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Awdhut Geeta

Shree Banmali Chturvedee · 2009/09

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*श्रीगणे
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* भाषाटीका सहिता
ईश्वगनुग्रहादेव पुंसामदैतवासना।
महद्भयपरित्राणा विप्राणामुपजायते ।।.१ ॥
बडे भय से रक्षा करनेवाली अभेदबुद्धि पुरुष श्रेष्ठ बाम-
णों में उत्पन्न होती है ।।
येनेदंपरितं सर्वमात्मनैवात्मनात्मनि ।
निराकारकथंवन्दे ह्यभिन्नशिवमव्ययम् ॥ २॥
जिसने अपने आत्मारूप माया से इस 'सब विश्वको
अपने बीचमें रचा है वह निराकार है, सबमें व्याप्त है, क-
याणरूस है,अविनाशीहै,उसकी किसतरह बन्दनाकरूं॥२॥
पञ्चभूतात्मक विश्वं मरीचिजलसन्निभंम् ।
कस्याप्य हो नमस्कुर्यामहमेको निरञ्जनमा३॥
पृथ्वी जल तेज वायु आकाश इन पांच तत्वों से बना |
हुआ जो जगत है सो 'मृगतृष्णाके जलके समान सुंठा
है मैं एक और निरंजन है अहो ! मैं किसके लिये
नमस्कार करूं ॥३॥

. अवधूत गोता। आत्मैव केवलं सर्व भेदाभेदो न विद्यते । अस्तिनास्तिकथं बयां विस्मय प्रतिभाति मे४ केवल आत्मा ही सर्वमें है इसमें भेदं और अभेद कुछ 'नहीं है इसके सम्बन्ध में अस्ति नास्ति ( है वा नहीं है) किस तरह कहा जाय ये मुझको बड़ा आश्चर्य मालुम होता है। वेदान्तसारसर्वस्वं ज्ञानविज्ञानमव च । [अहमात्मानिराकारःसर्वव्यापी स्वभावतः॥५॥ वेदान्तोंका सार सर्वस्व यही है और यही ज्ञान, विज्ञान है कि स्वभाव से सब में वर्तने वालों और. निराकार जो आत्मा है वह में ही हू।॥ ५॥ यो वै सर्वात्मको देवो निष्कलो गगनोपमः। स्वभाव निर्मलःशुद्धःसएवाहं न संशयः ॥६॥ जो.देव सबकी आत्मा है कला रहित है 'आकाश. के समान है स्वभाव से निर्मल और शुद्धहै वही मैं हूँ इसमें संदेह नहीं है ॥६॥ अहमेवाव्ययोऽनन्तःशुद्धविज्ञानविग्रहः । सुख दुःखं न जानामि कथं कस्यापिवर्तते॥७॥ मेंही अविनाशी और अनन्त (जिसका अन्त नहीं; है ) हूँ शुद्ध ज्ञानस्वरूप में ही हूं। सुख और दुःख किसको और किसतरह उपस्थित होते हैं यह मैं नहीं जानता हूँ॥७॥.

भाषाटीकासहितो। न मानसं कर्म शुभा शुभं मे। न कायिकं कर्म शुभाशुभं मे॥ न वाचकं कर्म शुभाशुभं मे। ज्ञानामृतं शुद्धमतींद्रियोऽहम् ॥८॥ मेरे बीच में मन संबन्धी शुभ अशुभ कर्म नहीं हैं शरीर संबन्धी शुभ अशुभ कर्म नहीं हैं वाणी संवन्धी शुभ अशुभ कर्म मुझमें नहीं हैं मैं ज्ञानअमृत स्वरूप हूं, शुद्ध हूं और इन्द्रियों से पर हूँ॥८॥ मनो वै गगनाकारं मनो वै सर्वतोमुखम् । मनोऽतीतं मनः सर्व न मनः परमार्थतः ॥९॥ मन आकाश के समान है मन चारों तरफ से मुखवाला है मन परे है मनही सवहै वास्तव में मात्मा से अतिरिक्त कुछ नहीं है ॥६॥ अहमकमिदं सर्व व्यौमातीतं निरन्तरम् । पश्यामि कथमात्मानं प्रत्यक्षं वातिरोहित १० यह सब विश्व आकाश से परें और सदां है यह देखताहूं परन्तु आत्मा प्रत्यक्ष है वा छिपा हुआ यह किस तरह से देख सकता हूं ॥१०॥ त्वमेवमेकं हि कथं न बुध्यसे। समं हि सर्वेषु विमृष्टमव्ययम् ॥

अवधूत गाता सदोदितोऽसि त्वमखण्डितः प्रभो। दिवा च नक्तं च कथं हि मन्यसे . ११॥ तुम एक हो. इसलिए समता क्यों नहीं देखते हो, तुम संपूर्ण प्राणियों में अविनाशी और समभाव में रहते हो हे प्रभो ! तुम सदा प्रकाश रूप और अखण्डित हो फिर दिन और रात को किस प्रकार. मानते. हो॥.११ ॥ आत्मानं सततं विद्धि सर्वत्रैकं निरन्तरम् । अहं ध्याता परं ध्येयमखण्डं खण्ड्यते कथम् .१२ आत्मा सदा सब जगह एक है और नित्यहै यह जानो ध्यान करने वाला और परमध्येय अर्थात् ध्यानके योग्य हूं यह कहकर उस असण्डित पुरुष को किस प्रकार से खण्डित करते हो ॥ १२॥ न जातो न मृतोऽसि त्वं न ते देहः कदाचन । सर्व ब्रह्मेति विख्यातं ब्रवीति बहुधा श्रुतिः॥१३॥ न तूने जन्म लिया है, न मना है, न तेरा कभी शरीर सन ब्रह्म हैं इस बात को श्रुति अनेक प्रकार से कहती हैं १३ सवाह्याभ्यन्तरोऽसि त्वं शिवः सर्वत्र सर्वदा । इतस्ततः कथं भ्रान्तः प्रधावसि पिशाचवत् १४ तु बाहर है और भीतर है सब जगह सदा शिव रूप. है इधर उधर पिशाच की तरह क्यों घमता फिरता है ॥१४॥ मैं

५
भाषाटीकाalpali
संयोगश्च वियोगश्च वर्तते न च ते न मे ।
नवं नाहंजगन्नेदं सर्वमात्मैव केवलम् ॥ १५॥
तेरा और मेरा न संयोग है, न वियोग है, न तु है
न मैं हूँ न येजगत् है सब जोकुछ है केवल ब्रह्मही है। १५ ।
शब्दादिपञ्चकस्यास्य नवासि त्वं न ते पुनः ।
'त्वमेव परमं तत्वमतः किं परितप्यसे ।।१६ ॥
शब्द, रूप, रस, गन्ध, स्पर्श, इनके वीचमैतु नहीं है
और न वे. तेरे बीच में हैं तु परम तत्व है इससे क्यों
सन्ताप करता है ॥ १६ ॥
जन्म मृत्युनने चित्तं वन्धमोक्षौ शुभाशुभौ ।
"कथरोदिपिरे वत्स नामरूपं नतेनमें ॥१७॥
न तेरा जन्म है न मृत्यु है न तेरा चित्त है न बन्धन
और मोक्ष है न शुभ और अशुभ हैं श्रतएव रे वत्स !तु
क्यों रोता है ? यह सब नाम और रूपमात्र है न तेरा
है न मेरा है ॥ १७ ॥
अहो चित्त कथं भ्रान्तः प्रधावसि पिशाचवत् ।
अभिन्नं पश्य चात्मानंरागत्यागात्सुखी भव १८
हेचित्त ! तुषबड़ाकरपिशाचकी तरह 'क्योंदौड़ता फिरता
है आत्मा को अभिन्न भाव में देख और विषयों को,
छोड़कर सुखी हो ॥ १८॥

६
अवधूतनीता।
त्वमेव तत्वं हि विकार वर्जितं ।
निष्कम्पमेकं हि विमोक्ष विग्रहम् ॥
न ते च रागो ह्यथवा विरागः ।
कथं हि संतप्यसि कामकामतः॥१९॥
तुही विकार तत्व एक निष्फल और मोनस्वरूप है
न तेरे राग हैन विराग है फिर विषय वासना में लीन
होकर क्यों सन्ताप करता है ॥ १९ ॥
वदन्ति श्रतयः सर्वा निर्गुणं शुद्धमव्ययम् ।
अशरीरं समं तत्वं तन्मा विद्धि न संशयः२०
सत्र श्रुति कहती हैं कि ईश्वर निर्गुणहे शद्ध है अवि-
नाशी है उसके शरीर नहीं है समान है तत्व है वह मैं ही
हूं सो जान इसमें सन्देह नहीं है ।। २० ॥
साकारमन्तं विद्धि निराकारं निरन्तरम् ।
एतत्तत्त्वोपदेशेन न पुनर्भवसंभवः।। २१ ।।
साकार झूठा है निराकार नित्य है यह जान, इसी
तत्व के उपदेशसे फिर संसार में नहीं आयेगा ॥२१॥
एकमेव समं तत्वं वदंति हि विपञ्चतः ।
रागत्यागात्पुनश्चित्तमेकानकें न विद्यते ।।२०।।
विद्वान कहते हैं कि एक ही समान तत्व है विषयों को
छोड़ देने से चित्त एकाग्र होजाता हैं फिर डामाडोल नहीं
होता है ॥२२॥

भावाटीकाप्साहा अनात्मरूपं च कथं समाधि- रात्मस्वरूपं च कथं समाधिः॥ अस्तीतिनास्तीति कथं समाधि- मोक्षस्वरूपं यदि सर्वमेकम् ॥२३॥ जो आत्माका रूप नहीं हैं तो फिर समाधि किस तरह होसकती है और जो अपनाही स्वरूप है तो भी समाधि कसेहे ये पदार्थ है ये नहीं है इस प्रकार जो बुद्धि में कल्पनाहै तौमी समाधि कैसे है ये सब एकहै और मौत स्वरूप है ।। २३॥ विशुद्धोऽसि सम तत्त्वं विदेहस्त्वमजोऽव्ययः। जानामीह नजानामीत्यात्मानं मन्यसेकथं२४ तू शुद्ध है समान तत्व है देह रहित है अजन्मा है अवि- नाशी है में जानताहूं और नही जानता हूं तु आत्माको किस तरह मानता है।॥ २४॥ तत्वमस्यादिवाक्यैश्चस्वात्माहिप्रतिपादितः । नेतिनेतिश्रुति—यादनृतं पाञ्चभौतिकम् ।२५ वह तु है इत्यादि वाक्यों से आत्मा प्रतिपादन किया जाता है यह भी नहीं यह भी नहीं है इस प्रकार से प्रति इस [१] पंचभूत से बनेहुए विश्वको झूठा बतलाती है२५ १पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, ये पांच तत्व हैं। -

.
अवधूतगोता।
आत्मन्येवात्मना सर्व त्वया पूर्ण निरन्तरम्।
ध्याता ध्यानंनते चित्र निर्लज्जध्यायतेकथर६
तुमने अपने वीच में आत्मासे सब विश्वको पूर्ण किया
है तू ध्यान करने वाला है दूसरे के ध्यान में नहीं आताहै
फिर निर्लज्ज होकर क्यों ध्यान करता है ॥३६ ॥
शिवं न जानामि कथं वदामि।
शिवं न जानामि कथं भजामि ।।
अहं शिवश्चेत्परमार्थ तत्वं ।।
समस्वरूपं गंगनोपमं च॥२७॥
शिवको मैं नहीं जानताहूं किसतरह बताऊं शिवको
जानता नहींहूं किसतरह भजू यदि मैंही शिवहूं तो परम-
तत्वरूपहूं समान स्वरूपहूं आकाशके समानहूं ॥ ३७॥
नाहं तत्वं समं तत्वं कल्पनाहेतुवर्जितम् ।
ग्राह्यग्राहकनिमुक्तं स्वसंवेद्यं कथं भवेत्॥२८॥
कल्पना और हेतु इनसे रहित जो समानतत्व है वह
मैं नहीं हूँ ग्राह्य ग्रहण करने योग्य और ग्राहक ग्रहण
करनेवाला ये दोनों बात उसमें नहीं हैं अर्थात् न तो वह
किसी से ग्रहण किया जाताहै न वह किसीको ग्रहण करता
है वह ऐसा ईश्वर अपने आप किसप्रकार जाना जा
सकता है ॥२८॥

भाषाटीकामाहता।
अनंतरूपं न हि वस्तु किंचित् ।
तत्वस्वरूपं नहि वस्तु किंचित् ॥
आत्मैकरूपं परमार्थतत्व।
न हिंसको वापि न चाप्यहिंसा ॥२९॥
कोई वस्तु अनंतरूप नहीं है, कोई वस्तु तत्स्वरूप
भी नहीं है. परम अर्थ और तत्वका स्वरूप एक श्रात्मा ही
है, इसमें हिंसा और अहिंसा का कुछभी भाव नहीं है २६
विशुद्धोऽसि सम तत्वं विदेहमजमव्ययम् ।
विभ्रमं कथमात्मार्थे विभ्रान्तोऽहं कथं पुनः ३० ।।
तु विशेष शुद्ध है समान तत्वहै देहरहित है अजन्माहै
और विनाशरहित है फिर आत्माके अर्थ भ्रम क्यों है |
और मैं और तू क्यों चक्कर में पड़े हैं ।। ३० ॥
घटे भिन्ने घटाकाशं सुलीनं भेदवर्जितम् ।
शिवेन मनसा शुद्धो न भेदः प्रतिभाति भे ३१
घडे के फूट जाने पर जो घडे के भीतर आकाश है वह
महा श्राकाश में लीन होजाता है और उसमें भेद नहीं
रहता है इसीप्रकार मनके शुद्ध होने पर जीव शिवमें लीन
होजाता है मुझको भेद नहीं मालूम होताहै ।। ३१ ॥
"न घटो न घटाकाशो न जीवो जीवविग्रहः ।
केवलं ब्रह्म संविद्धि वैद्यवेदकवर्जितम् ॥ ३२॥

- अवधूतगीता। न घड़ा है, न घटाकाश ( घड़े का आकाश है,) न जीव है न जीव का शरीर है, जानने योग्य और जानने वाला इन दोनों से वर्जित वह ब्रह्म है सो जान ॥ ३२ ॥ सर्वत्र सर्वदा सर्वमात्मानं सततं ध्रुवम् । सव शून्यमशून्यं च तन्मां विद्धि न संशयः३३ सब जगह सदां सबका स्वरूपात्मा है सर्वव्यापी है और नित्यहै और सव शून्य है और शून्य रहित है वह मैं हूं सो जान इसमें संदेह नहीं है ।। ३३ ॥ वेदा न लोका न सुरा न यज्ञा । वर्णाश्रमौ नैव कुलं न जातिः॥ न धूममार्गों न च दीप्तिमार्गो। ब्रह्मैकरूपं परमार्थतत्वम् ।। ३४ ।। न वेद हैं न लोक हैं न देवता हैं न यज्ञहैं न वर्णाश्रम है न कुलहै न जाति है न धूममार्ग है न तेज का मार्ग है एक ब्रह्मरूपही परमार्थ का तत्वहै ।। ३४ ॥ व्याप्यव्यापकनिर्मुक्तं त्वमेकः सफलो यदि । प्रत्यक्षं चापरोक्षं च ह्यात्मानं मन्यसे कथम् ३५ व्याप्त होने के योग्य और व्यापक इनसे भिन्न जो एक तुमहों यदि सब में होतो आत्मा को प्रत्यन और परोन कैसे मानते हो.।। ३५ ।।

११ भाषाटाकासहिता। अद्वैत केचिदिच्छन्ति द्वैतमिच्छन्ति चापरे। समं तत्वंन विन्दति द्वैताद्वैतविवर्जितम् ॥३६॥ कोई हैत को मानते हैं कोई अद्वैत को मानते हैं हैत और अहैत से भिन्न जो समान तत्व है उसको नहीं प्राप्त होते हैं। श्वेतादिवर्णरहितं शब्दादिगुणवार्जितम् । कथयन्ति कथं तत्वं मनोवाचामगोचरम् ॥ श्वेतादिवर्ण से रहित हैं शब्द, रूप, रस, गन्ध, स्पर्श. इन गुणोंसे वर्जित है मन और वाणी जिसमें पहुँचते नहीं है। हैं ऐसे तत्वको आदमी किस प्रकार कहते हैं ।। ३७ ।। यदाऽनृतमिदं सर्व देहादिगगनोपमम् । तदा हि ब्रह्म संवेति न ते दैतपरंपरा ॥३८॥ जब देहादि ये सब विश्व झूठा है तब आकाश के समान ब्रह्मही है यह जानों तुमारे वीच भेद नहीं है ॥ ३८॥ परेण सहजात्मापि ह्याभिन्नः प्रतिभाति मे । व्योमाकार तथैवैकं ध्याता ध्यानं कथं भवेत्३९ मुझको मालूम होता है कि परमेश्वर से जीवात्मा अलग नहीं है यह जीव आकाश के आकार का है एक है ध्यान करने वाला है ॥३९॥ यत्करोमि यदश्नामि यज्जुहोमि ददामि यत्। ।

