Acharya Shri Vinaychandra Gyan Bhandar, Jaipur

Ishopanishad Hindi Vigyanbhashy Khand-2

Sharma, Motilal · 2011/08

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मस्तापना शप्रगपति की मनुकम्पा से भाग हम इगोपनिपत-दिदी-विमानमाप्प दिवीय स्वण्ट अपने उपनिषत् प्रेमियों के समय उपस्थित करने में समर्प हो सके हैं। प्रपम सपा में ३ मन्त्रों का भाप्प प्रकाशित हुमा है, एक इस दुसरे सरर में उपनिषत् के शेप १५ मन्त्रों का माप्य सम्पम एमाह । मारम्म के तीन मन्य पुरुषास्मा का निरूपण करते हैं, एष मागे के ५ मप्र प्राकृतास्मा का प्रतिपादन करते हैं। इस विषय विमाग को सक्ष्य में रखकर ही दमन तीन मन्त्रों को सतन्य सण में, एक १५ मम्मों को स्वतन्त्र सग में प्रकाशित करमा प्रापरपक समम । मन्त्र अयारमक पुरुपास्मापिकरण भी २५० पृष्ों में, एक पपदरामग्रारमफ माफमास्मापिकरण भी ५५० पृष्ठों में ही संपन [मा है । इस प्रकार सम्य यह ईगमाप्य १०० पृमों में पूर्ण मान दोनों पपयों के प्रकाशन का अप "परिदिफपिन्नातमकारानफन" उक्त पर में माननीय श्रीप्लेरीमक्ष्मीबाई मोरया, एवं माननीय रागासारवधीमुकुन्द मापनी पिती महोदय के रुप प्रयास से सन् ३८ में तगमग र सहमर पारित हुए थे। उस दम्प से पई से प्रकाशन सम्बन्धी सामग्रम (ट्रेडिस मनि-याप-कर मशान मारि) परी (२) गया पा । साप ही में कमेटी से सिसिररूप में यह प्रतिज्ञा की गई पी कि "५ सदसर.की वागत मिन्दी-वानिक अन्य स्थानीय श्रीवासपर प्रेस से प्रकाशित कर दिये जायगे। दनुसार एक य के मीतर भीतर हमने सगमग २॥ साल के म्पप के दो सण प्रकाशित कर दिए हैं। शिसत प्रतिमानुपार ग्यप + विसाब के साप प्रकाशित समों की १०० प्रतिए कमेटी की सेवा में मेन दी गई है। माकी बचे र प्रम से भी हम शीघ्र ही मुक्त होने का प्रयास कर हे । इस समय में कमेटी से, विगेवता श्रीमतीलेडीसमीबाई, एष समासादम श्रीमुन्दमासनी से पा विनम्र निवेदन करना चाहते हैं कि कमेटी में यो द्रम्प हमें प्रदान किया पा उसका उपयोग किरमानुसार प्रकाशन सम्बन्धी सामान में ही होगण । ऐसी स्पिति में प्रकाशन सा परात होना चाहिए पा, नही सका है। कमेटी बारा प्राप्त सामान से किप्त प्रकार संकट प्राप्त बन कर हम दो सह कमेटी के सामने रखने में समर्थ होसकर इस का पूरा विवरण "मारी यात्रा, और वैदिकसाहिव" नाम के परम्प से कमेटी को विदित होगा । इन सब सकटों के रहते हुए भी कमेटी को हम विपास दिसाते है कि मनिम प की समाप्ति तक से भी बनेगा हम शेप भय से मुक्त होने का प्रयास करेंगे । हमें माशा -मेरी सादिवा एष रामासाहब हमारी विषम परिहिपति को पपप में रस्ते पर महिप्प में भी इस सादिम पर इसी प्रकार मनुप्रा बनार रक्सो । इस के मनन्तर "उपनिपविज्ञानमाप्पभूमिका का प्रथम सर प्रकाशित होगा। यह मूमिधर . पृष्ठों में सम्पन्नई। इसी लिए इसे भी दो खण्डों में ही प्रकाशित करने का नियम किया है । इस में निम्न लिखित विषयों का समावेशवा है- -प्रारम्मिरूपकम्प--- २-पासपाठरास्प- १-उपनिपत गर का प्रय-.. --क्या उपनिपत् वेद है।-१२. मूमिकाप्रथमखण्ड (गभग १०) (1) (५)-.-उपनिपदों में क्या है! (६)-२-उपनिपर ज्ञान का अधिकारी कौन है? (७)-3-उपनिपत् हमें क्या सिखाती है? (८)-1-पीपनिपद मान के प्रवचफ कौन थे? (२)-५-प्रामण-भारण्यफ-उपनिपद में परस्परम भूमिकादितीयखयड पया सम्बन्धी (१०)-६-अतिराप्दमीमांसा, एस एफे परमाद पर एक राष्टि। (भगमग ५०० पृष्ठ) प्रकाशित दोनों मण्डों के सम्बध में हमें अपने प्रेमी पाठकों से यह निवेदन करते हुए समा का अनुभव होता है कि प्रकाशन में अशुद्धियों को भावरपकता से अधिक स्पान मिला है। फारण इसका यही है कि पप्पपन के काय में संतम रहने कारस हमें समय मदुत ही कम मित्रता है। साथ ही में भर्षसम्वन्धिमी परिस समस्या के कारण हम इस कार्य के सिए स्मतम्य म्यक्ति रस्में में भी मसमर्प है। इन्हीं सारी परिस्पितियों को मक्ष्य में रसते र पाठक उस गपगप क सिए हमें क्षमा प्रदान करेगे यही निवेदन कर हम अपनी सैदिप्त प्रस्तावना समाप्त करते हैं। J पीयतामनेनात्मदेवतेति-शम् फासगुनहप्प १३ शिवरात्रि रिमिरिपेयः-- वि० सं० १९२० मोतीलालशर्मा,मारद्वाज (प्रन्पसमाप्ति) पपुर-रामपानी

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ईशोपनिषत्-हिन्दीविज्ञानमाष्य-द्वितीयखराड की विषयसूची vond प्रथ प्राकृतात्माधिकरणे- अव्यक्तात्माधिकरणम् ar (१ पृष्ठ से १५१ पृष्ठ पपन्त) विषय पृष्ठसम्पा पिपय पृष्ठसम्पा . ३ ३- * C- P १. --मकृविमर --प्रधिकरणसाप -प्रम्यकास्मसम्पनियन -मसमन्य २-मन्त्र का भक्षयर्थ -विष की दिनिपति १--म्माषकी पापपत्ता --एकम-भनेकप ६-भदेत की मीमांसा ७--समातीय-विगातीय-सगतमद -कस्सित मटेसबाद १ -मनीपरबादप्रधान जगम्मि ૨ प्पाचंद १०-पिरस का मन ११-सरपम्सक शिप की सम्पना ३ । १२-ममन परपुमप गि " [व] विपय पृष्ठसध्या विषप पसंख्या " १२-नाम-रूप की सस्पत्य ६ १५--मन्त्र का प्रतिपाप विषय ११--जगन्मिप्यावश्चद की प्रशाखीयता ७ १८-मन्त्रसमम्मी सोपाधिकमाय १५-बगत् की सस्पता के समर्पक 18-माहिति एव मापान समम्म बोलप्रमाण २०-मन्त्रोपाच पाक्रम १६-णमा के स्परूपधर्म २१-विषाकर्ममप मम्पय इवि-निपयोपक्रमा ११ मन्त्रार्थसम्बन्धिनी-त्रयीवेदनिरुक्ति (१२ पृष्ठ से ५० पर्यन्त) वियप प्रससम्पा विषय प्रासंध्या १ बामसापक वेट --प्रमा से सर्वप्रपम वेद का प्रामाष -वेद में चार निभाम -अमिवेद सोमवेद ५. -अमितत्व का अग्निस्य " " " -क्रिया का रूप "-कम्पन एवं गति का सार भ्य (स-पा) १२-अप्रिपिपगरभफ शरीर १५-प्राणामि का मिसन १९-कम्माप्पर भनि १४-प्राण-मन मैद से भप्ति के दो नि" १६-दिशकपमधर्मय मामि 10-सफोरपमा सोम १८-पि-माग . ७. सेम-स्नेहम्पण -अनिमयी मूर्ति " " पिपय पृष्ठसंख्या विषय पृष्ठसंस्पा २४ २. , " ४२-प्रागापमवेद १३-वेद से भाप्ति v-वेदि, वेद, या, प्रयापति १५-पुष्करपण १६ १६-पुर की उत्पत्ति ४७-चतुर्मुस्तरमा ४०-पीरसमुद्र १७ ११-सरखतीवाक् ५०- नारदऋपि ५१-सरस्थान् समुद्र ५२-प्राकृतिक मान्यापान १८५३- भग्निहोत्र ५/- दरापूर्णमास पासुमास्य ५६- म्पोतिरोम २० भमिषपन ५-सप्णाजिन " " २६ १२-प्रमीपोमात्मक जगत् २०–समाग्नि,देवामि,मूसाग्नि २१-अनित्रयी (प्रयीयेद ) २२-सोमवेद (मपबद) २३-सायतन निरायतम सोम २१-प्रारमवेदोपक्रम २५-उम्प-प्रम-साम २६-भारमवेद में प्रयीवेद २७--प्रतिष्ठायेदोपक्रम २८-प्रतिष्ठाप्रयी २२-घसिमरूपनिवचन ३० असतोवति -सतोपति १२.-प्रतिष्ठावेद में प्रयीवेद २५-ज्योतिपदोपक्रम २४–पमम्योति २५-मूसम्योति २६ सम्मम्योति ३७ - ज्योति, चेतमा, भानंद १८-सम्धिदानादषम वेद ३९-भनिवेदविव १०-मनम्तवेद ११-प्रयोगर्मित मूसप्रपत्र " " " " " ५८-" " " २१ ६०-भावानपा " २२ " ६–महापृपिवी ६२-प्रमापति के रम ६. नियति वेद ६.-मूर्तिमान २३ २८ 28 पिपर पसन्या विषप पटसस्य ज ---पत्रण दीपगियमिरा E " ५. | २-मप-मन भरी २९-प्रथमम वेद २.लायधीम्माधिक वेद ११-पौरपंप पेद ५१२२---भाषण ३५-पोपाणा १४-~-पोय ३५-तोर 12 " 1 " " 1.-प्रासपायु ११-पबहन पर १२-माररिसा १५-मुक्तिा वायु १५-दिगमेद से मतिमाग " ५-म्पाम " " M 12 10 " २६ नमान, पापक, शुचि १७-मपम्पियराम १५--समासूम १-समाप्रपोप ३ --पाषा मण १~-अपोज़ि २३--ममममपर्ण २३-सा का म्योरपुत्र भवर्ष २४-मारपानी २९-बारपानी २९-दसीय २.-मोकप्रबक मम्मी १९-यनारायण -समाचार ४१-म, पेद, पी, मणि ४२-पुश्म, सोर अपर्ण, सोम १५११~-विधा, रिमति, भाकारा बद६. 12-धर्म, नी या प्रास, पद ४५--मएस-काय ६-पुष-मपण्य " " . h र मूतम् ४५-पुप एपेई सबम् १०। ५.-सूत्रमा . विपय पृष्ठसख्या पिपय पूछसम्पा " " 1 ८०- " " " ५१-प्यास्यावामों का मातरिया ५२-पारमेष्ठप ममोवा २५-पास ५-इगपत्नी ५५-पास्मयभूत १६ वेदवाक् ५७--भाकाशत्मिका वाक् २८-पाट्कौशिक विवर्त ५र--मारमम्मी प्रमापत्ति ६०--मने मदेवत् ६-अवयवगति ६२-अवयमीगति ६.--उमपति ६४---गसिस्पिति कर दिग्दरान ६५-कुम्भकार प्रयापति ६६-प्रमापति का परातस ६७-घट का निमित्त कारण उपादानकारण सहकारीकारण ७०-चौपट ०१-घटमस ७२-पटोप ७३--पिटपास -कुम्मकार-भपर --भूपृष्ठ-मम्पप ६. ७६-सूत्र-सूत्रबायु ६२ -पक्रययुर्वेद ७८-मिट्टी परमाग ७१-द-युवनिपति -पानी-मापोमयाझ ८१-कीपक-वियनामि ६३ ८२-पयामकमाण ६६ ८३-ठसारूप-साया पर-मूसोफ-मुम ८५-मुबझेक-उदर ८६-सर्गेक-मुस -पटनिर्माता, निमनिम्माता में सिद्धा E-मनेनदेयत का एकप्रसमम्पप ८६-पतिस्पिति का समन्वय १०-मनसो जमीय ६८ १-देक्सृष्टि ६. १२-नन्दियदेक्ता २३-पूर्वमर्पत -देवतामों का परामब -मातोमूत मापी महेबर १६-मन्त्र के तीन पाद ७१ १७-मत्र का चौपा घरस " " " " " " [-] विपप पृष्ठसन्या विषय पृष्ठसंम्पा ૦૨ " " " " " " ०३ " " २०-रेत सत्र २५-पोनितत्व -नेहोषाव 1-सथिमवर्षक शिकायु १०२-सरिनिमक यमवायु १०३-पिकनिम्मावा मातरिया १०१-पियाराम की भ्यापित १०५-पिती-पुरोक १.६-मस्तारपा का फर्म १०७-मापाशर १०-मातरिय मोर माह १०१-अमम्योति ११ -सम्पोति ११-परम्पोक्ति ११२-रूपन्योति १५-मारिकार २१५-पारा १५-वेताराम १९६-अमराव 10-पपपराम १.-एकाप १९५-पसी रानव 00-गोभमगिर १२१-बराहसीसा ७६ १९२-पवन गौर शूकर १२३-अम्मज और कार पर १२४-मसविणेपक मम्मम २५-पसविशोषक शुफरपर १२६-सब पिए पुरुष है १५७-मन्त्रप्रमाण १२८-धीसापहामिमत प्रप १२८-सब पुरुप लिए है १०-सायरामाप्य भौर कर्मकाया १-सापसमाम्प में विशामरणिका भभाव" २३२-ममराम्द का निपम १५५-वरम प्रसम्मन्पिनी प्रास्मविप पिणी मारमा का उपक्रम ७० ११-सायम्भुव मास्पा १५-सौर देवारमा ११६-पार्षिक मूतात्मा १२७-उपनिषदों का भाग्य १५-पौवेद का भारमा १२-मागम परत का भामा ११. गोपनिषद की सम्मान ११-नाम-काम-बर्मामा ११२-मास्मविकास का दिएशन " " " " " " " .

[2] विपय पृष्ठसस्पा १० ८२ m विपय पृष्ठसंख्या १६६-परोपासना १६७-कात्रयी १६०-उपनिषत्कार की उपासमा १६६-उपासना का अप १७०-उपासना का मर्प १७१--मर्तिमम १७२-ममी की उपासना १७१-मा की उपासना " म EL . " ८६ " म " " " ११३-भारमविक्तपरिक्षेस १४-विपार पुरुष की बिमति ११५-भारमविश्नों कीम्पाप्ति १४६-निपात भरपरुष ११७-त्रिपात परपुरुष ११८-एक ही बारमा के वीम विपर्व ११२-वेतनधि १५०-भर्मचेतनमुदि १५-पचेतनसृष्टि १९२-रसारममृति १५६-देवाव्यसृष्टि १५१-भूतासामरि १९५-अपमाधिकारी ११६-मध्यमाधिकारी ११७-उच्चमापिकारी १५-सपमूतान्तरात्मो गसमा २९-दिरपयगर्मोगसना १६०-अयस्पोपासना १९१-मोहारोपासना १६२-सद्गीयोपासना १६२-प्रणयोगसमा १६१-मम्पयोपासना १६५-अपरोपासमा CS " " १७१-उपासना का प्रपमातम्म १७५-उपाना माहितीयसम्म १७६-पीपत बह-तुससी भादिकी उपाना १७७-भगवत्प्रतिमयमों उगसना १७८-ग्रासम्पम की उपासमा ७६-विम िश समाम १८०-सदासीनमाव १८१-प्रतिमा १८२-वतिमा १८३-श्रीकर प्रमाण १८१-क्षेत्र में बीमाति २१ १८५-योनि १८६-ज्ञानदेवा कवि १८७-नरशद की पारूप १८८-वैदिक भारपान n म] विपय पृष्ठसम्पा M " " " " M " १०१-पितुष्पिवास ११.-रश्मिविपपिणीमाना कापक्रम १२१-मात्मा प्राण-पत्र १२२-परोरामण ११३-मामेप-सौम्पप्राण १२४-स्यूलभूत १९५-पुस्पप्रमाति २६-करिएग ११७-राद् पुत्र २६८-रिममाव (२९-स्त्रीरूप रश्मिए २००-गुनिपयिणीमारना का उपक्रम २.१-पतन ममि ०.२-ममेतन सोम २०३-पशिफीसरि २०४-मैमुनीमष्टि ००५-पुरुष-पी २६-शरीररचनामेद .0-ईश शरीर ८-बोमस शरीर २.९-सौम्य एक ".-मानेपोणित विपय पूषसम्पा २११-सकोच-मक्स २१२-नि सीममाव शा का प्रवक २१५-एति-प्रेति २१-समिदामि २१५-सामिक्नी २०६-गुवयी २१७-महिपत्रणी २८-स्त्री का पुरुषत १०२ २०४-पुरुष का स्त्रीप २२०-स्त्रीकामुक पुरुप २२१-पुरुषकामुका स्त्री २२२-मासमा २२३-मकरराशिमोर मगल २२०-मकरन (काम) २२५-पुरुष की प्रजननशक्षित २२५-गुणवत २७-मीनराश मौर शुक्र २८-मममम म] २२१-रातिस्प २५०-शिम्स २३१-शि का समय १० सोम और भन्त पृष्ठ २३३-प्रीम मोर पम्त पृष्ठ २१५-प्राति का पम्प न , 1 " " " " " H " , । " [-] " " " " " " पिपय पृष्ठसंस्था विषय पृष्ठसम्पा २१५-ममिप्रधान पुरुषशरीर १०॥ २१२-पितुप्पितासत् २३६-सोमप्रधान पुरुपारमा २५०-अम वार्पोपसहार २३०-सोमप्रधान सीशरीर २५१-एक्यामरुत् २३८-मधिमधाम सी का मारमा ०५२-योनि में शुक्राति २१५-सी का सौम्प भ्रूण २५५-रेतोषा मातरिश्मा २०-पुरुष का भाग्नेप भ्रूण २५४-पायुपहिमीनारिए २४१-पुभूण-खीभण ." | २५५-प्रमोत्पविक्रम २१२-सिम देवता १०५ | २५६-मभिदेवतसस्था ०१३-अनननकर्म का प्रित्वमाव २५७-मन्त्रार्यसङ्गति का उपक्रम २२१-प्रपमाक्रमण २५-दशिनी विराट् २४१-विसीयाक्रमण २५६-पन्यापक्रम २१६-प्रमन्प्रसाति १०१ | २६०-पुण्डीर स्वयम्भू २०७-कविपुत्र का रास्याप १०७ | २६-अनेनदेनत् प्रास्तारमा २१८-मापामाग २६२-शान्तारमा " " " " मन्त्रार्थप्रकरण-समाप्त । अव्यक्तात्माधिकरण में ब्रह्म-कर्मसवन्धाधिकरण (७ पृष्ठ से १५१ पय्यन्त) कम-कम्ममपमम्पप 1-सम्मपविगदपमन्त्रारिलेस १७ -समनिमतिका उपक्रम १-पास केरा विधनिम्मण . ५---विचारमा-मन ६--विषवर्म [] पिपय पृष्ठसम्पा विपय परम्या . U १२८ १२९ " " ग २१-प्रारम्बसम्कष १.-मोमामिक्सम्बध "-सातानिकसम्बन्ध ११-विमर्चसम्बन्ध ५-वैकल्पिकसम्बन्ध २१-ऐपिकसम्बन्ध २५-मोपपादिकसम्बन्ध २५-परिणामी सम्पप 1-सानातिकसम्म २५--सायोतिक्सप्पाष १६-मौपादानिकसम्याद १०-सामिकसम्पप ४१-माक्रमिकसम्मारीसम्म्य ४२-प्रमवासमानत्व-प्रमचाविस पनामाविछपनल-अमाप परलसम्म १) " -प्रम-शुक्र-विश्व E---अमृत-मर-शुक्र-विरम -ईश के प्रतिपाय दिपप १०-अम्यातनिरूपकमात्र ११- हिसितत्वनिरूपकमान २० १२-रिक्तस्वनिरूपम प्रमाग १३ कारणतामापी ११-चप्पा मारमा १२. १५-पप्पाच प्रम १५-अरापरा पण्णी १७-पप्रम की म्पापका १८--यग्रामपरिसेस १२२ १६-प्रातपुस्पनिरूपवामित्र योपनिपत् .-अधिकरायी २१-मन्त्रों का विषयानुसार विमाग मरान १२३ २-विषारसम २१-सम्पप निसा १२६ १-दारानिक परिसर सम्पम्प ५-मम्म्म १२७ ०६-वमितिकसम्बध २०-प्राकृतिकसमाप २८-पोरसम्म १२८ " " ४५-प्रमयसम्बनक-प्रमबनिसपमत प्रभाएपपरत सम्बन्ध (२) " ४९--प्रमभटम्बावासम्पनत्व प्रमाक्सियत प्रमाण परस्पसम्बन्ध (१) " 11-प्रमवानासम्पन-मममानिसपनाक- प्रमापारपसम्पर (2) " प्रसस्पा ४६-प्रमबासमनस्व-प्रमपवितयनल प्रमायझरबसम्पन्ध (१) १२३ १७-प्रमवासम्बनतानासम्मनस्त- " " 1३१ " " " " " पिपय प्रशसस्पा ६५-"वदेनवि०" मन्त्र का भवराप १० ६६-तारमा मनुष्य ६०--पारमा मनुष्य ६- सब का तारतम्य ६६-विषयानुगतापुदि ७०-प्रयुक्त मनुष्य १६८ ७१-समान विमुदमनाप ७२ सम्बधमेदाधि ७३-निष्ट दयी -मेदवार का निराकरण -विषयमारमा ७६-मापादिफचीर ७७-प्रावाहिकमी ७८-पुरतीय ७६-पुषिमाग -पुक्कयो ८-युद्धानयोगी ८.-पपानाचमनुष्य ८३-अप-रममयी उपासना 1-पत्र माग्ममापना ८.-कुरमरकर पा ८६-मन्त्रावसाति ८७--अनिवपमीपसम्पम्प -मोतमोउमाबसम्पप " " प्रमनिवपनत्यमिहयनल प्रमा- पक्षावारपससमय (६)" ४८-सम्पम्प में संशय १६-सरूपसम्बन्प (५) ५.-पप्पासतिरबसम्म (१) "-पचमतिविपसम्बध (५) ५२-पभिमसचाक्कापकरणभाव- ५३-(१)कार्य पारण में है ५०-(२) फारस काप में। १५-- (काय-कारण भिन्न ५६-1) कारण दीपाय ५७~ (१) काय कारण से प्रमिमा फिर कारण पाप से मिल" ५८-(२) बरस में फाप पस्त ५६-अप काम में प्रतिष्ठित (१)१४ ६०-पम्म प्रम में प्रतिष्टि (२) -मन काम परस्पर मिन(१) ६२-प्रमहीम्म ६३-प्रय कम से मिल, किरण पम्म प्रा से ममिम (1) ६.-मन में कम्म मास सा(६) " " " " " " " [6] पिषय पृष्ठसम्पा विषय पृष्ठसंख्या " " " A " " २१-प्रारम्पसम्बन्ध १२८ -मौमातिसम्भव १२९ -सातानिकसम्मष १२-मसम्बन्ध १५-कल्पिकसम्बन्ध ११-ऐपिकासमन्ध २५-मोपपादिषसमन्म ३५-परिणामी सम्बन्ध १७-सानातिकसम्म ५ १८-सायोतिषसाबाप २६-भोपादामिकसम्म १०-साकामिकसम्पम्प ४१-मात्रमिकसमारीसम्बाघ २-प्रमपारम्बाप-प्रमाविस पमावानिएफ्नल-प्रममा परत्वसम्पप १) १५-अमबसपार-प्रमानिसपना प्रमाणपक्षात सम्बन्ध (२) १-श्रमवासम्बनापहम्पनाम ' -प्रम-गुफ-विरम -अमृव-प्रम-गुक-विश्व - के प्रतिपाप नपप १-सम्पनिरूपकमात्र ११-विकृतितत्वनिरूपकमन्त्र १२० ११-कारिकतत्वनिरूपकम प्रमाग १३-कारणाचतुपयी ११-पतुष्पात भारम्प १५--पप्पाव १६-अक्षरा प्रयत्री १७--यप्रणाम कीम्पापका 14---गायत्रामपरिशेस १२२ बालपुस्पनिरूपणस्मिन गोपनिपत् ००-अभिकरणामी २१-मत्रों का वियानुसार विभाग १२३ ०२-पपपरिसर १३-सम्बन्ध विनासा 2-दानिक पक्षका समय रेखमम्दम्प १२७ ६-समितिकसम्बर २०--प्रातकसमाप २५-पानिसम्पप १२८ " " 1 " प्रमाशिपाय प्रमाण 11 " 7 -प्रमथनासम्बन-प्रमचारिसपमक प्रमापारलसम्पन्ध (0) " " " " " पिय प्रपसम्पा पिपय पूण्सम्या ४५-प्रमपासमनाय-प्रमाविसपनाक ६५.-"वदेमतिः मन्त्र का भपयप १० ममवापभरावसम्बन्ध (५) ११ -स्तारमा मनुप्प १४-प्रमवासम्बनतामासम्बनत -महम्म्म मनुष्य प्रमाविकपणत्वाविश्वपमा प्रमाण ६--सबका तारतम्य पक्चरवारपारतसमप ()" विषयानुगतायुद्धि c~-सम्मम्प में संशप ७२-भात मनुप्य -सरपसापप (1) ७१-सपखानविमढम्नुप ५०-एप्पासहतिवसम्बध (१) ७२०-समयमैद -~-मनामविपतिवसम्मम (५) " ७३-मिठायी ५२-पमित्रसधाकायकारसमार- -~मेदवाद का निराकरण ५२-(१) कार्य कारण में है ७५--विषयमारमा ५-(0) कारण काप मेरे ७६---मायादिपनीर ५५---(पाप-बारस मिल हैं ७७-प्रावाहिकमी ५९-९)वरण दीपाय ७८-पुरजीत ५७-आप कार से भमिन ७६-पुषिमाग किन्नु कारमार्य से मि" ८०-गुरुयोग्य ५९~(६) कारस में काए पाप 5.युधानपोणे ५६-बम काम में प्रतिषित । (१)मातमनुप्प ६.--पम्म अन में प्रतिष्टि (२) SA-ममयी उपासना ~म पर्म परसर भिन्न है।) ८-साय माग्ममापना १२-अप ही कम्म (५) 51-कुमार पर ६१-यम से फिस, किम्नु ६-मवासात १४२ पम्म रस से पमिम (1) मनिपनीयसम्माप ६-मन में काम मास पा(६) " पर मोदमोवम्पक्सम्पन्न 11 " " . " " .

[] " " " विषय पृष्ठसम्पा पिय प्रसंस्था ८६-तरासरीमाक्सम्व १०६-मन्यापोपसहार २०-भाषारापमापसम्बम्प १.७-७ मन्योकम १-मेदसमान्य ११ | १०८-सर्वत्रसारममावना २२-ममेदसम्मान १०२-मोरगतिसामुद्धि २५–मेदामेदसम्म 1.-मोहम्सकोक २४-मन्त्रार्पोपसंहार ११५ | १११-योकनिवरपुपाप २५-मामास में कर्मका समन्वय ११२-मौतमायकीतपासमा २६-स्पूनस्पतिरपाय "३-"विमानवा" सम्दयस्प ७- मनापोपकम १.१-सामाम्पमन -मम्बका भधगप ५-सरियकराम 1-प्रापक-परागमन १६-कसौ पदातिना से 1..-युष्मदरमत्प्रत्यपगेचरविषय ११७-"इदमिस्पमेर" विपपी १.-उपवासन 01-म्योति-भारण ११२-भेदमुनिका मास्यन्तिक निराकरण । १.२-निदाखविमान ११७ १२०-प्रातिमासिकौत १०५-विजुगुप्सा १२१-पापारिकोट १.-गोप १२२-पारमार्पिकौत १०५-मानपदमाप्ति १२३-मन्त्रार्पोपसहार सम्बन्याधिकारसमाप्त इति-पम्पहारमापिकर समाप्तम " " १८ " [] प्रय प्राकृतात्माधिकरणे- २-महदात्माधिकरणम् (१५१ पृष्ठ से २५१ पृष्ठ पर्यम्स ) विषय पृष्ठसम्पा " " " " " " पृष्ठसम्पा विपय १---मातरूपनिदर्शन १५४/ २१-मेद और प्रयापति २---प्रयवरागायत्री २२-प्रमा और प्रजापति ३-झपनापति के पाठ मापन २३-सवेद मौर रखोक -पत्वारिंशतकापरमाविराट १५० २४-वेद और सवेद -सबलायरा निराद् २५-विसकम्मा -मनाभूप पद १५१ | २६-विश्कर्मा भामममित्र -प्रजापति के तीन भवयव २७-कामप्रपा २८-दरापूर्णमासविधान ---मन्त्र कर मनपर्ष २६-प्रतिपत्-मनुचर -मन्त्रार्थ भीर प्रामीमम्याख्याता १६० ३०-मधुराडि ११-प्रकरणसंगत मात्राप ३१--म्पापक पूर्सिम्प १२-गुकराद प्रयोग १२-माकस्पान १६२ | १३-~-मिगुणमूर्ति महान् १४--माष्यामिमत शुक्रगद ३४-~-प्राणम्पी अदिति १५-सापणामिमत गुफरादाप ११-पुण्पारकास १६--गुरु की २७स्पार्मों में म्याप्ति १६४ २६-६ रब १७--कम्-पौर एकः ३७-परोपमासस्य १८-सम्प्रदापबाद से हानि ३०-परम-मप्पम-मबमधाम १२-ठपादामकारणा १६६१रमात्मा, पद, पुनपद २०-सष्टि का मापार ४०-पानापस्पसस्पा १०- १६८ १६९ " " " , १७१, " बिपप पृष्ठसम्पा विषय पृष्ठसम्पा 7 " १.२ | ६५-समाति १७३ ६६-माप की पाति ६७-पातरिना सुति ६०--मातरिश्वा पाति १७१ | ६९-से पर्यगात् " -मुतिसमनप १२-परमप्रमापति ३-प्रतिमाप्रमापति ww-माम्मणीवाक् १५--जगव पिवरी ०६--समप्रमादसम्बरम ४४--समुरापेसम्बन्ध १८--भरपबसम्मम्म ४५--श्रीपुरुषसम्म ५.-माविस्फोटन " " ७.-पण्याय सम्बन्ध " " ७. पम्पाय की भानिकता ७२-सहतसाहित्य पर कहा १७५/०३-शस्त्रों की नियतायता ७-एकदेश की समानता ७५-गुक-बीयत का पार्यक्य ७६-रका मानिकरताप ७७-यका १-समयसम्बन्ध " , " ७८-पराक्रम का " " १७६ " ८०- २२-उदरभुझिसम्बन्ध ५२-भग्नि-अम्नि र सम्व घ १५-पानी पानी का सम्बन्ध १५-भग्निगामी का समय १६-परिकारसम्बन्ध १७-निरषासम्म 1:- फोटकसम्बन ५-सरित रसम्प ६ -रपि-प्राणसम्बन्ध -परोधप्रियदेव ६२-परकी पाप्ति ६३-यापकम ५१--रेत की प्याति ७१-मय नवीय ८१-मिय ८२-प-मबरपरा ८५-देवमाग " " १८० " " " ८?--सामाग ०५-देवीसम्पत् ८६-मारीसम्पत् ८७-प्रमचयनित ८८-कभष " दा []' पिपप पृष्ठसम्मा पिपय पृष्ठसंन्या १८१ १८१ १८५ १-रेत का भप पीप्परता ११-उपादानाद्रम्पल १२--माग्नेपरेत-गुफ १३-सौम्यरेत-रेत २१-पनरेत १५-तरतरेत २६-भिवप्राण . . " १७-भ्रूण n " " २८७ २८-प्रजननकर्मके भरोधक दोष २९–विपदोपनियतकमारकर्म १००-सारदेत १.१-प्रचरितरेत १.२-शुक् मोर गुफ 77 ११३-भीमावस्यापम शुक्र ११४-निरोपपरिहार ११५-सम कुछ नही है १६-सप कुछ एसी में है १९७-भमाप का विकास १२वसायत्प ११९-कर्माचल १२०-मायामेवा वरन्विते १२१-गुकातिन १२२-'तत्'-विहान १२३-कर्म में प्राचि १२४-परास्मिका भविषा १२५-मातरास्मिका लिया १२६-प्रस्मिनपन सम्बन्ध १२७-पिथदुर्ग १२८-दुर्ग की इट १२९-मालवी ईश्वर १३०-शिपिविर प्रगपति "-तीन म्पोतिए १३२-चिस्याम १२३-पितेमिपपास ३१-धीरपिति १३५-देवविति १६-मूतरिति " १०१ १०४-मचाशुक्र F २८८ १८४ 4 11 १०६-एक-रेत के पतिकास १०७-मामपोनि १०८-प्रतियोनि १०५-मितियोनि ११०-सम् १११-सृपिम्प २१२-सारिपीट מת " प्रपसम्पा विषय पृष्ठसंपण १८० १३७-मोविण म्पोत 1-मात्मा-शरीर १ ५१-१-मासमा १९२--प्रममात्रा १९५-सप्सदरायशि -सामी ६५-बाय-कारण-भारम्भ १६५-निवृत विराद् " १४०-देकम्पम १४१-भूवमाम १२२-पम-पुर ११५-मारनपरिह १११-कुट M , , " . " १६८-त्रिकरपद १६२-त्रिकापुन पद १७०-नाकर प्रयापति १७-यूनविरादप्रयापति " M " " १९७-राशि १४८-मरणप-माम का रास्कर्ष २१५-भारमा 12-सम्बत ११-मापास्पिकसम (प्राम) १५२-माभिदेविकसप (पुर) १४-काय निकाय १५१-निकामद १५५-पचासकरवार १६-मामहपषिमामक भाषण ५-दन्पिर्क ११-पिपा-मा-कर्म १७४-नास्पाताहन १७१-काम-कर्म-एक ७६-माषनामासमासस्कार २0७माधिकारिकतार १.१-पागातमीप ०१-मनमकम्म १८०-ममिक्रमकम " h " " " " " १२-पुस्पापकम्म , - १५.- भूतमात्रा अपात्तिकमीष [प] प्रससस्या २०० २०१ " " २०२ २०३ " विपप पृष्ठसंख्या पिपय १८-नियतकामगस्पिकमीप १२६ । २०२-मापोमप महान् १९६-नित्यजीव २१०-मादाम १८७-सामयिकभीम २१॥-पञ्चपतिव १८-भारमामिमानीदेवता २१२-अमृतविमाग १८९-प्रकृतिका बोम २०३-मत्पविमाग १६०-प्रयतार की भावश्यकता २१४-पहुभकमचरम् १२१-अनासक्तमोईसर १२७ २१५-प्रजापतिः १९२-विकलावा २१६-पास १९३-अविधामयाक्र २१७-काम-कर्म-शुभ १४-काममामोंकासमुद्र २१८-एफ की चतुका म्याप्ति १९५-प्राजापत्यवाण २१९ विमाक २६-सत्पथानमनन्तमम २२०-पहमसामष्टि १९७-ममम्तमदेपर २२१ एफ का दारोतरमाब १९८-वर्षमा भवस्म २२२-पदमप स्वपम्म् (१) १९५-पादयस्थाम और उधमार २२३-मापोमय परमेष्ठी (२) २००-विरयोपक्रमस्पन २२९-अमृताग्निमपस्म्प (1) ००१-निरमोपसारस्पान २२५-माग्निमप सूप (1) २.२-सोप का उदप २२६-चापोमप पन्द्रमा (५) २०३-योगमापा २२७-मपी पृपिषी (६) २०४-शुक्र की सामान्य म्याप्ति २२८-मन्त्रापापक्रम २०५म की गुरुप २०० २२१-कापस २०६-सपा का रेतस्म २३०-प्रणव २०७-महान् की माण ०११-स्नायुत २८८-स्चयगत २१२-मगुबाब २० " - प रि से सार " २०५ २०६ " " विषय पूछसंस्था विषय पृष्ठसंस्था २१२-पाप्मनियत 1 . " २४-मस्तापिरत्व " २२-प्रपापभिनव २५१-की -१०-मनीपी २११-परिम् २४२सयम्म् २१३-कविका माकम्प २४०-पपापनिम्मण २४.-मिगुणमीमांसा २४६-पगुणकम्हान् २१७-महिमपमहान् २४८- मन्त्रापरहार इति प्राकृतात्मधिकरणे महदात्माधिकरणाम् २६ M २११ ३ पाक्तात्माधिकरणे विज्ञानात्माधिकरणम् (२१५-३०१ पपन्त) प्रासंध्या qिue प्रसंप्या पिपप १- विमानरमासरूपनिदशन २१५२१३३--सरसरसम्म २--- पदमाताररथ -मपरी " [प] विपप पृष्ठसध्या विषय पृष्ठसंस्था २२२ " ग " २२३ " " " 7 महासुपस E---सयम्मुमसामणि -सूर्यम्सासृष्टि -पृपीवीम्सासरि -अपमासहि २.-दितीयासधि १-पतीपासृधि १२-मोहारमिपा ५-उद्गोपविया ११-प्रणवविधा १५ बामनिय १६-पावतिय १७-माहेबरविम १८-पुरायसम्म १९-त्राममप्रिया -किपामर्सिविष्णु २.-भषमूर्षिशिष २२-त्रिमर्पिविण्द् २३-प्रायास्तकर २.-मस्पिति कुमारशियमरममत २६-काशमन वाहीकमत २७-मप्रकाप्यमत २५-मदनकमत ०१७ २९-परिशमत २१८३.देहमनकमत ११--करपपमत ३५--पन्नतरिमत २३-चकरमत रापमहपिमत २२० २५-भारयिमत २६-वामप्रधानसटिकम ३७ कियाप्रपानस्पितिक्रम २८--अप्राष्टिकम "|-शिरोमूलासृषि ४. दफ्मसासधि ४५-पादपूसासष्टि ४२-हिरपपगर्मविपा ४५-मुत्पा-पिण्या ११--पारको प पहा ११-अग्निपिति १६-पायुरिति ४७--मादित्पपिति ४८--साप्पपिति 12-पिणास्पिति ५०-सपमातम्यापिति ५१-विधम्यातिमिति ५२---साप्पदेवा " " " " " 7 ८ २६९ " " २२६ २२७ विपप प्रासंध्या पसम्पा २२७ २१५ 7 २३-पोहशीन ११-प्रमापतिपुत्र -मात्मण्योतिप्रसार ५६-मेष्ठ प्रयाग ५७-पदपेन्द्र १५-सोहरामिय ५९नाममहिमा २३५ २३५ २२८ " " " " " -ऋसहिता ७१-महामारत में पुमके c.- अमिपुत्र -भिभासमाना ८१-मणिगोत्र ८५-सूर्य के उरमर ८४-उपप्रमोकी स्पिति ८५-चायवाहिक सरिकम ५६-गोमेवनिधार ५७-कन्ट एवं मासके पिचार -पूर्व-पश्चिमविधान को क्षमा कर-सत्प काममवार १ -पा गम्भमसीद 1 ६०-परमधाम ६१-मबमबाम २१६ " Cc- 7 ५२-विमनस्प ६२-अमरानिमपसूप्य ११--याशिमयसूर्ण ५५- अशलिमयसूर्ण १६---प्रमापनिका पुत्पाद ५७.-समिभाव -सर्वसपछि ६५--सरित्नरा " . " " " -स्पिर ०२. सदोबस ३-सोमामि २२-अर्पण २३२ | १५-देवानां मिर्च पास २४-समयर शम्द काम १५-सरकी पेक्षा २६-पि परिग्रमण २७-कारप्रकसम्सर २-मनुप्रम ममुमारकमान २९-मन-नामम्पोन १..-प्रप्यामसापा , " " -हिरण्मय भएर पिपप पृष्ठसस्या २४३ . " " " " " १०१-मापिदैविकसत्मा १०५-अष्टौ पुदयः १.1-धम्मरक्षण १०१-हामपण १०५-नैराग्यक्षदर २०३-ऐपचपण १००-अधर्मक्षय .5-महानतपण १०१-भासक्तिवाद १.0-नरर्पसक्षम १२१-पारपास ११२-दमीसम्पत ११३-अपमास १५-भाषरीसम्पर ११२-इन्द्रसम्तान १६-महोणे २१७-सम्पपरिसेस २१८-विपामुख्य १९९-पषिपागुरुप १२०-ममिनिवेराहपस १२१-अर्दवानमनितमोर १.२-परापरली १२१-अपरापर पिर १०१-माप्त देवसाय प्रसस्पा विषय ०१८ | १२९-उत्तमम्पोति १२६-लिस्पस्वर्ग १२७-अमविश्प १२९-विष्णुपिरप १२९-इन्द्र विष्टप १५०-त्रिविष्टपर्प १३१-बाहया १३२-माहाण १५५-पदविंयवर्ग १३१-समासरप्रतिमा १२१-प्रतिष्टास्तोम १२६-परमस्सोम १३७-सप्तदरातोम १३८-सप्तदरामगापति १३२-यात्मक विष्ण ११०-विष्णु के तीन विक्रम १४१-प्रणस्यविएप २. १४२-साराम्प या १११-माकप्तम १४१-सौम्पपिपुर ११५-प्रमानपपुरुष १९६-सामि १४७-सरसाम २०३ १५८-सूप्ममरण " ०४१ M " " ०१२ 1 २१५ [म] पिग्य धमक्या विषय पृधर्मश 14-गागोमाग " - " 1Y -UiT etic 11 '५५-गुमान . २१५] १७३नमिष्टायम १७२-प्परम १७५-शनमान १०६-गोगरण १७७ साहरिया २१६] 1.0-4मरातो १७६-शामिनिन्द्र १८.-गया ११-मेगानामा परी १८२-मेमाप मामा पीपी 1-1-बिपि 1-गारमा -११ " 11-राम 110-पाग Re-im 11- . " ܐܒܘܢܫܫܛܬ . १९२-rrrrr १५-मार (2) १८-गमा .Co-ordinare Ir.crtmme " n " " " पिपय प्रशसख्या विषय पृष्ठसंम्पा १६७-चतुर्मदण्डस २५० २२०-सूर्यकेन १६८-मौतिकधरुण १२.-महापष १९९-वान प्रधान समगुण २५१ ०१२-निमेपगति २००-गाप्रधान रमोगुण २२३-प्रसु पन्या २०१-पर्पप्रपाम तमोगुण २२१-प्रशान-धिाम २०२-अशाप्रकृति २५-मास निधन २०३-सस्थादपि महानात्मा २२६-पूर्णिमा-अमावास्या २०४-सामानन्दपिकास २२७-पाधिदैविक पगत् *०५-मिगुणमय २५० | २२८-“बाय धरातल २५८ २०६-सोकरण सूप्प २२९-वन इवाससमे २०७-भारमण विधानारमा २१०-इन्द्रपोनि २०८-पानुप पुरुप २११-माप्यात्मिकी पूर्विम्म ०१-भारमतिपणे के प्रभव, प्रतिष्ठा २३२-बामदयस्पा (पूर्णिम्म) पोनि, भाण्र्यों का निदराम २५५ २५१ २३२-मामत प्राणाग्नि ९१०-प्रारमप्रमपदि परितेस म. , २३१-प्यास्मिकी भरमी ०११-इन्द्रियप्रमवादि परिलेस म.. २३५-मवस्पात्रपी परिलेस ०१२-कर्मरमप्रभवादि परिसेस न० ३ २३६-बागरमी ११३-शरीरप्रमादि परिसेस न . ०१७-स्वप्नावस्था (मरमी) २५२ २११-शिवाधारस रहस्य २५५ / २१०-मापारिमकी अमावस्या ५१५-विज्ञानशिप २५६-सुपुफिकास (अमावास्या) ०१६-प्रसपुरुष २१.-सस्पषित २१७-सात्विक एव पभुध २११-उत्पपिवान ९१८-केन्द्र ९५६ ०१२-दक्षिणप .१६-मपानप्रास २४१-मना-प्रतीय 1 " " " 1 " २६० " [प] पृष्ठसम्पा " " " २५८ विपप २४१-विममोपासना २४५-पचपानी २४६-विधानमन 3-सेमोनादी २४०-माह-महम् २१२-माणसिक्रपुरुष २१०-दीपसिंध २११-प्रसग ससगमाव २५२-पिदामाद २५-अनाया (मुभुषा) २५१-त्रियादि २५-राचि सानि २१५-नगमतीतमारमा २५-बियपानन्द २२८-मामम्दोरमदान गर-पानका कमात्र २९०-भारमानन्दाप्रति २५१-विमानेन परिपरपति २५१-मुणदुरितक २५३-मनको विपति २६०-मारवमन २६५ ममिवामस्तान २५६-सावरगमन २६७-मोदनियम पृष्ठसम्पा विषय २६५-मोहकसिमाबुनि २६२-पस्नासत्कार २५०-पाविप २६१ | २७१-मनोनित २०२-प्रसमार्मिषन २०३-भासत्तिनियम २७१-कारों की रस्ता २६१ २०४-पिरकाशिकाम में मूस २७६-उमयात्मनः २७७-मोक सारी २००-संकापतिपक्ष्यारमझमान २०९-स्पिरसपणाप २८०-विपिप्प ०६३ | २०१-सरकारफिश्प २०२-अनुप्मानरुपण २०३-कामतवण २५.२८-गहरा २-५-पचपण २५५ | २०५-चोपराक्षस २०७-सम्मान २८८-स्मृतिविमम २८२-पुदिनार २१.-सानाश -भाना सरकार " " २५६ " " " , " " २०१ " " " " - [२] पिपय पृष्ठसम्पा पिपय पृष्ठसम्पा ૨૭૨ २९२-विचा-प्रवियोपश्म २१३ मप्रार्थोपक्रम २२१-मन्त्रप्रफरणसम्मति २७२ | २९१-विषयसगतिप्रकरणसमाप्त मन्त्रार्थप्रकरण प्रथममन्त्रार्थप्रकरण (२७३ पष्ठ से २७८ पृष्ठ पपरत ) विषय प्रसस्या विषय प्रससण्या " २ ---प्रपममन्त्र (१० मन्त्र) मलाप -विपा-मषिधादर्शन -पाप्ते-फियते -सरपोति-परम्पोति " . ४. २७७ " . " " १५-नेति नेवि सम्पय १५-मस्तीस्पेर .६-प्रपमार्पोपसंहार १७-शिवीयार्पोपप्रम २७४ १८-पिपा चलिपासे मिम -पीरा। २.-दितीपापोपसहार २१-सहिता का मन्य २२-तृतीपापोपप्रम २१-भारतमातनिराकारक २१-विपागर्भितार्म २५-दामामिपरिपा २६-प्रतीपापसार प्रथममन्त्रार्थसमाप्त " " २७ -कारपितापग्रह -कर्ममपविज्ञान ---मान्य माननि १.-सम्पर-रिपा ११-मापद-मपिपणा १२- गणतीतमामा १५-शि-नेति pus " [.] द्वितीयमन्त्रार्थप्रकरणा ( ५०० पृष्टसे २८८ पृष्ठ पफ्त) विषय प्रपसम्पा विषय ठसम्ण २८९ " २८५ " -दितीयमत्र (१ मत्र) २७८ २१-सिरिससाइन बान) २--कमप्रपा २७६ | २२-मिशिटी वाइन (कर्म) --वामम्सककम २८ २३--रातपषश्रुति -विहानमूसकाग्म २९--मित्र और वरुण --मनामम्बककर्म २५--अमिगता प्रमाण ६--योगससिद २६-कण पत्रिय -पोपनुपापी कर्मठ २७-यमापन ८--साख्यानुयायी शानी २८- -पत्रिपाम्पामण -विविवा निष्ट्य २८१ २२-ब्रामणस्पचत्रिय १ -फर्मठों की रंण १०--मनोवस ११-यऽरिपामुपासवे २१-प्राण्वस १२-1.ममाग का दम्म २८२ १२-मोराग्रह १३-मिप्पाचार १५-प्रमा १८-उभयत पतन १५-राविमिमी १५-मनमर्ग का मूपोऽसमारस्य बाग्स १६-महान वस्प शरणम् १६-विविध -मान्य परिवामिमानिन --पायोनिद्रप्स १० पर्मण २८-नाम-पापिय-परप १९-बस (मन) पर-पम्पपस्थासूत्र २.-पत्रबस (मम्म) १.-पासपपुरोपा २८९ " " " " . " २८७ ८१ । " विपय पृष्ठमख्या पिपय पृष्ठसन्या २८७ १८७ " " ११--झाय-यहास १२-सनातनी-मापसमामी १३-विदमासी-राष्ट्रवादी १४-दोनों की भान्ति १५-देश की दुदण ५-य उ पिपायो रवा द्वितीयमन्त्रार्थसमास " २८८ 1 तृतीयमन्त्रार्थप्रकरण (२८८ पृष्टसे १०१ पृष्ठ पम्पम्त ) वि पृष्ठसंम्या पिपप पृष्ठसख्या " " 1-प्रतिसिस २११ १५-मनाससकम्मयोगाम म. ६-कम्मारामघष्ट्पस मै.६ २१२ -जीवनयात्रानिहक्रम न०७ १८-पापमयापकम्म २२३ १२-माहविषया -मधिदक्त-पप्पारम-अधिन -मम्नी सोमाविपक्ष २६ २२ –सोमताय की पति २३-प्राणा -मापोपड़ " १--मृतीयमन्त्र (I" मन्त्र) २८ २--पाननिष्ठा कर्मनिष्टा -मुनियोगनिष्ठा --कुरु फम्य स्त ६---ममिगरता भीरप्पा र ७--पच मजुन ८-भजन की प्रान्ति --भाति निराकरण १०-सामयागसपणसपास ११-मेगापर म.१ २२. १२-पासीप्यम्प म.. ११-मारिणगारापर नं. ३ " " " ११- " " २१-पत्र २६-भमादप " [] विषय पृष्ठसंख्या दिपप पृएसम्पा २२० " " " २२१ " " २७-समया २११ -शरीरत्रया -मिरपा १८-स्तस्य मयपना २९--मनुगमप्रति १६पहिवा सयोग 10--प्रगामाप ५०-उगिहरे सर्वम् --पन यनयनन्न ५१-पति-समागस्पिति ३२-पासे प्रमोपति १०-पारर्म की प्रबनता १-प्रनाशनबन ५~ -पासपण ३१-पानुपर्यमृष्टि १६५४-फम्पपपेगापिकधारस्ते ३५-पागदनियंपन ५५-पसाण कीपकता २६-पूजा १६-तापी-फले मे २७-संगमम ५७-रामपि म पिप्पते xu---मान सगोऽसिकम्पाय २९-भूनसमाधी दामा १६--मुरिपोग पर भाग १.ज्सक संगमनपा ६.-मापसम्प्रधान ११-भरमसमभी पूगाया 1-सिमरिया 1"-ऐगण (भाइसिम्प) ६२-उत्पाप्पाकाश १३-७ru, भूत २१७८५-पिाश ४१-यारिन तापामा -नायकम १५-मागपत ६--समारप युरियोग ६५-प्रारोTAR तृतीयमन्चार्यसमाम " h " " " नि पाहतात्माधिकरण विज्ञानात्माधिकग्गाम् माम ३ [प] प्रप प्राकृतात्माधिकरणे प्रज्ञानात्माधिकरणम् (१०८ पृष्ठसे २१६ पृष्ठपन्त) " " " " " विषय पूछसम्मा विपय पृष्ठसंस्था भानामतरुपनिदर्शन २०५३०६ 10--गायत्र पुरुष का रितीपपर्व २११ -विषयोपक्रम २०७।१०-" पतीपपर्ष -अधिकरण सगति पर्पपर्व -बुष्टिक्रमामुसार सस्पादिमाग २०- पथमपर्व ३१२ ५ अम्पारमानुसार समाविमाप पष्टपथ -पितरमाप २२-- सप्तमपर्ण -पिततिधि माम -पोपिदग्नि २०-गफमपुरुषपरित २५--सम्मूनि-विनाणमा क्रमा १०-पपति २९-गतित्रपी ११---अमावास्या नाम २७-कानपिण १०-~-माप्मान प्रस्म २८-हिरण्यगर्म मना १३--गायत्रो पुष्प २९बाप्पाप पामी १४-श्वर - जीर १५--गयाराम --अभिप्राण से पदोपति १६-गपत्रपाषा प्रपमर्य १२-झापापुराण ८-- " n " " [स] विषप पुण्सम्या विषय पृष्ठसंस्था ९२२ २२६ , " " . १९---पुण्यसाति ३१--सोमो रामा २५-भीमामा २६-धनगर 10-भत्रिपुत्र पन्द्रमा ५८-महामारत १२-महाभारतसंगति अक्सहिता 1-सति विनायोपक्रम १२-विभाग तिरोभाव १२-उदय-स्व १४-समरिसम्बन्ध " ३२० १५५७-मुबाधिष्ठाता चम्ममा १८-मग प्रकृति २१६-सरिसाधि ६०-पुरुषाम्नि ६१-परमाम्नि ६२-मुतो माति ५३-परिदकामय चन्द्रमा १८ ६४-पुरुष-प्रकृति ६५-स-स २६.-भग्नि-सोम ३२. १७-ममममम् ६८-सममभावः ६६-अभुति १.-प्रस्पदणी ११-पुष्पीनरमपम्म ७२-पसविता ७३-मन्त्री " 1-सचारस " " ३१७ ६-मय पटोऽस्ति १७-सचा का मनुष्य २८-सच्च का ग्रा ५२- सण की पुष्ठि -मय की उत्पति ११--विमति सम्मान १२- समिपेकीमावे ५३-सम्--मूति ५.--उदपावरपा ५५---उद-भक्न ५८-पिनास्पा १२ " , -प्रद्यमामा ७५-मादिनिक बना ७६-पायरिमक पत्रमा ७-विष मौर जगत् ७८-सफ्ती मन्दसी-प्रेयसी -बम स्नेहन c.-ए-परिधि " [] विपय पृष्ठसंम्प पिपय शासख्या ३२८ २०६ ९१-उप-प्रक ८०-सकोच-विकास ८३-अङ्गियी ८४-मगुरुपी ८५-राविषसोम F६-पावपवया ८७--पचामिनिषा --शिरतमो रस: कर-सवस्मातिमान २०-फरयपप्रमापति -दक्षप्रजापति १०४-समूतभारमा १०५-मात्मादि १.६-प्रेतारमा १०७-प्रभुमुसपितर १०८-पिणदानसचणबार १०१-प्रदासूम १९०-रेत १११-दिम्पनिरसरस ११२-मईमाव की म्याप्ति " २११ " " " " " " २२६ " M २५-दएकी १० कन्याएं -दावापणिए १५-नियतसम्प १६-मोसम ऋतु २७-मारोहावरोहफम २८-प्ररिपबम्धन हर-ग्राम्पनिमोक १००-कौपीतकिधुति १.१-विपदमपन्द्रमा १.२-शिवस्व १.१-पर-प्रतिमेपर १११-पिवर ११५-अममयमन ११६-प्रतिपाठक ११७-पुम सम्भूति ११८-पान्द्रनारी ११९-सौरपास्थिति १२०-बैगुण्पमाव १२१-मात्राविमाप ३३८ । १२-पिदरा-सोमाश 01-महापेवा-धीः २१. १२१-पिग्मम १२५-खोबसीयसमन १२६-सनियमन . " " " २१२ [] विषय पृष्ठसंख्या विपप सम्बा २१२ १२७-मनिन्द्रियमन ..-प्रधनमन १२५-निक्सविषय १०-मति ऐसेय प्रयगति-समाप्त पर्सा दिपप हमस्या १ -तीयमार्य- -२०७---३ -प्रपम्मा--१९३--३१४ -दितीपात्रा--३५-~३१६ २ मारुतात्माधिकरणे प्रज्ञानात्माधिकरगा समाप्त भप प्रास्तास्माधिकरगे प्रागारमाधिकरणाम् पुण्यापा १२ पगत्या पिप 1--STR-11-11-जनमा -- --मन.स 1-मापा गुनगरप ७--अमाप गप --मुरारी विषय पपसख्या " " ३५६ " " पासस्या पिपम ३५१५-मदितिगम से देवोत्पति ३१-पागयोपनिपत २५--प्रतिष्ठाबादेवता २६-खोमतिमाग ३७-देवविमाग ३०-सर्वमूतान्तरामा १९-ममृत-प्रम देव-मत ४०-शुद्धिसंस्कार ११-स्मातसंस्कार १२-श्रीतसरकार " " " " " " र-महेमर १०-मपत्य १९-सहसवाया १२-मूहमाग १२-मप्यमाग मन्तमाग १५-~मोला १६-गणद १७-सापीमपण १८--मोक्तासपर्ण १५-उपेपर 00---महेपर २१-परमेश्वर २१-पोग्पम्तरगमन ५--ममम्मामामा २१-प्रमि सपा देवताः २१-मरत-पस्पु २६--विस्पानि २७--रिवनिपयामि २८-पी ०१-परिमापूपिणी ३०-कपणानुन ११-पुष्करपस २१-रेरमातामरित " १५-सपुक्त् सखा १८-बरजगत् परिलेम ३.८ १५-चीवमगत्परिसेस ३५६ २५० १६-एप समतान्तरास्मा ७६० -मोकारमनिरी १८-सस्मधर्म १९-प्रकरणसंगति २६१-२६१ ५.-रिएमपपाय २९४-३६ १-पूपमेकर्षे -मसत्प्राण १३-अपि ५-सर्पिप्राए २५५९-प्राणपिमृती १६-पागेगापित २६७ " " ३०- " " विषय प्रमसम्या विषय प्रसस्पा १७-एकर्षिप्राण १८-पूपा ७१-उपास्प-उपासक ७२-दायामपीपमा ७.-त्रिविषयीन १६८ २७२ " ७४-प्राय-म्पन-प्रपान " ३७४ " ७८- ६०-मदन्तका ६१-रेवतीप्पा ६.-पपिपीपप्प ६३-सूर्पापा ६.वायुपूषा ६५-एकविप्रासाम्प ६६-यमाबापस्य ६७-सूप्पामापत्प ६०-पूपन् २-परानो पा ००--म्पियम्मरूप " ७१-मनिर ७७-मनिस --गानाम्मुक्तिः ७६-पायुरनिसमएवम् ८०-भूप्तचिति ८१-प्राणपिति ८२-देवनिति ८२-मन्त्रापोपसंहार " 1 " प्रारुतात्माधिकरणे प्राणात्माधिकरण समाप्तम् ५ [क प्रम] भय प्राकृतात्माधिकरणे शरीरात्माधिकरणम् ६ ( ३७६ पृष्ठसे ३-६ पृष्ठपर्यन्त) पृष्ठसस्या २०१ ---८० मार " विषय पृष्ठसम्पा विषय -शरीरामस्वरूपनिदर्शन ३७६-३७८ । दप २--मस्मान्त शरीर २७६ १. नामि पाचेदवेदीत २०० "ममपि १२--सप्तवितस्तिकाय -पुरुप परिमाण १३--माधिमौतिक पुरुप ६--प्रादेशमित प्राण 11-~मस्मान्तविर मारघ्र ३६. १५--का-मत १६--प्रकरणोपसघर इति प्राकन त्माधिकरणे शरीरात्माधिकरणं समागम् ६ २८२ २३ ७- प्रय माकतात्माधिकरणे उभयो सत्यात्मनोरग्निना-ऐकात्म्यम् (१८१ पृष्ठ से १८६ पृष्ठ पफन) पिपय प्रष्टसम्या पिपय जीप-बमसत्प २८१ ---जी देवसस्प -पर-नमसस्य १- -ईयर-देवसाप पूटसम्पा . २८५ " [व प्रम] पिपय पृष्ठसक्ष्या पिपप पूरसंम्बा ५---सत्यप्रविष्ट २८५ - वाप्तवेदा २८५ २८६ ६-पुम " १.-मममेद ११-युमाभिष्याता मनि १२-प्रकरणोपमधर अयोन्यप वाजसनेयोपनिषत्-विज्ञानभाष्य सम्पूर्णम् -- उपनिपत निष्कर्ष (१८७ पृष्ठ से १९२ पृष्ठ पर्यन) एसच्या पृष्ठसंख्या - ७- विषप १--भोगासप्तमन -विचकी महिपरता ३-महाराज पपाति १---६माशाक्य ५-प्रथम भादेश विषय ६- -रिवीप मादेश -सूतीय भादेश -चतुर्प मादेश र---पशम धादेश १.-पाठ माग E८ २८ ओं शान्तिः शान्ति ॥ शान्ति ।

प्रकृतिवमय
मयाध्यक्षण प्राति सूयते सचराचरम्"
प्राकृतात्माधिकरण
२
-
प्राण-माप-वाक्
-अम-अनादमयः मारुतात्मा विश्वात्मा
१-१-१-अनेकदा मनसो गयीय
५-२-२-तदेमति तन्नति
प्रम्पकात्यापिकरण
-यस्तु स्वाणि भूतानि
७-४-१-यस्मिन् स्वाणि भूतानि
८-५ -१–स पर्याप्नुभमकायम्
मालास्माधिकरण
1-६-१-मध तम प्रविशन्ति
१ -७-२-पत्यदेवादुपिया
निशानात्माधिकरण
११-८-३-विा चाविषो प
१२-१-१ -अन्ध सम प्रविशति
१३-१०-२-पम्यदेवा। सम्मकार
→ प्रशानात्माधिकरण
२१-११-३-सम्मृति च विनाश घ
१५-१२-१-हिरपमयेम पात्रेण
१६-१३-२-पपन्ने
माणास्माधिकरण
२७-११-३-वायु मिसममृतम्
१-अपेद भस्मास शरीरम् १- गरीरास्माधिकरम्म
१८-१५-१-मग्ने नय सुपथा रापे 1- प्रनित्य की सर्मता
ॐ पूर्णमद पूर्णमिदम्

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पूर्णमदः
पूर्णमिदम
१-शान्तात्मा
मर्षिदैकसम्
प्रध्यास्मम्
ब्रह्मसत्याक्षर
ब्रह्म-कर्ममयः प्राकृतात्मा स्वयम्भूः
अव्यक्तात्मा
१
स्वयम्भू
शान्तात्मा
(अव्यक्तात्माधिकरणे शान्तात्मा )
वेदावच्छिन्नो वेदमूर्तिर्विद्याकर्ममयात्मा
विश्वेश्वरः
अनेजदेकं मनसो जवीयो नैनदेवा प्राप्नुवन् पूर्वमर्पत् ।
तदायतोऽन्यानत्येति तिष्ठत्तस्मिन्नपो मातरिश्वा दधाति ।।
(ईशोपनिषत् । मन्त्र)

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अव्यक्तस्वरूपनिदर्शन सर्यादिरा कर्षमपम तिर्यक् प्रकाशयन् भ्रामते यदनषान् । एर स देशो मगवान परेगयो योनिस्वमानानपितिठस्पेफः ॥ या स्वमान पति विषयोनिः पाप्यास सर्वान् परिणामयेपः। सर्वमेवदिषपधितिष्ठत्पेको गुणांस समान् विनियोमयेयः ॥२॥ वदि गुस्रोपनिपत्र र सद् प्रमा वेदयव प्रायोनिम् । प पूर्म मा अपयश्च तदितुम् सन्मया अमवा वै वमनु' ॥३॥ गुणान्नयो यः फलकमकर्ण कृतस्य तस्यैष स घोपमोला । स विषसपखिगुणसिवा प्राथापिपः सभरवि स्वकर्मभिः ॥ ४ ॥ अनापनन्त कसितस्य मध्ये विश्वस्य सशरमनेफरूपम् । विश्वस्पैक परिपेशितार शास्वा देष मुष्पवे सर्भपायः ॥५॥ स तम्मयोऽायत ईशसस्थो का सरगो भुवनम्याम्प गाप्ता । य ईशेऽस्य भगवो नित्यमेव नान्यो हेनुपियव ईशनाय ॥ ६ ॥ एप देसो विपकर्मा माात्मा सदा जनानां हदय समिनिटः । ला मनीपा मनसाऽभिक्लप्पो य एतद्विदुरमताम्ते ममन्ति ॥ ७ ॥ छन्दोसि या दो प्रतानि मृत मम्प यह पेदा पदन्ति । प्रस्मान्मापी सुभते विषमवत् पस्मिधान्यो मायया समिल्दः ॥८॥ यो यानि योनिमनिविष्ठस्पेको पस्मिभिद स च निषेति सबम् । समीशाने परदं देसमीन्य निषाय्येमा गन्तिमस्पतपेति ॥ ६ ॥ विथत गनुस विश्वतो मुसो विभतो बाहत विपतस्पात | से पाहुभ्यां पमति संपवर्षापाममि पनपन देम एका ॥१०॥ अव्यक्ताद्व्यक्तय सर्वा प्रभवन्त्यरागमे । रात्र्यागमे प्रलीयन्ते तत्रेवाव्यक्तसंज्ञके ॥

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॥ श्री भम्यक्तादीनि मूनानि व्यक्तमापनि भारत ! प्रम्पक्तनिपनाप तत्र का परिदेवना || ॥ (गी० २।२८।) भष्पक्कादम्पकमा सा प्रमपन्स्पारागमे । राम्पागमे प्रप्तीयन्ते सयाम्पक्तसमके ॥२॥ (गी ८.८) माति नामवष्टम्प पिसमामि पुनः पुनः । मूतग्रामिम कृत्स्नमम वेगात् ॥ ३ ॥ (गी. ९।८1) मयाप्यय मरुतिः स्यते सचराचरम हेतुनानेन फौन्वेप ! जगद्विपरिवर्तते ॥ ४॥ (गी ।१ ) चर्प से सम्बन्ध रसने वाला पहिया पिप समाप्त होगया। ममत्र- प्रकरण भारम्म होता है। पुत्र प्रकरण का प्रसपा नाप ते सोफा", इत्यादि मन्त्र प्रापरणतन्त्र का निरूपण करता है। भामरणतन्त्र वियो। इसी विचाकरण से भारमप्रकाश रहतामा भी तिपेक्षित होगा। इस भावरणतन्त्र के सम्बन्ध में प्रश्न उपपित होत. कि-भावरणतन्त्र, का प्रवक कौन है। विशुद्ध सम्पय पुरुष तो केवड भास्मकाम बनवा मा माप्तकाम भतएप निफाम है । ऐसी मास्पा में विशुम भम्पय से पिच की प्रापि हो पा समय नहीं है। इसी प्ररन का समाधान करने के लिए 'महा' इस्पादि पत्र के सम्पयहितोपरकार में ही नितिधित मन्त्र हमारे सामने पाता है। अनजदेक मनसो जवीयो नेनहेवा प्राप्नुवन् पूर्वपर्पत् । तद्धारतोऽन्यानत्येति तिष्ठत्तस्मिन्नपो मातरिया दधाति ।। “पा (कोइ) एक (विसहस तस्व सम्पा) फम्पादित। (पर) मनसे मी (पपिक) मंगपामा । परिम सही (सपा) म्पाप्त उस सब को देपवासोग प्राप्त करने में

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विपचपक्रब अहसारमा सा ईशोपनिपत ॥ 100 प्र० यही सीमित असापश्चिम बनता एमा, मतएव विनियतिभाव का प्रावक बनता मा अम्यय कासाने सगता है जैसा कि पुरुषनिरुक्ति में स्पष्ट कर दिया गया है। (देसिए ई० ठ २६५-२८५ पृ.) बसमाग सर्वपा क्षणिक है, पोम से इस पा सरूपग्म है । सी मापन्सिक पोम से भम्पयपुरुष 'मसत्' कइसाने सगता है । रसमाग सर्वपा भरण १। शान्ति स का सरूपधर्म है । इसी भास्पम्तिक शान्ति से यह 'सत्' माम से म्यगास होने सगता है। नित्य मणतिगर्भित निस्प शाम्त अमृत-पस्युरूप सदसत् तत्व ही मोकार (ईश्वर), पी भाकार (पशमन बीवाम्पप) १, ही महस्कार (निस) । यही रामानुज सम्प्रदाय का विशिगत है । इस प्रकार सस्प दो है, परम्सु भापर्य -कासाते है रोनों 'एफ' । ऐसा क्यों ' इसका उचर भपर्ने बस से पूछिए । वन में पपा, सूती, , कपास , मही, बस । सेन , बायु है भाकारा है, प्राण, मन, विज्ञान १, मानन्द , अनन्त ( परात्पर) है। पत्र में इतनी पीनें, फिर मी एक एक कासावे, ऐसा क्यों पस जो उधर इस 'पयों का ही उपर पूर्व के 'क्यों' का है। . - . पीततत्व के वास्तविक मर्म को म समममें बाते कह एक दारानिकों का कहना है कि " पदि रसगर गम को भी शापत एवं पम्नुस (एफपवार्य ) मानमिया मापगा तो प्रदेव का समूस पिनायोमापगा । प्रव नाम रुप फर्मान्मक पिच को सर्नया मिप्याही सपमना पारिए । केगम रसतस्प मस्प है। और सारा मपब मायिफ है, मिप्यास प्रकार-मन्तं न पापिके' करते हुए मामरूपात्मक निश्च को भसम्म मानने पाठे- "प्रसस्यमावि ते अगदारनीपरम्" (गी० १९८०८ रसो०) मगधन् के इस कपन के अनुसार मनीपरपदी कस्पित भोतवाद की रक्षा के प्यार से इस बह की शामतता पर प्रहार करना चाहते हैं। उनके प्रति हमारा यही काना कि पोड़ी देर के लिए सम्पुपगमपद से हम प्रतिरक्षा के चिर कर्ममप विष को भापके कपनानुसार मिप्पा मान लेते हैं। पह मानसेनें पर मी यस स्वीकार करने से जो भापति हमारे उपर भावी है, उस भापति से भाप मी नहीं पर सकले । सास्परिक पदार्यों में स्वगन, सनावीप, विमातीय मेद से तीन प्रकार के मेर पामामा माइश पनि :- दयाराम . पमपपरामरता दोहार देसामों का सपठा पठारी प्रतिक्रमण कर गाई ऐस मनन में मारिमा (नाम का नरसविरोप) पप नाप के पप को रसना प्यमय कापरार्थ । शुति की है कि एक तस ऐसा । गोसाक सिर हमारे ही तार एफ पना सिर मी पण मा मदीप तत सत , पगलत परम्स रेदोनों वो मर मिव भामागत है। उमपामा एम वस्तुताक एक है। इस प्रकार त एकही कार में मया मिरो मार्यो पर समिपय माता रही । ऐसा कौनमा तप है जो निरस्ता पर भी ना , प यरा मी तुपा है, जो अनेग भी है,एप मनसे मी तर दोन प्रता। इस का उत्तर भारपुर । भम्पप का ममता मियाम्पग सर्माण पिर (भनेत् । दे, मयुमरममाग सर्वपा पराभरनी ही दोनों पत्तियों में यह ससारमें म्पास सेवा ।ममर मारताना-गिरमा समार पर ग्यमाति धर्म सीनियति से विभीििनयनि माम से प्रसिरोगरा कममा (पिति-1) भोर गिना (नी-सम्परा) पोदो र (ग) म सोरमा पिकमिर- 'Trint नी मा सिमानुमार मिनिपनि सस दुनिया महार बना गिरता है। रोगी रमा मा सोना । मेग रमरा साफ पनि मनीष गग मेपन सो तिन । म मापारिक नगर पारस र भणा पुण, निरा पारे गुर मप सब मे मे मीनियम साप। mafreen mixtuमग समान है। गा ममतरता तुदो त म प गर मेरो , उपमुग्ध ATHERPA नाममा मा rm at arekriwartantrn २१७-२८११)।

रास्तामा विपापक्रम माशोपनिपस् 18 ही सीमित मतापिएम बनता मा, मतएव हिनियतिमात्र का प्रक्रेक समता मा भव्यय करसाने उगता है जैसा कि पुस्पनिक में स्पष्ट कररिया गया है। (देखिए ई. उ २६१-२८५ पृ.) मसमाग सर्वया पणिक , चोम ही इसका सहपर्म है। इसी भास्यन्तिक पोम से अम्पयपुरुष 'मसत्' कासार्ने सगता है । रसमाग स्र्थपा मपण है। यान्ति इसका मरूपपर्म है। इसी भास्पन्तिक शान्ति से पह 'सत्' भाम से भ्पवात होन मगता है । निस्प प्रशासगर्भित नित्य शान्त पमृत-मृत्युरुप सदसत् तत्व ही भोकार (ईपर), की प्रहार (सरगमूस जीवाम्पय ) , की पास्कार (निस)है । यही रामानुग सम्प्रदाय का निशिराईत है । इस प्रकार तत्व दो है, परम्त पाश्चर्य कहलाते है दोनों 'पफ' । ऐसा यों ? इसका उत्तर भपर्ने मात्र से पूछिए । स में छपा है, सूत है, स, कपास है, मिट्टी , बस है न है मायु, भाकारा है, प्राण है, मन है, विकान 1, मानम्द , अनन्त (परात्पर) है। पत्र में इतनी में, फिर भी पर एक करसावे, ऐसा क्यों ! बस गो उत्तर इस 'क्यों' का, पही उत्तर पूर्व के 'क्यों' का। - पतितल के पक्कि मर्म को न सममने माछे कुप एक दार्शमिकों का कहना है कि " पदि रसवत् बम को मी शानव एवं मम्सद ( एकपदार्प) मानसिया भापगा वो प्रदेव का समूस पिनारा रोमायगा । प्रतः नाम रुप कर्माम्मक विषको सर्पवा मिप्यारी सपमना पालिए । नम रसवस्व मस्प। और सारा प्रपथ पायिक है, मिप्यास प्रकार--'अनव दे पापिके' करते हुए नामरूपारमक लिब को मसम्म मानमें पाटे- "प्रसस्पमाविष्ठ वे भगदाहरनीपरम्" (गी० १५५०८ रसो०) मगधन् के इस कपन के मनुसार मनीश्वरबदी कल्पित पतिपद की रक्षा के म्याम से इस क्स की श्वतता पर प्रहार करना चाहते हैं। उनके प्रति हमारा यही करना है कि पोड़ी देर के लिए अभ्युपगमञ्चद से हम मौतरफा के लिए कर्ममम पिम को भापके कपनानुसार मिप्पा मान लेते हैं। पर मानतेने पर भी पस स्वीकार करने से दो भापति हमारे उपर माती, उस भापति से भाप भी मही पा सकते । सासरेक पदापों में स्वगन, सनातीप, विजातीय भेद से सीन प्रकार + मेर प्रास्तामा शोपनिपत् ।। विषयोपक्रम मा करते हैं। मा भार मनुम्प का मे विमातीप मेद है। मनुष्य-मनुरूप का मेद सगातीय भेद है। एक ही मनुष्पशरीर में कान-नाक मुस एप-पैर मादि गरीराज्यों का पारस्परिक मेह "जगत " मेद है। असल इन तीनों मेदों से पृषक् माना जाता ६ रेसा कि- ' एकमेशा दिवीप प्रम" इस्मादि पचनों से सह। विजानीप मेद को हटाने के लिए 'एकम् ' करा है सनाती मे को हटाने के लिए एव' कहा है एवं सम्त मेद की म्याति के लिए 'पदिनीयम् ' काना पका है। इस पर हमारा यह काना है कि हम उसे सजातीय विमा- सीपमेदरम्प तो मामते है, परन्तु मापके माने हुए भदेताम के स्वरूपानुसार उसे सगतमे एस्प नहीं माना पासकता । कारण है। निस शिानमानन्द ग्रह" " सस्पमा नमनन्त मम" के अनुसार उसमें सचा-चेतना -पानन्द या तीम पमै महत सिद है। मति (सचा), माति (चेतना), प्रिय (मानन्द) या तीन पर्व मापके ही माने गए हैं। उस एक प्रम का तीन तरह से मान होरहा है। क्या मातिमूहक मेद ममे का प्रतिबाधक नहीं पदि वो इस सिपाधि को हटाने का मार के पास क्या उपासचापति। उक्त विप्रतिपति का निराकरण करते ए माप बनते है कि- पचपि प्रमवार स-पेतना- मानन्द रूप से तीन तर से मासित होत्य। परन्तु सचा तीनों की एक । मातिमेद देव कारण नहीं है अपि तु सचामेद देत का कारण है। एसी प्रात्या में सचामेमसा मागत- मर का प्रकार में समावेश नही होसकता" ।पा पर उत्तर ( हम माम रूप को माम् हुए) मही देमकले। मारप देसावे हैं । यसपी पति होती है सचा एक है। पूर्वोत तोगारण पर प्यान दीजिए। मन माग बना प्राण भाग बना है भायरा बाप, बापु पपि भमि नम रस पिही मिशी फराम सास का ई मा सूत का एवं कपरे से रस बना है। प्रति- मुरम का मामय सेते पर यदि मान म्पियन बोरवे जायगे तो उस सम पदाप माप कीमा में प्रसव बगे । इन मा भनेक मातियों के रहने पर मी-"वापारम्भ विसस नामुनिशम्पा माप के भनुमा पूर्व वाण हाती उचोपराय में प्रोत हो। म क मतामात्र से मनेक भानियों के (प्रतीतियों के ) म पर भी ४ प्रातस्मा 1 पानपम् । विपापक्रम बस एक कराता है। यही अवस्था यहाँ है । यसतरख अनेकरूप से प्रतीत हो रहा है सार ही में उपाधिमेद से सप्ताभाव का भी पापाय प्रतीत हो रहा , पर तु रमापत सचारस एक है। मत नामरूपप्रवर्तक पतपदार्थ को मानलने से मांततस में कोई याधा उपरिपत नही होती। ऐसी अवस्था में कल्पित अक्तपाद की रक्षा में प्रस्त होकर नामसपारमक विष को मिण्या मानना सर्वथा मिप्पा ।" अनृते दे तु मायिके" ग्रम सन्य जगमिश्या" पह प्रमाण किस शाब के है यह पता न सगा । सम्पूण वेदनामय में गीता में वेदान्तसूत्रों में कही भी विष को मिथ्या नहीं यससाया है। विश्व को मायिक अवश्य बतलाया है परन्तु माया बस मिथ्या है- यह किस माधार पर मान लिया गया, यह समझ में न थापा । यदि चाप पुरा म मानें तो हमें यह कहने दीजिए कि भारतवर्ष का उनप्ति का समूल बिनाश यदि किसी ने किया है तो वह यही कम्पित जगन्मिप्याषा है। संसार मिय्या-प्रारमा सस्पर, मांसा- रिफ फम बन्पन के फारण" इन मनुचित एव मणसीय भावनामों ने कमण्य भारतवर्ष क्वे सयपा प्रर्मपय बना ससा है। पाठकों को हम या विचास दिसादेते हैं कि भाप के शाओं में कही भी जगत् को मिप्पा मही पतसाया गया है, अपितु यह विष को ब्रह्म की विभूति पाम रहा। 'मस्प मानमनन्त याम के अनुसार विश्व का सप्रमब म सत्ता चेतना-पानन्दलारस बनता मा 'सत्य' है । इपर ग्रामवद सपम' यह भूति सत्याम के पापभूत विय को 'यम' मान रही है । एक सायपूत महर्षि की ही अव सस्य मामी गाती है सो सम्पति मस की तिरप विम को कैसे मिप्या माना जासकता है । कारण के गुण तो काय के पारमफ (मरपसारक) बनते हैं। सब कारण सत्य है तो पाप से मप्पा होसकता है। 'पर मरण पमयो मन मई पबत्तम (गता १. मदरसो ) के अनुसार सायर्षि पम्पय से साग पिन पना है। सम्पास नदी पारूप में माफर विष करतान संग गपा है। ऐसा प मिप्पा दोगा-पह कौन निघास परम ! ममगा जीपलाक मारभूत मनातनः" (गोतामअसो ) 'पफागेन म्पिन ममम' 'मिपादप उदत पुरुषः पाटा पाहवामा शानिपत : विपबारकम म्योगपत् पुन' 'पुरुष एबर्ट मर्व यदमून यप माध्यम एक पा इट रिमूव सबम 'तमेक सन्त विमा या पदन्न इत्यादि श्रुतिस्मृतिए बम स्पर सम्दों में प्रकापणनावर को पुए करती ह निज को प्रक्ष की विभूति माम रही है तो ऐसी अवस्था में निम को मध्या मानना क्या मी कसपना नहीं है। अपि च सरि होती। ममापसि से । प्रजापति को सटिकामना से तप पा करनी पकती है। उम की चिरफास की तपथपा से निय उत्पम रमा । जैसा कि - प्रमापतिर्मा इमप्र एफ-प्रासीत् । मोऽकामयत बहुम्स्या म्ममापेप गुमान गच्छेग स तपाऽतप्या' ( उ० १९६१) इत्यादि भूतियों से भ्पर है । साधारण मनुष्य परिश्रम करके यदि किसी वस्तु का निर्माण करता है तो तोक में उस का मादर होता है। ऐसी स्थिति में बगन्निफ्ता में तपा निस बिरका निर्माण किया उसे एक ऐसा से मिप्या पतमा देना सचमुच अपराध ६ मपराध ही नहीं मचम्प भपाप है। भपिक-मा मास्मि' योऽरसोऽसौ' इस्पादि रूप से उपनिषपुतिए मां पदार्म को याम मानती है। उमप तिदन प्रमापविराम-स्प मापवब" (यत १.। को १म 1981 १.) इस्पादि नामसमुक्ति उस मा प्रजापति को प्रपत-मृत्युमप मान रही है। भौती उपनिषत् के भाषा पर बसवासी स्मात्ती उपनिषत् (ौता। पप्त पर मापुरम मर सपाहम न इत्पाटि रूपसे सप्ट शो में प्रम को सभपधर्मकिन बतमा रही है। ऐसी म्पित्ति में मम के पत्युप्रशन विश्व को मिथ्पा मानना सारस नहीं तो भीर स्पा । निस मामलपमप विप माप मिथ्या मान हे। देखिये मुक्ति उसी क लिए मने क्या विचार प्रकट करती- अयं मा नाम स्प कम । नेपा नाम्नागिपेतोपामुग्यम् । मनोटि मपाणि मामान्यतिप्यनि । पनोपा साप, पनदि मानापमिा ममम पोपा बम पनदि ममि नामानि बिनि । भव पाणी पतु । प्रब कममापारमा (गरीरम) नाना प्रय सरेफपपमात्मा । भाम्मा- एक मन्नेत्पम् । नदनाम --- प्राकास्मा विपयोपक्रम 19 शोपनिशम् ॥ सस्पेन छ नम । प्राणो चाऽप्रमृतम् । “नामरूप मत्यम्" । साभ्या मग भगाग्छन्न (शत काम 108 ।प्रा.) इति । निसप्रकार हमने स्पष्ट शब्दों में नापसपे सत्यम्' इस रूपसे माय वेद में नाम रूपा रमक विश्व की सम्पता बताई है, क्या विश्व को मिया सिर करने बासा कोर वाम्य माप बतमा सकेंगे नहीं तो क्यों मापके काम्पनिक मत का भादर किया जाय । 'प्रसस्पम पनि ने जगाइरनीश्वरम' के अनुसार क्यों नहीं पापको प्रनीश्वरवादा' माना जाय । रामानुग सम्प्रदाय के अनुसार स्पों नहीं माफ्को 'पपन्नपौद' कहा बाप । समस्या यसरी रटिश है। माग जगन्मिप्यारवषाद पर प्राय समी विधानों का रस मभिनिवेश है। उनके उस मन्तम्प के विरोध में कुछ मी काना भापति को निम्नस देना है। फिर भी सस्य सिद्धान्त सस्प ही रहेग्य । उपर की पट्रियों से केक्स पोम प्रकट कर ना दूसरी यात है, एष शास्त्रीय विपार से निर्णय पर पहुंचना दूसरी बात है। हम माग स्पष्ट शब्दों में पाया- के सभी निशानों को यह मामा देना चाहते हैं कि जगन्मिथ्यात्मवाद प्रशास्त्रीय है । 'प्रम सस्प मगन्मिथ्या' पाम्प का शास्त्र से कोई सम्बन्ध नहीं है। प्रस्थानत्रयी का कोई मी पक्य जगत् को मिण्या नहीं वतता रहा । विष के लिए 'प्रनृत' शब्द मश्य पाया है। परत इस अन्त शम्द का मर्ष मी मिप्या नहीं है, जैसा कि विचार उपस्फ्ति होने पर प्रकट होग्य । नीरवीरविवेकियों के सम्मुख पुष एक मक्न उपस्थित कर दिये जाते है । यह बचन निग्य ईश्वर की फति -इयर की अपने प्रशरूप से पिश्य धना है । प्रता तटंगमूत मिकर तदरूप है। इस सिद्धान्त कत्र स्पष्टीकरण करते हैं। विद्यमों का यह कतम्य होना चाहिए कि वे इन बरनों का समयय कर विरकार से पसी माने बासी जगन्मिप्यास्वविपपिणी मिप्या भान्ति का निराकरण कर देश को निष्काम कर्मयोग में प्रवृत्त करें।

प्रास्वामा
शानिएन । -
विपयोपकम
सप्प मनमनन्त मन यो पेद निहितं गुरुपाम् ' (8. उ०१)।
२- स एवाघस्नात् स उपरिणाद, म पथाए, स पुरस्तात् सदविणत स
उघरत, स पवे सर्यम्-(ममयर सर्यम् ) ( उ २१)।
1-'पुरुप वे सर्वम्-सद्भूत पर भाम्पम " ( पशु में भ०।२०)।
१-- एक पा १६ विवध सर्पम् "
1-'प्रजापते न वापन्यो नया रूपाणि परिता पब" ( प १०२०)।
4-~" एफ सरिया बापा पदास्यामि पम मारियानमा' से ॥६४६).
-~-प्रस न मन सरप मासीत् पतपे पापपिपी नएन ' (त.मा बरा५)
तव शुक त प्रम तदापतमुप्पट व मासोका भिता सर्वे " (फ्ट.14)
र-- यो देखना प्रभवोदय निमाधिपो रुद्रो मापि ॥ (रवता उप ॥१)।
10- पोग्यास प्रजापति
(रात ७७)।
१- एप प्रगाना प्रजापतिपरि मनिद" (ो पू १)।
१२- प्रजापति वेद सर्गमन प्रगयो " ( )।
"-'प्रमापतियों कानम्पतपत् । तेया तप्यमानाना रसान् प्राद-अमि पूफिया
बायुमन्तरिपात् भारिप दिव' (ो उ PI७)।
१४- प्रमागत विडकमा" (श GIPIRIR),
१५- 'इमे सोका प्रजापति " ० ०१५। ७)।
१५- पापिषी हि प्रजापति "
(श 10 ६)।
१७- माम्पा बम्त सम्पतीमाभूमी मनपन पर एक " (भक् 1-11).
15- र्ममुग्वेद प्रजापति ' (श ११११)।
11- मिपार्थ उौद पुरुष पारोस्पेशमवत् पुन ' ( प ३ 11)।
२ प्रजापतिस्त्वेवेद सब पदिद किस" (mr)
२१- 'पएको पासपनीत एनीमि' साम्सोकानीपत शनीमिा " (रषे उ ।
१

प्राकृतारमा विपयोपक्रम ईशोपनिषत् ॥ - २०- "घर प्रधानममृताधरं हर परास्मानावीशते देव एक "खे ११०)। २३-" एको पों पहुधा शक्तियोगात् वर्णाननेकान् निहितार्पो दराति (रपे. ।।१)। २१-'मा सर्यस्य प्रमको मत सर्व प्रयते" (गी० पृ. ८)। ५- ममैगयो जीबोके जीवमूता सनातन " (गी.)। २५-'मय परतरे नान्यत् किशिदस्ति धनप" (गी ७।७)। २७-"मिसम्पामिद स्नमेकांशेन स्थितो जगत् "गी. १०१२)। २-" नामरूपे सत्यम् " (श० ११ को० २१-"ऐतदारम्पमिद सर्प, तत् सत्य, स मारमा " (उ० ५५७)। ३ -" तस्माद् बा एतस्मादारमम भाकारा सम्मूतः, माकागानायु., योनि ममे राप., भम्प पृथिवी पुमिम्पा मोरथप , मोपधीम्योऽन्न, भन्नाद्रेत , रेतम पुरुष । सपा एए पुरुषोऽम्नरसमय ।+ ++ ++ अपने प्रना प्रमापते या काच पूपिषी मिता । सब वे तेऽममाप्नुवन्ति येऽन्न प्रमोपासवे । भन्न हि भूताना म्पेष्ठम्' ( १० ११- २१-"यौ किम प्रापि स प्रजापति" (शत०११।१३)। ३२-"मनोमयोऽप पुरुषो मा सत्य" (१०भा० . प. ६० )। २३-"मममय कि सोम्य मन (पा०1०७१)1 ३४-"पोराक्स सोम्प पुरुप" (का. 3. ६/७१) । ३५- तप प्रजापति +++माम प्रजापति " (. x २२१७१)। १६-"प्रजापति प्रमा भस्मत । स वर्षेभ्य एष प्राणेम्पो देवानस्जत, येऽगमप्राणा- प्रया + + + तस्य , प्रमावरमेव मार्यम्पसी ममतम्" (शत. १०PR12-2-)। १७. स भास्नैप देगनसूरत, तस्मै स समजानाप दियास । अप योऽस्मपरमाण वेनापपनसमत । तस्मै ससगनाप तम इस" शत. १६-i)। ३८--"कोर देव प्रक्षिणेऽनु सम्मा पौ ६ गात स उ में मन्त । स एवं गात स ननिष्पमाण प्रमानास्तिष्ठति सर्वतोमुन । (रमे० ३.१)। स्तेम्पो मापा प्रातारमा रोपनिषत् । विपयोपाम - उस सत्यमीमांसा से प्राल में इस मही बससाना है कि रस पसरूप विपा फम दोनों मारमा के सापधर्म है । मभिमसचामाक के फारस दोनों एकतर है। विधामाग विपतिमूर्ति होने से सपा कम्प रहित है। इसी विषाभाग को सप्प में रसकर अतिने 'अनेमस' पहा है। कर्मभाग गतिरूप होने से पमत् है । इन दोनों विम्दमायों से रेत का अम महोत्राय मत एकापम्पहारमूला उसी साताम की मोर सप रस कर भुति में 'परम्' कामने बत्-मौर पगत् दोनों उस एक के उदर में समावि है । मभ्पस्प 'एकम्' दोनों का सम्मान सूत्र है। इसी हस्प को हस्प में रसकर "प्रनेनन्-पकम् -पनसो जमीया" परम रक्सा गया है। इस प्रकार स्पए ही इस मन्त्र का निवार्ममयाम्पयतिपादत्त सिद्ध होगता है। यदि इस मन्त्र में विस्मिथपो मातरिया दपाति' पाय न होता तो परपमेष प्रपम प्रकरणबत् या रितीप प्रभास भी विश्वोपरित (वेदोपहित । शुर मध्यप काही निरुपक मन मिया माता । परम्त उह तुर्थ चरण ही उस के मेदयुक्त सोगधिक मात्र की मोर बम्परा भ्यान मामर्षित करता है। उस स्पतिगतिमद निरापण तत्व में मातरिया माम का तप विरोप भप का मापान करता है । भापान का अर्थ माहिति । एक माखान पर एसरी वस्तु का रस्सा पाना ही पहिति किस माधान है। रिक परिमारानुसार बिस पासपन पर वस्तु का प्राधाम होता । बिस पर पस्तु पारित होती है भमण ( मोता) बनतामा 'पभाद' नाम से म्पात होता एक भाशित होनेवासा पदार्थ मानि' कराता है। माहिति राम्द ही परोपभाषा में माइति । यही भान है । उदर मादा पाहित पम पम । योमों का समम्मित- पही या कामासदाहरबाप सूर्प भयाद है उस पर भारित मतएर माहिति नाम से प्रसिद पदमा ( सोम) मातिए । पपीतिक (भाषिर्दषिक ) नित्यया। इसी अवानात्मक या का पहप फवातीलाई बुति करती है- सपा मोऽनाम्निरेप मा । तस्मिन् पतरियाभ्पादपति-पारितम पबाम्प मा। पारिनयोता भाहुनए इस्पापलने परोठम् । पादिस्पो ।

प्रारुवात्मा बिपयोपक्रम का शोपनिषत् ।। . । पा मचा, तस्य चन्द्रमा (सोम) एषादिवयः , चन्द्रमस माठित्पे प्रादपति" (शत० १०६।३।१-२) प्रकृत मन्त्रमाग यही याक्रम यता रहा है । प्राचीन भाप्य के अनुसार भप् का पर्य है कर्म, मातरिखा का अर्थ है सूत्रवायु । सूत्रबायु उस भनेवदेवत् नाम के परमात्मतत्व में कर्म का प्राधान करता है। पेनानिष्टि से मप् माइति द्रम्प है, मातरिरवा मी एफ सावत्र तत्व है, जैसा कि मागे चाकर स्पष्ट होगायगा । इस भयाहुति से पह सम्पयपुरुप या पुरुषरूप में परिणत होनाता है। पुरुष घरत या कर भाप्रय नहीं देता, तबतक प्रजोत्पचि मही होसकसी । कारण 'सा या प्रमा पठा ' (गी ।१०) के अनुसार प्रमा सपि का मूल उपक्रम यह प्रजापति ही है। अप् की भाइति होती है इससे यहस्वरूप नियम हो । उघर हमारा शुर भन्यय पुरुष भोकभोग्यसपण ममममादात्मक या से सबपा यहिमत है । क्योंकि यह का पहिसा मस भापोमप परमेष्ठी । मापसे ही यह होता है। पार्टि परमेष्ठी का मप् माम का पुरनम प्राणमय वेदपुरबन से उत्पन होता है। स्वयम्म का प्राण ही 'प्रमनिरासिस' वेद है। 'सोs पोऽसनत पाप पर मोकात्' के अनुसार इसी वेदवाक् से पानी उत्पम होता है। ऐसी मा स्था में वेद हो तब मा वाल का विकास हो मप् हो वम मातरिया द्वारा उस मन्पपाम पर मा का मापान हो। अतः मानना पड़ता है कि मप्रगत सम्पप ब्रम वेदमय ही है । वेदमर्षि सम्पय पर ही बाहुति समय है । वेदमप अम्पपाम हो, दूसरे शब्दों में सम्पयामिम वेद ही इस मन्त्र का मुख्य प्रविपाप विषय है। मम्पप स्त्रय विपाकर्ममय है । अतएप इस के मा- स्मघर के पत्रीदत प्रापमाग से प्रकट होनेपाहा येद भी मवरप ही विपाकर्ममय है। घेद में मो विपा-पर्म या भाग है, वह सम्पय के विपा-काम का ही अनुपा है । वेद क्या पदार्प है। यह पौरुषेय है, अपना पौरुषेय ! प्रादि प्ररमों के सम्बन्ध में पका मतभेद है। इन सब विषयों का विवेचन माप्पभूमिका में किया साधु है। मत प्रात में मन्त्रार्प से सम्पन्न रमने पारो पेदपदार्प काही स्वरूप पाठकों के सामने रक्सा नाव। इति-विपयोपक्रम 1 ।

मन्नार्थसम्बन्विनी-त्रयीवेदनिरुक्ति प्रय पर"" प्रप पट । इस्मादि दार्थाम कर साधक तत्व है। से जिसके द्वारा पदार्थ की उपसम्धि होती है वह उपरिभ ही खेद है जैसा कि पूर्व की पेनिति में विस्तार से समाया पापुका मेद का चम्म विच माविमाप प्रामपर से होता है। प्रामसर की (मप) मझा विष्ण, , अमि, सोम या पाच कलाए । सरिनिर्माण करना ममा का काम है। परन्तु पन तक यह प्रताव प्राणमप वेदकर को अपनी प्रतिष्ठा नहीं बना लेता, वा तक यह सरिनिर्माण में सर्वपा असमर्थ राता है। समिनिर्माता है प्रमा, परन्तु साधन (उपादाम । वेद । अतएव मन की सफा से प्रया से सर्व प्रपम पेद काही प्रादुर्भक होता है। उस प्रविध में प्रतिष्ठित होकर प्रमा निम निर्माण करता है पेसा कि पूर्व की विधनिति में निखार से बताया गयुका। पदमपों के मकों को यह सुनिदित निबेदखल क, यमुम, साप पर मेव से चार मागों में । बर्ग लिम्क वेदतत्व निभानशि से प्रपि-सोम मेद से दो माग्ने में लिमहो। प्रपिरेट परिसा बेद है, सोमरे दूसरा बेद म तल को दाहक होता मा केन्द्र से निकलकर विहिप मस्पामों में परिणत वा इमा, उच्रोर निराकसित होता पता भी मप्रगामी होने से 'भनिए परवाना मागे पहना, मागे मना इसका सामारिक धर्म है । परोधमापानुसार पर अमिताव की भमि' माम सम्पात पता है- (देशिर ६ का। प्रा१म१५ ११.)।पसल जो दाम होतामा प्रधि (R म) से केन्द्र की मोर माता मा प्रमि की मोर जावे गए दाहक अग्नि में मात होकर भनि •प्रामा मार भवर्मगधि श्रम पोषु प्रपाल, मई यति लममामा नोपपतन स्नात [मा मम - प्रास्तास्मा जयीद शानिपत - के सघात से को खससूप से सुरक्षित रखता है यही सुत (माइत ) होने से 'भूयते' इस निषेचन के मनु सार सोम नाम से प्रसिद्ध है। सोम स्नेहवरम है, भमि सेजसात है। स्नेहतत्व की प्रतिष्ठा हिप तितो, तेजतत्म की प्रतिष्ठा गसितव है। स्पिति--गति दी मागे चाकर स्नेह-तेज परिणत होमाती है। प्रत्येक पार्थ स्पिति-गति-स्नेह-वेग इन पारों की समरिमात्र है, जैसा कि मागे जाकर पर होगापगा । ससर में पाप जितनी भी मुठिए देस रहे हैं, वे सम भग्निमयी है। अग्नि ही मूर्चि का निम्मरण करता है । दसरे शब्दों में पग्नि पस्तु का सरूप है । वस्तु (पदार्थ) गुगाफटोहम्पम्' इस दायनिक सिद्धान्त के अनुसार कर्म का पद गम है। यह फर्म कर्म एवं किया मैद मे दो भागों में विभक्त है । एक एक किया क्रिया कर साती है, ऐसी अनेक क्रिमामों की समपि 'कर्म' नाम से म्यवान होती है । भनेक क्रियाओं कर्म (काम ) पूरा होता है । उदाहरणार्थ भोजन निर्माण एक है । इस कर्म की सिद्धि के लिए इमन अमि-पानी-माय-नमक-फ्रकार प्रादि मनन्त क्रियाए परनी पड़ती हैं । 'रसोई ने पार होगा। यह एक कर्म सपम्न होगा । इस कर्मसपपि के सिये उदयपषत भवान्तर कितने ही कर्म करने परे । बस महार्म सिद्धि के लिए किपमाण भवान्तर कर्म किया नामसे एक समान्तर कमी से निपम्न कम फर्म नाम से म्पबात किया जाता है । एक ही कर्म की दो अवस्थाए होगती है । इसी कियासतानरस्प को सक्ष्य में रख कर अमियत करते है- गुणभूतपय समाजमजम्मनाम् । मुदपा प्रकरिपवमेवः क्रियेति म्पपदिश्यते ।। पास्यपदी) कम की रिग अवस्या जोमयुका है, कर्माकस्पा शासवत् है । स-बस किया है । स्पिति कम है । सस्पाम पर स्पिर गहते पर पाना दिसना। इसे ही कम्पन करते है। संदेश का परिमाग कडे दुर भागे मना बसना ह, यही गति । इस प्रकार कियाभाग कम्पन भोर गति दो मामि परिणत राता है। इसी अभिप्राय से इसका सबस' राम्द से अभिनय किया भाव करना या कि बस्तुमात्र में एक स्पिरमात्र है, एक समान है। " ATHARET मायापनिपन ॥ - मा निरस्तर उस पदाय में से उमके परमाणु निकसा करते है इसी ( परम्पगुमिनिर्गमा ) भास्य का नाम किया है। वस्तुपिया कर्म है । समीर पर पि राशिय । शगर ममिपिया है। माप राम को वहाँ हो है, गरम पात है। या मान के प्रम्य दशन है। इस भरिमर्ति शरीर से प्राणानि कर निरन्तर विलसन होता रहता है ।लियमन्य परिश्रम, रोमन भादि से प्रारमा नि मर होता रहता है। इसी कमी को पूरा करने के लिये साप प्रात ममाहुति (मोबन ) की पावश्यकता होती है । मी पिण भग्निमय है मोबस्तु मर्ष हो रही है ह भी भमि है। इस प्रकार पियाप कम विमनसषण क्रिया दोनों का भमिमपरब सिम होजाता है। बस्तु- पिणा कमी यह मा अमिहै। बस्तुपिया में होने वाला म्यापार किया है या मी अग्नि । है। इस प्रकार संसार में मितने मी कम्म है उन सब का भनिमपरवमान सेना परता है। अनि की मी कमध्यापनाको सत्य में रमाकर 'मितानि (सबाणि) कापययममि" (गत की । ५भ । १२ १० ) या कहा जाता है । म अमुक वस्तु गह इस मामय का 'वसना कम से ही तो सम्बन्ध रमना है। परिवमरूपात्रिया एवं पुद साकस्पापन कम ( वस्तुपिएरा ) ही तो पति के विषय बनने । पशि विषयक सारे कर्म अमि- रूप दूसरे रामों में इन कर्मों का प्रक्वक किंध स्वरूप सम्पादक पनि हो । इसी रह स्पको सप में रखकर निम (निमग्दु ) शाम करता है- "यस किधिहाष्टिविषयकमपिकम्मर तन" (पा०नि० ६० ७८३) सकर्मप्रवठक समर्मति उम अमि की प्राणं मत मेद से दो मस्पाए हैं। प्राणामि अमृतामि। यही दाना । भूतामि मानिई यही मत । वस्तुपिणा मौविकामि पिण पत निराकार प्रासामि देवता है। प्राणामि किया है मूनामि कम है । इस प्रकार ससार के सारे भूत एव संपूण वता "सबारिप पाइएप मूतानि सनि देशान् गर्मी मिति पो ऽमि विपचि" (सन र का । म०1१] । ६२ अनुसार ममि मय ही हैं। इस समानामि की मचा सोमाइति पर निमर है । जब तक सोमाइति होती रहती है तभी तक अग्नि सस्वरूप में प्रतिष्ठित राता। भूतप्रमिमप प्राणानि ही महिलपमें परिणत उमा । परम्नु लिमास कीनिर बब तक उस में सोम की प्राप्ति नही होग, तब तक मा पाहतारमा है। ईशोपनिषत् ॥ अमीवर - मुर्ति कमी प्रतिष्टित न रहेगी । कारण-अग्नि तेजोमय होता मा विशक्सनधा है । बह ठहरना नानता ही नहीं । उसमें निरन्तर गसि होती रहती है । वह मूर्ति का निर्माण नहीं करता, अपि त उस के स्वरूप को विशकशित करता है । परन्तु स्नेहगुणक सोम इस में भारत होकर इस की विशकसनशक्ति का स्तम्भन कर देता है । इस सोमसम्बन्ध से अग्नि को बाध्य होकर मर्मिरूप में परिणत रहना पड़ता है । यह सोम अग्नि में पाहत होकर अग्निमय बनकर ही मूर्ति सचा का कारण बनता है इसी भाषार पर अग्नि को मूर्ति का अधिष्ठाता मानसिया जाता है । परन्तु वस्तुत यह मूर्णिमाष सोम की स्पा पर ही निर्मर है। जिस प्रकार भनि 'माय' कह साता है, एवमेव सोमलव 'रयि' नाम से म्यमात होता है। रयि (सोम) ही मूर्ति मनता है, इसी भाधार पर --'मस्मामचिरेव रयि ' (प्रश्नोपनिषत् १ प्र० ५ ० ) यह कहा जाता है । सोमतत्व प्राति दम्य है, अत एव मोक्ता अग्नि की अपेक्षा इसका स्पान (दना) मीधा माना जाता है । यह सब कुछ होते हुए भी सोम भग्नि का अमिन मित्र अन्तरंग सखा है। अपने छोरे दर्जे के इसी सोम सखा के कारण प्रचलित होकर या मग्नि ही वेदत्रयी फा प्रमय यमसा, वैसा कि मन्त्रनुति करती है- पमिमागार उपचः कामयन्ते, प्रपिागार समु सामानि यन्ति । प्रमि मागार समय सोम पार पामम्मि सम्पे न्पोकाः ॥ (अक्से० १।१२।१५) उक्त भग्नि-सोम के निरूपण से प्रकृत में हमें पही क्तताना है कि सम्पूर्ण भौतिक विश्व में पमि-सोम का साम्राम्य, जैसा कि 'अनीपोमात्मझ मगत्' इत्यादि से स्पप है । म्पयम्भू-परमेष्ठी प्रादि विश्व के पाच पथ है। पार्षों में स्वयम्भू सस्पानिमय, सूप देवाधिमप, पृथिवी भूनामिमपी है। परमेष्ठी चौर चन्द्रमा सोममय है, जैसा कि सुनिरुक्ति में विस्तार से पतसाया गया है । इस राशि से भी विश्व का पमिसोममयाब सिर होगता है। इनमें पति- वेद पेटमयी है, सोमवेद पौषा प्रथमवेद है । मग्नि की भमि-पापु-मादित्य यह तीन भास्पाए है, मारक अमिवेद मम्-यमु -साम मेद से तीन भागों में विम्ल होनाता है। - प्रावास्मा मा ईशनिपत भयोबर सोमतल दिसोम (निरायतन सोम) माम्बर सोम (सायतन सोम) मेद से दो भागों में विभक है। भवएष सोमवेद-पोरागिरा अपर्याङ्गिरा मेद से दो मार्गों में विमत होगाता है। दोनों की समणि अपरंपेद है । प्रयीवेद की प्रतिष्य अमिमूर्ति बना है, दूसरे राम्दों में प्रयीवेद पिता पर प्रतिष्ठित है, एवं सोमपेद प्रक्षा के म्पेष्ठपुत्र अपी पर प्रतिष्ठित , पैसा कि भागे गाकर स्पर हो बायन । सोमवेद को थोड़ी देर के लिये कोर दीजिये, पमि वेद पर पि गलिए । यह ममिवेद पास्मा प्रतिष्ठा ज्योति मेद से तीन भागों में निमकी। पारमोद पमुवी प्रतिष्ठावे भग्दा पर मोतिद सामेट है। पतीनों ही पेद पूर्वप्रति पादित मन-प्राण-पक्के त्रिपकरण से अथीभाष से युक्त है। तीनों में से सर्पप्रपम सर्व प्रभान मात्मरूप पद को ही सीलिए । " १-यात्मवेद (यजुर्वेद - ऋग्यजु साममय ) 'समा एप प्रास्मा गाम्मपा पागमपो मनोमया' के अनुसार मारमा मन-प्राण- अम्मप है। इसी का माम विभागर्मित अम्यपारमा ( समात्मा )है। मामा की इन धीनों मसामों से जमरा रूप-कर्म-नाम इन तीन मर्प फसामों का उदप होती । मन रुपमात्र का मप है । मन ही विवपरूपाकारावरित बनता है. सरे राम्दों में सारे रूप मन से ही उठते हैं मरण हम मन को रूपों का जरय (पमरम्पान) मानने के लिए तप्पार । मन दी रूपों को भारस करता है पाकार मन पर ही प्रतिष्ठित राव मतएप इसे सब पों का प्रम (विमति रूपाणि) कहा गसकता है। परम-मनुप्प-प-पट मादि सब के प परस्पर में सपा मिम है । परन्तु इन मिन्नों में मन अमित्र रूप से म्याप्त है, सब रूप में समान सम , मत मनको ही पों का साम (परसानभूमि का गासहा है। इस प्रघर यतो पिठन्ति समणि पाणि पिमति पत् समाधि पाणि, सौ पद पोपु मोपु"इस निरबन प्रक्रिया के पनुसार इस मारम्य की मनोक्साको रूपों का सम्म-म- माम सपण मारमा मानने के लिए गप्पार है। इसी प्रकार मा की प्राणमा कमी की उम्म . ।

प्राकामा साईशपनिपम् 18. अबीर । मस-साम है वातसा नामों का उप-प्रम-साम है। नाम-रूप-कर्म भेद से बह एक पा स्मतस तीन मार्गों में विमल रहा है। तीनों मिसकर एक मास्मा है । इस मारमा की मनो कसा में उम्पमात्र प्रशन है, प्रम-साम मात्र गौण है प्राणकला में प्रममाव की प्रधानता है, उप-साम गौण हैं , एष वाक्कामा में साम की प्रधानता है उस्य मा गौण हैं । इस गौसमुत्य माव के कारण तगादग्याय से हम मम को उम्प कइसकते हैं प्राण को मम कर सकते हैं, एक वाक् को साम करसकते हैं। या उक्थ शुक् है, मझ पजु है, साम साम है। इस प्रकार उम्प-प्रम-सम मेद से पारमहर यजुर्वेद में तीनों वेदों का सममय होगाता है। - २-प्रतिष्ठावेद (ऋग्वेद -ऋग्यजु साममय ) दूसरा है प्रसिप्ठाद । इसीका नाम अग्वेद है। यह प्रतिष्ठातरच प्रास्ममि, मसतोध ति, सतोपृति मेद से तीन मार्गों में विमत है । मन-प्रास-वाक् की अम्पाकृतावस्या का माम- सवारे, पो मारमा है । प्रत्येक पस्तु पर इस भारमहरण सचामन का अनुप्राह है। प्रत्येक वस्तु पत्तिमानारम है । सूय सरूप से निपमान है पृषपी है हम है इस प्रकार प्रत्येक पदार्य पा पदार्मस्व सुरक्षित रखने वाला गो भलिमाब-ससचा ह इसी का नाम मात्मवृति' (मारम प्रतिष्य-मात्मसत्ता) है। हम (प्रस्पेय पदार्थ) मन को धारण करते हैं, प्राण को एवं वाक् को धारण करते हैं। इसी पति से हम है। 'प्रहमस्मि' () पी मो मारमवति किंध- सपति यो यस्तु सचान्य होती है या मम्य सपा के मनुमा से सत्तावत् बन पाती है। उदाहरणाप-घर पहसे न पा, वह भसद या नास्ति रूप या ममात्र के गर्म में विलीन पा। कुम्भकार मिमी में प्रवास द्वारा भपर्ने मनप्राणवामय भारमा के मापार पर इस्तप्रयोग से गरता है। कुम्मपार के बौरवगत् में प्रतिष्ठित, अतएव वदाकायकाखि (पगकारा परित) मन माण गरु की सहायता से दया-पक-पीवरादि सापनों द्वारा ए मसत् पट १.

प्रहिवात्मा माशोपनिषत् ॥ मापका में रिपत मचा को प्राण कर सतायुक्त का गवाहै। पट में वो सारे व मिकी से पाई है। प्रसर का मत्सचा से सत् बन रहा है। इसी सत्ता की अपेक्षा से 'पर उत्पम इमा' या प्याहार होता है। अपूर्वसवधारण को 'भन्म' का गावा।। उत्पन्न बस्तु भपनी प्रान्त (उत्पादक) में ही प्रतिष्ठित रहती है। अतएव इस प्रतिसता को 'प्रसवो पृति' मा गगता सा कि-'पारम्म सिफारो नामषेय परिस्पेन सत्यम्" इस्मादि से स्प। हसरूप से हम मामपति रूप, एस राम असतो पति प।। जीवात्मस्वरूप भामति से पसत् गरीर सच्चमुह मन । पपी दूसरी प्रतिष्य। तीसरी सोमृति है । पर मी सत् है, पट भी सर है। सत् पट में सद बस मा इमा, यदी सतोप्रति है । दम भूपृष्ठ पर प्रतिष्ठित पुस्तक मेग पर रक्सी । मस्तित पदार्प स्प्रतिष्ठा में प्रतिष्ठित पते ए मम्प प्रतिष्ठा पर प्रतिष्ठित हो रे । महापाण माप प्रास की प्रतिष्ठा।भमाद मन की प्रतिष्ठा है। शरीर की प्रविष्य है।मारी प्रतिष्ठा पर है, पर की प्रविष्टा भूपिण, भूपिया की प्रतिष्ठा पानी । पानी की प्रतिष्ठा भनिए पनि कि प्रविधि प्रयु पप कि प्रतिधा भावपरा, भाषण की प्रतिष्ठा सौम्पप्राण, माण की प्रतिध मन है, मन की प्रतिष्ठा विवान मानन्द सत्र की प्रतिष्ख है। इस प्रकार या प्रविध उमणेत्तर के समायों को पाने में प्रतिष्ठित रसती प्रतएव हम इसे सतोपनि' पने लिये तप्पार है । इसी को परप्रविष्य भी कहा जासकता है। यही बस प्रतिष्य। पुषप्रतिष्टा भरमप्रति है, प्रातिप्रतिष्टा प्रसवोपति । एवं शिप्रविष्टा सवोवृति है। पुरुप प्रात, प्रहति दी मास्या में भाकर पित करने हप्तीमत उक्त सानो प्रतिष्ठधों पर मसगरमा-'पास्मरिवति' (भारम्प्रतिष्टा) पर ही पर्यवसान सिद्ध हो माता तीनों प्रतिष्य प्रतिष्ठा है । प्रविष्टातत्त '' ममताप माण, पैसाकि पूर्व के मामयेर माया मानुषपदी प्राणये सप्तपुस्पापक प्रमप्रगति प्रास्तारमा शोपनिपत् । अमीवर तप से प्रकट होता है। "प्रभ र सर्वस्प पथमजम्" "द्रम पेसर्वस्य मतिष्ठा" के मनुसार प्रमावर से समुद्भूत या प्राणप्रतिष्ठा साक्षात् घेद है । जैसे भप्रहसिक मार विष्णु से उप- म होनेवाले मात्र लोफ कहलाते है, एवमेव प्राणप्रकृतिक प्रमाक्षर से प्रसूत प्रतिष्ठामाव वेद माम से प्रसिद्ध है। पूर्वप्रतिपादित इन सीनों पतियों में मारमधति मग्नेद । क्योंकि भागे की सारी प्रतिष्ठाए पारमप्रतिष्य पर ही प्रतिष्ठित रहती है । मसतोवृति-सतोधति दोमों का भाधार पास्मप्रतिष्ठा । । यगु-घोर साम अक् पर प्रतिष्ठित रहते हैं । भतएव सर्वप्रतिष्ठारूप इस मामप्रतिष्ठा को हम अवश्य ही अग्वेद कर सकते हैं । प्रस्ताप ऋग्वेद । अक्ही उपक्रम ।। मारमप्रतिष्ठा ही इतर प्रतिष्ठानों का प्रस्ताव (उपक्रम ) स्थान है। असतोवृति यमुद । काप में कारस सचा का योग हो गाना ही असतोषति है। कारणसचा फाप में भारत हो जाती है। दोनों का यमन होता है। मत 'पननार' से इस असतोषति को हम अवश्य ही पद कहने के लिये तप्यार है । एष शेष सप्तोपति साममेद है। साम का 'पा सम मैने' या सपण । मारमधति पर है। अन्य को धारण करने वासी मारमसचा ही सतो- पुति है । मामधृति ही मागे जाकर सतोपुति बन जाती है । सतोपति अम्हपा मारमवृति से सममापफम ६ मत इसे सामवेद कहा बासकता है। इस प्रकार अग्वेदसप प्रविष्यवेद में प्रतिष्ठात्री के कारण अक्-पा-सामारिका वेदत्रयी का उपभोग सिद रोमाता है। । । ३-ज्योतिर्वेद (सामवेद -ऋग्यजु साममय) सीसरा रेग्योतिपद । 'सर्व तेमा सामस्म शश्वत' के अनुसार भ्योति ही सामवेद ।।भानग्योति, मूतम्पोति, ससम्पोति मेद से पोतितस्त्र तीन मार्गों में विमझ है। भारमम्पोति मगम्पोति है। सूर्प-पन्द्र-बिगुत-नव-प्रमि-भेद से पनपा विमा म्पोति भूतम्पोति पानपोति दी भूतम्योति की प्रवियो । शान ही भूत का भापार भूमि है। नयोति से ही भूतम्पोति प्रकाशित सती है, अतएव इस हामम्पोति को 'पोविपाग्योति १॥

पाहतात्मा भागेपनिपान् । पत्रिका में स्थित स्पा को प्राण कर सपायुक्त न पाता है। पट में गो सवारी की से पाई है। मसत् मा मृत्सत्ता से सत् बन रहा है। इसी सचा की अपेक्षा से 'पर उत्पम हुमा' या म्पहार होता है। अपूर्वसत्ताधारण को ही जिम्म' करा पाता है। उत्पन्न बस्तु अपनी प्रति ( उत्पादक ) में प्रतिष्ठित यतो ।। अतएव इस प्रकृतिसवा को 'प्रसतो पृति' कमा मापसा कि-"पापारम्पर्ग विकारो नामपेय मुधियत्येय सत्पम्" प्रमादि से पर। समरूप से हम भामहति रूप है, एक शरीर मस्तो पति कर 11 जीवाममचारूप भामति से अपए की सापुक बन पा है। पीएसी प्रतिष्य। तीसरी सवोति ।। बस भी सत् , क भी सत् ।। सत् भट में सत् यस मरा एमा, पदी सत्पति है। हम भार पर प्रतिष्ठित पुस्तक मेज पर रस्सा है। मस्तियुत पदाप समाविष्य में प्रतिष्ठित पाए पम्प प्रतिष्य पर प्रतिष्ठित हो रे । महाप्राण मम्म- प्राण की प्रतिष्ठा है।ममाद पन की प्रतिष्ठा की प्रतिपय ।मारी प्रतिष्ठा पर , पर की प्रतिष्ठा मपिण, भूपिया की प्रतिष्य पानी है, पानी की प्रतिष्ठा अग्नि है पनि कि प्रतिध्य पाप कि प्रतिष्ठा पावरा, भाक्य की प्रतिष्टा सौम्पमारा प्राण की प्रतियमन, मन की प्रतिष्ठा विमन है मानन्द सब की प्रसिद्ध है। इस प्रकार या प्रतिष्ठा सरोदर के समायों को भरने में प्रतिष्ठित रहती, पतष इम इसे सतोपनि पाने दिये तप्पार है। इसी को परप्रतिष्य भी कहा पासपतामही तीसरी प्रविष्य है। . + पुरुपप्रतिष्ध मारपपति , प्रातिप्रतिष्टा असतोपति , एक वितिप्रतिष्य सतोपुति।। पुरुष ही प्रातिप्रति व्यवस्था में मार मिति पश्चाने सम्बी है। यह तीनों प्रतिष्ठमों प्रमततोगता-'प्रात्मरिवि' (भारमप्रतिष्य) पर ही पर्यरसाम सिरो जाता है। तीनों प्रतिष्ठा प्रतिया है । प्रविष्टावत 'प्र'ममवत प्राण, साफि पूरे भारम्वेद में प्रताप पापुष है। यासी पाराशे सतपुरुपपुस्मरमक प्रमपणापनि प्रावात्मा प्रयाबेद पनिपत् 15- फास इन्हीं तीनों ज्योतियों के कारण म्योतिर्मय देक्तामों को प्रिसत्य कहा जाता है । उक्त तीनों स्पोतिए विश्व में परस्पर में निम सम्पद है । मानम्योतिर्मय मारमा (शिानारमा) सुपप्ति- में जब पुरीतति मादी में रसा जाता है तो वह भूत-एव सस्पम्पोतियों का प्रत्यक्ष करने में असमर्प होमाता है। सूर्य -चन्द्र-अग्नि-वार-पात्ममेद से पक्षम्योतिर्मय यह मानम्पोतिधन बीधारमा भूतज्योति के सहारे ही भप्यारमसस्था में प्रतिष्ठित रहता है । प्रादिसज्योति से ही र सतत् कर्मों में प्रात्त होने के लिए समर्प होता है । तदभाम में चन्द्रमा, चन्द्राभाव में भनि, भमि के अभाव में वाक्, सामाव में भारमा है। परन्त बिना सूर्यादि म्योतियों के यह मभिक समय तक नहीं ठहर सकता, जैसा कि प्रमूर्या नाम ते लोका' इसाटि पत्रमाप्य में विस्तार से बताया जाधुका है । शारीरप्राणों के केन्द्रभूत एदय में भो निखामज्योति है वही भाला है । भूतम्योतिर्मन स्य द्वारा मध्यात्म में प्रविध होने वाला यह भारमा सप्रमवरूप ग्योतिमप सूर्यादि के पिना फैसे प्रतिप्ति रह सकता है । इसी प्रकार मामरूप के बिना भी गुस् अनारम्प का विकास असमय है। नामरूप को छोड़ देनेपर अनात्मा निम्किम्पकमाष में परिणत होताामा मातिगत् से बाहर निक्स गाता है। ऐसी अवस्था में हम कह सक्त है कि उपयुक्त तीनों ज्योतिए परस्पर में मोतप्रोत रहकर ही उपसम्म होती है । इन तीनों मध्यमव बानायोति प्रस्तावस्थानीय होने से अम्वेद । विपपावसानभूमिपा सस्य पोति सामवेद है। दोनों का यमन (सम्पन्ध) कराने माटी मप्पपतिता मूतम्पोति यजुर्वेद है। समकार म्पोतिसक्षण सामवेद में ज्योतित्रयी स वेदत्रपी का मोग सिर होनाता है। मे - . पास्मा, मविष्ठा, स्पोति इन तीनों में प्रतिघ्य सातत्व , म्पोति चेतना, मारमा पामन्दपन है। सचभयभाव सत , चेतनामय पित् है प्रानन्दायपमान मानन्द है । विरवातीस विरार सम्पय के सत्ता-चेतना -भानग्द के भाश्रय से प्रतिपित एने पासा सिक- मूर्वि प्रमापति भी सम्बिदानम्दपन है, तदशमत मीरास्मा मी सम्पिदानन्द १, ईसरसमूत रिप भी 'सपिदानन्दम्' है । सपिलानन्दमन ईयर-चीप-विश्व इन सीमों के सच-घेतना पानन्द पर तीन वेद । सतरा पेदत्रयी का भी सचिदानम्दरप सिद्ध होगाता है । यही ब्रम २१ प्रारुवारमा -सोपमिपम् ।। (ज्योतियों की मीस्पोति) कहा जाता है। मूतम्योति पचि है, इसी मास की पपड़ा से 'म्पोतिया कागया है । इसी महम्पोति का निरूपण करती हुई उपनिषसि करती है- न तप सूर्यो मोति न पटवारक नमा लिपुतो मान्ति कोऽयममि । पेर मान्नमनुमाति सर्प तम्प मासा सपमिद पिमाति ॥ बत पपाप है। जबतक हम में ज्ञान है, तमी तक सूप-पन्द्रादि हमारे सिर प्रका- मित है। यदि हान पिसुप्त है तो सारे विस में हमारे विपे अन्धमारी। इसी भापार पर मारतीप मापा में 'पाप मरा दो मग परम (पाप)' पर किंवदन्ती प्रचलित है । इसान- म्पोति से प्रकाशित मूतम्पोतियों का नागर स्यम्पोरि। इसका बहरिन्द्रिय पर मनुप्रा होता है। तीसरी ससम्योति नामरूपास्मिन है। नामरूपात्मक षटपदादि में यो माग बिग्रेप माम से प्रसिब नही मत है। यही तप विप्रनमापा में माण' नाम से प्रसिब है। या अमृतमाग पर-पटयदि समस्त पापों में समान है अबरोर रूप से पाती। पही पनिर (पपास) मामला कोपा से विशेष पन कर अप प''प्रपं पर यदि रूप से प्रपा प्रपा प्रतीत होने लग गया है। यदि नामरूप का परिस्पाग करदिमा पाता। तोबा अपनतस्त्र पौराधिक विशेषमात्र से पृपा होता मा मातीति का विषय बन जाता है। मामरूप के बिना पा सर्पया तिरोहित है । नामरूप से परिन्तिम होम्र ही वह प्रवरित रोता है। प्रतएव भरत को मापादित करने पाने, किला उसे भारिरूप से प्रचार में बने पसे मामरूप को हम मांग ही पोति' करने के लिए सम्पार है लिपपोपक्रम में समाए र सस्पनिरसन के अनुसार नामरूपामिका ज्योति समग्योति । ।सा कि निम्न भुवि से सरोगाना । "देनदमनं सस्पेन इमम् । नापे सस्पम् । वाम्पामपं प्राणरधा' (शत. ११.) इति ।

