Prakrit Bharati Academy, Jaipur
Dashkanthvadham Granthank-23
Front matter
राजस्थान पुरातत पथमाला राजस्थान राज्य द्वारा प्रकाशित सामान्यतः अखिल भारतीय तथा विशेषतः राजस्थानदेशीय पुरातनकालोन संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश, राजस्थानी, हिन्दी आदि भाषानिबद्ध विविध वाङ्मयप्रकाशिनी विशिष्ट ग्रन्थावलि प्रधान सम्पादक पुरातत्त्वाचार्य जिनविजय मुनि [ अॉनरेरि भेम्बर ऑफ जर्मन ओरिएन्टल सोसाइटी, जर्मनी ] सम्मान्य सदस्य भाण्डारकर प्राच्यविद्या संशोधन मन्दिर, पूना; गुजरात साहित्य-सभा, अहमदाबाद; विश्वेश्वरानन्द वैदिक शोध-सस्थान, होशियारपुर; निवृत्त सम्मान्य नियामक- ( प्रानरेरि डायरेक्टर ), भारतीय विद्याभवन, बम्बई ग्रन्थाङ्क २३ महामहोपाध्याय पं० दुर्गाप्रसादद्विवेदविरचितं दशकण्ठवधम् नाम रामचरितम् स्वोपज्ञसाधुशुद्धिटोकासमन्वितम् प्रकाशक राजस्थान राज्याज्ञानुसार सञ्चालक, राजस्थान प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान जोधपुर ( राजस्थान) ,
महामहोपाध्याय पं० दुर्गाप्रसादद्विवेदविरचितं
दशकण्ठवधम्
नाम रामचरितम्
स्वोपज्ञसाधुशुद्धिटीकासमन्वितम्
सम्पादक
श्री गङ्गाधर द्विवेदी
साहित्याचार्य, व्याकरणतीर्थ, विद्यारत्न
व्याख्याता, महाराज-संस्कृत-कॉलेज, जयपुर
प्रकाशनकर्ता
राजस्थान राज्याज्ञानुसार
सञ्चालक, राजस्थान प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान
जोधपुर ( राजस्थान )
विक्रमाब्द २०१७
प्रथमावृत्ति १०००
ख्रिस्ताब्द १९६०
} भारतराष्ट्रीय शकाब्द
भारतराष्ट्रीय शकाब्द १८८२
विवाद. १९६०
मूल्य ४.००
मुद्रक-मूल पाठ, पृ० १ से १४० प्रभात प्रेस, जयपुर; पृ० १४१ से १५६
अजन्ता प्रिन्टर्स, जयपुर और शेष सामग्री साधना प्रेस, जोधपुर ।
राजस्थान पुरातन ग्रन्थ-माला प्रधान सम्पादक-पुरातत्त्वाचार्य मुनि श्री जिनविजयजी সামাৰ স্বত্ব १-संस्कृत ग्रन्थ १. प्रमाणमंजरी, ताकिकचूड़ामणि सर्वदेवाचार्य,सम्पादक-मीमांसान्यायकेसरी पं० पट्टाभिराम- शास्त्री, विद्यासागर । मूल्य-६.०० २. यन्त्रराजरचना, महाराजा-सवाई-जयसिंह-कारित । सम्पादक-स्व० पं० केदारनाथ, ज्योतिर्वित् । मूल्य-१.७५ ३. महर्पिकुलवैभवम्, स्व० पं० मधुसूदन अोझाप्रणीत, सम्पादक-म०म० पं० गिरिधर शर्मा चतुर्वेदी। मूल्य-१०.७५ ४. तर्कसंग्रह, अन्नंभट्ट, सम्पादक-डॉ० जितेन्द्र जेटली, एम. ए., पी-एच. डी., मूल्य-३.०० ५. कारकसंबंधोधोत, पं० रभसनन्दी, सम्पादक-डॉ. हरिप्रसाद शास्त्री, एम. ए., पी. एच-डी., मूल्य-१.७५ ६. वृत्तिदीपिका, मौनिकृष्ण-भट्ट, सम्पादक-पं० पुरुषोत्तमशर्मा चतुर्वेदी, साहित्याचार्य । मूल्य-२.०० ७. शब्दरत्नप्रदीप, अज्ञात कर्तृक, सम्पादक-डॉ. हरिप्रसादशास्त्री, एम. ए., पी-एच. डी. । मूल्य-२.०० ८. कृष्णगीति, कवि-सोमनाथ, सम्पादिका-डॉ. प्रियवाला शाह, एम. ए., पी-एच. डी., मूल्य-१.७५ ६ नृत्तसंग्रह, अज्ञातकर्तृक, सम्पादिका-डॉ. प्रियवाला शाह, एम. ए., पी-एच डी., मूल्य-१.७५ १०. शृङ्गारहारावली, श्री हपं-कवि-रचित, सम्पादिका-डॉ. प्रियवाला शाह, एम. ए., पी-एच. डी., डी. लिट् । मूल्य-२.७५ ११. राजविनोद महाकाव्य, महाकवि-उदयराज, सम्पादक-पं. श्री गोपालनारायण बहुरा, एम. ए., उप-सञ्चालक, राजस्थान प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान, जोधपुर । मूल्य-२.२५ १२. चनापाणिविजयमहाकाव्य, भट्ट लक्ष्मीधर विरचित, सम्पादक-केशवराम काशीराम शास्त्री। मूल्य-३.५० १३. नृत्यरत्नकोश (प्रथम भाग). महाराणा कुम्भकर्ण रचित,सम्पादक-प्रो. रसिकलाल छोटालाल पारीच. तथा डॉ० प्रियवाला शाह, एम. ए , पी-एच. डी., डी. लिट् । मूल्य-३.७५ १४. उपितरत्नाकर, साधुसुन्दर-गणी-विरचित, सम्पादक-पुरातत्त्वाचार्य श्री जिनविजय मुनि । मम्मान्य संचालक, राजस्थान प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान, जोधपुर । १५. दुर्गापुष्पाञ्जलि, म०म० पं० दुर्गाप्रसाद द्विवेदीकृत, सम्पादक--पं० गङ्गावर द्विवेदी, मूल्य-४.७५ गाहित्याचार्य । मूल्य-४.२५ डी. लिट् । डी. लिट् ।
[ २ ] विरचित, १६. कर्णकुतूहल, महाकवि भोलानाथ विरचित, सम्पादक-पं० श्री गोपालनारायण बहुरा, एम. ए., उप-सञ्चालक, राजस्थान प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान, जोधपुर । इसी ग्रंथकार की अपर कृति 'श्रीकृष्णलीलामृत' सहित । मूल्य-१.५० १७. ईश्वरविलास-महाकाव्य, कविकलानिधि श्रीकृष्ण भट्ट सम्पादक-श्री मथुरानाथ शास्त्री, साहित्याचार्य, जयपुर । मूल्य-११.५० १८. रसदीपिका, कवि विद्याराम प्रणीत, सम्पादक-पं०श्री गोपालनारायण बहुरा, उप- सञ्चालक, राजस्थान प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान, जोधपुर । मूल्य-२.०० १६. पद्यमुक्तावली, कविकलानिधि कृष्ण भट्ट, सम्पादक-पं० श्री मथुरानाथ शास्त्री, साहित्याचार्य । मूल्य-४.०० २०. काव्यप्रकाशसंकेत, सोमेश्वर भट्ट कृत, सम्पादक-श्री रसिकलाल छो० परीख भाग १ मूल्य-१२.०० २१. भाग २ मूल्य- ८.२५ २२. वस्तुरत्नकोश, अज्ञात कर्तृक, सम्पादिका-डॉ. प्रियवाला शाह । मूल्य-४.०० २३. दशकण्ठवधम्, पं० दुर्गाप्रसाद द्विवेदी कृत, सम्पादक पं० गङ्गाधर द्विवेदी, मूल्य-४.०० २-राजस्थानी और हिन्दी ग्रन्थ १. कान्हड़दे प्रबन्ध, महाकवि पद्मनाभ रचित, सम्पादक-प्रो. के. बी. व्यास, एम. ए. । मूल्य-१२.२५ २. क्यामखां रासा, कविवर जान रचित, सम्पादक-डॉ. दशरथ शर्मा और श्री अगरचन्द मूल्य-४.७५ ३. लावारासा, चारण कविया गोपालदानविरचित, सम्पादक-श्री महताबचन्द खारैड़ । मूल्य-३.७५ ४. बाकीदासरी ख्यात, कविवर बाँकीदास, सम्पादक-श्री नरोत्तमदास स्वामी, एम. ए. । मूल्य-५.५० ५. राजस्थानी साहित्यसंग्रह,भाग १, सम्पादक-श्री नरोत्तमदास स्वामी,एम.ए.। मूल्य-२.२५ ६. कवीन्द्रकल्पलता, कवीन्द्राचार्य सरस्वती विरचित, सम्पादक-श्रीमती रानी लक्ष्मीकुमारी चूंडावत। मूल्य-२.०० ७. जुगलविलास, महाराजा पृथ्वीसिंह कृत, सम्पादिका-श्रीमती रानी लक्ष्मीकुमारी चूंडावत । मूल्य-१.७५ ८. भगतमाळ, ब्रह्मदासजी चारण कृत, सम्पादक-उदैराजजी उज्ज्वल मूल्य-१.७५ ६. राजस्थान पुरातत्त्व मन्दिरके हस्तलिखित ग्रन्थों की सूची-भाग १ मूल्य-७.५० १०. राजस्थान प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान की सूची मूल्य-१२.०० ११. मुंहता नैणसीरी ख्यात, भाग १, मुंहता नैणसी कृत, सम्पादक-श्री बदरीप्रसाद साकरिया मूल्य-८.५० १२. रघुवरजसप्रकास, फिसनाजी पाढा कृत, सम्पादक-श्री सीताराम लाळस मूल्य-८.२५ १३. राजस्थानी हस्तलिखित ग्रन्थोंकी सूची, भाग १, सम्पादक-श्री मुनि जिनविजय । १४. वीरवाण, ढाढी बादर कृत, सम्पादिका-श्रीमती रानी लक्ष्मीकुमारी चूंडावत्त । मूल्य-४.५० मूल्य-४.५० भंवरलाल नाहटा । - भाग २ ।
[ ३ Man WHAml " " " " " " प्रेनों में छप रहे ग्रंथ संस्कृत ग्रंथ १. मनप्रवीप, नावय जर्मानित नानादा--पुनि श्रीजिनविजयजी २. त्रिपुरा भारती लधुन्तव, पर्माचार्य मोत ३. कम्णामृतप्रपा, व्यपुर गोगमयर-विनिर्मिन ४. बालशिक्षाव्याकरण, टयपुर मंग्रामांन विरचित ५. पदायरलमंजपा, पं० मा मित्र ननित ६. बसन्तविलाल फाग, प्रभात कक एम. सी. मोदी ७. नन्दोपाण्यान, अनात कर्तृक बी. जी. सांगर) ८. चांडव्याकरण, आवायं चन्द्रगामि विरचित श्री बी.टी. दोनी ६. वृत्तजातिसमुच्चय, गावि विरहार, विनिर्मित ,, एच. टी. बंगालकर १०. कविदपंग, अनान कर्तृक ११. स्वयम्भूछन्द, कवि स्वयम्भू विनिर्मित १२. प्राकृतानन्द, रघुनाथ कवि रचित मुनि श्री जिनविजयजी १३. कविकौस्तुम, २० रघुनाय विरचित श्री एम. एन. गोरी १४. नृत्यरत्नकोश, भाग २, महाराणा कुंभा प्रगीत टा. प्रियवाला साह १५. भुवनेश्वरी स्तोत्र (सभाप्य), पृथ्वीधराचार्य रचित श्री गोपालनारायण बहुरा १६. इन्द्रप्रस्थ प्रवन्ध डॉ.दगरय गर्मा २-राजस्थानी और हिन्दी ग्रन्थ १७. मुंहता नंणसी री म्यात, भाग २, नगामी मुंहता सम्पादक-श्री बदरीप्रसाद साकरिया १८. गोरा बादल पदमिणी चउपई, कवि हेमरतन सम्पादक-श्री उदयसिंह भटनागर विनिमित १६. राजस्थान में संस्कृत साहित्य की खोज मृत लेखक श्री पार. एस. भण्डारकर अनुवादक-श्री ब्रह्मदत्त त्रिवेदी । २०. राठोड़ारी वंशावली सम्पादक-मुनि श्री जिनविजयजी २१. सचित्र राजस्थानी भाषा-साहित्य प्रन्य-सूची २२. मीरां बृहत् पदावली विद्याभूपण स्व. पुरोहित हरि- नारायणजी द्वारा संकलित २३. राजस्थानी साहित्य संग्रह, भाग २ सम्पादक श्री पुन्पोत्तमलाल मेनारिया (देवजी बगदावत और प्रतापसिंह वार्ता आदि) २४. पुरोहित वगसीराम हीरां और अन्य वार्ताएं श्री लक्ष्मीनारायण गोस्वामी इन ग्रन्योंकि अतिरिक्त अनेकानेक संस्कृत, राजस्थानी और हिन्दी भाषाके ग्रंथोंका संशोधन और सम्पादन किया जा रहा है। 'राजस्थान पुरातत्त्व' नाममे एक शोध-पत्र ( जनल ) निकालनेकी योजना भी विचाराधीन है।
सञ्चालकीय वक्तव्य भारतीय साहित्यमें संस्कृत काव्य-ग्रन्थोंका विशेष महत्त्व है । यों तो अनेक संस्कृत काव्य-ग्रन्थ विद्वत्-समाज में समादरणीय हैं किन्तु वाल्मीकि, भवभूति, हर्ष, माघ और कालिदास जैसे महाकवियोंके काव्योंकी सुख्याति देश-विदेशके समस्त काव्य-प्रेमियों तक प्रसृत हो चुकी है। यही नहीं, इनके काव्योंके देश-विदेशकी कई भाषाओंमें रूपान्तर और व्याख्यान भी प्रकाशित हो चुके हैं। संसारके प्रमुख देशोंमें, सर्वत्र ही संस्कृत-काव्यों और नाटकोंका अध्ययन-अध्यापन, सम्पादन-प्रकाशन और अभिनयादि-प्रवृत्तियाँ लोगों की विशेष रुचि से गतिशालिनी हैं। राजस्थान प्रदेश भारतीय सभ्यता एवं विद्याका विशेष क्षेत्र रहा है। यहाँके अनेक शासक स्वयं रसिक साहित्य-प्रणेता और साहित्यकारोंके आश्रयदाता रहे हैं। राजस्थानी जनता भी विद्याभिरुचिमें किसीसे पीछे नहीं रही है। यही कारण है कि राजस्थानमें साहित्यिक सामग्री प्रचुर मात्रामें उपलब्ध होती है । प्रस्तुत महाकाव्यके प्रणेता स्वर्गीय महामहोपाध्याय पण्डित दुर्गाप्रसादजी द्विवेदी पूर्व जयपुर-राज्यके आश्रित थे। प्रगाढ़ पाण्डित्य एवं साहित्यिक प्रतिभाके लिए सरकारकी अोरसे उन्हें विशेष मान एवं प्रोत्साहन प्राप्त था। द्विवेदीजी कृत दशकण्ठवधम् (चम्पू) रामचरित्र-विषयक एक सरस काव्य-कृति है जिसका प्रकाशन विद्वत् समाजमें चिरप्रतीक्षित था। "राजस्थान पुरातन ग्रन्थ- माला" के २३वें ग्रन्थके रूप में इस काव्यका प्रकाशन हो रहा है । स्वर्गीय महामहोपाध्यायजी रचित एक और ग्रन्थ 'दुर्गा-पुष्पाञ्जलि' भी इस ग्रन्थमालामें प्रकाशित हो चुका है। इन दोनों ही ग्रन्थोंके सम्पादक ग्रन्थकारके पौत्र श्री गङ्गाधर द्विवेदी, साहित्याचार्य हैं । ग्रन्थकर्ताके जीवनवृत्त एवं रचनाएँ आदि विषयों पर 'दुर्गापुष्पाञ्जलि' के सम्पादकीय लेखमें पर्याप्त प्रकाश डाला जा चुका है। आशा है कि सस्कृत काव्य-प्रेमियोंमें इस कृतिका समुचित आदर होगा। मुनि जिनविजय महा-शिवरात्रि, सं० २०१६ वि० भारतीय विद्या भवन, बम्बई सम्मान्य सञ्चालक राजस्थान प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान, जोधपुर
विषय-तालिका
विषय
पृष्ठ संख्या
१. सञ्चालकीय वक्तव्य
२. मूल पाठ
१-१५६
३. परिशिष्ट
श्लोकानुक्रमणिका
महामहोपाध्यायपण्डितश्रीदुर्गाप्रसाद द्विवेदविरचितम् दशकण्ठवधम् नाम रामचरितम् तदोंपदार्थस्य वरेण्यमेतकद् देवस्य भर्गः सवितुः प्रधीमहि । ब्रह्मादिरूपत्रितयोपसंहृतियों नो धियः कर्मभुवि प्रचोदयात् ।। 0 साधुशुद्धिः। को मत्स्यादि निपेवितु' निविशते नानावतारान्तरे को वा न्यूनतयावधारितमहस्याश्वासमायास्यति । शृङ्गारोदयदीपितोऽपि चरमे नालम्बते गौरवं चेतः केवलमेकमेव मनुते श्रीरामभद्रं हरिम् ॥१॥ दशकण्ठवधं नाम चरितं रामवर्मणः यत्र विन्यस्यते साधुशुद्धिाभाय शर्मणः ॥२॥ एतदुच्छृङ्खलं ब्रह्मन् ! मनश्चेद् रावणायते । तदानीमिन्द्रियग्रामो दशकण्ठायते ध्रुवम् ॥३॥ दण्डान्वयक्रमेणात्र तथार्थान् प्रारभामहे । यथा न सज्जतेऽहन्ता संसारकैफले महे ॥४॥ इहामुत्रानुरक्तानां किमन्यद् वासनावहम् । उभयत्र विरक्तानां किमन्यद् वासनावहम् ॥५॥ अथ दशकण्ठवधाख्यरामचरितं प्रारिप्सुः-'मङ्गलाचरणं शिष्टाचारात् फल- दर्शनात् श्रुतितश्चेति' सां० द० ५.१ ) इति प्रमाणयन् सच्चिदानन्दलक्षणं परमा- त्मानं परामृशति- - २ दशकएठवधम् - तदिति । ॐ पदार्थस्य प्रणववा व्यस्य । 'तस्य वाचकः प्रणवः' (यो० द. १.२७) इति पतञ्जलिः। अवतीति ओम् । अव रक्षणादौ । 'अवतेष्टिलोपश्च' इत्यौणादिको मन् । वेदितव्यं वेदनसाधनं च-शब्दार्थप्रत्ययानामितरेतराध्या- सात् संकरस्तत्प्रविभागसंयमात् सर्वभूतरुतज्ञानम्' (यो० द० ३.१७) । तथा च गीतासु पठ्यते-'ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म' (८.१३) इति । शिवमहिम्नि-'समस्तं व्यस्तं त्वां शरणद ! गृणात्योमिति पदम् ।' इति च । व्यस्तपक्षे-अकार उकारो मकार इति तदवयवाः । 'अकारं चाप्युकारं च मकारं च'-(मनु० २.७६) इति मनुः । दीव्यतीति देवः । पचाद्यच् । तस्य । सुवति प्रेरयतीति सविता । षू प्रेरणे। तृच् । तस्य । 'विश्वानि देव ! सवितः !' (शु० य० सं० ३०.३) इति श्रुत्यन्तरम् ! तदेतकद् । 'अव्ययसर्वनाम्नामकच्याक्टेः' (पा० सू० ४.३.७१) इत्यकच् । तदिदं सकलान्तर्यामितया परोक्षापरोक्षमिति तत्त्वम् । वरेण्यम् अभ्यर्थनीयम् । भर्जते इति भर्गः तेजः । भृजी भर्जने । 'अञ्च्यञ्जियुजिभृजिभ्यः कुश्च' इत्यौणादिकोऽसुन् । प्रधीमहि सम्यग् ध्यायेम । ध्यै चिन्तायाम् । क्वचित्-'सत्यं परं धीमहि' (वि० भा० १.१.१ ) 'त्रियम्बकं संयमिनं ददर्श (कुमा०सं०३.४४) इत्यादिवत् लोकेऽपि विशिष्टप्रतिपत्तये छान्दसप्रयोगः । अन्यथा-'ध्यायेम सत्यं परम्' यद्वा-'सत्यं परं मन्महे' इति-'त्रिलोचनं' किं वा-'त्रिचक्षुषं' इति च प्रयोजयेत् । सर्वे वयमुपासकाः उक्तलक्षणं भर्गः संप्रज्ञातासंप्रज्ञातयोगाभ्यामाकलये- महीति तात्पर्यम् । प्रवर्तनायां लिङ् । लिङ्वाच्यप्रवर्तनया प्रवृत्तिनिष्पत्तौ तु लडेव । अभेदवादे तु तदात्मतासमापत्त्या वयमितरैः प्रध्यायेमहीत्यप्यनुसंधेयम् । आत्मा हि चिद्रप एको विभुनित्यश्चास्ति । स्वयंप्रकाशत्वात् सजातीयादि- भेदशून्यत्वात् सर्वगतत्वाद् अनाद्यनन्तत्वाद् यावभेदकजालस्य जडत्वाच्च । ततश्चैतन्यात्मनो विराटशरीरत्वमव्याहतम् । तथा चोक्तम्- 'एकः स आत्मनासौ न हि क्रमोऽस्तीह देशकालाभ्याम् । भेदिनि मिथः स युक्तश्चेत्ये भेदाश्रयः खलु सः ॥' (विरूपाक्षपञ्चा० २.१२) इतरथा- 'उत्क्रम्य विश्वतोऽङ्गात् तद्भागैकतनुनिप्ठिताहन्तः । कण्ठलुठत्प्राण इव व्यक्तं जीवन्मृतो लोकः ।।' (विरूपाक्षपञ्चा० १.५) प्रथमो गुच्छकः . - इति यथादर्शनभेदावमर्शनदुष्परिणामो व्यक्त एव । इतो वैशेषिकदर्शने प्रतिपत्तिसौकर्यार्थं चार्वाकादिमुखमुद्रणाय प्रथमभूमिकायामेवात्मा परीक्षित इति द्रष्टव्यम् । अन्यथायमन्तःकरणगुणसंपृक्तः कथमिव वयेत । श्रुति-स्मृतिषु युक्ति- प्रमाणाभ्यां निगुणत्वेन निरूपितत्वात् । समानतन्त्रे न्यायेऽपि प्राधान्येन कथक- कथैवावतारिता । अथवा अस्तु बालानां सुखबोधायारम्भवाद इवान्तःकरणसंबन्धे- नात्मगुणवादः । मन्ये, सांख्यदर्शने द्वितीयभूमिकायामात्मा परीक्षित इति । यस्मात् 'असङ्गोऽयं पुरुषः' (सां० द० १.१५) इति सूत्रयता भगवता श्रुति-स्मृतिसिद्धा- न्तितमात्मनो निगुणत्वमेव प्रतिपादितम् । सुखावबोधाय लौकिकदृशा तु- 'जन्ममरणकरणानां प्रतिनियमादयुगपत्प्रवृत्तेश्च । पुरुषबहुत्व सिद्ध त्रैगुण्यविपर्ययाच्चैव ।।' (सां० का० १८) इति । किमियता-'ईश्वरासिद्ध:' (सांख्यद० १.६२) इति सूत्रयतापि महामुनिना- 'एवं तत्त्वाभ्यासान्नास्मि न मे नाहमित्यपरिशेषम् । अविपर्ययाद्विशुद्ध केवलमुत्पद्यते ज्ञानम् ।।' (सां० का० ६४) इति भावनया 'विज्ञानं ब्रह्म'ति रहस्यमुन्मीलितमेव । समानतन्त्रे योगे तु 'क्लेशकर्मविपाकाशयैरपरामृष्टः पुरुषविशेष ईश्वरः' (यो० द० १. २४) इत्यादिना यथाप्रसङ्ग प्रणयवाचकं वस्तूपक्षिप्तमेव । मीमांसयोस्तु धर्मब्रह्मोपासने उपबृहयद्भधामपि जैमिनि-पाराशर्याभ्यां वेदपुरुषव्यपदेशेन चरमभूमिकाया- मात्मा सुपरीक्षित एव । इत्थंच-'ईक्षते शब्दम् (वे० द० १.५ ) इत्यादिना परमाणुप्रकृतिवादादिनिरसनपुरःसर वेवर्मना तुक-सांख्य-योगपदार्थान् पश्य- द्भिरेकमेवात्मतत्त्वं निश्चेतव्यम् । अतएव- 'नित्यो नित्यानां वनश्चेतनाना- मेको बहूनां यो विदधाति कामान् । तत्कारणं सांख्ययोगाधिगम्यं ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपाशैः ॥ (श्वेता० ६.१३) इत्यादि श्रुतिसंवर्गेण क्वचिदभ्युपगमवादेन भिन्नप्रणालिकोऽपि तर्क-सांख्य- योगप्रवाहो वेदप्रणालिकयैव नीतो नेतव्यश्च विभावनीय इति दिक् । ब्रह्मा कार्यब्रह्मा चतुराननादिपदव्यपदेश्यः आदिः प्रथमं येषां तेषामुत्पत्ति- स्थितिसंहारघटकानां रूपाणां त्रितयस्य त्रयस्य उपसंहृतिः उपसंहारोऽन्तर्भाव यस्मिन् सः । 'संख्याया अवयवे तयप्' (पा० सू० ५.२.४२)। श्रूयते च- ४ दशकण्ठवधम् 'यो ब्रह्माणं विदधाति पूर्व यो वै वेदांश्च प्रहिणोति तस्मै । तं ह देवमात्मबुद्धिप्रकाशं मुमुक्षुर्वै शरणमहं प्रपद्य ।।' (श्वेता० ६.१८) यः सविता अन्तर्यामी । नः अस्माकं प्रमातृणाम् । धियः धीपदोपस्थाप्यान्तः- करण-तद्धीनबुद्धिकर्मेन्द्रियाणि । कर्मभुवि-व्यवहारदशायाम् । प्रचोदयात प्रेरयति । लडथे लेट् । तथा च-'व्यत्त्ययो बहुलम्' (पा० सू० ३.१.८५) इति वृत्तिभाष्यगतम्- 'सुप्तिङपग्रहलिङ्गनराणां कालहलचस्वरकर्तृ यहां च । व्यत्ययमिच्छति शास्त्रकृदेषां सोऽपि हि सिध्यति बाहुलकेन ।।' इति । तदुपबृहणं 'क्वचित्प्रवृत्तिः क्वचिदप्रवृत्तिः क्वचिद्विभाषा क्वचिदन्यदेव ।' इति बाहुलकविवरणं च यथाङ्गोपाङ्गगतिक वेवस्तूद्धर्तुमेव शरणं मन्तव्यं न पुनस्तन्नवनवं मनीषितं वर्त्म नेतुमिति । अन्यथा वेदगव्यां मातरि पुरुपायितं स्यात् । अत्र सवितुः भर्ग इति पुरुषस्य चैतन्यमितिवदभेदे षष्ठीति संक्षेपः । वंशस्थेन्द्रवंशयोरुपजातिः ॥१॥ इदानी परमात्मनः प्रधानशक्तिकार्य निर्दिस्तस्यान्वेष्टव्यत्वमादिशति- ब्रह्मत्वमापादनरागरञ्जितो विष्णुत्वमाप्यायनकेलिकर्मठः । रुद्रत्वमादानकलावलम्बितो योऽभ्येति मायीव स साधु मृग्यताम् ॥२॥ ब्रह्मत्वमिति । यः अन्तर्यामी, माया अघटितघटनापटीयसी अस्यास्तीति मायी। ब्रीह्यादित्वादिनिः । मायावी इव । अस्ति जायत इति बीजांकुरमर्यादया यद् आपादनं कार्यघटनं तत्र यो रागोऽनुरागः, तेन रञ्जितः अभिनिविष्टः सन् । ब्रह्मत्वं ब्रह्मभावम् । अभ्येति प्रयाति । विपरिणमते वर्धत इति यत् पल्लवादि- रूपेण कार्यस्य आप्यायनं परिपोषणं तस्य या केलिः तदनुगुणनिभालनं तत्र कर्मठः कर्मशूरः सन् । विष्णुत्वं विष्णुदशाम् । अभ्येति प्राप्नोति । अपक्षीयते नश्यतीति पल्लवादिविस्फारसंकोचक्रमेण यद् आदानं कार्यस्य कारणाभिमुखीभवनं तस्य कलायां कलनाव्यापारे अवलम्बितः प्रतिष्ठितः सन् । रुद्रत्वं रुद्रावस्थाम् अभ्येति गच्छति । सः एकस्वभावोऽपि नामरूपप्रथया भिन्नभिन्न इव प्रतीयमानः । साधु सोद्योगम् । मृग्यताम् अन्विष्यताम् । मृग अन्वेषणे । कर्मणि लोट् । ब्रह्मजिज्ञासां प्रतिजानाना एकस्मादेव ब्रह्मणो जगतो जन्म-स्थिति-भङ्गमुप- दिशन्ति । तत्रोत्थाप्याकाङ्क्षया हरिहरादिपदाक्षेपेण ब्रह्मजिज्ञासा नाकुलीकर्तव्या। श्रुत्तहान्यश्रुतकल्पनाप्रसङ्गात् । यदि तथाभिप्रायोऽभविष्यत् तर्हि हरिहरादिष्वन्यत U प्रथमो गुच्छकः ५ पाठेनैवापठिष्यत् । तथा च-तत्र निरतिशयं सार्वज्ञबीजम्' ( यो० द. १.२५) इति सूत्रे योगवार्तिके- "हरिहरादिसंज्ञामूर्तयस्तु शक्तिशक्तिमदाद्यभेदेनोपासनार्थमेव परमेश्वरस्यो- च्यन्ते न तु साक्षादेव ।" इतो माण्डूक्यादुपज्ञातो विराड-हिरण्यगर्भ-प्राज्ञ-विभागोऽपि यथोत्तरं सारग्राही ब्रह्मण एकत्वमेव बोधयति । श्रुति-स्मृतिनीत्या आत्मब्रह्म श्वराः पर्याया इति मनोहत्य मीमांसनीयम् । एतदभिधेयरूढानां शब्दानामैकमत्येऽपि जाति-गुण- क्रिया-यहच्छासंश्लेषेण पार्थक्यम् । तत्र शरीरिणि भौतिकस्य शरीरांशस्य व्यपगम इव चिदैक्यामर्शानुमानानुभवाभ्यामेकत्वमेवोपपद्यते । अतएव भगवता पाराश- र्येण पुराणेतिहासेषु पञ्चदेवोपास्तिमभिदधतापि पञ्चायतनोन्यायेन पर्यायात् पञ्चानामपि गौणमुख्यभावं वर्णयता तदेकतायामेवावस्थायि । अन्यथा तत्र मृढत्वारोपणास्माभिरेव प्रत्यवेतव्यम् । इह हरिहरादिसहस्रनामस्वपि विशेषण- विशेष्यसंगत्या भेदकनाम्नां समवाये भेदः, अभेदकानां त्वभेद इत्यन्यत्र विस्तरः । इन्द्रवंशा वृत्तम् ॥२॥ इदानी विशेषवर्तनशालिनि विवर्ते परिणमनयोगिनि परिणामे वा परमा- मन ऐश्वर्येष्ववतारावतंसमुपश्लोकयति- वीजं धर्मद्रमस्यावनिरुपनिषदामास्पदं दर्शनाना- मास्थानं मङ्गलानामुपवनमतुलानन्दमाकन्दकानाम् । स्फूर्जत्पीयूषवृष्टिः कलिकलुषकथाक्लेशसंतापभाजां प्रत्याख्यानं रिपूणां चिरमवतु जगज्जानकीजानिरेकः ॥३॥ बीजमिति । पतन्तं जनमालम्बनीभूय धरतीति धर्मः । श्रोणादिको मन् । तथा च श्रुतिः- "धर्मो विश्वस्य जगतः प्रतिष्ठा लोके धर्मिष्ठं प्रजा उपसरन्ति । धर्मेण पापमपनुदन्ति, धर्मे सर्व प्रतिष्ठितं, तस्माद् धर्म परमं वदन्ति ।।" इति । (तैत्ति० आर० १० प्रपा ६३ अनु०) तथा- 'चोदनालक्षणोऽर्थो धर्मः' (मी० द० १.१.२) इति जैमिनिः । अयं हि फलदर्शनरूपेण-'यतोऽभ्युदयनिःश्रेयससिद्धिः स धर्मः' (दै० द० १.१.२) इति कणादेनासूत्रि । सोऽयं प्रवृत्तिलक्षणो निवृत्तिलक्षणश्च । तत्र प्रथमः कल्पसूत्रwr दशकएठवधम् गृह्यसूत्र-मन्वादिस्मृति-पुराणेतिहासेषु प्रतिपादितः । इह कल्पसूत्रादिपञ्चके यथोत्तरं दौर्बल्यमित्यनुसंधेयम् । द्वितीयस्तूपनिषद्-ब्रह्मसूत्र-स्मृति-पुराणेतिहासेषु निरूपितः । इह तु पञ्चके ईश-केन-कठ-प्रश्न-मुण्ड-माण्डूक्य-तैत्तिरीय-छान्दोग्य- वृहदारण्यकैतरेय-श्वेताश्वतरकैवल्यादयः कतिपया एवोपनिषदो हृदयंगमाः । अन्यास्तु कालवशाद् बहुत्र संदिग्धा श्यन्ते । इयमेवावस्था मनुयाज्ञवल्क्यस्मृती अपहाय स्मृत्यन्तरे, विष्णु-मार्कण्डेयौ विहाय पुराणान्तरे, रामायण-महाभारत- योश्चापि क्वचित्त्वचिद् दृश्यते । ब्रह्मसूत्रादिषडदर्शनानि तु साकल्येन सम्यञ्चीति सर्व यथायथं परीक्षणीयम् । धर्म एव द्रुमः । मयूरव्यंसकादिः । धर्मो द्रुम इव इति वा । धर्मघटक- त्वात् । धर्मद्रु मस्य बीजं हेतुः । तथा चास्माभिरुपदिश्यते राज्ञः प्रति- "राष्ट्रे पुरे ग्रामटिकान्तरे च धर्मप्रचाराय सदा यतध्वम् । य आश्रयीभूय विधीयमानो जनं पतन्तं धरतीति रूढिः ।। (चातुवर्ण्यशि० ७२ श्लो०) इति । उपनिपूर्वात् सदेः कर्तरि क्विपि उपनिषदः-मन्त्रब्राह्मणलक्षणस्य वेदस्य भागाः । यथा वाजसनेयिमन्त्रसंहितायाश्चत्वारिंशोऽध्याय ईशावास्योप- निपद् वाजसनेयिब्राह्मणस्य शतपथस्य चतुर्दशः काण्डो वृहदारण्यकोपनिषद् । अरण्ये पाठ्यत्वाद् आरण्यकमिति संज्ञा । यदाहुः- "अत्र चोपनिपच्छब्दो ब्रह्मविद्ये कगोचरः । तच्छब्दावयवार्थस्य विद्यायामेव संभवात् ।। उपोपसर्गः सामीप्ये तत्प्रतीचि समाप्यते । सामीप्यतारतम्यस्य विश्रान्तेः स्वात्मनीक्षणात् ।। त्रिविधस्य सदर्थस्य निशब्दोऽपि विशेषणम् । उपनीय तमात्मानं ब्रह्मापास्तद्वयं ततः ॥ निहन्त्यविद्या तज्जं च तस्मादुपनिषद् भवेत् । निहन्त्यानर्थमूलं स्वाविद्यां प्रत्यक्तया परम् ।। गमयत्यत्तसंभेदमतो वोपनिषद् भवेत् । प्रवृत्तिहेतून्निःशेषांस्तन्मूलोच्छेदकत्वतः ॥ यतोऽवसादयेद् विद्या तस्मादुपनिपद में भवेत् ।" इति । है. अत्रेदमध्यनुसंघयम्-उपनिषच्छब्दो ब्रह्मात्मैक्यसाक्षात्कारविपयः । पनिपूर्वस्य क्यिपप्रत्ययान्तस्य 'पद्ल विशरणगत्यवसादनेषु' इत्यस्य धातोरुप- प्रथमो गुच्छकः उपनिषदाम् अवनिः प्रादुर्भावस्थानम् । दर्शनानां शास्त्राणाम् अास्पदं प्रतिष्ठा । मङ्गलानां श्रेयसाम् । आस्थानं संसद् । अतुला निरुपमा आनन्दा एव माकन्दकाः सहकारा आम्रविशेषाः। तेषाम् उपवनम् आरामः । कलौ कलेवा कलुषा मलिनाः कथाः वाक्यप्रबन्धाः ताभिर्ये क्लेशाः-अविद्या-स्मिता-राग-द्वषाभि- निवेशाः-पुराणेतिहासयोः तमो-मोह-महामोह-तामिसान्धतामिस्रसंज्ञाभिर्वर्णिताः, तैः संतापं भजन्तीति तेषाम् । भजो रिवः । स्फूर्जन्ती भासमाना पीयूषस्य सुधायाः वृष्टिः वर्षाः । रिपूणाम् अन्तः-संचारिणां काम-क्रोध-लोभ-मोह-मद-मात्सर्या- ख्यानां षण्णाम् एतत्संसर्गेण परेषां रावणादिदुर्विनीतानां च प्रत्याख्यानं निराकृतिः । अतएव एकोऽद्वितीयः। तथा चोद्धृष्यते सुन्दरकाण्डे वायुसूनुना- 'जयत्यतिबलो रामो लक्ष्मणश्च महाबलः । राजा जयति सुग्रीवो राघवेणाभिपालितः ।।' (वाल्मी. रा. यु. कां. ४२. २०) जनयति ब्रह्मविद्याम् उपपादयतीति जनको विदेहः । एवुल् । 'जनिवध्योश्च' (पा० सू० ७. ३. ३५) इति निषेधाद् वृद्धिप्रतिषेधः । विदेहेत्यत्र-'अशरीर चा वसन्तं प्रियाप्रिये न स्पृशतः' (छां० उ. अध्या. ८ सं .१२) इत्यप्यनु- संधेयम् । तस्य राज्ञोऽपत्यमयोनिजा जानकी । अस्या अयोनिजत्वं तु सीतेत्यौ- पचारिकनाम्नापि व्यक्तम् । जानकी जाया पत्नी अस्येति जानकीजानिः । 'जायाया निङ्' (पा० सू० ५.४. १३४) जङ्गम्यते इति जगत् स्थावरजङ्ग- मात्मकं विश्वम् । चिरं चिराय | अवतु रक्षतु । इहावतेरन्येऽप्यर्था यथासंभव- मुन्नेयाः । लोट् च ( पा० सू० ३. ३. १६२ ) इति प्रार्थनायां लोटः । स्रग्धरा- वृत्तम् ॥३॥ निषदिति रूपम् । तत्रोपशब्दः सामीप्यमाचष्टे । तच्च संकोचकाभावात् सर्वान्तरे प्रत्यगात्मनि पर्यवस्यति । निशब्दो निश्चयवचनः । सोऽपि तत्तत्त्वमेव निश्चिनोति तन्नैकट्यवाच्युपशब्दसामानाधिकरण्यात । तस्माद् ब्रह्मविद्यास्वसंशीलिनां संसारसारतामति सादयति विषादयात शिथिलयतीति वा परमश्रेयोरूपं प्रत्यगात्मानं सादयति गमयतीति वा दुःखजन्मप्रवृत्त्यादिमूलाज्ञानं सादयत्युन्मूलयतीति वोप- निषत्पदवाच्या । सैव प्रमाणम् । तस्याः प्रमारूपायाः करणभूतः सर्वशाखासूत्तर- भागेषु पठ्यमानो ग्रन्थराशिरप्युपचारात् प्रमाणमित्युच्यते । स्पष्टश्चायमों बृहदारण्यकभाष्यादिपु ॥
दशकण्ठवधम् सांप्रतं महाराजस्य कलेस्तत्प्रकृतेश्च महिमानमुदीरयति- विद्राणेव गुणज्ञता सरसता लीनेव मैत्रीप्रथा छिन्नेव प्रलयं गतेव महतां वाक्येषु हेवाकिता। एका स्वार्थविकस्वराद्य वलते वैचित्र्यचर्या यया निःशङ्क महितापि पूर्वसरणिः सद्यः समुत्सार्यते ॥४॥ विद्राणेति । गुणानां शौर्यादीनां ज्ञता वेत्तता विद्राणेव पलायितेव । विपूर्वाद् द्रातेः कर्तरि क्तः । निष्ठानत्वं णत्वं च । सरसता सहृदयभावः । लीनेव लुक्कायितेव । मैत्री सख्यं तस्याः प्रथा निर्व्याजावस्थानम् । छिन्नेव विशीर्णेव । महतां महापुरुषाणाम् । वाक्येपु उक्तियु । हेवाकोऽभिलाषोऽस्यास्तीति हेवाकी तस्य भावस्तत्ता । श्रद्धोति यावत् । प्रलयं गतेव विनाशं प्राप्तेव । अद्य इदानीम् । एका केवला । स्वार्थेन आत्मनोऽभिलपितेन विकस्वरा भासुरा विपूर्वात् कसतेः कर्तरि वरच् । विचित्रस्य भावो वैचित्र्यम् वैलक्षण्यम् । प्यम् । तस्य चर्या घटना वलते व्याप्नोति । वल संवरणे । यया वैचित्र्यचर्यया । महिता पूजितापि । पूर्वा पारम्परिकी। किं वा- येनास्य पितरो याता येन याताः पितामहाः । तेन यायात् सतां मार्ग तेन गच्छन्न रिष्यते ।। ( मनु० ४.७१८ ) इति मनूपदेशेन पूर्वेषां पितृपितामहादीनां सरणिः आचारपद्धतिः । निर्गता अपक्रान्ता शङ्का आतङ्को यस्मिन् कर्मणि तद् यथा. स्यात् तथा । सद्यः अविलम्वितं समुत्सार्यते परावर्त्यते । समुत्पूर्वात् सरतेणिजन्तात् कर्मणि लट् । शार्दूल- विक्रीडितं वृत्तम् ॥४॥ सांप्रतं भारतवर्पस्य अपकर्षमूलकान् पुरुषान् विभजन् निर्विष्णो भगवन्तं प्रार्थयते- एके मान्यजुपः, परे परगुणच्छेद क्रियाकर्कशा हन्तान्ये द्विरदेक्षिकाव्यसनिनो निःसारमित्थं जगत् । इत्यालोच्य मुहुमुहू रघुकुलोत्तंस ! प्रशंसाश्रय ! ब्रह्मण्याद्भुतवीर्य ! केवलमदस्त्वामेव याचामहे ॥५॥ एक इति । एके मुख्याः, प्रज्ञापराधेन । मन्दस्य कर्म भावो वा मान्द्यम् । 'मूढाल्पापटुनिर्भाग्यमन्दाः स्युः' इत्यमरः । तज्जुपन्ते सेवन्ते इति मान्द्यजुषः । कर्तरि विवप् । पितृपितामहादिसमुपार्जितसंपदं भुजाना इति यावत् । परे अन्ये, प्रथमो गुच्छकः है परे उत्कृष्टा वा, परेषां ये गुणा अभिलषणीया अन्तः करणधर्माः तेषां छेदक्रियाः दोषारोपणव्यापाराः, तत्र कर्कशा निष्ठुरस्वभावाः- 'योगिनो योगिनां मध्ये भोगिनोऽपि च भोगिनाम् । विदुषामतिविद्वांसो दुर्जनाः कैर्विनिश्चिताः ।। इत्येवंप्राया महासंस्थानविप्लावकाश्चाटुकाराः । हन्तेति खेदे । अन्ये इतरे । द्वौ रदौ दर्शनार्थी येषां ते द्विरदाः मातङ्गाः । तेषाम् ईक्षिका नयननिमीलिका तव्यसनिनः । तद्वद् विलोकयितार इति तात्पर्यम् । प्रायो लक्ष्मीदुर्ललितप्रकृतय एवमनुभूयन्ते | इत्थं विवेचनेन जगत् निस्सारं गतश्रीकम् । इति मुहुमुहुः पौनः- पुन्येन आलोच्य विविच्य । हे रघुकुलोत्तंस ! रघूणां कुलम् अन्वयः तस्य उत्तंसो भूषणम्, तत्संबुद्धिः । रघुशब्दो यदुशब्दवत् तदपत्ये लाक्षणिकः । प्रशंसाया आश्रय ! आधार ! मर्यादापुरुषोत्तमत्वात् । ब्रह्मणि साधुः ब्रह्मण्यः, तत्संबुद्धिः । तत्र साधुरिति यत् । 'ये चाभावकर्मणोरित्यनः प्रकृतिभावः । अत्र ब्रह्म वेदो ब्राह्मणश्च । शम्बूकनिग्रहेण ब्राह्मणबालरक्षणकथा प्रसिद्धैव । अद्भु- तमाश्चर्यभूतं वीर्यं यस्येति तत्संबुद्धिः । अद्भुनत्वं समुद्रनिग्रहादौ सुप्रसिद्धम् । अदः केवलं त्वामेव याचामहे अर्थयामहे । अदसा निर्देश्यं प्रधानं कर्म संबोध्यस्य अन्तर्यामित्वेनानुल्लिखितम् । एवकारेण दात्रन्तरव्युदासः ॥५॥ सांप्रतमादिकवि भगवन्तं वल्मीकजन्मानं स्मरति- स्मरामि रामायणसर्गबन्धब्रह्माणमावद्धरसप्रवाहम् । योऽद्व तसिद्धान्ततरङ्गिताया वेदान्तलक्ष्म्याः कुतुकान्यतानीत् ॥ ६॥ स्मरामीति | सप्तकाण्डात्मकं क्रियाप्रधानं षट्प्रकरणात्मकं ज्ञानप्रधानं चात्र रामायणपदार्थः । स्मरामि तदीयलोकोत्तरकविकर्मभावनेन तं प्रति प्रह्वीभवामीति तात्पर्यम् । यः आदिकविः अद्वैतं जीवब्रह्म क्यम् । लोके चेत्यचित्पदयोराभास्या- भासकत्वेन पार्थक्याभ्युपगमेऽपि पर्यवसाने चित एव वस्तुत्वम्। अभिधीयतेऽपि रूपकेण- 'मायाख्यायाः कामधेनोर्वत्सौ जीवेश्वरावुभौ । यथेष्टं पिबतां द्वतं तत्त्वमद्व तमेव हि ॥' इति । अद्वतस्य सिद्धान्ताः वादिप्रतिवादिभ्यां निश्चितार्थाः। तैः तरङ्गितायाः विचारितायाः । इतच् । वेदान्तस्य उपनिपत्प्रमाणस्य लक्ष्म्याः कुतुकानि कौतुकानि । अतानीत् अतनिष्ट । तनोतेः कर्तरि लुङ ॥ इन्द्रवज्रोपेन्द्रवायो- रुपजातिः ॥ ६॥ -- ।
दशकण्ठवधम् , साम्प्रतं प्रकृतमुक्तिविशेपं काव्यवस्तु निर्दिशति- प्रसह्य सद्यो हृदयं विशन्तः कियन्त एवाइ तभङ्गिहयाः । पदे पदे कन्दलयन्ति रागं कान्ताकटाक्षा इव वाग्विलासाः ॥७॥ प्रसह्यति । किं प्रमाणमेपां ते कियन्तः, कतिचिदेव न तु सर्वे । 'वाता- धिका हि पुरुषाः कवयो भवन्ति' इति निषेधस्मरणात् । 'अधीत्य शास्त्राण्यभियोगयोगाद- भ्यासवश्यार्थपदप्रपञ्चः । तं तं विदित्वा समयं कवीनां, मनः प्रसत्तो कवितां विदध्यात् ।।' इति विधिप्रवणाच । अद्भुता हृदयावर्जिका या भङ्गी रचनाविशेपः तया हृद्याः हृदयंगमाः । हृदयस्य प्रियाः हृद्याः । यति हृदयस्य हृदादेशः । 'भव्याः' इति पाठे-भव्याः उज्ज्वलाः । वाचां विलासाः । कान्ताकटाक्षा इव । प्रसह्य वलात् । अव्ययम् । सद्यः तत्क्षणम् | हृदयं मानसं विशन्तः लभमानाः । पदे पदे प्रतिपदम् । वीप्सायां द्विर्भावः । पदम् सुप्तिङ्लक्षणं चरणविन्यासश्च । रागम् अनुरागम् । कन्दलयन्ति अङ्क रयन्ति । उत्पादयन्तीति यावत् । कन्दलशब्दात्-'तत्करोति तदाचष्टे' ( ग० सू० २०४) इति णिच् । पूर्ववदुपजातिः ॥ ७॥ एवं पद्यमभिदधत् प्रवन्धस्य चम्पूत्वव्यपदेशार्थं गद्यमवतारयन् रामायण- कथामुपक्षिपति-तत्र तावत् प्रथमं विनेयरिदमवधातव्यम्-शब्दार्थाभ्यां दोप- वजे कविकर्म रीयते अलंक्रियते गुण्यत इत्यतो रसोऽपि नापेयात् । येन यो हि तात्पर्येणाभिधीयते लक्ष्यते व्यज्यते स प्रथमया विभक्त्या अभिधेय-लक्ष्य-व्यङ्ग-य- रूपः तृतीयया च अभिधायक-लाक्षणिक-व्यञ्जकरूप इत्यतिरोहितम् । सोऽयं शब्दार्थप्रपञ्चो हर्षचरित वाणी वाणयता वाणेन- 'श्लेपप्रायमुदीच्येषु प्रतीच्येष्वर्थमात्रकम् । उत्प्रेक्षा दाक्षिणात्येषु गौडेवक्षरडम्बरः ।। नवोऽर्थो जातिरग्राम्या श्लेपोऽक्लिष्टः स्फुटो रसः । विकटाक्षरवन्धश्च कृत्स्नमेकत्र दुष्करम् ॥'
प्रथमो गुच्छकः ११ इति कवितारहस्याचिख्यापयिषया निरटङ्कि । एवंप्रायाभिप्रायवान् ननु शब्दार्थों काव्यमिन्याचार्यरुद्रटमनुसरन्-तददोषौ शब्दार्थों'-(का० प्र० २२) इत्यादिसूत्रण राजानकमम्मटोऽपि यथाशासनमुपदिदेश । यच्च तैलङ्गान्वयमङ्ग- लान्वयमहालक्ष्मीदयालालितेन- 'रमणीयार्थप्रतिपादकः शब्दः काव्यम् । रमणीयता च लोकोत्तराह्लादजन कज्ञानगोचरता, लोकोत्तरत्वं चानुभवसाक्षिको जातिविशेषः । (रसग० प्रथमा.) इति समयान्तरेणावोचि तदप्यापाततो रमणीयम् । तथा परिष्कारेऽपि शब्दार्थयोरेकस्य काव्यत्वाभिधाने अन्यस्याप्राधान्यापत्तः। 'शब्दार्थो सत्कवि- रिव द्वयं विद्वानपेक्षते' (शिशु० व० २।८६) इत्यादिना द्वयोरेव प्राधान्यावगते- श्चेति दिक् । साहित्यापराख्यमिदमलंकारशास्त्रमपि ब्रह्मादिदेवोद्भूतमपि रुद्रोपज्ञत्वे- नाख्यायते । तदिदं नाट्य काव्यमिति द्विधा स्मयते । द्वयोरपि प्रपञ्चन नाट्य- शास्त्राग्नेयपुराणादौ । तत्राद्यम्-'पाराशर्यशिलालिभ्यां भिक्षुनटसूत्रयोः (पा० ४।३।११०) इति पाणिनिनाप्यस्मारि। द्वितीयं पुनः-'अग्निमीले-' (ऋ० १११।१११) इत्यादि- 'वागर्थाविव संपृक्तौ-' (रघु० ११११ ) इत्यन्तमनेकधा श्रोत्रियैः पण्डितैश्च परीक्षितमेव । तत्र-'कविर्मनीषी परिभूः स्वयंभूः-' (शु० य० सं० ४।८) इत्यादि प्रकृती रूढैव । इह गुणदोषालंकाररीतिरूप एकः प्रवाहः । विभावानुभावव्यभिचारिसंयोगनिष्पत्तिको व्यञ्जनावलम्बितो रसो द्वितीय इति सर्व यथायथं वस्तुस्थापनधियैवावधातव्यं धीधनैर्नान्यथेत्यलम् । प्रकृते तु- 'गद्यपद्यमयं काव्यं चम्पूरित्यभिधीयते ।' इति, 'वृत्तबन्धोज्झितं गद्य मुक्तकं वृत्तगन्धि च | भवेदुत्कलिकाप्रायं चूर्णकं च चतुर्विधम् । आद्य समासरहितं वृत्तभागयुतं परम् ।। अन्यदीर्घसमासाढ्यं तुर्य चाल्पसमासकम् ।' इति च दर्पणोक्तानि षष्ठपरिच्छेदे गद्यलक्षणानि । अथ. कथाप्रसङ्ग मुनिपुंगवो वाल्मीकिर्यदृच्छयाऽऽगतं देवर्षि परमेष्ठितनयं नारदं पप्रच्छ ॥८॥ अथेति । पुमांश्चासौ गौश्च, पुमान् गौरिवेति वा । 'गोरतद्धितलुकि' इति च । , १२ दशकएठवधम् 'स्युरुत्तरपदे व्याघ्रपुङ्गवर्पभकुञ्जराः । सिंहशार्दूलनागाद्याः पुसि श्रेष्ठार्थगोचराः ।।' इत्यमरः । मुनिषु पुंगवः । 'दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः । वीतरागभयक्रोधः स्थितधीमुनिरुच्यते ।। (२।५६) इति गीता। दीव्यतीति देवः । ऋषति आम्नायं पश्यति इति ऋपिः । देवश्चासौ ऋषिश्च देवर्पिः । तम् । परमेष्ठितनयं हिरण्यगर्भाङ्गभुवम् । पप्रच्छ । प्रच्छ ज्ञीप्सायाम् । दुह्यादित्वाद् द्विकर्मा । तत्र द्वितीयं प्रधानं कर्म वक्ष्यमाणम् ।।८।। सांप्रतमस्मिन् लोके को नु श्रीमान् कीर्तेः प्रतापस्य चाश्रयः, सुकृतो- उज्वलः प्रजावत्सलः, इति पृष्टः स प्रत्युवाच-18॥ सांप्रतमिति । 'नुःस्यात् प्रश्ने विकल्पार्थेऽप्यतीतानुनयार्थयोः इति विश्वः ।।६।। वैवस्वतस्य मनोवंशे मुक्तामणिः, इक्ष्वाकुकुलकुवलये दिनमणिः, महापुरुपहीरः रघुबीरः, असतां विरामः सतामारामः श्रीरामः, इत्यभिधाय देवलोकं गते देवौं सहर्मों भरद्वाजद्वितीयो महर्पिर्माध्याहिकाय नियमाय जाह्नव्या नातिदूरं तमसातीरं समाससाद ॥१०॥ वैवस्वतेति । विवस्वतः सूर्यस्थापत्यं वैवस्वतः तस्य मनोः । 'स्वायंभुवो मनुरभूत प्रथमस्ततोऽमी, स्वारोचिपोत्तमजतामसरवताख्याः । षष्ठस्तु चानुप इति प्रथितः पृथिव्यां, वैवस्वतस्तदनुसंप्रति सप्तमोऽयम् ।। इति । चंशोऽन्यवाये वेणौ च । मुक्ता मणिरिव मुक्तामणिः । इक्ष्वाकूणां कुलमेव कुवलयं कमलविशेपः तत्र । दिनमणिः प्रद्योतनः । महापुरुपेषु होरः हीरकरत्नम् । अलंकार इति यावत् । रघुपु वीरः । विरामोऽवसानम् । आराम आनन्दस्थानम् । भरद्वाजत्तदाख्यो मुनिरुपचारार्थ द्वितीयो यस्य सः। मध्याह्न भवो माध्याह्निकः स्नानसंध्यातर्पणरूपो नियमः तदर्थम् । नातिदूरमिति नशब्देन 'सुपसुपा' इति समासः । नातिविप्रकृष्टमित्यर्थः । तमसा नदीविशेषः । सा च कोसलेषु सरवाः दक्षिणस्यां दिशि क्वचिन्निर्जला क्वचित्सजलेति । 'वितमसा तमसासरयूतटाः?