१२ गोता। . স্বর एतत्सर्वं न मे किंचिदिशुद्धोऽहमजोऽव्ययः४० जो काम मैं करता हूं जो खाताहूं जो हवन करता हूँ जो देता हूँ ये सब मेरा कुछ नहीं है. मैं शुद्ध हूं अजन्माहूं और नाशरहित हूं ।। ४० ॥ मर्व जगदिद्धिनिराकृतीदं । सर्व जगदिद्धि विकारहीनम् ॥ सर्व जगदिद्धि विशुद्धदेहं! सर्व जगद्विद्धि शिवकरूपम् ।।.४१ ॥ इस सब जगत्को निराकार जानो सवं जंगत् को विकार हीन समझो सब जगत् को शुद्धः देहवाला 'समझो सप जगत् · को एक शिवका रूप समझो ॥४१॥ तत्वं त्वं हि न सन्देह किं जानाम्यथवा पुनः असंवेद्य स्वसंवेद्यमात्मानं मन्यसेकथम् ।। ४२ तु तत्वरूप हैं इसमें सन्देह नहीं है और इससे ज्यादाम क्या कहूं परन्तु आत्माकों, जों जाना न जाय और जो जान लिया जाय ये दोनों बात क्यों मानते हो ॥४५॥ मायाऽमाया कथं तात छायाछाया न विद्यते। तत्वमकमिदं सर्व व्योमाकारं निरंजनम्॥४३ हेतात ! जो मायाहै वह अमाया किस प्रकार हो संक्ती है जो छाया है वह अछाया कैसे हो सकती हैं यह सब एक तत्वं है आकांश के समान है, शुद्ध है ।।.४३ ॥

१३ - भाषाटीकाप्साहित आदिमध्यान्तमुक्तोऽहंन बद्धोऽहं कदाचन । स्वभावनिर्मलः शुद्ध इति मे निश्चिता मतिः।! मैं आदि, मध्य, अन्त, से, मुक्त हूं मुझको बन्धन कभी नहीं है स्वभाव से निर्मल और शुद्ध हूं यह मेरी बुद्धि ने निश्चय किया है ।। ४४॥ महदादि-जगसर्व न किंचित्प्रतिभाति मे । . " ब्रह्मैव केवलं सर्व कथं वर्णाश्रमस्थितिमा ४५॥ महत्तत्व से लेकर जो सब जगत है वह मुझको कुछ । नहीं मालुम होता है केवल सब ब्रह्म ही है फिर वर्ण और आश्रम की स्थिति किस तरह है ॥ १५ ॥ जानामि सर्वथा सर्वमहमेको निरन्तरम्। निरालम्वमशून्यं च शून्यं व्योमादिपंचकम्४६ मैं अकेला ही सब तरह से सब जगत् को जानता हूँ वह नित्य है आधार रहित है शून्य नहीं है आकाश से आदि लेकर जो पांच तत्व हैं.सो शून्य हैं ।। ४६ ।। न पण्ढोन पुमान्नस्त्री न बोधो नैव कल्पनाः। मानन्दो वा निरानन्दमात्मानं मन्यसे कथं४७३ आत्मा न नपुंसकहै, न पुरुषहै, न स्त्रीहै, न बोधहै, न कल्पनारूप है फिर आत्माको सानन्द वा निरानन्द क्यों मानता है ॥४७॥ .

अवधूत गीता।
पडंगयोगान्न तु नैव शुद्धं ।
मनोविनाशान्न तु नैव शुद्धम् ।।
गुरूपदेशान्न तु नैव शुद्धं ।
स्वयं च तत्वं स्वयमेव शुद्धम्।। ४८॥
पडङ्ग योग से शुद्ध न होताहोय यह बात नहीं है मनके
नाशसे शुद्ध न होय यहभी बात नहीं है गुरूके उपदेश से
शुद्ध न होय यहभी नहीं है अर्थात् इन सब बातोंसे शुद्ध
होजाता है वह स्वयं तत्वहै आपही शुद्ध है ॥ ४८
नहि पंचात्मको देहो विदेहो वर्तते न हि ।
आत्मैव केवलं सर्व तुरीयं च त्रयं कथम् ॥ ४९
पांच तत्वों से बना हुमा देह नहीं है विदेह भी नहीं है
सब केवल आत्मा ही है फिर सुषुप्ति और समाधि आदि
अवस्था किस तरह हैं ॥ ४९॥
न बद्धो नैव मुक्तोऽहं न चाहं ब्रह्मणः पृथक् ।
न कर्ता न च भोक्ताह व्याप्यव्यापकवर्जितः५०
न में बंधा हूँ न छूटा हूँ,न ब्रह्म से अलग हूं, नमैं करने
वाला हूँ, न भोगने वाला हूँ व्याप्य और व्यापक इनसे
वर्जित हूँ ॥५०॥
यथा जलं-जले न्यस्तं सलिलं भेदवर्जितम् ।
प्रकृतिं पुरुषं तदभिन्न प्रतिभाति मे ॥५१॥

१५
भाषाटीकासाहिता
जैसे जल में जल मिला देने से जलही होताहै कुछ
भेद नहीं रहता है इसी तरह प्रकृति और पुरुष मुझको
मिन्न नहीं मालूम होते हैं । ५१॥
यदि नामन मुक्तोऽसि न बद्धोऽसि कदाचन।
साकारं च निराकारमात्मानं मन्यसे कथम् ५२
जो तु न मुक्त है न बंधा हुआ है तो अपने लिये
साकार और निराकार क्यों मानता है ।। ५२ ।।
जानामि ते परं रूपं प्रत्यक्षं गगनोपमम् ।
यथापरं हि रूपं यन्मरीचिजलसन्निभम् ।५३।
तेरे असली रूप को मैं जानता हूं प्रत्यच में आकाश
के समान है और दूसरा जो रूप है सो मृगतृष्णा के जल
के समान है ।।.५३॥
न गुरुोंपदेशश्च न चोपाधिन मे किया ।
विदेहं गगनं विद्धि विशुद्धोऽहं स्वभावतः५४
न मेरे गुरू है, न उपदेश ह, ने मेरे उपाधि है, न
क्रिया है, आकाश रूपी देह है सो तु जान मैं स्वभाव से
ही शुद्ध हूं ॥ ५४॥
विशुद्धोऽस्यशरीरोसिन ते चित्तं परात्पर ।
अहं चात्मा पर तत्वमितिवक्तं न लज्जसे ५५
तू विशेष शद्ध है देह रहित हैं सबसे पर जो चैतन्यह
वह तेरे नहीं है मैं आत्मा हूं परमतत्वह यह कहने में तुझ
को लाज नहीं आती है.॥ ५५ ॥

६ अवधूतगीता। कथं रोदिषि रोचित्त ह्यात्मैवात्मात्मना भव । पिव वत्सकलातीतमद्वैतं परमामृतम् ॥ ५६॥ रे चिच! तु क्यो रुदन करता है तूं परमात्मामें मिलजा हे वत्स ! जिसमें कि कला नहीं हैं ऐसे अद्वैतरूपी परम अमृत का पान कर..॥५६॥ नैव बोधो न चाबोधो न बोधाबोध एवचः । यस्येदृशः सदाबोधःस बोधो नान्यथा भवत्५७ न तो वह बोध है, न अबोध है न इन दोनों के बीच में है जिसका कि इस प्रकारका ज्ञान है वही ज्ञानहै इसके विरुद्ध नही होसकता है ॥.५७।।. ज्ञानं न तर्को न समाधियोगो । न देशकालौन गुरूपदेशः ॥ स्वभावसंवित्तिरहंच तत्व। माकाशकल्पं सहजं ध्रुवंच ।। ५८ ॥ नशान है. न तर्क है, न समाधि और योग है, न देशकाल है, न गुरूका उपदेशहै मैं स्वभावही से ज्ञानस्वरूप. परम तत्व आकाश के समान स्वाभाविकौर नित्यहूं । नजातोऽहं मृतोवापि न.में कर्म शुभाशुभम् ।।

भाषा टोकासहिता। विशुद्धं निर्गुणं ब्रह्म बंधो मुक्ति कथं मम।।५९ न मैं पैदा हुआ हूं, न मेरे शुभ अशुभ कर्म हैं, मैं विशुद्ध निर्गुण ब्रह्म हूँ,मेरा बन्धन और मोक्ष किसप्रकार सकते हैं ।।५९ ॥ यदि सर्वगतो देवः स्थिरः पूर्णो निरन्तरः । अन्तरहिन पश्यामि सवाह्याभ्यन्तर कथा॥६० यदि वहदेव सर्वव्यापी है, स्थिरहै. पूर्णहैं, नित्यहै,तोमैं उसमें कुछ अन्तर नहीं देखताहूँ फिर वह वाहर और भीतर किस तरह से है ॥६॥ • स्फुरत्येव जगत्कृत्स्नमखण्डितनिरन्तरम् । अहोमायामहामोहो दैताद्वैतविकल्पना ।।६९॥ वह परमेश्वर अखंडित और निरंतर इस विश्वकोप्रका- शित करता है तब अत्यन्त आश्चर्य की बात है कि त और अद्वैत की जो कल्पना है वह माया का बड़ा भारी मोह है ।। ६१॥ । साकारं च निराकार नेति नेतीत सर्वदा। भेदाभेदविनिर्मुक्तो वर्तते केवलः शिवा६२॥ साकार और निराकार दोनों के सम्बन्ध में सदा महही कहा करते हैं कि ग्रहमी नहीं, यहमी नहीं तय भेद और. अभेद इन से अलग एक केवल शिवहीं वर्तमान है ।।२।। .

LAAS TV . iranti भाषाटीकासहिता। नतेच माता च पिता च बन्धु- न तेच पत्नी न सुतश्व मित्रम्।। न पक्षपातो न विपक्षपातः । कथं हि संतप्तिरियं हि चित्त।।६।। नं तेरे माता है, न पिता है,न बन्धुहै, न स्त्रीहै, नतेरे पुत्र है, न मित्र है, न तेरा किसीके साथ पक्षपात हैन विष क्षपात है, फिर चित्तमें ऐसा सन्ताप क्यों है।। ६३॥ दिवा नक्तं ने त चित्त उदयास्तमयो न हिं। विदेहस्य शरीरत्वं कल्पयंति कथं बुधाः।।६४|| रे चित्त ! मैं तेरे सम्बन्ध में दिन रात नहीं हैं,न उदय और अस्तहैं, पंडित लोग अशरीरी का शरीर किसप्रकार से कल्पना करते हैं ॥ ६४॥ नाविभक्तं विभक्तं च नहि दुःखसुखादि च । नहिं सर्वमसर्वच विद्धि चात्मानमव्ययम्।।६५|| आत्मा के सम्बन्धमें न अभिक्तता है न विभक्तता है न सुखहै, न दुखहै न सम्पूर्णताहै न अपूर्णताहै आत्मा केवलं विनाशरहित जानना चाहिये.॥ ६५ ॥. नाहं कर्ता न भोक्ताच न मे कर्म पुराऽधुना। न में देहो विदेहो वा निर्ममेति ममेति किम्६६ न मैं कर्ताहूं न मोक्ताहूं न मेरे पहिले कर्मथे न भवहैं, भाषाटीका सहिता न मेरे देहहै, न विदहहै, फिर निर्ममता और ममता कैसे हो सकते है॥ ६६ ॥ न मे रागादिकोदोंपो दुःख देहादिकं न मे आत्मानं विद्धि मामेकं विशालं गगनोपमम६७ न मेरे विपयादिकदोपहैं,मेरे देहसे आदि लेकर दुःखमी नहीं है, मैं एक विशाल आकाशके समान आत्माहूं, सो जान ।। ६७॥ सखे मनः किं बहु जाल्पतेन. सखे मनः सर्वमिदं वितय॑म् ॥ यत्सारभूतं काथतं मया ते । त्वमेव तत्त्वं गगनोपमोऽसि ॥६॥ हे सखे । मन, बहुत कहनेसे क्या प्रयोजन है, हे सखे! मन, इस सब तर्क बितर्कसे भी क्या प्रयोजन है मैंने जो सारभूत तुझसे कहाहै वह तूही आकाशंके समान परम तत्व है॥६॥ येन केनापि भावेन यत्र कुत्र मृता अपि । योगिनस्तत्र लीयंते घटाकाशामिवाम्बरे ६९/ जिस किसी भावसे.योगी जहां कहीं भरजाय वह पर मात्मामें ऐसे लीन होजाता है जैसे घडेके फूटजाने पर उसका आकाशवडे आकाशमें लीन होजाताहै ।। ६९॥ २३TV 40.14 -- अवधन गीता तीर्थे चान्त्यजगेहे वा नष्ठस्मृतिरपि त्यजन् । समकाले तनु मुक्तः कैवल्यव्यापको भवेत् ।७०/ जिसको स्मरण नहीं रहा ऐसा भी योगी तीर्थमें अथवा शूद्र के घर में समान समय में देह त्याग करै तौ संसारके बंधनों से छूटकर मोक्ष स्वरूप होजाता है ॥ ७० ॥. धर्मार्थकाममोक्षांश्च द्विपदादिचराचरम् । मन्यन्ते योगिनःसर्व मरीचि जलसन्निभम्७१ धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष, और मनुष्य से लेकर चराचर विश्व इन सबको योगीमृगतृष्णाके जल के समान झूठ समझते हैं ॥१॥ अतीतानागतं कर्म वर्तमानं तथैव च । न करोमि न भुञ्जामि इति मे निश्चला मतिः७२ जो बीत गये हैं जो आनेवाले हैं और वर्तमान ऐसेहैं जो कर्महै उनको मैं न करता हूँ नभोगता हूं यह मेरी नि: श्चल बुद्धि है ।। ७२ ॥ शून्यगारे. समरसपूत- स्तिष्ठन्नेकः सुखमवधूतः ॥ चरति हि नग्नस्त्यक्त्वा गर्ने । विन्दति केवलमात्मनि सर्वम्॥७३॥ बने मकान : में समान रस . से पवित्र होकर अब M 40 - २१ भाषाटीकासाहिता। अकेला ही बडे सुख से रहता है घमंडको छोड़कर नंगा हो कर घूमता है वह केवल आत्मा के वीचमें सत्र प्रानन्दको प्राप्त होताहै ।। ७३ ॥ त्रितयतुरयिं नहि नहि यत्र । विन्दति केवलमात्मनि तत्र॥ धर्माधी नहि नहि यत्र। बद्धो मुक्तः कथ मिह तत्र । जिसमें कि मुषुप्ति; और समाधि. नहींहैं केवल आत्मा के बीच में चैतन्य को प्राप्त होता है जिसमें कि धर्म अधर्म नहीं है उसमें बंधन और मोक्ष किस तरह से हैं ७४ विन्दति विन्दति नहि नहि मन्त्रम्। छन्दोलक्षणं नहि नहिं तन्त्रम् ।। समरसममो भावितपूतः। मलपितमेतत्परमवधूतः ।। ७५॥ मंत्र को नहीं जानता है, नहीं जानता है, छदोंके लक्षणों को नहीं जानता है, तंत्र को नहीं जानता है, समान.रसमें भग्न भावना से शुद्ध होकर एक अवधूत योगी इस गीतको गाताहै ॥ ७५॥ सर्वशून्यमशन्यं च सत्यासत्यं न विद्यते । स्वभावभावतः प्रोक्तं शास्त्रसंवित्तिपूर्वकम् ७६, 8 २२ . अवधूतगीता। सब जगत् शून्य है और अशून्य है सत्य और असत्य नहीं है शास्त्रके ज्ञान से और अन्तः करण के भावसे यह कहा गया है।॥६॥ इति श्री दत्तात्रेय विरचितायां अवधूतगीतायामात्म संवित्युपदेशोनाम प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥ द्वितीयोऽध्याय . अवधूत उवाच। बालस्य वा विषयभोगरतस्य वापि । मूर्खस्य सेवक जनस्य गृहीस्थतस्य ।। एतद्गुरोः किमपि नैव न चिन्तनीयं । कथं त्यजति कोऽप्यशुचौ प्रविष्टम् ।। १॥ बालक हो अथवा विषय मोग में फंसा हुआ. : हो मूर्स होय, सेवकज़न होय, गृहस्थहाय इस बात का सदुपदेष्टा गुरूके विषयमें, कुछ विचार न करें जैसे कि गदी जगह में पडे हुए रत्नको कोई नहीं छोडता है ॥ १॥ नैवात्र काव्यगुण एव तु चिन्तनीयो । ग्रामः परं गुणवता खळु सार एव ।।

aaiii A A A ARALALLA da २३ भाषाटीकासहिता। सिन्दूरचित्ररहिता भुवि रूपशून्या। पारं न किं नयति नौरिह गन्तुकामान् ॥२॥ गुरूके सम्बन्ध में काव्य और गुणों का विहार नहीं करना चाहिये, गुणवान को सारही ग्रहण करना चाहिये, जो सिंदूरादि अनेक प्रकारके रंगोंसे चित्रित नहींहै ऐसी कुरूप नाब क्या पार जाने वालों को पार नहींलेजातीहै २ प्रयत्नेन विना येन निश्चलेन चलाचलम् । अस्तं स्वभावतः शान्तं चैतन्यं गगनोपमम्।।३ जो कि चलायमान नहीं है ऐसे परमात्माने यत्न के विनाही सब जगत को असलिया वह स्वभाव शांत है और चैतन्य है आकाश के समान है ॥ ३ ॥ अयत्नाच्चालयेद्यस्तु एकमेव चराचरम् । सर्वगं तत्कथ भिन्नमद्वैत वर्तते मम ॥ ४ ॥ जो कि अकेलाही बिना यत्न के इस चराचर जगत् को चलायमान करता है सर्व व्यापी है वह पृथक कैसे हो सकता है वह अत है. मेरे हृदय को ऐसा.ही प्रतीत होता हैं ॥४॥ अहमेव परं यस्मात्सारासारतरं शिवम् । गंमागमविनिर्मुक्तं निर्विकल्पं निराकुलम्।।५॥ :: मैं सार से भी सार, शिवरूप, गमन और भागमन से रहित, निर्विकल्प और निराकुल हूं ॥ ५॥ :