पापारमा पनिपस । प्रसीद । पास्म-पतिठा-म्पोति तीनों मिसकर एक वेद है। तीनों का समुचित रूप ही हम उपसम्ध होता है। प्रत्येक यस्तु की हमें भस्तिरूप से उपसम्धि होती है। मस्ति सत्तातरम है, यही प्रतिमवेद है । वस्तु :-पह हम मानते हैं । यह हानग्योति ही घेतना है। चेतना ही ज्योति द है। दो वस्तु है, बिस का हमें ज्ञान होता है, मानसत्ता का प्रतिष्ठाभूत वहीं तीसरा यस्तु जत 'रस' है । यही प्रिय है, यही मानन्द है, यही मारमा है, यही प्रास्मवेद है। अस्ति- माति-मिय की समरि ही वस्तूपसम्भिो । यही प्रयीद है । ससार का प्रत्येक पदार्थ वेद है, अनन्त पकिरी अनन्त मेद । समष्टिरूप से एक ही घेद है। उपमधिरूप यह 'सचिदानन्दात्मकवेद' नामअपकर्मात्मक भौतिक पदाप के माधार से ही प्रतीति का कारण बनता है। यदि मस्तिमत् पदार्प में से भामरूपात्मक मतभाग को हटादिया जाता है तो ससाप से निराकार रहता हुमा वेद तिरोहित हो जाता है । उपतन्धिरूप घेद को आप मग भी देखेंगे, मूत्र के माधार पर ही देखेंगे । त्रयीवेद के भाभार पर प्रविष्टित रहमें बासा नामपर्मप्रपश्च मसत् रहता एमा भी उस वेद मस्ति से मस्तियत् प्रतीत होने सगता है । ससार में पप पस्ति' 'पति' कर के देख रहे है, विश्वास कीलिए वह सब अपीगर्मित घेद है।पी मति अमृत है, जो भपत है यही है। साथ ही में मामरूपकात्मक मत्यमाग मी की है। क्योंकि मनप्राणनामय अस्तिमाग ही तो नामरूपकर्म का प्रमव । सी बेदविज्ञान को सरूप में रखकर भूति करती है- सर्वमा - "स प्रा पाव निपायर्या सर्वाणि मृतान्पपश्पद । एतद्पा परिव । एनटि-प्रपतम् । पदयपत तदपन्ति ! पवद् वन-यन्मन्पम् । परयो बाब पिपायर्या सर्वाणि भूतानि- मतिष्ठितानि । (रात १.५।१।२) इति । गरण नेपामापम्प का मामलापति से उत वेद पास्तव में प्रागपग्य है। पुर ( मनुष्य) प्रमापति से उत्तम केशवोमादि भेसे पुरुष को चारों मोर से बेरित का या पनिपत - प्रायरमा है यही सर्वत्र म्याप्त है, यही सब कुछ है, इसी में सब कुछ। यो मौसिकोद इन तीनों में मानम्दारमकवेद ही (यमुर्वेद ही) पहिला पुरजन है। यही सधि का मूलप्रमयी। यह अनेन । मनसो मवीप है, एकम् । मागे का सारा प्रपत्र इसी मम्पक वेद से उत्पम होता र उपम होकर इसी प्रतिष्ठित पर रहता , अन्त में इसी में बिसीन होनाता है- प्रम्पकादीनि भूनानि म्यतम यानि मारत । अध्यक्तनिपनाम्पेष सत्र का परिटेपना । अग्निवेदविवर्त्त अग्निषेदस्मयीद -( मूलवेद ) -मारमा भामम . सण यद अम्वेद -सामवेद पपिपयो मूमर -प्रतिष्टाबद ३-म्पोतिष 'सत् पित् --- चेतना भम् यजुर्वेद साम्बे + उम्पम्-१ - उम्पवेदा -----अमवेद माम - -३-सामवेद P श्रात्मवेदः-पेटापास्प : यजुर्वेद १ यजुरमि -- P अग्वे यजुर्वेद सामवेद अग्वेद प सामवेद । मारमा -१-मामप्रतिवेद -असतोपतिर मिति -३ सतोप्रतिबेद { मामा-१-बानम्योति भूतानि -मतम्पोर्षिद माममपेसम्मम्पोनि प्रतिष्ठावेद -मेदत्रयात्मक ऋग्वेद २ भूगमि + ३ ज्योतिर्वेद -वेदप्रयास्पका सामवेद' ३ सामामि प्रयरमा - पनिपम् । अपीयर 1 - - . प्रात्म-प्रविष्ठा-ज्योति तीनों मिलकर एक वेद है। तीनों का समुश्चित रूप ही हमें उपसम्प है। प्रत्येक वस्तु की हमें पस्तिरूप से उपसम्धि होती है । अस्ति मत्तमत्त । यही पविणवेत है । पन्तुरे-यह हम जानते हैं । यह ज्ञानम्पति ही घेतना है । घेतना ही ज्योति है। जो वस्तु है, निस पा हमें जान होता है, हानसत्ता का प्रतिष्ठामूस नही तीसरा बस्त- तत्व 'रस' । यही प्रिय है, यही भानन्द है, यही मारमा १, यही भारमषेद है। प्रस्ति- मानि-प्रिय की समरि ही पस्तूपसम्धिी । यही प्रयीदी। ससार का प्रत्येक पदार्थ वेद, 'मनन्त पक्किए अनन्त मेद । समष्टिरूप से एफ ही वेद है। उपसम्धिरूप यह 'सचिदानन्दात्मकनेद' नामन्स्पकरमक भौतिक पदाप के भाभार से ही प्रतीति का कारण बमसा है। यदि भस्तिमत् पदार्प में से मामरूपात्मक भूतमाग को इटारिया जाता है तो स्वस्वरूप से निराकार रहता हुमा वेद तिरोहित हो जाता है । उपसग्निरूप वेद को माप अब मी देखेंगे, मूस के माघार पर ही देखेंगे । श्रपीवेद के माधार पर प्रतिष्ठित हमें मासा नामपर्मप्रपञ्च सर्मपा असद राता मा भी उस पेद भस्ति से पक्षिवत् प्रतीत हो गया है । ससार में भाप यो इस 'मस्ति' 'पति' कर के देख रहे हैं, विपास कीगिए पा सब प्रयोगर्मित पेद ही है। सी मति अमृत है, जो अमृत है वही है । साप ही में मामरूपकारमक मायभाग मी ही है। क्योंपि ममप्राणपास्मय भसिमाग ही सो मामरूपफर्म का प्रमबसी वेदशिान लक्ष्य में रसकर युति करती है-- "स प्रय्या पाव पिपायो सर्वाणि मृतान्यपण्यम् । एतद्पा अस्ति । पतदि-प्रपतम । पदपपर्व पदपम्ति । एक्दु वत्-यन्मतम् । प्रय्या गाव विधार्या सर्वाणि मूवानि- मतिष्ठिसानि " (एस० १.।६।१।२।) इति । घेदतस्य को प्रामाफ्स्प कहा जाता है । मप्रमापति से उमृत वेद वास्तव में प्राजापत्य है। पुरप ( मनुष्य) प्रमापति से उत्पन्न केशलोमादि जैसे पुरुष को चारों भोर से पेशित कर प्राकृवात्मा साईपनिपात् ।। । - - सेते हैं, एकमेव प्रगपति से उत्पन्न प्राजापत्यवेद प्रगपति को केन्द्र बनाकर इस के चारों मोर प्पाप्त हो जाता है । सम्पूर्ण विश्व इस प्रामाफ्स्पवेद से प्राप्यापित रहता है। इसी प्रामापरप- वेद का दिन कराती गई मुति करती है- १-"प्रमापतिरिद प्रम मेदानां संसमसे रसम् । तेना विधमाप्पार्स सान् कामान् दुहा माव ॥ (ऐ मा " २- 'महावतं कर्म मा निम्फेवरप शनया ससमे, मेन सर्वफलमानुयाम, सपिय कामान् सम्पादयेयम् ।' इ- 'मानापसो पेदा" (दै० प्रा)। ४-"प्रमापतेर्पा एवानि श्मभूमि यद पेदः" (ले० प्रा० ) | उस प्रापनापति अपनी वेदविभूति के कारण पेदि, पेद, या, ममापति, मेद से पतसस्प बन जाता है। उदाहरण के लिए पार्पिप्रमापति की संस्थानों का विचार करिए। पृथिवीसहपसर्पक सप्तपुरुषपुस्पारमक भमि प्रमापति , पैसा निधनिति में बत पाप बाजुध है। भूपिण निर्माण की रचा रसने वाले इस मनिप्रयापति की सब से पहिले 'पुष्करपर्ग' पर पी जाती है। पुफरपर्ण इस की परिती प्रतिष्य बनती है । पार्षिकप्रनापति (महा ) पुपरपम पर प्रतिष्ठित होकर ही पाविधि निर्माण में समर्थ होता है प्रतएर पार्षिक प्रमा को 'पपमा कममोदममा' मादि नामों से म्पकत किया जाता है। इसी मा पार पर पपपुराणादि में भूमिण को पदमकमल माना गया है। पानी में हन्तायामक सूक्ष्मातिसूचम हरितर्ण की वो ' कायो कि काई मागे गाकर मास रूप में परिसत मेगाती । ही 'पुष्करपणे' । पुप्फरपण फर राम्दार्प ।-पानी का पना । पारम्म में । . प्रया का प्रतिशत पप का क्या सम्म पापमुगमोरा मार लाल Aप्राप्तस्मा प्राविति भाविमौविक लोन ए वन विहान माणदेखना चाहिए। १४ प्राध्यात्मा भाईशोपनिपम् ।। प्रयीवर पानी के उपर पानी से ही इसका निर्माण होता है । पानी प्रतिष्ठायम्य है, वहै । भाप इसमें चो मी गरेंगे विचीन होनायगा । सब से पहिसी प्रतिष्ठा यही पुष्करणपर्ण है । प्रत पानी का पहिसा सस्मरूप पुष्करपण है। सशरीर-सादय भार को ही मिशानमापा में सस फारा जाता है। अबतक पानी में उदयमान न पा । परन्तु पुष्करपर्यसप दो सपासी काई में पिसमाव का उदय होगाने से प्यदमाव प्रकट होजाता है। प्रजापति परति गर्ने के अनुसार प्रजापति पदय में प्रतिष्ठित होकर ही सपिनिर्माण्ड में समर्प होता है। इस प्रया पति की पहिसी प्रतिष्ठामि यही पुष्करपर्ण है । पुरमात्र में प्य है, दय प्रचापति की प्रविष्य है । उस पर्स पुरमाव का स्वरूपसमर्पक बनता हमा ही 'पुरकरलास्' पुम्फरपर्ण नाम से म्यवान होता है। इसमें प्रतिष्ठित प्रजापति (ब्दयशक्ति केन्द्रस्य ) ही पार्पियसृष्टि का कारण बनता है। अभी समाव का उदय नहीं हुमा है । पुष्करपर्ण में भभी पानी ही मपान है। पानी ही घनताभाव में भाकर सकेन्द्र बन गया है । इसी भाषार पर 'मापो पुष्करपर्यम्' ( रात० ६।१।२।२। पर कहा जाता है। भापोमम पुष्करपर्ण की प्रतिष्ठा भापोमय पारमठन विष्णु है । विष्णुकी नाभि में पुष्करपर्ण प्रतिष्ठित । पुष्करपण पर प्रमा प्रतिष्ठित है , मी पर सब कुछ प्रतिष्ठित है। सब की प्रतिष्ठा होने से वहां प्रक्षा को प्रतिष्ठा कहा जाता है, यहां इसकी भी प्रतिमा होने से मापोम्य विष्णु को प्रतिष्य की मी प्रतिध्य कहा मात्व है। विष्णु की नामि से पुष्करपर्ण निकला है। उसी पर मास-माप पाइ-प्रभामादरूप पर्मुल प्रमा प्रतिष्ठित है। एमापोमय पानी स्यूड पामी नहीं । पपि त प्रम्म नाम का वायुमय पानी है। इसी में सप्तरसात्मक दुग्म का उदय होता है, अतएव इसे धीरसमुद्र कहा भाता है। प्रतिसवरक्रम में वायु रोष समात्य है वायु गतिशीस , सर्पणशील है। इसी येष पर विष्णु प्रतिष्ठित है । यह वायुमय पानी मिस अपि ( प्राण ) से उत्पन होता है वह 'नारद' माम से प्रसिद्ध है। षणमार से अनुएप् है, सरवाक नैसे माती है एकमेव पनिपाक सरस्वती माम से प्रसिद्ध है। पैसे पार्षिकसमुद्र 'प्रण' कहलाता है, स्वायम्मुक्समुद्र नमसान् कालाता है, एपमेष पारमेष्ठम हम समुद्र 'सरस्वान्' नाम से प्रसिद्ध है । इसी में मनिप्रय , । २५ भावारमा का पिनियन् ॥ - . चिका सरस्पतीया प्रनिप्रित है। पर-पर्सोनों इसी बनियान पर प्रतिष्ठित हैं। यही वार- की मशि की मतप्रवर्तिका ।। या मापोमयो पनिया स्वप्रमा उमी नारदपि । प्राण) पर प्रतिपित है । इसी महासपि शिान को प्रसादमाषा में प्रकट करत हुए पुराण में कहा है "वीरममुर में रोप गय्या पर विपामगवान् सारो राउन की नामि में से कमन निकल गा। मप पर तुर्मस्त प्रमा बिराममान । पा पागे मेरो से सष्टिनिमाण फर रो। पिप्णुमगवान् के मम्सक की भोर नारद मो परे ग्नके पाप में रीणा प्रकल में व्या निदराम से हमें यही क्ततामा है कि सप्तपुरपपुस्पात्मक प्रमापति पनि) के म्यापार से सर्वप्रपम पुष्करपर्ण उपनामा, श्री प्रयापत्ति की, पिंच सारे पापि हिप की पहिसी प्रतिष्ठा बना । इसी ग्रस्प को सक्ष्य में रस कर श्रुति करती है- पत् पयपश्यन् सरिरम्प मध्ये-पीमपरयजगत प्रविष्ठाम । मन पुष्करम्पापननादि भान पठ एपिम्पायतन रामि ॥ (ता. १।२।१) पति । यही पुष्फरपर्म मागे बाकर सावायु की समता पानी की स्निग्धता के परस्पर के संधि मम्प से उपरोक्त पनमार में परिसत होता मा मपिणरूप में परिणत हो पाता है। प्रमापति के ये से पानी पा एमा पानी से पुकापस उत्पमामा, ही बनावस्था में भाकर भूपिण मनगया । इस मूपिण के केन्द्र में प्रगापति प्रतिष्ठित हो गये । यही पपिपी घेदमर्सि प्रजापति के समय से पेरि' नाम से प्रसिद्ध है। इस वेदि पर अमिरुप पी पी- पर प्रतिष्ठित मा । पार्पिर प्रमि मावात् के है। अग्निमय पवेद सम्पति । स सत्या- समवेदरूप उप प्रमापति के मर्कसप प्रामकतामों के बारा ( इसी पेरि पर) पाहता। सोमाइति दोन से ही ममिव २१ स्तोम पर्यन्त पितत हो जाता है। पार्थिव पियामि प्रन्यापान , शिप्रेमावणिम यासत्या प्रपिरोष। पररास्तोम्पपिम पासस्मा २१ पायास्मा झाईशोपनिपन् । जयीद पूर्णमासरे सप्तदरास्तोमापन्छिन यासस्था चातुमास्य एम पाप, एष यही ज्यो विष्टोम है । एकविंशस्तोमापछिम यासस्पा ममिया किंवा चपनयम है । इस प्रकार स्तोम- मेद से पार्थिव यशसस्पा उक्त विमार्गों में परिणत हो जाती है। इसी मनीपोमात्मक या से महा प्रावाफ्स्य वेद एकविंशस्तोमपर्यन्त व्याप्त हो जाता है । प्रिस्तोम सक अभिमय ऋग्वेद है, पञ्चदशस्तोम तक वायुमय पमुर्वेद । एकविंश तक प्रादिस्यमय सामवेद है । यही मुसवेद का स्तिान है। इसी मितान समय मे उक्त पार्यिप यासस्था पिसानयज्ञ भावानया पादि नामों से प्रसिद्ध है। अभिवायुरपिम्पन्न प्रर्य प्रम सनावनम् | दोह यासिस्पर्प-ऋग्- यः-सामन्तक्षसम् ।। (मनु १।२३) इस्पारि मानसिदान्त इसी पार्पित पत्रमाधिक मामापस मेद का स्पीकरण करता है। इस वेदतस्त्र की प्रतिष्य पियरपृपिपी, एव अमृता पृथिवी है। याविक परिमापा के मनु- सार चिस्मासिमय भूपिण्ड 'फपणामिन ' काताता है, एक चिसेनिघेयामिमयी महापृपित्री पु- फ्फरपर्ण माम से प्रसिद्ध है। (देखिए ० ६।४।१।१ ) । पिण्डपूपिणी में छन्दोमेद प्रतिष्ठित १, तत् सम्बन्धी पार्पिवया- पातानपन' नाम से प्रसिद्ध है। मूपिम येदि । मातृपि- वी महादि । । प्रजापति केन्द्र में प्रतिष्ठित रहता है, पा भनुपद में ही मतसापा नात्रुका । दयस्पित -द-पम्-रूप अन्तर्यामी नाम से प्रसिद्ध प्रमा-पिप्णु-न्द्र का नाम ही प्रजापति है । प्रमि-सोमावर वेद है। या मम्मि सोम उस प प्रमापति से ममिम है । इन्द्र हो मगर्भित होकर पनि बनाता है, विष्णु ही प्रमगर्मित होकर सोम करसाने लगता है। अतएव अन्वर्यमी उप प्रभापति के अश्पपमूत विमतरूपसम्पादक मनीपोमारमक वेद को रस पश्य ही प्रजापति के 'श्मनु' करने के लिए तप्पार है । दपमान का माम ही सम्म है। इस सम्म पम्तर्यामी का विपत वेद भी मारपमेष सम्म है । प्रमापवि सस, इसफा सेट सस्य, बेदमप विष सम-'ससे सर्व प्रतिष्ठिवम् ' । यही सम्मवेद पावरा मापेदिक भाभार पर २१ तक म्माप्त होता है। इस प्रकार यह समप्रमापति सम्म (वेद) के परा पानी . ६० -- प्रास्वारमा सोपानपत् ॥ प्रयायेर । -- त्तिका मरतीय प्रतिष्ठित है । मर-वर्ग दोनों इसी पनिवार पर प्रतिष्ठित हैं । यही वार- की मारि की मूमप्रवर्तिका ६ । पप पापोमयी अनिवाक प्रमा उमी नारदपि । प्राण) पर प्रतिणि। इसी महासएि विज्ञान को प्रसादमाषा में प्रकट करते हुए पुराण ने कहा- "दीरसमुद्र में रोप गय्या पर विष्णुमगवान् सोरोचन की नाभि पं मे फम निकम गा । कान पर पतुमुस्त प्रमा बिराममान । पर नागे पेनों से सष्टिनिपान कर रो। विष्णुमगरान् के मातक की मोर नारठ मोप उनर राप में वीणा प्राल में उप्र निरान से हमें पी ससाना रे नि मतपुरपपुस्पारमा प्रजापति ममि) प म्यागार से सर्वप्रथम पुप्फरपर्ण उत्पम एमा, की प्रमापति की विष मारे पापि पिच रापदिमी प्रमिण बना । इमी गस्प को सप्प में एप कर श्रुति कहती है-- यन् पपपायन मग्रिम्प मध्ये-नीमपरपजगतः प्रतिष्ठाप । मत पुष्करम्पापनादि भात पणे पिम्पायतन गपि ॥ (त• मा. ११) ति। पुणपग धागे गायर बार की माता पामी की रिमन्यता के परस्पर रे सहरि गायध मे उता पनमात्र में पारंगत होता या पिणतप में परिगत हो पाता है। प्रग मे पनी 11 रमा पानी मे पुषरण उनमामा, वही गनापरपा में पमा भाग नापा । म रिण र नेण्ट में प्रारति प्रतिदिन दरोग्य । यही पृयिती पनि प्रमालिके मे परि नाम मे प्रमियम वेदि पर भनिए पदी प्रदी प्रति ( 1 नि पनि माग । परिमप पद पेद सपास सपा म प्रमाके भावर प्राग मामों के माग (मी मेरि पर ) या दो। मेरी पार सोम पात मिल जाता । पारि पिएपनि पापा ममाप्रपामा पपिरोष पसामागिरम पापा 1 प्रतिमा या ईशोपनिषत् ॥ प्रपीपेर , भयचरमाबमय विधा शासम कर रहा है, उसका बही नियतिसूत्र, विहानदम वेद पदाप है। इस वेदसीमा के बाहर कुछ मी नहीं है । जिसका वेद नहीं पर भी न स मेद!, न म पेट । यो सम कुछ मामतामा मी वेदत नहीं मानता, पर भी न स पेद, नस बद। इसी वेद से वेदि और यारूप विच का निम्माण मारे। विनिर्माण के सिएसेसर अषम पानी ही उत्पम काना परता है। स्वायम्मुग प्रमनियमित वेदप्रजापति के काम-प- अम से वेद माम से प्रसिद्ध प्रय; नाम का प्रस्ताव उत्पन्न होता है। इसी मिथुनमाव से प्रयीवर पष्टि करने में समर्थ होता है, जैसा कि भागे जाकर स्पष्ट होगायगा । उम्प मूसवेद का ऋत् माग छन्दोवेट है, इससे मूर्ति का (पिप का) निम्माण होता । माममाग बिताननेद है इससे परिमामा की स्वरूपनिष्पत्ति होती है । एक पन माग ग्सरे, यही गतिमा का अभिष्ठाता है। इन सीनों वेदों की मूतप्रतिष्ठा मानुतिरूप प्राम र (पपवेद) है।दी पारों मौसिक घेदोका निरूपण करते हुए महर्षि तितिरिकाहसे है- शग्भ्यो माता सर्पगो मूर्तिमा समागतिर्यामुपी एवं गश्वत । सर्प मा सामरप्या शवपत् सर्व ब्रमण रेप माम् ।। (• मा ३।१२।६।२ )। भूमिः पारणे दिवि देव ईयवे पजुर्वेद तिष्ठति मध्ये प्रह। सामवेदेनास्त्रमये पदीयते पेदैरयन्यनिभिरेति मूर्यः ।। (० २।१२।२।। मनप्राणपा के निवाब के कारण सीनों वेद पग-पगः-साम मेदसे तीन तीन माग ३ विमा है । इन समय विशद निरूपण उपनिषद्भाष्यभूमिका में किया पापुश्य है, मत गाल में इनके माममात्र का दिग्दरान करा दिया जाता है। 1 मामरम्म -सा ईशोपनिपत - उत्पन करता हा पृपिपीरूप वेदि को उत्पम का पारंपत्ति से युक्त होता मा-दि-वेद पा-पमापति भेद से बतुप्फत पनजाता है। इसी घेद रहस्य को प्रकट करते हुए निमधि- सिस मोव वचन हमारे सामने पाते हैं। '-"एप प्रमापविर्यदायम, एतद् प्रम, पसत् मर्मम् । वदेतत् पवनद-पमिति। तदै तदेतदेय सदास सममेव" (२०११) न देवा सर्प ससमपदन् । तगत् वव सर्य प्रयी सा पिया। से देवरा भनबन्-पनवे रुत्य सस वनरामी" (रा. २१) "सपा (पेदेनो पे िनिविदुः पृपिरी सपा यहो मापसे मिश्पदानि । प्रच्छिल याम पि विद्वान तयाहोता सबनोसदमासान् (मा०३७४) -"प्रय बेदः पृथिवीमनचिन्न् गुरासती गाने गहरपे । स चिन्दन यममानाप मोकमग्छि या मूरिकर्मा करोतु ॥' (तै मा १७६) 1-"येदेन रदगा भमुराणां विच वेपपविन्दत । मद् पेस्प मेदसम, भपिरेम मेदिः । सा पा इस सन दिः इमा - मपा-पर दिा' इस पाप के समय से सर्पमतप्रपच मभिप्रेत है । इसकी प्राप्ति उमी प्रीपिपा के तार में है। तभी तो पूर्वोत-प्रपा सार रिपाया ममाथि मृतान्य- पागन यापन परिताप हो । या प्रगति -वेद-पर-न चीन नमामों में मनुषस बनता मा म मदामुन ने केन्द्र में भ -पीसप तीनों भुक्नों मा गाता बनता मा मातपामी नाम से प्रसिद्ध होता है । पद पन्तयामी निम निपति ममम १८ प्रामवारमा का शोपनिषत् ॥ प्रमोद पक्चरमाक्मय विध का शासम कर रहा है, उसका यही नियतिस्त्र, विधानदम वेद पदार्म है। इस वेदसीमा के बाहर फुख मी मही । बिसका घेद नहीं बह मी न स पेदा, न स पेद वो सब कुछ नामता मा मी वेदतरस नहीं जानता, यह मी न स पेद, नस पेद । इसी वेद से वदि भौर पारूप विश्व का निर्माण हुआ है । विनिर्माण के सिएरासे सर्व प्रपम पानी ही उत्पम करना पड़ता है। स्वायम्भुव प्रसामियसित वेदप्रयापति के फाम-तप- प से सुवेद नाम से प्रसिप प्रयपा नाम का भपताल उत्पम होता है। इसी मिथुनमाव से प्रपी पुष्टि करने में समर्थ होता है, जैसा कि मागे गाकर स्पष्ट होनायगा। उम्प मूडवेद का अ भाग पन्दोवेद है, इससे मूर्ति का (पिप्प का) निम्माण होता है। साममाग बितानपेट है इससे परिमामार की ससपनि पति होती है । एक या माग रसस, यही गतिमाप का भविष्यता है। इन तीनों मेदों की मूसप्रतिष्ठा मातिरूप मम पेट (मविद) है। इन्ही पारो मौसिक वेदोका मिरुपण करते हुए महर्षि तितिरिकासे है- अग्भ्यो भावां सपशो मूर्तिमाः सागतिर्याजुपी शरमत् । सर्व तेजा मामलप्प 1 शानद सर्प द प्रमों प पम् ॥ (ते. ३।१२।१।१-२ ) । भूमिः पूरे दिनि देव ईपते पजुदे विष्ठति मप्ये पाहा। सामवेदेनास्त्रमये महीप बेदैरएपनिमिरेवि यः ।। (वै० ११ १२ १९०१)। मनप्राणवाक् के निवभाव के कारण वह तीनों वेद भण-पदु -साम मैदसे तीन चीन माग में विमा है । हम सबका मिशद निरूपर उपमिपाध्यभूमिका में किया नाव, मत प्रत में इनके माममात्र कर दिग्दशन करा दिया जाता है। २५ प्रास्वारमा अपाये पनिपत :- १-4न्दोवेद -मनि "-.mm""उम्पम्++-- वगतः २-रसवेद'-मप्पस्यो वायुमयोऽमित्रम ---- -पदः २-भिवानवेद -महिमममसम्" सामवेद -मूलवर १ साम +→→ -- १-छन्दोवेद -(ऋक्) १-विष्कम'-अग्वेद २-परिणाहा-सामवेद प्रयम् - यमुर्वेद सदित्य श्वस्मये छन्दोवेदे त्रयोपभोग १ 40. २-वितानवेद साम) १-पूर्णमासम् "भग्वेद २ २-उचर-उत्तरमणासम् "सामवेद 1- (मटिसा) रेय" "पुर तरित्प साममय बितानवेदे वेदश्योपमोग ३-रसवेद -(यजु) -उत्तरोन हसीमान्तो विकम्मा -अग्वेद ३ २-उत्तरोतर परिमन्ति मससानि-सामवेद सदित्य तुमपे रसबेदे वेदत्रयोपमोग ५-सपोरस्तरामे प्रतिष्ठित्पनि माक्-पाय प्रायममासि इति-प्रयीवेदानित • पियका धिप्त विरेचन पाय मानिए पत्र के मेदान्त-प्र में बेद म साप दिपार मामले में नियम। - मन्त्रार्थसम्बन्धिनी-अथर्ववेदनिरुक्ति , दप्रपी का निरूपण समाप्त हुमा । पय क्रमप्राप्त पौये मर्यक्वेद का सरूप क्ससाया जाता है। पूर्व के वेदत्रयी प्रकरण से यह मान लेना पड़ता है कि केक्स वेदतरम (वेदप्रयीरूप केवस भनि ) सृष्टि करने में असमर्थ है । सरि अग्नि-सोम के समन्वय पर निर्भर है। कारण सएि समरिभाव से सम्पग्य रखती है । एष संसृष्टि परस्पर में विजातीय योपा घृपामाग्म पर निमर है। योपा रयि नाम से, वृपा प्राण नाम से प्रसिद्ध है । इभर अक्सामरूप पयोनाम से सीमित नयरूप ययुर्वेद प्राणामक बनता पुमा केवर 'वृपा' सt, भग्निमय है । माग्नेय- प्राणप्रधान (प्रमानिकप ऋषिप्रामप्रधान ) यह पावेद सर्वपा प्रसंग है। ऐसी मक्स्पा में इस मसम वेरप्रमापति से तब तक सृष्टि नहीं होसकती, जब तक कि 'योपा' मामक संसग भक्तत्व (रपि ) उत्पन मही होमाता । अतएव सृषिकामुक अमीमय उस प्रमप्रमापति को सब से पहिले पानी ही उत्पन्न करना पड़ता है । सृषिकामना से प्राण मुम्ध होनाता है। मस्पेक कामना फससिदि पपम्त प्राणधोम का कारण बनी रहती है यह सर्वनुम्त विषय है। पही मुग्ध प्राणानि संघर्ष के कारण भरूप में परिणत होमाता है। इस का यह भर्प नहीं है कि ममुत्पति के मनम्तर प्राणामि रहा से नहीं । पा कार्यकारणमात्र कर्णवन्तु ( माली का बाहा ) के समान है । मकली अपने एक प्रदेश से गास बनाती है। श्री (प्राधिकरूप से) मास बनती है, परन्तु उस का सहप न्यों का त्यों बना सता है, जैसा कि सरूप गोत्पति से पहिले पा । इसी को "प्रमिमसचाक कार्यकारणमार" करा जाता है । पी भवस्था है। वेदप्राण का गो माग तुम्ध हो जाता है, प पानी बम बाता है, शेष माग मों का पों ससरूप से प्रतिष्ठित रहता है । इस प्रकार प्रगनाया के प्रभाव से होम हारा सर्वप्रथम पामी उत्पन्न होता है। एक ही प्रयापति प्राण-माप मेद से दो मार्गों में विमसा हो जाता है। माणमाग टपा है , पुस्प है, पति है । अपमाग पोपा है, श्री, पनी । इसी दम्पती प्रामवारमा - रोपनिषत् ॥ प्रसार १-दोषेद-मुनि ""उत्पम्----- ग्मेट -सवे -मप्पस्यो पपुमयोऽमियम --- यजुर्वेदः ३-विपनवे -महिममासम् साम+++ सामवेद मुलवद १ - १-छन्दोवेद -(ऋक्) १-विष्कम - अगद २-परिणाह-सामवे ३दयम् --पद सदिय शमये छन्दोवेटे वेदत्रयोपभोग - Ha-- २-वितानवेद - साम) १-पूबसूर्णमासम् २२-उधर-उधरमणसम् -"सामवेद ३-अग (परिमा) रेसा या -- तविरप माममये किसानवेदे वेदनपोपमोग HMM ३-रसवेद -(यजु) १-उपरोवर हलीमान्तो विष्कामा -अग्रे ३ २-उपरोपर प्रदिन्ति मयाहानि-पाय रिम्प यमुम्पे रसोदे वेदम्योपभोग -सयोस्तराते प्रतिष्टि पनि पाप-पार्वेद प्रारसमनासि इति-प्रयीवेदानिसक्ति • पिप्त रिवर करपाण मालिक पर टान्न- पद पा साप रिपार माया पुस। .

पारमा । ईशानप ॥3 अमर - एम' प्रादित्यम्य पर मा' इत्यादि नामों से म्यमत किया जाता है, यही मौलिकतरखो। क साम इस पशुपुरूष की प्रतिष्य है। इसी प्रपीविया का निरूपण करती ई नियुक्ति यदेवन्मएरम तपवि-सन्माम्यम्, हा प्रथा, सहचा मोफः । अप यदेतदचिदीप्यते, तन्मामवम् । तानि सामानि, स साम्ना लोका। प्रय य पप पतस्मिन्मएरमे पुरुषः, सोऽमिा, तानि यपि । स यजुपी सोकः । सैपा प्रप्ये विद्या सपति" (यत १०१।२।१-२ )। - - , अक्साम क्योमाध है, या वप है। वस्तुपिण का विधम्म ( पास ) प्रा है। वस्तु के चारों मोर का पेरा ( परिणाव ) साम है । म्यास को त्रिगुणित करदेने से मस्त का पेण बन जाता है। दूसरे शब्दों में वस्तुपिएर का घेरा कपिणा के पास से तिगुना होता है, इसी मापार पर साम का प्रिय माप' (तीन अक् का एक साम---तीन म्पासों का एक परवाह) या सषण किया जाता है। इस प्यास भोर परिणाड मे वेपित पस्तुतस्त्र या निस प्रवर कार में भय प्रतिषित रहना है, एवमेष यह (स्वतत्य) अमाम रूप म्पास और परिगाह में मातमुक यता है। इस मुशिमात्र को सक्ष्य में रखकर ही पशु को नप ( मम ) नाम से प्पा कर दिया भाता है।बय शरद भम राम्द काही पपाय मही, असा कि प्रा- पीनों में बय का पर्व मम पाहै। माधर्म की समता के कारण ही यजु को बप करा पाता है। अपि लिस प्रकार पर (पीपरा) में रहमें गामा पनी पमर से निकास पर भाकारा में पर उपर संचरण करता राता है, एवमेव असामरूप पहर में प्रतिष्ठित यमें पता गतिमति क्यु मितानभाव से समहिमामरस में विचरण लिया करता है, इस पहिलाप सापम्प से भी इसे पप (पचो) कागया है। इस बप को वपन में रसने वाले सीमित रखने पले भाफ्सनरूप अक् साम है, मतरत्र हने सोनार' (अप का बभन पाने वाला) कहा भाता है। बोनाप मोर मय की समरे 'मपुन माम से म्पमा होती है । प्रस्पक पस्तु पुन प्रावात्मा * सापनिषत् ॥ क मिथुममात्र से प्रमा उत्पम होती है। प्रमापति की इस इका का--- " एकाकी म रमवे, नद्वितीय--पविध पनी । इस्मादि रूप से भमिनय विपण गाता है। इसी सति शिाम को सदय में रखकर मगवान् मनु करते है- पचरफारमम्पक निस्पं सदसगात्मकम् । पदविघटः स पुरुपो मोके प्रति कीस्पन (मनु १०११) पदाविशन्ति भूतानि महान्ति सहकर्ममिः । मनमापपया सूक्ष्मः सर्पमृतकदम्पपम् ||॥ (मनु १।१८1) वेपामिदं तु सप्तानो पुरुपा मौमसाम् । मुपाम्पो मूचिमात्राम्प समपरपम्पयाम्पपम् ॥३॥ (मनु १।१२०) सपा तु सनामानि कर्माणि च पुपर प्रयक् । बेदरम्प एपादौ पृषक् सस्वाम निर्ममे II (मनु १२२११) सोऽमिप्पाप शरीराव स्वात् सिमपिविपामगाः । अप एव ससनादौ वाट पीसमाधमत् ॥ (मनु 1) विमा हपास्मनो देहपर्दैन पुष्पाऽमवत् । प्रर्दन नारी वस्पा स पिराममसमत् प्रमुः॥६॥ (मनुश) क मानब निशान के अनुसार योवाला के मिथुन से सर्वप्रपम विगद पुरुन उत्पम होता होता है दूसरे शयों में पलप ही इस मिथुनमात्र से मिण्ट्सप पन गाता है । इस विराट कर सहप पागे गार पर होगा, पहिरो मस्तल का विचार करिए । मूस के भू-साम-पप्प तीन विषय सताए हैं। इन तीनों को प्रमाण मापुषप- महामन-पुरुप इन नाओं से म्यगास किप्प पाता है। उदाहरण के लिए सूर्यपि (मनि- गेता ) मदुप, सौरप्रकारमण (रशिममास ) मसात सूर्यकेन्द्र में रहने पग स्पिति- मित गतिरूप प्रासानि पुपो । इसी को 'रिएपगर्मपमापति' रियमयपुरुप' 'पाशुप- १० पास्यामा ईशारनप | पुरम' 'मादिस्यम्य पर मा' इत्यादि नामों से रगत दिया जाता है, यही मौसिकस। माम इस सुपुरुप की प्रतिष्ठा है । इसी प्रीविषा का निरूपण करती हुई बाबियुति यदेवन्मपरस तपति-तन्माष्पम, ता अचा, स ऋचा नोकः । पप यदेवदचिदीप्यते, तन्मालम् । तानि सामानि, स साम्ना सोका। प्रय य एप एतस्मिग्मगरसे पुरुपा, सोऽमि , वानि यपि । स यजुर्णा सोकः । सैपा प्रध्येव रिचा सपति" (रात १०१।२।१-२ ) । अक्साम योनाध है, पगु प है। बखपिण का मिषम्म ( म्पास ) श्रा । यस के चारों मोर का घेरा ( परिणाह) साम है । म्यास को त्रिगुमित करने से वस्तु का मेरा बन जाता है। दूसरे शब्दों में बस्तुपिएस का घेरा बस्तुपिण के म्यास से तिगुना होता है, रसी भाभार पर साम का विच माप' (सीन प्रपा एक साम-तीन म्पासों का एक परिणाह) यह अपर किया जाता है। इस म्पास मोर परिणाह से वेरित बस्तुगत पा है। चिस प्रकार उदर में श्रम प्रतिष्ठित रहता है, एवमेव पगु (पशुतरम) प्रश्माम हरप्पास और साह में अम्तमुक्त राता है । इस मुशिमात्र को सक्ष्य में रखकर ही प3 को पप (अप) माम से म्यात कर दिया जाता है। रापद माम राम्द का ही पर्याय नाही, पैसा कमा- पीनों में बप का मर्प मम किया है। मनचम की समता के कारण ही या कोप का भाता है। पिप मिस प्रकार पसर (पीमरा) में हमें बसा पचा पमर से निवस कर भावारा में पर उपर संचरण करता रहता है, एवमेव असामरूप पदर में प्रतिष्टित पर्ने पासा गतिम िपशु बितानमाष से समहिमामास में निवरण किया करता है, इस पविलाप मापम्प से भी इसे बप (पपो) पहागया है। इस बप को बधन में रसने वाले सीमित रखने पले भाक्तनाप शुक् साम है, अतएव हमें बोनाप' (अप कर बाम करने पसा) मय महा है। क्योनाप मोर प की सनी वयुन' नाम से पधा होती है। प्रोपक बस्तु पुन प्रागारमा कामोरमिपन । है। युन में पप-योनाप लिमाग है बय ययु, पोनाप अमाम है, अक्साम पड म मोतमोत रहते है। इस रहस्य को सघर में रखकर ध्रुति करती (- "ते पदा स्तुनते यानुरासति, प्रथास्मिमेत पपदकते नुरोति । तटेनमेप रसोऽप्पेवि । न मे मातपिद स्तुत शते, इति पश्यन्ति । नो मादुरपमि वि। अपिमेन पश्यन्ति । प्रात्मा प्रमिः । वदेनमेनेऽरम रसो मुस्वापीव सच साम प । बदमे श्वसामे यमुरपीवा" (मत.१.१।१।।) इति । इस से पर सिम होगता कि बस पायतनरूप प्रक्साम सपि करने में असमर्थ है।अक्सामहर म्पस परियार से कोई वस्तु उत्पम नही हो सकती । म्मास मप्परेय, परिणाम पारों मोर को रेख है। पड़ी रेबरमक किंवा सेवारमा एक पुर (सीमामा) है। इस पुर में प्रतिष्ठित परिनि 'पुरि गरे के भमुमार पुष्प, यही मपिका है। मपुसक पर साम सहमारी मात्र है । बक्सामरूप पाद से पग्दित पपुस्य 'दिनम। पत्- पौर रोमनों को समशि पहु, पैसा कि भागे पाकर स्सए हो गया । यत् माग पास (प्राण) , न माग पान (भाकारा ) । इस पत्रूप प्राणप्रयु के पापार स पुरुप मर्पयाक माग ही पुम हो कर भाप में परिणत होता है, जैसा कि 'सोऽपोऽसमत पाप पर मोनद । पागेर साऽसम्पन' (१।।) स्परि भूतियों से सा। पानि पुम्प रोकर पामी बन पाता। इस का प्रापर प्रमाण पनि परि ग से अपना पेग्मन्तर से शारीप्राणानि मुम्प हो पाता है तो उसी समय पहाने निस . पाते हैं। एमीर में भदुत्पषि तीन प्रकार से होती है। परमम करने से पानी उपम दोबाती। ग्रोक पानी उत्पम DJ 1, एक प्रेम से पानी उत्सम होता है। परममानित एमी 'मेर करना , रोप दोनों गोकास मेमाम माम से प्रसिद्ध है । इन तीनों पानियों के अतिरिक एक पोपा माविक पामी निरन्तर रोमकूपों से निकला करय है। प्र-मुम्सामा-प-शि १४ प्रास्यास्मा शानिपत् । पारि में जो मानता है मह यहा सामाविक पानी है। इस प्रकार अभ्यारमसस्मा में प्रयुगति को र भागए हैं। 'प्रपेराप' इस सिद्धान्त के अनुसार यह चारों पानी अग्नि से ही उत्पम आते हैं। परन्तु इन गरे के स्वरूप में यह पता है । फापरूप म के चन्तर से मानना पाता है कि इन के फारसाग्नि में भी भारय अन्तर ऐगा। प्रसोरात यह भग्तर पान छेना मी मनुचित न हो। मानिसस सस्य और या मेद से दो भागों में विभक्त है। सस्यामि मौलिक अमि है, पहामि यौगिक भग्नि है। विशुदायस्पा सत्याग्नि है, मिश्रावस्या यहाग्नि है । सत्याग्नि अमृतप्रधान है, पदाग्नि मृत्युमभान है। पाधि परिभाषा के मनुसार सत्पामि निसेनिपानि है, पनामि चिया कि है । 'मद हरे पासना मर्पमासीमपतम्' यह प्रसिद्ध ह । मौलिक पनि प्रश्न ( Phrica) है, मियामि यह ( Chemistry) है । इस ही यह की प्रतिष्टा है-'प्रम सवाप प्रतिष्ठ' 1 सुप्रसिद्ध यजुरग्नि (वेदामि ) ही सस्यामि है । 'पन्न फवा सन्य चनमामाई' के अनुसार इस वेदानि के भाधार पर ही पहामि का वितान होता है । इस घेणामि की बगे जाकर तीन अवस्याएं हो पाती है। स्वयम्भ इस फी प्रपम विकासभूमि है, सूप इसरी विकासममि है भूमिण तीसरी विशासभूमि है। एक ही सत्याग्नि तीन स्पानों में प्रति टित होफर मिम मिम नाम रूपों में परिणत हो रहा है। दो तीन पिचों के पारण सरप फार प्रिमत्य' कासाता पयम्भू में प्रतिषित वेगामि ब्रह्माक्षर के सम्बन्ध से प्रमानि पसाता है, सूप में प्रतिष्टिम पही सत्यामि सौर प्राणरूप देवताभों के सम्माध से 'देवामि अम से एत्र भूपिणा में प्रति प्ठत पही सत्यानि भूत सम्पप से 'भूतानि करवाता है । प्रहरप पेपया सपाभ प्राणमप है, अतएव समाप्ति को 'माणाति' पहा बात है। यही मूस प्रति ।, पतएव इसे 'मानानि मी या जाता है । सूय बामप है, अतएम देवाग्मि पर 'रागपि' पहा पाता परयत की प्रति इसी से होती है, पर इसे पाक्षिप परिमापानु- सार पाप भी फसा आता है । भूपि ममादमप है, भतरण भूतानि पो 'प्रभादामि' पदा पाता है । भूपिण्ड में ही पचपरमाणों का मिस होता है, पारा समाप से हमे प्रावरमा सापनिपत - 'पागमामि' भी कहा जाता है। सायम्मुत्र भग्नि प्रमनिमसित वेद, सौर पनि ग्यपत्री- मात्रिक वेद । पार्षिक पनि सस्पये किंधा यामात्रिकद है । इस प्रकार एक वेदाधि किंप समामि तीन मागों में निम्स हो रहा है। दूसरा । पञ्चमि । इसका सबस अमादामि नाम के पार्षिक सम्मामि से होता है । पार्मिक सस्वाग्मि तत्सविस्त होक अपि-नायु-पारिस्प हम-तीन मस्यामों में परिणत हो जाता है। समामि भगन प्रभान है ममादायु म्यान- प्रधान , मामाद पदिस्म प्रारप्रधान है। मप्पस्म म्पानानि के कापार पर मगन-प्राणामि पर पर्पस होता है। पापपण तीनों का पजन है यही पह। इस से पंचामर माम के यानि का प्रादुभाव होता है। ममामि को हमने पार्पित बताया है। इस की मृत मोर पस मेर से दो अपार है । मुस समागम भूपिण के केन्द्र में प्रतिष्ठिन होता मा प्रजापति नाम से प्रसिद्ध है। इस अमिरस का उर्म गमन होता है। यी अमिरस #बा सस्पामि पृथिवी के २१ स्वोम तक म्पप्त हो कर पन-तरन-रिस इन तीन पास्यामों में परिसत होत्या पनि-यापू-मादिश्य करसाने उगता है। सर पपी में स्वोतोप मिा तीन लिया है। हम तीनों के नर (मापक) यही प्रमि-नापु-मादित्य है। टस पमि इन तीनों विवानरों केपण से उपस होता है मत इसे पैचानर' काना म्पायप्राप्त है। इस प्रकार एक से पनि की मत-मधु मेद से दो परस्पाएं, भपताम्मकीन प्रास्पामों की अपेपा से चार पारपार हो जाती है जैसा कि-"चतुर्दा मिडिवोपा अमेऽपिरास" (सत. 1 1) माल से सर है। 1-सम मि (भएताप्ति) मारमा प्रास्मम्मी-प्रमावि -पाति (मत्याग्नि -विषम् १-मग्नि-प्राणग्नि -प्रास्तामि सापामुषः-समनियमितवेदा १-देवाग्मि बम बाग्नि सौर:--गमत्रीमाविषयेद' समामि -भूपग्नि-समाग्नि पाराकारमा -+--पार्पिग-पाम्पनिषद २-सामरामि -पाग्नि -माग्नि -विधानि-रिसानवेद' पमामिः ?

पारुवामा शारोपनिपत्।। - इन चारो भमियों के कार्य सर्वमा निपत है। निषरण और प्रविष्ठा यह दो काम साफ- म्मुत्र प्रमामि केपरपरमाणुमों को एक स्थान पर मर रसना विवरण है, पदार्प को संभ- ठित रसमा विवरण है। पर काम प्राणरूप ब्रह्माग्नि का है, मतएव प्राण को विवर्षा का माता है। प्रस्पक बरत में एक प्रकार का टहराव होता है। पापायादि में यह टाव मधिक । नादि (नामा मादि) में सराव कम है। वित्त में मोर मी कम है। पदापों में वार तम्य से रहने वाला यह बरा ही प्रतिष्ठाता'म सर्वस्य प्रतिष्ठा के अनुसार प्रतिष्ठापर्म मामिका ।। प्रतिष्य और विवरण प्रभाग्नि के साक्षात् दर्शन है । दूसरा देवामि । रुप मौर विकास यह दोधर्म सौर देवमि के है । पुसकसिका मागे जाकर विक सित होती है, शित भाती है, सस्प मनुप्प का चेहरा सिता यता है । वस्तुभाव का या प्रसादमाव ही विकास है, इसका प्रस्तक एप्रधान सौर मग्नि दी। सारी प्रग सूर्योदय से विकसित होजाती है। गनि के तम से सकुषित पदार्प सौर प्राय से सिर पड़ते है । सौर एन्दमय भमि ही रूप प मपवा गोमगीति के अनुसार सप्ताप किं वा मनात रूपों में) का भविष्यता है। मतएव सूर्य को 'पणि' कहा जाता है । रुप और विकास देवमिरे सापात् बर्म है। तीसरा है पार्मिर मूतानि । पाक मौर सिमपन इसके सामाजिक धर्म है। दस प्रकार के सोमों में एक सेम ही नाम से प्रसिर । इस पत्र सोम की पन-तरस- विरम-गुप मेद से पार भक्स्पाए हैं। यही गरों अस्पाए विधाममाषा में समा ग-पर- परुण-धर्म न मामों से प्रसिद्ध है। इनमें शुक्सोम प्रमासोम कहलाता है। पापाणार पन पदापों की सरूपनिष्पति इसी परमासोम से होती है। 11 तरतसोम तरसता का प्रवक है। पानी-त-मादि में इसी की प्रधानता है । यु-प्राय- मावि में विस, सोम की प्रथा- मता है। पारमा में गुणसोम प्रतिष्ठित सत्य है । भरमासोमप्रधान मनादाम पदारपरि पाक करता है, ताससोममप पही माम पदायों को पिसा, देवा है । कर भग्नि की पाय- स्पा ), पिसा मा कपूर भग्नि की विसपनावस्या है। मम ही समाप्त करता है, भनि हो विसपन का है, जैसा कि 'भा संपामो विसपन च सेम -संयोगाव (६०) से रपए । 1

माहात्म्य
- शम्पनिपत् ।
प्रकार
है। पर दोनों में समादामि के हैं। चोपाई मि.मस्यापम पजाग्नि माम का परवानरामि ।
मेरेदार या दो इसके सामाविक पम है । गरमी मातुम होना-स्तु को बता रामना
दोनों काम वेगनर के है । हम शरीर को यहाँ से हवे हैं गरम पाते हैं। पर सामर के सापाव
पर्णन है । पूर्वोह तीन सम्माणियों में माप है, न दार है। मौशिक भमि में ताप-नार का
मवात ममात्र जप और दार्पणाधीन है। समय से ही ताप उत्पम होता है, सर्प
सेही दाह होता है। समामि निराकार है। उसमें संप कपमपि सम्म नाही है। सरप होता
पाधि हानियों में । इसी से बाप दासदस वानर उत्सम होता है । इस प्रकार इन
पर्मों से पुतबारों ममि निच कामरूप संपादन कर रहे हैं।
अग्नि प्रजापति
१-परपम्
?-
प्रमाधि स्थपामुष.
-प्रतिष्ठा
रेमिः-सरा
समामि (मपति)
२-पम्
पति-
यमि-पवित
पर प्रापयत्मनो मर्यपसीईसमवम्'
-
-विहार
यशामिः मेवानरः अभिः ( अ)

प्रास्वा मा का शरमिपत् ॥3 पर इम चारों ममियों से चार प्रशर का भिम मिस पानी उत्पम होता है। कारण पानी उ न पाना ममि का सामाविरुधर्म है । सायम्मुव प्रमाग्नि से पारमेष्ठप मम्म नाम का पानी सत्पम होता है। यही पवित्रतम पानी मागीली का सस्पसमर्पक यमता है। सौर देव मि से पीयि नाम का पानी विम्य पानी) नतम होता है। यही दिम्पपानी यमुना बस का सरूप समर्पक ममता है।पाधि मूनामि से मर नाम कर पानी उप्तम होता है , एवं भारतरिक्षय वाग पापमय चामर से अदा माम का पानी उत्पन होता है। वही पारों का ससप समाते हुए महर्षि ऐतरेय पर है- । - मात्मा पा इदमेक एमाम प्रासीमा पद बिन मिपत । सचिव तोकाम्नु सना इति समायोकान्समत- अम्मो मरीषियरमाप' प्रदोऽम्मा परेय दिन पौ. प्रविष्ठा । अन्तरिदं परीपय ।। पृथिवी मरः । या प्रपस्वाधा पापा (प्रदाया पापा । (ऐ० उ००१-२- ) इति । से साफ- पामानिदैविक मात् की पति । "यदेवोपदमुप-पदमुम वदन्निा" के मनु सार उस पारों ममिए हमारे शरीर में मी प्रतिष्ठित है। स यह भी इन चारों से पारों पानी उ सम होते हैं। किसी कार्य सिद्धि के लिए मनुष्प पब पारग्रम करने माता तो इस म्भव प्राणामि गुप्म हो पड़ता है। प्रतिष्यमाप शिषित होने सगता है। अतएव परियम के मावर पकाम मातुम होने लगी है। प्राणामि के विवरणरालि, मोर प्रतिधाराति के हास। का नाम पकान है। इस परिमम से सबसे पहिले सलाट पर पसीने माते । बसा कि मनुपर पही स्वेदवेदोत्पति में बताया गार्मे पण । ममधिक परिश्रम से सारे समीर में पसीने पूर्ने गते है। प्राणाधिक तप से पसीने मिकसते है, यही कार्यसिदि की प्रथमभूमिका है। भाधार पर चोक में प्रमुख्ने प्रमुक काय के लिए पसीना पापा"-मनी ! पसीने की कमाइ है। ऐसी किंवदन्तिएं प्रचलित है। शिरोगा सायम्मुषी है। भवएप तत्प्रतिष्ठ मसालि के पोम से पम ससाट में से पसीने पावे है।

प्रकिनारमा हाईमपात ।। पदि मनुप्प प्रेमविमोर होमाता है तो मोम् निकस परवे।। दीको प्रेमानु' का माता है । प्रेमामु से भारमा में एक प्रकार का शान्ति का उदय होता है। पा सोमिय मा है। सौरामि पुद्धि का अनुपाहको । मुनि योर मन साप गते है। बौदसौर मामा पर्पण से मन पर भाग्रत होता है। मन पिपस पाता है। हीमोग पमुरुप में परिहात होकर माओं से बहन प्रेम कैसा-पि, पवित्र साविक । मनप्रधान प्रेम हो । पर कारस है गोमुनिगम प्रेम मामग्द का बास है। सौकिक निरमप्रेम हुसका प्रक का बनता एमा रोक में ही मस्तम्त है। तीमरा है पार्थिव मताधि, किंभ पाशुगनि । यही पशुपति है। यह पपक के पथप्ठाता है. मूतति है। ससाना इनका सामाविषयमी, भलएन-'सरोहीत् तदूत्रस्प यम' के अनुमार रेगम के अधिष्टाता या पार्षिक भूमामि समाम से प्रसिर मत में (सामारिक Aपयों में) अपवित पामति रसनें से मोर का उप होता है । यह मोह न सोरममि) को कस बनता गाम को प्रय बनाता पा मनातीप समय से भगति प्रतक पाधि भूतामिका भमुमपदक जनता मा पारिमप्ति को पुरष कर गलता है। इस पोम से जो रोर पानी उसम्म होता है पी शोधानु नाम से प्रसिद है। परि पनी गरीर में ही सो विस्त (पागा पन) पजपमा मदि रोग उत्मम होजाते है। इसके पम्विक बेम से यही प संहार के बस बनगाते है। जिसे रोना मता हो उसे नीमर रोटेना चाहिये । सूब ममुपात करने पहिए । इससे शरीर इसका रोगावा है । जो मनुप्प इन मांगों के पी गाते है। भरप रोगी बन जाते है। पोपा बालयग्नि है। पति की उत्पत्ति इसी पनि से होती है। उत पनि से पाठकों को पारित होगया होगा कि पानी अग्नि से पच ऐना, है। पीप के प्रयन्तर वर्मा का मागमन महति । भनि में वाप है, पानी में आप नहीं। पमान मनिती वो पानी बना है मतएष पामीठा ममि (सीमा) मा यता है। प्रकापचा से विचार करिर । परिमम-प्रेम-योक भेद से प्रापामसम में बन राप्रपा पनी प्रधानरूप से अपम है। बावेद परिमममम । सध - । .

माहवारमा मा शानिपत अपवर प्रमर सायम्मुत्र प्राप्ति है। शरीर में सवार से नामि पयत पृथिवीमोफी, यही पस्तिगुम। एप पस्त मनरिक्षलोक है, यही उदरगुहा है। दय से कण्ठ पयत पुतोफ, यही रोगुण है, यही सूपटोक है। मरतक चौपा पारमेष्ठ पनोफ है, यही यिरोगुरा यही वयाभू भगवन् प्रतिष्टित है । इसी प्रमप्रमापनि की सपा से वेगाससान 'ब्रक्षरध' नाम से प्रसिद्ध है । परिमन से इनके पाक् माग पर माघात होता है पानी उत्सम होगा है। इसी का नाम पसीना है। इसी को हमन 'मम्म कहा है। सूप देवामिमप मतसाया गया है। इसी को शुक्रामि भी करते हैं। पाप्रकरण में पन्द्रम्म पन्थी' मा नाम से सूय शुकमा नाम से प्रसिद्ध है । प्रेमानपद में एक शोर में दोनों में मधि शुम्भ देता है। इस से मन पिरस जाता है । यधपि मनो स सभी इन्द्रियों से निकसत्य है, पर- म इसका प्रधान विनिर्गम स्थान पान ही है । मतएव भस बिन्दुको मानस ( मोकभाषा में 'मामप्या' नाम से प्रसिद्ध ) कहा जाता है। अतएव दोनों पानी मन के डाय व से ही पार निकलते हैं। मन चान्द्र है। पदमा सोम रसमय है यमनि। यदि पवित्र सौर पनि का इस पर प्रभात होता है तो पादान हुन होता है । इस टुति में प्रेमका उदेक है । अतएव इसे प्रम स' पदा जाता है। इस रसका प्रमास पुस पनि भाग्ने में नमक है। वे पागों रसमा पस्साए श्रदा-ना पस-स्ना-काम -रनि इन मार्गों से प्रसिब है। दम्परा मनोरस परि गुरु- पिता-माता-ठमाता विज्ञान-तपरपी-पाति प्रमों की भोर पाता है तो इस परानुयोगिफ- प्रामतियोगिक प्रेम को 'अक्षा का पाता है। पर हमारा मा पु-सेवा-पारियोटों भर जाता है तो यह अपरानुयोगिक परमतियोगिक प्रेमभात्सस्य कासवा। इन दोनों में एक बा भासन सकारे, एक का माया है। प्रथा में प्रेम करने या भवरकामा में, दिन के साथ मेम किस्य नात्य है. उपापा मेरे पासाय में प्रेम करने का उपाया में, बिन केक साप प्रेम किया जाय, ये श्रमकपा में है। दो ममिमपियों का पारस्म रिक प्रेम स्नेह माम से प्रसिद्ध है। यह प्रेम समान योगिक समानानुपोगिक' है। हो दोनों समान है। प्रथा-परसम्प-स्नेह तीनों प्रमों में प्रेम करने बसे भी वेतन, एस प्राहारमा माईग्रेपमिपात यदि मनुष्य प्रेमविभोर होगता है तो भम् निक्स पावे हैं । इदी को प्रेमानु' करा पाता है। प्रेमाधु से भाम में एक प्रकार का शान्ति का उत्प होता है। या सोगनिकी पा। सौमि बुद्धि का अनुपमहक है । पुद्धि पोर मन साए गये हैं। बरसौर समर्पण से मन पा माथत होता है। मन सिपत परता है । ही मनोवेग प्रभुरूप में "रिसत होकर पांचों से परमिस पर प्रेम कैसा-विप, पवित्र साधिक । मनप्रधान प्रेम बहार का कारण बानियान प्रेम भानन्द कर बास है। बौकिक विषयप्रेम इसका प्रक तक बनता मा शोक में ही मतमत है । तीमरा है पारित भूतारि, किंवा पागु गमि । पी परति है। यह प्रक्रि के प्रमष्ठाता है भूताति है । साना दलका काभाविककर्मी, मतरत-'सोऽरोटीन सदस्य रह-यम्' के अनुमार रेदनाम के अधिष्ठाता या पार्पित मूतामि रुप नाम से प्रसिर मवात में (सामारिकामों में) पधिपामहि रस से मोह का उदय होता है । मह मोर वानराति सोममि) को बनता पामको सा बनावा मा सनाढीप सपप से भमति प्रसा पार्थिव भूतानि का अनुमाहरू जनता मा पारिकग्नि को ठप कर गलता है। इस पोम से यो रोद पानी म होता है ही शोकान नाम से प्रसिदो । परि पापमी रास में ही रहमाता है तो विल (पागा पन) राजाप माल रोग सपम होगाते है।सके मामन्तक मेम से यही मसबार के घण बनगते है। जिसे रोका मगो उसे जीमर रोना चाहिये । तर मगाव घरमें दिएं । इससे शरीर मन होजाता । जो मनुष्य इन मासुत्रों को पी गाते है परप ऐमी बन जाते है । पौषा सामान है। मचारि की उत्पत्ति इसी प्रमि से होती है। उक्त ममिमी से पाठकों को पा विदित होगया होम्य कि पानी मधि से सम्म ऐया प्रीम के भनस्तर वर्षा का मागमन प्रतिनि। ममि में वाप है पानी में पप बग पया। बता पनि हो तो पानी बना है भतरव पानी मा ममि (मीम) मारता है। प्रापरता से विचार करिर । परिमम-प्रेम-गोड मैद से प्रापरमसंस्था में खान 0 प्रकारे पानी प्रधानरूप से गरम ते । ससादर परिप्रसाद । कम - प्रारुपास्मा अपवर ईशोपनिपत् ॥3 । है जैसा कि पूर्व की परात्परनिरुक्ति में प्रतसाया धारक है । इन पांचों बसों की उत्पत्ति में भामेछा ही प्रधान कारण है । 'उसे एसी इच्छा ही क्यों ई! पर प्रतिप्रश्न है । इस भोजन क्यों करते है। इसका उत्तर है---में मोजन की इछा होती है इसलिए । पर - भोजन की इच्छा क्यों हुई इस प्रश्न का उत्तर में में रम मसमप है । भधिक से अधिक 'एवरेच्छा' काकर पीछा सानिया गाता । जब हम हमारी इषा का ही उत्तर नहीं सक्से तो ईभरेष्ठा के सम्बन्ध में क्या कहा नासपता है । ईपरतत्व अनुमान सियो । क्रिया से (पहिाणा से) प्राण का अनुमान होता ह, क्योंकि बिना प्राण मन्तपपार-पा- रति) के बाग्म्यापार नहीं बोसकता 1 प्राणम्यापार बिना इच्छा के समय महीं है । सम्पूर्ण विस क्रिपामय है। इसका संचासन प्राण से होता है। प्राण का उद्गम स्पान था। साप ही में यह सब निर्माण हमारी इडा से को सम्बन्ध नहीं रसता । मवएक मानमा परसा है कि सपिनिमाण में बो फुल मैचित्र्य उत्पम होता है, प सम प्रमापति की रफा पर निर्भर है। बाबसा सा चाहता है, पैसा पैसा ही वना गवता । तमी तो ईशावास्यमिदं सपम्' इस वाक्य को वाबत् परितार्म होने का भासर मिसता है । पूोल जायादि पांचों बसों का मापारभूत मार उसी की रफा से उत्पन्न हुमा । घेद प्रजापति, किंग वेदापभिम पोरगी प्रगपति कामना द्वारा अपने वेद के वाक् माग से सर्व प्रथम पानी उत्पप करता है। पानी सत्फन कर 'प्रपा पिपया सराप मारिन्'(एस० २१११।।) के अनुसार उत्पम पापो- मपाठ के गर्म में प्रविए होगाया है। इससे मणत (ममाण) का उदय होजाता है-तत भाप समाच' इस प्रकार मप्पविर प्रजापति प्रागे की सप्ति कामना से प्रेरित होकर सम्पयोगिनी 'मैं इन पानियों से ससार को अपने ऊपर पारण कई' या कामना करता । उसी पण सलकाम समसेकम्प प्रजापति की काया से उस पानी में एक प्रकार का प्रविषम (प्रतिम बर) उत्पन्न होगाता है। पी प्रतिष्ठाक्य गोपयादि युतियों में पारा- बस' नाम से म्पमत एमा है। पवन में सातों सोकों को पानी ही पारण कर स्थ। सोक सक्की प्रतिष्ठा, मोक की प्रविष्टय माप है। पुरजन ही दो मोकसृधि का भविष्यात्म है-'सर्पमम प्रविष्ठितम् ।। - माहवरमा शिपनिपात ।। , गिन के साप प्रेम किया जाता है वे मी घेतन है । परतु पुस्तक मकान-वितादि अन्य सापर सपति के साप चो।मारा प्रेम है उसमें केस पाम' का विकास है। परमस्त के सप प्रेम करना ही कम है। उक्त पारों प्रेमों का परि एक ही स्थान में समावेश होता है तो-रवि माम के भपूर्वभाष का उदय होता है। रविप्रेम अधिकारी विच में केस दोस। मौर ईमर इन दो के साप ही रतिप्रेम पटित होती को हम घर की भविष्ठात्री समम है। गृासनी को हम अदा की पशि से देखते हैं साप ही में पुत्रारिषत् बीर हमारा बारसम्ममान मी रहता है। जी एक सन्मित्र की मावि उपित परामर्श देने वासी धीनसङ्गिमी है। सर्वथा पर बी के कशपाय, नासिका, मोह, पोस पशभूपा-नूपुरपनि मादि के साप मनुष्य का मो प्रेमावर्षी सामरूप है । यी रति है। या तक या रति स्त्री के साथ है, तब तक सं- सार। पन है। यही रति यदि ईबर के साप होगाती है, जोकि रति भासप्रदाप में में मामति' नाम से प्रसि । तो मुक्ति है । वपन मुक्ति का यही रहस्य है । प्रमादरम्यान के भागत से जो पानी निकलता है, वही शोकामु । प्रतिमास में इसी मासिबम्य पामी से रमत (पादी) का निर्माण होता है। पादीत के मामों से बनी है। इसी चिर-पति पि रमत न देयम्' या मादेश है। मई में यदि यनमान ररत दक्षिणा दे देग्य तो एक के भीतर भीतर पर महाप्रपण कर पाया । इसी लिए निनदक्षिणा का निपप किया गया ।इस प्रकार भनेक रियों से पानियों की सति का विचार किया जासकता है। पा तो प्रासनिक पपी । म पठिए प्रहात अवय की मोर । ममी केसवेर मपि सायम्मुन प्रायमप प्रम का सामाग्प है। मग्नि पर पम्पा है। इसका प्रदेश नियत ।इस पर पाक् माग से जो तत्व उरफ्नामा ए प्रजन या अपितु म्याप्त होगा । पानी पर भाप पहा भी गगे, प नियत प्रदेश में म सकर चारों और फैस पापी । इसी मास्ति किंध पाप्तिबर्म से या तापम पत्त प्राप' नाम से पास है। वेदप्रयी पक्माग सत्पम इस प्राप' किंग 'भप् स्व में मापा-पारा-पाप-मीपन-भव मैद से पाच प्रकार के पास होते है। इन सबकी भागासभूमि महामापामाम का बसको , प्रमा पानपत् ॥ - - पुरुपदपा अपमादितो गर्मी मपति यदेवः । तदेतत् सम्यो- भ्यम्तेमा समूतमात्मन्येषास्मान पिति" (ऐ मा २।५।।) नापाक्सोत्पत्ति के मनन्तर इन पानियों से उत्पम पित्र में एवं मना में भवन से पाप्त होमाक पर एफा होती है। रचा के सम्माहितोतरफस में ही पानी में प्राणिमत उत्पन्न होगाता है। पानी की -पापु-सोम पर तीन मस्याए । म्या इस अपायी का सामाविक धर्म है। संसार के इतर पदार्थों को भाप निस निफ्त प्रदेश में रह देंगे, वे उस स्थान से मागे नहीं मासकेंगे । परन्तु पानी-प-सोम में यह बात नहीं है। एक क्दुिमात्र पानी भी यहां गिरेग्न कहाँ से मागे फैस नामा प्रयापति किस रूप से निब में म्पाप्त हो रहे है। इसका उत्तर यही पानी है। अब्दप से प्रजापति सब पर भाप्त हैं मम् से ही सब का सकरण कर रस्सा है। मतएव 'सर्पमामोत सम्मादाप!' "पदमोदक म्मा पार { शत० VIDI) इमादि के अनुसार इस तल को- भाप भारि यदि मामों से म्पल किया नामतात की इरा (रस )स्थिर नही है, महती, मत- म्यातिठपका है। इयरस का प्रसास ही म्पप्ति में प्रधान कम है। प्रारम पानीको 'सग्दिनारा पस्प के अनुसार 'सरिर' मा पाता। सरित्समिस नाम से प्र- सिम है। पपपि पर ठीक यही पानी बोकरूप में परिणत होकर हुवमाक को फोनदेय है, उस सम्प या सरिर मही रास्ता । परन्तु बोकसृष्टि के पहिले ये दसरा रहा है। भइसी पूर्णक्रम को नाप मे रखकर-मापोवाइदम ससितम्बासा (गस.१९११ पर कहा जाता है। 'कस्मै देवाय हविषा विषम (सु . १३) के अनुसार बेदमूर्ति सम्पा, प्रतएव पनिक नाम से प्रसिद्ध प्रयापति' नाम से मात होता है। परक (भमिगत ) प्रजापति पानी उपप र सत्र म्पाप्त होवारमा, सदों में पानी के कारण सर्वप्रजापति किं निरक बनता पम 'प्रसम्' संपति से पाता। प्रमापति की कामना को अहम्' बनाने पण ही पानी है। मवरण " (अनिश्चममा पति) मत (सरमावपुरू) करोति" इस म्पुत्पधि से पानी को पास का पाय . - विरमा । ईशोपनिपन् । । बारामत को उपम कर के अनन्सर इन पानिों से सप १० उपम फत्त' इस (दा का उत्पन्न है। इस पा से पानी में प्रजनन शाह भागती है। समुच ससार एक सस र में रहने पाठे पार्षमात्र की उत्पति पामी से ही होता है। शुकमा ति कर कारण है। एक पामीर की सपाता है। फेन पत् सिमरा भर रिसय सा पानी से ने है । पामी भोषधि बनामोपधि एक बना है। इस प्रकार प्रमासरि का भोगदान मी पानी ही है. वैसा कि-वान्दोम्प 2 पनि तु पञ्चम्यामानाराप पुरुषचसो मम वि' इत्यादि पवामिविया में स्पट है। प सय रस ही किस एक विषप्रचाकी उनका कारको तरस 'माग्ने प्रस्या' इस चिन से इस बस को 'मापापस' कहा जाता है। निगु जापाठ पतक सृष्टि करने में असमर्थ है, जानिए मिसा पुरुपात को भाने में प्रतिष्ठित न करले । जाग्रहप गुरुमप नी मारिया की प्रेरणा से उस ममिये को मानें गम में प्रतिमित कर सेना है। ऐसा ममामित गण पानी ही प्रसनमधर्मा है । सी साप पाया है सौ परे। सोममप गपास ही सी र उगदान कारण है। अमि पुरुप । पही इस जापान से मेपित गमान मेसिनकीका ( मर्मरामत) मोहित साय मम। पर आपमान से सि बधित है। मब पुरुष के को डोमिये । शुक्र सोमप जाय। एक में हमें बाजी गर्मी पुरुप है । जीवत् पुस्प भी जाम है। भोपपातिक मारमा सर्वप्रथम पुरपणस्प गुमाहिम इसी गापा में गमधारस करता है। यी प्रासीका प्रपमगन्न करा- मम । पुस्प के समारा शुक पुस्फाकार को अपना मायतन बनाकर ही छोसित में भारत होता । शरसि प्रदेश का गुरु भात नहीं होता उत्पम प्रया में उसी मन की कमी रह जाती है। गुरु द्वारा माता के गभारप में प्राणी का प्रति टन होना इस का दसरा मम ।। १• मास के पनाता पपारस्तु के प्रत्यापात से गम का भूमिप हो गाना (स कब मसरामन है। मौतरमा त सग से लिप्तपाप्मा पन पामा स्पा मन्म है। पाप पा हद सम् के अनुसार इस चतुप गाम में प्राचा सर्वत मार को प्राप्त देवा है। सी रास्प सपन में रखकर महर्षि महीदास करते

प्राकमा
शोपनिपात् ।।
अमर
पांच वृतमम है। इसी प्रतवस को 'परिश्रित' भी कहा जाता है। भापो से परिश्रिता'
(श राशर के अनुसार प्रत्येक पिणा इस प्रतपस से घाश्चन्त रहते हैं। प्रप्त के उदर में मूर्ति
प्रतिष्ठित रहती है । प्रत्येक पिया को स्वस्वरूप से प्रतिष्ठित रखना भूतनस का मुख्य काम है।
क्सपिण सत्य है । पाश से घिरा रहता है। स्म पिपा के मी प्रापक परमाणु अवरूप
है। इस प्रकार अन्ततोगत्वा प्रत पर ही सव का पर्यवसान से बाता।। 'कृत नास्पनि
किबन' यह सिवात प्रसि।
इस प्रकार प्रमापति की इका से मामय स्वायम्मुन पानी में नाया-पारा माप नीरन
मत यह पाच मस उत्पम हो जाते हैं । इन पांचों वक्षों से ही पात्याप्रमापति का पात
पा स्वस्वरूप में प्रतिष्ठित है। गोपपनामा के भारम्भ में ही इन बसों का विवेचन
-
१-मनिषा मामिद सर्व धारयिष्यामि परिद विष" ... इदि पारा' ।
२-"अनिवा इद सब अमपिम्यामि यदिद निध" ---
पति 'माया'
५-"मदिरी इद सर्व-स्पामि परिद कि" ... इति 'पाप' समम्म प्रतिष्टितम्
४-"ठ - पा रस । ठहूँ जोमम् "नि 'भीरनपु'
-"भूत भूमिरिय मिता"
इति 'नवम्
१-"सर्वसामु पतिष्ठितम्" -वि-पारापप्तम्
२-"सर्वमा प्रगायते इति-जापावसम् “पापो में सर्वे देवा । माय
३- सर्पमापोम्प अग"-वि-पापोवनम् मानो मे मायते पदाम्पो देवता
१-"मापोमप प्राण "--वि-भीवनासम्
भ्या" इति निगमो मत।
1- नापति किसन"ति-पस
सबसे पहिले कप्प पा ! उपर बेदमय माणमूर्ति प्रसत् माम म पसिद सप्तपुरुप
पुरुषात्मकस्वपम्म सरप ममापति' । 'एकाकी न रमते द्वितीपर पतिपणी

पावारमा - रणनिपन् । अपरि - है। उपर कमस माम र क पुष्प मी है। कमसपत्र ही पुष्करपर्ण है, जैसा कि पीवेद निति में ममताया वाक्य ।। या मी भापोमय है। यही बामप पमित प्रयापति की परिसी प्रतिष्टा है। मन मे मा -प्रम फरोवि' से कमल काना मन बन जाता । सोकसधि का भभिष्टाला पानी हो । मोक-तु मुपने नने के अनुसार सोक काही नाम मुका है। पानी की सोक है, पतब पानी को मुग्न नाम मे मी म्पवान किया जाता है। बसाना यही है कि पानी में प्राप्तिसपण तीसरा 'पापोषम उत्पम होगा। भापोबसमनन्तर-मान पानिपों से मीरन का संचार कर-गदायों में जीर नीप गति रात्' इस इप्पा से पानी में पोपा भीरनाम सत्रम होता है। बात की स्वस्त प में यो स्थिति की उस वस्तु का जीन है। स्पितिरियुक्ति का माम दी मत्यु। गई वस्तु में गो गतिप्रवाद है वही जीवन का सूपको। प्रतिष्टाक्स के रिहम हो गाने से जिस समय प्रतिषस उपस्त हो जाता है, उसी पण मृत्यु का सामाग्प होगा। इस पशुमार को रोकने का यही भाम्पप्रासरूप बापु । कम्पासकर, मापोमप प्रासही कम्पाय (बीन का भविष्या स्मता मा पापोमय होने से सामसहाशिम माम से प्रसि।पही शिप जीनसता की प्रतिष्ठापी जीपनीय रस सीके सिप 'पा र गिरतमो ग्मतम्य मामयनेम (यो से ११।११) यह कहा जाता है।म प्रारा को जीवनसचा कर पाग समम । । परन्तु पस्ता में मानव का जीनीपरसही भीग्न पापाता मार में पा रस हत्य, तभी तक गोन। मनुष्प १५ दिन तक सपना जीवित रह सकल्प, परन्तु पानी मिा जीन गाए करना अशाप है। मन परमारें मे पातु महारोती प्राप निकलने में पायु होती है। इस प्राश कर रपण पी पादरम है। 'मानाप्रप पसम्पिन पुरे मामनि' (प्र. iमनुसार पर मत प्राणमि समत गगत नाम प्रचार प्राण में मौनीप सि रामने समोर 'नीरनाम मास में प्रगिर। 7 पापामा का शोपनिषत् । प्रवर उत्पम होते जाते हैं, स्पों स्पों प्रजापति की ‘एकोst पास्पाम्' या कामना पूरी होती जाती है। यही इसका मूमाभाव है , भूमाही मानद है । प्रमहरा विमम्म्य प्रजापति के भानन्द केसादात् दर्शन है। रप्ती सारे रहाय को सप्प में रखकर सामति करती है- "मरपाइदमप्र मासीद, लय उ-एकमेव । तदक्षत-मा यव-सदेकमेवारिम, एम्ताह मदेव म मात्र द्वितीयं देव निमग-नति 1 दम्पर्धाम्पत्, भम्पतपत् , समतपद | तस्य माम्धस्प तप्तस्म सवप्तस्प ससाठे नेहो यापमगायत-सेनानन्दत् । तमासीत्-महो पप सुबेदमविदामह इति । तपदायीत्-महदै पक्ष सुवेदमवियामा इति, तस्मात् मुवेदोऽभवत् । त बा एत एपेद सन्त सेव इस्माधवठे परोस । परोपिमा स हि देश भवन्ति प्रमाधिप:/++++++I म भूपोऽयाम्यद, भूयोऽसम्पत्, भूप भात्माम समतपत् । तस्य प्रान्तस्प तप्तस्य सतप्तस्प सर्वेम्पो रोमगर्नेम्प पुपक् स्वदपारा प्रास्यन्दत । तामिरनम्दस् । तनवीर-आमिमी पामिदं सर्प पारयिष्यापि यदि क्रिय, मामिमा ग्रामि सर्प मनयिष्यामि पदिद किस शामिपा पामिन सी-प्राप्म्यामि पदिद किय, इति । वपदापीदामिन० तस्माद् पारा ममबस्त मायण धाराष, पचास मियते । तबदीत-पामिनी• तस्माग्नापा ममतावमायाना सापाल, पचास पुस्पोमायते, पण पुत्र पुमामनरकमेकण्वतार तस्मात् प्राति पुरवत् पुलस्य पुत- त्वम् । सपदावीत् मामिला तम्मादापो ममबस्तदपामत्तम् । माप्नोतिर सर्पन कामान् पान् कामयते" इति । (गोपपत्रामण पूर्वमाग १ प्र.। १-२०) इति-अथर्ववेदनिरुक्तिः मन्त्रार्थसम्बन्धी वेदप्रकरण समाप्त ।

प्राकमास्मा का पनिषत । के अनुपार सृरिकामना से उसने तप और श्रम किया । इससे उसके प्राख में होम उत्पा धमा । पोम से दूसरे मिण नाम के प्रदर की सहायता से दूसरीमस्त उत्पम होगई । उस इसरी पस्त का क्या माम है ' ठर । सुवेद' । पदि कोई मनुष्प परिमम करता है तो सर्व प्रपम उसके पगट पर स्वेद [पसीमे] उत्पम होते है । प्राधिक परिम्म से सारे रोमतों से फ्सी चूने बगते है, जैसा कि पूर्व में स्वमाया माधुका है। इसी अभिप्राय से श्रुति करती है- 'स स्पोऽाम्पत्-भूयोऽतप्पा । भूप प्रास्मान संवप्तम्प- सम्पो रामगर्नेभ्यः षष् सेदपारा माम्यन्दव"-(०मा० ५.१)। लपम्पमापति से सत्पथ इसी मुर्वेद का नाम 'भपाद ।।भपता की म प्रमेवेद ममिमप होने से उप्र है।पभप्वेद किंवा सोमवेद शान्त है। भनिवेद ही मासिक रूप से पनी बार शान्त बन जाता है। यही इसका समान है मवरण इसे 'वेद' (शनिवेद) नाम से म्पमत करना अपप कन बाता है। इस सुवेद को परोवधिय देवता अपनी स्थानिक परोक्षमाषा में 'स्वदवेद' नाम से म्पत करते हैं। स्वेद को पसीना कसा बात है । यदि माप सीपी भाषा में अपविद का पहप पूना बात है तो इसका उत्तर -मापके ससाट पर आए ए पसी । प्रजापति के स्मेर ही का नाम 'अवरो' । त्रयीमा प्रपमनपा या सग। यी अप्रिमचि है, या अपोधि किंध सोममति ।। प्रपत्रमा, योगा। । प्राण, परपि। यह रिमनिमाता-दम्पती । इसके मिथुन भाव से सर्वप्रपम विराट् पुरुप उत्पम रोग, मिण्ट से मागे को सरिए राम । प्रारूप योबालसा, बेदत्रयीरूप साल दोनों ही सृष्टि के प्रमवर एक प्रमण को 'म' कहा जाता है। ऐसी अवस्था में हम उस दोनों ताबोंको 'म' कर सकते है । एक दाम १ एक पुपदनाम । प्रयीवेद प्रम नाम का प्रम। अपवेद समझ नाम से प्रसिद।। जैसा कि-'प्रमपमा मने एनम पाताम्' पनि ११) मादि से सामा भोपे अवर्षदेर का संक्षिप्त दिग्दर्शन । मुत्रम में प्रागे पाकर पूोल नाम पारादि मा उत्पच होते है । पीय पत्रिकी एवं मैनुनीसृष्टि के अनुप्राहक है।ो यो ममीन नवीन पदार्थ - Ye परन्तारमा अपये पनिपत् । उत्पम होते गाते है, त्यो स्पों प्रमापति की-एको बहुस्पाम्' यह कामना पूरी होती जाती है। यही इसका मूम्पमात्र है, माही भानन्द है। प्रस्मक्षण विषमा प्रजापति के मानन्द केसाचार दशन है । इप्ती सारे रहस्य को सक्ष्य में रसकर सामथुति कहती है- . अभ्यतपत्, 'घमारमा इदमम भासीद, सप -एकमेव । तदैवत-महदैया-तदेकमेवारिम,इन्ताई मदेव मामात्र द्वितीय देस निर्मम-इति । तदम्ययाम्पद, समतपत् । तस्प मारतस्य ततस्प सतसस्य ससाटे स्नेहो पदादमवापत-सेनानन्दत् । तमासीत-माई पद एपेदमविदामा इति । तपदावीत्-महरे पर मवेदमविदामह इति, तस्मात् एमेदोऽमात् । बा एत सवेद सन्त सेद इस्माचक्षते परोक्षण । परोभप्रिया इत्र हि देवा भवन्ति प्रमपविप । + + + ++ + स भूयोऽयाम्पत्, भूयोऽपत् भूप मारमान समतपत् । तस्य भान्तस्य सप्तस्य सतप्तस्य सर्वेम्पो रोमगर्नेम्प प्रपक् स्वदधारा प्रास्पन्दत । वाभिरनन्दस् । सदरमीत-मामिला मामिदं सर्प पारपिप्पापि यदिदं किय, पाभिवा प्रामिद सपै मनयिष्यामि यदिद किय मामि पारमिव सर-माप्म्यामि यदिद विध, इति । तपदावीदामियाः तस्माद पारा भमबस्त सारण धारास्व, पचास प्रिफ्ते । तपदाधीत-माभिध तमाम्नाया ममश्रावमापाना गापाय, पचास पुरुपो गायते, पचपुत्र पुमाम्नरकमेक्यतवार तस्मात् प्राति पुत्ररतत् पुत्वस्य पुत्र- त्वम् । सपदावीत् भाभियं तम्मादापो अमवस्तदगमरम् । माप्नोति र सर्वन् कामान् यान् कामफ्ते" इति । (गोपपत्रामस पूमभाग १ प्र.। १-२-७०) इति-अथर्ववेदनिरुक्तिः मन्त्रार्थसम्बन्धी-वेदप्रकरण समाप्त ।

प्राकारमा का शोरनिपन - अनुसार सृशिफामना से उसमें तप और मम किया । इससे उसके पास में पोम उत्पन पुमा । फोम से दूसरे विष्णु नाम के पहर की सहायता से दूसरीवस्तु उत्पम होगई । उस इसरी मस्त का क्म माम है 'तर । 'सुवेद' । यदि करें मनुष्य परिमम करता है तो सर्प प्रपम उसके सबाट पर स्वेद [पसीन] नापम होते हैं । समधिक परिमम से सारे रोमानों से पसीने भूने बगते , जैसा कि पूर्व में बसताम्म माबुका है। इसी मभिप्राप से भुति करती है- 'स मृगोऽाम्पत्-भूयोऽवप्यत । भूप प्रास्मानं सवप्तम्प- सभ्यो रामगर्नेम्पा पृथ खेदपारा माम्पन्दत"~~(•• पू० )। त्यम्मप्रापति से उत्पप इसी मुवेद का नाम 'पपरव' ।। अपवावी म। प्रीवेद अमिमय होने से उम है। यह अप्वेद किंग सम्वेद ग्रस्त है। पत्रिवेद ही मॉशिक रूप से पनी बनकर शान्त बन जाता है। ही इसका मठमा है मतपम इसे ''द' (सप्रेतवेद) माम से पास करना फ्यप का चाता है। इसी सुवेद को परोपिय देवता मपनी स्वामाविक परोपमात्रा में 'स्वदपेद' माम से म्यपत करते हैं। स्वेद को पसीना का जाता है। दि भाप सीपी भाषा में अपर का स्वरूप पहना पाहत तो इसका उत्तर है-पापले सबाट पर भाए हुए पसीनें । समप्रमापति के स्वेद ही कर नाम 'प्रपरपेद।। पीम प्रपमा पा यह सरा है । अपामा ममिति, पहभापोमर्षि किंम सोममति । पीपमषा पर पोचा। प्रास, दरपि । मह मिनिमय दम्पती । एसके मिपुन भाव से सर्वप्रपम पिराट् पुरुप उत्पन होप पिण्ट से मागे की सदिए होंगे। मरूप पेपाठच बेदत्रयीहप ताल दोनों ही सहि के प्रमत्र एवं प्रमत्र को 'म' करा पाता है। ऐसी मस्पा में हम यह दोनों लोको 'बम' कर सकते है । एक दाम है एक सुगमम।पीवेद प्रम नाम का नाम भविद मम नाम से प्रसिर । जैसा कि 'प्रसवमा इदमप्रे शाम पाम्ताप' सर्विया ॥११) इमादि से मारो पौषे मपविर का संक्षिप्त विमरीन । पुनम में भागे पाकर पोळ माया पारादि का उत्पम होते है। पीस पाकी एक मैयुनीसृष्टि के अनुप्राहकायों में नाम मन पदार्प . YC प्रातमा शाशोपनिपन मणु प्रदिप . . की प्रधानता है। पनीत प्राण में मी पारस्वरूपसमर्पक ममाद माग (पाधि माग), परन्तु मत्पम्पमात्रा में । इसी प्रासापत्य पानी से गांगेय पानी की सरूप निम्पत्ति हुई, पत पार्थिव पानियों की अपेक्षा गांगेय पानी प्रतिमधुर है या सापात् सोम , ममत है, चीनीय रस, दोष (कीटाण) नाशक है । इसी शान्त मपुर मस्त रसमाग से मुगुतल का विकास होता है। मर्ननग्रीस तत्तही गुहै। इस मुगु की पम-तरस-विरस मेद से तीन भक्स्पाएं होगाती है । पनावस्पा पाप माम से, तवावस्पा पापु माम से, एक विरसागस्पा सोम नाम से प्रसिद्ध है। दूसरे शब्दों में पनावस्थापन ग माप, तरवारस्यापम मगु गायु, विरता पस्पापम मगु सोम नाम से म्यपात होत्यहै। भप सब का मधुररस ही सधि का उपादान बनता है। प्रतएव इसे 'रेत' [उपादामद्रम्प-शुक] कहा जाता है। पी रेत पेठामि से सतत बन कर प्य रूप में परिणत होता है। इसी प्रमिप्राप से झुसि करती है- "वा प्रपा ममानवत, वाम स्था छापामरयत् । वमस्पेक्षमाणस्य स्पम रेवोऽस्म्म्मद । पदम प्रयतिष्ठत् । वास्तवाम्पमाम्पत, अभ्यतपत, सम वपत् । वा प्रान्ताम्हप्ता सनमा सार्दपेष रेतसा देपममनन् । वासा मन्या अन्यतरा प्रतिसपणा अपेपा प्रमादप । वा भयान्ता रेत समुद्र हवाऽतिन् । भयेतरा पेया' म्यादपः शान्तास्तवाभ्याम्पत्, अभ्य सपत, समवपद । साम्पा श्रान्ताम्पस्वप्ताम्पा मेवप्पाम्पो योत पासीद, वसम्पत । पदमरपव तस्माद् युः समभरत, समृगोर्मगुवम् । मुगुरिम में सर्वेषु मोकेषु माति य एम पेद'-(गो० पृ. ॥३-) इवि । 'पापुगपरपन्द्रमा इमेते मगमा [गो पू. श। रात गुतत्व में पारमेष्टय माप्प प्राण [परुण की प्रधानता राती है।मापोमय रेतही - रूप में परिणत होता है, पतएव व परुणो म्पगृहीत, तस्मात् स गुपारुणि' (ऐ० मा. १९) इमादि के अनुसार इसे पाणि (परसपुत्र) मामा जाबो । मसोमराठि से पही मर्षि प्रका] रूप में परिणत होता है। दीपशिसा भरिमा , दीपप्रमा संग [ग्स एमा मन्त्रार्थ प्रकरण - । रिकामुक मम के-या तप मम से मुनमतस्त्र में सर्वप्रपम मापा पारा, माप, स भीवन, मन, या पाच पस उत्पम होते है, पैसा कि पूर्वप्रकरण में बताया पा पुका है। प्रयीपन प्रजापति का परिणा कार्य सुमन पा, पयसोत्पति दूसरा काय है। इप्पा-तप-प्रम का विनाम नहीं है। तीनों म्यापार निरन्तर होते राते है। फसत नए नए पदार्थ उत्पम होते पते हैं । इसापादि सरि-मनुमों से मागे गाकर मृगुप्तत्य उत्पम होता । वत्पम होने पते भापोमप मम में चार और मपुर या रस उत्तम होते है। मपुररस भाप का सरूपधर्म है एवं चाररस (वायरस ) माणित बम है। पानी में रोगों से है। इस प्रश्नसमाधि के लिए पसीने पर परि गहिए। पसीना सषेद मा सम्म । पसीने में एक रोमों रस है, परन्तु हमारे पसीने में सबण रस की प्रधानता कारण हमारा शरीर पार्पिषमाग प्रणाम । एवं पृपिपी के मूल उपादानों में 'मृत' माम से प्रसिद्ध पारमाग की प्रधानता है। अतएव पार्षिक समुद्र पारप्रधान ही होता है। मपुररस महम्प माधमतप प्राप इम्परा पसीना किसी पस्तुको उत्पम नहीं कर सकता । पदि ममधिक मात्रा से पसीना में सगता तो उस में मधुररस अधिकमात्रा से संपठित गोमावा है। निसी पास्तान में गिर कर सटिका कारण बन जाता है।पोषारूप हमारे पसीनों के साप जब ययुगत हपामि का सम्पप होय तो इस योषा सपा के मिपुनमाष से पसीनों में स्मकीटाणु उत्पन्न होजाते है, जिनका कि एबीवस पात्र अपय माकोसकोप ( English ) से प्रमनिय बासकता है। साक्तार पक्मपुत्र के इम्ही सचित पसीनों से ( मस्फार्म में) सुप्रसिर मकरमय का बाम मा पा । इस प्रकार गीप्रमापति के घर में दोनों रस उपस महोते हैं। मतप तामष इमरप्रजापति में भी रोगों की सच माननी परती है। मन्तर फेरस इतना है कि पाईर में ) मपुररस की प्रधानता है, चाररस ममाम्पमात्रा | काय परम्परे में पचीत मभार (पपिपी) की प्रधानता थी, उस में पचीत प्राण । ।

प्रावास्मा झोप मपन - स्य मतिय । वायु प्राय-मपाम-म्यान-समान-उदान मेद से पनपा विमा होकर गादि सचार का कारण बनता है वही चौपा माणवायु है। साधारण मनुष्य जिसे वायु काते है, मिसका स्वगिन्द्रिय से हम प्रसव करते हैं, जिसके भाषात का अनुभव होता है,विससे मेघ-उस-पादि विष्प- मान होते हैं यह पायु उक्त चारों भार्गव मायुमों से सपा प्रपद तप है। इस सानु मूत पायु को 'यात (पाव भागत मेपजम्) नाम से म्पत किया गाता है। मार्गमायुचतरपी प्राण कपा है, यह बातवायु मौतिक है। भार्गवायु के साथ सापकी एक भगिरामायु का विकास मौर होता है। पगिरा से रस वायु म विकास होगा। रुव से १६ प्रकार के मस्या का विकास शेता-मस्तो सापुत्रास ], मरुत् आयु का विकार मारत है. यही बातबारे । इसी को 'समीरण' कहा जाता है। इसी का हम प्रायद कर ऐ । बाल वायु से सवपा विमा मौसिक मार्गक मापुमों में से प्राणवायु प्रमापति के पूर्वभाग में (पूादिक में ) रस्परूप से प्रतिष्ठित बताई। यहां प्राणवायु का जाना है। यहां से निकल कर प्राणप्यु सम्पूर्ण विष में म्याप्त होता है। अतएव पूविक्रम सूर्य के लिए 'भाणा प्रजानामुदयस्पेप पर [प्र. 31] यह कहा जाता है । मासरिघा वायु दसिदिशा में उपहप से प्रतिष्ठित सता है। यहां से निकलकर या सर्वत्र म्याप्त मा पिराधि का सरूप सपा दक बनता है। पश्चिपदिशा में परमान बायु उम्परूप से प्रतिष्ठित रहता है । इसी पान २ सिए- परमानो इरिव भारिपण' (सत. २RIUL) पा करा गाव है। एवं चौपा सरिता उमरदिशा में उत्पम्प से प्रतिष्ठित ग्रता । उस पारों वायुभों में से पमान नाम का वायु सौरममाण में भाकर स्पससम से परमान पारक गपि या तीन रूप गाण कर सेता है । बोरमसिह के सम्पाप से यह दोनों पायु बोररुप में परिणत होते हुए पोरामि नाम से प्रसिद्ध होगाते हैं । एकादरामनि पशुपति (मा- देव) की सोम भादि पाठ मतिर शिम पुमानादि तीनों सति प्रेशन है। परमान भूपिण से सकान्त पा है, पापक मम्तरिष में म्मात गता, एवं एनाम से प्रसि ६ सूर्यमासम्प पुसोक्स्प राव है। प्राणगाय हमें पूर्व से मिलता है, मारमा दक्षिण से, पाहवारमा भूना गनपत । । सोम] 1, इसी भाधार पर अनिपिगु , सममूग, महारेपङ्गिरा सम्ममूर' (1) इस्मारि कहा जाता। सोमशक्ति से ही या पदापों का सानन[सपात-एकीकरण] कातामा मनिर्गस बनता है मतएव 'विमा-गम्छति' इस निधन से इसे भृगु का भाताई । सद्गु ही परोधमाषा में स्गु नामसे प्रसिद। संकोच इसका सामाविकर्म है । तरण पापापम मगु को हमने पायु तसाया है । इस वायु की [भागायु की] माग-परमान- पातरिक्षा सविता या चार घबस्पाए है। पारों के मिम मिम कर्म है । पासप्रश्वाससप प्राणवायु 'परमान' ।। पह पत्रमामवायु (Oxygen ) और अम्म माम का प्रपम मार ( Hydrogen दोनों संसप होकर पूत पानी के उपादान बनते हैं, दूसरे शब्दों में परमान और मम्मके रासायनिक सयोग पीनमा पानी उरम्म होता है। यही पामी प्रिपमास-मूर्षित होने से पर' [मरण] नाम से प्रसिद्ध ।। दुमय । मावरिया वायु । संकेतभाषा मनुमार माता पिया का नाम है पिता महिमामपास का नाम है। पिस को पूपिनीशम्द से, महिमा को पु शम्द से म्यात किण बाता है। सभी पिण प्रषिमी समी मधिमाए पौ। सुप्रसिर पूपिणी की तरह स्प-परमेष्ठी-सयम्भू मादि सभी स्थिर पूपिणी है । जिस पर पाप प्रविष्टिनर उसी का नाम पृथिवी नही अपितु वेदिध नाम पृपिनी मागरभूमि का माम पिणी । पेदमूर्ति प्रमापति की प्रतिष्ठा का नाम पूपिणी ।। इस परिभाषा के अनुसार स्मयम्भू-परमष्ठी-म्य-पद्रमा-पूनिवा-या पाचों पिस पूपिया, पाचों ही परिषी होने से 'मावा है इस माता के चारों मोर म्याप्त हमें पासा मागन पापु ही 'गतरिना', जैसा कि भगे जाकर एए होगया । ममी केस पही समम ना पयाप्त होगी पिण के पारों मोर म्याप्त बने माता पिरासरूपसर्पक एवं रक्षक मागर पायु ही 'मानरिमा' है।जो माग बायु सांसारिक फापाको कापका प्रभाव के सिर प्रेरित करता है, या प्रेर पिता बायु ही तीसरा सरिनामा'विना सक्षिा बापु की प्ररणा के कोई भी प्राण कोई भी बात रायपुम्मुस मही न साती । इसी भाषार पर-सबिता देवाना मसविता' या पहा जाता है। रिस पायु से तप के पदाप गतिौर बने एt, मापारमसस्पा में दो प्रास्वास्मा रोप नपान ।। पगु प्रण वायु प्राण-अपान-म्पन-समाम-उदान मेद से पमा विमत होकर पलादि सचार का कारण बनता है ही चौया माणवायुहै। साधारण मनुष्य बिसे गयु काते है, जिसका वगिन्द्रिय से हम प्रस्पद करते है, जिसके भागात का अनुभव होता है,निससे मेघ-बस-पादि विप्य- मान होते हैं बरपायु उक्त चारों भार्गव वायुमों से सर्पमा पुपक तत्व है। इस सर्थनुमत वायु को पात(पाठ भात भेपमम्। नाम से म्पास किया जाता है। मार्गप्रयायुषतएपी प्राम रूपा है, यह पाठवायु मौतिक। भागवायु के साप सपही एक पगिण्यापु का विकास और होता है। भगिरा से सम्बयु का नियस होता है । रुर से १६ प्रकार के मामाय पर विकास है-[मस्तो उम्पुत्रास ], मरुत् वायु का विकार मारद । यही मान्य है। इसी को 'समीरण' कहा जाता है। इसी का हम प्रत्यय कर रहे हैं। बात वायु से संपण विमा मौसिक भार्गव वायुभों में से प्राणवायु प्रगपति के पूर्वमाग में (पूरिक में। उम्परूप से प्रतिष्ठित रहता है। यही प्राणपायु का नजाना है। यहां से निकल कर प्राणवायु सम्पूर्ण बिस में म्याप्त होता है। अतएव पूर्वविवस्य सूर्य के लिए 'भाग्य प्रमानामुदयस्पेप पर [प्र० उ. 11-1] या कसा गाता है। प्रतरिमा प्रयु दरियादिशा में उपहप से प्रतिष्ठित यता है। यहां से निकहार या समत्र म्पाप्त मा पिएसृष्टि पसरूप संपा दक बनता है। पश्चिमदिशा में पनपन अयु उपयरूप से प्रतिष्ठित रहता है । इसी परमान के लिए- पममानो हरित मारिरा' (रात० २१२U0) पर कहा गया है। एवं चौपा सबिता उमरदिशा में उम्परूप से प्रतिष्ठित राता है। उतबारों बाहों में से पम्मान माम का प्रयु सौर प्रमाण में भाकर रुससन से परमान- पारगुचि यह तीन रूप गरम कर सेता है। पोरमर्षि के सम्बन्ध से यह तीनों पर पोररूप में परिणत देते हुए पोरामि माम से प्रसिद्ध होगावे हैं । एकादरामनि पशुपति (महा- देव) की सोम भादि भाठ मचिए शिम परमानादि सोनों समर्जि, पोगन् । पवमान भूपिण से समान्त राय पापक पन्तरिक्ष में भ्याप्त यता, एवं शुरु नाम से प्रसि र सूर्पमपासहप पुगेकप गरि ।। प्राणप हमें पूर्व से मिलता है मातरमा दपिए से, 1 प्रास्वारमा गनपत । मगु रिय - - पमान पश्चिम से, एस सरिता उत्तर में मिसता है। पारों वायु मार्ग है गरों का उत्पति स्पान [सूप से कार) पापोमय परमेष्ठिमण्डस है। यहां से सौरमास में पाकर उस दिशा मों में क्रमश उक्य रूप से प्रतिष्ठित होकर ठरू वायु ऐसी सोस्प के सतपसगदक बनते हैं। - प्राण-पवमानादिपारों पापु सोम प्राप तीनों गुहै। इस स्गु से भागे मार - पला प्रामु कालिकास मेता है। पानी का नो माग गुरूप में परिणत होने से रोष रह नाता हैवी 'भप-मान-परिशिप्यते अनुसार प्रया' करता है। यही परिशित भपया माग मागे गाकर भगिरा रूप में परिपत होता है । तात्पप यह है कि पानी में हमनें मधुर भार पार मेट से रो रस बतलाए है। इन में मधुररस गुरूप में परिणत होता है सेप हारमाग भर्ण करताता है। माप पामी को जमीन पर गह दीजिये उसका सोमप्रधान मपुर रस तो सूपरमिमगत मप्रिय (सोमप्रिय) इन्द्रप्राय हारा भाकर्पित होकर पुलोक में पता बापगा इसी को पानी का सूपना करत है। पानी के बाप्परूप में परिणत होकर उरगाने से जमीन पर एक सफेद सा प्रग्या या गाता है मसापात् चार है। मत्र में पार निरोप मात्रा में गवारे, पतएव इसमें पारम्प्रग अधिक माय मे शेप गरे । मधुररस मधुप इसोक + सगसीप भाकपस मे इसोक में चला जाता है परमाग चारप्रमान पृपिकी के अर्मस से पी रह जाता है। इसी परिशिष धार का नाम 'प्रपा'। यही अपर्व पगिय का यमक है। दूसरे राम्दों में ग्राम्य पानी का ममुरमाग मुगु का बनक, पारमाग पपई की प्रतिय है। मधुररस एवं पारस गु-मौर मपाप नही। अपितु इन रसोंमें बनेपा म्पप गु और अपर्णा । । प्रत्यक्ष प्राप्ती के स्वर में दोनों रस है । इन में मधुररसा- बपिम मागर प्राण तो पुष्टोक में पाता रहता है एवं वारसापिस अपयप्राण यही इसी के साप यगय । मनुष्य के बातों में यम के मकान में यहाँ यहाँ पम्मुष्प बाता। मन उन स्थानों में प्रमाणा अनुरापरूप से म्पपप्त रहता है। इसी अपास्त्र के माधार पर यान्त्रिक बोगसमाप्रयोग करने में समर्प होते हैं। प्राणियों में पानप्राणी कच) इस प्रवर्ग १४ प्रायस्मा - सोपनिपत् ।। पगु-पहिर प्राण का परिवाता है। जिस रास्ते से चोर भागता है, उस एप्त्वे में उसका प्रयास मनु रायप से प्रतिष्टित होता जाता है। कुछ भपनी प्रापि से प्रपर्वाप्राण को परिधानती दुमा घोर का पता मगा सेताहै। मपर्णप्राय का भागेय से सम्बन्ध । भागेप मगि रुधिर में व्याप्त रहा है। इस एक समय से एक ही पपस्म सद्यानधारा में प्रतिष्टित होता मा जमन-मरणापौष का काम बनता है । अपर्धन एरा एफ की पवित्रता सारे मराध में पाप्त होगाती है। यह निराकारसूत्र यपि धर्मवों से नही दिसलाई पयता, परन्तु इसके कार्यों में इसकी सत्ता स्वीकार करनी पड़ती है। मापको सम्बन्धी मापसे पाम्सो कोस पर राता है। पदि उस पर कोई विधि माती तो तस्कार भापत्र रदय म्याइन्स हो पता है। उसी अपर्वासूमसम्बन्ध की महिमा है । विदेशाप बन्पु यदि भापको पाद करता है तो भापके हिस्का ( विकी) पहने मगती है। उसके माम सेते ही विधको वर हो नाती है, यह भनुभूत विषय है। भोरेगनों का मन मपया सूत्र सोम की प्रपामता से कोमस रहता है। एवमेव सौम्या स्त्री का मी अथवाप्राण नियस राता राता है, पतएव में एक जियों पर समाप्रयोग अधिक एक शीघ्र सम्म होगाता है ।( देखिए शत. १११६७।१।। भपर्वा मामा की विपसमूमि है मतएव भगिण को पपगहिरा' नाम से मी म्यगत किया माता है। एष भोर भगु है दूसरी मोर मगिरा माप में प्रयो। मप्पपतित मपर्वा कर प्रशनाप से मनिरा के साप प्यार से मगु के साथ सीमाएक समयपतित- म्याप से दोनों को अपर्वा मानचिया नात्य है । एणु-महिगामक या पपा ममम है । पा उस वेदमुनि म को सबसे परिसी मम्तान पेष्ट पुत्र है। पीयेर की प्रतिष्ठा म पगई म भरि है अपितु समएिकप अपना है। इसी भमिप्राप से निपती है- घमा देवाना मयप मरमा विषाय रचा मुनम्प गोपा। स प्रमारियो साविपापनिष्ठापपर्याप स्पष्टपुषाय पार (मुण. १।११।। । + CORRITRA रियर सरिगनात्ययंत पारिरिगर रेजना वासिए ।

प्राममा मा पनि पणि मपर्ण माप, चार है। इससे भगिय का विकास होता है, अगिरासे भमि का विकास होता है। उधर मुगु स्नेह तत्तरे मधुररस है। मपर्म की प्रतिष्य यही भगुवेदी । मत पगु को हम सोमवेद की प्रतिमा कर सकते है । परन्तु मानेपी अपवायी प्रयीवेद की प्रतिष्ठा बनती है । इसरे राम्दों में पीवेद मास्पात्रययुक्त भनि, अपु, मादिम्म मे मित्र प्रशिरा पर ही प्रतिष्ठित है। मनिवेद की प्रतिय श्रमियर पहिरा ही बन सकता है। . । . उपर कालाया गया है कि मप्पपतित पर्व दोनों में सतर्मत है। अतएव परमात मग महिरा पह दो ताल बच गाते है । एक मपुप्रधान को सरापार प्रधान है । सीपी माया में एक (ग) मीठा पानी है तो दूसरा (महिण) सारापानी है। जिस भूप्रदेश में पण की प्रधानत रातो मांझादि का पानी मीन होता है एक यहां प्रक्रिया की प्रधानता पद हैमा स्वरापामी मिशता है। दोनों ही भापोमरि होनेसे 'चत , पण मी जातो पहिरा मी प्रत है। भापोमय (सम्पहिरोमय परमेष्ठी प्रत। श्ववमर मरमेष्ठी" । स्वपि पार मेठप मास में मुगु और मलए दोनों पापोमप होते हुए है, परन्तु मागे जाकर [सौरममाण में बाका] माहिरा समरूप में परिपत होगता है। गु [भाप-आयु-सोम ] सदा पत प्रमान ही सत्य। महिरा सम का प्रमग ममता मा सत्पति गु । सपम्मू प्रगपति क तप से सत्पम होने वाले पही शात सम (गु-पहिरा) महो- गन्त्र के परिप्रुप समरमा सूर्य के जनक । पही दोमों पर माम से प्रसिद्ध रोदसी समुद्र के, एवं पानापिहप रोदसाटोप के सनक है । इसी प्रासम्मतिान को में रकार मुति करती है- पर्व प सत्पमीदारपसोय नापत । सनो राममायत ता समुद्रो पर्मप 10 समुद्राइममापि समस्परो प्रमापत । अप्रेरामाणि विवपहिचस्प पिफनो पगी.

प्राकवारमा । ईशोपनिपात !! मग प्रतिरा सूर्यापन्द्रमसौ पाता यथापूर्वमकल्पयत् । दिष प पिषीं पान्तरिक्षमयो स्मः ॥ ३ ॥ [अक् सं० १० म० । १२. सका इति । भपा को हमने प्रमा का म्येष्ठ पुत्र का है। यही अपर्या पनि यम-प्रादिस्प रूप में परिणत होकर भू मुव -स्व इम तीन सोकों का प्रवर्तक बनता है। यही रोगसीराम' है । या भप-भार एमपी से उत्पम मा है अतएव रोदसी को 'अपमपाम' पर- गये प्रादि नामों से म्पत किया जाता है। मप से उत्पम होने वासा ममि-पम-मादि स्परूप त्रयीवेद दूसरा वेद है। यही वेर सौरसस्या का सहपसमर्पक ममता मा 'गायत्री मात्रिक' माम से प्रसिर होता है। प्रयोक्षिा को साप सेकर भापोमप समुद्र में प्रमित होने पासा पुस्प प्रगापति सर्वप्रथम इस भमिश्रपीवेद को उत्पम करता है। विष की भपेक्षा स्थ पम्मुवामनिवसित वेद प्रयमन एवं हमारी सौरत्रिलोकी की अपेक्षा या वेद सर्वप्रपमय है। अमनिमसित वेद पुरुषाविनामूत पुस्पस्वरूपसमर्पक बनता [मा अपौरपेप पा, परन्तु यह गय० वेद इस वेदमपि पुस्प प्रमापति से उत्पम होने के कारण पौरुषेय है। हिरण्मयमणासस्प प्रमी- फ्न मिस सूर्य को माप देस मारे प्रमाण में सबसे पीने इन्दी हिरम्पगममगवान् का प्रादुम्पब होता है । सी सौरवेदमी की उत्पत्ति का क्रम बतलाती हुई बानिति कासी है- "तस्पा ( पपौरुपेपमेद ) प्रविष्ठायां प्रनिहितोऽतप्पन । सोऽपोऽस मत पाप पस (देवबाप एब) मोकात रागर साऽसग्यत । सोऽका मयत माम्पोऽदम्पोऽपिममायेपेति, सोऽनया ( प्रपुरूपविश्या ) पप्या पिपया सापः प्राविशत् क्त प्रापरे समपचत । वदम्पप रात्-पस्थिति । प्रस्तु-भूगोऽस्तु-त्पर सदनपीत । ततो उमेर मपपममग्यत प्रम्पवे विषा-[ गायत्रिपाधिको वेदः" [शत०६।१।१।१.] । .

पाहतारमा मी शानिपत मुगु गरा प्रीविषा ही प्रगपनि का पहिला प्रवियर है। प्रनम्तर प्रमश पोपापड पोएर, रेवोऽगामे से तीन भएर मौर उपम होते हैं। इस प्रकार एक प्रा पार मणों में परिपाठ होकर सबम्' वनमाना है। चारों मयों की समरि ही एक रोसी प्रमाण है इसी का नाम मौरमयरम किंचा सौरमिनोकी-(सौरमगत) ।। खायम्मुव पप्प [महिमामण] प्योम (परमाकाण) नाम से पारमेष्ठप महप्प समुद्र माम से म्यारल होता है, एव सौर पैवतप्य प्रमाण नामसे प्रसित है। यह प्रमास उस पापोमय पारमेष्ठप समुत्र के गर्भ में बुदरूप से प्रतिष्ठित है । एवं पारमेष्ठप समर सपम्म क यसप्प में (परमप्रकाश में) मुमुदरूप से प्रतिष्ठित है। वैसे म्पोम का अधिष्ठाता प्रमनि- भसितवेदावसिम स्वयम्भू १, समुद्र का अविष्यता सुप्रमाधिपम परमेष्ठी 1, एवमेन इस प्रमाण के पविष्टात्य गायत्रीमात्रिक्वेदापच्छिम मगवान् सूर्यनारायण है । पर अपापा के प्रपम प्रविष्टाता है। इन्हीं कब निसपण करती भुति करती है। रियपगम' समपनाने मूतस्प जात पतिरेफ मासीत् । स दाशार पृथिनी पामुकेमा स्मै देवाय पिपा रिपम ॥ पहु. १० १३१४) सरप्रयम मेटमपम्वपम्म प्रमका प्रारिसर ता. पनन्तर उसके बारमाग मे पापोपय मुग्राम का माविर्मार रानामग्रम पर एवं प्रगिरामप है। पाप-वायु- मोन परे पपिपमादिस अंगिरा ।।मों की समाधि पाप है। इनमें से प्रापोमय भगिरा म गायत्रीपामिक बेद उत्तम मा । प्रगिरा स उपम या वेदवत सूर्यप में परिणत र सी पपड़िगेमय अपसमुद्र में प्रतिष्ठित सारा दमय सय स्वपम्म का पदिमा प्ररतार पानी स पाप हा पहिमा भरतार गायत्रीमाधिक माम इस पORA रिवन मिरगरियामा मुरारोगना गिनमाण में रेनाशारिने ।

प्रास्यास्मा माशोपनिपात् ॥ मगु प्रविण का समरेट" यह पूर्व के सन्दर्भ से मसीमति सिर होनाता है। साथ ही में यह भी सिद होनाता है कि "भापोपय परमेष्ठी मन त में ही सारा सत्यविष प्रतिष्ठित है व परमप्ठी का काई मी अतिक्रमण नहीं कर सम्मा"। इसी विशाम को सक्ष्य में रखकर निम्न लिखित ध्रुतिश्पन हमारे सामने भावे हैं- 1-"तपत् सत् सस्पमाप एष दत् । प्रापो हि सत्यम् । अप एम सस्य [ग्रमनिपासितवेदसस्पस्प ] अनमन । सस्मापदषापो यन्ति प्रयेद सर्व मायते यदिदं कि" (शत ७ का । १।११५१क. ) । २- 'तमम परमेष्ठि वं नात्येति किंधन । श्ते ममुट पारित भूने भूमिरिय पिता || -'पापो सम्बङ्गिरोस्पमापो भम्पनिरोमयम् । पन्वते प्रयोपदा भगनगिरस श्रिवाः॥" 1-पाप परेदमन भाम।। ता प्रापा सत्य [ गापनीमाविकपदसत्यं ] प्रस म्यत । सत्प प्रम, ग्रम प्रनापति, प्रमापतिर्देवान् ते टेमा सस्पमिस्यु- पामते । वदेतत् ध्याधरं सत्यमिति । स इत्येकमवरं वीत्पेफमदर, प्रमिस्पफ- मक्षरम् । प्रथमोनमेऽचरे सस मायनोऽनृतम् । सदेववनृत ससेन परिणीत सत्पमयमेव मपति । वपत् वत् सत्यमसौ स प्रादिस्या"। [शत० १.०1८६१-२] प्रम-चेद-प्रयी-अपि-सब भमिमार्थक हैं । मुग्राम-पुपेद-प्रयर्ष-सोम पर सर ममिमार्थक है । मन्त्रोपात एनत्-मनेजत् तत्व यही प्रमनिश्वासित घेद है । प्रतिपादित पतुर्विध भार्गव पयुमों में से प्रयतम मात्रा से मन्यात मातरिगा। इसी मातरिया से पप की उस भनेरदेवड्प प्रम में मानुप्ति होती है। इसी से सारे प्रिय का वरुप सम्पम होता है। 'पाप' तत्व का सहप निर्वचन होनुका । समय है भाप 'पाप' के स्वरूप विस्तार 2 प्रास्वारमा नामनिपत । wa . से भागा गपे होंगे । मत इस प्रकरण को पोड़ी देर के लिये यही छोर दौनिये, एस प्रम पर रधि गठिये। पूर्व प्रतिपादित मार्य सम्बन्धी प्रकरस से विश पाठकों को यह भलीमति मिरित होगया होगा कि प्रमनिसित सायम्भुव त्रयौवेद का पजु माग ही सरि का मौलिक लो। रक्साम सहकारी मात्र है । या पुरुष है, साम नपुसको , केवट पदोहप है। श्रा सामारिएम पदनिपा-कर्ममप मम्पयपुस्प की विकासम्म , मवएन इसे 'पुरुष' शब्द से म्यान किया जाता है । यह यमुपुरुप दिनल की समारबत इस का नाम 'मग्नू' पर। 'रामागे सरस्वत्या पियाप्यो यमने सियाम्' इस कोरा के अनुसार 'जू' शब्द मायरा का पाचक है, एवं यह रान वायु का पापक। या वायु पनी विमत पक्माम मातरिका पारि मार्गमायु, एक अवधयु भारि से सर्वपा मिल पस्त है। यहाँ का प्रयु राह शपि नाम से प्रसिद प्रसव प्राण का परक है । यह पहप प्राणपु मिद गतिरूप है, पही मम्पप के कमभाग का विकास हप भाकाय नगर सिपतितत्त। पही मम्पय के भिषामाग का निवास है। 'पयाकाण्गतो निग्य बापुः सर्गभगो पा'mm) मनुमार पतितप माकाण एक गतिकप पाय निस्प प्रतिनामत । पिणा,म्पिनि, मापारा पाक, न, मह सब सन्द ममिमार्पक है । कर्म, गति पापु माण, यद, 40 सब राम भमिमापक है। यत्-पौर न इन दोनों प्रनों की समाधि पम्न' । यही पा' सर परोतप्रिय देनाभों की परोपमाषा में 'यमुर्वेद' नाम से प्रसिद्ध है। इसी पर का नियन करती ई बानिमुति करती है- 'भप बार पनुर्पोऽप पवते । एप पिमेरेई सर्व मनपति। पर्व पन्तपित मनु ममापते तस्माद् पापुरेप पनुः । भयंपाकागो ना, पदिवपन्तरि हम् । एवं पाघ्रगमनु मरने । तदेवपनुरापुरम, अनरिचप, याप, माप । तस्मापनु' ! +xx | तदेतपदुधासामपा: मतिष्ठितम अफ सादे पाना' (गत १.सरा१२ प्रसारमा शोपनिषन् । पश प्रपिरा - यत् पोर न दोनों ही अमृत-मस्यु मेद से दो दो भागों में विभा है। ममत न अमृता काय है, प्रप्त यत् अपत प्राण । मापन मोकाश है, मप यत् मन्यप्राय है। 4 की प्रतिष्ठा धपत है। भपताकाश इन नाम से प्रसिद्ध है, अपतप्राण प्राण माम से प्रसिद्ध है। साकाश माम् नाम से, मयप्राण वायु नाम से प्रसिर। दोनों अविनाभूत है। अमृता काराप इन्द्र, और प्राण से देवसधि होती, माकारारुप वाक् ( विसे इन्द्रपस्नी भी कहा जाता है। एष मर्पयायु से मतसधि होती है। देव भोर मृत दोनों सृपियों के उपादान ममिन ई मत देक भूत का अविनामाव सिर होजाता है । गौम प्रशनता की अपेक्षा से "य देवना' र भूनम' यह मेद म्यबहार प्रचलित है । वस्तुत न दबता भूत के बिना रहता एष म मूत ऐक्ता के बिना प्रतिष्ठित रहता । इस प्रकार अपनी मर्पपासा से भूतसधि का, ममत रसा से देवसृष्टि का भविष्याता बनता पुमा असामावलिम पुरुष ही सब इस पर रहा है-'पुष्प एपेई सरम्'। उपनिषदर्प का समय करने वाले ग्यास्पातामंनि मन्त्रगत 'मारिया' अमु को मप्र वायु' सममा है । फाइना नहीं होगा कि सानिक पदार्थों के पृषयावरण को न समझने में कारण फैसी कैसी मपार मूस होजाती है। सूत्रपयु तो हमाग यत् माम का 'मागणरापु' । इसी को सूत्रामा कया जाता है। पापु गौनय नद मूत्रम्' रात . ११ का ६।।।। से सापम्मुग वेदमर्पि सूत्रपायु की ममित है। मधारमा सायम्भू का मनोता । टेसिए. • भा०१५५ पृ.)। प्रमाण-नन्द्ररप दमाघरों की समधि मन्तमी, अमिसोम को समरि, किंवा सोमानित भमि स्पारमा है । भनि सपके है । यही मूत्रसस्प है। उपर मातरिरथ मार्गसपायुरूप बनता मा परमेष्ठी का मनोता है। । एपिस का उपादान होने से प्रम है। इसमें दो फसाए । मतएर या दिग्रम' पा सहकारी सी से उत्पम होने बासा सुमेद मुमम है । गु महिरा के भनपा मों से पा सुमम पाप पायु सोप ममि पम मादित्य इन ( मायों में विश । म प्रामा या रोपनिपत।8- गु-पक्षिय - । - - - 'पापत्रम' को हम 'परश्रम' नाम म्यात कर सकते हैं। हिना के समय से सब कुन उत्पम मा । त्रिम का (मय। बाग्म्पग (इन्वपत्नी) उसी प्रायरूप यत् के पापार से पानी पना है। यही पामी मम्म है, पप्पामक है। एक पाश्रमौठिक सएिक्रम में इसे 'बापु कना गा। पराप' पर सिक्षान्त सर्वविदित है। एष- 'वस्प बा एतस्यारागेपोपनिपत' [सन १. 11१।१] के अनुसार फराकर बात (म्यफनी) माझाद ममामि। पही तो प्राणम्पापन से होकर मम्भरूप बाप्पामक पानी के सप में परिणत गुम्यो जैसा नि-मागेय सामग्पत' इलादि रूप से पूर्व में स्पए कर दिया गया । इस यमप पारमेष्टर समुद्र के गर्म में इसी के महिगभाग से देगामि नाम से प्रसिभ गायत्रीमात्रिक मामि उत्पम होता है। यही पौरुपेय वेदाग्नि, मी सूर्य है, 'प्रपीमयाय प्रिगुप्सात्मने नमः । सौर रमिएं 'परीचि' नाम से प्रसिप है। इनके पर्पससे मर पानी तत्पम होता । मुक्ति मरीपि प्रति ही मर पानी है सौरामि से उत्पपापही पानी मागे नाकर क्रमा पाप-फेन-मन- सिकना-रारा-प्रश्मा-पप-रएप रूप में परिणत होता हुमा भूपिया का ससफ्सम- पंक बनवा । इसप्रकार का एक होम्-मायाकाश-मावाक् वास् (माकाग) वाप, पनि, पानी पिही इन पार सर्पो में परिणत होमाता है 1 पामों मूत पारमय है। तभी तो-'पपो बागेवेदं सबम्' (ऐ०मा १।१।६) पानीमा रिचामुवनाम्पपिना' (ते. २८) पर कामा चरितार्थ होता है । प्रजापति (पोणी) सक वेद का माम् । शम्दवमानसरप मतएक शदनाम से म्पपात बेदया उस भारमप्रजापति प्रसा के निवास है यही वेद पाक् म्प पी लिस का मसीसी बेदमूला, मतएव वेदमपी सधि का निरूपण करते हुए अपि करते हैं- । 'तस्मादा एतस्मादात्मन भाग सम्मना । भाकायादवायु, पापोरणि । प्रपेरापा । पम्पा पविती' [ उ २।।

प्राच्यास्मा
- पशोपनिषत् ।।
मग प्राण
7
.
प्रजापतिररमन्दी
शरीरम्
पाटकौशिकमिदसर्वम्
-ब्रह्माक्षर प्राणमय पाढीप्रजापति 'अात्मा
1-1-यत-गर्मियो भू-स्वयम्मा
-श्राकाश (माकाण)
३-२-पापोमय सपन-परमेष्ठी -वायु (वायु)
v-1-पयीपन: -सूर्यः
-श्रामि [वेन ]
| ५-1-मडिया प्रापा-पन्मा श्रापः [स]
16-५-परमयी----पृथिवी --पृथिवी [ पृथिवी]
'भनेमदेकम् , इस्मादि मन्त्र यम का निरूपण करता मा इसी भारमन्त्री प्रजापति
का विरसेपण करता है। यम का भनेगत् माग सोपाधिक विपामाग', एनत् माग
सोपाधिक फर्ममाग । पसाचसाप विमाकर्ममय मध्यप ही यह है। इस पर्सन की म्याप्ति
कहा तक है। उत्तर 'मापावत' । यहाँ तक मामी महेबर म्याप्त है, हो सक वेदवत्वम्पाप्त
है। तभी तो उसे परिमूर्ति सम्दसे म्यमान किया जाता है। महाँ तक मापी मम्पप म्याप्त
है, यहां तक तवमप्रकृतिभूत महामघर म्याप्त है। मुतर भारमघर के प्राणरूप विचारपर
से सपम पनीहत प्रामपञ्चमन के विपरीत वेदपुरखन की सच्चा यहां तक सिद्ध होगाती।
इस मापाचक्र को सामने रखिए, मन्त्र का अर्थ कीनिए, स्पितिणविरूपा सारी पस्मिति
स्पर होवायी।
।
संसार में गतिवान पपर्यपगति, प्रवयीगति, उमपगति मेद से तीन मागों में विमा
है।रपधक की गति समपात है।रप का पहिया (मायणी) मी पसरहा एवं परिये के
प्रापय मी पसरे। कुमार के पापा] की गति परयगति है। पक नरा भी नही
पसता, मात्र परा मी मी यर । पूर्वदेश परित्यागपूर्पक उतरदेश का सयोग करना ही

प्रास्वारमा # शोपनिषत् ॥ मुगु-प्रीय गति है। कभपने निपत कीटक से अणुमात्र मी नहीं पा | र एक स्थान पर ही यता इभ्य मम रहा है। यह प्य धूम या है, उस के अवयव घूम रहे हैं । एव मतकात का की गति प्रगति हम टेन में बैठे पे पर रहे हैं। हमारे भवफा नहीं पस हे अपि हम (भापती) पसर । इन तीनों गतियोंमें से प्रातमात्र केयस मापवगति का निरूपण करता है । मायावाशिम वेदपन ईयर सपा स्थिर है । पयत् सम् । एक ईमाशरीर में प्रतिष्टित पायावत् पार्य पदापों के परमाणु परमाणु गतिशीम है । म्यापक से ससार सर्पपा रिफर । पसरूप से सा । म्पटिशि से सब अस्पिर है। यदि किमान को छोड़कर भाप निम को अपनी राशि में सावेगे तो पापको सपषा पिर विमई देग्प, म्पतिभाष को सामने रसने से भी गीतशीस मिलेगा। प्रायवी स्थिर , अरपा पर है, पही तात्पपी। माप्त महर्षियों की रदर्शिता का जब हम निपार करने लगते हैं तो हमें मापर्पपक्ति र गाना परता । निगूठवम बिप्त मप्यात्मविधा के स्वरूप को पपावत् परिचानना भी कठिन सपस्पा, ऋषियोंने म्यानहारिक (सौकिक ) धम्तों द्वारा उसे इतना सरल बना रक्स कि उसे सममने में एक मान्दि मी साग में ही समर्थ होगाप । कुम्भकार (कुमार) खोक्मापा में 'ममापनि' नाम से प्रसि।पर-उदयाचदिमृण्मय पार्यों का निर्माण करने बहे, बस से यह मनुष्य कर अपियोंने 'ममापनि' नाम रक्सा, बोकि प्रमापछि रापद रिमुक्न विशाता पाता (ईबर) का बाधक है। साधारण पी से विचार करने पर कुम्भकार की इस प्रजापति सा में कोई विशेष महत नहीं माराम होता । परन्तु मम इस सम का सूक्ष्मेपण पिया बाया है तो प्रतीत हो पाय है कि कुम्मकार प्रस्तर में प्रमापति का मार है। वैसा स्पिति सृधिनिर्माध ईश्वर प्रयापति की है ठीक वैसी ही स्पिति इस प्रभापति (गस्द) की । परनिर्माणमक्रिया में कुम्मकार मिती दर पर, सम, भूपिया, पानी या सात उम कारण अपेक्षित है। इस कारणसमरि से कार्य उत्पादतान में मुपियर अम्मकार एवं पाक [क] का पाप है। भकार मी जमीन पर बैठता एक क मी कोर के भापार पर भूपियापर राता है। गुरमकार निमिचकारण , घट बनाने माना है। सूत्र-दण १४ परिमाण माशापनिषत् 18 प्राचारमा --- असमवापिक्चरण है, मिट्टी उपादान कारण है, पानी सहकारीकारण है। कुमार मिट्टी में पानी रासकर उसको पिम्दमान थमाकर पिया मना दादाभनन्तर बक के समीप मित स्थान पर बैठकर पपर परपिर रस देवा । मनम्वर कीसक से क्यु पक को दया से परे वेग से घुमाता है । घूमते हुए चक्र पर रक्ले हुए मृपिक में हस्तकौशस से अपने बौद्धपट [लयाचीफ्ट कर भाकर देता बावा है । पोपी देर में घट उत्पन होगाता है। निर्माण होने के भनन्तर सूत्र [गेरी-अपना वीवर-पिपा] से घर को पक से पूपक कर भूपृष्ठपर सूसमें के लिए रख देता है। सूस गाने पर भग्नि द्वारा उसे पकाया है। पग्नि सम्बन्ध से घट का बिमारा हो जाता है। अग्नि सब से पहिले घट के पदपरमाणों को निराकसित कर गमता है। इस अग्मिविशमसन से परमागुमों की सन्धि में प्रतिष्ठित पानी न पाकर उनकारत हो जाता है। इसी शिकसन प्रक्रिया का माम म्यापदरानानुसार 'पटपस । पानीको निकास कर सविस्पानों में स्स्य पनि अन्तयाम सम्बन्ध से प्रतिष्ठित होनाता । स भग्निसपान से रसपपरमागु दरान के शम्दों में परतपट पुन सहित जता एमा परिपकन बाता है। इस प्रकार इस पिठरपाक के मनन्तर पर सबममा सपम हो जाता है। पट घ स्लप माकार] सभी को विदित है। उपर की भोर गोलाकार मुरु होग, मध्य में विपुलोदर होता है, पैदा उखामा होता है, या तो इस [कुम्भकार] प्रचापति की सरि भय पसिए प [ईमर] प्रजापति की मोर। । मापरतत्व कुम्मकार [निमित्त कारण] है । पत्रकोणात्मक पम्पप्रम मण्ठ [भासम्बन] है। पूर्वोत प्रवाह ही सूम। पयुर्वेद एफ है। इसी बद का पर मर्दमाग विधी [उपारान] है। प्रगति की धुनीति दगा। इसी को 'प्रमदण' डामाता है। सुपसिद्ध मापनम पानी [सहकारी कारण है । विश्वमामि में केन्द्र में) या पबमो। इस की स्थिति ठीक कुमार के पक जैसी है। पक सूर की धूम सा है,पर समुदाय [भवपक्ष] सर्वपा स्थिर सर पर प्रमापति परवेदरूप मलपिया रखता। परद बीमाए भास्वामा पनपत् । पनिम्मीद --- न मप्रसिद पपत्रीमालिकवेद है । पी वेद भागे जाकर पटरूप में परिणत होता है। मा-मुर मातीनों लोकों की समधि एक घट है। यही विषम िफ्ट पफम या में 'उमा' नाम से प्रसिद्ध है। मूोक इस मुन्न (4)ी, मुझेक उदर पुसोको सचिन सूप मुसहै। एक संम्सर पपस्त इस घट में भनि पसा याममन्ता उस काबपन होता है। प्रेसो- परूप उघ (मर) के परमाणु परमाणु में अग्निपिति हो जाती है। यही पिति संघिरपानों से पाप माने में हमारे जातो है। निति से घट सामना सामो पाता है। इसी प्रामा- पम्प पट का दिग्दराम बारावीई भमिरहस्पति कहती है- १-मेमोन उसा' [ग. ७५२।१७] २-भामापसमेतत् कम यदुसा' [श०६।।1] [शत. १२२।। १।२।२।२१।] प्रगपति से मिमिन सी पार्षिक प्रमा पठसाप में परिणत होकर ही प्रतिसित हो रही है। इस प्रकार कुम्भनरष्टि एर प्रागपम्मपि दोनों समानधर्म है। इसी सपियस्य के शिवण सिर कृषिोंने कुम्भकार की 'मनापति' समा रक्सी है। सप मारीयों इग्म कार के पक से प्रतिपा का सहप पदिमानते हुए कुमार को अपना गुरु ना पा । सपमुग यो महा इस प्रगति के रुप है, वही ससस पपुवक कोसतो 'सव पानिपाद पर' के प्रमुसार पर मी बसच है। मा पूमता हा ममुराप कपसे रिपर है तो यह भी मापापा एनत् मनवा आमा समुनापा भनेर है। मानो हमारा र (सुम्माया) प्रगपति उस (मि) प्रमापति के साप सा करो । इसी भाषर पर धीमी 'पयना निर्मातखिमुनरिपातु म कमा" पर सूमि प्रचलित सेमरहने अगमक, भौर पस्ने पसे मापा एक स्पाम पर, इस प्रकार सपने पम्प न मोर पसने पत्ता पत् दोनों का एक मिदु पर समाबर है।पनि गति से ममम पियवा से एक है, एपमेन पद पार न होने पर मी पत्र नया शोपनिपत 15- ममेरेर मक्ष एक है। एक ही तप व की अपेक्षा से सपा अनेजर है, पर की अपेक्षा से वही एमत् है। वही एनत् है, पहो भनेन । ।बह मम से मी पपीय विच दौरने गाण है। माधिभौतिक जगत् में तेज पउने बासा पाय है। माध्यामिक जगत में गायुसे मी शीमग्रमी मन है। दोनों में पही गात माई है। जिस यमाय के मागमन से वायु भोर मन बम ग्रीम ग्यमी बन जाते है तो उस यत् के गतिवेग का क्या काना है । तो स्वय गविरुप ही है । इस भयाति की गतिमान् वायु और गतिमत् मन से समता कर सकते हैं। मन में हम विपद है, विपिन्द्र गतिशीस है। मन में प्रविष्ठा मम लिपति माग]की पयसा ही मन की दुस- गति में मुस्प का है। उपरा शुरु गतिरुपता मा सपमुष मनसो नवीय बात पयार्य में यह है कि मनेनदेन की समणि से भाप्यारिमक एवं माधिमौतिक प्रपञ्च का निर्माण होता ह । फम भाभिमौतिक एव माणस्मिक पदापों में [प्रत्येक में ] पिति-पति दोनों माों की सधा सिद्ध होगाती है । भाप जितने भी गतिमान् पदाप देख रहे है, निवास कीथिए (तितारतम्य ) उममें पोपी पात स्पिति भएप है, जितने भी हिपतिमत् पदाप १ उम सबमें (स्पिति के तारत-प से) गति मारय है । विगुरुगति-और विगुम्पिति प पदापन माधिभौतिक जगत् में है न मापपरिमक जगत् में । कारण इनार उगदान हिपतिगति की समापि है। कही स्पिति सप प्रभान है तो कही गतितप । पात प्रत्येक में दोनों । पस्पिति से गति को सर्वथा निकास दिया जाता है सोय त्पिति गतिरूप में परिणत होगाती है। एवमेव पनि गति में से स्थिति सपा निकट जाती तो बह गति रिपति रूप में परिणत प्राप्ती है। उदाहरण के लिए मनुप्प पार्ने घर से ठीक निपत समप पर एक साप पगीचे के सिए रमना होते हैं। इनमें पुष या मी तो बनी पहुष गाते , पुष दो में पहुंपते हैं । इसक्य स्पा मारण ! उत्तर की होम कि दो सीप पण प शीम पहुप गया, जो मन गन से पसा वह देर से पहुवा । इस प्रभ या पुमा किनिसर्ने सम्दी गाड़ी पा उपए जमी पापा, एस रिसने ॥रे पीरे पैर उगए देर से पहुवा । निर्म पर पा कि जिस पाने पैरों में हिपनि कम समीप ति भाषिक सी ए यादी पापा, माचारमा अमेरित सारापनिपन - मिसमें गति कम रस्ती एव स्पिति अधिक रस्त्री या देरसे पहुंचा। इस स्पिति-पति के तार वम्प से गति में पातर होगण । मान सीबिए एक म्पति यहाँ घटेमर में पहुचा यहाँ दूसरा भाष पटे में, तम्सय १५ मिनिट में, तीसरा पार 0 मिनट में पाप गया । पीरिये पौपा मादमी दो मिनिट में ही पहुच गपा । पारपर्य-पाव तो एक ही मिनिट में मा. पापा । एक मिमिट में पाचने पासा ऐसे वेग से पण कि उसनें कर पा रस्था, पर उटापा पा भनुम्पन सपना ही कठिन होगया । या मरता मा म दिसई देकर बसतासाही दिससाई दिया । फलत पर सिर होगा कि मपर्ने पर से एक मिनिट में पहुंचने वाले पक्रिया गति (पा) में स्पिति (बाराब) बहुत कम पी , तमी तो यह एक मिनिट में पहुंच गया । कम्पना कर सीधिये, जिस भासस्पिति में निपत स्पाम पर पहुंचने में एक मिनिट जापग्य, परि या मास्पिति मी उस की गति में से निकाल दी जाप वो पा रोगा । एसी स्थिति में उसे एक मिनिट भी न बगेग्म मपि त एक पण में होगा पाष भायगा । एक पण में नहीं पापेग्म, मपि तु मिस पर प पर हेग्म उसी पण में बानिये में मिलेगा । इस प्रकार स्मिति के सर्माण निवस गाने से सप्तकी गति स्पितिरूप में परिणत माफी । क्या ऐसा होना समानही । पितिगति दोनों की समणि से उत्पन रेनगाहे मनुष्य में (मनुप्पोरसहित पदार्पमात्र में) शुद्रगति नहीं य सकती । उस में मारप स्पिति राती है। ऐसा तब तो केस प प्रशापविही हो सकता । मन में पोपी बहुत मिति , परम्त उस मिशुदगति में स्थिति के प्रत्पत्तिक मभाव से गरा मी यराब नहीं है, वमीप एक ही पत्र में पह-पा-उपर-नीचे-सर्पक उपहम्म हो । प्रगति के हिपतिरूप वएस म्पापक सी गतिग्रस्प कप में रसकर- 'मनसो मषीय' करा गया है। एक पुस्तक मेज पर रस्सी । पुस्तक स्पिति (मराबा-माव से माकम्त है। परन्त निम करता है कि पाप इसे परती सममिए । पररूप से प्रतीपमान पुस्तक एकही पण में चारों मोर माही।।पा गविसमीि ही एक दूसरी गति से मपम्न होती रिमतिमाय में परिदत रोखी। माप पूर्व में बैठे हैं। पुस्तक मापसे परिचम एसी हई ।। 16 मास्वारम्म - शापनिपत् - अगरबत् पदिमाप पुस्तक को अपमी भोर जायगे तो पुस्तक की पश्चिमागति निकल पायी । दूसरे शम में चक्तक पश्चिमदिग्गति को पाप पुस्तक में से निकाल न देंगे, तब तक पुस्तक पूर्व की मोरज मासकेगी । इस प्रकार स्थित पुस्तक में से पति के निकास देने से पुस्तक की स्पिप्ति गविरूप में पाणित होगायगी । निदर्शन मात्र है। संसार में जितने मी स्पिर पदार्प है, वे मिरम्तर पारों मोर पसरले पदि पारों मोर की गति निकास दी दापगी तो पदार्प की स्पिरता सवमा उत्कारत होगामी । यह पदार्य गतिगर्म में विलीन हो पाया । इस निददर्शन से पतसाना या सिलिगुदम्पति एव विशुद्धगति उस मुसनम का सिल्प है। यपपि सचा- रष्टि से उसे भी विशुद्धगति, स्पितिरूप नहीं माना जासकता । कारण दोनों तल पक्निा भूत हैं। तथापि विप पोर उस के पार्पश्य समझने के लिए बौदनगत् में उस की विशुद्धता की भावना की जासकती है। इसी बौद्धप्रस्पय को सदप बना कर अपिन-'मनसो जमीय" पर कहा है। इस से मतसामा केक्स पी है कि सम्पूर्ण विश्व में उसके पैसा तोही है। । पूर्वकपमानुसार ही म्पोतिर्मयो देवष्टि का प्रारक है। देस्ता प्राणघन है। प्राण सर्प पतिरूप मगरप। परम्तु इस का विकास सूर्य में होता है । देवता मी इतर पदार्थों की तरह एक पदार्पत तिरूप प्राण की प्रधानता राने पर भी इन में स्पिति का भास्पन्तिक समान ही मामा बासकता । पर प्रजापति के पथात् उत्पन्न होने से प्राणपन देक्तामों में माथिकहर से स्पिति नियमान है तो प्राण की प्रधानता से दौरते हुए मी दमता उस पूर्वप्रतिष्ठ ( पूर्वमर्पत् ) प्रमापति को केमे प्राप्त कर सकते हैं। मप्यारमपद में इन्द्रिए देवता हैं। मुख्य- प्राण का मिक्स ही इन्दिए हैं। भारमा एप में प्रतिष्ठित है । इस्प पात्मप्रकाश इन्द्रिपदर ताभों में माता है । इन्द्रियों के शर बाहय । ऐसी अवस्था में प्राऐग्दर्ति प्रशानमन से सपातित इतस्तत सांसारिक विपपों की मोर मनुपावन करमें प्रो इन्द्रियदरता उस पूर्यत मात्मतरम को प्राप्त करने में कैसे समर्प हो सकते हैं। यह पूर्व, या पर है। इसी रहस्प को सम्प में रखकर उपनिषत् करती है- ६॥

प्रणम्प साशापनिपत । अमेबगद , निसर्ने गति कम रस्सी एक स्पिति अधिक रस्सी बह देरसे पहुचा । इस स्पिति-गति के तार तम्प से गति में भातर होगया । मान सीमिए एक म्पक्कि वहाँ पटेभर में पहुषा यह दूसरा भाष बैठे में, वीसरा - मिनिट में, तीसरा पाच ही मिनट में पाप गया । सीरिये चौपा भादमी दो मिनिट में ही पहुंच गया। मारपर्य-पापा तो एक ही मिमिट में मा. पहुचा । एक मिनिट में पाचने वाला ऐसे वेग से पता कि उसने कम पैर रस्य, कर उठाया यह अनुमाम अपमा 0 कठिन रोगा। यह व्यारा सा न दिखाई देकर बसतासा ही दिखाई दिया । फात पर सिम होगया कि अपनें पर से एक मिनिट में पापर्ने बासे म्पति की गति (पास) में स्पिति (खराब) बात कम पी , तभी दो प एक मिनिट में पाप गया । कायना कर मीशिये, बिस सम्पपिति में नियत स्थान पर णुचने में एक मिनिट मायग्य, पदि का मास्पिति भी उस की गति में से निकाल दी माप तो पा रोग । ऐसी स्थिति में उसे एक मिनिट मी म बगेम्प मपि त एक पप में ही पापा पाप बापण । एक पग में नहीं पहुंचेगा भपि तु रिस पर मेय पर रहेगा उसी घर में बगीचे में मिलेगा । इस प्रकार स्थिति के सपा निकल पाने से उसकी गति रिपतिरूप में परिणत होगायी । क्या ऐसा होना समय है। मही । पितिगति रोगों की समाधि से उत्पन होनबाहे मनुम्म में (मनुप्पोखपित पार्थमात्र में) गुरगति नही । सकती । उस में प्ररप की स्पिति गती है। ऐसा तब तो केमाप प्रगपति को दो सकता । मन में पोपी मात विति, परन्तु उस पशुपति में पति के मास्वस्तिक प्रभाव से गरा भी खराब नहीं भी एक ही पण में या-का-उपर-मीधे-समर उपसम्म हो भाता । प्रगति के हिपतिरूप प्रतएव म्यापक इसी गतियस्प बगल में रसकर- 'पनसो मबीप'मा गयौ। एक पुत्वक मेग पर रखी गई पुस्तक स्पिति (खराब)-भाव से भ्यान्त है। परन्तु निमन करता है कि माप इसे बनती हई सममिए । पिररूप से प्रतीयमान पुस्तक एक ही पण में चारों भोर गायी। । पह गविसमरि ही एक दूसरी गति से पास होती रपतिमान में परिणत ऐयो।। माप पूर्व में है। पुस्तक मापसे परिचम रमाई।

माष्ठात्म्म अनेवदेवत् । शापनिषत् ॥2 यदि मार पुस्तक को अपनी मोर लागे तो पुस्तक की पश्चिमागति निकस जापान । दूसरे राम्दों में जातक पश्रिमदिग्गति को भाप पुस्तक में से निकास न देंगे, तब तक पुस्तक पूर्व की मोरज भासकेगी । इस प्रकार स्मित पुस्तक में से गति के लिबाव देने से पुस्तक की स्पिति गतिरूप में पाणित होगायगी । निदर्शन मात्र है। संसार में जितने भी स्पिर पदार्प है, ने निरन्तर चारों भोर पायी पदि पारों मोर की गति निकाह दी दापगी तो पदार्य की स्पिरता सपा उत्तान्त होजायगी 1 पर पदार्प गतिगर्भ में विसीम ऐ गाया । इस निददर्शन से बताना पा कि निराशस्पिति एव विरामगति उस मुकाम का ही स्वरूप है। यपि सचा रधि से उसे मी निरामगति, स्पिविरूप नहीं माना जासकता । कारण दोनों वरुप पक्निा- मूत।। तपापि बिच मोर उस के पार्षस्य सममाने के लिए बोरखगर में उस की निगुस्ता की मावना की जासकती है । इसी बोरप्रात्यप को सप बना कर अपिने-'मनसो ननीय' पर कारे। इस से बतलाना केवल यह है कि सम्पूस निध में उसके वैसा तो की है। । - पूरफ्नानुसार ही पोतिर्मयी देवधि का प्रम। देवता प्राणपम है। प्राण त्य गतिकप मारप, परन्तु इस कर मकरस सूर्म में होता है। देक्य मी स्वर पदार्थों की तरह एक पदार्य है। मत तिरूप प्राण की प्रपामय राने पर भी इन में स्पिति का भात्पम्तिक ममुगुम ही माना चासकता । चब प्रणापति के पश्चात् उत्पन होने से प्रासपन देवतामों में भोशिकार से स्पिति विद्यमान है तो प्राण की प्रधानता से दौरते हुएमी दक्ता उस पूर्वप्रतिष्ठ (पूर्वमर्षत् ) प्रमापति को केमे प्राप्त कर सकते है। पप्परमपम में इन्दिए देकता है । मुस्प- प्राण व विकास ही इन्दिए है। भारमा एप में प्रतिष्ठित है।स्प मामप्रकाश इम्पियदर तामों में भाता है। द्रों के द्वार पहिया । ऐसी अवस्था में प्राणेनमर्षि प्रशानमन से सपानिव इतस्तत' सांसारिक नपों की भोर मनुधापन करने वाले इन्द्रियदेवता उस पूर्वपर्पए भारमतस को प्राप्त करन में कैसे समर्प हो सकते हैं। पर्व, यह पर है। इसी रहस्प को सप में रसकर उपनिषद करती है- " प्रापमा अमेगायत् शोपनिषत् । । पराधि स्वानि म्पतृपद सपम्मूम्तस्पात पगा परपनि नान्तरास्मन् । कपिदीर प्रस्पमास्पानमववाहचरसुस्पतस्वमिछन् । (कठ०१.२०११) इसी पमिप्राय से- ननरेपा प्राप्नुवन् पूर्वमर्पत' यह करा गया है। इन्द्रियातीत है, इन्द्रियागम्प, पही तापप है। भारमा इय में ६, देवता उससे पर है। तो क्या देवता [इदियों ] और देकतामों के लिपप में ( मौतिकपदापों में ) मारमा नही है ! इसी प्रम के सम्मान को सस्प में रसती हुई मुमति मागे जाकर कहती है-'वापतोऽम्पानोति विष्ठत्' । देवा उसे पार कैसे सकते १, बबलप सस्पान में श्रेय बेट दौर भगाने पाटे देवयमों के मागे से भागे प्रतिष्ठित रहता है। मनेजत् पाप सिष्ठ ६ एबत् एपा देवतामों का अतिक्रमण करने वाला है, पैसा कि पूर्व में स्पिति-ति घ तारतम्प समाते हुए कहा माधुका है। सर्पमा पापक है। उसके पाण्य में सब कुछ प्रतिष्ठित , परन्तु मलिसी में प्रतिष्ठित मान मां नेपुते पपि। रस का तात्पर्य यह है कि भाषेय भापार के बिना नहीं र समप, पिरत मापार सरूप से प्रतिषित गसकता है। असे भाषेय की अपेक्षा नहीं होती। मानक के सारे प्रपत्र का निकर्ष पही [मा कि "मामापापछिम इजरसरप पर्बम मी ईश्वरवत् मारामायापक्षिम होग मा पापको।" या मसवेद महेबर का निरसित है। इसी अमिप्राप से मुति बनती है- 'एष मा परेऽस्य मालो मूलम्प [मोचरस्प] निरसितमेनपरग्नेटो यमुना सामसेवः +++ प्रस्तानि साणि निमितानि" [श० ११११.] RI परलोमन की मापी मार है। मम्मति बेद म को स्पान कि मरी है। पर एष स्तम्भकावर सहा मासा [मवरपर] ' । उस का एष माग सकपा स्थिर है एक प्रारुपास्मा पोनिखोपा माशोपनिषत् ।। भास्पन्तिक पर है । यही पसुम नाम का मित्राप्रमापति है। इसी का निरूपण करते पर मन्त्र के तीन पाद हमारे सामने भाते है । विनिर्माण माप की भाति से होगा । ए इस प्रजापति का चौपा पाद है। तीन पाद विपके माधार किन्तु विधातीत | इस लिस्प सिर- विपाविमूति विज्ञान को सस्प में रसकर मप्रति अपि मे तीन पादों से तो विशुर प्रम का निरूपण किया , एवं एक [चौथे ] पाद से विस का निरूपण किया है। यही वो मन्त्र का मन्त्री यही वेदवाणी का उत्कर्ष है। "अनेक मनसो मीयो, नैनवा प्राप्नुपन् पूर्वमर्पत् । तदारतोऽन्यानस्पति निष्ठत" उक्त विपानमन्त्र सृषि के महाधार का निरूपण करता है । सरि समरिमावर निर्मर है । समति दीपा, एफ में दूसरे का माहुत होना ही यन, ममि में सोम का प्राभान करना ही है। इसी विधात्मक पापाद का निरूपण करता मा निम्न लिक्षित चतुर्पपाद हमारे सामने माता- "तस्मिन्नपो मावरिषा दधाति" विनम मामक पहल के माग से तप-श्रम ारा पसय माम का ममम [अप्रम] उत्पम मा पा कहा जाभुका है। प्रकरणसगति के लिए केस यही समावेना पर्याप्त होगा कि पार्द की उत्पचि में [पारे वह पेतन हो, या मवेतन ] योनि, रेत, रेवोपा इन तीनों भाषों की अपेक्षा राती है। रेत उत्पति का कारण है उपादाम कारण है। परन्तु विशुद्ध रेत सृष्टि करने में असमर्प है। अन्य प्रतिष्ठा में प्रतिष्ठित होकर ) यह प्रनमपिता कमता है। बीन ही पर मनता है, इसमें कोई सन्देह नहीं । परन्तु मूगर्भ में प्रतिष्ठित ए बिना प प्रज नन कम में भसमर्पी। इस प्रकार मोम्म पस्तु का उपादान बनवा - तो रेत है, एवं • “निपापूर्ण उत् पुसा पारोस्पेशामात् पुन " (पा ..