प्रथमो गुच्छकः १३ - इति रघुवंशम् । तस्याः तीरं तटम् । समाससाद प्राप ॥१०॥ तत्र पुण्येष्वरण्येषु विचरन्नग्रे क्रौञ्चस्त्रीपुसयोरेक पुमांसं मन्मथ- मोहितं निषादशरविद्धं शोणितपरीताङ्ग भूतले विलुठन्तं ददर्श ॥११॥ तत्र ति । क्रौञ्चौ चकवाकी, स्त्री च पुमांश्च इति स्त्रीपुसौ। 'अचतुरे ति साधु । तयोः । निषादस्य व्याधस्य शरेण विद्ध ताडितम् । शोणितेन क्षतजेन परीतानि प्राप्लुतानि अङ्गानि यस्य तम् । ददर्श आलुलोके ।।११।। तं तथा चेष्टमानं पश्यतस्तस्य दयानिधेह दयालीनः शोकानल- प्रवर्तितः साक्षात्करुणरस एव- 'मा निपाद ! प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वतीः समाः । यत् क्रौञ्चमिथुनादेकमवधीः काममोहितम् ।। इति श्लोकच्छलेन निःससार ॥१२॥ तमिति । तथा चेष्टमानम् । चेष्ट चेष्टायाम् । कर्तरि शानच् । क्रोशन्तमिति यावत् । दयते अनया इति दया । दय रक्षणे। षिद्भिदादिभ्योऽङ् । निदधाति अस्मिन्-निधीयतेऽसाविति वा निधिः । 'कर्मण्यधिकरणे च' इति किः । दयाया अ- न्तःकरणधर्मविशेषस्य निधिः तस्य । हृदयं मानसम् आलीन आरूढ़ः । शोक एव अनलः परपीडासहिष्णुतया संतापजनकत्वेन दहनः तेन प्रवर्तितः संचारितः । सा- क्षान् मूर्तः। करुणरस एव तदाख्यरसविशेष एव । इति श्लोकच्छलेन- 'मा निषाद-' इति काव्यसंसारे प्राथमिको यः श्लोकस्तच्छलेन व्याजेन । निःससार प्रादुरास । अत्र ध्वनिकार'- 'काव्यस्यात्मा स एवार्थस्तदा चादिकवेः पुरा । कौञ्चद्वन्द्ववियोगोत्थः शोकः श्लोकत्वमागतः ।।' इति विविधविशिष्टवाच्यवाचकरचनाप्रपञ्चचारुणः काव्यस्य स एवार्थः सारभूतः संनिहितसहचरीविरहकातरक्रौञ्चाक्रन्दजनितः शोक एव श्लोकतया परिणत इत्यर्थः ।' (ध्वन्या. १ उद्यो.) इति । 'मा निषाद-' इति श्लोकार्थस्तु- रे निषाद ! व्याध ! निषीदति मनः पापं वा अस्मिन्निति । षद्-घञ् । निष्करुणेत्यर्थः । त्वं शाश्वतीः निरन्तराः । शश्वद् भवः अण् , ततो ङीष् । ताः । समाः वत्सरान् । द्वितीयावहुवचनम् । समाशब्दो नित्यं बहुवचनान्तः । तथाच- संवत्सरो वत्सरोऽब्दो हायनोऽस्त्री शरत् समाः' । इति । तत्प्रायोऽभिप्रायेण ।
१४
दशकएठवधम्
पाणिनिराचार्यस्तु-'समां समां विजायते' (पा० ५-२-१२) इति सूत्रयन्नेक-
वचनान्ततामस्य प्रतिपेदे । प्रतिष्ठां स्थितिम् । आश्रयं चेत्यर्थः । अत्यन्तसंयोगे
द्वितीया । 'प्रतिष्ठास्थितिमाहात्म्ये' इति वैजयन्ती । मा अगमः मा प्राप्नुहि ।
आशंसायां भूतवच्चेति लुङतिदेशः। न कदाचित् त्वं निरुद्दगमेकत्रावासं
प्राप्स्यसीति तात्पर्यम् । अगम इत्यत्र छान्दसोऽडागमः । काशिकाकारस्तु नाय
माङ किन्तु मा शब्द एवेत्यडागमं समर्थितवान् । दुर्घटवृत्तिकारेण पुनः 'त्वम-
गम': इत्यत्र तुशब्दः पुनरर्थे । मा शब्दस्य लक्ष्मीवाचिनो नया बहुव्रीही
'गोखियोरुपसर्जनस्य' (पा० १।२१४८) इति ह्रस्वे हे अम ! अलक्ष्मीकेति
निपादविशेषणं मत्वा अडागमप्रसक्तिर्वार्थत इति विशेषः । रामायणमञ्जर्यामा-
चार्यक्षेमेन्द्रेण तु त्वमगमेत्यत्र 'त्वमालब्धाः' इति पाठान्तरमुपकल्पयता सेय-
मनुपपत्तिः समाहितेति सर्व यथायथमनुसंधेयम् । यत् यस्मात् । त्वं क्रौञ्चमिथु-
नात्-ऋञ्च एव क्रौञ्चः । स्वार्थे अण । तयोमिथुनं दाम्पत्यरूपं द्वन्द्वम्, तस्मात् ।
ल्यब्लोपे पञ्चमी । तमासाद्य त्यर्थः । एक पुरूपावयवं काममोहितं-कामेन रति-
क्रोडया मोहितं रसावेशनिर्भरम् । अवधीः हिंसितवानिति शापाभिप्रायकोऽर्थः ।
ब्रह्मणः प्रसादाधिगतः प्रथमोऽयमादिकवेर्वाङ निष्यन्दो न केवलं शापपर
एव भवितुमर्हति यावन्मङ्गलार्थकोऽपीति मन्वानाः पूर्वाचार्या भगवन्महिमा-
शंसकत्वमप्यस्य वर्णयन्ति । तद्यथा-
निषीदत्यस्मिन्निति निपादो निवासः, मा लक्ष्मीः, तस्या निपादो मानिपादः
श्रीनिवासः, तत्संवुद्धिः । त्वं शाश्वतीः समाः सर्वकालं, प्रतिष्ठां माहात्म्यम्
अगमः लभस्व । लकारव्यत्ययः । यत् यस्मात् क्रौञ्चमिथुनाद् रावणमन्दोदरी-
रूपाद् राक्षसमिथुनात् । कामेन मोहितं सीतापहर्तारम् । एकं रावणम् अवधीः ।
रावणं हत्वा त्रैलोक्यसंरक्षणपरस्त्वं चिराय विजयस्वेति परमार्थः । वाक्यार्थहेतुकं
काव्यलिङ्गमलङ्कारः । अत्र च सप्तकाण्डोपनिवद्ध रामायणीयं कथाशरीरमपि
भङ्गयन्तरेणोपन्यस्तं स्वयमुत्प्रेक्षितु सुशकमिति नेहायस्तम् । वाच्यलक्ष्यव्यङ्गय-
विधया श्लेषमर्यादया च तत्र तत्र संभवन्तोऽप्यर्थाः प्रतिपदं व्याख्यातुमशक्याः
प्रेक्षावद्भिः स्वयमुन्नेया इत्यलं व्याख्याननिर्वन्धेन ।।
शकुनिशोकावेशेन मया किमिदं श्रवणपेयं व्याहारीति सविस्मयं
भरद्वाजं त्रुवाणो यथाविधि विहिताभिषेकस्तेनैवापूरितकलशीकेन पृष्ठतो-
ऽनुगम्यमानः स्वाश्रमं प्रतिपेदे ॥१३॥
प्रथमो गुच्छकः शकुनिशोकेति । शकुनेः चक्रवाकस्य शोकावेशः शुचोऽवतरः यस्य तेन । मया किमिदं श्लोकरूपं श्रवणाभ्यां पेयं श्रोत्ररसायनं व्याहारि अभाषि | वि- आङ -पूर्वाद् हरतेः कर्मणि लुङ । सविस्मयं साश्चयं यथा तथा भरद्वाजमुनि ब्रुवाणः ब्रु वन् । बब् व्यक्तायां वाचि । शानच । विधिमनतिक्रम्य यथाविधि । विहितः अद्वैवतैर्मन्त्रैः संपादितः अभिषेकः स्नानं येन सः । तेनैव भरद्वाज- मुनिना आपूरिता कलशी कुम्भिका येन तेन । 'नवृतश्च' (पा० ५।४।१५३) इति कप् । पृष्ठतः पृष्ठभागे। अनुगम्यमानः अनुस्रियमाणः। स्वाश्रमपद निजावास- स्थानम् । प्रत्तिपेदे आजगाम । पद गतौ । अत्र वेद्ब्राह्मणोपनिपत्सु श्लोकाख्यस्य च्छन्दसः प्रसिद्धत्वेऽपि तस्य रसप्राधान्यादाश्चर्यत्वोक्तिः । अतएव महामुनेरादि- कवित्वाख्यानमिति सर्व समञ्जसम् ॥ १३ ॥ तत्र तमर्थं ध्यायतो महामुनेः पुरस्तादितरत्र श्लोकोपलम्भमसह- मान इव मन्त्रब्राह्मणलक्षणस्य ब्रह्मण उपवृंहणस्थानमानायकवयिता ब्रह्मा प्रादुर्वभूव ॥१४॥ तत्रेदि । तमर्थ श्लोकात्मकम् । ध्यायतः पुनः पुनर्विचारयतः । महामुने- ल्मीकेः । पुरस्ताद् अग्रे । इतरत्र वेदेभ्योऽन्यत्र । श्लोकस्य पद्यस्य । उपलम्भम् उपलब्धिम् । असहमानः अमर्षमाणः । इवेत्युत्प्रेक्षायाम् । तथा चाचार्य दण्डीपठति- 'मन्ये शङ्क ध्रुवं प्रायो नूनमित्येवमादिभिः । उत्प्रेक्षा व्यज्यते शब्दैरिवशब्दोऽपि तादृशः ।।' इति । ब्रह्मणः वेदस्य । उपवृहणस्थानम् आविर्भावभूमिः । वेदा हि कारणब्रह्मणा कार्यब्रह्मणश्चतुराननस्य हृदये प्रकाशिताः । तत ऋषिमुनिषु विस्तरं प्राप्ताः । तथाच श्रूयते- 'यो ब्रह्माण विदधाति पूर्व यो वै वेदाँश्च प्रहिणोति तस्मै । तथंह देवमात्मबुद्धिप्रकाशं मुमुक्षु शरणमहं प्रपद्य ।। (श्वेताश्व. उप. ६।१८) इति । स्मयतेऽपि- 'युगान्तेऽन्तहितान् वेदान् सेतिहासान् महर्षयः । लेभिरे तपसा पूर्वमनुज्ञाता स्वयंभुवा ।।' इति । (तैत्तिरीयसंहिताभरष्यभूमि.)
१६ दशकएठवधम् आम्नायानां वेदानां कवयिता कवनकर्ता । आम्नायन्ते अभ्यस्यन्ते इति आम्नायाः । म्ना अभ्यासे । कर्मणि घन् । कवयतीति कवयिता | तृच । 'कविर्मनीपी परिभूः स्वयंभूः-' इत्यौपनिषदी श्रुतिः । ब्रह्मा हिरण्यगर्भः । प्रादुर्बभूव आविर्भवतिस्म ||१४|| सादरं पाद्याासनवन्दनैः सत्कृतश्चासौ दशनज्योत्स्नया पुण्यपीयूपं विकिरन्निव बल्मीकभुवमावभापे-॥१५॥ सादरमिति | सादरं गौरवपूर्वकम् । पादायार्धाय च वारि पाद्यम् अय॑म् । आसनम् विष्टरम् । वन्दनम् अभिवादनं स्तवनं च । तैः । सत्कृतः पूजितश्चासौ ब्रह्मा । दशनानां दन्तानां ज्योत्स्नया चन्द्रिकया। पुण्यमेव पीयूषं सुधाम् । विकिरन विक्षिपन् । इव । वल्मीकाद् भवतीति वल्मीकभूः वल्मीकजन्मा। क्विप् । तम् । श्रावमापे जगाद ॥१५|| मुने ! करुणावतस्तव शोक एव सरससारस्वतप्रसरशंसकं श्लोक- त्वमापन्नः । तन्नारदनिर्दिष्टं रामचरितं रामायणं विधीयताम् । एव- मास्तां चिराय श्रुतिवहनपरिश्रान्ता सुधास्नपनशिशिरा सरस्वती । इत्याभाष्य तिरोहिते ब्रह्मणि तदाज्ञया प्रतीच्या ज्ञानशा तपोनिधिर- विकलं रघुराजचरितं करामलकीकृत्य स्वर्गमिव सुरसार्थसुन्दरं रामायणं विदधे ॥१६॥ मुने इति । मुने ! मननशील ! | करुणा विद्यतेऽस्यास्मिन्वेति करुणा- वान् । प्राशस्त्ये मतुप् । तस्य । क्रौंचवधहेतुकः शोक एव । सरसो हृदयाकर्षक: सरस्वत्याः अयं प्रसरः उद्गमः तस्य शंसकम् आवेदकम् । श्लोकत्वं पद्यभावम् । आपन्नः प्राप्तः। तदित्यव्ययं पञ्चम्यर्थे । नारदेन निर्दिष्टमाख्यातम् । रामचरितं रामायण व्याख्यातचरम् । विधीयतां क्रियताम् । निर्मीयतामिति यावत् । विपूर्वको धान करणार्थे, तत आशिपि कर्मणि लोट । एवम् इत्थमनुप्ठिते । आस्तां भवतात् । चिराय चिरस्य | श्रुतीनाम् अपौरुषेयीणां गिरा वहनेन धारणेन परिश्रान्ता क्लिप्टा । अर्थप्रधानरामचरितवर्णनेन सुधारनपनशिशिरा पीयूपावगाहनशीतला सरस्वती भगवती वाग्देवी । इत्याभाप्य आदिश्य । तिरोहिते अन्तर्हिते । ब्रह्मणि आत्मभुवि । तस्य आज्ञया शासनेन । प्रत्यञ्चतीति प्रथमो गुच्छकः १७ प्रतीची। ऋत्विगिति क्विन् । उगितश्चति डीप् । तया प्रतीच्या सर्वंकषया । ज्ञानदृशा अवबोधष्टया । तपोनिधिः-तपसां कायिक-वाचिक-मानसिकलन- णानां निधिरधिष्ठानम् । अविकलं समग्रम् । रघूणां राजा स्वामी तस्य चरित- माख्यानम् । करामलकीकृत्य हस्तकलितधात्रीफलवत् प्रत्यक्षीकृत्य । स्वर्गमिव नाकवत् । सुराणां देवानां सार्थो वर्गः । उपमेयपक्षे-सुरसाः वाच्य-लक्ष्य-तात्पर्य- व्यङग्य रूपा अर्थाः तैः, सुन्दरं मनोहरम् । विदधे रचितवान् । यदाहु :-'स्याद्वाचको लाक्षणिकः शब्दोऽत्र व्यञ्जकस्त्रिधा। वाच्यादयस्तदर्थाः स्युस्तात्पर्थोऽपि केषुचित् ।।' इति । (का. प्र. २ उल्ला.) 'वाच्योऽर्थोभिधया बोध्यो लक्ष्यो लक्षणया मतः । व्यङ्गयो व्यञ्जनया ताः स्युस्तिस्त्रः शब्दस्य शक्तयः ॥ इति । (सा. द. २ परि.) 'तात्पर्याख्यां वृत्तिमाहुः पदार्थान्वयबोधने । तात्पर्यार्थ . तदर्थं च वाक्यं तद्वोधकं परे ।। (सा. द. २ परि.) इतिच । ॥१६॥ तदनु मुनिसुनासीरोऽश्विनाविव परस्परोपमों वेदपरिनिष्ठितो कुशलवौ रामायणरसायनं ग्राहयामास । तच्च तौ यथासंगीतं मुनिमण्डले गायन्तौ कदाचन रामभद्रनियोगेन तत्सनाथायां परिपदि यथाक्रम गातुमुपचक्रमाते ॥१७॥ तदन्विति । तदनु भविष्यतो रामायणस्य प्रणयनानन्तरम् । मुनिः सुना- सीर इन्द्र इव । अश्विन्यां जातौ अश्विनौ आश्विनेयाविव । 'संधिवेला तु- नक्षत्रेभ्योऽण' (पा० ४।३।१६ ) इत्यण् । 'नक्षत्रेभ्यो बहुलम्' (पा० ४।३।३७ ) इति लुकि-'लुक्तद्धितलुकि' (पा० ११२।४६) इति डीपो लुक् । परस्परम् अन्योन्यम् उपमा सादृश्यं ययोस्तौ । कुशलवौ तन्नामानौ सीतादेव्याः सूनू । रामायणमेवाश्चर्यजनकत्वाद् रसायनम् । ग्राहयामास अध्यापयामास । कुशल- वाविति अण्यन्तावस्थायां कर्तारौ ण्यन्तावस्थायां च कर्मणी । 'गतिबुद्धिप्रत्य- वसानार्थ-' (पा० १।४।५२) इत्यनुशासनात् । तच यथावद्गृहीतं रामायणम् । तौ यमलौ यथासंगीतं गान्धर्वशास्त्रानुसारम् । मुनीनां मण्डले परिषदि । राम- १८ दशकएठवधम् भद्रस्य दाशरथेः नियोगेन आदेशेन। तत्सनाथायां तेन भूपितायाम् । परिपदि सभायां यथाक्रमं यथासंवन्धम् । गातुमुपचक्रमाते प्रारेभाते । तदिदं वाल्मी- कीयमा तदुपजीव्यं प्रकृतं रघुवंशवत् पौरुपमिति व्यक्तम् ।।१७।। अथेदानी जनपदं वर्णयति- अस्ति स्वस्तिमान् , प्रत्यादेशः स्वर्गोद शस्य, वीप्सा चैत्ररथप्रदे- शस्य, दृष्टान्तसदनं सकलासेचनकानाम् , कविकर्मातिक्रान्तविभूत्या भगवत्या सरय्वा सरसीभूतभूभागः कोशलो नाम जनपदः ॥१८॥ अस्तीति । स्वस्तिमान् कल्याणानुबन्धी । स्वर्गोदेशस्य स्वर्लोकस्य प्रत्यादेशो निराकृतिः । चैत्ररथप्रदेशस्य कुवेरावासस्य वीप्सा द्विर्भावः । सकला- सेचनकानाम्-'तदासेचनकं तृप्तेर्नास्त्यन्तो यस्य दर्शनात्' इति लक्षितानां यावद्रमणीयानां इप्टान्तसदनमादर्शः । कविकर्माणं वर्णनमतिक्रान्ता अति- शायिनी विभूतिरश्चर्यं यस्यास्तथाभूतया । भगवत्या जलात्मकद्रवद्रव्यविलक्षण- विग्रहालंकर्मीणया । एतच्चागमेयु गङ्गादिवर्णनेपु प्रसिद्धमेव । सरय्वा तदाख्यया महानद्या । सरसीभूतः मसृणप्रायः न तु मरुप्रदेशादिवन्नीरसः भूभागः भूमि- प्रदेशो यस्य ताहक कोसलो नाम उत्तरकोशलाख्यो जनपदो नीवृत्। अस्तीति पूर्वेणानुपङ्गः ॥ १८ ॥ यत्र परागमहिता बाटिका ब्राह्मणाश्च, उच्चापा हृदाः क्षत्रियाश्च, बहुलाभाः सस्यसंपदो वैश्याश्च, द्विजातिनताः फलिनः शूद्राश्च, अश्रान्तविक्रमाः कृपीवला विटपाश्च, सच्छाया मार्गा आश्रमाश्च, सदागोभृतः सीमानो गोपाश्च, सुरुचिराजीवनमिताः तडागाः कूपाश्च, बहुधान्यजुष्टा ग्रामा मठाश्च, तीव्रतापहारिणः छायावृक्षाः सन्तश्च ॥१६॥ यत्रेति । यस्मॅिश्च कोसलजनपदे । पराः उत्कृष्टाः अगाः वृक्षाः, परागाः सुमनोरजांसि च, तैर्महिता महनीयाः । मह पूजायाम् । वाटिकाः वृक्षवाटिकाः । परा वेदसंमता आगमाः शास्त्राणि तत्र हिताः उचिताः ब्राह्मणा अग्रजन्मानश्च । एवमुत्तरत्रापि एकमेव विशेषणं • विशेष्यद्वये संगच्छत इति द्रष्टव्यम् । उच्चाः भूयस्यः श्रापः सलिलानि येषु ते उच्चापाः । समासान्तोऽप् प्रत्ययः । ह्रदाः जला- शयाः । उद्गताः चापाः धनूपि येषां ते उच्चापाः । क्षत्रियाश्च । वहुलाः आभाः प्रथमो गुच्छकः १६ कान्तयो यासां ताः बहुलाभाः । सस्यसंपदः सस्यानां समृद्धयः । बहवः भूयांसो लाभाः कलान्तरादयः येषां ते बहुलाभाः। वैश्या विशश्च । द्विजैः पक्षिभिः अतिनताः तद्विहारेणातिनमिताः । फलिनः शाखिनः । द्वजन्म-कर्मरूपे जाती जन्मनी येषां ते द्विजातयो ब्राह्मण-क्षत्रिय-वैश्याः। तेषु नताः नम्राः नतू- द्धताः । शूद्राः पादजाश्च । एवं चत्वारो वर्णा वर्णिताः। यत्र विभागे-'ब्राह्मणो- ऽस्य मुखमासीद्-' इति चतुर्वेदप्रसिद्धः पुरुषसूक्तमन्त्रः प्रमाणम् । प्रतिवादि- वादनिरसनपूर्विका जातिमीमांसा तु 'चातुर्वर्ण्यशिक्षाया वेददृष्टौ' द्रष्टव्या । अश्रान्ताः नवनवोन्मेषाः विक्रमाः पराक्रमाः येषां ते अश्रान्तविक्रमाः । कृषिरेषा- मस्तीति कृषीवलाः कृषकाः । 'रजः कृष्यासुतिपरिषदो वलच्' (पा० ५।२६११२) इति वलच् । 'बले' ( पा० ६।३।११८) इति दीर्घः । अश्रान्तं निरन्तरं वीनां शकु- नीनां क्रमाःक्रमणानि येषु ते अश्रान्तविक्रमाः। विटपाः पादपाभोगाश्च । सती विद्यमाना छाया अनातपो येषु ते सच्छायाः । मार्गाः पन्थानः । सताम् आचारवतां छाया कान्तिः येषु ते सच्छायाः। आश्रमाः ब्रह्मचर्यादयश्च । सदा गाः बिभ्रतीति सदागोभृतः । डुभृञ् धारणपोषणयोः । कर्तरि क्विम् । तुक् । सीमानः सीमाः । सदा आगांसि गोकत कसस्यचारणेनापराधान् बिभ्रतीति तथोक्ताः। गोपाः, गोपालाश्च । सुष्टु रुचिः शोभा येषां तथा- भूतानि राजीवानि कमलानि, तैः नमिताः सुरुचिराजीवनमिताः । तडागाः सरांसि । सुरुचिराः सुन्दराः जीवनम् इताः प्राप्ताः । इण् गतौ । क्तः । कूपाश्च । बहुभिः धान्यैः ब्रीहिभिः जुष्टाः संश्रिताः । जुषी प्रीतिसेवनयोः । क्तः । ग्रामाः । बहुधा अनेकधा। अन्यैः नानादिग्देशागतेः जुष्टाः सेविताः । मठाश्च । 'मठश्चात्रादिनिलयः' इत्यमरः । तीव्र तापमानपं हतु शीलं येषां ते तोव्रतर- पहारिणः छायाप्रधाना न्यग्रोधप्लक्षादयो वृक्षाः । शाकपार्थिवादिः। तीव्रता तैक्ष्ण्यम् अपहतु शीलं स्वभावो येषां ते तीव्रतापहारिणः । ताच्छील्ये णिनिः । प्रियंवदा इत्यर्थः । सन्तः सजनाश्च । एवंचात्र वाटिकादिविशेष्यपदानां द्वन्द्वद- शकम् विंशतिः ।।१।। यत्र च विविक्तसरयूतटाभोगः सर्वदातुलसीमवतामाधारतयाने- कधारञ्जयति ॥२०॥ यत्र चेति । विविक्तः विजनः पूतश्च सरय्वाः तटाभोगः तीरविस्तारः । कर्तृपदम् । सर्वदा सदा हरिहरादिपूजार्थं तुलसीम् अवतां रक्षताम् । आधार-
दशकएठवधम्
तया आवासत्वेन । सर्व नानासस्यं ददति वितरन्तीति सर्वदाः । अतुलाः
निरुपमाः । यथायोगं निबद्धा इति यावत् । सीमाः चतुर्दिक्काः मर्यादाः सन्ति
येपां येपु वेत्यतुलसीमवन्तः । सर्वदाश्च ते अतुलसीमवन्तश्च । विशेपणयोरपि
परस्परं विशेषणविशेष्यविवक्षया-'विशेषणं विशेष्येण बहुलम्' (पा. २।१।५७)
इति समासः । पष्टयर्थबहुव्रीहिणा मतुवर्थाभिधानेऽपि तन्निवन्धनं क्वचिन्ना-
समञ्जसम् । इह-प्रत्ययस्थात्कात्-' (पा. ७।३।४४) इति सूत्रे 'असुब्बतः' इति
भाष्यप्रयोगो नियामकः । तथाभूतानां केदाराणाम् । आधारतया आश्रयत्वेन ।
सर्वदा अतुला सीमा अण्डकोशः तद्वतां कस्तूरीमृगाणाम् । आधारतया विहार-
स्थलत्वेन । सर्व द्यन्ति खण्डयन्ति इति सर्वदाः अतुलाः अप्रतिभटाः सीमावन्तः
व्याधादयः घातुकाः । तेपाम् । आधारतया मृगयास्पदत्वेन । अनेकधा वहुधा ।
रञ्जयति प्रीणयति । अनेकाः धाराः यस्मिन् कर्मणि तद् यथा स्यात् तथा ।
जयनक्रियाविशेषणम् । जयति लोकोत्तरं वर्तते । अभिभवतीति वा । अकर्मकः
सकर्मकश्च जयतिरित्यर्थः ॥२०॥
अमन्दसौगन्ध्यतरङ्गिताभि-
मरन्दसंदोहकरम्विताभिः ।
पतत्प्रसूनोत्करवन्धुराभि-
यों भृष्यते कुञ्जपरम्पराभिः ॥२१॥
अमन्देति । यः कोसलाख्यो जनपदः । अमन्दं गाढं यत् सौगन्ध्यं सौरभ्यं
तेन तरङ्गिताभिः नीरन्ध्रिताभिः । 'तदस्य संजातं तारकादिभ्य इतच् (पा०
५।२१३६ ) इतीतच् । मरन्दानां मकरन्दानां संदोहः संचयः, तेन करम्विताभिः
संपृक्ताभिः । पतन्ति गलन्ति यानि प्रसूनानि कुसुमानि तेपाम् उत्करः संघातः
तेन वन्धुराभिः मनोहराभिः नतोन्नताभिर्वा । कुञ्जानां निकुञ्जानां लतादिपिहि-
तोदराणाम् अवस्थानानां परम्पराभिः संहतिभिः । भूष्यते अलंक्रियते । भूष-
अलंकारे । कर्मणि लट् । उपजातिवृत्तम् ।।२।।
उदारकर्माप्यनुदारकर्मा-
वनीपरागोऽप्यवनीपरागः ।
यः पाटलाभोऽप्युपशल्यरूढ-
द्रुमावलीश्यामलितश्चकास्ति ॥२२॥
प्रथमो गुच्छकः २१ ५ उदारेति । यश्च । उदाराणि प्रशस्तानि कर्माणि क्रियमाणानि यस्मि- स्तथाभूतोऽपि । न उदाराणि न प्रशंसाकर्माणि चरितानि यस्मिंस्तथोक्तः । अपिना विरोधो द्योत्यते । तत्परिहारस्तु-अनुदारम् अनुकुटुम्बिनि कर्म यस्मिन्नित्यनुदार- कर्मा। अव्ययीभावगर्भो बहुव्रीहिः । पाटला श्वेतरक्ता आभा शोभा यस्य तागपि उपशल्येषु अामान्तेषु रूढाः याः द्रुमाणां शाखिनाम् आवल्यः वीथ्यः ताभिः श्यामलितः श्यामलिमातं प्राप्तः-इति विरोधः । पाटलः श्यामलो न भव- तीत्यर्थः । विरोधनिरासस्तु-पाटलैः ब्रीहिभिः आभांति शोभते इति पाटलाभः । 'आशुव्रीहिः पाटलः स्यात्-इत्यमरः । वनीपः अवनीपोऽर्थाद् वनीपभिन्नो न भवतीति विरोधः । तत्परिहारस्तु-वनीपानां याचकानां रागः प्रीतियंत्र । धनधान्य- समृद्धत्वात् । अवनोपानां भूभुजां रागो यत्रेति । वनीम् अरण्यानीम् , अवनी भुवं च पान्तीति वनीपाः अवनीपाः । 'आतोऽनुपसर्गे कः' (पा० ३।२।३) चकास्ति दीप्यते । चकास दीप्तौ । उपजातिवृत्तम् ।।२२।। किमियता । यत्र च पुनहिमकरकरनिकरकरम्बितकुमुददलावदात- कीर्तिकर्पूरकरण्डीकृतरोदसीकास्तपस्यन्ति तपोनिधयः ॥२३॥ किमियतेति । इयता किम् । यत्र च पुनः । हिमाः शिशिराः कराः यस्य सः हिमकरः चन्द्रः, तस्य कराः किरणाः, तेषां निकरः समुदायः, तेन करम्बितानि संवलितानि यानि कुमुदानि कैरवाणि, तेषां दलवत् पत्रवद् अवदाता विशुद्धा या कीर्तिः सैव कर्पूरः नासीरः, तस्य करण्डं स्थापनपात्रम्, तत्कृता रोदसी द्यावापृथिव्योर्वपुः यैः ते तथोक्ताः । 'अभूततद्भाव-'इति च्विः । समासान्तः कप् । तपोनिधयः ऋषयो मुनयः सुकृतिनश्च । तपस्यन्ति तपांसि चरन्ति । 'कर्मणो रोमन्थतपोभ्यां वर्तिचरोः' (पा० ३।१।१५) इति क्यङ् । 'तपसः परस्मैपदं च' इति वार्तिकेन परस्मैपदम् ॥२३॥ येषां दर्शनमाशु मोहतिमिरध्वंसाय हंसायते पादाम्भोजरजाकणश्च सुमनोहर्षाय वर्षायते । ते सिद्धीकृतसिद्धयोऽपि विषयास्वादस्पृहानिःस्पृहा भूमानं कमपि स्मरन्ति सरयूक्रोडे कुटीवासिनः ॥२४॥ येषामिति । येषां तपस्यतां दर्शनम् आशु सद्यः । द्रष्टृणां मोहोऽज्ञानं स. एव आवरकत्वात् तिमिरम् अन्धकारः, तस्य ध्वंसो नाशः, तदर्थ हंसः सहस्रकिरणः २२ दशकण्ठवधम् इव आचरतीति हंसायते | उपमानपदाद् हंसात् कर्तु : आचारेऽर्थे क्यङ् । येषां च पादौ अम्भोजे इव, तयोः रजःकणः धूलिकणिका च । सुमनसां सुधियां हर्पः उल्लासः तदर्थम् । वर्षायते इति वर्पाशब्दात् पूर्ववत् क्यङ । वर्षा अपि सुमनसां पुष्पाणां हय प्रभवन्तीति श्लिष्यते । ते। सिद्धीकृताः साधनानुपङ्गण सिद्ध- पदवीं गताः । सिद्धयः अणिमादयः येषां ते तथाभूता अपि । नियमापेक्षया विपयाः शब्दस्पर्शरूपरसगन्धाः श्रोत्रत्वक्चक्षुरसतघ्राणगोचराः, तेपाम आस्वाद- स्पृहाः ग्रहणवासनाः, तासु निःस्पृहाः निष्क्रान्तगााः। अतएव सरयूक्रोडे सारवप्रान्तरे, कुटीपु पर्णशालासु वसन्ति तच्छीलाः महात्मानः । कमपि अनिर्वचनीयम् । भूमानं पारमेश्वरं महः । स्मरन्ति चिन्तयन्ति । स्पष्टोऽयमों वेदान्तदर्शने-'भूमा संप्रसादाध्युपदेशात्' (वेद० ११३८ ) इति सूत्रवृत्ति- भाष्ययोः । शार्दूलविक्रीडितं वृत्तम् ।।२४|| वातान्दोलनकेलिलोलसरयूकल्लोलमालोज्ज्वले सर्वाङ्गीणफलप्रसूनविभवव्याघूर्णमानद्रुमे । क्वापि नसुतान्तरालविकसन्नीलाम्बुजन्मोपरि क्रीडत्पटपदकान्ति किंचन महो ध्यायन्ति बद्धासनाः ॥२५॥ वातेति । बद्धं स्वस्तिकपद्मादि स्थिरसुखम् आसनं यैः तथोक्ताः महापुरुपाः। वातस्य समीरणस्य या आन्दोलनकेलिः व्यापारलीला, तया लोलाः चञ्चलाः ये सरय्याः कल्लोलाः उल्लोलाः, तेषां मालाभिः परम्पराभिः उज्ज्वले प्रकाशमाने । सर्वाङ्गाणि व्याप्नोतीति सर्वाङ्गीणः सर्वावयवसंपूर्णः। 'तत्सर्वादेः पथ्यङ्गकर्म- पत्रपात्रं व्याप्नोति' (पा० ५।२७) इति खः । सर्वाङ्गीणो यः फलप्रसूनविभवः प्रसवसंपत् , तेन ब्याघूर्णमानाः व्याजृम्भमाणाः द्रुमाः यस्मिंस्तादशि । कापि प्रदेशे । ब्रध्नस्य सूर्यस्य सुता यमुना, तस्या अन्तराले मध्ये, विकसन्ति विकस्व- राणि, नीलाम्वुजन्मानि इन्दीवराणि, तेपाम् उपरि उपरिष्टात् । क्रीडतां पट्पदानां कान्तिरिव कान्तिर्यस्य तत् । 'सप्तम्युपमानपूर्वपदस्य' इति वार्तिकेनोत्तर- पदलोपोऽत्र द्रष्टव्यः । अथवा-क्रीडन्तः खेलन्तो ये पट्पदास्तद्वत् कान्तिर्यस्य तत् । किंचन किमपि । रामात्मकं कृष्णात्मकं वा महः । तच लीलाविग्रहोपलक्षकमपि । देवानां विग्रहवत्वे-'विरोधः कर्मणीति चेन्नानेकप्रतिपत्तेर्दर्शनात्' (वे० द० ११३२७) इति वेदान्तसूत्रमपि निरूपितम् । ध्यायन्ति चिन्तयन्ति । पद्याभ्यामाभ्यां योगाभ्यासयोग्या भूमिः सूचिता । तथा च न्यायसूत्रम्-'अरण्यगुहापुलिनादिपु प्रथमोगुच्छकः २३ योगाभ्यासोपदेशः (४।२६४२) इति । शार्दूलविक्रीडितं छन्दः ।।२।। इदानीमयोध्यापुरीं वर्णयति- तत्र च यथाविधि विधीयमानवर्णाश्रमधर्मक्रियाकौशलेषु कोशलेषु मानवमरुत्वता मनुना निर्मिता द्वादशयोजनायामा त्रियोजनविस्तारा सुरा- सुरैरयोध्या अयोध्या नाम पुरी विधिकर्मावधिः सर्वसंपनिधिः ॥२६॥ तत्र चेति । विधीयन्त इति विधयः श्रौत-स्मार्च-पौराणलक्षणाः । उक्तं च- 'चोदना चोपदेशश्च विधिश्चैकार्थवाचकाः।' इति । विधीननतिक्रम्य वर्तत इति यथाविधि । यथाविधि विधीयमानाः अनुष्ठीयमानाः । वर्णानां ब्राह्मणादीनां तदन्तरप्रसूतानां च आश्रमाणां ब्रह्मचर्यादीनां तदवस्था- विशेषाणां च याः धर्मक्रियाः धर्मकर्माणि, तासां कौशलं दाक्ष्यं येषु तथाभूतेषु कोशलेषु कोशलाख्येषु जनपदेषु । देशवाचकः शब्दो बहुवचनान्तः प्रयुज्यत इति तु प्रायोवादः । मानवमरुत्त्वता मानवेन्द्र ण मनुना वैवस्वतेन निर्मिता विहिता । कारयन्नपि कर्वेव भवतीति भावः । द्वादशयोजनेत्यायामविस्तारनिरूपणे वाल्मीकीयं रामायणं मानम् । इदानीं तु सरय्वाः दक्षिणतीरमुपश्लिष्टा संकुचितैव । अस्याः दक्षिणे संनिहितप्रायैव तमसाख्या सरिनिर्जलेति । सुराश्च असुराश्च सुरासुराः, तैः । 'येषां च विरोधः शाश्वतिकः' (पा० २।४।६) इति सूत्रस्य तु नायं विषयः । देवासुरविरोधस्य नैमित्तिकत्वात् । अयोध्या योद्धमनीं । अयोध्या नाम अयोध्येति विख्यावा | पुरी नगरी। विधेब्रह्मणः कर्मावधिः कार्यसोमा । सर्वासां संपदा निधिः धानी । अस्तीत्यप्रयुज्यमानोऽपि वाक्यबलाल्लभ्यते । तिङ्सुबन्तचयो वाक्यमित्यभिधानात् ।।२६५ याक्रान्तापि सुरोत्सवैः प्रतिगृहं पावित्र्यसंदानिता दुर्वर्णाकलितापि यानवरतं चञ्चत्सुवर्णाश्चिता । या क्षोणीबलयाश्रितापि विलसन्नानाप्सरोभूपिता रज्यत्यच्छसुधासितापि परितो या रक्तवर्णोर्जिता ॥२७॥ याक्रान्तेति । या अयोध्या । गृहान् गृहान् प्रति इति प्रतिगृहम् । सुराणां मद्यानाम् उत्सवैः गोष्ठीभिः आक्रान्ता परिगता अपि । पवित्रस्य भावः पावित्र्यं शुचित्वं तेन संदानिता स्यूता । पावित्र्यं च स्वरूपतः हेतुतश्चति द्विविधम् ।
२४ दशकण्ठवधम् यथा स्वरूपतः शुद्धमपि चाण्डालान्तं हेतुतोऽशुद्धम् । इयं तु उभयतः शुद्धा । सुरासंसर्गेण आपततो दोपस्य परिहारस्तु-सुराणां देवानामिति व्याख्यानेन । या, अनवरतं नित्यम् । दुर्वर्णैः दुष्टवण: आकलिता संश्लिष्टापि । चञ्चद्भिः दीप्तिमद्भिः सुवर्णैः शोभनैः वर्णैः अञ्चिता पूजिता । अत्र दुर्वर्णा सुवर्णा न भवतीति विरोधोद्भावने-दुर्वर्णानि रजतानि, सुवर्णानि स्वर्णानि-इति व्याख्यया तत्परिहारः । या, क्षोण्याः वलयं मण्डलम् आश्रिता संगतापि । विलसन्तीभिः नाना विविधाभिः, अप्सरोभिः स्वर्गवाराङ्गनाभिः । भूपिता अलंकृता । क्षोणिपृष्ट- गताः अप्सरसो न भवन्ति, तासां भूतलस्पर्शाभावादिति .विरोधोपस्थितौ- विलसद्भिः प्रकाशमानैः, विभिः हंसादिपक्षिभिः लसद्भिः शोभनैरिति वा । नाना- प्सरोभिः अनेकैः अपप्रधानैः सरोभिः भूपिता-इति तन्निरासः । या, अच्छा निर्मला सुधा पीपूषम्, सेव सिता शुभ्रापि। रक्तो लोहितो यो वर्णो द्रव्यनिष्ठगुणः तेन ऊर्जिता प्राणिता । अर्जवलप्राणधारणे । क्तः । शुक्लवर्णा रक्तवर्णा न भवतीति विरोधे अच्छया विमलया सुधया लेपनद्रव्येण-कलीति भापाप्रसिद्धन-सिता धवला तथा-रक्ताः अनुरक्ताः वर्णा ब्राह्मणादयः, तैः अजिता उज्जीविता-इत्येवं विरोधनिराकरणमनुसंधेयम् । सर्वत्र विरोधद्योतकोऽपिः। कविसंप्रदायाद् 'या' इति सर्वनाम्नः आवृत्तिश्च । रज्यति प्रीयते । शार्दूलविक्रीडितं वृत्तम् ।।२७|| लीलालोलमरालवाललुलितव्याकोशकोशाम्बुज- श्च्योतत्स्फारपरागरागललितं व्यालोलमम्भोभरम् । विभ्राणा तरुणारुणारुणमिव प्रावारमुत्कण्ठिता यां कल्लोलभुजच्छ लेन सरयरालीमिवालिङ्गति ॥२८॥ लीलेति । लीलया खेलया लोलाः चञ्चलाः मरालानां हंसानां वालाः शावकाः, तैः लुलितानि आलोडितानि, तथा- व्याकोशाः विकचा' कोशाः पुटानि येपां तानि, अम्बुजानि । एपां विशेपणसमासः । तथाभूतेभ्यः अम्बुजेभ्यः श्च्योतन्तः गलन्तः स्फाराः भूयांसः परागाः किंजल्काः तेषां रागेण वर्णेन ललितं सुन्दरम् । व्यालोलं तरलम् अम्भसां भर पूरम् । तरुणः नवीनः अरुणःरविमण्ड- लम् , तद्वद् अरुणं लोहितं प्रावारम् उत्तरासङ्गम् इव विभ्राणां विभ्रती। उत्कण्ठिता कूलगता उत्का च । सरयू: सरयूसरित्, वयस्या च । कल्लोलाः ऊर्मयः एव भुजौ . वाहू , तच्चलेन व्याजेन | आली सखीमिव । याम् अयोध्याम् । आलिङ्गति आश्लिष्यति । शार्दूलविक्रीडितं वृत्तम् ।।२८।। , प्रथमो गुच्छकः सुधांशुशोभाजयजागरूकै- रभ्युन्नतैः स्फाटिकसौधशृङ्गः। हिमाद्रितुङ्गत्वजिगीपयेव या वर्धते विष्णुपदं श्रयन्ती ॥२६॥ सुधांश्विति । या पुरी । सुधांशोः पीयूपरश्मेः शोभा छविः, तस्याः जये पराभवे, जागरूकैः व्याप्रियमाणैः । 'जागुरूकः' (पा० ३।२।१६५) इति ऊक- प्रत्ययः । अभ्युन्नतैः अभ्रंकपैरित्यर्थः । स्फाटिकैः स्फटिकमणिनिर्मितैः । सुधालेपोऽ- स्त्येषां सौधानां हाणाम् । 'ज्योत्स्नादिभ्य उपसंख्यानम्' इति अण् । शृङ्गैः शिखरैः। हिमाद्रः हिमालयस्य, तुङ्गत्वम् उच्छायः, तस्य जिगीषया जेतुम् इच्छयेव । विष्णुपदम् आकाशम् । मेरुगतं विष्णुपुरं च । विष्णुपुराणवर्णनात् । श्रयन्ती सेवमाना। वर्धते स्फायते । वृध वृद्धौ । ब्रह्म-विष्णु-रुद्रपुराणि मेरावेव वर्णि- तानि । मेरुस्तु देवभूमितया पुराणेतिहासादौ सुप्रसिद्ध एव । इयमयोध्या तु भुवर्लोकगता । भूलोकस्तु लङ्कादक्षिणभागे। एवं भूर्भुवःस्वः संज्ञकास्त्रयो लोका भूविशेषगता एव मन्तव्याः । महरादिचत्वारो लोकास्तु भूमेरोरुपरिष्टात् । एवं विष्णुपुराणतो वेदितव्याः । यत्तु साकेतगोलोकादिव्यवस्थाऽन्यथान्यथा कल्प्यते सा तु कल्पनैवेति संक्षेपः ।।२६।। कलाकलापाकलिताकृतीनि स्थले जले व्योमनि सद्गतीनि । यथेष्टवेगानि गृहोपमानि यानानि यस्यां सततं प्लवन्ते ॥३०॥ . कलेति । यस्यां पुरि । कलाः वेदनिर्गतानि अर्थवेदरूढानि विश्वकर्मादि- शिल्पशास्त्राणि, तासां कलापाः उच्चावचविभागाः, तैः आकलिता सुनिरूप्य आपादिताः, प्राकृतयः अङ्गोपाङ्गघटनावस्थितयः येषां तानि । स्थले भूम्यादौ । जले समुद्रादौ । व्योमनि अन्तरिक्षादौ । इहादिशब्दलभ्यः पर्वत-सरिद्-द्योलोक- लक्षणोऽर्थः समुन्नेयः । तत्र कौवेरं पुष्पकं, राघवं स्यन्दनं लिङ्गमिति संक्षेपः । सत्यः अस्खलिताः गतयः गमनानि येषां तथोक्तानि । यथेष्ट यथाभिलषितं वेगो जवो येपा तानि । गृहाः उच्चावचभूमिकाः उपमा सादृश्यं येषां तानि । यान्ति
२६
दशकएठवधम्
एभिः एषु वा इति यानानि पञ्चभूतवैभवारब्धकलायन्त्रादीनि । 'करणाधिकरण-
योश्च' (पा० ३।३।११७) इति ल्युट् । सततं नक्तन्दिवम् । प्लवन्ते । प्लुङ्
गतौ । इमे उपजाती ॥३०॥
या भाति तर्कविद्यत्र प्रकाशितनवक्षणा ।
परं गुणिनि वर्वति यत्र शक्तिविलक्षणा ॥३१॥
येति । या पुरी । तर्कविद्या तर्कशास्त्रमिव प्रकाशितनवक्षणा आभाति ।
प्रकाशिताः आयोजिताः नवाः नूतनाः क्षणाः उत्सवाः यस्यां सा । -अथ
क्षणं उद्धर्षो मह उद्धव उत्सवः । इत्यमरः । तर्कविद्यापक्षे तु-नव नवसंख्याकाः
क्षणाः पाकक्षणाः यस्यां सा | स्पष्टोऽयमर्थः पीलुपिठरपाकवादावसरे-
'तत्रापि परमाणौ स्यात् पाको वैशेपिके नये ।
नैयायिकानां तु नये द्वयणुकादावपीष्यते ॥
इत्यादौ । परं यत्र । गुणिनि पौरलोके । विलक्षणा लोकोत्तरा ।
शक्तिः सामर्थ्यम् । वर्वति वरीवृतीति-इति व्यतिरेकोद्भावनम् । तर्कशास्त्रे तु-
शक्तिग्रहं व्याकरणोपमानकोशाप्तवाक्यादित्यादि विचारावसरे-'नीलादिपदानां
नीलरूपादौ नीलविशिष्टे च शक्तिः कोशेन व्युत्पाद्यते । तथापि लाघवानीला-
दावेव शक्तिः, नीलादिरूपविशिष्टे तु लक्षणैवाङ्गीक्रियते ।' इति । व्याकरणे तु-
'गुणवचनेभ्यो मतुवो लुगिष्टः' इति भिन्न व रीतिराश्रीयते । एवं गुणे शक्ति-
गुणिनि लक्षणा आस्ताम् । अस्यामयोध्यायां तु गुणिनि गुणशालिन्यपि
विलक्षणा शक्तिः प्रतीयत इति वाचोयुक्तिमात्रम् ।।३१।।
भूमयो बहिरन्तश्च कान्ताहावपरिष्कृताः ।
अश्रान्तं कम्रगोत्राणां सौहित्यं यत्र कुर्वते ॥३२॥
भूमय इति । यत्र यस्यां पुरि । कान्तैः मनोहारिभिः आहावैः निपानः ।
'आहावस्तु निपानं स्यादुपकूपजलाशये ।' इत्यमरः ! परिष्कृताः घटिताः ।
वहिभूमयः । तथा-कान्तानां कामिनीनां हावैः शृङ्गारभावक्रियाभिः, परिष्कृताः
भूपिताः । अन्तभूमयश्च । यथाक्रमं कम्रगोत्राणां । गवां समूहाः गोत्राः ।
'इनित्रकथ्यचश्च' (पा० ४।२।५१) इति सामूहिकः त्रः। स्त्रीत्वं लोकात् ।
टाप् । कम्राः शोभनाश्च ताः गोत्राश्च, तासाम् । कम्राणां कामुकानां गोत्राणि
कुलानि तेपाम् । 'कम्रः कामयिता-' इत्यमरः । अश्रान्तम् अनारतम् । सुहितस्य
भावः सौहित्यं तर्पणम् । 'सौहित्यं तर्पणं तृप्तिः' इत्यमरः । कुर्वते कुर्वन्ति ॥३२॥
प्रथमो गुच्छकः २७ यस्यां च सर्वदासारवन्तोऽन्तर्वर्षागृहा वही रक्षापुरुषाः, विश्वंभरा- परागभाजोऽन्तालका पहिर्वाहीकाः, लताङ्गीकृतहार्दाः कुसुमेषुचपल- चेतसोऽन्तर्विलासिनो बहिमिलिन्दाः, वयोविलासहारिण्यो विटपालि- परायणा अन्तर्वाणिन्यो बहिरुपबनवल्लयः, मधुपरागवन्ति परागवन्ति रागवन्ति चान्तर्वारभवनाजिराणि बहिः क्रीडाकुञ्जलतान्तराणि ॥३३॥ यस्यां चेति । यस्यां च । अन्तः अभ्यन्तरे-वर्षाणां कलायन्त्रप्रवर्तितानां गृहाः प्रालयाः । सर्वदा निरन्तरम्, न तु विश्रम्य विश्रम्य; आसारवन्तः धारा- संपातशालिनः । 'धारासंपात आसारः' इत्यमरः । बहिः प्राकाराद् बाह्यप्रदेशेषु । रक्षापुरुषाः पालकाः । सर्वदा सारवन्तः बलवन्तः इत्यर्थः। 'सारो वले स्थिरांशे च' इत्यमरः । अन्तः- बालकाः अर्भकाः । विश्वभरायाः परागान् पांसून भजन्ति इति विश्वंभरापरागभाजः। धूलिधूसरविग्रहा इत्यर्थः । बहिः बाहीकाः प्राकृताः लोकायतिकाः । बहिषष्टिलोपो ईकक् च । विश्वंभरे भगवति अपरागभाजः । अन्तः विलसन्ति तच्छीला:-विलासिनः कामुकाः । लतावद् अङ्गानि यासां ताः लताङ्गयः। सुकुमारगाव्य इत्यर्थः । लताङ्गोषु, कृतं विहितं, हाई प्रेम, यस्तै तथोक्ताः। कुसुमेषुणा पुष्पायुधेन, चपल तरलं, चेतः चित्तं, येषां ते; तथाभूताश्च । बहिः- मिलिन्दाः षट्पदाः। लतासु वल्लरीपु, अङ्गीकृतं हार्द यैस्ते । कुसुमेषु पुष्पेषु । चपलचेतसः दोलायमानमानसाश्च । अन्तः–वाणिन्यो मत्त ङ्गनाः । वयसः यौवनस्य, विलासेन कौतुकेन, हारिण्यः हृदयग्राहिण्यः । विटानां भुजङ्गाना, पालौ पङ्क्तौ, परायणाः तत्पराश्च । बहिः-उपवनवल्लर्य आरामवीरुधः । वयसां पक्षिणां, विलासेन क्रीडया, हारिण्यः हृदयंगमाः। विटपानां शाखिविस्तारपल्ल- वानाम् , आलिघु, परायणा आसक्ताश्च । मधुना, पराः उत्कृष्टाः, अगाः वृक्षाः, मधुपानां रागाश्च । तद्वन्ति । परागाः-किंजल्काः क्रीडापर्वतकाश्च । तद्वन्ति । रागाः-लोहितादयः गीतकानि च । तद्वन्ति । सर्वत्र प्राशस्त्ये मतुप् । नपुंसके बहुवचनम् । अन्तर्बहिश्च समानार्थकम् । वारस्य वेशस्य, भवनाजिराणि गृहाङ्ग- णानि। क्रीडार्थं यानि कुञ्जानि निकुञ्जानि, तेषां लतान्तराणि व्रतत्यन्तरा- लानि ॥३॥ कथमसौ नाकान्नातिरिच्यते--यतोऽमुष्यामुपप्राकारं जिष्णुकोटयः, प्रतिपण्यवीथिकं वज्रोच्चयाः, अनुधात्रि नन्दनवर्गः, गृहे गृहे रम्भाः, शासने शासने गुरवः, पदे पदे सुधर्माः ॥३४॥ । .
