Adarsh Library, Jaipur

Ganga Maiya Vol I

Gupta Bherav Prasad · 2011/03

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गजकमल कथा माहित्य- गंगा मैया Geeta Buunt duursh liviel, vditoR. भैरवप्रसाद गुप्त राजकमल प्रकाशन प्राइवेट लिः दिल्ली बम्बई इलाहाबाद पटना

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गजकमल कथा माहित्य-५
गंगा मैया
Geeta Bhusan.
AttaishNT...JHIB.
भैरवप्रसाद गुप्त
.
राजकगल
प्रकाशन प्राइवेट लिः
दिल्ली बम्बई इलाहाबाद पटना

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एक उस दिन सुबह गोपीचन्द की विधवा भाभी पर से लापता हो गई, तो टोले मुहल्ले के लोगों ने मिलकर यही त किया कि यह बात अपनों में ही दवा दी जाए; किसी को कानों-कान राबर न हो। उन लोगो ने ऐसा किया भी, लेकिन जाने की क्या हुया कि गोपीचन्द के दरवाजे पर हलके का दारोगा एक पुलिस और चौकीदार के साथ नपुने फुलाये, प्रांखों में रोप-भरे पा धमका। उस वक्त उन लोगों की हालत कुछ वैसी ही हो गई, जैसी एक चोर को सेंप पर ही पकड़े जाने पर होती है। दारोगा ने तीमी दृष्टि से इकट्टे हुए मुहल्ले के लोगों को देखकर, एक ताव साकर पैतरा बदला और पुलिस की ओर इशारा करके गरज- कर बोला, "मबके हाथों में हयकहियां कस दो ।" फिर चौकीदार की पोर मुडकर कहा, "तुम जरा मुखिया को तो सबर कर दो ।" कहकर वह प्राग उगलती प्रांतों से एक चार लोगों को प्रोर देखकर चारपाई पर धम्म गे बैठ गया । उस वक्त उसकी डक-सी उठी मूंछे कार रही थीं। लोगों को जैसे काठ मार गया हो। सवन्य-सब सिर झुकाये हुए काठ के पुतली की तरह जहाँ-के-तहां सड़े रहे। किसी के फण्ठ से वोन न फुटा । फुटता भी कसे ? पुलिस ने बारी-बारी से सबके हाथों में य- कडियो पसकर, उन्हें दारोगा ये मामने लाकर जमीन पर बैठा दिया ।

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एक . उस दिन सुबह गोपीचन्द की विधवा भाभी घर से लापता हो गई, तो टोले-मुहल्ले के लोगों ने मिलकर यही त किया कि यह बात अपनों में ही दवा दी जाए; किसी को कानो-कान खबर न हो । उन लोगों ने ऐसा किया भी, लेकिन जाने कसे क्या हुआ कि गोपीचन्द के दरवाजे पर हलके का दारोगा एक पुलिस और चौकीदार के साथ नथुने फुलाये, प्रायों में रोप-भरे प्रा धमका। उस वक्त उन लोगों की हालत कुछ वैसी ही हो गई, जैसी एक चोर की संप पर ही पकड़े जाने पर होती है। दारोगा ने तीयो दृष्टि से इकट्ठ हुए मुहल्ले के लोगों को देखकर, एक ताव खाकर पतरा वदला और पुलिस की ओर इशारा करके गरज- कर बोला, "सबके हाथो में हथकडियां कस दो ।" फिर चौकीदार की पोर मुड़कर कहा, "तुम जरा मुखिया को तो सबर कर दो ।" कहकर बह् प्राग उगलती प्रांखों से एक वार लोगों की ओर देखकर चारपाई पर धम्म से बैठ गया। उस वक्त उसकी डंक-सी उठी मूंछे कांप रही थीं। लोगों को जैसे काठ मार गया हो। सब-के-सब सिर झुकाये हुए काठ के पुतलों की तरह जहाँ-के-तहां खड़े रहे। किसी के कण्ठ से बोल न फूटा । फटता भी कसे ? पुलिस ने बारी-बारी से सबके हाथों में हय. कड़ियां फसकर, उन्हें दारोगा के सामने लाकर जमीन पर बैठा दिया ।

गांव के लोगों की भीड़ वहाँ जमा हो गई । गोपीचन्द की बूढ़ी मां, जो अब तक मसलहतन् चुप्पी साधे हुए थी, दरवाजे पर ही बैठकर जोर-जोर से चीखकर रो पड़ी । पता नहीं कहां से उसके दिल में अपनी विधवा बहू के लिए अचानक मोह-माया उमड़ पड़ी । गोपीचन्द का बूढा बाप, जो बरसों से लगातार गठिया का रोगी होने के कारण चलने- फिरने से कतई मजबूर होकर पोसारे के एक कोने में पड़ा-पड़ा कराहा करता था, बाहर का होहल्ला और औरत की रुलाई सुनकर उठ बैठा और खांसने-खंखारने लगा, कि कोई उस अपाहिज के पास भी आकर बता जाए कि आखिर वात क्या है। गोपीचन्द गांव का एक मातवर किसान था। भगवान् ने उसे शरीर भी खूब दिया था। तीस साल का वह हैकल जवान अपने सामने किसी को कुछ समझता न था। यही वजह थी कि इतना कुछ होने पर भी जमा हुई भीड़ में से कोई उसके खिलाफ कुछ कहने की हिम्मत न कर रहा था। उसे हथकड़ी पहने, सिर झुकाये, चुपचाप बैठ देखकर लोगों को पाश्चर्य हो रहा था कि क्यों नहीं वहीं कुछ बोल रहा है। आखिर इसमें उसका दीप ही क्या हो सकता है ? किसी विधवा के लिए रजपूतों के इस गांव में यह कोई नयी बात तो है नहीं। कितनी ही विधवाओं के नाम उनके होठों पर हैं, जो या तो पतित होकर मुंह काला कर गई । या किसी दिन लापता हो गई, या किसी कुएं-तालाब की भेंट चढ़ गई। लेकिन जो भी हो, वह घर की बहू थी, इज्ज़त थी; इस तरह लापता होकर उसने कुल की मान-मर्यादा पर तो बट्टा लगा ही दिया। शायद इनी लज्जा के दुख के कारण वह इस तरह चुप है। होना भी चाहिए, इज्ज़तदार आदमी जो ठहरा ! साधारण गरीब आदमियों से उलझना पुलिस वाले नापसन्द करते हैं। बहुत हुना, तो इस तरह की वारदातों पर एकाध थप्पड़ लगा दिया, कुछ डांट-फटकारं दिया, या गाली-गुप्ता की एक बौछार छोड़ दी। वे जानते हैं कि उनसे उलझना अपना वक्त वरवाद करना । ६ . 1. M.1.1.us है। हाथ तो कुछ लगेगा नहीं . पर क्यों ले ? जान-बूझवार साधारण-ने-साधारण वहाने पर भी उलझना तो उन्हें पैसे वाले दज्जतदारां से पसन्द है । दारोगाजी ने गोपीनन्द के इम मामले में जो इतनी फुरती, परेशानी और कर्तव्यपरायणता का परि- चय दिया, तो उन्हे किमी कुत्ते ने तो काटा नहीं था ! मुखिया के आते ही दारोगा प्राग के भभूके की तरह फट पड़ा। फिर उसने क्या-क्या कहा, कमी-कमी अाय दिखायी, क्या-क्या पैतरे बदले और क्या-कुछ कर डालने की धमकियां नहीं दी, बल्कि कर दिखाने के फतवे भी दे डाले, इसका कोई हिसाव नहीं । मुखिया होठो ही में मुस्कराया, फिर गम्भीर होकर उमने वह सव पूरा कर डाला जो दारोगा ने भूल से अधूरा छोड़ दिया था। फिर गोपीचन्द और उसके मुहल्ले के अपराधी लोगो को कुछ खरी-खोटी मुनाकर पाप ही उनका वकील भी बन गया और उनकी पोर से माफी मांगने के माय-साय कुछ पान. फूल भेंट करने की बात चलाकर नहा, "दारोगाजी, इस गोपीचन्द ने नो एक बार जेल की हवा खाकर भी जैसे कुछ न सोखा । यह फिर जेल जाएगा, दारोगाजी, आखिर हम कब तक इसे बचाये रखेंगे? इसे यह भी मालूम नहीं कि एक बार दाग लग जाने के बाद फिर गवाही-हा- दत को भी जरूरत नहीं रह जातो।" फिर दूमरे लोगो को प्रोर हाय उठाकर कहा, "और इनको मैं कहता हूँ कि इसके साथ-साथ इन्हें भी बड़े घर की मर का शौक चर्राया है ?" इस बीच दारोगा अपना नया दांव फेंकने के लिए अपनी मुद्रा उसके अनुकूल बनाने में काफी सचेप्ट रहा । मुखिया के चुप होते ही बरस पडा, "नहीं साहब, नहीं । ऐसी-बसी कोई बात होती तो कोई बात न पी। मगर यह संगीन मामला है । पाखिर मुझे भी तो किमी के सामने जवाबदेह होना पड़ता है," कहकर वह ऐंठ गया। मुखिया समझ गया। 'सग जाने सग ही के भाखा'। हाथ बढ़ाकर उमने दारोगा का हाथ पकड़ा और नसे लेकर एक पोर हो गया। ७ को गांव के लोगों की भीड़ वहां जमा हो गई । गोपीचन्द की बूढ़ी मां, जो अब तक मसलहतन् चुपी साधे हुए थी, दरवाजे पर ही बैठकर जोर-जोर से चीखकर रो पड़ी। पता नहीं कहां से उसके दिल में अपनी विधवा बहू के लिए अचानक मोह-माया उमड़ पड़ी । गोपीचन्द का बूढ़ा बाप, जो बरसों से लगातार गठिया का रोगी होने के कारण चलने- फिरने से कतई मजबूर होकर प्रोसारे के एक कोने में पड़ा-पड़ा कराहा करता था, बाहर का होहल्ला और औरत की रुलाई सुनकर उठ बैठा और खांसने-खंखारने लगा, कि कोई उस अपाहिज के पास भी आकर बता जाए कि आखिर बात क्या है। गोपीचन्द गांव का एक मातवर किसान था। भगवान् ने उसे शरीर भी खूब दिया था। तीस साल का वह हैकल जवान अपने सामने किती कुछ समझता न था। यही वजह थी कि इतना कुछ होने पर भी जमा हुई भीड़ में से कोई उसके खिलाफ कुछ कहने की हिम्मत न कर रहा था। उसे पकड़ी पहने, सिर झुकाये, चुपचाप बैठ देखकर लोगों को आश्चर्य हो रहा था कि क्यों नहीं वही कुछ बोल रहा है । आखिर इसमें उसका दोप ही क्या हो सकता है ? किसी विधवा के लिए रजपूतों के इस गांव में यह कोई नयी बात तो है नहीं। कितनी ही विधवानों के नाम उनके होंठों पर हैं, जो या तो पतित होकर मुंह काला कर गई । या किसी दिन लापता हो गई, या किसी कुएं-तालाव को भेंट चढ़ गई। लेकिन जो भी हो, वह घर की बहू थी, इज्जत थी; इस तरह लापता होकर उसने कुल की मान-मर्यादा पर तो बट्टा लगा ही दिया। शायद इनी लज्जा के दुख के कारण वह इस तरह चुग है। होना भी चाहिए, इज्जतदार यादमी जो ठहरा साधारण गरीब आदमियों से उलझना पुलिस वाले नापसन्द करते हैं। बहुत हुआ, तो इस तरह की वारदातों पर एकाध थप्पड़ लगा दिया, कुछ डांट-फटकार दिया, या गाली-गुफ्ता की एक बौछार छोड़ दी। वे जानते हैं कि उनसे उलझना अपना वक्त वरवाद करना . ६ . है; हाथ तो कुछ लगेगा नहीं । फिर गुनाह-बैलज्जत का ग्राजाप सिर पर क्यो ले ? जान-बूझकर साधारण-से-माधारण वहाने पर भी उलझना तो उन्हे पैसे वाले इज्जतदारी मे पसन्द है । दारोगाजी ने गोपीनन्द के इम मामले में जो इतनी फुरती, परेशानी और कर्तव्यपरायणता का परि- चय दिया, तो उन्हें किसी कुत्ते ने तो काटा नहीं था ! मुखिया के आते ही दारोगा प्राग के भभूके की तरह फट पड़ा। फिर उसने क्या-क्या कहा, कैसी-कमी अाम्ब दिखायी, क्या-क्या पतरे बदले और क्या-कुछ कर डालने की धमकियां नहीं दी, बल्कि कर दिखाने के फतवे भी दे डाले, इसका कोई हिसाव नहीं । मुखिया होठी ही में मुस्कराया, फिर गम्भीर होकर उसने वह सब पूरा कर टाला जो दारोगा ने भूल से अधूरा छोड़ दिया था। फिर गोपीचन्द और उसके मुहल्ले के अपराधी लोगों को कुछ खरी-खोटी मुनाफर प्राप ही उनका वकील भी बन गया और उनकी पोर गे माफी मांगने के माथ-साय कुछ पान. फूल भेंट करने की बात चलाकर कहा, "दारोगाजी, इस गोपीनन्द ने तो एक बार जेल की हवा खाकर भी जसे कुछ न सोखा । यह फिर जैल जाएगा, दारोगाजी, पासिर हम कब तक इसे बचाये रखेंगे? इसे यह भी मालूम नहीं कि एक बार दाग लग जाने के बाद फिर गवाही-दाहा- दत की भी जरूरत नहीं रह जाती।" फिर दूमरे लोगो को पोर हाय उठाकर कहा, "और इनको मैं कहता हूँ कि इसके साथ-साथ इन्हें भी बड़े घर की सैर का शौक चर्राया है ?" - इस बीच दारोगा अपना नया दांव फेंकने के लिए अपनी মুন্না उसके अनुकूल बनाने में काफी सचेष्ट रहा। मुखिया के चुप होते ही वरस पड़ा, "नहीं साहब, नहीं। ऐसी-वंसी कोई बात होती तो कोई बात न पी। मगर यह संगीन मामला है । प्रासिर मुझे भी तो किसी के सामने जयाबदेह होना पड़ता है," कहकर वह ऐंठ गया। मुखिया समझ गया । 'सग जाने सग ही के भाखा' । हाय बढ़ाकर उसने दारोगा का हाथ पकड़ा और नसे लेकर एक पोर हो गया।

दस मिनट के बाद वे लौटे, तो दारोगा ने नोट-बुक और पेंसिल जेव से निकालकर कहा, "गोपीचन्द, तुम अपना बयान दो।" फिर भीड़ की ओर देखकर पुलिस को इशारा किया । भीड़ भगा दी गई। फिर गोपीचन्द के बयान दिये बिना ही दारोगा ने आप ही सब खानापूरियां कर ली। वारदात में लापता विधवा के एक हाथ में रस्सी और दूसरे हाथ में घड़ा थमाकर उसे कुएं पर भेज दिया गया और उसका पैर काई-जमी कुएं की जगत पर फिसलाकर, कुएं में गिराकर, उसे मार डाला गया । इधर गोपीचन्द की 'थैली का मुंह खुला, उधर कानून का मुंह बन्द हो गया । कहानी खतम हो गई। गांव में तरह-तरह की बातें उठीं। फिर 'बहुत-सी खूबियां थीं मरने वाले में' के अनुसार लोगों ने उसके विषय में कोई चर्चा करके उसकी आत्मा को व्यर्थ में कष्ट पहुँचाना अनुचित समझकर, अपने मुंह बन्द कर लिए । वात आयी-गयी हो गई। लेकिन ...... दो गोपीचन्द दो भाई थे। बड़े भाई मानिकचन्द और उसकी उम्र में मुश्किल से दो साल का फर्क था। पिता दो बैलों की खेती कराते थे। घर की भैंस थी। मानिकचन्द और गोपीचन्द भैंस का दूध पीते और घण्टों अखाड़े में जमे रहते । पिता ने उन्हें साड़ों की तरह आजाद और बेफिका छोड़ दिया था। खेलने-खाने के यही तो दिन हैं; फिर जिन्दगी 15 फा जुमा कन्धे पर पड़ने के बाद किसे फुरसत मिलती है शरीर बनाने की? इसी वक्त की बनी देह तो जिन्दगी भर काम पाएगी। उगते हुए जवानों को प्राबादी, बेफित्री, दूध और असाहे की कसरत जो मिली, तो उनकी देह सचि में ढलने लगी। उनकी जोडी जब अखाड़े में छूटती तो लोग तमाशा देखते और वढाई करते न थकते। जब प्रसाड़े से अपने सुडौल, मुन्दर शरीर मे धूल रमाये वे शेर की तरह मस्त चाल से झूमते हुए घर लौटते, तो अपने राम- लछमन की जोडी देखकर मां-बाप को छाती फूल उठती; चेहरा सुशी के मार तमतमा उठता और उनकी आँखों में जैसे गर्व के दो दीप चल उदवे । म उनकी बलयां लेती; वाप मन-ही-मन उनके लिए जाने कितनी शुभ कामनाएं करते। बड़ाई जितनी मधुर है, उसका चस्का लग जाना उतना ही पुरा है। यह आदमी को अन्या बना देती है । दोनो भाइयो के गढ़े-बने शरीर और उनके बल को वडाई गाँव मे और पास-पास जो शुरू हुई, तो उन पर जैसे एक नशा-सा छा गया । सेल-खेल में जो कसरत उन्होने शुरू की थी, वह धीरे-धीरे मौक बन गई। फिर तो जैसे शरीर बनाने और बल बढ़ाने की एक जबरदस्त धुन उनके सिर पर चढ गई । मां- बाप मोर गांव के लोगों का बढ़ावा मिला । मानिक चौर गोपी की जोड़ी गांव का नाम जवार में उजागर करेगी । मोर सचमुच मानिक और गोपी गांव की शोहरत मे चार चांद लगाने को जी-जान से कटिवस हो गए। बादाम घोटे जाने लगे, बकरे कटने लगे, घी मे तर हतुए को मुगन्ध मुहल्ले में मुबह-शाम छायी रहने लगी। पिता अपनी गाढ़ी कमाई उन पर न्योछावर करने लगे। एक और दुधारू भैस सूटे पर मा यधी। नतीजा यह हुप्रा कि उन से दुगुना और तिगुना उनका शरीर और चल बढ़ने लगा । और पच्चीस का माया एत-इते तो उनका शरीर मौर बल खाता हाथी की तरह हो गया। अब जो वे अखाड़े में छूटते तो .

उनकी सांसों की फुफकार की आवाज बोषों तक सुनाई पड़ती, जैसे दो सांड़ हुँकड़ रहे हों। जहां उनका पैर पड़ जाता अखाड़े की जमीन वित्ता वित्ता-भर धंस जाती। और जो कोई अपनी जांघ या बाजू पर ताल ठोक्ता, तो मालूम होता जैसे कोई वादल का दुकड़ा दुसरे बादल के टुकड़े से टकराकर गरज उठा हो । घण्टों वे दो पहाड़ों की तरह एक... दूसरे से टक्कर लेते और अखाड़े में जमे रहते । अखाड़े की मिट्टी खुद जाती, पत्नीने की धारें बहने लगतीं, तत्र कहीं वे बाहर निकलने का नाम लेते। वाहर पाकर वे हाथियों की तरह पसर जाते और उनके दो-दो तीन-तीन शागिर्द हाथों में मिट्टी ले-लेकर उनके शरीर से बहती पसीने को धारों को मल-मलकर घण्टों में मुखा पाते। अव हाल यह था कि शरीर बैंकाबू हुया जा रहा था; अपार शक्ति की किरणें उनके रोम-रोम से फूट रही थीं; मोटी-मोटो रगे सीमा तक स्वस्थ रक्त से फल-फूल कर अव फटी, अब फटी-सी हो रही थीं; और सुखं चेहरे ते जसे खून टपका पड़ रहा हो । ऊँचा माया, रोबीली, खून उगलती-सी आँखें, वांकी मूंछे, सुडौल गरदन, उन्नत, चौड़ी-चकली, चट्टान की तरह छाती, मांसल भुजाएँ, पुष्ट राने, गठीली पिण्डलियां लिने । जोम से ज़रा शरीर को भांजते, शक्ति और गर्व के नशे में मस्त हाथी की तरह झूमते जब वे चलते, तो लगता जैसे उनके हर कदम के साथ एक जलजला चला आ रहा है, उनकी हर जुम्बिश पर दिशाएं मुक्ती जा रही हैं, उनकी हर चितवन में ताकत की विजलियां कौंध उठती हैं। मां-बाप ने जब उन्हें ऐसी उन्नत अवस्था में देखा, तो गर्व और खुशी से फूले न समाए। गांव वालों ने देखा तो आँखों में खुशी की चमक और होठों पर सफलता की मुस्कराहट लाफर कहा, "हां, अब वह वक्त या गया जिसका इन्तजार हमें वरतों से था। अब देखें, कौन माई का लाल हमारे गांव के इन शेरों के जोड़े के सामने से सिर उठाकर चला - , जाता है !" वाप से राय ली गई, तो उन्होंने लापरवाही से कहा, "अरे, अभी तो ये बच्चे है।" लोगों ने ममझाया, "तुम बाप हो । बाप के लिए तो बेटा बूढ़ी भी हो जाए, तब भी बच्चा ही रहता है। मगर सच तो यह है कि बढ़ती जवानो को यही उग्न कुछ कर गुजरने की होती है। अब वक्त या गया है कि इनके बल, जोर और कुम्ती का डका गांव की हद में ही बंचा न रहकर पूरे जवार, नहील और जिले में ही न बजे, बल्कि पूरे मूचे मोर देश में भी इनका नाम चमक उठे । तुम अगर इस समय किमी तरह की कमजोरी दिखाप्रोगे, तो इनके हौसले पस्त हो जाएंगे। तुम इन्हें खुशी से आशा दो कि ये अपने नाम और कुल के मान पर चार चांद लगाने के माम ही गांव का भी नाम उजागर करें।" बाप को अपने बेटो की ताकत का अन्दाजा न हो, ऐसी बात न थी। लेकिन उनके पितृ हृदय में जहां बेटो को यशस्वी देखने को प्रबल कामना और उमग पो, वही ममता और स्नेह की विपुलता के कारण जरा शंका और भय भी था कि कही। लोगो की बात सुनकर उनके होंठों पर एक विराग को-मी मुस्कराहट फैल गई, जैसे उन्हें अपने नाम मोर मान की कतई फिक्र न हो। नाम, मान, या और वैभव की लालसा किसे नहीं होती ! लेकिन यह लालमा दूसगे पर प्रकट करके इन दुर्नन प्राप्तियो को महानता को कम करके, कोई बुद्धिमान् अपने को लोभी पोपित करके हास्यास्पद नहीं बनना चाहता । बाप अनुभवी प्रादमी थे। उन्होंने दिल की उठती हुई उमगो को दवाकर एक विरक्त की तरह कहा, लोग ऐमा ही समझते हो, तो मैं इसमे किमी तरह की वाचा डालना नहीं चाहता। माखिर उन पर गांव का भी तो वही अधिकार है, जो मेरा है। गांव की ही मिट्टी, पानी, हवा से तो उनको यह देह बनी है। नुम लोग उन्हीसे कही। अब तक वे हर तरह से प्राडाद रहे ! ग्राज भी वे बसा वाहे, करने को आजाद हैं।" लोग खुश-दुम दोनों भाइयों के पास पहुँचे और उनके वार की अनुमति की बात कहकर उन्होंने कहा, "अब तुम वतायो, तुममे कौन' "मगर तुम . पहले कुश्ती में उतरना चाहता है।" बैं दोनों अखाड़े में एक-दूसरे के दुश्मन बनकर उतरते थे, लेकिन अखाड़े के बाहर उनका आपसी व्यवहार इतना प्रेम-भरा था कि बस राम- लक्ष्मण का ही दृष्टान्त दिया जा सकता था ! गोपी ने कहा, "मेरे रहते भैया को कुरती में नहीं उतरना पड़ेगा। बाबूजी और भैया की आज्ञा और पाशीर्वाद का बल पाने का हक मुके ही तो भगवान् की ओर से मिला है।" मानिक गोपी से उम्र में वीस था, लेकिन शरीर और ताकत में गोपी मानिक से कहीं बीस था, यह खुद मानिक भी जानता था और गांव के लोग भी । एक तरह से गोपी के पहले उतरने की बात से लोगों को भी खुशी ही हुई। अच्छी साइत देखकर, ब्राह्मण और नाई के हाथ ललकार का पान जवार के नामी-गरामी पहलवानों के पास भेज दिया गया। इधर गोपी की तैयारी पोर जोर पकड़ गई। मानिक और गोपी के बारे में जवार के पहलवान. बहुत-कुछ सुन ही न चुके थे, बल्कि उन्हें अपनी आंखों से देख भी चुके थे। उनमें से फिसी को भी उससे भिड़ने की हिम्मत न रह गई थी। ब्राह्मण और नाई एक-एक कर सभी पहलवानों के यहाँ पहुँचे । लेकिन सब कोई-न- कोई वहाना करके टाल गए। आखिर वे जवार के सवसे नामी बूढ़े जोखू पहलवान के अखाड़े में पहुँचे । जोल्यू को जव उनसे मालूम हुया कि जबार का कोई भी पहलवान पान को हाथ लगाने की हिम्मत न कर सका, तो उसके प्रचरज का ठिकाना न रहा । ज्यादातर नामी पहलवान जोख का लोहा मानने वाले या उसके शागिर्द थे। अपनी जवानी के दिनों में उसने एक बार जो अपना सिक्का जमा लिया था, वह ग्राज के दिन तक वैसा ही बना रहा। किसी ने कभी भी उससे भिड़ने की हिम्मत न की थी। उसीकी तुती जवार में आज तक बोलती रही। अाज अब वे जवानी के दिन न रहे । जोग्य बूढ़ा हो चुका था । वह जानता था कि . 3 ? गोपी के मुकाबले में उटकर वह अपनी उम्र-भर की सारी कमाई कोनि हमेशा के लिए खो देगा । लेकिन अब चारा ही वया था? ब्राह्मण और नाई नव नामी-गरामी पहलवानों के यहां से, श्यामकणं घोड़े की तरह, गोपी की कीर्ति का फरहरा फहराते हुए चले पाए थे। जोम्बू के यहाँ से भी अगर वे उसी तरह चले जाएंगे, तो लोग क्या समझेगे ? बूढ़ा गेर इस वेइज्जती की बात सोचकर तमतमा उठा। उसकी मरदानगी को यह कसे गवारा होता कि कोई ललकारकर उसके सामने से निकल जाए जोम्मू बूढ़ा हो गया है । अव वह शरीर और बल नहीं रह गया। फिर भी पुराने खून का वह मदं है, मच्चा मदं । यो ललकार स्वीकार किये बिना ही कायरों को तरह पहले ही कसे सिर मुका देता ? उनने पान उठा लिया और गरजकर, वजरगवली की जय बोलकर उसे मुंह में डाल लिया। लोगों ने जब यह सुना, तो अचरज करने के साथ ही वे बूढे जोवू की मरदानगी और हिम्मत की दाद दिये बिना न रह सके। उनके मुंह से महसा ही निकल पड़ा कि जवार के जवान पहलवानों को चुल्लू-भर पानी में डूब मरना चाहिए । गोपी ने जब यह मुना तो जमे छोटा हो गया। अपने बाप की उम्र के पहलवान ने लडना उसे कुछ जचा नहीं। वह तो अपनी उम्र और जोड के किसी पट्टे से भिडना चाहता था। लेकिन अब हो ही क्या सकता था? एक बार बद कर कुछ और किया ही बसे जा सकता था ? नियत तिथि पर गांव का अखाड़ा बन्दनवार, अशोक के पत्तों के फाटको और रग-बिरंगी कागज को मण्डियों से यूब सजाया गया। वक्त के बहुन पहले ही से जवार और दूर-दूर के गांवों के लोगों की भीड जमने लगी। मां-बाप के आशीर्वाद लेकर, फूलों के हारों से लदे हुए दोनो भाई बाजे-गाजे के साथ अपने गांव के लोगों की भीड़ के आगे-मागे अखाड़े. की ओर चल पड़े। भीड़ उमंग में बावली हो-होकर बजरंगवली की जय-जयकार से प्रातमान को गुंजा रही थी, लेकिन गोपी के दिल में वह खुनी, उत्साह और उमंग न थी, जिसकी उसने कभी ऐसा मौका ग्राने पर कल्पना की थी। फिर भी मन की बात दवाकर वह ऊपरी जोश से भीड़ की खुशी में हिस्सा ले रहा था । अखाड़े पर दो अोर से एक ही वक्त गोपी और जोखू के दल पहुँचे। दोनों दलों ने जय-जयकार की। मारू वाजे जोर-जोर से बजने लगे । वातावरण के कण-कण में वीर रस का संचार हो रहा था। भीड़ की आंखों में खुशी और उत्तुकता चमक रही थी। सब-के-सब अखाड़े के पास ही पिले पड़ रहे थे। गोपी और जोखु के अभिभावक उन्हें चारों ओर से घेरे शाबाशी के साथ ही तरह-तरह की गुर की बातों का जिक्र कर रहे थे। कोई बुजुर्ग पीठ ठोंककर उत्साह बढ़ा रहा था, तो कोई हम-उम्र हाथ मिलाकर विजय की कामना कर रहा था और सव छोटे शागिर्द पांव छुकर सफलता के लिए भगवान् से प्रार्थना कर रहे थे। अखाड़े में कूदने के पहले मानिक ने गोपी के कान के पास मुंह ले जाकर चुपके-चुपके कहा, “बूढ़ा पुराना खुरट उस्ताद है। ज्यादा मौका न देना। हाथ मिलाते ही, पलक मारते ही''समझे । वरना कहीं गया तो फिर घण्टों की छुट्टी हो जाएगी। फिर हार भी खा जाएगा, तो कहने को रह जाएगा कि एक तो बूड़े से लड़ना ही गोपी-जसे जवान की ज्यादती थी, दूसरे लड़ा भी तो कहीं घण्टों में मिस-मिसकर तो यह कहने का मौका किसी को न मिले । बस, चटपट......" दो ओर से कूदकर वे अखाड़े में उतरे । दोनों ओर से जोर-जोर की जयकार हुई । मारू बाजे और जोर से बज उठे। भीड़ की आँखों की उत्सुकता की चमक में पुतलियों को थर्राहट बढ़ गई। दोनों ने झुककर अखाड़े की मिट्टी चुटकी से उठाकर, माथे से १४ लगाकर अपने गुरु का स्मरण किया। फिर हाथ मिलाने को एक-दूसरे की ग्रांसों से प्रासें मिलाये प्रागे वढे । हाय बढ़े। अंगुलियां हुई कि सहना जैसे एक बिजली-मो कोष गई । गोपी ने न जाने कैसे दाहिना पर जोखू की कोख में मारा कि बूढ़ा एक चोख के साथ हवा में उछला, हवा ही से जैसे एक माह की अावाज पायी, और दूमरे ही क्षण अपाड़े की मेड़ पर पहाट के एक टुकड़े की तरह वह महराकर गिर पड़ा । भीड में सन्नाटा छा गया। मारू बाजा घम गया। उसके दल के लोग माशका से कांपते हुए उसकी पोर वदे। भुककर देखा तो वह ठण्डा पड़ चुका था। अब क्या था, उनकी आंखो में क्रोध के गोले भडक उठे। "यह अन्याय है। "यह धोखा है"हाथ मिलाने के पहले ही गोपी ने जोखू उस्ताद को मार डाला "कुस्ती के कायदे को इस कायर ने तोडा है। हम इमे जीता न छोड़ेगे!" इत्यादि कोप और क्षोभ में चीखती ग्रावाजें भीड से उठ पड़ीं। गोपी ठक खडा था। उसकी नमक मे सुदन पा रहा था कि अचानक यह क्या हो गया। लेकिन यव नमझने-बूझने का मौका ही कहां था? जब जोनू के दल ने लाठियां उठा ली तो दूसरा दल चुप कैसे रहता ? लाठियां पट-पट बजने लगी। तमाशबीनो मे भगदर मच गई। कइयों के सिर से मून की धार वह चली, कई हाथ-पर में चोट खाकर गिरकर तडपने लगे। प्रातिर जव जोयू के दल वालो ने देखा कि उनका पहला कमजोर पड़ रहा है, तो उनमे से कदयों ने खुद बीच-बचाव का शोर उठाया और अपने लोगों को ही रोकने लगे। गोपी के अपने गांव का मामला था । जोयू के दल वाले पराये गांव के थे। अगर रोक- थाम को उन्हें न मूझती, तो एक यादमी भी बचकर न जा पाता। लाठिचा धीरे-धीरे थम गई। फिर कचहरी में समझ लेने की धमकी देकर वे चले गए। 1 ऐसी वारदात को लेकर कचहरी दौड़ना स्वयं उनके लिए कोई " ठा की बात नहीं थी। इससे इज्जत घटती ही, वढ़ती नहीं। जोखू इवान की इस तरह जो मौत हो गई थी, इससे जवार में क्या उनकी किरकिरी हुई थी, जो वे भरी · कचहरी में इस वदनामी का ढोल टते। हलके के दारोगा ने पहले जरूर इस्तगासा दाखिल करने पर र दिया, लेकिन गोपी के दल ने जैसे ही उसकी जेब गरम कर दी, वह । चुप्पी साध गया। जो भी हो इस वारदात का इतना नतीजा जरूर हुया कि जोखु के गांव वाले हमेशा के लिए गोगी और उसके खानदान के प्रारणलेवा वात्रु वन गए। उनके दिलों में एक घाव बन गया । गोपी के दिल पर जोख की इस तरह हुई मौत का इतना असर पड़ा कि उसने हमेशा के लिए लंगोट उतार फेंका । मानिक और गांव के लोगों ने उसे बहुत समझाया, लेकिन वह टस-से-मस न हुआ। वह अव हर तरह से घर-गिरस्ती के कामों में वाप की मदद करने लगा। तीन धीरे-धीरे वे वातें पुरानी पड़ गई। बाप को अब अपने वेटों की शाद की फिक्र हुई। इसके पहले भी कई जगहों से रिश्ते आये थे, लेकि उन्होंने 'अभी क्या जल्दी है,' कहकर टाल दिया था । अवको संयोग एक ऐसा रिश्ता पा गया कि उनकी खुशी की हद न रही। सीता र उर्मिला की तरह दो प्रेममयी, सगी, प्रतिष्ठित कुल की मुशील व की एक ही साथ दोनों भाइयों से सम्बन्ध की बात चली।

बेटे में वैसी ही बहुएं मिलने जा रही थीं। मां तो वर्षों से बहुमो का मुंह देखने को तड़प रही थी। इस रिस्ते की चर्चा जिसने भी मुनी उसीने वाप को राय दी कि "वस अब कुछ सोचने-समझने की बात नहीं । यह भगवान् की किरिपा है कि ऐनी बहुएं मिल रही हैं। एक ही साथ जैसे दोनो बेटों के सभी सस्कार हुए, वैसे ही एक ही साय व्याह भी जितनी जल्द हो जाए, अच्छा है।" खूब धूम-धाम से ब्याह हो गया। दो-दो मुगोल, मुन्दर बहुएं घर में एक साथ क्या उतरी, घर सम-सम भर गया। मां-बाप को सुमी का ठिकाना न रहा। जब उन्होंने देखा कि सचमुच बहुएँ उससे कहीं बढ- चढ़ कर हैं, जैसा कि उन्होंने मुना था तो उनके सन्तोष-मुप के क्या कहने ! गोपी प्यारी पत्नी के साय हो प्यारी भाभी पाकर निहाल हो गया। उसके लिए घर का ससार इतना मोहक, इतना सुखकर हो उठा कि वह बस घर में ही रमकर रह गया। बाहरी मसार से उसने एक तरह से नाता हो तोड लिया। वह एक धुन का ग्रादमी था। पहले उसे मातारिक बातों से, अपना शरीर बनाने और कमरत की धुन में, कोई दिलचस्पी ही न थी। अब एक छूटा, तो दूसरे से वह इन तरह चिपट गया कि लोग देखते और ताज्जुब करते । लोकाचार के बन्धनों के कारण उसे अपनी बीवी से मिलने-जुलने को उतनी आजादी न थी, जितनी भाभी से । भाभी से वह सुलकर मिलता और हंसी-मजाक के ठहाकों से घर को गुंजा देता। मां-बाप का दिल पर के इस सदा हंसते वातावरण को देसकर सुगी मे झूम उठता। मानक को इन बातों में खुलकर हिस्सा लेने को प्राजादी न घी, फिर भी पह गोगी और भाभी का स्नेहमय व्यवहार देखकर मन-ही-मन हर्ष-विभोर हो उठता। भाई-भाई का प्रेम, बहन-बह्न का प्रेम, देवर भाभी का प्रेम, पुष, माता-पिता यधुनो का प्रेम ! ऐमा लगता था, जैसे चौबीस घण्टे उस पर होती है-छकन्छककर, नहा-नहाकर घर का प्रत्येक प्राणी मानन्द- ममृत को वां Pin -- प्रतिष्ठा की बात नहीं थी। इससे इज्जत घटती ही, बढ़ती नहीं। जोख पहलवान की इस तरह जो मौत हो गई थी, इससे जवार में क्या उनकी कम किरकिरी हुई थी, जो वे भरी कचहरी में इस बदनामी का ढोल पीटते। हलके के दारोगा ने पहले ज़रूर इस्तगासा दाखिल करने पर जोर दिया, लेकिन गोपी के दल ने जैसे ही उसकी जेब गरम कर दी, वह भी चुप्पी साध गया। जो भी हो इस वारदात का इतना नतीजा जरूर हुआ कि जोखु के गांव वाले हमेशा के लिए गोपी और उसके खानदान के प्रारणलेवा शत्रु बन गए । उनके दिलों में एक घाव. बन गया। गोपी के दिल पर जोत्बू को इस तरह हुई मौत का इतना असर पड़ा कि उसने हमेशा के लिए लँगोट उतार फेंका । मानिक और गांव के लोगों ने उसे बहुत समझाया, लेकिन वह टस-से-मस न हुआ। वह अब हर तरह से घर-गिरस्ती के कामों में वाप की मदद करने लगा। तीन धीरे-धीरे वे बातें पुरानी पड़ गई। बाप को अब अपने बेटों की शादी की फिक्र हुई। इसके पहले भी कई जगहों से रिश्ते आये थे, लेकिन उन्होंने 'अभी क्या जल्दी है,' कहकर टाल दिया था । अवको संयोग से एक ऐसा रिश्ता आ गया कि उनकी खुशी की हद न रही। सीता और उर्मिला की तरह दो प्रेममयी, सगी, प्रतिष्ठित कुल की सुशील बहनों की एक ही साथ दोनों भाइयों से सम्बन्ध की बात चली। जैसे बैटे थे वैसी ही बहुएं मिलने जा रही थी। मो तो वर्षों से बहुमो का मुंह. देखने को तडप रही थो। इस रिश्ते को चर्चा जिसने भी मुनी उसीने वाप को राय दी कि "यस अव कुछ सोचने-समझने की बात नही । वह भगवान् की किरिपा है कि ऐसी बहुएं मिल रही हैं। एक ही साय से दोनों बेटों के सभी संस्कार हुए, वैसे ही एक ही शाप च्याह भी जितनी जल्द हो जाए, अच्छा है।" सूब धूम-धाम से व्याह हो गया। दो-दो सुशील, सुन्दर बहुएं घर में एक साथ क्या उतरी, घर सम-सम भर गया। मो-चाप की सुगी का ठिकाना न रहा। जब उन्होंने देखा कि सचमुच बहुएं उमसे कहीं वा- घढ़ कर हैं, जमा कि उन्होंने सुना था तो उनको सन्तोष-सुप के क्या कहने ! गोपी प्यारी पलो के साथ ही प्यारी भानी पाकर निहाल हो गया। उमके लिए घर का ससार इतना मोहक, इतना मुसकर हो उठा कि यह बस घर में ही रमकर रह गया। बाहरी ससार से उसने एक तरह से नाता ही तोड़ लिया । वह एक धुन का ग्रादमी था । पहले उसे सातारिक बातों से, अपना शरीर बनाने और कसरत को धुन में, कोई दिलचस्पी ही न थी। अब एक छूग, तो दूसरे से वह इस तरह विपट गया कि लोग देखते और ताज्जुब करते । लोकाचार के बन्धनो के कारण बने अपनी बीवी से मिलने-जुलने को उतनी पाजादी न थी, जितनी भाभी से । भाभी से वह मुलकर मिलता और हंसी-मजाक के ठहाकों से घर को गुंजा देता। मां-बाप का दिल घर के इस सदा हसते वातावरण को देसकर खुशी से झूम उठता । मानक को इन बातों में सुनकर हिस्सा लेने को प्राजादी न थी, फिर भी यह गोरी और भाभी का स्नेहमय व्यवहार देसकर मन-ही-मन हर्प-विभोर हो उठता । भाई-भाई का प्रेम, वहुत-बहन का प्रेम, देवर-भाभी का प्रेम, पुत्र, माता-पिता बघुनो का प्रेम ! ऐसा लगता या, बसे चौवीस घण्टे उस घर में अमृत को वर्षा होती है-छक-छकार, नहा-नहार पर का प्रत्येक प्राणी प्रानन्द .

