Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
Chana Chabena
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चना-चबेना
[ हास्य-रसपूर्ण सग्स पद्य-माला ]
रचयिता
पण्डित ईश्वरीप्रसाद शर्मा
भूतपूर्व "मनोरञ्जन -सम्पादक
प्रकाशक
शिवपूजन सहाय
व्यवस्थापक, सरस-साहित्य-माला,
आरा (बिहार)
प्रथम चार]
सं० १९८१
[मूल्य १)
यह पुस्तक प्रत्येक प्रसिद्ध पुस्तक-विक्रताके यहाँ एक रुपये में मिल सकती है। चार चॉवल रा चना-चवेना गङ्ग जल, जो पुरवें करतार । हंसिये और हँसाश्ये, बनिये लंह लबार ॥१॥ चना-चबेना फाँकि लो, पहनो मोटा सूत । चाल पुरानो ही चलो, दिल रासो मजबूत ॥२॥ चना चवेना जो मिलै, क्यों चाहँ हम चून? राम दया करि हेरिद, पूरी दूनो जून शा चना-चबेना चावि लो, तज चटोरपन वान । रहो मस्त अलमस्त है, हृदै राखि भगवान men श्रीललित माहन ललितप्रेम एमन मित्र लेना
समर्पण
स्वर्गीय पं० रघुवीरदत्त शर्मा,
(मठिला-डुमरांव निवासो)
-
,
तुम तो हमलोगोंको चेतरह धोखा देकर एक-त्र-एक
चले गये और हम दोस्तोंको रोनेके लिये इस पाप-ताप,
छल प्रपच और दुख-कष्टसे भरी हुई दुनिया छोड गये।
मोह । क्या रंगीन तबियत तुमने भी पायी थी। जहाँ
कहीं बैठ जाते, वहीं यारोका जमघट्ट लग जाता, हँसीका
फौआरा छूटने लगता, हँसते हँसते लोगोंके पेटमें चल पड
जाते। वह हर बातका जवान हाजिर रखना, पातोंका पुल
बांधना, हर वाक्यमें नोकझोफकी अदा दिखलाना जर
याद आता है, तर कलेजेपर सौ विच्छुओंका एक साथ
डक धैठता है। तुम्हारी ही यदौलत मुझ-सा मुंहचोर,
फमसखु न ओर घोदा भी बातूनी धन गया। यार । अय
इस दुनियामें तुम कहाँ मिलोगे जो तुम्हें गरमागरम चना-
चोना चपाऊँगा? इसी लिये महज तुम्हारे नामपर इस
चने-चपेनेका नैवेद्य उत्सर्ग किये देता हूँ। फिसो लोकमें
होना, इसे स्वीकार करना ।
तुम्हारा, ईश्वरीप्रसाद शर्मा।
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पधसं० पृष्ठ २१ २५ . विषय-सूची विषय १ छोटा मुंह बड़ी बात: २चना जोर गरम ३ चौपट-पुराणम् ( धावा-बीवी-प्रकरणम् ) (गडवड़झाला-प्रकरणम्) ५ अजी, मैं हूँ, मैं! ६ पिता पुत्र-सवाद ७ आजकलके दम्पती ८ आजकलकी गृहस्थी मियां मिट्ठ १० जले दिलके फफोले ११ इमारी नानी १२ फलियुगी सन्त १३ महन्त-रामायण नगाड़ा १५ रंगे कपडे और रंगे सियार १६ दाढ़ी-चोटी सम्मेलन १७ बजारतका ममिया 4. ३५ ३८ १४ चोपटका ४३ ४८ ५०
चना-चबेना
..
१८ नानीकी कहानी
१६ अखियां अटकी
हिन्दुओ! होशियार!
२१ एकोऽहं द्वितीयो नास्ति
२२ लीडारावतारः (सटीक)
२३ कथा चिट्ठा
२४ रिलीफ़-कमेटी
२५ रएडा-रहस्य
२६ सुधरी हुई खियाँ
२७ मियां मिट्ट के तराने
२८ लेखक-प्रकाशक-संवाद
२६ गोरखधन्धा
३० मदारी मियाँ
३१ जोरु-गुण-गानम् ( सटीक)
३२ कौन सी चाहिये, यह या वह ?
३३ वर्षा-वर्णन
३४ कलियुगी कर्ण
३५ सम्पादकजी
३६ चण्डाल-चौकडी
३० नयी रोशनी
७७
७८
८१
१००
..
2
धना-चयेना
-
सच पूछिये, तो इस झोलेमें जितने चने-चने हैं, चे
सब अधिकतर "मतवाला"के और फिर 'भौजी', 'गोलमाल',
'भूत' और 'भनोरमा' आदिके भाडमें भूने गये हैं। कुछ
इधर-उधरके हैं, तो कुछ एकदम कोरे भी हैं। आशा
कामिल है, कि मेरी यह सुदामाकी-सो भेंट हिन्दीके उदार
पाठक कृष्णकी सी सहृदयताके साथ अपनायेंगे।
हिन्दी साहित्यमें अनेक रसोली रचनाएँ अवतक निकल
चुकी हैं और प्रायः निकलती ही रहती हैं। उन सब रंगीली,
रसीली, चुभीली, चटकीली, नुकीली, भडकीली और
जोशीली रचनायो के स्वादके ऊपरसे यदि मेरी यह कडवी,
फसली, पारी और गधारी रचना भी कुछ प्रिय हो सकी,
तो मैं यही समगा, कि कविचर रहीमका यह दोहा
सार्थक हो गया-
नैन सलोने अधर मधु, कह रहीम घटि फोन
मीठो मावे लौनपर, 'अरु मीठेप लोन।"
कलकत्ता,
निवेदक,
शिवरात्रि,
ईश्वरीप्रसाद शर्मा
(स०१९८१)
-
-
?
-
चना जोर गरम ! 1 "The humorous writer professes to awalen and direct your love, your pity, your kindness your scorn for untruth, pretension, imposture-your tenderness for the weak, the poor, the oppressed, thc unhappy A literary man of the humorist turn is pretty sure to be of a philanthiopic nature, to have a great sensibility to be easıly moved to pain or pleasure, keenly to appreciate the varieties of temper of people round about hi, and sympathise in their laughter, love, amusement, tears the best humour is that which is flavoured throughout with tenderness and kindness -Thackeray. व्यय और हास्य-रससे भरा हुआ साहित्य मनुष्यके मनपर कितनी मासानीसे फैसौ गहरी चोट पहुंचाता है, किस तरह हंसाते हुए बडी-बड़ी बातें बतला जाता है, चना-चयेना यह बात अपरके अवतरणसे भलीभांति विदित हो जाती है। इसके लेखक विलियम थैकरे अगरेजीके यहुत बडे हास्य-लेखक हो गये हैं। अतएव, आपका कहना क्तिना अनुभव पूर्ण, कितना सत्य और समीचीन है कि हास्य- रसका लेखक हमारे मनमें प्रेम, दया और करुणाका उद्रेक करता है, असत्यके प्रति घृणा उत्पन्न करता है, घेईमान धोकेवाजोंकी पोल सोलता है तथा दुर्यल, दरिद्र, दुखित और दलित जीवो के प्रति सरस फरुणाका स्रोत हृदयके अन्दर प्रवाहित कर देता है। हास्य-लेखक अपने चारों ओर जिन लोगों को पाता है, उनकी हंसी, प्रीति, विनोद और मधुमें सहानुभूतिपूर्ण हृदय रखते हुए अपनी समस्त रचनामें करुणा और सहानुभूतिकी धारा प्रवाहित करनेका प्रयत्न करता है। वास्तवमें हास्य-लेखक पड़ा ही कुशल होना चाहिये। यह कामकी यातें भी सुनाये और हंसा-पिलाकर फडी-से- फडी यात कह जाये, यही उसकी तारीफ है। हिन्दीमें एक जमाना था, जब कि बडे-बडे हास्य-लेखक थे, अय तो मैदान उस टकरके लोगोंसे एकदम सूना नहीं, तो यहुत भरा हुमा भी नहीं है। व्रजभाषा-साहित्यमें हास्य और ध्यंग्यसे भरी पर ११ चना-चवेना , रचनाएं मौजूद हैं। कबीरदासकी उलटी वाणी परम प्रसिद्ध है। उनकी सीधी बातों में भी व्यंग्यकी भरी हुई है। गुसाई तुलसीदास सारी रामायणमें शान्ति, मकि और प्रेमकी धारा यहा गये हैं। पर हास्य उनके हायसे भी नहीं छूटने पाया। न विश्वास हो, तो बाल- काण्डमें शिवजीका विवाह-प्रकरण पढ़ लीजिये। वहींकी यह कहावत है कि 'जस दूलह तस पनी घराता!' सूरदासके गोपी-ऊधो-सवादमें भो कम मजेदारी नहीं है। गङ्ग, रहीम, वैताल, गिरिधरराय आदिकी खरी उकियोंमें व्यग्य- रङ्गको स्वासी बहार है। सिर्फ समझनेवाला सहृदय रतज्ञ चाहिए। यदि एक ही जगह बहुत सी हास्य-रचनाएँ देखनो छों, तो भडीमा-स'मह" के चारों भाग देख जाइये। निहायत अच्छी चीज है। खडी चोलीके गद्य-पद्यमें भी भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के ही समयसे हास्य और व्यग्यकी लहर चली। उनके लिखे हुए "अन्धेर-नगरी" कादि प्रहसन पढे और "भारत-दुर्दशा" में "चूरनके लटके" का मजा लें,तो मेरी गवाहीकी फतई जरूरत न रहे। भारतेन्दुके अतिरिक्त पण्डित प्रतापनारायण मिश्र, २० अम्बिकादत्त व्यास, पं. रामशंकर ध्यास, प. बालपण भट्ट, १० यदरीनारायण चौधरी, पखदत्त शर्मा और पाद घना-चयेना १ बालमुकुन्द गुप्त आदि पुराने हिन्दी-लेपको ने हास्य और व्यग्यकी खूय ही निराली छटा छहराई। इसी दलफे १० शिवनाथ शर्मा लखनवी आजतक "मिस्टर व्यासको कथा" सुनाकर हँसाते और खरी बातें सुनाते हैं। खेद है, बहुत-से हास्य-रसके पुराने लेस यो ही पत्रो की फाइलो में सड गये । हिन्दीवालोंने उनका उद्धार तक नहीं किया। स्वनामधन्य पण्डित महावीरप्रसाद जी द्विवेदो हास्य- रसके विशेष लेपक नहीं हैं , तो भी आपकी उक्तियोंमें व्यग्य और प्रच्छन्न हास्यकी ऐसी मन्तर्धारा रहती थी कि उनके सम्पादन-कालमें लोग 'सरस्वती' की समालोचनाएँ पढ़ने के लिये लालायित रहा करते थे। स्वर्गीय बाबू बालमुकुन्द गुप्तजीकी चोज भरी इबारत- भाराई हिन्दीवाले कभी भूल नहीं सकते। उनके "शिव- शम्भुके चिट्ठ" तथा 'चिट्ठ और खत" में वकिमका-सा लेखन-चातुर्य और गम्भीर हास्य भरा हुआ है। हर्पकी बात है कि उनके साथी ६० जगन्नाथप्रसादजी चतुर्वेदी आज भी लोगों को उनकी याद दिला दिया करते हैं। चौरेजी न केवल हास्य-रसके लेख ही लिखते , बल्कि चलते-फिरते, व्याख्यान देते, बातें करते,सदा हास्य ध्यंग्य की धारा बहाया करते हैं। हास्य की मनुल मूर्ति हैं। ---
चना-चबेना
4. मन्नन द्विवेदी गजपुरी वो०ए० अल्पायु ही हो गये;
नहीं तो उनसे हिन्दीका हास्य-साहित्य अवश्य अलंकृत
होता। चे भी अच्छी चोजदार रचना करते थे। उनके
मित्र १० बदरीनाथ भट्ट पी० ए० घडे ऊँचे दर्जेफ विनोदी
लेखक हैं। आपका 'मनोरजन' और 'चुगीकी उम्मेदवारी'
सुन्दर हास्य और शुद्ध व्यग्यके नमूने हैं।
श्रीयुत जी० पी० श्रीवास्तव हिन्दीके 'मोलियर' हैं।
हास्यपटुत्वके लिये पदक पा चुके हैं। आपको रचनाएँ
हंसीकी फौआरा हैं। आपकी चुलबुलो भाषामें बडी लोच
और फडक रहती है। उसमें रवानी होती है। सबसे पहले
आप "इन्दु" और "मनोरजन" द्वारा ही हिन्दी-ससारमे
आये थे।
उपयुक 'मनोरंजन'फे द्वारा घरसों मनोरञ्जक साहित्यका
अच्छा प्रचार हुआ। खेद है कि वह:पत्र चिरस्थायी नहीं हो
सका , परन्तु उसके यशस्वी सम्पादक पूज्यपाद पण्डित
ईश्वरीप्रसाद शर्मा यदा-कदा अपने लेखों द्वारा लोगोंका
मनोरञ्जन करते रहते हैं। हास्यपूर्ण पद्य-रचनामे आपको
अच्छी सफलता होती है। सम्प्रति हिन्दीमें जितने भी
हास्य-रसके पत्र निकलते हैं, उन सभीमें आपकी इस
तरहकी विनोद पूर्ण रचनाएं उपती रहती है। प्रस्तुत
चना-चमेना पुस्तक में जिन हास्यमयी रचनाओ का संग्रह है, उनमें बहुत- सी हास्यरसके सामयिक पत्रों में छप भो चुकी है, परन्तु कितनी अप्रकाशित ही हैं। पण्डितजीकी रचनाओं के विपयमें हम अपनी ओरसे कुछ ने कहकर सुप्रसिद्ध विनोदी पत्र "मतवाला" के सम्पा- दको ही शब्दोंमें सुनाये देते हैं। ये 'मतवाला' के दूसरे चर्पके पहले शकमें लिखते हैं-"हम अपने सुप्रसिद्ध विनोदी मित्र 'मनोरञ्जन -सम्पादक पण्डित ईश्वरीप्रसाद शर्माको भी बडे प्रेम और आदरके साथ स्मरण करते हैं, जिनकी हास्य- रसमयी कविताओने समय-समयपर "मतवाला" को विशेष चित्ताकर्षक बनाया है। शर्माजीको विनोदका व्यसन है। वे मनोरञ्जनकी मूर्ति हैं।" वास्तवमें जिन लोगों का पण्डितजीसे परिचय है, घे वधी जानते हैं कि उन्हें खुशदिलो कितनी पसन्द है, और वे मुहरभी सूरतोसे कितना परहेज रखते हैं। इसीलिये भापकी रचनाओं में भी आपकी हास्यमयी प्रकृति प्रस्फुटित हुए विना नहीं रहती। जो पकियां इस प्रत्यमें प्रकाशित हैं, उनके लिपे जानेका, मनोविनोदके सिवा, और कोई वास उद्देश नहीं है, तथापि उनमें कितनी ही राज- नीतिक, सामाजिक और साहित्यिक थातोंपर वह चुमती चना-चपेना हुई फरतियाँ जड़ो गयी हैं कि किसी-किसोके तो कलेजेके पार हो जायेंगी। वर्तमान युगकी दैनिक यातोंको लेकर ही पण्डितजीने उनपर हर-एक पहलूसे विचार करते हुए कटाक्ष किया है। विनोदके ही मिमसे आप बहुत कुछ परी-खरी सुना गये हैं। इसलिये इसे निरे सूखे चने और चोना ही न समझे, इसके साथ-साथ लाल और हरी मिर्चे भी हैं-जरा सम्हलकर जवानपर रखियेगा। इस पुस्तककी भाषा यड़ी चुस्त है। कहीं-कहीं वाज- बाज वाक्योंका प्रयोग तो इतना सुन्दर हुआ है कि प्रशंसा किये बिना नहीं रहा जाता। मैं जहाँतक समझता हूँ, हिन्दीमें यह अपने हङ्गकी नयी और मनोरक्षक सामग्री प्रमाणित होगी और इसका अधिकाधिक प्रचार भी होगा। यदि पाठक-वर्गने इसे अपनाया, तो शीघ्र ही इस मालाका दूसरा अन्य “कचालू रसीला" निकाला जायेगा, जिसमें पण्डितजीकी अन्यान्य हास्यरसमयी रचनाएँ गद्य-पद्य-मिश्रित-प्रकाशित की जायेंगी। .. 'मतवाला'-कार्यालय २३, शंकरपोप लेन, कलकत्ता (होली, वि० स० १९८१) हास्य व्यग्यानुरागियोंका सेवक शिवपूजन सहाय प्रकाशक ।
'चना-चवेना। चौपट-पुराणम् । 1 तृतीयोऽध्याय । वावा-बीवी-प्रकरणम् । बागाजी ज्वाच। आओ, आओ, चेले मेरे, कर लो मौज-बहार। एकाकार करो भारतको, होकर विगत-विकार ॥ रहें नहि बाबू बनिये। रहें नहि मोची धुनिये । सभी हों हिन्दू सच्चे । 'न होवे धर्मके कच्चे ॥१॥ । पान-पानका भेद मिटा दो, करो राष्ट्र को एक। दाढी-चुटिया सर कटवा दो, रहे न कोई टेक ।। तभी तो उन्नति होगी। सभी विधि सम्पति होगी। यनेगा मारत लन्दन। जो सर रोरीचन्दन ॥ सा उवाच । अहा ! , क्या ज्ञात अगम है ! गुरुका हान भगम! .
