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Rajasthan Ke Amar Shahidon Ki Kahaniyan

Amar Shahid Granthmala · 2011/03

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राजस्थान के अमर शहीदों की कहानियां

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राजस्थान के अमर शहीदों की कहानियां 7 अमर शहीद ग्रंशमाला संस्करण प्रथम, 1987 मूल्य पच्चीस रुपये प्रकाशक इतिहास शोध-सस्थान 33/1 भूलमुल्लैया रोड, महरौली नई दिल्ली-110030 मुद्रक हरिकृष्ण प्रिंटर्स शिवाजी पार्क, शाहदरा, दिल्ली-110032 विजयदेव झारी द्वारा इतिहास शोध संस्थान, नई दिल्ली के लिए प्रकाशित । आवरण सजा श्री विशन शर्मा एवं आवरण मुद्रण गणेश प्रेस, दिल्ली द्वारा।

राजस्थान के अमर शहीद 1. देशभक्त महाराणा मानसिंह/5-10 2. आठ फिरंगी नौ गौरा, लडे जाट के दो छोरा-- रणजीतसिंह व विशनसिंह/11-14 3. कोटा के दो विप्लवियों की फांसी- लाला जयदयाल और मेहरबां सां/15-18 4. वे हाक थे या क्रान्तिकारी- डूंगजी और जवाहरजी/19-21 5. राजस्थान वीर केसरी- केसरीसिंह बरहट/22-25 6. शहीद प्रतापसिंह/26-30 7. किसान क्रान्ति के सूत्रधार - विजयसिंह पथिक/31-38 8 क्रान्तिकारी गोपालसिंह ठाकुर/39-41 9. वीरपुरुप माणिक्य ताल धर्मा/ 42-49 10. शहीद ठाकुर कालसिंह/50-52 11. शहीद मूरजी/33-54 12. शहीद सीता देवी/55-56 13. शहीद जमना बनिया/57-58 14 कान्तिवीर दामोदरदास राठो/59-61 15. शहीद ठाकुर सरजन सिंह/62-63 16. सन् 1942 ई० का शहीद- लक्ष्मणप्रसाद सिंह/64-65 17. युवा विप्लवी- विशंभर दयाल/66-67 18. निमूचना गाव का शहीद- कन्हैया/68-69 19. गिन्सन की हत्या का षड्यंत्र और विप्लवी-- रामचन्द्र नरहरि चापट/70-71 20. प्राणनाथ डोगरा की हत्या और विप्लवी रामसिंह और रमेशचन्द्र व्यास/72 21. शहीद मालिका काली बाई/73-74 22. शहीद राधा देवी/75-76 23. आत्म बलिदानी शम्भूनारायण/77-78 24. डावडा ग्राम के शहीद- यो माथुरा दास, चुन्नीलाल शर्मा आदि/79 25 शहीद बालमुकन्द विस्सा/80 26. एक शहीद की रहस्यमय मृत्यु- थी सागरमल गोपाजी/81-82 27. तीखीमरे गांव के शहीद- ठाकुर छत्रसिंह व पंचम सिंह/83 28. सन् 1857 ई० मे राजस्थान के- चम्पावत ठरफरों को शौर्य गाथा/83-87 देशभक्त महाराणा मानसिंह राजपुताने की भूमि पर भारत को आज भी गौरव है। वीरों और वीरांगनाओं की गौरव-गरिमाओं से यह भूमि सदा निहाल होती रही। राजपूताने ने हर काल और हर युग में उत्थान-पतन देखे हैं। यहां की भूमि मे अनेक वीरों और वीरांगनाओं की तलवार झनझना उठी थी। जब-जव देश की आन और मान पर आंच आई तब-तब वीरों और वीरांगनाओं के लहू से यह भूमि सिंचित हुई। इस राज्य के वीरों और वीरांगनाओं ने अपनी वीरता और जौहर दिखलाए। आधुनिक राजस्थान राजपुताने का दूसरा नाम है। अपनी आन की रक्षा हेतु महाराणा प्रताप अपने स्वाभिमान की रक्षा के लिए जंगल-जंगल भटके, पर मुगलों के सामने कदापि नहीं झुके। अपनी इज्जत की रक्षा के लिए राजस्थान की सती नारियां जौहर की चिता में स्वाहा हो गई। महारानी पद्मिनी, पन्नादाई, चांद वीवी आदि जैसी नारियां तथा अनेक सूरमाओं जैसे-गोगाजी, बापूजी और बप्पा रावल ने मृत्यु को गले लगा लिया था। इस राज्य के राजपूतों की कहानियां