. विभोर है; कोई दुख नहीं, कोई प्रभाव नहीं, कोई चिन्ता नहीं, कोई शंका नहीं। क्या अच्छा होता, अगर यह फुलवारी हमेशा ऐसी ही. गुलजार बनी रहती, इसके पौधे और फूल हमेशा इसी तरह खुशी से झूमते रहते ! लेकिन दुनिया की वह कौन गुलजार फुलवारी है, जिसके पौधों और फूलों की खुशी को पतझड़ अपने मनहूस कदमों से नहीं रौंद देता? मुश्किल से इस खुशी के अभी छै महीने भी न गुजरे होंगे कि एक काली रात को खुशी की इस दुनिया के एक कोने में आग लग गई। मानिक सत्यनारायणजी की कथा के लिए कुछ ज़रूरी सामान लेने कसवे गया था। लौटने लगा तो काफी रात हो गई थी। कसवे से उसके गांव का रास्ता जोखू के गांव के सीवाने से होकर था.। सामान की गठरी काँधे पर लटकाये वह तेजी से कदम बढ़ाये चला जा रहा था। उस गांव के सीवाने के एक बाग में वह पहुँचा तो सहसा उसे लगा कि उसके पीछे . कुछ लोग पा रहे हैं। मुड़कर उसने देखना चाहा कि तड़ाक से एक लाठी भरपूर उसके सिर पर बज उठी। फिर कई लाठियां साथ-साथ उसके ऊपर चारों ओर से विजली की तेजी से चोट करने लगी । उसका होश गायब हो गया। वह ज्यादा देर तक अपने को संभाल न पाकर गिर पड़ा। सिर फट गया था। खून की धार बह रही थीं। इतने में उसे लगा कि किसी ने उसके गले पर लाठी पट करके रखी है, फिर उसे जोर से दवाया गया है। उसकी साँसें घुटती गईं, घुटती गईं; आँखें बाहर निकल पाई। हत्यारे लाश को ठिकाने लगाने की बात अभी सोच ही रहे थे कि कुछ लोगों के आने की आहट पाकर भाग चले। वे लोग भी कसवे से ही पा रहे थे । बाग में ऐन राह पर ही खून और लाश देखकर वे आशंका से भरकर ठिठक गए । गांव के लोग ऐसी वारदातों से शहरियों की तरह. 'भय खाकर भाग नहीं खड़े होते । ऐसे वक्तों पर भी वे अपना कर्तव्य ।

निभाना नूय जानते हैं। उन्होंने भुककर देखा पोर मानिक को पहचाना, तो उनके दुस को हद न रही। जवार का कोई ऐगा आदमी न था जो उन दो भाइयों को और उनको ताकत भौर यहादुरी को न जानता हो । मग-भर में उन्हे जोम के माथ गोपी की कुश्ती की बातें याद हो माई। फिर सब-कुछ उनको समझ में आप ही पा गया। जोन के गांव वालो से दस बुजदिलाना व्यवहार से वे क्षुब्य हो उठे। उन्होंने एक आदमी को गोपी को खबर करने की जा । साथ ही उससे यह भी कहने को कहा कि पूरे दल-बल के माय उसके गांव वाले अभी पा जाएं, ताकि इन चुजदिलों से मानिक ही हत्या का बदला टटके ही ले लिया जाए। "वेचारा मानिक ! उसको जवान बहू की जिन्दगी हमेशा के लिए दुखी हो गई। इन कायरो को इनका जघन्य पाप निगल जाएगा। बदला ही लेना था, तो मरदो की तरह मैदान में लेते ।" मानिक की लाश को धेरे हुए विपाद और ग्रोध मे बडबडाते वे लोग वही बंट गए । गोपी के घर सबर पहुँची। मां-बहुएँ छाती पीट-पीटकर, पहा. खा- खाकर, चौस-चीसकर रो पड़ी । गोषो को तो जैसे साप सूंघ गया । वह सिर पकड़कर जहां-का-तहाँ बैठ गया। बाप दिल पर जैसे घूमा साकर परयर के चुत बन गए । इस माकस्मिक वचपात से उनका मस्तिष्क हो शून्य हो गया। सारे गांव में इस हादसे की खबर विजली की तरह फैल गई। चारों मोर एक कुहराम-सा मच गया। सारा-का-सारा गाय लाटो मंभाले गोपी के दरवाजे पर दुस मोर क्षोभ से पागल हो इकट्ठा हो गया। औरतें मां और बहनों को संभालने लगो। बड़े-बड़े पिता को समभाने. युझाने लगे। लेकिन जवानो को कहाँ चन या? वे पारो घोर से गोपी को घेरकर उभे भाई की हत्या का बदला लेने के लिए ललकारने लगे। थोड़ी देर तक तो गोपी मुध-युध सोय उनकी बात सुनता रहा। फिर से उसकी प्रांखों मे लुत्तियाँ छिटकने लगी। वह तड़पकर उटा १३ - विभोर है; कोई दुख नहीं, कोई प्रभाव नहीं, कोई चिन्ता नहीं, कोई शंका नहीं। क्या अच्छा होता, अगर यह फुलवारी हमेशा ऐसी ही गुलजार बनी रहती, इसके पौधे और फूल हमेशा इसी तरह खुशी से झूमते रहते ! लेकिन दुनिया की वह कौन गुलजार फुलवारी है, जिसके पौधों और फूलों की खुशी को पतझड़ अपने मनहूस कदमों से नहीं रौंद देता? मुश्किल से इस खुशी के अभी छै महीने भी न गुजरे होंगे कि एक काली रात को खुशी की इस दुनिया के एक कोने में भाग लग गई। मानिक सत्यनारायणजी की कथा के लिए कुछ जरूरी सामान लेने कसवे गया था। लौटने लगा तो काफी रात हो गई थी। कसवे से उसके गांव का रास्ता जोखू के गांव के सीवाने से होकर था । सामान की गठरी कांधे पर लटकाये वह तेजी से कदम बढ़ाये चला जा रहा था। उस गांव के . सीवाने के एक बाग में वह पहुँचा तो सहसा उसे लगा कि उसके पीछे कुछ लोग पा रहे हैं। मुड़कर उसने देखना चाहा कि तड़ाक से एक लाठी भरपूर उसके सिर पर बज उठी। फिर कई लाठियाँ साथ-साथ उसके ऊपर चारों ओर से विजली की तेजी से चोट करने लगी। उसका होश गायब हो गया। वह ज्यादा देर तक अपने को संभाल न पाकर गिर पड़ा। सिर फट गया था। खून की धार बह रही थीं। इतने में उसे लगा कि किसी ने उसके गले पर लाठी पट करके रखी है, फिर उसे जोर से दवाया गया है। उसकी सांसें घुटती गईं, घुटती गईं; आँखें वाहर निकल पाई। हत्यारे लाश को ठिकाने लगाने की बात अभी सोच ही रहे थे कि कुछ लोगों के आने की आहट पाकर भाग चले। वे लोग भी कसवे से ही पा रहे थे। बाग में ऐन राह पर ही खून और लाश देखकर वे अाशंका से भरकर ठिठक गए। गांव के लोग ऐसी वारदातों से शहरियों की तरह 'नय खाकर भाग नहीं खड़े होते। ऐसे वक्तों पर भी वे अपना कर्तव्य १८ निभाना खूब जानते हैं। उन्होने भुककर देखा मोर मानिक को पहचाना, तो उनके दुस की हद न रही । जवार का कोई ऐसा प्रादमी न था जो उन दो भाइयो को और उनकी ताकत और वहादुरी को न जानता हो। धा-भर में उन्हे जोख के माय गोपी की कुस्ती की वाते याद हो पाई। फिर सब-कुछ उनकी समझ में पाप ही प्रा गया। जोम्पू के गांव वालों से इस बुजदिलाना व्यवहार ते वे क्षुब्य हो उठे। उन्होंने एक पादमी को गोपी को खबर करने की भेजा। साथ ही उमसे यह भी कहने को कहा कि पूरे दल-बल के साथ उनके गांव वाले अभी आ जाएं, ताकि इन वुजदिलों से मानिक ही हत्या का बदला टटके ही ले लिया जाए। "वेचारा मानिक ! उनको जवान बहू की जिन्दगी हमेशा के लिए दुखी हो गई। इन कायरो को इनका जघन्य पाप निगल जाएगा । बदला ही लेना था, तो मरदो की तरह मंदान में लेते ।" मानिक की लाम को घेरे हुए विषाद और ग्रोध में बडबडाते वे लोग वही बैठ गए। गोपी के घर खबर पहुँची। मां-बहुएं छाती पीट-पोटकर, पछा. सा. खाकर, चोरा-चीसकर रो पड़ी । गोणे को तो जैसे सांप सूंघ गया। वह सिर पकड़कर बाका-तहाँ बैठ गया। बाप दिल पर जैसे चूंसा साकर पत्यर के बुत बन गए । इस पाकस्मिक ययपात से उनका मस्तिष्क ही शून्य हो गया। सारे गांव में इस हादसे की खबर विजली की तरह फैल गई। चारो योर एक कुहराम-सा मच गया। सारा-का-सारा गांव लाटी भंभाले हुए गोपी के दरवाजे पर दुख और शोम ते पागल हो इकट्ठा हो गया। औरत मां और बहुओं को संभालने लगी। बड़े-बूढ़े पिता को समझाने. युझाने लगे। लेकिन जवानो को कहीं चैन था ? वे चारो ग्रोर गोपी को घेरकर उभे भाई की हत्या का बदला लेने के लिए ललकारने सगे। थोड़ी देर तक तो गोपी मुध-बुध खोये उनको बात सुनता रहा। फिर से उसकी प्रांसों में नुत्तियां छिरकने लगी। यह तड़पकर उटा । r । और कोने में खड़ी गोजी उठनकर घायल शेर की तरह दौड़ पड़ा। उसके पीछे-पीछे गाँव के लट्ठबाज़ नौजवान आँखों में बदले की आग लिये बढ़ चले । उधर खवर पाकर चौकीदार थाने की पोर दौड़ा। जोखु के गांव वालों को इस वारदात की कोई खबर न थी। उसके चन्द शागिर्दो का ही यह पड्यन्त्र था। उन्होंने अपना काम किया और चम्पत हो गए। गांव वालों ने जब गाँव की ओर बढ़ता शोर सुना, तो सोचा कि शायद यह कोई डाकुओं का गिरोह गाँव को लूटने बढ़ाया रहा है। पूरे गांव में तहलका मच गया। नौजवानों ने लाठी संभालकर मुकावले का निश्चय किया और जिधर से वह शोर बढ़ता आ रहा था, उधर वे गांव के बाहर ही भिड़ पड़ने को दौड़ पड़े। औरतों और बूढ़ों का कलेजा धक-धक कर रहा था। बच्चे बिलविला उठे थे। गोपी का दल पास पहुँचा तो सामने लाठियाँ उठी देखकर उन्होंने समझ लिया कि खुली फौजदारी की तैयारी इन्होंने पहले ही से कर रखी है। समझने-बूझने की स्थिति में कोई दल न था। एक-दूसरे पर वे भूखे शेरों की तरह झपट पड़े । लाठियां पटापट वजने लगी। अंधेरे में सैकड़ों विजलियां कौंधने लगीं। अंधेरे में अन्धों की तरह वस अन्धा- धुन्ध लाठियां चल रही थीं। किसके दल का कोन घायल होकर गिरता है, किसकी लाठी किस पर और कहाँ गिरती है, यह जानने की सुध-बुध किसी को न थी। एक ओर मानिक की हत्या के बदले की लपटें जल रही थीं, तो दूसरी सोर अपनी जान-माल की रक्षा का सवाल था । कोई दल अपनी हार कैसे मान लेता? देखते-देखते कई लोथें जमीन पर तड़पने लगी । खून की बौछार से जगह-जगह फिसलन हो गई। लेकिन इसकी ओर ध्यान देने का अवकाश किसे था? वहीं तो जान देने और लेने की वाजी लगी थी। मानिक की लाश थाने पर ले जाने का हुक्म देकर दारोगा और नायव दस हथियारवन्द कान्सटेवलों के साथ चौकीदार को. पागे करके घटना स्थल की ओर लपके । लाव्यिों की पटापट सुनकर उन्होंने टार्च , जलाकर सामने का विकट दृश्य देसा, तो अपना रिवाल्वर निकाल लिया और कामटेलों को हवाई फायर करने का हुक्म दिया । फायरों की बावाज सुनकर दोनों दल वालो ने समझ लिया कि पुलिस की दौड़ आ गई। वे अपनी लाठियों रोक भी न पाये थे कि पुलिस दनदनाती पहुँच गई। लोग भागने को ही ये कि वे चारों भोर से पुलिस की संगीनो से घिर गए। टानों को रोशनी से उनकी प्रासें चोधिया रही थीं। देखते-देखते उनके हाथों में हथकड़ियां पड़ गई। गोपी के बाएँ हाय की तीन उँगलियां पिस गई थी और गले के पास को दाहिनी पसली पर गहरी चोट आयी थी । लेकिन विपाद और क्रोध के झोंके में वह इस तरह गाफिल या कि दूसरे दिन भुवह उसकी ग्राख परगने के हस्पताल में सुली तो उसे इसका भी ज्ञान न पा कि वह कहाँ है, उसके हाथ, गले और छाती में क्यों पट्टियां बंधी हैं, उसका गरीर क्यों चूर-चूर हो गया है, उसका दिमाग क्यों ज़ोर-जोर से मन- मला रहा है। उसके अगल-बगल और भी उसके गांव और जोनू के गांव के कई जवान उमीको हालत में पड़े हुए थे। सब एक-दूसरे को टकटक फटी-फटी प्रांखों से ताक रहे थे। लेकिन जैसे किसी में भी कुछ कहने-सुनने को ताकत ही न थो, जैसे वे सब अपने लिए मोर एक-दूसरे के लिए समस्या बने हुए हो। भानिक रहा नहीं; घायल गोपी कानून को गिरफ्त में पड़ा हुना फैसले का इन्तजार कर रहा है। मां-बाप मोर बहनों के सिर पर एक साथ ही जैसे पहाड़ गिर पड़ा जिसके नीचे वे दवे हुए छटपटा रहे हैं, कराह रहे हैं, तड़प रहे हैं। गांव के कई घरों में मातम छाया है, कई घरों में दुख की घटा घिरी है। लेकिन गोपी के घर का विपाद जैसे फैलकर पूरे गांव पर आ गया है। लोग उसके घर भीड़ लगाये रहते हैं। कभी मां-चाप को समझाते . - और कोने में खड़ी गोजी उठाकर घायल शेर की तरह दौड़ पड़ा। उसके पीछे-पीछे गाँव के लट्ठवाज़ नौजवान आँखों में बदले की आग लिये बढ़ चले । उधर खबर पाकर चौकीदार थाने की ओर दौड़ा। जोखू के गांव वालों को इस वारदात की कोई खवर न थी। उसके. चन्द शागिर्दो का ही यह पड्यन्त्र था। उन्होंने अपना काम किया और चम्पत हो गए। गाँव वालों ने जब गाँव की ओर बढ़ता शोर सुना, तो सोचा कि शायद यह कोई डाकुओं का गिरोह गाँव को लूटने बढ़ाया रहा है। पूरे गांव में तहलका मच गया। नौजवानों ने लाठी सँभालकर मुकाबले का निश्चय किया और जिधर से वह शोर बढ़ता पा रहा था, उधर वे गांव के बाहर ही भिड़ पड़ने को दौड़ पड़े। औरतों और बूढ़ों का कलेजा धक-धक कर रहा था। बच्चे बिलविला उठे थे । गोपी का दल पास पहुँचा तो सामने लाठियां उठी देखकर उन्होंने समझ लिया कि खुली फौजदारी की तैयारी इन्होंने पहले ही से कर रखी है। समझने-बूझने की स्थिति में कोई दल न था। एक-दूसरे पर वे भूखे शेरों की तरह झपट पड़े । लाठियां पटापट वजने लगीं। अंधेरे में सैकड़ों विजलियाँ काँधने लगीं। अंधेरे में अन्धों की तरह वस अन्धा- धुन्ध लाठियां चल रही थीं। किसके दल का कोन घायल होकर गिरता. है, किसकी लाठी किस पर और कहाँ गिरती है, यह जानने की सुध-बुध किसी को न थी। एक ओर मानिक की हत्या के बदले की लपटें जल रही थीं, तो दूसरी ओर अपनी जान-माल की रक्षा का सवाल था । कोई दल अपनी हार कैसे मान लेता? देखते-देखते कई लोथें जमीन पर तड़पने लगीं । खून की बौछार से जगह-जगह फिसलन हो गई। लेकिन इसकी ओर ध्यान देने का अवकाश किसे था ? वहीं तो जान देने और लेने की वाजी लगी थी। मानिक की लाश थाने पर ले जाने का हुक्म देकर दारोगा और नायव दस हथियारबन्द कान्सटेबलों के साथ चौकीदार को आगे करके घटना-स्थल की ओर लपके। लाठियों की पटापट सुनकर उन्होंने टार्च २० जलाकर सामने का विकट दृश्य देसा, तो अपना रिवाल्वर निकाल लिया और कामटेबलों को हवाई फायर करने का हुक्म दिया। फायरो की भावाज सुनकर दोनों दल वालों ने समझ लिया कि गुलिस की दौड़ आ गई। ये अपनी लाठियां रोक भी न पाये थे कि पुलिस दनदनाती पहुंच गई। लोग भागने को ही थे कि वे चारों मोर से पुलिस की सगोनी से घिर गए। टानों की रोशनी में उनकी प्रासं चौधिया रही थीं। देखते-देखते उनके हाथों में हथकडियां पड़ गई । गोपी के दाएं हाय की तीन उँगलियों पिस गई थी और गले के पास की दाहिनी पसली पर गहरी चोट पायी थी । लेकिन विपाद और क्रोध के झोंके मे यह इस तरह गाफिल या कि दूसरे दिन सुबह उसकी प्रा परगने के हस्पताल में सुली तो उसे इसका भी ज्ञान था कि वह कही है, उसके हाथ, गले और छाती में क्यों पट्टियां बंधी हैं, उसका गरीर क्यो चूर-चूर हो गया है, उसका दिमाग यो जोर-जोर से मन- मना रहा है। उसके अगल-बगल और भी उसके गांव और जोन्यू के गाँव के कई जवान उसीकी हालत में पड़े हुए थे। सब एक-दूसरे को टकटक फटी-फटी आँखों से ताक रहे थे। लेकिन जैसे किसी में भी कुछ कहने सुनने की ताकत ही न थी, जैसे वे सब अपने लिए और एक-दूसरे के लिए समस्या बने हुए हों। मानिक रहा नहीं; धायल गोपी कानून को गिरफ्त में पड़ा हमा फैसले का इन्तजार कर रहा है। मां-बाप और बहनों के सिर पर एक साथ ही जैसे पहाड़ गिर पड़ा जिसके नीचे वे दवे हुए सरपटा रहे हैं, कराह रहे हैं, तड़प रहे हैं। गांव के कई घरों में मातम छामा है, कई घरों में दुख को घटा घिरी है। लेकिन गोपी के घर का विपाद जैसे फैलकर पूरे गांव पर छा गया है। लोग उसके घर भीड़ लगाये रहते हैं। कभी मां-बाप को समझाते .

और कोने में खड़ी गोजी उठाकर घायल शेर की तरह दौड़ पड़ा। उसके पीछे-पीछे गाँव के लट्ठवाज़ नौजवान आँखों में बदले की आग लिये बढ़ चले । उधर खबर पाकर चौकीदार थाने की ओर दौड़ा। जोखू के गांव वालों को इस वारदात की कोई खवर न थी। उसके चन्द शागिर्दो का ही यह षड्यन्त्र था। उन्होंने अपना काम किया और चम्पत हो गए। गाँव वालों ने जब गाँव की ओर बढ़ता शोर सुना, तो सोचा कि शायद यह कोई डाकुओं का गिरोह गाँव को लूटने बढ़ाया रहा है। पूरे गांव में तहलका मच गया। नौजवानों ने लाठी सँभालकर मुकावले का निश्चय किया और जिधर से वह शोर बढ़ता पा रहा था, उधर वे गांव के बाहर ही भिड़ पड़ने को दौड़ पड़े। औरतों और बूढ़ों का कलेजा धक्-वक् कर रहा था। बच्चे बिलबिला उठे थे । गोपी का दल पास पहुँचा तो सामने लाठियाँ उठी देखकर उन्होंने समझ लिया कि खुली फौजदारी की तैयारी इन्होंने पहले ही से कर रखी है। समझने-वूझने की स्थिति में कोई दल न था। एक-दूसरे पर वे भूखे शेरों की तरह झपट पड़े । लाठियां पटापट बजने लगी। अंधेरे में सैकड़ों विजलियाँ कौंधने लगीं। अंधेरे में अन्धों की तरह वस अन्धा. धुन्ध लाठियां चल रही थीं। किसके दल का कौन घायल होकर गिरता है, किसकी लाठी किस पर और कहाँ गिरती है, यह जानने की सुध-बुध किसी को न थी। एक ओर मानिक की हत्या के बदले की लपटें जल रही थीं, तो दूसरी ओर अपनी जान-माल की रक्षा का सवाल था । कोई दल अपनी हार कैसे मान लेता? देखते-देखते कई लोथें जमीन पर तड़पने लगीं। खून की बौछार से जगह-जगह फिसलन हो गई। लेकिन इसकी ओर ध्यान देने का अवकाश किसे था? वहीं तो जान देने और लेने की वाजी लगी थी। मानिक की लाश थाने पर ले जाने का हुक्म देकर दारोगा और नायव दस हथियारवन्द कान्सटेबलों के साथ चौकीदार को आगे करके घटना-स्थल की ओर लपके । लाठियों की पटापट सुनकर उन्होंने टान जलाकर सामने का विकट दृश्य देसा, तो अपना रिवाल्वर निकाल लिया योर कान्मटेबली को हवाई फायर करने का हुक्म दिया। फायरी को अावाज सुनकर दोनों दल वालों ने समझ लिया कि पुलिस की दौड प्रा गई। वे अपनी लाठियां रोक भी न पाये थे कि पुलिस दनदनाती पहुँच गई। लोग भागने को ही थे कि वे चारों भोर से पुलिस को संगीनो से घिर गए। टाों की रोशनी से उनकी पाखें चांधिया रही थी। देखते-देखते उनके हाथों में हथकड़ियां पड़ गई। गोपी के बाएं हाथ को तीन उंगलियों पिस गई थी और गले के पास को दाहिनी पसली पर गहरी चोट आयी थी। लेकिन विपाद और क्रोध के झोके में वह इस तरह गाफिल या कि दूसरे दिन सुबह उसकी मां परगने के हस्पताल में खुली तो उसे इसका भी ज्ञान न था कि वह कहाँ है, उसके हाथ, गले और छाती में क्यों पट्टियां बंधी हैं, उसका शरीर क्यों चूर-चूर हो गया है, उसका दिमाग क्यों जोर-जोर से मन- झना रहा है । उसके अगल-बगल और भी उसके गांव और जोयू के गांव के कई जवान उसीकी हालत में पड़े हुए थे। सब एक-दूसरे को टकटक फटी-फटी प्रांसो से ताक रहे थे। लेकिन जैसे किसी में भी कुछ कहने-सुनने की ताकत ही न थी, जैसे वे सब अपने लिए और एक-दूसरे के लिए समस्या बने हुए हो। मानिक रहा नहीं; घायल गोपी कानून को गिरफ्त में पड़ा हमा फैसले का इन्तजार कर रहा है। मां-बाप और बहनों के सिर पर एक साथ हो जैसे पहाड गिर पड़ा जिसके नीचे वे दवे हुए छटपटा रहे हैं, कराह रहे हैं, तडप रहे हैं। गांव के कई घरो में मातम छाया है, कई मे दुख को घटा घिरी है। लेकिन गोपी के घर का विपाद जैसे फैलकर पूरे गांव पर छा गमा है। लोग उसके घर भीड़ लगाये रहते हैं। कभी मां-बाप को सम । ।

- . हैं, कभी सान्त्वना देते हैं और कभी अपने को भी संभालने में असमर्थ. होकर उन्हीं के साथ-साथ खुद भी रो पड़ते हैं । मुकदमे की पैरवी का इन्तज़ाम हो रहा है। सब-के-सब अपनी गाढ़ी कमाई बहा देने को तैयार हैं। गाँवदारी का मामला है, गाँव के नौजवानों की जिन्दगी का वास्ता है और सबसे बढ़कर गांव की प्रांखों के तारे माँ-बाप के अकेले सहारे, तड़पती औरत और दुर्भाग्य की मारी वैवा भाभी की जिन्दगी की अकेली पाशा, गोपी को बचा लेने का सवाल है । बहुओं के बाप और बड़े भाई भी इस विपत्ति की खबर पाकर पा गए हैं। उनके दुख का भी ठिकाना नहीं है। वे भी गोपी को बचा लेने के लिए सब-कुछ न्योछावर करने पर तुले हैं । कोई भी रकम कानून का मुह बन्द करने में असमर्थ है । पाँच पाद- मियों का कतल हुआ है, एकाध की बात होती, तो दारोगा पचा-खपा देता । वह मजबूर है । हाँ, जिले के बड़े अफसर कुछ जरूर कर सकते हैं, लेकिन उनके यहाँ इन देहातियों को पहुँच नहीं। घायल अच्छे हो-होकर हवालात में पड़े हैं। मुकदमा सेशन सुपुर्द है। फौजदारी के सबसे बड़े वकील को किया गया है। उसकी बहुत कोशिशों पर भी किसी की जमानत मंजूर न हुई। पिता एक बार गोपी से मिल पाए हैं। मिलते वक्त दोनों ने अपने दिल-दिमाग पर पूरा-पूरा काबू रखने की कोशिश की थी। किसी प्रकार की दुर्बलता या तड़पन दिखाकर वे एक-दूसरे का दुख बढ़ाना न चाहते थे। बाप ने बेटे को ढारस बंधाया । वेटे ने बाप को कोई चिन्ता न करने को कहा । और कोई विशेष बात न हुई । विछड़ते समय, पता नहीं, दिल के किस दर्द के जोश में गोपी ने कहा, "भौजी का खयाल रखियो।" उस एक बात में कितना दर्द, कितनी कसक, कित्तनी तड़पन थी, बाप ने उसका अनुभव करके ही ऐठता दिन लिये मुंह फेर लिया था। उधर गोपी ने आँसू पोंछ लिए, इधर जेल के फाटक पर वाप ने अपनी आँखों के अांमुत्रों को पलकों में ही संभाल लिया। - - २२ प्रासिर मुकदमे का फैसला हुआ। मजा सबको हुई। किनों को तीन साल, तो किसी को चार और किसी को पांच साल के लिए जेल भेज दिया गया। गोपी को पांच लाल को सजा हुई। उसके घर में धीमा हुमा मातम फिर एक बार जोर पकड गया। मां-बाप के दुव का नया कहना ! बडी बहू को हालत अबतर तो थी ही। छोरी बहू के दिल में भी एक मान चुभ गया। चार बाप अब सचमुच बूढे हो गए। दोनों बेटे क्या उनसे बिछड़ गए, उनके दोनों हाप ही टूट गए। दिल के सारे रस को दर्द को प्राग ने जला दिया। कोई उत्साह. पाशा न रह गई उनके जीवन मे । बहुप्री का दर्द देखकर वह पाठो पहर कुढते रहते । खाना-पीना, काम-धाम कुछ भी अच्छा न लगता । बहुमों का बड़ा भाई प्रा-पाकर नेती गिरस्सी का इन्त- जाम करा जाता। मो का भी हाल बेहाल था। बैठी-ठी यह मामू वहाती रहती या अपने लालों को याद कर-करके विनूरती रहती। यही वह के दिल में जो एक बार मूल चुभा, तो उसका चन हमेशा के लिए खतम हो गया। वह बड़े ही कोमल और भावुक स्वभाव की घो। दुनिया के दुरा और चिन्ता का उमे कोई अनुभव न था। बहना जो प्राफत का पहाड़ उग मिर पर मा गिरा तो वह उससे दव-दवाकर चूर-चूर होकर ही रह गई। उसने चारपाई पकड़ ली। साना-पीना छोड़ दिया। दिन-दिन मूमने । लगी। सास-ससुर अपने दुख का आवेग रोककर उसे समझाते, भाई और दुसरी और उसे अपने को संभालने को कहते, लेकिन जैसे उसके कानों में किसी की बात ही नहीं पड़ती। एक दिन वाप कोल्हाड़े से रात को लौट रहे थे तो उन्हें जोर की सरदी लग गई। दूसरे दिन बुखार ले पड़ गए। यह ऐसा बुखार था कि हफ्तों पड़े रहे। खांसी का अलग जोर था। जो दवा-दारू मुमकिन था किया गया। घर की ऐसी तितर-वितर हालत थी कि उनकी सेवा भली-प्रकार न हो सकती थी। छोटी बहू ने तो पहले ही से चारपाई पकड़ ली थी। बड़ी बहू को अपने दुख से ही फुरसत न थी। अकेली दुखियारी बूढ़ी क्या-क्या कैसे-कोसे करती। फल यह हुआ कि बूढ़े कुछ संभले, तो उनके दोनों ठेहुनों को गठिया ने पकड़ लिया । कुछ दिनों तक तो वह लाठी का सहारा लेकर हिलते-डुलते कुछ-कुछ चल-फिर लेते थे । फिर उससे भी मजबूर हो गए। अव प्रोतारे के एक कोने में चारपाई पर पड़े-पड़े एड़ियाँ रगड़ रहे हैं। लोग उस घर की यह बिगड़ी हालत देखते हैं और आह भरकर कहते हैं, "मोह, क्या था और क्या हो गया ।" आखिर बड़ी बहू को खयाल आया कि घर की इस दिन-पर-दिन गिरती हालत की रोक-थाम न हुई तो यह तो कहीं का न रह जाएगा। उसे अपने लिए अब सोचने ही को क्या रह गया था? उसका जीवन तो नष्ट हो ही गया। उसके साथ ही अगर यह खानदान भी नष्ट हो गया तो उसके जीवन के इस कठोर श्राप का कितना दर्दनाक परिणाम होगा? नहीं, नहीं, वह घर की बड़ी बहू है, उसे अपनी जिम्मेदारी समझनी चाहिए। सब अपने-ही-अपने दुख से कातर होकर पड़े रहेंगे, तो काम कैसे चलेगा? और अव उसके जीवन का उद्देश्य सास, ससुर, देवर और वहन की सेवा के सिवा रह ही क्या गया है ? उसके दुर्भाग्य के कारण ही तो इस घर की यह हालत हो गई है। सास, ससुर, देवर, वन, -सब-के-सव उसीके कारण तो इस हालत को पहुंचे हैं। फिर क्या अपने दुख में ही डूबकर उनके तई जो उसको जिम्मेदारी है, उसे वह भुला देगी ? नहीं, अब उसका जीवन उन्ही के लिए तो है। उनकी सेवा वह दिल पर पत्थर रखकर करेगी। दुस को चढ़ी नदी एक-न-एक दिन तो उतरेगी ही। उस दिन से जैसे वह करुणा को देवी बन गई और दुखी और जलती हुई प्रात्माओ पर वह सेवा-गुभूपा, स्नेह और भक्ति को शीतल पाया बनकर छा गई। स्नान करके बहुत सवेरे ही वह पूजा करती। फिर सास, ससुर और बहन को सेवाग्रो में जुट जाती। समुर उसको मूनी मांग, मूनी कलाई और सफेद वस्त्र में लिपटी हुई उसकी कुम्हलाई देह देखकर मन-ही-मन रो पड़ते । उनसे कुछ कहते न बनता । वह उन्हें सहारा देकर चारपाई पर से उठातो, उनका हाय- मुंह धुलाती, सामने बंठ उन्हें भोजन कराती। समुर काठ के पुतले की तरह सब करते भोर दिल में बस एक तडप का तूफान लिये, जब तक वह उनके सामने रहती, मूक होकर उसके करण मुखड़े को मोर टुकर- टुकर ताका करते। सास को कुछ सन्तोप हुआ कि चलो यह अच्छा हुआ कि बडी बहू अपने को यों कामो बुझाने रखने लगी। ऐमा करने से वह दुख को भुलाये रहेगी और उसका मन भी बना रहेगा। छोटी बहन की तो वह मो ही बन गई। पहले यह उसे बहन की तरह प्यार करती थी, लेकिन अब उसे वहन के प्यार के साथ-साय मा के स्नेह, ममता, सेवा और त्याग की भी जरूरत थी। बडी बहू ने उसे यह सब-कुछ देना शुरू कर दिया। वह उसे बच्चो की तरह गोद मे विटाकर दवा पिलाती, खिलाती, उसके कपड़े बदलती, उसके बाल संवा- रती, चोटी गूथती। फिर सिन्दूरदान उसके सामने रखकर कहती, "ले प्रय मांग तो टोकले।" यह मुनकर छोटी बहन को वोरान यांखें अपनी बड़ी बहन को भूनी मांग को मोर उठ जाती। उसके कलेजे में एक हूक उठती मोर वह डब.

डवाई अांखें एक ओर फेरती, कहती, "इसे रख दे वहन ।” बड़ी वहन उसे गोद में लेकर, क्रन्दन करते मन को काबू में करके कहती, “ऐसा न कह मेरी बहन, मेरी मांग लुट गई तो क्या हुआ ? तेरी मांग का सिन्दूर भगवान् कायम रखें। उसे ही देख-देखकर मैं यह दुख का जीवन काट लूंगी। ले, भर तो ले मांग।" छोटी बहन बड़ी बहन की गोद में मुंह डालकर फूट-फूटकर रो पड़ती। बड़ी बहन की प्रांखों से भी टप-टप आँसू की बूंदें चू पड़तीं। लेकिन अगले क्षण ही वह अपने को संभालकर कहती, "ऐसा नहीं करते, मेरी लाडली," कहकर वह उसकी आँखों को अपने आँचल से पोंछ देती । फिर कहती, "ले अव तो सिन्दूर लगा ले मेरी अच्छी . बहन।" छोटी बहन आँखों में उमड़ते हुए आँसुओं का तुफान लिये काँपती उँगलियों से सलाका उठाकर सिन्दूर की डिबिया से सिन्दूर उठाती । बड़ी बहन उस वक्त न जाने कैसा ऐंठता दर्द दिल में लिये अपनी भरी आँखें दूसरी योर फेर लेती। गोपी की भाभी को उसके पति की याद बहुत सताती। हर घड़ी उसकी भरी आंखों के सामने पति की तरह-तरह की तसवीरें झलमलाया करतीं। पूजा करने वैठती तो हमेशा यही मिनती करती, "हे भगवान्, मुझे भी उनके चरणों में पहुँचा दो !" कभी-कभी उसे अपने देवर की योर अपनी हंसी, दिल्लगी और खुशी. के ठहाकों की भी याद आती। उस समय उसे लगता कि वह सब एक सपना था। आह, यह कौन जानता था कि वह हँसी-खुशी की बातें एक दिन इस तरह हमेशा के लिए खतम हो जाएंगी और उनकी गूंज यात्मा के कण-करण में एक दर्द-भरा गीत बनकर रह जाएगी ? फिर उसे खयाल आता कि किस तरह देवर ने भाई की हत्या के कारण गोक मे पागल होकर अपने नुस को पनि चना दी। उन क्षण परवस ही उसकी पांखें छोटी बहन की ओर उठ जाती, जिसके दामन में देवर के जीवन का मुस-दुख बंधा हुम्रा या । यह देख रही है कि उनको हर तरह की सेवा-शुश्रूषा के बावजूद भी दिन-दिन वह फूल की तरह मुरझाती चली जा रही है। वह उसे हर तरह समझाने-बुझाने की कोगिय करती है, लेकिन जैसे वह कुछ समझती ही नहीं। देवर जय लौटके पाएगा, और उसे इस हालत में देगा, तो उसको क्या दमा होगी? धीरे-धीरे दुस भेलते-भेलते यह पत्थर बन गई। बहन की सेवा वह और भी जी-जान से करने लगी। उसे लगता कि वह सिर्फ उसकी वहन ही नहीं है, बल्कि उसके प्यारे देवर को प्रमून्य पमानत भी है। उत्त अमानत को रक्षा करना उसका सबसे बढ़कर कर्तव्य है। लेकिन उसकी इतनी सेवायो का कोई भी असर उसकी वहन पर पड़ता दिखाई न देता। उसका हृदय कभी-कभी एक भयावनी प्रागका से कांप उठना। वह ठाकुर की मूरत के सामने गिडगिडाकर मिनती करती, "हे भगवान्, अव तो दया कर तू इस अभागे घर पर! और अगर तुझे इतने पर भी सन्तोष नहीं, तो तू मुझ प्रभागिन को हो उठा ले और अपने कोष को शान्त कर ले।" लेकिन भगवान् ने भी जैसे अपनी कृपा-दृष्टि उस खानदान से फेर ली थी। छोटी बहन को हालत न मुधरनी थी, न नुधरी। माखिर उसको हालत जब दिन-दिन बिगडती हो गई, तो उसका भाई एक दिन उसे अपने घर लिया ले गया । समान था कि शायद हवा बदलने से, वहाँ मा-भाभी और अपनी सखी-सहेलियों के बीच रहकर, मन प्रान होने से तौरव बहलाने से वह स्वस्य हो जाए । वह तो अगनी बदी बहन को भी कुछ दिनों के लिए लिवा ले जाना चाहता था, लेकिन इस पर का उसके बिना कैसे काम चलेगा, यही सोचकर उसे न ले जा सका। पानको पर चढ़ने के पहले छोटी बहू मूव विलसफर रोगो और सास और बहन से - , उवाई अांखें एक ओर फेरती, कहती, "इसे रख दे वहन ।" बड़ी वहन उसे गोद में लेकर, क्रन्दन करते मन को काबू में करके कहती, "ऐसा न कह मेरी वहन, मेरी मांग लुट गई तो क्या हुया ? तेरी मांग का सिन्दूर भगवान् कायम रखें । उसे ही देख-देखकर मैं यह दुख का जीवन काट लंगी । ले, भर वो ले मांग।" छोटी बहन बड़ी बहन की गोद में मुंह डालकर फूट-फूटकर रो पड़ती। बड़ी वहन की प्रांखों से भी टप-टप आंसू की बूंदें चु पड़ती। लेकिन अगले क्षण ही वह अपने को संभालकर कहती; "ऐसा नहीं करते, मेरी लाडली," कहकर वह उसकी आँखों को अपने साँचल से पोंछ देती । फिर कहती, "ले अब तो सिन्दूर लगा ले मेरी अच्छी वहन ।" छोटी बहन आँखों में उमड़ते हुए आँसुग्नों का तुफान लिये काँपती उँगलियों से सलाका उठाकर सिन्दूर की डिविया से सिन्दूर उठाती । बड़ी बहन उस वक्त न जाने कैसा ऐंठता दर्द दिल में लिये अपनी भरी आँखें दूसरी ओर फेर लेती। गोपी की भाभी को उसके पति की याद बहुत सताती। हर घड़ी उसकी भरी आँखों के सामने पति की तरह-तरह की तसवीरें झलमलाया करतीं। पूजा करने वैठती तो हमेशा यही मिनती करती, "हे भगवान्, मुझे भी उनके चरणों में पहुँचा दो !" कभी-कभी उसे अपने देवर की यौर अपनी हँसी, दिल्लगी और खुशी के ठहाकों को भी याद आती। उस समय उसे लगता कि वह सब एक सपना था । आह, यह कौन जानता था कि वह हँसी-खुशी की बातें एक दिन इस तरह हमेशा के लिए खतम हो जाएंगी और उनको गूंज प्रात्मा के कण-कण में एक दर्द-भरा गीत वनकर रह जाएगी ? फिर उसे खयाल आता कि किस तरह देवर ने भाई की हत्या के कारण शोक में पागल होकर प्रान सुख की बलि चटा दी । उस क्षण बरबस ही उसकी मां छोटी बहन को पोर उठ जाती, जिसके दामन से देवर के जीवन का मुख-दुख बंधा हुना था। वह देख रही है कि उनकी हर तरह को सेवा-गुथपा के बावजूद भी दिन-दिन वह फल को तरह मुरझाती चली जा रही है। वह उसे हर तरह समझाने-बुनाने की कोशिश करती है, लेकिन जैसे वह कुछ समझती ही नहीं । देवर जब तौटक पाएगा, और उसे इस हालत में देगा, तो उनकी क्या दशा វី ? धीरे-धीरे दुस झेलने-भेलते यह पत्थर बन गई। बहन की सेवा वह और भी जी-जान से करने लगी। उसे लगता कि वह सिर्फ उसको वहन ही नहीं है, बल्कि उसके प्यारे देवर की अमूल्य अमानत भी है। उस अमानत की रक्षा करना उनका सवते बढ़कर कर्तव्य है। लेकिन उसकी इतनी सेवामी का कोई भी असर उसकी बहन पर पड़ता दिखाई न देता। उसका हृदय कभी-कभी एक भयावनी पागका से कांप उठना । वह ठाकुर को मूरत के सामने गिडगिटाकर मिनती करती, "हे भगवान्, अब तो दया कर तु इस अभागे पर पर ! और अगर तुझे इतने पर भी मन्तोष नही, तो नू मुझ प्रभागिन को ही उठा ले और अपने कोर को शान्त कर ले।" लेकिन भगवान् ने भी जैसे अपनी कृपा-दृष्टि उस खानदान से फेर ती थी । छोटी बहन की हालत न सुधरनो थो, न नुपरी। याखिर उसको हालत जव दिन-दिन बिगडती गई, तो उसका भाई एक दिन उसे अपने घर लिवा ले गया । खयाल था कि शायद हवा बदलने से, वहाँ मां-भाभी और अपनी सखी-सहेलियों के बीच रहकर, मन ग्रान होने से तबीयत वहलाने से वह स्वस्य हो जाए। वह तो अपनी बडो वहन को भी दिनों के लिए लिवा ले जाना चाहता था, लेकिन हम घर का उसके बिना कसे काम चलेगा, नही सोचकर उमे न ले जा सका। पालकी पर चढ़ने के पहले छोटी बहू खूब विलसकर रोयो और सास और वह्न से , ऐसे लिपटकर मिली, जैसे वह उनसे आखिरी विदाई ले रही हो । सनुर के परों को उसने नांतुनी से धो दिया । बूढ़े ससुर हाथों से आँखें ढककर बच्चे की तरह फूट-फूटकर रो पड़े। जौन जानता था कि सचमुब यह उसकी आखिरी विदाई थी? माँ, चाप, भाई, भौजाई ने कुछ भी उठा न रखा। रुपये-पैसे पानी की तरह वहा दिये । लेकिन हुया वहीं, जो होना था। वह शूल जो एक दिन उस कोमल प्रारण में चुभा था, उसने उसके प्राण लेकर ही दम लिया। यह खबर जब सास-ससुर और बहन को मिली, तो उनकी क्या हालत हुई, इसका वर्णन नहीं हो सकता। यह तो कुछ वही हुआ जैसे उनके दिल के नासूर में एक तीर और पा लगा। पाँच जेल में शुरू-शुरू में गोपी के वाप उससे हर महीने एक वार मिलते रहे। फिर जब वह चलने-फिरने से मजबूर हो गए, तो उसके ससुर और साला वरावर उससे मिलने जाया करते । गोपी हर वार अपने मां-बाप और भाभी के बारे में पूछता, घर-गिरस्ती के बारे में पूछता। वे कुछ गोल-मोल उसे बता देते। संकोचवश न गोपी अपनी औरत के बारे में पूछता, न वे बताते। कैद का दुख ही क्या कम होता है, जो वे उससे कोई दिल पर चोट पहुंचाने वाली बात कहकर उसके दुख को और - बढ़ाते? गोपी को जेल में सबकी याद सताती, लेकिन भाभी के दुख का, उसे जितनी चिन्ता यो, उतनो और किसी बात को न यो। भाभी के विधवा रूप का चित्र हमेशा उनकी प्रांतों में घूमा करता। जिस प्यारी भाभी को पाकर, जिसके हृदय के स्नेह-दान से प्राकण्ठ तृप्त होफर, • एक दिन वह निहाल हो उठा या, उसो भाभी को विषका रूप यह किन आँसों में देख सकेगा? वह नूनी मांग, वह मूनी कलाइयो, यह मुरझाया मुखड़ा कारावास के परिथम से उसने कभी जी न चुराया। मेहनती देह पर कठोर परिश्रम का भी क्या अमर पडना या? घर की तरह खाने-पीने को मिलता, पैफियी की जिन्दगी होतो, तो जैल में मी गापी जसाका. तंसा बना रहता। किन्तु धी-दूध के पाले शरीर का अब मूसी रोटी मोर ककड़-मिली दाल से पाला पडा था। ऊपर से भाभी की चिन्ता चौबीसों पहर की। गोपी मूसकर काटा हो गया। फिर भी ढांचा एक पहलवान का था । सम हुमा तेली भी एक अधेती। किन की मजाल थी कि पांस दिशा दे। फिर सोधे गोपी से किसी को उलनने का मौका भी कैसे मिलता? वह दिन-रात अपनी ही मुसीबत में उलझा रहता। इतना बड़ा जेल भी जैसे एक एकाकीपन के घेरे में ही उसके लिए सीमित बना रहा। मुकदमे के दौरान मे वह जिला अस्पताल में पड़ा रहा था। पनली की चोट सतरनाक थी। ददं जाता ही न था। छोटे अस्पताल में एक्सरे चारा या नहीं। फिर किसी के लिए कोई क्या जहमत उठाये ? जमे- तरी दवा होती रही योर मुकदमा चलता रहा । और फिर उसे हवालात में भेज दिया गया। सजा पाकर गोपी चव वनारस जिला जेल में भेज दिया गया, तो भी उसको वही हालत यो। यह वो बन उसमे इनना था कि वह सब भेले जा रहा था। बनारस जिला जेल के अस्पताल में उसके सौभाग्य से एक ऐसे लिपटकर मिली, जैसे वह उनसे आखिरी विदाई ले रही हो । सनुर के पैरों को उसने बांसुओं से धो दिया। बूढ़े ससुर हाथों से आँखें ढककर बच्चे की तरह फुट-फूटकर रो पड़े। कौन जानता था कि सचमुच यह उसकी आखिरी विदाई थी ? मां, बाप, भाई, भौजाई ने कुछ भी उठा न रखा। रुपये-पैसे पानी की तरह बहा दिये । लेकिन हुआ वही, जो होना था। वह शूल जो एक दिन उस कोमल प्राण में चुभा था, उसने उसके प्राण लेकर ही दम लिया। यह खबर जब सास-ससुर को मिली तो उनकी क्या हालत हुई, इसका वर्णन नहीं हो सकता। यह तो कुछ वही हुया जसे उनके दिल के नासूर में एक तीर और पा लगा। , और वहन पाँच जेल में शुरू-शुरू में गोपी के बाप उससे हर महीने एक बार मिल रहे । फिर जब वह चलने-फिरने से मजबूर हो गए, तो उसके ससुर अ साला बराबर उससे मिलने जाया करते । गोपी हर वार अपने मां-व और भाभी के बारे में पूछता, घर-गिरस्ती के बारे में पूछता। वे गोल-मोल उसे वता देते। संकोचवश न गोपी अपनी औरत के वा पूछता, न वे बताते । कैद का दुख ही क्या कम होता है, जो वे कोई दिल पर चोट पहुंचाने वाली बात कहकर उसके को उसके दुख बढ़ाते ? गोपी को जेल में सवकी याद सताती, लेकिन भाभी के दुख उसे जितनी चिन्ता थी, उतनो और फिमो बात की न थी। भाभी के विधवा रूप का चित्र हमेशा उसको मांसा में घूमा करता। जिस प्यारी भाभी को पाकर, जिसके हृदय के स्नेह-दान से प्राकण्ठ तृप्त होकर, एक दिन वह निहाल हो उठा था, उसी भाभी को विधवा रूप में वह किन आँखों में देख सकेगा? वह मूनी मांग, वह मूनी कलाइयां, वह मुरझाया मुखड़ा" कारावास के परिश्रम से उसने कभी जी न चुराया। मेहनती देह पर कठोर परिश्रम का भी क्या असर पडना या? घर की तरह साने-पीने को मिलता, बेफिक्री की जिन्दगी होती, तो जेल में भी गांपी जैसा-का- तसा बना रहता। किन्तु घो-दूध के पाले शरीर का अव मूसी रोटी मोर ककड़-मिली दाल से पाला पड़ा था। पर से भाभी को चिन्ता चौबीसों पहर की। गोपी मूसकर काटा हो गया। फिर भी ढांचा एक पहलवान का था। सड़ा हुमा तेली भी एक अधेली। कित को मजाल थी कि आंख दिसा दे। फिर सीधे गोपी से किसी को उलझने का मौका भी से मिलता ? वह दिन-रात अपनी ही मुसीवत में उलझा रहता। इतना बड़ा जेल भी जसे एक एकाकीपन के घेरे में ही उसके लिए सीमित बना रहा। मुकदमे के दौरान में वह जिला अस्पताल में पड़ा रहा था। पसनी को चोट खतरनाक पी। ददं जाता हो न था। छोटे अस्पताल में एक्सरे वगरा या नहीं। फिर किसी के लिए कोई क्या जहमत उठाये? जैसे- तेरो दया होती रही और मुकदमा चलता रहा । और फिर उसे हवालात मे भेज दिया गया। सजा पाकर गोपी जय वनारस जिला जेल में भेज दिया गया, तो भी उसको वही हालत थी। वह तो वल उसमें इतना वह सब झेले जा रहा था। बनारस जिला जेल के अस्पताल में उसके सौभाग्य से एक अच्छा ।