चना चबेना चेलिन बननेको नहिं कहता, साथिन तो बन जाओ। धर्म-कार्य में स्वार्थ छोड़कर, मेरा हाथ बँटाओ छोडो छल-छन्द पुराना । बदलता रोज जमाना । करो कुछ सच्ची सेवा । मिलेगा मिसरी-मेवा ॥१॥ बीबी उवाच। चाया ! मुझसे मत बोलो, चोंच अपनी मत खोलो। करती आयी अपने मनकी, रहो सदा स्वच्छन्द । अन्त समयमें चेलिन वन, क्यों पड़ तुम्हारे फन्द ? चलूगी अपने रस्ते। फँसू या छूट सस्ते । उड़ाऊँ तेरी खिल्ली, शेरनी है, नहिं दिल्ली ॥१२॥ चेला उवाच । वाह वा! गुरुआनीजी ! वाह, धुढिया नानीजी । 'भागो, भागो, याँ से अब तो, बहुत बुरे दिन आये। भगत तुम्हारेभाग भागकर, चापाके ढिग आये। चलेगी एक न तुमरी। हटामो डफली-जरो। राह लो अपने घरकी । फसम चकरके सरकी ॥१३॥ इतिश्रीचौपटपुराणे,' भविष्योत्तरखण्डे बीसवीं-संदीवर्णन असहयोगान्दोलनान्तर्गत यावा-बीवी-प्रकरण नाम सूतीयोऽध्याय - समाप्त।
चना-चोना गड़बड़झाला-प्रकरणम् । -- . बाबाजी उवाच । सुनो यह ज्ञान प्रगम है, अहा ! क्या शान अगम है । होली आयी, होली आयी, लूटो मौज-घहार । जात पातका भेद मिटा कर दो एकाकार ॥ रहे नहि नीचा कोई। चने नहिं ऊँचा कोई॥ सभोका धर्म एक हो । सभीका कर्म एक हो ॥१॥ सुनो सव चेले-चेली! करो अब रेलापेली चाम्हन-बनिये, मोची-धुनिये, सैयद, सेख, पठान । रोटी-बेटी एक करो सब, तजो द्वतका ध्यान ।। तभी तो शान वढेगा। देशका मान बढ़ेगा। बनेगा भारत लण्डन । होयगा जगका मण्डन ॥२॥ चेला उवाच । पया ज्ञान यताया, भेदका भरम जवाया। अगम अगोचर महिमा गुरुकी, दुनिया भेद न जाने । परमेश्वर-अवतार आप है, जो जाने सो माने ॥ चलो सब दौडो सरपट । मिटायो सारी खटपट ॥ होवेगी उन्नति झटपट । रघो मत जीमें लटपट ॥३॥ २१ यहा। ।
चना-चबेना-
१
.
नामको रहा
नेका
(२)
पुरुषकी मतिही है फुछ और,
नारिकी गतिही है कुछ और
कहे वह और, करे वह और,
देख लो दुनियाका यह तौर
(३)
कहाँ दो कहलाते थे एक,
जन्म-भर धरे प्रेमको टेक।
वहाँ भर बदले रङ्ग भनेक,
नहि
(४)
पुरुषको भावे ग्राम-निवास,
नारिको भावे नगर-विलास ।
पुरुष कट्टर खबरधारी,
नारिको मलमल है प्यारी।
(५)
"घना दो गहना सोनेका,
नहीं तो मेल न होनेका ।"
पुरुषने कहा,-"व्यर्थ गहना--
नारिका शील बड़ा गहना ।।"
२८.
-
चना-चना
नारिने विगड बतायी डांट,
। पुरुषकी दिया युकिको काट ।
लगी-लिपटी फिर बोली वात,
'लगायी सोलह आने घात ॥
(७)
पुष्पने कहा,-"स्वामि-सेवा
नारिको देती है मेवा।
सत्तीही पतिको प्यारी है,
घही वस सच्ची नारी है।"
नारिने कहा, "करो मुंह वन्द,
न फिर कहना ऐसा हरचन्द ।
नारिको मत मानो दासी,
नहीं तो मंद होगी पासी॥
.
y
नारि हम नहीं, नरोंकी पान,
हमें हैं मान रहे भगवान।
देवियाँ हम कहलाती है,
माने जग भरसे पाती हैं।"
-
- चना-चबेना भEEG.न- (१८) "यही आदर्श पुराना है, 'जिसे सतियोंने माना है। इसे यदि तुम भी मानोगी, लोक परलोक बना लोगी।" आजकलकी गृहस्थी। (१) सुप गृहस्थीका मिला है धूलमें । लग गया कांटा रसोले फूलमें ॥ प्रेम आपसका हवामें मिल गया। फूटकाही फूल ऐसा खिल गया । (२) पुरुपने पायी हैं ऊंची डिग्रियाँ । --, घरमें अनपढ़ भर रही हैं नारियां ।। मिल रही जोडी यहाँ मेल है। खेलता विधना मनोसा सेल है।
चना-वना.
(३)
लड़ रही आपसमें नित है नारियों।
है उलझ जाती ननंदसे भाभियाँ।
देवरानीसे जिठानो लड़ रही।
दूसरीको एक नानो कह रही ।
(४)
घरफे कामों में नहीं जी लग रहा।
समय है आलस्यमें ही कट रहा ।।
ईश चरणोंको भुलाया ध्यान है।
पति पदोंका कुछ ने रखती मान है।
(५)
ईश-पूजाका दिपाती स्वाग है।
क्यों पड़ी ऐसी कुपमें भांग है।
नारिफे दित स्वामि-सेवा धर्म है।
उत्तरे हित यस एकही यह कर्म है।
इसके पास प्राप्त होता स्वर्गह।
यह दिलाता नारिको अपवर्गा
भूलकर सीधी मुंगम-सी यातको ।
मानती यो दिन रीरातो?
1
चनाचयेना
(७
तीथ, व्रत, पूजा, सभी घेकार है।
पति पदोसे यदि नहीं कुछ प्यार है।
वह गृहस्थ जलके होती क्षार है।
जिसमें आपसमें मची तकरार है।
(८)
आजकल घर-घर कलह है छा रही।
सम्पदा होकर विदा है जा रही।
विर रही काली घटा भापत्तिकी।
मिट रही आशा सभी सम्पत्तिकी।
(E)
नारियां यदि मेलसे रहने लगे
सुख सदनमें नित्यही होने लगे।
स्वर्गका सुख भूमिपर दिखलायगा।
स्वर्ग पानेको न मन ललचायगा ।
(१०)
आजसे हो तुम धनो गृहलक्ष्मियाँ ।
फैल जाये तव गुणों की रश्मियाँ ।
सती साध्वी नाम घरवा लो सभी।
पैर अपने जगसे पुजना लो ममी ॥
.
चना-चबेना
मियॉ मिट्ठ ।
अजी! मैं हूँ सबका सिरताज । न रखता शंका और न लाज ||
निगा रोज पराया काम । रह काम दाहिने-घाम ॥
फोड लूँ आँख, कटा लूं नाक । छींक दूं और जमाऊँ धाक ॥
करू औरोंकी यात्रा मंग! खुशीसे कर दूं सवको तग।
हुआ है शौक आजकल एक। धरी है मनमें अपने टेक।
बनूं में लेखकगण-सिरमौर । घदल दूं लिखनेका सव तौर ।
व्याकरणका सिर कर दूं कलम । छंदपिङ्गल भी कर यूँ हजम ॥
घडाघड कविता हो तैयार । लगे लेसोंका भी अम्बार ॥
न लिपनेका है मुझे शऊर । मगर जीमें है भरा ग़रूर ॥
दिलायेगा जो मेरी भूल । डाल दूं उसकी आँखों धूल ।।
'मिले जो राम ! कहीं अजमाना निकाले पत्र, बढ़ा दे भान ।।
वनूं मैं उसका सम्पादक । पजा हूँ ढोल-ढाक हक-दक ।।
काहीसे लेकर रोडाईट । छाप दूंगा कागजकी छींट ।।
यताऊं साधु उसे, जो चोर। साधुको कददू डाकू घोर ।।
गुणीको गाली हूँ रोक । न इसका मनमें लाऊँ शोक ।।
मकहकर पलू नित्य में राह । जगत्में किसकी है परवाइ ।
आजकल मचा महा अन्धेर । लगा लेखकलाणाहर।।
चना-चीनी
--
वर्णमाला-भरका ही ज्ञान ।
दिला देता है सम्प्रति मान॥
इसीसे मुझ-सा लएठ लवार।
चलीता हिन्दीका अपवार ।।
-
जले दिलके फफोले ।
-
.
।
भारतमें हुए बडे-बडे घेईमान।
काम करा लें, टका न देखें, और कर हैरान ।
'कोई देशके भक बनें औ कोई हिन्दी-प्रेमी।
कोई धर्म-धुर, कोई सुधारक, बन जाते सुमहान ।
काम पडेपर पीठ दिखावें, चदा पब्लिकका खो जावे।
बगुला-भगत ने फिरते हैं, बडे-बढे विद्वान ।
कोई पत्र-सम्पादक बनते, असहयोगका बानो धरते।
भाप अदालतमें धपके पां, तनिक न होते म्लान ।
औरोंको उपदेश करेंगे, आप चैनसे मौज करेंगे।
दो' 'दे दो' कहते फिरते, आप न देते दान ।
हिन्दीके उद्धार करैया, पहुँतेरे प्रकाश भया ।
हिन्दी प्रेमीपनका दम भर, फाटे सबके कान ।
.
-47
र
चना-चना
बावाले बापू गच्छे हैं। कहीं बढ़-चढ़कर सच्चे हैं।
दुरंगी चाल नहीं चलते। अन्तमें हाथ नही मलने ।
छिपे रुस्तम है ये परडे । धर्मको मारें ये उण्डे ।।
महन्थी पाकर मन्दिरकी। वाल चलते हैं धन्दरकी ।
नरकके कुत्ते वन जाते। काम भी लोम मोह-माते॥
न कोई पाप बचा इनसे। कोई कास छुटा इनसे ॥
पिये हैं दाल, ताडी, भग। लिये फिरते हैं रण्डी सग।
गेरुएकी होकी ओट । भयानक कर जाते हैं चोट।
कभी जो पुल जाती है पोल । ढोलसे नहीं निकलता बोल ॥
जूतियाँ चाँदीकी चलती । भापदाएँ तन हैं टल्ती॥
न कहता फिर कोई है बात । वही फिर दिवस,वही फिर रात।
यही फिर रङ्ग रंगीला साज । वही जो कल था,फिर है आज।
धचाओ राम । महन्तोंसे ।
नरकके कीडे-सन्तोंसे
लगा दो इनके मुंह स्याही।
यना दो नरक राह-राही॥
H
महन्त रामायण
दोहा।
चित्रकूटके घाटप, भइ लएठतकी मीर ।
बावा खड़े चला रहे, नैन-सैनके तीर ।
चौपाई।
सन्त-महन्तनकी अस करनी। जिमि लयार-लएठन-आचरतो ।
भूखनि भरहि गृही घेचारे । मालपुओंके भोग हमारे ॥
धास-पात जो खाइ अघावें । कामदेव नित तिनहि सतावें ॥
पुनि कस पूछसि बात हमारी ? जग-जाहिर है लीला सारी॥
माई-माई' कहत पुकारी । सुन्दर नारि निकट बैठारी॥
लोभ लाभको जाल विछायो । औसर देखि क्रोध दिखरायो।
कल पल छलसे यसमें लाई। करी बात सयही मन-भाई ॥
जदपि कहें वाइरते माई। मन मह समुझे किन्तु लुगाई ।
मंड मुंडाइ भये सन्यासी। किमि करिहौं नहिं सत्यानासी ?
लाज सरम सब धोइ यहाई। हम फ्पा जाने नारि पराई ?
दोहा।
बेटा घेटी है नहीं, जो कहुँ ब्याहन जार।
तो पुनि रखि का चाटिहौं, मान भायरू भाव ?
