र मे रोचते नित्यं पार्थः साम न विग्रहः कुरुभ्यो हि सदा मन्ये पाण्डवान्वलवत्तरान् ॥ ३५ ॥ तथा हि वलवानराजा जरासन्धो महाद्युतिः । वाहुप्रहरणेनैव भीमेन निहतो युधि तस्य ते शम एवास्तु पाण्डवैर्भरतर्षभ ! उभयोः पक्षयोर्युक्तं क्रियतामविशङ्कया ॥ ३७॥ एवं कृते महाराज ! परं श्रेयस्त्वमाप्स्यसि एवं गावल्गणे क्षत्ता धर्मार्थसहितं वचः उक्तवान्न गृहीतं वै मया पुत्रहितैपिणा ॥ ३८ ॥ इति श्रीमन्महाभारते मभापणि अनुगूतपर्वणि वृतराष्ट्रमंजयसंयादे एकाशीतितमोऽध्यायः ॥ ८१ ।। ममानं च अनुचूत पर्व । इति मभापर्व ममाप्तम् ।। में पाण्डवों के साथ विग्रह करना अच्छा नहीं समझता है । तुम दोनों ओर के बलाबल को विचारकर शंका है। मेरी समझ में पाण्डवों से द्रोह न करके मेल छोड़कर जैसा उचित समझो,वैसा करो। हे महाराज ! ही करना अच्छा है ॥३१॥३४॥ ऐसा करने से ही तुम्हारा कल्याण होगा । इसलिये मैं पाण्डवों को कौरवों से सदैव अधिक बलवान् , हे सञ्जय ! विदुर जी ने यो धर्मार्थयुक्त वचन कहकर जानता है । देखो, राजा जरासन्ध जो बड़ा तेजम्बी मुझे बहुत समझाया था; परन्तु मैंने अपने पुत्रों का और बलवान् या भीमसेन के हाथों से मारा गया। हित करने के लिये उनकी सलाह को अहीकार नहीं इमलिये पाण्डवों से तुम्हारा मेल ही रहे, तो अच्छा किया ॥३५॥३८॥ ममापर्व का इक्यामीयां अध्याय ममाप्त हुआ ॥८॥ -- - ' TTCOMMADAKDruarCOM सभापर्व समाप्त हुआ। पृष्ठ १४२७ नक। UPIRITERATERIEOHITCOIErecommercrEcrercrrrrrrrrrrrs *9166 J PaymnuTurmironmararuva JamraToramirmirmTORIAsimina समी पाय मग्मात् ऐचर्यमा प्रष्ट भोग्दाश म हा भारत १४२११ श्रीमहर्पिव्यामप्रणीतम महाभारतम् । अथ वनपर्व। आरण्यपर्व । अथ प्रथमोऽध्याय.॥ १ ॥ ॐ नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम् दवीं सरस्वतीं चैव ततो जयमुदीरयेत् ॥ जनमेजय उवाच-एवं द्यूतजिता. पार्थाः कोपिताश्च दुरात्मभिः । धार्तराष्ट्रः सहामात्यैनिकृत्या द्विजसत्तम ! श्राविताः परुपा वाचः सृजविरमुत्तमम् किमकुर्वत कौरव्या मम पूर्वपितामहाः कथं चैश्वर्यविभ्रष्टाः सहसा दुःखमीयुपः बने विजहिरे पार्थाः शक्रप्रतिमतेजसः के वै तानन्ववर्तन्त प्राप्तान्व्यसनमुत्तमम् किमाचाराः किमाहाराः क्वच वासो महात्मनाम् ॥ ४ ॥ कथं च द्वादश समा बने तेषां महामुने ! सा में पाण्डवों । यनवाम दिय जाने का दुर्दशा को पहुंच कर, मि तास वन में विशे। दाह सुनकर राजा जनमेजय ने पूछा- शम्मायन महारमा पाण्डयों के साथ यन में मनन गया। भी दुरामा राष्ट्र के पुत्रों ने हमारे पिनामा यहा उन्होंने क्या क्या काम किये, कहां हर पष्ट को इस तरह कपटक जुए में हराकर, और क्या क्या सान-दानेश कटोर पनों में निन्दा कर, महागर: उनि सिमा वन मंशा अरता रसी, पारवा ने क्या रिया इन्द्र के समान शप बिनाये । पेठ, निम्ना माय पारिनी.गरपुर्ण औरती ने, मईया मुक मोम्पदाकर भी, हिम HP BTTERTrrietnam-CITTERImrerPTITrana OT Ferrerarti celeron perrreerree's creuzetrer-SCL MUUTU 1 TST CLICK ON TLS'OL ODILEX - पहला अभ्याय ॥१॥ - १४३० महा मारत [ वनपर्व WATOTOXIDATIQUOTATIT Tinnan. GINAGTITIWI armi EDIDHIRIDHAMDAADI TATION -- । व्यतीयुर्ब्राह्मणश्रेष्ठ ! शूराणामरिघातिनाम् कथं च राजपुत्री सा प्रवरा सर्वयोपिताम् पतिव्रता महाभागा द्रौपदी सत्यवादिनी ॥ ६ ॥ वनवासमदुःखार्हा दारुणं प्रत्यपद्यत एतदाचक्ष्व मे सर्व विस्तरेण तपोधन ! श्रोतुमिच्छामि चरितं भूरिद्रविणतेजसाम् कथ्यमानं त्वया विप्र परं कौतूहलं हि मे वैशम्पायन उवाच-एवं द्यूतजिताः पार्थाः कोपिताश्च दुरात्मभिः । धार्तराष्ट्रः सहामात्यैर्निर्ययुर्गजसाह्वयात् वर्धमानपुरद्वारेणाऽभिनिष्क्रम्य पाण्डवाः उदङ्मुखाः शस्त्रभृतः प्रययुः सह कृष्णया इन्द्रसेनादयश्चैव भृत्याः परिचतुदर्श रथैरनुययुः शीघैः स्त्रिय आदाय सर्वशः व्रजतस्तान्विदित्वा तु पौराः शोकाभिपीडिताः । गर्हयन्तोऽसकृद्भीष्मविदुरद्रोणगौतमान् ॥ १२ ॥ ऊचुर्विगतसंत्रासाः समागम्य परस्परम् पोरा ऊचुः–नेदमस्ति कुलं सर्व न वयं न च नो गृहाः तरह बनवास के दारुण दुःख सहे । आप यह सब पाण्डवों के बन जाने का समाचार सुनकर विस्तारपूर्वक कहिए । उन पराक्रमी पाण्डवों का नगर के रहने वाले लोग शोक से दुःखी हो गये। चरित्र सुनने के लिये मुझे बड़ा कौतूहल हो रहा वे सब मिलकर निर्भय होकर भीम, है।॥५॥८॥ कृपाचार्य आदि को चार-चार दोष देते हुए कहने वैशम्पायन जी ने कहा-हे राजा जनमेजय ! | लगे, कि दुष्ट दुर्योधन ने शकुनि की सम्मति और दुर्योधन और उसके मन्त्रियों से कुपित किये हुए कर्ण तथा दुःशासन की सहायता से राज्य के लोभ पाण्डव जुए में हारकर, अपने शस्त्र लिये हुए, द्रौपदी. में पड़कर, हम लोगों का सत्यानाश कर डारा । सहित हस्तिनापुर के बाहर निकलकर, उत्तर दिशा जिस देश का राज्य यह लोभी, अभिमानी, नीच की ओर चल दिये । इन्द्रसेन आदि चौदह सेवक । और निर्दयी दुर्योधन, जो गुरुजन से द्वेष रखनेवाला अपनी-अपनी स्त्रियों सहित रयों पर चढ़कर शीघ्र । और मुहृद और आचार विचार को त्यागनेवाला उनके पीछे-पीछे हो लिये ॥९॥१॥ है, शकुनि, कर्ण और दुःशासन आदि अपने पापी SwnPOHARIWODHIADMADUATELATITIVATIOETTEEccurrenTrurce -- Duram द्रोणाचार्य, १४३१ महा मारत अध्याय १३ idauraanimumaunmarrirmINITIATMILITITUTrmirenuumirroranmnmarg । - Front an ornTMINTI. UDITOTTIMO INDUCTIONTATTITTIGLIM. TUTTI! - यत्र दुर्योधनः पापः सौवलेयेन पालितः कर्णदुःशासनाभ्यां च राज्यमेतच्चिकीर्षति न तत्कुलंन चाऽऽचारो न धर्मोऽर्थः कुतः सुखम् । यत्र पापसहायोऽयं पापो राज्यं चिकीर्पति ॥ १५ ॥ दुर्योधनो गुरुद्वेषी त्यक्ताचार-सुहृजनः अर्थलुब्धोऽभिमानी च नीचः प्रकृतिनिघृणः ॥ १६ ॥ नेयमस्ति मही कृत्स्ना यत्र दुर्योधनो नृपः साधु गच्छामहे सर्वे यत्र गच्छन्ति पाण्डवाः ॥ १७ ॥ सानुकोशा महात्मानो विजितेन्द्रियशत्रवः हीमन्तः कीर्तिमन्तश्च धर्माचारपरायणाः वैशम्पायन व्याच-एवमुक्त्वाऽनुजग्मुस्ते पाण्डवांस्तान्समेत्य च । ऊचुः प्राञ्जलयः सर्वे तान्कुन्तीमाद्रिनन्दनान् ॥ १९ ॥ क गमिष्यथ भद्रं वस्त्यक्त्वाऽस्मान्दुःख भागिनः। वयमप्यनुयास्यामो यत्र यूयं गमिष्यथ ॥ २० ॥ अधर्मेण जिताञ्च्छत्वा युष्मांस्त्यक्तघृणैः परैः । उद्विग्नाः स्मो भृशं सर्वेनाऽस्मान्हातुमिहाऽर्हथ ॥ २१ ॥ भक्तानुरक्तान्सुहृदः सदा प्रियहिते रतान् कुराजाधिष्ठिते राज्ये न विनश्येम सर्वशः ॥ २२ ॥ साथियों से रक्षित होकर करना चाहता है। उस देश कल्याण हो । हम सब दुःखियाओं को छोड़कर में धर्म के नाश होने से हम लोगों को सुख क्योंकर आप लोग कहा जाते हैं। हम मय भी आप ही के मिल सकता है । यह कौरवों का कुल भी नष्ट होगा। साथ चलेंगे। हम रोग यह सुनकर, कि भापको इससे यह सब से अच्छा है, कि हम लोग भी इस निर्दयी शत्रुओं ने अधर्म से जीत लिया है, महादुःखी के राज्य को छोड़ कर उन पाण्डवों के साथ चले है। आप को हम लोगों को छोड़ना उचित नही चलें, जो दयावान् , उदार, शत्रु और इन्द्रियों को है। हम आपके बड़े ही भक्त और मलाई चाहने- जीतनेवाले, कीर्तिमान् और धर्मात्मा हैं ॥१२॥१८॥ वाले हैं। इसरिये आप हमें इस टहल, अधी, पैगम्पायन ने कहा-हे राजा जनमेजय ! इस ! पापबुद्धि, दुराचारी दुर्योधन के हाथ में न मौपिएगा। मकार सम्मनि करके सब पुरवामी पाण्डवों के पास जो आप ऐमा करेंगे, तो जई मूल से हमारा नाम पहुँचे और हाथ जोड़कर उनम कहने लगे-आपका हो जायगा । हे पाण्डयो ! अच्छी और बुरीमति POSTEMMITMICtromur.cD TELEGRITTEEEEEEETrrectronics D.aunalainamainar १४३२ म हा भारत [वनपर्व ranzrainrarunmumminenwarunmmmm UDAIALLLLLLLLLIDAL श्रूयतां चाऽभिधास्यामो गुणदोषान्नरर्षभाः! । शुभाशुभाधिवासेन संसर्गः कुरुते यथा वस्त्रमापस्तिलान्भूमिं गन्धो वासयते यथा पुष्पाणामधिवासेन तथा संसर्गजा गुणाः ॥ २४ ॥ मोहजालस्य योनिर्हि मूढेरेव समागमः अहन्यहनि धर्मस्य योनिः : साधुसमागमः तस्मात्प्राज्ञैश्च वृद्धैश्च शुद्धभावैस्तपस्विभिः सद्भिश्च सह संसर्गः कार्यः शमपरायणैः येषां त्रीण्यवदातानि विद्या योनिश्च कर्मच तान्सेवेत्तैः समास्या हि शास्त्रेभ्योऽपि गरीयसी ॥ २७॥ निरारम्भा ह्यपि वयं पुण्यशीलेषु साधुषु पुण्यमेवाऽऽप्नुयामेह पापं पापोपसेवनात् असतां दर्शनात्स्पर्शात्संजल्पाच सहासनात् धर्माचाराः प्रहीयन्ते सिध्यन्ति च न मानवाः ॥ २९ ॥ बुद्धिश्च हीयते पुंसां नीचैः सह समागमात् । मध्यमैमध्यतां याति श्रेष्ठतां याति चोत्तमैः अनीचैर्नाऽप्यविपये ऽधर्मिष्ठर्विशेषतः ॥३०॥ से ही मनुष्य की प्रकृति में गुण और दोए आ जाते उन्हीं की सेवा करनी चाहिए। शास्त्र का मनन न हैं ॥१९॥२३॥ करने पर भी उनके सा से ही तरह-तरह का ज्ञान प्राप्त क्योंकि जसे फलों की गन्ध अपने सन से पृथ्वी, किया जा सकता है। आप पुण्यात्मा है; आप लोगों जल और यत्रादि को गन्धित कर देती है, उसी का म्वभाव अत्यन्त पवित्र है। यदि हम रोग प्रकार से मनुष्य जैसी सगत में पैठता है, वैसे ही सर्वधा अच्छे काम न कर सकेंगे, तो भी आपके साथ उससे गुण हो जाते है। मूद पुरुष की सगत रहने से बहुत कुछ पुण्य कर लेंगे । किन्तु जो उस से मोह और साधु की मत से धर्म उत्पन्न होता अधर्मी पापी दुर्योधन की सेवा में लगे रहेंगे, तो हमें है॥२४॥२५॥ पाप में फंसना पड़ेगा। जिन्हें देखन, एने, बात इसलिये महात्माभो ! गुणी, मत्यवादी और करने और पाम बैठने से मी पाप होता है, उनकी धर्मामा रोगी के साथ रहना ही गति है, और सेवा करने से माल की आशा कहां है ! जैसे साल जिनके कर्म, कुन और शान तीनों अत्यन्त पवित्र है, में रहा जाता है,सीही उदि दृचि होती ह॥२६॥३०॥ Immmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmm maxARPAwardarnamadimaansaatramasi. P SRODHPUTIFUTTETTEROLUTrtCurroritercel:- unmunaummarUNuADITr, FAIRATIOmmarAmAITINutar अध्याय १] म हा भारत १४३३ 4.mithaSINITINCIENumkuminangwantinuinduminumanimuaman amarimmiarminine ये गुणाः कीर्तितां लोके धर्मकामार्थसंभवाः लोकाचारेषु संभूता वेदोक्ताः शिष्टसंमताः ॥ ३१ ॥ ते युप्मासु समस्ताश्च व्यस्ताश्चैवेह सद्गुणाः इच्छामो गुणवन्मध्ये वस्तुं श्रेयोऽभिकांक्षिणः ॥ ३२॥ युधिष्ठिर उवाच-धन्या वयं यदस्माकं स्नेहकारुण्ययन्त्रिताः असतोऽपि गुणानाहुाह्मणप्रमुखाः प्रजाः तदहं भ्रातृसहितः सर्वान्विज्ञापयामि वः नान्यथा तद्धि कर्तव्यमस्मस्लेहानुकम्पया ॥ ३४ ॥ भीष्मः पितामहो राजा विदुरो जननी च मे सुहृजनश्च प्रायो मे नगरे नागसाहये ते त्वस्मद्धितकामार्थं पालनीयाःप्रयत्नतः युष्माभिः सहिताः सर्वे शोकसंतापविह्वलाः ॥३६ ॥ निवर्तताऽऽगता दूरं समागमनशापिताः स्वजने न्यासभूते में कार्या स्नेहान्विता मतिः ॥ ३७ ॥ एतद्धि मम कार्याणां परमं हृदि संस्थितम् कृता तेन तु तुष्टिमें सत्कारश्च कृतो भवेत् ॥३८ ।। वैशम्पायन उवाच-तथाऽनुमन्त्रितास्तेन धर्मराजेन ताः प्रजाः गार में जो गुण धर्म-अर्थ काम से उत्पन्न, भीष्म पितामह, बुद्धिमान् विदुर, माता कुन्ती आचारों से नियन्त्रित और साधु मम्मत कहे गये है, और अन्य अनेक भाई-बन्धु हस्तिनापुर में विद्यमान वे सब सद्गुणं आप रोगों में है। इसलिये हम अपनी हैं । वे हमारे विरह से अधीर होकर बड़े कष्ट से, भन्नगई के लिये, आप के पास ही रहना चाहते हैं । प्राण धारण कर रहे हैं । आप रोग यदि मेरा प्रिय युधिष्ठिर ने कहा-हम धन्य है; क्योंकि ब्राह्मण कना चाहते हैं, तो ऐसा कीजिए, जिसमें वे अत्यन्त आदि हमारी प्रजा हम पर इतनी भक्ति, आदर शोकाकुल न हो। मै उनको आप रोगों के हाथ में और नेह रखती है कि वास्तव में जो गुण हममें माप जाना हूँ। आप रोग शीघ्र लौटकर उनकी नहीं है, उनको भी हममें बताती जोहो, में देवम्ब करें, इसी में मेग हित होगा ॥३५॥३८॥ आपसे जो प्रार्थना करता हूँ, उमे मुनिए, और मुझ वैशम्पायन ने कहा- राजा जनमेजय! युधिष्ठिर पर यह तथा कृपा करके किमी तरह उनके विरुद्ध के उक्त प्रकार से ममन्नाने पर मय पुग्थामा हा करने का निश्चय न कीजिएगा ॥३१॥३४॥ । राजन् ! ऐसा कहकर महादु.मी पाण्डयों में पूछकर Inn NRANNA.N.LTOTIT । । - १४३४ महा गारत [वनपर्व maninorrent nununun NTKAT IIM CXMIMIUIRMALTIVASTAVIATIMITADIIVINCOM Purnirmwarerarmirman चक्रुरार्तस्वरं घोरं हा राजनिति संहताः गुणान्पार्थस्य संस्मृत्य दुःखार्ताः परमातुराः अकामाः संन्यवर्तन्त समागम्याऽथ पाण्डवान् ॥ ४० ॥ निवृत्तेपु.तु परेषु रथानास्थाय पाण्डवाः आजग्मुर्जाहवीतीरे प्रमाणाख्यं महावटम् ते तं दिवसशेपेण वटं गत्वा तु पाण्डवाः ऊपुस्तां रजनीं वीराः संस्पृश्य सलिलं शुचि ॥ ४२ ॥ उदकनैव तां रात्रिमूपुस्ते दुःखकर्शिताः अनुजग्मुश्च तत्रैतान्नेहात्केचिद् द्विजातयः ॥ ४३ ॥ सानयोऽनग्नयश्चैव सशिष्यगणबान्धवाः स तैः परिवृतो राजा शुशुभे ब्रह्मवादिभिः ॥ ४४ ॥ तेषां प्रादुष्कृताग्नीनां मुहूर्ते रम्यदारुणे ब्रह्मघोषपुरस्कारः साल्पः समजायत ॥ ४५ ॥ राजानं तु कुरुश्रेष्ठं ते हंसमधुरस्वराः आश्वासयन्तो विप्राग्याःक्षपांसा व्यनोदयन् ।। ४६ ॥ इति श्रीमन्महाभारते वनपर्वणि आरण्यपर्वणि पौरप्रत्यागमने प्रथमोऽध्यायः ॥ १॥ अनिच्छा से युधिष्ठिर के गुणों को स्मरण करते हुए ब्राह्मण लोग अपनी स्त्री, भाई-बन्धु और शिष्यों- लौट आये | सब पुरवासियों के लौट जाने पर पाण्डव सहित पाण्डवों के पास चले आये। युधिष्ठिर उन लोग अपने-अपने रथों में सवार होकर, प्रमाण नाम लोगों के आने से अत्यन्त सुशोभित हो गये । एक बड़ के पेड़ के समीप, जो गंगा जी के किनारे और उन लोगों ने सन्ध्या के आने पर, उस रमणीक था, पहुँचे । और जब थोड़ा सा दिन रह गया, तव स्थान पर राक्षसों के फिरने की बेला में आमि प्रज्वलित उस वृक्ष के नीचे गंगा के पवित्र जल को स्पर्श की और श्रुतियों का प्रमाण दे-देकर अनेक संपादों फरके डेरा किया । उस दिन रात्रि में पाण्डवों ने से राजा को धैर्य दिया और आनन्दपूर्वक उस रात दु.ख के कारण से सिवा जल के कुछ आहार नहीं को व्यतीत किया ॥३९॥४६॥ किया । उसी समय यहां देह के कारण से कुछ यनपर्व का पहला अध्याय समाप्त हुभा ॥१॥ GOLFITOITOTTA JYRSTATSULAW WINDOTJADI - - mmmmmmmOUTODDDDDDDDIOmmmmmmmmmmmmmmmmc मे भरा हुआ होने के कारण से बड़ा दूपित है। भाप रोगों को वहां जाने से बड़ा देश होगा । D229.MOIMOJOHOIDDRUDDIDIO.DTD.muMTDOODHOOMDHIRAL.COM म हा मारत DIDID TO TurmammmmmmmunommummmmmmmmmmmmmmmmunETARATinmuTE अथ द्वितीयोऽध्याय || 0 | NIN W inpDTE प्रम दुखी होने से देवता भी दुखी होते अध्याय २) १४३५ साम्पायन उवाच-प्रभातायां तु शर्वया तेपामक्लिप्टकर्मणाम् वनं यियासतां विप्रास्तस्थुर्भिक्षाभुजोऽग्रतः ॥ १ ॥ तानुवाच ततो राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः वयं हि हृतसर्वस्वा हृतराज्या हृतश्रियः फलमूलामिपाहारा वनं गच्छाम दुःखिताः वनं च दोपवहुलं बहुव्यालसरीसृपम् परिक्लेशश्च वो मन्ये ध्रुवं तत्र भविष्यति ब्राह्मणानां परिक्लेशो दैवतान्यपि सादयेत् किं पुनर्मामितो विप्रा निवर्तध्वं यथेष्टतः वाक्षणा ऊचुः-गतिर्या भवतां राजंस्तां वयं गन्तुमुद्यताः नाऽर्हस्यस्मान्परित्यक्तुं भक्तान्सद्धर्मदर्शिनः ॥ ५ ॥ अनुकम्पां हि भक्तेषु देवता ह्यपि कुर्वते विशेषतो ब्राह्मणेषु सदाचाराऽवलम्बिपु युधिष्ठिर उवाच-ममापि परमा भक्तिर्ब्राह्मणेषु सदा द्विजाः सहायविपरिभ्रंशस्त्वयं सादयतीव माम् वैशम्पायन ने कहा-हे राजा जनमेजय ! जन । हैं, मैं तो मनुष्य हूँ, आपका प्लेश देखकर मुझसे पात कार हुआ और पाण्डव वन को चरने लगे, सहा न जायगा, इससे आप लौट जाइए ॥१४॥ तर ये सब ब्राह्मण, जो भिक्षा मोजन करनेवाले थे, यह सुनकर ब्राह्मणों ने कहा-हे महाराज ! पाण्डवों के आगे चरने को खड़े हो गये । उनको आप रोगों ने जिस गह में पाय रक्खा है, उसी देखकर धर्मराज ने उनसे कहा-हे ब्रह्मर्षियो ! आप रोग हमारे साथ कहा जायेगा हमराज्य और लोग धर्म मार्ग के दिखलानेयारे और आप रोगा सर्वस्व हर लिया गया है । इस समय के शुभचिन्तक है। हमें रटाने की चेष्टा करना हम पन को परे जा रहे हैं । वहा फल मूल खाकर आपको किमी प्रकार उचित नहीं । देवता भी हमें रहना पड़ेगा। वह वन, सर्प, कछुए आदिजावों अनुयायी व्यक्ति के ऊपर दया दिम्बराते हो विशेष कर प्रामण के ऊपर स्नेह और आदर का माव कीन नहीं रखता । इमरिये महारान त्याग आप पयों करेंगे॥५॥६॥ INTITIOTIMADIDIANITOntimum TOPATH दूसरा अध्याय ||२|| दमाग १४३६ महाभारत [ वनपर्व Dmmmmmmmmm.in.mmmmmmmmmmmmmmmmmmuniIODIA . ॥ IIIIIIIIraniaTED STOEartimro आहरेयुर्हि मे येऽपि फलमूलमृगांस्तथा त इमे शोकजैर्दुःखैर्धातरो मे विमोहिताः द्रौपद्या विप्रकण राज्यापहरणेन च दुःखार्दितानिमान्लेशैर्नाऽहं योक्तुमिहोत्सहे ब्राह्मणा ऊचु --अस्मत्पोपणजा चिन्ता मा भूत्ते हृदि पार्थिव ! । स्वयमाहृत्य चाऽन्नानि त्वाऽनुयास्यामहे वयम् ॥ १० ॥ अनुध्यानेन जप्येन विधास्यामः शिवं तव कथाभिश्चाभिरम्याभिः सह स्यामहे वयम् ॥ ११ ॥ युधिष्ठिर उवाच-एवमेतन्न संदेहो रमेऽहं सततं द्विजैः न्यूनभावानु पश्यामि प्रत्यादेशमिवाऽऽत्मनः ॥ १२ ॥ कथं द्रक्ष्यामि वः सर्वान्स्वयमाहृत्य भोजिनः । मद्भक्त्या क्लिश्यतोऽनएन्धिक्पापान्धृतराष्ट्रजान् ॥ १३ ॥ वैशम्पायन उवाच-इत्युक्त्वा स नृपः शोचन्निषसाद महीतले तमध्यात्मरतो विद्वाञ्च्छौनको नाम वै द्विजः । योगे सांख्ये च कुशलो राजानमिदमत्रवीत् शोकस्थानसहस्त्राणि भयस्थानशतानि च युधिष्ठिर ने कहा-मै भी ब्राह्मणों पर सच्ची उपाख्यान सुनाया करेंगे । यह सुनकर युधिष्ठिर ने भाक्ति और श्रद्धा रखता हूँ । परन्तु मै अब सहाय कहा, कि आप लोग सत्य कहते हैं, मै भी ब्राह्मणों हीन हूँ। क्योंकि मेरे ये भाई, जो फल-मूल लाते, सब का सत्संग चाहता हूँ। परन्तु मैं अपनी निर्धनता को शोक के मारे महादुःखी हो रहे हैं और मै उनको देखकर अपने को धिक्कार देता हूँ। भला यह कैसे राज्य के जाने और सभा में द्रौपदी के बाल खींचे हो सकता है, कि मेरे मेह के कारण से आप इतना जाने के महाक्लेश से पीड़ित होने के कारण, किसी क्लेश सहें और मेरे पाम रह कर अपने आप भोजन काम को करने की आज्ञा भी नहीं दे सकता लाकर खावें । आप इम कलश को सहने के योग्य नहीं हूँ ॥७९॥ हैं और न मुझसे आपका क्लेश देखा जायगा। हाय ! तब ब्राह्मणों ने कहा-आप हम लोगों के इन धृतराष्ट्र के पापी पुत्रों को धिक्कार है ।।१०।१३।। खाने-पीने की ओर से चिन्ता न कीजिए। हम लोग वैशम्पायन ने कहा-ई राजा जनमेजय! युधिष्ठिर आप भीख लाकर आपके साथ रहेंगे और आपके उक्त रीति से कहकर वहीं बैठ गये और शोक के कल्याण की चिन्ता में रहकर आपको सुन्दर-सुन्दर मारे व्याकुल हो गये। उस समय शौनक नाम ब्राह्मण, om.m..ravanistamina Rainismastarfun.cams.tammarwarram.criwarrantiersmaranews IMIMUM - T JUTUTO UDD'UIUIUD LUFTTILADILD'TUWIMALUDIDUNT UT MULUT १४३७ अध्याय २] म हा मारत TailyாTTTTTTரானாராராராராNIRAINEREr.. ECIOUMIDIOAMIDIOTICICIATULUOTALArora - Tantriarrrrrrrruinimum दिवसे दिवसे मूढमाविशन्ति न पण्डितम् न हि ज्ञानविरुद्धेषु बहुदोषेषु कर्मसु श्रेयोघातिषु सज्जन्ते वुद्धिमन्तो भवद्विधाः अष्टाङ्गां बुद्धिमाहुर्यां सर्वाश्रेयोऽभिघातिनीम् । श्रुतिस्मृतिसमायुक्तां राजन् ! सा त्वय्यवस्थिता ।। १७ ।। अर्थकृच्छ्रेषु दुर्गेषु व्यापत्सु स्वजनस्य च शारीरमानसैर्दुःखैन सीदन्ति भवद्विधाः श्रूयतां चाभिधास्यामि जनकेन यथा पुरा आत्मव्यवस्थानकरा गीताः श्लोका महात्मना ॥ १९ ॥ मनोदेहसमुत्थाभ्यां दुःखाभ्यामर्दितं जगत् तयोाससमासाभ्यां शमोपायमिमं शृणु ॥ २० ॥ व्याधेरनिष्टसंस्पर्शाच्छ्रमादिष्टविवर्जनात् दुःखं चतुर्भिः शारीरं कारणैः संप्रवर्तते ॥ २१ ॥ तदा तत्प्रतिकाराच्च सततं चाविचिन्तनात् जो ब्रह्मनानी योग और सांग्व्य शाम्रों का ज्ञाता था, न होना चाहिये । पहले समय में गजा जनक ने युधिष्ठिर से कहने लगा, कि संसार में मनुष्य को कुछ मन को धैर्य देनेवाले श्लोक कहकर रोगों के अनेक प्रकार के दुःख और भय प्राप्त होते हैं, परन्तु शारीरिक और मानसिक दुखों का जिम तरह वर्णन इनके कारण से दु ख उन्हीं को होता है जो मूढ़ किया है, और जिस उपाय से उनका प्रतिकार किया होने हैं। आप जैसे बुद्धिमान् को पेमे कामों को, जा सकता है, सो कहता है। एकाग्र होकर मुनिए कल्याण, ज्ञान और मोक्ष के विरुद्ध हैं और ॥१८॥२०॥ जिनमें बहुत से दोप हैं, करना उचित नहीं है । इम जगत् में सब मनुष्यों को दो प्रकार के क्योंकि आपको संयम, नियम, आसन, प्राणायाम, दुख होते हैं एक गारीरिक दूसरा मानसिक । इन अन्याहार, धारण, ध्यान और समाधि आदि आठों में मे शरीर सम्बन्धी दुम्ब के होने के चार कारण है अंगों सहित प्रमज्ञान प्राप्त है । जो अजान को दूर करने न्याधि१, इष्टवियोग२, श्रम ३ और दुष्ट का सयोग ४ याग युनिस्मृतियों के अनुसार सिद्ध है ॥१४॥१७॥ मो ये चारों ओपी आदि के सेवन में और मानमी इमलिये आप मे मनुष्यों को धन नाश दुम्म चिन्ता के छोड़ने मे जान रहते हैं। जो आदि पर पड़े दम्ब और अपना वजन को आपति विद्वान् और बुद्धिमान् मनुष्य होने में अपने रो देमरर शारीरिक और मानसी व्यथा मे दुःखी मन को रोक कर, मानमी दुःम की मनोहर कथाओं PLETETuesmastreemicaineeeerrerectorate जो ।