स्पाउंडर मिल गया। वह भी उसी के जवार का था। तालों में कोई खास दवा नहीं रखी जाती। वह तो कम्पाउंडर की तीमार- दारी और गोपी के खून की ताकत थी कि दर्द कम होने लगा। वहीं उसकी मेंट मटलसिंह से हुई। यह घाघरा के दीयर का नामी पहल- वान था। एक ही बिरादरी के और हमपेशा होने के कारण दोनों एक- दूसरे से पहले ही से परिचित थे । गोपी का गाँव दीयर से करीब पांच मील ही पर था। मटह एक झोंपड़ी बनाकर घाघरा के किनारे चटियल मैदानों के बीच अपने बाल-बच्चों के साथ रहता था। जवार में यह किम्बदन्ती मशहूर है कि मटरू की हाथी की तरह बढ़ती ताकत को देवकर ईप्यावश किसी पहलवान ने न जाने पान में उसे क्या खिला दिवा कि मटरू की सांस ही उखड़ गई। उसे दमा हो गया। उसने वहुत इलाज कराया लेकिन उसकी सांस की बीमारी न गई। क्या करता, विवश होकर पहलवानी छोड़ दी और व्याह करके एक साधारण किसान की तरह जीवन विताने लगा। अब उसके तीन लड़के भी थे। एक तरह से वह दीयर का राजा ही माना जाता था। किनारों के मीलों खित्तों पर उसका एकछत्र राज था। घाघरा की धारा के साथ ही उनका 'महल' उठता और गिरता था। वरसात में ज्यों-ज्यों घाघरा ऊपर उठती पाती, त्यों-त्यों मटरू की झोंपड़ी भी; यहाँ तक कि भाद में जब पावरा उफनकर समन्दर बन जाती, तो मटरू की झोपड़ी किना के किसी गांव में पहुँच जाती। और फिर ज्यों-ज्यों सैलाब उतर लगता, मटरू की झोंपड़ी भी उतरने लगती और कातिक लगते-लग फिर अपनी पुरानी जगह पर पहुँच जाती । मटरू उसी तरह 'गंगा मैय का अांचल एक क्षण को भी नहीं छोड़ता, जैसे शिशु मां का। पहले नदी के हटने पर जो मीलों रेत पड़ती, उस पर झाऊँ । सरकण्डे के जंगल उग पाते। वैशाख-जेठ में जब ये जंगल जवानी होते, जमीदार इन्हें कटवाकर बेच देते। लोग लावन और सपरल छाने के लिए खरीद लेते। फिर बरसात शुरू हो जाती और सब भोर मैलाव उमड़ने लगता। मटरू जय तक पहलवानी से मस्त रहा, उसे किसी बात को चिन्ता 'न थी। घाट से ही उसे इतनी ग्रामदनी हो जाती, इतना दूध-दही और खाने-पीने का सामान मिल जाता कि सूब मजे से दिन कट जाते। कोई ग्वाला उसे दूध दिये विना नाव पर न चढ़ता । कोई वनिया मटरू का 'कर' चुकाये विना उधर से न गुजरता । मटरू के लिए इतना बहुत था। सांने, दण्ड पेलने और घाट पर ऐंठ-ऐंठकर मंजो हुई देह दिखाने के सिवा कोई काम न था। लेकिन जब पहलवानी हट गई, गिरस्ती बस गई, तो हराम की रोटी भी टूट गई। उसने झोंपटी के आस-पास का जंगल साफ किया । समुर से बैल और हल लेकर मेतो मुरू कर दी। नदी की छोड़ी हुई कुंभारी परती जैसे हल के फाल को ही प्रतीक्षा कर रही थी। उसने वह फसल उगली कि लोगों ने दांतो तले उंगली काटी। दो-तीन साल के अन्दर ही मटरू की झोपडी वडी हो गई। दुधारू जमुना पारी भैस और एक जोडा चल दरवाजे पर भूमने लगे। मटरू का हौसला बढ़ा। उसने मेतों का विस्तार और भी बढ़ा दिया पौर अपने एक जवान साले को भी अपने पात ही बुला लिया। सूब डटकर मेहनत की और मेहनत का पसीना सोने का पानी वन फसलों पर लहरा उठा। जमीदारों के कानो यह सबर पहुंची तो वे कुनमुनाये। उन्हें स्या सवर यो कि वह उमीन भी इस तरह सोना उगल मकती है। वे तो भा मोर सरपण्डो को ही बहुत समझते थे । तीरवाही के किसानों की जीभ से भी छाती-ठाती-भर रबी की देखकर लार टपकने लगी। लेकिन उनमे मटरू की तरह साहस तो था नहीं कि मागे बढते, जगत साफ करते और फनल उगाते। वे जमीदारी के यहाँ पहुँचे पौर लम्बी- चौड़ी लगान देकर उन्होंने खेती करने के लिए जमीन मांगी। जमींदारों को जैसे मांगे ही वरदान मिले । उन्हें और क्या चाहिए था ! उन्होंने दनादन दूनी-चौगुनी रकमें सलामी ले-लेकर किसानों के नाम जमीन वन्दोवस्त करनी शुरू कर दी। मटरू को इसकी खबर लगी, तो उसका माथा ठनका। वह गांवों में जा-जाकर किसानों को समझाने लगा कि यह कैसी वेवकूफी वह कर रहे हैं। गंगा मैया की छोड़ी जमीन पर जमींदारों का क्या हक पहुँचता है कि वह उस पर सलामी और लगान लें ? जिसको जोतना-बोना हो वह खुशी से आये और उसीकी तरह जंगल साफ करके जोते-बोये । जमींदारों से वन्दोवस्त कराने की क्या जरूरत है ? वह क्यों एक नयी रीति निकाल रहे हैं और जमींदारों का मन विगाड़ रहे हैं ? .''किसानों को यह कहाँ मालूम था ? वह तो मटरू से ही सबसे ज्यादा डरते थे। सोचते थे कि कहीं मटरू ने रोक दिया तो? उन्हें क्या मालूम था कि मटरू उनका स्वागत करने के लिए तैयार है। जब उन्हें मालूम हुआ तो उन्होंने पछताकर पूछा, “अब तो सलामी और लगान तीन-तीन साल की पेशगी दे चुके, मटरू भाई ! पहले मालूम . होता तो..." "अब भी कुछ नहीं दिगड़ा है," मटरू ने समझाया, "तुम लोग अपनी रकम वापस मांग लो। साफ कह दो कि हमें जमीन नहीं लेनी । यही होगा न कि एक फसल न वो पाओगे। अगले साल तो तुम्हें कोई रोकने वाला न होगा। गंगा मैया की गोद सब किसानों के लिए खुली पड़ी है। वहां भला वरती की कोई कमी है कि खामखाह के लिए तुम लोगों ने ले-दे मचा दी। यह याद रखो कि एक बार अगर जनींदारों को तुमने चस्का लगा दिया तो तुम्ही नहीं, तुम्हारे वाल-बच्चे भी .. हमेशा के लिए उनके शिकंजे में फंस जाएंगे। उनको लोभ की जीभ सुरसा की तरह बढ़ती जाएगी और एक दिन सवको निकल जाएगी। इसके उलटा अगर हम लोग सनमत रहे और जमींदारों का मुंह ने ३२ ताककर सुद हो उस धरती पर अपना अधिकार जमा लें तो ये जमी- दार हमारा कुछ नहीं बिगाड़ सकते । गंगा मैया पर कोई उनका प्रावाई हरू नहीं है । उसके पानी की ही तरह उसको धरती पर भी हम सबका बरावर हक है। अपने इस स्वाभाविक हक को जमीदारों का समझना खुद अपने गले पर ही छुरो चलाना है । तुम लोग मेरा कहा मानो और मेरा पूरा-पूरा साथ दो। देखेंगे कि जमीदार हमारा क्या बिगाड़ लेते हैं ?" किसानों ने बहाने बनाकर जमीदारों से रुपये वापस मांगे तो वे मुस्कराये । जमीदार को तहवील मे पड़े रुपये की वही हालत होती है, जो सर्प के मुह मे पड़े चूहे की। चूहा लास ची-चो करे, एटछपटाये, लेकिन एक बार मुंह में फंसकर निकलना असम्भव । बेचारे किसान भी ची-चीं करने के सिवा कर ही क्या सकते थे ? जमीदारी ने डांटकर भगा दिया। कोई रसीद-वसीद तो थी नहीं, किसान करते भी तो क्या? हो, इसका परिणाम इतना अवश्य हुया कि दूसरे किसानो ने जमीन बन्दोवस्त कराना बन्द कर दिया। इस तरह आमदनी रुकते और किसानों को जमीन लेने से विचकते देख, जमीदारों के गुस्से का ठिकाना न रहा । पता लगाने पर जब उन्हें मालूम हुआ कि मटरू इसकी तह मे है, तो एक दिन कई जमीदारो ने इकट्ठा हो, मटरू को दुला भेजा। मटरू दीयर में अभी तक जगल के एक दोर की तरह रहा था। जमींदारों की यह हिम्मत न थी कि उसे सोधे तौर पर रेडे । जवार में यह धाक जमी थी कि मटरू पहलवान के पास सैकड़ो लठत है। वह जब चाहे दिन-दहाड़े लुटवा सकता है । यही बात थी कि सारे तार में उसका दवदवा था । उपर से गुजरने वाला कोई भी उसे बिना सलाम किये न जाता। बुलावा सुनकर मटरू मकड़ गया। उसने साफ लफ्जों में यह पह- लवा भेजा कि मटरू किसी जमीदार का कोई प्रासामी नहीं है। जिसे गरज हो, वही उससे आकर मिले । ऐसे मौकों पर काम लेना ज़मींदारों को खूब पाता है । उन्होंने खूब पढ़ा-लिखाकर अपने एक चलते-पुर्जे कारिन्दे को मटरू के पास भेजा। कारिन्दे ने सूव झुककर 'जय गंगाजी' कहकर सलाम किया । फिर दोनों हाथों को उलझाता बड़ी दयनीयता से मुंह बनाकर बोला, "पार जा रहा था। सोचा पहलवानजी को जय गंगाजी कहता चलू।" सुबह का वक्त था। माघ का महीना । नदी पर गहरे भाप का दुओं उठ रहा था। चारों ओर कुहरे की झीनी चादर फैली हुई थी उसीमें सूरज की कमजोर किरनें अटककर रह गई थीं । सन-सन पछ्या वह रही थी। गेहूँ की छाती-भर उगी फसल निगाहों की सीमा तक चारों ओर झूम रही थी। कुहरे के जमे मोती उनके पत्तों पर चमक रहे थे । वालों ने दूधा ले लिया था। अब प्रोस पीकर पुष्ट हो रही थीं। मटरू गाड़े की लुगी और कुरता पहने चैलों की नादों के पास खड़ा था। कुरते की बांहे बाजु तक चढ़ी थी। दाहिना हाथ कुहनी के ऊपर तक सानी से भीगा था । अभी-अभी उसने नादों में खुद्दी मिलायी थी। आँखों तक मुंह डुबोकर बैल भड़र- भड़र की अावाज़ करते खा रहे थे । एक के पुटु पर वायाँ हाथ रखते मटरू ने निगाह उठाकर कारिन्दे की ओर देख कर कहा, 'पाट छूटने में अभी देर है। चीलम पियोगे ?" कहकर बह गड़े के पास या बैठा। कारिन्दा भी उसकी बगल में पतलों की चटाई पर बैठ गया। मटरू ने पास से खोदना उठाकर आग उकसा दी। फिर दोनों हाथ-पांव फैला- कर तापने लगे । मटरू ने आवाज दी, "लखना, जरा तमाकू-चीलम तो दे जाना" लखना मटरू का वड़ा लड़का था। उन चार साल, नंगा-घडंगा वह . एक हाथ में चिलम और दुमरे मे तमाफू लिये मोपदे से निकलकर दौड़ा- दौडा प्राकर काका के हाथ में पिलम-समाकू थमाकर वही वंह गया और उन्हीं की तरह हाय-यांव फैलाकर आग तापने लगा। मूरत की तरह सुडौल, मारले, सुन्दर वालक की ओर देखकर कारिन्दा बोला, "क्यों रे, तुझे जाड़ा नहीं लगता ?" चालक ने एक बार प्रसि भपकाकर उसकी ग्रोर देसा, फिर मुस्करा- कर सिर झुका लिया। मटरू ही बोला, "कुछ पहनता-मोहता नहीं। सोये में भी कुछ प्रोढ़ामो तो फैश देता है ।". "तुम्हारा हो तो लड़का है पहलवानजी," कारिन्दे ने लासा सुगाया। "हाँ, पांच साल पहले तक मैंने भी न समझा कि कपड़ा क्या होता है। एक लंगोट और लुगी काफी होती थी। गंगा मैया को मिट्टी मोर पानी का मसर ही कुछ ऐसा है कि सरदी-गरमी, रोग-सोग कोई पजरा नहीं पाता। क्या करूं, इस सांस की बीमारी से देह ही उखड़ गई।" कहार चिलम पर मटरू मंगारे रसने लगा। "बुरा हो उस दुस्मन का..." वीच ही में वात रोककर मटरू बोला, "छोड़ो भाई, इस बात को। तमाकू पियो । भगवान् सबका भला करें।" "हाँ, नाई," चिलम को मुंह लगाते कारिन्दा बोला, "मादमी हो तो तुम्हारी तरह, जो दुश्मन का भी नता ही मनाये।" कहकर कारिन्दा चिलम मुलगाने लगा। "किस गांव के रहने वाले हो? कायस्य मालूम होते हो ?" मटरू ने पूछा। "हाँ, रहने वाला तो बालूपुर का है, लेकिन काम जिन्दापुर के जमींदार के यहाँ करता हूँ। धुएं का सुरसुरा छोड़कर मतलव पर आकर कारिन्दे ने साफ-साफ ही कहा, "मुना था जमीदार ने .तुम्हें - बुलाया था, तुमने जाने से इन्कार कर दिया।" मटरू के माथे पर बल पा गए। उसने तीखी दृष्टि से कारिन्दे को ओर देखकर कहा, "हम किसी के तावे हैं, जो..." "नहीं, भाई, नहीं, मेरा मतलब वह नहीं था," कारिन्दा वीच ही में वोल उठा, "कौन नहीं जानता कि तुम राजा आदमी हो। तुमने अपने लायक ही यह काम किया। लेकिन वहाँ सुनने में यह भी पाया था कि सब जमींदार, जिनका दीयर में हिस्सा है, मिलकर तुम्हारे नाम एक बहुत बड़ा खित्ता लिख देने की सोच रहे हैं । तुम'' "लिखने वाले वह कौन होते हैं ?" मटरू ताव में आकर बोला, "यहां तो सिर्फ गंगा मैया को अमलदारी है। उनके सिवा तो मैंने आज तक किसी को जाना नहीं। और सुन लो, तबीअत चाहे तो उनसे कह भी देना कि दीयर में कोई जमींदार या जमींदार का बच्चा दिखाई पड़ गया तो विना टांग तोड़े न छोड़गा।" "अरे भाई, तुम तो बेकार गुस्सा हो रहे हो। मुझे क्या पड़ी है यह सव किसी से कहने की ? यों ही बात चली तो मैंने कह दी। यह भी सुनने में आया था कि पहलवानजी चाहें तो सलामी और लगान की रकम में भी उनका हिस्सा ले कर दिया जाए..." मटरू हँस पड़ा। फिर आँखें चढ़ाकर बोला, "मटरू पहलवान हराम की नहीं खाता। गंगा मैया के सिवाय उसने किसी के सामने कभी हाथ नहीं फैलाया। देखेंगे कि अब किस तरह जमीदार किसी कित्तान से सलामी और लगान लेते हैं और यहां की जमीन पर कब्जा दिलाते हैं ! मर्द को वात एक होती है ! गंगा मैया की सौगन्ध लेकर कहता हूँ, लाला कि..." "भाई, मैं तो गुलाम प्रादमी ठहरा | भला तुम जैसे राजा यादमी के सामने कुछ कहने की हिम्मत ही कैसे कर सकता हूँ ? जमींदारों का जूता सीधा करते ही उमर मेरी बीत गई। बुरा न मानना. ये जमींदार बड़े जालिम, शैतान होते हैं। तुम जैसे सीधे-सादे अादमी के . लिए उनसे उझलना ठीक नहीं। यह ऊंच-नीच, भूठ-सच, मकर. फरेब, कुछ नहीं देखते। अमलों के साथ रोज का उनका उठना-बैठना होता है । भला तुम उनसे कैसे पार पायोगे? फिर कागज-पत्तर पर भी उनका नाम दरज है। कानून-कायदे के पैतरे में ही वह तुम्हें नचा मारेंगे।" "कानून-कायदे की बात यह घर बैठे वधारा करें। मुझे कोई परवाह नहीं। मैं तो यही जानता हूँ कि यह धरती गंगा मैया की है। जो चाहे, पाये, मेहनत करे, कमाये, साये। जमींदारों ने अगर इधर प्रांस उठायी तो मैं उनकी प्रासें फोड दूंगा। कहाँ रखा था कायदा-कानून उनका अब तक? मैंने मेहनत की, फसल उगायो, तो देखकर दौत गड गए। चले हैं अब जमीदारी का हक जताने ! प्रायें न जरा हल कांधे पर लेकर ! दिल्लगी है यहाँ खेती करना ! भोले किसानो को वेरमूफ बना कर रुपये ऐंठ लिये । बेचारे वे मेहनत करेंगे और मसनद पर बैठे गुलछरें उड़ाएंगे तुम्हारे जमीदार । यहाँ मैं नहीं चलने दूंगा यह सब ! उनसे कह देना कि यहाँ गंगा मैया को अमलदारी है। किसी ने पाव बढ़ाये तो देखते हो न वह धारा! एक को भी जान न बचेगी. "जामो, प्रव घटहा खुलेगा।" कारिन्दा अपना-सा मुंह लेकर उठ खड़ा हुआ । मटरू बडबड़ाये जा रहा था, "हूँ, चले हैं गगा मैया की आती पर मूंग दलने..." दीयर में मटरू और उसके लठतों से पार पाना मुमकिन नहीं, यह जमीदार भी जानते थे पार पुलिस भी । यह बिलकुल वैसा ही था, जैसे जान-बूझकर सौप के दिल में हाथ डालना । ' मीलों लम्बे-चौड़े भाऊं और सरकण्डे के घने जंगलों के बीच कोई सुतवस रास्ता न था। अजनबी कोई वहाँ कहीं पड़ जाए. तो फंसा रह जाए। जान-बूझे लोग ही जंगल के बीच से होकर पाट वक जाने या भ टेढ़ी-मेढ़ी, बीहड़, द्रश्य और अद्रश्य पगडण्डी को जानते थे। फिर भी शाम होते किसी की हिम्मत उस पर चलने की न होती। लोगों का तो यह भी कहना था कि उन जंगलों में कितने ही डाकुओं के गिरोहों के अड्डे हैं। वहाँ मटरू से लोहा लेने का मतलब जान गंवाने के सिवा कुछ न था, सो मौके की बात समझकर जमींदार कला काछ गए; पुलिस से सांठ-गांठ चलती रही और मौके की तैयारी होती रही। हमेशा की तरह जेठ चढ़ते-चढ़ते फसल काट-कूट, दाँ मिसकर मटरू ने अनाज और भूसा ससुराल पहुंचा दिया। बाल-बच्चों को भी भेज दिया। खानावदोशी के दिन सिर पर पा गए थे। क्या ठिकाना कर गंगा मैया फूलने लगें। रात-रात-भर में परोसों पानी बढ़ता है। हहराती हुई धारा से बचकर झोंपड़ी ऊपर हटाना जितनी जल्दी का काम था, उतना ही जोखिम का भी। वैसी हालत में बाल-बच्चों को साथ रखना ठीक न होता । छुटी देह लेकर मटरू रहता था। ससुर तो उससे भी चले आने को कहते, लेकिन मटरू को जब तक नदी की हवा न छुए, नींद न पाती थी। उसकी स्वच्छन्द आत्मा को गंगा मैया को लहर एक क्षण को छोड़ना सह्य न था। कुएं का पानी उसे रुचता न था। अब की एक वात और मटरू ने कर डाली। उसने जवार में यह खवर भेज दी कि जो चाहे झाऊँ और सरकण्डा काट कर ले जाए; जमी- दारों से खरीदने की कोई जरूरत नहीं। गंगा मैया के धन पर सबका बराबर अधिकार है। चारों ओर से किसानों, मजदूरों और गरीबों ने जुटकर हल्ला बोल दिया। जिसे देखो वही सिर पर भाऊ या सरकण्डे लिये भागा जा रहा है। जमींदारों ने यह सुना तो जल-भुनकर रह गए। हजारों के घाटे. का सवाल ही नहीं था, बल्कि हर साल की एक मुस्तकिल आमदनी की मदद खतम होने जा रही थी। उन्होंने पुलिस से राय ली कि क्या

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- तीन बार मटरू को झोंपड़ी हटानी पड़ने लगी। जोरों से पानी बढ़ा पा रहा था। घण्टे में दस-दस, वीस-बीस हाय डुबो देना मामूली बात थी। दिन को तो कोई बात न थी, पर रात को मटरू सो न पाता। नदी का यह हाल, कौन जाने कब झोंपड़ी डूब जाए ? मटरू बैठा-बैठा टक-टक चमकते पानी की ओर देखा करता। ऊपर वादल गरजते, विजली कड़कती। नीचे धारों की हहर-हहर भयंकर आवाज गूंजती। रह-रहकर अरारों के टूटकर गिरने का छपाक-छपाक होता रहता। झींगुरों की कर्णभेदी सीटियाँ और मेढकों की टर्र-टर्र चारों दिशाओं में लगातार ऐसे गूंज रही थी, जैसे उनमें प्रतियोगिता छिड़ी हो। चारों और छाये घने अन्धकार में कभी इधर, तो कभी उधर भक से कुछ जल उठता। और मटरू बैठा-बैठा 'गंगा मैया' का यह विकराल रूप देखकर सोचता कि जो मां स्नेह से भरकर बेटे को छाती का दूध पिलाती है, वही कभी गुस्सा होकर किस तरह वेटे के गाल पर थप्पड़ भी मारं देती है। सावन चढ़ते-चढ़ते मटरू की झोंपड़ी किनारे एक गांव के पास आ लगी। ये दिन मटरू को वेतरह खलते । उसे ऐसा लगता जैसे गुस्से में आकर मां उसे खदेड़ती जा रही हो और धमकी दे रही हो कि "अगर पकड़े गए, तो छठी का दूध याद करा दूंगी !" उसे तो क्वार से शुरू होने वाले दिन अच्छे लगते, जब आगे-मागे मां भागती होती और पीछे- पीछे वह स्नेह और श्रद्धा के हाथ फैलाये उसे पकड़ने को दौड़ता होता कि कब पकड़ ले और उसके प्रांचल में मुंह छिपाकर, विह्वलता में रोकर उससे पूछे, "माँ इतने दिन तुम नाराज़ क्यों रहीं ?" मां-बेटे का यह भाग-दौड़ का खेल हर साल होता। कभी मां दौड़ाती तो बेटा भागता; कभी वेटा दौड़ता तो मां भागती। इस खेल में कितना मजा पाता था! आखिर नदी जब समुन्दर बन गई और कहीं भी किनारे मटरू के लिए जगह न बच गई तो लाचार हो, मां का दामन छोड़कर, उसे ४० कगार के गांव में झोपही सड़ी करनी पड़ी। रियोग के इन दिनों मटरू मांखों में ग्रामू भरे कगार पर वंठा घण्टों धारा के रूप ने फहराते मां के भांचल को निहारा करता । तूफानी वेग से धारा यांतो उचलतो-कूदती, प्रलय का शोर करती भागती जाती। बीच-बीच में कही-कहीं काले बुंदकों की तरह उभरकर नस अदृश्य हो जाते। कही भेवर में पडकर कोई पेड़ का तना इस तरह नाचने लगता से कोई उंगलियों पर चक्र नचा रहा हो। मटरू के मन में एक बालक की तरह उठता कि वह धारा में कूदकर उसे छीन ले और अपनी उंगलियों पर उसे नचाता धारा में किलोल करे। मां की दाक्ति से बेटे की शक्ति क्या कम है ? कभी किती झोंपड़ी को बहते जाते देखता तो तडपकर कहता, "मां यह तूने च्या किया? किसी बेटे का बसेरा उजाडते तुझे दर्द न लगा ? ऐसा गुस्सा भी क्या मा?" वस्ती को हवा उसे अच्छी न लगती, जैसे हरदम उसका दम घुटता रहता। जंगली फूल को तरह वस्तो मे पाकर यह मुरझाया-मुरझाग- सा रहता । सीमाहीन उस मैदान, उम साफ हवा, उस नरम मिट्टी, उस मुक्त धूर और उस स्वच्छन्दता के लिए उसके प्राण तडपते रहते। कभी- कमी तो यह इतना पयराता कि उनके जी में याता कि धारा में कूद पड़े भोर इतना तैरे, इतना तैरे कितन-मन ठण्डा हो जाएगा मोर फिर पारामों की सेज पर ही सो जाय । लेकिन तभी उसे अपनी प्यारी बीवी और नन्हे-मुन्ने बच्चों की याद मा जाती और वह जाने कैसा मन लिये कगार पर ये उठ जाता । उस समय ऐसा लगता कि कही वहाँ बैठे रहकर वह सचमुच न कूद पड़े। इन दिनों कभी-कभी बहुत भाग्रह पर वह ससुराल जाता तो एकाप रात से पादान रह पाता । उसे लगता जैसे मां उसे पुकार रही हो। वह लौटकर जब तक मण्टों धारा में न लोट लेता उसे चंन न मिलता।