चना-चना
चौपाई
पाली रण्डी और रखाई। मठमें अपने एक लुगाई ।।
रएडीने जूठा खिलवाया। धर्म धूल मेरा मिलवाया।
पर प्रसाद गुनि हिय हरखायो । चावि चारि तेहि जू उन खायो ।
वाप हमारे जो कहुँ है हैं। दादा परदादा जो है हैं।
सीधे पा जइहैं चैकुण्ठा । पंस-बीत जन्मा मैं लएठा।
पढ्यो-गुन्यो अच्छर नहिं एकौ । काम-काज सोख्यो नहि नेकौ ।
याप मरा अरु मातु सिधारी। फटेउ.करम मिलो नहि नारी ॥
भीख मांगते भाइ बगाला.! गले ढारि मोटी-सी माला।
भस्म रमाइ जगाइ अलखको। हथियायो मन्दिर मो मठको।
भय तो नित करती है चांदी। बीस वाह पचित हैं धांदी ॥
दोहा।
वाजिद अली नवायसा, नित भोगू में भोग।
पास फटकते हैं नहीं, कभी सोफ भी रोग ।
चौपाई।
कितनी नारि विगारी हमने । माया यहुत घटोरी इमने ॥
बहुत दिनापर मएडा फूटा। यना-यनाया गर है यूटा।
ना जाने यह कौन सतीको। भाद पड़ी है सत्यवतीकी ।
लाज लुटो जाती है मेरो। पोलक फूटा चुप है मेरी।
चना-चमेना
बडे सोचमें पड़े, कसै क्या ? कैसे बच जायेगी लाज ?
फैसे मुंह दिखलाऊ जगमें ? गिरी गगनसे फैली गाज ?
बड़े भाग्यले अवसर आया, हुआ गिरफ्तारीका ज़ोर ।
वह भी पकडे गये मचाकर गांधीजीकी जय'का शोर ।
बह भी खासा मेलाही था, पूरी थी भेड़ियाघलान ।
सच्चा झूठा कौन देखता सतूमें मिल गया पिसान ॥
माफ़ किया लोगोंने उनको, यों जर जाते देखा जेल ।
रूमझ लिया लोगोंने इसको, करनीकी भरनीका खेल।
आनेर जव कांगरेसने, जूतोंसे करके मादर।
निकाला अपने दलसे, भागे अपना मुँह लेकर ।।
कुछ दिन कर अज्ञातवाल, मन मारे दैठे थे चुपचाप ।
जैसा विषका दांत टूट जानेपर हो जाता है सांप ॥
मालदार दो-चार फंसे औ मिले मतलवी पक्के यार ।
सडी कम्पनी हुई ठाटसे, निकला हिन्दीका अखवार
गरमागरम मसाला भरकर, धुन चुन गालीकी बौछार!
करने लगे नये सम्पादक, छिप-छिपकर धनियोंपर वार॥
दिये किसीने चार-पांच सौ, मिले काहीसे पांच हजार ।
चूल्हे-मांड पढ़े दुनियाभर, उनका तो है बेडा पार।
कमी नरम-दसके यन जावें, कभी गरम दलके अवतार।
यमी गुशामद, पामी डपटसे, चलते हैं सब कारोवार ।
१४
1
-
॥
-
-
चना चयन
आज करें तारीफ किसीफी, फेल कर देव निन्दा घोर।
साधु येना देते हैं उसको, जिसको दुनिया कहती चोर
माल मारनेकी भाशापर तारोफ़ोंके याँधै सेतु ।
नहीं प्रयोजन और किसीसे, रसते फेवल धनसे हेतु ।।
कम्यस्ती फिर आयी इसमें; जेल हुई जब दूजी बार।
अब तो नामी हुए जगतमें, घने समीके हैं सरदार ।
लौट जेलसे खेल बनाया, अपना काम लिया है साधा
तकतर्क तो निशाना मारे, जैसे वनका कोई व्याध ।
धर्म-नौति भी राजनीतिक पने आप हैं ठेकेदार ।
और हुए साहित्य-क्षेत्रके, पूरे आप इजारेदार ।
ऐसी हवा चली चौवाई, चारों और जमी है धाक ।
सभी उन्हीं के पैर पूजते, सर चाटे तलवेको साफ ।
ऐसे रिश्वतखोर, अर्थफे दास, जहाँ पाते आदर ।
मैली होने कों ने देशकी, धुली हुई उग्नल चादर ?
टफा धर्म है, टका कर्म है, टका स्वर्ग है उनका एक
एका कमाना ही उनके जीवनकी है सर्वोत्तम टेक ।।
भोले-भाले भ्रममें भूले देशभक इनको ही जान।
छुरी ठिपाये रहते है ये, फाटे नित सनहीके कान ।
राम! पचाना इस मायाले, छायासे भी करना दूर।
भपडा लकी कपट कलाका, फेर देना भयं चकनाचूर ।।
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चना-चयेना
इन्होंने उनको भी बदनाम किया, जो सच्चे हैं निष्काम |
धराफर अपना त्यागी नाम । कमाया हर सूरतसे दाम ॥
दया हो राम ! दयाके धाम ! न पैदा हो ऐसे निष्काम ।।
गे कपडे न ठगे अब और। रंगे स्थारोंका पर्दले तौर ।।
-
दाढ़ी-चोटी-सम्मेलन ।
"मिली दो चुटिया-दाढ़ीको । पाट दो गहरी खाडीको॥
के दो प्रीति-रीतिका शैखं । काट दो वैर-भावका पट्स"
यही उपदेश लीडरोंका। मान, दल चला गीदडोका ।।
सांधकर असहयोगका योग। हुआ हिन्दू-मुसलिम संयोग है,
मिली फंस चुटियोसे दाढ़ी। खींच ले चलो देश-गाड़ी।
नामको रहा नहीं कुछ भेद । मुसल्मा लगे मानने वेद ।।
लगे हिन्दू कुरान पढ्ने । मियाँ साहब पुराण पढ़ने ।।
खिलाफतको आफत निज मान किया हिंदूने चदा दान ।।
कमेटी लगी जोर चलने । शत्रु सब लगे हाथ मलने ।।
मियाने गौरक्षाका चार्ज । सुनाया, खोला दिलका राज ।।
पुरी गो-हत्या बतलायी। बात हिन्दूके मन भायी ।।
मगर यह सब थी पोलमपाल। पोखरा था भीतरसे ढोल ।।
घट
चना-चोन्च
-
बडे हत्यारे वे निकले। स्तनो, घोर नीच निकले।
इसीसे भूल सकल उपकार । हमीपर करते हैं वे वार॥
मान-धन सतियोंका हरत । प्राणका नाश किया करते।
अभी तो कलको ही है वात । किया दिल्ली में जो उत्पात ॥
लखनऊकी वारी पायी । तपाही हिन्दूगर आयी।
लगे हाथो देखा कोहाट । जहाँका विगडा सारा ठार ॥
वहाँके लुटे सभी हिन्दू । जान ले भगे सभी हिन्दू ॥
कमी महलोंमे जिनका वास । भरी दौलत थी खासी पास ।।
चो मोहाल उन्हें अब हैं। दिगम्बर आज वने सर्व हैं।
दे रहे मूंछोंपर हैं ताव । मियाँजीका पूरा है दान ।।
दिपायी फिर नादिरशाही। मवाकर यो गुण्डेशाही ।
दाढी-चोटीका नकली मेल । मिट गया, निकला
पूरा
साफ अब साका उतरा है। ढहा नम्ली चबूतरा है ।
लगायी आग, मूर्ति दी तोड । मियांने हिन्दूका सर फोड ।
मनाते हैं पर पुशियाली । दे रहे हिन्दूको गाली ॥
महात्माजी करते उपवास। देशको सुनकर होता त्रास ॥
मगर क्या पिघलेंगे गुण्ड । दुष्ट ये मोटे मुसटण्ड ।
छोडकर लोडर-गणकी माश। छिन्न कर दुल्नाका पाश ।
सभी हिन्दू बलवान् यनो । भीम-अर्जुन-सन्तान यनो ।
नो हे हिन्द ! तुम पलमान । इसीसे राजी हो भगवान ।
खेल
।
चना-चयेना
।
तुम्हें हिन्दू रहने देंगे। किली विधिसे जीने देंगे।
दिखा दो फिर प्रताप-सा ताप | शिवाजीका-सा पुनः प्रताप ॥
मिट गयी जब नौरंगशाही । रहे करता गुण्डेशाही?
वज़ारतका मर्सिया 18
या खु.दा ! कोई गरीयोका मददगार नहीं ।
कोई दिलदार नहीं, कोई है गमख्वार नहीं ॥
हमने चाहा धा, वजारतके मजे हम लूटें।
दास पार्टीसे इसोसे या किया प्यार नहीं।
दम-घ दम चूमते ये हम कदम हुक्कामोके ।
मुरकके साथ तो चलनेको थे तैयार नहीं ॥
दिलमें या ख्याल यही, क्या करे गे अहलेवतन ?
इनकी सरकार नहीं, कोई इस्तियार नहीं।
इस लिये साय दिया हमने गोरे सावका,
सोचा, इस फूचेमें गुल ही निछे हैं, खार नहीं।
० पलास-कौन्मिससे वजीरोंका मेता
पजीरो पार निषो गयी पनियां।
नामजूर
दोनेपर दोनों
५०
चना-चरेना
पर दिया माज जमानेने हमें यह झटका।
औंधे मुंह गिर पड़े हैं, कोई आज यार नहीं ।
खाकमें मिल गये चौंसठ हजार सालाना ।
हौसले पस्त हुए-क्या यह नागवार नहीं ?
मुंह छिपाये हुए, भागे हुए हम फिरते हैं।
अब किसीको भी हम दिखलायेंगे रुखसार नहीं।
हो चुरा दासका, नेहरूका, उनकी मजलिसका।
गर न होते ये तो मिलती हमें फटकार नहीं ।
या सुदा ! तू ही बचा लेना हमे गर्दिशसे।
अप तो कर सकते किसी औरसे इसरार नही है
देखकर आज बजारतका जनाजा निकला।
दम निकलना भी तो मर है जरा दुश्वार नहीं।
इस पुरी मौतसे हमको बचा दे या मौला ।
चरना तुझ भी रहा कोई सरोकार नहों।
५१
नानीकी कहानी।
वाइ, मेरा बुढिया नानी। जगत्-भरकी हो गुल्मानी ॥
तुम्हारे लामो चेले हैं। गली में जैसे ढेले है।
तुम्हारे करतर न्यारे हैं। निराले दङ्ग तुम्हारे हैं ।
थाह पाना कुछ नानीकी । खोपडी परम पुरानीकी ।
नाकसे चना चबाना हे । नहीं कुछ आना जाना है ।।
दितपी नानी बनती हैं। तभी तो कान कतरती हैं ।।
प्यार जब वे दिखलाती हैं। हमें तब जूडी आती है ॥
ज जर नानीजी माला। चर्ने आफतका परकाला ॥
न नानी सूची गैया है। शेरको सच्ची मैया हैं ।
भेडफी पाल ओढ़ लेनी। सिहिनी-भाव छिपा लेती ॥
इसीसे काम चलाती हैं। जगत्-भरको भरमाती हैं।
हमारे सीधे धाराको। लँगोटी-धारी घायाको।।
फंसाया भरके नानीने। चलाया चरणा नानीने ॥
रङ्ग फुछ गहरा लायेंगी। दङ्ग अद्भुत दिखलारेंगी ।
"यनूंगी फिर भी गुरुमानी।" पात यह दिलमें है ठानी ।।
मिलाने सयको जाती हैं। फूटका जाल बिछाती है ।
चना चना
सुनहला मृग इसको जानो। नया यह लटका है, मानो।
बड़ी उस्तानी नानी हैं। न महिमा सबने जानी है।
जानते हैं कुछ-कुछ नाती। इसीसे नानो घयराती ॥
अखियाँ अटकी 10
देश सुधार, समाज-सुधारकी बातें करें चटकी मटकी।
रङ्ग नवीन सदा पदले , दिखला कला चे महा नटकी।
खद्दर-चद्दर, भेष दरिद्दर, देशकी भक्ति भरै टटकी।
देश जहन्नुम जाय मले, चदा-धनपर अंखियाँ अंटकीं ॥
रूप जनाने यनाय करें मरदानेसी यात सदा टटकी।
मेल-मिलापकी यातें करें और घाते करें वे पटापटकी।
देखि निराले नये रंग ढग रहें सर्वको मतियाँ भटकी।
रङ्ग दुरगे तजगे कचे, यह देखनको अखियाँ भेंटकी ।
विहार-प्रातीय हिन्दीयपि-सम्मेलन (गुजफ्फरपुर में समस्यापति ।
चना चवेना
कविताके नियमोंका मुझको न पता है ।
स्वाभाविक कवि विरला हो हो सकता है।
कवि होकर निकला मातृ-गर्भसें मैं हूँ।
मुझ-सा है जगमें कौन ? एकता मैं हूँ।
यदि काव्य-शास्त्रकी वात चलाये कोई।
यदि छन्द शास्त्रका नियम
पूछता
कोई ॥
तो मुह वा देता, आँख नवाता, हसता।
मैं झटपट उससे अटपट बातें कहता।
यस गाल बजाना, बात बनाना आता।
औरोंपर झूठा रोब जमाना आता ॥
में कवि हूँ, मैं ही कवि हूँ,-लासानी हूँ।
मैं काव्य-जगत्का राजा औ रानी हूँ।
राजा वनकर मैं रोव जमाता फिरता ।
रानी धनकर मैं मटक-मटककर चलता।।
में अपना आसन सबके ऊपर जानें।
कवियोंका है सिरताज, यही यस मानू ॥
में कालिदासका छोटा भाई बनता ।
हिन्दी कवियोंको मैं क्या कुछ गिनता ?
सच पूछो तो मैं चेला सयको जानूं।
गुण अपने, अपने मुंहसे नित्य वखानूं ॥
चना-चना इससे कितनोंके दिलपर पडे फफोले। क्या चिन्ता है। जिसको रोना है, रोले। जब सरस्वताकी खास मिहरवानी है। दुनिया मेरे आगे भरती पानी है । जनतक हिन्दीके पत्रोंकी है छाया । तबतक तो मेरी बनी रहेगी माया। में साफ आपमें धूल झोंक डालूंगा । कर सम्पादकसे मेल, माल मारूंगा। लोडरावतारः। फैलास शिवरे रस्ये गौरी पृच्छति शंकरम् । लोडराणा तु माहात्म्य श्रोतुमिच्छाम्यहं प्रभो ॥१॥ मापाटीका। रमणीय फलास पर्वतके शिनरपर यैठी हुई गौरी-जो है सो आय फरफे-शिवजोसे पूछती भई कि हे महाराज! में लीडरोंका माहात्म्य सुनना चाहती है, सो जाय करके आप मुझे सुनाइये ॥१॥ ९७
शिवजी कहते भये कि हे देवि! जो है सो जाय कर
सुनो, मैं तुम्हें बडी ही सुन्दर और सुख देनेवाली, पुण्यर
भरी हुई, ज्ञान और वैराग्यको उत्पन्न करनेवाली लीडरोंकी
उनके पाँव पूजनेवाले और मुशामदी रद्द बन जायेंगे और
चनाचरेना
शकर उवाच।
शृणु देवि प्रवक्ष्यामि लीला रम्यां सुखप्रदाम् ।
लीडराणां महापुण्या ज्ञानवैराग्यदायिनोम् ॥ २॥
भापाटीका।
लोला सुनाता हूँ॥२॥
कलियुगे भारत देशे पेतद्वीपसमागता।
कोटयूटधरा लोका राज्य कुर्वन्ति वै सुखम् ॥ ३॥
भापाटीका।
कलियुगमें, भारतवर्ष में, जो है सो जाय करके, सफेद
टापूसे आये हुए कोट-लूट धारण करनेवाले लोग, जो है सो
जाय करफै, बहे सुपसे राज्य करेंगे।॥३॥
भारतीया नराः सर्वे तेपा चरण पूजका ।
चाटुकारा भविष्यन्ति श्वेताइभयपीडिता ॥४॥
भापाटीका।
हे देवि! जो है सो जाय करकै, भारतके सब लोग
मदा गोरे चमडेके डरसे डरते रहेंगे ॥४॥
चना-चना
।
अवलोक्य दुर्दशां हो पा भगवान्कमलापति ।
गान्धीनाम महात्मात प्रेपयिष्यति भूतले ॥५॥
भापाटीका।
इनकी ऐसी जो है सो दुर्दशा देखकर भगवान् लक्ष्मी-
नाय गाधी नामके महात्माको पृथ्वीपर भेजेंगे ॥५॥
निर्मयो सद्यो गाधी, अहि सावतमुद्बहन् ।
भारतोद्धारण कत्तु तत्परो भविता लघु ॥६॥
भापाटीका।
वह निर्भय और सदय गाधी जो है सो जाय करके,
अहिसा व्रत धारण कर, भारतका उद्धार करने के लिये शीघ्र
ही तैयार हो जायेगा ॥६॥
तस्मिन् काले महादेश भारते वायुमण्डलम् ।
शुन्ध मेघ-समाच्छन्ने मविष्यति न संशय non
भाषादीका।
उस समय जो है सो जाय फरक्षे इस घढे भारी भारत.