इतिहास प्रसिद्ध हैं। वीर पुरुषों और वीर नारियों के इतिहास की गाथा में एक ही बात सामने आती है कि भारत को गुलाम बनाने वाली शक्तियां जब-जब राजपूतों के ऊपर हावी हुई तब-तब यह जाति शस्त्र लेकर उठी और इसने अपनी जन्मभूमि भारत के सम्मान की रक्षा के लिए निर्वासित होना पसंद किया। बलिदान होना अपना धर्म 6 : देशभक्त महाराणा मानसिंह समझा। राजपुताने के वीरों की इसी कतार में जोधपुर के महाराजा मानसिंह थे जिन्होंने कभी भी फिरंगियों की सत्ता के आगे अपना स्वाभिमान न बेचा, अपनी रियासत को दाव पर लगने नहीं दिया और अंत में निर्वासित होकर जिन्दगी गुजार दी और यह निष्कर्ष निकाला कि हमें भी अग्रेजों को अपने पदो में रखने का प्रदर्शन और दिखावा करना चाहिए और साथ-साथ देश को स्वतंत्र कराने की जडों को भीतर-भीतर मजबूत करना चाहिए। इस कार्य के लिए राजा मानसिंह भारत की अनेक रियासतों के राजे, रजवाड़ों, नवावों से पत्र-व्यवहार करने लगे। कई राजे-महाराजे साधु-संन्यासी के वेश में जोधपुर आने लगे और मानसिंह के दरवार में भारत की स्वतंत्रता के लिए अंग्रेजों को नालों पर रोक लगाने हेतु गुप्त वार्ता की जाने लगी। राजा मानसिंह ने जोधपुर में आए हुए राजों, महाराजों से फिरंगियों की चालों से सतर्क रहने को कहा। देश के विभिन्न भागों से आए हुए राजाओं के साथ हुई वार्ता में उनकी देशभक्ति निखर उठी। वे देशभक्तों की श्रेणी में गिने जाने लगे। जोधपुर में अचानक एक घटना घटी। एक अंग्रेज डॉ. श्री भोपले की हत्या कर दी गई । भोपले के हत्यारे देशभक्त लोग थे। महाराजा मानसिंह ने डॉ. भोपले के हत्यारे को अपने दरवार में रखा और उनका आतिथ्य किया। राजा मानसिंह के इस क्रिया-कलाप से फिरंगी अंग्रेजी सरकार के अधिकारी वर्ग नाराज हो गए थे। तभी से राजा मानसिंह पर अंग्रेजी सरकार कड़ी दृष्टि रखने लगी। जोधपुर में लार्ड वेटिंग ने राजाओं की एक बैठक बुलाई। चेटक में राजस्थान के अनेक राजे-महाराजे सम्मिलित हुए। देशभक्त राजा मानसिंह ने इस बैठक में भाग नही लिया और न लाई वेटिंफ की नीतियों तथा कार्यक्रमों का समर्थन किया न 1 देशभक्त महाराणा मानसिंह : 7 ही किसी हित की सूचना भेजी। राजा मानसिंह के इस रवैये से अंग्रेजी सरकार पहले से भी अधिक क्षुब्ध हो गई। अंग्रेजी सरकार ने मारवाड़ में ब्रिटिश सेना की छावनी खोल दी। राजा मानसिंह को ब्रिटिश सरकार का यह कार्य तनिक भी नहीं भाया। वे भीतर ही भीतर तव अंग्रेजी सरकार से टक्कर लेने के लिए शस्त्र-निर्माण पर ध्यान देने लगे, राजपूत राजाओं की एकता का प्रयत्न करने लगे। किन्तु उनका यह प्रयत्न सफल नहीं हुआ, सन् 1836 ई० में ब्रिटिश सरकार ने मारवाड़ के कई स्थानों को लेने के लिए जोधपुर राज्य के साथ संधि-वार्ता पर काई शत रखी। जिन दिनों डॉ. भोपले की हत्या हुई थी, उन्ही दिनों किशन- गढ़, सिरोही तथा जैसलमेर में भारी लूट-मार हुआ था। इन क्षेत्रों में ठग लोग छद्म-वेश में लोगों से ठगो कर रहे थे। राजा मानसिंह ने इन सब घटनाओं से होने वाले नुकसान को पूरा करने के लिए आर्थिक सहायता को देने का वायदा ब्रिटिश सरकार से किया किन्तु संधि की शर्तों पर उन्होंने जानबूझकर पानी फेर दिया। उनकी देशभक्ति ने इन सब शर्तों को स्वीकार नही किया