Ali, २४ abar अवधृत गीता। सर्वावयवनिर्मुक्तं तदहं त्रिदशार्चितम् । संपूर्णत्वान्न गृह्णामि.विभागं त्रिदशादिकम् । मैं सब अंग प्रत्यंग से हीन हूं देवता मेरा पूजन करते हैं, मैं देवादि का विभाग ग्रहण नहीं करता हूं क्योंकि मैं पूर्ण रूप हूं ॥ ६॥ प्रमादेन न संदेहः किं करिष्यामि वृत्तिवान् । उत्पद्यन्ते विलीयन्ते बुबुदाश्च यथाजल।। ७ प्रमादयुक्त होनेपर मुझे कुछ सन्देह नहीं है वृत्तिवान होकर भी मैं क्या करूंगा जिस तरह जल से उत्पन्न हो होकर बुलबुले जल ही में लीन होजाते हैं वैसे ही ये भी सब आत्मा से उत्पन्न होकर आत्माही में तीनहोजाते हैं महदादीनि भूतानि समाप्यैवं सदैवहि । मृदुद्रव्येषु तीक्ष्णेषु गुडेषु कटु केषु च ॥८॥ जैसे जलमें बबूला पैदा होते हैं और जलही में मिलजाते. इसी तरह महत् तत्व से आदि लेकर प्राणी पैदा होकर परमेश्वरमें लीन होजाते हैं ॥ ८॥ : कटुत्वं चैव. शैत्यत्वं मृदुत्वं च यथा जले । प्रकृतिः पुरुषस्तद्वदभिन्न प्रतिभाति मे ॥९॥ कोमल पदार्थ तीखे पदार्थ गुड़ और कड़वी वस्तु इनमें Ammmmmmm.introvertainmmmini हैं । भाषााकासाहता। पाडापत्र चञ्चलता और कोगलता जलमें पतलापनजैसे वर्तमान है उससे अलग नहीं है इसी तरह प्रकृति और पुरुषः अलग नहीं है, यह मुझनो मालूम होता है ॥ ६ ॥ इस ख्यारहितं यदा सूक्ष्मासूक्ष्मतरं परम् । मनाबुद्धीन्द्रियातीतमकलंक जगत्पतिम् १०॥ ईहरो सहज यत्रा अहं तत्र कथं भवे । स्वमवहि कथा तत्र कथं तत्र चराचरम् ।।११।। परमात्मा सर्वनाम से रहित है सून्म से भी सूक्ष्म है. परे है, मन, बुद्धि इन्द्रिय जहां नहीं पहुँच सकते हैं। कलक रहित है, जगत-का पति है ।। १० ।-जिसमें ऐसे गुण स्वाभाविक ही हैं, वहां मैं किस तरह से हूं, वहां- तु कैसे है, और उस में चराचर जगत् कैस है ? ॥ ११ ॥ गगनोपमं तु यास्त्रोक्तं तदेवगगनोपमम् । चैतन्यं दोपहीनं च.सर्व पूर्णमेव च ॥ १२ ॥ जो आकाश के समानां कहा गया है वह तो आकाश के सगान ही है. चैतन्या स्वरूप है, निदोंप है, सर्वज्ञ है' पूर्ण है ।। १२ पृथिव्यां चरितं नैव भारतें न च वाहितम् । वारिणा पिहित नव तेजोमध्येव्यवस्थितम्-१३ वह पृथ्वी पर चलता नहीं है। हमा में उड़ा नहीं है जल से ढका नहीं है, तेज में स्थित है ।। १३॥ ।

. . २६ श्रवधूतगीता। आकाशं तेन संव्याप्तंन तब्याप्तं च केनचित्। सबाह्याभ्यन्तरं तिष्ठत्यविच्छिन्न निरन्तरम् १४ उससे आकाश व्याप्त है वह किसी से व्याप्त नहीं है वह वाहर और भीतर ठहरता है अखण्ड है और नित्य है. ॥ १४ ॥ सूक्ष्मत्वाचददृश्यत्वान्निगर्णत्वाच योगिभिः । आलम्बनादि यत्प्रोक्तं क्रमादालम्बनंभवेत् १५ सूक्ष्म होने से, अदृश्य होने से, और निर्गुण होने से, योगियों ने आलम्बन श्रादि जो कहे हैं इस प्रकार ध्यान करे ऐसे प्रणायाम करे, ये आलम्बन क्रम से होता है १५ सतताऽभ्यासयुक्तस्तुनिरालम्बो यदा भवेत् । तल्लयाल्लीयते नान्तर्गुणदोषविवर्जितः ॥१६॥ निरन्तर अभ्यास करते करते जब योगी ध्यानादिक आलम्बनों से रहित होजाता है तब उस आलम्बन का लय होजाता है तब वह गुण दोषादि से विवर्जित हो, उस परमात्मा में लीन होकर तद्य होजाता है ॥ १६ ॥ विषविश्वस्य रौद्रस्य महामूछोपदस्य च । एकमेव विनाशाय ह्यमोघं सहजामृतम् । १७! मोह और मूर्खा को देने वाला जोभयंकर विषरूपीविश्वहै नाश करने के लिये एक ही अनमोल सहज अमृत है ॥ १७॥ .

भाषाटीका सरिता भावगम्यं निराकार साकारं दृष्टिगोचरम् । भावाभावविनिर्मुक्तमन्तरालं तदुच्यते।। १०॥ निराकार जो पदार्थ है वह भावगम्य है, अर्थात् हृदय में भावना द्वाराही जाना जाता है और साकार आँखों से दिखाई देता है, परन्तु भाव और अभाव इनसे जो अलग है उसको अन्तराल कहते हैं ॥ १८ ॥ बाह्यभावं भवेद्विश्वमन्तः प्रकृतिरुच्यते । अन्तरादन्तरं ज्ञयं नालिकरेफलाम्बुवत् ।। १९ ॥ वाहर की तरफ संसार है, भीतर माया है, और उस से भी भीतर परमात्मा जानने योग्य है जैसे नारियल विश्व है उसके भीतर गोला है वह माया है गोला के भीतर जो पानी है वह परमात्मा का रूप है ॥ १९॥ भ्रान्तिज्ञानं स्थितं बाह्ये सम्यग्ज्ञानंच मध्यगम् मध्यान्मध्यतरं ज्ञेयं नालिकेरफलाम्बुवत् ॥२०॥ प्रांति ज्ञान बाहर स्थित है अच्छा ज्ञान बीच में है उस के भी मध्य में नारियल जलकी तरह वह चैतन्य है२० पौर्णमास्यां यथा चन्द्र एक एवातिनिर्मलः । तेन तत्संदृशं पश्येदविधादृष्टिविपर्ययः।।२१। पूर्णमासी में जैसे एक चन्द्रमा ही अति निर्मल है वैसे ही ईश्वर को देखें ! कौर भेद बुद्धि से देखना है वह आदमी की दृष्टि का फेर है ॥२१॥ :

अध्व गोडा
अनेन प्रकारेण बुद्धि भेदोन सर्वाः ।
दाता च सालोले गीको नामकोटिभिः।२२
इसी प्रकार से बुद्धका यह सब में नहीं है जो दांता
धीरज को नन होता है और उसका यश न जाता है
इसी तरह परमात्मा का यश केला हुआ है ॥ २२ ॥
गुरुप्रज्ञाप्रसादन भूखों वा यदि परितः ।
यस्तु सजुम्य ते तवं विरक्तो भव सागरात् ॥२३
शुरु और बुद्धि इनकी गं ये सूबे हे अश्वा पण्डित
जो तत्वको जान लेना वह भानागर से छूट जाताहै:३
रागद्धेपविनिर्मुक्तः सर्वभूतहिते रतः ।
दृढ़वोधश्च धारश्च से गच्छेत्परमं पदम् ॥ २४ ॥
राग और देश से जो अलग हो सब प्राणियों का हित
कर, दृढ बोध हो, धीर हो. वह परम पदको प्रश्न होता
घटेमिन्ने घटाकाशं आकाशे लीयले चया ।
देहाभावे तया योगी स्वस्पे परमात्माने :२५॥
घड़े के फूटने पर घड़े का आशा जैसे बड़े प्राश
में लीन होजाता है. इसी त:ह योगी. इंह के त्यागने पर
अपने रूस पानात्मा में लोन बोजाता है ।। २५ ॥
उक्त तानां प्रतियोतविना गतिः ।
॥ २४॥

og भापाटाकासहिता। नबोक्ता योगयुक्ता अतिर्यान्तऽपि सागतिः२६ जिनने कर्म छोड़ दिये हैं उनकी यह गति कही है जो अंतागय बुद्धि होजाती है वही गति होती है ॥ २६ ॥ या गतिकर्मयुक्तानांसा च वागिंद्रियाद्रदत् । योगिनां या गतिःक्यापिकथ्याभवतार्जितार७ कर्म युकों की जो गति है वह वाणी और इन्द्रियों से होती है योगियों की जो गति वह कभी कहने में नहीं श्रासकती और वह आपसे बढी हुई है ।। २७ ।। एवं ज्ञात्वा त्वमें मार्ग योगिनानव कल्पितम् । विकल्पवर्जनं तेषां खयं सिद्धि प्रवर्तत।श्चिा कल्पना नहीं किया गया है और विकल्पसे वर्जित योगियों के इस मार्ग को जानकर उनकी सिद्धि प्रापही होजाती है ॥ २८॥ तीर्थे वान्त्यजगेहेवा यत्र कुध मृतोऽपिवाः । न योगी पश्यते गर्भ परे ब्रह्माणि लीयता२९॥ तीर्थ पे अथवा शूद्र के घर में जहां कहीं योगी मजा वह माता के गर्भ में नहीं आता है परनाल में लीन होजाता है :- सहजमजमचिन्यं यस्तु पश्येत्सक घाति यदि यो लिप्यते लेक दोपैः॥ ३० ॥ -- vy अवधूत गीता सकृदपि तदभावलम किंचिन्न कुर्यात्त- दपिन च विवद्ध संयमी वा तपस्वी ३० स्वाभाविक, अजन्मा और जो विचार करने में आवे ऐसे स्वरूप को जो देखे और अच्छी तरह चेप्टाकरे वह दोपों से लिप्त नहीं होता है योगी हो अथवातपस्वी उसके बिना कुछ काम न करे वह फिर बन्धन को प्राप्त नहीं होता है ! ३०॥ निरामय निष्पतिमं निराकृति निराश्रयं निर्वपुषं निराशिपम् ।। निईन्द्रनिर्मोहमलुप्तशक्तिकं । तमीशमात्मानमुपैति शाश्वतम् ।।३१।। जिस में कोई रोग नहीं है जिसकी प्रतिमा नहीं है स्वरूप नहीं है कोई आश्रय नहीं है जिसके कोई अंग नहीं है जिसके कोई सुख नहीं है और सुख दुख नहीं है मोह रहित, सर्व शक्तिमान, नित्य, ऐसे प्रात्मा को प्राप्त होता है ॥ ३१॥ वेदो न दीक्षा न च मुण्डनक्रिया । गुरुनाशिष्यो न च यंत्रसंपदः ॥ मुद्रादिकंचापि न यत्र भासते। तमीशमात्मानमुपैति शाश्वतम् ॥३२॥ 1. I

भाषाटीकासहित।
जिसके बीच में न वेद, न दीक्षा, न मंडलक्रिया, न
गुरु न शिष्य न यंत्र न मुद्रादिक प्रकाश करते हैं ऐसे
नित्य ईश्वर आत्मा को योगी प्राप्त होता है ।। ३२ ॥
नशाभवं शाक्ति कमान न वा।
पिण्डं च रूपं च पदादिकं न वा ॥
आरम्भनिष्पत्तिघटादिकं च नो।
तमशीमात्मानमुपैति शाश्वतम् ॥३३॥
न तो वह शिवका स्वरूप है न वह शाक्त है न मनुष्य
न पिंड है न रूप है न चरण से आदि लेकर उसके
शरीर है न तो उसका आदिहै न अंत है न घड़े से श्रादि
लेकर कोई वस्तु है ऐसे निरंतर ईश्वर आत्मा को योगी
प्राप्त होता है ॥ ३३॥
यस्य स्वरूपात्सचराचरं जगत्।
उत्पद्यते तिष्ठति लीयतेऽपिवा॥
पयोविकारादिव फेनबुखदास्त-
मशिमात्मानमुपैति शाश्वतम् ॥३४॥
जिसके स्वरूप से चराचर जगत पैदा होता है, स्थित
होता है, और लीन होजाता है जैसे कि जलसे भाग
और बबूला पैदा होते हैं और उसीमें लीन होजाते हैं
उस नित्य ईश्वर प्रात्मा को योगी प्राप्त होता है.॥३४॥

Aai... अधृतगीता! नारो निधार ल च दृशिलन ।। बोधोऽप्ययोधोऽपि न यत्रभासते ।। नाही चारोऽपि न यत्र विचित् । तमीशनातानमुपति शाश्वतर १.३५।। न तो उनमें नाक का रोकना न दृष्टि न वह वउता, वेध और अवेध मी जिस प्रकाश नहीं करता लिसने नाड़ि-नहीं चलती है उस नित्य-ईश्वर प्रात्ना को प्राप्त होता है। ३५ ॥ नानासमेकरवसुमत्पमन्यता। अणुवयित्वमहत्वशून्यता।। मानलमय वसमत्ववर्जितं । तमीशमात्मानमुपैति शाश्वतम् ॥३॥ उसमें अनेकपना नहीं है। एकत्व नहीं हैं. भेद भी नही हैं, छोटापन, लम्बपन बड़ापन ये भी उसमें नहीं हैं, प्रमाण, अग्नमाण, समता, इनसे वर्जित है, उस नित्य ईश्वर आत्मा को योगी प्राप्त होता है ॥ ६ ॥ सुसंयमी या यदि वा नयनी । सुमंग्रही था. यदि या संग्रही । निष्कर्मको वा यदि वा संकर्षक तमोशमात्मानमुपैति शाश्वतम।।३७:1 ३३ भाषा टीका साहिता। अच्छी तरह जितेन्द्री हो अथवा न हो अच्छी तरह संग्रह करने वाला हो अथवा न हो कर्म करता हो अथवा न करता हो सर्वव्यापी जो ईश्वर आत्मा है उसका प्राप्त होता है ॥ ३७॥ मनो न बुद्धिर्नशरीरमिंद्रियं । तन्मात्रभूतानि न भूत पञ्चकम् । अहंकृति श्चापि वियत्स्वरूपकं ॥ तमीशमात्मानमुपैति शाश्वतम् ॥३०॥ न उसमें मन है, न बुद्धि है, न शरीर है, न इन्द्रिय है नु पंचभूत है, न इन्द्रियों की मात्रा है, कार भी नहीं ६, शून्य रूप है, वह ईश्वर नित्य आत्मा है, उसका जीव प्राप्त होता है ॥३८॥ विधौ निरोधे परमात्मतां गते । न योगिनश्चेतसि भेदवर्जिते ॥ शाचं न वाशौचमलिंगभावना। सवै विधयं यदि वा निषिध्यते ॥३९॥ विधि, प्राज्ञा, निरोध, रोकना ये जब परमात्मा को प्राप्त होजाय तब मेद रहित योगी के चित्त में न शौच है न अशुद्ध है और चिन्ह रहित जो पदार्थ है उसकी भावना और न विधि निषेध रहता है ॥ ३६ ।। मनो वचो यत्र न शत्तमीरितुं ।

३४ wodnine अवधूत गीत।। नूनं कथं यत्रगुरूपदेशता ॥ इमां कथामुक्तवतो गुरोस्तद् । युक्तस्य तत्त्व हि समप्रकाशते ॥४०॥ जिसमें मन और वचन नहीं पहुँच सकते हैं उसमें निश्चय गुरू को उपदेश कैसे बन सकता है, इस कथा को कहने वाला जो योग्य गुरू है उसका यह तत्व समान प्रकाशित होता है ॥४॥ इतिश्री दत्तात्रय विरचितायां अवधूतगीतायामात्म 'संक्त्युिपदेशो नाम द्वितीयोऽध्यायः ॥२॥ • तृतीयोऽध्यायः अवधूत उवाच । गुण विगुणविभागोवर्तते नैव किंचित् । रातिविरतिविहीनं निर्मलं निष्प्रपंचम् ।। गुणविगुणविहीनं व्यापक विश्वरूपं । कथमहमिह वन्दे व्योमरूपं शिवं वै॥१॥ अवधूत बोला-जिसमें गुण और अवगुण का विभा- ग नहीं है जिसमें कुछ प्रीति और हेप नहीं है वह शुद्ध है माया से रहित है गुण और अवगुणसे हीन है व्यापक भाषाटोकालहिता है सब विश्व उसीका रूप है ऐसे शून्यरूप शिवको किस प्रकार बन्दना करूं ।। ३५।। श्वेतादिवराहतो नियतं शिवश्च । कार्य हि कारणमिंद हि परं शिवश्च ।। एवं विकल्प रहितोऽहमलं शिवश्च । स्वात्मानमात्मनि सुमित्रकथं नमामि २ सफेद से आदि लेकर उसमें रंग नहीं है नित्य कल्याण रूप है कार्य कारण रूप है शिव है इस प्रकार भेद रहित मैं अत्यन्त शिव हूं हे मित्र ! अपने आत्मा के बीच में आत्माको किस तरह नमस्कार करू ॥ २ ॥ निर्मूलभूलरहितो हि सदादितोऽहं । निघूमधूमरहितो हि सदादितोऽहम् ।। निर्दीपदीप रहितो हि सदोदितोऽहं। ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम् ।। जो मूल नहीं हैं और मूल दिखाई देता है उससे मैं । अलग हूँ सदा उदय हूँ जो धूत्रा नहीं है और धूना दि- खाई देता है उससे अलग हूं सदा उदय हूं ज्ञानामृतरूप आशाके समान हूं समर हूँ ॥३॥ निष्कामकामामिहनाम कथं वदामि । निःसंगसंगमिहनाम कथं वदामि ॥ निःसारसाररहितं च कथं वदामि।

