Adarsh Library, Jaipur
Uttar Ghata
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उत्तरगाथा
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१ रेवती किवाड़ भिड़काकर झांक रही है, सुदेव सूरज के डूबने के बाद रोज क्यों भाता है ? फिर भी अंधेरा अभी तक आंगन मे उतरा नहीं है। अपना सुदेव सिर पर पगड़ी की तरह अंगोछा बांधे इधर-उपर आंखें नचा रहा है। मन-ही-मन रेवती के लिए ही तो नही अकुला रहा है ! धूप दिन-भर हल चलाते-चलाते मुंह कसा सूख गया है । भूख-प्यास से अपने ही होंठ कैसे काट रहा है ! ताम्बे की तरह लम्बा-छरहरा, सौम्य मूर्ति-सा सुदेव रोज शाम को ऐसा ही मुसया हुआ दीखता है। पहली रात को जब सुदेव उससे इसी घर में मिला था तब वह कितना नुकुमार लगता था ! सचमुच, वावू ने अपनी रेवती के लिए सपनों का राजकुमार खोज दिया है। जव सुदेव ने अचानक उसे अपनी तरफ खीच लिया था तब रेवती उसकी गोद में भहराती हुई बोली थी, "मैं तो पांचवी कक्षा तक पड़ी हूँ। 'रानी केतकी की कहानी', 'सोरठी वृजाभार', 'बेटी वैचत्रा', 'विदेसिया', 'बसन्त बहार', 'डोमनी रानी नाम फूत बसिया', राहुल और भिखारी ठाकुर को सब किताबें पढ गयी हूँ। तुम किस कक्षा तक पढे हो ? मुदेव थोड़ी देर तक लगा गया था और अपने बंधन को स्वतः ढीला हो जाने दिया था। उसे अचरज भी हो रहा था और खुशी भी कि अपने यहां अब हरिजन टोली में भी लड़कियां पढने लगी हैं। उसने पूछा, "तुम्हारे टोले में और भी कितनी लड़कियां पड़ी हैं ?" "कोयली, परबतिया, जिऊनी, फुलवा, परेमी ढेर लड़कियां पड़ गयी हैं। सव के मरद बी० ए०, इन्ट्रेस पास हैं।" "इसका मतलब हुआ कि तुम्हारा मरद करिया असर भैस बराबर । उत्तरगाया/ "पाठशाला आज तक गये ही नहीं ? तुम्हारे गांव में कोई स्कूल नहीं है क्या ?" । "बड़ी-बड़ी कहानी है।" सुदेव ने वताना शुरू किया था, "एक स्कूल है रतनपुर में । दो-चार दिन गया था। वहाँ के वावू लोग उस स्कूल में हमारे टोले के लड़कों को उनके लड़के घेर-घेरकर मारते थे। हमें नहीं मालूम पड़ता था कि हमारा कसूर क्या है ? पहले ही दिन मुझे एक लड़के ने बैंच के ऊपर धकेल दिया था। एक बात और थी कि रतनपुर वालों ने आज तक मेरे टोले को कभी वोट डालने नहीं दिया था। परसाल गिरधारी चाचा सरपंच के लिए खड़े हुए थे। वोट के चार-पांच दिन पहले से ही गिरधारी चाचा आज तक लापता हैं। इन्हीं सब कारणों से बाबू को पढ़ाई-लिखाई से नफरत है । अरे कलक्टर होना है क्या ? तुम्हीं पढ़ गयी तो क्या हो गया, एक अनपढ़ से व्याह दी गयी न ?" ऐसा सलोना मरद किसी को बड़े भाग्य से मिलता है-यही बात सोचती हुई रेवती बोली, "तो क्या हुआ? मैं तुम्हें इतना पढ़ा दूंगी कि भिखारी ठाकुर की सारी किताबें पढ़ने लगोगे।" सुदेव को बड़े जोरों से हँसी आ गयी थी। उसने हँसते हुए इतना ही कहा था, "औरत-मरद में एक को होशियार होना चाहिए । तू मुझे अकल- बुध देना, मैं तुझे ताकत दूंगा।" इसके बाद तो वह सांड़ की तरह पुष्ट सुदेव की बाहों में सिकुड़ ही गयी थी। "रेवती की तन्द्रा अचानक टूटती है। सुदेव आंगन से लेकर भीतर तक किसी को न देखकर जोर से चिल्लाता है, "माई रे! प्यास के मारे जान निकली जा रही है। कहाँ मर गयी सब...?" रेवती घबराकर आँगन में निकल आयी और बीता-भर चूंघट काढ़कर अपने ही मरद के सामने खडी हो गयी। परन्तु सुदेव की झुंझलाहट तय भी खत्म नहीं हुई थी। अभी तो मेहरारू को गौना में आये एक सप्ताह भी नहीं हुमा था। आज आँगन में निकल आयी है, कल पड़ोस में निकलकर किसी के यहां उधार-चा के लिए जायेगी. फिर खेत 'वधार। उसने डपटकर पूछा, "माई कहाँ गयी है ?" "घर में शायद खर्ची नहीं थी। उसी के बन्दोबस्त में गयी हैं। यह लो - .. । ६/उत्तरगाथा
पानी।" वह उसी तरह लोटा उसको ओर बढ़ाती हुई चूंघट के अन्दर से
बोली।
"साली पानी, और कुछ नहीं ?"
"तुम्हारे लिए ही तो माई वन्दोवस्त में गयी हैं कि दावू भूखे-प्यासे
हलवाही से लौटेगा तो क्या खायेगा?"
"आग लगे तुम्हारो माई के इस पर में। भोर से किरण डूबने तक
लगातार हलवाही करो तव भी कही कोई पूछ नहीं।"
"मालिक ने दुपहरिया को कुछ दिया होगा न ?"
रेवती के इस सवाल से सुदेव और भी आग हो गया। उसने कहा, "ले
जापानी । मुझे नहीं पीना है।"
"इसमें मेरी गलती क्या है ?'
संभवत: सुदेव को उस पर मोह लौट आया हो। उसने उसके हाप से
लोटा झपटकर गट-गट साली पानी पी लिया। बाबू का मिजाज कैसा
"अभी उसी तरह है।"
"वैद्य जी आए थे?"
"नहीं पाए थे। कहते हैं, यहीं ले आओ।"
"का, हमारे घर पर आने में उन्हें कोई तकलीफ है क्या ?"
"कहते थे, नहा-धो लिया है। कल सवेरे पायेंगे।"
सुदेव पस्त होकर आगन में ही पाड़ी की नाद पर दोनों हाप से बूढे
की तरह माथा पकड़कर बैठ गया था, जैसे बावू नहीं, वही बीमार हो ।
रेवती फिर उसकी चिता में शामिल होने के ख्याल से बोली, "सरकारी
बंद्य होकर वे ऐसी बाते क्यों करते हैं ?"
"मुझे क्या मालूम ? तुम्हें अपनी पढ़ाई पर गुमान है तो जाकर
पूछती क्यो नहीं ?"
"इसमें गुमान की क्या बात है ? सरकार ने तो इस टोले में उन्हें
इमीलिए भेजा होगा न कि गरीब आदमी इलाज करें।माई ने जब
बताया तभी मुझे भी गुस्सा आ गया था। संस्कृत मोर वैद्य अभी भी
हरिजन टोली से घबराते क्यों ?"
? सुदेव ने उसकी तरफ प्रांखें तरेरकर ताका । वह अभी तक पूंघट काढ़े हुए थी। उसने कहा, "जा, अन्दर जा। नहीं तो माई कहेगी कि दोनों नाद पर खुल्लमखुल्ला बतिया रहे थे।" रेवती घर में घुस गयी। उसके जाते ही सुदेव की छटपटाहट फिर बढ़ गयी थी। यह आंगन, घर, पड़ोस, सर्वत्र कैसा विरान लगता है। बाबू ने कमाते-कमाते खाट पकड़ लिया। पैदा होते ही कंधे पर हल चढ़ गया। ऊपर से रोज-रोज मालिक से मिहनत-मजदूरी के लिए खिच-खिच । पता नहीं कब वह हरिजन टोली का होलिका दहन कर दे । सूखाड़ और वाढ़ से उसे क्या है ? सूर्य के तांडव और तपिश से तो हमारी न जान निकलती है। इन चीजों से उन्हें कब तबाही होती है ? हम अपने लिए कहाँ कभी चिन्तित हुए हैं ? उन्हीं की चिन्ता के लिए तो हमारा जनम भी हुआ है। दो ही रास्ते हैं- कुएँ-तालाव में डूब-घस मरो या कहीं भागकर परदेश चले जाओ।" उसका छोटा भाई भी अभी तक बकरी चराकर लौटा नहीं था। उसने नाद पर से ही पूछा, "सुवला अभी तक आया कि नहीं?" "कहां आया है ?" रेवती अन्दर से ही बोली। अंधेरा इसी आंगन में ही क्या, चारों तरफ उतरने लगा था। सुदेव को प्राज इतना डर क्यों लग रहा है ? क्या बाबू के ऊपर भगवान के यहाँ चलने की घड़ी आ पहुंची है क्या? इसी तरह दो-तीन साल पहले भी डरा- वना लगा था। सुदेव बकरियां लेकर इसी नाद पर चुपचाप पाकर बैठा था। तभी अकलू चाचा, रमई भगत और जोखू दादा के घर से चीखने- चिल्लाने की आवाज सुनायी पड़ी थी। किसी का वेटा, किसी की मेहरारू घंटे-दो-घंटे के अन्दर चल बसी थी। पूरे टोले में हैजे का भयंकर आक्रमण था। रमई भगत का तो सारा परिवार ही सूना हो गया था। सूखाड़ गौर बाढ़ की तरह बीमारियाँ भी इसी टोले के लिए होती हैं। सुदेव पूरे टोले में हाहाकार-चीख के मध्य स्वयं भी रोने लगा था। ठीक पंद्रह-बीस दिनों तक एक-न-एक आदमी की लाश बरावर घर से निकलती थी। लोग श्मशान से लौट भी नहीं पाते थे कि एक लाश पड़ी मिलती थी। गजव हालत थी कोई नहीं कह सकता था इस हैजे की बीमारी में कौन जिन्दा रहेगा और । - ८/उत्तरगाया - कोन मरेगा। पूरा टोला मुर्दो के टोला में बदलता जा रहा था। गांव के कछार एक देवी मंया का देवल था। रमपतिया काकी पर देवी आती थीं रमपतिया काकी मुट्ठी भर-भरकर नीम की टहनियां हायों से बटोरती थी और झूमती टहनियां पटकती सुबह-शाम टोले की परिक्रमा करती रहती या देवल के अन्दर चुपचाप गाती रहती-"निमियां की डालि मइया चढ़ली हिंडोलवा कि झूली, झूल..!" सभी लोग रमपतिया काकी को देखते ही हाथ जोड़कर खड़े हो जाते, मइया देवल से निकलकर गांव-घर का हाल- चाल लेने प्रायी हैं। ""आदमी-जन ही नहीं रहेगा तब तुम किस देवल- मन्दिर मे रहोगी है मइया ! . 'कौन तुम्हे पुआ-पकवान चढ़ायेगा ?" कोन तुम्हारे चरणों में बैठकर गुहार लगायेगा-"निमियां के हारि मइया चढ ली हिंडोलवा कि झूली, झूल..!".."बोलती काहे नही मइया ? काहे नही बोलती ?"रमपतिया काकी पूरे बदन को कंपाने लगती है." हाथ-पांव पीटने लगती है.. यांखें फाड़-फाड़कर देखने लगती है. लोग बूझ रहे हैं, देवी मइया अभी और गांव-घर खायेगी तब जाकर कही उनका मन पूरा होगा। "सचमुच आधा गांव साफ हो गया था। इसके बाद ही उनका कलेजा ठंडाया था। इस साल भी लगातार पामी पढ़ती रही है। प्राकाश में कही बादल का नाम ही नहीं। स्वर्ग में आग लगी हुई है । सावन-भादों के महीने में भी ऐसी तपिा ! रात मे लू चलती है। दुनिया कही उलट तो नहीं रही है ? मालिक इतना निर्मोही है कि परती जमीन में हल नही लगता तब भी कंधे पर हल उठवा ही देता है । हल का परिहय घसोड़ते-घसोड़ते छाती में दरद होने लगती है। बल कहर जाते हैं। अरे, जिसे आदमी के लिए कोई मोह नहीं हो उसे जानवर पर कहाँ से मोह पायेगा? गोता, पुराण, रामायण, कंठी, जात-बिरादरी जिसे आती है वही शक्तिशाली भी है और वही पर- मारमा का आदमी भी है। सुदेवराम चमार को कौन पूछता है ? धीरे-धीरे अन्धेरा गढ़ाने लगा था। सुदेव नाद पर अभी तक मिट्टी की तरह जमा हुआ था। अगल-बगल के एकाध घरो से धुओं छप्परों को चीर- कर फैल रहे थे। रेवती ढिवरी जलाकर मोसारे में रख गयी थी। तेल की कमी के कारण विदरी थोड़ी देर बाद ही युझ भी गयी थी। सर ? नाद पर इस प्रकार चिपका क्यों पा? बाबू के सिरहाने ही थोड़ी देर बैठ जाता, हाल-चाल पूछ लेता। या टहलते हुए वैद्यजी से ही बाबू की बीमारी के बाद में छानबीन कर आता। परन्तु माई ससुरी पता नहीं कहां जाकर मर रही है। माई है कि कसाई ? सुदेव याद करता है, वही जव-तब किसी विपत या तकलीफ में गुहारकर सुदेव पर ही बरसती रहती है और कहती फिरती है, यह मेरा लड़का नहीं, दुश्मन जन्मा है। माई के जिया गाई और पूता के जिया कसाई ! आज तो सुदेव फैसला करके ही छोड़ेगा। इस गांव में रखा ही क्या है ? "भूख, बीमारी, मालिक, अन्याय-~यही सव न अब तो सुदेव गाँव छोड़कर परदेश कहीं काम-धन्धा खोजेगा। यहाँ की तकलीफ से मन घबड़ा गया है। माई मांगन में आकर खड़ी हो गयी थी, लेकिन निविड़ अंधकार और सोच के कारण सुदेव को वह नजर नहीं आ सकी थी। माई अचानक बोली तोसुदेव खाली अचकचाया ही नहीं, गुस्से से भर भी उठा । "क्या रे कनेआ नहर से आए आठ दिन हो गए, घर-आंगन का तनिक भी ख्याल नहीं है क्या? अव नई-नवेली थोड़े है तू। पढ़ाई-लिखाई की अमीरी हमारे बाप- दादों के यहां नहीं है । चलाना अपने घर में।" रेवती कुछ बोली नहीं, मागन में निकलकर खड़ी हो गयी। "क्या हुआ, ईआजी?" "तू घर में ढिवरी जलाने से भी गयी ? कैसी अन्हरिया है ? जैसे मुरघटिया हो।" "ढिवरी में तेल नहीं है, ईआजी।" "तब ढिवरी का तेल कौन पी जाता है-मूस, कि तू ही पी जाती है ?" रेवती कुछ नहीं बोलती। ईआजी ने फिर पूछा, "बुढ़ऊ कैसे हैं ?" "अभी तो उसी तरह हैं।" "सुदेउमा, सुबलवा-वे दोनों लौंडे कहाँ मर रहे हैं ? उन्हें क्या फिकिर है कि घर में वाप की क्या हालत है ? मर गया तो घर में कफन भी - मुहाल है।" "कफन की क्या जरूरत है माई।" सुदेव नाद से उतरकर खड़ा हो - १०/उत्तरगाथा गया। "इसके पहले मैं ही गांव छोड़कर हमेगा के लिए चलता हूँ। अब दो- दोधाद एक ही साथ कर देना।" "रोज तू ऐसे ही बोलता है। कहावत है कि कोढ़िया डरावे यूक से।" बकरी दरवाजे पर कब से मिमिया रही थी। सुबल छोड़कर जाने कर चला गया था। सुदेव वाहर निकलने के लिए दरवाजे की ओर बढ़ गया। उसकी आत्मा कहती थी कि वावू प्रभी नहीं मरेगा। अमीर लोग घंटे. दो-घंटे की बीमारी में ही सुरधामपुर पहुंच जाते हैं । सुदेव के वाप के प्राण इतनी जल्दी नहीं निकलेंगे। माई को ही क्या बाबू की फिकिर है ? फिकिर ही होता तो क्या ऐसे घर-घर घूमती-फिरती? "इतनी देर से गयी कहां थी तू ?" सुदेव ने चिल्लाकर पूछा। 'शिवजी मालिक के यहां गयी थी। उन्होने ही खबर भेजकर बुलवाया था । और क्या तुम्हारी तरह घूमने गयी थी? घर मे मेहरारू आ गई है, तुझे फिकिर-चिन्ता है कुछ ?" "शिवजी मालिक ने किसलिए बुलाया था ?" "आसमान में आग लगी है। सावन-भादों के महीने में ऐसे लू चलती है ? सारा बखार ऐंठ रहा है। खाएगा क्या तू-अपने बाप का ठेगा?" "उन्हें क्या फिकिर पड़ गयी? उनको कोठी में तो अभी तक हजारों मन अनाज है।" "तू कुछ नहीं बूझेगा।" माई ने डांट दिया, "आज से मुहल्ले की औरतें शिवजी मालिक के द्वार पर हरफरौरी गायेंगी। मैं सबको घर-घर जाकर सबर कर आयी हूँ। जब तक हमारी वात इन्द्रासन तक नहीं पहुं. घेगी तब तक घरखा नही होगी।" सुदेव का दिमाग यही तडतड़ाता है अपनी जमीन, न अपना घर । आखिर माई को क्या चिन्ता पड़ी है ? जिसकी धरती है वह तो चादर तान कर सो रहा है । घरती पर प्राग बरस रही है । जैसे-जैसे घरती दहकती है हमारा कलेजा~ममूचे इस टोले का कलेजा क्यों दहक जाता है ? रतनपुर वाले मालिकों को चिन्ता चाहिए थी अब ये सारी औरतें कूद-कूदकर हर- फरोरी गायेंगी, चौखेंगी, रात-भर कूदेंगो"रामजी से"इन्द्रासन से पानी मांगेंगी। मानिकों की औरतें इन्हें घोड़ी कहकर मजाक उड़ायेंगी - अपने-अपने मरद की छाती से चिपककर हरफरोरी का मजा लेती रहेंगी। "जो तुम्हारे मन में आए सो कर। तुमसे तो इन्द्र भगवान की जान- पहचान तक नहीं है । तुम्हारे कहने से वरखा होगी ? मैं इस गांव में अकाल मृत्यु भोगने के लिए बिल्कुल तैयार नहीं हूँ। तू खुश कर रतनपुर के मालिक को। मैं गाय छोड़कर जा रहा हूं।" "तू रोज गाँव छोड़कर जा रहा है ? तुम्हारी यही बात सुनते-सुनते तो मेरे कान पक गए हैं।" माई की बोली बर्दाश्त नहीं हो रही थी। माई को क्या ऐसा विश्वास है कि सुदेव इस गांव को छोड़कर नहीं जा सकता? माई की छाती वायुनों की चिन्ता में रहते-रहते पथरा गयी है। वह बेटे के लिए गंगा की तरह सूख गयी है। निविड़, दमघोटू अंधेरे को चीरते-फाड़ते सुदेव निकल आया और दरवाजे पर बँधी बकरियों से ऐसा टकराया कि एक की सींग से उसकी जाँघ से खून ना गया। वह सुबल को बेपर्द गालियाँ बकने लगा। माई जब सुबल का पक्ष लेकर वोलने लगी तो सुदेव का माथा और भी झनझना गया, जैसे जांघ के खून पर किसी ने नमक छिड़क दिया हो। सुदेव का मुंह भूख ने कडु आ गया था। पांव दिन-भर की हलवाही से भरभरा रहे थे। इस पर भी माई का ऐसा व्यवहार होता है कि सौतेली महतारी भी ऐसा नहीं कर सकती। ऐसी हालत में कहीं परदेश में शरण लेना ही अच्छा है। यहाँ गाँव में तो सुदेव के साथ सबका एक ही जैसा व्यवहार होता है। शिवजी मालिक का असर सर्वत्र है-प्रकृति, हवा, पानी सब जगह । सम्भवतः उसकी इस गांव में जरूरत नहीं है। सुदेव इस जिले से बाहर एक बार बनारस गया था, शिवजी मालिक की ससुराल । अधिक दिन रहने का मौका नहीं था। सुदेव और सुबल दोनों थे। शिवजी मालिक महीने-दो-महीने पर एक बार बनारस जरूर जाते हैं । बनारस में उनका अपना मकान है। ससुराल से अलग तकाजा आता है। फिर भी, शिवजी मालिक की अपनी एक शान तो है ही। जमींदारी चली भी गयी तो क्या हो गया है ? अपना संस्कार और अहंकार तो है। सारे ढांचे का अभी बाल भी बांका नहीं हुआ है। शिवजी मालिक आगे-आगे १२/उत्तरगाथा मलमल की कमीज और सेनगुप्ता महीन घोतो मे मगही पान चबाते हुए झूम-झूमकर चलते थे। पीछे-पीछे सुबल उनकी बन्दूक वायें कंधे में और दाहिने हाथ में उनका पनबट्टा थामे हुए था और उसके पीछे उनका सूटकेस माये पर उठाए हुए सुदेव । फिर दस दिन उनकी सेवा-टहल के बाद लौट माया था। बरावर तो यायू ही उनके साथ जाते हैं। हो सकता है, इस वार जाना पड़े तो फिर सुदेव को ही जाना पड़ेगा। सुदेव तो परदेस जा रहा है, रानीगंज, झरिया, कलकत्ता-अभी कहां जाना है, कुछ भी नहीं मालूम । न कोई दिशा-बोध है, न कहीं कोई जानकार । खाली सुदेव माई के जार से घर छोड़ रहा है। हो सकता है, वहीं कोई अवलम्ब न मिले तो परदेश ही में डुबकी लगा जाए। रात में रेवती भरपेट रोयी थी। अभी तो उसके पाँव के महावर मद्धिम भी नहीं पड़े थे। सुदेव के साथ अभी एक रात खुलकर जगी भी नहीं थी। अभी तो इस गांव में उसकी हालत उस चिड़िया की तरह है जो अपने घोंसले से बाहर नहीं निकली है। "तुम सचमुच मे जाओगे?" रेवती सिसकती हुई पूछती है। "मैं यहां एक पल के लिए भी नही रहूगा।" "कहां जाजोगे ?" "रानीगंज, झरिया, कलकत्ता-कही भी।" रेवती जोर से रोने लगती है। "रास्ता देखा-सुना तो है नहीं। कहाँ जाओगे?" रेवती को घबराहट ठीक उस मां की तरह होती है जो अपने बच्चे को हमेशा के लिए अबोध ही समझती है। "सच मानो तो माई ही इस गांव मे मेरी असलो दुश्मन है। इसी के कारण तो जा रहा हूं। जैसे शिवजी मालिक हो इसके लिए सब कुछ हों। मैं मा बाबू कुछ भी नहीं हैं। इस पर भी उधर शहर है। सुनता हूं गांव की तरह उघर जोर-जुल्म नहीं है। शिवजी मालिक के लिए हमें, तुम्हे या किसी को भी डकैत, चोर, सूनी कुछ भी बनाकर खेल में सड़वा देना तो मामूली बात है। मगर वहां कोई इतना बड़ा झूठ नहीं बोलता। तुम तो पढ़ी-लिखी हो। तुम्हें वहा के बारे मे कुछ भी नहीं मालूम क्या?" रेवती रोती हुई बोलती हैं, "मैंने तो कलकत्ता छोड़ किसी भी जगह का नाम नहीं सुना है।" "मास्साहेब गए थे।" "कौन मास्साहेब ?" "वही, जो गांव में पढ़ाते थे स्कूल में।" "रतनपुर का यह टोला भी कैसा है कि एक भी आदमी साला यहाँ से कहीं भी वाहर नहीं गया है ।" सुदेव को अपने ऊपर गौरव भी हो रहा है। मगर रेवती की आँखें रात-भर रो-रोकर फूल गयी हैं। सुदेव किसी भी बात को समझने के लिए तैयार नहीं है। .."रेवती का सुदेव सुवह उठकर चल दिया है। उसका मरद विदे- सिया हो गया है ! २ आँगन में काग बोलता है, ईआ जी। 'वो' जरूर आएंगे। रेवती का मन होता है कि बकरियां हांकती ईआ जी को टोक दे, परन्तु लाज से सकुचा गयी है । क्या सोचेंगी ईमा जी! यही न कि रेवती रात-दिन मरद की चिन्ता में रहती है। अभी सुदेव को गए कितने दिन हुए हैं-यही दस-पन्द्रह दिन । ईआ जी के जार से ही तो 'वो' विदेसी हो गए हैं। नहीं तो उन्हें कुत्ते ने थोड़े काटा था कि वे घर छोड़ दें, गांव और 'वेकत' छोड़- कर विदेसिया कहलाएँ। गांव में और भी तो सभी लोग हैं। लेकिन, उनका तो विदेस का कोई रास्ता देखा हुआ नहीं है । कहाँ भटकते होंगे, किसी को मालूम है क्या ? भूखे होंगे, प्यासे होंगे-~-किसे मालूम है। ओसारे में लाल साग चीरती हुई रेवती काग को भर नजर निरखती रह जाती है । गौना के सात-आठ दिन ही तो बीते थे, 'वो' चले गए-बड़ी दूर" पूरब में रानीगंज, कि झरिया, कि कलकत्ता "कुछ नहीं मालूम ! अभा उन्हें भर नजर दिन में देख ही कहाँ पायी थी। याद पारती'ताम्बे का तरह लम्बा"छरहरा, मूरत जैसी सूरत "रेवती से विसुरती नहीं! हवा १४/उत्तरगाथा में पता नहीं क्या-क्या फुसफुसाती है। पहली रात वाली बातें...पंक्ति- पंक्ति उसके कानों में चूती है। मनभावन के तीन वरिस की तरह केवल तीन रात । तीन रातें तीन सौ बरिस रात क्यों नहीं हो गयी थी? उसका कोई और नहीं होता. रात मुश्किल में पड़ जाती। सुबह नहीं होती। मूरज मुंह नही काढ़ता।"रेल नहीं आती। 'वो' टीशन से ही लौट आते...! ईआजी को भव वेटा का ख्याल होता है। आंख के सामने था तो बराबर ताना मारा करती थीं। सौतेली की तरह गरियाती थी। अब तो आंख में लोर भर लेती हैं और टोला-पड़ोस में कहती फिरती हैं-~गांव में ही हलवाही मजूरी मिलती तो बाबू पादेम काहे जाते। जाने के पहली वाली रात को 'वे' भी कहने लगे थे, रानीगंज में रिक्शा खीचेंगे, तीन पहिया वाली गाड़ी। उस पर आदमी बैठते हैं-एक, दो, कभी तीन-तीन । और 'वो' बैल की तरह खींचते होंगे । आदमी को चढ़ाकर पालकी मे मुम- हर-कहार भी तो ढोते हैं। "वो' गर्मी को इस दहकती लू में भी खीचते होंगे। बरसात के पत्थर-पानी में भी सोचेंगे । अगहन-पूस में देह को छैदने वाले जाड़े में भी खींचंगे!... रेल का क्या दोप है! आदमी से आदमी घिन रखता है। अटारी पर सांझ को काग बोलता है। अब उनके लौटाने की कौन बेर है। सव भी रेवती का मन करता, काग बोले-~पर सगुनराम अच्छा करें। 'वो' जरूर आएंगे."कागा तेरा चोंच सोने की मदवा दूंगी."सोने को ! सांझ की हवा कुछ संदेश लाकर कानों के पास छोड़ जाती है। हवा उसे मुवर देती है, गीतों में फुसफुसाती है, रेलिया ना वरी, जजिया ना बैरी वरी पइसवा हो राम... रेवती के पपनियों पर मोती दाने की तरह आंसू तिर जाते हैं। "कागा! तू इतना क्यों चिल्लाता है। माया वह सहन नहीं कर सकती मन की बड़ी कमजोर है। उससे यादें नहीं बिसुरती। यह तो प्रता का नाम नहीं सुना है।" "मास्साहेव गए थे।" "कौन मास्साहेब ?" "वही, जो गांव में पढ़ाते थे स्कूल में।" "रतनपुर का यह टोला भी कैसा है कि एक भी आदमी साला यहाँ से कहीं भी बाहर नहीं गया है।" सुदेव को अपने ऊपर गौरव भी हो रहा है। मगर रेवती की आँखें रात-भर रो-रोकर फूल गयी हैं। सुदेव किसी भी बात को समझने के लिए तैयार नहीं है। ""रेवती का सुदेव सुबह उठकर चल दिया है । 'उसका मरद विदे- सिया हो गया है ! .. - २ आँगन में काग वोलता है, ईआ जी। 'वो' जरूर आएंगे। रेवती का मन होता है कि बकरियाँ हाँकती ईआ जी को टोक दे, परन्तु लाज से सकुचा गयी है। क्या सोचेंगी ईग्रा जी ! यही न कि रेवती रात-दिन भरद की चिन्ता में रहती है। अभी सुदेव को गए कितने दिन हुए हैं -यही दस-पन्द्रह दिन । ईआ जी के जार से ही तो 'वो' विदेसी हो गए हैं। नहीं तो उन्हें कुत्ते ने थोड़े काटा था कि वे घर छोड़ दें, गांव और 'बेकत' छोड़- कर विदेसिया कहलाएँ । गांव में और भी तो सभी लोग हैं। लेकिन, उनका तो विदेस का कोई रास्ता देखा हुआ नहीं है । कहाँ भटकते होंगे, किसी को मालूम है क्या ? भूखे होंगे, प्यासे होंगे---किसे मालूम है। ओसारे में लाल साग चीरती हुई रेवती काग को भर नजर निरखती रह जाती है। गौना के सात-आठ दिन ही तो बीते थे, 'वो' चले गए-बड़ी दूर" पूरव में रानीगंज, कि झरिया, कि कलकत्ता'''कुछ नहीं मालूम ! अभा उन्हें भर नजर दिन में देख ही कहाँ पायी थी। याद पारती ताम्बे का तरह लम्बा'छरहरा, मूरत जैसी सूरत.. रेवती से बिसुरती नहीं! हवा १४/ उत्तरगाथा - मैं पता नहीं क्या-क्या फुसफुसाती है। पहली रात वाली बातें.."पंक्ति- पंक्ति उसके कानों में चूती है। मनभावन के तीन बरिस की तरह केवल तीन रात । तीन रातें तीन सौ बरिस रातें क्यों नहीं हो गयी थी? उसका कोई और नहीं होता." .."रात मुश्किल में पड़ जाती। सुबह नहीं होती। सूरज मुंह नहीं काढ़ता।"रेल नही आती। 'वो' टीशन से ही तोट आते...! ईआजी को भव बेटा का ख्याल होता है। आंख के सामने था तो बराबर ताना मारा करती थीं। सौतेली की तरह गरियाती थीं। अब तो आँस मे लोर भर लेती हैं और टोला-पड़ोस में कहती फिरती हैं-गांव में ही हलवाही मजूरी मिलती तो बाबू परदेस काहे जाते। जाने के पहली वाली रात को 'वे' भी कहने लगे थे, रानीगंज में रिक्शा खीचेंगे, तीन पहिया वाली गाड़ी। उस पर आदमी बैठते हैं-एक, दो, कभी तीन-तीन । और 'वो' बैल की तरह खीचते होगे । आदमी को चढ़ाकर पालकी मे मुस- हर-कहार भी तो ढोते हैं। "वो' गर्मी की इस दहकती लू में भी खीचते होंगे। बरसात के पत्थर-पानी में भी खीचेंगे । अगहन-पूम में देह को छैदने वाले जाड़े में भी सीचेंगे! रेल का क्या दोप है। आदमी से आदमी घिन रखता है। अटारीपरसांझ को काग बोलता है। अब उनके लौट आने की कौनवेर है। तय भी रेवती का मन करता, काग बोले-पर सगुनराम अच्छा करें। 'वो' जरूर आएंगे."कागा तेरा चोंच सोने की मढ़वा दूंगी."सोने की ! सांझ को हवा कुछ संदेश लाकर कानों के पास छोड़ जाती है । हवा उसे सुबर देती है, गीतों में फुसफुसाती है, रेलिया नारी, जहजिया ना बैरी वैरी पइसवा हो राम' रेवती के पपनि पर मोती दाने की तरह आँसू तिर जाते हैं। "कागा! तू इतना क्यों चिल्लाता है । माया वह सहन नहीं कर सकती मन की बड़ी कमजोर है। उससे याद नही विसुरती। यह तो बता . कि 'वो' किस तरह हैं. 'कहाँ हैं, निरोग तो हैं न! देह तो वैसी ही है न ! जब से गए हैं विदेसिया मेरे, कोई खबर-संदेश नहीं । चिट्ठी-पत्री क्यों नहीं आयी ! क्या कहकर गए थे। जाते ही भेजूंगा। हे राम! मेरे विदेसिया जरूर अच्छे होंगे न ! • "जरूर अच्छे होंगे! निरोग होंगे ! गोदावरी आग लेने आयी थी। रेवती अभी भी साग चीर रही थी, यादों की माया में वीरायी फिर रही थी। गोदावरी टोकती है, "हाय भौजी। अंचरा के कोर से लोर काहे पोंछती हो ? मन ससुराल में भइया के विना नहीं लगता न ! माई याद पड़ती होगी। नहर भाया है क्या ?" रेवती लजाती है। मोटे-मोटे, भरे-भरे न चाहते हुए भी कई मोती दाने झलक आते हैं। "माई किसे याद नहीं पड़ती, गोदा!" गाँव, गलियां, अकेलहा आम, सहेलियाँ "मोती.. और सव रेवती के 'वो'-कई एक साथ आँख, मन और दिमाग चक्कर काटते रहते हैं । सुदेव की याद तो वहुत मलाती है। रह-रहकर अकेले में छाती फाइती रहती है। नहर में गंगा के किनारे वालू के टोले 'घरौंदे कुछ ही दिनों पहले तो छूटे हैं। पीपल के टीले वाली बचपन की सहेलियाँ। चरवाही में तक- रार करता हुआ मोती ।''आम के टिकोरे। 'अष्टमी-एकादशी के दिन सावनी स्नान । "भाई-भौजाई.''और चरवाही में मोती के साथ आँख- मिचौनी । मोती के साथ अकसरहाँ तकरार हो जाती थी तो वह तालियाँ पीट-पीटकर मोती को चिढ़ाने लगती थी-"बेटिया में बेटवा गुलेल खेलेला । भर मुट्ठी सेनुरा जियान करेला।" (वेटियों के साथ बेटे खेल- खेलकर भर-भर मुट्ठी सिन्दूर बर्बाद कर दे रहे हैं।) भोले-भाले गीत "सव कुछ तो रेवती को एकान्त में वेधते हैं। यादों के पंछी बीच-बीच में अपने गांव उड़ जाते हैं। "पतोहू काहे रोती है, गोदा ?" ईआ जी गोदावरी से रेवती के बारे में पूछती हैं। यादों के पंछी जैसे वहेलिया के अचानक तीर खाकर गिरते हैं। ईया जी समझाती हैं, "माई-बाप को कब तक याद करोगी, कनेया। आँगन में कई दिन से काग बोल रहा है। तुम्हारे नहर से खोज-खबर, के १६ / उत्तरगाथा । - - लिए तुम्हारा माई-भतीजा भी तो नहीं आता। कोई तकलीफ है क्या ?" "क्या कहती हैं ईआजी, तकलीफ की बात । रामजी ने मुझे सब कुछ तो दिया है। आप भी मेरी सगी माई से कम हैं क्या ?" रेवती अपने आंसू प्रकट करना नहीं चाहती। "तव अकेले में रोती काहे रहती है, कनेआ?" "कसे कहूं व्यथा, ईआ जी!" रेवती ओसारे से उठकर ढिबरी जलाने लगती है। आधी रात बीत गयी है। रेवती को नींद नही पाती । वह सगुन-अप- सगुन विचारती है। माई भइया, गंगा के किनारे-किनारे गांव की सभी सहेलियाँ "मोती "और 'वे' भी। रेवती अपने गांव अकेलहा आम के नीचे धैठकर डोली लेकर गुजरने वाले कहारों को अपनी सहेलियो के साथ विढामा करती थी-कनेआ जाली भूइ-मूइये, मार लइके टूइय-टूइयें ।' (डोली की कन्या भूमि-भूमि चल रही है । ए लड़को ! इसे टुइयां फेंककर मारो।) रेवती की डोली भी जव गांव से इसी तरह गुजरी थी भोर रतन- पुर के इस टोले के पिछवाड़े डोली मुमहरों ने रखी थी तो यहां की बेटियो ने भी यही चिल्लाना शुरू किया था, 'कनेा अइली भूइयें भूश्य, मार लइके दुइये-टुइयें।' (कन्या हमारे गांव भूमि-भूमि आयी है। ए लड़कों, इसे टुइयां फेंककर मारो।) रेवती का भाई होली के पास खडा था। कुंआरी लड़कियों ने उसके भाई को देखकर कहना शुरू कर दिया । 'कनेमा हो, दूगो धनियाँ द । लाल मिरचाई के फोरन द। भाई माउल मेंट कर।' (एक कन्या, दो धनिया की पत्तियां और लाल मिचं झैंक के लिए दो। तुम्हारा भाई भाया है उससे मुलाकात कर लो।) मोती जरूर चरवाही में अकेला होगा, रोता होगा। वह तो उससे वायदा कर आयी थी, रेवती उसके व्याह मे अपने हाथों मंगल कलश रखेगी, झूमर गाएगी, उसकी कनेला उतारेगी."ससी वधिगी, क्योंकि मोती को उसी तरह नही मुलाया जा सकता, जिस तरह गांव की गलियां नही दिसुरती।"विदाई की रात वह मोती के साथ भरपेट रोयी थी। मोती ने कहा था, मगर मेरा मोह सच्चा होगा न रेवती, तो वह सोचकर तुम्हें जरूर गांव लाएगा। तुम्हारे बिना तो जोहरिया के दाने मूख जाएंगे। सावन के पहले जरूर ना जाना। 1 मैं वहाँ अकेलहा आम के नीचे टीले पर तुम्हारा इन्तजार करूंगा। रोज- रोज की तरह मोती अव भी वहीं बैठा होगा । मोती ने रेवती को ठीक ही तो समझाया था-रेवती की ससुराल आने पर मोती को लोग क्या कहेंगे भला। मोती न उसका भाई होता है, न भतीजा। वह न कोई पाहुन ही है, न बहनोई । रेवती की ससुराल वालों के सामने जग हँसाई होती। मोती नीम के नीचे बैठा-वठा रोया करता। रेवती के आँगन में गीत होते, लगन के गीत होते, "पहिला लगनियां तिल चाउर, ओही में इँटावल पान।" पहिला लगनवां तिल चाउर एss." लगनियाँ बाड़ा सुनर, सगुनवाँ अकुलाइल एss." मोती से ज्यादा तो अब वही याद आते हैं । आज यादों के तार इतने झनझनाते क्यों हैं ? "ईआ जी, मुझे नींद नहीं आती ईआ जी!..'नींद नहीं आती।" रेवती अचानक चिल्लाती है। "तुम्हें क्या हो गया है, कनेआ ?" ई जी चिहुंककर पूछती हैं।" "ऐसी वात नहीं, ईआजी 'वो' जरूर आएंगे। सुबह होते-होते जरूर आ जाएंगे। काग मुझे सगुन बता गया है।" "सो जा कनेआ! वावू क्या आएंगे। वाबू तो इस सर्दी में भी रिक्शा खींचते होंगे।" "उनके तन पर चादर होगी न, ईआ जी ?" "कोन ठीक, बाबू के पास पैसे होंगे।" कहते-कहते ईआ जी का कं० भर पाता है। ईआ जी सोचने लग जाती हैं 'अपने वाबू भी तो सर्दी में भीगते होंगे।"