[वनपर्व . - கனரரFATIHIமாமனாரான randarmirernama.. १४३८ महा मारत mammmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmonamuramarurncorl आधिव्याधिप्रशमनं क्रिया-योगद्वयन तु ॥ २२ ॥ मतिमन्तो ह्यतो वैद्याः शमं प्रागेव कुर्वते मानसस्य प्रियाख्यानैः संभोगोपनयैर्नृणाम् मानसेन हि दुःखेन शरीरमुफ्तप्यते अयापिण्डेन तप्तेन कुम्भसंस्थमिवोदकम् मानसं शमयेत्तस्माज्ज्ञानेनाऽग्निमिवाऽम्बुना प्रशान्ते मानसे ह्यस्य शारीरमुपशाम्यति ॥ २५ ॥ मनसो दुःखमूलं तु स्नेह इत्युपलभ्यते 'स्नेहाच सज्जते जन्तुर्दुःखयोगमुपैति च ।। २६॥ स्नेहमूलानि दुःखानि स्नेहजानि भयानि च शोकहों तथाऽऽयासः सर्व स्नेहात्प्रवर्तते ॥ २७ ॥ स्नेहाद्भावोऽनुरागश्च प्रजज्ञे विषये तथा अश्रेयस्कावुभावेतौ पूर्वस्तत्र गुरुः स्मृतः ॥ २८॥ कोटराग्निर्यथाऽशेष समूलं पादपं दहेत् धर्मार्थो तु तथाल्पोऽपि रागदोपो विनाशयेत् ॥ २९ ॥ विप्रयोगे न तु त्यागी दोषदर्शी समागमे के सुनने और शरीर के दुःखों को अच्छे भोग भोगने , इन में भी भाव का हो जाना बड़ा भारी दोष है, से दूर कर देते हैं । बहुधा शरीर में कष्ट मानसी क्योंकि वह धर्म और अर्थ को इस प्रकार से नाश दुःख होने से ही होता है । जैसे जल के भरे हुए कर देता है, जैसे वृक्ष के कोटर में से लगी हुई घड़े में गरम लोहे का गोला डाल देने से सब जल अग्नि उस वृक्ष को जड़ पेड़ से जलाकर मस्म कर गरम हो जाता है ॥२१॥२४॥ देती है ॥२८॥२९॥ इससे मनुष्य को चाहिए कि ज्ञानरूपी जल विषय के न मिलने से भी सब कोई त्यागी से मानसी दुःखरूपी अमि को ठण्डा करके अपने स्वरूप होते हैं। परन्तु त्यागी वही है, जो विषय को शरीर के कप्ट को शान्त करे। इसके सिवा मेह पाकर वैर और विग्रह को छोड़, सब विषयों में अपने भी मानसी दुःख होने का कारण है और मय, मन को न फंसावे । इस कारण से धन और मित्र शोक,हर्प और नेश भी मेह ही से होते हैं ।।२५।२७॥ पाकर मनुष्य को उसमें स्नेह करना उचित नहीं है। विषय में स्नेह रखने मे भाव और अनुराग और जो स्नेह उत्पन्न मी हो, तो उसे शान से दूर प्रकट होते हैं,ये दोनों ही अकल्याणकारी है। परन्तु कर दे । जो मनुष्य कामी, शास्त्री और आत्मा को IDEOWWpmmmmmIDEnRAHUmmmmmmmuIRTHEWISATRAUTINCTERIEEEED - अपनदीजर और माणों का काररूसी रोग। मेर पोरनारे भीर मृत्यु क या दोहे हम तन्ना कोसम नदी कर सतह ॥३०॥३५॥ मनुष्यों की मन्या भय होता! भौर परोग १४३९ महा मारत अध्याय २) ParamaonmamimarnsarmmmmmmmmmmmmmmmmmIIMSTDAIrimurtime ॥ ३० ॥ - ARUIREDumenvayasxeCDHemann Munawxxxxporror errisexsx. विरागं भजते जन्तुनिर्वरो निरवग्रहः तस्मात्स्नेहं न लिप्सेत मित्रेभ्यो धनसंचयात् । स्वशरीरसमुत्थं च ज्ञानेन विनिवर्तयेत् ज्ञानान्वितेपु युक्तेषु शास्त्रज्ञेपु कृतात्मसु न तेषु सज्जते स्नेहः पद्मपत्रेष्विवोदकम् ॥ ३२ ॥ रागाभिभूतः पुरुषः कामेन परिकृप्यते इच्छा संजायते तस्य ततस्तृष्णा विवर्धते ॥ ३३ ॥ तृष्णा हि सर्वपापिष्ठा नित्योद्वेगकरी स्मृता अधर्मबहुला चैव घोरा पापानुवन्धिनी ॥ ३४ ॥ या दुस्त्यजा दुर्मतिभिर्या न जीर्यति जीर्यतः । योऽसौ प्राणान्तिको रोगस्तां तृष्णां त्यजतःसुखम् ३५ ॥ अनाद्यन्ता तु सा तृष्णा अन्तर्देहगता नृणाम् । विनाशयति भूतानि अयो निज इवानलः यथैधः स्वसमुत्थेन वहिना नाशमृच्छति तथाऽकृतात्मा लोभेन सहजेन विनश्यति राजतः सलिलादग्नेश्चोरतः स्वजनादपि भयमर्थवतां नित्यं मृत्योः प्राणभृतामिव ॥ ३८ ॥ यम में रसनेवाले होते हैं, उनके चित्त में म्नेह इस हे युधिष्ठिर ! मनुष्य को तृष्णा के होने दी मकार मे नही मुमता है, जैसे कमल के पत्तों में पानी से मुम्ब होता है और जो नहीं छोड़ते हैं, उनसे नहीं जाना है। जो मनुष्य विषयों में रिप्त होता है, उसे वह तृष्णा जिमका आदि और अन्त नहीं है, इम भनेक प्रकार की कामनाएं पर रेती है, उन कामनाओं प्रकार से नाश कर देती है, जैम त रोदन्ध अमि मेवा मिरने और न मिलनेवारी यस्तुओं की इच्छा मी रोदे का नाम कर स्वयं नए दो जाती। कान रगता है, और उस इच्छा से तृष्णा पढ़ती चली अथवा अमे काठजन्य आगि म्याधय पाठ को मम्म जाती है । इसलिये वह सृष्णा हा वेग, पाप और करदेनी है, उसी प्रकार मे मनाला धन में लोभ सी अशि के लगने में गरीर नाम नामा र मनुन्य उग तृष्णा को नहीं छोड़ सकते हैं। है। धनी मनुष्यों को गना, जन, अमित पार और म्पजनों में उसी प्रसार मय रसना मर AIR- 10230amaramarepreneurs १४३८ म हा भारत [ वनपर्व TIMADIOMETHORTATUTORIArenO1ODHARTIONAuumJDHAAR asian savadaNIRamrosa - EmmmmmmmmmmmmmmmmmunymirmannmummmmmmmmarorarrasTuurror.! आधिव्याधिप्रशमनं क्रिया-योगद्वयन तु ॥ २२ ॥ मतिमन्तो ह्यतो वैद्याः शमं प्रागेव कुर्वते मानसस्य प्रियाख्यानैः संभोगोपनयैर्नृणाम् मानसेन हि दुःखेन शरीरमुपतप्यते अयापिण्डेन तप्तेन कुम्भसंस्थमिवोदकम् ॥ २४ ॥ मानसं शमयेत्तस्माज्ज्ञानेनाऽग्निमिवाऽम्बुना प्रशान्ते मानसे ह्यस्य शारीरमुपशाम्यति ॥ २५ ॥ मनसो दुःखमूलं तु स्नेह इत्युपलभ्यते स्नेहाच सज्जते जन्तुर्दुःखयोगमुपैति च ॥ २६॥ स्नेहमूलानि दुःखानि स्नेहजानि भयानि च शोकहो तथाऽऽयासः सर्व स्नेहात्प्रवर्तते ॥ २७ ॥ स्नेहाद्भावोऽनुरागश्च प्रजज्ञे विषये तथा अश्रेयस्कावुभावेतौ पूर्वस्तत्र गुरुः स्मृतः ॥ २८॥ कोटराग्निर्यथाऽशेष समूलं पादपं दहेत् धर्मार्थो तु तथाल्पोऽपि रागदोपो विनाशयेत् ॥ २९ ॥ विप्रयोगे न तु त्यागी दोपदी समागमे के सुनने और शरीर के दुखों को अच्छे भोग भोगने इन में भी भाव का हो जाना बड़ा भारी दोष है, से दूर कर देते हैं । यहुधा शरीर में कष्ट मानसी । क्योंकि वह धर्म और अर्थ को इस प्रकार से नाश दुख होने से ही होता है । जैसे जल के भरे हुए कर देता है, जैसे घृक्ष के कोटर में से लगी हुई घड़े में गरम राहे का गोला डाल देने से सब जल अमि उस वृक्ष को जड़ पेड़ से जलाकर भस्म कर गरम हो जाता है ।।२१।२४॥ देती है ॥२८॥२९॥ इससे मनुष्य को चाहिए कि ज्ञानरूपी जल विषय के न मिलने से भी सब कोई त्यागी से मानसी दुःखरूपी अमि को ठण्डा करके अपने स्वरूप होते हैं। परन्तु त्यागी यही है, जो विषय को शरीर के कष्ट को शान्त करे। इसके सिवा सेह पार वैर और विग्रह को छोड़, सब विषयों में अपने भी मानसी दुख होने का कारण है और भय, मन को न फंसाये । इस कारण से धन और मित्र शोक,हर्ष और प्लेश भी मेह ही से होते हैं ।।२५।२७|| पाकर मनुष्य को उसमें म्नेह करना उचित नहीं है। विषय में स्नेह सम्पने मे भाव और अनुराग और जो स्नेह उत्पन्न भी हो, तो उसे शान से दूर प्रकट होते हैं,ये दोनों दी अकल्याणकारी है। परन्तु कर दे । जो मनुष्य ज्ञामी, शास्त्री और आत्मा को TWORDamWERHIRUPADDIMOTIPORMHDWWIDTIOmment ACCUDROMDMIDIDIOHDILUOTWDOTOSMOLTOLODVOTIOD. PINTERNATINITIATIMImmunommamannamrammORATImmanamancianmarmararananuary व - - 1. commmmmmmmunuTITIC - फिर कीचड़ को धोने से अच्छा है । इसस राजा अध्याय २ म हा भारत १४४१ त्यजेत संचयांस्तस्मात्तज्जान्क्लेशान्सहेत च । । न हि संचयवान्कश्चिद दृश्यते निरुपद्रवः अतश्च धार्मिकैः पुम्भिरनीहार्थः प्रशस्यते ॥ १७ ॥ धर्मार्थं यस्य वित्तहा वरं तस्य निरीहता प्रक्षालनाद्धि पङ्कस्य वरमस्पर्शनं नृणाम् युधिष्ठिरवं सर्वेषु न स्पृहां कर्तुमर्हसि धर्मेण यदि ते कार्य विमुक्तेच्छो भवाऽर्थतः ॥ १९ ॥ युधिष्ठिर उवाच-आत्मोपभोगलिप्सार्थ नेयमर्थेप्सुता मम भरणार्थं तु विप्राणां ब्रह्मन् ! काङ्कन लोभतः ॥ ५० ॥ कथं ह्यस्मद्विधो ब्रह्मन् ! वर्तमानो गृहाश्रमे भरणं पालनं चापि न कुर्यादनुयायिनाम् ॥ ५१ ॥ संविभागो हि भूतानां सर्वेषामेव दृश्यते तथैवाऽपचमानेभ्यः प्रदेयं गृहमेधिना ॥ ५२ ।। तृणानि भूमिरुदकं वाक्चतुर्थी च सूनृता सतामेतानि गेहेपु नोच्छिद्यन्ते कदाचन ॥ ५३॥ देयमार्तस्य शयनं स्थिनश्रान्तस्य चासनम् मित्रों के साथ रहना आदि सुखों को अनित्य जानकर, है। यदि आप धर्म करना चाहते है, तां धन की इच्छा उनके होने की इच्छा नहीं करते हैं । इससे मनुष्य को छोड़ दीजिये । यह सुनकर युधिष्ठिर ने कहा-हे को उचित है, कि धन को जोड़ना छोड़ दें, और ब्रह्मन् ! मैं स्वयं मुख से रहने के लिये धनोपार्जन उसके नाश होने के दु.ख को सहकर, संतोष करे, करना नहीं चाहता, मैं लोभवश होकर भी धन की क्योंकि कोई धन को रखनेवाला उपद्रवों मे खाली नहीं करता । मुझे तो ब्राह्मणों का पालन- नहीं है । मनुष्य उसी धन को श्रेष्ठ जानते हैं जो पापण करने को ही धन चाहिये ॥४८॥५०॥ विचार करके देखिये, हम गृहस्थी हैं । अनुगन जो मनुष्य धर्म के करने की इच्छा से धन ! व्यक्तियों को पालन पोपण किये बिना भला हम कमे चाहे, उसको ऐसी इच्छा न करना ही अच्छा है, रह सकते है। देखिये न, प्रायः सभी प्राणी मभी क्योंकि कीचड़ से दूर रहना, कीचड़ में फस कर को बांटकर भोजन करते हैं। जो रोग अपने रिये भोजन नहीं बना सकते, उन यती और प्रमचारियों को सुधिष्टिर ! आपको धन की इच्छा करना उचित नहीं भोजन कराना गृहस्थी का धर्म है । जो सत्पुरुष TEETAILESHeromenanREERupment । देवइच्छा में मिल जाव ॥४४॥४७॥ , १४४० म हा भारत - IIMIMILITATIRITRIRITULTUTTOTTOMORRITruoue TOTRIOTILATIOINTINE H COULDROTOIMMITALIRIDIODTAITIOTIVALINITY न यथा ह्यामिषमाकाशे पक्षिभिः श्वापदैर्भुवि । भक्ष्यते सलिले मत्स्यैस्तथा सर्वत्र वित्तवान् ॥ ३९ ॥ अर्थ एव हि केषां चिदनथं भजते नृणाम् अर्थश्रेयसि चाऽऽसक्तो न श्रेयो विन्दते नरः ॥ ४० ॥ तस्मादर्थागमाः सर्वे मनोमोहविवर्धनाः कार्पण्यं दर्पमानौ च भयमुद्वेग एव च ॥४१॥ अर्थजानि विदुः प्राज्ञा दुःखान्येतानि देहिनाम् । अर्थस्योत्पादने चैव पालने च तथा क्षये ॥ ४२ ॥ सहन्ति च महद् दुःखं नन्ति चैवार्थकारणात् । अर्था दुःखं परित्यक्तुं पालिताश्चैव शत्रवः ॥४३॥ दुःखेन चाधिगम्यन्ते तस्मान्नाशं न चिन्तयेत् । असन्तोषपरा मूढाः सन्तोपं यान्ति पण्डिताः ॥ ४४ ॥ अन्तो नास्ति पिपासायाः संतोपः परमं सुखम् । तस्मात्संतोपमेवेह परं पश्यन्ति पण्डिताः ॥ ४५ ॥ अनित्यं यौवनं रूपं जीवितं रत्नसंचयः ऐश्वर्यं प्रियसंवासो गृध्येत्तत्र न पण्डितः ॥ ४६॥ उनको इस प्रकार से निर्धन कर देते हैं, जैसे मास । रक्षा और नाश होने में दहधारियों को बड़ा दुख को आकाश में पक्षी, पृथ्वी पर कुत्ते और गीदड़ । होता है, क्योंकि प्रथम तो धन दुःख ही से इकट्टा और जल में मछलिया नहीं छोड़ती हैं ॥३६॥३९॥ । होता है, फिर इस पन के कारण से मनुष्य एक दूसरे यह अर्थ किमका अनर्थ नहीं करता है । इसके को मार डालता है और जिनको दुःख के दूर करने एकत्र करनेवाले का कल्याण कभी नहीं होता है। के लिये मनुष्य पालता है, वहीं धन के लोभ से उसके क्योंकि इसके आने से लोभ और मोह की वृद्धि ' वैरी हो जाते है ॥४०॥४३॥ होती है और मनुष्य सदैव कार्पण्य अर्थात् कृपणता इसमे धन के नाश होने पर अज्ञानी लोग से उचित धन को खर्च करके धन की रक्षा करने चिन्ता में डूबे रहते हैं, और पण्डित लोग सतोप की इच्छा से दूसरे का बुरा चेतना, अपने को पड़ा करते हैं । इस संसार में तृप्णा किसी की नहीं मानना और भय और शङ्का से चित्त का डावाडोल मिटती है; बढ़ती ही चली जाती है । इससे रहना आदि अनेक धन होने के दुःखों से दुखी पण्डित लोग संतोष ही को अच्छा कहते हैं । और रहता है । ज्ञानी रोग कहते हैं, कि धन के उत्पत्ति; योवन, रूप, जीविका, रतों का सञ्चय, ऐश्वर्य और METAHARIRECTREDITATIHARITIENTATAREETrenaTVETECTIITTERIEEEEEEEEEEE ------- ।

नादे, उसका ऐसी इच्छा न करना ही अच्छा है,
सिर कीचड़ को धोने से अच्छा है। इसम राजा
युधिष्ठिर ! आपको धन की इच्छा करना उचित नहीं
१४४१
। अध्याय २
म हा भारत
ARTIMITATIRITUREMummiammmmmmmranumanAmAmnancimumaramanaraxmmar
ZNDIMILADI
-- anmravatIten2012
.
---- mineranamparesh
त्यजेत संचयांस्तस्मात्तज्जान्क्लेशान्सहेत च
न हि संचयवान्कश्चिद दृश्यते निरुपद्रवः
अतश्च धार्मिकैः पुम्भिरनीहार्थः प्रशस्यते ॥ १७ ॥
धर्मार्थं यस्य वित्तहा वरं तस्य निरीहता
प्रक्षालनाद्धि पङ्कस्य वरमस्पर्शनं नृणाम् ॥४८॥
युधिष्ठिरेवं सर्वेषु न स्पृहां कर्तुमर्हसि
धर्मेण यदि ते कार्य विमुक्तेच्छो भवाऽर्थतः ॥ ४ ॥
युधिष्ठिर उवाच-आत्मोपभोगलिप्सार्थ नेयमर्थेप्सुता मम
भरणार्थं तु विप्राणां ब्रह्मन् !काङ्क्षन लोभतः ॥ ५० ॥
कथं ह्यस्मद्विधो ब्रह्मन् ! वर्तमानो गृहाश्रमे
भरणं पालनं चापि न कुर्यादनुयायिनाम्
संविभागो हि भूतानां सर्वेषामेव दृश्यते
तथैवाऽपचमानेभ्यः प्रदेयं गृहमेधिना
तृणानि भूमिरुदकं वाक्चतुर्थी च सूनृता
सतामेतानि गेहेषु नोच्छिद्यन्ते कदाचन
देयमार्तस्य शयनं स्थिनश्रान्तस्य चासनम्
मित्रों के साथ रहना आदि सुखों को अनित्य जानकर,
है। यदि आप धर्म करना चाहते हैं, तो धन की इच्छा
उनके होने की इच्छा नहीं करते है । इससे मनुष्य
को छोड़ दीजिये । यह सुनकर युधिष्ठिर ने कहा-हे.
को उचित है, कि धन को जोड़ना छोड़ दे, और
ब्रह्मन् ! मैं म्वय सुम्ब से रहने के लिये धनोपार्जन
उसके नाश होने के दु ख को सहकर, सतोप करे, ! करना नहीं चाहता, मैं लोभवश होकर भी धन की
क्योंकि कोई धन को रखनेवाला उपद्रवों मे स्वारी
इच्छा नहीं करता । मुझे तो ब्राह्मणों का पालन-
नहीं है । मनुष्य उसी धन को श्रेष्ठ जानत है जो
पापण करने को ही धन चाहिये ॥४८॥५०॥
विचार करके देखिये, हम गृहम्थी हैं । अनुगन
जो मनुष्य धर्म के करने की इच्छा से धन
व्यक्तियों को पालन पोषण किये बिना भग हम मे
रह सकते है। दम्बिये न, प्राय सभी प्राणी मभी
क्योंकि कीचड़ से दूर रहना, चिड़ में फस कर
को पाटकर भोजन करते हैं । जो रोग अपन रिये
भोजन नहीं यना सकते, उन यती और यमचारियों को
भोजन कराना गृहम्पी का धर्म है । जो सत्पुरुष
.
देवदच्छा मे मिल जाये ॥४४॥४७॥

१४४२ म हा मारत [ वनप. amin mmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmunremarati annimalandanirannirnama तृपितस्य च पानीयं क्षुधितस्य च भोजनम् ॥ ५४ ।। चक्षुर्दद्यान्मनो दद्याद्वाचं दद्यात्सुभाषिताम् उत्थाय चासनं दद्यादेव धर्मः सनातनः ॥ ५५ ॥ प्रत्युत्थायाऽभिगमनं कुर्यान्न्यायेन चार्चनम् । अग्निहोत्रमनड्वांश्च ज्ञातयोऽतिथिवान्धवाः ॥ ५६.।। पुत्रा दाराश्च भृत्याश्च निर्दहेयुरपूजिताः आत्मार्थ पाचयेन्नाऽन्नं न वृथा घातयेत्पशून् । न च तत्स्वयमश्नीयाद्विधिवद्यन्न निर्वपेत् ॥ ५७॥ श्वभ्यश्च श्वपचेभ्यश्च वयोभ्यश्चाऽऽवपेद् भुवि । वैश्वदेवं हि नामैतत्सायं प्रातश्च दीयते ॥ ५८ ॥ विघसाशी भवेत्तस्मान्नित्यं चाऽमृतभोजनः विघसो भुक्तशेपं तु यज्ञशेपं तथाऽमृतम् ॥ ५९ ॥ चक्षुर्दद्यान्मनो दद्याद्वाचं दद्याच्च सूनृताम् अनुव्रजेदुपासीत स यज्ञः पञ्चदक्षिणः ॥ ६० ॥ यो दद्यादपरिक्लिष्टमन्नमध्वनि वर्तते आन्तायाऽदृष्टपूर्वाय तस्य पुण्यफलं महत् एवं यो वर्तते वृत्तिं वर्तमानो गृहाश्रमे होते हैं, उनके यहां तृण (आसन) जल, स्थान और | देते हैं । केवल अपना ही उदर भरने के लिये मीठे वचनों की कभी कमी नहीं रहती ॥५१॥५३॥ ! भोजन न करना चाहिये । वृथा पशुओं की हिंसा गृहस्थी को रोगी के लिये शय्या, चलने से | करना किसी तरह ठीक नहीं। देव, पितर, मूत थके हुए के लिये आसन, प्यासे को पानी और और मनुष्यों के लिये जो अन्न नहीं दिया जाता भूखों को भोजन देना पड़ता है । नेत्र, मन, और उसको स्वयं न खाना चाहिये ॥५४॥५७|| मधुर वचन का प्रयोग करना, उठकर आमन देना, । सायंकाल और प्रातःकाल के समय कुते, दूसरे के उठते ही खड़े हो जाना, तथा अतिथियों चाण्डाल और पक्षियों के लिये पृथ्वी पर अन्न रस. की यथोचित सेवा करना गृहसियों का सनातन फर वैश्यदेव-यलि करना चाहिये । जो मनुष्य प्रतिदिन धर्म है । क्योंकि अमिदोत्री, स्थ के चैल, अतिथि, पितर, देवता और अतिथि को भोजन कराने के स्वजाती, भाई-बन्धु, पुत्र, सी और मृत्य आदि पश्चात् यज्ञ से वना भोजन करता है, वही मनुष्य यथायोग्य आदर-सत्कार न पाने पर मनुष्य को जला अगन भोजन करता है। इस यश में अतिथि को KaamYtARTrail । - ישיבישעיסי'פישטטמניפוטישטויבנפיטפטפטיטינטיסי का मन्तव्य क्या है। उसे प्रकाश कीजिये । यह मुनकर मानक ने कहा-हा। बड़े कष्ट की बात है, म हा मारत mmmwinmusmantr RAUTTAmms TITIWITANTS ANTIL ALOTA hd माना जाता है । हे द्विजश्रेष्ठ ! इस विषय में आप अध्याय २) १४४३ तस्य धर्म परं प्राहुः कथं वा विप्र! मन्यसे ॥६२ ॥ शौनक उवाच-अहो वत महत्कष्टं विपरीतमिदं जगत् येनाऽपत्रपते साधुरसाधुस्तेन तुष्यति शिश्नोदरकृतेऽप्राज्ञः करोति विघसं बहु मोहरागवशाकान्त इन्द्रियार्थवशानुगः ह्रियते बुध्यमानोऽपि नरो हारिभिरिन्द्रियैः विमूढसंज्ञो दुष्टाश्वैरुद्धान्तैरिव सारथिः पडिन्द्रियाणि विषयं समागच्छन्ति वै यदा तदा प्रादुर्भवत्येषां पूर्वसंकल्पजं मनः मनो यस्येन्द्रियस्येह विषयान्याति सेवितुम् । तस्यौत्सुक्यं सम्भवति प्रवृत्तिश्चोपजायते ॥ ६७॥ ततः संकल्पवीजेन कामेन विपयेपुभिः विद्धः पतति लोभाग्नी ज्योतिर्लोभात्पतङ्गवत् ॥ ६८ ।। ततो विहारैराहारमोहितश्च यथेप्सया महामोहे सुखे मग्नो नाऽऽत्मानमवबुध्यते . ॥ ६९ ॥ एवं पतति संसारे तासु तास्विह योनिपु सहमरी दृष्टि से देखना, मन की प्रसन्नता से और । इस जगत् में सब उलटा ही देख पड़ना ।देखिए मीठी वाणी से प्रसन्न करना, अतिथि के पीछे भले मनुष्य जिस कार्य से लज्जित होते हैं, दुष्ट जाना, अन्न आदि से अतिथि की सेवा करना यह मनुष्य उसी से प्रसन्न होते हैं। अज्ञानी मनुष्य पाच प्रकार की दक्षिणा देनी चाहिये ॥५८०६०॥ इन्द्रिय और पेट के कारण मे वैश्वदेवकर्म बहुत जो गृहस्थी राह चलते हुए, थके हुए, अपरिचित करता, परन्तु मोह, राग और ऐश्वर्य की इच्छा अतिधि को उदारता के साथ भोजन देता है, उसे में फंसा रहकर इन्द्रियों के विषयों में लिप्त रहता महापुण्य मिलता है । पण्डित लोग कहते हैं, कि है । और वह इन्द्रिया ज्ञानी को भी इस प्रकार से जो रोग गृहस्थाश्रम में रहकर, इस प्रकार से आचार इधर-उधर डावाडोल करती रहती हैं, जमे जिस रथ का पालन करते हैं, उन्हीं का धर्म (आचार) श्रेष्ठ के.पीड़े दुष्ट और चञ्चल होते हैं, उसके सारथी को घोड़े विपरीत-मार्ग में ले जाते हैं ॥६१॥६५॥ हे गजा युधिष्ठिर ! जब इन्द्रियां विषय की चाहना करती है, तय रस चाहना से मन में विषय mmmmmmmmmmmmmmmmmmmmm. .. 1 rrucoria . reOOGHCLETTTTEmrrINER DILHAPUR MITMLCMDUCTION AMAVDIDIOAANAADILATION । १४४४ म हा भारत वनपर्व ENiraimarimmmmmunommamirmirmawrimurrrrrnmummmmmmmmamruarunarar अविद्याकर्मतृष्णाभिमा॑म्यमाणोऽथ चक्रवत् ॥ ७० ॥ ब्रह्मादिपु तृणान्तेषु भूतेषु परिवर्तते जले भुवि तथाऽऽकाशे जायमानः पुनः पुनः ॥ ७१ ।। अवुधानां गतिस्त्वेषा बुधानामपि मे शृणु ये धर्मे श्रेयसि रता विमोक्षग्तयो जनाः ।। ७२ ॥ तदिदं वेदवचनं कुरु कर्म त्यजेति च तस्माद्धर्मानिमान्सर्वान्नाऽभिमानात्समाचरेत् ॥ ७३ ।। इज्याध्ययनदानानि तपः सत्यं क्षमा दमः अलोभ इति मार्गोऽयं धर्मस्याऽष्टविधः स्मृतः॥ ७४ ॥ तत्र पूर्वश्चतुर्वर्गः पितृयाणपथे स्थितः कर्तव्यमिति यत्कार्यं नाऽभिमानात्समाचरेत् ॥ ७५ ॥ उत्तरो देवयानस्तु सद्भिराचरितः सदा अष्टाङ्गेनैव मार्गेण विशुद्धात्मा समाचरेत् भोगने की इच्छा हो जाती हैं । उस इच्छा से अज्ञानियों की गति बताई है। अब हम आपको फिर उस विषय के मिलने का उपाय मनुष्य करने उन ज्ञानियों की भी गति बतलाते है, जो नित्य लगता है और फिर उन विषयों में प्रवृत्त होकर मोक्ष चाहा करते है और जिनकी प्रीति भी मोक्षधर्म लिप्त हो जाता है । इसके पीछे मनुष्य विषयरूपी में ही लगी रहती है ॥६९/७२॥ कामदेव के वाणों से वेधित होकर, इस प्रकार से देखिये, वेद का यह वाक्य है, कि जो फर्म लोभ में पड़ जाता है, जैसे दीपक की ज्योति में पतगा करो सो निष्काम होकर करो। इसी कारण से मनुष्य उजाले के लोभ से आकर गिर पड़ता है॥६६।६८|| को चाहिये कि जो कार्य करे, उसके करने का अन्त में यह होता है कि वह मनुष्य फिर अभिमान कभी न करे । यज्ञ करना, वेद पढ़ना, केवल अच्छ। खाने-पीने और अच्छा विहार करने दान करना, तप करना, सत्य बोलना, क्षमा करना, के उद्यम में लगे रहकर, मोह के मुख में पड़ा हुआ इन्द्रियों को जीतना और लोभ न करना, ये आठ आत्मा को नहीं पहनान सकता है, और अविद्या धर्म के मार्ग हैं । इनमें से यज्ञ करना, वेद पदना, अर्थात् अज्ञान के कारण से ब्रह्मा से लेकर तृण दान करना, तप करना, ये पहले चार पितृ लोक मादि तक पृथ्वी, आकाश और जल की अनेक- जाने के उपाय है। सत्य पालना, क्षमा करना, अनेक योनियों में जन्म ले-लेकर चक्र के समान इन्द्रियों को जीतना और लोम न करना, ये पिडले पूमा करता है । हे महाराज युधिष्ठिर ! हमने यह चार देवलोक के देनेवाले हैं। मनुष्य को उचित awareneurmurresumeermaneurimeHTANDEDIENTreateries manasamunaimmimanslation .