अवधूतगीता। ज्ञानामृत समरसं गगनो पमोऽहम् ।। कामना रहित जो काम है उसका वर्णन कैसे करूं,निःसंग को संगता में किस प्रकार कहूं निःसार को साररहितत्त्व कैसे कहूं मैं ज्ञान और अमृत स्वरूप हूँ, समान रस हूं, आकाश के समान हूं ॥४॥ अद्वैतरूपमाखिलं हि कथं वदामि । दैतस्वरूप मखिलं हि कथं वदामि ।। नित्यं त्वनित्यमखिलं हि कथं वदामि । ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम् ॥५॥ वह सम्पूर्ण अहेव रूप है उसका वर्णन कैसे करूं, सम्पूर्ण देत स्वरूप है निश्चय करके कैसे वर्णन करूं, सम्पूर्ण नित्य और अनित्य रूप है कैसे वर्णन करूं, ज्ञान और अमृत स्वरूप हूँ. समान रस हूं. आकाश के समान हूं ॥५॥ स्थूलं हि नो नहि कृश न गतागतं हि । आद्यन्तमध्यरहितं न परापरं हि ।। सत्यवदामि खळु वै परमार्थतत्त्वं । जनामृतं समरसं गगनोपमोऽहम् ॥ ६ ॥ न तौ वह स्थल है, न कृश है न जाता है न पाता है, आदि, अन्त, मध्य इनसे रहित है उसके पहिला पिछला ७ भाषाटीकासहिता। नहीं है मैं परमार्थ तत्व को निश्चय सत्य कहता है, में ज्ञान और अमृत स्वरूप हूँ, समान रस हूं आकाश समान हूं ॥६॥ संविद्धि सर्वकरणानि नभोनिभानि । संविद्धि सर्वविषयांश्च नभोनिभांश्च ।। संविद्धि चैकममलं न हि बन्धमुक्तं ।। ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम् ॥७॥ सब इन्द्रियों को आकाश के समान न समझो, सब विषयों को आकाश के समान समझो, निर्मल एक है वन्धन उसमें है नहीं सो जान मैं अमृत स्वरूप हूं. समान रस हूं, आकाशके समान हूं।॥ ७॥ दुर्बोधबोधगहना न भवामि तात। दुर्लक्ष्यलक्ष्यगहनो न भवामि तात ॥ आसन्नरूपगहनो न भवामि तात। ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम् ।। खोटा ज्ञान मुझको नहीं है, कठिन से जो देखने में आवे ऐसा भी नहीं हूं, हे तात ! समीप में प्राप्त होनेवाला जिसका रूप है ऐसा भी नहीं हूं, हे तात ! मैं ज्ञान और अमृत स्वरूप हूं समान रस हूं आकाश के समान हूं,॥८॥ निष्कर्म कर्मदहनो ज्वलनो भवामि । निर्दुःखदुःखदहनो ज्वलनो भवामि ॥

35
अवधूतगीता।
निर्देहदेहदहनो ज्वलनो भवामि :
ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम्।। १ ।।
जो कर्म नहीं हैं और देखने में कर्म मालुम होता
उनके जलाने वालों में अग्नि हूँ सुख और दुःख इनको
जलानेवाला में अग्नि हूं.जो देह नहीं है और देह सरीके
मालुम होते हैं उनको जलानेवाला में अग्नि हूँ ज्ञान और
अमृत रूप हूं समान रस हूं आकाश के समान हूँ ।। ६॥
निष्पापपापदहनो हि हुताशनीऽहं । ...
निर्धर्मधर्मदहनो हि हुताशनोऽहम्
निबन्धवन्धदहनो हि हताशनोऽहं ।
ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम ॥ १०॥
पाप और पुण्य इनको जलानेवाला अग्नि हूं. जो धर्म
नहीं है और धर्म सरीके मालुम होते हैं उनके जलानेवाला
में निश्चय अग्नि हूं मोक्ष और बन्धन इनके जलानेवाला
में निश्चयं अग्नि हूं ज्ञान और अमृत रूप हूं समान रस हूं
आकाश के समान हूँ॥१०॥
निर्भावभाव रहितो न भवामि वत्स ।
नियोगयोग रहितो न भवामि वत्स ।।
निश्चित्तचित्तराहतो न भवामि वत्स ।
ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम् ॥ ११ ॥

Septegover
भाषाटीका सहिता।
हे वत्स ? में भाव और अभाव से रहित नहीं
हे वत्स ! में नियोग और योग से रहित नहीं
हे वत्स ! में चैतन्य और अचैतन्य से रहित नहीं
ज्ञान और अमृत रूप हूँ समान रस हूँ आकाश
समान हूं।।११।।
निर्मोहमोहपदवीति न मे विकल्पो।
निःशोकशोकपदवीति नमे विकल्पः।।
निर्लोभलाभपदवीतिन मे विकल्पो।
ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम्।१२॥
बैर और प्रीत मुझ नहीं है और भेद नहीं है सुख
और दुख नहीं हैं उदारता और लोभ ये मुझ में नहीं
है भेद नहीं है मैं ज्ञान और अमृत रूप हूं, समानहूं अंकाश
के समान हूं ।। १२ ।।
संसारसंततिलता न च मे कदाचित् ।
संतोषसंततिसुखेन च मे कदाचित्॥
अज्ञानबन्धनमिदं न च मे कदाचि-
ज्ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोहम्। १३॥
मुझ में संसार की फैली हुई लेता कभी नहीं है संतोष
का विस्तार युक्त सुख मुझमें नहीं है ये अज्ञान का बंधन
मुझ में कभी नहीं है मैं ज्ञान और अमृतरूप हूँ समान
रस हूँ आकाश के समान हूँ॥१३॥

गीता।
whos
अवधूत
संसारसंततिरजो न च मे विकारः।
संतापसंततितमो न च मे विकारः।।
सत्वं स्वधर्मजनकं न च मे विकारः।
ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम्।१४
संसार के विस्तार की रज मेरे बीच में नहीं है न
उसका विकार है न मेरे दुख का तमोगुण है न उसका
विकार है अपने धर्म को पैदा करने वाला तमोगुणभी
नहीं है न विकार है, मैं ज्ञान और अमृतरूप हूं समान रस
आकाश के समान हूं।। १४ ॥
संतापदुःखजनकोन विधिःकदाचित् ।
संतापयोगजनितं न मनः कदाचिता।
यस्मादहंकृतिरियं न च मे कदाचि-
ज्ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम्१५
संताप और दुःखको पैदा करनेवाली विधि मुझमें नहीं
है संताप और योग से पैदा हुआ मन भी कभी नहीं है
क्योंकि मेरे कभी अहंकार नहीं है मैं ज्ञान और अमृत
रूप हूं समान रस हूँ आकाशके समान हूँ॥ १५ ॥
निष्कम्पकम्पनिधनं नविकल्पकल्पं ।
स्वप्नप्रबोधनिधनं न हिताहितं हि ॥
निःसारसारनिधनं न चराचरं हि ।
ज्ञानामृतं समरसं गगनापमोऽहम्॥१६॥

४१
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भाषांतीकासहिता।
विकार रहित जो विकार है सो झूठा है जो विलक्षणता
से रहित विलक्षणहै वह असत्य है यदि सत्य है तो केवल
श्रात्मा है हे, मन तु सबकी तरह क्यों रोता है ।।१६।।
नो वेद्यवेदकमिदं न च हेतुतये ।
वाचामगोचरमिदं न मनो न बुद्धिः।
एवं कथं हि भवतः कथयामि तत्वं ।; पर
ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम्।।१७।।
यह वेध वा वेदक नहीं है' कर्म + वा कारण नहीं है,
यह वाक्य से अंगोचर है, मन और बुद्धि इसको नहीं
पा सका है। इस प्रकार में आत्मतत्व को किस तरह कह
सकता है,
निर्मिन्नभिन्नरहित परमार्थतत्वम् ... HTS
अन्तर्बहिनहि कथं परमार्थतत्वम् ।।..
प्रासंभवे न च रत नहिं वस्तु किंचि-
जानामृतं समरस गंगनोपमोह।।१८
यह निर्मिन्न भेद रहित परमार्थ तत्त्व है। इसके भीतर
बाहर कुछ नहीं है, प्राकमवता, नहीं है, लिप्तता नहीं
है, इसके अतिरिक्त और कुछ वस्तु नहीं है, यह ज्ञाना
ति समरस और आकाश के समान है।
मज्ञानामृत समरस और आकाश के समान
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PORN
अवधूत गीता।
4
रागादिदोषरहितं वहमेव तत्त्वं ।
देवादिदोपरहितं त्वहमेव तत्त्वम् ।।
संसारशोकरहितं त्वमेव तत्त्वम् ।
ज्ञानामृत समरसं गगनोपमोऽहं ।।१९।।
अहंतत्व, रागादि दोपरहित, · देवादि दोप रहित,
संसार शोकरहित; अहंतत्व, ज्ञानामृत समरस और
गगनोपम हूँ ।। १९॥
स्थानत्रयं यदि च नेति कयं तुरीयं ।
कालत्रय यदि च नेति कथदिशश्च ।
शान्तं पदं हि परम परमार्थतत्त्वं ।
ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम् ॥२०॥
श्रहंतत्व सम्बन्ध में जापत स्वप्न सुषुप्तावस्था रूप
स्थानत्रय नहीं है, तब तीसरा कैसे हो सकता है, अईतत्व
सम्बन्ध में कालशय नहीं है, तब सम्पूर्ण दिशा कैसे शे
सकती है परमार्थ वत्व परम शांतिप्रद स्वरूप, ज्ञानामृत,
समरस और गंगनोंपम हूँ ॥ २० ॥
दीर्घो छंधुःपुनरितीह न मे विभागो।
विस्तारसंकटामितीह न मे विभागः॥
कोणं हि चतुलमितीह न मे विभागो।
ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम् ॥ २१॥

४३ . भाषाटीकासहिता। मेरे दीर्घ और लघु विभाग कुछ नहीं है, विस्तीर्ण और संकीर्ण ये विभाग भी नहीं है, कोण और गोल ये विभाग भी मेरे नहीं है, परन्तु मैं. ज्ञानामृत समरस और गगनोपम हूं ॥२॥ "मातापितादि तनयादि न मे कदाचि- ज्जातंमृतं न च मनो न च मेकदाचित।। नियाकुलं स्थिर मिदं परमार्थतत्त्वं । ज्ञानामृत समरसं गगनोपमोऽहम् ।।२२। मेरे , माता, पिता को पुत्रादि. कमी नहीं हुए. न मैंने कमी जन्म लिया न मैं मरा, मेरे कभी मन स्थिरहयह परमार्य तत्व व्याकुलता रहित, स्थिर हैं मैं शानामृत, समरस और गगनोपम हूं।। २२॥ शुद्धं विशुद्धमविचारमनन्तरूपं । निर्लेपलेपमविचारमनन्तरूपम् ॥ निष्खण्डखण्डमविचारमनन्तरूपम् । ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम् ॥२३॥ में शुद्ध, विशुद्ध, अविचार्य और, अनन्तरूप हूँ, मैं निर्लेपलेप अनन्तरूप हूँ मैं निखण्ड खण्ड अविचार और अनन्तरूप हूँ, मैं ज्ञानामृत समरस और गगनोपम हूँ ॥२३॥ "IN LAAAAAAAL अवधूत गीता समान है॥२४॥ ब्रह्मादयः सुरगणाः कथमत्रः सति । स्वर्गादयो वसतयः कथमत्र सति ।। यद्यकरूपममलं परमार्थतत्त्वं । ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम् ॥ २४॥ जो वह परमार्थ तत्व एक रूप है निर्मल है,तो उसमें ब्रह्मादिक देवता कैसे हैं, स्वर्गादिक स्थान कैसे हैं, में ज्ञान और अमृत रूप हूं समान रस हूँ आकाश के निति नेति विमलोहि कथं वदामि । निःशेषशेपविमलो हि कथं वदामि ।। निर्लिङ्गलिंगविमलों हि कथं वदामि ।' ... ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम् ॥ २५॥ अस्ति और नास्ति इनसे निश्चय शुद्ध है उसका वर्णन कैसे करू, अंशेष और शेष इनसे शुद्ध है उसका वर्णन कैसे करूँ, चिन्ह और अचिन्ह इनसे वह निश्चय शुद्ध है. उसका वणन कैसे करूँ, मैं ज्ञान और अमृत रूप हूं, समानरस हूँ आकाश के समान हूं.॥ २५ ॥ निष्कर्मकर्मपरमं सततं करोमि । निःसंगसंगरहितं परम-विनोदम् ॥ निर्देहदेहरहितं मनन : विनोद | भाषाटीकासहित 504 ज्ञानामृत समरसं गगनोपमोऽहम् ॥२६॥ कर्म और अकर्म इनको अच्छी तरह करता हूं, संग और कुसंग इन ने रहित हूं, ये परम आनन्द है, देह और विदेह से रहित हूं. ये. बडा आनन्द है, मैं ज्ञान और अमृतरूप हूं समान रस हूँ आकाश के समान हूँ॥ २६ ॥ मायाप्पचरचना न च मे विकारो। कौटिल्यदम्भरचना न च मे विकारः। सत्यानृतेतिरचना न च मे विकारो। . ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम्।। २७॥ न तो मेरे माया का प्रपञ्च है न विकार है न कुटि- लता और न कपट है न उसका विकार है सत्ता और असत्य नहीं है न विकार है, मैं ज्ञान और अमृतरूपई समान रस हूँ आकाश के समान हूं ॥२७॥ संध्यादिकालरहितं न च मे वियोगो । ह्यन्तःप्रवोधरहित बधिरो न मूकः ॥ एवं विकल्परहितं न च भावशुद्धं ॥ ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम् ॥२८॥ मैं सन्मयादि कालों से रहित हूँ, मेरा वियोग नहीं है, भीतर मेरे ज्ञान है, न बहिरा हूँ, न गूंगा है, इसप्तकार . YYYYHITr.."