तन पर चादर नहीं होगी, कनेआ ठीक ही कहती है। अगहन-पूस की सनसनाती वयार शरीर को भाले की तरह छेदती होगी। रिक्शे पर कई वैठे होंगे-~~-एक, दो, तीन चार और पांच भी। हाय दइव ! पेट कैसा मुदई है, दुश्मन है। मुहल्ले-टोले में इस सर्दी में सबके बाडू हैं, केवल मेरे ही बाबू परदेस हैं। जिस विधि राखें राम उसी विधि प्रादमी को रहना है । दइव के चक्कर में आदमी पिसाता है, ईख की तरह। रो-छछन- कर सबुर करना है." - १८/उत्तरगाथा "एक राजा को चार बेटे। सुनती है न, कनेआ?" ईमा जी उसे और स्वयं को भी वहलाने की कोशिश करती हैं।" "हूं, ईमा जी !" रेवती अन्यमनस्क-सा उत्तर देती है। ईआजी आगे कहती हैं, "राजा ने मना किया, सुनो वेटो! सभी दिशा में जाना, परन्तु दक्खिन की ओर कभी मत जाना । सो छोटे बेटे न सोचा, आखिर क्खिन की ओर क्या बात है जो वाप जान से मना किया है। मैं तो दक्खिन की तरफ ही जाऊँगा। इस तरह बड़ा गया पूरव, मझोला गया पच्छिम, और संझोला उत्तर। छोटा बेटा जान-बूझकर दक्खिन दिशा की और ही चल पड़ा।" रेवती फिर हुंकार भरती है, "हूँ। तब रानीगंज किधर है ईआजी?" "यहाँ से पूरव । अच्छा, आगे सुन, कनेआ!" "कहो, ईप्राजी।" "अब समझो कि चलते-चलते राजा का छोटा बेटा एक घने जंगल में पहुंच गया। वहां पहुंचते-पहुंचते रात हो गयी। राजा का छोटा बेटा बहुत पक गया था। इसलिए अपना अंगोछा विछाकर वही सो गया । सो सम- झना मनेा कि उसी जंगल में एक बडा भारी दैत्य रहता था। सुबह हुई तो क्या देखता है कि वह भारी देत्य उसे हथेली पर उठाए अपनी मांद की और चला जा रहा है।" "है!" रेवती हुंकारी भरती है। "जैसे ही दैत्य ने उसे निगलने के लिए मुंह को फाड़ा वैसे ही राजा के छोटे-बेटे ने हाथ जोड़ लिया, ए जंगल के राजा। मुझे बहुत जोरों से भूख लगी है। पहले मुझे खिला दे तब मुझे निगल जाना। इस बात पर दंत्य का कालेजा पसीज गया." रेवती ने बीच मे ही टोक दिया, "अच्छा, ईमा जी। उन्हे भी भूख लगती होगी तो रिक्शे का मालिक खाने के लिए पूछता होगा न?" "कौन ठीक है, उस दश्य की तरह भलामानस होगा। तब न ? बाबू बीमार पड़ते होगे तो दवा करता होगा, नहीं करता होगा-कौन जानता रेवती ऐसी आशंका से डर जाती है। बात को उलटने के लिए बोलती है, "अच्छा आगे बोलो, ईनाजी । राजा के बेटे का फिर क्या हुआ ?" "सो समझना कनेआ, जो दैत्य ने इस पर जवाब दिया-ए मानुख बच्चा ! मेरे पास मानुस बच्चे को खिलाने के लिए कुछ भी नहीं है। इस जंगल के पास ही एक वस्ती है-अंधेर नगरी। वहीं डोमनी रानी राज करती है। वहाँ जाने के बाद तुम्हें रसोई मिल जाएगी। लेकिन हाँ, डोमनी बहुत खूबसूरत मेहरारू है। उसने बड़े-बड़े राजा-महाराजाओं को कैद कर रखा है। उसकी शर्त यह है कि उसके दाएं हाथ के कंगन का जोड़ा जो कोई ला देगा डोमनी उसी के साथ व्याह करेगी। सो भइया,तुम मेहरारू के चक्कर में डोमनी रानी के महल की भोर मत बढ़ना, नहीं तो हार दाबकर तुम्हें भी डोमनी का कैदी बनना पड़ेगा। राजा का छोटा बेटा बोला, कुछ भी कहो। मगर मुझे तो भूख लगी है। पेट को अन्न तो मिलना ही चाहिए। तव दैत्य ने कहा कि ठीक है। पेट भरते ही तुम मेरे पास प्रा जाना। सो समझना कनेआ, कि अंधेर नगरी पहुंचते ही राजा का छोटा वेटा क्या देखता है कि जो जैसे वैठा है तो वैठा ही है । खड़ा है तो खड़ा ही है। यानी उसे टकटकेपुर बाजार कहा जाता था। जिस समय डोमनी रानी महल में होती उस समय तो सभी जिन्दा होते और अपना-अपना काम- धन्धा करते होते, परन्तु जहाँ वह इन्द्रासन गयी वहीं सारे लोग काठ की तरह जड़ हो जाते।" रेवती पूछती है, "अच्छा, ईआजी । डोमनी रानी इन्द्रासन क्यों जाती थी?" "अरे वह तो इन्द्र महाराज से फंस गयी थी न ! इसलिए साल में छः महीने यहाँ होती थी और छः महीने इन्द्रासन में सेज पर।" रेवती सोचने लगती है, घर में 'वो' तो छ: दिन भी उसके साथ सेज पर नहीं रहे । लेकिन इन्दर के पास तो बहुत पैसे हैं, वह अमीर है, देवता- पित्तर है। ''तो मामूली आदमी हैं । मजूरिन के बेटे, गरीबिन के बेटे ! छोटे आदमी के वेटे! कितना भेद है ! तभी ईआ जी टोकती हैं, "सो तो नहीं रही है कनेमा ?" रेवती कहती है,"मुझे तो बड़ा मजेदार किस्सा लग रहा है। ईआजी" ईआजी आगे कहना शुरू करती हैं, "राजा का बेटा नगर में प्रवेश २० / उत्तरगाथा करते ही सबसे पहले एक दुकान पर गया और अंगोछा बन्धक रखकर भर- पेट भोजन किया। दूसरे दिन वह खूब तड़के डोमनी रानी के महल के फाटक पर पहुंचा।" "किसलिए, ईआजी ?" "आगे सुन तो! राजा के छोटे बेटे के मन तो डोमनी एकदम समा गयी थी। उसने मन में ठान लिया था कि चाहे जो हो, मगर डोमनी के साथ वह जरूर ब्याह करेगा । सो समझना कनेमा, कि महल के फाटक पर पहुं. चते ही उसने नगाड़ा पीटना शुरू किया। नगाड़ा बजना था कि पटरानी महल मे हाजिर। वह बोली, ऐ नौजवान ! अगर कंगन का जोड़ा नहीं मिला तो जिन्दगी भर के लिए मेरे कैदखाने में रहना पड़ेगा। राजा के छोटे बेटे ने सिर झुकाकर डोमनी रानी को शतं को मंजूर कर लिया।" रेवती फिर विचार करती है, राजा के छोटे बेटे ने कितना बड़ा खतरा उठाया है डोमनी रानी के लिए। उसके 'वे' भी तो इतना ही बड़ा खतरा उठाकर गए हैं पेट के लिए। उन्हें किसी सौतिन या औरत से क्या मतलब है । राजा के छोटे बेटे की तरह इश्कवाज योडे हैं । 'वे' ऐमा छोटा काम कभी नहीं कर सकते । राजा के छोटे बेटे की नीयत की तरह गरीव आदमी कभी नहीं होता । नहर में भोजाइयां ठीक ही तो गाती हैं । रेलिया न बरी, #l4rus. जहजिया न वरी, .AGAR वैरी पइसवा हो रान। GEETA BHA JAIFUR-342004 ईआजी की तरह रेवती के नहर में भी गाँव को बहू-बेटियाँ सभी मिलकर जगत साव के कुएं पर इन्द्र को मनाने के लिए गीत गाती थी, आज भी बैठकर इन्द्र से पानी मांगती होगी। इसी फागुन मे मोती का व्याह जरूर हो जाएगा। वाप रे! कितना निर्दय है जगत साव । सेर भर सतुप्रा के लिए दिन भर धाम में पीस दिया था मोती को। दैत्य की तरह खटता रह गया था मोती। कोई क्या कर सकता था। वरखा का विश्वास ही उठ गया था। गांव मे दो-बार को छोड़कर सभी मौत के कगार पर थे। मोती की महतारी, छोटा भाई! तीन दिनों के भूखे ! क्या इस देश्य से कम भयं- कर जगत साव है ? कुदाल धरती माई में धंसाकर पक जाता था मोती। Co. उत्तरगाथा / २१.. 1 नख से लेकर शिख तक तवे की तरह लहक जाता। फिर भी कुदाल को धरती में इतना धंसाता, मानो दो भागों में फाड़ देगा। कसाई भी इतना क्या निर्दय होगा, जिस तरह मोती पपड़ियों वाली धरती के साथ हो जाता था। आखिर यह सब किसके लिए? इस मुदई पेट के लिए ही तो लेकिन इन्दर तो अहेरी है आदमी का। इसीलिए मोती धरती में जगह बनाते- बनाते थक गया था। कहीं शरण नहीं मिली थी। बाबूचक रेवती के गाँव से पाव कोस पर कगडूंछ मालिकों की वस्ती। एक बार मोती उसी रास्ते से गुजरा था। किसी को सलाम करना भूल गया था। कन्धे से कुदाल उतारकर मोती वावूचक के एक मालिक के पायदाने धम से गिर गया, अव तो बरखा का कोई आसरा नहीं, मालिक ! सारे वधार में भाग लपलपा रही है। वह मालिक उसे भद्दी गालियां देते हुए ठठाकर हंसा था। नाद पर झूम-झूमकर गवत खाते हुए बैल भी उस दैत्याकार ठहाके से चिहुंक उठे थे। रेवती से मोती ने सब कुछ बताया था। ईआ जी की कहानी का दैत्य बाबूचक के मालिकों से कहां खूख्वार है ? यहाँ के शिवजी मालिक का नाम ईआ जी के मुंह से सुनती है। यह भी तो वावूचक वालों के करेज की तरह का ही खूख्वार लगता है। खाली शिवजी मालिक के बारे में रेवती गोदा- वरी के मुंह से जव तक सुनती है कि देखने-सुनने में बड़ा सुघड़, सुभेख जवान है। मगर आग लगे ऐसे दैत्याकार जवानी में। कहीं रानीगंज में भी उनके रिक्शे का मालिक भी शिवजी मालिक की तरह का ही दैत्य हो तव ? अभी उनकी उम्र ही क्या होगी--अट्ठारह-वीस ! बस यही न ! अट्ठारह वरिस की इस उमिर में तीन-चार आदमियों को रिक्शा में बैठाकर खींचते होंगे। कहीं वह आदमी भी जगत साव या शिवजी मालिक निकल गया तो? वे लोग तो 'उन्हें भाड़ा भी नहीं देते होंगे। दो थप्पड़ मारकर, ठहाका लगाते हुए निकल जाते होंगे। 'वो' जव चिट्ठी-पत्री देने के लिए बोल गए थे तो जरूर भेजते होंगे। डाकखाने से चिट्ठियांदुश्मन गायव कर देते होंगे। "परन्तु सुदेव और रेवती की चिट्ठियों से किसी को क्या वैर हो सकता है ! कई वार हिम्मत कर चुकी है कि डाक मुंशी बाबू से पूछे, पर संकोच कर जाती है । चिट्ठियाँ होती तो • २२/ उत्तरगाथा वह देता क्यों नहीं ? ईआ जी को वह हिलाती-डुलाती है तो उन्हे जम्हाई भा रही है। बीच में उसे भी स्याल नहीं रहा कि ईआ जी को नीद आ रही है। वह भी गजब है कि अनाप-शनाप सोचने लगी थी और कहानी के बीच-बीच में इधर-उधर भटक जाती थी। वह ईआ जो को झकझोरकर जगाती है, "अधूरी कहानी छोड़कर सो रही हैं क्या ऐ ईशा जी? राजा के बेटे और डोमनी रानी का क्या हुआ? क्या राजा के बेटे ने रानी के कंगन का जोड़ा लगाया?" ईमा जी बुदबुदाती हैं, "है..."जरूर लगा दिया होगा, कनेआ। परन्तु मुझे तो नीद आ रही है। बाकी कहानी क्ल रात मे सुनाऊँगी। मुझे अभी छोड़ दे..." "अच्छा, ईआ जी! आप तो सो रही हैं, लेकिन मुझे तो आपको इस मयूरी कहानी के चलते बिल्कुल नीद नहीं आ रही है।" रेवती की आंखें सचमुच मंधेरे मे खुली हुई हैं। चाहती भी है, तब भी नींद नहीं आ रही है। .. ३ "जैसे रात्रि सम्पूर्ण गांव को दैत्य की तरह निगल गयी हो, कही कोई आवाज नहीं। टोले को बहिरा साप ने सूंघ लिया है। दविखन की ओर सियारित करती है। भयानक अकाल पड़ेगा या भरसा मे पूरा टोला वह जाएगा, कौन जानता है। अचानक रेवती चीखती है मोर ईआ जी को कस लेती है। "बड़ा भयानक सपना था, ईआजी। 'वे' पहबान में नहीं आ रहे थे। दांत निकल आए हैं। ओखें फंस गयी हैं । खालो भोली उनकी है, सारा शरीर राकस का हाय ईआ जी, मैं कैसे जीऊंगी'वो' मुझे अब पहले की तरह कहाँ मिलेंगे.. कहां मिलेंगे."ईआजी!" ईग्राजी, गोदावरी की महतारी को बुलाती हैं । "देख रे गोदवा की माई, मेरी कनेमा को क्या हो गया है ? खराव-खराव सपनाती है। विछोह कर रोती है।" "कनेमा को भूत-परेत का आंगछ है । किसी ओझा-गुनी को बुलाकर दिखलाओ।" गोदावरी की महतारी राय देती है। "इस अंधेरी रात में किस दुआर जाऊँ?" "पिलवा मुसहर बड़ा अच्छा गुनी निकला है।" ईआ जी माथा ठोक लेती हैं । "हाय रे करम ! आधी रात में मुसहर दोली कैसे जाऊँ ? बगीचा पार कर जाना है। वाबू रहते तो बेखटक अभी दौड़ जाते । कनेमा ऐसे थोड़े छछनती ?" अभी-अभी तो कनेआ को ईआ जी डोमनी रानी का किस्सा सुना रही थीं। तनिक आँख लग गयी थी। इसी बीच कनेआ सपने में चीखने लगी थी। इधर रेवती सोच रही है, उनकी बातों को याद कर रही है। -सुवल के भइया, क्या भरोसा, उधर तुम कोई सौतिन रख लो। -जिसके रूप को ताकते ही गेहूं के बाल झूमते हों, सरसों के फूल लजा जाते हैं, उसके मरद को सौतिन की क्या जरूरत है। "चल सुबल की महतारी, ले चल कनेमा को। मैं भी चलती हूं पिलवा मुसहर के पास।" गोदावरी की महतारी बोलती है। रेवती छटपटाकर उठ जाती है । "नहीं, नहीं."! मुझे कुछ भी नहीं हुआ है । खाली 'वो' ही तो मेरे दिल-दिमाग में समाए रहते हैं। यही लगता है कि कहीं से आ रहे हैं। बधार, आरी, डगर, आहट, सोहनी, कोढ़नी, चाहे जांतसारी हर बेर तो 'वो' ही छाए रहते हैं । भूत-परेत आप लोगों के दिमाग में है, ईआ जी।"मुझे तो कुछ नहीं है ! कुछ नहीं...।" रेवती बोलते-बोलते के करने के लिए 'मोय-ओय' करने लगती है। गोदावरी की महतारी अँधेरे में हँसती है, "अरे मिठाई खिलाव सुबल की महतारी । सुदेव वहू को दूसरी देह है। पेट में बच्चा है।" "मुझे भी तो यही लगता है।" ईआ जी खुशी-खुशी कहती हैं, "अच्छा हुआ कि आठ ही दिन में कनेा का पेट रह गया है। नहीं तो जुग-दुनिया कितनी खराब है। कनेत्रा पर किसी की बुरी नजर ही पड़ जाती। हम २४/ उत्तरगाथा - १ गरीब लोगों का परमात्मा भी कहां रखवाला रह गया है। उस दिन तो शिवजी मालिक के खेत पर कनेआ को भी गेहूँ की कटनी में ले गयी थी। मालिक का लड़का शहर से आया था और कनेआ के सामने ही आरी पर जाकर बैठ गया था। अगर कोई कुछ कर ही दे तो हम लोग क्या कर सकते हैं।" "गरीब की बेटी-बहू को सुन्दर नहीं होना चाहिए, सुबल की माई।" रेवती से बर्दाश्त नहीं होता है। "उसी हंमुआ से उसकी प्रांख नहीं निकाल लेती ईआ जी!" वह दांत किटकिटाती है। चुप्प!" ईग्रा जी डांटती हैं, "ऐसी सराव वोली मुंह से नहीं काढ़ते, हवा के भी कान होते हैं।" रेवती परसों ईआ जी के साथ कटनी मे गयी थी तो कहाँ वह शिवजी मालिक का लड़का ध्यान मे था । ध्यान मे 'वो' थे कि कही से अचानक मा जाते तो कितना अच्छा था। कभी उचक्कर देखती, कभी डगर की ओर लपककर दौड़ जाती। 'यो' रानीगंज से जल्दी ही लौटेंगे, यही तो रेवती फा अदम्य विश्वास था। मगन होकर कटनी कर रही थी, गेहूं की बालियों में तेज धार थी। उसके बाएं हाथ का अंगूठा हेसुओं से लग भी गया। मजूर के हर जगह खून ही तो बहते हैं। उन्ही के खून से तो नए पौधे अंकुरते हैं । हैमुए के धार को उसने छूकर देखा था। घार मोथर हो चली थी। बड़ी मुश्किल से डंठल कटते थे। चेहरे पर पसीना छलछला माया था। पसीना पोछने के बहाने वह बार-बार खड़ी हो जाती ओर डगर की और झांकने सगती। शायद ..! .."वे कहीं से टपकने वाले हैं । रेवती जव स्कूल में पढ़ती थी, मास्साहेब जी कभी-कभी कहा करते थे, जमीन उसी की रहेगी जो जोते-बोएगा। गरीब के बच्चे सुनकर बहुत सुश होते थे, उनके बाप के पास भी जमीन हो जाएगी। परन्तु नहर का साव तो जमीन वटाई पर देता था। साव का वेटा सूरजमल शहर में सोना- चांदी का कारोबार करता था।जगत साव गांव पर खेती कराता था और सूद पर रुपए चलाता था। वावूचक वाले बाबुओं के बीच जगत साव की कर थी। वह जब-तब उन्हे रुपए भी देता रहता था और उनसे सूद नही लता पा लेता भी या तो बहुत कम, नाममात्र के लिए। मास्साहेब जी यह भी कहा करते थे, हम लोग आजाद हैं। इसका मतलब रेवती धीरे-धीरे ख्याल करती है। अपने राज में कोई किसी पर जोर-जुल्म नहीं करेगा। पैसे वाले साव-महाजन और बाबू लोग ही मिल-जुलकर दुनिया को बनाते- बिगाड़ते रहे हैं । हरिजन टोली में स्कूल खुला था तो जगत साव जल-भुन गया था। लड़कियाँ स्कूल में आने लगी तव तो उसे और भी बर्दाश्त करना मुश्किल था। "मगर एक चीज जरूर थी, रेवती के इलाके में जुलुम के खिलाफ बड़ा जोर था। इसलिए किसी का भी जोर-जुलुम बहुत मुश्किल से चल पाता था। जगत साव सीमा लांघकर आगे बढ़ने की हिम्मत नहीं करता था। रेवती का चाचा देवकीदास पार्टी में था। पार्टी का अखबार आता था। रेवती को अखबार पढ़ने, चाचा की बातें सुनने और वहस करने की आदत बन गयी थी। ससुराल में तो सब कुछ उल्टा-उल्टा ही है। इस इलाके में तो साहस मरा हुआ है। शिवजी मालिकों का यह इलाका गजब का मुर्दा है। पलटू दादा की दालान पर औरत-मर्द की हर रविवार को भीड़ लगती थी। पलटू दादा मस्त होकर सुनाते थे-जात-पात पूछे ना कोई, हरि को भजे सो हरि के होई । 'यही कारण है कि रेवती भिखारी ठाकुर, राहुल, कवीर, पार्टी को ही नहीं, जुल्म को भी पहचानती है। यहाँ भाकर रेवती का साहस टूट गया था। मर्द अनपढ़ था तब भी चिन्ता की बात नहीं थी। उसे तो रेवती अक्षर सिखलाकर कबीर, राहुल और पार्टी के बारे में बता सकती थी, परन्तु अपने रत्न-धन तो रेवती के आते ही विदेशिया बन गए है। पढ़े-लिखे होते तो चिट्ठी-पत्री देते न ! मगर पढ़ने-लिखने से भी क्या हो जाता है। फुर्सत नहीं मिलती होगी तभी तो चिट्ठी-पत्री नहीं दे रहे हैं। देवकी चाचा कहते हैं कि शहर में मजदूरों का संगठन है। तब क्या रेवती के 'वो' भी उस संगठन में होंगे? संगठन में होंगे तब तो चिन्ता की कोई बात नहीं है । रेवती की तरह वह भी मजबूत होंगे। मगर यहाँ ससुराल में तो मजबूती कोई काम नहीं करती। ईआ जी को अभी भी भूत-परेत का आँगछ ही लगता है और शिवजी मालिक पर- मात्मा है। ऐसे परमात्मा में तो रेवती के इलाके में लोग पाग देते। "वचा के रहना, कनेआ?" बहुत देर बाद ईआ जी वोलती हैं 1 "क्या बात है, ईआ जी?" "कोई बात नहीं है ? पेट में लड़का रह गया है, बाबू की निशानी!" "वायू की निशानी! तुम तो ऐसे कह रही हो जैसे 'वो' फिर कभी लौटकर नही माएंगे।" "लोटकर तो आएंगे ही। पता नहीं, बाबू कव तरु आएंगे ! हवा का हहास वाहों झोंका । बदन सिहर उठता है जैसे कोई सूई चुभो रहा हो। ईआ जी भांगन मे गोदावरी की महतारी के साथ चली मायी हैं। एक पहर और रात टल गयी है। वे गायद सुवह को प्रतीक्षा तो नहीं कर सचमुच, गोदावरी की माई के साथ ईआ जी पिलवा मुसहर के यहाँ जा रही है। रेवती नाक-भौं सिकोड़ती है, कैसी ढोंगी हैं ईआ जी। भला, इस हालत में पिलवा मुसहर क्या करेगा? रेवती हजार मना करती रह जाती है, ईशा जी कहां मानती हैं। बगल के घर से परमा के खांसने की आवाज आती है। ईआ जो गोदावरी की मतारी से कह रही हैं, "बुढ़वा न मरता है, न जीता है। महीनों से घर को परेशान किए रहता है।" "इसमे बाबू जी का दोप ही क्या है, ईआ जी?" रेवती वही से बोलती है। "चुपचाप रह, कनेआ। पिलवा आया तो तुम्हारे ससुर को भी दिसला देंगे।" रेवती बहुत समझाती रही, मगर वे दोनों पिलवा मुसहर के पास चली गई हैं। वह झुंझला-झुंझला कर हाथ-पांव पटकती रहती है और फिर चुप लगा जाती है। बुढ़ऊ भोर में ज्यादा सांसते हैं। फिर वही हहास बांधे हवा का झोंका । बदन सिहर उठता है। रेवती को स्याल पाता है। पलटू दादा को दालान पर लोग जमा थे और ऐसी अंधेरी रात में वह पलटू दादा की दालान से जगत साव के घर की ओर से लौट रही थी। उसका बेटा भाया था। वह छत पर बैठा था और नीचे बिजली को बत्ती में देख रहा था। रेवती पर मौख गई तो धड़धड़ाकर नीचे उतर पाया। जैसे बाज की तरह काफी देर से उमी की प्रतीक्षा में हो। उसने आते ही रेवती का हाथ पकड़ लिया था और घर में अन्दर सीत्र रहा था। रेवती उसे गालियां बकते हुए जोर-जोर से चिल्लाने लगी थी। काफी लोग जमा हो गए थे और चमरटोली के लोग उसके घर में घुसकर साव के बेटे की मरम्मत करने लगे थे। देवकी चाचा ने बीच-विचाव किया था तब जाकर जगत साव के बेटे की जान बची थी। तभी से वह फिर कभी गाँव लौटकर नहीं पाया था। उसी समय से रेवती का मन बढ़ा हुआ है। ऐसे लोगों को अकेले में भी देखने की हिम्मत रखती है। पर यों तो शिवजी मालिक के वेटे को भी दिखला देगी । मंगर साले की हिम्मत नहीं हुई। .."फिर भी रेवती घर से बाहर निकलने लगी है। सोहनी-कोढ़नी, घास-पात, मिहनत-मजूरी के लिए बाहर आती है। इसके बिना गुंजाइश ही कहाँ है ? घर में बूढ़ा ससुर बीमार है। 'वाहर इज्जत-पानी पर तो खतरा बना ही हुआ है । गरीव की बेटी का सुन्दर होना पाप है न! रेवती उठकर आँगन में आ गई है। रात की कालिख मिटती जा रही है। बगीचे से कोई आवाज साफ आ रही है । राखो हो रामाऽऽ राखो'""ओ पत राखो द्रोपदी के...... ४ , स्लेट-पेन्सिल के साथ सुवल जब ढिवरी के सामने ओसारे में बैठकर भौजी को हाँक मारने लगा तो स्वयं माई को भी अंचरज हुमा था। अब यह बुढ़वा सुग्गा पढ़ने बैठा है ? सुदेव-बहू को अब यह कैसा मजाक सूझ रहा है ? सुबला पढ़कर ही क्या करेंगी। लोग-दुनिया सुनेगी तो क्या कहेगी। यही न, कि मरद परदेस छोड़कर चला गया तो देवर से पढ़ाई के बहाने लटपटा गई है। गरीव पर चारों तरफ से हमला है। हम कुछ भी नया काम करते हैं तो पाप-समझा जाता है। उसने झुंझलाकर कहा, "वहू रे! छोड़ यह संव गुड़िया-घरोंदा को खेलं । लोग-बाग हंसकर जी जाएंगे। पढ़ाई-लिखाई हमें शोभा नहीं देगी। "समझ रही है कि नहीं कुछ ?" सुवलें तो समझता था, माई भीतर-भीतर बहुत खुश होगी। सुदेव - TREAT भइया ने भी स्कूल का मुंह नहीं देखा या तो सुवल कहां से देखता। यह तो बड़े भाग्य की बात है कि भौजी पढ़ी-लिखी है। ऐसी नेक भौजी स्लेट पेन्सिल लेकर पढाने बैठी है तो कितनी अच्छी बात है। सुवल जिस उत्साह से दिवरी लेकर बैठा या वह उत्साह माई का वचन सुनकर हठात् नरम हो गया था। उसने कहा, "इसमें हरज क्या है, माई ?" माई बोली, "इसमें हरज तो कुछ नही वेटा! लेकिन जुग-दुनिया ठीक नहीं है।" "इसका मतलब?" "देवर-भौजाई को दुनिया हंसेगी और क्या ?" इस पर रेवती से नहीं रहा गया। वह सुबल के पास धम्म से बैठती हुई वोली, "सुन लो, ईआजी ! मैं उस खानदान की हूँ जिसके हाथ में लालझंडा देख कर सारा वावूचक थर-थर कांपता है। सुबल की मैं भौजाई भी हूँ, महतारी भी। मैं तो सोचती हूं पूरे टोले के औरत-मरद को बटोर पढाऊँ। हम लोग इसीलिए तकलीफ भोगते हैं ईआजी कि अनपढ हैं। समझी, कि नहीं ?" ? खुद सुदेव इतनी लम्बी बात का जवाब माई क्या देती वह तो बहू की लम्बी-चौड़ी बातों पर हक्का-बनका यो। "सुबला पढ़कर क्या करेगा?" "बहुत कुछ करेगा।" "बहुत कुछ में क्या-क्या ?" "भला-बुरा समझने की अक्ल इमे पाएगी।" माई फिर झुंझलाई। "अक्ल आने से क्या होता है । ताकत हमेशा बड़ो के पास होती है।" माई को रेवती आगे भी जवाब देती, परन्तु घर में खांसते हुए ससुर के पास सरक गई। सुबल को दुखी चमार को पलानी में रात भर नीद नही आई थी। भौजी ने जो भी अक्षर समझाए और लिखवाए ये सुवल अमृण वानी को तरह अपने मानस मे घोल गया था।"भौजी वडीप्यारी है । जितनी देर है भौजी, उतनी ही समझदार भी है। इस टोले पर तो इतनी समझदार नहीं होगी। रतनपुर में शिवजी मालिक या दो-चार दूसरे. दूसरे लोगों के यहाँ भौजी से थोड़ा ही ज्यादे समझदार औरतें होंगी । सुदेव भइया का करम बड़ा ठीक था कि इतनी बढ़िया मेहरारू मिल गई है। सुबल दिनभर शिवजी मालिक के खेत में बैल की तरह खटता है और रात में भौजी के व्यान दिलाने के पहले ही दिवरी लेकर बैठ जाता "भइया बड़े भाग्य वाले हैं, भौजी!" सुबल अचानक स्लेट पर पेन्सिल रोकते हुए कहता है। "क्या मतलव सुबल ?" "मतलब यह कि तुम्हारी ही तरह कोई तुम्हारी वहन होती तो मैं बेझिझक उसके साथ व्याह कर लेता।" रेवती बच्चों की तरह किलकारियाँ भरकर हँसने लगती है। "अव तो कोई बहन खाली नहीं है, सुवल मइया । मुझसे कर लो।" "भइया नाराज नहीं होगा ?" हठात् रेवती का चेहरा उतर जाता है। जैसे एक मिनट पहले कोई भी निरच्छल हंसी नही हँसी हो । सुवल ने दवे हुए घाव को फिर से उकसा दिया है। मस्तिष्क में कई तरह के विचार घुड़दौड़ करने लगे हैं। सुवल इस तरह झेंप गया है जैसे उसके मुंह से कोई अनुचित वात निकल गई हो। थोड़ी देर तक दोनों अलग-अलग सोचते रहे हैं। "मुझसे कोई गलती हो गई न, भौजी?" सुवल अचानक पूछता है । "नहीं तो!..." "तब तुम अचानक उदास क्यों हो गई हो?" "कैसे मालूम !" "तुमहठात् चुप हो गई हो भीजी! "माई-बाबू ख्याल आ रहे हैं न?" "क्या बताऊँ सुबल भइया कि अभी-अभी कौन-कौन याद आ रहे हैं।" सुबल स्लेट-पेन्सिल और अक्षर-बोध की किताव समटने लगता है। और ढिवरी उठाकर चौरा के ऊपर रखने की कोशिश करता है। "पढ़ने का मन नहीं कर रहा है क्या, सुबल भइया?" रेवती चौंककर पूछती है। "तुम्हारी तवियत ठीक नहीं लगती, भीजी।" ३०/उत्तरगाथा "तुम्हें कैसे मालूम रे पागल ? मैं तो बिलकुल ठीक हूं।" "माई को भी पसन्द नहीं। उसे भी खराब-खराव स्याल आते रहते हैं । ऐसी पढ़ाई से क्या फायदा है ?" "सुबल !" रेवती उसके हाथ से ढिवरी छीन लेती है।" मैं तेरी मास्टरनी हूं रे। इतने दिनों की मिहनत तुम छोटी-सी बात के लिए खा जाना चाहते हो? मैं औरत होकर सब कुछ बर्दाश्त कर रही हूँ। तुम तो मरद-बच्चा हो !" सुबल को लगता है कि भौजी के सामने वह सौ मुट्ठी का एक मुट्ठी हो गया है बोला, "मुझे लगता है भौजी कि तुम्ही मेरी सही माता हो। आज से मैं तुम्हारी हर बात मानूगा।" "किसी की हर बात मानना भी बहुत अच्छी वात नहीं है, सुबल !" सुबल अांखें फाड़कर उसे ताकने लगता है। "तुम तो गजब आदमी हो, भौजी । जब तक तुम्हारे वरावर पढ़ नही लेता तव तक तुम्हारी वार्ते मुझे समझ में नहीं आ सकतीं।" रेवती खिलखिलाकर हंस पडती है । "वडा भोला है मेरा देवर।" आंगन मे चौरा के पीछे बैठी-वठी माई कुढ़ती रहती है। वह कई तरह से बातों को जोड़-जोड़कर सोचती है। कही ऊंचा-नीचा सुदेव बहू के पैर न पड़ जायं । पास-पड़ोस फुसफुसाहट कभी-कभार सुन लेती है "सुदे- उवा बहू सुदेउवा को भूलती जा रही है और सुबल से लटपटा रही है... दोनों साप-साथ कटनी में जाते हैं और साथ-साथ लौटते भी हैं । "घर में आधी रात तक पढाई के नाम पर दोनों हा-हा, हो-ही करते रहते हैं। गोदावरी की महतारी एक दिन टोक रही थी। जुग-जमाना तो खाली हल्ला ही करना जानता है न? जव चाहे किसी की इज्जत मिट्टी में मिला दे। रतनपुर तक शायद देवर-भौजाई की बातें फैली नहीं है। नहीं तो अब तक कई दर्जन शैतान माखें रेवती के पीछे पड़ जाती। शैतान आंखों के भय ने ईआ जी को एकदम कमजोर बना दिया है। ." पता नहीं बाबू को क्या हो गया है। बाबू को परदेस में दो महीने से ऊपर हो रहे है। कोई चिट्ठी-पत्री नही आयी है। कही माई की बातों मे वह दुखी तो नहीं है ? माई को अपनी बातें याद आती हैं, वरावर वह सुदेव को ताने मारती रहती थी। सुदेव बरावर गांव छोड़कर चले जाने की बात कहता रहता था। माई उसके दुखी मन पर और सेर भर नमक डाल देती थी, और कहा करती थी--'तू बरावर गांव छोड़ने को बात करता है। गाँव छोड़कर जा भी तो?.."और"एक दिन बाबू सच- मुच गाँव छोड़कर चले गए हैं। माई को अवं पछतावा होता है कि वह सुदेव को क्यों ऐसा जवाब देती थी। 'वाबू परदेस जाकर गाँव-जवार, घर- दुआर, महतारी-मेहर सब कुछ काहे भुला गए हैं। माई की आँखों से ढर-ढर लोर ढरकता है। सुवल और रेवती किताव पर आँखें गड़ाए हैं। माई को चौरा के पीछे से ऐसा लगता है जैसे रेवती और सुदेव के मुंह एक-दूसरे में सट गए हों। रात को सोते समय जब तव महसूस होता है, रेवती के पेट में कोई पिल्लू सरकं रहा है । यह कोई छोटा-मोटा नहीं, दिन-प्रति-दिन बढ़ने ही चाला है। यही तो 'उनकी' निशानी रह गयी है। कहकर तो गए थे कि जाते ही चिट्ठी दूंगा। पर कहाँ दी उन्होंने कोई चिट्ठी ! रेवती सुनती है कि परदेस में सौतिनों की कोई कमी नहीं। कौन ठीक, जाते ही कोई गले पड़ गयी होगी और चिट्ठी-पत्री डालने नहीं देती होगी। ऐसी बातें ध्यान में आते ही रेवती घबड़ाने लगती है । जी में आता है उस विदेसिया के पास पंख लगाकर उड़ जाएं। लेकिन उस करमंजरुओं का कहीं कोई ठिकाना हो तब न ? कहाँ-कहाँ उड़ती फिरेगी रेवती अकेली ? सुबल, रेवती और माई तीनों शिवजी मालिक की कटनी कर रहे थे। शिवजी मालिक बार-बार रेवंती के सामने जाकर बैठ जाता । परन्तु रेवती को यह सब अच्छा नहीं लगता । लम्बा घूघट निकाल लेती और उस ओर से अपना चेहरा घूमा लेने की कोशिश करती। "तुम्हारे विदेसिया वेटो की कोई चिट्ठी-पत्री आयी कि नहीं ?" शिवजी मालिक हठात् पूछता है। "क्या कहूं ए मालिक !" माई अचानक वेदना में खो जाती है । "कुछ पता नहीं चलता, बांबू वहाँ कैसे हैं ! कोई पता-ठिकाना भी तो नहीं मालूम । नहीं तो सुबल को भेजती। कहीं जाते ही वावू वीमार..." शिवजी हंसता हैं। "मेरी बात मान सुवला की महतारी तो सुदेउवा ३२/उत्तरंगाथा । - बहू की कहीं जगह करा दे।" "क्या मतलब?" माई चौंकती है। "अभी नई, जवान मेहरारू है यह सुदेउवा बहू । कही इसके पैर ऊँच- नीच न पड़ जायें। आखिर तुम भी गरीव हो तो इज्जत-पानी है कि नहीं ?" रेवती झोंक से खड़ी हो जाती है। उसके माथे का घूघट सरककर विसर जाता है मोर वह हंसुआ तानती हुई पूछती है, "आप लोगो का भी मालिक जब किसी जवान मेहरारू का सेवाग कहीं दो-चार महीने के लिए चला जाता है तब उस अभागिन को किसी दूसरे मरद के माथे मढ़ देते हैं क्या?" रेवती से शिवजी मालिक को कौन कहे, माई को भी ऐसे जवाब की आशा नहीं थी। शिवजी तो तत्क्षण एकदम लजा गया था। परन्तु रेवती के इस जवाब से एकदम तिलमिला भी गया था। जवार-प्यार में आज तक किसी ने शिवजी मालिक के सामने जवान हिलाने की कोशिश नहीं को है । आज एक वेगार खानदान की औरत मालिक को 'बद्जबान' बोल रही है ! माई कांपती हुई रेवती का हंसुआ पकड़ लेती है, कौन टीक पगली बहू बाबू के ध्यान में मालिक पर हसुआ न चला दे। परन्तु सुवल खाली हक्का-बक्का भौजी का मुंह ताक रहा है। 'सुनती है न, सुबला की महतारी ! तुम्हारी सुदेउवा बहू कैसी छिनाल की तरह बतिया रही है ? यही मगर सेत मे पटक दूं तो... “यह हाय में हेसुआ है, मालिक।" रेवती हमुआ फिर कार को और वान लेती है । "मैं ऐसे खानदान की बेटी हूँ जो जुलुम के समय इसी तरह हाथ में हमुभा उठा लेता है । हिम्मत हो तो प्राओ पकड़ लो न गट्टा ?" रेवती उस खेत पर एक पल के लिए टिकी नहीं। हमुप्रा भांजती हुई घर लौट आयी। मगर ईआ जी नाराज थी। बहू की ऐसी ढिठाई पर उन्हें गुस्सा था। बहू के चलते तो मुंह का निवाला छिन जाने वाला है। सांग पता नही कहाँ चला गया तव इतना ऐंठ रही है। ऐसी जवानी में परमाता आग लगा दे? शिवजी मालिक खेत में पटक ही देते तो क्या कर सुदेवा बहू ? जवार-पचार में जग-हंसाई होती और पेट का बन्ना नुक- - सान होता सो अलग। यह तो कहो कि शिवजी मालिक का बड़प्पन रहा कि वे वहाँ परहेज गए । अव न तूफान मचा देंगे कि रेवती तिनके की तरह 'बचना भी मुश्किल हो जाएगा! ईआ जी सुनती हैं, मालिक लोग देवता नहीं तो पत्थर होते हैं । अपने शिवजी मालिक तो दोनों हैं। अगर घर में ही अचानक रात में आ जायें और कहने लगें कि सुदेउवा बहू से आज रात भर बदला लेंगे तो ईला जो को हिम्मत है किसी की वात को वतंगा बनाने का? वहीं भोगने के बाद गर्दन नहीं उतार देंगे सुदेउवा बहू की? अभी कुछ बदला थोड़े है। हल्ला मचाने से क्या होगा। अपनी ही इज्जत माटी में मिलेगी। ईला जी याद करती हैं, वे व्याह में ही सत्तुराल आ गयी थीं । अभी आए दो ही दिन गुजरे थे कि शिवजी मालिक का बाप रात में घर के अन्दर चला आया था। पहले तो उन्हें लगा कि सुदेव के बाबू हैं, लेकिन ढिवरी के अंजोर में सफेद धप-पप किसी गोरे-चिट्ट यादमी को देखा तो खटिया से उठ गयी। उसके बाप ने लपककर उसका हाथ पकड़ लिया था और कहा था, "घवड़ा नहीं। तुम्हारा मरद आज की रात नहीं आएगा। उसे मालूम है कि प्रसाद का भोग पहले देवता लगाते हैं।".."और फिर एकदम भोर में घर से उठकर गया था। जव तक वह पापी जिन्दा रहा, कई वार रात में आता-जाता रहता था। सुदेउवा का बाप जानते हुए भी कुछ नहीं बोल पाता था। सुदेव बहू को यह सब क्या मालूम । उसे तो यही लगता है कि जमाना बदल गया है । अब ये लोग डर गए हैं । "अरे ! .."डरते होंगे इसके नैहर में ? यहाँ तो अभी तक उन्हीं का राज है। कभी-कभार वोट मांगने के लिए लोग आते हैं तो सुराज के बारे में बतियाते रहते हैं। कभी तो कोई यह भी आकर कह जाता है कि अपना राज है। अपने राज का मतलव "ना, लक्षण ईआ जी को आज तक कुछ भी मालूम नहीं है। शिवजी मालिक भी उस घटना के बाद खेत पर टिका नहीं था। ईमा जी को विश्वास हुआ था कि सुदेउवा बहू का पीछा करते हुए वह घर पर ही गए होंगे । इसीलिए सुवल को खेत पर ही समझाकर घरमा गयी थीं। घर पर लाकर एक वात के लिए संतोप था कि शिवजी मालिक का यहाँ ऑगछ नहीं है। परन्तु बहू पर गुस्सा भी कम नहीं था। उसने पुलाल की ३४ उत्तरगाथा दर में आग लगा दी थी, जिसमें अपना तो अपना-इस रतनपुर के समूचे टोले का स्वाहा हो जाने का खतरा भी था। आंगन मे पांव रखा तो देखा, रेवती राख में रगड़-रगड़कर महली से चिउटा छुडा रही है। ईशाजी गुस्मे में ही बोलती हैं, "मछली कहाँ से रे, सुदेउवा बहू ?" "कटनी से लौट रही थी तो पोखरे मे टोले के कुछ लड़के मछली मार रहे थे। उन्ही के पास बैठ गयी थी तो उन्होंने थोडी मछली दे दी है।" रेवती उसी तरह मछलियां रगड़ती जा रही है। "वह भी शिवजी मालिक का ही पोखरा है। समझती है कुछ ?" "तब क्या मैं वहां लड़को को ललकार कर ले गयी थी?" "नहीं ले गयी थी, लेकिन लोग दुनिया तो यही कहे न, कि सुदेउवा बहू शिवजी मालिक के पोखरे से लड़कों को बटोरकर मछली भरवा रही थी। शिवजी मालिक के कान खड़े होगे। एक बार इसी तरहतुम्हारे ससुर ने एक मछली पकड़ ली थी। बस, इमी के लिए शिवजी मालिक के बाप इसी दुपार पर, इसी मांगन में घुमकर तुम्हारे ससुर को जूते से तडतड़ाने लगे थे "और टोला-पड़ोस के लोग इसी तरह मुंह ताकते रह गए थे?" ईआजी ने जैसे रेवती की इस बात को सुना नहीं हो। वह अपने मन की कहती जा रही हैं, "आज की घटना के बाद तो पता नहीं क्या होने वाला है।" कसी घटना, ईआ जी?" "तुमने शिवजी मालिक को गाली नहीं दी क्या ?" "गाली नही ईआ जी, हमारी इज्जत पर जो उन्होंने हमला किया था उसी का जवाब दिया पा।" "बर्दाश्त करना उसके जार को, कनेआ! कही घर में घुम आया तो मेरी हिम्मत नहीं कि तुम्हें बचाऊँगी।" ईआजी कितनी मरी हुई हैं । इच्छा होती है मछली का पानी उठाकर इनके चेहरे पर फेंक दे। समय बदलने का इन्हें तनिक भी शान नहीं है क्या ? रतनपुर का यह टोला हो क्या-सारा जवार ही नहीं बदला है। .