उस रात कगार पर बैठे-बैठे उसकी पलकें जव झपकने लगी, तो उठकर वह झोपड़ी के दरवाजे पर पड़ी पत्तलों की चटाई पर लेट गया। बड़ी सुहानी, ठण्डी हवा चल रही थी । धाराएँ जैसे लोरी गा रही यी और अरार रह-रहकर ताल दे रहे थे । मटरू को बड़ी मीठी नींद पा गई। नींद में ही अचानक उसे ऐसा लगा मानो छाती पर. कई मन का बोझ सहसा या पड़ा हो। उसने कसमसाकर आँखें खोली तो छाती पर टार्च की रोशनियों में दो नौजवानों को चढ़ा पाया। हाथों का सहारा ले वह जोर लगाकर उठने को हुया तो जंजीरें झनझना उठी। मालूम कि हाथ बँधे हुए हैं। घबराकर उसने इधर-उधर देखा तो चारों ओर भाले से लेस कान्सटेवल दिखाई पड़े। उसकी समझ में सवा: गया। गुस्से और नफरत से कांपता वह दांत पीसकर रह गया। जब से वह कगार की वस्ती में पाया था पुलिस उसके पीछे पड़ी थी। ग्राज मोका पाकर उसने उसे दबोच लिया था। रात-ही-रात मटरू को हथकड़ी-बड़ी चढ़ाकर जिले की हवालात में पहुँचा दिया गया, और गाँव वालों पर इतनी सख्ती की गई कि कोई चूं तक न कर हुमा कि -- सका। रपट-मुकदमा, गर-गवाही, सब-कुछ पहले ही से तैयार था.। मटरू के ससुर खबर लगने पर थाने पहुंचे तो उन्हें मालूम हुआ कि मटरू डाके के अपराध में गिरफ्तार हुआ है। पुलिस ने मटरू की झोपड़ी पर छापा मारकर जो जेवर और माल बरामद किये हैं, वह जिन्दापुर के. जमींदार नथुनीसिंह के हैं; एक-एक कर पहचान लिये गए हैं। जल्द ही कचहरी में मुकदमा खड़ा होगा। इस्तगासा तैयार हो रहा है । जिसने यह सुना आँख फाड़कर रह गया--कोई दुःख से तो कोई आश्चर्य से। लेकिन उस दौरान में जवार पर पुलिस की सख्ती इतनी चढ़ा दी गई थी कि किसी की हिम्मत पुलिस या जमींदार के खिलाफ. एक बात भी जवान पर लाने की न थी। शोर यह मनाया गया कि मटरू मरदार के गिरोह के करीब पचाम डाकू फरार हैं। पुलिस उन्हीं- को गिरफ्तारी के लिए सरगरमी से दौड़ लगा रही है। दूसरे-तीसरे दिन यह भी अफवाह गांवों में फंउ जाती कि मात्र दो डाकू गिरफ्तार हुए तो प्रान तीन । एक अजब हडकम्प मचा दिया पुलिस ने चारों मोर। महीनों रख-रचकर सब हस्वे हथियार के साथ जो मुकदमा तैयार किया गया था उसमे बाल को साल निकालने पर भी कोई नुक्स निकात लेना मुश्किल था। फिर छोटे से लेकर जिले के बड़े-बड़े अधिकारियों तक को मुट्ठियां इतनी गरमा दी गई थी कि सव-के-मय कुछ भी खड़ा- का-सडा निगल जाने को तैयार थे। डिप्टी साहब को कचहरी से होकर मुकदमा सेशन मुपुर्द हमा। साले और ससुर से जो भी करते बना उन्होंने किया । लेकिन नतीजा वही निकला जो पहले ही सौल-मुहर बन्द करके रख दिया गया था। मटरू को तीन साल की सख्त सजा हो गई और तीन दिन के अन्दर हो रात को गाड़ी से बनारस जिला-जेल को उसका चलान भेज दिया गया। छः भाभी का जीवन.एक साधना का जीवन बन गया । कलेजे में पति की चुनती हुई यादें दवायें वह रात-दिन अपने को किमी-न-किसी काम में युभाये रसती । पासों से टप-टप पून मामू जाने से रोक दिया था। लड़की को पढ़ने-लिखने की भला क्या ज़रूरत ? फिर सब कुछ भूल गई । अब, जब वक्त काटे न कटता, तो उसने फिर सालों बाद उस अक्षर-ज्ञान को धीरे-धीरे ताजा किया। घर में रामा- यण के सिवा और कोई किताव न थी। वह उसी पर अभ्यास करने लगी। एक चौपाई में उसके मिनटों बीत जाते । अक्षर-अक्षर मिलाकर वह शब्द बनाती । फिर कई वार उसे दुहराकर आगे बढ़ती। फिर दो शब्दों को एक साथ कई वार दुहराकर आगे बढ़ती । इस तरह एक चरण खतम करके वह पूरे चरण की वीसों वार दुहराती। इसमें वक्त कटने के साथ ही, कुछ भी न समझते हुए भी, उसे एक आध्यात्मिक सुख और सान्त्वना मिलती। उसका खयाल या कि धीरे- धीरे अभ्यास हो जाने पर वक्त काटने का एक अच्छा साधन हाथ लग जाएगा । दुखी प्राणी के लिए वक्त काटने की समस्या से बढ़कर कोई समस्या नहीं होती। और वह तो ऐसी दुखी प्राणी थी, जिसे सारी जीवन ही इस तरह काटना था । विधवा के जीवन में सुख के एक क्षण की भी कल्पना कैसे की जा सकती है ? सुवह सास-ससुर के उठने के पहले ही वह सारा घर बुहारकर साफ कर लेती। हलवाहा पाता, तो उससे भैंस दुहवाती, उसे नांदों में चलाने के लिए भूसाघर से भूसा निकालकर देती। फिर ज़रूरी सामान देकर उसे खेत पर भेज देती। पुराना हलवाहा बड़ा ही नमक हलाल था । उसी पर आजकल पूरी खेती का भार छोड़ दिया गया था। घर के आदमी की तरह वही सब-कुछ करता और भाभी को पूरा-पूरा हिसाव देता। ससुर की नींद खुलती तो वे बहू को पुकारते । भाभी जल्दी-जल्दी. आग तैयार कर, हुक्का भरकर उनके हाथ में थमा आती। सास ने कुछ इस तरह देह छोड़ दी थी कि भाभी को ससुर के सभी काम 'सव लोक- लाज छोड़कर करने पड़ते थे। चारपाई पर ही वह उनके हाथ-मुह धुलाती, दूध गरम करके - ४६ पिलाती ! फिर हुक्का ताजा कर, उनके हाय में दे, दवा को मालिस करने लगती । समुर कहर-कहरकर हुक्का गुडगुड़ाते रहते । कहीं किसी जोड़ पर भाभी का हाय जरा जोर से लग जाता तो चीखकर कहते, "अरे बहू जरा संभाल कर मल । मोह, माह !" फिर वह घर के काम में लग जाती । फटकने पछोड़ने, कूटने-पीसने से लेकर खिलाने-पिलाने तक के सभी काम यह करती। सास विनूर- विमुरकर किसी कोने ची रोती रहती या टुकर-टुकर भाभी को काम करते निहारा करती। भाभी अब पहले की भाभी नहीं रह गई~न वह रूप, म रंग, न वह जवानी, न देह । अब तो जैसे पहले की भाभी को एक चलती-फिरती छाया रह गई। दुबली-पतती, मूसी देह, वेग्राव, पीला चेहरा, उदास, मानुप्रो में सदा तरती-सो पोखें, मुरझाये, सिले-से होठ, रोएं-रोएँ से असे करणा टपक रही हो, एक जिन्दगी की जैसे मुरदा तसवीर हो, पा जंचे एक मुरदा जिन्दा होकर चल-फिर रहा हो। हाय, वह क्यो जिन्दा है ? माह, उसके भी प्रारा उन्हीं के साथ क्यों न निकल गए ? बहन ने कसा पुण्य किया था कि उसे भगवान् ने बुला लिया। हाय, यह कैसी महापापिन है कि नरक भोगने को रह गई? इस नरक से वह कर उवरंगो, इस यातना से प्राखिर कब हट- कारा मिलेगा? महीनों बाद व्यया की बरसाती धारा जव धीरे-धोरे साधारण होकर शान्त हुई और जव भाभी धीरे-धीरे सव-कुछ करने रहने की अभ्यस्त हो गई, तो उसके जीवन को व्यर्थता और असीम निराशा, जो पागों के चूर-चूर हो जाने से प्रायी थी, उक भी धीरे-धीरे कुन्द होने लगे। मर भाभी कभी-कभी कुछ सोचती भी, मव कभी-कभी उसके हृदय में जीवन के उन मुखों के अंकुर फिर उमरते-से अनुभव होते, जिन्हें एक . * बार वह अपने जीवन में फल-फूल से लदे देख चुकी थी। पति की याद से भी अब कभी-कभी उसके मानस में उन्हीं कोमल भावनाओं का स्फुरण होता, जो उसके सहवास में उसे मिला था। अब बार-बार उसके मन के सात परदों में दवे स्थान से सवाल उटता, "क्या जीवन में दे दिन फिर कभी न पाएंगे? क्या वह सुख फिर कभी न मिलेगा ? वह, वह.." और उसके मुंह से एक दवी हुई ठण्डी सांस निकल जाती, प्राणों में जाने कैसी एक ऐठ और दर्द महसूस होता। वह कुछ व्याकुल- सी हो उठती। काश... ऐसे अवसर पर जाने कैसे उसका व्यान अपने देवर की मोर चला जाता । वह सोचती कि उसकी हालत भी तो ठीक उसीकी जैसी होगी। उसका भी तो सुख का संसार उसीकी तरह उजड़ गया। उसके मन में भी तो आज ठीक उसीकी तरह के भाव उठते होंगे। वह भी तो उसीकी तरह तड़पता होगा कि काम और तभी जैसे कोई उससे कह जाता, "वह तो मर्द है। जैसे ही वह जेल से लौटेगा, उसका दूसरा व्याह हो जाएगा और फिर उसकी एक नयी जिन्दगी शुरू होगी, जिसमें पहले ही-सा सुख और वह मर्माहत हो उठती । उसके होंठ विचक-से जाते, जैसे उसमें एक नफ़रत, एक गुस्से का भाव भर उठता हो और यह प्रश्न उसकी आत्मा की तड़प में लिपटकर उठ पड़ता हो, "ऐसा क्यों होता है ? यह अन्तर क्यों? क्यों एक को अपनी उजड़ी दुनिया को गले से लिपटाये तिल-तिल जलकर राख हो जाने को विवश होना पड़ता है और दूसरे को अपनी उजड़ी दुनिया फिर से वसाकर सुख-चैन से जिन्दगी बिताने का अधिकार मिलता है ?" और वह तिलमिला उठती! नहीं, ऐसा नहीं होना चाहिए, हरगिज नहीं। उसे भी अधिकार होना चाहिए कि... ये कैसी बातें उठने लगी हैं मन में ? भाभी को जब होश पाता, तो उसे स्वयम् पर आश्चर्य होता। अभी कल की ही तो बात है कि - पति के वियोग में तड़पकर वह मर जाना चाहती थी। लेकिन पान माज यह क्या हो गया है कि वह एकदम बदल गई है, ऐसी-ऐसी बातें सोच रही है, ऐसे-ऐसे विचार मन में उठते हैं, ऐसी-ऐसी इच्छाएं पन्तर में सिर उठा रही हैं। और यह अभी कल को ही अपनी मन.स्थिति को यात सोचकर अपने ही मामने प्राज समिन्दा हो उठती है। कही किमी को माज उसके मन में उठने वाले भाय मालूम हो जाएं, तो? नहीं, नहीं ! सोग क्या कहेंगे? लोग उसे कितनी पापिन समझेगे? लोग उसे यया- क्या ताना देंगे कि पति को मरे अभी दो-तीन साल भी न पौर यह कलमुंही ऐसी-ऐसी बातें सोचने लगी। यह विधवा जीवन की पवित्रता मागे क्या कायम रख सकती है ? मोह, जमाना कितना बिगड़ गया है देखो न, कल की विधवा पाज... और वह एक विवशता और व्याकुलता से तडप उटती। वह इस अपने मन को क्या करे ? वह कैसे इन अपवित्र भावों को दवा दे ? यह ठाकुरपर में पाजकल प्रार्थना करती कि 'भगवान्, उसे शक्ति दे कि वह कुल-रीति पर कायम रहे, मन में उठती अपवित्र भावनाओं पर काबू पा सके, विधवा-जीवन पर कलंक न लगने दे !लेकिन भगवान से उसे वह शक्ति नहीं मिल रही थी। मन हरिण की तरह जव-तब छलांगें मारने लगता । वह बरबस पति को याद करती। सोचती, कि जब तक उनकी याद वाकी रहेगी, यह न डिगेगी। लेकिन अब उसको याद भी धुंधली पड़ती जा रही थी। बहुत कोशिश करके भी वह बहुत देर तक उन यादों में न विता पाती। न जाने कब यादें अपना रूप बदल देती ! व्यया उत्पन्न करने वाली यादें उन सुखों को याद दिलाने वाली बन जाती, जो उसे अपने पति से मिले थे। और फिर उन सुखों को याद करके उन्हें फिर से प्राप्त करने की चाह मन में उठ पड़ती। अन्तर एक मीठो सिहरन से भर जाता। और जब उसे इसका खयाल पाता, तो वह अपने को धिक्कारने लगती। इस तरह एक अजीव रहस्य- मय नन्द उसके मन में बस गया। और वह जान-बूझकर वह 10मं0--४ भी अनुभव करती रही कि कौन पक्ष जीत रहा है, कौन हार रहा है। अव पहली हालत उसकी न रही। अब घर के काम-काज, सास- ससुर की सेवा में उसकी वह तन्मयत्ता न रही। अंब जैसे वह सब याचे मन से करती, अब कभी-कभी सास किसी काम में देर होने पर उसे डाँटती तो वह जवाब भी दे देती, "दो ही हाथ तो हैं मेरें। क्यों नहीं तुम्हीं कर लेती ? लौंडी की तरह रात-दिन तो खट रही हूँ। फिर भी यह नहीं हुआ, वह नहीं हुआ ! सुनते-सुनते मेरे कान पक . गए..." साल सुनती, तो बड़बड़ाने लगती। अनाप-शनाप जो भी मुंह में आता, कह जाती। भाभी में अभी उससे जवान लड़ाने की हिम्मत न थी। फिर भी होंठों में बुदबुदाने से अब वह भी वाज न आती। धीरे-धीरे दोनों चिड़चिड़ी हो गई और झल्ला-झल्लाकर बातें करने लगीं । एक दुखमय शान्ति, जो इतने दिनों छायो रही घर में, वह अब खतम हो गई । अव तो टोले-मुहल्ले वालों के कानों तक भी इस घर की वात पहुंचने लगीं। ये बातें दो अतृप्त बीमार जिन्दगियों की थीं-चिढ़, गुस्से, विवशता और व्यर्थता से भरी। एक दिन सुबह भूसाघर से खांची में भूसां निकालकर दालान में खड़े हलवाहे को देने भाभी आयी, तो खांची हाथ में लेते हलवाहे ने कहा, "छोटी मालकिन, कई दिनों से एक बात कहने को जी होता है, बुरा तो न मानेगी?" कपड़े पर पड़े भूसे के तिनकों को साफ करती भाभी वोली, "क्या. चात है ? कह न । तुझे कुछ चाहिए क्या ?" मालकिन," हलवाहे ने आंखों में नंगी करुणा और होठों पर सच्चा मोह लाकर, वड़ी ही सहानुभूति के स्वर में कहा, "मालकिन, . ५० वह मांखों पापको यह देह देखकर मुझे वडा दुस होता है। अभी मापकी उम्र ही क्या है ? इसी उम्र से इस तरह प्रापको जिन्दगी कैसे कटेगी? इतने हो दिनों में प्रापको मोने को देह कैसे मारी हो गई ! मालियन, प्रापको इम रूप में देखकर मुझे बहुत दुस होता है," कहते-कहते ऐसा लगा कि वह रो देगा। भाभी के चेहरे की उदास छाया मोर भी कालो हो गई। वह गोली, "क्या करें रिलरा, नाम्य के पागे किसका बम चलता है ? विधाता ने सेनुर मिटा दिया, करम फोड दिया, तो अब इसी तरह रो-धोकर के तो जिन्दगी काटनी है । तू दुम्ब काहे को करता है । करम का साथी कौन होता है ? विधाता ने ही जब मेरा मुस न देखा गया, तो..." पर मोचन रसती सिसक पडी। एक ठण्डी सांस लेकर विलरा बोला, "यह कैसा रिवाज है मालिकन, मापकी बिरादरी का ? इस मामले में तो हमारी ही विरादरी मच्छी है, जो कोई वेवा इस तरह अपनी जिन्दगी खराव करने को मजबूर नहीं । मेरी ही देखिए न । भवा भाभी को छोड गुजर गए तो भोजी का च्याह मुभासे हो गया। मजे से हमारी जिन्दगी कट रही है। और माप ऊंची बिरादरी में क्या पैदा हुई कि मापको जिन्दगी ही खराब हो गई. "क्या कहूँ मालिकन, मन में उठता तो है कि छोटे मालिक से मगर आपका न्याह हो जाता..." "विलरा!" ऊंची विरादरी का महकार भमक पा, "फिर कभी यह यात जवान पर न लाना! जिस कुल का तू नमक खाता है उसको मर्यादा का खयाल न कर, ऐसी बात फिर मुंह से निकाली तो मैं तेरी जवान सींच लूंगी ! तुझे क्या मालूम कि इस कुल की विधवा जिन्दा जलकर चिता में भस्म हो जाती है, लेकिन "जा, हट जा, तू!" कह- कर भाभी अपनी चारपाई पर मा गिरी मोर पसाफफककर रोने लगी। सास-ससुर अभी तो रहे थे। काफी देर तक भाभी रोती रही।

. यह रोना एक अपमानित पात्मा के अहंकार का था। नीच, कमीने आदमी ने जिस तार को छेड़ा था, वह कितनी ही बार आप-ही-पाप भी मंकृत हुमा था, भाभी ने उसका स्वाद भी मन-ही-मन लिया था। लेकिन वह तार इतना गोपनीय, इतना अहंकारों और संस्कारों के बीच छिपाकर, सावधानी ने रखा गया था कि उसे कभी कोई छू पाएगा, इसकी कल्पना नानी को न थी। उसो तार पर उस नीच कमीने आदमी. में जो उंगली रख दी थी। यह कोई साधारण अपमान को वात. थी ? भाभी को बुब्धता हो तदन में फूटी थी। इस क्षुब्धता की एक बार जहाँ उन कमोने की गरदन पर थी, वहीं उसकी दूसरी धार स्वयं भानी की गरदन पर, इसका ज्ञान भाभी को था। वरना वह कमीना क्या चप्पड़ खाये दिना जा पाता? रजपूतनी के खून की वात थी कि कोई व्हा? भाभी उन दिन से और सावधान हो गई, ठीक उसी तरह जैसे एक वार दोरी पनड़ जाने पर चोर । अब वह विलरा के सामने भी न जाती। सान को सुवह ही जगा देती। उसीके हाथ दूध निकालने के लिए धूंचा और चलाने के लिए भूसा नी मिजवाती। कोई भी हो, आखिर मरद हो तो है । किसी मरद के सामने विधवा न जाना चाहे, तो इसकी प्रशना कौन न करे ? जो भी हो उत्त कमीने अादमी की उस वात ने भाभी की गोपनीय पापमय कल्पनात्रों को परवान चढ़ने के लिए एक मजबूत आधार दे दिया। जाने-अनजाने भाभी के खयाल में देवर अब उभर-उभर आता। उसको सैकड़ों वातों की याद ऐसा-ऐसा रूप लेकर आती कि भाभी को शंका होने लगती कि देवर कहीं सचमुच तो उसे न चाहता था । : मातुन, निप्कलंक, निश्छल, पवित्र लेह पर वासना की झीनी चादर मोड़ाते किसको कितनी देर लगती है ? फिर भाभी का भूखा मन तो भाजपाल ऐसी ही कल्पनाओं में मंडराया करता। कभी-कभी तो उसे उन कमीने की बिरादरी से भी ईप्या हो जाती कि काश:"तभी फिर जाने कहाँ से कौन कठोर पुरुप मा, भाभी पर इतने कोड़े लगा देता कि भाभी खून-खून हो छटपटा उठती। भाभी की कलनामो को भी सेज कांटों की थी, जिस पर उसकी देह पल-पल निदती रहती। सात बनारस जिला जेल पहुंचते ही मटरू की सौस को बीमारो उखह गई। तीन-चार दिन तक तो किसी ने उसकी परवाह न की, पर जब वह विलकुल लस्त पड़ गया, कोई काम करने काबिल न रहा, तो उसे अस्पताल में पहुँचा दिपा गया। उसका विस्तर ठीक गोषी को बात में था। । डास्टर कियो दिन प्राता, किसी दिन नहीं पाता। विशेषकर कम्पाउंडर ही सब-कुछ करता-धरता। यह वडा ही नेक प्रादमी था। उसको सेवा-सुथूपा से ही मरीज प्राधे अच्छे हो जाते थे। फिर यहाँ साना भी कुछ अच्छा मिलता था, थोडा घी-दूध भी मिल जाता था, • मापात से भी छुटकारा मिल जाता था। यही सुविधा प्राप्त करने के लिए बहुत से तन्दुरुस्त रोगी भी असताल में पड़े रहते। इसके लिए डापटर को और बाहर की थोडी मुट्ठी गरम कर देना ही काफी था। जाहिर है कि वैसा घुशहाल कैदी ही कर सकते थे। एक हफ्ते तक मटरू येहाल पड़ा रहा। पर मूसी सांसी सांसता और पीड़ा के मारे 'ग्राह-ग्राह किया करता। बलगम मूस गया था।

"एक साला है तो । मगर उसमें वह हिम्मत नहीं। फिर भी चुप- बाप न बैठेगा। थोड़े दिन की मेरी शागिर्दी का असर उस पर कुछ-न- तोपड़ा ही होगा; देखना है।" "यह तुमसे मिलने पाएगा न; पूछना।" AN - धीरे-धीरे मटर और गोपी का सम्बन्ध गहरा हो गया । दोनों के समान स्वभान, समान दुख, समान जीवन ने उन्हें अन्तरंग बना दिया । उनका जीवन अब एक-दूसरे के साथ-सहारे से कुछ मजे में कटने लगा। एक ही बैरक में वे रहते थे। जहाँ तक काम का सम्बन्ध था, उनसे किसी को. कोई शिकायत न थी, इसीलिए किती अधिकारी को उन्हें छेड़ने की जरूरत न थी। मटरू की 'गंगा मैया' जेल भर में मशहूर हो गई। उसे छोटे-बड़े सब बहुत ही धार्मिक आदमी समझते और जव मिलते, 'जय गंगा मैया' कहकर जुहार करते । एक तरह की जिन्दगी उन दीवारों के अन्दर भी पैदा हो गई। हनी-दिल्लगी, लड़ना-झगड़ना, ईष्या-द्वेष, रोना-बाना वहाँ भी तो वैसे ही चलता है, जैसे बाहर। कब तक कोई वहाँ के समाजी जीवन से कटा-हटा, अलग, अकेले पड़ा रहे ? सैकड़ों के साथ सुख-दुख में घुल-मिलकर रहने में भी तो आदमी को एक सन्तोष मिल जाता है। अव मटरू और गोपी के बीच कभी-कभी जेल के बाहर भी साथ ही रहने-सहने की वात उठ पड़ती। दोनों में इतनी घनिष्ठता हो गई यी कि जुदाई का खयाल करके भी वे वेचैन हो उठते । मटरू कहता, "जेल से छूटकर तुम भी मेरे साथ रहो, तो कैसा ? गंगा मैया के पानी, हवा और मिट्टी का चला तुम्हें एक बार लग भर जाए, फिर तो मेरे भगाने पर भी तुम न जायोगे । फिर मुझे तुम्हारे-जैसे एक साथी की भी जरूरत है। जमींदार अब जोर-जबरदस्ती पर उतर आए हैं। न जाने मुझे वहां से हटाने के बाद उन्होंने क्या-क्या किया है ?

नौटने पर फिर वे मुझसे भिडेंग । मव को उनका मुकाबला करना है। ववार के किसान इस वीच फूट न गए तो मेरा साथ देंगे। मैं चाहता कि गंगा मैया की छाती पर मेड़ें न खिचें । में सिंचना मसम्भव भी है, क्योंकि 'गगा मैया' को धारा हर साल सब-कुछ वरावर कर देती है। होई निशान वहाँ कायम नहीं रह सकता । जमीन छोड़ने पर जो जितना आहे, जोते-बोये । जमीन को वहाँ कभी कोई कमी न होगी; जोतने वालों की कमी भले ही हो जाए। वहां सवका वरावर अधिकार रहे । जमींदार उसे हड़पकर, यहाँ अपनी जमीदारी कायम करके लगान वसूल करना वाहते है, यही मुझे पसन्द नही । गगा मैया भी क्या किसी को जमींदारी ने है गोपी ?" "नही भया, यह तो सरासर उनका अन्याय है । ऐसा फरके तो एक दिन यह भी कह सकते हैं कि गगा मंया का पानी भी उनका है, जो नीना, नहाना चाहे, कर चुकाये।" "हाँ, सुनने में तो यह भी पाया था कि पाट को वह ठेके पर उठाना चाहते हैं । कहते हैं, घाट उनकी जमीन पर है । वहाँ से जो पार-उतराई मेवा मिलता है, उसमें भी उनका हक है। मेरे रहते तो वहां किसी को हिम्मत ऐसा करने की नहीं हुई। अब मेरे पीछे जाने क्या-क्या उन्होंने किया हो। सो भया, वहाँ अपना एक मोची बनाकर इस अन्याय का मुकाबला करना ही पड़ेगा। अगर तुम मेरे साथ रहो तो मेरा बल दूना हो जाएगा।" "सो तो मैं भी चाहता हूँ। लेकिन तुम्हें तो मालूम है कि घर में मैं ही भकेला यच गया हूँ। बाबू को गठिया ने अपाहिज बना दिया। मूढ़ी मां और विधवा भाभी का भार मेरे हो सिर है। ऐसे में घर कसे छोड़ा जा सकता है ? हो, कभी-कभार तुम्हे सौ-पचास लाठी की जरूरत हुई तो जरूर मदद करूंगा। तुम्हारे इत्तिला-भर की देर रहेगी । यों दो- चार दिन पा-ठहरकर गगा मैया का जल सेवन जरूर साल में दो-चार वार करूंगा। तुम भी माते-जाते रहना । माँ सर-समाचार तो बराबर तता ही रहेगा।" मटरू उदास हो जाता । वह सचमुच गोपी.पर जान देने लगा था किन उसके घर की ऐसी परिस्थिति जानकर भी वह कौसे अपनी बातः र जोर देता ? वह कहता, "अच्छा, भाई, जैसे भी हो हमारी दोस्ती यम रहे, इसकी हमें वरावर कोशिश करनी चाहिए।" इधर बहुत दिनों से मटरू या गोपी की मिलाई पर कोई नहीं पाया. था । दोनों चिन्तित थे । दूर देहात से कामकाजी · किसानों का बनारस आना-जाना कोई मामूली बात न थी। जिन्दगी में बहुत हुना, तो सालों से इन्तजाम करने के बाद वह एक बार काशी, प्रयागः का तीरय करने निकल पाते हैं। उनके पास कोई चहबच्चा तो होता नहीं कि जव हुग्रा निकल पड़ें, घूम आएँ। फिर उन्हें फुरसत भी कव मिलती है ? एक दिन भी काम करना छोड़ दें, तो खाएँ क्या ? और खाने को.. हो भी तो विटोरने और खेत खरीदने की लालसा से उन्हें. छुटकारा कैसे मिले? गोपी के ससुर पहले दो-दो, तीन-तीन महीने पर एक बार प्रा. जाते थे। लेकिन जब से उनकी एक बेटी विधवा हो गई थी और दूसरी चल. बसी थी, उनकी दिलचस्पी विलकुल खतम हो गई थी। खामखाह की दिलचस्पी के न वह कायल थे, न उसे पालने की उनकी हैसियत ही थी। दूसरा कौन पाता? मटरू के ससुर बिलकुल मामूली आदमी थे। जिन्दगी में कभी वाहर जाने का उन्हें अवसर ही न मिला। हां, साले से कुछ उम्मीद जरूर थी। लेकिन वह भी जाने किस उलझन में फंसा है, जो एक बार भी खबर लेने न पाया। अगले महीने में चन्द्रग्रहण पड़ रहा था । मटरू और गोपी को पूरा विश्वास था कि इस अवसर पर जरूर कोई-न-कोई मिलने पाएग

ग्रहण में काशी-नहान का बड़ा महत्व है । एक पप, दो कान।
ग्रहण के एक दिन पहले इसवार था। नुबह से ही मिनाई र
मची यो । विन कंदियों को मिलाई होने वाली यो, उनके नाम र
पुकार रहे पे मोर उन्हें फाटक के पान बहन में बैठा रहे है। जिला
नाम पुकारा जाता, उसका चेहरा खित जाता; वितका न पुकारा सार
उदास हो पाता । सन से एक सुसो का पोर-सा उठ रहा ।
मटरू और गोपी पांखों में उदास हसरत तिवरक के रहर यो
थे। उन्हें पूरी उम्मीद थी कि आज कोई-न-कोई उनने भी मिलने रण
पाएगा। लेकिन जब सब पुकार खतम हो गई और लत्त
भाषा, वो उनकी मांखों की हसरत मूक रुदन करके मिट गई।
"देखो न," घोड़ी देर बाद गोपी उसे रोकर बोला, "धारक
नहीं पाया।"
"हाँ," उसांस लेता मटरू बोला, "गंगा मैया की मरजो.."
तभी उनके वार्डर ने भागते माकर कहा, "चलो, चनो, कर
पान, तुम्हारी मिलाई प्रायी है। जल्दी करो, पन्द्रह मिनट तो है
बीत गया।"
मटरू ने सना, तो उसका चेहरा खिल उग। तभी मोनोरे पर
में फूठा, "मेरो मिलाई नहीं भायो वार्डर साहव ?"
"नहीं, भाई नही, माती तो बताता नहीं ?" पाडेर ने मला
पहनपान को प्रापी है। हम तो मम थे कि इनके पासिंग
कोई है ही नहीं, मगर आज मालूम हुमा फि..."
"मेरे साय गोपी भी चलेगा," मटरू ने जात र कहा, “यह
भी तो मेरा रिश्तेदार है।"
"जेलर साहब के हुकुम बिना यह कैसे हो सकता है ? सो, देर
करके वक्त सराव न करो," वार ने मजबूरी जाहिर को।
"अरे जमादार साहब, इतने दिनों बार तो कोई शितने प्राता है।
बोन महीने महीने प्राने वाला है हमारा ? मेहरबानी करो। इसरे

. - लिए तो तुम्हीं जेलर हो," मटरू ने विनती की। "मुश्किल है, पहलवान, वरना तुम्हारी बात. खाली न जाने देता। चलो, जल्दी करो। मिलने वाले इन्तजार कर रहे हैं," वार्डर ने जल्दी मचागी। "जाम्रो भया, मिल पामो। हमारी ओर का भी कोई सर-समा- चार हो तो पूछ लेना । क्यों मेरी खातिर..." "तुन चुप रहो," मटरू ने झिड़ककर कहा, "जमादार ताइब चाहें तो कार सकते हैं, मैं तो यही जानू।" कहकर मटरू वार्डर की ओर बड़ी ही दयनीय आँखों से देखकर बोला, "जमादार साहब, इतने दिन हो गए यहीं रहते, कभी आप से कुछ न कहा। आज मेरी विनती सुन लो। गंगा मैया तुम्हें बेटा देंगी।" बार्डर निपूता था। कैदी उसके वेटा होने की दुना करके उससे बहुत कुछ करा लेते थे। यह उसकी बहुत बड़ी कमजोरी थी। वह हमेशा यही सोचता, जाने किसकी जीभ से भगवान् बोल पड़ें। वह धर्म- सकट में पड़कर बोल पड़ा, "अच्छा, बोल पड़ा, "अच्छा, देखता हूँ। तुम तो चलो; या मेरी शामत बुलायोगे ?" "नहीं जमादार साहब, वात पक्की कहिए। वरना मैं भी न जाऊँगा। अब तक कोई मिलने न पाया, तो क्या मर गया ? गंगा - - गया..." "अच्छा भाई अच्छा; तुम चलो। मैं अभी मौका देखकर इसे भी पहुँचा देता हूँ। तुम लोग तो एक दिन मेरी नौकरी लेकर हो. दम लोगे।" कहकर वह आगे बढ़ा। मटरू ससुर का पैर छू चुका, तो ताला उसका पैर छूकर उससे लिपट गया। बैठकर अभी सर-समाचार शुरू ही किया था कि जाने किधर से आकर गोपी भी धीरे से उनके पास बैठ गया। मटरू ने कहा, "यह हरदिया का गोपी है । वही गोपी-मानिक । सुना है नाम ?" "हाँ, हाँ," दोनों बोल पड़े। । " "यह भी यहाँ मेरे ही साथ है । इसके घर का कोई सर-समावार?" मटरू ने पहले दोस्त को ही बात पूछो । "सब ठीक ही होगा। कोई खास बात होती तो सुनने में प्रातो न?' चूहे ने कहा, "मच्छा है मपने जवार के तुम दो आदमी साथ- साय हो। परदेस में अपने जर-जवार के एक मादमी से बढकर कुछ नहीं होता।" "अच्छा पूजन," मटरू ने साले की ओर मुसातिब होकर कहा, "तू दीयर का हाल-चाल बता। गगा मैया को धारा यही वह रही है, या कुछ इधर-उधर हटी है ? "इस साल तो पाहुन, धारा बहुत दूर हटकर यह रही है। जहाँ हमारी झोपड़ी थी न, उससे माघ कोस पौर यागे । इतनी बडिया चिकनी मिट्टो अब की निकली है पाहुन कि तुम देखते सो निहाल हो जाते । इस साल फसल बोई जाती तो कट्ठा पोछे पाँच मन रबी होती। मैं वो हाथ मलकर रह गया। जमीदारों ने पच्छिम की ओर कुछ षोता-वोया है। उनकी फसल देखकर छाती पर सांप लोट जाता "किसानों ने भी..." "नहीं पाहुन, जमींदारों ने चढ़ाने को तो बहुत कोशिश की, लेकिन तुम्हारे टर से कोई तयार न हुमा। जमींदारों की भी फसल को भला मैं बचने दूंगा! देखो तो क्या होता है। सव तौरवाही के किसान सार साये हुए हैं। तुम्हारे जेल होने का सबको सदमा है। पुलिस वालों में भी मामूली तंग नहीं किया है। जरा तुम छूट तो जामो फिर देखेंगे कि कैसे किसी जमींदार के याप की हिम्मत यहां पर रसने को होती है। सप तैयारी हो रही है पाहुन !" "शावारा !" मटरू ने पूजन की पीठ ठोककर कहा, "तू तो बड़ा शातिर निकला रे। मैं तो समझता था कि तु बड़ा डरपोक है।" "गंगा मैया का पानी पीकर और मिट्टी देह में लगाकर भी क्या - था, कोई अांखें साफ कर रहा था, कोई नाक छिनक रहा था, किसी, मुंह से कोई बोल न फूट रहा था। पलट-पलटकर वे फाटक की ओर नी ही ओर मुड़कर देखते हुए जाते अपने सम्बन्धियों को हसरत-भरी रों से देख रहे थे। आठ दो बरस बीतते-बीतते गोपी के यहां मेहमानों का आना-जाना शुरू हो गया । गोपी अभी जेल में है, उसके छूटने में करीब दो साल की देर है। यह जानकर भी वे मेहमान न मानते । वे सत्याग्रहियों की तरह धरना डाल लेते । अपाहिज बाप से वे विनती करते कि वे तिलक ले लें। गोपी के छूटकर आने पर शादी हो जाएगी। ये दिन मां की खुशी के होते । उसकी आंखों में चमक और चेहरे पर. खुशी की आभा छा जाती। वह दौड़-धूपकर मेहमानों के खातिर-तवाजे का इन्तजाम करती । बहू को आदेश देती, यह कर, वह कर, । लेकिन . भाभी के ये दिन बड़ी अन्यमनस्कता के होते । एक झंझलाहट के साथ वह काम करती। चेहरा एक गुस्से से तमतमाया रहता। आँखों से चिन- गियां छूटा करतीं। सास से सीधे मुंह वात न करती । बरतन-भाड़े को इधर-उधर पटक देती। कभी-कभी दवी, जवान से यह भी कहती कि "अभी जल्दी क्या है । उसे छूट तो आने दो।" तब सास फटकार देती, "उसके माने, न आने से क्या होता है ? शादी तो करनी ही है. ठीक हो जाएगी तो होती रहेगी। दूढ़े की ज़िन्दगी का क्या.ठिकाना ६१ उसके रहते ठीक तो हो जाए।" भाभी सुनती तो उसके दिल-दिमाग में एक तूफान-सा उठ बड़ा होता । सारा शरीर जैसे एक विवश झोष ने फुक उठता। प्राते-जाते पैर जमीन पर ऐसे पटकती, मानो सारी दुनिया को चूर-चूर कर देगी। होठ विचक जाते, नधुने फूल उठते और जाने पागलो-सी क्या-क्या भुन- भुनाती रहती। सास यह सब देखती, तो मुन्नाम होकर कहती, "तेरे ये लच्छन अच्छे नहीं हैं । तुझे यह क्या हो जाता है ? बेवा को दिमाग ठण्डा रखना चाहिए । काहे पर अब तू मुझे दिमाग दिसाती है ? जो भगवान के पर से लेकर आयो यी, यही तो सामने पडा है। चाह रोकर भोग, चाहे हम- कर । इससे निस्तार नहीं। भले से रहेगी, तो दो रोटी मिलती रहेगी। नहीं तो किसी पाट को न रहेगी। सब तेरे मुंह पर थकेंगे।" "थूकेंगे क्या ?" भाभी भी जल-भुनकर कह उठती। "बाप-भाई मर गए हैं क्या? उनके कहने से न गई, उसोका तो यह नतीजा भुगत रही हूँ । जहाँ जांगर तोड़ेंगी, वही दो रोटी मिलेंगी। रोएँ वह जिनके जांगर टूट गए हों।" अपने और अपने मदं पर फन्तो सुनकर सास जल-भुनकर कोयला होकर चीख पड़ती, "अच्छा, तो चार दिन से जो तू कुछ करने-घरने लगी है, उसीसे तेरा दिमाग इतना चढ़ गया है ? तू क्या समझती है मुझे ? किसी के हाथ का पानी पीने वाले कोई और होंगे। मुझसे तू चढ़- बढ़ के वातें न कर । मेरे हाय अभी दूट नहीं गए हैं । तू जो भाई-बाप पर इतराई रहती है, तो वहां जाकर भी देख ले । करमजलियो को कहीं ठिकाना नहीं मिलता । अभी तुझे क्या मालूम है ? माटे-दाल का भाव मालूम होगा, तव समझेगो कि कोई क्या कहती थी । मैं इस बूढ़े के रोग से मजबूर है, नहीं तो देसतो कि तू कैसे एक बात जबान से निकाल लेती है।" इस झगड़े का प्रातिरो नतीजा यह होता कि या तो भाभी अपने - E- अखिों में आंसू भर आते, "अव मेरा वह जमाना न रहा । खेती-गृहस्थी सब बिखर गई । अव कौन बैसा मान-प्रतिष्ठा का आदमी मेरे यहाँ रिश्ता लेकर आएगा, कौन उतना तिलक-दहेज देगा?" "मन छोटा न करें बाबूजी, अभी कुछ नहीं बिगड़ा है। देवर पाया नहीं कि सब सँभाल लेगा। सब-कुछ फिर पहले की ही तरह जम जाएगा। तब तो कितने ही पाकर नाक रगड़ेंगे। आप जरा सन्न से तो काम लें बाबूजी, अभी जल्दी भी काहे की है। वह पहले छूटकर तो आएं।" "हां, वह यही सब सोचकर तो किसी को जवान नहीं देता। लेकिन तेरी सास है कि जान खाये जाती है। कहती है, लड़का दुहेजू हुना, ज्यादा मोन-मेख निकालने से काम न चलेगा। उसे जाने काहे की जल्दी पड़ी है, जैसे हम इतने गये-गुजरे हो गए कि कोई रिश्ता जोड़ने ही हमारे यहाँ न पाएगा। कुछ नहीं, तो खानदान का मान तो अभी है । नहीं बहू, जल्दी में मैं किसी ऐसी जगह न पडूंगा। उसके कहने से क्या होता ससुर ककड़ कर बोलते। . - उन्हीं दिनों एक दिन शाम को एक अजनबी नादमी ने पाकर गांव की पच्छिमी सीमा के पोखरे के कच्चे चबूतरे पर बैठे हुए लोगों में से एक से पूछा, "गोपी सिंह का मकान किस ओर पड़ेगा ?" गरमी की शाम थी। अंधेरा झुक आया था। आस-पास घने वागों के होने के कारण वहीं कुछ गहरा अन्धकार हो गया था। खलिहान से छूटकर किसान यहाँ सीधे प्राकर, नहा-धोकर चबूतरे पर बैठ गए थे और दिन-भर का हाल-चाल सुन-सुना रहे थे। कइयों के तन पर भीगे कपड़े थे और कश्यों ने अपने भीगे कपड़े पास ही सुखने को पसार दिए थे। कई तो अभी पोसरे में गोता ही लगा रहे थे। उनके खांसने- खैखारने और 'राम-राम' कहने और सीढ़ियों से पानी के हलकोरों के टकराने की आवाजें या रही यो। वानों ने शिडियों का स्तर उठ रहा या। हवा बन्द घो। लेकिन पोसरे को दांतों पर फिर भी कुछ ठण्डक थी। सवाल सुनकर सबको निगाहें उठ गई। पोखरे में पड़े हमों ने भी गरदने चढा-बढ़ाकर देसने की कोशिश की। एक ने दी पूछा भी कि कौन है, किसका मकान पूछ रहा है। अजनवी महज एक लुगी पहने है। परीर मोटा-नगडा है। छाती पर काले घने बालो का साया साफ दोस रहा है। गले में काली विलडी है। चेहरा बड़ी-बड़ी घनी, मूंछ-दादो से ढंका है । पालों में उरूर कुछ रोब और गरूर है। सिर के बाल चटा की तरह गरदन तक सटके 20 जिससे सवाल पूछा गया था, उसने गोपी के मकान का पता बता कर पूछा, "कहाँ से माना हुआ है "काशीजी से पा रहा हूँ। वहाँ जेल में था," अजनवी कहकर प्रागे बढ़ने ही वाला था कि एक मादमी से जल्दी में पूछ बैठा, "अरे भाई सुना था कि गोपी भी काशीजी के ही जेल में है। यहाँ उसमे तुम्हारी मेंट हुई थी क्या ?" अजनयो ठिठक गया। बोला, "हाँ, हम साय-ही-साय थे । उसीका समाचार बताने माया हूँ।" सुनकर सभी-के-गभी उठकर उसके चारो पोर पड़े हो गए। पोसरे के मन्दर से भी सभी भीगी देह लिये ही लपकमाए । कइयों ने एक- साथ ही उत्सुक होकर पूछा, "कहो या उसका समाचार; अच्छी तरह ये तो है वह?" "हां, मजे में है । किसी बात को चिन्ता नहीं," कहता हुमा मजा नवी मागे बढ़ा, तो सनी उसके साथ हो लिए। जिनके कपड़े ते हुए थे, उन्होंने उठा लिए । एक दौड़कर समाचार देने चला गया) "उसकी छाती में चोट लगी थी मैया, ठीक हो याम:

"हीं।"
"और भी गांव के कई नादमी उसके साथ जेल गये थे। कुछ उनका
समाचार?"
"वह सब वहां नहीं हैं । शायद सेण्ट्रल जेल में होंगे।"
"तो तुम दोनों साथ ही रहते थे ?"
"हाँ"
"तुम्हें क्यों जेल हुई थी भैया? काहाँ के रहने वाले हो तुम ?"
"जमींदारों से दोयर की जमीन को लेकर झगड़ा हुआ था। तुम
लोगों को मालूम नहीं क्या ? ढाई-तीन साल पहले की बात है। मटरू
पहलवान को तुम नहीं जानते ?"
"अरे मटरू पहलवान ?" सभी चकित हो बोल पड़े, "जय
गंगाजी !"
"जय गंगाजी!"
"सव मालूम है भैया, सब । उसकी धमक तो कोसों पहुंची थी। तो
तुम्हें सजा हो गई थी। कितने साल की ?"
"तीन साल की ।"
"गोपी की सजा तो पांच साल की हुई थी न ? कब तक छुटेगा ?',
बेचारे को घर-गिरस्ती बरबाद हो गई, जोरू भी मर गई।"
"क्या?" चकित होकर मटरू बोल पड़ा।
"तुम्हें नहीं मालूम ? उसको जोरू तो साल भीतर ही मर गई।
गोपी को किसी ने खवर नहीं दी क्या ?"
"खबर होती तो क्या मुझसे न कहता? यह तो बड़ी बुरी खबर
सुनाई तुमने।"
"कोई अपने अख्तियार की बात है भैया ? भाई मरा, जोरू मर
गई। बाप को गठिया ने ऐसा पकड़ लिया है कि मालूम होता है कि
दम के साथ ही छोड़ेगी। जवान वेवा अलग कलप रही है। क्या वताया
जाए भैया? गोटी बिगड़ती है, तो अकल काम नहीं करती। एक

उमाना इनका वह या, एक माज यह है। याद माता है, तो कलेगा कचोटने लगता है। इधर से पायो।" दूर में हो रोने-पीने को प्रावाज माने लगी। मा-मामी खबर पाते ही रोने लगी थीं। पुरानी रातों को रिमूर-निमूरकर वह रो रही थीं। मुनकर मुहल्ले की जो पोर इक्ट्ठी हुई थी, उन्हें समझाकर चुप करा रही थी। वाप किसी तरह उठकर दीवार का सहारा लेकर बैठ गए थे। उनका मन भी चुपके-चुपके रो रहा था।" किसी ने एक मटोला लाकर बूढ़े को चारपाई के पास डाल दिया, किसी ने दिया लाकर ताक पर रख दिया। मटरू ने बढ़े के पर पकड़कर पा लागों किया । बड़े ने गद्गद् होकर पाशीप दिये । फिर पूछा, "मेरा गोपी कंसा है ?" भौर फफक-फफककर रो उठे। कितने ही लोग अपने प्यारे गोरी का समाचार सुनने के लिए यहाँ मा इकठे हुए। मटरू जैसे गोहत्या करके बैठा हो, ऐमा चुप, भरा- भरा पा। लोग भी प्रापस में कुछ-न-कुछ कहकर ठभी सांसें मेने लगे। कुछ बूदे को समझाने लगे, "तुम न रोमो काका ! तुम्हारी नीयत तो ऐसे ही सराव है, मोर खराब हो जाएगी। इतने दिन बीते, थोड़े बाकी हैं, कट हो जाएंगे। जिम भगवान् ने बुरे दिन दिसाये, वही पच्छे भी दिखाएगा।" "पानी-वानी तो पियोगे, न भैया?" एक ने पूछा। "परे, पूछता क्या है रे ? जल्दी गगरा-तोटा सा। पका-मांदा है" एक बूढ़े ने कहा, "हाप-मुंह पोकर ठण्डा लो, बेटा। ग्राज रात ठहर जामों। बेचारों को जरा तसल्ली हो जाएगो।" मटरू के मुंह से वोल ही न फूट रहा था। वह तो कुछ योर ही सोचकर चला या। उसे क्या मालूम था कि वह कितने ही व्यया के सोये हुए तारों को छेड़ने जा रहा है। पोरे पोरे, काफी देर में, व्यथा का उफनता हुआ दरिया शान्त हुमा ।

एक-एक कर लोग हट गए तो बूढ़े ने कहा, "वेटा, अव मुंह-हाथ धो ले। तेरा आदर-सत्कार करने वाला यहां कोई है नहीं''कुछ खयाल.न फरना । तेरी बड़ाई हम सुन चुके हैं। तू समाचार देने आ गया, तो हमा दुखियों को कुछ सब हो.गया । भगवान् तुझे सुखी रखें ! हाथ-मुंह धोकर मटरू बैठा तो. अन्दर से मां ने लाकर गुड़ और दही का शरवत-भरा गिलास उसके सामने रख दिया। मटरू ने उसके भी पैर छुए। बूढ़ी आँचल से वहते अाँसुओं को पोंछती वहीं खड़ी हो . गई। देख ही शरवत पीकर मटरू जैसे अपने ही से बोलने लगा, "कोई चिन्ता की बात नहीं है माई, गोपी बहुत अच्छी तरह है। हम तो एक ही साथ खाते-पीते, सोते-जागते थे। एक ही बात का उसे दुख रहता है, कि घर का कोई समाचार नहीं मिलता।" "क्या करें बेटा? जो आने-जाने वाला था, उसे तो तुम रहे हो। पहले उसके सास-ससुर चले जाते थे। इधर वे भी मोटा गए हैं। क्या मतलब है उन्हें अब हमसे ?" सिसकती. हुई ही बूढ़ी वोली। "अरे, तो चिट्ठी-पतरी तो भेजनी थी !" "हमें क्या मालूम वेटा ! "तो चिट्ठी-पतरी वहां जाती है ?" "हाँ-हीं, क्यों नहीं, महीने में एक चिट्टी तो मिलती ही है।" "तो कल ही लिखकर पठवाऊँगी।" "अव रहने दो। मैं भेजवा दूंगा। तुम लोगों को कोई चिन्ता करने की जरूरत नहीं। हाँ, सुना कि उसकी जोरू भी नहीं रही। उसे तो कोई खबर भी नहीं।" "मैंने ही मना करा दिया था बेटा, दुख की खबर कैसे कहलवाती ? वहां तो कोई समझाने-बुझाने वाला भी उसे न मिलता।" "अरे, जोरू का क्या ?" बूढ़ा बोला, "वह छूटकर तो आये । यहाँ तो कितने ही रोज़ नाक रगड़ने आते हैं। फिर ऐसी बहू ला. दूंगा कि..." । ७० . "नहीं काका, अब की तो उसकी गादी में करवाऊँगा। तुम बीमा प्रादमी पाराम करो। मैं सब-कुछ कर सूगा । उसे पाने तो दो। तुम क्या मालूम कि उसे मैं अपने छोटे भाई से भी ज्यादा मानता हूँ। मी काका, यह भी मुझे कम नही मानता। हो, उसकी भाभी तो मच्छी है। उसे वह बहुत याद करता है।" दरवाजे की प्राड में खडी नाभो सब मुन रही है, यह कियो को मालूम न था। बूढ़ी वोनी, "उमका प्रब क्या अच्छा और क्या बुरा बेटा ? करम ही जव दया दे गया तो क्या रह गया उसको जिन्दगी में? जब तक जिएगी, पडी रहेगी। उसके गाईन्या ने भी इधर कोई सवर न ली।" "गोती को उसकी बहन चिन्ता रहनी है । बवारा रात-दिन 'भाभी, मामी' की रट लगाये रहता है । इन दोनों में बहुत मुहम्मत घी क्या ?" मटरू ने पूछा। "अरे बेटा, बहू ऐसी प्राणी है हो । विलकुलै गज है, गऊ," चूदा बोल पड़ा, "उसीकी सेवा पर ही तो मेरा दम पड़ा है। उसको मूनी मांग देखकर मेरा कलेजा फटता है। इसी उम्र में ऐसी विपत्ति मा पड़ी पेवारी पर फिर भी वेटा, मेरे रहते उसे कोई दुस न होने पाएगा। वह मेरी बड़ी बहू है। एक दिन घर की मालकिन बनेगी। वह देवी है, देवी।" बूढो मन-ही-मन यह सब सुनकर कुड़ती रही। जब सहा न गया तो बोली, "खयका तैयार है। अभी सायोगे या.."