अवधूतगीता। विकल्प से रहित हूँ, भावना से शुद्ध नहीं हूँ. में ज्ञान और अमृत स्वरूप हूँ, समान रस हूँ, आकाश के समान हूँ. ॥ २८॥ निर्मथनाथरहितं हि निराकुलं वै । निश्चित्तचित्तविगतं हि निराकुलं वै ।। संविद्धि सर्वविगतं हि निराकुलं वै। ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम्।।२९।। जो नाथ नहीं हैं नाथ सरीके मालूम होते हैं उनसे मैं अलग हूँ, व्याकुलता रहित हूँ, जो चैतन्य नहीं है और चैतन्य सरीका मालूम होता है उनसे मैं अलग हूँ व्याकुल नहीं हूँ, सर्वव्यापी हूँ,सो जान,#ज्ञान और अमृत स्वरूप समान रस हूँ आकाश के समान है.॥२९॥ कान्तारमन्दिरमिदं हि कथं वदामि । संसिद्धसंशयमिदं हि कथं वदामि ।।.. एवं निरन्तरसमं हि निराकुलं वै । ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम्॥३०॥ कान्तार मन्दिर वा संसिद्ध संशय किस प्रकार कहूँ,मैं निरन्तर सम निराकुल, ज्ञानामृत, समरस और प्रकाश के समान हूं ॥ ३० ॥ निर्जीवजीवरहितं सततं विभाति । हूँ , ... " -- भाषा टीका सहिता निर्बीजबीजरहितं सततं विभाति ।। निर्वाणबन्धरहितं सततं विभाति ॥ . ज्ञानामृतं समरस गगनोपमोऽहम् ॥३१॥ वह ईश्वर : जड़ और चेतन से रहित होकर निरन्तर प्रकाश करता है बन्धन और मोक्ष से रहित होकर निरन्तर. प्रकाश करता है, मैं ज्ञान और अमृत स्वरूप हूँ समान रस हूँ आकाश के समान हूँ॥ ३१ ॥ संभूतिवार्जितमिदं सततं विभाति । संसाखर्जितमिदं सतत विभाति ॥ संहारवर्जितमिदं सततं विभाति । ::: "ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम् ॥३२॥ यह ईश्वर विभूतियों से रहित प्रकाश करता है, यह निरन्तर संसार से वजित प्रकाश करता है। यह निरन्तर प्रलय से रहित प्रकाश करता है, मैं ज्ञान और अमृत स्वरूप हूँ समान रस हूँ आकाश के समान हूँ॥ ३२॥ ।' उल्लेखमात्रमपिते न च नामरूपं ॥ निर्मिन्नभिन्नमपि तें न हि वस्तुं किंचित्। निर्लज्ज मानस करोषि कथं, विषादं। ज्ञानामृतं समरसं गगनापमोऽहम् ॥३शा --- KATA अवधूत गीता। तेरे नाम रूप लिखने मात्र के भी नहीं, भेद और अभेद ये वस्तु तेरे कुछ नहीं है, हे निलज्ज ? मानस ? मन तू क्यों दुखी होता है, मैं ज्ञान और अमृत स्वरूप समान रस हूँ आकाश के समान हूं ॥ ३३ ॥ किं नाम रोदिपि सखे न जरा न मृत्युः। किं नाम रोदिषि सखे न च जन्मदुःखम् ।। किं नाम रोदिषि सखे न च ते विकारो। ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम् ॥३४॥ हे सखे ? तु क्यों रुदन करताहै, न तेरे बुढापा है, न मृत्यु है, हे सखे ! तू क्यों रुदन करता है, न तेरे जन्म है न दुःख है, है सखे, तू क्यों रोता है तेरे विकार नहीं मैं ज्ञान और अमृत स्वरूप हूँ समान रस है. आकाश के समान हूँ ॥३४॥ किं नाम रोदिपि सखे न च ते स्वरूपं । किं नाम रोदिषि सखे न च ते विरूपम् ।। किं नाम रोदिषि सखे न च ते वयांसिं.॥ ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम् ॥ ३५ ॥ हे सखे ! तू क्यों रोता है तेरे स्वरूप नहीं है, हेस खे! तु क्यों रोता है तेरे बुरा .रूप नहीं है हे सखे! तू क्यों रोता हैं तेरे अवस्था नहीं है, मैं ज्ञान और अमृत स्वरूप हूँ समान रस हूँ आकाश के समान हूँ॥ ३५॥ . AN भाषाटीकासहिता। किं नाम रोदिषि सखे न च ते वयाँसि।। किं नाम रोदिषि सखे नच ते मनांसि।।' किं नाम रोदिषि सखेन तवेन्द्रियाण ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम्।।३६॥ हे सखे ! क्यों रोता है तेरे अवस्था नहीं है, हे सखे ! क्यों रोता है, तेरे मन नहीं है, हे सखे क्यों रोता है, तेरे इन्द्रियों नहीं हैं मैं ज्ञान और अमृत स्वरूप हूँ समान रस हूं।आकाश के समान हूं ॥३६ ।। किं नाम रोदिषि सखे न च तेजस्ति कामः।। किं नाम रोदिषि सखे न च ते प्रलोभः । किं नाम रोदिषि सखे न च ते विमोह। ज्ञानामृतं समरसं गगमोपमोऽहम||३७॥ हे.सखे ! क्यों रोता है तेरे काम नहीं है, हे सखे क्यों रोता है तेरे लोभ नहीं है, हे सखे.१ क्यों रोता है मोह नहीं हैं मैं ज्ञान और अमृत समान हूं ॥ ३७॥ ऐश्वर्य मिच्छसि कथं न च ते धनानि । ऐश्चमिच्छसि कथं न च ते हि पत्नी.. ऐश्चर्यमिच्छसि कथं न च ते ममेति । ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम्।। ३०॥

५० अवधूतंगीता। तेरे धन नहीं है ऐश्वर्य की इच्छा क्यों करता है तेरे स्त्री नहीं है ऐश्वर्य की इच्छा क्यों करता है तेरे ममता नहीं है एश्वर्य की इच्छा क्यों करता है में ज्ञान और, अमृत रूप हूं।। ३८॥ - लिंगप्रपंचजनुषी न च ते न मे च । निर्लजमानसमिदं च विभाति भिन्नम्।। निर्भदभेदरहितं न च ते न में च । ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम् ॥३९॥ हे निर्लज्ज ? लिंग को प्रकट करने वाला शरीर न तेरे है न मेरे, ये जो भेद दीखता है.. यह ..मानसिक है मेद और अभेद से रहित तेरे है न मेरे, मैं ज्ञान और अमृत रूप हूं ॥ ३९ ॥ नों वाणुमात्रमपि ते हि विरागरूपं । नो वाणुमात्रमपि ते हि सरागरूपम् ।। नो वाणुमात्रमपि ते हि सकामरूपं । ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम् ॥४०॥ नतो तेरे कुछ भी वैराग्य है न तेरें कुछ भी विषय ला- लसा है, न तेरे कुछ भी कामना है मैं ज्ञान और अमृत स्वरूप हूँ॥ ४०॥ ध्याता न तेहि हृदयेन च ते समाधि- 7 " Minindia भाषाशासाहता। ५१. ध्यान नते हि हृदये न बहिः प्रदेशः ॥ ध्येयं न ति हृदये न हि वस्तु कालो। ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम् ॥४१॥ न तेरे हृदय में कोई ध्यान करने वाला है न तेरे समाधि है न तेरे हृदय में ध्यान है न बाहर का प्रदेश है तरे हृदय में ध्यान करने लायक वस्तु नहीं है न वस्तु है,न काल है मैं ज्ञान और अमृत रूप हूं ॥ ११ ॥ " यत्सारभूतमखिलं कथितं मया ते। नत्वं न मे न महतो न गरुर्नशिष्यः।। स्वच्छन्दरूपसहजं परमार्थतत्त्वं । ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम्।।४ ॥४२॥ मैंने जो सम्पूर्ण सारांश तुमसे कहा है वह न तौ तू है न मैं हू न बड़ा है न गुरू है न शिष्य है वह परमार्थ तत्त्व अपनी इच्छानुकूल है और स्वाभाविक है मैं ज्ञान और अमृत रूप है ॥४२॥ कथमिह परमार्थ तत्वमानन्दरूपं । कथमिह परमार्थनेवमानन्दरूपम् ॥ कथामिहपरमार्थ ज्ञानविज्ञानरूपं । १. यदि परमहमेकं वर्तते व्योमरूपम्।।४३॥ सा T श्रवधन गीता तत्व और आनन्दं रूपी यहां परमार्थ कैसे है और आनन्दरहित परमार्थ कैसे है ज्ञान और विज्ञान रूपी परमार्थ कैसे है क्यों कि मैं केवल एक हूं और शून्प. रूप हूँ॥४३॥ दहनपवनहीनं विद्धि विज्ञानमेकं । .. अवानिजलविहीनं विद्धि विज्ञानरूपम् ।। समगमनविहीनं विद्धि विज्ञानमेकं । गगनमिव विशालं विद्धि विज्ञानमेकम् ४४ अग्नि और पवन इनसे ही न एक विज्ञान है सो जान पृथ्वी और जज से हीन ज्ञान एक है सो जोन, वह समान है और चलता फिरता नहीं है सो जान वह विज्ञान एक और आकाश की तरह विशाल है सोजान ॥४४॥. न शून्यरूपं न विशून्यरूपम् । न शुद्धरूपं न विशुद्धरूपम् । रूपं विरूपन भवामि किंचित् ।। स्वरूपरूप परमार्थतत्वम् ॥४५॥ न तो वह शून्यरूप है न विशप शून्य रूप हैं. न शुद्ध रूप है विशुद्ध रूप है मैं रूपवान हूंन कुरूप हूँ में अपना ही रूप हूं और परमार्थ तत्व हूँ॥ ४५ ॥ मुञ्च मुञ्च हि संसार त्यागंमुञ्च हि सर्वथा ।

भाषाटोकासहिता। ys त्यागात्यागविषंशुद्धमपृतं सहजे ध्रुवम्।।४६|| निश्चय संसार को छोड़दे २ सब ओर से निश्चय मागको छोड़दे त्यागकरना और लेना ये विषहै वह तत्व साहै अमृत है. स्वाभाविक नित्य है ।। इति श्री दत्तात्रयविरचितोयां अवधूतगीतायामात्मसावित्यु- पदेशानामतृतीयोऽध्यायः ॥३॥ .॥ चतुर्थोऽध्यायः॥ 1157 . श्रीदत्त उवाच । नावाहनं नैव विसर्जनं वा। पुष्पाणि पत्राणि कथं भवन्ति ॥ ध्यानानि मन्त्राणि कथं भवन्ति । समासमं चैव शिवार्चन च ॥३॥ श्रीदच पोला न आवाहन है न विसर्जन है पुष्प और पत्र कैसे हैं. ध्यान और विषम कैसे हैं सम और विषम कैसे शिवका. पूजन कैसे है ॥१॥ न केवले बन्धविबन्धमुक्तो। न केवलं शुद्धविशुदमुक्तः ।। . . . है .

५४
शवधूतगीता।
न केवलं योगवियोग मुक्तः
" स वै विमुक्तो गननोपमोऽहम् ।। २ ॥
नह केवल बन्धन और मोक्षसे ही अलंग नहीं है न
केवल शुद्ध अशुद्धसे ही मुक्त है न केवल संयोग वियोग
से ही मुक्त है वह निश्चय सबसे छूटा हुआ है मैं आकाश
के समान हूँ॥२॥
संजायते सर्वमिदं हि तथ्यं ।
संजायते सर्वमिदं वितथ्यम् ॥
एवं विकल्पा मम नैव जातः।
स्वरूपनिवाण मनामयोऽहम् ।।३।।
जन्मलेता है, वह सब सत्य है जन्मलेता है वह सब
झूठ है इस प्रकार भेद मेरे नहीं है मैं मोक्ष स्वरूपहूं और
निरोग हूं ॥३॥
न साञ्जनं चैव निरञ्जनं वा
'' नचान्तरं वापि निरन्तरं वा ।
अन्तविभिन्नं नहि मे विभाति ।
"; स्वरूपनिर्वाण मनामयोऽहम् ॥ ४॥
नतो वह मायासे युक्त है न मायासे अलग है न उस
में भेद हे न अभेद है भीतर अलग मुझको नहीं दीखता
है मैं मोक्ष स्वरूप हूँ और निरोग हूं ॥ ४ ॥

- भाषाटीकासहिता। अबोधबोधो मम नैव जातो। बोधस्वरूपं मम नैव जातम् ॥ निर्वाधबोधं च कथं वदामि। स्वरूपनिर्वाणमनामयोऽहम् ।।५।। अज्ञान और जान मेरे बीचमें पैदा नहीं हुए ज्ञान स्वरूप मुझमें पैदा नहीं हुआ जिसमें ज्ञान नहीं है ऐसे ज्ञान को कैसे कहूं मैं मोक्ष स्वरूप और निरोग हो।५।। न धर्म युक्तो नच पापयुक्तो नबधयुक्तो न च मोक्षयुक्तः ॥ युक्तं त्वयुक्तं न च मे विभाति स्वरूपनिर्वाणमनामयोऽ हम् ॥६॥ नतौ मेरे धर्म है न अधर्महै न बन्धन है, न मोक्षहैन योग्य और अयोग्य मेरे बीचमें प्रकाश नहीं करते हैं मैं मोद स्वरूपहूं और निरोग हूँ ॥ ६ ॥ • परापरं वान च मे कदाचिन् । मध्यस्थमावो हि न चारिमित्रम् ॥ हिताहितं चापि कथं वदामि। स्वरूपनिर्वाणमनामयोऽहम् ॥ ७॥ पहिला और पिछला मेरे कभी नहीं है न बीचका श्रवधून गीता भाव है न शत्रु और मित्र है हित और अहितकैसे कहूमैं मोक्ष रूपहूं और निरोग हूं। ७.॥ नो पासको नैवमुपास्य रूपं । नचोपदशो न च मे क्रिया च ॥ संवित्स्वरूपं च कथं वदामि । स्वरूपनिर्वाणमनामयो ऽहम् ॥ ८॥ न. तो उपासना करनेवाला है न उपासना के योग्यरूप है न उपदेश न क्रियाहै ज्ञानस्वरूप का कैसे वर्णनकहूं मैं मोक्षरूप है और निरोगहूं।। ८ ॥ नो व्यापकं व्याप्य महास्ति किंचिन् । न चालयं वापि निरालय वा॥ अशून्यशून्यं च कथं वदामि। स्वरूपनिर्वाणमनामयोऽहम् ।। ५।। न तौ यहां कुछ व्यापकहै न व्यापक होनेके योग्य, कुछ न उपदेशहै न क्रिया है फिर उस ज्ञानस्वरूप को कैसे कहूं मैं मोक्ष स्वरूप हूँ और निरोगहूं ।।।। न ग्राह को ग्राह्यकमेव किंचिन । न कारणं वामम नैव कार्यम्।। आचिन्त्याचन्त्यं च कथं वदामि । स्वरूपनिर्वाणमनामयोऽहम्!! १०॥ date भापाटीकालहिता। नतौ कोई उसको पकड़नेवाला है न वह पकडने योग्य है नमेरे कुछ कारण है न कार्यहै वह ईश्वर विचार करने में नहीं आसकता है उसकारूप कैसे कहूँ मैं मोक्षरूपहूँ और निरोग हूँ ॥१०॥ न भेदकं वापि न चैव भेछ । नवेदकं वा मम नैव वेद्यम् ॥ गतागतं तात कथं वदामि । स्वरूपनिर्वाणमनामयोऽहम् ॥ ११॥ न भेद करनेवाला हैनमेद के योग्यहै न जाननेवाला हैन जानने में आसकता है न जाताहैन आता है हे वात! उसका कैसे वर्णनकरू मैं मोचस्वरूपहूँ और निरोग९११॥ न चास्ति देहो नच मे विदेहो। बुद्धिर्मनो मे न हि चेन्द्रियाणि॥ रागो विरागश्च कथं वदामि । स्वरूपनिर्वाणमनामयोऽहम् ॥ १२ । न मेरे देहहै न विदेह हैन बुद्धि और मनहै न इन्द्रियां हैं राग और विरागका कैसे वर्णन करूं मैं मोच स्वरूप और निरोग हूँ ॥ १२ ॥ उल्लेखमात्रं नहि भिन्नमुच्चै। मलेखमात्रं न तिरोहितं वै ॥ .

पूर अवधूत गीता। समासमं मित्र कथं वदामि । स्वरूपनिर्वाणमनामयोऽहम् ॥१३॥ 'लिखने मात्रको भी वह किसीसे अलग नहीं है लिखने मात्र को भी वह छिपा नहीं है हे मित्र ! सम विपम कैसे कहूं मैं मोक्ष स्वरूप हूं और निरोग हूँ ॥१३॥ जितेन्द्रियोऽहं त्वजितेन्द्रियो वा । नयमो मे नियमो नजातः॥ जयाजयौ मित्र कथं वदामि। स्वरूपनिर्वाणानामयोऽहम् ॥१४॥ मैं जितेन्द्रिय हूँ और अजितेन्द्रिय हूँ न मेरे संयम है न नियमहै हे मित्र ! जीतना और हारना मेरे नहीं है उसका वर्णन कैसे करूं मैं मोक्ष स्वरूप हूँ और निरोगहूँ ॥ १४॥ आमूर्तमूर्तिन च मे कदाचिद - आद्यन्तमध्यं न च मे कदाचित् ।। बलावलं मित्र कथं वदामि । स्वरूपनिर्वाण मनामयोऽहम् ॥१५॥ झूठी मूर्ति मेरे कभी नहीं है. श्रादि अन्त:मध्य ये. मेरे कभी नहीं है हे मिन ! वल और अवलको कैसे कहूं मैं मोक्ष स्वरूप हूँ और निरोग हूँ॥१५॥ मृतामृवं वापि विषाविषं च।

..... भाषादोज्ञासहिता। संजायते तात न मे कदाचित्॥ अशुद्धशुद्धं च कथं वदामि । स्वरूपनिर्वाण मनामयोऽहम् ॥१६॥ हे तात ! मरना और न मरना विष और अविष ये मेरे कमी पैदा नहीं होते हैं अशुद्ध और शुद्ध नहीं है इसका वर्णन कैसे करूं मैं मार स्वरूप हूँ और निरोग हूँ॥१६॥ स्वप्नः प्रबोधो न च योगमुद्रा नक्तं दिवो वापि न मे कदाचित्॥ अतुर्यतुर्य च कथं वदामि । स्वरूपनिर्वाण मनामयोऽहम्।। १७॥ सोना और जागना ये मेरे नहीं है न योग मुद्रा है रात और दिन मेरे कभी नहीं है सुषुप्ति और समाधिका वर्णन कैसे कहूं मैं मोचरूप हूं और निरोग हूँ ॥ १७ ॥ सविद्धि मां सर्वविसर्वमुक्त। माया विमाया न च मे कदाचित् ॥ संध्यादिकं कर्म कथं वदामि। स्वरूपनिर्वाण मनामयोऽहम् ॥१८॥ सव और अधूरा ये मुझरें नहीं है माया और अमाया मुझमें कमी नहीं है सध्यासे आदि लेकर काल नहींहै कर्म नहींहै फिर कैसे कहूं मैं मोक्षस्वरूपहूं और निरोगहूँ॥१८॥ ..