अव तक रेवती का इलाका हाता ता देवका चाचा सार लागा का खाला चुके होते। यहाँ ईया जी कैसी हैं कि उल्टे रेवती को ही डाँट रही हैं। "धवड़ामो मत ईप्रा जी। जिस क्षण वह पापी इस आँगन में पाँव रखेगा उसी क्षण या तो उसके पाँव काट लूंगी या फिर पोखरे में जाकर डूब मरूंगी।" ईआ जी को रेवती के इस उत्तर को सुनते ही धक् से लगता है। इसी शिवजी मालिक का वाप भी तो बहुत साल पहले इसी आँगन से होकर घर में आया था। कहीं कनेआ को सव कुछ मालूम तो नहीं? वह भी चाहती तो क्या उसके पाँव नहीं काट सकती थी ! ""परन्तु कनेा का कहना सही है कि जमाना बदला हुआ है। जमाना बदला हुआ नहीं रहता तो शिवजी मालिक गोने के दूसरे ही दिन कनेआ के घर में नहीं घुस आता? यह बनावटी वात नहीं है, अगर वह घर में घुसता तो कनेआ उसके पाँव जरूर काट लेती। फिर तो जवार-पथार में एक नया काम हो जाता ! ईमा जी ने देर तक कनेआ को मुंह लगाना उचित नहीं समझा । वे तो बराबर उसके सामने मात खा जाती हैं। वह ऐसे-ऐसे जवाब लाकर पटकती है कि सुनकर डर तो लगता ही है, अचरज भी होता है। ईया जी मन को बदलने के लिए गोदावरी के घर की ओर चली गयी रोज की तरह रात में खाने-पीने के बाद ओसारे में रेवती और सुबल ढिवरी के नीचे बैठे हुए हैं । ईआ जी चौरा के पीछे बैठी-बैठी झपकियाँ ले रही हैं। "माज तो तुमने वहुत हिम्मत से जवाब दिया, भौजी!" सुवल स्लेट पर कुछ लिखते हुए कहता है। "तुम्हें खराव लगा का क्या सुबला भइया ?" "नहीं भौजी। मैंने तो पहली बार ऐसी हिम्मत तुम्हीं में देखी थी। साला कुछ वोलता न, तो मैं क्या चूड़िया पहनकर बैठा रहता? मारकर आरी पर ही गिरा देता।" "सचमुच, भइया !" "सचमुच नहीं तो क्या झूठ भौजी ? तुम्हारी तरह हर घर की भौजी ३६/उत्तरगाथा इसी तरह की हो जाए तो किसे अन्याय करने की हिम्मत पड़ेगी? हम अन्याय, जलुम में मिल-जुलकर आग नहीं लगा देंगे?" रेवती दुगने उत्साह से भर जाती है। ईआ जी ने शाम को मन को कसा कमजोर बना दिया था। रेवती सोचती है. 'वो' इसकी रक्षा के लिए नहीं हैं । परन्तु देवर तो उन्ही की तरह रक्षा के लिए तंपार है। रेवती का तो उन्ही का भाई सहारा है। रेवती मव अकेली नहीं है.. हिम्मत देने वाला साय में दूसरा देवर भी है। ई जी की नीद अचानक अचकचाकर टूटती है। "क्यों रे बनेआ, यह तुम लोगों की घुसुर-फुमुर क्व तक चलती रहेगी ?" ईआ जी की बात रेवती को बाण की तरह लगती है, "ऐसी बेस्वाद बात काहे बोलती हैं, ईआजी ?" "तुम दोनों का चाल-ढाल मुझे बिल्कुल पसन्द नहीं है।" "क्या बकती हैं, ईआ जी। जब आप ही अपने मुंह से ऐसी बात कहेंगी तो दूसरे-दूसरे तो मजाक उड़ाएंगे ही।" "पढाई के बहाने तुमलोग अनाप-शनाप करो तो दुनिया हंसेगी नहीं?" "चुप रहो, ईआ जो ?" रेवती अन्धेरे में आसं तरेर लेती है। परन्तु ईआजी चौरा के पीछे से ही अन्धेरे में रेवती के गुस्सैल चेहरे की कल्पना कर लेती हैं और पैर पटकती हुई सोने के लिए घर में चली जाती हैं । ""परन्तु रेवती अकेली नहीं है, बुराइयों, कुविचागे और जुल्मों में लड़ने के लिए सापी देवर भी मिल गया है।"और और पेट में भी तो एक तीसरा आदमी पल रहा है। वह तो यह सब बर्दाश्त और नहीं करेगा। यह तीसरा आदमी "एकदम नया आदनी! रेवती जोर-जोर से अक्षर बोलती जा रही है और मुबल पीछे से दुहुराता जा रहा है... गोदावरी की माई जब चौरा के पीछे ईशा जी के कान में कुछ फुसुर- फर करने लगी तब भी वेचारी रेवती को कुछ भी शक नहीं हुआ था। वे दोनों आज भी उसी ढिवरी के नीचे बैठकर राहुल वावा की किताब 'तुम्हारी क्षय' वाँच रहे थे। वे दोनों महिलाएं भी तो निर्दोष ही हैं, जिन्हें लगता है कि औरत-मर्द एक साथ बराबर रहें तो आग लगना स्वाभाविक "मैंने तो यहाँ तक सुना है," गोदावरी की माई कहती हैं, "कि सुदे- उवा बहू का पेट भी किसी दूसरे का है। नहीं तो सुदेव गौना के बाद गाँव पर रहा ही कितना दिन ? उँगली पर गिनकर छः-सात दिन । वह भी घर में कब-कव गया है ? सब कुछ पर विचार करना, सुबलवा के मतारी? क्या भरोसा, पेट किसका है ! कोई तो कहता है, सुबलवा का है, काई कहता है शिवजी मालिक..." ईआ जी बात काटती हुई चीखती हैं, "क्या रे गोदावरी की महतारी, तुम्हें मेरा ही घर डंसना है ? मेरी कनेमा पर ऐसा लांछन ? तू मेरी वहन दाखिल है रे ! . 'तेरे मुंह से ऐसी बात "मुझे तो विश्वास ही नहीं होता है। मेरी कनेआ शेरनी हो सकती है, कुतिया कभी नहीं हो सकती।" कुतिया होती तो अभी घर से निकाल देती, ए गोदा की माई.. घर से निकाल देती...।" ईआजी की सिसकियाँ तेज उठती जा रही हैं। अचानक देवर-भौजाई का ध्यान किताब से टूटता है । 'क्या हुअा है ईआ जी ?' रेवती आंगन में दौड़ती है। "मुझे कुछ मालूम नहीं है, कनेआ !" ईआ जी जब रोने लगती हैं तब गोदावरी की माई उठकर चली जाती है। "वावू आज होते तो यह सब सुनने को नहीं न मिलता, कनेआ ! सच्चाई कुछ और है, दुनियादारी कुछ और होती है। दुनिया के साय-साथ अब मुझे भी साथ देना पड़ेगा, ए कनेआ चल, हम वाबू के पास अभी चलते हैं। रात-भर चलकर टीशन पहुंच जाएंगे। कोई न कोई गाड़ी हमें वावू के पास तो पहुँचा ही देगी।" रेवती को कुछ समझ में नहीं आ रहा है । ईआ जी को अचानक जव तब क्या हो जाता है ? .."अनाप-शनाप वकने लगती हैं। वह समझने की कोशिश करती है, "घर में चलकर सो जा, ईआ जी! मैं भी चलती हूं।" "तू आँगन से अन्दर जा । तुम्हारा रात में बाहर निकलना ठीक नहीं ३८/ उत्तरगाथा
है। पेट में बाबू की निशानी है । उस निशानी को कुछ हो गया तो हम कही
के न रहेंगे।"रात में तरह-तरह के विड़िया-चुरुंग उड़ते रहते है, तुम्हें
डंस लेंगे...."
"यह सब ढोंग है। तुम अन्दर चलो ना?" रेवती हाथ पकड़ कर
खीचती है।
"तू तो हर बात में इसी तरह वकती रहती है। मुझे यह मय अच्छा
नहीं लगता।"
"तब क्या बात है, ईआ जी ! साफ-साफ बताती क्यो नही ?"
ईआ जो झुंझलाती हैं । "साफ-साफ क्या कहूँ ? तुम्हे भी तो अकल है
न, कनेमा ! दुनियादारी से लड़ने की मुझने ताकत नहीं है रे ! अभी
गोदावरी की महतारी बड़ी सराब-खराब बात कह रही थी...'
"क्या कह रही थी, ईया जी!
"यही कि तुम्हारे बारे में गांव मे हल्ला है कि..."
रेवती क्रोध में बात काटती है, "कि मेरे पेट में बच्चा उनका नहीं है,
पहीन।"
"हाँ, कनेमा!"
"तब, जिसका है वह सामने क्यों नहीं आता है ? मैं जिन्दगी भर के
लिए उसका हाथ पकड़ लेती।"
ईआ जी जैसे उसकी बातें सुन नही रही हैं। "चलती काहे नही
कनेमा वाबू के पास ?"
"हम कहाँ अन्दाज पर चलेंगे, ईआ जी?"
"कही भी चलेंगे । नहीं तो उपर ही डूब मरेंगे!
!"
"इसका मतलब क्या हुआ, ईआ जी ?"
"मैं अपने सोना जैसी बहू पर लांछन बर्दाश्त नहीं कर सकती।"
"क्या चारको मुझ पर संदेह है, ईशा जी!"
"ना, ना कनेआ, ना ! तू तो हर गरीब आदमी की तरह सच्ची और
पवित्र है। लेकिन सुबल को लगाकर लोग कहते हैं तो मन धवडाता है।"
"सुबल मेरा देवर है, छोटे भाई जैसा। लेकिन लोग तो शिवजी
मालिक का भी तो नाम लेकर मुझे गालियां देते हैं। ऐमी दशा में हमें
! - गाँव छोड़कर जाना ठीक है क्या ? मेरे विचार का देवर है, और मेरे ही विचार की उनकी निशानी। हम यहाँ अकेले कैसे हैं ईआ जी?" "तुम्हारी भी बातों से मेरे भीतर कम घबराहट नहीं होती, कनेआ!' ईमा जी को अचानक एक उपाय सूझता है। "तू मेरी सलाह मान तो कुछ दिनों के लिए नहर चली जा।" "इस हालत में नहर में मेरा मन विल्कुल नहीं लगेगा, ईआ जी!" "माई याद नहीं आती क्या?" "किसके माई-बावू याद नहीं आते, ईआ जी।" "तब मेरी सलाह मान तो कुछ दिनों के लिए चली जा, कनेआ।" दूसरे दिन सुबह ही सुवल भौजी को नहर पहुंचा आया। रेवती का गाँव छोड़ने का मतलब था अफवाहों का और भी पुरजोर और तीखा हो जाना। "परमा वहू ने अपनी पतोहू को नहर इसीलिए पहुंचा दिया है कि बात सही है। 'देख लेना, उधर ही पेट गिराकर आएगी। और नहीं तो माई-बापू जरूर दूसरा घर कर देंगे। इससे तो यही अच्छा था कि परमा बहू सुवलवा से ही करा देती।''घर की लाज घर में ही रह जाती।" चारों तरफ से रास्ता चलना मुश्किल था। ईआ जी को गली, डगर, खलिहान भी अजीव आँखें बनाकर घूरने लगे थे। धान की रोपनी में शिवजी मालिक अलग ताना देते रहते थे। उसने तो यह भी कह दिया था, उसे मुभ पर ही छोड़ देती, परमा बहू। महीना-दो-महीना में आप ही ठंडी हैं जाती। घर से निकालने की जरूरत ही नहीं थी। घर की इज्जत घर में है रह जाती।''ईआजी कटकर रह गयी थीं। कर ही क्या सकती थीं? उन् ही अपनी जवानी याद नहीं है क्या ? लेकिन सुनती हैं, अव तो जवाहि लाल का राज है। जवाहिर लाल के राज में भी वैसी ही हालत है क्या हालत नहीं होती तो शिवजी मालिक को इतना कहने की हिम्मत के होती? "मैं तो कहता हूं, सुबला को आज फिर उसके नहर भेज दे।" शिव मालिक फिर कोंचता है। "किसलिए, मालिक ?" ४०/उत्तरगाया "इज्जत की रक्षा खातिर।" "कसे होगी, मालिक?" शिवजी उमके वहुत नजदीक जाकर कहता है, "इधर-उधर मारा- मारा फिरने से अच्छा है वह हमारे-तुम्हारे पास ही रह जाती। हम लोगों की बात तो घर में दब ही जाएगी। मेरे सामने जवाहिर लाल का राज होने पर भी किस साले की हिम्मत है ?" ईआ जी काठ जैसी आंगन में चौरा के पीछे बैठी हैं। आंगन मे ही नहीं, मोसारे में भी धुपाघुप्प अंधेरा है। परसो तक यही कनेआ सुबल को पढाने बैठनी थी। आज घर-द्वार कैसा मूना लगता है। कने ठीक हो तो कहती थी, ऐसी दशा में उसका गांव छोड़कर जाना ठीक नहीं है। परन्तु इन्ही की मति में पता नहीं क्या समा गया कि कनेा को जबरन नहर पठा दिया । अव तो ईमा जी को ही अकेलापन काट रहा है। सुबल अवोध है । यह बूढा भी एक जिन्दा लाश है। पता नही कव उठ जाए। टोला-पड़ोस के व्यंग्य-ताने से अलग परेशानी है। कुछ समझ में नहीं आता रे राम ! एक गरीब आदमी को ऐसी दशा में क्या करना चाहिए? आकाश में बादल शोरगुल मचा रहे हैं । एक-दो-बूंद टपक भी जाते हैं। ईआ जी चिन्ता की गहराई में ऐसे लापता हो गयी हैं कि प्राकृतिक दुनिया से बिलकुल अबोध हैं। ठीक आधी रात को रिमझिम बरखा शुरू हो गयी है। उसी समय बाबूचक के हिरामन दादा की बैलगाड़ी रतनपुर के सीवान पर पहुंचती है। रेवती हिरामन दादा के हाथों से बैलों का रास पकड़कर खीच लेती है और कहती है, "वस यही रोक दो, हीरामन दादा! गांव का यही सीवान है। मैं यहां से चली जाऊंगी।" "डरेगी नहीं बेटी तू ?' "कसी बात करते हो, दादा!" वह स्वयं ही बैलगाड़ी से उतरने लगती है । "बेटी भी तो तुम्ही लोगों की हूँ।" रेवती बारिश में बुरी तरह भीग गयी है। वदन मे कपड़े सट गए हैं। वह रतनपुर से टोले की ओर डगर पर उतर गयी है। हीरामन दादा अभी तक बैलगाड़ी रोके खड़े हैं। उन्ही का साहस मंजोकर रेवती तेजी से घर की ओर आ रही है। हठात् दुआर पर कनेआ की आवाज सुनकर ईआ जी चौंकती हैं। कहीं वे सपनों में तो कनेआ को नहीं सुन रही हैं ? लेकिन नींद खुलने के बाद भो कनेआ की लगातार बोली सुनायी पड़ रही है। आंगन में घुटने भर पानी लगा हुआ है। छप-छप पानी चीरती हुई ईआजी दरवाजा खोलती हैं। वह अकवकायी हुई हैं । "हाय कनेमा, आधे रास्ते से लौट आयी क्या ? ऐसी खतरनाक रात। इस झमाझम बरखा में तुम्हें डर नहीं लगा? घर में कुशल-क्षेम तो हैं ?" कनेआ कुछ बोलती नहीं, घर में सरकती जा रही है। ईआ जी साड़ी उठाकर देती हैं और फिर पूछती है, बोल ना, "कनेआ कुछ ! गूंगी, तो ऐसी नहीं थी तू । रो काहे रही है ? तनिक बोल रे, मेरी समधिन ठीक तो हैं ?" तनिक सिसकियाँ सहारे के कारण तेज हो जाती हैं, "माई एकदम कुशल से हैं, ईआ जी ! खाली मोती परसों एक घंटे की बीमारी में मर गया। चार कोस तक कोई डाक्टर नहीं था। मेरे गाँव का प्राण चला गया। उसके बिना मैं अपने गांव नहीं रह सकती थी।" "यह मोतिया कौन है, कनेआ ? गोतिया-सगां था ?" ईआ जी अचम्भे में डूबी हुई हैं। "रिश्ते में तो कुछ भी नहीं था। लेकिन वचपन से ही हमें एक ही साथ पढ़े-खेले थे। गांव में ही एक-दूसरे से व्याह करने का रिवाज होता तो मैं आपकी बहू बनकर कहाँ से आती? 'वो' जव तक परदेस नहीं गए थे तब तक बराबर उनकी शक्ल में मोती मेरे सामने खड़ा रहता था।' "जो होनी थी वह हो गयी। चुपचाप सो जा।" ईग्रा जी ढिबरी जलाकर छोड़ देती हैं। सुबह होते ही यह बात फैल गयी कि परमा को पतोहू नैहर से भी भाग आयी है। सारे टोले में अजीव हंगामा था। शिवजी मालिक ने तो वात को और भी बतंगड़ बना दिया था। वह तो लालची कुत्ते की तरह दरवाजे का चक्कर लगाने लगा था। इससे लोगों का संदेह और भी पक्का हो गया था। एक दिन रेवती विना झिझक शिवजी मालिक को टोकती है, "मेरे ४२/उत्तरगाथा दुआर पर तुम मत पाया करो, मालिक।" "काहे रे, सुदेववा बहू ?" वह संतान की तरह हंसता है। "आप तो हम गरीबों के दरवाजे पर अपने वाप-दादों के जमाने से हो कभी नहीं आए हैं । अब खुलेयाम सुबह-शाम आ जाते हैं, वेमतलव । इससे मेरी बहुत बदनामी होती है।" कनेआ के साहस पर तो ईआजी के प्रचम्भे का ठिकाना नहीं है। "मेरे आने-जाने रो तुम्हारे दुआर को बदनामी नही, शोभा बढ़ती है। समझी न? जवाहिर लाल ही तो जात-पांत मिटाने की बात करते हैं । इमी से तुम लोगों का माया भी सनक गया है।" रेवती बोलती है "कहिए तो आपके माथे के लिए भी राहुल बाबा की एक किताब दूं तुम्हारे घमं की क्षय ! जात-पात और जिम धर्म को आप छाती और माया से लगाए हुए हैं उसको राहुल बाबा ने नकली बताया है।" शिवजी मालिक चौंकता है, यह साली छिनाल ही नहीं, लोडर भी है। इस इलाके में भी यह रोग तो नहीं फैल रहा है ! रह जा, तुम्हारी सब दोखी एक दिन में मिटाते हैं। ईआ जी और ससुर के दवाव के बावजूद रेवती ने शिवजी मालिक के खेत पर जाना छोड दिया है। रतनपुर काफी 'धनहर गांव है। बीघे में तीन मन धान काट लेना बड़ी मासान बात है । नहर में समय पर पानी आ जाता है। यही कारण है कि यहाँ गेंहू की अच्छी फसल हो जाती है। रतनपुर मे प्रायः सभी प्रमुख जातियों के लोग हैं। परन्तु शिवजी मालिक और उसकी तरह के लोगों का ही अधिक बोलबाला है। रेवती जहां व्याही गयी है वह रतनपुर का ही एक टोला है, जहां एकाध घर लोहार, बढ़ई और यादव को छोड़कर वाको सभी हरिजन हैं। ये सभी रतनपुरके मजदूर हैं और रोटी से लेकर इज्जत- आवरू तक सब कुछ के लिए रतनपुर पर ही आश्रित हैं । शिवजी मालिक तो दो बार एक मामूली औरत से अपमानित हो चुका है। यह रतनपुर के लिए अविश्वसनीय घटना है। उसने टोले के दो-चार लोगों के कानों-कान उसने यह घोषणा भी कर दी है कि परमा की पतोहू का किसी पराए मरद का पेट है। उसे गाँव से निकाल-बाहर करना ही होगा। किसके पास कलेजा है, शिवजी मालिक की बात को काट दे? न चाहते हुए भी उसकी हर वात तो माननी है। सुदेउवा बहू ने तो गाँव में अजूवा वाकया कर दिया है। उसके पेट में सुदेउवा का वच्चा नहीं तो यह किस मरद का मरद के आम औरतों की तरह सुदेव बहू कमजोर नहीं है। जब भी कहीं कानाफूसी सुनती है, चिंघाड़कर कहती है, यह वच्चा सिर्फ मेरा है मेरे मरद का! जो परदेस गए हैं। 'वो' अगर होते तो हंसनेवालों की जीभ खींच लेते। मैं इसी गाँव में रहूंगी। किसकी महतारी साँड़ है जो मुझे मेरे दुआर से निकाल दे। मेरी तो लाश ही यहां से जायेगी। इस भारी हंगामे के बीच एक छोटी-सी घटना हुई और बहुत जल्दी गुजर भी गई। सुदेव का वाप-परमा एक रात को मरा हुआ पड़ा था। माई और रेवती सिरहाने वैठकर छाती पीट रही थीं। परन्तु सुबल रोते भी एक बहुत बड़ी मुक्ति का एहसास भी कर रहा था। फिर भी कफन से लेकर श्राद्ध-कर्म तकज्यादा परेशानी नहीं हुई। शिवजी मालिक ने सारा गुस्सा पीकर इस विपत्ति में उन्हें संभाल लिया था। कफन-मिट्टी के दिन भी उसने पचास रुपये दिए थे। ईमाजी भी कनेमा के साथ शिवजी मालिक के आतंक को भूल गयी थीं। खाली वावू की कमी खटक रही थी। ऐसे धूमधाम से श्राद्ध किसी इरिजन का बहुत कम होता है। कोई ब्राह्मण दर- वाजे पर खाने के लिए तो नहीं आया था; लेकिन इन लोगों ने रतनपुर में पांच ब्राह्मणों के यहाँ दान श्राद्ध के दिन ही भेजवा दिया था। यही बहुत बड़ी खुशी थी कि उन्होंने दान को स्वीकार कर लिया था। शायद इस कारण से भी कि उस 'गरीब' की मदद में एक बहुत ऊँचा हाय भी था--- शिवजी मालिक का हाथ एक पखवारे के भीतर सब कुछ समाप्त हो गया है। लेकिन रतनपुर में शिवजी मालिक की सहायता ने रेवती के बारे में अफवाह को काफी वल- वान बना दिया है। चाहे कोई कुछ कहे, मगर बच्चा तो शिवजी मालि का ही है। नहीं तो काहे कोई इतना करेगा? अपने रक्त के लिए किसी को काहे मोह नहीं पाएगा? दो-दो बार तो सुदेउवा बहू शिवजी मालिक ४४/उत्तरगाथा ? को अपमानित कर चुकी है। परन्तु उसने जबान तक नहीं हिलाई है। इतने कड़े पानी का आदमी मुफ्त में अपना क्रोध पी जाएगा रात में बाबू को याद करते-करते ईमाजी को नीद नहीं आ रही है। तरह-तरह की बातें सोचती-विचारती जा रही हैं। कल तो पंचायत जो फैसला कर देगा उसे मानना पड़ेगा। पंच लोग क्या फैसला सुनाएंगे, इन्हें अच्छी तरह मालूम है । बाबू रहते तो कुछ वल रहता। अपने खून को मरी पंचायत में स्वीकार कर लेते। भरी सभा में अपनी 'सीता' की लाज बच जानी।"अब तो पंचायत में सीता की लाज लुटती रहेगी, दुलारी सीता को गृह त्याग करना ही पड़ेगा। "सुनती है. कनेझा एक बात?" ईआ जो झकझोर कर रेवती को जगाती हैं। "नीद नही आती क्या, ईआ जो ?" रेवती खुमारी में दूसरी करवट बदलती है। "अरे, नहीं रे ! सुनना, एक वात ? पूछती हूं बता ना?" "पूछो ना !" "तुम्हारा बच्चा सुदेउवा का ही है न?" रेवती झोंक से उठती है। "विल्कुछ उन्ही का है, ईआ जी। उफ ! पता नही उस कसाई ने आज तक कोई चिट्टी-पनी क्यों नहीं दी। यहां लोग फांसी पर लटकाने पर तुले हुए हैं। मुझे फांसी पर लटकने में कोई एतराज नहीं है, ईमा जी। झूठ, अपमान और इस जलम के कारण सारे बदन में माग लगी हुई है। कुछ भी पता-ठिकाना होता तो उस कठोर विदेसिया के पास चल देती और बांह खीचकर लाती और पहती, योल रे विदेसिया, बोल । सबके सामने ईमान से वोल कि बच्चा किसका है? लेकिन 'वो' तो कहीं नहीं दौख रहे, ईयाजो! .. यही उन्हें मैं देखू ? "अब कहां से हिम्मत लाऊँ कहाँ से ?" रेवती फफक पड़ती है। "री मत कने!.."मत रो।" ईआजी तो और भी जल्दी रोने लगती हैं । "हमारा इस गांव में कोई नही रे। सुबलवा तो अभी बच्चा है। तुम्हें लोग निकाल देंगे तो मैं कैसे जिऊंगी रे !"
"झूठ और जुलुम के सामने इतना कमजोर मत बनो, ईप्राजी। हम भी कोई ककरी की वतिया नहीं हैं। कल की पंचायत होगी तो हम सामना करेंगे। तुम्हें किसी ने खवर दी है ?" "गोदा का वावू शाम में वोल गया था।" "वही करा रहे हैं ?" "नहीं, संव करा रहे हैं। शिवजी मालिक भी।" "यह सब तो उसी पापी की चाल है ईआजी। मेरे अपमान को दुगना करने के लिए ऐसा मायाजाल फैला रहा है। लेकिन रेवती भी इतनी कमजोर चिड़िया नहीं है कि आसानी से फंस जाएगी।" "तुम अकेली ही हो कनेआ। बहेलिये बहुत हैं।" "अकेली कहाँ हूं--तुम, सुवल भइया जैसा देवर। फिर 'वो' भी तो यादों में समाए रहते है। उंगली पर गिनो तो, कितने लोग हो जाते हैं ?" ईया जी जिस वातावरण में पली हैं उससे डरना भी अस्वाभाविक नहीं है। जब तक रेवती से वतियाती रहती हैं तभी तक बल रहता है। फिर तो अंधेरा ही अंधेरा है । उस अंधेरे की कई परतें हैखूखार नीर हिंसक पशुओं से भी खतरनाक । पंचायत के दिन टोले भर अजीव तरह का आतंक है, जैसे सबके-सव अपराधी हो। हर वेटी और बहू डरी हुई है। असल पंच तो रतनपुर के अमीर बाबू लोग हैं। उन्हीं के हुक्म पर पंचनामा तैयार होता है। झगड़ा चाहे जिसका भी हो, कसूरवार भी कोई हो, परन्तु पंचायत शुरू होने के पहले ही सादे कागज पर वावू लोग सवों से दस्तखत करा लेते हैं। इसकी वजह यह है कि पूछताछ के दौरान अगर किसी तीसरे को भी अचानक कसूरवार ठहरा दिया जाय तो उसके निकल भागने की कहीं गुंजाइश नहीं हो। उस सादे कागज पर लिए अंगूठों के निशान का उससे भी जबर्दस्त इस्तेमाल है। इस्तेमाल यह है कि वनिहारी मजूरी के समय साले लोग इधर-उधर नहीं कर सकते। इस बार भी रेवती के बारे में पंचायत बैठी है, तवं उसी तरह लोगों के अंगूठे के निशान सादे कागज पर लिए जा रहे हैं। लोग आज भी कांपते हुए अपना अंगूठा आगे बढ़ा देते हैं। परन्तु एक अठारह-बीस ४६/उत्तरगाया - साल का युवक सीना तानकर खड़ा हो जाता है. "पंवों! माज सीता की अग्नि-परीक्षा है। मेरी सीता भौजी अगिन में खड़ी होकर परीक्षा देगी और पवित्र होगी तो अग्नि से वेलाग निकल आएगी। हमारे अंगूठे के निशान की क्या जरूरत है ? यह परिपाटी गलत ही नहीं, बुरी भी है। जरा सबके चेहरे को ताकिए--फैसला मेरी भौजी के बारे में होने वाला है और सारे टोले के लोग डरे हुए हैं। मैं तो अंगूठे का निशान देने के लिए तैयार नहीं हूं।" सुबत की बात सुनते ही पचायत में खलबली मची हुई है। शोर और हल्ला-गुल्ला से कुछ भी सुनाई नहीं पड़ रहा है। रतनपुर और इस टोले में यह पहली घटना है। कितने तो अभी भी सुबल को बात गुनकर भी उसके 'साहस को स्वीकार नहीं कर रहे है । मुवल अभी लडका है, सनक गया है । अनाप-शनाप बक रहा है। दो-तीन चौकियां एक सुले मैदान में सटाकर बिछी हैं । अपर शिवजी मालिक के अलावे भी रतनपुर के चार-छ. लोग पालथी लगाकर बैठे हैं । परन्तु नीचे धरती पर आसन जमायै लोगो के भीतर गजब खलबली है। ऊपर वाले तो अभी तक चुप हैं और प्रभु की दया से खाली मुस्कुरा रहे हैं। परन्तु नीचे वाले लोग दहशत के कारण सुबल के खिलाफ बुरी तरह चौरा रहे हैं। अगल-बगल की हवाएं, पेड़ सब कुछ कैसे शान्त हैं, जैसे वे भी अपमानित और लांछित होकर चुप हो गए हों। या उनके कंठ ही अवरुद्ध हों। अचानक चौकी के भी ऊपर शिवजी मालिक सड़ा होकर कहना शुरू करता है, "भाई रे ! तुम लोग फसते को अपने हाथों में लेने की कोशिश मत करो। तुम लोग हंगामा करोगे तो हम यहाँ से चल देंगे । आखिर हम कुछ यहाँ किसलिए आए हैं---तुम्हें आपस में लड़ाने या फैसला करने ?' चारों तरफ एकदम चुप्पी है । वह आगे कहता है, "बोल रे कार ? यह पंचायत किसलिए बुलाई गई है ?" कारू बिजली की तरह हाथ जोड़े ही खड़ा हो जाता है। "पंच सरकार ! इस टोले में बहू-बेटी को इज्जत बचाकर चलना मुश्किल है। गांव में इसी तरह की घटना होती रही तो हमारी बहू-बेटी पर भी इसका अपर पड़ेगा." "असल बात बोलो, कार?" चौकी के ऊपर वाला ही कोई उसे टोकता है। "तो साफ-साफ बता देता हूं, मालिक !" कारू के हाथ उनी तरह जुड़े हुए हैं। "परमा काका की पतोह और सुदेव बहू का चाल-चलन इस गांव में ठीक नहीं है । गाना में बाई उसके पहले से ही उसे दूसरी देह है। इसके बदचलन होने के दो नमूने और हैं। खेत पर शिवजी मालिक से गजब-गजब बात कर रही थी। वह तो शिवजी मालिक वहां से भागे तभी इनकी इज्जत भी बबी। एक बार और अपने दुपार पर ही शिवजी मालिक को अंट-शंट बकने लगी। मैं तो कहूंगा, सुदेव बहू बदचलन ही नहीं, मुंह की खराव मेहरा है। हमारे यहाँ रही तो हमारी बेटी-बहू पर इसका असर पड़ेगा। एसी मेहराद को परमा बहू भी घर में रखने के लिए तैयार नहीं हो सकती। पाप ही लोग इसके बारे में 'नाव' कीजिए।" कारपंचों की बाजा से फिर बैठ जाता है। इधर-घर से कार के समर्थन में भी आवाज उठ रही है। तत्र निवजी मालिक आदेश देता है, "पंचों की राय में यहीं नुदेउवा बहू को बुलाया जाय। ननी शिवजी मालिक के समर्थन में जोनों से चीखते हैं। सुबल फिर विना प्रादेश-राय के कुछ कहने के लिए खड़ा हो जाता है, "मेरी मौजी उतनी ही पवित्र है, जितनी रामायण में नीता हैं।" उसका बच्चा किसी दूसरे का नहीं, मेरे भइया का है।" "तुम्हारे भाई के सिवा किसी की भी गवाही पर विश्वास नहीं किया जा सकता।" एक पंच उने वमकाने की कोशिश करता है। "तब मेरी नीजी यहाँ पंचायत में नहीं आएगी?" "ऐनी मेहराद को कौन रखेगा?" "मैं बूंगा पंचो! मैं-परमा चमार का बेटा सुबल राम । वह मेरी बात बनकर रहंगी और मैं इसी गाँव में रहूंगा। मैं भौजी के साथ ब्याह कर लूंगा। तब नौजी का बच्चा हमारा कहलाएगा न ?" ४६/उत्तरगाथा जब सुवल पर पटकता हुआ घर की ओर मुड़ता है तो शिवजी मालिक उसे रोकने की कोशिश करता है, "हमारा आखिरी फैसला भी सुनता जा, सुबला ? सुदेउवा वह को रखना ही है तो रख सकता है। रंडो-मुतरिया रख ले। हम क्या ? मगर हम तुम दोनों को इस टोले पर नहीं रहने देंगे?" सुबन दोनो हाथ फैलाकर चिल्लाता है। "सुन लो शिवजी मालिक ! मैं उसके साथ यहीं रहूंगा-इसी घर में। हमें घर में आग लगाकर जला देना। मगर गांव हम नहीं छोड़ने वाले हैं।" पंचायत धीरे-धीरे उखड़ने लगी है। ६ आंगन मे पांव रोपते ही मुबल को पहली नजर भौजी पर ही पड जाती है। क्या भौजी पंचायत से इतना उदास है ? तब चेहरा उतरा कैसे है ? वह लपककर पूछता है, "उदास हो भौजी ! .."तुम तो इस गांव की सीता मइया हो! सवों की हेकड़ी कहाँ चली गई? मैं तो तुम्ही से बल लेकर ही तो इतना कुछ बोल गया था। मुझसे नाराज हो, भौजी ?" "नही, सुवल भइया," रेवती चौखट पर बैठनी है, "मगर तुमने सचमुच का मुझे परीक्षा में डाल दिया। तब क्या सचमुच मैं तुम्हारी मेहरारू बन सकेंगी, सुबल ? मेरे पेट में तो उन्हीं का वच्चा है न ! उन्ही के स्नेह-दुलार का चिन्ह ! मैं तुम्हारी पली कैसे हो सकती हूँ। इस मन का बंटवारा कैसे करूंगी सुबल ! .. कैसे करूंगी !.""मुझे पाग, पानी, गोली, बन्दूक से बिल्कुल कोई डर नहीं है। लेकिन मेरा मन तुम्हें अपना पति कैसे मानेगा, सुबल !.."कैसे...!" "भौजी ! तुम तो मेरी भी सीता माई हो-मुझे रास्ता और अकल दोनों देती हो, ताकत देती हो ! लोग तो तुम्हें ही भरी पंचायत में बुलाना चाहते थे। पता नहीं, पंचायत में लोग तुम्हारे साथ कैसा सलूक करते। मैं इसे कैसे बर्दाश्त कर सकता था!..." मुबल की औखों से मोती दाने - असर पड़ेगा। "असल वात वोलो, कारू ?" चौकी के ऊपर वाला ही कोई उसे टोकता है। "तो साफ-साफ बता देता हूँ, मालिक !" कारू के हाथ उसी तरह जुड़े हुए हैं। "परमा काका की पतोहू और सुदेव वहू का चाल-चलन इस गांव में ठीक नहीं है । गौना में आई उसके पहले से ही उसे दूसरी देह है। इसके बदचलन होने के दो नमूने और हैं। खेत पर शिवजी मालिक से गजब-गजव वात कर रही थी। वह तो शिवजी मालिक वहाँ से भागे तभी इनकी इज्जत भी बची। एक बार और अपने दुपार पर ही शिवजी मालिक को अंट-शंट बकने लगी। मैं तो कहूंगा, सुदेव बहू बदचलन ही नहीं, मुंह की खराव मेहरारू है। हमारे यहाँ रही तो हमारी वेटी-बहू पर इसका असर पड़ेगा। ऐसी मेहरारू को परमा बहू भी घर में रखने के लिए तैयार नहीं हो सकती। पाप ही लोग इसके बारे में 'नेआव' कीजिए।" कारू पंचों की प्राज्ञा से फिर बैठ जाता है। इधर-उधर से कारू के समर्थन में भी आवाज उठ रही है। तब शिवजी मालिक आदेश देता है, "पंचों की राय में यहीं सुदेउवा बहू को बुलाया जाय। सभी शिवजी मालिक के समर्थन में जोरों से चीखते हैं। सुबल फिर बिना आदेश-राय के कुछ कहने के लिए खड़ा हो जाता है, "मेरी भौजी उतनी ही पवित्र है, जितनी रामायण में सीता हैं।" उसका बच्चा किसी दूसरे का नहीं, मेरे भइया का है।" "तुम्हारे भाई के सिवा किसी की भी गवाही पर विश्वास नहीं किया जा सकता।" एक पंच उसे धमकाने की कोशिश करता है। "तव मेरी भौजी यहाँ पंचायत में नहीं आएगी ?" "ऐसी मेहरारू को कौन रखेगा?" "मैं रखूगा पंचो! मैं-परमा चमार का बेटा सुबल राम । वह मेरी औरत बनकर रहेगी और मैं इसी गाँव में रहूंगा। मैं भौजी के साथ व्याह कर लूंगा। तब भौजी का बच्चा हमारा कहलाएगा न?" ४८ / उत्तरगाथा जव सुबल पर पटकता हुआ घर को ओर मुड़ता है तो शिवजी मालिक उसे रोकने की कोशिश करता है, "हमारा आखिरी फैसला भी सुनता जा, सुबला? मुदेउवा वह को रखना हो है तो रख सकता है। रंडी-पुनरिया रख ले। हमें क्या ? मगर हम तुम दोनो को इस टोले पर नहीं रहने देंगे?" सुवल दोनों हाथ फैलाकर चिल्लाता है। "सुन लो शिवजी मालिक ! मैं उसके साथ यहीं रहूंगा-~-इसी घर मे। हमें घर में आग लगाकर जला देना । मगर गांव हम नही छोड़ने वाले हैं।" पंचायत धोरे-धीरे उखड़ने लगी है। ६ आंगन में पांव रोपते ही सुबत की पहली नजर भौजी पर ही पड जाती है। क्या भौजी पंचायत से इतना उदास है ? तब चेहरा उतरा कैसे है ? यह लपककर पूछता है, "उदास हो भौजी ! "तुम तो इस गांव की सीता मइया हो ! सवों को हेकड़ी कहाँ चली गई ? मैं तो तुम्ही से बल लेकर ही तो इतना कुछ बोल गया था। मुझसे नाराज हो, भौजी ?" "नहीं, सुयल भइया," रेवती चौखट पर बैठती है, "मगर तुमने सचमुच का मुझे परीक्षा में डाल दिया। तब क्या सचमुच मैं तुम्हारी मेहरारू बन सकेंगी, सुबल ? मेरे पेट में तो उन्ही का बच्चा है न ! उन्ही के स्नेह-दुलार का चिन्ह ! मैं तुम्हारी परली कैसे हो सकती हूँ। इस मन का बंटवारा कैसे करूंगी सुबत! "कैसे करूंगी ! "मुझे माग, पानी, गोली, बन्दूक से बिल्कुल कोई डर नहीं है। लेकिन मेरा मन तुम्हें अपना पति कैसे मानेगा, सुदल ! .."कैसे...!" "भोजी! तुम तो मेरी भी सीता माई हो-मुझे रास्ता और अकल दोनो देती हो, ताकत देती हो! लोग तो तुम्हें ही भरी पंचायत में बुलाना चाहते थे। पता नही, पंचायत में लोग तुम्हारे साथ कैसा सलूक करते। मैं इसे कैसे बर्दाश्त कर सकता था! 'मुबल की आँखों से मोती दाने . से दो-तीन बूंद आँसू चू पड़ते हैं । रेवती के मन में सुबल के लिए भी कम जगह नहीं है। मन बड़ा विशाल है उसका । सुवल को मन से निकाल भी नहीं सकती! अभूतपूर्व द्वन्द्व और हाहाकार उसके भीतर है जिसे रेवती जैसी नारी ही बर्दाश्त कर सकती हैं। वह समझाती है, “कमजोरी मत लामो, सुवला विचार करो। अगर 'वो' आ गए तो मैं उन्हें तुम्हारी पत्नी के रूप में कैसे मुंह दिखाऊंगी? क्या वे अपने बच्चे को स्वीकार करेंगे? क्या वे पहचान जाएँगे कि बच्चा उन्हीं का है ? इन शैतानों के मुंह पर तमाचे के लिए यह जरूरी है कि 'वो' अपने बच्चे को पहचान लें। 'उसी दिन मेरे मुंह की लाली भी रहेगी। तभी तुम्हारी पत्नी बनकर जिन्दा भी रह सकूँगी, नहीं तो जिन्दगी भर के लिए मेरे मुँह से कालिख नहीं धुल सकेगा!" "मैं तुम्हारे साथ सो भी नहीं सकता, भौजी ! मुझे सोने का साहस भी नहीं हो सकता । 'मगर इतना तो सच जरूर है कि मैं तुम्हारे विना जिन्दा भी नहीं रह सकता। यह सब तुम्हारा ही था न, कि शैतानों की पंचायत में भी एकदम डरा नहीं! फिर तो, मैं बोल ही कहाँ रहा था। वह तो तुम्हीं मेरी मात्मा में बोल रही थी। शैतान भी इतना समझ रहे थे यह सुवल नहीं बोल रहा है, बोल रही है ! ..." बात तो तुमने ठीक ही कही है," रेवती कहती है, "इसके आगे उन शैतानों को सही जवाव हो भी क्या सकता है। मुझे तो तुम पर घमंड है सुबल, कि तुमने उन्हें करारा जवाब दिया है। मगर मेरी जो दोतरफा लड़ाई हो गई है ! "कैसी दोतरफा भौजी ?" "एक तो अपने भीतर के खिलाफ । दूसरी लड़ाई उन शैतानों के खिलाफ।" "हम एक काम क्यों नहीं करते भोगी ?" सुवल को अचानक उत्साह महसूस होता है। "कौन-सा काम, भइया ?" "हम भइया को खोजने क्यों नहीं चलते ?" "हम उन्हें कहाँ-कहाँ खोजेंगे। 'वो' हमें कहाँ मिलेंगे ! मिल जाते सुदेव बहू । ५०/उत्तरगाथा तब फिर क्या बात थी। तब तो मैं सारी दुनिया को अकेली जीत लेती।" "तुम कही दूसरी जगह नहीं जा सकती क्या ?" "वहां जाऊंगी?" "माई के घर--नहर।" रेवती का चेहरा बदलता है। "सुन ले सुबल ! मैं ऐसे हगामे के ममय अपने पति का गाँव नहीं छोड़ सकती। जो कुछ भी होगा उसे ददाश्त करूंगी। और तब तक इसी गांव मे रहूंगी जब तक 'धो' नही मा जाते सुबल ने भी गांव में ही रहने की बात पचायत में कही है । लेकिन उसे लगता है कि यहां चैन से रह पाना बड़ा मुश्किल है। भौजी उससे ब्याह कभी नहीं कर सकती। वह जिन्दगी भर भइया का इन्तजार करेगी।... मइया भी तो बडा गजव आदमी हैं । उसे घर-दुआर को कोई सुध-बुध नही है ? वादू मर गया, इस हालत में भी उसे नहीं आना था? उसकी सीता तो अभी तक अग्नि परीक्षा मे सरी उतरी है। मगर जहां हजारो ऐनी फलान आंखें और खराब विचार हों वहां सीता कब तक बचती रहेगी ? रावणो की तो कतार है यहाँ !. शाम को सुबल खाकर उठ ही रहा था कि रेवती उसे टोकती है, "कही जरूरी काम स जाना है ?" "नही, नौजी।" सुबल अंगोछे में हाथ पोंछते हुए कहता है, "जहाँ सोता है वहीं जाना है। और कहां जा सकता हूं।" "तब आज पढ़ना नहीं है ?" मुबल चोक्ता है। "यह सब व्यर्थ है, भौजी!" "क्या बकते हो?" रेवती को आक्रोश उभरता है। भरी पंचायत में मुझे अपना मेहरारू बनाने में व्यर्थ नहीं लगा था और ज्ञान-समाज के लिए पटने-लिखने की बात करती हूँ तो व्यर्य लगता है ?" 'मुझसे गलती हो गई, मौजी । मुझे माफी दे दो।" सुबल मुंह लटका । लेता है। "कसी गलती?"