था। अंग्रेज भी मानसिंह की मानवता को समझ गए। ब्रिटिश सत्ता ने बाड़मेर में फौजी-छावनी बनानी शुरू कर दी। मालानी में बसे ब्रिटिश सत्ता को समर्थन न देने वाले राजपूत-जमींदारों को बंदी बना लिया गया। मालानी में भी एक फौजी छावनी खोल दी गई। डीडवाना और भरोठ नमक-उत्पादन के प्रसिद्ध क्षेत्र था। सेना का खर्चा पूरा करने के लिए नमक उत्पादन के इन दोनों क्षेत्रों पर अंग्रेजी सरकार ने अपना अधिकार कर लिया। इस सधि की निम्नांकित शत रखी गई थीं। महाराणा मानसिंह को डाक्टर भोपले की हत्या का जिम्मेवार ठहराया - । 8: देशभक्त महाराणा मानसिंह गया था। किशनगढ़, सिरोही तथा जैसलमेर के क्षेत्रों में लूटमार, डकैती की गई उनसे अंग्रेजी सरकार को अत्यधिक नुकसान पहुंचा था। उन सब को आर्थिक क्षति को पूरा करने का आश्वा- सन महाराणा मानसिंह दे चुके थे। अंग्रेजों ने मानसिंह को ब्रिटिश-विरोधी लोगों को प्रशासन से निकालने का पत्र लिखा। अंग्रेजी सरकार की इन गतिविधियों को राजा मानसिंह ने निकट से समझा और आगे की योजना आरंभ कर दी। उन्होंने यह योजना बना रखी थी कि रूस और परशिया की सेना के कदम भारत की ओर जैसे ही बढ़ें ठीक उसी समय सभी क्रान्तिकारी फिरंगियों पर टूट पड़ें। किन्तु योजना का रहस्य पहले ही खुल गया। सन् 1839 ई० में क्रान्तिकारियों की क्रान्तिकारी योजनाओं पर पाबंदी लगाने के लिए अंग्रेजी सरकार द्वारा एक जांच आयोग संगठित किया गया। अंग्रेज मानसिंह को विद्रोही घोपित करने और दण्डित करने का रास्ता निकालने लगे। मारवाड़ के सामंतों को मानसिंह के विरुद्ध भड़काने के अंग्रेजों ने प्रयास किए। देशभक्त सामन्त मानसिंह को सम्मान देते आए थे। कोई भी सामन्त मानसिंह के विरुद्ध किसी भी प्रकार का कार्य करने के लिए तैयार नहीं हुए । अंग्रेजी सरकार की यह चाल भी असफल रही। अब अंग्रेजी सरकार ने एक और चाल चली। जोधपुर और मारवाड़ में प्रशासनिक सुधार करने के बहाने लेकर मानसिंह के पास करनल सदरलैंड को भेजा गया । मानसिंह और करनल सदरलैंड में कई दिनों तक वाद-विवाद होता रहा। मानसिंह ने फरनल सदग्लैड की एक भी बात नहीं मानी। कारनल सदरलैण्ड मानसिंह के दरबार से जोधपुर गया और यहां से मानसिंह को विटिश-विरोधी गतिविधियों के संबंध में गवर्नर जनरल को पत्र लिया। गवर्नर जनरल ने सदरलैण्ड को देशभक्त महाराणा मानसिंह : 9 जोधपुर में सेना भेजने का आदेश दिया। ब्रिटिश सैनिक मारवाड़ की तरफ बढ़ने लगे। मारवाड़ में सेना की घुसपैठ होते ही महाराणा मानसिंह बनाढ नामक स्थान में आए हुए करनल सदरलैण्ड तथा कप्तान लढलो के सम्मुख पहुंचे और ब्रिटिश सत्ता को जोधपुर का किला देने की स्वीकृति दे दी। वे हृदय से जोधपुर का किला अंग्रेजों को देना नहीं चाहते थे। वे एक देशभक्त के साथ-साथ दयालु भी थे। अंग्रेजी सत्ता के शस्त्रों के वार से प्रजा का खून न वहे और दूसरी ओर महाराणा मानसिंह यह भी समझने लगे थे कि जोधपुर रियासत के बहुत से वफादार लोग भीतर-भीतर अंग्रेजी सरकार से मिले हुए हैं। रियामत के लोगों की अनेकता को भी उन्होंने परख लिया था। अपनी छोटी-सी प्रजा के साथ अंग्रेजों को विशाल सैनिक शक्ति अगर लड़ेगी तो प्रजा ही मारी जाएगी। इसलिए उन्होंने अंग्रेजों को जोधपुर का किला देना स्वीकार कर लिया। 