६० अवधूत गीता। संविद्धि मां सर्वसमाधियुक्तं । संविद्धि मां लक्ष्यावलक्ष्यमुक्तम् ॥ योगं वियोगं च कथं वदामि। स्वरूपनिर्वाण मनामयोऽहम्॥१९॥ सब समाधियों से युक्त मुझको जान जो देखलिया जाय और जो देखने में न आवै इनसे अलग मुझको जान योग और वियोग कैसे कहूँ मैं मोक्ष स्वरूपहूं और निरोग हूं१६ मूर्तोऽपि नाहं न च पण्डितोऽहं । मौनं विमौनं न च मे कदाचित् ॥ तर्क वितर्कञ्च कथं वदामि । स्वरूपनिर्वाण मनामयोऽहम् ॥२०॥ नमैं मूर्खहूं न पंडितहूं मौन और विशेष मौन ये मेरे कभी नहींहै तर्क और कुतर्क भी नहीं है फिर उसका कैसे वर्णन करू मैं मोक्ष स्वरूपहूं और निरोग हूं ॥ २० ॥ पिता चमाता च कुलंन जाति- जन्मादिमृत्युन च मे कदाचित् ॥ स्नेहं विमोहं च कथं वदामि। स्वरूपनिर्वाण मनामयोऽहम्।।२१।। न मेरे माता है न पिताहै अल है न जातिहै मेरे कभी : 4AAAAA भाषा टीका सहिता। जन्म मृत्यु नहीं है स्नेह और मोह नहींहै फिर कैसे वर्णन करूं मैं मोच स्वरूप हूँ और निरोग हुँ॥ २१ ॥ अस्तं गतो नैव सदोदितोऽहं। तेजो वितेजो न च मे विभाति॥ संध्यादिकं कर्म कथं वदामि । स्वरूपनिर्वाण मनामयोऽहम् ॥२२॥ मेरा अस्त नहीं है सदा उदय है तेज और अन्धकार मुझमें प्रकाश करतेहैं सायंकाल प्रातःकाल आदि मेरे नहींहै। कर्म भी नहीं है फिर कैसे वर्णन करूं मैं मोक्षरूपहूं और निरोग हूं ॥२२॥ असंशयं विद्धि निराकुलमां- असंशयं विद्धि निरन्तर माम्॥ असंशयं विद्धि निरञ्जन मां। स्वरूपनिर्वाणमनामयोऽहम् ॥२३॥ निश्चय मुझको न्याकुलता से रहित जान निश्चय मुझको व्यापक जान निश्चय मुमको माया रहित जान मैं मोर स्वरूप हूं और निरोग हूं ॥ २३ ॥ ध्यानानि सर्वाणि परित्यजन्ति। शुभाशुभं कर्म परित्यजन्ति ॥ त्यागामृतं तात पिवन्ति धीराः।

६२ अवधूत गीता। स्वरूपनिर्वाण मनामयोऽहम् ||२४|| धीर मनुष्य सब ध्यानोंको छोड़ देते हैं शुभ अशुभ कामोंको छोड़ देते हैं हे तात ! वे त्याग रूपी अमृतको पीते हैं मैं मोच स्वरूप हूँ और निरोग हूँ ॥२४॥ विन्दति विन्दति नहि नहि यत्र । छन्दोलक्षणं नैहि नहि तत्र ।। समरसमग्नो भावितपूतः । प्रलपति तत्त्वं परमवधूतः॥२५॥ नतो इसमें काव्य है न छन्द और लक्षण है समान रसमें मग्न होकर भावना से शुद्ध होकर अवधूत केवल तत्वको कहता है ।। २५ ॥ इति श्री दत्तात्रयविरचितोयाँ अवधूत गीतायां स्वामिकार्तिक संपादे स्वात्मस वित्युपदेशोनाम चतुर्थोऽध्यायः।। ॥ स पंचमोऽध्यायः श्रीदत्त उवाच । ओमिति गदितं गगनसमं । तन्न परापरसारविचार इति ।।

- भापाटीकारिता अविलासविलासनिराकरणं । कथमक्षरविन्दुसमुच्चरणम् ॥१॥ श्रीदत्त वोला ॥ वह ईश्वर ओंकार रूप कहा गया है पहिला और पिछला इनके सारका विचार उसमें नहीं है अविलास और विलास ये उसमें नहीं है फिर अक्षर और अनुस्वार का उच्चारण कैसे है ॥ १॥ इति तत्त्वमसिप्रभृतिश्रुतिभिः । प्रतिपादितमात्मनि तत्त्वमसि ।। त्वमुपाधिविवर्जित सर्वसमं ॥ किमु रोदिषि मानसि सर्वसमम् ।।२।। इस प्रकार “ तत्वं असि" इत्यादि श्रुतियों से तु प्रतिपादन किया गया है आत्मा के बीच में तत्व है तू माया से अलग है सब में समान है हैं चित्त ! तु सबकी तरह क्यों विलाप करता है ॥२॥ अध ऊर्ध्वविवर्जितसर्वसमं । बहिरन्तरवर्जितसर्वसमम् ॥ यदि चैकविवर्जितसर्वसमं । किमु रोदिषिमानसिसर्वसमम् ॥३॥ ऊपर और नीचे से अलग है सब में समान है बाहर और भीतर से अलग है सब में समान है यदि एक सब अवधूतगीता। से अलग सब में एकसा है तौ रेमन तु सपकी तरह क्यों रुदन करता है ॥३॥ .. हि काल्पतकल्पविचार इति । नहि कारणकार्यविचार इति ।। पद संधिविवर्जितसर्वसमं । किमु रोदिषि मानसि सर्वसमम् ॥१॥ यह कल्पित और कल्प का विचार नहीं है, कार्य और कारण का विचार नहीं है, यह पद और सन्धियों से रहित है सब में समान भाव है, फिर तु सर्वसम होकर मन में क्यों रोता है ।। ४॥ नहि बोधविबोधसमाधिरिति । नहि देहविदेहसमाधिरिति । नहि कालविकालसमाधिरिति। किमु रोदिषिमानसि सर्वसमम्।।५॥ न तौ ज्ञान और अज्ञान की समाधि है नदेह और विदेह की समाधि है, न समय कुसमय की समाधि रेमन ! सबकी तरह क्यों विलाप करता है ॥ ५॥ नहिं कुंभ नभा नहि कुंभ इति । नहि जीववपुर्नहिजीव इति । नहि कारणकार्यविभाग इति ।।

भाषाटोकासहिता। किमु रोदिषिमानसि सर्वसमम् ॥३॥ नती घडेका आकाश है न पड़ा है न जीवका शरीर हैन जीन है कारण और कार्य का विभाग है फिर हे मन ! क्यों विलाप करता है। ॥६॥ इह सनिरन्तरमोक्ष पदं । लघुदीर्घविचारविहीन इति ॥ नहि वर्तुल कोणविभाग इति किम रोदिषि मानसि सर्वसमम् ॥७॥ यहां सब के बीच में मोक्षका पद है छोटे बड़े का उस में विचार नहीं है गोलाकार और कार्यका विभाग नहीं। है फिर हे मन! तु सवकी तरह क्यों विलाप करता है ।। इह शून्यविशन्यविहीन इति । इह शुद्धविशुद्धविहीन इति इह सविसर्वविहीन इति । किमु रोदिषि मानसि सर्वसमम्॥८॥ यहां शून्य और विशून्य से अलग है यहां वह शुद्ध और अशुद्ध से अलग है यहां सब और थोड़ा इनसे अलग मन ! सबकी तरह क्यों विलाप करता है ॥ ८ ॥ नहि भिन्नावभिन्नविचार इति।

६६ प्रवधूत गीता बहिरन्तरसधिविचार इति ॥ आरिमित्रविवर्जितसूर्वसमं । किमु रोदिपि मानसि सर्वसमम् ।। ९॥ भेद और अभेदका इसमें विचार नहीं हैं बाहर भीतर और बीच में, इनका उसमें विचार नहीं है शत्रु और मित्र ये उसमें नहीं सब में समान है. फिर हे मन ! सब की तरह क्यों रोता है॥६॥ नहि शिष्यविशिष्यसरूप इति । न चराचर भेद विचार इति ॥ इह सर्वनिरन्तर मोक्षपदं । किम रोदिपि मानसि सर्वसमम् ।। १० ॥ शिष्य और अशिष्य का स्वरूप नहीं है चराचर का भेद नहीं है यहां सब में व्यापक है और मोचस्वरूप है हे मन ! सबकी तरह क्यों गेता है ।।१०।। ननु, रूपविरूपविहीन इति । ननु भिन्नविभिन्नविहीनः इति ।। ननु सविसर्गविहीन इति । किमु रोदिषि मानसि सर्वसमम् ।।११।। निश्चय वह रूप और कुरूप पसे अलग है निश्चय वह भाषाकासाहता। भेद और अभेद से अलग है निश्चय वह सृष्टि और वि- सर्ग से अलग है फिर हे मन ? सबकी तरह क्यों विलाप करता है।॥ ११ ॥ न गुणागुणपाशनिबन्ध इति । मृत जीवनकर्म करोमि कथम् ॥ इति शुद्धनिरंजनसर्वसमं । किमु रोदिपि मानसि सर्वसमम् ॥१२॥ यह गुण और अगुण के पाश से बँधा हुआ नहींहै, फिर मरण वा जीवन का विचार कैसे कर सकता हूँ। यह शुद्ध निरंजन और सर्व सम तत्व रूप है, फिर सर्व सम होकर मन, मनमें क्यों रोता है ।। १२॥ इह भावविभाव विहीन इति । इह कामविकामविहीन इति॥ इह बोधतमं खलु मोक्षसमं । किमु रोदिपि मानसि सर्वसमम् ॥१३॥ सर्वसम स्वरूप में भाव विभाव नहीं है और निकाम मी नहीं है, यह बोधतम और मोक्ष के समान है। इस लिये तु सर्वसम होकर मन, मनमें क्यों रोता है॥१३॥ इह तत्वनिरन्तरतत्वमिति । नहि संधिविसंधिविहीन इति॥ ra Param वामन

६
अवधूतगीता।
यदि सर्वविवर्जितसर्वसमं ।
किमु रोदिषि मानसि सर्वसमम्।।१४॥
इसमें तत्व वा निरन्तर तत्व नहीं है, सन्धि विसन्धि
भी नहीं है, यदि यह सर्व विवर्जित है तो सर्वसम हो
कर भी तु मन, मनमें क्यों रोता है ।।१४ ॥
अनिकेतकुटी परिवारसमं ।
इह संगविसंगविहीनपरम् ॥
इह बाधविवोध विहीनपरं ।।
किमु रादिषि मानसि सर्वसमम्।।१५।।
इसके कुटी वा परिवार कुछ भी नहीं है, इसमें संग
विसंग भी नहीं है, इसमें बोध और विवोध भी नहीं है
इस लिये तु सर्व सम होकर भी क्यों रोता है ॥ १५॥
अविकारविकारमसत्यमिति ।
अविलक्षविलक्षमसत्यमिति ॥
यदि केवलमात्मनि सत्यमिति ।
किमु रोदिषि मानसि सर्वसमं॥१६॥
अविकार वा विकार ये सब सत्य नहीं है, अविल-
क्षण वा विलक्षण ये भी सब सत्य नहीं है, यदि केवल
आत्मा ही सत्य है तो इन बातों के निश्चय होने पर भी
तु सर्व सम होकर मन, मन में क्यों रोता है ॥ १६ ॥

PAHISARA.Asseenshee-----
DAANA
४
भाषाटोकासहिता
इह सर्वतमं खलु जीव इति।
इह सर्व निरन्तरजीव इति॥
इह केवलनिश्चलजीव इति ।।
किमु रोदिषि मानासि सर्वसमम्।। १७ ॥
इसमें सर्वतम जीव है, इस में सर्व निरन्तर जीव है,
इसमें केवल निश्चल जीव है. अतएव तु सर्व सम होकर
मन, मनमें क्यों रोता है ॥ १७॥
अविवेकविवेकमबोध इति ।।
अविकल्पविकल्पमबोध इति ॥
यदि चैकचिरन्तखोध इति ।
किमु रोदिषि मानसि सर्वसमम् ॥ १८ ॥
अविवेक वा विवेक यह सब अवोध मात्र है, अविकल्प
वा विकल्प यह सब अज्ञान मात्र है, यदि सर्वसम तत्व
एक और निरन्तर वाधमात्र है, तब तु सर्वसम होकर मन!
मनमें क्यों रोता है ॥ १८ ॥
नहि मोक्षपदं नहि बन्धपदं।
नहि पुण्यपदं नहि पापपदम्॥
नहि पूर्णपदं नहि रिक्तपदं ।
किमु रोदिषि मानसि सर्वसमं ॥ १९॥

७० अवधूतगीता। न तो मोक्ष का पद है, न बन्धन का पद है, न पुण्य का पद है, न पाप का पद है, न पूरा पद है, न रीता पद है, फिर हे मन ! सबकी तरह क्यों विलाप करता हे ॥ १९ ॥ यदि वर्णविवर्णविहीन समं। यदि कारणकार्यविहीनसमं ॥ यदिभेदविभेदविहीनसमें । किम रोदिपि मानसि सर्वसमं ॥२॥ समतत्व यदि वर्ण विवर्ण से हीन है, यदि कारण और कार्य से विहीन हैं यदि भेद और अभेद से हीन है, तो तु सर्वसम होकर मन, मनमें क्यों रोता है ॥ २० ॥ सर्वनिरन्तर सर्वचिते । इह केवलनिश्चलसर्वचिते ॥ द्विपदादिविधार्जितसर्वचित । किमुरोदिषि मानसि सर्वसमं ॥ २१ ॥ यह तत्व सर्व निरन्तर, सर्व चैतन्य जागरूक, केवल निश्चल भाव में सर्व चैतन्य है, इसी तरह द्विपदादि विवर्जित सबमें ही चैतन्य है, अतएव तु सर्वसम होकर मन, मनमें क्यों रोता है ॥ २१ ॥ अतिसर्वनिरन्तरसर्वगतं।

भाषाटीमा सपिता। रतिनिर्मलनिश्चलसर्वगतं॥ दिनरात्रिविवर्जितसर्वगतं । किमु रोदिषि मानसि सर्वसमम् ॥ २२ ॥ यह तत्व निरन्तर सर्वगत है, रति निर्मल वा निश्चल रूप से सर्वगत है, दिन रात्रि से रहित होकर सर्व गत है अतएव तु सर्वसम होकर मन, मन मेंक्यों रोताहै।।२२।। नहि बन्धविवन्धसमागमनं । नहि योगवियोगसमागमनं नहि तर्कवितर्कसमागमनं। किमु रोदिषि मानसि सर्वसमम्।। २३ ।। इस तत्व में बन्ध औरविवन्ध का समागम नहीं योग और वियोग का भी समागम नहीं है. तर्क वितर्क का भी समागम नहीं है, अतएव तु सर्वसम होकर मन, मनमें क्यों रोता है ॥ २३ ॥ इह कालविकालनिराकरणं। अणुमात्रकृशानुनिराकरणं ॥ नहि केवलसत्यनिराकरणं । किम रोदिषि मानसि सर्वसमं ॥२४॥ इस तत्व में काल विकाल का निराकरण है अणुमात्र पदार्थ का भी निराकरण है, केवल सत्य का निराकरण ७२ - श्रवधुतगीता। नहीं है, फिर तु सर्वसम होकर मन, मन में क्यों रोता है ।।२४ ॥ ह देहविदेहविहीन इति । ननु स्वप्नसुषुप्तिविहीनपरं॥ अभिधानविधानविहीनपरं। किमु रोदिषि मानसि सर्वसम।। २५ ॥ इसमें देह विदेह नहीं है, यह स्वप्न और सुषुप्ति विहीन है, अविधान विधान से दूर है, फिर तु सर्वसम ; होकर मन, मनमें क्यों रोता है ॥२५॥ गगनोपमशुद्धविशालसमं । अविसर्वविवर्जितसर्वसमं॥ गतसाराविसारविकारसमं । किमु रोदिषि मानास सर्वसमं ॥२६॥ यह समतत्व आकाश के समान विशाल, सन से रहित और सबके समान है, यह सार और विसार और विकार से रहित सर्वसम है अतएव तू सर्वसम होकर मन, मनमें क्यों रोता है ॥ २६॥ इह धर्मविधर्मविरागतरम् । इह वस्तुविवस्तुविरागतरम् ॥ इह कामविकामविरागतरं ।

भाषांटाफाहिता । किमु रोदिषि मानसि सर्व समं ।। २७ ॥ इसमें धर्म और अधर्म में विराग होता है, वस्तु और अवस्तु में विराग होता है, काम और विकाम में भी विराग होता है, फिर तु सर्व सम होकर मन, मनमें क्यों रोता है ॥२६॥ सुख दुःख विवर्जित सर्वसमं । इह शोकविशोकविहीनपरं ॥ गुरुशिष्यविवर्जितत्त्वपरं । किमु रोदिपि मानसि सर्वसमं ॥ यह सब मम तत्व सुख दुख से रहित, शोक, विशोक से विहीन, गुरु शिष्य के रहित परम तत्व है, तब सर्व सम होकर तू मन, मन में क्यों रोता है ॥ २८ ॥ न किलांकुरसारविसार इति । न चलाचलसाम्यविसाम्यमिति॥ अविचार विचारविहीनामिति । किमु रोदिषि मानसि सर्वसमं ॥ २९॥ इसमें सार विसार का अंकुर मात्र मी नहीं है, चला विषमता, अविचार या विचार कुछ भी नहीं है फिर तु सब सम होकर मन, मन में क्यों रोता है ॥२९॥ इह सारसमुच्चयसारमिति।