"मैंने पंचायत में गलती कर दी है।" "चुप रह मूरख ?" रेवती उसे फिर डाँटती है ।" ऐसी हिम्मत पर तू मेरा पति कैसे बनेगा? इसी बल पर तू मेरे लिए रावणों से लड़ाई लेगा? काहिल..." सुवल ढिवरी उठाकर अन्दर जाता है और किताबें, स्लेट, पेन्सिल लेकर ओसारे में बैठ जाता है। वह बिना भौजी की प्रतीक्षा किए बोल कर किताव पढ़ने लगता है। आँगन में चौरा के पीछे वोरा डालकर ईआ जी उदास बैठी हैं। गोदावरी की महतारी एक बात और दोपहर में आकर कह गई थी। विरादरी वाले हुक्का-पानी बंद करने की बात कर रहे थे । इसके लड़के ने पंचों का अपमान किया है। पहले का जमाना होता तो लोग वहीं सुबलवा को पकड़ कर 'मुशक' चढ़ा देते और सुवलवा छटपटा कर रह जाता।" शिवजी मालिक चुने हुए हुए मुखिया भी तो हैं। वे चाहते तो घर पर दरखास्त मँगवा कर ही रेवती सुबल या किसी को भी एक महीने के लिए जेल भेजवा सकते हैं.."शिवजी मालिक 'मजिस्ट्रेट' भी हैं... पंच लोग रेवती के खिलाफ कागज भी तैयार कर रहे हैं । मजवून का कुछ भी पता नहीं चल रहा है। गोदावरी का वाप बोल रहा था कि सुदेउवा बहू पर हंसुआ से हमला करने का मुकदमा ठोकेंगे शिवजी मालिक ! शिवजी मालिक जिद्द पर हैं कि इस बदजात औरत को गाँव से निकालना ही होगा। ईआ जी अचानक रोने लगती हैं। "क्या हो गया, ईआ जी!" वह उठकर बैठ जाती है। "क्या नहीं हुआ रे, कनेआ ? वावू का कहीं पता नहीं है। शिवजी मालिक तुम्हें जेल भेजने की तैयारी कर रहे हैं।" "सुराजी लोग भी तो जेल जाते थे। मैंने चोरी, डकैती थोड़े की है कि मुझे लाज है। जेल में ही कुछ दिन रह जाऊँगी तो क्या हो जाएगा?" "तुम्हारे लड़के का क्या होगा? वह जेहल का लड़का कहलाएगा कि नहीं ?" "मेरा बेटा बन्दुक की गोली से भी तेज निकलेगा, ईग्रा जी। यही बेटा -- - ५२/उत्तरगाथा सा मागे चलकर हमें तुम्हें बचाएगा। सुराजियों की तरह बीर-बांकुड़ा निकलेगा। हमारा भविष्य जेहल में ही तो चमकेगा।" "सो तो ठीक है रे, कनेमा। गोदावरी के वार से शिवजी मालिक कह रहे थे कि सुदेउवा जिन्दा नही है। उसकी महतारी उसको श्राद्ध कर दे। हाय ए रामजी! बाबू हमारे कहाँ हैं।" वह फिर रोने लगती है। रेवती हड़बड़ाकर उठती है और अंधेरे में टटोलकर गडासा उठा शेती है, "मैंने उस पापो को अभी जान नही ले ली तो देवकी चाचा के खानदान की बूंद नहीं । क्या समझता है मुझं वह-औरत या हरिजन?" ईआ जी उसे लपककर पकड़नी हैं । "पांव पड़ती हूँ। बेटी रे! अभी यह सब घन्धा छोड़ दे। उसके कर्मों ने बाबू नही मरेंगे। वायू तुम्हारा बदला लेने गांव जरूर पाएंगे...!" रेवती गंडासा लिए ही फिर साट पर बैठ गयी है, जैसे उस दुश्मन के इंतजार में बैठी हो। "तू गंडाना उधर फेंककर सोतो काहे नही रे?" ईआ जी हाथ पकड़ कर सींचती हैं। "आज रात मुझे नीद नहीं आएगी।" "तब बैठी-बैठी क्या करेगी रात भर?" "सुबह तक या तो जेल जाऊँगी नहीं तो जान दे दूंगी।" ईया जी घबड़ा जाती है। क्या हो गया अचानक बनेना को ? कभी- कभी इमे क्या हो जाता है ? रहती है, रहती है सनको की तरह बतियाने लगती है। हो न हो इस पर भूत-प्रेत का ही मांगछ है। चाहे जैसे हो पिलवा मुसहर से इसे दिखलाना जरूरी है। एक जवान बेटा घर छोडकर भाग हो गया है। बहू पगलाती ही जा रही है। अभी पता नहीं मालिक लोगों की आंखें इसे कहाँ-से-कहां पहुंचाएंगी। ले-देकर एक सुबल रह जाता है। यह तो अभी एकदम बच्चा है। ईआ जी का मन नहीं मानता । अभी तक कनेमा माटी की मूरत की तरह न हिलती है, न बढती है। सोती काहे नहीं है । कही सचमुच दिया तो? वे फिर बोलती है, "जेल कैसे जाएगी, कनेआ?" "पापी को इसी गंडासे से मार डालंगी । मेरे 'वो' अमर फल वसकर परदेस गए हैं। वे मरे नहीं हैं, ईश्रा जी । उनका पापी श्राद्ध क्या कराएगा, मैं ही उसका श्राद्ध कराऊँगी। श्राद्ध की बात सुनकर बदन में आग लगी है। मैं उसके साथ रात-रात भर मजे उड़ाऊँ तो मैं बहुत अच्छी हूँ। हम उनके लिए भोगने-खाने की ही चीज हैं न, ईआ जी?" ईआजी उठकर रेवती के हाथ से छीनकर गंडासा अंधेरे कोने में पटक देती हैं। "मेरी बात भी सुन लो, ईआ जी । अगर अव से वह मेरे दरवाजे आया तो इसी गंडासे से उसके पाँव काट लूंगी। वह मुझे दूसरी औरत सम- झता है क्या ?" रेवती के भीतर अजीव तरह की वेचैनी है। वह अपने सतीत्व की लाज बचाने में खुद सक्षम है। "सुवह पिलवा मुसहर के पास चलेगी, मेरे साथ ?' ईया जी उसकी चिन्ता को झटका देती हैं। रेवती खिलखिलाकर हँसती है, “क्या हो गया है मुझे ?" "बहुत कुछ हो गया है तुझे । पेट में लड़का सयाना होता जा रहा है। तुम वहुत अनाप-शनाप वक रही हो । पिलवा मुसहर को देखते ही तुम ठीक हो जाओगी। वह पहुंचा हुआ ओझा है। जवार-पथार में सब तरह की बीमारी ठीक कर देता है। उसके भभूत का छुआ लड़का बरावर जीता है। मेरी वात मान, सवेरे तू चल ?" "चुप रहो ईप्रा जी ?" रेवती झुंझलाकर डाँटती है, "हसुआ के व्याह में खुरपी का गीत मत सुनायो । उस पापी का स्मरण आते ही वाहर-भीतर आग लग जाती है।" ईआ जी खामोश हो जाती हैं और रेवती रात भर सोच में डूव जाती । ईया जी तो शिवजी मालिक के खेत पर पाती-जाती थीं, परन्तु रेवती ने तो उधर सोचना भी छोड़ दिया था। सुवल रतनपुर से कोस भर आगे रघुनी टोला गांव में एक कोलेसर यादव के यहाँ हल जोतने लगा था। सारे परिवार के लिए रतनपुर के सारे दरवाजे पंचायत के बाद बंद कर दिये गये थे। रेवती बकरियाँ लेकर डगर-वधार की ओर निकल जाती थी। लेकिन रतनपुर के कुछ युवक-या बूढ़े-सयाने भी रास्ते में ताने-बाने कसने से बाज नहीं आते थे। रेवती विफरकर रह जाती थी। ५४ / उत्तरगाथा एकदिन वहा बनायवात हा गया था। एक युवक रेवती की ओर माझे मारकर अरहर की झुरमुट में चलने का इशारा कर रहा था। रेवती सोचने लगी थी, अब से चोली में एक कटार छिपाकर रखना चाहिए था। परन्तु इसने भी बड़ी हिम्मत से काम लिया। रेवती जोर से बोली, "कहाँ चलने के लिए कहते हो क्या मेरी कोई बकरी तुम्हारे अरहर में घुस गयो है ?" युवक का मन लवलबा गया था। उसने कहा, "अरे नहीं रे, सुदेउवा बहू. मुझे नहीं पहचानतो क्या? मैं तो शिवजी..." रेवती ने लपककर वात को काट लिया था, "समझ गयो! समझ गयी! तू तो शिवजी मालिक का बार है न?" युवक चौंक गया। साली कही गाली तो नही दे रही है ? "देख सुदेउवा बहू, मेरी मर्यादा पर चोट पहुंचायी तो यही पटक दूंगा?" "मुझ पर तू पास क्या जमा रहा था। मैं तो तुम्हारे भले को ही बात कह रही थी।" रेवती ने कुछ हंसने की कोशिश की। "क्या कहना चाहती थी, वता?" "मुझे अरहर को मेत में घुमने के लिए कह रहा था न?" "यन, वस! हम लोग पलक मारते ही निकल आएंगे।" "मगर मेरी एक गर्त है।" "बोर ना, तुम्हारी क्या शतं है ?" युवक उत्साहित हो रहा था। "पात मानेगा जरूर?" "एकदम अपनी कसम से।" "अपनी कसम क्या होता है। मालिक लोग तो बहुत तरह की कममें खाते हैं। उसी तरह की कुछ सही कसमे सा न?" तो मुन नै, मैं प्रान पर जान देने वाले सानदान का पादमी हूँ। मैं तुम्हारे पास धन-दौलत जो चाहो हाजिर कर सकता हूँ। वस, तुम्हारा शरीर मुझे चाहिए। अगर मैं पूरा नहीं कर दूं तो असल बूंद की पैदाइस नही, समझी ?" "सो तो मुझे मालूम है कि तुम कहां की धुंद हो । मगर और चुछ मेरे, विश्वास के लिए कह ना?' rink उत्तरगाथा/ ५५ रेवती की जिद्द उसे मचलती बालिका की तरद् आनन्द दे रही थी। "अगर मैंने तुम्हारी शर्त पूरी नहीं की तो मैं स्वयं अपनी बहन।" "वस, बस! यहीं तक रहने दे।" रेवती ने उसकी फिर बात काट दी, "अव मैं समझ गयी कि तू मेरी बात मान लेगा। तो एक मामूली-सी शर्त मेरी भी है। अगर तू अपनी बहन की शादी मेरे देवर सुवल से करा दे तो मैं भी तेरे साथ इस अरहर में घुसने के लिए तैयार हूं।" कुछ क्षणों के लिए तो वह युवक हक्का-बक्का था। परन्तु तत्काल वह रेवती को मारने के लिए लपका। इस बीच रेवती ने पगार से ईट उठा लिए थे। उसने ताबड़तोड़ चलाना शुरू कर दिया था। युवक के सिर से खून निकल रहा था। उसका माथा जोरों से झन- झना रहा था और वह पारी पर लेट गया था। रेवती वहाँ रुकी नहीं। बकरियों को हाँकती हुई तेजी से घर की ओर निकल गयी थी। दो ही चार मिनट में खबर आग की तरह जवार-पथार में पसर गयी कि सुदेउवा बहू सनक गयी है । वह जिसको पाती है, उसी को ईट उठाकर मारने लगती है। दीना बाबू के लड़के को ईट से मार-मारकर आरी पर पार दिया है । वह देखने में खाली इन्दर-परी है। बड़ी ससुरी जालिम है- जालिम ! दीना बाबू का वेटा कॉलेज में पढ़ता है। कित्ता रईस है, बिल्कुल बाप पर ही गया है। उसकी जान लेने पर तुली हुई थी। यह तो कहो, किसी तरह दीना बाबू के लड़के की जान बच गयी है । दीना वावू पुण्यात्मा थे। कुछ लोग तो चौदह कोसी पंचायत के चक्कर में थे। परन्तु दीना बाबू या शिवजी मालिक कोई भी किसी बात के लिए कम नहीं था। पंचायत को ऐसी-तैसी? दीना बाबू ने सीधे जाकर दारोगा की मुट्ठी में नोट ठूस दिया -अव दारोगा वावू चाहो तो इज्जत बचा लो, चाहे डूबा दो। रईस आदमी की जिन्दगी अकारथ है ! .. क्या कहा, औरत जात ?..'साली औरत नहीं, मर्द की भी बाप है। लड़का एकदम सादा और रईस । अरहर फे अन्दर झुरमुट में इशारे से बुला रही थी। नहीं तैयार हुआ तो पीटने लगी। क्या कहा झूठ वात है ?"नहीं दारोग जी, नहीं।"रतनपुर के उस टोले के सब ससुरे गवाह हैं । . ५६ / उत्तरगाथा दारोगा बाबू तमतमाए हुए गांव की ओर दौड़े हैं। इसी समय रात में पकड़कर साली को ठंडा कर देना है।"न रहेगा बांस, न बजेगी बांसुरी। अधिक छटपटायी तो मारकर फेंक देंगे। सुबल हांफता हुआ आंगन में घुसा है । "भौजी! जल्दी करो। हम दोनों फौरन गांव छोड़ दें। दारोगा आ "हम दोनों चल देंगे तो ईआ जी का क्या होगा सुवन ?" ईआ जो कहती हैं, "तुम दोनों कही जामो, कनेआ ! और अपनी जिंदगी बचा लो।" "बेटी को आशीर्वाद देती हो न, ईशा जी! 'वो' लोटें तो उन्हें बता देना, उनकी निशानी को जिन्दा रखने के लिए मैं सब कुछ सहूंगी।" "मेरा मागोप है रे विटिया ! जल्दी कर?" ईमाजी डकर-डारकर रोती हैं। पुलिस और दारोगा के पहुंचने के पहले रेवती पौर सुबल जवार छोड़ चुके थे । आखिर दोनों कितनी दूर तक जा सकते हैं । भाले, गंडासे के साथ लोग चारो तरफ बगीचा और बधार में ढूंढ रहे हैं। आखिर सुवल उस छिनाल को कहाँ तक भगाकर ले गया होगा!.."बोल ना रे परमा बहू, पतोहिया कैसी कुलक्षण निकली कि देवर को लेकर भाग गयो ! दीना वावू तो यह भी कहते हैं कि वह छिनाल बीच रास्ते मे ही सुवला को मरवा डालेगी पोर खुद किसी और तगडे आदमी के साथ चल देगी। तब सुदेव परदेश से लौटेंगे तो अपना ही ठेंगा चाटते रह जाएंगे। गांव अव उस कुलक्षण से बिल्कुल निश्चित है। साली गोदावरी और ईया जी रेवती के लिए फुका फाड़कर रोती हैं। ईआ जी को कई बार थाने में बुलाया गया था। थोड़े दिनों तक लगता था ईआ जी बहुत परेशान होंगी। लेकिन इस बुढ़िया के पास था ही क्या --साली गरीबी! एक बात और है, पहले ही विपत्ति की कल्पना मात्र से ही आदमी को चारों तरफ अंधेरा-ही-अंधेरा लगता है। लेकिन आदमी थोडा मन को कड़ा कर ले तो प्रकाश-ही प्रकाश नजर आता है। जिस दिन रेवती मोर सुवल पर छोड़ रहे थे उस दिन ईआ जो स्वयं महसूस कर. - थीं कि वे वेजान हो रही हैं । परन्तु अब उन्हें लगता है कि रेवती उनके लिए प्रकाश छोड़ गयी है। शिवजी मालिक के चेहरे से नफरत होती जा रही है । जो भी कनेआ को कुछ बोलता है तो मन में यही बात आती है कि उसकी जवान खींच लें। चिन्ता इसी बात की है कि दोनों कहाँ होंगे, किस तरह होंगे। कनेमा जवान है, लरकोर' है। दुश्मन तंग करेंगे तो वे 'बच्चे' अपनी रक्षा कैसे कर सकेंगे। .."बाबू अब भी आ जाते। तव तो ईया जी का भाग्य ही खुल जाता। .."पापी शिवजी मालिक बोलता है कि बाबू मर गये हैं । ससुरे को भगवान जी ने तार भेजा है क्या! इन्हें न भी चाहो तव भी हमारी दुनिया में पता नहीं कहाँ से घुस ही आते हैं । अव तो जो भी कनेआ और सुबल को लेकर खराव-खराव वात करने की कोशिश करता है. तब ईप्रा जी उससे गाली में ही वात करती हैं। कहती हैं, वह तो अपनी भौजाई को शैतानों की आँखों से बचाने के लिए कहीं लेकर चला गया है। तुम्हारी मां-वहन को भगाकर तो नहीं ले गया है ? बाबू मेरा सुदेव आ गया तव सवको बाँस करेगा। कनेा के साथ उन शैतानों की बुरी नीयत रेसे-रेसे में थी। कनेआ की इतनी ही गलती है न कि उसने शिवजी मालिक और दीना वावू के लड़के से अपनी इज्जत बचा ली है। इन्हीं की आँख के सामने एक दर्जन जवान कनेआ वेटी उनका भोजन बन गयी है। किसी की जवान तक हिली है ? शिवजी मालिक का वाप भी तो शैतान से कम नहीं था। ईआ जी के साथ रात भर जवरन सोता था। कनेमा ने साहस दिखलाकर तो गांव को रास्ता दिया है। तभी तो चौदह कोसी पंचायत की जरूरत पड़ी है। कनेआ हाथ में गंडासा न उठाती तो पंचायत की क्या जरूरत थी। परन्तु वे पापी तो पंच हैं। फैसला क्या देते।''कनेआ ने शैतानी फैसले को ठेंगा दिखला दिया न? टोले की आँख खोलने के लिए यही बहुत है । ईप्रा जी अलख जगाती फिरती हैं, हम-तुम जी कर क्या करेंगे? तुम्हारी इज्जत के खिलाफ कोई देखे-सुने तो उसकी आँख निकाल लो। कनेआ के जाने के वाद ईआ जी को रोस कुछ हुआ न जव-तब शंका कील की तरह चुभती रहती है, कहीं कनेआ का पेट वाबू ५८/उत्तरगाथा ? परन्तु मन में का नहीं हुआ तव? सुबला का भी तो हो सकता है। दोनों का आपस में मेल-जोल भी तो बहुत या न ! मेहर-मदं की तरह रात-दिन इकट्ठ रहते थे।"वावू कही आए और कह दिया, कनेआ को लड़का मुझसे नहीं है, तब ! दौतानो की और भी चलती हो जाएगीन? सुबला के मुंह से कभी- कभार ईआ जी मुनती थी, मेरी भौजी सीता मइया है"सोता मइया कोई देवी-देवता हैं ! जरूर है तभी तो सुबला भी कहता रहता है। सीता मइया लौटकर आएंगी तो अग्नि-परीक्षा देंगी और बाबू उसे स्वीकार लेंगे । यही है कि वायू होते तो अपना आदमी तैयार कर चुके होते और गांव में लड़ाई होती."इसी गांव से इज्जत के लिए लड़ाई."" ईमा जी तो सबके सामने बड़दडाती है मेरी कनेमा सीता मइया है। साली उसके राम आलें-बरा! सुबल को रेवती के नहर मे रहते पन्द्रह दिन हो गये हैं। उसे स्वयं भी भार की तरह लगता है। हालांकि रेवनी के वावू या माई किसी ने कुछ भी नहीं कहा है । वह इधर-उधर चुपचाप बैठा रहता है। भौजी को चुप- चाप छोड़कर चला जाना भी तो ठीक नहीं है । उसे लडका होने मे दिन और देर है । उसके घर वाले तो यहां तक कहते हैं कि रेवती अब लौटकर रतनपुर कभी नही जाएगी। बेटी के साथ उन्होंने अच्छा व्यवहार नहीं किया है । मेरी सीता बेटी को रतनपुर वालों ने बहुत तकलीफ दी है । अब सुदेव परदेस से लौट भी आया तो रेवनी रखनपुर नहीं जाएगी । वे बेटी का 'दूसरा घर' करा देंगे। सुबल जब-जव रेवती का दूसरा घर कराने की बात सुनता है तब-तब वह यात सुबल को अच्छी नहीं लगती है। सुवल ने तो भरी पंचायत में चिल्लाकर कहा था, भौजी को वही रस लेगा। लेकिन भौजी गांव छोड- कर नहीं जाएगी। भौजी का वह हाय पकड़ने के लिए तैयार है। ये लोग दूसरा घर घराने के लिए बारम्बार क्यों कहते हैं ? वहां गांव पर हल्ला ।
. है कि यह सुवल के साथ भाग गयी है। गांव लौटकर गया तो क्या लोग इसे जिन्दा छोड़ेंगे ! "मुझे आज्ञा दो, भौजी!” सुवल पूछता है। "कहाँ जाओगे भइया ?" "कहीं भी!"भइया की तरह कहीं भी चला जाऊंगा।" "और मैं यहाँ क्या करूँगी? तुम भी मेरा साथ छोड़ दो तो जीऊँगी कसे? इस बच्चे का रक्षक नहीं बनोगे सुबल ?" सुवल घवड़ा जाता है। "यहाँ निठल्ला वैठकर रोटियाँ तोड़ते रहना अच्छा नहीं लगता, भौजी!" "तुम्हारे इस बच्चे में देर ही क्या है, सुबल ?" सुबल चौंकता है, "मेरा बच्चा, भौजी!..." "तव और क्या ? दुनिया को समझाने के लिए तो तुम्हारा ही कहना पड़ेगा न ? उनके तुम पूरक हो । औरत को ऐसी दुनिया में हमेशा एक मर्द चाहिए। मेरे जानते इन तमाम मर्दो के वीच तुम्ही एक अच्छे हो सुवल, जिसकी नीयत मुझे अादमी समझती है। तुम चले गए तो फिर मेरे सामने अँधेरा छा जाएगा।" "मैं तो अजीव दुविधा के बीच जी रहा हूँ, भौजी !' यहाँ तुम्हें कोई कुछ कहता है, सुवल ?" "नहीं, भौजी !” सुवल समझाने की चेष्टा करता है। "हम सभी मजूर हैं, दूसरों के लिए हल उठाए हुए मजूर । यहाँ इलाका तो गजव तरह से गर्म है। कुछ पता नहीं, कव देवकी चाचा की जान चली जाय।" "वे तो तुम्हारे आने के पहले से ही भागे हुए हैं । वे होते तो शायद । " बहल जाते।" "बहल नहीं जाता, भौजी। मैं तो जिन्दगी भर के लिए उन्हीं के साथ हो जाता।" इलाके में भूमि-आन्दोलन जोरों पर है; जो जिले में गौरा आन्दोलन के नाम से अखवारों में प्रख्यात है। देवकी दास गौरा आन्दोलन की अगु- आई कर रहे हैं। गौरा में साठ हजार इकट्ठी जमीन है। उस गैरमजरूया जमीन पर कमजोर लोगों को बेदखल करते-करते भूपति अपना अधिकार ६० / उत्तरगाथा जमाते जा रहे थे। देवकी दारा की लड़ाई ने इलाफ के कोरा करम सोसा दिया है। यहां दर्जनों जानें भूपतियों और पुलिस द्वारा सी गयी हैं । पाहीद शिवनाथ प्रसाद ने गौरा थान्दोलन में अपनी पहली जान दी है। शियनाथ ने गौरा में एक हाई स्कूल की स्थापना की थी और उरा स्कूल के प्रधाना- ध्यापक भी थे। एक तरह से गियनाथ प्रसाद ही गोरा बान्दोलन के जन्म- दाता भी हैं । उन्होंने ही इलाके के मूमिहीनों, मेतिहारों को गंगटिन किया है। एक रोज शियनाय पमाद रात में साइकिल पर घर से लौट रहे थे। तभी जमीदार गुडी ने उन्हें घेरकर वन्दूक गे मार दी थी। रगी गमय देवको दाम ने उनके एन का टीका अपने माथे मे लगा लिया था और मगम खायी थी, मरते दम तक शहीद निवनाथ प्रगाद का दावा की नहीं देगा। गौरा आन्दोलन जारी रहेगा। अब तो गौरा में हजारों गियनाय प्रगाद पंदा हो गए हैं। एक शिवनाथ प्रगाद मारे गए मां एक दर्जन भियनाथ प्रसाद तत्काल पैदा हो जाते हैं । पता नहीं, गोग की वह साट हजार एकर जमीन और कितने गुन की प्यागी है । देवकीदास कई महीने में जेल में हैं। अभी जेल से छूटने की उम्मीद भी नहीं है। कई लोग देवकी दास में मिलने के लिए हर जेल पर जा रहे थे। उन्हें कहीं दूसरे प्रेस में भेजने की बात चल रही थी। बाग-पास के कई लोग, रेवती के घर वाने, रेवती भी थी । मुबल भी उनके माप घला गया था। वही उनसे देर तक बातें नहीं हो पायी थी। एक दूगर का हाल-गमाचार पूटने मे ही ममय हो गया था। रास्ते में लौटते समय रेवती ने पूटा था, "तुम्हे चाचा केंगे मग, मुक्स?" "अब मैं इस गांर को छोड़कर यही नहीं जाऊंगा, भोगी।" "मच कह रहे हो न !" "मेरी तो यहां मिन्दगी ही बदल रही है।" ममय बड़ी तेजी से बढ़ता जा रहा है। रेवनी माँ बन गया है। गुबल आन्दोलन में पूरी तरह रम गया है। राम-विचार के लिए गायियों के गाय मुवन नी देवकी दाम के पाम प्राना-बाना रहता है। रेवनी वदनंत अप समें मुबल को देगरफी नहीं गमानी है। भावना और विचार T/s.
अनुरूप सुवल को पाकर रेवती हर तरह के समर्पण के लिए तैयार है। अब तो सुबल को अपना पति मान लेने पर भी उसके सतीत्व पर कोई आंच नहीं आ सकता। क्या किसी स्त्री के दो पति नहीं हो सकते ? अगर होता होगा तो रेवती के भी हो सकता है। लड़का ठीक उन्हीं पर गया है । नाक-मुंह, रंग सब कुछ उन्हीं की तरह। 'वो' इसे देखकर कितने खुश होंगे। रेवती को जीने के लिए सहारा मिल गया है। अब सुवल ज्यादा उसके पास नहीं रहता तव भी चिन्ता-फिकिर की कोई बात नहीं है। यह लड़का भी तो देवकी चाचा के कदम पर ही जाएगा, रेवती का सपना पूरा हो गया है और लड़का अपने वावू के गाँव लौटकर उन रावणों की शैतानो आँखें वरावर के लिए काढ़ लेगा जो दूसरों की बहू-बेटियों के इर्द-गिर्द काल की तरह धूरती रहती हैं। रेवती का बेटा सच्चा मानस पुत्र है। ..'ईआ जी कैसे होंगी ! इच्छा होती है उन्हें बच्चे को दिखलाने के लिए रेवती एक घंटे के लिए भी गाँव चली जाय । परन्तु माई-बापू मना कर देते हैं । सवांग भी नहीं है कि मदद करेगा। उन्होंने बेटी को कैसे कसाई के गले में मढ़ दिया है। एक साल से ऊपर हो रहा है । मुदइया ने न कोई खोज-खबर ली न चिट्ठी-पत्री दी है। वह गाँव लौटकर आ ही जाय तव भी क्या मतलब है ? ऐसे काहिल, लापरवाह, वेफिक्र, मरद पर बेटी को भेजकर ही क्या होगा ! .. 'बेटी बिना किसी मरद के रह जाय, यही अच्छा है। "सुबल भी लड़का बुरा नहीं है। अपने यहाँ भी इसकी अच्छे लोगों की संगति हो गयी है। इसके रहते रेवती के लिए दूसरा घर सोचने की जरूरत भी क्या है । अगर रेवती उसे चाह ले तो माई-बाबू को क्या एत- राज हो सकता हैं। एक रात को फूस वाली पलानी से सुवल के कराहरे की आवाज सुनाई पड़ी थी। रेवती चौंकी थी। कई दिनों के बाद कहीं से आया था सुबल। यह भी तो भूपतियों की आँखें से वचता ही फिरता है रेवती देझिझक उठकर उसके पास सिरहाने जाकर खड़ी हो गयी थी। ६२/ उत्तरगाया "तुम कब आए सुदल? यह तुम्हें क्या हो गया है।" रेवती उसके सिरहाने बैठ जाती है। "बन्दूक चला दी थीन?" सुबल फिर जोर से छटपटाता है। 'उफ !" रेवती चीखती है । ' कसे सुवल ? वहां पापी ने मार दी ?" "गोली निकल गयी है, इस हाय में। पट्टी बंधी है। कोई सतरा नहीं है। मगर रह-रहकर टीसता है।" सुबल अंधेरे में उसकी मोर पूरा हाय बढा देता है। रेवती अनायास ही उसके हाथ को सहलाने लगती है। वह गुवल को बाहों में ममेट कर देर तक पड़ी हुई थी और उने गाड़ी नीद भी आ गयी थी। लडका जब रोने लगा था तो जगाने के लिए माई हडबडापी उठी थी। कहां चली गयो रेवती? रेवती पलानी की ओर से दौड़ी थी, माई ने देख लिया था। भीतर-भीतर मंतोष हुआ था, दोनो का मन मिलता है तो अच्छा है। सुबह में लोग सुबल को उठाकर अन्दर ले गए थे, बाहर किसी के जानने का सतरा था। दुश्मन पुलिस में फौरन सूचना दे सकता या। माई भी उसे देखभाल करने के लिए रेवती से कई बार बोल गयी थी। रेवती ज्यादा रात तक सुबल के करीब रहती है और माई बच्चे को संभाले रहती है। कभी-कभी तो रात-भर सुवन के सटिया पर ही सोयी रह जाती है । अचानक भोर मे हड़बड़ाकर उठती है और बाहर भागती है। ईमा जी को सबर मिल गयी थी कि कनेआ को बवुआ हुआ है-- ठीक नाक, रूप और रंग सुदेव मे मिलता-जुलता। सुबह ही डाक मुन्शी एक लिफाफा दे गया है । रेवती लाज-शरम छोड़कर दौडती है और याबू हाथ से ले लेती है। कही 'उनको' चिट्ठी तो नहीं है । "जल्दी-जल्दी लिफाफा फाड़ती है, यह तो रतनपुर से चिट्ठी आयो है, ईआ जी ने लिख- वाया है। सुबल के पास चिट्ठी यांचती हुई पहुंचती है। देस सुबल, ईआ जी ने क्या-करा लिखवाया है। मेरे बाबू को चुम्मा-प्यार भेजा है। सुन । के ना?" रेवती सुबत के सिरहाने वैठकर सुनाने लगती है, "सोरमतो श्री सरब उपमा जोग लिखा ईया जी की तरफ से कनेआ, सवल और नमका बाबू ---" - को आशीर्वाद पहुंचे। आगे कनेआ को-मालूम कि बबुआ को देखने की बड़ी लालसा है। उसके बारे में एक चिट्ठी भरकर लिखना । कनेवारे, ऊंच- नीच पर कभी मत डालना। यहाँ लोग-हँसी उड़ाते-उड़ाते-ठंडा पड़ते जा रहे हैं। लेकिन शिवजी मालिक कहता है कि सुबला-भौजाई को भगाकर ले गया और उसके नहर में रहकर डकैती सीख रहा है। आगे तुम्हारे बाबू, चाचा सव खानदानी चोर, डकैत हैं क्या? सो साफ-साफ़ लिखना। अगर ऐसी बात है तव तो सुबला की लाइन खराव हो जाएगी। शिवजी मालिक दीना बाबू तो यहाँ तक कहते हैं कि एक मुठभेड़ में सुबला को गोली लग गयी है । यह वात कहाँ तक सच है, कनेया? जल्द-से-जल्द लिखना । मेरा मन घबड़ाया हुगा है। यहां लोग यही कहते हैं कि तुम्हारे नैहर के जवार- पथार में अच्छे लोग नहीं रहते हैं। उनकी संगति में सुवला नामी गिरामी बनता जा रहा है। रास्ता चलना मुश्किल है। वाबू बिदेसिया हो गए, वहीं जाकर बस गए! मुवल को तुम्हारे नैहर में क्या हो गया है ? तुम पर ही तो भरोसा है, कनेआ। तुम उसे समझाती काहे नहीं हो। "आगे कनेआ को मालूम कि शिवजी मालिक के खेत दुआर पर जाना मैंने भी छोड़ दिया है। अकेली तो हूँ रे ! काहे के लिए अपमान, सहूं ? रतनपुर के ही गृहस्थ की सेवा कर देती हूँ। वही सुबह-शाम के लिए थोड़ा चावल दे दिया करते हैं। मुझ अकेली के लिए इतना ही पेट पालने को बहुत है, कनेा । बबुआ बैठता है कि नहीं ? कितने महीने का हो गया है ? सुवल को समझा-बुझाकर बुरा-धन्धा छुड़वा देना। वह तुम्हारी बहुत इज्जत करता है। मैं ज्यादा क्या लिखू। सो थोड़ा लिखना-ज्यादा सम- झना । चिट्ठी का जवाब जल्दी देना।" चिट्ठी पढ़ते ही रेवती का चेहरा गम्भीर हो गया है। परन्तु सुवल तो भौजी की वेचनी को लेकर घबड़ा रहा है। वह उठकर बैठने की कोशिश करता है, "चिन्ता हो गयी तुम्हें, न, भौजी ?" "तो तुम्हारे गाँव में एक और हल्ला उठाया जा रहा है कि गोरा आन्दोलन चलाने वाले सभी गुंडा-डकत हैं।" "उन्हें मेरे लिए नहीं घबड़ाहट है कि मैं क्या कर रहा हूं। उन्हें तो यह घबड़ाहट है कि हमारी तरफ भी वैसी ही घटना न होने लगे। उन्हें तो ६४/ उत्तरगाथा अपनी ही चिन्ता सा रही है।" "तनिक हाय इधर वढा तो सुबल," रेवतो उसका घायल हाथ सह- जाती हुई पूछती है। "अब तो घाव एकदम सूख गया न?" "पता नही, माई कैसी होगी।" मुवल के भीतर असह्य छटपटाहट महमूस होती है । "मुझे यहाँ से जाना चाहिए, भौजी।" "फिर कब तक लोटोग?" "कैसे कहूँ।" "नहीं, नही..." रेवती उसका हाय कम लेती है। "अभी कुछ दिन और को। "मुझे ईआ जी की याद मा रही है।" "चल, मौजी। हम दोनो माई से मिलकर एक ही दिन में लौट आएंगै । माई बबुआ को भी अपनी नजर से देम लेगी।" "सच !" रेवती प्राहलाद से भर जाती है। "तब चलना आज ही।" "हम कल भोर में उठते ही चल देंगे।" "तुम्हे याचक वालों ने देखते हुए पुलिस को बता दिया तब ?" "हम मुंह अंधेरे ही यहां से निकल जाएंगे।" बैशाम को रतनपुर पहुंचे थे। गांव मे फिर मनसनी फैल गयी थी। ईआजी ने लपककर रेवती की गोद से बच्चे को लिया था और चूमते-घूमते उसका मुंह लाल कर दिया था। उन्होंने छूटते हुए पूछा, वहां जाकर फंसी संगति में पड़ गया रे, मुवला? यहाँ रतनपुर मे जीरो का हल्ला है कि तू नामी लूटेरा निकल गया है और तुम्हारा नाम सबरो में छपता रहता है।" रेवतो हंसती है । "हमारा सुबल तो बहुत अच्छा काम कर रहा है, ईना जी । तुम उन वादमाशों की बात का विश्वास क्यों करती हो?" "सुवला को गोली लगी थी न ?" "लगो थी।" सुवल उत्तर देता है, "लेकिन हर गोली साने वाला गुंडा-बदमाश ही होता है क्या? यान कल तो बात ही उलट गयी है। अच्छा प्रादमी अपनी इज्जत, अधिकार चाहता है तो उसे गोली खानी ही पड़ती है।" पता नहीं, माई को ठीक-ठीक सुबल समझा पा रहा है कि नहीं। परन्तु माई फिर पूछती हैं, "गौरा मे कैसा मामला है, कनेआ?" TTTT .