- aasamatamarendan.aitanaamaansar DILOmnition अध्याय २] म हा मारत १४४५ PrimarTUAnantum NOTIII IITTyurumantraTARITAmruitmuraramwwe.niturer सम्यक्संकल्पसंवन्धात्सम्यगिन्द्रियनिग्रहात् सम्यव्रतविशेपाच्च सम्यक्च गुरुसेवनात् सम्यगाहारयोगाच्च सम्यक्चाऽध्ययनागमात् सम्यकर्मोपसंन्यासात्सम्यश्चित्तनिरोधनात् ॥ ७८ ।। एवं कर्माणि कुर्वन्ति संसारविजिगीपवः रागद्वेषविनिर्मुक्ता ऐश्वर्य देवता गताः ॥ ७९ ॥ रुद्राः.साध्यास्तथाऽऽदित्या वसवोऽथ तथाऽश्विनी योगैश्वर्येण संयुक्ता धारयन्ति प्रजा इमाः ॥ ८० ॥ तथा त्वमपि कौन्तय! शममास्थाय पुष्कलम् । तपसा सिद्धिमन्विच्छ योगसिद्धिं च भारत ॥८१ ॥ पितृमातृमयी सिद्धिः प्राप्ता कर्ममयी च ते तपसा सिद्धिमन्विच्छ द्विजानां भरणाय वै ॥ ८२ ॥ सिद्धा हि यद्यदिच्छन्ति कुर्वते तदनुग्रहात् तस्मात्तपः समास्थाय कुरुष्वाऽऽत्ममनोरथम् ॥ ८३ ।। इति श्रीमन्महाभारते वनपर्वणि आरण्यकपर्वगि पाण्डयानां प्रव्रजनं नाम द्वितीये ऽध्यायः ॥ २॥ है कि इन कर्मों को अभिमान से न करे । इन आठौं । यसु और दोनों अश्विनीकुमार. य मय देवता निर्दिष्ट धर्म के मागों पर वही मनुष्य चलते हैं, जिनकी : योगसाधन के द्वारा ही मार्ग प्रज्ञा का पालन कर रहे आत्मा शुद्ध होती है ॥७३।७६॥ हैं |७७८०॥ और जो मनुष्य इस संसार को जीतना चाहत हे महाराज युधिष्ठिर ! इसी प्रकार से आपको है, वे ये कर्म करते हैं प्रत्येक कार्य को संकल्प भी समता धारण करके तपस्या करके अपने काम इन्द्रियों को रोकना, विधिपूर्वक व्रत की मिद्धि करना उचित है । आप अपने कर्मों में करना, हिंसा को त्यागना, गुरु की मेवा करना, पितृ लोक को तो जीत हो चुके है । अब तपम्या वेद पदना, किंय करके ब्राह्मणों के पालने के लिये सिद्धि प्राप्त कीजिए। हुए. कमों के फल को त्यागना और चित्त को दखिये, मिद्ध लोग जो चाहते हैं, यही तपम्या करके चलायमान न होने देना । देखिये, देवनाओं को लेते है। उसी प्रकार से आप भी नाम्या करके भी राग और द्वेष के छोड़न ही से ऐश्वर्य प्राप्त हुआ, अपने मनोरथ को सिद्ध कीजिए. ॥८१८३॥ है। और साध्यगण, ग्यारह रुद्र, यारह आदित्य, आठ पनपर्य का दूसरा अध्याय ममाम हुआ ॥२॥ काक करना, अच्छी तरह से आहार करना, 1 --.mmmc101000539rrrrmudrap १४४६ म हा मारत [ वनपर्व HEIRananminimalinmunicurramananmiauranamurarriTunerimurarurindinrararunnruire अथ तृतीयोऽध्यायः॥ ३ ॥ AMTADIMIRATIONALITY - वैशम्पायन उवाच-शौनकेनैवमुक्तस्तु कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः पुरोहितमुपागम्य भ्रातृमध्येऽब्रवीदिदम् युधिष्ठिर उवाच-प्रस्थितं माऽनुयान्तीमे ब्राह्मणा वेदपारगाः न चाऽस्मि पोपणे शक्तो बहुदुःखसमन्वितः ॥ २ ॥ परित्यक्तुं न शक्तोऽस्मि दानशक्तिश्च नास्ति मे । कथमत्र मया कार्यं भगवांस्तद्ब्रवीतु मे वैशम्पायन उवाच-मुहूर्तमिव स ध्यात्वा धर्मेणाऽन्विष्य तां गतिम् । युधिष्ठिरमुवाचेदं धौम्यो धर्मभृतां वरः धौम्य उवाच-पुरा सृष्टानि भूतानि पीडयन्ते क्षुधया भृशम् । ततोऽनुकम्पया तेषां सविता स्वपिता यथा गत्त्वोत्तरायणं तेजो रसानुद्धृत्य रश्मिभिः दक्षिणायनमावृत्तो महीं निविशते रविः क्षेत्रभूते ततस्तस्मिन्नोपधीरोषधीपतिः दिवस्तेजः समुद्धृत्य जनयामास वारिणा निपिक्तश्चन्द्रतेजोभिः स्वयोनी निर्गते रविः sorrian.amaz.comamrataxx.मा.NIHITS : - तीसरा अध्याय ॥ ३॥ . धैशम्पायन ने कहा-ई राजा जनमेजय ! शौनक सुनकर धौम्य ऋषि ने एक मुहूर्त भर तो ध्यान किया ऋापि के उक्त उपदेश को सुनकर युधिष्ठिर ने अपने | उपरान्त धर्म की गति को याद करके कहने लगे-- छोटे भाइयों के सामने धौम्य पुरोहित से कहा-हे । हे युधिष्ठिर ! पहले समय में जब सब जीव उत्पन्न महाराज ! वेद-वेदार के पूरे पण्डित ये ब्राह्मण हुए थे, तब भूख से बहुत ही व्याकुल हुए । यह किमी तरह नहीं मानते । इन्हेंोंने मेरे साथ चलने ' देखकर सब प्राणियों को उसन्न करनेवाले सूर्यनारायण का निश्चय कर लिया है। मेरे पास धन भी नहीं ने, दया के मारे उत्तरायण होकर, किरणों के द्वारा है, जो में इनका भरण-पोषण कर म.' परन्तु इन्हें । तेज और रस को निकाला, फिर वे दक्षिणायन दोकर छोड़ने की भी मुझे इच्छा नहीं है । अब मुझे क्या । पृथ्वी पर अवतीर्ण हुए ॥१६॥ करना चाहिये ! में इस बारे में आपका उपदेश सूर्य जब क्षेत्र बने तर चन्द्रमाने आकाश से तेज सुनना चाहता हूँ ॥१॥३॥ निकालकर जल के द्वारा उस क्षेत्र में ओषधियों को वैशम्पायन ने कहा-हे राजा जनमेजय ! यह । उत्पन्न किया। उन औषधियों के अंकुर उत्पन्न हो जाने । - IMARITHLESTATISTICE rndiAIITET.INEELAne mumtarius mmmummnare DINATOMODI .. अपनी प्रजा के दुःखों को दूर किया था । इसलिये त्वष्टा, पूपा, अर्क. मविता, रवि. गमास्तिमान, अध्याय ३] म हा भारत १४४७ ओषध्यः पडूसा मेध्यास्तदन्नं प्राणिनां भुवि ॥ ८ ॥ एवं भानुमयं ह्यन्नं भूतानां प्राणधारणम् पितैप सर्वभूतानां तस्मात्तं शरणं व्रज राजानो हि महात्मानो योनिकर्मविशोधिताः । उद्धरन्ति प्रजाः सर्वास्तप आस्थाय पुष्कलम् ॥ १० ॥ भीमेन कार्तवीर्येण वैन्येन नहुपेण च तपोयोगसमाधिस्थैरुदधृता ह्यापदः प्रजाः तथा त्वमपि धर्मात्मन् ! कर्मणा च विशोधितः । तप आस्थाय धर्मेण द्विजातीन्भर भारत ! जनमेजय उवाच-कथं कुरूणामृपभः स तु राजा युधिष्ठिरः विप्रार्थमाराधितवान्सूर्यमद्भुतदर्शनम् ।। १३ ॥ वैशम्पायन उवाच-शृणुष्वाऽवहितो राजञ्च्छुचिर्भूत्वा समाहितः । क्षणं च कुरु राजेन्द्र ! संप्रवक्ष्याम्यशेपतः ॥ ११ ॥ धौम्येन तु यथापूर्व पार्थाय सुमहात्मने ! नामाष्टशतमाख्यातं तच्छृणुष्व महामते ॥ १५ ॥ -सूर्योऽर्यमा भगस्त्वष्टा पूपाऽर्कः सविता रविः । गभस्तिमानजः कालो मृत्युर्धाता प्रभाकरः ॥ १६ ॥ पर सूर्य उनमें पग्म उत्पन्न कर देते है और उन्हीं इतनी कथा सुनकर राजा जनमेजय ने पूछा- में यह प्राणियों का आधार अन्न उत्पन्न हो जाता है। । हे वैशम्पायन जी ! उन ब्राह्मणों के लिये गजा इससे सम्पूर्ण अन्न सूर्यरूप है। सूर्य ही सब का पिता, युधिष्ठिर ने सूर्य का आराधन किम प्रकार से किया ! अर्थात् पालनकर्ता है । इसलिये हे युधिष्ठिर ! तुम सूर्य वैशम्पायन ने कहा-हे राजा जनमेजय ! मैं सब कथा है। की शरण लो॥७९॥ महात्मा राजा लोगों का यही । कहता हूँ। तुम पवित्र और सावधान होकर सुनो। धर्मदे, तप करके और अपनी आत्मा को शुद्ध करके महात्मा धीम्य ने युधिष्ठिर को, जो सूर्य के एकमा आठ मजा का पालन करते हैं । देखो, गजा भीम, कार्तवीर्य नाम बताये थे, वे तुममे कहता हूँ ॥१३॥१५॥ । अर्जुन, पैन्य और नहुप आदि ने तपस्या करके ही धान्य पुरोहित ने कहा-सूर्य, अपर्मा, मग. हे युधिष्ठिर ! तुम भी शुद्धामा होकर धर्म करो और , अज, काल, मृत्यू, धाता, प्रमाकर, पृथ्वी, जल प्राममों का पालन करो ॥१०॥१२॥ तंज, आकाश, वायु, मोम, पृहस्पति, शुक्र, पुष, VEEDueturn धाम्य उवाच- 1 LEDITrrer.cnki AmmOOD0OHTOT PEDDHADOTOml १४४८ महा भारत विनपर्व .mirmanian.mmmmmmmmmmmmmmmIITONImmmmmmmmmurvernmmmmrammarrianarary awimmaamstramaranamaraarior GlimIRALEmaintent ॥ २० ॥ पृथिव्यापश्च तेजश्च खं वायुश्च परायणम् सोमो बृहस्पतिः शुक्रो बुधोऽङ्गारक एव च इन्द्रो विवस्वान्दीप्तांशुः शुचिः शौरिः शनैश्चरः। ब्रह्मा विष्णुश्च रुद्रश्च स्कन्दो वैश्रवणो यमः वैद्युतो जाठरश्चाग्निरैन्धनस्तेजसां पतिः धर्मध्वजो वेदकर्ता वेदाङ्गो वेदवाहनः कृतं त्रेता द्वापरश्च कलिः सर्वमलाश्रयः कला काष्ठा मुहूर्ताश्च क्षपा यामस्तथा क्षणः संवत्सरकरोऽश्वत्थः कालचको विभावसुः पुरुषः शाश्वतो योगी व्यक्ताव्यक्तः सनातनः ॥ २१ ॥ कालाध्यक्षः प्रजाध्यक्षो विश्वकर्मा तमोनुदः । वरुणः सागरोंऽशश्च जीमूतो जीवनोऽरिहा ॥ २२ ॥ भूताश्रयो भूतपतिः सर्वलोकनमस्कृतः स्रष्टा संवर्तको वह्निः सर्वस्याऽऽदिरलोलुपः अनन्तः कपिलो भानुः कामदः सर्वतोमुखः । शयो विशालो वरदः सर्वधातुनिपेचिता मनः सुपर्णो भूतादिः शीघ्रगः प्राणधारकः अङ्गारक, इन्द्र, विवस्वान्, दीप्तांशु, शुचि,शौरि, सर्वतोमुस, शय, विशाल, वरद, मन, सुपर्ण, शनैश्वर, ग्रह्मा, विष्णु, रुद्र, स्कन्द वैश्रवण, यम. भूतादि. शीघ्रग, धन्वन्तरि, धूमकेतु, आदिदेव, बंधुतामि,जठराग्नि,ऐन्धनाग्नि,तेजपति,धर्मध्वज, अदितिसुत, द्वादशात्मा, अरविन्दाक्ष, पिता, वेदका, वेदाङ्ग, वंदवाहन, सत्ययुग, त्रेता, माता, पितामह, स्वर्गद्वार, प्रजाद्वार, मोक्षद्वार द्वापर, कलियुग, कला, काष्ठा, मुहूर्त, क्षपा, त्रिविष्टप, देहकर्ता, प्रशान्तात्मा, विश्वात्मा, याम, क्षण, मवत्सरकर, अश्वत्थ, कालचक्र, विश्वतोमुख,चराचरात्मा, सूक्ष्मात्मा और मैत्रेय, विभावसु, व्यक्ताव्यक्त पुरुष, शाश्वतयोगी, ये सूर्य के एक सौ आठ नाम म्वयंम् ब्रह्मा ने कहे कालाध्यक्ष, प्रजाध्यक्ष, विश्वकर्मा, तमोनुद, है । हम यक्ष, पिता, देवता और दानयों के द्वारा वरुण, सागर, अंश, जीमृत, जीवन, अरिहा, सेवित और सुवर्ण तथा अशि के समान तेजस्वी भृतात्रय, भूतपति, स्रष्टा, संवत्तक, यति, सूर्यदेव को, माल के लिये चार यार प्रणाम करते सर्यादि, अलोलुप, अनन्त, कपिल, मानु,कामद, हैं। जो कोई मूर्योदय के समय शुद्ध चिस से acrmerrEPARATHAPTERMEDmmmmmHDHISTMIDADIMMIDDMRATED Anatantammananmitraramisar.new.maratiARRITER - .. - . COTM'LCLCLCLCL17 แกน y น

4TIONumnirrorrrrrrrnuTIRITAararaurCCTIANITarrariuTITALITLODI
immunitaminimunmanuT
।
वैशम्पायन ने कहा-हे राजा जनमेजय ! धौम्य करने लगे ॥३२॥३४॥
अध्याय ३]
महाभारत
१४४९
TONEIMITALITrmirrrmmmmmmmuterromrurmurrammarrmirmal
धन्वन्तरिधूमकेतुरादिदेवोऽदितेः सुतः
द्वादशात्माऽरविन्दाक्षः पिता माता पितामहः ।
स्वर्गद्वारं प्रजाद्वारं मोक्षद्वारं त्रिविष्टपम्
देहकर्ता प्रशान्तात्मा विश्वात्मा विश्वतोमुखः ।
चराचरात्मा सूक्ष्मात्मा मैत्रेयः करुणान्वितः ॥ २७ ॥
एतद्वै कीर्तनीयस्य सूर्यस्याऽमिततेजसः
नामाष्टशतकं चेदं प्रोक्तमेतत्स्वयं भुवा ॥ २८ ॥
सुरगणपितृयक्षसेवितं ह्यसुरनिशाचरसिद्धवन्दितम्
वरकनकहुताशनप्रभं प्रणिपतितोऽस्मि हिताय भास्करम् ॥ २९ ॥
सूर्योदये यः सुसमाहितः पठेत्स पुत्रदारान्धनरत्नसञ्चयान्
लभेत जातिस्मरतां नरःसदा धृतिंच मेधां च स विन्दते पुमान् ॥ ३० ॥
इमं स्तवं देववरस्य मानवः प्रकीर्तयेच्छुचिसुमनाः समाहितः ।
विमुच्यते शोकदवाग्निसागराल्लभेत कामान्मनसा यथेप्सितान ॥ ३१ ॥
वैशम्पायन उमाप-एवमुक्तस्तु धौम्येन तत्कालसदृशं वचः
विप्रत्यागसमाधिस्थः संयतात्मा दृढव्रतः
॥ ३२ ॥
धर्मराजो विशुद्धात्मा तप आतिष्ठदुत्तमम्
पुप्पोपहारैर्वलिभिरर्चयित्वा दिवाकरम् ॥ ३३ ॥
सोऽवगाह्य जलं राजा देवस्याभिमुखोऽभवत् ।
योगमास्थाय धर्मात्मा वायुभक्षो जितेन्द्रियः ॥ ३४ ॥
इन एक सौ आठ नामों का पाठ करता है वह पुत्र
ऋपि से इस स्तोत्र को सुनकर राजा युधिष्ठिर ने
नी, धन-रन, धृति और मेधा पाता है । उसे दूमरे
ब्राह्मणों का पालन करने के लिये सावधानी से आत्मा
जन्म में पूर्व-जन्म का ज्ञान बना रहता है । एकाग्र
को शुद्ध और व्रत में दृढ़ता करके, विधिपूर्वक पुण्य
मन से देवाधिदेव दिवाकर के इस स्तोत्र का पाठ ।
और बलि आदि से सूर्य की पूजा की। उपरान्त
करने से मनुष्य का गोक (दावानल) रूप भवसागर गगा जी के जल में भीतर जाकर सूर्य के सम्मुख
छुटकारा हो जाता है, जिम से उसका मनोरथ खड़े हो गये और योग की रीति से आचमन प्राणायाम
करके जितेन्द्रिय और वायुभक्षी होकर सूर्य की तपस्या
LCRUILLLLLLLLLLLLLLLLLLun
---.mri2142TION
से
सिद्ध होता है ॥१६॥३१॥

१४५० म हा भारत [ वनपर्व CULODrammarATTIArunuTITUITITIOUTUITIO Turmannnnupamarimmunmar, आगा. amaruaaTINDI.T.TT.GAnmun.JIHEmiraamannaram.aur.mms v.india.08amaivnrTRAJaa.nasa......... गाङ्गेयं वायुपस्पृश्य प्राणायामेन तस्थिवान् शुचिः प्रयतवाग्भूत्वा स्तोत्रमारब्धवांस्ततः ॥ ३५ ॥ युधिष्ठिर उवाच-त्वं भानो ! जगतश्चक्षुस्त्वमात्मा सर्वदेहिनाम् । खं योनिः सर्वभूतानां त्वमाचारः क्रियावताम् ॥ ३६ ॥ त्वं गतिः सर्वसाळयानां योगिनां त्वं परायणम् ।। अनावृतार्गलद्वारं त्वं गतिस्त्वं मुमुक्षताम् ॥ ३७॥ त्वया संधार्यते लोकस्त्वया लोकः प्रकाश्यते । त्वया पवित्रीक्रियते निर्व्याज पाल्यते त्वया ॥ ३८ ॥ त्वामुपस्थाय काले तु ब्राह्मणा वेदपारगाः स्वशाखाविहितैर्मन्त्रैरर्चन्त्यषिगणाऽर्चितम् तव दिव्यं रथं यान्तमनुयान्ति वरार्थिनः सिद्धचारणगन्धर्वा यक्षगुह्यकपन्नगाः ॥ १० ॥ त्रयस्त्रिंशच्च वै देवास्तथा वैमानिका गणाः सोपेन्द्राः समहेन्द्राश्च त्वामिष्ट्वा सिदिमागताः ॥ ११ ॥ उपयान्त्यर्चयित्वा तु त्वां वै प्राप्तमनोरथाः दिव्यमन्दारमालाभिस्तूर्णं विद्याधरोत्तमाः ॥ ४२ ॥ गुह्याः पितृगणाः सप्त ये दिव्या ये च मानुपाः । पहले तो उन्होंने उक्त स्तोत्र का जप किया, करते हैं, जो आपसे वर पान की चाहना करते हैं, ये उपरान्त सूर्य की स्तुति करने लगे। हे सूर्यदेव ! जिधर-जिधर आकाश में आपका रथ जाता है, उधर तुम जगत् की आत्मा और नेत्र हो । मब जगत् ही उधर फिर-फिर कर आप के पीछे रहते हैं। आपा आपी से उत्पन्न है । आप सब जीवों के कर्मों के ही पूजन करके सिद्ध, चारण, गन्धर्व, यक्ष, गुधक जाननेवाले हैं । आप ही सब जानी, योगी और और पन्नगगण, तैतीस देवता, विमानवासी देवगण, मोक्ष चाहनवालों की गति और परायण हैं, और इन्द्र और महाइन्द्र ने सिद्धि पाई है ॥३९॥४१॥ ऐम द्वार हैं, जिनके बंद करने को कोई कुजी नहीं विद्याधर लोग मन्दार पर्वत के फूलों से आर । इन मप रोकों को आप ही धारण, प्रकाशित, की पूजा करके अपन मनोरथ को पात हैं । गुपक, पवित्र और पालन करते हैं ॥३५॥३८॥ दिव्य और मानुष, सान पितृगण, वमु, मस्त, रदः महाराज! वंदपाठीमााण और ऋपिरोग मार साध्यगण और किरणें पीनेवाले यार सिल्प भावि सिद्धी पूजन समय पर अपनी-अपनी शाम्बा के मंत्रों मे किया ने आप काही आराधना करके संसार में प्रधानता HeartneraRANTHALIDITIENTTETDreercirECTErrrrrrracrorernancer । sam.G.Sc.mm... -

DOMDODIMOMOTOIMMIDDLOOMDOIOIDADOTIDILADIMDITOMATOULD
ETTITIOMRITrumanTITUTI
DINARTUNITIHUnmumnamummmmmmmmmmmurarurnama
anuman
שישישישפר בא
MULINCRUITMLI
विष्णु भगवान् ने देवताओं के शत्रुओं का नाश
अध्याय ३]
म हा भारत
१४५१
ते पूजयित्वा त्वामेव गच्छन्त्याशु प्रधानताम् ॥ ४३ ॥
वसवो मरुतो रुद्रा ये च साध्या मरीचिपाः
वालखिल्यादयः सिद्धाः श्रेष्ठत्वं प्राणिनां गताः॥ ४४ ॥
सब्रह्मकेषु लोकेषु सप्तस्वप्यखिलेषु च
न तद् भूतमहं मन्ये यदर्कादतिरिच्यते ॥ ४५ ॥
सन्ति चान्यानि सत्त्वानि वीर्यवन्ति महान्ति च।
न तु तेषां तथा दीप्तिः प्रभावो वा यथा तव ॥ ४६॥
ज्योतींषि त्वयि सर्वाणि त्वं सर्वज्योतिषांपतिः ।
त्वयि सत्यं च सत्त्वं च सर्वे भावाश्च सात्त्विकाः॥४७॥
त्वत्तेजसा कृतं चक्रं सुनाभं विश्वकर्मणा
देवारीणां मदो येन नाशितः शाईधन्वना
त्वमादायांऽशुभिस्तेजो निदाघे सर्वदेहिनाम् ।
सर्वोषधिरसानां च पुनर्वसु मुश्चसि ॥ ४९ ॥
तपन्त्यन्ये दहन्त्यन्ये गर्जन्त्यन्ये तथा धनाः
विद्योतन्ते प्रवर्षन्ति तव प्रावृषि रश्मयः
न तथा सुखयत्यग्निर्न प्रावारा न कम्बलाः
शीतवातादितं लोकं यथा तब मरीचयः ॥ ५१ ॥
किया । आप गर्मी की ऋतु में सब प्राणियों के
ब्रह्मलोक सहित सातों लोकों में ऐसा कोई तेज और सब ओपधियों के रस को अपनी किरणों
पाणी नहीं, जो आपकी पूजनीय ज्योति से अलग
से खींचते है और फिर वर्षा ऋतु में छोड़ देते हैं।
हो । यद्यपि आर भी प्राणी पराक्रमी और बड़े हैं,
इस ऋतु में आप की कोई किरणें संसार को
परन्तु आपके तेज के समान किसी का प्रकाश
तपाती है, कोई भम्म करती हैं और कोई बादल
नहीं है । सब ज्योति आप ही में है । आप सब
होकर वर्षती हैं, गर्जती और प्रकाश करती हैं।
ज्योतियों के स्वामी हैं और आप ही में सत्य, सत्त्व
और सम्पूर्ण सात्विकी भाव है ॥४५/४७॥
जिस समय शीत पड़ता है और वायु टण्डी
आप ही के तेज से विश्वकर्मा ने सुदर्शन चलती है उस समय अमि और कम्बल आदि
नाम का चक्र बनाया था, जिससे शाङ्ग धनुपधारी वों से प्राणी को इतना मुख नहीं मिलता है,
जितना आपकी किरणों से होता है। आप अपनी
imaDTI.HOT.ITIHDINidairani......
पाई है ॥४२॥४४॥
॥४८॥५०॥