अवधूत गाता। कथितं निजभावविभेद इति ॥ विषये करणत्वमसत्यमिति । किमु रोदिपि मानस सर्वसमं ॥ ३० इसमें सारों का भी सार है, अपने भाव के विभेद के कारण से यह तत्व कहा गया है, पार्थिक विषय में जो कुछ किया जाय वह सब असत्य ही है, अतएव सर्वसम होकर मन ! मनमें क्यों रोता है ॥ ३० ॥ बहुधा श्रुतयः प्रवदन्ति यतो वियदादिरिदं मृगतोयसमं ॥ यदि चैकनिरन्तरसर्वसमं । किमु रोदिपि मानसि सर्वसमं ॥३१॥ बहुधा श्रुति कहती हैं कि आकाशादि सब पदार्थ जो दृष्टिगत हो रहे हैं वे सब मृगतृष्णा के समान अतएव यदि एक निरंतर और सर्वसम है, तो तू मन मनमें क्यों रोता है ॥३१॥ विन्दति विन्दति नहिं नहिं यत्र । छन्दो लक्षणं नहिं नहिं तत्र॥ समरस मग्नो भावित पूतः।। प्रलपति तत्त्वं परमवधूतः ।।३।। - ७५ मापाटीकासहिता। न तो यह कान्य है और न इसमें छंद के ही लक्षण है समरस में निमग्न होकर अवधूत शुद्ध भाव से इस परम तत्व को कहता है ॥३२॥ इति श्री दत्तात्रेय विरवितायां अवधूतगीतायां स्वामि- कार्तिक सम्बादे श्रात्मसंवित्युपदेशोनाम शमशुष्टि कथनम् नाम बमोऽध्यायः ॥५॥ षष्ठोऽध्यायः । श्रीदत उवाच । बहुधा अतियः प्रवदन्ति वयं वियदादिरिदं मृगतोयसमं ॥ यदि चैकनिरन्तरसर्वशिवम् । उपमेयमथो ह्युपमा च कथं ॥ १॥ श्रीदत्त बोला कि अनेक श्रुतियां कहती हैं कि भाकाशादि यह सम्पूर्ण जगत मृगतृष्णा के जलके समान है, यदि एक निरन्तर सर्व शिव उपमेय है, तो उसकी उपमा कैसे हो सकती है ॥ १॥ अविभक्तिविभक्तिविहीनपरं । ननु कार्यविकार्यविहीनपरम् ॥

७६ अधुर गीता यदिचैकनिरन्तरसर्वशिवं । यजन व कथं तपनं च कथम् ||२|| वह भाग विभाग से हीन पदार्थ है. वह कर्म और अकर्म से हीन परम पदार्थ है, यदि सर्व शिव एक और निरंतर है, तो अजन ही किस प्रकार से सम्भव है, और तपस्या ही किस प्रकार से सम्भव है ।। २ ।। मन एव निरन्तर सर्वगतं । ह्यविशालविशालविहीनपरम् ।। मन एव निरन्तर सर्वशिवं । मनसापि कथं वचसा व कथम् ॥३॥ मन ही निरन्तर सर्वगत है, मन ही अविशाल और विशालता से हीन है, मन ही निरन्तर सर्व शिवमय है. यदि मन ऐसा है तो मन और वाणी द्वारा उसका अर्चन किस तरह हो सकता है ।।३।। दिनरात्रिविभेदनिराकरणम् । उदतानुदितस्य निराकरणम् ।। यदि चैकनिरन्तर सर्वशिवं । रविचन्द्रमसौ ज्वलनश्च कयम् ॥४॥ यदि वह सर्व शिव एक निरन्तर है तो दिन रात्रिका .

भाषाटाका सहित। भेद, अथवा उदित अनुदित का मेद निराकृत हो जाते हैं तो सूर्य चन्द्रमा वा अग्नि का प्रकाश की किस तरह सम्भव हो सकता है ॥४॥ गतकामविकामविभेद इति । गतचेष्टविचेष्टविभेद इति ॥ यदि चैकनिरन्तरसर्व शिवं । वहिरन्तरभिन्नगतिश्च कथम् ॥५॥ यदि सर्व शिव एक निरन्तर और सत्य है तो काम विकाम विभेद, वा चेष्टा विचेष्टा भेद नष्ट होजाता फिर बाहर भीतर इस प्रकार का भिन्न भेद किस प्रकार होसकता है । ५। यदि सारावसारविहीन इति। यदि शून्यविशून्यविहीन इति॥ यदि चैक निरन्तरसर्व शिवं । प्रथमं च कथं चरमं च कथम् ॥६॥ यदि सार, विसार शून्य, विशून्य. यह सब कुछ भी नहीं है, यदि एक और निरन्तर सर्व सत्य है तो पहला वा पिछला किस तरह सम्भव होसकता है ।।६।। यदि भेदविभेदनिराकरण । यदि वेदकवेद्यनिराकरणम्॥

अवधून गीता यदि चैकनिरन्तरसर्वाशेवं। तृतीयं च कथं चरमं च कथम् ।।७।। यदि भेद करने वाला और भेद इनसे अलग है यदि जानने वाला और जानने योग्य इनसे अलग है यदि एक है और अन्तर रहित शिव रूपहै तौ तीसरा और चौथा कैसे ॥७॥ गदितागदितं नहि सत्यमिति। विदिताविदितं नहि सत्यमिति ॥ यदि चैकनिरन्तरसर्वशिवं । विषयोन्द्रियबुद्धिमनांसि कथम्।।था कहा हुआ और न कहा हुआ ये सत्य नहीं है जाना हुआ और न जाना हुआ यह सव सत्य नहीं है यदि एक है और भेद रहित सब में शिवरूप है तौ विप की इन्द्रियों में वुद्धि और मन कैसे है ॥ ८॥ गगनं पवना नहि-सत्यमिति । धरणीदहनो नहि सत्यमिति ।। यदि चैकनिरन्तरसशिवं । जलदश्च कथं सलिलं च कथम् ।।९।। आकाश और पवन ये सच्चे नहीं हैं पृथ्वी और पवन सच्चे नहीं हैं और भेद रहित सब में शिव रूप हैं तो " - भाषाटीकासहिता। बादल और जल कैसे है ॥ ६॥ यदिकल्पितलोकनिराकरणं । यदि कल्पितदेवनिराकरणं ॥ यदि चैकनिरन्तरसर्वशिवं गुणदोषविचारमतिश्च कथं !! १०॥ यदि कल्पना किये हुए लोक के दर करने वाला है यदि कल्पना किये हुए देवताओं से अलग है यदि एक है और भेद रहित सत्र में शिवरूप है तौ दोष की बुद्धि कैसे है ॥ १० ॥ मरणामस्णं हि निराकरण करणाकरणं हि निराकरणं ॥ यदि चकनिरन्तरसर्वशिवं । गमनामगन हि कथं वदति।। ११ ॥ मरना और जीना करना और न करना इस में नि- श्चय नहीं है यदि एक है और भेद रहित है सबमें शिव रूप है तौ जाना आना कैसे होता है ।॥ ११ ॥ प्रकृतिः पुरुषो नहिं भेद इति । नहि कारणकार्यविभेद इति । यदि चेकनिरन्तरसर्वशिवं । पुरुषापुरुषं च कथं वदति ॥ १२॥ 1 Co अवधूत गीता प्रकृति पुरुष और भद निश्चय नहीं है कारण कार्य का भेद नहीं है यदि एक है और रहित सबमें शिवरूप है तौ पुरुष और प्रकृति कैसे होते हैं ॥१२॥ तृतीयं नहि दुःखसमागमनं । न गुणाद्वितीयस्य समागमनं ॥ यदि चैकनिरन्तरसर्वशिवं । स्थविरश्चयुवा च शिशुश्च कथ।। १३|| तीसरे जिसमें दुःख की प्राप्ति नहीं गुण से सुखकी प्राप्ति नहीं है यदि एक है निरन्तर सबमें शिवरूप है तो बूढ़ा जवान बालक ये कैसे है ।। १३ ।। ननु आश्रमवर्णविहीनपरं । ननु कारणकर्तृविहीनपरं । यदि चकनिरन्तरसर्वशिवं । अविनष्टविनष्टमतिश्च कथं ।। १४॥ निश्चय आश्रम और वर्ण इनसे अलग है और. कती इन से निश्चय हीन है यदि एक है और निरन्तर सुवमें शिवरूप है तौ अविनाशी और विनाशी ये बुद्धि कैस है॥१४॥ ग्रसिताग्रसितं.च वितथ्यमिति । जनिताजनितं च वितथ्यमिति ॥

भाषाटोकासहिता। यदि चैकनिरन्तरसर्वशिवं । अविनाशि विनाशि कथं हि भवत्१५ असना और न ग्रसना ये झूठे हैं पैदा होना और न होना ये झूठे हैं यदि एक है और भेद रहित है सबमें शिवरूप है तौ अविनाशी और नाशवान ये कैसे हैं।१५ पुरुषापुरुषस्य विनष्टमिति । वनितावनितस्य विनष्टमिति ॥ यदि चैकनिरन्तरसर्वशिवं । अविनोदविनोदमतिश्च कथं ॥१६॥ पुरुष और नपुंसक इनका नाश है स्त्री पतिका नाश है यदि एक भेद रहित सबमें शिव रूप है तौ प्रानन्द और दुःखकी बुद्धि कैसे हैं ॥ १६॥ यदि मोहविषाद विहीनपरो । यदि संशयशोकविहीनपरः ॥ यदि चैकनिरन्तरसर्वशिवं । अहमेति ममेति कथं च पुनः॥ १७॥ यदि मोह और दुःख से हीन है यदि संशय और शोक से हीन है यदि एक भेद रहित सबमें शिव है तो 'फिर महंकारता कैसे है ॥ १७ ॥ A- २ शवधूतगाता। ननु धर्मविधर्मविनाश इति! ननु वन्धविवन्धविनास, इति ॥ यदि चकनिरन्तरसर्वशिवम् । इह दुःखविदुःखमतिश्च कथम्॥१०॥ निश्चय धर्म और पापका नाश है निश्चय. बन्धन और मोक्ष का नाश है यदि एक भेद रहित सबमें शिव रूप है तो यहां दुःख और सुखकी बुद्धि कैसे है ॥ १८॥ नहि याज्ञिकयज्ञविभाग इति। न हुताशन वस्तु विभाग इति॥ यदि चकनिरन्तरसर्वशिवं । वद कर्मफलानिभवन्ति कथं ॥ १९ ॥ याज्ञिक और यज्ञ इनका विभाग नहीं है न अग्नि और वस्तु का विभाग है यदि एक भेद रहित सबमें शिव है तौ कर्म के फल कैसे होते हैं सो कहो ॥ १९ ॥ ननु शोकविशोक विमुक्त इति । ननु दर्पविदपविमुक्त इति ॥ यदि चैकनिरन्तरसर्वशिवं। ननु रागविरागमतिश्च कथम् ॥२०॥ निश्चय शोक और अशोक से अलग है निश्चय घमंड और नम्रता इनसे अलग है यदि एक मेद रहित

३
प
भाषाटीकासहिता।
सब में शिव है तो विषय लालसा और वैराग्य की बुद्धि
कैसे है॥२०॥
नहि मोहविमोहविकार इति।
नहि लोमविलोभाविकार इति ।।
यदि चेकनिरंतरसर्वशिवं ।
ह्यविवेकविवेकमतिश्च कथम् ॥ २१ ॥
न तो मोह और विमोह का विकार है. न लोभ और
विलोम का विकार है, यदि एक भेद रहित सव में शिव
है, तो अज्ञान और ज्ञान कैसे है ॥ २१ ॥
लमहं नहि हंत कदाचिदपि ।
कुलजातिविचारमसत्यमिति ॥
अहमेव शिवः परमार्थ इति।
आभिवादनमत्र करोमि कथम् ॥२२॥
तु और मैं ये कभी नहीं है, कुल और जाति का
विचार झूठा है, असल में मैं ही शिव हूँ यहां दण्डवत्
कैसे करूँ॥ २१ ॥
गुरुशिष्यविचारविशीर्ण इति ।
उपदेशविचाराविशीर्ण इति ॥
अहमेव शिवः परमार्थ इति ।
अभिवादनमा करोमि कथम् ॥२३॥

अवधूत गीता। गुरू और शिष्य का विचार नहीं है, न उपदेश का विचार है असल में मैं ही शिष्य हूँ, यहां दण्डवत् कैसे करूँ॥ २३ ॥ नहि कल्पितदेहविभाग इति । नहि कल्पित लोकविभाग इति ।। अहमेव शिवः परमार्थ इति । अभिवादनमत्र करोमि कथम् ||२४|| कल्पना किये हुए देहका विभाग नहीं है, न कल्पना किये हुए लोक का विभाग है, वास्तव में मैं ही शिव रूप हूं, फिर प्रणाम किसको करूँ ॥ २४ ॥ सरजो विरजो न कदाचिदपि । ननु निर्मलनिश्चलशुद्ध इति ।। अहमेव शिवः परमार्थ इति । आभिवादनमत्र कमि कथम् ॥२५॥ रज सहित रज से अलग ये कमी नहीं है, निर्मल निश्चल और शुद्ध ये भी नहीं है, असल में शिव मैं हूँ फिर प्रसाम कैसे करूँ॥ २५ ॥ नहि देहविदेहविकल्प इति । अनृतं चरितं नहि सत्यमिति ।। अहमेव शिवः परमार्थ इति।

AAAATAAN ty: . भाषाटीजनहिता। आभिवादनमत्र करोमि कथम् ॥२६॥ देह और विदेह का भेद नहीं है, झूठा प्राचरण करना सत्य नहीं है, वास्तव में मैं ही शिव हूँ, फिर दण्डवत् कैसे करूं ॥ २६ ॥ विदन्ति विदन्ति नहि नहि यत्र छन्दोलक्षणं नहि नहि तत्र ॥ समरसमग्नो भावितपूतः प्रलपति तत्त्व परमवधूतः।।२७॥ इस पुस्तक में काव्य नहीं है, छन्दका लक्षण नहीं समान रस में मग्न होकर भावना से शुद्ध हुआ, प्रायोगी इस परम् तत्व को कहता है ।।२७॥ इति श्री दत्तागेपविरचितोयामवधूत गीतायां स्वामिकार्तिक संघाझे स्वात्म सबित्युपदेशो मोक्ष निर्णयोनाम पष्टोऽध्यायः ॥ ६॥ सप्तमोऽध्यायः श्रीदत्त उवाच । स्थ्याकपटविरचितकन्थः । पुण्यापुण्यविवर्जितपन्थः ।। शून्यागारे तिष्ठति नग्नः।

अवतगीता।
शुद्धनिज्जन समरसमग्नः ॥३
श्रीदच बोलानाली में पड़े हुए कपड़ों से जिसने
कंथा बनाली, पुण्य और पाप जिसके मार्ग में नहीं है,
शुद्ध माया से रहित समान रस में मग्न हुअा अवधूत
नंगा होकर सूने मकान में रहता है ।। १ ।।
लक्षालमविवर्जितलक्ष्यो।
युक्तायुक्तविवर्जितदक्षः ॥
केवलतत्त्वानिरञ्जनपूता ।
वादविवादः कथमवधूतः।।२
लक्ष और अलक्ष से जिसका लन्य वर्जित है योग्य
और अयोग्य इनसे वर्जित और चतुर है शुद्ध तत्व से
पवित्र ऐसा वह योगी है, यहां वाद और विवाद किस
प्रकार है ॥२॥
आशापाशविवन्धनमुक्ताः ।
शौचाचारविवजिर्तयुक्ताः ॥
एवं सर्वविवर्जित संत-
स्तत्त्वं शुद्धानरञ्जनयन्तः ॥ ३ ॥
आशा की फांसी के बन्धन जिसके छूट गये हैं, शौच
और प्राचार वर्जित और युक्त है इस प्रकार सन झगड़ों
को जिनने त्याग दिया ऐसे संतजन शुद्ध माया रहित
तत्व को धारण करते हैं ॥३॥