"साठ हजार एकड़ जमीन की लड़ाई है।" "साठ हजार एकड़ ! बाप रे इतनी जमीन पचाने वाला कोई राकस ही होगा, कनेआ?" "राक्षस से भी खतरनाक, ईआ जी।" रेवती का लड़का घुटने के वल ओसारे में रेंगने लगता है। वह लपककर उसे उठा लेती है। "इसे आशी- वर्वाद दो ईआ जी, कि तुम्हारा पोता सुवल का दाहिना हाथ बने।" "इसका मतलब क्या हुआ, कनेआ। मुझे साफ-साफ समझा दे।" "इसका मतलब हुआ ईश्रा जी, तुम्हारे लड़के कभी भी गलती के सामने नहीं झुकें।" 'पता नहीं, रानीगंज-झरिया में वाबू के साथ वहाँ के लोग कैसा सलूक करते होंगे।" "वो भी तो आप ही के खून हैं न, ईआ जी। 'वो' किसी भी गलती को बर्दाश्त नहीं करते होंगे । इसीलिए न उन्हें आने के लिए फुर्सत मिलती होगी, न चिट्ठी-पत्री ही लिखने की फुर्सत मिलती होगी।" ईआजी चिन्तित हो जाती हैं ! वावू को कहीं इसी तरह राक्षस ने घायल कर दिया हो तब ? .."अँधेरे में आंसू लगातार गिरते हैं । डेढ़ साल के लगभग हो रहे हैं। अव वाबू कब आएंगे। 'अस्पताल में भी होंगे तो वहाँ से भी नाम कट गया होगा! ईया जी सुदेव के वेटे को छाती से चिपकाए सोयी हुई हैं। गोदावरी दीवार की ' भुरकी' से रेवती को जगाती है। 'जाग रही हो, भौजी कि सो गयी हो?' धीमी-आवाज में गोदावरी फुसफुसाती है। "क्या है, ननद रानी? अच्छी तरह हो?" "सब ठीक है, भौजी । मगर अभी वावू कह रहे थे कि रतनपुर से एक आदमी थाने में गया है।" "काहे के लिए गोदा ननद ? ' "तुम्हारे लिए, सुवल के लिए..." J - "सचमुच !" "हाँ, भौजी।" रेवती आँगन में सुबल को जगाती है। "अरे उठ, सुवल । हमारी ६६ / उत्तरगाथा खबर पुलिस को हो गयी है । तुम को और भी भारी सतरा हो।" "तुम्हे कैसे जानकारी हुई है ?" "गोदा मुरकी से कह रही थी।" "फिर तो यहाँ एक पल के लिए भी टिकमा ठीक नहीं। पुलिस रात में भी आ सकती है।" "चलो, हम अभी निकल चलते हैं।" ईआ जी हठात् बिछड़ने की खबर से फूट-फूटकर रोती हैं । वे बच्चे को कंधे पर सुलाए सीवान तक छोड़ने के लिए आती हैं । जीप को सरसराहट मुनायी पड़ रही थी। सचमुच, पुलिस को खबर हो गयी थी। वे दौडकर बगीचे में पेडों की आड़ में हो गए थे। और जीप सरसराकर टोले की भोर निकल गयी थी। "रो मत, माई। में बराबर तुम्हारी खोज-खबर के लिए माता रहूंगा।" "मूठ नहीं बोल रहा है, सुबल ?" "नहीं, माई! मैं सच कहता हूँ। कआ के बबुमा को साथ में लाएगा न ?" "लाऊंगा। अव तू जा। पिछवाडे से पहुच जा । उनके पहुंचने के पहले घर के अन्दर चली जाना। कुछ पूछे तो बता देना, यहाँ कोई नहीं माया था। यह भी पूछे कि मुबल और उसकी भौजी कहाँ रहते हैं तब भी कहना कि मुझे नहीं मालूम।" "फिर कब ग्राओगे, सुबल ?" "मैं बराबर आऊँगा। तू जा न?" माई रोती-कलपती लौटती है। रेवती और सुबल अधेरो को चीरते हुए भाग रहे है। अपने जवार- पथार के रात्रि-सन्नाटे मे भी चिर-परिचित झंकार है जो भयावह होते हुए भी आत्मीय लगती है। आधी रात लगते-लगते देखरा पहुंच गए हैं। "यहीं से छः बजे सुबह बावूचक के लिए बस मिलती है, भौजी।" दोनो एक वद ढाये में बैठते हैं ।
11 "तुम्हारे लिए वहाँ दिन में पहुँचना ठीक नहीं है।" "मैं रात में कभी आऊँगा।" "नहीं, नहीं।" रेवती घबराती है । "मैं तुम्हें अभी अकेले नहीं जाने दूंगी। तुम्हें मेरे साथ चलना होगा। पता नहीं, तुम कितने दिन बाद मानोगे।" "कुछ काम रह गया है। उसे पूरा करते ही जल्दी आ जाऊंगा।" सुवल उसे बोलता है। "अब तो ऐसा हो गया है सुवल, कि तुम्हारे बिना मन एकदम नहीं लगता। थोड़ा बबुआ दौड़ने-घूमने लग जाए । बस, मैं भी तुम्हारे ही साथ आन्दोलन में रहूंगी। रक्खोगे?" रेवती कहकर हँसती है । "तुम्हारी ही अगुआई में तो मैंने थोड़ा-बहुत सीखा पढ़ा है। जिसका चाचा इतना बड़ा नेता हो उसे रखने, न रखने का सवाल ही कहाँ है ?" "एक बात पूछती हूं, सुबल ! वताना, सच-सच बताना।" "क्या वात है, भौजी।" "अगर तुम्हारा बच्चा मेरे पेट में रह गया तब क्या होगा?" सुवल अचकचा जाता है-"अरे ! ऐसा क्यों होगा ?" "क्या होगा?" इसी तरह बात करते, हँसते-बोलते सुबह हो गयी थी। बस अपने समय से ही ठीक छः बजे खुलने वाली थी। रेवती बस में एक किनारे बैठ गयी थी और अपने बच्चे के साथ हँस रही थी। बस जब तक खुली नहीं थी, सुवल चौकन्ना खड़ा था। सामने सुबल की नजर दौड़ती है। वह चौंक जाता है । दीना वाबू का लड़का कुछ सामान के साथ बैलगाड़ी से उतर रहा है। तो क्या वह शहर जा रहा है ? यह बस शहर से होकर ही जाती है क्या? कनडक्टर से पूछ- ताछ के बाद उसे इत्मीनान हो जाता है। फिर इस दैत्य के साथ भौजी को अकेली छोड़ना ठीक नहीं है । अब चाहे जो भी हो, भौजी के साथ जाना ही पड़ेगा। वह चुपचाप जाकर रेवती के बगल में बैठ जाता है। "आखिर मन नहीं ही मानान," रेवती हँस पड़ती है, "मेरे साथ ६८/उत्तरगाथा चलना तय कर लिया न? चलो, जो होगा हम दोनों मिलकर देख लेंगे।" "ऐसी बात नहीं । कुछ और वात है।" सुरल उसे इशारे मे बतलाता है। 'उघर दिखलाई पड़ता है कुछ ?" "मरे!" रेवती चौंकती है, "यह पापी कहाँ से आ गया रे?" "अभी बैलगाडी से उतरा है।" "तब हाथ में सूटकेस और झोला लेकर कहां जा रहा है ?" "तुम्हे किस तरह मालूम ?" "देखती नहीं, इसी तरफ आ रहा है।" "हमसे कुछ बोला तो हम दोनो मिलकर उसे मजा चाखाएंगे।' "ताकने की साले को हिम्मत नहीं। चलो, अव में भी चलती हूँ।" "रेवती भीतर-भीतर खुश हो रही है। "शहर में उतरकर किधर जाओगे?" वह पूछती है। "यह जहाँ भी उतरेगा न, इसी के साथ उतरूंगा।" "इससे लोगे?" "नहीं, नहीं । तुम्हारे लिए निश्चित रहूगा कि खतरा टल गया है।" रेवती हँसती है। उन्हें आपस में हंसते देखकर बच्चा भी किनकारियां भरने लगता है। वस सुल गयी है । वे दोना बाबू के लड़के की ओर में ध्यान और नजर खींचकर आसपास के दृश्यों में खोए हुए हैं। सोन नदी के किनारे-किनारे बस भागती है। रेवती वाहर झांकती हुई सोचती जा रही है, अगल-बगल के लोग यही सोचते होंगे न, कि दोनों पति-पली हैं। कैसा भाग्य है रेवती का भी। गुबल की और वह अनायास ही खीवती कमे चली गयी है। विदेसी मुनेंगे तो क्या सोचेंगे! सुवल ने गाढे समय में रेवती की इज्जत बचायी है। कायर की तरह चुप्पी साध लेता तो पंचायत के दिन ही लोग उमे बुलवाकर पता नहीं क्या-क्या करते । “अव तक कहाँ-कहाँ भटकती रहती रेवती ! ""सुवल तो उन्ही का प्रतिरूप है न ! शहर में चौक पर दीना बाबू के लड़के के साथ-साथ मवल भी उतर गया था 1 और वस चौक से होकर फिर गांव की ओर बढ़ गयी थी।
प लड़का पाँव-पांव आगे दौड़ता है और रेवती पीछे-पीछे उसे छूने के लिए दौड़ती है। ज्यादातर माँ-बेटे खलिहान में निकल जाते हैं और राजा- चोर, मालिक-किसान के खेल खेलते रहते हैं। आस-पास के दूसरे-दूसरे लड़के भी पा जाते हैं। 'वो' होते तो देखते उनका बेटा कितना बड़ा हो गया है। वह तुतला-तुतलाकर बोलने भी लगा है। गिनती और समूचा ककहरा उसे याद है। सुवल को ही बाबू कहता है, सुनकर 'वो' बुरा तो नहीं मानेंगे? इसमें बुरा मानने की वात ही क्या है ? वावू, दादा किसी को कहे, लेकिन है तो उन्हीं का न ! सामने से रेलवे लाइन गुजरती है। वरावर कोई-न-कोई रेल जाती है। जब-जब रेवती रेल को देखती है उसे परदेसी पिया की याद माने लगती है। रेलिया ना वरी, जहजिया नावैरी, वैरी पइसवा हो राम" सुबल भी कई दिनों बाद परसों आया था, रात में अचानक । उससे देर तक बात नहीं कर सकी थी। वह बहुत जल्दी सो गया था। सुवल पास में होता है तो उसी में खोयी रहती है। 'वो' तव बहुत कम याद आते हैं। परन्तु एकान्त में उसके कलेजे की मजबूती नहीं रह पाती। 'वो' घाव की तरह टीसने ही लगते हैं। बाबूचक की एक औरत ने रेवती की माई से पूछ दिया था, "रेवती का दूल्हा कभी आएगा भी या।" "हम कैसे कहें ?" "सुवल घर रह जाएगी क्या ?" रेवती की माई ने जवाब दिया था। "रह भी जाएगी तो क्या हो जाएगा। वह आज दो-ढाई साल हो गया नहीं लौटा तो बेचारी रेवती क्या ७०/उत्तरगाथा करेगी? हम जवान बेटी का आचार नहीं डालते। हम गरीब लोग जल्दी पुरुष की छाया कर देते हैं । उसे जिन्दा रखने के लिए फिर दूसरा कोई सहारा नहीं है।" वह औरत आगे कुछ नहीं बोली थी। रेवती की माई के इस जवाब के बाद दूसरा सवाल भी क्या हो सकता था। वह तो खुद राजी है, बेटी को देवर के सहारे छोड़ने के लिए तैयार है । रेवती का सवांग भी तो गजव का मनहूम है-एकदम मामनुप । उसे कोई फिक्र-चिन्ता नहीं कि घर में एक जवान औरत छोड़कर आए है। वह अकेली कैसे रह रही होगी। रेवती को मतारी तो मन-ही-मन तय कर चुकी है, चाहे जो हो रेवती का अव देवर के साथ घर बसा ही दिया जाए । रेवती का भी देवर भीतर से एक- दम आ गया है । मतारी ने कई रात दोनों को एक-दूसरे की गर्दन में बांह डालकर सोया देख लिया है और परहेज कर गयी है। फिर देवर भी तो 'सुराजी' ही है-एकदम रेवती के परिवार के ही अनुकूल। एक दिन रेवती को माई भी रेवती के साथ ही सुबल के खाते समय सामने बैठ गयी है। सुबल सकुचा रहा है। पहली बार घर की बड़ी-बूढ़ी मुबल के सामने-सामने बैठी है। कोई बात है क्या? क्या बात है। वह बार-बार रेवती की ओर कनखियों से देखता है। रेवती मुस्कराकर लजा जाती है । सुवल की आस जैसे रेवती से पूछ रही हो-बोल न भौजी ! प्राजक्या बात है कि तुम्हारी मतारी मामने भाकर बैठ गयी है । मुझे खाने में संकोच हो रहा है। जल्दी वता ना? लेकिन रेवती तो वहुत हल्के सिर हिलाकर इंकार करती हुई हँस देती है और जमीन की ओर ताकने लगती "एक बात कहती हूँ, सुबल वेटा!" रेवती को माई अचानक बोलती है, "इन्कार मत करता, बबुआ।" "कैसी बात है, माई जी!" सुचल का मुंह चलना एक जाता है और आँखें पाली पर टिकी रह जाती हैं। "रेवती की दूसरी देह है, बबुआ दुनियां की नजर में अलग-अलग रहने से क्या फायदा? अव दुनिया को भी बता ही देना चाहिए कि तुम दोनों औरत-मरद हो।"
८ लड़का पाँव-पांव आगे दौड़ता है और रेवती पीछे-पीछे उसे छूने के लिए दौड़ती है। ज्यादातर मां-बेटे खलिहान में निकल जाते हैं और राजा- चोर, मालिक-किसान के खेल खेलते रहते हैं। आस-पास के दूसरे-दूसरे लड़के भी पा जाते हैं। 'वो' होते तो देखते उनका बेटा कितना बड़ा हो गया । वह तुतला-तुतलाकर बोलने भी लगा है। गिनती और समूचा ककहरा उसे याद है। सुवल को ही वाबू कहता है, सुनकर 'वो' बुरा तो नहीं मानेंगे? इसमें बुरा मानने की बात ही क्या है ? वावू, दादा किसी को कहे, लेकिन है तो उन्हीं का न ! सामने से रेलवे-लाइन गुजरती है। बरावर कोई-न-कोई रेल जाती है। जब-जब रेवती रेल को देखती है उसे परदेसी पिया की याद आने लगती है। रेलिया ना बैरी, जहजिया ना वैरी, वैरी पइसवा हो राम"। सुबल भी कई दिनों बाद परसों आया था, रात में अचानक । उससे देर तक बात नहीं कर सकी थी। वह बहुत जल्दी सो गया था। सुवल पास में होता है तो उसी में खोयी रहती है। 'वो' तब बहुत कम याद आते हैं । परन्तु एकान्त में उसके कलेजे की मजबूती नहीं रह पाती। 'वो' धाव की तरह टीसने ही लगते हैं। वावूचक को एक औरत ने रेवती की माई से पूछ दिया था, "रेवती का दूल्हा कभी आएगा भी या...।" "हम कैसे कहें ?" "सुबल घर रह जाएगी क्या ?" रेवती की माई ने जवाब दिया था। "रह भी जाएगी तो क्या हो जाएगा। वह आज दो-ढाई साल हो गया नहीं लौटा तो वेचारी रेवती क्या ७०/उत्तरगाथा करेंगी? हम जवान बेटी का आधार नहीं डालने। हम गीय लोग जल्दी पुरुष को छाया कर देते हैं। उसे जिन्दा रखने के लिए फिर दूसरा कोई सहारा नहीं है।" वह औरत मागे कुछ नहीं बोली घो । रेवती की माई के इस जवाब के बाद दूसरा सवाल भी क्या हो सकता था ! वह तो खुद राजी है, बेटी को देवर के सहारे छोड़ने के लिए तैयार है। रेवतो का साग भी तो गजब का मनहूस है-एकदम प्रामनुप । उसे कोई फिक्र-चिन्ता नहीं कि घर में एक जवान औरत छोड़कर आए हैं। वह अकेली कैसे रह रही होगी। रेवती को मतारी तो मन-ही-मन तय कर चुकी है. भाहे जो हो रेवती का अब देवर के साथ घर बसा ही दिया जाए । रेवती का भी देवर भीतर से एक- दम आ गया है । मतारी ने कई रात दोनो को एक-दूसरे की गर्दन में बाह हालकर सोया देख लिया है और परहेज कर गयी है। फिर देवर भी तो 'मराजी' ही है--एकदम रेवती के परिवार के ही अनुकूल। एक दिन रेवती की माई भी रेवती के साथ ही सुबल यो साते समय सामने बैठ गयी है। सबल सकुचा रहा है। पहली बार घर की बड़ी-बूढ़ी सुबल के मामने-सामने बैठी है। कोई बात है क्या? क्या बात है। वह चार-वार रेवती की ओर कनखियों से देखता है। रेवती मुस्कराकर लजा जाती है । सुयल की आंखें जैसे रेवती से पूछ रही हों-बोल न भौजी ! माज क्या बात है कि तुम्हारी भतारी सामने आकर बैठ गयी है । मुझे साने में संकोच हो रहा है । जत्नी वता ना? लेकिन रेवती तो बहुत हल्के सिर हिलाकर इंकार करती हुई हंस देती है और जमीन की ओर ताकने लगती "एक बात कहती हूँ, सुबल वेटा!" रेवती की माई अचानक बोलती है, "इन्कार मत करना, बबुआ "कसी बात है, माई जी!" सुबल का मुंह चलना रुक जाता है और आंखें थाली पर टिकी रह जाती है। "रेवती की दूसरी देह है, बबुमा दुनियां की नजर मे अलग-अला रहने से पया फायदा? अब दुनिया को भी बता ही देना चाहिए कि दुन दोनो औरत-मरद हो।"
- रेवती लजाकर अपने हाय में लोटा रख लेती है और वहां से उट जाती है। सुवल सिर झुकाए ही बोलता है, "मुझसे गलती हो गयी है, माई जी! मैंने भौजी के साथ... "अब जो हो गया, सो हो गया।" रेवती की माई पागे कहती है "अब तुम रेवती के साथ व्याह रचाकर रहो। इसके साँग के लौटकर आने की उम्मीद नहीं है।" "ऐसा न कहें, माई जी! भइया जरूर आएँगे।" "अब तीन वरिस में नहीं आए तो अब क्या आएंगे। विदेसिया सांग ऐसा ही छली होता है। परदेस में ही कोई सवतिन रख लेता है।" सुबल ज्यादा तर्क क्या दे सकता है । रेवती के पेट में नया शिशु तो इसी का पल रहा है । व्याह तो रवाना ही होगा । अपनी माई भी मन-ही- मन राजी है । भइया मा गये तो फिर भौजी को उन्हें सौंप देंगे। वह झट- से उत्तर देता है, "प्राप लोग हैं तो भौजी से व्याह कर लूंगा।" रेवती की मतारी बहुत देर तक वहाँ नहीं रुकी, हँसती हुई रेवती को पुकारने के बहाने वहाँ से उठ जाती है। सुबल कुछ असमंजस झेलने की स्थिति में घबड़ाकर उठना ही चाहता है कि रेवती लोटे में पानी लेकर फिर आ जाती है। उसके हाथ से लोटा संभालते ही सुबल पूछता है, "माई जी की बातों पर राजी हो, भौजी ?" "तुम्हारी राय क्या है, सुवल ?" "मुझे तो खाली भइया का डर लगता है।" "उस दिन तुम्हें डर नहीं लगा था सुबल, जब तुम मेरे पेट में नए शिशु को जन्म दे रहे थे?" मुदल अवाक रह जाता है। मगर रवती हँस देती है, "कायर कहीं का । उस दिन देखा जाएगा "किस दिन ?" 'जिस दिन विदेसिया लौटकर आएगा।" "भइया को मनाने में साथ दोगी?" "उन्हें हम दोनों राजी कर लेंगे।' ग " रेवती का लहका पता नहीं कब दोनों के बीच में खड़ा हो गया है। रेवती अपने बेटे से पूसती है, "बाबू रे ! ये तुम्हारे कौन हैं-बावू हैं कि चाचा...!" 'धत् !" लडका बीच में ही काट देता है, "वायू तो परदेस गए हैं । ये तो सुबल चाचा है।" रेवती हसती हुई उसे अपनी गोद में खीव लेती है और उसके गालों पर अपने होंठ रगडती हुई पूछती है, "वह रमलगना तो अपने चाचा को भी वायू कहता है न?" "तब तुमने मुझे पहले सिखलाया क्यो नही ?" "रेवती और सुवल हंसते हैं। रात में सुबल से वह पूछती है, "माज से तुम मेरे पति हो, अब से मुझे भौजी के बदले क्या कहोगे?" "मेहरारू कहूंगा, और क्या ?" "मेहरारू कहकर पुकारोगे?" "तुम मुझे भौजी कहोगे और मैं तुम्हे सुवल, तो टोला-पड़ोम के लोग क्या कहेंगे? मैं तो तुम्हे सुराजी पिया कहूंगी। और तुम कहकर रेवती बड़े जोर से हंसती है। "हम लोग वही पुराने नाम से एक-दूसरे को बुलाएंगे।" रेवती चुपचाप सटोले पर पड़ी हुई है ।आकार में कोई बत्ती की तरह तारा सरकता हुआ जा रहा है। रेवती सोचती है, यह तारा नहीं होगा, तारा तो स्थिर है । सुनती है कि लोग इस पर चन्द्रलोक, सूर्यलोक में घूमते हैं। अपने 'बो' को इस जमाने में कोई साधन नही मिला कि अपने बारे में कोई खबर भी करते । यही लिख देते कि जेल में हैं। अव तो जेल के बाहर ही ज्यादा बुरे लोग हैं। जिन्हें जेल में रहना चाहिए वे ही तो हमारे गांव के सरगना बने हैं और अपराध और मौज दोनों काम एक साथ कर रहे हैं। "सुन भौगी ! मुझे एक नाम अभी सूझ गया है।" सुबल अचानक बोलता है। "कसा नाम ?" उल्लास और बंधेरे में रेवती नमकी योर कति से ताकती है।
"यही कि बड़े बाबू का नाम लव और होने वाले का कुश। कैसा गा?" "लव-कुश । यह तो एकदम जुड़वा नाम है। बड़ा प्यारा है।" "सीता के लड़के का भी यही नाम था।" "कौन सीता?" "वही रामायण वाली सीता।" और, सुबल अंधेरे में उसका हाथ टोलते हुए खींचता है, “मगर तुम तो जिन्दगी वाली सीता हो। वह सीता भी तो तुम्हारी ही तरह मजूर की बेटी थी। उसके बाबू भी तुम्हारे बावू की तरह जंगली रावण से लड़ते थे। खाली उस सीता के मरद राजा राम थे । और तुम्हारे..." "सुराजी राम हैं।" रेवती उसकी वात बीच में काटती हुई फिर जोर से हँस देती है । "मगर एक बात है, सुवल ! हमारे लव-कुश के तोएक बाप राम हैं, दूसरे के लक्ष्मण होंगे।" "लव हमारी बातें सुन रहा होगा, भौजी।" "लव सो रहा है। कुश हमारी वातें सुन रहा होगा। तुम देख लेना, हमारे लव-कुश जरूर तुम्हारे रास्ते पर चलेंगे।" "चलना पड़ेगा, भौजी। पूरी घटिया परम्परा को बदलना है। तुम्हारा तो मेरी जिन्दगी पर बहुत बड़ा असर है । तुम एक साथ मेरी गुरु, दोस्त, भौजी, पत्नी-सब कुछ हो।" थोड़ी देर दोनों के बीच गहरा सन्नाटा रहता है। परन्तु रेवती ही पहले सन्नाटा तोड़ती है । "अगर तुम्हारे भइया लौटकर पाए तो मैं अग्नि- परीक्षा नहीं दूंगी। मैंने तुम्हें पति स्वीकार कर कोई गलत काम नहीं किया "मेरा भइया कमजोर नहीं है, भौजी। वह आते ही तुम्हें स्वीकार कर लेगा।" "स्वीकार करना पड़ेगा, सुबल ! तभी मैं जानूंगी कि वह असली मरद है।"उसे जानने-पहचानने का मौका ही कहाँ मिल, सुबल ! वह हफ्ता भर ठहरने के बाद ही तो परदेस चला गया। तव से तो मैंने तुम्हीं में उसे देखा है। तुम्हीं से मैं अनुमान लगाती हूं कि वह भी. तुम्हारी ही तरह मजबूत ७४ / उत्तरगाथा और प्रसल होगा।"वह जरूर मजबूत और मसल होगा।" रेवती बोलते-बोलते गम्भीर हो गयी है। रात का कुछ भी अता-पता नहीं है। मगर उन्हें सुबह का भी ऐसा कोई सास इंतजार नहीं है। एक ही सप्ताह बाद रेवती के नहर में एक हल्का-सा समारोह हुआ। टोला-पड़ोस के कुछ निकटवर्ती लोग 'भोज' पर माए। वही यह विधिवत् पोपणा रेवती के बाबू ने कर दी कि रेवती ने देवर सुबल के साय घर नसा लिया है। रेवती को तत्क्षण घ्यान आता है, इस मौके पर ईमाजी होती तो कितना अच्छा पा । 'कोहवर' की ही रात वह ढिवरी जलाकर लिखने बैठ जाती है, "मागे ईआजी को मालूम की याज से मैंने सबके सामने देवर को पति मान लिया है। इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है ईमाजी, कि मुझे 'उनकी ओर से किसी भी प्रकार की विरक्ति हो गयी है। मेरे लिए अब उनमे और देवर मे भेद कर पाना बडा मुश्किल है । "मुझे पूरा भरोसा है कि आप सामने होतीं तो दिल से हम दोनों को आशीर्वाद देती। ""एक बात और! छिपाने से क्या फायदा, ईआजी! .."देवर से पेट में लड़का रह गया है । देह छूटते ही दोनों बाबू-लव-कुश को लेकर चरण छूने आऊंगी। रतनपुर के बाबुओं का जुलुम नरम है कि अभी उसी तरह है ? यहाँ तो लड़ाई जमकर चल रही है। चाचा को एक मामले में सात- साल की सजा हो गयी है। अभी इनके ऊपर दो-तीन और मामले हैं। गौरा में बड़ी तेज लड़ाई है । उनकी बन्दूक की बलि चढ़ने के लिए संकडों जवान तैयार हैं, इनमें हमारा सुरल भी एक है। प्रन्यास के कारण सुबल का नाम कढ़ा जाता है। यह तो मेरा मरद है। नियम के अनुसार इसका नाम मुंह से नहीं न काढ़ना चाहिए । ईआजी! मेरे मन पर यह सब नियम- पुराण एकदम नहीं जमता"दूसरे बाबू दो ही तीन महीने के भीतर पर में पाने वाले हैं । इस रात को ज्यादा क्या लिखूपोड़ा लिखना, ज्यादा समझना है। हां, एक बात तो छूट ही रही थी, आगे ईमाजी को मालूम है कि गोदावरी गांव पर ही है या ससुराल चली गयी है। उसकी याद बहुत सताती रहती है।" बचानक कलम रखकर रेवती जैसी ढिवरी फूंकने के लिए मुंह पमाती है कि कानों में अनायास ही करे मधुर स्वर गूंजने लगते हैं । आंगन में . - खड़ा भाड़-झंखाड़ नीम का पेड़ सरसराकर हिलता है और रेवती के होंठ अचानक ही सोहर गुनगुनाने लगते हैं, मचिया बइठल मोर सासू सरव गुन आगर हो हंसिए वात पुछली हो... बहुमा कवन वरत कइलू, ववुलवा वड़ा नीमन, होरिलवा वड़ा सुनर हो... सुबल की नींद अचानक फक से खुल जाती है। ढिवरी की रोशनी में रेवती का दीप्त चेहरा और भी प्रज्वलित हो उठता है। उसके होठों को चूमते हुए पूछता है, "यह क्या भौजी..." "चुप्प !" रेवती उसके मुंह वन्द कर देती है, “अब भौजी कहाँ ? 'वो' लौटकर आ गये तो फिर देखा जाएगा।" "वहुत अच्छा गाती है तू " "सचमुच !" रेवती का उल्लास कनेर की तरह और भी खिल उठता है, "अपने वाबू के अगवानी में सोहर गुनगुना रही थी।" "पाधी रात को ?" "ऐसे ही, होंठ गुनगुनाने लगते तो मैं क्या करती..." "आगे सुनाना, मुझे भी अच्छा लगता है।" "सुना।" रेवती मागे की कड़ियाँ फिर गुनगुनाने लगती है, : "कार्तिक मासे बरत छठ कइली, अगहन मासे एतवार इहे वरत हम कइली हो सासुजी, बबुलवा हमार नीमन, होरिलवा हामार सुनर हो. "माई की याद आ गयी।" सुबल उठकर बैठ जाता है। "तुम्हारा सोहर बड़ा मनभावन है। अपनी सास से तुम गोहार-गोहारकर वतिया रही है। अब मुझे नींद कहाँ से आ सकती है।" "तू घबड़ा नहीं। मैंने चिट्ठी में ईआजी को सब समाचार लिख दिया है।" "और क्या लिख दिया है ?" रेवती ढिवरी फूंकती है। बाहर की तरह अन्दर भी अन्धेरा हो जाता है। रेवती उसका हाथ खींचकर सुला देती है, जैसे दुधमुंहे बच्चे को वांध । '.. ७६ / उत्तरगाथा रही हो, "सो जा। हम ईआ जी से मिलने तीसरा महीना उतरते ही चलेंगे।" "मैं तो सुबह उठते ही जाऊंगा।" "अकेले?" "तुम्हारा विचार है तो त भी चल सकती है। मगर ऐसी हालत में कने चलेगी तू? तुम्हारे पांव तो बहुत जल्दी भरभराने लगेंगे।" "क्या समझता है तु महतारी वह खाली तुम्हारी हैं, मेरी नहीं हैं ?" "सोचो ना, माई से मिले मुझे कितने दिन हो गए है ?" "इस चिट्ठी का जवाव पाते ही चलेंगे। तुम सो जामो, मैं गुनगुनाती "माई का जवाव कौन लिखेगा, यह कभी सोचा है ? अपने सभी तो रतनपुर वालों के जुलुम मे गांव छोड़-छोडकर भाग रहे हैं।" 'अनायास रेवती के सामने यथार्थ नंगा नाचने लगता है और उठकर बैठती हुई ऐसे स्टपटाती है जैसे रतनपुर अभी दौडकर चलने के लिए सयार हो । वह एलान करती है, "सुनो । हम दोनों सुबह ही पलेंगे।" "तुम भी चलोगी! वह भी इस हाल त मे ?" "तुम्हारी बहू होने के बाद पहली बार गांव चलूंगी। तुम अकेले कसे जाओगे? हम यहाँ माई-बाबू मे विदाई लेकर चलेंगे।" सुबल चुप लगाता है। "क्या सोचने लगे?" रेवती फिर टोकती है। "सोचता हूँ, घाती आग में तुम अभी नहीं चलो।" "क्या वकते हो । पारम नहीं भातो? मुझे छोड़कर अकेले जाओगे ?' रेवती फो सचमुच का गुस्सा चढता है। आखिरकार दोनो का समझौता हो जाता है और मुबह सास-ममुर से विदाई लेकर रेवती के साथ गांव चलने के लिए राजी हो जाता है। रवती ईआजी के नाम लिखी हुई चिट्ठी मोड़ कर आंचल के एक कोने में पाहुर की तरह बांध लेती है। ईआजी से मिलने की आशा में उसके भीतर अजीय उल्लास है। रात भर यतियाने के लिए सुबल को बार-बार जगाती है । ढिबरी जलाकर चिट्ठी सुबल को कई बार मुनाती है। जनाurate - दूसरे दिन रात में आठ-नौ बजे के लगभग हीरामन दास की बैलगाड़ी रतनपुर के सीवान पर पहुंचते ही रेवती हहास बांधकर घर की मोर भागती है और ईआजी के पांव छानती हुई फफक-फफककर रो पड़ती है। ईआजी की आंखें भी बाँध संभाल नहीं पाती हैं, वे सिसकती हुई बोलती है, 'तुम दोनों हमें महाधार में छोड़कर कहां चली जाती हो, कनेआ ? यहां अकेले लोहा लेते-लेते मन घबड़ा गया है । टोले के आधा आदमी इधर-उधर भाग गये हैं। लेकिन जो भी रह गए हैं, उन्हें समझ लो कनेआ, लोहा हैं- लोहा ! शैतानी आंख से अब डरने वाले नहीं हैं। उन आँखों को भी काढ़ लेने की हिम्मत रखते हैं। खाली डर लगता है तो पुलिस से। सुनती हूं, पुलिस के सारे लोग उन्हीं के आदमी हैं। पुलिस आँख मूंदकर उन्हीं की मान लेती है और हमें जब तब तंग करती रहती है। कैसे बताऊं रे कनेआ। मुझे भी तुम्हारे अतापता के लिए थाने में भूखे-प्यासे तीन-चार दिनों तक एक बार बन्द कर दिया गया था। मगर वेटी, जो हिम्मत तुमसे मिली है वही तो मेरे पास पूंजी रह गयी है..." ईआजी अपने आँसू रोक नहीं पा रही हैं, और लव को गोद में उठा- कर बार-बार चूम रही हैं । रेवती भी अपने आँसू बटोरती हुई जबाव देती हैं, "अंचरा में सब बात बांध कर रखी हैं, ईमाजी। मैंने दूसरा घर कर लिया है। मेरा मरद साथ में खड़ा है। ईआज़ी के पांव छूते काहे नहीं तुम ?" वह सुवल' की ओर इशारा करती है। सुबल लपककर माई के पांव छूता है। "कैसी हो, माई।" वह पूछता है । "अच्छी हूँ, बबुआ।" "घर में अंधेरा काहे है ?" "अभी-अभी चबूतरे पर ढिबरी वुझाकर सोयी हुई हूँ। रुकना, तुम दोनों ओर इस बबुआ के लिए कुछ पकाती हूं।" "नहीं, ईआजी।" रेवती रोकती है, "हमारे पास चूड़ा-गुड़ है। हम उसी को भीगोकर खा लेते हैं।" ईआजी अंधेरे में दियासलाई टटोलकर ढिवरी जला देती हैं। आंगन और ओसारा सब कुछ वैसा ही है। तुलसी का बिरवा काफी फैल गया है - ७८ / उत्तरगाथा और एक, दो बकरिया कम नजर आ रही हैं। "और बकरी कहाँ गई, माई ?" सुवल पूछता है।" "चावू रे ! खर्ची-बर्ची की कमी हुई तो बेच दिया है।" लव देर से दादी को पहचानने की कोशिश कर रहा है। "भइया को कोई चिठ्ठी-पत्री प्राई ?" "कभी-कभार फनेआ की ही आती थी। बाबू की तो कोई सवर नहीं।" "गोदावरी कहाँ है ?" रेवती यात पलटती है। "हल्ला-हंगामा सुनकर उसके ससुराल वाले ले गए हैं। उसकी महतारी बोल रही थी कि फिर मानेवाली है। गोदा को दूसरी देह है, इसी महीने होगा।" रेवती अचरज करती है, "गोदा कितने दिन की है। मेरे सामने तो चच्ची थी।" 'समय जाते क्या देर लगती है, कनेा। सब कुछ कितनी तेजी से बदल रहा है। रतनपुर वालों ने पूरे टोले को काम देना बंद कर दिया है। अब जब तुम्हारे टोले के लोग मुकने का नाम नहीं ले रहे तो इन्हें तरह- तरह के झूठे मुकदमे, चोरी, राहजनी, संघमारी और टकंती की पटनाएँ गढकर फैसा रहे हैं। कभी-कभी तो मन घबड़ा जाता है कि क्या करें!" "चिन्ता न कर, माई!" सुबल समझाता है, "मैं गांव छोड़कर नहीं जाऊंगा।" "मगर कनेा कैसे रहेगी, वुआ?" "तुम्हारी पतोहू बनकर, और कैसे?" "सो तो है । “मगर पाने को पता चल गया कि मुदेव बहू उनकी है तव। रतनपुर के बाबू लोग भी तो हैं। लेकिन जब टोले की किसी पाठ की उन्हें अब जानकारी नहीं होती तो क्नेआ के बारे में भी नहीं होगी। मेरी कनेआ चौखट से बाहर पांव नहीं रखेगी। मुझे तो खाली तुम्हारी चिन्ता है।" "मेरी चिन्ता काहे की? तुम्हारी नई पतोहू भी बाहर-भीतर रहेगी। डरने की क्या बात है ? यह तो इससे भी लोहे की मन वाली है।"
माई को वेटे की बातों से कुछ-कुछ धीरज मिलता है। वह पोते को गोद में लेकर सो रही है। ९ समय गुजरते क्या देर लगती है। नहर में रेवती माई-बाप से कह कर आई थी कि दो-चार दिनों में ईआजी से भेंट-मुलाकात के बाद लौट आएगी। मगर इस बार उसे ससुराल आए महीने से भी ज्यादा हो रहे हैं। रेवती को फिर वेटा हुआ है । जिस दिन से लड़का धरती पर आया है, रेवती उसे कुश कहती है। ईआजी के पाँव तव कुश को पाकर धरती पर नहीं है । सुवल एक महीने से गायब है। रेवती रोज-रोज उसकी बाट देख रही है। उसका मन दिन-प्रतिदिन घबड़ाता जा रहा है । सुवल जिस दिन लोटने का वायदाकर जाता है, उस दिन जरूर लोटकर आ जाता है। कहीं वह पकड़ तो नहीं लिया गया है। इआजी को भी यही आशंका है। परन्तु रेवती उन्हें ढांढस देती रहती है। हालांकि, उसी का संशय ज्यादा पुष्ट होता जा रहा है। नैहर से बाबू की चिट्ठी का भी इंतजार कर रही है। कुछ दिनों तक तो यहाँ उसका मन बहुत घबड़ाया था। चौदह कोसी पंचायत वह भूली नहीं है। रेवती अभी आँगन में खटोली पर कुश. को सुला ही रही थी ईआजी दुआर की ओर से आकर चबूतरे पर बैठती हैं । "गजब हो गया, कनेआ ! जानवर को भी माया-मोह होता है। इनमें तो जैसे दिल ही डालना भगवान जी भूल गए हैं। एकदम पापी हैं-सव भारी पापी!" "क्या हुआ, ईआजी?" रेवती भी बैठ जाती है। "हम लोगों की जान खस्सी भेंड़ से भी सस्ती है।" "क्या हुआ, ईआजी ?" "कारू भगत के वेटे को मुदई लोगों ने मार डाला?" "क्या कहती हो, ईआजी! इस तरह दिन-दहाड़े ?" | उत्तरगाथा ईया जी का क्रोध बढ़ता है, "कारू भगत का लड़का कमनिम पाटी में था।" "तब इससे क्या हो गया? "रतनपुर वाले मालिकों के जुलम सुनेगी?" ईमा जी इसे सींचकर घर के अन्दर ले जाती है । "कारू भगत के लड़के को बहलाकर दुआर पर ले गए और एक घर में बन्द कर अंग-अंग काट दिया। अब कहते हैं कि पूरे इस टोले को आग की तरह फूंककर ताप जाएंगे।" "कब ?" रेवती के मुंह से अनायास ही निकलता है। "कय क्या-उन्होंने कोई दिन दिया है ? हमको, तुमको, सयको सजग रहना है और क्या ?" बातचीत करते समय ही अचानक रेवती के पेट मे कुरा दौड़ना शुरू करता है, जैसे टोले में हलचल की कथा उसे पहले से मालूम हो और वह बाहर निकलकर लड़ने के लिए छटपटा रहा हो। रेवती हल्को 'दरद' महसूस करती हुई जमीन पर लेट जाती है। "पिलवा मुसहर के पास जाती है। तू उठकर सटोले पर जा।" ईआजी खडी हो जाती है। "आप भी गजब है, ईआजी।" रेवती दरद से कराहती हुई भी हंसती है । "अरे, समय पूरा हो रहा होगा । दरद तो उठता ही।" "तुम्ही तो कह रही थी कि अभी बीस-पच्चीस दिन की देरी है।" रेवती फिर हंसती है। "कह तो रही थी, लेकिन स्लंट पर दिन थोड़े लिखकर रखा हुआ है कि सुकुल यावा के पतरे की तरह दिन ठीक- ठीक ही निकल जाय । जोड़-घटाव गलती भी तो हो सकती है।" रेवती का दरद बढ़ता जा रहा है । वह दौडकर गोदावरी मीमाई को बुलाती है। रेवती बडे जोर से छटपटा रही है। गोदा को माई मुस्कुरानी है, कनेमा की देह चाहे अभी छूटे, चाह रात में लेकिन चौबीस घंटे से ज्यादा देर नहीं है । ईआजी मोहर गुगुनाने लगती है। "कार्तिक मासे घरस छठ कइली, अगहन मासे एतवार। इहे वरत हम कइली हो सासु, वदुलवा हमार नीमन, होरिलवा हमार सुनर हो..."