प्रातारमा सामिपत II खोनितोष निस प्रतिष्ठा में प्रतिमित होकर प मफ्नी प्रममग्रहित को विकसित करने में समर्थ होता है, यह प्रतिधनि योनि है । बीनरूप रेत मी , पोनिरुप भूगम भी है। पर फिर भी काम नहीं पता । बीर को मृगर्म में गसनेवासा तीसरा पदार्म पता-पीगापमकरने एमा] और होना चाहिए। यही वीसरा तत्त रेत का योनि में भाषाम करताामा-रखोपा' नाम से प्रसिदो। वैषमा में पनि योमि है, सोम रेत , मात देने वाला पर्यु रेवोपा है । रेत का भापाय पोनि में रेत का मापान करता है, तदनम्तर ही प्रभाष्ठि किंवा पदार्पो पति होती । सषि, कामुक सम प्रमापति सथिनिर्माण करना चाहता है । समितिया में रेत-रेतोग-योनि तीन माव भपपित । इपर प्रजापति के पास सिधय स्पर्ने माप के (प्रणाझिप पशुगम के) रासरी वस्तु का अभाव है। इस समय की पूर्ति के शिर ( काममा सीमा से ) उसे अपने पापको प्रम-सममइन दो रूपों में परिणत होमा परता है। एक माग से या प्रम बनाता है, एक माग से सनम बनवा है । मम पह, मम पाप है। यह ममि है, पडी पनि । माप सोम है, पही रेत है । प्रसिद्ध मार्गन मातस्मिा नामक मायु रेतोपा है यातिथप मापो- प्रम में माप-बापु-सोम-प्रमि-पम मारिस्प यह माग बताए गए हैं। इन में भगिरा मामला फ्म पापु- 'यमा मसानप्पटे ( एव ७।११।१) के अनुसार [ खमर्जियम J सरि का प्रपतक नही, मपि तु निक, विक है। सरि प्रिया से होती है। शिवायु श्री मपर्णगापु है। इसकी प्राण-पबम्पन मारवा-सविता इन चारों भवस्थानों का पूर्व में नहपप किया गया है। इन चारों में पिपासस्पसमर्पक मातारा गपुगी मारूप रेत का मापान करता है। पूर्व प्रतिवामुसार मातरिया के समय में समा भावश्यक होगया। पता पपिपी का नाम है, पूपित्री शम्द पिणमात्र या उपक्षण, पैसा के पूर्व में बताया गापुर। प्रत्येक पि मामिमप है। पर ममि पिस्प सिनेनिषेय मेद से हो मार्गों में निमत स्पिनि से पस्तुपिण्ड क्मता है, चिनिय से बहिर्मपास का रूप सम्पम होता है। इन दोनों में विलपिड को संक्तिमापानुसार 'पपिनी' बताए रितेनिषेपमणस को दिम्पप्राण के समावेश से 'पुमोफ' कहा जाता है। इस प्रकार प्रत्येक ॥ । - भावात्मा +9 आईपनिषत् ।। - मस्तु में पिणपिवी महिमापो इन दो भागों की सा सिद्ध हो पाती है। सरिता, प्राण, पब मान इन कनों मार्गरवायुतत्वों का महिमामास से सम्मम्घ है । महिमामात में सीमों प्रास- प्यु म्पाप्त होकर पिप्स पर अनुमा करते हैं। पर महिमा का विकास निसापिण के मापीन है। बिना पिण के महिमा नहीं, एक बिना मातरिमा के पिपण मी । मा [पृपिवीसप पिण] के पारों मोर म्याप्त रहने पासा स्पिर वायु की मातरिया है। पिण्ड निर्माण करमा, मिर्मित पिण्ड को खसार में सुरक्षित रसना पा दोनों कार्य मातरिया के है। भापोमप समुद्र में मामेप बायु के प्रवेश से पानी का माग पन हो जाता है। पनामस्पापम यही पानी 'अपांगर' [पानी की मर-मसाई] भाम से प्रसिद्ध है। या पन परम्पगु मूपिण्ड के उपादान बनते पार्थिवपरमाणु' नाम से बाल होते हैं। इसी के लिए-'पद्पः पृयिती' पर का जाता है । यह मान्यपरमाण, किंवा पार्थिव परमाणु उस भापोमप समुद्र में प्रताप से श्वस्ततः म्याप्त राते हैं। उस परिस्पिति में भी मातरियायु (मो कि ईभर प्रजापति का भवन रूप शे से साक्षात् प्रजापति ) बसता है या समुद्र में फैजे गए उन पार्पित परमानों का सासन कर-ठम परम्प होता मा उ पिण्डरूप में परिणत कर देता है । एकमाता- प्रेम मिशसत सब पामग्रमों को सकसित करना इसका परिता काम है, सकसित कर पिण्णावस्पापम उस पदाप के चारों मोर वेपत होगना इसका दूसरा नाम है। पदि मातरिया मायु एक ही समप में चारों मोर से परमानों का सनसन म करे तो दूसरी मोर से परम्पणु तिल्लत सकस पाप । ऐसी अवस्था में पिणतरूपनिर्माण प्रसंभव होगप । ति या माव- रिमा पर एक ही कार में पत्परमाणुओं का बारों मर से संपरण कर उस संकलित माग पम पिया के चारों मोर दिसरसा से म्पस होगाता है, अतएव इसे 'पा' का है। "हणवे-( सरण) इति पर, प्रदोषि-वि-पार, परमासो पाति परा। बराह राम का यही नियंचन है। इस महाविध में सपम्मू-परमेष्टी-सूप पानमा पृपिनी या पाच महापिया माने जाते है । परिमापा के अनुसार मानम्पोतिर्मय सब पिण सपम्म् नाम से, पम्पो तिर्मय सब पिण परमेष्ठी नाम से, सम्पोतिर्मय सब पिण सूर्य माम से परम्पोतिर्मप सब पिण " पाश्चारमा सारंपनिपात बरावर । चन्द्रमा माम से, एक रूपम्पोतिर्मय सब पिश पपिपी नाम से प्रसिब है । सप्तमोकामक निब में मरम्प पिया । मतपण ही प्रसस्य है । इन सा पिणों की बातिर उह प्रकार से पनि हो । ता पचयावत् पिण्डों का स्यम्भू परमेष्ठी मावि पाच महापिगों में मतर्माण सममलेना चाहिये । पपि पिगरों का सरूप इसी मातरिया नाम के परामायु से संम्म मा है। परि प्रमापति माहरूप धारण करते तो पापोमय समुद्र में परमाणुसप से प्प्यात पाचो की भूपिम सदा के लिए पानी में रहते । इसी मराह की कृपा मे भूपिण का मारता । पतएप पूपियों को बराह की पानी माना जाता है यम्भू भादि को भूपियों - रूप मिम मिा, भतएप तत्काए समर्पक, तत्सविता गण मी पपा निम्श होता मा पाच स्वरूप पारण करता है। ये पांचों बगह कम्य प्रादिवराह पक्षनराा, मनसा वापरा, पम्परा इन नामों से प्रसिद्ध है। नरस व भादिपर्ष स्वयम् , मखएक वत्सम्बन्धी वराह 'पादिवराई' नाम से प्रसिद्ध है । तस्मिमपो मातरिश्वावपाति' इस मन्त्र माग का मारिरण पारमेष्ठप 'यारा' का प्रकरण मपर है । इस की विकासभूमि यही परमेष्ठी ।। मत विष्णुमय परमेष्ठी को हम परप ही पामर्षि करने के लिए तप्पार है। अपि प-ममि में सोमाइति होना ही या । भनि मंगिय, सोम है। दोनों परमेडी के मनोता है | सपाम् का प्रमाणित प्रपीओर ही पक्माग से भापोमय ( एम- हिरोमप ) या ममता है, जैसा कि 'सैपा असीमिपा या!' स्पारि से पा ।। हन्दी सब कारणों से हम परमेष्ठी को पामगार मानने के लिए तप्पार ।। । प्रमाकामुक प्रगति प्रथम भापोमम पारमेष्ठापड़ को ही उत्पन्न करता है। पाय मन्य का निर्माण करता समापोप पातलो पिसाप में परिपत राम मात- रचा पारा माम से प्रसिद्ध । परमेटी के समानर स्वस्वरूप से घोरकरण, परत सोपा वि से पोतिर्मय मा आमा प्रेस का केसमत रमेव सूर्य है। इस का मामेरक पपु सेत- परा' नाम से प्रसिद्ध प्रतिपय म पनि होता ६ वायु प्रपर्प , भारिप गाना मारमा हाईसीपनिषत् . है, एवं चन्द्रमा प्रमा है। इसी प्रथात्मक चन्द्रमा का स्वरूपसमर्पक मातरिश्त्र 'ब्रह्मपराए । भूपियर का स्वरूपसमर्पक पराद पमपरराए' माम से म्पकत होता है। एम्ष' राम्हमें 'मातम पस्' यह तीन माग है।ईम पियर की भोर इशारा है, पां-मासमन्तात् मागका घोतक है, रम् म्यासि का सूचक है। पाइस के चारों मोर बस र एमूष का 'यही मर्प है। इसी पार्षिक कार का साप पतमाती हई भुति करती है- . 'सा (प्रादेशमात्री (पृषिनी ) पप इवि पराक एण्यपान । सोऽस्य पतिः प्रमापतिः । (रात १।१२।११।।" " सरातो रूप कला पन्पमर्मव । AI मातरिया पात्रों का सामान्य नाम है, मादिवराह, याराहादि निरोपनाम है । बराह पपु रूप है। मु मातरिय की पत है। बसे पृपिषी में पिरस (पमरस) का साम्राम्प, पुसोक में मधुरस का साम्राम्प है, परमेष्ठी में अमृत (सोम)का सामाग्यो, एवमेव मन्तरियपत आयु में पतरस ( तरस रस ) की प्रधानवा है-'पनमन्तरिसस्प' (यत mmm httI पाप बायप्राणप्रभान त सम्म प्राणियों में na परन्तु इस की मतिपय 'कर' नाम के पशु में ही प्रती है। कर पा सस पुरूप मानिदैविक वराह की साक्षाद प्रतिमा है। विस प्रकार फरपा प्रजापति का पतार कूर्म (पमा ) , एवमेव पाहप्रमापति का मस्तार एफर पर है। अतएव इतर पशुओं की अपेक्षा शूकर में पी (१२) भतिमात्रा में उपसम्म होती है। सबसे अधिक पव इसमें पता है।सी बस को वक्ष्य में रसकर युति करती है- "प्रपा (पार्थिवापी) र देश पुवकुम्म परेशपाया, वतो- बरा सममूर । तस्माद पराहो मेदुरा, पवादि सम्मत" [• UNJ पार्षिक पग्नि करपा शेष [मपु] मर्ति , इसी में प्रवाति होने से यूकरपरा उत्पम होता । मसूपया में दीक्षित पणा पापहीठपानए एकरपर्म के ] परिनता - बामा का ईशापमिषात - बपामार है। पानी का एप मन्पुर्पहरा' [ते. प्रा. PRIL]- 'पराकोप' [. पू. २२०] के अनुसार एकर सादा ग्रेप की मूर्ति है। दो शेरों के बीच में से राकर निर्मीक नियस मावा, परन्तु दो ग्रारों के बीच में से पर नहीं पासकवा । उस बार के स्वरूप धन के लिए अपियों ने निदान दिपा के मापार पर उम की भाति एकर जैसी बमा गसी राह पपु मप्रठ से समग्न राता है। यही तितततितिमूत इस एकर पा की । । शुकर गब मावेश में मार पसा है तो अपने गृग से पीन को कुरे दता मा माटे के साप स्-म्-रता हुमा मागे पड़ता है, पहीवायु पर ग्यापार है। दोनों को समान लि। पाठक सुमन मापस करें कि राजपूनाने में मेवाती सुप्रसिय नसिरसीसा के दूसरे दिन होने वाली मातीसा में जो मनुष्य बराह बनता । नसिंह की पर सीवा घूमता मा नहीं चलता, अपि तु जमीन पर लौटता हुमा सरपट पमता क्यो किसिमी सति में या सीधा होगी का बह पापुका प्रमापनि इसी तर पटते है। मापोमप मणास पसरप्राण की भावासभूमि है । परम्परामा पिषी किस समप इन मसरों के अधिकार में पी परन्तु मागे पाकर इस मया प्रमापति की पा से भूपिण मसमर से निकल कर सम्सराबदिन सौरदेक्तामों के अधिकार में मागपा । नाममा पति महरों केोपी देतामों के उपकारक है । मतएव भमुप्राविभून पवन दिम्पप्रायो- पचारक याप्रमापति की प्रतिक्षतिमन एकरपय को देपबुद्धि से देखते हैं। भूपिणापा को मधमाग पता उसे मनी पानशक्ति से न करते रहमा पसागपु का स्वामाषिक पम ।। इसी कारण के लिए 'पर' का जाता है । अतएव तत्पतितिभून शूफरपशु मसमाग का विष्ठादि का निराकरण रिया करता है। पाणि भौतिक भाग से प्रत्यादि की पशि होती है। यही बराह प्रविष्ठित है। मसएप राफरपा मोर पस्यम [महतर-मान] की एकाति 1, मनियोजन ऐनों का सम्पन प है। गुरपशु का पासन विशेषत एही के परों में ऐव।इस प्रकरण से यई में पड़ी माना है कि रिमनिमम का प्रभान कारण रेत का भाषाम करने पण पिणसरि का प्रतिक मार्गपरिरोष वायुही-'मारिया। प्रनमदेह' पोनि ६ पारेख है। मावरिया टोपास किमागे माकर सागापण । - प्रावरमा शापनिपत् ॥ त्रिपारिति , पूर्व में हमने यगुरूप प्रमानि को पुरुष कहा या एव सुमरूप भाप को स्त्री कहा था । पान इससे ठीक विपरीत करते हैं। अग्निरूप अस स्त्री है, भापोमप मुनम पुरुष है। वा अमिपुरुष सी वम रहा है, पर प्रमजी पुरुष बन रही है। इस भैपरीष्म का प्रस्मस भनु मक मनुष्य समाज में किपा वासकता है। आप गिनें मनुष्य करते हैं, वे सब लिए है, एवं बि भी करते हैं, वे सब पुरुष हैं। इसी रास्प का प्रतिपादन करते हए महर्षि दीर्घतमा करते हैं- लिय' सतीतों च मे पुस भाहु पश्य आयमाम वि घेवदन्यः । कविर्यः पुष स भाषिकेत मम्ता विमानात स पितुष्पितासत् ॥ अक्स० १ ममम, अस्पबामीपस्त । १४, १५ म. । . सभी सापणापापन उक्त मन्त्र के मापा मक और माघिदेविक १५ मेद से दो भर्प किए हैं। अधिदक्तपर में सौररश्मियों की प्रधानता मानी ! रश्मियों पर ही बर्ष याया। एक मप्पारमपद में निरस्तसमस्तोपाधिक विगुर मात्मा । साप मर्प का समन्बय किया। वर वेद के प्रसिद म्पास्पाता यास्कमुनिने मन्त्र को भारमगति परक सगया है। इस मा से हम मिस भर्प का दिमयन कराने पो है उसका किसी मान्य से सम्बन्ध नही है मप सत्र भर्प है। सापळापाय में यो मप किए हैं उनके सम्म में भी हमारी यह विप्रतिपदिका पदापों का विहानरएि से निरसेपण नही गमावस शस्दारम्बर पर मिश्यम आमा है। इस कपन से हम अपमें ये प्रेमी पाठकों को यह सुति करना चाहते है कि ठपसम्म बेदभाम्प फर्माण की रष्टि से मझे ही उपयोग हों, मन्तु विधान से माम्याप अनुपयुक्त एवं ममारित से प्रतीत होते हैं । सदाहरण के लिए मसागर कोसीलिए। प्रमशरद का मामय प्रन्यों में 'प्रममिति दपचरम्' यह निधनाम । माष्पकारने 'मद उसकमधर, नपिसकपक्षरम् यह निरपन किया है। विचार अनिए क्या पनपन ठीक है। भत्-पौर नम्-मतर है इस सबविदित विपप के लिए ममीराराणा भुक्नेि-'अपमिकि- प्रस्वरमा साभापनिषता मिपाहिनि , पवरम्' कहा रो-पर बात नही सक्ती । ममय ही मुक्ति किसी गा अप को सूचित करती है। हमारी धि से पर्दा दो माहरों से अग्नि एष सोम अभिप्रेत है। पचादरों में प्रमा निनन-पर तीन अपर सहचारी है भनी सोम यह दो अपर सहचारी । । ममि की विकासमूमि सूर्य है, सोम की विकासमूमि पदमा है । सूर्यचरस के समय से पम का निर्माण होता है। यह मय प्रोपपि-बमस्पति मे से दोमागों में निमको । भोषधियों में सौर पनि गोवा राता है, पानसोम प्रधान हता, अतएव या मनोस पर्वको पत्रमा को मोषियों का पति कहा जाता है पत्रमा ही मन का भविष्ठाताहै। एकमेव बनस्पतियों में चासोम गौर सौर पनि प्रगान रहता है। अतएव पनस्पतिए बुद्धिक मानी पाती है सूप ही बुद्धि का प्रपर्वक है । इसप्रकार मोपषि-मस्पतिरूप उभपविध सम में तारतम्प से मनि-सोम दोनों अपरों की सजा सिब होनाती है । मुति का गएप मा दो पपरों की भोर, न कि मादागर विदित मत्-और नम् मघरों की भोर । यही दशा उप मुक मन्त्राप की है। यद्यपि विषय प्रमाकत है तथापि गैलरी के परिचय के लिए रेतोण प्रकरण के सम्बन्ध से वह मन का प्रानिक पप पाठकों के सम्मुस उपस्फ्ति किया जाता है। सक मन्वार्प के सम्बन्ध में प्रास्मपिपपिडीमावना, रश्मिपिपपिणीमावना एक विपपिबीमारना इन तीन भाक्मामों की प्रधानता है। प्रका में शुकवियिती माझ्ना का सम्बन्ध, भव सूचीफया पाप से पहिले सपेप से प्रात्मा रमि० माना काही दिग्दर्शन कराप्प पाता है। -प्रात्माविषयिणीमावना--- परमविपियामाक्ना के सम्बन्ध में भापको प्रमोस्मा देवात्या, मृतात्मा ल तीन भारमतिमलों के सामने रम्मा पबैग । पापम्मुवमात्मा को प्रात्मा करा पाता है, सौर १- निसरोवन यापन मिशनमापके अपम वर्ष में प्रसार माममाप मेरेखपादि।

प्राकृतास्मा ॥ शापनिषात - त्रिपालभूचि मारमा देवारमा है एष पापिरमात्मा मूतारमा है। उपनिपदा में सायम्मुख भास्मा की प्रधा नता है, निगमगाम्न सक्-पतु साम नाम से प्रसिद्ध वेदप्रयी] में सौरभारम्प की प्रगनता, समागमणब में पार्पिय मतात्मा का निरूपण है । मौलिक सौरपदापों का निरूपण करने पासा भूग्वेर, यौगिक सौरपदापों का निरूपण यजुर्वेद, एवं सौरमाणों का पार्पियप्राणों के साग सम्बम्प रहस्य पतसाने वासा वेदविभाग सामवेद है। यह प्रयीविया निगमणास है, इस की प्रविष्य देवारमा । केनोपनिषत् में इन तीनों का विस्तार से निरूपण दो बामा है। मत प्रकत में इमके माम मात्रों का सम्लेस कर दिया । (केमोपमिपत् में) 'प्रमा देवेभ्यो पिमिो' 'मूतपु मतेपु निषिस धीराः या कहा गया है। इनमें प्रम' महात्मा १, 'देवेम्पा देवात्मा का सूपात एव 'मूसेषु मृतेषु भूतारमा का सूपक है। - भम्पपपुस्पासम्बनदरपुरुषसाधक मदरपुरुष प्रमात्मा है यही प्रौपनिपदपुरुप किं पा चौपनि पदास्या है। पमयमामरूप भगीप्राण के समबाप से जिस भलीपारस का उदय होता इतर प्राणों का (इन्मियप्राणों का मारमा। इसी का माम देवारमा है। यही नैग मिक पापा है। दो मिसका उस्प-प्रम-साम होता, ही उसका पारमा कइसाता। पही भारमा भूतात्मा है । इसी को प्रागमिक प्रारमा करानाता है। इन तीनों में से प्रसन्न भोपनिषदामा प्रसारमा) का ही निरुपण करता है। उक्त तीनों मारविमर्ग एकमात्र सम्पय पुरुष की विमृति है । पही प्रमारमा, पी देवारमा है, बही भूवारमा -'मत्त परवरं नान्यत्' । मम्पयपुरुष ही मानन्द-विधान-मन- प्रार-बार पर पांच कराएं बतमा गई हैं। इन पापों के भामेम् विज्ञान मन प्राणवाई या तीन विमाग है । प्रथम विभाग जनप्रधान प्रानास्मा , दूसरा विमाग काम (सा) प्रधान कापास्मा , तीसराविमाग कर्मप्रधान 'कस्मिा' है ।बामारमा हामशक्तिमान है, कामारमा प्रियाशक्तिप्रधान , कर्मारमा अपरातिप्रधान, सी को अमात्मा भी कहा जाता है। पापामार का नाम भीमम की ही यात्रा होती है। पर दिमाग मौसिक दिमाग है। - . + प्रामा नशा ईशापनिषत् निगरिमूर्ति इसी पम्पयपुरुष से भागे जाकर मक्षर गौर भामर का विकास होता है। महामाया के सम्बन्ध से सपासप मलयप का विकास होता है, जैसा कि पुरुषनिक में निस्तार से बतसाया नाचका । भम्पयाम्म का सामूत कारमा प्राणवाड्मय क्तमाया गया है। इस पर कामारमाहप मन का मी मना रहता है । मतएर सम्पपामस्मा मन-माण-बार मेर से विकस बनताकारमा का मोमाग बामकिपन होताामा पानास्मा ,प्रासमा किप्प शक्तिपन होता हुआ कामारमा । एव नामाग् पर्पतिमन होता मा कर्मरमा है। इस प्रकार फम्पप के केवल कर्मात्मा में मी मन-प्राण-माक् मे से उक्त तीन मात्माओं का भोग सिब होनाता है। दूसरा विमाग शानरमा का है। मानन्द मिशान को बनारमा कहा है। जिस प्रकार मम्मपतिर कामरूपम्न का कारमरूप प्राणवार पर मनुमा हाता), एवमेव भानन्द निजामरूप पामारमा के साप भी मन का सम्बन्ध होता है ऐसी स्थिति में मध्यप का हाना मामाग पामम्द-विज्ञान-मन मे से निगम बन जाता है। मानन्द गुरबानमर्सि बनामा मानास्मा, विज्ञान मियामप ऐवा तथा कर्मात्मा है, मन भयो की पापारममि बनता एमा कर्मात्मा है । इस प्रकार मम्यप के केस वामात्मा में भी भानन्द-विज्ञान-मन मेरसे उठ तीनों पास्मामों का मोग सिद होगा। तीसरा मम्पपरित काममय मन माम मा कामात्मा । बिस प्रकार सम्पप के मानन्द विशामरूप धन माग क साप एष प्रासगरमपर्म पग के साप मम्पस मन का सम्बन्ध यता एवमेव मप्पस्य मन पर भी शान-समरमा दोनों का अनुमा होता है। अमात्मा के सम्म प से (पानाद निशान के समय से ) मन में सम (कामना इका) का उदय होता है।ानमन्या मोरिया' या सियत सर्वसम्मत है। कर्मात्मा के (प्रासपा के) सम्बन्ध से मन में भागरण का उदय होता है। मप्पस्प मन काम मागरस के सम्मम से गुम्ब हो पाता है. यह पोम किया। इस प्रकार केबस मनमें काम-प-यावरण इनवीन पियों का उदय हो जाता है। बानामगहीत काममयमन अमात्मा कर्मानुपहीत प्रामयमप मन कमामा, मितेपणा ही मन कामात्मा है। इस प्रकार काममा र समाज से देस मप्यप कामात्मारूप मन में भी सातोनों भामामों का मोग सिस 1 नारमा * ईशापनिपात् । त्रिपरिभूति जाता है। स्वय पचकस सम्पय प्रेधा विमाक है। इस की प्रत्येक कामा पुन धाषा विभा । यही त्रिपाविमति है । इस समूति का मूसस्तम्म प्रारमा का विसरमाब है वसा कि पुरुपास्माधिकरण के पनापना के प्रिन्दमाव की व्यापकता" प्रकरण में विस्तार मे मतमामा पापुका है। महामायावच्छिन्न -निष्कलो-मायी-अव्ययपुरुप सर्वालम्बनम् अध्यात्मा-त्रिपात (त्रिपाल उदेतपुरुप ) मम्पया- सकता मानन्दः २-विज्ञानम् मानाति-पानात्मा - प्रोमा ..+ ३-मन क्रियाशक्ति-कामात्मा - देवास्या ममात्मा "प्रयं सदेकमयमात्मा" -पापास एक समवेतन १-प्राण मसि-कमान्मा - मृताग्मा १-ज्ञानात्मा (बझात्मा थानन्दविज्ञानमनोमय )"त्रिपादूर्व देवपुरूप" मानास्मा- 1-मामन्द मानम्--मारमा +++ प्रात्मा 'प्रयसेद -शामम्--किया--कामारमा गमा "प्रास्मा - एका सोवनपम् मन --कर्मामा - मृतात्मा P पपमात्मा दर ki शनिपत् । विधि D -कामात्मा (देवात्मा-कामविक्षेपावरणमय ) 'त्रिपार उदेत'रूप' मामा-मा- सम्मा मात्मा 'प्रपे सद १-मः नामम्-बानगरमा +++ प्रमा बामा .-भामणम् -पर्ष:-कर्मरमा भूतामा "मामा उ एका सभेवयम्" मयम ग्या' ३- कात्मा (भूतात्मा मनप्राणवाङ्मयः) "त्रिपादूर्ष उदयपुरुषः" कर्मस्या- १ सकम १-मन: -मम् -शानामा +- ब्रमात्मा प्रयसदेकर "भास्मान पका २-प्रार -किपा-कामातम पपमास्या साततपयम्" -अष-भूतात्म्य ++- भूनारण ++ देवास्या कर्ममा सम्पर पुरन काममा सम्पप पर प्रतिष्ठित , मारमा का मासम्बन मनात्मा रामनामा सी का भावबम , करमात्मा सधिसाधी, कर्मरमा (प्र) सहिपर्ण ।इस कर्परा का भागे पाकर मपर भौर भारमयरकप मातरंग प्राति पर मनमा त्य है।सपा की मनमपी मोकशा समाप से ( सम्परूप से ) प्रतिष्ठित पतीसरे सद में सम्भवपुल पमप्रधान होताम्म बानरमा , प्रमाण है । प्रायव्य का भार पर मनुमा होता है इससे अपर कियमय ममता एप वाम्म कमाता है । पदकमा का प्रमु- प्रद मामवर पर होम इससे मर्पयाम्म माता कर्ममप मम्पप प्रसारमा भयर बार भूतात्म्य है। पुरम की दूसरी रिमति है। कमसे शान-काम- मात्मा नया देशापनिपात : निपपीमूद १-सम्पयपुष्प (बानम्मानप्रधानो मनोमय -पानाम्प्र------ अमास्मा २-प्रदरपुरुर (क्रिय्य)-कियाप्रधान प्रासमपा-करमात्मा देस्मा ।-मात्मपरपरुप (मर्म -अपप्रधानो बास्मय-कर्मात्मा---मूतात्मा मम्पयपुरुप पुरुप प्रभापति है। अपर भौर पर इसकी प्रगा। मक्षमा देवता है. परपग भूत है। देवनानि च भूनानि' या प्रसिद्ध है। देवितामि देवरमा है, भूतानि मूतारमा है, मय सम्पय मारम्प है । पोगमापा समन्ध से दैक्त मदर, भौर मौतिकपर दोमो की पांच पांच पसार होगाती है, मिनका कि विशद निरूपण पुरुपनिरुक्ति में होनुका ।। इम तीन मारमा मों में मम्पय प्रधान भारमा है भवर एव पर निमो, दोनों की समरि मिपुरुष पुरुष है । भम्यय पुरषो भवर अमृत है पर मुसी। ली तीन क्सामों का निरूपण करती ई पति कहती है-- पुरुष एमेदं सर्व पदमत पर भाम्पम् । उतामृतस्यस्पेशानी यदभेनातिरोरासि (पठ स. २११)। मन्त्र का पूर्वमाग भम्पय पुरुप का मिसपण करता मा करता है कि भागे का सारा प्रपत्र पुरुष विभूति से म्याप्त है। पुरम ही मावर बना दी पर बना है।अमृत का अधि छाता महर, एप जो मम से प्रवृम होता है पर पर है। प्रवर पुरुष के लिए पनि मेपति न छप्पति' कहा जाता है, पां पर के लिए 'पदमन-प्रतिरोनि' या कहा गया है। अपने कामदों के कारा मदर भोर पर पुरुप मी पुस्पक् विपातिमृति से मुक्त होनात्म है प्रमाक्षर अप्पय की बानफमा से अनुग्रहीत होता मा धानारमा, किंवा प्रमात्मा है इन्द्रा विष्णू (दोनों मपर) अम्पप की क्रियाकसा से मनुगृहीत नकर पामारमा, किंवा देवारमा है। अग्नीयोमाघर मम्मय की भर्पकसा से मनुग्रहीत होकर कमारमा किंमा मतहमा है । इसी प्रकार प्राणवरमा सअनुपडीत होकर पानात्मा ( हमारमा ) है, भापवावर क्रिया से अनुपहीत कामामा [देवाष्मा) है एष पमामा-पर भर्यामुग्रहीत कर्मामा [भूतात्र) है। इस प्रकार मपर भौर पर में मी पूढे तीनों मारमवितों का प्रेग होगा।

urt-dRमा
माशिपनिषत् ।
पिरति
अक्षरपुरुषस्विपात्
११-जमा
मम् -नरमा ++ प्रभास्पा
.
क्रिया -कामात्मा
२-न
३-विष्णु
१-अग्नि-
देगामा
बिपार्म उदरपुरूप
५-सोमः
भर्ष
-कर्मारमा
मतामा
क्षरपुरुषत्रिपात्
११-प्राण धनम्नामप
२-माप
२
३-वाक्
किया --कामारमा
१-ममम्
अर्य .-करमा
भमाद
प्रमात्मा
देवात्मा
मूता-मा
"भिपा पदैवपुष्पा

माहवारमा
का रोपनिपत् ।
प्रिपारिभूति
प्रभास्मविर - यास्मपिपर्व 'मूनास्मनिपर्च
.
१-मन
१-मानन्दतिबाने 1-1-1-मन ---१-प्राणपापो
२-भानन्द ---२-विहानम्---२-मनः
मम्पयपिमूवि ३-काम: -&-३-विषेप -&-1-पारम् अम्पपपिपचम्
---&-1-प्राय ----वाक्
मम्पप --2-५-मदर -भारमपर
भक्षरविभूतिः ॥ ५-प्रमा -- ६-चन्द्रापिपा-वभागीयोमी प्रवरविचम्
परविभूतिः ।
-७-ममापी-3 प्रमामादौ महरतिवर्ष
I
+--
#-
।
प्रमास्मा
प्रमारमा
कस्मिा
उपनिषत्
भारण्यक
पोपनिपदपात्मा
नैगमिकपारमा
(शामकरणम्) (उपासनाकाम् )
भारमा उ एक सन् । एतत् त्रयम्
प्रागमिझमास्मा
(कर्मकरणम्)
अम सद् एक-१ अपमारमा

प्राव्दारमा
MATO
मानिपत
भव्यय, महर, परमेद से पुरसत्रयरूप र पुर विस में पेवन, प्रदेवन, अपवन
मेद से तीन विमार्गों में तिमाह होता है। पेतनमृति उसका पहिला विर्त इसका प्रभान
पषिमता परमपविशिर मम्पपगुस्स [शनारमा] है । मवेतनमएि इसका दूसरा विपत है,
इसव भविष्याता सम्पपहिरमिशिर भरपम्प [यमात्मा] है। एक मदनमृधि तीसरा विर्स है।
इसका भविष्य मम्पपदरनिशि परपुरुष [कम्पस्मा] है । वनसृष्टि में पहरणमा,एष परपाव
का सहयोग है, भावनसृधि में वाविप महर, एष माप्चर का सापोग है।
एक मवेतम मएि में भीसोमनाथप एव ममानादधा का सापोग है। वनसृष्टि असमृधि,किंग
भारमसृषि है। प्रसवेतममृष्टि देवमपि किंग प्राणसरि है। एव भवनमृष्टि भूतहणे, किंव
मृधि । बैसा कि निम्मावि मत तानों से स्पर होगता है।
-
.
१-गानामा-मम्पप जानेग-वनसरि -प्रसारमसृधि-
२-मात्मा-पर-कमेनारचेतनसृष्टि देवारमादि
१-कर्मा-पर-समपा-प्रचेतनसहि:-
:-- भूत्वममाति
पोगीपुपरिपार
२
१-अनात्मा-मम्मपनपनेन पेतनसधि - अमात्मसृधिः
२-काम्मरमा सम्पय कामेन पर्सचेतमसधि - कामसृष्टि
३-मामा-प्रापय कामपा प्रतनधि
मम्पयपुरुषस्तिपात
F
जानेम घेतममृधि
•--परमहरिः
३ २-कमारनौ-न्याविष्णू-कामनाइशेतनसुशि-* देशममृति प्रधरपुष्परिणपाद
३-कर्मस्मानी-पायोमी-कमणा-मवेतनसूऐ मममसृषि,

गोपनिषत्
Prat
१नामा-माण
-मानेन घेवममृमि. - मारपसधि
४ ३-सामाग्मामो मान्यची-कामना वतनसृष्टि --- देवात्मसृष्टि
-कमारमानौ-मामादो-फमपा -मधेतनसृधि - भूतारमसहि
বমিবাৰ
.
इम तीन सरियों का मागे भाकर मररुप में स्वयम्भू-सूर्य-पृपिवी इन सीम पिणों में
प्रकास घेता। सपाम् घेउनसधि का भातम्मन है, भएप प्रकरणारम्म में दमने मामा
को नायम्मुत्र मामा का सूप भई वेवनसष्टि कर मासम्मन है, मसएप देवारमा को
सौरचारमा कहा है । पूपिनी पतनसुधि का मसम्पन है, मतएव भूतारमा को पापियभारमा
या है। स्परम् मम है, सूय देव है, पथिरी मत है ।पा सह धारमविरतों की परम मा
मानम्मि है।
१-स-सयाम्बानमपो मनोमय ~~-हानारमा प्रसारमा
२-देश -सूर्य ---नियामक प्राणमय --काम्परा ---- देवारमा मिपार्ष वदपुरपा
३-भूतम्-एपीपर्पमयी -मपी-मारमा ---- भूतारमा
१-पासापप-विफसाम्पय--प्रम--- प्रायमप पापम्मुष मारमा प्रपास्मा
२-पधासार--- एकताप्पप-म्दामिष्णु-मापोमप --सौर भारम्प --देवामा
1-मादा-~मिलाम्पप-अनीपोम-मयमादमप - पर्पित भास्य - भूतात्मा
१-देवनाप्रपाना --पुरुष
२-मधेवनाप्रपाम -पुस
-प्रवेतनप्रपान-गुस्सा
--पेतनपुर
मदतनपुरुष
-अमेवनपुरुष
-
'पुरुप एवेद सर्वम्'

मा पनिषत् ॥
।
ठक तीन मात्मविश्तों के कारण प्रेश वि भामरुप की उपासना भी तीन हीर
से होती है। समस्त उपनिषदों में उपासना के सीम ही घर । प्रमात्म्पुप रतन
प्ति से भी उपास्य ६ मदतनय से मौ उपास्प है, भवेतनापि से भी उपाय है। भनि
का मेद से उपासना मेद प्रतिनि । प्रपमाधिकारी मवेतनगि से उसकी उपासना कर
सकते है, मम्पमाधिकारी भरतमाधि से, एष उत्तमाधिकारी नारि से उसका प्ान कर
सकते है। पर तीनों उपासनाए सर्वभूताम्बरास्मोपासना, रिपपगर्मोपासना, अवस्यो
पासना नाम से प्रसिद्ध है । इन तीनों उपासनावतों का उपनिषों में पृपक पप रूपये
निरूपण मा।बिस्तारमय से अधिक काका प्राव में बस तीनों उपासनाओं के तीन
मन्त्र उपम्पात कराए जाते है-
मनिमा तुपी चन्द्रम्पी दिग' पोरे पाविसलाम पेदा ।
?
पापुः माणो हृदयं विश्वमस्य पम्पा प्रतिपक्षेप सर्वभूतान्तरात्मा सर्वभूतासराला
(मुपाक. २१)
हिरययगर्म समरवनाने भूतस्प मातः पतिरेक भासीर ।
२
हिरण्यगर्म
स दापार प्रपिषी पावर्मा कस्मै देवाप हरिपा विषम ॥
(पशु सं० ११)
कर्मम्मोऽपामगास पोऽश्वत्य सनावनः ।
तदेव या त प्रम वदेवामृतमुप्पो (ह. ग)।
३ परमाद पर नापरमस्ति निषिद, पस्मामापीयो न पायोऽस्ति करिए।
हमर स्तम्पो रिवि सिष्टपकतनेद पूर्ण पुरण मम् ॥
(रपेठा शर)
सबमूनान्धरास्मनोपासना सपाभूना उरासना है। सम्भू विवरूप है, सहर है।
पूपित सातो सोक, मूल, देवत्व, प स प इसके उवर में समाए । सप्तचोक

माहवारमा गतमासी मा शानि सम्पन्म से ही इसे 'सप्तरितस्विकार' कहा जाता है। यही शिवेवर है, यही प्रमात्मा है। इस विसरूप की उपासना करना, निरम्तर उसके म्पापक खरूप पर फितन करते रहना मारमविकास का मुम्म हेतु है। इससे भारमहान का उदय होता है, कारण यह माम भानाम्य बनता हुमा मनप्रपाना चेवनसति का मधिष्ठाता है। हिरएपगर्मोपासना सूयमूसा उपासना है।सूप सप हिरण्यगम है। सौरभग्निमण हिरम है। इसके गर्म में सूप प्रविमित है। हिरण्य के चारों ओर माप भीर वार का स्वर है। सतत स्र्पप्पान से मप्पात्मगत देप्राण सरस पनता है। भारमहामोपकारिणी दिपायुभि का उदय हो । कारण यह मामा काम्परमा (देश्वरमा) बनता पा प्राणप्रधाना ममतनधि का मधिष्ठाता है। प्रवत्योपासना एपिकीमला है। "बर एक स्तम्प प्रचात् मारणात है, मचन्द्र है" इस प्रकार से विस की पर (ससारसप) रवि से मारना करने वाले के भारमा में भए राशि का उदय होता है। मपंरारा किया पर भधिकार फरता मा उपासक घनतरण प्राप्त करने में समय गाता है। पही तीनों उपासमाए प्रोकारोपासना, उशीयोपासना पमानोपासना माम से मी म्पन हुई है। सपग्भूमूसा सांभूतान्तयरमोपासना मोकारोपासना है, जैसा कि मुति कहती है- 'भोमिन्यतवरमिदं सर्वम् । तस्पोपरम्पानं भूत भरद ममिप्यदिवि सम्मोहार एप । पवान्पद निकासावीत उदप्पोकार एर' (मादाय ३०१)। "एतदै ससकाम पर पाप प मम पदोझारः" [म.उ.]। रापम्मा हिरणपगर्भोगसना उड़ीयोपासना है, जैसा कि "प पपासा तपवि समुदगीय मुपासी ला3० ३।३।१) इस्लासिए से सा।। एवं तीसरी पूपिणीमूसा मनापोरासमा प्रणयोगसना । प्रमगोराव यह भी ध्यान रगना चाहिये कि ईगोपनिपन मपामुसा भी मागेपासना (साभूतस्तरामोपासना) कानिमाण परती है, जैसा कि 'यो प्रथमद पापिदम्' । ईशापनिपत् ।। सामनारी प्रापमा - इस मरम्म रे मामाठ से सिम है। फठोपनिषद पृथिवीम्सा प्रणरोपासना (मबत्योपासना) का निरूपण करती है जैसा कि 'कर्षमुमोनाशात एपोनस्पसनावना' (पठ ) स्मारिरूपसे स्प पच मुण्टपोपनिपट सूपमा सद्गीथोपासना (रिस्पामों पासमा) का निरूपण करती है, जैसा कि 'तदासमं [प्रारिमः] म पु कासियो पान्पपश्यन्" [मु. ११२११] पेनाधरं पुरुपं पेद ससम्" [मु. १।२।२] "पत्र पाव नत्र म्या" [मु. ११६), "दिरएमये परे को हिरम ग्राम निष्कनम" [मु० २।२।१] परा पश्य परयेत रुपमाणम्" [मु. ॥१॥३५] 'बाप तरिम्पपपिन्सरपम्" [मु. 10) "सप जाए एमी अमु. १२.] इस्मादि सर से सा। तीनों ही उपास नामों का सपर ममि है। सपामू को मूस मानकर पृपिली तक माजाना मोकारोगसना है। प्रपिकी को मन मानकर सपाम तक बसे जाने प्रणोपासमा है। सूर्य को मुप्स मानकर पर पृषियी एव उधर सपम्भू तक चले गाना उद्गौफोपासमा प्रथम भी मोंकार सगीय गौर है। यो प्रणा है यही उदगीप है, जो उद्गीपापही प्रणव है। रविकोण में भेद है, पसन तीनों भात्मारि से अमिला है। इसी ममिता को सरूप में रसकर छान्दोग्यभुति करती है- "अप वा य चदगीय स प्रणव , या पराग स पद्गीय इति । असौ या प्रादित्य उदगीपा, पपा प्रणा-मोम। इस पसरनि" (०२३॥१)। बोकारोपासना प्रम्पपोपासनाई, उद्गीपोपासना अवरोपासना है, प्रयपोपासमा झरोपा समा है। कारण पम्पय का सायांमुत्र प्रभा पर अपर का सौराष्ट्र पर, घर का पार्षिक पग्नि पर पनुमा बसा कि पूर्व की तालिकामों से स्पष्ट कर दिया गया है । इन तीनों उपासमामों में प्रणमोपासना मूनाम्मा से सम्बन्ध रम्ती हकर्मकार, उद्गीपोपासनाच- स्मा से सम्मान रसती हुई उपासनाकागा, मोक्योपासना प्रसारमा से समन्ध रस्सी हुई मानकापर।गीता इसी उपासना से प्रधाम मानती है। कर्म का समय बाभय भूतमांग के साप है, उपासना देकना की रीमार अनुपास्य , केवट बानगम्म ।।

प्राकवरमा चारहपनिपत :- उपासनाची 1-सबस्नगतरास्मोपासना-( स्वयम्भूमूसा-आयामोपासना-मोकारोगसना )-बान क्याम् २-हिरएपगर्भोगसना-~~ (म्पम्सा-देवमोपासना-सद्गीयोपासना )-उपासना म् ३-प्रमयोपासना (पृथिवीम्सा--भूता मोगसना प्रम मोपासना )-फमकायाम पोपनिषदकास में उपासना का पही झम पा । परन्तु फासम्पसिक्रम से ग्यों ग्यों माना समात्र का योद नगर निषा होता गया स्पों स्यों का प्राकृतिक तत्वों की उगसना में शियित ममता गया । पतएव पुषणयुग में उक्त तीनों उपासनाए पनियोपासना रूप में परिणत दो गई । इस का यह पर्प नही कि प्रतिमोपासना पाकिसयाम्-सूर्य पृपिपी भी तो उमी की प्रतिमा है । पृथिवीपर दशि रसमी जाती है, मनोपेग मारमापर रहता है। सूपनिम्म प्रतिमा १, इस पर रशि रस्ती जाती है, तद्वारा पान सपम्पापा मारमा पर पिपा मानिस र से पनिर पर पहुचना ही तो प्रतिमोपासना है । स्यूस को सक्ष्य बनाकर मूक्ष्म पर पटुपना ही प्रतिमापूजन है । "रशिप पपर-महप भ प पर ' इसी पर सो नाम उपासना है। रिश र समूत की उपासना तो पन ही नहीं सपनी । उसना भूतग्रय, सिंच मुनि कोदो सकमी को प्राकृतिक पृथिवी -म्पपिन पादि मर्तियों की उपासना परला तो भरमत् सारा साधारण मश्रीि पिशी के पापकरूप पापणारि की प्रतिमा को ही मगरलयपना का साधन मानत है । सन् एक है, प्रवर में है। पुराणने विमी नवीन म दिप पद्धति पा पनुमा नदी पिया । भपि सु गो उपासना मे (उपनिषत् ) में भीए मे उस चधिकारी रिधिमना से प्रा का कर दे गतता है, बसा रि निम्न मिगिन पन मे गए। - - रति गमनम् । १-प्रगामे, पापा मम् ।।-परेर ५ तमोगरयम | •TORITrयर किनमें भास्सारमा माईरोपनिषत् प उपासना मिपत्पस्याप्रेमपस्य निगुणस्य गुणा मन । उपासकाना सिदपर्व तमसो पापना । को कम उक्त तीनों उपासनामों का पा, ही क्रम परिपचा मह । प्रद उपासक यह मानते है कि मार्यात में उपासना के मुसस्तम्म दो मामें नये । प्रतिमा परिण स्तम्म पचादि दूसरा स्तम्म है। पीपल-पर-तुमसीकेता भादि षों की उपासमा गाती है। भगवरिष, मगर प्रतिमामी की उपासना की जाती है। यह प्रविमोपासना साकार-निराकार मद से दो भागने में बिक ग्राप्तप्रामोपासना सिरोपासना है। इसस-पाद उर-सवटादि शारीर मायायुक्त मर्गिों की भाराधना साकारोपासना है। इस प्रकार शासनामोपासना, मतिमो. पासना, हतीपासना मे से पौशिक उपासना तीन मामों में निमकतनमुरि सदा मन्द होती है, पर नहीं होती। पुस्प [मनुष्य] रेतर है, यह गन्द्र है। मारे पास से इसका निर्माणामास उगसना में प्रतिमा का सरूप पुसाकार पैसा बनाया जाता "होसप्रसिब प्रतिमोपासना परिसी समूतान्तयत्मोपासना है । भवनोपासना पस प.मोसमा १, ही पिरम्पगर्मोपासना है। रमसम्ममप्रतिमा के केन्द्र में एक रहा है। उपर का कृष्णस्तर सफम् ।। सर्व सूर्य की प्रतिमा है। साबरम सचमुच विरण्यगर्म है। तीसरी मनत्योपासना पोपासना है। प्रमोपासना कापस माल माना गया है। इसमें तीन मार है। हमार, रविममाष, सर्प मेद से समप्रम विसत् ५ प्रिपाद पुस्पोमर का पप्पमात्र साचात् समग्भू प्रमा, रश्मिमा विष्णु , मेयप समसमान शिव। त्रिमर्पियो समशि रा.ग्रामप्रतिमा है। प्रकाराम्सर से बिपार करिए- भित्र में मात्मा के तीन प्रधान निकचरे । पहिता उदासीनमार है, इसरा प्राविभाव तीसरा रिडिमार है। उसीनमात्र 'प्रपत' है, प्रकृतिमान 'मम', विनिमय 'गुमनतस्प कार्य करण परियो' के अनुसार प्रताप यासीनमात्र पर तीन ६, प्री पी मिती कार्य है। कप, कारण कापायरयातीत मे से एक ही पुरुष प्राध्याम्म आईस नियत संरपरार वीन भागों में विमा होरहा है । इस विपाविभूति का पूर्वक अमृता पसस्थाप्रकरस में विस्तार से निरूपम किया जायुका है। मवतक मिम तीन प्रमरित्रों का विविध रूप से दिग्दर्शन कराया गया है, उस सारे पारमप्रपत्र को प्रमतम्' सममिए । प्रमी प्रम के सम्बध में पुष नहीं कहा गया है। पोग्पीपुरप में ही कई प्रकार से तीन प्रात्मविश्नों का मोग मतलाया है। अनारम-देवारम-भूवारमसमरिरूप पोडपीपुरुष भनमार दिइसीको मारमा सममिर । यही विमासम्पन उदासीनत्र है । प्राणादि पांच विकार पररूप पबप्रति प्रझम्पक है, यही दैवात्मा है। पाक्- माप-मग्नि पी समरि विकृति भय है, पही शुफ है, १- पोग्गी पुरुष उदासीनभाष अमृतम् ++ प्रमात्मा (बानारमा) २- पशहराम प्रकृतिभाव (कामारमा) 'वदे" ३-विलो विस्तपः-विविमान शुक्रम् → भूतात्मा (कमात्मा)j यही मूतामा - - - +++देवामा तपक इम तीनों भात्मामों के निमसिसित सपस सममने चाहिए- 1-"अपयपुरुपातम्मन घरपुरुपसापकोऽप्तरपुरुपः"]-जझात्मा (मोपनिपदभारमा) २- 'भारूमयभाग्याङ्गीमायसमघाये योऽयमङ्गीपालन देवात्मा (नैगमिक अन्य ) स एवरेपा माणानामास्मा" 2-"पस्प यदुवं प्रम प साम, बत् वस्पास्मा"-भूतात्मा (भाममिकमारमा ) --- पैसा कि प्रकरस के भारम्भ में बताया गया है-“निया सी." इस्लादि मन्त्र मध्यप-प्रपर-पररूप पोरशीपुरुष नाम के गोपनिपद मारमा कर ही निरूपण करता है। पर प्रसारमा प्रस्तुत की, फिर मी "मम्पपुरुप, पचराप, परपुरुष" इत्यादि सूप से इसे पुरुषशब्द से प्यास किया जारहा है, श्रीहप भारमा को पुरुष बतलाया मामी विपरीत म्पाहार कर शिशम रावी मुति करती है- 'सिपा सतीस्ता च मे पुस मा प्राचारमा या शिरोपनिषत् । पार "यो मस्तुम रिमपि सोग उन्हें मुझे पुस्प मतग रहे है" यी पदार्थ ।। अपारमा ती कैसे है 1 परिपत्री तो उसे पुस्प क्यों कहा जाता है। इस रास्य को मासों पासा देख साना , मास का ममा इस रास्म को क्या समझ सकता है- 'परयदरखान् न विपनदप' । मात् जो मुदिमाम है, वानिक है वे ही अपनी विधानानि से उतर रहस्प को समझ सकते है । सासरस मनुष्य इस गुण म्पकार के रास्प को कपमपि नही समझ सकते । सस्य क्या है! उसे कोन सममा ! मन्त्र का वपर भाग इसी प्रश्न का सम्मान करता है। पत्र में पीय की माइति होती है। इस से पुत्रोत्पति होती है। को भविष्यत्री मममम है। माता के गम में ही पुत्र नाम लेना है। सम्पूर्ण निम उस मामप्रमापति का पुत्रस्यामीप है, विच उसी के गम में जन्म मेत्य है, यही विषयोमि ,शिका पत्र है । योनिरुप स्पा- नीय, अतएप माम्मपुरुष लिप पुत्र की 'मावा' बनता पा सचमुष 'श्री'tी भी एक मही तीन तीन-सम्पप, मकर, पोर पर । पिता रेतोपा होता , रेत की माइति में पहा है भारम्म में पी रेतोपना है, मतएव पिन्धस्थानीय बनाम मा पुरुष शम्दसे मी म्पा ल होता है। पुरुष भी एक मही तीन तीन-सम्पयपुरुप, भपरपुल, पपुस्प ! विस्पोनि पापी है, रेवोपारा यह पुस्प है, रेतापापही पुत्र है। वही माता पी पिता है, जी मार है, पी कुमारी । इसी भमिप्राय से अति-स्मृति करती है- "तंबी, पुपानसि, सं कुमार पत पा कुमारी" । "नेर सी न पुपानेप नवार्य नपुंसका। पपपपरीरमाटचे वेन देन स पुग्पते ॥' "समम माता पिता समेष सपेष पिया इपित म । त्पमेव संभ ससा समेव सर मम देव देव " जो मात्रा में पुत्र [पसका रोना मा भी की मामात्रवेण] है, यही उस रहस्य को बानना है। ऐसा काम पुत्र प्रतिष्ठा की पी से] मपर्ने माप मी पित। मर्माद, दोन नागोपनिषत् ।। संपरम्पपहार में हर पितास्मामीप मनुष्य पूग्यररि से नहीं देसा बाता, भपि तु उसी का पुत्र यदि भारमा मनाता है तो दोनों की उपस्थिति में पुत्र ही पिता [ पूम्प ] रष्टि से देसा नाता है। केवस मास मुफेद होने से ही एक म्पक्ति भर नहीं कहलाता । यदि एफ सबका भवान है, मौर साप ही में विद्यम है वो उसे र कहा जाता है। भायुपदि का कारण नहीं है । क्योर पृध नहीं करतान, भपि तु विपास ही बयोवृद्ध कालाप है, एक यही सोक में पूजित होता है । इसी अभिप्राय से भगवान् मनु करते हैं- । न तेन हदो मपति येनास्य पसित गिर । पो रै युवाप्यपीयानस्त देवा. स्पनिरं पिदुः।। (मनु) विहानात्मा उस भात्मप्रजापति का मिशाम पुत्र है, कति है। यही तो उस रास्यको मान सकता है। सचमुच भान पार्यावर्ड युति के-करिया पुत्रा स ईमापिकव' इस भादर्श को भूस गण है । सति के मा पर्तमान मारतने मपोग्प-मर्म म्यक्तियों का समादर कर रस्सा है, पोग्यों को हेप समम रस्सा है। प्राचीन युग में क्या होता पा इसके सम्पन्म में मामण ग्रम्प में एक बा सुन्दर भाषमान उपत्यम्य होता है । भगिय महर्षि के बराज भतएव 'मागिरस' नाम से प्रसिर, भास्पा में बात कोरे (PAY) पुत्र म अनिर्माता ये, सापावात धर्मा पे । एकबार देवसमा ५ अपमें पित्त के साप पह बैठे गए थे। पां किसी कार्य से अपने पिता का माहाम करते आए इनके मुस से-"पुमका छोटे यो] या सुनते ही पिता मप्रसम होगये, और बोले कि अरे ! तू हमारा पुत्र होकर हमें 'पुत्र' कर रहा है। मधर्म कर रहा है। उसने उपर दिया कि वास्तव में फ्तिा में ई कारण मैं मन्त्रनिमाता । मन्त में देवतामोंने मी इसी पपका समर्पन किया । १-पतनि पुसको चरमपुत्र पवाय पाए।विध समी पराय इसके पुत्र पर मायावी तर मारना है। प्रात्ममयी महात्मा शुसीलने रखी पार को मपानक्ष, श्रे सिमासममकाही एकमा।

प्रायरमा माणपनिया हरपार -~- "गिया-प्रागिरसो मम्बहता मामदासीत् । स पितृन पुत्रका इति- मामलपक्ष । पिनरोऽनुपन-अधर्म (रापि) यो. न. पितृन्-'पुरका' इसाम प्रयसे । सोऽपीत-मा पार मिवास्मि यो मन्माए-इति । (ते- पितर'-पुपोधरे-अप्रपाना) देवानहन्त । वे देश भरन्-एप पार पिता, यो मन्त्रकव-इति । स (गिशुरारिसा)-पामयत्" इति । (ता. २४)। प्रहत मन्मने पिया के अभिप्राप से 'पितुप्पिदास' यह कहा है। यह काम- सपनी प्रश्न अप का सपिच हिम्दएन । मब सूपरप्रिमसम्बन्धिमी मावना का विदयन कराया जाता है। इति-आत्मविषयिणीमावना । P-रश्मिविपपिरामिायना विवादस्प सूप दिरस्पगर्मप्रयापति है। प्रजामति में मात्मा, मास, पर या तीन कमाए नित्य प्रतिष्ठित गती है। मामु भाग मात्मा, पोति माग प्राय, गौ माप पा है। पी तीन सूर्प के मनोत्त-( देखिए ई उ मा २.१) भायुमाग मारमा की निकास- भूमि, म्योखिमाग देवता की लिसग्मिी, एक गौभाग भूत का जनक मोक्य में कितने म्समूत है. सब का सनक सौर गौतम है । प्रकाशरूप देताओं का विकास सौरम्पोतिमाग से एमा।हम सब प्राधियों के मामा का मापार भायुमाम ।।इम तीनों में भाववरण अपराण मापाता पनि बसिवा बोपनीय र परिवार स्थान ।

माफमारमा माईशोपनिषत् | सैरमार । 'मुस्माण, महीप्राण है । इसी को 'परोरनापाण' कहा जाता है। इसी को सक्ष्य बना कर-'योऽसावादिस्पे पुरुप सोज' यह कहा जाता है। इस मात्मप्राण को-'भादिस्य स्प पर मा।' इस नाम से भी म्पमत किया गाता है। ज्योतिम्मग प्रामरूप देवता है। या भमि-सोम मेद से दो भागों में विभा। मानेयप्राणाभिम सौरसाविघमि पारकर, सौम्प प्राणादिम पारमेष्ठप मार्मबसोम दाम है। दोनों का समनिसहप पोति है । पर सूर्य में जो प्राय देख रहे है, यह भग्नि-सोप का समन्वित रूप ही है। स्मभूत पशुरूप है। १-मामा-भायु (मामा).. .-2 परोरनापास २-प्राण - म्येति (देश) मामेप-सौम्पमापी सौरसस्पा ३-पय गौ (भूतानि) - स्पूतमूतानि इन तीनों में हिरण्यगर्भ नाम से प्रसिद्ध भारमरूप पोरनाप्राण के माधार पर ही मामे- सौम्पप्राण प्रतिष्ठित है। इस भनि मौर सोम के सम्बन्ध से मनिमल सौरमात्मा भी दो मार्गों में विमत रत] होमाता है। मामेपमाणवश्वेदेन वही हिरण्यगर्म प्रयापति पुरुष है, कारण ममि को पुरुष माना गया है। एक सौम्पप्राणवधिम भी प्रमापति स्त्री है, सोम को ही स्त्री मामा है। इस दम्पति के मिथुनभाव से दराप्राणमूर्ति वियन पुत्र उत्पम होता है। सौरश्मिए पपपि भग्निसोममयी है, परन्तु प्रधानत्य सोन की ही है। कारण सोम ही भारत होकर ज्योखिमय बनत्य हुमा रश्मिरूप में परिणत हो या है। रश्मिमाव साचात् बसता इमा सोम है। सोम स्त्रीरूप है। मवएव हम कर सकते हैं कि सौररश्मिमणप स्त्रीमसार है। परत माधयति मी किरण -मपूस -उल इस्मादि रूप से इनें पुरस्ववाचक सम्दों से म्पत किया जाता है। कारण स्पष्ट है । इस ग्रस्प को इनका कमिपुत्र मानता है । मर्मात्-ममि सोम के मिथुनमात्र से उत्पन होने पासे विण्ट का सरूप देखिए-हाँ पापको सी-पुरुष दोनों मात्र उपत्सम्म होंगे । विराट् म्पोतिमपसा है, मोति सोमनग्य है । सोम सगु, गु कवि । गुसोम ही भमि में पाहत होकर सिद् पुत्ररूप में परिणत जमा है, इसी भागा- तत्व को गएप में रखकर पिर्ने विराट्रपत्र को 'कवि' शम्द से मात किया है। अग्निसोम ।

प्रमा पनिषत् । निगपत्र के पिता माता हैं। विराम्पोति की उन दोनों के पाीमार का कारण है । यदि ज्योतिम्ग ठाम म होता तो सूप में 'ममी पौर सोप दास र इसका पता हीन मात्र । यही परि का परिपन है। मपने मम पि का ममिम्पक मिण्ट्पत्र मारप से पिा का भी मि मिमिम्यमका है। स्पविद्धान बनुमिहाम, किंवा पापपुरुषभिम है। जो पाप पुपतिमानपत्य [सूर्यविसमवेच] है, पेही यह समझ सका है कि रस्मियों के बारूप होने पर भी ठमें पुरुष यों कहा जाता है। पही मन का दूसरा है। पर तीसरे प्रधान मय की पोर मापय पान मर्पित किया जाता है। इति-राश्मिविपयिणीमावना २ ३-अथ शुक्रविपायणीमावना- पवतन ममि में ममतन सोम की भाति होना पाकिसधि है, चेतन अग्नि में चेतन सोम की मानि होना मभुमीप है। ममि में प्रत्याति पाकिमसधि, गोगत में समाति पर होगा मधुनासरि है। उस मन्त्र प्रधान रूप से मधुमीसधि घी पस्योाटन करता । मयप का उपस करते हुए कहा गप्प पा कि ससार में मितने पुल, सब पास्तर में शिए हैं। बीमा होने पर मी पुरसो को पुरुष या माता बितनी मी लिए है, दे पास्ता में पुल है। पुराने पर मस्सिों को] डी का मामी [गिर १०. मा. पृ १-11। मनपरिमापा के अनुसार भक्ति के पुरुष का माथा मोमानको श्रीमानया निर्षिधर सिप है । परमप्ति मौर सोम मामा और शम मे से दो भागने में समा रहल। पुल भौतिस पर निर्मण भग्नि से ru ६, भी मौलित Tir मा निर्माण सोत से दोपहै। पति को प्रतिष्टा 14 मगरमा माईशोपपत् ॥ रहार . दपिपारिक है, सोम की प्रतिष्य वचरादिक । पतएव जी को मामा कहा जाता है । पुरुष दपियार है, स्त्री पुरुष का माम माग है । प्रसि शरीर में दक्षिणपाव भामेय है, वामपारस सौम्य है। पुरुष का मीर अग्निप्रधान में से कमरा होता है, स्त्री का शरीर सोमप्रधान होने से कोमल होता है। पुरुष कर्कश, की कोमवाली है। इस प्रकार इस शरीर रचना की अपेक्षा से भामेपारीप्रवानपुरुष पुरुष है सौम्पशरीरप्रधानाजी सीई। इस टि से पुरुष को पुरुष करना, एक स्त्री को स्त्री करना न्यायसगत है, पपाप है । परन्तु भामरमा उक्त सौकिक म्पमार भसगत है। मातापि से माग्नि स्त्री का पारमा मन र है, सोम पुरुष का मामा न पाहै। स्त्री मारमा (प्रतिष्ठयमाब) शोणित (रपिर) में प्रतिटिव है, पुरुष का चीनीय रस गुरु है। शोषित भनिरपान , शुक सोमप्रधान है। स्पी-पुरुप-मपुसक सीनो सपियों का एक शोषित सम्बन्ध के सारतम्प से सम्पन्न है। शुक शोपित दोनों परस्पर भविनामूत है । शुके साक्षात सोम है, गोमित साक्षात् भनि । सोम शीतप्रधान है, अप्ति उमाप्रधान है । एक भाई, इसरा गुप्फ । सर्दी, भाद, सोम, गुफ, योपा, रपि सप भमिनापक है । गर्म,गुप्क, ममि, भाष, पा, प्रास सप ममिभापक है । सप्पूण मौतिक विम इन्ही दोनों का (अग्मियोम कर) समग्वित रूप, नैसा कि भुति करती है- "इस वा इद न तृतीयमस्ति गुफ पाई पा यमुकं वदाय, पदाई तत् सौम्यम्" [शत० १।६।३ । २३ । ] सकप्रमपम्न यी मनीयोम प्राप्ति के उपादान बनते हुए शुक्र-योसित नामसे म्यत्र ल होते हैं। सौम्पएक स्त्री, माग्नेप शोरिहत पुरुष है । यह एक माना इमा सिदान्त है कि पनि भफ्नी चरम सीमा पर पहुंच कर स्पोमय सोमरूप में परिणत होगता है, एवमेर सोम अपनी मन्तिम प्रतिया पर पहुंच कर पमिकप में परिणत होगाता है। सोम सकोषमा १ गुमम पाराग्वेषम् । वामपन मूवाना सनिर्म परस्पनरामिरेड परस्ये पद, परसनुपरात नुपरेशात " (भुव 14.1)1 प्रस्वासमा । ईशोपनिपम् - रमरहार । है, भनि निकासधर्म है । सकोप की परमावस्पा विकास की जननी, मिास की परमा बस्पा सफोष की बननी है। ममि तेयतय है, सोम स्नेहल है। सीम्प से मविकान्त स्नेह तेन का[सम्पर क] उत्पत्ति का कारस बनाता है, सीमा से उत्तान्त सेम स्नारप में परिणत होजाता है। दो मित्रों का निसीम स्नोमान कमी कमी दमाप ( बैरभाष) का उत्पादक देखा गया है, एक दो सत्रों का निसीम रुदमाव [पैरभाव ] कमी कमी स्नेह भाव (मिश्वा) का उत्पादक देखा गया है। नि सीमता [भति] साप का पात करने बसी है। प्रत्येक मरतु खसीमा में प्रतिष्ठित पतीही पानी सम्परक्षा करने में समय होती है। हो तो प्रल में ममि सोम का विचार प्रान्त । अनि केन्द्र से निकलकर बाहर प्रपिकी मोर जाया करता पर सोम प्रधि से केन्द्र की मोर पाया करता है। भनि परामाति है, सोम प्राप्ति है । एक गाता है एक माता है । एक प्रेति [गति दे, इस भागपति है। पाठेर ममि में प्रतामा सोम भाव है। इसी एवि-प्रेतिस्प मामसोमामक पर से सारे पदाप सहरूप से प्रतिष्ठित है। गमन रिसर्ग, भागमन मादाम है। भासन विभयोमास्मक पात। पग्नितत्र का वस्तुपिड से समापद, कारण पनि मस्प है, एक सम्म सा सरय सरीरी होता है। सोम का रिण की महिमासप पन्त रिश से समापन कारण सोम भूलो उपर मम्तरिच मी प्रतिरूप परमेष्ठी है। प्रत सोम मे सिपाहिम,विध विणता पनि सतत माश्यात सत्य है, इसी भापार पर-हने ममि रिप मिता' या सानियानरमा भमि को पिशप में परिणत गर्ने पाय, सोपमा पदी सोम है । पाना सोमाम मप्ति में माहुत होता पता है, तभीतक ममि प्रग सिन राता है। प्रायसित पनि को पाक्षिण परिमापा में समिटापि करते हैं । एति-प्रेति ( सामितियों से भागनविमुगमप ममप परामग्नि समिद एप है। मतएप पार्म में पनि परिपानार [एन. १ ।। 1के अनुमार सामिनी पत्रों से भी को +aसनिल तिरेपण पप विशारमाध्यमिपबामद में समाचार माहवरमा भाईयोपनिपत - संरमार समिद करने पर विधान है। बात यथार्थ में यह है कि अग्नि मणिराम िहै , सोम गुमति है। मङ्गिरा की यनि-पायु-पादित्य यह तीन प्रक्स्याए हैं। भवायात्रय मामिदय से फैसता हुमा मागे जाता है। अग्नि की तीनों भवस्यार विकसित होते होते बघ चरम दशा पर पहुच पाती तो वीनों ममियों की गति विपरीत होजाती है। मानन्तिक विशकसन से ऊपमामात्र प्रक्तक प्रपियन ट माता है, अनि शान्त होजाता है। ममि की पा शान्ताफ्स्पा ही विर रीत गति का मामय मेती हुई सोम नाम से स्पषत होने सगती है। सोम माप-पायु-सोम इन तीन भागों में विक है। तीनों क्रमश केन्द्र की मोर माते रहते हैं । नक्तक केन्द्रविनु पर तीनों नहीं पागात, तबतक तो तीनों को प्रतिष्टित राने के लिए पमाप्त धरातस मिसगाता है। परस्त र पविन्दु पर पाने से तीनों को एक विदु पर बरना पड़ता है। इससे तीनों में घरण होगाता मोठे ही शान्तारपा नाश होगाती है। उमाबस्पा उपम माती है इसी का नाम पनि , इसकी गति बदस बाती है। प्रकल में इस प्रमीसोममाषा से हमें केरस यही बतखाना है कि ममि का णि से सम्पन्न है । इसका प्रसार प्रमाण यही है कि एक हब में पाप सोसता हुमा पानी भरवा दीजिये । उस पानी के [ऊप की भोर] निफसर्ने के लिए सूक्ष्मतम विद्रोंबाडा एक फवारा सगा दीविर । उस में से निकसमा पा पानी सगा सरी रूप में परिणत हो जायगा । इन क्सकों को भाप गोतस पायेंगे । कारण पर धक पिपर पा, तबतक मम्मि पानी में प्रतिष्ठित पा । पिसामात्र के नए होते ही भनि निराकसने की पराकाध्य पर पाप कर सत्पमान (पिगमात्र ) से पुत होता मा प्रतरूप में। परिसत हो जाता है । पूर्वप्रतिपारित मातरिया के लिहसमानुसार पिण का नाम पृथिली है, महिमा पुसोफ है। पिरासर पृथिवी से निकसकर महिपत्रयी पुलर महिमा मपास की मोत्याग करती है। पनि को इसी स्थमाविक गति को खप में रखार महर्षि कहते है- . इव एव उदासान् दिया पटाम्पासान् । ममूर्मयो पपाापि पामगिरसो यपुः ॥

प्रायरमा हाईपनिपता - ++ भगिरा तेन तर है वो भगु स्नेह ।यही गर्मा-पदी है। सर्दी पराकाष्ठा पर पापा भनि नाती नादि को बम गहती है। इधर पराकान पर पहुची से गर्मी गो (पानी) बन जाती है । सतरनानि [शनि कामु का नमक , या पूर्व की भप- मे मिमि में विस्तार से मागाही गाजार है। उक्त कपन से यह सिद्ध हो पाता है कि पति की परमावस्पा सोम है, एक सोम की पर मारस्पा पनि । स्त्री के भामाप शोणित में प्रारसोम (मग्नि है, इस दिए स्त्री मात्म एपा पुरुष है । परप के सत्यता में प्रारमि [ सोम ] है, अतएव पुष मत्मा की है। प्रकारान्तर से यो सममिर-गुरु ममरस से बमत्य है। मम पासोम से बनता है, मठ मुझ सापात् सोम , सोम सापार स्त्री। पशुगरप से पुत्र की प्रतिष्ठा बना पाहै। इस प्रतियरधि से शुकम्प पुरुष सोममय बमत्ता मा पास्तव में श्री है। एक बात मौर--सोमरूप, मारव स्त्रीरप गुग पुरुष में प्रतिष्ठित, स्वरस पुरुष मी कामना किया करता,सानि अनुपद में हो सर होने वाला है। ममि से ग्रोणित का निर्माण होता है, पर शोषित साक्षात् भनि । ममि सापात् पुरुप है। पर ऐतिरप से स्त्री की प्रतिष्ठा बनाए। इस प्रतिष्टाशि से शाणितममी स्त्री मणिमयी बनवी मास्तर में पुरुष है। ममिरूप, प्रतएव पुस्यरूप णेशित स्त्री में प्रतिष्ठित है, मतएक स्त्री पुरुष की काममा किया परती। स्त्री की प्रगमनल पात्र में प्रतिष्ठित है। पाचन मंगम नाम से प्रसिद भामेप पुरुषमा मप प्राण से युक्त है। भायर मासमा रह (सा) समिर में जो शासी एक गर्मी है, या मावप्राण की ही महिमा है । मनसा मकर राशि में भावा पा उष कराता है। मारव मांगतिक पाचन में प्रतिष्ठित भापकाम 'महरम' माम से प्रसिद्ध है। मारणा मणिमय काम है। दूसरे रामों में सीके श्रम में अभिमानि पुस्प य है, मन सीको पुसामना होती है। पुरुप की प्रसननराशि शुभ में प्रतिष्ठित है। शुक[04- सवित्र रिरिचर रापपरिगनमाप्प प्रपमर्प में है। - प्राप्यस्मा काशपनिपस् - परमार रेत ] गुरु नाम से मसिद सौम्प स्मीमा के सौम्पप्राण से युक्त है। शुपमा रत, भत- एष तन्मय शुक्र मी खेत है। गुरुयह मीनगशि का मोम करता मा उच का कहलाता है। पतएष शुक्ररूप शुक में प्रतिष्ठित सौम्पम 'मीनप्षम' भाम से प्रसिद्ध है। मीनपर सोम- मय काम है। दूसरे शब्दों में पाप के काम में सोममूर्ति सभी पैठी हुई, मतएव पुरुष को रखी कामन्य होती। सोम शस्तित्व है, सोम सम्बन्धी भनि शितल है। शिवतरण शक्तिकाममय है, शक्तितत्त शिक्काममय है। शिव राफिक पर प्रतिष्टित राति शिव की अनुगामिनी । सम्पूस विध शिक- राशिमय है। कहने को दो तस है, जो शिा (ममि) । वही शक्ति (सोम) है, जो शक्ति है वही शिव । निष्कर्स यही मा कि गुरु-गोपित प्रधि से संसार की स्त्रिए पुरुष है, पुष लिए है। या स्त्री-पुरुप का दूसरा युग्म है। - पह एक नियत सिदान्त है कि बिस पस्तु का बाहर कर घराक्स गरम होता ६ उसका पन्स पृष्ठ ठदा होता है, एक यो पार से छा सेवा है, उसका मम्त पृष्ठ गरम होता है। प्रकृति का निरीक्षण कीरिये । श्रीता में प्रहविमपरसरूप बहिरावट में सर्दी रहती है, एष मन्त.. प्रारूप प्राधियों के शरीर में गरमी का साम्राम्प राता है । शीतकार में हमारा ठरामि प्रदीप्स रहता है। मुख में से धूम निकसता रहा है। इसी प्राय ममिक्स से हम शरीर पर कम्प मादि को भासामी से उठाने में समर्थ होगाते है। इसी प्राव पमि की पा से मम अधिक स्वाया जाता है। इस प्रकार बाहर पछ , भीतर गर्मी है। मीमत में ठीक इससे उसटा होमाता है। प्रकृति में गर्मी का साम्राम्प, परम्त प्रतिगर्मस्प मायाम में सर्दी की प्रभानता है। यही शीतमाग पसीमा बनकर बाहर निकला करता है। मग्निक्सपीय पता है, प्रतएव इम निर्मस गये है। शतिकास में मिस पनिया की पा से पाहा हम दो से तीन तीन कम्पों को मोड़ने में समर्म बन पाते थे, वहां प्रीमकार में भग्नि की का से एक मामुभी पर कामी मार सहन नहीं करसकते । इस प्राकृतिक रिमविसे महल में हमें यह प्राकारमा शोपनिषत् । रम्यार मसाना है दि पुरस शरीर से भाम्नेय है। इसका महि पृष्ठ अमि प्रधान है। अतएव पुरुप सो स्त्री पर पविक व भात्य है । पर मत पृष्टाप इसका एक ठा। मतएष भाग जाकर इस कोष शान्त शेगता है। शरीर की अपेक्षा मामा बस पन् ता । मसएर शरीरसापेप कोष स्थायी नहीं रहता। उधर स्त्री का शरीर सौम्प है। उसे क्रोध नहीं पाती। मौम्यगरीयपन स्त्री AAR 1, बसा है। परन्तु मीतर शोणितरूप पनि । प्रपम जों मंत्री को कोष भावगतीनही यदि मारमभाग पर भापत होने से घी का मामा विगा पा भो फिर कुरास नहीं है । अतएव सीए प्रसि: मनी बाती है। यही भास्या मासा की। १२ मय तक कम्पा का १६ र पुर का शयर सौम्प पता है। प्रास्मा पानप है। मन एक स्त्री हटगत् बासठ मी प्रसिद्ध है । प्रतिसोम के इस गर्मनिधन की अपश से स्त्री पुरुप का एक तीसरा युग्म चार वनजाता है । स्त्री का शोणित चाग्नप है. इसलिए प्रो पुरुष । यहा गया है। गोणित का उपर का पृष्ठ धारप ही माम्नेय है परत इस परिमप एशोशित के गम में प्रतिष्ठित प्रजननकम का मुझप अभियाता मम्प सौम्प । । इस सौम्प भूण की अपेक्षा सरश्री पसतोरवा रसीलासपत में उसे पुस्प का ही भाश्रय सेना पाता है। पुरुष का शुक्र सौम्प है, इसलिए पुरुषापी है । शुक्र का उम का रसर पास्ता में मौम्प है। इस सोममप गुग के गम में प्रतिष्ठित प्रपनाम का मुम्प मधष्टाता भण'उत परि भाषानुसार माग्नेय है। इस माग्नेय भूण की अपेक्षा से पुरुष मन्तवोगाचा पुस्प ही रहता है। स तीसरी पान को मापार मान्ते गए दी तो में--प्रमी श्री भी दी रोगी पुरुप पुरपरी रोगा' या किंमदन्ती प्रचलित स्त्री की पश्चिम प्रविष्य सोम 01, पुम्प की मन्तिम प्रतिष्ठा भमि दी।पी सौम्पा हे पुस्प माम्नेय ही 11 सौम्प इसे गम में माग्नेय 'भग प्रतिष्ठित है, माग्नेय शोणित के गम में सौम्प सीमग प्रतिप्रित । यदि शुक प्रवत है तो अपिम्प से तदर्मित माग्ने पुण प्रश्न बनता मा पुषधि का कारण नता है। पर माचक प्रगत है दो चअभिनय से तद्गमित सौम्य श्रीमण प्रपस ममता हमा यो पति का कारण बनता है। यदि दोनों का सममिमुनमात्र गोय तो नपुसक - प्रामात्मा । शीपनिषत् ।। संरमपहर . प्रनय उत्पम होती है। यदि केस शुक्र शोणित का समन्वय होता है, (पदि तद्गत भूगों का जो कि स्त्री-पुश्य विज्ञानम्पपा में योगा-नपा नाम से प्रसिद्ध है मिथुन नही शेता) तो ऐसा मिथुनभाव म्पप भाता । मायुर्वेद का वक्त सिद्धान्त वमी ठीक होसकता है, पर कि सौम्य राक में भाग्नेय भूग,एव माग्नेय मार्तव में सौम्यमय की सत्ता मानसी नाती है। कारण भनि से ही पुरुप का विकास समय है। इसी रहस्प को सदप में रखकर प्राणायाम करते है- प्रापिक्ये रेवस पुस फन्पास्पादानापिक । नपुंसद तपो साम्पे ययेखा परपेवरी"- (मप्रकरण) । - भग्नि मी देवता है, सोम मी देता है। दवता प्रिसस्प होते हैं । देवताभों का प्रत्येक कार्य प्रिमाषपुक्त होता है। तीन ग्यापारों से देवता स्पायसिसि में समर्प होते है। पूर्व कपना नुसार प्रमोपतिर्म में तीन म्यापारों की सवा सिर हो सावी है। तीन मिथुमों से मिथुन कर्म संपम होता है। पान दौनिपे-प्रजोत्पत्ति के लिए पहिले पुरुष स्त्रीगमन करता है। भभी दोनों के शरीमों का संयोग है । पुरुष शरीरापेक्ष्या मामेप बनता मा पुरुष, स्त्री गरीरापेचपा सौम्बा बनती र स्त्री है। इस प्रपमाक्रमण में सपमुष पुरुप (पुरप का भाग्नेय शरीर ) स्त्री (स्त्री के सौम्प गरीर ) की भोर पाण। इस प्रपम मिथुनकर्म से संपप दारा धाकालिक पेयानर अग्नि उत्पम शेतास अमिपरिताप से पुस्प के सवाश शरीर में म्याप्त शुक्र अग प्रत्यग से मिक्सर पुनीमूत बनकर मधोमाग धरा स्त्री के गर्भाशय में प्रतिप्रित माग्नेय मार्तव में माइत होता है। यह गुरुयोणित का मिमुनकम दूसरा कर्म है। इस में शुद्ध सोम ६ गोषित भग्नि है । शोणित में गुरु की प्राप्ति क्या होगी, अग्नि में सोम की भाति होती है। यही भाप्पारिमा या। इस हितीप कम में स्त्री पुरुष पर माक्रमण कर रही है। कारण सा है। शुकही तो छोसित पर माक्रमण कर रहा है। शुक सौम्य होने से सचमुच स्त्रीरूप, एक योपित माग्नेय होने से स्तर में पुरुष है । और भागे पदिए । •सपिया पियरपिरोपन रापप बिगानमामोनितीय वर्ष में निपुण है।

प्रजरमा या ईशोपनिपम् ॥:- परमार योगिस्त में राने वास सौम्य मुणपर (खीमण पर) शुरू में यनें पसा माग्नेय भूण (पुसूय) मामण करता है। पर अन्तिम मिमुन है। इस में जिस की प्रधामन्य रहती है, उसो भूप का विषय होता है । इस अन्तिममण में पुस्प ही (प्रभूण ही) सी पर (सीभूब पर) माझमण करता है । प्रयम्मक्रमण में पुरुष प्रधान, मध्यमाक्रमण में श्री प्रधान, परमात्रमय में पुरुषप्रधान, इस प्रकार दोनों भोर से पुरुषप्रतिष्ठा की मिपि से मम्परपात्री की सतन्त्र पा नए हो पाती है। पो हतपी इस प्राप्त नियम का सपन करते हैं, ये अपने साप साप मी के रूप को भी नए फर दत है । उ तीनों प्रात्राममों में मप्पाक्रममरष्टि से (शोषित- शुक्र पी एशि से ) सचमुच संसार की सब लिए पुस्प है, एक संसार के सम पुरुष लिए है। क मत्र इसी मष्यरिपति का निरूपण परसा है। - अध्यात्मसस्था १ १-यापारीयुक्त पुरुष-पुरुष २-मोम्पीयुक्ता स्त्री ही }ক্ষণসিষমশালি-মঘমাক্ষসহ্য সুখমন্স सी "पुरुप एवेद सर्वम्" १-मौम्मे शुभम्- २-मामेपमाचसम्- २ स्त्रीपुस्पानुभापरि-द्विवीपक्रमणस्वीप्रपामम् १-शुक्रगत भामेय [भण -पुरुष २-गो. ग. साम्य स्त्रीभूम-मी पुरुप प्रियमनुशपति-सुतीपाश्मरपुरसमा. TE सानो स्पिधियों में से मप्य के शुकरहिवभाष को सम में रसार अपि करते है- श्रिया सवीता मे पुस भार इस हम्प को पल्पवान् ही सकता है, अपनों का प्रभा इस रहस्य को क्या जाने । को म कामति के 'मकर-मीन' सरूप को समझना है, वही पा मान सकता है कि सक ।

प्राफतारमा ईशो निपत् - सारपवार । पास्तप में श्रीकाममय है, शोणित वास्तव में पुरुषकाममय है । वह दूसरा सममने वाला प्परित है पिपुरुष । यह इस श्रीमान को चानता दुघा सचमुच अपने पिता का भी पिता पन रहा है। मुगु पोर पशिरा का रास्प पानने वाला पुत्र ही की है। ऐसा पिहान् अपने पिता से भी अधिक प्रतिष्टित माना जाता है। विज्ञानरशि के अनुसार कलि का अपहै सगुतस्य । भाप- पायु-सोम को ही सगुण कहते हैं । पुत्पति शुक्र की भाति से होती है। सोममप शुक ही मग्मि शोणित में सुन (ममिपुत-माहुत) होकर पुत्ररूप में परिणत होता है। गुरु में जो मनवा है वह पानीका माग है, सराभाग सोम है, गतिमात्र पायु है। इस प्रकार शरा (सोम) प्रधान गुक में भार-बायु-सोम तीनों तत्व प्रतिरित है। ऐसी प्रयत्मा में हम शुकको भारय ही 'गु' कर सकते हैं । मग ही कपि । ।पा कवि (मगुरूप शक) पुत्ररूप में परिणत होता है, पता शुक को घारप ही 'कविपुम' फश मासकता है। एक सोमप्रधान होने से पुप्ररूप में परिणत होता है, इधर मोम ही है, भारस तद्रूप पुत्र (पुरुप) को हम पारप ही भी काने के लिए तम्पार है । सी अभिप्राय से-'करिपा पुम समाचिके।' (को पविह इस एप को जानता है) मह कहा गया है। कन्पासताम में शोणित की प्रभा मता रहती है-'फन्याम्यागासमापिने' । कपिपुर (गुवस्प पुरुषभण) ही कीमण योणित भण) के साप सयुक्त होकर श्रीमान का वरण मनता है । सोम ही भमि की घोर जाता है। फरयो पायक प्रतएव भीए शोणित भूय का सम्पद परिशता शुकभण ही है । इसी मभिप्राप से मागे जाफर अति वाली है-'यस्ता विमानाद' (कविरूप जो पुरुषभण स्त्री भ्रूण पो आनता है)। जिसप्रकार स्मीमपसमर्थक स्त्रीभ्रम मानेप योखित में प्रतिष्ठित राता १, एपमेव पुरुषसरूपसर्गक पुण साम्पगुक में प्रतिष्ठित रहता है, पर पूर्व में कहा जापुका है। गुरु पर भाधान करने माता पुरुष 'पिना' पइसाता है । इस पुस्प पिता का पुत्र शुक है। पुप्ररूप शुकदी पुभरण का उपाय पनता है । पुषगरा गुयाति देने वाला पिता माता के गम में अपनी स्वीरे गम मे] सय बग्म सेना, मतएर 'भापते पिता स्मय- अस्पा' इस निषपन सेस्त्री को 'नापा पदा जाता । परमें प्रधा में उम्पन होने पान - पुत्र

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भावात्मा काशीपनिपत्। मारमबहार - यदि यह वायु गुफ को दो माों में विमझ कर देता है तो यपर सन्तान उत्पन्न होती है । रेत को योनि में, सुप्रम को प्रम में, सोम को भग्नि में शुक्र को शोणित में माहित करने के कारण से या वायु 'मावरिया' कासव है। माता सी है, पिता पुरुष है । बायु शुक्र के चारों मोर वेशित कर री शुक्र की मातुति देता है। सोमप्रपामशुग बीरूप बनता एमा सचमुच 'मावा' है। प्रतएम-"मातरि (गु) भयदि (भ्यासले माति)" इस म्युत्पत्ति से शुभ मापाता इस रेतोपा वायुको 'भावरिश्ता' फरमा म्पापसात होता है। रेत मपर्ने माप योनि में सिक माही होता, मपि उपायु द्वारा ही यह सिक्का होता है। बीपुरुप के मिथुनम्मा से भग्नि प्रस्त होनावा । मनि के सुम्प होते ही शरीरगत वायुपाहिनी नाडियों [धममियों) में मरा हुमा माय स्थान भ्युत होता हुमा मग्नि से सतप्त शुक्र को संस्थान से पुत कर देता है। मामु के प्रमापात से ही गुरु गतिमत् ममत्वामा योरिणव में भास होता है । इस मप्यारमसस्था के साप मधिदैवत की सम्वा का विचार कीरिए । गर्माशयगत सदिर को ममि सममिए, इसी को घेद सममिए । वेद धेरि पर ही दो प्रतिष्ठित पता है । माता ही तो घेदि । निमापरपयायक भनेवदेवत् पगु को ब्रम सममिए । शुक्र को सोम सममिए, इसी को सुधेद समझिए, इसी को पर प्रमापरपयापक 'भाप' [सनम] सममिये । शुक के पारों मोर बेषित मार्गबवायु को 'म्पतरिया' सममिरे । ती तीनों को कपय पोनि-रेव-रेवोपा सममिये । प्रारूप योनि में मापरूप रेत की दापुरप रेतोपा मातरिचा शरा माति होती है। दूसरे शब्दों में मातरिचा मापसरव की मन में माउति देता है, इसी से गर्माधानपूर्वक प्रनोत्पति होती है । पाप्राप्पामिक प्रजोत्पविक्रम । पैसा भाप यहां [भप्यास्म में ] पस्पक्ष कर रहे है, ठीक पी रिपति हो [भविंदैवत में ] सममिपे-"पदेव वदमुम" । १-पोनि. २-नेत २-तोषा-- -एकम् [सौम्यम् ] -भाचकम् [म्पमेयम् ] ----- +पमाग्नि [प्रम]] →पससमोम [भाप] पदा प्रमोत्पतिः [अनुप्पाराव ] -~-मागवायु मातरिया] नायु १॥

प्रासमा मा रोपमिपत ॥ एसपब रेवोधा पिता का पिता (अमदावा-ममिम्याक) पास्तव में कवि पुत्रकप शुकही। एक मोर पण है, दूसरी मेर पित्य है। मध्य में पुणाभिष्ट्या कविपुत्र नामक एक है। यदि वा पुत्र म होता तो पृथ्ण कभी सपनरूप में परिणव नहीं सकता था। दूसरे राम्दों में पा रेतोपा पिता कमी जापा में चम्म माहीं सकता था । पिम के पापा में जन्म का रे पुक, मतरक हम इसे माश्प पिता का मिला (पुगप पिता का मी भमिम्पक) कर सकते है। इसी रहस्प को सदर में रखकर 'सपिपितापत्' "प शुमार कमिपुत्र पिता [प्रतिकृतिरूप पण का भी उत्पादक एक ममिपद्धक यमता मा पुसरूप माने फिल्म का भी पिता बन या या मया है। पत्रापसम्पम्पिनी तीसरी शुक्रविषयिणीभाषना का सधिम सिन । गया इति-शुक्रषिपायिणीमावना। ३ प्रासङ्गिक पचा समाप्त हा । मम पुमः प्रात वियप का उमाण किया जाता है। उप- मिपत् के चतुप चरण का उपक्रम करते हुए रेत-रवोपा-पोनि उत्पत्ति कर्म में इन वीन माषों का समावेरा बमहाया गया है [ देखिए इमा० १७७१.] । इन तीनों में रेस और योनि दोनों हिमा है, रेतोषा गणित है। पपी पविदेपासस्या में यहाँ-'मातरिमा' नाम से प्पमत होता है, महा मापारमसस्था में श्री 'एक्यामरुन्' माम से प्रसिद्ध है। योगा प्राणप्रचामा जी का मनिमय शोणित योनि , पाप्रापप्रधान पुरुप पा सोममराक रेत' । पर माइति ट्रम्प, भाष तक, साम।बी का रक्त भारत का स्पान है, पनि प्रय है। इस अमरूप पोनि में सुमन की माहुति होती है। मातुति दने बासा मुहै। •एसपिन सणिण विरेवा मासदीपस्त पिानमाम्प में देखना चाहिए ।

प्राविरमा का ईशोपनिषत् । सारम्पार पदि या वायु एक को दो मामों में निमस पर देता है तो पमन सन्तान उत्पच होती है । रेत को बोनि में, सुत्रध को बस में, सोम को ममि में,शुक्र को शोणित में माहित करने के कारण की यह वायु 'मावरिया' कराता है। माता मी, पिता पुस्प है। आयु शुफ के चारों भोर वेशित होकर ही शुभ की पाहुति देता है। सोमप्रपामशुक बीहप बनता हुमा सचमुच 'माता' है।प्रतएव-"मातरि (गुन्हे) पति (म्पातो मपति)" इस म्युत्पति से गुरु भाषावा इस रेतोषा गायु को 'मातरिश्वा' कामा म्पापसमत होता है। रेत अपनें भाप योनि में सिक मही होता, मपि तु मायु द्वारा ही यह सिहोता है। श्रीपुरुप के मिथुनमा से ममि प्रबल होगाता है। ममि के तुम्ध होते ही शरीरात वायुवाहिनी मारियों [धमनियों में मरा हुमा वायु स्थान मुक्त होता हुमा पग्नि से सतप्त युग को सस्पान से व्युत कर देता है। वायु के प्रमापात से से शुक्र गतिमत् बनवा सभ्य योगिरत में माहुत होता है। इस मापारमसस्या के साप अधिदेव की समता का विचार कीथिए । गमाशयगत रुधिर को ममि सममिर, इसी को वेद समथिए । वेद वेरि पर ही तो प्रतिष्ठित रहता है। माता ही तो दिहै। निमापरपयापक मनेजदेवत् य को प्रख सममिए । शुक्र को सोम समझिए, इसी को सुवेद समपिर, इसी को पर प्रमापरपयापक 'भाप' [सनम] सममिये । शुक्र के पारों मोर वेरित मार्गमायु को 'भातरिया' सममिपे । इही तीनों को कमरा योनि-रेख-रेवोपा सममिपे प्रमाण योनि में मापहप रेत की बायुरूप रेतोपा मातरिश्मा धरा भाइति होती है। दूसरे शब्दों में मातरिया मापतरव की प्रम में माहुति देता है, इसी से गर्मापामपूर्वक प्रनोत्पत्ति होती है । पह है माध्यामिक प्रमोत्पत्तिकम । जैसा माप यही [भप्यारम में ] प्रत्याप कर रहे हैं, टीक बी पति को [भषिदेवत में ] सममिये-“यदेह सदमुत्र"। . - २-रेत ३-खोपा- -माचाम् [भामेयम् ]--→→ →पनमामि [ मम]] -→पमामसोम [ माप] सवः प्रजोत्पचित [अनुप्माशीत ] +--भागमायु-मातरिया शुक्रम् [सौम्पम् ]- १०४

१-माप (सौम्य -श्री-रेत)माप -अम्मिनुभामम्
मातास्मा
या ईगोपनिषत् ॥
अनेजत्-पबदरूप प्रम यपुरसिम्मति समता मा यपि पुरुप , परन्तु यह निवप्रया का
पोनेस्मानीय होने से स्त्री कहा जा सकता है। एक समय सेमरूप होने से यबपि स्त्री
पन्त मस्पानीय होने से ( रेतस्पानीय होने से) यह पुस्प माम से म्पत किया जा सकता
है। प्रपंपियाफ्न से माप उपमामा । प्रपोलिया के साम्प र मापके गर्म में प्रमा
होगा । पर पहिण माक्रमण है, महिमा मिथुन है । ममामिलप पुरुष सुममसोमरूप स्त्री
पर मानमय दर यामागे चाकर मप्पात्मप्रमानुसार मातरिया पप र माप (क)
उस प्रम (योनि) २ साप संगत होता है। प शुग-योम्ति का दूसरा मिमुनकर्म है।
भागे जाकर माग्न पुभूगरूप गपत्रीमात्रिक नाम के पेामि, एक प्रकामिव सम्पारूप स्त्रीभ्स
दोनों का मिथुन होता है। पर तीसरा माक्रमण है । इस से मियुनमान सामना सम्पाम
हो जाता है, एक तत्काल निराट्यरुप गर्म में मागता है। पालिराट् इस दम्पत्ती की पहिती
सतामहै।
अधिदेवतसस्था
१-प्रझामि (भनि-पुरुप ) प्रम प्रपोऽमि मनुपाति (प्रपाकमयम (पुरुष)-
२-माप: (सोमा-स्त्री) (पुस नियमनुगकति ) प्रधानम्
२
हि भाक. भम् (स्त्री)प्र
१
३
२- स्मगर्मित सोमवेद (कोभय सोम - अश्वेिद सोमवेदमनुषाकी ? ए मा घेद ()-
१-मगर्मितोऽपिवेदनपभूतोऽमि -पुरुप)
(पुण पिंपममुणवत) प्रधानम्
"ततो विराडजायत"

प्राकमास्मा में शीपनिषत् ।। मसामति 'भनेजदेके मनसो भपीय' इस्मारि मन्त्र तीनों रिपतियों में से मम्पस्पिति का से निरूपण करता है। ममिममिम योनिरूप से सस्पान में प्रतिष्टित है। इस में मारिश शरा भापरूप रेत की भाति होती है । दोनों के { भग्नि मोर पाप के ] मिथुन से विराट् पुरुप उत्पन होता है, जैसा कि-'तस्यां स विराजमसमद प्रमुः" इस्मादि रूप से करा चा पुका है। प्रम-पाप के मिभुममाव से उत्पम अपूर्वभाष में प्रम मोर भाप के प्रतिरिश और क्या हो सकता है ! वे दोनों पक पक थे, दोनों का समतिरूप विराट् है । अक्सामावलिम प्राम मम है। इस में यत्- (एनव-भनेन । दो विमाग है । इस प्रकार अक्-साम यजुमुर्तिबम श-साम-यत्-न मेद से चतुष्कास हो जाता है। दूसरा प्राप्तरत्रहै । इसकी मृगु-मङ्गिरा मेद से भोप-वायु-सोम-मि-यम-पादित्य या ९ कमाए हैं । समूप १० कसाए हैं। दराकस की समरि दश महर की समरिहै । एन्दोविज्ञान के अनुसार दणपर एन्द को से 'मिरान ' [दधिनीमिराद् ] कहा माता है । यही विराट् सूर्यरूप से हमें प्रस्मथ दिखाई देगा। सूप भापोमय है, इसी लिए वो–'अपांगम्मन्स्सीद' पर कहा जाता है, एक अमिमयल तो सहै। यदि सूर्य में पानी न होता तो सूप घणमात्र में संसार को मस्म कर गसता । साप में परि सूर्य में ममि म होता तो सारा संसार समुदगर्म में विलीन हो गाता, जैसा कि प्रतिदिन धीण घेता इमा किसी युग में [कम्पान्त में ] निःशेप ममता एमा सौर भनि प्रमुख भाप का साम्राग्य रसता मा प्रत्य का भविष्यता बन पायगा । इसी मप्-अग्नि मर्सि विरासूपपुस्प [ हिरण्यगर्मप्रजापति ] से आगे की सारी पपिएं होती है, जैसा कि निम्न विसिव श्रुतियों से स्पर- . 1-विषम परिणं मावस परायण ग्योतिरेक वपन्तम् । सप्तरश्मिा शवया पर्चमानः प्राणः प्रजानामुदयत्येप सूर्य । [प्ररमोपनिषत् ११] मामा माशोपनिपत :- मानामा ५-दिगो रुपम उरुपमा नदेवि दरे परम्वरसिधाममानः । नूनं जना सूर्येण प्रसता भयमपानि यसपासि ॥ [ सै० म० । ६३ ० । १ में.) -चि देवानामुदगावसुमिप्रस्प पम्णस्पाः। भागापावापृथिमी भन्दरिध सूर्य प्रात्मा जगतस्तस्थुषश्च ।। [पणु सं० १०६] मम और मुझम दोनों मम्पक थे, पहिला म्याक ही सम्पोतिर्मन हिरण्यगर्भनाम से प्रसिय विराट् पुरुष है। हिरण्यगर्मविपा के उरासक माबि बि को सूर्यमूस मानते हैं, पैसा कि–'मुगरकोपनिषदपिमानमाम्य' में विस्तार से निरूपित है। इस मिथुनमाप से मा का उदय होता है, पी प्रमापर सूप का निपहप, साहिल पूर्व में बताया जा चुका है। इसी प्रमाण को सस्प में रहकर स्मृति करती है- सयाममपदम सामागसमममम् । वस्सिमो वम प्रमा सरसोकपितामा' ।। (मनु० १६)। सयम्भू -स सूय के पिता है। सूर्य हम सबके पिता है।तमी तो प्रमा को पिता मा नाय] कहा गया है। विराद पुरुप को पर्ने गर्म में बीजरूप से प्रतिष्ठित रम पमे, रख-पोनि-रेतापारूप उस दम्पतीमात्र काही 'भनेमदम्' इमादि मन्त्रमे निरूपणहमा है। 'प्रनगरक मनसो मवीयो नैनदेग माजुरन् रमपद' 'तदातोऽन्यानसेनि विद पा मन्त्रभाग योनि का निरूपक), 'हस्मिापा' पर प्रग रेत का निरूपण करता है, एप 'मातरिया पावि पर मन परेतोषा का प्रवेपन परतावेदमन ईमर समुदामरूप से साप मनेग्र, भरपारमा मन से भी पीय है । इस प्रकार निर्म पम्ति (पति) नर्मित निप्पणम्त पतिय] पप ईमर [सबभूताम्तमा] बत् स्तम्भ पा साप मैप इस पूर्णपुरपये पूर्ण है। स्मितितिसमरिरुप सम्पापक, निम्तु मापापपिप इसी तल +फवारमा ईशोनिपस् & मनापति को हमने यजुर्वम कहा है । वेदश्यी में अखेर महोदय , सामवेद महावत है, यह प्रमि है पा है, योनि है । इसी यजु के दस मस्यबाद भाग से पामरूप मापोत्रम उत्पम हुमा है। वहांतक यमुन म्पाप्त है, हीतक भापोत्रम म्याप्त है । दोनों समामायतन है । महा मायावमिम वियाफर्ममय उस म्यापक पराशरविशिष्ठ प्रश्यप पुरुप [पोरशीपुरुष का विध पाने सामने रखिए । इस पर पहिया वेदप्रपीरूप नमस्तर समझिए, दूसरा पसाप मुनम स्तर सममिए । साथ ही में तीनों की पाप्ति समानप्रदेश में सममिर । साप ही में यह भी स्मरण रसिर मि उत्तर उत्तर स्तरों में पूर्व पूवस्तर निम्न प्रतिष्ठित है । 'मनमरेकम् ' से पहिला उपनिपमाग पिशुद्ध पोपीपुरुष का निरूपण करता ', 'मनेमदेकम्' इस्मावि मन्त्र विषा-कममप दूसरे प्रशस्तर का निरूपण करता है , एर मागे का-'सपर्पगाव' इस्मामक सीसरा मधिकरण तीसरे मुनमस्तर का निरम करता है। प्रमपुरुष से उत्पन मनप [अप] सी पुरुप पर प्रतिछिन पी, पति पत्नी का सम्बन्ध पा, परस्त बहिर्याम सम्बन्ध था, दोमों के शरीर मात्र मिले हुए थे। ऐसे योगास पहिम सम्बन्ध से बरयोत्पति असमय पी। मएप मागे मार मातरिश शा दोनों का मन्तपाम सम्बन्ध मा । इन दोनों के मिथुन भाव से बो भपूर्ण तत उत्पम इमा, पही-शुक' नाम से प्रसिमामा । पूर्वमें हमनें इस मर्वभाष को 'पिराटप' का पा एवं यहां गुरु को भपूर्वमाव यतसापा नारा है । इसमें विरोध नहीं समम्मा पाहिए । कारण 'गुरू' ही सूप का बग्मदाता है। शुक्रावस्या कामशिष प्रदेश ही मागे नाकर सूयाप में परिणत होता है । अतएव-'सदाऽएप पर शुक्रो य एप वपति' वपदप वपति तेनैप शुक्र' [शत० १ २।११।] इस्मादि रूप से सूप शुक्र माम से प्रसिर । भएर प्राविधा के अनुसार यहाँ पन्द्रमा को 'मन्दी' का नाता है, वहां सूर्य को शुक्र का बावा । सौरामि ही भपर्ने प्रबग्यारा से प्रीष्म ऋतु का अधिष्ठाता बनता है, प्रवरव मीम ऋतु को भी [सूर्य सम्बग्भ से] 'शुर'का नाता है। भयेष्ठमास 'शुद्ध', पापामास 'शुधि । विलिर राव. श]| विराट् सूय को छोड़ दीपिए । अभी विराट् राम्द से केवत का माण कीथिए । प्रयीप्रम एव भापके मन्तयामाप याग सम्मान से प्रागरण . माइशोपनिषत् ॥ मा नो अम्पर उत्पन हुपा, बही मिष का उपादान बनता मा [अ-साम-यत्--- वयु-मोम-भग्नि-पम-मादिम मेद से दशपर बना मा निराशक नाम से प्रसिद्ध राणा वक [महामायावक प्रम-मुबमास्तर म्पप्त थे, ही तक दोनों की सम्मिसित भस्मा- रूप पिराशर प्पाप्त मा । यही पहिसा भम्याक खपाम् । ससौम मोर असीम [लिनु मायावहिम होने से परमार्पतः असीम | मेद से सपाम् दो प्रकार का है। यस्तक मसान् की उपपि नहीं होती, सब तक पुपशीर खपम्म् का उदप नहीं होता । मदुत्पति से पहिले पपनी सपा रखने वाला शुक्ष्मति सपा म्पापक है, मधमापादिम मनतामा एक। इस महा नियापान मा सपा के उदर में महान् कीग से उरित हो रही पमन्त योगमायो से पनन्त पुपीर सयम्भ प्रादुन होवे , बिनका न दिग्दरान पाठ मत्र में कराया पापण। जो पिठी समप सिम पा, की भावारिया शारा परान [प] से मिभुनमात्र को प्राप्त होत्य हुमा 'शुक पास में लगता है। शुक रप पदापास प्रश्न का उपप्रमगर्मित पजुनम । विश्व के उपादान कारण ही को शरते हैं। इसमें वेद-भुवद दोनों है । दोनों का मिपुममाष ही विसापाशन मनसा है, भतरप इस मिमुनहर को हम भारप ही 'शुक' राप से प्यार कर सकते हैं। यही प्यापक मापत सम्भू है । ही पाय मागे जाकर प्पा मासर में परिशत होकर मर का प्रभा-प्रतिष्ठा परायण बनता है, वैसा शिन वपन से पर- । प्रम्पकादम्पत्तय सरा ममरन्पाराग। राम्पागमे मतलीपन्ने परम्पकमाके । (गो. ८१८) पही भापा माचल के सम्माप से भाप में परिणत होगा। इस प्यारक मापनि पारस से सरि लमाण होता। शरीर पर विरानि पिन शरीर में प्याक सभी गुर प्रगति पर मही मना । पपिचित पर दीपोने ३म्पनर प्रयोगति मरण मापदी पारला प्रस्वास्मा मन्तति माईरोपनिषत् ॥a- यहां सममिए ।महामायापन्छिन परशरीर शुक्रमप (लम सुप्रनमय) है। जैसे मिम पिन शुक्रा- हुतियों से मिम मिय (पुत्र कस्यादि ] प्रचार तत्पम होती है, एक्मेव ईपर शरीर में म्यास शुक्र की सिम सिम मातियों से मिष मित्र प्रवा की उत्पत्ति होती है। ईयर पी मना के -स्मयम्भू (पुरीरस्वपम्म) २-परमेष्ठी, सूर्य, ४-पन्द्रमा, ५-पपिपी पर पच सिमाग है । पानों की समरि एक विचाना है। ऐसी ममन्त प्रचार (मनन्त विप) उस में उस के सिम मिम शुक्र प्रदेशों से उत्पम होती है । इस प्रकार मुक मेद से मनन्त निवप्रनामों को उत्पम कर का अनन्तविवामिष्टान न पाता है। ईश्वरतात 'गुक' रूप में से परिसत दो या। प्रात मन्त्र इसी का समापन करता है। एक मा एक पिम पिम प्रनामों को कैसे उत्पम करत्य' पुष्टीर प्रमाचों का म्य स्वरूप है। इम सब प्रश्नों का समापान 'स पर्य गाव परि मन करता है। पम्म् अपसस्प है। प्राकृतिकप्राण की दिखसमचि होने से इसे 'मावास्मा' का बाप है। मानप म्फा विश्व का भविष्टादा पा स्वर सम्यक है। इसी एशि से इसे 'प्रम्यकास्मा' कहा जाम। मध्यात्मसंस्था में यही सम्परांश'शान्तास्मा' माम से प्रसिर १-(रेखिए कोपनिषत् ।।१) यही प्रमतस्पातर,सपम्म, प्रम्य- कारमा, शाम्तारमा मादि विनिय नामों से प्रसिद पहिला प्रारूवारमा है। पर महानास्मा अम से प्रसिह दूसरे प्रास्तारम्म की भोर विज पाठकों का पान माकर्पित किया पावा। - इति मन्त्रार्थप्रकरणम्

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श्रव्यकात्माधिकरणे- विश्वविश्वात्मनो-सम्बन्वाधिकार ( अमृतात्मना सह ब्रह्मसत्यस्य मम्वन्धनिरूपयाम् ) ब्रह्म-कर्मणोः सम्बन्धः १ तदति तम्भबति सद्रे तास्तिके । तदन्तरस्प सास्म तद्द संस्प बापत ॥१॥ मम कर्मस्पर यस्त सवाणि भूतानि-मास्मन्येषानुपरपति । सर्वमतेष चारमान स्तो म विजुगुप्स्ते ॥ २ ॥ फर्म प्रसस्वम् पस्मिन्सवाणि भूतानि-मात्मैवादिचानतः । तत्र को मोह क शोक एफस्समनुपरफ्त ॥५॥ अमिन कम

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५ wat ब्रह्मकर्मसम्बन्धनिराक्ति म्पय पुरुप प्रकृति को भागे कर के ही सिनिमाण में समय होता है। प्रकृति प्र शिशिध, (मत एष) सथिप्रवर्तक मम्पय पुरुष के ब्रा और कम यह दो प्रधाम निस । भामम्द-विधान-मन का समुचप प्रममाग है, मन-प्राण-पक्का समम्क्विरुप कर्ममाग है। दोनों निष्म सहचारी है। प्रम-कर्ममय सम्पप से (प्रकृति द्वारा ) उत्पम लिय में भी प्रम-कर्म (हान-क्रिया ) इन दो तत्वों का ही सामाग्य है । प्रयास करने पर भी माप वान कर्म के प्रसिरिक तीसरी वस्तु प्राप्त नहीं कर सकते निधारमा में प्रमभाग विकसित रहता ६ विश्व में फर्म की प्रघामता रहती है। मत एप विचारमा को 'प्रम' माम से म्पबत किया गाय, एवं विच को 'कम' नाम से पुकारा जाता है। इस मेद म्पहार का भूस कारण यही है कि सम्पपात्मा का सठिाचीभाग मन प्राण- बास्मप है । मम स्पों का उप-म-साम ६ प्रार कर्मों का क्रियामों का) उप- प्रम-साम है, एक पतस्य नामों का उप-प्रम साम है। मामरूपकर्म की समरि ही निस सम्पपरमा रेकर्मभाग को भासम्बन मानकर रादतन्मात्रा वारा ही विश्व का निर्माण आमा है। इस फर्मप्रपान विप के प्रम-राक-पिरस या सीमा विवत है । सम्पपप्रधान पोग्शी सर्व प्रपत्र किंवा ममतारमा है । उपनिषत् के भारम्म में (१० ११) एव प्रासा- राधिकरणातर्गत वेदनिरुक्ति की प्रकरणसंगति में (पृ० स० ४।१० उपनिषत् का जो विषय विमाग बतलाया गया , माम उसे दूसरी तरह से देखिए । कर्मगर्मित बम ( पोग्गी पुरुष) के प्रपत-प्रम-शुक्र-मिका या चार मिगत है। यही पनुप्पानमा, मिसा कि पूर्व के चतुपानमनिरूपणाधिकार में विस्तार से दिग्दर्शन कराया बापुका है। प्रान्सर से शोपनिषत् इम्ही चारों प्रम निवतों का निरूपण करती है। मत्रत्रयात्मक प्रपम प्रकरण (पुस- पारमाधिकरण) प्रमत नाम से प्रसिद लिएर पोग्रएप का निरूपण करता है । 'प्रनेम ऐक ममसो मवीप' या मात्र नाम नामसे प्रसिद्ध मम्पा तत्व का निस्पण करता है। - प्रवरमा भादशीपनिषत् । सम्मानित -- - स पपगालुकम्' इस्मारि मन्त्र शुत्र माम से प्रसिद्ध महतियार पशतव का निरूपण परता, एक 'सपर्पगा' से भागे का साप प्रकरण विश्म नाम से प्रसिद्ध धारक पद का प्रतिमान करता है। इन पारों विषयों में भतारमा निरपरमा है , विपक्ष मापन ३ विमसायो है पुर। मन [पम्पक] मूसमाति है। शुक्र विवि । विकार लिया। पल-प्राव-विवि-विवर-की पत-सम-एक-पिरस हैं। इन चारों में पुरुष ज्ञानप्रणा बना मान, प्राविति-विकार यह तीनों मिक्स कर्मप्रधान बनते हुए कमाए दी । यपपि नियस केस विकारसए का ही नाम है । तपापे वित्तिरूप पुक्र ही इसम उगम पारण बनता है। एक फापर तिस उपादान कारगरूप शुक्सवा से ही सच्च युक्त बनगा। कारण काप से मभिष, वियर निरस्त से अभिम । मतरस विकृति कर सुर को विकासमनप पिच में मनमा मानचिपा जाता है। तीसरा है प्रवरूप अप भार । मध्य प्रति दीपक महत (क) को उत्तम कर दिया की मस जननी बनती है। प्रान की पप्पामा ही तो म्पकमात्र में परिणत होकर शुफ (उगान) बनती है। मत इम प्रतिर पन्या मन का मिविरुप प्रा शुरू में पन्तभाव मान लिया पाग। पारी को मिस्त से प्रप नही लिया पासता मिहत को मरव से पृपा नही माना जासक्रम। माझवी (निमिसारण) ,माप उपादाकारणासगरि मिरर कापसाचीपा मपममतामा प्रतिनीलिमीराननीनों का मासम्पन पनता मा रातमान प पारपती । पपरि गपाधि से पार करने पर मर्प सपनामा में भी सोण पुरुष में मी) समय-मवर-मापवर-अपामसिर पूरा कम से उप्ट कारराम परपी की मुना सिरोपाती है। इस ममाग में मापप अपन, पर मप (मामा), पर गुम (AERA, RRB-ए-मिस राशि परिमाप मरे याने में पाया पनमन है, पर अमित पररा, भापश उनकारास कम- ARE ग पाप मा, तप मेरे पाएमावरे यार उस गाईपनिया - साल्पनिक स्पित होने पर इस क्रम को प्रधानता नहीं दी गसकती । 'तर सर्वाणि भूतानि' के पनु सार मौतिकनिरण मम्यप-प्रदर की कारणता से पृषक ही मानना पड़ता है। टीक है कि मामचरण वा ही परमारपता है , तथापि स्माधि से हम पोरीला अमृतारमा को कामकारणातीत ही करेंगे । इस प्रकार पतुष्पादनम के सम्बन्ध में मामा-पिरस मेद से दो विध रोगाते है । मामा भी पतुपात है, अन मी चतुष्पाद है। दोनों की समष्टि मध्यवर गायत्रीद। मतएव अमविद् प्रामण गायत्री से ही विरस का निर्माण मानते हैं। पुरुष-प्रति शिकवि सब कुछ गमपी के उदर में समाविर है। गायत्री चतुष्पाद अन की विभूति है । 'सराणिमा छन्दांसि चतुरुपरामि' के अनुसार गायत्री के भारग्म में चार पार (मपर) थे, परन्तु विनोत्पत्ति के मनम्तर बतुप्पा पारमासमशी गायत्री पायपरा बन गाठी है। इसी प्राविमूति की प्राप्ति के लिए प्रमविद् प्रामस माममुहूर्त में पूर्वामिमुख सोपे कर गायमीत्रा का स्मरण किया करते है। पत्री ही स्व पुल है। सीपस्यको सदय में रसकर पान्दोग्य ध्रुति फारसी है- "गायमी पा सर-मृत-पदिद विष । पाम गापभी । माग्ना इई सी मृतप । गापति प प्रापते घ । + + + ++ सावनस्प महिमा बतो ग्यापि पूरुप । पादोगस्य सर्ग भूतानि, मिपारस्पारतं दिगि । यदेवद प्रम इति, इद गार वत् पोऽt- परिपा पुरुपादाकारा । यो स परिपी पुरुपादाकारा:-मय पार स योऽपमन्दा पुष्प प्राकामा । यो में सोऽन्वा पुरुष प्राकार भर्य गान स पोऽयमन्तादय माकागः । देवत् पुमै भति, पषमपानिनी प्रियं समते य एप पेद" इति । [पान्दोग्योपनिपट ३ प्र १० से)

मायामा
भाशोपनिषत् ॥
हम्मपनिर्म
गायब्रह
-
(११मध्ययपुरुष-पुरुष प्रमसम्म मासम्बनम्)
२-२-परपुरुप -प्रहति -प्रम (निमित्तकारणम् ।
२३ मामवरपुरुष विमति -शुगम् (उपाधानकारसम्)
मात्मा
-पतुप्याब्रम
१४१ एकम् (२) विकारसंघ -पिश्यम्(कायमपञ्चम् ) विश्वम् ।
(विषम् (२)
"मशवरा गापत्री गायत्री या इई सर्पप"
गायन
५१-पासशीपुरुष -पुरुष -अपवम्(भारम्बमम्) मात्मा
(पुरप)
६२-महा(पम्पत प्राति)-प्रकृति-अम (मिनिस्कर.)
७-२-राकम(म्यकप्रति मिति:-शुक्रम (उपादाम०) पिम्
(८४ीयम्(म्पतकापा) विकासप-विषम् (कार्यप्र.) (प्रकठि)
*
पतुष्पादूराम
1
दोनों दस विकता में से दोपनिषत् में प्रधान रवि किस पर पाठक
स्प मार करें । उने उपनिषद के माम से से या विदित होगागा 8 उपनिषद की
प्रधानपि दूसरे विर। राम मौदिश राव की अपणा रसत्य है। पोजणी पुरुष
मारमा -शुकमिस की समष्टि इस मामा का पी। इस मामय का माम रंग
कार। पारममाण अमृतभाग ६, रापरमाम माम्याग है। दूसरे एम्दों में मारमा
पुरुष पर प्रति ।। उपनिषत् प्रातिपुरुष का निरूपण करती है। मरस इस
उपनिषत् में हमने पुरुषात्माधिकरण-पाकनास्मापिमण पोही मधिकरण रखते हैं।
साप 0 में पुस्पामाक्रिया का शीर्षक (रिह) ममतारमा पसारे, प्राह करण कर

प्रास्वात्मा माशोपनिषत् ॥ समान 'मारुसामा' यह शीर्षक रस्ता है। सामान्य घरि से सारी उपनिषत् के दोही विमाप है। भारम्म के तीन मन्त्रों की समधि पुरुषदिमाग इ मागे के ( भनेमदे से प्रारम्भकर नम किं विषम पयम्स ) १५ मन्त्रों की समधि प्रातिनिमाग है। प्राति की भागे धाकर प्रकृति विकृति विकारसंघ (प्रम-शुक्र-विम) या तीन मास्याए पोनावी है, अतएव दूसरा दिमाग तीन भागों में विभक्त हो जाता है।'भनेमदेक०' इत्यादि चतुर्षमन्त्र प्राप्ति के प्रभावित कर निरूपण करता है । 'सपर्यगात्' इस्पारि भाठा मन्त्र प्रति के राक्रवित का निरूपण करता है। एम मागे के (अन्य तमा० इस र मन्त्र से प्रारम्भ कर 'नम उकिं विषम' इस १८ मन्तक) १० मन्त्रों की समष्टि प्रकृति के विविधभूत पैकारिकसंघ का निरूपण करती है। इस प्रकार १(१ मन्त्र), १ (८ मन्त्र), १ (२ से १० धक) इस कम से प्रतिक ही सीनों विकतो का निरूपण मा है । उपनिपपदेश वीचारमा (अप्पाम) से सम्पन्न रसता है। पीवामी देवसस्प नाम से प्रसिद्ध है । बीवदेवसत्य की प्रतिष्ठा खिरीप देवसत्प है। यह दोनों ही देम- सस्प पिरष के पूपिमीपर्व पर प्रतिष्ठित हैं । देवरूप भनिरूप है । सोम ममि का बीमत है। सूर्य इस देवसत्म का मामा है । सूपर विरम् (म्यक सिर ) देवसध्य की मुसप्रतिष्ठा है। सोममय चन्द्रमा वीमीय रस है, जीवन का सापन , प्रथिवी माधार है। इस प्रकार म्पक विश्व में सूर्य-चन्द्रमा देवसत्य-पृथिवी या चार विवर्ष होगाते हैं। सूर्य की अग्नि , देवकप मी ममि है, पृथिषी भी भन्नि ! , मप्पतित सोमरूप पाहमा मी मसि से ही गति है। विष के लिए 'ममीपोमारमक नगर' पह का पाता है। इन में भमिकमा सूर्य-शेक्सत्य-पमिली इन सीन मागों में विभक्त । पोथी सोमकम है । इसप्रकार ममीपोमारमक निरके स्पादि वक्त पित होगाते हैं। चारों की समधि को हम (मनसोम को मना ममि के गर्म में मानते [ए) अमिशाद से म्यवात कर सकते है । समरिरुप से विष सोमगर्भित ममि परिरूप से यही सूप-पन्द्रमा-देवसत्प-पपिपी इम पार मार्गों में पिक है। सूर्य म्पक मिरव का भारम्मस्पान है, पृथिवी अन्तिमस्थान है। मप्पमें पन्द्रमा और देवसस्प प्रतिष्ठित है । इम पारों म्परियों का मन्ततोगत्य समरिरुप ममि पर भवसान है। इस क्रमसे १ मन्त्रात्मक चौपे विश्वप्रकरण के . १२३

मागरम
जागोपनिषत् ॥
उम्मपनिट
+
भवान्तर पाच प्रकरण हो जाते है । पपकरण पन्न प्रकरण देवसत्याकरण-पृपिभीमकरण
प्रपिकरण इन प्रकरणों में । मन्त्र (११०११) सर्पसा का, १ मत्र (१२ १३ १५)
चन्द्रमा का, २ मन्त्र (१५ १६ या दो मन्त्र पूरे एवं तीसरे १७२ मन्त्र का 'बापुरनिगमप
सम्' पर एक बरण) देवसपकसा का , पौन मन्त्र (१७ मन्त्र के रोप तीन पास)
पृथिवीसा का, एक एक मत्र (मयरहा मात्र) समरिरुप पनि कर मिनपर करता है, जैसा कि
लिपपविभागमापन में कर दिया गया।
पपपि इस अपार्सगिक पचासे पाठक हम होरहे होंगे। परन्तु हम उन विधास दिसत
है कि या सोमपत्र उन के लिए उपनिषदाम का मार्ग अगु करदेग्न । पविर समरिरूप से
विपतिमाग की मोर पसते हुए अपना पोम और भाइए ।
वरनिरत् को भस्मदी रिप्रजापति का निरूपण परतेपुर तदरामून भापारम्परपा का
मितपण करना संस्था पुरुष और मध्यमेद से रो भाग में विमानसंबम से
पुत्र मोबपर्ने काममाग को भागे रसना परवा। सप पुरष मी पम्पप-अपर पर मेह से
IAS,पम्पप र नर्मभाग भी मन-प्राणपक मेर से प्रेमा निमत है। इन में
मन मापपाध्यम हैपर प्राणप्रदान है, पर गम्भधान है, पावरवि ! अध्याभ
मेस्पा में सम्पपनस मन कामना से मणे का, प्रासाप मदर का का, पासप परम्पारण
.
'सूपणामुमोमAN II प्रवस रोगों में भर
मस्सगा।
+सरल र
सिप्राएरशेखर परवान मगरले
पोरेवान मगमपीपारोमात्रा में होगराए
विशीपरमवीगर निगम से पतिति पी माने सराप पापा
समाएर मेरोटीनरेन्द्र मगरणरोगागागरा
परत में राणाकपार प्रसार में भारत