१४५२ म हा भा र त [वना ETV ImmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmuT: -- ... Munnamam MAHASAIIMIDIODEnyTRADIO Datranasurmulam त्रयोदशद्वीपवतीं गोभिर्भासयसे महीम् त्रयाणामपि लोकानां हितायैकः प्रवर्तसे ॥ ५२ ॥ तव यादयो न स्यादन्धं जगदिदं भवेत् न च धर्मार्थकामेषु प्रवर्तेरन्मनीषिणः आधानपशुबन्धेष्टिमन्त्रयज्ञतपःक्रियाः त्वत्प्रसादादवाप्यन्ते ब्रह्मक्षत्रविशां गणैः ॥ ५४॥ यदहर्ब्रह्मणः प्रोक्तं सहस्रयुगसंमितम् तस्य त्वमादिरन्तश्च कालज्ञैः परिकीर्तितः मनूनां मनुपुत्राणां जगतो मानवस्य च मन्वन्तराणां सर्वेषामीश्वराणां त्वमीश्वरः संहारकाले संप्राप्ते तव क्रोधविनिःस्मृतः संवर्तकाग्निस्त्रैलोक्यं भस्मीकृत्वावतिष्टते ॥ ५७॥ त्वद्दीधितिसमुत्पन्ना नानावर्णा महाघनाः सैरावताः साशनयः कुर्वन्त्याभूतसंप्लवम् ॥ ५८॥ कृत्वा द्वादशधाऽऽत्मानं द्वादशादित्यतां गतः । संहृत्यैकार्णवं सर्वं त्वं शोपयसि रश्मिभिः ॥ ५९॥ त्वामिन्द्रमाहुस्त्वं रुद्रस्त्वं विष्णुस्त्वं प्रजापतिः । किरणों से इस सम्पूर्ण पृथ्वी को, जिसमें सात द्वीप । है । आप चौदह मनु, मनु के पुत्र, जगत् , मनुष्य, और छ अवान्तरद्वीप हैं, प्रकाशित करते हैं और तीनों । ईश्वर और सव मन्वन्तरों के ईश्वर है । जब लोकों का हित करने के लिये प्रवृत्त रहते हैं । जो । प्रलयकाल आता है, तब आप ही की संवर्तक नाम आपका उदय न हो, तो सारे संसार में अंधेरा क्रोधाग्नि तीनों लोकों को भस्म कर डालती है। फला रहे। कोई भी धर्म-अर्थ काम के चिन्तन में । ॥५५/५७|| मन न लगा सके । आप ही की कृपा से ब्राह्मण, और आप ही की किरणों मे नाना प्रकार के क्षत्रिय और वैश्य लोग गर्भाधान आदि संस्कार बादल उत्पन्न होकर बिजली सहित सम्पूर्ण पृथ्वी पशु-यन्ध, इष्टि, मन्त्र, यज्ञ, तप, और अनेक कर्म के चारों प्रकार के जीवों को जल से पूर्ण कर देते करते हैं ॥५१॥५४॥ हैं। आप ने अपने बारह रूप बनाकर बारह नाम शास्त्रकार महापुरुषों ने आप ही को सहस्र-युग पाये हैं और अपनी किरणों से आप सब पृथ्वी को परिमित प्रमा के दिन का आदि और अन्त कहा मुखा देते हैं। आप इन्द्र है, रुद्र है, विष्णु है, EvammarACHARITRIBHUMHEEOHIRPremuTERMANEECITIEEEEEEEELArcror. - १४५३ अध्याय ३ महा मारत HTTAmrTITrumournimamminarun HarromrooranrarunanaTONI IPANTATILIZARRORNEVAAD - त्वमग्निस्त्वं मनः सूक्ष्म प्रभुस्त्वं ब्रह्म शाश्वतम् ॥ ६० ॥ त्वं हंसः सविता भानुरंशुमाली वृषाकपिः विवस्वान्मिहिरः पूषा मित्रो धर्मस्तथैव च ॥६१ ॥ सहस्ररश्मिरादित्यस्तपनस्त्वं गवांपतिः मार्तण्डोऽर्को रविः सूर्यः शरण्यो दिनकृत्तथा ॥ ६२ ॥ दिवाकरः सप्तसप्तिर्धामकेशी विरोचनः आशुगामी तमोघ्नश्च हरिताश्वश्च कीर्त्यसे सप्तम्यामथ वा षष्ठयां भक्त्या पूजां करोति यः । अनिर्विण्णोऽनहंकारी तं लक्ष्मीर्भजते नरम् ॥ ६४ ॥ न तेपामापदः सन्ति नाऽऽधयो व्याधयस्तथा । ये तवाऽनन्यमनसः कुर्वन्त्यर्चनवन्दनम् ॥६५॥ सर्वरोगविरहिताः सर्वपापविवर्जिताः त्वद्भावभक्ताः सुखिनो भवन्ति चिरजीविनः ॥६६॥ त्वं ममाप्यन्नकामस्य सर्वातिथ्यं चिकीर्पतः अन्नमन्नपते दातुमभितः श्रद्धयाऽर्हसि ॥ ६७॥ ये चं तेऽनुचराः सर्वे पादोपान्तं समाश्रिताः । प्रजापति हैं, अग्नि है, मन हैं, सूक्ष्म हैं. सनातन जो मनुष्य अहङ्कार को छोड़ कर पष्ठी या सप्तमी को आप का पूजन भक्तिपूर्वक करता है, वह हस अर्थात् विश्व के हर्ता है, सविता अर्थात् लक्ष्मी पाता है । और जो आपके अनन्य भक्त उत्पन्न करनेवाले हैं, भानु हैं, किरणों की मालाएँ । होकर आपको दण्डवत करते हैं, उनको कोई आपति रखने वाल हैं, वृषाकपि अर्थात् हर वा हरि है, नहीं व्यापती है और उनको मानसी और शारीरिक विवस्वान हैं, मिहर है, पूपा है, मित्र हैं, धर्म हैं, सहस्र रोग भी नहीं होते हैं। और जो मनुष्य आप में यह किरणों के स्वामी है, आदित्य हैं, तपन है, मार्तण्ड भाव मानते हैं, कि सूर्य ही सर्वव्यापी है, वह रोग हैं, अर्क हैं, रवि हैं, सूर्य है, शरण योग्य है, दिन- और पाप रहित होकर सुग्वपूर्वक चिरञ्जीवा होकर कर है, दिवाकर है, सात घोड़े रखनेवाले है, धाम- रहते हैं ॥६४॥६६॥ *शी अर्थात् ज्योतिमय किरण रखनेवाले है, विरो इसलिये हे महाराज ! हे अन्न के स्वामी ! चन हैं, शीघ्रगामी है, अन्धकार-नाशक हैं और हरे आप मुझ कामना रखनेवाले को अन्न दीजिए । मैं रा के घोड़े रखनेवाले है ॥६११६३|| श्रद्धा से अतिथियों को भोजन कराना चाहता हूँ। WEMIUMWILINI IVIDIMDIMIDIMUSELILIDTRIDED Humaurur ब्रह्म हैं ॥५८.६०॥ . - ADULTIMOTI UML १४५४ म हा भारत { वनपर्व ERTimininamainahiRurumulmamminimuminumarang TITITIATINITIAL माठरारुणदण्डाद्यास्तांस्तान्वन्देऽशनिक्षुभान् ॥ ६८ ॥ शुभया सहिता मैत्री याश्चान्या भूतमानरः ताश्च सर्वा नमस्यामि पान्तु मां शरणागतम् ॥ ६९ ॥ वैशम्पायन उवाच-एवं स्तुतो महाराज भास्करो लोकभावनः ततो दिवाकरः प्रीतो दर्शयामास पाण्डवम् दीप्यमानः स्ववपुषा ज्वलन्निव हुताशनः विवम्वानुवाच-यत्तेऽभिलपितं किंचित्तत्वं सर्वमवाप्स्यसि अहमन्नं प्रदास्यामि सप्त पञ्च च ते समाः गृह्णीष्व पिठरं तानं मया दत्तं नराधिप! यावद्वय॑ति पाञ्चाली पात्रेणाऽनेन सुव्रत ! ॥७२॥ फलमूलामिपं शाकं संस्कृतं यन्महानसे . चतुर्विधं तदन्नाद्यमक्षय्यं ते भविष्यति ॥ ७३ ॥ इतश्चतुर्दशे वर्षे भूयो गज्यमवाप्स्यसि वैशम्पायन उवाच-एवमुक्त्वा तु भगवांस्तत्रैवान्तरधीयत ॥ ७ ॥ इमं स्तवं प्रयतमनाः समाधिना पठेदिहान्योऽपि वरं समर्थयन्। तत्तस्य दद्याच्च रविर्मनीपितं तदाप्नुयाद्यद्यपि तत्सुदुर्लभम् ७५ ।। यश्चेदं धारयेन्नित्यं शृणुयाद्वाप्यभीक्ष्णशः मे आपके माठर, अरुण और दण्ड आदि सेवकों लो यह ताबे का पिठर अर्थात् परोसने का पात्र को जो आपके चरणों की सेवा किया करते है, दण्डवत् लो, इससे द्रौपदी घर में बनाए हुए फल-मूल, मांस करता हूँ। क्षुधा और मंत्री आदि भूत-माताओं और शाक आदि जिस पदार्थ को जबतक परोसा को भी में प्रणाम करता हूँ । मुझ शरणागत की करेगी तब तक वह पदार्थ नहीं घटेगा । और अब रक्षा कीजिए ॥६७/६०॥ से लेकर चौदहवें वर्ष में तुमको फिर राज्य मिलेगा। वैशम्पायन ने कहा-हे राजा जनमेजय ! वैशम्पायन ने कहा-हे राजा जनमेजय ! सूर्यदेव मूर्यदेव युधिष्ठिर की उक्त स्तुति सुनकर प्रसन्न हुए, उक्त रीति से कहकर वहीं अतर्धान हो गये । इम और अपने अनि के ममान ज्वालामान शरीर से स्तुति को, जो कोई दूमरा मनुष्य भक्तिपूर्वक मनको दर्शन देकर कहने लगे-हे युधिष्ठिर! तुम्हार मय गेक कर पाठ करेगा, सूर्य देवता उसकी दुर्लम मनोरथ सिद्ध होंगे । में तुमको बारह वर्ष तक मनोकामना को भी पूरा करेंगे ॥७३१७५|| नित्य अन्न दूंगा ॥७०।७२॥ और जो मनुष्य इसको नित्य पढ़ेगा या मुनंगा EMAmmOMPHOTOmPIRITTIMATADITMummarCLEEPIN NAUKARomamrexiauraxisasaraswirintasauma... - ParACL.CIM IDOLLABILITYATIMELIMINAILAINITALIA १४५५ अध्याय ३] महाभारत numINITITUTION ITTunnrnmuinnumarmus .itritiuanrimarTIRTUNITION APRILLIND ॥ ७७॥ ॥ ७८॥ ESMALLAHALPEmmun. पुत्रार्थी लभते पुत्रं धनार्थी लभते धनम् ॥ ७६ ।। विद्यार्थी लभते विद्यां पुरुषोप्यथवा स्त्रियः उभे सन्ध्ये पठेन्नित्यं नारी वा पुरुषो यदि आपदं प्राप्य मुच्येत बद्धो मुच्येत वन्धनात् । एतद ब्रह्मा ददौ पूर्व शकाय सुमहात्मने शकाच्च नारदः प्राप्तो धौम्यस्तु तदनन्तरम् धौम्यायुधिष्ठिरः प्राप्य सर्वान्कामानवाप्तवान् ॥ ७९ ॥ संग्रामे च जयन्नित्यं विपुलं चाप्नुयाद्वसु मुच्यते सर्वपापेभ्यः सूर्यलोकं स गच्छति ।। ८० ।। वैशम्पायन उवाच लब्ध्वा वरं तु कौन्तेयो जलादुत्तीर्य धर्मवित् । जग्राह पादौ धौम्यस्य भ्रातृ॑श्च परिपस्वजे ।। ८१ ॥ द्रौपद्या सह संगम्य वन्द्यमानस्तया प्रभुः महानसे तदानीं तु साधयामास पाण्डवः संस्कृतं प्रसवं याति स्वल्पमन्नं चतुर्विधम् अक्षय्यं वर्धते चान्नं तेन भोजयते द्विजान् ॥८३॥ भुक्तवत्सु च विप्रेषु भोजयित्वाऽनुजानपि शेपं विघससंशं तु पश्चाद्भुङ्क्ते युधिष्ठिरः उसके सब मनोरथ पूरे होंगे। पुत्र चाहनेवाले को । इसका पाठ करनेवाला संग्राम में नहीं हारता है पुत्र, घनार्थी को धन, विद्यार्थी को विद्या इसके और धन-धान्य से युक्त रहकर सब पापों से छूटकर नित्य पढ़ने और सुनने से मिलती है, चाहे पुरुष हो, सूर्यलोक में जाता है ॥७६।८०॥ चाहे स्त्री । और स्त्री पुरुष में से जो कोई इस । वैशम्पायन ने कहा-हे राजा जनमेजय ! इसके स्तोत्र का पाठ दोनों सन्ध्याओं में करेगा, वह आपत्ति पीछे राजा युधिष्ठिर सूर्यदेव से वर पाकर जल से छूट जायेगा और जो बन्धन अर्थात् कैद में पड़ बाहर निकले । और धौम्य ऋपि के चरणों को गया होगा तो कैद से भी छूट जायगा । यह स्तोत्र । छूकर और माइयों को प्यार करके द्रौपदी से मिले पूर्व समय में ब्रह्मा जी ने इन्द्र को दिया था, इन्द्र और चारों प्रकार का थोड़ा-थोड़ा अन्न द्रौपदी से ने नारद जी को दिया, नारद जी ने धौम्य ऋषि तैयार करवाया । वह चारों प्रकार के अन्न अक्षय हो को दिया और धौम्य ऋषि ने राजा युधिष्ठिर को जाते थे। उसी में से युधिष्ठिर पहले ब्राह्मणों को भोजन दिया कि जिससे उसकी मनोकामना पूरी हुई। कराते, फिर छोटे भाइयों को खिलाकर, विस - ॥८४॥ amsuamnaam से ORINCILITIMMOLMY -- १४५६ महा मात विन WildlineGurulimmimarwmmunimarai Harrruaranari SINU1012 WULU VIDLJIVI UMIDIIDIDUNTD'OCT युधिष्ठिरं भोजयित्वा शेपमश्नाति पार्वती द्रौपद्यां भुज्यमानायां तदन्नं क्षयमेति च एवं दिवाकरात्प्राप्य दिवाकरसमप्रभः कामान्मनोऽभिलषितान्ब्राह्मणेभ्योऽददात् प्रभुः ॥ ८६ ॥ पुरोहितपुरोगांश्च तिथिनक्षत्रपर्वसु यज्ञियार्थाः प्रवर्तन्ते विधिमन्त्रप्रमाणतः ततः कृतस्वस्त्ययना धौम्येन सह पाण्डवाः द्विजसद्धैः परिवृताः प्रययुः काम्यक वनम् ॥ ८८॥ इति श्रीमन्महाभारते वनपर्वणि आरण्यकपर्वणि काम्यकवनप्रवेटो तृतीयोऽध्यायः ॥३॥ अर्थात् चंच हुए अन्न को आप खाते थे और पाण्डव हर बात में पुरोहित को आगे कर लेते थे युधिष्ठिर के भोजन कर लेने पर द्रौपदी भोजन करती और जब-जब कोई तिथि, नक्षत्र या पर्व आन पड़ता थी । द्रौपदी के भोजन कर चुकने पर वह आहार था, तब तब विधि और मन्त्र के प्रमाण से यज्ञ के की सामग्री चुक जाती थी 11८१४८५।। योग्य वस्तुएँ आ जाती थीं । इसके पीछे पाण्डव सोहे राजा जनमेजय ! युधिष्ठिर ने उक्त प्रकार धौम्य ऋषि से म्यम्त्ययन सुनते हुए ब्राह्मणों सहित से सूर्य से वर पाकर ब्राह्मणों के मनोरथ पूरे किय । गङ्गातट मे काम्यक वन को चले गये ॥८६८८॥ वनपर्व का तीसरा अध्याय समाप्त हुआ ॥३ अथ चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४॥ वैशम्पायन उवाच-वनं प्रविष्टेप्वथ पाण्डवेषु प्रज्ञाचक्षुस्तप्यमानोऽम्बिकेयः। धर्मात्मानं विदुरमगाधबुद्धिं सुखासीनोवाक्यमुवाच राजा! ॥ १ ॥ धृतराष्ट्र उवाच प्रज्ञा च ते भार्गवस्येव शुद्धा धर्म च त्वं परमं वेत्थ सूक्ष्मम् समश्च त्वं संमतः कौरवाणां पथ्यं चैपां मम चैव ब्रवीहि ॥ २ ॥ एवं गते ! विदुर यदद्य कार्य पौराश्चमे कथमस्मान्भजेरन् । चौथा अध्याय ॥४॥ वैशम्पायन ने कहा-हे राजा जनमेजय ! पाण्डयों जानकार हो। सव कुरुवंशियों के ऊपर तुम्हारी के वन को चले जाने पर, सुखपूर्वक बैठे हुए राजा समान दृष्टि है । इसलिये बताओ, क्या करने में धृतराष्ट्र ने दुखी होकर विदुर जी से, जो बड़े हमारा उपकार हो सकता है ! व्यतीत हुई बात के बुद्धिमान् थे, कहा-हे विदुर ! तुम शुक्राचार्य के लिये मैं कुछ नहीं कहता । इस समय जो करने समान निर्मल बुद्धिवाले और सूक्ष्म धर्म के विशेष योग्य है। और जिस उपाय मे सब पुग्यासी हम स EMOID 192912mme:WRAPPEPPU MADONTHSIPHULPHULEureaumeet AyE महा भारत manomitimromanTimimarane TUnrmmmmmmaarmomromanmammILL .... ArAmINISCHATAR TECENTS TamiraramaranuarunaunuuurTEATHAK को गान्त करने के लिए यह उपाय आता है, बाहुबलशाली मीमसेन जिस पक्ष के योद्धा है, कि आप सब जीते हुए धन को पाण्डवों को दे जगत् प्रसिद्ध गाण्डीव जिनका धनुष है, उनके लिये अध्याप४] १४५७ तेचाप्यस्मान्नोद्धरेयुःसमूलांस्तत्त्वं ब्रूयाः साधु कार्याणि वेत्सि ॥ ३ ॥ विदुर उवाच-त्रिवर्गोऽयं धर्ममूलो नरेन्द्र ! राज्यं चेदं धर्ममूलं वदन्ति । धर्मे राजन्वर्तमानः स्वशक्त्या पुत्रान्सर्वान्पाहि पाण्डोः सुतांश्च॥ ४ ॥ स वै धर्मो विप्रलब्धः सभायां पापात्माभिः सौवलेयप्रधानैः । आहूय कुन्तीसुतमक्षवत्यां पराजैपीत्सत्यसन्धं सुतस्ते एतस्य ते दुष्प्रेणीतस्य राजञ्च्छेपस्याहं परिपश्याम्युपायम् । यथा पुत्रस्तव कौरव्य ! पापान्मुक्तो लोके प्रतितिष्ठेत साधु ॥ ६ ॥ तदै सर्व पाण्डुपुत्रा लभन्तां यत्तद्राजन्नभिसृष्टं त्वयासीत् । एष धर्मः परमो यत्स्वकेन राजा तुप्येन्न परस्वेपु गृध्येत् ॥ ७ ॥ यशो न नश्येज्ज्ञातिभेदश्च न स्याद्धर्मो न स्यान्नैव चैवं कृते त्वाम् एतत्कार्य तव सर्वप्रधानं तेषां तुष्टिः शकुनेश्चाऽवमानः एवं शेपं यदि पुत्रेषु ते स्यादेतद्राजंस्त्वरमाणः कुरुष्व तथैतदेवं न करोषि राजन्ध्रुवं कुरूणां भविता विनाशः न हि क्रुद्धो भीमसेनोऽर्जुनो वा शेपं कुर्याच्छात्रवाणामनीके । येपां योद्धा सव्यसाची कृतास्त्रो धनुर्यपां गाण्डिवं लोकसारम् ॥ १० ॥ येषां भीमो बाहुशाली च योद्धा तेषां लोके किं नु न प्राप्यमस्ति । पीति करने लगे और हमारी जड़ को न काटें, सो । दीजिए, क्योंकि दूसरे के धन का लोभ न करके तुम हमसे कहो । कर्तव्य के बारे में तुम विशेष अपने धन से सन्तुष्ट रहना बड़ा धर्म है ॥४॥ ऐमा करने से आपको केवल धर्म ही होगा, यह सुनकर विदुर ने कहा, कि धर्म-अर्थ-काम आपका यश न मिटेगा और स्वजातियों में फूट न और राज्य इन सब का मूल धर्म है। इससे होगी, पाण्डव इस बात से प्रसन्न हो जायेंगे और आपको अपने और पाण्डु के पुत्रों की रक्षा धर्म- शकुनि का अपमान होगा । यह काम सय से श्रेष्ठ पूर्वक करनी चाहिये । उस धर्म को शकुनि आदि है, इसके करने से आप के सब पुत्र बचे रहेंगे, पापात्माओं ने सभा में अधर्म रूप कर दिया, जो नहीं तो सब कौरव कुल का नाश हो जायगा। सत्य-प्रतिज्ञ युधिष्ठिर को बुला कर छल से जुए में भीमसन और अर्जुन के फ्रोध करने पर क्षत्रियों जीन लिया। मेरी समझ में युधिष्ठिर के इस अपमान की सेना नहीं बच सकती है । अत्रज्ञ अर्जुन और Gmain , कए से जानकार हो ॥१॥३॥ SPIRATION HOMMIDDISEMIUIRusamuTRUCHCHEMERWISEHLILAHME १४५८ म हा भारत [ वनपर्व II-TRUUrinrani ROImammuTRADurAurnantwasan । TriCTATUT.iranimuanrrrrrrrrrr wilLLY Annahai.inatara - उक्तं पूर्व जातमात्रे सुते ते मया यत्ते हितमासीत्तदानीम् ॥ ११ ।। पुत्रं त्यजेममहितं कुलस्य हितं परं न च तत्वं चकर्थ इदं च राजन्हितमुक्तं न चेत्त्वमेवं कर्ता परितप्तासि पश्चात् ॥ १२ ॥ यद्येतदेवमनुमन्ता सुतस्ते संप्रीयमाणः पाण्डवैरेकराज्यम् । । तापो न ते भविता प्रीतियोगान्न चेन्निगृह्णीष्व सुतं सुखाय॥ १३ ।। दुर्योधनं त्वहितं वै निगृह्य पाण्डोः पुत्रं प्रकुरुष्वाधिपत्ये अजातशत्रुर्हि विमुक्तरागो धर्मेणेमां पृथिवीं शास्तु राजन् ! ॥ १४ ॥ नतो राजन्! पार्थिवाः सर्व एव वैश्या इवास्मानुपतिष्ठन्तु सद्यः । दुर्योधनः शकुनिःसूतपुत्रःप्रीत्या राजन् ! पाण्डुपुत्रान्भजन्तु ॥ १५ ॥ दुःशासनो याचतु भीमसेनं सभामध्ये द्रुपदस्यात्मजां च युधिष्ठिरं त्वं परिसान्त्वयस्व राज्ये चैनं स्थापयस्वाभिपूज्य त्वया पृष्टः किमहमन्यद्वदेयमेतत्कृत्वा कृतकृत्योऽसि गजन् ! ॥ १६ ॥ धृतराष्ट्र उवाच श्रुतं वाक्यं विदुर! यत्ते सभायामिह प्रोक्तं पाण्डवान्प्राप्य मां च । हितं तेपामहितं मामकानामेतत्सर्व मम नावैति चेतः इदं त्विदानी कुत एव निश्चितं तेपामर्थे पाण्डवानां यदात्थ । तेनाद्य मन्ये नासि हितो ममेति कथं हि पुत्रं पाण्डवाथें त्यजेयम् ॥ १८ ॥ संसार में असाध्य कुछ नहीं। पहले दुर्योधन के, दुर्योधन को कैद करके पाण्डवों को राज्य देने से पैदा होते ही मैंने आप से जो कहा था, उमे :सी अवश्य ही सन्तुष्ट हो कर युधिष्ठिर धर्म के अनुसार समय कर डालना अच्छा था। मैंने उसका त्याग पृथ्वी का शासन करेंगे। ऐसा होने से सब राजा करने के लिये कहा था; किन्तु आपने यह नहीं लोग पनियों की तरह हमारी सेवा करेंगे । इसलिए किया । इस समय भी मैंने आपको यह हित का दुर्योधन, कर्ण, और शकुनि पाण्डवों की शरण में उपदेश किया है । इसके अनुसार काम करने से जायें । आप का पुत्र दुःशासन, अपने कुकर्म के अन्त को किसी तरह का सन्ताप होने की आशा प्रायश्चित्त के तौर पर, भरी सभा में द्रौपदी और नहीं है ॥८॥१२॥ भीमसन से, क्षमा की प्रार्थना कर । आप दु.म्य जो आप का पुत्र सन्तुष्ट होकर, पाण्डवों से को मीठी बातों से शान्न करके युधिष्ठिर को राज मिलकर, एक माय राज्य भाग करने में महमत हो, तिलक दे दीजिए । एमा करने से आप कृतकृत्य तो आपके लिये सब तरह मङ्गल है, नहीं तो उमे हो जायेंगे । जो युछ आपने हित की यान पछी गृहण अर्थात कैद करके बुरुवंश का भला कीजिए। , यह मैंने यह मुनाई । अब जो पुछ आप और पूएं ॥ १७॥ CURITUTORYPELL mumenterer STTILITWmTerceriLrLeclerce BOSSOMUADIOMUVILITTLEDIADAM mernamArunt DZATARAULUMTLCLULAIMILAULTUMMMMMIC. असंशयं तेऽपि ममैव पुत्रा दुर्योधनस्तु मम देहात्प्रसूतः स्वं वै देहं परहेतोस्त्यजेति को नु ब्रूयात्समतामन्यवेक्ष्य स मां जिह्म विदुर! सर्व ब्रवीपि मानं च तेऽहमधिकं धारयामि। यथेच्छकं गच्छ वा तिष्ठ वा त्वं सुसान्ल्यमानाप्यसती स्त्री जहाति ॥२०॥ वैशम्पायन उवाच एतावदुक्त्वा धृतराष्ट्रोन्वपद्यदन्तर्वेश्म सहसोत्थाय राजन् ! नेदमस्तीत्यथ विदुरो भापमाणः संप्राद्रवद्यत्र पार्था बभूवुः ॥ २१॥ इति श्रीमन्महाभारते वनपर्वणि आरण्यकपर्वणि विदुरवाक्यप्रत्याख्याने चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥ वह कहूँ ॥१३॥१७॥ बुद्धिमान् का काम नहीं। मैं तुम्हारा यथोचित सम्मान यह सुनकर धृतगष्ट्र ने कहा-हे विदुर! तुमने | करता हूँ, किन्तु तुम मुझे बुरी सम्मति देकर, मेरे जब सभा में हम दोनों के सामने ऐसा कहा था, तब । बुरे का उपाय करते हो। इस कारण तुम चाहे यहां तुम्हारा कहना पाण्डवों के लिये हितकर और हमारे । रहो, चाहे और कहीं चले जाओ, उससे मै अपनी लिये अनिष्टकारी, मुझे नहीं जान पड़ा था; किन्तु , कुछ हानि नहीं समझता । जो स्त्री बुरे चलन की आज मैं निश्चितरूप से समझ गया, कि तुम पाण्डवों होती है, वह बहुत समझाने पर भी अपने पति को का बड़ा पक्ष करते हो । हमारी भलाई पर तुम्हें , छोड़ देती है। वैशम्पायन ने कहा-हे राजा जनमेजय ! तनिक भी ध्यान नहीं है । जो हो, धर्म के अनुसार धृतराष्ट्र उक्त प्रकार से कहकर उठ खड़े हुए, और पाण्डब मेरे पुत्र है सही; किन्तु दुर्योधन मेरे शरीर महल के भीतर चले गये। विदुर जी भी यह सोचते । इस कारण पाण्डवों के उपकार हुए कि इनका नाश होने को है, पाण्डयों के पास के लिये मैं अपने पुत्र को किस तरह छोड़ सकता जाने को चल दिये ॥१८॥२१॥ हूँ ! हे विदुर ! दूसरों के लिये एसा उपदेश करना यनपर्व का चौथा अध्यायं समाप्त हुआ ॥ ४ ॥ - वैशम्पायन उवाच-पापडवास्तु वने वासमुद्दिश्य भरतर्षभाः सरबती और दृपद्वती (घग्घर) नाम की नदियों, स्थली में पहुंचे। वहां पर उन्होंने काम्यक वन को अध्याय ५] म हा भारत १४५९ LAGAINinfinishit MilabilituithalifillindiilandliandanimamalinibauliDivalunmulahnirmire PEEDEDDwamirrouTEDORE . - । से उत्पन्न हुआ h imiliarount अथ पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥ प्रययुर्जाह्नवीकूलात्कुरुक्षेत्रं सहानुगाः सरस्वतीपद्वत्यौयमुनां च निषेव्य ते पांचवां अध्याय ॥५॥ वैशम्पायन ने कहा-हे राजा जनमेजय ! में स्नान करके, पश्चिमाभिमुख हो, वे एक वन से पाण्डव लोग काम्यक यन को जाने के लिये अनुचरों- | दूसरे वन में पहुंचने लगे। इस तरह अनेक यनों के साथ गंगातट से चलकर कुरुक्षेत्र में पहुंचे। यमुना, को लांघते हुए वे सम्वती के तट पर स्थित मरु- १४६० महाभारत [वनपर्व Eurmmammniruinomountinumnarenmmmunimummunmunrounmunmunarni FDMouTRUITRAITISTILeartereAnt ययुर्वनेनैव वनं सततं पश्चिमां दिशम् ततः सरस्वतीकूले समेषु मरुधन्वसु काम्यकं नाम ददृशुर्वनं मुनिजनप्रियम् तत्र ते न्यवसन्वीरा बने बहुमृगद्विजे अन्वास्यमानामुनिभिः सान्त्व्यमानाश्च भारत!॥ ४ ॥ विदुरस्त्वपि पाण्डनां सदा दर्शनलालसः जगामैकरथेनैव काम्यकं वनमृद्धिमत् ततो गत्वा विदुरः काम्यकं तच्छी|रश्वैर्वाहिना स्यन्दनेन। ददर्शासीनं धर्मात्मानं विविक्ते सार्धं द्रौपद्या भ्रातृभिाह्मणेश्च ॥ ६ ॥ ततोऽपश्यद्विदुरं तूर्णमारादभ्यायान्तं सत्यसन्धः स राजा । अथाब्रवीद्भातरं भीमसेनं किं नु क्षत्ता वक्ष्यति नः समेत्य ॥ ७ ॥ कच्चिन्नायं वचनात्सोवलस्य समाह्वाता देवनायोपयातः कञ्चित्क्षुद्रः शकुनि युधानि जेण्यत्यस्मान्पुनरेवाक्षवत्याम् ॥८॥ समाहृतः केनचिदाद्रवति नाहं शक्तो भीमसेनापयातुम् गाण्डीवे च संशयिते कथं तु राज्यप्राप्तिःसंशयिता भवेन्नः ॥ ९ ॥ वैशम्पायन उवाच-तत उत्थाय विदुरं पाण्डवेयाः प्रत्यगृह्णन्नृपते !सर्व एव । तैः सत्कृतः स च तानाजमीढो यथोचितं पाण्डुपुत्रान्समेयात् ॥ १० ॥ देखा जिसमें बहुत से मुनि लोग रहते थे। इसके भीगसेन से कहा-हे भाई ! न जाने विदुर जी पश्चात् मृगों और पक्षियों से भरे हुए उस रमणीय यहा आकर हमसे क्या कहेंगे । ये क्या शकुनि के वन में रहने का निश्चय करके पाण्डव वहीं रहने कहने से फिर हमें जुआ खेलने को बुराने आ रहे लगे। मुनि लोग उनको सान्त्वना देने लगे ॥१४॥ हैं ! दुरात्मा शकुनि क्या हमारे अस्त्र-शस्त्रों को हमी समय पाण्डवों में मिलने की इच्छा भी जीत लेने की इच्छा रखता है । अब हमें फिर रखनेवाल विदुर जी, शीघ्रगामी घोड़े जिसमें जुते चलना ही पड़ेगा, क्योंकि मैं बुलाये जाने पर रुक नहीं हुप थे, उस रथ पर सवार ही कर समृद्धियुक्त काम्यक सकता हूं। जो हो, यदि गाण्डीव धनुप हमारे वन में पहुंचे। उन्होंने वहा पहुँच कर देखा, कि हाथ से जाता रहा, तो राज्य की प्राप्ति हमारे रिये द्रौपदी, चारों भाइयों और ब्राह्मणों के बीच में असम्भय हो जयागी ॥५॥९॥ धर्मराज पटे हुए है । सत्यसन्ध युधिष्ठिर ने दूर से वैशम्पायन कहते है-हे राजा जनमेजय ! अम ही विदुर को रथ पर शीम आते हुए देवकर, सय पाण्डव रोग आदर का भाय दिखाते हुए shiromamarMRur.mamatamaramatarORI.maa.animi Tamanarta । CELUITETUTUTNUCLEOMU..USTATUS are accuN1.0.6T* numanा.MIRATE चैत्र । अध्याय ५] महा भारत १४६१ Prana.mATTIMESwamaurammarranumanvitthartimmumorruirturmthix.xumamm समाश्वस्तं विदुरं ने नरर्पभास्ततोऽपृच्छन्नागमनाय हेतुम् । स चापि तेभ्यो विस्तरतःशशंस यथावृत्तो धृतराष्ट्रोऽम्बिकेयः ।। ११ ॥ विदुर उवाच-अबोचन्मांधृतराष्ट्रोऽनुगुप्तमजातशत्रो! परिगृह्याभिपूज्य एवं गते समतामभ्युपेत्य पथ्यं तेषां मम चैव ब्रवीहि ॥ १२ ॥ मयाऽप्युक्तं यत्क्षम कौरवाणां हितं पथ्यं धृतराष्ट्रस्य तद्धे तस्मै न रुचामभ्युपैति ततश्चाहं क्षममन्यन्न मन्ये परं श्रेयः पाण्डवेया ! मयोक्तं न मे तच्च श्रुतवानाम्बिकेयः । यथातुरस्येव हि पथ्यमन्नं न रोचते स्मास्य तदुच्यमानम् ॥ १४ ॥ न श्रेयसे नीयतेऽजातशत्रो ! स्त्री श्रोत्रियस्येव गृहे प्रदुष्टा । ध्रुवं न रोचेद्भरतर्षभस्य पतिः कुमार्या इव पष्टिवर्पः ॥ १५ ॥ धुवं विनाशो नृप कौरवाणां न वै श्रेयो धृतराष्ट्रः परति यथा च पणे पुष्करस्यावसिक्तं जलं नतिष्ठेत्पथ्यमुक्तं तथास्मिन् ॥ १६ ॥ ततःकुद्धोधृतराष्ट्रोऽब्रवीन्मां यस्मिञ्च्छ्रद्धा भारत तत्र याहि । नाहं भूयः कामये त्वां सहायं महीमिमां पालयितुं पुरं वा ॥ १७ ॥ उट वंह हुए । म्यागत मम्भाषण आदि के द्वाग रुचा जैम रोगी का पथ्य का अन्न नहीं अच्छा उन्होंने विदुर जी का यथोनित मम्मान किया और लगता । हे युधिष्ठिर ! श्रोत्रिय ब्राह्मण के घर रहन- उन्हें मुन्दर आसन पर बिठाया । इसके पीछ जय वाली बुरे चरित्र की बी जैसे कुल के लिये कलम विदुर जी विश्राम कर चुके, तब युधिष्ठिर ने उनमे रूप होती है, वैसे ही अम्विका के पुत्र धृतराष्ट्र भरत- ओने का कारण पूछा । अब विदुर जी विस्तार के यश के नाश का कारण होंगे । नवयुवती बी जैसे साथ पुनराष्ट्र का आचार सुनाने लगे ॥१०॥११॥ वृद्ध पति की चाह नहीं करती, वैसे ही मेरे वचनों विदुर ने कहा-हे युधिष्ठिर ! राजा धृतराष्ट्र ने पर धृतराष्ट्र की श्रद्धा नहीं हुई । कमल के पर पर एकान्त में बुलाकर मुझ से कहा कि विदुर ! जो पड़े हुए जल बिन्दु की तरह मेरे उपदेश के वचन मो हो गया । यतलाओ, अब हम अवम्या 'धृतराष्ट्र के हृदय में नहीं टहरे, इसमे रट जान क्या किया जावे, जिससे हमार और पाण्टु के पड़ता है, कि या भरतवमा यहुन नीम निम्न हो पुत्रों का कल्याण हो । मैंने उन्हें उनक और मब जायगा ॥१२॥१६॥ कौग्यों के हित की बात कही; किन्तु मेरे उपदेश मेो उपदेश के अनुसार कार्य करना तो दूर कवाक्य उन्हें विरकुल ही नहीं रुने । हितकारी रहा, धृतराष्ट्र ने 'दूर हो' कह कर मुझे अपने यहां होने पर भी मेग उपदेश उनको इस प्रकार से नहीं से निकाल दिया है। उन्हों ने शोध के मुनी ...rammTORITERCIATTLDECEUTIrerrerstara שיט'שישימנעני होना था, 12ICUDo" महा मारत [ वनपर्व DinviroMOTI ALLIATIUMIATULAIMIRROL Auranimuanrnruruman -- mmsmartATuranmannuT: सोऽहं त्यों धृतराष्ट्रेण राज्ञा प्रशासितुं त्वामुपयातो नरेन्द्र !। तद्वै सर्वं यन्मयोक्तं सभायां तद्धार्यतां यत्प्रवक्ष्यामि भूयः ॥ १८ ॥ क्लैशैस्तीत्रैयुज्यमानः सपत्नैः क्षमा कुर्वन्कालमुपासते यः संवर्धयन्स्तोकमिवाग्निमात्मवान्स वै भुङ्क्ते पृथिवीमेक एव ॥ १९ ॥ यस्याऽविभक्तं वसु राजन्सहायैस्तस्य दुःखेऽप्यंश भाजः सहायाः । सहायानामेप संग्रहणेऽभ्युपायः सहायाप्तौ पृथिवीप्राप्तिमाहुः ॥ २०॥ सत्यं श्रेष्ठं पाण्डव ! विप्रलापं तुल्यं चान्न सह भोज्यं सहायैः। आत्मा चैपामग्रतो न स्म पूज्य एवंवृत्तिर्वर्धते भूमिपालः ॥ २१॥ युधिष्ठिर उवाच-एवं करिष्यामि यथा ब्रवीपि परां बुद्धिमुपगम्याप्रमत्तः। यच्चाप्यन्यद्देशकालोपपन्नं तद्वै वाच्यं तत्करिष्यमि कृत्स्नम् ॥ २२ ॥ इति श्रीमन्महाभारते मभापर्वणि आरण्यकपर्वणि विदुरनिर्वासे पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥ कहा-मैं पृथ्वी के शासन या प्रजा के पालन के । विपत्ति के समय सब क्लेश अकेले नहीं सहने पड़ते । बारे में अब तुम्हारी सम्मति नहीं सुनूँगा। सा हे सहायक पाने का यही उपाय है । और सहायक युधिष्ठिर ! मैं धृतराष्ट्र से त्यागे जाने के कारण मे मिल गया तो सब कुछ मिल गया । इसलिये सहा- तुमको शिक्षा करने के लिये आया हूँ। तुम को यकों को समान रूप से सम्पत्ति बाँट कर उम का चाहिए, कि जो मैंने तुम्हें सभा में उपदेश दिया उपभोग करना ही अच्छा है । उनके आगे अपने था और अब जो कुछ कहूँ, उसके अनुसार चलो। मुख अपनी बड़ाई न करनी चाहिये । ऐसा व्यवहार जो मनुष्य शत्रु के प्लेश से दुखी होने पर क्षमा करने से राजाओं की वृद्धि होती है । यह सुनकर पूर्वक रहकर समय को देखा करता है, वह इस युधिष्ठिर ने कहा-हे विदुर जी ! मैं बड़े यत्न और प्रकार से बढ़कर जैसे थोड़ी भी अमि मुलग-सुलग परिश्रम के साथ आप का कहा करूँगा। इस समय कर सब भम्म कर देती है, धीरे-धीरे बढ़कर अकला देश-काल के अनुकूल जो कुछ उत्तम उपदेश आप सम्पूर्ण पृथ्वी का राज्य करता है ॥१७॥१९॥ देना नाह, वह दें। मैं उसे मागने और करने को मम्पति के समय जो अपने सहायकों के साथ प्रस्तुत हूँ ॥२०॥२२॥ समान रूप से सम्पठि का भोग करता है, उसे . यनपर्व का पांचवां अध्याय समाप्त हुआ ॥ ५ ॥ . - अथ पप्ठोऽध्यायः ॥६॥ वैशम्पायन उवाच-गते तु विदुरे राजन्नाश्रमं पाण्डवान्प्रति धृतराष्ट्रो महाप्राज्ञः पर्यतप्यत भारत ! marTHLETITIATTIMIRMIDIOINEETIRIDIUDHEEROECITIERurmer अपने पास पाकर धृतराष्ट्र कहने लगे-हे सञ्जय ! मैं honTANDHIDIVITYMIUTAIDUADITUDIOTION DRATAm -- m । .. अध्याय ६] म हा भारत १४६३ RELATrammamitramGENT rruarrorapramanarrantimepratammnasamaceu विदुरस्य प्रभावं च सन्धिविग्रहकारितम् विवृद्धिं च परां मत्वा पाण्डवानां भविष्यति ॥ २ ॥ स सभाद्वारमागम्य विदुरस्मारमोहितः समक्षं पार्थिवेन्द्राणां पपाताविष्टचतनः म तु लब्ध्वा पुनः संज्ञां समुत्थाय महीतलात् । समीपोपस्थितं राजा सञ्जयं वाक्यमब्रवीत् ॥ १ ॥ भ्राता मम सुहृच्चैव साक्षाद्धर्म इवापरः तस्य स्मृत्वाऽद्य सुभृशं हृदयं दीर्यतीव मे तमानयस्व धर्मज्ञं मम भ्रातरमाशु वै इति ब्रुवन्स नृपतिः कृपणं पर्यदेवयत् पश्चात्तापाऽभिसंतप्तो विदुरस्मारमोहितः भ्रातृस्नेहादिदं राजा सञ्जयं वाक्यमब्रवीत् ॥ ७ ॥ गच्छ सञ्जय ! जानीहि भ्रातरं विदुरं मम यदि जीवति रोषण मया पापेन निर्धतः न हि तेन मम भ्रात्रा सुसूक्ष्ममपि किंचन व्यलीकं कृतपूर्वं वै प्राज्ञेनाऽमितवुद्धिना छठवां अध्याय ।। ६ ॥ वैशम्पायन ने कहा-हे राजा जनमेजय । विदुर | अपने भाई विदुर को, जो साक्षात् दूसर धर्मराज के जी के पाण्डवों के पास चले जाने पर, उस ज्ञानी समान है, याद कर-करके महादुखी हो रहा राजा धृतराष्ट्र को यहा दुख हुआ। और वह विदुर । हूँ । उनके वियोग से मेरा हृदय फटा जा रहा है जी के प्रभाव और संधि और विग्रह आदि नीति ॥१५॥ की निपुणता पाण्डवों का भविष्यकाल में उदय इसलिये तुम मेरे भाई, धर्म के ज्ञाता विदुर जानकर, महादुःखी होकर, ममा के द्वार पर निकल को तुरन्त यहा ले आओ । यह कहकर धृतराष्ट्र आये और यह समझ कर, कि मैंने विदुर जी के विलाप करने लगे और पछतावा कर-करके अपने द्वेष साथ वृथा द्वेप किया और मूछिन होकर,सब राजाओं को याद करके भाई के स्नेह की फांसी में बंधे हुए, के सामने पृथ्वी पर गिर पड़े । कुछ देर के सञ्जय से फिर कहने लगे-हे सञ्जय ! तुम जाकर पश्चात् होश आई और वे उठ बैठे । सञ्जय को | मेरे भाई विदुर को ढूंढो । मुझ पापी ने क्रोध में उसे निकाल दिया है। देखो वह जीता है, या नहीं। मेरे MAINALITrusuntum HOMOEOParitam OmniwarranIOOTng म हा भारत [वनपर्व STICTLEmrunanuarAnimaumaramanmunamurramanaranimurrrrrran, TAMIIeararTRxdf.aaraaimanaraபாராரா.. स न्यलीक परं प्राप्तो मत्तः परमबुद्धिमान् त्यक्ष्यामि जीवितं प्राज्ञ ! तं गच्छानय सञ्जय!॥ १० ॥ तस्य तद्वचनं श्रुत्वा राज्ञस्तमनुमान्य च सञ्जयो वाढमित्युक्त्वा प्राद्रवत्काम्यकं प्रति सोऽचिरेण समासाद्य तद्वनं यत्र पाण्डवाः रौरवाजिनसंवीतं ददर्शाथ युधिष्ठिरम् ॥ १२ ॥ विदुरेण सहासीनं ब्राह्मणैश्च सहस्रशः भ्रातृभिश्चाऽभिसंगुप्तं देवैरिव पुरन्दरम् युधिष्ठिरमुपागम्य पूजयामास सञ्जयः भीमार्जुनयमाश्चापि तद्युक्तं प्रतिपेदिरे ॥ १४ ॥ राज्ञा पृष्टः स कुशलं सुखासीनश्च सञ्जयः शशंसागमने हेतुमिदं चैवाऽब्रवीद्वचः सञ्जय उवाच-राजा स्मरति ते क्षत्तधृतराष्ट्रोऽम्बिकासुतः तं पश्य गत्वा त्वं क्षिप्रं सञ्जीवय च पार्थिवम् ॥ १६ ॥ सोऽनुमान्य नरश्रेष्ठान्पाण्डवान्कुरुनन्दनान् नियोगाद्वाजसिंहस्य गन्तुमर्हसि सत्तम ! ॥ १७॥ वैशम्पायन उवाच-एवमुक्तस्तु विदुरो धीमान्स्वजनवत्सलः माई विदुर ने. जो बड़ा बुद्धिमान् और ज्ञानी है, शोभायमान हैं । सञ्जय ने पहले युधिष्ठिर को प्रणाम मेरा किमी ममय में थोड़ा सा भी अप्रिय नहीं किया। किया । फिर भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेव को हाय, मैंने उसका बड़ा भारी अपमान किया है प्रणाम करके वह आसन पर बैठ गया ॥११॥१४॥ हे सन्जय ! तुम शीघ्र विदुर को ढूंढकर यहा ले इसके पीछे संजय युधिष्ठिर के कुशल पूछने आओ; नहीं तो में अपने प्राण दे दूंगा ॥६॥१०॥ पर, अपने आने का कारण कहकर, विदुर जी से यह सुनकर समय यहां मे पृतराष्ट्र को प्रणाम कहने लगा-राजा धृतराष्ट्र आपको याद कर रहे हैं। करके 'महुत अच्छा' कहकर काम्यक वन को चल आप शीघ्र जाकर उन्हें दर्शन दीजिए और उनके दिया। और थोड़े ही समय में पाण्डवों के आश्रम प्राणों की रक्षा कीजिए । वैशम्पायन ने कहा- में पहुंचकर उसने देखा, कि मृगचर्म ओढे हुए युधि राजा जनमेजय ! बुद्धिमान् विदुर मंजय की उक हिर, देवताओं की मण्डली में इन्द्र के समान, विदुर यात को सुनकर धर्मराज की अनुमति से फिर नि- ममेत हजारों ब्रामणों और चारों भाइयों के बीच में । नापुर को लौट आये ॥१५॥१८॥ Torre ricourTTIILLOTTENBCIETmcrudera'crerfirrorifl! - + INDIODMIUIIMIMADILAMOUMMODIDIUITMIDULTUDIOAAMTIMMIDIORAMOLUMTO . महा मारत न अध्याय ६] १४६. JanmrawrrammaramanrammarAALITORainmann.muTERMITrilim.DESI युधिष्ठिरस्यानुमते पुनरायागजाह्वयम् ॥ १८ ॥ तमब्रवीन्महातेजा धृतराष्ट्रोऽम्बिकासुतः दिष्टया प्राप्तोऽसि धर्मज्ञ! दिष्ट्या स्मरसिमेऽनघ!॥ १९ ॥ अद्य चाहं दिवा रात्रौ त्वत्कृते भरतर्षभ ! प्रजागरे प्रपश्यामि विचित्रं देहमात्मनः ॥ २०॥ सोऽङ्कमानीय विदुरं मूर्धन्याधाय चैव ह क्षम्यतामिति चोवाच यदुक्तोऽसि मयाऽनघ ! ॥ २१ ॥ विदुर दबाच-क्षान्तमेव मया राजन्गुरुमें परमो भवान् एपोऽहमागतः शीघ्रं त्वदर्शनपरायणः ॥ २२॥ भवन्ति हि नरव्याघ्र ! पुरुषा धर्मचेतसः दीनाभिपातिनो राजन्नात्र कार्या विचारणा ॥ २३ ॥ पाण्डोः सुता यादृशा मे तादृशास्तव भारत ! । दीना इतीव मे बुद्धिरभिपन्नाऽद्य तान्प्रति ॥ २४ ॥ वैशम्पायन उवाच-अन्योन्यमनुनीयेवं भ्रातरौ द्वौ महाद्युती विदुरो धृतराष्ट्रश्च ले भाते परमां मुदम् ॥ २५॥ इति श्रीमन्महाभारते वनपर्वणि आरण्यकपर्वणि विदुरप्रत्यागमनं नाम पष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥ महातेजस्वी धृतराष्ट्र ने विदुर को आया हुआ | मैं सदा ही क्षमायुक्त रहता हूँ । आप तो मेरे परम जानकर कहा-हे निप्पाप ! मेरा बड़ा सौभाग्य है | गुरु हैं । मैं आपके दर्शनों की इच्छा से शीघ्र चला जो तुम मुझे याद करके फिर हस्तिनापुर में आ गये । आया हूँ। हे महाराज ! धर्मात्मा लोग सदा दुखी हे भरतश्रेष्ठ ! तुम्हारे शोक में मुझ को रात्रि भर मनुष्यों का पक्ष लेते हैं, इस में कुछ सन्देह करने निद्रा नहीं आई। जागते जागते मेरे शरीर का रस की बात नहीं है । निस्सन्देह मेरे लिये जैसे आपके पलट गया है । यह कह कर अब धृतराष्ट्र ने विदुर । पुत्र हैं, वैसे ही पाण्डव भी है, परन्तु पाण्डव दुःखी जी को अपनी गोद में बैठा लिया और फिर उनका हैं, इससे मेरा मन उनकी ओर विशेष है। माथा सूंघकर वे कहने लो-हे निष्पाप ! जो कुछ वैशम्पायन ने कहा-हे राजा जनमेजय ! इसके पीछे मैंने तुमसे कहा है, उसको क्षमा करो ॥१९॥२१॥ वह दोनों भाई परस्पर मिलकर बहुत प्रपन्न हुए । यह सुनकर विदुर जी ने कहा-हे महाराज ! ॥२२॥२५॥ वनपर्व का छठा अध्याय समाप्त हुआ ॥ ६ ॥ - । ।