रेवती का दरद जैसे-जैसे बढ़ता है, ईआ जी की खुशी बढ़ती जाती ครีip आधी रात के लगभग रेवती के घर थाली वजने की आवाज टोला- पड़ोस में फैलती है। लोगों को बूझने में देर नहीं लगती कि सुदेऊवा बहू को लड़का हुआ है। ईआजी को ताज्जुब होता है, कनेआ को कैसे मालूम कि इस बार भी लड़का ही होगा। जव वावू पेट में था तभी कनेआ और सुबलवा ने मिलकर इसका नाम रख दिया था। ढिवरी के उजाले में ईआजी देखती हैं, यह बावू तो एकदम सुवलवा पर ही गया है-नाक- नकस एकदम मिलता-जुलता। क्या नाम रखा है इसका ? वे मन-ही-मन याद पारती हैं-शायद, कुशल ? सीता महतारी को लव-कुश मिल गए हैं। इससे ज्यादा चाहिए भी क्या ? विदेसिया बाबू को तो कैसे कोई चिन्ता-फिकिर ही नहीं है। परदेस में ही धूनी रमा लिया है-साधु हो गया है सुबलवा का क्या भरोसा! आज है, कल नहीं हैं। उसको भी नहीं मालूम है। जहाँ इतने भारी-भारी शैतान लोग हैं वहाँ ईआजी ने भी बेटा के लिए कलेजे पर पत्थर बांध लिया है। इस बेटे पर जवार- पथार के लोगों का अधिकार है। ईआजी ने भी धरती मैया के आँचल में खुशी-खुशी एक बेटा सौंप दिया है। सीता मैया के तो दोनों सवांग हाथ से निकल गए हैं । यही लव-कुश तो घर-दरवाजे के रक्षक बनेंगे। एक दिन चबूतरे पर अपनी दोनों टाँगों पर कुश को सुलाकर ईआ जी तेल मालिश करती हुई पूछती हैं, "अपने दोनों लव-कुश बाबू को कोई भारी पंडित या सुकुल वावा को ही बुलाकर जन्म-कुंडली बनवा लिया - जाता।" "अपनी जात के लोग अपने बच्चों की जन्म कुंडली भी बनवाते हैं क्या? मैंने तो पहले कभी नहीं सुना।" रेवती को अचरज होता है। "यह वात तो है, कनेआ!" ईमाजी मुंह लटका लेती हैं, हमारे यहाँ जन्म कुंडली बनाने के लिए कोई तैयार ही नहीं होगा। परन्तु एक बात तो है, कनेआ। हमारे लिए पिलवा मुसहर ही तो पंडित का बाप है । एक से बढ़कर एक भविष्य बताता है । क्या मजाल जो उसकी कोई वात फेल हो जाय।" ८२/उत्तरगाथा रेवती ईआजी के भोलापन पर सिलखिलाकर हंसती है ? वह सम- झाती है, "जन्मकुंडली को चिन्ता उनको होती है ईमाजी, जिन्हें दूसरों का खून चूमकर खुद की जिन्दगी बचाने की हविश है। हमारे बावुओं की कोई कुइली ही नहीं होती है। हमारे येटो का हाथ देख लें नो बड़े-बड़े नाडितों का माया भी चकरा जाय। अपने पोते का हाय अपने हाथ में होकर क्यों नहीं देखती हैं कि उसके हाथ मे अजूबा क्या है ! ईआजी बच्चे का हाय उलट-पलट कर देखती हैं। "मुझे तो इसके हाप को रेखाएं ही ममझ में नहीं आती हैं। बाप रे ! भला किसी के हाप इतनी रेखाएं होती हैं !" ईमाजी चौंकती हैं। ये मब रेखाएँ नहीं हैं, भाले-गड़ासे हैं, ईआजी" "इसका मतलब?" "आपका पोता शंतानों का जुलुम कभी बर्दाश्त नहीं करेगा।" "सच !" ईआजी अह्लाद मे वोलती हैं, भगवान करे, तुम्हे ऐसे इक्कीस बेटे हो!" "धत् !" रेवती लजाकर वहाँ से उठ जाती है। समय गुजरता जा रहा है। रेवती को नहर की तरह यहाँ का इलाका भी तनावपूर्ण होता जा रहा है। मजूरो, बनिहारों और कमजोरों को कभी भी आदमी नही समझने वाली शोपकों की मुट्ठी भर जमात भी भयभीत रहने लगी है ? एक छोटी-सी बात ने रतनपुर के इलाके में नई लड़ाई की शुरुआत कर दी है। रतनपुर शहर से दक्षिण वाईस मील की दूरी पर बसा है। रहा लोग बस से जाते हैं और वस जहाँ तक पहुंच पाती है वहाँ से तीन सील पैदल या बैलगाड़ी से लोग रतनपुर पहुंचते हैं। रतनपुर में कुल एक सौ चालीस परिवार हैं, जिसमें पच्चीस परिवार राजपूतों के हैं। बाकी सब परिवार रजवाड़, तेली, धोबी और दुमाध जातियों के हैं। ये जातियां पिछड़ी मोर अनुमूचित जातियां हैं। जमीन का ज्यादा हिस्सा उन पच्चीस परिवारों के पास लगभग च्चीस दीर्घ में लेकर साठ बीघे तक है। इनमें शिवजी मालिक को एक सौ पचास वीघे जमीन है। इनसे वत्री हुई जमीनें सिर्फ पांत्र परिवारों के पास डेढ़ से तीन वीये तक हैं। वाकी सभी भूमिहीन हैं। इनकी झोपड़ियाँ जिन जमीन पर हैं, उस जमीन का कानूनी परवा इनके पास है। खेत मजूरों में जो कमिया है उसे इस इलाके में हरवाह कहा जाता है। रतनपुर का टोला, जहाँ रेवती रहती है, छुछ हरिजनों-मार और दुसाधों का टोला है जो रतनपुर के कमिया मजूर हैं जिन्हें रतनपुर के मालिकों की इजाजत के बाद ही दूसरे गाँवों में हरवाही करने का हक है। इस टोले में सुबल का वाप रतनपुर के शिवजी मालिक का वन्घुला या यों कहिए कि कमिया मजूर था। उसका बड़ा बेटा सुदेव परदेश भाग गया है और छोटा नुवल मालिकों से 'विद्रोह' कर गया है। नालिक के भीतर-भीतर यह बाग कब ने सुलगा रही है। गांव की जनीन बहुत उपजाऊ है। यहाँ जाल में तीन फसलें होती हैं। शिवजी मालिक के अलावे भी यहाँ तीन के पास टक्टर और पम्पिग सेट फिर भी, नहर से सिंचाई के लिए पूरी सुविधा है। डेहरी-ऑन-सोन से आने वाली नहर गांव के बिल्कुल पास के घरों ने सिर्फ पचास गज की दूरी से गुजरती है। पिछले साल से ही यहां मालिक और मजूरों का सम्बन्ध बिगड़ता आ न्हा है । मालिकों ने अचानक मजूरी की शर्तों में तब्दीली कर दी है। हर- वाहों को वाईन कट्टा जमीन जनाज के लिए दो कट्टा जमीन गन्ने के लिए मालिकों से मिलती रही है। पिछले साल मालिकों ने बचानक वाईन कट्टा से जमीन घटाकर चौदह कट्टा कर दी और गन्ने के लिए जमीन देनी बन्द कर दी। उन्होंने हरवाह को दिया जाने वाला धान भी बीस मन से घटाकर दन मन कर दिया है। मजूरों ने भी जिद ठान ली है कि वे यहां के मालिकों को छोड़कर दूसरे गांवों में जाकर हत्वाही और वनिहारी करेंगे। मालिक लाठी और भाले के साथ गांव के सीवान पर खड़े हो गए.-ससुर लोग गाँव छोड़कर दूसरी जगह जाएंगे तो हमारा काम कौन करेगा? मगर पता नहीं, इनमें भी हिम्मत कहाँ से बा गयी है। वे ये मालिकों की वदलो हुई शर्त पर काम करने के लिए तैयार नहीं हैं। नालिकों ने दूसरे गांवों से मजूर मंगवाने शुरू ८४/उत्तरगाथा कर दिए है। सबसे बड़ी बात तो यह है कि मालिकों ने अपनी जिद के लिए एक बहुत बड़ी परम्परा तोड दी है-उन्होने हल वी भूठ स्वयं पकड़ ली है। हमारे यहां ब्राह्मण, राजपूत, भूमिहार हन तक नहीं छूते । इमलिए उनके बीच के दो-तीन दीये जोत वाले भी वेचारे परम्परा के चलते हर- वाह रसने के लिए मजबूर हो जाते हैं। फिर भी कही-कही ये लोग परस्पर को ठेंगा दिसलाते हुए भी हल को मूठ को पकड लेते हैं और बैल के परि- हद मे जनेउ लटकाकर खेत जोत लेते हैं। मालिको की कतार से इन्हें कोई अलग भी कर दे तो कोई बात नही । मगर ये ऐसी झूठी परम्परा को सीना तानकर इनकार करने लगे हैं। दग-पन्द्रह दिन पहले की घटना है। पडोस मे जिला के बोदरा गांव से छोटे-छोटे कुछ व्यापारी रतनपुर थाए थे। उन्होने यहां के किसानो से दस गाड़ियों में चावल खरीद लिया और दाम चुकता करने के बाद जैसे ही सीवान से बाहर हुए कि रतनपुर के मालिको ने ही दोहरी चाल चली। मालिको ने अपने गुडो को ललकार कर व्यापारियो का अपना ही धेचा हुआ चावल लुटवा लिया मोर स्वय पुलिस थाने मे जाकर प्राथमिकी दर्ज करा दी कि कुछ लुटेरो ने वोदरा गांव के व्यापारियो का दम गाड़ी चावल लूट लिया है। इसी घटना के चलते चौवालिम हथियारबंद पुलिस रतनपुर और उसके टोले में छः बजे सुबह पहुंच गयी है। तमाम मजूर अपने-अपने परो में दुबके हुए है । परन्तु पुलिस इनकी झोंपड़-पट्टियाँ उजाड रही है और मालिको की सहायता से मजूरों को बाहर खीच-सोचकर बेरहमी से पीट रही है। गनेमी दुसाध को मालिको ने गोली मार दी है और उसकी देह को घसीटते हुए नहर तक ले गए है । इससे भी मन नहीं भरा है तो रामा- नन्द बाबू और रामेश्वर बाबू उसकी छाती पर बैठ गए हैं और छूरा से उनके पेट से रोकर गुप्तांगों तक चीरकर अट्टहास कर रहे हैं । फेकन दुमाघ, बालगोविन दुमाघ और रामनाथ तेली जिसे शादी के बाद अपनी मेहरारू साए आठ दिन ही हुए है, तीनों को घसीटकर पुतिस गाडी तक ले गए हैं। गोदावरी के पेट में ही बच्चा मर गया है। रेवती के बाल पकड़कर मालिक लोग पुलिस गाड़ी तक घसीटते हुए रो गए हैं। उसकी गोद मे सात-आठ दिन का मासूम बच्चा है और लव माँ के पास अवमरा चीख रहा है। पुलिस बार-बार रेवती से सुवल का पता पूछ रही है । सुवल उसका देवर ही नहीं, अब तो मरद भी है। रेवती पर पिछले भी कई इल्जाम हैं। सुवल पर मालिकों ने व्यापारियों का चावल लुटवाने का इल्जाम मढ़ दिया है। ईआजी के चीखने-चिल्लाने से क्या होता है ! पुलिस गांव के कई निर्दोष और अनाड़ी युवकों के साथ रेवती को भी 'लाल दरवाजा' ले गयी है। टोले में लगातार कई दिनों से सन्नाटा है। सुबह-शाम छप्परों का सुलगना कई दिनों से बंद है । बचे हुए लोगों में अधिकांश टोले से भागे हैं। मगर ईमाजी भी गजव 'कठजीव' है-घर के अन्दर ही पड़ी हैं। गोदावरी का बाप भी सबको छोड़-छाड़ कर भाग गया है। सम्पूर्ण टोला श्मशान से भी ज्यादा भयावह और सुनसान लग रहा है। ईआजी के हाथों में कोई एक पोस्टकार्ड दे गया है। यह किसका पोस्टकार्ड हो सकता है ! कनेआ तो जेल में हैं । बाबू विदेसिया हैं--परदेस में ही भुला गये हैं। उनको क्या पता है कि गाँव-घर में भूकंप हुआ है। पहले की सारी दुनिया बदली हुई है। अब तो महतारी होकर भी ईआजी ने बेटे की ओर से कलेजे पर पत्थर बाँध लिया है। सुदेव अब क्या आयेगा! वह अव कभी नहीं आएगा। अव तो हमें भी इस धरती से धो-पोंछकर मिटाने का संकल्प मालिकों ने कर लिया है । इस हालत में बाबू परदेस में ही रह जाय तो अच्छा है। 'अपना देश' ही कहाँ रह गया है। जमीन-जाय- दाद, नहर, पुलिस, न्याय-सव पर तो उन्हीं का कब्जा है। कनेआ भी वावू के हाथ से निकल गयी है। पता नहीं, वह जेल में ही रुड़ जाएगी या कभी वाहर आने का भी भाग्य होगा! कनेमा को बाहर लाने वाला कहाँ कोई रह गया है। सर्वत्र अन्धेरा है-कुप्पाकुप अंधेरा! पोस्टकार्ड पढ़ने वाला कोई नहीं है । ईआजी मोड़-चमोड़ कर पोस्ट- कार्ड को अंचरा में बांध लेती हैं। सुबल भी बेटा है तो क्या-ईआजी के लिए तो वह भी मुर्दा है। ऐसी माफत में मेहरारू महतारी और दो-दो लड़कों को छोड़कर कहां मर रहा १६/उत्तरगाया है ? दुनिया के लिए 'सुराजी' बनता होगा। यहां तो तमाम अपने लोग "जेहली' हो गए हैं। आज से जिन्दगी भर के लिए 'जेहल' काटने के दिन शुरू हो गए हैं। ईग्राजी को पोस्टकार्ड के अक्षरों में अब कोई उत्सुकता नहीं रह गयी है--सुदेव, सुबल और कनेमा तीनों का ठौर वे जानती हैं । चौथा उन्हें कोई भी पोस्टकार्ड लिखने वाला नहीं है। ईआजी गांव छोड़कर जा रही हैं--पता नही, कहाँ ! कोई सीवान पर लाठी के सहारे खड़ा-खड़ा गा रहा 'तनी खाड़ा होके सोच 5 एक छन भइया, काहे चलत बाटे गोली दनदन भइया, केहु के मतुना या अन्न, भरल बाटे लास मन केहूँ के मरलो प जुरे ना कफन भइया." १० जेहल की दुनिया-रेवती के लिए एकदम नई दुनिया है। तरह-तरह के वार्डर, तरह-तरह की मेहरारू । रेवती कम्बल विछाकर लव-कुश के साथ रात-दिन पड़ी रहती है । लव के माथे पर चोट आ गयी थी। धीरे-धीरे घाव मूख रहा है । वार्ड लम्बा-चौड़ा है। मगर दस से ज्यादा औरतें उसमें नहीं है । तरह-तरह का पहनावा, तरह-तरह की बातें । एक पूरव देश की जनाना थी जहाँ 'वो' विसारकर चले गए हैं। दांतो मे मिस्सी लगाती है, सिपाहियों से लुक-छिपकर पान मंगाकर साती है और उन्ही के सामने वीड़ी मांगकर पी भी लेती है। बाप रे ! वार्डरों के साथ तो उसका मुह ही नहीं सटता । रेवती को अब पता चला है कि वह पाकिटमार जनाना है, रेल मे यात्रियों की जेब काटती है । रेवती ने औरतों के बारे में ऐमा कमी नहीं सुना है। वह जनाना अजीब तरह की कुर्ती पहनती है। छाती से एक इन्च ऊपर, बाकी पेट बिल्कुल नंगा रहता है। तिरी माग काढ़ती है मौर पतली लकीर की तरह सिन्दूर भी लगाती है । तब क्या इमे अपना मरद भी है ? तव काहे लुच्चे सिपाहियों के साथ इस तरह हटर-हटर बतियाती रहती है ? वार्डरों की एक भी वात खाली नहीं जाने देती, मुंह तोड़ जवाब देती है। नाक में पान-फूल छूछी, कानों में सोने की गोल-गोल बालियाँ, जैसे ईआजी की किस्सावाली इन्दर की रानी हो । वह साड़ी भी गजब तरह से पहनती है। कमर के चारों ओर ऐसे लपे- टती है जैसे केले के पत्तों के भीतर की नई कोपलें हो। खाली दो ही चोटियाँ लटकाती है और ललाट पर मैनी गाय की सींग की तरह चार-पाँच बालों की घुघराली लटें बाहर कर देती हैं, जैसे हवाएं स्वयं खींच लायी हों। कभी-कभार वार्डर उसकी छातियों पर ऐसे अँटकता है कि वह समझ जाती है और हँस-हँसकर गालियाँ बकती हुई मुंह फेर लेती है। रेवती उदास कोने में पड़ी रहती है और वरावर रोती है। वार्ड की औरतें तरस खाती रहती हैं। उसके बच्चे को गोद से लेकर प्यार करने लगती हैं । वेचारी कुछ वोलती नहीं है । जनाना वार्डेन भी जब तक उससे बहुत कुछ पूछने की कोशिश करती है। मगर मरद सिपाहियों की तरह वह भी मजाक शुरू कर देती है। 'साली के दो-दो मरद हैं तब भी क्या, इसके शरीर का वाल भी बांका नहीं हुआ है। दोनों जरूर पुस्ट सांड़ होंगे तभी इतने वजनदार दो-दो बच्चे व्याई है ? . 'खूखार डकैत है। मरद के साथ मिलकर चावल लुटवायी है । उस पूर्वी पाकिटमारिन से यह कम है क्या? ."खाली इसका चेहरा मासूम है, भीतर से तो काठ है-काठ !" रेवती जैसे कुछ सुनती नहीं है, विफरती रहती है। वह तिरछी माँगवाली जनाना उससे पूछती हैं, "कहाँ से आयी हो?" रेवती लजाती है "अरे, बोल भई ? कहाँ घर है तुम्हारा?" "रतनपुर का एक टोला है।" रेवती सिसकती हुई वोलती है। "इसी जिले में है ?" पहली बार रेवती की उससे इतनी ही बातें हुई हैं। धीरे-धीरे वह उसका नाम भी जान गयी है। जमादार जब-तक उसका नाम लेकर पुका- रता है---अंजु ! आज तक नहर या ससुराल उसने अंजु नाम कभी नहीं c८/सत्तरगाथा मुना है । अंजु के साथ उसको झिमक खत्म हो गयी है। अंजु उससे दूसरी बार फिर सवाल करती है. "डकती में रहती हो?" रेवती अचानक आंखें तरेर लेती है, "क्या वकती हो, अंजु दी? हमारे पानदान ऐसा कोई नहीं है। हमारे सवांग लोग तो मजूरी के सवाल पर लड़ते है । रतनपुर वालों को नाहक सताया गया है ?" "तब चावल किसने लूटा है।" "रतनपुर के किसानो ने?" "वे भी तुम्हारे साथ जेल आए है ?" "सभी बेकसूर पकड़कर लाए गए है।" रेवती क्रोध में बोलती है, "वे जेल में आने लगें तब तो जमाना बदल जाय। मगर उन्ही के लोग तो पुलिस में है । वे जेल कैसे आ सकते हैं ?" रात मे कैदी नम्बर दे रहे है। रेवती को नीद नहीं आ रही है। वह अंजु के ऊपर मे धीरे से कम्बल खीचती हुई पूछती है, "अंजु दी, एक बात बताना तो?" "क्या है, रे?" वह हड़बड़ाकर उठती है। "ये लोग कौन है ?" "कौन लोग रे?" ग्रंज झंझलाकर फिर लेट जाती है । "वही जो एक साथ गा रहे हैं।" "ऐसे लोग तो रोज दस-बीस आते रहते हैं।" "कौन लोग है?" "सत्याग्रही है।" "सत्याग्रही माने ?" "तुम्हारी ही तरह के लोग हैं।" अंजु कम्बल तानकर अपना मुंह ढंक लेती है। "सो जा चुपचाप।" "तब क्या ये लोग सुराजी हैं !" रेवती होठों में फुसफुमाती है । उसे सुबल याद आने लगता है। गीत की और उसका ध्यान केन्द्रित होता जा रहा है। गीत के साफ-माफ शब्द उसे सुनायी पड़ने लगे हैं- तनिक ठाड़ा होके सोच एक छन भइया काहे चलत बाट गोली दनदन मइया । सत्तागापा./ केहु के केहु के नतुना वा अन्न भरल वाट लाख मन दुलम बाटे खरची हरदम भइया तनिक ठाड़ा होकेऽ सोच ऽ एकछन भइया । केहु के रंग-रंग के ड्रेस भरल वाटे सूटकेस केहु के मरलो प जुरे न कफन भइया तनिक ठाड़ा होके सोच 5 एकछन भइया । सुबह नम्बर खुलते ही पुरुष वार्ड में जोरों का हंगामा सुनायी पड़ता है । "जेल के अंदर कैसा हंगामा है, अंजु दी?" "सिपाही कैदियों की डंडा लगा रहे हैं।" "क्या मतलब ?" "नम्बर से निकलना नहीं चाहते होंगे।" "पुलिस यहाँ भी वेरहम है न ?" "यह तो हर जगह वही है।" अचानक पहली रात की तरह ही फिर बगल वाले वार्ड से ही कोई तान छेड़ता है, उठ जाग मुसाफिर भोर भई अब रैन कहाँ जो सोवत है ! जो सोवत हैं सो खोवत है, जो जागत है सो पावत है! "इसका क्या मतलब है दीदी?" रेवती गीत का मतलव न समझती हुई पूछती है। "यह भी कुछ कैदी मिलकर गाते हैं।" "किसलिए?" "सुनती हूं इसे गाने वालों की सजा कम कर दी जाती है।" "तव हम लोग भी मिलकर इसी भजन को क्यों नहीं गाते हैं कि हमारी भी सजा जल्दी खतम हो जाएगी।" अंजु इसकी अवोधता पर हंसती है, "मुझे तो खुद नहीं मालूम कि मेरी सजा कितने दिनों की है । तुम्हें मालूम है क्या ?" रेवती सिर हिलाकर अपनी अज्ञानता प्रकट करती है। ६०/उत्तरगाथा
"यहां बहुत ऐसे कंदी हैं जिन्हें अपनी सजा की मियाद बिल्कुल मालूम
नहीं है।"
दूसरे दिन नम्बर बंद करते समय रेवती जमादार से पूछती है, "रात
में वह गीत गाने वाले कौन हैं ? वे क्या गाते रहते हैं ?"
जमादार उसका कुछ जबाव नही देता है, कुटिलता से मुस्कुराकर
पास खड़े सिपाही से पूछता है, "गनपत सिंह ?"
"जी, हजूर ।"
"इस जनाना को जानते हो?"
"देखता हूँ हजुर ।"
"कैसी है?"
"बहुत मच्छी है।"
"मेरा मतलब नहीं समझ, गनपमिह ?"
"समझ गया, जमादार माहव ।"
"क्या समझ गए ?"
"दो लडकों के बाद भी यहुत काम के लायक है ।" कहते हुए सिपाही
लाकर हंसता है।
रेवती गोद के बच्चे को जमीन पर धम्म से पटकती है और लपककर
दरवाजे की सलाखें पड़कर चिल्लाती है," इघर मा जमादार के बच्चे ?
तुम्हारे मुंह के भीतर में तुम्हारी जवान सीच लू? प्रादमी के लायक नहीं
रह गया है।"
जमादार भी वैया की तरह हम देता है और वाभियों के गुच्छे
नचाता हुआ मागे बढ़ जाता है। सिपाही भी दुम की तरह उसके पीछे-
पीछे हिलता जा रहा है।
"ये लोग इमी तरह हमेशा मनाप-शनाप बकते रहते है।" एक औरत
कहती है।
"और तुम लोग बर्दाश्त कर लेती हो?"
तव हम
लोग क्या करें?"
"तुम लोग मेरा साय दो। हम लोग उसे पकड़कर सूर्य मार मार?"
कुछ तो रेवती का मुंह ताकती रह जाती हैं। मगर कुछ रेवती को
नादान समझकर हंस देती हैं। "सुनती हूँ एक जमाना आजादी मिलने के पहले सुराजियों का भी था। उनकी वार्डरों के साथ खूब ठनती थी।" अंजु उन्हें अनुभवी की तरह बताती है, "वे सिपाहियों की टाँग पकड़कर खींच लेते। मगर अब वह जमाना कहाँ रहा ?" "क्या बात करती हो अंजु दी," रेवती कहती है, "अभी क्या हम सुराजियों से कम हैं ? आँखें निकाल लूंगी। उन्हीं जालिमों के कारण तो यहाँ सजा भुगत रही हूँ। मुझे डामिल-फांसी का कोई भय नहीं है।" जनाना वार्डेन खड़ी-खड़ी उनकी बातें सुन रही है। वाप रे ! यह जनाना तो नम्बरी खूनी है दादा ! इसके बारे में जेलर साहब को रपट करनी चाहिए । रेवती नामक इस जनाना को अकेली कोठरी में वन्द रखा जाय ! जमादार और जनाना वार्डेन की रोज-रोज की शिकायतों से जेलर वे भी कान खड़े हो गए हैं। जेलर सोचता है, इस खूखार औरत के बारे में यह भी पता लगाना जरूरी है कि इसका पिछला इतिहास कैसा है ? रेवती के बारे में जेलर इतनी ही सूचनाएं इकट्ठा कर सका है कि इस औरत का चाल-चलन ठीक नहीं है। कपड़े की तरह मरद बदलती रहती है। इसका पहला मरद परदेस गया है जो आजतक नहीं लौटा। दूसरा व्याह होते ही छोड़-छाड़कर लापता है और डकैतों के गिरोह में शामिल हो गया है। इस बीच पता नहीं कितने मरद बदल चुकी होगी। जेल अधीक्षक जेलर की बातों से सहमत है और रेवती अलग कोठरी में डाल दी गयी है। अब वार्डरों अथवा अन्य अधिकारियों को रेवती से मजाक करने का बड़ा ही एका त स्थल मिल गया है.। जमादार तो गनपत सिंह को लेकर बिना ड्यूटी के भी उधर पहुंच जाता है और रेवती से ही रातभर कोठरी के अन्दर ही गुजारने की इजाजत माँगता है। रेवती घबड़ा गयी है। दोनों लड़के एक साथ चीखने लगते हैं तब रेवती पागलों की तरह हाथ-पांव दरवाजे की सलाखों पर पीटती है और फूट-फूटकर रोने लगती है। "सुबल भी जाने कहाँ मर गया है ? रेवती दिन-प्रतिदिन सूखती जा रही है। नई जमादारिन एक महिल के साय साना देने के समय प्रायः रोज आ जाती है । जमादारिन रेवंती को वैसी खूसार नहीं लगती है । यहुत सोच-विचारकर एक दिन रेवती पूटती है, "दीदी, बाप हमारी अंजू दो को जानती हैं न, वह सात नम्बर में है।" "जानती तो हूँ। मगर क्या बात है ?"जमादारिन को बडी-बही आंसें उसके सम्पूर्ण चेहरे पर फैल जाती है । रेवती उसके चेहरे पर अटकते हो सहमती है। मगर फिर साहस बटोरकर कहने लगती है, "मुझे अंजू दी से वात करा दो, दीदी !" "यह कैसे हो सकता है ?" जमादारिन बनावटी डोट के लिए फिर अपना चेहरा बिगाड़ लेती है। "तुम मुझे गेलर समझती हो क्या ? मेरा मतलब है मैं उसकी तरह कैदियो के साथ निर्दयी नहीं हूं। परन्तु मुझे भी कोई पावर है ? कुछ नहीं है ? वही में इजाजत मिल जाए तो सब कुछ करा सकती हूँ।" "तुम्हारी पांव पड़ती हूँ, दीदी...!" रेवती फफक-फफककर रोने लगती है। जमादारिन झंमलाती है, "तुम समझती क्यों नहीं कि मैं तुम पर दया भी नही दिसला सकती। जेल का ऐसा ही मैनुअल है-कायदा है। अंज को यहाँ लाना या तुम्हें ही साथ में ले जाना इतनी प्रासान बात है ? वाबा र ! मेरी नौकरी तो जाएगो हो। मुझे भी जेलर पकड़कर तुम्हारी ही वगल में ढूंम देगा समझी?" "मुझे तुम्हारे साथ बहुत अच्छा लगेगा, दीदी ! .."बहुत अच्छा लगेगा ! मेरे इन बच्चों पर तरस सामोगी नहीं ? .."मेरे दो-दो मरद हैं, दीदी "दोनों-के-दोनों मर गए है। घर पर ईआ जी हैं, ठीक तुम्हारी जैसी। उफ! पता नहीं, कहाँ होंगी?..." वह जोर से रोने लगती है। जमादारिन घवडा जाती है और डरने लगती है। वह फिर बनावटी डांट से वोलती है, "जोर-जोर से चोरोगी तू ? कहीं जेलर चला आया ता उल्टा मुझे ही पास करने लगेगा। उमके वांस करने का मतलब है तीनो लोक से जाना। ना वावा ना, मुझे अपने बाल-बच्चों को भूखा नहीं मारना है। सबको अपना पेट प्यारा होता है'"सबको"!"जमादारिन बुदबुदाती हुई चली जाती है।
। रेवती रेवती फिर जमीन पर लेट जाती है और लड़कों के साथ रोने लगती है। इस 'काल कोठरी' में तो दिन काटे नहीं कट रहा है। इन दीवारों को तोड़कर कैसे निकल भागे रेवती ? हरामी 'मरदों' ने तो सारी ताकत ही छीन ली है । कायर की तरह मुंह छिपाए बैठे हैं। सुबल को पता चल नहीं गया होगा कि उसकी बेकसूर मेहरारू जेल में है? हवा का तवा हुआ झोंका भुरकी' से उतर-उतरकर आता है रेवती की छाती पर सवार होकर लगातार मुक्का मारता चला जाता है। विदेसिया तो विदेसिया 'यह नया साँग सुबल भी अपनी सारी खुशी और बल छीनकर चला गया है। ठंडी बयार तो मन को और भी कमजोर बना देती है। अंजू दी के साथ का 'सुराज' पापी जेलर ने छीन लिया अपना सर्वस्व हारकर इस 'कालकोठरी' में छटपटा रही है। ऐसी स्थिति में हठात मोती पता नहीं कहाँ से ध्यान में प्राकर धंस गया है ! बहुत कोशिश कर रही है रेवती, उसके क्रोधाग्नि में मोती का ध्यान जल जाए। मगर मोती का ध्यान तो मेले की तरह फैलता जा रहा है। ध्यान इतने मधुर होते हैं, इतने मीठे' कि चरवाही में मोती के विरहे याद आने लगते हैं, "रसे-रसे वंसिया वजाऊ रे सँवरिया, छूटल संघतिया वा मोर लोढ़ी-लोढ़ी कुसुमी के कटिया डगरिया से छतिया के देत वा खखोर" सच रे पापी जेलर ! ईश्रा जी अकेली होंगी ! सारी बकरियां मार-मारकर अब तक 'मुदई लोग' हजम कर गए होंगे। अपना टोला तो उसी तरह उजाड़ होगा---एकदम पतझड़ और विरान । खाली सिपाहियों को बूट से पत्ते खड़खड़ाकर चूर-चूर होते होंगे और चारों तरफ भय की असंख्य परतें घहराने लगती होंगी। ईप्रा जी उस वीराने में खर्ची कहाँ से लाती होंगी, जीती कैसे होंगी ! "ईआ जी से सुनी हुई फूलबसिया की कहानी रेवती को अक्षर- अक्षर याद है। 'फूलवसिया जब राजा के छोटका वेटा के साथ प्रायी तो इन्दर महाराज को नचा के छोड़ दिया था। दूसरे की बेटी-बहिन पर शैतानी नीयत रखनेवाला इन्दर फूलबसिया के सामने थर्र मारने लगा है। . .. ६४/उत्तरगाथा कहने के लिए भले ईआ जी की कहानी पिछले युग की हो, मगर रेवती तो आज भी फूलबसिया से कम नहीं है। मुदई लोगो को मजा पखाने की हिम्मत रखती है । जेल से छूटते ही मालिकों से गिन-गिनकर बदला लेगी। जेल से छूट तो ले ? उमी दिन उन्हीं को बन्दूक से दाग देगी ! .."धरती से हमेशा के लिए जुतुम की विदाई कर देगी ! गांव-गिरान के लोग भी समझेंगे इस युग में भी फूलबसिया जिन्दा है। डोमिन फूलवसिया ने इन्दर को मात कर दिया था। रतनपुर के कई हत्यारो को मात करना है। "एक-मे-एक इन्दर वहाँ है। शिवजी मालिक की आंखें न निकाल ती तो रेवती नाम नहीं। जेल में रेवती का यही एक संकल्प है ! याधी-आधी रात को रेवती को लगता है, कई लाख आवाजें 'फूल बसिया', 'फूल बसिया' कहकर पुकार रही हैं । "डोमनी तोर फुलवा के मारल मिरगवा जरि गइले सरग कठोर..." खूब छक-छककर गाता है इन्दर ! लोग झूठ-मूठ कहते हैं कि वह बादलो का राजा है । घरती माई की प्यास बुझाने के लिए इन्दर इतना दुराचारी कैसे हो गया है। ऐसे दुराचारी को हम लोग ऊंचा पोढा कैसे देते हैं ? इसके माथे पर इज्जत का सेहरा कोन बांधता है ? शिवजी मालिक का पूत ! मूड़ी मरोड़कर हांडी में कसने के लायक है। रेवती चिहुक-चिहुक उठती है, जैसे 'लरकोर' सपनाती हो।"मुरकी के उस पार जामुन के पेड़ की कल्पना करती है, जिस पर बगुले के जोडे अंजोरिया में चमकते हैं। नीड़ साली है, जोर्ड टाल पर फुदककर एक- दूसरे से सटे-सटे बैठ हैं। दुनिया से निश्चिन्त । जैसे जीवन में कही किसी हलचल या तूफान का संकेत नही हो । रह-रहकर डंने फड़फड़ाते हैं, जैसे जिन्दगी के सारे विघ्नों को झाड़ रहे हो। ""यहाँ फूलबसिया नीड़ में अकेली है। दांत किटकिटाए भी तो किस पर? सामने लोहे की लम्बी तनी छड़ !'एक नही, दो नहीं, कुछ मिला कर वारह । निकल भागना मुश्किल है। पंस भी उगे तब भी छड़ों के बोध रेता कर टुट जाएंगे। जेल के सामने ही जेलर की कोठी है। संतरी !