नो तिरवाही के किसानों में प्राकृतिक स्य ने सच्छन्दता और नाह- सिकता होती है। खुले हुए कोनों फैले मैदान, नाक और सरकण्डे के जंगल और नदी ने उनका लड़कपन में ही नम्बन्ध स्थापित हो जाता है। निडर होकर जंगलों में गाय-भैंस चराने, घाउ-लकड़ी काटने, नदी में नहाने, नाव चलाने, अखाड़े में लड़ने, भंस का दूध पीने से ही उनकी जिन्दगी गुरू होती है और इन्हींक वीच वीत नी जाती है। प्रकृति की गोद में खेलने, साफ हवा, निर्मल जल पीने, दूध-दही की इजरात और कनरस्त के शौक के कारण भी हट्टे-कट्ट, मजबूत और स्वभाव से अक्खड़ होते हैं। अनीम जंगलों और मंदानों का फैलाव इनके दिल- दिमाग में नी से स्वच्छन्दता और स्वतन्त्रता का वाव भाव बत्रपन में ही नर देता है। फिर जमींदारों की वस्ती वहां से कहीं दूर होती : है। वहां से वे इन पर वह शोर-जबरदस्ती, जुल्म ध्यादती को बांड़ नहीं चढ़ा पाठे, जो पास-पास के किसानों को उनका गुलाम बना देती है। बल्कि इसके विरुद्ध जमींदार वहां के प्रासामियों ने मन-ही-मन डरते हैं। उनकी ताकत, उनके वातावरण, उनके अक्तड़पन और मर- मिटने की साहसिकता के आगे, जमींदार जानते हैं कि उनका कोई वस नहीं चल सकता। इसीने वे उनके साथ भरसक समझौते से रहते हैं, कहीं कोई ज्यादती भी कर जाते हैं, लगान नहीं देते, या प्राधा-पांना देते हैं, तो नी नजरन्दाज कर जाते हैं, उनले भिड़ने की हिम्मत नहीं करते। पुलिस भी सीधे उनके मुकाबले में खड़े होने से कतराती है। बहुत हुआ, वह भी जब किती जमींदार ने जरूरत से ज्यादा उनकी मुट्ठी गरम कर दी, तो पुलिस ने लुक-ठिपकर, पोवे-बड़ी से एकाध को पकड़कर अपने अस्तित्व का दोष करा दिया। इससे अधिक नहीं।

ये जितने स्वच्छन्द, स्वतन्य मोर ताक्तयर होते हैं, उतने ही वय- मुर्म भी । यात-बान में लाठी उठा लेना, खून-सच्चर कर देना, एक-दूसरे से लड़ जाना, फमल काट लेना, खलिहान में भाग लगा देना या किसी को लूट लेना माये दिन की बातें होती है। दिमाग लगाकर, सोच-विचार करके वे कोई मामला तय करना जानते ही नहीं। वे समझते हैं कि हर म की दया लाठी है, यल है । विधर भागे-यागे कोई भागा, सब उनके पीछे पड़ जाते है। जिसके मुंह से पहली बात निकल गई, मब उसीको से उड़ते हैं। कोई तक, कोई बहस, कोई रातचीत, कोई सर-समझोता वे नहीं जानते । बात पर भडना और जान देकर उसे निवाहना वे जानते हैं। उनके यहाँ मगर किमी बात को का है तो यह है पल को, साहस को, मर-मिटने के भाव की। उनका नेता वही हो सकता है जो सबसे यादा बली हो, दगल मारा हो, मोर्चे पर मागे-मागे लाठियां चलायी हों, भरी नदी को पार कर गया हो, घडियालो को पछाड़ दिया हो, किमी बड़े जमीदार से भिड़ गया हो, उसे थप्पड़ मार दिया हो या सरेप्राम गाली देकर उसकी इज्जत उतार ली हो। इनकी सबसे बड़ी कमजोरी खेत और बल-भस है। खेत पर वे जान देते हैं । किसी भी मूल्य पर वे सेत लेने के लिए तैयार रहते हैं। उनकी इस कमजोरी से जमीदार अक्सर फायदा उठाते हैं, उन्हें बेवकूफ बनाते हैं। एक बैल या भैंस खरीदनी हुई तो कुण्ड बनाकर, सतू-पिसान बांध. कर निकलेंगे। मोल-भाव होगा उसी अक्खड़पन के साथ । जो दाम ये मुनासिब समझेगे, उसके अलावा कोई और दाम मुनासिब हो ही कैसे सकता है ? वे पड़ जाएंगे धरना देखेंगे; घमकाएंगे; लाठियां चमकाएंगे। वैचने वाला मान गया, तो ठीक। वरना रात-विरात व उसे खोलकर तिड़ी कर देंगे और दीयर के जंगल में उसे कहीं छिपाकर अपनी बहादुरी का पसान मुनेंगे और करेंगे। वहीं यह काम किसी भी दृष्टि से सराव नहीं समझा जाता। मटरू ने जब उन्हें दीयर के सेतो के बारे नमनाया था, तो चूंकि यह 1 एक.पहलवान, वहादुर, निडर और 'गंगा मैया के भक्त की बात थी, वे. मौन हो गए थे। फिर मटरू के जेल चले जाने के बाद जमींदारों की दुसरो वातें उनकी समझ में कैसे आती ? यहाँ तक कि जमींदारों ने उन्हें लालच दिया कि वे जहाँ चाहें, खेती करें और कुछ न दें। फिर भी दे ना कर गए। उन सवकी अब एक ही रट थी कि मटरू पहलवान जय तौटकर पाएगा और जैसा कहेगा वैता होगा। उसके पाने के पहले कुछ नहीं। पूजन ने भी चाहा था कि मटरू का काम जारी रखे । लेकिन मटरू की तरह उसमें हिम्मत और ताकत न थी कि वह अकेले झोंपड़ी बना- कर नदी के तौर पर जंगलों के बीच, जमींदारों से दुश्मनी वेसहकर रहे. और खेती करे। इसलिए उसने कोशिश की थी कि दस-बीस किसान और उसके साथ तीर पर रहने, खेती करने के लिए तैयार हो जाएं। लेकिन वे मटरू के नाम पर ही तैयार हुए थे। जैसे एक सियार बोलता है, तो सब उसी सियार की धुन में बोलने लगते हैं। उसी तरह मटरू के आने के पहले इस दिशा में कोई कदम उठाने के लिए तैयार न थे। मजबूर होकर, अपना दवदवा कायम रखने के लिए तव जमींदारों ने खुद वहां अपनी खेती का सिलसिला कायम किया था। यह काम कुछ-कुछ वाघ के मुंह में हाथ लगाने के ही बरावर था। साधारणतः वे वैसा कभी न करते । लेकिन अब परिस्थिति ही ऐसी आ पड़ी थी। वे कुछ न करते तो यह अन्देशा था कि दीयर में उनके दव जाने की बात उठ जाती और किरकिरी हो जाती। फिर सारा खेल चौपट हो जाता। सब किये-घरे पर पानी फिर जाता। सो उन्होंने वहाँ अपनी झोपड़ी खड़ी करवाई। अपने आदमी और हल भिजवाकर जोतवाया-बोवाया और तनख्वाह पर कुछ मजबुत पादमियों को रखवाली के लिए वहाँ रखा। फिर भी वह जानते थे कि जब तक तीरवाही के किसानों से उनका व्यवहार ठीक न रहेगा, तब तक कुछ वचना मुश्किल है। उन्होंने - पहले यह भी बोगिय को यो कि कम-से-कम रसयाली का जिम्मा वहां ही कोई प्रादमी ते ले, लेकिन कोई संचार नहीं हुपापा। इस तरह समोसारं को काफी सर्व करना पड़ा। यहां तक कि मगर फसल कटनर सही मुलामत घर मा जाए, तो भी उसका दाम रा से कम हो हो। फिर भी उन्होंने ना किया। दवदवा कायम रखना जरूरी पा। दवदवा न रहा, तो जमींदारी कैसे रह सकती है। फसल उगी, बढ़ो और देखते-देखते छाती छातीभर सनी हो लहरा उठी। तारवाही के किसानों ने देखा तो उनको छातियों पर सांप लोट गए। उन्हें ऐसा लगा जैसे किसी में उनके अपने सेव पर हो कसा करके यह फसल बोयो हो, जसे उनके घर से ही कोई मनान की बोरियां उठाये ले जा रहा हो, और वे विवश होकर बस देखते जा रहे हों। ऐसे ही मौके का फायदा पूजन ने उठाया। मटरू के साप सम्बन्ध के कारण उनका मान आसिर कुछ तो किसानों में हो ही गा का। उसने चुपके चुपके किसानों से वात छैड दो, "वाहर का मास्नो हमारो मांतों के ही सामने हमारी 'गगा मैया' की परतो से फसल काट ने जाए ! डूब मरने को जगह है ! पोर याद रसो, मगर एक पर भी फसल कटकर जमींदारों के घर पहुँच गई, तो उनका रिकार र जाएगा। मटरू पाहुन के पाने में अभी सालो की देर है । तर कर सारी धरती उनको कब्जे में चली जाएगी। प्रादमो के उन का चस्का लग जाने पर पड़ियाल को जो हालात होती है, यही उमोकारों को होगी। तुम लोग तव 'मटरू, मटरू' की रट लगाते रहोगे और कुछ न होगा। वैसे मौके पर मटरू पाकर ही क्या कर लेगा? जरा तुम भी तो सोचो। तुम इतना तो कर ही सकते हो फि फसल उमीदारों के पर न जाने पाए।" यह किसानों के मन की बात की। पूजन को पास उसके गर उतर गई। कई जवानों ने पूजन का साथ देने का पारा किया। ut -- एक. पहलवान, वहादुर, निडर और 'गंगा मैया' के भक्त की बात थी, वे मौन हो गए थे। फिर मटरू के जेल चले जाने के बाद जमींदारों की दूसरी बातें उनकी समझ में कैसे प्राती ? यहाँ तक कि जमींदारों ने उन्हें लालच दिया कि वे जहाँ चाहें, खेती करें और कुछ न दें। फिर भी चै ना कर गए। उन सबकी अब एक ही.रट थी कि मटरू पहलवान जव लौटकर आएगा और जैसा कहेगा वैसा होगा। उसके आने के पहले कुछ नहीं। पूजन ने भी चाहा था कि मटरू का काम जारी रखे । लेकिन मटरू की तरह उसमें हिम्मत और ताकत न थी कि वह अकेले झोंपड़ी बना- कर नदी के तौर पर जंगलों के बीच, जमींदारों से दुश्मनी बेसहकर रहे और खेती करे। इसलिए उसने कोशिश की थी कि दस-वीस किसान और उसके साथ तीर पर रहने, खेती करने के लिए तैयार हो जाएँ। लेकिन वे मटरू के नाम पर ही तैयार हुए थे। जैसे एक सियार वोलता है, तो सब उसी सियार की धुन में बोलने लगते हैं। उसी तरह मटरू के आने के पहले इस दिशा में कोई कदम उठाने के लिए तैयार न थे। मजबूर होकर, अपना दबदवा कायम रखने के लिए तब जमींदारों ने खुद वहां अपनी खेती का सिलसिला कायम किया था। यह काम कुछ-कुछ बाघ के मुंह में हाय लगाने के ही बरावर था। साधारणतः वे. वैसा कभी न करते । लेकिन अव परिस्थिति ही ऐसी या पड़ी थी। वे कुछ न करते तो यह अन्देशा था कि दीयर में उनके दव'जाने की बात उठ जाती और किरकिरी हो जाती। फिर सारा खेल चौपट हो जाता। सब किये-धरे पर पानी फिर जाता। सो उन्होंने वहां अपनी झोंपड़ी खड़ी करवाई। अपने प्रादमी और हल भिजवाकर जोतवाया-बोवाया और तनख्वाह पर कुछ मजबूत श्रादमियों को रखवाली के लिए वहाँ रखा। फिर भी वह जानते थे कि जब तक तीरवाही के किसानों से. उनका व्यवहार ठीक न रहेगा, तब तक कुछ वचना मुश्किल है । उन्होंने - ७६ पहने यह भी कोशिश को धो कि कम-से-कम रसवालो का जिम्मा वहाँ का ही कोई आदमी ले ले, लेकिन कोई तैयार नहीं हुअा था। इस तरह जमींदारो को काफी सर्च करना पड़ा। यहां तक कि अगर फसल कटकर सही- सलामत घर या जाए, तो भी उसका दाम बचें से कम ही हो। फिर भी उन्होंने वैसा किया। दवदवा कायम रसना जरूरी था। दवदवा न रहा, तो जमीदारी कैसे रह सकती है। फसल उगी, बड़ो और देखते-देखते छाती-धाती-भर पडी हो लहरा उठी। तीरवाही के किसानों ने देखा तो उनको छातियों पर सपि लोट गए। उन्हें ऐसा लगा जैसे किसी ने उनके अपने खेत पर हो कब्जा करके यह फसल बोयो हो, जैसे उनके घर से ही कोई मनान को बोरियां उठाये ले जा रहा हो, और वे विवश होकर बस देखते जा रहे हों। ऐसे ही मौके का फायदा पूजन ने उठाया । मटरू के साथ सम्बन्ध के कारण उसका मान यासिर कुछ तो किसानों में हो हो गया था। उराने चुपके-चुपके किसानों से बात छेड दी, "वाहर का आदमी हमारी माखों के ही सामने हमारी 'गंगा मंया' की धरती से फसल काट ले जाए ! डूब मरने को जगह है ! और याद रसो, अगर एक बार भी फसल काटकर जमीदारों के घर पहुँच गई, तो उनका दिमाग पर जाएगा। मटरू पाहुन के पाने में अभी सालो को देर है । तब तक यह सारी धरती उनके कब्जे में चली जाएगी। यादमी के सून का चस्का लग जाने पर घड़ियाल को जो हालात होती है, वही जमीदारों की होगी । तुम लोग तव 'मटल, मटरू की रट लगाते रहोगे और कुछ न होगा। वैसे मौके पर मटरू माकर हो क्या कर लेगा? जरा तुम नौ तो चोचो। तुम इतना तो कर ही सकते हो कि फसल जमीदारों के पर न जाने पाए।" यह किसानों के मन की बात थी। पूजन की बात उनके मन में उतर गई। कई जवानों ने पूजन का साथ देने का वादा किया । सब तैयारियां हो गई । और जद फसल तैयार हुई तो एक रात कटकर, সা पर लदकर पार पहुँच गई। रखवाले दुम दबाकर भाग खड़े हुए। जान देने की वेवकूफी वे जनींदारों के लिए क्यों करते? दूसरे दिन एक शोर उठा । एकाध लाल पगड़ी भी नुखिया के यहां दिखाई दी और फिर सब-कुछ शान्त हो गया। कहीं से कोई नुराग कैसे निलता ? सब किसानों की छाती ठण्डी हुई ची। कह दिया गया कि काटने वाले, हो-न-हो, पार से आये होंगे। नदी किनारे कई जगह डांठ पड़े मिले हैं। रात-ही-रात नावों पर लाद-लुदकर बम्पत हो गए । उनको तो लवर तक न लगी । लगी होती तो एकाच लावी तो वज हो जाती। जवानों का मन बड़ गया। झा बार नरकण्डों के जंगलों पर नी उन्होंने रात-बिरात हाथ साफ करना शुरू कर दिया और कहीं-कहीं तो महज दिल की जलन शान्त करने के लिए भाग भी लगा दी। जमींदार सुनते और ऐंठकर रह जाते। ऐसी वेदसी से तो उनका कमी पाला ही न पड़ा था। एक बार पुलिस की मुही गरन करने से बो आखिरी नतीजा हुआ था, उन्होंने देख लिया था। अब फिर उसे दुहराफर कोई फायदा ते देखते? अब पूजन का मान वहां बड़ गया। लेकिन पुजन भी इससे ज्यादा कुछ न कर सका। जमींदार भी चुप्पी साध गए। उन्होंने सोचा कि छेड़ने से कोई फायदा नहीं होने का। अगर वे शान्त रहें, तो सम्भव है कि किसान भी शान्त हो जाएं और फिर पहले ही जैसी हालत सुपर जाए । उनको ओर से कोई पहल कदमी न देखकर किसान भी कुछ उदासीन हो मटर का इन्तजार करने लगे। वहीं आये तो आगे कुछ किया जाए । यों उस साल के बाद वहां कोई उल्लेखनीय घटना न घटी। .

गोपी के घर मटरू का यह नमय बडी वेकली से कटा। स्टेशन पर मटरू की गाड़ी तीसरे पहर पहुंची थी। वहां ने उसका दीयर दस कोस पर या । एक छन भी रास्ते में कही वह रका, सुस्ताया नहीं। भून की तरह चलता रहा । गगा मंया को लहरें उसे उसी तरह अपनी भोर खीच रही थी, जैसे किसी सालों विछट्टे परदेसी को उसकी प्रिय. उमा। वह भागमभाग बल्द-से-जल्द गगा मैया की गोद में पहुँच जाना चाहता था। मोह, कितने दिन हो गए ! वह हवा, वह पानी, वह मिट्टी, वह गंगा मैया ! ग्राज कहीं उसके पस होते ! रास्ते में ही गोपी का पर पड़ता था। सोचा था कि पांच छन में सर-समाचार ले-देकर, वह फिर भाग खड़ा होगा और पट्री-दो-घड़ी रात वीतते-बीतते गंगा मैया का कछार पकड़ लेगा। लेकिन गोपी के पर ऐसी स्थिति से उसका पाला पड़ गया कि उसे रुक जाना पड़ा। उन दुसी प्राणियों को छोड़कर भाग खड़ा होना कोई मामान कान न था। मन छन-छन कचोट रहा था, लेकिन न रुक सकने की बात उसके मुंह से न निकली। उनके पादर-सत्कार को इन्कार कर, उनके दुसी दिलो को, चोट पहुँचाये, ऐमा दिल मटरू के पास कहाँ था? सायीकर गोपी की मां मोर यार के साथ वटी रात गये तक बातचीत चलती रही। मासिर जब वे थक गए, मां सोने चली गई और बूढ़ा सरर्राटे लेने लगा, तो मटरू ने भी सोने की कोशिश की। मगर नींद कहाँ ? फिर दिल-दिमाग उसी दीयर में भटकने लगे। यह नदी, वह जंगल, वह हवा, वह मिट्टी, जसे सर वहाँ बाह फैलाये खड़े मटरू को गोद में भर लेने को तड़प रहे हैं और मटरू है कि इतना नजदीक पाकर भी सवको भुलाकर यहां पड़ा हुपा है । 'मापो, प्रामो! दौड़कर चले मानो, बेटा! कितने दिनों से हम तुमसे बिछुड़कर तड़प रहे हैं ! प्रानो, जल्द पाकर हमारे फलेजे से चिपक जामो ! मामो, अामो' पोर इस 'मो' को पुकार इतनी ऊंची पोर लम्बी होकर मटरू के फानो में गंज उठी कि उसका रोम-रोम तडप उठा। यह व्याकुल ५६ , . होकर उठ बैठा। आंखें. फाड़कर चारों ओर ऐसे देखा कि कहीं यह पुकार पान ही से तो नहीं आयी है, कहीं यह जानकर कि . मटरू पास आफर यों पड़ा हुआ है, 'गंगा नया खुद ही तो नहीं चली बाई ? मटर उठ खड़ा हुआ और ऐसे भाग चला जैसे उसे डर हो कि फिर कहीं कोई उसे पकड़कर न बैठा ले । चारों ओर घना सन्नाटा और अन्यकार छाया था। कहीं कुछ सूझ न रहा था। फिर भी मटरू के पैरों को यह अच्छी तरह मालूम था कि उसकी 'गंगा मैया' तक पहुँ- चने की दिशा कोनसी है। फिर उन फौलादी पैरों के लिए रास्ता बना लेना क्या मुश्किल वात थी? कटे खेतों ने, मटरू बेतहाना सीघा भागा जा रहा था। एक क्षण की देर भी अब उसे सह्य न थी। पैरों में खुरकुची गड़ रही है। कहीं कुछ दिखाई नहीं देता, होरा-हवास ठिकाने नहीं है। फिर भी वह माना जा रहा है। आंखों के सामने बस 'गंगा मैया' की धार चमक रही है। मन बस एक ही बात की रट लगाये हुए है-'या गया माँ, आ गया! नींद से भरी वरतो गरम-गरन सांसें ले रही है। अन्धकार की सेन पर हवा सो गई है। गरमी से परेशान रात जैसे रह-रहकर जम्हुआई ले रही है। उमस भरा सन्नाटा ऊँघ रहा है और प्रात्मा में मिलन की तड़प लिये मटरू भागा जा रहा है। पसीने की धारे शरीर से बह रही हैं। भीगी आंखों के सामने अन्धकार में 'गंगा मैया' की लहरें बाँहें फैलाये उसे अपनी गोद में समा लेने को वढ़ी आ रही हैं । ऊपर से तारे पलकें झपकाते यह देख रहे हैं। लेकिन मटरू 'गंगा मैया' के सिवा नहीं देख रहा । उसके कानों में मां की पुकार गूज रही है। उनके प्राण जल्द-से-जल्द मां की गोद तक पहुँच जाने को तड़प रहे हैं। वह भागा जा रहा है, भागा जा रहा है। यह दीयर की हवा की खुशबू है । यह दीयर की मिट्टी की खुशबू है। यह मैया के आंचल की खुशबू है। नटरू के प्रारण उन्मत्त हो उठे।

. रोम-रोम उत्फुल्ल हो कटक्ति हो गए । उमरो में रिजती भर गई। वह आँधी की तरह पुकारता दौड़ पड़ा-"माँ! मा!" लहरों की प्रतिध्वनि हुई,"बेटा ! टा।" दिशाग्री ने प्रतिध्वनि की, "धेटा ! बेटा!" धरती पुकार उठी, "बेटा ! टा!" माकाग और धरती से करोड़ों पिहल मायो मारवटी की पुकारों से गूंज उठे, जसे दसों दिशाएँ पुकारती हुई बोरकर मटर गले गे लिपट गई। मटरू एक भूगे बच्चे की तरह पार गगा गंगाको गोद में कूद पडा। 'गगा मया' ने अपने बेटे को अपनी गोद मग पग लिया, जैसे अपने तन-मन-प्रारण में ही उमे गमोहर दम नंगी। यह मान- कल के स्वर नही, मां की पुचकारी पोर गुम्यों पर है। दिमा झूम रही हैं, हवा गुनगुना रही है। मिट्टी पिलपिला रही है, : "पा गया, हमारा वेटा मा गया ! हमारा लाइला प्रा गया !" ट्स यह कितनी अगम्भव बात थी, मानी जानदीपारिकारी वह अपने मन में पोगे जा रही यो । प्रागिर ? प्रादमी के जीने के लिए एक महारा मी, हवा और पानी मिमी के पास कोई वास्तरित महागनदादा यह मवास्तविक नहारे ही का सहारा लेता है। वह पता स्वप्न का महारा मानने सड़ा कर लेता है। मनी पारदर किसी ठोस आधार पर ही अवलम्बित हों, ऐसी बात नहीं। बहुत-सी कल्पनाओं और स्वप्नों के आधार भी काल्पनिक और स्वप्निल होते हैं। . लेकिन आदमी उन्हीं से जीवन की यथार्थ शक्ति प्राप्त करके जीता रहता. है। कौन जाने इस विचित्र संसार में कहीं निराधार कल्पना और स्वप्न भी एक दिन तही हो जाएं! यह सही है कि इस तरह के सहारे का सृजन आदमी उसी स्थिति मैं करता है जब उसके लिए कोई दुसरा चारा ही नहीं रह जाता । जीने को स्वाभाविक अदम्य चाह आदमी को विवश करती है कि वह ऐसा करे। क्या भाभी की परिस्थिति ऐसी ही नहीं थी? फिर वह ऐसा कर रही थी तो इसमें अस्वाभाविक क्या है ? जिस दिन उसने महरू के मुंह ते गोपी की वह चन्द बातें सुनी थी, उसी दिन से जैसे बहुत पहले से उसके हृदय में उगे उस अंकुर को उन बातों ने अमृत से सींचना शुरू कर दिया था। ये बातें उसके जीवन के सुने तारों को हर क्षरण कंकृत करती रहतीं। उसके होंठ सदा एक मन्त्र की तरह वुदबुदाया करते, "गोपी को उसकी बहुत चिन्ता रहती है। वेवारा रात-दिन 'भाभी-भाभी' की रट लगाये रहता है। इन दोनों में बहुत नोहब्बत थी क्या ?" और उसके प्रारा ते एक मधुरतम संगीत के अमृत में नहा उठते । अात्मा जैते विह्वल हो बोल उठती, "हाँ, बहुत मोहब्बत थी, वहोत 'परदेसी, तू उसे चिट्ठी लिखना, तो मेरी ओर से यह लिख देना कि मुझे भी उसकी चिन्ता लगी रहती है। मेरे प्राण भो रात- दिन उसको रट लगाये रहते हैं। हाँ परदेती, हमने बहुत मोहब्बत थी, वहोत !" भाभी को इस मन्त्र के जाप ने अब बहुत बदल दिया था। वह चिड़- चिड़ापन, वह कड़वापन, वह दुलाहट, वह क्षुब्धता, वह वेखी अब खतम हो गई थी। अब वह अपने को कुछ उत्साहित अनुभव करती, काम में कुछ रस लेती, पूजा-पाठ का कुछ अर्थ समनती, सास-ससुर को सेवा-शुभ्रूपा में उत्ते कुछ फल दिखाई देता । व्यर्थ जिन्दगी २ एक बार्यकता का प्राभास होता। कोई है जो उसकी बहुत-बहा चिन्ता करता है, उसकी रात-दिन रट लगा रहता है। कोई है. कोई घर को कलह मिट गई। गब-कुछ सुचारू रूप से चलने लगा। साम की कोई शिकायत नहीं रह गई। पका-पकाया दोनों जून, मोटो- मोटो, भादर-मान को बातें, हर माता पर एक पाय पर सही बहू, कनो हिलने-डुलने का मौका न देने वाली, बड़ी रात गये तक उबटन को मालिया । करम फूटी वह घर को लक्ष्मी न वन जाए तो क्या बने? समुर तो पहले ही ने उमको मेवा के गुलाम थे। वे जानते थे कि जिन दिन बहू ने हाय सोचा, यह कल मरने वाले होंगे तो धान ही मर 'जाएंगे। औरत के यम की बात यह कहाँ रह गई थी। बल्कि वह तो उनकी लम्बी बीमारी से भाजित पाकर कभी-कभी ऐसे सरापने लगती किसे बूढा भार हो गया हो । बहू को पड़ी तीमारदारी ने तो उवमुच उनमें यह उम्मीद पंदा कर दी कि वे बच जाएंगे। उनके मुंह से हर शरा माशीप के शब्द कड़ा करते। कभी-कभी उन मातीपों से एक कुलबुलाहट का अनुभव करके भानो पूर बैठती, "बाबूजी, मुझ प्रभागिन को आप ऐसे प्रमोस क्यों देते हैं ?" बुढे की प्रांतों में बौनू भर पाते । व्याकुल होकर वे चोलते, "जानवा हूँ वहू कि यह असर को सौंचना है। लेकिन अपने मन को क्या कल? मानता ही नही बहू, मैं तो हमेशा यही प्रार्थना करता है कितू मुखी रहे।" एक करुण मुस्कान होठों पर लाकर भाभी रहती, "मुख तो उन्हों- के साथ गया बाबूजी!" और टप-टप प्रानू नुपाने लगती। "तू नच कहती है बहू," बूढ़े माद्रं कण्ठ से कहते, "औरत का तोर- परलोक मरद वे ही है।" उनके टेडने पर सिर रखकर बिसरातो हुई भाभी कहतो, "मेरा वो लोक-परलोक दोनों नसा गया वाबूजी, आज अब' मुझे असीस दीजिए कि जितनी जल्दी हो सके, इस संसार से छुटकारा मिल जाए !" "नहीं वहू, नहीं, तू भी इस अपाहिज वूड़े को छोड़कर चली जाना चाहती है ?" बूढ़े कांपते स्वर से कहते । सिर उठाकर, अांचल से आंसू पोंछ भाभी कहती, "देवर की नयी वहू ग्राएगी। वह क्या आपकी सेवा मुझसे कम करेगी ?" "कौन जाने, बहू कैसे पाएगी? तू तो पिछले जनम की मेरी बेटी थी। न जाने कितना गंगा नहाकर इस जनम में तुझे बहू के रूप में पाया," बूढ़े गद्गद् होकर कहते, "दूसरे की वेटी क्या इस तरह किसी की सेवा कर सकती है ? यह तो मेरा सौभाग्य है वेटो कि तुझ-सी बहू' मुझे मिली। नहीं तो कौन जाने अब तक मेरी मिट्टी कहां गल-पच गई. होती।" "मेरा दुर्भाग्य भी तो यही है वाबूजी कि सारी उमर विपदा मलने के लिए जी रही हूँ। परान नहीं निकलते । मैं तो रोज मनाती हूँ कि कब ये परान निकलें कि सांसत से छुटकारा पाऊँ । आखिर अब मेरी जिन्दगी में क्या वच गया है जिसके लिए परान अटके रहें ?" भाभी निढाल होकर कहती। "अपने भाग से ही कोई नहीं मरता-जीता रे पगली!" बूढ़े उसे सान्त्वना देते, “जाने किसके भाग से तू जी रही है ? मेरे मन में तो आता है कि मेरे भाग से ही तू जिन्दा है। रामजी ने मुझे ऐसा रोग दिया तो साथ ही तुझ-सी बहू भी दी कि रात-दिन सेवा कर सके। बहू अपने चाहने-न-चाहने से क्या होता है ? जो रामजी चाहते हैं वही होता है । कोन जाने रामजी की इसमें क्या मन्शा हो ! वहू मैं तो सोचू कि मेरी ही सेवा के लिए तू पैदा हुई ! "हाँ री, ऐसा सोचते बखत तुझे गोपी का मोह नहीं लगता? तुम दोनों में कितनी मोहब्बत थी! मटरू उस दिन कहता था न कि गोपी को तेरी बहुत चिन्ता रहती है। । ८४ बहू, वह तुझे बहुत मानता है। अब तक वह जिएगा, तुझे कोई तकलीफ न होने देगा। तू निसवातिर रह ।" "कौन जाने बाबूजी, माग में क्या लिसा है ? देवर का मोह मुझे भी कम नहीं लगता। उसे एक बार देख लेती, फिर मर जाती। जाने उसकी नयी बहू कैसी पाए, उसका व्यवहार मेरे साप कंगा हो ? मुझने तो कुछ सहा न जाएगा, बाबूजी। कहीं देवर का मन मला हमा, तो मैं तो कही को न रहूंगी।" भाभो फिर सिसक उठनी। "यह तू क्या कहती है, बहू ?" बूढे एक मोठी डोट के साथ पाहते, "तू मेरी बड़ी बहू है। तू घर की मालकिन की तरह रहेगी । मेरे रहते..." "प्रापका यस कहाँ चलने का, याबूजी ? पाप मच्छे रहते तो मुझे किसी बात को चिन्ता न रहती। उसने प्राकर कही देवर पर जादू फेंका, और वह उसके बस मे होकर "नहीं वाबूजी, मेरा तो मर जाना ही अच्छा है। कहीं ताल-पोखर'.." "बहू !" बूढ़े जैसे चौंककर चीस पडते, "ताल-पोयर फा नाम कभी फिर मुंह पर न लाना । जानती है, तू किस सानदान की बहू है ? भले ही घर मे मढ़-गल जाना, लेकिन बहू, खानदान पर कतक का टीका न लगाना ! किमी को कहने का अगर कभी मौका मिल गया कि फला की बहू ताल-पोसर में डूब मरी तो मैं अपना सिर फोड़ लूंगा। इस पूरे के सिर का खयाल रखना बेटी, मोर चाहे जो करना," मावेश से यक- कर बूढ़े कांपने लगते। प्रांचल से पांसू पोछते भाभी वहां से हट जाती। इस चूहे से कोई बात करना व्यर्थ है । यह कुछ नहीं समझता--युछ नहीं। हमें अपनी तीमारदारी की चिन्ता है । चूढी को पर से काम-कान पर अपनी मेगा के लिए उसकी जरुरत है। कोई नहीं सपाल करला कि पासिर उभे भी तो कुछ चाहिए। लेकिन किसी को खयाल भी कैसे हो सकता? स्वप्न में भी कोई यह कल्पना कैसे कर सकता कि एक सीनुल की बेवा यहू"मसम्भा, असम्भव ! और भाभी में फिर से एक सुन्नता भर उठने को होती कि तभी जैसे कोई कानों में गुनगुना उठता, "मुझे तुम्हारी बहुत चिन्ता है, भाभी ! मैं रात-दिन तुम्हारी रट लगाये रहता हूँ। तुमसे में कितनी मोहब्बत करता था। मुझे या जाने दो भाभी, फिर तो..." और भाभी फिर एक हिंडोले में झूलने लगती। कोई परवाह करे या न करे, वह तो और वह काम में मग्न हो जाती। फिर पहले ही का कार्यक्रम चलने लगता था। वही पूजा, वही रामायण-पाठ, वही सब-कुछ । वह ठाकुर से प्रार्थना करती, 'तेरी बांह बड़ी लम्बी है, ठाकुर । नामुमकिन को भी मुमकिन करना तेरे लिए कोई मुश्किल नहीं। कुछ ऐसा करना कि...' विलरा को भूसे की खांची थमाने जाती तो जाने क्यों उसके मन में उठता कि बिलरा फिर वही बात कहे। लेकिन विलरा भय खाकर सिर झुकाये रहता। एक दिन भाभी ने ही टोका, "क्यों रे, तुझे कोई हत्या लगी है क्या, कि इस तरह चुप बना रहता है ?" सिर झुकाये ही विलरा ने कहा, "सच ही छोटी मालकिन क्या मेरे मुंह से उस दिन ऐसी कोई बात निकल गई थी..." "अरे, वह तो मैं भूल भी गई। नाहक तू..." "छोटी मालकिन, मैं मन की बात न रोक सका, कह डाली। मेरे कहने से तुमको कष्ट हुमा । मुझे माफ कर दो। छोटी मालकिन, हम लोगों के दिल में कोई ऐंठ नहीं होती। तुम लोग तो मन में मौर रखते हो, मुंह से कुछ और कहते हो । मुझे तो ताज्जुब होता है कि बड़े. मालिक और मालकिन किन आंखों से तुम्हारा यह रूप देखते हैं। मेरा तो कलेजा फटता है। इसी उम्र से तुम साधुनी बनकर कैसे. रह सकती हो ? इसीलिए मन में उठा कि कहीं छोटे मालिक के साथ में कुछ तुम्हारा..." भाभी का मन गद्गद् हो गया। आँखें मुंद-सी गई। लेकिन दूसरे ही क्षण जैसे किसी ने खोंचकर एक थप्पड़ जमा दिया हो । वह बोली, "ऐसीरात न कहा कर बिलरा।" पोर मन्दर भाग गई। बितरा कुछ क्षण वहीं सडा रहा। फिर होंठो पर एक करण मुस्कान लिये नांद की पोर चल पड़ा। सोच रहा था कि उस दिन का गरम लोहा पाज कुछ टण्डा पट गया है। माज डॉट नहीं सानी पड़ी। सच, अगर ऐमा हो जाता तो कितना अच्छा होता! वैचारी को जिन्दगी मुख से कट जातो। छोटे मालिक माह न कर सके तो उसे रस तो सकते ही है। कितने ही उनको बिरादरी के ऐसा करते हैं। मुनने में तो पाता है कि इनके परदादा भी एक चमारिन को रखे हुए थे। फिर यह तो उनकी भाभी ही है । योई दिन हो-हल्ला होगा फिर सब पाप ही शान्त हो जाएगा । कसाइयो के हाय पड़ी एक गऊ की जान तो बन जाएगी। कितना पुण्य होगा! महोने-दो महीने में रात-बिरात मटरू सर-समाचार लेने जरूर पा जाता । अब वह मट्ठा भी फूंककर पीता था। दुश्मनी को भूलकर भी अच वह कोई ऐसा मौका देने को संपार न पा कि पहले ही की तरह फिर पकड़ में पा सके । वह दोयर कभी नहीं छोड़ता। जानता था कि इस प्रकृति के किले मे कोई उस पर हमला करने की हिम्मत न करेगा। अब वह पहले की तरह प्रकला भी न था। उसको भोंपड़ी के पान दर्जनों झोंपड़ियां बस गई थी। पचासो फिमान नौजवान अपनी लाठियों के साथ उनमें रहते थे। कई प्रसाड़े भी सुन गए थे। मवके बैल और भैसें भी वहीं रहती। मटरू जब छूटकर पाया था तो रबी को फसल कट चुकी यो। सबका नयाल था कि दीयर में सिर्फ रबी की ही फसल बोई जा सकती है। फिर तो बरसात ही शुरू हो जाती है और चारों मोर पानी-ही-पानी नजर माता है । लेकिन मटरू साली बंठना न चाहता था। उसने तय किया कि.प्रय अस बोई जाए। सबने नाना किया। लेकिन मटरून माना। उसने बन्हा कि 'गगा नया की . पा होगी तो ऊख भी होगी। ऊंची, अच्छी मिट्टी की जमीन देखकर सने ऊख वो दी। उसकी देखा-देखी औरों ने भी हिम्मत की। एक जो हाल होगा सवका होगा । जाएगा तो बीया, और कहीं आ गया, गुड़ रखने की जगह न मिलेगी। दीयर गुलजार हो गया। झोंपड़ियां वस गई। चूल्हे जलने लगे। भैसें रंभाने लगीं। अखाड़े जम गए। बिना किसी विशेष मेहनत के ऊस 'ऐसी आयी कि देखने वालों को ताज्जुब होता। तर, चिकनी मिट्टी का मुकाबला बांगर की मिट्टी क्या करती ? वहाँ तो चार-चार हाथ की भी ऊख हो जाए तो बहुत, वह भी लाख मशक्कत के बाद । और यहां जो ऊखों ने सिर उठाया तो ऐसा लगा कि हाथी डूब जाएँ। बस अब डर था तो 'गंगा मैया' का। वरसात सिर पर चढ़ आई थी। नदी बढ़ने लगी थी। सबकी धुकधुकी उसी ओर लगी थी। सब कहते "गंगा मैया ने किरिपा कर दी, तो ऊख काटे न कटेगी।" सब यही मिनती करते कि 'गंगा मैया' इस साल धार पलट दे। कुछ ऐसी होनहार कि सच ही नदी की खास धारा अव की उस पार बन गई। पानी इधर भी खूब फैला, लेकिन दस-पन्द्रह दिन में ही ऊखों की जड़ों में और भी मिट्टी छोड़कर चला गया। किसानों की खुशी का ठिकाना न रहा । मटरू की शाबाशी होगे लगी। उसने कहा, "यह सव 'गंगा मैया' की किरिंपा है।" जमींदारों ने सीधे तौर पर छेड़ने की कोशिश न की थी। अव मटरू अकेला न रह गया था। सुनने में बस यही पाया कि उन्होंने सदर में दरखास्त दी है कि किसानों ने उनकी जमीन पर कब्जा कर लिया है। सरकार पड़ताल कराये और वागियों को दण्ड दे। वरन बलवा होने का अन्देशा है। फिर क्या हुअा, कुछ पता न चला। सरकार का दरवार बहुत इ है, जाते-जाते पुकार पहुंचेगी। होते-होते सुनवाई होगी। तब तक क दीयर में कोई निशान वाकी रह जाएगा? और फिर कुछ होगा . .