( बन ruaruMIUMUDWpTUTOLUTUMNDI ."PANCorom म हा मा र त TIMImmmmmmmmmmmmmm.anamamalinumarimmurarumauwnlHTOTH अथ सप्तमोऽध्यायः ॥७॥ वैशम्पायन उवाच-श्रुत्वा च विदुरं प्राप्तं राज्ञा च परिसान्वितम् । धृतराष्ट्रात्मजो राजा पर्यतप्यत दुर्मतिः स सौवलेयमानाय्य कर्णदुःशासनौ तथा अब्रवीद्वचनं राजा प्रविश्याऽवुद्धिजं तमः एप प्रत्यागतो मन्त्री धृतराष्ट्रस्य धीमतः विदुरः पाण्डुपुत्राणां सुहृद्विद्वान्हिते रतः यावदस्य पुनर्बुद्धिं विदुरो नाऽपकर्पति पाण्डवाऽऽनयने तावन्मन्त्रयध्वं हितं मम अथ पश्याम्यहं पार्थान्प्राप्तानिह कथंचन पुनः शोषं गमिष्यामि निरम्बुर्निरवग्रहः विपमुद्बन्धनं चैव शस्त्रमग्निप्रवेशनम् करिष्ये न हि तानृद्धान्पुनामिहोत्सहे शकुनिरुवाच-किं वालिशमतिं राजन्नास्थितोऽसि विशांपते!। गतास्ते समयं कृत्वा नैतदेवं भविष्यति सत्यवाक्ये स्थिताः सर्वे पाण्डवा भरतर्षभ! । पितुस्ते वचनं तात!न ग्रहीष्यन्ति कर्हिचित् ॥ ८ ॥ सातवां अध्याय ॥ ७ ।। वैशम्पायन कहते हैं-हे राजा जनमेजय ! तबतक उससे पहले ही तुम मेरी भलाई का उपाय विदुर जी के लौट आन की और धृतराष्ट्र के द्वारा करो । यदि पाण्डव किसी तरह फिर आ गये, तो विदुर को सान्त्वना मिलने की सूचना पाकर, दुर्बुद्धि मै फिर दुर्बल और उदास हो जाऊँगा.. मै खाना दुर्योधन को बड़ा दुःख हुआ । अज्ञान के अधेरे पीना छोड़ दूंगा । तब मै विष खा लूँगा, या ग्रीवा में अन्धा हो रहा दुर्योधन, शकुनि, कर्ण और में फाँसी लगाकर मर जाऊँगा अथवा आग में जल दुःशासन को बुलाकर उनसे कहने लगा-देखो, गजा मरूंगा, किन्तु पाण्डवों की समृद्धि को देख न धृतराष्ट्र के बुद्धिमान् मन्त्री विदुर फिर आ गये । सकूँगा ॥१६॥ वे पाण्डवों के सुहृद है और सदैव उनके हित में यह सुनकर शकुनि ने कहा-हं राजन् ! तुम प्रीति रखते है । इसलिए विदुर, जब तक पिता जी किसलिये मूढ पुरुष की तरह चिन्ता कर रहे हो' को पाण्डवों को फिर बुलाने की सलाह नहीं देते, पाण्डव तो समय की अवधि करके वन को गये हैं। GUNJASTHorom.imaMITERROTEIRTEDumaem.mummymuteTRATEILLERY دلارام للولدنافاداتنا اعرفأدفوع . .

है Amr.uii. ra.HimanaMIRMIRIT - वैशम्पायन उवाच- बात नहीं है। हम फिर उनको जुए में जीत लेंगे और तुम्हारा हित करने के लिये पाण्डवों के दोषों को देखकर, अपन दृढ़ मंत्र को छिपा कर, धृतराष्ट्र दुःशासन ने कहा-हे मामा जी! आप बड़े ज्ञानी हैं। आपने ठीक-ठीक कहा है। मुझे आप की बुद्धि अध्याय ७] महाभारत १४६७ painmmm.waummmmmmmmmunymnGHTINAINITIVITrmananmaanimumnimE अथवा ते ग्रहीष्यन्ति पुनरेप्यन्ति वा पुरम् निरस्य समयं सर्वे पणोऽस्माकं भविष्यति सर्वे भवामो मध्यस्था राज्ञश्छन्दानुवर्तिनः 'छिद्रं बहु प्रपश्यन्तः पाण्डवानां सुसंवृताः ॥ १० ॥ दुःशासन उवाच-एवमेतन्महाप्राज्ञ ! यथा वदसि मातुल ! नित्यं हि मे कथयतस्तव बुद्धिर्हि रोचते ! कर्ण उवाच-काममीक्षामहे सर्वे दुर्योधन ! तवेप्सितम् ऐकमत्यं हि नो राजन्सर्वेपामेव लक्षये ॥ १२ ॥ नागमिष्यन्ति ते धीरा अकृत्वा कालसंविदम् । आगमिष्यन्ति चेन्मोहात्पुनीतेन ताञ्जय -एवमुक्तस्तु कर्णेन राजा दुर्योधनस्तदा नाऽतिदृष्टमनाः क्षिप्रमभवत्स पराङ्मुखः ॥ १४ ॥ उपलभ्य ततः कर्णो विवृत्य नयने शुभे रोपाद्दुःशासनं चैव सौवलं च तमेव च उवाच परमक्रुद्ध उद्यम्यात्मानमात्मना अथो मम मतं यत्तु तन्निवोधत भूमिपाः ! प्रियं सर्वे करिष्यामो राज्ञः किंकरपाणयः इमलिए तुम जैसा विचार कर रहे हो, वैसा होना सदैव रुचती है ॥७॥११॥ असम्भव है । हे भरतश्रेष्ठ ! पाचों पाण्डव सत्य- इसके पीछे कर्ण ने कहा-हे राजन् ! हम परायण हैं । सत्य को छोड़ कर वे कभी धृतराष्ट्र लोग एकमत होकर, मदा तुम्हारा हित सोचा करते की बात न मानेंगे; अथवा यदि वे अपनी प्रतिज्ञा है । पाण्डव समय को बिताये बिना कभी नहीं छोड़ कर चले भी आगे, तो भी कुछ चिन्ता की आवेग और जो आवेगे भी, तो उनका हम सब फिर जुए में जीत लेंगे ॥१२॥१३॥ वैशम्पायन ने कहा हे गजा जनमेजय ! कर्ण की बात को सुनकर दुर्योधन ने अप्रसन्नता मे अपना की आज्ञापूर्वक मध्यस्थ हो जायेंगे। यह सुनकर मुख फेर लिया । यह देखकर कर्ण दुर्योधन के मन की बात को पहिचान गया और क्रोध से नत्र फाड़ कर शकुनि और दुःशामन से कहने लगा-राजा का CRIMIREOnmainamaiamanaianा। MUMIDIOLMELANDU LATIMIMIMIMIMMITTIMITA mumITAHARIYAR [ वनपर्व - IELAMMATIMAMALINIMIZEXAMINAMMIDAIL.CCHIMLAINIK TryamanamamaximnanmmmmmMINDIATIMD.ThimirmanuTRIT १४६८ म हा भारत Immmmuniamromimmiummmmmmmmomommmmmmmmmmmurmammar न चाऽस्य शक्नुमः स्थातुं प्रियं सर्वे ह्यतन्द्रिताः ॥ १७ ॥ वयं तु शस्त्राण्यादाय रथानास्थाय दंशिताः गच्छामः सहिता हन्तुं पाण्डवान्वनगोचरान् ॥ १८ ॥ तेपु सर्वेषु शान्तेषु गतेष्वविदितां गतिम् निर्विवादा भविष्यन्ति धार्तराष्ट्रास्तथा वयम् ॥ १९ ॥ यावदेव परिघुना यावच्छोकपरायणाः यावन्मित्रविहीनाश्च तावच्छक्या मतं मम ॥ २० ॥ तस्य तद्वचनं श्रुत्वा पूजयन्तः पुनः पुनः वाढमित्येव ते सर्वे प्रत्यूचुः सूतजं तदा एवमुक्त्वा सुसंरब्धा रथैः सर्वे पृथक्पृथक् निर्ययुः पाण्डवान्हन्तुं सहिताः कृतनिश्चयाः ॥ २२ ॥ तान्प्रस्थितान्परिज्ञाय कृष्णद्वैपायनः प्रभुः आजगाम विशुद्धात्मा दृष्ट्वा दिव्येन चक्षुषा ॥ २३ ॥ प्रतिषिध्याथ तान्सर्वान्भगवाँल्लोकपूजितः प्रज्ञाचक्षुषमासीनमुवाचाभ्येत्य सत्वरम् इति श्रीम-महाभारते वनपर्वणि आरण्यकपर्वणि व्यासगमनं नाम सप्तमोऽध्यायः ॥ ७॥ प्रिय करना अनुचरों का प्रधान कर्त्तव्य है । हम यह सुन करके सब के सब कर्ण की प्रशंसा लोग दुर्योधन का हित करना चाहते हैं; किन्तु | करने लगे और बहुत अच्छा' कहकर, क्रोध कर राजा धृतराष्ट्र हम लोगों को रोके हुए है ॥१४|१७|| करके, अलग-अलग रथों में चढ़-चढ़कर, पाण्डवों इस लिऐ मेरी समझ में हम सब शस्त्र लिये / को मारने के लिये नगर से बाहर निकले। उन्हें हुए रथों पर चढ़-चढ़कर, वन को चलें और पाण्डवों । पाण्डयों को मारने के लिये जाते देखकर, लोकपूजित को मार डालें, उनके मरने पर ये सब धृतराष्ट्र के ! भगवान् वेदव्यास ने, दिव्यदृष्टि से अच्छी तरह पुत्र और हम सब बेखटके हो जायेंगे। क्योंकि सब देख भालकर, रास्ते से ही उन्हें लौटा दिया । जब तक पाण्डव दुखी और मित्रहीन है, तब तक इसके पश्चात् वे उस अन्ध राजा धृतराष्ट्र के पास उनको जीत लेना बड़ी बात नहीं है ॥१८।२०|| गये और कहने लगे ॥२१॥२४॥ वनपर्व का सातवां अध्याय समाप्त हुआ ॥७॥ .. - ANTATARISTMETRONHAIRLIRMIRMILIATImmuTOOTTRAININARMARTAIRAIMIMURARIANTERTAINMENT अध्याय ८] म हा भारत १४६९ ARRIAnimammmmmsumanmawrmummmuuGINITorrarICTIMILIATurmanima अथ अष्टमोऽध्यायः ॥ ८॥ व्याम उवाच--- mpanion MARATarrammarwanceramanawamwamiaawitamanuman.amommararary धृतराष्ट्र ! महाप्राज्ञ ! निवोध वचनं मम वक्ष्यामि त्वां कौरवाणां सर्वेषां हितमुत्तमम् ॥ १ ॥ न मे प्रियं महाबाहो ! यद्गताः पाण्डवा वनम् । निकृत्या निकृताश्चैव दुर्योधनपुरोगमः ते स्मरन्तः परिक्लेशान्वर्षे पूर्णे त्रयोदशे विमोक्ष्यन्ति विपं क्रुद्धाः कौरवेयेषु भारत! तदयं किं नु पापात्मा नव पुत्रः सुमन्दधीः पाण्डवान्नित्यसंकुदो राज्यहेतोर्जिघांसति वार्यतां साध्वयं मूढः शमं गच्छतु ते सुतः वनस्थांस्तानयं हन्तुमिच्छन्प्राणान्विमोक्ष्यति ॥ ५ ॥ यथा हि विदुरः प्राज्ञो यथा भीष्मो यथा वयम्। यथा कृपश्च द्रोणश्च तथा साधुर्भवानपि विग्रहो हि महाप्राज्ञ! स्वजनेन विगर्हितः अधर्म्यमयशस्यं च मा राजन् ! प्रतिपद्यताम् ॥ ७ ॥ समीक्षा यादृशी ह्यस्य पाण्डवान्प्रति भारत! । उपेक्ष्यमाणा सा राजन् ! महान्तमनयं स्पृशेत् ॥ ८ ॥ आठवा अध्याय॥८॥ व्यास जी ने कहा-हे राजा धृतराष्ट्र ! मै सब पाण्डवों के नाश की चेष्टा किया करता है । इस कारवों की भलाई के लिये तुमसे जो कहता हूँ, सो लिये जो तुम पुत्र का भला चाहत हो, तो दुर्बुद्धि एकचित्त होकर सुनो । दुर्योधन आदि तुम्हारे पुत्रों दुर्योधन को इस बुरी चेष्टा से रोको । वनवासी बड़ा भारी छन करके पाण्डवों को बनवाम दे पाण्डवों को मारने जाकर वह आप ही अपने प्राण दिया है, यह सुनकर मैं अत्यन्त दुखित हुआ हूँ। खो बैठेगा ॥१॥५॥ हे भरतश्रेष्ठ । पाण्डव लोग बनवास में रहकर जो हे महाराज ! महापाज विदुर, भीष्म, द्रोणाचार्य, लेश सह रहे हैं, वह निःसन्देह उन्हें मरण रहेगा। कृपाचार्य आदि हम लोगों के समान तुम भी सचन तेरह वर्ष व्यतीत होने पर वे अवश्य बदला चुकाने । पुरुष हो । हे महामाज्ञ ! भाई-बन्धुओं के माथ का उपाय करेंगे । अत्यन्त कुबुद्धि पापी दुर्योधन विरोध करना निदिन्त अधर्मरूा और अयश का ऐश्वर्य के लोभ से बहुत ही उतावला होकर सदा | करनेवाला है । इसलिए इस अधर्मयुक्त काम में WWEDDIDIOHOTOCHOOCHIDIDIOMETHIMITrurrenMULTIOECator TOLTILIUNITEILLION Trinnnnnt TUTA ने - महा मारत [ वनपर्व BORATORRENTLILMuhammmmrainraniumommammiumuTISANILIT.LI -- - rrianRGINirutarini.DILIT.LTara rammaratachammsrandikhaniना । अथवाऽयं सुमन्दात्मा वनं गच्छतु ते सुतः पाण्डवैः सहितो राजन्नेक एवाऽसहायवान् ततः संसर्गजः स्नेहः पुत्रस्य तव पाण्डवैः यदि स्यात्कृतकार्योऽद्य भवेस्त्वं मनुजेश्वर ! ॥ १० ॥ अथवा जायमानस्य यच्छीलमनुजायते श्रूयते तन्महाराज! नामृतस्यापसर्पति कथं वा मन्यते भीष्मो द्रोणोऽथ विदुरोऽपि वा। भवान्वाऽत्रक्षम कार्य पुरा, वोऽर्थों निवर्तते ॥ १२ ॥ इति श्रीमन्महाभारते वनपर्वणि आरण्यकपर्वणि व्यामवाक्यं नाम अष्टमोऽध्यायः ।। ८॥ हाथ न लगाना । हे कौरवो ! पाण्डयों के प्रति इस । हो सकता है । अथवा जिस मनुष्य का जैसा स्वभाव दुर्योधन की जिस प्रकार की कुबुद्धि है, वह छोड़ जन्म के समय होता है, प्राणान्त होने तक नहीं देनी चाहिए, नहीं तो बड़ा भारी अनर्थ हो जावेगा। जा सकता। इसलिये वैसा होने की सम्भावना कहा मेरी सम्मति है, कि तुम्हारा दुराचारी पुत्र असहाय । है ? जो हो, भीष्म, द्रोणाचार्य, विदुर और तुम इस होकर पाण्डवों के साथ वन को जावे । यदि पास विषय में क्या सोचते हो ? तुम लोगों की क्या रहने के कारण, पाण्डवों के लिय उसके हृदय में | सम्मति है ! जिससे अन्त में कुछ अनिष्ट न हो, स्नेह उत्पन्न हो जाय, तो तुम्हें अपने काम में सफलता वमा उचित उपाय करना हम सब का कर्तव्य है, प्राप्त हो सकती है, अर्थात् तुम्हारे पुत्रों का भला नहीं तो तुम्हारी बड़ी हानि होगी ॥६॥१२॥ वनपर्व का आठवां अध्याय समाप्त हुआ ॥ ८ अथ नवमोऽध्यायः ॥ ९॥ धृतराष्ट्र उवाच-भगवन्नाहमप्येतद्रोचये द्यूतसम्भवम् मन्ये तद्विधिनाऽऽकृष्य कारितोऽस्मीति वै मुने! ॥ १ ॥ नैतद्रोचयते भीष्मो न द्रोणो विदुरो न च गान्धारी नेच्छति द्यूतं तत्र माहात्प्रवर्तितम् ॥ २ ॥ परित्यक्तुं न शक्नोमि दुर्योधनमचेतनम् नवमां अध्याय ॥ ९॥ व्यास जी की उक्त बात को सुनकर धृतराष्ट्र | अनुमोदन कर दिया या । भीष्म, विदुर, द्रोणाचार्य कहने लगे-हे महाराज ! द्यूतक्रीड़ा के लिये मेरी और गान्धारी ने भी उसका विरोध किया था । हे इच्छा न थी। दैव ही की प्रेरणा से मैंने उसका महाराज ! मैं सब दोषों को जानता हूँ, परन्तु क्या mommmmmmmmmmmmmmmmmmmmunanaanwrmaramitraamammarm.cDIUIDAICTED www..caranamanna .

। - Imamammi... HINEALITIELD CHUIDAReceILIARRIALI अध्याय ९] म हा भारत WATERMEETImmurrITTLENTIOWHATMAMITTImran mammII amamrifictirrrrrn पुत्रस्नेहेन भगवञ्जानन्नपि प्रियव्रत ! व्यास उवाच-वैचित्रवीर्य ! नृपते ! सत्यमाह यथा भवान् दृढं विद्मः परं पुत्रं परं पुत्रान्न विद्यते इन्द्रोऽप्यश्रुनिपातेन सुरभ्या प्रतिबोधितः अन्यैः समृद्धरप्यर्थन सुतान्मन्यते परम् अत्र ते वर्तयिष्यामि महदाख्यानमुत्तमम् सुरभ्याश्चैव संवादमिन्द्रस्य च विशांपते ! त्रिविष्टपगता राजन्सुरभी प्रारुदत्किल गवां माता पुरा तात ! तामिन्द्रोऽन्वकृपायत ॥ ७ ॥ इन्द्र वाच-किमिदं रोदिपि शुभे! कञ्चित्क्षेमं दिवौकसाम् । मनुष्येष्वथ नागेपु नैतदल्पं भविष्यति ॥ ८ ॥ सुरभिरुवाच-विनिपातो न ते कश्चिदृश्यते त्रिदशाऽधिप! । अहं तु पुत्रं शोचामि तेन रोदिमि कौशिक ! ॥ ९ ॥ पश्यैनं कर्पकं क्षुद्रं दुर्वलं मम पुत्रकम् प्रतोदेनाभिनिघ्नन्तं लागलेन च पीडितम् ॥ १० ॥ निपीदमानं सोत्कण्ठं वध्यमानं सुराऽधिप ! करूँ, पुत्र के स्नेह से मैं अपने अज्ञानी पुत्र दुर्योधन | और उसे रोती हुई देखकर कहने लगा-हे कल्याणी ! को त्याग नहीं सकता हूँ ॥१३॥ तुम किसलिए रोती हो ? देवलोक, मनुष्यलोक, और यह सुनकर व्यास जी ने कहा-हे धृतराष्ट्र ! | नागलोक में तो कुछ अनिष्ट नहीं हुआ ! ॥४८|| तुम सत्य कहते हो । संसार में पुत्र से बढ़कर और यह सुनकर कामधेनु ने कहा-हे देवेन्द्र ! मैं कोई पदार्थ नहीं । परन्तु जिस पुत्र के कारण से तो पुत्र-शोक से खिन्न होकर रो रही हूँ। देखो, शोक उत्पन्न हो, उस पुत्र को मैं शत्रु के समान यह नीच किसान मेरे दुर्बल पुत्र को, जो अपने बल जानता हूँ । अब मै तुमको इन्द्र और कामधेनु का के अनुसार हल को खींच रहा है, कोड़ों से मार रहा उपाग्न्यान सुनाता हूँ, जिसमें इन्द्र ने कामधेनु को है और बड़ा कट दे रहा है। मुझसे वह दु.ख देखा रोते हुए देखकर और-और कारणों से यह समझ नहीं जाता । मेरा पुत्र व्याकुल होकर बार-बार बैठ लिया, कि पुत्र से अधिक कुछ नहीं है । एक समय जाता है,तो पीटा जाता है। इन दोनों मेरे पुत्रों में ऐसा हुआ, कि स्वर्ग में गौओं की माता कामधेनु एक बलवान् है, इसी कारण अधिक बोझ लाद रो रही थी। उसी समय वहां इन्द्र भी आ गया सकता है । दूसरा दुर्वल है । उसके शरीर में हड्डियां MNSTRUTD ITSHTOTHROOMDIOmmmmmmmmmmmTIMITIOIROIDIOININE - -rrrenParenatamund TICALMALELILLULU १४७२ महा मारत [ वनपर्व BurmwarRUARUITATuointruminimuUMTAINMENINITIOUTINATIm 1 S.2mmusauILLINUXUXAMINATAULAMI कृपाऽऽविष्टास्मि देवेन्द्र ! मनथोद्विजते मम एकस्त्वत्र बलोपेतो धुरमुबहतेऽधिकाम् अपरोऽप्यवलप्राणः कृशो धमनिसन्ततः कृच्छ्रादुद्वहते भारं तं वै शोचामि वासव ! वध्यमानः प्रतोदेन तुद्यमानः पुनः पुनः नैव शक्नोति तं भारमुद्रोढुं पश्य वासव! ततोऽहं तस्य शोकार्ता विरोमि भृशदःखिता । अश्रूण्यावर्तयन्ती च नेत्राभ्यां करुणायती ॥ १४ । शक्र उवाच-तव पुत्रसहस्रेषु पांड्यमानेषु शोभने ! किं कृपायितवत्यत्र पुत्र एकत्र हन्यति* ॥ १५ ॥ सुरभिरुवाच-यदि पुत्रसहस्राणि सर्वत्र समतैव मे दीनस्य तु सतः शक ! पुत्रस्याभ्यधिका कृपा ॥ १६ ॥ व्यास उवाच-तदिन्द्रः सुरभीवाक्यं निशम्य भृशविस्मितः जीवितेनापि कौरव्य ! मेनेऽभ्यधिकमात्मजम् ॥ १७ ॥ प्रववर्ष च तत्रैव सहसा तोयमुल्वणम् कर्पकस्याचरन्विघ्नं भगवान्पाकशासनः तद्यथा सुरभिः प्राह समवेतास्तु ते तथा ही हड्डिपां देख पड़ती हैं। इसी कारण यह अधिक बोझ उसे दीन देखकर मेरे हृदय में अत्यन्त करुणा होती नहीं लाद सकता। हे इन्द्र ! देखो, बार-बार, कोड़े की | है। व्यासजी कहते हैं,कामधेनु के ये वचन सुनकर इन्द्र मार खाकर भी वह अधिक परिश्रम नहीं कर सकता। को बड़ा आश्चर्य हुआ। उन्होंने समझ लिया कि संसार इस कारण मैं अत्यन्त दुःखित और शोकाकुल होकर में पुत्र प्राणों से भी बढ़कर प्यारा होता है । इसके आंसू बहाती हुई करुण स्वर से रो रही हूँ ॥९१४॥ | पश्चात् उस किमानके उक्त निष्ठुर कार्य में विघ्न डालने यह सुनकर,इन्द्र ने कहा-हे शोभने ! तुम्हारे हजारों के लिये इन्द्र ने लगातार मूसलाधार वर्षा की।१५६१८ पुत्र पीड़ित हो रहे हैं, फिर तुम केवल एक को ही ऐसी हे धृतराष्ट्र ! जैसा कामधेनु ने कहा था उसी दशा में देखकर दुःखित क्यों हो रही हो? कामधेनु ने प्रकार से यद्यपि कई पुत्र मनुष्य के हो परन्तु जो कहा-हे इन्द्र ! हां, मेरे हजारों पुत्र हैं और उनपर दीन और दुखी होता है उस पर विशेष प्रीति होती मेरा स्नेह भी समान है। परन्तु जो पुत्र परोपकारी है, | है। मेरा पुत्र जैसा पाण्ड था वैसा ही तुम और हिन्यति- हन्यमाने इत्यर्थः । कृपायितवती-कृपां कृतवतात्यर्थः। παιτοτιττεττττττττττττατταιιπιπππττητττοιτιττττσιστής maxmans.wml.axa.aamaarnamusamisamasi.ma.mATREATIRar.com.aamRIED । FUL on.onemarar Crm .... राजा लोग और भीष्म, विदुर और द्रोणाचार्य भी कौरवों का उदय ही चाहते है। परन्तु जो आपका SUMMITMDIVIDUADIMIMGDILAIIMIRIDIURDUMDM १४७३ अध्याय १० महा मारत LATORREmmmhirunmantaram ormummyTIANRAImaamirmentinuarOTTONarmilia aynamULDHOLIDUOTTRODURIN सुतेषु राजन् ! सर्वेषु हीनेप्वभ्यधिका कृपा यादृशो मे सुतः पाण्डुस्तादृशो मेऽसि पुत्रक!। विदुरश्च महाप्राज्ञः स्नेहादेतद् ब्रवीम्यहम् चिराय तव पुत्राणां शतमेकश्च भारत ! पाण्डोः पञ्चैव लक्ष्यन्ते तेऽपि मन्दाः सुदुःखिताः॥ २१ ॥ कथं जीवेयुरत्यन्तं कथं वर्धयुरित्यपि इति दीनेषु पार्थेषु मनो मे परितप्यते ॥ २२ ॥ यदि पार्थिव ! कौरव्याञ्जीवमानानिहेच्छसि । दुर्योधनस्तव सुतः शमं गच्छतु पाण्डवैः ॥ २३ ॥ इति श्रीमन्महाभारते वनपर्वणि आरण्यकपर्वणि सुरभ्युपाख्यानं नाम नवमोऽध्यायः ॥ ९ ॥ विदुर हो, मेरे लिये सभी एक जैसे है। परन्तु तुम्हारे | रहेंगे और किस उपाय से उनकी उन्नति होगी। तो एक सौ एक पुत्र हैं और पाण्डु के केवल पाच ही । इसलिये हे राजा धृतराष्ट्र ! यदि तुम कौरवों को पुत्र हैं और वे पाच भी अत्यन्त दुःखी हैं। उनकी जिलाना चाहते हो,तो अपने पुत्र दुर्योधन और पाण्डवों ऐमी दशा देखकर दिन-रात इसी चिन्ता से मेरा का मिलाप करा दो ॥१९॥२३॥ हृदय सन्तप्त हो रहा है, कि किस तरह वे जीवित । वनपब का नवमां अध्याय समाप्त हुआ ॥ ९॥ अथ दशमोऽध्यायः ॥१०॥ धृतराष्ट्र उवाच--एवमेतन्महाप्राज्ञ ! यथा वदसि नो मुने ! अहं चैव विजानामि सर्वे चेमे नराधिपाः भवांश्च मन्यते साधु यत्कुरूणां महोदयम् तदेव विदुरोऽप्याह भीष्मो द्रोणश्च मां मुने ! ॥ २ ॥ यदि त्वहमनुग्राह्यः कौरव्येषु दया यदि अनुशाधि दुरात्मानं पुत्रं दुर्योधनं मम दसवां अध्याय ॥ १० ॥ धृतराष्ट्र ने कहा-हे महामुनि ! आप सत्य मेरे ऊपर अनुग्रह है, कौरयों पर दया है, तो आप कहते हैं । मैं भी ऐसा ही जानता हूँ और ये सब मेरे दुष्ट पुत्र को शिक्षा दीजिए । यह सुनकर व्याम जी ने कहा-हे कौरव ! आज मैत्रेय ऋपि पाण्डयों के पास होते हुए हम लोगों को देखने आ रहे है। aranMEROLIL ' १४७४ महा मारत [वन BurenTumoudhaDinwu DDITIALDIDIAuyYSARALIRTUALEFuturn व्यास उयाच-अयमायाति वै राजन् ! मैत्रेयो भगवानृषिः । अन्विष्य पाण्डवान्भ्रातृनिहैत्यस्मदिक्षया एष दुर्योधनं पुत्रं तव राजन् ! महानृपिः अनुशास्ता यथान्यायं शमायास्य कुलस्य च ॥ ५ ॥ ब्रूयाद्यदेष कौरव्य ! तत्कार्यमविशङ्कया अक्रियायां तु कार्यस्य पुत्रं ते शप्स्यते रुपा वैशम्पायन उवाच-एवमुक्त्वा ययौ व्यासो मैत्रेयः प्रत्यदृश्यत पूजया प्रतिजग्राह सपुत्रस्तं नराधिपः अर्घाद्याभिः क्रियाभिर्वे विश्रान्तं मुनिसत्तमम् । प्रश्रयेणाब्रवीद्राजा धृतराष्ट्रोऽम्बिकासुतः सुखेनाऽऽगमनं कच्चिद्भगवन् ! कुरुजाङ्गलान् ? । कञ्चित्कुशलिंनो वीरा भ्रातरः पञ्च पाण्डवाः ? ॥ ९ ॥ समये स्थातुमिच्छन्ति कच्चिच्च भरतर्षभाः ? कच्चित्कुरूणां सौभ्रात्रमव्युच्छिन्नं भविष्यति ? ॥ १०॥ मैत्रेय उवाच-तीर्थयात्रामनुक्रामन्प्राप्तोऽस्मि कुरुजाङ्गलान यदृच्छया धर्मराजं दृष्टवान्काम्यके वने तं जटाऽजिनसंवीतं तपोवननिवासिनम् वह तेरे पुत्र को न्याय के अनुसार कुल की शांति जङ्गल से यहां आते समय आप को कुछ दुःख तो के लिये शिक्षा करेंगे ॥१५॥ नहीं हुआ ! पांचों पाण्डव कुशल से है न ! वे अपने सो तुम को जो कुछ यह कहें, गका रहित करना प्रण को पूरा करना चाहते हैं न ! कुरुवंशियों की उचित है और जो तुम अवश्य करने के योग्य काम को भ्रातृ सम्बन्धी प्रीति तो नाश न होगी:॥६॥१०॥ न करोगे, तो मैत्रेय जी तुम्हारे पुत्र को शाप दे देंगे। यह सुनकर मैत्रेय जी ने कहा-हे महाराज ! मैं वैशम्पायन ने कहा-हे राजा जनमेजय! व्यास जी उक्त तीर्थयात्रा करता हुआ अकस्मात् काम्यक वन में जा प्रकार से कहकर चले गये और मैत्रेय ऋषि ने आकर निकला था और वहां मैंने धर्मराज युधिष्ठिर को दर्शन दिये। राजा धृतराष्ट्र ने अपने पुत्र सहित उनको देखा । उस वन में उम महात्मा युधिष्ठिर को देखने बड़े आदर-सत्कार से लिया और विधि के अनुसार अर्घ की इच्छा से बहुत से मुनि लोग आये थे । मैंने आदि से उनकी पूजा की। इसके पश्चात् विश्राम कर वहां पर तुम्हारे पुत्र के जुआरूपी अनर्थ और अनीति चुकनेपर राजा धृतराष्ट्र कहने लगे-हे महाराज ! कुरु और बड़े भय का हाल सुना था । यह सुनकर mmm.m...amisamanna...amisa.sa.tvan.kamininatanAnnapurna . में LYRIMINATIONALITIALISUTROMINATIVINIYAMIRMILARITAINMAMARIES १४७५ महा मा रत अध्याय १०] Drmanaormaanmnmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmm.armHITARName ॥ १२ ॥ rintureuarATIONALITY MERIDHIANDIENTOTILTIATTIPTE समाजग्मुर्महात्मानं द्रष्टुं मुनिगणाः प्रभो! तत्राश्रीपं महाराज! पुत्राणां तब विभ्रमम् अनयं धृतरूपेण महाभयमुपस्थितम् ॥ १३ ॥ नतोऽहं त्वामनुप्राप्तः कौरवाणामवेक्षया सदा ह्यभ्यधिकः स्नेहः प्रीतिश्च त्वयि मे प्रभो!॥ १४ ॥ नैतदोपयिकं राजंस्त्वयि भीष्मे च जीवति यदन्योऽन्येन ते पुत्रा विरोध्यन्ते कथंचन मेढीभूतः स्वयं राजन् ! निग्रहे प्रग्रहे भवान् । किमर्थमनयं घोरमुत्पद्यन्तमुपेक्षसे दस्यूनामिव यवृत्तं सभायां कुरुनन्दन ! तेन न भ्राजसे राजस्तापसानां समागमे वैशम्पायन उवाच-ततो व्यावृत्य राजानं दुर्योधनममर्षणम् उवाच श्लक्ष्णया वाचा मैत्रेयो भगवानृषिः ॥१८॥ मैत्रय उवाच-दुर्योधन ! महाबाहो ! निबोध वदतांवर ! वचनं मे महाभाग ! ध्रुवतो यद्धितं तव ॥ १९ ॥ मा द्रुहः पाण्डवाराजन् ! कुरुष्व प्रियमात्मनः । पाण्डवानां कुरूणां च लोकस्य च नरर्पभ! ते हि सर्वे नरव्याघ्राः शूरा विक्रान्तयोधिनः । सर्वे नागायुतप्राणा वज्रसंहनना दृढाः ॥ २१ ॥ तुम्हारी प्रीति और स्नेह के कारण से कौरवों को मण्डली में शोभा नहीं देती हैं । वैशम्पायन ने कहा- देखने को यहां चला आया हूँ | सो मुझका बड़ा हे राजा जनमेजय ! इसके पश्चात् भगवान् मैत्रेय आश्चर्य है, कि तुम्हारे और भीष्म के जीते जी तुम्हारे जी ने सम्मुख होकर मधुर वाणी से दुर्योधन से पुत्रों में क्योंकर विरोध हुआ ॥११॥१५॥ कहा-हे महाबाहो ! हे महामाग दुर्योधन ! मैं तुम को दण्ड देने और अनुग्रह करने का तुम्हारे हित के लिये जो कहता हूँ, सो सुनो। तुम सब अधिकार था, फिर क्या कारण है, जो तुमने । पाण्डवों से विरोध मत करो। हे भाई! ऐसा काम करो, ऐसी अनीति होने दी । तुम्हारी सभा में चोरों की जिसमें तुम, पाण्डव, कौरव और सब संमार प्रसन्न सी जो-जो बातें हुई, वह तुम जस तपस्वियों की हो । हे भाई ! पाण्डव बड़े शूरवीर, पड़े पराक्रमी ETWITTEERUTwimmDRILLIANCEmxnm PHOTaraGEET FULLLLLLLUMAMA Durian Tracht. . DIDIEAUCLICROINiraru १४७६ महा मारत [ वनपर्व ImrnimammalhamanrnmuvimuTMITTI ommuniranummmuTHumawaitinute ETINomaasanSTORARHLEDIDI . सत्यव्रत-धराः सर्वे सर्वे पुरुषमानिनः हन्तारो देवशत्रूणां रक्षसां कामरूपिणाम् ॥ २२ ॥ हिडिम्ब-बकमुख्यानां किर्मीरस्य च रक्षसः इतः प्रद्रवतां रात्रौ यः स तेषां महात्मनाम् ॥ २३ ॥ आवृत्य मार्ग रौद्रात्मा तस्थौ गिरिरिवाचलः तं भीमः समरश्लाघी वलेन बलिनां वरः ॥ २४ ॥ जघान पशुमारेण व्याघ्रः क्षुद्रमृगं यथा . पश्य दिग्विजये राजन् ! यथा भीमेन पातितः ॥ २५ ॥ जरासन्धो महेष्वासो नागाऽयुतवलो युधि सम्बन्धी वासुदेवश्च श्यालाः सर्वे च पार्पताः ॥ २६ ॥ कस्तान्युधि समासीत जरामरणवान्नरः तस्य ते शम एवाऽस्तु पाण्डवैर्भरतर्षभ ! ॥ २७॥ कुरु मे वचनं राजन् ! मा मन्युवशमन्वगाः वैशम्पायन उवाच-एवं तु ब्रुवतस्तस्य मैत्रेयस्य विशांपते ! ऊरं गजकराकारं करेणाऽभिजघान सः दुर्योधनः स्मितं कृत्वा चरणेनोल्लिखन्महीम् ॥ २९ ॥ बड़े योद्धा, दस दस हज़ार हाथियों के समान बड़े । हाथियों का बल रखनेवाले जरासन्ध को वाहु-युद्ध बली,वज रूपी देहधारी और बड़े दृढ़ हैं ॥१६॥२१॥ में माग है। वासुदेव श्रीकृष्णनन्द्र पाण्डयों के परम- इस के सिवा, वे सत्यपतिज्ञ हैं; उन्हें अपने | मित्र हैं और राजा द्रुपद के पुत्र उनके साले हैं। पौरुप का अभिमान है । देखो, उन्होंने हिडिम्ब, ' ॥२२॥२६॥ भक, किार आदि कामचारी देवशत्रु गक्षतों को इसलिये चुदाप और मरण के वशवी मनुष्यों में मारा है । एक दिन, रात्रि के समय, महात्मा पाण्डवों कौन ऐसा साहसी और बलवान् है, जो पाण्डवों से युद्ध को देखकर निशानर किर्मीर पर्वत की तरह अचल करने की इच्छा कर ! हे दुर्योधन ! मेरी यात मानकर मान से उनकी राह रोककर खड़ा हो गया । समर शीघ्र पाण्डवों से मेल कर लो। वैरविरोध मत बदाभो । में पढ़ाई पाने वाल, श्रेष्ठ बली भीमसेन ने बाघ जमे | वैशम्पायन ने कहा-हे राजा जनमेजय ! महर्षि मैत्रेय साधारण पशु को मार डालता है, वसे खेलते खेलते यह कहकर चुप होगये। दुर्वृद्धि दुर्योधन,हाथी की सूड उस निशाचर को मार डाला । इसके सिवा, उन्हीं | सी, अपनी जांघ पर हाथ मारकर मुमकराता हुमा पाव भीमसेन ने दिमिजय के लिये निकल कर, हजार के अंगूठे से पृथ्वी खोदने लगा। वह युछ भी न काकर । HDBPromomDDURADHreyuHDPHOWommueucract FATARIANDED : । - अध्याय १०]] म हा मारत १४७७ யோயோEITIGITHIRINாரராாயாரOOTTITHIUT TILES न किंचिदुक्त्वा दुर्मेधास्तस्थौ किंचिदवाङ्मुखः । तमशुश्रूपमाणं तु विलिखन्तं वसुन्धराम् ॥ ३० ॥ दृष्ट्वा दुर्योधनं राजन् ! मैत्रेयं कोप आविशत् स कोपवशमापन्नो मैत्रेयो मुनिसत्तमः विधिना संप्रणुदितः शापायाऽस्य मनो दधे ततः स वायुपस्पृश्य कोपसंरक्तलोचनः मैत्रेयो धार्तराष्ट्रं तमशपद् दुष्टचेतसम् यस्मात्त्वं मामनादृत्य नेमां वाचं चिकीर्पसि तस्मादस्याऽभिमानस्य सद्यः फलमवाप्नुहि ॥ ३३ ॥ त्वदभिद्रोहसंयुक्तं युद्धमुत्पत्स्यते महत् तत्र भीमो गदाघातस्तवोरं भेत्स्यते वली ॥ ३४ ॥ इत्येवमुक्ते वचने धृतराष्ट्रो महीपतिः प्रसादयामास मुनि नैतदेवं भवेदिति मैत्रेय उवाच-शमं यास्यति चेत्पुत्रस्तव राजन् यदा तदा शापो न भविता तात विपरीते भविष्यति वैशम्पायन उवाच-विलक्षयंस्तु राजेन्द्रो दुर्योधनपिता तदा सिर झुकाये बैठारहा। वह अपमान देखकर, मैत्रेय जी ऐसा कीजिये, जिसमें यह बात न होये। यह सुनकर. कोधित हो गये और शाप देने की इच्छा से लाल मैत्रेय जी ने कहा यदि तुम्हारा पुत्र दुर्योधन पाण्डवों लाल नेत्र किये हुए, दैव की प्रेरणा से आचमन से मिलाप कर लेगा, तो यह शाप नहीं लगेगा; नहीं कर शाप देने लगे ॥२७॥३२॥ तो जैसा हमने कहा है, वैसा ही होगा ॥३३॥३६॥ हे दुर्योधन ! जो तूने अभिमान से अन्धा होकर वैशम्पायन ने कहा-हे राजा जनमेजय । इसके मेरा अपमान किया है, मेरी बात नहीं मानी है, पीछे राजा धृतराष्ट्र ने भीमसेन के वल का स्मरण इस कारण तू शीघ्र ही इसका फल पावेगा । इस करके मैत्रेय जी से पूछा-हे महाराज ! भीमसेन ने दोह के कारण पाण्डवों के साथ जो तेरा युद्ध किस तरह किरि राक्षस को मारा था ! यह सुनकर होगा, उसमें महाबाहु भीमसेन गदा के प्रहार से | मैत्रेय जी ने कहा-जो मेरा कथन तुमको अच्छा तेरी इस जांघ को तोड़ डालेंगे । यह सुनकर घृतराष्ट्र नहीं मालूम पड़ता और तुम्हारा पुत्र सुनना नहीं ने मैत्रेय जी को प्रसन्न किया और कहा, कि महाराज चाहता, इससे मैं नहीं कहूँगा। मेरे जाने पर ये विलक्षयन् इत्यस्य मीमवलं क्यिदधिकमिति विशेषेण चुभुत्ममान इत्यर्थः । IMADIMIRIDDHIPOMVIDEmmaNament ama.mmmammuurmumouamnamamurt MMICALMILLILAXM IIEILeagurcuTECTETrxx .