.. , वैनट पर ही लोक लेंगे! जेलर है या बहेलिया ! आदमी कभी अकेला नहीं रहता। मगर बहेलिए ने रेवती को इस कोठरी में अकेला डाल दिया है। कभी-कभी सोचती है, अपने नम्बर का फाटक तोड़कर उड़ जाय।"ईमा जी के पास ! टोला-पड़ोस के लोगों के पास! सोच-विचार करती रेवती भोर कर देती है। इधर जमादारिन नम्बर खोजती है, उधर हर रोज की तरह प्रभाती गूंजती है। "उठ जाग मुसाफिर भोर भई, अब रैन कहाँ जो सोवत है जो सोवत है वह खोवत है, जो जागत है सो पावत है: रेवती रैन को सोचकर काटती है और भोर जागकर। बरावर की तरह जमादारिन अपनी भद्दी और डरावनी आँखें फाड़कर दरवाजे पर मुस्कुराती है। रेवती अनायास ही पागल की तरह पूछ देती है, देती है, "मेरा नाम जानती हो, जमादारिन जी?" उसके मुंह से 'दीदी' न सुनकर जमादारिन को कुछ-कुछ अचरज होता है। "जानती काहे नहीं हूँ रेवती नाम को?" "उहुंक !" "फिर ?" "फूलवसिया।" "फूलवमिया ? जमादारिन चकराती है। "हूं ! यह घर का नाम है, ईआ जी का दिया हुआ।" "कोन ईआ जी?" "मेरी सास । ठीक तुम्हारी उमिर की।" जमादारिन क्या समझती है फूलवसिया को? वह पगली समझकर टाल जाती है और कहती है, "ये लो किताव । कल शाम को ही सात नंवर वाली अंजु ने दिया था। जेलर से 'ओडर' करा लिया है। जेलर बाबू तुम्हारी पढ़ाई की बात से बहुत खुश है। तुम सबके लिए कोई सरकारी मास्टर आनेवाला है।" "मुझे मास्टर की जरूरत नहीं है, पढ़ना जानती हूं।". "इसीलिए तो किताव लायी हूं।। रख ले इसे ?" ६६ / उत्तरगाथा रेवती उसके हाथ से किताब ले लेती है। वह किताय को उलटती- पलटती पूछती है, "सरकार जेल भी देगो और पढ़ाई भी कराएगी, इसका क्या मतलब है ?" "गांधी जयन्ती के दिन से।" वह रेवती का मतलब नहीं समझती ?" "गांधी जयन्ती का मतलब?" "जेलर से पूछना।" जमादारिन बड़बड़ाती हुई चल देती है, साली का भेजा खराव है...? रेवती सोचती है, जेलर से लेकर कैदी तक गांधी जी का बहुत नाम ते रहे हैं । गांधी जी के कहने पर ही तो उसके बाबू 'सुराजी' बने थे और गांव के ही कुछ धनी वावुओ ने अंग्रेजों से मिलकर मुखबिर का काम किया था।वाबू बीच वधार में अंग्रेजों की गोली खाबर मरे थे। गांधी जी इस दुनिया में नहीं है और न रेवती के बाबू ही रह गए हैं । परन्तु रेवती का सारा परिवार ही सुराजी है-चाचा से लेकर साग तक ! रेवती को यही बात समझ में नहीं पाती कि गांधी जी का नाम लेकर सब कुछ कहनेवाले लोग इतने निर्दय कैसे हैं ? गांधी जी ने ही तो हम सुराज दिलाया है । जमादारिन भी गाँधी जी का नाम बड़ी श्रद्धा में तती है। यह धीरे-धीरे समझ गयी है कि यह भी हवावाली औरत है। जेलर त नचाता हुआ प्रायः हर वार्ड के सामने से दिन में दो-तीन बार चक्कर लगा जाता है। रेवती उसे देखते ही घृणा में उबलने लगती है, परन्तु बनावटी दिनम्रता ओढकर चुपचाप हाथ जोड लेती है। "गया है रे औरत ? बच्चे किस तरह हैं ?" जेलर सलासोपर बत मारते हुए पूछता है। रेवती सहमकर पौधे की दीवार से टकराती है । "सब आपकी दया है, सरकार!" "गांधी जी को तू भी जानती है ?" "भरे गांव-घर के सभी लोग जानते हैं, सरकार!" जेलर अट्टाहाम करता है । "जमाना एक्दम बदल गया है। है न ? सभी चार-डकत भी उन्हे जानने लगे हैं।" "यह सब तो आपकी चिन्ता है, सरकार। मैं क्या जानती हूँ ?" ।
। "वाप रे!" जेलर जोर से बोलता है। "किताव भी पढ़ लेती है तू ?" आँखें फाड़कर जमीन पर पड़ी एक पतली-सी किताव की ओर देखता है। "इसे दीदी दे गयी थी। पढ़ने में मन बिलकुल नहीं लगता है।" "क्यों?" "यह तो मेला घुमनी' किताव है। ऐसी किताब मैं नहीं पढ़ती।" "साली भारी चार सौ बीस है।" जेलर गलियाता हुमा वगल के वार्ड की ओर बढ़ता है। रेवती मुंह में थूक वटोरकर वहीं से फेंकती है। जेलर अगर सलाखों के सामने खड़ा होता तो उसके मुंह पर थूक भचाक से आकर पसर जाता। जेलर की पीठ पर नजर गाड़ते हुए रेवती बड़बड़ाती है, "सुन लो जेलर साहेब, मैं असली सुराजी की बेटी हूं। आँखें निकाल लूंगी? 'तुम्हारी सही जात मैं पहचान गयी हूँ। तुम सब एक हो। मुझे जामिल-फांसी की कोई चिन्ता नहीं है।" जमादारिन पता नहीं किधर से आकर पूछती है,"किससे बकवास कर रही थी तू ?" "वही जेलर का बच्चा अभी गलियाकर चला गया है।" जमादारिन गिद्ध की तरह आँखें फैलाती है, “गलिया तू रही है और उल्टै जेलर बावू वेचारे को बुरा-भला बकती है ? वह अपने सात साल के वच्चे की उँगलियाँ पकड़कर खींचती है। रेवती की नजर जब उसकी आँखों की ओर जाती है तब उसके मन में जमादारिन के प्रति एक अजीव तरह का घृणा मिश्रित मजाक उठने लगता है। वह कहती है, "लड़के को पहली बार यहाँ लायी हो, दीदी। बच्चा तुम्हारा ही है न ?" जमादारिन चौंकती है। "तव क्या तुम्हारे बाप का है ?" "भगवान न करे यह मेरे वाप का हो।" "इतनी जवानी में मत ऐंठन रख रेवती!" जमादारिन उसे समझाने की चेष्टा करती है । "दो बच्चे हो गए हैं। अब जवान नहीं रही है तू।" "मगर तुम तो अभी भी बहुत अच्छी लगती हो । जवानी चढ़ने पर सुनरी भी बहुत अच्छी लगती है। काहे जमादारिन जी?" रेवती हँसती ६८/ उत्तरगाथा
जादा९
"अभी जेलर से डंडा करवाती हूँ।"
'रेवती खिलसिकरहनती है। "मुनती हूँ, इस लड़के का बाप भी
कोई सिपाही है। है न, दीदी?"
"तुम्हें फिसने बताया ?"
"सुनती हूँ कि तुम लोगों के अधिकांश लड़के नेतर से लेकर सिपा-
हियों तक के ही हैं । तुम्हारे बारे में तो बिलकुल परको सवर है।"
"मेरे बारे में कौन अन्ट-मान्ट बक्रता है ? बता दे तू उसका नाम
अभी? देखना, मैं उसका क्या करवाती हूं।"
"तब ही बता दूं, जमादारिन जी ?"
"हो, तू सच ही बता दे।"
"तचमुच ?"
"देश, तू वुझौवल छोड़ ! सच बोल।"
"अच्छा तो लो जमारिन जी, सच बोलती हूं। मुझे अंगूदी यता रही
यो।"
"बह सात नम्बर वाली?"
"हो, जमादारिन जी ?"
जमादारिन एकदम हैरत में पड़ती है। "इस यार्ड में आने के बाद
तुम्हारी मुलाकात अंजू से नहीं हुई । एकदम झूठी बात है।"
"सात नम्बर मे तो मैं भी रही हूं। तभी बता रही थी।"
"पहले तू मुझे कैसे जानती थी?"
"बड़े नामो के साथ तुम्हारा भी नाम सुनती थी।" रेवती के मुंह
अनायास ही सारी बातें निकलती जा रही हैं । उसे इन सारी बातों से क्या
वास्ता? मगर जमादारिन समझती है कि सच्चाई कहाँ है ? सच्चाई है
तभी तो रेवती को जवाब देने में वह लड़बड़ा जाती है ।
'तुम्हारे ये दोनों किसके हैं ?" जमादारिन महती है।
"सच बताती हूँ। ये मेरे दोनो पतियो के ही हैं । इसे तो दुनिया के
सामने दोल पीटकर बताती हूँ।"
"तू खुद रंजी है और दूमरों को गालियां बकता है।"
उत्तरगाषा
रेवती जमादारिन की इस बात को बर्दाश्त नहीं कर सकी और लोटा उठाकर जमादारिन के ऊपर फैक्त दिया है। जमादारिन अपने लड़के का सोंचती हुई भागती है और हाँफती जा रही है। ११ ईया जी दौड़-धूप कर धक गयी हैं । कनेआ से भेंट करने का आज तक संयोग नहीं हुआ है। वीस-पच्चीस दिन तक लगातार दौड़ती रह गयी हैं। मगर जेल पर कोई भी सुनने वाला नहीं है । रेवती के साथ ही गांव के और भी कई लोग जेल गए हैं । जेल पर पहुंचने पर मालूम होता है कि इन लोगों का मामला दूसरा है। ये 'नक्सलाइट' हैं। इनसे किसी को भी मिलने की इजाजत नहीं है-रेवती से तो और भी नहीं है। परदेसिया वायू की चिट्ठी अभी भी अंचरा के कोने पर वौधे फिरती हैं। जब तक कनेआ खुद नहीं पढ़ लेती तब तक इस चिट्ठी का मोल ही क्या है। यही चिट्ठी तो इन दिनों ईआ जी की 'शक्ति' है। नहीं तो कनेक्षा और सुबल भी तो इन्हें छोड़ गए हैं ! सुवल जेल पर नहीं जा सकता है। उसके दुश्मनों की कमी नहीं है। गांव में अभी भी दो चौकियां पुलिस रहती है। टोले से बाहर निकलने में भी कम जोखिम नहीं है । पुलिस पूछते-पूछते तंग कर देती है। बहुत कहने- सुनने के बाद तो गांव से बाहर जाने की इजाजत मिलती है। ऐसी हालत में सुबल के लिए टोले में घुसना और फिर निकल जाना कितना भारी जोखिम है ! गाँव में बलात शान्ति जरूर है; परन्तु पुलिस धीरे-धीरे कैसे उनकी हो गयी है, यह बात किसी से भी छिपी नहीं है। अभी तो यह लाचारों को ही तंग करने से बाज नहीं आती है। शिवजी मालिक अभी तक चावल, मुर्गियाँ और यारियां पुलिस-चौकियों पर पहुंचाता है। पुलिस के खून में उसका 'नमक' घुल-मिल गया है। पुलिस के इस खून को बदलते बहुत वक्त लगेगा। शायद, रेवती जैसों के बेटे जवान हो तभी संभव हो सकता है।
ईशा जी को अपने पोतों का ध्यान माता रहता है। क्या क्या सचमुच ठीक कहती है कि पोते के हाथों में साली भाले. गंडासे हैं ? ई जी ने कता को ऐसे इक्कीस वेटे पैदा करने के लिए आगीर्वाद दिया था। इस गाँव के जुल्म को पलटने के लिए तो यही काफी हाँगईशा जी को अब अपनी मूर्खता पर हेसी थाती है । सब ही तो कनेमा कहती है, गरीव की कोई कुडली नहीं होती। इसीलिए अमीरों को ही इसको चिन्ता ज्यादा होती है । तब भी लव-कुश को जेल में रहते छ: महीने से भी कपर हो रहे हैं। रानीगंश से परदेसी बाबू की चिट्ठी मभी तक ईशा जी के अंदरा में पड़ी है। दूसरे से पढ़वाकर ईमा जी को बाबू का हाल-समाधार मालूम हो गया है । बाबू ने इतना ही लिखा है वे जल्दी ही गांव लौट रहे हैं। तबसे इन्तजार करते-करते ईआ जी थक गयी हैं। धीरे- धीरे विश्वास बंधने लगा है जब बाबू ने कई माल से कोई सोज-खबर नहीं ली तो अचानक इस पोस्टकार्ड का क्या मतलब है ? जहर किसी ने मनाक रिया है। बाबू का मन गांव से उचट गया है। अब वाबू लोटकर स्या आएंगे ! अब तो लव-कुश ही वादू के पौधे हैं। यही कुछ दिनों में पेड़ बनकर फैन गए, तब शायद ईशा जी को छाया मिले, नहीं तो इस बुढ़ापे की लाठी सुवल, कना सबके-सब हाथ से निकल गए हैं...! बहुत कोनिश-परवी के बाद ईमाजी और गांव के दूसरे-दूसरे लोगों को अपने गांव के जैलियो से मुलाकात की इजाजत मिली है। मगर यह क्या ? कनेआ तो लव-कुश के साथ फाटक के भीतर ही है। कैमा भाग्य है कि वे लपककर याने दोनों पोतों को गोद में भी नहीं उठा सकती । तब दादी को देखते ही छटपटाने लगता है। रेवती और ईआ जो दोनों पता नहीं कब से फकर रही है। ईआजी बाहर से ही रेवती को समझाती हैं, “गाने दे, कना ! रो मत वेटी। अब तो गांव के लोग बहुत बड़ी लड़ाई लडने लगे हैं। रो-रोकर अपने भीतर कमजोरी मत ला!... हमे तो बस इन्ही दोनों पोते का आसरा है। ये पेड़ की तरह जल्दी-जल्दी सयाने हो जाएं। रो मत रे, कनमा । ये जरूर जुल्म का बदला लेंगे "जहा उगे ! यह ले चिट्ठी, कना। वायु की चिट्टी है। छ: महीने से अंचरा बांध फिरती हूँ। मह ले। इंआजी पोस्ट-कार्ड सलाखों के बीच में बढ़ाती हैं। "वावू की चिट्ठी आई है !" रेवती वेहताश लपकती है और ईआ जी के हाथों से पोस्ट-कार्ड झपटकर जोर-जोर से पढ़ने लगती है, “सोसती श्री सरव उपमा जोग सुदेव की ओर से बाबू और माई को पायलागी और सुबल को आशीर्वाद पहुंचे। वावू की तबीयत कैसी है ? आगे माई को मालूम कि रानीगंज पहुंचते ही मुझे रिक्शा खींचने का काम मिल गया था। मगर दूसरे ही दिन एक घटना हो गयी थी। एक सिपाही के साय दारोगा मेरे रिक्शे पर थाने तक आया और जब मैं पैसे मांगने लगा तो उसने मुझे भद्दी गालियां दीं। माई रे ! यही नहीं, उसने पटक-पटककर मुझे बहुत मारा और राहजनी के केस में जेल भिजवा दिया । तभी से फई जेलों में भटकता रहा हूँ। बीच-बीच में पता चलता कि मुझ पर मुकद्दमा चलने वाला है। मुकद्दमा चलने के बाद थोड़े दिनों की सजा होगी और मैं जेल से छूट जाऊँगा। मगर अब तो कई साल बीत गए हैं। मैं तो तमाम दुनिया से निराश हो गया था। मगर इधर पता चला कि मेरे जैसे लोग एक, दो रोज में छोड़ दिए जाने वाले हैं । मैं छूटते ही घर आऊँगा। थोड़ा लिखना, ज्यादा समझना।" चिट्ठी समाप्त होते ही रेवती उल्लास में आँखें फाड़-फाड़कर ईआ जी की ओर ताकने लगती है। "छः महीने हो गए हैं । फिर न वाबू पकड़ लिए गए हों! !" ई जी और भी जोर से रोने लगती है। "रोओ मत, ईमा जी! वे दुनिया में हैं तो जरूर बाएँगे। आने वाले ही होंगे । देख लेना ईआ जी, वे मुझे जेल से छुड़ाकर जरूर ले जाएंगे।" "हमारा भी भाग्य कैसा है रे, कनेआ। हम सभी जेल के लिए ही जनमे हैं क्या? अब तुम्हें वाचू पहचानेंगे ? नहीं पहचानेंगे.' "नहीं ईमा जी, नहीं। वे मुझे जरूर पहचानेंगे। अपनी मेहरारू को कौन मरद नहीं पहचानेगा। उन्हें आने तो दो। मैं तो सबसे पहले उन्हीं की न हूँ, ईया जी ! देखना, वे मुझे छाती से लगा लेंगे !" "बाबू का पहला हक तो है ही रे, कनेआ ! सुवल तो दुनियादारी के चलते तुम्हारा मरद बना है।" "सचमुच, ईआ जी!" रेवती उल्लास में बोलती है, "वे सचमुच मुझे - १०२/उत्तरगाथा स्वीकार कर लेंगेन ?" "जरूर रे कनेभा, जरूर ! दाबू को आ तो लेने दे। मगर अब क्या याएंगे । चिट्ठी को आए तो छ. महीने मे ऊपर हो गए हैं।" "ऐमे मत बोलो ईशा जी, वे जरूर आएंगे | "आज-कल में आएंगे। उन्हें तो आना ही है।" सिपाही बीच-बीच में बोल देता है, "जल्दी करो लोग । समय हो गया है। दोपहर से ज्यादा समय हो रहा है। मुझे भूख लगी है।" ईमा जी उलट-उलटकर सिपाही को देख लेती है। मगर इतनी नफ- रत मन के भीतर भरी हुई है कि कुछ बोलने की इच्छा ही नहीं होती। घोड़ी ही देर बाद सिपाही के बार-बार दबाव से रेवती के गांव के जेहली पीछे की ओर लौट जाते हैं । रेवती की आँखें फिर इबडबाती हैं । यह कुरा को गोद में लेकर सड़ी हो जाती है और लव का हाथ पकड़कर अन्दर की ओर मुड़ जाती है।" रेवती को संतोम यही है कि उनकी' चिट्ठी ईआ जो इसी के पास छोट गयी हैं। हो सकता है, जान-बूझकर छोड गयी हों। दूसरे दिन जमादारिन रेवती से पूछती है, "घरवालो से क्या-क्या बातें . "मेरे 'बो' परदेश से लौट रहे हैं, जमादारिन जी !" "तब तुम्हे भया फायदा है। जेल से छूटकर जाओगी तब न?" जनादारित उपके भोलापन पर हमती है।" "धे' मुझे यहां से ले जाएंगे।" "कसे रे?" "जेल का फाटक तोड़कर।" जमादारिन सुअरी की तरह मुंह बना लेती है। "भरसय जेलर तुम्हें डाकू नहीं कहते हैं । बा रे ! कैसी पूंखार मेहरारू है?" "तुमको मैंने गालियां दो क्या जमादारिन जी?" "अपने मरद से जेल का फाटक तोड़वाएगी न? उसे भी पाड़कर मन्दर मंगवाती हूँ।" रेवती अपने दोनों हाथ जोड़ लेती है। "एक प्रार्थना है, जमादारिन जी! उन्हें भी इस वार्ड में भेजवा देना। हम साथ-साथ रहेंगे। तुम्हारा और जेलर का बड़ा उपकार होगा, दीदी !" "चोप्प !" जमादारिन कर्कश आवाज में चिल्लाती है और जाने लगती है। पता नहीं, रेवती को कैसा बल आ गया है कि वह लगातार हंसती जा रही है। जमादारिन के सामने से ओझल हो गयी है । तब भी रेवती का उल्लास कम नहीं हो रहा है। उसके दोनों बच्चे मुंह ताक रहे हैं। उनका पोस्ट-कार्ड उसके हाथ में है। वह बार-बार उसे पढ़ती है और हँसती जा रही है। यह रात भी गजब हो गयी है। काटे नहीं कट रही है। जेल में आने के एक हफ्ता तक ऐसी ही वेचनी थी फिर धीरे-धीरे आदत बन गयी है। मगर आज फिर वही वेचैनी क्यों है ? ईआ जी के आ जाने से तो नहीं ? या 'उनका' यह पोस्ट-कार्ड ही सोने नहीं दे रहा है ! 'वे' आएंगे-यही कम उल्लास की बात नहीं है । सामने वाले वार्ड से कैदी एक साथ मिलकर गीत गा रहे हैं। रेवती अनायास ही उनके स्वर के साथ गाना शुरू कर देती "तनी खाड़ा होके सोचा एक छन भइया, काहे चलत बाटे गोली दनदन भइया, केहू के अतुना वा अन्न, भरल वाटे लाख मन, केहू के मर लोप जुरे ना कफन भइया"।" ये अपने नैहर के आसपास के लोग तो नहीं है। रेवती को आज अचा- नक ही ध्यान आ रहा है। हो सकता है, सुबल भी पकड़ाकर आ गया हो । ये सुबल की टोली के भी तो हो सकते हैं ? सारा इलाका 'जेहली' होता जा रहा है। ऐसी हालत में 'वे' अचानक चले भी आते हैं तो अपने लोग उन्हें कहां मिलेंगे। ईया जी को क्या भरोसा कि वे कहाँ रहेंगी। रेवती, सुवल सब लोग जेल में हैं । तब कहीं 'वे' आकर परदेस लोट न जाएं ! रेवती की आँखें अचानक बरसने लगती है। एक बार के लिए 'वे' मिल जाते ! वस, उन्हें असली वात का पता चल जाता। उन्हें मालूम तो हो जाता कि यह रेवती अन्त-अन्त तक उन्हीं की है। रोना-रोमां से उन्हीं १०४/उत्तरगाथा की है। रेवती का हृदय चीरकर कोई उनकी मूरत मिला से। सुरत के साथ दोबारा घर कर सेने से क्या हो जाता है-रेवती का सम्पूर्ण शरीर तो उन्ही की धरोहर है न! यह सम्पूर्ण बेदाग है। सुबत भी तो एकदम मोला है। भइया को पाते ही उनकी रेवती उनके चरणों में सौंप देगा। किरतो रेवती के लिए कोई चिन्ता की बात नहीं है । चिन्ता है तो बस एक ही बात की-इम जैल मे रेवती कब तक निठल्ला जिदगी काटती रहेगी? क्या सचमुच सुबल भी जेल में आ गया है ? सामने के याई पाते कैदियों की बोली थाने की कोशिश करती है। उनकी सम्मिलित आया को अलग-अलग यौटकर थाहने की कोशिश करती है। अगर मान लिया, सुवल जेल में हुआ भी तो उससे मुलाकात कैसे होगी? उसे कैसे मालूम होगा कि उसके भइया आने वाले हैं। जमादारिन से लेकर जेलर तक--- सभी तो एक-से-एक बडकर संसार हैं। रेवती का यहां सुनने वाला ही फोन दूसरे दिन वह जमादारिन से पूछती है. "मुबल को जानती हैं, दीदी जी?" "कौन, सुबल ?" जमादारिन वल्लू की तरह आँखें गडाकर पूछती "मेरा देवर है, मरद भी है।" "छि:छि.?" जमादारिन दरवाजे के जार ही थूक देनी है, "मुझे तुम्हारे पेशे से क्या मतलब है।" "क्या कहती हो, दीदी जी?" "तब और क्या रे ! तुम्हारी तरह मैं रंडी है क्या?" रेवती के बदन में आग लग जाती है। वह दरवाजे के पास झपटकर जमादारिन को पकड़ लेती है। "कलमुंही? उल्लू की औलाद ? मुझे गालियां बकती है। सिपाहियों के साय तू रंडी का काम करती है। हिनास..!" रेवती अपने दोनों हाथों से जमादारित यो माये के बाल पकड़कर खीच रही है। जेल के अन्दर पगली घंटी टनटना उठनी है। बन्दूकधारी सिपाही चार-दीवारियों के पीछे चौकन्ना होकर दौड़ रहे हैं। वार्डों के भीतर सल- - बली मची हुई है। बिना किसी पूर्व योजना.के कौन-सी घटना हो गयी कि जेलर को पगली घंटी बजवाने की ज़रूरत पड़ गयी है ? कई महिला वार्डेन रेवती को पकड़कर मार रही हैं । दो-तीन.सिपाही लव-कुश को खींचकर पकड़े हुए हैं। दोनों बच्चे माई के साथ ही चीख रहे हैं और जेलर हाथ में रूल लिए हुए चुपचाप हत्यारे की तरह खड़ा है। वार्ड में ही रेवती अर्द्ध-नग्न पड़ी-पड़ी छटपटा रही है। चोली तार- तार फटकर लटक गयी है। लगभग चार-पांच घंटे बाद उसे लोग उठाकर अस्पताल में फेंक आए हैं। रेवती रात-भर बड़बड़ाती रही है। जिस महिला वार्डेन की उसके साथ ड्यूटी है, वह डर से उसकी बातों को समझने की कोशिश नहीं करती है। जमादारिन ने ही अचानक कहीं से देख लिया तब एक मिनट में जेलर से बोलकर नोकरी से छुट्टी करा देगी। मुआ जेलर भी कम शैतान नहीं है। उसका चेहरा कहीं से भी नहीं लगता कि वह कभी आदमी भी रहा है। हमेशा रोव और गुस्से में ही रहता है। उसका वश चले तो सबको फांसी पर सुलवा दे। रेवती वेड पर छटपटा रही है.। तीन महिला वार्डेन उसे लाठी से दबाए हुए हैं। उसके लव और कुश उसकी आँखों से ओझल कहीं रखे गए हैं। रेवती बड़बड़ाती हुई अपने बच्चों को याद कर लेती है। जेल के भीतर आम कैदियों में जोरों पर चर्चा है कि दस नम्बर वाली नक्सलाइट है। अवसे बेचारी को लाठी-बेड़ी में रखा जा रहा है। लेकिन इस 'अफवाह से जेलर को प्रसन्नता ही मिल रही है। वैसे भी रेवती का शरीर जगह-जगह से टूट गयी है। आधा एक घंटे के बाद ही हांफती हुई गिर जाती। जेलर भी निश्चिन्त है कि ऊपर से तो कोई 'आर्डर' है नहीं, कि लाठी-बेड़ी में रेवती को जिन्दगी भर रखना है। यह तो जेलर का मनमौजी आदेश है । जबतक जी चाहेगा नक्सलाइट रेवती लाटी-बेड़ी में ही रहेगी। यह तो जेलर की ही शोध है कि रेवती नक्स- लाइट है । दरअसल उसकी क्रूरता के सामने जो भी टिक गया और थोड़ी- बहुत 'सामना' करने की मुद्रा अख्तियार की, कि बस जेलर माँख मूंदकर उसे नक्सलाइट घोपित कर देगा। उसका कहना था, जब तक इस दुष्टा औरत का मर्द इसे लाठी-वेड़ी में आकर देख नहीं लेता तव इस खूखार : १०६/उत्तरगाथा
औरत पर 'दया' करने का सवाल ही कहां है । बेलर को पता है कि इसका
मर्द भी इसी कम में लिप्त है।
एक दिन सहानुभूति का नाटक करते हुए जेलर रेवती से पूछता है ।
"मुझे तुम पर बड़ी दया आती है, रेवतो!"
"हाँ, जेलर बाबू !" रेवती हॉफ्ती और रोती हुई बोलती है, "मैं मर
माऊँगी । मुझे अगर मारना ही है तो एक ही बार क्यों नहीं मार डालते?"
जेलर टठाकर हंसता है, "लाठी चेड़ी सोलना मेरी मर्जी पर है।"
"आपकी मर्जी कब होगी, जेलर बाबू?"
"एक गाना सुना दो।"
"मैं गाना नही गाती।"
"कुछ तो गाती होगी, वही मुनाओ?"
रेवती रोती जा रही है और गा रही है।
तनी खाडा रोके सोच एकछन भइया,
काहे बाटे गोली दनदन भइया,
केहू के अतुना बा अन्न, भरल बाटे लाख मन,
केहू के मरलो प जुरे ना कफन भइया ।
जेलर की स्वाभाविक फरता हठात् उभर आती है और नाटक का
आवरण उतारकर फेंकता है। "जी करता है, साली को समूचा रूल पेल
.
।
"मुझे गाना नहीं पाता, बताया न? यह भी तो मैंने यही आकर इसी
जेल मे सीखा है। आपको अच्छा नहीं लगता ?"
"चुप रह, साली!" जेलर गुर्राता है।
"आप उन्हें क्यों नहीं मना करते जो रात-रात भर गाते रहते हैं ?"
"हुक्म !"जेलर रूल सलाखों के ऊपर पटवता है। "भोग इसी
तरह जिन्दगी भर।"
जेलर पर पटकते हुए चल देता है।
रेवती दीवार से लगकर खड़ी हो जाती है और फूट-फूटकर रोने
लगती है । कुरा माई के पांव पकड़कर बन्दर की तरह लटका हुआ है।
लव को अब रेवती से अलग बच्चों के वार्ड में रखा जाता है। उसकी
सिसकियां टूटती नहीं हैं। "सुदेव और सुवल को स्मरण कर गुस्से में बड़बड़ाती है। मोती और ईआ जी के स्मरण मात्र से तो अश्रु-प्रवाह का वेग और भी नहीं थम पाला। रेवती अब वैसी ताकत अपने भीतर महसूस नहीं करती है। उसके भीतर ऐसा आवेग उठता है, मोती कहीं से अचानक आता और उसे हारिल की तरह उड़ाकर नहर के पोपल गाछ के नीचे ले जाता । 'सुदेव और सुवल की दुनिया कैसा भीपण अत्याचार है।"बेटे को महतारी से अलग कर अकेली साँस लेने के लिए विवश कर देना कितनी बड़ी सजा है ! .."रेवती तो इस काल- कोठरी में सर्वदा के लिए बन्द कर दी गई है। उसे बाहरी दुनिया की लड़ाई के बारे में क्या मालूम है । सुदेव और सुबल को अपने-अपने बच्चों के लिए परवाह ही कहाँ है । वे रेवती को न सही, अपने बच्चों को तो आकर ले जाते ? कितने स्वार्थी हैं-रेवती को घुल-धुलकर मरने के लिए छोड़ दिया है। अव उसके मरने में देर ही क्या है। एक बार दोनों को देख लेती। खास तौर से उस विदेसिया को ही बता देती, तुम्हारे लिए माया-प्यार माज तस जसकी तस है। तुम्हारी ही याद के लिए तो देवर सुवल को अपना सवांग मान लिया है। जिस क्षण तुम पाते उसी क्षण तुम्हारे पाँवों पर गिरकर तुम्हारी हो जाती। "सुवल भी तो अपनी भौजी को अपने भइया को समर्पित कर देने के लिए वायदा कर चुका है। परन्तु रेवती के 'वो' भारी छलिया हैं। कई वर्षों के बीच एक पोस्टकार्ड डालने के बाद फिर मौन हो गए हैं । माना चाहते तो क्या आ नहीं सकते थे? हो सकता है, गांव पर आ गए हों और किसी ने उन्हें रेवती के खिलाफ वहका दिया हो । तो क्या सचमुच वे इतने कच्चे होंगे ? रेवती को उन्हें समझने-बुझने का अवसर ही कहां मिला था ! उँगलियों पर गिनकर सात-आठ दिन में ही तो परदेस चले गए थे। रेवती की अश्रूपूरित आँखें हठात् नीचे की ओर टटोलती हैं-- पाँवों में उस दिन महावर ज्यों-के-त्यों थे ! न मालूम कितने धार पाँवों पर टपक पड़े होंगे ! आँसुओं का प्रवाह अभी भी नहीं थम रहा है। 'वे' उतने कठोर कभी नहीं हो सकते। देवर की तरह उनका भी संकल्प जरूर कठोर होगा । बुरे लोगों का उन पर भी कोई असर नहीं होगा। १०८ / उत्तरगाथा सुबल की तरह 'वे' भी पक्के इरादे वाले होगे ! ... रेवती इस तरह कभी विचलित नहीं हुई है, जिस दिन जेल वाले हत्यारे को तरह उस पर डंडे बरसा रहे थे उस दिन भी नहीं । उसे लगता है, वच्चा-वाई से लव 'माई-माई' कहकर चिल्ला रहा है । कुरा पाँवों तले सिसक्ते-सिसकते सो गया है। वह दीवार से लगकर सोने की कोशिश कर रही है । अश्रु-धार उसे सोने भी नहीं दे रहे है। रात्रि का सन्नाटा कैदियों के नम्बर लगाने से रह-रहकर मनझना उठता है। रेवती के भीतर भय और भी तीव्रता से पसरता जा रहा है । जेल का घंटा बारह-बार टनटनाता है। कई लड़कों के रोने की आवाज घाती है। रेवती को लगता है कि उसमें एक आवाज जरूर लव की है।' लव अपनी माई को अपने पास बुला रहा है। रेवती पगली की तरह हठात् कोठरी में चक्कर लगाती है और गेट की शलासों पर अपनी ठुड्डी टिका देती है। सामने वार्डेन चबूतरे पर ही लुढक गई है । सामने पूरब पौर दक्षिण कोने पर कपर संतरी जल्लाद की तरह बन्दूक ताने खड़ा है। "दीदी ! .."अरे ओ दीदी जी!..." रेवती धीरे-धीरे वार्डेन को जगाती है, "मेरे पास आओ न, दीदी ! मुझे बहुत डर लग रहा है। मुझसे बातें करो ना?... वार्डन ओघे मुंह खर्राटे ले रही है। पता नहीं, इधर ईआजी ने महीनो से मुलाकात करना क्यों छोड़ दिया है। ईआजी जरूर आती होंगो! जेलर ही उनसे मिलने की अनु- मति नहीं देता होगा। सारी दुनिया कठोर हो सकती है । ईआजी ऐसा कभी नहीं हो सकती। रतनपुर को और भी भयानक हालत होगी। मुदई लोग उन्हें गांव से बाहर निकलने नहीं देते होंगे ! .."या मौका पाकर ईआजी टोला छोड़कर कहीं चली गई होगी! .."कहाँ गई होंगी ईआजी ! ""कोई कागा भी तो ईआजी का संदेश लेकर यहां आने वाला नहीं है। कमी अकेली हो गई है रेवती। बाहर की कुछ भी खबर आती रहती तो मन को साहस मिलता रहता। .""गलासों पर ही माथे के सहारे लुढक गई है और हल्की-सी नींद, भी आने लगी है। परन्तु आखें अचानक फक से खुल जाती हैं । चार का घंटा बज रहा है। गाँधी जी का भजन शुरू हो गया है। उधर 'सुराजियों' का कंठ भी फिर से जागने लगा है। तनी खाड़ा होके सोचss एक छन भइया, काहे चलत बाटे गोली दनदन भइया... वार्डेन जगी हुई है। वह रात की लम्बाई पर झुंझलाती है। रह- रहकर उसके मुंह से गालियाँ निकलती हैं। पता नहीं, यह किसे गालियाँ दे रही है । वह दूर तक टहलती हुई रेवती के पास लौट आती है। "आज तुम्हारी डंडा-बेड़ी खुलने वाली है। तुम्हें मालूम है ? रात में जेलर बावू हेड से वतिया रहे थे।" रेवती कुछ जवाब नहीं दे पाती। वह आँखें फाड़-फाड़कर एकटक उसे ताक रही है। रतजगा करते-करते रेवती की लाल-लाल आँखें फूल- कर बड़ी हो गई हैं, जिन्हें वार्डेन पहचान नहीं पा रही है। १२ सुदेव परदेस से लौट आया है। टोले के बगीचे के पास जैसे ही पांव रोपा था, उसे घर का सारा समाचार मिल गया था-रेवती ने दूसरा घर कर लिया है, ''यह जेल में है और माई और सुबल का कोई पता नहीं है। रास्ते में उसे भदई दा मिले हैं। उन्होंने सुदेव को सारी स्थिति समझा दी है । "सुबल बहू को कैसे शिवजी मालिक और रतनपुर के लोगों ने तंग कर गाँव से भगा दिया है और उसके नहर वालों ने कैसे सुवल के हायों उसे सौंप दिया है । मगर माई होती तो सारी बातें सच्ची-सच्ची मालूम हो जातीं। टोले मौर रतनपुर के बीच एक पुलिस चौकी खुल गयी है। एक मैजिस्ट्रेट के साथ पुलिस के दस-बारह जवान रहते हैं। उनका खेवा-खर्चा रतनपुर के बाबू लोग चलाते हैं। पुलिस जब-तब टोले को धमकाती रहती है। और वावुओं के अन्न की गर्मी हुई तो टोले के एकाध लोगों को पकड़- कर पीट देते हैं। ११० /उत्तरगाथा पुलिस चौकी वाला मकान हरिजन स्कूल है। सुदेव था तब मकान नहीं था और न कही स्कूल का ही नाम था। (स्कूल तो आज भी कही नही है। सरकारी कार्यालय में भले हो । हरिजन स्कूल के नाम पर चारों तरफ से ईंट की दीवारो और छत या उप्पर रहित तीन कमरे हैं । ) सुदेव को गौने की पहली रात को अपनी मेहरारू के मामने ही लजाना पड़ा था जब उसने पूछ दिया था-पाठशाला कभी गए नहीं ? तुम्हारे गांव कोई स्कूल नहीं है क्या? सुदेव को उस रात की सारी बातें आज भी ध्यान मे है। उसने अपनी मेहरारू को सारी बातें सच-सच बता दिया था।"रतनपुर के बावू लोगों के लडके किस तरह इन्हें तंग करते थे। तभी से हरिजन टोली को पढ़ाई-लिखाई से नफरत हो गयी थी। यह स्कूल तो इधर हुआ लगता है । भदई दा को भी कुछ नहीं मालूम कि स्कूल के नाम पर यह मकान कैसे खड़ा हो गया है। दो-तीन साल पहले मकान में काम लगा था। रतनपुर के हरिविलास वायू खड़ा होकर बनवा रहे थे। तभी से सरकारी कागज पर तो हरिजन-स्कूल है, परन्तु लोग इसे हरिविलास बाबू के खंडहर के रूप में ही जानते हैं। पुलिस चौकी आने के पहले तक यहां हरिविलास वावू का मदेशी थान और चारा भंडार था। उन्होने अपने खचं से फूस-पलाश के पत्तों से बथान और मडार की रक्षा के लिए मड़ई बनवा दिया था। सुदेव का अचरज अभी तक दूर नहीं हो पा रहा है। ऐसी कौन विपत्ति आ गयी कि रतनपुर और टोले के बीच में पुलिस चौकी की जरू- रत पड़ गयी है । सुदेव की आंखें फट रही हैं, इस चैती के महीने में भी खलिहान ने हजारो मन धान के बोझ पड़े हैं । अभी तक दोनी क्यों नहीं हुई है ? खेतो में पकी हुई गेहूं की बालियां खडी हैं। कटनी भी लगी है। एकाघ माह तो बरसात होने वाली है, सुनहलो सोनी धान को पालियां आज तक सलिहान मे बिलबिलाती कैसे हैं ! भदई दा उमका हाथ पकड़कर खलिहान मे टाल के पीछे बैठाते हैं और कुछ देर तक उसका हाल-ममाचार पूछने के बाद संनी मलते हुए सारा किस्सा, बयान करने लगते हैं, "तुम्हारे गांव छोड़ने के दाद से तो सारे गांव में आग लगी हुई है। बाकी सुदेव बबुआ, अब तुम्हारा यह .