देखा जाएगा। पटवारी के नाम तो वन वीपर लिसा है, कागज-सत्तर में भी दीयर किसी के नाम नहीं। कोई मेंड-डाँड तो बन नहीं सकता, यहाँ बनायी भी जाए, तो क्या 'गगा मैया' रहने देगी ? सरकार क्या साक पडताल करेगी? वरमात में मटरू और उसके साथी काफी होशियारी से रहे । एक तरह से भव उनका एक दल बन गया था। ग्राम-पास के गांवों के किसान उनके भाई-वन्द थे। हर बात को वे खोज-यपर लेते रहने मौर मटरू के कान में पहुँचाया करते । अव मटरू पर जान देने वाले गंकड़ो थे। यो भी मटरू को पकड़ ले जाना आसान न था। मटरू रात को ही अपने दस-याच माथियो के साथ गोपी के घर माता और रात रहते ही चला जाता । सर उमका सरकार बडो उमग से करते। सास-समुर पूछते, "गोपी को शादी को कहीं वात चलायी ?" मटरू कहता, "अरे, हमे चलाने की क्या जरूरत ? दर्जनों यों ही मुंह-बाये बैठे हैं । उमे मा तो जाने दो। फिर एक महीने के मन्दर ही शादी लो। वह बहू ला दूंगा कि गांव देखेगा।" मटरू गोपी को बरावर चिट्ठी देता। लेकिन उसने भी गोपी को उसकी औरत के बारे में कुछ न लिखा था। क्यो खामसाह के लिए दुस का समाचार लिखे। न जाने उसके चले पाने के बाद गोपी को कैसे कटती है। कई बार सोचा कि मिल पाए । लेकिन फुरसत कहाँ ? फिर 'गंगा मैया' । को वह कैसे छोड़े; अपने किसान भाइयों को कैसे छोड़े। उसीके दम से तो सब में दम है। कहीं उसको गैरहाजिरी में जमीदार कुछ कर चतो? अन्दर साने जाता तो भानी के बनाये तयका की प्रशंसा करके कहना, "तभी तो गोपी लट्ट है। मैं नो पहूँ, क्या बात है? इवना बढ़िया खयका जो एक बार खा लेगा, वह क्या गोनी को नौजी को कभी भूल सकता है ?" सास भी कहती, "ये दोनों बहने वड़ी गुनवती थीं, वेटा करम को क्या कहूँ?" भाभी सुनती और मन-ही-मन जाने क्या-क्या गुनती । एक बार तो मौका निकालकर उसने अपने को मटरू को दिखा भी दिया था। मटरू खुद भी उसे देखने को उत्सुक था। वह देखकर जैसे छाती पर एक चूंसा खा गया था। उसने कव सोचा था कि गोपी की भौजी अभी ऐसी जवान है, ऐसा विजली-सा उसका रूप है। तभी से उसका दिल भाभी के प्रति सहानुभूति से भर गया था। कभी-कभी बड़ी मीठी-मीठी बातें वह यही सहानुभूति दरशाने के लिए मां से भाभी के बारे में कह देता। भाभी निहाल हो उठती। मटरू को चिन्ता लग गई। गोपी की भौजी-सी सुन्दर बहू गोपी के लिए कहाँ से खोजकर लाएगा ? उसने तो आज तक ऐसी औरत कहीं न देखी। गोपी उस पर जान देता है, तो इसमें ताज्जुब की कोई बात नहीं। ऐसी औरत पर कौन जान न देगा? इसीकी तरह इसकी बहन भी तो होगी? फिर दूसरी से उसका मन कैसे भरेगा ? और मटरू के मन में बिलरा के मन की बात उठ खड़ी हुई। सदा दीयर में स्वच्छन्द रहने वाले मटरू के मन पर बिरादरी के रीति-रिवाज का उतना संस्कार न चढ़ा था। उसने स्वच्छन्दता से ही जीवन बिताया था । जव जो मन में उठा था, वैसा ही किया था। कभी कोई बन्धन न माना था। वह तो बस इतना ही जानता था कि आदमी के पास बल और वहादुरी होनी चाहिए। फिर कौन रोक सकता है उसे कुछ करने से ? उसने तो यह भी तय कर लिया कि अगर गोपी तैयार हो गया, तो वह यह करके ही दम लेगा। बहुत होगा, गोपी को अपना घर छोड़ देना पड़ेगा। तो उसके दीयर में एक झोंपड़ी और बस जाएगी। उसी- की तरह वह भी रहें-सहेंगे । चिरई की जान तो बच जाएगी। 80 ग्यारह गोपी अपनी सजा काटकर जव छटा तो उने और कैदियों की तरह यह स्तुगी न हुई जो कैद से छूटने के वक्त होती है। प्राज वह अपने पर की ओर जा रहा है। आखिर उसे अाज अपनी उस विधवा भाभी के सामने जाकर मडा होना ही पडेगा, उसे उन दगा में, मपनी इन मासों मे देखना ही पड़ेगा, जिसके लिए करीब पांच वर्षों में भी वह पर्याप्त साहस नहीं बटोर मका है। गांव में जब वह घुमा तो मन्घ्या की धुंधली छाया पृथ्वी पर कुकी आ रही थी। बाड़े के दिन थे। चारो और अभी से सन्नाटा छा गया था। पोखरे से एकाध प्रादमियों के ही बानने-संसारने की मावाजमा रही थी। घाट भूना था। गांव के ऊपर जमे हुए धुएं का बादल धोरे. धीरे नीचे सरका पा रहा था। मागे बढकर गोपी ने सोचा कि किसी से घर का समाचार पूछे । लेकिन फिर ठिठक गया। पास ही छोटा मन्दिर था, मोचा पुजारीजी के पास ही क्यों न चले । भगवान् के दर्शन भी कर ले, पुजारीजी से समाचार भी पूछ ले। गोपी का दिल लरज रहा था। सालों दूर रहने से उसके मन में यह वात उठ रही थी कि जाने इस बीच क्या-क्या हो गया हो । उसे डर लग रहा था कि कही कोई उसे कोई वुरो सवर न सुना दे। मन्दिर उसे वीरान-सा दिखाई दिया। पाश्चर्य हुमा कि ऐमा क्यों ? यह भगवान् को प्रारती का समय है । फिर भी मन्नाटा छाया हुमा है। चबूतरे पर कोई यूदा भिसमगा अपनी गठरी रगे, लिट्टी सेंकने के लिए अहरा सुनगा रहा था । उसने गोपी को पास सड़े देखा तो पूछा, "का है भैया?" "मन्दिर चन्द क्यो है ? पुजारोजी नहीं है क्या?" गोपी ने . पास जाकर पूछा। भिगमंगा जोर से हंस पड़ा। दांत न होने के कारण ढेर-सा थूक उसके होंठों से वह पड़ा । वह बोला, "तुम यहां के रहने वाले नहीं हो क्या ? अरे, पुजारी को भागे हुए तो आज तीन साल के करीव हो गए। गांव की एक वेवा के साथ पकड़ा गया था। उसे लेकर जाने कहाँ मुंह काला कर गया।" और फिर ज़ोर से अट्टहास कर उठा। गोपी के कांपते हाथ अपने कानों पर पहुंच गए। उसका दिल जोरों से धड़क उठा । उससे एक क्षण भी वहाँ न ठहरा गया। असीम व्याकुलता लिये वह सीधे अपने घर की ओर बढ़ा। एक आशंका उसके मन को कंपा रही थी कि कहीं... अपने घरों के सामने कौड़े के पास बैठे जिन-जिन लोगों ने उस दूख और व्याकुलता की मूर्ति को गुजरते हुए देखा, वे चुपचुप उसके साथ हो लिए। मूक दृष्टि में कभी-कभी गोपी उनकी जुहार का उत्तर दे देता । न किसी से कुछ पूछने की मनःस्थिति उसकी थी, न लोगों की। लग रहा था जैसे वे सव अपने किसी प्यारे की लाश जलाकर मौन और उदास लौट रहे हों। घर वालों को तब तक किसी ने दौड़कर गोपी के आने की सूचना दे दी थी। गोपी अभी अपने घर से कुछ दूर ही था कि उसके कानों में अपने घर की दिशा से जोर-जोर से चीख-चीखकर रोने की आवाजें आने लगीं। उसका दिल बैठने लगा। रोम-रोम व्याकुलता की तड़प से कांप उठा । पैरों में कंपकंपी छूटने लगी। आँखों के सामने अन्धकार-सा छा गया। दिमाग में चक्कर-सा आने लगा। उसके साथ-साथ चलने वाले लोगों से उसकी यह दशा छिपी न रही। कुछ ने बढ़कर उसे सहारा दिया। एक के मुंह से यों ही निकल गया, "होश-हवात खो बैठा है वैचारा । भीम की तरह भाई के मरने का दुख क्या कम था जो विधाता ने इसकी औरत को भी छीन लिया ?" गोपी के कानों में इसकी भनक पड़ी, तो मुड़कर नांखें फाड़े वह । १२ . पूछ बैठा, "क्या ?" काइयों ने साथ ही कहा, "अव दुख करने से क्या होगा भया? उनका-तुम्हारा उतने ही दिन का सम्बन्ध लिसा था। अब जो रह गए हैं, उन्हीको संभालो । अब उन्हें तुम्हारा ही तो सहारा रह गया है।" गोपी को लगा, जैसे एक विजली की तरह जलता मूल उसके दिल में कौंधकर उसके तन-मन को जलाता सन्न से निकल गया । वह गया खाकर सहारा देने वालों के हाथो मे आ रहा । उसे घर ले जाकर लोगो ने चारपाई पर लेटा दिया और पानी के छोटे दे उसे होग मे लाने लगे। औरतो ने रोते-रोते, वेहाल हुई मा और भाभी को, और बड़े-बूढों ने विस्तर पर कूल्हते पिता को किसी तरह यह कहकर चुप कराया कि अगर वडे होकर वही सव इस तरह तड़प-तड़पकर जान दे देंगे तो गोपो का क्या होगा। , दुख की घटा छायो रही उस घर पर महीनों । व्यथा के आंसू बरसते रहे सवको माखों से महीनों। दुख की जितनी शक्ति है, उससे कहीं अधिक प्रकृति ने आदमी को सहन-शक्ति दी है । जिस तरह दुस को कोई निश्चित सीमा नहीं, उसी तरह मनुष्य को सहन-शक्ति भी असीम है। जिस दुख की कल्पना-मात्र से मनुष्य की मात्मा की नींव तक कांप उठती है, वहीं दुस जव सहसा उसके सिर पर भहराकर आ गिरता है तो जाने कहां से उसमें उसे सल करने की शक्ति भी पा जाती है । उसे वह हंसकर या रोकर झेल ही लेता है । दुस को काली घटा के नीचे बैठकर यह तड़पता है, रोता है। रो-रोकर ही वह दुस को भुला देता है । घटा छंटती है। खुशी का प्रकाश चमकता है और प्रादमी हंस देता है । उसे यह बात भी भूल जाती है कि कभी उस पर दुख की घटा भी लायी थी, कभी वह रोया मोर तड़पा भी था। यह बात कुछ असाधारण मनुष्यों पर भले ही ६३ । - लागू न हो, पर साधारण मनुष्यों के लिए सर्वथा सच है। गोपी, उसके माता-पिता और भाभी साधारण ही मनुष्य तो थे । व्यथा के उमड़ते-घुमड़ते सागर में सालों दुख के थपेड़े खाकर धीरे-धीरे उन्हें लगने लगा कि वे व्यथा और दुख की गरजती लहरें कुछ करुण और कुछ मधुर स्मृतियों की मन्द-मन्द लहरियाँ वन उनके व्यथित हृदयों को अपने कोमल करों से सहला-सहलाकर कुछ प्राशा, कुछ सुख के झीने-झीने जाल बुनने लगी हैं। भाभी और देवर, दोनों एक ही तरह के दुर्भाग्य के शिकार थे। उनकी समझ में न आता कि वे कैसे एक-दूसरे को सान्त्वना दें। भाभी ने पूर्ववत् अपने को पूजा और घर के कामों में उलझा दिया था। वह यन्त्र की तरह सब-कुछ करती, जैसे वही सब करने के लिए उस यन्त्र का निर्माण हुआ हो, जैसे यह यन्त्र एक ही रफ्तार से इसी तरह जब तक चलता रहेगा, काम करता रहेगा। इसके नियम में कभी कोई परिवर्तन न होगा । हाँ, धीरे-धीरे, जैसे-जैसे इसके पुरजे घिसते जाएंगे, इसकी चाल में शिथिलता पाती जाएगी; फिर एक दिन इसके पुरजे विखर जाएंगे; यह यन्त्र टूट जाएगा हमेशा के लिए। भामी अब कहीं अधिक गम्भीर और चुप और उदास बन गई थी। मानो अपनी पूजा और कामों के सिवा उसके जीवन में कुछ हो ही नहीं। गोपी भाभी को देखता और उस निस्मीम उदासीनता, नीरसता और दुख में लिपटी हुई वीमार-सी पुतली को देखकर सोचता कि क्या वह ऐसे ही अपना जीवन बिता देगी ? क्या वह सचमुच उसे ऐसे ही जीवन विता देने देगा ? दुनिया के हर बाग में पतझड़ आता है, फिर वसन्त पाता है। क्या भामी के जीवन में एक बार पतझड़ पाकर सदा बना रहेगा? क्या फिर उसमें कभी वसन्त न पाएगा? क्या फिर एक बार उसमें वसन्त लाया ही नहीं जा सकता ? पतझड़ में चुप हुई वुलवुल क्या हमेशा के लिए ही चुप हो जाएगी ? क्या उसकी चहक वह एक बार फिर न मुन सकेगा ? ६४ गोपी अपने समाज के रीति-रिवाज से परिचित है। वह जानता है व उमको विरादरी की विधवा लकडी का वह कुन्दा है जिसमे उमर ति को चिता की आग एक बार जो नगा दी जाती है, तो वह अलता हता है। तब तक जलता रहता है, जव तक जलकर राम नहीं जाता। उसे राख हो जाने के पहले किसी को छूने की हिम्मत नहीं होती, बुझाने को तो वात हो दूर । घोर गोपी सोचता है कि क्या उसकी भी भी उसी तरह जलकर राख हो जाएगी? वह उस लगी प्राग को कभी बुझा न सकेगा? गोपी के मन को आँखों के सामने ये प्रश्न हर मण चक्कर लगाते रहते हैं । और वह सदा जैसे उन प्रश्नो का उत्तर ढूंढ़ नकालने में इवा-सा रहता है । भाभी के मुख-दुख का स्थान यों भी उसके जीवन में कभी कम नहीं रहा है, पर भव जव भाभी के जीवन में कभी भी सवम न होने वाली वीरानी मा गई है, तो उनका स्थान उसके हृदय में और भी गहरा हो गया है। वह एक तरह से अपने विषय में कुछ न सोच, मदा भाभी के विषय में ही सोचा करता है कि कैसे वह अपनी स्नेहशीला भाभी को फिर एक वार पहले ही को तरह चहकती हुई देगे। दुनिया चाहे जिस परिस्थिति में रहे, बेटी वाले बापों को चंन कहाँ ? गोपो जेल से पाने का पता जैसे ही उन्हें पला, फिर उन्होंने दौड़ना-धूपना गुरू कर दिया। गोपी के जेल में लौटने की हो तो पख थी। पब शादी पक्की करने में कोई तय नहीं होना चाहिए। पिता उन्हें सीधे गोरी मे बात करने को कह देते । अपंग प्रादमी ठहरे। सब कुछ प्रब गोषी को हो तो करना-धरना है । वह जैसा मुनासिब समझे, करे। गोपी उन्हें देखकर जल-भुन पाता है । उसको समझ में नहीं माना कि भाभी के सामने वह कमे अपनान्गाह रचा सकता है। वह किन यांसों से उस बुशी के उत्सव को देनेगो, किन कानों से माह के गीत सुनेगी, किस हृदय से वह सव. सह सकेगी? नहीं-नहीं, गोपी जले पर इस तरह नमक नहीं छिड़क सकता। ऐसा करने से तो खुद उसका दिल भी टलनी-छलनी हो जाएगा। उसके जी में आता है कि वह मेहमानों को फटकार बताकर कह. दे, 'तुम्हें शर्म नहीं पाती ऐसी बातें मुझसे कहते ? कुछ नहीं, तो कम- से-कम एक इन्सान होने के नाते ही मेरे दिल की हालत तो समझने की फोशिश करो। शादी की बात करके मेरे हरे जख्मों पर इस तरह नमक. तो न छिड़को !' लेकिन सौजन्यतावश वह शादी न करने की बात कह- कर उन्हें टाल देता है। वे उसे उलझाने की कोशिश करते पूछते हैं, "अाखिर ऐसा तुम क्यों कहते हो?" गोपी चुप रहता है । वह कैसे बताये कि वह ऐसा क्यों कहता है ? "अाखिर इस उम्र से ही तुम इस तरह कैसे रह सकते हो ?" दूसरा सवाल फेंका जाता है। गोपी का मन पूछना चाहता है कि भाभी की उम्र भी तो मेरे ही वरावर है, आखिर वह कैसे रहेगी? लेकिन वह चुप ही रहता है। तीसरा कम्पा लगाया जाता है, "एक-न-एक दिन तो तुम्हें घर. वसाना ही पड़ेगा, वेटा!" और गोपी कहना चाहता है कि क्या यही बात भाभी से भी कही जा सकती है ?' लेकिन उसके मुंह से कोई बोल ही नहीं फूटता । अन्दर- ही-अन्दर एक गुस्सा घुमड़ने लगता है। "और नहीं तो क्या ? कोई बाल-बच्चा होता तो एक बात होती, चोयी वार लासा लगाया जाता है। "लड़का चुप है। इसके मानी यह कि उस पर असर पड़ रहा है । शायद मान जाए।" 'भाभी के भी तो कोई बाल-बच्चा नहीं। क्या उसे इसकी ज़रूरत नहीं ?' गोपी के दिल में एक मूक प्रश्न उठता है । उसके होंठ फिर भी नहीं हिलते । गुस्सा उभरा पा रहा है । नधुने फड़कने लगे हैं। "खानदान का नाम-निशान चलाने के लिए..." ६६ । और गोपी और ज्यादा कुछ सुनने को ताव न लाकर गरजते बादल की तरह कडक उठता है, "तुम्हें मेरे खानदान को चिन्ता करने की कोई जरूरत नहीं । तुम चले जाप्रो!" "अजीव पादमी है ! हम कसे बातें कर रहे है और यह कसे बोल रहा है?" कहता हुमा अपमान का कडवा चूंट पीकर मेहमान कहते, "दर-दहेज की अगर कोई बात हो तो "कुछ नहीं, कुछ नही ! में शादी नहीं करूंगा। नहीं करूंगा । नहीं करूंगा!" और वह खुद वहाँ में उठकर हट आता। पर यह सिलसिला टूटने को न माना। और अब तो यह किमी ऍमे मेहमान के पाने की खबर सुनता है तो पागल सा हो जाता है। उसके हृदय का द्वन्द्व और भी तीव्र हो उठता है । वह जमे अपने से मूक स्वरो मे पूछने लगता है, "कसे, कने? कसे अपनी विधवा भाभी की वीरान प्रासों के सामने मैं अपने व्याह के रास-रग की रचना करूं' कसे अपने हृदय को तड़प की पुकार न सुनकर, मैं एक अबोध कन्या को लाकर अपना सुस का संसार वसाऊं? नहीं, नहीं, नही! यह नहीं हो सकता!" और वह फूट-फूटकर रो पडता । घारह दीयर में इस साल सूर्य हुमककर रब्बी पायी थी। मोतों पको गेहूँ की फसल से जैसे पासमान लाल हो उठा था । कटिया लगने की सवर पाकर दूर-दूर से कितने ही औरत-मदं वनिहार माकर वहाँ वस गं० म०-७ गए थे। कम-से-कम पन्द्रह-बीस दिन कटिया चलेगी। मटरू पहलवान खूब वन देता है और दूसरे किसानों को भी ताकीद कर दी है कि वनिहारों के वन में कोई कमी न करें। सो बनिहार मोटरी बांध-बांवकर अनाज ले जाएँगे। 'गंगा मैया' के किनारे एक मेला-सा लग गया है। कई दुकानदार भी घाटी-पिसान, साग-सत्तू, वीड़ी-तमाकू की छोटी-छोटी दुकानें लगाकर बैठ गए हैं । अनाज के बदले वे सौदा देते हैं। पैसा यहां किसके पास है ! वनिहारों को रोज जो शाम को वन मिलता है, उसी में से खर्चे के लिए वे थोड़ा मिस लेते हैं और ज़रूरत की चीजों से दुकानदारों के यहां बदल आते हैं। दिन में तो सभी वनिहार सत्तू खाते हैं। लेकिन रात में रोटी-लिट्टी सेंकने के लिए जब सैकड़ों अहरे गंगा मैया के किनारे जल उठते हैं, तो मालूम होता है, जैसे आसमान में धुएँ के बादल छा गए हों। मटरू यह सब देखता है तो फूला नहीं समाता। लोग-बाग मटरू की इतनी सराहना करते हैं कि वह शरमा जाता है। लोग कहते हैं यह मटरू पहलवान का बसाया इलाका है। दूसरे किसमें इतनी सूझ और हिम्मत थी जो जंगल को भी गुलजार कर देता ! पुरतों से दीयर पड़ा था। कभी कहीं कोई दिखाई न देता था । अब वही धरती है कि मेला लग गया है । सैकड़ों किसानों और वनिहारों की रोजी का सहारा लग गया है । सब उसे असीस दे रहे हैं। पुश्तों से धाँधली करके जमीं. दार जंगल वेचकर हजारों हड़पते रहे। मटरू पहलवान के पहले था कोई उनका हाथ पकड़ने वाला ? भाई, आदमी हो तो मटरू पहलवान की तरह ! शेर है, शेर ! उस पर हजारों आदमी क्या यों ही जान दे रहे हैं ? दिलों पर ऐसे ही इन्सान राज करते हैं। अव है जमींदारों की मजाल कि उसकी तरफ ग्राख दिखा दे ? मटरू सुनता है तो दोनों हाथ नदी की ओर उठाकर कहता है, "यह सव हमारी 'गंगा मैया' को किरपा है । उसके भंडार में किसी चीण ..

की कमी नहीं, लेने वाला चाहिए भया, मेने वाला। मो का पाचन क्या कभी बेटों के लिए खाली होता है ? वह भी जगत् को माता, 'गगा मैया' का !" कृप्प-पक्ष का चाँद जमे हो मानमान में प्रस्ट इप्रा मटरू पौर पूजन के बनिहारों को हाफ देना शुरू कर दिया । दिन में गरमी पौर सू के मारे बनिहार परेशान हो जाते हैं। ठण्डी मुबह के दो-तीन घण्टे में जितना काम हो जाता है, उनना दिन के पाठ-दर घण्टों में भी नहीं होता। वनिहार नदी के किनारे ठण्डी रेल पर गहरी नीद में कतार लगाकर सोए थे । बडो प्यारो उतरिया हवा बह रही थी। चार मोठी शीतलता की वारिदा कर रहा था। नदी धीमे-धीमे कोई मधुर गीत गुनगुना रही थी। हांक मुनते ही बनिहार पोर बनिहारिने उस सड़ी हुई। मालम का कहो नाम नहीं। यकी देसी को नदी यो हवा जैसे ही छूती है उनमें फिर में वही ताजगी और पति मा जाती है । यहाँ की दो-चार घष्टं की नींद में गांवों को राजभर की नींद से भी कही ज्यादा पाराम मोर विश्राम प्रादमी को मिल जाता है। ढांड पर प्राग मुलग रही है। पान ही तमाम मौर मंनो रसो दुई है। जो तमायू पोता है, वह चिलम भर रहा है। जो नी साता है, वह मुरती फटक रहा है । घोडी देर तक यून-यूदियों को मौ-सों ने रिजा भर जाती है। फिर कटनी शुरू हो जाती है। खेत को पूरी चौड़ाई में वनिहार और बनिहारने स्नार लगाकर पावो पर बंठी काट रही हैं, बनिहार एक पोर बनिहारिने दूसरी मोर । एक सिरे पर मटरू जुटा पोर दुनरे पर पूरन । पूरन ने वगन की युती औरत को कुहनी मारकर हेंसते हुए कहा, "कहानी एक बदिया गीत ! चूदी ने मुस्कराकर यानी वगल वाली को दुहुनो मारी, पाकि - पूरी जंजीर झनझना उठी । नवेलियों ने खांसकर गला साफ किया । एकाध:क्षण 'तू कढ़ा, तू कढ़ा' रहा। फिर धरती को वैदियों के कण्ठ से धरती का जंगली मधु-सा मीठा गीत फुट पड़ा; चेहरे दमक उठे, आँखें चमक उठी, हाथों में तेजी आ गई। काम और संगीत की लय बंधी, फिजा झूम उठी, चांद और सितारे नाचने लगे, 'गंगा मैया' की लहरें उन्मत्त हो-होकर तट से टकराने लगीं। 'ए पिया, तू परदेस न जा, वहाँ तुझे क्या मिलेगा, क्या मिलेगा? यहीं खेत पक गए हैं, सोने की वालियाँ कुम रही हैं। मैं हँसिया लेकर भिनसारे जाऊँगी, गा-नाचकर फसलों के देवता को रिझाऊँगी, खुश होकर वह नया अन्न देगा, मैं फाड़ भरकर लाऊँगी। कूटूंगी, पीसूगी, पूना पकाऊंगी, ठहर दे के पीढ़े पर तुझको वैठाऊँगी, अपने ही हाथों से रव-रच खिलाऊँगी । याद है तुझे वह पिछली फसल की बात? ए पिया, तू परदेस न जा ! वहाँ तुझे क्या मिलेगा, क्या मिलेगा? ऊपा को सिन्दूरी भाभा धीरे-धीरे खेतों में फैलकर रंगीन झील की तरह मुस्करा उठी । बनिहारों और बनिहारिनों के चेहरे स्वर्ण- मूर्तियों की तरह दमक उठे। नदी का पानी सुनहरे नावे-रवां के दुपट्टे की तरह लहा उठा । कहीं दूर से दरियाई पंछियों की कूके शान्त, सुहाने वातावरण में गूंजने लगीं। प्रकृति ने एक मीठी अंगड़ाई लेकर खुमार-भरी पलक उठाई । सूरज की पहली किरण ने उसके अधर मे और चर-अचर ने झूमकर जीवन और प्रेम की रागिनी छेड़ दी। मटरू के कानों में आवाज़ पड़ी, "मटरू भैया!" अकचकाकर मटरू ने देखा और लपककर गोपी के गले से लिपटकर .

कहा, "गोपी, मरे गोपी, तू कर पा गया भया?" "सूच पूछ रहे हो? चार-पांच महीने हो गए हमें पाए । खबर भी नली?" गोपीने शिकायत की। "इतनी जल्दी कैसे छूट गए? में तो सोचता था, इस महीने में टूटोगे," उसके दोनों बाजुनों को अपने हापो से दवाता मटरू बोला। "छ: महीने और 'रेमिशन' के मिल गए । सुना कि उपर तुम वरा- वर घर प्राते-जाते रहे । इधर क्यो नहीं पाए ? मैं तो वरावर तुम्हारा इन्तजार करता रहा । मजे में तो रहे ?" गोपी बोला। "हाँ, गंगा मैया को सव कृपा है । तुम अपनी कहो। इधर कामों मे बहुत फंसे रहे । यहाँ से हटना वड़ा मुश्किल होता है । सोचा था कि कटनी खतम होते ही तुम्हारे यहाँ एक रात हो पाऊंगा। अच्छा किया कि तुम मा गए। मेरे तो पांव फंस गए हैं !" अपनी झोंपड़ी की मोर गोगो को ले जाते मटरू ने कहा । "तुम तो कहते थे कि यहाँ अकेले तुम्हीं रहते हो; मैं देखता हूँ कि यहाँ तो एक छोटा-मोटा गाँव ही बस गया है," चारों पोर देसता हुमा गोपी बोला। मटरू हंसा । बोला, "सव गंगा मैया को कृपा है । प्रव तो संकड़ों किसान हमारे साथ यहाँ वस गए हैं । नटरू प्रद अकेला नहीं है । उसका परिवार बहुत बड़ा हो गया है ।" और वह फिर हंस पड़ा। झोंपड़ी के सामने लखना कन्धे तक दाहिने हाथ में पानी भूसा लिप- टाये सहा उन्हें देख रहा था। मटरू ने कहा, "तेरा चाचा है ये, क्या देख रहा है ? चल पाव पकड़ !" लखना पांव पकड़ने लगा तो गोपी ने उसे हाथों से उठाकर कहा, "बड़का है न?" "हाँ," मटरू ने कहा, "क्यों दे, भैस दुह चुका ?" "हाँ," लड़के ने सिर झुकाकर कहा। "तो चल, चाचा के लिए एक लोटा दूध ला तो। पौर हो, लपक- . 9.

कर खेत पर जा ! पाती छोड़कर पाया हूँ।" चढ़ाई पर गोपी को वैठाते मटन ने कहा। "बरे, अभी तो मुंह-हाथ भी नहीं धोया। क्या जल्दी है ?" गोपी "शेर भी कहीं मुंह धोते हैं ! और फिर दूध के लिए क्या मुंह धोना!" हैसकर मटरू ने कहा । जेल, घर की सब बातें कहकर गोपी ने कहा, "प्रारण संकट में पड़ गए है। तुमसे राय लेने चला आया। अब तुम्हीं उबारो, तो जान बचे। रोज-रोज मेहमान घर खोन-खा रहे हैं। समझ में नहीं आता, क्या कह । भाभी की दशा नहीं देखी जाती । वड़ा नोह लगता है उसकी छाती पर खुशी मनाना हमते तो न होगा।" "सच पूछो तो इसी उधेड़-बुन में मैं भी पड़ा था। वहां जाने पर माई और बाबूजी तुम्हारी शादी पक्की करने की बात कहते थे और मैं टाल जाता था। जब से तुम्हारी भाभी को देखा, दुनिया भर की लड़- कियां नजर से उतर गईं। सोचा था, तुम आ जानो, तो कुछ सोचा जाए। भैया, सच कहना, तेरा मन भाभी के साथ शादी करने को है ? हमको तो लगता है कि तुम उसे बहुत मानते हो।" "मेरे चाहने से ही क्या हो जाएगा?" गोपी ने उदास होकर कहा। "क्यों न होगा? मर्द हो कि कोई ठट्ठा है। सारी दुनिया के खिलाफ तुम्हारा मटरू अकेले तुम्हें लेकर खड़ा होगा । क्या समझते हो मुझे ? मैंने तो यहाँ तक सोचा था कि अगर तुम्हारे मां-बाप तुम्हें घर से निकाल दें, तो यहाँ मेरी भोपड़ी के पास एक और झोंपड़ी खड़ी हो जाएगी। और देख रहे हो न ये खेत । मिल-जुलकर काम करेंगे, कमा- एंगे और खाएंगे। कोई साला हमारा क्या कर लेगा ! सच कहूँ, गोपी, तेरी भाभी की सोचकर मेरा भी कलेजा फटता है। तू उसे अपना ले । .

बड़ा पुष्प होगा भया ! कमाई के हाथ से एक गऊ और मिस्कार के हाय से एक चिरई बनाने में जो पुण्य मिलता है, वही तुझे मिलेगा। वहादुर ऐसे मौके पर पीठ नहीं फेरते।" गोपो को पोड ठोकने मटर ने कहा। "लेकिन उसकी भी तो कोई बात मालूम हो। जाने क्या सोन रही हो! वह तैयार होगी भंया " गोपी ने होठो में कहा। "अरे, पांच महीने तुझे प्राए हो गए, और तुझे यह भी मालूम नही हुमा ?" मटरू ने पाश्चर्य प्रकट किया। "कसे मालूम हो भैया ? वह तो बिलकुल नंगी हो गई है । बम पासू-भरी मांसी से वैसे ही देखा करती है जैसे छुरी के नीचे कवूनरो। मैं कैसे जानूं..." "प्रबे, तो एक दिन पूछ देस!" "लेकिन माई, वावूजी..." "एक यात तू समझ ले । माई, बाबूजी के चक्कर में अगर पड़ा तो यह नही होगा। रीति-रिवाज और संस्कार को बूढ़े जान के पीछे रखते है । उम्र-भर की कमाई इज्जत पावरू को वे प्राणों से वैसे ही चिपकाए रहते हैं, जैसे मरे बच्चे को बंदरिया । समना चक्कर में न पड़। जवान प्रादमी है। प्रवे, तुझे उर काहे का? फिर मैं जो हूँ तेरी पीठ पर। देखेंगे कि तेरे खिलाफ जाकर कौन क्या कर लेता है । हिम्मत नाहिए, बस हिम्मत । हिम्मत के मागे दुनिया मुक जाती है।" "अच्छा, तो तुम कब पापोगे ? तुम जरा माई, बाबूजी को सम- झाते । वे बड़ी जल्दी मचाए हुए हैं।" "वस, चार-पांच दिन में। संत कटने भर को देर है। मैं नव कर लूंगा। बस तू अपनी भाभी को समझा ले । चल तुझे खेत दिसाऊँ। उपर से ही गगा मैया में गोता लगाकर लौटेंगे।" ? तू उनके तेरह कितने ही मेहमान या-पाकर जब निराश होकर लौट गए, तो एक दिन सुबह, जब भाभी अपनी पूजा में तल्लीन घी, मां ने गोपी को वुलाया और पिता के सामने ला खड़ा किया। पिता की मुख-मुद्रा अत्यधिक गम्भीर थी। गोगी सहता समन न सका कि आखिर क्या वात है। पिता ने उसे और पास बुलाकर कहा, "बेटा, मेरी और अपनी मां की अवस्था देख रहे हो न ?" गोपी ने जैसे किसी आशंका से भरकर सिर हिला दिया। "बेटा, अब हमारा कोई ठिकाना नहीं । आज किसी तरह कट गया, तो कल दूसरा दिन समझो। हमारे दिल में क्या-क्या अरमान थे, प्राज उन्हें याद करके भी हमारा कलेजा फट जाता है । खैर, भगवान् की जो इच्छा धी, पूरी हुई। लेकिन अब क्या तु चाहता है कि घर-गिरस्ती को इसी उजड़ी अवस्था में छोड़कर हम..." कहते-कहते उनका कं० उमड़ती हुई पीड़ा के आवेग से रुद्ध हो गया। माँ ने सिसकते हुए अपना मुंह अांचल से ढककर फेर लिया। गोपी के दुखी हृदय के जल्मों के टांके जैसे किसी ने निर्दयतापूर्वक पट-पट तोड़ दिए । उसकी आत्मा दर्द के मारे कराह उठी। वह अपने को और सम्भालने में असमर्थ होकर वहां से हटने लगा तो पिता ने भरे गले से टूटे हुए स्वर में कहा, "हमारे रहते ही अगर तू पर बसा लेता, तो कम-से-कन हम शान्ति से..." गोपी आगे की बात न सुन सका। वह चौपाल में जाकर विलस- विलखकर रो पड़ा। मोह, उसे कोई क्यों नहीं समझ रहा है ? किती . . १०४ को अपनी बेटी के ब्याह को फिक्र है तो किसी को उसके कुल के नाम- निशान को फिक्र है । मां-बाप को उजडा घर बनाने की फिक्र है । लेकिन उसके चोट खाए दिल को क्यों किमी को फिक्र नहीं है ? यह सोच-सोचकर वह वारम्बार मुझलाया और उसने मुभला. झुंझलाकर इसे बार-बार सोचा। आखिर वह एक नतीजे पर पहुँच गया। उसने दृढ़ता के साथ समाज की ओर से, दुनिया की ओर से पाखें मूंदकर उत्तेजना की स्थिति में निश्चय किया कि वह घर बसा- एगा, जरूर बसाएगा, लेकिन इस तरह वताएगा कि उसके हृदय की चोटो पर मरहम लग जाए, उसकी विधवा भाभी के जलते जीवन पर शीतल जल की छोटे पड जाएं। दूसरे दिन शाम को जब मां बाप के पंताने बैठकर उनके पैर दवा रही थी, गोपी पूजा-घर में जाकर धक-धक करता हृदय लिये भाभी के पीछे खड़ा हो गया। भाभी पूजा में तल्लीन थी। रामायण का पाठ चल रहा था"। "यहि तन सती भेंट अव नाहीं..."मामी इसी पंक्ति को बार-बार भरे गले से दुहरा रही यो। पाखों मे टप-टप आंसू चू रहे थे। गोपी का हृदय करुणा से भर गया । उसकी प्रांखो से भी प्रामू को धारा बह.चली। माखिर पांचल से अखें सुखाकर, भाभी ने पूजा समाप्त कर ठाकुर के चरणों पर सिर नवाया। फिर चरणामृत पान कर उठी तो सामने देवर को एक विचित्र अवस्था में खड़ा देखकर पहले तो उसकी मांखें फैल गईं, फिर दूसरे क्षण पलकें झपकने लगी। जेल से लौटने के बाद गोपी एक बार भी भाभी से प्रांखें न मिला सका था, एकान्त में मिलने को वात तो दूर रहो । भाभी एक बार गोपी को प्रोर चकित हिरनी को तरह देखकर बगल से जाने लगी तो गोजी ने प्राणों का सारा साहस चटोरकर अपना कापता हना हाथ उसको योर बढ़ाया कि भाभी के मह से जैसे एक चीख निकल गई, "वावू !"

। गोपी का चेहरा तमतमा उठा । आवेश में जलता हुआ वह कांपते स्वर में बोला, "भाभी, अब मुझते यह सब नहीं देखा जाता !" भाभी अपने देवर को खुब जानती थी। उसकी एक ही बात, एक ही हरकत से वह उसके मर्म को सारी बातें जान गई। उसके चेहरे पर दुख की जो छोई जमी हुई थी, उस पर खुशी का एक हल्का रंग आया और चला गया। उसकी आंखों की बीरानी और विवशता पर खुशी की एक किरण फूटी और अदृश्य हो गई। वह रुदन-भरे स्वर में बोली, "मेरे भाग्य में यही लिखा था, वावू !" और रुदन के उमड़ते आवेग को रोकने के लिए उसने होंठों को दांतों से भींच लिया। "मैं भाग्य-वाग्य की बात तो नहीं जानता भाभी। मैं तो सिर्फ अपने दुःख और तुम्हारे दुःख की वात जानता हूँ। क्या हम दोनों मिलकर यह दुखी जीवन साथ-साथ नहीं काट सकते ? उजड़े हुए दो दिलों के मिलने पर क्या कोई नई दुनिया नहीं वस सकती ?" कहकर गोपी ने भरी आंखों में प्राग्रहपूर्ण निवेदन लाकर भाभी की ओर देखा। भाभी ने एक ठण्डी सांस ली, दूसरे क्षण उसका चेहरा एक आशा और निराशा की द्वन्द्व-भरी करुण मुस्कान से विचित्र-सा हो गया। बोली, "ऐसा कभी नहीं हुआ वावू, ऐसा भी क्या..." "ऐसा कभी नहीं हुप्रा, इसलिए आगे भी कभी नहीं होगा, यह बात मैं नहीं मानता। भाभी, मैं तो बस यही जानता हूँ और खूब सोच- समझकर देख भी लिया है कि इसके सिवा हमारे-तुम्हारे लिए कोई दूसरी राह नहीं। मैं तुम्हारी इस अवस्था के रहते अपने जीवन में एक क्षण को भी चैन ते न रह पाऊँगा।" गोपी ने सीधे दिल की बात कहकर अांखें नीची कर ली। उसके हृदय की तड़पती सचाई को भाभी न समझ पाई थी, यह बात नहीं । देवर के हार्दिक स्नेह से वह सदा दबी रही है। उसी का 'सहारा लेकर वह आज भी एक असम्भव को उसी तरह गले लगाए हुए है, जैसे विच्छी अपने पेट में बच्चों को पालती है। विच्छी के प्राण .