दशकएठवधम् कथमिति । कथमसौ कथंकारमियम् । नाकात् स्वर्गात् । नातिरिच्यते न शिप्यते-यतः-अमुष्यां नगर्याम् । प्राकारस्य वरणस्य समीपे जिष्णूनां टयः । जयन्ति अभिभवन्ति वा जिष्णवः । 'ग्लाजिस्थश्च स्नुिः (पा०३।२।१३६) ते रस्तुः । प्रतिपण्यवीथिकं हट्टविपणिपु । वज्राणां हीरकाणाम् । उच्चयाः पूगाः । नुमातृकं नन्दनानां वर्गः। गृहे गृहे प्रतिगृहम् । रम्भाः कदल्यः । शासने सिने गुरवः उपदेष्टारः । पदे पदे प्रतिस्थानम् । सुधर्माः शोभनधर्माः । स्वर्गे -एको जिष्णुः, एक वज्रम् , एक नन्दनम् , एका रम्भा अप्सराः, एको गुरुः, का सुधर्मा इति पुराणेतिहासतो व्यक्तम् ॥३४॥ चापीषु स्खटितारविन्दनिचया गञ्जासु पानप्रियाः क्रीडाशैलगुहासु मीननयना वेशेषु वेशाङ्गानाः । उद्देशेषु सरोवरा उपवनीकुञ्जेषु शृङ्गारिणो रागं पल्लवयन्ति यत्र नितरां कान्तालिविभ्राजिताः ॥३५॥ वापीष्विति । यत्र यस्मिन्नयोध्यापुरे। वापीपु दीर्घिकासु । कान्तैः गुञ्ज- दूः, अलिभिः भ्रमरैः, विभिः हंसादिपक्षिभिश्च, भ्राजिताः दीपिताः । भ्राज दीप्तौ । फुटितानां विकसितानाम् अरविन्दानां निचयाः वाताः । गञ्जासु मदिरागृहेषु । पञ्जा तु मदिरागृहम् ' इत्यमरः । कान्तः अभिमतास्वादैः, अलिभिः मद्यैः, विभ्रा- जताः विद्योतिताः । पानप्रियाः पानरसिकाः । क्रीडाशैलानां केलिपर्वतकानाम् । हासु दरीपु । कान्ताभिः स्निग्धाभिः, आलिभिः वयस्याभिः, विभ्राजिताः ष्टिताः। मीननयनाः मीनाक्ष्यः । वेशेषु वेशशालासु । कान्तानां दयितानाम् , प्राल्या पङ्क्त या, विभ्राजिताः सभाजिताः । वेशाङ्गनाः वारवधूट्यः । उद्देशेषु प्रारामादिक्रीडाप्रदेशेषु । कान्तैः रमणीयैः, प्रालिभिः सेतुभिः, विभ्राजिताः पथासंनिवेशं घटिताः । सरोवरा: क्रीडातडागप्रवराः । उपवनीकु पु उद्यान- ततागृहेषु । कान्तानां रामाणाम् , आल्या श्रेण्या, विभ्राजिताः परीताः । शृङ्गारिणः वेलासिनः । नितराम् अत्यर्थम् । रागम् अनुरागम् । पल्लवयन्ति विस्तारयन्ति । पल्लवशब्दात्–'तत्करोति तदाचप्टे' इति णिच् । एक हि विशेषणं पट्सु वेशेष्येपूपपद्यते ॥ शार्दूलविक्रीडितं वृत्तम् ।।३।। यत्र प्रासादशालामणिमयबलभीसंगताः प्रौढकान्ताः साकृतं नूतनेन्दीवरमधुररुचीन् गच्छतो बारिवाहान् ।
प्रथमो गुच्छकः २६ " . आकृष्यान्योन्यमारात् स्वचिकुरनिकुरान् स्वाङ्गलावण्यलक्ष्मीः साकं तैश्चञ्चलाभिश्चिरममरवधूसंनिभा भावयन्ति ॥३६।। यत्रेति । यत्र यस्यां पुरि । प्रासादानां सौधविशेषाणां शालासु गृहविशे- षेषु, याः मणिमय्यः रत्नप्रचुराः, वलभ्यः शिरोगृहाः, तत्र संगताः आरूढाः अमरवधूसंनिभाः देवाङ्गनाभिः सदृशाः। प्रौढकान्ताः यौवनोद्धताः युवतयः । अन्योन्यं परस्परम् । साकूतं सोत्प्रासं यथा तथा । नूतनेन्दीवरवन् मधुरा मसृणा रुचिः द्युतिः, येषां तथाभूतान् । आरात् समीपे । गच्छतः नभसि संचरतः । वारिवाहान जलदान । हस्तेनाकृष्य । तैः वारिवाहैः साकं सार्धम् । स्वस्य आत्मनः, चिकुरनिकुरान् केशपाशान् । स्वस्य, अङ्गानाम् अवयवानाम् । लावण्यलक्ष्मीः लावण्यस्य सुपमाश्च । 'मुक्ताफलेषु च्छायायास्तरलत्वमिवान्तरा । प्रतिभाति यदङ्गषु तल्लावण्यमिहोच्यते ।। इति । तथा-तद्गताभिः चञ्चलाभिः क्षणप्रभाभिश्च । चिरं चिराय । भावयन्ति मिन्वन्ति ।।३६॥ उद्यन्नीलाश्मवद्धक्षितितलविलसद्रश्मिजालप्ररोहान् प्रत्यग्रोद्भिन्नाङ्क रसहजरुचो वाञ्छतां सामिलापम् । शङ्क भास्वद्धयानां प्लवनधनजवादापतस्ताय॑वन्धु यंत्रापानूरुभावं कठिनमणिशिलाघातभग्नोरुसंधिः ॥३७॥ उद्यदिति । यत्र यस्यां पुर्याम् । तायः गरुडः । 'गरुत्मान् गरुडस्ता_-' इत्यमरः । तस्य बन्धुरग्रजःकाश्यपिः । 'सूरसूतोऽरुणोऽनूरुः काश्यपिर्गरुडाग्रजः ।' इत्यमरः । प्रत्यग्रोद्भिन्नाः अभिनवोद्गताः, ये दूर्वाख्यतृणविशेषस्य अंकुराः अभि- नवोद्भदाः । 'काण्डात्काण्डात्प्ररोहन्ती-' इति श्रुतिप्रसिद्धाः । तत्सहजरुचः तत्सो- दर्या तीन् । उद्यद्भिः स्फुरद्भिः, नीलाश्मभिः मरकतमणिभिः, बद्धं घंटितम् , यत् क्षितितलं भूपृष्ठम् , तत्र विलसन्तः उद्गच्छन्तः, ये रश्मिजालानां मरीचि- पुञ्जानाम् , प्ररोहाः कन्दलाः; तान् । साभिलाषं सतर्षम् , यथा तथा । वाञ्छताम् इच्छताम् । भास्वतः सूर्यस्य, हयानां रथाश्वानाम् । प्लवनधनजवात्-प्लवने प्रान्तरातिक्रमणे, यः घनः भूयान जवः वेगः, तद्वशात् तत्पराभवात् । आपतन् अनाधारम् भ्रश्यन् । कठिनाः कठोराः, याः मणिशिलाः रत्नप्रावाणः, ३० दशकएठवधम् तत्र यः आघातः निपातः, तेन भग्नः खण्डितः, ऊोः सक्थ्नोः, संधिः संधानं यस्य तथाभूतः सन् । अविद्यमानौ ऊरू यस्य, तस्य भावम् । अनूरुत्वमिति भावः । आप आससाद । इति शङ्के मन्ये । 'मन्ये शङ्क ध्रुवं प्रायो नूनमित्येवमादिभिः । उत्प्रेक्षा व्यज्यते शब्दैरिवशब्दोऽपि तादृशः ।।' इत्युक्तं दण्डिनः काव्यादर्श ॥३७|| फुल्लदल्लीमतल्लीवलयितविविधानोकहाहूयमान- प्रौढध्वान्ताढ्यकुञ्जोदरगतकमनद्वन्द्वनमैंकसाक्षि । यस्यामुद्यानन्दं मृदुपवनपतत्पुष्पगन्धानुगच्छ- न्माचल्लोलम्बनादद्विगुणितमदन भुञ्जते भाग्यभाजः ॥३८॥ फुल्लदिति । यस्यां पुरि । भाग्यभाजः सौभाग्यशालिनः । फुल्लन्त्यः स्फुटाः, याः वल्लीमतल्यः प्रशस्तवल्लयः। 'प्रशंसावचनैश्च' (पा० २।११६६) इति समासः । ताभिः वलयिताः वेष्टिताः, विशिष्टा विधा प्रकारो येषां तथाभूताः, ये अनोकहाः शाखिनः, तैः आहूयमानः संचीयमानः, यः प्रौढध्वान्तः गाढान्ध- कारः, तेन आढ्यं संपन्न यत् कुञ्जोदरं लतागृहान्तरम् , तद्गतं यत् कमनद्वन्द्व कामुकमिथुनम् , तस्य नर्मणः एकसाक्षि असाधारणद्रष्ट । मृदुना कोमलेन, पवनेन वायुना, पतन्ति पतनशीलानि, यानि पुष्पाणि प्रसूनानि, तेषां गन्धं सौरभ्यम् , अनुगच्छन्तः अनुसरन्तः, माद्यन्तः हर्षमाणाः, लोलम्बाः भ्रमराः, तेषां नादैः निःस्वनैः, द्विगुणितः द्वैगुण्यं नीतः, मदनः मन्मथः, यस्मिन् तथोक्तम् । उद्यानवृन्दम् आक्रीडनिकुरम्बम् । भुञ्जते सेवन्ते ।। एतानि स्रग्धरा- वृत्तानि ॥३८॥ यस्याश्चोत्तरभागे विमलतरतरङ्गरिङ्गत्प्रतिविम्बकर्तनातपतापत- प्ततपावगाहनाय कृतप्रयासैरिव, माध्यंदिननियमाय तटोपविष्टानां पट्- कर्मणामातपापनोदार्थमुद्यद्बततिवितानोपगूढविटपाभोगकैतवेन धृतातपत्र रिव, उदयास्ताचलमध्यभ्रमणशीलस्यभगवतः सप्तसप्तेः प्रान्तरसंचराति- क्रमणक्लान्तरथ्यपथ्यपाथेयार्थमनूरुशिष्टिसंपादितशष्पकूट,गरिव, पाद- पकदम्बकैरलंक्रियमाणकूला; मदमत्तराजहंसकुलकेलिपरिभ्रान्तपाठीन- पुच्छपरिवर्तनावधूतविकचपङ्करहपटलविगलन्मकरन्दविन्दुसंदोहवासित- बोया; अवगाहनावतारितमत्तमातङ्गघटाकपोलपालीश्च्योतन्मदधाराकपा- प्रथमो गुच्छकः ३१ यितकल्लोला, विविक्ततटनिहितस्फाटिकपट्टनिविष्टमहर्षिहर्षसमुदीर्यमाणो- पनिषन्निनादमधुरा; स्नानागतवालखिल्यजनजेगीयमानमुक्तस्तवस्तोमा; अभिषेकावतीर्णपौररमणीकुचकुम्भकुकुमपुञ्जपिञ्जरीक्रियमाणसलिलसंताना, दिव्यदोहददानायातनववधूवरानुगप्रकरपरस्परहर्षस्पर्धावर्धमानसंगीतवादि- त्रवाचालितपरिसरा; तटनिकटवासिनो भगवतो नागेश्वरस्याट्टहासच्छटेव कूलंकपाकारेणावस्थिता; तत्रभवतोऽरुन्धतीजानेः कीर्तिरिव स्रोतोरूपेण पेरिणता; पार्वणचन्द्रचन्द्रिकानिष्यन्दधारेव चिरसंचिता; ज्योतीरसव- सतिरिव प्रचेतसः; श्वेतचन्दनललाटिकेव भुवः; मुकुरफलिकेव कुबेरक- कुभः; वैकुण्ठकन्येव कमलोपभोगमुदितमधुसूदननादनन्दिता; वह्निका- प्ठेव पुण्डरीकमण्डिता; नरवाहनसंसदिय प्रकटशङ्खपद्ममकरकच्छपा; सभङ्गाप्यभङ्गा; वसिष्ठतनया भगवती सरयूर्वहति ॥३६॥ यस्या इति । यस्याः दक्षिणायाश्च । उत्तरभागे उत्तरस्यां दिशि । सरयूः तन्नाम्नी सुप्रसिद्धा नदी। वति समुच्छलतीति व्यवहितेनान्वयः । किं विशिष्टा सेत्यपेक्षायाम्- विमलतरतरङ्गषु शुद्धोमिषु, रिङ्गन्ति मूर्छन्ति, प्रतिबिम्बानि प्रतिच्छायाः येषाम् , तथाभूतैः । वैकर्तनातपस्य सौरोद्योतस्य, तापेन संज्वरेण, तप्ततया प्लुष्ट- तया। अवगाहनाय मजनाय । कृतप्रयासैः विहितप्रयत्नैः, इव । माध्यंदिननिय- माय माध्याह्निकानुष्टानाय । तटोपविष्टानां तीरे निषण्णानाम् । षट्कर्मणाम्- षट् कर्माणि वेदाध्ययनाध्यापनादीनि येषां तेषाम्-अग्रजन्मनाम् । आतपापनो- दार्थ निदाघवारणाय । उद्यद्भिः, व्रतत्तीनां वल्लरीणां-वितानैः विस्तारैः उपगूढानां वेष्टितानां विटपाभोगानां काण्डशाखापल्लवपत्रपुष्पफलसंपदां-कैतवेन व्याजेन । धृतातपत्रैः गृहीतच्छत्रैः, इव । उदयास्ताचलयोः मध्ये भ्रमणशीलस्य ! भगवतः सप्तसप्तेः सप्ताश्वस्य । प्रान्तरसंचरस्य दूरशून्यस्याध्वनः, अतिक्रमणेन उल्लङ्घनेन क्लान्ताः श्रान्ताः, ये रथ्याः रथस्य वोढारः अश्वाः । 'तद्वहति रथयुगप्रासङ्गम्' (पा० ४।४।७६) इति यत् । पथ्यं हितम् , यत् पाथेयं पथि साधु । 'पथ्यतिथिव- सतिस्वपतेर्ड' (पा० ४।४।१०४) इति ढम् । तदर्थम् । अनूरोः सूरसूतस्य, शिष्टेः आज्ञया, संपादितैः संचितैः, शष्पकूटानां बालतृणपुञ्जानाम् , शृङ्गः ३२ दशकण्ठवधम् शिखरैः, इव ।' पादपकदम्बकैः वृक्षवातैः । अलंक्रियमाणानि भूष्यमाणानि, कूलानि तीराणि यस्याः, तथाभूता | मदेन मत्तानि, यानि राजहंसानां हसविशे- पाणाम् , कुलानि यूथानि, तेषां केलिभिः क्रीडाभिः, परिभ्रान्ताः ये पाठीनाः मत्स्यभेदाः, तेषां पुच्छपरिवर्तनेन पुच्छान्दोलनेन, अवधूतानि कम्पितानि यानि विकचानि स्फुटितानि, पङ्कहाणां पङ्कजानां पटलानि, तेभ्यः विगलतां क्षरताम् , मकरन्दविन्दूनां संदोहै, वासितानि अधिवासितानि, तोयानि यस्याः तथोक्ता । अवगाहनाय मन्जनाय, अवतारिताः हस्तिपकैः प्रापिताः, याः मत्तमातङ्गघटाः गन्धगजयूथानि, तासां कपोलपालीभ्यः गण्डस्थलीभ्यः । 'प्रशंसावचनैश्च' (पा० २११६६) इति समासः ( श्च्योतन्तीभिः नरन्तीभिः, मदधाराभिः दान- लेखाभिः, कषायिताः तिक्ताः, कल्लोलाः ऊर्मयः यस्याः तथोक्ता । विविक्त विजन- पूते, तटे निहितः निक्षिप्तः, यः स्फाटिकपट्टः स्फटिकशिलातलम् , तत्र निविष्टाः उपविष्टाः, ये महर्पयः, तैः हर्पण समुदीर्यमाणानां स्वरव्यक्तिपुरस्सर पठ्यमानानाम् उपनिपदा निनादैः रावैः, मधुरा रुचिरा । स्नानाय आगताः, ये वालखिल्यजनाः मुनिविशेपाः, तैः जेगीयमानाः पापघ्यमानाः, सूक्तस्तवानां स्तोमाः समुदायाः यस्याम् , तथाभूता । अभिपेकाय अवगाहनाय, अवतीर्णाः कृतावतरणाः, याः पौराः पुरभवाः रमण्यः, तासां कुचकुम्भयोः । 'स्तनादीनां द्वित्वविशिष्टा जातिः प्रायेण' (वामसू. ११५।१७ इति वामनः । कुकुमपुजेन कश्मीरजन्यकेशरपरागस्तोमेन, पिञ्जरीक्रियमाणः सलिलसंतानः वारिपूरः यस्याः, तथाभूता । 'पिञ्जरः पीतरक्ताभः' इति । दिव्यदोहददानार्थम् आयाताः, ये नववधूवरयोः अनुगप्रकराः सहचारि- वर्गाः, तेपां परस्परहर्पस्पर्धाभिः वर्धमानः संगीतैः- 'धातुमातुसमायुक्त गीतमित्युच्यते बुधैः । तत्र नादात्मको धातुर्मातुरक्षरसंचयः ।।' इत्यादिनिरूपितैः । वादिनः ततानद्धशुपिरधनादिभिः पातोद्यपदाभिलप्यः, वाचालितः मुखरितः, परिसरः यस्याः, तथाभूता । तटनिकटवासिनः समीपवसतेः । भगवतः सकलसिद्धिसद्मनः । नागेश्वरस्य तदाख्यज्योति गस्य । '... 'नागेशं दारुकावने ।' (शिवपु० ज्ञानसं० ३८ अ० १६ श्लो) इति पुराणवचनात् । अट्टहासच्छटेव हसितराशिरिव । कूलंकपाकारेण नदीरूपेण | अवस्थिता । हासः श्वेत इति कविसमयः । तथा चोक्तं साहित्यदर्पणे सप्तमपरिच्छेदे- 'मालिन्यं व्योग्नि पापे, यशसि धरलता वय॑ते हासकीयो रक्तौ च क्रोधरागौ, सरिदुदधिगतं पङ्कजेन्दीवरादि ।'
प्रथमो गुच्छकः ३३ , इत्यादि । तत्रभवतः पूज्यस्य । अरुन्धतीजानेः वसिष्ठस्य | कीर्तिरिव समज्ञेव । स्रोतोरूपेण प्रवाहाकारेण, परिणता। पार्वणस्य पार्विकस्य, चन्द्रस्य इन्दोः, चन्द्रिकानिष्यन्दधारेव ज्योत्स्नाप्रवाहपारम्परीव । चिरसंचिता चिराय राशीकृता । ज्योतीरसस्य स्फटिकमणेः, वसतिः अवस्थानम् , इव । प्रचेतसः वरुणस्य । श्वेत- चन्दनस्य मलयजस्य, ललाटिका ललाटभूपणम् , इव । 'कर्णललाटात्कनलंकारे' (पा० ४।३।३५) इति कन् । भुवः भूदेव्याः । मुकुरफलिकेव दर्पणविम्बमिव । कुवेरककुभः धनददिशः । दिशो विभुत्वेन सर्वगतत्वेऽपि विन्ध्यावधिकल्पनया तथात्वाख्यानम् । वैकुण्ठस्य, कक्ष्येव प्रासादप्रकोष्ठ इव । कमलायाः इन्दिरायाः उपभोगेन; अन्यत्र, कमलानां वारिरुहाम् , उपभोगेन संचरणेन, मुदितः प्रसन्नः यः मधुसूदनः नारायणः, परत्र, ये मधुसूदनाः मधुलिहः, तन्नादेन, नन्दिता समृद्धा । वह्निकाष्टा आग्न यीदिग् , इव। पुण्डरीकेण तन्नाम्ना दिक्कुञ्जरेण; अन्यत्र, पुण्डरीकैः सिताम्भोजैः, मण्डिता भूपिता । नरवाहनस्य धनदस्य, संसत् सभा, इव । प्रकटाः आविर्भूताः, शङ्खा-पद्म-मकर-कच्छपाख्याः निधिविशेषाः यस्याम् , तथाभूता परत्र, प्रकटाः रिङ्गन्तः, शङ्खाः पद्मानि, मकराः कच्छपाः, तदाख्यवस्तूनि यस्याम् तथोक्ता । सभङ्गा भङ्ग प्राप्ता, अभङ्गा भङ्गन रहिता, न स्याद् । अपिः विरोधे । परिहारे तु-भङ्गः तरङ्गः सह वर्तमाना सभङ्गा । अथ अभङ्गा, गङ्गायमुनादिरिव नानोपद्रवेण वर्जिता । वसिष्ठस्य तनया वासिष्ठीति जोर्जाह्नवीव पुराणेतिहास- प्रसिद्धा । अत्र मामकं पद्यम्- 'अश्रान्त तव संनिधौ निवसतः कूलेषु विश्राम्यतः पानीयं पिबतः क्रियां कलयतस्तत्त्वं परं ध्यायतः । उद्यत्प्रेमतरङ्गभंगुरदृशा वीचिच्छटां पश्यतो दीनत्राणपरे ! ममेदमयतां वासिष्ठि ! शिष्टं वयः ॥३॥' (सरयूसुधा) इति । भगवती रूपान्तरग्रहणक्षमा, न तु वारिरूपैव ॥३६॥ मजन्नागरनायिकाकुचघटीसंघभग्नीभव- त्पुष्प्यत्सारवशुक्लकृष्णकमलारण्यस्य पत्रव्रजः। जङ्घालो मरुता निरन्तरमहो यो व्योम्नि संकीर्यते. . मुग्धास्तं कलयन्ति तारकततीप्रत्युप्तनीलाम्बरम् ॥४०॥ मज्जनागरेति । मजन्तीनाम् अवगाहमानानाम् , नागरनायिकानां पौररमणीनाम् , कुचघटीसंघट्टेन स्तनकलशावमर्दैन, भग्नीभवन्ति त्रुट्यन्ति, ,
,
३४
दशकएठवधम्
पुष्प्यन्ति विकस्वराणि, सारवाणि सरय्वां भवानि, यानि शुक्लकृष्णकमलानि
पुण्डरीकेन्दीवराणि, तेषाम् अरण्यस्य काननस्य । पत्राणां दलानाम्, व्रजः जातः ।
जङ्घालः वेगवान् , अर्थात् मरुता दिक्षु विदिक्षु विक्षिप्तः ! यः व्योनि मरुता निर-
न्तरं संकीर्यते विकीर्यते । मुग्धाः भ्रान्ताः । तं तारकानां नक्षत्राणाम् , ततीभिः
पङ्क्तिभिः, प्रत्युप्तं घटितम् , नीलाम्बरं नीलं नमः । कलयन्ति जानन्ति । अहो
आश्चर्यम् । शार्दूलविक्रीडितं छन्दः ॥४०॥ इति पुरीवर्णनम् ।
तामध्युवास रुचिरां कुलराजधानी
भूवासवो दशरथः श्रु तपारदृश्वा ।
लेभे यमात्मजतया जगदुदिधीरे-
नारायणः प्रकृतिपूरुपयोः परस्तात् ॥४१॥
तामिति । भुवः भूपृष्ठस्य, वासवः इन्द्रः । श्रुतानां शास्त्राणां, पारम् अन्तं
दृष्टवान् । शेः वनिप् । 'दशरथः' इत्याख्यः, दिलीपस्य प्रपौत्रः, रघोः पौत्रः,
अजस्य पुत्रः । तां वर्णिताम् । रुचिरां मनोरमाम् । कुलस्य मन्वादिसंतानस्य, राज-
धानी राजशासनास्थानीम् । अध्युवास अधिवसतिस्म । 'उपान्वध्यावसः
(पा० १।४।४८ ) इति आधारस्य कर्मत्वम् । प्रकृतिः मूलप्रकृतिः, पूरुपः साक्षी ।
'मूलप्रकृतिरविकृतिर्महदाद्याः प्रकृतिविकृतयः सप्त ।
षोडशकस्तु विकारो न प्रकृतिर्न विकृतिः पुरुषः ॥' (सांख्यका०३.)
इत्यादिना व्युत्पादितौ प्रकृति-पुरुपपदार्थों, तयोः । परस्तात् परः । सर्वपुरुषयो-
निरित्यर्थः। जगतो लोकस्य, उदिधीपुः । उत्पूर्वाद् दधातेः सन्नन्ताद् उप्रत्ययः ।
नारायण:-
-
'आपो नारा इति प्रोक्ता आपो वै नरसूनवः ।
ता यदस्यायनं पूर्व तेन नारायणः स्मृतः ।।'
इत्युक्तः । आत्मजतया अपत्यत्वेन । यं सुकृतिनं दशरथम् । लेभे प्राप्तवान् ।
स्वेच्छयैव नान्यजनसाधारण्येन । यं लब्ध्वा प्रादुर्वभूव इति तात्पर्यम् । वसन्त-
तिलकावृत्तम् । उक्तं च पिङ्गलसूत्रे-
वसन्ततिलका त्भौ जो गौ ।' (पिङ्गलसू० अ०७८)
यस्य पादे तकारभकारौ जकारौ गकारौ च तद्वृत्तं वसन्ततिलकोत्युच्यत इत्यर्थः ।
एवमग्रेऽपि ॥४॥
प्रथमो गुच्छकः ३५ , येनान्वभाषि भुवनान्तरजृम्भमाण- कीर्तिप्रतापभरसौरभभास्वरेण । अस्तोपसर्गमधिकद्धिं समृद्धभावं राजप्रजाप्रणयवन्धननन्दनश्रीः ॥४२।। येनेति । भुवनान्तरेषु लोकान्तरेषु; जृम्भमाणौ जागरूको, यौ कीर्ति- प्रतापौ यश ओजसी, तयोः भरः प्राग्भारः, स एव विमलावदानजन्यतया सौरभं सौगन्ध्यम् , तेन भास्वरेण प्रकाशमानेन । भासतेः कर्तरि वरच् । येन दशरथेन । अस्ताः नष्टाः, उपसर्गाः, यस्मिन् कर्मणि । तथा अधिका अभिला- पातिशायिनी, ऋद्धिः संपत् यस्मिन् कर्मणि । तथा समृद्धाः उदाराः, भावाः पदार्थाः, यस्मिन् कर्मणि । तद् यथा स्यात् तथा । राज्ञः रञ्जकस्य स्वामिनः, प्रजानां प्रकर्षेण जायमानानाम् ,. यत् प्रणयवन्धनं परस्परप्रीतिशृङ्खला, तदेव नन्दनं महेन्द्रोद्यानम् , तस्य श्रीः इव श्रीः, काचित् सौभाग्यलक्ष्मीः। अन्वभाषि अनुपूर्वाद् भाषेः कर्मणि लुङ् ॥४२॥ यस्यौजस्तपनः सपत्नसुदृशामाविश्य चेतस्यरं तत्रत्यां सुखसाधनी सरसतां संशोण्य चक्रे पुनः । नेत्रद्वारपतत्पयोझरमिषार्पोदयं तादृशं यं चीक्ष्य स्मितहसमण्डलमगान्मुश्चत्तदास्याम्बुजम् ॥४३॥ यस्येति । यस्य राज्ञो दशरथस्य । ओजः प्रताप एव तापकत्वात् तपनः उष्णधामा । सपत्नसुदृशां वैरिस्त्रीणाम् । अरं द्रुतम् , चेतसि मानसे । आविश्य संक्रम्य । तत्रत्यां तत्रभवाम् । सुखसाधनी संतोषावहाम् । सरसतां सारस्यम् । संशोष्य खिलीकृत्य । पुनः-नेत्रद्वाराभ्याम् अक्षिवमभ्याम् , पततो गलतः, पयोझ रस्य अश्रुप्रवाहस्य, मिषाद् व्याजात् । तादृशं तथाभूतम् । वर्षोदयं जलदागमम् । चक्रे कृतवान् । यं वीक्ष्य अवलोक्य । तासां सपत्नसुदृशाम् , आस्याम्बुजं मुखार- विन्दम् । मुञ्चत् जहत् । स्मितमेव हंसमण्डलं मरालकुलम् । अगात् अंयासीत् । इणो लुङि गाङादेशे रूपम् ।।४।। नाविद्वान्न शठो न कैतवपरो नाम्नायसिद्धान्तभि- मानेकागमभेदभिन्नहृदयो न द्रोहदग्धाशयः ।
३६ ३ दशकण्ठवधम् नो सत्कारपराङ्मुखो न विधुरो लोको व्यलोकि क्वचि- द्यस्मिन्नात्मजनिर्विशेषमवनीनाथे प्रजा रक्षति ॥४४|| - नेति । यस्मिन् दशरथे। अवनीनाथे वसुधाधिपे । आत्मजेभ्यः अप- त्येभ्यः, निर्गतः विशेषः तरतमभावो यस्मिन् कर्मणि तद् यथा स्यात् तथा । प्रजाः जनान् । रक्षति पालयति सति । क्वचित् कापि राष्ट्र । अविद्वान् अज्ञः । लोकः न व्यलोकि नो ऐति । एवं कचित् शठः- 'प्रियं वक्ति पुरोऽन्यत्र विप्रियं कुरुते भृशम् । व्यक्तापराधचेष्टश्च शठोऽयं कथितो बुधैः ।।' इति विष्णुपुराणोक्तलक्षणलक्षितः । एवम्- 'मनसा वचसा यश्च श्यते कार्यतत्परः । कर्मणा विपरीतश्च स शठः सद्भिरुच्यते ।।' इति शब्दार्थचिन्तामणिनिरूपितश्च लोको न । कितवस्य खलस्य कर्म कैतवम् । तत्र परः परायणो लोको न । आम्नायस्य निगमागमस्य, सिद्धान्तम् उपादेयप्रमेयम्, भिनत्ति खण्डयति, इति आम्नायसिद्धान्तभिद् लोको न । तथा च रामायणम्- 'तस्य संदिदिहे बुद्धिमुहुः सीतां निरीक्ष्य च । आम्नायानामयोगेन विद्यां प्रशिथिलामिव ।।' इति । अनेकेपां नानाप्रकाराणाम्, आगमानां शास्त्राणां, भेदैः प्रक्रियाभेदैः, भिन्न दोलायमानमिति यावत् । हृदयं मानसं यस्य ताहक लोको न । द्रोहेण जिघांसया, दग्धः हतः आशयो वासना यस्य तथोक्तः लोको न । सत्कारः आगतस्वागतम् । तच्च- 'तृणानि भूमिरुदकं वाक् चतुर्थी च सूनृता । एतान्यपि सतां गेहे नोच्छिद्यन्ते कदाचन ॥' इत्यवधिकः । तत्र पराङ्मुखो विरतंव्यापारो लोको न । इहेदं तत्त्वम्- 'प्रियप्राया वृत्तिविनयमधुरो वाचि नियमः प्रकृत्या कल्याणी मतिरनवगीतः परिचयः । पुरो वा पश्चाद् वा तदिदमविपर्यासितरसं रहस्यं साधूनामनुपधि विशुद्धं विजयते ।। भेदं प्राप्तम् , प्रथमो गुच्छकः ३७ इति । विधुरो इतिकर्तव्यताविकलो लोको न । 'व्यलोकि' इति सर्वत्रान्वेति ॥४४॥ .. यस्मिंश्च चक्रवर्तिनि प्रकृति पालयति, छलप्रसङ्गो न्याये, न व्य- वहारे; पदाथकल्पनालाघवं वैशेपिके, न प्राघुणिकसत्कार; विकारोदयः सांख्ये, न संख्यावन्मानसे; प्राणनिग्रहो योगे, न नियोगे; आर्थी- भावना मीमांसायाम्, न नैष्ठिकेपुः मायावादो वेदान्ते, न प्रजासु; प्रत्ययलोपो व्याकरणे, न प्रतिज्ञातप्रदाने; परगुणच्छेदो ज्याचाफ- गणिते, न वाकोवाक्ये; अलंकाराकलन साहित्ये, नाक्षदर्शके; कृष्ण- चरितं पुराणे न नागरेऽश्रावि ॥४॥ यस्मिन्निति । यस्मिंश्च दशरथे । चक्रे भूमण्डले राजमण्डले वर्तितुं वा चक्रं सैन्यं वर्तयितुं शीलमस्येति चक्रवर्ती। 'सुष्यजातौ णिनिस्ताच्छील्ये' (पा० सू० ३।२।७८) अवश्यं चक्रं वर्तयतीति तु-आवश्यके णिनिः । तस्मिन् चक्रवर्तिनि सार्वभौमे । प्रकृति प्रजामण्डलं पालयति रक्षति सति । छलस्य चतु- र्दशस्य पदार्थस्य, प्रसङ्गः प्रसञ्जनम् । न्याय प्रमाणादिषोडशपदार्थीप्रतिपादके गौतमोपज्ञे दर्शने । न व्यवहारे-अष्टादशधा विभक्त व्यवहारपदे छलं कपटमिति । पदार्थानां पारिभाषिकाणां कल्पनया लाघवं तन्त्रान्तरापेक्षया गौरवनिरासः । वैशेषिके सप्तपदार्थीप्रतिपादके कणादोपज्ञे दर्शने । न प्राघुणिकानाम् आगन्तु- कानां सत्कारे शुश्रूपायां पदस्य व्यवसितादेः अर्थस्य धनस्य कल्पनायां योजने लाघवं संकोच इति । विकारस्य षोडशकगणस्य उदयः उद्गमः सांख्ये कपिलोपत्रे दर्शने । न संख्यावतां पण्डितानां मानसे हृदयक्रोडे विकारस्य कामादिषर्मि- विकृतेरुदय इति । प्राणानाम् असूनां निरोधो योगे पातञ्जलदर्शने । न नियोगे राजकीयाज्ञायां प्राणानां निग्रहो बाध इति । आर्थी लिङाधु पस्थाप्या भावना प्रवर्तना मीमांसायां त्रयीव्यवस्थापकशास्त्रे जैमिनिसंकलिते । न नैष्ठिकेषु ब्रह्म- चारिविशेषेषु आर्थी धनसंबन्धिनी भावना चिन्तेति । मायायाः वादः अवतारः अस्मान्मायी सृजते विश्वमेतदित्यादिप्रक्रियाप्रपञ्चिते वेदान्ते उपनिषत्प्रमाणे शास्त्रे पाराशर्यसंकलिते। न प्रजासु प्रकृतौ मायया वादो व्यवहारकल्पनेति । प्रत्ययस्य स्वादेः लोपः अदर्शनं व्याकरणे पाणिनितन्त्रे। न प्रतिज्ञातस्य वस्तुनः प्रदाने वितरणे प्रत्ययस्य विश्वासस्य लोपः खिलीकार इति । परगुणः राशित्रयस्य . .
३८ दशकण्ठवधम् ज्याछेदो हरः। परगुणच्छेद इति व्यवहारो ज्योतिपसिद्धान्तस्कंधे सूर्यसिद्धा- न्तादौ । न वाकोवाक्ये उक्तिप्रत्युक्तिप्रस्तावे परेपां पराणां वा गुणानां छेदः खण्डनमिति । अलंकाराणां शब्दार्थोभयलक्षणानां भावकरणव्युत्पन्नानाम् आक- लनं मीमांसनं साहित्ये काव्यप्रकाशादिसाहित्यशास्त्रे । न अक्षदर्शके व्यावहा- रिकपदे अलं कारायाः बन्धनालयस्य कलनम् अभियुक्तकृते विवेचनमिति । कृष्णस्य भगवतो देवकीनन्दनस्य चरितमितिवृत्तं पुराणे ब्राह्मादौ । न नागरे पौरे कस्यचिदपि कृष्णं मलीमसं चरितं वृत्तमिति । 'अश्रावि' इति प्रत्येकमन्वेति । शृणोतेः कर्मणि लुङ् ॥४॥ यस्य च कनकलतिकेव न कठोरा, तारकेव न वासरधूसरा, क्षण- प्रमेव न क्षणप्रभा, तरङ्गिणी लावण्यपूराणां, जन्मजगती मदनविभ्र- माणां, चन्द्रशाला सुकृतविलासानां, रोहणस्थली पातिव्रत्यमाणिक्यानां, कौसल्या कैकेयी सुमित्रेति परस्परानुग्रहा वेदत्रयीव धामत्रयीव लोक- त्रयीव महिपीत्रय्यासीत् । यस्येति । यस्य च राज्ञो दशरथस्य । कनकलतिकेव स्वर्णवल्लीव न कठोरा न कठिना शरीरतः स्वभावतश्च । कनकलतिका तूभयतस्तादशीति व्यतिरेकः । एवं तारकेव न वासरधूसरा, केवलं नक्तमेव जाग्रती अपितु नक्तंदिवं प्रकाशमाना। क्षणप्रभेव चपलेव न क्षणप्रभा किंतु स्थिरकान्तिः । तरङ्गिणी स्रोतस्वती, लावण्यं प्राग्व्याख्यातं तत्पूराणां प्रवाहाणाम् । जन्मजगती उत्पत्तिस्थानं मदनविभ्रमाणां मन्मथविलासानाम् । चन्द्रशाला शिरोगृहं सुकृतविलासानां पुण्यपरिष्काराणाम् । रोहणस्थली जन्मभूमिः । पतिः व्रतं अस्याः पत्यो व्रतं अस्या इति वा पतिव्रता । . सा च-- 'आर्ते मुदिता हृष्टे प्रोपिते मलिना कृशा । मृते म्रियेत या पत्यौ साध्वी ज्ञेया पतिव्रता ।। सुप्ते पश्चाच या शेते पूर्वमेव प्रबुध्यते । नान्यं कामयते चित्ते सा स्त्री ज्ञेया पतिव्रता ।।' एवंभूता । तस्याः भाव एव माणिक्यानि रत्नविशेपाः तेपाम् । कोसलस्य राज्ञः अपत्यं स्त्री कौसल्या । 'वृद्धकोसलाजादायक ( पा० सू० ४।१।१७१) 'यङश्चाप्' (पा० सू० ४।१।७४ ) सूत्रनिर्देशात् कोसलशब्दो दन्त्यसकारमध्यः ।
प्रथमो गुच्छकः ३६ केकयस्य राज्ञोऽपत्यं स्त्री कैकेयी । 'जनपदशब्दात्क्षत्रियाद' (पा० सू० ४।१।१६८ ) केकयमित्रयुप्रलयानां यादेरियः' (पा० सू० ७।३।२) 'टिड्ढाणद्ध- यसज्दन्नमात्रच्तयष्ठकठकक्करपः' (पा० सू० ४।१।१५) इति ङीप् । सुमित्रा शोभनं मित्रं यस्याः सेति समासः । शोभनेन मित्रेण सहितेति वा । शोभनत्वं च दाम्पत्यरूपेण मधुरसंबन्धेन इति । परस्परेषां परस्परेषु वा अनुग्रहः यस्याः तथाभूता । वेदानां ऋग्यजुःसामाथर्वणां त्रयीव । त्रयोऽवयवाः ऋग्यजुःसाम- लक्षणाः यस्याः सा त्रयी। आथर्वणेऽपि रचनात्रैविध्यस्य सत्त्वान्नाव्याप्तिरिति सूक्ष्मेक्षिकया द्रष्टव्यम् । धाम्नां सौरचान्द्रमसाग्नेयानां त्रयीव । लोकानां भूर्भुवः स्वर्लक्षणानां भूम्यन्तरिक्षदिव्यानां वा श्रुतिस्मृतिप्रसिद्धानां त्रयीव । महिषीणां कृताभिपेकाणां त्रयी । आसीत् । अस्तेः कर्तरि लङ् । अभवत् ।।४६।। यथासमयमुपासितामपि निष्फलव्यवसितां गार्हस्थ्यगहोमयीमित्र महिपीत्रयीं चिन्तयमाने चिन्तापरिष्यन्दमन्दिमानमुपेयुपि पुत्रार्थमश्व- मेधक्रतुमाचरितुकामे भूशतक्रतो मन्त्रिमतल्लिका सुमन्त्रोऽमुष्मै- 'देव ! किमुत्ताम्यांस, अवग्रहग्रहनिगृहीतेषु राज्ञो रोमपादस्य जनपदेष्वङ्गषु सुधाधारानुकारया वृष्टिसृष्ट्या दृष्टब्रह्मवर्चसमहिम्नः शान्तासखस्य विभाण्डकसूनोऋष्यशृङ्गस्य प्रभावेण तव पुत्रा जनिष्यन्ते।' इति भावत्सनत्कुमारकथितं पुराणवृत्तं कथयांचक्रे । सोऽपि सुमना यियक्षन् वसिष्ठशिष्टयाऽनेष्ट रोमपादजामातरं सशान्तादार वैभाण्डकि महातेजसमयोध्यामलंकृताम् ।।४७|| यथेति । यथासमयं यथा ऋतुकालम् । उपासितां निषेविताम् अपि । निष्फलम् अष्टप्रसवं व्यवसितं प्रयतनं यस्यां तथोक्ताम् । गृहस्थस्य कर्म गार्हस्थ्यं तदेव शोच्यत्वात् गर्दा, तन्मयीमिव । महिषीणां राज्ञीनां त्रयीम् । चिन्तयमाने अनुशोचति । चिन्ता अनपत्यंताजन्यव्यथेत्यर्थः । तस्याः परिष्यन्देन प्रस्त्रवणेन मन्दिमानं मन्दताम् । उपेयुषि गतवति । पुत्रार्थं संतानाय | अश्वमेधक्रतुतदाख्य श्रौतमध्वरम् । आचरितुम् अनुष्ठातुं कामो यस्य तादृशे । भूशतक्रतौ महीन्द्र । मन्त्रिमतल्लिका प्रशस्तो मन्त्री । सुमन्त्रः अन्वर्थनामा । अमुष्मै दशरथाय -- दशकण्ठवधम् देव ! महाराज! किं किमर्थम् । उत्ताम्यसि खिद्यसे । अवग्रहो वृष्टिप्रतिवन्धः स एव ग्रहः व्यथकः, तेन निगृहीतेपु ग्रस्तेपु । राज्ञो रोमपादस्य तदाख्यनृपतेः । जनपदेषु देशेषु । अङ्गपु तदाख्येपु । सुधाधारानुकारया पीयूषपूरप्रतिमया । वृष्टिसृष्ट्या वर्षासर्गेण । दृष्टः परीक्षितः, ब्रह्मवर्चसस्य ब्राह्मण्यस्य, महिमा प्रभावः, यस्य तादृशः । शान्तासखस्य शान्तापतेः । विभाण्डकसूनोः विभाण्ड- काख्यमहर्पिपुत्रस्य । ऋष्यशृङ्गस्य ऋष्यशृङ्गनाम्नो महर्पः । प्रभावेण शुभाशंसनेन तव भवतः । पुत्राः सूनवः । जनिष्यन्ते उत्पत्स्यन्ते ।' इति इत्थंभूतम् । भगवता सनत्कुमारेण ब्रह्मतनयेन कथितम् आदिष्टम् । पुराणवृत्त चिरंतनवृत्तान्तम् । कथयांचक्रे वर्णितवान् । सोऽपि दशरथः । सुमनाः तवृत्तश्रवणेन सुमनाः हर्षमाणः । यियक्षन् यष्टुमिच्छन् । वसिष्ठशिष्टया कुल- गुरोर्वसिष्ठस्याज्ञया । रोमपादस्य जामातरम् ऋष्यशृङ्गम् । रोमपादो हि ऋष्य- शृङ्गप्रभावादभिमतां वृष्टिं समधिगत्य परितुष्टः तस्मै महर्पये स्वात्मजां शान्तां दत्तवानिति कथा रामायणादितोऽनुसंधेया। सशान्तादारं शान्तया दाराभिः सह वर्तमानम् । वैभाण्डकि विभाण्डकस्यापत्यम् ऋष्यशृङ्गम् । महातेजसं लोकोत्तर- प्रभावम् । अयोध्यां पुरम् अलंकृतां तदागमनहर्पण परिष्कृताम् । अनेष्ट आनीत- वान् ॥४७॥ ततश्च यथावसरं प्रत्यग्रोत्फुल्लपृथुलकमलिनीपटलाटोपपाटलायमा- नवाटिकापर्यन्ते, नूतनोन्निद्रसहकारमञ्जरीमधुरसास्वादमुदितमधुकरपुञ्ज- गुजितदिङ्मुखे, नैकविधविटपिविटपाभोगनियंत्पुष्पपरागपरीतसंचरे, विकचकुसुमसौरभासारनीरन्धितरोदसीके, वसन्तावतारे, सरयूत्तरतीरे यथाकल्पपरिक्लृप्तायां, प्रयत्नोपकल्पितवैतानिकसामग्रीसंभृतायां, सगौर- ववितीर्यमाणवस्तुजातायां, यथाक्रमसंपाद्यमानसवनसंतानायां, व्याप्रिय- माणऋत्विक्प्रकाण्डायां, जाज्वल्यमानाऽग्निशरणायाम्, एकविंशतियूपो- च्छायायां, यथाशासनानीताश्वरत्नपुरस्सरं पशुपरिष्कृतायां,यज्ञभूमौ, भगवद्वसिष्ठऋष्यशृङ्गादेशमनुवर्तमानो गृहीतदीक्षः सपत्नीको विरराज महाराजः ॥४॥ - तत इति । ततश्च अनन्तरम् । यथावसरं यथासमयम् । प्रत्यग्रोत्फुल्लाः प्रथमो गुच्छकः ४१ नवविकासाः, या पृथुलाः बहलाः, स्थलकमलिन्यः स्थलस्य भूपृष्ठस्य कमलिन्यः पद्मिन्यः, तासां यत् पटलं स्तोमः, तस्य आटोपेन बंहिम्ना, पाटलायमानः श्वेतर- कायमानः, वाटिकापर्यन्तो यस्मिंस्तथाभूते । नूतनोन्निद्राः नवनवोन्मेषाः, ये सहकाराः आम्रविशेषाः, तेषां साराः सर्वस्वभूताः, याः मञ्जयः कुसुमोद्गमाः, तासां मधुरसास्वादेन मकरन्दपानेन, मुदिता. मत्ताः, ये मधुकराः मधुलिहः, तेषां पुजेन प्रकरेण, गुञ्जितानि दिङमुखानि यस्मिंस्तथाभूते । नैकविधाः नानाप्रकाराः, ये विटपिनां शाखिनां, विटपाभोगाः शाखादिविभवाः, तेभ्यो निर्यन्तः निर्गच्छन्तः ये पुष्पपरागाः कुसुमरजांसि, तैः परीतः संकुलः, संचरो मार्गो यस्मिस्तथोक्त। विकचानि विकसितानि, यानि कुसुमानि प्रसूनानि, तेषां सौरभासारेण सौगन्ध्य- तरङ्गण, नीरन्धिता व्याप्ता, रोदसी द्यावापृथिव्योर्वपुः यस्मिंस्तथाभूते । वसन्तस्य पुष्पसमयस्य सुरभेः, अवतारे प्रादुर्भावे । सरय्वाः उत्तरतीरे सौम्यतटे । यथा- कल्पं श्रौतसूत्रानुसार, क्लृप्तायां संपादितायाम् । प्रयत्नैः प्रकृष्टव्यापारैः, उपकल्पिता घटिता, या वैतानिकी याज्ञिकी, सामग्री वस्तुसंभारः, तया संभृतायां परिपूर्णायाम् । सगौरवं सादरं, तत्तत्कर्मणि वितीर्यमाणं प्रतिपाद्यमानं, वस्तुजातं पदार्थसार्थों यस्यां तथोक्तायाम् । यथाक्रमं यथाकल्पं, संपाद्यमानः अनुष्ठीयमानः, सवनसंतानः यस्यां तथोक्तायाम् । तत्तत्क्रियासु व्याप्रियमाणाः नियुज्यमानाः ऋत्विक्प्रकाण्डाः प्रशस्ताः ऋत्विजः यस्यां तथोक्तायाम् । जाज्वल्यमानं प्रकाशमानम्, अग्निशरणम् अग्निशाला यस्यां तस्याम् । एकविंशतिः श्रौतवर्मना एकविंशतिसंख्याकानि यानि यूपानि काष्ठस्तम्भविशेपाः, तेषाम् उच्छ्रायः उच्छृतिः यस्यां तस्याम् । यथाशासनं यथाशास्त्रम्, आनीतम् आहृतम् , अश्वरत्नं तादृशलक्षणलक्षितः अश्वः, पुरस्सरः अग्रसरः, यस्मिन् कर्मणि तद्यथा तथा। पशुभिः कल्पोक्तैः अनेकैः परिष्कृतायां विशिष्टायाम् । यज्ञभूमौ अध्वरभुवि । भगवतोः वसिष्ठऋष्यशृङ्गयोः, आदेशम् आज्ञाम्, अनुवर्तमानः अनुरुन्धानः । गृहीता स्वीकृता, दीक्षा संयमविशेषः, येन तथाभूतः । सपत्नीकः सपाणिगृहीतीकः । महाराजः दशरथः । विरराज विरेजे ॥४॥ , ततश्च क्रमतः - "कौशल्या तं हयं तत्र परिचर्य समन्ततः । कृपाणैर्विशशासैनं त्रिभिः परमया मुदा । पतत्त्रिणा तदा सार्ध सुस्थितेन च चेतसा । अवसद्रजनीमेकामव्यग्रा धर्मकाम्यया ॥
४२ दशकण्ठवधम् होताध्वयुस्तथोद्गाता हयेन समयोजयन् । महिष्या परिवृत्त्याथ वावातामपरी तथा ।। पतत्त्रिणस्तस्य वपामुद्धृत्य नियतेन्द्रियः । ऋत्विक्परमसंपन्नः श्रपयामास शास्त्रतः ॥ धूमगन्धं वपायास्तु जिघ्रतिस्म नराधिपः । यथाकालं यथान्यायं निणु दन् पापमात्मनः ।। हयस्य यानि चाङ्गानि तानि सर्वाणि ब्राह्मणाः । अग्नौ प्रास्यन्ति विधिवत् समस्ताः पोडशविजः।।" ( इत्यापपटकम् ) ॥४६॥ ततश्चेति । ततश्च क्रमतः वैधक्रमेणेत्यर्थः । इदानी जैनवौद्धकल्पानां पिष्ट- पशुकल्पकानां ज्ञानाञ्जनशलाकायमानं वाल्मीकीयमार्पपटकमवतारयति- 'कौशल्येत्यादिना पोडशर्विजः ।।' इत्यन्तेन । 'पर्यग्निकृतानारण्यान् उत्सृजत्यहिंसाया' इति श्रौतसमयाचारात् आरएयान् पशून पर्यग्निकृतानुत्सृज्य शामित्रे विशसनकर्मणि ग्राम्याणां पशूनां यथाशास्त्रं नियोजनानन्तरमिति पूर्वेण संवन्धः। कौसल्या महिपी शामित्रप्रदेशे तं मृताश्वं समंततः परितः, परिचर्य समन्त्रकं प्रदक्षिणाप्रदक्षिणं संचार्य, कृपाणैः तिसृभिः सौवर्णीभिः सूचिभिः, एनं अश्वं परमया मुदा निरवधिकश्रद्धया विशशास संज्ञपयामास । तदा विशसनोत्तरकाले, कौसल्या धर्मकाम्यया धर्मसिद्धिसंपाद- नेच्छया। काम्यजंतादकारप्रत्यये टाप् । अव्यग्रा शवस्पर्शजनितमनोविकारशून्या पतत्त्रिणा अश्वेन साधं साकं एका रजनी रात्रिम् अवसत् अवात्सीत् । अयं -तत्तन्मन्त्रोच्चारपूर्वकं महिपी यथाविधि अश्वमुपसंगम्य प्रजनने प्रजनन संनिधायोपविष्टा । ततोऽध्वर्युः क्षोमेन वाससा महिपीमश्वं च प्रच्छा- दितवान् । सा च रेतोधानमन्त्रमामृशन्ती आग्नीधे जागरणं कुर्वती निशां निनाय । होता, अध्वर्युः, उद्गाता, तथेतिपदेन ब्रह्मणोऽप्युपसंग्रहः। महिष्या कौसल्यया परिवृत्त्या एतत्पदपरिभापितया उपेक्षितया च साकं वाचातां भोगिनी अपरां पात्रप्रदां पालाकली च राज्ञो दक्षिणार्थ परिगृह्य हस्तेन समयोजयन् रमणवत् पाणिग्राहमगृह्णन् । तथा च सूत्रम्- - भाव:- प्रथमो गुच्छकः oC 'महिषीं ब्रह्मणे ददाति, वावाता होने, परिवृत्तिमुद्रात्रे, पालाकलीमध्वर्यवे ।' इति । एतदुत्तरं आसां निष्क्रयद्रव्यदानेन पुनरादानं विधीयत इति संक्षेपः । आसां निरुक्तिस्त्वेवम्- 'कृताभिषेका महिषी परिवृत्तिरुपेक्षिता । वावाता भोगिनी पानप्रदा पालाकली मता ।।' तस्य पतत्त्रिणो अश्वस्य । 'पतत्रिपक्षितुरगावित्यमरः'। वपां वपास्थानीयां तेजनी 'नाश्वस्य वपा विद्यते' इति सूत्रात् । उद्धृत्य आदाय, नियतेन्द्रियः नियतं अव्यग्रं आन्तरं बाह्य च इन्द्रियं यस्य तथाभूतः, परमसंपन्नः परमेण प्रयोगादिसहकृतेन चातुर्येणं संपन्नः वित्तः, ऋत्विक् याजकः, शास्त्रतः शास्त्र- विहितेन विधिना, श्रपयामास पपाच । 'श्रा पाके' इत्यतः कर्तरि लिट् । ततो वपाहोमकाले नराधिपः मण्डलेश्वरो दशरथः, यथाकालं होमकालमनतिक्रम्य, यथान्यायं यथाशास्त्रं, आत्मनः पापं ज्ञाताज्ञातोभयरूपं संततिप्रतिबन्धकरं निणु दन् निवर्तयन् , हुतायाः वपायाः धूमगन्धं गन्धोद्गारिधूमसंतानं, जिघ्रतिस्म अजिघ्रत् । वपाहोमानन्तरं अङ्गहोमे चिकीर्षिते षोडशत्विजः षोडशसंख्याकाः ब्राह्मणयाजकाः, विधिवत् यथाविधानं हयस्य सर्वाण्यङ्गानि मन्त्रोच्चारपूर्वकं अग्नौ यज्ञीयाग्नौ प्रास्यन्ति होस्यन्ति । 'वर्तमानसामीप्ये वर्तमानवद्वति' लटः प्रयोगः । सर्वाणीत्यनेन सर्वस्य हुतत्वेन शेषभक्षणं नास्तीति सूचितम् । अङ्गहोम- फलं त्वेवं श्रूयते- 'अंगे अंगे वै पुरुषस्य पाप्मपोपश्लिष्टः, अंगादंगादेवनं पाप्मनस्तेन मुचतीति ।' यजमानस्य सर्वमपि पापं निवर्तत इत्याशयः । यत्तु सांप्रतं कतिपये महेच्छाः हिंसाशब्दश्रवणमात्रादेवोद्विग्नाः श्रुति-स्मृति- समयाचारसिद्धामपि याज्ञिकी पशुहिंसां प्रतिक्षिपन्तः पिष्टपशुवर्मना व्यवहतु- मीहन्ते, युक्तितदाभासविजृम्भितैश्च प्राक्तनी मर्यादा विपरिवर्तयितुमुत्सहन्ते त इह मन्त्र-ब्राह्मण-सूत्र-मीमासादिरहस्यमुग्धतया कथमिव नोपालभ्याः। नहि प्राणि- हिंसाहेतुकत्वादेव किमपि परिवर्जनीयतया प्रामाण्यकक्षामधिरोहति । एवं 'अग्नीषोमीयं पशुमालभते ।' (तै० सं० ६ कां० १ प्रपा०, ११ अनु०) तथैतत्सहधर्मिण्यः 'सप्तदश प्राजापत्यान् पशूनालभेत ।' 'कपिञ्जलानालभेत ।' इत्येवंजातीयकाः श्रुतयोऽन्यथा योजयितुं शक्यन्ते । शास्त्रविरोधात् यथारुचि- नियमासंभवात्, अनाश्वासप्रसङ्गाच्चेति सर्वं यथायथं परीक्षणीयम् । न च ४४ दशकएठवधम् ..'माणवकस्य हृदयमालभते' इत्यादि दर्शनेन तथा श्रुत्यभिप्रायः पिष्टपशुर्वेति वक्तुं पार्यते । 'अग्नये छागस्य हविपो वपाया मेदसः प्रेप्य अनुव हि वा' इत्यत्र 'प्रेष्यत्रु वोर्हविषो देवतासंप्रदाने (पा० सू० २।३।६१ ) इति सूत्रभाष्यादिनापि छागरूपस्य पशोरेव संज्ञपनस्य सिद्धत्वात् । किंच, 'अशुद्धमिति चेन्न शब्दात् ।' (ब्रह्मसू० अ० ३।२५) इति वेदान्तसूत्रमप्यत्रार्थे संवादमादधन विभावनीयमिति दिक् । स समापितमहामखः प्राची होत्रे, प्रतीचीमध्वर्यवे, उदीचीमुद्गात्रे, अवाची ब्रह्मणे च प्रादात् । ते तु न वयं स्वाध्यायाचरणप्रवणा अरण्य- शरणा धरणीं शासितुमीश्महे । तदेपा भवतैव शिष्यताम् । अस्मभ्यमद- सीयनिष्क्रयभूतं यत्किंचित्कल्प्यताम् इति सानुरोधमवादिपुः । तथोदितश्च साक्षात्कृतमन्त्रेभ्यस्तेभ्यो गवां जातरूपाणां रूपाणां च कोटीरितरे- भ्योऽपि यथाकामं प्रकामं वसु प्रदायाप्रीयत ॥५०॥ स इति । स दशरथः । समापितः पारनीतः, अश्वमेधाख्यो महामखो महाध्वरौ येन तादृक् । प्राचीम्-अयोध्यां केन्द्रीकृत्य प्राग्भूभागम् । होने हौत्रकर्मानुष्ठात्रे ऋग्वेदविदे । प्रतीची प्रत्यग्भूभागम् । अध्वर्यवे आध्वर्यवकर्मा- नुष्ठात्रे यजुर्वेदविदे। उदीचीम् उत्तरभूभागम् । उद्गात्रे औद्गात्रकर्मानुष्ठात्रे सामवेदविदे । अवाची दक्षिणभूभागं च । ब्रह्मणे ब्रह्मकर्मानुष्टाने सर्व वेदविदे आथर्वणिकाय । प्रादात् स्वस्वत्वनिवृत्तिपूर्वकं प्रायच्छन् । ते प्रधानभूताः होत्रादयः चत्वारः ऋत्विजस्तु । वयमेते स्वाध्यायाचरणेपु स्वस्वशाखाकलनेपु प्रवणाः परायणाः, अरण्यशरणाः वनवासिनः । स्वाध्यायसरक्षणार्थमेव विविक्त- वसतय इत्यर्थः । धरणीम् अवनी शासितुं पालयितुं न नो ईश्महे प्रभवामः । तत् तस्माद् एपा धरणी, चिराय परिचितेन भवता त्वयैव शिष्यताम् पाल्यताम् । अस्मभ्यम् ऋत्विग्भ्यः । अमुष्याः इदम् अदसीय निष्क्रयभूतं मूल्यत्वेन परिक- ल्पितम् । यत्किचिद् वस्तु कल्प्यताम् निरूप्यताम् । इति इत्थं सानुरोधं सप्रति- वन्धम् । अवादिपुः अकथिपुः । तथोदित उक्तश्च । साक्षात्कृतमन्त्रेभ्यः स्वायत्ती- कृतमन्त्रप्रतिपाद्य भ्यः ।, तेभ्यः ऋत्विग्भ्यः । गवां गोतल्लजानां, जातरूपाणां स्वर्णानां, रूपाणं रूप्याणां च कोटीः संख्याविशेपान् । इतरेभ्यः होत्रादिसहाय- भूतेभ्यः अन्येभ्योऽपि, यथाकामं यथेप्टं, प्रकामं भूरि, वसु द्रव्यं, प्रदाय वितीर्य, अप्रीयत अतुप्यत् ॥५०॥ , प्रथमो गुच्छकः ४५ पुनश्च विनयशालीनेन तेन पुत्रकाम्यया प्रार्थितः स भगवानृष्य- शृङ्गोऽथर्वशिरोमन्त्रैः पुत्रीयामिष्टिमकापीत् । अहो ! महर्षेः प्रभावः कियत् श्लाध्यताम् । यत्र मन्त्रव्याहारप्रादुर्भवद्दवताप्रसाददर्शनेन शब्दपूर्विका सृष्टिरिति वेदवादः पप्रथे । हहो इयतापि तावत्कथमिव न चित्रीयामहे, यदेतस्या इष्टेः पर्यवसानेन अपरिच्छिन्नोऽपि परिच्छिन्न इव कश्चिदिन्दीवरदाममञ्जिमा महिमाऽजनिष्ट ॥५१॥ पुनश्चेति । पुनश्च अपिच विनयशालीनेन नम्ररेण तेन राज्ञा पुत्रकाम्यया संतानेच्छया प्रार्थितः निवेदितः स दृष्टमहिमा भगवान् षडैश्वर्यसंपन्नः ऋष्यशृङ्गः अथर्वशिरोमन्त्रैः सद्यःफलप्रदैः अथर्ववेदोक्तैःसंतानप्रवर्तकैर्मन्त्रैः पुत्रीयां पुत्रफलिकाम्, इष्टिं यागविशेषम् । अकार्षीत् अकृत । अहो ! इत्याश्चर्ये । महर्षेः ऋष्यशृङ्गस्य । प्रभावः तपोबलम् । कियत् इयत्तया कथमिव श्लाध्यताम् प्रशस्य- ताम् । यत्र इष्टी, मन्त्रव्याहारेण मन्त्रपाठेन, प्रादुर्भवन्त्यः प्रकटीभवन्त्यः, याः देवताः मन्त्रप्रतिपाद्याः, तासां प्रसाददर्शनेन प्रसन्नतावलोकनेन । शब्दपूर्विका सृष्टिः-'भूरिति व्याहरन् भुवं ससर्ज' इत्यादिलक्षणा । इति वेदवादः वैदिक- सिद्धान्तः, स्फुटं व्यक्तम्, प्रपथे प्रथितो बभूव । हहो इत्याश्चर्ये । इयता एताव- तापि । तावद् वाक्यालंकारे । कथमिव किमिव, न नो चित्रीयामहे विस्मयामहे । यदेतस्या इष्टेः, पर्यवसानेन परिणामेन, अपरिच्छिन्नोऽपि अमेयोपि, परिच्छिन्नो मेय इव, कश्चिद् अनिर्वचनीयः । इन्दीवराणां नीलाम्बुरुहां, दाम्नः सजः इव, मञ्जिमा सौन्दर्य, यस्य तादृक् । महिमा प्रभावः । अजनिष्ट अजनि ॥५१॥ अत्रान्तरे दशमुखेन निपीड्यमाना दावानलेन विकला इव जीवसंघाः । देवाः सरोरुहभुवं पुरतो विधाय नारायणं नलिनलोचनमेतदुचुः ॥५२॥ अत्रान्तर इति । अत्रान्तरे अस्मिन्नेव यज्ञसमये । दश मुखानि आननानि, अङ्गविकारत्वात् यस्य सः तेन । निपीड्यमानाः बाध्यमानाः। देवाः इन्द्रादयः । दावानलेन दवाग्निना । वदावौ तु वनवह्नौ वनेऽप्युभौ-इति मेदिनी। विकला व्याकुलाः जीवसङ्घाः इव । पशुप्राया इत्यर्थः । सरोरुहाद् भवतीति सरोरुहभूः .
. ४६ दशकएठवधम् पद्मयोनिः । 'भुवः संज्ञान्तरयोः' (पा० सू० ३।२।१७६ ) इति कर्तरि विप् । तम् । पुरतः अग्रे। विधाय कृत्वा । नलिनलोचनं पुण्डरीकाक्षम् । नारायणं विष्णुम् । एतद् वक्ष्यमाणम् । प्रधानकर्म । ऊचुः कथयामासुः ।।२।। त्रैलोक्यनायक ! विरञ्चिवरप्रभावाद् दुःखाकरोति बहुधाद्य स रावणोऽस्मान् । तेनात्मसत्त्वमपहाय विहायसं च वर्तामहे वयमितस्तत आधिमन्तः ॥५३॥ त्रैलोक्येति । हे त्रैलोक्यनायक ! हे विश्वभर ! अद्य इदानीम्। विरचिः ब्रह्मा । ब्रह्म त्युपलक्षणम् । शिवोऽपि । तस्य वरप्रभावात् प्रसादमहिम्नः । सः पौलस्त्यः चैश्रवणः रावणः । लोकान् रावयति-इति क्रियया विश्वध्रु क् । अस्मान् वहुधा सहस्रधा । दुःखाकरोति पीडयति । 'दुःखात्प्रातिलोम्ये' (पा० सू० ५।४।६४) इति डाच् । तेन हेतुना वयम्, आधिः मानसपीडा, तद्वन्तः । आत्मनः सत्त्वं वीर्यम् । अपहाय त्यक्त्वा । विहायाः स्वर्गः तं च अपहाय । आत्मसत्त्वमिहापि अन्वयनीयम् । इतस्ततः यत्र तत्र । वर्तामहे जीवामः ॥५३॥ त्वं शासकः सकलशासनकारकाणां त्वं पालकः खलनिपीडनकातराणाम् । त्वं स्थापकः श्रुतिनिरूपितपद्धतीनां यत्र प्रयाणनिरता न खलु स्खलन्ति ॥५४|| त्वमिति । हे भगवन् ! त्वं भवान् । सकलानि समग्राणि यानि शास- नानि, निग्रहानुग्रहरूपाणि, तेपां कारकाणां कर्तृणाम्, अपि शासकः नियन्ता । असि । एवं च निमित्तमात्रेण उपेन्द्रसंज्ञां श्रयन् इन्द्रादिवाधकस्य त्वमेवानन्य- शरण इति लभ्यते । त्वं भवान् । खलाः दुरात्मानः, तेषां निपीडनेन वाधनेन, कातराणम् अधीराणाम्, पालकः रक्षकः । असि । एतत्तु गुणप्राधान्येन तवैव कर्मेति । त्वं भवान् । श्रुत्या वेदेन, निरूपिताः व्यवस्थापिताः, याः पद्धतयः मार्गाः, तासां स्थापकः व्यवस्थापकः । असि । एतदपि पूर्वोक्ता डनं, तत् स्तुतौ शोभनम् । यत्र वेदागमपद्धतिपु, प्रयाणनिरताः गमनपरायणाः, न खलु नैव, स्खलन्ति पतन्ति ।।५४|| ।
प्रथमो गुच्छकः ४७ एकोऽपि तात्विक दृशा भुवनेश ! भूयो भूयोभिरागमवचोभिरनेककोटिम् । प्रासादयन् नवनवाङ्क रमेयभङ्ग्या वाग्विभ्रमे भ्रमयसे प्रतिभाधिरूढान् ॥५॥ एक इति । हे भुवनेश ! हे जगन्नाथ ! । त्वं तात्त्विकशा परमार्थदृष्टया । एकः केवलोऽपि । भूयः पुनः । भूयोभिः बहुविधैः । आगमवचोभिः शास्त्रवाक्यैः । अनेककोटिम् नानाप्रथाम् । आसादयन् प्राप्नुवन् । प्रतिभाम् अधिरूढान् वैतण्डिकान् । वाचां वाणीनां, विभ्रम विकल्पे । नवनवाः नवप्रकाराः, अङ्क,राः उन्मेषाः येषु, तथाभूताः ये मेयाः प्रमेयाः, तेषां भङ्गया कोटिपरिष्कृत्या । भ्रमयसे मोहयसे ।।५।। पुंजातधर्मविधुरोऽपि विशिष्य ताव- न्मायां बशामतिरसादिव गृहमानः । ब्रह्माण्डसंततिममूमसृजस्तदेत- को वेद कोशपिहितं तव नाथ ! तत्वम् ।।५६॥ पुंजातेति । हे नाथ ! हे स्वामिन् ! । त्वम् । पुसि जाताः ये धर्माः कर्तृ त्वभोक्तृत्वादयः, तैः विधुरो हीनोऽपि । निर्गुणत्वादिति भावः । तावद् वाक्यालंकारे। अतिरसादिव बलवद्भोगगार्थ्यादिव । वशां स्वाधीनाम् । मायां प्रकृतिम् । विशिष्य गृहमानः आश्लिष्यन् । अमूम् एताम् । ब्रह्माण्डम् एव संततिः, ताम् । असृजः उत्पादितवानसि । पुंधर्मेण विकलः अर्थात् षण्ढोऽपि वशां वन्ध्यां मायाम् आश्लिष्य यद् ब्रह्माण्डमकार्षीः इति तात्पर्यम् । तदेतत् कोशपिहित कोशाच्छादितम् । तैत्तिरीयप्रतिपादिताः अन्नमयादि पञ्च कोशाः वेदान्तप्रसिद्धा एव । तव भवतः । तत्त्वम् रहस्यम् । को वेद वेत्ति । न कोऽपीत्यर्थः ॥५६।। हृत्कन्दराश्रयिणि विभ्रति धर्ममेघ- भावं भवत्यमृतवर्पिणि विश्वशिल्पिन् ! व्याजृम्भमाणचितिशुक्तिनिरर्गलश्री- रभ्येति मौक्तिककलामणुविन्दुरेपः ॥५७॥ .