भाषा टीकासहिता। कथमिह देहविदेहविचारः । कथमिह रोगविरोगविचारः॥ निर्मलनिश्चलगगनाकारं । स्वयमिह तत्त्वं सहजाकारम् ।। ४ ॥ यहां देह और विदेह का विचार कैसे है, यहां राग और विराग का विचार कैसे है, यह तत्व निर्मल है निश्चल है और श्राकाश के समान है,और श्राप स्वाभा- विक श्राकार है कहने में नहीं आता है ॥ ४॥ कथमिह तस्वं विन्दति यत्र । रूपमरूपं कथमिह तत्र ॥ गगनाकारः परमो यत्र । विषयीकरणं कथमिह तत्र ॥५॥ जो कि शून्य आकार है उसमें कैसे जाना जाता है रूप और अरूप कैसे है उसमें विपय कैसे होता है ॥५॥ गगनाकारनिरन्तरहंस- स्तत्वविशुद्धनिरंजनहंसः ॥ एवं कथामिह भिन्नविभिन्न । बन्धविबन्धविकारविभिन्नम् ॥ ६ ॥ शून्याकार और भेद रहित हंस है शुद्ध तत्व और मायारहित हँस है इस प्रकार के इस में भेद और अभेद - HALÁÅ Landaka - अबधूनगीना कसे हैं वह हंस बन्धन और मोक्ष से अलग है ॥६॥ केवलतत्वनिरन्तरसर्व । योगवियोगौ कथामह गर्वम् ।। एवं परमनिरन्तरसर्व- मेवं कथमिह सारविसारम् ॥ ७ ॥ वह सब केवल तत्व है और माया से रहित है उसमें योग और वियोग कैस हैं घमंड कैसे हैं इस प्रकार वह सव भेद रहित हैं इसमें सार और प्रसार कैसे हैं॥ ७ केवलतत्वनिरंजनसर्व गगनाकारनिरन्तरशुद्धम् ॥ एवं कथामिह संगविसंग । सत्यं कथमिह रंग विरंगम् ।। ८॥ यह सब केवल तत्व है और माया से अलग है शून्याकार है और अत्यन्त शुद्ध है इस प्रकार यहां सङ्ग और कुसङ्ग सत्य कैसे हैं रङ्ग और विशेष रङ्ग कैसे हैं। योगवियोगै रहितो योगी। भोगविभागै रहितो भोगी। एवं चरति हिमन्दं मन्दं। मनसा कल्पितसहजानन्दं ॥९॥ योगी संयोग और वियोग को छोड़कर गृहस्थी भाषाटीकासहिता। भोग विभोगों को छोड़कर इस प्रकार अपने मन में स्वाभा विक आनन्द का विचार करके मन्दी चाल से चलते हैं। बोधविनोधैः सततं युक्तो द्वैता द्वैतैः कथमिह मुक्तः। सहजोविरजानकथामिहयोगीशुद्धनिरंजनसमरसभोगी जों आदमी ज्ञान और अज्ञान से सदां युक्त है वह हैत और अदत से कैसे छूट सकता है जो स्वाभाविक रजोगुण से भरा हुआ है वह शुद्ध माया रहित समान रसका भोगने वाला कैसे हो सकता है ॥ १० ॥ भग्नाभग्नविवर्जितभनो लालमविवर्जितलमः । एवं कथमिह सारविसार समरसतत्वंगगनाकारः१ खडित पदार्थ और खंडित पदार्थ इनसे जिनका नाश नहीं है मिला हुआ पदार्थ अलग पदार्थ इन दोनों से अलग है समान रस है और तत्व है शून्याकार है उस में सार और असार कैसे हैं ॥१॥ सततं सर्वविवर्जितयुक्तः। सर्व तत्वविवर्जितमुक्तः ॥ एवं कथमिह जीवितमरणम्। ध्यानाध्यानः कथमिह करणम्॥१२॥ निरन्तर सबसे अलग है और मिला है सब तत्वों से अलगहें और आसक्तहैं इसप्रकार इसमें जीना और मरना " AAS.Sudaai tanANALAal. ६० अधवृतमाता। कैसे है और ध्यान करना और न करना इसमें कैसेहै ॥१२॥ इन्द्रजालमिदं सर्व यथा मेरुमरीचिका । अखण्डितमनाकारो वर्तते केवलः शिवः । १३ । यह सब संसार इन्द्रजालहै जैसे कि मृगतृष्णा का जल झूठा है जिसके कि टुकड़े नहीं होते जिसकी कि कोई शकल नहीं है ऐसा एक शिव है ।। १३ ॥ धर्मादौ मोक्षपर्यन्तंनिरीहाः सर्वथा वयम् कथं रोगविरागैश्च कल्पयन्ति विपश्चितः ॥१४॥ हम सब ओर से धर्म से लेकर मोक्ष तक कुछ चेष्टा नहीं करते हैं फिर विद्वान लोग राग वैराग्य की कल्पना कैसे करते हैं ।। १४ ॥ भविन्दति २ नहि २ यत्राछन्दोलक्षणं नहि नहितत्रा। समरसमनोभावित पूतः प्रलपति तत्त्वंपरमवधूतः१' इस पुस्तक में काव्य नहीं है छन्दों का लनण नहीं है समान रसमें मग्न हुआ भावना से शुद्ध हुआ योगी इस परम तत्व को कहता है ॥ १५ ॥ इतिश्री दत्तात्र यविरचितां अवधूतगीतायां स्वामी कार्तिकसंवादे निरंजन कथन नाम सप्तमोऽध्यायः ॥७॥ अष्टमोऽध्यायः श्रीदत्त उवाच। . त्वद यात्रया व्यापकताहताते ।

भाषाटीकासहिता ध्यानेनचेतःपरता हताते॥ स्तुत्वा मया वापरता इताते। क्षमस्व नित्यं त्रिविधापराधान ॥१॥ श्रीदच बोला तुम्हारी यागा से व्यापकता हत हो गई है, तुम्हारे ध्यान से चित्त की विषयपरता दूर होगई है, आपकी स्तुति के द्वारा मेरी वाकपरता नष्ट हो गई है है गुरो ! मेरे इन तीनों अपराधों को नित्य क्षमा कर॥१॥ कामैरहतधीर्दान्तो मृदुःशुचिरकिंचनः । अनीहो मितभुक्शान्तःस्थिरो मच्छरणो मुनिः२ अव मुनि का लक्षण कहते हैं। कामों से जिसकी बुद्धि नष्ट न हो, इन्द्रियों को रोकने वाला हो कोमल हो, वेपर- वाह हो. पवित्र हो, चेष्टा रहित हो. थोडा भोजन करता हो, शांत हो, स्थिर हो, मेरी शरण हो, उसको मुनि कहते हैं ॥२॥ अप्रमत्तो गंभीरात्मा धृतिमाज्जितषड्गुणः । अमानी मानद कल्पो मैत्रकाणिक कविः ३ सावधान हो, गंभीर चित्त वाला हो, धीरज रखने वाला हो, छैनौं गुणों को जिसने जीत लिया हो अहंकार से अलग हो, मान देने वाला हो, समर्थ हो सबसे मित्रता रखता हो, दयालु हो चतुर हो,॥ ३ ॥ "

प्रवधूत गीता।
कृपालुरकृतदोहस्तितिक्षुःसर्वदेहिनाम् ।
सत्यसारोऽनवद्यात्मासमः सर्वोपकारकः ॥ ४ ॥
कृपालु हो, किसी से बैर न करे, सब प्राणियों कोसहने
वाला हो, सत्य सारवाला हो, शुद्ध चित्तवाला हो समान
हो, सबका उपकार करने वाला हो ॥४॥
अवधूतलक्षणं वर्णैतिव्यं भगवत्तमैः ।
वेदवार्थतत्त्वज्ञवेदवेदान्तवादिमिः ।।५।।
वेद और अक्षरों के अर्थ और तत्वको जाननेवालावेद
वेदांत को जानने वाले भगवान के भक्त अवधूत का लक्षण
नाम के अक्षरों से जानते है ॥ ५ ॥
आशापाशविनिर्मुक्त आदिमध्यान्तनिर्मलः ।
आनन्दे वर्तते नित्यमकारं तस्यलक्षणम् ॥ ६ ॥
अवभृत में पहिला अक्षर अ है उसका अर्थ कहते हैं आशा
की फांसियोंसे अलगहोआदि मध्य अन्त में निर्मल हो,नि-
त्य आनन्द में रहे यह अकार का लक्षण है ॥६॥
सना वर्जिता येन वक्तव्यं च निरामयम् ।
त नेषु वर्तेत वकारं तस्य लक्षणम् ॥ ७ ॥
विषय वासना जिसमें है नहीं कुशल पूर्वक बोलता है
जो वर्तमान है उनमें वर्चता है यह वकार का लक्षण है।
धूलिधूसस्गात्राणि धूतचित्तो निरामयः ।
धारणाध्याननिर्मुक्तो धूकारस्तस्य लक्षणम् ॥८॥

... भाषा टीका सहिता। अवधू. का अर्थ कहतेहैं ।धूल से जिसका शरीर मैला है चित्त को जिसने राक रक्खा है निरोगी है धारणा और ज्यान से अलग है यह धूकार का लक्षण है ॥ ८॥ तत्त्वचिंता धृता येन चिंताचेष्टा विवर्जितः। तमोऽहंकारनिर्मुक्तस्तकारस्तस्य लक्षणम् ॥९॥ तत्व का जो विचार करता हैचिंता से अलग है तम और अहंकार से अलग है यह तकार का लक्षण है।६॥ आत्मानं चामृतहित्वा अभिन्नं मोक्षमव्ययम् । गतो हि कुत्सितःकाको वर्तते नरकं प्रति ..१०॥ अमृतरूपी भेद रहित मोक्ष स्वरूप अविनाशी आत्मा को छोड़कर खोटा कौआ नरककी ओर जाता है ॥१०॥ मनसा कर्मणा वाचा त्यज्यतां मृगलोचने । न ते स्वर्गोऽपवर्गो वा सानन्दं हृदयं पदि।। ११ ।। मन कर्म वाणी सेमृग नयनी को छोडे। न तेरे स्वर्गहैन मोक्ष हैजो तेरे हदय में आनन्दहै तो स्त्री कात्याग कर११ न जानामि कथं तेन निर्मिता मृगलोचना । विश्वासघातकी विद्धिस्वर्गमोक्षसुखार्गलाम्।।१।। मैं नहीं जानता हूँ कि मृग के समान नेत्र वाली स्त्रीको उसने क्यों बनाया उसको विश्वासघात करने वाली स्वर्ग, मन्त्र के सुखकी रस्सी जान ॥ १२ ॥ भूत्रशोणितदुर्गन्धेह्यमेध्यद्वारदूषिते ।

अवधूत गीता। चर्मकुण्डे ये रमन्ते ते लिप्यन्ते न संशयः।।१३।। मूत्र और रुधिरकी जिसमें दुर्गन्ध है भृष्ट जिसका द्वार है ऐसे चमडे के कुंड में जो रमण करते हैं वे लिप्त हो जाते हैं इसमें शक नहीं है ।। १३ । कोटिल्यदम्भसंयुक्ता सत्वशौचविवर्जिता। केनापि निर्मिता नारीबन्धनं सर्वदेहिनाम्।।१४।। कुटिलता और कपट से भरी हुई, सत्य और शुद्धिवर्जित सब प्राणियों का बन्धनरूप स्त्री को किसने बनाया ॥१४॥ त्रैलोक्यजननी धात्री सा भगी नरको ध्रुवम् । तस्या जातो रतस्तत्र हाहा संसारसंस्थितिः॥१५॥ निलोकीको पैदा करनेवाली और धारण करनेवालीभग जिसके अंग में है वह निश्चय नरक है, उसमें फसनेसे आ दमी जन्म लेता है, हा! हा संसार की कैसीरचना है॥१५॥ जानामि नरकं नारी ध्रुवं जानामि बन्धनम् ।। यस्या जाती रतस्तत्र पुनस्तत्रैव धावति ॥१६॥ मैं जानता हूँ कि नारी निश्चय नरकहै, मैं जानताहूंकि स्त्री बन्धन है,इसमें रति करने से आदमी जन्म लेता है फिर भी वहीं दौडकर जाता है।। १६ ।।. भगादिकुचपर्यंतं संविद्धि नरकार्णवम् । रमन्ते पुनस्तत्र तरन्ति नरकं कथम् ॥ १७॥ योनि से लेकर कुंच तक नरक का समुद्र जानौ । जो -.

६५ भाषाटोलासहिता। उसमें रमण करते हैं, वे नरक को कैसे तरते हैं ॥ १७॥ विष्टादिनरकं घोर भगं च परिनिर्मितम् । किमु पश्यसि रे चित्त कथं तत्रैव धावसि ॥१८॥ विष्टा से आदि लेकर घोर नरक रूपी यह योनिरची है,रेचित्तात क्यों देखता है और वहीं क्यों दौडताहै॥१८॥ भगेन चर्मकुण्डेन दर्गन्धेन व्रणेन च । खंडितं हि जगत्सर्व सदेवासुरमानुषम् ॥ १९ ॥ ये भग चमडे का कुंड है बुरी बांस पाती है इसमेंधाव है, इस भग से देवता असुर, मनुष्यों से आदि लेकर सव जगत् खण्डित होरहा है ।। १९ ।। देहाणवे महाघोरे पूरितं चैव शोणितम् । केनापि निर्मिता नारी भगचैव अधोमुखम् २० देह रूपी महा घोर समुद्र में रुधिर भरा हुआ है,ऐसी स्त्री को किसने बनाया नीचे को जिसका छिद्र है, ऐसी योनि को किसने बनाया।॥ २० ॥ अन्तरे नरकं विद्धि कौटिल्यं बाह्यमंडितम् । ललितामिह पश्यति इहामंत्राविरोधिनीम् ॥२१॥ 'भीतर शरीर में नरक जानो बाहर को कुटिलता है, देखने में सुन्दर मालुम होती है, इस लोक और परलोक में विरोध करने वाली है ।।२१ ।। अज्ञात्वा जीवितं लब्धं भवस्तत्रैव देहिनाम ।

•HALAL1t A-AAL अवधूत गीता। यतो यातो रतस्तत्र अहो भवविडम्बना ॥२२॥ उसीमें मनुष्यों का जन्म होता है इस प्रकार अपनेपाये हुए शरीर को न जानकर उस में रवि करता है, नरक को जाते हैं देखो! कैसी संसार की विडम्बना है ।। २२॥ दर्शनाद्धरते चित्तं स्पर्शनाद्धरते वलम् । संभोगाद्धरते वीर्य नारीप्रत्यक्षराक्षसी ।। २३ देखने से चित्त को हरलेती है, स्पर्श करने से बलको हरती है, संयोग करने से वीर्य को खींच लेती है, इस प्रकार से स्त्री प्रत्यक्ष गचसी है ।। २३ ।। यत्र मुग्धारमन्ते च सदेवासुरमानवाः । ते यान्ति नरकं घोरं सत्यमेव न संशयः॥२४॥ इसमें देवता असुर और मनुष्य मूर्ख होकर रमण करते हैं, वे घोर नरक में जाते हैं यह सत्य है इस में शक नहीं है ।। २४ अग्निकुण्डसमा नरिघृतकुम्भसमो नरः । संसर्गेण विलीयेत तस्मात्तां पखिजयेत् ।।२५|| स्त्री आग के कुण्डं के बराबरहै, पुरुष घी का घड़ाहै. उसका संग होनेसे लीन होजाताहै इससे उसका त्यागकरे ।२। गौडी माध्वी तथा पैठी विज्ञेया त्रिविधा सुरां । चतुर्थी स्त्री सुराज्ञेया ययेदं मोहित जगत् ॥२६॥ गौडी. माध्वी, षैष्ठी; ये तीन तरह की मदिराहै चौथी भाषाटीकासहिताः मदिरा स्त्रीहै जिससे यह संसार मोहित होरहाहै ॥२६॥ मद्यपानं महापाप नारीसंग तथा भवत् । तस्मादाय परित्यज्य तत्त्वनिष्ठो भवेन्मुनिः।।२७॥ मदिरा पीने में बड़ा पाप है वैसे ही स्त्री संगम में महा पाप है इससे इन दोनों को छोड़कर मुनि को तत्व मेंमन लगाना चाहिये ॥ २७ ॥ चित्ताक्रांत धातु बद्धं शरीरं। नष्ठे चित्ते धातवो यान्ति नाशम् ।। तस्माच्चित्तं सर्वतो क्षणीयं । वस्थे चित्तबुद्धये संभवन्ति ॥२८॥ चित्त से खींचा हुआ धातुओं से बंधा हुआ यह शरीर है चित्त के नष्ट होने पर धातुओं का नाश होजाता है इसलिये चित्त की चारों ओर से रचाकरनी चाहियेचित्त के सावधान होने पर बुद्धि सावधान रहती है ॥२८॥ दत्तात्रयावधूतेन निर्मितानन्दरूपिणी । ये पठन्ति च शृण्वन्ति तेषां नैव पुनर्भवः ।।२९।। आनन्द रूपी दत्तात्रेय अवधूत ने यह बनाई है जो इसको पढ़ते और सुनते हैं उनका फिर जन्म नहीं होता॥२९॥ इति श्री दत्तात्रेतायाम अवधूनगोarयां स्वामि-कार्तिकसंवादे स्त्री निराकरणं नामाष्टमोऽध्याय || १०० अवधूत गाता। हैं और चार वेद जिसके पत्ररूप हैं ऐसे संसार रूप इस अश्वत्थ (पीपल ) वृय को ज्ञानी जन अविनाशी अर्थात् नाश रहित कहतेहैं ऐसे इस संसाररूप वृक्ष को जो जानता है वही वेद के अर्थ को जानता है ।। ५ ॥ सर्वस्यचाहहृदिसन्निविष्टोमत्तःस्मृतिनिमपोहनं च। दैश्चसर्वरहमेव वेद्यो वेदान्तकृद्धेदविदेवचाहं ।।६।। अर्थ-हे अर्जुन ! सम्पूर्ण प्राणियों के हृदयमें विराजमान हूं और मेरे से ही सम्पूर्ण प्राणियों के स्मृति, ज्ञान और ज्ञान का नाश होता है, और सम्पूर्ण वेदों करके मैं ही जानने योग्य हूं, औरमैंही सम्पूर्ण . वेदान्तशास्त्रका रचने वाला हूं और मैंही वेदान्त शास्त्रका जाननेवालाहूं ॥६॥ मन्मना भवमद्भक्तोमद्याजी मांनमस्कुरु । मामेवैष्यसि युक्त्वैवमात्मानं मत्परायणः ।।७।। अर्थ-हे अर्जुन ! तू मेरे निपे अपने मनको लगा और मेरा ही भक्त हो, और मेराही भजन पूजन आदिकरऔर मेरेकोही नमस्कारकर इसप्रकारमेरे विपे तत्परहुआतूअपने श्रात्मा को मेरे में युक्त करके मेरे कोही प्राप्त होवेगा॥७॥ इति श्री सप्तश्लोकींगीता भाषीटीकासहितासमाप्ता। F2

Awdhut Geeta

Author
Shree Banmali Chturvedee
Title
Awdhut Geeta
File name
Awdhut Geeta
Text
OCR done
Citation
1934
Published
2009/09
Publisher
Bombay Bhushan Press Muttra
Language
Sanskrit
Pages
99
Library
Sanmati Library, Jaipur
Classification
Granth
DLI number
345424
Barcode
99999990233766.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
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VMLT id
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