१४७८ म हा मारत [वन arminamainainitaminerarmiummmuTummmmm ImrnamrunmarrinamaAINMITRun ॥३७॥ । wpar.im.com aartaasaraman.arnamaintains मैत्रेयं प्राह किर्मीरः कथं भीमेन पातितः मैत्रेय उवाच-नाहं वक्ष्यामि ते भूयो न ते शुश्रूपते सुतः एप ते विदुरः सर्वमाख्यास्यति गते मयि इत्येवमुक्त्वा मैत्रेयः प्रातिष्ठत यथागतम् किर्मीरवधसविग्नो बहिर्दुर्योधनो ययौ इति श्रीमन्महाभारते वनपर्वणि आरण्यकपर्वणि मैत्रेयशापे दशमोऽध्यायः ॥ १० ॥ ममाप्तं च आरण्यकपर्व ॥ विदुर जी किर्मीर के मारे जाने का सब वृत्तान्त दुर्योधन किर्मीर दैत्य का वध सुनकर व्याकुल. हो कहेंगे । यह कहकर मैत्रेय जी तो चले गये और कर बाहर को चला गया ॥३७/३९|| वनपर्व का दसवां अध्याय समाप्त हुआ ॥ १० ' अथ किौरवधपर्व । अथ एकादशोऽध्यायः ।। ११ ।। धृतराष्ट्र उवाच-किर्मीरस्य वधं क्षत्तः! श्रोतुमिच्छामि कथ्यताम् । रक्षसा भीमसेनस्य कथमासीत्समागमः विदुर उवाच-शृणु भीमस्य कर्मेदमतिमानुपकर्मणः श्रुतपूर्व मया, *तेषां कथान्तेषु पुनः पुनः इतः प्रयाता राजेन्द्र! पाण्डवाद्यूतनिर्जिताः । जग्मुस्त्रिभिरहोरात्रैः काम्यकं नाम तद्वनं रात्री निशीथे त्वाभीले गतेऽर्धसमये नृप ! ग्यारहवां अध्याय ॥ ११॥ धृतराष्ट्र ने कहा-हे विदुर ! भीमभेन के साथ सम्बन्धी भीमसेन का काम सुना है । सुनिए-पाण्डव किरि राक्षम का युद्ध किस तरह हुआ ? भीमसेन ने लोग जुए में हारकर, यहां से चलकर, तीन दिन और किस तरह उस राक्षस को मारा' यह वृत्तान्त सुनने तीन रात चलते-चलते, भयानक आधी रात के समय- की मुझे बड़ी इच्छा है। विदुर ने कहा-हे राजन् ! | मनुष्यों के मांस और लोहू को खाने पीनेवाले कर उस अमानुष कर्म करनेवाले गीमसेन के कामों का कर्मा राक्षसों के रहने के स्थान-काम्यक धन में पहुंचे वर्णन प्रायः कथाओं के प्रसन्न में हुआ करता है। ॥१३॥ इमी तरह मैंने कथा के प्रसङ्ग में यह किर्मीर-वध सब वनचारी और तापस लोग राक्षसों के भय सो कधान्तेषु-पाण्यानो बधाप्रमरपु | रामासे भयानक । CATITISTITUTTTTTTTTTTTTTTTTISTIMOTIMATIOETROPIVIDIODIO ? , VLOVE म हा भारत अध्याय ११) . Torna D.TOTDATE । Jaun KNULLULO. LIL' ULAT MU'MUL PLOT MULUTO! mammiufiaomimicrius...... NIRimirmmim PRONIUMrinarinaraLOTHERAPE प्रचारे पुरुषादानां रक्षसां घोरकर्मणाम् तद्वनं तापसा नित्यं गोपाश्च वनचारिणः दूरात्परिहरन्ति स्म पुरुषादभयात्किल तेषां प्रविशतां तत्र मार्गमावृत्य भारत ! दीप्ताक्षं भीषणं रक्ष सोल्मुकं प्रत्यपद्यत बाहू महान्तो कृत्वा च तथाऽऽस्यं च भयानकम् । स्थितमावृत्य पन्थानं येन यान्ति कुरूद्वहाः स्पष्टाष्टदंष्ट्रं ताम्राक्षं प्रदीप्तोर्ध्वशिरोरुहम् सार्करश्मितडिच्चक्रं सवलाकमिवाम्बुदम् सृजन्तं राक्षसी मायां महानादनिनादितम् मुञ्चन्तं विपुलान्नादान्सतोयमिव तोयदम् तस्य नादेन संत्रस्ताः पक्षिणः सर्वतो दिशम् । विमुक्तनादाः संपेतुः स्थलजाः जलजैः सह संप्रद्रुतमृगद्वीपिमहिपक्षसमाकुलम् तद्वनं तस्य नादेन संप्रस्थितमिवाभवत् तस्योरुवाताभिहतास्ताम्रपल्लववाहवः विदूरजाताश्च लताः समाश्लिष्यन्ति पादपान् ॥ १२ ॥ स उस वन को दूर से ही छोड़ जाते थे । पाण्डय यह वर्षाकाल के बादलों के समान भयानक शब्द रोग उसी वन में प्रवेश करने लगे। इसी समय उन्होंने करके गरजने लगा ॥४॥९॥ देखा, कि चमकती हुई आँखोवाला एक राक्षस हाथ उसके भयानक शब्द से सब बनवासी पक्षी में जलती हुई मशाल लिये, दोनों हाथ फैलाये, राह डर गये और जलचारी जीव भयभीत होकर अपनी- रोके, उनके सामने चला आ रहा है। उसका मुख । अपनी बोली में आर्त शब्द करने लगे। उस समय भयानक है। उसकी आठी लम्बी-लम्बी श्वत दाढ़ें मृग, भैंसे, शेर, रीछ आदि जीवों के इधर से उधर दिल दहला देनेवाली हैं । आँखें ताबे के रस की , और उधर से इधर भागने के कारण से, वह वन ऐसा है। संडे हुए सिर के बाल चमक रहे हैं । यह दीखने लगा, मानों वन चलता है। और इस वन सूर्य की किरणों से रञ्जित, बिजली और बगलों से के लाल लाल पत्ते रखनेवाले वृक्ष, जो दूर-दूर पर भी गोभित, काले बादल के समान जान पड़ता है। उस राक्षस की जाँघों के चलने की हवा से उखड़- पाण्डवों के सामने आते ही राक्षसी माया फैलाकर । उखड़ कर दूसरे वृक्षों पर जा-जा पड़े । उसी समय MMARILLERITELADIurrenwLLWHArrencHEIRULE TOTA TODILIUALE ALLOTulmuaaTRAIL.Amr.ur' म हा मारत [ वनपर्व bi UNIWASINTERNOODreasETML तस्मिन्क्षणेऽथ प्रववौ मारुतो भृशदारुणः रजसा संवृतं तेन नष्टज्योतिरभून्नभः पञ्चानां पाण्डुपुत्राणामविज्ञातो महारिपुः पञ्चानामिन्द्रियार्थानां शोकावेश इवातुलः स दृष्ट्वा पाण्डवान्दूरात्कृष्णाजिनसमावृतान् आवृणोत्तद्वनद्वारं मैनाक इव पर्वतः तं समासाद्य वित्रस्ता कृष्णा कमललोचना अदृष्टपूर्वं संत्रासान्न्यमीलयत लोचने दुःशासनकरोत्सृष्टविप्रकीर्णशिरोरुहा पञ्चपर्वतमध्यस्था नदीवाऽऽकुलतां गता मोमुह्यमानां तां तत्र जगृहुः पञ्च पाण्डवाः इन्द्रियाणि प्रसक्तानि विपयेषु यथा रतिम् अथ तां राक्षसी मायामुत्थितां घोरदर्शनाम् । रक्षोनैर्विविधैर्मन्त्रोम्यः सम्यक्प्रयोजितैः पश्यतां पाण्डुपुत्राणां नाशयामास वीर्यवान् ॥ १९ ॥ स नष्टमायोऽतिवलः क्रोधविस्फारितेक्षणः उस वन में वायु बड़े वेग से चलने लगी, जिसके । उन पांचों पाण्डवों के बीच में इस प्रकार से व्याकुल कारण से आकाशमण्डल में धूल छा गई और चारों , हो गई, मानों पाँच पहाड़ों के बीच में हार, नदी ओर अंधेरा हो गया ॥१०॥१३॥ व्याकुलता से बह रही है ॥१४॥१७॥ पांचों ज्ञानेन्द्रियाँ जिस तरह, अपने शत्रुशोक पाण्डवों ने द्रौपदी को अचत देखकर इस के वेग को नहीं जान मकती, उसी तरह पांचों पाण्डव प्रकार से पकड़ लिया, जैसे विषयों में लगी हुई उस राक्षस को नहीं जानते थे, कि वह उनका परम इन्द्रियां रति को ग्रहण करती हैं। उस समय धौम्य शत्रु है । काली मृगछाला पहने हुए पाण्डवों को दूर ऋषि ने राक्षसों को नाश करनेवाले मन्त्रों से उम से देखकर, मैनाक पर्वत के समान, उस राक्षस ने राक्षस की सब माया पाण्डवों के देखते-देखते दूर पन के द्वार को रोक लिया । और द्रौपदी पहले कर दी, और वह राक्षस माया के नष्ट होने पर नेत्र फभी किसी दैत्य को न देखने के कारण से भयभीत | फाड़े हुए काल के समान दीखने लगा । अब दो गई, और उमने अपनी दोनों आँखें बन्द कर ली। युधिष्ठिर ने उम से कहा-आप कौन हो! और किम । उस समय यह द्रोपदी जिसके पाल बिखरे हुए थे, के पुंग हो! हम भापका क्या कार्य करें! यह मुना। BumrIDIODIOHDHILDREHMEDITORITEReteactressurel -- J न MIRMIRRIGAMItainme - अध्याय ११) पहा मारव १४८१ TRACTELamainararianne mammALLUTEramaniramananemantarainrammarring काममूर्तिधरः क्रूरः कालकल्पो व्यदृश्यत ॥ २० ॥ तमुवाच ततो राजा दीर्घप्रज्ञो युधिष्ठिरः को भवान्कस्य वा किं ते क्रियतां कार्यमुच्यताम् ॥ २१ ॥ प्रत्युवाचाऽथ तद्रक्षो धर्मराज युधिष्ठिरम् अहं वकस्य वै भ्राता किर्मीर इति विश्रुतः ॥ २२ ॥ वनेऽस्मिन्काम्यके शून्ये निवसामि गतज्वरः । युधि निर्जित्य पुरुपानाहारं नित्यमाचरन् ॥ २३ ॥ के यूयमभिसंप्राप्ता भक्ष्यभूता ममाऽन्तिकम् । युधि निर्जित्य वः सर्वान्भक्षयिप्ये गतज्वरः ॥ २४ ॥ वैशम्पायन उवाच-युधिष्ठिरस्तु तच्छुत्वा वचस्तस्य दुरात्मनः आचचक्षे ततः सर्व गोत्रनामादि भारत ! ॥ २५॥ युधिष्ठिर उवाच-पाण्डयो धर्मराजोऽहं यदि ते श्रोत्रमागतः सहितो भ्रातृभिः सर्वैर्भीमसेनार्जुनादिभिः हृतराज्यो वने वासं वस्तुं कृतमतिस्ततः वनमभ्यागतो घोरमिदं तव परिग्रहम् ॥ २७ ॥ विदुर दबाच-किर्मीरस्त्वब्रवीदेनं दिष्ट्या देवैरिदं मम उपपादितमद्येह चिरकालान्मनोगतम् भीमसेनवधार्थ हि नित्यमभ्युद्यतायुधः कर दैत्य ने कहा-मैं किसैर नाम का दैत्य बकासुर अर्जुन, नबुल, सहदेव नाम के मेरे माई हैं । शायद का भाई हूँ और इस काम्यक वन में निर्भय रहता तुमने मेरा नाम सुना होगा । इस समय राज्य छिन हूँ और आये हुए मनुष्यों को युद्ध में जीतकर भक्षण जाने से वनवास का विचार करके, मैं तुम्हारे निवास- किया करता हूँ। तुम बताओ कौन हो ' तुम सब स्थान इस घोर वन में आया हूँ। यह सुनकर उस को अब मैं जीतकर भक्षण करूँगा ॥१८॥२४॥ राक्षस ने कहा-देवताओं की कृपा और मेरे भाग्य वैशम्पायन ने कहा-हे राजा जनमेजय ! युधि- | से आज मुझे इच्छा के अनुसार मोजन मिला है। ठिर उस दुरात्मा दैत्य की बात को सुनकर उसे ॥२५॥२८॥ अपना गोत्र और नाम बताने लगे, कि मैं पाण्डु मैं भीमसेन को मारने इच्छा से शस्त्र लिये का पुत्र धर्मराज युधिष्ठिर हूँ और ये चारों भीमसेन हुए बहुत दिनों से उसे ढूँढता फिरता हूँ। परन्तु मुझे MIMWAREDMIDDHISmar.mammumIDEODEDIOLETTINENETITION ॥ २८ ॥ TAIPUR MATALAMATALULLLLL १४८२ महा मारत [ वनपर्व 2.TW MODITIERTAmravinanniawrmirmirrautomatician चरामि पृथिवीं कृत्नांनैनं चाऽऽसादयाम्यहम् ॥ २९ ॥ सोऽयमासादितो दिष्ट्या भ्रातृहा काङ्कितश्चिरम्। अनेन हि मम भ्राता वको विनिहतः प्रियः ॥ ३० ॥ वैत्रकीयवने राजन् ! ब्राह्मणच्छद्मरूपिणा विद्याबलमुपाश्रित्य न ह्यस्त्यस्यौरसं वलम् हिडिम्वश्च सखा मह्यं दयितो वनगोचरः हतो दुरात्मनाऽनेन स्वसा चाऽस्य हृता पुरा ॥ ३२ ॥ सोऽयमभ्यागतो मूढो ममेदं गहनं वनम् प्रचारसमयेऽस्माकमर्धरात्रे स्थिते समे ॥ ३३ ॥ अद्याऽस्य पातयिष्यामि तद्वैरं चिरसंभृतम् तर्पयिष्यामि च वकं रुधिरेणास्य भूरिणा ॥ ३४॥ अद्याऽहमनृणो भूत्वा भ्रातुः सख्युस्तथैव च शान्ति लब्धास्मि परमां हत्वा राक्षसकण्टकम् ॥ ३५ ॥ यदि तेन पुरा मुक्तो भीमसेनो बकेन वै अद्यैनं भक्षयिष्यामि पश्यतस्ते युधिष्ठिर ! एनं हि विपुलप्राणमद्य हत्वा वृकोदरम् संभक्ष्य जरयिष्यामि यथाऽगस्त्यो महासुरम् ॥३७ ॥ एवमुक्तस्तु धर्मात्मा सत्यसन्धो युधिष्ठिरः नैनदस्तीति संक्रुद्धो भर्त्सयामास राक्षसम् ॥ ३८ ॥ वह कहीं नहीं मिला । आज दैवयोग से मिला है। लोहू से यक दैत्य को तृप्त करूँगा और इस राक्षमों इसी ने मेरे प्यारे भाई वक को चैत्रकीय वन के काटे को उखाड़ कर अपने भाई और मित्र से रूप ब्राह्मण के वेष से विद्यायल के द्वारा मारा था। अमण होकर पैलूंगा। हे युधिष्ठिर ! पहले यह इसी भीमसेन ने पहले मेरे हिडिम्य नाम के मित्र , भीमसेन वकासुर के हाथ से बच गया था, अब में इमे को मारा था और उसकी बहन हर ली थी । आहा ! मारकर तुम्हारे सामने भक्षण करूँगा और इस प्रकार आज यह वही मीमसेन मेरे इस गहन वन में आधी से इसको पचाऊँगा, जैसे अगस्त्य जी ने बड़े दैत्य रात को मेरे यहां होते हुए आया है ॥२९॥३३॥ वातापि को पचाया था ॥३४॥३७॥ अब में इससे अपना पुराना पैर लेकर इसके महात्मा युधिष्ठिर किर्मीर की ये पाते सुनकर - TAITDHRITIKiwimmunimal । पाऊu.ma.mami कपट । 'טייטיטוויטמיפויטיפֿטיטוט:גמטיטיסימיםטפטיטיפייפיטפימיטיטינופניצל १४८३ म हा मारत अध्याय ११] Amarur arrinnnnnny AIRTAIHamrommmmmmmmmunanamamAINIITian . nommumtammmmmanimamminummer ततो भीमो महावाहुरारुज्य तरसा द्रुमम् दशव्याममथोद्विद्ध निष्पत्रमकरोत्तदा ॥ ३९ ॥ चकार सज्यं गाण्डीवं वननिष्पेषगौरवम् निमेपान्तरमात्रेण तथैव विजयोऽर्जुनः ॥ ४० ॥ निवार्य भीमो जिष्णुं तं तंद्रक्षो मेघनिःस्वनम् । अभिद्रुत्याऽब्रवीद्वाक्यं तिष्ठ तिष्ठेति भारत ! ॥ ४२ ॥ इत्युक्त्वैनमभिक्रुद्धः कक्षामुत्पीड्य पाण्डवः निष्पिष्य पाणिना पाणिं संदप्टौष्ठपुटो वली ॥ १२ ॥ तमभ्यधावद्वेगेन भीमो वृक्षायुधस्तदा यमदण्डप्रतीकाशं ततस्तं तस्य मूर्धनि ॥ ४३ ॥ पातयामास वेगेन कुलिशं मघवानिव आसंभ्रान्तं तु तद्रक्षः समरे प्रत्यदृश्यत ॥ ४४ ।। चिक्षेप चोल्मुकं दीप्तमशनिं ज्वलितामिव तदुदस्तमलातं तु भीमः प्रहरतां वरः ॥ ४५ ॥ पदा सव्येन चिक्षेप तद्रक्षः पुनरावजत् किरिश्चाऽपि सहसा वृक्षमुत्पाट्य पाण्डवम् ॥ ४६ ॥ दण्डपाणिरिव क्रुद्धः समरे प्रत्यधावत बहुत ही क्रोधित हुए और उस डॉटकर कहने लगे राक्षस के सिर पर इस प्रकार से मारा, मानों इन्द्र ने अरे मूद ! तेरी यह इच्छा कभी पूरी न होगी । वज्र मारा है। उसके लगने से वह राक्षस संभ्रान्त उसी समय महाबाहु भीमसेन ने एक बड़ा पेड़ उखाड़ सा हो गया ॥३८॥४४॥ लिया और उसके पत्ते नोच डाल और अर्जुन ने अब क्रोध से भरे हुए उस किसर ने प्रज्वलित गाण्डीव धनुष हाथ में लेकर एक पल भर में चलाने वज्र के समान जलती हुई उल्मुक अर्थात् मशाल के योग्य कर लिया। उस समय भीमसेन ने अर्जुन भीमसेन पर घलाई । महाबलि भीमसेन ने खेल की को रोक दिया और उस मेघ के समान गरजते हुए तरह उस जलती मशाल को वायें पाँव से पकड़ कर राक्षस के सम्मुख जाकर कहने लगा, कि "ठहर जा, उसी राक्षस के ऊपर फेंक दिया। उस समय उस टहर जा" और क्रोध से दात पीसकर और कमर को दैत्य ने भी अकस्मात् एक वृक्ष उखाड़ लिया और बाँधकर हाथ मलता हुआ दौड़ा और यमराज के क्रोधित होकर यमराज के समान भीमसेन पर दौड़ा। दण्ड के समान अपने उस वृक्ष रूपी शस्त्र को उस उन दोनों में युद्ध इस प्रकार से होने लगा, जैसे पूर्व RWAIITDOOTDEOmmmmmmmmmmmm PIDEO DRIEDORULELOP2 - JHALILABAALAL AIIMULLLLLLLE 5 ILLUUUNITEDா १४८४ महा मारत [ वनपर्व armananamanmruamnnianumarnmamimaramanum: outu'OusmagLODIDITDU DULFUDULLA MANDIRI - तवृक्षयुद्धमभवन्महीरुहविनाशनम् वालिसुग्रीवयोत्रोर्यथा स्त्रीकाक्षिणोः पुरा । शीर्षयोः पतिता वृक्षा विभिदुर्नेकधा तयोः ॥४८॥ यथैवोत्पलमालानि मत्तयोपियोस्तथा मुञ्जवजर्जरीभूता वहवस्तत्र पादपाः ॥ ४९ ॥ चीराणीव व्युदस्तानि रेजुस्तत्र महावने तवृक्षयुद्धमभवन्मुहूर्त भरतर्षभ ! राक्षसानां च मुख्यस्य नराणामुत्तमस्य च ततः शिलां समुत्क्षिप्य भीमस्य युधि तिष्ठतः । प्राहिणोद्राक्षसः क्रुद्धो भीमश्च न चचाल ह ते शिलाताडनज पर्यधावत राक्षसः वाहुविक्षिप्तकिरणः स्वर्भानुरिव भास्करम् ॥ ५२ ॥ तावन्योन्यं समाश्लिष्य प्रकर्पन्तौ परस्परम् उभावपि चकाशेने प्रवृद्धौ वृषभाविव ।। ५३ ॥ तयोरासीत्सुतुमुलः संप्रहारः सुदारुणः नखदंष्ट्रायुधवतोळघयोरिव दृप्तयोः ॥ ५४ ॥ . दुर्योधननिकाराच्च वाहुवीर्याच्च दर्पितः समय में तारा नाम स्त्री के पीछे वाली और सुग्रीव नामी युद्ध वृक्षों से हुआ। उपरात राक्षस ने एक बड़ी दोनों भाइयों का युद्ध हुआ था । उन दोनों के भारी शिला उठा कर भीमसेन पर चलाई, परन्तु वृक्षों से युद्ध करने के कारण से उस पृथ्वी के सब भीमसेन अचल खड़ा रहा। तब राहु जैसे मुंह पर। वृक्ष नाश हो गये और दोनों के सिरों पर रग-लग कर सूर्य को ग्रमने के रिये दौड़ता है, वैसे ही वह कर टुकड़े टुकड़े हो गये ॥४५॥४८॥ राक्षस दोनों हाथ फैलाकर भीमसेन को पकड़ने के जैसे दो मतवाले हाथियों के चरने मे कमरों लिये चरा ॥४९॥५२॥ के यन के वन नाश हो जाते हैं, इसी प्रकार से उन जैसे दो साड रहते हों, वैसे दोनों वीरं परस्पर दोनों नरोत्तम भीमसेन और राक्षसोरम किर्मीर के रिपटकर और खीचकर भिड़ गये। बड़े बड़े नासून युद्ध से उम वन के पक्ष मूस के समान तार-तार और दादें ही जिनके शम ,टन प्रचण्ड दो व्यामों हो गये और बहुत से वृक्षों के यकले टतर-उतर की तरह ये भयर युद्ध कर रहे थे । समा में युग. कर गिर पड़े। एक मुह तक तो उन दोनों का कर दुर्योधन ने जो द्रौपदी का अपमान दिया था, - .. HDarreprecxirroreverruecamremednermerememorcecreasurcerearrercar १४८५ म हा मा रत अध्याय ११] Direr LILITaruna.iruuuumirauliusammanmamimmaaNmunmunaramming ॥ ५५ ॥ nabalinarianna.comsninmuflainamail.anuar... कृष्णाकटाक्षदृष्टश्च व्यवर्धत वृकोदरः अभिपद्य च वाहुभ्यां प्रत्यगृह्णादमर्पितः मातङ्गमिव मातङ्गः प्रभिन्नकरटामुखम् ॥ ५६ ॥ स चाऽप्येनं ततो रक्ष. प्रतिजग्राह वीर्यवान् । तमाक्षिपद्भीमसेनो वलेन वलिनां वरः तयोर्भुजविनिप्पेपादुभयोर्वलिनोस्तदा शब्दः समभवन्द्वोरो वेणुस्फोटसमो युधि ।। ५८॥ अथैनमाक्षिप्य बलाद् गृह्य मध्ये वृकोदरः धूनयामाम वेगेन वायुश्चण्ड इव द्रुमम् स भीमेन परामृष्टो दुर्वलो वलिनो रणे व्यस्पन्दत यथाप्राणं विचकर्ष च पाण्डवम् तत एनं परिश्रान्तमुपलक्ष्य वृकोदरः योक्त्रयामास वाहुभ्यां पशुं रशनया यथा बिनदन्तं महानादं भिन्न भेरीस्वनं वली भ्रामयामास सुचिरं विस्फुरन्तमचेतसम् ॥ ६२ ।। तं विषीदन्तमाज्ञाय राक्षसं पाण्डुनन्दनः प्रगृह्य तरसा दोभ्यां पशुमारममारयत् ॥६३ ॥ उससे याहुबल का अभिमान रखनेवाले भीमसेन बहुत कर कॉपने और यथाशक्ति भीमसेन को खींचने ही कुपित थे । हाथी जैसे सूड उठाकर दूसरे गज- लगा। भीमसेन ने जब उस राक्षस को बहुत ही राज पर झपटता है, वैसे कुपित भीमसेन ने हाथों मे निर्बल और थका हुआ पाया, तब उसको भुजाओं उस राक्षस को पकड़ लिया । राक्षस ने भी पहले के बन्धन में इस तरह बांध लिया, जिस तरह कोई से अधिक पराक्रम दिखाकर भीमसेन को पकड़ा । पशु को बांधता है ।।५३।६१॥ भीमसेन ने उसी दम उसे दूर पटक दिया । जैसे तब यहुत ही होनबल होकर, वह राक्षस साम करता है, वैसे ही दोनों वीरों के बाहुप्रहार से | फटे हुए नगाड़े का सा विकट शन्द करने लगा। धार शब्द होने लगा। तय भीमसेन ने आक्रमण भीमसन उमे ऊपर उठाकर घुमाने लगे। इस प्रकार करके राक्षस की कमर पकड़ ली और वे उसे इस से राक्षस के विवश और अचेत होने पर, भीमसेन तरह घुमाने लगे जैसे आधी से पेड़ हिले । अब वह ने उस पर ऐसे आक्रमण किया, जैसे सिंह क्सिी राक्षस भीमसेन के भयङ्कर भाक्रमण से निर्बल हो- मृग पर झपटे । भीमसेन ने टसकी कमर पर घुटना NEEND MEMODEO.HDPOTUmuveninumminturiomasmIYEWremorner PuneritTIUmailmentarie. 1 १४८६ म हा भारत [ वनपर्व *ण । Proraruveasoor MOImamaArron.AIRRIGITIOnITALITIGGraramaniruICLmah आक्रम्य च कटीदेशे जानुना राक्षसाधमम् पीडयामास पाणिभ्यां तस्य कण्ठं वृकोदरः ॥ ६ ॥ अथ जर्जरसर्वाङ्गं व्याविद्धनयनाम्वरम् भूतले भ्रामयामास वाक्यं चेदमुवाच ह हिडिम्ववकयोः पाप ! न त्वमश्रुप्रमार्जनम् करिष्यसि गतश्चासि यमस्य सदनं प्रति ।। ६६॥ इत्येवमुक्त्वा पुरुषप्रवीरस्तं राक्षसं क्रोधपरीत-चेताः । विस्रस्तवस्त्राभरणं स्फुरन्तमुद्रान्तचित्तं व्यसुमुत्ससर्ज ॥ ६७॥ तस्मिन्हने तोयदतुल्यरूपे कृष्णां पुरस्कृत्य नरेन्द्रपुत्राः। भीमं प्रशस्याऽथ गुणैरनेकैहप्टास्ततो द्वैतवनाय जग्मुः ॥ ६८ ॥ विदुर उवाच-एवं विनिहतः संख्ये किर्मीरो मनुजाधिप! भीमेन वचनात्तस्य धर्मराजस्य कोरव ! ॥ ६९॥ ततो निष्कण्टकं कृत्वा वनं तदपराजितः द्रौपद्या सह धर्मज्ञो वसति तामुवास ह ॥ ७० ॥ • समाश्वास्य च ते सर्वे द्रौपदी भरतर्षभाः प्रहृष्टमनसः प्रीत्या प्रशशंसुवृकोदरम् ॥ ७१ ॥ भीमवाहुवलास्पिष्टे विनष्टे राक्षसे ततः रखकर दोनों हाथों से उसका गला दबा दिया। से रगवाले उस राक्षस के मरने पर, युधिष्ठिर आदि इससे उसके सब अङ्ग ढीले पड़ गय, बड़ी बड़ी आंखें राजपुत्र भीमसेन की प्रशंसा करने लगे। इसके पश्चात् बाहर निकल आई । तर उमे पृथ्वी पर घसीट कर पाचों पाण्डव द्रौपदी को आगे करके द्वैतवन की भीमसन कहने लगे अरे पापी ! तू हिडिम्य और । ओर चले ॥६२।६८॥ यकामुर के आंम् नहीं पोंछ सकेगा। अब तू म्वय इतनी कथा सुनाकर विदुर जी ने कहा है यमराज के यहा जाने की तैयारी कर । क्रोध में गजा धृतराष्ट्र ! युधिष्ठिर की आज्ञा से भीमसेन ने भरे हुए पुरुषश्रेष्ठ भीमसेन ने इस तरह कहकर उम इस प्रकार किीर राक्षस को मारा था । इस प्रकार राक्षस को मार डाला । उसके कपड़े और गहन से वन के निष्कण्टक होने पर पाण्डव लोग द्रौपदी इधर-उधर विम्बर गये, वह मरते ममय न्याकुल हो को दिलासा देने और भीमसेन की प्रशंसा करने के यर छटपटाने लगा। इस तरह निर्जीव जानकर उपरान्त द्वतपन में रहने का विचार करके विमों से भीमसेन ने उम गक्षम को छोड़ दिया। यादल के रहित मलमय बन के भीतर घुमे । हे कौरवशेष्ठ ! जम - AND - T.COCAITAMMITTIMTITIMILM ATMAITAMINETITIATIMEArcurr HDMINIMITMuli अध्याय १२] महाभारत १४८७ IMITTINotianurmuTOTTENTATIOrnamurninCENTERTAINApring विविशुस्ते वनं वीराः क्षेमं निहतकण्टकम् ॥ ७२ ॥ स मया गच्छता मार्गे विनिकीर्णो भयावहः वने महति दुष्टात्मा दृष्टो भीमबलाद्धतः ॥ ७३ ॥ तत्राऽौपमहं चैतत्कर्म भीमस्य भारत! ब्राह्मणानां कथयतां ये तत्राऽऽसन्समागताः ॥ ७४ ॥ वैशम्पायन उवाच-एवं विनिहतं संख्ये किरं रक्षसां वरम् '। श्रुत्वा ध्यानपरो राजा निशश्वासाऽऽर्तवत्तदा ॥ ७५ ॥ इति श्रीमन्महाभारते वनपर्वणि किर्मीरवधपर्वणि विदुरवाक्ये एकादशोऽध्याय ॥ ११ ॥ ममाप्तं च किौरवधपर्व । मैं पाण्डवों के पास गया था, तब राह में मैंने भी वैशम्पायन ने कहा-हे राजा जनमेजय ! अन्धे राजा उस दैत्य को मरा हुआ पड़ा देखा था । और वहा धृतराष्ट्र भीममेन के हाथों से किरि दैत्य का वध पर जो ब्राह्मण लोग इकट्ठे हुए थे, उन्हीं के मुख सुनकर, दुखी हुए और चिन्ता करके श्वास लेने से मैंने यह भीमसेन के युद्ध का हाल सुना था। | लगे ॥६९।७५॥ वनपर्व का ग्यारहवां अध्याय समाप्त हुआ ।। ११ ॥ अथ अर्जुनाभिगमनपर्व । अथ द्वादशोऽध्याय. ॥ १२ ॥ वैशम्पायन उवाच-भोजाः प्रव्रजिताञ्च्छुत्वा वृष्णयश्चाऽन्धकैः सह । पाण्डवान्दुःखसंतप्तान्समाजग्मुर्महावने पाञ्चालस्य च दायादो धृष्टकेतुश्च चेदिपः केकयाश्च महावीर्या भ्रातरो लोकविश्रुताः ॥ बने द्रष्टुं ययुः पार्थान्क्रोधामर्पसमन्विताः गर्हयन्तो धार्तराष्ट्रान्ति कुर्म इति चाऽब्रुवन् ॥ ३ ॥ वासुदेवं पुरस्कृत्य सर्वे ते क्षत्रियर्षभाः वारहवां अध्याय ॥१२॥ वैशम्पायन ने कहा-हे राजा जनमेजय ! पाचों माई केकेय उम महावन में पाण्डवों के पास पाण्डयों के वनवास और क्लेश का हाल मुनकर भोज, आये । दुर्योधन आदि घृतराष्ट्र के पुत्रों की निन्दा अन्धक और वृष्णि वश के यादव, राजा द्रुपद के और "क्या करना चाहिए?" इस बात का आन्दो- पुत्र, चेदि देश के राजा धृष्टकेतु और बड़े पराक्रमी । लन करते हुए, सब लोग श्रीकृष्ण जी को आगे ALEONLIPUIREMErenTIMILAINEERINLINEurneumneLLCHALCHITELLITERALEGETIme amuLAIAIDANDRUARDIC TODWOZTO 1 ANATOMITTPार