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सपपरिक भाईशोपरिपत् । - PORT का साची बनता है। इसी मोग-कर्म पापरणसाली त्रिपुरुप पुरुष का निसपण क्रमश भारम्म के चीन मयों में भापही परिसा मत्रप्रयात्मक पुस्पारमाधिकरण है।(अमृतम्) । (सरा विवत है प्रत । प्रान्ति का पहिसारूप है-यझमगर्भित निमरूप प्रासमय यजु यम । पहीमपारम में सम्पत्तास्मा नाम से प्रसिद्ध है, यही ईमरसस्प में स्वयम्भू नामसे प्रसिद्ध ।भारम्भ में पह एकाकी पा । यही मागे नागर शुभविकास का कारण बनता है। 'भनेमदेकम्' इस्पारि पीपा मप्र इसी प्रभावित पर निरूपण करता है।(प्रम)। प्रकृति का दूसरा विर्य एक है। सिमर्मित ( यजुर्गमगर्मित) मापोमय मुनम पर ही नाम 'शुक्र' मा भम्पारन की म्पकारस्पा है। यही विकृतिम्मम है। अघिदेक्त में पा परमेष्ठी माम से, मापात्म में यही मानास्मा नाम से प्रसिद्ध ।। सपयगाव इत्यारि ८ मत्र इसी शुक्रवित का निरूपण करता(शुक्रम। प्रकृति का सीसरा विवर्ष १-भग्नीपोमात्मक विच । विष की प्रपम विकासमूमि सूप पदमा है, मैसा कि 'या चन्द्रमसौ पावा यया पूर्णमकल्पयत्-सिप च पृथिवीं पान्त- रिक्षमयो स्मा' इत्यादि मन्त्रवर्णन से स्प है। स्प भामि , पदमा सोम है। सूय ही अपन प्रबर्य भग्नि से पृथिवी को उत्पम करता हुआ पानापूपिनीरूप में परिणत होता है। सूर्य - सोक , पृथिवी पृपिनी है , मप्पस्थ सोममिस मन्तरित है। इस तोप की समपि । 'प्रमाण', पही निरव । पृपिया पियास्प विष्म पनि पूपिणी 1, पृथिवी काही प्रामामि देवस्म है । पर देवसम्म पपिपी पर प्रतिष्टित है। इस नाम से सामिप्रापि-सोम-देवसम- गायमापि-मेद से मनीपोमात्मक निम तुपर्ण वनगता है । सप कर मुख धरावात एक समामि है। मागे के १० मन्त्रों से इसी पयमा बिमाक ममीयोमामक विष का निरूपण हुमा है । (इसियेई. दि. मा. ८७ पृ.) । इस पुरुष प्राप्ति का मारपारीण सासम्पम-पूण मसपा परात्पर तत्व है। इसी रहस्म को चित करने के लिए उपनिपत् के उपक्रमोपसहार में 'मों पूर्णमद " इस रूप से शान्तिपाठ दिया है। परात्पर प्यापक होने से सपा गान्त है । ग्री शान्ति मा भिष्ठाता है। १२५ माहवारमा मा पनिषत् ॥ तम्बाप मर्मत प्रहल प्रकरण सम्पप र निरूपण करता है। समग्ध के सम्बन्ध में मत्रसमन्धिनी सम्बन्ध निकासा सम्बर है। मा एष प्रसपास मत्रसमय का दिग्दशन कराना पा । पुम प्रश्वा भनुसरण वित्पा गाता है। पपपि ममी विधा सका मही बसतापा गया। कारस मनायोमामक विष का उपाान गुमला म्या महत् , इस की मुसप्रति भम्पक्त प्रस। 'अनेमकप' से इस का निरूपण मा है। फिर भी प्रमही मरण की मूसप्रति है। महविः कर्मी के मनु सार यी प्यास्पा में मार लियरूप में परिणत होने पसी । हिप की मुराप्रति फा निकरण होगपा तो एक प्रकार से निरस का निरूपण होगया । प्रनमदेकम् के मनन्सर ही प्रथिने अमर्म (पुस-प्रकृति) के सम्पय का निरूपण करना उचित समम्म । इस प्रकरण में मम शब्द योगीपुरुप का पामर्मशम्द विकार (निस), विकत (4) गर्मित पम्पक मन का पाचक है। इस फर्ममप, मतएव कर्म नाम से (कर्म माम से) प्रसिस इस मम्पन्न प्रम का विकास उस पुरुषाय से (पुरुष प्रम के धर्ममाग से) मा। मपनी मामवर कसा से मम्पस प्रम का मम (उपादाम) बना है। अतएव सकिल की अपेषा से उसे हम अवश्य ही मन कर सकते है। 'तत्सष्ट्वा तदेवानुमागिन' के अनुसार हमारा सम्पप्रम को उत्पम कर यह पोग्गीपुरुप (मपूतामा) इसके गर्म में प्रतियोगपा है। दूसरे शब्दों में मोतिक कर्ममा निरस में समस्त प्राप्त प्रतिष्ठित होता है। ऐसी परि स्पिति में या प्रश्न उपस्थित होता है कि इस प्रम (मामा) कर इस कर्म (मरण ) के साप स्पा सम्बन्ध कसा सम्पयसरे शम्दों में मारमान कर्मविन में किस समय से प्रनिर र निसवर-निरपेरा-विरप्रधार भावि माों से प्रसिद होगा। प्रत सीनो मन्त्र इसी सम्बन्ध बिझसा को गस्त करते हैं। दरानशास्त्र में प्रम-स का सम्बन्ध ६ प्रकार से माना है। ही सम्बन्ध पविकल्प' भाम से प्रसिमग्रम कारण, नप काप । गोकर्म हम कार्प-कारणम्पों समय में विध्य पारे । काय-कारणसम्बन्ध भनेक प्रकार से उपसम्म होता। यारण २ प्रारुपास्मा सम्मपनिपाकि काशीपरिपत् । लिए कुछ एक कार्यकारणभावों का विचार कीमिए । विविध कार्यक्रममावों का निरूपण करते हर मभियुक्त करते है- कारप हेतुनिमित माविध नि मारबम प्रमोदमी वया। पिमर्वसपारिरसममारिकमासपूर्व समापिका मताः ॥ १-दीपमाप से दीपक बस उठता है।दीपरानाका कारण है, इससे प्रग्पतित दीपशिखा कार्प । इन दोनों का सम्बन्ध देवसम्मन्य' ।। इसे ही 'प्रवत्ता सम्बन्ध भी करा माता है। कैसा लिमपण समभो । कारण का कावरूपमें परिसत होनामा उपादाम सम्बन्धी या कारणरूप दीपराडाका कार्यसरूप सापक बनती ई मी सप दीपा महीं बमती, यही लिखवणताहै। २-वायु में एक प्रकार का नोदमानस (प्रेरणावस) पेसा बाता है। नोदना कार्य है, यामु है। इसी बायुनोदना से प्रचादि में कम्प होता है । मेषों का सबरण होता है। य कार्यकारणसम्बन नैमित्तिक किंध निमित्तसपन्य नाम से प्रसिद्ध है। ३-आकाश में पची ता रहे हैं। सर्प दरान (काठ ) करते हैं। मृगशावक (हरिण के सच्चे) रक्षा करते है । पुष्प में से गप निकता करना है। यहां पपी-सर्प-पगशाक-पुष्प या चारों कमरा उपना-दशन-उपासना-गम इन पार कार्यों के कारण हैं। इनका पारस्परिक सम्पन्न 'मारुविक (साभाविक), विंधा मावि (समाज) सम्बध कराता है। -गम्द से शम्द पैदा होता है। भाप भपर्ने मुख से बो राम्द बोलते है, उसका माकाश में सत्र म्याप्त बाक्समुद्र में मापात होता है। भाषाव होते ही बाक् समुश्में बारित यदा- काराकारित शहर उत्पम होजाती है। एक सहर के मामात से भागे दूसरी पार, इसी से तीसरीमार, तीसरी से चौथी, पांगी इस प्रकार बीषियों की पारा बन पाती है। यही प्रतिषमिभावीपी सार अन्य म्पक्ति के कामपर पाप कर शरदोत्पति का कारस बन पायी है। इसी के लिए- 'गमेम्पा शम्दोत्पचिा' या कहा जाता है। भाप मो माद सुनते हैं सा प्रषिम्पाय १२० प्राममा पनिपात् ।। सम्भावनिक । से पन्य म्पति के मुस से पोछे हुए राम्द से उत्पम मा है।वेग से तेगका मकाम होता है। से साम कर सरूप सफ्म होता है। पहोशम्द वेग-अ कारण । शम्द-सेन- साम बाप हैं।इन काफ्कारों का सम्म 'योनि' नाम से प्रसिदौ । इसी को साम्पाविक सम्भव मी का गावा। २-जो मनुष्य शीम पता है, उसकी गति में पेग उत्पा होगा, इसी ममिप्राप से शीघ्र गगमी के लिए-पापहे पेग से नारकरे या कहा जाता है। येगकाप, गति काारस है। गति ही मेग की सूचना देती है। समरस के धनम्तर रस, रस के मनम्तर पस्क, इस क्रम से सत मातुओं व विकास होता है। पति-ममरस कारण है, वेग-सप्तपातुकम-फार्म है । मह सम्बन्च 'मारम नामसे प्रसिद्ध है। इसीको 'सरिरिक सम्बन्ध काया। इसी माधारपर "पर सरकार की पाती, उस का मारम्प दी ऐसा या" पर किंबदन्ती मरसितारे। ६-विल से तेल उत्पन्न होता है, हिमासप से गहा उत्तम होती है, पूष से पूत निकलता , पापास से मर्वि किमती है, ना से सिंह निकलता है । हो तिस-हिमासयम पापाय गुहा कारण है । वैस, गङ्गा, पत, मर्षि, सिंह कार्य है। या सम्बन्ध रिदम' किंग 'मौमासिक' मामसे म्यमान होता है । इस सम्बन्ध में भावरपभग कोही कारणता है। सिस मे से तेल नया उत्पम नहीं होता, माप तु तिममें पहले से तैसस मारण म्प हा है। इस मारण च माम ही 'विस' मारण कोहय दीजिए, सैत प्रकट होनापन। हिमाचल पड़ाव मापरण। पता भामरा । पापाय मर्षि का मामाण। गुहा सिंह का मारण है। मई वस्तु उत्पम नहीं होती, मपि तु पहले से लिपमान बस्त मामयनारा से प्रकार होगाती है। पी प्रापातिक दर्शन (साय गन) साप-बाद मिरान्त है। बात पपा । यदि ऐसा न हो तो पानी में से भी प्रत निकल सकता है। दूप से सेट निकाल सकता है। एक बारचप पापण में सभी देशों की प्रतिमाए पहिसे से प्रमरमा या ईशोपमिपत् ।। सापनिकि । प्रतिष्ठित हैं। शिम्पी नई मूर्ति नहीं बनाता, अपितु या पापापस्थित मर्षि के बहरापरण को इटा देता है। शिम्पी निन मर्तियों का सरूप मानता है, उनी का स्वरूप पापास में से मह निकाल सकता है। पान है-पदि शिम्मी पपर्ने शिम्पारों से (टकी हपोरे से ) मर्सि पर प्रहार कर देगा तो मुर्ति नए हो जायगी । मूर्ति को पचा वचा पर ही उसे मार का पागण हटाना पड़ता है। भावरण के माश्यन्तिक य देने से पापाणस्प प्रतिमा प्रकट हो जाती है । इसी का नाम सस्काया है। नो बस्तु है, उसी की उपसम्धि होती है. यदिस्या दुपमभ्येन । परि पापाय में मूर्षि पहिले से म होती वो सहमणिम्मी मी पापाण की मूर्सि नहीं बना सकते थे । पदि शिनी ही पापा को मूर्ति का रूप देता है तो पो नहीं यह पानी की मूर्ति बना छेना । इसी प्रमिप्राय से 'नासो नियवे मायो नामारो विपते सत' या कहा जाता है। यही प्रतिमापूजन की मनारिता एव वैदिकता है । इसी उद्मा सम्बन्ध को 'मासिकसम्मका बाता है । बिच मया नहीं बनता, अपि तु मा प्रकार के भग से प्रकट तारे। ७ भूमि से भकुर उत्पम होता है। प्राणियों से नोदना बस (प्रेरण यस ) का उदय हो वा ।र से ताप उत्पम होता है। पुरुष से पुत्र उत्तम होता है। मामी से पास उत्पन होता है। यहां मि-प्राणी--पुरुष-मकली कारण है, भकुर-मोदना-ताप-पुत्र-जात काय है। इन का सम्बन्ध 'उमरसमन' कहसाता है । इसे ही 'मोतिमसम्बन्ध' मी करते हैं। यहाँ प्रमव कर (कारण कर ) मारा नहीं है, केरस प्रमव का एक देश प्रमव से पलक होकर कार्यरूप में परिणत होता है। सारा पिण भकुर मही बनवा, सारा शुक पुत्र मही बनता । सारी मकली पास नहीं वमती । भयितु मू-गुज-मसी का एक प्रदेश भकुर-पुत्र पासास में परिणत होता है। इसी को सावानिकसम्म भी करा जाता है। ८-पाठ मिर्व सपथ। प्ररिहमपरिणामपाइ की विपर्व माम से प्रसिद्ध है। प्रम विध पन मया है। अन्य की मास्पान्चर का नाम ही मप रस रिया है।भपा निरस सस से पक् पदार्प मही है। मन ही विश्वास से प्रतीत होता रहा ह ! विश्व साक्षात् प्रा है। यही ।

प्राध्यात्मा यारोपनिषत् । समबनिधि प्रमनिरपद है। इसी को मातिमासिफारिष काते हैं। निरस प्रामवत् स्वत्र सा माही रसता । विश्व की केवट माति है। सपा प्रम की ही। अपवा सञ्चारमाही रसलप से मान हरसमसातबा सितिगासामी इस प्रतिमासिकमर्स में ही प्रवर्भाव। । रसगोद में मप्परेसा विपुषदात्त है। जिस पर भूपिण स्प के चारों भोर परिकमा समता ५ महत शन्तिास नाम से प्रसिद र । चायपुडो में विमल मेष-प-मिपुनादि यदिए राथितिर है । नक्षत्रों से नश्य पुरुषों का सहप बनाामा है। यह सब काम्पनिक पात है। माकारा में पोर वास्तव में गोर पर नहीं है, भारिताप को सड़क नहीं बनी है। राशियों की कोई प्रतिमाए नहीं है। केस कापना है। कासना से परिकल्पित है। यही विशप किया पैस्पिक सम्बन्ध है। १०-रमारा मन नई नइ फापनाए लिया करता है।मपर्ने मतगत् में विपित्र विचित्र सरों की माना किया करता है। पही मनोयग्य है, इसी को ऐपिहासमन्म' का पाता है। ११-नप से पुष्प पर उत्पम होते हैं। सोह से पिा (ग) उत्पम होता है। शरीर से मेरा सोम सत्पम होते । शुक सरपम होता है। यह सब 'भोपपादिक समन्य है। १२-1 से जी उत्पम होती है। शुक्र गरीरहप में परिणत होता है। राय से रसी बमती है, पत्र (कागय) बनते हैं। मगर से माम उत्पन्न हातापायु से पग्नि, ममि से गस, से पृपिली उत्पम होती है। यो कारण (प्रात ) अपने ससप से मुक्त होता मा काय (A) रूप में परिणत हो या मरूपान्तरमहरूप यही सम्म परिणामी विमा परि सामिक माम से प्रसिद। १३-पानी से भोपधिए, मोपनियों से एक उत्तम होता है। पो रसानुभिक किया रसाही सम्म। १२-नया-सुप-पास-पार सय कार्य सांपोविक समापी सम्मम ममत।

काशोपनिषत् - सम्पनिक प्राध्यात्मा . १५-पानी में रहर, मिट्टी में घट, तम्स से पट, सक्ती से पाट, सण से कटक, सेन- भय-मामका ऋमिक विकास इन सय का प्रौपादानिक किंवा उपादान सम्पन्ध में मनतमीव। १६-अमि से पानी का गरम शेबाना, रु से साप सेवाना, सुपर्स का पिपस पाना, इस्मादि सांकामिक सम्बाप है। १७-स्फटिकमणि पर नपापुप्प का राग, पह भाक्रमिकसवारी समय है। इसी को मामिरापिझ सम्मघ कहा जाता है। १०-ऊण (मकली) की नामि से तस्तु उत्पम होता है । माली कारण है, मकसी से उत्पन नारा कार्य है। इसी प्रकार पुरुप से केश सोम उत्पन होते है । पुरुप कारण है, केमोम काय है। पृथिवी कारण है, मोषधि क्मस्रतिए कार्य है । पिता कारण है, पुत्र कार्य है । मधिका कारण है, घट कार्य है । इम पांचों ही कारणों का उपादाममात्र से सम्मघ है। उपादामकारण स्वेम पापों की कारमा यपपि समान प्रतीत होरही है, परस्त सूक्ष्म विचार करने से पौधों का पार्षस्य स्पररूप से प्रतीत होने सगता है । परिले ठणमामि को ही सीनिए । मसीकी मामि से उत्पम बनेपाबा मास मपमें प्रमव (मकली) से पृपक् नियवसम्म रहता है। साप ही में भागे जाकर पा जास भपमें प्रमक (मकली) में सीन भी हो जाता है । इस प्रकार अपने प्रमरका माध्यम सेना, प्रमत्र से पक रहना मन्तम प्रभव में ही सीन होमामा, यह एक प्रकार का कार्यकारणभाव है। उपनामि में प्रभमानाप्तम्मनत, अमवस्यभरत, प्रमपवित्नयनस्त पह ताम कोटि है। केशमोम पुरुप से उत्पन होकर पुरप में ही प्रतिष्ठित रहते हैं। पारी की तरह पुरुप से पृपक मही रहते । साथ ही में पह अपने प्रभव पुरुप से पृपा भी होगाते हैं । इस प्रकार पाहा प्रमयसम्ममत्व, प्रमअनारम्बनत्व दोनों पम है । वास की तर इनफा 'प्रमख में लिसपन मही होता । मोपभि वनस्पतिए प्रभव (पृथिवी) में धामग्वित है, पातम्पित होती हुई सतत्र प से उपर की और पाती है, यही इन पृषपरड है। इन्हें काट कर दीजिए, - ।

प्रापमा माशोपविषा । सम्पपमिरर फिर भी इनका भासम्पन पृपिसी ही रहती है। मसीक पास में यह बात मी। यदि उसे भाग कादिया पापा को मानी इसका भासम्बन म रहेगी । यहाँ प्रत्येक दण में पित्री एमासम्बन है । मकली का पात्र असे मकसी से पृपा होगा मोषधि सविए पीरमूत पृथिवी से कभी पृपा नही रो सकती । इनका लिलयन पृथिली में ही होता है। मक्ली में मिलयन भतिवपन दोनों धर्म है । यह देवविलयम है। प्रपक्वरत्व पाय और मोरपियों में समान है। पुरा से सत्पम खसोम में भागबनव-मनासम्बन दोनों पर्म थे, मकी में मनासम्मनस्य ही पा, पृथिवी में भासम्बमात ही है। साथ ही में केवायोम में प्रभा- सपमल्ल होनही । भोपपि बनस्पतियों में प्रमपवितफ्नल दी। मकसी के पास में विपना भतिसपनल दोनों धर्म है इस प्रकार तीनों में सन इस मन्तर है। पिता पुर के कार्यकारणमात्र में तीनों से मिवासता है। यहां पुत्र अपर्ने प्रमा (पिता) में भावम्बित मही है। इसका नियम मी मिट्टी में होता है। परन्ट गाव-मोपनिदेशकोम पुगत-या मिकी से पपड्पर महीपनि से विकृतिक उसम होते है। परमी उपादान कार्यक्रममा सम्बन्ध परन्तु या पानी से विसपण है। दीयाका से अन्य दीपक बा परता है। साकामि कारण, परन्तु राहावाग्नि का मत् निमित् भश मी दीपक में प्रनित नही होत्या । समकारबत् निमित्त कारयता का भी ऐसे स्पस में समावेश मही होता एवं मयत् सपा- दान कारयता भी नही मामी पासकती है। सा हिरमय सम्म। उपमुक न एक सरसों के पाठको को पा शिवित गया होगा कि कार्यकायमान किसी एक ही नियम पर प्रतिष्ठित नही ।।परि ऐसा होता तो किसके सारे पदार्थ ममानमर्मा होते । सबका सत्पादक तन एक है, इसमें करें सन्दो मही । फेवस सम्बन्ध की विसरणता, एवं अपनवा से पदापों में पविश्य उत्पन छगावा।माएक मार काफ्यासान काय कारणों में सम्माधों परमानना परता। ११२ मानास्मा शापनिपत् ॥ सम्बनिरछि १-प्रयवासममाव 1-२-प्रमापिसपनाबाविसयमसम ३-प्रभवपक्चरल “पयोगनामिः समते गृहवेच"१ 0 १-प्रभवासम्ममत २-२-प्रमवतिसपनत्व ३-प्रमगृपवरल 'यया पृपिम्पामोपपयः सम्मरम्ति" २ १-प्रमसम्बनपानासमनाप ३-२-प्रमचाविसयमरन ३-अमएपवस्व "यया सच पुरुषाव फेगसोमानि" , -- १-प्रमानासमनव ४-२-प्रमाक्सियनल ३-प्रमपपरत "पा पितु -पुप्रा" . -0 १-प्रमसम्बनत ५-२-अमनविसपनत्व ५-प्रमवाप्रपक्चरत "पया मुछिकातो पटा ५ या पनि १-प्रमगसम्पनलामासमनत ६-२-प्रमत्रपिसयनवालिसपनस्त -प्रमापाचरतापत्रमा “पया मुदीप्तान पारमादिम्फुलिहााममपन्चे' मापारमा ईशोपनिषत् ॥ उपपुल कुछ एक निगनों से पाठयों को निवित होगया होगा कि लिय में काफ्कारण- मान भनेक मार्गों में विमत हैं। ऐसी अवस्था में-'एकस्मिन् पर्मणि विरुदनानासोट्यार- गारिवाने सराय सम्पाय के अनुसार काम ग्राम और कार्य फम के सम्बन्ध में विज्ञासा का होना स्वाभाविक होगत्म है। प्रल में केवल पारिकाप समार' की ही प्रधानता है। इस पार्मिकम्प सम्पप के भो गाकर १३ मिगच होनाते हैं। ल १३ हरों का ४-try पक्रम है । पार स्पस्पसमप, पर पर्यामष्टमित्त सम्बन्ध है, पाच मन्मामक्तिभिस्त सम्बन्ध है । तेरहों का पतिकाम्पों में मातभव है । इसी पविकास सम्बध को-'प्रमिभ सपायकार्यकारणमारसम्मप' या जाता है। उदाहरण के लिए एक मिट्टी के परे पर भिमन्दिर । स्किी से पका ममा है, पर सभी को विदित है । मी मारा है, या कार्य किसा कर्म दीप कमरा से उत्पम घटस्प कार्प मिट्टी के साप क्या सम्बन्ध है। अपना मिट्टी का घरे के साप क्या सम्पन है (काप पर काम के साप, कारस का काय के साप क्या सह निवर कोमिए । मिट्टी क्ट की प्रतिष्य है । मिकी को मोर कार भट कपमपि समरूप से प्रतिष्ठित नहीं सकता । ऐसी परिस्पिति में हम कर सकते हैं कि फैमिही में, यही प्रथम सम्बन्ध है। साथ ही में पारमिम मिती घट को खोलकर नयी रा सकती । मिकी का जो माग पर घमाताप रूप मृत्तिका सचमुच पट के निमा नही र सकती। घर के नर शेगाने पर मिली प्रारम रोम, परम्तु पटाकागारित मिहीन गी। पटकाररुप पी सीतको मब तक किक का भाकर मिपमान है। ऐसी पर त्पिति में हम कर सकते है कि मिट्टी पी में है, यही दूसरा सबब है। पर एक सम्म पदाप, सिसी एक सतन्त्र पार्य है। यदि म और मिट्टी एक ही बस होते तो-'पटमानय' (पा गमो ) स मा से मिकी मी साइ जासकती थी , एष 'मिही मामो इस बाप से मरिका का मी भानयन होसकता पा, परतु ऐसा होता महरी । पटादसे मारी सायणावा है, पपिका एम से मिकी ही साई गती है। मा. हम कर सकत है कि विसी पो से मिम, पही तीसरा सम्म ! के परमाण र नाइए, पतिका ।

प्रारुपास्मा चाशानिपता- सम्मानिधि के अतिरिक्त उसमें भापको दूसरी बस्तु न मिलेगी। मि ही तो घटरूप में परिणत होती है। घट मिट्टी से मिन पदार्प महीहै। 'पाचारम्मना विकारो नामर्द पतिकसेर सत्पम्' के अनुसार पट सवा स्तुत मिट्टी की ही सत्ता है। ऐसी परिस्पिति में पटमतिका से कैसे प्रया होसकता है। पर मिट्टी । यही निष्कप है। पही चौपा सम्बध है। मिट्टी घट के बिना मी ग सकती है, परन्तु घर बिना मिकी के एक पण भी जीवित नहीं रह सकता | मही पाच सम्बन्ध है। घट को सता पदार्प नहीं है। मिली ही घरूप से दिससाई देरही है । निस प्रकार स्पाग में पुरुष की, पगमरीचिकर मैं उस की, गुक्ति में रनत की, रज्जु में सर्प की भान्ति हो जाती है एवमेव मिट्टी में पो की प्राप्ति हो रही है। इसी को दारानिक मग्यास कसा करते है। मिट्टी का महीं है, फेरठ प्रतीति होरही है । जिस सम्बन्ध से सर्मपा असत् पर मिकी में सरूप से प्रतीसि होरहा है, उसी को 'प्रप्यास सम्मघ' कहा जाता है । यही ६ ठा सम्पन्ध है। इसप्रकार मृद्ध का कार्यकारससमच निम्नसिसित ६ भागों में विमान देखा जाता है। --- ---- २-मूर घटे ------- १-घटो परि "(भमा मिट्टी में है) कार्यकारणे (मिही पोमे). --------पारण कार्य ३-मृद्धटो मिन्नो "(पमा मिम है, मिटी मिल ()- मायकारणमिमे -मचिव भट.mmmmm (मिट्टी दीपा कारणमेव कार्यम् 1-पटये मूतिकातोऽमिमः, मृतिक-कामिपी से पमिमी --माय कारणावभिनम् तुपटदो मिमा मिट्टी पर से मिमी -+कारण यस्पाद मित्रम् ६-मपप्पस्तोमट .mmmm.mom (मिसी में भड़ा पप्पात १) कारणे कापमप्यास्तम् उपयुक्त यही ६ सम्पम्प मझकम में सममिए। तर एमा वदनानुपारिरात्" के अनुसारमा प्रय तप कर्ममप विम में म्यान है। उधर बह कर्म (सस) उस मास में प्रतिष्टित है । प्रम भिम, लिस मिन है । शमममम मम का कममाग ही विश्व वन रहा । मन कर्म के मिम, पों प्रास्तास्मा ईशोपनिषत् । सम्मानमकि कि कर्ममय निम के न रहमें पर मी प्रम समरूप से विमा निससी पेक्षा के प्रतिष्ठित रहवा, परन्तु कर्म (सिरम) लिम से पमिम । कारण कर्म (विष) मा कारण के बिना सपा पनुपपम है । प्रम में कर्म अभ्यस्त है । यही पर्म का पदिकम्प सम्बन्ध है। इसमें है। उसमें है। दोनों अमिम है। मी या। इस मिम है, यह उससे पनि। उस में या मास रा है। - १-समस्पम् ++----कारण कार्यस्थम् २-कर्म नमस्पम +कार्य कारणस्पम् २-कसकर्मणी भिम ++ कार्यकारणे मिन्ने १-जोर कम कारणमेव कार्यम् -म कमत' पृपक्? कारण कार्यातक् । कर्म तु मपृषक र *काप छ कारणवपक ५-मणि कर्माम्पस्तम्+कारसे कार्यमापस्तम् "कर्मस्वमर्मस्प, मकर्म कर्मसद, मिमदय वन, पदमिममदयम् प्रकर्म मियेत नमामिपये, ऽप्पासोऽपवे स्पादिवि पर- पिझल्पनाः।। (श्रीगुरुप्रसीव सरापतहुम्वेदबाद) - इन सभों सम्पन्भों में प्रत में तीनों मन्त्रों पर प्रथम-दितीय-चतुर्ष इन तीन सम्पादों का निरूपण एमा। तदनवि.' इस्मादि मन्त्र 'गम कर्मस्पम्' इस प्रपम् सम्बन्ध का निरूपण करता है । 'यस्तु सर्वाणि-' इस्लावि मात्र कर्म समस्यम्' इस दितीय सम्बन्धका निरुपण करता है। एप 'यस्मिन्स्सर्वाणि' इत्यादि मन 'नमेष कर्म' इस वोपे सम्पन्न का प्रतिपादन करता है।९ो समयों में से सात तीन सम्पयाही प्रधान है। मत मुतिने काही को विशेष माना है। वीनों में से प्रपमसम्बन्ध का निरूपण करवा सम्म निम्नलिखित मात्र हमारे मन मावी- तदेति तनेजति तददरे तदन्तिके। तदन्तरस्य सर्पस्प तदु सर्वस्य वापत १ (६० ५ म०)। - ११ प्राकारमा आदेशापलिका . . - पीपमता है, पर नहीं पनवा है, पार है, पर फिर समीप है। मा सपणे भीवर या फिर सरक बाहर" या मन्त्र का भवराप । इस मन्त्र कमात्मा. पिपयाम्मा स्वास्मा मेर से दो भर्प, एव सएिपिहान सम्बन्धी एक मर्प, इस प्रकार तीन मर्प होगवे । विदान-प्रविहान् मेद से मनुष्य को दो भागों में निमक है । शास्त्राप्पयन से अपनी दुदि को विधासस्कार से युक्त रखनें पले सदसद्विवेकी विचारशीत मनुष्प विद्वान् फरसाते है। 'साना पीना मौन पाना' इस सिदान्त को परमपुस्पाप समझनें बासे शास्त्रज्ञान से शुम्प सौकिक विपों में रख यपानात मनुष्प भविमान माने जाते है । बिछान् मनुष्य का मारम्म सहला रहा, प्रतएम इसे 'रुतास्मा' कहा जाता है। अविएन् मनुम्प का प्रामा पासमा मप मौतिक संस्कारों से मारत होता मा भारमान से पत्रित यता, मतएव इसे 'मत वारमा' कहा जाता है । इमियों के द्वारा रुपरसारि मौविक विषयों का मागमन होम।। भागत बिपों का संस्कार ज्ञानमप मन पर होता है। विपय मौतिक होते हुए तमोमय है,मतएवमान पोति के मारक है। इनके सम्पपासे मनमय मन अपनी विपक्ति (जानप्रकाश) से भारत त्यामा गरा बन जाता है। मन के साप बुद्धि का समपन्न गन्ध है। फसत मनके भौतिक भागरण से बुद्धि मी मशिन होगाती है। मलिन दिसे पुदिपुक्त महानात्मा का सत्यमाग मतिन होगाता है । महान् पर पोरगीपुरुषरूप मारमा प्रतिष्ठित है। मलिनसत्व की कृपा से मारमा का मचामाग मलिन होगाता है, यही दुःस का मत है। इसका प्रधान कोरस मशिनमुने है। बुधि के माम्पत्तर माग में (इस भोर) मारमा है, पम भाग में (उस मोर ) विषय है । विपपानुम्वा युद्धि मशिन होती होती माम्पवर भास्मा से अमुह रहती है। कार्यकाय .-परिवार भूवनामपर परमे। सपसाचाराचा पोश) पुण्मुन्दिर पम् सिम And Tरावाम् । (गनिद।

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भवतामा शा ईशोपनियत् ।।8- सम्मानित संसारी पसत् को प्रधान मान हे । सांसारिक के लिए या प्रामसर सेर, मुहारमा के लिए पो समीप में समीप । सांसारिक की शि में प्रभारमतव मीतर कुण पुमा, प्रकारमा के लिए प्रकट है । योगियों की रधि में जो सम , सामान्य मनुष्यों की छवि में पभसम । सामान्य मनुष्यों की रष्टि में दो सम्म। योगी उसे मिप्पा समभरो। एक भनमम के अनुयापी मामण है, एक फर्ममय अमरूप निर के अनुपानी अभयक है। एक भारितकी, दुरा मास्तिकग । एक शिशुभकर्म के भनुपाई कर्मठ है, दूसरे गुद्ध पान के मनुपापी बामी है । एक सपमतानुपापी में दूसरे पोगमतानुपापी है। इस प्रकार 'मोकेऽस्मिन द्विरिषा निष्ठा पुरा का मयाऽनय' के अनुसार कोक में दो विभिम नियर प्रचलित है। १-देवति ~~-- •मावात्मनेऽपिएपे कर्मणि शि (हिमामपापी) कर्म २-सम्नेसवि++---- -स्वात्मने पे ममणि हि (भारमामुयापी) प्रय } १-तारे 1------ मातामने ऽभिषे कर्मसि रशि. (विधानुयायी) कर्म २-सावि -- १-तदन्तरस्य सपा-ममतात्मने ऽभिषे कर्मणि परि (पानुपापी )-कर्म -.- सर्व विदित हम दोनों नियमों के मेदपाद का निराकरण करती ई भूति करती। कि दोनों को प्रपन सममामा मान है।पी विष ही लिया है। श्री एबत सी मनेमत है। पपीर है, पपी समीर है। पी सपने भीतर, यी सबके बार" ममात् प्रमामित कर्ममाग से घर पर है, कर्मगर्मित प्रमभाग से पह अपर . करपा वार, क. गमा प समीप है। गर्मपान भीर प्रवीत प्रासारमा माशापतिपत् ॥ . - फिरूपा माक्ना मर होगांती है। ऐसी पपुप्त बुद्धि मुधि ही नहीं। ममिवामात्र । पुरि मनसारिका धामप्रचार मुरि का सरंपर्म है। लहलप रप ल. पोग समय सहपर्म ही नही रहा तो बुद्धि का एला म एम के सम्पम है । इसी माम- प्राप से भगवान् काते है- नास्ति बुदिरपुकस्य ननायुक्तस्प मापना । न पामाश्यता यान्विरग्रान्तम्य कुना सम् ॥ (गीवा २५६) निपपानुग्त्य मुन्दि मारपामपी मनकर भारमलरूप को भारत कर देती है। ऐसा ही मात्मा (मनुष्प) मारमा करसावा है । ऐसा मनुप्प कमी सत्कर्म में मातम होगा। इसे कमी पारमविपपिणी मिशासा ही नहीं होती। "मामा-रान-परोकन्देस्ता सबग। ऐसे मृतकों की यह भाषसभूमि बना रहता है। एते ए पित् (भात्मवान) भारत से परमतिर मन सा है। सांसारिक विषयों को ही या महतारमा मुसापन सममता से भावामगा के लिए 'समानविमास्वाम् विदि नशनचेतसा.' या करा गया है। ऐसे माहवारमा का कर्मरूप, भलएर सर्मपा एमव्हप (परिमयमशीन पणिक) व प्रधान पराम्प। - क टक इसके विपरीत दिशा समुचित नियामकर्म पर मापरणों पाहार मनमा करते ए प्रार मानामि से सरित माकरणों को नए करते हुए मिस युनियोग प्राप्त कर सिप ऐसे सिमास्यापन पोमी कतारमा है , सी पुलियोगी है इनकी र उस भनेबत् रुप सम्पग पर हो गयी है । एक पोर में मुक्त पोगी। स्मा। दूसरे कोरे में भक्त लामा है। एक सामान के उपासक att के भनुपायी है। दूसरे कमपहिरे सगसक है, गतिशी पणिक सांसारिक लिपपों में रत है। प्रत मत्र की रोगों को माप बना कर मर R "मो ससारी ! सनकी मैं पावर पण्यायो मुहारमा सनकी प्रपि में पर तल सपा मनिवाची ।भपाद मुहामा भनेयत् को मुगप समम ।

का शापमिपत् 119 सम्मपनिधि प्राचारमा - ससारी एबट को प्रधान मान रहे हैं। सांसारिक के लिए हमारमतय र सेपूर , मकारमा के लिए ही समीप मे समीप है । सांसारिक की टि में यह मारमतत मीतर भुषण पुमा, तारमा के लिए पर प्रकट है। योगियों की दृष्टि में गो सम है, सामान्य मनुष्यों की दृष्टि में परमसत्य है। सामान्य मनुष्यों की राशि में वो सम । योगी उसे मिप्या समझ रहे। एक शाममप ब्रम के अनुयायी प्रामण है, एक कर्ममय प्रमहप विय के भनुपापी भ्रमणकरें। एक मास्तिक, दमय नास्तिकरण है । एक मिगुखकम के भनुपाई कर्मठ है, दूसरे मिगुरबान के भनुपापी हानी है । एक साक्ष्यमतानुयायी । दूसरे मोगमतानुयायी है । इस प्रकार 'मोकेऽस्मिन् दिविधा निष्ठा पुरा मोका मयाऽनप' के अनुसार चोक में से तिमिम निद्याएं प्रचलित हैं। ++---- १-सवेमति २-उनैवति माहवात्मनेऽपियुष फर्मपि टि (निशानुपापी )-कर्म -कृतात्मने बहुपे प्रममि एप्ठि (मात्मामुयायी)-प्रम +---- - १-रुद्रे - २-तान्ति महत्यत्मनेऽभिमे कर्मणि रविः (मेघानुपापी )-कर्म .तास्मने बिदुपे प्रमणि तिः (मामानुपापी)-म १-सदम्तरस्प सर्वस्प-मतामने ऽभिषे कर्मणि पशि (निश्चानुपापी )-कर्म सन विदित इन रोनों मिष्टामों के मेदपाद का निराकरण करती हुई अति करती है कि दोनों को पक् समममा भान है।पही निब , पी विबामा है ।मही एपर है की भनेप्रत। पहीर, पी समीर है। श्री सबके भीतर-, पही सब के बाहर है। भपात् नमामित कर्ममाग से पपर, कर्मगर्मित समभाग से एमा० ग. कर्ममार, क० ०प्रसार समीप 1. . कर्मणा या भीतर प्रवीत १ का इशापनिषत् ॥ समयनिधि रोता है, क. ग. पप्पा पी सब प्रस्मक है। मन भी यही । कर्म मी मारे । पी जान है, की योगी । यो छानयोग, भी कर्मयोग है- " प प योग पमा पापति स (एर मासिकमा) पति- नाम्पो मेदादी) 1 द्वितीप पर्प में इसी माग का सीकरण। - १ - तीसरे रिपेया-या । जिस प्रकार कमठ मकवामा, एक मनी इपस्मा कहताते । एपमेय पासक को विधेयामा करा माता है । सिर-साप्प दोनों भवत्पाभों से पृपक् मौकिक को में रत महात्मा है, साप्पदणसे पुक्त मनुष्य विपात्मा है. इसी को 'पुभानपोगी' 'पाप' निगम' इत्यादि छन्दों से प्पा किपा पाता है। सिदण में यही निरेपारमा स्वारमा कागाने सगता है। इसी को-'युक्तयोगी' 'स्वहस्प' मादि नामों से पगात किया जाता है। परम वैविक गुवाईट सम्प्रदाय के प्रवर्तक माचार्यमी में ही उन तीन विभागों को मापादिक- भीष, प्रांगारिकभीष, पुनीष मेद से इन नामों से म्पपात किश्य है । कलात्मा युतपोग्न (बिमपर भगवान् का अनुमा हो चुका है) पुएमीय कराते है-"भगवदनुप्रास पोपा"। उन्ममरणप्रवाह में इतस्तत माने पाटे गलपिमुख पपागात मोड़-पासादिक कागवे है। यही पषभर महवामा है । एष मगरनुमहरूप पुषिमाव की प्राप्ति के सिर को बार- या का मनुगमन करते नए सिमस्या को प्राप्त करने में पलीत बने रहते है, 'पादिकनीर । मारनपासपणपोप के सम्मान से ही क संप्रदाय 'परिमार्ग' माम से "मसि ।

भातास्मा मामपन सम्पबनिराठि - १तास्मा- (मुक्तयोगी) सिद्धावस्पारम- ---पुर (मनोमयमार्ग)-पानी २-विवेपारमा (युनानयोग) साम्यावस्थापन --मादिक (प्राणमयमाग)-उपासक २-मकतारमा (यपानात मनुष्य) सत्यम्मुताक्स्पायम-प्रात्यक्षिक (पास्मययाग,-फर्मठ । । उपासना मप्प की पस्तु है । इम में प्रामकर्म दोनों का समय है। इसी को युरियोग कहा भाता है, निस कि दिग्शन प्रपमार्पोपसहार में कराया बाचुका है । प्रम पर टि रसते हुए कर्म करना ही मुद्धियोग है । बम मर्म है, कर्म कर्म है । मर्म में कर्म समझिए, कर्म में पकर्म समझिए । बर्म को मर्म में प्रतिष्ठित सपमते हुए कम करने से मर्मानित कपनमूता भासक्ति नहीं होती। ऐसा कम मान्धन होता है। इसी प्रमिप्राप से मपवान् कहते हैं- ग्रमयपात्राप कर्माणि संगै स्पस्ता फरोवि यः। लिप्प न स पापेन पपपप्रमियाम्मसा ॥ (गी. १०)। उक्त राशि से कममार्ग में प्राच होनेवासा पुरुषश्रेष्ठ ही 'विवेपारमा' करसाता है। इसकी रपि दोनों पर है। कर्मासि से पह उसे एबत् पर, भात अविर सममता , सपि से पर उसी को भनेर-समीर-सत्र पाप्त समझ रहा। इस भमिममाश्ना से भागे पाकर विपेपारमा-'यमस्वस्प सर्पमात्मरामूत्' इस युति कर अधिकारी यनता हुमा सिद्धावस्या पर पहुच पाता है। रागदेर ना हो जाता है, मौतमसा ब्रह्मानन्द प्राप्त हो जाता है । प्रस्त मन्य सी भाव का निरूपण परता। पोरगी पुरुष का भपतप्रधान विपामाग संमार में हिपतिहर से, एस कर्ममाग गति रूप से प्रत्यक्ष विषण्या या हिपतिरूप, भारमाष्टमा पर विया-कर्ममप है। रिपति गतिसमशि 'युजुरंद' । । तत्वहम, मतएव पेदमर्वि नाम से प्रसिद पोशीम स्पितिगतिमप से ही मध में म्पाप्त होरहा है, जैसा कि 'भनेमदेसम् ' इत्यादि मन्त्रभ्यप्प में विस्तार से प्राकारमा सापतिपत् ॥ सम्बरपरिक बताया बापुका है। यपपि स्पिवितिमात्र तमप्रकाशयत् परस्सर में प्रमात विम्म परि मी दोनों का एक ही विन्दु पर समन्वय होरहा है। कैसे सके लिए उसी पूर्व परिचित प्रामाषनायक (कुम्हार के पाक) पर रि गहिए । कुमार के इस्तम्वरूप इन्द्र के लिये पण सारा दणके मापात से स्पिर कीस पर प्रतिष्ठिन हत्यामा पक प्रबस वेग से घूमने सत्य है। परमास परमाग गदिशी है। इस प्रकार प६ प पन्टों पस्ता बसा है । परन्तु भारपर्य है कि पटों पाते रहने पर भी ना माने नियत स्थान से मिखुमान मी मागे नही भवता । हम सब मी चक को देखते हैं, उसी नियत स्थान पर पाते है । परसाद, इस लिए को पक रमवि' ।। साप 0 में स्पानामागसपण स्पतिवियुतिरूप गतिका के अमाव से-निमति' पर मी मानना पगा। इस प्रकार दोनों विरुव धर्म एक पक्र में सम्म रहे है। एक मनुष्य अपने घर से दस मिनिट में विक्टोरिपा बस्न पाफ्ता । । यदि यह स्थान पर ही सहा रस्ता तो उसे गतिशोर महीका बासमता पा । मामें स्पान से बटने परी उस लिर-गपति' (IR ) का प्रयोग होता है। एक मनुष्प मपर्ने स्थान पर सहा इमा राप दिवा रहा है। इसके निर सोक में-"अमुक मनुष्प अपन स्पान पर स्लामा निरन्तर पदिमा रहा है। यही तो का नाम है। यहीं माप स्पिति- दोनों भागों का प्रसव कर सकते हैं। ममुप्य भिमकुछ मही बस रण है, इसलिए 'नमति' का समयप है। मत्रपत्ररूप धप पर रहा है, इसलिए 'रमविर का समय है। समुदाय स्पिर t, मापन पर है। दोमो विम्ब धर्मों का भामप एक ही मनुप्प है । मी परिस्किी पहा पर सममिए । ब्रममा मानमत्या सापा 'यति , इर से सपा मया । कर्ममार्प सपा 'एमति -पदरूप से सर्वपा पछ । बमपर को समधि ही ईधर-वगवि वमति । मुम्मकार का एक घूम रहा है उसे माप देख रहे हैं । घूमते हुए पक की जो सिख ममी ममी मापो सामने पी सोधिर पसक मारते ही कार से र उस भोर में पसीई निस पवितु को पार मापने से दूर सममले थे, ११ ममी भभी इसी पण में भापके समर मागई । सपमुष प्रतिवियु दर र समीप से समी'वहरे तदपिके । - भावमा नाशपनिपत सम्पति घूमता इमा वा गतिशीच अपने परमानों के भीतर से भीतर है, बाहर से बाहर है। बाहर भीतर परदेसो टघर पर ही पक है। पूर्वोक्त मुकाम भी ऐसा ही है-वदन्तरय सर्पस्य सदु सहस्प पावत । बरततातु कुम्मकार के अधिक धक के साप मसौकिफ सपकको सुहना करना सपा प्रसगत है।बसिम्पिति सो-'रामगरणयोर्पदं रामरापणयोरिपर के अनुसार भनुपमेय (सासानी-माहितीप) ।जितनी रिपरसा भाप समझ सकते हैं, इससे मी शीतम ।। भापके लिए सम्मि, मप्रमेय है, अनिर्वाचनीय है। एकमात्र सटरम पक्षण से भाप उसे बामसकते हैं । "उस की गति िथति ऐसी होगी, अमुक के सारा होगी। इस प्रकार उसका सरूप सण परलेमा मापके सिर सपथा समय है। , विगुन मारमापेक्षया ब्रह्म पर , विमुख कर्मापेक्षमा घर है। पेदरम्पा भवभिम प्रम स्पिर , पदपचेदेम घर। स्थितितत्व उस तिवाप के बाहर भीतर सब मोर म्याप्त है। पपपि पितित् गति मी लिपति के बाहर भीतर सम भोर विधमान है, परन्तु दोनों में स्पितिरुप रसतप ही प्रधान है। प्रतएप 'सव-पत्' इस रूप से उसी को बाहर-भीतर-दर- समीप पतलाया गया है। रिपति भाधार त भाषेय है। भाघार की प्रधानता से भी उसी का मतान्तरीमाप मानमा उचित रोप। मपि च ममरुप स्पितितत्त कारण, विम रूप पतितत्व पार्प ।। करण प्रपमसचाक है, इसलिए मी मसरा तरीमान में इति में तत् सम्दमाम्प रस को ही प्रधानता दी ।पिति माघार , गति भाप है, इसका परमर्य नही है कि पुस्तक मेमपर री टेनिस पुस्तक का मापार ममय है, परन्तु टेमिस पुस्तक के नीचे के भागमात्र से सति । पुस्तक के बाहर मीतर टेविड मही। परत या मापारषेपमात्र ऐसा नही पा यदा देम स्थिति , पदवलेदेन ति । पानी में सरितए राराम जैसा भाषाराषेपमाष है । पानी माघार, शर्करा भाषेप । परन्तु ऐनों मिटकर एकरूप वन रें। पानी के परमाण परमाणु में शमय म्याप्त है, शर्वरा के मश मस्पश में पामी म्पाप्त है। पदनोवेम पानी म्माप्त है, ताछेदेम राम्पाप्त है। ऐसा भोतमोत- पापात्मक भाषाराभेयमाव ही प्रात में भपित है।

माहवारमा नारामिषा- हमारत सिंहासोक्तपा एक बार पुन पविकास सम्बन्ध पर परि गलिए । इन ६ भों सम्मों में पहिले दो सम्बन्ध एक मेणिक हम भोरमोसमावसमान्य' कर सकते है। तीमरा मेद साप, पोपा प्रमेद समय, पौषध मेगमे समप। मेद-प्रमेद मेगमे सादि पापों सम्पप परम्पर में सपा निम्स । एक ही सत्र में अनेक (मिम) समय हो नहीं सकते रहे हैं। यही इस प्रम-बम समाप की अनिवनीता है। यही 'म यस किंवा प्रध्याम नाप का पत्र मनिशानीप सम्पप। १ कम में मनुस्यूत है। (स कमस्यम्) २-कर्म मन में प्रतिष्ठित है। (कम नस्पम् ) +--श्रोतप्रोतमाषसम्पन्न ३-अन्न कर्म दोनों परस्पर भिम रे (अकर्मणो मिम्ने) }+--भेउसम्बन्ध ५-अन्न ही कमरूप में परिमात होता है ( कम) /---श्रभेदसम्बन्ध -सन कम से मिम, का प्रन ही है (अप कर्मत --मेदाभेदसम्बन्ध पूप कमपा) 4-दोनों का समाप भनिनीय ह (AAP कर्मा प्पस्तम्) --अनिर्वचनीयसम्बन्ध 'देमति' मावि मत्र टळ ५ो सम्पायों में से 'प्रप फर्मस्पम्' इस प्रपम सम्बया पर प्रपान रि रस्ता एमाधर्मप्रसस्पर शिवीप सम्पपका निरूपम करताप्रम- प्रपानापेचपा प्रात मात्र को प्रपम सम्बन्धका निरूपक माना पासकता है-(देखिए ... मा०५. सं० कि.स १२०, एवं गोकाना इसे दितीय सम्पम का प्रतिपादक मानवे पर समनापीरप मोवप्रोतमान का दम्पराक माना जासकता है। मन्त्र में सर्पर "वदतव का उन्लेला पमता बानी पप्तवा परदर है, या समीपमा मीवर पारस प्रकार प्रतिचाप के साथ सत् शाप सपकी से प्रभाव है। मम कर्म में माहवारमा का शानिपम् - समान 'मोत होणारे साथ ही में पनति, दरे,सर्पम्य पापत , स्यादि मामय 'कर्मप्रम में प्रोत इस सीय सम्पन्च की मोर मी हमारा ध्यान भाकर्षित करते हैं । मन्त्र का 'सदन्तरम्प सनस्य न सरस्प वापस' यह उचर भाग ही सम्बन्ध का निरूपण करता है। मत इस मन्त्र का प्रधान वक्ष्य पूर्व के 'पनेमकम्' मत्र में बतखाए गए मझकर्मात्मक गुमसरूप क्य की 'तदेमति तमेमति' इस्मादि रूप से सीकरण । मन्त्रों में नामिता (पुनरुकि) दोष नही माना गाता । ऐसी मास्था में निष्कर्ष पर निकला कि 'वोजवि.' इमादि मात्र ता पूर्व मन्त्रप्रतिपादित भर्य का स्पीकरण करता है, एक 'यस्तु सर्राणि भूतानि' 'यस्मि स्सराशि मूतानि' मादि दो मन्त्र अमर्म के सम्बन्ध का प्रतिपादन करते हैं। इन दोनों उत्तर मन्नों में यख सर्माणि प ६ टा मन्त्र तो भारम्म के-मर्मस्वम्-कर्म प्रमाणप' इन दो सम्बन्धों का निरूपण करता है, पर यस्मिन्रताणि' स्मादि मन्त्र 'मेव फर्म' इस पौषे ममेद सम्बन्ध का प्रतिपादन करता है। ५ - मान्मा बम है, इसका पाभ नहीं कि उसमें फर्म नहीं है। सिमर्म, इस का या पत्पर्म नही है कि इस में मम नहीं है । दोनों में दोनों है, दोनों दोनों के प्रचामता मप्रधानता में तारतम्प है । मामा में नम (धान) माग प्रधान, सलिए उसे प्रमका। मन में कम प्रपाम है, इसलिए इसे कर्म कहा है। मारमा हामप्रघाम होत्यमा ससूक्ष्म है। इस का धर्मपतुभों से प्रमय नहीं होता | मौतिक विश्व ही प्टि का लिपप बनता है। परिते हमारी रष्टि स्यूस निब पर, दूसरे शब्दों में कर्ममाग पर भावी है, मनन्तर (महामशरा)वदन्त मलिए भारमतत्व पर पशि भावी है। इसी स्मुस-सूक्ममात्र के काम को प्रघाम मानकर स्यूमार + प्राममा नापा पन् सम्पनिक . पतिन्याप से प्रत मन्त्र पहिले कर्म को प्रम में मनुस्यूत सताता है, मनम्तर प्रम को कर्मस्प मतदाता । ही दोनों सम्बन्धों घ निरूपण करता पमा निम्मसिमित मंत्र हमारे सामने माता- यस्तु सर्वाणि भूतानि-श्रात्मन्येवानुपश्यति (कर्म ब्रह्मस्थम्) सर्वभूतेषु घात्मानं ततो न पिजुगुप्सते । (ब्रह्म कर्मस्थम्) (ोपनिषत् ६ मन्त्र) मन्त्रक पार कर्म नमस्पम्' इस द्वितीप समय का एवं सत्तराई-ग्राम फमायम' इस प्रपम सम्बम्प का निरूपण करता है। सर्वाणि भूतानि' को 'सनमूनेषु पारमान प्रम है। जो (मात्मतत्पमेला) सम्पूर्ण भूतो निर) को पास्मा (म) में ही मनुगत दसता है एप सारे मूवों में पान्मा को प्रतिष्ठिव समझना पर कमी किसी से पूणा नहीं करवा" परमित्र का मर्य अस कि प्रश्न के प्रारम्म में मनसाया गप, उलमा दोनों सम्बयों का निरूपण, करम मा प्रभानरूप से धर्म प्रमपम्' इस दूसरे सम्बन्ध काही मिरूपन करता है। पस्तु सकारि मृवानि' 'सर्वमपुर इस्लावि रूप से मूत माग को हरी प्रधानता दी है। 'मति' इस्पषि मन्त्र 'वर' तप से यहाँ प्रस को प्रधान मान सा है, हो पा मन्त्र भूत- भाग को प्रधान सुपए बना रहा है। मसर-पराए मेव से अमके रोल है। प्रत्यास 'पाप' ५ पग्म 'लम्' है । एक मस्मत्यमबाप्प विप कम है, इसरा पुप्मएपर- पाप्प लिपप नम है। मिषपी प्रमा, निफ्य पराक, ग्रार । पुष्मदस्मत्प्रनकोबर विपप विपपी तमप्रकारापत् परसर में मम्मत निमम समप्रमान, पम्प कमप्रमान है।हम और पिपप पही दोनों क्रमश प्रमग पण्प प्रम। हम (मात्मा) भीतर १, विपप पहर । म मनप्रपाम , मपप फर्मप्रधान ! मान प्रकरण, म्पोल।

प्राकनारमा माशापनपत् ॥ सम्मानित - . - कम मप्रकारा, पारण है । इस प्रकार सौकिक मनुष्यों की घधि में दोनों रा परस्पर में भमत विरुद्ध है। पाकिस्य शिमिन्दान्तुतिमाव की घनमी है।तिमा का मामी पता से सम्बन्ध है। निम्दामान का परमाप (मनास्मीयता से सबध है। ससार (ससारी मनुष्य) अपने को मोर अनुगत रहता है, पराए की मोर पिमुस रहता है । मनारमीय बस्तु से घृणा करता है पारमीय से प्रेम करता है । विष्टा से मनुष्य पृणा करता है, क्योंकि इस की राह में पर मनामीय है । इस प्रकार कर्मरूप विषय , एक प्रारूप मारमा को मिम मिन सममने पासा मनुष्य ससार में विक्तनों ही से गग परता है, विसों ही से रेप करता है । मनुकूल पेदमीफ्ता में गगका, प्रतिकूस घेदनोफ्ता में रेपका उदय है। दोनों में मनमूसा मासक्ति है। थासक्ति दुस पा कारण है । राति भी शोक का कारण है, निन्दा भी शोक का कारण है। यह मिदा-तुतिमाव समी तक रहता है, नप सक कि मारमा भौर लिपपों में मेदमुदिरहती है। देप समी सका है. पप तक कि वह उसे मनारमा (मपने से मिम) समझता है। एवमेव सुति भी परभाव से ही सम्पथ रहती है । यदि उसे यह निरित रोनाप कि मैं उसमें इ, बह मुममें है, हम दोनों एक ही घणक के विदस है मेरा स्वरूप उस पर प्रतिष्ठित है, ५ मुम में प्रति- स्ति तो ऐसी परिस्पिति में रागद्वेपम्सक स्तुविनिम्दामाष का भवसर ही मही भाता । जब दोनों एक इसरे की प्रविधा है तो कौन बड़ा, फोन छोटा, कौन निघ, कोन तुम, कौन निदक, मोन स्तोता। इसी निम्दामूतफ पुरिसतमाप का निराकरण करती, सकर्म दोनों में परस्पर अनुम्परा अनुप्राहकता पर निरूपण करती हुई श्रुति कहती है कि-"तुम सम्पूर्ण मूतों को मारमा में सममो, एक सम्पूर्ण भूतों में मारमा को समझने । महप मिस के बरै परे में मार्मरूप प्राप्त बने म्याप्त सममो, एष रम में सर्वत्र कम पो अनुस्यूत समझो। यदि तुम भास्मा पौर विभ फे इस मोतप्रोतसम्मथ को म्यवसायमुद्धि से समम पर तो तुम्हारा शोकमसक निम्दातुति भाव से सा के लिए पुरस्परा होगया-'वो न विजुगुप्स' । सुविभाष से मामा में पोम पा उदय होता है। यह गेम ही भणन्ति का कारण ममता मा भामस्तन का प्रश्न मनता है। निन्दा देषमूना है, सुचि रागमा । एवं पूर्व पपनानुसार रागदेप पा पाने पार से ।

प्राणि का शापनिषत् ॥ उम्मपनिषष्ठि सम्ब।बह-'पा प्रपना है या पाया ग भाष, ही गगोप है। दोनों ही मोह के उपदक हैं। बता मेद पुदि ता तक गाटेप है। बतक रागद्वेष है, तब तक मोह । जबतक मोह मिाधम पुदि सर तक पुदि समुपत । मुषित मुदि पानएम्पा है। पानाम्पा पुदि नियत बनती ई मन पर अधिकार रखती मन की सबसत्य का कारण बन जाती है। सबस मन सङ्गोषहप प्रामतिमात्र का प्रवर्तक है। भाससि कामना की जननी है। कामना कोपा है । कोष सेनोह का पिच । सम्मेह स्मृतेभरा का जनक है। स्मृतिमय पुरिनाश का कारण है। बुद्धिनाश भात्मपतन का कारस है । यही मात्मभात , मिसव पि पुस्पात्माधिकरण के णरणतन्त्र में विस्तार से निरूपण किया जा पुका है। इस मापति से बचने का उपाय है-रिकी सरपरका । तप रागदेषमुक मोर का परियाग अपेपित है। वर्ष पगहेपाक प्रम-कर्म की विजातीयता का परित्याग पापरपक है। तभी परम गन्ति मिल सकती है। भान-बर्म को मिलाकर देखिए तभी मानद है।शन की कर्म में उपासना कीगिए, कर्म की भर्महप बान में सपासना कीजिए । बानपूर्वक कम कोचिए, कर्म को नाम मामित बनाइए, बर्मशारा मनसंपति प्राप्त कीजिए। यही मुद्धिमानी । इसी को मुरियोग करते है। पीन मेपसपम्पा है। इसी प्रौता कर सीकरण करवीई स्माची उपनिषत करती है - कर्मययममय परपेव, प्रमणि पर्म या। स बुदिमान मनुप्पेषु स पुक्त कृतनकमहत् ॥ (गी• ) पूर्ण फपन से साधारण मनुष्यों को पत्र भर हो सकता। धर्म को ग्राम में देसो, प्रम कम में सो" पा भएर अग्न-कर्म इन दो तपों को सचा सिद्ध करते हुए 14 प्रान्तारमा शाशोपनिषत् 18- समान प्रतीत हो रहे हैं। जब तक हैत रे, सातक कप्प है जबतक कम्प है, तबतक भय है 'द्वितीयाद पै मयं मयति' तक भयो तबतक भशान्ति - प्रशान्तस्य कुतः मुखम् । पूर्वनिरूपणांसी से किसी को हैत का भम न से गाय पस घणन्तिम्सक इसी दैतभम का उम्मसन करती ई मुवि काती है- यस्मिन्त्सर्वाणि भूतानि, श्रात्मेवामूदविजानत । तत्र को मोह क शाक एकत्त्वमनुपश्यत ॥ (गोपनिपत् ७ मन्त्र) । मम्यास द्वारा मुनियोग ( निष्काम कर्मयोग) का साधन करते करते गिस समय भारम- साचावकार पे जाता है उस समय उस मुक्त योगी के लिए सारा प्रपन भास्मा ही मन जाता है। ऐसी भक्स्पा से युक्त उस पानी के लिए का शोक है, का मोह है । 'यदरमन्सर अरुसे, भय मय मानि" के अनुसार पक्तक दैत । समीतक मय है । एकरप म्यापकमा का मग है । प्यापकता में कम्प मही है । एक वस्तु का भव्य स्माम की मोर मुकना ही तो कम्प है।म्पापकतानसे मतिरिक्र कोई स्थान नहीं है, यहाँ कम्पम को मकारा मिठे । ऐसी परिणीय RR में भारमा में स्पाम विरुप मप कैसे हो सकता है । इद वा इद पा' इस नानाभाव से मोर होगावा। पित्त का विस्य ही मोहौ । मोर मे विवेकयक्ति नए हो पाती है। कामी कार्यविवेकता मारी जाती है। इस प्रकार मोह के साप साप ही शोक का उदय होगातारे इस शोक-मोह से छुटकारा पाने का उपाय है-भवमाव की उपासना । इसी से मोहफसिस का नारा रोप । दुधि में मि का उदप होय, मी गोकमिति होगी, जैसा कि स्मृति करती है- पदा वे मोहकसित मुदिपेसिवरिप्पदि । खदा गन्वासि निद प्रोतम्पस्प श्रुतस्प प॥ (गी० २०१२) ग्राहा शापनिषत् ॥ समनिधि समग 'या अपना पापगपा ग मात्र है, वहीं गगवेष ।। दोनों ही मोद के उत्पादक । वन तक मेद पुदिना तक भाडेप है । यस्ता रागद्वेष है, सब तक मोहर । मतक मोमिन बुदि है तब तक मुनि बतुपत है। तुषित पुन प्यानगम्या है। पानशूम्या पुदि निवास बनती मन पर अधिकार रसती मन की सबसता का करण न बाची है। सबस मन सङ्गोपनप मामक्किमात्र का प्रबर्गक है। पासहि कामना जननी है। कामना कोकाका है। शेष सनोई का पिता है। संमोह समय का पमा स्मृतिभश मुद्धिनाश का कारण है । मुविनाश भारमन का कारण है । यही मात्मपान, जिसका कि पुस्पास्माधिकरण के गरसतन्त्र में विस्तार से पण किया जा जुक्य ।। इस पापपि से बचने का उपप-पुदि की सहपरपा । तदर्प रागीपमुसक मोह का परिस्पाग अपेपित है। सर्प गगोपएक प्रम-कर्म की विजातीयता का परित्याग भावरपक है।वमी परम शामित मिल सकती है। शान-पर्म को मिस्र देखिए तभी मानद शान की कर्म में उपासना कीथिए, धर्म की भर्महप मन में उपासना कीथिए । भानपूर्वक काम कीजिए, गर्म को शाम के पारित बनाइए, कर्मवाय शानसंपति प्राप्त कीमिए। ही मुरिमामी है, इसी को बुद्धियोग करते है। पही यसपापा ।इसी मौतार्थ का स्पीकरण करती र स्मार्ण उपनिपत करती है- पम्पपफम य परमेव, प्रामणि पफर्म या। स दुरिमान ममुप्पप स पुका कत्तनमहत् ॥ (गी० 111८) ६ परम से साधारण मनुष्यों को रेत का भ्रम हो सकता है। कर्म को प्रम में देखो, अमको कर्म में देतो" या भावर प्रश्न कर्म इन दो वालों की सच्च सिम करते र प्रास्वारमा ईशोपनिषत् १७ समनिसाफ प्रतीत रोजा सकत, तस्तक कप है सस्तक कम्प, तबतफ भप है द्वितीयाद वे मयं भवति' । मबतक भयो तस्तक भशान्ति - प्रशान्तस्य कुस एवम् । पूर्वनिरूपणमंत्री से किसी को वैत का प्रम न हो गय वस मणन्तिमसक इसी दैतधम का उम्मसन करती हुई भुति करती है- यस्मिन्सगिा भूतानि, श्रात्मैवाभूदविजानत । तत्र को मोह क शाक एकत्त्वमनुपश्यत । (ईशोपनिषत् ७ मत्र) अभ्यास का मुदियोग ( निष्काम कर्मयोग) का साधन करते करते जिस समय भारम साशवकार गावा। उस समप उस युक्त योगी के लिए सारा प्रश भामाही मन माना है। ऐसी मस्पा से युक्त उस बानी के लिए कहा योक है, कहा मोह । 'पदुदरमन्वर कुम्ने, प्रय मय मरति" के भनुसार नपतक तो मौतक मय है । एकल व्यापकता का मूम। म्यापकता में कम्प नहीं है। एक वस्तु का मन्य स्पान की भोर मुक्ता ही तो कम्प है। पापकलस्य से मधिरित कोई स्पान नहीं है, यहाँ कम्पन को प्रकाश मिले। ऐसी परिरिप- ति में मात्मा में स्थानम्युतिरूप मप कैसे हो सकता है । इद वा दपा' इस मानामाव से मोरोमाता पिता वैचित्य ही मोह। मोह से विवेकशक्ति ना हो पाती है। कामी कारिकता मारी गाती है। इस प्रकार मोर के साप साप ही शोक का उदय होमाता। इस शोक मोह से छुटकारा पाने का उपाय -मौतमाय की उपासना । इसी से मोहसिस का नाश होगा । पुनि में विधा का उदय रोग, तमी शोकनिषति होगी, बैसा कि स्मृति पदा ते मोरप्सिस बुद्रिम्पवितरिष्यति । सदा गन्दासि निद प्रोवम्पस्प अवस्प भ ।। (गी० २११२) 5 मा - ईशापरिपत् ॥ उमापनित सम्बर। गहा-'या अपना पापगया या भाव , सी गगोप। दोनों ही मोह के उत्स्यदक । बम तक मेद मुदिता तक वेष है। सतक रागद्वेप है, तब तक मोरे । जस्तक मोहमिमि मुदिौ तब तक बुद्धि पसुपित है। कषित भुद्धि भ्यान शून्या । पानशुम्पा दुधि मिस नती हई मन पर अधिकार रखती ई मम की समसता का कारण बन जाती है। सबस मन सङ्गोषकप मासमिमान का प्रार्थक है। मासति कामना की जननी है। कामना कोपका का सार समोह का पिता समोर सनेश का पनक है। सविनय युधिनाय का कारण है। मुविनाश भात्मपतन का कारस ।। पी भारमणात , जिसका कि पुरुषारमाधिकरण के भारतत्र में विस्तार से निरूपण किया जा चुका है। इस मापपि से बचने का उपाय है-मुचि की सहपरवा । तदय पगोषमसक मोर का परित्याग अपेचित ।। तदप रागद्वेषम्यक प्रम-कर्म की लियातीयता का परिस्पाग भारयक मी परम शान्ति मिल सकती है। बान-कर्म को मिलाकर देसिए तभी मानद । ।बान की कर्म में उपासमा कोमिए, कर्म की मर्महप मान में सपासना कीथिए । मनपूर्वक कर्म कीथिए, कर्म को सम के मामित बनाए, कर्महारा मनसपपि प्राप्त कीथिए । यही पुरिमामी 1, इसी को पुरियोग करते है। पही न भेयसपपा है। इसी प्रौत्पर्य का सची करम करती ई स्मानी उपनिषत करती है- कर्मपपर्कम यः परपेव, अकमपि धर्म या। स दुरिमान मनुप्पप स पुका सनर्मात् ॥ (गी. 4110) ६ पूर्व कपन से साधारण मनुष्यों को रेत का भ्रम हो सकता है । ' को प्रम में देखो, मन को कर्म में दसो" पर भपर प्रमर्स इन दो वनों की सण सिद्ध करने पर प्रास्वारमा -शोपनिषत् ।। सम्पनिक प्रतीत हो रहे हैं। जब सक रेत, तस्तक कम्प है जबतक पम्प है, तबतक मप है- 'द्विवीयाद वै मयं मवति' (नवतक भयो तस्तक भशान्ति - प्रशाश्वस्य कुस पुखम्'। पूर्वनिरूपणसी से किसी को देत का भम न हो नाय यस प्रणन्तिमसक इसी दैतनम का उम्मपन करती हुई मुति करती है- यस्मिन्त्सर्वाणि भूतानि, श्रात्मेवाभूविजानत । तत्र को मोइ क शाक एकत्त्वमनुपश्यत । (ईशोपनिषत् ७ मन्त्र) अभ्यास आग मुद्धिपोग ( निष्काम कर्मयोग) का साधन करते करते जिस समय धारम साक्षात्कार हो जाता है उस समय उस युक्त योगी के लिए सारा प्रपत्र भारमा ही बन जाता है। ऐसी अवस्था से मुक्त उस पानी के लिए कहा शोक है, करा मोहो । 'पदुदरमन्तर कुरुव, भय मय मरति" के अनुसार चक्तक दैत । तमीत मय है । एकस्व व्यापकता का मूत है । म्यापकता में कम नहीं है। एक बस्तु का मन्य स्थान की मोर झुकना ही तो कम्प है। पापकसम से मतिरित कोई स्थान नहीं, यहो कम्पन को प्रकाश मिझे । ऐसी परिस्थि- ति में मात्मा में स्थानम्युतिमा मय कैसे हो सकता है । इद मा दया' इस नानामाव से मोर होगाता । पित्त का वैचिस्प ही मोर। मोह से विवेकशक्ति नए हो जाती है। कार्या कार्यतिवेकसा मारी माठी है। इस प्रकार मोह के साप साप ही रोक का उदय होमाता है। इस शोक-मोह से छुटकारा पाने का उपाय है-प्रतिमा की उपासना । इसी से मोहसिन का माय होगा । बुद्धि में विपा का उदय होग, तभी शोकनिति हो, बैसा कि स्मृति करती है- - यदा ते मोकप्सिस बुदिम्पवितरिप्पति । वदा गन्दासि निद प्रोतम्पस्य अवस्प प ।। (गी० २११२) माहरण साशापनियात् ।। समपनिक । सम्बर।। नहा-'पा प्रपना वा पगया या मात्र है, यही गगरेप। दोनों ही मोह के उत्पादक है। च तक मेट पुद्धि, सब तक ढेप है। बवतक रागद्वेष है, तब तक मोह है । उता मोमिनि मुनि ता तक पुद्धि पसुपत है। कपित मुद्धि प्याम गुम्पा है। पानशून्पा मुवि निवड पनती हई मन पर अधिकार रसती हुई मम की सबसता का कारण बन पाती है। सबस मन सङ्गगेपहप प्रामझिमात्र का प्रपर्षक है। मासहि कामना की चमनी है। कामना कोर का काम है। कोर सोहका पिनासमोर सतपय का बनह । विमरा बुद्धिनाश का कारण है | युबिनाश पारमपतन का कारण है। यही मारमात , जिसका कि पुरुषारमापिकास के भावरणतन्त्र में विस्तार से निरूपण किया सा- है। इस भापधि से बचने का उपाय 1-पुद्धि की वापरता । तब रापमता मोह का परित्याग अपेक्षित है। तदर्थ रागदपएक प्रम-कर्म की विमाप्तीपता का परिस्पाग मारपक है। वमी परम शामिल मिट सकती है। बाम-गर्म को मिलाकर देखिए, तभी मानन्द ।।मन की कर्म में उपासना कीथिए, कर्म की भर्मरूप दान में उपासना कीजिए । बानपूर्वक कर्म काबिए, कर्म को जान से मामित बनाइए, कशाप मनसंपति प्राप्त कीथिए । यही युतिमानी, इसी को मुरियोग करते है। पही नि मेपसपम्पा है। इसी मौतार्य का स्पष्टीकरण करती गई स्माची उपनिवड करती है- कर्मण्यम य परपेद, अकमणि पर्म या। स मुविमान मनुष्येषु स पुका मस्तकमहम् ॥ (गी० 111) ६ पूर्व कपन से साधारण मनुष्यों को रेत का भ्रम हो सकता है। 'फर्म को प्रम में रेलो, नमको कर्म में देसी" यह मार प्रम-कर्म इन दो सालों की सण सिद्ध करते र प्राचारमा सम्बनिक - ईशोपनिषत् ॥ प्रतीत होते हैं। जब तक देत, तक्तक कम्प है मक्तक पम्प है, तमत्तक मप है- 'दितीयाद ये मयं मवसि' । मक्तक मयो तबतक पशान्ति - प्रशान्वस्य कुन पुखम् । पूर्वनिरूपणची मे किसी को रैत का मम न हो गप बस अन्तिमूसक इसी दैतम्रम का उम्मपन करती हुई श्रुति करती है- यस्मिन्सर्वाणि भूतानि, श्रात्मैवाभूदविजानत । तत्र को मोह क शाक एकत्वमनुपश्यत । (ईशोपनिषत् ७ मन्त्र) अभ्यास द्वारा पुद्धियोग (निफाम कर्मयोग) का साधन करते करते घिस समप भारम सापातकार रो नाता है उस समय उस युक्त योगी के लिए सारा प्रपन भारमा ही मम गाना है। ऐसी मस्पा से युक्त उस बानी के लिए कहाँ गोक है, कहा मोह । 'पदुदरमन्तर करणे, अप मय मपति के अनुसार जबतक हैत । तमीतक मय है । एकरस न्यापकता का ।। म्यापकता में कम्प नहीं है। एक वस्तु का मम्य स्थान की ओर मुश्मा ही तो कम्प । म्यापकतपसे मतिरिककोई स्थान नहीं है, जहाँ कम्पम को भरकाश मिझे। ऐसी परिपि ति में पारमा में स्वामभ्युतिरूप भय कैसे हो सकता है । पद वा द पा' इस भानामाव से मोर होगता मिचका चिस्प 0 मोह।। मोह से निवेकराति मा हो जाती है। कार्य कार्यवेकसा मारी गाती है। इस प्रकार मोह के साप साप ही शोक का उदय होजाता है। इस शोक मोड से छुटकारा पाने का उपाय है-मौतमाव की उपासना । इसी से मोहकसित का नाश होय । पुदि में विधा का उदप होण, तमी शोकनिति होगी, वैसा कि स्मृति करती है- । , पदा ते मोदकसित मुदिम्पतिवरिष्यति । वदा गन्चासि निद श्रोतम्पस्य अवस्य प॥ (गी. २११२) १४६ या ईशापनियत् ॥ समपनियदि । सम्बन-'पा प्रफ्ना , पापराया या भाव है, भी गगोप। दोनों ही मोर के उत्पादक है । मब तक मेद बुद्धि है, तब तक रामदेव है। अबतक रागद्वेष है, तब तक मर। मक्तक मामिाश्रय मुवि तब तक मुदि मुफ्त है। कनुपित मुरि प्यान गुम्या है। पानयन्य मुवि निरा नती मन पर अधिकार रमती मन की सत्यता का काय बन जाती है। सबस मम सरोपरूप प्रामहिमा का प्रदर्षक है। मासक्ति कामना की भननी है। कामना कोपका कारोव सोहका पिता । सोह स्मृतिभा का पनको स्मृतिमय बुद्धिनारा का कारण । मुदिनारा मात्मपतन का कारण है। यही भारमभात , जिसका कि पुस्मात्माधिकरण के मापरणवत्र में विस्तार से निरूपण किपा मा मुका। इस मापति से बचने का उपाय -धि की स्वरूपरषा । प रागद्वेषमूलक मोह का परियाग अपेक्षित है। तदप गोषम्यक प्रम-कर्म की निगातीपता का परित्याग भापरपक है।वमी परम शान्ति मिल सकती है। माम कर्म को मिथकर देसिए तमी भानन्द है ।म की कर्म में सपासना कीबिए, कर्म की भर्महप जान में उपासना कीथिए। मनपूर्वक कर्म कीजिए, कर्म को अम के माबित बनाए वारा मनपत्ति प्राप्त कीनिए। श्री बुद्धिमानी है, इसी को दुरियोग करते है। पीन पसपम्पा है। इसी प्रीता का सही करय करती ई स्मार्ण उपनिषद करती है. -- कर्मपयम प. पश्येद, अकमणि पर्म या। स विमान मनुष्पपु त पुका छत्तनमहत् ॥ (गी. 11) ६ पुर्व कपन से साधारण मनुष्यों को तब प्रम हो सकता है। धर्म को प्रम में देसो, ममको कप में दलो" या भवर प्रम-कर्म इन दो तलों को सजा सिट करते प्रकतारमा माईशोपनिपत् ।। सम्पनिक . प्रतीत हो रहे हैं। जब तक देत, तपतक काप १ जबतक बम्प है, तबतक मप है- 'दिवीपाद वै मयं मसि' नियतक भयो तबतक मणन्ति - पयाग्वस्य कुत सुखम् । पूर्वनिरूपणसंधी से किसी को दैत का मम न हो गाय बस घणन्तिम्भक इसी तभम का उम्मसन करती हुई शुति करती है- यस्मिन्सगि भूतानि, प्रात्मैवामूविजानत । तत्र को मोह क शाक एकत्त्वमनुपश्यतः ।। (इशोपनिषत् ७ मन्त्र) अभ्यास धरा मुहिमोग (निष्काम कर्मयोग) का सापन करते करते विस समय चारम साहातकार हो जाता है उस समय उस युक्त योगी के लिए सारा प्रपश भामाही बन गाना है। ऐसी अवस्पा से युक्त उस पानी के लिए कहा शोक है, कहो मोह है । 'यदुदरमन्चर फुरुते, भय मय मावि के अनुसार अक्तक दैत । तमीवक मय है। एकरस म्पापकता का मूस है । म्यापकता में कम्प नहीं है । एक बस का भव्य स्थान की मोर मुस्मा ही वो कम्प है। पापकतनसे प्रतिरित कोई स्पान महीं है, यहाँ कम्पन को भरकाश मिछे । ऐसी परिसिप ति में मात्मा में स्मानपुतिरुप मय कैसे हो सकता है। 'इद वा दया' इस नानामाव से मोह रोमाता । रिचा चिस्प 0 मोह। मोह से विवेकाकि न हो जाती है। कापी कार्यविवेकता मारी गाती है। इस प्रकार मोर के साप साप ही शोक कर उदय होगाता है। इस शोक मोह से छुटकारा पाने का उपाप है-पतमाव की उपासना । इसी से मोहकलिस च मारा होम । एधि में विषा का उदय होम, वमी शोकनिति होगी, जैसा कि स्मृति काठी- पदा वे मोहसिस बुदिम्पतिवरिप्यति । बदा गन्वासि निद प्रोतम्पस्य श्रुतस्प प ॥ (गी० २।१२) माइगर साशापनिपात् ॥ समन्पनिक - । । सका। पr-'पा पपना पापगया या मात्र है, वहीं गोप। दोनों ही मोह के टत्पादक है। बा तक मेट पुरि, ता तक भाडेप है। जबतक रागद्वेष है, तब तक मोह । पतक मोहमिश्रित युरिक सब सम पुदि मुपित है। मुषित मुलि स्याम म्या है। पानशून्या बुद्धि नियत बनती हई मन पर अधिकार मती मन की सबसता का कारण बन पाती है । सम्स मन सहयोपहप मामक्रिमात्र का प्रदर्शक है। भासक्ति कामना की जननी है। कामना कोरा कागा है। कोर समोर का पिता है। समोर सविनय का पनफ है । स्मृतिमंरा इरिनारा का कारण है । युदिनारा भामरतन का कारण है । मही भात्मपात है, मिसका कि पुरुषारमाधिकरण के भावरणतन्त्र में मस्तार से निरूपण किपा मा- पुत्र है। इस भापति से बनने का सपाय -गुदि की सरूपरषा । तदर्प रागद्वेपमसफ मोह का परित्याग अपेक्षित है। सम्र्य रागऐपएक प्रम-कर्म की निमावीयता का परित्याग मारमक है।समी परम मित मिझ सकती है। मन-मर्म को मिलाकर देसिए, तभी मानद है।जान की कर्म में उपासना कीजिए, कर्म की मकर्मकप भान में वपासना कीजिए। शामपूर्वक कम कीदिर, कर्म को म के भामित बनाइए, काय बानसंपत्ति प्राप्त कीगिर। पही बुद्धिमानी सी को मुरियोग करते। पी नि पसप पा है। इसी प्रोताप का पटी करण करती ई स्माची उपनिपत करती है- । धर्मपयफम प' परयेद, अकमणि पर्म या। स बुरिमान् मनुप्पेषु स पुतः सनात् ॥ (गी० ८) ६ पूर्व कपम से साधारय मनुप्पों को रेत का भ्रम हो सकता है। प्रेम में सो, प्रम कम में देतो" ५५ पर मस-कर्म इन दोनों की सण सिम पर ए प्राचारमा शासपनिषत - उत्पनिमकि समझ रहे शो, बिचास करो वे दोनों सरव भास्पा पृपक् पृपा प्रतीत होते हुए भी परमाता मपुपक है, दोनों में दोनों मनुस्यूत है । पर अधिकारी इस प्रपम मेशि में सत्तीर्ण होनाता है तो भागे जाकर-'यस्मिन्सवालि मूवानि' इत्यादि रूप से अति रहे सहे मेद का भी निराकरण कर देती है । प्रातिमासिक रेत से म्यावहारिफत पर साती है। मन्ततोगत्या पार मार्षिक मत पर पहुभा देती है । इस प्रकार प्रकृन्तमन्ध 'प्रमेव फर्म' इस पाप सम्बध का निरूपण करता मा प्रम-कर्म के ममेद सम्बम का से दिम्दर्शन झपता है। ។ इति ब्रह्म-कम्मणो सम्बन्धाधिकार हमामा - सापनिषत् सम्बनि मुक्ति का तापय पहीलप्रम-कर्म दो तिहै। भाति रो, सत्ता एक है, इसलिए परमापत प्रोत है। सपामेद गीत का पारण ममवा। अप्ति का 'विमान रुपए बका चमत्कार रसता है। मानस'नी, रिभानत का।"म म्यापको बास्मा एक भी भेद नहीं। इस प्रकार केक्स प्रदान मानतः' से सम्मम रसवा । मानिक मनमूततापान का 'विमानता' से सम्बध है। मुसि कावी है कि तुममें साउप- निष पासी, बीवन मर मर्द सम्' 'पास्मोई सई-नो नानारिव किचन' का पारा पस किया, परम्त इस कारे नापिक मन से (शम्दयम्पमात्र से ) पहें तस्तक कदापि शान्ति मही मिल सकती, पक्तक कि तुम पपार्पहप से उस बान पर प्रतिष्ठित न हो पायो । पामी मोम पामी समम हे हो, भमि को भनि समम रह हो, इसी प्रकार कोरे शम्दारमा को शोरकर जिस दिन दम भरतरसमा से मतिताव पर विचार कर बोगे, मी शोक-मोह से पुकार योग्य । मही तो-'मी येवान्दिनः समें खपाप प्रसिर । पाममा सामाम्म शाम है, इस का मन से सम्बन्ध है। मरोपरूप से कार्यकारणसवाप परिहानपूर्वक पानमा विशेषमान है। निगेवरूप से जानना यपाप मानना है। इस जानन का मुनि से सम्ममा है। दमित्वमेव' या विवास मुनि से ही होता है । मा करना हा मन का काम विपास परमा इनि का काम है । मुस्यिोग ही मामा के पाम्पग में प्रसारगुण का उपय पत्रमा शोक मोर निधि का रस बनता है। पूर्व के मन में तिसम्म का निरूपण मा एर प्रहलमन्त्र मौतमम्बाप का निरूपण कर गहास में निरोप नही सपना उपागा शिषमाणानों पामानामुफ्मासना। धमस्पे परमनि स्पिसा बना सम्प समीदव ॥ (वारपपदी) इस शिपासिदारत के अनुमार परिकारी मा से भुतिन तिमीत दोनों मायों का अमिक निमपण किया। -मर्म को सभी प्रमक पप समम भार है। परिसे भी इस मा पन्तिरमे परिप निराकरण ली। पती निको म सपा नि!

पूखमद
8-स्वयम्मूः
पषिदेवतम् ।
पूर्णमिदम्
P-महानात्मा
यापारमा
(महवैभव)
मझसत्याक्षर.-
तेज-स्नेहमयः प्राकृतात्मा परमेष्ठी
महानात्मा
परमेष्ठी
माफ
+ महानात्मा
(प्राकृतात्माधिकरणे महदात्माधिकरण द्वितीयम् )
अथर्वपदावच्छिन्न.-तेजस्नेहमयात्मा
विश्वयोनिः
स पर्यगान्कमकायमत्रणमस्नाविरं शुद्धमपापविद्धम् ।
कविमनीपी परिमः खयम्भूर्यायातथ्यतोऽर्थान् व्यदधात्-
शाश्वतीभ्य समाम्य ।
(शोरनिषत्
मन्त्र)

माफ्तारमाधिफरणे-- अव्यक्तात्माधिकरणं समाप्तम् मूत माविष्यत् मस्तौमि वहुब्रह्मैकमक्षरम् महन्दी-कमक्षरम् स पेदेवत् परम प्रम धाम या विश्व निहिन भाति शुभ्रम् । घपासते ये सकामास्वे "शुक"-मवदविवर्चन्ति पीरा॥ (मुण्फ १२।१०। मम योनि-महद्ब्रह्म तस्मिन् गर्भ दपाम्याम । समयः सर्वभूतामा सो भवति परत ॥ २ ॥ सर्वयोनिपु कौन्तेय मूर्सया समरन्ति याः | सासो ब्रह्म महद पोनिरह बीमप्रद पिता ॥ ॥ (गीता १।३ ।। प्रद सबम्" के अनुसार रपमान सारा अपच मम । स के माठ भायर हैं, एवं मापापार को ग्यापभी पहा पायो । भएप भछापपय मरूप " सर्वप्रपत्र को हम 'गापमान कर सकते हैं, जैसा कि 'तान्पेवा परी पटा तरा गायत्री । गापर्म साम । प्रम र गायत्री' (१० उ.पा. १९११) इस्पारि सामति से पर। मप्रमापति (ईसरममापी) के पाभाठ भवयर भयेप, भघर, प्रामवर रिकारवर, रिपयद पपीतपण पवनन, पुरन, पुर, इन मामों से प्रसिम है, जिनका कि प्रियद निरुपण के प्रकरणों में किया जाग।। मन के इन पाठों मापों में से प्रत्येक मनपा पास है। इस प्रकार कटारवि से प्रम की

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प्रास्तामा मानव - ईशोपनिषत् ।। । एवं नहीं है। यह सम से मति (मतिकान्त) है, मतएव इस के सिर "रिराना मनाएट छन्द" (शत ८।२।।१।-पशु से ११) यह कहा गया है । यपपि प्रारूप परमा सिट् की इन पासीसों कसाों का पूर्व में म्पटिएप से उम्लेख करदिपा गया है, तथापि सम विधान के चिर इम का यहां मी दिग्दर्शन करादेना मसंगत न होग्य । एक बात और प्यान में रखिए । विराराम प्रजापति है । एष प्रगापति का "भास्म-माण-पयसमष्टि -प्रमापवि" पा सक्षम है। ऐसी स्पिति में इस विराद् प्रयापति में मी १११ क्रम से मारमा प्राण पशु इस तीन विम्यगों का मग मामना पण । पम्पय मदर मात्मवर ग्राम के इन सीन सक्यों की समएि मास्मा है, मिकार-विषय-पचनन-पुरमन-न पार भवयवों का संघाव मारण पुर । पशु करा गावा है, जैसा कि मागे के परिलेस से स्पए हो पाता। उक्त विराट्या का समदासा तत्व ही 'एक' नाम से प्रसिद्ध है । एक के सम्बन्ध से से विराट् पुरुष चासीस कसामों में लिमाल होनाता है। इसी सर्वोपादनभूत शुक्रनम का निरुपम करती ई मुति माती - स पर्यगाच्छुकमकायमव्रणमस्नाविर शुद्धमपापविद्धम् । कनिर्मनीपी परिमू स्वयम्भूर्यापातथ्यतोऽर्थान व्यदधात्- शाधतीम्य समाभ्य ॥ "कार्यरहित, प्रयरहित, स्नापुरहित भतएम श्रमाय-अव्रण अस्नाविर नाम से प्रसिद भतएव सदपाप्मा से प्रषिद राम के पारों मोर मा भ्याप्त होगया, दूसर गमों में शुम को भारों घोर से पेर सिपा । (इस प्रकार गुफ को पारों मोर से वेष्टित कर) कवि-मनीपी-परिमू-स्वयम्भू इस्पादि पिरिष नामों से प्रसिद्ध --उस वस्त्र ने (एफ द्वारा) यया क्यास्म से सदा के सिए पदापों का निमास करदिया। मात् पर वत्व परिस शक को पेटिव करता है, पर्ष पेटिव एम से पिप निर्माण ६११ नसानपनिषत मयप्रवराम १० कथाएं शेगती है। इसी क्वारिंगत्स हद को परमापिरार"मा माता । विराट पद के गिनीचिरान बिग्निीरिंग मिगिनीरिरात् पस्वारिंगिनीरिराट् १० २० १० १०) पहबार बिच है। इनमें पारिधिनी (पाहीस महर की) मिराद् ही परमानियटू बरसाती है। इससे बादिर कमी नही है। पुरुष, मातरजमाति, पिारी, निकारसंघ (विस) सब कुम इस परमाविराट् के गर्भ में निविष्ठ है। पुरुषमाधिकरण के उपकसमें परमानिण्ट का सरूप प्रका- राम्तर से बताया गया है-(देखिराईमा:पृ०स०७ ।अनुगम सिदान्त के अनुसार विराष्ट्र का कई प्रकार से सम्पप होसपरा है । मतएक-एपा 4 परमा निराद् ययतारिंगिनी' (to०२२१०१२) इस मनुगम पवन के अनुसार इस व प्रम की उचालीस करों के साप भी समयप झिापा गासकता है। प्राही 'सरम्' है। एष ' ससासम्' (पत. १६९१), 'परमै सासम्' (ता.पा. १६ारा२) इस्मादि के अनुसार सांसद साम एर परम [ अन्तिम सीमा ] का धपक है। मवरण इस परममावसपा सबसपा परमाविराट को मागे गाकर पम्पभूतिने 'ससावरा मे परमा रिराष्ट्र ( मा २६।।।) त्पादि रूप से सालाप पाया है। सहमाचरा वर्ष साक्षापयादि इतर सारे सद इसके गर्न में प्रतिको पद सकरपण (प्रतिमण) करने में समर्म • HAAR करने को रेसन निगम प्रसार, समगुम मप्र th मन अनुगम का है। मारणमिम योपैयामामोजिणे तिष्ठ मा रसायनामिकमर में प्रतिपानि पशुपा श्रीपिप्राधि रस्सीसा का समय का दुमा भनुन्न । - महेश महारा नगा। समापन पर पर तीन तार याद किया गया है । भूमिका में पम्प शिष्य मो में पान।म तवम र मम्पस मा मिस का मातम र समर से सीएपप गी बाबा।'पपापामा पिरा पयामि की रात . मग मीरास एम अनुगम पोम । इसी गिरायो। जब मरताहै।

माहवारमा या ईशोपनिषत् ॥ माप्रपा 14 नही है यह सब से मति (पत्तिान्त) है, भतएव इस के सिर "निराखा प्रनाप्रष्ट छन्द" (रात ८।२।।१।-पशु सं ११।९) यह कहा गया है। यपपि प्रमरूप परमा विराट् की इन चाचीसों कक्षामों का पूर्व में म्पटिरूप से उसेख कररिया गण है, तपापि सम शिन के लिए इन का यहां मी दिग्दर्शन करादेना मसंगत म होस । एक मात और ध्यान में रसिए । विराटनम प्रयापति है। एष प्रजापति का "प्रारम-प्राण-पशुसमष्टि -प्रमापति" यह सपणी । ऐसी स्पिति में इस विपद् प्रजापति में मी ३५१-कम से पात्मा-प्राण पशु इन तीन लिमानों का मोग मानना पण मम्पय प्रघर-मात्मदर मम के इन सीन मावों की समटिमात्मा है, विकार-विषयट्सवमन-पुरमन-इन बार मवयों का संघास पाणी एक पुर को परा का नाता है, जैसा कि मागे के परिलेस से सप हो जाता है। वक मिण्टाम का समदासा तस्व ही 'शुक्र' नाम से प्रसिद्ध है । गुफ के सम्बन्ध से से विराट् पुरुष पासीस पचामों में नमक होनावा है। इसी सोपावनभूत शुक्ररम का निरुपम करती ई श्रुति परवी है- स पर्यगाच्छुक्रमकायमत्रणमस्नाविर शुद्ध मपापविद्धम् । कनिर्मनीपी परिम् स्वयम्भूर्याथातथ्यतोऽर्थान व्यदधात् शाश्वतीभ्य समाभ्य ॥ "फापरीत, व्रणरहित, स्नापुरहित, प्रतएव श्रमाय अव्रण प्रस्ताविर नाम से प्रसिद प्रतएर शुद,पाप्मा से पपिद गुफ के चारों भोर पाम्पाप्त होगया, सर शों में एक को पारों ओर से घेर लिया। (इस प्रकार गुफ को पारों मोर से बेटिव फर) कवि-मनीपी-परिमू-स्वयम्भू इत्यादि विविध नामों से प्रसिद्ध उस ससस ने (शुफ धारा) यया क्यारूप से सदा के लिए पदापों का निमामा फरदिया। अपात् गा मल परिल शुम को पेष्टिव करता है, पर्प टिन एफ से विष निर्माण { माहतास्मा 1 ईशोपमिपत् ॥ मामाका , , किया करता है। नस का या रचनामम मनायनरत है, सदा पइसा है। एक ही नियम से विष निर्माण हुमा है, एवं इसी प्रकार मनिष्प में भी निर्माण होता रांगा" या मत्र मापन प्राचीन पास्यातामों में इस मन्त्र का क्या पर्व किया है। एव विद्वानरएि सेम कहाँ तक ठीक है। यामी गान सेना मापस्यक होग्य ।। प्राधीमों के मतानुसार टल मन्त्र मामा के स्परूपसरण का निरूपण करता है। पाते हैं कि पूर्व के मन्त्रों में मिस मास्मा का निस्सव हुमा है, प्रा स्य स्वरूप से कैसा है। उस का स्वम्पन्नलक्षण क्या है। स पर्यगात् ' इत्यादि मन्त्री प्रश्नों का समाधान करता है। उफ सण मास्मा परिवः भ्याप्त होगा। माकागवत पर सर्पम्पापी है , पर गुद शुरूप , पोतिष्मान् है, दीप्तिाबाप- ( प्रकाश स्वरूप है), प्रकाप (अशरीरी है), सिनशरीर से पमित है, मदत है, शिगन्प होने से प्रस्नागिर है। इस प्रकार भम्रण और भरनागिर इन दो शों से स्यूमगरीर का मविपेप किया गया है। पर यद, निर्मस है, प्रविधामम से गदित है, इस प्रकार 'शुद्ध' शन से कारण शरीरमतिपेप किया गया है। धर्मापमादि पापों से पिपमित होता हुमा मा अपापषिदी। गत शुक्र-अकार्य-अवर्ण- प्रस्नाविरं--शुद्ध-अपापविद इन सपनों को शुक -अकाय -अना प्रस्नापिर -शुद्ध -अपापविद्धः इस प्रकार पुलमान में परिणव कर मेना पाहिए। क्योंफिस पर्यगात्'इत्यादि प से पुंस्स्वमार से उपझप कर 'कविर्मनीपी परिमूः स्वयंम्' इत्यादि रूप से पुस्लमान पर ही उपसंहार किपा गया है। (मा उपन्य उपसंहार में पुंस्त्वमाव की प्रधानता है वो मम्पपतिव 'शुभमकायमणम स्नाविरं शुद्धमपापविद्धम्' इत्यारि पाक्य की पुरुषप्रधानता-सत सिन होमाती है, पही तात्पर्य 14 प्राम्विदशी सटा है, जैसा कि नान्योऽतोऽस्ति द्रा' इस अनिममार से सरसह सर सर के ऊपर राने बासा परिम है। - -

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प्रापरमा
माइगोपविषम् -
शुष्मामीगाच
७
५-"वर्णगुफमुपसो नि विपुल" (अक्स० रारा)।
५-प्रपतवीर शुभमर्षि" (अस०३।१३)।
-- गुक पिना सोम" (अक्स. २०३२।२)।
-"पर्णविराममासाम्" (अक्स० ३।१५)।
1-"श्योपा एपा शुक्रबुरे" (अक्स० )।
१०-"मपिप्यान मपरा शुरुययः (अस० १२१५)।
"-"एक तमन्त पारमा (भास. ४HRI)।
१०-"प्रापये मरत पारु शुकम्" (अक्स. ५१॥३)।
५-'मासों प्राहमम्" (अक्स• २५११)।
१४-'शुक्र पर वेऽन्यत्" (अक्स ६५८)।
१५-"साहुको पश्निा" (अक्स० ६८11)।
१६- बासुपरिवं शुभमुषरत" (अक्स० ७६६६)1
1-'धर्मु दिपि गई पोतिरपारपा" (अस० ८।१३.)।
१५-"एक हिरण्यमावदे" (अक्स० ८६)।
-'परपान त पापुम्" (एक्स. श६६।१४१)।
२.-"विपि शुफ पनत सूर्यस्य' (असा)।
२.-"म्पोतिः एमसौ" (ऐप. २१)।
२२-"परिपपम्" ( ऐना. १०६०)
1-पोतिन एक हिरण्यम्" (ऐला. १२)।
२४-"गुरु व छुए कीणाति यत् सोम दिरपयन' रात AANI)।
२५ मोऽसि गुरुमात्ममतपसि [माम्य ]" (VT. शारदा ॥११)।
२६-"एकापापा' (ऐ ०७६)।
२७-"सर्स गुणम्" (शत शरार।

मावस्मा का शोपनिषत् ।। शुभरारी मासि दिन बिन प्रकरणों में 86 रुप से गुरु राम्द प्राप्त हुमा है,उन उम प्रकरणों को अपने सामने रख सीमिए, उपसम्पमाप्यों को भी पोड़ी देर के लिए उपयरक सममिए, और फिर मर्म कीजिए । भाप को विदित होगाया कि शुक्र शम्द का अमुक भय ही ऐसा है, को सब शुक्र शन्दों में समान रूप से म्माप्त होसकता है। भारम्भ से ही पन्छिए । बिस 'शुक्रम्' को उपभोपसहार के यस पर 'शुक्र' मानते हुए भाष्पकारने प्रक्स में निसे उस परिस्म निगुण ममपरक मामा , वे ही माप्यकार खप उपनिषत् में ही वे अत्रमेवदविषचन्ति पीरा' इस्मादि हर से परे हुए 'शुफम्' को “शुकम्" ही रस्ते हुए करते है- "ये पफामा पिमृतितृप्यापिमिता मुमुवा सन्त उपासते, परमिप सेपन्वे, शुक्र नृतीमं पदेवत् प्रसिद शरीरोपादानफारसामविपर्नन्ति धीरा, पीमो न पुनर्पोनि मसर्पन्दि" ( मुणक० म० भ० ३।२।१)। इस प्रकार यहाँ एक मद से पुस्योपादनमूत सुप्रसिद्ध शुक्र (वीर्य) का माण किया गया है। पाविरमासी-'एकम निकीत: शारार्थोऽन्यमोपकारको भगति इस ग्याप को नही मानती ! परि मानती है तो क्यों माही मुणकोपाच शुक शब्द को भी परिस्म म परक माना माप, अपना ईशोपाच गुरु राम्द को भी क्यों म धपादामकारमपरक मान लिप्प माप। सर्पश्री सायणाचार्यनं घेद पर माप्य लिखा है। समी सिंहान् इस भाग्य का भादर करते है। भव देसमा माथि उक्त अस्पतों में उपाच एक राम्द होंने क्या भप किया है। २-"पा भादिस अपनी रश्मियों द्वारा समस्व भूतों के सारभूत रस (शुक्र) को कर्ण (पुप्लोफ की भोर) सेमाता" । (३)-" भने! तुमारे (माय) शरीर का को शुक (सम्वसित वेग) पपफ सा"।(४-"या प्रादिस शुक्ररूप (पुसोफ के) पप पादोहन करता" (५)रेम ! प्रादिस फी वरा मकाशित शुभप भापको उपा ममप्तित कर सी"। (६)-रे अमे ! विप्मती प्रना (पोता सोग ) प्रापकी शुभ (दीप्ति रूप ग्नालापों की स्तुति करती है । (७)-"रेन्द्र ! माप (गोदुग्ध से एक प्रक मातारा या ईशोपनिषत् ॥ गुम्यममार एस) शुक्ररूप सोप का न कीजिए । प्रपा गुणमन्पीमा में पवमान, प्रवएर गारप सोम का पान कीमिए"1(e) इन उपायों के शुभ प्रभाग) रुप वर्णकी ( ने अपने सेम से) प्रष्टद कर दिया" (E)-"पानी परसाने वाले सूर्य (सपा) ने अन्तरिक्षम स्तन से चारुप पानी को दा सिया"(१)-मपा (एमोकस्य सौर)मने प्राप्पा पित शुक्ररूप सोम को" (" 'एकरूप (दीप्तिाप) रजको विवव फरदिया"। (17) "२ (प्रमर्प ! पापने वायु के लिए मिस बरणीप (एक नाम के) दीप सोमप सपादन किया है।(11)-'निस दीप्त पानी (शुक्र) के प्रति सर्प पारों मोर प्रकट ता" ("पन् ! तुमारा एक शुभ [शुक्म] पर्य है, एक कप्पण"। (१५)-(पश्चित में) शुक्मरूप (शुकम्प) दम तरिक्ष से मरता(६) देव पामों का रितपी पा (मर्प) निर्यन (शुम) पतु उदित हमा'। (१७-१ इन्द्र ! पापन मिस समय पुमोक में निर्मस भ्योतिर्मय सूर्य को प्रतिष्ठिव किया। "निमात दिरणपस्प पल्मा का प्रादान करता है" [१६]-"परमानने गुमोक में दीप्प मान वर मर्य] को परपम किया" [२०'गुम्मोक में पूजनीय सूर्य के राक की [दीप्तिमतमगरस की ] भैसे कोई मारापना करता"। [२०]"पा र्प ज्योतिर्मप शुफ है।। [२२“याराफ रिपप [ग्योति] " । [1]-"म्पोविनी गुरूप रियो । [२१]- 'सो कोकिरियय पुर्णसरार [भगफी] से सोम सरीदता है, बा राम से ही एक तरीदना"।[-]- भाग्य ! (षत) माप वमोमप रे, ग, प्रसव । [२६]-"पानी ही एक" [२७-"ससरी गुड+ + + +। उपक प्रणाणों के अनुसार अप प्राचीनों के मतानुसार ही गुरु राम पुपरीप मत- रस अभिन, पप प्रकोप, दीप्ति, सोम, म्योति, माप, सोम दीसरन, दीमसोम, वीप्तपानी, एक्सपरम शुत्सदक, निर्ममार्प,निर्मसम्योगि, निर्मचद्रमा, समर्य, दीशि ममयम, मर्य, शिपम्पोति, पोति, सोम, प्राग्य, पानी, सम-म पदार्थों के लिए प्राकारमा 8 ईशोपमिपत् 18. शुफामीमारिस . . प्रयुक्त हुमा है । इन सब का पयवसान विनमगर्मित (पपुरनिगमित ) पनाम ( भाप ) में हो बाता है। मप्तल की भस्या विरोप ही सोम है। सोम ही चन्द्रमा है। चन्द्रमा ही मौषधि धारा वीर्यरूप में परिणत होता है। 'मासत् सोमो महिपमकार" (प्रक् स० १।१७।११।) के अनुसार सोम्पाति से ही सूप में स्मोति का उदय होता है। सोममम सौर ज्योति ही हिरण्प है। पचभूतों का मूब उपादान ही माप, पही मूतों का रस है । यही ग्मेपशु में प्रविय होकर पयरूप में परिणत होता है। वह सप प्रत है, परन्तु इसके गर्म में सम पसुरमि प्रति ठित ६ मत पा सस्प भी है। इन्ही सब परिस्पितियों के माधार पर हम कर सकते हैं कि प्रत मन्त्र में प्राचीनोंने 'शुक्म्' को 'शुऊ' परक मामते हुए जो इस का बिगुद भारमपरक भर्ष किया, परपरितमात्र है । जैविक साहिल किसी सप्रदाय विशेष क्व मनुधर नहीं । यपपि सुमी सम्प्रदायों का मब ये शास्त्र किसी सम्प्रदाय को मौरिक नाही कराया सकता, तपानि 'वेदशास्त्र में प्रमु सम्प्रदाय का ही प्रभानरूप से निरूपण मा " पा मानना प्रौरिणादमान है । वैदिक पदापों के यपानुरूप समन्वय के लिए निशुवापि अपेक्षित पदि पहले से किसी मत पर भासा होकर पवेद साम्पाप में प्राच हो तो सहस्र माम्प भी भाप को घेद के पपार्प तापप से सहम मर सकेंगे। फुख समप पूर्व चिसय पाठशाला के प्रपाम प० एम्भर रुप्माचार्य धारा सशोपित्त, एष श्रीगोपालगन दस्सामीविरपिस उपनिपाप्प प्रकाशित हुमा है। कृष्णमाचार्य अपनी मरतामा समाप्त करते हुए प्रन्स में मिस्ते है- 'इदन माष्य सरसया गेल्या परर्चमान मुखेनापमनगमयति । मिशिष्टादत सिटान्तरसमयमानानामुपकारकमेतत् । पचप्परित नाम परचित क्वाधिदर- १ "सरी सेलिस मय या माच सरसता से शान मा। विशित सिमान्त प्र भागने मामिए पासपरकीरपि कहाँ यही मार पोरनामें जो में प्राचात म्पस्मा से नाम मात्र को मेरसम्पति मिशित सिद्धान्त प्रमहरमात्र मी कपन महामाहेmrat परम्प सन् १५ में निपंप सपर प्रेस में मुद्धि मा है|mmmm - ११.

प्रास्तारमा मारणपनिल गुरुवाति क्पयोमनायो गगावपु ष मे परम्पामपानत , प्रयापि विगिराईनं तु न संगतोऽप्पनिमहले । तन्टि गुणक्दर्शिना विदुपामा नन्गपम स्यात्"। म मिशिरारत की पूर्ति करने के लिरी उपनिषत् प्रकर पा इन साम्म सायिक मयों से, जो कपस फसपना का सामाग्प निमाण करने वाले चतुर शिम्पी भाग्म- तुशि हो सकती है ! यदि मही तो किसी भी सम्प्रदाय का मामय म लते हुए पाप हमारे साप पचिर । हम मापको अपति के दशन कराते हैं। विषमरम्म में कत्रा गप कि निराझम का अम्मदा- शुतल है । इस गुरुपापं कर सामान्य विवचन पूर्ण के धकाधि पार में विस्तार से किया पुका। मन यहां पिरपेपण की भावरकरा नहीं है। बत गुनसम्मम्मी परमों का 8 दिग्दरान काना पर्याप्त रोगा। - गुज स्पा पदार्प इस का उत्तर 'उपासनकबरपा' । विस का उपादामकारण फोन है। इस का उत्तर है - "सष्टिसावी प्रम्पपयुक भवएस बीमासस्पापम प्रवरान तीव भास्पयर" । भग्यछापिनास में हमने पसुझर मिन पप्रम को शक तणावा पा, एक पा मम्पपापयापिम मामाघर को शुक्र बहाया गया। इसमें निरोप नही सममना पाहिए, जैसा मि मागे मामर स्पट ऐनापग्छ । चत्वारिधिनी परमामिराट् के पूर्वोत पाठ मा- पों का स्मरण काबिए । उन भाटों प्रपों में सात 'पुग्मन माम के मापत्र की पांचों पसार रेट-पोफ-प्रमा पीय-पशु इन नामों से प्रसिद्ध है। इन में बेद नाम का पहिला परम्मन ही सरि का भापार है। बिना वेद के न विरसधि होती , म बीवति । अन्तर केपस इतना है कि ईघरसंस्था में परिठे पुरुष, पुरुप से पिप का मूर येतात प्रादुर्भत होता है परमादि में परिसर उत्पन्न हो। अनावर येदार पोगमाम फा प्रादुभाष होता ।।हरनन्तर पुर (जीवाम्पप ) मा विष्ट होता है (देविए। उ मा प्रस. १०.) ममपत्र में पन्तर ।। परम्त बिना मेरो प्रभापति का सहप निप्पम मही सकळा, या निहित है। बता प्रा नही, तलक प्रगति नहीं। ना तक सोक नही, तर प्रग प्राज्यारमा पपूर्णपाठ का ईशोपनिषत् ॥ - नही । नम तक मापोमय मुवेद नहीं, तब तक ठोक नहीं । उप तक पुर्वेद नहीं, तमतक मुखेद नहीं । इसप्रकार परम्परया घेद ही प्रजापति का कारण मनता हुमा 'प्रभापति शम्द को भन्बर्ष बनाने में समर्प होता है। तमी तो प्रजापति को घेदमर्षि कसा जाता है । इस प्रणा पति की चिर-प्रतिपा-मीव-शिपिविष्ट मेद से चार संस्थाए क्तलाई गई है। इन पारों में ईपरप्रजापति विश्वकमा नाम से प्रसिर है। इस विपकी प्रजापति के समानशीस-पसन चार भभिन्न ससा उत्पन्न होते हैं। चारों मित्र मरुण, इन्द्र मि सोम इन नामों से प्रसिद्ध है। किसी समय यह पोषों पृपक् पृथक् पे । बब तक यह पृषक् पृषक रहे, तबतक इन की विनिर्माणसम्बन्विनी कामना पूरी न । फसत होने विचार किया कि ऐसे काम नहीं पस सस्ता । अपने को परस्पर में मिलकर धिनिर्माण करना चाहिए । ऐसा ही क्षण । पात्रों मिस गये । मिसने से कामना पूरी होगई । इन की समधि कर्मति का हेतु बनी, अतएव पाह पर 'काम' नाम से प्रसिद हुमा । यही या पाविधानपरिमापा के अनुसार भागे पाकर 'पूर्णमास' माम से न्यवान मा । समरूप पदमा मग्निमयी पृपिवी के चारों भोर परिक्रमा जगाता है। इस की पह परिक्रमा एक चान्द्रमास में पूरी होती है । इस परिकमा से पादमास के रुप्स गुक्ल दो पच होगये । पापच की भगिसम विग्राममूमि 'दग' करसाने सगी, एक गुक्तपद की प्रासान भूमि पूर्णिमा' कालाने सगी । दर्शतिथि में चन्द्रमा की मृत्यु है, पूर्णिमा में सुधारस्पा । गुस्सरितीया चम्मकास, गुस्सायमी बचपन है, रुणामी वाम स्था है। इन सब मानों की मूगापारमम्मि प्रसिपत् ( परषा)। यही से चन्द्रमा के पास एक वृद्धि की प्रपति ( उपक्रम ) होती है, अतएव इसे 'प्रतिपत्' कशा पाता है। रोप सारे चान्द्र मगोपत्र प्रतिपत् का अनुसरण करते हैं, प्रविपत् के भनुग्नमी है, प्रतएव उनें मनुधर करा माता है। मविपत् अनुचर सकितिक राम्द हैं । मसप्रतिष्ट्य को प्रसिपत् कहा जाता है, मता नुगत इतरभावों को अनुपर कहा पाता है। सूप प्रतिपत् है, रश्मिए भनुपरौ । पत्रमा प्रति पत् , नपत्र अनुचर है । भारमा प्रतिपत् है, इन्दिपप्राण मनुषर हैं । मस्तक प्रविपत् है, इतर मग मनुघर है । गुरू प्रतिपद। शिष्यवर्ग अनुचर है। सेमाप्पच प्रतिपद , सेना प्रमुचर १५७ माध्यमा का पनिषत् पर्समास है।आप प्रतिपत् , कर्म मनुबर है। मुख प्रतिपत् , पाम भनुपर है । पतु प्रतिपत् है, रूप अनुचर । मिशन म । विस में सर्वत्र भाप इसी प्रकार 'प्रतिपदनुपरौ' इन दो मानों सादरकार पर सकते हैं । प्रतिपत् एक होग, अनुचर भनेक होंगे । कण मोरात्र भनुपर है, कम प्रतिपत् प्रतिपट पुस महोरात्र मनुधर है, शुक्मप्रतिपत् प्रतिपक्ष 14 हपणपतिपत् का शासन दर्शपर्यन्त । गुमप्रतिपट का सन प्रशिमा पन्त । । दश- कास निप्राम (हास) कास, पर्शिमाकास तमाम (हरि) पार है । दर्श में चान्द्र पदार्प इम से नियुक्त होते रहते हैं। पूर्णिमा में चारवपदाप हम से युक्त होवे राते दिशेरि भक्सान की सूपिया है पौगमासेपि प्रामात्र की प्रबर्विका है । अत के अनुसार प्रत्येक पदार्थ का दश- व पौणमासकास नियत है । उताबरण के लिए प्रत को सबिए । मारिनास प्रत का पीस- भास , रोगकास दरा। भारिकमास में भयकाश से बायुद्वारा [प्राणरूप से] Vत की पारि होती मग भारिन के पानी के सिर मोक माषा में 'घी परस रोया कहा पाता है। पत्र-शस मधु का पीसमास है। इनमें सूर्य से मधु [ग] की गति होती है। सूर्य निस समम मपुमा मधुमविका का पचा) नाम से प्रसिद्ध भरणी मात्र पर माता, उस समय से ही मधु का पोपमासकास पारम्म होगता।मों मन पद पूपिणी पर गिर नाता है। इसी मधुरपि से पसरत में प्रत्येक पदाप में नैसनिक माधुप बकसित होणावा। मधु सम्बन्ध से पत्रणम मधु-मापा म्पस माम से प्रसिव । करना यही है कि पदाप का भागमनकास पौण मास है, नियोगकास दर्श। महोरात्रपरिक्रममत् दोनों चक्रवत् परिभ मपीस है । परिभमण से ही दरा-पूर्णमास का उदय होता है। अत: इस परिकमारूप कर्म को ही दर्गमासपन' पर दिया बाता है। चन्द्रमा पूपियी का उपप्रा , साप ही में पृपिके चारों मोर परिश्मा गाता है।माएर पृथिवी को म प्रतिपत् कर सकते है, एप परम्प को मनुपर कर सकते है। इसी प्रकार पणमा को साप लिए ए, पपिपी भरमें नियत पान पर (पत्तिाच पर) सर्पपरों ओर परिक्रमा सम्पती । इस परिश्मा से प्रमियम प्रदिति-दिनि यारो भारपाएं उत्पच होगाता। परिति-रिति प्रदोराम संपरसर प्रपन - भरमा का रोपनिपात - परापूर्वमा भेद से तीन भागों में विमल । दिन में पपिपी का मो माग सौरप्रकाश से युक्त रहता , मरिति है। विगत पार्थिवभाग सौरप्रकाश मे पत्रित होता हुमा दिति है। मप्पाण पर्णिमा .. मप्यरामि ममापस्य है, प्रात पर गुस्साष्टमी है, सायपास एप्णाष्टमी है । इसी प्रघर उपरायणममस भविति दक्षिणायनमसस विति है। उत्तरायण उपक्रमकास गुस्सा धमी, मप्पकार पर्णिमा , उपसहारकास पाएमी है, दक्षिणायन मप्पकास दर्श, शिवराम पूर्णिमा है । साय सम्परसर पर्शिमारूप ६ प्रकाशबप, समरसर के पूर्व-पधिम सब भोर पूर्णिमा (प्रकाश) का सामाग्प है। इसी भपिप्राय से युति करती है- पूणा पमान पूर्ण पुरस्तान्मध्पना पौर्णमासी मिगाय । तस्पा देना अघि समसन्त रच नाफ ए मादपन्नाम् ।। (ले० प्रा० ३।१।१) इति । पौपम्पसेशि का सम्बन्ध मप्प के सिपकास से ही है। यही सारे मापदेवता प्रतिष्ठित है, यही माफ स्पान है। इसी मभिप्राय से 'मप्यतः पौरापासी भिगाय. सादि कहा गपा है । यही पृथिवी का दर्शपूर्णमास है । पृषिषी सूर्य कर रपमह ! , मठएष सूर्य प्रतिपत् है, पृथिवी मनुचर है। पन्द्रत पृपिषी को साप लिए गए सूर्य परमेष्ठी के चारों भोर परिक्रमा मग्य सा।। यही सूर्य का दण्पूर्णमास है । इसी सौरदीपूर्णमास से परमेष्ठी रूप महान् में गुपय- मान का उदय होता है। परमेष्ठी का वा माग यो सौरप्रकारा से युक्त रहता है, पर्सिमाका है, यही पदिति मण, यही मम्माममाषानुसार सत्प्रषान महान् है । विस्त तमोमय माग दशकास, पही दिति माल है, यही वम प्रभान महान् है । सन्धिमाग रोमान् है। इसी सौर मदिति का निरूपण करती हुई वपमिषति करती है- पा मारेन (मौरमाणन ) सम्मरसादिविर्देवतामयी। गुर्गा मपिम्प विष्ठन्ती या मूरोमिर्ममायव ॥ (कठ०१७)। . . - माहारमा - ईशोपनिषत् ॥ परांपूर्णमा । सूर्य परमेष्टी का उपह, मतएक परमेष्ठी प्रतिपट , सूप अनुचर है। पन्द्रमा-पृथिवी एक सूप को अपने महिमामयडस में प्रतिष्ठित रस्ता मा परमेष्ठी म्मयम्भू के पारों मोर परिक्रमा सगया है। इस परिक्रमा से ही विसका सहप निर्मास होता है। निच एक प्रकार का प्रकाश है, यही पुण्याह (ममा का दिन-सरिकार) 1 यही सरिकार अदिति मास है, यही पूर्णिम्य है। प्रसपाक्स्पा विरणाममात्रात्मक तमोरूप वितिकास है, यही दश है , यही परमेष्टीत दपूणमास है । प सपम्म् स्पिरो, मतएव इसे परोरमा फसामान।। पृथिवीरूप मूमोक, सूप्परुप सौंफ, पूपिषी मोर सूप के मध्य का भुपर्मोक परमेष्ठीरूप ननस्सोक, परमेष्टी और सूर्य के मप्पा महलोंक सयाम् और परमेष्ठी के मम्मका तपोसोफ पा ६ भो रग (परिभमणीस सोक) उस परोरमा सस्पमोकारमक स्पिर स्वयम्भू के मापार पर प्रतिष्टित है। उसने अपनी प्रासरफि से [सपाभू प्रास प्रधान ! ६ भों का विपरम कर ससा है। इसी रहस्य को सरूप में रहकर मन्त्रशुति करती है। अपिफिसाश्चिकितुपमिदन करीन पृम्हामि मिदमने न विद्वान् । विपस्वस्वम्म पच्मिा रास्यास्पफपे किमपि सिदेफम ॥ (असनासदीयसक १।१५।५।) इस प्रकार प्राणप्रणन विपकमा सपम्म् (पर) प्रगपति मपमी बरुण [परमेष्ठी] ग्य [ मूर्य ] अमि [पृथिवी], साम [पग्वा] इन चार प्रतिमामों से युक्त होकर दर्शपूर्णमास का प्रया बनत्य मा परमप्रमापनि नाम से प्रसिर होजाता है। इसी परमप्रजापति का निरूपण करती हुई पत्रुभुति करती है- या ते पामानि परमाणि पारमा पा मध्यमा विधर्मग्नुतेमा । शिवा सास्सिम्यो इपिपि सपासप पनस्ल सम्म पानः ।। [पयुस १७३२१ मलियानरमास मासबापमापिगममाप्प २ मा परिए।

प्रसारमा -8 ईशोपनिषत् ॥ परापूपमा सस्य, तप, मन, मह यह धार परमधाम रे, स्वः मप्यमघाम है, मुगामा भबमघाम है। दूसरे शब्दों में स्वपम्मू परमेष्ठी परमधाम है, सूर्य मध्यमघाम है चन्द्रमा एष पथिषी मनमभाम है । परमेष्ठी-सूर्य चन्द्रमा-पमिवी-यह घार उस के अमिम सखा है। इनें वह श्रेष्ठमित्र (स्वयम्भू) शिक्षा देना है। नसा स्वरूप उस का है, जो संस्पाक्रम उस में है, ठीक वैसा ही स्वरूप, पही संस्पाक्रम तक चारों प्रतिमाप्रबापतियों में है । वह बर्मुस है, यह चारों भी फ्तुम है । पर प्रात्मा [दयमा), पर पिण्ड], पुनःपद [ महिमा ] भेद से त्रिपा है ये ही सीन तीन पर्व इन चारों में है। पही शिक्षण है। उक्त कामप्रपत्र से परस्पर में मिससे पुए पापों सर्वरूप वन रहे हैं। इसी भाधारपर पूर्वप्रकरणों में हमने प्राणादि पाषों को 'सार्थ्य' किंवा 'सर्प' नाम से म्यवात किया है [देखिए ६ वि मा १ - १२५ ] । विश्व में सत्र मी सर्वप्राणादि पा सानाग्य है । प्रमापति की इन्ही संस्पाों का दिग्दशन कराती हुई माचिक्षुति करती है- - "स ऐचव प्रजापति इमं पा प्रारमन प्रतिमामक्षि++++ वा पाऽएताः मापवेरभिदेवता प्रमभ्यन्त-अमि-रिन्द्र -सोम परमेष्ठी प्राजाप- त्य + + + + तव एवं परमेष्ठी मामापत्यो पक्षमपद्यदर्शपूर्णमासो, साम्यामपभव । नाभ्यामिष्ठाऽकामयत मामेवेद सर्प स्यामिति ,समापोऽममत "पापो वा इदं सर्वम्" । स परमेष्ठी ममापति पिवरमप्रभीत-कामप्र पाडा पझमवर्ग, वेन स्वा यामपानीवी , येति । तमपामत् । स या अफाम यव - पामेदं सर्व स्यामिति , सप्राणो ऽममत् “प्राणो वाइद सर्वम्" स प्रमापविरिन्द्र पुत्रमरीत् भनेन स्सा कामप्रेण + + + + स वाग- "वाग्वा हद सर्वम्"। स इन्द्रोऽग्नीपोमो भ्रातरौ-अप्रमीत, मनेन मां कामपेण + + ++ अन्नाद एपान्यवरोऽममन, अन्नमन्यवरः । मनादएवामिरमवत्, अन्न सोमा। अन्नोंदश्च पा इदं सम्मन्ने छ । ता पा भवन, प्रान्तमा - सोपनिपन् 18- एम्पूर्समास पवाः पब देवता (ग्रमा (माण), विष्णुः (माप'-परुण, इन्द्रः (पार , प्रमि (माद) सोम' (प्रभम् ) एता पवईमवा) एवेन कामप्रेण पोना नयन्त । वा याकामा (सम्पाप्ति-प्राप्तिकामा ) प्रपनन्त, स प्राभ्यः काम समाम्पत । यदफामो साउएवेन यन पनवे, सोऽस्मे कामः सरम्पवे" (शत. ० ११।१म. । ६० । १३ का-२. क. पन्त)। टात अति की तीन चार बातों पर पाठकों को लिप म्यान देमा चाहिए, क्योंकि नमी के भापार पर पुपीरनिया का गस्प भक्तम्वित है, गोवि मागे बाकर स्पट शेग । परिसी बात तो यह है कि प्रयापति शम्द से प्रात में म्णपक मामापरिषम मापी महेयर भमिग्रेत है। इस प्रगपति से अमरा परमेष्ठी, इम्ब, पनि, सोम हम चार मपिदस्तामों का प्रादुर्भाव होता है। इनमें मुतिन परमेष्ठी को प्रागपम कहा है। एसरी प्रत यह है कि परमेष्टी ही सबसपम दर्यपूणमास या करता है। परमेष्टी मागे पाकर उस पितर प्रजापति से काबकि मैमें दर्ग पूर्णमाम नाम का कामम या देसा है, मेरी इया कि मैं इस सासे माप का पनन करत । प्रजापति की 'तपास्तु'इस अनुमति से परमेष्टी प्रागापम कामप्रयह से प्रयापति च पमम करता है। परमेष्टी का सपम् प्रमापति के पारों मोर परिक्रमा हानाही कामप्रया से इस प्रयापति का पान करना है । वीसरी पात पा कि इस परमेष्ठीत परिकमारूप पा से ही प्रणा- पनि की नवीन प्राणसंस्पा का उदय होता है। परिठे सवरूप मापोमप परमेष्टी का उदय होता है, अनन्तर प्राणमप मयम्भू का उदय होता है। मापी सयम्म पृथक् तरण है एवं परमेष्टी के सपम्प से प्राणरूप से उदित होनेंगसा योगमायाप्पिम पुनीर खयम्म् पृपर है। मापी सपम्भू प्रपमय पा, इससे परमेष्ठी उत्पम एमा, परमेष्ठी से पुरि नपाम् का जन्म हुमा । प्रागापम परमेष्ठी के परा पुण्ररूप में परिणत होने वाले इस परिधिन सयाम के लिए भागे भाकर- 'स प्रमापतिरिन्द पुप्रमप्रसीद पाया है। मृतिके भारम्म का प्रयापति शम्द मह म्यापक मपी म्यपाम् (मरेपर) का बाबक यह मागे का प्रयापनि शब्द महेयर सपा में मुक्त पारोबर पुणीर सपाभूप पपको। मापी सपम्मकी प्यासे परमेष्टीने दर्शपूणमास किया है, मवारमा -शा रोपनिषत् प्र परापूर्णमाठ " १, एव पुरवीर त्रयम्मू की इच्छा से इन्द्र (सूम) ममि (पपिणी ) सोम (चन्द्रमा ) ने दशपूर्णमास किया है। पुणीर सयम्मू की अपेक्षा से ही परमेष्ठी-सूप भादि प्रतिमापनापसि नाम से न्यब बताए है । एक एक मारणा पाष पाच पुण्डर । इन पांचों में खयम्म् परमप्रजापति, गेप पारों प्रतिमाप्रापति है । उस व्यापक मापी स्वयम्भू के उदर में ऐसी परपुण्डीरामिका सहन (१०००) प्रानापस्म बस्याए प्रतिष्टित राती हैं। मायावच्छेदेन स्वयम्म् एक, पुण्णी- राधेदेम सपम्मू एक सास है, याही वाचम्य है। पञ्चपुराडीराप्राजापत्यवल्शा १-"प्राणो वाइद सर्वम्" प्राणः-स्वयम्भू ब्रह्मा परमप्रजापति, २-"पापो वा इद सर्वम्" माप: परमेष्ठी विष्णु 3-“वाग्वा इद सर्वम्” पारु-सूर्यो इन्द्र प्रतिमा- ४-अन्नादो वा इदं सर्वम् प्रभाट-पृथिवी अमि प्रजापतय४ ५-“अन्न वाइद सर्वम्” मनम् चन्द्रमा साम - ऐसी सास वयामों को (टानियों को) अपने उदर में रखने माता मायी महेपर ही प्रझायस्प है, जैसा कि भागे के परिक्षेत्र से स्पष्ट होगा। प्रसाश्वत्परूप इसी वेदमति महेमा के वेदमाग से सुगम रूप मापोमय मम का बम होता है । वेद सप विमरे, मुत्रम पर प्रम। पहिले परमप सम्म प्रभाग्नि ही पा । 'पविध परनी च' इस इच्छा से मागे गाकर पही सस-मत यह दो रूप धारस करलेता है। समावाक् यमुनम है, प्रताबा सुनाम है । इसी को भग्नदने 'माम्मयोग' (मापोमयीयर) माम से म्यबहत किया है । ( देखिए "माम्मणीस्त ) यह प्रसपहर अन्न मुमती विषके मादि प्रातक , असा पि 'प्रनेमदेकम्' इत्यादि मन्यमाप्प में विस्तार से पतामाया माजुका है। ममिमप ब्रह्म मा संहिता " माशोपनिषत् ।। सकिरसम्प पुरुष है, पति के पिता है। पापोमय पुरम सी, पानी है, माता है । प्रम महेसर है, मुत्रम पावी है। यही बगर के माता स्विच - जगता पिवरी मन्दे पापवी परमेश्वगै" । एही दोनों के समय से भागे की सृष्टिधारा पसती है। दो परतुओं का समाध चार प्रकार से एमा रता है। चार से पशिरिक काई पाच प्रबार नहीं है। साप ही में यह भी प्यान रनिए कि जैसे सम्बन्ध सम्न्या निति है, एपमेष दो सरस मी सर्वपा शिक्षित है। ठम दा के पतिरिक्त तीसरा तख भाप को मिस में माही मिस सकता। वे दोनों तरम वे ही समरूप पायपुस्प, सामरूप सौम्या की है। सचमुच ममीसोमा- मक सीपुरुष के अतिरिक्त मम्प तीसरी बस्तु मही तिमी तो "मापोमात्पर्क नग" "इप मा इदं न हमीयमस्ति शुष्क पार्दध । यालुप्फ ददाय, पदासत् सौम्पम्" इत्यादि मौतमचम परितार्थ होते हैं । यह दोनों ही तरण विजातीय हैं। एक भोता है, दूसरा भोप है। ममि मोका है, मनुएम पा माद माम से, सोम मोग्य है, अतएव पर मम नाम से प्रसिय है। दोमोपा पा समाधमतपस मोक्त भोग्यमान समुदाय और भवन मेद से दो भागों में विमान (भमि ) ममम ( सोम ) रुप सीपुरम का यदि माया सपन्य होता है तो ऐसी प्रास्पा में अमेयाम "पुरप बहाता है, सौम्पमुकाम भी करसाता है । पदि समुदाय सम्पप होना, दूसरे राप्दों में साग सोम सामना परि मरिणाम के उदर में पसाबाता तो उस समय पर दोनों तरफ श्री-पुरुष न पहबार ममममार नाम से म्पबास्त होते है। मम सब भार के (साम यस प्रम के ) उर में बहा जाता है वो उस समय भारत ने पाछे माम की मात्रामा पाती है। परन्तु ऐसा होता मी मावि साय मम ममार में भारत ओगावा है । जव चाप मम खावेतो मह भाप के शारीमि में मार ममिलाप में परिणत होता मा मपमा प्रतिस्बिा सरूप सो बटता है। अब पदि उस भुतपत्रको भाप उसी तरूपमें प्राप्त करना चाहे तो पा मसमय है। यदि नाम सामना परिन में भाहल रोजुवा कायम एमे समुपातिसपाल में ही उन अम सपनों को समा-माम का माता है। इस समाप से कोई नई परतु मनमा) द एम नहीं होती, मातु मे प्रमका भापतन मात्र पान्यो यही पनि पुष्टि करती है।

-काशापनिपत - साटारसम्मम्म प्राकवात्मा यदि समुदाय का सम्पन्ध नहीं है, अपितु भवया का सम्बन्ध है तो पुष्टि नहीं सष्टि है। इस सम्बध में भवपनी निर्षिकार है, केवल भषयब की चिति है । यही पितिवापस अवयव सम्बन्ध (ससश्चिषण सृष्टिसम्बन्ध) सधि (भप्वमायोपचि ) का कारण है । इस सृष्टिम्सक भनयव समम्म में ही प्रम एव मुनम ची-पुरुप नाम से म्पबास होते हैं । समुदायरूप मम मामाद के सम्बन्ध में-"यदा मौ समागपत्र -प्रवाक्यायो, नापम्" इस्मादि रूप से मुति ममसचा का उच्छेद धनमाती है, एव माया सम्बन्ध में भगमात्र का उच्छेद है । उम्छेद नहीं, प्रमाण में परिणति है । मतएव इस सम्बन्ध में मम-ममाद का प्रयोग न होकर भी पुरुपशम्दों का प्रयोग होता है। इन दोनों का (सीएम पुरुप का) अभयत्र सम्बन्ध तीन प्रकार से समय है । सी-पी का सम्बन्ध मी समय है। इस भवपत्र सम्बन्ध से न पोम होता, न सृष्टि होती । क्योंकि सृष्टि विजातीय बस्तुदय के समन्मय से ही होती है । मी-पी सगातीप पदार्प है। साथ ही में सोम्प होने से दोनों भत्रया भाद हैं। भतएव या मिथुनमाव सपणा निरमक है । एवमेव पुरुष पुरुष (के भायों) का सम्बध सम्भव है । पदि दो पुरुषों का समन्वय वो सर्वनारा है। दोर्मों ही भग्नि हैं। समान बस वाले दो भाग्नेय प्रह टकरा कर जैसे महाविस्फोटम [जोकि विस्फोटन ऐन्त्रमूकम्प नाम से प्रसिद्ध है। के जनक बननाते है भषध समान गति रसने यासी दो पक्षाव ट्रेनों के सम्मश्च से [भिरमाने से] असे महाविस्फोटन होगता , एवमेव भाग्नेय पुरुषावों का सघर्ष विस्फोटन का जनक पमगाता है। इस सम्बन्ध में भी सुनि का प्रभाव है, क्यों कि दोनों ही समातीप हैं। इस सम्बन्ध में प्रठि सो मही। परस्तु पोम भारप है। तीसरे बी पुरुष के शुक-गोस्पितरूप प्रायों का सम्बन्ध । इस बिमातीय मापत्र सम्बन्ध से ही भर्षमात्र का उप होता है। यही सम्बन्ध 'समन्वय' माम से प्रसिद है। इसी से सृष्टि होती है- 'वन समपात्" । इस सम्बन्ध में अवयव को शामि होती, मापी ग्यों के त्यों सुरक्षित रहते हैं । पुस ममि है, स्त्री माप (सोम) है । भनि के उदर में पानी चसा गाय, अग्नि भमि मिटाय, पानी पानी मिागाय, भाग पानी मिसाप, इस प्रकार दोनों के सम्रार के पार ही शर । पदि मग्नि के उदर में पानी (सोन) वसा गया ।