उसके बच्चे ले लेते हैं, यही सोचकर वह उनसे अपना गला ता नहीं छुट्टा सती । भाभी के प्राग भी ऐसे ही निकल जाएंगे, वह जानती है। फिर भी उम असम्भव को अपने मन में एक क्षण को भी यह अलग कहीं कर पाई है ' आज के इस अवसर का उसे मुद्दतों से इन्तजार था, उसने बहुत बार यह भी सोचा था कि ऐने अवसर पर वह क्या कहेगी। लेकिन अब अवसर सचमुच उसके सामने आ गया, तो उसे लगा कि मन की बात उसके होठों पर प्रायी नहीं कि देवर के सामने वह छोटी हो जाएगी। इस अवस्था में उसे लगा कि उस बात को वरवस दवाना ही रड़ेगा। उसकी विवशता देवर को भी मालूम है, उसे यह भी मालूम है कि भाभी अपने प्यारे देवर के हार्दिक स्नेह, सच्चो महानुभूति का भार सहन कर मकने में आज कितनी असमर्थ है, वह यह भी जानता है कि उसके किये हो कुछ हो सकता है। भला भाभी के लिए वैसे देवर का निवेदन करा देना, अपने और उसके अव तक चले पाये स्नेह-मूत्र में बंधे सम्बन्ध को तोड देना कैसे सम्भव है। इतना सब जानकर भी भाभी के मुंह से कुछ निकालकर उसे वह छोटी क्यों बनाना चाहता है ? प्रसमजस में पडी-सी भाभी बोली, "हमारा समाज, हमारी विरा- दरी, हमारे मां-बाप ऐसा कभी न होने देंगे वादू !" "भाभी, इन सवको तुम मेरे ऊपर छोड दो, मैं तो तुम से यही जानना चाहता हूँ कि जिस राह पर चलना मैंने तय कर लिया है, उस पर तुम भी मेरे माथ-साथ चल सकोगी न?" कहकर गोपी ने भाभी की ओर ऐसे प्रांखो में कलेजा निकालकर देखा, जैसे उसके जवाव पर हो उसका जीवन-मरण निर्भर हो । भाभी के होठो में कम्पन हुा । मन को वात होठो पर माकर उबलने लगी। लेकिन फिर भी, लाल साहस बटोरने के बाद भी भाभी के मुंह से कुछ निकल न सका। उसके हृदय का द्वन्द्व मुंह तक पायी बात को भी जमे गट-से पी गया। हृदय की तूफानी धड़कन पर ही - काबू पाने के लिए उसने अपना तमतमाया, कांपता मुंह नीचे कर लिया, और गोपी को मानो उत्तर मिल गया और वह झपटकर वाहर हो गया। भाभी हृदय का उमड़ता आवेग निकालने को ठाकुर के चरणों में गिरकर विह्वल होकर रो पड़ी । भगवान्, भगवान्, क्या सच ही.'' । गोपी मां-बाप के सामने जाकर खड़ा हो गया। बाप ने उसकी पोर देखकर पूछा, “दाना-मिसना अव कितना रह गया बेटा?" "बाज खतम हो गया बाबूजी !" "अच्छा, तो जा हाथ-मुह धो ले। भाभी ने रोटी सेंक ली हो त गरम-गरम खा ले । दिन-भर का थका-हारा है।" फिर अपनी औरत की ओर देखकर कहा, "फसल दा मिसकर घर आ जाती है तो किसान को साल-भर की मेहनत सुफल हो जाती है। काम से जरा फुरसत प उस दिन वह पाराम की एक सांस लेता है।" "वावूजी !" वाप ने मुड़कर फिर गोपी की और देखकर कहा, "क्या कहता है कोई बात है ?" "हाँ।" "तो कहो।" "बाबूजी, अब मैं घर बसाऊंगा।"... "यह तो बडी खुशी की बात है बेटा ! हम तो तुम्हारी इसी बात का, जब से तुम आए, इन्तजार कर रहे थे। कल ही लो। तय कर कितनी देर लगेगी। कितने प्रा-पाकर चले गए। अरे हाँ, मटरू इध महीनों से नहीं पाया। कह गया था, 'मैं ही गोपी का व्याह कराऊँगा भूल गया होगा। दांने मिसने से आजकल किस किसान को कहाँ किर्स बात की फिक्र रह जाती है ! खैर, अब सब ठीक हो जाएगा बेटा, तुर्भ - कोई चिन्ता करने की जरूरत नहीं।" फिर भपनी औरत की ओर मुड़कर सुद्यो से पागल हुए-से बोले, "सेत का धन कट-कुटकर जब घर मा जाता है तो किमान का ध्यान खेत से हटकर घर में पा जाता है। क्यों, गोपी की मां ?" मा सुशी में फूली हुई अपने मांचल से अपने लाडले के मुंह पर बनी धूल-गर्द को पोछती हुई बोली, "सो तो है ही, गोपी के बाबूजी, घर भरता है तो पेट भरता है, और जब पेट भरता है तो..." और वह जोर से सी-खोकर हंस पड़ी तो बूढ़े भी हो-हो कर उठे। "लेकिन बाबू जी......" सिर झुकाए, हाथों को उलझाता गोपी बोला। "तुम फिक्र न करो, वेटा। सब ठीक हो जाएगा। बेटा, मेरे कुल से सम्बन्ध करने का लोन किममे नहीं ? मभी कुछ नहीं बिगड़ा है। तू लायक बनकर रहेगा तो सब विगडी बन जाएगी। वही देखने को तो अभी तक मैं जिन्दा हूँ। क्यों, गोरी की मो?" "और नही तो क्या ? मेरा लाल सलामत रहे, तो फिर घर सम- सम भर जाएगा। हे भगवान्.." और बूढो ने दोनों हाय माथे से लगा . लिए। "मगर यावूजी," सूखते गले के नीचे थूक उतारता गोपो बोला, "मैं.. मैं.."मुझे "मुझे अपना घर बसाने के लिए किसी दूसरी लड़की को नहीं लाना है । मैंने तय किया है कि भाभी..." "क्या ?" क्रोध में कांपते पिता ऐसे चीख पड़े कि उनकी मासे निकल पाई। मौ जैसे सहसा जमकर पत्यर हो गई। उसका मुंह पोर भांखें सीमा से अधिक फैल गई। पिता ने गरजकर कहा, "मेरे जीते- जी अगर तूने यह बात फिर मुंह से निकालो, तो"तो"तू सुन ते, वह मेरे घर की देवी हो सकती है, लेकिन बहू, बहू"यह मानिक की हो रहेगी ! तूने अगर "मोह, मानिक को मौ!" ननका क्रोध में उठा हुमा कमर से ऊपर का शरीर कापता हुमा कटे पेड़ को तरह धम से गिर !

। पड़ा और वह दोनों ठेहुनों पर दोनों हाथ रखते ज़ोर से कराह उठे। मां जलती अांखों से गोपी की ओर देखती, गुस्से से कांपती, उनके ठेहुनों को सहलाने की व्यर्थ कोशिश करने लगी। "बूढ़े को कड़क सुनकर कई आदमी लपक आए । भाभी दरवाजे पर पाकर ओंठ चबाने लगी। गोपी हाथ से सिर पकड़े वहां से हट गया । दुनिया समझती है कि वेटा और विधवा बहू मां-बाप की अांखों के तारे हैं । बूढ़ा कैसे दूसरों से कहता है, मेरी बहू मेरे घर की लक्ष्मी है। वेवा हुई तो क्या, वह मेरी जान के पीछे है। उसकी सेवायों का बदला क्या इस जीवन में मैं चुका सकता हूँ। पिछले जनम की वह मेरी । बेटी है, अगले जनम में मैं उसकी बेटी बनकर उसकी सेवा करूंगा। तभी ऋग्ण से उऋण हो जाऊँगा !' और माँ ? 'इसे मैं आँखों की पुतरी की तरह रसू गी । मेरे लिए तो यह मेरा मानिक ही है। बड़ी बहू एक दिन घर की मालिकन बनेगी । उसे तुलसी की तरह सब अपने सिर पर रखेंगे !' लेकिन कोई भोले गोपी से तो पूछे कि वे उनके लिए क्या है ? पोह, उनकी आँखों की लपटों ने क्यों नहीं उसे वहीं जलाकर भसम कर दिया, क्यों नहीं बढ़ कर भाभी को जला दिया, क्यों नहीं फैलकर सारे घर को जला दिया? सब झंझट ही साफ हो जाता। फिर बूढ़ा- बूढ़ी वैठकर मसान जलाते । गोपी का सारा तन-मन फुक रहा था। उसके जी में पाता था कि अभी सबको नोंच-नाचकर रख दे और भाभी का हाथ पकड़े घर से निकल जाए। कई वार चौपाल से घर में जाने को उसके पैर बढ़े और पीछे हटे। कई बार उसने दाँत भींच-भींचकर कुछ सोचा, लेकिन इतनी हिम्मत उसमें कहाँ थी कि मां-बाप की छाती पर पैर रखकर वह चला जाए? उसने कब सोचा था कि आखिर उसे ऐसा भी करना पढ़ेगा? वह तो सोचता था कि मां-बाप का अकेला लाडला जैसे ही मह खोलेगा... वह विवम क्रोध में पागल-सा ही बाहर निकल पड़ा । उसे भय लगा कि सचमुच पह कहीं कुछ कर बैठा तो? उसकी अब तक बंधी आशा टूट गई थी। इतने दिनों अपने हृदय से लड़कर उसने उससे जो समझौता किया था, वह व्यथं सिद्ध हो गया। पिता की एक बात ने ही उसके प्रव तक के खड़े किये महलों को ठोकर मारकर गिरा दिया। एक नयी राह पर चलकर अपनी मंजिल के करीब यह पहेवा ही था कि उसकी टांगें तोड़ दी गई। माज वह जितना दुखी था, उससे कही अधिक क्षुब्ध या अपने मां-बाप पर। एक चली पाई खोखली रीति, समाज के एक थोथे रिवाज, सड़ी-गली एक रूढ़ि, कुल की एक झूठी मर्यादा के दम्नी-पुजारी मां-बाप आज अपने सूनी जबड़े में एक फूल-सो मुकुमार, गाय-सी निरीह, रोगी-सी दुर्बल, निहत्यी-सी अपनी रक्षा करने में बस, कंदी-सी गुलाम, सुवह के आखिरी तारे-सी अकेली युवती को दवाकर चबा डालना चाहते हैं। ओह ! इन्ही आँखो से कैसे वह निर्दयता का यह क्रूर दृश्य देखता - रहेगा? वह चौरामा-सा कटे हुए सेतों और खलिहानों में परेशान दिमाग और क्षुब्ध हृदय लिये बड़ी रात तक घूमता रहा। उसे इस वक्त सिर्फ एक मटरू ही ऐसा मादमी दिखाई देता था, जिसकी गोद में सिर डाल. कर वह जरा शान्ति का अनुभव करता। शायद वही यव कुछ करे । भाभी को अोर से तो उसे तसल्ली हो ही गई। उसके जी में माया, प्रभी दोड़कर मटरू के पास पहुँच जाए, लेकिन घर की सोचकर कि जाने आज भाभी पर क्या बोते, वह वापस लोट पड़ा। यह सेतों-हो-रोतों से पर को पोर चला, चारों ओर सन्नाटा छाया था; काली रात ने सव-कुछ को ढंक लिया था। चोर की तरह वह घर के दालान से खटोला निकालने को घुसा तो . मां की कड़कती हुई आवाज सुनकर चौखट पर ठिठक गया । मा चोट खाई बाघिन की तरह गरज रही थी, "कलमुही, तुझे शर्म न आई देवर पर डोरा डालते? मैं तो समझती थी कि सावित्रा-सी सती है वहू । क्या-क्या पाखंड रचे थे, पूजा-पाठ, ध्यान-भक्ति, सेवा- सुन्न सा ! मुझे क्या मालूम था कि इस पाखण्ड के आड़े तू मेरो नाक काटने की तैयारी कर रही है । चुईल, तुझे लाज न आई यह सब पाप- करम करते ? यही सब करना था तो तू क्यों न निकल गई किसी पापी के साथ ! तु काला मुंह करती, मेरा बेटा तो बच जाता तेरे जाल से ! कितने ही आए रिश्ता लेकर और लौट गए। हम कहें क्या वात है कि वह किसी के कान नहीं देता! हमें क्या मालुम था कि भीतर- ही-भीतर तु वेशर्मी का नाटक रच रही है ! कुशल है कि बूढ़ा अपंग हो गया है, नहीं तो तुझे ग्राज बोटी-बोटी काटकर रख देता । तू चखती मजा अपनी करनी का! जा कहीं डूब मर, कुलबोरिन..." गोपी और ज्यादा न सुन सका । उसका दिमाग फटने लगा। उत्ते लगा कि अगर वह एक क्षण भी वहाँ और खड़ा रह गया तो कुछ ऐसा भीपण काम कर डालेगा जिसका फल अत्यन्त ही भयंकर होगा। वह लड़खड़ाता हुप्रा-सा भागकर घर के पास के कुएं की जगन पर दोनों हाथों से फटता सिर दवाए पड़ गया। उसमें एक हाहाकार मचा था। भाभी ने आज तक ऐसी बातें न सुनी थीं। आज जीवन के गुजरे हुए दिन उसकी आँखों के सामने वैसे ही नाच उठे जैसे किसी मरने वाले के सामने। मां-बाप, भाई-बहन का लाड़, मानिक का प्यार, सास-ससुर-देवर का स्नेह ! उधर विधवा होने के बाद जरूर कुछ चिड़- चिड़ा होकर वह सास से उलझी थी। लेकिन इस तरह की बात कोई कहे, इसका मौका उसने किसी को कभी न दिया था। ग्राज भी उसकी ११२ कोई गलती न थी। फिर सास जो ऐसी बाते बिना कुछ बानेन्यूट, सोचे- समके उसे मुनाने लगो, तो उसके मन को क्या हालत हुई, यह महन हो समझा जा सकता है। उनका घायल हृदय हाहाकार कर उठा। इस अचानक, वेकारण हमले में वह ऐसे सुल हो गई, कि न कुछ कह सकी, न रो सकी, न गिसक सको, न एक प्राह ही भर सकी। दिमाग भन्ना रहा था, चेतना पर एक मसह्य पीडा का सामोश नशा-सा-छा गया था, मग. अंग जैसे निर्जीव हो रहा था। जहाँ होश मोर बेहोगी एक-दूसरे से मिलते हैं, ऐसी स्थिति में यह बुत बनी बैठी रह गई। सान बडयदाती रही, घबड़ाती रही। लेकिन उसे अब जैसे कुछ मुनाई न दे रहा था। उसके मुन्न दिल-दिमाग की गहराइयों में मार को वह एक ही बात गूंज रही थो, "जा कहीं डूब मर कुलदोरिन ! जा..." कभी पहले भी मर जाने की बात उसके मन में उठो यो, लेकिन एक प्राथा, एक सहारे ने उसके हाथ थाम लिए थे। वह माया मसम्भव हो यो, तो क्या, फिर भी माता थी। लेकिन मान? माज वह भी टूट गई। जिस तारे पर नजर लगाए यह आज तक जीवित थी, वही टूटकर गिर पड़ा। भव''अब सिर्फ अन्धकार है-मन्धकार, निविड़, कठोर, भयंकर। बडबड़ाते-ही-बड़वडात साम माट पर पड गई मौर बड़बड़ाते-हो- बड़बड़ाते थककर सो गई। उने साने यौने, बूढे के दवा-दारू, पेटे को सौग-सवर, यहाँ तक कि घर का बाहरी परवाना बन्द करने की भी गुस्से के मारे मुधि न रही। अन्धेरी रात पल-पल गाड़ी होती गई। पर फा सन्नाटा गहरा होता गया । वातावरण भोय-भोय करने लगा। निजनता को भी से नींदपा गई, सांसे भी जैसे थम गई हो। मत्यकारपूर्ण प्रवल में डूबी हुई भाभी को चेतना में एक हरकत हुई। इसे में दुत-सी वह उठ खड़ी हुई। कोई याद नहीं, कोई गयान नहीं। उसके बेहोश पर उठे । यह चौसट है, जिस पर भाभो ने म..

में पाने के बाद कभी पर न रखा था, लेकिन आज वह वह नहीं है । आज एक लाश है, जो बाहर जा रही है। और उसे तो इस क्षण यह भी ज्ञान नहीं कि वह क्या कर रही है । एक वेहोशी की चेतना है, जो उसे लिये जा रही है। यह कुएं की जगत् की सीढ़ियां हैं। दो कदम और..." और फिर... "कौन है ?" फैली अांखों से देखता अभी तक जगा. पड़ा गोपी पुकार उठा। वेहोशी को अचानक होश या गया। काँपती भाभी कुएं की दाँती की ओर दौड़ी कि गोपी ने उसे पकड़ लिया। "कौन है ? "भाभी तुम!" भाभी बेहोशी हो उसकी बाहों में आ रही। यही होने वाला था, यही होने वाला था ! गोपी की बुज़दिली का नतीजा यही होने वाला था ! अब ? समय नहीं । जल्दी; जल्दी! सोचने का समय कहां, मूर्ख ? और गोपी भाभी को अपनी बाहों में उठाए भाग चला। अन्धकार! कोई रास्ता नहीं, लेकिन गोपी भागा जा रहा है। रास्ते देखने-समझने का यह समय नहीं। इस वक्त तो भाभी को इन चांडालों से कहीं दूर ले जाना है । वह बस यही जानता है, यही! - चौदह पौ फटने के पहले ही गोपी लौटकर कुएं को जगत् पर पड़ रहा। अभी वह अपने को स्वस्थ करने की कोशिश कर ही रहा था कि मां के ११४ चीखने को यावाज उमरे कानो में पड़ी, "हाय राम ! बडी वह घर में नहीं है..." लेकिन वह प्रांत मूंदें ऐगे पटा रहा, जसे नीर में वेखवर हो। धीरे-धीरे मुहल्ले के प्रोरत-मदं उसके दरवाजे पर जमा हो गए। गोपी को जगाया गया । वह एक हत्यारे की तरह चुप बना रहा। लोगो ने बहुत सोच-समझकर भीड हटाई और हिमायत को कि सब चुप रहें, किसी को कानो-कान खबर न हो, वरना बदनामी जो होगी, सो तो होगी हो, ऊपर से कही लेने के देनं न पड़ जाएँ। लेकिन इस तरह की वारदातें छिपाए कही छिपती हैं ? बहवो को इस तरह की संगीन सवरें फैलाने में एक अजीब तरह का मना मिलता है । सो घड़ी-पाप पड़ी बीतते-बीतते दारोगा प्रा धमका। दारोगा चला गया । गोपी चौपाल में अकेला वंठा सोच मे दूवा था। मां की रुलाई को भावाज सुनकर उसका पारा चढ़ जाता था। उसको समझ में न माता पा कि वह मयो रो रही है ? उसी ने तो उसे डूब मरने के लिए कहा था। भव यह ढोग क्यो दिसा रही है ? उसके जो में पाता था कि जाकर उसे सूप पाड़े हाथो मोर कहे कि सय तो नाक बच गई ! सुशी मनाप्रो ! अपने कुल की मर्यादा का ढोल पीटो! वह अपने बाप से भी झगड़ना चाहता था। भय तो इज्जत बढ़ गई ? कलेजा टंडा हमा ? हत्यारो ! उस मासूम की हत्या का पाप ताभिन्दगी तुम्हारे सिर पर रहेगा! तुम अपनी विरादरी को हार बनाकर गले में पहने रहो, रीति-रिवाज को सूव माला जपो ! लेकिन रात की घटना उनके दिल-दिमाग पर इतनी मोर इस तरह छाई थी, कि वह उठ न सका । सोचने-विचारने पर उसे लगता था कि यह भी मां-बाप से किसी प्रकार भी कम अपराधी नहीं। उसका भी उनमें उतना हो हाथ था, जितना उनका। मगर हिम्मत करके वह मां- वाप का मुकाबिला कर सकठा, सरे-ग्राम भाभी का हाथ पकड़ लेता, तो भाभी के लिए ऐसा करने को नौवत क्यों प्राती? यही सयाल उसे ११५ . वैतरह दबाए हुए था । उसकी जवान वन्द थी। आज वही बात फिर उसके मन में बार-बार उठ रही थी कि सच ही उसके समाज की विधवा लकड़ी का वह कुन्दा है, जिसमें उसके पति की चिता की आग एक वार जो लगा दी जाती है, तो वह जलती रहती है, तब तक जलती है, जब तक वह जलकर राख न हो जाए, और उसके राख हो जाने के पहले उसे बुझाने का किसी को अधिकार नहीं। क्या राख हो जाने के पहले उसने भाभी को बचा लेने की जो कोशिश की, वह उसकी अनधिकार चेप्टा थी? क्या उसकी सच्ची, सहानुभूतिपूर्ण कोशिशों का यही अन्तं होना था? आखिर इसमें बाकी ही क्या रह गया था ? भाभी के राख हो जाने में कसर ही कितनी थी ? यह तो संयोग ही था न, जो वह वच गई। वरना, वरना....."और वह फूट- फूटकर रो पड़ा। ओह ! यह क्या होने वाला था ! हे भगवान् तेरा लाख-लाख शुक्र, जो.. और वे सदाल फिर-फिर उसके दिमाग में उठ पड़ते-ऐसा क्यों हुमा? क्यों, क्यों? और उसके ही अन्तर की आवाज उसके जवाब में गूंजने लगती, 'हाँ, तुम सच्चे थे, तुम्हारा दिल भी सच्चा था, तुमने कोशिश भी की जरूर । लेकिन उस कोशिश को सफलता की मंजिल तक पहुँचाने के लिए जिस साहस की जरूरत थी, वह पूरा-पूरा तुममें न था। इस साहस के अभाव ने ही भाभी को राख हो जाने के लिए मजबूर कर दिया था। साहसविहीन इस तरह की कोशिशों का यही अन्त होता है। ये आग को और भी भड़का देती हैं। ये तत्क्षण जलाकर राख कर देती हैं। मूर्ख, अव भी समझ, अब भी संभल ! यह बच्चों का खेल नहीं; यह भावुकता के व्यर्थ के जोश के वश का रोग नहीं ! यह आग में फांदकर आग बुझाना है, यह जीवन पर खेलकर जीवन बचाना है, यह युगों-युगों से लाखों विधवाओं का खून पीकर वलिष्ठ हुए रीति-रिवाज के भयंकर राक्षस से अकेले लड़कर उसे पछाड़ना है, ११६ यह बीह जंगल से एक नई राह निकालनी है। कोई ठट्ठा नहीं, कोई खेल नहीं! और जीवन में कभी भी हार न मानने वाले गोपो को भगा कि जैसे उसके साहस और बल को यह दूसरी ललकार है, जिसके सामने अगर उसने सिर झुका दिया तो उसकी भाभी जलकर राख हो जाएगी। पहली ललकार जोवू को यो पौर माज यह दूसरी है। मोर गोरो को महसूस हुमा कि मान फिर यही सून उसको नसों में दौड़ने लगा है, जिसकी ताकत के सामने वह किसी को कुछ न समझता था। ? कुएँ मे काटा डाला गया; ताल-पोषर को छाना गया। मोर जब वहीं कुछ पता न चला, तो तरह-तरह की मफवाहें हवा में उड़ाई गई, तरह-तरह की कहानियों रची गई । मोरतों ने भाभी मे कितने ही कुल- छन निकाल ढाले, बूढ़ों में जमाने को कोस-कोम मारा, यारों ने चर्चा चला चला सूब मजे लूटे। लेकिन किसी में इतनी हिम्मत न थी कि गोपी के सामने जबान खोलता। फिर अपनी चादर के छेद को छिपाकर दूसरे की चादर के छेद मे पर डालकर कहाँ तक फाइते? ढला गिरने से पानी को मतह मे जो हतबल मचती है, वह कितनी देर ठहरती है दिन बीतते गए। दुनिया पूर्ववत् चलती गई। भोर एक रात जर गांव में सोता पड़ गया था, गोपी के दरवाजे पर एक भारी-भरकम गोजी धर्म से बज उठी। बूढे ने, जिसको नींद प्राजकल पहले को बहू वालो सेवा-सुश्रूषा न पाकर हिरण हो गई थी, यों हो मुंदी माँखें खोलकर टोका, "कौन ?" भागन्तुक धीमे से हंसा। फिर बूढ़े की मोर बढ्ता योता, "जाग रहे हो वाबूजी ?" ."कोन ? मटरू है क्या ? अरे वेटा, मेरी नीद तो उसी दिन से उड़ . गई, जिस दिन बहू चली गई। अब तो लाश ढो रहा हूँ। कौन उसके बराबर अब हमारी सेवा करेगा ! बुढ़ी तो जरा देर में भल्लाकर भाग खड़ी होती है । अब तो भगवान् उठा लें, यही मनाता रहता हूँ। आयो, बैठो। वहुत दिन पर आए ! क्या-क्या हो गया इसी बीच ! सोचा था, अब दिन लौटेंगे, लेकिन करम में तो जाने अभी क्या-क्या भोगता वदा है।" दीवार से गोजी टिकाकर, पंताने बैठता मटरू बोला, "तब ठीक हो जाएगा वाबूजी, आप चिन्ता न करें। इस घर को बताने के लिए हो तो इतने दिनों रात-दिन एक किये रहा। सोचता था कि जब तक कान न बन जाए, कौन मुंह लेकर आपके यहां पाऊँ। जवान दी थी, तो उसे पूरा किये बिना चैन कहां ! मटरू की जिन्दगी इसी एक बात से तो पैमाल रहती है। अपने स्वभाव को क्या करू ? गंगा मैया के पानी, मिट्टी और हवा के तिवा जिन्दगी का कोई सुख न जाना । हां, हरू और न्याय के सामने किसी को मैंने कभी कुछ न समझा। कई बार मुंह को खाकर भी इन जमोदारों की ऐं नहीं जाती। मुंह का लगा हुया आसानी से नहीं छूटता, वावूजी। पुश्तों हराम का दीयर से बटोरा है । अब नहीं मिलता तो दांत किटकिटाते हैं। सुना है, कानूनगो को पड़- ताल करने का हुक्म आया है। अब तो चारों ओर पानी-ही-पानी है, वह काहे की पड़ताल करेगा ? वात अगले साल पर गयी। तब तक हमें भी तैयारी करने का मौका मिल गया है। जान दे देंगे बाबूजी, लेकिन जमी- दारों का वहां पांव न जमने देंगे। सालों यह लड़ाई चलेगी। गंगा मैया. को कृपा से हमारी जीत होगी। हक और न्याय हमारे साथ हैं। झूठ, फरेब, धांधली, जोर-जुलुम की गाड़ी बहुत दिनों तक नहीं चलती। अब मटरू अकेला नहीं, दीयर और तीरवाही के हजारों किसान उसके साथ हैं। अपनी प्यारी धरती पर जान देने वालों से उनकी धरती छीन लेने की ताकत किसमें है ? 'इन्हीं झंझटों में फंसा रहा वावूजी, नहीं कभी का सब ठीक हो गया होता। इधर गंगा मैया भी फूल उठी हैं। पांच दिन पहले हो तो अपनी भोपड़ी उस पार से गया है। इस पार तो तों की तरह जमोदार मेरो महक संपते रहते हैं। अब तुम रहो, यही का समाचार बहुत दिनों से नहीं मिला।" "क्या कहे बेटा, घर में एक करने धरने पासो पो, यह भो..." "वह तो मुन चुका है, गवतो." "क्या बता मटरू बेटा, ऐसी नायक वह थी कि उसकी बाद पानी है तो कलेजा फटने लगता है। अब मैं नहीं जोऊंगा।" कहते कहते वह रो पड़े। "बाबूजी, तुम इस तरह अपना जी हलका न करो। तुम्हारे परशो की सौगन्ध खाकर कहता हूँ शबूजी, कि मैं गोपी को ऐसी रहना दूंगा जो पले ही भापकी बड़ो यह और छोटी बहू दोनो को जगह नर देगी। प्राप चिन्ता न करें।" "लेकिन गोपी तयार तो हो बेटा, वह तो हमसे बहुत नाराज है । बोलता भी नहीं । अव नुमसे स्या छिराऊँ, वह अपनी भाभी के साप ही पर बसाना चाहता था। यह भला कैसे हो सकता पा ! जाने उम दिन पगली बूढो ने क्या-क्या बहू को कह डाला। वह पर से निकल गई। इधर यह हमसे नाराज हो घुलता जा रहा है। हमें क्या मालूम पा बेटा, कि इस तरह उसका दिल लगा था। मालूम होता तो हम काहे को कुछ कहते ? मां-बाप के लिए क्या वेटे से बढ़कर बिरादरी है ? यह भी दो-चार होते तो एक बात होती। यहाँ तो उसी एक के सहारे हमारी जिन्दगी है। विरादरी वाले क्या हमें खाना दे देंगे? लेकिन हमे नया मालूम था? पर कितना पछतावा हो रहा है। परे, मेरी तो बेटी ही निकल गई। उसके बराबर कोई मेरी सेवा क्या करेगा? लेकिन पर किया क्या जा सकता है बेटा? तुम उसे समझायो। भव तो होग संभाले ।" "समझाऊंगा वावूजी, मेरी बात वह नहीं टाल सकता। मुझे मरने मानिक भैया की तरह वह मानता है । तुम चिन्ता न करो, र ठोकहो जाएगा। कहां पड़ा है वह ?" उठते हुए मटरू ने कहा !... "अरे वेटा, जरा देर और बैठ ! मुझे यह तो बताया ही नहीं कि कहां..." मटरू धीरे से हंसकर बोला, "अपने ही घर की लड़की है वाबूजी। . यो समझ लो कि मेरी छोटी साली ही है । पण्डित से जंचवा लिया है। गनना-बनना सब ठीक है ।. रूप-रंग में विलकुल गोपी की भाभी ही की तरह है । जरी-बराबर भी फर्क नहीं । गुण में भी उसी की तरह । सेवा- व्हल तो इतना करती है बाबूजी, कि तुमसे क्या कहूँ। तुम देखना न । तुम तो समझोगे कि बड़ी बहू ही दूसरा रूप धारण करके या गई। तुम भी क्या समझोगे कि मैं कैसा पारखी हूँ ! जव से गोपी को भाभी को देखा था, गोपी के लायक कोई लड़की ही नजर पर न चढ़ती थी। उससे कम कैसे प्राती घर में? वह तो संजोग कहो कि विलकुल वैसी ही लड़की घर में ही निकल आई । वे लोग दुग्राह उसकी शादी करने को तैयार हो न होते थे। सच भी है, वैसी रूपवती, गुणवत्ती लड़की की.. शादी कोई दुग्राह ते कैसे करे ? वह तो मटरू की वात थी कि मान गए। नटरू की वात कोई नहीं टालता, बाबूजी। लेकिन हां, घर की हुई तो. क्या? मैंने उनसे साफ कह दिया है कि जो भी दर-दहेज वे मानने, देना पड़ेगा। तो वादूजी, कित्ती बात का लिहाज न करना । जो मांगना हो, कह दो...॥ "अरे, हमें उससे क्या मतलब है ! तू गोपी से ही यह सब तय कर लेना। हमें क्या वेटा ? जिसमें तुम सब खुश, उसमें हम खुश । घर वन जाए, बस यही भगवान् से मिनती है। अच्छा, तो जा सहन में गोपी पड़ा होगा। उससे बातें कर ले । और वेटा, जितना जल्द हो, इसे कर डाल । देर अव नहीं सही जाती। हे भगवान् "सो तो सब तैयारी हो करके आया हूँ वावू जी," कहकर मटरू उठा और गोजी में वधी गठरी खोलकर बूड़े के हाथ में थमाता हुमा बोला-"यह मिठाई, धोती और पांच सौ रुपये तिलक के हैं..." १२८ "है, हैं, परे, इतनी जल्दी कैसे होगा यह व्य । पर-पुरोहित, पर. विरादरी..." "सो तुम सब करते रहना वादू जो ! मेरा तो जानते हो, रात हो का मेहमान हूँ। फिर गंगा मैया उफनी हुई हैं। पारलार का मामला है। कौन चार-चार माने-बाने का जोसिम उठाएगा । फिर तुम यह सब ले लोगे तो गोपी पर दवाव डालने की एक जगह भी निकल पाएगी। मेरा काम कुछ प्रासान हो जाएगा। यो काम तो तुम्हारा ही है। पर .गोपी को भी टीका लगा जय गंगा जी!" मोर वह उठ पड़ा। गोपी सहन में खटोले पर पड़ा सर्राटे ले रहा था। मटरू ने पहुंचकर एक ज़ोर की घोल जमाई मोर उसका हाय पकड़, उठाकर बैठाता हुमा बोला, "क्यों थे, मैं तो तेरी शादी के चक्कर में इतनी रात को उफनती हुई नदी पार करके माया हूँ 1 पोर तू यहाँ सर्राटे ले रहा है । पाने दे बहू की, फिर देसू गा कि कसे सर्राटे लेता है !" सकपकाया हुमा गोपी उठकर खड़ा होता धीरे से बोला, "चौपाल में चलो मटरू या !" "और यहाँ क्या हुमा है वे? मो, शमं पानी होगी। मवे, तूने तो कुमारों को भी मात कर दिया !" गोपी उसका हाय सोचकर मन्दर ले गया। उसके हाप से गोली लेकर दीवार से लगाकर, खड़ी करके वह वोला, "मेरी..." "अभी चुप रहा मुझे अपना काम कर लेने दे।" कहकर उसने वाई हथेली पर दाहिने हाप का मगूठा रगहा मोर कुछ मन्त्र-सा बड़बड़ाता हमा गोपी के माथे पर तिलक-सा लगाने लगा, तो गोपी बोला, "इसे तूने कोई खेल समझ रखा है ?" मटरू सहसा मोड़ से गम्भोर हो उठा। बोला,"सेल तू कहता है ? बहादुरी के लिए मुश्किल से मुश्किल काम भी खेल है और बुजदिलों के . 4 GAH लिए. पासान-से-अासान काम भी मुश्किल । तू यह बात किससे कह रहा है, कुछ खयाल है ? मटरू ने अपनी जिन्दगी में किसी काम को कभी भी मुश्किल न समझा। उसने मुश्किलों से हमेशा ही खेला है और तेल-खेल में ही सर कर लिया है। तू इस तरह की बात फिर जवान. पर-न लाना ! दुनिया में मुझे किसी बात से चिढ़ है, तो वह बुज़दिली है और जिस दिन मैंने समझ लिया कि तू बुज़दिल है, उसी दिन तुझे और तेरी भाभी को काटकर गंगा मैया की भेंट चढ़ा दूंगा ! समझ सूगा कि एक भाई था, मर गया, एक बहन थी, न रही।" उसका गला भर्रा गया और उसने सिर झुका लिया । गोपी उसकी गोद में सिर डालकर सिसक पड़ा। मटरू उसकी ' पीठ सहलाते हुए बोला, "पागल, मेरे रहते तुझे कौनसी बात मुश्किल • लगती है ? उठ, मेरी बात सुन । वक्त ज्यादा नहीं है । रात-ही-रात • मुझे वापस जाना है।" और उसने गोपी को उठा उसके गालों को थप- थपाते हुए कहा, "सिसवन बन.के सामने मेरी नाव लगी रहती है । वहाँ तू कहेगा तो मेरी झोंपड़ी तक पहुँचा दिया जायगा। मैं अपने ' आदमियों से कह रखूगा । तुझे कोई दिक्कत न होगी। मैंने बाबूजी को तिलक दे दिया है । कल पीली धोती पहनना । विरादरी में मिठाई ' बँटवा देना और फिर शादी की तारीख की खबर मेरे आदमियों को दिलवा देना। सब बाकायदे हो। दूल्हा बनकर मेरे यहां आना । पारात-वारात भरसक न लाना, लाना, तो छोटी। गंगा मैया कोप में हैं। खैर, जैसा मुनासिब समझना, करना। मेरी बहन की शादी है। . अपने को बेच देने में भी मुझे कोई उन्ज न होगा। गंगा मैया फिर मेरी झोली भर देंगी। उसके दरबार में किसी चीज़ की कमी नहीं, समझा? मन में कभी कोई ऐसी वात न लाना। यह बात न भूलना कि तू मटरू का भाई है । ऐसा करना कि मटरू की इज्जत बढ़े। मटरू की इज्जत वहादुर ही बढ़ा सकता है। अच्छा, तो खयाल रखना मेरी बातों का। - सिसवन वन । अव चलूँ!" - - . 0:- "मेरी भाभी कसे है ?" प्यार से गदाद गोरी बोल पड़ा। मटरू हंसा, बोला, "प्रये, प्रब भी वह तेरी भाभी ही है ? दुलहन क्यों नहीं कहता? अच्छी है, बिलकुल प्रच्छी है। गगा मंया को ह्या जहां तन को लगी कि तीनो ताप मिट जाते हैं। वह तो अब ऐसी हरी हो गई है कि देखें तो जिया लहरा उठे। इस बीच कभी मौका मिले तो मा जाना," कहकर उमने गांपो का माया चूम लिया और उठ खड़ा हमा। गोपी ने उसके पांव पकड लिए। मटरू बोला, "हां, अभी से सोक ले कि बड़े साले का मादर कैसे किया जाता है।" "भैया !" गोपी ने परमाकर निर कुसा लिया। मटरू ने उसे उठा- कर अंक में भर लिया। . पन्द्रह मुंह अंधेरे ही विलरा सानी-पानी करने पाया तो बूढ़े ने उसे बुलाकर कहा, "दौड़ा जाकर पुरोहित जी को बुला ला। कहना, साथ ही चले पाएँ, देर न करें।" "क्यों मालिक, कोई मेहमान पाये हैं का? छोटे मालिक का वियाह......" "हाँ, हाँ रे, नव ठीक हो गया, तू जल्दी जाकर बुला तो ला।" बिलरा चला तो उसके पांवों में वह फुरतो न थो, जो ऐसे सुशी के मौको पर हुआ करती है। छोटी मालकिन जिस दिन तापता हो थी, उसे बहुत दुःख हुआ था। गोपो के आ जाने के बाद उसे छोटी लिकिन को देखने का मौका न मिला था। गोपी ही भूसा वगैरा कालता था। उसके जी में कितनी बार पाया. था कि छोटे मालिक वह अपने मन की बात कहे। कई बार अकेले में बात उसके मुंह जोआई थी, और गोपी ने उसकी कुछ कहने की मंशा समझकर पूछा सी या। लेकिन वह टाल गया था, उसे हिम्मत न पड़ी थी। छोटी मालकिन औरत थी, उससे कह देना आसान था। लेकिन यह बात गोपी के साथ न थी। कहीं गुस्सा होकर एकाध थप्पड़ जमा दिया तो? छत्री का गुस्सा क्या होता है, इससे उसका कितनी ही बार पाला पड़ा था। और माखिर जब छोटी मालिकिन के भाग जाने की बात उसे. मालूम हुई तो उसके मुंह से यही निकला था, "च'च"कैसे जालिम हैं ये लोग! आखिर बेचारी को भगाकर ही दम लिया।" उसे उस मासूम छोटी मालकिन की याद बहुत आती थी। वेचारी, जाने कहाँ, कैसे होगी, कौन जाने कहीं इनार-पोखर ही पकड़ लिया हो! उसको यह समवेदना, एक भोले-भाले दिल वाले की थी। आखिर छोटी मालकिन से उसका नाता ही क्या था? फिर भी इसका जितना सच्चा दुःख उसे हुआ था, शायद ही किसी को फिर कितनी जल्दी ये लोग उसे भूल गए। जैसे कोई बात ही न हुई हो। कितने दिन हुए अभी उसे गये ? और यहाँ दन ब्याह ठन गया। खुशियां मनाई जाएंगी। बाजे बजेंगे। कितनी स्वार्थी है यह दुनिया ! अपने सुख के आगे दूसरे के दुख की यहां किसे परवाह है? विलरा जव पुरोहित को साथ लिये लौटा तो दरवाजे पर हंगामा मचा था । वुलावे पर बिरादरी के लोग इकट्ठ तो हुए थे, लेकिन बिना सव-कुछ जाने-बूझे वे शामिल होने से न कर रहे थे। कहाँ की लड़की है, उसके मां-बाप का खून कैसा है, हड्डी कैसी है ? वह रात को बरछ का सामान देकर क्यों चला गया ? क्यों नहीं रुका ? इस तरह कही किसी का तिलक चढ़ता है ! । ' गोपी एक मोर चुप उता पा। बरे हो दोसर से नहारे चंगुर उनसे बातें कर रहे थे। पण्डितजी को उन्होंने देखा तो बुलाकर पास पड़ी चारपाई पर बैठाकर उन्हीसे कहा, "डिवजओ, क्या में प्रन्या हूँ? अपने ग्युन-सानदान की फिक मुझे नहीं है ? पार ये मुझे पार दिलाने पाये हैं ! मौके की बात है, मटरूसिंह रफ न सका। सड़की उसकी साली है। कई बार कह चुका, समना चुका, मिन्नत कर पुरा, लेकिन इनकी ऐंठ हा नहीं जाती। अपाहिज होसर पहा है, तो ये रोग जमाना चाहते हैं। प्राज ये भूल गए कि हम कौन हैं !" "बिरादरी के मामले में सब बराबर हैं । मास में देखकर तोमरसी नहीं निगली जाएगी। पण्डितजी, पाप ही कहिए, शादी है कि कोई ठट्ठा !" एक बोला। पण्डितजी जानते थे कि किधर का पाना इन पवार पर ठोक है। उन्होंने सांसकर गम्भीर होकर कहा, "पारका कहना टोक है । नेरिन भाई, हर मौके के चनाव का विधान भी भगवान ने बनाया है। पार लोग तो जानते ही हैं कि मौके पर मगर वर वीमार पर जाए. गस्त के साथ न जा सके, तो सोटे के नाय नी गभू का विवाह सम्मन्न कर दिया जाता है। मौके पा चलार नो निकालना हो पडता है। तो कारण मटरूसिंह न एक मके तो क्या इमोतिए यह मौका निकल जाने दिया जाएगा? नहीं, ऐसी बात तो रीति के विरर होगी। मेरोरा तो यही है । पचों को प्रव जो मर्जी हो !" बिरादरी वालों में कानापूती शुरू हुई। एक वा बोला, "डित- जी, मापने जो मौके की बात कही, वह ठोक है। लेकिन यह मोसा तो कुछ वैसा नहीं । टाला जा सकता है। नगन तो कहीं भगहन में हो पड़ेगी। चार-पांच महीने पभी हैं।" "कसे टाला जा माता है ? यह पोती, मिठाई, स्पा स्पा सोरा दू?" बूढ़े गरम हो उठे। "कई बार ऐसा भी हुमा है," एक दूसरा बोल पड़ा।