m का घंटा बज रहा है। गाँधी जी का भजन शुरू हो गया है। उधर 'सुराजियों का कंठ भी फिर से जागने लगा है। तनी खाड़ा होके सोचs 5 एक छन भइया, काहे चलत वाटे गोली दनदन भइया वार्डेन जगी हुई है। वह रात की लम्बाई पर झुंझलाती है। रह- रहकर उसके मुंह से गालियाँ निकलती हैं। पता नहीं, यह किसे गालियाँ . दे रही है । वह दूर तक टहलती हुई रेवती के पास लौट आती है। "आज तुम्हारी डंडा-बेड़ी खुलने वाली है । तुम्हें मालूम है ?. रात में जेलर वायू हेड से वतिया रहे थे।" रेवती कुछ जवाव नहीं दे पाती। वह आँखें फाड़-फाड़कर एकटक उसे ताक रही है। रतजगा करते-करते रेवती की लाल-लाल आँखें फूल- कर बड़ी हो गई हैं, जिन्हें वार्डेन पहचान नहीं पा रही है। 4 १२ सुदेव परदेस से लौट आया है। टोले के बगीचे के पास जैसे ही पांव रोपा था, उसे घर का सारा समाचार मिल गया था--रेवती ने दूसरा घर कर लिया है, ''वह जेल में है और माई और सुवल का कोई पता नहीं है। रास्ते में उसे भदई दा मिले हैं। उन्होंने सुदेव को सारी स्थिति समझा दी ।'सुवल बहू को कैसे शिवजी मालिक और रतनपुर के लोगों ने तंग कर गाँव से भगा दिया है और उसके नहर वालों ने कैसे सुबल के हाथों उसे सौंप दिया है । मगर माई होती तो सारी बातें सच्ची-सच्ची मालूम हो जातीं। टोले और रतनपुर के बीच एक पुलिस चौकी खुल गयी है। एक मैजिस्ट्रेट के साथ पुलिस के दस-बारह जवान रहते हैं। उनका खेवा-खर्चा रतनपुर के बावू लोग चलाते हैं। पुलिस जव-तब टोले को-धमकाती रहती है। और बावुओं के अन्न की गर्मी हुई तो टोले के एकाध लोगों को पकड़- कर पीट देते हैं। ११०/उत्तरगाथा पुलिम-चोली कला मकान हरिजन स्कूल है। सुदेव या तर मकान नहीं पा और न ही स्कूनका ही नाना। (स्कूल तो जाज भी वहीं नहीं है। सरकारी कार्यालय में मले हो । हरिजन स्कूल के नाम पर चारों तरफ इं. की दीवारों और छत या छप्पर रहित तीन मरे हैं।) सुदेव को गाने की पहली रात को अपनी मेहरारू के मानने ही नजाना पड़ा था जब उसने पूछ दिया या-पावशाला कमी गए नहीं ? तुम्हारे गांव कोई स्कूल नहीं है क्या? सुदेव को उस रात की सारी वाउँ आज भी ध्यान में है। उसने अपनी मेहरारू को सारी बातें सच-मच बना दिया था।"रतनपुर के बाबू लोगो के लड़के किस तरह इन्हें तंग करते थे। तभी से हरिजन टोली को पड़ाई-लिसाई से नफरत हो गयी थी। यह स्कूल तो इधर हुआ लगता है । भदई दा को भी कुछ नहीं मालूम कि स्कूल के नाम पर यह मकान कैसे खड़ा हो गया है। दो-तीन साल पहले मकान में काम लगा था। रतनपुर के हरिविलास वायू सड़ा होकर बनवा रहे थे। तभी से सरकारी कागज पर तो हरिजन स्कूल है, परन्तु लोग इसे हरिविलास बाबू के खंडहर के रूप में ही जानते हैं। पुलिस चौकी आने के पहले तक यहां हरिविलास बाबू का मवेशी थान और चारा मंडार या। उन्होंने अपने खर्च से फूस-पलाश के पत्तों से वधान और भंडार की रक्षा के लिए महई बनवा दिया था। सुदेव का अचरज अभी तक दूर नहीं हो पा रहा है। ऐसी कोन विपत्ति आ गयी कि रतनपुर और टोले के बीच मे पुलिस चौकी की जरू- रत पड़ गयी है। सुदेव की आंखें फट रही हैं, इस चैती के महीने में भी खलिहान ने हजारो मन धान के बोझ पड़े हैं । अभी तक दोनी क्यों नहीं हुई है ? सेतों में पकी हुई गेहूं की बालियो सड़ी हैं। कटनी भी लगी है। एकाध माह तो बरसात होने वाली है, सुनहली सोनी पान की वालिया आज तक खलिहान में बिलबिताती कैसे हैं ! भदई दा उसका हाथ पकड़कर खलिहान में टाल के पीछे बंटाते हैं और कुछ देर तक उसका हाल-समाचार पूठने बाद गनी मलने सारा किस्सा,बयान करने लगते है, "तुम्हारे गांव छोड़ने के दार सारे गांव में आग लगी हुई है। बाकी सुदेव यदुआ, अब दुदार टोला खस्सी-बकरी थोड़े रह गया है कि कसाई के सामने अपनी गर्दन झुका दे । असल में बबुमा, रतनपुर के बावू लोग तो यहाँ के मूल निवासी हैं नहीं। हमारे पूर्वज ही यहां के असल निवासी है। परन्तु ये लोग धीरे- धीरे मालिक बनते चले गए । तुम्हारे वाबू, परमा को सब कुछ मालूम था कि जब ये लोग हमारे गांव आए थे तव वंटाईदारों को चार-पांच विगहा खेत जोतने के लिए और दो सेर कच्चा चावल या गेहूं देते थे । सन् ६७ में जब नया सर्वे हुआ सुदेव ववुआ, तब इनकी नीयत बदल गयी। अब कहने लगे कि एक-डेढ़ बीघा खेत और एक सेर पक्का चावल से ज्यादा नहीं देंगे। हमारी तो भूखों मरने की नौवत थी।" भदई दा खैनी मलने के बाद होठों के नीचे डालते हैं और फिच-से' थूकते हुए आगे कहना शुरू करते हैं, "तुम्हारे गांव से जाने के बाद यहां एक और नया काम हुआ है। रतनपुर के वागवाला जो तालाब है न, उसकी मछलियों की वन्दोवस्ती अब हमारे साथ सरकार करने लगी - है।"... सुदेव चौंकता है, "यह कैसी अजूबा बात है भईद दा, पहले तो शिव जी मालिक के अधिकार में तालाब था। क्या मजाल जो बाहरी एक भी प्रादमी तालाब का पानी छ दे।' "नयी बात यह हुई है," भदई दा कहते है, "कि तुम्हारी तरह के तमाम नौजवानों ने मिलकर 'मछुमा सहयोग समिति' वनायी है। अव तो छूटकर हम लोगों के लड़के मछलियां मारकर लाते हैं। परन्तु तकलीफ की बात यही है कि यहां के गरीब नेवाज कलक्टर पर मालिकों ने हाईकोर्ट में मुकदमा कर दिया है। "ऐसा क्यों किया है ?" "कलक्टर ने शिवजी मालिक, हरिविलास बावू और सामविहारी सिंह की वन्दूकें जप्त करा ली है।" भदई दा अचानक तालियां पीट कर हँस देते हैं, "उनके पास बन्दूकें वापस पा भी जायें तब भी हमारे लड़के डरने वाले है क्या? ठेंगा डरेंगे। चाहे वी० डी० ओ० और मझिआंव के मुखिय गनेसी मिसिर समझा-बुझाकर थक गए हैं, बनिहारों-मजूरों को भर खाना दो । मगर कौन सुनता है ? उल्टे उन्होंने बटाईदारी में मिली जमी ११२ / उत्तरगाथा की फसल भी काटकर अपने खलिहान में ले पाए। सरकार ने एक सौ चौवालिम लगा दिया है। तद भी इनकी जबरदस्ती गयो नहीं है । सेतों से धान काटकर लाते ही थे। हमारी औरतो को बाहर निकलकर पेशाव- पसाना करना भी मुश्किल था। रात भर टार्च जलाकर तंग किया करते थे।हमारे लड़के इसे कैसे बर्दाश्त कर सकते थे? सुदेव बबुआ! इन्होने भी जान हथेली पर ले ली है । तुम्हारा भाई सुबल और तुम्हारी बहू ही तो हमारी बांखें हैं । पता नहीं, वेचारी जेल में किस तरह होगी। सुबल नहीं होता तो परमात्मा जानता है हमारी क्या दशा हुई रहती। आज सुबल की एक माबाज पर समूचे प्रखंड के हजारो मरद-मेहरारू अपना सिर फट- वाने के लिए भी तैयार हैं।" "तुवल कहां है, दादा?" "तीन-चार दिनो से मेंट नहीं हुई है। "माई कंसी है ?" "उसे तो महीनों से नहीं देखा है। टोले में जब से मालिकों ने प्राग- सगी और गोली-बन्दूक की है तब से आधा टोला विरान हो गया है । लोग भागकर इधर-उघर चले गए हैं। यहां पुलिस चौकी होने के बाद भी डर बना हुआ है । यह खलिहान मे जप्त फसल देख रहे हो न, इसके बारे में बाबू लोग कहते है कि आग लगा देंगे मोर पुलिस को बता देंगे कि हरि. जनों ने ही आग लगाकर धारा एक सौ चौवालिस तोड़ा है। हमारे कई लड़कों को डकैती और दूसरे-दूसरे अपराधों में फंसाकर जेल भेजवा दिया है। कचहरी पुलिस से न्याय उठ गया है, ववुआ !" सुदेव खलिहान के चारों तरफ अपनी आँखें दौड़ाता है। अगहनी अभी तक खलिहान में पड़ी है। एक दो महीने बाद ही तो बरसात शुरू होने वाली है। मालिक लोग साफ इन्कार कर गए है-खेत बटाईदारी पर नहीं थे, मजूर साने बिल्कुल झूठे है । हमने इन्हें काम के बदले मजूरी दी भदई दा उसे घर तक लाते हैं । माई जहाँ वरियां बांधती थी वह वयान जंगल बना हुआ है। बाहर का दरवाजा खुला है । चबूतरे पर तुलसी झुलस कर झाड़ी की तरह नजर आती है। दोनों घरों मे ताले पड़े हैं, परन्तु प्रोसारा कुत्तों और सुप्ररों का स्थान बना हुआ है । सुदेव चबूतरे से नाद की ओर देख रहा है। अभी भी नाद ज्यों-का-त्यों पड़ा है । खूटा भी वैसे ही गड़ा है। नाद फूटा हुआ है और उसमें सड़ा हुआ पानी भरा है। उस पर मच्छड़ों और पिल्लुओं का अंबार है। लगता है, कई बरस से किसी ने नाद को छुआ तक नहीं है। माई का सारा समय तो भाग-दौड़ में ही बीत रहा होगा। पता नहीं भागकर कहाँ रहती होगी। सुबल मिले तो पता चले। 'सुबल का मिलना भी तो मुश्किल ही होगा। उसके पीछे तरह-तरह के वारंट, पुलिस, इस गाँव के मालिक जाने कितने लोग होंगे ! गाँव तो असली महाभारत बना हुआ है। सुदेव आज तक निरक्षर है। रानीगंज जेल में दो-तीन दिन में ककहरा आधा तक सीख गया था, परन्तु न मालूम क्यों कैदियों को रात में पढ़ाने की प्रथा फिर वन्द हो गयी थी। जेल में ही अपना एक यार था-~-साधोशरण । सिपाही से लेकर कैदी तका-सभी उसे साधु ही कहा करते थे । साधु भी भोजपुर जिले के किसी गांव का ही रहने वाला था। इसी से सुदेव के साथ उसकी बहुत अच्छी वनती थी। साधु रात भर उसे महाभारत की कथा सुनाता था। सुदेव को महाभारत की बहुत-सी कथाएँ याद हो गयी हैं। अब वह सोचता है तो यही समझ में आता है कि वह महाभारत तो दो राजामों की लड़ाई थी, पांडवों को कौरव विना लड़ाई के सुई की नोंक के बरावरं भी जमीन देने के लिए तैयार नहीं थे । यहाँ तो मालिक और मजूरों की लड़ाई है। मालिक जो भी अधिकार छीनते गए हैं उसी को वापस लेने की लड़ाई है। मगर यह असली महाभारत नहीं है तो उसकी शुरूआत तो जरूर है। सुदेव अनायास ही नाद के पास चला आया है। इसी जगह से तो माई के साथ लड़ाई हुई थी। माई ओसारे से कैसे काठ की तरह जेवाव. सवाल लड़ाती थी। सुदेव का कलेजा सुन-सुनकर छलनी हो रहा था। मगर माई थी कि बाण पर वाण चलाती जा रही थी। सुदेव सुनते-सुनते तंग आ गया था । वह हरवाही से शाम को लौटकर इसी तरह नाद पर बैठा था। भूख-प्यास से कलेजा ऍठ रहा था और माई ऐसी कठोर थी कि गौने में ताजा-ताजा आयी मेहरारू के सामने ही वाण पर बाण चलाए जा रही थी। आखिर सुदेव का भी कोई इज्जत-पानी है कि नहीं ? नयी ११४ / उत्तरगाथा नवेली मेहरारू क्या सोचती? यही न बेचारी सोच रही होगी कि 'मरद कितना ववुआ है-एकदम कमजोर ! सुदेव कितना बस्ति करता! माई की कमाई बोली नही बर्दाश्त कर सका था सुदेव और उसी रात को घर से निकल गया था, दिशाहीन और सुन्दर ! रानीगंज में मामा के गांव का था, लखन । सान में काम करता था। मुदेव को अच्छी तरह याद है, जब वह रेलगाड़ी पर सवार हुआ का तब लखन ही उसे खीचता हुआ ले जा रहा था। मगर रानीगंज में सुदेव चारो तरफ लखन की खोजकर हार गया था। लखन का पता किसी को भी ठीक-ठीक मालम नहीं था। दो- तीन दिनों तक तो ऐसे ही मारा-मारा फिर रहा था। संयोग से उसे चार माए रोज पर रिक्शा खीचने का काम मिल गया था। सुदेव को बड़ी खुशी हुई थी, थोड़े ही दिनों में सौ-डेढ़ सौ रुपए कमाकर माई के लिए ले जाएगा और उसके हाथों पर पटकते हुए कहेगा, ले माई ! बेटे से बडा राए को ही समझती थी न ! चवा खूब रुपए।" मगर गुदेव की जिद पूरी नहीं हो सकी थी। सिपाहियों के साथ उसका झंझट हो गया था और उन्होंने उसे तरह-तरह के मामलों में फंसा दिया था। मुफ्तखोगे का सामना करने का नतीजा बडा बुरा हुआ था। रानीगंज में तो रिक्शा यूनियन भी लड़ती रह गयी थी। मगर कहीं कोई परिणाम निकला था। यूनियन थककर चुप लगा गयी थी। सुदेव जेल में सड़ता रह गया था। उमे तो विश्वास हो चला था कि जेल में ही पूरी जिन्दगी कट जाएगी। मगर एक दिन अचानक पता नहीं कैसे जेल में छोड़ दिया गया था।... माई के सामने पुरानी बातें याद करने से फायदा ही क्या है ! जो बीत गया सो बीत गया । अब तो आगे की सुधि ही जरूरी है। पता नही, माई पाहां होगी, क सी हालत में होगी। जिन्दा होगी, मर गयी होगी।... सुदेव का मन तरह-तरह की प्राशंकाओं से घबड़ा रहा है। चारों तरह अंधेरा फैनता जा रहा है। भदई दा चबूतरे पर सनी फटकते हैं तो उसकी तंद्रा टूटती है। दादा भूत की तरह यहां चुपचाप क्या कर रहे हैं ? पोड़ी देर तक तो उसे दादा को ध्यान ही नहीं रहा है। दादा उसकी प्रतीक्षा में कब तक बैठे रहेंगे? तभी अचानक याहर से यावाज होती है, "बरे, भीतर कोई है होने।
परन्तु ओसारा कुत्तों और सुअरों का वथान बना हुआ है । सुदेव चबूतरे से नाद की ओर देख रहा है। अभी भी नाद ज्यों-का-त्यों पड़ा है। खूटा भी वैसे ही गड़ा है । नाद फूटा हुआ है और उसमें सड़ा हुआ पानी भरा है। उस पर मच्छड़ों और पिल्लुओं का अंबार है। लगता है, कई बरस से किसी ने नाद को छूआ तक नहीं है । माई का सारा समय तो भाग-दौड़ में ही बीत रहा होगा। पता नहीं भागकर कहाँ रहती होगी। सुबल मिले तो पता चले। "सुवल का मिलना भी तो मुश्किल ही होगा। उसके पीछे तरह-तरह के वारंट, पुलिस, इस गाँव के मालिक जाने कितने लोग होंगे ! गाँव तो असली महाभारत बना हुआ है। सुदेव आज तक निरक्षर है। रानीगंज जेल में दो-तीन दिन में ककहरा बाधा तक सीख गया था, परन्तु न मालूम क्यों कैदियों को रात में पढ़ाने की प्रथा फिर वन्द हो गयी थी। जेल में ही अपना एक यार था-साधोशरण । सिपाही से लेकर कैदी तक-सभी उसे साधु ही कहा करते थे । साधु भी भोजपुर जिले के किसी गांव का ही रहने वाला था। इसी से सुदेव के साथ उसकी बहुत अच्छी बनती थी। साधु रात भर उसे महाभारत की कथा सुनाता था। सुदेव को महाभारत की बहुत-सी कथाएँ याद हो गयी हैं। अब वह सोचता है तो यही समझ में आता है कि वह महाभारत तो दो राजापों की लड़ाई थी, पांडवों को कौरव विना लड़ाई के सुई की नोंक के बरावर भी जमीन देने के लिए तैयार नहीं थे। यहाँ तो मालिक और मजूरों की लड़ाई है। मालिक जो भी अधिकार छीनते गए हैं उसी को वापस लेने की लड़ाई है। अगर यह असली महाभारत नहीं है तो उसकी शुरूआत तो जरूर है। सुदेव अनायास ही नाद के पास चला आया है । इसी जगह से तो माई के साथ लड़ाई हुई थी। माई ओसारे से कैसे काठ की तरह जवाव. सवाल लड़ाती थी। सुदेव का कलेजा सुन-सुनकर छलनी हो रहा था। मगर माई थी कि वाण पर बाण चलाती जा रही थी। सुदेव सुनते-सुनते तंग आ गया था । वह हरवाही से शाम को लौटकर इसी तरह नाद पर वैठा था। भूख-प्यास से कलेजा ऐंठ रहा था और माई ऐसी कठोर थी कि गौने में ताजा-ताजा आयी मेहरारू के सामने ही वाण पर वाण चलाए जा रही थी । आखिर सुदेव का भी कोई इजत-पानी है कि नहीं ? नयी । ११४ / उत्तरगाथा नवेली मेहरारू क्या सोचती? यही नचारी सोच रही होगी कि 'मरद' मिलना वबुमा है-एकदम कमजोर ! सुदेव कितना बस्ति करता! भाई को कसाई बोली नहीं पर्दाश्त कर सका या सुदेव और उमी रात को घर से निकल गया पा, दिशाहीन और सुन्दर ! रानीगंज में मामा के गांव का था, लखन । खान में काम करता था। मुदेव को बच्छी तरह याद है, जब वह रेलगाड़ी पर सवार हुआ का तव लसन ही उसे खीचता हुआ ले जा रहा था। मगर रानीगंज मे सुदेव चारो तरफ लखन की खोजकर हार गया या । लसन का पता किसी को भी ठीक-ठीक मालूम नहीं था। दो- तीन दिनों तक तो ऐसे ही मारा-मारा फिर रहा था। संयोग से उसे चार गाए रोज पर रिक्शा सोचने का काम मिल गया था। सुदेव को बडी खुसी हुई थी, थोड़े ही दिनों में सौ-डेढ़ सौ रुपए कमाकर माई के लिए ले जाएगा और उसके हापों पर पटकते हुए कहेगा, ले माई ! बेटे से वहा रए को ही समझती थी न ! चदा खूब रपए। मगर सुदेव की जिद पूरी नहीं हो सकी थी। सिपाहियो के साथ उसका झंझट हो गया था और उन्होंने उसे तरह-तरह के मामलों में फैमा दिया था। "मुफ्ततोगे का सामना करने का नतीजा बड़ा बुरा हुआ था। रानीगंज मे तो रिक्शा यूनियन भी लड़ती रह गयी थी। मगर कहीं कोई परिणाम निकला था। यूनियन थककर चुप लगा गयी थी। सुदेव जेल मे सडता रह गया था। उमै तो विश्वास हो चला था कि जेल मे ही पूरी जिन्दगी कट जाएगी। मगर एक दिन अचानक पता नहीं कैसे जेल से छोड दिया गया था।" माई के सामने पुरानी बातें याद करने से फायदा ही क्या है ! जो वीत गया सो बीत गया । अत्र तो आगे की सुधि ही जरूरी है। पता नहीं, माई कहां होगी, कैसी हालत में होगी। "जिन्दा होगी, मर गयी होगी।... मुदेव का मन तरह-तरह की प्राशकाओं से घबड़ा रहा है। चारो तरह अंधेरा फैलता जा रहा है। भदई दा चवूनरे पर सनी फटरते हैं तो उसकी तंद्रा टूटती है। दादा भूत की तरह यहाँ चुपचाप क्या कर रहे हैं ? थोड़ी देर तक तो उसे दादा को ध्यान ही नहीं रहा है। दादा उसकी प्रतीक्षा में कय तक बैठे रहेंगे ? तभी मगनक बाहर से आवाज होती है, "अरे, भीतर कोई है हो?
- चौकी पर बुलाहट है।" "हां, भइया ।" सुदेव नाद से उतरकर खड़ा हो जाता है। मैं हूँ सुदेव । तुम कौन हो? "मैं इस गाँव का चौकीदार हूं, देवन दुसाध ।" सुदेव वाहर निकल आता है । "पायलागी, देवन काका। तुम कसे हो?" "ठीक हूँ, बबुआ ! तुम कब आए हो?" "माज ही, काका। भदई दा के साथ तनिक घर-दुपार देख रहा था।" - भदई दा भी वाहर आ गए हैं और देवन चौकीदार की ओर खैनी बढ़ाते हैं। "चौकी पर तुम्हारी बुलाहट है।" "किस चौकी पर ?" "गांव में जो पुलिस चौकी है-~-वहीं।" "किसलिए, देवन काका?" "दारोगा जी या मजिस्टर साहेब को कुछ पूछना होगा, और क्या ?" "क्या पूढेगा मुझसे ?" चलते हुए सुदेव पूछता है । "कुछ बातें होंगी, और क्या?" "मैं तो इस गांव में कई साल तक रहा नहीं।" चौकीदार चुपचाप मागे-आगे चल रहा है। भदई दा एकदम चुप हैं। उन्हें पुलिस के बारे में कुछ-कुछ जानकारी है। पिछले दिनों मलुका- दास को भी चौकी पर इसी तरह बुलाया गया था। और थोड़ी देर तक उससे पूछताछ करने के बाद जेल में भेज दिया गया था। इस तरह कई लोगों को फुसलाकर दारोगा ने जेल भेजवाया है। सुदेव के साथ भी वैसा ही सलूक किया गया तब ? सम्भावना ऐसी ही है। शुरू-शुरू में शिवजी, हरविलास और सामबिहारी सिंह को कुछ दिनों तक के लिए हिरासत में जरूर लिया था, मगर वे दो ही दिनों में छूटकर चले आए थे । गांव वालों की आंखें फटकर रह गई थीं। कसूरवार सीधे बचकर निकल आए थे। टोले पर बन्दूक और गुंडों के जोर जुल्म उन्होंने ही m
किया था और सरकार के घर से बैंकसूर चले माए थे। इस बीच टोले के
कई लोगों को एक सौ चौवालिस तोड़ने के दोप में जेल ले गई थी। अब
देखना यही है कि वेकसूर सुदेव के साथ सरकार का क्या सलूक होता है ।
अचानक संगीनघारी पुलिस की आवाज सीधे कलेजे में घुस गई
है-"हाल्ट !"
सुदेव और भदई दा डरकर खड़े हो जाते हैं। मगर चौकीदार
निर्भीकता के साथ उत्तर देता है, "दोस।"
संतरी कहता है, मा जाओ।"
अंधेरे में इनके और उनके बीच एक सिपाही लालटेन रखकर जाता
है। फिर भी वे एक-दूसरे के चेहरे को ठीक-ठीक समझ नहीं पाते हैं।
मजिस्ट्रेट और दारोगा कुर्सी पर बैठे हुए हैं । भदई दा, सुदेव और चौको-
दार सामने ही जमीन पर ही बैठते हैं।
"क्या नाम है, तुम्हारा ?" दारोगा पूछता है ।
"मुदेव ।"
"कहां रहते थे।"
"रानीगंज।"
"क्या काम करते थे?"
"रिक्शा खीचता था।"
"कव आए हो?"
"माज ही, सरकार ! दोपहर को।"
दारोगा पोड़ी देर तक मजिस्ट्रेट के कान में और फिर अंग्रेजी में
वतियाता है।
'यहाँ के बारे में किसने खवर दी थी।" दारोगा फिर पूछता है।
"किसी ने भी नहीं, सरकार।"
"तब कैसे पाए हो?"
"अपने मन से आ गया हूँ। यहाँ आने पर पता चला है कि मेरी माई
और भाई यहां नहीं रहते हैं।"
"ये सब नक्सलाइट हैं । नुम्हें कुछ पता है ?"
"नहीं, सरकार।"
दारोगा ठठाकर हंसता है। "मेहरारू के बारे में कुछ पता है ?" "जी! वह तो आते ही भदई दा बता दिया कि जेल में है।" दारोगा और मजिस्ट्रेट फिर कुछ बतियाते हैं। "गाँव से बाहर कहीं जाना नहीं होगा।" दारोगा उसे चेतावनी "कुछ काम-वाम करने के लिए भी नहीं ?" "नहीं ?" "पेट का क्या होगा, सरकार "तुम्हारा भाई तालाव का सेक्रेटरी है न ? मछलियाँ खूब खाओ। सरकार ने तुम लोगों के हाथ वन्दोवस्त तो कर ही दिया है।" सुदेव कुछ जवाब नहीं देता है। भदई दा जानते हैं, चौकीदार के साथ सिपाही तालाब में जाल लेकर पड़े रहते हैं । मछुआ समिति के किसी भी आदमी को कुछ भी बोलने की हिम्मत नहीं है। सुदेव इन दिनों गांव पर नहीं रहता है। उसके रहने पर तो किसी की भी हिम्मत नहीं होती है। कम-से-कम शाम को तो हरिजन स्कूल पर इन दिनों मछलियाँ रोज बनती हैं। रतनपुर के भूस्वामी उन्हें ऊपर से सह देते रहते हैं। "आज्ञा होती सरकार, तो चलकर कुछ खाने-पीने का इन्तजाम करता।" सुदेव खड़ा हो जाता है। "मेरी बात समझ में आ गई कि नहीं?" "हां, सरकार । लेकिन कल-परसों अपनी औरत से भेंट करने जेल पर जाना चाहता हूँ।" "गाँव छोड़कर जाने का हुक्म नहीं है। कहीं जाना हो तो यहाँ पूछ- कर जाना होगा। नहीं तो तुम भी सव की तरह ढूंस दिए जाओगे।" "अच्छा, सरकार ।" लौटते समय उन्हें लगता है, वाघ-भेड़िए को माँद से अनायास ही वे भाग आए हों। चौकीदार भी उन्हीं के साथ चल रहा है। 'सुवल से भेंट करोगे, सुदेव बबुआ?" चौकीदार पूछता है। "तुम्हें सुवल का पता है ?" सुदेव को अचरज भी होता है। "काहे पता नहीं होगा, ववुआ। सुवल ही तो गरीब दुखिया का - ११८ | उत्तरगाथा बल है।" "तुम पुलिस के आदमी नही हो?" "जैसे वे लोग नौकरी भी करते हैं और पनिकों के आदमी भी हैं, वैसा मैं नहीं हूँ। मैं तो अपने लोगों के साथ हूँ। भदई दा, तुम चुप क्यो हो ?" "मुन बेटा!" भदई दा बहुत देर बाद वोलते हैं जैसे उनका कंठ अचानक खुला हो। "सुवल तो बराबर हाया की तरह हमारे साथ है। इलाके से दम-बारह हजार जवान वह एक बोली पर इकट्ठा कर सकता है । मुदई लोगों के पास कलेजा है तो क्यो नही पकड़ लेते हैं उसे ?" "माई के बारे में कैसे पता चलेगा, दादा " "सब पता चल जाएगा, वेटे । मुबल सव कुछ जानता है।" पता नही, क्यो भदई दा की मांखें डबडबा गई है। अंधेरे में अंगोछे से पोंछ लेते हैं। देखते-ही-देखते टोला उजड गया है। एक ही घोसले में बसेरा लेने वाले पंछी पता नहीं कहाँ-कहाँ विखर गए है। टोले भर मे कुत्ते-सियार के अलावे दूसरी बोली अव मुश्किल मे सुनने को मिलती है। भदई दा की मड़ई में दो-चार और भी जन हैं इनके घरो मे आग लगने के बाद से ही में भदई दा की गरण मे आ गए हैं। सुनने में आया है कि सरकार की ओर से तिरपाल दिए गए हैं, परन्तु मुखिया और बी० बी० प्रो० बावुनों से मिले हुए हैं इसलिए उनने कोई भी कुछ नहीं पूछता है। इधर कुछ दिनों में तो मुखिया छः बजे शाम के वाद चर मे भी नहीं निकलता है। उत्ते भय है कि 'नक्सलाइट' उमे जिन्दा नहीं छोड़ेंगे । भदई दा जैमे बूढा आदमी भी इन झूठों की बातें सुनकर गुस्मे में कांपने लगते हैं। बाबुओ भौर मालिकों ने कैसा घोपा खड़ा कर लिया है। जितने गरीव हैं उनकी नगर में सब नक्सलाइट हैं। "मुसिया को कोन मार. सकता है भदई दा?" मुदेव डरा हुआ है। उसे दो-नीन वर्षों के भीतर ऐसे परिवर्तनों से स्वयं भी अचरज हो रहा है । मुखिया एक नम्बर है, बबुआ। अपने पेट से घरावर इसी तरह को वातें गढ़ता रहता है।" "मगर मुखिया हमारे खिलाफ हरकतें करता रहता है तब तो यह अच्छी बात नहीं है।" अँधेरा डरावना होता जा रहा है। यहाँ से स्कूल पर आग का गोला साफ नजर आ रहा है। बाकी सारे गाँव में चुप्पी है। वह सोचता है, ऐसा दिन ती आना ही था। जुल्म जब बढ़ता है तो यही होता है."गरीब. तनते हैं और उन पर अत्याचार बढ़ता जाता है । सुदेव भी जव इस गाँव में आ गया है तब डरने से थोड़े काम चलेगा? इस नए महाभारत में शरीक तो होना ही पड़ेगा। , . १३ रेवती की आँखों से मांसुओं के अविरल धार फूट पड़े हैं। शलाखें पकड़कर यह ठगी-सी खड़ी है। वह समझ नहीं पा रही कि उसे ऐसी हालत में क्या करना चाहिए । मन तो बावरी की तरह दौड़कर सुदेव से लिपटना चाहता है, मगर सलाखें, पुलिस और बाहरी-भीतरी लगभग दो-तीन दर्जन आणे पता नहीं उसे अलग-अलग कितनी नीयतों से घूर रही हैं। ''अभी तक रेवती को विश्वास क्यों नहीं हो रहा है कि उसके 'वो' साक्षात उसके सामने खड़े हैं ? अगर आखें अविश्वास से विचलित हैं तो पानी की अजस्त्र धारा कहां से फूट रही है। बहुत कोशिश के बाद तो सुदेव को अपनी रेवती से मिलने भी अनुमति मिली है। "मुझे पहचानती नहीं सुबल की भौजी ? भूल गयी हो क्या?" सुदेव भी उपवाया हुआ है। रेवती की आवाज बंध गयी है। कंठ जैसे एक युग से बंद हो गया हो। लव और गुरा अजनबी 'मरद' को बार-बार घूर रहे हैं। . 'तुम्हारे ही दोनों ववुआ है न, सुबल की भौजी ?" सुदेव को लगता है, बातों का सिलसिला बढ़ने से रेवती के अवरुद्ध कंठ फूटेंगे। रेवती अपना माया हिलाकर इन्कार करती है और जोर-जोर से फफक पड़ती है। "गुछ बोलती काहे नहीं रे?"
"क्या बोलू? कई बरस से तो कंठ ही मूल गया है।" रेयती सिसकती
जा रही है।
"ये दोनो किसके है ?"
"यह लव है, तुम्हारा और कुरा सुवल से है।"
"यह सब कैसे हो गया, सुबल की भौजी?"
रेवती को अचानक कोई बल मिलता है। "तुम निर्मोही मुझे मागकर
चले गए । गांव के गिद्धों से बचना मुश्किल हो गया। मैंने जान पर खेलकर
अपनी इज्जत बचाई है। अपनी इज्जत के लिए मुवल के साप सो घर
यसाना ही था। मगर सुबल ने वचन दिया है तुम्हारे आने पर अपनी
भइया की इज्जत वापस कर देगा।"
"मुझे तुम पर विश्वास है सुबल की भौजी! मैं जानता हूं तुम ऐसा
कोई भी काम नही करोगी जो मुझे सराय लगेगा।" सुदेव अपने दोनों हाप
अन्दर ले जाकर लव और कुरा को सहलाना चाहता है।
"तुम मुझे यहां से कब ले चलोगे?"
"अभी तो हो सकता है मैं भी तुम्हारे पास मा जाऊँ।"
"क्या मतलब?"
"हमारे-तुम्हारे जैसे तमाम लोग तो यही आ रहे हैं। हमारे लिए
गांव में जगह ही कहां है ?"
रेवती पता नही क्या सोचकर उदास हो जाती है। जमादार दूर से
ही देख-देखकर बड़े कुटिल ढंग से हम रहा है। रेवती जप-तय उरो घृणा
ताक लेती हैं।
"मैं दोनों लड़के किसके हैं रे जवान ?" जमादार यही से चिलाता
"मेरे है-अपने सून हैं । तुम्हें काहे एक है जमादार जी?" मुदेव
जवाब देता है।
"जेल में साली बहुत उछलती है।"
तुम्हारे वाप का कुछ लगता है क्या?" रेवती चीखती हुई कहती है।
सुदैव अचम्भे मे रेवती को तारने लगता है और जमादार उसे भद्दी
गालियो बकता हुआ आफिस के अन्दर हो जाता है।
उत्तरगाया।
। "सभी साले इसी तरह के पापी हैं मुंबल के भइया!" रेवती शलाखों पर माया पीटने लगती है। "जेल के बाहर और भीतर चारों ओर ऐसे ही पापी हमारे पीछे पड़े हैं।" "ऐसे लोग गुरू से ही हम पर कब्जा रखते बाए हैं।" "ईयाजी कहां हैं ?" रेवती ही वात पलटती है। "मैं तो खुद माई से मिलने के लिए बेहाल हो रहा हूँ। माई का अता- पता शायद मुबल को मालूम हो।" "मुवल को पता चल गया है कि तुम गाँव आ गए हो।" "तुम्हें कैसे मालूम ?" मुदेव अचरज करता है । "हमें बाहर की घटनामों की बराबर जानकारी रहती ह।" मुदेव को बार-बार इच्छा होती है कि दोनों बच्चों को शलाखों से खींचकर कलेजे से साट ले। उसके हाथ स्वतः ही भीतर की ओर लपक जाते हैं। बच्चे डरकर पीछे की ओर खिसक जाते हैं। तब क्या रेवती ने उन्हें यह नहीं बताया कि सुदेव ही उनका असली बाप है ? 'ये मुझसे डरते क्यों हैं ?" सुदेव को थोड़ा क्रोध भी आता है। "डर तो इनके खून में ही नहीं है । तुमने इनके हाथ नहीं देखे क्या?" रेवती बच्चों के हाथ पकड़कर सुदेव की ओर बढ़ाती है, "ये तो अपने हाथों में भाले, गड़ासे, बन्दूक लेकर पैदा हुए हैं। ये सीता के बेटे हैं-लव-कुश हैं। देखते नहीं किस तरह चाँद-सूरज की तरह बढ़ते जा रहे हैं।" सुदेव इशारे से उन्हें अपनी ओर बुलाता है। बच्चे मुस्कराते हुए बढ़ जाते हैं । सुदेव उनके हाथ पकड़कर खींचता है। बच्चे किलकते हुए हाथ अन्दर की ओर खींच लेते हैं । सुदेव गेट खोलने वाले सिपाही से गिड़गिड़ाता है-~-या तो वह बच्चों को थोड़ी देर के लिए बाहर आने दे और नहीं तो मुदेव को ही अन्दर आ जाने दे। अपने बच्चों को प्यार करने की बहुर इच्छा होती है।" सिपाही किसी भी शर्त पर तैयार नहीं है । सुदेव का हहास वाँधक उत्साह नीचे की ओर उतरता जाता है। पता नहीं इनका संस्कार ऐस काटोर क्यों होता है ? बच्चों और मेहरारू के साथ भी इनके बर्ताव में को परिवर्तन नहीं आता है। खाकी वर्दी डालते ही थे पत्यर-दिल कैसे हो जा । । 60तत्तरगाथा "ठीक है, मुवल को भौजी। फिर कमी पाऊँगा । अभी चलता हूँ।" "फिर कव याओगे?" "जल्दी ही आऊंगा।" जमादारिन रेवती के बजाय बच्चों को निर्दय की तरह घसीटती है, ताकि रेवती भी विना दुलाए काठवाले फाटक के अन्दर चली गाए। सुदेव को जेत पर मे लौटकर आते-आते रास्ते में ही अंधेरा हो गया है। रतनपुर का टोला अभी आया कोस से कम नहीं है । मुदेव बगिया चंताल की तरह लपकता जा रहा है, जैसे गांव में उसे किसी को प्रतीक्षा हो। उजड़े हुए गांव मे अब मुदेव को किसको प्रतीक्षा हो सकती हैं ? अपनी सीता से मिलकर लौट रहा है मुदेव । सीता ने उसे जल्दी ही अपने पास बुलाया है । अभी तो अपनी सीता को मर्यादा हरण करनेवाले शिवजी सिंह की जांध तोडने के बाद ही मुदेव पुन. लौटेगा। लव और कुग अजेय हैं । अपमान का बदला लेने के लिए ही ये पैदा हुए हैं । निवजी के कारण ही तो सारा गांव उजाड़ हुआ है--गांव की दर्जनो सीता लूटी गयी है । हत्यारे गांव में ऐश कर रहे हैं. बैंकसूर जेल में है । उन्ही लिपो में उसकी सीता भी है। हरिजन स्कूल पर पुलिस चौकी से वन्दूकधारी संतरी अचानक चिग्याइता है, "हाल्ट!" सुदेव हक्का-बक्का खड़ा है जैसे उसे काठ मार गया हो। अभी तक संतरी किरिच-बन्दूक इस तरह ताने हुए है जैसे गोली मार देगा। "बोलता क्यों नहीं है ? कौन है तू ?" अभी सुदेव को कहाँ ज्ञान है कि कुछ कहे। उसके कंठ में तो लाया मार गया है । अचानक सटाक-सटाक आवाज करती हुई गोली बगीचे की ओर से छूटती है । सुदेव वगैर कोई आवाज किए वही धरती पर लुढक जाता है। थोड़ी देर में पुलिस चौकी से एक साय टाधारी सिपाही निकल पड़ते हैं । एक मादमी लाश को घसीटते हुए पुलिस चौकी ले जाता है और दूसरे लोग बगीचे की ओर वन्दुक चलाने वाले की मोर दौड़ जाते हैं। संतरी m स्वयं हैरान है कि जब उसने बन्दुक नहीं चलायी है तब गोली अचानक बगीचे की ओर से किसने चलाई है। रेवती के राम की लाश चौकी में सुबह तक पड़ी है। टोले और फिर अगल-बगल गाँवों से धीरे-धीरे चौकी के चारों ओर भीड़ बेसुमार होती जा रही है। शहर से पुलिस की दूसरी टुकड़ी भी आने वाली है। भीड़ एक- दम कावू के वाहर है।
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