देशका वायु-मएडल सुन्ध हो उठेगा और यादलोसे हक
जायेगा, इसमें कोई सन्देह नहीं है 100
शासका मुषमानास्तु यास्यन्ति निभृतालयम् ।
परपन्तो हीदृशीं देशे लोकाना शुमजागृनिम् ॥ ८॥
--- गली, हर चौराहेपर, सफेद खद्दर पहने सब लोग लीडर बडे पुण्यसे भरा हुआ स्वार्थ-त्याग-रूपी उत्तम व्रत लीडरा फि विधात्यतिनत सत्यं चिकीव ॥११॥ चना-चपेना भापाटीका। देशमें लोगोंकी ऐसी शुम जागृति देखकर, जो है सो जाय करके, शासक लोग मोहमें पड़कर सूने घरोम जा छिपेगे॥८॥ अस्मिन् काले भविष्यन्ति गेहे गेहे चतुष्पथे। लीडरास्या नरा सर्वे शुक्ल-वहर-धारिणः ॥ ६॥ भापाटीका। इसी समय जो है सो जाय करके घर-घर और गली कहलाते हुए नजर आने लगेंगे ॥६॥ स्वार्थत्याग महापुण्य वहन्तो घुत्तमं व्रतम् । अहि सा धारयिष्यन्ति सर्वभूतहिते रता ॥१०॥ भापाटीका। ६० धारण करके जो है सो ये सब प्राणिमात्र हितमें लगे हुए अहि साफा व्रत प्रहण करे गे॥१०॥ पार्वती उवाच। त्यरया चद् देवेश | देश दुर्भाग्य-दु सिता. ।
चना चना भापाटीका। पावतीने कहा, हे देवताओं के देवता! आप जो है सो जाय करकै शीग्रही मुझे बतलाइये कि ये देशके दुर्भाग्यसे दुखित लीडर लोग सत्यव्रतकी अभिलाषा करते हुए क्या- क्या करे गे? ॥ ११ ॥ r शकर उवाच। शकोमि वा न हि लीडराणा ययार्थरूप शृणु देवि सत्यम् । अशेपलीलाचरितानि तेपा सहस्रजिह्वो कथनेऽप्यशक्त ॥१२॥ भापाटोका। शिवजीने कहा,-"हे देवि । जो है सो जाय करफै इन लोडरोंका यथार्थ रूप मैं वर्धान नहीं कर सकता। इनकी लोलाएँ और चरित अशेष अर्थात् जो है तो अनन्त हैं। इनका वर्णन करनेमें सहस्र जिह्वाएं रसनेवाले शेष भी समर्थ नहीं हैं ॥१२॥ प्रगृह्म चन्दाधनमप्यकातरा स्वदेश-कल्याण-निमित्तमानकम् । क्रमेण सर्व निजलालसाग्नौ दास्यन्ति होतार इवाग्निकुण्ड ॥३॥ भापाटीका। चंदेका धन, थकातर मावसे, स्वदेशमे कल्याणके ही .. F
-
लोकाना ताडनं सम्यक्प्रेक्षयिष्यन्ति लोडराः॥१६-२०॥
पीडित करेंगे तथा लीडरगण जो है सो, लोगोंको दमनको
लोगोंको मीठी-मीठी बातें सुनाकर अर्यात् जो है सो लच्छे-
चना चोना
दरवारमें जो बडे-बडे राक्षस-चौर थे, वे ही आजकल धूळ
लीडरोंके रूपमें घूम रहे हैं। इनसे ठगा जाकर वह महात्मा
अपनी सारी शक्ति खो देगा ।। १७१८॥
ये त्यागिनः सत्यसन्धास्तेऽपि यान्ति पराभवम् ।
नष्टे प्रभावे लोकाना शासका उग्रमूर्तयः ॥
पुन पुन प्रजापुञ्ज पीडयिष्यन्त्यकातरा.।
मापाटीका।
( इन्हीके करते ) जो त्यागी और सत्यसन्ध होंगे, वे
भी पराभवको प्राप्त होगे और लोकसत्ताका प्रभाव नष्ट हो
जानेपर शासक उग्रमूर्ति धारणकर चार-चार
चस्मीने पिरले हुए टुकुर-टुकुर देखा करेंगे ।।१६-२०।।
कदाचिदपि कर्तव्या भारतोद्धारकल्पना ।
न तावद्देवि ! कल्याणि ! यावद्ध र
र्ता दिलीडरा ॥
लोकाच पञ्चयिप्यन्ति चदन्तो प्रियभाषणम् ।
चहन्त शुद्धबेश तु हृदि हालाहल विषम् ॥२१-२२॥
भापाटीका।
हे देवि! हे कल्याणि । जातक जो है सो ये धूर्त लीडर
प्रजापुञ्जको
-
!
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चनाचोना दार व्याख्यान दे-देकर, हृदयमें हलाहल-विप रखते हुए भी । सफेद-पोश बने हुए ठगते फिरे गे, तातक हरगिज़ भारतके उद्धारको कल्पना नहीं करनी चाहिये ॥२१-२२॥ इति श्रीपर्तमानपुराणे लोडरावतार-वर्णने पार्वती-शकर सवादो नाम प्रथमोऽधनाथ ॥ कच्चा चिट्ठा। आजतक मौजसे बहार लूटि वाह-वाह, सबसे करायी पिटवायीं घोर तालियाँ। झाड झाउ धक्त ता सुनाइ देसभक्ति-राग, पोरी सरकारको सुनायीं सूर्य गालियाँ । रेख नहि भीनी, अमी उन है नवीनी, तऊ लीनी सब देससे यधाई अरु डालिया। खस-पास कण्ठ खोल आफत खिलाफतकी, सयको सुनायी औ चलायी चमचालियां ॥१॥ कोट डाट खहरको, टोप गांधी यागको-सो, धोति सु-मोटी या लंगोटी घोधि लीनी है। ६.
चना-चना सूधो-सो सुचेस यह देखि देस मोहि रह्यो, मीठी मीठी यातनमें देस-भक्ति भोनी है। सांधे स्वार्थत्यागो देस-लेवकको पूछ झोन ? लण्ठ औ लारनकी लीला परवीनी है। याही हेत देस सब आँपि मदि- दि निज वार-बार थैतियाँ इन्हींकी भरि दीनी है ॥२r जन्म धारि हिन्दू-कुट जाइ जवनोसे मिले, आफत खिलाफतकी आपनी बनाई है। नाम लिखवायो जाति-पाति तोडकोंमें जाइ, खाइ सर संग चुटिया भी कटवाई है ॥ मौलीके सङ्ग इफरङ्ग भये पण्डितजू, दग दुनिया है, धूम चारो ओर छाई है । एकताके धोखे एकाकार करि थाही भांति हिन्दू-जनताको खूब जूतियाँ खिलाई हैं ॥३॥ चदा दिल्बाइ हिन्दुआनसों खिलाफतको, मेट घढवायो दुह जातिमे सवाई है। जोरसे फमेटी चलवाई औ बनाई वात, घात हु लगाई निज जेवह भराई है। जा दिनते दूरि भई आफत खिलाफतकी, वा दिनते सांसत हमारी जान आई है। ६६ चनाचना हिन्दुनके नेता शुद्धवेता बने मारे फिरें, मौलवीने आरती हु बन्द करवाई है । लेतो जो खिलाफतको पच्छ नहिं गाँधी तब, दादो-चुटियाको मेल फैसे को करावतो? पेल दिखराइ याही मेलको भडकदार, कौन सरकारको बेहद डरपावतो? गोवध-विरुद्धमें घताओ कौन आधी वात, मौलवी-मियाँसों सपनेमें कइलारतो। धारह महीने में स्वराज मिलिरकी आस, कौन सारे देसके हियेमे उपजावतो? ॥५॥ किन्तु यह प्रीत नहीं, भोन चालूहो की रही, रीत जो पुरानी रही वाही फेरि प्रगटो। लागीचौडी यात यो अहिसा-ग्रत-पालनकी, धूलमें मिली है भी चली हे लगी-लिपटी ।। हाथा पाई, मार-पीट, लाठी तलवार अर, धारि हथियार होन लागी डांट-डपट्टी। नेता-गण पटे-सटे देपते तमासे रहे, जनता फटाइ नाफ पनि गई नकटी ॥६॥ पाइ पाइ चन्दा-धन मोटे अलमस्त पनि, घुमत हैं लापनमें धाक-सी जमाई है।
कहाँ है स्वराज? जान आफतमें आई है। मेलकी दीवार वह कौन ढहवाई है ? ॥७॥ खावें धन चन्दाको निकाला नया धन्दा है। ऐसो पनि जावै ज्यों खुदाका प्यारा यदा है। याहरसों साफ-साफ भीतरसों गन्दा है ॥६ चनाचना धारिकै अहिंसा छिपे हिसाको प्रचार करें, मेलको हिमायती हरार मचवाई है । गुएडे करें लूटपाट, हिन्दू सर खावें लात, पू जाइ नेतनसों हिन्दू औ मुसलमान, कोऊ लेवे मोटर, बनावें घर-द्वार कोऊ, नेक ना लजावे ओ बनावें वात भाँति-भांति, रामही यचावें ऐसे ढोंगी देसभकनसों, अजर-अनोवा विकराल जाल-फन्दा है। ऊपरसों राम-राम, भीतरसों सिद्ध काम, - रिलीफ-कमेटी। रात दिन रामलों मनावत हौं माथ नाइ, बाढ़ कहूँ भावे या दुकाल परियो करें। धाइ धाइ लोग फिर भागत विचारे सब, नारि-नर नित्य विललाइ मरियो करें। लम्बी-चौडी वात करि जाइ देस-देसनमें, चन्दा लिसवाइ हम सेवा करिवो करें। सेवा करि मेवा पाइवेके हेतु मेरे मान, अति अकुलात नहि चैन लहियो करे ॥१॥ सेवक सुधारफको चाकर चतुरको हौं, दास देसभऊनको नाम ही इमारो है। जाइ-जाइ द्वार-द्वार भोस मागि वार-यार, दीननकी सेवा एक कामही हमारोहै। पोलिफे रिलीफ की कमेटो हम चीफ यने, मूद कई थीफ+ पर मान न हमारो है। • Relhi(रिलीफ) कष्ट निवारण । +Chet (पोफ) प्रधान। + Thick (पीपर) पोर।
चना-चबेना धुलि झोंकि आँखिनमें लोगनकी चौडे आम, दोगके निराले दङ्ग नित्य यतलाओ तो non रण्डा-रहस्य। - ठेकेदार धर्मके, सुधारक समाजके हैं, नामी अगुमा हे औ गुलामीके नसैया हैं। एड़ी और चोटीको पसीना एक होत जात, रात-दिन दीननके दुखके हरैया हैं। ऐसो अवतार उपकारको अनोखो और, कोऊ ना दिखात देस नैयाके खेवैया हैं। याही हेत भारतकी रएडा-गन जानत हैं, आप ही हमारे माय बाप अरुभैया हैं ॥१॥ झाडि-झाडि वकृता सुनाइकै रुलाइ डारे, दसा विधवानिकी दिखाइ डरपावते । वेद औ पुरान छान-छानके सुनावत है, "व्याह विधवाके सब शास्नन यतावते । "आप जो करत नर व्याह चार-पांच-पांच, क्यों न नाव रांड़की हैं पार वे लगावते ? ७२ चना चवता "धूढे सेठ पूसटविहारीमल लाज तजि, साठ साल ऊपरमें व्याह है रचायते ॥२॥ "ऐसे रंडुओंको मिलवाओ विधवासे जाइ, जोडी युवकोंकी युवतीसे मिल जाने दो। "जाके घर बेटी औ पतोहू विधवा हैं पडी, वाके घर नवलकिसोरी मत आने दो। "पूढेकी घरातमें हजार विन डालो अरु, जूतियाँ भिगाइ वाके सीसपै जमाने दो। "पूढो पाचे खोडसी और पोडसीको पूसट है, नेकु सरमाइ यहि समय न आने दो" ॥३॥ यात ये विवेकमयी सुनिफै निहाल भई , रएडा गन पुलकि असीसत अघावै ना। देसके उधारक, समाज सुधारक हैं, जानि अभागिनिके मोद हिय मावै ना। आई सव चरन पखारन सुधारकके, लाज बस ये तो निज चरन बढ़ावै ना। देखि-देखि पुण्यको तमासा यह लोग-बाग, वाटत बतासा गुन गाइ तृति पावै नाnn खोलि विधवाश्रम सुधारकने देस-देस, पीटि दियो डका निज कीरति-कमाईको।
चना चवेना
.
न भाती पाकशाला औ न भाता कूटना-पिसना ।
है भाता पाठ नावेलका,* कलमका रात-दिन घिसना ||
हटाकर जाल घटका, मिटाकर आँखकी लजा।
है सुधरी नारियोंने भव, सजायी मेम-सी सज्जा ।
पुरुषसे लड़ रहीं अधिकारके हित नारियां जगकी।
भला क्यों चुप रहेंगी देवियां इस वृछ भारतकी ?
इसीसे भूलकर प्राचीनता आदर्शकी अपने ।
यहाँ भी देवियां हैं देखतीं यूरोपके सपने + ।
मगर भारतका रुतबा फ्या वढेगा ऐसे करतबसे ?