प्रारुपास्मा । ईशोपनिपत्। सकिरताप सो पुष्टि पदि ममि भग्नि (नाम-प्रम) का सम्बन्ध होगया दो पिस्फोटन । यदि पानी पानी [सनम सनम) मिस गए तो निरर्पक यदि भाग पानी का (समरूप पुस्तके प्रक, मुत्रम सप स्त्री के रोमित का) समन्वय है तो महि। -स्त्रीपुरुपका समुदाय समन्म(भनि सोमका समुदाय सबम्प)- -पुष्टिकर ३मापन सम्बन्ध) (स.स.) २-स्त्री स्त्री का सम्बन्ध -(सोम सोम का प्रक्पब सम्पन्म) -निरर्थक ३-पुरुप पुरुष का सम्बम्ब (ममिममि का भरपत्र सम्बन्ध) -विस्फोटक १-स्भी पुरुष का भगक्व सम्बन्ध (अग्नि सोम का मपत्र सम्बन्ध) --सृष्टिकर + स्त्री पुरुष के बो पश्यय सटि के उपादान बनते है उनकी को लियनभाषा में योपा पा कहा गता। पोवा पा शम्द समितिको । प्रश्नोपनिपत में इसी के लिए रयि पाण' शए प्रयुक्त हए , एव यहां रयि प्राण के मिपुनमात्र से ही सष्टि की उत्पत्ति क्तचाई गई १-(दसिए प्रश्नोपनिपत् १ प्ररन) । पोपा यदि सरमना पाके गर्ममें है तो मम ममादमार, मापन सम्बन्ध में पीपुरुषमार है । योपा-सपा के प्रथिममक भवयप विज्ञानमाला में रेत योनिमाम से प्रसिर है। रेत मुभम माम के पोपा का भरा। योनि नाम नाम के सपा का प्रय है। भालेय म्पम योनि । सौम्प भाग रेत है । दूसरे शब्दों में महानिरूप परम पोमि प समाहप पनप (माप) माग रेत है । स्पिति बपौर रिसलाई परताका पम्प । इसी प्रापार पर परोक्षमिया इस दिशा मयचदिपा' या सिगास प्रतिष्ठित है। प्रहरीका प्रत्येक कार्य परोष (पर्दै) में होता है। माम की प्रम में भाति होती है। ममि पुस्प है सोम बी है। यह पीलप साय पुरुष में प्रतिष्ठेत परणी, उपर पुरुपरूप मम भी में प्रतिष्ठित है। सी में पुस्प य , पुरुष में स्त्री भेटी है, जैसा कि पूर्व के प्रभ्यतात्मा पिहर में मस्तार से बताया पाप है। ।

प्रापारमा हा ईशोपनिषत् - ये पापा । - विषनरूपसम्पादिका महामाया की नहातक म्यापि, यहाँ तक वेदघन वेदमूर्ति पर की पारित है। पदवच्छेदेन ईयर (महेपर) म्याप्त है, तबधेदेने मम (वेट) मुग्राम (मुवेर) माप्त है, एक विन्दु भी दोनों से एल्प नहीं है। दोनों में एक प्रकार से मन-प्रमादभाव सम्बन्ध है । भनएष यह माइतिसम्बन्ध सुधि के लिए भनुपयुक्त है । सधि तभी हो सकती है, जब कि उस पापक प्रम के किसी एक प्रदेश में म्याप मुमम के पिसी एक अवयव की पाहुति हो । पोनमाग पारूप प्रभा भवयव है, रेतोमाग योपासप सुब्रम का अश्या है। इन दोनों अवयों में मायामहिम सबम्यापक सापस लातस्थितिमत) का एक प्रत्ययविशेष विशेष, इसमें मातरिया माम से प्रसिद्ध भार्गवायु नारा उस बम पर सर्वत्र न्याप्त समझ नामसे प्रसिर पर प्रम (माप) * एक भषयाविरोष फी माहुति होती है, पही अवयव रेत है । इन भत्रपयों के से सारा विम वना है। भागे की सारी सृष्टिमों में इस अवयव सम्बन्ध कीही ध्याप्ति सम मनी चाहिए । सरसृष्टि हो, अपना जीवसृष्टि, सर्वत्र योपापारूप प्रम-मुना के अवयन सम्बन्ध कीही प्रधानता है। उदारसके लिए पुरुप को सीबिए । पुरुपके सवाज शरीभमें रेत म्पाप्त है, उपर स्त्री के सवाह शरीर में योनिरुप माचब (6) ग्याप्त है । परन्तु समी रेत भयवा समी माग प्रजोत्पत्ति का कारण नहीं बनता । यदि ऐसा हो तो स्त्री पुरुपका सरूप ही नए होगाप । स्त्री पुरुप पा माशिक रेस-मात्र ही प्रजोत्पति का कारण बनता है। सपि किस सम्बध से होती है। या यतसा दिया गया | पर प्रकरणमाति के लिए एकबार भापका प्यान 'मनेमठेकम्।' इस मम्प्रार्थ की भोर माकर्पित करते हैं। समन्वय वहां बसाया गया है कि मामावदिम चामत साम्पापक पझरूप ब्रह्मानि में मात रिभाषायु पदमरूप भापोमप ( सम्वशिरोमप ) मुमम की भाति देता है । इस प्रकार 'प्रनमंदकम् । इरपावि मन्त्र सामाग्यप से पापक गम में म्यापक समझ की भाति बत- भाता है। परन्तु मास्तर में ऐसा नहीं है । पूर्षणपनानुसार साइति में प्रभाभारमामात्र है,एक ऐसा समन्ध पुषिकर बनवा मा मी सम्मियादा से महिमव है। सरि भरपब सम्पय पर ही निमा है। मतएव "मातरिका एमदनगद प्रा में पाप की प्राति देवा" इस मास्प भास्वरमा ना रोपनिपात् । प्रगपर की प्रालि . - का "ग्रम के एक योनिरुप मदेश में मातरिश्वासापु पापोमपग्राम रेवोरुप एक पटेग की भाति दता" पही पर्य सममना चाहिए । यही कारण है कि पुतिन "तस्मिमपो मातरिश्मा जुनि" या म काकर "तरिममपो पातरिश्मा दपाति' यह कहा है। भारति सम्पप समुपसम्मन्बामक प्रभामादमात्र पर निर्भर है, भापानसम्बन्ध मायासम्बन्पारमक खी-पुरुषमार पर निर्भर है । मोम्म्याहार में भी “योनि में रेत को प्राति होती है" पह मही कहा जाता, अपि "पानि में रेल का प्रापान होता।" यही कहा जाता है । मत एकच वायु को होय (माहुति दने बसा) नहीं कहा जाता भपि तु रेतोपा (रेत का पापान परने पासा) पडा जावी । प्ररन होता है कि 'अननदकम् ' इस्पादि मन्त्र से प्रतिगरित सामान्य अर्प की उपेपा पर-'भवयर फी भरपर में पाति होती' पर विशेष अप किस पाधार पर प्रमाणिक माना गया। इसी प्रश्न का समाधान करने के लिए 'स पपगागम्' इस्पारि मन्त्र हम्पर सामने पाया है। मत्र में पड़ा मा गुरु राम्द री टाल परन का सम्म भान करता है। इस विशामा को शस्त करने से पहिन गुफपाप का सहप परिषप परामा मारपफ दरोग्य। - पापपिरखेपराविधान के विलुप्तप्राप होगामे के कारण विमों की शि में भागदिन गुफ-रेन-पीय पीनों पमिम पदाप हैं तीनों पयाप है। परन्तु पपाप में एक मिम बस्स है, रत पम्प वस्तु कर बापक वीर्य शब्द रिसी भाप ही पाप का बोधक।बी और शुक रेत में प्रतिष्ठिर इसीसिर नात्याचाराचम्' म्याय से रेत को गुक रागे से म्पादन पारिया जाना है। ऐसा होने पर भी तीनों को एक ही वस्तु मान मैटना सपा भमरे । रात सादिम्प पर पार पामारी करमण जाता है । ससाधारणका पर विचास है कि मार माग में एक एक पद के पनेर पयाप होता है । पता जो जैसा पाहता, मानुसार रेमा रामए पालमा परातु पर एस पपने, पारकों को यह मिसास रिसाल सि सात सारिप में एक मप के लिए दी एम प्रगुप्त मा परेपी समानता को घर पप गायन प्रतिगया है । पापारिसे सप शनिपा पारेही प्रनिगर। - या ईशोपनिषत् ॥ बागीपराम भास्वरमा पिप्णु-नारायण-चामन सब मिमार्प के बाचक हैं। मोश्वर श्वर-परमेश्मर भात्मा-ग्रम सब शम्द पृपगों के पोतक है। मपा-पाकणसन-सपा-पा-सुनायीर-पुरंदर सब अपने अपनें पों में लिप्त हैं । भुदि-मनीपा पिपणा मधा-पति सब मिनाय के परिचायक है। विसके लिए जो शब्द नियत है, वह उसी कर योधको । पर और वस्त्र कमी पयाय मही है। प्रादिन मौर सप कमी पर्याप नहीं है । पायु मोर वात, पिरययगर्भ भौर पपभू', कमी पयाय नहीं है। इसीप्रकार शुक्र-वीर्य-रेत कमी परस्पर में एक दूसरे के पर्याय नहीं है। । दीनों में से पहिले वीयशस्द को ही खनिए । रेत में रहने वाचा, मारमवस को मदाने वासा तर विशेष ही वीर्य' करसाता है । बस-वीर्य-पराक्रम तीनों में भी मेद है। शक्ति पस है प्राणशक्ति पीय, मन की शक्ति पराकम है । हापी में वल की प्रधानता है।बापी अपने भार से एक सिंह को कुषस सकता है। सिंह में पीय की प्रभामता है। शरीरशक्ति से प्राणशक्ति बसकती है, पाव प्राणप्रधान (वीर्यप्रधान ) सिंह हापी को परास्त कर देता है। मन की साका पराक्रम है। दूसरे पर भाक्रमण कर उसे अपने पश में करलेना ही 'पराक्रम है। यामनो बस है। पुरुष में (स की प्रभामता ।। या रस पीय से भी प्रक्स है, अतएव पराक्रमी मनुष्य वीयणसी सिंह को भी एक पधर (पीचरे ) में पद कर देता है । इस प्रकार बस-वीर्य पराम तीनों शम्द नियत भयों के पापकरें। मारमा मन-माण-माम्मप माना जाता है । मन बानप्रधान, प्राण, कर्मप्रधान, एव अक् भयंप्रधान है । पारमा की इम सीमों कमाभों के उपकारक क्रमरा प्रम-पत्र-लिट् नाम के तीन पीय है । तस्वीप ज्ञान का मनुयायी, पत्रवीय कर्म का प्रेरक है, एव निवी भर्पति का संचासक है । स्वीप का भमि से समय, पश्वीप का न्द्र से, विनीय का विश्वेदेषों से सम्बन्ध है । बिस के रेतमें प्रसवीप की प्रभामता है, उसकी सन्तान प्रामण करवाती है । वीर्ष प्रधान रेत क्षप्रियवर्ण का, लिपीय प्रपान रेत मेरयवर्ण का प्रवर्तक है । विस के रेत में प्रवीर्यरूप, पिन्तु सामाम्पत पीयरुप पूपा माम से प्रसिद्ध पार्थिव तमोमय प्राणदेवता की प्रधानता रहती है। उस की सन्तान सछूट करवासी , इसी के लिए-'यायावरणमय' यह कहा जाता है । इन चारों वीयों के विरोध -

दापनि
पर्स परमार
भार मसमाग है। इन देवमिरोभी मसमों की प्रमश चिनो रेत में प्रधानता होती है,
उन से कमरा अस्पन भन्स्पारसापी, दम्प, म्लेच्छ इन पार मसानों की ताधि होती
है। या चाय से मा वर्ण है । वही प्रसाद निरमसित करसाते हैं।
देवभाग-.-
•मलमाग
( देवीमेश्व)
(मारीसंपत्)
.
मस्पर
पावसायी
१-अपर्ण (भनि )-
२-पत्रिपर्ण (एम)--
३-बापवर्ण (मिरवदेद्य
५-अवरवर्ण पूषा)-
वर्ण सृष्टि
यु
म्लेच्छ
-प्रवर्ण सृष्टि
स पा एप आत्मा वाड्मय प्राणमयो मनोमय
१-मन (मानराशि ) मानोदयौपपिक-ब्रह्मपीर्यम् --तपमाना-नाझमा
२-मामा क्रियाशी) कर्मोदयौपयिफ-चत्रवीर्यम्-तत्पपाना -क्षत्रिया
-पा (पति) प्रयोदयौपषिक-विवार्यम्
----पाना -पेश्या
वह निदरान से पाठफों को ए माम सेना पागा बि पीयात एक मोर रेत से सर्वमा
प्रपा तत्व है। रेत में प्रतिष्ठिन गर्ने माग रसित पाप है। रेत के पप से पंप का मी पप
होगाव मतएव 'प्रमपर्य' काम गरवापरक मान पिपा बाता है।
FA

प्रसारमा का ईशोपविपत् । गुरु रेज-पीर्य मा पलिए शुभ-रेत की भोर । पुरुष के रेत का नाम शुक्र मही, भपि । भमि का नाम एक है। गुफामि सी में रहता है, रेत रूप सोम पुरुष में रहता है। शुक्र का प्रधान मायतन बी का रंग है, रेत का प्रधान मायतन पुरुष का सोमभाग है। पुरुष के रेत में वैसे उक्त वीर्य रहते है, एवमेव जी के रस में भी पीय प्रतिष्ठित रहते हैं। दोनों के बीर्य शुर रहते हैं, समी वानरूपा सपि (सम्तान) होती है। परधा के लिए बीप रपा मावश्यक है।पर्गप्रप के पार्थ सरूप को यफिमित् मी म मानता भा, परन्तु जानने का ममिमान करता इमा एक श्यवर्ग का महान् नेवा नेतृत्व के भमिमान में परकर अपने पुत्र का यदि एक मामण पर्ण के नेता की कापा के साप विषाद करने में कोई हानि मही सममा तो यह उसका, एक उसके देश का दुम्पि है। यदि यह मामी सबकी किसी प्रामण पुत्र को देदे तो शाम हा उसका यह कार्य भनुपित मोगा, कारण प्रामण इतरवस की, काया के साप पारित ग्रहण कर सकता है। पीयरचा के लिए णबसि वैवाहिक म्यादा मासयक है। इस मर्यादा का पाचन न मा सो क्या होगा ! इसका उपर है मारतपर्प की प्रमोगति । मत प्रल्स में यही करना है कि अप की अवयव मूता योनि (ममि) गुफा, इस की प्रधान प्रतिष्ठा स्त्री है। पुनम का मापन मूत रेत (सोम) रेत है, इसकी प्रधान प्रसिष्य पुरुष है। योनि में रेत का पालन होता है, इसका 'शुक्र में रेत का पापान शेव । यही तात्पर्य है। इसप्रकार मीयात् रेत एस शुक्र कर पायल्प भी मसीमति सिर माता है। संत राम्द पुरुष के सौम्पमाग के लिए ही नियत हो यह बात नहीं है। पस्तुत रेतत्व मा मधेरक उपादानाम्पत्व समझना चाहिए । प्रना का उपादामरम्प न केक्स पुरुप का सौम्यम्पग है, न फेंक्स स्त्री का माम्नेय शोहित माग है, अपि तु दोनों का समरिक्त रूप ही उपादान है। ऐसी मबस्पा में हम दोनों को रेव' कर सकते हैं। स्त्री का माग्नेय माग भी उपायम होने से रेत , पंप का सौम्प माग मी उपादान होने से रेत है । परन्तु एक माम्नेपरेव, इसरा सौम्परेत है। इसी मेद को समझाने के लिए मैवानिकों ने भामेयरेत को 'राम' शब्द से म्पमात निपा ६ एवं सौम्परेत को पारिशेप्पाद रेव राप्द से प्रसिद्ध किप्प है। १०१ प्रामारी समारोपनिषत् ॥ मनरेत शुक्र है, सरपरेत रेत है। नवा [परिपार] भमि का धर्म है, तरसता पामी का पर्म है। अस सम्मानि 1, मनाम व भाषा धन, पतरस है। यह मुकरेत दोनों ही कमरा सा-योपापाय से अनुग्रहीत राते हैं । हमने शुष्ट-रेव सप पोनि-रेत के समपप से प्रयोत्पत्ति बताई।परम्त वस्तुत सरि के मूसापार है-योषा--पाप्राण । शुक्ररुप स्त्री के भामेप मग में सने बाग पितप्राय बम काशाता है, पुरुप के सौम्परेत में बने माग चितप्राण योषा नामसे प्रसिद है।इसी प्राण को मिषन परिभाषा में 'ण' करा गाव है। यदि गुरुशोणित के भण भीमित , समी दोमों के समय से प्रमोत्पपि होसकती है। परि मण निव मूपित है , म रे वो ऐसी दश में निरन्तर हमें वासा भी राक्योषित कर मिपुनमान प्रयोत्पति का कारण मी स्नसकता । इम भूगों की मियतवा के, एष बिमारा के मातृदोप, पितृदोप, महोप, नाहीदोप, प्रहदोप, मारि पाठ दोर है। इन पये की चिकित्सा घमशा में प्रतिपारित है। सुप्रसिद्ध श्रीदकर्म पितृदोष का निवर्तक मामा पाता है। अतएव निखकोटि में प्रमित हर मी मार को प्रमशाब में काम्पकर्म (पुत्रकाम्नासापक) माना है। मिका पहीमा कि सारदेव शुक प्रवाहित रस रेत है। दोनों में प्राण प्रति. ठित १, प्राणानुग्रहीत यही दोनों मीन कारण है। इसी गुरु-रेत-विज्ञान को बप में रखार ममियुक्त कावे- "एफ तु सारमोतो, रसो रेवः पारि यत् । मानानुगणी (गुरेनसी) माणिनां नीवन विदुः ।।" एक भाग्नेय पदार्प । इसके लिए प्रमाण की अपैषा महाँ। । 'समापिसमुना हा' से कोशकार सर ही गुफ को भनि बता रहे हैं। भनिः गोपवि, रेतो रसवि" सेही दोनों कमरा गुरेख नाम से प्रसिदए । गुरु ही रोक, मेक संताप, ताप साप ताए ममि का धर्म है । रममप से एक् (भमि ) ही ' गुना है। शुक्र साकार भनि १सरिमारिरिचर "माविकाय' में देना पाती। ।

माहारमा
साईशोपनिषत् |
शुम्त
है, पवरष प्रहया में भाव होने वाले १० मापात्रों में से भनिमय सौरमा पात्र को शुफ'
का गया है। इसी पार पर निम्नसिसित बचन प्रसिद्ध है-
1-"अनाने शुम (यत० ११२०/-"तो मा अमम्" (गो७ मा० पू० )
२- प्रमिः शुधि' (शुक० माMER)-'तो सोपा"(रास. शाश२)
इसी शुक को हम माग्नेय होने से विन' कर सकते हैं-"मो वा प्रमि" (रात. २
श), एम रेत को सौम्प होने से 'स्नई पहा नासकता है। एक बात मौर-एक में रेत,
रेत में एक मनुस्यूत है। गुरु में भनि प्रधान है सरस सलेम गौम है। रेत में सेम प्रधान
६, पन भनि यौण है। इसीलिए कहीं कहीं माप रेत को हुक का रिख पाता है, जैसा कि
मकरण के भारम्भ में शुरु सन्द की म्पाप्ति पसाते हुए कहा गया है। एकमेव कहीं की
अमिमय शुक को रेत यतमा रियम बात्य है। इसे दोनों तत्वों के सपनप से हरि सेती,
पा प्रत्येक दशा में प्रिय है।
१-राफर (सारबर)-ममि,
२-रेवा (प्रचहिरस)-सोमः
पोनि
रेत
१-नाम (सारण )---नि:-
-मुग्राम ( प्रपहिरस)-प्रेम
पोम
1-सत्यम( सारषद )-मग्नि +---ना
२-भतम् (प्रपहिरस')-प्रेम-----
दोनों के समन्वय से कैसे संसार बना। इस मरनसम्पधि के लोए निम्नलिखित प्रकरण
पर एि गलिए । सति का मूहप्रवकसप अपव-मस-एफ इन तीन म्पों में सिमा
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माहवरमा का शनि - इन में अमृत प्रात्मयोनि ६ म प्रालियोनि , शुत्र मिळनियोनि है। दूसरे शब्दों में पो समझिए कि प्रात्मशष्टि मत से होती है, प्रविधि से पी, एनिसिपा रिसरि गुरु सेती। सरिके ही मिन विरान में प्रमावस्यमय-मदर मामले में से EिRT, नफरत प्रणादि मेर से पचास है, शुमसत यत्-स् मेद सें Fra । विपत् पपत (३), पाकस (N), शिकसंगुका २)को समरि ही दनिमिण्ट (दशकसतिण्ट), सी 'सर्पम् । परमें को ममत-मय-एक सीन पदार्थ है। बतुत ममृत प्रमा, मन से इंक। सष्टि से पीत रसस्त मा की तत्तपरत करता है, सम्मुम मनवर की प्रम' काम माता, सटिका उपादान बनकर पी शुक्रबासीने माता । मायापही तत प्रत, पूर्वबापापी वसा मस को तहरूप में परिणत करने के समय कही म नाम से म्याने सगवा है । ऐसी रसा में हम का सकते हैं कि अमृत एक प्रम यह दो मरमनियर सहि के मूम है, एवं एक- विच सथि का बीम'। जब तक अमृत एव मम सरि के बीज न बन पाते, तस्तक के दोनों भक्त प्रल एणी मार्गों से म्परात होते है पस्तु बीमतस्या में भावर इम्सी दोनों की समट वारूप में परिपत होती (बेदापिम बनती शुक' नाम धारण करडेती है। पिपये प्रम में हममें पारा था कि पहिसाठी प्रम्पपयुक, प्रतएव वीमावापापन अपरानुगृहीत कामहर को पाव-(सिएR.मा स.१.)। यही पगुनम को शुक महाते पुए निरोप का उत्पापन एवे एस से सम्मान की प्रतिया पीईभी। मसरप्राप्त रक बिघ मी पतिार करना चाहिए । बीजावरपापम पर पर पर है, एवं बीमारापम मपर पर ही पर्जन है। सारी सरि मस्प्रिाम। मति मग का सहप । सारा मय मूर्तपुर । इस पुररूप मिश्च से पूत वेद सोप-प्रगा भारि मामों से प्रसिर पुरनन । पपि इन पांचों पुरधनों को सहमति के पैगमत होने से 'सकते है, पारि पणिों में प्रपमा एक प्रनिटाप परदनाम की (र मारुतरमा विरोधपरिहार या ईशोपनिषत् ।। पुरबन है, मत इसी को शुक्र कर दिया गया है। यह वेदवाव भामदर की सर्वप्रधाना एवं सर्व प्रथम प्राण कसा कर विकार है, दूसरे शम्दों में वेदवस की उपादानभूमि भारमपर , एप 'पापारम्मण विकारो नामषेयं मयिकोष ससम्' के अनुसार कापहप वेद कारमरूप भारम- पर से अभिम है। ऐसी स्पिति में शुरूप पेद को मामघर का जासकता है। मामघर प्रकृति का Hमाग है, मवर अमृत माग ।। भवर मोर भारमधर दोनों एक ही अमृतमत्पुमति प्रजापति के दो अवयव है, दोनों मिशार एक वस्तु है। ऐसी दशा में यदि मकारपररूप वेदामिन भारमपर शुक है तो भास्मपरामिम मदर भी अवश्य ही शुक्र है । साप ही में बिना मम्पयासमान के सर पर मी बीजाक्स्मा में परिणत मह) होसकते, मत भवर-परम सय मम्यय मी गुरुपोष्टि में विलिए होमाता है। तभी तो-ही प्रमृत ई, पहरी प्रम, पही गुमी" या करने का साहस किपा गाता है । मम्मय ही भएर बनता है, पी पर बनता ही वेदरूप में परिणत होता है। प्रदरतस्य मम्पप के सिंगामाग का विकास है, भरतस्य उसी के कर्ममाग का विकास है।वही अपमें सिपा-कर्म भाग से भेदरूप से प्रकट होता है। वेद का यत्-गतितल) मात्र उसके कममाग का विकास है, -( स्पिवितल ) भाव उसी के विपामाग का विकास है। कही लिपारूप (मपररूप ) से, कहीं कमरूप (पररूप) से, कहीं उमपर विदरूप) से वही सर्वत्र व्याप्त हो । उससे पम्प कुछ नहीं १, सबकुछ ही है, सब का उसी में है। उपर्युक कपन से यह कहने में कोई भापति महीं की पासासी कि पसाबमिडम पोपी पुरुष ही शुक्र है । विस-पचपन-मुरमन भारि बहिणपन्यक्रमहति पोरपी के बिना महीरा सकती । भम्पमासिम भावर पर ही तो पाप में परिणत होकर परिजप्रकृतिलप में परिणत होते है। इस परमार्परवि से विचार करने पर-"यटिसादी मम्पपपुक्क, प्रवएस पएपन्मुस पीनावस्पापम भवरपर शुक" "एभत् प्रनेन वल एक है। इन दोनों पायों में कोई विरोभी मही पता । यही भावगमस्टिम पनुरूप शुक्र मातरिरण घरा होने वाले भाप के अपाम से विखाप में परिणत होता है । निधारस्पापम नही समतल "मवत्प" - भावमा माईशोपनिपम् - । - माम धारण कर लेना है। इस प्रभाप के सम्पय के विधा-कमका प्रम-काम के अनुप्रा से ग्रमा पस्य कापस्प यह से मेद होगते हैं। इनमें प्रमासस्य का निरूपण कट एवं मुण्टक- माप्प में एम्प है, एक कमावत्य का निरूपस श्रादविधान के कर्मगति प्रकरण में हमारापी पाहुति से ही (परपुण्डीरा प्रामायसवरम) का सम्म होता है। शुक्र की सहमातियों से सहारण मुक्त समय का सरूप सरम होता है । प्रत्य समार , इस ससारमहीप का वीर शुक्र सम है । शुक कर पतिरमण करना ही मायोपाधिशून्या परामुफ्त है। निष्काममात्र से दो इस पाप की उपासना करते हैं, वे ही धीर युधानयोगी निरकार के उपासनायोग (पुद्धियोग) से पुतयोगी बनते हुए एकरूप लिपसीमा ( मापासीमा) से पाहर निकलने में समप होने 1-"मामे अपचन्त मापामेता वरधि य" । इसी सस्य फा स्पधीकरण करती भूति करती है स तत्परम प्रसपाम यम पि निहिन माति शुभ्रम् । उपासने पुरुप ये पकापास्ते शुक्रमेतदतिरन्ति पाराः ।। (मुपाकोपनिषत् ।। मच पहप महमर को पाप अध्ययापर शि से प्रमत कर सकते हैं परामपापा प्रम कर सकते है महामहरिदमपरिधि से शक कर सकते ही प्रपत्र भगत, वही मन, वही गुज।म मी पहिए-परस्त उसे मामाप की मन्तिम परिषि तक प्पात समम्मिर । भार को लियास करना चाहिए मि गुरु-मम-प्रसुन इन तीन मामों से पुस्मय पाने असा पर वार (पापी महेश्वर) माने उदर में अनन्त (सहय) प्रामापस्म बगाएं प्रतिष्ठित एतामा एक नेप्रत् कार से मारा है। इसी 'सन' मिशन का पर पर रिकहते हैं- “अपम्पोऽगाम्य पपोऽसरपः सनातनः । देर शुक व प्रम नरामतयुप्पन । तदु नापनि फमन । पहनन्" [कर. ५११।।

मापनिपत्र रिचा प्रदिपा रवारमा उक्त पन बीबरूप उसी यजुर्मय का निरूपण करता है । घेद को हमने शशि का मूसा- नार पतसाया, एक साप ही में इसे परात्मक फहा । यपि पिच में भविपारूप (भावरणरूप) पर्ममाग की ही प्रभानता है, परन्तु विनिर्माण मिना विषा की सहायता के सपैया अनुपम है रिना मानाप विचाके कर्म समय ही नहीं है।मानद-विहान-मम विधामाग २, मन-प्राण-वाक् कर्ममाय है। मामद बिझन के दिना साधारण मनुष्य भी कर्म में प्रश्व नही होता । पानन्द ही नर्मप्रचि का भूसस्तम्भ है। यह विषारूर शान भचर , भविवारस पर्म पर है। दूसरे शब्दों में भम्पप के विपामाग का अनुमा भार पर, एवं कर्ममाग का मनुप्रह पर पर है। मतएव उपनिषदोंने मदर को विधा राम से, घर को अविका गम्द से म्यवान किया। दोनों का श अम्मय अपने दोनों भाों से दोनों पर शासन परवा है। इसी मभिप्राय से श्रुति कहती है- दे प्रवरे मनपरे तनन्से विधानिये निहिते या हे। घर पविधा पमृत तु सिया विधारिये ईवे यस्तु सोऽन्यः ।। (खेता० उ०५।१।। विपासप पर का विकास 'जू', फर्मरूप पर का विकास 'यत्' ।। रूप विपातस्य प्रनेजत् ।, यरूप पर्सतत्व पजत् । एबत् भनेमत् की समरुिप पी एक । टिम इस वेति गुरु को सधि के प्रधान मनुक्ध का सहारा लेना पाना है। मनुगए । 'चिविसमप' । योग पिमृति, सावर भारि १३ प्रकार के सम्प- भों में से प्रन्यिपन नाम से प्रसिद्ध पितिसम्मम्मी सपि का प्रमान अनुक्ध है। एक बस्तु पर दूसरी पतु का विनार (सोकप्रसियेमा') ही रिति है। ईट पर ईट पर रमने से असे एक हर्ग का सरूप मनवा 1, एवमेव उसी पोउशीरूप मारमण्यतस पर एक (ट) रुप भौतिक विरपरों की चिठि से सिमदुग का निर्माण हुपा है। विश्वमा या शुकपिति- बीन, देश, मृत, मेद से तीन मार्गों में विमा है । पोणी पात्मा पर परिसी मीननिति , भास्मा शोपनिपन् । मोमी । एष दोनों - बीयरित पर देवपिति , देवपिति पर भूतचित है। तीनों वितियों की समरि निक, निय विवि का सम्मान पोरनी विभारम्प है, भारमा मौर विष की समटिमात्मग्बी विरो, दो भागों की समरि प्रतिमाममापति है। दोनों की समएि ही भीरमनापति, की समशिदी गिपिविष्टपमापति है, सर्वत्र प्रजापति का ही सामाग्यो- 'प्रमापतिस्मेरे है स यविद विष"1"श्रीणि म्पोतीपि समवे स पोशी" के अनुसार प्रम्पप (धन- म्पोति ) पक्षर (कर्मम्पोनि) र (मूतम्पोति ) इम तीनों म्योतियों से प. पोग्शी प्रजापति विशित्रपरप विषप्रा साप संयुक्त रोरा । महातिम वर का शो हमारा (पीय- मा) पागमौतिक शरीर हमारा निम है। लिप सएहप ,मात्मा लिएहप है। दोनों में समान विमग्रम (मार्यम) , प्रनिर अप पिवनिरेपक्रम (पपतास) है। मिसप्रकार प्रतिर प्रय सम्पप-पदर-परमेद से निकस है, एवमेव विममग्रम भी पीन-टेप-मूत मेद से त्रिकत हो । पका की सटि ही ईबर १, पट्मास की समरिहा गीत -"पादकौशिक पिई सर्पम्" । बीधिति पर मापय का अनुमा , देवरिति पर भादर का अनुमा एम भूतचिति पर पर का मनुपर।बीपिति शानम्पोत, देवरिति कर्म-पोति, मूसमिति भूतम्योति है । इन विसरूप तीन दिन पोतियों से यह निमामालप पोरशी अपमी सम्पप- मदर-पररूप पूर्वोत तीमों पक्षियों से युक्त होता है। पोग्शी विमाप सीनों मोतियों का भावार है, अतएव इसे-पोतिपा ग्योति ' (पिए की बीज-क-मूतरूप तीनों पोलमें की पोति) या जाता है। ज्योतिपाव्योति पोरशी विश्वात्मा- -प्रम्पप (बानग्योति) +-+-चीनपिविः (पानम्मोति) २-अदर(कमज्योति ) ---- २-देवपिविः (कमम्पतिः) पादकोशिकमिदं ३-वर (म्तम्पोति )-11-मुवपितिः (भूतम्पोति) सर्वम् (प्रात्मा) - (शरीरम् ) - विश्यम् महात्मा जाईशोपनिषत् ।। पुराम . . ईभर की अपेक्षा नीवसस्था हमारे समीप रे, मत प्रपम उसी की भोर थापा पान माकर्पित किया जाता है । मप्पामसस्पा में प्रात्मा और शरीर यह दो दिमाग है। इनमें धारमा कौन है ! इसका उचर पोरशीपुरुप' । शरीर कौन है। इसका उधर है-'पीम देर-मून समष्टि' । भूतमाम, दक्पाम, पीजग्राम की समष्टि ही शरीर है। पीजमाम को मारम प्राम का नाता है। या पारममाम उस प्रधान मामा से मिस एफ 1, पह भनेक हैं। यही मारमग्राम कारणगरीर, देवमाम मुस्मशरीर , भूतग्राम स्थूलशरीर है। कारण शरीर पर सूक्ष्मशरीर, सूक्ष्मशरीर पर स्थूस शरीर प्रतिष्ठित है। तीनों शरीर पोग्शी मारमा पर प्रतिष्टित है। अनेक बातुनों के संध को 'ग्राम' कहा जाता है । भास्तिकदशनानुयामी निसे 'पात्मपरिया' काते हैं, गीताशाम जिसे 'फू' कहता है, श्रमणक निसे पुगस' परवे है, गौर जिसे 'स्तूप' कहते हैं, ग्यौतिषी निसे 'राशि' करते हैं, सोकम्यवहार में नो टेर' 'यो'-पादि नामों से प्रसिद्ध है, भी विहानमापा में 'ग्राम' एवं 'पुर' नाम से प्यार किया माता है । सिंहानि बन्पपशु समुदाप यमाकर नहीं राते, मपि । एकनकी विवरण करते हैं, मत एम इन्हें 'परण्यपशु' कहा जाता है । मरण्यशम्द बगसकर अपकन, अपितु एकाकी माप का समर्थक है । इसीलिए एकानमात्र से सम्बध रखने पछे उपासमा प्रतिपादक पेद भाग को 'भारएप कहा जाता है। उपासना 'परविर्ननसंसरि' पर ही निर्भर है। बात में शहर की तरं समुदाय नहीं रहता, मतएव जगत को भी भरण्प कह दिया जाता है। पाउत भरण्य एकलमाव का सूचक है । मृग मादि वन्य पशु समुदाय मनाकर रहते हैं, इसी समुदायरूप माममात्र के कारण मृगादि को 'प्राम्पप' कहा जाता है। बस्ती में समुदाय की प्रषामा राती है, मत एष बस्ती को मी प्राम कर दिया जाता है । क्तुत ग्राम 'संघ' का पापक है। "पराधिके नायम्पानाराग्या ग्राम्याम पे" (या सम 1) में भारण्य-प्रम्पपशु का यदि कोरे "भगत में रान पाने पशु एवं ग्राम में रने याचे पशु" या भय र तो लिवानपि से उल भर्प सपा भनयकोटि में गिना मापग्ण | "सिंादि पारपपपगु है, मगादि ग्राम्पप" यही मप समीधीन होना । बतमाना यही है कि भाजारमा का गोपनिषत् ॥ पर प्राम . भाग्यामिक्सब के सिर 'ग्राम' शर प्रयुक्त हुमा ।, एवं प्राषिविकसप के लिए 'पुर राम्द प्रयुक्त एमा।। मामिबहप ईश्वर का शरीर 'पुर' कामाता है। पुर के सम्म से 4 'पुरुप' कमाता है । पब हमारीररुप जीव पा लिग 'ग्राम' कासावी । सी ग्राम के समय से इसे 'निकाप' किंवा 'काय' कहा जाता है। अनेक परतुओं को समरि 'ग्राम है, म भनेक ग्रामों की समरि निकाय है। मूत पाप , मतएव रन भूतों की समरिमें हम 'ग्राम' कर सकते हैं। इसी प्रक्चर पाव देशों की समतिरूप देवमाम भी प्राम, मात्माम भी प्राम है। शरीर में तीन ग्राम है, मत एक इसे 'निकाय' करा मासकता यही 'निकायकन्द' है-(देसिर शव eAI)। निकाय ही कायदे, काप ही शरीर है। पृपिरी मस-चेम-पापु-माकाय र सुप्र सर पाचों मन ही भूमण्यम पही पसार है। इसी का विदर्शन कराते हुए अपि करते हैं- है . . "धात्मकमिति कस्मात् प्रपिम्पापस्तंभोरापुरानापिति । अस्मिन पणापके गरीरे का पिरी ! का पाप को मापु ! किमाफागम् इति । मम्मिन पधात्मके गरीरे वा यह फठिन सा पपिपी, पद् वर्म वा मापः यदुर्ग सचेत , यत् संपरति स पापुः, यह एपिरं वदाकाशम्-रपुष्पते" (गर्भोपनिद ) भरिप-मांसादि बन पातु पृषि, कफ-साग-स्वर-मन-इपिर-रस मावि परत पातु पानी, गर कोने से मिस उपमा (गरमी) का अनुमान होता है, वही वास प्रभास पायद राग में नितमा रित (पोस) माग। प सब माकाश । यी तात्पप है। इसी भाकाराने एक दूसरे भूतों को प्रपा कमा रक्सा है। यदि म्पबधाम (मन्तर) म होता सारे पात मिलकर एकरूप होगाते । पर सी. या मांस है, पतबा है, पा भिध मिथ नाम-प-पहार मा होगत । इसी ममिप्राय से-'पाकायो नामरूपयोनिरिता' परका गाता है। मार-माए धातु-ओष-मन-म पांचों इन्द्रियों की समावि ही देवमाम प्राकवारमा वा ईशोपनिषत् ।। सप्तपशराशि है। दाशनिक ११ इन्द्रियों का इन्ही वैदिक पांच इन्द्रियों में पन्तमात्र है । वाक् पमिदेवता २, प्राण वायुदेवता है, चतु प्रादिस्य है, श्रोत्र दिम्सोम है, मन माखरसोम है- देखिए ९० १० १ स०)। इन देवतामों के सम्बन्ध से ही इद्रियमाम देवप्राम कामाता है, इसी को सूदमशरीर कहते है। तीसगी मीनाम | यह सब में प्रधान दे, यही हमारा सुपरिचित 'शुन', । इस शुक्पाम किंवा पीनग्राम में निघा-मझा-मम यह तीन तत्व प्रतिष्टित एते हैं । वाममनित मावना सरकार विधा है, कमानित पासना सरकार कर्म है पिताधार तरण प्रहा है। पर माना वासना सस्कार ही बग्म का हेतु है। मतएव एतद्रूप माम को पीन-गम म्पदि मामों से म्यात किया जाता है । यही पग्म स्पिति मग का कारण है पतएव शुक्ररूप इस पीबचिति पने कारणशरीर फहा बाता है । इसी विपाकमरूप शुरु को मम का पारम्भक माना जाता है । इसी ममिप्राय से "स रिपाकर्मणी पारमेत पूर्वममा " (रात. ११ का० ७१२ ३२) यह कहा जाता है । गुगत प्रज्ञामाग पर ही विदश या प्रसि- बिम्म परताह । दूसरे शब्दों में विदाम्पस (चित का प्रतिविम्ब) नाम से प्रसिद्ध बीमारमा पर नमाता यही शुक्रगत प्रभा (सोम) भाग है इसीलिए प्रज्ञामर्सि इस शुक्र को भारमप्राम फहा भाता है। च भूतों के सम्बध से एक ही प्रथा पाय मागों में विमत दोगाती है । इस प्रकार ५ भूतमात्रा, ५ प्राणमात्रा, (इविए), ५ प्रशामाया निषा घोर कम-इन १७ पस्तुमों की राशि से बह भारमा निस्य युक्त रहता है, जैसा पि अभियुक्त करते हैं । फम्मानमारापरो योऽसी मोक्ष पास पुग्यत । स सप्तदपेनापि रागिना पुश्यते प स ॥ (म० शन्तिप० मो० ३५१ ० १९ रसो.) पीमदेव भूत की समधि भारमप्रपति का कारण पनती हपदम्' माम से प्रसिद्ध है। गGिR पचन साप्सनमाप्प में मारपीर । , 'या मारमा प्रपनो मपनि नम् परम् रमनिरपन अनुम्न आमा सम्मान (मरम्पन) से 'पर माम में एगन हमार। . १६ मसारमा सोपरिपत् ।। सारसी - इस पद से अतिरित एक पुनामद मौर होता है इसे ही महिमा मया का नाम है। उसमें भी साफ-पेद-सोक मेद से तीन सानिए सेवा है । बाक्साहसी का सम्बाप शुक्रचिति से ५ वेदसाहसी का सम्बन्ध देवगिति से है, सोकसाहसी का सम्पम्प मूतचिति से है। मम्पकारमधिकरणात गुफनिरुक्ति का पाठकों को स्मरस शेगा । या इमर्ने मार-पाप-प्रपि-की समधि को शक मतमापा पा-(देशिए. मि.म. प्र. ३११ )। इनमें पक्का विकास सय एक है, मार पा सिकास मूतगिति , एष भनि मा विकास दरिति ।। पप्रधाना शुक्रषिति बाक्सापसी की, सप्मभाना भूतपिति सोक साली की, एष पमिप्रभाना दबपिति सोकसारसी की जननी है। एक ही पाक भाग से शुक्र बनता है, मापमाग से मूत बनता है मप्रमाग से देखता रहता है । वीनों चितिए, एवं एब तीनों साहनिए एकमात्र शुक्र यादी वित्त मी सोकको बीम-कारण-पार म्मक मादि मार्गों से म्यपान करना परिवार्य होता है। इसप्रकार विपस मारमा, विकस चिति, विस सासी मेद से 'मूमनिराट् का समप संपन होगा। "न पोनाक्षरेस छन्दांसि मयन्ति न दाम्पाप्" इस श्रोत सिमाम्स के अनुसार एक मदर अपना दो मादर केम्म मपमा मधिक होने पर भी बन्द का सहप नही मिलव । ५पति दगार पद का नाम विरम् । तथापि एक हर कम होने पर भी विराट का सहप मलप्प रह सी नगासर म्यून निराद के निग्न चिरा पर्श पाता है ।"म्पूनाई ममा मना- प' (गत. २०) के अनुसार नयपर ग्यून वियन ही प्रणा की पननी है। सपि सादी लय भम्पप मन-माण-पाक के विसरमाप से नरकास है। महरष उत मानुसार समका सम्प्राय पी ए (मगर) मगा। विषस भारमा है, किस पर (पि.), निगाठ पुन पद [ मरिम्य ] है। महिस्स में लिए, हदय भारम्प है, तीनों सपशि प्रमा न्यूनविराट् प्रजापति (नवाक्षरविराट्) १-१-मम्यप (मनः) २-२-महर (प्राण) ३-३-मारमवर (मा) mmmmmmm भास्मादयस्य । -- १-१-बीवनिति (पा-मन ) कारणशरीरम् ५-२-मतपिति (माप प्राय) स्यूसमीरम् ६-३-देवमिति (ममि )-सूक्ष्मशरीरम शरीरं पदम २ मनापतिः (जीवा) ७-१-मानसारनी(पपट्कार -मन ) १.२१-११ ८-२-सोकसावली(सोका पाण) पो मा २-३ वेदसाहसी (वेदा-बार) यजु साभप --महिमा पुन पदम् j 1-विषा-१ । २-कम- २-श- ७-प्रमामापा पीमपिदि । (गुमर) १-पृथिवी-१ २-उस -१ -तेर--1 १-बापु-१ -भाषाश दराकेन-----सम -भूनमामा मृतचिति शरीरम् १-ग-१ २-प्राण-१ राग्रिना- १-पापमाना -पोत्र--१ १-मन- देवषितिर मागस्पा श्री ईशोपनिषत् ।। कामकर्म- १-अम्पप २ श्रात्मा मारघर. -0-- - महिमारूप पुन पद को मातोमहीयान् का पात्य, एवं स्वान्तरतम सूक्ष्मतम मारमतत्व के लिए 'मणोरषीयान्' कसा पाता है। महिमपुछ गरीरप्रयी कर्मप्रपान, भात्य बामप्रपाम है। शान्त, मिकिप। साम्प्रधान मामा के लिए उपनिषदों में 'प्रकर' राम्द प्रयुक्तामा ६ एवं कर्मप्रधान गरीर के सिप 'क' शब्द प्रयुहमा बम तक इसका (शरीर का) माथा, तब तक मास (भारमा) गन्थन में है। इस मात करे कमी उप- हत मी कर सकल्प, पैसा कि-'नास्परुवा रोन' इत्यादि उपलिपपों से स्प। तह तीनों वितियों में से बीयमिति ही बीवधि का कारण ६ एवं वही ईसरसारिका कारा, यर का वाक्यसी कारणवा को बतखाने के लिए प्रपिने इस का नाम कारमगर रस्सा है। बता गुमरूप कारण शरीर है, तब तक म नीव की मुकि, एवं न (मापारिमोक्सवणा) ईबर की मुक्ति । पूसरे शब्दों में शुक्र का मतिपन ही मुक्ति का कारण है। बिनवि से शुख का सरूप दविए । कारण ही बीम है। इसे शुकाम, कर्म इन तीन सदों से पुकारा गासकता है। क्योंकि काम-कर्म-ग तीनों की समरिकी मीवित्ति । या तो हि के साधारण मनुस्म है । दूसरे शब्दों में किस योगनिति के बिना को भी सरिर्म सभा नहीं है। प्रत्येक सुधि में तीनों निम अपेपित है। समिकर्म का सम्पप के परिसादी मन-प्राण-बार माग से सम्बन्ध है । पर तक इन तीनों कसामों का समभाप मही दोमाता, तबतर पनि हो या, यिर को भी कर्म नहीं सकता। मन से काम का, मारा से कम कर, पर वाक् से याका रदय होता है। तानों में सरि का परिता बीज परम , दूसरा पोर, एक तीसप पौराईसर चैषा बाहय रेसा कर्म करता है, ये समपर्म से पैसी से बच सत्यम हो माती है । "परसदमेसमरवापि मनसो रेत: - 1 भारतमा । ईशोपनिषत् I एम-प-धम भक्तार होता है। प्राकृतिक नियमसंघ ही धर्म है, धर्मविप्राय दी मस्तार का कारण है। इसी अवतारविज्ञान को वक्ष्य में रसकर पुरुषोधम नाम से प्रसिद्ध भम्पयपुरुष के भवतारभूत मत एक पुरुषोत्तम नरम से ही अपपत, भतएव पूर्णावतार भगवान् कण करते है- यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्मगति मारत ! मम्पुस्थानमपमस्य वदात्मान समाम्पई॥ परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कताम् । घमसंस्थापनायर्याय सम्भवामि युगे युगे ॥ (ता० १७-८) । भस्त इस भप्राकृत विषय को इम मषिक मदामा नहीं चाहते । यह हमें कमीचत्मिक चेतन जीवों के विपय में करना है। संस्कार कर्मरूप है, कर्म निमा कामना के समय है। काममा से कर्म होता है, बनित संस्कारपत्रही एक है, यही वीर है । पूर्वसंचिताक (कर्म) का मोग होता रहता है, मागे मागे नवीन नवीम संचय होता सतारे । मासकिमाना से जीब बघन में भामाता है, मनासपोरगी ईरकर 'कुपमपि न मिप्यते' । मनमायणम्यक् की समरि भविषापय ।। काम कम-एफ को भपका भविषा करो, एकरी बात है। सी भापार पर काम-कर्म-गुक्म को विधाम्स कहा मासा । अक्षर विधा है, पर पवित्रा है- ( देखिए रखे. उ० ।।१)। पर की प्रण कसा ही घुरूप में परिणत ऐसी है, ऐसी स्थिति में अन्ततोगत्मा शुकाम का प्रमाग्मिरूप याम पर ही पर्यक्सान माममा परता है। को पूर्व के चितिप्रकरस में हमने बामघान क्तमाया है। पर क्या भो जाकर भाप-ममिरूप में परिवत होती हुई निफर बनाती है । इसी भाषा पर पूर की शुक्र निरुक्ति में एक राम्द से वाक्-पाप-ममि तीनों का प्रहण किया है। १-मन -काममयम् (साराति) कामः (या) २-प्राण -कममपा (किपाराति)-विया (तप) ३-वार-राक्रमयी (मालिक)-मापणम्(प्रमा) . अविद्यात्मक शुक्रम् १ इस पर निगरपन गांताधिाममाप्य प्राचार्य एस्प में स्ना पीए ।

भाजार माईशोपपत् ।। पर्मम्पूर । म्यू' (पर्म यूए) नाम से प्रसिद्ध है। अनेक प्रश्रमों से एक ममिक्रम का, मनेक अमिनमों से एक पूरा सहर बनता है। यह कर्मम्मर सत्काररूप से भारमा में प्रतिष्ठित राता है। नितिकम से प्रारम्भ ममिक्रम कर्म को धोकर शेष सारा कमम्पा नाच होगात्त है। प्रारम्परिप भमिकम कर्म की मोग से ही निति होती है-नामिक्रमनायोऽस्ति" । हमा पार्मासत मनुष्य कर्मम्यूह से उत्पम धर्मसन्तान के भानपोछापसप पारा बस से गम्म मय के चक्र में फसा राता है। ऐसे ही गोष-मावस्पिक मीप कागते हैं। दूसरा दिमाग 'मारिफारिकप्रीब' । मके मापास्पिक-नियतममधिस्विक भेद से दो मेद है। समाचरिपक नीव जर है। सूर्य-परमेष्ठी-पन्द्रमा-पूपिनी-मचा अति ईपगभून घर भाभिकारिक मी 'प्रभापत्पिर हैं। पर अपने पार्ने नियत अधिकार से मपिस्त है। नियतकर्माचरियक गौष पेल है। इन के मी निम्म-सामपिक मेद से दो विस्त । लप्णु-समन्द-महण-कुवेर-पग्नि-ए-सोम-मर्म मावि तम देवता (ो कि देवताविमन के अनुसार-पारमामिमानीदेवता नाम से प्रसिग ) निल नियतकर्मा- पचिपी इन देवयमों के मातार, एक राम-कप्स भारि ममवार सामपिक निफ्त कमावपिपली है। निस उदरप से भतार होता है, उदरप समाप्ति के मनन्तर भतार पुरुष सीमासपण कर गाते है इसी ममिग्राम से मारायसागर मग अन् म्पस करते है- "पाप पिकारमबस्पितिरापिफारिशारणम्" (ण. सू० ३।१।१२।। प्राकृतिक नियमों में मनुप्पसमान के प्रमपराप से या परपन होने लगायो प्रति तुम्भ रो परची है। इस क्षोम के मापात से तरसम्मय म्ययक विवाग्मा का एक भाग मार्य बनकर शुम्भ यावरण को शान्त करने के सिर नीर बनमात्य है। वही माधिकारिकगीय मापर करता है। प्राति देवमे से बिमस । यदिपपक पोम होता ,त्मपानी १"मिमानि म्पपरेशम् विराप नुगठिम्याम् , ( सु २११४) । इस BR का रियर Rोपर परिमारेगा।

प्रास्तरमा सा ईशोपनिषत् 115 पाप-सम भक्तार होता है। प्राकृतिक नियमसेष ही धर्म है, धर्मविप्र ही भक्तार का कारण है। इसी अक्सारविहान को सप्प में रहकर पुरुषोत्तम नाम से प्रसिद्ध मभ्ययपुरुष के भतारभूत स्त एव पुरुपोचम नाम से ही उपगीत, प्रतएव पूर्णाक्तार भगवान् रुम करते है- यदा यदा हि धर्मस्य म्मानिर्भगति भारस ! प्रभ्युत्पानमपमस्य तदास्मान समाम्पई ।। परिमाणाय साधूना विनाशाय च दुप्फवाम । पमसंस्थापनायर्याप सम्ममापि युगे युगे ।। (मिसा० १७-८)। मस्तु इस मप्राप्त विषय को हम अधिक दाना मही पाहवे । या में कर्मामयिक चेतन बीयों के विपय में करना है। संस्कार कर्मरूप है, कर्म विना कामना के समय है। काममा से कर्म होता है, तबनित संस्कारपुखही एक है, पही बीब है । पूर्वसंचितराक [कर्म] का मोग होता रहता है, भगे भागे मवीन नीम संघय होता हतारे । मासकिमावना से मीव मघन में भानाता है, मनासयोगी ईश्वर 'कुषमपि न प्लिप्पो' । मनप्राणग्रा की समाए मविपाग्यप है। काम कम-क कहो भयवा भविषा करो, एक ही बात है। इसी माधार पर काम-कर्म-गुक्रमस विश्व को विपस पा मासा ।भक्षर विषा है, पर भविषा है- ( देसिए रखे. उ०।१)। पर की प्राण का ही यरूप में परिणत शेती है, ऐसी स्थिति में मततोगरा एक्तत्व का प्रमापिसप यनुप्रम पर ही पर्पक्सान मानना पड़ता है। के चितिप्रकरण में हमनें वाक्प्रधान रवाया है। यह प्रहरी पगे भाकर भाप-अमिरूप में परिणत होती हुई विकास बन जाती है । इसी भाषार पर पूर्व की शुस निरुक्ति में एक शम्द से पा-पाप-प्रमि तीनों का प्रण किया है। १-मन काममपम् ((पाक्ति) करम (रक्षा) २-प्राण -कममप (क्रियाशक्ति) किया (तप) ३-मा-शुक्रमपी (मर्पशक्ति)-भावरणम्(श्रम) अविद्यात्मकं शुक्रम समिनिशा विषन गावगाहानमाम्य प्राचार्य एस्य में रेस्ना पाहिर ।

ईशोपपत् ॥ । म्पर' (कमामू) नाम से प्रसिद्ध ।भनेक प्रकों से एक ममिक्रम का, अनेक ममिकों से एक म्यूह का सरूप पाता है। यह कर्ममा साकारहा से मात्मा में प्रतिष्ठित सता ।। नितिकम से प्रसप्प मित्रम कर्म को मोदकर शेष सारा कमम्मानित होगाता है। प्रारम्पकमाए पमिकम कर्म की मोग से ही नाति होती है-"नहामिक्रमनायोऽस्वि" । कहना या बर्मासत मनुष्य धर्मप्यूह से ठप वर्मसम्मान के भाप्रपोझपरूप पारा- बस से उम मरण के वा में फसा सव। ऐसे ही भीष-मापस्मिक गीप कागवे हैं। दूसरा विभाग 'मात्रिकारिफमीप है। इनके अमावास्विफ-नियसकमावस्पिक झेद से दो मेद है । प्रमायिक जीव पर हैं। सूर्य-परमेष्ठी -बदमा-पिती-नपत्र मार ईपराभूत पर भाषिचरिक बीच 'ममास्मिक है। यह अपने माने नियत अधिकार से पवित है। मितकमारियक गोड चेन है। इन के मी निम-सामयिक मेद से दो शिकत है। मध्य-विष्णु-रद-य-पकरण-और-भगि -आयु-सोम-गर्म मावि चेवन देवा (गोवि देवतालिबान के अनुसार-प्रारमामिमानीदेवता नाम से प्रसिद ) निस्म नियतकर्मा बम्पिक जी है। इन दावों के भतार, एष राम-प्स माल मावार सामपिक नियत- कम्पपिसी है। निस उदरप से प्रचार होता है, रेप सम्पप्ति के मनन्तर मक्वार पुरुष सीसासवरण कर गाते है इसी भमिप्राप से नारापणापतार मगवान् म्पास करते है- "यार पिचरमररिपतिरापिकारिकारणम्" (ग• सू० ३।३1३२)। प्रारतिक नियमों में मनुप्पसमाज के प्रशापराप से यह परवचन होगवादो प्रति सुम्प से पाती है । इस घोम के मापात से समद म्पक विदामा कर एक भाग प्रवर्ग बनकर तुम्भ पारण को प्राप्त करने के चिर जी मनमानी मारिवारिकगीन मसार करता है। प्राति देवमैद से विमाह । पपिपक पोम होता है, तदप्रपान ही "भाममानि प्यपदास्तु विरापानुगतिम्पाम् , ( स २१) । स मरस प्रागिर Raबिरेमा पनि।

प्रातमा माइशोपनिषत् 1 इया-प-श्रम - मातार होता है। प्रारतिक नियमसंघ ही धर्म है, धर्मविप्सव ही भक्तार का कारण है। इसी प्रयत्परविज्ञान को सक्ष्य में रखकर पुरुषोतम नाम से प्रसिद्ध मन्पयपुरुष के पतारम्त एव एक पुस्पोतम नाम से ही उपगीत, मतपय पूर्णगतार भगवान् काम करते है- यदा यदा हि धर्मस्य सानिमति मारत ! धम्पुस्थानमपमस्य तदात्मान सजाम्या ॥ परित्राणाय साधूना विनाशाय च दुप्फवाम् । पमसंस्थापनापाप सम्मवामि पुगे युगे । (ता. २७-८) । मस्तु इस पप्रारत विषय को हम अधिक दाना नहीं पाहवे । मा िहमें कीपिक घेतम नीयों के विषय में करना है। संस्कार कर्मरूप है, धर्म विमा कामना के समय है। कामना से कर्म होता है, तबनित संस्कारबाही शुक्र है, यही बीम है । पूर्वसंधितशक [र्म] क्स मोग रोता रहता है, मागे भागे ममीन मबीन संचय होय रहता है। भासस्लिमाकमा से जीव बपन में मायाता है, मनासाहयोगी ईरषर 'कुरमपि न सिप्पो' । मनप्राणपक्की समरि भविषाम्पप है। काम कम-गुरु को मथवा मविया करो, एक ही बात है। इसी पाधार पर काम-गर्म-गरमस विय को निपमूस का याता है। मदर विपा, पर प्रविपा- ( देसिए रखे० ३०५।१)। पर की गण कसा ही पलप में परिसत होती, ऐसी स्थिति में प्रतियोगमा शुक्रतत्व का प्रमानिरूप मसुझ पर हो पयवसान माममा पर। शुक को पूर्व के वितिप्रकरण में हमने अक्प्रधान बताया है। पर पाक ही पगे पाकर पाप-ममिका में परिणत होतो हा विकार बनवाती है । इसी मापार पर पूष की गुरु निरुक्ति में शुक शब्द से बार-माप-प्रमि तीनों का प्राण किया है। १-मम काममपम् ((फाफि)-पाम (प्दा) २-प्राण -कममप (क्रियारामि)-विया (तर) ५-पाद-राममपी (भराति) मारसम्ममा) . अविद्यात्मकं शुक्रम् इस दिम र निरन गातापानमाप्प मामा पस्प में देखना भए ।

पालाम भाईयोपनिपम् ।। म्यू' (कर्मम्पूर) नाम से प्रसिद्ध है। मनेक प्रक्रमें से एक ममियम का, मनेक अमिलों से एक म्मूद का सहर पनता है। या कर्मम्मा सरकारका से मातम में प्रतिष्ठित गता। नितिकम से प्रारम्प भमिकम कर्म को छोरात शेष सारा काम्पा ना होगाता है। प्रारम्पकप भमिकम कर्म की मोग से ही निति होती है-निहाभिकमनायोऽस्ति" । करना यही कर्मासक्त मनुष्य कर्मम्यूा से सत्तम धर्मसन्तान के प्रामापोहपहप धारा बस से नग्म मय के चक्र में फसा रासा है। ऐसे ही पौष-मास्पिक श्रीव करते है। दूसरा दिमाग 'मारिकारिफमीव' का है। इनके ब्रमावास्विक-निपवक्रमविस्तिक भेद से दो मेद हैं । प्रमात्विक भीष जग है। सूर्य-परमेष्ठी-चन्द्रमा-पूपिणी नक्षत्र मावि बिराङ्गमूत जब भाषिकारिक जीव 'प्रमास्यिक है। यह मपर्ने अपने नियत अधिकार से अधिकतर मिठकर्मापरिपक चौब इन है। इनके भी निम-सामपिक मेद से दो विस्त है । सम-विष्णु-म्प-न्द्र-रूप-कुबेर-पमि-बायु-सोम-गापर्व मारि फेवन देवता (जो कि देशाविधान के अनुसार- र-मात्मामिमानीदेववा नाम से प्रसिद्ध ) निम नियतकर्मा- परिपत्र जीव हैं । इन देवतामों के मवार, एष यमकण भाति भवतार सामपिक नियत- कर्मपिकली। बिस उद्देश्य से मातार होता है, हरप समाधि के भनम्बर भतार पुस सीसासमय पर बाते है, इसी अभिप्राय से नारायणकतार मगान् म्पाछ कर है- "पापदधिकारमारियविरापिकारिकारसम्" (ण• सू० ३।३।१२।। प्राकृतिक निपों में मनुप्पसमाष के प्रतापराप से सब परिन होने लगा वो प्रकृति पुम्भ हो पाती है । इस धोम के मापत से हसम्पद म्पापक विमा का एक भाग प्रवर्ग बनकर पुम्प पवायरस को राप्त करने के सिर मीत्र बनमाल।पही माधिकारिफयीय मसार करना है। प्रति देवमेव से निम्। पसिषपक पोम शेखा है, तवापान की १' भमिमाने प्पपयस्तु निरोपानुगतिम्पाम् , ( FRAN)। इस विप परिम रिचा गणपतिरेमा दिन।

माहवारमा शोपनिषत् II इमा-प-सम मातार होता है। प्रारतिक नियमसंघ ही धर्म है, मर्मविप्सव ही भक्तार का कारण है। इसी ममतारविहान को लक्ष्य में रसकर पुरुषोतम नाम से प्रसिद भष्मयपुरम के भक्तारमूव प्रत एस पुरुषोत्तम माम से 10 उपगीत, अतएव पूर्णायवार भगवान् कप्त करते हैं- यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्मपति मारत ! मम्पुस्पानमपयस्य तदात्मान सजाम्पा ॥ परिणाप साधूनां विनाशाय च दुप्फवाम् । घमर्सस्यापनायाय सम्मवामि पुगे युगे ॥ (मिता ० ११७-८)। मस्त इस प्रप्राप्त विषय को हम भपिक बहाना मही चाहते । याहा में कर्मामलिक चेतन बीवों के विषय में करना है। संस्कार कर्मरूप है, फर्म विना कामना के समय है। काममा से कर्म होता है, वमनिष्ठ संस्कारपुन ही एक 1, पही मीन है । पूर्वसंचितशुक्र [कर्म] का माग होता रहता है, भागे मागे ममीन नबीम संपय होता असारे । मासक्तिभाना से जीव वपन में मानावा है, मनासयोगी ईरपर 'कुपपपि न लिप्यते' । मनप्राणवाक्की समरि मविपाम्पय है। काम कम-एक कहो मषवा भविषा कहो, एक ही बात है। इसी भाधार पर काम-कर्म-खमस किस को पिप मूस कसा पाता है। पर लिया है, पर मलिया है- ( देखिए श्वे. १०११)। घर की प्राण कसा ही फ्रूप में परिणत रोती है, ऐसी स्पिति में प्रस्तोगला गुरुतस्त्र का प्रक्षामिरूप पर्याय पर ही पयवसान मानना परता है। एक को पूर्ण के विविप्रकरण में हमने पक्षान बासस्या है। यह पकरी मो पाकर पाप-प्रनिरूप में परिणत होतो विपत बनाती है। इसी भाषार पर पूर्व की राम निरुक्ति में शुक शब्द से वाक्-पाप-भपि तीनों का प्राण किया है। १-मन -काममपम् (पाराति)-काम (सा) २-प्रास कममपः (प्रियाशक्रि)-किण (सपा) २-बार-गुकमयी (मर्पशक्ति)-माकरणम्(मामा) अविद्यात्मक शुकम् १ इस Aपाशिर चिन गोतावधानमाप्य भाचार्य एस्य मे रेसना पाहिए ।

ईशोप-पम् ।। कमन्स म्यू' (धर्मम्पूर) नाम से प्रसिद। भनेक प्रक्रमों से एक ममिक्रम का, अनेक अमिनमों से एक म्यूर ना सहा कता है। या कर्मप्यूा सकारमर से भाग में प्रतिष्ठित राता।। मितिकम से प्रारम्प ममिक्रम कर्म को फोरकर शेष सारा कमम्पूर नाच शेगाता है। प्रारम्भकमहा अमिकम कर्म की मोग से ही निधि होती है-"नामिक्रमनाशोऽस्ति । कहना पीककर्मासत मनुष्य कर्मप्यूह से सत्पन धर्मसम्तान के प्रश्नपोशपरूप पाय बस से नग्म मप के पत्र में फसा राम।। ऐसे ही औष-मास्पिक बीब कामसे है। दूसरा दिमाग 'माधिकारिकमीच करो। इनके ग्रमाचास्विफ-नियवकमावस्यक मेव से दो भेद है । प्रमाचरिपक बीरगा। सूर्य-परमेष्ठी-पन्द्रमा -पिती-नपत्र मावि ईमपात पर भाषिकारिक पीक 'प्रमापस्थित है। यह अपने अपने नियत अधिकार से भविस्तर नियतकाचरिपक चीन चेन है। इनके मी निम-सामयिक मेद से दो धित है। प्रध्य-की-रूप-द्र-परण-कुबेर-भग्नि-यु-सोप- मावि पेठन देता (गे कि देवानिमन के अनुसार-मारमामिमानीदेवता नाम से प्रसिह ) निस्म नियतकर्मा पचपनी है। इम देवतामों ममतार, एक रामकृष्ण माल मगर सामयिक नियत- बर्मपरिपकवान। बिस ठोरप से प्रसार होता है, परप सम्पप्ति के मनन्तर मस्तार पुरुष सीसासरण कर गावे । इसी अभिप्राय से मारापणास्तार भगवान् म्पस करते हैं- "यादपिकारमारिपविरापिकारिकारणम्" (. सू. ३।१।१२।)। । मातिक नियमों में मनुप्पसमान के प्रमपराप से या परिमन होने लगता है तो प्रति पुम्म हो पाती है। इस छोम के भामाठ से सम्पर म्यापक विदामा का एक माग प्रवर्प बनकर तुम पतावरण को शान्त करने के चिर जी बनमायो। ही मालिकारिकगीय भश्वर कागता प्रति देवमे से सिम है । पदमपफक दोम होता है, तत्प्रपाम ही १“ममिमानि प्पपोस्तु विरापानुपतिम्पाम् , (गा HI11)। इस AR RRO सिमरिमा मरेमा।

प्रातमा - ईशोपनिषत् ॥ पा-६प-भम मातार होता है। प्राकृतिक नियमसंघ ही धर्म है, धर्मविप्सव ही मस्तार का कारण है। इसी मसारविज्ञान को सत्य में रसकर पुरुषोसम नाम से प्रसिद्ध मध्यपपुस्प के प्रस्तारमूत पत्र एष पुरुषोत्तम माम से ही उपगीत, श्रतएव पूर्णक्वार मगवान् काम करते है- यदा यदा हि पर्मस्य सानिर्मगति मारत ! मम्युस्थानमपमस्प व्दात्मान पजाम्पा ॥ परिवाणाप साघूर्ना विनाशाय च दुप्फवाम् । भमसत्यापनायाय सम्मनामि पुगे युगे ।। (पिता ० १७-८)। मस्त इस अप्राकृत विषय को हम अधिक महाना नही चाहते । मह हमें कीषिक चेतन मीयों के विषय में करना है । संस्कार कर्मरूप है, फर्म बिना वमना के समय है। काम्ना से कर्म होता है, क्यनित संस्कारपुष ही एक है, पही मीन है । पूर्वसंचितशुक्र [कर्म] का मोग रोता रहता है, भागे भागे नवीन नपीम संपप रोता रहा है। भासक्तिमायना से मीय मघन में मानावा , मनासहयोगी रिपर 'कुषमपि न लिप्यते' । मनप्राणवार की समरि मनिषाम्यय है। काम-कम-गुक को भपवा भविषा कहो, एक ही यात है। इसी पाधार पर काम-कर्म-शुभमस विश्व को भविपास कसा मावा है |मक्षर विधा है, पर भविषा है- ( देसिए रखे० उ ०।१)। पर की प्राण कसा ही बुरूप में परिणत होती है, ऐसी स्थिति में मन्ततोगत्रा गुरुतत्व का प्रसामिरूप म्युमम पर ही पर्यवसान माममा परता है। शुक को पूर्व के बिसिप्रकरण में हमने अपघान बसाया है। पर पाक् ही मागे पाकर आप-मनिरूप में परिणत होतो निफर बनमाती । इसी भापार पर पूष की शुभ निरुक्ति में एक शम्द से वाक्-माप-प्रमि तीनों का प्राय किया है। १-मन काममपम् (पाशक्ति) कामः (का) २-प्रायस कममप (क्रियाशक्ति)-निय (प.) २-बार-शुक्रमयी (मर्पक)-भारणम्(ममा) अविद्यात्मक शुक्रम् १ इस Aषयमा शिर चिन गीताविधानमाप्प प्राचार्य एस्प में देखना पीर ।

पागात्म भाईयोपनिषत् ॥ मागपत्पपस्या से भर भाप के समाज शरीर में काम कर्म भी है, शुक्र भी है। परन्तु इन तीनों के मब या कार्यहर में परिणव होते है, पम्फा-कर्म-गुक तीनों का मिफ्त माग ही उपादान ममता ।पही परिस्थिति मायापहिम महेयर के शरीर में सममिर । ईयर के किसी मिपा प्रदेश में ही सरिमा कामना का उदय होता है, उसी प्रदेश में कर्म का उदय होता है, एक पही शुक विश्व का उपादान बनता है । ईयर का शरीर गोडाकार है, ग सर्वदः पाणिपाद, सर्ववोऽविशिरोमुस । गो तक मोबर म्याप्त पही तक प्रमरप शुक, एवं समरूप रेत म्याप्त है। कामनामों का समुद्र ।काममे से कम कर्मभेद से शुक्रमेह होगता है। निफ्तकाम-कर्माधिम नियताक नियतविर का उपादान ममता है। उस में कामामेद से मनात धक है। नितने गुरु ठग्नें ही मिय । एक एकनिसका उमारक एक एक गुफ है। प्रमात समाधिष्ठाता महेबर भरपत्य प्रापति है । उसका पमपमा एक एक नरम एक एक पमपुणीरा प्रामापरस्म मया । म्यापक ममापी परात्पर में मापा उदय त्पेसर का उदय होता है । माया अनन्त है, मतएव मापीमहेन्चर भी मनात है। प्रत्येक मार्प' मोपर (पाप) के उदर में भमम्त प्रमाण । परात्पर एक रे, मागेच साप प्रपत्र अनन्त है ।पपसि परात्पर मी मात । परत इस की ममतता दिग्देशकापामवर से समय रसती, मोनादि की मनप्ता ससपा से सावध रखती है । इस प्रकार पर्व विभूति अनन्त , सम है, मानमति है- 'सम्पं मानमन त प्रम" । परापर भसम है। इसी मसीममात्र को सूचित करने के लिए उसे परात्पर (ससीम पर नामक प्रम्पप से भी पर- प्रसीम) माम से म्यात रित्या चाता है। किस प्रकार एक पट (वस्त्र) में ससीम ममन्त तार विन्दुए प्रतिष्टित गती है, एवमेव उस मसीम परात्पर पपतस में गोलाकार मनात मापी मरेपर प्रतिष्ठित है। इस Aषय का लगद मवेषम शमाप्प प्रपम सपा में मस्तार से फिपा गाजु -(देखिए। मा प्र २२५ से २५०) । प्रत्येक मापी महेवर मनावमसि रामबाप उसमूत म्पना जाता है। पमत का केन्द्र मणि ( परिधि) से कर्ज माग मायो । उस उर्षपूतरूप देय बिन्दु से चारों मोर प्रपि पर्पत साम पाए निकली ईशोपनिषत् ॥ पोपमाया हैं। प्रत्येक शाखा में स्वयम्म, परमेष्ठी, सूर्य, पृपिषी, पद्रमा यह पौष पाप पुणीर (पा-पोर ) है। उपक्रम में पुणीर स्वयम्भू , उपसहार में पन्द्रमा है, मतरस पानामा को निधन' (भवसानस्पानीप ) कहा जाता है। यही सम भाव मापी मोचर के स्वरूप परिचायक है। पही परिस्पिति इतर महेयरों की समगनी चाहिए । तीसरा वि मारोबार फा । सपम्भू की महिमा में समहिम परमेष्ट्री परमेष्ठी की महिमा में समहिम स्य, सूर्य की महिमा में समहिम पृषिषी, एष पृथिवी की महिमा में समदिम चन्द्रमा प्रतिधित है। यही सपम्म सप्तसोकाधिष्ठाता ईश्वर प्रजापति है-~-(देखिएई वि प्र २७८)। अब तक के सन्दर्भ से यह मसीभांति सिद्ध होजाता है कि मायी महेश्वर में सर्वत्र एकसर से यजुबमाप्नि मरा पुमा ।। महेपर पर कोई भी प्रदेश इस से अप नहीं है । एवमेव उसी प्रदेश में सनम भाप (सोम) भरा मा , इससे भी कोई स्पान Rक नही। दोनों ही मायामाचेदेम महेयर की तरह पारक है। इस म्पापक महेभर के धरातल पर प्रतिष्ठित म्पापक मन-सुगम के मिस प्रदेश में कामना का उदय होता है उतने प्रदेश में कर्मप्रनित होम से एक मय सीमामान उत्पम होता है। महामाया के सदर में उत्पन होने पासे इसी सीमाभार को 'योगमाया' कहा जात ।।सकी जननी भरानाया पुषा ।भरामापा के मषि यता विप्पा है, अतएव तम्मतिका योगमापा को-"योगमाया रेपवत सया संपोपसे नगन" इस्लारि रूपसे विष्णुमाया का माता है । काममनित सीमामहिम (योगमाया- विन) उस निक्त प्रदेश से परिहिम या यमुझम (पघुमम का मंग) की पूष्टि की योनि पनप्ता मा शुक्र नाम धारण करता है, एवं उसी सीमित प्रदेश का मुनम (माप) भाग रेत माम धारण करता है। मप्रारमकाक में इसी सुनमारमकरेत कर रेतोषा मातरिया छ माधाम होता है। 'मननदकम्०' का मर्ष करते समय हममें सुमाझ (भाप ) युएस ग्रन को शुक पत- साया था, पहा करत यमुर्मस को तो शुक्र, एक मुमम को रेत बतलाया जारहा है। वह शुकर रेतरूप मम में सुमन की समाधि को गुफ गतसाने का कारण यह था कि साधारण मनुष्य शुरु १११ शोपनिषत् । मान्माण - पोशी पति का कारस सममने है। इनकी घटि में शुक एप्प का ये उपारामा एष यह रिकिसी सीमा तक बैंक में की आसकी उपमान देव ER | अपि तु दोनों की समष्टि उपादाम है । इसी सायरस पि का साम करते इए, एक का उपादान भयं प्रमते इए हमने दोनों के समुप को कई मम्द से पास कारिय प । मातु समग्रमा मुक फेरस प्रमादिका पक, एक रेत केरल मुद्रम का सबक है। इस रेत का मापात मा, इससे सम्म् का लम्प निपल इम्म । यही एमन सष्टि व परिल रूप है। योगपतिय पुणीर समम्मू , मनेनदेयम्।' पच्या माम्बाईपम, महेनर के रुप से समलित पापक सयम्भू पास एक है, पुधीर सयाम् मनात (सात) है। इस योगमायावधिहम ससीम पुरखीर सपम्मू से ही परमेष्ठी का उदय होना है। की छाम्दा पनि का दूसरा रूप है। मया सम्म में काम पप भी है, परन्तु या प्रचानता प्रास की। मास सगल, असापारा मैलुनीसधि का कारय मही ममता । ॐ परिस्पिति में प्रासमय सम्म् को भी प्रतविक उपादाम भी मामा पासका । परिपतविक उपादाय से समभमा मापोमय परमेष्ठी की। प्रतएव शुष (उपादान कारण स्था) पद का पपरसान परमेठी पर ही पामना पर।पही इस - पछि परमेष्ठी की माय से 'महान' मा गाया है। पी सरियों की मार भिवार कि बा तो सामान्य शि से मापात रमू को ही सब पोकी अपेक्षा महान (सबसे ससा) मानना Sara होता है । परन्तु वानिकों में मम्मको मान्न परमर परमेष्ठी को महान् परा। सचमुच परमेष्टी । सो की अपेक्षा मान ।। प्रासमर्ति सपम्भू प्रयापति प्राय की सवा- मासी प्रामास मेटी पर निर्भर है। पर मटी के दपूर्णमास से 8 पुरीर सफा सहप निपम पठा। परिसे मापात सर्व जगताप, मनम्तर पाय को सक्षम का मासर नि । पानी ही प्राय की प्रतियो- 'प्रारोमपा प्राव'। मध्यात्मसम्पा में यातक शरीर में सप्तक प्रतिष्टित सता है, वो वक प्राए समरूप से प्रतिदिन रहा है, जैसा कि-"यादै भागेषापो भवन्ति वारदापा प्राटारमा पनिपत् ॥ मान् की मचा पदति" (शत० ५।३।५।१६।) इस्पारि श्रोतक्चन से स्पष्ट है । प्राणपेक्षया पानी की पही मा । पानी के गम में प्राण प्रतिष्टित रक्षा, पहिले "मापो पाइदै सम्"1, मनन्तर 'भारसो वा इदं सर्वम्,-(देखिए ई. वि. मा० पृ. १५) मातरिया बापु के वेएम से ही भम्पत स्वयम्भू का उदप पा है। यह प्रवरिया पायु-पाप का ही एक मरा है। इससिए मी प्राणमप स्वयम् की अपेक्षा भापोय परमेष्टी को महान् पहा शासषता ।। वैकारिक लिप र उपादान भी यही है, इसलिए विद्यापेक्षया भी पहरी महान् है । भन्मत मन था, या मरे (मरिक रपि -परनो. १)। सारी मर्सिए दूसरे सम्मों में पूर्व नगत् सी रविप्रधान परमेष्ठी के गम में उत्पम पुमा है। भाप महेंगे मायी महेनर सबकी अपेक्षा महान् है ऐसी पास्मामें विश्वसीमा में महबर को छोड़कर परमेष्टी मादिको से महान् कहा था सकता है! म काँगे भाप मूसते हैं । केरस माया से ही महसर (पम्प) का विकास नहीं होता, यरिघाप में माते समय उसे भी इसी क्रमाश्रय सेना पड़ता है। भास्मपुरष ईसी में गर्मधारण करता है, इसी से भागे की मूर्तिसहि होती।पाप के पाप-पायु-सोम पर सीम धित। चेतना भागमन के यही वीन पर है। मतएव विरण में प्राप्य-पापम्प-सौम्य तीन दी प्रकार की जीपमधि उपसम्म होती है। इस वीवष्टि का भविष्ठा मी भापोमय पर मेटी की है। इसप्रकार रिर-जी-वियसब कुछ इसी के पारित है-'सषमापोमप जगत्। के इसी महत्व को सहप में रखकर चिों ने इसे 'महानास्मा' नाम से म्पमत किया ।इसी मादाम की मचा का निरूपण करती हुई स्पति करती है- . मम पोनिमहब्रूझ पस्मिन् गर्भ दपाम्याम् । समयः सर्पभूनाना ततो मरति मारत । सर्रयोनिपु कौन्वेप मूर्तयः सम्मपन्ति याः। पास अप मापोनि पीमपदः पिता ।। (ता१11-2)।

मावरमा आईसोपनिषत् - भूत मविपर पापा मम के प्रमृत-मृत्यु मे से दो दिमाग है । सूर्य से ऊपर का प्रपञ्च मक्त निमाग सूर्य से मीचे का प्रपत्र मृत्यु निमाग है । मदरपुप सप अमृतरूप है । इस का विकास सूर्य पफ्त पता है। दूसरे शब्दों में भार की प्रधानता स्र्प तक (सूर्य के प्रस्तामि मामक प्राणामि तक)ो। सूर्यपिणा से मारम्म कर नीचे सरे माप निरव में पर का साम्राग्प है।दर को 'प्रम' कहा जाता है। यह प्रसपर मनेकपा मम् ARL मायों से भाकाम्त है । इस मारप पर पर एक महर प्रतिष्टित है । मिगुर महर मही, मपि महसन मुक्छ अपर । क्योंकि परसरि का उपादान प्रारूप परमेष्ठी मामा मामी है।या सूप से उपर रहता था अपत प्रधान बनकर मपवापर मोटि में प्रदिए मान लिया भाता है। इस समाग के अनुसार पोम्पापुरुष, सम्पाट (सपम्म) महान् (परमेष्टी) इन तीन का एक सत्र भरत सिमाग होनाता है। एक सूर्यपिण चन्द्रपिया-पपिपीपिया इन तीन का एक सतन्त्र मम्प निमाग होगता है। इस प्रकार एक ही एक व भगत मृत्यु मेद से दो पगों में निमत शेगाता है, जैसा कि पूर्व की गुणनिति में बतलाय बाय ।। इसी रहस्प हप में रसकर-"भूत भविष्यत् प्रवीमि पत्रकमधर, मादप्रमसमपरम्" पह कहा जाता। १-पोरगीपुरुष २-पम्पकसपम्भू ३-परमेष्टी महान् -अमृतम्-१ 0-- प्रजापति - १--सूर्पपिणम् --समापिणम् 1-पिणम् मत्पम्-२ एम्पप स नपगान०' मन्त्र गुमरूप इसी माझमा निरुपए है। पा पटिया, पर पूर्व के निरूपण से पिरित मा होय । इस की यह ठिबता पही ।

प्राशीपनिषत् । तमन्ना मामारमा - समाप्त नही होमाची । भभी इस संबन्ध में भौर भी कुस रकम्प है। यजुप्रस गुफ है, यह पहिला पद है। काय-कर्म-गमप परियायत शुभ है, यह दूसरा पक्ष । प्रम भुनक्ष की समष्टिरूप माद्मम शुक्र है, यह सीसरा पप है। मान माप अमि-पनि-मापनात मर से शुक्र, या नोपा पक्ष है । भपेश भेद से चारों मिन मिन प्रतीत होते हैं, पर- न्तु परमार्थत सब भमिमार्पक है। पूर्व की शुकनिरुक्ति में हमने भौये पक्ष को ही प्रधानता दो एप इस प्रकरण में शेष तीनों पदों को प्रधान माना गया है । भव इन चारों का सम- आय पर इस परिकरस बो समास करना है। सब का मूस विधा-पर्ममय सम्पयपुरुष है, निर्षिपद हे । भानन्द-विधान-मन का समुपय मियामाग है, पी अमृत है । मन प्राण-पाक्न समग्वितरूप पर्सम्यग है, यही परिपा द, पी मृत्यु है। दोनों की समर्षि विश्व । विश्व का मूस गुम ( उपादान) लिपाकर्म की है,पही भविपारूप परिता शुभ है । परम्त केसा निपार्म ! लियर नहीं, अपितु वेदरूपक्षण- बरिछम मिपार्म । पत् रूप मृत्यु, न रूप मठ ही ( पक्ष ही संसार का सुषहै। यह शुक पूर्यकपनानुसार मन प्राण-बाङ्मय परिसाक्षी मम्पप क वाक् माग का ही मिस है। म म्पपवाक् ही वेदरूप में परिणत होती है । मृतावस्पापम वाक् पार है, पसापरपापम पाक पद है, अतएव मन्पकाधिकरण में इस येद को 'ग्रानिः पसिव' कहा है । निष्का यही उम्म कि पम्पपशक का विकासमप, भतरण पार नाम से प्रसिर मस्त-मायुरूप स्पपम्मुत्र प्राप्त मि असित पद ही (जिसे कि इस प्रकरण में 'पाम्गुक' पा गया है) प्रथमम स प्रति- टाप शुरु है। यही इस की दूसरी भरपा है। इसी पर प्रतिमित होकर नम (HI) मदर सति के अभिशाप बनने में समर्थ होते है, जैसा कि मुगडकोपनिपन के मामासा नो प्रथमः सममा एपादि मन्त्रमाप्प में सर किप्प गपारे । यसपा पर पदिसा गुफ है। "एफासी न रमले नर दिलीपप्पत पतिम पत्रीय" के अनुसार पार (पत् पर)ी पुस भाग पानी बन जाता है। यही मार (निस में फि भार-पपु मादि पक्षम नित शुकमोग १)नी है।सप फा, पर शत है। इन दोनों की समरिकी गुफ की तीसरी भारपा है। 'तत् सदा देवानुमारित्' के अनुसार . न वेद मप्तस्य को उत्पन्न कर इस के भीतर प्रतिर होगा। इसी से पुरारीरसयाम् नम होता है। चारों मोर पापोमय पालम मास , मीच में वेदनकी प्रतिष्टित ।मार में बो मनियमाग है उस की ममि-बापु पादित्य पह तीन मास्पाएक्सगाई गई है। यह भगिराप्रमी भागेगाकर "गापीमारिकेमद"रूप में परिसव होती है। महिपति पत्र नाम से प्रसिद, मतएव तसप मेद को 'गायत्रीमा० करना म्यामास ।। सपि याममा यी प्रथम विकास भूमि भाप शुक्र । भपर्ने हो मणिरा भाग से कर मापन क वे रूप से प्रादुर्घत होता है । महिराप्रयी भमि है, सपी सेम ।। दोनों का समरिक रूप या पातिवर्षमापजु साम मवयम्" यी पामरमक चौपा शुक। प्रकागन्तर से देखिए । सापम्मुत्री पार पहिला गुफ है, पारमैप्टप प्राप सय गुरु है, सौर पनि सीप गुरु है। तीनों ही अमृत पस्पु मेद से दो दो मार्गों में बम होए परगुफ संपत्ति के सम्पादक परमाते है । उत्तर उचर की सरि में पूर्व पूर्ण के गुरु अनुस्यूत रहते है। ऐसी मस्पा में सम सा गुओं की सूक्ष्मावक मानमें पर मी विकास क्रमिक ही माना जा मम । सफाम रेस पारम्प है। परमेष्ट्री सयम्भू के उदर में , इसथिए र समरूप से से मापोमप कनयामा बाक् के मगमन से वास्मय भी है । सूर में भलमि-मोमि के साप साप पाम्-मार का मी समच ६ क्योंकि स्प परमेष्ठी के गर्म र श्रमानुसार प्रपिली गौर सूर्य के गर्म में प्रतिष्ठित मतRषस्थानीय पत्रमा में पांच शुद्ध है। एवं पशि मानुसार (साप ही में हम पापित प्राणियों की अपेक्षा से पति क्रमानुसार मी) सबसे मन्त में मग्नी बाने की पूपिनी में ६ में शुक्र का मोग होडा, बैसाकि भागे के परों से परमाता ।

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मम्मान
भाग्मा
माईशोपनिषत् ।
-
(9
(1)
-
१-खयम्भू -वाड्मय । बाक् !
२-परमेष्ठी-पाङ्मय, भापोमय ।-आप २
३-अमृतसूर्य -कामर्ष , म्योपय , श्रमतामिमय -अमि ३
४-मर्त्यसूर्य -नामप, आपोमय., भभूतामिमय मामिर्मय ,-श्राम ४
५-चन्द्रमा पाड्मय, भापोमम', भभूतामिमयः, मर्यामिमप , मापोमय -श्राप ५
६-पृथिवी-एमपी भापोमपी, मरतामिमयो, ममाप्रिमयी, पपापोमयी,
मर्यवाईमयी-वाक् ।
राक में भाप का माग है, मगर्भित ममि का माय , समधि महरम । महमान
में मापा मपम प्रतिष्ठानर से प्रतिष्ठित है। मातरिया का इस एक के चारों भोर पास
मिमी सरि निमाय नही मारे । केस मातरिया धरा सष्टि के मीरभूत मायमरूप
राफ का भानिमारम।की भागे मय पनने पासा । हमरा भोपनिषद पत्र सी
विगुर पानिपखरता है। माप समापी उपकरणों का AAYसमाप्त मा।
भर मनापीमोर AT पाठकों का पान भारुति सिपा जाता है।
मन्त्रार्थमकरण
म सबन की समष्टिगप उस शुरु को (सम्पारक भारिमपामरूप शुक
को) मारिणा बागुर्ने पारों मोर से घर लिया। इस परिप्पन से ही पा
शुक (निमे कि मर गान, भतरण भापोमम महद्मप्र के भरा
भूनने से पादमाम' नाम से पट पगे) परि र कारण
बनता ITमक गातीय पम, पपुवा सगतीर धमाके

पाल्पामा साईपनिषHE- में सम्मिमण से ही गुम पशि का कारण बनता है। काया एसी मा के ससर्ग से शुक्र फापत, माणस, स्नारिरव अगुदस्स, पाप्मस्टिस मार मानों का उदय होता है । सम् सीप पापा सघात सापमार, विगतीय पदाय का योग होनाना ही प्रयत, इन गर्मा का सम्बन्ध कराने पसा सूत्र स्नायुशन सनों मानाचे भाने गदरूप से परपा में पापा पामरिद बन माग है । पर शुक्र में वह भारों मानों का उप मदी होता, तपनर पर सटिमया से पाहर की बस्तुहै। मप्पाममरपा में भाप गुण के उक्त परों धर्मा का सापसार कर सकते हैं। पाथिर-पान्तरिस्प-सौरतीमो समातीप यमियों की (एक पसिना इसतिर अग्नि समातीय है) इसी शुक पर पिति रही। या पप्रिमितिही 'राम' (मगर) है। कार की मुसमिति शुष ही शुभ दी भाषान के मन तर गमन में परिमन रोकर कमरा रिंगा शेर शरीररुप में परिणा होगा। इस मरहम गुरु को 'मम्म' करने के निर हार है 1 मिजातीय सोम पर भी इस मशिप गुरु के साप सम्म हो रहा है। सेम सम्म से ही तो पोन में भारत एक 'सुन कर परत दोपौ । मेष मे दो पुत्र गुन' परसाता। यह मिगतीपमात्र ही शुरु पास १। सोम स्नेह तपस्नास ट्रम्प में मरे के साप सिखने का सामानिकर्म को गूर पर पम परतारे (गेम में प्रतिष्ठित) वही मूग विशनमाग में-'असा' माम से प्रमिम मी तमनमाय * कारण माण्य यो 'समय' 'सन्नान मार मार्गों से म्परत मामी गं पे मार पर पनमाणी के शुगमप पानाम्मा के साप माने पुत्र-पौ गए पनिर गार है। इसी का पुत्र मोरप पर पो पिगारान गालियाना है। मागित् मापौरपम् 'सरिगरता त पुस्प सप्तमे नि अनुगार सातों पास पर पाप ग म बोगी सगी सरा के समय में दानापुर बना 'मारिने में । mimarrisairat'मामागपनि wrink ।

का ईशोपनिपत् । सोपविष्फ प्रारुपास्मा - सस्काररूपा भविषा । इसी को 'पूर्वपमा' मी कह सकते हैं । इससे या शुक निर रहता है। भविषा पाप्मा (मस) है। इस प्रविपाहा पाप्मा से बिर होकर ही यह एक प्रमोस्पति का कारण मना है। वक्त ककाममा पूर्वक कम किया जाता है, तब तक यह पासनाप अतिवासस्कार से मुक्त रहता है, एम तमीठक प्रारसी शुक के पक से लिमुक्त महीं होता । अपि कहते हैं कि पापि शुक काफ्यादि भ से मुक्त है, शुक्र कर शुफपना काफ्स्पारि मागन्तुक धर्मों से की परिताप होता है तथापि इसकी नो मौलिक-प्रारम्मिक प्रतिस्विफ प्रास्मा, पर कायस्मादि चारों भर्मों से रहित है । निट समप सरिकामुक प्रमापति की (सप्तपुरुपपुस्पात्मक प्रजापति की) कामना से उस गर गुफ को मातरिया पारों मोर से घेरता है, उस समय पर अपर्ने गुरारूप में है। ममी न उसमें सजातीय सम् , म विशातीयमाव का सम्बन्ध है, न सूप- माव का उदय, म मविपासप पाप्मा का ही है । यप प मातरिया की कृपा से मागे बाकर ही वह उक्त चारों समातीप -विनासीय धर्मों से माप ही युक्त होने वासा है, परस्त परम्मरण में तो पा सर्पमा भकाप-मत्रम-मनामिर-अपापपिट-मतएप सर्वपा शुद्ध ही। मातरिया के सम्पन्न से कापस्वादि धर्मों से क्यों युक्त होना इसका उत्तर मात रिया से पूछिए । मातरिमा कवि, परिम, स्वयम्भू है। मावरिमा वायु को हमन मार्गव (ग) वायु कहा। मगु कति है, मारव मार्ग मातरिश्पको कति कहा गया है। बग्ममरण धर्म से पायन्स लिलिवमावमप वम इसी मातरिया का काम्प (इति) है। परि रेतोपा मात रिया प्रप्त में (योनि में) माप (रेत) का प्राधान म करत्य तो निरा का निर्माण मसभा पा । कति मातरिरण के होमें बाछे रेत के भाषान से ही मस्य निरस की उत्पतिस तकमो मनुप्प बसता खेसवा था, पर माज मरगण । मायोस्प में उस सरूप का पता नहीं है। यी उस कलि का महाकाव्य है। वही सपर काम में उपधि का भविष्यता बनता . प्रति सपरकास में पही विनाश का भविष्यता बन जाता है। मातरिया की के इसी काम्य का रूपस करते हुए महर्षि करत है- - - प्राध्यारमा ना ईशोपनिषत् - महामुगुक रिघु ददार्य समने पहना पुमान सन्त पतितो मगार । दसस्प परप काव्य मीस्वापा ममार सपा समान' ।। (अक्स० १०/१५)। भूगुतत्व स्नेहधी । स्नेही संसरिसवणा परि का पमण । यह स्नेहपर्म ही भार्गवमातरिश की की परिसरात है। इसी स्नेहपर्म से चितिमात्र का उदय होता है। चितिसमरिसे अप' । एक का वितिसपस पापहप में परिसत होमाना, मातारमा की कनिलराति (स्नेहगुप) काही महिम्य है । 'एकोज स्पाम्प यानाशातीय- मार के मापन का कारण है। इस कामना का उदय मन से होता है। मनकामना मिनीपा'। मनीनामाष से ममातीय परिपयों का प्रा होता है। जातीय परिपारी 'प्रय' । मार्ग, मावरिया पपपि अयुरूप होमे से सप नित्याप्रपाम, परम्त किया बिना मन की कामना के सम्मम नहीं है। मत मातारचा में सम्पय मन का मनमा सिब हो जाव। इसी से पर 'मनीपी' बना भा है। पर मनीषीमानी कामनामों का प्रयक बनवामा, सिगातीपों के भागमन का घर नता मा के प्रमाण का कारस कनवा ।। भपिच-पातरिया का सारा धन एक नम्पी स्व। यो नियम से महिपषों का निर्माणमा । परि मनमानी नहीं है। अपि तु चैसे एक बुद्धिमाम शिम्पी बुदिपूर्णक मर्मियों का निर्माण करवा , एक्मेब यह मी मम्पप मन से पुल बनवाया दुनिपूर्वक । महिप (मूहप) A का निर्माण करता है। यहाँ मावरचा की (पशिफार्थ), को पप गरिमान है। पापूर्व गौतमविवस्त्र' (त, १०।६७९ के अनुसार मातरिमा सूझमाप का भी प्रक्क है। इसी सूत्रसम्पप से पर उस एक पारों ओर म्याप्त होत्य मागबम धमाव के उदय का कारण बनता है। समाव से पहबारों मोर म्माप्त पोतारमा परिम' (परिमाणे मोर-भू-म्पाप्त रहनेपा) । इसका पा परिम्भाव के नानिरव का कारकम्मापक यस्तु में केन्द्र मी होता, बिमा केन्द्र काममप FORमा सायोपमिपत् ॥ पापा-भरावामा . मन का उदय मही होता, निन्न काममय मन के प्रशनाया का उदय नहीं होता, विना मनाप के नियम का मामन नहीं होता, विना विपन के सेप मही होता । सेप का कारस मरानाप है। मवएम मान्मया (मूल) को 'पाप्मा' कहा जाता है, जैसा कि मृति कहती है- "नरे किवना मासीन-पत्युनवेदमारतमासीन-शनायया। प्रथनाया हि मृत्युः । बन्मनोऽकुरुव-प्रास्मन्धी स्याम्" इवि (सत० १०६) इस प्रशनापा र प्रमग मन है। मन की प्रतिष्ठा दिया है। इस सीमामार पर निर्भर है। यह सीमामा मातरिश पर निमर ।। मातरिरमा ही उस शुक्र को सबम्म नाम से प्र सिम प्रपम पुण्मररूप में परिसत करता है। इसी सीमा से स्वपम्मू 'मा' (मेवाकार ) बनता है-रेखिए मनु० १०। रसो०) "स एप पायुः ममापतिः (पावरिनाम्योपराए प्रमापवि:) प्रस्पिस्टुमेऽन्तरिये समम्म पर्यका" (a = |३||१।२) के अनुसार पर मातरिवारमापासीमातक म्यास शक के एक प्रदेश को पारों भोर से घेर कर इसे पुप्पीर- समयम्भूरूप में परिणत करता है, असा कि पूर्व में बताया माधुका है । पही सपम्भूमात्र सीमामान से सोन, मएच समनस्क बमय मा प्रगनापासप पामा के उदय का कारण बनता है। एप इस सपामभाग के उदय का कारण मातरिरणा है, मत वामपन्पाप से हम इसे भी सपाम् गन्द से परत कर सकते है। इस प्रकार अपने फमि मनीपी-परिमू स्वयम्भ इन पार तरूपभों से युक्त यह मावरिया, प्रमावस्पापम मतएर प्रकाप-मरण भत्ताविर-मपापविल, पतएव पिएद एक को कम काप-प्रण-नाचिर-पापनिद बना राता है। कविमर्म कप का, ममीतीधर्म मण का, परिभूधर्म स्लाविर का, एक स्वयम्भूमान पाप्मा का प्रवर्तक ।पर्धमति मातरेखा ठकको उक पारौं पों से पुरू करने के परबत् १, सरे शब्दों में कापचारि से मुक्त र सेतीकारक विनिर्माण में समयता। Rot

प्राध्यारमा
माशोपनिषत् -
पातपमा
मन
धरि एक प्रकार का म्यापारम्यापार किया है। महिप गुरु का उपादान पन.
पामा मी
पापाराग्यो। क्रिया सदागति मारवा पाय काही पर्ममता
'यागावप्यो एमावि रुप से प्रविन मावरिमा को ही सरिकता नपा है। मस्तरिरण
युती मानें स्नेहमरूप विभाग से समर्थको कार्यप में परिणत करता एमा,
से गमनकर कामना का भविष्यता कनवा मा, सक को माकप में परिपतरामा,
परिमूमात्र से को लागुप में परिणत करवा रामा, स्वयम्भूमाप से परामापा द्वारा गुण
को पाप्मविर बनावा मा उहण 'प्रपमर्षि यम से सहारे सिर माँ कर (पदार्मों
घ) पपापूर्व निर्माण कर पाई-पापातम्पतोऽपनि म्पदपायावतीम्या समाम्प
प्ररिकमावरिया
पघुपादानप-यक्रम
तत्
- पूर्वमका--पपाद--काम्
पथात्-प्रणम्
• पूर्वममातिर-पपाद--स्वामिरम्
पूर्ममापमिद-पचार-पापनितम्
--
मनीपी
परिम्
क्षयम्भू
।
भैसा (पपा) भार भाप देस रो, सुधि के प्रारम्भ में भारत में पेसा (पपा)
बनाया था, एवं '
पापपर' इस सिमान्त अनुसार सदा के लिये (रावतीम्प -
सम्पम्प) गा ऐसा बनावा रोग उस मनीपी मरिया की निर्मम परति सपके लिए,
निपता का अपगमन, पानी का प्रपागमन, पायु का विर्यग्गमन, भूपिमा का

प्रारुवारमा शोपनिपात् । पहाणामान् - कान्तिपच पर नियत परिभ्रमा, मादि मादि पदार्यों के दो नियत मात्र पहिले थे मेरी भाग है, एक ममिप्य में मी ऐसे ही रहेंगे । बिस परिस्थिति के लिए छोकम्यवहार में-" काम वो सालों साप्त ऐसा ही रोता रहता है-सदा एकसार होता रहता है" यह का मावा, ठीक इसी महार को सूचित करने के लिए 'यायावय्यतो' इस्मादि कहा पण इम सरिप्रक्रिया का प्रमच कर रहै । युति को समिप्रक्रिया का सरूप बतमाना है। इसीलिए स्सूमारुन्धवि "पाप से 'तया यया' पर क्रम न रसकर 'यम तपा' या कम रक्सा गया है । भुति कहती है कि जैसा तुम माम देख रहे हो, सदा के लिए मातरियामें पैसा ही बनाया है, वर्तमान में पैसा बना रखा है, एष मनिप्प में वैसा । बमाता रोग्य । वर्षमान परिहिपति तुम्हारे सामने ६ इसी से बम. भूत-भविष्यत्--हिपति र अनुमान लग सकते हो। , - T मावरियाप्पिन एक मधिदैवत में परमेष्ठी' कराता है, भम्यात्म में यही 'महानात्मा' माम से प्रसिर । इसमें प्रकृतिरूप सस प्रमावर की अपकता की प्रधानता है।यसम्म के सम्बन्ध से ही हमने इसे प्रकरण विभाग में 'ममसस्पातर मान्' नाम से प्यार किया है। भूमिका के दर्शपूर्णमास से इस महान में प्रतिविमाप का उदय होता है, बाद दर्शपूर्ण से प्रतिमाम का, सौर दर्शपूर्णमास से मारुतिमाप का उदम होता है। पार्षिवमाग मात् के समोगुण का प्रवर्तक , सौरभाग प्रमोगुण का प्रवक , एवं स्वायम्मुबमाग सस्वगुण का प्रर्तक है । ज्ञानप्रभान समम्मू ममा सत्तमूर्ति है, क्रियाप्रमान' सौरविष्णु रमोमूलि, भर्पप्रधान पार्थिव भूतेशशिन वमोदि । इस प्रिमर्षि के सम्बन्ध से माममा गुण्य से युक्त होगता है, जैसा कि 'उपनिपनिझानभाष्पभूमिका' के 'पया उपनिपत पेद। १ महान् ४ . यहनेवा का प्रतापी मार का एकमात्र मक्यम अधिकती है।ममी समिस में पाठपुष मस्तम्प है। परन्तु निस्ताममप से पेश की यी है । म की पमिदों में, विरोण भावविधान में इम निरमा कातिपाद विदेशम मारे। .01 माञ्चारम मोपनिषत् । हार मनाना इस प्रकरण में विस्तार से बताया पापुका है । महान् को हमने भापोमपकार । मह भापवल-पाप-वायु-सोम-प्रमि-पापु-पादिय मेद से पद्कत है। इनमें अपने साप पाठविमान का, पाय (मार्गपाए) के साप पाटिमार का, सोम के साथ पकविमाप ब, ममि के साप तमोगुपका, बास (समाय) के साप रजोगुण का, एस भादिम के साप सलगुण का सम्म। इस प्रकार या पदक मान्-पग्रस नकर पाटकौशिक निम का प्रमा-प्रतिष्ठा परापण मनरहा है। १-१-पार्पिदरापूसमासाम्पा २-२-बान्ददापूर्वमासाम्या ५-३-सौरदण्णासाम्या -माहीमादमा । महमानोदप माठिपकोदप पिछणको महान् -सत्गुणोदय रबोगुणेश्या तमोगुणोदया 1-1-सापम्मानमत्रिणा ५-२-सौरक्रियमविप्ना ५-१-माधिमविपशुपदिना पापोमयो महानात्मा पानिमय १-१-माप. १-१-यु १-३-सोमः -महिपमप "भापो-ममगिरोस्पमापो मुग्वतिरोमयम्” 8--1- भनि तमोमयः मानिया स्वोमपा -समिया ) २-1-माविस साईयोरनियत मन्त्रायोपवार भावारमा प्रत्येक सरि में योनि-रेत-रेवोधा सीन मावों का सम्बन्ध निस्म अपेक्षित है । सम सिद पाम पाप-बाद-मध प्रमादनम पांचों प्रकृतियों का स्मरण कीथिए । यही पांचों क्रमश स्वयम्मू- -परमेष्ठी-सूर्य-चन्द्रमा पृथिवी इन पांचों पों के रेव' है। व्यापक मास योनि पा, ध्यापक मास रेत पा, व्यापक मातरिश्मा रेतोषा पा, इससे म्पापक सयम्मू का उदय इभा । परिछिममाण पोनि पा, परिछिममाण रेत पा, परिच्छिन मातरिश्या रेतोषा पा, इससे परिचिएम पुणीर सयम्म् का यन्म एमा । मासमय पुपटीर स्वयम्भू योनि बना, मापवस्व रेत बना, मातरिया रेतोषा मना, इससे परमेष्ठी का उदय हुभा । मम पापोमय परमेठी पोनि मनेग्प, तीसरा पालम रेत बनेगा, मातरिवारेसोपा रोगा, इससे सूर्य उत्पम होग्य । पारमय स्य पोनि मनेगा, मातरिया रेतोपा रहेग्म इससे भूपिया उत्पन होग्य । प्रभादमय भूपिन्छ योनि बनेगा, मम रेत बनेग्य, एक की मातरिया रेतोपा बनेगा । इस से चन्द्रमा तत्पन होगा । यहाँ भाकर सूधिक्रम समाप्त होमायगा । इस प्रकार सरिफम में रेतोघा सर्वत्र मावरिया ही पता है। सृष्ठिपर्वमेद से उसके माम रूप धारय ही भदप्त चाते हैं, वैसा कि पूर्वाधिकरण में परास्त्रस्पनिरयन में स्तमाया माधुका है। पूर्व पूर्व प्राप्त (प्रायादि) उचर उपर की प्रात (ममादि) की पोनि बनती है, उत्तर-उचर की प्रकृसिए (मारि) पूर्व पूर्व प्रहस्तियों (प्राणादि ) के रेट बनते हैं । अभ्यतास्माधिकरण में पापक म्वयम्भू का निरूपण हमा, इस प्ररुत महदारमाधिकरण में पुरखीरसयम्भू, एक परमेष्ठी की उत्पति पवसाई गई है। इस भापोमप महान् को योनि (ममयोनिमहद्गम) सममिर, तीसरे बाक्तव को रेव सममिर, पहरा ति मारिमा को रेवोपा सममिए । इस बात के महपोनि में भाभान होने से विज्ञानयन, पतएव विज्ञानात्मा माम से प्रसिद सहसासु मगवाम् सूर्यनारायण का जन्म हो । मागे का भपिकरम इसी नग्मोत्सव के लिए हमारे विहा मारमा (मुनि) को प्रेरित कर रण। इति-प्राकृतात्माधिकरणे शुक्रात्मानरूपणम् २

मामृतात्माधिकरणे-
महदात्माधिकरणं समाप्तम्
२

पूर्णमदः
पूर्णमिदम्
विज्ञानवैभव ?-विज्ञानात्मा
धन्यामम्
अधिदेवतम्।
ब्रह्मसत्याक्षर
विद्या-अविद्यामयः प्राकृतात्मा सूर्य्यः
विज्ञानात्मा
३
सूर्यः
4-
काकू
विज्ञानात्मा
(प्राकृतात्माधिकरणे विज्ञानात्माधिकरण तृतीयम् )
गायत्रीमाधिकवेदावच्छिन्न -विद्या अविद्यामयात्मा
विधारमा
१-अन्वं तम प्रविशन्ति येऽविद्यामुपासते ।
ततो भूय इव ते तमो य उ विद्यायां रताः ॥
२-श्रन्यदेवाहुर्विधयाऽन्यदेवाहुरविद्यया ।
इति शुशुम धीराणा ये नस्तदिचचक्षिरे ।।
३-विद्या चाविद्यां च यस्तदेदोमयं सह ।
अविद्यया मृत्यु तीा विद्ययामृतमश्नुते ।।
(ईशोपनिषत् ९, १०, ११, मत्र)

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विज्ञानात्मस्वरूपनिदर्शन- एको सो मुबमस्पास्य मध्ये स एवापि सनिले समिविय । तमेव विदित्वातिमृत्युमेति माश्प पन्या लिपवेऽयनाप ॥ (पे०६।१५)। स विभागनिदारमपोनिन काबकासो गुणी सर्पविष । प्रपानक्षेत्रापठिगुणेश संसारमोहिपतिमधहेत ॥ (पेता० ६१६)। स तन्मयो अमृत सस्योन सर्पगने मुनस्यास्य गोप्ता । यईयेऽस्य जगतो निस्समेव नान्यो हेतुम्पित ईशमाय ॥ (श्वेता. १०)। पदा तमत्वम रिवा न रानि सम्म चासचिव एव केस । तदादर वत्सपितुर्वरेण्य प्रा च तस्मात् प्रसता पुराणी ॥ (श्वेता० ॥१८)। रिययगम समबचवाने मूतस्य बात पतिरेक भासीत् । सदापार पृपिली पामुठेम करमै देवाय हविषा निषेम ॥ (या )। योरपना प्रथम पपस्तते तत सूर्यो तपा वेन भावनि । भागा भानदुराना काम्म सचा यमस्य धातममृत यमामहे ।। (अ )। ("वत् सवितुर्वरेण्यं मर्गो देवस्य धीमहि धियो यो म प्रचोदयार") प सेतुरीमानामामटर म पत् परम् अमय तीपा पार माचिकेत शकमहि ।। (ठ० ॥३२)। विमानान्मा सह देवैरब सबै प्राणा मूतानि सम्प्रतिष्ठन्ति यत्र । वरचार वेदयो पस्त सोम्य स स सर्वमेवाविवेश । (प्र. ११)। एतेषु पपरते मानमानेषु यषा कास चातयो माददायन् । वमपन्येवा सूपस्प सम्यो पत्र देपानी पनिरेकोऽधिवास ॥ (मुण. श)। मनोमय मारनेता प्रविष्टियोऽन्ने एप सम्मिाप । तद्विशनेन परिपश्पन्ति धीरा पानन्दरूपममृत परिमाप्ति ॥ (मु० २ २१७)। हिरण्मये परे को निरन प्रम निफसम् । तभ म्पोतियो म्पतिस्तपदात्मविदो वितु ॥ (मु० २२)। स सुविषमरतरिचसोता वेदिपदतिपिदुरोणसत् । पारसमसामोमसदरमा ग्रेगा प्रतिमा भद्रिा मृत शत् ॥ (फ• २०२

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॥ श्री । तमेव पीरो विमाय मा कुठि प्रामण । नानुभ्यायामाम्म्दान् पापो पिग्सापन दिवत् ॥ नीहारवारयनसारमपाकरामा फरमापर्दा फनकपम्पकदामभूपाम् । रतापीनकुषम्ममनोहरामी पाणी नमामि मनसा बयसा निमूदै ।। म्पक प्राण से स्वयम्भू प्रकट हुए, खपमझरूप पोनि में सक्षम रूप भाप रेत का प्रादिवरामावरिश्वा नाम के रेवोपा परा भाषान होने से प्रादापत्य परमेष्ठी उत्पमए । भम्पक सयम्भू वेदामि प्रधान होने से सस पा, म्मत परमेष्ठी मप्रधान होम से भूत -"मेर परमेष्ठी" । त रूप यही मग्रम भईमाव की प्रतिष्य , इसी माघार पर :-'महमस्मि प्रयमना भूतस्य पूर्व देवेम्प" या करा पाता है। इस अवरुप मापोनि में तीसरे मार नाम के रेत की पारामावरिमा माम के रेतोषा द्वारा मापान पुमा। इस बार रेत के भाधान से संबस्सर का गम पुथा। पही सासरामि मागे जाकर 'स्य' रूप में परिणत तुमा । समसरारमफ सूर्प मापोमप परमेष्टी समुद्र में लो कि पारमेष्ठप समुद्र 'सरसान्' माम से प्रसिद) विचरण करने वाटा एक सुपर्ण (समहरे पसबाना पची) है । दक्षिणायन इस का दक्षिणपद, उत्तरायण इसका उपरपद , सिवाय इसका प्रास्मा है । पदमा, पृयिनी, पान्दमीप, पार्थिवमीच यह पा सुपर्ण इस सक्सर सुपर्म के उदर में प्रतिष्ठित राते है, अतएव इसे 'मामपर्ण' कहा जाता है। नितिस सरसयामक इसी महामपर्म का निरूपण करते हुए पेदपुरुष कहते हैं- "अप र पाप महासुपर्ण एम यत् संपत्सर । वस्प यान्युचरस्वादिपुरता परमासानुपपन्ति-सोऽन्पवर पदा, मप यान पापरिशत सोऽन्यवर, मात्मा रिपुवान" (शवा. १२२२१७)। - माहवार माशोपनिषत् - मासुम्प में सब महामुपागमक (सरसरात्मक) माटोमप यह सूर्य पमपमा विम के मम्प में प्रतिष्ठित । मध्यभाग 'दय (केस) कराता है। लिस प्रकार सांगरीर की प्रतिष्टा 'दय', एवमेव पनपा निवशरीरात्मक चिर के इस महाशरीर की प्रतिथ्य एयरूप पूर्य ही- "मादिष्यो में पिसस्य दयम्" । यह सूर्य सानिमामिमय है, पमि को रिएपरेवा कहा नावा।मतएप इस स्पप्रजापति को 'हिरण्यगमनापवि' मरा जाता है। यही सौर पुरुप उपनिपदों में 'दिरएमयपुरुष' नाम से प्रसि ।। दिस महर्षिन सब से परिसे इस हिरण्यगर्मविगान को पहिचाना, पप गार्षि मी निरपयगर्भममापति नाम से प्रसिद्ध ाए। Rरएपार्म अपि का मत है कि सम्पूर्ण निम की मूस प्रविष्य हिरण्यगम (सूर्य) हो । विध प्रहिम हिरण्फार्म का विकास होता है। स्वयम्म, परमेष्टी, पन्द्रमा, पपिपी या चारों पर्व बिरयपर्म के पश्चात् प्रकट हुए हैं। इन कीमध्यभूमि, सकप संपादक एकमात्र विमाविष्ठाता हिरगर्म प्रगपति ही है। उधर विश्वकर्मा सम्म् के पश, भएन विधामा माम से ही प्रसिद्ध मार्पि का कहना है कि सर्वप्रपम निर में साम्पा समम्म् ही सव को म्पन्न करता मा प्रकट होता है-"त्व म्यसम्ममगमानम्पको प्यमयभितम्" । परमष्टी- पूर्व-पन्द्रमा पृपिनी नारों पर सपा के पभाव, प्रकट हुए । इन चारों की मानप भूमि सरूप सपादक एकमात्र विभाषिष्ठता सपा प्रत्यपति दी। प्रणमामिपा प्रमम प्रय मार्षिों का कहना है कि पृथिवी ही सब की मम प्रतिष्य है। सप प्रपम मिन्ध में पृथिरी ही प्रकट है। पहिले मा है, धनम्तर मुब-ख (सूप) मावि सोकों का विकास मा ।सयम्भू-परमेष्ठी-मप-चन्द्रमा या चारों परिपूथिनी के पपात् प्रकट हुए है ।ल, पारों की मामपमृमि मरूप सगदक एकमात्र विवाधिष्ठाता पार्षिषममापति दी है। इस प्रकार मुठियों में पटिपिपा के सम्बन्ध में परस्पर में सर्पपा विस्म तान मत उपसम्प-होते हैं। स्मयम्भमनासहि प्रपम मत , म्पमसामणि रितीय मत , पपिबीमसासधि तृतीप मत है। स्पोपनिषत् में समा भूमसामणि कोही प्रधानता दी।सदिता में तीनों से सरियों के समपा प्रमाण उपसम्म होते, असा कि निम्म सिसित चनों से स्पर होगाता है।

प्रास्तास्मा नाईरोपनिषत् ॥ सुप्रिमतवार १-खयम्मृमूलासृष्टि प्रथमा-- 1-~-य इमा विधा मुवनानि जुहापिोवा म्यपीदद पिता नः । स माशिपा पिणमिरहमान' प्रयमच्छश्वरी माविवेश ।। २---किंस्विदासीदधिष्ठानमारम्मण फतमवस्वित् कयासीत् । यो भूमि अनयन् विश्वकर्मा विधामौर्णोन्महिना विश्वपझा ॥ 1-मिलतपतुरुव विभतो मुसो विभतो बाहुरुत विश्वसस्पात् । सं पाहुभ्यां पमसि सपप्रपामा ममि मनपन देन एफ' । -यावे धामानि परमासि यारमा या मध्यमा विश्वकर्मन्नुतेमा । शिवा ससिम्पो इपिप बघायः स्वर पजस्थ तन्व पाना ।। (पयु स०७०।१७-१८ १९ २० २१ २२ २३ २४-मात्र)। C- २-~-सूर्यमुलासृष्टिर्दितीया हिरण्यगर्भः समयमाने मृतस्प माता पविरेक मासीत् । स दामार पृथिवीं चामुमो कस्मै देवाय हरिपा मिरेम ॥ (पन्जु १३), २-चित्रं देपानामुदगादनीके पर्मिस्य वरुणस्याग्नेः । भामापावापयिची अन्तरिक्ष सूर्य भात्मा भगवस्तरघुपम ॥ (प) १-येन पौरुमा पृथिवी चहलया येन स्व स्तमिव येन नाम। यो अन्तरिक्षे रनसो सिमाना करम देवाय हविपा रिपेम ।। 1-प्रजापते न तदेतान्यन्यो विश्वा नावानि परि वा पमूम । यत् कामास्वं जुड़मस्तमो अस्तु पर्य स्पाम पतपो रयीणाम् ॥ (सक् स० १० में । १२१ स०)। ।

प्रापमा
- ईगोपनिषत् ॥
पानी
३-पृथिवीमूलासृष्टिस्तृतीया
-सासशीपर्पा पुरुपा सामाव' ससपात् ।
स मूर्मि सम्व स्पस्वास्पतिष्ठादशाहसम् ॥ (पशुः )।
२-मदिविषारवितिरन्तरिदमदिविमावा स पिता स पुमः ।
वि देवा श्रमिति पचनना प्रदिविनावमदिविनित्यम् ।। ( 11१.)
३-इयरे देम्पदिविपिनापी"(प्राजहा)।
४-"इयं र पाएपो सोफानां मपमासम्पन" (शव० दा)।
५-"पूर्य मगवी पस्यो हीद सर्व जगत" (शव ६१।२६)
६-"पिम्पामिम सोका (मतिष्ठिवा) (ज. २०११.२)।
.
इन ठीनों घधिविधाओं का सपनिषदों में मण मोगररिया (
सपा), प्रदूगीष
पिया (सर्पमिया), प्रणारिया (प.निषा) इन नामों से निरूपणमा ।। लपम्मू से भा-
रएम मानकर पृथिवी पर मासाम मानना भोकाररिया , सूप को भारम्भ स्थान मानकर
उपर परमेष्ठी सपम्म् पर, इमर कन्दम्य एवं पपिपी पर पर्यवसान म्यनमा ग्गीवविधा,
पृषिपी को मा मानकर सपाम् पर भवसान मानना मणपिया। सफामू निगदपाप
अ मस्तक है, भतएव इस मचा को 'शिरोमूसारिपा' काना चाहिए । सूर्प निरादयस्प
कादम, भवा इसे 'पदपममारिया' समझना चाहिए। एष पपिी पाद स्थानीय मत
से पादमूसायष्टिविया करना चाहिए ।
पुण्पने मो इसी वर का मापार मान कर तीन प्रकार से सठिीषा का उपाय
किया है । "प्रमा से सारे विश्व का भारम्म हमाई, सारा दिन माम" या पुषण
•पणासपारण में पुलिस से से सृषि का नाम मा मसा है-(परि-

प्राक्रवारमा शोपनिषत् मित का एक मत है। "विपणु से सारे पिच स्त्र निर्माण प्रा के सम्पूर्ण विश्व वैष्णपरे" पा दूसरा मत है । एष-"मोश्वर (मासदेन) से ही विश्व का मन्म स्थिति मैग हुपा है, सारा वि माहेपर" यह तीसरा मत एप ब्रह्मपुराण को अप से इसि सक देख आइए, वह विष्णु महेअर मावि इतर सम्पूर्ण रेस्तामों को गौरस पतलाया गया है, प्रभा को सव का भाविप्रपाक यसखाया गया है । इसी प्रकार विप्मपुराणने मप से इति एक सब देवताओं की अपेक्षा विष्णु की प्रभामम का ही निसपण किया है। शिवपुराण एकमात्र मरेपर को प्रधान देवता मान रहा है । सस्बिाद के रहस्य को न सममनें के कारण ही भान रक्त मिम मिम पुराणों के अमाशों को उपन्यस्त करते हुए शप-चप्पर मुशामुनि कोही परम पुरुपाप समझ रहे हैं। सायम्मुव ब्रमा छानचि , सौर मिष्ण क्रियाधि, पार्थिव शिव भर्यमूर्ति। एक ही विराट् पुरुय के तीन अपत है । प्रिधि की समयि ही प्रधाम है। इस सम्बन्ध में प्रश्न यह उपस्थित सा कि उक्त तीनों मतों में से किसे सचा कहा चाप ! सख्म एक हो सकता है। उपर वीमों की मत घेदामिन जने से मान्य है। परन्तु मान्य वे हर मी सदेह के जनक अपरप हैं । इस सखे की निवृत्ति के लिए भापको उपदभूत मायुर्वेद की शरण में जाना चाहिए । सदेहरूप मागावकमर पो निवृष करना चिकित्सा शास्त्र का ही कार्य है। रम-शुक्र के मिभुमभाष से गर्मस्पिति होती । भागे माकर गर्म कमरा पुष्ट होता दुमा १० मास में सर्वानपत्र सपन बन माग | गर्म के सरकप में प्रश्न उठाया जासकता कि गर्भ में पहिसे मस्तक बनधा! पपवा परि हदप का विकास होवामपणा पर नामि का उदय होता है। किंस्य पहिले पकारायगुर का मानिमान होता है। इन प्रमों के सम्बन्ध में मिपम्बरों के मिन मिल मत है । कुमारगिरामरदाम के मवानुसार पहिसे क्षिप गम का गिर बनता है, मनम्तर मम्प भवयों का विकास होता है। इदम ही (र- पस्प प्रज्ञान मन ) सब इन्द्रियों का मासान है। जब तक दप का विकास नहीं होता, १- 'संशपारमा पिनरपति (गोवा)।