"और मैंने उसे जो जवान दी है ?" बूढ़े वमक उठ । "ऐसी कोई हरिश्चन्द्र की जवान नहीं है।" एक तीसरे ने ताना दिया। दूड़े के लिए सहना मुश्किल हो गया। वे काँप उठे और गरज- कर वोले, "यह बात किसने मुंह से निकाली है ? जरा फिर तो कहे। असली राजपूत वाप का बेटा हुआ तो उसकी जवान न खींच लू तो कहना। अवे गोपिया, तु खड़ा-खड़ा मेरा. अपमान देख रहा है । जरा बता तो उसे कि तेरे बाप को झूठा कहने का क्या. नतीजा होता है।" विरादरी में एक क्षण को सन्नाटा छा गया। फिर एक कोलाहल- सा मच गया । “यह जवान खींचने वाले कौन होते हैं ? "पद आने पर बात कही ही जाएगी ! यह सारी विरादरी का अपमान है"उठो, उठो ! ... 'चलो, चलो ! कोई गाली सुनने यहां नहीं पाया है "टाट पर बैठने वाला हर आदमी बराबर होता है। इनकी क्या मजाल ! जठो, उठो। "चलो..." पण्डितजी "हाँ, हाँ" करते ही रह गए। लेकिन धोती झाड़-झाड़कर, सव-के-सद उठकर, बौखलाए हुए, अांखें दिखाते वहाँ से चले हो गए. । अब तक भरी-भरी, दरवाजे पर खड़ी हुई बूढ़ी को भी, जैसे गुवार निका- लने का मौका मिल गया । हाय चमका-चमकाकर वह बोली, "जाओ, जायो ! तुम्हारे बिना हमारे बेटे की शादी नहीं रुक जाएगी। पण्डित- जी, पूजा की तैयारी कीजिए। इनके आँखें दिखाने से क्या होता है ? होगा कोई घूरा-कतवार इनकी परवाह करने वाला ! यह मानिक के बाप का घराना है, जो अकेले ही हमेशा सो पर भारी रहा है। क्या समझ रखा है इन्होंने ?" "सच कहती हो जजमानिन, यह तो सरासर इनका अन्याय है। पुरोहित की बात भी इन्होंने न मानी। इससे आपका क्या बिगड़ कुछ खर्चा ही बच जाएगा। जिसका कोई नहीं, उसक जाएगा? १२६ भगवान् है, किसी के बिना कहीं किसी का काम अटका है ?" कहकर पंडितजी ने तैयारी शुरू कर दी। इस तमाशे से सबसे ज्यादा खुसी बिलरा को हुई । इन्ही कमवस्त विरा- दरी वालो के डर से तो छोटो मालकिन को वह हालत हुई। इम बिरादरी का इर न होता तो जितनी वेवामी की जिन्दगी तबाह हुई, सब बच जाती और ठिकाना पा जाती। वह खुशी बिलकुल एक प्रति- द्वन्द्वी को जीत को यो । उसे लगा कि यह उसी की जीत हुई। पण्डितजी को खिला-पिलाकर, विदा कर, गोपी पीली धोती पहने हुए चौपाल में बंठा सोच रहा था कि चलो, यह भी अच्छा ही हुमा । बिल्ली के भाग से छीका ही टूट गया। रास्ते का एक बड़ा पहाड माप ही हट गया... तभी बिलरा पाकर उसके सामने बैठ गया। गोपी ने उसकी प्रोर देखकर कहा, “बहुत खुश हो । क्या बात है ?" "मालिक, तुम्हारी बिरादरी वालों को भागते देखकर पाज मुके बहुत खुशी हुई," हाथों को मलते हुए विलरा बोला । "इसमें खुशी की क्या बात है ?" गोपी यों ही बोला। "वाह, मालिक ! इसमें कोई खुशी की बात ही नहीं है ? इन्हीं के डर से तो छोटी मालकिन निकल गई। इनका डर न होता तो काहे को वह पर छोड़ती ?" उदास होकर विसरा वोला । "हां, यह तो तू ठीक ही कहता है," कुछ खोया-सा गोपी बोला। "तुमको भी विरादरी वालों का बहुत डर था, मालिक ?" "लेकिन माज तो उनसे तुमने अपना सब नाता तोड़ लिया। पहले ही ऐसा कर लेते मालिक, तो छोटी मालकिन को घर क्यों छोड़ना पड़ता? पहले ऐसा क्यों न किया मालिक?" भरे गले से विलरा बढ़े "और । ही दर्दनाक स्वर में बोला। गोपी उसके इस सवाल से घबरा गया। उसे क्या मालूम था कि यह नीच, गवार भी ऐसी समझ की बात कर सकता है ?. वह बिलकुल अचकचाया-सा उसका मुंह देखने लगा। विलरा ही बोला, "जाने कहां-वह किस हालत में होंगी। उनका बड़ा मोह लगता है मालिक ! ऐसी वाली की तरह वह थीं कि क्या बताऊँ। उनकी याद आती है तो आंखों से लोर टपकने लगता वह रो पड़ा। गद्गद होकर गोपी वोला, "भगवान् तेरे जैसा दिल सबको दे, तेरे जैसा मोह सबको दे ! तू दुःख न कर, भगवान् सवं अच्छा ही करते हैं। तू चुप रह !" "मालिक," सिसकता हुआ विलरा. बोला, "जब छोटी मालकिन को देखता था, तो मन में उठता था कि तुम्हारे साथ उनकी कसी अच्छी जोड़ी होती। मालिक, विरादरी वालों का डर न होता तो तुम उनके साथ व्याह कर लेते न?" गोपी का दिल हिल गया। वह विह्वल-सा होकर विलरा का हाथ पकड़कर उसको आँखें पोंछते हुए बोला, "तू बड़ा अच्छा आदमी है, विलरा । जा, सुबह से तू घर नहीं गया। तेरी औरत खोज रही होगी। भाई से खयका मांग ले।"

सोलह . पड़ताल क्या होनी थी, जो होती ! कितनी ही घोलियो को तरह यह भी, किसानों को डराने-धमकाने की एफ. जमीदागना और अफसरी चाल ही थी । और फिर गंगा मैया को माया कि इस माल पानी हटा नो दोधारें बन गई-~-एक इधर और एक उधर, प्रौर बीच में परती निकल पाई, दो पाटियों के बीच में पहाडी की तरह। यह साल गहरे संघपं का पा, मटरू जानता था। उसने इसको पूरी तयारी भी की थी। यव जो नदी की दो धाराएँ देखी, तो उसे लगा कि गगा मंया ने उसके दोनों पोर अपनी विशाल यहि फंसाकर उसे पपनी ऐसी रक्षा के घेरे में ले लिया है कि दुश्मन नास सिर मारफर भी उमका पाल बांका नहीं कर सकते। रेत पर पहले मटरू की झोपड़ी खड़ी हुई, पौर देसते-ही-देखते पिरले साल की ही तरह पचासों झोपड़ियां जगमगा उठीं। जमीदारों ने सोचा था कि इस साल कोई किसान वहाँ न जाएगा, लेकिन जब यह खबर उनके कानों पहुंची, तो वे पलवला उठे। थाना, वहसील, जिले को दौर-पूप गुरू हो गई। इतने दिन चुप रहकर उन्होंने देख लिया था कि ऐमा चलने से वे पुराने दिन नहीं पाने के । अब तो कुछ-न-कुछ करना ही पड़ेगा, वरना हमेगा के लिए दीयर हाप से निकल जाएगा। यह पासिरी बाजी है, हारे तो हार, और जीते तो जीव । जान लड़ाकर इस बार इधर या उपर कर हो लेना है। मिट्टी तो चिकनी है, लेकिन धरती पभी बहुत गोली है । रही- फहीं तो भय तक दलदल ही पड़ा है । मूखने में बड़ी देर लगेगी। दोनों मोर वरावर जोर की धाराएं हैं। न भो मूखे। बावग का वक्त निकला गंमै-- १२६ - .. "" जा रहा है। देर से भी वावग के लायक घरती होगी, इसकी उम्मीद न यो। मटरू चिन्ता में पड़ा था। सब किसान चिन्ता में पड़े थे कि क्या किया जाए, कहीं यह साल खाली न चला जाए। पूजन की पहुँच धरती के बारे में मटरू से कहीं गहरी थी। यों ही देखने के लिए उसने किनारे के पास एक छोटा सा गल घेरकर थोड़ा धान को वीया डाल दिया था। पांच-छ: दिन के बाद वहां . हरियाली नजर आई तो उसने मटरू से कहा, "पाहुन, इस साल धान बोया जाए तो कैसा?" : मटरू ने हंसकर कहा, "वे, धान क्या माजकल बोया जाता है ?" - 'पूजन ने अपने प्रयोग की बात कह के कहा, "सुना है. बंगाल, मद्रास में धान को कई-कई फसलें होती हैं। अव - को हमारी धरती भी धान लायक ही मालूम पड़ती है। पानी की कोई कमी नहीं। नमों महीनों बनी रहेगी। मैं तो कहूँ, पाहुन बोया जाए। गले : बैठे रहने से कुछ भी करना बेहतर है। नहीं कुछ हुआ तो बीया जाएगा और कहीं हो गया तो एक नई बात- मालूम हो जाएगी।" मटरू उसी क्षण उठ खड़ा हुआ और. पूजन के साथ जाकर गढ़े में उगा धान देखा तो उसकी आँखें झपक गई। कहा, "सच रे, तेरी वात तो ठीक ही मालूम होती है।" और किसानों से फिर चट राय-वात हुई। पूजन की बात मान ली गई। बोने की तैयारियां शुरू हो गई। %3D . .... : गोपी से आने के लिए मटरू- कह आया था, लेकिन तब से, वह एक बार भी न पाया। नाव वालों से बरावर सर-समाचार ले-दे जाता है, लेकिन आता नहीं। अगहन सुदी नवमी.को लगन है। बारात में दस-पांच मेहमानों के सिवा कोई न होगा। विरादरी ने खान-पान बन्द .

कर दिया है। किसी बात को चिन्ता नहीं।
एक दिन भाभी ने मटरू से कहा, "भैया, तुमने उससे पाने को
कहा या न?"
"लेकिन वह तो एक बार भी न माया । तुमसे झूठ तो नहीं
कहा.पा?"
-
.
"झूठ क्यों कहता री? लेकिन वह पाए भी कमे"
"क्यों ?"
"शादी के पहले कोई दूल्हा ससुराल जाता है क्या ?" कहकर
मटरू मुस्कराया।
"दुत ! जाग्रो भया, तुम तो दिल्लगी करते हो, और यहाँ मन में
रात-दिन एक घुकधुकी लगी रहती है..."
"कि कैसा होगा दूल्हा ? भैसे की तरह काला कि चाँद की तरह
गोरा ? ऐं ?"
.."हाँ, पहली बार देखना है न !"
"तो ?"
"जाने क्या-क्या अभी देखना बदा है भाग में ! तुम लोगों को यह
सब तमाशा जाने क्यों अच्छा नहीं लगता..."
"तो यहाँ तो दरवाजे पर गगा मैया है। कुएं में डूब मरी होती
तो नरक में पढ़ती। यहाँ गगा मैया की गोद में समा जानोगी, तो
सौधे बैकुण्ठ पहुँच जामोगी," कहकर मटरू हंसा।
"तुम लोग मुझे ऐसा करने भी तो दो। तुम्हें क्या मासूम है कि जब
सोचती हूँ कि वहां फिर जाने पर कती माफत भौर विकट दशा में
पडूंगी, तो मन कितना बेकल हो जाता है। इससे तो मर जाना कहीं
मासान, है।"
"हूँ। तो फिर वही बात ? तेरे इस भैया के रहते भी तेरी चिन्ता
नहीं जाती ? भरी पगली, अब घर बसाने की सोच, एक नयो जिन्दगी
..
:

A भाभी पाकर खड़ी हो गई तो लखना की मां ने गठरी । के नये नये गहनों की चमक से आँखें जगमगा उठीं। लखना की का चेहरा खुशी से उद्दीप्त हो उठा। वह एक-एक को उठाकर ने लगी। मन की उमंग दवाती हुई भाभी भी झुक गई। कड़ा, गोड़हरा, हंसली, बाजू और हल्का। एक-एक का एक-एक ड़ा । लखना की मां ने पूछा, "ये जोड़े क्यों मंगाए ? अच्छा..." "क्यों ?" बीच ही में मटरू बोल पड़ा, "हमारे घर दो पहनने वालियाँ हैं न ?" "भैया," भाभी चीख-सी पड़ी, "मेरे लिए तुमने काहे को मंगाए ?" "क्यों, भाई के घर से नंगी ही ससुराल जाएगी क्या ? कोई देखेगा तो क्या कहेगा ? पगली, यह तू क्यों नहीं समझती कि मेरे कोई लड़की नहीं है, और अब," कनखी से अपनी औरत की ओर देख- कर बोला, "होने की कोई उम्मीद भी नहीं । तुमसे ही बेटी की साभ भी पूरी करनी है। इसने न जाने कितनी बार गहने के लिए कहा था। आज तेरे ही भाग्य से इसके लिए भी आ गए। पसन्द हैं न !" तभी बाहर से एक किसान ने पाकर कहा, "पहलवान भैया, फूल- चन गिरफ्तार हो गया। बाहर खबर देने एक आदमी आया है। कहता है..." खयका अधखाया ही छोड़कर मटरू उठकर वाहर लपका। बाह बहुत से किसान जमा थे। सबके चेहरे पर परेशानियां थीं। पूछने खवर लाने वाले ने कहा, “फूलचन के वाप ने नाव पर खवर भेजी कि फूलचन आज दोपहर को गांव में अपने घर पर ही गिरफ्तार गया। अपनी बीमार मां को देखने वह आज सुबह ही घर गया र दोपहर को दस पुलिस वाले पाकर उसे गिरफ्तार कर ले गए। वे को भी खोज रहे थे। कहते थे, सौ आदमियों पर वारण्ट है, दीय मामले में । जमींदारों ने फौजदारी चलाई है।" . - ।

सुनकर सब सन्नाटे में मा गए। जमोदार कुछ करने वाले हैं, यह सबको मालूम था, लेकिन अचानक इस तरह वारण्ट कट जाएगा, यह कौन समझता था ! सोचकर मटरू ने कहा, "सब नावें इस पार मंगा लो। उधर के तौर पर एक भी नाव न रहे, और उपर उस पार जाने याली नावों को भी तयार रखो। सबसे कह दो, कोई गांव में न जाए। मव लाठियां तैयार रखो। मवसे कह दो, होशियार रहे । एक नाव सिसवन बन के सामने उधर से सवर लाने के लिए भेज दो। हो, फूल- चन के बाल-बच्चे कहाँ है ?" "यही अपनी झोपड़ी में हैं। सबर पाकर सब रो रहे हैं," एक बताया। "चलो उन्हें संभालो," प्रागे बढता हुमा मटरू बोला, "सिसवन बन कौन जा रहा है ? कोई होशियार पादमी जाए। गांवों के अपने यादमियों को भी तैयारी करने की ताकीद करनी होगी। ये जमीदार अब खून-खराबी पर उतर पाए हैं।" Purr Geeta Bhur: ... liecowy Hooray! Adarsh anuyar, JAIPUR. सत्रह दूसरे दिन झटपट एक-एक करके सब झोंपड़ियां उठाकर झाऊँ के जंगल में खड़ी कर दी गई। तोरी पर जवानों का पहरा बैठा दिया गया। खबर मिलती रही कि पुलिस वाले रोज गायो का एक चक्कर लगाया करते हैं, लेकिन दीयर के किसानों को यह मालूम था कि जब तक वह यहाँ हैं, कोई उनका वाल-वांका नहीं कर सकता। इस किले में पाकर कोई दुश्मन अपनी जान बचाकर नहीं जा सकता। सब चौकन्ने हो गए थे। कोई अपने तीरवाही के गांव में नहीं जाता। जरूरत को चोले इधर से पार कर बिहार के कस्वे से लाई जाती हैं। एक ओर से जीवन की डोर कटकर दूसरी ओर जा जुड़ी है । सब ठीक चल रहा है। कोई गम नहीं । धाराएं वैसे ही बह रही हैं । घान वैसे ही लहलहा रहे हैं। हवा वैसे ही चल रही है। लेकिन इधर मटरू कुछ परेशान-सा है। जिन्दगी में कभी भी परे- शान न होने वाला मटरू आज परेशान है। बहन की शादी है। कहीं ऐन मौके पर विघ्न न पड़ जाए। फिर कोनसा मुंह वह दिखाएगा अपनी हिरामन को ? आजकल गंगा मैया की टेर उसकी बहुत बड़ गई है। उठते-बैठते, सोते-जागते, वरावर उसके मुंह से यही निकलता रहता है, "मेरी मैया, यह नाव पार लगा दे ! मेरी मैया..." वहन-बेटी का भार क्या होता है, अाज उसे मालूम हो रहा है। न खाना अच्छा लग रहा है, न पीना। औरत और भाभी पूछती हैं, तो रुमाँसा होकर कहता है, “जो नहीं होता। सोचता हूँ, मेरी बहन चली जाएगी, तो मेरी यह झोंपड़ी कितनी उदास हो जाएगी ! "तो जाने क्यों देते हो ? रोक लो," औरत परिहास करती। "क्या बताऊँ ? रघुकुल रीति सदा चलि पाई..."और गुनगुनाता हुआ वह वहां से हट जाता है । बाहर आकर फिर वही टेर लगाने लगता है । "मेरी मैया, यह नाव पार लगा दे । मेरो मैवा..." - - -- - मैया ने बेटे की पुकार सुन ली थी। सकुशल वह दिन या पहुंचा। शाम के धुंधलके के नुकते ही सिक्न वन के घाट पर वारात उत्तरी । नाऊ, पण्डित, वर और पांच बाराती। न वाजा, न गाजा। जैसे पार उतरने वाले राही हों। फिर भी, उस दिन रात-भर भाऊ के जंगलों में हवा शहनाई - घजाती रही । गंगा मैया को लहरें किसानिनों के गले से गला मिलाकर भंगल के गोत रात-भर गाती रही । किसानों को टिमको बजी। विरहों की बहारें लहराई। रात भर मधु की मोस टपकती रही, टप, टप । जगत की नन्ही-नन्ही चिड़ियों भोर नदी के बड़े-बड़े पंछियो ने एक साथ मिलकर जय प्रभाती शुरू की, तो विदाई की तैयारियां होने दुलहन भाभी से लिपटकर वैसे ही रोई, जैसे एक दिन वह अपनी मा से लिपटकर रोई थी। लखना मोर नन्हे को वैसे ही चुमा-चाटा जसे एक दिन अपने भतीजी को चूमा-चाटा था। फिर पूजन की भेंट ली । मटरू इन्तजाम में भागा-भागा फिर रहा था। न जाने क्यों उसे बड़ी घबराहट-सी हो रही थी। बहुन उसके पार पकड़कर रोवेगी तो यह क्या करेगा, उसकी समझ में न मा रहा था। प्राखिर सवारी दरवाजे पर पा लगी, विदा की घड़ी मान पहुँची। बहन भेंट के लिए भैया का इन्तजार कर रही है। अब भागकर कहाँ जा सकता है! दिल कड़ा करके वह सडा हो गया। दुलहन पांव पकड़कर रोने लगी। लखना की मां ने उसे उठाने की बहुत कोशिश की, लेकिन वह पाप छोड़ने हो पर न पाती । मटरू बुत बना खड़ा था। रुदन को किन मजिलों से धुप-धुप वह गुजर रहा था, यह कौन बताए ! माखिर जब वह उसे उठाने के लिए झुका तो दो पत्थर के मामू टपक पड़े । उसकी बाहो में सही, उसके कन्धे पर सिर डाल दुलहन ने कहा, "तुम साथ चलोगे न ?" "यह क्या कहती है वहन ?" लखना की माने चिन्तित होकर कहा, "इस पर पारण्ट है।" मटरू ने उसका मुंह हाथ से बन्द करना चाहा, लेकिन वह कह हो गई। दुलहन ने सिर उठकर जाने किस व्याकुलता पर काबू पाकर कहा, - "नहीं भैया, तुम्हारे जाने की जरूरत नहीं, लेकिन बह्न को भूल न जाना । मां-बाप, भाई सवको खोकर तुम्हें पाया है, तुम भी भुला दोगे तो मैं कैसे जिऊँगी?" "नहीं, नहीं, मेरी हिरामन, तुझे भुलाकर मैं कैसे रह सकूँगा, तु हिम्मत से काम लेना । मैं....." और वह ज्यादा कुछ कह सकने में असमर्थ हो हट गया। तीर तक उदास मटरू गोपी को समझाता रहा। गोपी ने उसे आश्वासन दिया कि चिन्ता की कोई बात नहीं, वह हर हद तक तैयार है। लेकिन मटरू को सन्तोष कहाँ ! उसके कानों में तो वही बात मूंज रही थी, "तुम पर जितना विश्वास होता है, उतना उस पर नहीं !" नाव चली जा रही है, वाल-बच्चों, किसानों-किसानिनों के साथ खड़ा मटरू ताक रहा है। उसकी उदास आँखें जैसे उस पार, दूर एक तूफान को माता देख रही हैं, जो उसकी बहन का स्वागत करने वाला है। प्रोह, वह साथ क्यों न गया ! घर आकर उदास मटरू चटाई पर पड़ रहा। उदास धूप फैल गई है। दूध के मटके एक अोर पड़े हैं। उन पर मक्खियां भिनभिना रही हैं, थकी गृहिणी को जैसे कोई होश ही नहीं। सचमुच घर कितना उदास हो गया है ! मटरू का दिल भरा-भरा-सा है। खूब रोने को जी चाहता. है । एक ही कलक मन को मथ रही है. वह वहन के साथ क्यों न गया। जाने उस पर क्या बोते ! काफी देर के बाद गृहिणी उठी। इस तरह वैठे रहने से काम कैसे चलेगा? सारा काम-धाम पड़ा हुआ है। मर्द के पास पाकर बोली, "जानो, नहा-धो पामो। इस तरह कब तक पड़े रहोगे ?" "नहा-धो लूंगा," मटरू ने अनमने ढंग से कहा, "मुझे उसके १३८ साथ जाना चाहिए था। जाने वैचारी पर क्या पड़े !" "गोषो क्या मदं नहीं है ?" तुनककर प्रौरत बोली, "तुम तो नाहक सोच-फिकिर कर रहे हो । उठो!" कहकर वह उसकी देह पर से चादर सोंचने लगी। "मदं है तो क्या हुआ? आखिर मां-बाप का लेहाज तो प्रादमी को करना ही पड़ता है। मुझे डर लगता है कि कही उसने कमजोरी दिखाई तो मेरी हिरामन का क्या होगा। मुझे जाना चाहिए था लखना की मा!" "कुछ होगा तो सबर मिलेगी न । इस वक्त तो तुम उठो। देखो, कितनी देर हुई । घर का सारा काम अभी उसी तरह पड़ा है," कहकर वह अन्दर से धोती दातून ला उनके हाथों में घमाती बोली, “जामो, जल्दी नहा-धो ग्रामो । मन हलका हो जाएगा।" किसी तरह कसमसाकर मटरू उठा पौर तीर को ओर चल पड़ा। धाज गंगा-स्नान मे वह ग्रानन्द न पाया । जिन्दगी में इस तरह का यह पहला अनुभव था। उसे लग रहा था कि प्राज गगा मया भी उदास है । उसकी धारा में वह जोर नहीं, उसको लहरी मे वह थिरकन नही, उसमें तैरती मछलियों में चपलता नहीं । कहीं कोई तार नीला हो गया है। साज देसाज हो गया है। 'तुम्हारे पास रहकर यहाँ कोई डर-भय नही लगता "जब सोचती हूँ कि वहां फिर जाने पर केसी प्राफत और विकट दशा में पडूंगी, तो मन कितना वेकल हो जाता है."तुम भी मेरे साथ वहाँ कुछ दिनों के लिए चलोगे न ? तुम पर जितना विश्वास होता है, उतना उस पर नहीं मटरू के मन में ये बातें गूंज-गूंज जाती हैं और उसे लगता है कि उसने जान-बूझकर हो अपनी हिरामन को उन विकट परिस्थितियों में अकेली झोंक दिया है। और वह मन-ही-मन तड़प उठता है। क्यों, क्यों नहीं वह साथ गया ? क्यों उसे अकेली छोड़ दिया? क्यो उसके साय विश्वासघात किया?

वारण्ट ! यहाँ का उसका कर्तव्य ! कहीं उसे कुछ हो गया होता, यहाँ उसके साथियों की क्या हालत होती? साथी उसके अब पहले की तरह वेवकूफ नहीं हैं। उन्हें अपने पांवों पर खड़ा होना सीखना चाहिए। मटरू अाखिर हमेशा उनके साथ कैसे बना रहेगा ? मटरू के जीवन में पहले एक ही पर्तव्य था, लेकिन अब तो दो हो गए हैं। उसे अपने दोनों कर्तव्यों को निभाना है । दोनों मोर्चों पर वरावर के दुश्मन हैं। एक के जालिम पंजों में पड़कर कितने ही किसान तड़प रहे हैं और दूसरे के खूनी जबड़े में पड़कर एक वहन कराह रही है। एक नहीं, अनेक, अनेक । उनके लिए भी रास्ता निकालना चाहिए। घाट पर बैठा खोया-खोया मटरू जाने ऐसी ही क्या-क्या ऊल-जलूल . वातें सोचे जा रहा था, कि पूजन ने आकर कहा, “बहना तुम्हें बुला रही है । चलो, जल्दी करो। कव के पाए यहाँ यों बैठे हो,” कहकर मटल के सामने पड़ी भीगी धोती उसने उठा ली। चलते-चलते मटरू ने कहा, "पूजन, एक वात पूर्वी ?" "कहो ।” "अगर मैं न रहा पूजन, तो तुम लोग सब संभाल लोगे ?" "लेकिन तुम रहोगे कसे नहीं ? गंगा मैया तुमसे छोड़ी जा सकती है ?" "नहीं, छोड़ी कैसे जा सकती हैं ! लेकिन मान लो, न रहूँ ?" "वाह ! यह कैसे मान लें ?" "अरे, उस दफे नहीं हुग्रा वा । मैं क्या 'गंगा मैया' को छोड़ सकता था? लेकिन संजोग कि पुलिस वालों की पकड़ में आ गया। उसी । तरह......" "अंव की कैसे हो सकता है पाहुन ? तव तुम यह अकेले थे। आज सैकड़ों जवान तुम पर जान देने को तैयार हैं। भले ही हमारी जान चली जाए, लेफिन तुम्हारा वाल-चौका न होने देंगे! पाहुन, तुम धरती की जान हो!" १४० "पाहुन !" "तो तो है, लेकिन सार। "नहीं, नहीं, पाहन, ऐसा नर नोकरः "मोक, तुमने दो बात करना काम मैं मर ही गया?" पूबन गौरा पड़ा. सौरतको "पूजन," गम्भीर बिहना मर . " का, उनकी धरती का, इन सेतो. सहारन और इन किनारों का पोर मरने नर को मदने रन- बच्चों की तरह, बल्कि उनने भो रही भाग है। सरकार कि कहीं में न रहा तो भन्यानो बमोहरर नसे जम जाएंगे?" "नहीं पाहुन, नहीं ! प्रपर दो बाउ है जो लोक म्हारे सायी अपने सून की पासिरी बूंद तक से इनको रक्षा शिवार गुजरा जमाना फिर वापस नहीं पाता, उसी तरह कार उस पर यहाँ फिर कभी न बन पाएंगे। हमारा वो निनदन मनाया रहा है । हमारे साथी बढ़ते जा रहे हैं। माना मारेराहा है। नतो. पाहुन, वसा कभी न होगा! यहाँ का मान हर किसान पहनने को वमन्ना रखता है । तुम इसको चिन्ता न करो राम!" "शावास !" मटरू ने उसको पीठ टोकार रहा. "मार गुरा है, बहुत सुध ! पूजन, ऐसा ही होना चाहिए, ऐका हो!" और सचमुच उदासी छंट गई। चेहरा पहले हो की तरह मक उठा। मासे चमक उठी। लेकिन जैसे ही झोपड़ी में पुसा, वह पहले हो को तरह फिर मास हो गया। मौरत ने चौके में रटाई डाली। नोरा भरपर पानी रहा। फिर बोली, "ग्रामो, रोटी सानो।" वैठकर मटरू ने पहना फोर तोड़ते हुए कहा, "को नहीं" । . "जी कैसे करे ! तेरी हिरामन जो चली गई। "उहूँ, उसके जाने की चिन्ता नहीं। "फिर ?" "जाने उस पर क्या बीते ! अव तो पहुंच गई होगी। "वीतेगी क्या? हम तुम राजी, क्या करेगा काजी.? गोपी तया है तो उसका कौन क्या विगाड़ लेगा?" "सो तो है रे, लेकिन हमारा समाज बड़ा जालिम है। कितने गोपियों को इसने जिन्दा चवा डाला है। और गोपी कुछ कमजोर भी। वैसा न होता तो यह कहानी इतनी लम्बी क्यों होती ? वह ते संजोग कहो कि गोपी कुएं पर जगा पड़ा था, नहीं तो कहानी खत्म होने में देर ही क्या थी ? सोचता हूँ कि जिस वक्त गोपी की मां उसर्क भाभी को जली-कटी सुना रही थी, अगर उसी वक्त हिम्मत करके आगे बढ़कर गोपी अपनी भाभी का हाथ थाम लेता तो कौन उसक क्या कर लेता? लेकिन वह वैसा न कर सका। औरत का मर्द परहे एक बार विश्वास हट जाता है तो फिर मुश्किल से जमता है। कहती यो न वह, 'तुम पर जितना विश्वास होता है, उतना उस पर नहीं । "तो तुम्हारे ही विश्वास पर उसकी जिन्दगी पार लगेगी। पाखिर..." "अरे, सो तो है री, कौन किसकी जिन्दगी पार लगा देता वक्त की बात होती है। उसे इस वक्त मेरे सहारे की जरूरत थी। दो चार दिन में गांधी गुजर जाती तो सब आप ही ठीक हो जाता "सब ठीक हो जाएगा। रोटी खायो,” छिपली में गरम दूध ढालती हुई औरत ने वात खत्म कर दी, "जो हुआ हमसे, किया न? कौन इतना गैर के लिए करता है ?" "तू औरत है न, लखना की मां," दर्द-मरे स्वर में मटरू बोला, "मेरे और मेरे बच्चों के सिवा तेरा कोई अपना नहीं। मैं किसी को अपना बना लूं तो ऊपर से तू भी उसे अपना कह देगी। मेरी मंशा ३४२

ही तो तेरो नगा है। डेरा दिल ना कर, MAIt rate
मेरी नंगा के जिलाफ भी सपनो नशा से किसी पर अपना
से। गोली को भाभी बर तक यही हो उसे सारे रहो...
पदी नेरी इन्टा यो। लेकिन मग तेरा दर 3 HRI II
सका । लसना को ना. नान ले कि कहो पा मे ६ बाए, और
तेरी मदद को मैं न जातो?"
"चर भी रहो, सा लो, फिर नागर!'
जीन होते भी मटरू ने भरपेटसाला । मौरत का सो कोशेर
नहीं। वह जानता है, तो यह यनो है, वैसा ही परहार तो करेगी।
न साकर उसका मन नंता क्यो करे !
चटाई वाहर धूप में रिकर, हातावकरालया
मटरू गुड़गुड़ाता रहा मौर सोचता रहा। सोपते-सोप ने
रात-भर का जागा पा । हुमा एक पोर टिकाकर पल गया परमोती
देर में नींद में दूर गया । मौरत ने पार कर दी।
शाम ढल गई।
कही कोई माफत का मारा प्रफेसा सोता, नाd
चीसता इमा मटरू के सिर पर उसो १८६ पी पी ।
जाने किस सपने में चारुकर यह पुकार उठा, "पू मन "
दौड़ते हुए माकर पूजन ने कहा, "TTI पा रहा है It, int
का मासमान काला हो गया है।"
तोते को दें की पायान पर भी पायमान ।
मटरू पादर फेंकफर मड़ा हो गया। फिर घर पर
देसता बोला, "पूजन, मेरी हिरामा । म रहा
है उसका चौकार !" और अपने पिया भार की पोर पर बस
दिए।

दरवाजे पर खड़ी औरत चिल्लाई, "कहाँ जा रह पूजन चीखा, "इस तूफान में कहां जा रहे हो ?" मुड़कर मटरू ने कहा, "अभी लौट आऊँगा।" तूफान आ गया, गंगा मैया की लहरें चीख उठीं, हवा सू-सू कर उठी। जंगल सिर धुनने लगा। धरती हिलने लगी। झोंपड़ियों अव गिरी, अब गिरी। घाट पर नावं वाले से मटरूं ने कहा, "खोलो, जल्दी करो !" "इस तूफान में, पहलवान भैया? यह क्या कह रहे हो ?" नाव- वाला प्रख-मुंह फाड़कर बोला। "कोई हर्ज नहीं। अपनी मया की ही तो लहरें हैं ! उठायो: लगी । मुझे जल्दी है । लामो, मुझे दो! तुम चुपचाप बैठे रहो।" और मटरू ने नाव खोल दी। देखते-देखते चिंघाड़ती लहों में नाव अदृश्य-सी हो गई। - गोपी के दरवाजे पर गोजी धम से जब वोली, तो तूफान गुजर चुका था। बाद का सन्नाटा घर पर छाया था। हमेशा की तरह बूड़े ने आवाज न दी। मटरू को खुद ही आगे बढ़ना पड़ा। उसने बूढ़े के पांव छूकर कहा, "पांव लागो, बाबूजी।" वाबूजी चुप! "नाराज हो क्या, वाचूजी ? नयी बहू पसन्द नहीं आई क्या ? ३ क्या विलकुल तुम्हारी बड़ी बहू की ही तरह नहीं है ? मैंने क या न..." "हट "हट जाव मेरे सामने से !" बूढ़ी हड्डी चटख उठी। कैसे जाएँ ? रिश्तेदारी की है कि कोई दिल्लगी है ! "मेरी नाम-हंसाई करके जले पर नमक छिड़कने आया है। तो पिट गया गांव-भर में ! क्या वाकी रह गया ! मुझे पहले ही १४४

न मार डाला, चाण्डालो!"
"ऐसा क्यों कहते हा, याची? तुम मेरी उमर भी लेकर निमो!
उस दिन तुम्हीं ने तो कहा था, 'उसकी याद ग्राती है, तो कलेजा फटने
लगता है। मां-बार के लिए क्या बेटे से वार बिरादरी है"विरादरी
वाले क्या हमें खाना देंगे लेकिन हमें रया मालूम था...' अब तो हो
गया मालूम ? अब तो फलेना नही करना चाहिए। लेकिन यहाँ
तो..."
"चुप रह ! मैं क्या समझता था कि तुम राव ऐसे पामल..."
मटरू हंसा । बोला, "पागल तुम और तुम्हारा समाज है वाबूजी।
लेकिन मुश्किल तो यह है कि जो उसका पन्धेरसाता मोर पागलपन
सत्म करके एक गऊ की जान बचाने के लिए मागे बढ़ता है, उसे ही
वह पागल कहता है।"
"यह सब जाकर तू उसोसे कह । मेरे सामने से हट जा!"
"कहाँ है वह ?"
"चौपाल में।"
"चौपात मे ? घर में नहीं ?"
"मेरे जीते-जी वह घर में पांव नही रख सकता !"
"तो उसका एक पर मोर भी है। उन्हें चौसाल मे रहने की जरूरत
नहीं। उन्हें में सभी..."
"वाप-बेटे के झगड़े में तू क्यों पड़ता है ! तू जाता क्यों नहीं ?"
"यह बाप-बेटे का ही झगड़ा नहीं है । यह पूरे समाज और उसकी
लाखों विधवानों का झगड़ा है । इसके साथ मेरी बहन की जिन्दगी का
वास्ता है । मैं उन्हें
"वह मेरा बेटा है..."
"नहीं, जिस बेटे को तुमने घर से निकाल दिया..."
"अरे यह क्या शोर मचा रखा है ?" बूढ़ी चोसती हुई बाहर पा
गई।

"छाती पर मूंग दलने मटरू पाया है," बूढ़े ने करवट लेकर कहा। "गांव-भर थू-थू-करा दिया। अब क्या बाकी है ?" बूढ़ी ने हाथ चमकाकर कहा। "उन्हें लिवाने पाया हूँ," मटरू ने जोर देकर कहा । "तु कौन होता है उन्हें लिवा जाने वाला ! उनके मां-बाप क्या मर गए हैं ?" बूढ़ी ने उसके मुंह पर थप्पड़ उलाते हुए कहा । "प्राज मालूम हुआ कि मर गए हैं। नहीं तो वे घर से निकाल- कर चौपाल में नहीं डाले जाते।" "यह तुझसे किसने कहा ?" बूढ़ी ने शान्त होकर कहा । "बाबूजी "इनकी मति को तुम क्या लिये फिरते हो ? इधर सानो।" कह- कर बूढ़ी उसका हाथ पकड़कर घर के अन्दर ले जाकर फुसफुसाकर वोली, "देखकर मक्खी नहीं निगली जाती। क्या करते, टोले-मोहल्ले, गांव-गोएड़े के सव-के-सव कीचड़ उछालने लगे तो बुढ़ऊ ने उन्हें चौपाल में कर दिया। मैंने बहुत सहा । जब सहा न गया तो मैं भी उघटा-पुरान लेकर बैठ गई। इसी गांव में मेरे बाल सफेद हुए हैं । किसी का कुछ छिपा नहीं है मुझसे । जब झाड़ने लगी तो सव . दुम दवाकर भाग गए। तुम्ही कहो, किसी चमार-डोमिन से मेरी बहू हो सराव है ? डंके की चोट पर उसने व्याह किया है । शोहदों, घठियों की तरह चोरी-लुक्के तो अपना मुंह काला नहीं किया। माना कि उसने पुरा किया, लेकिन पागल बनकर कर ही डाला, तो क्या उसका सिर उतार लिया जाए ? बेटा ही तो है ! लाख बुरा उसका माफ किया तो एक और सही। अपने सड़े हाथ को कोई काटकर तो नहीं फेंक देता। भगवान् ने जो माला गले में डाल दी, उसे उतारकर कैसे फेंक दूं? वेटा, उन्हें खुद जाकर मैं घर में लाई हूँ। उनका घर है। कौन उन्हें निकाल सकता है ? हम वूड़ों का क्या ठिकाना ! अाज उन्हें तो भोगने को अभी सारी जिन्दगी पड़ी है । जैसे चाहे, रहेंतु

सपका खाएगा। रसियाव-पूरोपको है रे।"
मटरू ने कतार बनी के पर लिए। गद्गद होकर कहा, "माई,
तू कितनी अच्छी है ! यह बाबूजी तो..."
"वाजा गुस्सा है। मब ठीक हो जाएगा। बाप बेटे से कब तक
नाराज रह सकता है !"साएगा? हाय-परणेन?"
"वे कहा है ?" मदरू ने पूरी के कान में कहा ।
बूटी ने मुस्कराकर उसके कान में कुछ कहा, तो मटरू भी मुस्करा
पड़ा। "चन चौके में," भागे वाती हुई बूढ़ी बोली, “सा ले।"
"अब कैसे साऊँ ? वह मेरी छोटी बहन है न ! उसका एन.
अब चलूंगा 1 गंगा मैया पुकार रही है । सब परेशान होंगे।"
तभी वगन की कोठरी का दरवारा एसा और गधी को दो मूरतों
ने निकलकर मटरू के दोनों पैर पकड़ लिए।
गद्गद् होकर मटरू ने कहा, "गगा मैया तेरा मुहाग पमर करे,
मेरी हिरामन !"
खड़ी होकर, पूंघट में सिर काए हिरामन रोली, जसे होठों से
लाज टपके, "गंगा मंगा को मैंने पुनरी बासो पो भया ! भाभी से कह
देना, चढ़ा देगी।"

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Ganga Maiya Vol I

Author
Gupta Bherav Prasad
Title
Ganga Maiya Vol I
File name
Ganga Maiya Vol I
Text
OCR done
Published
2011/03
Publisher
Ellahabad,look Bharti Prakashan
Language
Sanskrit
Pages
159
Library
Adarsh Library, Jaipur
Classification
Literature
DLI number
552225
Barcode
4990010032939.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library of India
VMLT id
SloAmfOvwUM
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