हमारी देवियोंका मान बढ़कर है जगत्-भरसे ॥
हमारे ढंग निराले हैं, हमारी रोति न्यारी है।
हमें लखकर चकित होता, सदा ससार भारी है ।।
हमारा तो भला होगा, न भूलें रूप यदि अपना ।
न छोडे रीतिको अपनी, न देखे औरका सपना ।।
पढे सर नारियां, विदुषी बनें, कर्तव्यको पालें ।
न सीखें किन्तु यूरपकी, निराले ढगकी चालें ।
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नायेल-उपन्यास (किस्से कहानीको पुस्तके)।
+ यूरोपयो मेमो की तरह पुरुषोंके यरायर अधिकार पानेको
उत्एक है। यही भाय है।
चना-चीन
पर्ने गृह-देवियों वे तो, कभी मत लेडियां होवें।
किसी दिन भूलकर प्राचीन मर्यादा नहीं पोवें ॥
मियाँ मिट्ट के तराने।
सूर्यफी ज्योति हमी तो है। चांदकी किरण ही तो है।
अजी | दम देश-भक भरपूर । देश-सेवामें रहते चूर ।
मलाई औरोंकी करते। रात-दिन जगके हित मरते।
रोष हे गाँठा जनतापर। जमाना शैदा हे हमपर ।
हमारो ज्य-जय होती है। पैरकी पूजा होती है।
टिपी पोल मगर मदर । पेटमें विष, पाएर सुन्दर ।
अजी! दम भारी लीटर | मसायोगी है हम प्लीटर।
मसायोगी पन मारा माल | पियापर गदगुन मापा-आलn
पोटो पोल पमानों दी। सपनी महायोली।
Lyrmecा रिपपापा । सफापा सपा परपाया
पता: ममा जोगा।
मा मादामरा मोगा rai-TATER
04
लेखक-प्रकाशक-संवाद।
लेखक उवाच ।
लेसकोंके अन्न दाता आप हे ।
सुख -विधाता शान्ति-दाता आप हैं।
आपका अवतार जो होता नहीं।
लेखकोंका तो गुजर होता नहीं।
छापकर मेरी लिखी ग्रन्थावली।
दी पिला मेरे हृदयकी है कली।
इस लिये गुणगान कर यकता नहीं।
आपका यश-लिन्ध तिर सकता नहीं ।
किन्तु लपिये, आज मेरी दुर्दशा ।
भाग्य-रेखा बन रही है कर्फशा ॥
इस लिये थोडी मदद कर दीजिये।
बतेकी या घस धर लीजिये।
हो गया मैं इन दिनों मुहताज है।
द्वारपर भवदीय वाया माज हूँ॥
चना-चपेना
मेरी रचनाए जन-प्रिय खूब हैं।
आप उनसे लाभ पाते खूब हैं ।
अश पया मेरा नहीं उस लाभमें ?
चन्द टुकडे भी नहीं क्या भागों ?
आप लेने लाख रुपये हैं जहाँ ।
पाँच-दस दे दें मुझ भी तो वहाँ ।।
प्रकाशक उवाच।
7
सोपडीमें अक्ल प्या रपते नहीं ?
आँस रहते देख दवा सकते नहीं ?
है तुम्हारी खोपडो औंधी वडी।
हो रहे हो इस लिये ऐसे सिडी।
मांगते क्या खाक हो मुझसे भला ?
सिरके अन्दर खन्तका अंधड चला!
छापकर पुस्तक तुम्हारी ठाटसे।
घढके रुनया फर दिया है लाटसे।
सारे जग नाम भी तय हो गया।
मेरे फरते मान-गौरव यह गया ।
पा दिया पलटा मुझे इस फामका?
मुस्तदफ पमा नहीं ईनामका ?
चनाचवेना
की तुम्हारी शुद्ध सारी गलतियाँ ।
रातको दो-दो जलाकर यत्तियाँ।
प्रूफ देपे गोरसे बहुवार हैं।
तब कहीं पुस्तक हुई तैयार है।
फंस गये रुपये हजारों पासके।
अगतलक पूरा नफा न कमा सके ।
फिर भी लेनेकी उनी तव दिलमें है।
जामो थैरंग, चूहिया अब विलमें है !
नाम-यश ले चाटना चटनी बना।
मांग खाना भीख मुट्ठी भर चना ॥
मुझसे पाभोगे कभी धेला नहीं।
जान लेना गुरु मुझे, चेला नहीं।
-
गोरखधन्धा।
हिन्दीकी दुनिया अजय हमारी भाई।
इसमें सबकी चल जाती है गुरुआई।
याँ टके सेर विकता खाजा, भाजी भी।
यो पण्डित भी आदर पाता, पाजी भी ।
यह साम्यवादका अजय नमूना मारी।
लखकर होती है घुद्धि विदा बस सारी।
इससे पण्डितगण है घबराये भारी।
कारण, उनकी ही तो होती है ख्वारी।
पर लण्ठदासकी पांचों ही हैं घीमें।
उनको सुटका क्यों कुछ भी होगा जीमें।
वे सम्पादक धन पूजा करवाते हैं।
पर चिट्ठीतक गैरोंसे लिपवाते हैं।
दे टके रोज लिखवाते वे कविता हैं।
मौ काव्य-जगतके धन जाते सविता है।
उनकी विद्या सय भादेका
पर जनता माजाने उनपर रहे।
चना-चवेना
है धन्य-धन्यकी छूट हो रही भारी।
यश-कीर्ति-राशिकी लूट हो रही भारी ॥
है चोर बहुत सम्प्रति ऐसे ही छाये ।
है घोर मूर्ख, पर सम्पादक कहलाये ।।
लिखवाते सव औरोसे ही हैं भाई ।
पर लिखवाई देते हैं आधी पाई।
या चने चरनेपर ही टरकाते हैं।
'लेखकको लाखों चरके बतलाते हैं।
लेखकको यशका भूखा जो लख पाते।
यस तारीफोंके सेतु चाँध भरमाते।
"हे आप बडे प्रतिभाशाली हे भाई !
प्रतिभा 'रवीन्द्र' की मैंने तुममें पाई ।।
है 'शरच्चन्द्र'-सी कला भाव-चित्रणमें ।
'चकिम' का-सा चातुर्य चरित्रांकणमें ।
हिन्दीमें यस हो भारतेन्दुके सानी।
है शैली अनुपम, पे-टकर, लासानी।"
चाटु-यापयका खोल खजाना भारी।
लेखकसे लेते रहते हैं घेगारी।
इस तरह फंसे है लेसका -गण मायामें।
मम्पादक करने मौज छत्र-छाया ।
मदारी मियाँ।
-
चडे सवेरे एक गांवमें मियाँ मदारी आये ।
बजा तुमोडया जोर-जोरसे गीत उन्होंने गाये।
लोग-लगाई लगे देखने पेल अनूठे उनके ।
बालक-धूढे सरही दौडे करतर उनके सुनके ।
वाजीगर ये मियाँ अनोखे झोला उनका भारी।
चाते उनकी मीठी मीठी लगतीं सबको प्यारी॥
चिकनी चुपडी खूब सुनाकर गहरा रंग जमाया।
बाजीगरने उसी गांवमे घर अपना बनवाया ।
गत तुमड़ीकी सुन-सुन करके निगडी आदत सबकी।
श्रद्धा हुई सभीकी उनपर अजर अनोसे दवकी।
धीरे-धीरे मियाँ मदारी पञ्च यन गये पक्के ।
उनके मागे पडे-यड़ोंके छूट गये सय छक्के ।
लड़ा-मिडाकर सयको आपसमें पचायत करते।
जुर्मानेकी रकम अदाकर थैली अपनी भरते॥
चलें जूतियां थापसमें ही, भाई-भाई लड़ते।
मियाँ मदारी उनके झगडेका निपटारा करते ॥
८३
चना-चीना
निपटारा करते-करते ही किया सफाचट सबका।
बदला लिया मियांने सबसे ना जाने यह कबका?
भाई-भाईके झगडेका देख नतीजा ऐसा ।
रोने लगे ग्रामवासी सब खो अंटीका वैसा!
मियाँ मदारी हुए गांवके स्वामी सोलह आने ।
बनकर उनके दास गाँवके लोग लगे पछताने ।।
चतुर मियांने अपने घरके लोग बुलाकर रखे।
अपनी रक्षाका प्रबंध कर मज़े मौजसे चक्खे।
अपने नाते-गोतोंको तो मियाँ मदारी माने ।
जिनका सब कुछ छीना-झपटा दास उन्हीको जाने ।
नाटक न्याय-नीतिका दिखला ईश्वरको ठगते हैं।
मालिक बन जानेपर भी वह नटवाजी करते हैं।
नही छूटती जिसकी जैसी कुछ आदत होती है।
सदा करैला कडवा होता नीम तिक होती है।
मियाँ मदारीके किस्सेसे सीप सीप लो भाई ।
चुरी सदा होती है जगमें घरके वीच लड़ाई ।।
घरकी फूट देख बाहरके लोग टूटने आते।
चन्द-यौट करें आ करके अपना रोब जमाते।
फिर चिडिया जन चुग ही लेगी सारी खेतीमारी।
वृया कलपना रोना-गाना उल्लू बनकर भारी॥
८४
जोरू-गुण-गानम् । ध्रुवम् ॥१॥ मूल-भार्या यस्य पल तस्य तस्य घुद्धिर्वलीयसी। भार्या यस्य गृहे नास्ति मरणं तस्य टीका-जिसके जोरू है, उसीको घलवान समझना चाहिये। घडी जबरदस्त अक्ल भी उसीमें होती है, जिसके जोरू है। जिसके घरमे जोरू नहीं, उसको तो पस मौत धरी है ॥१॥ मूल-भार्या हि परमा सिद्धि ऋद्धिर्भार्या समुच्यते । मूर्वोऽपि पण्डितश्रेष्ठ भार्या भक्ति-परायण ॥शा टीका-जोरू ही बडी भारी सिद्धि है। वही ऋद्धि भी कहलाती है। यदि कोई मूर्ख भी हो और अपनी जोकका खासा र यना हुआ हो, तो वह पण्डितों- में भी श्रेष्ठ गिने जाने योग्य है ॥२॥ मल-वृथा यौवन-सम्पत्ति पृथा मत्ये हि जीवनम् । वृथा च भूषण रन यस्य भार्या न विद्यते शा सोका-जिसके जोरू नहीं है, उसकी जवानी, दौलत, जिदगी, भूषण, रक्ष भादिसमी पाते पैकार.nn - चना-चबेना वह आधे मूल-वृथा विद्या वृथा शिक्षा वृथा भिक्षा वृथा कथा। एका भार्या विना लोके सर्वशून्या दरिद्रता nen टीका-विद्या, शिक्षा, मिक्षा ( भीख मांगकर पेट भरना ) और कथा (यानी बोलनातक) भी (विना जोल- वाले के लिये ) बेकार है। एक जोरके विना सर्व- शून्या दरिद्रता ही छा जाती है ॥४॥ मूल-मंत्रदाता गुरुर्भार्या भार्या देहार्द्धभागिनी। शय्यागता प्रिया भार्या केन सा उपमीयते ॥५॥ टीका-जोरू मन्त देनेवाले गुरुके समान है। शरीरकी हिस्सेदारिन है। शय्यापर विराजनेवाली प्यारी जोरूकी उपमा भला किससे दी जाये १ ॥५॥ मूल-भार्या हि सुखदा लोके मुक्तिदा मरणात्पर । शुभदा सौख्यदा भार्या भुकि भुकि-प्रदायिनी ॥६॥ टीका-जोरू इस संसारमे सुख देनेवाली और मरने वाद मुक्ति देनेवाली है। भलाई करनेवाली सुखदात्री भार्या भुक्ति-मुक्ति दोनों ही देती है ॥६॥ मूल-माया चरण पूत सेवित येन नित्यशः । मूगोऽपि लभते ज्ञानं गृहशत्रु अयो भवेत् non टीका-जिसने नित्य जोरके पाक कदमोंके नीचे नाक रगडी है, पर यदि मूर्स भी हो, तो शानी बन जाता है
चना-चना
-
और घरके शत्रु ओंपर (भाई-भतीजोपर ) विजय
प्राप्त कर लेता है ॥७॥
मूल-अलकार-प्रिया भार्या झणकारेण लौरयदा ।
लोचनानन्ददात्री सा कर्णानन्दविधायिनी ॥८॥
टीका-जो जोरू गहने खूब पसन्द करती है, वह अपने
गहनोंकी झनकारसे ही दिल खुश कर देती है।
वह आँखोंको आनन्द देनेवाली तो है ही, कानोंको
भी आनद देती है (गहनोंको मनकारसे, यह तो
आप समझते ही होंगे।)]
मूल-गृहयुद्ध सदा भार्या भत्तुं पक्षावलम्बिनी ।
मातृणा कलहे भार्या गृह-विच्छेदकारिणी राधा
दीका-घरमें लडाई लगे, तो जो हमेशा अपने मियांका ही
साथ देती है, और भाई-भाइयोंमें कलह हो, तो जोक
जरूर उन्हें एक दूसरेसे अलग करा देती है men
मूल-विच्छेद-जनितं सौख्य विधाय सुखदा भवेत् ।
स्वच्छन्द जोवन तस्या प्रसादरिख उच्यते ॥१०॥
दौका-इस तरह भाई-भतीजोंसे अलग होकर रहने में जो
मज़ा है, उस मजेको चलाफर यद सुप देती है।
फिर तो ऐसे स्वच्छन्द जीवनको जोड़की
ही समझना पड़ता है ॥१०॥
चना-चवेना
।
मूल-भार्यायाश्च प्रसादेन धन लब्धं मया पुरा ।
नस्या पित्रालये प्राप्त विवाहे यौतुकं यदा ॥११॥
टीका-जोरूकी ही बदौलत मुझे कुछ समय पहले विवाहके
अवसरपर उसके बापके घरसे दहेजके रूपमें धन
मिला था। (यह भी तो, उसीका इकवाल था,
नहीं
तो उसके वापके यहां मेरा किसी जन्मका कर्ज
थोडे ही वाकी था १) ॥११॥
मूल- अद्यापि जनकस्तस्या न मह्य ददाति च।
'घडी' 'चश्मा'डी'दिव्या, पैरगाडी'सुशोभनाम् ॥१२॥
टीका-आज भी मेरी जोरूका पाप मुझे धन देता ही रहता
है। कभी घडी, कभी चश्मा, कमी सुन्दर
छड़ी और कभी मनमोहिनी पैरगाडी ॥१२॥
मूल-'फर्मायशानुसारेण' वाच्छतं मे प्रयच्छति ।
तस्मात्करपलता भार्या सेवितव्या नरै सदा ॥१२॥
टीका-वह बेचारी मेरी फर्मायशके मुताविक चीज देती ही
रहती है। इस लिये जोलको कल्पवृक्ष जानकर
मनुष्योंको चाहिये, कि उसकी सदा खिदमत बजाते
रहे--सेवा किया करे ॥१॥
मूल-गौरागाना शुभे राज्ये प्रान्त फलियुगे तथा ।
सतीत्व-रहिता भार्या सर्वदानन्ददायिनी ॥१४॥
चना चयना टीका-कलियुगमें, गोरोंके पवित्र राज्यके जमानेमें, जिस जोरूमें 'सतीत्व' न होगा, वही सदा आनन्द देने- चाली होती हैा मूल-स्वाधीना सर्वकार्येषु 'मेम' सजा-विभूपिता। नृत्ये गीते सभाया च त्यका लज्जा ययाशुभा ॥१५॥ साभार्या पतिदेवस्य सर्वमङ्गलदायिनी । घालडान्स गता या हि 'लाट'- देवानुरजने ॥१६॥ टीका-जो सब कामों में परम स्वतन्त्र हो, मेमका-सा ठाट रखती हो, नाचने-गाने और सभाओंमें माने-जानेमें जो मनहस शर्मको पास भी नहीं फटकने देती हो, वही भार्या यदि लाट साहयको खुश करनेके लिये उनके "चाल-नाच"में भी शामिल हो गयी, तो समझ लो, कि उसके पति देवके चारों ओर मङ्गल. ही मङ्गल है ॥१५-१६॥ मूल-मुखरा त्यकलजा या दुर्विनीता सुशिक्षिता । उद्धता कथिता लोके नरै "मरदमारिनी" ॥१७॥ सैवाधुना हि लोकेऽस्मिन् पूजनीया नर सदा । तस्मादन्या मया भार्या प्राणेभ्योऽपि गरीयसीmen ख्याल-दान्स (Bail dance)-भंगरेजी नाय। +लाट-लाट साहव। -
चना-चयेना
,
टीका-बोलने में जिसकी जुबान वेलगाम घोडीकी तरह
सरपट दौडती हो, जो खूब पढ़-लिखकर भी पूरी
हठीली और वैसी उजड्ड हो, जैसी औरतको लोग
"मर्द-मारनी" कहा करते हैं, तो आजकलके ज़माने-
में उसी औरतकी सब लोग कदर करते हैं। इसी
लिये तो मेरो जोरू मेरे लिये पूजाकी चीज है और
जानोजिगरसे भी बढ़कर है ॥१७१८॥
वन्दना।
मूल-भार्ये । देवि। प्रसीद त्वं नमस्तुभ्यं करोम्यहम् ।
ससार-सुख-सिद्धयर्थ नृणां भाव केवलम् ॥१॥
टीका-इस लिये हे जोरू-देवी ! मैं तुम्हें प्रणाम करता हूं।
तुम मेरे ऊपर प्रसन्न हो; पयोंकि सासारिक सुखों-
की सिद्धिके लिये मनुष्योंको केवल जोरूका ही एक-
मान सहारा रहता है ॥१॥
मूल-त्वमेव माता च पिता त्वमेव
त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव ।
त्वमेव स्वर्ग नरकं त्वमेव
गृहं त्वमेव गृहिणी त्वमेव ॥२०॥
चना-वना टीका बस मेरे लिये तो तुम्ही माता-पिता, भाई बन्धु, हित- मित्र, स्वर्ग-नरक-सव कुछ हो (क्योंकि) तुम्हीं घर और धरनी दोनों हो ॥२०॥ - कौन-सी चाहिये, यह या वह ? देख लो पाठक ! अनोसे चित्र दो। ध्यान इसपर टुक हमारे मित्र दो। कौनली तस्वीर तुमको चाहिये। जानना हम चाहते, बतलाइये ।। (१) एक सरला कामिनी है ग्रामको। है न भूसी वह जगतमें नामकी । उठ सवेरे पति-चरणको चन्दना । करके करती जगत्-पतिको चन्दना ।। लेके झाडू, साफ करती घरको है। पाक करके वह खिलाती सरको ह॥ याद इसके घर्तनोंको मांजती। शरफे सर सामान यह है साजती ॥
चना-चयेना
(२)
दूसरी नारी घड़ी विद्या पढ़ी।
कर रही है पुरुषले स्पर्धा पड़ी।
आँख तो तड़के कभी खुलती नहीं।
काम करनेको कमर हिलती नहीं ।
घरके सारे काम दासीगण करें।
एक तिनका वे उठाकर क्यों धरें ?