१४८८
म हा भारत
[ ..
Maithimati.ALMITUTIOINUTimnuin
Arunanirrum
।
BITIOWonyyyummunomyu091AIAHILAALLL
॥
परिवार्योपविविशुधर्मराज युधिष्ठिरम्
अभिवाद्य कुरुश्रेष्ठं विषण्णः केशवोऽब्रवीत्
वासुदेव उवाच -दुर्योधनस्य कर्णस्य शकुनेश्च दुरात्मनः
दुःशासनचतुर्थानां भूमिः पास्यति शोणितम् ॥ ५ ॥
एनानिहत्य समरे ये च तस्य पदानुगाः
तांश्च सर्वान्विनिर्जित्य सहितान्सनराधिपान् ॥ ६ ॥
ततः सर्वेऽभिषिञ्चामो धर्मराज युधिष्ठिरम्
निकृत्योपचरन्वध्य एष धर्मः सनातनः
वैशम्पायन उवाच पार्थानामभिषलेण तथा क्रुद्धं जनार्दनम्
अर्जुनः : शमयामास दिधक्षन्तमिव प्रजाः
संक्रुद्धं केशवं दृष्ट्वा पूर्वदेहेषु फाल्गुनः
कीर्तयामास कर्माणि सत्यकीर्तेर्महात्मनः
पुरुषस्याऽप्रमेयस्य सत्यस्याऽमिततेजसः
प्रजापतिपतेविष्णोलोकनाथस्य धीमतः
अर्जुन उवाच-दश वर्षसहस्राणि यत्र सायंग्रहो मुनिः
व्यचरस्त्वं पुरा कृष्ण ! पर्वते गन्धमादने
दश वर्षसहस्राणि दश वर्षशतानि च
करके युधिष्ठिर के पास पहुंचे और उनके चारों ओर वैशम्पायन ने कहा है राजा जनमेजय ! उस
चट गये ॥१॥४॥
| समय श्रीकृष्ण जी को पाण्डवों के दुःख के कारण
उस समय श्रीकृष्ण ने व्या कल होकर युधिष्ठिर से क्रोधित देखकर, अर्जुन श्रीकृष्ण जी के फ्रोध को
से कहा-इस में कोई सन्देह नहीं, कि यह पृथ्वी । शान्त करने के लिये उनके पूर्व जन्मों में किये हुए
पापी दुर्योधन, कर्ण, शकुनि और दु शासन, इन । कमों का कीर्तन करने लगा-ये श्रीकृष्ण अप्रेमय,
चारों दुरात्माओं का लोहू पियेगी। हम सब लोग ' मत्यरूप, बड़े तेजम्बी, प्रजापति के स्वामी विष्णु,
मिलकर उन चागें दुगचारियों को और उनके साथी लोकनाथ और ज्ञानरूप थे । अर्जुन कहने लगा-हे
राजाओं को युद्ध में जीतकर मारेंगे और तुम्हाग श्रीकृष्ण जी! पूर्व समय में आप मुनिरूप से गन्ध-
(धर्मराज युधिष्ठिर का) अभिषेक करेंगे। छल करने मादन पर्वत पर दस हजार वर्ष तक इस प्रकार से
वाले दुरात्माओं को मार डालना ही सनातन धर्म है विचरा करते थे, कि जहां सन्ध्या हो जाती थी, पही
आप अपना पर समझते थे। फिर आप पुष्कर जी
MrREETITIRITTEERINETRIEVANIMERNETITIVATEMATITTERereumanuscrerescrcramers
-
-
॥५७॥

TOIMINTIAN TODOTTO अध्याय १२] म हा मारत १४८९ VImamirmwamiRUTTITrusuTIOuwan TIMOTTATTUMTWTTATILMITM Crn पुष्करेष्ववसः कृष्ण! त्वमपो भक्षयन्पुरा ॥ १२ ॥ ऊर्ध्ववाहुर्विशालायां वदयाँ मधुसूदन ! अतिष्ट एकपादेन वायुभक्षः शतं समाः अवकृष्टोत्तरासङ्गः कृशो धमनिसन्ततः आसीः कृष्ण! सरस्वत्यां सत्रे द्वादशवार्षिके ॥ १४ ॥ प्रभासमप्यथाऽऽसाद्य तीर्थं पुण्यजनोचितम् तथा कृष्ण ! महातेजा ! दिव्यं वर्षसहस्रकम् । अतिष्ठस्त्वं यथैकेन पादेन नियमस्थितः लोकप्रवृत्तिहेतोस्त्वमिति व्यासो ममाऽब्रवीत् । क्षेत्रज्ञः सर्वभूतानामादिरन्तश्च केशव ! निधानं तपसां कृष्ण ! यज्ञस्त्वं च सनातनः निहत्य नरकं भौममाहृत्य मणिकुण्डले प्रथमोत्पादितं कृष्ण ! मेध्यमश्वमवासृजः कृत्वा* तत्कर्म लोकानामृपभः सर्वलोकजित् । अवधीस्त्वं रणे सर्वान्समेतान्दैत्यदानवान् ततः सर्वेश्वरत्वं च संप्रदाय शचीपतेः में ग्यारह हजार वर्ष तक केवल जल पीकर रहे॥८॥१२॥ सव तत्त्वों तथा प्राणियों के आदि भी हैं, अन्त भी हैं। इसके पश्चात् आपने एक पाव से खड़े होकर, हे श्रीकृष्ण ! आप तपस्या के आधार और नित्य- बदरिकाश्रम में मौ वर्ष तक ऊपर को हाथ किये यज्ञस्वरूप हैं । हे अच्युत ! आपने भूमिपुत्र नरकासुर हुए केवल वायुमक्षी रहकर तपस्या की । हे श्रीकृष्ण! को मार करके मणिमय कुण्डलों को ग्रहण किया है फिर आपने सरस्वती नदी के किनारे बारह वर्ष के और प्राथमिक पवित्र अश्व की सृष्टि की है ॥१३॥१७॥ यज्ञ में अपने शरीर को लटकाकर और निर्मास करके, आप तीनों लोकों में सब से श्रेष्ठ और सब उत्तरीय वन त्यागकर तपम्या की । उपरान्त आपने । लोकों को जय करनेवाले हैं। आपने इन सब कार्यों प्रभास नाम तीर्थ में नियमपूर्वक एक पाँव से खड़े को पूरा करने के पश्चात् , युद्ध में दुष्ट दानवों को रहकर हजार वर्ष तक तपस्या की। हमने व्याम जी मारकर, इन्द्र को सबका ईश्वर बनाया है । हे महा- के मुम्ब से सुना है, कि आप ही लोकसञ्चालन के लिये बाही! आप शरीर धारण कर मनुष्यलोक में भी एकमात्र कारण हैं । हे श्रीकृष्ण जी ! आप क्षेत्रज्ञ और प्रकट हुए हैं। हे परन्तप ! तुम्ही नारायण हो, तुम्ही * भूनायासारेण प्रथमेन अश्वोत्सर्गरूप कर्म कृत्वा इत्यर्थः । LINE ADDIOBIHDDDDDDD TAIMIMIRIYADIPLOMANSHAVTIDIOHITIREDIEARomma -----arunricuTuURDURIDIOTRADITION या - महा मारत [ वनपर्व Inmarrinaamnnainamanujaraumaulinurcumionaruarurnranaraur.ruarurns ami onmaraamTIAAmumDILAWADAINITIATiarelimina.aTimiliaTICTLULD rituerrorisUNDurari मानुषेषु महावाहो ! प्रादुर्भूतोऽसि केशव ! स त्वं नारायणो भूत्वा हरिरासीः परन्तप ! ब्रह्मा सोमश्च सूर्यश्च धर्मो धाता यमोऽनलः ॥ २० ॥ वायुर्वैश्रवणो रुद्रः कालः खं पृथिवी दिशः अजश्चराचरगुरुः स्रष्टा वं पुरुषोत्तम ! परायणं देवमूर्धा क्रतुभिर्मधुसूदन ! अयजो भूरितेजा वै कृष्ण ! चैत्ररथे वने ॥ २२ ॥ शतं शतसहस्राणि सुवर्णस्य जनार्दन ! एकैकस्मिंस्तदा यज्ञे परिपूर्णानि दत्तवान् ॥ २३ ॥ अदितेरपि पुत्रत्वमेत्य यादवनन्दन ! खं विष्णुरिति विख्यात इन्द्रादवरजो विभुः ॥ २४ ॥ शिशुभूत्वा दिवं खं च पृथिवीं च परन्तप ! त्रिभिर्विक्रमणेः कृष्ण ! क्रान्तवानसि तेजसा ॥ २५ ॥ संप्राप्य दिवमाकाशमादित्यसदने स्थितः अत्यरोचश्च भूतात्मन् ! भास्करं स्वेन तेजसा ॥ २६ ॥ प्रादुर्भावसहस्रेषु तेषु तेषु त्वया विभो ! अधर्मरुचयः कृष्ण! निहताः शतशोऽसुराः ॥ २७॥ हरि हो, तुम्ही ब्रह्मा हो, तुम्ही चन्द्रमा हो, तुम्हीं में शत-सहस सुवर्ण दक्षिणा में दिये हैं। हे यादव सूर्य हो, तुम्ही धर्म हो, तुम्हीं पाता हो, तुम्ही यम नन्दन ! तुम्हीं अदिति के गर्भ से जन्म लेकर इन्द्र हो, तुम्ही अग्नि हो, तुम्ही वायु हो, तुम्ही कुबेर । के छोटे भाई विष्णु कहलाये हो । हे शत्रु-दमन ! हो, तुम्ही रुद्र हो, तुम्ही काल हो, तुम्हीं आकाश तुम्हीं ने बामन स्वरूप धारण कर म्वर्ग, आकाश और हो, तुम्ही पृथ्वी हो, तुम्ही दस दिशा हो, तुम्ही । पृथ्वी को अपने तेज से तीन पग में अन्तर्गत कर अज हो, तुम्ही चर अचर के गुरु हो, और तुम्ही लिया है। तुम्ही ने स्वर्ग और आकाग को प्राप्त करके सष्टा अर्थात् दक्ष प्रजापति आदि सृष्टि के करनेवाले सूर्गलोक में सूर्यमण्डल को अपने तेज से सूशामित दो ॥१८॥२१॥ किया है ॥२२॥२६॥ मधुसूदन ! तुम्ही ने चैत्ररथ यन में अनेक तुम्हीं ने हजारों अवतार लेकर सैकड़ों दैत्यों या करके देवताओं की पूजा की है । हे जनार्दन! को, जो अधी थे, नाश किया । तुम्ही ने तांत तुम्ही ने यथायोग्य भाग के अनुमार प्रत्येक यज्ञ की बनी हुई पागों को काटकर, निमुंद और नाक - - TAINMECEM WHATSAPTAILated

॥ २९ ॥
....nn
RAMMITr
अध्याय १२]
म हा भारत
१४९१
ULTETIN ADJDOUMWAMoottom TTTTTTTTTTTTTTTTTTS
सादिता मौरवाः पाशा निसुन्दनरको हतो
कृतः क्षेमः पुनः पन्थाः पुरं प्राग्ज्योति प्रति ॥ २८ ॥
जारूथ्यामाहृतिः क्राथः शिशुपालोजनैः सह ।
जरासन्धश्च शैव्यश्च शतधन्वा च निर्जितः
तथा पर्जन्यघोषेण रथेनाऽऽदित्यवर्चसा
अवाप्सीमहिषी भोज्यां रणे निर्जित्य रुक्मिणम् ॥ ३० ॥
इन्द्रद्युम्नो हतः कोपाद्यवनश्च कसेरुमान्
हतः सौभपतिः शाल्वस्त्वया सौभंच पातितम् ॥ ३१ ॥
एवमेते युधि हता भूयश्चाऽन्याञ्च्छृणुष्व ह
इरावत्यां हतो भोजः कार्तवीर्यसमो युधि
गोपतिस्तालकेतुश्च त्वया विनिहतावुभौ
तां च भोगवती पुण्यामृपिकान्तां जनार्दन ! ।
द्वारकामात्मसात्कृत्वा समुद्रं गमयिष्यसि
न क्रोधो न च मात्सर्यं नाऽनृतं मधुसूदन! ।
त्वयि तिष्ठति दाशाह ! न नृशंस्यं कुतोऽनृजु ॥ ३४ ॥
आसीनं चैत्यमध्ये त्वां दीप्यमानं स्वतेजसा ।
नाम के दैत्यों को मारा और प्राग्ज्योतिप नाम नगर
को नष्ट किया था । तुम्ही ने इरावती नगरी में
की राह निष्कंटक कर दी 1 तुम्हीं ने जारुथी नाम
सहस्रबाहु अर्जुन के समान वीर्यशाली भोजराज,
की नगरी में आहृति, काथ, शिशुपाल, जरासंध, तालकेतु और गोपति को मारा था । तुम्हीं ने उस
शव्य, और शतधन्या आदिकों को विजय किया था
द्वारकापुरी को, जो भोगवती, पुण्यस्थान और ऋषिक
पर्वत के समीप बसती है, अपनी आत्मा के म्यरूप
मेघ के समान शब्द और सूर्य के समान प्रकाश में मिला लिया है और वह समुद्र में ही लोप हो
वाले रथ पर चढ़कर, समर में रूमी को हराकर, । जायगी। तुम झौधी, झूठे, निर्दयी और कुटिल
तुम्ही ने भोजराज-कुमारी रुक्मिणी को अग्नी स्त्री नहीं हो ॥३०॥३४॥
बनाया है । तुम्ही ने क्रोधित होकर कसरुमान्,
ऋपि लोग अपने हृदय में अपने तेज से दीप्त
यन, इन्द्रद्युम्न, सौभपति शाल्व और साम विमान और विराजमान् तुमको ध्यान करके, अभय रहते
: 'मुर वेष्टने' धातोरोणादिय उम्प्रत्यये तत इदमधे तदितोऽश्मत्यय.। मारवा आन्प्रतन्ति-मया रस्ययः । मौकागद
ऽप्ये घोप्यम् । मध्यमस्वरलोणे विशेषः ।
EERUPTOMOTIHARIDDHIRECTEAPEReneREETrercretATECEILLECruerrers
॥२७॥२९॥