मास्वरम जा रोपनिपात् ।। गर्ममिका । तब तक पनु, मोत्रमणादि इन्द्रियों का विकास कपमपि समन मही" इस कारण को मापने रसते पए कामपन पारीक माम के पेप गर्म में सर्वप्रपम पदय का विकास मानते हैं। मदकाप्प के मतानुस्मर मामि पहिसा भाग है। मामि द्वारा ही मावात रस से गम की पुष्टि होती है। भद्रगौनको मतानुसार माघर के मागमन का साधन बनता हमा पाशपगुद परिसे विकसित होता है। परिग के मतानुसार पहिले हाप फों का विकास होतोपदेश मनक के मतानुसार पहिले इन्द्रिय का विकास होता है। मरीचि महर्षि के पुत्र प्रतएप मारीचि बा मारीप नाम से प्रसिब महर्षि कश्यप का करमाकप सब परोच तिपय है। गर्मच कौनसा मग पहिले बनता है। यह इन्दिपाटोत विषय है, पता इसके सम्बन्ध में-"इदमित्व मेव" इस प्रकार निषफ्रूप से कुछ नहीं कहा मासता । इस प्रकार इनके मतानुसार पर लिपप ही भपिल है। भगवाम् पन्वन्तरि करते है-सारे मग एक साप बमते है । समी भवपम परस्पर में भम्पोऽम्पत्रिवत् । मतः इमका युगपत् ही सम्मन (उत्पत्ति) मानना ठीक होगा ।। इसी मत को सिद्धान्त पच मानती परकसरिता करती है- "समाजनिति पुगपत्-ति पन्वन्तरिः । तदुपपर्म-सिदस्वात् । न च वस्मात प्रवामिनि चिरपाम् । तस्मादयपूर्ण सामानां तुरपकासामिनितिः । सर्वमा पन्योऽपाविपदा, तस्मापवामूर्व दर्शन साघु" (परक स, शारीर स्पान ६ विषयाभ्याय-१९४) इस प्रकार मापुर्वेद के मतानुसार माध्यात्मिकपुरषोत्पत्ति में समी माया एक साप उद पम होते है, पापि सूक्ष्मरमानुसार कुमारगिरामरदाम के मतानुसार पहिले मस्तक की विकास मानना पाता है। बीमरूप से समी भरपब समानकासीन होने पए मी भरपन में परिसे मस्तक की ही प्रधान है। इस प्रकार शर्कराप मापि पहिले उदरच माण के पुत्र पहिले मप र प्रियस मानते । (ऐ मा २।११५१) । इस प्रकार भूतियों में मी मत 'पार।तपापि कहाँ समिविकासक्रममा मस्तकोत्पत्ति के प्रापम्प को प्रगन मामा गम 1,पैसा कि श्रुति करती है- प्राचारमा या ईशोपनिपत् ।।3- ऋमिकापिकास । "शिरो पो भये सम्भवतः सम्मपति । चतुदा निदिव- घशिर -प्रासमतु:श्रोत्रं पाम्" (at० मा. २२)। "शिरो दिमयम मायमानस्य मायते" (शव० ८२८)। विकास मी सबसे पहिले मस्तक का ही होता है, एक "शीपतो माऽ नायमानो मायते" (एत० ।।१।१५) के अनुसार प्रसरकार में मी पहिले मस्तक ही भाप्रणी मनसा है। शिर सचमुष सष्टिक्रम में प्रमही है। तभी तो जरा पा प्रकोप समसे पहिले मस्तक पर ही होता है-"यस्माग्छीपरयेषाग्रे पतितो मपति" (गत ११।१।१।६।) । इसी प्रपममाव के कारण प्रपमणि के तर मनुष्य को शिरस्पानीय मुरूप) माना नासा है । गर्भ की स्पिति स्दय से ही पती, यही पीकन की प्रतिष्ठा है । विक्रम में पैरों की प्रधानता है। यही मम अदिक्त में सममिए । पीनरूप से मा-माप वागादि पापों प्रतिए समकालीन है। परन्तु यष्टि (उत्पति) क्रमानुसार पहिसे शिरस्यानीप मयम्मू का विकास होता है । इस एष्टि- फ्रम की अपेक्षा से स्वायम्भुव झा का ही सम्प्रमामस्व है । ममा ज्ञानप्रधान मान-पथ- क्रिया तीनों मम्पोऽम्याधित हैं, सयापि प्रापम्प मान का मानना परता है । विम की स्पिति सूर्य पर निर्भर है। सूप से ही महदमझ में त्रैगुण्य भाव का उदय होता है । मिगुण- मानापम मार मबतक है, तबतक गरिजब तक सूर्प है, समी तक गुणोदप है । फसव सूर्य का विवस्पितिस्थापकल मसीमति सिद्ध होमाता है । इस स्थितिक्रम के अनुसार सारे विश्व में सौर मिपा नाही साम्राज्य है। हमारी पशि परिने पृथिवी पर परती, मनम्तर मूर्य-चन्द्रमा-परमेष्ठी की घोर हमारा ध्यान पार्पित होता है । इस टिझम के अनुसार सारे विष में पार्थिव पोभर का ही सामाग्प है। मानपान सृष्टिझम, फर्मपधान स्थिति- फम, भर्यपान रष्टिक्रम की अपेक्षा से उक्त तीनों मुशिविपामों में कोई निरोपमा । सयम्भूमहासरि -शिरोमसा--सरितमप्रधाना पिपा (उत्पचिमुसा भोरसिपा) २-म्पमसासरि--पमहा- -स्पिसिकमप्रधाना मिप्णुविधा(स्पितिम्सा-उद्गीपविषा) २-पृपिनीम्सासरि पादमसा -रविक्रमप्रपामा महेशविघा (नामसा-प्रणबविपा ) - परिवार पिकिसाकाग घरामकाज उपनिरवकार माहवारमा हाईपनिषत प्रात प्रकरण उक्त तीनों सरिभारामों में से हिरयपगर्म विपा नाम से म्ममात पिर पाने योग्य सूर्पविषा का ही निरूपण करता है। उसी का उपवास करना प्रस्व प्रकरणार्य है। मिपाकर्ममप भम्पय पुरुप मित्र के पांचों पों म्याप्त है। इस प्रस्मय प्रमाण यही है कि निष के समी पदापों में शान एष क्रिया (कम) की उपसम्मि होती है, जैसा कि पूर्व के प्रकरणों में विस्तार से बताया नाचुर है। मपप का निपामाग पदापों में शनरूप से प्रतिष्ठित है, फर्भमाग कियारूप से प्रतिष्ठित है । निस्प्रेरित विधा-कर्ममाग को 'प्रम 'कर्म' गग्दों से पत्राप्त किया जाता है, पही इसके दिम्पहप है-'म फम च मे दिम्पम् । -सोपाधिक नही बम-वर्म ज्ञान-क्रिया नाम से प्रसिद्ध है। इस प्रकार यपपि स्वयम्मू-पर मेष्ठी-एप-पन्द्रमा-पिती विस के हम पानों पों में (प्रत्येक मान-क्रियारूप से पम्पप के सपा-कर्म दोनों भाग प्रतिष्ठित है, तपापि इन दोनों की पूर्ण विकासममि मध्यस्प सूर्य ही माना जाता है। स्य विध का कन, तर पर्व परिपिस्पानीय केन्द्र में सब ठलियों का पूण विकास राता है। मुतरी केन्द्रस्थानीय स्र्प में सम्पप के घनरूप विपाम्पग कर, एवं कर्मरूप परिपाभाग का पूर्ण विकास सिम होजाता है। यही फारण मिस के मौर किसी पर्ष के लिए 'दिपा पारियो प यस्तदेवोमयं सा पान का कर स सूर्प को ही विपा-प्रनियामक माना गया है। भपि च सापडा प्रनामहा पुरोगाप ममापति' गीता ॥१.) इस सिद्धान्त के मनुसार पन से 0 सिपमा का निपाख होय है। यह पा 'ममा' 'मिसा' भेद से दो मारें में विमलापही दोनों पा सबन-चपन नामों से प्रसिद्ध है। मुमापा सोमपान १, सोन कर ही सकम होता है। लिसाया प्रमिपान, ममि काही चपन होता है। ममि में सोम की मारी होने से मोरापाप प्रमिोम, इष्ण-गुबसपाप दर्शपति- स, प्रीप्य नपा-गीतनुरुप धातुमास्प, उपरापण दक्षिणपनप पशुपम्प, सरस्सर फप पोतिटोप (मोमपाग-किंगामापाग) इस कम से सोमपा पाँचमाग में सिमा रोगाता प्रास्वारमा आरोपनिषत् ॥ मुस्ता-पिता है।इन पांच मायवों के कारण ही मुसायन को 'पालो के यमः' (शत ११॥६) के मनु सार पाडू (पश्चाक्पः) कहा जाता है। ममि में सोम की माहुति होने से पायतन हदि नही होती, मपि वरिपति की रक्षामात्र होती है । इस प्रकार पनि में सोम की माहुति होने से पार मुस्मापा सपम होता है। निगरण किंवा विसयन इस सोमाविरूप सम्माया ति सबन या का सामाविक धर्म है । भनि में सोम गव दीचिए, अग्नि उसे 'निमस' बायमा, पी गा यगा, इत सोम का भग्नि में पिसपन होचायगा, भव सोम की दूठे से भी नही मिलेग्य । दूसरा रिसायन । ममि में ममि की भाति दो से इस ममिया का खरूप निप्पन शेता है। ममि अमि का निगरा (एसम) नही कर सकता । मत्तएष इस यज्ञ में मायसम की परि होती है । पह अमिपा मी अमितायु मादिस दो साभ्य मायामि के मेद से पांच ही भागों में विभक है । प्रयिचिति से पूपिनी का, पापुपिसि से प्रम्हरिद का, मादिसमिति से गुमोफ का सरूप निष्पम होता है । पित्री-अन्तरिक्ष की सधि में, भन्तरिक एस पुसोक की सन्धि में दो मग्नि और पित राते हैं । इस प्रकार एक ही पनि भवस्था मेद से पचषि तिफ बन जाता है । इस पितिया से तो पस्त का साप निर्माण होता है, एष उत्पन कस्तु की सरस सचा मुबाया से होती है। प्रकारान्तर से यो सममिर कि उत्पति सोपया से शेती, पुदि ममिया से होती है स्थिति सोमहा से होती है ।मापन्त में सोम है, मध्य में ममि है। सूर्य ममिमय है, इसके उस मोर पारमेष्टर सोम है, इस मोर चान्द्र सोम है।मप्पारमसम्स्पा में इस रिपति का प्रस्मत कीबिए । शुक्र रेत) सोम है, शोणित (पनिरूप-पासक-रग) मसि है। इस रखरूप पोनि में वीर्यरूप सोम की माइति होने से गर्भ का उदय होता है । इसप्रकार उत्पत्तिकात में सोमण की प्रषानवा है । भागे चाकर क्रमशः गमाषपर पड़ने सगते है, यही पपिपिति है। भस्थि-मांसादि की पिति ही अमिचिति है, ही पदि का कारण है। मनरूप सोपति से इस पिमाग्निमय समीर पिपा की स्पिति एती है। प्रात -साप होने वाले प्रमाविरूप इसी दैनिक सोमया से सरीर सखरूप में प्रतिष्ठित रावा है रस्प करे पास में रस कर पानिपुति करती है- इसी पपन २२५ प्रास्तारमा माईसोपरिपत् । पादित "तपत पब षिवीमिनोवि, एवामिरेवन चमिमिनोति, यषिनोकि- तस्माधिवया" (०६।१।२।१०)। "पबतम्रो म्पसपन्त- सोम, सक, मांस, मस्ति, मना । वा एता पथ वियाग ( मत. ६ । ।।२।१७)। "qध ते प्रपयो यदेवामितया (एन० - २।१।११।)। उल दोनों फों में पुरमा, किम सोमया का अधिष्टयता भापोमप परमेष्ठी एवं पिष्म किंवा पक्रया का अधिष्ठाता पास्मय पुर्य ।। परमेष्ठी सोमप्रधान है, सूर्य समि- प्रधान है । मुत्या सोमप्रचान, पिया ममिप्रधान है। उत्पति का मूस मामय पथ परमेष्ठी (सोमया), कास का मजाक सूर्यया (भमिका)। बब तक उत्पम बस्त पिस्परूप में परिक्षत मही होगाती, तसा उस की उत्पति भनुपपि के समान है । पर मेष्ठी की उत्पादकराशि का विकासस्पान सूर्य है। महत्परमेटी ही गर्भधारण करने वाली योनि ६ परन्त इस गर्म का प्रजननरूप से विकास सौरसत्ता में ही देता है। इस से यह मान सेना परता है कि सूर्य से उपर उत्पादक योनिरूप मानुभम के रहने पर भी किस्यामिपा के ममात्र से प्रजनन कर्म का मितान्त ममाव है । भौतिक-मार्य प्रभा की उत्पति का मूत उपक्रम सूर्य ।इस रहस्य को पास में रखकर पफ्नमुक्ति काकी है- "पौर्वात उचमा सपमातपणा, मादिस्प पचमा विलम्पोतिः । पापीनं तापरिवमादिस्पाय-मतून दमावि, वरमावर्षाचीवाव मत प-प्रपो पमननम् । एवंदापीनं पारिवादिस्पाच ममनन दपाति, तस्माद पीनपेगावा प्रमायवे ।स्पित (समान) लावा परार माननम् । पापमो मेष समापे देवास्तारन्दो देवा" (रातमा का ।भ । ११)। प्रयासधि की उत्पत्ति समय ( मौसम) होती है । एमप ही माम चतु। श्त निषों में ही विशेष पदार्प उत्पम होते । 1 समन ही संपस्सर । सरसर २५ माहवात्मा - ईशोपनिषत् ॥ पोग्यानि , की मुस्प्रतिष्ठा सूप है। मुतरी समरसरात्मक सूर्य से ही प्रयोत्पविक्रम का भारम्भ सिर होगाता है। चतुर्दशमिप मूवर्सग की प्रति का भारम्भ स्पान सूर्य ही है, जैसा कि मागे जाकर पर हो जाएगा । सूप से उपर ऋतुओं का प्रभाव है, भतएन भूतम्लक प्रमनन कर्म का भी ना समार है । निसप्रकार स्य से माघे नवीन मनीन पदार्प उत्पन होते रहते हैं, पुराने पदार्प मा होते गते है, वैसे स्य से ऊपर यह पम-मरणच मही है। तो सृधि के भारम्म में बिन मौखिक साभ्य देरादि का विकासमा पा, ही विकास भाव तक उसी रूम से विषमाम है। दूसरे गहों में यही परिवर्शन का मभाव , यही वसलाने के लिए युविने ~'यायमो मेब स- नाग्रे देषास्तारन्तो देवा (रात 1) यह कय है। मद्गम निस चिदास्मा (भम्पय) को भपमें गर्म में धारण करता है, उस का पूर्ण से कास पितिमा सूर्य में ही माकर होता है। सूप से उपर परमेष्ठी में विदामा माता, परम्त विसयमभमा सोमया के प्रभाव से बह विलीन हो जाता है, यहाँ केस गर्मसधा है। महनन के गर्भ में स्ने बास उस पोरकीपुरुष का विकास सो सूप में ही होता है। निधारमा की गमभूमि मानम ( परमेशी), प्रजनमभूमि सूय है। परी कारण है कि यमा मातिक सयम्भ, विष्णु प्रहनिफ परमेष्ठी, सोम प्रकृतिक चन्द्रमा, प्रमि प्रकृतिक म, इन्द्र प्रतिक म्प इन पांचों में से इन्द्रप्रावक सूप को दी पोरगी' कहा माता है। क्योंकि पोशीपुरुष माम से प्रसिद्ध पिलरमा का पूर्ण विकास करत हारमक रूप में की होता है-"मसी प पोरगी पोऽसी (सूर्यः) सपति" (कोमा १७ सी निशरमा के पमध से इन्द्रवत्त इतर प्रकृतियों की अपेक्षा पोरशी प्रगति की ज्येष्ठ श्रेष्ठ सन्तान कराती है। पिता का ही पुत्र मेट-पस श्रेष्ठ (सरत) कासार, मो सिदा के यसको विगुणित करता है। मिस पुत्र से पिता का परा संसार में फसता है, वह पुत्र श्रेष्ठ माना जाता प्रमा-विष्णु-म्-भमि-सोम मेद से पोडी प्रनापति के पाप पर है ।हम पांचों में साम्पेष्ट प्रमा, सबकनिष्ट सोम है, विष पुत्र इन्द्र (स्य), सौ पुयनें गिमाप पिता का परामपत्रिसोको में साप सूप के दागी मिस में भारमम्पोति का प्रसार २७ माहवारमा नारम्पनिषत् । - एमरिया मा-"म्प मारमा भगतम्यम्पुपम" । इसी सुपती के कारण प्रजापविन विम के सबसे ठचे भासन पर (पदय सबसे उप कामावर, एवं पिस के हृदय में हास्य प्रतिष्टित प्रति- टित किया है। यहीय पुत्र का सपम्मेष्टच, एक सर्वश्रेष्टन। इसी प्रमिप्राय से महापामण भुति करती है- - " "स (पोरगीपनापविभिदास्मा) ऽकामयतेन्गे मे प्रमार्या श्रेष्ठः स्यानिति । तामस्म सग (विमयमात्ना) मसमुचत् । वो या इन्द्राय मनाः श्रेष्ठपायादि पन्त-छिप प पन्त " (AT० प्रा० .६ रोपवेपानामोनिष्ठो, गमिष्ठा, सहिष्ठः सनम पारपिप्पदम" (पे० प्रा० १६) सर्व पा पदमिन्गय तवस्थानमास पन्दि किष" (गव ) "उदयमद्र" (शत० १२५)। प्रेसोरप क्या है, किसी पर शिम्पी का सोस्कर शिरस (कथरीगरी) शिम्पी पही रामपइपुत्र के इस ए शिम्प पर प्रसन्म शेकर दो प्रगापटिने इसके ग्ले में निगपमास टासी है। इसके इसी शि से प्रमानित होकर (सका सोश मामते पर) को प्रगानें इसे श्रष्ठ माना है-'भमा श्रेष्ठघायाविष्ठ व वछिप परयन्म "(१६४३। सपमुष एक ऐसी ही वस्तु है। सारा लिय इन्द्र से पूर्ण है। योप में ऐसा कोई स्थान नहीं, या 'गुन' नाम से प्रसिद्ध इन्द्र का साम्राम्प न हो। जिसनें मप्परितु पो पहिचान लिग, उसमें सब कुछ समम सिप्प । इसी लिए काशिराममवदन को एम के पमिमामी देवताने का -'पवेदेवार मनुप्पाप तिवम मन्ये पन्मा विजानीयात्। (मैं मनुप्प के लिए भी परम पित समाजोशिप मुम (पन को) सममगप)(को. १)इन्द्र की इसी सर्प- म्यरमा, एस सरता का रिएन पापी हुई मन्त्रभृति करती है- 1-पपार इन गर्व दे गर्त मृमिहत पुः। न सा पमिम्मान म्या प्रनु म मानमर रोदसी ॥ (म. प.)।

तरमा या ईशोपनिषत् ।। पिमूर्विस २-र्यस्येव ररमयो द्वापयित्नयो मस्सरासः ममुप साफमीरते । वन्तु सव परिसर्गास भागयो नेन्द्राहते पवते धाम किचन ॥ (RELESE) ३-दो दिन दिई पृषिष्या इन्द्रो अपामिन्द्र इत् पर्वसानाम् । इन्दो पामिन्द्र इन्मेपिराणामिन्द्र मे योगे इम्प इन्द्रः ॥ (श्च २०१८६1१०1) ४-लकिरिन्द्र मदुघरो न ग्यायो अस्वि वृषान् । नकिरेन पथा स्वम् (श्व० 4211) प्रकारातर से न्द्र की श्रेष्ठता का विचार कीजिए । सम्पप-प्रधर-पार की समधि पोशीपुरुष है। इनमें मम्पप वानप्रघाम है, मदर नियाप्रमान पर मर्यप्रधान है । धान प्रधान मम्पय, मर्पप्रधान पर दोनों का मम्पपरित क्रियाप्रधान मदर के साप समय।। मत महर बान-किया-पर्य वीनों विभूतियों से युक्त होमाता है। पर माम से प्रसिद्ध भम्पय केस वानप्रधान ही, प्रम नाम से प्रसिद पर केस मर्यप्रधान है परन्तु मप्पस्थ मपर बान-अप के सदश में पतित होता भ्य भिमूर्णिप्रपान है, जैसा कि करमावि करती है- पतधेनावरं प्रम (घर) पदपेलावर परम् (अव्यय)। एक्स्पेमावर मास्था यो यदिग्छवि सस्य पद ॥ (फल० १।६।१६)। सपम्मू परमेष्ठी सम्पपमपान है, पन्द्रमा प्रपिकी परप्रधान है, जितु मप्यस्प सूर्य मदप्रवान बना वा परमधाम में प्रतिष्ठित मम्पप, भरमसाप में प्रतिष्ठित पर दोनों का सपाहक मनवा मा पोरगी बन रहा है। केरल मम्यप की ररि से विचार कीलिए । मम्पप का विषामाग प्रमन, सूर्य के कार इस की प्रभानव्य है।कर्ममाग मत्यु , सूप से मीपे इस की प्रधानता है। परम्प मापस्प सूप में दोनों का समन्वय । दिपा-मनिया दोनों के यदि भापको एक साप दरान करने वो इसके लिए विज्ञानयन सूर्य की ही शरण में गाना पोगा। सौर कर्ममाग ही मागे नाकर मारणहर में परिपत होता मा पाम मायामा नाईशोपनिषत् । छन बनकर 'पर्य' नाम से म्ययाय ने सगा है। इस प्रकार सूर्य में हाम (ARAT (कर्म), अर्ष तीनों की सण मिस शेगाती है। तीनों राशियों का सूप में पूर्ण विकास है। जानराशिमय होने से-'पियो यो नः प्रयोदया' (पन. २२॥३) या कारा पाता है । क्रिय ग्रासिमप होने से-'माण प्रमानामुदपसेप मया (प्रत १८) पा का मान है। एक पपरासिमप होने से इस के सिर-नन मना मर्पण प्रमता भयमर्यानि मासि' (ज) यह कहा जाता है। इन तीनों में मर्म का कर्म में वायत परमाप में प्रम-बम मेद से दो मता ही रह जाते हैं। ससार के मिलने मी कर्म है, सब सूर्य के कर्म मपग से सम्बन्ध रखते है । एष समार में चिवनी मी मनराहिर है, वे सब सौराम के मा- अप से समाहित है। इस प्रकार अपाता, सराय, नपा-प्रतिपारमक सूर्य भगन निब के मम्प में प्रतिष्ठित होकर प्रजापति का यश फैला रहे है । बिस दिन इनका रूप होगा पप, उस दिन सम ब.मनुपाम्पतम के गर्भ में विसीम होगापा । मामास एप्प गम (सम्पागम) है, सूर्मसपा पारागन (समागम) है। यही प्रमाति का पुपकार । । सर्म- रास्ता सूर्य उत्पम कैसे पाय प्ररन बस नाम है। इसके समाधान के लिए निम्न निसिय सरस्सररिपा प्रकारस पर पशिगसमी चाहिए। स्मरण पीलिए उस स्थिति का भबकि म पृथिवी पी नबन्द्रमा पा, न सूर्य पर। उस समय पनि पा तो क्या पास प्रमका सम्पभान करती मामहति करती है-- 'मापो वा दमये ससिसमेवास । वा मकामपम्प-कर्प नु प्रमामेमरीति । वा प्रमायस्वास्दपोऽसप्पन्ता वासु नपस्तप्यमानासु दिपमपमा सममूर। अनाठो ही संमत्सर प्राप्त । दिई हिरएमपाएट यापर सबसरस्म पेमा, वामद पर्पसरत । ततः सरस्सरे पुस्पा सममनन् ।+ + + । सब रिपमपाया पहनत । नाद तर्हि कापन प्रविष्ठा पास । वनमिदमेव शिर एमपागर पार सरस्सराय मासीचामिद पर्यमुपद । वानि वा एतानि ।

मकवात्मा ॥ शोपनिषत् ॥3- निखमार पचादराथि तान् पचलनकरुव, कम पचप सिएपमिमाटोकान् मावान् संघस्सरे ममापविरम्पुदतिष्ठत् । स सहसापुझे। + ++ समात्मन्पेष प्रमा विमपच ।+++Iस ऐचत प्रमापति:-सन माऽमरसारिप-प इमादेपवा प्रश्दीति-स सर्पस्सरोऽभनद । सर्नस्सरो नामतर-पत सरस्सर इति" (शत० ११ को० श)। "सिपी-पन्द्रमा स्यादि की नरपधि से पीसे समित (नाम से मसिद) पानी ही था। पानियों न इका की कि भपन कैसे चपन में चानुसार चन पानियों ने तप किया, मम किया। इस प-अम से तप्यमान पानियों में मुनारी मगा उत्पम हा । उस समय तक सत्सर अस्पम न हुमा पा। उस समय पारण्मयाएर पाह! वफ व्याप्त,महावक कि माम सवरसरचक्र की सीमा है। एक पर्प में पा (पुरमार से पुकता हुमा) पुरुप पनगपर। उस (भापोमप ममापति ने हिरएमयापर की मोर रष्टि समी। उस समय (उस भयर में ) कोई प्रतिष्ठा न थी । फेरस सबस्सर की सीमातफ ममापति उस हिरपमरायर को सिए हुए फिरवा रम। भागे भाकर पाय अधरों से भए स्पा की। इन मम्मों के सारे पापोमय मनापति एक वर्ष में उठ सड़ा हुमा । भागे माफर उसने अपनी प्रायु हमार बप तक यह किया । (इस से प्रजा उत्पन्न प्रमावि नाम से मसिद्ध उस ममा फो ममापति में अपने ही गरीर पर मतिष्ठित फिया । भागे भाकर पजापति ने विचार किया फि भरे ! इस प्रमनन कम में) प्रफ्न हो अपना सब कुछ लोठे । ममा- पति के इसी मापनमप मसरत का नाम “सर्वत्सर" एमा। पर सर्पस्सर ही भाग संवत्सर नाम से मसिद"। सर्वत्र भायोमय पामी या साषाम्य है। रस को "रा"40 नाता है। पर इरा नाम का रस ही ममि सम्मान से पन मन पता है । ममी प्रतिमि उत्पम नहीं मार कर २५१ माहवात्मा - शोपनिषत् ॥ होग पस्पा'" प्रायमबिमाप्ति का साम्राम्य है। उस समय पानी का रस माग सर्षमा प्रवासयोस, मनप्रविष्ठा का प्रमान। माएक सरिमापमपी-(पसरणीसा) इरा-(रसमागः) इस निधन से पानी की प्रापमा परस्पा "सरिर" नाम से प्रसिद्ध पी। पानी उस समय "ससिल" पा सच वापर्य यही है कि उस समय पानी का रस माग सरिर पा। सरिर ही ससिम का पोतक । पर उपरमाते राना, या प्रप्ततरम का सामा- कि धर्म है।चापोमय परमेष्टो म्वर्य प्रताप मत इसे म्पायत सपिच ही माना बासकता है। ममी "ना पाप साया न , सम (पिता -मार का उदय प्रमी नहीं हुमा है" यही बताने के सिए- 'मापो पाइदमग्रे सलिममेवास' यह करा गया है। इस पापोमय मानम के गम में मनप्राणवाम्मप सरिसाची सम्पय गर्मी बन रहा रहा है।का मना इसका ममपर्म ।इसी की कामना से मातरिण की रुपा से मुरूप पानी में समय होता है। बात यह कि पत परमेष्ठी का पानी वापुरूप है । यह पसबापु स्पिर पतरिया पायु से पितामा है। इस स्पिर वेन के भीतर गतिवी पासु परना स्यापार करता यता है। पातरिया की सीमा तक जाकर वापस लौटता है। यदि सीमा महोती वो पयुकोपर उपर निकल जाने के लिए पपाप्त परातस मिस माता। उस समय समप का मासर म भावा । परन्तु पिणखरूपसमर्पक मातरिया के पेन से युको निकसनें मसर नहीं मिलता। पर अपने पतिसमान से परस्पर में टकय गायु के इसी समर्प से माग्नेप परम्पण उत्पम होगाते हैं । मुकच सम्ररूप यसप्रयोग दी-सदोषस' माम से प्रसिद्ध है। या ममि इसी बस से उत्पमा मतएव इसे 'सहोमा' कहा जाता है। इसी सहोना ममि की मोगा- पस्या 'पा' नाम की तीसरी प्रति ।। पर पक्तम पही मापका सपरिचित, मर्यसरूप- समर्पक गायत्रीमाणिकरे। इसी मारव की उस पापोयोनि में भारी होने से उस सोमा पनि उत्पम मा ।'भप पर ससादी वासु पीजमबासमत्' इमारिरूप से मनुने बिस बीग घ उन्लेस लिपा पापी बागनम है। बीनावस्पापम बात भाप में मपात होकर संबर से अमितप से मासिव मा । मरे पामेष्ठा समुद्र में ममि परम्परारूप

पाहतारमा
बागीपनिपात् ।
प्रमोद
से म्याप्त रोगा। मातरिया बारा भय का सरूप बन चुका पा ।इस मापोमय भर में
चारों ओर ममि अतहर से भरगया । ममी पिरस मी मना, अपक्ष छमिपरमानुभों का उदय
हुमा, पी दिरयमयापर कागण । श्री अमिपुत्र 'घूमकेतु' नाम से प्रसिद्ध है। पही
धूमकेतु सूपपिस के पमक हैं। इसी घूमस का निरूपण करती हुई मन्प्रति पहती है-
(3)रयो घूमतमो पावमूसा प पनि ।
यवन्त हयगग्नयः । (भर सं. ८॥४)।
(२)-~एवेत्ये मयगयप दासा साधम ।
उपसामिम केवपः ।। (स )।
(३) अपय साधिष्टम सौपषीरनुरुध्यसे ।
गर्म समायसे पुनः॥ (वस० १४२६)।
(१)-पदप दिपिना मसि, अप्सुजा सहस्कृत ।
चस्मा गीर्भािवामहे ।। (धुर सं० २)
(५)-स नो महाँ भनिमामो पूर्यकेतुः पुरुमन्द्रः।
पिय पामाय नितु ॥ ( स० १११११।।
(६)-पदपुण्या अरुपा रोहिता रये पावजूवा सूपमस्येप से रवः ।
प्रादिन्मसि भनिनो घूममेनुनामे सम्पेमा रिरपामा पयतम ।। ( HEINDI
•(१)पायु से परिव समानुपए प्रति अन्तरिक्ष में पूषार पुपर मर्म से मारो।
(२) पूषा पूमार विवरण भने गाने या (भूमोमुरूप) पनि यो एप मद बनता
(यह म) प्रपये है।
(1)-मन । बाप का नियस्वाल पानी में है। स भाप कोनिया पर अनुमा पर नो मर्मय
प्रशिम (मोरिस्प से) सा है।
()-रेभपे ! आप पुरत में, पर्व पनियों में मपत्र में बात है। हेमस है भार (निस)
सुधरें। से भाप में हम परत से स्तुति करो।
(सियानाम होने से अनिमात-पीपस्थित समज), नान्ति समान
प्राविमा मनु माम का अमिमा युरि पर्व धर्म (पतय कमिए सबसे।
-

प्रारवारमा माईशोपनिषत् ॥ मोर भैदिक निम तापों का वही ही प्रसाद मापा में स्पष्टीकरण करने वाले अपान्तरतमा मानि के भरतार मगवान् रुदपापन (पेदम्यास) ने अपने सुप्रसिद्ध महामारत प्रग्य में सक्त धूमकेतुर्मों की उत्पति का पदा स्पष्ट प्रतिपारन क्रिया ६ स्म कि निम्न निसिन बहनों से सर- पुरास्ति मिल्माकारामनतमचसोपमम् ।। मापदापबन प्रमुप्तमिव संरमौ ॥१॥ न समिप्तमुपन्न तमसीवापर वम || तस्माच सचिसोपीगगुरतिष्ठठ मारूत ॥२॥ पपा भाजनमदिरा नि.सदमित्र वक्ष्यते ।। तपाम्भसापूर्पमास सरम्द करतेऽनिस ॥३॥ सपा सलिससने ममसोऽन्ते निरन्तरे । मिपएल बापु समुपति फेषाम् ॥२॥ स एप परते पपुरणपोपीरसम्मत्र । पारस्पानमासाप प्रणन्ति माधिगपति | तस्मिन् पापणम्मुमप दीसवेगा महारत ॥ प्रादुरमदगिम्न निस्तिनिर नम | (१) ! निग ममम भार बाम गाम (मारपी)ोस पुस रप पगार सरनी सीबतो भिास म PART बनाना स रा में (परिमें) में मनु मात्र से मार पात्रा! पार मामिमा रोने र समोसम'म मरा पाप नमरण र जनारमा रानीपी)। मोरया में पुपन ) in AIIM पगिता पाने रामनिमम गला THEIRA Aर मतमय भएमा प्रास्तास्मा - शोपनिषत् ॥ सपना मामि पक्नसमुक्त रख समाक्षिपते नसम् सोऽमिर्मातसयोगाद पनस्वमुपपयवे IIsn सस्पाकाश निपतित स्नेहस्तिष्ठति यो पर ॥ स संघातपमापम्मो मूमियमनुगमति ॥८॥ रसाना सर्वगभामा स्नेहाना प्राणिनां रूपा ॥ मूमियोंनिरिहया यस्पा सर्व प्रसूयते ॥६॥ (महा० शान्सिप० मोक्षप० १८१ माररखो १७२सो पर्यम्स) उक्त म प्रवर्णन एम पासपचन से पाठकों को विदित होगा कि भापोमय (गायुमय) महास मुद्र में तखत दोलायमान प्रस, सौरप्रकारात् प्रकारामान पातामिपुक्ष ही घूमनेतु ।। 'धूमकेतूनामेफसहस्रसस्येवि-मगिरवासमानास्ती नुसार पम्वेत संख्या में एक- सहम माने जाते है । पही साल मकेतु पूपायुक्त-'स सामायुमो प्रयापति की मातु के सात विमाग है। पही भमिपुध सूर्यपिया के उत्पादक।। कोई एकमा घुमकेतु (पशिमा पनि ) अमरा केन्द्र में संघातमाव को प्राप्त होता मा सर्यपिएसप में परिणत होगया है। प ममिपुध परिभ्रमणास पा प्रतएष सदुत्पान सूर्य भी रखापान पर घूमत्ता हुधा अपनें प्रमब परमेष्टी के चारों पोर परिषमा सय रस, एक सर घूमकेतु सूप के चारों मोर परिममा सगा रहे है। उचाप सान मेद से इन की परिक्रमा का काम अनववर्षों में विभक्त । मते घूमते भूमने तु मब सूर्य के समीप जाता है, समी पर हमारे एपिप में माता है। यही इस का उदय बात माना जाता है। परिभ्रमणशील भूमकेतु से उत्पम सूप के परि प्रमण से ही प्रवाशों से भागे जाकर शनि-मंगस-पृहस्पति-देवसेना-पिषी-उप-मा गर-कपिस--यह-मादि प्रपन एपक् भनेक भागोस उत्पम इए है। यह सब सूय के है । स्य पामी के गर्म में उत्पम हम्म है, मतएव इन गोसों में केन्द्र में ममि है, बादा मावस्मा - ईशोपनियत् - गोमेपरिपार पामी है । फेदम भग्नि प्रजापति है। यह भस्मदादि प्रमानिर्माण में क्रमशः विसस्त्र (स) होता गमा कम दोरग । जिस दिन भनि निरोप शेजायाय, मोसों का मायु समाप्त शेवायगा । एसी कम से एक दिन सूर्य म मा बापा, रा पापग्य ही ससिमावस्यापम के भापोमप समुद्र । मका उत्पच होगम, फिर मया सूर्य, नपा विच बनेग्म । विरघर के इस बिपक के मनापमन्त प्रवाह कोफन पानसक्ता है। सष्टि की उत्पतिक सम्बन्ध में पाश्चात्य चम्तने "मोमेपरिवार"(Nebular Hypothoes.) को प्रपामता दी है। इस सिमान्त के माविकर्ण केन्द्र और मामाप्स का कहना है कि "फिसी समप साग पिन सम्म पायुमय पा । उस समय वायु प विष चक्र की पर चारों पोर पम गा पा । भागे माफर क्रमशः मप्य भाग में पनमाप का उदय होने लगा। पार के माग के सम्बन्ध विच्छेद होमाने के कारण योविर्गोम ट टूट कर पृपा पृषक होगए । ये व गोसे मेसे पैसे ठरे होते गए, जैसे पेस पिपसवे गए, भागे माकर पह पन पमगए । इनका पातमाम वो कठिन गया, एवं मीवर का माग सप्णावस्पा में गा । इस मकार भग्तरिक्ष में भूगोमो श्री मपसिई"। छमना कीजिए पूर्व-पश्चिम दिवान की । दोनों में से कौन पथा में प्रपम प्रस । “पीसे पापु पा, पा पिएर पना, पिएर पिपस गया, फिर कठिन होगमा " इस पस्प का क्रमिक रपय किसने सब से परिसे ससार के सामने रस्सा ! मी पेद मार्षिोंने । भाकाय से पापु, आयु से पम प्रापि, पन भमि से तरस पानी, तर पानी से पुन: पन (पपिपी) मार- इस क्रम के (पम्मादमा परमादास्मन माकागा सम्मूता, मा कागदापा, पापोरपिा, प्रपेरापा, प्रम्पः पृपिषी, प्रविम्या मोपपया, भोपपिम्पोऽ में, प्रमाद पुरपा) प्रपम भारिकता है, हम अभूतों के पिता पितामह । मिन की कि सताने पेद का सिरहार कर मार के तवान पुग में अन् समानामिमानियों से पद दसित हो रही है। पाकरण-पाप-माप कर उसार नही कर सकते समारक-एक मात्र वेद । पविक विमान ॥ घेद एष दिमावीना निम्मेपसकरा परा"। " प्रारुपास्मा बागीपनियन्। सस्पाम प्रकृति का अनुसरण मीबिर । मापोमप (वायुमप) प्रभापति के गर्म में घूमकेतुरूर हिर प्मयाण से मागे माफर पिडरमक सूर्य का कम मा, चमों का विकास रामा, प्रभापति प्रमानिर्मास में युक्त होकर 'सर्वस्सर' का सपन्सररूप में परिसत होमर। गायबीमाधिक पदफ्न, प्राप्तवान्मय, इन्द्रापरमय संक्सरामिष्यता यही सूप सस्प का भमवार है । पियामि पर होने से पा सन। मपोमप परमेष्ठी सर्पमपम इसी सप्स को अपने गम में धारण करता है। सूर्य पानी की गहराई में प्रतिष्ठित है-"मां गमन्त्सोद" (P०७४%)। इसी सस स्य का निरूपण करते ए निम लिसित मौतवचन हमारे सामने भावे है- -वपत् यत् समं प्रयी सा विषा" (शत ०१०)। २-"स्प पापा सममेर घम" (शत. २।१।१।१०)। ३-"ससमेप य एप पति" (शत. १११।२)। -"पापो पै (सौर)-देगाना पियं पाम" (त० प्रा० ॥२.४१२)। सत्यम होकर पा हिरण्मयाएर पारों म्मेर समुद्र में घूमने सग्य ! मागे क्या हमा! मुनिए । मारिन 'सपासर' शब्द को कासशक समझा जा रहा है। परि किसी निशान से 'सपस्सर' शरद भर्प पूछा जाता है तो य उचर में २९० दिन के अषक 'पर्प' शब्द को प्रभाव के सामने रख देता।पक्षत सेरसर शम्द कास का बपक नहीं है, भपितु ममि का पापक है। इस सेक्सयमि के 8 पब रुप पाच नियत है । जिस मार्ग पर पृथिवी स्प के चारों मोर परिक्रमा सगाती, एमाग कान्वितच नाम से प्रसिद्ध है। इस क्रान्ति- पास में म्याप्त हो सोर ममि है, उसी का नाम संमसर है। या क्रान्तिमय ही ससुर की मा (परिधि-तर-मन्तिप सौम्) । सूप से पृथिवी ससम होती है । उत्पन कर सूर्य के चारों ओर घूमने लगती है। ऐसी परिस्पिति में भनि उपम हो तब हो सूर्य का सहा सम्पम हो, सूप हो तब पृथिवी बनें, पृपिषी हो तब संवसराप्ति की सीमा से। इसी अमिप्राप से सूर्पोत्पधिकार की पिति को बस में रखकर पति ने उस समय संपस्सर न पा, - , प्रातामा माशारनिपत्र भावमा - पान जो तुम सवस्मर की पेली देख रो रो, पहा तक सेवन अमि मरा हुआ था, पर्व परब मेग से घूम राया" या का। पृयिकी एक बर्ष में इस माम्यात्मक सासर के चारों घोर घूम मानी । इसलिए सासर राम का वापा बनता मा कास कर पारकपन पय । पस्तुप्त मिश्र पनि का पाक। सूप का जमापा, सिपा-फर्ममप विशमा का विकास हुभा । सारा मन पो केस एवं पुरवित होगया ! सूप में मो इम्यमाग । बर तो फम , एष पेतना मग रिपा ।सौर इन्द्र पम्पोनि का (प्रयरा ) पविष्टाता है। इसी म्पोति को भूतग्योति करते हैं। विद्यामाग मानम्पोति है। दोनों में अनुपाप-प्रनुमाएक सयभ।। भूतम्पोति बारम्पोक्ति पर प्रतिष्ठित , मनग्मोति माग्पति के पापार पर विकसित है। हमारी मुदिबसे मस्याम्पसस्मा को प्रकाशित करने बाचा मुब। एवमेव पर सूप प्रापिदविकसस्पा को प्रायशित करने बासी (इसर की) बुदि। इसमें मनिपा-मिपा रेनों माषों का सामाग्य है, पन एस इस में ग्याति मोर बम का उन्य होजाता है। दोनों भाव (प्रयेक) पार पार भगों में निमस है । म्पोतिपक्षण निपा माग पर्म, मान, पराम्प, ऐपर्प इन पार भागों में निमक, एक तपस अपमामाग प्ररप-मान-मासक्ति-मननप इन पार माग्ने में पिमा परी साम्प्यामिमन 'मी उदय" ।। दिपा का पतुरा ममत स्पेनिमाग सम्पप के रिपामाग का, एक पमिपा व पास मिक्त समोमग पम्पप के माप पामागस मनु पाप है। प्रारतिर म निपसंभ कर नाम पम , जैमा मि माधिकरण में मनार से महापा पापुर-(पिर.मि.पू. m) प्राविकोपराशिन रंगने पानी गरमा गरस निगलकर सारे मूनों के गम में प्रतिर सर मी लडेर में मारा पीपराग्य ।। गाय मीर से तमित रहने अनी नाम र .amalniलिपिवानमाण'मेरमा ! । 1 प्रामवारमा - शोपनिषत् ॥ सविरमील पामा, रागोप । . पी समरि 'ऐश्वर्य' है। नियतपर्म को धाप्त करनें सा पाप्मा 'प्रथम'। भानग्योते को भापत करने पासा पामा प्रशान। पापों में प्रपिमधन गसने उत्सा फर, पाहा पाप्मा मासक्ति । प्रारमग्योति को प्राप्त कर उसे जारूप में परिणत परदेन पाठा पाप्मा 'प्रनवय' ।। ईश्वर के शरीर में (स्य के सम्पप से) दोनों का सम्बन्ध है। सूय अपने प्राप्राण से सपाधतएपीकर देवीसम्पत् पर प्रवर्सफ बनता है, एव प्रवासारण से भविपापपुण्याम्प मामुरीसंपत् का बना पनता है, मेसा कि वामसनेय श्रुति करती। "स मास्पनर (मुरुपमाणात्मकमार्गोनर) देवरा रहनत । वे देरा दिवमभि- पप-प्रयापर, तोताना देवय-पतिसमभिरपायाप सम्म राममानाय दिवेशस 1+ + + + प्रिय योऽयमाद प्राण सेनामुरानरग्यत । न इमा मेर पृथिवीममिपपायग्यन्त । तस्मै यनमानाय तमाशा स" + + + +1 परमादेन पिणाऽभ्यनुत- 'न र युपुरसे फनमपनानाऽमिमा मान कप नास्ति । मापे माते पानि पुलापादुनधि ग न मु पुरा पुपुन्मे ।।" (शत० ११ पा. १७-०)। सापडीमामा सूप प्रमापन से ही टेर-प्रमुर मुष्टि पो प्रधि मतसा दी। दवा भोर मार दोनों सूप (पद) की सन्तान है । मी भरपा में बोला भारों के पाप पुर यातापा गार पराग है ' उ मन्प्रभुनने हसी मप वा रिया पिश सम्य से गूप में महोत्रमा का पारामा कास में मोर मागा नामक प्राप्रपामा रहना राशि में पार्थिा प्रपानरागा की प्रगनना सती, इसी को प्रारमण पर गा। पिरी गूप काही उपद, चा पषित पाना को 1-Mitrateria पामार पसरपपा NिGARH पितामणमा प्रास्ता माईगोपनिषत् । समाधान सूर्य का ही प्रमाप्राण मान लिया जाता है। पृथिवी में ममिपारूप परमाग की प्रधानता है, पर पार्षिवभाग परप्रधान बमप्ता हुआ मूवमपान है। सूय में विचारूप अपरमाग की प्रधानता है। यह सौरमाग पपरप्रधान घनता मा प्राणमपान है। भूतमयी पपिपी की परिकमा से प्राणप्रपान सूर्य तमोमय भामरतिभूति का मारम्मक बनता है। सबसयमक पोतिर्मय प्रार प्राय से भी सूप्प देवीतिमूति का मरूप समर्पक मनता है। दिन में सूर्य की देवनिमूति कर, एव रात्रि में भामरीनिमूति का साम्राम्प है, जैसा कि पुखिने-“स पदस्म देनान् सरमा- नाप दिवास, दारकुरत । मप यदस्मा अमुरान् ससमानाय वम इनास, al रापिमफुस्त । sोग रसादि रूप से भागे पाकर सा कर दिए। सम्पत्परिलेख २-बिया भविबा -- क्ष तमा १-पर राविः प्रामाण प्रवासाबा देवः ममुराण देवतानि च मृवानि देवीसम्पद पिपामापी देख पा प्रमुगम उम्से प्रागापमाः मापुरीसम्पत् परिपाचनपी २४

गरमा
मा शाप मपत् ।।
पाचार
सपगत विपा (हान)-माग खस्वरूप से एकरूप है । वेवस पार्षिवभूत के सम्बन्ध
से ही इसके पार निवर्स होनाते हैं । पार्पिभूत पाप्मारूप होने से भविपाप्रधान है। यह
भूतमागही मारमा पो निकी से प्युत परवा तुम अधर्म का कारण बनता है। बड़ी विस्पोतिन
पावरफ पनता हा प्रमान पर राग-वेश पर मूस बनता हुमा मामक्ति का, एष मारमविकास
का प्रतिद्वन्दी पोता मा पनप पा प्रपतक पनवा है । ससार में निवनें अपम होते है,
निम्ना मन्नान, बिकनी मामकि, जितना रिफासामार है, उन सब कीनर सांसारिक
मयसम्पति हो । इन पार उपाधियों के कारण नसरूप से सर्वपा स्पाधिक बह विपामाग
भी पार मागों में पिमा रोगता है। इस प्रकार पेस भूत की परा से एक ही पुदि भाउ
सहप धारण करती है।
विद्यायुद्धय
१-चम ..
श्रविद्यायुद्धय
-- अपम
० महान
२-राग्य -३ मामकि
४-पेप. ----- नग्मय
-
पार मरमा Aपयों के मूस पाप है। मिनिवश से मपम का उदय होता है। दिसे
ल-दरार रहा नायरदो ममिनिरेग । 'गुरुपदेग-गास्त्र-सोमपदिर-मारि
पुरा मदी । घो ष म सपमान की टीम । म मी ममुप है । हम माना
मपा डग सप समम सपना राप्रपार पाने मारको म सर्व समम र गरिसता
मिनात नासर उपप सम्म कामा मनिपेश । मुसार में और सब ऐ रिरिसा
एमा, मनी मानो' वा सों की शिीमा पप का भी नहीं पर सहने
'नस पनिनिरिटमर्गमनमिसागप" | परमान ही दिन मा।
.

माहवारमा - सोपमिपत्य सपी मूर्स पो समम्मया मासकता है, रिदान् सरसता से पुलिस बात को मान छेत्य है। परन्तु प्रर्दमितियों का अनुरक्षन मसभव है। मानसमर्मिदग्प अपिरिसप । भाग भरतर्ष में इसी ममिनिमेश का समाम्य है।सभी शिपित माने जाते है, पर सभी पूष अमिनितिर है। शास्त्र की मर्यादा मी यो समते है। शादों में क्या । इसके निर्या- यफ भी की है, फिर चाहे सातगमय शाम में इनका धम्पुप्रवेश मी न हो । युगधर्म के हस्प वेचा मी थी। तभी वो देश क्रमश समति करवा चारहा है। करना परीकि अमिनिवेश मर्मधुद्धि का चमक, मषम नाश का कारण । शिक्षा का समाप महान का कमण! निमा शाखाप्पन के शान का प्रामण मोहरा । पदेप मासक्ति के पमक है, अस्मिता प्रमेश्य की माता । जो पति निरस्कर हमारे पास कुछ नहरी - कुछ नहीं कर राणा, शीघ्र ही सारी निति तो भेटवा । म स्मिव (मिलना) मार। मपने मामा में सब कुछ विमूहि समझना मिस ऐप का कारण है। प्रत्येक दण में सम्पत्य का मनुमा रमा मस्मिता पण मनश्चय है। -ममिनिवेश से-प्रपर्म २-मरिया से ३-रागद्वेप से -पासक्ति १-पस्मिता से -प्रनकार्य पूर्ष पनानुसार ईयर के शरीर में पूषोक मठ निवर्स है । उस में देवीसपद मी , मासरीसपद मी है । तप.पि मा सरूप से सदा विकसित रहता है। कारण इस का पी किया समवयोग का अभिष्टया बना । उसमें भरिया सिरप, मम्पपा मपि पारा ससार कैसे रिस उत्पम होता ! परम्त समयपोग के प्रमाण से पपर्ममय निब लिप्त तामा भी प्रसिप्त है । मनिपायुक्त होवारम्प भी प्रतिमा से अपरापए (Rt. "गकर्मविपाकायपरपरापर पुरुपरिशेप ईश्वरः' (पावस-पोदशन ) । -मान प्राध्यात्मा उत्तमग्योति हा पनिषत Iler "सप्त देरखगा" के अनुसार देवसम सात भागों में निमक है।इन सातों देवलों की प्रतिष्टा सूप्प ही है मसएम सप्प के लिए- 'मध्ये सरत्सरस्प स्वर्गो लोक" (शत १७/- ११ "स्त्रों सोफ मा ज्योतिरुचमम्"( पा सै २०२१-शस १रारा२९) इत्यादि पहा बाता है इन सात देखगों के अतिरिक्त तीन पिग भोर है। यह सीमो प्रमश प्रापिएप, पिपापिष्टप इनपिष्टप नामों से प्रसित है। सीमा की समपि प्रिमिटिपरपर्ग। एप्पी के १७ महर्गण से भारम्भ कर २५ में मार्गय तक भो एक प्राकृतिक मा शेरहा। पही नपाइया ( इन मागणों को समष्टिरूप) माम से प्रसिद्ध । सनराइप के फेन्द्र में { २१३ पास ) मास्यामिछाता सूर्य प्रतिर पृथिवी के १ मार्गमों में से किस महर्गण पर सूप प्रतिप्रित है । इस प्रश्न का समाधान करते हुए निम्नलिखित श्रोत पपन हमारे सामने भाते है- १--"एफर्षियो मेसों लोका' (श श)। २-“एकावियो वः स्मर्गो सोका" (३० मा. २७) ३-"पप एक्कानियो य एप (सूर्य) वपति' (शव० )। संक्रसपत्मक सप्प की प्रविष्ठा पपी नपारा।।७तक पूर्षिवी का मपमा प्राण 10 से २५ धक सौर संफसर का सामाग्प है, इसी भाषार पर- 'नगाहो वै पसरत्य प्रतिमा" (पर्ति मा १।१२। ) या का जाता है। शाहगण स्प से माये है, एव . मार्गण सम्प से उपर हैं । इन दोनों धतोमों की प्रतिमा एकशिस्तोमामक सूप्प ही है- "एकारियो पतुरोमा नोमाना परमः" (को०० १९१६) "प्रविष्ठामा पकरिंशः स्तो- माना" (HORT७२)। इन में १७ मा स्तोम प्रसनिष्प कसाता। पहात पाधि भामिप्रयापति की प्रधानता बर्ग।। पी सप्त रास्तोमस्य समिप्रमापति सप्तदया' (ऐ० प्रा० ८११) के अनुसार प्रमापति करवाता है। पाी भमि 'भाइसमीप' नाम से प्र- सिद्धी-( देखिए ऐ० मा० ॥२१-२६)। ससदयस्तोमम्प इस भारतीय मप्ति में सोम - प्राचारमा लायोपनिषत् ।। निर्म D की भाति होती है। इस भारत से या पनि प्रम्मलित होकर २१ एक विश रसोम तक म्पाप्त रोमाता है। इसी सोमाइति के प्रभार से पार्थिव या की एपनिय तक पाप्ति मानी पाटी है। इस यामक निप्प के विमृद्ध (E), पचय (१५), एकरिंग (२) पर तीन विकम है। एही तीनों रिक्रमों से (पक्राणों से ) पापनविष्णु र-१५-२१ रुप पृयिनी-मम्वग्दि- पी इन तीनो लोकों में म्याप्त होगाते है ।२१ पर लिपणु की पाप्ति सम्पन है । यही २१ का सान 'रिप्पुरिष्टप कराता है-"तान् विपारेफरिंगन स्तोमेनाप्नोत्" (RD. २१७१२) । सी सिविएप को प्रप्नायविएप साराग्पयन म दि नामों से मी म्पपत विमा गाता - ( देखिए ते० प्र॥१३)। यही मर्ग-नाफरमग नाम से भी प्रसिद १।२१ से २५ तक पर लिपुत् का साम्राम्प है। इसी को सौम्परिपुत् करा पासा ।पी सौम्पमिपुत् उपनिषदों में-'अमानवपुरूप' माम से प्रसिक है । यी तीसरा इनरिएप है। सर शपदों में यों सममिए कि २५ से २१ तक इन्द्र की प्रधानता , २१ से १७ सक मिण की प्रधानता है, एक १७ से १ तक पार्थिव प्रथा की प्रथामता है। पार्षिक प्रमा की मूलप्रतिष्टा १७ वा स्तोम | लिपा की मूतप्रतिष्टा २१ स्तोम है, एक सौम्पनिषतरूप पण की प्रतिष्ठा पानियस्तोम है। इस प्रकार १७ से २५ तक के स्तोमों में से-१७-२१-२५ वीन तो लिएपसों में समातिर हो पाते है । राप रा मते हैं सोम । इन के साप में २१ का समाप मामा जाता है। या २१ मिम मारिए पचा २१ मिम। इस मिमता का कारण पनि और मासे २९ तक सग्यापि माम से प्रसिद मारिवामि का साम्राम्प है । मुक्य मप्पपठित २. स्वोम में मी मारिकतामि की सचा सिर ऐनाती है । इस नापिकतामि के सम्बन्ध से २१ अर्गस देवसगमेंट में मति। पर २१ पर निप्पा यमौ प्रमुख I AJ के समय से बर२० परिप बर्गकोट में मी प्रति इस प्रपर ५१२ दो सरूप हो पावे।।भी सात देशमगा की पतिष्य है।१८-१९-२. पर तीन देवखग २१ से इमर। २२-५३-२१ या संत रेपसर्ग २१ से उपर सर्प २१ साता देवसर्ग है। पपी तीन- - 4 प्राकारमा सरप ना सोपविपत् ॥ मनुसार 'स्वरसाम' नाम से प्रसिद्ध के कारण सूर्यग्राण होता है, जैसा कि भम्प मों में स्पर। यी सप्त स्कंगसमरि 'प्रिणाषिकेतस्वग' नाम से प्रसिद्ध है। या सातों सन क्रमश प्रपोदक, तमामा, अपरामित, नाक, पपिपी, प्रयो, रोपन, इन मामों से प्रसिद है। १० से २१ सा पास गने वाले एकरी भग्नि की सात मिम मिम मस्याएं हो जाती है। पति की वे सातों अबस्पार कप -अग्नि, मापु, इन्द्र, प्रादिस्य, परुण, पत्यु, प्रमा, इन नामों से प्रसिर है । इस प्रकार सप्तदेवा-धीन विशप क-इन सब की समरिसर मवारण की प्रतिमादप सौगरिनमप सकर अचसहप से सदा पा है। इस समरसर में समी गौ का समावरा है। दूसरे शब्दों में यह स्वर्गों का टीसा (पर्वत) ।। मतएव इसे तपास कहा जाता है । मिही पापा मादि का वो एक उमव सम्र होता १, उसे प्रान्तीय भाषा में टोया कहा जाता है। इसी के लिए वेद मापा में 'पास' सम्द मयुकामा है। सबस्सर क्या है, का परण ।। प्रविष्ठासत्व को ही घरण कहा नावा है। सौर सक्सर ही मोक्य की प्रतिष्ठा है। इस प्रतिष्ठा की मी मुसप्रति एकशिस्म मादित्य, भतएप इसे भी 'पण' सम्म से मवान किया नावासा कि पनिमुति करती है-- -- "मसागादिसो पास एकविंशतिपक्षपार परुसमिति, यदापो- ऽस्समेति-पयेदं सर्प प्रियवे" शत. 10/11२)। "मतिठाये पासम्" (शत)। समसर साहप परुस (प्रतिमा सिनिए मी इसे पारण का समय। यही लषस्य भयावद में 'सम्म' (सम्मा) नाम से म्यपन म-"स्कम्मे सप पति हित," (पप स.१०४०)मनिस्काम (सासर, भविपासी रुप से सका। पी पाय -पपिपी घमासम्पन है। इस कामरूप सगपरण के उपर (पत्र मे) पिy से सूर्प सप रण। सरसरपक भानप है। वही एकपशस्मक (एक पहिए पा) अनिमप माहवारमा शाईग्रोपनिपत । परमारमि मपास सूर्य का सुनहरी रप है। गापत्री-उप्रि-मनुष्टुप्-पाती-पक्षि-मिष्टर-न गवी माम से प्रसिय सात पद (साव पूर्वापस, किंध महोत्रा) रप के सात घोरे में। इन पोटों पर सूर्य सबारी । इस प्रकार नीचे वर्गधरणाप स्तम्म, उस पर पोरे, उस पर सूर्य प्रतिष्ठित है। इसी सूर्य को-'परमामि कहा बाता है भरमा नाम के भुग सोम की भाइति से ही सूप म्पोतिर्मप बन गाए जैसा कि मन्ममृति कहती है- माचद सोमो मरिपसकारापो यद्गोऽणीव दवान् । मदपाहिन्ने फरमान मोमोजनयत् सुर्ये ज्योतिरिन्दु ॥ (ऋक् स. १७१११)। इसी सोमाति से सूप में सप्तमरिमका रश्मियों का उदय होता है। सप्तस समय ही (चित्र विचित्र पों का समुचप ॥) पूरिन है । इसी प्ररमा भौर पृश्नि माग के कारण सूर्य के 'भरमामि भाता है। भपि र मित प्रकार एक मामा (पपर) पर होता है, इसी प्रकार सूप स्वसरूप से प्रश्मानरम ( पापासमोष्ठ) की तण पिर , सूर्य का रशिम- मवार पहिन । सिपापेक्षया सुप भरा है, मणसापेक्षया परिन है । इस परमापरिन सौरमणार के साप रक्षा, समुद्र, अरुप, सुपण इन चार माधों का सम्बन्ध है। उषा शम्द बुपम(स) का पावक, समुद्र एम्द पानीघ मात्रक , माप गद पुरुष का बाधक है,एष सुपण शरद पदी का पापक । स्य सापात् पम -'इपमो रोगीसि । रस-परस पातु-पपात-रिप-ग्पविपादि की पि स्प से ही होती है, इसी पण कर्म से इसे पम' करा जाय। भाप च पही गोप्राण गीपा करारम्मक । वापर्य पर कि देवा वर्षीच होने से ही म्प पम मही है, पाप तु प्रायरपोल सचमुच पम (गो) पहै। सौर रश्मियों के सर्य से मीपि नाम का पानी सत्पम रोता है।सारा रोदसी सोप इस पापी से म्पस से पारमेन समुद्र सरसान् करावावर संसायनिक सौर पैरसी समुद्र मर्णव नाम से प्रxिt-'तव समग्रो पर्णवा समुठावर्षमादपि सर प्राध्यात्मा रिपेपनिषत् ॥ विमानसून स्सरो प्रमापद' (क्स.१.१९०१२)भिपि प पान का मषिष्ठाता होने से मी माविल समुद्रा स्मक है। सूर्य ही एकमात्र पति का भधिष्ठाता है, जैसा कि इति करती है- कृप्य नियान हरयः सुपर्ण प्रपो पसाना दिसमुत्पतन्ति । व मापनमन्त्सदनारतस्यादिद् पृढेन पृथिवी म्मुषते ।। (पक स. ११९९ मापवासीम सूत्र १७०) 'यदा सससाबानिस्योन्परिममिः परितो -मयपर्पति' इत्यादि प्रामणति, एष 'मादित्पाजायते राष्टि' इत्यादि सवि मी उस भय का ही स्पधीकरण करती है। पुरुप शम्द पोरशी भास्मा का पापक। प्य में बसाया वा पुका है कि पियवा सूप में ही पुस्प का विकास होता है। इसी पारमपुरुप को सक्ष्य में रखकर 'पोऽसागादिस्प पुरुपः सोडाप' यह कहा जाम है। पैसोप में जितना भी पुरुष (भारम ) विवत है, सब क्त अधिग्यता पुस्पासिम सूर्य ही । गरुर पवी का पैसा भाकार होता है ठीक वैसा ही माकार सौर सरसर का मतएव पूर्व में सरसर को-'मामुपर्य' (पैसोक्य म्याप्त गम पदी) कहा गया है। मारमा इसी मुफ्स का मेश है, मतएप प्रयासकास में प्रारमा भी मरस नाम से ही म्पसार होता है। यह प्रवरूप सुपर्ण ( जीवारया ) सोक्यस्तर में पवित् सेषरण करता है । सरसिर गणपुराण इसी मामयति रास्प का निरूपण करता है। इस प्रकार सपा-(पम), समुद्र (भोर), मस (पुरुष) सपण-(संकरसर) इन चार मावों से निप माकान्त मा परमापूशिन सूप पुरोक में उसी प्रकार का हुमा है, जैसे कि भाकाण में निरापार (फिन्तु पराक से भाषाएयत) पिपान (पापुपान) समा राता है। ऐसी प्रयोस्प में म्पत इसी विमान का निरूपस करती ई श्रुति करती है- विमान एप दियो मम्प माहे भा प्रपिवान् रोदसी पन्वरितम् । स विमापीरमिष्ट पनापीरवरा पूर्वमपर प केतुम् ।। (पडु सर ११), उवा समुदो प्रहप उपर्यः पूर्वस्प योनि पितराविषय । मापे दिनो निहिवः पभिररमा वि चापे रमसापान्यन्ती ।। (प्रा. श)। 4 ६४७ माहवारमा या रोपनिषत् ।। खान "पसी या मादित्योऽश्मा पृभिः रश्मिमिहिमपटसं पृश्निा। एप इमी लोका- पन्तरेण तपदि। स्पिरो या मरमा पृभि-, अन्वरेम प सोकमप। विक्रम- मायो पा एप पा सोकानापम्तात् पाति" (सत. 1)। उपर्युत प्रापिदपिक स्वर्गपरुण केबस बानगम्य है, मन से उपास्म है। धर्मपष्ट से परमापरिमाप सूर्य के प्रतिक्कि माप स्वर्गहस के और किसी माया को नहीं देख सकते। जिस समप भूमणरस पर देवयुग का सामाम्प पा, उस समप देवतामों में ( मनुष्पविष मौम- देक्तामों ने-धिमकी कि सच्चा धाम सर्वपा उच्छिम हो चुकी है) मीमावर्ग मदेश में उस प्रारुविक (माधिषिक ) स्वाधरुण की मकर में बैंक मेसा ही एक परुस बनाया था। इसी प्रकार बिहानतालों की परीचा के सिर सिन्धु नद के उस पार सरस्पती नदी के समीप के टीले पर (बई पर कि बसिष्ठ मार्षि का मामन पा) एक विद्वानमान बनाया था। ग्री विनमान स्पसन' नाम से प्रसियामा है। देवे पर मचे प्रमाण चतुपा मिर्' (पा. १००।१३) इत्यादि रूपसे अग्वेद सहिता में इस महा पिणद निरुपम है। पर मी प्रकृति की नकस पर ही बनाया गया था। विस्तारमप से इसका निरूपण प्रत में पनपेक्षित है। इस प्रकार उस समय की कथामो में स्वर्गपरूण और सूर्यमदन को सोच स्थान दिया चावा पा । दुआपुद्धि भलरों की का से माग मूमएस वक्त दोनों विस्तियों से रहित हो मया है। पोरे से शब्दों में सागपाय की मी पापा मन सीमिए । । जिस प्रकार प्रान्त में दिएपादि सग बताए गए। इसी प्रकार मोम प्रा रा इस भूपिया पर निष्पादि सर्ग म्पबस्वा म्पयस्मित ई पी। ईगनकोस में सौगीरराष्ट्र के मषि- माता मौम इयू का साम्राम्प पा। वो माग भाग सीरिया (Riboria) नाम से प्रसिद्ध, बिस माग में मार पार पर्पण का (फ क्य) सामाग्पो मानसिक मितव असम्प इस एक पाटी मनुप्प, एक न एक वर्षति पा पषियों को कोररस मही', जी का सम्म माग किसी समय भिमरापती' नाम से प्रसिद्ध पा । दीरेधाविपति इन प्रामी मावरमा माशोपनिषत 18 शिविरपत मुधर्मासमा में निर्णप किया करते थे। यही मेहर माम का दो मस्तक, एक भीवा पाशा पद् मुत स्वर्गीय पक्षी था, ही साद हाप पासे 'ममाय' माम के साथी होते थे। इस प्रकार देवयुग में टक्त स्थान मानव सम्पता का सर्वोच्चतम स्थान बनाया था । मोर मोर सब देव स्पामों पर अधिकार कर लेने पर भी प्रमुर इस रिशा में माझमण न कर सके। मत या 'मपरामि पादिम्' नाम से प्रसिदई । यही एन्द्रपाम पुगयुग में 'पद्रपिटप' पा । प्राय (पामीर) पर फान्तिमतीसमा युक्त प्राग्ज्योसिप मगर में घमनिष्टप पा । एव उपर दिशा में इन्द्र मक्ष के मध्य में धुन से नीचे के प्रदेश में मद्रगिरि-चन्द्रगिरि नाम से प्रसिर दोनो पर्वतों के माप में विष्णुविएप पा । इन टीमों की समरि ही उस समय 'पिरिएपसर्ग' नाम से प्रसिद्ध पी। इनमें प्रम भौर विष्णुविष्ठप के मध्य में मेरु से उत्तर १७ भरा पर पौषा मनस्म सिएप पा । यही देवनामों की देरयमन भूमि पी । देवता यदी या किया करते थे। उधर फस में मो मीच भाम के मुफ्नकोष (भूगोल) में 'बातमी' नाम से प्रसिद्ध है, पही देव पुग में प्राची सरस्वती' नाम से प्रसिद्ध पी । देवसासोग इसी नदी में मषमपस्नान (खा म्तस्नान) किया करते थे, पही स्पाम मनस्पविएप पा, पही सगपरुस पा । परी खग का परिपायक पा । पहा से चारों और रास्ता बता पाईशम की भोर विप माग, उत्तर की भोर विष्णाषिएप का मार्ग, पश्चिम की पोर प्रभाविप कार्ग, एवं दक्षिण की भोर पिदमार्ग या। जिसे भाग 'मगोमिया'मा माताजी हमारा 'मपी' नाम का पितृसोक पा । इस प्रकार पारों भौर गमन के माग से युक्त इसी (पतुष्पप-चौरादा) में सर्गरम्ण मारा पा। चतुप्पप के टीक पीच में ९पोकोर उषा चबूतरा बनाया गप इस पर को शिम्स से (मीचे सेवा, उपर से अमर कोय ) एक पर का स्तम सा किया गया, पी प्रग्या पा। इस भरमा के सोंप परतत पर प्राविषद (एको परमो बाति सप्तनामा-मना ११९४२) पातु का एक भव बनाकर उसके सुपण के सात मासक बनाए गए। इस सप्समुख पर पृष्ट पर एक दया सा कर उस पर धमकता पा रश्मियक सूर्य प्रतिष्टित किया गया । परिम्प्रसार के परण ही इस का पृश्नि नाम रस्सा गया । पापनापटी ।

मागरमा - इंशापनिपत् ।। मिस सूम दिन-रात समान रूप से प्रकाशित रहता था। पारों मागों के पपिकों को माग मस- खामा इसका मुस्म काम पा । सा से नीचे पन्तरे के चारों मोर एक चतुर्भद्र मगास मनाया गया था। इस मणा के पारों कोणों में क्रमश रक्षा समुद्र ग्रहप सुपर्ण या चार मस्तरं प्रतिष्ठित की गई थी। एक कोण में पाषाण का रपम (पैस) मना किया गया था। दूसरे कोस में और से टीक नीचे एक गहरा पदी पा। इस की भाति ऐसी वमा गई थी, जैसे सोमापारण के लिए या माय मार रहा हो। तीसरे कोणमें अब पर एक मनुष्य बनाया गया था। उसके बाप में एक मात्र पा, भौर म मासा मूगम में प्रविर पा । मिस स्थान पर मामा गाभा था, पहा से पानी निकाल कर पीये कोण में बने हुए समुद्र ( सगेवर) में निरन्तर मावा गवा पा। इसी पानी से पा तालाई सा भरा रहता पा। मामय यह पा कि मासे से निकल र पानी के निस्तर माने पर मी उस तामात्र में से (और किसी मार्ग से पानी के बाहर निकलने का पर महोते ए मी ) पानी अपनी नियत सीमा का उम्समन मही करता था। देवधिपति इस शिप से उस समप सास विम पक्ति पा । म दिविकाधम्मस प्रतिमा सेका सर्वत्र व्याप्त होगमा पा । इसी प्रतिमाहप मौतिक वरुण का निरूपम करते ए पि करते है- इस दीपि पसे मामूर्य रोग्यरिमि । बिगोमिरदिपेरयमन । (शास. १७)। इन्द्रो दिवः प्रतिमान पपिम्पा विरसा पेद सपना इम्ति गुप्णम् । महीं निपामानोर मण पासम्म पिस्कम्मनेन ससम्मनीयान् । (० से. १९१४) मागे के परिसेस से स्वगरम्पको प्रतिमा का यह सप रोजाइन्छ । प्रतिमा शिर से तत्कालीन प्रयाने दरें सर्वश्रेष्ठ माना पा, जैसा कि दो बापमाप मना अपपापातिप्ठम्व-परिचय परपनपः' इत्यादि रूप से पूर्व में का नाम विमानधनसूपप्रकरण के समय से तत् सम्बपी संसरामक रमपम्स का विमान , - । 54 - . 1॥

तामा वामपनिषता . । कराया गपा, भव पुन प्राने का मनुसरण करते हैं । यमपि विच की योनि मागम ही है, तथापि जब तक पाश्मय सूप का इस के साप सम्बन्ध नहीं हो पाता, तब तक या सशि करने में असमर्थ ही रहता है। कारण इसका पी है कि सुष्टि की प्राति सम्म रम-सम इन गुणों के मापार पर होती है । इम सीनों में भी पुष्टि का प्रधान मत रजोगुण ही है। मानपान सत्तगुण निष्क्रिय होने से, प्रयाधान तमोगुण पा होने से म्यापारमूखा सक्रियरधि में मस मय है । समर्प है एकमात्र मध्यातित शिपाप्रपान रमोगुण्ठ । विध कर मूस रस रग के साम पदि सस्त्र की प्रधानता रहती है तो सासिकी सहि होती , वम की प्रधानता से वामसी मष्टि होती है , स्वयं रम की प्रधानता से रमोमयी मष्टि होती है। पानम्व ज्योतिर्मय होने से गुभ्र (शुक्स) माना जाता है, तम पावरमरूप होने से फप्ना माना गता 1, एम मप्पपतित रस 'रक्त' है । पही सृष्टि में प्रधामरूप से अनुग्क है-'रजोजुपे नन्मनि सत्वातये । महत् प्राति इन शुरल-रक-रुप्स मावों से युक्त मन पुरुप की पमा है। दूसरे शब्दों में 'मम योनिपान ग्राम सस्मिन् गर्भ दयाम्परम्' के अनुसार प्रतिमूत, प्रतएव 'प्रमा' माम से प्रसिर इस महत् प्राति से पुक्त होकर ही मनपुरुष सरि किया करता है।सा कि-'प्रमापेको लोहितगुस्तकप्पो रही प्रजाः पममानाः सपा' (श्वेता. १) पादि से स्प है। पतसाना या कि सरि मादान के बैगुण्यमात्र पर मिमी, एक यह त्रिगुणा सूप के दर्शपूर्णमास यन से उत्पन होती है , जसा कि पूर्व के मादरमा रिकरण में सार पठसाया मा पुश्य है । सूय शान-किया-अप-र्ति है। यही सीमा, मात्र महान में सप्त-रस-तम रूप से विकसित होते है। सपरम-तम तीनों ही गुस दिपमाएमा में गाते हुए तीनों ही शेष है । सप शानभाग को विकसित करवा , इससे (ज्ञानोदप से) मानन्द भाता है । सत्र का प्रावक सूर्य ही है, भएक-'ससादपि सपनात्मा' हरपादिम से मुदिप सूत्र को, किंभ सूर्यरुपा पुरि को 'सत का गायन (दखिर, प्रत्टोप०६७)1 दिस मीकामा में स्म की प्रधानता एदी है, उसमें मान पोर पानन्द (भा मानार) पणे का विषयस रहता है। सप (विपीमाग) पम्पपा के पिपापभानन्द २४ माशोपनिषत् । गुरुपमा - मिशन को मिकसित करता है। वो धीर सदा प्रसभ रहते है, लिपारसीम है, बुद्धिमान है उममें सब की प्रधानता है। यह सदा पाम से ही परिभम करते हैं। इनसे शरीमायास नही हो सकता । बिस में मप्र यता मधिक 1, काम्य कर्मों में, सांसारिक पार्षों में दो रात दिन प्रार रहता है, उस में रचोगुण की प्रधानता समभिए । एष प्रमाद-मासम्य-प्रतिनिद्रा- भविमोमन-निरर्पक कालपापन-या सब तमोगुण का धमाकाR है । (देप्सिर गीता. 18 प०।६,७,८ रसो०)। इस प्रकार उस नीलो गुण प्रकृति से (सौर दर्शनमास पर) उत्पभोकर देइस्पित मीपम्पय को कान में गर देते है, जैसाकि स्मृति करती है- सतं रमस्वम इति गुण प्रकृतिसमकार। निवघ्नन्ति महाबाहोरे देहिनमम्पयम् ॥ (पीसा० १२१२१)। इस प्रकार भापोयोनि में कारोव से उत्पम, मादाय में गुस्प का उदय करने पासा, मध्यप-बर पापविधा से उमपशप हुए सोनश ससांगु मगवान् पिच के केन्द्र में प्रतिष्ठित हो रहे है। अम्पारणसस्पा में भाने वाला यही सौर माग 'निशानास्मा' नाम से प्रसिद। भाधिदैविक मिानामा (सूप ) का मिसपण समास राम, भव अप्प कि सूर्य (जिनाम) का दिन कराया जाम।। निया-अविचारमक पर सूर्य मप्पामगार में-'विशानाम्मा' 'बुदि' 'पाशुपपुष्प विक पापा' अदि विविध मार्गो से प्रसिद्ध है। प्रत्येक प्रात्मा के साप ममा, प्रविष्ठा, पोनि, भागप, इन चार चार मानों का सम्मान। मापात्मरममा में मितने मी मात्मविस, सब प्रमादि मित्र मिलाप्परिपक मात्मानों का उत्पतिस्पाम अमर करता है। बिस पर से यह शरीर में प्रविय होते है, पर ही पोनि । पाकर शरीर के जिस स्पान में परसपतप से प्रतिष्ठित होते है, मही प्रतिष्ठा। ए.प से हो पा - मिसन समिपमा गरमान शेरमी बरतम्। म Aधारी मिचो मामी नरामपबर । Jan मदो नाम मार्ग निमोनि रित गरिवेश- मध्ये निहिला रविण विकमे नम त्यास मने ॥ सामान परिहि जनतविमानप निरोमा जमरे antRMANARAN म. ईशोपनिषत-विज्ञानभाष्य Man इयो मानमर्ष रो मोवि सरपrati १

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माहवारमा या ईशोपनिषत् | ਸ) . पोन्गी पुरुप का प्रमय सर्वम्यापक ईयर का पोशी पुरुष (स पर सूप इस प्रयोक्य- सप एक मया का भविष्टाता पोपी पुरुप) है। पर उसी का भय है। कही कत्रा शुक्र को भी इसका प्रभव माना गया है। राक का निरूपण पूर्ण प्रकरण में विस्तार से किया जा पुकारामत इस सम्मप में केस मही समझ लेना पपाप्त होगा कि प्रा समझ की समान रूपा सिपा-कामकर्ममयी भविषा ही शुक्र है, पी वेद है। मध्यात्म में पहिले वेद का मम होता है, वेद से योगमाया प्रादुर्भूत होती है, योगमाया से जीपम्पय प्रकट होता है । वेदमयी सुकरपा मोगमाया ही मापक पोग्शी को परिफिम चौमयोशी पर प्रमव बनाने में समर्म बनती है। ऐसी परिस्पिति में शाम योगमायाचिगम्पय तीनों को ही पीक्योरी कर प्रमन माना जा सकता है। मानास्मा इस की योनि । माक्सोम के दायही या मापारम- संस्था में प्रवियरोता। परमामाय सर्वोपरित, इस के मीवर पुराणाकाण, इस में मदिरा काग, इस में शरीराकाग, इसमें दयामाय, सन्तरतम दाराबाय (दमाकारा) है। यही उमपहप से मात्मा प्रतिक्षित रहता है। मई रूप से यह सोम-नसानों को छोड़कर सभी अगरीर में व्याप्त है। इस प्रकार सम्पूर्ण शरीर इस का मारय ।। दूसपरेशान्तास्मा नाम से प्रसिद्ध पम्पकामा' । स्वयम्भू इस का प्रमप है, शिरोगुरा पेनि , प्रतिष्टा हदय , भाशय है सपनगरीर । सीसरा मानास्मा है। इसका प्रमा परमेष्ठी ६ योनि एक, प्रविष्य हरप, भाशप सपाइशरीर ।। पोपा शिानात्मा है। इसका प्रमत्र स्प , योनि केशव माम से प्रसिद प्रमरभो। यी 'नान्दनदा' (माग्दमदार ) माम से प्रसिद्ध । प्रतिष्य दप है। भाराप सागरीरी। पांचाई मानारमा (सन्द्रियमन) इसका प्रमत्र पार्षिाप्रमित पान्द्र सोम, योनि एफ १, प्रतिया हाय, माण्य सरगरीर ।। ६ य इन्द्रियर्ग है । इस में पार-वाण- पतु-प्रोप्र-मन पात्रों के समय मनि, मापु पारित्य, दिफमोम, मास्सरसोम र पछि देवया प्रमय है । मना पाणापरिकम ममानमन पोनि है । मुसगोल-नासिकागोस-पतु गोल-प्रोपगोष-मपर घ यह पाप स्पाम इन पांचों की प्रतिशत यही नियत म्यान मावास्या - ईशोपनिषत् ॥ प्रमबमवियदि इन के माश्य है। सावा शरीर है। पाश्रमौखिक समीर के पांचों मूव प्रमच है, उत्पविकास, में एक योणिव इन मूठो की योनि है। उत्पस्यमम्तर पचमतसमष्टिम्प पञ्चविष मम (मम-रस-गर्मी-पपु-राम्द) योनि है, इन्हीं के द्वारा मूतों का भागमन होता है। माराय सनियरीराभाठा माणास्मा नाम से प्रसिब फर्मास्मा ।। इस की पैवानर देनस मात्र या तीन कलाएं है । इन में वानर का प्रमर मिटवस्वोमस्पानीय पार्थिप पिवनि- पेयामिपोनि मामि , प्रतिष्ठय रक्षिणपा, माण्य सागरीर ।।मान्तरि रप पचरास्तोमस्थानीय वायु तैमसारमा छ प्रमर, दय से निकर कर ण्ठ सक म्पाप्त गने बासी मोनाही पोनि , हद्रय प्रतिष्ठा है, राप सकिशरीर है। एक यिस्तोमावशिम रिम्प प्रादिर (इन्द्र) प्रा का प्रमा, मपुम्णानाही पोनि है, धूसपि प्रतिष्ठा है, माशय सायरी है। इन सब में प्रतिष्टा मिट मिम बताई गई है, परन्तु मम इन सब को सामान्य प्रतिष्ठय समिम प्रविष्ठितम्'। कारण इस का यही । कि पर वक ममाति होती रहती वी तक पासचा है, यासचा पर मप्पामभगत की सच है-"भपियोऽपाम दो देहएका वर" (Aध ।। पोशीपुम्प -पुरुप .योग्शी तदिद---सर्वम् १-मम्पामा-मम्पका -साफ २-महानामा--महान् -परमेष्टी -शामामा-रि----- -प्रामामा--ग चन्द्रमाः कर्ममा--- -मोलामा 1-सन्द्रियाणि-~-मोगसामानि-पित्री (परम्--मोपपानम् इलियेभ्या पराक, अम्मम पर मनः । मनसम्म परायुधिर्मदेरात्मा पशन परः।। मावः परमम्पक, मध्यका पुरुपा परा। पुस्पाम पर फिदिम साकाष्ठा सा परामवि (कोपनिपत् १ मा १५.।१०-११) भावारमा नशा रोपनिषत् ।। मयूरपुष कभारमप्रपों में से प्रकत में केस विज्ञानारमा केही प्रमादि का विचार अपेक्षित है। सूर्य इस का उत्पपि स्पान, उत्पम होकर यह केशान्तार से सम्पात्मसंस्था में प्रति सेता है। प्रसरन माम से प्रसिर केशान्तस्थान से सतत भाते रहने वाले सौरदेवमय इसी निशानप्राश को मामुरप्राणप्रपान सौरतरिका से बचाने के लिए शिम्बा रखने का मादेश है। इस मुसूक्ष्मद्वार से गिानशिव दयस्प प्रज्ञानास्मा (मम) पर प्रतिष्ठित हो जाते हैं। हां उम्परूप से प्रतिष्ठित होकर, मकरूप से विज्ञानप्रकाश सायरीर में व्याप्त होपाता है। इदपनिह से भारम्म कर सूर्पकेन्द्र तक एक निफ्त म्यर्ग बना मादप से मीचे पार्थिन भपानमाण का साम्राम्प है, प्रदय से भारम्भ कर ऊपर तक सौरप्राण की प्रधामसार दोनों प्राण (पार्पिय भपानपण, सोर प्राणप्रोण) क्रमशः पृपिथी और सूर्य, केन्द्र से मर है। यही स्पान क्रमरा मनास्तस्तिफ एस सस्तिक नाम से प्रसिद्ध है। सोसीय सौर स्वस्तिक शस्वस्तिक है, भूगोलीय पार्मिक स्वस्तिक मध स्वस्तिक है। इन दोनों स्वस्तिकों से उमयत: परिमिपम रमा एम्म का प्रसपुरुष इतस्तत' विवरण किया करता है, जैसा कि मुक्ति करती है-- - "अन्तरिक्ष पाऽमनु रक्षभरवि-ममूममुमयमा परिखिमम् । ययाय पुरुषोऽमूस उमयसः परिछिमोऽन्तरिक्षमनुपरवि" ॥ (शत० मा० १।१।२१।। - इस सस्तिक कर दिग्दराम पुरुपास्पापिकरण में कराया बाचुका-(देखिए । मा ११.) । प्रत्येक म्यक्ति के उक दोमो स्वस्तिक मिम मिल है। पदी दोमो स्वरितक हमारे पीवन की प्रतिम है। सौर-पार्पिप रस से ही हम उत्पन्न इए है, एपी रसों से नीलित है। अब तक वैयक्तिक स्वस्तिक शाम्त राव है, तमी एक उस म्पति की स्वरित (शिप-कम्पा) । ससिसमाव की प्रापि के कारण ही इन 'सस्तिक' का पासा है। पास्वस्तिकात के समय से पतमुम पन जाता है। परिणस्पवेचा जानते है कि प्रत्येक बमारमा या ईशोपनिषत् ॥ प्रसुभम्पा प्राणी का खगोस एवं मूगोस निफ्त है । सम निक्त मार्गों के सों से ही उस मासियों के प्राण प्रतिष्ठिव गते है। इसी स्वस्तिकाममा के लिए भारतीय देशधर्म में स्परितक का पूजन किया मावा है। सस्तिक एक नही, दो बनाए बाते है । दक्षिसोसर पारयों में दोनों स्वस्तिक चित्र स्पापित किए जाते हैं। इन में रपिस स्वस्तिक पप स्वरिक्क की, एक सत्तर स्वस्तिक सप्तस्विफ की प्रतिमा है। इस से कामा यी कि दय से नीचे राने बासा, प्रमप्रतिय (साधर) से प्रविय में पामा पार्षिक प्रपानमाण भघ स्वस्तिक को प्रतिष्यभूत मुकेन्द्र से निश्प मद पता है । एवमेन हदय से उपर पमें बासा, अमरन्च से प्रविध बने बामा सौरमाए (विशनारमा ) सस्वस्तिक की प्रतिष्ठामत मर्यकेन्द्र से निस्य माराता है। पैसे निपस स्पाम पर जाने के लिए नियत मार्ग मा खता , एकमेव प्रत्येक प्राणी के दय से भारम्भकर सूर्य- केन्द्र तक सस्तस्विरूप स्वतन्त्र मार्ग बने गए हैं। यही मार्ग उपनिषदों में 'महापप' नाम से प्रसिद्ध मारे। प्रत्येक प्राणी का विधानास्मा भपमें अपने समरितकरूप नियत मापों से प्रतिपण सूर्य में जाया करता है, वं मापा करता है। एक निमेप (पसक) में यह विपुग्मप रिवानप्राय सूर्य में तीन बार गाकर सोट माता।इस महापप में प्रविपवर्णयुत सौर रश्मिएं म्याप्त रहती है। दूसरे रादों में इस मार्म का स्वरूप सूर्यरश्मिए पछिमेद से सर्वपा मिमा इसी असूक्ष्म महापप का निरूपण करती हई श्रुति कासी- . "मणः पन्या निवतः पुरामो मा स्पष्टो अनुनिलो पपैन । तन पीरा भपियन्ति प्रापिदः स्वर्गलोकमित वर्ष विमुक्ता ॥१॥ वस्मिन् शुक्समुव नीपमाः पिस हरिवं मोहित प । एप पन्या प्रममा रानपिचम्वेनैति प्रमानित पुपपत्तेमसम ।।२।। (गत १९७२) त्वप्रतिष्ठ प्रज्ञान (मन) को प्राप्यामिक पा सममिर, तक्ष्प्रतिष्ठ विधान (पुषि) को सूर्प सममिर । ग्रिानामा को प्रतिष्ठा दिप प्रशान मन ही है। जिस प्रकार प्राप्ति में प्रमव-योनि-प्रतिष्ठा-श्राशय-परिलेखा १-प्रभव -(उत्पत्तिस्यानम्)-मरामा,एक-योगमायाप) "पुरुषाम पर किचिव,सा- काष्टा सा परा गति" २-पोनि -(प्रवेशद्वारम् )-महानारमा (महसोम ) पोरशीपुरुष-मस्तारमा २-प्रविष्ध-स्पितिस्पानम्)-सपान्तरतमो दाराकाश (मम्पकात् पुरुप पर) -पाराप -(प्पाप्तिस्थानम् -रामम् १-प्रमन -स्वयम्भू २-योनि-शिरोगुण ३-प्रतिष्ठा-नश्यम् ४-माशय -शरीरम् -मम्पकारमा-(प्राइसारमा)-मम्यकमममसत्यात्मा (महत पर १-प्रमय -परमेष्ठी २-योनि -गुकम् ३-प्रतिष्ठा-दयम् -भा राय -शरीरम् -महानारमा (प्रास्तात्मा)२-महान ) मसस्पारमा (मुरारमा (पर) ४ २-योनि-नाम्दनम् २-प्रतिष्ठा-दपम् १-माराप -शरीरम् -पिशानारमा (माहवारमा) ३-पुद्धिमासस्यात्मा (मनसत परा. ५ -प्रम-चन्द्रमाः (भमम् । २-पोमि-गुकम् १-प्रतिष्ठा-पम् १-पाप-गरीरम् प्रश्नमात्मा (प्राक्तारमा):-मनामसत्पात्मा (द्रियेम्पः पर .

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१-अमन-माखरसोमः २-योनि --प्रज्ञान (इन्द्रियाणि (फर्मावम्छिम- शरीरत ) पराण्या) संकल्पविकल्पारमकमिन्द्रिय- ६ मना- २-प्रसिधा-अमर भम् १-माशय -पोझियाणि - १-प्रमा-दिक्सोम २-योनि-प्रदानम् -प्रतिष्ठा---योप्रविषरे १-माशय --मन (प्रज्ञानम्) प्रोप्रे २ परागया १-अमन-मादित्यः - २-योनिः-प्रज्ञानम् -चक्षुपी ३ ३-प्रतिष्ठा--विमरे १-भाराय-ममा (प्रवामम्)) फा इन्द्रियासि १-अमवा वायु २-पोनिा-प्रधानम् ६२-प्रतिष्ठानासाविषरे १-पापा-मम (प्रशानम्) नासिके (पाण:) - १-प्रमय:--पमि २-योनि:--प्रधानम् १०५-प्रविष्ठा-विहा b पाछ५ ५-पाशय -ना (प्रयमम्)

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वैश्वानरतैजसमाज्ञमूर्ति
प्रतिकाम्झिन्द्रकृतारमा पारणात्मा का
कम्मात्मा देषसत्या
-समय - एकयि मादित्य ]
२-पोनि -पुणाना
प्राणमय-मादिस्पेद्र -देवसत्य -१ मात्र
३-~प्रतिछायम्
१-भय-शरीरम्
१२ (२)
-पचदशो
बायु
-योनि -तेजोनाम
-प्रविष्ठा-दयम्
१-भाश्प-गरम्
देनसामा-वायु -देवसाप -२ तेजस
पिकसा-कम्पास्मा देवसत्य'
(१३ ()
--प्रमा-त्रिपदमिनियम
२-~ोमि-नामि
1-प्रतिष्ठा-पाठरामि
१--भाराम-शरीरम्
यामरामा-मनि-देक्सस्य.-मानर

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- १-प्रभा -पवी मृत् २-१-गुरगोपिने-मानस परिपसादयो पनपापा । %3D ३-प्रतिष्ठापनिधिए ५-भाग्य-रारम् म" --.- १-प्रमा-गापिकार पता २-पोनि-शुण्यापिते-पापण २-प्रतिम-भार ५-पाराप -गरीम् भमा सादपसरतापी . --.-- स १-प्रमा--पशीलोऽनि पार्थिव २-पोनि -गुपयोपित नाम ५-प्रतिष्टा नम -माराप गरीरम् शरीर-मूलप्रतिष्ठा म १-प्रमा-पशीलोपा पनि २-पोनि -गुमायोगित-बायुध ३-प्रतिष्टा-या -पाराय -गरीरम् पमम्यो पापुवादिग्प ४ . १-प्रमा-पचलमायरा गर्पिन २-पोनि -गुमायोप्पिने-समय ३-प्रविष्टा-मात्रय १-माराम सरीरम् मुपिरामि ५

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प्रास्तारमा सापनित ! प्रकारावारतम्र पनाम्य सूब से प्रकाशित पता ६ एस इसी प्रकाश के तारतम्प से जैसे ही अमावास्या, पूर्षिमा, कृष्णामी, गुस्वामी मादि माप उत्पम होते है, ठीक इसी तरह यह प्रज्ञानचन्द्र विधानसूर्य से प्रकाशित रहता, एष प्रकृतिक्त् भम्पास्मसस्था में मी ममा-पर्णिमा भादि मानों का उदय होता है। मन्तर दोनों में केक्स इवना ही है कि प्रकृति कर मास (महिमा) २० दिन का होता है, एष भाम्पस्मिक मास एक अहोरात्र क्या है। मा कास गुस्सप राषि कास प्यपक्ष है। प्रकृति में क्या होता है । पहिले सपा विचार कीथिए । सूप पियकेन्द्र में प्रालिसिस। मनमा कृषिणी रे भोर परिशमा सारा चन्द्रमा परिक्रमा करते पगते पृपिपी के इस मोर पागावा । तो सूर्य का पूरा प्रकारा इस पर पड़ता है इसी का माम परिणम्प है। घूमते घूमते जर या पृपिली के उस भोर (सूर्य की मोर) षमा नाता है तो चन्द्रमा का दरय माग (पपिवी की मोर का मार) सीरप्रकाश से पश्चित रोमासा है। इस प्रकार सूम चम्दमा के सगम से परा (मावास्पा) का वाम होता है--'दशः स्पेंन्दुसम्मा' । पृषिषी के केत से काटवे पर दणिोपर एक रेसाहेगाइए । इम रेराों के प्रान्तमाग में बम पन्द्रमा भावारे तो क्रमश गुलामी, रुष्णामी का चम्म शेगाता है। शुक्लाष्टमी में सापकास भाषा (तुष) पन्द्रमा प्रकाशित सवा ६, एक रुप्यारी में रात्रि के १२ को भाषा पन्द्रमा प्रकाशित गता है। पूर्णिमा में सारा बद्रमा प्रकाशित नहीं रहता, एबम ममावस्पा में पूरा पत्रमा पाहायतामपि । प्राविक स्पिति के मनुसार मापा पम्द्रमाही प्रकाशिक-मप्रकासित हता है। पूर्णिमा में रप भाषा माग प्रकाशित है, मारय माषा माग मप्रकाशित भम्प में पृष्ठमा प्रकाडित है पित्री की भोर का पापा माग प्रकाशित, प्रतएव यामही दीसता। मनुसार मम्मी में अनुप माग को ही प्रकाशित भप्रकाशित मानमा परता । पातुत सभी विपियों में सदा ही भाषा माग प्रकाशिव, एक भाषा माग प्रचारित पता है। हमारी स्पिति के अनुसार हम एक कहा-मोकामा-तीन कमानस मार फवारिमाग माम सेते हैं। मापाचिदक्षिक भगत की परिस्पिति । इस लिपति प्रास्यामा रोपनिषत् : . व भाम्पास्मिकस्था का भर कीदिए । इदय से प्रारम्घ्र पक्व सौम्य सण सममि । इस सौम्प का भविष्यतापम मममसूर्य है।इप पर मनरूप पानमा प्रति छित है। एप शिशु से प्रारम्भ कर अमरन्ध्र पर्वत सोमयरातस इसी को पा(R4- र परि) का नाता -( देखिए प्रश्नोपनिषत् २।२१) मुसस्पाम पग्निप्रपाम पृथिवीसोक है। मासिकास्पान कामुमपान मम्तारपोक बस्थान भारिमप्रधाम पुसोक है। धोत्रापान रिक्सोमप्रधान पौषा मापोचक । मनमरन मन की मन्तिम प्रतिा है । इस प्रकार इस सोमघरातस पर इम्ब्यिाप बेटीस्प किंमा बारों सोक प्रतिष्ठित है। कलसान में एक मसिपेशी अपर बटकी ती, इसी के लिए-'प्सन पामसम्मे' पर कराया है। मी गसस्तन सोकभाषा में भागसी नाम से प्रसिर । । उपनिषभाषा में यही 'इन्द्रयोनि ' भाम से प्पमत।स की स्थिति पाद (मुर) यि के समभरातस पर । यही पास्तविक मुसोक । । ममरण से एक प्रादेश पर पाइपठपि, पप्ठ से एक प्रादेश पर सरप- बिना पा से मन पर की भोर पचता है । पस्ते २ पारूप प्रपिती बोक को पार कर जब पर मामी मन्तिम सीमाकप प्रमरम्न पर ण पाता है एसी भासा में इस पर पस सामनसूप का पूर्ण प्रकाश पाता है पही इस की पूर्णिमा लिए इस समय प्रकाशित मन से नीचे है, मतएप मन के प्रकरण से सारी इन्दिए प्रकाशित हो परती है। मानस प्रकार को प्राप्त करते ही इनिरंभपना कार्य प्रारम्भ कर देती है।सी परिमाकाब माम 'नाप्रदयस्पा'।माँ से मन क्रमशः मीचे उतरता । भाइवान पर माता है में आपकार हो जाता है। मोत्र का प्रय, पाका रूपदशन, रसना का सारा सब माम्म ते पाते । मुरूप (मासा) माय इस मप भी, इस समय मौ क्या प्राणायम एतस्मिन् पुरे नापति' (प्रश्नो.111) ममुहार सदा मामता राव। पाठ-प्रवास मोर मासिकार में मी पपावत् पाते गते बाद सब- स्पान है पही मामी “वागएपी ममया सविदाना"(त० १९१२११)ी मम्प की सभिवानीपा स्वप्नापस्पा' । इस में और किसी हरिप पर तो प्रकाश मही एला, परन्तु उपर की २५८ प्रतारमा माशोपमिपत् ॥ सनममीनार बान पर थोड़ा सा प्रकाश हवा है। यही कारण है कि सप्नावस्था में मनुष्य न देख सकता, म मुम सकरप, न संभ सफता, म स्वाद लेसकता, परम्म पागम्मापार करता रहता है। पूर्ति पर्याप्त प्रकाश नहीं है, अतएव यह खप्नवाक् मनमत होती है "मप्यो मिस सिसलाप" (उदफ्माचार्य का समावलि ) । स्वप्नावरपा में मनुष्य म्पर्य वाक् का प्रयोग करता मा देखा जाता है। मन क्रमश नीचे उतरवा मा जब दपस्प विज्ञान सूर्य के समपरातल पर माना है तो उपर के श्रेखोक्य मपास में शोर अन्धकार हो जाता है। यही सन्दुसगमस पण भयापास्या है, यह 'सप्तिकास' है। यहाँ बाग्म्मापार मी बंद हो जाता है । घोर निवा में सारी इन्द्रिए (मुख्य प्राण को कोर कर) सर्वपा स्तम्ध बन पाती हैं। इस प्रकार पाम्द मम की परिक्रमा से मप्मारमनगर में मी दशादि का सम्पय सिब हो जाता है। उक्त प्रकरण से पाठकों को यह विदित होगया होगा कि मन में जो प्रकाशन मानसूर्य की ही महिमा है। साप ही में यह भी सिर विषयक प्रशम भाप्यारिमा भगत् में प्रधानता 'मन' की ही रहती है । मन ही लिशान की प्रतिष्ठा है। मिस का मन मर माता। उसकी मुस्लिमी मर होगाती है। इस का प्रत्पर प्रमाण यही है कि मन पार्षिक प्रमा इति से बनता है "प्रभमपं हि सोम्य मन" । परि दो चार दिन मम नाही सामा गाता तो मन नियत होगता, शीणकाप बन पाता है। उसी समय मन पर प्रतिष्ठित रहने पासा मशान मी निर्मत होगाठा, विपार शक्ति न होगाती है "मुदित न प्रविमावि किंधि " * "सस्पे पिचे युदमा संस्फरन्वि" । विज्ञान-प्रशाम दोनों सपरिम्या (एक दूसरे से मिए) गते हैं । विज्ञानताव माद्गमित निम्म्योति (भारमम्पति ) से प्रकाशित है, प्रधान सिद्धन निशान से प्रकाशित । इन्दिए मिममम्पोतिमप प्रज्ञानम्पोसि से प्रकाशित । पपात (मौतिक प्रपञ्च ) प्रज्ञानम्पोतिर्मय इन्द्रियभ्योति से प्रकाशित है। इस प्रकार पारम- ज्योति का मूतपदापों तक नितान करना रिझानपमाधिष्ठावा एक मात्र मान काही काप है। उपनिषत् प्रेमियों को निशानामा के समाप में मात्र एक माधर्ममयी स्पिति पवमाते हैं। विशनारम्प को लापरुप से नहाँ हमने पिर पतमापा है, हो मदर से उसे सपाङ्गगरीर २११ प्रारवारमा काशोपनिषत् ॥ चापपुस्म ल में म्पास महापा ३ । इस की म्याप्ति का पूर्ण विकास केवल दक्षिण प (परिमी भस) में ही होता है, क्या पर कम पाश्चयो । दप से वित्त महान दक्षिण मास पर भार मांस से बाहर निकला। बाहर एक प्रादेश तक इस की गति होती है। टि के मन मोर प्रतीक यादो मेद है। सीपी सि अनुफाधि करसाती है, तिरछी धरि प्रतीकरि का चाती है। माप प्रवीकार से इस पाप पूप को देख सकते है। इस के विविध प्रकार के २० रुप होते है। यह स्य का भयो, सर्प स्लप एकशि है, मत एक सदशमूत पिशा- नारमा के २१० रुप होगावे है। इस पर भाप हि मही बरा सकते ।दपिण मास के प्रतीकमान से भाप यों भ्यो इसे देखते गांपो, स्पो पो पाइपर उपर दोषवा मा बिवाई दप । इसे देखना निशानामा की सर्वोतर उपासना । या इमात्मक है, पुरुप सप है। दपिणा पुरुप प्रधान है, मएस दक्षिण में इस का विकास होता है। पामवतु में मी प्रतीकशि से भापको एक मिनु के दर्शन होंगे, परत पाइन्द्रपनी है। मामाजी प्रमान है, अत अपनी का विकास बामपनु में ही होता है। हमेशन करे पाप सर्पप (सरसों) के माकार में देखेंगे। मक्षिका (मासी) के पर मैं जैसा विविध वर्ग (रंग)स का ठीक सही रंग है ! इतना पान रहिए कि माप इसे स्पपकरण (घर) में म रस समतो । यसब मौ रासेम्प, पार्थिव समप्रेमप पूपामाण के गर्म म(लाय में) दाँलेगा, साह भागे भने असे 'दिरपमपेन पाव'• इस्पावि मात्रमाम्प में सा होने पसा। इसका पशु से प्रादेश मात्र (१०॥ माल) माहर निकलना बतलाया पछत पर पशु से बाहर न निकलता, के भार निकला इमा दिवाई देता है। भादरा (काच- माइमा) में भाप भपना प्रतिविष देते है। यदि भाप माधरी से र हटो पाते तो पापको सपना प्रतिविम्ब भी काप के मीना पीचे एखामा प्रवीण शेव, ग्यों पों माप काय के समीप भावे बारेमा स्पों ऐसा प्रतीत होग, मानों माफका प्रतिविम्म समीप माता पाता है। बहुत काम एफन पाप , न उस में पीछे हटने की म भागे भाने के रि स्थान है। प्रतिविम्ब एक ही भगवस पर प्रतिटिव केस कापी प्राध्यात्मिक अवस्थायी-परिमेख- पन्द्रमा अपरमम् -पूर्णिमा-बामदास्पा भाप २ पी पौ... मासि- मन्तरिक्षम् पृष्पी- -भरमी-सप्नास्पा -दपम्- -भमानास्पा-सप्तिा सूर्य विज्ञानम्

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पाहतारमा •ाापनिषत् ॥ पापपुरुष बीघता ही प्रागति-गविमाष उत्पम कर देती है। ठीक यही स्पिति महा समम्पिए । पतु पटस एक प्रकार का काष है। इस पर दयस्प जिान का मोनादी द्वारा प्रतिचिव पड़ता है। यह जब रशिमहप से स्थान में स्थित स्वयोनि (योनि) पर मासा तो पतु के वाहर एक प्रादेश स्यामा मालूम होता है, क्योंकि इन्द्रयोमिदय से एक प्रादेश पर है। स- स्थान पर सीट पाने से केवल पन पर प्रतिनिग्दिस रहता है। इस प्रकार अनेक रूप पारण करने पासा, इन्द्रमर्षि यह विज्ञानारमा पतु सम्यम्भ से-'पासुपपुरुप', दक्षिणाधि सम्बन्ध से 'दक्षिणाधिपुरुष' माम से प्रसिद्ध हो रहा है। सौर दिवानपुरुष की उपनिपत (प्रतिय) 'मा' (प्रकाशमणास ) , इस बासुपपुरुप की उपनिषत् 'पदम्' (विद्गमित महान् ) है। दोनों का परस्पर में शनिष्ठ समय है। पादित्यपुरुष रश्मिरूप प्रामों से इसके साथ, विधानपुरुष प्राणरूप रश्मियों के साप उसी पूर्वोक्त महापय में समुक्त हो रहे है।सी विज्ञान को सपय में रसकर झुष्टि कहती है- "वपद वव सस्पमसौ स भादिस्यः । य एप एतस्मिन् मरासे पुरुष, यसपाय दक्षिणेऽदन पुरुपा, तातापायोऽपरिमन् मतिष्ठिवी । रश्मिमिरेपोऽस्मिन् प्रतिष्ठित , माणरयममुप्मिन् (मतिष्ठिमः। (हरदा० उप०.१)ति । इस की प्रतिष्ठा मूमि पयस्प है। जिस प्रकार एक दीपशिखा स्पिरुप से प्रकाशित रहती । एषमेव दय के भमभाग में दीपाहिप विधानप्रमु प्रकाशित हो रहा है, जैसा कि योग याइरलप करते हैं- अनन्ता रश्मपस्वस्प दीपपणा स्पियो दि । सितासिवा स्पिाः फपिसा नीससोदिवा ॥१॥ ऊपमेक स्पिवस्वे यो मिश्या मर्पमएरसम् । प्रससोफमवित्रम्य वेन यावि-परा गतिम् ॥ २ ॥ (याइ स्म. प्रा म यतिधर्मप्रकरण १६९-१९७ रो)।

माहवारमा मा पनिपन् । सुपरसा या पादुपपुरुप सौर होने से मसग ।, उपर प्रभागारमा बाद होने से ससम है। सौर भग्नि गहा नामपान बनता एमा प्रसंगमाव का प्रचक, ग्रामसोम पनेर प्रमान बनतामा ससगमारका प्रवक पापपुरुप विषा-अविपात्मक रुपमा मयी पसत इस में मी रिया-परिपा दोनों मागों की सच सिद्ध हो जाती है। यदि या विनामारमा प्रशन मन की भोर मचाता है तो इसका भविपामाग विकसित हो जाता है। कारण इसका सही। कि मौतिक विपय भागरणहर है, नकल विपों में इम्तियों के बारा मम मासात सवा है। मन सम्मत बिरों की मोर अनुगमन करता यता सदोष वाया रहता है। इस अनुपान का कारण यह । कि मन की सीनीय संवि चिदानन्द ।विजन परा माया इम्प चिदानन्द (पम्यप्पनन्द) मन का सरूपनिर्माता है। एक लिममरास का यह एक मामा मा सिमान्त कि निस तल से बिस वस्तु का उदय होता , परतु उस प्रमा के भागमन से से जीन पारण करने में समर्थ होती है। मन का सरूपसंपादक फि मा- रमानन्द ६ मा मन को तरूपसा के लिए प्रपेक दण में भामद (स) अपेक्षित है। एब की बार करना, सब प्राप्ति के लिए मिरम्तर प्रयास रहना मन का सामासिक धर्म । मन की सी मुसपणा (एलेषा ) का माम है-'मरानापा' , यी पुण।इसे शास्त करने के लिए मर बाहर निकलतास के करने के द्वार थिए । इत्रियों की गति पराक्ष (मार की मोरीपयों की मोर) | मनापति में इन्द्रियों का इस बार की मोर विप।बो मठ बार के सपो को देख करम एप मरने में सकप देसने में भसमप है, फिर एयस भात्मा पर उस का गमन कैसे समय इसी प्रकार समी मिदए मसरूप को देखने में असमर्प होता, मात्मदर्शन में नितान्त मसमर्प बनती ईस विषयमोग मेसीन राती है, नैसा कि निरिसित की बबनों से सा- "परारि सानि म्पदास्मयम्भूस्वस्मात् पराए परपति नान्तरास्मन् । भीरः मत्पगास्मानपचवाटचपचरपतवामिणान् ।। (कटोपनियत ।।१।।

माहवारमा मनाईयोपमिपत् । मात्मानन्द . . . न तप पसुगच्छति, न पागच्छवि, नो मनो, न वियो, न रिभानीमो, यौवानुशिष्यादन्यदेव तद् मिदिसादयो भपिदिवादपि" (न० १।।1)। विपयों में मो मानन्द यह नियों से माया दमाहै। विषय मानन्दका कारण नहीं है, अपि त इन्दिए भामन्द का कारण हैं । इस का प्रत्याच प्रमाण यही है कि अबतक दिए सस यती है, सक्स राती हैतमी तक विपय मानन्दमय मालुम होते हैं। प्रयों के रुग्ण हो नाने पा, निर्वस होगाने पर, मपया मर शेनामें पर नही विषय दु पद बम माते है। इन्द्रियों में बो पिदामाद का विकास है, हमी इन्द्रियों की निजी संपत्ति मही, अपितु मन के एरा पर भानपद इन में भाया है । फसता इन्दिए मी भानन्द का कारण नहीं है, अपितु मन मानन्द का कारण है । मम तक मन सस दशा में रहता है, समी तक देखने, सुननें, समें पीमें बोसने में मानन्द भाता है। परि मम किसी कारण से म्याकुल होता है तो इन्दिए सर्वपा ससदशा में सती हुई मी दस का कारण बन जाती है । उस समय कुल पचा नहीं बता | मन में जो भानन्द है, मी मन की प्रतिक्षिक संपत्ति नहीं है। मामा से से इस में चिदानन्द का भागमन मा ।तएव निसम विज्ञान (मुदि) मावि कास बता रही विपपात से वास्तविक मानन्द उय सकता है। पुद्धिमान् मनुष्य के लिए नहो भन्दमगध. भानन्द का कारण है, एक गर्दम के लिए या पदम सामान्य काठ से मपित मस्स मही रसवा-'यया सरो पन्दनमारबाही, मारस्य येचा न मुसौरमस्य । निशान में ही भानन्द । मिनाश सर्वनाश का कारण है। बिस की सकस (भवस) मारी गई, पर क्या कर सकता है। इसी प्रकार निदान का मामन्द मी सुद की संपति नही है। भपि तु सस्प नाम से प्रसिर, महमाषप्रवत्तक माद्गम में प्रतिष्ठित पारमानन्द से ही विधान मामन्दमप पनामा है। या तक 'म' (भारमा), तमी तक विज्ञान महमा (भारमा ) मर्पित हो जाता, अपच शरीर से वकान्त रोजाता है तो सारी मप्यारम- संवा उदिम हो जाती है। इस प्रकार मन्तको गला मारमान'द को मुम्प भामन्द मान पा पाता है। बातमी का योभन उपार निषा जावा, इससे खनिक मानन भारमा बाईशोपमिपन् । प्रदिपप्रास्मा महीमासक्ता मानन्द वो रया, प्रणमत म्पति तो उसटा पिता में पर मावा है। मा परतुक बस्तु यदि माईतो-सपोमा पिमयोगान्ता' इस सिद्धान्त के अनुसार या कभी न कमी मारय मापस बाग । पिपयनन्द्रियपग-मानान (मन)-चित्रान (दि) इन सब में हम जो भानन्द मामा देखते हैं, या भागन्तुक है-'तस्पैम माषामुपादाप सर्वे पनीरन्ति' । या मागम्तुक भानन्द मसापी , प्रतएव पिरणति के लिए सपा अनुपयुक्त है। सापी में वियपार इन्द्रियामर, इन्दिपवर मम का मानन्द मन से बर पुरमानन्द सप यस मात्मानर से पराङ्मुस बने पर है । मतएर मुम्बमान्, मनस्सी, शामों का पारंगत कोई भी पहा महो पाप सकता । इसी स्पिति का यो मुम्दर राम्दों में निरूपण करती । उपनिप- कृति करती है- नापमात्मा प्रपवनेन सम्मान मेरपा न पाना श्रुतेन । पोप पगुते वेन सम्पम्सस्पैप माम्मा पिष्टाने व स्वाम् ।। (कटोपनिषत् | १ | २ | २२ - 'सो मान मीदेहिमना' महाम तुमसीदास के इस सिद्धान्त के अनुसार जिस दिन भारमा के ऊपर पापा मा भाषरण दट पाता। उस दिन भादिस्यबत् सवा एक यह प्रका शिपाता है। मिस प्रकार बापु प्रकाश उत्पम नहीं करा फेवर मेघावरण बटा देव है, पहिचे से ही मिपमान सौर प्रकाश माने भाप प्रकट हो नाना । तर जोपण - उपासना-मनपोप्रति माग्मानन्द को उत्पम नही करते, अपि सुभामण मात्र हटा देते है। भामा तो सत:प्रकाशरूप है, उसके लिए पम्पसाचन सर्पया अनपेपित है। उठ कपन से या मी मठीमति सिम बाता है कि विशन मामा के समापदभ- व इस मैं मन-इन्द्रियादि की अपेक्षा भानन्द की मषि मात्र ती दिशानन परि पापन्धि पीराः या कशा नात्यो।मपदि की अपेपा मन में पत्रिक मामन्द, क्यों कि मन मिशान के समय है । भौतिक विषयों की मपेचा इन्द्रियों में अधिक मानन्द पोलि ।

गरमा ना ईशोपनिषत् ॥ प्ररिपामरमन A इद्रिये मसिक विग्यों की भपेश मन के समीप है। इस प्रकार विषयों में पाकर मानन्द अस्पान्य माया में रह जाता है। उधर मानन्द की सोग में मन इन्द्रियों के द्वारा पार निकट पर विषयों पर पाता है। परन्तु रोता क्या है-मुनिर ! पानी मामा से अधिक मानन्द मिलने पर री मानन्द माता है-“यो चै मूपा तत् मुख, नास्पे मुम्बमस्ति, मानमित्युपास्म" के अनुसार भूमा (पास) माप में मानन्द । परि एक समाधिपति को कहीं से १० रुपये मित आँप सो उसे मामम्द नही भासपता । दोसत की प्राप्ति में ही मानद का भनु- मा कर सकता है । निस एक पैसे से २ ५५ पा बचा प्रसन्न हो मासा, पी पैसा एक मनुप्प को मानन्द मही पहुंचा सकता । यही परिस्पिति पाती है। मन महोदप मामन्द की सोग में गिरयों पर जाते हैं। परन्तु उरें यह मातुम नही है कि विषयों में जितनी सी पाद की मात्रा है, यह द्रियों से मार, इन्द्रियों में मो मानद मापा है, पर मुग से मापा है। भूसापेठया इन्द्रियों में प्रति मानद है, इन्द्रियापेक्षा स्लप मुझ में ( मन में ) मधिक मानम्द है । इस प्रकार विवेक पुद्धि से पधित मन पोके से लिपपों पर पाष गाता है। चाकर उसे पदवाना पड़ता है। किसी भी विएप पर मन पिरात तक प्रतिष्ठित मही सम्मा-'प्रतिपरिचयाचमा । पोरे दिन रहता है, भिषित भूमानन्द मितता नी, दूसरे विषय पर दौड़ता भी मानन्द मही मिसप्ता, तीसरे पर, भोपे पर,इस प्रकार परिध विषयों में दौर समवा यता एमा मन शुभ होमाता है। यही मनपा पारस्प है, यही चोम , क्षोभ भशान्ति का कारण है-'प्रगन्तस्य कुना मुसम्"। "गए पे पायेमी पनने, दुगे भी राने में भी सरोगेया' टक यह सोकोक्ति विषयासह मन पर वादन वोमा पाब रसी परिताप होती है। सने 'ए पे मामा , मिता यावरणरुप दुस, गान्धि, धोम । मानन्द की म्पप साखसा से निपपासात स भ पेवेकी मन पो पुकार म पिपर सरकार मित है।ल सकारों की पा से पाप मानन्द के से मरस हर महादु सापान में निमम रहना पड़ता है। सरकार प्रधान होते र परप्रपाम है। बारिया भतएर इस संस्मराशि को 'परिपा' कहा गया समपिर मारण से परिपमा मन .

TFORM मानास्पर •ाोपनिषद के सेवक ने ए विशामात्मा का स्मोवि माम (विपा मग) मारत होगता है, मोमब माम (मनिषा माग) प्रबर बन जाता है। प्रार भविषादि के योग से भारत का भक्ति मान भपात होता शुभा मामा के निया माग को भारत भर सेता है। सर्वत्र महामापकार का साम्रग्रम्प हो गाय। यही मोह का जनक है-"प्रशानेनार दान देन मुन्ति मनाया इस सिद्धान्त हो कौन मही जानता । इस प्रकार विपयासत मम से युक्त पुदि भपर्ने भविषा माग को प्ररसता से मोश की गननी न जाती है। इसी को 'मोफकिसा' बुद्धि का पाता है। सारासाराविषमता, भविपम्पकारिता का नाम ही मोह।। 'मनसो विषयाकाराकारिवं मासनासरकार के अनुसार मन का लिपकाररूप में परिणत शेगाना होपासना संस्कार है। मन चाम, भान्सोम स्नेहा। इसीलिए स्त्रमा निस नवा पर चाताप उसी मपत्र का स भारण कर है। मया (सग्नेय) में सदा ही समी मात्र नियम है। परमा म्पहर होता-माम मचिनी, माम मरसी। इस का तात्पर्य यही है कि माग बधिनी काममा, भाव भरणे का पदमस से मना निम्मघासमागम लिसके साप ममत्व वाघराधरित मन बायसी का भरा हमारा ममत एक पर मी निस निगम से संयुक्त होता है, उसी का प्रकार पारयर सेवानिपका- एकारित मन मासमामय है। संस्काररूप माकार ( भारस) बासपति- पादपति- प्रास्मानम् के अनुसार 'पासनाएको संस्कार कसाब व न बाय।प से वासनामम रविमसूत्र-(सास्त्र ) चविषयों के लिए निकला करते है। दूसरे क- म्दों में सम्पमिमिति इन मकों के रा (कामनासूत्रों के I ) मन पर १ म बिपों की मोर शेगा करता है। खमनिवसंस्कारद्वारा विषयेषु मनसो पम्पनमासहि। मनु- इस पपन का नाम से भासति ।। पाना संस्कार में भापति का प्रमक भाप मार्ग में पते २ को मुन्दर रय देष मेते है, वकास मन पर उस कीपाप (संस्कार-पस- मा) भाती है। पर पाप माप के मन को रस एप को पुमा २ देखने के लिए माकर्षित N प्राध्यात्मा रोपनिषत् ।- प्रशासपास करती। पी भासति । एक बात गौर । यदि उक्त संस्कार र मही होता तो मासक्ति मी मही होती। संस्कार समूस बन कर ही भासक्ति का कारण बनता है । इम संस्कारों को र करने वाला है-'पिरकास का अनुभम' । मनसा अनुमचमन्यसस्कारापानेऽनुमवस्म घिर- कामिकतनुः' के अनुसार मम पर मो संस्कार भाता है, पदि भार बार उसी की मोर भाय रक्सा चाता है तो-'स तु दीर्घमासनरन्सयसस्फाराऽऽसेनियो सममिः' (योगदा समाधिपाद, ११ सू०) के भनुसार नाक चिरकास के मनुप्पान से वा संस्कार मूत बन जाता है। प्रसम-संस्कार भासक्ति का कारण मही मता , अपेतु भनुमय धरा वर्षमा हुमा संस्कार ही भासक्तिरूप 'संग' का कारण बनता है, पैसो कि 'ध्यापमो विपयान पुसः सगस्तप्पमायते' (गता २१३२) इस्पादि से स्पट । निष्कर्ष यही हुमा कि मन संस्कारों के चिरकालिक सम्बल से विषयों के साप पर होगाग है। मन को रम्ने प्रशाम कहा है। प्रशाम में मना-पाव पर दो तल । प्रा सोमवात, 'प्राण इक्व है। दोनों का तादाम्य है । सोम 0 पिदंश का प्राहक बनकर ज्ञानमति बनता हुमा भवा' नाम से म्पमात शेने माता है। मन में भाप मम और क्रिया दोनों धर्म देखते हैं। साप ही में यह मन स्प-रस-पादि मूतमात्राओं का भी मनुप्रारको । सोम-पिदरा-पाण पही तीनों कमरा भूतमात्रा-प्रामामा-माणमात्रा के मनुप्राहक हैं । सोम मतों का प्रको। विद शप्रामार का जनक है। प्राण इमिंयग्राम का उपकारक है । विदयुत सोम प्रवामांग (पान) है, प्राण प्रिया भाग है। इस प्रकार प्रया-प्रणि भेद से मन उमपातक न पाता है-'उमपास्मक मन: । प्रा-प्राण के इसी वादाम्पमीन का निरूपण करते आए महल कोपीकि करते है- "या मनास माण, या माणसा ममा । सहवास्मिन शरीरे सव , सोधिन । मानोऽस्मि पा मापारमा । मामापुरममित्युपास्ता xxxi वस्पेष रहितपतद मिझानम्" (कोपी० उप० )।

प्रारुपास्मा मोहासागर -डाईग्रोपनिषत् ॥ सोममपी प्रश्न के समय से ही प्रमा-प्राणरूप इन्द्र मोक'सारी' बन पाता है। प्रशान- मन निस विषय पर पाता है, स्नोगुसक सोम के प्रभाव से या वहीं भासत हो जाता है। 'मिस पर पर (पिपय पर) गए, पी के रोगप' पी 'मोफ'सार' है। प्रोक मरकर पावक है-"पापा पोक" (ऐ. ८।२६) । मन रूप प्राश इन्द्र का सामासिक धर्म (सार) मोक ( निषों में मासक्त हो मामा ), मतएप इसे मोक् सारी करना न्याप संगत होता है। प्रावके इसी मासकि माव को सक्ष्स में रम कर मुति करती है- 'भोफासारी बारन्तापम मा एप इन पूर्व गछति ऐरवापर गलति' ऐ.मा ६।१३२२)। महा एक बार मा किसी लिपप पर भासत होनाता है, यस बार २ उसी विषय की मोर रोसा करता है। ऐसा धर्म एक पत्र प्राइव का है। विशुद्ध रूप से प्राणमपि मर्सम है, सोम सम्बन्ध से इसे पासक्तिमात्र से मात्रचन्त हो चाना परता है। मन के प्रससिमाज के सम्बन्ध में एक प्रश्न उपस्थित होता है।"सकम्प निकम्मा स्मक मन को हमने पूर्व में पास क्यापा, वैसा कि 'पषस हि मना रुण ममापिएसम दरम्' इस्पादि मार्ग बचनों से स्पर। ग्राग-परित्याग यह मम का सामाविक धर्म है। म किसी एक विषय में घिरकरस तक प्रतिस्वि मीरा समय । ऐसी परिस्पिति में मन की लिपपों के साप मासक्ति (पिएकातिक पवन) अनुपपम होगाती है। सरकारों की पिराखा बस्पा ही भासहि च एव पणिक मन में विरानिकत का ममाष फिर मन को, किला प्रोन्द्र को मोकासारी (पिवयासत) कैसे पतलाप गण" । इस प्रथ के समाधान के सिप हमें चातुपपुरुप की रण में नाना परेमा । पिशुब मन पस्तव में पपमा अपन,मतएग पास है। परन्तु इन्दि साप सेने से ही मन भापति के पफ में पर नाब। सरे शब्दों में पुलिसात मन ही भाप्सलिया कारण है। सिर सूर्य से उत्पम मुशि स्पिरा ।। तत्सम्बन्ध से भरिपर मम में पिरताप उदय रोगावा । सांस्कारिकल्प वहाँ मन का सम्म या चिरकामिकार बुद्धि का पम है। इसी प्रवा चेकर मन रिसों में बस शेगाता। , प्रान्वारमा पनिपत ॥ उसेवा प्रवा पदि ऐसा है तो फिर एक प्रश्न उपस्थित होता है। सूर्परुप विज्ञानामा (पति) को चन्द्ररूप प्रज्ञानारमा पर (मन पर) प्रतिक्षित बताया गया है। मन मोर मुनि दोनों परपर में पति- भाभूत है। मन कमी मुदि से पृपा मही हो सकता, एम मुनि न मन से कभी पृपक होती। दोनों निरप सम्बर है, जैसा कि धुति करती है- "फतम भास्मेति योऽयं विज्ञानमय पाणपु पम्तम्पोंदिर पुरुषः ।" (पृ मा उ )। 'वदा प्रस्यैवटाविष्कन्दा भपातपाप्मामय पम् । वधया प्रियया निया सपरिप्वको न वार्म किचन मेद-नानर, एनमेपार्य पुरुप (विज्ञानारमा-घातुपपुरुषः) प्राञ्जनात्मना सपरिप्वक्त" (पूमा ठशशर) । " -- एसी दशा में सदा ही समी विपों के साथ भासक्ति होनी चाहिए, क्योंकि सस्कारमाएक मन, एक सतोत्पादिकापुरि दोनों सदा ही साल है । परन्तु हम देखते हैं कि कितने ही विषयों से मन पृणा करता है। उनके म्मरणमात्र से मन तशिन से परय है। इस का क्य पारण ! प्रासकि मूता सामग्री के रहते हुए भी कहीं वाससि हो, काही न हो इसका क्या उपर ! 'मुदिदैविध्य' । मुस्तित्व अपेक्षा, उपेक्षा मात्र से दो भयो से भाकान्त पता है। प्रपेवादि से सरकार स होगाता है, उपेवापुद्धि से संस्कार स्सिा नहीं होने पाता । मन को हमनें पणिक बसाया है। परि मन प्रस है तो स्पिर मुदि निर्वस रोगाती, ऐसी दशा में स्पिरमाव उत्पम नहीं होता , उपेक्षामात्र का उदप शेगाता है। यदि मुनि प्रबल तो मन की शिकता निस क्न जाती है, उपेपारा रिपरमार उत्पम होमाता है। इसी को सोक में-गौर फरना' कहा जाता है । 'गौर करो'सका मर्प है मुबि से नाम हो, मुरिस पहाम्रो । इससे सस्कार एप होय, अन्यथा सस्सार निरस रहेगा। इस प्रकार इस भपेक्षा मुदि से सफार मत बन जाने हैं, पी भासशिका मन है। टीक इसके विपरीत उपेशद्धि में सारंगपिाप है, यही भनासप्ति का मूग है। ग्रामीनमान ।

मापारमा शीपमियन् ।। ही उपेक्षामार । 'मनसा पीवरिपये प्रदेभिरकासिकलममुप्पान के अनुसार मन इन्द्रियों के द्वारा मिन विषयों का सत्काररूप से मास करता है, पदि सस्काररूप से भाग्य निपों में (पपेक्षामाव की प्रधानत्य से ) सुमि मधिक समय तक यर पाती है तो वही पति 'अमुम्माम माम से म्पबात होने लगती है। चिन्तन करना भमुप्पान है। इस प्यनरूप पुद्धि के प्मापार से भागात विषप का मन के साए चिरकातिक संयोग हो जाता है, प संयोग ही संग, संगही मासहिए। 'मनसः सरदीवरिषपस्प पहिया परिमिघृता फाम" के अनुसार संस्कारस्मक निय पादित मन कर पहि रिपत संस्कार जनक वच् विपयों की पोर बार बार दोरना ही 'काम' है। सगरूपा भासहित काम की बननी है। यही काम भागे बापर होप का जनक मन जाता है । 'अनुफूप्तसपोगसक्षमाः मुलानुरायी संस्कारो रागः, अनुसार ममिसपिप्त, मतएन एस के साधनमूत मियप के साप ही काम का सम्पप होता है, पही राग या निपपपरिचिपका 'रागमूसा ।। एव 'प्रतिकलसपोगमचसो पुसानुरायी संस्कारो हेपा' के अनुसार मन का भपर्ने अवधित लिपप के साप (मो किस का प्राक) मुमता पपासहि दोनों में है। राग सम्पप से एक मित्र के लेापारा में मन जितना गहरा 1, उस से बही भरिक शत्रु के साप मम पर सता रावण-कस मादि मार इसी रेप मुनि से मुकाए । बम से राम का उदय है, काम से होप का उदयो । कामसम्म नाशिकरण बम ही गोष का मस है। एक बस को पाप मी चाहते हैं, उसी को एक दमा, यहि मी चाहता है। एक ही स्पान पर दो कामों का समम्पप होगा।रोगों का मपि पर एक है। इस सम्पनापिकरणरूप पाम से तयसपका उदय गावा।"प्रमी प्सितविपपेश्पाइमपाका वदमाविसमावमापा शारीरामानुरामा होममोपा" के अनुसार भपने ममिपित पदार्प का परि मम्प म्पह सेने की बजा कर सगा तो उस पति को उस की प्राप्ति में भागश गाती है। इस से गम का अमि पुम्भ हो परबा पनि का पर धोम ही 'पोप है। राग से ही काम का उदय मा है, राग से - , - .