४८ दशकण्ठवधम् हृदिति । हे विश्वशिल्पिन् विश्वस्थपते ! हृदेव कन्दरा गुहा, तदाश्रयिणि । मानसगुहाधिष्टातरीत्यर्थः । धर्ममेघभावं पातञ्जलप्रतिपादितं धर्ममेघत्वम् । विभ्रति विभ्राणे । अमृतवपिणि अमृतमुचि । भवति त्वयि जागरूके । एपः अयम् । अणुविन्दुः आणवादिमलेन संकुचत्प्रसरः । व्याजृम्भमाणा विकस्वरा, या चितिः चिदेव शुक्तिः मुक्तास्फोटः, तत्र निरर्गला संकोचविगलनेन स्वच्छन्दा श्रीः सुपमा यस्य तादृशः सन् । मौक्तिककलां जीवन्मुक्तिदशाम् । अभ्येति प्राप्नोति । आणवादिमलत्रयं तु- - 'गोपितस्वमहिम्नोऽस्य संमोहाद्विस्मृतात्मनः । यः संकोचः स एवास्मिन्नाणवो मल उच्यते ॥१॥ पटकचुकव्याप्तिवशाद्विलोपितनिजस्थितेः । भूतदेहस्थितिर्यासौ मायीयो मल उच्यते ॥२॥ यदन्तःकरणाधीनबुद्धिकर्मेन्द्रियादिभिः । वहिव्याप्रियते कार्म मलमेतस्य तन्मतम् ॥३॥ इत्युक्तमाचार्यश्रीवामदेवपादैः ।।५७।। क्रोधानलक्कथितदैवतसिद्धसाध्यः सोऽवाध्य एव सकलस्य मनुष्यवर्जम् । प्रभो ! दशरथात्मजतामुपेत्य सदयो विधेहि दशकण्ठवधेऽवधानम् ।।५८॥ क्रोधेति । क्रोध एव दाहकत्वात् अनलः ज्वलनः, तेन कथिताः विशीर्णाः । कथे निष्पाके-क्तः । देवतानि सिद्धाः साध्याश्च येन तथोक्तः। सः रावणः । अन्वर्थनामा। मनुष्यवर्ज मनुष्यं वर्जयित्वा । सकलस्य समस्तस्य । अवाध्यः वाधनानहः एव । हे प्रभो ! स्वैरिन् ! । तस्माद् हेतोः' दशरथस्य राज्ञः, आत्मजतां पुत्रभावम् । उपेत्य प्राप्य । सद्यः शीघ्रम् । दशकण्ठस्य दशग्रीवस्य, वधे हनने अवधानं प्रणिधानं विधेहि कुरुष्व । 'दशकण्ठवधे काव्ये अवधानं विधेहि' इति ध्वन्यते ।।५८|| तस्मात् भूमण्डले वयमपि द्रुतमेव युष्म- सेवाकृते विविधयोनिपु संभवामः ।
४६ प्रथमो गुच्छकः यत्र प्रकाशमधिगच्छति कल्पवृक्ष- स्तत्रैव सर्वविभवा हि परिस्फुरन्ति ॥५६॥ . ० भूमण्डल इति । हे प्रभो ! वयमपि, युष्मत्सेवाकृते युष्माकमाराधनाय । भूमण्डले भूतले । द्रुतमेव झटित्येव । विविधयोनिषु नानायोनिषु । यथोपयोगं संभवामः उत्पत्स्यामहे । हि यस्मात्, यत्र कल्पवृक्षः प्रकाशमधिगच्छति उदेति । तत्रैव सर्वविभवाः सर्वे उपयुक्ताः भावाः । परिस्फुरन्ति उद्यन्ति ।।५६।। इत्युक्तवत्सु दिविषत्सु स दीनबन्धु- नीलाचलोद्गतहिमांशुरुचिस्मिताभिः । पीयूपवर्षमधुराभिरुदारगीर्भि- राश्वास्य तान्विधुरितान्नयनातिगोऽभूत् ॥६०॥ इतीति । इति इत्थम् । उक्तवत्सु कथितवत्सु । दिविषत्सु द्यु सत्सु । सः दीनानां दुर्विधानाम् । बन्धुः बान्धवः । तान् दिविषदः । विधुरितान् विह्वलान्. । नीलाचलात् मरकताद्र, उद्गतः उदितः, यः हिमांशुः हिमकरः, तस्य रुचिवत्, कान्तिवत्, स्मितं यासु तादृशीभिः । पीयूषवर्षवत् सुधावृष्टिवत् मधुराभिः श्रवण- पेयाभिः । उदारगीभिः प्रशस्तवाग्भिः । आश्वास्य संतोष्य । नयनातिगः अन्तर्हितः । अभूत अजनिष्ट । एतानि नव वसन्ततिलकावृत्तानि ॥६०॥ ततो वैतानाद् वैश्वानरादुद्भ तो विष्वग्विसारिदीप्तिदीप्तः विग्रहवान् विभावसुरिव, नूतनस्तनयित्नुसच्छायकायो नवजवाकुसुमकान्तिवसनः शिशिरारुणरागरञ्जितमरकतशिखरीव लोहितोष्ठपल्लवः, प्रभाकरबिम्ब- किसलयितरोदसीशकलसंधिरिव स्निग्धहर्यक्षरोमसोदरश्मश्रु मूर्धजः, सौदामनीदामदन्तुरितधनाधनाभोग इव दिव्याभरणसंवीतः, सुरासुरसंघर्ष इव सुलक्षणोऽपि विलक्षणः, दुन्दुभिस्वानगभीरया गिरात्मानं प्राजा- पत्यं पुरुष शंसन्, वराभयस्तम्भाभ्यामिव दोर्ध्या योगाहितसंकोचा, भुवनाण्डप्रतिकृतिमिव दिव्यपायसपरिपूर्णाः स्वर्णपात्रीम्, पुत्रीयते विनीताय दशरथाय वितीर्य तिरोधात् ॥६१।।
दशकएठवधम् तत इति । ततः अनन्तरम् । वैतानाद् वैश्वानराद् यज्ञाग्नेः । उद्भूतः संजातः । विष्वग्विसारिणीभिः सर्वतो विसृत्वराभिः, दीप्तिभिः प्रभाभिः दीप्तः । विग्रवान् मूर्तः । विभावसुर्वहिरिव । नूतनः नवः, यः स्तनयित्नुः वलाहकः, तेन सच्छायः समानकान्तिः कायः मूर्तिः यस्य ताहक् । नवजवाकुसुमवद् वसनं वासः यस्य सः । अरुणवासा इत्यर्थः । अतएव शिशिरारुणः शिशिरकालिको यः उपाद्योतः, तस्य रागेण रञ्जितो विच्छरितः मरकतशिखरी नीलाद्रिरिव । स्थित इत्यर्थः। लोहितौ रक्तवर्णों ओष्ठपल्लवौ यस्य सः । अतएव प्रभाकरबिम्बेन सूर्यमण्डलेन किसलयिता पल्लविता या रोदसी, तस्याः शकलसंधिः खण्डसंधान- मिव ! स्थित इत्यर्थः । स्निग्धं मसृणं यद् हर्यक्षस्य केसरिणः रोम. तत्सोदराः श्म- श्रुमूर्धजाः यस्य तादृक् । अतएव सौदामनीदाम्ना विद्युल्लेखया दन्तुरितः संजात- दन्तो धनाधनाभोगो मेघाडम्वर इव । स्थित इत्यर्थः । दिव्यैः आभरणैः अलंकारैः संवीतः भूषितः । पक्षे दिव्याभः रणो यस्मिन् इति । सुरासुराणां संघर्षः संमर्दः । शोभनानि लक्षणनि यस्य ताहक विलक्षणः लक्षणहीनः न भवतीति विरोधः । अपूर्व इति तत्परिहारः। दुन्दुभिस्वानगभीरया दुन्दुभिराधीरया-इत्यर्थः । गिरा वाचा । आत्मानं स्वम् । प्राजापत्यं पुरुषं पुमांसं शंसन् सूचयन् । वराभययोः स्तम्भाभ्याम् इव | दोर्ध्या वाहुभ्याम् । योगेन योगविभूत्या, आहितः निहितः संकोचो यस्यां ताहशीम् । भुवनाण्डस्य प्रतिकृति प्रतिमानमिव । दिव्येन अलौकि- केन पायसेन चरुणा परिपूर्णां संभृताम् । स्वर्णपात्री सुवर्णभाण्डम् । पुत्रीयते पुत्रमिच्छते । विनीताय नम्राय । दशरथाय राज्ञे । वितीर्य दत्त्वा । तिरोधात् अन्तरधात् ॥६॥ सोऽपि दरिद्रो रत्नखनिमिव तामवाप्यानन्दसंदोहतरङ्गितो चीत- संतापशल्यायै कौशल्यायै ततः पायसार्धम्, उदञ्चन्मोदमात्रायै सुमित्रायै तदर्धादर्धम्, प्रमदमय्यै कैकेय्यै तदवशिष्टादधम्, पुनरनयंचरित्रायै सुमित्रायै तदवशिष्टाधमपि प्रायच्छत् ।।६२॥ सोऽपीति । सोऽपि राजा | दरिद्रः निस्वः । रत्नखनिमिव मणिरोहणस्थ- लीमिव । तां पायसस्वर्णपात्रीम् । अवाप्य । आनन्दसंदोहतरङ्गितः आह्वादमग्न इत्यर्थः । वीतो निमूलः, संतापः अनपत्यतालक्षणः एव शल्यो यस्याः सा तत्यै कौशल्यायै । ततः स्वर्णपाच्याः पायसार्धम् । उदञ्चन्ती उच्छलन्ती, मोदमात्रा आनन्दातिशयः, यस्याः तस्यै। सुमित्रायें तदधादर्धम् । प्रमदः हर्पः प्रस्तुतः प्रथमो गुच्छकः ५१ अस्यां सा प्रमदमयी । तत्प्रकृतवचने मयट् , ङीप् । तस्यै कैकेय्य तदवशिष्टादर्धम् । पुनः भूयः । अनर्घ्य अमूल्यं चरित्रं पातिव्रत्यं यस्याः तस्यै, सुमित्रायै तदव- शिष्टार्धमपि प्रायच्छत् प्रादात् ॥६२।। ता नरेन्द्रदयिता निराधयो भाविभावुकनिषण्णमानसाः । पुत्रहेतुरिति वृहितादरं प्राश्य पायसमतीव रेजिरे ॥१३॥ ता इति । ताः कौशल्याप्रभृतयः । भाविनि भविष्यति, भावुके मङ्गले, निषएणम् आरूढम्, मानसं मनः, यासां ताः। नरेन्द्रस्य राज्ञो दशरथस्य दयिताः प्रियाः । पुत्रहेतुः पुत्रकारणमिति । बृहितः उपोदलितः, आदरः यस्मिंस्तादृशम् । पायसं पूर्वलक्षणं पयोविकारविशेषम् । प्राश्य भुक्त्वा । निर्गताः निमूलिताः, आधयः मानसव्यथाः यासां तथाभूताः सत्यः । अतीव अत्यर्थम् । रेजिरे शुशुभिरे ॥६॥ भेजिरेऽथ तनुतः प्रभावतो गौरवं किमपि ताः समन्ततः । प्रेयसा त्रिदशराजबन्धुना यत्र दोहंदविधाः सुपूरिताः ॥६४॥ भेजिर इति । अथ ताः समन्ततः समन्तात् । तनुतः शरीरेभ्यः । प्रभावतः प्रभावेभ्यः । किमपि अनिर्वचनीयम् । गौरवं गुरुभावम् । भेजिरे आसेदुः । यत्र यस्मिन् काले । त्रिदशानां राजा महेन्द्रः, बन्धुः सखा यस्य तथोक्तेन । प्रेयसा तासां प्रियतमेन । दोहदानां विधाः प्रकाराः । सुपूरिताः प्रवाहिताः । न हीन्द्रसख्ये त्रिलोक्यां किमपि दुर्लभमिति भावः । इमे रथोद्धतावृत्ते ॥६४॥ चैत्रशुक्ले नवम्यां तिथावादितेयनके कर्कलग्ने तुषारांशुवागीश्वराधिष्ठिते; तुङ्गयातेषु खेटेषु पञ्चस्वपास्ताखिलो- त्पातसंतानसंबन्धगन्धाङ्क रेऽनेहसि ।।
५२ दशकएठवधम् ये रामभद्रेति रम्येण पुण्येन नाम्ना मुहुः सत्कवीनां बचोवल्लरीः स्फारमुवेल्लयन्: सर्वमानन्दयन् शर्म संचारयन् साध्वसं भञ्जयन् मञ्ज सोऽसावि कौशल्यया श्रीहरिः॥६शा चैत्रेति । सः श्रीहरिः । चैत्रशुक्ले नवम्यां तिथौ । आदितेयन के पुनर्वसु- नक्षत्रे । तुपारांशुवागीश्वराभ्यां चन्द्रगुरुभ्याम् अधिष्टिते कर्कलग्ने । पञ्चसु खेटेपु ग्रहेपु । तुङ्गयातेषु उच्चस्थितेषु । अपास्ताः निरस्ताः, अखिलाः समग्राः, उत्पातसंतानाः भौमदिव्यान्तरिक्षरूपाः, तेपां संवन्धगन्धाङ्क रा; संपर्कलेशोद्माः, यस्मिंस्तथाभूते । अनेहसि काले । रम्येण शब्दतोऽर्थतश्च मनोहरेण । पुण्येन पवित्रेण पावित्र्यजनकेन च । रामभद्रति श्रुतिस्मृतिप्रसिद्धेन । नाम्ना अभिधा- नेन । मुहुः वारंवारम् । सत्कवीनां वाल्मीकिव्यासादीनाम् । वचोवल्लरीः वाग्वततीः । स्फारम् अत्यर्थम् । उल्लयन् वृहयन् । सर्व स्थावरजङ्गमात्मकम् । विश्वम् आनन्दयन् आह्नादयन् । शर्म सुखम् । संचारयन् प्रवर्तयन् । साध्वसं भयम् । भञ्जयन् मर्दयन् सन् । कौशल्यया भगवत्या महाराझ्या । मङ क्षु सपदि । अनायासमित्यर्थः । असावि उदपादि ।।६।। स्फुरन्मरन्दसौरभप्रवाहमासनोत्सुक- भ्रमन्मिलिन्दकाहलीविजृम्भणावभासिता; दिवो निपेतुरुचकैरुदारपारिजातक- प्रसूनवृष्टयस्तदा निलिम्पलोककल्पिताः ॥ दिशः प्रशस्तदर्शनाः समीरणाः सुखावहा भुवः प्रकर्षसंगता जनाः प्रसन्नतामिताः; विचित्रकर्मभोगतः क्वचिचराचरान्तरे निविष्टजीवचेष्टिता वयं प्रसादमागताः ॥६६॥ स्फुरदिति । तदा तदानीम् । दिवः आकाशाद् उच्चकैः। निलिम्पलोकैः देवकुलैः, कल्पिताः सृष्टाः । स्फुरन्तः उन्निद्राः, ये मरन्दानां मकरन्दानाम्, सौरभप्रवाहाः सौगन्ध्यतरङ्गाः, तेषां वासनया लिप्सया, उत्सुकाः उत्कण्ठिताः, -
प्रथमो गुच्छकः
अतएव भ्रमन्तः, ये मिलिन्दाः भ्रमराः, तेषां काहलीविजृम्भणया ध्वनिविशेषा-
विष्कारेण अवभासिताः नीरन्ध्रिताः । उदाराः पारिजातकप्रसूनानां वृष्टयः
वर्षणानि । निपेतुः पतिताः। दिशः आशाः । प्रशस्तदर्शनाः सुखालोकाः ।
समीरणाः वायवः । सुखावहाः स्पृहणीयस्पर्शाः। भुवः कृत्रिमाकृत्रिमस्थलप्रदेशाः।
प्रकर्षसंगताः स्वस्वगुणोत्कर्षेः हृदयंगमाः। जनाः लोकाः। प्रसन्नतां प्रसादम् ।
इताः प्राप्ताः । विचित्रं भाविकवादेन विलक्षणं, यत् कर्म शरीरबाङ्मनोभिरारब्धम्,
तद्भोगतः तद्भोगाय । क्वचित् कस्मिंश्चित् । चराचरान्तरे स्थावरजङ्गमलक्षणे सर्गे ।
निविष्टं लीनं, जीवस्य बलप्राणधाम्नः, चेष्टितं विलसितं, येषां तादृशः । वयं
संप्रति वर्तमाना अपि । शाब्देन आर्थेन च व्यापारेण प्रसादम् आगताः
प्रतिपन्नाः इति पुनरुक्तप्रायम् ॥६६॥
पुष्य क्षितिजमुपागते झषे विलग्ने
संलग्नप्रमदनिशामनाञ्चिते जनौधे ।
सौभ्रात्रप्रकरणतात्त्विकप्रमेयकल्यं
कैकयी भरतमसूत भूरिभाग्यभव्या ॥६७॥
पुष्यर्व इति । भूरि भूयिष्ठं, यद् भाग्यं भागधेयं, तेन भव्या शोभना ।
कैकेयी राज्ञी। पुष्यर्वे पुष्यनक्षत्रे । झषे विलग्ने मीनाङ्ग । क्षितिजं क्षितिज-
रेखाम् । उपागते प्राप्ते । मीने उदिते सतीत्यर्थः। संलग्नः संश्लिष्टः, यः प्रमदः
आनन्दः, तस्य निशामनेन आकर्णनेन, अञ्चिते । जनौघे अन्तःपुरवर्गे ।
सौभ्रात्रप्रकरणस्य भ्रातृस्नेहपूर्तेः, यत् तात्त्विकप्रमेयं मार्मिकरहस्य, तत्र कल्यं
निष्णातम् ! भरतं तन्नामानम् । असूत अजीजनत् ।।६७।।
साईं कर्कटलग्नेऽभ्युदिते मार्तण्डके महाभागौ ।
तौ लक्ष्मण-शत्रुध्नौ प्रासोष्टार्या सुमित्रापि ॥६॥
सार्प इति । आर्या महनीया । सुमित्नापि राज्ञी । साचे आश्लेषानक्षत्रे ।
कर्कटलग्ने कर्कोदये । मार्तण्डके सूर्ये । अभ्युदिते सति । तौ महाभागौ महा-
शयौ । लक्ष्मण-शत्रुघ्नौ तन्नामानौ । यमलावित्यर्थः । प्रासोष्ट प्रासूत ॥६६॥
दशकराठवधम्
-
यथाकल्पं भगवता वसिष्ठेन कल्पिते संस्कारजाते ते रामभद्रादय-
श्चत्वारो भ्रातरो विद्यानां विनयानां च संक्रान्तिमणिदर्पणा नवनवै-
रिन्दुकिरणैरिव स्वभावमधुरैरात्मगुणैः सह लोकानां हृदयान्यध्यवात्सुः ।
परस्परप्रेमवन्धेष्वपि तेषु प्रकृत्या चन्द्रः सूर्यमिव लक्ष्मणो रामं शत्रुघ्नो
भरतमन्वसापीत् ॥६६॥
यथेति । यथाकल्पं यथागृह्यसूत्रशासनम् । भगवता वसिष्ठेन कुल-
गुरुणा । कल्पिते अनुष्ठिते । संस्कारजाते संस्कारकलापे सति । ते रामभद्रा-
दयश्चत्वारो भ्रातरः। विद्यानां चतसृणां त्रयीप्रभृतीनां, विनयानां च शीलानां
च । संक्रान्तये संक्रमणाय, मणिदर्पणाः रत्नमुकुरविम्वाः । नवनवैरिन्दुकिरणैः
वर्धिष्णुसुधांशुकरैरिव । स्वभावमधुरैः प्रकृतिपेशलैः । आत्मगुणैः स्वचरित्रैः ।
सह समम् । लोकानां जनानाम् । हृदयानि मानसानि | अध्यवात्सुः अधिवस-
न्तिस्म । परस्परेपाम् अन्योन्येपा, प्रेमवन्धाः स्नेहग्रन्थयः, येपां तेषु अपि । तेषु
रामभद्रादिषु । प्रकृत्या स्वभावेन । चन्द्रः चन्द्रमाः । सूर्य सवितारमिव ।
लक्ष्मणो रामं, शत्रुघ्नो भरतम् । अन्वसापीत् अन्वयासीत् ।।६६।।
दन्तरिवाभ्रमातङ्गो भुजैरिव जनार्दनः ।
आश्रमैरिव सद्वर्णः सुतैर्दशरथोऽरुचत् ॥७०॥
दन्तरिति । अभ्रमातङ्गः ऐरावतः । दन्तैः चतुभिर्दशनैरिव । जनार्दनः
विष्णुः । भुजैः चतुर्भिः वाहुभिः इव । सद्वर्णः ब्राह्मणादिः । आश्रमैः ब्रह्मचर्या-
दिभिश्चतुभिरिव । दशरथो राजा, सुतैः रामभद्रादिभिः । अरुचद् अरोचिष्ट ||७०||
कृतरत्नाकरोल्लासो हृतलोकतमोमलः ।
प्रसन्नमण्डलो राजा विरराज करोज्ज्वलः ॥७॥
कृतेति । कृतः संपादितः, रत्नाकराणां रत्नखनीनां समुद्रस्य च, उल्लासो
वृद्धिः, येन तादृक् । हृतः दूरीकृतः, भूरादीनां जनानां च, तमोमलः अज्ञानग्रन्थिः
अन्धकारश्च, येन ताहक् । प्रसन्नं मुदितं निर्मलं च, मण्डलं सामन्तवर्गः
बिम्बश्च, यस्य ताक् ! करैः भागधेयैः अंशुभिश्च, उज्ज्वलः विशुद्धः स्वच्छश्च ।
राजा दशरथः, चन्द्रमाश्च । विरराज विरेजे ॥७॥
प्रथमो गुच्छकः अवाप्य परमोच्छ्रायं प्रकाश्य परितो महः । आक्रान्तजगतीचको राजहंसो व्यरोचत ॥७२॥ अवाप्येति | आक्रान्तं स्वाधीनीकृतं शासनेन चक्रमणेन च जगतीचक्र भूमण्डलं येन तथाभूतः । राजहंसः, राजशार्दूलः मरालराजश्च । परमोच्छायं महतीं श्रियं गतिविशेषं च । अवाप्य आलम्व्य । परितः समन्तात् । महः तेजः धाम च प्रकाश्य निरूप्य च । व्यरोचत व्यद्योतत ॥२॥ सरस्वतीन्दिराधौते प्रवेष्टविटपाश्रिते । तस्य खड्गलनाभोगे चिरं चिक्रीड मेदिनी ॥७३॥ सरस्वतीति । तस्य राज्ञो दशरथस्य । सरस्वतीन्दिराभ्यां धौते निणिक्त । प्रवेष्टौ बाहू एव विटपौ, तदाश्रिते तदालम्बने । खङ्गो निस्त्रिंश एव, लता वल्ली, तदाभोगे झलझलायाम् । मेदिनी चिरं चिक्रीड । सुखेन सौरभमाससादेत्यर्थः । वीरभोग्या हि वसुधरेति तात्पर्यम् ।।७३।। पठन् द्विजो वागृषभत्वमीयात् स्यात् क्षत्रियो भूमिपतित्वमीयात् । वणिग्जनः पण्यफलत्वमीयाज- जनश्च शूद्रोऽपि महत्त्वमीयात् ॥७४॥ पठन् द्विज इत्यादि मूलरामायणानुरूपम् । विशेषस्त्वमे ॥४॥ तातश्रीसरयूप्रसादचरणस्वर्वृक्षसेवापरो मातृश्रीहरदेव्यपारकरुणापीयूपपूर्णान्तरः। साकेतापरभागबद्धवसतिदुर्गाप्रसादः सुधी- रास्ते तेन कृतेऽत्र रामचरिते गुच्छोऽयमायो गतः ॥७॥ इति श्रीमति रामचरिते दशकण्ठवधे भगवदवतारो नाम प्रथमो गुच्छकः ।
५६ दशकएठवधम् अथ द्वितीयो गुच्छकः। - अथ-'योऽद्वतसिद्धान्ततरङ्गिताया वेदान्तलक्ष्म्याः कुतुकान्यतानीत्' इति प्रानिर्दिष्टमर्थं चिख्यापयिपुरुत्तरग्रन्थं ससंगतिकमवतारयति- अथ भगवन् ! जीवन्मुक्तस्थितिः कीदृशीति सप्रश्रयं भरद्वाजेन मुनिना घृष्टो वाल्मीकी रामवसिष्ठसंवादमधुरमक्षरामृतं ब्रह्मरसमुप- बृहयन्नुवाद- ॥१॥ अथेति । अथ रामभद्रादीनाम् अपराख्यविद्याग्रहणानन्तरम् । जीवन्मुक्त- त्य जीवत्ने मुक्तस्य स्थितिलक्षणम् । सप्रश्रयं सप्रणयम् । प्रश्रयप्रणयौ समावित्य- मरः । रामवसिष्टयोः यः संवाद उक्तिप्रत्युक्तिरूपः, तेन मधुरं श्लक्ष्णम् । अक्षराणि वर्णा एव अमृतानि पीयूपाणि, अक्षरम् अविनश्वरम् अमृतं मोक्षश्च, यस्मिन् तम् । ब्रह्मणो वेदस्य रसं निर्यासम्, ब्रह्म व रसः तं च । उपवृहयन् पल्लवयन् । उवाद-वदव्यक्तायां वाचि ॥११॥ जागतस्य भ्रमस्यास्य जातस्याकाशवर्णवत् । अपुनःस्मरणं मन्ये ब्रह्मन् ! विस्मरणं वरम् ।।२।। जागतस्येति । हे ब्रह्मन् ! भरद्वाज ! । आकाशवर्णवत् नभोनल्यवत् । जातस्य अत्यन्तासंभावितया कल्पितस्य । अस्य पुरोवर्तिनः । जागतस्य जगत्सं- वन्धिनः । भ्रमस्य मिथ्यामतेः । भ्रान्तिमिथ्यामतिभ्रंमः इत्यमरः । उक्त च परमार्थसारे- - 'रज्ज्वां नास्ति भुजङ्गस्त्रासं कुरुते च मृत्युपर्यन्तम् । भ्रान्तेमहती शक्तिर्न विवेक्तं शक्यते नाम ॥२८॥ इति । तन्मूलाविद्यावासनोच्छेदेन अपुनः स्मरणं यथा भवति तथा । विस्मरण स्मरणाभावम् । वरम् सर्वोत्कृष्टम् । मुक्तिलक्षणम् श्रात्यन्तिकदृश्योच्छेदः, स्थत्यं नदुपललितचिन्मात्रावस्थितिश्चेत्यर्थः । मन्ये प्रमाणानुभवाभ्यां निश्चित- पानन्मि । नीरूप नभसि नेल्यस्येवात्मनि विजृम्भितस्य श्यजातस्यात्यन्तं विनय परीय प्रति ज्यायान् पन्थाः । अत्रे सारम्-
द्वितीयो गुच्छकः
'भिन्नाऽज्ञानग्रन्थिर्गतसंदेहः पराकृतभ्रान्तिः ।
प्रक्षीणपुण्यपापो विग्रहयोगेऽप्यसौ मुक्तः ॥ इति ॥
दृश्यात्यन्ताभावबोधं विना तन्नानुभूयते ।
महीयसापि यत्नेन स्वबोधोऽविष्यतामतः ॥३॥
-
दृश्येति । दृश्यस्य प्रपञ्चस्य, यः अत्यन्ताभावो बाधः, तस्य बोधं ज्ञानम् ।
तज्जीवन्मुक्तलक्षणं स्वरूपं च । नानुभूयते न साक्षाक्रियते । अतः अस्मात् ।
महीयसा महत्तरेण । यत्नेन उपायेन । स्वबोधः आत्मज्ञानम् । अन्विष्यताम्
गवेष्यताम् ॥३॥
उपदेशफलितमाह-
दृश्यं नास्तीति बोधेन मनसो दृश्यमार्जनम् ।
संपन्नं चेत् तदोत्पन्ना परा निर्वाणनिर्वृतिः ॥४॥
दृश्यमिति । चिद्र पादात्मनो व्यतिरिक्त दृश्यं देहादि जडजातं नास्तीति
बोधेन तत्तज्ज्ञानेन मनसः मानसात् । चेद् उक्तलक्षणस्य दृश्यस्य मार्जनं निरसनं
संपन्नं घटितम् । तदा परा निर्वाणाख्या निवृतिः आत्मसुखम् उत्पन्ना
आविर्भूता इत्यर्थः । मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोरिति भावः ॥४॥
अशेषवासनात्यागो मोक्ष इत्यभिधीयते ।
क्षीणायां वासनायां हि चेतो गलति सत्वरम् ॥५॥
एष वासनया कायो. ध्रियते भूतपञ्जरः ।
तन्तुनान्तर्निविष्टेन यथा मौक्तिकगुच्छकः ॥६॥
अशेपेति, एपेति च । वासना पुनरुत्पत्तिबीजम् । पुनरुत्पत्तिः प्रेत्यभावः ।
चेतो मनः वासनापुञ्जरूपम् । शेषं स्पष्टम् ।।५-६॥
वासनां विभजते-
वासना द्विविधा शुद्धा मलिना चेति गीयते ।
मलिना जन्मनो वीजं शुद्धा जन्मविभञ्जनी ॥७॥
५८
दशकएठवधम्
वासनेति । स्पष्टम् ॥७॥
अज्ञानघनसंकाशा घनाहंकारकर्कशा ।
पुनर्जन्मकरी ज्ञेया वासना मलिना बुधैः ।।८।।
अज्ञानेति । अज्ञानक्षेत्रे एव वासनाबीजानि प्ररोहन्ति हि ।।८।।
संभृष्टवीजसंस्थाना पुनर्जन्माङ्क राक्षमा ।
शरीरे वासना शुद्धा भाति चक्रे यथा भ्रमिः ॥६॥
संभृष्टेति। संजाते ज्ञाने कृतकृत्ये चक्रे भ्रमिरिव शरीरे भृष्टवीजकल्पा
वासना भवाङ् कुरोत्पादिका न भवति । उक्त च परमार्थसारे-
'अग्न्यभिदग्धं वीजं यथा प्ररोहासमर्थतामेति ।
ज्ञानाग्निदग्धमेवं कर्म न जन्मप्रदं भवति ||६२।।'
इति ll
अत एतत् फलति-
ये शुद्धवासना भूयो न जन्मानर्थभाजनम् ।
ज्ञातज्ञेयास्त उच्यन्ते जीवन्मुक्ता महाधियः ॥१०॥
-
य इति । ज्ञातज्ञेयाः प्राप्तज्ञेयावसाना इत्यर्थः । तथाच गीतासु-
'यदा ते मोहकलिलं बुद्धिय॑तितरिष्यति ।
तदा गन्तासि निर्वेदं श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च ।।'
इति ॥१०॥
मुक्तिफलं दृष्टान्तयन् भरद्वाजं नियन्त्रयति-
जीवन्मुक्तिश्रिया रेमे यथा रामो महायशाः ।
तदत्र साध्यते साधो ! सावधानोऽवधारय ॥११॥
जीवन्मुक्तीति । सावधानः एकतानः सन् अवधारय निश्चिनु । किं तत् !
हे साधो ! यदन्न जीवन्मुक्तिविषयकं साध्यते दृष्टान्तानुभवाभ्यां व्युत्पाद्यते
इति ॥१२॥
द्वितीयो गुच्छक ५६ अथ विद्याविनयसंपन्नो रामभद्रः कानिचिद् दिनानि गृहेषु क्रीडया नयन्नेकदा नखकिरणकेसरपरीतं पितृपादप- समुपसृत्य, तात ! तीर्थानि द्रष्टुमुत्कण्ठितं मम चेतो भवदाज्ञां प्रतीक्षत इति विनतकंधरं प्रार्थयांचक्रे । अनुज्ञातः शास्त्रविप्रैः स्निग्धैर्वयस्यैश्च सहलक्ष्मणशत्रुघ्नो यथायथं चतुर्दिगन्तश्रितानि तानि तीर्थदेवतायतनपुण्यारण्यानि . सभाजयित्वा कोशलानन्दिनीं प्रत्ययासीत् ॥१२॥ अथेति । सभाजयित्वा प्रीतिपूर्वक सेवित्वा । समाज प्रीतिसेवने ॥१२।। तदन्वनुदिनं रघुनन्दनः प्रासादेऽवस्थितः, शरदि कासार इव कार्य श्रयन्, पद्मासनगतः, कपोलतलसंलीनपाणिपल्लवः, अरुणोदय- विच्छायमिन्दुत्रिम्बमिव वदनमुकुलं दधत्, चिन्तापरायणस्तूष्णीको व्यापारशून्योऽजनिष्ट ॥१३॥ तदन्विति । कासारः पद्माकरः। पद्माकरस्तडागोऽस्त्री कासारः सरसी सरः इत्यमरः । पद्मासनं नामासनविशेपः । यथा- 'वामोरूपरि दक्षिणं नियमतः संस्थाप्य वामं तथा- दक्षोपरि पश्चिमेन विधिना धृत्या कराभ्यां धृतम् । अङगुष्ठं हृदये निधाय चिवुकं नासाग्रमालोकये- देतद् व्याधिविकारनाशनकरं पद्मासनं प्रोच्यते ।।' इति । तूष्णीकः तूष्णींशीलः । शीले को मलोपश्च ॥१३॥ अहह ! किमेवं कुमारोऽजनीति चिन्तयति परिजने, शोचति मातृमण्डले, विषीदति वयस्यवर्गे, दुर्मना दशरथः सहसा दौवारिके- णागत्य, 'देव ! भवन्तं द्रष्टु द्वारमधितिष्ठति स भगवान् विश्वामित्रः' इति सत्वरं व्यज्ञपि ॥१४॥ अहहेति । दौवारिकः द्वारे नियुक्तः । 'तत्र नियुक्तः' (पासू० ४।४।६६) इति ठक् । विश्वेषां मित्रः विश्वामित्वः । 'मित्त्रे चर्षों' (पा० सू० ६।३।१३०) ६० दशकएठवधम् इति दीर्घः । विश्वस्य मित्रं निरुपाधिप्रेमगोचरतया प्रेयान् । 'आत्मानमेव प्रियमुपासीत' इति श्रुतिः । 'विश्वत्रयेण यो मैत्री कर्तुमिच्छति धर्मतः । विश्वामित्रः सः' इति स्मृतिश्च । व्यज्ञपि न्यवेदि ॥१४॥ सोऽपि श्रवणसमकालमेव सिंहासनादुत्थाय सामात्यः समं वसिष्ठ-बामदेवाभ्यां पदातिरेव त्वरितपदं पद्यमानः पिशङ्गजटाजूटं ससंध्याभ्रमिव शैलकूटम्, उल्लसद्यज्ञोपवीतं सवारिप्रपातवेणिकमिव शिखरिणम्, अपरभुवनोपादानकारणशेपमाण्डकमिव कमण्डलु दधानं, सुकृतसुधामधुराभ्यां वाङ्मनसाभ्यां वन्दारूननुगृह्मानं महर्पिमालु- लोके ॥१॥ सोऽपीति । पिशङ्गजटाजूटं पिङ्गलसटावन्धम् । पिङ्गपिशङ्गी कद्रपिङ्गलौ इति, तिनस्तु जटा सटा इति चामरः । अतएव ससंध्याभ्रमिव शैलकूटम् । उल्लसद्यज्ञोपवीतं धृतयज्ञसूत्रम् । अतएव सवारिप्रपातवेणिकमिव शिखरिणम् । अपरभुवनस्य भुवनान्तरस्य, यत् उपादानकारणशेपं निर्माणावशेषद्रव्यं, तस्य भाण्डकमिव कमण्डलु दधानम् । सुकृतसुधामधुराभ्यां पुण्यपीयूपसोदर्याभ्याम् । वाक् च मनश्च वाङ्मनसे । 'अचतुर-' (पा० सू० ५।४७७) इति निपातनात् । ताभ्याम् । वन्दारून् अभिवादकान् । 'शृवन्द्योरारुः' (पा. सू. ३।२।१७३) इति ॥१॥ अवलोक्य दूरादेव भूतलमिलन्मुकुटमणिकोरकं प्रणिपत्यैनं यथाशास्त्रं परिपूज्य च प्रतिनन्दनमधिगत्य प्राञ्जलिरेतदवोचत् ॥१६॥ अवलोक्येति । स्पष्टम् ॥१६॥ भगवन् ! भवता द्विजराजेन पयोधिरिच परमोल्लाससीमानं लम्भि- तोऽहमिदानी किं व्याहराणि किं वाऽऽचराणि, यदादेशविधिप्रसितो ममान्तरात्माऽऽत्मानमतोऽपि महान्तं मन्येत, इति प्रणयपेशलं ब्रुवाणे धरणिसुत्रामणि स प्रत्यवोचत ॥१७॥ भगवन्निति । द्विजराजेति श्लिष्टम् । शेपं स्पष्टम् ।।१७।। .
द्वितीयो गुच्छक ६१ अयि ! रघुधुरंधर !! महावंशप्रसूतस्य तवैष व्याहारो वाढमुप- पद्यते । यदहं दशरात्रेण क्रतुना यियक्षमाणो रक्षोभयनुब्धोऽधिज्यधन्वानं रामभद्रमेव रक्षितारं मन्यानोऽर्थित्वेन त्वां प्राप्तोऽस्मि ॥१८॥ अंयीति । वाढमुपपद्यते प्रकामं संगच्छते । दशरात्रेण क्रतुना सोमयाग- विशेषेण ॥१८॥ पुत्रस्य तादृशं दौर्मनस्यं रणेऽपाटवं च विभावयन् नननेति गर्भितेन वाकोवाक्येन गमननिषेधमेव समर्थपन्नपि पार्थिवो महर्षिभ्र - भङ्गभुजङ्गभीतो वसिष्ठरोधितः सलक्ष्मणं रामभद्रमाजूहवत ॥१६॥ पुत्रस्येति । वाकोवाक्येन उक्तिप्रत्युक्तिप्रस्तावेन ॥१६॥ सोऽपि च प्ररूढमानसव्यथाविपएणः शनकैरुपेत्य पुरस्तात् पितरं परस्तात् तपोधामनी वसिष्ठविश्वामित्रौ ब्रह्मनिष्ठं वामदेवं च प्रणम्य तेन मूर्धन्याघ्रातः सवात्सल्यमालिङ्गितस्ताभ्यां तेन च प्रयुक्ताशीरवन्यां परिजनास्तीर्णेऽशुके न्यविक्षत । तदनु क्रमेण तैरेवमवादि ॥२०॥ सोऽपीति । सोऽपि रामभद्रः । तैः दशरथवसिष्ठविश्वामित्त्रवामदेवैः।।२०।। पुत्र ! प्राप्तविवेकोऽसि कल्याणानां च केतनम् । जडवज्जीर्णया मत्या मोहायात्मा न दीयताम् ॥२१॥ पुत्रेति । 'पुन्नाम्नो नरकाद् यस्मात् पितरं त्रायते सुतः। तस्मात् पुत्र इति प्रोक्तः स्वयमेव स्वयंभुवा ।।' इति निरुक्तिः । जइवद् अविवेकिवत् । जीर्णया शिथिलया। मोहनं मोहः । मुह वैचित्त्ये-घब । आत्मा जीवः ॥२१॥ राजपुत्र ! महाबाहो ! शूरस्त्वं विजितास्त्वया । दुरुच्छेदा दुरारम्भा अपीमे विषयारयः ॥२२॥ राजपुत्रेति | विषया एव अरयः ।।२२।।
६२ दशकएठवधम् किनिष्ठाः के कियन्तस्ते हेतुना केन चानघ ! । आधयस्तेऽवलुम्पन्ति मनो गेहमिवाखवः ॥२३॥ किमिति । आधयः किं निष्टाः के चेति स्वरूपप्रश्नः । केन हेतुना चेति निसित्तप्रश्नः। ते कियन्त इति विभागप्रश्नः ॥२३॥ इति पृष्टो मुनीन्द्रेण समाश्वस्य च राघवः । यथावद् वा मारेमे लड़ते को हि सद्वचः ॥२४॥ इतीति । इति विशिष्य मुनीन्द्रेण भगवता विश्वामित्त्रेण | पृष्टः प्रणुन्नः । समाश्वस्य समाश्वासं प्राप्य । सतां महात्मनां, सद् उपादेयं च वचः। कः प्रेक्षा- वान् । लखते अतिक्रामति ॥२४॥ ( १ ) सदाचारपरो भूत्वा भ्रमित्वा तीर्थभूष्वहम् । भोगनीरसया बुद्धया महर्पे ! मृष्टवानिदम् ॥२५॥ सदाचारेति । स्पष्टम् ।।२।। किं नामेदं चत सुखं येयं संसारसंगतिः । जायन्ते मृतये यत्र म्रियन्ते जातये जनाः ॥२६॥ किमिति । "मृतिवीजं भवेजन्म, जन्मवीजं भवेन्मृतिः” इति वचना- दित्यर्थः ॥२६॥ अयःशङ्क, समाः सर्वे परस्परमसङ्गिनः । श्लिष्यन्ते केवलं भावा मनःकल्पनया स्वया ॥२७॥ अय इति । सूच्यादिवन् मिथः संवन्धशून्या अपि दृश्या भावाः अह- मेतेपां मम चैते इति क्रियाकारकभावेन संवध्यन्ते-इत्यर्थः ॥२७॥ मनसा जगदाभोगि मनोऽसदिव दृश्यते । मृगतृष्णाम्भसा कष्टं मृगा इव विमोहिताः ॥२८॥ मनसेति । जगद् मनसा आभोगि विपयानुवन्धि । तच्च मनः अत्यन्त-
द्वितीयो गुच्छकः
६३
तरलत्वाद् असदिव शून्यकल्पमिव दृश्यते अनुभूयते । कष्टं मृगतृष्णाम्भसा
मरीचिवारिणा मृगा इव भोगाभिलाषेण विमोहिता वयम् ॥२८॥
नहि केनापि विक्रीता विक्रीता इव यन्त्रिताः।
अहो ! सर्वे वयं मूढा जानाना अपि शाम्बरीम् ॥२६॥
नहीति । शं वृणोतीति शंवरो दैत्यविशेषः, तत्संबन्धिनीं शाम्बरीम्,
मायाम् । उक्तस्यैव प्रपञ्चः ॥२६॥
एवं विमृशतो वाढं दुरन्तेष्वस्थिरेषु मे ।
भावेष्वरतिरुत्पन्ना पथिकस्य मरुष्विव ॥३०॥
एवमिति । दुरन्तेषु दुष्परिणामेषु । अरतिः वैरस्यम् । उक्कं च
पातञ्जले-'परिणामतापसंस्कारदुःखैगुणवृत्तिविरोधाच दुःखमेव सर्व विवेकिनः'
(यो० द० २।१५) इति ॥३०॥
तदिदं भगवन् ! ब्रू हि किमिदं परिणश्यति ।
किमिदं जायते भृयः किमिदं परिवधते ॥३॥
॥ इति प्रथमः परितापः ॥
तदीति । हे भगवन् ! त्रिकालज्ञ ! तदिदं प्रत्यक्षमुपनतं ब्रूहि आख्याहि ।
किमिदं दृश्यं सत् परिणश्यति अगोचरतां प्राप्नोति । सतो नाशासंभवात् ।
किमिदं भूयः जायते प्रादुर्भवति । परिणष्टं कथमिव जायेत । किमिदं पुनः
परिवर्धते । परिणष्टस्य पुनरुत्पत्त्यसंभवे तद्वर्धनानौचित्यात् । यदि च दृश्यमसत्
तर्हि किं परिणश्येत् । स्वरूपेणासतो असत्त्वप्रतिपादनं वन्ध्यासूनुध्वंसवदनुप-
पन्नम् । एवं च जननवर्धने अपि । यदि यद् दृश्यते तदन्यन् नश्यति-इत्यादि
प्रतिपाद्यत तदा संवन्धाभावेन शङ्कव दुष्यति ॥३१॥
॥ इति प्रथमः परितापः॥
इदानी परितापमेव प्रपञ्चयति सप्तदशभिः प्रघट्टकैः-
( २ )
मोहयन्ती मनोवृत्तिं खण्डयन्ती गुणावलिम् । .
प्रयच्छन्ती दुःखजालं श्रीरियं किं गवेष्यते ॥३२॥
६४
दशकएठवधम्
मोहयन्तीति । श्रयतीति श्रीः सौभाग्यसंपत् । माघोक्त्याऽखिललोक-
कान्तेति यावत् ॥३२॥
लक्ष्मीविशङ्कटोल्लासकल्लोलानलमाकुलान् ।
जडौवान् विकृतान् धत्ते वर्षास्विव तरङ्गिणी ॥३३॥
लक्ष्मीरिति । विशङ्कट पृथु वृहत् - इत्यमरः । जडौघान् - वारिवेगान्,
जडवृन्दानि च । ..'ओघो वेगे जलस्य च । वृन्दे परम्परायां च द्रुतनृत्योप-
देशयोः-इति मेदिनी ॥३३॥
इयं श्रीः पदमेकत्र नो निबध्नाति चञ्चला ।
दग्धेवानियताचारचक्रमा व्यतिराजते ॥३४॥
इयमिति । उपमेयपक्षे-अनियताचारेपु शास्त्रविहिताचरणशून्येषु, उप-
मानपक्षे-अनियताचारं स्खलितन्यासं यथा तथा, चक्रमो यस्याः सा । व्यति-
राजते इति- 'कर्तरि कर्मव्यतिहारे' (पा० सू० १।३।१४) इत्यात्मनेपद-
मिष्यते ॥३४॥
गुणागुणानपश्यन्ती श्रीरेपा पार्श्वशायिनम् ।
राजप्रकृतिवन्मूढा दुरारूढाऽवलम्बते ॥३॥
गुणागुणेति । प्रायेण राजानोऽविवेकिनो भवन्ति । उक्तंच-आश्रयन्ति
समीपस्थं राजानो वनिता लताः इति ॥३५॥
तावच्छीतमृदुस्पर्शी लोकः स्वेषु परेपु वा ।
वात्ययेव हिमं यावल्लदम्या न पस्पीभवेत् ॥३६॥
तावदिति । वात्यया वातसमूहेन । 'पाशादिभ्यो यः' (पा.सू. ४।२।४६)
इति यः ॥३६॥
प्राज्ञाः कृतज्ञा; संख्यज्ञाः पेशलाः सरला अपि ।
पांसुमुष्टय व मणयो लक्ष्म्या हि मलिनान्तराः ॥३७॥
द्वितीयो गुच्छकः
६५
प्राज्ञा इति । प्राज्ञाः प्रज्ञावन्तः । कृतज्ञाः उपकारविदः । संख्यज्ञाः
संग्रामप्रणयिनः । पेशलाः चारवः। चारो दक्षे च पेशल:-इत्यमरः । सरलाः
उदाराः ॥३७॥
सुदृष्टिदीपिकावात्या वैराग्येन्दुकलाकुहूः ।
श्रीरियं सुखसमति मुधैव जनजल्पना ॥३८॥
।। इति लक्ष्मीनिराकरणम् ॥
सुदृष्टीति । दृष्टिः ज्ञानं नेत्रं च । 'दृष्टिः स्त्रियां बुद्धौ लोचने दर्शनेऽपि
च-इति मेदिनी । वैराग्यम् एव इन्दुकला, तत्र कुहूः रात्रिविशेषः । सा नष्टेन्दु-
कला कुहू:- इत्यमरः । 'दृष्टानुअविकविषयवितृष्णस्य वशीकारसंज्ञा वैराग्यम्'
( यो० द० १११५) इति ॥३॥
॥ इति लक्ष्मीनिराकरणम् ॥
युज्यते वेष्टनं वायोः खण्डनं सुरवर्त्मनः ।
ग्रथनं च तरङ्गाणां संगतं नायुषः पुनः ॥३६॥
युज्यत इति । संगतं संगतिः ॥३६॥
चलत्पल्लवकोणाग्रलम्बाम्बुलवभङ्गुरम् ।
आयुरुन्मत्तवत् कायमपहाय पलायते ॥४०॥
चलदिति । चलतः पल्लवस्य कोणाग्र यल लम्बाम्बु, तस्य लववद्
भङगुरम् । उन्मत्तवद् अविवेकिवद् इति भावः । पलायते । अय गतौ ॥४०॥
अविश्रान्तमना मूढो जीवितं ततमीहते ।
केवलं क्लेशपाकाय गर्भमश्चतरी यथा ॥४॥
अविश्रान्तेति । आत्यन्तिकतृष्णोपरतिहिं मनसो विश्रान्तिः । अश्वाद
गर्दभ्याम् उत्पन्ना अश्वतरी ॥४१॥
भारो विवेकिनः शास्त्रं भारो ज्ञानं हि रागिणः ।
अशान्तस्य मनो भारो भारोऽनात्मविदो वपुः ॥४२॥
दशकएठवधम् भार इति । एवमादिस्थले शब्दस्य पुनरुक्तिरेव विच्छित्तिमावहति । अतएव-'नैकं पदं द्विः प्रयोज्यं प्रायेण' (वा० सू० ५।१) इति सूत्रयन् वामनः प्रायेण इति प्रायुक्त ॥४२॥ पादपा अपि जीवन्ति जीवन्ति मृगपक्षिणः । स जीवति मनो यस्य मननेन न जीवति ॥४३॥ ॥ इति जीवितगीं ॥ - पादपा इति । पादैः मूलैः पिबन्ति इति पादपाः वृक्षाः। 'सुपि स्थः' पा० सू० ३।२।४) इति कः । एपां चेतनत्वे स्मृतिरपि- "तमसा बहुरूपेण वेष्टिताः कर्महेतुना । अन्तःसंज्ञा भवन्त्येते सुखदुःख समन्विताः ।।' (मनु. ११४६) इति । मनसो ह्यजीवनत्वं निश्चलीभावः । इयं मनोवस्था उन्मनीभावपदेनापि परिभाष्यते ॥४॥ ॥ इति जीवितगीं ।। ( ४ ) मिहिका गुणपद्मपु कुलिशं शमशाखिपु । सैहिकेयो विमर्शन्दावहंकारो भृशायते ॥४४॥ मिहिकेति । अहमिति करणमहंकारः । अहमिति विभक्तिप्रतिरूपकम- व्ययम् । आत्मा हि अहंप्रत्ययप्रत्ययी । तत्र शब्दसृष्टिप्रस्तावे- अहमिति प्रत्याहारन्यायेन अकारादिहकारान्तो वर्णसंघातः । अर्थसृष्टिप्रस्तावे तु- अभि- मानोऽहंकारः इति अन्तःकरणवृत्तिविशेपः। अभृशो भृशो भवतीति भृशायते । 'भृशादिभ्यो भुव्यच्वेर्लोपश्च हलः' (पा. सू.३।१।१२) इति क्यङ् ।।४४।। इह कायमहारण्ये क्षुब्धोऽहंकारकेसरी । जृम्भते विकटाटोपं तेनेदं जगदश्यते ॥४॥ इहेति । जभि-जुभी गात्रविनामे ! अन्यते ग्रस्यते । अश्चातेः कर्मणि :- लट् ॥४शा
द्वितीयो गुच्छकः
६७
निराकुर्वन् घनाकारमहंकारमहाकरी ।
आ? आरोहयते कामं दुरारम्भनिषादिनम् ॥४६॥
निरेति । आः ! अहंकार एव महाकरी मत्तमातङ्गः । घनाकारं
निराकुर्वन् पराभवन् । दुष्टः प्रारम्भः दुरारम्भः, स एव निषादी, तम् । कामं
यथा स्यात् तथा, आरोहयते ॥४६॥
अहो ! अहंकृतेः कृत्या यदल्पेऽपि परिच्छदे ।
अाढ्य मन्या नृपंमन्याः प्राज्ञमन्याश्च जज्ञिरे ॥४७॥
अहो इति । अहो ! हहो ! । अहंकृतेरहंकारस्य । कृत्या करणेन चेष्टया
अथवा कृत्येति प्रथमान्तम् । यद् यस्मात् कारणाद् अल्पे कतिपयेऽपि ।
परिच्छदे भोगसामग्रीसत्त्वे । इत्थंप्रकृतिका जज्ञिरे-इत्यर्थः ।।४७||
अहंकारेऽम्बुदे शान्ते तृष्णया तडिताऽशमि ।
विच्छिन्ने विटपारोहे व्रतत्यापि विलीयते ॥४॥
अहमिति । अहंकारे अम्बुदे शान्ते सति । तृष्णया तडिता विद्युता
अपि अशमि शान्तम् । शम्यतेर्भावे लुङ् । व्यस्तरूपकम् । विटपारोहे विच्छिन्ने
सति, तदालम्बिन्या व्रतत्या वल्लर्यापि । विलीयते शम्यते इति प्रसिद्धम् ॥४८॥
अहमित्यस्ति चेद् बुद्धिरहमापदि दुःखितः ।
नास्ति चेत सुखितस्तस्मादनहकारिता वरम् ।।४६।।
।। इत्यहकारजुगुप्सा ।।
-
अहमिति । अनेनाहंकाराभावो व्युत्पादितः ॥३
॥ इत्यहंकारजुगुप्सा ॥
( ५ )
मनो मननविक्षुब्ध दिशो दश विगाहते ।
मन्दरान्दोलनोद्ध तक्षीरोदाम्बुपृषद् यथा ॥५०॥
मन इति । क्षुब्धस्य मनसो दशदिशावगाहने देवासुरैर्मथ्यमानस्य क्षीरो-
दस्य क्षीराब्धेः पृषतो दृष्टान्तः ॥५०॥
६८ दशकण्ठवधम् भोगदूर्वाङ्क राकाङ्क्षी श्वभ्रपातमचिन्तयन् । इतस्ततो धावसानो न श्राम्यति सनोमृगः ॥५१॥ भोगेति । श्वभ्रपातम् अधः पातम् ।।५१|| क्रोडीकृत दृढग्रन्थितृष्णासूत्रयुजात्मना । पक्षिणा जालकेनेव चेतसा परितप्यते ॥५२॥ क्रोडीति । क्रोडीकृतः अन्तर्नीतः, दृढग्रन्थिः विषयग्रहो यया तादृशी, तृष्णैव सूत्रम् तन्तुः, तेन युज्यते इति तथाभूतेन । आत्मना बलप्राणभृता चेतनेन । का। पक्षिणा जालबन्धेन इव । चेतसा करणेन परितप्यते क्लिश्यते-इत्यर्थः ॥५२॥ अनल्पकल्पनातल्पे विलीनाश्चित्तवृत्तयः । बोध्यमानान युध्यन्ते तदत्यर्थं व्यथामहे ॥५३।। अनल्पेति । अनल्पकल्पनैव तल्पम्, तत्र । तल्पपट्टे शय्या-कलत्रयोः इति द्विस्वरे हैमः । व्यथामहे-व्यथ भय-संचलनयोः ॥५३।। अवान्तरे निपाताय प्रान्तरे भ्रमणाय वा । तृणेन पवनेनेव चेतसा बहु चल्यते ॥५४॥ अचान्तरेति । अवान्तरे अकाण्डे । निपाताय प्रशमाय । प्रान्तरे शून्ये । भ्रमणाय गमनाय । पवनेन वायुना, तृणेन इव । चेतसा, बहु अधि- कम् । चल्यते भ्रम्यते ॥५४!! धूमिना मत्सरौघेण ज्वालिनाऽनन्तचिन्तया । आश्रयाशेन मनसा प्लुष्यते स्फारमन्तरम् ॥५५|| धूमिनेति । मत्सरोघेण अन्यशुभव पावेशेन । धूमिना धूमवता । ज्वा- लिना ज्वालाविप्टेन । आश्रयाशेन अग्निना इव । मनसा अन्तरं स्पनरं बहु प्लुप्यते दह्यते ।।५।।
द्वितीयो गुच्छकः ६६ यावन्न मनसोऽपैति जगचित्रं प्रसारितम् । तावत्कौतूहलाक्रान्तं कथमेतत् प्रशाम्यति ॥५६॥ यावदिति । एतद् मनः ।।६।। क्षणं ध्यानं क्षणं ज्ञानं क्षणं नन्दनचिन्तनम् । विलक्षणं मनो यावद् विपयोर्मिषु सक्षणम् ॥१७॥ क्षणमिति । सक्षणं सस्पृहम् । क्षणमिति-'कालाध्वनोरत्यन्तसंयोगे' (पा० सू० २।३१५) इति द्वितीया ॥५॥ क्षणाजगन्ति संचर्य न मनागपि तिष्ठति । यत्तन्निगृह्यतां केनाकाशकासारतृण्मनः ॥१८॥ ॥ इति चित्तदौरात्म्यम् ॥ क्षणादिति । आकाश एव कासारः, तत्र तृड् तृष्णा यस्य तादृग् मनः । अतएव गीतासु- 'चञ्चलं हि मनः कृष्ण ! प्रमाथि बलवद् दृढम् ।' महाशनो महापाप्मा विध्येनमिह वैरिणम् ॥ (६।३४) इति ।।८।। ।। इति चित्तदौरात्म्यम् ।। अलमन्तभ्रमायैव तृष्णा विलुलिताशया । प्रयाता विषमोल्लासमूर्मिरम्बुनिधाविव ॥५६॥ अलमिति । भ्रमो मिथ्यामतिः आवर्तश्च । विलुलिताशया आलोडित- चित्ता । अन्यत्र आन्दोलितमध्यप्रदेशा ॥५६॥ वाञ्छन्नपि रयं रोद्ध, वात्ययेव जरत्तृणम् । नीतः कलुषया क्वापि तृष्णया चित्तचातकः ॥६॥ वाञ्छनिति । रयं चापल्यं वेगं च । रोर्बु वाञ्छन्नपि चित्तमेव चातकः पक्षिविशेषः । धर्ममेघाख्यरसपानाय मेघरसपानाय चेत्याल्लभ्यते । वात्यया जरत्तृणमिव कलुषया तृष्णया क्वापि नीतः प्रापितः ॥६०।।
७०
दशकण्ठवधम्
मरुतीव रजःपुञ्जो वियतीव शरद्धनः ।
उदन्वतीय डिण्डीरस्तृष्णावर्ते भ्रमाम्यहो! ॥६॥
मस्तीति । डिण्डीरोऽब्धिकफः फेनः- इत्यमरः ।।६१।।
अश्रान्तजलसंसर्गा गाढोर्धाधोगमागमा ।
तृष्णा ग्रन्थिमती स्फारमारघट्टाग्ररज्जुवत् ॥६२||
अश्रान्तेति ।. आरघट्टः घटीयन्त्रम् । अरहट इति प्रसिद्धम् ॥६२।।.