१४९२ महा मारत [... immmmmmmmmmmunimun mmmmmiu । OMMITIONamuTUDIODAVARANAMAALOURamumanteam - आगम्य ऋषयः सर्वेऽयाचन्ताऽभयमच्युत! ॥ ३५ ॥ युगान्ते सर्वभूतानि संक्षिप्य मधुसूदन ! आत्मनैवाऽऽत्मसात्कृत्वा जगदासीः परन्तप! ॥ ३६ ॥ युगादौ तव वार्ष्णेय ! नाभिपद्मादजायत ब्रह्मा चराचरगुरुर्यस्येदं सकलं जगत् तं हन्तुमुद्यतो घोरौ दानवौ मधुकैटभौ तयोर्व्यतिकमं दृष्ट्वा कुद्धस्य भवतो हरेः ॥ ३८ ॥ ललाटाज्जातवाञ्च्छम्भुः शूलपाणिस्त्रिलोचनः । इत्थं तावपि देवेशौ त्वच्छरीरसमुद्भवौ ॥ ३९ ॥ स्वन्नियोगकरावेताविति मे नारदोऽब्रवीत् तथा नारायण ! पुरा क्रतुभिर्भूरिदक्षिणेः ॥ ४० ॥ इप्टवांस्त्वं महासत्रं कृष्ण! चैत्ररथे वने नैवं पूर्वे नाऽपरे वा करिष्यन्ति कृतानि वा यानि कर्माणि देव ! त्वं वाल एव महाबलः कृतवान्पुण्डरीकाक्ष ! वलदेवसहायवान् कैलासभवने चापि ब्राह्मणैर्व्यवसः सह ॥ ४२ ॥ वैशम्पायन उवाच -एवमुक्त्वा महात्मानमात्मा कृष्णस्य पाण्डवः । है । हे मधुसूदन ! तुम्ही युग के अन्त में बिना | सिद्ध करने के लिये ब्रह्मा और शम्भु दोनों इसी निमित्त सब जीवों को अपनी आत्मा में लय करके, तरह तुम्हारे शरीर से उत्पन्न हुए हैं ॥३५॥३९॥ जगत् स्वरूप हो जाते हो और युग के आदि में हे श्रीकृष्ण ! तुम्हीं ने पूर्व समय में नत्ररथ तुम्हारी ही नाभि में उत्पन्न हुए कमल से ब्रह्मा जी, वन में महासत्र यज्ञ किया था, जिसमें बड़ी बड़ी जो सब जगत् के कर्ता और सब जड़ और चैतन्य के , दक्षिणाएं दी गई थीं। ऐसा यज्ञ देवता और मनुष्यों गुरु है, प्रकट होते हैं । मधु और पेटभ नाम के में कोई नहीं कर सकता है । बाल्यावस्था में भी दोनों मदान्ध असुर, जय ब्रह्मा को मारने के लिये तुमने यलदेव जी की सहायता से बड़े बड़े अद्भुत उद्यत हुए थे, तब उनके इस दुर्भाव को देखकर काम किये थे । तुम क्लास भवन में भी प्राक्षणों तुम्हें क्रोध चढ़ आया था और तुमने अपने ललाट के साथ रहते रहे हो ॥४०॥४२|| से शूलपाणि त्रिलोचन शम्म् को उसन्न किया था। वैशम्पायन ने कहा-हे राजा जनमेजय ! अर्जुन महर्षि नारद ने मुझसे कहा कि तुम्हारे कायों को उक्त प्रकार मे श्रीकृष्ण जी की स्तुति करके चुप "tyaPiroen ... - min . crocemruMICROWTITaTeetणालाMUMLengror Tes -- अध्याय १३ म हा मारत १४९३ EELIாரானாaaரயாயாயாரானாரUTTIRITUALTLLLLS तूष्णीमासीत्ततः पार्थमित्युवाच जनार्दनः ॥ १३ ॥ ममैव त्वं तवैवाऽहं ये मदीयास्तवैव ते यस्त्वां द्वेष्टि स मां द्वष्टि यस्त्वामनु स मामनु ।। ४४ ॥ नरस्त्वमसि दुर्धर्ष ! हरिनारायणो ह्यहम् काले लोकमिमं प्राप्तौ नरनारायणावृषी ॥ १५ ॥ अनन्यः पार्थ मत्तस्त्वं त्वत्तश्चाऽहं तथैव च नाऽऽवयोरन्तरं शक्यं वेदितुं भरतर्षभ ! वैशम्पायन उवाच-एवमुक्ते तु वचने केशवेन महात्मना तस्मिन्वीर-समावाये संरब्धेष्वथ राजसु धृष्टद्युम्नमुखैर्वीरे_तृभिः परिवारिता ॥ ४७ ॥ पाञ्चाली पुण्डरीकाक्षमासीनं भ्रातृभिः सह अभिगम्याऽब्रवीत्क्रुद्धा शरण्यं शरणैपिणी ॥ १८ ॥ द्रीपयुवाच-पूर्वे प्रजाऽभिसर्गे वामाहुरेकं प्रजापतिम् स्रष्टारं सर्वलोकानामसितो देवलोऽब्रवीत् ॥४९॥ विष्णुस्त्वमसि दुर्धर्प ! त्वं यज्ञो मधुसूदन यष्टा त्वमसि यष्टव्यो जामदग्न्यो यथाऽब्रवीत् ॥ ५० ।। ऋपयस्त्वां क्षमामाहुः सत्त्यं च पुरुषोत्तम ! हो रहा । उस समय श्रीकृष्ण जी कहने लगे-हे । भरी हुई अपने वीर भाइयों के बीच में बैठी हुई अर्जुन ! तुम मेरे हो और मैं तुम्हारा हूँ । जो कुछ थी, शरण जाने की इच्छा से श्रीकृष्ण जी के पास, मेरा है उसपर तुम्हारा अधिकार है । जो लोग तुमसे जो शरण के योग्य थे, गई और कहने लगी-हे शत्रुता या मित्रता रखते हैं, वे मेरे भी शत्रु और | श्रीकृष्ण ! मैंने असित और देवल ऋपियों के मुख मित्र हैं। तुम नर हो, मैं नारायण हूँ। हम देवकार्य से सुना है, कि आप प्रजापति प्रथम पुरुष और जगत्- के कारण नर और नारायण ऋषि के रूप से मनुप्य कर्ण हैं । हे मधुसूदन ! परशुराम जी ने आप को लोक में प्रकट हुए हैं। हम में परस्पर कुछ भी विष्णु अर्थात् सर्वव्यापी, यज्ञ, यज्ञ का करनेवाला मंद नहीं है। हमारे अन्त को भी कोई नहीं जान और पूजन योग्य कहा है । हे पुरुषोत्तम ! कश्यप | जी आप को क्षमा, सत्य और सत्य से उत्पन्न यज वैशम्पायन ने कहा-हे राजा जनमजय! श्रीकृष्ण । कहते हैं । मैंने नारद जी से सुना है, कि आप जी की बात को सुनकर वह द्रौपदी, जो क्रोध में आकाश आदि पांचों तत्त्व के उत्पन्न करनेवाले और NUTRITIENDUMIDCumwMDRImmmmmmpure . - ! - सकता ॥४३॥४६॥ DODIODOILMMODATE १४९४ म हा भारत [वन. EmusarmtitunmitroGOOTINGTONLIOUTUTORIATIOLATITUTITrountrnmunanuaran । WAMMOTIAARTIMIRMITTEDIJNORBIDHI सत्याद्यज्ञोऽसि संभूतः कश्यपस्त्वां यथाऽब्रवीत् ॥ ५१ ॥ साध्यानामपि देवानां शिवानामीश्वरेश्वर ! भूतभावन ! भूतेश ! यथा त्वां नारदोऽब्रवीत् ॥ ५२ ॥ ब्रह्मशंकरशक्राद्यैर्देववृन्दैः पुनः पुनः क्रीडसे त्वं नरव्याघ्र ! वालः क्रीडनकरिव द्योश्च ते शिरसा व्याप्ता पद्यां च पृथिवीप्रभो!। जठरं त इमे लोकाः पुरुषोऽसि सनातनः ॥ ५४ ॥ विद्यातपोऽभितप्तानां तपसा भावितात्मनाम् । आत्मदर्शनतृप्तानामृपीणामसि सत्तमः राजर्षीणां पुण्यकृतामाहवेष्वनिवर्तिनाम् सर्वधर्मोपपन्नानां त्वं गतिः पुरुषर्षभ ! त्वं प्रभुस्त्वं विभुश्च त्वं भूतात्मा त्वं विचेष्टसे ॥ ५६ ॥ लोकपालाश्च लोकाश्च नक्षत्राणि दिशो दश नभश्चन्द्रश्च सूर्यश्च त्वयि सर्व प्रतिष्ठितम् मर्त्यता चेव भूतानाममरत्वं दिवौकसाम् त्वयि सर्व महावाहो! लोककार्य प्रतिष्टितम् ॥ ५८ ॥ सा तेऽहं दुःखमाख्यास्ये प्रणयान्मधुसूदन! । सब प्राणी, साध्यगण, देवता और ग्यारह रुद्रों के के अद्वितीय आश्रय हैं। आप प्रभु, विभु, भूतात्मा भी ईश्वर है ॥४७॥५२॥ और सर्वत्र विचरणशील हैं ॥५३॥५६॥ हे पुरुसिंह ! आप ब्रह्मा, शहर और इन्द्र आदि लोकपाल, मर लोक, नक्षत्र, दसों दिशाएँ, देवताओं को उत्पन्न करके इस प्रकार में उनके माथ आकाश, चन्द्रमा और सूर्य सब आप ही के अन्त- कौड़ा करते है, जैसे बालक विलीनों से खलता र्गत हैं। और मय देवताओं का अमर होना, गनुप्यों है। आप मनातन है। आपके मस्तक से माग स्वर्ग का मरना और सब लोकों का कार्य होना, आप ही और दोनों पैरों से पृथ्वी न्याप्त है । मब चगचर की इच्छा के अनुमार है । हे कृष्ण ! आप दिव्य जगत आपके पेट में है । जो प्रापि विद्यावान् तपस्वी और मानुप, सभी प्राणियों के ईश्वर है । इमलिये शुद्ध-चित्त और आत्मदगी है, उनके निकट आपही संवश में आपमे अपना दु.स्व कहती हूँ। में है । आप पुण्यकर्म करनेवाले. युद्ध में न रुकने पुन की बहन पाण्डवों की मार्या और आपकी सह- पाले, सब धर्मों के ज्ञाता और प्रनिपालक, राजपियों पात्र होकर भी भरी सभा में स्वींचकर गई गई। COVIDEDIODOWUNLIMILDREAMSHREATUTENERALrcurrentra.. - TUCLUCYm ANILE पृष्ट मत्य BANDITIONS TOTONI GIANDTITION .न्याय १२] म हा मारत १४९५ JAININDImmmmmunrTOARITAImmammarAmarn ईशस्त्वं सर्वभूतानां ये दिव्या ये च मानुपाः ॥ ५९ ॥ कथं नु भार्या पार्थानां तव कृष्ण! सखी विभो!। धृष्टद्युम्नस्य भगिनी सभां कृप्येत मादृशी? ॥ ६०॥ स्त्रीमिणी वेपमाना शोणितेन समुक्षिता एकवस्त्रा विकृष्टाऽस्मि दुःखिता कुरुसंसदि ॥ ६१ ॥ राज्ञां मध्ये सभायां तु रजसाऽतिपरिप्लुता दृष्ट्वा च मां धार्तराष्ट्राः प्राहसन्पापचेतसः ॥ ६२ ॥ दासीभावेन मां भोक्तुमीपुस्ते मधुसूदन! जीवत्सु पाण्डुपुत्रेपु पाञ्चालेषु च वृष्णिपु नन्वहं कृष्ण ! भीष्मस्य धृतराष्ट्रस्य चोभयोः । स्नुपा भवामि धर्मेण साऽहं दासीकृता वलात् ॥ ६४ ॥ गर्हये पाण्डवांस्त्वेव युधि श्रेष्टान्महावलान् यलिश्यमानां प्रेक्षन्ते धर्मपत्नी यशस्विनीम् ॥ ६५ ॥ धिग्बलं भीमसेनस्य धिक्पार्थस्य च गाण्डिवम् । यो मां विप्रकृतां क्षुद्रेमर्पयेतां जनार्दन ! शाश्वतोऽयं धर्मपथः सद्भिराचरितः सदा पया यह टीक हुआ कांपती हुई, रजम्बरा, फेरल में इन पराकमी पाण्डवों की निन्दा करती हैं। पक पर पहने और यम पर मासिक धर्म के रक्त इन्होंने यशस्विनी धर्मपसी को इस प्रकार से पर के दाग रगनेवारी मुशको शासन सहज ही पाते और अपमानित होने देसकर भी शण्याही ! ममा में राजाओं के पीप में स्वीच राया । दुर्मति की। अर्जुन के इस गाण्डीय धनुष और भीमसेन के तराष्ट्र के पुन, मुझे उस दशा में देगया, इस पड़े घरको धिकार है, क्योंकि दुष्टों के द्वारा मेरा भर- मान दोने देगा भी टन्दोंन मे चुर मह हे गादन ! पापार, वृधि और पाण्डयों के रिया। जो कोई थोड़ा मा भी पगमन रमता है जीने गहने भी दुष्टों ने दामीभार से मरा उपमोग पर भी भरनी सी की रक्षा करता है। यह पोट पी। में धर्म के अनुसार मनातन और माधुरगों ने मदरमपमा शराष्ट्र और मामी पुप्रा । सो भी दुष्ट पानिमी कारक्षित रहने पर गन्नान रक्षा समन भादि पर मुझे दामी मान होना भर मान के भिनदी मे अग्नी मामा ३२ ॥१३॥६॥ पोरसा दो है पनि काम राना El.El. CHUDUICOD । - mmmmmmmm-Te.. 'Whmr.mmmmmm महाभारत [.. பாராயணரையாயeraாராராயாயையையா..ளாளானாயா यद्भायां परिरक्षन्ति भर्तारोऽल्पवला अपि भार्यायां रक्ष्यमाणायां प्रजा भवति रक्षिता प्रजायां रक्ष्यमाणायामात्मा भवति रक्षितः आत्मा हि जायते तस्यां तस्माज्जाया भवत्युत । भर्ता च भार्यया रक्ष्यः कथं जायान्ममोदरे ॥ ६९ ॥ नन्विमे शरणं प्राप्तं न त्यजन्ति कदाचन ते मां शरणमापन्नां नाऽन्वपद्यन्त पाण्डवाः पञ्चभिः पतिभिर्जाताः : कुमारा मे महौजसः । एतेषामप्यवेक्षार्थं त्रातव्याऽस्मि जनार्दन ! प्रतिविन्ध्यो युधिष्ठिरात्सुतसोमो वृकोदरात् अर्जुनाच्छुतकीर्तिस्तु शतानीकस्तु नाकुलिः ॥ ७२ ॥ कनिष्ठाच्तकर्मा च सर्वे सत्यपराक्रमाः प्रद्युम्नो यादृशः कृष्ण! तादृशास्ते महारथाः ॥ ७३ ॥ नन्विमे धनुपि श्रेष्ठा अजेया युधि शात्रवैः किमर्थं धार्तराष्ट्राणां सहन्ते दुर्वलीयसाम् ॥ ७४ ॥ अधर्मेण हृतं राज्यं सर्वे दासाः कृतास्तथा क्योंकि पति स्त्री के उदर में पुत्ररूप से जन्म लेता है । यह श्रुतकीर्ति अर्जुन से, यह शतानीक, नकुल से, और स्त्री को भी पति की रक्षा करना इस विचार से | और यह श्रुतकर्मा सहदेव से उसन्न हैं । हे श्रीकृष्ण उचित है, कि मेरा पति मेरे उदर में पुत्र रूप से जन्म जी ! मेरे ये पांचों पुत्र प्रद्युम के समान महारथी लगा ॥६५॥६॥ हैं ॥७०१७३॥ पाण्डव शरणागत को कमी विमुख नहीं करते, धनुर्विद्या में इन पांचों का अभ्यास श्रेष्ठ है किन्तु मेरे शरणागत होने पर भी इन्होंने मेरी प्रार्थना और शत्रु इनको नहीं जीत सकता है । परन्तु न पर ध्यान नहीं दिया । देखो, युधिष्ठिर आदि पांचों | जाने वे किसलिये दुर्वल दुर्योधन आदि के किये पाण्डवों द्वारा मेरे गर्भ से प्रतिविन्ध्य, सुतसोम, अपमान को सह रहे हैं। हाय ! उन पृतराष्ट्र के श्रुतकीर्ति, शतानीक, श्रुतकर्मा, ये पांच तेजस्वी और | पुत्रों ने अधर्म से सब राज्य लेकर सर को दास कर महापली पुत्र उत्पन्न हुए हैं। इनके कारण से तो लिया और मुझ रजम्बला एक यस्त्र पहने हुई) मेरी रक्षा करना पाण्डवों को अवश्य उचित था। ममा में स्वीन ले गये । जिम गाण्डीय धनुष को यह प्रनिविध्य युधिष्ठिर से, यह सुतसोम भीमसेन से, | अर्जुन, भीमसेन और आपके भिवा और कोई नही HARDTEMBIRDERMIRUDPanerurteomaroonePeeremerecarceerican - . , अध्याय १२] म हा मा रत १४९७ MommmmmmmmuTIONAIRMIRImummonorarTTITruriminGurammamromans सभायां परिकृष्टाऽहमेकवस्त्रा रजस्वला ॥ ७५ ॥ नाऽधिज्यमपि यच्छक्यं कर्तुमन्येन गाण्डिवम् । अन्यत्राऽर्जुन-भीमाभ्यां त्वया वा मधुसूदन! ॥ ७६ ।। धिग्वलं भीमसेनस्य धिक्पार्थस्य च पौरुषम् ।. यत्र दुर्योधनः कृष्ण ! मुहूर्तमपि जीवति ७७ ॥ कालः सृजति भूतानि कालः संहरते प्रजाः । तत्कालेन कृतं मन्ये न तु पौरुषवर्धनम् ॥ ७८ ।। य एतानाक्षिपद्राष्ट्रासह मात्राऽविहिंसकांन् । अधीयानान्पुरा वालान्त्रतस्थान्मधुसूदन ! ॥ ७९ ॥ भोजने भीमसेनस्य पापः प्राक्षेपयद्विपम् कालकूटं नवं तीक्ष्णं संभृतं लोमहर्षणम् ॥ ८० ॥ तज्जीर्णमविकारेण सहाऽन्नेन जनार्दन! सशेपत्वान्महावाहो ! भीमस्य पुरुषोत्तम ! प्रमाणकोट्यां विश्वस्तं तथा सुप्तं वृकोदरम् वध्व॑नं कृष्ण! गङ्गायां प्रक्षिप्य पुरमानजत् ।। ८२ ॥ यदा विबुद्धः कोन्तेयस्तदा संछिद्य बन्धनम् । उदतिष्ठन्महावाहुर्भीमसेनो महाबलः ॥ ८३ ॥ चढ़ा सकता है यह धनुष अब कहा गया ! हे इसके सिवा प्रमाण नामक जो एक परगद का श्रीकृष्ण जी ! भीमसेन के पराक्रम को और अर्जुन पेड़ गया-तट पर है, यहां विश्वास-पूर्वक खटके क पौरुष को धिकार है, क्योंकि दुरामा दुर्योधन, , सोते हुए भीमसेन को बांधकर, उस दुष्ट ने जल जिमे क्षणमा जीना न चाहिए. था, अब तक जीता ' में डुबा दिया और आप नगर को रोट पड़ा। महावाहु भीम जब जागे, तर कधन तोडकर, जल इसी दुष्ट ने इन पाण्डवों को पालकपन में, जय से निकलकर चले आये। उस पापी ने भीमसेन को ये विद्या ही पढ़ते थे, माता-सहित देश से बाहर निद्रा में तीन विषयाले सांपों से कटवाया; किन्तु निकाल दिया था और इमी ने भोजन में कालष्ट उममे भी भीगसेन की मृत्यु नहीं हुई। जय भीममेन विप मिलाकर भीममेन को खिलाया था। परन्तु की मूच्छा दटी, तय भीमसेन ने टन सांपों को भायुधल विशेष होने के कारण से, यह विष असा मार द्वारा और उमदुए के प्यारे मारथी को उरे के साथ पच गया ७८.८१॥ दाय के पापड़ मे माग | हम पधान् एक दिन mummmmmmercureIEPTEoITEEEEErrrrcreeeecrerecentor puranaamumaumaamanawmusum - 1 . ॥७४।७७॥

महाभारत [ वनपर्व CAMINGWATiminimurnimuTurumIITUTATTIMILI mmunmulniromainanAINTERNAT auuuNTRADITURALAtithunmuttitutiu आशीविषैः कृष्णसर्भीमसेनमदंशयत् सर्वेष्वेवाऽङ्गदेशेषु न ममार च शत्रुहा . ॥ ८४ ॥ प्रतिबुद्धस्तु कौन्तेयः सर्वान्सर्पानपोथयत् सारथिं चाऽस्य दयितमपहस्तेन जनिवान् ॥ ८५॥ पुनः सुप्तानुपाधाक्षीद्वालकान्वारणावते शयानानार्यया साधं को नु तत्कर्तुमर्हति? ॥८६॥ यत्राऽऽर्या रुदती भीता पाण्डवानिदमब्रवीत् । महद्वयसनमापन्ना शिखिना परिवारिता ॥ ८७॥ हा! हताऽस्मिकुतोन्वद्य भवेच्छान्तिरिहाऽनलात्। अनाथा विनशिष्यामि वालकैः पुत्रकैः सह 1 ८८ ॥ तत्र भीमो महावाहुर्वायुवेगपराक्रमः आर्यामाश्वासयामास भ्रातॄश्चापि वृकोदरः ॥ ८९ ॥ वैनतेयो यथा पक्षी गरुत्मान्पततां वरः तथैवाऽभिपतिष्यामि भयं वो नेह विद्यते ॥ ९० ॥ आर्यामधेन वामेन राजानं दक्षिणेन च - अंसयोश्च यमौ कृत्वा पृष्ठे वीभत्सुमेव च ॥ ११ ॥ सहसोत्पत्य वेगेन सर्वानादाय वीर्यवान् वारणावत नगर में कुन्ती-सहित पांचों पाण्डव लाक्षा वायु के समान है, अपने चारों भाइयों और माता को गृह में सोये हुए थे, पापी दुर्योधन ने पाण्डवों को | धैर्य दिया और कहा- तुम लोग बिलकुल न डरो । जलाने के विचार से पुरोचन के हाथों उसमें आग तुम सब को रेकर गरुड़ के समान उछल कर लगवा दी। हे मधुसूदन,! कौन पुरुष ऐसा घृणित इस अमि से बाहर ले चलूंगा 11८७१९०॥ कर्म कर सकता है ॥८२८६॥ और फिर बाई गोद में अपनी माता को, दाहिनी कुन्ती माता उस आग को देख अपने को | में युधिष्ठिर को, दोनों कन्धों पर नकुल और सहदेव सकट में पड़ी हुई जानकर व्याकुल हृदय से 'हाय को और पीठ पर अर्जुन को चढ़ा लिया और अक- मुझे मार डाला' कहकर रोने लगी। वह कहने लगी- स्मात् उछल कर बाहर निकल आया और सबको इस ममि से अब किस तरह बचाव हो । आज मैं | अग्नि से बचा लिया । यशस्वी पाण्डव रात्रि को ही अनाथ की तरह पालकों के साथ यहीं जलकर मर माता-सहित चल कर महावन हिडिम्य-कानन में जाऊँगी। उस समय भीमसेन ने जिसका पराक्रम पहुँचे। वहां पर यकावट के कारण से ये चारों भाई WORMATIOUTUITIWADITIDIARIMDHEWITTERNITORITEMOIRCruarat.com aanamaAMITTERTISEMARDAN - mirrinriminanimunarni romanasmartamal SIROINiranmuurunuwarrantan .. अध्याय १२) महा मारत १४९९ wnLINITIATTIRANwnTTTTTTTTTrn.comTTPUITCOICTGLA भ्रातॄनार्या च वलवान्मोक्षयामास पावकात् ॥ ९२ ॥ ते रात्री प्रस्थिताः सर्वे सह मात्रा यशस्विनः । अभ्यगच्छन्महारण्ये हिडिम्बवनमन्तिकात् ॥ १३ ॥ श्रान्ताः प्रसुप्तास्तत्रेमे मात्रा सह सुदुःखिताः । सुप्तांश्चैनानभ्यगच्छहिडिम्बा नाम राक्षसी सा दृष्ट्वा पाण्डवांस्तत्र सुप्तान्मात्रा सह क्षितौ । हृच्छयेनाऽभिभूतात्मा भीमसेनमकामयतू ।। ९५ ॥ भीमस्य पादौ कृत्वा तु स्व उत्सङ्गे ततोऽवला । पर्यमर्दत संहृष्टा कल्याणी मृदुपाणिना तामवुध्यदमेयात्मा वलवान्सत्यविक्रमः पर्यपृच्छत तां भीमः किमिहेच्छस्यनिन्दिते! ॥ ९७ ।। एवमुक्ता तु भीमेन राक्षसी कामरूपिणी भीमसेनं महात्मानमाह चैवमनिन्दिता ॥ ९८ ॥ पलायध्वमितः क्षिप्रं मम भ्रातैप वीर्यवान् आगमिष्यति वो हन्तुं तस्माद्गच्छत मा चिरम् ॥ ९९ ॥ अथ भीमोऽभ्युवाचैनां साभिमानमिदं वचः नोद्विजेयमहं तस्मान्निहनिष्येऽहमागतम् ॥१०॥ तयोः श्रुत्वा तु संजल्पमागच्छद्राक्षसाधमः भीमरूपो महानादान्विस्सृजन्भीमदर्शनः ॥१०१॥ माता-सहित सो गये। उस समय इनके पाम हिडिम्या | पिणी राक्षसी ने मीमसेन के यों पूछने पर, नाम राक्षसी आई और भीममेन के सम्प को देख हे पुरुषश्रेष्ठ ! मेरा वीर्य-मद से उन्मत्त, दुरानारी कर कामासक्त हो गई । भीममेन पर अनुगग हो भाई तुम को मारने के लिये अभी माता होगा। जाने से यह राक्षसी, उनके चरणों को गोद में रख इसमे तुम शीघ्र यहां से मागी । यह सुनकर भीम- कर, अपने कोमल हाथों से दबाने लगी ॥२.१९६॥ सेन ने गर्व के माथ कहा-हे मुन्दरी ! मैं तुम्हारे उम समय इन पराममी और बुद्धिमान् भीम. ' माई से बिलकुल नहीं डरता। यहां आते ही पर सेन ने उस राक्षमी से पूछा है सुन्दरी ! तुम क्या : मेरे हाथ से मारा जायगा ॥१७॥१०॥ रादती हो! तर उम अनुपम रस लावण्यवनी काम राक्षमाधम हिडिम्ब उनकी हम यान-चीत को antraMEAUMTIALAIEEERam Mummarraman TRETUTELCI.cr.arrrrrr. HTTPTITBOTTTTrrrrm १५०० महा मारत [ वनपर्व TANT nunliminating iTunnilinguoiLorei! EMAIMURTwunrmmmummu - nananamanuman राक्षस उवाच-केन सार्ध कथयसि आनयैनं ममाऽन्तिकम् । हिडिम्बे ! भक्षयिष्यामो न चिरं कर्तुमर्हसि ॥ १०२ ॥ सा कृपासंगृहीतेन हृदयेन मनस्विनी नेनमैच्छत्तदाख्यातुमनुक्रोशादनिन्दिता ॥ १०३ ॥ स नादान्विनदन्छोराराक्षसः पुरुपादकः अभ्यद्रवत वेगेन भीमसेनं तदा किल ॥ १०४ ॥ तमभिद्रुत्य संक्रुद्धो वेगेन महता वली अगृह्णात्पाणिना पाणिं भीमसेनस्य राक्षसः ॥ १०५॥ इन्द्राशनिसमस्पर्श वज्रसंहननं दृढम् संहत्य भीमसेनाय व्याक्षिपत्सहसा करम् गृहीतं पाणिना पाणि भीमसेनस्य रक्षसा नाऽमृष्यत महावाहुस्तत्राऽध्यद् वृकोदरः ॥ १०७ ॥ तदासीत्तुमुलं युद्धं भीमसेनहिडिम्बयोः सर्वास्त्रविदुपोषैर वृत्रवासवयोरिव ॥ १०८॥. विक्रीड्य सुचिरं भीमो राक्षसेन सहाऽनघ! । निजघान महावीर्यस्तं तदा निर्वलं बली ॥ १०९ ।। हत्वा हिडिम्ब भीमोऽथ प्रस्थितो भ्रातृभिः सह । हिडिम्बामग्रतः कृत्वायस्यां जातो घटोत्कचः ॥ ११० ॥ सुनकर गरजता हुआ वहां आ पहुंचा। वहां आकर लिया और अपने कठोर स्पर्शवाले सुदृढ़ हाथ से उसने कहा-मी हिडिम्या ! तू किम से बातें कर एकाएक उनके ऊपर प्रहार किया। राक्षस ने जब रही है ! इम पुरुष को मेरे पास तुरन्त ले आ। मैं हाथ पकड़ कर यो प्रहार किया, तब महाबाहु भीम- इसका मांस खाऊँगा । अब तुझे विलम्ब न काना । सेन फ्रोध के मारे प्रज्वलित हो उठे ॥१०३।१०७॥ चाहिए ॥१०१।१०२॥ फिर वृत्रासुर और इन्द्र के समान, सब मस्त्री सर्वाङ्गसुन्दरी हिडिम्या के मन में करुणा का भाव में निपुण हिडिम्ब और भीम का भयका युद्ध होने मर आया था । वह चुपचाप बैठी रही । तर मनुप्य. लगा । हे श्रीकृष्ण ! मीमसन ने बहुत देर तक उस मांस-लोभी दुराचारी हिडिम्ब जोर में चिलाता हुआ राक्षस के साथ युद्ध किया । उपरान्त जब वह नित भीमसन की ओर लपका | फ्रोध के आवेश में वेग ' हुआ, तब उस मार डाला । डिम्ब को मार कर, से जाकर, उस राक्षस ने भीममेन का हाथ पकड घटोत्कन की माता हिडिम्या को आगे करके, माता EDITORImuTROPIOIDDDDREDSOMEnareneurnmareer ..

. अध्याय १२] महा मारत १५०१ "WWommmmmwOLITITIONmmmmmmmmmmmmmmmunrinmmmmmmmmmmom arorananey ततः संप्राद्रवन्सर्वे सह मात्रा परन्तपाः- एकचक्रामभिमुखाः संवृता ब्राह्मणवजैः प्रस्थाने व्यास एषां च मन्त्री प्रियहिते रतः । तताऽगच्छन्नेकचक्रां पाण्डवाः संशितव्रताः तत्रोऽप्यासादयामासुर्वकं नाम महावलम् पुरुपादं प्रतिभयं हिडिम्वेनैव संमितम् तं चापि विनिहत्योयं भीमः प्रहरतां वरः सहितो भ्रातृभिः सर्वे पदस्य पुरं ययौ लब्धाऽहमपि तत्रैव वसता सव्यसाचिना यथा त्वया जिताकृष्णरुक्मिणीभीष्मकात्मजा॥ ११५ ॥ एवं सुयुद्धे पार्थेन जिताऽहं मधुसूदन ! 1. स्वयंवरे महत्कर्म कृत्वा न सुकरं परैः एवं क्लेशैः सुवहुभिः क्लिश्यमाना सुदुःखिता । निवसाम्यार्यया हीना कृष्ण ! धौम्यपुरःसरा ॥ ११७ ॥ त इमे सिंहविक्रान्ता वीर्येणाऽभ्यधिकाः परेः । निहीनेः परिक्तिश्यन्ती समुपेक्षन्ति मां कथम् ॥ ११८ ॥ एतादृशानि दुःखानि सहन्ती दुर्वलीयसाम् । और माइयों के साथ मीमसेन वहां से चल दिये। इसके | योग्य अद्भुत काम करके, आये हुए राजाओं को उपरान्त शत्रुनाशन पाण्डव ब्राह्मणों के साथ एकचमा परास्त करके, मुझको प्राप्त किया ॥११३।११६॥ नगर्ग,की ओर चले। हितचिन्तक भगवान् वेदव्यास हे जनार्दन ! इस तरह यहुत से क्लेश उठाती श्री मन्त्री की तरह इनके साथ थे ॥१०८।११२॥ हुई में, अब साम से बिछुड़ कर, आचार्य धौम्य के पाण्डय लोग जर उस नगरी के पास पहुँन, तय माथ यहाँ रहती हूँ। मेरा हृदय दुःख भार सन्ताप विहिप के समान पराक्रमी मा नाम का भयानक से सर्वदा जनता रहता है।हाय ! मैं नहीं जानना राक्षस देख पड़ा। भीमसेन उसे मी मारकर भाइयों के | हूँ.कि ऐसे पगममी पाडय उन दीन-पराक्रम शाओं साथ द्रुपद नरेश की नगरी की ओर चले। धीरण ! के दिये हुए मेरे क्रेश को क्यों महदहै। टन जी! तुम जैसे राजा भीमक दीन्या रुक्मिणीको पारी और दुर गधुओं के दिये हुए दुःम मेरे से आये थे, सेही नगरी में रहते समय, महा. पदय से बहुत दिनों तक कभी दूर न होंगे। पर्ग भर्जुन ने म्ययंवर में, औरों से न हो मक्ने | यामुदेय भी ! और मषिक पदमी, पर IRIRAAmazmananmnauguramama , CertTHE THI PrerrrrrTETD:CTITILI १५०२ महाभारत [ वनपर्व Dammaminuwannamrunmunimimi. LI ORDIMAL दीर्घकालं प्रदीप्ताऽस्मि पापानां पापकर्मणाम् ॥ ११९ ॥ कुले महति जाताऽस्मि दिव्येन विधिना किल । पाण्डवानांप्रिया भार्या स्नुपा पाण्डोर्महात्मनः ॥ १२० ॥ कचग्रहमनुप्राप्ता साऽस्मि कृष्ण ! वरा सती । पञ्चानां पाण्डुपुत्राणां प्रेक्षतां मधुसूदन ! ॥ १२१ ॥ इत्युक्त्वा प्रारुदत्कृष्णा मुखं प्रच्छाद्य पाणिना । पद्मकोशप्रकाशेन मृदुना मृदुभाषिणी ॥ १२२ ॥ स्तनावपतितौ पीनी सुजातौ शुभलक्षणौ अभ्यवर्पत पाञ्चाली दुःखजैरश्रुविन्दुभिः ॥ १२३ ॥ चक्षुपी परिमार्जन्ती निःश्वसन्ती पुनः पुनः । वाष्पपूर्णेन कण्ठेन कुद्धा वचनमब्रवीत् ॥ १२४ ॥ नैव मे पतयः सन्ति न पुत्रा न च वान्धवाः । न भ्रातरो न च पिता नैव त्वं मधुसूदन! ये मां विप्रकृतां क्षुद्ररुपेक्षध्वं विशोकवत् न च मे शाम्यते दुःखं कर्णो यत्प्राहसत्तदा ॥ १२६ ॥ चतुर्भिः कारणैः कृष्ण! त्वया रक्ष्याऽस्मि नित्यशः। संवन्धागौरवात्सख्यात्प्रभुत्वेनैव केशव ! ॥ १२७ ॥ कुल में मेरा जन्म हुआ है, दिव्य विधि के अनुसार पोंछती हुई कहने लगी-न मेरे पति हैं, न पुत्र हैं, में पाण्डवों की प्यारी धर्मपत्नी और महात्मा पाण्डु म भाई है, न यान्धव हैं, न पिता है । अधिक क्या की पुत्रवधू हुई हैं। तो मी दुष्ट दु शासन ने पाण्डवों कहूँ, हे श्रीकृष्ण ! तुम भी मेरे सहायक नहीं हो, के सामने ही बाल पकड़ कर मेरा अपमान किया। क्योंकि दुष्ट के हाथों मेरा अपमान होते देखकर ॥११७११२१॥ भी, तुम लोगों ने शोकहीन भाव से उसकी रापरवाही वैशम्पायन ने कहा-हे राजा जनमेजय ! झी । कर्ण ने उस ममय जो मेरी हमी की थी, उम द्रौपदी उक्त रीति से कहकर अपने कमररूपी कोमल दु ख को मैं किसी तरह नहीं भूल सस्ती। हे श्रीकृष्ण! हायों से मुख को दक कर रोने लगी और उसके | तुम को सदा मेरी रक्षा करनी चाहिये, क्योंकि में आंसू उसके स्तनों पर, जो हद पुष्ट सुडौल और तुम्हारी मक्त, रिश्तेदार, अमिकुण्ड से निकरने में शुभ लक्षणों से युक्त थे, गिरने रगे। उस ममय द्रौपदी प्रतिष्ठिन और तुम्हारे सामर्थ्य में सामर्थ्यवती है। फ्रोधित होकर गद्गद् वाणी से आँखों को वारम्यार ॥१२२।१२७|| FODDH20pmomaamanwarmnitumadram- - writrate म हा मारत अध्याय १२] InITTUTITUntre nuTRUTTITUrurrountum ImuTIOTITUTITUTITUNITTITUTION गयाwmmandutomarathi वैशम्पायन उवाच-अथ तामब्रवीत्कृष्णस्तस्मिन्बीरसमागमे 5 वासुदेव उवाच-रोदिष्यन्ति स्त्रियो ह्येवं येषां कुद्धाऽसि भाविनि । वीभत्सुशरसञ्च्छन्नाञ्छोणितौघपरिप्लुतान् ॥ १२८ ।। निहतान्वल्लभान्वीक्ष्य शयानान्वसुधातले यत्समर्थं पाण्डवानां तत्करिष्यामि मा शुचः ॥ १२९ ॥ सत्यं ते प्रतिजानामि राज्ञां राज्ञी भविष्यसि । पतेद् द्यौहिमवाञ्च्छीर्येत्पृथिवी शकलीभवेत् ॥ १३० ।। शुष्येत्तोयनिधिः कृष्णे ! न मे मोघं वचो भवेत् । *तच्छ्रुत्वा द्रौपदीवाक्यं प्रतिवाक्यं तथाऽच्युतात्॥ १३१ ॥ साचीकृतमवैक्षत्सा पाञ्चाली मध्यमं पतिम् । आवभापे महाराज ! द्रौपदीमर्जुनस्तदा ॥ १३२ ॥ मा रोदीः शुभताम्राक्षि! यथाऽऽह मधुसूदनः । तथा तद्भविता देवि ! नाऽन्यथा वरवर्णिनि !॥ १३३ ।। धृष्टद्युम्न उवाच-अहं द्रोणं हनिष्यामि शिखण्डी तु पितामहम् । दुर्योधन भीमसेनः कर्णं हन्ता धनञ्जयः ।। १३४ ॥ रामकृष्णौव्यपाश्रित्य अजेयाःस्मरणे स्वसः!। अपि वृत्रहणा युद्धे किं पुनधृतराष्ट्रजैः वैशम्पायन ने कहा-हे राजा जनमेजय ! बनाऊँगा । चाहे समुद्र सूख जाय, हिमालय पर्वत महात्मा श्रीकृष्ण ने आये हुए वीरों के सामने बीच से फट जाय, स्वर्गलोक नीचे गिर पड़े और दोपदी से कहा-हे द्रौपदी ! त जिनके ऊपर कुपित । पृथ्वी के सैकड़ों टुकड़े हो जायें परन्तु मेरा वाक्य हो रही है, उन सब की, स्त्रियां भी इसी प्रकार से | निष्कल नहीं होगा ॥१२८३१३०॥ रोवेंगी और अर्जुन के बाणों से मरे हुए और रुधिर भगवान् वासुदेव ने जब इस प्रकार की प्रतिजा में भरे हुए, पृथ्वी पर पड़े हुए अपने-अपने पतियों की, तब द्रौपदी ने तिरछी दृष्टि से अर्जुन की ओर को देख-देख कर विलाप करेंगी । हे भाविनी ! | देखा । उन्होंने द्रौपदी को सम्बोधन करके कहा- में सत्य प्रतिज्ञा करके कहता हूँ, कि यथाशक्ति हे द्रौपदी ! अब तुम मत रोओ । श्रीकृष्ण ने जो पाण्डयों का कार्य पूरा करके तुझको राजरानी कुछ कहा है यह कभी अन्यथा नहीं हो सकता। * तौपदीवाक्यं श्रुत्वा तपाऽच्युतात्प्रतिवास्य श्रुत्वाऽनो द्रौपदीमायभाषे इति म्यवहितेनाऽन्वयः । CREDITINDIATTImummummmmmWLODAIITRADITORIMARCHICITISEMEDIESVATION BDUOmmmmmmmmmmmmmm.indainnumanasammananAmmam maramanan........ - १५०४ महा मा र त [ वनप EMAIJAILITTrmananthan HourTTI OTUITIMITMunmannanoramaram - वैशम्पायन उयाच-इत्युक्तेऽभिमुखा वीरा वासुदेवमुपस्थिताः 'तेषां मध्ये महावाहुः केशवो वाक्यमब्रवीत् ॥ १३६ ।। इति श्रीमन्महाभारते वनपर्वणि अर्जुनाभिगमनपर्वणि द्रौपद्याश्वासने द्वादशोऽध्याय ॥ १२ ॥ इसके पीछे धृष्टद्युम्न ने कहा- हे बहन ! मै द्रोणा धृतराष्ट्र के पुत्रों की कौन कहे, इन्द्र भी हमारा चार्य को मारूँगा, शिखण्डी भीष्म को मारेंगे, भीमसेन सामना न कर सकेंगे । वैशम्पायन ने कहा-हे राजा दुर्योधन को मारेंगे और अर्जुन कर्ण को मारेंगे | जनमेजय ! यह कह कर वे सब वीर श्रीकृष्ण जी अधिक क्या कहूँ, हम लोग श्रीकृष्ण और बलदेव । के पास आये । उस समय श्रीकृष्ण जी युधिष्ठिर को सहायक पाकर यदि युद्धभूमि में खड़े होंगे, तो से यों कहने लगे ॥१३१।१३६॥ वनपर्व का वारहवां अध्याय समाप्त हुआ ।। १२ ।। +9- महाभारत का तृतीय अङ्क समाप्त हुआ। RA इति श्रीमन्महाभारते तृतीयः खण्डः । ३ oTuzmamuramminaiaurIMETIC IIT ALL TICTanuary STREET पए IMILAIME LDRENTIOuroramurODOOT

Sachitra Mahabharat Bhasha Tika Ank-iii

Author
Maharishi,vedvyas
Title
Sachitra Mahabharat Bhasha Tika Ank-iii
File name
Sachitra Mahabharat Bhasha Tika Ank-iii
Text
OCR done
Citation
1960
Published
2012/08
Publisher
Lahore.,laxmandas Pyarelal Jain Sanskrit Pustakalaya
Language
Sanskrit
Pages
431
Library
Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
DLI number
312691
Barcode
99999990321454.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
SYfPtxDeUiB
Download PDF

Sachitra Mahabharat Bhasha Tika Ank-iii