पति-चरणकी वन्दना बेकार है।
नारिका क्या कम कहीं अधिकार है ?
(१)
एक बच्चेको खिलाती रात-दिन ।
देखकर उसको दुखी, होती मलिन ॥
निशि दिवा मुखडा उसीका जोहती।
मातृ-छवि उसकी सदा मन मोहती॥
(२)
दूसरीके शिशुको मैया धाय है।
दूधके हित घरमें पाली गाय है।
पुत्रको ले अंकमें रखती नहीं।
रेशमी साड़ी मलिन होगो कहीं!
चना-चवेना
(१)
एक नित है धान घरका कूरती।
गीत गा गाकर लदा सुस लूटती॥
चले जाँता घरमें घर-घर रात दिन ।
प्रिय नहीं चुप बैठना पल एक छिन ।
(२)
चन्द्रकान्ता दूसरी है पढ़ रही।
ऐव अपने औरपर है मढ़ रही।
लेख लिखने, काव्य रचनेमें लगी।
रात-दिन शृङ्गार-रसमें है पगी।
(१)
एकके तनपर न गहना एक है।
मात्र पति वाकी उसको टेक है॥
स्वप्नमें निन्दा न स्वामीकी करे ।
है न चिन्ता कुछ, जिये चाहे मरे ।
स्वामि-सेवामें लगी तन मनसे है।
प्रेम उसको एक जोवन-धनले है।
हों सुषी स्वामी, सदा यह ध्यान है।
निज सुखोंका कुछ न रखती ज्ञान है।
चना-चना
(२)
दुसरीको सूझती बस मौज है।
हैं मियां कैसे, न इसकी खोज है ॥
लामो गहने और रुपये-साड़ियाँ ।
हवा खानेको खरीदो गाड़ियां।
रात-दिन फ़रमायशें होती रहें।
अक्ल पतिकी दङ्ग नित होती रहे ।
है न कुछ परवा उसे परिणाम की।
कुछ नहीं चिन्ता उसे धन-धामकी।
नाच-गाने में सदा यदमस्त है
बात करने में बड़ी ही चुस्त है ॥
काम-धन्धा उससे कोसों दूर है।
वह अंधेरैका महज एक नूर है !
६४
वर्षा-वर्णन ।
(बीसवीं सदीकी रामायणके लीडर काढसे उद्धत)
चौपाई।
घन घमण्ड नभ गरजत घोरा।
टका हीन कलपत मन मोरा॥
दामिनि दमकि रद्दी घनमाहीं।
जिमि लीडरकी मति धिर नाहीं॥
वर्षहि जल्द भूमि नियराये।
लीडर जिमि चदा-धन पाये ॥
बूंद अघात सहहि गिरि फैसे।
लीडर-वचन प्रजा सह जैसे ।।
क्षुद्र नदी भरि चलि उतराई।
जस कपटी-नेता-मति भाई॥
भूमि परत मा डायर पानी।
जिमि नेतहि माया लपटानी॥
सिमिटि-सिमिटि जल भरहि तलावा।
जिमि चन्दा नेता पहें माया ॥
चना-चना
॥
सरिता-जल जलनिधि मह जावै।
जिमि पचलिफधन नेता खावै
दोहा।
हरित भूमि तृण संकुलित, समुझि परै नहि पन्थ ।
जिमि मिलाय नेता दिये, श्रुति कुरान गुरु-प्रत्य ।।
चौपाई।
दादुर-धुनि चहुँ ओर सुहाई ।
जिमि लीडर भाषत मनभाई।
नवपल्लवमय विटप अनेका।
वर्तमान-युग लीडर-भेका ।।
भर्फ जवास पात दिन भयऊ।
जस स्वराजके उद्यम गयऊ।
खोजत कतहुँ मिलै नहि धूरी।
जिमि स्वराजकी आसा दूरी॥
सस-सम्पन्न सोह महि फैसी।
लीडर-गणकी बातें जैसी।।
निशि-तम घन खद्योत विराजा।
नकली नेतनफेर समाजा।।
महावृष्टि चलि फूटि कियारी।
जिमि कौसिलने वात विगारी॥
चना-चना
कृपी निरावहिं चतुर किसाना।
सत्य तजहिं जिमि सुबुध सयाना ।
देखिय चक्रवाक खग नाही।
जिमि गांधीजी कौंसिल माहीं ।
ऊसर बरसै तृण नहि जामा।
कौसिल गरजे सरै न कामा ।
विविध जन्तु सकुल महि भ्राजा।
भारत जिमि अंगरेजी राजा।
जह-तह पथिक रहे थकि नाना।
जिमि नेतागण मुंह पियराना ।।
दोहा।
काहुँ प्रपल चल मारत, जह-तह मेघ विलाहि ।
जिमि गांधोकी 'फते, मिथ्या भ्रम नसि जाहि ॥
कलियुगी कर्ण। नेकनामी आपकी कमाई बड़ी बापकी है, छाई जग कीरति अनूपम जुन्हैया-सी । देखनमें सूधे लगैं, बातें सब टेढी करें, भीतरसे वाघ, पर सूरत है गैया-सी। पण्डित पढ़े या वेद सास्त्रके न पावै मान, खातिर करत वार-नारिनकी मैया-सी। दानमें न धेला कौँ देत दीन दुखिनको, देत देखि और इन्हें आवत जडेया-सी ॥१॥ परम प्रसिद्ध पजूसनमें मक्सीचूस, चूस लेहि रक्त भक जो पै कह पावैगे। देइ रिन सूद लागि पीसि देत खद् फको, पांसे पिछवाइ कवौ जूआ ह खिलायेंगे। आज देइ डारेंगे रुपैया एक काहको तो, फालिही जुमामें जोति वापिस मैंगावैगे। एक पाई प्रान है, न देखें सपनेह काह, पाइ यदि जावे रोइ-रोह मरि जा_गे ॥२
चना चना
दानवीर लोगनको नाम सुनि कांप उठे,
जानि न सकत दान कैसे करि डारते ।
राम है रुपैया, मैया-धाप है रुपैया, भैया!
ऐसो रुपयाको देह हाथ किन जारते।
दान-की-ही साध जो अगाध भरी हिय माहि,
दे डा गारी तिन्हें हाथ जो पसारते।
पण्डित मिसारी गुनी जाचकको दल देखि,
देह के किवार मूदि नैन मौज मारते ॥an
होत जो सभा है कहीं जाति हित, देस-हित,
लाला मक्खीचूस तेहि वीच न पधारेंगे।
लाज औ' संकोच-पस जा पहुंचे जो कयौ,
चदा हेत अण्टीसे न कौडिह निकारेंगे।
माइके मुलाइजेमें चदा लिखि देत यदि,
देइफ वसूली जान फन्देमें न डारेंगे
जो धनि जायेंगे खजानची समाके किसी,
सारी जमा मारि के न नेकह डकारेंगे ॥en
कलियुगी कर्ण कहलाइयेकी साध वडी,
देनेको न नाम लेहि एकह छदामको ।
गोअनके नामपर रित्तो रखवावे,
पर,
फ कि-वापि डार जाइ यागनमें दामको।
चना-चयेना धर्म हेत कौडी एक भूलेह न खर्च करें, चाहत सुनाम जस लूटन हरामको। हाय पैसा हाय पैसा रटत रहत नित, भूलेह न नाम रसना सों कढ़े रामको ॥५॥ सम्पादकजी। हिन्दीमें सम्पादक बनना काम बड़ी आसानीका। चलती नाव यहाँ बालू पर काम नहीं है पानीका ॥ विना फिटकरी या हल्दीके रङ्ग यहाँ चोपा आता। घुर्दू भी साहित्य क्षेत्र अपनी धाक जमा जाता। इसीलिये भरमार हुई है ग्रन्थों औ अखवारोंकी। गुजर हुई सम्पादक-दलमें कोरे लएठ लगारोंकी ।। नहीं फारसी पढ़ी जिन्होंने जाने थोडी-सी हिन्दी। उर्दू के भ्रममें अक्षरके नीचे देते है विन्दी ॥ आती है। यही मदद सम्पादक बनने में उनको पहुँचाती है। फैसा माटदागेको जारी किया पत्र भडकीला-सा । सम्पादक यन याप निराजे, छपा नाम चमकीला-सा । अगरेजीसे नहीं तमल्लक बंगला कुछ-कुछ
चना-चयेना
रखकर सहकारी सुयोग्य-सा उससे कलम घिसाते हैं।
मुफ्त कमाते नाम सोंपर मूठा रोब जमाते हैं ।
पोथीकी दूकान खोलकर पुस्तक जो छपवाते हैं।
लेखक कोई होवे, पर वे सम्पादक बन जाते हैं ।
किसी विषय पण्डितका भी लिसा ग्रन्थ पा जायेंगे।
कोरे होकर भी उससे, वे सम्पादक बन जायेंगे।
जो विद्यामें सचमुच उनके दादा-गुरु हो सकते हैं।
उनके अन्योंके सम्पादक बनते नहीं हिचकते हैं।
शर्म हयासे नाता तोडा, धृष्ट हो गये भारी हैं।
पत्र ग्रन्थ-सम्पादक बननेकी उनको बीमारी है।
एराकी-अपनी घोंडों पर गदहा रोग जमाता है।
यह लस क्षोभ बडा होता है, जी भी कुढ़ सा जाता है ।
किन्तु नहीं दुनिया रहनेकी हरदम भोलीभाली है।
सदा सभीकी मिथ्या लीला यहाँ न चलनेवाली है।
घडा एक दिन फूटेगा हो इस सम्पादकशाही का।
अन्त नहीं आवेगा फिर तो उनकी विकट ताहीका
खाका खींचा जायेगा और जडी फन्तियाँ जायेंगी।
यखिये सारे उघडे गे औ' धनी उडती जायेगी।
लण्ठदास सम्पादकजी ! मट सावधान अर हो जाओ।
कहीं न जाये उलट जमाना, ध्यान यही मनमें लाओ।
चना-चबेना
मिलना-जुलना छोड़ सभीसे, रहना सदा अकेले में ।
चोंच संभलकर खोला करना, पड़ना नहीं झमेलेमें ।
बोल खोल देता है अकसर पोल भीतरी दुनियामें ।
वर्ना फ़र्क बहुत ही कम है, मियाँ शेख औ' धुनियाँमें ।
कोयल काली, कौआ काला, भेद नहीं इनमें पाया।
भेद खुला जव ऋतु वसन्तमें कोयलने गाना गाया।
इसीलिये समझाया तुमको चुप्पी साध सदा लेना।
विद्वानोंके सम्मुख अपनी पोल प्रकट मत कर देना ।
चण्डाल-चौकड़ी।
चौकडी यारो की पक्को । सुधारोंकी चलती चकी ।
व्याह विधवाओके होते । जगाते उनको जो सोते॥
मिलाते दाढ़ी औ चोटी। सङ्ग सव खाते हैं रोटी ॥
इसीसे समझ लिया उद्धार | राम कर देगा घेड़ पार ॥
चार यारो की यह टोली । निराली इसकी है वोली।
कहें कुछ और, करें कुछ और। हमारे नित्य यदलते तौर ।।
यगलमें छुरी, राम मुखमें । निरन्तर रहे मस्त सुपमें ॥
असहयोगी थे पिछले चर्प । जेल थी सेल, दु ख था हर्प ।
3
चना-चपेना
फएड जमना बजाजजीका । रहा आधार बना जी का।
वकालत खाक नहीं चलती। लीडरी अगर नहीं मिलती।
इसीसे खद्दर कुछ दिन धार | दिखाया खूब देशका प्यार ।
छुडाया छात्रोंका पढना। सिखाया देश हेतु मरना ॥
पर गये फिसल हमारे पैर । जेलको कर आये जो सैर।
फेंक चद्दर खहरकी दूर । किया व्रत सारा चकनाचूर ।
वकालत कर दी फिर जारी। सहे गे कबतक हम ख्वारी?