कुटिला कोमलस्पर्शा विपवैपम्यसंश्रया ।
दशतीपदपि स्पृष्टा तृष्णा कृष्णव सर्पिणी ॥३॥
कुटिलेति । कुटिलेति चत्वारि विशेपणानि उभयत्र तुल्यानि ।।६।।
अनावर्जितचित्तापि सर्वमेवानुगच्छति ।
न विन्दति फलं किंचित् तृष्णा जीर्णेव कामिनी ॥६४॥
अनावर्जितेति । न आवर्जितम् अनाकलितं चित्तं यया तथाभूता
जीर्णा
कामिनीव ॥६४॥
पदं करोत्यलध्येऽपि तुप्तापि फलमीहते ।
चिरं तिष्ठति नैकत्र तृष्णा लोलेव बानरी ॥६॥
पदमिति । पदं स्थानं चरणन्यासं च ।।६शा-
उद्यद्धनरसोत्सेधा परमालोकमुद्रिका ।
मोहकेकिकुलाकीर्णा तृष्णा कादम्बिनीयते ॥६६॥
.
उद्यदिति । कादम्बिनी मेघमाला-इत्यमरः ।।६।।
आयताऽनन्तसंस्थाना विचित्रा विगलद्गुणा ।
आबद्धरागसंताना तृष्णा शक्रधनूयते ॥६७॥
द्वितीयो गुच्छकः ७१ आयतेति । अनन्तम् अपरिच्छिन्नं, अनन्ते खेच संस्थीनं यस्याः सा । गुणः औदार्यादिः मौर्वी च । शक्रधनूयते -शक्रधनुः इन्द्रायुधम्, तद्वदा- चरति । शक्रधनुष्शब्दादाचारेऽर्थे · क्यङ । 'कर्तु: क्यङ् सलोपश्च' (पा० सू०३।११११) इति ॥६॥ वल्लकी कामगीतानां शृङ्खला मोहदन्तिनाम् । नटी जगद्रूपकाणां तृष्णा केनाभिभूयताम् ॥६८|| ॥ इति तृष्णाभङ्गः॥ वल्लकीति । जगन्त्येव रूपकाणि । नाटकादिश्यकाव्यविशेषाः ॥६॥ ॥ इति तृष्णाभङ्गः।। ७.) सुखराकाप्रभोद्भासि क्षणमानन्दतुन्दिलम् । क्षणं दुःखकुहूध्वान्तच्छन्नं क्लिष्टमिदं वपुः ॥६६॥ सुखेति । सुखमेव राका पूर्णचन्द्रा रात्रिः । पूर्णे राका निशाकरे-इत्यमरः । दुःखमेव कुहूः शून्यचन्द्रा रात्रिः । सा नष्टेन्दुकला कुहू:-इत्यमरः । क्षणमित्य- त्यन्तसंयोगे द्वितीया ॥६॥ बद्धास्था ये शरीरेषु सक्ताः संसृतिभूतिषु । ते मोहमदिरोन्मत्ताः किमुच्यन्ते धिगन्तरा ॥७०|| बद्धास्थेति । आस्था आलम्बनम् । आस्था त्वालस्वनास्थानयत्नापेक्षासु योषिति-इति मेदिनी । संसृतिः संसारः ॥७०॥ तडित्सु शरदभ्रषु गन्धर्वनगरेषु च । स्थिरता निश्चिता येन तेन विश्वस्यता तनौ ॥७॥ तडिदिति । गन्धर्वनगरं राजनगराकारं नीलपीतादिमेघरचना- विशेषः ॥७॥ इयं हि चेतना दीना देहान्तरविवर्तिना । मिथ्याज्ञानपिशांचेन ग्रस्यमाना विमुह्यति ।।७२।।
दशकएठवधम्
इयमिति । दीना वराकी ||७२।।
न किंचिदपि दृश्येऽस्मिन् दृश्यते सत्यवत्तया ।
दग्धात्मना शरीरेण जनता विप्रलभ्यते ॥७३॥
नेति । सत्यवत्तया परमार्थतया । दग्धात्मना चेतनहतकेनेत्यर्थः ।।७३||
अधिस्तिर्यगारूढप्रवालावलिसंवृतः ।
प्रकाएडशाखाविटपप्राग्भारविभवोच्छितः।।७४॥
आमूलचूडपर्याप्तिपत्त्रपुष्पफलोर्जितः ।
तृष्णाशीविषसूत्कारः कोपवायसवाशितः ॥७॥
द्रोहगृध्रगरुक्षोभोऽहंकारोल्लासलालितः ।
कस्यात्मीयः परो वापिकायवृक्षोऽयमुद्गतः ॥७६।। (तिलकम्)
॥ इति कायजुगुप्सा ॥
ऊर्चेति । सर्वदिक्कया प्रवालसंतत्या वेष्टित इत्यर्थः ।
प्रकाण्डेति । तत्तदवयवसमृद्धया अभ्रकप इत्यर्थः ।
आमूलेति । आमूलाग्रं तत्तद्भोग्यविशेषेण प्राणित इत्यर्थः ।
तृष्णेति । सूत्कारः फूत्कारः । वाशितः शब्दितः । तिरश्चां वाशितं
रुतम्-इत्यमरः।
द्रोहेति । गरुक्षोभः पतविक्षेपः। स्वकीयः परकीयो वा । उभयथाप्य-
नास्थेयः इति भावः । तिलकं त्रिभिः संबद्धं विशेषकमित्यर्थः ।।७४-७६||
।। इति कायजुगुप्सा ।।
( 5 )
लब्ध्यापि तरलाकारे कार्यभारतरङ्गिाणि ।
संसारसागरे जन्म, वाल्यं क्लेशाय केवलम् ॥७७॥
द्वितीयो गुच्छकः ७३ ० लब्ध्वेति । क्लिश्नन्ति इति क्लेशाः। तथा च पतञ्जलिः-'अविद्यास्मि- तारागद्व पाभिनिवेशाः पञ्च क्लेशाः' (यो० द० २।३) इति ॥७७॥ अशक्तिरापदस्तृष्णा मूकता मूढबुद्धिता । गृध्नुता लोलता दैन्यं वाल्ये वल्गन्त्यशृङ्खलम् ॥७८॥ अशक्तीति । गृध्नुः गर्धनशीलः । गृधु अभिकाङ्क्षायाम् । 'असिगृधि- धृषिक्षिपेः क्नुः' (पा० सू० ३।२।१४०) इति क्नुः । अशृङ्खलं निरर्गलमिति क्रियाविशेषणम् ।।७८॥ रोपरोदनरौद्रीपु दैन्यदीप्तदुराधिषु । दशासु बन्धनं वाल्यमालानमिव हस्तिनः ॥७॥ रोपेति । रौद्रयः उग्राः। आलानं हस्तिवन्धनम् । अालानं करिणां वन्धस्तम्भे रज्जौ च न स्त्रियाम्-इति मेदिनी ॥७६।। प्रतिविम्बधनाज्ञानं नानासंकल्पपेलवम् । वाल्यमालूनसंशीर्णमनः कस्य सुखावहम् ॥८॥ प्रतिविम्बेति । प्रतिविम्बवद् घनं सान्द्रम् अज्ञानं यस्मिंस्तत् । नाना- संकल्पैः पेलवम् कोमलम् । तत्तत्संकल्पितविपयालाभाद् आलूनवत् सर्वतश्छिन्न- वत् संशीर्णवद् दुःखितवन् मनो यस्मिस्तत् ॥८॥ सर्वेषामेव सत्त्वानां सर्वावस्थास्य एव हि । विशिष्य शैशवे चेतश्चाञ्चल्याधिक्यमृच्छति ॥८॥ सर्वेपामिति । प्रत्यक्षमनुभूतमेतत् ।।८१|| मनः प्रकृत्यैव चलं बाल्यं च चलतां वरम् । भ्रात्रोरिव तयोः श्लेपश्चापलायालमेधते ॥२॥ मन इति । पूर्वस्यैव प्रपञ्चनमेतत् ।।८२॥ विकल्पकल्पितारम्भे दुर्विलासे दुराशये । आः कष्टं मोहमायत्ते वालो बलवदापतन् ।।८३॥ ॥ इति बाल्यजुगुप्सा ॥
७४ दशकएठवधम् विकल्पेति । बलवदित्यव्ययम् । बलवत्सुष्ठु किमुत स्वत्यतीव च निर्भरे- इत्यमरः ॥८॥ ।। इति वाल्यजुगुप्सा ।। (६ ) वाल्याक्रीडमतिक्रम्य प्रसरत्कामकेलयः । आरोहन्ति निपाताय यौवनं सालशृङ्गबत् ॥८४॥ वाल्येति । वाल्यमेव आक्रीडः उद्यानविशेपः, तम् । सालशृङ्गवत् प्राकार- शिखरवत् ॥४॥ चिन्तानां चलवृत्तीनां वनितानामिवावृतीः । विगाहते भ्रमच्चेतो. भ्रमरो व्रततीरिव ॥८॥ चिन्तेति । भ्रमत्, चेतः-इति पदद्वयम् । विगाहते आलोडयति ।।५।। नानारसमयी चित्रवृत्तजस्वालपिच्छिला । भीमायौवनभूर्येन तीर्णा, धीरः स दुर्लभः ॥८६॥ नानारसेति । भगवन्तं रामभद्रमपहाय नान्यमुपलभामहे-इति नातिश- योक्तिः ॥८६॥ अहो ! प्रतिपदं पातः प्रतिपातमधोगतिः । प्रत्यधोगति भिन्नार्तिरुत्कटे यौवनभ्रमे ॥८७॥ अहो इति । नातिच्छन्नेयं सारालंकारोक्तिः ।।८७|| यदा हि परमां कोटिमाटङ्कयति यौवनम् । तदा स्मरशरक्षुब्धं चित्तं कामति यौवतम् ।।८८|| यदेति । यौवतं युवतीनां समूहम् ।।८।। असत्यं सत्यसंकाशमचिराद्विप्रलम्भदम् । स्वप्नाङ्गनासङ्गसमं तारुण्यं दुरतिक्रमम् ॥८६॥ ।। इति यौवनयहाँ ।।
द्वितीयो गुच्छकः
असत्येति । असत्यम् अचिरस्थायित्वाद् विद्युद्विलाससदृशमिति भावः ।
अचिरात् सद्यः । विप्रलम्भदं वियोगजनकम् ॥८६॥
॥ इति यौवनगीं ॥
( १० )
सविकारा हृद्यगन्धा सरसोल्लासभूमिका ।
मदिरा मदिराक्षी च केवलं व्यक्तितः पृथक् ॥६०॥
सविकारेति । मदिरा प्रसिद्धा । मदिरः पक्षिविशेषः, तद्वद् अक्षिणी
यस्याः सा मदिराक्षी । मीनाक्षीवद् व्युत्पाद्यते । एषा द्वयी, केवलं व्यक्तितः
व्यक्तः गुणविशेषाश्रयमूर्तेः । आकारादिति यावत् । पृथक् पृथग्भूता । मादनगुणेन
तु एकैवेति तात्पर्यम् ।।६०॥
परिष्कृतानेकरागैर्वल्लकीव स्वरोद्गमैः ।
काँस्कान्न चित्रयत्येषा तरुणान् हरिणानिव ॥११॥
परिष्कृतेति । रागोऽनुरागः, गीतकं च । स्वरः सलेशभाषणाभिव्यक्तः
सप्तसंख्यागश्च । चित्रवत् आश्चर्यवत् करोतीति चित्रयति । मोहयतीति
भावः ॥११॥
किरातेनेव कामेन वागुरा इव योषितः ।
कुरङ्गानिव संमुग्धानात्मसात्कतु मातताः ॥१२॥
किरातेनेति । वागुरा मृगबन्धनी-इत्यमरः । आत्मसात् स्वाधी-
नान् ।।१२।।
ललनाविपुलालाने मनोमचमतङ्गजः ।
रतिशृङ्खलया बद्धो मुहुर्माद्यन् विघूर्णते ॥१३॥
ललनेति । विघूर्णते कर्तव्याकर्तव्यं न पर्यालोचयतीत्यर्थः ।।३।।
कायपल्बलमत्स्यानां स्वान्तकदमचारिणाम् ।
पुंसां दुर्वासनारज्जुर्योषा. बडिशपिण्डिका. ॥१४॥
.. दशकण्ठवधम् कायेति । बडिशं मत्स्यवेधनकण्टकः, तत्रत्या पिण्डिका ।।६४|| मुखं गुहा स्तनौ गुल्मौ नितम्बो वालुकोचयः । नारी मरुस्थली यत्र नियन्ते कामुकाध्वगाः ॥६५॥ ॥ इति स्त्रीजुगुप्सा ॥ मुखमिति । अहो ! विषयरसपानाज् ज्ञानरसपानस्येयती भिदा इति तात्पर्यम् ।।६।। ॥ इति स्त्रीजुगुप्सा ॥ ( ११ ) . अपर्याप्तं हि बालत्वं बलात्पिबति यौवनम् । यौवनं च जरा पश्चादहो ! कर्कशता मिथः ॥१६॥ अपर्याप्तमिति । पिवति ग्रसति । अहो ! वाल्य-तारुण्य-वार्द्धकानामवस्था- विशेपाणां परस्परं कार्कश्यम् ॥६६|| अनायासकदर्थिन्या जरया जीर्णतां गते । सपत्न्येवाहता योपिन्मतिः क्वापि पलायते ॥६७|| अनायासेति । अन्यावस्था तु आयासेन कदर्थिनी। इयं जरा तावदना- यासेनेति । कदर्थनम् श्रात्मन्यवज्ञा । उपासकानां त्वेवं न भवतीत्यपि द्रष्टव्यम् । आहता अभिभूता ६७|| शीर्णायां तनुवल्लयों गतमिन्द्रियगुच्छकैः । चित्रमाशारसा तृष्णा भावानभि युवायते ॥६॥ शीर्णायामिति । गतमिति भावे क्तः । भावानिति-'अभिरभागे' (पा० सू० ११४६१) इति कर्मप्रवचनीयसंज्ञायां-'कर्मप्रवचनीययुक्ते द्वितीया' (पा० सू० २।३।८) इति द्वितीया । युवायते-युवतिरिवाचरतीति क्यङ् ॥६८|| जाग्रज्जरासुधादीप्तं वपुरन्तःपुरान्तरम् । अशक्तिरार्तिरापच सुखमध्यासतेऽङ्गनाः ॥६६|| .
द्वितीयो गुच्छकः ७७ जाग्रदिति । जाग्रती जरैव सुधा लेपनद्रव्यं, तया दीप्तं धवलम् । वपुरेव अन्तःपुरम् अन्तर्भवनम्, तदन्तरम् । अशक्तयादयः अङ्गनाः । सुखम् अकुतोभयम् । अध्यासते-'अधिशीस्थासां कर्म' ('पा० सू० १।४।४६) इत्याधारस्य कर्म- संज्ञा IEEN दृष्ट्वैवोत्कण्ठितेवाशु प्रगृह्य शिरसि क्षणम् । प्रलुनाति जरा कायं कामिनी कैरवं यथा ॥१०॥ दृष्ट्वेति । उत्कण्ठिता उत्का समीपस्था च । शिरसि मूर्धनि अग्रभागे च । कैरवं चन्द्रकिरणविकासि कमलम् ॥१०॥ दुष्प्रेक्ष्यं दुरवस्थानं दुराधिव्याधिवान्धवम् । अभ्यर्णमरणोद्वारं वार्धक केन गृध्यते ॥१०१॥ ॥ इति जराजुगुप्सा ॥ दुष्प्रेक्ष्यमिति । गृध्यते अभिकाच्यते ।।१०१।। ॥ इति जराजुगुप्सा ॥ ( १२ ) विकल्पकल्पनानल्पजल्पितरल्पबुद्धिभिः । भेदैरुद्ध रतां नीतः संसारकुहरे भ्रमः ॥१०२॥ विकल्पेति । ममेदं भोग्यम्, अहमस्य भोक्ता, इमानि च तत्साधनानि, अनेन इदम् इत्थं संपाद्य भोक्ष्ये, इमद्य लब्धम्, इदं लप्स्ये; इत्येवमादिभिः विकल्पकल्पनैः अनल्पानि जल्पितानि येषां तैः । अल्पबुद्धिभिः मन्दः, कर्तृभिः । भेदैः शत्रुमित्रोदासीनादिभिः । संसारकुहरे ब्रह्माण्डान्तरे भ्रमः उद्धु रतां दुरुच्छेदतां नीतः ॥१०२॥ सतां कथमिवास्थात्र जायते जालपञ्जरे । शिशूनामेव संतुष्टिः फले मुकुरविम्बिते ॥१०३॥ सतामिति । सतां विवे किनाम् । अत्र जालपञ्जरे इन्द्रजालकल्पे आयतने । फले आम्रादिरूपे । मुकुरबिम्बिते दर्पणादौ प्रतिफलिते ॥१०॥ .
७८ दशकण्ठवधम् इहापि भासते येषां सुभगा सुखभावना । तामप्याखुरिव ग्रन्थि कालः कृन्तति सर्वतः ॥१०४|| इहेति । इहापि एवंदुर्विलसितेऽपि ॥१०४॥ कालो जगन्ति सामान्याददन्नपि जिघत्सुकः । दृश्यसत्तामिमां सर्वा कवलीकतु मुद्यतः ॥१०॥ कालेति । सामान्यात् सर्वसाधारण्यात् । जिवत्सुः अत्तुमिच्छुः जिघत्सुरशनायितः-इत्यमरः ।।१०।। विरञ्चिमूलब्रह्माण्डवृहद्दवफलिद्रुमम् । ब्रह्मकाननमाभोगि यः पराक्रस्य चेष्टते ।।१०६॥ विरञ्चीति । यः कालः । विरञ्चिः अपञ्चीकृतभूतात्मा मूलं यस्य ताहग , ब्रह्माण्डमेव बृहन् देवः दैवतवर्गः, फलप्रदतया फली फलवान्, द्रुमः वृक्षः, यस्मिंस्तत् । 'जात्याख्यायामेकस्मिन्वहुवचनमन्यतरस्याम्' (पा० सू० १।२।५८ ) इति विकल्पेनैकवचनम् । ब्राँव काननं, दुर्गमत्वान्महारण्यम् । आभोगि आभोगवत् । पराक्रम्य परिभूय । चेष्टते जृम्भते ॥१०६॥ जगज्जीर्णकुटीकीर्णान् निदधात्युग्रकोटरे । यः क्रमाद् गुणवल्लोकमणीन् मृत्युसमुद्के ।।१०७॥ जगदिति । यः कालः । जगदेव जीर्णकुटी तत्र कीर्णान् विक्षिप्तान् । गुणवन्तो लोका एव मणयः, तान् । उनकोटरे भीपणकन्दरे। मृत्युरेव समुद्कः संपुटकः, तत्र । क्रमाद्-अद्य श्वः परश्वः-इत्यादि क्रमेण । निदधाति निः- क्षिपति ॥१०७॥ गुणैरापूर्यते यैव लोकरत्नावली भृशम् । भूपार्थमिव सा कण्ठे कृत्याप्येतेन पात्यते ॥१०८|| गुणैरिति । गुणः शौर्योदार्यादिभिः तन्तुभिश्च । लोका एव रत्नानि, लोका रत्नानीव; तेपाम् आवली ।।१०।। - ७६ द्वितीयो गुच्छकः चारयंश्चारहस्तेन कोणेष्वादित्यदीपकम् । कालो लोकालये कुत्र किमस्तीति विलोकते ॥१०॥ चारयन्निति । चारः चारणम् । गतिरित्यर्थः। स एव हस्तः । कोणेषु अन्तरालेषु ॥१०॥ भज्यते नावभग्नोऽपि दग्धोऽपि नहि दह्यते । दृश्यते नापि दृश्योऽपि कालो मायाविदेशिकः ॥११॥ ।। इति कालापवादः॥ भज्यतइति । मायावी मायी । देशिकः उपदेष्टा । ततः कर्म- धारयः॥११०॥ ॥ इति कालापवादः ॥ ( १३ ) अस्योड्डामरचेष्टस्य दिष्टस्य क्रूरकर्मणा । अजातमिव भृतं च भावि चेदं चराचरम् ॥११॥ अस्येति । उड्डामरा उद्भटा, चेष्टा लीला, यस्य सः तस्य । दिष्टस्य कालस्य ॥१११॥ अस्य विश्वभरा पात्रं पारावाराः परि ताः । अवदंशाः ककुब्नागा ब्रह्माण्डं पानमण्डपम् ॥११२॥ ॥ इति कालविलासः ।। अस्येति । परिनु ताः मदिराः। अवदंशाः पानरुचिजनकभक्षणानि । ककुब्नागाः दिग्गजाः ॥११२।। ॥ इति कालविलासः ॥ (१४) विष्वग् विश्वेषु निदधत्कालः स्वस्य करालताम् । कृतान्तरूपतां धचे शैलूप इव भूमिकाम् ॥११३।।
दशकएठवधम् विष्वगिति । विष्वक समन्ततः । भूमिकाम् रूपान्तरम् । भूमिका रचनायां स्यान्मृर्त्यन्तरपरिग्रहे-इति विश्वः ॥११३|| नृत्यन्नितान्तरागीव नियत्या प्रियया समम् । लक्ष्यश्चित्रपदं क्रामन् भावे भावे रसं वहन् ॥११४॥ नृत्यनिति । नियतिः कृतस्य कर्मणः फलावश्यंभावनियमः । चित्रपदं विचित्रचरणन्यासम् इति क्रियाविशेषणम् । भावः पदार्थः स्थायिभावश्च । लक्ष्यो वश्यः॥११४॥ अन्तरेण क्रियामस्य स्वपरिस्पन्दलक्ष्मणः । नान्यदालक्ष्यते रूपं न कर्म न समीहितम् ॥११॥ अन्तरेणेति । अन्तरेण विना। स्वपरिस्पन्द एव लक्ष्म चिन्हं यस्य सः तस्य ॥११॥ तारकासुमनोनद्धव्योमकुन्तलपक्षकम् । दीप्तिमांसलमार्तण्डचन्द्रमण्डलकुण्डलम् ॥११६॥ लोकालोकाचलश्रोणिवाचालक्षुद्रघण्टिकम् । इतस्ततो रणभीमविद्युद्वलयकङ्कणम् ॥११७|| अनिलान्दोलनोद्ध तपुष्करावर्तचेलकम् । तुभ्यत्क्षोणिघनाधातभग्नशेपफणागणम् ॥११८॥ तददोऽन्योन्यसंघर्पोद्रेकदीर्णदिगन्तरम् । संवर्तवर्तनारब्धं दिव्यस्त्रीपुसताण्डवम् ॥११६॥ (चकलकम्) ॥ इति कृतान्तविलसितम् ॥ तारकेत्यादि । तारका एव सुमनसः पुष्पाणि, व्योम एव कुन्तलपक्षक: चिकुरवन्धः । मार्तण्ड-चन्द्रमण्डले एव कुण्डले । अचलश्रेणिः एव क्षुद्रघण्टिका। विद्यु द्वलयमेव कङ्कणं करभूपणम् । पुष्करावर्ताख्यमेघः एव चेलकम् । क्षुभ्यन्त्याः क्षोण्याः घनाघातेन भन्नः शेपफरणागणः यस्मिंस्तत् । तददुः स्त्रीपुस-
द्वितीयो गुच्छकः
८१
लक्षणं ताण्डवम् । अन्योन्यस्य यः संवर्पोद्रे कः अभिभवेच्छातिशयः, तेन
दीर्णानि भिन्नानि दिगन्तराणि यस्मिन् तत् । संवर्त-वर्तने प्रलयक्षणे आरब्धम् ।
दिव्ययोः स्त्रीमुसयोः-'अचतुर-' (पा० सू० ५।४।७७) इति साधु । ताण्डवं
नृत्यविशेषः । चक्कलकम् कालापकम् चतुर्भिः संबद्धमित्यर्थः । ॥११६-११६॥
॥ इति कृतान्तविलसितम् ॥
(१५)
एवं कालादिवृत्तान्तैर्दुरन्तैः कीलिता इव ।
कथं संसारचक्रेऽस्मिन्नाश्वास तात ! दध्महे ॥१२०॥
एवमिति । कीलिताः यन्त्रिताः । तातेति विशिष्य विश्वामित्रं प्रति
संवोधनम् ॥१२०॥
कालः कवलनाकल्यो दैवं दारुणचेष्टितम् ।
कृतान्तः कर्कशस्वान्तो वराकी जगती हता ॥१२॥
कालेति । कवलनाकल्यः ग्रासकुशलः। जगती भुवनम् । जगती भुवने
क्ष्मायां छन्दोभेदे जनेऽपि च-इति मेदिनी ॥१२१॥
आयुरत्यन्ततरलं मृत्युरेकान्तनिष्ठुरः ।
तारुण्यं तरुणीगीर्ण वाल्यं वालिशतापदम् ॥१२२॥
आयुरिति । बालिशतापदम् मौल्य॑स्थानम् । बालिशश्च शिशौ मूर्खे,
भूकेशः शैवले वटे-इति मेदिनी ॥१२२॥
लोकोऽभिलषितालोको बन्धवः स्नेहसिन्धवः ।
भोगा जगन्महारोगास्तृष्णाश्च मृगतृष्णिकाः ॥१२३।।
लोकेति । अभिलषितालोकः इष्टदर्शनः । आलोकस्तु पुमान् द्योते दर्शने
वन्दिभाषणे-इति मेदिनी ॥१२३।।
द्विषन्त इन्द्रियाण्याशु सत्यं मिथ्यातिरस्कृतम् ।
रजोगुणहता दृष्टिस्तुष्टिनित्यमवस्तुनि ॥१२४॥
८२ दशकएठवधम् द्विपन्त इति । द्विपन्तः अमित्राः। द्विप अप्रीतौ । 'द्विपोऽमित्रे' (पा० सू० ३।२।१३१ ) इति शत । रजः गुणेषु मध्यमः पांसुश्च । अवस्तुनि प्रतिपिद्ध पदार्थे ॥१२४॥ ज्वलतीच जरा देहे वहतीव स्पृहा हृदि । मनो विलुठतीवान्तमुदिता करुणापि नो ॥१२॥ ज्वलतीति । ज्वलति त्वरते । वहति एधते । विलुठति प्रक्रमते । मुदिता करुणापि वृत्तिः । नोदेतीति तात्पर्यम् । 'मैत्री-करुणा-मुदितो-पेक्षाणां सुख-दुःख- पुण्या-पुण्यविपयाणां भावनातश्चित्तप्रसादनम्' ( यो० द० २३३) इति योग- सूत्रम् ।।१२।। सुलभो दुर्जनारलेपो दुर्लभः सज्जनाश्रयः । अहंकारकरातोद्य नृत्यते ह्यभ्यसूयया ॥१२६|| सुलभ इति । अहंकारकरे आतोद्य वादिनं यस्मिन् कर्मणि । नृत्यते इति भावे लट् ।।१२६॥ अनुरक्ताङ्गनालोललोचनालोकरञ्जितम् । मानसं विशदीकतु विदुपापि न शक्यते ॥१२७॥ अनुरक्तति । वैपथिको रागो दुष्परिहर इति तात्पर्यम् ॥१२७।। परोपकारकारिण्या परार्तिपरितप्तयां । स्वात्मशीतलया बुद्ध्या बुद्धो विद्वस्यते परम् ॥१२८॥ परोपकारेति । बुद्ध इति-'मतिबुद्धिपूजार्थेभ्यश्च' (पा० सू० ३।२।१८८ ) इति वर्तमाने क्तः । विद्वानिवाचरतीति विद्वस्यते । क्यङ् ॥१२८।। भूयो भूयोऽपि भूयांसो दुराशापाशसंदिताः। दोपगुल्मकसारङ्गा विशीर्णा जन्मजङ्गले ॥१२६|| भूय इति । भूय इति पुनरर्थेऽव्ययम् । जङ्गलं काननम् ।।१२६|| द्वितीयो गुच्छकः ५३ - अद्योत्सवोऽयमृतुरेप तथेह यात्रा ते बान्धवाः सुखमिदं सविशेषभोगम् । इत्थं वृथैव कलयन् सुविकल्पजाल- मालोलकोमलमतिर्गलति प्रकामम् ॥१३०॥ ॥ इति दैवदुर्विलासः ॥ अद्यति । आलोला दोलायमाना, कोमला सुकुमारा । विवेकाक्षमेति यावत् मत्तिर्यस्य तादृक् । गलति विशीयते ॥१३०॥ ।। इति दैवदुर्विलासः ।। (१६) पर्यायसंक्रान्तरवीन्दुरत्न- दीपप्रकाशोऽपि जगद्विलासे । न लक्ष्यते क्वापि तदर्थजातं येनातिविश्रान्तिमुपैति चेतः ॥१३॥ पर्यायेति । पर्यायः अहोरात्रविभागः। रवीन्दू एव रत्नदीपौ । अर्थो वस्तुविशेषः परमार्थतत्त्वं च ॥१३॥ बाल्ये गते कल्पितकेलिलोले मनोमृगे दारदरीषु जीर्णे । काये जराजर्जरतां प्रयाते विदूयते केवलमेव मन्दः ॥१३२॥ वाल्य इति । मन्दः इति कर्त्तव्यताविचारमूढः ॥१३२|| जरातुपारव्यथितां शरीर- सरोजिनीं वीतरसामवेत्य । विनिःसृते जीवितचञ्चरीके जनस्य संसारसरोऽवसन्नम् ॥१३३।।
८४ दशकएठवधम् जरेति । इदम् इतिकर्तव्यताविचारसौन्यस्य फलं दर्शितम् ।।१३३।। तृष्णासरित् सान्द्रतरप्रवाह- पूरस्यदग्रस्तपदार्थपूगा । तटस्थसंतोपतरून् समन्तात् समूलकापं कपतीव स्टा ॥१३४॥ तृष्णेति । पूरस्य स्यदो वेगः। पूगः वृन्दम् । पूगस्तु क्रमुके वृन्दे-इति मेदिनी । समूलकापं कपति-समूलं कपतीत्यर्थः । 'निमूलसमूलयोः कषः' (पा० सू० ३।४।३४ ) इति णमुलि-कपादिपु यथाविध्यनुप्रयोगः ( पा० सू० ३।४।४६) इति ।।१३४॥ तनूतरिस्दैजसतन्तुमूता जगत्पयोधौ तरलं तरन्ती उरुक्रमैरिन्द्रियनक्रवर्ग- रम्याहता हन्त ! निमज्जतीव ॥१३॥ तनूतरीति । तनूः कायः। कायो देहः क्लीवपुंसोः स्त्रियां मूर्तिस्तनुस्तनूः इत्यमरः । तैजसतन्तुमूता रजोगुणवद्धा । मूङ् वन्धने-क्तः । उरुक्रमैः विपुल-- क्रमणैः ॥१३॥ दुःखेषु दूरास्तविपादमोहाः सुखेष्वनुत्सितमनोभिरामाः। सुदुर्लभा संप्रति सुन्दरीभि- रनाहतान्तःकरणा महान्तः ॥१३६|| दुःखेप्विति | अनुत्सितम् अगर्वितम् ।।१३६।। विशद्विपादां विपमामवस्था- मुपाश्रितो दग्धवयोविरामे ।
द्वितीयो गुच्छकः - ० ८५ भावान् स्मरन् स्वानिह धर्मरितान् जीवन्मृतो म्लायति गेहकोणे ॥१३७|| विशदिति । दग्धवयसः यौवनहतकस्य विरामे अवसाने । भावान् अनुष्ठितान् इत्यर्थः । अन्यत्राप्युक्तम्- 'उत्क्रम्य विश्वतोङ्गात् तद्भागैकतनुनिष्ठिताहन्तः । कण्ठलुठत्प्राण इव व्यक्त जीवन्मृतो लोकः ।।' इति । अप्रयोजकतया परिवारोपेक्षणे वर्णितदशा सुप्रसिद्धैवेति भावः ॥१३७।। समूलघातं निहते सपत्ने पत्नीकृतायां च नयेन लदस्याम् । भुङ्क्त हि सौख्यानि पराणि यावत् तावन्मृतिर्मार्गति कामिनीव ॥१३८॥ समूलेति । समूलघातं समूलमित्यर्थः । 'समूलाकृतजीवेषु हन्कृयहः' (पा० सू० ३।४।३६) इति णमुल् । ऐहिकसुखसाधनोपार्जनप्रवणस्य आमुष्मि- कावसरो नायातीति भावः ॥१३८।। प्रियासुभिः कालमुखं क्रियन्ते जनैडकास्ते. हतकर्मबद्धाः । यैः पीनतामेव बलादुपेत्य शरीयाधेन न ते जयन्ति ॥१३६।। प्रियासुभिरिति । प्रियासुभिः प्रियप्राणैः, यैः कर्मभिः, शरीरयाधेन शरीरपीडया, वलाद् हठात्, पीनताम् एव पुष्टिम् एव, उपेत्य स्वीकृत्य, ते जनाः, एडकाः मेपाः इव; विवेकशून्यत्वात् । 'उपमानानि सामान्यवचनैः' ( पा० सू० २।१।५५) इति समासः । जनैडकाः ऐहिकामुष्मिकफलकांक्षिणः । कालमुखं कालपासं यथा स्यात् तथा क्रियन्ते । कर्मिणो निष्पाद्यन्ते इत्यर्थः । ते हतेन क्षयिणा। नश्वरफलघटकेनेत्यर्थः । कर्मणा व्यापारेण वद्धाः नियन्त्रिताः सन्तः न जयन्ति-जीवन्मुक्तयादिमार्गस्खलितत्वात् कृतकृत्या न भवन्तीति तात्पर्यम् ।
८६ दशकएठवधम् 'अविद्यायामन्तरे वर्तमाना- ( मुड० उ० २६८) इति । गीतासु च- 'कामात्मानः स्वर्गरताः- ( २।४३) इति च । प्राञ्चस्तु-नरमेपा इत्यादि वहु व्याचक्षते ॥१३॥ इतस्ततश्चोपनता मुधैव समानसंकेतनिबद्धभावा । मेलासमासङ्गसमा जनानां कलत्रमित्रव्यवहारखेला ॥१४॥ इतस्तत इति । इतस्तत इत्यव्ययं यत्रतत्रार्थे । मेला-मेलके समौ इति मेदिनी । क्रीडा खेला च कूर्दनम्-इत्यमरः ॥१४०।। प्रदीपहेतिष्विव भूरिभुक्त- दशास्त्रतिस्नेहनिवन्धनीषु । संसारदोलासु चलाचलासु न ज्ञायते मर्म विमोहिनीपु ॥१४१॥ प्रदीपेति । अचिहेंतिः शिखा स्त्रियाम्-इत्यमरः । दशावस्था दीपवयोः- इति मेदिनी । स्नेहः स्यात् पुंसि तैलादिरसद्रव्ये च सौहृदे-इति मेदिनी ।।१४१।। संसारसंरम्भकुचक्रिकेयं प्रावृट्पयोबुद्बुदभङ्ग रापि। असावधानस्य विचारणासु चिरस्थिरप्रत्ययमातनोति ॥१४२।। संसारेति । चिरस्थिरप्रत्ययं स्थायिज्ञानम् । असावधानस्य चलचित्तस्य ॥१४॥ मनोहरस्याप्यतिदोपवृत्त- रन्तर्विनाशाय समुत्थितस्य । विपद्रमस्येव जनस्य सङ्गा- दासाद्यते संप्रति मूर्छनैव ॥१४३॥ .
द्वितीयो गुच्छकः ७ मनोहरेति । विषद्रुमः कारस्करो वृक्षः । मूर्छना मूर्छा ॥१४३।। कास्ता दृशो यासु न सन्ति दोषाः कास्ता दिशो यासुन दुःखदाहः । कास्ताः प्रजा यासु न भङ्ग रत्वं कास्ताः क्रिया यासु न नाम माया ॥१४४॥ कास्ता इति । दृशः दृष्टयः । वैषयिकज्ञानानीत्यर्थः । दुःखदाहः सुख- संचाराभावः। भङ्ग रत्वं नश्वरभावः । माया अनाश्वासः ॥१४४॥ सर्वत्र पाषाणमया महीधाः मृदा मही दारुभिरेव वृक्षाः । मांसैर्जनाः पौरुषवद्धभावा नापूर्वमस्तीह विकारशून्यम् ॥१४॥ सर्वत्रेति । 'प्रकृत्यादिभ्य उपसंख्यानम् । इत्यभेदे तृतीया । पौरुषबद्ध- भावाः पुरुषार्थाहंकृताः । किमपि विकारशून्यम् अपूर्व दृश्यं नास्ति । वाचारम्भणं विकारो नामधेयमिति तात्पर्यम् ॥१४५।। जनः कामारूढो विविधकुकलाकल्पनपर- स्ततोऽन्यो दुष्प्रापो जगति सुजनोऽनचरितः । क्रिया, क्लेशावेशा विधुरविधुरा लौकिककथा न जाने नेतव्या कथमिव दशा जीवनमयी ॥१४६॥ ॥ इति निःश्र यसविरोधिभावानित्यता ।। जन इति । कामारूढः स्वार्थपरायणः । अनर्घचरितः अमूल्यचारित्रः । लौकिककथा लोकयात्रा । कथमिव कया चर्यया । अहो ! दुःखं दुःखमिति भावः । शिखरिणी छन्दः ॥१४॥ ॥ इति निःश्रेयसविरोधिभावानित्यता ।।
दशकण्ठवधम् (१७) विपर्ययमिमा यन्ति भूतभौतिकभूतयः । धान्यधान्य इवाजस्र पूर्यमाणाः पुनः पुनः ॥१४७॥ विपर्ययेति । यन्ति यान्ति । इण गतौ । धान्यधान्यः धान्यकुम्भ्यः ।।१४७॥ प्रतिक्षणविपर्यासवाहिना निहतात्मना । जगभ्रमेण के नाम मतिमन्तो न मोहिताः ॥१४८॥ प्रतिक्षणेति । निहतात्मना अधःपातितात्मना ।।१४।। क्षणं विपत् क्षणं संपत् क्षणं जन्म क्षणं मृतिः । विलक्षणप्रवाहेऽस्मिन् मुने ! किमिव न क्षणम् ॥१४६।। क्षणमिति । क्षणमित्यत्यन्तसंयोगे द्वितीया । अहो ! सर्वं नश्वरमिति भावः ॥१४॥ घटस्य पटता दृष्टा पटस्यापि घटात्मता। तन्न यन्न विपर्यासि दृश्यते रोदसीतनौ ॥१५०॥ घटस्येति । घटस्य विशीर्णस्य क्षेत्रे कार्पासपरिणामेन पटता दृष्टा-इत्यर्थः । एवं पटस्यापि परिणामवशेन घटता समुन्नेया ॥१५०।। इतश्चान्यदितश्चान्यद् वस्त्वेवं विदधद् विधिः । क्रीडन् शिशुरिवैकान्तं न खेदं प्रतिपद्यते ॥१५॥ ॥ इति सर्वभावाविरतविपर्यासः ।। इतश्चेति । यदेकत्र ततोऽन्यत्र विलक्षणमिति भावः ॥१५१।। ।। इति सर्वभावाविरतविपर्यासः ।। (१८) इति मे दोपदृष्ट्य व क्लिष्ट मानसकोरके । उत्पद्यन्ते न भोगाशा मृगतृष्णा इव हृदे ॥१५२॥ 4 द्वितीयो गुच्छकः ८६ इतीति । इति हेतुप्रकरणप्रकाशादिसमाप्तिषु-इत्यमरः । मे मम रामस्य । दोषदृष्टय व सर्वत्रासमञ्जस्यपर्यालोचनेनैव ॥१५२।। जन्मावलिवरत्रायामिन्द्रियग्रन्थयो दृढाः । निपुणं येन मुच्यन्ते जितं तेन महात्मना ॥१५३॥ जन्मेति । नध्री वीं वरना स्यात्-इत्यमरः । मुच्यन्ते भिद्यन्ते । जितमिति भावे क्तः ॥१५३।। इदानीं स्वच्छया बुद्धचा चित्त' चेन्न चिकित्स्यते । पुनरेतचिकित्साया ब्रह्मन्नवसरः कदा ॥१५४॥ इदानीमिति । चिकित्स्यते नैरुज्यीक्रियते । कित निवासे रोगापनयने च ॥१५४॥ वासनाजालजटिला दुःखसंकटसंकुला । निपातोत्पातभूयिष्ठा भीमा ह्यज्ञानताटवी ॥१५५।। वासनेति । संकटं ना तु संवाधः-इत्यमरः ।।१५५।। आयुर्वायुविघट्टिताभ्रपटलीलम्बाम्बुवद् भङ्ग र भोगा मेघवितानमध्यविलसत्सौदामिनीचञ्चलाः। लोला यौवनलालना जलरयोहल्ला इति व्यामृशन् मुद्रामेव दृढामकार्षमधुना चित्त चिरं शान्तये ॥१५६॥ ॥ इति सकलपदार्थानास्था ॥ आयुरिति । उद्घल्ला वारिवेगवदुद्भटा इत्यर्थः । विपयविरतिलक्षणां मुद्रां संनिवेशविशेषम् । अकार्ष व्यधाम् ॥१५६।। ।। इति सकलपदार्थानास्था ।। इदानी परितापमुपसंहरन प्रयोजनं दर्शयति- प्रयोजनं तु-'यमर्थमधिकृत्य प्रवर्तते तत् प्रयोजनम्' (१.१।२४) इत्यक्षपादः । - ६० दशकण्ठवधम् (१६) इत्थमभ्युत्थितानर्थसार्थसंकटकोटरे । जगन्निपतितं वीक्ष्य मूर्छतीव मतिर्मम ॥१५७।। इत्थमिति । जगन्निपतनमेव लक्ष्मीनिराकरणादिना प्रघट्टकजातेन प्रपञ्चितम् ॥१५॥ तदतुच्छमनायासमनुपाधि भ्रमापहम् । किं विश्रान्तिपदं तात ! यत्र शोको न विद्यते ॥१५८॥ तदतुच्छमिति । अनुपाधि उपाधिशून्यम् ।।१५।। सर्वारम्भसमारूढाः सुजना जनकादयः । व्यवहारपरा एव कथं निःश्रेयसं गताः ॥१५६।। सर्वारम्भेति । जनकादय इत्यन्तेन प्रवृत्तावेव निवृत्तिलक्षणो धर्मो जिज्ञास्य इति स्पष्टम् । जनको विदेहः । स हि प्रथमो विवक्षितः, रघुयटुवत् । एवमादीनां तत्संतानाभिधाने तु लक्षणैव ॥१५६।। का दृष्टिं वा समालम्व्य भवन्तो वीतकल्मपाः । जीवन्मुक्ता महाभागा विचरन्ति क्षमान्तरे ॥१६॥ कां दृष्टिमिति । विचरन्ति व्यवहरन्ति ॥१६०॥ तदेतदुच्यतां तत्त्वं मद्यमाधिमुपेयुपे । स्निग्धमम्युभृतं हित्वा चातकोऽन्यं न नाथति ॥१६शा ॥ इति प्रयोजनम् ॥ तदेतदिति । तत्त्वं परमार्थः । स्निग्धं वृष्व्यु न्मुखम् । नाथति याचते ॥१६॥ अहह ! लुलति जीवितपल्लवाग्रलग्नपानीयपृपन्निवहे, पतति सज्जनसङ्गविटपवृन्तश्लथक्कुसुमसमूहे, सर्पति दुर्वासनापवमानझंकारे, ।
द्वितीयो गुच्छकः ६१ स्फुरति दुराशासौदामिनीदामवारे, उद्यति मोहमिहिकाविताने, गर्जति गर्वबलाहकप्रताने, मूर्छति लोभकेकिकेकाकलकले, तावद् विषमभवद- वानलतापप्रशमनस्य कः प्रयत्नः का शैली किं विधानमिति यथायथं सम्यङ् निवेदितवान् रामभद्रो मुनिवृन्दारकाणाममीषां विश्वामित्रपुरस्स- राणां पुरस्ताद् विवदिषुस्तूष्णीमासांबभूव ॥१६२॥ अहहेति । अहहेत्युद्भुते । जीवितं जीवनमेव पल्लवानलग्नपानीयपृषन्निवहः, तस्मिन् लुलति दोलायमाने सति । एवमग्रऽपि योजनीयम् । तत्र-पवमानः प्रभञ्जनः । वारः समुदायः । निवहावसरौ वारी-इत्यमरः । मिहिका प्रालेयम् । केकी मयूरः । तावदिति वाक्यालंकारे । विषमः उच्चावचः । प्रयत्नः प्रकृष्टो यत्नः । शैलीपरिभाषाशैलीसंकेतसमयकाराश्चेति त्रिकाण्डशेषः। विधानं विधिः । मुनि- वृन्दारकाणामिति 'वृन्दारकनागकुञ्जरैः पूज्यमानम्' (पा० सू० २।१।६२) इति समासः । विविदिषुः वेत्त मिच्छुः । आसांवभूव ॥१६२।। अत्रान्तरे भास्वत्प्रकाशावेशविकसन्मुखी कण्टकितावयवनाला स्फु- रदामोदरससंभृता सरोजिनीव, विमलविचारणापास्तसमस्तभववेदना मुहूर्तममृतपूरप्लावितेव, प्रमेयावधाननिष्यन्दा श्रवणनिविष्टेतरेन्द्रिय- ग्रामेव, जननीरसा शिशुतनुरिव, परमार्थपरायणा कविसतिरिव, रामचित्तापि विरामचित्ता संगता समस्ता जनता जहर्ष ॥१६३॥ . अत्रान्तर इति । भास्वान् सूर्यः प्रकाशश्च । कण्टको रोमाञ्चोऽपि । आमोदः आनन्दः सौरमं च । इवेत्युत्प्रेक्षायाम् । निष्पन्दो निश्चलः । श्रवण- निविष्टेतरेन्द्रियग्रामा. श्रवणैकपरायणा। जने लोके नीरसा। जनन्याः रसो यस्यां सा। परलोकः वैरिजनः ब्रह्मादिलोकान्तरं च । मुक्ताः जीवन्मुक्ताः मौक्ति- कानि च । परमार्थः तत्त्वज्ञानं वाच्यलक्ष्यव्यङ्गयतात्पर्यात्मा च । विरोधपरिहारे विराम उपरामः । जहर्प मुमुदे ।।१६।। तदनु ससाधुवादसंलापं देवलोकविसृष्टा, सुरतस्कुसुमकोशस्त्रवन्म- धुविन्दुकरम्बिता, अनुचलल्लोललोलुभलोलम्बमण्डलगुजिता, प्रसृमरमधु- ,
६२
दशकण्ठवधम्
रामोदमोदमानजनमानसा, उद्ग्रीवनागरवर्गावलोकिता; चरणपल्लबद्वयसी,
परिष्कृतपरिपन्मणिकुट्टिमा, अदृष्टपूर्ण, उन्मिपत्प्रमाजालमांसला अाया-
मिनी कर्बुश रत्नपतिरिव पुष्पवृष्टिरा च मुहूर्तचतुर्भागाद् विहायसः
पपात ॥१६४॥
तदन्विति । करम्बिता मिश्रिता । लोलम्बाः भ्रमराः । प्रसृमरो विसृत्वरः ।
चरणपल्लवद्वयसी । प्रमाणो द्वयसच्-डीप् | कुट्टिमोऽबी निवद्धा भूः। उन्मिपदि-
त्यादिविशेषणत्रयं रत्नपङ्क्तौ पुष्पवृष्टौ संगमनीयम् । आ च इति पृथक्पदम् ।
विहायसः आकाशात् ॥१६४||
तत्कालमिह . परस्परपरामर्शसंघृष्टकृष्णाजिना, यज्ञोपवीतिनी,
लोलाक्षमालावलया, कमण्डलुधारिणी, पिशङ्गजटाजूटा, प्रसरद्दीप्तिविता-
नतारतम्येन काचन सवितरन्ती, काचन चित्रभानवन्ती, काचिदिन्दवन्ती,
काचित्तारकायन्ती, काचन पुनरुडूयमाना यदृच्छयोपस्थिता दिव्या
मुनिपरम्परा यथान्यायमुपवेशिता अभिमतरसां साध्वी दाशरथिगवीमेव
मुहुमुहुरन्योन्यं श्लाघमानावतस्थे ।।१६।।
तत्कालेति । अक्षो गुलिका । सवितरन्ती सवितारमिवाचरन्ती | चित्र-
भानवन्ती चित्रभानुर्विभावसुस्तमिवाचरन्ती। इन्दवन्ती इन्दुमिवाचरन्ती । तार-
कायन्ती तारकामिवाचरन्ती । सवित्रादिशब्दाद् आचारक्विवन्तात् शतरि ङीपि
नुमि च सवितरन्तीत्यादि । उडूयमानेति उडु लघुतारकमिव आचरतीति क्यङि
शानचि च रूपम् । यदृच्छया स्वारसिंक्या इच्छया ।।१६५।।
विदन् द्विजाग्र्यो हि मुनित्वमीयात्
तद् बाहुजन्मा जनकत्वमीवात् ।
वणिक् तुलाधारसमत्वमीयाज
जनश्च शूद्रोऽपि च मुक्किमीयात् ॥१६६॥
द्वितीयो गुच्छकः ६३ विदन्निति । द्विजान यो ब्राह्मणः । बाहुजन्मा क्षत्रियः । जनको सीरध्वजो विदेहः यत्संबन्धात् भगवती सीता जानकी वैदेहीति व्यपदिश्यते । वणिग् वैश्यः। तुलाधारकथा महाभारते (१२।२६०।८) इति । शूद्रः पादजः न तु धर्मध्वज- व्याख्यानेन मूर्को व्यक्तिविशेषः ॥१६६।। तातश्रीसरयूप्रसादचरणस्ववृक्षसेवापरो मातृश्रीहरदेव्यपारकरुणापीयूषपूर्णान्तरः। साकेतापरभागबद्धवसतिदुर्गाप्रसादः सुधी- रास्ते तेन कृतेऽत्र रामचरिते गुच्छो द्वितीयो गतः ॥१६७॥ ० ।। इति श्रीमति रामचरिते वासिष्टनिर्यासे वैराग्यप्रकरणं नाम प्रथमो गुच्छकः । आदितो द्वितीयः ॥
d दशकएठवधम् अथ तृतीयो गुच्छकः। अथ तथाभूतायां समितिसुधर्मायां स भगवान् विश्वामित्रः पुरो- गतं रामभद्रं प्रीत्येदमभ्यभापत-अये ! ज्ञानवतां वर !! भवता स्वबुद्धय व सर्वं व्यज्ञायि । केवलं स्वभावशुद्ध भावत्के प्रतिभाने मुकुरे मनाङ्मार्ज- नमिव स्तोकमुपदेशासञ्जनमुफ्युज्यते । अहो ! मुनिवृन्दिष्ठाः !! ज्ञेयं ज्ञातमनेन रघुवीरेण यदस्मै सुमेधसे रोगा इव भोगा न रोचन्ते ॥१॥ अथेति । अथ रामभद्रस्य परितापनिवेदनानन्तरम् । समितिरेव सुधर्मा देवसमा तस्याम् । अये इति कोमलामन्त्रणे अव्ययम् । व्यज्ञायि अवेदि । प्रतिभाने ज्ञाने । आसञ्जनम् आसङ्गः ॥१॥ ज्ञातज्ञेयस्य मनसो नूनमेतद्धि लक्षणम् । न स्वदन्ते यदेतस्मै भोगाः स्वर्गागता अपि ॥२॥ ज्ञातेति । स्वदन्ते रोचन्ते ।।२।। भोगवासनया वन्धः शान्तया त्वस्य तानवम् । वासनातानवं राम ! मोक्ष इत्युच्यते वुधैः ॥३॥ भोगेति । वासना शुद्धा मलिना चेति प्रागुक्तम् । तत्र शुद्धामभिप्रेत्य संसारयात्रासूत्रमेतत् ॥३॥ इदानीं केवलीभावविश्रान्ति समपेक्षते । रामवुद्धिः शरल्लक्ष्मीः स्वभावसुपमामिव ॥४॥ इदानीमिति । केवलीभावः कैवल्यम् । तत्र विश्रान्ति विश्रमम् । रामबुद्धिः शरलक्ष्मीरिति व्यस्तरूपकम् । स्वभावसुपमामात्मप्रसादम् ।।४।। अङ्ग ! भगवन् !! वसिष्ठ !!! अस्य महात्मनो मनोविश्रान्त्यै रघुकुलगुरुणा श्रीमतैव युक्तयः प्रस्तूयन्ताम् । कचित् स्मरसि ब्रह्मयोने ! यदावयोवेरोपशमाय निःश्रेयसाय च निपधाद्रौ भगवता ब्रह्मणा स्वय- तृतीयो गुच्छकः ६५ मतुप् । - मुपदिष्ट ज्ञानम् । येन च युक्तिमता भास्वता श्यामेव संसारवासना सद्यः शममुपयाति । एवं प्रणयपेशलं व्याहरति विश्वामित्रे तत्र समवेताः सर्वे तमेवार्थमभिननन्दुः । तदनु वसिष्ठोऽपि त्रिकालदर्शी महातेजाः-अङ्ग! सकलमविकलं स्मरामीति हर्षमाणो ब्रह्मनिष्ठं ब्रह्मोपझं ब्रह्मोद्य तज्ज्ञानमुपदेष्टुमुपाक्रमत--॥५॥ अङ्गति । श्रीमतेत्यत्र तपोज्ञानसमृद्धिः श्रीशब्दार्थः। प्राशस्त्ये येन ब्रह्मोपदिष्टज्ञानेन । ब्रह्मनिष्ठ ब्रह्म कारणरूपम् । ब्रह्मोपझं ब्रह्मा कार्यब्रह्मा । 'उपज्ञोपक्रमं तदाद्याचिख्यासायाम्' (पा. सू. २।४।२१) इति समासः । ब्रह्म उपनिषदः उपचारात् तद्वदनम् । निरूपणमिति यावत् । वदः सुपि क्यप् च ।।५।। रामभद्रण प्रथमपरितापादौ-'किं नामेदं बत सुखं येयं संसारसंगतिः । जायन्ते मृतये यत्र नियन्ते जातये जनाः ॥' इत्यादि यदुक्तं तद् यथाप्रतिपत्ति- सौकर्यमभिधातु भगवान् वसिष्ठः- 'परमार्क-' इत्यादिना समुपक्रमते- ( १ ) परमार्कप्रकाशान्तस्त्रिलोकीत्रसरेणवः । उत्पत्योत्पत्य ये लीनास्ते ह्यसंख्या रघूत्तम ! ॥६॥ परमार्केति । हे रघूत्तम ! रघुषु अवतंसभूत ! राम !! परमः अपरि- च्छिन्नः अर्कप्रकाशः आत्मप्रकाशः । अनस्तमितभात्मक इति यावत् । एवं च आत्मा चासौ प्रकाशश्चति व्यक्तमेव । श्रूयते च मुण्डके- "न यत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारक नेमा विद्यु तो भान्ति कुतोऽयमग्निः । तमेव भान्तमनु भाति सर्व तस्य भासा सर्वमिदं विभाति ॥" ( मुंड २ खं. ११) इति । एवंभूतस्य परमार्कप्रकाशस्य अन्तः अवकाशे । ये त्रिलोकीत्रसरेणवः त्रयो लोका एव परिच्छिन्नप्रमाणतया त्रसरेणुकल्पाः । ब्रसरेणुस्तु- 'जालान्तरगते भानौ यत् सूक्ष्म दृश्यते रजः । प्रथमं तत् प्रमाणानां सरेणुं प्रचक्षते ।'
६६ दशकएठवधम् इत्येवमादिपरिभापितः । यथाकालम् उत्पत्योत्पत्य यथान्यायम् उत्पद्योत्पद्य इति तात्पर्यम् । लीनाः तिरोहिताः। ते हि असंख्याः संख्यातुमनौंः। असंख्येया इत्यर्थः। त्रिलोकीत्युपलक्षणम् । अनेककोटिब्रह्माण्डा अपि द्रष्टव्याः । अनेककोटयः ब्रह्माण्डाः येषां ते । अभिमन्यमानत्वादिरूपः संवन्धः षष्ठ्यर्थः । विकारपोड- शान्तर्वर्तिपञ्चीकृतस्थूलभूतकार्यो हि ब्रह्माण्डः । तदभिमानी विराडुच्यते । ब्रह्माण्डान्ततिसमष्टिलिङ्गशरीराभिमानी स्वराट् । तदुभयकारणाव्याकृताभिमानी सम्राट् । तदुक्तम्- 'प्राधान्येन विराडात्मा ब्रह्माण्डमभिमन्यते । स्वराट् स्वरूपमुभयं सम्राडित्यब्रवीच्छु तिः ।।' इति ॥६॥ वर्तमानाश्च ये सन्ति तेऽपीमे चित्रदर्शनाः । संख्यातु नहि शक्यन्ते भाविनां तु कथैव का ॥७|| वर्तमानेति । ये च वर्तमानाः अनुभूयमानाः त्रिलोकीत्रसरेणवः सन्ति । ते अपि इमे चित्रदर्शनाः विलक्षणावस्थानाः । नहि संख्यातुं परिच्छेत्तुं शक्यन्ते पार्यन्ते । भाविनां भविष्यतां तु कथैव का । दूरापास्तेत्यर्थः ।।७।। तिर्यङ्मानुपदेवेषु यः कश्चिन्नाम नश्यति । यस्मिन्नेव प्रदेशेऽसौ तत्रैवेदं प्रपश्यति ॥८॥ --- तिर्यगिति । तिर्यगादिपु यः कोऽपि यस्मिन् प्रदेशे नश्यति तस्मिन्नेव असौ प्रत्यगात्मा इदं श्यजातं पश्यतीत्यर्थः ॥ ८ ॥ आतिवाहिकनाम्नान्तः स्वहृद्येव जगत्त्रयम् । व्योम्नि चित्तशरीरेण व्योमात्माऽनुभवत्यजः ॥६॥ आतिवाहिकेति । अजो व्योमात्मा शरीरी अन्तः स्वहृदि व्योन्नि एव आतिवाहिकनाम्ना चित्तशरीरेण जगत्त्रयं यथावासनमनुभवति । एतत्परलोकया- त्रानिर्वाहकं शरीरम् अतीन्द्रियत्वात् सूक्ष्मम्, अनुमेयत्वाल्लिङ्गम् , भौतिकमात्रा- घटितत्वाद् पातिवाहिकम्, इति च व्यपदिश्यते । उक्तंच-
तृतीयो गुच्छकः
६७
'पञ्चप्राणमनोबुद्धिदशेन्द्रियसमन्वितम् ।
अपञ्चीकृतभूतोत्त्थं सूक्ष्माङ्ग भोगसाधनम् ।।' इति ।।६।।
एवं मृता म्रियन्ते च मरिष्यन्तीति निश्चितम् ।
यथावासनमुत्पन्ना भूतग्रामाः पृथक् पृथक ॥१०॥
एवमिति । एवं मृता-इत्यन्तेन लोकसंचरणमेव व्युत्पादितम् ॥१०॥
संकल्पकल्पनाक्लुप्तमनोराज्यविलासवत् ।
इन्द्रजालकलाकीर्णमिथ्यार्थप्रतिभासवत् ॥११॥
स्वप्नसंवित्तिसंघब्धव्योमापणविहारवत् ।
एतज्जगत्संसरणं स्वान्तरेवानुभूयते ॥१२॥ (युग्मकम् )
संकल्पकल्पनेत्यादि । संकल्पकल्पनेति युग्मकेन जगत्संसरणप्रक्रियायाः
सुखावबोधार्थ दृष्टान्तनिरूपणम् । तत्र संकल्पकल्पनाभिः क्लृप्तं सज्जितं यन्
मनोराज्यं तद्विलासवद् उपभोगवत् । इन्द्रजालकलाभिः साम्बरमायाभिः कीर्णो
विस्फारितः मिथ्यार्थः प्रातिभासिकवस्तुकलापः तत्प्रतिभासवत् प्रतिभानवत् ।
जगतो नश्वरत्वादिति तात्पर्यम् । स्वप्नसंवित्त्या स्वप्नकालिकप्रकाशेन संहब्धः
घटितः यः व्योमापणः तद्विहारवत् चङ्क्रमणवत् ॥११-१२॥
तत्रातिसक्तियोगेन तत्रैच घनतां गतः ।
इह लोकोऽयमित्येव जीवाकाशे विजृम्भते ॥१३॥
तत्रेति । अतिसक्तिः अभिनिवेशः । धनतां पञ्चीकरणेन दायम् ॥१३॥
पुनस्तत्रैव जन्मेहामरणाद्यनुभूतिमान् ।
मृतश्च मन्यते तत्र परलोकं तथा पुनः ॥१४॥
पुनरिति । ईहा जन्मोत्तरं मरणपर्यन्तं चेष्टा ॥१४||
तदन्तरन्ये भूयांसस्तेषामन्तस्तथापरे ।
संसृज्यन्तेऽत्र संसारे कदलीदलपीठवत् ॥१५॥
६८ दशकएठवधम् तदन्तरिति । तदन्तः वासनाभ्यन्तरे । कदलीदलस्य पीठानि आधारभूताः कदलीत्वचः तद्वत् ॥१५॥ न भूम्यादिमहाभूतश्लेपा न च जगत्क्रमाः । अहो ! मृतानां तत्रापि तथाप्येषां जगद्ममाः ॥१६॥ न भूम्यादीति । तत्रातिसक्तियोगेनेति पूर्वार्धस्यैवायं प्रपञ्चो लोकानास्था- प्रयोजकः ॥१६॥ अविद्यैव ह्यनन्तपा नानाप्रसरशालिनी । जडानां निम्नगा दीर्घा सर्गकल्लोलमालिनी ॥१७॥ अविद्योति । 'अनित्याशुचिदुःखानात्मसु नित्यशुचिसुखात्मख्यातिरविद्या' (२।५) इति सूत्रिता अविद्या । तत्र दृष्टान्तः-जडानामिति | जडानां मूढ़ानां वारीणां चेति श्लिष्टम् ॥१७॥ अगाधे परमाम्भोधौ रामैताः सृष्टिवीचयः । भूयो भूयोऽनुवर्तन्ते पूर्णेन्दाविव चन्द्रिकाः ॥१८॥ अगाधेति । परमाम्भोधौ अपरिच्छिनात्मनि-इत्यर्थः ।।१८।। आश्वस्तान्तःकरणो ध्वस्तविकल्पः स्वरूपसारमयः । परमशमामृतसुहितो विकसति विद्वान्निरावरणः ॥१६॥ ॥ इति भूयोभूयः सर्गः॥ आश्वस्तेति । आधिकारिकादिभोगवशेन शरीरवानप्यशरीरी जीवन्मुक्त इति तात्पर्यम् ॥१६॥ ॥ इति भूयोभूयः सर्गः ॥
तृतीयो गुच्छकः
६६
( २ )
सदेहत्वेऽप्यदेहत्वे देहिनो मुक्तता समा ।
सोमित्वे वाप्यनूमित्वे वारिणो वारिता यथा ॥२०॥
सदेहत्वेति । सतरङ्गस्यातरङ्गस्य जलाशयस्य इव जीवन्मुक्तस्य विदेहमुक्त-
स्य च तुल्यैव मुक्ततेति भावः ॥२०॥
न बोधरूपयोर्भेदः सदेहादेहमुक्तयोः ।
सस्पन्दो ह्यथवाऽस्पन्दो मरुदेष न चामरुत् ॥२१॥
न बोधेति । दृष्टान्तस्य साकारत्वे कदाचिद् दान्तिके भ्रमः स्यादिति
तन्निरासार्थं निराकार दृष्टान्तमुपन्यस्यति-न बोधरूपयोर्भेद इति । नहि सस्पन्दो-
ऽस्पन्दश्च मरुन स्वरूपतो.भिद्यत इति भावः ॥२२॥
सदेहा वा विदेहा वा मुक्तता विषये नहि ।
अनास्वादितभोगस्य कुतो भोज्यानुभूतयः ॥२२॥
सदेहेति । स्यादेतद्, यदि शरीरादिदृश्ये मुक्तता भवेदित्यर्थः ।।२२।।
सर्वमेव हि संसारे पौरुपादेव लभ्यते ।
न तादृक् किंचिदप्यत्र यदलभ्यमुदीर्यते ॥२३॥
सर्वमिति । नित्यलब्धस्यात्मनो लामे दृश्यवारणार्थ पुरुषार्थ प्रशंसती-
त्यर्थः ॥२३॥
शास्त्रोपदिष्टमार्गण यद् देहेन्द्रियचेष्टितम् ।
तत् पौरुषं तत् सफलमन्यदुन्मत्तजृम्भितम् ॥२४॥
शास्त्रोति । एवंस्वरूपं पौरुषं पौरुषं भवतीति भावः ।।२४।।
प्राक्तनाद्यतने गीते पौरुपे पुरुषर्षभ ! ।
वृद्धो यूनेव पूर्व हि परेण परिभूयते ॥२५॥
प्राक्तनेति । उक्तस्वरूपमेवाद्यतनं पौरुषं शिथिलमूलं प्राक्पौरुपं पराभव-
तीति तात्पर्यम् ॥२॥
दशकएठवधम
यत्नवद्भिटाभ्यासः प्रजोत्साहसमन्वितः ।
गिरयोऽपि निगीर्यन्ते कैव प्राक्पौरुपे कथा ॥२६॥
यत्नवदिति । दृश्यवारणार्थमेव उत्साहप्रयत्नाभ्यासप्रभृतिलक्षणं पौरुपं
प्रपञ्चयतीत्यर्थः ॥२६॥
पौरुपेण प्रयत्नेन त्रैलोक्यैश्वर्यभास्वराम् ।
कश्चित् प्राणिविशेपो हि विन्दति स्म महेन्द्र ताम् ॥२७॥
॥ इति पौरुपम् ॥
पौरुषेणेति । अहो ! तदिदं पौरुषम् इयद् वयेते यत्प्रभावेण इन्द्रशब्दा-
र्थोऽपि महेन्द्रतायोगी । मीमांसायां तु इन्द्रमहेन्द्रशब्दौ भिन्नप्रवृत्तिनिमित्तौ
स्फुटावेव ॥२७||
॥ इति पौरुषम् ।।
( ३ )
प्रवृत्तिरेवं प्रथमं यथान्यायं प्रवर्तिनाम् ।
प्रभेव वर्णभेदानां साधनी सर्वकर्मणाम् ॥२८॥
प्रवृत्तीति ।'न्यायं मर्यादामनतिक्रम्य प्रवर्तिनां मनोवाक्कायैः व्यवहरण-
शीलानाम् । वर्णभेदानां शुक्लनीलपीतादिवर्णभेदानां प्रभैव साधनी तद्वत् ।
'तस्माच्छास्त्र प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ' (१६।२४)
इति भगवद्गीतेः ॥२८॥
मनसा साध्यते यच यथान्यायं न कर्मणा ।
तदुन्मत्तक्रियाकल्पं चेष्टनं नार्थसाधनम् ॥२६॥
मनसेति । उभाभ्यामेव साधनीयमित्यर्थः ।।२।।
परं पौरुपमाश्रित्य दन्तैर्दन्तान् विचूर्णयन् ।
शुभेनाशुभमुद्युक्त प्राक्तनं पौरुपं जयेत् ॥३०॥
तृतीयो गुच्छकः परमिति । एतत्फलितमाह-परं पौरुषमिति ॥३०॥ प्राक्तनः पुरुषार्थो मां नियुक्त इति चेतना । बलादधस्तात् कर्तव्या प्रत्यक्षात् प्रबला न सा ॥३१॥ प्राक्तनेति । प्राक्तनः पुरुषार्थः प्रारब्धकर्मफलम् ॥३१॥ प्रत्यक्षमानमुत्सृज्य योऽनुमानेषु तिष्ठते । इमौ साविति प्रेक्ष्य स स्वदोर्थ्यां पलायते ॥३२॥ प्रत्यक्षेति । तिष्ठते इति-'प्रकाशनस्थयाख्ययोश्च' (पा० सू० १।३।२३) इत्यात्मनेपदम् ॥३२॥ दोषः शाम्यत्यसंदेहं प्राक्तनोऽद्यतनगुणैः । विधीयमान भैषज्य रुल्लाघोऽत्र निदर्शनम् ॥३३॥ दोषेति । उल्लाघो नीरोगः । उल्लाघो निपुणे हृष्टे शुचिनीरोगयोरपि-इति हैमः ॥३३॥ न यातव्यमनुद्योगैः साम्यं पुरुषगर्दभैः । उद्योगो हि यथाशास्त्रं लोकद्वितयसिद्धये ॥३४॥ न यातव्यमिति । पुरुषा एव गर्दभास्तैः । लोकद्वितीयम् एष लोकः परलो- 'कश्च ॥३४॥ प्रत्यहं प्रत्यवेक्षेत देहं नश्वरमात्मनः । संत्यजेत् पशुकर्माणि साधुवानि संश्रयेत् ॥३॥ प्रत्यहमिति । पशुः पामरः ॥३५॥ किंचित्कान्तानपानादि कलितं कोमलं गृहे । वणे कीट इवास्वाद्य वयः कुर्यान्न भस्मसात् ॥३६॥ किंचिदिति । ऐहिकसुखपरतन्त्रो वयोयापनं न विदध्यादित्यर्थः ।।३६।।
.