आरोपनिषत् ॥ मोनित की कोर का उदय हम है। दूसरे राम्दों में कामप्रतिरथम ही क्रोष का मत है, यही कामप्रतिनम ट्रेप का मूष । काम एक मिम संकार , झोप एक मिम संस्कार है। दोनों का मन में सम्मेसन होता है। इन दोनों लियातीय सस्कारों के सर्प से एक मीसरा अपूर्व संस्कार उत्पम हो जाता है, पही 'समोर' नाम से प्रसिद्ध है। अनुमाहितसंस्कारसम्पज्ञान स्पति है, स्मृति विशान बस को मसाती है। समोह से (चिचक्षोम) से स्मरणपछि नए हो माती है । स्मृतिनारासे बुद्धि (विधारणति) मय होनाती है। मुस्लिम ही मिनाश का मुआप कारया। इसी क्रमिक मनोविज्ञान का निरूपण करते हुए भगवान् करते हैं- . यदा मोहकसित बुदिर्गविवरिष्यति । सदा गवासि निद प्रोवम्पस्य श्रुवस्य च ॥१॥ (गौ० २१५२) । प्यायवो पिपपान पुसा संगस्तेपूपमायत । सजाव समायवे फामा कामात फ्रोपोमिमायवे ॥२॥ कोपाममति समोरा समोहात स्पतिविभ्रमः। स्मृतिभ्रशाद् बुदिनागो मुदिनागाव मणश्यति ॥५॥ (गी० २।६२ ९२)। उपर्युक्त मनोविज्ञान से पाठकों को यह विदित होगया होगा कि परि विज्ञानारमा मन की मोर मुक नात्य है तो न मम पर भाए इए भविपामय मौतिक निपयसस्कारों को बनाता हमा भारमस्वरूप को माइत कर देता है । मुख में चो विषा-(सामामाग, मह मन के साप मुक्त होकर पानेन्द्रियों का उपकार करता है। इस बानीय सरकार को ही 'मनुमवाहितसंस्कार' करते है, पही 'मारना' नाम से प्रसिद्ध है । एक मुनि का प्रतिपा-(कर्म ) माग मन शरा कर्मेन्द्रिमों का उपकारक बना है। यही समयनित सम्भार 'पासना' नाम से प्रसिद है। न-(विया ) संस्कार, एष कम-(भविषा ) सस्कार ही मन की पौर मुकी सी मुनि की इस पर संचन 'गीताविहानमाप' में रस्मा बीए ।

ताईसोपमिपात् ।। हमा से (भभियान से ) समक्ष बनते हुए दुसमता मासकि चमक बन जाते हैं। पति पा कर्म है, परमार, इसरे शब्दों में पद्मम है। इस की उपासना करने बासे मयतम में प्रतिर होते है। पर रिचा की मोर सुन पले उस से भी मषिक गहरे अपकार में भाव है। कर्म तवना बुरा असर नहीं करस्य, चितमा विनि 'समम से होता है। मर्प की फरूपनाए मनुष्य को पाबन्ध रामवी है । निश्चम-पुदि से पिया पामें बसा कर्म शुभ विपास प में परिपत होगाता है, परत सम-विपा भाषरक-प्राति बम से मी काही अधिक भयाएर शेबाती है। क्योंकि कममनित पासना संस्कार की अपेक्षा नजनित माना संस्कार भपि पहो। को उतना दण नही मिन्ससा, नितमा कि बोरी की कारसने वाले को मित्य शर्म (कर्मयनित यसमा सम्कार ) तो मए होसहवा, परन्त बान (शाय मित मामा सकार ) सरा मष्ट नहीं होता। माप एक म्पति को मुरे कर्म से सीप रोक सकते हैं, परन्तु उस के बुरे विचार ( मावना) सहसा मसी बदहे पासकावे । स्यूस की बिकि- स्सा साग , सूक्ष्म की सिविता कठिन राम्ही सारे रहस्यों को सरप में रस्ता भा, विानाम्य बराकपपर्म बतायामा प्रस्व निशानाम्मापिकरण पाठकों के सामने उपस्पित विशालतमतिपादिक तपनों मन्त्रों में उपसम्म होने पक्षी योपनिफ्त में भारदिन "प मा विगन्ति • "भन्पदेशानिया" " पापियार" मम देखा जाता है। पर हमारी रि से ( शिशमाशि से ) इन तीनों स्त्रों का "प्रम्पयामि पपा" 'मम्भ सम पविगति"-- "पि पारितो'. यह कम होना चाहिए । ऐम सेयरों की प्रसारपानी मे यर निशानाम बाप गया हो। पाते ग्यात विनात्मा पसरूप बतना भापक है । भारम्वरूप परिधान के अनम्ता "जो पास्मा के पचास स्म पको नहीं मानने,ग्न की ऐसी गति होती" या करने का मकसा मिझता है। सर्वत में-सपिये भारपरेषता फी इस पर उपासना करो २ पाना म्यापमान होता है।

प्रारुपास्मा का सातमिवत् । अपरेमा यही क्रम शानिक है । वैज्ञानिक क्रम का 'पन्योपाइपिंपया.' या प्रपममात्र विज्ञानारमा का सारूप मतदाता है। 'अन्य तमा प्रविशन्ति०' इत्यादि मात्र भारमा के प्रतिपादित स्वरूप से विरुव मानेगासों की मधोगति बताता है, एक सवान्त में-'विया पापिपाव' इस्पादि मन्त्र प्रतिहत मामताप का स्पीकरण करता है। इसी क्रम का समादर करते हुए निम्न सिसित मन्त्र की घोर पापका प्यान माकर्षित किया पावा है- अन्यदेवाहविद्ययाऽन्यदाहरविद्यया ।। इति शुश्रुम धीराणां ये नस्तदिचचक्षिरे ॥१॥ (६ व १० मन्म) "परमात्मस्व विधा से मी पपा का माता है, भरिया से भी पृया का माता है। निन (पारोग्यरिद) विद्वानों ने हमारे लिए भास्मस्वरूप का निरूपण किया है, उन पीरों के (पास्मा के समाप में) ऐसे ही नियार -पर इम मन भाये रे,प्रा पीर पि द्वानों का कारनाकिमा पात्मवत विधा-परिधा दोनों स पृपस्वस्वरे" या मन्त्र कर सामान्य मर्य। हम लिय में समधि एव म्परिरूप से सर्वत्र विधा और भविषा (पान एव कर्म) का साताकार कर रहे हैं। प्रत्येक पदार्थ शन-फर्ममय है। साप 8 में नई जान 1, 4 की (विपप) मारप है। कर्मसभातरूप लिपप के बिना भाप भपमें शाम को कमी मही देस सकते । प्रत्येक दण में पान विषयाकारानारित बन कर, मासिव होता। इसी प्रकार प्रत्येक कर्म शानमप है । 'माय' मा किपा । आप किसी पद को मानते है, पा जामना मी कर्म । भाप कोई काम कर रो , उस में मौ धाम निस सम्म । समार में सतत प्रयास करने पर भी पाप लिगुन बाम एवं निशुम कर्म ध पर्षय मही तुम्न सफो । इन में शानभाग ममृत है, कर्ममाग मृत्यु है। दाम भादर्शवत् सा एक सप रहता है, यही इस का भमृतमान है । सन में माने पाले फर्मरूप विषप निरन्तर बदमते रहते हैं, पर कर्म का प्राध्यक्षमा शोपनिषत् ॥ नागि मृत्युमान है। बान विपा ६ कर्म मतिया है। दोनों का (सोपारिकरुप से) प्रमक होण है। इन दोनों का भूसापार निशानात्मा (पुलि) मशानात्मा में प्राण और चिद यह दो माग है । साप में तीसरा सोमव मी है । प्रधानारमा (मम ) में मौसमर्ने सोम-चित्- माण-परवीन की भरपा मकवाए थे, परन्तु इस में और विज्ञान में सामवर है। विद्या मास्मा सूर्य की प्रक्षित होने से पारों भोर से प्रचशित रातामा स्थग्योतिर्मपतस्व।। प्रजानाम्म चन्द्रमा की प्रतिमति होने से एक माग से (मिस मोर विज्ञानात्मा का प्रकाश माता -उस माग से ) प्रकाशित रातामा परम्पोविर्मयस्त्वासाप ही में विज्ञानारमा का सोम पारमेष्ठप अक्षणपति सोम १ प्रामामा का सोम पान हा सोम मिशन मोर प्रशाम में ही पातर है, जो भातर सर्प और पात्रमा में है। विधाम पिप्रधान , प्रमन सोम लप्रपात है। विधान विषयों पर पा सकता , प्रान पर विपप भाते हैं। मगीन रचना में मानम्पापार की प्रधानता किसी की नीना की प्रतिशिप करने में प्रशानामापर प्रपार है। सोमबत् दोनों के प्राण में मी मेट है। विवानप्रास दिम्प, महानप्राण प्रान्त रिप। विधानेन्द्र मया' है, प्रचनेन्द्र 'कृपा'। इसी प्रकार मिशान का विदरा मास्युक्त होने से प्रास , प्रदान में गो पिदश भापा पनिगम की ही देन है । इन सब कारों से विशाम-प्रमान की सोम-चिदश-प्राय तीनो कामों का पाप, एक पृषग्धर्मप मिर रो जाता है। हिमामा पारे, फारपिता है। प्रशानाम्य है। इसी मवान की शान (प्रा), किया (माण) भर्य (मूत) तीमो रातियों का सपासप वा विशनारमा मानी सोमकला से विशनाम प्रहामामा को मतम्पप्रा (पद-प-रसादि विषयों) के सिर, मित्र को प्रशामात्रा के थिए, एवं प्राशा को प्रायमात्रा (इन्द्रियवर्ग) के लिए प्रेरित परता। अब वा रिजाल, तमी ता पाम्पारिमसंस्पा की सरपरिषति । सोम मुलदिरा रिकाम पा विधा (बानी माग है, विशनानुमाीय प्रायेव माग है। इस प्रक्चर भमतमायुमप, दूसरे रामों में विपा-भगिधामम तीसरे शब्दों में पान कर्ममय शिानामा । मप्पामसपा पर उसी प्रकार प्रापरक पर्ष सरसर ममामा , बसे र सूर्य ।

प्रामा साईयोपनिषत् मेर-बेटि अपने अमृतमा भाग से विश्व का प्रकाएक ना मा है। बम तक सूर्य है, वमी तक मह- रागम , मी तक विवरे । निस टिम सूर्य म रहेगा, उस दिन रात्र्यागम द्वारा प्रक्षप का सापाज्य हो पाया। - "पा मिपा (मान) है, १४ प्रविया (कर्म)" इस प्रकार से हम ससार में समरि म्पहिला से मिस शाम-धर्म का साक्षात्कार कर रहे हैं, हमारे विमानधन सूप की महिमा है-~-'मा सूर्य वाजनि' । इस प्रकार पक्षिा विपासप से हम शिानामा के साक्षात् दर्शन पर रहे। पही सोपाधिक विपा-मविधा विहानस्य व स्वरूप है। इस सरूप को (माम कर्म को ) शषित मशिक्षित समी पानते हैं । इस भानवे -म करते है पर पार समी के मुख से निकलते हैं । स्पा सबिदिव पही विचा-भविमा (सोपाधिक बान-कर्म) निशानामा का वास्तविक पहप है! स्पा समी भामज्ञानी है। फिर वो शामोपदेश की भापकी म रही। इसी सारी बटिक समस्या को उत्तमाता मा 'अन्यदेमाहुचिया' इत्पादि मन्त्र हमारे सामने पाता है। हम सांसारिक पदापों में शानरूप से विस विपामा का सामान कार कर रहे हैं, क्या या प्रत्यक्षानुभूत विधा मास्मविपा है। अपि करते है-'भन्यव-रिपया। निस भविधामाग का हम फर्महप से दर्शन कर रहे हैं, क्या या 'मास्मपिपा, अपि करते है-'अन्यत्-प्रविषया'। गत असत में बाकि ध्रुति को निशानामा' में से निमुद आत्मपाप, सम का परि भाम परवाना है। यपि विप में प्रस्यप र विभा-भविपामाग उसी का बिल है, परन्तु या दोनों ही माग भौतिक विप से संपरिम्पक बनकर सोपाधिक पनते हुए स्वसरूप से पुन हो रहे है। पर विशुर विधा मनिषाकप भारतच पर स्वानुमोकाम्प है 11 शम्द की गति मही 2-'मिझातारमरे पान सिमानीयात्' । विम के प्रत्येक पत्र के मिपा-परिधा भाग पर पि साख पाइए, सवय 'इदै न- न-दमपि न-दमपि न यही करना पड़ेगा । इस प्रकार न-न परते जब सारे विज प्रपत्र की समाप्ति होगाय, उस समय जो विशुर-अगम्प तप Astग्रघमारे- their प्रोगाम माम्रो माँट Prfar ET,दरग, मंत्रावर । rartha-67 रिन । टटरपरा र नगर, frntra घरंग रेश Pration) मम गमग 'पग्रह, PREMI' तिन नितिनति) प्रगतम्यर । गम्भिर (RPIT),"प मम नविनति पदरापार का अपना प्रभागात 'ननि ननि पाप का मनपरि । प्रपर नकार 'ममा पास समिरामा मकार को मी प्रमावर मनिर ।'' सरायो 'न है- परमा, अन मग प्रमान का मीभमाब, पर वापप देगा। समाप मे मना का कारण मन राम, बम विप मामा के सम्पबचप्रमाण मान- गला कारण बन जाता है। मीण में 'ननि नमि' का पहोच है-मातीस्पेर' (मगीति एमापत्र कुलसपसम्पने)। इसी मात्र के सिर मति ने पाहा 'अम्पत्' गम्द मा प्रपोग रिया। मिनेष भामाप यही, परन्तु का नब 'मम्पन्' मात्र को सामने रक्सोगे गव । विएको पिपा भविषा मत समझो, बिच में विचा-पत्रिपामा मामा को प्रबिर समम्।। गापापिफ पर बिल हुए 'भाग्य' से निति निरुपापिक प्र भनुमब करो, महीमामा प्रारमा । सोगरिक मात्र तो उसी कर विवहप है। यहां मौकिक मनुष्प मामा के योगरिक (विश्वम्म) मार को प्रभान सममते १, पापौर योग निम्माभिक को वसरिक भामरप परते ।।पही उल मन्त्र का परिसा मर्ष ।। विान को पिया मतियारमप बतलापा गया है। या लिपा मोर भविषा माग उविरूप पाएगी परिधानुदि पिचएपी विचामुति है। या सौर विपा-मरिया माळवारमा पनिषत् ॥ मरवार - भाग है । इन से क्रमश अम्पयाम्प के विपा-भविषा भाग का उपकार होवा, मतएव इनें भी रिपा-मरिमा राम्द से मयत कर दिया मास। वस्तुत विषा-मषिधात्मक सम्पयाम- तत्व सौर विधा भविषा से पृपक्तस है। यह किसने सममा इसका उत्तर :-"पीरा"। सौर विधान पी भाग है । इस पीतल के परिशता विद्वान पीर हैं। नो धीर (सौरविज्ञान विवाता) वे ही न समझ सकते है कि यह इस सौरी मलय से मी मन्य। एव सौरी विषा से भी मिम है। यही मन्त्र का दसग भर्य है। अपमाप में मो मात्र प्रकट किए गए हैं, उन्ही भायों को 'विपाया:-मविपाया इन षष्ठवन्त पाठों से मी म्पत किया जासकता है। सम बसविताने पष्ठपन्त पाठ को हरी प्रभान माना है, जैसा कि मन्मभुति करती है- मापदेमारिपापा मम्पदापुररिणापा। शवि सम्म पीरा ये नस्तद्वियपधिर ॥ (पषु सं १० म । १३ म)। सामान्य ममुप्पों में विधायद का मर्थ शान, एवं मनिषाराम्द का मर्य महाम समझ रस्सा है। इसी भान्तिमें इरें भामस्वरूप से पवित कर रखा है। घर मास्मा का - रूप मी लिपा-भविपात्मक मतलाया जाता है। स्पा भारमा के विपा-मनिपामाग सोकसिर शाम-महान होस का समाधान करतीई भुति करती है कि तुमनें निषा का जो मय (बाम ) समम रस्। तपारे समझ गए विपास्वरूप से उस पारमपिया का सहप सपा विभिम -'मन्येदबानियापा' (भारमविषाण ) । एवमेव तुमनें भविषा का बो भर्घ (भान ) समम रस्सा , तुम्हार समझे हुए प्रतिवास्ताप से भास्मा के उस भरिणा का इसय ही तार्य है-'मन्यदेमाइररियाया । मिया से मपय की मिसा-या भमिप्रेत • भम्परेवतरितारपो प्रविदिवारभि । शात रापुम पीप पे मस्तविधिर" (न. ११५) "अन्यत्र पारम्पमापमा' (करार) इत्यादि सपनिमम भी इसी कतीपाप का सीकरण ले। । - मा भावारमा का पनिषत् - - , भविषा से सम्पप का एड पर्ममाग अभिप्रेत है। पविया का मर्प मशाम नी, अपि । कम है।मात्मा विवावियरमक है-इस का तात्पर्य-प्रास्मा विषाकर्ममप है। यही है। अपिव नपा-प्रविश शद से झान-कर्म का ही प्रहण कारमें पाले कुछ एक मनुष्यों का । करना है कि विपाइप नमाग सपा स्तम्न तत्व र यही वास्तव में प्रारमा है। कर्मच मानरूप होता मा भारमा का भावरक है। विषा कमी भविषा से, एक भविषा कमी विचा से संयुक्त नहीं होती । दोनों (विषयी-विषय ) तम -प्रकाशवत् अत्यन्त निम्म । इन दोनों किम्वों का जो एका सम्पवेश देख मावा रे, मह सर्वपा मिथ्या भाति । भावरणमूला भनि पा का पाइप मारमा से क्या सम्बन्ध ! इसी भ्रान्तमत का निराकरण करवी भूख करती है कि यदि हम विषा परिपा का ऐसा ही स्वरूप समस्ते हो सो विचास करो, म तुममें विधा का यवार्य रूप समम्म, न भविषा का । तुम्हारी सममी हुई दिवा का एक म दिपा का नो स्वरूप है, उस माम निया का एक पश्चिा का स्वरूप सर्वया 'मन्पत् है। जिसे तुम मिप्पा पाने का साहस करते हो पा भविषा मान नहीं, अपि त विपागर्मित क, एवं निसे तुम सुख दिया करते हो कमगमिता विणा है। मूस गए पूर्व की 'तद तस्प सर्पस्प ददु सपम्प पाजतः' इस प्रतिकाको । पारमा का भाषा भाग मिला है, माधा- भाग कम है। दोनों का समम्पितरूप एक पात्मा है। ऐसी पिठ में काम के अनुयायी भी उसे नहरी परिचानते एक केस पर्म के अनुयायी भी मात्मसातपशान से बमित रहते हैं। धम प्रकाशन दोनो बिर समय है पर दोनों का एक समय मिग्या मी भपि त- 'भमत पप सस्पुप सदसवात्ममुन' के अनुसार मितान्त सत्य है । जो मारमा के इस समम्भिारपा मारापमा म फर फेक्सनमाग भपमा केरस कर्ममाग की उपासना करते है, पामते हो उन की मा दण देती है। माही जामते तो सुमो । अन्धं तम प्रविशन्ति येऽअविद्यामुपासते । ततो भूय इस ते तमो य उ विद्यार्या रता ॥२॥ (६.१ मत्र)। २० प्राध्यत्मा । ईशोपनिषत् ।। तीभव पुरुपास्माधिकरणान्तर्गत सत्र के प्रमनीसिपद में कमप्रपत्र का दिग्दसम कराते पर कम के कम-विकम-प्रफम भेद से तीन प्रधान विपर्ष,एवं ५ साषाण विग वताए गए हैं-(देखिए ई वि मा सण १२१-१२५ पृ)। कर्मवत् पान मी मान-शिान महान इम तीन मार्गों में ही निमक है। रगुको सप सममना मझाम है। इसी को भ्रान्ति, मोर मिस्यामान मादि शम्दों से पास पिपा जाता है। दाशनिक परिमापानुसार इसी भानरूप भान्तान को 'मातिमासिकीर' कहा जाता है। यह महान परमापाधि से मी मसत्य है, एव पहारदष्टि से मी मसस्प है। यही वेदान्तनरानामित 'पन्यास' है । रमु को रसु सममना लिबान है । यहाँ मान सम्द से निम्न शान हो मर्मिप्रतो । रख रख नहीं, सापात् नम है। परन्तु लोकिक मनुष्यों ने अपने सौकिक म्पाहार की मनिषा के लिए इसे 'रन्जु नाम से पास कर रहा है। म्यबहाररपि से रज्जु को रसु काना मपपि सस्प है, पाल्तु परमापररि से रग्स को रग सममना विज्ञान (विस्वबाम) है । इन्द्रियों से जिन विपयों का जैसा बान होगा। यह सब परमापान से युक्त होता मा विज्ञानकोटि में प्रविय है। इसी को 'भ्यावारिकोटि' का पाता है। एक रसु को मात्मा सममना बाम-भाना न्मुकि' । यही मारमाशिद पही 'पारमापिकीर, पही वास्तविक शाम है। इन में शान कर्म का उपकार , निशान विक्रम का उपकारक है, एव महान माम का उपकारक है। सरे शब्दों में मारमशान से निवृतिसक्षण भात्मीय (निकाम का का उदय होता है। पद्यम से प्रतिपय म्यागारिक कर्मों का सामन होग, एर ममान से पतन मूसक धान्त कर्मों में प्राप्ति होती है। -मानम् (मारमान-सर्वथा सत्यम्...फम्र्म (भारमीय कर्म) २-विमानम् (सोमन, परमापा मसप...२-रिरूप (म्पापारिक कम) म्पमारतः सम्पम् ) 1-ममानम् (मिमान भान्ति ) ५-पर्य (निरर्पक फर्म) भनकमरिया प्राचारमा नाशपनिरन् । १-विपा (धान) सापेछ प्राधिकर्म सकर्म-धमकारी २-Rषा (बाम)-निरपेच प्राधिकम- "सकर्म-साधुकारी नाममूसकर्म २-दिवा (बाम) सापेक्ष नितिकम' निकामकम-कर्मयोग्य । -स्पिानिरपेड पिम्पबम विकर्म--सौरपतिक]-विधानमसकार्म ५-विधानिरपेच निरर्पकर्म "महम-~-पपेयाचारी-महानमुहबर्म --- इस प्रकार सम्पूण विप में ज्ञान और कर्म का सामाग्य हो । प्रेमाविमात घाम में से कान, एक पाश्मित कम में से कर्म प्राप, रोग विज्ञान-प्रदान, एक सिर्म-मर्म हेस ६ मा हस्पबेनामों का सिद्धान्त है। इस काम और कम के सम्बन्ध में मारतीय विमानों में चिरकार से मिम मिम दो मत पठे पारे । कामच को ही प्रधानता देने पठे कमरों का करना है कि मात्मा का भम्युदर कम से ही हो सकता है। कर्म करने में ही करपाण है। सम्पूर्ण विम प्रगपत्ति का कर्म है। उस में कर्म से ही या विमति प्राप्त की है। कम करते पामो, अन का उप अपने भाप रो गापाप-'कन सप योगसंसिर मामेनास्मनि बिचति' । शाम के लिए प्रयास करने की को भारयता नहीं है। हमारा मुरुप श्रेय कर्म (प्रतिकर्म) होना चाहिए । की शिान् कर्मठ, कर्मयोमी, धर्मनिष्ठानुपापी मादि नामों से प्रसि। दूसग दस करता है कि वर्म से कमी अम्पुरप नहीं सकता तमारा या कामानि प्रजापति में कम से या विमतिमति प्राप्त की है, सर्पपा मसंगत है। प्रयापति निगरानमा है। किम की समाषना ही नही है। यह तो निस्पार-बुर-मुक्त है। तमे गोबर्मप्र पर (निस) सिचाई देया , ण 'रग्सपर्यत्' स्पाणपुल' 'यदिरमवात् सपना प्रान्ती, मप्पासम्पत्र । सारा लिए एक पण च निप्पामा। हम मानते RR पासमुचित कर्म श्रेष्ठ है, मफल देने वाचा है । परम्त वह मी मागे गाकर पणिक ( रेप प्रारुपास्मा । ईशोपनिषत् ॥ मिष्ठामेर . । फिक) मुसकोटि में प्रलिए होता मा दुःस का ही कारण बन जाता है। 'बीणे पुपये मर्म- मोके पसन्ति' नावे मग याल्पा'। कर्म कर्म है, पाप्मा, भावरक है। इससे धाममर्वि भामा कर नि भेयसमाव कपमपि समय नहीं है। सपर्मपरिस्पागसपण पानपो- गम्प सन्यास से ही मुक्ति हो सकती है। पी हामैकवादी 'शानी' 'माननिष्ठानुपापी' 'सांस्य' मादि मामों से प्रसिद। एक करते हैं शान श्रेष्ठ है, दूसरे काते है कर्म श्रेष्ठ है। एक करते हैं सारा कर्म पोष पारकर महार में चले लामो, पसरे करते है रात दिन कर्म (प्रवृतिकर्म) करते हो। चोक में प्रशित इसी दो विरुव नियमों का निरूपण करते हुए मगवान् करते है- सोकेऽस्मिन् द्विविधा निष्ठा पुरा मोका मपानप । शानयोगेन सांख्यानां कर्मयोगेन योगिनाम् ॥ (गीता) उपनिषद की रधि में वह दोनों ही मार्ग पवन के कारण है। नियामाग भी बैंक नहीं, भक्पिामाग भी ठीक नहीं। ठीक स्या नही ! समष मही । कर्मठ कर्म में प्राच होते ए पासना सस्कार से भारमा को भारत कर से हैं।शानी कागने वाले बाम में प्राच हवे गए भावना से मामा को भारत रहे । सनम शामयोग, सकाम कर्मयोग दोनों ही मा मा-सनासकार के जनक बमवे ए वन के कारण है। सर्पकर्मपरिणागपण सांस्मयोग बन ही नहीं सकता । क्योंकि शानपत् कर्म मी मारमा का पर्व (माग) ', असा कि पूर्व में बत गपा गया है। उपर कर्म मी बिना शान के मप्रा ।।मो केरस कर्म के अनुयायी है, दिनों के लिए उम का सांसारिक मत्र भरय सता, परन्तु इस प्रतिमनक सस्कार से मा मा भाव होमात्यो । पी प्रतिकर्म भागे गाकर ममतमरूप पावागादि स्पासपोनियों का भरण बनवा रामा मात्मा को सदा के लिए भापक्म से भारत कर संवा :-( देखिएई मिमा रमण भावरणतन्त्र१५१से१२३पर्वत)। ऐसी दण में हम कर सकते किबोकेस भनि भारुप कम की उपासना करते है, भोर म में प्रति होवे हैं-"भन्म दमः प्रविणम्ति पेऽपिपामुपासवे"। । - प्रायरमा का शापनिपन् । मिप्यापार - पह तो भविभोपासकों की क्पा , मब विपानुयायियों की दशा देसिए । केस धन को ही श्रेष्ठ मानने वाले महानुमात्र सांसारिक मम्पुदय के बभूत कर्म को सो परिसे से ही मोर बैठते हैं। सरकार कोपीन सयकर भरण्य में पले गाते हैं। ऐसा ही है, बो होना होता है। शुर शाम कमी पता नहीं, कम से कम इस दशा में भी मुक्तिकामना माश्य गती है । मुक्तिमाममा ही क्यों, मामा-पीमा-सोना सभी शारीरिक कर्म तो यहाँ मी साप यो । इन्द्रियों के वेग मीवर से उत्पाद मचाते है । बनाष्टी सोग से पा कस्ता दान्त र सकते हैं । मी तो मगवान् ने ऐसे सम्पास को मिध्यापार' (रोग) का है। जब कर्म तो भासहित भरप, मासति । तो पावरस मी ममय है। इस भारस्पिति तक तो कर्मठ और पानी की समान दण। भन्तर दोमों की परिस्पिप्ति में केवल यही रा पाता है कि फमानुपामी यहाँ सांसारिक मन का मोका नता, या बनानुयायी इस मव से भी बधित हो जाता है। अतएव हम कर सकते है कि इन वियोपासकों की द पीपोरासकों से भी बुरी है। कर्मट उबर न सही, इमर के तो है। परन्तु यह घर के से, न उपर के रहे, "दुरिमा में दोनो गए-मापा मिप्ती न राम" | न सौकिक पुस, म मामानन्द सी मभिप्राय से उपनिपत में इनके लिए- "ततो भूप इस ते तमो य च पिपापो ग्या" पर कहा। काना नहीं होगा कि भार उक्त प्रोत बबन भारवर्ग में भरण परिताप हो रहा है। सपकर्मपरित्यागसपण मन्यास के उपदेना पापामाँ की पा से मात्र भारतस्य सारा फर्ममाप पपने आप से सो बैयौ । प्रत्येक बर्म के लिए मान पर परमुखापेथी बन रहा । उपर कर्मठ विमेना योग प्रतिदिन भागे मन जारहे है ।म पार्ने 'ससार मग है, पास्मशान री सवारी इस बारे मागप में मस्त है। पर सपोकि केरस पर्म को पानाने पाठ कर्मट मी पणिक मा के पनन्धर उसी भागरण से भारत हो जाते हैं, परम्त उनमें सौनिक सम्पत्ति तो मिल रही है। उपर परिसत रिपानुरागी हमारा समाज दोनों से पबित हो रहा है । इस प्रकार प्राप्त मन्त्र विगु मानयोग, कर्मयोग दोमो कोही निदा करना है, इनमें मी विर शनियों की विशेष निग्दा करता है।

प्रास्तास्मा या शापनिषत पाया प्रकारान्वर स मार्य की संगति लगाइए । पिमा कर्म की लिपा भी अधूरी है, पिना विषा फ फर्म मी अपरा है। विधा-कर्म के समन्वय से ही फर्मवा का उदय होता है। एक म्पति विद्या (शामान) से सर्षया शुन्य है, निरक्षर मून्य है। पपपि या पी फर्म फरहा है, परतु शासवान से पुक्त मुटि के प्रमार से इसमें कधष्पार्चम्य का पियफ नहीं रहता । मजदूरी करके अपने कुद्रम्प फा मरण पोपण करते हुए पशुमत् नीरन म्यतीत कर देना ही इसका परम पुरुषार्थ है। ऐसा मूर्स (किन्तु मोकिक कर्मों में पद) मनुष्य सचमुच भास्मष्टि से गहरे प्रपेरे में है। इसे परलोक मारमा भादि का कुछ ध्यान नहीं है। अन्याय-भोफा-मानसामी मिप्यामापण भादि स अपने माफ्को सपतुर मानने का गर्ष रमने माप्ता या विषाशून्य मनुष्य मिचमोह से मोहित होकर फाप्तक्षेप किया करता है-'अज्ञानं तस्य शरणम्' । कुछ मनुष्य से भो विषा पढ़ते हैं, शासान सम्पादन करते है, इनकी मुद्धि में रिमेक भी उस्पम हो जाता,यापास्म-परमात्म-परसोक का स्वरूप मी सममने सगदे है। परन्तु पा महा- नुभाष केपस 'समझ' (मिया) पर ही विश्राम कर लेते हैं। सम चौरे म्पास्मान दे रामना, बात पाव में धर्म की दुई देना, इस प्रकार फेवस पाणी पर ही इनके धर्म- फताप का भवसान होनाता है, कम करना इनके लिए एक विपत्तिो-'वाक्शूरा'। सममो प्रपश्य रे, परतु स्लप कुछ नहीं करते । मादेष्टा , मादिष्ट नहीं । विद्वान् है, कर्मठ नहीं है। पर है, गुणे नहीं हैं। करते है, करवे नहीं हैं। इस प्रकार केवल रिमा को अपनाने पासे या महानुभाव फर्मपरित्याग से सब कुछ लो रो। देखिए अपने समाम को । पाम इन दोनों दसों की क्या दशा है। देशस्तिपी फर्म प्रमण महानुमान शाबान से पश्चित दोहे हैं। फत्त या होता कि फर्मठ प्रास्म एपा पाटन होते हुए भी समट है, सपरिणामी हैं। परन्तु हमारे विद्वान् भाटव होने के साथ साथ ही संपधि से मी पवित होरे हैं। कोई सा ही मम्ममा विद्वान् मापको २८३

ईशोपनिपात् ॥
सम्मति से पुक मिलेगा। मन्पपा समी पिक्षानों पर निर्थवि (दारिद्रा) देववा की विशेष
हपा मिसगी ! क्या इसी का नाम प्रमुाप है ! क्या पर्म से पही फल मिलता है।
क्या इसी मापार पर-'यतोऽभ्युदयनि यससिद्धि स धर्म' या कहा
माना! भाररपका मान दोनों को दोनों पों के प्रपनाने की। विद्वान उनक
मंठों से कर्म करना सीमें, कर्मठ इन विद्वानों से रिपारण करें, तमी राष्ट्र का प्रयु
स्पान सम्भव है। केवल प्रमबम (विपावस ) मी कुछ नहीं करसकता, केरस पत्र
बस (धर्मरस) मी परे । प्रम-सत्र के समय में राष्ट्र का कल्याण है। सिवि
म (Civil) और मिलिट्री (Mintery) क समन्नम से ही राप्रपा प्रभ्युदय है।
के समम्पप से ही भर ममापति विषसामाग्य का
उपमोका बन रहा है। इसी महतिसिद विज्ञान का निरूपण करते हुए पि काते
विपा-धर्मप ब्रह्म-क्षप्रवल
"नझेव मित्र , क्षत्रं वरुणः । श्रमिगन्तेन ब्रह्म, कर्ता
क्षत्रिय । ते इतेऽअग्रे नानेवासतुझप क्षत्रं च ।
ततः शशकव ब्रह्म मित्र ऋते तत्रादरुणात् स्थातुम्,
न तत्रं वरुण -ऋते नाणो मित्रान् । यद्ध किन व
रुण कर्म के प्रसूतं ब्रह्मणा मिनेण,न देवास्मै तत्
समानुषे । स तत्र वरुण -प्रय मित्रमुपमन्त्रयाञ्चके-
उप मावत्तम्ब, ससृजावहै, पुरस्ता क्खे, त्वत्प्रसूता
कर्म करवा इति । तथेति । तो समसृजेता, तत एव
मैनावरगो ग्रहोऽभवत् !x+++तसदवरलप्तमेव-यद्-
नायगोऽराजन्य स्यात, या राजनं लभेत समृद्धं तन् ।
St

प्राडवारमा मोपनिषत् ॥ . एतद्ध सेवानवक्लप्तं यत् क्षत्रियोऽब्राह्मणो भवति । य- द किश्च कर्म कृतेऽप्रसत ब्रह्मणा मित्रेण, न हेवास्मै तत् समृध्यते।वस्मादु क्षत्रियेण कर्मकरिष्यमाणेनो पसर्त्तव्य एव बाझगा । स हेवास्मे तद् ब्रह्म प्रस्त कर्मयते” इति (शत० प्रा०४ क...[४ा०)। प्रम मित्र है, पत्र वरुण है। भागे मागे घम्तने मासा ही ( अनुमति प्रदान मरने माता दी) प्रम, फत्ता सप्रिय है। यह दोनों (प्रम-पत्र ) पासे पृयक - यह से ही पे, पर्याद सष्टि से पहिले इन की साघर परस्या पी, प्रन्यिापनमार न पा। उस समय (पष्टि से परिस) प्रम मिम तो सब परुप के बिना (वसर पसे) मविष्ठिव राने के लिए समय होगया, परन्तु आप परुण ब्रम मित्र के विना स्व- वाम स्प से मविष्ठित राने के लिए समर्थ न हो सका। उस (एकाकी दशा में) प्रस मित्र की मनुजा कोसायोग के बिना परुने मो कुछ कर्म किया,पह कर्म इस परुणपत्र के लिए समृदि का कारण २ पना । (भपर्ने कर्म को म्पर्य होता देख कर ) ER पहा में प्रममित्र से मार्थना की कि (रेवा!) भाप मेरे ऊपर रुपा करें, भाप मेरे पास लौट पानी प्रपन दोनों मिल पाय, में सदा पाप को मागे रमगा, पाप मैसी प्रागा देंगे तदनुरुप्त की फर्म फरंगा । प्रमने 'वषास्तु' कर दिया, दोनों मिम गए । ( इन दोनों क समन्वय से ) ( सुमसिद मोरामप ) या मैत्रावरुणयह संपन्न होगया।++x++पर पाव वो फिर भी बन सकती है कि प्रामण पिना रामा क रामाप | पदि प्रामग्म राना को प्राप्त कर सेंगा पो पर उस प्राप्रप की सटि होगी। परन्तु या पाव वो किसी भी भा-या में संभव नहीं है कि क्षत्रिय रिना प्रा मण क (माम भी) रा माप । पिना मामा की मादा क धषिय जो मी सा मास्वास्मा - ईशोपनिषत् ॥ R मम ज्ञान कर्म करता है, का कर्म कमी सपदि का कारण नहीं बन सकता । इस सिए कम करने की का रसने वाले चपिय को अवश्य प्रामण का सहारा लेना चाहिए। प्रम से प्रादि फर्म इस पप्रिय कमिए प्रपश्य ही सपर बन जाता है"। है,क्षम कर्म है। मान मनोबल है, फर्म प्रायबल है। माण श्रापोमय है, इदि सुयमयी ।। भापोमय पारमेष्टय परुणमारा क्षत्र है, विज्ञान मप सूर्य मित्र है। दोनों के समन्भप से मेत्रावरुण पप अहोरात्रग्रह उत्पन्न ! मा है।रानि फे १२ प स मम्यान के १२ समेत प्रदलगोस ( पूर्पकपास) मित्र है। इस में सूर्य की मपानवा रहती है-'मैत्रमह' । दिन के १५ मने से राशि के १२ वमेतक का पर्दसगोस ( पश्चिमकपास ) वरुण है। इस में पारमेष्ठप सोम की पपानता रहती है-रात्रिर्वारुणी'। पोराम का परिप्लव डी विष का स्प है । इस प्रकार ब्रह्म-तत्र के समन्वय से विश्व प्रकाशित हो रहा या विच वीसरा वाग्बल है। इस प्रकार मन ( प्रम), प्राण (दा), वाक् ( विद) की समटि 'द सर्वम् है। परि ब्रह्म-क्षत्र का सम्मन्य मिशिल होमा वा है वो पिप अर्पमूर्ति विश्व मयावस्था में परिरुप हो माता है । यथपिका- न-म दोनों को दोनों को प्रोता है । परन्तु प्रपानतावान की ही है। कारण मान व्यापक है, मूलघरातल है। मा पटिप सपदि नहीं राती, बकर्म का को पिसयन हो जाता है परन्तु शान स्वखाप से ग्यों का सों मतिष्ठित रावा। पदि मान का कम के साथ समन्वय होगाता है तो मिचस्प से उस की सपरि परश्प से नापी । परन्तु कर्म यदि पान का भाप्रय छोर देता है तो पा अपना स्वसप ही सो पेठवा है। इसी रास्य को बतलाने के सिए अवि में सपबरण द्वारा प्रसमिम की 10l प्राध्यास्मा का ईरोपनिपात् ॥ पुयेषा भार्थना करवाई है। मन ही धन की योनि है-( देखिए ई सि मा सएट को- तन्त्र) । प्रत्येक फर्म में शान पहिस है, कर्म अनन्तरमावी है । बचतकर्मों का मान ही तचत् कमां की महति का कारण बनता है। इसी शानग्रस के वपासक को ब्राह्मण काा जाता है, यामत के उपासक को त्तनिय का जावा है , एर पर्यशक्तिकप पारुतत्त के उपासक को (रिहगीर्य के उ- पासफ फो)वैश्य फा माना है। प्रकृतिसिद निम ब्रह्म-क्षत्र-विद् वीर्यों के भाधारपर ही मारतीयवर्णव्यवस्थासूत्र समाप्तित है। प्रकृसिषद प्रत्येक राना एक एक प्रामण पुरोधा अवश्य रखना चाहिए, एव इसी के प्रादेशानुसार इसे कर्म में भष्टत्त होना पारिए । चाणक्य पुरोधाने चन्द्रगुप्त को उन्नति के किस शिखर पर पहुवा दिया पा या सर्वविदित है। यदि प्रामण को रामा का माप न मिमगा तो नाममा प- पनी विपा का विकास न कर सकेगा, परन्तु उस के साप की कोई नि न होगी। उपर मदो मत रामा पनि प्राम को पुरोषा न पनाएगा वो पर लय भी नष्ट हो. मायगा एम पिवीर्यस्प राष्ट्र की प्रयक्ति मी लोरेगा। । ऐसी दशा में हमारे दरागासियों का क्या चम्प रोमावास का विचार में स्वयं करें। पजाप तत्र बगाल ब्रह्म आयसमाज क्षत्र , सना- तनधर्म ब्रह्म । राष्ट्रीयदल चत्र, विद्धन्मएडली ब्रह्म है। पान मानवपकवार दोनों के समन्वय की । नप सक ऐसा न होगा, सस वफ किसी मी कर्म की सिदिन होगी। एक पाव और प्यान में रखनी चाहिए। यपपि गसती गेनों की परन्तु मपानता रिपोपासकों की ही है। यदि कमठ गप्मती करवावो विद्वान् माटो पी। सब मे परिमे टेग का मासाग अपने फराप से पुन दुमा । पालो म माहवारमा मास्मि नाईपसि! म मियोपासकों की है। इसी मूसने पूर्णव्यवस्था का महत्व नष्ट किया है। मूर्ख का अपराप पम्प है, परन्तु विद्वान् पदि गमवी करता है,पर यदि कर्राम्यम से पिमुल गोवा वो उसका अपराध मयारो-'तो भूय इव ते तमो य उ वि धायां रता' । भरिया के उपासक वो अपकार में है, परन्तु उन से मीप कि मम्पकार में थे , मो रात दिन विपा की उपासना करते हुए मी पर्ममार्ग से यधिक है। इस मकार पात्मा के पड़ों की उपासना करने पास दोनों ही दस सन- स्पुन रो। बरी बटिस समस्या है। बरत नाम मी दुरा, केवल शन उस से भी मुरा । एक न कर्म मर्ग से पीरिक मोह वीसरा मग मी । ऐसी परिस्पिति में पप किया जाप , कि- स भाग कर भरणम्पन लिया वाम ! इसी प्ररन घसम्मान करती मग पाकर मुखिकरती है- विद्या चानिधो प यस्तदेदोमयं सह । अविद्यया मृत्यु तीर्ता विधयामृतमश्नुते ॥३॥ ( रिम) रामविरिया माम से प्रसिद रैराग्पादियोगपिया नाम की प्रपमा निपारे पर- ह प्रथम एवं द्वितीय भाव में मगवान् में को विस्तार के साप भानपोगनिष्ठा, एष पोगनिष्ठा निरूपण किया । साप ही में 'नास्ति बुदिरपुकाप (भगाद्गौवा) त्यादि रूप से भईन को पुनियोग मम्म समाप । मगात्मविपादित इदियोम का भमिप्राप मन में पा समम्ध कि मगधन् कर्म की अपेक्षा बानमार्ग को श्रेष्ठ माना है। पुदि विशन विधान पान है इस सार्वजमीन प्रत्यय के अनुसार इदिमाग को ज्ञानयोग समम विपण गण । उमर मगधन् में शाननिष्ठा-कमनिष्ठा का निरूपण कर मुभियोगमिष्टा पर प्रकार का उपसार किया था, उदिमाग को ही श्रेष्ठ बतखामा मा, साप में कुछ भास्वरमा काशीपनिपत् । कम्ममा फम्म स्व.' इस्पादि रूप से भर्चन को वोषित कर्म करने के लिए बाध्य किया पा। फष्णार्जुनसवाद स्पा पा, प्रम पम का समन्वय पा । मगवान् कप भमिगम्ता प्रम थे, मर्जुन की वत्रिय पा । शान-कर्म का एकीकरय पा । इस प्रकार मगधन् ने मर्जुन को | कुप करा पा, पाठीक पा । परम्त इन उन्मुग्प भक्षरों के पस्तविक तात्पप को न सम- सताराम भान प्रश्न कर बैठा- ध्यायसी घेव कर्मसस्ते मता बुदिमनार्दन । सद किं कम्मणि घोरे माँ नियोगपसि केशव ॥ (नाश१) । इस प्रभ के उचर में तीसरे अध्यायमें भगवान् ने उसी उम्मुग्न अर्थ को स्पर किया । भगवान् में मतसाया कि युरियोम वास्तव में न कर्मयोग है, न बानयोग है, अपितु दोनों के समन्वितरूप का ही नाम मुशियाग है । मुन्द्रि में शान कर्म दोनों है । युधि का ज्ञानमाग विषा 1, कर्ममाग भनिया है। मिम दो निष्टाभों का हमने उम्लेन किया है, परमार्परमि से ये दो निष्ठा नही, मपितु युरियोग नाम की एक निष्टा है । जो सांस्म है, श्री योग है। भो योग है, वही सांस्य है-एक सांप प योग प य पश्यवि स पश्यति'। इस पर यदि प्रम परे कि मगन् ! कर्म कर्म है, भावरक है । यह भामरस किए बिना नहीं रह सकता, ऐसी दण में माप मुझ कर्ममाग में स्पों प्रात कर रहे है। इसके उत्तर में हम यही करेंगे कि कर्मपरित्याग सर्पपा मसभव है। कितने ही कर्म (मात्मीयकर्म) ऐसे हैं, जो किसी भी रशा में छोरे नहीं जा सकते | सी परिस्पिति में कर्मपरित्याग का ढोंग करना अपने मापको भोका देना है। हम मानते हैं कि कितने ही फर्म भारम ऐसे हैं जो पन में गम देसे है, परन्तु कितने ही ऐसे भी है जो बचन के स्थान में बपनमुक्ति का कारण बनते हैं। क्या इन मापन कमां को छोड़ने में मुस्लिमानी है। नियत कर्म बोरे महीपा सकते, मयपन का को छोरना मुरा, फलत सर्वकर्मपरिमागप्तक्षणसन्यास का कोई मूरप नहीं पता । कर्म क्यों नहीं हो पा सकते, इस पानिपतारे सात कारण है। २८२ मारवारमा माईरोग्पमियत कम्मनिवाग - १- प्रभ्युपगमसाद का भाप्रय मेते हुए एम योड़ी देर के लिए या मान से कि सचमुच कम प्रापरक हैं। पछा इन छोड्दीमिए। ऐसा करने से मविप्पक सिए पापरण पद रोजापगा। परन्तु ऐसी दशा में सचित ( सस्कारस्प) कों को पाने का माप के पास पया सापना हान निष्क्रिय बल है, प्रत पर पाररमा को हटाने में असमर्थ है। इस के लिए माप को पाप होकर नष्कर्म का प्राश्रय मेना प्रापरफ हो मायगा । नेफ्फम्पसिद्धि कमा रम्म के विना सरपा प्रसम्मम है। यानरणनिष्टसर्प नैफम्पकर्मानुष्ठान म सारश्यफहै। । कमकी नफर्मम्पा पहिली यही अनिवार्यता है। इसी के लिए मगवान् ने -'न कर्मणामनारम्भान्नेकर्य पुरपोऽश्नुते' या २- उपर कर्मसन्यास सर्पमा म्यप है। मिस प्रयोजन के लिए (पानरम के मासन्तिक निराकरण के लिए ) कर्मसम्पास सिया गया, मा प्रयोमन वो सिद्ध हुमा नहीं, कर्म मोर छोड़ दिया, प्राप्तसी और बन गए, इस म्पर्य के मार्ग से सुनें अपना क्या हित समझ रखता है। कर्मसन्यासवेय्यर्य रूपा यही इसरी मनिपार्यवा है। इसी के सिए मगमान् ने 'न घ स न्यसनादेव सिदि समधिगच्छति' या कराई। मात-मूमपरिसाम, गमन, मोमन मादि निपत शारीरक कों को कमी मोहा मी नहीं मासकमा । मम परबग कर यह सारे कर्म करने की पड़ते। मब फर्मसाग असम्मम है तो फिर धर्म परिमाग कसा ! यही फर्मपरित्यागाशक्यरूपा वीसरी मनिवापता है। इसी के लिए भगवान में-'नहि कश्चित् चणमपि नातु तिष्ठत्यकर्मकृत्' या का है। २.

माहवारमा जाईशोपमिपात् । कमोनियमेवो सापही में रिसफा (छींक) अम्माभिमाई-उपासी), वासनिवास, मुमुचा मादि कितने ही प्रकृतिसिद्ध कर्म है। तुम निमय फरसो कि माम से हम नहिनफा सेंगे, न बाई नेगे, न मूख लगेगी। परन्तु सुमारे इस निश्चय से मेगा क्या । तुमारी इच्छा यहां भवसद है। इन फर्मों में प्रकृति का हा य है। पर अवश्य सुम को इन कमों में महत कर देगी। अपने समय पर तुमारी इच्छा की कोई अपेक्षा न रखते हुए या माविक कर्म रोती प. गे । यही प्रकृतिसिद्धलक्षण चौपी भनिवार्यता है। इसी के लिए भ गवान् ने- 'कार्यते वश कर्मसर्व प्रक्रतियो' पर कहा है। मासकि पैदा न करने पाले मनासतकर्म विशिष्टकर्म है। बसावकार से इन फमों का निरोय किया, इन्द्रियों का सयम किया, परन्तु मन पश में नहीं । इन्द्रिपसयम होने पर भी मन अन्तर्जगत् में इपर पर रिपपक्षोलुष बनवा मा मटकता फिरता है। यही मियाधार है। इससे वो प्रका यही है कि इन्द्रियों को अपना अपना फर्म करने दो, मन को पग में रमलो। फर्म करो, पासक्कि मद रफ्सो । फर्म का परित्याग मत करो, कामना का परित्याग करो। इन अनासक्त कमों से इन्द्रिये अपने माप संपत पन पिगी । यही तो इस अनासक कर्मयोग की रिशेपता है। कर्म की मी पनि भनिपायता है। मन को इन्द्रियों के मामीन मत बनायो इनियों को मन के भाभीन पनाभो, यही मनासक रूपयोग है। इसी के सिप-यस्त्विन्द्रियाणि मनसा नियम्यारमतेऽर्जुन । कमेन्द्रिय कमयोगमसक्त सविशिष्यते पाकहा। बमोदिपााण सयम्प प भास्त मनसा स्मरम् । इन्द्रिमाथाम् पिग्रसरमा मिथ्यापारास् सम्पत । (गोधा ।)

प्रसारमा परिपत्र- सम्मानिशाना ६- नियतकर्मरम्म से भावरण एमाले अनारम्भ से भापरण बना रावा इसलिए नियत कमों का भारम्भ ही परखा। इस प्रकार कमारम्म-एवं कर्मसम्यास दोनों में नियतकर्म का प्रारम्मी श्रेष्ठ सिद रोता है। यही कम की ६ठी प्रनियापता है। इसी के लिए भगरान् ने- 'नियत फुरु कर्म वं कर्म ज्यायो अकर्मगाः' पर का है। - सबसे प्रापश्यक मात तो या फिर्ममार्ग की रक्षा से ही घर की पिपविमति की रक्षा है। मुंह मुदाय भये सन्यासी के अनुसार समी फम छोर तो सारा विषादी नपिउन दो माप । फिर वो शालोप देश के प्रोता दो नग, जीपनपापा का निवासी प्रसम्मर माप- 'न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगा'। अब कर्म से नीरनपात्रा का मुगमता से निपार वाद पर संपन होता नहीं, अपितु पन निमोफ होता है वो ऐसी दशा में कौन बुदिमान् कर्मपरित्याग को उचम काँगा। कर्म की यही मालीं मनिपार्यता है। इसी के लिए मगवान् ने-'शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्धपेदकर्मण' इस प्रकार साव वर से ना कर्म की अनिवार्यता सिद हो जाती है तो ऐसी स्थिति में कमपरित्याग केमे बन सकता है। सप्तधा धिमक्ता-कॉनिवार्यता १-नफर्मोपायलादमित्वम् "न कर्मणामनारम्माफर्प पुरषोऽनुव" २-सम्पासवैपादनिबाफलम् - "न प सम्पसनादेव सिदि समपिगावि" -कमरिमामयपवादनिवार्यत्रम् "नदि भिक्षणमपि नातु तिष्ठसमय" १-प्रसिदबाइनियायत्रम् "कावे मना कर्म सर्व महर्तिमगुणे" २१९ माजमारमा पराकम्म मारोपनियात् । + ५-मनाससकर्मयोगौनेम्पादति। "कर्मेन्द्रियो कर्मयोगपसका स निशिप्यसे" ६-मारम्म-कमसम्पासयो कभी- "नियत कुरु कर्म स कर्म ग्यायो पफमण" रम्ममेठपादनिवार्यत्वम् ७-बीक्ययापानियहफमदनिक "गरीरयाप्रापि पते न मतिरपदकर्मम " या तो तुमा कर्म की अनिवार्यता का विचार | भव कर्म के मबपनमार पर एम- लिए । गीवाशाबमें भमन्धन कम्मो को । पापकर्म, २-सोकस्पिनिनिर्मारकाम, ३-उपे घातकर्म, :-स्वभावसिदसहजकम इन चार मागों में निम्स किया है। मिषप भार- कता से अधिक विस्तृत होता नारध है। भत प्रक्त में मिक्स यज्ञापकर्म कर दिग्दर्शन करा के इस प्राधिकरण को समाप्त किया जाता है। यज्ञार्थकर्म (अबन्धन) पाच दिन यत्र गन्द का केस भग्निहोप-दर्शपूर्णमास-पातुर्माम्प-पशुपंप-सोम- याग-चयन भादि मनुप्पास पक्षों के मप ही सम्बन्ध समन जाता है। यहीं से केस पेदरिदित या कामास किया जाता है। किसी मरा में ऐसा समझना हीक भी है। परन्तु इमी को यह समझना सर्पया मूह है। पापात-निषेपमेद से दो भागों में मिल है । निस्पपन प्राइवया कराता है। पर अघिदयर-अभ्यास्म-प्रपिमृत इम तीन मार्ने में विभक्त है । विधेयया मदप्पयन कराय। भग्निहोत्राति सारे या प्रकृति में हो रहे हैं। प्रतिया से (मो कि भपिदैक्तिका माम से प्रसिद)मप्पात्म और भधिमूत मगत् का निर्माण मा है । एष उस मिस्प प्राहलयह की प्रतिकृति पर अमियों ने पप ग्रोव को कामाविष्कार किया है। हम को यह करते है, पाक उस प्रतिमा की नकस है। इसी चापार पर 'देवाननुपिपा मै मनुप्पा'-'यदै देवा भकुर्षस्तत् फरमाणि' इस्पादि निगम १ इन विषयों का विशद सिचम गीतापिणनमाप्पः अपम्पनकम्मरयागानौबिस्योपनिषत् नाम पारप में रेमा पाहिए । ।

भावारमा माईशोपनिषत् ॥ पचम्म प्रचचित है। प्रकृतिपत्र में जैसा हो रहा है, यदि वत्प्रतिकतिभूत मनुप्प पत्र में उससे बरा भी विकत किया जाता है तो इसका सरूप बिगड़ जाता है। प्रारस-विधेय मेद से देषा निमल इन पदों में से प्रत में सम्मिक प्राकृत पा का ही प्रास।'प्रम्नि में सोमाति' होना ही याविसमें मन्य बस्तु माहुत ही है, पी अम्नि है। भारत होने वाली वस्तु सोम है। सप में सब माात हो रहे हैं। सब प्रमाद है , सब मम है। इसी प्रग्नीपो मारमा पा से विश समरूप में प्रतिष्ठित हो रहा है। परात्पर-मध्यप-प्रघर-घरसमरि को हमने पोशी-ममापति कहा। इस पोरडी प्रजापति का मचर भाम प्रमा-विष्णु- इम्र-पम्नि-सोम-इन पाप सामों में विभक्त है। इनमें प्रमा का गो कोरम है, दो प्रयी- पदम्प में परिणित होता है । इस वेदोपति में हम्नाविष्ण की स्पसा ही मुख्य कारण है। इस प्रकार प्रमा विष्णु इन्द्र से उत्पन्न वेदत्रयी के कारण यह पोरी वेदमूर्ति कम पाता है। इसी भाषार पर पूर्व के प्रकरणों में हममें ईधर को पेदमूर्ति करा ।। वेदप्रयी का पडमाग माग्नि है । प्रमामिप पोम्यो पुरुष में प्राण, पाप, वाक्, भन्म, प्रभाव इन पांचों प्रातियों की भाति रोती है। यह पाप माइति । एष इन पापों की समधि को इम भवरप ही-'सोम' पाने के सिए तप्यार है । उस प्रमामिमय पुरुष में प्रायमोम की पाति होने से स्क्पम्मू प्रकट होता है। भापसोम की माइति होने से परमेष्ठी उत्पम होता । पासोम को माइति ने से स्र्प उत्पन होता है। प्रभादसोम की भाति होने से पृपियरी उत्पन्न शेती! एवं ममसोम की भाति होने से पनमा उत्पन होता है। पम्मू मासय ।। परमेष्टी प्रापोया ।। सुप्प पाग्यह।। पृपिकी प्रमादया। चन्द्रमा प्रभपा। इस प्रकार पक्ष विमल सोमरूपा प्रकृति का पुरवामि के साथ समन्वय होने से पञ्चायपत्र विषयः सत्यम हो जाता है। इसी मामR पर-पारको पा पाकरा माता है। अनुगम सुनि, मतएव इसके भनेक भावे है जिनका कि धागे के सपनि- पो में समप सुपय पर निरुपण होता रहे । भभी कस रना ही समझ सेना पर्याप्त होग कि प्रति एक पुरुष के समाप से पंचाक्पब सिधया उत्तम होता है। पांचों में प्राणादि पाप । -- ११४ प्राध्यारमा ा सोपनिषत् || पहा देवता प्रतिष्ठित है। प्रामण प्रम्पों में एक भास्थान प्राता है कि-"प्रमापति ने यह द्वारा देवतापों को उत्पम किया । उस्पम देवतामों ने प्रभ किया कि के प्रभापति ! इम मापके पा से उत्पम हुए है। मा में क्या प्राशा होती है। उत्तर में प्रमापति ने का फि मोफर्म मैनें फियामही तुप फरोमिन या द्वारा हमेंउत्पम किया है,तुम मी पाद्वारा ना नई प्रमाए उत्पम करो । पस उसी मादेश के अनुसार देवतामो ने उस मामापत्य विषया से पुन या किया, एन सके द्वारा पांचो सोकों में (स्मयम्म मादि में) राने वासी ममामों को तत्पम किया। एवं देवया से वापस इस मी पाम यहदारा हरी प्रमोस्पति में समर्थ होते है। ताराप्य इस मास्यान का यही है कि विवाह के देवताओं का फिर परस्सर सगम होता है। इससे भागे की सारी प्रवाए उत्पम होती है। इसी विज्ञान को पदय में रसकर-~ -'योन यामय नन्द देना।'-इत्यादि का जाता है। याकर्म से ही साय विस सत्पम मा है, इसी से सारी प्रवाए उत्सम हो रही है। एष इसी से मागे मागे मई नई प्रजाए उत्पम होती सती है । इसी प्राकृतिक नित्यसिस याविशन को सएप में रक्ष कर मगधन् करते है- सा या प्रना। पटा पुरोगाम प्रमापतिः। अनेन प्रसमिप्यम्पमप मोऽस्पिटकामधुर । (ता १.)। एक को दूसरे के साप मिलामा यनन है । इसी मेम से संसार में नए मए माविष्कार होते रहते है। इसी से ससार के पदार्थमात्र उपमाए हैं। इसी से हम पाएँ नो कामना सिद कर सकते हैं । ससार में जा घेतन ऐसा कोई मी पदार्य नही है मो या म परसा हो। जिस पदार्प का पह मद जाता है, वह नए भाता है। पूति प्रकरण से या भीमात सिद्ध हो जाता है कि सत्यपाप प्रा शब्द परमात्र का पारक। भव परा म्पास्यातामों की सीमा देखिए । उनकी रएि में "ग्रा०प० यि तीन ही प्रगा। प्रगा. पति में पा सारा इन तीन पा को उत्पम किपा" यह है प्रना शम्द का मर्प । प्रजापति जो कुम सत्पम करते है, उसका मूस यह मेरे । यह यहमष्टि पार क्यों में लिया है। । ૨ माशोपनिपन् । मारवारमा पशपथम मनुष्पों में ही या पर्ण विमाग नही अपितु पदार्थमात्र में पातपर्य का समावेश है। इसी ममिप्राय से सामाम्यहप से पणरि का निरूपण करते हुए मगवन करते हैं- । चातुर्पपय मया घई गुणकमपिमागणः । तस्प कारपि मां पिदपफारमम्पपम् ॥ (गीता ) मगमन करते है-मने चार प्रकार की प्रगासल की। इपर टीकाकार गतीम बसों को (सो मी मनुप्पों से सम्बन्ध रसने बले प्रामण-वधिय-पैरयों को) ही उत्पम किया" पहभप करते हैं। कितनी मूस है । इस मूस का कारण पासझप न सममना ही।उनि प फोहनादि प्रसिद पर समम रस्सा है। किसी विशेष कारण से पाय या मनुष्य ही कर सकते है। इन में मी ममण-पत्रिप-मेरप को हो भषिकार है। पयसिप होने से हमें मनषित । सगोने सममा कि इस कह से प्रमोपपि होती है। कि फा करने का विधान ठीन के लिए ही पापा नावा।।मत पा से सम्बध रखने वाला यहां का प्रमा शम्द तीन पगे कासको सकता है। मस्त पधिकार पर्चा का इमे को अधिकार नहीं। यहाँ हमें केपस मपना मन्तप्प प्रकाशित करने का अधिकार हम पह को सूधिका प्रवर्तक समझते है। एक प्रमा से सारे विष का प्राण करते हैं, साथ ही में उस विभप्रया की सच इसी पर- कर्मम समम् । रासायनिक प्रक्रिया से दो वस्तुओं के मिलने पर को होता है, वही परसरि करतातीहै । पही सम्पब-'पाग' कामय।। यागतम सपा क यह पवन (या) देवप्मा, देवसगमन देवदान मेद से तीन भागों में विभक्त है। पातु के दानों मप है। मूतसम्बन्ध से दानपा होता है देवसम्बन्ध से सगमनपा होता १, ५ भात्मसम्बन्ध से पूमापा है। उदाहरण के लिए मेरा को मीनिए । - पा (मनुष्यात मौत पा) में उन निम्म प्राणदेश्यों के लिए पुरोदारा की माइति दी जाती है। इस पुरोगरा में भूत-बाण दो माग है। रप माग मौलिक है, एक विस तबके मा- पार पर पुगेगा दम्य सम्मरूप में प्रतिष्टित ,पप्राण है, यही देता है । मत पपापपर मयूबमाष उत्पन प्राध्यात्मा भाईगोपनिषत् :- पशाम है। प्राण १५ भवयव है। पुरोगरा में १५ देवता है, . भूत है। इन में परमान बिस देवता की.माफ्ना करके पुरोगश की माहुति देता है, पुरोगश का पही देवता उत्रण होकर उस निस्स प्राकृतिक प्राणदेवता के साप मिस चाता है। 'पावरि वारदात्मा' इस सिदा म्त के अनुसार पत्रमान का मास्मा भी पुरोगरा में रखा है। पुरोगरा शरा पनमाम का भात्मा भी सन प्राणदेवतामों के साप मिस यो। यही उन देवतामों के लिए पवमान का भास्मसमर्पण है, इसी का नाम पूा। दूसरे शब्दों में भास्मा को देक्सोक में, देवता मो के शासम में प्रतिष्ठित करना ही, अपने पापको उनकी पारापना के लिए मेट चहाना हो देवपूमा । । एष मो देव माग है या उन देवटामों से मिल पाता है। यह संगतिकरण है। पाकी वयता है भूतभाग । उसे देवता से सवे है, परन्तु स्वाग सम्बध से । "न पे देवा भरनन्वि-न पियन्ति, एवंदेवापत रष्ट्रा हप्पम्ति के अनुसार दाग पिवरमास की तरह अन्तर्याम सम्बन्ध से इस पुरोगरा में प्रविय नहीं होते, अपितु पहर म्याप्त होते हैं । मतएप "स मनोति म्याप्नोवि" इस म्युत्पत्ति से देवाम 'स्वाहा' माम से प्रसि।साग बोसकर ही देवता भोंके लिए माइति दीगाती है। इसप्रकार एक फामें तीन दिमाग होमाते हैं। सर्वत्र तीनौ । मारमा कारपरागर , देव सूक्ष्मशरीर , मूत स्यपशरीर है । पारमा मनोमय है, देव प्रासमय है। मूत-प्रारमय है । सारी वस्तुए (प्रमामात्र) मनप्राणवामय है । तीनों भाग भन्यके तीनों में पाया करते हैं, मम्पके तीनों माग इसमें मापा करते हैं। इसी निविषयामक मादाम विसर्ग से सर प्रमाए अपने अपने सरूप में स्थित है। - . १-मूतसमन्धात् दानप्य -स्पूनारीरसम्बन्धी-पभम -देवसम्बग्पात्---सजविकरणमा-सूदारीरसम्बन्धी-प्राणमप -भारमसम्बन्पाद-गण--- -कारसशरीरसम्मन्पी-मनोमय स एप मनामाणबा- मया,मावानरिस- स्मक स्थिविपाः हमारे मप्यामिक प्राण निरस्तर भाभिषिक प्राणदेसामों में भारत होते यते है, आप ही में से प्राणोक्ता हमारे में भारत होने पते हैं। प्राविमा भपने पदाप निरन्तर ARTRIT हासोपनिषत् ॥ पान - f में देता रहता है, साप ही में सेवा मी हता। में सससे उत्पन्न मा । उत्पन्न हुने - से मुझ मन को पचाता), एष भन्नरूप मुझे हाते पले उसे में भी खाया गया है। सी विषय का निरूपण करते हुए फेमहर्षि करते है- "भामस्मि ममममा मृतस्य पूर्व देवेम्पोऽसनस्स नाम । पो मा ददाति स ६ देषमापत, अहमन्नमन्नमवन्तमदर्मि" (ऐतरेयमारण्पक) इस पेरम्पर के पारस्परिक स्पोग को पारिता संयोग' का नायका पात, महा के बई शवे, पापा निरन्तर पसता रहता है। बस इस पक की मचा के लिए बो कर्म अपेक्षित है, पपी-'पाप' कर्म को पाते है । हम उस का दिन पावे, हमारा फिर सत्य। 'गरिकशा नामिरे सपम्॥ (मापन ११।२।११) पर धब सिशिस्त है। उभिएको प्रार्य करते है । इस प्रवरिया का निद निरूपण पूर्व के-ईशावास्पपिद सम्'-~लमादि मत्र में किपा चा मुका है। नया मागे साकार भवे-देर मैद से दो मागों में निम्त होगावा । विस्तार मप से इस बनिरपण नही किया गासकता । यहाँ परे प्रपश से से मस पही तथानामरूप प्रात्मा को रिपति रक्षा के लिए मान सहस्त मो नाप्राप्त कर्म है यापन का कारण मारी बनता । उसके म करने से समटी हानि होती है। पकिस्थिति एवं समामस्थिति मिन कर्मों से हो- वीपी पापकर्म है। उन के प्रकर्वक पाप मही है, प्रकृति ।मएम उन से सार नहीं होता, सरूपरषामात्र होती है। मन पर्ने कमी मही बोरना चाहिए | सी पाकर्म की मापनवा बताते हुए मायन करते है- । । १ इस रिस र मिन प्रितमकामांवन्धमोपनिपत, नाम के प्रसव में लापर मामलामा योपनिषत् ॥ मसम्म पायात कर्मयोऽन्यत्र घोफेऽय कम्मपना। वदर्य कर्म को वेप मुक्तसरः समापर ॥ (गीता शरा)। मन की प्रधानवा स्यने के लिए ही मगवान् में 'मुक्कसंगा' का है। मन की इन्वा से मो कर्म किया जाता है, पर यहार्य महो । अपितु बुद्धि की प्रधानता से, दूसरे शब्दों में मुसियोग शराबो कर्म किए जाते है, मे ही-यहार्यकर्म है, एव वे भाम्भन है। पूर्व के निरूपण से यह सिब हो पाता है कि कर्मपरित्याग सर्वपा मसमय है। साप ही में यह भी मान सेना परताकि केबस कर्म महरप ही मधम का कारण है। कर्मपरित्याग- समय धाम भी निरर्थक है, कामनामप कर्म भी अनुपादेय है, 'काम्पान फर्मो न्यास सन्यास फरयो विदा' यही बुद्धिमोग है। यह एक प्रश्न उपस्थित होता है। मनुष्य तवत् कों में तत्तत् फसाया को लेकर ही प्रात होता है। यदि उसे या विदित होगा कि ममुक कर्म करने से मुझे भमुक फम न मिलेगा तो पास कर मी उस निरक कर्म में प्राच मही होता। ऐसी परिस्पिति में मनोविज्ञान सिदान्त के अनुसार मो पत बन नहीं सकती, उसके लिए -'कर्मपपेमाधिकारस्ते मा फलेषु कदापन' या भसमय माहा कैसे दी गई। इसके उचर में भी पपी समझ सेना पयाप्त होंगा कि मनुष्य की भाप्पारिमफसस्पा एक सीमित सस्पा है। उस में बान-कर्मशक्तिए परिमित है। कम्मारम्भदया में ही यदि मनुष्य फा बानकर्ममम माम्य पर की भोर मुक मामग्य तो इस की शान-कर्मगति पर आपाप । पापा समर्म फस पर बसा बायप, भाषा ज्ञानकर्म साप्प कर्म पर रह जायगा । परिणाम इस का पह होगा कि सापकर्म की सिद्धि के लिए वितना कर्म अपेक्षित होना चाहिए, क्तमा (फाश में विमाको नाने कारण ) न रोग , कम मरा रा नापण । सिथिए कम- काम में फच की चर्षणा (भनुमय ) में कर्म को वर्ष न कर सामना कर्म में ही सीन शेगा मा पाहिए । ऐसा होने से पमाण रखने की दश में जो कर्मसिदि पिरफास से सम्बन्ध रखती थी, अपच पिस की सिमि में सन्देह पा,फ्याशापरिमाग से पाकर्म सीन एव मारपदी सफस बन जापगम कर्म कमीपप मही गावा। यदि ममि पर पानी रस्सा गायाप ने पानी मारय प्रास्यास्मा जाईशोपनिषत् ॥०- - । गरम रो बापण । माप ममम्पमात्र से कर्म कर, और फतम हो या सकपा मसभा है। प स्त फस मत्पन्न करना भाप का काम नहीं है। माप कम को सिर कर दीलिए, प्राकृतिकनि. पम के अनुसार सिट कम क्षय फस का जनक न पाया । फस पर शिरसना मनधिकार घेय है। मोबस कर्मसिदि को सपादन करने वाला है, उसे निरर्पक सत्र करना है। माप की माण से फस सत्पन्न नहीं होता, मपि तु माप के कर्म से फससिदि होती है। इसी भमि प्राय से महर्षि परक में- देवावीः पसे ने' ' ( परक स सूत्रस्वाम-त्रियोप भ सात्तोप- देश)। यह कहा है। ममुक मनुष्प तान् है, उस की इस विद्या से ही करना दुरा है। अपितु मिस कर्म से ससे निपाफर मिला 1, सस छमत कर्म के साप इप्या कामी चाहिए। अमुक म्पनि भनवाम् , इस प्रोप्या से मामफ्तम होता। मिस कम से यह पनिक बना 1, सस फर्म के साप ईप्या करने से सम्पुदय होता है। यही नम्मति सम्पवम एष सोक- घमण है। परको कर्म सिद्धि का देव मत बनामो, अपितु कर्म को कम सिदि का सम्- मो, ही करना है। इस फसायामाग से एक तो कर्म भरम सिद्ध हो पाया, फस मिम, सप्त के भाप मोक्ता बनेंगे । हुसरा मोमा भारी जाम दरोगा सका तो करना होगा। राळ प्रकार से माणसामूक पदि कर्म किया जायगा तो मकर्म, एष तरपनितास मा सक्ति के कारण नबगे-कन्नपि न सिप्पो' । फल मिशा, उसका मापनें भोग किया, ५ एक मामकि की चमनी भाण के परिमाप से सब करते पर भी माप मार्ग काबार, पडीवो मिकामकर्म की निशपवा।इसी यस्पको बप में रहकर मगवान करते किमारा भनि फार के कर्म में है। पर फल उमारे अधिकार में ही नही तो फिर माण ही क्यों करते से । भगान् की इस अति का कोई पर भर्प न सममसे कम फस की ही माण मही तो कर्म में प्राति से ऐस लिए मागे बार भावान करते है-'मा कर्म देवर-भावे समोऽस्लमसि' । पल को हेतु मत बनामो, कर्म को कार्य सिद्धि का समम । कमी गर्म से मित्रता म करो, फल मी पो मर्म है। उस से संग करना फर्मतमति से बम्बित रहला। - - प्राध्यात्मा ईशोपनिषत् ॥ - + मनपा . एक भापति कर जैसे तैसे निराकरण किया गया, दूसरी भापति भौर उपस्थित हो । पनिए ! फणण भासक्ति की बनमी है, इससिए मी उसका त्याग करना चाहिए, एष शशि विमाग से प फर्मसापक कर्म की शक्ति कम करने के कारण भी छोड़ने योग्य है। साप ही में फमाण मनधिकार पेश, कर्मसिसि में इस की कोई मपेक्षा मही, प तक सो सब परि स्पिति ठीक ठीर हो गई । परन्तु जो कामना कर्म की बननी है, उस के परित्याग का मादेश कैसे समपामा । कामना (इप्पा) के बिना यत्न मही हो सकता, पठतः परम्परया कामना का कर्मननकल, किंवा वर्मप्रतितल सिम होभाव है। वभर फसायावत् कामना को भासकि की मननी मताया जाता है। ऐसी परिस्पिदि में ऐसा कोई फर्म नहीं रहता मो मिना कामना के सपनो माप । सभी कर्म सकाम है, अतएप कर्ममात्र (सकाम बनते ए) मासकि के प्रमक बनते हुए भावरमरूप वपन के कारण है। फसतः सन्मास का 'सफर्मपरित्याग- मदएप सन्यास' इस किंदम्ती पर ही विमाम मानना परता है। ऐसी दण में 'कामना रहित से फर फम करो' इस मादेश का कोई मुम्य नहीं है। इस विप्रविपति के निराकरण के सिए पुदि से काम सीजिए, विशनारमा की शरण में पसिए, समापाम हो पाया। दुनि और मन की प्रधानता अप्रपामता से एका के दो रूप हो जाते है। मन की प्रभामता से मुदि की स्वतन्त्रता मर हो जाती है, मनोराग्प । मन चान्द्र सोममप दोने से लेण्सक है।फत ऐसे मन की कामना भारप ही स्नेहपर्म के कारण भासक्ति की नमनी है। उपर पुरि की प्रानता से मन गौण बन जाता है। ऐसे मुदिप्रधान मन की कामना स्नेहमयी म पर मुस्सियम से तेजोमपी बम गाती है। नतम मसग मतएव तम्मपी कामना मसगमावमपी बनती हुई भासत की जननी नहीं बनती। यही तो मुदिपोग है। पामना, परम्त कामना कर यो मासधिभाव , पुदि की सरा से पतप्राय है। देसी मावा मायामा जाईरोपनिषत् || समितरोप भास्पा में इस कामना का रहना म राने के समान है, यही निफामकर्म है। दार्गनिक परिमाषा के अनुसार विचार कीगिए । दारामिकों ने इया के सायाप्पाचा, परिपवादा मेद से दो रूप माने हैं। मपने माप उटीई इपया उस्पिकांपा है । प्रयास से उठाई गई का उत्पाप्याकया है। इन दोनों मामों का प्रपमसपा में निरूपण किया ना Jat, अतः यहां पिएपेपण की मारयकता नहीं है। युधिप्रपाना इषा पास्मेप्सा, ईपरेमा, पही उत्पाप्याकांपा है। मन यदि पुदि के मनुगत मन गाता है तो भारमेमा प्रधान मन बाती है, ऐसे मन की कामना भकामना है। पदि मन लिपयों की मोर ही मुका पत्य है तो भास्मेका से परामुख होगामा, स्वस्वरूप से प्रधान बनता मा काममम मन पाता है। पी कामना बपन का कारण है। निष्कामफर्म में इसी काममा के परिवाग का मावेश। मामा-फर्म दोनों भात्मा के सरूप है । पर्म करो-प्रमाप, कमी वपन न होगा । मिति- कमरूप भरिया के द्वारा मारमा पर माया मा सत्पुरुप सरकार इट गापा, ममतारमा कर सापादकार से मामात्र । सस्पुरुप कर्म-(सस्काररूप फर्म, समुद्र का तरण निजिकर्मरूपा भविषा से ही हो सकता है-'न कमणा न मनपा पनेन स्पागेनैकेज्मवलमानगुः' इत्यादि में कर्म राम्द काम्पर्म का ही पावत्याग सम्द से कामना का परिस्पाग ही मभिप्रेत है। कामना का स्पान ही तो पास्तविक स्पाम है। कर्म कोष दिप्य, काममा बनी रही, या तो परि त्याग नही प्रा।लिफर्य यही मा कि मम्पस्प चिानामा में निपा-पश्चिा (कर्म) दोनों है। दोनों स्वतन्त्र होकर पुरे है । मिसकर मान कोयने में समर्प है। हम दोनों के समक- मात्र से सम्पए के दोनों माग समय को गात हो मात है। पर समाप्त ही सपा दिगोग है, समसदी शान्ति, गान्ति की प्रास्मान है। 4 प्राध्यात्मा + ईशोपनिषत् - अपहार इस प्रकार हमारा यह दवीय मधिकरण (विषयमानुसार चतुपं भधिकरण) निया- मविचारमक सूम का,एवं तदराभूत विषा-मविधास्मिका भुद्धि का स्वरूप बतसाता भा,दोनों की समनिरप पुद्धियोग का ही उपदेश देता है। श्रुति को अभ्यारम भघिदेत दोनों सस्पायों का स्वरूप बससाना ममीर पा, प्रतएव उसने दोनों के (सूर्य मौर बुद्धि के) सामाम्पधर्मों से सम्बन्ध रसने पाले 'मिपा-मनिषा' शब्दों का ही प्रयोग किया है। विषा-प्रविपास्मक विज्ञानात्मापिकरण समाप्त मा, पर क्रमप्राव संमूवि-पसंमृत्पात्मक प्रमानात्मापिफरम की मोर पाठकों का प्न भाकर्षित किया पात्य ।। इति-विज्ञानात्माधिकरणम्

माकृतास्मारिकरणे
विज्ञानात्माधिकरणं समाप्तम्
३

पूर्णमद
प्र-चन्द्रमा
पपिदैरतम्
प्रज्ञानवैभव ४-मज्ञानात्मा
प्रम्पास्मम्
ब्रह्मसत्याक्षर
सम्भूति-असम्भूतिमयःप्राकृतात्मा चन्द्रमाः
प्रज्ञानात्मा
३
4-
चन्द्रमा
-प्रन्नम्-
--प्रज्ञानात्मा
(प्राकृतात्माधिकरणे प्रज्ञानात्माधिकरण चतुर्थम् )
ब्रह्मस्वेदवेदावच्छिन्न -सम्मति-असम्मतिमयात्मा
यशसञ्चालक
१-अन्ध तम प्रविशन्ति येऽसम्भृतिमुपासते ।
ततो भूय इव ते तमो य उ सम्मयां रता ॥
२-श्रन्यदेवाह सम्भवादन्यदाहरसंभषात् ।
इति शुष्टुम धीराणां ये नस्तदिवत्तिरे ।।
३-सम्मृतिं च विनाश च यस्तदेदोमय सह ।
विनाशन मृत्यु ताली सम्मूत्याऽमृतमश्नुते ।।
(ईशोपनिषत् १२-११-११-०)

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प्रज्ञानात्मस्वरूपनिदर्शन- १- पजाप्रवो दरमदेवि देव वद सप्तस्य यति ।। दरहम ग्योदिपा ज्योतिरेक वन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु ॥ (यमु ३४१) । २- पत् प्रज्ञानमुत घेवो पृविश्व यजोतिरन्तरमपम्ममाघ । यस्माम व किषन कर्म क्रियते मे मन शिर्मसफरपमस्तु ॥ (३४२)। ५- पेने मूर्त मुपने मरिष्यत्परिसहीतममृतेन सर्वम् । पेन यस्तापवे सप्त होता वन्मे मन शिपमकल्पमस्तु ।। (१५५३) 2- भपीय वृक्षा निश्विास रचा नक दारो कर पिदिपपुः । अदम्बानि बरुणस्य प्रवानि पिपासचन्द्रमा नक्कमेति । (घक ॥२॥१.)। ५- चन्द्रमा प्रसन्वरा एपों पापवे दिपि । नमो हिरयपनेमपः परं विन्द पिपुवो पिच मे प्रस्य रोदसी॥(१।१०।१)। ६- मरो नयो मरवि मापमानोज फेनुरुपमामेसनः ॥ मार्ग देवेम्पो निदपासायन् प्र चन्द्रमा स्तिरते दीयमायुः ॥ (201८१९) पममा मनसो मात (पजुः ११।१२) पन्द्रमा मे मनसि स्थित " (ने या १०८)। - वपनामनश्चन्द्रमाम्सा (• उ० ॥२८) १०- मनो मे, रेता म मना म पुनः सम्मृतिम सन्मे त्वयि (पपसि) ॥ (म र १२) ११- पचम्मन प्राप्तीन, स चन्द्रमा पमपन् । (म० उ० २१)।

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॥ श्री॥ पुगोर्मध्ये ससाटे तु नासिफापास्तु मूसता । बानीयादयत स्पान पद प्रझायवन मह ।।१॥ मानरामयस्सं सच देववाम्प सदाशिका | नादरूप भुनोर्मध्ये मनसो मास विदुः ॥२॥ चिर्प सर्पति मुर्गोऽसी ससस्तमुन्मुखा। चालुमसे स्पिसमन्द्रः मुपो पर्पसपोमुसा॥ मिचे चति तसारो नियस मोर उम्पते । सस्माधि स्थिरीकर्यात् माया परया विषा चिरं कारणमर्याना तस्मिन् सवि जगस्त्रयम् । तस्मिन् पीणे अगत् घीसं वचिकिस्स्य प्रपनवार मनोश गगनाकार मनोहरं सर्वतोमुत्रम् । पनोऽ सर्वमात्मा पन मना फेरमा पर ॥६॥ मनः फर्माणि जायन्ते मनो सिप्पति पातक। मन मेदुम्मनीमयाव पुपर्य न च पावकम् ॥७॥ मनसा मन पामोक्य पिशून्य पदा मेरे । वता परं परब्रह्म रयते सर्समम् ॥ मन एर हिबिन्दुध उस्पचि-स्पितिकारसम् । मनसोत्पपवे बिन्दुर्यया धीर धृतारमकम् IEN मर के सभी कार नर्मदेवर रार, शासमाम के सभी कार सपाम। इसी प्रकार ईशर प्रमापति के समी पर्व ईबाप्रमापति । समरिकप से मी रही सम्ध, परिकप से भी रही सर्वता । म भी दोनों समानधर्मा । 'म मेई सरम' । ईपरप्रजापति का तीसरा पर्व (पूर्व) बहा दिश-पनियामक सपा नौमा पत्र (चममा ) सम्मृति (उत्पति) और असम्भूति का पविधता है। प्रात भरिभरण सीन मन्त्रों से इसी पर निरुपण करता है।

मास्वामा या ईशोपनिषत् ॥2 मपरसा सक्रिमानुसार सर्प के अनन्तर पृपिवी, सगरत में मा। परन्तु मममस्या की पर से पत्रमा सूर्य एष पृषिी के मध्य में प्रतिष्टित । पार्षिक प्रमा पर सूर्य एक पित के मप्प में राने गाठे फष्णपद के भविष्यता पदमा का ही मनुमा हो। पर परम्प पिपी के इस पर मामाता रेमो ऐसी मास्या में समसोम का सौर इन्द्र के सप सम्पन्न होमाता । शतपक्ष में, निशेत पूर्णिमा में सारा पान्तसोम सौर सानिमामि में इस साल । शुस्वापिस पासोम का प्रविधी पर पागमन नहीं होए । पिी के घरों मोर घूमने पाम्म झयाम मह पूपिणी के उस मोर (सूप की मोर) मागायो सो चन्द्रमा का रूप माग पूपिणी की और मनुगत रहता है। फसा यहाँ सौर परमए महीं पडुबनें पानी । इस पास में (साय में), विशेषत प्रमाराल्पा में चासोम प्रमूतमान से प्रविधी पर माकर पोपषि-वनस्पतियों में प्रसिर से माता है। यों तो पूरे कृष्णा में पात्रोम पूपिणी पर मा पल, परन्तु जब मा क सूर्प पोर पपिपी के मध्य में मानानो तो मेम सामना पपिपी पर भागाता है। यही सूर्ये दुसगमनल 'प्रमागस्पा' माम से प्रसिद। इस दिन चन्द्रप्रेम पार्षिक भमि के स्पप नियस काल है, परस पा लिपि 'पमिना-ममा (स) बसवि (सोम') इस म्पुपति से प्रमावास्या नाम से प्रसिद्ध है। इस प्रमासोम में सन्तानमारक पिवरना प्रमुर रहता ६ माएक भावस्पा पितृविपि कास तो है । सोम के साप पितर प्रास भी प्रोपवियों में प्रतिर होगाता है। प्रोभिए । पुरुषाग्नि में इस होकर एकस्स में परेणा होती है। पितरमाणावधिम शुक की योपिइमि में मति ने से प्रमोहमति होती है। गुगात इसी पिवरप्राण समिधन के सिर ममावास्या में दर्गेएि की बात है। करना पीकि बस्यमा सूर्य एवं पपिसी के मध्य में माम, ठमीन पम्पात्मसस्था का उपकारक करता है। हम्पपक्ष ही सोम का मशनकास है, इसी सस्य कोसप में रख कर पविष्ट करता है- मोरपत्रमाप पर पगार-सो असीमान् मम्पमानो मास्तपीवीप बिम्पमिमयाबके । स प परापतो मगाम । वमोष्ट घिरे । अपि प्राकगत्मा काग्रेपमिषत | प्रयोगासा बवाना, हिरणपात्प पीणा, साती छन्दसाम् । धममिानुपिचेद । तेनैता रामि सहानगाम । वे देना प्रमुपन् ममा नै नोऽप सर्वसति I+ + x +1 से देना प्रमुरन्-न या इममन्यद सोमादिनुपात् । सोमपेपार सम्मरामेति। वस्मै सोमं सममरन् । एप म सोमो रामा देवानामन्न यचनमा ।स यंप एतो रा िन पुरास्वाम पश्चाइय, तदिम लोकमागछति । सह- यापीपपीर परिणति । स वै देवानां पस, प्रभ पाम् । पदेप एवं रापिमिहामाबसवि तस्मादमावास्या नाम" । (शत० प्रा० शाश१-५)। "विस समप इम्र में हार के लिए (सामर पर) 4 फेंका-(उस समय) द्र अपने भाप को (सयप में मसमर्प समझ हुए) र से दर माग गए । तात्पर्य यह हुमा कि हमने माल मीच कर समापुर पर बम फेंकने को तो फेंक दिया, पर उमें यह लिमास म पा कि मरे पर से पत्र मारा ही जायगा। फसत बप्रहार कर पत्र के फिर पचकर प्रहार करने के भय से इन बी दूर निक्स गए । (धूकि इन्द्र देववा मपि, छन्द भादि के मायव थे, मत उनके गुम हो माने पर) में (देवतार्होर्ने) रखना भारग्म किया। (रने के निर) देव- तामों की भोर से प्रधि गए, पियों की भोर से दिरयपस्तूप गए, एक छन्दों में यहती गया । मन्तत ममि इन्द्र को नियता । इस ममि के साप यह इन्च इस (समानास्पा) रात्रि में सौर मार (मग्नि के साप इन्द्र को मोट भाया देखकर) देवता मापस में करने तगे म भान भरना यह (पम् महमूम्प निविरूप इन्द्र) ममि के साप निवास कर रहै। + + + । [भूफि प्राकम्म में इग्न की शक्ति पीण होगई थी इसलिए देवतामोंने बस प्रदान के लिए यह निरषय किया कि सोम के पतिमि सा पदाप पद को तृप्त नही कर सकता । पान इन्द्र के लिए सोम का ही सम्मरण करें । परत मोनें एद्र के लिए सोम प्रदान किया । पीए सोमरामा सताभों का मम , मो फि माकारा में प्रसाद पर चन्द्रमा है। पर जिन त म पूर्व दिसलाई देता, न परिश्रम, उस राशि में पर इस सोक पाहतारमा या ईशोपनिषत् ॥ बामपुस + . - पिनी सोक में भागता है। यहाँ मोपनि एव पानी में प्रविए होमाता है या क्षेत्र सायों की निधि , सम है। यह इस ग्राम में इन्द्र के साप रहा है, इसशिर (म) या तिथि "भमागस्या" कागती। हमारी (मापारिमासस्पा की) सम्मृति एवं प्रसम्मति र कारण सूर्य-गृपियोमप्पत्य कृष्णपक्षाधिष्ठाता पन्द्रमा है, नएस उपनिपत में सृष्टिकम की उपेक्षा कर उस स्थिविक्रम को प्रधान मानवे गए स्पास्मक विज्ञानात्मा के ममातर (सष्टिक्रमप्राप्त पृपिपी का निरूपण म कर) पनात्मक प्रहानास्मा का ही निरूपण किया है। "गायत्रो पुरमा' (ऐ० मा• PID इस निमम मुति के अनुसार पुस्प पत्र है, 'पुरुष एवंद सर्पम् (यजुः स० २१॥२) के अनुसार सरा प्रपच पुरुष है। पुप के पपपि भनेक विभत है, तापि प्रत में केस परफप, भीमपुरप (ममुप्यपुरुप) इम दो नियों की प्रपामा सममनी चाहिए । ईपरपुरुष मारम्प है, पाम्य है। पीयपुस्प माप्तिकर्ता, उपासक है । पदोनों ही पुरुष परम्मत एक.पुस । प्रशावर-विभूति के सम्बन्ध से भी गापत्र , मीपपुरुप मी गाय सम्मपन्न मोर मर्यान्द का मी मामाप सम्पप। विस प्रकार नियत प्रहर-पर-चाम्पों के समय से सम्बन्द का कम्प निष्पक्ष होता , एसमेव नियत पदार्गों के समय से महिन्द कर सरूप विपक्षणे साता है। पुरुप काठ पदार्यों की समपि । उधर घठ भार के साथ का माम गापनी, प्रतएप माठ पदाप सरूप भाट महर को समशिरूप इस पुस्प को पत्री पद से बन्दित होने के कारण मर । 'गाय' का बासकया है। गायन पुरुप में सब का मन्तर्मत t, गायत्र पुरुष साक्षात् प्रम देखिए दा० उ० १ प्र. ११) उ.प्रा. । १मनुस०।०)। +सअन्याय मणिकनिक वचन रातपपविज्ञानम प य देखगा पारिए।

मारुतात्मा सा ईशोपनिषत् ।। गापमपुरप गाकापुरुप का पहिसा पर्व रस-पप्तरूप है यही मूस पब ।। रस सत् , बस मसत् ।। मसद्गवमुक्त सदस की समति ही पहिया पर्व है। इसी प्रथमपर्व को परात्पर पा पाता । (देखिए ई वि. प्र सं २५५) । मागे के सात पर्ष इसी प्रपम का विकास है। परात्पर का रसमाम मायारुव प्रन्सधिवि से मानन्दरिझानमनोमय बनता सभा 'भरत' माम से, एक पसमाग मायाचन परिधिति से मनमामानास्पप बनसा हमा 'मृत्यु' नाम से प्रसित हो जाता है । रस का प्रथम विकास अमृत , पस का प्रपम विकास मृत्यु ।। रस बसराय नहाँ परात्परतरण के लिए नियत है, वहा भमृत-मत्युग्म्द मायोपाधिक पुरुपति के थिए नियत है। जैसे पराम्पर की रस-रस वश सत्-असत् नाम से प्रसिद्ध है, एवमेव पुरुष की उस दोनों फसामों के लिए क्रमश विधा-कम राम्द निफ्त है। अमृत-परपुरुप विषा- कर्म की समपि यह पुरुष (पोरशीपुस्प) उस ग्गफरपुरुष का दूसरा पर्व, किंवा दूसरा अपर है। पुरुष का रसप्रधान विधामप मस्त माग ही प्रागे जाकर स्थिति' रुप में परिणत होता है, एक मतप्रधान फर्ममय मृ पुभाग भागे जाकर 'गति' रूप में परिणत होता है। स्पिति गति उस रस-पस का रितीय विकास है। यही विकासाचस्पा 'वेद' नाम से प्रसिद, से ही 'अयम्म' करा मावा है। यही गणपत्रपुरुष का तीसरा पर्य, किंवा तीसरा भावर रसम पाना स्थिति, पसभपाना गति इन दोनों शम्दों के लिए क्रमशः पनिरुक-निरुक्क शम्द निफ्त है। भम्यात सायम्भू का रसापान मनिसात स्मितिमाग ही मागे माकर स्वरूप में परिणत होता है, एक बतप्रधान निरुत गतिमाग ही मागे नाकर तेमाप में परिणत होता है। यह स्नेह-रोग उस रस-पस का रतीप विकास है। यही लयसास्मा 'मोद' माम से प्रसिद्ध, यही 'परमेष्ठी' नाम से म्पत्रास होता है। मायापुरुष का यही चौका पर्व, किंवा पोपा अपर है। रसप्रधान लेह, बसाधान वेग इन दोनों पदों के लिए प्रमश रमि- -भाग शम्द निपत है। पताम्मा परमेष्ठी का रसप्रपान रपिम्प स्नोमाग ही मागे पाकर (दाम के सम्बन्ध से) रिचाप में परिणव होता है, एक बयपान प्रारूप तवभाग ही मागे वाकर परिपा रूप में परिणत होता है। यह सिपा-भविपा उस रस-बस का चतुए विरस । पही प्राचारमा हा सोपमिपत् । । विकासावस्था 'रिपयगर्म' माम से प्रसिद। । इसी को सूर्य का नाम है। पापुष यही पाच पर्य, किंवा पाचवा मदर है। रसपघाना विद्या, मप्रधाना ममिया इन दोनों का के लिए समय ज्योवि-दम राम्द नियत है। या स्प कर रसप्रशन म्पोतिर्मम विमान मागे भाकर सम्मति रूप में परिणत होता है, एष यक्षपान तमोमय पश्चिामाम । मागे गाकर भसम्मृति (विनाय) कप में परिसव होता है। यह सभूति ९२ मसम्भूति ठा रस-पस का पबिई विकास है। यही विकासाचा विषय माम से प्रसिरइसी 'चन्मा' का नाता है। परप का पीपल पर्ष,किंध पर भररसप्रभाना सर्व गरपाना असम्भूति हल दोनों सदों के लिए प्रमाण पत्पति-सप र दो हम्द निपत ! রুশ পণ্য ব্যয় সকাল দিব মূর্তিমান আলী ৰাধ স্নান ও অমিষ দুই म सह नाम से प्पमत खास प्रवान अयसप सम्मतिमा मागे माग भर्परूप में परिणत होवामा निराद नाम से प्रसिद्ध होता है। इन दोनों के मध्य में ए वीसरे किमामप हिरण्मार्म तत्व का विकास और हो । जननि सा लिया रिपपगमे, अचि विराद की समधि देवसम' मास से प्रसिर । स की प्रतिः भरता एपिसी । उस रसमस कर यतिषसापुस्प का पीप H७ मार रामनिमति देवसस के रसपमान नमाण से भाग पाकर रेषा का विकास होता है नवापान भर्षमाग से मत का काम होता है। देषव (प्राय) 'भूत' उस रस-पस कर स्वयं निवास है। पी विकासास्मा 'भूपियर' नाम प्रसिमा पुरुष का पही ईप, किए या भवर । रसप्रधान देवता । प्रपात भूत न रोनों राम्दों लिए नमः प्रभूत्र-मच-गद लिया है। बीमा प जीपुरुष में है। केस मवम् मावि के नामों में मारो। इस प्रकार एक 2 (स* पिविवारवम्य से आभार रूपों में परिणत रोगाता है। वो उस मम मापद पापम्।

बाध्यातमा माईशोपनिषत् ॥ - उक्त फापुरुष-वासिका से पाठकों को विदिताश होगा कि पन्द्रमा ही सम्भूति भोर विनाश का कारण है। बदमा से पहले सूर्य, सूर्य से पहिले परमष्ठी की सम्भूति (उत्पसि) हो- पाती है । भूपिण सूर्य का उपना। समान्त में भूपिण से चन्द्रमा का मम्म होता है, मत- एप पृथिवी सूर्य का उपमा करवाती है, एवमेव चन्द्रमा पृथिली का उपप्रा कासाता है। थिवी में रहने पासा सूपविरोधी, पारदराकला का प्रविमम्पक पामाद प्राण 'ममि' नाम से प्रसिद्ध है। यह प्राण पाकमपान है, एष माक्तत्व पागरण का चनक है । फलत पार मय अभिमाण का भी भारकत्ल सिम शेगाता है। भूपिण अपने पद पर घूमता मा इस स्वावपरिभ्रमण से दैनंदिनगवि का ( महोत्र का ) सप्प सपादन करता एमा, सूर्य के चारों भोर मफ्ने निपत प्रान्तिश्च पर चूमता मा संवत्सरगति (पाक्षिक गति) का भविष्य- ता बन रहा है। प्रसग से चूमते हुए भूपिण्ड के साप सहसाग सूर्य के पशि का सम्बन्ध होता गता । इस सौर पनि के ताप से पार्पित्र बास्मप भभिप्राय ( पार्पिक्यास्मय ममिरस) दुत होता राता है। विपना मा पा परिपाण भूपिण के साप साप ही भूपियर से संगम रस्ता मा घूमता रहता है । ऐसी तीन परिक्रमामों के मनन्तर यह त भत्रिप्राण (भमिरस ) सोमरूप में परिमत होगाय है। सौर मग्नि से परिवप्पमाम यह सोममाग पमि नेत्र से पाकर पनीमूत गोवा मा चन्द्रपिपासप में परिणत दोबावा है। मात पाक भनिगरीर का चितमा भए सोमरूप में परिसत होनाता है, पर उस पार्षिक मारमप, मतएष पन भत्रि की अपेक्षा इसका बन भाता इसका बनते ही पाप पिंच पति से पृथक् छकर चारों और रिणों में शतरुप से व्याप्त होता मा प्रषिकी की भोर ही मनुष्य हो जाता है | अन्तरिप में हिरण्यगर्भ प्रभा नाम से प्रसिद्ध आयु पन्द्रका परावन पर (बायु में इतस्तत: ) म्याप्त सोमपरमाणुओं को एककामाबालेवेन समेट कर उणे पुनीमूत बमा गमता है। वायु का पह पिणसम्पादनव्यापार पृथिवी की २१ प रिकमा पर समाप्त होता है । अपार पिया के घार्गे मोर घूमते हुए सोमपरमाण कमरा धन होते होते वायुम्पापार से पिरी के २१ परिक्रमण के ममन्तर एपमाम सम्प्रपिशाहप में परि प्राकामा या ईशापनिषत् ।। अनिमाग - मान होते है । ही पिण्ड पृयित्री के भारों और पुतस में घूमता हुभा दिखाई दे रहा है। रिन में सूर्यकिरणों का पार्थिव पानी बाप्पस्म में परसत होकर मन्तरिक परावस मे पास होगाते है, पही पानी पत्रि में सूय के घमाव से फिर पिनी की मोर (मोस रूप से) गिरमें हा है। यही भास्पा सोम के समन्ध में सममिर । सोम मन्तरिक्ष में कर पुन पूपिनी पर रिमा चारतारे, परत पहारा नाम से प्रसिद्ध उसी पयु से (देतिर ०६०००मय- करमाधिकरण वेरित होकर शिरूप में परिणत होता हुमा मिगीत ऐनातालिस प्रकार भाषण में इतमाल म्पात फेत (मनिपुट क्रमश पिण्डीमूत बनकर सूर्यरूप में परि- सव ए-दिविर वि०४ . २३१५), एमे इठस्तठ पैसे ए पार्षिष सोम सपाही पमा मणीमत कर पादरूप में परिणत हुए है। इसी बन्योत्पत्ति यस को पप में र पुराण पाव- पिता सोपाल में रिमा मोऽनिगियाभिः । मागस्परिमामृत ऊर्मामाधिः ॥ सुपर नाप तपो पेन तप्त परत पुरा। प्राग वर्पसहस्रागी रिप्पानीवि र नः श्रुतम् ॥२॥ तस्योरवसात स्पिवरपानिमिपप्प हि। सोमध तनुरापेदे मादि सरै दिनः ।। करमापामे तस्य सोपर्म मामिवात्मना। नेताम्यामस्रवत् सोमो पगपा पोतपन दिया । पदान पारणे राकास्तरप गर्मस्प वा दिया। वता सदामिः शीतांशृर्निपपात पसुन्धराम् ॥५॥ पति मोमपायोपय प्रमा मोपियामा । एपमारोपपापाम मोधना दिनकाम्पमा गायत्रपुरुषपरिलेख अष्टाक्षरावैगायत्री-ईश्वरपुरुषो गायना-जीवरुपोगाथा १-रस (सत् । २-यहम् (मसत्) परात्पर परात्पर १-अमृतम् (विषा) २-मायु (कर्म) पोदशीपुरुप १-स्पिति (मनिस्स) २-पति ( निस्त) -~~~~~पोडशीपुरुष ---- स्वयम्भू }~~-~~ परमेष्ठी ~~~-श्रव्यतात्मा १-स्नेह (रपि ) २-सेम (प्राण ) महानात्मा १-पिा (म्योति ) २-भविपा (तम ) -- सूर्य विज्ञानात्मा -.- समूीि (उत्पति) २-विनाश: (B) चन्द्रमा --- प्रज्ञानात्मा ७-१-पानम् (प्रम) २-पर्ष (पर्म) }-~- -सातीसुपर्ण मोकासुपर्ण १-पता (मम्) २-भूतान ( मूतम् ) मपिण्डम् शरीरम् माहवारमा जायापनिषत् । प्रतिमाप गत होते हैं। पी पिण पृपियी के चारों मेरे पुपरात में घूमता सभा दिखाई दे रहा है। दिम में सूभित्रयों ा पावित पामी पाप्पम्प में परिणत होकर मन्तरिक वचतर में म्याप्त होगाते । ही पानी रात्रि में सूय के प्रभाव से फिर पपिपी की मोर (मोस रुप से) Fरने सम्ले है। पही मनाला सोम के सम्बन्ध में सममिए । सोम मतरिध में जाकर पुन पूपिणी पर निगरमा चारता है, परन्तु पापराा माम से प्रसिद्ध उसी बायु से (देखिर दिसामन्प. कामाधिकरण वेरित होकर मिणरूप में परिणत होता [भा निगृहीत ऐनाता है। बिस प्रकार भाफाश में इतस्तत म्याप्त केतु (ममिपुध क्रमश मिडीमत बनकर सर्यरूप में परि गत ए -विसिर ०वि .स. २१५१), एक्मेष इतस्तत फैले हुए पार्पिय सोम साही क्रमशः पिणीमत होकर चन्द्ररूप में परिणत ए है। इसी पद्रोस्पचि रहस्य को सरप में ग्य र पुराण काय- पिता सोपम्प थिमा मोडभिभगवानपि । काठमयपशितामृत कर्मचाईमापुति ॥१॥ समर नाप तपो यन तन मन पुरा । श्रीगण वर्षसहसाण विम्यानीति र नः श्रुवम् ॥२॥ तस्पोरवसावम स्पितस्पानिमिपस्प लि। सोमव तनुरापेदे पाइदिः स वै दिनः ||३|| कर्ममामे तस्य सोमार्च मावितास्मनः । नेत्राम्यामसात् सोमो दरमा पोतपन दिया समान पारणे रक्तास्तस्प गर्मस्प व दिगा। तका सहामिः शीतोर्निपपात वसुन्धराम् ॥५॥ पतम्त सोममायोग्य प्रमा सोपितामहः । रबमारोपयामास सोकानां विधम्पया l बाईपनिपत स तेन स्यमुम्पेन सागगन्तो यस पराम् । त्रि सप्तकलो ऽतिशपशामकारामिपरिणाम || सम्म पम्ति तेमा पृथिवीमम्मपयन । भोपप्या समुदमूनाक्षेनसा अपपत्युर ।।८} तामिः पुष्पात्पर्य सोफान पभाश्चापि चतुरिंपाः । पोश हि भगरान् सोमो जगतो हि ट्रिमोधमा Hon सतस्तस्मै ददौ गप ब्रह्मा प्रमनिर्दा पर। पीपपीनां विमायाप ध दिममचमा ॥10॥ [प्रमाणोपोचत ] प्रासयो ! एक बार सोम रे पिय मगान् पनि भपिर्ने पानिपा । (मासिद्धि के लिए) प्रययुग में (पत्रसधि के मरम्मकास में ) महातेजसी पधि मर्पिन अपने पापों को ऊंचाकर, गरीर से हिमर पापाण की प्रतिमा समान बार 'र' माम का मका उप तप किया। हमने सुना है कि तीन हमार दिभ्य वप पर्यत म पश्नि या म तप किया। सर्वपा निरचेर एकाम रूप से रिपत उपरेता उन भनि महर्षि का शरीर महापरिणामी प्रामण सोमस्म में परिणत होगया । सोम की भावना करने वाले मषि महर्षि का यह सोम ऊपर की भोर उस नेत्रों से सोपरस यह निम्ता, उसने दसों दिशाभों को प्रकाशित कर दिया। जा दिशाए उस गर्मीमत सोम को धारण करने में समर्प न होसकी तो वह शीवार सोम प्रथिनी की मोर गिरने सगा । सोम को पूपिणी कीमोर गिरता दुभा देवर या उसे सोकका म्याण के लिए भग्ने स में बैठा विण । रप में बन कर प्रमाने २१ पार उसे भूमिपा की परि धमा करवाई। मिरखे हुए सोम कर यो प्रश्न माग पपिपी में गिर गया उससे भोपरि वापस ।वी मोपनियों से पन्द्रमा चतुर्विध प्रमा का पोपण योनिमेष्टो ! मगवान् सोम चमत् के पोल है । वेदपिदों में से प्रमाने काम को राज्य का प्रवियप पनाया, मो परिपौर प्रामयोमा अधिपति मनाम--सोमोऽस्मा मामी रामा"। -

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माध्यात्मा ईशोपनिपत् ।। - चल मामान समानरूप से प्रापिदविक (प्रातिक) एव प्रापिमौतिक ऐािसिक) परित का निरूपण करता है। मौम प्रमान मणि महर्षि के पुत्र चन्द्रमा का राम्यमिक कर इन्हें उत्सविणा च विपास बनाया था, एष धोम और मामयों का सोकपास माय पा । भागे बाकर गुस्पन ताप के अपहरण से मरमति पाद्रमा की उदासीनता से मासु ए सासापक सोमाय [सोमप्रसी] का समय बिनाशामा । इसप्रकार गपवनगाषिBAता पम्प की हा से मौमदेववर्ग सा के लिए भिम होगा । इसीलिए ममुरसम्प्रदायमा माग भी अपने पानिकों में सम्मा को ही प्रणनता देते हैं। इसी प्रकार मामारत में भी पन्द्ररूप में परिणत मात्र रामनार की लिपि मामीई, पैसा कि माराफ्स करते हैं इयुक्तस्वर्जुनस्पीमापुस्तमप्रवीत् । मस मे पश्रेष्ठ ! मम्मकि मुमहात्मनः ॥१॥ मोरे दमस्पयुष्यन्त सरिता देवदामना । पमिष्यत गरेका सामुः सोममारकरी ॥२॥ भप से दपसा प्रस्था निान्यतेम दान देवा मृपनिशान ! सौप मिमिला ॥३॥ प्रहरैप्पमानास्ते दीणमा दिगोडसः। अपरपन्त तपस्पतत्रि विम तपोभनम् ॥ ४॥ प्रपनममुवन देवा यावकोप निवेनिपम् । मररिपुमिरिंदो चमारिस्पारिमापौ ॥५॥ पपं गप्पापोवापि गमिस्वमसाहवे। नापिगमधाम यान्ति मपास्वायत ना ममः॥८॥ ५ प्राध्यात्मा माईग्रेपनिपत - भविमान प्रत्रिखाच मार्य रखामि मगवस्तेऽमुनमन्द्रमा भय । विमिरना समिता दापुान्ता प नो मर ॥७॥ एमुक्तस्तदामि तमोनुदभवच्छशी ॥ अपश्यद सौम्यमापाव सोमवद पियदर्शन ॥८॥ दानाविमम सोम सपा सूप व पार्थिव । मागमफरोदमितपसा स्पेन सयुगे ॥६॥ भगतिविमिर पापि मदीसमफरोचदा ॥ १०॥ [महामारत मनु पर्व १७ म]। "पर सुनकर मनम चुप होगया। वायु में (पुन ) का कि हेमरा में श्रेष्ठ | तुम (मन) महामभों में सुप्रसित भत्रि का कर्म (चरित्र) मनो । ( एकवार ) घोर मयकार में देर दामन (देवता और मसुर) एक स्थान पर सम्मिलित होकर पुर करने मगे । (उस पुर में) स्वर्भानु नाम के राष्ट्र में सकलों तारों से पत्रमा भौर सूर्य का शरीर पानी ममा गता। है रानामों में श्रेष्ठ ! इस प्रकार उन मद्य मापन दानों से पीरित वे देवता उस पोर मषकार से घिर गए । उस समप मसुरों से संत्रस्त वे देवता सर्पपा वर्मरित होगए। (उसी परसर मे) उमपीएकाप दक्त भो में (एक स्पाम पर) वपस्सी ममि को तप करते हुए देखा। सपा रातमरि एवं चिन्द्रिय पत्रि से देवा (निमय पूर्णक) पहनें गे कि (हे मा ) इस पुर में सूर्य और चन्द्रमा मसुरों द्वारा तीरों से बीप गले गए हैं । (प्पन हम सबमुब) इस पोर मम्मकार में इन सभों से मारे पपिणे । हमें इस समय पर भी शान्ति नहीं है। प्रमो। भाप (0 इस समपो इस मय से हमारी रक्षा कीजिए । (देवतामों की यह कार प्रापमा सुन कर) पनि कामें सगे-रे देक्याभो । तुमी मलामो, में पिस उपाप से वम्हारी रक्षा कर ! देवता कर बगे, हेमा माप चन्द्रमा पन माइए, एक अंधकार का नाश करने वाले सर्प प्रास्मात्मा - ईशोपनियत - बन गाए। इस प्रकार सूय घरमा मन फर भाप इन दस्युभों के मार का कारण अनिए । देकसानों से यह सुनकर ममि (तास) मवकार दूर करने गठे चममा मन गए । एक सोन माववत् सुन्दर पारे की तरह दीसमें में सुन्दर नस बदमाको अधिन देखा ।। राजन् । उस पारमा थोर सयको अधिक प्रकाराम देख पर उस पुर में भने तपोबह से मत्रि में उन दोनों में अधिक प्रकार कर दिया । इस प्रकार भषि ने मपर्ने तपोबत से संसार को भार गुम कर दिया, सर्वत्र उनासा कर दिपा" । विशास के साप साथ उक्त पौराणिक मास्यान में गहन जाम भी दिपा पुमा, मिसका कि निरूपण विस्तार भय से प्रत में पिपा नामकता । इन पौशिक भासमानी के मूल मौत माझ्याम हो । प्रायः इसी से मिसता पुस्ता मापान भप सरिता में, प्रामख में भी वरसम्म सेवा है। देखिए- -यमा सूर्य स्वर्भानुस्तपसारिष्यणासुरः । प्रदेश विषपा मुग्पो मुफ्ना यदीपयुः ।। २-सर्मानोरपपदिम्ट मापा भगो दियो बर्चमाना भान् । गुणा भूप तमसापत्रम तरीपेश प्रमथापिन्ददतिः ।। -आम्मो प्रमा पुपुमाना सपर्पन कीरिणा देवापसोपसिषन् । अत्रि पूर्यस्स विपि पचरापाव स्वर्मानोरपमापा मापद ।। ४- पुर्य खानुस्तमसादिप्पदापरा अघयस्तमन्नागिन्दन नाम्पे अरावनुगम् ।। (भा स..100-4-) १-"खानुपाऽभासुर सय वममा विम्याप । स मसा लिदो न प रोषस, तप से मारुतो मौषधमोऽपावाम । सरपोऽपरवपाप्मा पनि (ग्य ।।२।१-२)।

बानमा शोपनिषत् ॥ बीकी अस्पा इस प्रकार मापसाहित्य में चन्द्रमा की उत्पति पार्षिष भत्रि से मानी गई है, एन पत्रमा को सोम का पिएस, एष पृथिवी का उपग्रह माना गया है। पर वर्षमान विज्ञान के अनुसार पन्द्रमा किसी समय का एक स्वतन्त्र सूर्य है। पश्चिमी विद्वानों का कहमा है कि-"किसी समय पन्द्रमा घोर तप्प पा, दूसरा सूर्य या । बा पीरे पीरे वेडा होने मगा, तान्तर में बाहर का सर मा हो गपा, गर्म में प्रपि रागपा, इसी परस्पा का नाम पृपिली हुमा । पृपिवी का पद माग मो सपथा भपियन्य बनता मा प्रथिमी फ्री पफर से पार होकर पूयित्री के पारों भोर घूमने सगा, पसी पनमा कासापा" । मस्तु इन मतमताम्वरों से हमारा कोई प्रयोबन मही है। यह बात सारमना सिद्ध है कि चन्द्रमा पृथिवी के पीछे उत्पम हुमा है, एमं या पृथिली का उपप्रा है। पर यह सिर । किचनमा सरिक्रम में सब के अन्त में उत्पन होने वाला पदो ऐसी स्थिति में चन्द्रमा को निध की सम्मूति, एष बिमारा का कारण मानमा कैसे संगत हो सका।हम पार्षिक प्राणिों की उत्पपि-नाराका कारण वो फिर भी पपा कपबित् पत्रमा माना जासकता है, परन्तु एकहेसपा चन्द्रमा को सम्पूर्ण विष का उत्पत्ति-परायण मान बैठना कैसे संगत हुपा ' ठाक प्रम का समाधान करें, इस से पहिले संक्षेप से सेति, एम किनारा शब्दों का मर्प जान सेना मावश्यक हो । प्रकरण रे भारग्म में ही यह बताया गया है कि रस-पास के मापातारतम्प से विव मवितर भार उपम हो मावे है । रस भौर बस इम दोनों में रस प्रत्येक दण में पसम राता है एक बस रस की म्यापक भास्पा में मर्सग, एष रस की परिपिएम दण में ससग बन जाता है। रस की व्यापक एव परिरिकम दशामे से पस की पार भास्पाए शेगाती है। वे ही पा भमपाए माविमार, तिरोभार, सम्भूति बिनाए इन मामों से प्रसिद्ध है रस म्यापक है । इस म्पारक रससमुद्र में मरूप वर उदित होते रहते हैं, एक मस्त होते पत है। रस की पारकता के कारस इम ससंगपी बसों को परस्सर में प्रविषम फरमें का भामर मही माता । अपितु विज प्रपर एक समीम समुद्र में सारे उमी एती है, एवं प्रायरमा पाईपनिषत् । उपभूध पिपरा बैठती रहती है, इसी प्रकार उबावचमाचपम बस उस रसबराता में साबर सम्बन्ध से बैंक सहरों के सम्पन उदित होते गते हैं, एक अस्त होते रहते है। बसों का यह सम्बन्ध मसगस- मध है। माविर्मान-विरोमार, उदय प्रस्त यही इस सम्बन्ध का स्वरूप है । बसों का ऐसा । सम्बन्ध समष्टिमदनदयन्यिभूमक मष्टिसमन्म से सर्पपा परिभूत । । मागे जाकर मनपा की कृपा से रस परिधिम हो जाता है। इस परिषेदभाव के कारण दयास उत्पम हो पाता है। दफास से सर्वप्रथम 'सचारस' का उदय होता है। पुरुषारमाधिकरण की पुरुष निरुक्ति में आ पिस्तार से बताया पापुच है कि बस की पिति से एक ही रसता भानग्द-विज्ञान-मन पाण-पार मेद से पश्चकोरारूप में परिणत हो जाता है- देखिने मग मी २५५२८५४ ) । इनमें मन-पापा की समधि ही सपारस ।। इसी सा- रस भ नाम 'मस्तिस्क है। पही सत्तारस सम्भूति का कारयो । पदि वह मम्बिसम्बन्ध सचारस के उदर में भागाते है तो उस सत्तामुक्त बहसमुखप में भर्प नाम-प-कम का उदय पेचात्य है । बस सचारस के प्रन्यिापन समय में बसों का अपूर्व नाम प पारण र सेना की बस की 'सम्मति' है। एप प्रनिमन के टूट माने से उस बससपाव का सचारस से पृषद होते हुए नाम मा परिस्पाग कर ना ही 'पिनाथ' है। सवाक म् पातु से सम्भूति सद निगम । प्रप पोऽस्ति' बट पदार्थ का पर सचापण निर्वाचन है। मिट्टी में यो मनप्राण पदमप चारस पा, उसे लेकर भाग पठ साति का भविष्याता बन मिस दिन 8 में से मिली की सण निकल भाग, रस दिन घट अपने नामरूप का परित्याग पर देग्य । यी पट का नाशकार होनापों पर सारस र भनुम भी दो प्रकार से होता है। भाप पपिपीतम पर प्रतिष्ठित है। पृपिली की पतितपणा सत्ता में आपको पका सम। परपणा सिर भी इस पापि सच्च से अपर पियोग हो जाता है तो मात्मा मपानव दो नाता है। भाप मार्ग में गाए। विन्दु विदु पर पार्पित सण मापकी अनुम्पदिका बनसोपते पर भापी की किसी प्रास्तास्मा पाईपनिषत् । बम्नति निमारा सुन्दर श्य पर जाती है। उसे देखने में भाप इतने तासीन हो जाते हैं कि भापको मर्ग में भाने माझे गर्व (ई) का प्यान नहीं पा मास्मात् पैर फिसप गावा। उसी समय मात्मा में एक प्रकार का कप हो पाता है। यह कम्प मौर ऊब नही, केपट पयमात्र के लिए पृपिणी की प्रतिष्ठारूपा सचा का वियोग ।। यदि पामबूम कर सापपानी से भाप तीन फिर केहरे ग में मी पाच रस देते है वो मय महोशखा, कारण इस समय भाप का कप उस सचा पर यता है। परन्तु भाव दशा में पदि मापका पैर फुटपाप से साफ पर भी गिर जाता है तो भारमा कल्पित हो पाता है, क्योंकि सभापकी शि सत्ता पर नहीं पाती। इस निदर्शन से बतलाना यही है कि हमारे पर पृषिवी की सत्ता का भनुप्रद सता। हम पारि सपा के गम में प्रतिष्ठित यते हैं। एक मिट्टी के देसे को माप कितमा ही ठचा फैकिए, उसी पार्पियरुचा के भावर्षस से तत्वास नीचे मा जापान । इस प्रकार चम्सोक की ववत्प्रणामों पर लोकों की प्रतिष्ठास्मिका सचा का मनुमा राता है। परन्तु इस सवारस का हमारे साप परिपक्चन सम्बन्ध नहीं है, अपित सिविसम्मष है। इस सण से हमारे में किसी भपूर्व माम-रूप का उदय नही होत्य, सेक्स सहपरषा होती है, भवएप इस सञ्चारस के अनुप्रा को हम सम्मति न कहकर 'निमृति' ही कहेंगे । का मिमी का हिस्सा शरीररूप में परिणत हो गया है। हमारा शरीर पार्थिव । पृषिपी की सलाही प्रम्पियन सम्बन्ध से भपूर्ण नाम-रूपोदय की उममी बनती है हमारी (शरीर की) सम्मति का कारण बनी है। दम एक निफ्त बिन्दु है। इस एफमाषास्मिर पविदु के साप पार्पित सवा का ना परिपपम हो जाता है, तभी भपूर्वमाव का उदय होता है। इसी ममिप्राप से इस भपूज्यवरपा को 'सम्मति' का है। 'समिस्कीमापस नगमिक सिद्धान्त के अनुसार 'सम्' एकीमार का सूपक ६ 'वि' सचामान का पोतक है। ऐसी भूति (सच्च), यो पम्पियन रा पससमरि के साप एकीमाष को प्राप्त हो याप, यही 'सम्भूति' ।। मूति का एकीमाब से पृषक् हो जाना ही बस का विनाश है । स मए मही होता, अग्धि कपन से बस की उत्पति मानवी जाती है, एष अम्पिलिमोरसपाही बन का दिमाग मान - ૧૨!

माहवारमा सम्मति-मनारा । ईशोपनिषत् ॥ सिपा बाता है। गो बसपात प्रतिपादन से पुक्त सत्तारस से भपूर्व नाम रूप धारण करता हमा प्रकट हुमा पा, पी अग्पिवपन के टूट जाने से भाग उसी सत्ता के गम में विलीन हो । सचारस को अपने फेम में रस मेना इसर गमों में सपा को अपने सदर में रस मेना बम की सम्मविद, पप बस न सवा के गर्म में पता माना यस का विनाश माना जाता है। सत्ता नीचे है, पस ऊपा , पस्त भउत्-अयन' (सत्ता के अपर गमन) है, यही उदयावस्था , यही सम्भूति है। उत् अयन एर गया, पल सचा के घर में मीन हो गया, पपी विनाशावस्था है। इसी वस्य को समझाने के लिए उत्पचितपणा सम्भूति के लिए यहाँ पियों ने 'स' शब्द प्रयुक्त किया है, पहा बिमाश के लिए 'मतप' शब्द प्रयुक्त किया है। मर्यो का सयपर ही इम का दिनारा है, उदयमात्र ही इनकी उत्पति । सम्मृति में बतप्रभान , विनाश में रसप्रधान है। दूसरे शब्दों में सम्मृति में सत्ता पर की ममुगामिनी पन रही । निारा में बस सच का मनु- प्रमी बन रहा है । वपन सम्भूति है, धनविमोन मिनारा है। एक ही तत्व की भस्मा विशेष सामूति है, परस्पाविशेष विनाश है, परमार्पतः न सम्मति। न विनाश है-'न भायवे निपते पाकदापित'। सम्भूति एव विनाश का सक्षिप्त सरूप मनसाया गपा, भाउत प्रश्न का मवेपन किया पाता है। यह मकरण सम्मूवि-विनागास्मकपनमा का निरूपण करता है । सम्पूर्ण विध चममा से ही उत्पम होता , एक चन्द्रमा ही बिमिनार का कारस पर पूर्वपद पर पमा पाकि विवपों के अन्त में पृषिधी से उत्पन्न होने वाला पम्नमा सम्पूर्ण सम की सम्मति एष विनाश का कारण कैसे माना पासकता है। इस प्रश्न के सामान के लिए पोरी दर के लिए हमें यापुरप की शरण में बसना होम । पूर्व के निधनात्माधिकरण में पाकर कामरूप पतसावे ए पापदाप का माप बतातापा गपा वसिर ई. २ स. २२५-३.२)। ममि में सोम की भाति होने से ममिसोम के समन्वय से बो एक मपूर्वमाष उत्पम होता है, उसी का नाम यह है। इसी पा से मित्र में रखने माटी मना का गोपनियत् सामूविननारा , सत्पन होती तर म सपारस से पुल बसमात को सम्मति का कारण समारोहै। दोनी विस्य मामों का समन्वय कीथिए । मनमाणमा मचिरस सचा , या विज्ञानकप पनि एक मानन्द से मनामृत । । समति पत्रकार, किंग किस सविदानन्द प्रमही "अभ्येय है। अक्षर एवं पास्महर माम से प्रसिद इस सम्यय की दो प्रवर मन्दरग मातिए हैं। ठेस पुरुप की खभाषमता है, प्रतएव उस से मतिनामूत है । प्रेमान, अतएव समति अन्तरगप्रतिनिशिः पुरुष ही पोरीपनापति पपि सम्मति का कारण सथिदा- मन्द मो, पापि सचाभाग को काम धना गया है। मानन्द और विज्ञान घि भा सम्मूर्ति के कारण है किन्तु गौरप से मानन्द काम सम्पय प्रश की मुतिसादी भाग है। मन-प्राण गम्मप संचमांग सप्टिसाधी । मुक्ति में यह गोगा प्रभान । परि में या प्रधान है, यह गौण है। सा मिनाय से मना की सैमहिप सारस के समयप-मसमवय को समति व नाश का कारण मंतसाय गय है। मन से कामना का उदय होता है, प्राणम्यापार उस का तप , वाग्म्यापार अमम-तप-- मे ही सृष्टि के सापार मनुर्वन्धी-०भा०म०३१००)। वह साधम प्रमापति मंदर- मय, अधर पेदमधि, वेद का पडेग माग्नि ।ऐसी देश में संधारसहप घेद- मूर्ति पोस्सी प्रमापति को पश्य ही 'अग्नि' (वेदाग्निममि) का बासका है। पुरुप सामान 'भमि -"पुरुषो पा भमि" ० १११)-"प्रमापित (हा- 'भारमा पा प्रमि" (त. १२)। इस पुरुपोनि में बतप्रभानो पर्वमा निमत प्राप्त की भांति होती है । यह मापमाना प्रति हो सोम' है । 'मुतो मरवि 'म्यते ऽयो' 'प्रमिपुती मावि इस्पारि निवनों के अनुसार ममि में माइत होने असा पदाप ही 'सोम' । पर सोम मंमि में माइत दोर भनि को प्रतीत करता पुमा, मयमपि रश्मिप्रसार करता हम्य प्रदौस होमाता है, पर सोम को 'पदेपा शम्द से परत कर दिया जाता है। भाप मतरिष में पत्रिकामय जो पिणदेखते । उसी का मॉम पापमा महो। अपितु चन्द्रमा सोममी, पन्द्रमा शम्द सोमवता पु 1 17 १२१ मारमा भाईशोपनिषद उम्भूति मिनाय - पह, सोमतल भामिदम्प का आपकास सामान्य परिभाषा के मनुसार मात होने वाले दिने भी पदा, सब सोम है । एक मिन पदार्थों में इन सोमकप पापों की पाहुति दी है, ये सब पदार्प 'मभाद' मन ए ममि है। पुरुषप्रजापति में रस की प्रा. मा, प्राय-मापापदि पापों प्रहतियों में की प्रमानवाप रस, यह का मोक्ता (फमाद) मा मा पूर्वकपतानुसार साक्षात् भनि, या भोग्य (पम) क्मता मा साशात सोम है । इसकी वसमें भाति होती है, रसरसारमा पीपोमधि पुरुपमहादि का समन्वय पोता है इसी पर से विश्व सम्मृत हुमा ।साए नि सोम- रूप प्रहरी की पुस्प में मााति होने से ही सत्पम मा ।। भमि में पुरुष की प्रधानता रासी, दूसरे गम्दों में रस की प्रधानता रहती है, मतएव पुस्प (मनुष्य) को प्राप्य मत सापा मावा है । सोम में प्रात का, दूसरे शो में पसरूप की प्रधानता एती है। मतएम जी को सौम्पा का दावा है। पुरुष अहति, रस-म, अग्नि-सोम धन अफिसर्पक हैं। महति-पुरुप का समनप, रस-म का सपनप, अग्नि-सोम का सपनप पर मतपनप ही सम्भूति बिनाय का कारण है। इसी स्प को सामने रखने इए हम कर सकते है कि बम्बमा (सोम-महति ) ही सम्पूर्ण निव को समति एव निमारा का भविष्यता है। भपक्षप्य समी सोम है, समी ममि । म पनि मय पदापा के प्रत्यों को सेकर * भपर्ने शारीर भग्नि में माइव करते हुए उम माहुल परायों की अपेक्षा पन्नाद (ममितो भाप परापों के लिए हम मम्म (सोम) मी है। हमारा रस स्म से पा ६ सूप कर सहम समस्य से पब ए है। उसके पापों को पा मगर, यह हमारे भात का मादान करता मा धादिय पन या है। इसी प्रकार प्रमा में मी एष प्रमा सरी प्रग ६ प्रपणे पालेठी देती राती है। संप मादान विसापक अन्नान्नादा व्याप्त है। समी अन्न , ममी सोम है। सपी भमि ई, समी मनाइ~"प्रभार पामिरमा सोमःापमादय बाद सर्वमम(. ११।१।।१९)। इसी पास माम-मनादभाव का निरूपण करती हुई मम्मभुति परसौहै- - माहवारमा - सापनिपात् । सावि विमारा प्रामस्मि प्रपमा अवस्य पूर्व देवेभ्योऽममस्प नाम । यो मा ददाति स इ देसमारदहमन्नमन्नमदन्तमभि । - पर सो शामरहि । मब प्रसवरष्टि से सोम की सम्मति विनाश का विचार कीजिए। समति (सृषि) पास्मा-महावि-विहति इन वीम मागों में विभक्तामात्ममष्ठि-प्रतियष्टि पिकवियष्टि मेद से समतिरूपा सप्ति के तीन नियत है । इन टीमों ही सृटियों का मभिष्ठाता सोमतत्व है। मादात्माधिकरण में यह विस्तार से बताया जा चुका है कि सोमभूचि मान् में ही पोळी भारमा गभ धारण करता है-मम योनिमामम' । भारमपिकाठमम्मि एकमात्र मात्सोम (पारमेष्ठम सोम) हो । प्राति प्रम से विष का निमाण मा है, परन्तु भप्ठत्व की माइसि से । मप्तन सापार सोम है । इस प्रकार प्रकृति का प्रतिस्वरूप समिकर्तृप भी सोमसम्बन्ध पर ही निमर है। इसी सोमाइति से सूर्य का विकास मा १, इसी सोम से परमेष्ठी का विकास प्रा , पसि सोम प्रम्पक्त पुपटीर यम्मू का बना है। इसी सोमाइति से भूपिएर निप्पम मा ।। इसी सोम का प्राक अंग पन्द्रमा है। इस प्रकार भागे जाकर बम्नमा नाम धारण करने वाला सोम ही सम्पूर्ण मिस की सम्भूति का कारण बन बावा है । सोम की इसी सम्भूतितपसा निति का निरूपण करती हुई श्रुति करती है- मरचव सोमो परिपसारापा पद्गर्मोऽटणीत देवान् । अदभारिने परमन मोगोऽभनपत् सूर्यग्योतिरिन्दुः ।। [भक्.६।१७१११]| -- भवानसमुद्र मयमे विधर्मअनयत् प्रजा मुनस्य रामा । पा पवित्र मपि सानो मध्ये वृहत्सोमो बाटपे पुरान इन्दुः ॥ [ ..] ३- परिवमिः परमानो नृपदा रामा देवानामुत मस्पानाम् । दिना मुबर पिपनी रयीणपन भरत मुमत चार्विन्तु ॥ [ सर९२४] ।

सामूवि-नाए ' मामा 4 ईशोपनिषद 1- एप विश्वविद पाते मनीपी सोमो 'विश्वस्य मुवनस्य राजा। दप्ता दरपन विदपेबिन्दुर्वि पारमम्मे समयावि पावि ।। ( HERE)। ५- या वे प्रामानि दिनि या प्रयिया या पर्वतेप्पोपपीप्यम् । अमिनों विशः मुमना गोम्बाजन्सोम विन्पा समाप ( PIERRN) ६- समिमा मोपनी सोम पिबास्तमपो अमनपस्व गाः । पमा वन्योन्तरिवं स्म स्पोतिपानि धमो मार्य ॥१३२)। १- (महानारमा का सरूप सम्पादन करने के कारण)-परिप-(महान् नाम से प्रसिस) सोम में पा महत् कर्म (पहा मारी कर्म) किया है, जोकि पानी के गम बने हुए देव वाओं का (सौर देकतामों का) बरस कर लिया है। (मापोमप परमेष्ठी मसस में प्रति- ठित मप्कन को मिरगवरपास सोम की भाति से ही म्पोतिर्मय सौर देक्वानों का कास है, इसी मभिप्राप से “प्रपा पदूगर्भोऽषीव देवान् । पा करा )। (सूपित माग को निकालने के कारण) पपमान [नाम से प्रसिद्ध इसी पारमेष्ठप ब्रमण स्पति सोम] में इन (सौर ममतप्राण) में प्रोम (सप्रदीप] स्पापित किया -मी तो "या पका पपसहतिरिनामे तत्या कशा बाता है)। इसी इन्दु (सम्म) में पूर्व में ग्योति प्रका) उत्पम की।। " ग्पोसिपा समों प" इस समसिमान्त के पमुसार दाप पारमेष्टप सेम की दारक सौर साविभाग्नि में निरन्तर भाति होती रहती है। इसी सोमपाधि से सौर मपास में प्रकाश हराए । “मा प्पेन रनसा पचपान" इस मा अधि के अनुसार सूर्य, किंवा सौर अग्नि मी स. समप से मोर प्य [य] 1, ९५ "ग्रमा हप्सम मोऽत-पन्द्रमामा- इस पत्र-प्रामण पुति के अनुसार पानमा (सोम) मी मोर हण माप्ति में प्रकरण, न सोम में प्रकाश । प्रकाश उत्तम होता दोनों के समय है। इस सम्मप में पोनि स्पानीप मग्नि सापान पर प्रविमित रहता है। इसमें रेवः प्राप्पास्मा सोपमित् सम्मान ream स्थानीय सोम की भाति होती है। इसीलिए सोम को ही ज्योति का प्रतीक माना जाता । पही निमामिहोत्र १, ही मरापर्पस -"भुर्यो हपा अग्निहोत्रम्" (शत २का परम |५।१क.) २- पानी की वर्षा करने के कारण समुद्र नाम से प्रसिर यह सोम राजा इस मिस मन्त रिप में (टोप में अपनी माइति से) प्रणा उत्पम करता हुमा सम का अतिक्रमण कर सा।। तात्पर्य पी। किवान्दोग्य उपनिषत् की पचाग्निरिया के अनुसार अदात्मक मोम की मशः अदा-सोम-धि (पानी)-प्रम-रेत रूप में परिणत होता आमा क्रमश पु-पर्मन्य-पपिपी-पुरुप-योपित इन पांचों ममियों में माहुत होता हमा "इति । पचम्पामाशावापा पुरुपवयसो भमन्ति" इस सियास्त के अनुसार प्रयोपछिका कारण बनता है। अमिपूपमाण साडीस प्रदीश सोम विपरूप से प्रार होता ॥२॥ ३- सूम्प की पवित्र रश्मियों से पवित्रतम नामा, ठेवता मनुष्यादि प्रमामों का अभिपति, सम्पूण सम्पत्तियों का भविष्यता या सोम मसौमति गृहीत होता हुआ कल्याणाप्रद सममाग को धारण करता है || ४- सनी, मनीपी, सोक्य कर रामा पह सोम सर्वत्र म्याप्त होता है। यही कम्मों में अपनी शक्ति प्रदान करता है। यही सबका वेपन करता था, कम सत्रासम करता हमा मागे बसता है ॥२॥ (शेष दोनों च मम स्पर)। नरूपण से पर भीमति सिर होनावा कि वास्तव में सम्पूर्ण विष की सम्मति एष विनाश का कारण एकमात्र सोम ही है। सोम की इस म्पाप्तिको पू सक्ष्प में रखिए ए सुप्रसिद्ध सोम (पद्रपिण) पर पि गथिए । उपनिषत् मुति को सामान्यरूप से सम्भूति और विनाश कर मरूप बताना , साप ही में महानारमा का मी निरूपण करमा , पर प्रसानारमा का सम्बम्प प्रलदरा पिए के स्थप है, अतएर किसी पिरोपभाष का बस न कर मा मास्मा शोपनिषत् ॥ सम्म विमान - मान्य रूप से "सम्मति प पिनाय च सानि पर दिया गया। सोम सारे मित्र की सम्मूति नारा का कारस कैसे कर समापान होगपा । मापी सोम हमारे माध्यामिक पिच की सम्भूति र विनाश का कारण से ममता है। इस प्रम के समा धान के लिए भापको सस म्यापक सोम ही के प्रत्पशमूत सपि के मन्तिम पर्वरूप, प्रषिकी के उपग्राभूत उपसिर पिण्ड पने ही सामने रसमा परेन । स च पिश से सम्पन्न रस्में पसी सम्मृति सम्भूति एव पुनासम्मृति मेद से दो मार्गों में निमत है। हमारी प्रा. मिक सम्भूति का कारण मानिदैनिक पत्रमा है, एव उत्तरोत्तर होने वासी पन्मपकापा सम्मी का कारण प्राप्पास्मिक पत्रमा है। प्रात भनिन प्रपानरूप से इसी भाभ्य रिला पदमा का निरूपण करता है। मादिषिक पदमा हमारी प्रापमिक सामूहिक कारण कैसे बना है। पहिले इसी प्रम का विचार कीथिए । 'प्रम्नीपोमात्मक भगत" (पावासोपनिषत् ) इस पुति के अनुसार सम्पूर्ण बगए (रोदसा टोप) भनीपोमात्मक सोरप्रिलोकी जगम प्रालियों के सम्म से 'ममद' माम से मसि।विभौर पगत् शप परस्पर में पाप मा।। सपती-जम्दसी रोदसी इन तीनों प्रयोयों की समरि विक , एन एकमात्र रोदसी पिसोकी भगक्ष है। पर अगर सचमुच मायोममय है। पगलपसपारम भग्नि मोर सोम दोनो हो भनेक भागों में विक है । परन्त स्तमा प्यान (सिए कि वमन भाम र सामान्य पण, एक स्नान सेम का समाप पण। एक को प्रविध पदय, एक की प्रतिष्ठा परिपि । परिनार कंग में पप से प्रतिष्ठित होता मा भस्म से निरन्तर परिधि की पोर पापा करता एव सोमतत्व परिपि से निरएकर क्षेत्र की मोर माण करना है। ममि मापने वेबनसभाव से सच्चर मिणमित घेता गाता है। इसी विकसन से इसकी प्रग्नि-पम-पादिप पर मि माल मस्पाए थेशाती है। इसके विपरीत सोमनल भपर्ने स्नेहनतमा से उचरोपर सकषित होता गावासी सकोप से इस पी भापमापु-मोम मतीन म स्मार रोपाती है। मम्निापी भगिरा। मङ्गिय पिया से मिकमार मिरम्तर पर को be

मास्वरमा
ईशोपनिषता
এমুখি যিয়
।
पाया करता है, वियकरन की पराकाष्ठा पर पहुंच ने से इसकी विकास किया बद हो जाती है।
विकास की मन्तिम भास्या पर पहुचते ही मणि की गति गट पाती है। विरमगतिमानापम
मङ्गिय ही गुरूप में परिणत होकर केन्द्र की मोर माने जगता है।न्द्र की भोर पावे
माते पत्र मुगुपपी (माप-पायु-सोम) ठीक केन्द्रविन्दु पर मा जाती है सो स्नेहसमा किया
भारस हो जाती है, परकास वीनों में सर्प हो जाता है। इस सर्प से भगिरा का जन्म हो
जाता है। दूसरे शब्दों में केन्द्र में भाकर मृग ही भगिरा रूप में परिणत हो माता है। इस
प्रकार एक ही प्रजापतिवस्व गति-भागति भेद से भप्ति (अगिरा ), सोम (२) पर दो रुप
धारण कर लेता है। नो पग्नि है वही सोम है । जो सोम है, वही ममि है। थनि भमि है,
सोम पानी है । भनि पराकाध्य पर पहुंचकर पानी बन पाता है, पानी उमाम की परमावस्था
पहुचकर ममि बन जाता है। इस प्रकार सम्पूण जगत् में वेग-स्नेहसक्षण भग्नि-सोम का
साम्राम्य है। इनमें वेमोरूप अमिताव के प्रग्नि, यम, मादित्य, सापयामुप, देव, श्वन,
मस्प, पपानर, भादव, महत, उदत, पिप्पय भादि भवान्तर भनेक भेद है।सोम के भी
भवान्तर भनेक मेद है । उम सब अवान्तर सोर्मों का १० नासियों में मातम माना जा
सकता है। मणि-सोम के इसी गाय से जगत् मे पैमास्य तपसम्घ होता है। सोम की ये
१. पाविर निश्चित मामों से प्रसिर है।
1-परमा--(-घुर -पर्म , ३-पक्षण, ४-पर्म )
२-पपुर ---म, २-नमुभिर-सम, -मम्मा )
-परम्---१-राना, २-मामा, ३-मास, -रि )
-मापा--(पगम -प्रगरिस)।
५-सर--(प्रपिममरः)।
-मोपपी:-(पिमित )।
७-प्रप्त --(प्रा)
८-पवित्रम्-(प्रामणस्पति ।
- मरम्पाप।
"-मामा--(मरान् ।
-

माहवारमा पनिषत् ।। सास-बार भमि में सोम को भारत से पुरुष उत्पम होता है। इस पाकिम काही माम पाहै। मवएप हम कर सकते हैं: पुस्प पी सम्भूति का पारण याही । ' पाया' के अनुसार पर पुरुषबबप समपक पापमापन। पुरुषय से सम्बन्ध रसने शो मामि के भी पोच ही प है, एवं सोम के भी पांच ही पर हैदोनों को समरि दशावर विराद पाहै । उस महाविराट् से इस सुपिरा का गम होता है-"भदैन नारी वा स बिराममानव प्रमुः" । मनि पुपरी सोम स्त्री। दोनों पविपनियों के मिथुन से उस महामिण्ट की सम्भूति, एव उसी से शुभमराट् सम्भूताया है। पुस्पलप भनि के पांचों पर्व कमा पु, पम्प, पूपिणी, पुरुप, योपित इन मामों से प्रसिद्ध है । एक सोम- ताल के पांचों पर्व कमश प्रथा, सोम पपा, प्रम, रेत इन नामों से प्रसिद्ध है। दिम्पसोक का ममि पनिमा अमिरे, पाम्तरिक्ष्य भमि उसय मि है, पारि पग्नि तीसरा भनि पुरुषामि भोपा भनि । योपिदमि पापी भनिपार्पित प्रमि पनापि, भान्तरिय ममि दरपामि यही बापु है । भायु एपा इगे' इस समितिपासूत्र के अनुसार पनग्य माम से प्रसिद्ध भारिप वरमवाली बलि का अधिष्ठाता है। हिम्प पनि पिरमावस्या- पम, पी पारिमामि है। महिएनपी ही ममि-बायु-पारिस्म है।पही एपिनी-पर- पु । पुस्पानि में इन तीनों अधियों का समुचपो । अभिवप के सपोग से नय वापपमा पनि तापम होगगता है, पहीचानर नाम से प्रतिर। पुप साशत् पैमानर ममि की प्रतिमा है । पर भारी पाम (पु-वर्ग-पथिरी-पुरुषरूप भाविस-यम-अभिमप-बमार) स मामि । पोचलो ऐपित् भनि तरूप है। वतन सरप इसी प्रतामि से सरह होता है। इसी मलामि से बी का मात्मा मनवा है।बी अवमिमपी है। सभी सम्मों में इस जलामि का मातिमान मही होता, अपितु अनुास में ही प्राप्ति का काम है। तुमती मौलामि में सोमाइति होती तमी प्रमोपति होती है।