जिन्हें हमने था भडकाया। नौकरी-पढना छुडवाया ।
घेरते आज सभी हमको। न चलने देते हैं हमको।
होशकी दवा न क्यों करते । अभागे मरते तो तरते ॥
अरे, हम रंगे सियारोंके । देशके नकली प्यारोंके ।
जालमें जो भी आवेग । दीन-दुनियासे जावेगा।
पल्टना पात सिद्ध हमको। जान लो स्वार्थ-गिद्ध हमको।
नारिको जूते मारेंगे । सभामें लेक्चर झाडेगे।
"नहीं तबतक सुधार होता । नारिका मान नहीं होता।
बन्द परदेके अन्दर है। जेलही उनके हित घर है"
पर नहीं मान स्वयं करते । नारिका ध्यान नहीं धरते।
तग है अपनी ही नारी । रात दिन सुनती हे गारी॥
मार गालीदी हैं महती। नामको सौख्य नहीं रहती।
"व्या विधगधोंका करना"-इमारा नित्य यही फहना।
चना-चपेना
पर नहीं घरमें हैं करते । स्वयं अपने करते डरते।
कहें हम "जाति-पाति तोडो। सपीले नाता अर जोडो।
बनायो ब्राह्मण वनियेको । धनुर्धर क्षत्री धुनियेको ॥
खिलाओ ब्राह्मन सँग धोयी । मिले ज्यों आलूमें गोवी ॥"
पर नहीं आप कभी खाते। वापके मारे घबराते।
मरेंगे कव सड़ियल बुड्ढ़े । देशके पट जायें गड्ढे ॥
हमारा दल चारो का है । असाडेके यारोंका है।
कर चुके शेष देश-उद्धार । लीडरीको बाजी ली मार ॥
करेंगे अव समाज संस्कार । रएिडयोंका करके उद्धार ।
उन्हें ऊपर लाना होगा । वजाना औ गाना होगा।
गजल, ठुमरी, ख़याल टप्पा । लगेगा धुरपदका धप्पा ।।
बजेंगे तवला औ डुग्गी । नाचकर गायेगी सुग्गी ॥
भाडमें जाये सारा देश । न हमको कोई भी है क्लेश ।
मौजसे लीडर कहलाये । कचहरी प्लीडर बन आये ॥
कुछ दिनों छूटा यह धन्दा। सहारा था पलिक चन्दा ।
न अप फूटी कौड़ी पाते । कचहरी छोड़ कहाँ जाते ?
इसीसे लिया थूककर चाट । लिया चोगा-चपकन है डाट ।।
कहे कोई कुछ, सुनता कौन ? लाख रुपयेसे वहकर मौन ।
काम तो अपना चलता है। किसीको क्यों यह खलता है ।
खलो की है सारी पलना । दुष्टही पर-सुप्त लख जलता ।।
१०४
नयी रोशनी।
*
*
काला साहब
चकाचौंध फैली नयी रोशनीकी।
हवा भर रही पश्चिमी धौंकनीकी
॥
न अपने रहे भाव औ भेष-भाषा ।
अजन हो रहा है यहाँका तमाशा॥
चढ़ा रङ्ग चोपा सभोपर यहां है।
हुमा दङ्ग लखकर नजारा जहाँ है ।
अजय चन्दरों सी शक्ल है बनाई।
तिलक-छाप रे पेन्हते नेक्टाई॥
घदन देख झक मारती रोशनाई।
मगर साहनी ठाटकी धुन समाई ॥
कलूटी शकलपर मनों "सोप" मलते।
चढा "यूट डीसन" मटक चाल चलते ॥
ल्गा "सोप पीयर्स" है देह धोते।
नहीं माफ कोए कमी हंस होते।
लुटी देशको श्री, विलायत गई है।
नहीं भापकी नींद गायर हुई है।
चना-चयेना
गुलामीका ऐसा नशा चढ़ गया है।
न वाकी रही शर्म या कुछ हया है ।
रहे अब न पण्डित, न वायू न लाला ।
हवस साहबीको, मगर रङ्ग काला ॥
नहीं नीति भाती पुराने समयकी ।
लगी धुन सदा साहयोंकी नकलकी।
चरण चूमते पश्चिमी अफसरोंके ।
करें चूर सिर नित्य देशो नरोंके ।
करोड़ों विचारे नही अन्न पाते।
दया हाय । उनपर नहीं आप लाते।
कहीं 'वोट' लेना हुआ वोटरोंसे।
न नीचे रखेगे उन्हें मोटरोंसे।
मगर चार दिन बाद रगत बदलती।
उन्हीं वोटरोंपर छुरी तेज चलती।
हया-शर्म धो धारमें है वहा दी।
नयी चाल देखो अजर है चला दी।
लिये सङ्ग वीची हवा खा रहे हैं।
गले बाँह डाले मजा ले रहे हैं।
धना मेम पूरी शहरमें घुमाया।
चलाकी तरह दूर घूघट हटाया ।
चना-चयेना
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न साहबपने में कसर एक रखी।
यही बैठ मौजे सभी नित्य चक्खी ।
*काले साहवका यावा*
हुआ वापसे पुत्रका रङ्ग चोखा।
घडा वापको दे रहा नित्य धोखा ।
उन्हें 'मूर्ख वुड्ढा' सदा कह पुकारे।
है लौंडा मगर साहनी रङ्ग धारे ।
लगा हैट, मोटर चढा, घूमता है।
सदा साहो के चरण चूमता है ।
जहाँ "क्लनर-केफ" में जा पधारा।
महामश्य भोजन गलेसे उतारा।
गटक योतलें तारता पीढ़ियों को।
म्वतम कर रहा सभ्यता-सीदियो को।
*काली मेम
हुई नारियाँ भी अजर आजकी हैं
निशानी न याकी रही लाजको है।
गया घाघरा और साड़ी उतारी।
पहन गौन चलती नगरमें सवारी॥
चढ़ी नाकपर स्वच्छ ऐनक चमकती।
फलाई-घडी कर-कमलमें झलकती।
चना-चबेना
मियां-सड बाजारमें डोलती है।
सभा-मध्य मा वेधड़क बोलती हैं।
नहीं शोल, आँखें सभीसे लड़ाती।
नयन-बाण घरोक सबपर चलाती ।
जरा सांवले रङ्गकी है दिखाती।
मगर गोरियोको नहीं कुछ लगाती ।
नहीं तेल-उवटन कभी हैं लगातीं।
'पमेटम' रगड़ रद्ध गोरा बनाती।
धिसा 'पाउडर' गालपर नित्य जाता।
'हिमानी' का मक्खन मला रोज जाता।
चरणमें महावर लगावे गवारी।
कडे और छडे कौन पहने सु-नारी?
पहन यूट, मोजे मनोहर चढ़ाये ।
बगलमें "उपन्याल" चल्ती दवाये।
लिखे लेख औ रोज कविता वनायें।
नया पाठ नारी-जनोंको पढ़ायें।
"लखो नारियो । स्वत्व क्या है तुम्हारा !
सुनो आज कर्त्तव्य क्या है हमारा ?
पुरुप और नारी वरावर कहाते ।
मगर आज छोटे-बड़े हैं दिपाते।
१०८
चनाचना
मियां हैं बने 'लार्ड' हम नारियोंके।
विधाता सभी भांति सुकुमारियोंके ।
करें लाख जोरो-सितम नारियों पर।
बडा जुल्म है हाय । धेचारियों पर।
उठो, लो कमर कस, लडो आज उनसे ।
सभी छीन अधिकार लो आज उनसे।
उठो, दासताकी दशा यह मिटाओ।
तजो मूर्खता शीघ्र घूघट हटायो ।
करें कोशिशे हम सभी आज आयें।
जुडी गांठको तोडना अब चलायें ।
चलायें प्रथा हम ससम छोडनेकी।
किसी दममें रिश्ता रसम तोडनेकी ।
विलायतकी मेमें तुरत छोड देती।
पुन नेह नाता नया जोड लेती।
किया किस तरह सर वहाक नरोंको।
नचाये मदारी यथा यन्दरोंको।
जगत्में वडा मान ये पा रही हैं।
हमी दु ख सहतो चली जा रही हैं।
मिटाना हमें आज होगा अंधेरा।
तभी ज्ञानका देस सकतीं सवेरा।
चना-चपेना
खसम-छोड घीनी जगत्में पुजाती।
पडा मान आदर यहाँ नित्य पाती।
सती कौन होगी सदी घीसवीमें !
रही हिन्दुआई कहाँ ईसवी में ?
सती वन करे नित्य पतिकी टहल है।
बड़ी मूर्य है वह, न उसको अकल है।
मिलेगी उसे नित्य फटकार-गाली।
न गहना, न कपड़ा, न लोटा, न थाली ।"
स्वराजी।
1
हम हैं स्वराजी, देस-उन्नतिके कामी, अरु
नामी हैं जहानमें उदारताकी खान हैं।
जाति है हमारी नहि हिन्दू न मुसलमान,
"इण्डियन" नाम ही हमारो अभिधान है।
काँगरेस-रेसमें पछाड खाइ औंधे मुंह,
जेल-दुख पाइ, तन छीन, मुख म्लान है।
याही ते बनाई नई पारटी जवरजङ्ग,
मानै सर लोग जिन्हें आँस्न अरु कान हैं nen
चना-चवमा भारतसों लेइक विलायत लौं कॉपि उठ्यो, सोर अस घोर पारटीको मचवायो है। रेडिड डराये, यवराये मजदूर-दल, पार्टीको पायो मजबूत बनवायो है। धमक दिखराइ सरकारको बगावतकी, उलटो असर यहि घातको दिखायो है। धार तो मुडी न मानटेगूके सुधारनकी, रेडिङ्गने गरजि-गरजि डरपायो है ॥२॥ सी० पी० में स्वराज-दल विजय-निसान लेइ, हाँ हुजूर मन्धिनको दूर करवायो है। भई गति वाही है चंगालके वजीरनकी, घेतन विनाही मचन्द्र दिलवायो है। कापि उठे रेडिङ्ग, गरजि उठे लोटन भी, परि स्वराजिनको जेल भिजवायो है। देखहु निर्दोषनको दण्डके प्रभाव आज, सयहि स्वराज-पारटीको अपनायो .nn गाँधीवाया आइफै मिले हैं याही दल-यीच, फाँगरेस सारी पारटीके दाय आई है। देसमें घाव रोबदाब याही दलको है, सपकी सहानुभूति सहजहि पाई है।
चना-चबेना
दास-नेहरू पै आस लागी सारे देसकी है,
अति अभिलास उर बीचमें समाई है।
लाटकी सभामें किन्तु वक्त ता सिवाय कछु,
चोखी करतूति अब लौ न बनि आई है nen
सूदखोर-गुणगानम् ।
0000000000
ग़रीवोंका हर रोज उपकार करना ।
किसानोंको ऋण दे सुखी नित्य करना ॥
यही आपका काम कल्याणकारी।
महामोददायक, बड़ा सौख्यकारी ॥
रखेगा अमर नाम उज्ज्वल तुम्हारा।
पसारे रहेगा सुयशका पसारा॥
वहे प्रेमसे आप धन मूसते हैं ।
सदा जोंक-से रक्तको चूसते हैं ।
न होली-दिवाली सलूनो-दसहरा।
किसी दिन कभी सूदका ध्यान विसरा ॥
न सन्ध्या, न पूजा, न रोजा, न फाका ।
फकत आपको सूदहीले इलाका ॥
m
चना-वना
मरें क्यों न भूखों करज खानेवाले।
नहीं आप उनपर तरस लानेवाले
न देवे भगर सूदका धन विचारा।
फरें आप घर-द्वार भो कुर्क सारा
कभी एक पैसा नहीं छोडते है।
कसाईपनेसे न मुंह मोड़ते हैं।
कहा सूद ले ले यड़ा माल मारा।
दया धर्मसे कर लिया है किनारा।
यडी तोंद मोटी, बडा पेट भारी-
हुआ आपका--देखकर पुद्धि हारी।
बड़ा नाम कंजूसपनमें कमाया।
है धन ही बहुत आपके चित्त भाया ।
गया वीत जीवन, नहीं है लगाई।
कभी धर्ममें सूदकी एक पाई।
भरी घरमें दौलत, बड़े हैं कहाते।
मगर कुछ बड़प्पन नहीं है दिखाते
जगत-धीच दानी पडा मान पाता।
घदी है समा मध्य सम्मान पाता।
मगर सूद खाखा भरे ले तिजोरी।
कडा सूद ले नित्य माया पटोरी।
बना-चपेना नखुद आप खाये, किसीको पिलाये। करे दान खुद ना किसीसे दिलाये । लगे मुखमें उसके वुलू-ब्लैफ-स्याही। करे राम उसकी निरन्तर तपाही। घवराहट। लिखना मुझ नहीं आता। "लेख, लेख" क्यों चिल्लाते हो? माफ़ करो भ्राता ॥१॥ तुम तो हो साहित्य-विशारद, लिखे-पढ़े भरपूर । मुझको लिखना-पढ़ना अव तो तनिक नहीं भाता men किसी तरहसे कलम चलाफर पेट भरा करता। देव-योगने कलम पेटका जोड दिया नाता ॥३॥ इधर-उधरके लेख उड़ाफर, बना फिरा लिपखाड। सर तो ऐसा धोखा जगको दिया नहीं जाता ॥४॥ रोज मनाता हूँ ईश्वरसे-"मुझे हटा लेना- हिन्दीके साहित्य जगतसे, दया करो त्राता " ॥५॥ इस साहित्य जगत्में देखा, फैल रहा अन्धेर । मुम-सा मूर्ख पहा सम्पादक यहाँ गिना जाता ॥६॥ ११४ . , चना-चवेना न एक ओर लेखक-लीला है जैसी अपरम्पार । प्रय-प्रकाशक-गणका दल भी, वैसा दिखलाता non लेना चाहें मुफ्त अन्य भी' कोडी देवे नाहि । लेखक-गणपर इन देवोंको तरस नहीं आता nu फिर देखो भापसमें लेखक जूते लात चलावें। एक दूसरेको गाली हो देता दिखलाता mell इसी हेतु लिखने-पढ़नेसे श्रद्धा उठती जाती। सम्पादकजी! लेख न मांगो, जी है घवराता ॥१०॥ भरने दो, घस, पेट मुझे, औ' रहने दो एकान्त । मेरे लेख रिना न पापका कुछ गिड़ा जाता ॥१॥ . - वसन्त-स्वागत ! - , प्यारे वसन्त । आओ, दिलकी कली खिलाओ। हम हिन्दुओंकी खुजली, यस जल्द ही मिटाओ ।। दो-चार लात-घूसे, थप्पड़ चपत करारी। गुण्डोंके कर-कमलसे उपहार यह दिलाओ॥ जस्तक न लात खावें, तबतक न चैन पायें। प्रति दिन हमें मिले यह, तरकोर वह बतायो ।
चना-चपेना
था शीतसे ठिठुरता अरतक घदन हमारा।
सहनेमें लात-जूता मज़बूत अब बनायो ।
जयचन्दने उठाया जूता विदेशियोंका ।
उस नेमको निगाहें, यह प्रेम हिय जगामो॥
आदत हजार वर्षों से जो लगी हमारी।
उसको किसी तरहसे, प्यारे ! नहीं छुडाओ ।
दो घुद्धि हमको ऐसी, उल्लू बने रहें हम ।
करवट कभी न वदलें, इस नींदमें सुलाओ।
हो लाख भाइयोंका अपमान, हानि होवे ।
चिन्ता नहीं इमें हो, बेफ़िक्त यों बनाओ।
वेदान्त-ज्ञान सन्या इमको सदा सुलभ हो ।
संसार-गति दिसाकर गुमराह मत बनाओ।
हमको नहीं हो चिन्ता, मिल जायें धूलमें जा।
भूलें न सिर उठाये , यह सोख तुम सिखाओ।
हमको वसन्तकी तो कुछ भी नही ख़बर हो।
"मालिक है राम रट यह रसनासे नित कढ़ाओ ।
अलमस्त, सुस्त, काहिल, गाफिल बने रदे हम।
'क्या हो रहा जहाँमें ? हमको न यह सुनाओ ॥
तुमको यहार कहते, करने वहार ही दो।
ठोकर लगा-लगाकर हमको न तुम जगायो ।
चना-चमेना
आओ, वसन्त ! आओ, स्वागत सहर्ष करते।
गांजेका दम लगा दो या भङ्ग ही पिलाओ ।।
कुछ हैं चरसका चस्का, मदिरा महान प्रिय है।
यदि हो सके तो फौरन, दो योतले दिलाओ ।।
हम हैं अफीमची भी, यह साफ जान लो तुम।
राहे-ख दा रहमकर, दो ग्रेन' ही दिलामो ॥
शुभ आगमनमें अपने प्यारे वसन्त ! अब तो।
"उल्लू घसन्त" हमको ससारमें घनाभो ।।
--
लेखकी मांग।
'सम्पादकजी! नमोनमस्ते, पत्र आपका प्राप्त हुआ।
पढकर शोक समेत हर्षका भाव हदयमें व्याप्त हुमा ।।
फूल गया यह पात देखफर, लेखक मुझे समझते माप ।
किन्तु लेख लिख देना होगा, सोच यही होता सन्ताप
लेखक क्या , अनुवादक हूँ, गुपचुप लेख पुराता ।
अदल-बदलकर इधर-उधरसे, अपने नाम छपाता।
किन्तु माप-से यहुभाषाविद् लोगोंसे मैं डरता ।।
लेख भापके लिये लिए क्या सोच-सोचकर मरता हूँ।
-
चनाचना
यही नहीं फेवल है, कारण इसका और दिखाता है।
लेख नहीं पनों पर लिपता हूँ, वह सब सत्य बताता हूँ।
विना टकेका लेप मांगते, आप नहीं शर्माते हैं।
लेखक बदले में हम कुछ लेते हुए लजाते हैं।
इससे तो है कहीं भला यह, असहयोग कर लें हम भाप ।
पत्र न भेजे आप मुझे फिर, देवे नहीं मुझे सन्ताप ॥
नहीं चाहिये पत्र आपका, मुझे माफ कर दें चुपचाप
राजी रहूँ इधर मैं भी नौ' खुश रहिये अपने घर आप ॥
अनुरोध ।
.