१०२
दशकण्ठवधम्
उद्यत्सच्छास्त्रसत्सङ्गसदाचारसुधोर्जितः ।
एष पौरुषसंतानो दत्ते फलमभीप्सितम् ॥३७||
उद्यदिति । पौरुषमेव संतानः पौरुषस्य संतानो वा । संतानः संततौ गोत्रे
स्यादपत्ये सुरद्रुमे-इति मेदिनी ॥३७||
आलस्यं यदि न भवेजगत्यनर्थः
को न स्याद् बहुविभवो बहुश्रुतो वा ।
एतस्मादवनिरियं ससागरान्ता
संकीर्णा नरपशुभिश्च निर्धनैश्च ॥३८॥
॥ इति पौरुपस्थापनम् ॥
आलस्येति । नरपशवो निमर्यादाः । आलस्यम् एव आत्मोन्नतिविघटन-
स्य परं निदानमित्यर्थः ॥३८॥
इहैव वासिष्ठे महारामायणे प्रथमो दिवसो व्यरंसीत् । तथाच पठ्यते-
"इत्युक्तवत्यथ मुनौ दिवसो जगाम
सायंतनाय विधयेऽस्तमिनो जगाम ।
स्नातुं सभाकृतनमस्करणा जगाम
श्यामाक्षये रविकरेण सहाजगाम ॥"
इति । एतेन सांप्रतं व्याख्यानताण्डवाडम्वरैः संध्योपासनादि कर्म लोपयन्तः
सभाव्यसनिनो रागान्धाः पर्यालोच्या इति ॥ वचनव्यत्यय आर्पः ।।
।। इति पौरुषस्थापनम् ॥
( ४ )
यथा प्रयत्न येत तथैध्येत फलैरपि ।
इति पौरुपमेवेप्टे किं देवं नाम दृष्यति ॥३६॥
पथेति । भूयेत भवितव्यम् । भावे लिङ् । एवम् एध्येत एधितव्यम् ।
दप्यति । हपहपमोहनयोः । मोहनं गर्वः ॥३॥
तृतीयो गुच्छकः
१०३
शक्तस्य पौरुषं व्यक्तमव्यक्त वापि यद् भवेत् ।
तद्दवमित्यशक्त न वुद्धमात्मन्यबुद्धिना ॥४०॥
शक्तेति । पौरुषमेव दैवमिति फलितम् ॥१०॥
पौरुपेण कृतं कर्म यद्यकस्माद् विपद्यते ।
तत्र व्यापादकाकोपो न देवमिति घुष्यताम् ।।४।।
पौरुषेति । व्यापादकस्य अनुष्टातुः, आकोपः मौढ्यम् ॥४१॥
द्वौ हुडाविव युध्येते पुरुषार्थों परस्परम् ।
जीयते दुर्बलस्तत्र वृथा दैवकदर्थना ॥४२॥
द्वाविति । हुडो मेषः- इति शब्दार्थचिन्तामणिः ॥४२॥
भिनुको मङ्गलेभेन नृपतां यदि नीयते ।
प्राक्तनं पौरुषं तत्र बलवद्वापि कारणम् ॥४३॥
भिक्षुकेति । अन्यपौरुषेण अन्यस्य फलभोगे पक्षान्तरम् । मङ्गलेभो
मङ्गलगजः ॥४३॥
यन्न शक्नोमि तस्याथै यदि दुःखं करोम्यहम् ।
तदमारितमृत्योर्मे युक्त प्रत्यहरोदनम् ॥४४॥
यन्नेति । सर्वथा ह्यशक्ये प्रवृत्तिः-अहो मे मृत्युभविष्यतीतिवद्रु दित-
चेष्टैन ॥४४॥
ईश्वरप्रेरितो गच्छेत् स्वर्ग नरकमेव वा ।
य एवं मन्यते मन्दो नाथवान् पशुरेव सः ॥४॥
ईश्वरेति । नाथः नासारज्जुः-इति शब्दार्थचिन्तामणिः। नहीश्वरेण
मित्वामित्रवत् किंचित् संपाद्यते । तथाच स्मयते गीतासु-
'नादत्त कस्यचित् पापं न चैव सुकृतं विभुः ।
अज्ञानेनावृतं ज्ञानं तेन मुह्यन्ति जन्तवः ॥' (५।१५)
इति ॥४५॥
१०४ दशकएठवधम् कश्चिन्मां प्रेरयत्येव मित्यनर्थकुकल्पने । यः प्राप्तो दृष्टमुलंब्य स हेयो दूरतोऽधमः ॥४६॥ काश्चिदिति । कश्चिद् अन्तर्यामी। माम् । प्रेरयति प्रयोजयति । इति व्यामोहमात्रम् । स हि कमर्थमभिसंधाय प्रेरयेद् इति तात्पर्यम् ।।४।। स्वार्थप्रापककार्यकप्रयत्नपरता बुधैः । प्रोक्ता पौरुपशब्देन सा सिध्येच्छास्त्रसंस्कृता ||७|| स्वार्थेति । शास्त्रसंस्कृता शास्त्रानुमोदिता नतूत्पथं नीता ॥४॥ प्राकृतं पौरुपं वीर ! देवनाम्नावगीयते । तत्रालम्बितकर्तव्यः खञ्जः श्राणः कुणिर्न किम् ॥४८॥ प्राकृतेति । वीरेति रामभद्रस्य साभिप्राया संवुद्धिः। अतएवान्यत्राप्युक्तम्- 'उद्योगिनं पुरुपसिंहमुपैति लक्ष्मी- देवेन देयमिति कापुरुपा वदन्ति । दैवं निहत्य कुरु पौरुपमात्मशक्तथा यत्ने कृते यदि न सिध्यति कोऽत्र दोपः ।।' इति । अत्र यत्ने को दोपः-इति विचारणीयम् । सर्वथोद्योगवता भवित- व्यमित्यर्थः ॥४८॥ सकलकारणकार्यविवर्जिता निजविकल्पवलादुपकल्पिताम् । वितथदेवकथामवहेलयन् सततमाश्रय पौरुपमात्मनः ॥४६॥ ॥ इति देवनिराकरणम् ॥ सकलेति । निजविकल्पवलादुपकल्पिताम्-आत्मनो विकल्पकोटेः समु- स्थापिताम् ।।४६॥ ॥ इति दैवनिराकरणम् ।।
तृतीयो गुच्छकः
१०५
(५)
ये सदुद्योगमुत्सृज्य मूढा दैवाङ्कशायिनः ।
ते धर्ममर्थं कामं च हापयन्त्यात्मविद्विषः ॥५०॥
ये सदिति । आत्मविद्विषः । तथा च श्रीभगवद्गीतासु-
'उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत् ।
आत्मैव ह्यात्मनो वन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः ।।' (६५)
इति ॥५०॥
संवित्स्पन्दो मनःस्पन्द इन्द्रियस्पन्द एव च ।
एतानि पुरुषार्थस्य रूपाण्येभ्यः फलोदयः ॥५१॥
संविदिति । मनसा बुद्धया कर्मणा च एकहेलया प्रवृत्तौ फलावश्यंभाव
इति भावः ॥५॥
यथासंवेदनं कर्म यथाकर्म फलान्यपि ।
एवं शुभाशुभे दृष्टे न दृष्टे ते व्यवस्थिते ॥५२।।
यथेति । संवेदनं ज्ञानम् ॥५२॥
अशुभेषु समाविष्ट' शुभेष्वेवावतारयेत् ।
चित्त बालकवद् यत्नादिति शास्त्रार्थसंग्रहः ॥५३||
अशुभेति । शास्त्रार्थसंग्रहः शास्त्रार्थसंक्षेपः । तत्त्वमिति यावत् ॥५३।।
सच्छास्त्रतः सद्गुरुतः स्वतश्चेति त्रिसिद्धयः ।
पुरुषार्थस्य सर्वत्र न देवस्य कदाचन ॥५४॥
॥ इति पौरुषप्राधान्यसमर्थनम् ॥
( ६ )
नं चाकतिर्न च स्पन्दो न च सत्तावभासवत् ।
तन्मिथ्याज्ञानवद्रूढं किं दैवं नाम जल्प्यते ॥५५॥
दशकएठवधम् न चाकृतीति | आकृतिः आकारः । 'प्राकृतिर्जातिलिङ्गाख्या' (न्या० द० २।२।७०) इति गौतमः । स्पन्दनं स्पन्दः क्रिया । सत्ता सामान्यम् । तदवभास- वत् तत्प्रतीतिवत् । रूढं प्रसिद्धम् ।।५।। स्वकर्मफलसंसिद्धौ दैवमस्तीति निश्चयः । आत्तो दुरवबोधेन रजाविव भुजङ्गमः ॥५६।। स्वकर्मेति । स्वकर्मफलसंसिद्धौ दैवनिर्णये रज्ज्चां दुर्ज्ञानगृहीतः सो दृष्टान्तः ॥५६॥ दैवमेवेह चेत् कत पुंसः किमिव चेष्टया । स्नानभोजनवार्तादि सर्व तेन विधास्यते ॥५७॥ देवमिति । एकान्ततो दैवक त्वनिश्चये तूष्णीकेन भवितव्यम् । किं चेष्टा- न्तरेणेति तात्पर्यम् ।।५७॥ न च निष्पन्दता लोके शवतामन्तरेक्षिता । स्पन्दादेव फलोन्मेपस्तस्माद् दैवं निरर्थकम् ॥५८ न च निष्पन्दतेति । शवतायामेव स्पन्दाभावः संघटते- इति जीवता सव्यापारेणैव वर्तितव्यम् ॥५८।। पृथक् चेद् बुद्धिरन्योऽर्थः सैव चेत् काऽन्यता तयोः । कल्पनायां प्रमाणं चेत् पौरुपं किं न कल्प्यते ॥५६॥ पृथगिति । इष्टापत्तौ बोध-बोधकयोविरुद्धकोटिमुद्भाव्य गत्यन्तराभावात् पौरुपमेव साधितं भवति ||५|| तेनामूर्तस्य न श्लेषो नभसेव वपुष्मतः । मूर्तं च दृश्यते श्लिष्टं तद् दैवं नोपपद्यते ॥६॥ ॥ इति दैवनिराकरणसमर्थनम् ॥
तृतीयो गुच्छकः
१०७
.
तेनामूर्तेति । अमूर्तस्य तत एव व्यवहारदशायां कल्पितस्य जात्याकृति-
व्यक्त्याख्यपदार्थातिकान्तस्य चिद्वस्तुनः सङ्गराहित्यात् प्रतिपादितं साधु संघटत
इति तात्पर्यम् ॥६॥
।। इति देवनिराकरणसमर्थनम् ।।
भगवन् ! यल्लोकेपु प्रतिष्टितं तद् दैवं नाम किमिति राघवेण पृष्टो
वसिष्ठो व्याख्यत-अङ्ग ! अवन्ध्येन पौरुषेण संपादिता शुभाशुभार्थ-
संपत्तिः इष्टानिष्टवस्तूपपत्तिा, अनुष्ठितस्य कर्मणः फलप्राप्ताविदमित्थं
स्थितमित्युक्तिः एवं मम मतिनिश्चयश्चेत्युक्तिः इदमस्य बोधकमित्यनाश्वा-
सनवाचोयुक्तिों देवमित्याहुः। भगवन् ! यत्खलु पूर्वकर्मोपार्जितं जगति
देवं देवमिति व्यपदिश्यते तदेकान्ततो भवता किमपमृश्यत इति तेन पृष्टः
स पुनराख्यत-अङ्ग ! साधूच्यते--॥६॥
भगवन्निति । प्राणिनस्तेषामावासा इति द्विविधो लोकपदार्थो द्रष्टव्यः ।
तत्र-
"अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम् ।
विविधाश्च पृथक् चेष्टा दैवं चैवात्र पञ्चमम् ॥” गीता.
इत्यादौ परसाचिव्येन दत्तहस्तावलम्ब दैवाख्यं वस्तुव्यक्तमेव ।।६।।
या मनोवासना पूर्व जजागार निरर्गला।
सैवेयं कर्मभावेन लोके परिणतिं गता ॥६२॥
यद्वासनो हि पुरुषस्तत्कतॆष प्रजायते ।
नान्यभावोऽन्यकर्मा स्याद् दैवं कर्म पुराकृतम् ।।६३।।
इत्थं कर्मस्थकर्माणि कर्म प्रौढा स्ववासना ।
वासना मनसो नान्या मनो हि पुरुषः स्मृतः ॥६४॥
मनश्चित्त वासना च कर्म दैवं च निश्चयः ।
राम ! दुनिश्चयस्यैताः संज्ञाः सद्भिदाहृताः ॥६॥
१०८ दशकएठवधम् एवं पुरुषकारेण नेतरेण कदाचन । सर्वमासाद्यते वीर ! तस्मात्त्र प्रयत्यताम् ॥६६॥ या मनोवासनेत्यादि । वस्तुतो निष्कृष्य दैवाख्यं वस्तु निर्वक्तुमशक्यमपि तदधिकारमुपोद्वलयितु-'अत्यन्तासत्यपि ह्यर्थे ज्ञानं शब्दः करोति हि' इति न्या- येन- या मनोवासनेत्यादिश्लोकपञ्चकेन देवमुज्जीवयन् रामभद्रमाश्वासयति ॥६२- ६६॥ भगवन् ! अयं प्राक्तनो वासनाप्रसरो यथा मां प्रयोजयति तथैव कृपणस्तिष्ठन् किं विदधामीति राघवेणोक्को वसिष्ठ आख्यत- सौम्य ! शुभाशुभेति द्विविधा खलु वासना । तत्र शुभया चेदिदानी नीयसे तदा शुभेनैव शाश्वतं पदं गन्तासि, चेदशुभया तदपा प्रसह्य विजेत- व्यव- ॥६७॥ भगवन्निति । कृपणः कापण्यदोपोपहतस्वभाव इति भावः । शुभाशुभे- त्यादि स्पष्टं प्राक् प्रपञ्चितमपि ॥६७।। प्राज्ञश्चेतनमात्रस्त्वं न शरीरं जडात्मकम् । अन्येन चेतसा तत्ते चेत्यत्वं क्वेव वर्तते ॥६॥ अन्यस्त्वां चेतयति चेत्त चेतयति कोऽपरः । इमं कश्चेतयेदित्थमनवस्था न शाम्यति ॥६६॥ प्राज्ञ इति, अन्य इति च । 'यो मनसि तिष्ठन् मनसोऽन्तरो यं मनो न वेद' (वृह० उप०) इति श्रुत्या मनसः प्रेरकः प्राज्ञात्मा अन्यः, तदधीने मनो- वासनोद्भवे कथं मम स्वातन्त्र्यम् इत्याशङ्कय समाधत्ते । अनवस्थाख्यो दोषो न शाम्यति अपितूदेत्येव ।।६८-६६।। शुभाशुभाभ्यां मार्गाभ्यां वहन्ती वासनासरित् । योजनीया शुभे मार्गे प्रयत्नैः पौरुपाश्रितः ॥७॥ शुभाशुभेति । तथा च योगभाष्ये- 'चित्तनदी हि द्वेधा प्रवहति०' इत्यादि ||७०11
तृतीयो गुच्छकः
१०६
अव्युत्पन्नमना यावदनभिज्ञाततत्पदः ।
गुरुशास्त्रप्रमाणैश्च निर्णीतं तावदाचर ॥७१॥
अव्युत्पन्नेति । वासनया संसारः। संसारेण वासनेत्यन्योन्याश्रयत्वात्
प्रमातृवर्गस्य संसारान्तःपातित्वाद् यावत्प्रमेयाणां स्वरूपवशेन संकीर्णत्वाच । तत
एव-'श्रुतिविभिन्ना स्मृतयो विभिन्ना--' इत्येवंजातीयज्ञापकत्वाच सत्यप्येकत्रा-
विकल्पसमये यावत् पारमार्थिक उन्मेपो न स्यात् तावद् गुरुशासनैकपरायण-
तैव ज्यायसीति उपदिशति । अव्युत्पन्न परमार्थाकलने अपरिचितं मनो यस्य
तथाभूत इत्यर्थः ॥७॥
ततः पक्ककपायेण त्वयाभिज्ञातवस्तुना ।
शुभोऽप्ययं चासनौवस्त्याज्यो निहिताधिना ॥७२॥
॥ इति कर्मविचारः॥
तत इति । कपायगुणयोगात् कषायः संसारसरणहेतुर्वासनैव । वस्तुतस्तु
वन्धहेतुत्वाद् अशुभवासनेव शुभवासनादि त्याज्या भवतीति तत्त्वम् ॥७२।।
॥ इति कर्मविचारः॥
-
L
संप्रति तज्ज्ञानमवतारयति यत्र खलु सर्व ज्ञेयं परिसमाप्यते-
यथास्थितब्रह्मतत्त्वसत्ता नियतिरुच्यते ।
सा विनेतुर्विनेतृत्वं विनेयस्य विनेयता ॥७३॥
यथास्थितेति । नियतिः- ब्रह्मतत्त्वं यथास्थितं सच्चिदानन्दस्वप्रकाशात्मना
सर्वत्र समतया सर्वानुकूल्येन स्थितं तत्संबन्धिनी सर्वपदार्थानां सत्तैव भविष्य-
कालसंबन्धेन व्यपदिश्यमाना भवितव्यताख्या नियतिरित्याहुः ।।७३।।
प्ररोचनार्थं चतुर्भिर्ज्ञानशैलीमेव प्रपञ्चयति-
तदेकानमना राम ! पौरुषोल्लासलालितः ।
संसारमरुसंत्रस्तचित्ताध्वन्यसुधावधिम् ॥७४॥
जन्ममृत्युरुजाक्लेशप्रत्यादेशमहौषधिम् ।
जीवन्मुक्तिमहानन्दनिस्तरङ्गपयोनिधिम् ॥७॥
११० दशकण्ठवधम् तपो दान तथा तीर्थमनुपाया भवच्छिदे । इत्येव करुणादृष्ट्या कलितां परमेष्ठिना ||७६॥ सुखावबोधसंहब्धकथासारविकस्वराम् । इमां विभावय ब्राह्मी ज्ञानशैली मनोहराम् ।।७७|| (चक्कलकम्) तदेकाग्रेत्यादि । परमेष्ठिना परमगुरुणा ।।७४-७७।। नित्यं हि साधुसंपर्काद् विवेकोऽयं विकाशते । विवेकपादपस्येमौ भोगमौक्षौ फले स्मृतौ ॥७८|| नित्यमिति । स्पष्टम् । विवेक एव पादपः तस्य फले इव भोगमोक्षौ ।।७।। मोक्षद्वारे द्वारपालाश्चत्वारो दर्शिता इमे । शमो विचारः संतोपश्चतुर्थः साधुसङ्गमः ॥७६।। मोक्षद्वारेति । प्रतिपत्तिसौकर्यार्थ मोक्षाख्यद्वारे चतुरो द्वारपालान् व्यप- दिशति ||७|| एते सेव्याः प्रयत्नेन चत्वारोऽपि सुमेधसा । त्रयो द्वौ वा तथैकोऽपि सेवितो नितिं दिशेत् ||८|| ॥ इति ज्ञानावतरणिका ॥ एत इति । एतेषु परस्परानुप्रविष्टरहस्यार्थेषु चतुर्पु एकोऽपि यथायोगं निषेवितो परार्थसंग्राहकः परिणमतीत्याशयः ||८|| ॥ इति ज्ञानावतरणिका ।। अथ प्रपञ्चितायां ज्ञानशैल्यां प्रथमं शमाख्यं द्वारपालं पञ्चदशभिनिरूपयति- एतां दृष्टिमवष्टम्य दृष्टात्मानः सुबुद्धयः । उदिता इव.संसारे विचरन्ति गतव्यथाः ॥८॥ एतामिति । एतां जागती सृष्टिदृष्टिम् । अवष्टभ्य विलाप्य । दृष्टात्मानः प्रत्यक्षीकृतात्मस्वरूपाः । अतएव सुवुद्धयः । संसारे संसरणशीलेऽपि । गतव्यथाः तृतीयो गुच्छक १११ संन्तः उदिता इंव आत्मसाम्राज्यलीना इव.विचरन्ति व्यवहरन्ति ||८ आत्मसाम्राज्यविलीनत्वमेव द्वाभ्यां प्रपञ्चयति- न शोचन्ति न वाञ्छन्ति न याचन्ति शुभाशुभम् । सर्वमेवात्र कुर्वन्ति न कुर्वन्ति मनागपि ॥८२॥ स्वच्छं दीव्यन्ति तिष्ठन्ति विरमन्ति निराधयः । हेयोपादेयसंबाधवर्जिताः स्वात्मनि स्थिताः ॥८३॥ न शोचन्तीत्यादि । हेयोपादेयसंवाधवर्जिता- अग्राह्यग्राह्यविचिकित्सा- भ्यां यः संबाधः मुग्धभावः तेन वर्जिताः अपराभूताः । विदितवेदितव्या इत्यर्थः ।।८२ ८॥ निरापायं निरातङ्घ निभ्रम स्वास्थ्यवैभवम् । न विना केवलीभावाद् भासते भुवनत्रये ॥८४॥ निरपायमिति । केवलीभावः कैवल्यम् । आत्मस्वरूपेणावस्थानमि- त्यर्थः ।।८४॥ प्राप्तमेतत्पदं तात ! न बाह्य साधनं मतम् । केवलं पौरुषारब्धं श्रवणाय व संततम् ॥८॥ प्राप्तमिति । श्रवणादि श्रवणं मननं निदिध्यासनं च ॥५॥ तत्समस्तसुखासारसीमान्तमिति शस्यते । तदेवामन्दनिष्पन्दं रसायनमपीध्यते ॥८६॥ तत्समस्तेति । अत्र-'एतस्यैवानन्दस्यान्यानि भूतानि मात्रामुपजीवन्ति सा काष्ठा सा परागतिः' इत्यादि श्रुतयो जाग्रत्येव ॥८६॥ गच्छता तिष्ठता वापि भ्रमता पततापि वा। असुरेण सुरेणापि मानुषेणेतरेण वा ॥८७॥ मनः प्रशमनोद्भूतं तदवाप्यं महत्सुखम् । पचेलिमं फलं विद्यात्. सद्विवेकफलेग्रहे ॥८॥ युग्मकम्) • • .
११२ दशकएठवधम् गच्छतेत्यादि । गच्छतेत्यादिना देशकालपाननिवन्धनो वैपम्याभावो दर्शितः । इहापि परमार्थे वस्तुनि सुरासुरसंघर्षानवकाशेन कक्षाविभागः सुदूर- मुदस्तः ।।८७-८८॥ हृत्कुशेशयकोशेषु येषां शमकुशेशयम् । ते पद्मापतिवद् वन्द्या द्विहत्पद्मा मनीपिणः ॥८६॥ हत्कुशेशयेति । एवं योगमास्थिता सुरा वा असुरा वा इतरे वा निर्विशेष प्रशस्यन्ते । अहो! येषां हृदयमेवारविन्दं तत्र विश्रान्तो शम एवारविन्दम्- ते रागद्वेपबहिर्भूता एकरसा महात्मानो वैलक्षण्येन द्विहृत्पद्मा इव लक्ष्यमाणा पद्मा- पतिपद्मनाभसमुद्भूतपद्मासनवत् कथमिव न स्पृहणीया इत्यर्थः ||६|| सौहार्दहय सर्वत्र शमपीयूपवर्पिणि । सुजने परमं तत्वं स्वयमेव प्रसीदति ।।१०॥ . सौहार्देति । इत्यनेन परतत्त्वस्य विश्रान्तिस्थानं दर्शितम् ||६०|| एतदेव शमपुरस्कारेण प्रपञ्चयति- शमामृतरसाच्छन्नं मनो यामेति नितिम् । छिन्नान्यपि तयाङ्गानि मन्ये रोहन्ति राघव ! ॥११॥ यः समः सर्वभूतेषु भावि काङ्क्षति नोज्झति । जित्वेन्द्रियाणि यत्नेन स शान्त इति कथ्यते ॥१२॥ युद्ध बापि शुद्धया बुद्ध्या यथैवान्तस्तथा बहिः । विमलं वर्तमानो यः स शान्त इति मन्महे ॥१३॥ शमसंपन्नवृत्तीनां सर्वत्र समदर्शिनाम् । उदेति निर्वृतिश्चित्ताज्ज्योत्स्नेव हिमदीधितेः ॥१४॥ शमममृतमहार्यमार्यगुप्त दृढमवलम्व्य परं पदं प्रयाताः ।
तृतीयो गुच्छकः -- विनयपर ! यथा महानुभावा- स्त्वमपि तथा खलु सिद्धये प्रयाहि ॥६॥ ॥ इति प्रमथो द्वारपालः शमः ॥ - शमामृतेत्यादि । स्पष्टम् ॥६१-६५|| यद्यपि शमादिषु चतुर्पु एकेनान्य आक्षिप्यत इत्युक्तप्रायम् । तथापि सति शमे निर्बाधो विचार उदेतीति प्रक्रियामाश्रयन् दशभिर्विचाराख्यं द्वितीयं द्वारपालं प्रप- ञ्चयति- शास्त्रावबोधभासिन्या धिया परमशुद्धया । कर्तव्यः कारणज्ञेन विचारोऽनिशमात्मनः ॥१६॥ शास्त्रावबोधेति । स्पष्टम् ॥६६|| विचाराद् वदते शास्त्रे नयते तत्त्वमञ्जसा । आसयत्यन्तरे तच क्रमतेऽत्र निरन्तरम् ॥१७॥ विचारादिति । वदते इत्यत्र-'भासनोपसंभाषा-' (पा० सू० ११३।४७) नेन, नयते इत्यत्र-'संमाननोत्सञ्जनाचार्य-' (पा० सू० १।३।३६) इत्यनेन, क्रमते इत्यत्र-'वृत्तिसर्गतायनेषु क्रमः' (पा० सू० ११३।३८ ) इत्यनेन चात्मनेप- दानि विशेषप्रतिपत्तये द्रष्टव्यानि ॥१७॥ शक्तिधृतिः स्मृतिज्ञप्तिः प्रतिपत्तिः क्रिया फलम् । फलन्त्येतानि सर्वाणि विचारेणैव धीमताम् ॥१८॥ शक्तिरिति । शक्तिः सामर्थ्यम् । धृतिः धैर्यम् । स्मृतिः स्मरणम् । ज्ञप्तिः ज्ञानम् । प्रतिपत्तिः स्फूर्तिः । क्रिया अनुष्ठानम् । फलं निष्पत्तिः । फलन्ति निष्प- द्यन्ते ॥६॥ जडाजडपरिज्ञानं नेयार्थपरिवर्तनम् । विचारप्लवमाश्रित्य तरेत् संसारसागरम् ।।६।। जडाजडेति । नेयार्थः प्रतिषिद्धार्थः । विचार एव तारकत्वात् प्लवः ॥६६|| ११४ दशकण्ठवधम् या विचारविकासिन्यो मतयो गतयो विदाम् । अप्सु तुम्व्य इवापत्सु न ता मञ्जन्ति वाहिताः ॥१०॥ या विचारेति । गतयः अवगमाः । वाहिताः आश्रिताः ॥१०॥ मूढमानसरूढानामवाप्य पटुरोधिनाम् । अविचारकरञ्जानां मञ्जयों वेधसूचिकाः ॥१०१।। मूढमानसेति । अविचार एव समन्ताद् व्यथकत्वेन करजाः । मञ्जों वल्लयः । वेधसूचिकाः वेधनसूच्यः ॥१०१।। कजलनोदमलिना मदिरामधर्मिणी । अविचारमयी निद्रा सुज्ञा स्वप्नं न सर्पति ॥१०२॥ कजलेति । स्पष्टम् ॥१०२॥ रामैप केवलीभावः सुविचारकृपः फलम् । यत्र निष्कामतोदेति शीतांशाविव शीतता ॥१०॥ रामेति । निष्कामता वासनाराहित्यम् ||१०३|| उपेक्षते गतं वस्तु संप्राप्तमनुवर्तते । न क्षुब्धो वा न चाक्षुब्धः प्राज्ञः पूर्ण इवार्णवः ॥१०४॥ उपेक्षत इति । एवंलक्षणकः स्थितप्रज्ञो भवतीति भावः ॥१०४॥ कोऽहं कथमयं दोषः संसार इति संततम् । यथाशास्त्रं परामर्शो विचार इति कीर्त्यते ॥१०॥ ॥ इति द्वितीयो द्वारपालो विचारः॥ कोऽहमिति | प्रकृतोपयुक्त विचारलक्षणमेतत् ।।१०।। ॥ इति द्वितीयो द्वारपालो विचारः ।।
तृतीयो गुच्छकः ११५ अथ संतोषाख्यं तृतीयं द्वारपालं पञ्चभिः प्रपञ्चयति- संतोषैश्वर्यसुखिनां चिरविश्रान्तचेतसाम् । साम्राज्यमपि शान्तानां प्रतिभाति तृणोपमम् ॥१०६॥ संतोषेति । शान्तानाम् अचलप्रतिष्ठानाम् ॥१०६॥ संतोषमुदिता प्रज्ञा राम ! संसारवृत्तिषु । विषमास्वप्यनुद्विग्ना न कदाचन हीयते ॥१०७॥ . संतोषमुदितेति । संतोषेण मुदिता प्रसन्ना। संसारवृत्तिषु सांसारिकीषु व्यवहृतिषु । विषमासु असमञ्जसासु । अनुद्विग्ना निर्बाधा । न कदाचन हीयते अपितु यथासंभवं चीयत एव ॥१०७॥ अात्मनात्मनि संतोष यावन्नाप्नोति मानसम् । उद्भवन्त्यापदस्तावल्लता इव मनोविलात् ॥१०॥ प्रात्मनेति । मन एव विषमत्वाद् विलम् गतः। उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेदिति भावः ॥१८॥ आशाविलासविवशे. चित्ते - संतोपवर्जिते । म्लानादर्श वक्त्रमिव ज्ञानं न प्रतिविम्बति ॥१०॥ आशाविलासेति । निर्मले हि चन्द्रादि प्रतिफलति । व्यत्यासे तु प्रति- फलितमपि दोषाक्रान्तमिव प्रतीयत इति स्पष्टम् ।।१०।। नालब्धमेष्यते येन न लब्धं चाभिनन्द्यते । स पूर्णेन्दुरिवाऽऽपूर्णः संतुष्ट इति गण्यते ॥११०॥ ॥ इति तृतीयो द्वारपालः संतोषः ।। नालन्धमिति । संतोषस्य स्वरूपप्रतिष्ठानमेतत् ।।११०।। ॥ इति तृतीयो द्वारपालः संतोषः ।।
११६
दशकण्ठवधम्
इदानीमन्तिमं साधुसङ्गमाख्यं मोक्षद्वारपालं सप्तभिः प्रपञ्चयति-
शुन्यमाकीर्णतां धत्त मृत्युरप्युत्सवायते ।
विपत्संपदिवाभाति राम ! साधुसमागमे ॥१११॥
शल्यमिति । साधवः सन्त इति जगति सुप्रसिद्धमेवाबालाङ्गनम् । तत्र
विशिष्टवाच्यार्थस्तु प्रतिश्लोकं व्युत्पादित एव । य इदानीमपि शब्दगुणेनापि
आस्तिकपुगवान् आश्वासयति । व्युत्पादनविधा तु-'मनुष्याणां सहस्र पु कश्चि-
द् यतति सिद्धये' (भ.गी. ७-३) इत्यादिन्यायेन दुर्लभतरतमैव । अत्र सामा-
न्यसाधुपदार्थनिर्वचनं भवभूतीयमपि न विस्मर्तव्यम् । तथाहि--
--
"प्रियप्राया वृत्तिविनयमधुरो वाचि नियमः
प्रकृत्या कल्याणी मतिरनवगीतः परिचयः ।
पुरो वा पश्चाद् वा तदिदमविपर्यासितरसं
रहस्यं साधूनामनुपधि विशुद्धं विजयते ॥"
इति । एतेपां परीक्षणं तु-
'शमदम्भः शुचिदम्भः स्नातकदम्भः समाधिदम्भश्च ।
निःस्पृहदम्भस्य तुलां यान्ति न चैते शतांशेन ।
इत्येवमादिक्षेमेन्द्रसूक्तितोऽपि सुव्यक्तम् । 'शून्यमाकीर्णतां धत्ते-' यथा-सुर-
थ-समाध्योः सुमेधसः संगमे । '-मृत्युरप्युत्सवायते' यथा भगवतः श्रीदधीचस्य ।
'विपत्संपदिवाभाति-' यथा-क्रुन्ती-वासुदेवयोः ।।१११।।
मतेर्विकासनं सम्यङ् निष्कासनमहंमतेः ।
आधेरपासनं सौम्य ! साधुसङ्गमसौभगम् ॥११२॥
मतेरिति । मतेः-मुकुलिताया इत्यर्थः । अहंमते अविद्यायाः। सा च पिशा-
चीव पुमांसमात्मसात् करोति । आवेः मानसव्यथायाः । अपासनं सुदूरनिष्का-
सनम् ।।११२।।
नीरागाश्छिन्नसंदेहा गलितग्रन्थयोऽनय !!
साधयो यदि विद्यन्ते किं तपस्तीर्थसंग्रहैः ॥११॥
o तृतीयो गुच्छकः ११७ नीरागा इति । वस्तुतो जन्मजन्मान्तरार्जिततपस्तीर्थसंग्रहाणामेव पारमा- थिकं फलं ताक् चित्तवृत्तिसमुदय इति ॥११३॥ त एते नरकानीनां संशुष्कन्धनतां गताः । यदृष्टा हेलया सन्तः क्लेशसंतापतोयदाः ॥११४|| त एत इति । 'हरत्यघं संप्रति हेतुरेष्यतः-' इत्यादिमाघोक्तथा व्या- ख्यातप्रायमेतत् ॥११४॥ संतोषः परमो लाभः सत्सङ्गः परमा गतिः । विचारः परमं ज्ञानं शमो हि परमं सुखम् ॥११॥ संतोष इति । एकैकस्य मोक्षद्वारपालस्य निष्कृष्टार्थदर्शनम् ।।११।। एकैकोऽपि किलतेषां परेषां प्रसवास्पदम् । तस्मात् संसिद्धये धीमान् यत्नेनैकं समाश्रयेत् ॥११६॥ एकैकैति । इदानीमुक्तेषु चतुषु एकैकस्याप्यनुष्ठानं परानुष्ठानफलकमिति संक्षेपेण विनेयान प्रति उपदिशति ॥११६।। विचारशमसंतोषसाधुसङ्गमशालिनि । नरे श्रियो विराजन्ते कल्पवृक्षाश्रये यथा ॥११७॥ ॥ इति चतुर्थो द्वारपालः सत्सङ्गः ॥ विचारेति । एवंविशेषणविशिष्टे पुसि कल्पद्रुमे श्रिय इव यथाकल्पनमु- द्भवन्ति ताः सर्वाः संपद इति यौगिकार्थेनापि स्फुटम् ॥११७।। ।' इति चतुर्थो द्वारपालः सत्सङ्गः ।। इदानीं वक्ष्यमाणस्यार्थस्य सुखावबोधाय दृष्टान्तमुत्थापयति- आर्ष वा पौरुषं वापि ज्ञानमज्ञाननाशनम् । सौरमाग्नेयमथवा तेजस्तिमिरभञ्जनम् ॥११८।। आर्ष वेति । ऋषिर्वेदस्तत आगतः गतमार्षम् । 'संबुद्धौ शॉकल्यस्येतावनाएं पा० सू० ११११६) इत्यादौ ऋषिशब्दस्य वेदपरता प्रसिद्धव । तथाचार्य ज्ञान-
११८
दशकएठवधम्.
मीशावास्यादिवाक्यघटितं फलितम् । पौरुपं तु रामायणमहाभारतादिघटितम् ।
'स्वाध्यायोऽध्येतव्यः' इत्यध्ययनविधिविशेषसत्तायामपीह फले विशेपाभाव इति
भगवतो वशिष्टस्याशयः । अतएवान्यत्रापि-
'स्त्रीशूद्रद्विजबन्धूनां त्रयी न श्रुतिगोचरा ।
इति भारतमाख्यानं कृपया मुनिना कृतम् ।।'
इत्युपदिष्टम् ॥११८॥
पौरुषे अर्थवादमुत्थापयति-
अपि पौरुपमादेयं शास्त्रं चेद् युक्तियोधकम् ।
अन्यच्चार्पमपि त्याज्यं भाव्यं न्याय्यैकसेविना ॥११॥
अपि पौरूपमिति । त्याज्यमित्यस्य त्यागे न तात्पर्यमपितु सुखावबोधने
शासने । अर्थवादे स्वार्थे तात्पर्याभाव इत्यन्यत्र विस्तरः ।।११।।
युक्तियुक्तमुपादेयं वचनं वालकादपि ।
अन्यत्तृणमिव त्याज्यमप्युक्तं पद्मजन्मना ॥१२०॥
युक्तियुक्तमिति । उक्तस्यैवोपवृहणम् ॥१२०॥
योऽस्मत्तातस्य कूपोऽयमिति कौपीः पिवत्यपः ।
मुक्त्वा गाङ्गी: सुधाधारास्तं शिष्यात् कोऽतिरागिणम् ॥१२१॥
योऽस्मदिति । 'तातस्यकूपोऽयमिति ब्रु वाणाः क्षारं जलं कापुरुषाः पिबन्ति'
इत्येवंजातीयकेनाभाणकेन सुप्रसिद्धमेतत् ॥१२१।।
उक्तमर्थसदृष्टान्तं विनेये भगवति संक्रामयति-
दृष्टान्तेन विना राम ! नापूर्वार्थोऽववुध्यते ।
प्रदीपमन्तरा नक्त प्रदर्शनगृहं यथा ॥१२२॥
दृष्टान्तेनेति । अत्र-'लौकिकपरीक्षकाणां यस्मिन्नर्थे बुद्धिसाम्यं स दृष्टान्तः'
(न्या० द. १।१।२५ ) इत्यक्षपादीयं सूत्रम् ।।१२२।।
दृष्टान्ते हेयांशं विशदयति-
येय राघव ! दृष्टान्तस्त्वं मयात्र प्रबोध्यसे ।
सर्वे सकारणास्ते हि प्राप्यं तु सदकारणम् ॥१२३॥
तृतीयो गुच्छकः
११६
०
यैरिति । सत् परमार्थसत्यम् । अकारणं नित्यम् । अप्रयोजकैरेव मृत्सुष-
र्णाधु पादानैदृष्टान्तैः सद् ब्रह्म कारणं बोध्यते । तथाच जन्यत्वादयो दृष्टान्तधर्मा
दान्तिके ह्य पेक्ष्याः ।।१२।।
उपमानोपमेयानां कार्यकारणसंगतिः ।
वर्जयित्वा परब्रह्म सर्वेषामेव वर्तते ॥१२॥
उपमानेति । यथा विचारादिभिविम्बग्राहकं ज्ञानमुत्पद्यते इत्युच्यते तथा
ज्ञानाद् बिम्बमुत्पद्यते इति न वक्तव्यम्-ब्रह्मण उत्पत्तेवक्त मशक्यत्वात् ।।१२४।।
ब्रह्मोपदेशे दृष्टान्तो यस्तवेह निरूप्यते ।
एकदेशसधर्मत्वं तत्रान्तः परिगृह्यते ॥१२॥
ब्रह्मोपदेशेति । एतदुक्त भवति-जगद्विवर्त ब्रह्माधिष्ठानबोधने भुजङ्ग-
विवर्ताधिष्ठानबोधकरज्जुदृष्टान्तस्याधिष्टानं विवर्ताशमात्रेण दृष्टान्तत्वं न तु दार्टी-
न्तिकनित्यत्वसुखित्वादिसर्वाशेन ॥१२५॥
यो यो नामात्र दृष्टान्तो ब्रह्मतत्वावबोधने ।
दीयते स स बोद्धव्यः स्वप्नभूतो जगद्गतः ॥१२६।।
यो य इति । स्वप्नजात इव मिथ्याभूतो जगदन्तर्गत एव न वास्तवः
॥१२६॥
एवं सति निराकारे ब्रह्मण्याकारवान् कथम् ।
दृष्टान्त इति नोद्यन्ति मूर्खवैकल्पिकोक्तयः ॥१२७||
एवं सतीति । एवं दार्टान्तिके दृष्टान्तधर्माभावे सति विकल्पोक्तीनाम-
.
नवकाशः ॥१२७||
अन्यासिद्धविरुद्धादिदृशां दृष्टान्तदूषणैः ।
स्वप्नोपमत्वाज्जगतो न किंचिदपि हीयते ॥१२८॥
अन्यासिद्धति । अन्येषाम् असिद्धविरुद्धादिदोषदृशां तार्किकाणां
दृष्टान्तप्रदूषणैर्दू प्यस्य हेत्वादेर्जगतः स्वप्नोपमत्वाद् वस्तुनि न किंचिद् दूषणं
समुदेतीत्यर्थः ॥१२॥
१२० दशकण्ठवंधम् अवस्तु पूर्वापरयोर्वर्तमानेऽपि तादृशम् । यथा जाग्रत् तथा स्वप्नः सिद्धमावालमागतम् ॥१२६॥ अवस्त्विति । पूर्वापरयोः उत्पत्तिविनाशपूर्वोत्तरकालयोः । अवस्तु अभाव- ग्रस्तम् । वर्तमानकालेऽपि ॥१२६।। स्वप्नसंकल्पनाध्यानवरशापौपधादिभिः । यथार्था इह दृष्टान्तास्तद्रूपत्वाजगत्स्थितेः ॥१३०॥ स्वप्नेति । जाग्रति कार्याकार्यत्वेन संदिग्धयात्रादौ देवताप्रार्थनादिना शयानस्य स्वप्ने कार्यमिति संकल्पोदये तथा चिन्तने चिन्तनोपलक्षितचिरकाल- पूजामन्त्रजपस्तुत्यादिना तदनुकूलवरलाभे शत्रूणां मुनिशापादिदर्शनेन वा प्रात- र्यात्रादिकरणे शत्रुजयादिदर्शनात् स्वाप्नौषधलाभेन जागरे रोगशान्तिदर्शनाच तत्साम्येन सर्वजगत्स्थितेरपि तद्र पत्वात् स्वप्नदृष्टान्ता यथार्थाः ।।१३०।। स्वप्नाभत्वं तु जगतः श्रुते शास्त्रेऽवधार्यते । न सद्यः पार्यते वक्त ' वाकिल क्रमवर्तिनि ॥१३॥ स्वप्नामेति । तथा च स्वप्नवदाभासमानमिदं जगच्चकं शास्त्राद्युपायमन्तरा न केवलया वाचा प्रतिपत्तुं सुशकमितिभावः । अकारणे कारणता यद्वोधायोपमीयते । न तत्र सर्वसाधर्म्य संभवत्युपमागुणे ॥१३२॥ अकारणेति । यदि जगति स्वप्नायुपमाने सर्वांशेऽपि साधय विवक्षितं तर्हि ब्रह्मण्यपि कटकमुकुटाधु पादानस्वर्णदृष्टान्ते तद्वदेव परिणामिता कुतो न विवक्ष्यते ।।१३२॥ उपमेयस्योपमानादेकांशेन सधर्मता अङ्गीकार्याऽवयोधाय निर्विवाद सुवुद्धिना ॥१३३॥ उपमेयेति । उक्तार्थस्यैव विशदीकरणम् ।।१३३।। दृष्टान्तस्यांशमात्रेण बोध्यबोधोदये सति । उपादेयतया ग्राह्यो महावाक्यार्थनिश्चयः ॥१३४||
तृतीयो गुच्छकः
१२१
दृष्टान्तेति । अंशमात्रेण उपादेयलेशमात्रेण । उपादेयतया ग्राह्यतया ।
महावाक्यानि 'तत्त्वमसि' इत्यादीनि ।'
न कुतार्किकतामेत्य नाशनीया प्रबुद्धता ।
अनुभूत्यपलापान्तरपवित्रौर्विकल्पितः ।।१३।।
॥ इति दृष्टान्तनिरूपणम् ॥
न कुतार्किकैति । नैषा तर्केण मतिरपनेया ( कठो० उप० ३१६) इत्या-
युपनिषद्वाक्यैः कुतर्केष्वनास्थाप्रतिपादनात् यथारुचि नियमासंभवाच्चेति तात्प-
यम् !
॥ इति दृष्टान्तनिरूपणम् ।।
विशिष्टांशसधर्मत्वमुपमानेषु गृह्यते ।
को भेदः सर्वसादृश्ये तूपमानोपमेययोः ॥१३६॥
विशिष्टांशेति । विशिष्टो विशेषेण प्रतिपादयितु विवक्षितो योशः तेनैव
सधर्मत्वं सर्वत्रोपमानेषु गृह्यते । अन्यथा -'गौरिव गवयः' इत्यादौ जात्यादिनापि
सादृश्यविवक्षायां भेदाभावादुपमानमात्रोच्छेदः स्यादित्यर्थः ॥१३६।।
दृष्टान्तबुद्धावेकात्मज्ञान-शास्त्रार्थवेदनात् ।
महावाक्यार्थसंसिद्धा शान्तिनिर्वाणमुच्यते ॥१३७॥
दृष्टान्तेति । तत्त्वंपदार्थशोधनोपयोगि तत्तदृष्टान्तबुद्धौ सत्याम् एकमद्वि-
तीयं यज्ज्ञानस्वरूपमात्मतत्त्वं तदेव शास्त्रार्थः तस्य वेदनाद् अवबोधात् ।।१३७।।
शान्ति श्रेयः परं विद्धि तत्प्राप्तौ यत्नवान् भव ।
भोक्तव्यमशनं प्राप्त किं तत्सिद्धौ विकल्पनैः ।।१३।।
शान्तिमिति । विकल्पनैः विकल्पावतरणैः ॥१३॥
तावद् विचारयेद् यावत् तुर्यविश्रान्तिमाप्नुयात् ।
प्राप्तविश्रान्तिसंपत्तु निर्मन्दर इवाम्बुधिः ॥१३६॥
तावदिति । एतावत्येव विचारस्येयत्तेति ॥१३६॥
१२२
दशकण्ठवधम
एकांशेनोपमानानामुपमेयसधर्मता ।
बोद्धव्यं बोध्यवोधाय न भाव्यं बोधचञ्च ना !॥१४०॥
एकांशेनेति । बोधचञ्चुना लोकेषु आत्मख्यात्यै ज्ञानध्वजिना न भवित-
व्यमित्यर्थः ।।१४०॥
अनुभूतेर्वेदनस्य प्रतिपचेर्यथाभिधम् ।
प्रत्यक्षमिति संज्ञह कृता जीवः स एव नः ॥१४१॥
अनुभूतेरिति । प्रकाशात्मना भवनम् अनुभूतिः 1 वेद्यस्य प्रकाशनं वेद-
नम् । अनुभव-वेद्य-वेत्तृलक्षणस्य त्रितयस्य व्याप्तिः प्रतिपत्तिः । शेषं स्पष्टम् ।।१४१॥
स एव संवित् स पुमानहंताप्रत्ययात्मकः ।
स ययोदेति संविच्या सा पदार्थ इति स्मृता ॥१४२॥
स एवेति । साक्षी वृत्त्युपाधौ संवित् । अहंताप्रत्ययात्मा पुमान् प्रमाता
स एव यया विपयाकारवृत्त्या वाह्यावरणभङ्गे आविर्भवति सा पदार्थो विषय
इति ।।१४२॥
एवं व्यष्टौ उपपाद्य समष्टौ हिरण्यगर्भेऽपि दर्शयति
स संकल्पविकल्पाद्यैः कृतभूरिक्रमभ्रमैः ।
जगत्तया स्फुरत्यम्बु तरङ्गादितया यथा ॥१४३॥
स संकल्पेति । तरङ्गादितया अम्बुवत् स एव पदार्थः जगत्तया स्फुरतीति
तात्पर्यम् ॥१४॥
प्रागकारणमेवाशु सर्गादौ सर्गलीलया । .