माफवास्मा या ईशोपमिपत्॥3. सम्भूति-रिनारा -प्रनिराप्रयी -सस्पाधि १-गु---दिष्परिरलाकि मादित्यः २-पर्नन्या-पान्तरिचयवरसामि मापु २-पृथिवी-पापिषधनामिः प्रधि: ४-पुरुषः प्रप्रियसयोगमन्मा ----वधानर ५-योपित्-चतकाले म्यासो भवामि यतामि ]-स्तानि इसी प्रकार प्रयातस्य सोम की पिरमावस्या, सोम सरसागस्या है, वर्षा (पानी) घना पस्या है। तीनों की समाप्ति 'मृगु है । इन तीनों के समन्वय से मन्त्र का निकास होता है, मन ही मागे गाकर रेवोसप में परिणत होता है। उक्त पचिों भनियों में कमरा इन पापों सोमों की पाहुति होती है । पाची माहुति में पुरुप उत्पम होता है। प्राणदेवता पर के सपासक है, माइति दने माछे है । विम्याग्नि में सदा सोम की माहुति होती है । पादरस का नाम ही मारे । यह रस भापोमय है, पनमा स्लप पानीयपिण, असा का पिण। प्रत्येक पानी में यह पान्दरस प्रतिष्टित रहता है, इसी रसमाग के लिए 'यो मः शिपवमो रस" पार करा पाता है। पपप इसी मागर पर-"प्रापो श्रदो सनमन्ते प्रदापा मेण्या- घा माप" स्मादि अतिवचन प्रसिद्ध है।यही चान्दमदारस दिम्पप्ति में माहुत होकर सोमरूप में परिणत हामाता श्रदा पहिसी मवरपा, सोम इस मास्था है । इस सोम की पजन्या निमें माइति होती है । इस भाति से टिपस्यूल पानी'उत्पन्न होता है। यह स्थूसपामी उस भदा नाम के सूक्ष्मगनी पी सीपरी परस्पा है। इस बाकी तीसरे पार्पिमानि में भाति होती है। इस माइति से अम्न' उत्पन्न होता है। पर वोमी भरपाई। मायाभिम प्राणदेवदामोधरा (इन्द्रो दाय) इस मान की पुस्गति (पेशानरामि ) मे भाति होती है। गरीयग्नि में भार तमन्मसोम रसमस के अमिक विरामसन से क्रमश रस-भग्रफ-मोम-भेद-मस्थि-मम्मा रूप में परिणत होता मा सीम्त में रतोप में परिणत होगता है। यह रेत भयमसिं उस भासोम की पानी पापा। नुवास में स्त्री के अनामि में (पचर में )स रेत सोप -शोपनिषत् ॥ उहावि-रिमाय की माइति होती है। इसी से पुरुपोत्पषि होता है। इस प्रकार प मशाहप मप्तान भड़ा सोम-पपा-प्रम-रेवोम्प में परिणत होता हुआ पानी माइति में पुरुपरूप में परिणत हो जात्य, वैसाफि निम हिसित उपनिषदपवन से सारे- "पति तु पथम्यामा वानराप पुरुपपरसो मन्ति" (5.3.1 बहादस्प से यह सिव होमाता कि यह प्रयासप पासोम परम्परया पुरुप की प्रपसम्भूति का कारण बनता है। पुरुप बस्तुमात्र का उपबहस ।। ऐसी प्रेमोक्य में जितने भी पदार्म है, सब को सम्मूप्ति का कारण चन्द्रमा हो । टोक्यम्पाक सप साधि देवसस ( साधीसुपण ) मी दासमारमक चम्ममा से ही सम्भूत है। इतर सारे चा घेतम पाप मी सी से उत्पम इए है। सूप कापप ममापति, पत्रमा दवसमारति , पम्न मा मिस पफ पर पृषि की परिकमा बमवर मारत वर' नाम से प्रसिद। या रए पासोम से म्याप्त रहता है। दवचालिम इस बात सोम के सूपसम्माय से १२ समाग होमाते । । १२ मास ही १२ निम्पग है । पानसोमबपिम ५० राशिरूप समोर का एक एक प्रवेश एक एक मास । । एक सरसरफा में ऐसे १२ मास है। इन १२ वाचायणिपों के साप सौर-करपाप्रमापति मोग हो । विवि के साप भोम एने से दर, मदिवि से भादिय, कालू से सर्प, पिनवा से गम, भारि प्रचाए उत्पम होती है । ससR की सारी प्रचार करपा प्रमापरा मी १२ दाचामपियों से उत्पन । पम-परिस्मेमि-गिर-का-सपे पममा-मयप भारि मेट से बसोम- पमतम. मागों में निमक होगावा ।।दचप्रमातिल कम्पामा सेही सारिका समान होता है। सब कारणों से हम सोमपन पत्रमा को अमरप ही 'सम्भूति का कारण मानमरे म तप्पार है। । प्रत्येक स्तु मने पपर्ने नियत समय पर उत्पनरोप समय बोकमाना १ प्रातारा या योपनिषत् ॥ पातमिमा . में 'मोसप' माम से प्रसिद है। मोसम प्रभुतुकास में ही वस्तु की उत्पत्ति होती है। ऋतुसमए सेवासर । इस समसर का बरूप ऋजसोम की भाति से ही सपम होता है। पादरेत ही अनुरुप सत्सर का अभिष्ठाता है। सबसर के १०लिमाग धम्द्रमा के सम्बन्ध से ही 'मास' माम से प्रसिब है। चन्द्रमा नपत्र समन्ध से बदसता रहता है। इस परिणाम- भाव से ही पन्द्रमा 'मास' (मसि परिणामे) नाम से प्रसिद्ध है। प्रस् का (पन्द्रमा) जो मोग कार, मही (मास -मप-मास) के अनुसार 'पास' (महिमा) नाम से प्रसिद्ध है। इस ति से भी पन्द्रमा कोही सम्भूति का कारण मानना परता है। इसी प्रकार पिमाश का मधिपता भी यही पदमा है। नैसी स्पिति अपरोक्रम में , सी ही स्पिति भारोहकम में है। मबरोह सम्भूति, मारोह सिनाय है । "वदन्वर प्रविपची ति सपरिप्वका प्राननिरूपणाभ्याम्" "यारमकवानु मुपस्वात" माषागरण स.एम।१-२२) स्पादि सूत्रों से मारोह-मरेर गम का ही निरूपण किया गया। निस क्रम से प्रन्यिा मनपा सम्मृति ई थी, उसी कम से प्रन्यिपिमोफरूप चिनाय होता है। दोनों का अभिध्यता पामा ही।।पमा के भरा भावरूप से होने वासी इसी सम्भूति एवं लिमाय का सहप परमाते हुए मार्षिकोपीतकि कहते हैं- 'स पार- पेक्षेपास्माल्लोकात मपन्ति पन्द्रमसमेर से सर्षे गछन्ति । सेपी प्रामे पूर्णपक्ष भाप्पाप, तानपरपचे न प्रमनपति ! + + + +। न यत् प्रसार तपक्षियनते, भय य एन न ममार, तमिर रिमूस्या पनि । मस कीगे पा, पतको पा, शकुनिसा, गाईमो पा, सिंदोपा, मत्स्पो मा, परवा पा, पुष्पो पा, पम्पो पा-पतेपु स्थानेषु प्रयामासते पपा कर्म, पपा रिपम् । समागवं पति-कोऽसि ! इति । त मतिपाव-विचक्षणात पो रेत प्रामृत, पयरगान मम्नाद पिम्पमस्तमा पुसि कर्नपरेपणम् । घुमा का मातरि निपिप स माप रपमापयानो, दादगायोदय उपपासो, दादरायोडगेन पिनाऽऽसवादिदे, प्रतिवदिरे, वन्य श्वको भपसा प्रामर

मायामा
काशपनिषत।
सम्भूति सिमान
पप । वेन ससेन वेन वपसा-ऋतुरस्मि, मायोऽस्मि, कोऽस्मि समस्मीति,
समवि एमने ।+ + + +1 मा पूति-कोऽसीति । प्रतियार तु
रस्मि, भावतोऽस्मि । मागापोने सवो, माय रेत सरन्सरस्य वेनो-
भूतस्य भूतस्य भूतस्पाऽऽत्सा स्वमस्मासि । पस्तपसि-सोऽमस्पि-वि' ।
(०२.. भ
.."
पदमा सिमक्षा है। यही पूर्वधरित क्रमानुसार ऋतु द्वारा रेत बमकर सर की
सामूवि का कारण मनता मा सगरम में परिणत हो। इसी विधान के भापार पर
निम्म हिनिल पौरपान हमारे सामने भात है-
--
1-प्रसाँप सामो रामा विपदणमन्मा" (फो. २०७018)
--"चन्द्रमा मै मायने पुन' (. मा. ४)।
1-"पप (द्रमा) रेव। (गत• ६11)।
"बरपा पर सर" (गो. मा.. श१५)।
मो पापा सम्भूति र कारण !, पूर्वपनानमार ही निमाया भी अभियाना।
सोम गिरना बताया पति में माहुत होता रहता है, तभी तब सामूविरुप गिरपार
है, तभी तक पपप मायु के भाते ही सोमसपर टूट जाती है, पर दोगावा है।
बसपिएंट नाती , रस से बस ( पम्पिसमाप की पोशा से)"प होका पहा
परिएन हो जाता है। इसी का नाम लिना है । मिस कम से।
प्रतिमना।।पही कारणरि सम्मन।
में वह पागमा पार
पापानिरि दो माग किन
मामा रममा में पारगर उपरमग में
परमारनपर्ग में गता।
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प्रास्वारमा शोपनिषत् । सम्भूति-विनाय - दक्षिणायन यह सा पान्दमाग है । गरीरध्याति, भरा, शुक्लपत, उत्तरायगा, समरसर यह सब सौरभाग है । पदमा में जाने के लिर प्रेता'मा फो १३ मास (पा ममास) भगवे हैं। यह पामो रिरकास तर पृथिवी पर रहा है, पास सफा चान्द्रमामा (महानारमा) पार्षिक पारपण से यद रहता है। शरीरस्पागानगर इधर से इसे पृथियो समती है, उभर से चन्द्रम में पता है । माप से परि (पाविसति में अधिक मासति रहने से) पानि भारपण प्रबस दोना है तो हमे उपर (पम्दसोर में ) जाने में महा कर होता है। यही वणवस्या 'पचमुग्रपिार' नाम से प्रसिद । । इस समय पार्थिव भावपण को नियंत मनाने के लिए पान्दवस बहामा मन्पारपर, इस का एक मात्र उपाय है--पिपटटानप्तवण श्राद'। प्रेतपिता पटाप : पुर द्वारा प्रस सोममप तगमति से घान्द्ररस से युक्त फर सरस पना दो है । पियांभोग से सबाट पनमा हुमा प्रतारमा रिना । कर के पोर में नाने में समय होता है । भस्तु धानिपप भात, पोहमा है कि वो पन्द्रमा उरा, बही सार। प्रारण के प्रारम्भ पेपर यातापा गया है कि हमारी प्रपम सम्भूति या पररण पदमा ६पर पुन मुग्भूति का पारण पन्द्रप्रापशमूत प्रशान मन है । न दामों पदों में से प्रपम पा समधान होगा भर समाप्त पुन माभूति के पविष्टाता मापामिर पदमा का पाए अहिपत दिया जाता है। प्राग्राममुपा में दो प्रकार से पान्द्र सोम पा मोग है। पासोम दी पनि फमानुसार रेन' पनना है। उप रत की बारी से दम उपम दो, पर परिसा मोग है। हम छाप प्रात प्रतिदिन जो पन से है, उसमें पापिा-मारिप-दिप्प तीनो साने फे रम प्रतिटिन है। पार्षिक पनरस से मस पर पर मग (मा) मनमा, पातरिय तारण ये मन में रहने बाते पूनभाग (सिमाई- स्नेहम) पाप होगाला स्मारण से पूछ ( पान से कफ प्रावर पर मुपर गता।पि वितरण के मापन गे पम रिमा उपम होता है। पर • Rint frrAta'मालविश'मरा THI माझ्यात्म साईपनिपात सम्मति-मिनाय मधुमाग सूर्य का रस है। चौपा रस पाम्बसोम है। इस मा दिम्परस में ही अन्तमार है। मधु मौर रेत का पनिष्ठ सम्पन्म है। मन में यो एक वादविरोष (पापका) होता है, यही सोमरस है। शिनमापा में यही रिपरस अमृत नाम से प्रसिब है। कही कहीं इसे चौपे सोक का रस मी माना जाता है । पृथिवी-मन्तरित-पी-दिर-पर भार सोक है। इन पारो बोको के कमरा प्रमि-पापु-मादिरप-पन्द्रमा या धार देवता अधिष्ठाता हैं। मम में ममि से दपि (मन) रस भाव ।। पाप से पत (तरस) रस पाता है। मादिस्य से मधु (बिरस) रस भाता है। एक घरमा से अपतरस माता है। मुक्त मम में मो पार्षिक दधिमाग (फनम्ग) १, पर रस पसक माम मेद, अस्थि, मना, शुरु हम सात भागों में विमा ।। शुक पपात पारिस है । पापि माग के हट नाने से केस मान्सरिपप गाय,एम दिम्य सौर चान्दरसरा मावे है। इन रसों की सटि ही 'मोम' ।। भोग बायुमपान पायग्य पातु है। मागे नाकर पान्तरिक्ष्प रस भी एट जाता है । इसी मधुमय विमुद सोमरस का माम 'मन'। इस प्रकार जोकरसों के तारतप्प से एक ही मुकामरस एक-मोग-मन इन टीम रूपों में परिणत हो जाता है। पार्षिक सप्तगतरूप शुक मारुवस्व, भान्तारपस पायुमप गोत्र मायवत, दिग्य मादिपमप वारस मनस्वस्त । मर-मास-पार की समशिदी 'इम' (मात्मा) है। -- -पापियननरस प्रविधी-प्रधिषि ]-ससगाव एकम् पार २-पान्तरिपवासास (अन्तरिदम्बापुः-धाम -मोमा- २-दिम्पविरसम्म- पौर- -दिम्पामवरसा दिए -प्रादिस्पर पघु मन:----मनः एक मी भान है, मन मी पाय । शुकावि से हम सत्पन होते हैं । इस एक समातीप पाकर्षण सिरान्त के अनुसार बाबरस पापा करता है, साप में मनााग भी प्रावासमा श। ईशोपनिषत् ।। सम्मति-निारा . पान्दरस भाय करता है। बो पान्द्ररस सतन्त्ररूप से शुक में माता पह-ससि' नाम से प्रसिर । मात्र सम्बन्ध से गुमप्रतिष्ठ पान्द्र सहोमाग २८ भागों में निमाल होगावे है। यही भाप्यात्मिक सतामप्रवक पिनर है। इन का मन के साथ कोई सम्बध नहीं है। एवं मम्हारा यो पान्द्ररस हमारे में भाता है, वही पूर्वोक लशकशन प्रक्रिया के अनुसार 'मन' बनता है-'मममय हि सौम्प मनः' । 'पोटशफनो में चन्द्रमा' (पशि मा. २९) के अनुसार चन्द्रमा पोषणकस है । एक एक चाल सक्सर में एक एक मन कसा का विकास होता है। इस क्रम से मन की सरमकता में भायु के १९ बप ग गाते हैं । मन सिता १८ बप में सपथ बोती है। यही चान्द्रसोम का पूसरा भोग है। हमारा मन साक्षात् माध्यामिक पदमा , यह मम हारा सपम मा, ममहाराही मध्यात्मसंस्था में सस- रूप से प्रतिष्ठित राता है। मन का उपादान चन्द्रमा है, हमारा मम परमा में प्रतिष्ठित , इसी मभिप्राय से युति करती है- १-"वयनसम्द्रमा स" (० २.०८.)। २-"मनमन्द्रमा" (०२० २६)। १-"चन्मा मे मनसि श्रिवा" (ले० प्रा. १०)। ४-"पचन्मन एप स पन्द्रमा:" (शत० १०१७)। पन्द्रमा से (पारा) उत्पम मन में स्नेहतमप्रधान पही अदारस प्रतिष्ठित है। इसी असारून स्नेह के कारण हमारा मन विपणे में मासक होता हुमा उनके साप पर होजाता १. पसा कि पूर्व के विज्ञानास्माधिकरण में विस्तार से क्तसापा मापुका है। वरी लिपयसरकार पुम्य 'पासना' है। यही बसनापुम हमें मागे जन्म सेनें के लिए बाप्प करता है। जब तक संस्कारका परिपागुरु मन पर प्रतिष्ठित. यता , बसक प्राणी मश्य ही पुन - सम्भूति के एक में फसा रहता है। कामनामय परियाविहम मन ही मागे के जन्मों के लिए शुक्र (उपादानकारण) बनता है, अतएव पूर्व के मादात्यापिकरगा में फाय-मरिया को एक पतलापा गया है। प्र िपविमोक विनाश, प्रन्पिबंधन सम्भूति है। मामा के पियन प्रारुपास्मा ासापनिपा- सम्भूति विमान का कारण (मासनामय) मन ही, एव बंधनमुछि का पारण मी (बासनाशून्य ) मन ही है। पुन 'सम्भूति एम विनाश दोनों का कारण यही मन है। जैसा कि ममियत करते हैं- न दो न पनीस्मा ननिपासि परंतप । मन एव मनुप्पामा पारस एप-मोबयो । शुक हमारा परतविक रेत (उपादान) मही, अपितु सम्भूति का प्रभाम रेत तो काम- मय हमारा मन ही। यही पुन सम्भूति र कारण। इसी ममिप्राप से उपनिप- पुति कहती है- "मनो मे, रेवो मे, प्रमा मे, पुन सम्भूविर्मे क्न्मे पयि (पन्द्रमसि) । (० २.१२७१५)। हमारा चन्द्रमा मा पारिमसंस्पा को सम्मति - मिनाय का कारण है, उपर पावर मारी ईबर का मन भाधि निक संस्पा की सम्मृति-नाश का कारण है । पूर्व में पन्द्रमा राप्द को सोमपरक मानते पर हमने सोमरएमा चन्द्रमा को सम्पूस मिस की सम्मति का कारण बताया पा, भान हम प्रपद ए इसी चद्रमा को सम्पूण विच की सम्मति का कारण कर सकते है। हिरण्याम Aण के अनुसार नियन्त्रस्मस्य ही निम का प्रभव- प्रतिष्य-परायण। सूर्य से उपर के सपम्म्-पाटी दोनों परलोक सूर्य के अमृतमाग से प्रविष्ठित है, एष सूर्य से मीचे के मसोक स्य के मपमाग से खसहप से प्रतिष्ठित है। इस प्रधर सूप ही पतविच कर मास्कम्म (स्वम्म) बन रह है। इस सूर्य को पीवित रखने वाला है, यही प्रस्प प पवम्य । सूप सरश्मिों से पार्षिक रसों का निरन्तर पादान का पता है। इसी मादाम से स्पप्रजापति का मस्त माग पूरा होता राता है। इस कमी को पूरा करमा पान्द्रनासपी पर निर है। भूपिया से सका चालानी का फार्षिक रस सूर्प में भारत होवे राते है। जब तक पत्रमा है, जब तक बागबनानी । माकपादनापी। तम तक सारपस्पति,म तक पामक सूर्प पीवितो, तक सूर्य १८ प्राकृतारमा सम्मतिविनारा - सापनिषत् । जीवित है, सभी तक अमृतमृत्युमय लिप की सम्मृति है। इस प्रकार परम्परया इस सम्मति का श्रेय एकमात्र चन्द्रमा को ही है। अध्यात्मप्रगत क्ने देखिए ! हम उत्पन हुए है, पत्रमा से । हमारी पुन सम्भूति होती रे चन्द्रमा (मन) से । एस अपनी मायु के मोगकाम में हम जो कुछ सम्भूति (पेमप) प्राप्त करते हैं, वह मी इसी चन्द्रमा (मन) से । परि मन नही हो तो हमारे विद्वानानुदि),महान, मम्प कादि कुछ नही कर सकते । मन पर ही विधान प्रविष्ठित है। मन पीध्र पात्र है। इसी पर लिबानसूर्य प्रतिविम्बित होता है। विज्ञानास्माधिकरण में बससाई गई प्रक्रिया के अनुसार मिबानसूर्य के दर्शपूर्ण पास से ही मछन् में प्रेगुषपमाव का उदय होता है। प्रैगुण्य महान् ही पिदामा की मोनि है । यदि मन नहीं तो विज्ञान नहीं, विज्ञान मही तो त्रिगुणमानापन महान् मही , महान् महीं तो विदामास नहीं, पिदामास नहीं तो कुछ नही । या तो मन से उघर (माभ्यन्तर) की स्थिति, मन पग्लिए इधर की भोर । 'स स देवो पुनक्ति' (केनोपनिपद) के अनुसार सारी इम्बिएं मन से युक्त होकर ही वाविषयमोग में समप होती है। वियपहान में प्रझापामा पाण्माषा-भूतमात्रा या त्रिपुटी राती है । मन में सोम-चित्- मास या धीन फसाए है । इम में पिदरा से प्रशामात्रा पर, सोश से भूतमात्रा पर, एष माश से प्राय मात्रा पर मन का अनुमा होता है। न हि प्रशापेना फाचन पी सिग्येत, नामाहासिपम्, प्रन्पम मे मनोऽमृत्" (को-त० ३ ० ८ स.) के अनुसार पिना मन के इन्मिए लिपपमोग में एकान्तत असमर्थ है। बिना निपपाम के शरीर नही, नहीं तो कुछ मही। . इस चानमन को 'मसान' नाम से म्पपात किया माना है। हमारी मप्यारमसस्पा में तीन प्रचार का मनोराग्म है । पत्रकस पम्पय बासा मन सासम्पन है। यह गान्धेतन सब में समानरूप से निपमान है। इसी सिमन की अपेक्षा से भारतीय भार्यसाहिल का सर्वम्या पक कम्पवाद प्रतिष्ठित है। इस भम्पय मन को 'पोरसीयसमन' मोबस्यसनम' मादि मार्गो से पास किया जाता है। दूसरा पान्दमन । 'निपतविपपस्वमिन्द्रियस्वम्' इन्द्रिय मारवारमा काशीपनिपत - सम्भूति मिनाय के का यह सारण है। समी इमिए पपर्ने मपर्ने कप-म-पादि निपतविपयों को ही मोगने में समप है । यही इन्द्रियों का इन्द्रियत। मोग शानसापेष है। समय ही सम इन्द्रियों म्स एक ऐसा मानपत्र माममा पाया कि जिसकी अन रश्मियों को लेकर दिए सम्मनिपपभोग में समर्प बनती है। उसी बानपत्र का नाम महान मन है । या सब इन्द्रियों का प्रमुहै। मिना इसका स्वाप निर को मी इन्द्रिय पाना कम मही कर सकसी । बकि या सब इन्द्रियों में मनुस्यूत राव, प्रतएक दम इसे 'सन्द्रियमन' नाम से म्पास कर सकते है।स का विषय निक्त नहीं है, यह सब में है, मवएम निस्तलिपप सारा हदिप मपदा से पर रहता था परी 'प्रनिन्द्रिपमन' नाम से भी प्रसिद है। इसका सोम माग चिदय से मुक्त रहता है पतएव इसे 'मनानमन' काना मी म्याम्प्राप्त होता है। एक तीसरा मन मोर है। उसका काम है-मचे पुरे का अनुभव कामा । मनुकूम पेटना, मति, फूल बेठना इस का निम्त विषप, अतएव या सीसरा पन वियफोटि में प्रतिय होता मा 'इन्दियमन' नाम से प्रसिर । इसी के लिए 'मना पठानीन्द्रियासि' (पपई) या कहा जाब। महत इन सत्र लिपपों का मशद निरूपण मभन निरपणामिका मागे की केनोपनिपट में होने वाचा । इस विपप को प्रतिलित न कर पापही कामा पाहते है कि प्राणेन्द-प्रा-सोम की समनिरूप या सन्द्रिय, भवएप प्रनिनिप, प्रशाना माम से प्रसिद्ध मममय मन ही मम्मत-माव-विमान-गरीर-इन्दिए-शरीरदपवा-मून- गारीग्मोक भारि सम की सम्भूति का कारण है। प्रभाव की इसी सम्म पनिरूपण करते ए महर्षि ऐतरेय करते हैं- . , कोऽयमास्मेति पयमुपास्मो कवर स पास्पा ! इति । पेन पा पायवि, पन पा श्रृपोवि, येन पा गम्भानामिप्रावि, पेन पावा म्पारोति, पेन पा स्वाद पा स्वादु पिमानावि, यवत्-पवय, मनम (नियमन), एस स मानाहान पिशान नमान, मेघा हि प्रवि, मति, मनीपा, भूति, सामा क्रम, रस कापो, पण इति । सर्यायवैवानि ममानस्स नामपेयानि मान्ति ।

पापात्मा । -सा शिपनिपात - सम्मति-विनाठ पप प्रम, एष इन्द्र, एप प्रमापति, रेवे सर्व देशा, इमानि च पचमतमतानि पपिपी-पायु-राफाश-पापो-ग्योतीपीत्यतानि, इमानि ष सुमिप्रापोवनी मानीतराणि, चेतराणि पाण्डनानि ष, नानानि च वेदमानि ष, मि मानि प, भाषा, गामा, पुरुपा, इस्विनो, पवमिचेद माणि मगमप पनि घ, यह प्यापर, तत् प्रज्ञानेत्र, प्रज्ञाने मतिष्ठितम् । प्रशानेमो सोकः । प्रमा भविष्ठा । स पवेन माझेनात्मनाऽऽस्मारनोकादुत्क्रम्प प्रमुष्मिन्सयों मौके संधान फामानाप्चामृत समभवत्, समभवत् ॥ (ऐतरेय भारण्यक २।६।१)। समृति एव विनाश का स्पा ताप अधिदेवत, एन मध्यात्म में पदमा और मन ही सम्भूति-दिनारा के अविष्यता कैसे है ! इलादि बहिरग प्ररनों का समाधान होचुन । भव मूतमन्प की भोर पाठकों का प्णन पाकर्पित किया जात्म है। उपनिपद में प्रात मधिकरण के तीन मम्मों का 'भय वम भनिरान्सि' 'मन्यदेवाहुर सम्ममात्' 'सम्मृति च पिनारा ' पा कम उपसम्म होता है, परन्तु विज्ञानरपि से पूर्व के मिशानात्मभिकरण की तर यहा मी 'मन्पदेपा सम्मपात्' 'अन्य तमा मनिग्रन्मि' 'सम्मृति प पिनाथ पपही कम सममाना चाहिए । 'मन्पेदपाह' पर प्रथम मन्त्र प्रमा- नात्मा का खरूप बनतामा ', 'मपम मनम्ति' यह मन्त्र प्रतिपादित मामसरूप से विरुद्ध गाने वालों की पोपी पतसावा , एष 'सम्भूविं व पिना च' इस्मादि मन्त्र प्रति पारित मामलरूप का परीकरण करता है। इस क्रम को प्रपान म्पमते हुए, सम्मृति-बिना- शामक प्रवानात्म का निरूपण करते ए निम्नलिखित प्रपम स्य रमारे सामने प्रात्त है- अन्यदेवाहु सम्भवादन्यवराहससम्मवात् । इति शृथम पीपणां ये नस्तदिचचक्षिरे ॥१॥ ( उ० (३०)" - भाइसरमा का ईशोपनिषत् । सम्मुनि-विनाय च या सक्षण है। समी इम्बिए अपने भपर्ने उप-रस-पादि नियत विषयों को ही मोगन में समर्प है । यही इत्रियों का इग्रिक्व है। भोग यन्सापेच है। माश्य ही सब इन्द्रियों के मन में एक ऐसा पानपन्य मानमा पराक जिसकी शाम रश्मियों को झकर इम्बिए मसविषयमोम में समय बनती है। उसी पानपात्र कर माम प्रज्ञान मन है। यह सब इन्द्रियों का प्रमुहै। बिना इस का सहारा लिए कोर मी इन्द्रिय भरना कम महीं कर सकती । भूति या सब इन्द्रियों में मनुस्यूस रहता है, पर हम इसे 'सनियमन' माम से मनात कर सकते हैं । इस का मपय नियत नहीं है, यह सब में मतएव निपतलिपप सपण इन्द्रिप मपाश से पृपा रस्ता मा यही 'प्रनिनियमन' नाम से भी प्रप्सिम है। इसका सोम, म्यग विवश से युक्त हता। मवएत्र इसे 'भानमन' करना भी म्यायप्राप्त होता है । एक तीसरा मम भोर है। उसका काम है-माथे पुरे का अनुभव करमा । मनुफ्त पेदना, मति सस बेदना रस का मिक्त विषय है, अतएप या तीसरा मम इन्द्रियकोटि में प्रतिय होता पमा 'एनियमन' माम से प्रसिद है। इसी के लिए मना पठानीन्द्रियास्मि' (भपर्ष) का, करा जावा । भस्तु इन सब विषयों का निराद निरूपण प्रझन निहपसारमा मागे की केनोपनिपत में होने वाया। मत इस लिपप को मरिक हिस्तव म कर केस यही कामा चाहते है कि प्राणेन्द्र-प्रा-सोम की समरिरूप या सन्द्रिय मवएन प्रनिन्द्रिय, प्रामाम साम से प्रसिद्ध मानमय मन ही प्रम्पक-मस्व-दिशात-शरीर-इम्दिए-शारीरदरता-मून शरीरसाफ यादि सब की सम्भूति का कारण है। प्रधानाम की इसी सपता का निरूपण कराए महर्षि ऐतरेप करते है- फोऽपमारमेति पयमुपास्मो कवर स पास्मा ! इति । येन पा पायवि पन पा भृणोवि, पेन वा गन्मानाभिप्राति पेन पा पाम म्याकरोति, येन या खाद पा स्वार पिमानाति, ववव-वर्ष, मनध (ट्रियमन), एवन स मानपामान विज्ञान, प्रशान, मेपा, रएि वि, मकि, मनीपा, वि, सकसः अतु, रमापो, परा इति । सपिपेरतानि मानस्य नामोयानि मपन्धि ।

श्रादेशपनिपत - सम्पूति-समास एप प्रम, एष इन्द्र, पप ममापति, रेवे सर्ने देवा, इमानि १ पचमसमूतानि पितरी चायु-राफाश-मापो-स्योतीपीत्पवानि, इमानि पद्धमियापीय पी नानीवराणि, चेतराणि पायवमानि च, मारुमानि प वेदमानि च, समि- जानि ष, प्रया, गाव, पुरुषा, दस्तिनो, यवम्वेिद माणि महमच पापि, पथ प्यापर, तत् प्रज्ञानेत्र, प्रज्ञाने प्रतिष्ठितए । प्रसानेप्रो सोका । प्रसा प्रतिष्ठा । स एवेन पाझेनात्मनाऽऽस्माक्तोकादुकम्प प्रमुमिन्स्यों सोफे सवान् कामानाप्वाऽमृत सममवत्, सममवत्" । (ऐतरेय मारण्यक २१६११)। समृदि-एष विनाश का कम स्वरूप है। भभिदैरत, एप पप्पाम में पत्रमा पौर मन की सम्भूति-विनाय के भविष्यमा कैसे है । इस्मावि पहिरण प्रश्नों का समाधान होपुर । मुखमन्य की मोर पाठको का प्यान पाकर्षित किया जाता है। उपलिपत् में मत भपिारण के तीन मनों का 'घम' भपिशन्ति' 'अन्यदेबाहुः सम्मान' 'सम्मृति प मिना प' यह क्रम उपसम्व होता है, परम्त विशाररि से पूर्व के विद्वानास्पापिकरण की सर यहां भी 'मन्पदेगा। सम्मपात्' भन्म वमा मनिरान्ति' 'सम्मृति प विनाश प' पी मम समम्म्मा पाहिए । 'मन्पेदवा' पर प्रपम मन्त्र ममा नारमा का सरूप बतखाना', 'मन्म दम पररान्ति' यह मात्र प्रतिपादित मालम्पसप से विनर बानें पों की भयोपसि बताता है, एक 'सम्मृति प विनागे घ' इस्मादि मन्त्र प्रति पारित मारमसरूप या सीकरण करता है । इस प्रम को प्रधान मनमोहए, प्रामति-विनर शत्मक प्रभानामा का निमपण करते हुए मिनसिस्थित प्रथम मन्त्र हमारे सापने भावी अन्यदेवाह सम्भवादन्यदाहससम्भवात् । इति शुश्रुम धारामा ये नस्तद्विवचत्तिरे ||१|| (१.३० १३.)।

घाममा जापमिपत् । पम्मतिपमान । "मिदान मोग उस (मगनारमतत्त) को सम्मनस भी प्रपर कावेर, मसभा से मी पृषद करते हैं। मिन शानिकों ने हमारे लिए पात्मस्वरूप बतलाया है, उन पीर विद्वानों के द्वारा हम यही मुनवे पाए-किवा पामतल समूति और प्रस म्मूनि दोनों से पृपया मात्र का अपराप । सम्भूति प्रस्तिती, मसम्मति मास्तिमल है। सचारस से भनुग्रहीत पदार्प सामूति है, समरस से नियुक्त पदार्थ मसम्मति है। उत्पधि मोर विनाश दोनों भाव प्रस्मक । र उत्पविरुपा सम्मूर्ति निमारासपा मसम्भूति प्रात्मा के पर्म नहीं है । प्रलनात्मा में मो माम अंश (रा), म वा उपम हो, म उसका कमी विनाश होता । बसों कीवी रसरूप मामा के मनुह से सामूति होती १, रसपरिस्मानमवस्था स्पा में रखों की ही मसम्मृति होती है। सामूति-प्रसम्मति दोनों क्स के धर्म है । हम दोनों का मावान बनता राणा दोनों से पृपा है । सम्मति मोर भस- मूीि नि मापार पर होती है, उसे मातम (प्रमनाम) समझना चाहिए । भप रस-ससमणिरुप पर मामा न मे सम्भूति का भविष्ठावा है, न केक्स असामति कर अधिष्ठाता है। अपितु दोनों सभी के मन है। यह मसम्मतिरूप है इसलिए वो उसे सम्मत नहीं करा नासकवा । सम्मृतिरूप , मत उसे मसम्मति भी नही कराया सकता । समति एक मसमति का परसर में निरोप, प्रत उसे उममात्मक भी नही करा बासमता । एसी स्पिति में यदि ससके मन में फूल बना पासकता है तो यी या सम्मति-पसम्पति दोनों से पृषक है। अपि र भामा का रसमाग सम्मी का अविष्ठाता है, बसमाग भसम्मति का भाषि- टान गुर रसरूप । म गुम पसरूप है। उस साप दोनों से शिवपण सभषात् दोनों को समपि मात्यो । 'सवो मधुपसवि निरसम्दिन' 'अन्दर ममोरपर्व ममारपतमाहितम्' अपने पैर पम्पुम सदसपाहममुन' 'नासदासीयोसदासीचदानीम' इस्लादिमीव-स्मा पनों के अनुसार सोकर समर एस सम्म दोनों से मन्पर सेवा मा पर दोनों की समति है। ऐसी भाषा में. - प्रामवारमा उम्भति-मिनाथ - ईशोपनिषत् ॥ अन्ध तम प्रविशन्ति येऽसम्भृतिमुपासते । ततो भूय इव ते वमो य उ सम्मूल्यां रता ॥२॥ (1० उ० १२ म । जो पति केवल प्रसमति की उपासना करते हैं, यह घोर अन्धकार में प्रनित होते हैं, एवं इनसे भी अधिक ने मनुष्प मम्मकार में प्रतिर होते हैं, जो कंपस सम्भूप्ति में ही रती । भयात जो चार्वाकारि केबस पणिक बस को ही प्रधान मामते हुए संसार को शुन्य शून्य सममने है, तो शत्मरूप पपकार में हैं ही, परत मास्तिक बनने का गर्व करमें वाले मो महानुभाव पणिक बस का निरादर कर केस सांसारिक मस्विरूप विपर्यों में ही भासत रावे है। यह नहीं समझते कि गिन की हमनें सम्मति समझ रमसी इ, कातर में उन सबका नाश ने वामा है, ऐसे माल पुरुष पोर भी अधिक मावरम में है। पपिध समित्कीमावे के अनुसार सम् का भप है दो वस्तुमों का एकीमाष । प्रात में ये से तय गरिचित रस-पाती हैं। रस सचा, किंवा सत्ताव पभित्ता पक्ष से प्रसत्तम अभिप्रेत है। इस असत् यस में गो सत् रस का सबध है, वही पस की सम्म ति, सा कि पूर्व में विस्तार के साप बताया जाभुका है। सचारस खखरूप से सर्पया एक । मसत्वस-'पृनी स पस्तुपामोति यनानेम पश्यति' के अनुसार मामा है। अब तक यह बस सञ्चारूप एकरस से प्रपा राता है, तब तक एकीमाव से यत्परता एमा पहनामामानापन है। यही रस से मनुमाहीत होत एकीभाव को प्राम होना एमा सम्मति- एप में परिणत रोमाता है । यसु-रससफो:-सरसतो -एकीमार ही सम्मत है। सम्भूति सवास, अब बस मसम्भूति है। बस भावरण सहप होने से तम है। ऐसी अवस्था में मो पसम्मतिरप केस इस बस माग की ही उपासना करते है, व सचमुच भाषरगप्प मन्नतम में प्रतिट रहत है। स असत् (मास्ति) भाव है, नास्ति एम्पमा, गुन्यमान मानवार । 'मममेव म भरति भसद् प्रति पेट सट' के अनुसार केवल मसर के २४३ FFoस्मा का ईपनिषत् । मकवाधार उपासक सम असत् वन जाते है। परन्तु वे और भी अधिक गहरे अपघर में हैं, जो कि बस रसरूप सम्मति की ही उपासना करते हैं। रस वसपण है। बिना बस के निश पासीविंद मोमवममावमतदा । पप्रवर्यमनिरपं समसयित्र सर्वतः ।। के अनुसार सत्रमा प्रभाव-असक्षण-प्रमतरप-मनिरप-ममुस तमो । बब तक या का मामय नसिया माता,तब र सससर से रस भनुपाम्पतम है। यह तम मातम से मी गराए । यस ससार का सपो मत इसकी उपासना करने बासा, भावरणापा सांसारिक सपति को प्राप्त करलेता है। पाना तिगुर रसरूप सम्मति का अनुपायी म इस का यवा, म रबर २ । यी इसका मुपान्मार है। एभी भारपा में क्या करना चाहिए? सुनिए- सम्मतिं च विनाशं च यस्तदेनोमय सह । विनाशेन मृत्यु तीर्खा सम्भृत्यामृतमश्नुते ॥३॥ (.न. १९ म." मो भीर विद्वान् सम्मति मौर विनाश दोनों को एक विन्दु पर प्रतिसित देता है नाश से पायु का तस कर सम्मति से ममता प्राप्त करने में समर्प गगता है। मश्राम के समय में राप महम्प नही । मत्यु हो अत्याप्ति सापम ।।मत होगों के सम. बिहप की ही उपासना करनी चाहिए । निकामभाव से पसार समार की उपासना करते इए अपूत पर पशि रविर को प्रादेश, पही उपग की सारी पडी मामी रपनिपत है। उपनिषत् कर प्रधान सभामा एम ए प्रत्येक प्रकरण में पश्चिम पाप भाप तमापुमपण पाम्मा कम माता है। भामसरूपपाराम के लिए भामसपि का सरूप १४॥

मारुवारमा बामपनिषत पकरणापर जानना मी भावरपक होगातारामतएम मगमा उपनिषत् को इस का मी स्वरूप पतमामा पर सा । यही कारण है कि उपनिषत् भात्मा-एव भारमसपि दोनों के किसी निशेषमाव का निरूपण न कर सामाय शब्दों का उपयोग करती है। उपनिषद ऐसे भवर बोसती है, बिम से पारमा-एव भारमहरि दोनों का सहप गतार्थ होता है। मतरण प्रात के तीनों मन्त्रों से नहाँ रसवतारमक मात्मा का परिधान होता है, एवमेव सम्भूति-विनारामयी पारपा धामास दि का भी परिमान होमाता है । म केस अधिदेवतचरित्र का ही, किन्तु अध्यात्मस्पिति का भी उसी भतरों से सटीकरण होनाता है। परीप मगर की अपेक्षा से मकव प्रकरण से प्रमसमावरस्प प्रमपप सम्मूति-रिनारा के कारणमूत 'पन्द्रमा' का खापमान होता है। ए पापात्ममगत की अपेक्षा से मनुष्य की पुनःसम्मृति के अधिष्ठाता प्रमा- नास्मा का साप परिषय जाता है। साप ही में दोनों निषों के भाप्तम्पनमूत सदसदात्म सम्मृति-विनागरुप प्रमुखमृत्युमय प्रात्मा का पोप होमाता है। इसी सारे मझानमन का मतिपाइन फरवा दुपा प्रज्ञानात्माधिकरण समाप्त होता है। इति प्रज्ञानात्माधिकरणम् ।

माकृतारमाधिकरणे-
प्रज्ञानात्माधिकरण
समाप्तम्
४
.00

पूरामद
पूणमिदम्
मायारमम्
साक्षी-देक्सस्यः प्राणवैभव मोक्ता देवसत्य
अधिदेवतम्
देवसत्याक्षर
ज्ञान-क्रिया-अर्थमय:-वैकृतात्मा साक्षी
प्राणात्मा
५
सातीदेवसत्य
अमृताम्नाद
-भोक्तादेवसन्य
( प्राकृतात्माधिकरणे प्राणात्माधिकरण पञ्चमम् )
यज्ञमात्रिकवेदावच्छिन्न -झान-क्रिया-अर्थमयात्मा
मृतास्मा
१- हिरण्मयेन पात्रमा सत्यस्यापिहित मुखम् ।
तत्त्वम्पन्नपावृणु सत्यधर्माय दृष्टये ॥
२- पनेक यम सूर्य प्राजापत्य व्यूह रश्मीन् ।
समूह तेजो, यत्ते रूपं कल्याणतम तत्ते पयामि ॥
योऽसापसो पुरुप सोहमस्मि ।।
३- वायुरानेलममृतम्
॥
((ोपनिषत् ११-१६-१७ मन्त्र)

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देवसत्यात्मस्वरूपनिदर्शन
१- अमिययको भुवन प्रविष्टो प प प्रतिरूपो ममूव ।
एकस्तया सर्वभूतान्तरात्मा सर्प प मतिस्पो पहिय ।।
२- वायुमर्यको मुत्रनं भविष्टो पं रूप प्रतिरूपो पम्प ।
पफरवथा सर्वभूतान्तरात्मा स्प रूप मतिप्पो पहिच ।।
३- सुर्यों पथा सर्वसोकस्प चतुर्न सिप्यते पाचपर्वाभदोपैः ।
एकस्तपा सर्वभूतान्तरात्मा न मिप्यवे सोस्दाखन वामः ।।
४- एको पशी सर्वमतान्तरात्मा एकं स पापा या करोवि।
वमात्मस्व मेऽनुपरपन्ति पीरास्वेपो मुख शाप नेवरेपाम् ।।
(कठोपनिषत् २ ० ५ १०१-१०-११-१२ म०)।
५- अपमानः पुरुषो मप्प प्रास्मनि विष्ठति ।
शानो भूतमम्परप न वतो पिजुगुप्सते । एतदैवत । (कठ० २-०-१२)।
पहलमा पुरुषोऽन्तरास्मा सदा मनाना हदये समिविद्यः ।
खाचरीराद प्रोन् मुस्मादिपीका धैर्येण ।। (कठ० २।६।१७) ।
हा उपर्या सपुमा ससाया समानं रक्ष परिपसमावे।
तयोरन्या पिप्पस सादयनप्नभन्पोऽमिधाकणीति ॥ (मुगरक. ११)।
८- समाने एवे पुरुषो निमपोऽनीशया गोपति मुनमानः ।
छ यदा पापमम्पमीरामस्य महिमानमिति पीवशोकः ॥ (मुमका ११२)।

- यदा परपा पश्यते समय कीरमीयं पुरुप समयोनिम् ।
खदा विद्वान् पुपपपापे मिपूय निरज्जना परमं साम्यमुपैति ।। मुणक २॥१॥३)
१०- प्राणो मेप यः सर्मवैरिमावि विमानन विद्वान् मरते नातिपादी।
प्रामकी मात्परवि क्रियामानेप प्रमनिदा परितः ॥ (मु. ११११५)।
पुमानः प्रपर्म मनस्वराय सपिया पिया।
प्रयोविनिंचाय्य पृपिम्पा मभ्यामरत् ॥ (रखे० २।१)।
१२- सासगी पुरुप सासामा सासपात्
स भूमि विभवो दृस्याऽसविठ्ठपणामम् ॥ (श्वे. ११)।

॥ श्री ॥ यो देवो भनी पो मप्मु यो विश्व मुक्नमाविवेश । य भोपधीषु पो क्नस्पतिषु सस्मै देवाय नमो नम ॥१॥ तदेवामिस्वदादिस्यस्वदायुस्तदु चन्द्रमा । तदेव शुक्र वद् प्रम तदापस्तत् प्रयापति ॥२॥ अषो पहरे परमे म्योमन् यस्मिन् देवा भघि विश्वे निषेदु । पस्त मवेद किमचा करिष्यति य रचदिदुस्त इमे समासत ॥ ९ ॥ गुणाक्यो यः फसकर्मक लस्य तस्मैव स चोपभोक्ता । स वियरूपस्त्रिगुणस्त्रिया माणाधिपः सञ्चरति सर्ममिः॥१॥ माष्ठमावो रक्तिम्परूपः सकल्पाकार समन्यितो यः । मुखे गुमनात्मगुणेन व भाराप्रमाणो पपरोऽपि यः ॥५॥ एको देवः सर्वभूतेष गूढ सम्पापी सर्नमूनान्तराग्मा । कायदा सर्पमूताधिपस सादी चेता केवसो निगुणय ॥ ६ ॥ मात्मान रपिम निदि शरीर रपमेव तु । पुदित सारपि विदि मन प्रमहमेव च ॥ ७॥ इन्द्रियापि श्यानाइर्विक्यास्तेषु भयन् । भारमेन्श्यिमनोयुक्त भोके पाहुमनीषिणः ॥ ८ ॥ . - मसम्य से सम्बन्ध रसनें पठे स्पपम्मू, परमेष्ठी सूर्य, चन्द्रमा, इन पार भाधिदैविक सत्पात्मामों का, एक ही के भराभूत प्रम्पक, मान् निशान, प्रशान् इन चार माप्यास्मिक सस्पारमाभों का पूर्ण के-- -पम्पकात्मापिकरया, र-मादारमापिकरण, ३-विज्ञानास्माधि करण, ४-महानास्मापिकरण इम चार मधिकरणों में निरूपण किया गापुका है। हमारी स्पिति के अनुसार सयम्भू-परमेष्ठी-मूर्य-पन्द्रमा-पपिपी यह क्रम प्राध्यामा + शोपनिषत् ।। देवाल है। पापांचो पिड क्रमशः प्राणनम, मापोग्रम, पायमम, भननम, समादाम इन नामों से प्रसिद है । इन पारों में भात्मा-पद-पुन:पद यह तीन तीन पर्व है । मतएव पापों पिया सादर-सशरीरी पनवे आए 'सस्प है। इसी माघार पर इन पापों प्रमों को हमने 'सस्पास्मा' 'नमसस्पास्मा' 'पासस्माचर' स्पादि नामों से म्यमात कि ।भब तक बार प्रमसत्यों का निरूपण मा है। पृपिनी नाम का पापा ममसस्य शेष रहा। । उभिव या पा कि चाममममस्म के अनन्तर ही उपनिषत पाच पापिय ससस्प का निरुपण करती। परन्त ऐसा न कर पार्षिक प्रमसाप से पहिले, एक सम्झनामसाप के मनम्तर पुतिने पार्थिन देस समास्मा का निरूपण किया है। अमसमरूप पृपिणी के भूत-माण मेद से दो दिन में । इन दोनों में मूतप्रधामा पृपित्री (भूपिण्य) मसल है । ससम्मात्मक इस मूपिण पर प्राणप्रपाना पूपिणी (महिमा- पि) प्रतिष्ठित है। इसी प्राणमपी पृथिनी के साप देवसमामा का सम्मम्य है । देवसम्मति छामयी प्राणपूपिणी देवरूपा है। यह प्रससम्मरूप चन्द्रमा, एक प्रमसमरूप मूपिपर दोनों के माप में प्रतिक्षित है। इसी प्राकृतिक स्पिति को वश्य में रसकर उपनिवत् में पावायसन निरूपण के मनन्तर ही प्राणपियरी पर प्रतिष्ठित देवसमारमा का निरूपण किया है। मनन्तर बाकी बचे हए मूपिणात्मक पाच समसमात्य का निरूपयोग । औपनिर धन के लिए जैसे योग्यी प्रजापति का मरूप पानमा भारपक है, एसमेत बिना नमसस-देषसस के सरूपवान के भी उपनिषदप का समन्वय करना कठिन है। भागे माने बारीकठोपनिपद में इस कठिनव्व का विस्तार के साप निराकरण किया गया है। मत प्रात में प्रकायसङ्गति के लिए दो चार सम्मों में इन दोनों का परिचयमात्र पर विषय जाता है। प्रमसम-देवसम के परिमान के लिए निम्म विसित गौतमन पर पी गतिए- मायामा का श्योपनिषत् स T 1 डॉ सुपर्णा सयुजा सलाया, समान वृक्षं परिपस्वनाते । तयोरन्य पिप्पल स्वादत्ति, अनननन्योऽभिचाकशीति ।। (मुणको० ॥२॥१)। "एक हप की ए शाला के प्रप्रमाग पर दो मुनारी रग के पदी बैठे हैं। दोनों सयुद्ध (मोटो) हैं। दोनों में घनिष्ठ मित्रता है। इन दोनों में से एक पपी फस को बस रण है, दसरा पक्षी पिना खाए पस लाने माने की चौकसी फर है।" या मन्त्र का फपिताप । पर पपही पाप का सुपरिचित महामायापपिएम पमृत-प्रम-शुभमचि मोबरतप 'मपत्पर'। इस भवस्या में सासरत्या (एक हमार बनिए) है। प्रत्येक यनी में सपम्भू-परमेष्ठी-भूर्प-चन्द्रमा प्रषिकी पर पाप पर्ण (अम्पिए) हैं , पही सहमवरण समामत्य ।। पदी पक्षपर नही पैठता, पच की टहनी पर पैठता है। टहनी के भी मोर किसी पग में न बैठकर बनी के भागे के कोर पर बैठता है। पही परिस्पिति यहां समम्मिए । भवत्पवृक्ष की एक यनी में सयम्भू मलमाग !, स्य मायमाग है, पृपिछी सबसे पन्त का माग है। इसी पर दोनों पक्षी बैठे हुए है । इन दोनों में एक पक्षी फल साता मा 'मोक्का' बन रहा है। इसी को कठोपनिषत् में 'मम्पद' नाम से पत किया है। इस फा न साप हुमा 'सावी' बन रहा है। मोक्ता एव सादी दोनों पदियों का सरूप देक- तामों से सम्म मोटा है, मवएप यह दोमों 'देवसस' नाम से प्रसिद्ध है। नीपारमा-भौर परमास्मा का पुग्म माना जाता है। परमात्मा ईपर, जीयरमा मीर भी पोर पर केस देवसस्म का नाम है। सपम्मू भारि पपेरपर है, मवस्य महेपर t, परात्पर परमेश्वर पम्म्-परमेठी-स्प-बम्बमा-भूषिण पर चर के उपकरण है, •स अनुपम पम ५ अर्थ होते है । इस पो भरिएपगर्मरियाप्रतिपार मुराकोपनिषत् में विस्तार से निहार दुपा है। , प्राइमरमा माईशोपनिषत म्यास-पहान्-विधान-प्रदान-गरी या पीर के उपकरणा।।कर्म भोगने पसा, न्यन्तर में जन्म लेने वासा जीवात्मा केबस मोहन देवसम्म है। प्रान्-महान भपकादि का कर्मम्प्रेग से कोई सम्कम नही है । इस मामपकरण से हो माटम पयक सम्मानित होने है। 'मर भीपस्मा म मोगर्ने के लिए मोकाम्बर में, किंवा योन्यन्तर में पसा गया को फिर बाद किसके लिए किया भावात भर पास्मा प्रमन्मा है वो सभी सत्पति से बचाई भावी ऐसे ऐसे प्रश्नों का उस समय कोई माप काही सत्य, बने कि सपा विमा माम्मसत्पाभों का सलपान होजाता है। भार पहानामा के लिए ही विध गावा।।कर्ममोला या देवस पोरगी पुरुप सपा पममा दो।। मस मागे मार्ने बासी पनिषदों में हम सब लिपों का स्पपीकरण सेवा रोग्य । प्रस्त में केश विरमौर और का सरपOAधाप 1 पामों में सबसे मस्त का प्रम प्रसाद ।। मस्तिष को ही प्रमाद कप पाता है। 'भमिः सा देवता प्रतिपुरोगाः सर्वे देगा मीयन्ताम्' के अनुसार मन्माद अग्नि हो । रेमतोमों की मूसपति। पतरत्र सब देवतामों के सिर भनि म दो माइति दी भावी । भग्नि ही देवयों का मुखपद से नापतेराप्मनो पर्मपासीदमपवर' इस गम के मनुधार पा प्रजापति पनि प्रपत-पायु मे से दो भागों में निम्तो । अपरामि प्रासामि नाम से, म्याग्नि मूवाग्नि नाम से प्रसिद्ध है। पापरिमायानुसार प्रत्यमि को 'पितेनिपे पामि एवं मध्यामि को 'पिसामि' करा जाता है। भूताप मापामि से भूपिणा का निर्माण सम्म। पाप-फेन-पर-सिला-गरा-पग्मा-पप-रिपप इन पाठ हतियों में सरगत र मर्यानि पिणाक्षप में परिणत पाएन इसे 'रिस्पापि करना म्बाद सात रोता है। सप ममत्वामि, चि प्राणानि केन्द्र में सपतप से प्रधिभित यता उभा र रमि)-प से मपिता पर निरमपना एक साल बाब बना म भत्तग्नि म्यात पता, मावा का अपत्पनि मार परिपापिली माम से प्रसिद।। बमनामिपरिमापा के अनुसार विमाप्रिमप भूमिपर प्यामिन कर , प्राध्यात्मा लासोपनिषत् ॥ पाल माना है, एवं चितेनिधेयाग्निमय. भूमणस 'पुष्करपर्व' माम से प्रसिद्ध है। इस पुकरपूर्णरुप महिमामपाल में म्याप्त गर्ने बाले भग्नि की क्रमश पन-चरस-पिरस-या तीन मास्पाएं से माती है। एक ही ममि की पह तीनों भवस्याएं क्रमश प्रपि-पायु-मादिस्य मान से प्र सिद्ध भूपृष्ठ के ममास की सीमा तक म्याप्त रहने पाले पाणामि के तीन लिम्ाग कर गदिए। इन तीनों में मी अयस्पातारतम्प मानना पगा। धनामि की पनावस्था के सरतम्य से माठ भत्या माने जाते है, भसि के पी पाठ अवयव माठ बसु है । मम्प के तरसस्तर की (तरसता के तारतम्य से ) ११ पवस्थाए है, यही ११ रुम हैं। भरत के निरसस्तर की (पिरखता के तारतम्य से ) १२ मरस्थाए है, यही १२ मादिम है। इम सीन भवसामों में दो सान्य प्राणों का उदय होता है। इस प्रकार प्रमिग्येष्ठ पाठ पमु पापुज्येष्ठ १ रुद्र, इन्टरपेष्ठ मादित्य, ५ साम्पमाण, मूप १३ देवता हो पाते हैं । एक ही मामि पहिले भमि-बायु-माविस्परूप से तीन रुप धारण करता है, वही पयावर मास्वामों से भागे माकर २५ रूप धारण कर लेता है-"अधि: सर्या देवा"। प्रदिसा महिरे देनास्पयशिदरिन्दम । पादिया पसयो का परिरनी प परंतप ॥ (पा. रा.)। पृपिपी में मार-गौ पौ या तीन मनोता हैं । माष्पके प्रपम सपा में शुक्रनिरुक्ति में पान- पाप मपि नाम के तीन गुरु मतसाए गर -(वैलिए...पू. ३२७) । सार पम्मुर मारुस्वर पौ , पारमेठप प्रापस्वर गौ है, एव सौर प्रमिस्वर पार ।। पौ(पक् एक)-पग भूमिपा के केन्द्र से मारम्म कर मापृथिवी १८ स्तोम तक म्याप्त है। मग १५ स्तोम तक म्याप्त 1, एवं बारुमाग (ममिक) पपिपी के २१ महर्गण तक म्पत है। 'वस्प पा पवस्मारगेपोपनिपत्' ( स० १०१ ) के अनुसार बाक्स्वर मि। इस भमिस्तर की ही भमि-बायु-प्राविस यह तीम पारपाए हैं। पृपिीपृष्ठ से भारस्मे करमार्गस तक (बो कि महर्गमों समरि विवस्वोम माम से प्रसिद) मनावस्यारम भमि प्रतिष्ठित है। यहां से पवागमार्गण पर्यन्त रमणावस्यापम भग्नि (पाप) माचारमा बागोपनियत् । J . प्रतिष्ठित है। एव प से २१ पर्यस्त निरस भनि (इन) प्रतिष्ठित है। पितरोम इस महिमा पृथिवी का पृयिमीयोक), इस का प्रतिष्ठामा (मधिष्ठात्य) ममि । पदरास्तोम भविम्य पपिपी का अन्तरिक्षमोक, इस का भविष्ठाय पा । एकविलोम महिम्मपविध का पुसोफर इसका प्रतिष्ठाप एन ।इस प्रकार केस महिमा पृषिधी में 0 सोममेव से योस्पमाप का नाप ऐसाता। सी पापिपत्रिसोकी स्तोम्पत्रिसोकी' माम से प्रसिय है। पार्षिक प्रमोक्य में म्पाप्त नी तीनों ममियों के सनातया से मेवानरवीरमयमर्भ समविदेरीप देवसम का बन्म होता है। पापिर मिवधि को पाभार पना कर पान्तरिय माप, दिम्य इन्द्र की माइति होने से, तीनों रे समन्वय से पैचानर पनि हो । वानर पनि में पपपिसोक्य का पनि , परस्त प्रधानवा पानिक अग्नि की है। भारिप आयु में पार्षिक मामि रिम्प की माहुति से रिपगर्म का बम्म होता । इसमें मी'तीनों 1, परम्त प्रधानता भारत रिस्प बामु की । एवं रिम्पामि में पापित ममि, भाम्तरिक्ष्प मापु की भाति होने से सगरमा पन्म होता है। इसमें भी तीनो ममि है, परम्न प्रधानता विम्य मान की। ममि प्रपंक्ति का अधिष्ठाता है, भात तत्प्रधान बेचार मति अपमर्षि हो । पपु मिपाराकिर भविष्यता, मत वत्प्रपान हिरण्यगम कियामसि ही। एष इन्य जान- राति का अविद्या ! म तवमान समाधानमपिचानर पनि काममा बापु- गमित पार्षिक प्रपि प्रतिष्ठा मित्स्तोम है, मागप (माग्विामान) साग प्रेमोक्य। इसी मापार पर-ौरवानरो पतवे म्ण' (मा. ), 'भा पो of माता- प्रपिलीम'थान मावि का नावा। हिरण्यगर्म-आयु कर प्रमय पापिनामि- लिगमित पान्तरिक्षय वायु प्रविष्य पाहतोम, भाप साप चोप । संधारण का प्रभा भनिगायुगमित रिम्प एन, प्रविश एकविंगतोमर, धाराम सोप ही विदेशसमरि सामनपा-अपराधि से सारे भौतिक मारमा बनती।। नारे अभियान में से दो इस देवसम्म को 'सबमूताम्मरात्मा' या गाव।केनोप - प्रजवारमा पमित देसास - निपद में लिन भमि-वायु-नन्द्र का लोक्य में विनय बताया गया है, यह पही सर्वभूता म्वरमा है। इस देवसम्म की प्रतिष्ठा प्रमतस है, प्रमसम की प्रतिष्ठा मास्मसस ।। भारमा के प्रपत-प्रम-देन-मृत पार विग है। पोडपीपुरुप सप प्रपवास्मा। सयाम्-परमेष्ठी भादि पापों पप्रममिपर्य है । भनि-वायु-चन्द्र की समरि देवरिपर्व है, भूतप्रपथ मसिर । यही चारों सस्माए मप्पास्म में हैं। इन पारों माध्यामिक संस्थानों में से भरवारमा भसस्करवीप है । प्रम-देव-मूत तीनों का संस्कार किया जाता है। चौकिक शुदिसंस्कार मूतसंस्कार , १६ स्मार्चसंस्कार ग्रामसंस्कार , ३२ औवसस्कार देव संस्कार है। इन सस्कारों से प्रम-देव-भूत पर तीनों लिन ए सात बनकर नमविभूति- मप बनगाते है। जैसा कि प्रमियुक्त करते है- संस्कार संस्कृत पूरुचरैरपि सस्कृतः । निसमगुणैर्युक्तो नामको प्रम सौफिकम् । प्राम पदयमाप्नोवि यस्माम ग्यवत पुनः ।। अप्पारमसंस्पा की उक्त पारों संस्पाभों में मपतसस्पा के तो वे ही नाम रहते है , तर सस्पामों के नाम बदल जाते हैं। ईबरीप देवसम्म का सर्व भाग यहाँ प्राप्त माम से, हिरएप गर्म माग हेमस नाम से, पैमानर माग वानर नाम से ही प्रसिद है । यही मूवामा ।। इस की प्रतिष्ठा ही सामतान्तामा है । यह मोक्ता सुपर्य है, यह सादी पर्य। पा फर्मका है, या कर्मसादी है। दोनों ससा है, दोनों सार है। दोनों स्तोम्पत्रिलोकीरूप समाबप की शाखा के अप्रमाग में प्रतिष्ठित है । दोनों की मूसप्रतिष्य मूमिपर।। सर्वज्ञमाग सासगीप , हिरएफार्मम्पग सामाक्ष , मानरम्पग सहस्रपात् ।। मूस-मध्य-अन्त मेद से मा त्रिपर्ण । मिपा देवसल पावरूप वानर भाग से मपिण पर प्रतिष्ठित है। मापारमसमा में चीपरप से यही दश मंगुस का भतिक्रमस पर (प्रादेशमान बनकर) मतिपित होण है । इसी देवसम का समरिप से निरूपण करती हुई मन्त्रभूति करती है- - - मात्मा माशोपनिषत् ॥ सहसमीप पुरपा सासाधा सासपात् । स भूमि सनवस्मृलायविठयाइगुप्तम् ॥ ( या सं. ११३१)। ईश्वरजगत्- १-परापर २-मम्पय-पाकर २-मदर-यमकस पोग्ग्रीममापति (अमृतसपस्म्म) १-मात्मपर-पाकर १-झायामू -मास्तरमा माप:---- २-परमेष्ठी- - -अमसत्पास्मा 1 -स्य ईघरप्रजापति प्रवामाद मीमापिनी १-सर्व- २-हिरण्यगम बापु ३-मामर - अग्नि देससस्पास्मा सादी मामादा- ---मपिता प्रामस्पम् १५८

प्रास्वारमा
शोपनिषत् ।
जीवजगत्
१-पपत्पर-एकता
२पम्पय-पधकर
शोरपीप्रमापति
(ममवसमामा)
माया-१-मम्परमा-पाहतात्मा
"
-२महामारमा-
-1-विहामारमा-
मसत्पास्मा
पार
"
जापपजापात
प्रमा----प्रधानात्मा-
"
१-प्रायन
परनामा २-शेषतायु
३ीचार-प्रमि
देषसत्यारमा मोका
पाबाट -1-परम्
-अमसस्पम्
१-प्रमा-भान्तरिक्षय-रिप्यानिमिताधिपतिशयमिः
१-२-प्रविध-विादलो
विधानरामि पार्थिव
१-माप-तौम्पपिसोकी...
(प्रर्पस किमा)
-०-

माइवामा
मोरनिषत्
सम्वनाथ
१-प्रमत-पापिकसिम्पामिणमित मान्धरियो पाए
२-२-प्रविष्य-पदरास्तोम ----
५-माशया-सौम्पत्रिसोकी
हिरण्यगर्मोवायु प्रान्तरिक्ष्य
(क्रियाक्तिपपत्रका)
१-प्रम -पापिक-पासारस्प-ममिमितोरिम्मेन्द्र
३-२-प्रविष्य-एकगिस्तोम.....
२-पाण्य.-सौम्पत्रिमोकी...
सर्वन-इन्द्र-दिव्य
(पानयक्तिमाः)
---
,
एष सर्वमूतान्तरात्मा
1-6--
पाखोमो
१५खोप
परिसर
विरसय
निरोम
-भूपियटः

प्रकरणात प्राध्यामा ईशोपनिषत् ।। - - अमि-बायु-इन्द्र तीनों ही प्राणात्मक । ई भतएव पागणामित्रयी से सपम इस देवसस्य को हम 'प्राणाप्मा' करने के लिए तय्यार ।। इन्द्रियरग, मझानमन, एम मुदि के सहारे स्यूत- शरीररूप रथ में प्रतिष्ठित यह रयी कारमा इस मोफ की यात्रा करता ६ एवं प्राविना- रिकशरीरस्प स्पतगरीररूप) रप में प्रतिष्ठित होकर परतोफ की यात्रा करता है। इस रमी कममोक्ता कर्मात्मा के उस पोर में मन (प्रज्ञान) मुदि (विज्ञान)-मात-पम्पक-पोरगी है, इस छोर में शरीर । विद्यानारमा सौर । । महद्गर्मित चिदारमा के दिमाग का साक्षात् समग्ध चितिषम्य परिदम इसी सौरविज्ञान के साथ होता है । विज्ञान विदामा से सापात् सम्बन्ध रखता है, अतएव 'वदिशानेन परिपश्यन्ति पीराः' यह कहा जाता है । अपारम- सस्या में वानपुरुप ही प्रधान तय है। इसी विज्ञानग्योति से प्रधान प्रकाशित है, इसी से देवसम्मरूप क मा प्रकाशित है। फास्मा-मन-दि वीनों का घनिए सम्बन्ध है । मिना मन-युष्टि के मम्मामा कर्मभोग करने में सर्वपा प्राप्त है। मत एब मन बुद्धि को भोगसाधन होने से) भोक्तारमा में घम्तभूत मान लिया जाता है। इसी भमिप्राय से इस कामरूप देक- समास्मक मोतारमा फा -'पारमेटियमनोयुक्त मोफत्यादुर्मनीपिण' (कठोपनिषद्) यह सक्षण किया जाता है । ममानयुक्त चासुपपुरुपावरियम (सौरमिनारमा मदिम ) मोक्ता देव सस्प 'मरम्' है, पही भीमा है । चान्द्रयुक्त सौरपुरुषाधम साधी देवसस्स 'पोम्', पही परमात्मा है । सौर एवं विज्ञानापपिएम देवपसमधिरुप साक्षी मोर मोक्ता देवसस के लिए दी उपनिषत् ने 'ससपर्म' शब्द का प्रयोग किया है। भब बरा मन्त्रों की सगति का विचार कीथिए । 'दिरयमयेन पारेण ससस्यापिरित मुम्मम्' इस्पारि मप्र पाठपपुरुष (विज्ञानारमा) की उपासना का, दूसरे शब्दों में उसके प्रसाद करने का उपाय बतलाता है। ऐसी भरपा में उचित पद पा कि विद्वानात्मप्रतिगदक - १०-११ मन्यो के मन्त में दी (निशानारमाधिकरण में दी) 'दिरपमपन पाण' स्पादि पड़ा माता । परम्त ऐसा मर भरिने सम्भूतिविनागरमक प्राहानारापिकरण के भम्त में (१:- मन से मागे) इसे पड़ा है। ऐसा म्पतिनाम क्यों किया गया ! उधर सर है । उपनिषदुप माळवारमा साईरोपनिषत L देश प्रभानप से बीमारे ससपान कराने के लिए प्राचामा। चीनसंस्था में- 'स पा एप रिझानात्मा प्रमानारमना सपरिपक्त' के अनुसार विज्ञान प्रज्ञान में मोदप्रस्त 'प्रान महान में सपरिमात | बिना नहाम के प्रशाम कुछ माही कर सकता, साप ही में विना प्रभान के विद्वान मी खसरप से प्रतिष्ठित महीरा सकता । न केवल जीवसस्या मेंदी, भपितु ईपरसस्पा में भी यही स्पिति है। पन्द्रम्म (सोम) के बिना सूप कभी प्रतिप्ति मही रख सकता । सौरपुरुष माफए , ज्योतिर्मय है । इसका यह पविभाष पासोमाने पर निर्भर है।' ग्योतिपा मितको पर्य के अनुसार सोम में ही सूप को ज्योतिर्मय बना रस्सा, रेसा कि पूर्व के पनाना'मारिकरण में विस्तार से बताया गपुर। इसी प्रकार पान्दमा सौप्रकार से ही चन्द्रिकामय बन । यही हिपति मापात्म में है। मन पर ही सौरविशनपुरण प्रतिविम्बितसा है। यदि मन न हो तो उसी पण कानाम्प उत्यन्त गगप । ऐसी भारपा मे हम कर सकते है कि पापपुरुष का पानुपरमा प्रथम सम्पन्न पर समासम्बित है। निगम पारपुस की वासना मतभर है। क्योंकि यह कभी मिक पम्प (एकाकी) सता ही नही । इसी सारी परिस्थिति को साप में रखकर पिने पिज्ञानारम्प पिपरख मत मानपुर की प्राप्तिक मायभूत रिगमपेन.' मारि मन्त्र को पहार प्रणामामारिकरणकमत में पड़ा है। इससे प्रषिको यही सिखाना है कि जिस पापुरपुर की तुम उसना करने पसे से यह उपासना बिना प्रशनन के सहयोग के पसमा मनोपेगरी चापुरापुरुष की उपासमा गाभापार ।। HAITना की सासना या प्रकार बताने में रियमन सिलावि मत्र को उसी मरिसर मत में परमानापारिभात में कोपा !स प्रभस सम्पमा तोगा, पर 3 इगी समय में प्रभ और सापितोता। प्राय मा धनुगार 'रिपपेन लार मात्र पाने वापारमारिकरण नाम से सिर सांग्माण में गाए मना ।।गा पर्यो ! पनानुगार तो पूरे मामा विगमप होना पारपासना उतर उगमा रिमा प्रास्तास्मा पनिषत् मरसमाति । " ही। विज्ञानात्मा उपास्य , प्रमानामा उपासना का साधन है, कर्मा-मा उपासक है। उपासक कर्माम्म ही मनोयोग (प्रज्ञानयोग) गाय उस विवान पुरुप की उपासना करता है। ऐसी भरस्मा में उपासक कमात्मा के साथ उस उपास्स विज्ञानात्मा कर सम्बन्ध मतसाना पाक रयक है। इसी सम्बन्ध परिधान के लिए उपासनाप्रकारप्रतिपादक 'हिरपमयेन मारि मन्त्र का कर्मामाधिकरण के अन्त में समावेश करना उचित होता है। मपि र जबतक कात्मा शरीर में प्रतिष्ठित राता, वमी तक मन्य भामसस्पार प्रति- प्ठिव गती है । जीवरमस्या में प्रधानता कर्मस्मा की ही पत्म (मोक्ताम)-प्रतिपादक पठोपनिपत में यह विस्तार से बतलाया जाने वाला है कि रात भीमरम्म देवसस्परूप कारमा का ही माम नहीं है, अपितु कामापरपर्ययक इस महात्मा का मोका पना "मात्मेन्द्रियमनोयुक्त मोकेमाहुमनीपिण" के अनुसार मुनिरूप पानुपपुरुष, एवं मनोमय प्रहामपुरुप के समम्बप पर ही निर्भर है। इसीलिए तो उपनिषत् में मम एव पुनि को कारमा के साप निस्म सम्बर मामा । यपपि चापपुरुष का वितमा घनिए सम्बन्ध प्रडामाग्मा के साप है, उतना देवसलरूप प्राणारमा के साथ नहीं है, सपापि बिना इसके सम्पन्ध के भोकामा का भोक्ताल ही मही बन सकता । विज्ञान-प्रशान एक मेथि में है, मोकामा एसरी अणि में है। प्रधान-विज्ञान दोनों का सम्मान इसके साप होता है । इस देवसप की 'मावा' (मा- स्मता ) प्रशानसपरिप्यक्त सोरपिशान के माधार पर ही प्रतिष्ठित है, पैसा कि-'मूर्य माम्मा- भगसम्वस्पुपम रस्मादि से स्पर। देवसस्त्र प्रतिपादक प्राणास्माधिकरण के मप्य में 'रियमोन' इस्मादि का पड़ा माना ही पा पुचित करता है कि चाचप्पुरुष का सम्मान 'प्रशाम कम्परमा दोनों से है। मैं क्या । इस प्रश्न का नर । दरसस' । इस देवसन कर में पना' उसी पानुपपुरुप पर निर्भर है। पूर्व में ही बताया गया है कि देवसम्म की अपेक्षा से विधान का प्रधान के साप पनि सम्बन्ध है। इसी स्थिति को लक्ष्य में रसकर प्रदाननिह पण के मन्स में ही पहिले उस विज्ञान व सरूप दो मत्रों से बताकर तीसरे 'पापुरनिम- मपव' मन्त्रमाग से देवसम्म का सरूप क्तचाया गया है । इस प्रकार इस प्रकरस के तीन RTOURHT शाशीपमिषन् । RREमरमा । मन्त्रों में से भारग्म के दो मन चानुपपुप की उपासमा का प्रकार बताते है, तीसरा मन्त्रमा प्रासामा का सहप बताता है । इसी पानुपपुरुप की उपासमा का प्रकार पसाताम्म निम्न चिसित मन्त्र हमारे सामने प्राता है। हिरगमयेन पात्रेण सत्यस्यापिहित मुखम् । तत्व पनपावृणु सत्यधर्माय दृष्टये ॥२॥ (2.3.1 म.)। "रियमपपा से सबका मुल रका हुपारे पूपादेवता! समपर्म की एक मिए (सादावार के पिए) माप उस पावरण को पाइप" पर मन्त्र का अपर्प । बसम्मपति पानुपपुरुष सौर पुस्प है। यह एदयस्प मन पर प्रतिष्ठित होकर दक्षिण से प्रादेश मात्र बाहर निक्षता है जैसा कि मिशानात्मापिकरण में विस्तार से बताया गया है। इस नियमपुरुष का भाप अनुकरष्टि से साक्षात्कार कर सकते हैं । परस्त इतना भारप है कि पापाप्य, दविणाधिपुरुप मादि मार्गों से प्रसिद्ध यह सम्मकत्व सूर्य के हिरस्मप प्रकारा में नहीं दीखता । एप में भाप इसे नहीं देख सकते । पर देसा पासकता है-पार्षिक पिपास की सत्ता में । पापागमभाना पृषिधी हो 'पृपा' कामासी । शपथरि का मम पक, तमोमय पापिय माम्मप मास ही 'पूपा है । 'छाया' इस प्राण का पास्तविक सरूप है। इस सापामय पूपामाण के भगमन से हिरमपपात्रहप भारस हट जाता है, उसी समय भानुषपुरुष के दरान होगाते है । प्राचीन म्याम्पमताभों के मतानुसार पापपुरप असनमा मह बिसका ने सापातकार न होसके । माप काया में अपनी बहिनी म से सम्माधि से एक प्रादेश पर ग्री-मारोप का भम्पास करते पाए । मनोयोगप इस पम्पासपोग से एक दिन सर्पपासार इस पुरुष के भाप पारस ही दर्शन रोगापगे ( भिस दिम नाप इसके दर्शन करणे, तिघास झीलिए उस दिन पेदवार भापके लिए पप माप प्रष्ट होगापम्प । कारण पाठपपुरुप सौर , एस सूर्यदेवता सपा प्रपीमिया यमकेमा सार देवपन है।

प्राज्ञवास्मा प्राशोपनिषत् ॥ प्रासमरिमा - मपि ध प्रकारान्तर से मन्त्राप का समन्मय कीजिए । सांसारिक संपति हिरयमपपान है , ससार मनहरा है। सुषण (सपपि) ने भारमतत्व को भारत कर रस्सा है। इस हिरण्मप पात्ररूप विचमोह से मुग्न मनुष्य मातहदय में प्रतिष्टित सम्म मारमतत्व के दर्शन करने में असमर्प होरहा है। इस पार्षिक मौतिक सम्पत्ति का भविष्ठावा पृथिवी का ममिमानी देवता 'प्पा' है। उसी की भाराधमा से भौतिक भावरण हट सकता है। जो पूपादेवता भावरण का भधिष्ठावा घेता है, वही भावरण दूर करने में समय है। हमें प्रणतमाव से उसी पार्थिव पमिमानी देवता से प्रार्थना करनी चाहिए कि पपन् ! मापर्ने स्वशक्ति से सत्मारम- तत्व पर जो भौतिक संपविरूप भामरण रस्सा है, उसे हटाइए, हमारे भात्मा को भौतिक मुक्त कीजिए, निससे कि हम भारमावरूप पहिचान सकें । पूपा देवता भाबरण को घटाकर सस्पधर्म का साक्षात्कार करवाती है, पा उक्त मन्त्र से सिमामा । या पूपा देवता किस प्रकार से मावरम हाती! इस प्रश्न का समाधान करती हई मागे माकर श्रुति करती है बघन से पन्ने क यम सूर्य प्रानापत्य व्यूह रश्मीन, समूह तेज । यत्ते रूप कल्याणतमं तत् पश्यामि-योसावसौ पुरुप सोऽहमस्मि ।।२।। (ई० उ०१६ म०)। सरि के मसमपरक प्राण को 'यपि' कहा जाता है । सायम्मुन प्रसवमाण का ही माम पि है। पूर्व के सम्यक्तास्माधिकरण में हमने सापम्मुव घेद को 'मनिमसित' पाद एव उस वेद के ग्गुमाग को 'मम' करा है । उस पगु का पत् माग ही प्राण है, यही अपि है । इसी से मागे की सरी सरिए होती है । इस प्रपिप्राण की सप्तर्पि, पिपि, एकपि, म्यपि मादि भनेक नाविए है । बिम में अपसम्ध होने वाले एकल, द्विस्व- मिस्त-मादि मितनें भाव हैं, उन सब के मूसाधार यही एकर्पि-दपि भादि पिमाण हैं। साथ रम, साव उपरस, सात पातु, साव उपपातु, सात सिप, साव उपपिप, साव सोक, साव पावास, सावदीप, सात समुद्र, सात मरुव, साव रंग, साव छन्द, सप्ताप, गारीर साव पात, सतनाही, सप्तापि, सप्पसमिप, सतोम मादि मादि जितने भी सप्तक है, उम सप का प्रवत्ता एकमात्र सप्तपिपाण' है।

प्रास्वारमा या ईशोपनिषत् ॥ प्राणमरिया . श्व-सत्य, पपी-सोम, सस्प-प्रनृत, पारा-पृपिपी, योपा-पा, रपि-भाग, प्रम-पप्रम, स्विति-ति, प्रादान-विसग, प्रम-कर्म, मान-त्रिपा, मृत्त-अमन, निरुक्त-प्रनित, प्रपत-मृत्यु, सव-प्रसव, मो-म, शुल-कपण, पुरुष-पति, पति-पही, पिता-पुत्र, सामी-सेपफ, मामा-गरीर, भाग-पानी, प्रम-मन, भोप- मि-वनस्पति, मुर्प-पन्द्र, प्रोपदय, चतुर्य, पादप भादि प्रादि निवर्ने मी दैव माप है, सब की मूप्तमविष्ठा 'यार्षि' माण की है। भैलोरप, वापि पीर्यप्रयी, ममाप्रपी, मेदनमी मिसब मानि बितने भी शिता भाव है, उन सवय मत पपिंपरा है। एवं एकस्वभावापन पदार्थों की मूसप्रविष्य 'एकपि' प्राण है। इन प्राणों के अप्पास्म-मपिदैवत-अभिनवम-पपिमूव मेद से मिन भिन्न कार्य ६, पैसा कि माम्पायमसण की विधनिक्ति में समाप्त पाधुका है-(देटिएईम म ११९२-३९२)। उसी प्रकरण में माकन नाम से प्रसिद्ध सप्तपिपाण का निरूपण लिया गया है। इस सप्तर्पिप्रास के समी एव म्पटिहप से सप्तपि-पपि-एफपि पा तीन मे होमाते है कैसा निम्नलिखित विषय से स्पट होगाता है- १-१-गोतम २- २-भरधर भोत्रे इपि पतुपी इपपि सप्तपि:(यत०१११५४२) -१-सिष्ठ नासिके पतिः 4-4 १-२-धममि ५-२वरपर ७-१-मधि - पापि भावारमा प्रतिप्राय ईशोपनिषत् । पपपि गु- उक्त सप्तर्षिप्राणों में से साता पनि प्राण वाङ्मय है । पर मार (ममि)-मप प्राण ही मुस में प्रसिमित होकर मन सावा है, भतएष-प्रनमचि' इस पुस्पति से इस बामय प्राण को-'प्रचि' कहा जाता है। प्रसिरी देवाओं की परोक्षमाषा में 'प्रमि नाम से प्रसिद, बैसा कि श्रुति करती है- 'पागेषामि । पाचा (अपिना) मममपते। प्रतिई नामवपदमिः । सर्मपाचा मपति, सर्वपस्याभ मवचि, य एवं पेद" (शत० १॥रा)। पर वाक्तस्त्र प्रदिरा अपि है। पूर्व में बिन अपिप्राणों का दिम्दशन कराया गया है, थे मनन्त प्रकार है । उन सब की मूसप्रतिष्ठा वाममय भगिरा नाम का एकषिप्रास ही मेसा वि सेऽशिरसा मूनपा (प्रक् १०१६।५) इस्मादि मन्त्रमन से स्पष्ठ है। -भगिरा-प्रभि मेद से भंगियप्राण भत्रि से पृपक् तत्र माना गया है। परस्त पर मातः सीनों एक ही है । महिय भग्नि की विशकचन की पराकाष्ठा पर पहुंच कर भागा सोम- रूप में परिणत शेगावा। एक मगित ही चितिमात्र को प्राप्त होकर पामच्छद बनता एमा 'पणि' कासाने सगता है। यही मागिरस अप्रिप्रास मूपिरा का स्वरूपसमर्पक है। इसी पकर्षिामय-गायिन प्रप्रिमाण के दृत मार से भाप पन्द्रमा उत्पम होता है, पेसा कि पूर्व के महानास्मापिकरण में पन्द्रोत्पत्ति-प्रकरण में बसाया गानुका है। अगिरा पाममा भवस्था में भाकर भत्रित, पही वानमि रूप है। यही मनिमय प्राण पाक्रूप से (मागिन्द्रिय रूप से ) मुस में प्रतिष्ठित होता है-'प्रपिग्मूखा मुस प्रामिगत्' । भत्रि माम से प्रसिद या भगिरा ही मन्त्र 'एकपिमाण' है । 'ममापतिर्वा एका' (ते. मा० १९६०) अनुसार पर एक्यकी है । इसी भगिराग्नि से (अगिराप्ति के मयेमाग की चिति से) भूपिड का समसप नियम हुमा। इसी एपिहप पार्षिक नागमि, सिंध प्रागमि, किंा पत्रिका माम 'पूपा है। पाममा मात्र के पार पह मत्रिमूर्ति पूपाप्राण पारदर्शकता का प्रतिबम्पक हामा तमोमय है, रुप्स , पायासप । इसी पूषा प्राण के सम्मान से पृथिवी को पूषा पस जना,सा कि निम्न पचन से स्पर- .

धाकारमा काग्रेपनियत | १-~स और पर्समसमव पूपणम, इस पूपा, इय दीर्द सर्व पुप्पति-पदिई किय' (यत. ११२१५)। पारिया के समय में मामय अन्यों में एक परम किया गया गया है कि, "पाम्प (पत ) वरत पदार्प है। इस की प्रमि में प्राति दी जाती है। इस परम पाम्पद्रम्प की माइति से धनमानापमयुक्त पुरुप कैसे सस्पन दो नावा?"। इस प्ररम का सफ- पान करते हुए भागे लाकर रामप्ति में सा दिया है कि-"वृक्ष प्राश्म सम्म फार्म है, परन्तु इसमें दिग्गपणकल (सुबर्गलएर) गमकर इस की भावि की भावी है। भवपप प्रस्थिमापयुक पुरुप उत्पभोवा"। इस परनोतर का बस पाकित शुक 1 मा पार्पिचप्पर साप ही में तरह है। परन्त इस पार्षिय रस शुक में निरस्मयकस अप ममता सम्पादक सौर रियमय वेब प्रशिगया है। इससे भस्पिभाग का निर्माण बता । बिस प्रगा के शुक में सौरपाप कम होता है उस निल रहती है। सौर बसर के नितने पर पुल में उतनी ही विरं है। एक एक पर्ष से एक एक महिल का निर्माण होता है। सशानि विथविश्व सरप्तरस्पानि पराम मम (०२०), स्पेवायत पर पुरुपस्पीनि पमबानम" (गो. मा. पु. UI) पपपि पारपात्प विशन् (ला भारतीय गिान प्रयुत मी) दांवों को ही नही मानते परस्त विकसन्सविान के मनुसार दात रही का प्राथमिक सकरना म कि मम्मि निर्माण सौर तेर से होता है। उपम शिव एकसक दांत पैदा नहीं होते। काम इसका पीकि एक वर्ष तक इसमें पार्थिवपपा प्राण कीवी प्रपानका राती है। माम मौमाय मस नहीं होने पाता, फसत चौत हारन नही होवे । मा त वाम न होने ३ एकमात्र कारण पार्षिक पूपाप्राण की प्रशमता है। इसी भाभार पर-स्य रम्यान परोपाप तस्मागारठम्वक पपा' (को• In) बकरा गाता है। भूमि में पा सम्द की मनेका ग्याप्ति देसी बाती है। सूर्य को मी पपा का पाता ।पाप मी पूषा माम से प्रसिर । एविपी को मी पपा मान्य गपा है। रेती नवा 1 115 भागारमा शीपमित्रत् wve WAN - . भी पूपा नाम से म्पपास होता है। पूष्यो स्वाभ्यासाददे नापसि(पठ २२'का पूषा राम्द रेक्ती नक्षत्र का मानक है। "सोमः पूषा व वसविपासा पक्षितीनाम्"(साम २।२।१०) का पूपा एम्द पूपिथी का बापक है। "पूष्ण: पोपेण मन दीर्घायुस्वाप रावशारदाय शव गरम्प प्रायुपे परसे" (तत्तिमा १।२।१९)का पूषा शम्न सूप का बाप । “भयं वे पूपा योऽ (बापू) परने, एप ही सर्व पुष्पवि-पदिदं किष" (गत १४१२) व पूरा सम्द वायु का पात्र है। प्रातमन्त्र के 'पपन्' शम्द से रेवी मात्र को फोरकर रोप तीनों (पमिकी-पायु-सूर्य) पूपामों का प्राण है। पूपि भग्निमयी ६, अन्तरिय वायु- मय है, सोपसदिस पुष्टोक मादिरपमप है । १२ भाहित्यों में से एक पूपा माम का भादित्य है। प्रकृति में सूर्य शम्द से इसी भादिस्य विशेष का प्राइस है। पार्षिक पूपा पूर्व कपनानुसार 'एफपि । रोदसी सोप के मातरिक्ष में बने पना भागिरस वायुरूप पूपा 'यम' है। मोकप मादिस्परूप पूषा 'सूर्य' ।। एफपि (पार्षिक पूपा), पम (मान्तरिय पूपा), सूर्य (दिम्य पा) वीनों ही मावास्य, , प्रमापति की सन्तान है। मूपिण विपग्निमप है। इस में मिनिमम मणिमा नाम का पूपाग्नि प्रविष्टित है । फेवस्प यही पूषा पार्थिव प्रजापति है। इसी प प्रजापति की एफपि -र्य (मादिस्प) पद तीन भवस्याए हो पाती है। पूर्वप्रदर्गिव देवसस्य सरूप में महिमा पपिपी में गने वाले निम पग्नि-पायु-मादिम्प एन तीन देक्वानों का दिग्दर्शन कराया गया है, पी सोनों है। शिवस्तोम तक ममिप्रशान एकपि प्रामापस्प पश्चदरास्तोम तक प्रभान यम मामापस्प,एक एकरशमोम पपश्व भादित प्रधान स्प भामापाप प्रतिष्टित है। एक ही सप्रमापति की या तीन मावस्थाए । पति-पाप-प्रदिप तीनों एक ही पर्षिक भगिध के निर्म , माम तीनों के लिए (समटि रवि से) अपि में परि 'प्पन' यह कहा है। एवं मागे नाकर इसके परिरुप प्राणापल्प भागों का दिग्दशन करते हए -"एफएँ ! यम ! सूर्य ! मानापत्प" यह कहा है। सूप में ग्पोति, गौ, मायु, यह तीन मनोता है । मोति इन्द्र है, हिरण्मपभाग है, पी रेखमा । मो माग पथ है, यही पता है-'पो में पूपा । भाग मापर, ही यमन .

प्राध्यात्मा ॥शोपनिरन् माण। सूर्य में पानी है, उसमेति , पशु, तीनों की साध सूय है । अपाम, मनुवार, बन्द मावि पशु है। सूय देवमय है, इस लिए या इन।भापोमय है, इस लिए पास। पशुमप है, इस लिए 'पूरा' है। इन तीनों में पूषाभाग देवता ( ज्योतिरिम्ममपा सकारा) का निरोपी है। पृथिवी से सूर्य तक एक ही पूपामास माप्त होरहा है। पिरीमुक्त स्या परि, अन्तरियमुक्त पूपा यम है खप विम्यमोक्स्प पा र्म है। यहाँ एकपिप्रास ( पाथि- ५ तनमय थापाहर पाप्राण ) रहता है, यहां ऐन्द्र ज्योतिभाग नहीं पता । बस इसी एक पार्पिण पूपाप्राण को परप में रखकर अति करती है- पा ! पाप पृषिम्पपरदेन एकपि, अन्तरिक्षारपछेदेन यम है । तिप्पसोफापदेन सूर्य । पापमहिमाप से प्रमोक्य में पाप्त होकर, अपनें मनापति (मूल-गया-प को मामापत्य र दल-मई, कों में परिणत फर एर्पि-यम-श्रादित्य मन से तीन स्वरूपों में परिशव होते हैं। भाप स्वयं (केन्दार छेरेन ) प्रभापति है, एन एफपि-पमादि पाप के वीनों संप माप के ही पिर्चमव होते हुए मामापस्प है। ऐसे माप अपनी (रुपण) ररिम यों को फैमाइर ! साव ही में प्राप्तोरप में प्राप्त दिरपमप सौर पेन का (सत्पपर्म के दर्शन के लिए ) संपरा कीमिर, सरितभाप का मो कम्पासवम पो मैं से ही देखता है (देसना पाहवा)।मो पर सौर दिरयमप पुरुपा, पहरी में है। तात्पर्य पारेमियोक प्यापक पूपा में सम्मधर्म के अनुसप्रतिष दो मार है। पूवा में रहने बासा मिरमप ( देवरूप म्पोतिर्मय -माग समवर्म के दर्शन का विरोधी है, कर य इस की सत्ता में पाप गप्प के दर्शन नही होसकले । ए तमोमय विदिभिम बमाग मनु स्पोन्टि इसी की सत्ता में वायुपाण के दर्शन होते हैं । पूपा का या पार्पित तमोमयर ही समपर्माधि में उपयोगी बमता हुमा हमारे लिए कापायतमरूप मदन में ही रूप अपेक्षित । तमोमय भूतभाग पूपा का प्रावितिक रूप है। रिरम+ भाग प्रगन्तुक । हिरण्फ्भप सौर मग तो मेरा मात्मा । पतोस तप, उपासक से देस बर मेरा क्या गम हो । ए तो सप में देखना चाहत्य-स उपा. प 4 समय- प्राचारमा माशोपनिषत् ॥ - स्प कहतत्व को, पूषावलिम कल्याणतमरूप को। इसी विहान को लक्ष्य में रखकर पुति काती- यचे करयाणवम पदचे पश्यामि । योऽसापसौ पुरुप (हिरएमय:) सोऽहमस्मि" (नव पश्यामि स नु-अहमेवेवि मापः) । पूर्ण के सन्दर्म का निष्कर्ष यही एमा कि पार्षिक भगिरा भाग पूपा है । बिरद-पबादक- एकविरा मेद से इसके एकर्पि-पम-सूर्य -यह तीन प्रागापम रूप हैं। पूपा पृथिवी है। इसके साप मा (दिन) का भी सम्बन्ध है, रात्रि का मी सम्बन्ध है। मा सौर माग, यह भानु- पपुरुष का भाषरक होने से मकापासरूप है। रात्रि का घोरतम भी भागन्तुक तामा, मतएव चानुपपुरुष का भावरक बनता मा भकल्याणरूप ही है। प्रातिस्मिक पापामाग ही इसका कम्याणतम रूप है। पादुपपुरुष को न भाप दिन में (धूप में) देख सकते, म रात्रि के भन्यकार में देख सकते । यह दीसता -काया में । सम्मधर्मदर्शन के लिए हमें पूपा के कायारूप इसी कल्याणतम रूप पर रएि भमानी चाहिए, थापामप भूतप्रधान पूपादेवता की ही उपासना करनी चाहिए। मन्त्रार्थ के मारग्म में हमनें- पूपमेफ यम सूर्य' इमाहि मन्त्र को "प्पाप्राण का कौनसा रूप समपर्म का साक्षात् करवाने में समर्प" इस प्रम का सम्मान करमें पामा पतगया था । वास्तव में मात्र उत प्रश्न काही प्रधान रूप से समाधान करने पर संपत इसी मर्प पर मन्त्र की म्पाप्ति समाप्त नही होगाती । मपितु उता के साप साप ही पर मन्त्र धानर-गस-मामरूप बीच देवसम्म का मी निसपण करता है। पूपा को रिस भूपिया सममिर । इस पर प्रतिष्ठित त्रिपदस्पानीय भग्नि एफपि पञ्चदरास्पानीप पायु पम, एकर्षियरपानीय भारिख्स म्प ।। एकपि भग्निप्रधान पंधानर का, पम वायुप्रधान हिरएप गर्म कर, सूप इन्द्रप्रधान सर्पद का सरूप संपादक है। पार्थिव पूपा प्रमापविरुप प्रमसम्म है, निसानि निरुपण मागे के प्रकरण में होमें वासावीनों की समपि देवसम्म है, पही मानामा का रोपनि प्रापारमा । श्याममतमय गरी है। इस मौविक प्रपामागभार देवसवलप भएपनि दकिम्मापतम रूप है। सस्पधर्मसप विहान की उपासना सेवा में इसे ही देखना चाहत है।पा का कल्याणतम अपतरूप में' (भोशा-पसम्म) हूँ या भपत माग उस वरीय पपरपुरुष से अमिम, उसी का प्रस्पर। (पागम -अपतानि नावापानीय -ममिा-मामा बार) २-पम -प्रामापया-ममतामि' -पभरापानीय -प्रयु -रिपपगः तेजस) 1-सूर्य-प्रामापाप - अमूलानि -एक विग्रस्पानीप'-न्य -सपा (प्रा) - देपसस्पास्मा' रवानर पनि मसपायु-मामान तीनों की समष्टि देवसमाप बीएमा । इसप्रकार पनि 'पा मात्र में ममि-पायु-सन तीनों प्रतिय, तथा हमारे में प्रभागता पर की ही है। वायु ही हम्परा वास्तविक मात्मा है। दिशमास को ही जीवारा सा पायी। पित कर प्रतिविम्ब ही निदामास है । इस विद का पाविम-'मम मोनिमायाम पस्किन गर्भवपाम्पाम्' के प्रमुमार माम् पर ही प्रतिष्ठित है। गुरुपीमामास सग की मार- पार-सोय पार वीन प्रवरपर है - मासम की इन तीम प्रस्थानों के कारण ही मात् प्रविविध पानी-पा-सोम इन तीन स्पानों में प्रतिषित होगा। भएपनीसम भाप मीर, पापम्प मीर, सौम्प मे से कोन की माने में मह । पानी में बनें पते मारपरि मी प्राप्प है ।हम की तमा का पापार पामी। पीनेस में रस रिया गाता है तो इन प्य जीवों की पेक्ना उत्कान्त होगाती है। सम्पग पायम पीपों का है। पिली पर साम होने पाते जीव वायम्म कृमि-कीट-पति परा-ममुम्प-वादि सब पापम्प चीर । विना युके नबीनसण महीयससी। हम - - माल पर पार चपन।वित्परम्मन्यता पोस मग में मतदोष मारे।

मातस्मा ईशोपनिपत् ॥ ध्यानपायु बाप मीयों को यदि अधिक समप तक पानी में रखा जाय तो हमारी पीबनसाचा वकान्त होगाय । तीसरा विभाग सौम्प जीपों का है। रावस-पिशाप-पक्ष-गपर्व-ऐन्द्र-पेश्य- मामापब-माम भेदमिम प्रष्टविष सस्वपिशासनीव सौम्प । पासोम ही इनकी चेतना का माघार है। उक्त बीवनिमागों में से उपनिपपदेश हम बापम्य बीवों के लिए ही प्रयुक्त सभा है। हमारी मध्यात्मसस्था में वायु ही प्रधान है। वैश्वानर मपान सम्बन्धी है, प्राइमाग प्राण सम्बन्धी है, मध्यस्थ वायुरूप तैमसमाग ध्यान सम्बन्धी है। बन सक मप्यस्य म्पान वायु खसाप में प्रतिष्ठित रहता है तभी तक जीवनसाधफ प्रासाप मानर- प्रात प्रतिष्ठित रहते हैं। न माग्न नापानेन मर्यो मीपति फरचन । इतरेण सुजीपन्ति यस्मिमेवामुपाश्रिवौ ॥१॥ फर्म माणमुभयति अपान मसगस्पति । मध्ये पामनमासीन सर्व देवा उपासवे ॥२॥ [ कठ ५-३।] उस श्रुति के अनुसार मध्यस्य म्पामवायुमय तैनस ही जीवनसध का कारण है। बीच में भैयामा या तैयस वायु इस भोर से पार्पिम रस लेता है, उस भोर से दिष्परस नेता है। पार्पिमम्पग प्रयपान होने से मर्स है, पिम्पमाग धानमपान होने से अपव है। मप्पस्प बापु इपर मनुगत बनता हुभा मर्समानापन है उभर मनुगत रहता गुमा अमृतमारापमहै। पार्षिकरस 'पूरा' नाम से प्रसिद है। महर्षि ऐतरेय में इस पार्थिव इस रस के सम्बन्ध से ही प्रानपुरुष को 'परामप' बताते हुए परोपम्पब से इसे हिरयमय कहा है। विद्यमपुरुष मी हिरण्मय , प्रामपुरुष मी हिरपमय है। दोनों ही हिरण्मय है, फेरस सरूप में प्रस्तर है। विधानपुस्प हिरण्य (पति) मय होने से हिरण्मय , एष प्रशानपुरप इरामप [पापियामरसमप] होने से हिरण्मय है। (देखिए ऐ. मारण्पक २।७।)। इस निदर्शन से प्रश्न में से पी कहना है कि पार्षिक मस्प मौतिक रस 'परा' करमावा । सारा भयप्रपत्र पावि रामप वैवानर से सम्बन्ध रखता है । भूतप्रधान होता मा पर मापन का कारण बनता गमा पस्यु प्रमात्मा मा गोपनिषत् ॥ पविरा मंप है। निस पुस्प का आयुमय मामा पार्थिव मन्य इस की भोर [ पार्थिव सपति की मोर ] मक गत्य है, उसका पपयुरूप मारमा इराप्रपान बनतामा मृत्युरूप बन जाता है। अब वक पार्षिन इरानिच में पासक है, तब तक भमुखत्त का प्रभार है । 'नापतसस्प तु मा शास्ति विचन' । यदि वाघुमय भारमा पार्थिव सरस की भासति दोहार मनमर्षि मारमा मामय लेता मा 'भनिर' (परा रहित) बन जाता है तो अमृतपान की प्रधानता से या भी अमृतरूप यम पाय -शना मुक्ति'। "देवसस ही बीयरमा है। उसमें प्रपन मप्परम तेरस प्रयु है। पदि भाप भारमकम्पाण पाहते है तो अपने इस वायुप्रभान भाग को 'प्रनिर' पनाइए, पात्रि सपत्ति से भासहिः करमा कोरिए। अनासक्रि-पोगरूप बुदिपोग पण या मापका बापुभाग पनिर बन जाय तो सियस कीनिए, मर्यभान से पृपकोटा [भा या उसी समय-'भपव' बन बायण । इसी रास्प का निहपस करते गए पागे गाकर अपि करते हैं- "वायुरानिलममृतम् - ((. उ० १७ म०)। (यदा पापुः (मप्पस्पस्तमसारमा) भनिनो-(प्रनिरो-पापियरसासक्तिमिररिवो) मबति-पप स भास्मा अपक्षमाययुको मरवि)- पाधि पात इस है, इस से भौतिक शरीर बनता है, यही रूपा मूतपिति है। पान्तरिकप पात वायु है, यही मोन बनता । मी मायचिति ।। दिम्य बात पर, इस से मन मनता, पडी देवमिति है। इस प्रकार सोप के तीनों विजें से पम्पत्य के उह तीनों विनों का निर्माण तालिम्पोक पनोमय है, अत्तरिपोक माणमय। प्रपिकासोक पास्मय -(देखिए मापणीसंहिव--)। म मपमन भक्त प्राणवापु दोनों के मप्प में है। यदि पर इमर है तो सापमानापन , पनिर वो पर है। 0

प्राकणस्मा
या ईशापनिरत
उपरहार
१- गरोरम्-वाक्-गर्षिघात -अमि (मृत्यु -रामप (वायुमत्युमय )
-मोग-प्राण -मान्तरिक्ष्य घसम्-वायु
12
३-मन -मन --दिम्यानम् -
-इन्द्र (ममृतम् )-हिरण्मय (बायुरनिसमपतम्)
इस प्रकार हमारा यह प्राणास्माधिकरण देवसत्य से भावनाभूत चानुपपुरुप की उपा
सना का उपाय गतसाता हुमा, देवसाप का निकास करता हुमा, समारत में उसे वायुमधाम
बतसाता दुपा, साप ही में भारमा के भम्तमान के लिए पार्थिव विषयों में मनासक्ति रसने
का मादेश देत्य हुमा समाप्त होता है।
इति-प्राणात्माधिकरणम्
--.:--

माकृतास्माधिकरणे
प्राणात्माधिकरणं
समाप्तम्
५

पूणमट: ++----
भूतवैभव
पूणमिदम्
६-शरीरम्
प्रापास्मम्
पनिदपतम्
ब्रह्मसत्याक्षर
वीज-दैवत-भूतमयः प्राकृतात्मा भूः
शरीरम्
4-4-4-
4-
६
-माम्नादा -शरीरम्
(प्राकृतात्माधिकरणे शरीरात्माधिकरणम्)
यज्ञमाधिकवेदावच्छिन्न -वीज-देव-मूतमयात्मा
चिस्पास्मा
अथेद भस्मान्त शरीरम् ।
जो तो स्मर, कृते स्मर, तो स्मर, कृत स्मर ।।
(शोपनिषत् १७ मन्त्र)।

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शरीरात्मस्वरूपनिदर्शन*
१-पधारमक पचम पर्समान षगश्रय पद्गुणयोगयुक्तम् ।
स सप्तधातु त्रिमत दियोनि चतुविधाहारमय शरीरम् ।।
(गर्मोपनिषत् )।
२-स-पायु-योति-पपय-पृथिवी विश्वस्य पारिणी ।।
(केयोपनिषत् ।
३-मस्मनिष्टस्प दान्ते दोपा मस्मानिसगमात् ।
मस्मस्नानवियूद्धारमा मस्मनिष्ठ इति स्मृत ॥
(सामागासोपनिपत)
१-मप पेठेपो सप्तामा पुरुपा श्री', यो, रस पसीत् , समय समुन् । सदस्य
गिरोऽभवत् । यष्ट्रिय समुदौहन् , सस्माकिर । तस्मिन्नेतस्मिन् प्रावा ममपन्त,
तस्मादेमैतष्पिर । मप यत् सवस्मिमयक्त, तरमाड शरीरम् ॥
(ता. ६ का १ ।१.क.)।
२-"पारमा 4 वन" (रात.६२।९।)।
५-"प्राम्मनो पेषाप्पानानि प्ररोहस्ति" ( शत० ८७२।१५) ।
७-"पाडू इतर प्रास्मा (शरीर) सोम-पा-मांस-मस्मि-मना" (at Kा ५११४) ।
--परनोऽपमास्मा (0) पलिप" (को० ० २०१३) ।
१-"तस्मारितर मामा (शरी) मेपति परयति " ( १७)।
१०-'भूमोऽरपोऽवामा पदास्मा (शरीरम्) (गत ६।६।१।१०)।

११-'तस्मारय सर्व वात्मा (शरीर) सण (मम्मिया)।
संवदेव जीविप्पतम मरिप्यतपरिणामम् ।
उप्स एम जोनिष्पन्, शीतो मरिष्यन्" (गत ११) ।
१२-"तत् सर्म प्रास्मा (शरीर) वाचमप्येति, अमय मावि (को प्रारा),
१५-"यो वास्मा (शरीरम्)" (स्त ५।६।२
।।
११-"सप्तपुरो पय पुरुप [गरी परात्पर मामा,
प्रप पपपुकानि" [EMII)
१५-"प्रास्मा शरी] ए-उहा" (एत.६श).

n श्री ॥ मामूतानि सम्मानि सस्तानि क्रमेण च । सप्तपातुमयो देदो दग्धा योगामिना सने ॥१॥ पपाकायस्तपा देह भाकाणादपि निम्मत । सूक्ष्मात् सूक्ष्मतरो रय स्यूसात् स्यूतो मगमा ॥२॥ प्रवमिष पयसि निगूढ मृते मूते प बसति विज्ञानम् । सतत म पपिसम्म मनसा मापाममूतेन ॥ उ पनिपट का बलम्प विषय प्राय समाप्त है। मारमाधि की अपेक्षा से मप्यात्मसाया में जो तास्तिक भए थे, उमका क्रमिक निरूपण कर उपनिपद गता है। पो ससारी टल मारमनियों को म पहिचान कर केक्स शरीर की भाराधना में ही निमग्न रहसे हए मोग-ऐपयों में तम्सीन रहते है, निम यपानात मद मनुष्यों के जीवन का एकमात्र उद्देश्य गरीर परिपातन ही , मिनोम-"साना-पीना मौज उदाना" (at drink and bo mar) इसी सिदात को अपने जीवन का परम पुरुपाप माम रक्सा , उन का प प्रियतम गरीर एक दिन मस्मसात् (रास की डेरी) ने पता है। यदि उगहोंने इसी शरीर में प्रतिष्ठित सात भारमसत्याभों को न पहियामा तो भन्त में शरीर तो एक दिन मिदी में मित्रही पापण, साप ही में पद पपागात इस माम-पत्युपरम्परागपण शासप से भी कमी गुटकारा न पासकगे । अमृतारमा निकस गपा, रह गा भस्मान्त गरीर । मिपास कपे जो शम एक दिन मस्स बनने वाला है, इसी मरमान्त शरीर में प्रमवारमा से प्रमुपडीत फम्पासा प्रतिमित है। उसके साप को परिधानों । कमा राममानास्मा [पन्तमन] प, प्रधानाय पिानारमा [व] पर, विद्वाना मानास्मा पर मान् परा .

मायामा काशपमिरत कामावरमस्म । - - । भम्पत माम से प्रसिद्ध गन्तात्मा पर पहुक्ते हुए, पराकट्य रूप उस पुरुप तस्य को प्राप्त कर अपना बन्म, एष बीपन सफल करयो । इस सम मानव शरीर को पाकर भी परि तुमने भाना चम्म एवं मीन, निरर्पण होगमा दिया वो धमर्ने अपना सबसे बमा अनिय कर लिया। यी शरीर भात्माधि से तुमारे उशर का सामन ए, यही शरीर हमारे सर्वनाश का कारण ।इसी मात्र का परे सुन्दर शम्दों में बिम्बशन कराती हई अति करती है 1- मेदवेदीदप सध्ममस्ति, न चेदिहावेदीमाती बिनष्ठिः । भूवेष मूतेषु निरिम धीय प्रेमास्माम्सोकादमृता भवन्ति । (केनोपनिषत् २।११)। २-अस्प मिससमानस्स गरीरस्पस्म देन । दारिमुष्पमाभस्म निमत्र परिशिप्यते ॥ (कोप० ।)। ५- पेदएकर मोई प्राक् शरीरस्प निबस । क्त प्रेस सोपेषु शरीरत्वप कम्पवे ।। (कठ०६ा)। मिस प्रकार महाविध उस विचम्पापक ईपर कर शरीर है एवमेव हमारे बीमात्मा का पा भौतिक गरीर हम्प पिईमरत्व शरीरापेपपा १ अगुत करपर नीता भी अपने विश्व की पेश से ८५ मगुण काही है। दोनों का भाकार सम्प्रम है, तभी तो "पुरानो मनापनेदिष्ठम् ' (मनुष्य ईयर के बात समीप है, ईबर से मितवा शुभता है (सत. २।५।१ ) पा मुक्ति परिता होती है। मोर पुस्प ही क्या, प्रत्येक प्रापी का पर अपने गुरु के परिमाण से८. मगुरु का होता है। एक महीने का वा मी ." भगुस का है, एक पुष मी ४ मगुरु कर दी। कारण इसका यही कि मरमसहि का मूए स्वम्म प्रयापर गायत्री पन्द माना गया है, जैसा कि पूर्व में विस्तार से बताया माधुकरी-(देसिए ई उ त प्रहानात्माधिकरण . स. ११० सेपर्यत)। "प्रशासरा गाममी" इस सिमान्त के अनुसार पत्री को माठ मपर का पद मान्य गंपा है। प्राणक्य का नाम मपरा एवं मादेशक्तिः प्राण" (ऐ मा १२१) प्राकतामा साईशोपनिषत् ।। मासम्माप्ति अनुसार प्रासतरप प्रादेश परिमित साम में अपनी व्याप्ति रस्ता है। भगुष्ठ भौर तर्जनी को केला दीगिए । इन दोनों के मध्य का मितना प्रदेश होगा, बड़ी प्रादेश कासावेग्म । पा भगुती-परिमण की अपेक्षा से १०॥ मगुरुमित होग, जैसा कि- 'मत्पविष्टदशाहसम्" इत्यादि से सानिफर्प यह पुष्पा कि प्रत्येक प्राण की म्याप्ति १०॥ मंगुसावहिन प्रदेश में रहती है। अपनी में ऐसे पाठ प्राण विभा भार प्रदर है । पलत रे गायत्री मन्द की म्याप्ति ८४ भगुतमपी बम बासी है। अमर ध्र से कण्ठ तक एक प्रादेश। कपट से ज्दय तक दूसरा प्रादेश।। हदय से नाभि तक तीसरा प्रादेश ।। नामि से प्रसन्म (गुदस्थान ) पर्यन्त चौया प्रादेश।। प्रमग्रन्धि से गोगों की कगासी तक दो प्रादेश है या से पाद पप्यात दो प्रादेश है । सम्भूप माठ प्रादेश को गाते हैं । इस प्रकार भाठ प्रादेशों से शरीर चोराप्ती मगुरु का होगा। इन माठों प्रादेशों में क्रमश सस्प, तप, जनस, मार, स्व मुना, पृषियी, माइन माठ पई का सपमोग है। सर शरीर सप्तरितस्विफाय नाम से प्रसिद्ध । पैसा कि-"सपेटिवायत्मसप्तनिवस्तिकाया" (मागक्त) हरयादि पुण्य-सिमान्त से स्पष्ट |मगुट से कनिष्ठिका अगुती पम्पन्त नो वितत प्रदेश, उसे ही विम्ति (क्सिांत) कहा जाता है। यह प्रदेश १२ मगुप्त मित है। ईर शरीर में भू-मुरा- म-मा-मनत्-वप -सस्पम्-पा सप्तसोकस्मिका सास वितस्तिए है । सम्प विश्वात्मक इवर शरीर भी चौरासी मगुट कर ही हो पाता है-१२+~Et)। जैसी स्पिति इस प्राप्यात्मिक पुरुष की है, टीक ही स्पिनि उस प्रादिपिक पुरुप का केक्स मप्पण माधिमौतिक प्रपथ में दोमों में भेद उपस्पिस कर रस्सा है। देखिए । योऽध्यात्मिकोऽयं पुरुपा सोऽसासापिदैरिफ। पप्रमोमपरिछेदः पुरुपो पापिमीतिकः ।। [मीमम्प्रगत वि० स० ..प्र. ८ रसो०] बर के मत सात पर्षों में पाठ पर्व होगाते हैं । सावर्षे, विभा परिसे भूप के मा- पपिपी दो लिमान है, जैसा फि पुत्र के प्राणामाधिकरण में विस्तार से बताया जाउमर है।

गोपनि पभायें कप-पदमावरम्मनो मममासीदमपदम्' इस सिमान्तरे मसार ममत-मत्प मेह से ये दो मामों में विमान मात्र माने की मिसाल मस्प मार्गों की समष्टि मिस्त्यास प्रधाम, मामा फसफार्मित भवनमाना। पर मुहमाम है, मूतही मूति, भूति ही मस्म , यी मरमारत है। बैंक भीम मप्यात्म में है। भारत मतमा मात्मस्पा से भम्पामसस्थानों का उदय होता है। एक विवसत्ता से शरीर का ससा निष्काम हारे पापा सपोस निरपराभूत झरीर का पा सहप इन सब निषों का मिशद निरूपण समाप्य : मपमस्लपर में किया नायका -(दसिर ई उ प्र . विधनिकि १४७ से १६. पृष्ठ पपत)। पिएपेषण की कोई मामला नही।।प्रास में केस यही समझ सेना पयाप्त होय कि हमारे शरीर का निर्मण पपपि पिस सेरामा, परम्त भूपिण पचारमक, किंवा सप्त शोकात्मक है ।मत: तटुपम शरीर में भी बस के समी भौतिक प्रत्परों का समावेश सिद्ध होगायी। पापाद-मस्ता र भौतिक है। इसमें उस माठो परों का मोग या, साक्षि मागे के परिसेस से सर होगापा । रात समरसस्पा का निरूपण करता मा निम्न लिखित मा हमारे सामने भावा- प्रथदं मस्मान्तं शरम् । घों तो स्मर, इतं स्मर, तो स्मर, कृत स्मर ॥ (है. उ०१० मा। 'प्रपई मस्मान्त गरीरम्' इस एप से उपनिषद को यही पतसाना कि मप्पा मापुरुप भातमा भनित (मनिर) बनवा अमृतमा को प्रत रोगगता, परत शरीर भरमौमूत बनकर पीस पाव।इस प्रकार पशोपनिपद उपासवानीप पोरगी पुरुप से भारम्भ कर उपहार र शरीरपर्पन्त सम्पूण भारतमागों पर से निसपण करती -"सापनि। "पूर्णोपनिषद" इम्पनि माों को पर्ष करी।

वारमा साईयोपनिपत् . उपनिपदादेश समास मा । ईश्पर-ए भीब दोनों का मरूप हमारे सामने रखकर पर्यन्त में पनिषत् हमें मादेश करती है कि 'यदि म शानकममप पूोक मारमसरूप का पाप सरूप बामना चाहते हो प्रेम का स्मरण करो एवं कव का स्मरण करो ! मष्य- सापति ऋद्ध है। 'मामिदं करिष्यामि' (मैं यह फरसगा) इस मानसधि का नाम ही का है। इस कल की सफलता 'दच । कार्यसिदि वक्षमान है, सदर्प होने वाला समाप इरादा) ऋतुमायो । पहिले पताभमर कसरूप दधमाव का उदय होता है। प्रत्येक कर्म में मन-दक्ष (कल-त) दोनों मार निसिए । मनोयुक्त प्राकम्पापार फतु, वाय्म्यापर कस है, दोनों का मासम्पन मन है। मम से काममा का उदय होता है, वदनु फस प्राणम्यापार हो परता है, तदनन्तर पागम्यापार होता है, कर्म सिद रोगगता । प्राप म्यापार काममामप है, अतएव ऋतु को मामस म्ापार मी मान लिया पात्या, जैसा कि- मुति करती है- "स यदेम मनसा फामयते-स्व मे स्पाद, इदं कर्मप-ति, स एम कतुः। (गत० १११११११)। " पय ऋतुर्मनोमयः मलिष्ट " (शत० ७)। इरादा का इरादे से गो कम किया जाता है या है। जो मनुष्य अपने ऋतु मोर कत पर पूर्ण पटि रमता है, वही भास्मोप में समर्थ होता है । मौकिक मिपप-सम्बन्धी मनु और त भासक्ति के कारण, मात्मानुपहरू कस एव रुत मनासक्ति के कारण है। क्या इरादा पा, क्या फिया' इस प्रकार प्रत्येक कम में दोनों पर रएि रक्सो । इस से सदसद्विवेक होय, मचे पुरे की पहिचान होती । फसत सत्कार्य में प्रापि होगी, भसत् कमों से मिति रेगी। मास्मयोष के लिए प्रत्येक दश में मारा क्या इरादा या, हमनें क्या करदासा' कित मे सादिर खालि मे सारय । पति सपिनप पेसी सततं कर्म प्राण ॥ ३१ प्राकृतात्मा मागोपनिषत् । मारोबार - इस विचारभारा को कार में रक्यो ! इस बधारा से पासात में तुमें पपाप परिस्थिति काम होगा। प्रास्यान के लिए सुपौर श्व के स्मरस से मतिरिक्ष और को पट तपाप मही। अपि प म भारमोपनिषत् सनी, पारमा का गम्दाय (ण) पडे परिधान मा। परस्त या यामिदक हान तब तक सर्वथा निरर्थक है, जब तक कि म तदनुस ऋस-और का भामप न सो। "मात्मा निम , म और मा अमिम, इम सावाद अमरे इस प्रकार मेक्स मुख से शाद कर देमें से ही मामबोध महीमा करता | भाप के लिए या मामलरूप प्रात भामरपक , तमेव (मणानन्तर) मनन-निधिष्पासन भी भारफक हैं। "मापारे पाप एम्पा-(रूप दरम्पा) । श्रोतम्पो मन्तम्पो निदिध्यासितम्पा" । भो, मनन को, अन्त्यमा में प्रकरो तमी भावात्कार होम्न । मन्वम्मा-माण, निदिप्यासितम्मा-तिमणानुस सकम्प रत्ने, सकम्मामा मातोपफी निष्काम कम कन्ये, पी मनोध के मुख्यार है-"कृतो स्मर कृत स्मर" । “अम्पासे भूया- समय मम्पम्वे के अनुसार पुनरुति पवा के लिए है। साथ ही में ही पनिपत सम्पत है, इस सम्पप्ति सूचना के लिए मी विस्की । " स्मरण करो, ज्व में रक्सोयही कापासा प्रयतम मार्ग है। इति शरीरात्माधिकरणम् । ---SE- 4 उभयो सत्यात्मनोरमिना-ऐकात्म्यम सपम्भू-परमेष्ठी-सर्प-पत्रमा-पपिपी ए पांच रमाय नमसमपम्पक- मान-शिाम महार-गरीर पर पांच बाब मसस्म है। सा-नीरपमर्मवैवानर

प्रास्तात्मा
रोपनिषत् ॥
प्रतिष
४म । न पुना का मानन पासा (सरूपसंपादन पर, पाता), मवएप 'भातवेदा'

प्रामा - ईसापनिषत् ॥ मौसम अमा नाम से प्रसिद्ध मग्नि है। सी बपुनमिद सिलि अग्नि का सरूप बसमातेर अपि करते- १ मग्ने ! भाप सपत्ति ,भारमसम्पति एवं विवसम्पनि) सिए हमें भगधे मार्ग से है पपिए । क्योंकि ससर की बयुमरुप बिन्नी मी सम्पधि, माप ही इस सबके पतम जाता है। हमारे मामा को कुटिम्स बना पासा [मसम्मान में से जानें पासमा भो पाप्मा है, उसे इमसे पृपद कीमिए। हे भग्ने ! हम मापके लिए बार बार नम याक्का बारस करते है- पिपके श्रम वनते है"। वारा-स्वपा-स्वगा-पोपर-औपर-नमा बाद मेद से मार कई में है। इनमें ममुप्पहप मम 'नमः ।। हम भापको नमस्कार कर। इसका तात्पप पीकि हम भापके मोम्प (नाम) मनते हैं। ममि ममाद IMR इसकी प्रसता का कारण है । भान हम सब 'नम' बोत ए इस अग्नि के मम, रूप मम बम ।। इस प्रकार प्रमसम-देपसमात्ममूत पुनापिटाला, सन्मार्गमनकासी भनिनेव को भूर- भूयः ममात्कार करते हुए या उपनिषत् समाप्त होती है। ओं पूर्णमद पूर्णमिद पूर्णाव पूर्णमुदच्यते । पूर्मास्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।। - यो शान्ति शान्ति !! शान्तिः । शात वाजसनेयोपनिषत् विज्ञानमाप्यं सम्पूर्णम् । -44 - एका पाय माही उपानिपत्र उपनिषत्-निष्कर्ष सरपरिवेक के प्रभाव से मनुष्य अपना खरूप मूसता हुमा पापग्मीयम फसाशापूर्वक भोगने में ही प्रास रहता है। मोगश्चर्यमसताना तपापहतचेतसाम् । न्यपसायास्मिका पुदिः समापी न विधीयते" (गीता० २१४४) इस स्मार्ण उपनिषत् के अनुसार यो म्परिक भोगेमय का वास्तविक रहस्य म सममने हुए पामना पूर्वक इममें महोगन प्रपञ्च रहते है, दूसरे शब्दों में जिनके बीवन का परम सत्य एक माम सांसारिक मोग-वैमा उन अविवेकी मनुष्यों का मोग्नसात मन पयत रहता है। मन के साप मुनि का पनिष्ठ सम्पम्प है। दूसरे शब्दो में सोमरसमय मन पर प्रतिबिम्परूप से पुदि प्रतिष्ठित है। मिस प्रकार वायु के मापाव से समुद्र से पार लेगाने वाली नौमा गमा पातो है-(पायुनासमिसम्मसि-गीता), भपका जिस तरह पानी के दिस नाम से तत्प्रतिष्ठ सूपप्रतिबिम्ब हित पड़ता है, टीक इसी तर कामाससिस्थानीय वायु में भाषात से पधस पना हुमा समुद्र, किंवा मप्रपामीप मन तत्प्रतिष्ठ नौकास्पानीय पुदि को पचत मना देता है। पुद्धि के साप मान्' नाम से प्रसिद्ध 'चित' की सामाविक पिरता मारी जाती है । पित पर साबमार उकाम्त होगा है, स्मोमिश्रित तमोमार मुदि मौर मन पर भावमण कर सता है । ऐसी मचिन पुद्धि कमी मारमशान्तितपणा समाधि में प्रतिष्टित मही रह सफसी । मठ ही ऐसा समारी कर मर को अपने पाप को सुनी सममना रहे, परत पदि इस स्सर पूछा जाप तो इसे वही उत्तर देना पड़ेगा, वो मि उदार काम मी महारार पपाति के मुग से निकले थे। पुरु प्राय प्राप्त पुराणस्या से भी जब पपानि की गरिमा महतो जिन होमर मात में उन्हें कहना परा- न नातु फाम फामानामुपभागेन गम्पति । इसिपा हारर मप गाभिनन्दने ।। । शपप पुर 10 । ठानिपहिण- इस प्रकार अविवेक द्वारा दुसाणा में निमग्न प्राणियों के समुशार के लिए गोपनिषत् प्रवृत्त हुई है। उपनियत् कम कपाश केवस यी है कि "तुम ईशाएि से मोग मार्ग में प्रदर रहते हुए निष्कामइदि से पापजीवन फर्म करते रहो" । निफामम्पत्र है गर्म करते करते कालान्तर में तुम्हारा मन मनासा मन भायगा, प्रम रिपर होगपगी , मन को हिपरता से दुद्धि स्पिर ऐनायो । बुद्धि की स्पिरता से रिप्रसाद होन-'प्रसाद सर दुरमाना निरस्योपमापते । प्रत उपमिपद में निम्न लिखित ६ अक्यों पर ही की रखनी चाहिए- -तेन सक्तेन भुलाया। -~मा गृप कस्यस्विद्धनम् । ३-पुर्वमेवेह कमाणि जिजीविपेत् । ४-योऽसावादित्ये पुरुपः सोऽहम् । ५- तो स्मर, कृत स्मर' ६-अग्ने नय सुपथा राये १-4 से छोड़ प मागी) मोग करो! ५-किसी की सम्पधि पर निपत मा रिगामा ! काम करते हुए ही मीवित रहने की इच्छा करो! स्-मो प्रादिम में मास्मा, वही इस रो! ५-अपने इरादे को भल्य में रक्सो, भो करमुरे दो से मरूप में मसौ! ६-सायी में अपने पास (अमित) का ठीक मार्ग में पपाग करो! IEO क्षा उपनिाधिप १- तु अपने जीवन में जो कुप भोग मिसन वासा , वह उस मन्तयामी की प्रेरणा से (तुम्हारे ही मधित कर्मों के अनुमार) पहिले से ही निपत है । 'जासायुमागा" इस सिदात के अनुसार तुम्हारी गति (योनि) मायु पोर भोग सीनों पहिले से ही निपर हैं । तुम्हें जो कुछ मिसने वाला है बद तुम्हारा भागधेय (हिस्सा है, उसे दूसरा नही पा सकता साप दी मे तुम दूसरे का ले भी नहीं सको । मिसने पासा मिस दी नापग्प, न मिसने बासा नहीं दी मिलेगा । विश्वास करो ! मोअन मुम्हारे जीपन के सिर, जीवन भोजन के लिए नहीं है । मोवन को जीवन का दास समझो, जीवन को मोमन का गुलाम मन मनायो ! व्यसनों के दास मत बनो, म्पसनों को अपना दास पनामो ! माने के लिए विवित मन रो, जीवित रहने के लिए गायो । भोजन की दासता में तुम स्वय संसार के मोचन यन जामोगे, एष मोमन को माना दास पनासेने से सार तुमारा भोग्प मन जायगा । पर ऐसा नही करोगे सो- - २-तुमारी सिसा तुमरी पसाना मुयारी मादा तुमरे भारमा यो गितगी। तुप पन की दासना में परमममाण करना पन कारों क सिर दारों की भ पानी पदगी, पारसाम के सम माना , पाकी दामना में में पामुपपेशी पनना परम दूमों की झिाकिर मानी । गोगो । ( मन पा पागर करो) किपा रो (पुरेसेवामा) 'साप मुममारास का पापनाममयों दमरों का साति रिमा रोहोरया तुम मनुष्य महा दो ! मग तुमार पाम पुदिपन महापा उम उम सपना के परामही दोघरे पापो'तुमने पान प्रश (मासमन-सी) से माना मितिमा भुसा सगा । उट' :: पेचा एमासे पगेपर मामा मानवगिपर पार पाम बीगनमम मार आर पनुपरगर It ।। उपनिषपिपर- में मारमक्स (Will Paner ) मिठेगा। कल तुमारी गगी देगी ! तुम भोगों के पम्मे से स्टोगे ! मही सो सुनो! ३- यो मनुम्प फास को अपने अधिकार से बाहर की वस्तु समझना मा ममम्पमाब से फेस फर्म में प्राच रहमा , सिम की निम्ति उस के चरणों में सोय करती है। फस को तुम उत्पम नहीं करते, फल उररम होता है तुमारे कर्म से | तुम कर्मदशा में ही पर फरकीपणा करने सगते हो तो परिणाम इस कर यह होता है कि तुमारा मन दोमों तरफ कट राता है, मनन्यता माती रहती है। नर्मसिदि में स्तिमा बस अपेपित १, वा पट माता, कर्म अपूण ग गावा।। फसत पूर्ण कर्म से सम्बन्ध सिमें माक्षे पूर्णफस का उदय मही होता । इस प्रकार कम्मप्रवृत्तिकास में फस की माण रस्ते पए तुम सही फसनाय के कारण मन बाते हो। यही नहीं, फसाशासकर से तमारा मन लिप्त रोगावा है, स्पृहा म जाती है। यदि तुम पहा इटामा पाहते हो मिस्मतप्त बममा चाहते हो तो कर्मप्रतिकार में सपा मनधिकृत फसाणा का परिमा ग करते हुए शास्मसिर चातुमण्पधर्मम्जक कर्मों में निकाम्बुद्धि से प्राच रहो । मोग- लिप्सा के लिए मीनित गर्ने की इफा मत करो, कम्म करने के लिए बीमित राम की एका करो । परिणाम इस का यह होगा कि कर्म की मनम्पता से फसामिसन्धि में भी सम्वोन सैगा, एवं फलाण से समय रखमें अब सरकार सेप मी न हन्त । मरे । तुम चिन्न मुफ फलों की भासक्ति में पाए हो। सोप की सपदि के भविष्ठाता मादिम पुरुष के बराय रोकर इन प सपतियों के पीवे दौरते हुए तुम अपने परागों की कीसि फिी में निगाहे थे। सोचो तुम कौन हो, कहां से माए हो, स्पा करना चाहिए पा कर रहे हो। पदि तम पह महीं बानते कि तुम क्या हो तो पुनो, हम - बताते हैं। - । उपनिषभिः । - सूर्य सुमारे सामने है । प्रेयोपप इस के प्रकाश से प्रकाशित है। "सूर्य पात्मा नगत स्वस्थुपच" (यजु से०) इस श्रौत सिदान्त के अनुसार हम उसी के अंश है। भए पशी से मभिम है । फसत जो पह, यही हम हैं । "हम फौन है" इस का यही सबा इतिहास है। मिम धोकेबाजों ने सुमारे इतिहास का सहप विकृत कर हमारे मा स्मवमव का अपहरया कर रस्सा है, एष जिस कम्पित इतिहास को मोहवश सस्य सम- मते हुए वम मपनी धमसिन सतन्त्रवा से पश्चित होरहे हो, कसरित,कसित, फुत्सित, कुतर्कमय उस मिम्पा इतिहासप्रन्म के पत्रों को पण गयो । भपने भतीत गौरव के सम्पे इतिहास का मन्वेषण करो । पा मिशेग्म तुम भपने ऋषियों की वाणी में, उपनिषदों में । वह इतिहास मगर भमर है, भवरव भमिट है ।मपने इस सस मात्म- इतिहास के बस पर तुम भन्मसिदा उस मारमामन्दमूसा मतन्त्रता को प्राप्त करने में समर्प बनोगे । परस्त इतना प्यान रसना कि इतितास देसने में कही प्रमाद म हो पाय । कम करो, परन्तु सावधानी से । मास मीच कर पयेवाचारी म मनमा । अपि तु निम्न निसित सिमास को सदा भपने सामने रखते हुए ही कर्ममार्ग में प्राच रहना- किं नु मे स्मादिद भस्वा किं नु मे स्पादकुर्मया । इति सचिन्म मेभागी कर्म कुर्वीत पा न वा ॥ कर्मनास पगा दुस्तर है। "किं फमे किमकर्मवि कापोऽप्यप्र मोहितो" " गीता) के अनुसार कपि (मगु-सोम) पराम, सोममप मम का संपम क्रमें के कारण कनि माम से प्रसिर परे गो मनस्वी भी कमी कमी घोका सा पाते हैं। ये मी कभी कभी वणायम धर्मम्सक भाषिकारिक फर्म की उपेक्षा कर मर्म को कर्म मान बैठते है, कर्प को अकर्म मान बैठते हैं। तुम्हें चाहिए कि- ५- तुमने कर्म में प्राच होने के लिए मो इरादा (ऋतु) किपा ६, उसकी म्प परीक्षाकर हो। साप ही में जो काम कर चुके हो उस पर पि रपसो। सोचो कि ममता हमने का उपनिषधिक 1 मो कुम किया उससे हम्परा श्या उपकार हुमा । एष उस से समाम का फ्य' हित म्य पमान को मम्य बनाने के लिए प्रतीत को सदय में रस्सो । कही ऐसा म हो कि फेस समान के मम्मवात के झपेटे में पाकर मास मीच कर भरपतीय कम्मों को शास्त्रीय मानते हुए, साप ही में कर्ममार्ग का रिण्डिमयोप करते हुए अपना सर्वनाश करा केटो । 'रस्प पारा निशिता दुरमया दुर्ग पपस्तत् फायो पदन्ति" । - ६- मुम्हारा कतु (इराण) मी सा उदात्त, प्रतीत मी तुम्हारा पड़ा मम्य पा । परन्तु सामधाम ! कही पतमान को न मूस पाना । पवमान में तुम्हारे पास जितनी राति । उसे प्यान में रखते हुए ही मागे मना । तमे चौरे इरादे, मतीव का गौरव ही कर्म प्राधि के मुरूप शर नही है। इसके लिए सुमें वर्तमान वर का माम्रप लेना पसग्म । तुम्धरी मप्पारमसस्पा में कर्म के प्रबहा देवता सोमगर्भिन ममि है । मनि महिए , सोम मग । यही दोनों तुरारे तप [कर्म] के समासा हैं । “परणाम हिरा तपसा सप्यापम्" इस ग्रोत सिमान्त का समादा करते हुए मुगु-पहिरा मप अपने शारीर माम्नेय बत को सामने रमते हुए सरनुसार कम्म करो । ही पनि दक्ता तुममें सुपय का अनुपमी बनाने बसा है। जो पशि शक्तिसीमा का उम्सपन करता मा भसम्मन कम्मो में प्रात शेगाता है या मी सफस मही होसकता । इस प्रकार ऋतु (इरादा) कृत (पतीम) प्रमि (मत्तमान स्ति) तीनों को सप्प में रखते एर, फलाण कोदते हुए कम्म में प्रच रहो, ऐहौकिक पारसौकिक दोनों विभूतिए फरमद तुम्हारे सामने सही है। मो शान्ति: । शान्तिा ! शान्तिा !!!

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ईशोपनिषत्-हिन्दीविज्ञानमाष्य
द्वितीयखण्ड
२
समाप्त

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Ishopanishad Hindi Vigyanbhashy Khand-2

Author
Sharma, Motilal
Title
Ishopanishad Hindi Vigyanbhashy Khand-2
File name
Ishopanishad Hindi Vigyanbhashy Khand-2
Text
OCR done
Citation
1903
Published
2011/08
Publisher
Jaipur City, Shribalchandra Electrike Press
Language
Sanskrit
Pages
508
Library
Acharya Shri Vinaychandra Gyan Bhandar, Jaipur
DLI number
314096
Barcode
99999990312244.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
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SZv2HALFWTn
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