"लेख लिख दो," "लेख लिख दो"-सुन तकाजे मर गया।
किन्तु घिसने से कलम जी तो हमारा भर गया।
काम धन्देसे हमें फुरसत कभी मिलती नहीं।
लेख लिखनेके लिये अव तो फलम चलती नहीं।
मित्र-मण्डलके सभी सरदार सम्पादक बने।
जोन पाये लेख, उनकी भौं न हमपर क्यो तने?
'छोड दो या मित्रता, या लेख लिख भेजा करो।'
सस्त हैरतमें पड़ा ६, हे प्रमो। रक्षा करो।
,
चना-चबेना
--
था धुरा वह दिन हमारा लेख जर लिखने लगा।
छोडकर पढ़ना पढ़ाना कलम ही घिसने लगा।
आजतक असयारमें यदि लेखही छपता नहीं।
लेख लिपनेके लिये कोई कभी कहता नहीं।
पेट-भर पाना नहीं, तनपर भला कपड़ा नहीं।
पासमें है नामको भी दाम औ' दमडा नहीं ।
देखकर यह हाल मेरा, नेक खाओ तर्स भी।
मांगकर अर देख मुझसे मत वढाओ मर्ज भी॥
जान लो मैं मर गया, अथवा न लिपना जानता।
मूर्ख है, यस कृष्ण भक्षर भैसके सम मानता ।
इस तरह सन्तोप कर लो, शान्त रहने दो मुझे।
करके मजदूरी किसी विधि, दिन बिताने दो मुझ ।
.
सरस्वती-पूजा।
आई हैं सरस्वती हमारे घर आज,
हर साल आई छाती पे धमकि चढ़ि जाती है।
मूढ़ हम जानें नहि सास्त्रनके गूढ भाव,
फेरि माइ खोपडी हमारी क्यों चयाती हैं।
चना-चपेना कौन है सरस्वती? न जानै पहचाने हम, हमसे पुजाइवेकी आस उर लाती हैं। बुद्धि विगरी है सारदाकी देखु भाई ! तजि यूरप-प्रदेश फेरि याही ओर भाती हैं ॥१॥ भारतके दिन चे पुराने गये चीत सव, गावें नये गीत न पुरानी रीत भाती है। माटीकी बनाइ खूबसूरत-सी मूरतको, पूजनको हिय न उमङ्ग उमगाती है। फूल-माल लेके हम पूजें सारदाको, यदि वात हमसे तो नहि भूले पनि आती है। जानि यहि हाल फेरि यीनाधारिनी यों भाज, लाज तजि द्वार पै हमारे चली आती हैं ॥२॥ मूरख यनाइ हीजड़ों-सी करि हिम्मतको, ज्ञान-गरिमाको गढ़ सारे ढहवाये हैं। ऐसे हैं दयालु देव स्वामी हम मूढनके, पेट भरि भोजन सुदुर्लभ कराये हैं। घेद गयो, सान गयो, लोक-मरजाद गयो, होटल प्रसाद-स्वाद मति मन भाये हैं। पते पै अनोखे साज देखिके हमारे देवि! घरन-सरोज फेहि हेतु माज आये हैं ? ॥२॥ .
चनाचना . भाती देव-धानी न सुहाती महारानी हिन्दी कौन-सी जुयान समझेगी आप भारती ! फारसी सुनाऊँ, स्तुति गाऊँ उरदूमें किधौं, ललकि सुनाऊँ अँगरेजी झकारती। आप यदि भारती हैं शब्दमयी मातु, 'तर क्यों न अँगरेजीकी यघार है यधारती । सुनि सरकारकी हमारी प्रिय भापा देवि । विपद हमारो क्यों न सारी आप टारती ? neu श्लोक न पढगे, रसनासे न कटेंगे, अर हत्थे न बगे हम सारदा भवानीके। जाओ तहँ देवि । जहँ करति निवास अय, भारतीय सेवक हैं मूढता दिवानीके । सारीरीतिभांति हमें पच्छिमकी भाती माज, लाज तजि निपट भये हैं गिना पानीके। माई-पाप-भाईकी न भाई हमें यात नेकु, पचन सुहात दिन-रात पर-नानी ॥५॥ मूढ सय भौतिसों कहावै हम भारतीय । कौन मुँह लाइ पूजा करें यीनापानीकी। देषी सारदाके करों पूजक रहे थे, भाज मूदता रही है वात उनकी निसानीको, चनाचवेना जो पै मातु सारदा दयालु होती भारत पे, कीरति बचाती वुद्धि-विद्या-वरदानीकी । मूरख घनाइ, जग-बीच हंसवाइ अब, चाइति है पूजा फूलमाला धूपदानीकी ॥६॥ खानमें विदेसी, हम पानमें विदेसी,भये, जानमें विदेसी अनजानमें विदेसी हैं। पाद पफजोंको परकीय हम पूर्जे नित्य, भाव नहि भाई निज ग्रामके स्वदेसी हैं। चाल-ढाल यूरपकी अति ही सुहावे हमें, फूटी आँख भावे नदि कोई कृष्णकेसी है। या ही हेतु देवि! तुम उलटि सिधारो घर, भाव-भकि-प्रेमकी यहाँ न लवलेसी है। वसन्त-पंचमीके वाद। पूजा हुई ठाटसे घसन्तपञ्चमीके दिन, सारदा भवानी घुद्धि-विधा-वरदानीको। बाजे या याजे, याजे दोल ओ मृदङ्ग-झांस, गायी गीत-गाया निज कीरति-कहानीकी। -
धना-चना
मूरति मगाइ फूल-चन्दन चढाइ धूप-
दीप दिखराइ नैवेद्य नजरानी की।
ऋद्धि-सिद्धि दानी सारदाको चार चाँचल ,
प्रेमसों रिझाइ ठाटदार अगवानी की ॥१॥
भारत देवी सारदाकी ममता है घडी,
तयै फूट फली, सगे भाई सत्रु होते हैं।
जूते-लात चलें दिन रात यहाँ आपसमें,
प्रेमसों पराये पद मान सीस ढोते हैं।
देखि दसा हिन्दुन की होति न दया है काको,
कौनसों विवेकीके न रोएँ राडे होते हैं ?
किन्तु ये पसारे पांव गोदमें गुलामीकी ही,
आँखें मीचि मौजसे मजेसे पौदि सोते हैं ।
भासरा सहारा घेहयाईको न ते तर,
कैसे सारदाको निज मुख दिपरावते ?
सारे देस-बीच मूढताकी कीच फौलि रही,
एते पैन देवीको सदन पर्धरावते।
साफ़ न हुए हैं दिल मापुसमें भाइनफे,
देवीके निकट कैसे कण्ठसे लगावते ?
डॉग तिहारो, पूजा-पाठ है नकारो,
यदि लखि करतूति हिय सोच नहि लावते ॥३॥
लण्ठ-शिरोमणि!
.
खोली जो जुवान है खिलाफमें हमारे,
हम मारे लात जूतोंके कचूमर निकारेंगे।
फोरेंगे तुम्हारी खोपडीको खण्ड-खण्ड फरि,
होसको सम्हालो, नहिं दाँत तोरि डारेंगे।
पोल मत खोलना हमारी कौं भूल करि,
हमहूँ तिहारे काज बहुत सँवारेंगे।
सि-मसि लायेंगे अपार धन चन्दा करि,
खाइ आप, कछुक तुम्हारी जेर डारेंगे ॥३n
थाओ, चलें, खोलें पाठसाला पसुसाला कहीं,
ठाटसे तिजारत चलावें भिखमलीकी ।
झोली लटकाइ, मुँह वाइ, दिखाइ दांत,
चन्दाको उगाह करें घात बहुरङ्गीकी।
नेकु ना लजावे जो पै दान कछु पावै हम,
करत पुसामद चमार अरु भनीको ।
यार ! पदनामी म हमारी करनेकी ठानो,
इमहि जारत तुम्हारे अस सड्नीको २n
१२४
पना-चपेना . सिद्ध पनि जावे हम, साधक बनावें तुम्हें, धाधक यनों ना यहि पुन्यकी कमाईमें । रड्नको जमामो, बहु ढङ्ग दिखराओ अजी, आजके जमाने में न गुजर सिधाई में। सीधे साँचे लोगनको घेरन ढेर मिले, हमसे लबारनकी नाक है मलाईमें। लण्ठके सिरोमनि हो, चएट पनि जाओ, कहीं पैठन न पावै जजमान गहराईमें ॥३॥ माल पै तिलक देइ कुकुमऽरु केसरको, पण्डितको भेस रचि भोले भरमाइये। तन्त्र, मन्व, यन्त्रको चलाइ पड्यन्त्र कछु, रकम कमाइ धीवी पचोंको सिलाइये। खदरको धारि रखवाइ देसभक नाम, वकृता पधारिक स्वराज धुलवाइये। जैसे धने वैसे छलछन्दसे कमामओ दाम, नित्य यगुला-सी भगताई दिसराइये ॥४॥ कलियुग पावन सुदावन सुफाल यह, लएठ पनि सी क्यों न चैनकी पजायते। सत्ययुग, त्रेता अरु द्वापरमें मुल जन, पुन्य 'करि येहद अपार दुख पायते। 3 + चना-वधेना दानी हरिचन्द, रामचन्द दुख पाये बाहु, पाण्डव विचारे दिन कलपि वितावते । काहेको फरत फलिकालकी धुराई लोग, पापी जव भोग मालपूभाको लगावते ॥५॥ आत्म-प्रशंसा। मैं लेखक-गणका सरदार। महिमा मेरी अपरस्पार ।। पढ़ा-लिखा चौकस पूरा हूँ। नये चावलोंका चिउड़ा हूँ। भापाकी अनुपम शैली है। शब्दोंकी पूरी थैली है। किसी विषयपर लेख लिखाओ। सम्पादक चाहे बनवाओ करतर देख निराले मेरे। रहता अचरज सवको घेरे। बँगला पूर्व पढी है मैंने उर्दू भी सीपी है मैंने १२६
चना-चपेना
॥
-
सवपर झूठा
गुप चुप लेख चुराऊ उनके ।
चिड़िया ज्यों चुगतो है तिनके
उनको अपने नाम छपाऊँ।
रोय जमाऊँ ।
जो मेरे गुरु कहलाते थे।
लिखना मुझको सिखलाते थे।
चे तो छिपे अँधेरे में हैं।
विरे रात दिन धेरैमें हैं।
दुनिया उनको वात न जाने।
लेपक घडा मुझीको माने।
गुरुको दुर्लभ चना चयेना।
जगले कुछ नहि लेना-देना।
में वेतन गहरा पाता हूं।
पूरी मालपुआ खाता हूँ।
रवडी खोवा और मलाई ।
तरह-तरहको सरस मिठाई।
मुझको सुलभ सभी दिन होती।
देख देख पीनी खुश होती।
चना- पीटे ताली।
भरो हुई जर पाने थाली।
१२७
चना-वधेना
पण्डित पढ़े घरों में रोवें।
बिन खाये मुंहको नित धोवें।
लेखक मैं कहलाता जगमें।
अकड़-अकड़के चलता मगमें ।
सब मिलके मेरे गुण गामो।
उभय लोकमें सब सुख
सिरपर लाल लगाऊँ विन्दी।
धन्य हुई मुझसे है हिन्दी
पाओ॥
eeeeəээээ
समाप्त
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