स्फुरित्या कारणं भूतं प्रत्यक्षं स्वयमात्मनि ॥१४४॥
प्रागकारणमिति । तत्साक्षिप्रत्यक्षं प्राक् सर्गादौ सृष्टेः प्राग् अकारणं
कारणान्तरशून्यम् एव सर्गलीलया सृष्टिप्रपञ्चेन स्फुरित्वां प्रादुर्भूय आत्मनि
सर्गभावापन्ने । स्वस्मिन्नेवेत्यर्थः । स्वयमेव कारणं भूतं जातमित्यर्थः ॥१४४||
कारणं त्वविचारोत्थं जीवस्यासदपि स्थितम् ।
सदिवास्यां जगद्रूपं प्रकृतौ व्यक्तिमागतम् ॥१४॥
तृतीयो गुच्छक १२३ कारणमिति । जीवस्य अजन्यत्वाद् असदिव स्थितं कल्पितम् । इवेत्य- नास्थायाम् । अतएव अविचारोत्थं कारणं तु अस्यां प्रकृतौ प्रकृतिलक्षणे स्वभावे सदिव कार्यत्वेन जगद्रूपं व्यक्ति प्रकाशताम् आगतम् । यद् वस्तु सृष्टेः प्राक् सूक्ष्मतया असदिव मध्ये प्रादुर्भावेन सदिव व्यवह्रियमाणं पर्यन्ते प्रलयावस्थया पुनः सूक्ष्मत्वं दधत् तद् इत्यमेवोन्नेतु शक्यमिति परमार्थः। एवं लक्षणकमेव वस्तु आदावन्ते च प्रतिपत्तिशून्यं निर्दिश्य मध्येऽपि तथा विलक्षणं निर्दि- श्यते ॥१४॥ स्वयमेव विचारस्तु स्वत उत्थं स्वकं वपुः। विघव्य घटयत्याशु प्रत्यक्षं परमं महत् ॥१४६।। स्वयमिति । आत्मनि तु स्वयमेव विचारो विमर्शलक्षणः यथासंकल्पं स्वत उत्थं स्वकं वपुः विघट्य अन्तःकरणज्ञानकर्मेन्द्रियैः संयुज्य परमं महत् प्रत्यक्ष भोग्यभावम् आशु घटयति संपादयतीति तात्पर्यम् ॥१४६।। विचारवान् विचारोऽपि यदात्मानं प्रबोधते । तदा राम ! निस्ल्लेखं परमेवावशिष्यते ॥१४७॥ - विचारवानिति । यदा विचारोऽपि विचारवान् सन् आत्मानं प्रबोधते अभेदतया अवगच्छति । बुधिर् अवगमने । हे राम! तदा निरुल्लेखम् अवि- कल्पितं परं वस्तु एव अवशिष्यते केवलीभावेनावतिष्ठते ॥१४७॥ इदानी सिंहावलोकनन्यायेन दैवनिराकरणं स्मारयन् पौरुषस्य प्राधान्यम् उदृश्यति- स्वयत्नमात्रे रघुराजसूनो ! तं दैववाच्यार्थमपास्य दूरे । श्रासाद्यतेऽन्तः परमं पदं तत् स्वपौरुषेणेव नहीतरेण ॥१४८॥ स्वयत्नेति । गीतोपनिषत्स्वपि अष्टादशे-'दैवं चैवात्र पञ्चमम्' इत्यनेन चतुर्भिः पञ्चमस्य दुर्वलत्वं व्यक्तमेवेति स्पष्टम् ॥१४८|| १२४ दशकण्ठवधम् विदन् द्विजाग्रयो हि मुनित्वमीयात् तद् बाहुजन्मा जनकत्वमीयात् । वणिक् तुलाधारसमत्वमीयाज्- जनश्च शूद्रोऽपि च मुक्तिमीयात् ॥१४६॥ विदन्निति । प्राग्व्याख्यातमेतत् । तातश्रीसरयूप्रसादचरणस्ववृक्षसेवापरो मातृश्रीहरदेव्यपारकरुणापीयूपपूर्णान्तरः। साकेतापरभागवद्धवसतिदुगाप्रसादः सुधी- रास्ते तेन कृतेऽत्र रामचरिते गुच्छस्तृतीयो गतः॥१५०॥ इति श्रीमति रामचरिते वासिष्ठनिर्यासे मुमुक्षुप्रकरणं नाम द्वितीयो- गुच्छकः । आदितस्तृतीयः ॥
अथ चतुर्थो गुच्छकः। अथ सृष्टिप्रकारनिरूपणपुरस्सरं 'एकमेवाद्वितोयं ब्रह्म' इत्यागमानुभव- युक्तियुक्तं ब्रह्माद्वैतं प्रतिपादयितुं प्रकरणमवतारयति- वाग्भाभिन्न माविद् ब्रह्म भाति स्वप्न इवात्मनि । यदिदं तत् स्वशब्दोत्थै र्यो यद् वेद स वेद तत् ॥१॥ वाग्भाभिरिति । वाचां 'तत्त्वमसि, ब्रह्माहमस्मि' इत्याधु पनिषत्सार- भूतानां द्वादशमहावाक्यानां, भाभिः स्वरूपप्रकाशैः । आत्मनि प्रत्यगात्मनि । स्वप्न इव भाति आविर्भूतं चकास्ति । स्वशब्दोत्थैः, स्वशब्दोत्थाश्च ब्रह्मणः स्वरूपप्रतिपत्तये क्रियमाणाः श्रवण-मनन-निदिध्यासनादिरूपा उपायाः, तैः। यद् वेत्ति, यादृशं ब्रह्म तत्त्वतः साक्षात्करोति । तद् वेद, तादृशमेव पूर्वानुभूतं सर्वस्मिन्नपि काले हृदयान्तः स्फुरति । इदमत्र तात्पर्यम्- ब्रह्मातिरिक्त न किमपि वस्तु इह परमार्थसद् भवितुमर्हति । 'आत्मैवेदं सर्वमित्यादि श्रुतिशासनाद् अनुभवसंवादाच्च । यच्चेदमनन्तप्रकारायमाणै वैचित्र्यप्रपञ्च रुल्लसितम् असदपि सदिव प्रतीयमानं जगत् , तत्सर्वं स्वप्न इव आत्मन्यध्यस्तं केवलं कल्पनामात्रसारम् । इत्येवंरूपेण सकृदपि संजाते दृढप्रत्यये न कदाचिदपि मुमुक्षोरात्मस्वरूपबोधहानिप्रसङ्गः, न वा ज्ञातपरमार्थस्य तस्य मुक्तिसमयावधि स्वस्वरूपात्प्रच्यावः, ब्रह्मविषयकः संदेहप्ररोहो वा कथंचिदपि संभवति । 'सकृद्विभातोऽयमात्मे' त्यादिश्रुतीनामप्यत्रार्थे एतदेव रहस्यम् ॥१॥ द्वाभ्यां बन्धस्वरूपं निर्दिशति- बन्धोऽयं दृश्यसद्भावाद् दृश्याभावे न बन्धता । दृश्यं त्वसंभवद् राम ! यथेदं तच्छृणु क्रमात् ।।२।। य एवोत्पद्यते कश्चित् स एव परिवर्तते । उत्पत्तिः संसृतावेति प्रागभ्यात्मा तु शाश्वतः॥३॥ बन्धोऽयमिति । वन्धः स्वस्वरूपानवमर्शः, मायाव्यामोहितत्वमिति वा । तथाच सांख्याः-प्रकारान्तरासंभवादविवेक एव बन्धः' (सां सू० ६।१६ )। परमार्थतो नात्मनि दृश्योत्पत्तेः पूर्व परतोवा विकृतेः कुतश्वन संभवः । तथा च श्रुतिः- दशकण्ठवधम् 'न निरोधो न चोत्पत्तिर्न बद्धो न च साधकः । न मुमुक्षुर्न वै मुक्तिरित्येषा परमार्थता ॥ इति । दृश्यं जगदाद्यात्मना भासमानों वेद्यवर्गः । स्मरन्ति च शास्त्रकृतः- 'यदिदं दृश्यते किंचिद् दर्शनात् तन्न भिद्यते । दर्शनं द्रष्टुतो नान्यद् द्रष्टैव हि ततो जगत् ।।' इति । अयं दृश्यपदार्थ:-"द्रष्ट्रदृश्ययोः संयोगो हेयहेतुः,' 'प्रकाशक्रिया- स्थितिशीलं भूतेन्द्रियात्मकं भोगापवर्गार्थ दृश्यम्', द्रष्टा हशिमात्रः शुद्धोऽपि प्रत्ययानुपश्यः,” (यो० द० २ पा० १७-१८, २० ) इत्यादिसूत्रैर्योगदर्शने प्रपञ्चितः ।।२।। य एवोत्पद्यत इति । संसृतौ संसरणदशायाम् । संसरणं च-जायते, अस्ति, वर्धते, विपरिणमते, अपक्षीयते, नश्यतीति पड्भावविकारनेमियुक्तम् । प्रागभ्यात्मा प्रत्यक्चेतनः । शाश्वतः शश्वद्भवः, अण ॥३॥. यदेतद् दृश्यते सर्वं जगत् स्थावरजङ्गमम् । तत् सुषुप्ताविव स्वप्नः कल्पान्ते प्रविनश्यति ॥४॥ यदेतदिति । स्थावर जङ्गमादितरद् । कल्पान्ते कल्पप्रलये । सुषुप्ती, जीवस्य ज्ञानशून्यावस्थायाम् । उपनिषत्स्वियं सुपुप्तिरेवं विवृता- 'यत्र सुप्तो न कंचन कामं कामयते, न कंचन स्वप्नं पश्यति ।' (वृउ० ४।३।१६) 'यत्रैतत्पुरुपः सुप्तः स्वप्नं (स्वप्नसृष्टंफलं) न कंचन पश्यति ।' (कौपी० उ० ३३३) 'तद् यत्रतत्सुप्तः समस्तः संप्रसन्नः स्वप्नं न विजानाति ।' (लां० उ०८६३३) अन्यत्रापि- "अक्षर्योऽर्थग्रहः पुंसां तञ्जाग्रदिति कथ्यते । यत्त विनार्थस्मरणं मनसा स्वप्नसंज्ञितम् ॥ यत्रार्थस्मरणे न स्तस्तत् सौपुप्तमिति- स्मृतम् । शुद्धवोधैकरूपो योऽवस्थातः. सैव तुर्यता ।।" इति ॥४॥ ~ . चतुर्थो गुच्छकः १२७ ततः स्तिमितगम्भीरं न तेजो न तमस्ततम् । अनाख्यमनभिव्यक्त सत् किंचिदवशिष्यते ॥५॥ तत इति । स्तिमितम् अमूर्तत्वानिष्क्रियम् । गम्भीर परिच्छेदानहम् । न तेजः, नीलपीतादिरूपविरहात् । न तमः, प्रकाशैकधर्मत्वात् । अनाख्यम् , निर्धर्मकतया इदमित्थमिति निर्देष्टुमशक्यम् । अनभिव्यक्तम्-स्वानुभबैकगम्य- तया वाह्यप्रमाणानामगोचरम् ॥शा ऋतमात्मा परं ब्रह्म सत्यमित्यादिनामभिः । शब्द्यते व्यवहारार्थं तत् सदेव महेश्वरः ॥६॥ ऋतमात्मेति । आत्मनो निर्वचनं तु- 'यच्चाप्नोति यदादत्ते यच्चात्ति विषयानिह । यच्चास्य संततो भावस्तस्मादात्मेति शब्द्यते ।' इति व्यासानुशिष्टमिह द्रष्टव्यम् । ब्रह्म, वृहत्त्वाद् बृहकत्वाद् वा । व्यवहारश्च उपदेश्योपदेशरूपः; तदर्थम् । नहि संज्ञाकरणमन्तरा व्यवहारः कश्चन घटते । लोकेऽपि देवदत्तादिपदव्यपदेश्या हि व्यवहारभाजो भवन्तीति ।।६।। सं तथाभूत एवात्मा स्वयमन्य इवोल्लसन् । जीवतामुपयातीव वीचितामिव वारिधिः ॥७॥ स तथेति । तथाभूतः चित्स्वभावतया स्थितोऽपि मुग्धः सन् अन्यः, आका- शादिक्रमोद्भ तलिङ्गसमष्ट्यात्मा जडः, स इव उल्लसन् , तदनुप्रवेशात् तदभिमानेन प्राणधारणाद्यपाधिना देहत्वमनुप्रविष्टः जीवताम् उपयाति इव, जीवव्यवहारं प्रतिपद्यत. इव । वस्तुतस्तु इद विभ्रमविजृम्भितमेवेति इवोपादानात् सूचितम् । दर्शनान्तरेऽपि- 'देहप्राणविमर्शनधीज्ञाननभःप्रपञ्चयोगेन । आत्मानं वेष्टयते चित्रं जालेन जालकार इव ।।' (परमार्थसार ३२२) इति ॥७॥ ततः स जीवशब्दार्थकलनाकुलतां वहन् । मनो भवति भूतात्मा मननान्मन्थरीभवन् ॥८॥ , ::
१२८ दशकण्ठवधम् तत इति । क्रियाशक्तिप्रधानं प्राणधारणमेव जीवशब्दार्थः । तत् कल नेन आकुलतां चञ्चलताम् । भूतात्मा भौतिकलिङ्गात्मा । मननात् संकल्पविकल्परूपात् । मन्थरीभवन् जाड्यं न मन्दीभवन् । मनो भवति परमात्मभावं विस्मृत्य मनः संपद्यते । मनो धर्मानपि संकल्पादीन् आत्मन एव मन्यत इति भावः ।।८।। तत् स्वयम् स्वैरमेवाशु संकल्पयति नित्यशः । तेनेस्थमिन्द्रजालाभं जगदेतद् विवर्तते ॥६॥ तदिति । तदेवं समष्टिमनोभावमापन्न हिरण्यगर्भाख्यं ब्रह्म, स्वयम् अन्येन अबोधितमपि पूर्ववासनानुरोधाद् विराड्भावं, भुवनादिभावं तत्र च चतुर्विधभूतग्रामभावमिति नित्यं स्वैरमेव संकल्पयतीति स्पष्टार्थः । तेन सत्यसंक- ल्पेन इन्द्रजालाभम् इन्द्रजालोपमम् । विवर्तते अतत्त्वतः अन्यथा प्रथते ।। यथाहि हेम्नः कटकं न पृथग्भावमञ्चति । कटकान च हेमापि ब्रह्मणीदं तथा जगत् ॥१०॥ यथाहीति । हेमकटकरूपात् कांचनात् कटकशब्दार्थो यथा न पृथग्भावं भजते तथा ब्रह्मणि प्रतिभातं जगदपीदं न पृथग्भावमञ्चति । तदेवम् अध्यारोप- शतैरपि नाधिष्ठानस्य पारमार्थिकी स्थितिर्भज्यत इति वस्तुपरमार्थः ॥१०॥ परं जगति न ब्रह्म हेनीव कटकात्मता । सैकतोस्त्रेण वारीव मनसैतञ्जगभ्रमः ॥११॥ परं जगतीति । सैकतोस्रण मरुमरीचिकया। सैकतं सिकतामयम् - किरणोत्रमयूखांशुः-इत्यमरः ।।११।। अविद्या संसृतिवन्धो माया मोहो महत्तमः । इत्यज्ञानस्य पर्यायाः कथिता मर्मवेदिभिः ॥१२॥ । अविद्यति । विद्यापोद्यत्वादविद्या । ऊ धस्तिर्यक्संसरणाद्धेतोः संसृतिः । स्वातन्त्र्यविघटकत्वाद् बन्धः। मिथ्यात्वान् माया, विश्वमोहकतया वा । मीयते परिच्छिद्यते प्रमातृप्रमेयप्रपञ्चो ययेति वा । भ्रमहेतुत्वान्मोहः । दुस्तरत्वान्महत् । स्वरूपावरकत्वात् तम इति ।।१२।। बन्धमोक्षयोः स्वरूपमाह द्वाभ्याम्- चतुर्थो गुच्छकः १२६ द्रष्टु श्यस्य सत्तव वन्ध इत्यभिलप्यते । द्रष्टा दृश्यवलाद् बद्धो दृश्याभावे तु मुच्यते ॥१३॥ जगत्वमहमित्यादिमिथ्यात्मा दृश्यमुच्यते । यावदेतत्संभवति तावन्मोक्षदशा व च ॥१४॥ द्रप्टुरिति । जगत्त्वमहमिति च । स्पष्टार्थों ॥१३-१४॥ नेदं नेदमितिव्यर्थप्रलापै नोंपशाम्यति । संकल्पजनकै श्यव्याधिः प्रत्युत दीप्यते ॥१५॥ जगदृश्यं तु यद्यस्ति न शाम्यत्येव कस्यचित् । नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सत:-॥१६॥ ! नेदमिति । जगदृश्यमिति च । दृश्यसद्भावे, नेदं नेदमित्युपेक्षया कथंचिदेकस्य निराकरणेऽपि परः प्रसज्जते, ततोपीतर इत्येवं दृश्यपरंपराया यथो- त्तरं प्ररोह , तस्मान्न केवलया वाचा बाधः यावद् विचार सहकारेणैवैति । दृश्य- व्याधिः-दृश्यमेव व्याधिः, दृश्यं वा.व्याधिरिवेति । पूर्वत्र मयूरव्यंसकादित्वात्स- मासः परत्र च उपमितसमासः । व्याधिरिव दृश्योच्छेदो न सुकर इति भावः । दीप्यते दीपदीप्तौ-भावे लट् ॥१५-१६॥ मोक्षे प्रतिबन्धकान् हेतूनाह- अचेत्यचित्स्वरूपात्मा द्रष्टा यत्रैव तिष्ठति । तत्रैवैतस्य दृश्यश्रीः समुदेत्यप्यणदरे ॥१७॥ . अचेत्येति । अचेत्यः बोद्धुमशक्यः चित्स्वरूप आत्मा यस्य, एतादृशः । अज्ञातात्मेति यावत् । यत्रैव दृश्यसमावेशायोग्ये परमाणूदरादावपि तिष्ठति स्थितिं लभते । तत्रैव एतस्य आत्मनः दृश्यश्रीः दृश्यबीजं समुदेति प्रादुर्भवति । अणूदरे-अणुः पूर्णाहंभावशून्यः संकुचितंमन्यो जीवः, तस्य उदरे उदरकोटरे- इति । यत्र क्वापि एवंभूतप्रदेशे तिष्ठन्नेतेनावश्यं परिभूयते ॥१७॥ जगत्प्रतिफलत्येवमादर्श इव चित्यपि। : जन्ममृत्युरुजाकीर्णा ततो दुःखपरंपरा ॥१८॥ ܕ ܀
१३०
दशकण्ठवधम्
जगत्प्रतीति । आदर्श इव यथा मुकुरतले सर्व साक्षात् क्रियते, एवं चित्यपि
परमाणूदरेऽप्यात्मनि ब्रह्माण्डान्तः समावेशः संभवत्येव । न तत्र प्रदेशकृतं प्राचुर्य
संकोचो वा अनुरुध्यत इति ।।१८।।
इदं प्रमार्जितं दृश्यं मयात्राहमवस्थितः ।
एतदेवाक्षयं वीज समाधौ संसृतिस्मृतेः ॥१६॥
इदमिति । प्रमार्जितं ज्ञाननिरपेक्षेण सविकल्पकेन समाधिना दूरोत्सारि-
तम् । समाधौ-समाधिश्च 'तदेवार्थमात्रनिर्भासं स्वरूपशून्यमिव समाधिः'
(यो द० ३।३). इत्येवंरूपः, तस्मिन् । समाधिस्थश्चेत् संसृति स्मरति, तदा
समाधेरेव भङ्गः । अस्मृता सा नैव माष्टुं शक्यते । एतदेव चास्य दृश्यस्य
अक्षयं बीजम्-यन्मूलको दीर्घदीर्घतरः संसरणव्यापारः ।।१६।।
सति दृश्ये कुतो राम ! निर्विकल्पसमाधिता।
समाधौ चेतनत्वं च तुर्यत्वं चोपपद्यते ॥२०॥
सति दृश्यते । दृश्यसत्तायां निर्विकल्पकः समाधिरेव न घटते, कुतस्तेन
मार्जनम् । सत्यपि वा तस्मिन् चित्तसत्त्वे चेतनत्वं, तस्याप्युपरामे तुरीयावस्था
चेति न समाधिरत्र प्रभवतीति व्यक्तम् ॥२०॥
सुषुप्तान्त इवैतस्मिन् व्युत्थाने दुःखदर्शनात् ।
भूयोऽनर्थपरिक्लिष्टे क्षणसाम्ये हि किं सुखम् ॥२१॥
सुपुप्तान्तेति । व्युत्थानं विरुद्धमुत्थानम् । 'प्रादयो गता' ( वा० २।२।१८)
इति समासः । ते समाधावुपसर्गा व्युत्थाने सिद्धयः ( यो० द० ३।३६ ) एतद-
भिप्रेत्योक्तम्-
"द्रव्यमन्नक्रियाकालशक्तयः साधुसिद्धिदाः ।
परमात्मपदप्राप्तौ नोपकुर्वन्ति काश्चन ॥
सर्वेच्छालामसंशान्तावात्मलाभोदयों हि यः ।
स कथं सिद्धिवाञ्छायां मग्नचित्तेन लभ्यते ॥" इति ॥२२॥
न च पापाणताप्रख्या रूढिं प्राप्ताः समाधयः ।
भवन्त्यग्रपदं शान्तं चिद्रूपमजमव्ययम् ॥२२॥
चतुर्थो गुच्छक १३१ न च पाषाणेति । पाषाणताप्रख्याः अश्मशकलकल्पाः, अनात्मभूता इत्यर्थः । रूढिं प्रसिद्धिम् । अजम्-न जायते इत्यजः । डः । तम् । अव्ययम्-न व्येति यत् तत् । 'एरच् ' इत्यच् । अग्रपदं मोक्षरूपम् । न भवन्ति न जायन्ते ॥२२॥ तस्माद् यदीदं सद् दृश्यं तन्न शाम्येत् कदाचन । शाम्येत् तपोजपध्यानैरिति मन्दविचारणा ॥२३॥ तस्मादिति । तदित्यं सतो दृश्यस्योपशमः सर्वथा असंभवी । शाम्येत्- प्रशमं यायात् । शमु उपशमे ।। संभावनायां लिङ् । मन्दविचारणा-मन्दानां मन्दा वा विचारणेति चेत्युभयथा योज्यम् । स्वात्मज्ञानलामे नियतिशक्तिसमुत्थं जपध्यानयज्ञादिकं नोपायतया क्रमत इत्याशयः । भगवद्गीतास्वपि-'नाहं वेदैर्न- तपसा न दानेन न.चेज्यया ।।' (११-५३ ) इति ।।२।। प्रलीनारोहसंतानं यथा पद्माक्षकोटरे । जागर्ति पद्मिनीबीज तथा द्रष्टरि दृश्यधीः ॥२४॥ ॥ इति बन्धहेतुदर्शनम् ॥ प्रलीनेति । प्रलीनः सूक्ष्मतयान्तगूढः, आरोहस्य संतानः प्रसवो यस्मिन्- तत् । पद्मिनीबीजम्-पद्मिनी.कमलिनी तस्याः बीजम् उपादानभूतम् । जागर्ति- आस्ते । द्रष्टरि प्रमातरि, दृश्यधीः- दृश्यसहिता धीः बुद्धिः-मध्यमपदलोपी समासः ॥२४॥ ॥ इति बन्धहेतुदर्शनम् ॥ कामकर्मवासनासंभृतया अविद्यया उपहितः आत्मैव जगदीजं मृत्युबीजं च, विद्यया तद्वीजनिष्ठायाः शक्तर्दाहे न मृत्युवशो भवतीति प्रागुक्त-तत्र जगतः सर्गे प्राथम्यमुपगतस्य आकाशतत्त्वस्य शोधनमुखेन वक्ष्यमाणार्थे आख्यायिकामुपन्य- स्यति- भो! एवं किलाख्यायते-आस्त आकाशजो नाम विप्रः । यस्य- चिरजीवितां विलोकयन्मृत्युमीमांसामास- मया खलु क्रमेण कृत्स्नानि १३२ दशकएठवधम् . भूतान्य वत्सत, पदि कृपाणधारेवात्र मम शक्तिः कुण्ठतीनि तेन पृष्टो यम ऊचिवान् । मृत्यो ! अलं स्वपौरपाबहेलनेन । एप याकाशन आकाश एव, नास्य कानिचिनिधनकारणानि कर्माणि, 'न चाजाताकृते- रिवास्य प्राक्तनः कर्मभिः सह किंचिदपि श्लेपः, तत एवास्य नावशं मान- सम् , न चानेन मनागपि क्रियते, यंत्पुनरस्य प्राणस्पन्दः कर्मानुमीयते तदत्र न कमधीः, पयसि द्रवत्वमिव नभस्वति स्पन्दनत्वमिव विहायसि शून्यत्वमिवैप परमे पदे तिष्ठन् स्वकारणाभिन्नः स्वयंभूः कथमिव गृह्यते ॥२५॥ भोः एवं किलेति । किलेति वार्तायाम् अव्ययम् । आकाशजः-श्राका- शाद् ईपत्प्रकाशाद् ब्रह्मणो जातः, लिङ्गसमष्ट्यात्मा हिरण्यगर्भः । चिरजीविताम्- चिरजीविनो भावः, ताम् । मृत्युवशेगो न भवतीति यावत् । मीमांसामास-विचा- रयामास । मानपूजायामिति धातोः-'मानेर्जिज्ञासाम्' (वार्ति०) इति जिज्ञासार्थे- 'गुप्तिजकिद्भयः सन् ' ( पा० सू० ३।११५)-'मान्बधदान्शान्भ्यो दीर्घश्चाभ्या- सस्य' (पा० सू० ३।११६) इति सूत्राभ्यां सनि अभ्यासदीर्घ च मीमांस धातुः । ततः कर्तरि लिट् । अघत्सत अद्यन्तेस्म । अद भक्षणे इत्यस्मात् कर्मणि लुङ् । ऊचिवान् उक्तवान् । वच धातोः कम्प्रत्ययः । नास्य....... 'कर्माणि-प्रारब्धा- धिकारफलानां फलारम्भेनैव विनाशात् , संचितानां ज्ञानेन वाधात् , आगामिनां बीजाभावान् नास्य कर्मानुपङ्गि निधनम्-इति भावः । अजाताकृतेः-अनुत्पन्ना- कारस्य इव । प्राक्तनैः......श्लेप इति-प्राक्तनैः पुराभवैः श्लेषः सम्बन्धः । तथाच सूत्रम्-'तदधिगम उत्तरपूर्वाद्ययोरश्लेपविनाशाविति' (ब्र० सू० ४।१।१३)। ततः "मानसम्-पूर्वदेहस्पन्दवासनावशो हि चित्तस्पन्दः स च नास्त्येवेतिभावः । 'क्रियते । तथाचायं परब्रह्मस्वभावे एव स्थितो न दृश्यस्वभावे । प्राणस्पन्दः-स्पन्दनं स्पन्दः-स्पदि किंचिच्चलने । प्राणस्य स्पन्दः क्रियोन्मु- न चा. : ख्यम् ॥२५॥ भगवन् ! कृतान्त !! शून्यात् कथमुपमुत्पन्न इति मृत्युना पृष्टो यमः पुनरुचे- अयं ब्राह्मणो न कदाप्यनि न वा नास्ते महाप्रलय- बेलायां केवलं चिन्मानं संतिष्ठते । तदनु येनास्य संवित्स्वभावत्वाद चतुर्थो गुच्छकः पुरस्तान्महन्महो देहोऽहमिति चेतति तेनैव कारतालीयवद् भ्रान्तमा- कारं पश्यति द्रष्टा । स चायं तदानीमम्बरान्तरे निर्विकल्पश्चिदाकाश- रूपो विज्ञानधन एवातत आस्थितः ॥२६॥ भगवन्निति । निर्विकारस्य शून्यस्य विकारः, अजस्य जन्म, सतां पृथिव्या- दीनामसत्त्वं च यदुच्यते तत्कथं शक्यसंभवमिति संदिहानो मृत्युराचष्टे भगव- निति । अयं ब्राह्मणो 'अजनीत्यादिना यमः प्रतिवक्ति-न वयं शून्यत्वाभिप्रायेण परस्य आकाशत्वं पृथिव्यादीनां चासत्त्वमभिदध्मः किंतु कारणात् पृथक कार्य- स्य सत्तेव नाङ्गीक्रियते । एवम् अजस्योत्पत्तिकथनमपि विवर्ताभिप्रायेण न परि- णामबुद्धया । ततश्च अयं द्विजः परमार्थतः केवलविज्ञानभामात्रम्', ततश्च स तथैव सदास्थितो न विकृतः । महाप्रलय 'संतिष्ठते-आद्यन्तयोः चिन्मात्र- पारिशेष्यात् तदेवास्य स्वाभाविक रूपमिति । तदनु 'द्रष्टेत्यन्तम्-तदनु सर्गारम्भकाले येन वासनादृष्टसंभृतजीवाविद्याहेतुना, पुरस्तात् पुरतः, महतो विराड्पस्य चतुर्मुखस्य वा देहोऽहमित्यभिलापयोग्यं, महः स्थूलं रूपं चेतति ईपत्स्फुरति, तेनैव अविद्याहेतुना, काकतालीयवत्-काकागमनमिव तालपतनमिव- काकतालम्, काकतालमेव काकतालीयम्-काकतालशब्दाद् इवान्तरार्थे सादृश्या- न्तरे 'समासाच तद्विषयात्' (पा० सू० ५।३।१०६) इति छप्रत्ययः, 'आयनेयी- नीयियः- ( पा० सू० ७।१।२) इति तस्य ईयादेशः । अतर्कितोपनतमिति फलि- तार्थः । स्वप्न इव भ्रान्तं मिथ्याभूतम् आकारं पश्यति द्रष्टा अस्मदादिजनः । सचायं 'आस्थितः-विज्ञानघनः विशुद्धज्ञानकरूपः, आततो विततः । परह- ष्ट्यध्यस्तदेहादिना नास्य निर्विकल्पतादिक्षतिरिति भावः ।।२६।। नास्य कायो न कर्माणि न क त्वं न वासना । केवलं व्योमरूपम्य भारूपस्येव तेजसः ॥२७॥ नास्येति । पूर्व प्रपञ्चितस्य निष्कृष्टार्थः ॥२७॥ वेदनामात्रशान्तौ तु नेदृशोऽप्येष दृश्यते । तस्माद् यथा चिदाकाशस्तथा तत्प्रतिपत्तयः ॥२८॥ वेदनेति । वेदना, वहिमुखचित्प्रवृत्तिः, तन्मात्रस्य शान्तौ । ईदृशोऽपि, प्रातिभासिकरूपोऽपीति । तस्माद् अधिष्ठानतत्त्वस्य परिचयेन विपयवाधात् , १३४ दशकएठवधम् तत्प्रतिपत्तयः वेदना अपि, यथा चिदाकाशः तथैव तद्भावादवतिष्टन्त इत्या- शयः ॥२८॥ एवमिह सौरभस्येव वेदनस्यानवकाशे पुष्पस्येव पृथिव्यादेरखका- शस्य वार्तं व दूरोदस्ता । तदत्राक्रमणसाहसं नभसि वीजाकरणकल्पमिति यमेन नियमितो मृत्युर्यथागतं गतवान् । एतन्निशम्य, पितरेप मम पितामहो नूनमिति रघूद्वहेन निवेदितो ब्रह्मभूराहस्म-भो एष खलु संकल्पाकाशशरीरो ब्रह्मा मन इति ॥२६॥ एवमिहेति । सौरभस्य सुरभेर्भावः-अण् । सद्गन्धस्य इव । वेदनस्य चित्स्वभावानां वेदनानां अनवकाशे असहने, पृथिव्यादेः दृश्यप्रपञ्चस्य । दूरो- दस्ता-दूरे उदस्ता प्रतिक्षिप्ता | नभसि व्योनि, वीजाकरणकल्पं बीजोप्तिसदृशं- गगनकुसुमायितमित्यर्थः । निशम्य आकर्ण्य । पितः गुरो!अनेन वसिष्ठमभिमुखी- करोति । एष आकाशजब्राह्मणेति नामान्तरप्रतिपादितो ब्रह्म पितामहः पद्मयोनिः 'पितृव्यमातुल-' इति साधुः । रघूद्वहेन रघुषु उद्वहः रक्षादिभारधारकः- उद् + वह + अच् । तेन । रामभद्रणेत्यर्थः । ब्रह्मभूः-ब्रह्मणो भवति इति-'भुवः संज्ञा- न्तरयोः' (पा० सू० ३।२।१७६ ) इति क्विम् । वसिष्ठः । आहस्म उक्तवान् । 'त्रु वः पञ्चानामादित-' इत्यादिना बेबो लटि आहादेशः । संकल्पाकाशशरीरो ब्रह्मा मन इति । संकल्पमात्रमेव मनोरूपम् । न पृथिव्यादिघटितम् । ब्रह्मा प्रजापतिः ॥२६॥ निराकारोऽपि संकल्पः कथं पुरुपाकारतामापन्न इति दर्शयति- चिद्वयोम केवलमनन्तमनादिमध्यं ब्रह्मेति भाति निजचित्तवशात् स्वयंभूः । आकारवानिव पुमानिव वस्तुतस्तु वन्ध्यातनूज इव तस्य तनोरभावः ॥३०॥ ॥ इत्याद्यसर्गक निरूपणम् ॥ चिद्व्योमेति । मनसो ब्रह्माकारकल्पनापरिणामो न वास्तवः, किंतु शुद्धं ब्रह्म व अज्ञानात् तथा विवर्तत इति तात्पर्यम् ॥३०॥ ,
-
चतुर्थो गुच्छक
१३५
ब्रह्मणो मनोरूपत्वाभ्युपगमे, मनसश्च वासनाजालरूपत्वात् प्राक्तनं वासना-
जालं न किंचिदस्य वर्तत-इति कथनं न बुद्धिपथमारोहतीति मन्यमानो राघवः
प्रश्न प्रस्तौति-
भगवन् ! यदि पृथिव्यादिवजितं मनो ब्रह्म ति गीयते तहीतर-
स्येव ब्रह्मणः शरीरे प्राक्तनी स्मृतिः किं न कारणमिति राघवेण पृष्टो
वसिष्ठ पाख्यत-यस्य किल पूर्वकर्मानुवन्धी देहस्तस्यैव संसृतिसद्धा
चात् स्मृतिः कारणम् । ब्रह्मणो हि पूर्वकर्माभावे प्राक्तनस्मृतेः क इव
संक्रमः । कारणात्मन इतरस्येव नापि ब्रह्मण आतिवाहिक प्राधिभौतिक
इति देहद्वितयं केवलमातिवाहिक एव ।।३।।
भगवन्निति । इतरस्येव अस्मदादिवत् पश्वादिवञ्च । प्राक्तनी स्मृतिः-
पूर्वशरीरत्यागसमयोद्भूता स्मृतिः । 'यं यं वापि स्मरन् भावमिति गीतोक्तरस्म-
दादिरिव ब्रह्मणः शरीरे कुतो न प्राक्तनी स्मृतिः । सत्यां च तस्यां तदुद्भवाधारसं-
स्कारदेहादिकेनापि प्राक्तनेन नून भाव्यमिति । संक्रमः संक्रमणम् । प्रवेश इति
यावत् । आतिवाहिकः-अतिवहनम् अचिः । धूमादिमार्गेण लोकान्तरप्रापणम् ।
तत्र साधुरिति ठक् । अस्मदादेलिङ्गदेह इव सूक्ष्म इति यावत् । अधिक तु
'आतिवाहिकास्तल्लिङ्गात् (ब्रह्मसू० ४।३।४) इति सूत्रस्थ-शारीरकभाष्यादवगन्त-
व्यम् । आधिभौतिकः, भूतानि व्याघ्रसादीन्यधिकृत्य जातः । अधि + भूत +
ठन् । उभयपदवृद्धिः । स्थूलभूतजः । शेषं सुगमम् ।
सर्वासां भूतवृत्तीनामेकोऽजः कारणं परम् ।
न चास्य कारणं कोऽपि तेनासावेकदेहवान् ॥३२॥
चित्तमात्रशरीरोऽयं न भूम्यादिक्रमोत्थितः ।
प्रजापतियोमरूपः प्रजाः प्रतनुतेतराम् ॥३३॥
सर्वासामिति । चत्तमात्रेति च । पूर्वोक्तस्य फलितार्थभूतत्वात् स्प-
ष्टार्थो ॥३२-३३॥
ताश्च चिद्व्योमरूपिण्यो विनान्यः कारणान्तरैः ।
यद् यतस्तत् तदेवेति सर्वैरेवानुभूयते ॥३४॥
दशकएठवधम्
ताश्चेति । ताः प्रजाः, अन्यैः तत्संकल्पव्यतिरिक्तः, कारणान्तरैः कारण-
भेदैः। यद् वस्तु, यतः यस्मादुपादानाज्जातम् । अनुभूयते कनककुण्डलादौ ।
ततश्च जगतो ब्रह्ममात्रत्वमेव सिद्धम् ॥३४॥
निर्वाणमात्रं पुरुपः परो बोधः स एव हि ।
चित्तमात्रं तदेवास्ते नाभ्येति वसुधादिताम् ॥३॥
निर्वाणमात्रमिति । निर्वान्त्यत्र इति निर्वाणम् , तन्मात्रं नियतिमात्र-
मित्यर्थः । वा गतिगन्धनयोः । भावे अधिकरणे वा व्युत्पन्नः । 'तोऽधिकरणे च'
(पा० सू० ३।४।७६) इति-'नपुसके भावे' (पा० सू० ३।३।११४) इति वा
तः । 'निर्वाणोऽवाते' (पा० सू० ८।२।५० ) इति निष्ठानत्वम् । निर्वाणमस्तं
गमने निवृतौ गजमजने । संगमेऽप्यपवर्गे च-'-इति मेदिनी । यतः स चित्तो-
पाधिः । चित्तभ्रान्त्या चित्तमात्रभूतोऽपि परमार्थतः सः चिदाकाश एवास्त इति
न पुन तिकपुरुपादिभावमायातीत्यर्थः ॥३५॥
भगवन् ! किं रूपं मनो येन नैकविधा जगन्मजरी संचार्यत इति
पृष्टो मुनिकुञ्जर आख्यत-॥३६॥
भगवनिति । किं रूपं मनः । मनसः तात्त्विकं स्वरूपं कीदृशमिति भावः ।
जगन्मञ्जरी लोकवल्लरी। संचार्यते प्रसार्यते । समुपसृष्टाचरतेय॑न्तात् कर्मणि
लट् । मुनिकुञ्जरः मुनिश्रेष्ठः ॥३६।।
परमार्थशा मनो नाम नास्त्येव किमपि तथापि शास्त्रीय व्यवहारोपयोगि
कल्पित तद्रूपमाह-
यदर्थप्रतिभानं तन्मन इत्यभिधीयते ।
अन्यन्न किंचिदप्येतन्मनो नाम रघूत्तम ! ॥३७॥
यदर्थप्रतिभानमिति । यत् अर्थप्रतिभानम् अर्थाकाराध्यासः । तदेव
मन इत्यभिलप्यते, नैतदतिरिक्तं किमपि मनसो निर्वचनं शक्यमुत्प्रेक्षितुमिति
भावः॥३७॥
वस्तुतो मनसो रूपं न मनागपि लभ्यते ।
नाममात्राढते व्योनो यथा शून्यजडाकृतेः ॥३८॥
चतुर्थो गुच्छकः १३७ वस्तुत इति । नाममात्राहते- नाममात्रात् नाम्ना एव केवलात् । 'अन्यारादिति' ऋतयोगे पञ्चमी । अतएव तत्काउँपु-'वाचारम्भणं विकारो नाम- धेयं मृत्तिकेत्येव तु सत्यम्' इति श्रुतौ मिथ्यात्वमस्योपपद्यते । शून्यजडाकृतेरिति भूतव्योम्नो मनसश्च साधारणम् ।।३।। न वाह्य नापि हृदये सद्रूपं दृश्यते मनः । सर्वत्रैव स्थितं चैतदवधेहि यथा नभः ॥३६॥ न बाह्य ति । अनेन नभसा मन साम्यमुपदर्शितम् । शेपं स्पष्टम् ॥३६॥ मध्ये यदेतदर्थस्य प्रथते प्रतिभासनम् । सतो वाप्यसतो वापि तन्मनोऽवेहि नेतरत् ॥४०॥ मध्ये यदेतदिति । प्रत्यक्षे सतः स्मृत्यादिपरोक्षे चासतो वा अर्थस्य मध्ये यदेतत् तदाकारप्रतिभानं प्रथां गतं सर्वलोकस्य तदेव मनः । मन्यतेऽनेन-इति- करणे असुन् । निराकारचितोऽर्थाकाराध्यास एव मन इत्यर्थः ॥४०॥ इदमस्मात् समुद्भूतं मृगतृष्णाम्बुसंनिभम् । रूपं तु क्षणसंकल्पाद् द्वितीयेन्दुभ्रमोपमम् ॥४१॥ इदमिति । इदं जगत् । अस्माद् मनसः । भ्रमः तद्विषयोऽध्यासः, तदुप- मम् ॥४१॥ भगवन् ! सच्चेन्नेदं दृश्यं शाम्यति असन्नावगम्यत इति कथं- कारमियं दृश्यविषूचिका पिपीलिकानाशं नक्ष्यतीति राघवेणोक्तो मुनिवृपा व्याख्यत- भो ! अस्य दृश्यपिशाचस्य निरासाय तावदेष मन्त्रराजः, सतो नाशायोगानष्टमप्येतदन्तर्वीजभूतं भवेदेव ततः स्मृति- सेकेन दृश्यधीरुद्भूय विविधदोषकुसुमस्तबकां भववल्लरी विकासयेदित्यनि- मोक्षः प्रसजति, स एष मोक्षपथाधिरूढानामेतेषां देवर्षिमुनिसार्थानां दर्शनादिव बाढं कान्दिशीकायते ॥४२॥ भगवनिति । दृश्यस्यासत्त्वे भवदुक्तः केवलीभावो नूनं संगच्छेदेव, परं सत्सदित्येव दृश्यानुभवात् तद् विरुध्यत इति परिणामवादाभिप्रायेणात्र राघवस्य ।
१३८
दशकएठवधम्
प्रश्नः । दृश्यविपूचिका-दृश्यरूपा विपूचिका प्रवाहिका । कथंकार केन प्रकारेण |
'अन्यथैवं कथमित्थंसु सिद्धाप्रयोगश्चेत्' (३।४।२७) इति कृञो णमुल् । पिपीलि-
कानाशं जीवनाशं नश्यतीत्यर्थः। 'कोर्जीवपुरुषयोर्नशिवहोः' (३।४।४३) इति
नशेः कर्तरि णमुल् । नक्ष्यतीति-णश अदर्शने-इति देवादिकात् कर्तरि लुट् ।
दृश्यमेव पिशाचः-पिशितमाचामति-इति योगार्थात् पिशाच इवाकुलयतीत्यर्थः ।
अयमत्राभिसंधिः- असतोऽप्यविद्यया सदनुबोधाद् दृश्यस्य सत्ताभ्रमः । कैवल्य-
भावोदये तु अविद्याया मूलोच्छेदान् नायं भ्रमः समुदेति । प्रथमं जीवन्मुक्त-
दर्शनलिङ्गन अनिर्मोक्षप्रसञ्जनेन च दृश्ये सत्यताविश्वास वारयतो विवर्तवाद-
मभ्युपेत्य भगवतो वसिष्टस्य प्रतिवचनम् । मुनिवृपा मुनिश्रेष्ठः । व्याख्यत व्या-
चख्यौ । मन्त्रराजः- मन्त्राणां राजेति विग्रहः । 'राजाहःसखिभ्यष्टच्' इति समा-
सान्तष्टच् । सतो नाशायोगात् 'भवेदेव । इहेदमाकूतम्- परिणाम-
वादे हि वस्तुत उत्तरोत्तरावस्थाभिः पूर्वपूर्वावस्थातिरोभावमात्रम् , नात्यन्तिको-
च्छेदः । सतोऽसत्त्वायोगात् । तथाच नाशलक्षणेन पार्यन्तिकेनापि विकारेण
तिरोहितस्य द्वैतस्य चित्ते प्रकृतौ वा अवस्थितस्य कामकर्मवासनावीजात् पुनरु-
द्भवो दुर्वार एव- इत्यनिर्मोक्षप्रसङ्गः- इति । स्मृतिसेकेन-स्मृत्या सेकः सेचनम्-
तेन | स्मृतिग्रहणं भोगोपयुक्तान्तःकरणवृत्तिप्रमुखस्य सर्वस्यापि जगतः उपलक्ष-
णम् । उद्भूय प्रादुर्भूय । विविधदोषकुसुमस्तवकाम्- विविधाः विविधप्रकाराः ये
दोपा अविद्याजन्मानः- त एव कुसुमस्तवकाः प्रसूनगुच्छकाः- ते सन्ति यस्यां
सा, ताम् । भववल्लरीम्- संसारमञ्जरी विकासयेत् प्रादुष्कुर्यात् । मोक्षपथाधि-
रूढानां जीवन्मुक्तानां देवर्षिमुनिसानाम् । देवाश्च ऋपयश्च मुनयश्चेति-
देवर्षिमुनयः- तेषां सार्थः सङ्घः- तेपाम् । कान्दिशीकायते- कान्दिशीक इवा-
चरतीति आचारार्थे क्यच् । विभ्यदिव नोपसर्पति । कान्दिशीको भयदु तः-
इत्यमरः ।
चिदात्मा यं स्वबाह्यप्रधानस्थमेव दृश्यं बुद्धयविवेकात् स्वहृत्स्थितमिव
पश्यति- सोऽयं संसारः विवेकज्ञानोदयात् तदविवेकाभिमाननिवृत्तौ सत्यामपि
बहिः तस्मिन्- ततो विषयरागिणाम् श्रारम्भादिवादिनां च मोक्षः स्यादिति
सांख्यसरणिं पुरस्कृत्य आशङ्कते । तथा च गौडपादाः-
'अस्पर्शयोगो नामैप दुर्दशः सर्वयोगिनाम् ।
योगिनो विभ्यति यस्मादभये भयदर्शिनः ।।'
इति ॥४२॥
१३६
.
-
चतुर्थो गुच्छकः
यदि स्याजगदादीदं ततो मोक्षो न कस्यचित् ।
वाह्यमाभ्यन्तरं वास्तां दृश्यं नाशाय केवलम् ॥४३॥
यदि स्यादिति । स्पष्टम् ।।४।।
तस्मादिमां प्रतिज्ञां त्वं शृणु रामातिभीपणाम् ।
यथायुक्ति यथाशास्त्रं संदर्भेऽत्र विजृम्भिताम् ॥४४॥
तस्मादिति । तस्माद्- विवर्तवादत्यैव परिशिष्टत्वात् । प्रतिज्ञाम्-प्रति-
ज्ञायते इति । प्रति + ज्ञा + 'आतश्वोपसर्गे' इत्यङ् , टाप् । ताम् । कर्तव्यतयो-
पदेशमार्गमित्यर्थः । भीपणाम् दारुणाम् । यथायुक्ति- युक्तिमनतिक्रम्य वर्तत
इति । एवं यथाशास्त्रमपि । संदर्भ प्रवन्धे । विजृम्भिताम् उल्लासिताम् ।।४४॥
ब्रह्मणो रूपं निर्दिशति द्वाभ्याम् -
अयमाकाशभूतादिरूपोऽहमिति लक्षिते ।
जगच्छन्दस्य नामार्थो ननु नास्त्येव कश्चन ॥४५॥
यदिदं दृश्यते किंचिद् दृश्यजातं पुरोगतम् ।
परब्रह्मैव तत्सर्वमजरामरमव्ययम् ॥४६॥
अयमिति । यदिदमिति च । निगदव्याख्यातावेतौ ॥४५-४६॥
पूर्णे पूर्ण प्रसरति शान्ते शान्तं व्यवस्थितम् ।
व्योमन्येवोदितं व्योम ब्रह्मणि ब्रह्म तिष्ठति ॥४७॥
पूर्णे पूर्णमिति । प्रतीचो यद् ब्रह्म क्यं तत् पूर्णे पूर्ण प्रसरति । व्योम-
न्येव घटाधुपाधित्यागाद् व्योम्नेवोदितम् । अतो ब्रह्मण्येव ब्रह्म तिष्ठति- नाणु-
मात्रमपि तद् विक्रियते । यत्र हि यध्यासः तत्कृतेन गुणेन दोषेण वा अणु-
मात्रेणापि स न संबध्यत इति ।।४७||
भगवन् ! नन्वेवं बन्ध्यातनूजेनापेषि शैलः, शशविषाणेन
पलायि दूरं, शिलयानति मुहुरिति व्याहरति रघूत्तंसे स सनृतवाग्
व्याहृत-॥४८॥
दशकएठवधम् भगवन्निति । अत्र वन्ध्यातनूजेनेत्यादयो दृष्टान्ताः पदार्थवाक्यार्थोभया- संभवप्रदर्शनायोच्यन्ते । सूनृतवाक्- सूनृता प्रिया सत्या च वाग् यस्य सः । प्रामाणिकमूर्धन्यः । व्याहृत व्याहरत् ॥४॥ मनो दृश्यमयं दोपं तनोतीमं क्षयात्मकम् । असदेव सदाकारं स्वप्नः स्वप्नान्तरं यथा ॥४॥ मनो दृश्यमिति । स्पष्टार्थः ।।४।। स्फुरति गच्छति वल्गति याचति भ्रमति मजति संहरति स्वयम् । अपरतां परतामपि केवला श्रयति चञ्चलशक्तितया मनः ॥५०॥ ॥ इति प्रकरणार्थकल्पनम् ॥ स्फुरतीति । मनश्चञ्चलशक्तितया यत् श्रयति तत्रैव स्फुरतीत्यादिभ्रमो विभाज्यते । अपरतां सांसारिकदशाप्रयुक्तमपकर्पम् । परतां कैवल्यलक्षणोत्कर्षम् । श्रयति उपयाति ॥५०॥ ॥ इति प्रकरणार्थकल्पनम् ।। महाप्रलयविस्फूत्तौं दृश्येऽसत्तामुपागते । अजोऽव्ययो भासमानः परमात्माऽवशिष्यते ॥५१॥ महाप्रलयेति । महाप्रलयस्य संकल्पप्रलयस्य विस्फूर्तिः विस्फुरणं यत्र । अर्थाजगति । असत्तां सूक्ष्मीभावादर्थक्रियाऽसमर्थताम् । परमात्मा महेश्वरः ।।१।। यः पुमान् सांख्यदृष्टीनां ब्रह्म वेदान्तवादिनाम् । वैज्ञानिकानां विज्ञानं शून्यं शुन्य विदामपि ॥५२॥ यः पुमानिति । सर्ववादिनामपि तत्तनु द्धिकल्पितैर्विशेषैः स एव सिद्धा- न्तविपयः- इति सर्वाधिष्टाने तस्मिन्न कोऽपि विवादः। अतएवेदमुच्यते- संज्ञासु केवलमयं विदुपां विवादः' इति ।।५२।।
- 1 २ चतुर्थो गुच्छकः १४१ यतो ब्रह्मादयो देवाः सूर्यादिव मरीचयः ।। यतश्च दृश्यविब्बोकाः समुद्रादिव बुद्बुदाः ॥५३॥ यतो ब्रह्मति । देवाः-दीव्यन्तीति देवाः । पचाद्यच् । प्रकाशप्राधान्या- न्मरीचय इव । तथा च स्मर्यते- 'दीव्यति क्रीडते यस्माद् रोचते द्योतते दिवि । तस्माद् देव. इति प्रोक्तः स्तूयते सर्वदैवतैः ॥ इति ।। दृश्यबिब्बोकाः दृश्यविभ्रमाः । समुद्राद् बुद्बुदा इव । अचेतनजगन्ति बुबुदानीव जायन्ते ॥५३॥ योऽधोमध्योर्ध्वलोकेषु सममेव विकासवान् । संपद्यन्ते विपद्यन्ते यत्र विश्वे घना इव ॥५४॥ योऽधोमध्येति । स्पष्टार्थः ।।५४|| यः प्लावयति संरब्धं पुर्यष्टकमितस्ततः ॥ येन निश्चेष्टिताकाराः शिलायोगमिवागताः ॥५॥ यः प्लावयतीति । संरब्धं स्वस्वव्यापारेषूद्युक्तम् । पुर्यष्टकम्-कर्मे- न्द्रियाणि, ज्ञानेन्द्रियाणि भूतसूक्ष्माणि, प्राणाः, अविद्या कामकान्तःकरण- मिति संभूयोच्यते । इतस्ततः अन्तर्बहिश्च स्वचिद्व्याप्त्या-प्लावयति प्लावनं विधत्ते । प्लव प्लवने । ण्यन्तात् कर्तरि लट् । चेतनानां चेतनता यत्प्रयुक्त त्यर्थः । निश्चेष्टिताकाराः अचेतनान्यपि वैचित्र्यभाञ्जि शिलायोगमिव शिलाध्यानमिव आगताः आस्थिताः ।।५।। प्रकृतिव्रतती व्योम्नि रूढा ब्रह्माण्डसत्फला ॥ चित्तमूलेन्द्रियदला येन नृत्यति वायुना ।।६।। ( इति मूलकारणदेवस्वरूपम् ) प्रकृतिव्रततीति । प्रकृतिः माया सैव व्रततिलता । व्योम्नि शुद्धायां चिति । रूढा संजाता । चित्तमूलदला-चित्तमूलं चित्तकारणकम् इन्द्रियदलम् इन्द्रियाण्येव दलानि पत्राणि यस्यां सा । येन ईश्वरेण । अन्यत् स्पष्टम् ।।५६|| ( इति मूलकारणदेवस्वरूपम् ) नह्यष दूरे नाम्यांशे नालभ्यो विषमेऽपि न ॥ स्वानन्दाभासरूपोऽसौ स्वदेहादेव लभ्यते ।।५७।। 7 १४२ चतुर्थो गुच्छकः स्याशयः । नह्यप इति । अभ्याशे अन्तिके नातिदूरे नाति संनिहिते क्रियामन्तरेण अलभ्ये विपमादिस्थे च फले क्रिया सफला स्यात्, आत्मा तु नतथेति पूर्वार्ध- । स्वानन्दा...'लभ्यते-विस्मृतकण्ठस्वर्णाभरणवज्ञानलभ्यता त्वस्य सुलभेति तात्पर्यम् ॥५७|| अयं स देव इत्येव संपरिज्ञानयोगतः ॥ जन्तु न लभते दुःखं जीवन्मुक्तत्वमेत्यपि ॥५८।। अयं सदेवेति । संपरिज्ञानयोगतः-संपरिज्ञानं स्वात्मानुभवः तद्- योगतः ॥५॥ स्वपौरुपप्रयत्नेन विवेकन विकासिना ।। स देवो ज्ञायते राम ! न तपोदानकर्मभिः ॥५६।। स्वपौरुपेति । श्रवणमननादिरूपात् स्वपौरुपादतिरिक्त नान्यत् साधना- न्तरम् ईश्वरपरिचयमुद्भावयतीति भावः ॥५६|| रागद्वपतमःक्रोधमदमात्सर्यवर्जनम् ।। विना तपो वा दानं वाक्लेश एव न वास्तवम् ।।६०॥ रागद्वषेति । न वास्तवं साधनमिति शेपः ॥६०॥ रागाधु पहते चित्त वञ्चयित्वा परं धनम् ।। यदय॑ते तस्य दानं तपो वा तच्च निष्फलम् ॥६१।। रागादीति । रागाधु पहते रागादिना कलुपिते । सति रागादौ धनार्जने परवञ्चनाद्यवश्यंभावाच् चित्तशुद्ध रेव दुर्लभत्वाद् दानादेः काम्यं फलमपि दुर्लभम् । दूरे ततो ज्ञानमोक्षप्रत्याशा ॥६१।। शणु तत् पौरुषं कीडगात्मज्ञानस्य लब्धये ।। येन शाम्यत्यशेपेण रागदपविचिका ॥६॥ शणु तदिति । स्पष्टार्थ : ॥६॥ अक्लेशवृप्या वृत्त्या वा लोकशास्त्राविरुद्धया । संतोपैश्वर्यसंपन्नो भोगगन्धं परित्यजेत् ॥६३।। .
चतुर्थो गुच्छकः १४३ अक्लेशेति । वृत्त्या जीवनसाधनसंपत्त्या । लोकशास्त्राभ्याम् अविरुद्धया संमतया । भोगगन्धं भोगवासनाम् । तदभिनिवेशमिति यावत् ॥६२।। यथा थाप्राप्तार्थसंतुष्टो यो गर्हितमुपेक्षते ॥ साधुसंगमसच्छास्त्रसेवी सद्यः स मुच्यते ॥६४॥ यथाप्राप्तेति । अर्थसंतुष्टः वित्तैषणाशून्यः । गर्हितं शास्त्रं, शिष्टेषु निन्दितम् । सद्यः तत्क्षणम्-शीघ्र वा ॥६४॥ विचारेण परिज्ञातस्वभावस्य महामतेः ।। अनुकम्प्या भवन्त्येते ब्रह्मन्द्रोपेन्द्रशंकराः ॥६॥ ( इति मुमुक्षुप्रयत्नोपदेशः) विचारेणेति । परिज्ञातस्वभावस्य-परिज्ञातः परिशीलितः स्वभावः आत्मतत्त्वं येन-तस्य । अनुकम्प्याः कृपाभाजः । उपेन्द्रो विष्णुः ॥६॥ (इति मुमुक्षुप्रयत्नोपदेशः) एष सर्वमिदं विश्वं न विश्वं चैष सर्वगः ॥ एष एको महान् देवो नहि विश्वाभिधास्ति दृक् ।।६६।। है एषेति । अस्य सर्वाधिष्ठानभावेन सर्वगतत्वमिति प्रतिपादनाय विश्वात्मत्वोक्तिरिति भावः ॥६६।। चेतनं राम ! संसारो जीव एष पशुः स्मृतः ।। अत उज्जिहते स्कारा जरामरणभीतयः ॥६७॥ चेतनमिति । चेतनम्-चेतयते चेतति वेति व्युत्पत्तिः । 'नन्दिग्रहि-' (पा० स्० ३।१।१३) इति कर्तरि ल्युः । वाङ मनःप्राणकरणग्रामानुप्रविष्टंब्रीव जीवः । स च बहिर्मुखतया विषयानेव सारतया पश्यन् परित्युच्यते । अतः अस्मादेव देहेन्द्रियविषयवामनानुसारात् तत्तद्दे हपरिग्रहे स्फाराः जरामरण- भीतयः उजिहते । उत्पूर्वाद् 'ओहाङ गतौ' इत्यतः कर्तरि लट् । अन्तः स्थिताः आविर्भवन्ति ॥६७|| स्थूल शरीरातिरिक्ततया तज्ज्ञानादेव जरामरणादिप्रत्ययः सिद्ध:-'अश- रीरं वा वसन्तं प्रियाप्रिये न स्पृशतः' इति श्रवणाद् इत्याशङ्कां परिहरति- -
१४४
चतुर्थो गुच्छकः
पशुरज्ञो ह्यमूर्तोऽपि दुःखस्यैवैप भाजनम् ।।
चेतनत्वाच्चेतनीयं मनोऽनर्थः स्वयं स्थितः ॥६८॥
पशुरिति । सर्वमविशेपेण पश्यतीति पशुः । अमूर्तस्थूल देहशून्योऽप्यसौ
न कृतार्थः । यतः अज्ञः अज्ञानवान् । चेतनीयं यन्मनः तद्र पोऽनर्थश्च स्वयं
भूत्वा स्थितः। अतो दुःखभाजनमेवैतत् । अशरीरमित्यादिश्रुत्यर्थस्तु स्थूल-सूक्ष्म-
कारण-देहत्रयरहितं प्रियाप्रिये न स्पृशतः -इत्येवंतात्पर्यकः न तु स्थूलदेहमात्र-
परः। तथात्वेऽपि स्वप्ने प्रियाप्रियदर्शनादिति भावः ॥६८।।
चेत्यनिमुक्तता या स्यादचेत्योन्मुखताऽथवा ॥
सा चास्य भरितावस्था तां ज्ञात्वा नानुशोचति ॥६६॥
चेत्यनिमुक्ततेति । मुक्तौ चेत्यनिर्मुक्ततैव प्रयोजिका । अचेत्योन्मुखता
तु.समाधौ प्रसिद्धा । इयमेवास्य भरितावस्था मुक्तावस्थेति ॥६६ ।।
अत्रार्थे श्रुतिं प्रमाणयति-
भिद्यते हृदयग्रन्थिश्छिद्यन्ते सर्वसंशयाः ।।
क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन् दृष्टे परावरे ॥७॥
।
भिद्यत इति । मूलाज्ञाननाशात् तत्कार्य-अन्तःकरणतादात्म्याध्यास-
लक्षणो हृदयग्रन्थिः भिद्यते नश्यति । तन्नाश देव तन्मूलकाः संशयादयोऽपि
नश्यन्तीत्यर्थः । परावरे-परं कारणमपि अवरं यस्मात् तत्-तथाविधे । कर्माणि-
सुखदुःखस्वभावानि । क्षोयन्ते समूल घातं विलीयन्ते ।।७।।
एवं तर्हि चित्तनिरोधलक्षणयोगेनैव चेत्योन्मुखत्वस्य रोद्ध शक्यत्वा-
ज्ज्ञानप्रयासो निरर्थकस्तत्राइ-~
तस्य चेत्योन्मुखत्वं तु चेत्यासंभवमन्तरा ।।
रोद्धन पार्यते दृश्यं चेत्यं विरमते कथम् ।।७१॥
तस्येति । चेत्यस्य दृश्यस्य असंभवज्ञानेन मूलतो वाधम् । चेत्यं कथं
वै शाम्यति विना ज्ञानमिति शेपः । तदित्थं ज्ञानमन्तरा तादृशस्वरूपसमाधि-
रेव न सिध्यतीत्यर्थः ।।७।।
यदेतच्चतनं जीवो विशीणों जन्मजङ्गले ।।
उशन्त्यात्मानमेतं ये ते मन्दाः कोविदा अपि ॥२७॥
चतुर्थो गुच्छकः
१४५
यदेतदिति । जन्मजङ्गले जन्मवने । जन्मग्रहणं शरीरसङ्घोपलक्षणार्थम् ।
शीर्णः गलितः । उशन्ति इच्छन्ति । वश कान्तौ । कान्तिरिच्छा । कर्तरि
ट् ॥७२॥
जीव एव हि संसारश्चेतना दुःखसंततिः ।।
ज्ञातेऽस्मिन् नापि विज्ञातं किंचिद् भवति सुव्रत ! ||७३।।
ज्ञायते परमात्मा चेत् सर्वा दुःखस्य संततिः ॥
प्रणश्यति विपावेशशान्ताविव विचिका ॥७४॥
जीवेति । ज्ञायत इति च । द्वावपि स्पष्टाौँ ।।७४॥
द्रष्ट्ऋदृश्यक्रमो यत्र स्थितोऽप्यस्तमयं गतः ।।
यदनाफाशमाकाशं तद्र पं परमात्मनः ।।७।।
द्रष्ट्ऋदृश्येति । अनाकाशमाकाशम्-आकाशबाधेऽप्यपरिच्छिन्नत्वेनविपु-
जत्वादाकाशम् ॥७॥
अशून्यमिव यच्छून्यं यस्मिञ्शून्यं जगत्स्थितम् ।।
सगौघे सति यच्छ्न्यं तद्र पं ब्रह्मणो विदुः ॥७६॥
अशून्यमिवेति । जगत् स्वभावशून्यमपि यत् सर्ववस्तुयाथात्म्यभूत-
स्वरूपेण पूर्णत्वाद् अणुमात्रेणापि अशून्यमिव शून्यम् असदपि जगत् स्थितम् ।
सद्भावमापन्नमित्यर्थः । सर्गौघे-सर्गलक्षणा ओघा यस्य तथाविधे अज्ञाने सति
यत्सदपि अनुपयोगाच्छून्यमिव शून्यम् ।।७६।।
तज्ज्ञातमात्मनो रूपं भवेन्नान्येन वर्त्मना ।।
जगन्नाम्नोऽस्य दृश्यस्य स्वसत्तासंभवं विना ॥७७।।
( इति जंगदादिदृश्यासत्ताप्रतिज्ञा )
तज्ज्ञातमिति । स्वसत्तासंभवं मिथ्यात्वं तन्निश्चयमिति यावत् ॥७७||
( इति जगदादिदृश्यासत्ताप्रतिज्ञा)
स्थितमेवास्तमायाति जगदृशं विचारणात् ।।
यथा स्वप्नागमे स्वप्ने ज्ञाते सत्यत्वभावनम् ॥७॥
चतुर्थो गुच्छकः स्थितमिति । यथा स्वप्नादौ स्थिते एवं स्वप्नोऽयमिति परिज्ञाने स्वप्न- सत्यत्वभावना अस्तमेति तद्वत् ॥७८।। तदिदं ज्ञायते ह्यस्मिज्ञानकोशेऽवधारिते ।। तज्जीवन्मुक्तिसाम्राज्यसौख्यं यत्रानुभूयते ॥७६।। तदिदमिति । विनेयानामभिमुखीकरणार्थ प्ररोचनावाक्यमिवेदं ब्रह्म- विषयकज्ञानप्रशंसापरम् ।।७।। बोधकनिष्ठतां यातो जाग्रत्येव सुपुप्तवत् ।। य आस्ते व्यवहतव स जीवन्मुक्त उच्यते ॥८॥ बोधैकनिष्ठतेति । यो व्यबहर्ता सन्नपि-नैव किंचित् करोमीति युक्तो मन्येत तत्त्ववित्' इति भगवदुक्तदिशा जाग्रत्यपि सुप्तवन्निर्विकार आस्ते स जीवन्मुक्तः ॥८॥ यस्य नाहंकृतो भावो यस्य युद्धिर्न लिप्यते ।। कुर्वतोऽकुर्वतो वापि सजीवन्मुक्त उच्यते ॥१॥ यस्य नाहमिति । न लिप्यते कर्तृत्वाकर्तृत्वाभिमानाभ्यामित्यर्थः ॥८१|| जीवन्मुक्तपदं त्याक्त्वा काये कालनिमीलिते ॥ विदेहमुक्ततामेति मसदस्पन्दतामिव ।।२।। तथाच- जीवन्मुक्तेति । कालेन निमीलिते अस्ते प्रारब्धक्षये सतीति यावत् । विदेह मुक्तता मुक्तिविरोपः । विदेहाद् देहविगमाद् या शुद्धा मुक्तता सा । 'ततः कालवशादेव प्रारब्धे तु क्षयं गते । वैदेही मामकी मुक्तिं याति नास्त्यत्र संशयः ॥' इति । मरुत् पवनः । अस्पन्दताम् निश्चलताम् ।।२।। यतः कालस्य कलना यतो दृश्यस्य दृश्यता ।। मानसी कल्पना येन यस्य भासा विभासनम् ।।८।। क्रियां रूपं रसं गन्धं शब्दं स्पर्श चचेतनम् ।। यद् वेत्सि तदसो देवो येन वेत्सि तदप्यसौ ॥८४।। (युग्मकम् ) ( इति परमकारणदर्शनम् ) १४७ चतुर्थो गुच्छकः यत इति क्रियामितिच । कालस्य कलनाः षड्भावविकाराः । दृश्यस्य दृश्यता, दर्शनफलव्याप्तिः । मानसी कल्पना इष्टानिष्टपरिहारविषया मनोरथ- विकल्पाः । येन निमित्तेन । क्रमाद् यदीयसच्चिदानन्दरूपता निर्वाह्या इति यावत् । तच्च त्रयम् यस्य भासा जगद्विभासनमेव नान्यत् । अयं भावः-अज्ञात- साधारणी सर्वव्याप्तिः सत्ता । अनावृतमात्रव्याप्तिः दर्शनम् । तत्र अनुकूल- वेदनीयमात्रव्याप्तिः आनन्दता इत्यवान्तरे औपाधिकवलक्षण्ये सत्यपि भारूप- व्याप्तेरेकरूपत्वात् । देहकर्मेन्द्रियोपाधौ क्रियां, ज्ञानेन्द्रियोपाधौ रूपादि, अन्तःकरणोपाधौ चेतनं प्रमातारं च यत्स्वरूपः सन् वेत्सि तत् प्रमातृनिष्कृष्टचिद्र पमसौ । येन विषयव्याप्तवृत्तिनिष्कृष्टचिद्र पेण वेत्सि तदप्यसौ देव इत्याशयः ।।८३-८४॥ ( इति परमकारणदर्शनम् ) नाशयित्वा स्वमात्मानं मनसो वृत्तिसंक्षये ॥ सद्रूपं यदनाख्येयं तद्रूपं तस्य वस्तुनः ।।८।। नाशयित्वेति । यथा समाधौ निरोधेन वृत्तिसंक्षये सति निरिन्ध- नाग्निवन् मनसः स्वमात्मानं मनःस्वरूपमपि नाशयित्वा यद् अनाख्येयं स्वप्रकाशसद्र पम् अवशिष्यते तद् इत्यर्थः ॥२५॥ पास्ति दृश्यं जगद् द्रष्टा दृश्याभावाद् विलीनवत् ।। भातीति भासनं यत् स्यात् तद् रूपं परमात्मनः ॥८६॥ नास्ति दृश्यमिति । निर्विकल्पकस्य समाधेः प्रारम्भे दृश्याभावाद् द्रष्टा प्रमातापि विलीनवद् भाति इति त्रिपुटीलयभासनं साक्षिरूपं तदित्यर्थः ।।८६। चित्प्रकाशस्य यन्मध्यं प्रकाशस्यापि खस्य वा ।। दर्शनस्य च यन्मध्यं तद् रूपं ब्रह्मणो मतम् ।।७।। चित्प्रकाशेति । यद् द्रष्टुः कोटौ अन्नमयान्ते अात्मतया प्रसृतस्य चित्प्रकाशस्य एकैककोशविवेकेन पर्यालोच्यमानस्य आनन्दमयकोशस्यापि आन्तरत्वान् मध्यम्, दृश्यकोटौ च मूर्तप्रपञ्चसारभूतस्य आदित्यात्मकप्रकाशस्य अमूर्तप्रपञ्चसारभूतस्य रवस्य, आकाशलिङ्गसमष्ट्यात्मनः अव्याकृताकाशस्य वा आन्तरत्वाद् यन्मध्यौं दर्शनस्य चाक्षुषादिवृत्तिरूपस्य च अन्तः स्फुरणरूपत्वाद्
१४८
चतुर्थो गुच्छकः
यन्मध्यम्, यथाक्रमम् आनन्दसच्चिद्र पं प्रसिद्ध तद् ब्रह्मणो रूपमित्यर्थः ।
तथाच तैत्तिरीयाणामुपनिषदि अन्नमयादीनां कोशानाम् आन्तरम् आनन्दमय-
कोशं प्रदर्श्य-तस्य प्रियमेव शिरः-मोदो दक्षिणः पक्षः प्रमोद उत्तरः पक्षः,
आनन्द आत्मा, ब्रह्म पुच्छ प्रतिष्ठेति' तस्याप्यान्तरं ब्रह्म दर्शितम् । वृहदा-
रण्यके च-द्व वाव ब्रह्मणो रूपे मूर्तं चैवामूर्त चेति' प्रस्तुत्य—'तस्य मूर्तस्यैष
रसो य एष तपति, तस्यैतस्यामूर्तस्यैप रसो य एतस्मिन् मण्डले पुरुष' इति
प्रदर्श्य-'अथात आदेशो नेति नेतीति मूर्तामूर्तारोपाधिष्ठानं तदन्तरं ब्रह्म
तन्निपेधेन दर्शितम् । 'प्रतिबोधविदितं मतम्' इति तवलकाराणामुपनिषदि
ब्रह्मण: सर्वबुद्धिवृत्या आन्तरत्वमुक्तम् ।।८७||
यतो जगदुदेतीव नित्यानुदितरूप्यपि ॥
विभिन्नवदिवाभिन्न तद्र पं परमार्थकम् ।।८।।
( इति कल्पान्तांवशिष्टपरमभावदर्शनम् )
यतो जगदुदेतीति । परमार्थकं वास्तविक्रम् । अन्यत् पूर्वमवोचामेति
नेरु पुनरायस्यते ||IT
( इति कल्पान्तावशिष्टपरभावदर्शनम् )
तुल्यस्यातुलभावस्य भावकैः किल तोलनम् ।।
अनन्वया यथैवोक्तिर्जगत्सत्ता तथैव हि ॥८६॥
तुल्यस्येति ।
तुल्यस्य उपमातुम् इष्टस्य, दृश्यस्य, उपमेयवहिर्भूत-
तुलायाः अलाभेन, उपमातुमशक्यस्य भावस्य, उपमेयकोटिप्रविष्टे: भावकैः यत
तोलनम् उपमावचनं तद् अनन्वयालंकारोदाहरणभूता यथा उक्तिस्तथैव ।
यथा-गगनं गगनाकारं सागरः सागरोपमः ।' इत्युक्तिनुपमत्वे पर्यवस्यति,
तथैव स्यात्-इति न विकल्पकल्पनादृष्टान्तः । अतो जगतः पृथक्सत्ता तथैव
यथा वन्ध्यापुत्रसत्तेति । असतः सदृष्टान्तादर्शनेऽपि असद्दृष्टान्तता न
विरुध्यते । वन्ध्यापुत्र इव खपुष्पमसदित्युक्तिदर्शनात् ||६||
आकाशे च यथा नास्ति शून्यत्वं व्यतिरेकवत् ।।
जगच ब्रह्मणि तथा रघूत्त सोपलब्धिमत् ॥३०॥
आकाश इति । व्यतिरेको भेदस्तदृत् । उपलब्धिमद् उपलभ्य-
मानमपि ॥१०॥
चतुर्थो गुच्छकः २४६ यथा पुरमित्रास्त्यन्तर्विदेव स्वप्नसंविदः ।। तथा जगदिवाभाति स्वात्मैव परमात्मनि ।।११।। ( इति परमार्थदर्शनम् ) यथा पुरमिति | स्वप्नसंविदः स्वप्नद्रष्टुरन्तर्गता वित् चैतन्यमेव पुरमिव यथा आमाति तथा परमात्मनि स्वात्मैव, जगदिव जगदाकारेण, आभाति आभासते ॥६॥ (इति परमार्थ दर्शनम् ) ब्रह्म व सर्गवद् भाति सुपुप्तं स्वप्नवद् यथा ॥ सर्वात्मकं च तत्स्थानं तत्र राम ! क्रमं शृणु ॥१२॥ 9 ब्रह्मवैति । यथा प्रतिपुरुपं सुपुप्त्यात्मरूपमेव स्वप्नवद् विवर्तते तथा ब्रह्मापीति दृष्टान्तानुसारिणीयं कल्पनेत्यर्थः । सर्वात्मकत्वं च-'आत्मा वा इदमेक एवान आसीत्' इति श्रुतौ सर्ववाचि, इदंपदसामानाधिकरण्यात् । तस्थानं सर्वसुषुप्तसमष्टिप्रलयावस्थ ब्रह्मति ||१२|| तस्थ खलु परप्रकाशस्य सत्तामात्रात्मकं यद् विश्व तदात्मनि संविदा अगृहीतात्मकमहंमर्शनपूर्व के भविष्यन्नामार्थकलनाम्यूहितरूपक स्त्रयमेव किंचिच्चत्यतामिवोपयाति । तदनु सा परसत्तैव सन्तश्चेतनो- न्मुखीचिन्नामयोग्या जायते । तदनु सान्द्रसंवेदना कलितकलनीया परं पदं त्यजन्ती जीवादिसंज्ञिता भावनामात्रसारा संसरणपरायणा वस्तुस्वभावेन सत्तामनूत्तिष्ठति । तदन्वाकाशसत्ताद्योधः ।।१३।। तस्य खल्वित्यादि । परप्रकाशस्य अनन्तप्रकाशात्मरूपस्य । सत्तामात्रात्मकम-सत्तामात्रं आत्मा परमार्थ रूपं यस्य तथाविधं संविदा अहंमर्शनपूर्वकम् अगृहीतात्मकं अहंकाराध्यासं विना, भविष्यन्नामार्थ कल- नाभ्यूहितरूपकं सर्वस्मिन् सृज्यविषये भावि नामरूपसंधानैः अभ्यूहितानि रूपाणि यस्मिन् तथाविधं सत् चेत्यतामिव गच्छति । तदनु 'सत्तामनूत्तिष्ठ- तीत्यादि-ईक्षणवृत्ति तद्विषयोपाधिभ्याम् ईश्वरजीवभावयोः प्रदर्शनम् । परसत्ता ब्रह्मसत्ता । चेतः ईक्षणात्मिका वृत्तिः तत्सहिता चेतना, तदभिव्यक्तचैत- चतुर्थो गुच्छकः न्यम् , तदुन्मुखी तत्प्रधाना सती । चिन्नामयोग्या, चेतयतीति चित् सर्वज्ञ श्वरः तन्नामयोग्या । वाक्प्रवृत्तिलभ्येति यावत् । जायते भवति । तदनु समनन्तरमेव । सान्द्रसंवेदना चिरानुवृत्या सान्द्रा घनीभूता संवेदना ईक्षणसंवेदना यस्याः तथाविधा सती । कलितकलनीया-कलितेन आत्तेन गृहीतेनवा तद्विपयकसूक्ष्म- प्रपञ्चात्मभावलक्षणपरिच्छेदेन न कलनीया । अतएव परं पदं त्यजन्ती अपरि- च्छिन्नभूमात्मभावं विस्मरणेनोज्झती। जीवादिसंज्ञिता भावि प्राणधारणोपाधिक- जीव-हिरण्यगर्भादिनामिका । संसरणपरायणा संसरणोन्मुखी । भावना- मात्रसारा-न विकारादिक्रियासारेत्यर्थः । वस्तुस्वभावेन तामिमां सत्तामेवा- नुसृत्य रज्जौ सर्प इव जीवभाव उत्तिष्ठति । तद्नु समनन्तरमेव । अस्या जीवसत्ताया आकाशसत्ताद्योघः प्रवाहः । इतरभूतावकाशदत्वाच्छून्यताप्राया उदेति । सूर्यादिसर्गोत्तरं भविष्यन्तीनां आकाशाद्यभिधानाम् आ समन्तात काशते इत्याद्यर्थ दा ||३|| इत्थंच यदुक्त ब्रह्मैव जगदाकारं भवतीति तत् सिद्धमित्याह- वीजं जगत्सु ननु पञ्चकमात्रमेय बीजं पराव्यवहितस्थितिशक्तिराद्या ।। बीजं तदेव भवतीति सदानुभूतं चिन्मात्रमेवमजमाधमतो जगच्छीः ॥४॥ ( इति जगदुत्पत्तिदर्शनम् ) बीजं जगत्स्विति । जगतः तन्मात्रपञ्चकं वोजं कारणम् । तस्य च वीजं परेण परमात्मना अव्याहता साक्षात् संवद्धा जगस्थितिहेतुर्मायाशक्तिरेव। इत्थं च तत् परमात्मतत्त्वमेव मायाशक्या वीजं भव-मायापगमे तदेव भवतीति प्रतिज्ञातार्थसिद्धिरित्यर्थः ॥६४|| (इति जगदुत्पत्तिदर्शनम ) प्रलये सुपुप्ताविव विलयेन मायाशवलब्रह्मभावं प्राप्तानां जीवोपाधीनां पुनराविर्भावक्रमं पञ्चभिः सहेतुकमुपन्यस्यति- परमे ब्रह्मणि स्फारे समे राम ! समस्थिते ।। अनुतनभस्तेजस्तमःसत्ते चिदात्मनि ।।६।।
चतुर्थो गुच्छकः
१५१
परम इति । विकारकृतवैपम्यशून्यमायाशवलत्वात् समे । समस्थिते
समे चाधिष्ठानस्थिते । अनुभूतानां नमस्तेजस्तम अादीनां या कारणात्मना
सत्ता तद्र पे चिदात्मनि ||५||
चितश्चेतयितृभावलक्षणजीवत्वस्य विपयकरणसिद्धिपूर्वकत्वात् तदध्यासं
प्रथमं दर्शयति-
पूर्व चेत्यत्वकलनं सतश्चेत्यांशचेतनात् ।।
उदेति चित्तकलनं चिति शक्तित्वचेतनात् ॥१६॥
पूर्वमिति । कलनं कल्पनम् । तत्र हेतुः सद्वस्तुनः तत्प्रथास्वभावतैव ।
एवमुत्तरत्रापि । यदेवाध्यस्यते तत्प्रथास्वभावतायाः चितिपूर्वसिद्धत्वात् सर्वत्र
निमित्तता ॥६॥
ततो जीवत्वकलनं चेत्यसंयोगचेतनात् ।।
ततोऽहंभावकलनं चेत्यैकपरतावशात् ।।१७।।
ततो जीवत्वेति । एकपरता तावन्मात्रोऽहमित्यभिमानः ||७||
ततो
बुद्धित्वकलनमहंतापरिणामनात् ॥
एतदेव मनस्त्वादि शब्दतन्मात्रकादिमत् ॥६||
ततो बुद्धित्वेति । अहंतापरिणामनात् अहंतोपचयतः । इत्थं धर्मसिद्धौ
शब्दादिविषयमात्राणां बासनात्मना स्वान्तर्गतानां स्वप्न, इव मननात् तद्वंटितं
मनोरूपं एतदेव संपद्यत इत्यर्थः ॥८
तस्य स्थूलदेहभावापत्तिम् आह-
उच्छूनादन्यतन्मात्रभावनाद् भूतरूपिणः ।।
अयमेवं महागुल्मो जगदादिर्विभाव्यते 188||
.
उच्छूनादिति । वासनात्मनां शब्दतन्मात्राणाम् अन्यैः स्पर्शादितन्मात्रैः
भावनान् मेलनात् पञ्चीकृतभावेनोच्छूनाद् आध्यात्मिकमहाभूतरूपिणः स्थूल-
देहभावापन्नान्मनस इति यावत् । महागुरमः प्रकाण्डरहितो महाद्र मः ॥६॥
१५२
चतुर्थों गुच्छकः
जगतः पञ्चकं वीजं पञ्चकस्य चिदव्ययां ॥
यद् बीजं तत् फलं विद्धि तस्माद् ब्रह्ममयं जगत् ॥१०॥
जगत इति । पञ्चकं तन्मात्राणाम् । विद्धि जानीहि ॥१०||
इत्यमेतत् पञ्चकं महाकाशे सर्गादौ चिच्छत्त्या स्वाङ्गभूतात्मेव
कल्प्यते न पुनः पारमार्थिकम् । अनेन यदपीदं जगदुच्छनतां प्रतिपद्य
वितन्यते तदप्यात्मन्याकाशात्मक सन्मयमेव । नहि क्यापि तत्सिद्ध
नाम मन्यते यदसिद्धन साध्यते । यच्च तावद्विकल्पात्मक स्वरूपं
तत्खलु कथं सत्यतामियात् । अथ चेत् पञ्चकं ब्रह्मात्मकधिया ब्रह्मास्ते
तदा प्ररूढं जगदपि ब्रह्मव । यथा खनु सर्गादाविद पञ्चकं कार्यभूतत्वे
कारणतामुपगतं तथैवेदानीमपीति किं चित्रम् । इत्थंहि न जायते किं-
चिजगज्जालं नवा लक्ष्यते, संकल्पपुरमिवासदेव ब्रह्माकाशे स्वात्मनि
जीवाकाशत्वं सदिव प्रतीयते । जीवाकाशोऽसौ स्वमेव तस्मिन् परमे-
श्वरेऽणुतेजःकणोऽस्मीति
चेतति
तदेवोच्छ नमिव
विभावयति--||१०१॥
यत्स्वयं
इत्थमेतदिति । चिच्छक्त्या चेतनप्रथनशक्त्त्या । स्वाङ्गभूतात्मा इव
स्वशरीरमिव संपन्नस्वरूपः । एतत् पञ्चकं तन्मात्रपञ्चकं कल्प्यते । अनेन
पञ्चक्रगणेन यदपीदं स्थूलं जगद् वितन्यते विस्तार्यते । आत्मनि आकाशरूप-
मिव स्वकल्पनाधिष्ठानात्मनि स्थितत्वात् सन्मयम्-न स्वत इत्यर्थः । पञ्चक
तत्कार्यस्थूलभूनपञ्चकमपि चिद् ब्रह्मैव । कारण कार्ययोरेकत्वप्रसिद्धहेतोरि-
त्यर्थः । प्ररूढं जगत् त्रिजगत्क्रमः ब्रह्मैवेति सिद्धम् । भूतत्त्वे पौर्वकालिकत्वे
स्वयम् औत्तरकालिकं स्त्रं प्रत्येवेति शेपः । किं चित्रम्-को विस्मयः । जग-
ज्जातम् । ब्रह्माकाशे महाकाशरूपे परमप्रकाशे आत्मनि जीवाकाशं सदिव
असत्सदिव प्रतोयते अनुभूयते । जीवाकाशः समष्टिजीवाकाशः-तस्मिन्
परमेश्वरे कल्पितः । विस्तृतमपि स्वम्, अणुनेजःकण:-अणुः अल्पतरः
स्फुलिङ्गवत् तेजः कणोऽस्मीति चिन्तया तथैवात्मानं चेतति अनुभवति । एत-
देवामित्य श्रयते- 'यथा अग्नेः जुद्रा बिस्कुलिङ्गा व्युञ्चरन्त्येवमेवास्मादात्मनः
सर्व एत आत्मानो व्युच्चरन्तीति' इति ॥१०१॥
असदेव सदाकारं जीवः संकल्पचन्द्रवत् ।।
चिन्तया चिन्तयन् द्रष्टऋदृश्यहरवया स्थितः ॥१०२॥
चतुर्थो गुच्छकः
एक एक द्वितां गच्छन् स्वप्ने स्वमृतियोधवत् ।।
किंचित्स्थौल्यमिवादत्ते ततस्तारकतां विदन् ॥१०३॥ (युग्मकम्)
असदेवेति । एक एवेति च । जीवः यद् भावयति तत् संकल्पचन्द्रवत्
संकल्पेन्दुर्यथा न सत् तथा असदेवेत्यर्थः । द्रष्ट ऋदृश्यभावसंबलनेन तस्योपचयं
दर्शयति-किंचिदिति । अणुतेजः कणभावमपहाय तारकता तारकसादृश्यं विदन
जानानः । किंचित् स्थौल्यम् आदत्त इव । अयमेवास्य भूतमात्रासंवलितलिङ्गा-
त्मभावः १०२-१०३||
अन्तर्भाति वहिष्ठोऽपि पर्वतो मुकुरे यथा ।
स्वरूपतारकान्तस्थो जीवोऽयं चेतयन् स्वयम्।।१०४॥
अन्तर्भातीति । स्वप्नसंकल्पयोर्बहिष्ठोऽपि विपयः तद्बाह्यरूपं परित्य-
ज्यैव अन्तर्भाति । यथा मुकुरे दर्पणे पर्वतः कूपजलप्रतिबिम्बितो देहः, यथा वा
गुहादिसंपुटगत प्रतिध्वनि वचः । तथा स्वरूपतया कल्पिततारकान्तस्थः
वासनामयदेहादिव्यवहारं चेततीत्यर्थः ।।१०४।।
एवमुच्छूनतां तस्मिन् भावयत् तेजसा कणे ॥
असत्यां सत्यसंकाशां ब्रह्मास्ते जीववाच्यवत् ।।१०।।
एवमुच्छ्नतामिति । भावयत् अध्यस्यत् । ब्रह्म आस्ते । अन्यत
सुगमम् ।।१०।।
इत्थं स जीवशब्दाथः कल्पनाक्तृप्तिकोविदः ।।
आतिवाहिकदेहात्मा चित्तरूपाम्बराकृतिः ॥१०६॥
भाविब्रह्माण्डकलना पश्यत्यनुभवत्यपि ॥
तदेतदनृतामानं स्वप्ने खोड्डयनं यथा ।।१०७॥ (युग्मकम्)
इत्थमिति । भावीति च । चित्तरूपाम्बराकृतिः चित्तरूपमम्बरमेव
स्थौल्येन स्थूल देहाकृतिः यस्य सः । स्कुलिङ्गाकारादिबाह्यविषयान्तस्वकल्पनाकार
ब्रह्म तदन्ते संस्थ' आवरणादिसंस्थायुक्तम् अण्डं ब्रह्माण्डं पश्यतीत्यर्थः।
खोड्डयनं व्योम्नि उत्पतनम् ॥१०६।।-१०७||
इत्यनुत्पन्न एवासी स्वयंभूः स्वयमुत्थितः ।।
संकल्पनगरप्रख्यं जगत् सदपि नैव सत् ॥१०॥
१५४
चतुर्थो गुच्छकः
इत्यनुत्पन्नति. । अनेन जगतः परमार्थ रूपं सिद्धान्तितम् ॥१८॥
अकृतं चानुभूतं च न सत्यं सत्यवत् स्थितम् ।।
महाकल्पे विमुक्तत्वाद् ब्रह्मादीनामसंशयम् ॥१०६।।
अकृतमिति । महाकल्पान्ते प्राक्तनानां ब्रह्मादीनां मुक्तस्वावधारणान्न
तदीयादृष्टसंस्कारेण अग्रिमजगन्निर्माणम् । यस्तू गसकः कल्पादौ हिरण्यगर्मा-
दिपदं लभते न तेन कदापि प्राग विचित्रं जगत् सृष्टमिति अनुभवाभावे
तत्संस्कारासंभवाजगतो न संस्कारजत्वमिति । तथाच स्वप्नेन्द्रजालवद् अकस्मा-
देव अविद्ययैवोद्भुतत्वान्मिथ्यात्वमेव सिध्यति । एतन नादृष्टसंस्कारसामग्री-
जन्यं जगद् भवितुमर्हतीति सिद्धान्त उन्मीलितः । ब्रह्मादीनां मुक्तिस्तु-
'यावदधिकारमवस्थितिराधिकारिकाणाम् ' (७० सू० ३।३।३२) इति वेदान्तसूत्रे
स्पष्टतया प्रतिपादिता । स्मृतावपि-
'ब्रह्मणा सह ते सर्वे संप्राप्त प्रतिसंचरे ।
परस्यान्त कृतात्मानः प्रविशन्ति परं पदम् ।।' इति ॥ ०६||
सिंहावलोकनन्यायेन प्रागुक्त सर्वमनुसंधायोपसंहरति-
आकाश एव
परमे प्रथम
प्रजेशो
नित्यं स्वयं स्फुरति शून्यतया समो यः ।।
स यातिवाहिकतनु नतु भूतरूपो
भूम्यादि तेन न सदस्ति यथा न जातम् ।।११०॥
( इति स्वयंभूत्पत्तिदर्शनम् )
-
आकाश एवेति । परमे, ब्रह्मणि, प्रजेशः स्वयंभूराकाशः शून्यमेव ।
यः समः परमात्मा स एव शून्यप्रजेशाद्यात्मना स्फुरति प्रथते । हि यस्मात्
सः प्रजेशः आतिवाहिकतनुः मनोमयशरीरः न पाञ्चभौतिकः । तेन सत्संकल्प-
मात्ररूपत्वेन । भूम्यादि न सद् अस्ति । यथा न जातं अनुत्पन्न शशशृङ्गादि
नास्ति, तद्वदित्यर्थः । तदित्थं यथा न जातं न चास्ते तथोपवर्णित-
मिति शेपः ॥११०॥
(इति स्वयंभूत्पत्तिदर्शनम् )
इत ऊर्ध्वमनक्षरमपि ब्रह्म लीलायितनिदर्शनेनाक्षरतां लम्भित
सद् दशकएठावमानमाससाद ॥१११॥
- चतुर्थो गुच्छकः १५५ इत ऊर्ध्वमिति । अनक्षरमपि अनाख्येयमपि 'यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह' इत्यादि श्रुतिसंवादात् । लीलायितनिदर्शनेन स्वोन्मीलित- सर्गाद्यनन्तप्रपञ्चजातेन अक्षरतां लम्भित 'न सोऽस्ति प्रत्ययो लोके यः शब्दानुगमाहते' इति नीत्या वागरूपतां प्रतिपद्य दशकण्ठावसानम् दशकण्ठपद- मत्र श्लिष्टं द्रष्टव्यम् । दश कण्ठाः कन्धराः यस्य तस्य कर्मज्ञानेन्द्रिय रूपस्येन्द्रियवर्गस्य तथा एतन्नाम्ना प्रसिद्धस्य रावणस्य च अवसानं विरामम् पाससाद प्रापेत्यर्थः ॥१११।। गृहे गृहे रामचरित्रचर्चा तज्ज्ञानचर्या तु निवेदितैव ॥ न चाधुना काव्यरसावकाश- स्ततोत्र मौनव्रतमाचरामः ॥११२।। - गृहे गृहे इति । रामचरित्रचर्चेत्यनेन 'रामादिवत् प्रवर्तितव्यं न रावणादिवत्' इति शास्त्रशिष्टसंमतः कर्तव्यमार्ग उन्मीलितः । ज्ञानचर्या- 'येन प्रबुद्धभावेन भुञ्जानो विषयान् स्वयम् । न याति पाशवं भावं ज्ञानचन्द्रः स कीर्तितः ॥' तथा- 'सर्व जगत् स्वदेहं वा स्वानन्दभरित स्मरेत् । युगपत् स्वामृतेनैव परानन्दमयो भवेत् ॥ 'सर्वो ममायं विभव इत्येवं परिजानतः । विश्वात्मनो विकल्पानां प्रसरेऽपि महेशता ॥' इत्येवंरूपा ॥११२॥ लोकानां मातापितृभ्यां परस्मै तस्मै भूम्ने भूरिशो मे नमस्याः ।। मर्यादानां दुष्कराणां स्थली यं सीतादारं राम इत्याहुरेकम् ॥११३॥ लोकानामिति । सीतादारम्-सीता दाराः यस्य सः तम् ॥११३।। विदन् द्विजाग्यो हि मुनित्वमीयात् तबाहुजन्मा जनकत्वमीयात् ॥
-- १५६ चतुर्थो गुच्छकः वणिक् तुलाधारसमत्वमीयाज् जनश्च शूद्रोऽपि च मुक्तिमीयात् ॥११४॥ तात श्रीसरयूप्रसादचरणस्वक्षसेवापरो मातृश्रीहरदेव्यपारकरुणापीयूपपूर्णान्तरः ।। साकेतापरभागबद्धवसतिदुर्गाप्रसादः सुधी- रास्ते तेन कृतेऽत्र रामचरिते गुच्छस्तुरीयोऽभवत् ॥११॥ इति श्रीमति रामचरिते वासिष्ठनिर्यासे वेदान्तरहस्यं नाम तृतीयो गुच्छः । * आदितश्चतुर्थः * कृतिरियं श्रीमदयोध्यापरप्रान्तवर्तिपण्डितपुरीवास्तव्यद्विवेदोपाख्याचार्य श्री सरयूप्रसादपादपद्मोपजीवनः श्रीदुर्गाप्रसादस्येति शिवम् ।
परिशिष्टम् श्लोकानुक्रमणिका श्लोकांशः * ३-७१ २-१६ ३-१२९ २-५४ ४-१०६ ४.६३ ३-१३२ ३-१८ ३-५ ४-१७ १-८ २-१ १-७२ ४-१२ ३-१७ २-४१ २-७८ २-६२ ३-५३ ४-७६ २-५ श्लोकांश: अकृतं चानुभूतंच अक्लेशवृत्त्या अकारणे कारणता अगाधे परमाम्भोधौ . अङ्ग ! भगवन् !! वसिष्ठ !!! अचेत्यचित्स्वरूपात्मा अथ कथाप्रसङ्ग अथ भगवन् ! जीवन्मुक्तस्थितिः अथ तथाभूतायां अथ विद्याविनयसम्पन्नो अद्योत्सवोऽयमृतुरेष अन्तरेण क्रियामस्य अन्तर्भाति बहिष्ठोऽपि अन्यस्त्वां चेतयति अन्यासिद्धविरुद्धादि अनल्पकल्पनातल्पे अनायासकथिन्या अनावजितचित्ताऽपि अनिलान्दोलनोद्धृत अनुभूतेर्वेदनस्य अनुरक्ताङ्गनालोल अपर्याप्तं हि वालत्वं अपि पोरुपमादेयं अमन्दसौगन्ध्यतरङ्गिताभिः अयमाकाशभूतादि अयि रघुधुरन्धर । अयंम देव इत्येव अयःशंकुसमाः सर्वे अलमन्तनमायव २-१२ २-१३० २-११५ ४-१०४ ३-६६ ३-१२८ २-५३ २-६७ २-६४ २-११८ ३-१४१ २-१२७ २-६६ ३-११६ १-२१ अव्युत्पन्नमना अवलोक्य दूरादेव अवस्तु पूर्वापरयो अवान्तरे निपाताय अवाप्य परमोच्छायं अविद्या संसृतिबन्धो अविद्य व ह्यनन्तपा अविश्रान्तमना अशक्तिरापदस्तृष्णा प्रश्रान्तजलसंसर्गा अशुभेषु समाविष्ट अशून्यमिव अशेषवासना अस्ति स्वस्तिमान् अस्य विश्वम्भरा अस्योड्डामरचेष्टस्य असत्यं सत्यसङ्काश असदेव सदाकारं अहङ्कारेऽम्बुदेशान्ते अहमित्यस्ति ग्रहह ! किमेवं अहह ! लुलति अहो ! अहङ्क्ते अहो ! प्रतिपदं अत्रान्तरे दशमुग्न अनान्तरे भास्वत्प्रकाशा अनानघनमहाशा १-१८ २-११२ २-२११ २-८६ ४-१०२ २-४८ २-४६ २-१४ २-१६२ २-४७ २.८७ १-५२ ४.४५ २-१८ ४-५८ २.८ २-२७ अाकाश एव परमे ४-११० • ४-६० २-५४ ग्रामायो न यथा * प्रायोऽको गुच्छकसंख्यामपरश्च श्लोकसंध्या सूचयति ।
[ २ ] १-३७ ३-१०८ ३-8 २-७५ उद्यन्नीलाश्म उद्यत्सच्छास्त्रसत्सङ्ग उदारकर्माप्यनुदार उपमानोपमेयानां उपमेयस्योपमानादेः ३.३७ १-२२ ३-१२४ ३-१३३ प्रात्मनात्मनि पातिवाहिक आमूलचूड प्रायताऽनन्त आयुरत्यन्ततरलं आयुर्वायुविघट्टिता आलस्यं यदि आश्वस्तान्त:करणो प्राशाविलास पाप वा पौरुपं उपेक्षते गतं वस्तु ३-१०४ २-६७ २-१२२ २-१५६ ३-३८ ३-१६ ३-१०६ ३-११८ 16 कविस्तिर्यगारूढ २-७४ ऋत अात्मा परं ब्रह्म ४-६ ४-१०३ ३-१४० ३ इत्थमन्युत्थिता इत्यमुत्पन्न इत्यमेतत् इत्यं कर्मस्थ इत्यं स जीवशव्दार्थः इत्युक्तवत्सु १-५ ३-११६ इत ऊध्र्व ३-७१ ३-८० ४-२६ ए एक एव द्वितां गच्छन् एकांशेनोपमानाना एके मान्यजुषः एकैकोऽपि एकोऽपि तात्त्विकदृशा एतां दृष्टिमवष्टभ्य एते सेव्याः एवमिह एवमुच्छूनतां एवं कालादि एवं पुरुपकारेण एवं मृता म्रियन्ते च एवं विमशतो एवं सति एवं सर्वमिदं एप वासनया इतश्चान्यत् इतस्ततश्चोपनता इति पृप्टो मुनीन्द्र गण इति मे दोपहष्ट्यैव इदमस्मात् उदानीं केवलीभाव इदानीमयोच्या इदानीं स्वच्छया इदं प्रमाजितं उयं श्रीः पदमेकत्र एवं हि चेतना पह. पायमहारण्ये रहापि भासते २-१५७ ४-१०८ ४-१०१ ३-६४ ४-१०६ १-६० ४.१११ २-१५१ २-१४० २-२४ २-१५२ ४-४१ ३-४ १-२६ २-१५४ ४-१९ २-३४ २-७२ २-४५ २.१०४ ४-१०५ २-१२० ३-६६ ३-१२७ ४-६६ २-६ - १-७१ ४-८४ ई २-५२ यन्प्रेरिती कृतरत्नाकगोल्लासो क्रियारूपं कोडीकृत क्रोधानलयवथित गज्जनक्षोदमलिना नयममो कलाकलातायान्निता १-५८ ४-६४ १-३४ उमादपनगा मोना [ ३ ] कश्चिन्माँ प्रेरयत्येव ४-१८ ४-१०० ४-१६ .३-४६ २-१६० २-६४ कां दृष्टि कायपल्वलमत्स्यानां कारणं त्वविचारोत्थं कालो जगन्ति कालः कवलना जगत्प्रतिफलत्येव जगतः पञ्चक जगदृश्यं तु जडाजडपरिज्ञानं जन्ममृत्युरुजाक्लेश जन्मावलिवरत्राया जनः कामारूढो जरातुपारव्यथितां जाग्रज्जरासुधादीप्तं जागतस्य जीव एव हि जीवन्मुक्तपदं जीवन्मुक्तिश्रिया ३-१४५ २-१०५ २-१२१ २-१४४ ३-३६ २-२६ २-२३ १-२३ २-१२ २-६३ ३-१०५ १-४६ ३-६६ ३-७५ २-१५३ २-१४६ २-१३३ २-६६ २-२ कास्ता दृशो किंचित्कान्तान्नपानादि किनामेदं किनिष्ठाः किमियता किरातेनेव कामेन कुटिला कोमलस्पर्शा कोऽहं कथमयं कौशल्या तं ४-७३ ४-८२ २-११ त १-५४ २-१३४ ३-११४ ग ४-११२ ४-७७ ३-८७ गृहे-गृहे गच्छता तिष्ठता गुणागुणानपश्यन्ती गुगरापूर्यते २-३५ २-७१ २-१०८ २-१६५ ३-८६ ४-६ घटस्य पटता २-१५० ४-६७ २-४० २-१०६ ४-३३ त्वं शासकः तृष्णासरित् त एते नरकाग्नीनां तज्ज्ञातमात्मनो रूपं तडित्सु गरदभ्रेषु तत्कालमिह तत्समस्तसुखासार तत्स्वयं स्वैरमेवाशु ततो जीवत्त्वकलनं ततो बुद्धित्त्वकलनं ततो वैतानाद् ततः पक्वकषायेण ततश्च यथावसरं तत. स्तिमितगम्भीरं तत: सजीवशव्दार्थ तदतुच्छमनायास तददोऽन्योन्यसङ्घर्पो तदन्तरन्ये तदन्वनुदिन तदनु मुनिसुनासीरो तदनु समाधुसंलापं तदिदं भगवन् ! ब्रूहि ३-७२ १-४८ ४-५ ४-८७ चलत्पल्लवकोणाग्न चारयंश्चारहस्तेन चित्तमात्रशरीरोऽयं चित्प्रकाशस्य यन्मध्यं चिद्वयोम केवलमनन्तमनादि चिन्तानां चलवृत्तीनां चेतनं राम ! 'संसारो चेत्यनिर्मुक्तता चैत्रशुक्ले नवम्यां ४-३० ४-८ २-८५ ४-६७ ४-६६ २-१५८ २-११६ ३-१५ २-१३ १-६५ ज ज्वलतीव जगज्जीर्णकुटीकीर्णान् जगत्त्वमिह २-१२५ २-१०७ ४-१४ १-१७ २-१६४ २-३१ THAN [ ४ ] ४-८६ ३-४२ ३-७४ १-८० द्वौ हुडाविव दन्तरिवाभ्रमातङ्गो दुःखेषु दूरास्तविपाद दुष्प्रेक्ष्यं दुरवस्थानं दैवमेवेहचेत् दोपः शाम्यत्यसन्देहं २-१६१ १-१ २-१३५ ३-७६ २-१३६ २-१०१ ३-५७ ३.३३ ४.४४ ध तदिदं जायते ह्यस्मिन् तदेकानमना राम ! तदेतदुच्यता तदोपदार्थस्य तनूतरिस्तैजसतन्तु तपोदानं तथा तस्मादिमां तस्माद् यदीदं तस्य खलु परप्रकाशस्य तस्य चेत्योन्मुखत्त्वं तत्र तमर्थ तत्र पुण्येप्वरण्येपु तत्रातिसक्तियोगेन तातश्रीसरयूप्रसाद तातश्रीसरयूप्रमाद धूमिना मत्सरौघेण २-५५ ४-२३ ४.६३ ४-७१ २.१४४ २-७३ ३-१३५ ३-५८ ४-२२ १-१४ १-११ ३-१३ १-७५ २-१६७ ३-१५० ४-११५ १-६३ १-४१ ३-५५ ४-३६ ३-२१ ३-१६ ३-३४ ३-८२ ४-५७ ता नरेंद्रदयिता तामध्युबास तावच्छीतमृदुस्पों तावद् विचारयेद् ताश्च चिद्व्योमरूपिण्यो तारकासुमनोन तियंटमानुपदेवेषु तुल्यस्यातुलभावस्य तनामूर्तस्य २-३६ ३-१३६ ४-३४ २.११६ ३-८ नृत्यनितान्तरागीव न किंचिदपि दृश्येऽस्मिन् न कुताकिकतामेत्य न च नि:स्पन्दता लोके न च पापागता न चाकृति न च स्पन्दो न वाह्ये नापि हृदये न बोधरूपयोर्भेदः न भूम्यादिमहाभूत न यातव्यमनुद्योगः न शोचन्ति न ह्येप दूरे नाभ्याशे नहि केनापि नानारसमयी नालन्धमेप्यते नाविद्वान्न शठो नागयित्त्वा स्वमात्मानं नास्ति दृश्यं जगद् नास्य कायो नित्यं हि साधुसम्पर्काद् निराकुर्वन् घनाकार निरापायं निरातङ्क निर्वागामानं नीगगामिछानसन्देहा नेदं नेदमिति २-२१ ४-८९ २-८६ ३-११० १-४४ ४-८५ ३-६० ४-८६ दृश्यात्यन्ना दृश्यं नास्तीतिबोधेन दृष्टान्तबुद्धादेकात्म ঘৃনালাম दृष्टान्लेग चिना राम! पदीयोगप्टिवायु २-३ २-४ ३-१३७ ३-१३४ ३-१२२ २-१०० ४-२८ ३-७८ २-४६ ३-८४ ४-३५ ३-११३ ४-१५ - . प्रयास प्रोटनप्राशोमो लिन्द्रियाण्यानु a पृथक् बुद्धिरन्योऽयः [ ५ ] फ ४-५६ ३-३५ फुल्लद्वल्लीमतल्ली १-३८ व प्रकृतिव्रतती प्रत्यहं प्रत्यवेक्षेत प्रत्यक्षमानमुत्सृज्य प्रतिविम्बघनाज्ञानं प्रतिक्षणविपर्यास प्रदीपहेतिविव प्रलीनारोहसंतानं प्रवृत्तिरेवं ३-३२ २-८० २-१४८ २-१४१ ४-२४ ब्रह्मत्त्वमापादन ब्रह्मैव सर्गवद् ब्रह्मोपदेशे बद्धास्था ये शरीरेषु वन्धोऽयं दृश्यसद्भावाद् बाल्याक्रीडमतिक्रम्य बाल्ये गते बुध्द्वापि शुद्धया ३-२८ १-७ ३-३१ १-२ ४-६२ ३-१२५ २-७० ४-२ २-८४ २-१३२ ३-६३ ४-६४ प्रसह्य सद्यो ३-२५ प्राक्तनः पुरुपार्थो प्राक्तनाद्यतने प्रागकारणमेवाणु प्राप्तमेतत् पदं प्राज्ञश्चेतनमात्रत्त्वं प्राज्ञाः कृतज्ञाः प्रियासुभि बीजं जगत्सु बीजं धर्मद्रुमस्य १-३ ४-८० ३-१४४ ३८५ ३-६८ २-३७ २-१३६ १-७४ २-६५ बोधकनिष्ठतां पठन् द्विजो ३-६७ ४-२६ ३-६ ४-३६ ४-६५ ४-४८ पदंकरोत्यलंध्येऽपि परमार्कप्रकाशान्त परमे ब्रह्मणि स्फारे परिष्कृतानेगरागै परोपकारकारिण्या परं जगति परं पौरुषमाश्रित्य पर्यायसंक्रान्त पशुरज्ञो पादपा अपि पुनश्च विनयशीलेन पुनस्तत्र व पुत्र ! प्राप्तविवेकोसि पुत्रस्य तादृशं पुंजातधर्मविधुरोऽपि पूर्णे पूर्ण पूर्व चेत्यत्त्वकलनं पौरपेण कृतं पौरुषेण प्रयत्न २-६१ २-१२८ ४-११ ३-३० २-१३१ ४-६८ २-४३ भगवन् ! अयं प्राक्तनो भगवन् ! कृतान्त भगवन् ! किं रूपं भगवन् ! नन्वेवं भगवन् भवता भगवन् ! यदि भगवन् यल्लोकेषु भगवन् ! सच्चेन्नदं दृश्य भज्यते नावभग्नोऽपि भारो विवेकिनः भावि ब्रह्माण्ड भिद्यते हृदयग्रन्थि भिक्षुको मङ्गले भूमण्डले भूमयो वहिरन्तश्च भूयो भूयोऽपि २-१७ ४-३१ ३.६१ ४-४२ २-११० २-४२ ४-१०७ १-५१ ४-७० १-६७ २-२१ २-१६ १-५६ ३-४३ १-५६ १-३२ २-१२६ १-६४ ४-२५ २-५१ ४-४७ भेजिरेथ तनुतः ४-६६ ३-४१ भो एवं किलाख्यायते भोगदूर्वाङ्कुराकांक्षी भोगवासनया वन्धः ३-२७ ३-३ म ४-३७ यदर्थप्रतिमानं यदा हि परमां २-८८ १-४० ३-११२ यदिदं दृश्यते ४-४६ ४-४० ४.४३ ४-७२ ३-६५ २-२८ यदि स्याज्जगदादीदं यदेतच्चेतनं यदेतद् दृश्यते यन्न शक्नोमि यस्मिरच ४.४ ३-२१ ३.४४ ४-४४ मज्जन्नागरनायिका मतेविकासनं मध्ये यदेतदर्थस्य मनश्चित्तं मनसा जगदाभोगि मनसा साट्यते यश्चे मनो दृश्यमयं मनो मननविक्षुब्धं मनो हरस्याप्यति मनः प्रकृत्यैव मनः प्रशमनोद्भूतं मरुतीव रजः महाप्रलयविस्फूर्ती मा निपाद ! मिहिका गुणपद्मपु यस्य च १.४५ १-४६ ४-८१ २-५० २-१४३ २-८२ ३-८८ २-६१ ४-५१ १-१२ २-४४ यस्य नाहंकृतो यस्याश्चोत्तर यस्योजस्तपन: यस्यां च यत्र च विविक्त १-४३ १-३३ १-२० १-१६ १-३६ यत्र पराग मुखं गुहा १-२७ मूढमानसरूढाना मुने ! करुणावतस्तव मोहयन्ती मनोवृत्ति मोक्षद्वारे २-१५ ३-१०१ १-१६ २-३२ ३-७४ १-३१ ३-६२ यत्र प्रासाद याक्रान्तापि यो भाति या मनोवासना यावन्न मनसो या विचार युक्तियुक्तमुपादेयं युज्यते वेप्टनं येनान्वभाषि येशुद्धवासना २-५६ ३-१०० ३.१२० २-३६ ४-३ ३-२६ ४-८८ १-४२ २-१० १-२४ य एवोत्पद्यते यत्नवद्भिर्दढाभ्यासैः यतो जगदुदेतीव यतो ब्रह्मादयो यतः कालस्य यथा कल्पं यथा पुरमिवास्त्यन्त यथा प्रयत्नभू येत यथाप्राप्तार्थ यथास्थित यथासमय यथासंवेदनं यथा हि हेम्नः यद्वारानो हि ४-५३ ४-८३ १-६६ ४-६१ ३-३६, ४-६४ येपां दर्शनमागु ये सदुद्योगमुसृज्य यैर्य राघव योऽयो मध्ये यो यो नामात्र योऽस्मत्तातस्य यः प्लावयति ३-१२३ ४-५४ ३-१२६ ३-१२१ ४-५५ ४-५२. ३-७३ १-४७ यः पुमान् यः समः सर्वभूतेषु ३-६२ ३-५२ ४-१० ३-६३ रागद्वेपतमः ४-६० [ ७ ] ४-६१ रागाद्युपहिते राजपुत्र रामैष केवली रोषरोदन २-२२ ३-१०३ २-७६ विष्वग् विश्वेषु वेदनामात्र वैवस्वतस्य २-११३ ४-२८ १-१० श ल शृणु तत् पौरुषं २-७७ शक्तस्य २-६३ २-३३ लब्ध्वापि ललना विपुला लक्ष्मीविशङ्कटोल्लास लीलालोल लोकानां लोकालोकाचल लोकोऽभिलषिता शक्तिवति शकुनिशोकावेशेन शमममृत ४-६२ ३-४० ३-१८ १-१३ ३-६५ ३-६४ ३-६१ ३-१३५ ३-६६ ३-२४ १-२८ ४-११३ २-११७ २-१२३ शमसम्पन्न ३-७ शमामृत शान्ति श्रेयः शास्त्रावबोध शास्त्रोपदिष्ट शीयां शुभाशुभाभ्यां शून्यमाकीर्णतां २-६८ २-६८ ४-३८ ४-१ ३-७० स ४-७८ ४-५० वर्तमानाश्च वल्लकीकामगीतानां वस्तुतो मनसो वाग्भाभि वाञ्छन्नपि वातान्दोलित वापीषु वासनाजाल वासना द्विविधा विकल्पकल्पना विकल्पकल्पिता विचारवान् विचारशम विचाराद् वदते विचारेण विदन् द्विजाग्र्यो २-६० १-२५ १-३५ २-१५५ २-७ २-१०२ २-८३ ३-१४७ ३-११७ ३-६७ ४-६५ २-१६६ ३-१४६ ४-११४ १-४ स्थितमेवास्त स्फुरति गच्छति स्फुरन्मरन्द स्वकर्मफलसंसिद्धी स्वच्छं दीव्यन्ति स्वप्नसंकल्पना स्वप्नसंवित्ति स्वप्नाभत्त्वं स्वपौरुपप्रयत्नेन स्वयत्नमात्र स्वयमेव विचारस्तु स्वार्थप्रापक स एव संवित् सकलवारण १-६ ३-५६ ३-८३ ३-१३० ३-१२ ३-१३१ ४-५४ ३-१४८ ३-१४६ ३-४७ ३.१४२ ३-४६ ३-११ " विद्रारोव विपर्ययमिमा विरञ्चिमूल विशद्विपादा विशिष्टांश २.१४७ २-१०६ २-१३७ ३-१३६ मकल्पकल्पना सच्छास्वतः स तथाभत एवात्मा सतां कमिदास्थान ३-५४ ४-५ २-१०३ [ ८ ] सोऽपि च प्ररूढ़मानस सोऽपि दरिद्रो सोऽपि श्रवणसमकालमेव सौहादहृद्ये संतोपमुदिता प्रज्ञा संतोषः परमो लाभ: संतोपैश्वयंसुखिनां संभृष्टवीजसंस्थानां संवित्स्पन्दो मन:स्पन्द संसारसंरम्भकुचक्रि २-२० १-६२ २-१५ ३.६० ३-१०७ ३-११५ ३-१०६ २-8 ३-५१ २-१४२ ho सति दृश्ये कुतो सदाचारपरो भूत्त्वा सदेहत्त्वे सदेहावा समूलवातं सर्वमेव हि संसारे सर्वत्र पापारणमया सर्वारम्भसमारूढाः सर्वासां भूतवृत्तीनां सर्वेषामेव सत्त्वानां सरस्वतीन्दिराधौते सविकारा हृद्यगन्धा स समापितमहामख स सङ्कल्पविकल्पाद्यैः सादरं पाद्याासन सा कर्कटलग्ने साम्प्रतमस्मिन् लोके सुखराकाप्रभोद्भासि सुखावबोध सुदृष्टिदीपिकावात्या सुधांशुशोभा सुलभो दुर्जनाश्लेपो सुपुप्तान्त इवैतस्मिन् ४-२० २-२५ ३-२० ३-२२ २.१३८ २-२३ २-१४५ २-१५६ ४-३२ २-८१ १-७३ २-६० १-५० ३-१४३ १-१५ १-६८ १-६ २-६९ ३.७७ २-३८ १-२६ २-२६ ४-२१ १-५७ हृत्कन्दराश्रयिरिण हृत्कुशेशयकोशेपु ३-८६ २-५८ क्षणाज्जगन्ति क्षरणं ध्यानं क्षरणं ज्ञानं क्षणं विपत् क्षणं संपत् २-५७ २-१४६ गैलोक्यनायक १.५३ IPE ज्ञातज्ञेयस्य ३-२ ४-७४ ज्ञायते परमात्मा * *
No text on this page.