24 सितंवर सन् 1839 ई० में महाराणा मानसिंह ने अंग्रेजी सरकार से एक और संधि की । इस संधि में मानसिंह ने मारवाड़ की प्रशासनिक व्यवस्था में सुधार का काम अंग्रेजों को सौंपा। मानसिंह ने ऐसा इसलिए किया कि इस संधि के बावजूद अंग्रेज जोधपुर राज्य की निर्दोष प्रजा का खून न बहाएं। उस समय तक जोधपुर के बहुसंख्यक लोग अंग्रेजी सरकार के विरोधी हो गए थे। अंग्रेज इस बात को समझ गए थे। मानसिंह ने भी इस स्थिति को भांप लिया था किन्तु वे असमर्थ थे। मारवाड़ के अंग्रेजों ने अंग्रेज विरोधियों को बन्दी बनाना शुरू कर दिया। मानसिंह ने उस समय को सभी परिस्थितयों को समझ लिया। सन् 1839 ई० के बाद से हो जोधपुर के राज्य कर्मचारियों तथा नाथ सम्प्रदाय से संबंधित लोगों में आपसी फूट, हत्या और पड़यंत्र के मामले दिनों-दिन घर करने लगे थे। जोधपुर की 10 : देशभक्त महाराणा मानसिंह रियासत के साथ नाथ सम्प्रदाय के नाथों, योगियों, महन्तों के संबंध का एक अलग ही अध्याय है। भीमनाथ के युग से ही जोधपुर, मारवाड़, मेवाड़ में नार्थो का आधिपत्य था। महाराणा मानसिह के गुरु देवनाथ थे। देवनाथ का मार्गदर्शन पाकर वह जोधपुर के राजकार्य का संचालन करते थे। मानसिंह ने जब नाथों और योगियों को भ्रष्टाचरण करते देखा, राज्य के आन्तरिक मामले में हस्तक्षेप कर राज्य के कर्मचारियों के साथ संघर्ष करते देखा, तब वे भौतिक जीवन के प्रति निराश हो गए और एक दिन अवसर पाकर अपना राजपाठ छोडकर साधुवेश में मारवाड़ से सदा के लिए चले गए। वे अनासक्त संन्यासी का जीवन बिताने लगे। जीवन का अन्तिम लक्ष्य 'मुक्ति' का मार्ग ढूंढ़ने के लिए अपनी पिछली जिन्दगी को वे भूल गए। संन्यासी वेप में ही एक दिन इस असार संसार को त्याग कर चल बसे ।

आठ फिरंगी नौ गोरा, लड़े जाट के दो छोरा रणजीतसिंह व किशनसिंह ॥ राजस्थान की भरतपुर रियासत किसी जमाने में शानदार रियासत थी। इस रियासत में वीर सूरजमल पैदा हुए थे। वीर सूरजमल ने मुगलों, अफगानों, मराठों के दांत खट्टे कर भरतपुर के स्वाभिमान का ध्वज गिरने नहीं दिया था। इसी रियासत में महाराजा रणजीत सिंह नामक एक राजा का जन्म हुआ था। महाराजा रणजीतसिंह को कभी भी भरतपुर की गुलामी अच्छी नही लगी। चाहे वह गुलामी अंग्रेजों की हो या मराठों की हो। सन् 1803 ई० में महाराजा रणजीतसिंह के साथ अंग्रेजों की संधि हुई थी। संधि में यह शर्ते रखी गई थी कि भरतपुर की रक्षा सदा ब्रिटिश सरकार करेगी और राज्य के आंतरिक मामलों में कभी भी हस्तक्षेप नहीं करेगी। महाराजा रणजीत सिंह पहले से भी स्वतंत्र नहीं थे, न रियासत ही उनके अपने अधीन थी क्योंकि भरतपुर रियासत पर सिंधिया परिवार का अधिकार था । स्वयं महाराजा रणजीतसिंह सिंधिया के जागीरदार थे। महाराजा रणजीतसिंह सिंधिया को खिराज दिया करते थे । अग्रेजी सरकार ने रणजीतसिंह से यह बात भी कही थी कि सिंधिया को जो आप खिराज देते आए है अब आपको नहीं देनी पड़ेगी। अंग्रेजों की शर्तों का पालन करते हुए महाराजा रणजीत सिंह ने अंग्रेजों की नीति के विरुद्ध सिंधिया और भोंसले को सहायता न देना शुरू किया। अंग्रेजों को दुहरी नीति महाराजा रणजीत सिंह की समझ में आ गई थी। अंग्रेजों ने रणजीत सिंह से होल्कर के 12 : रणजीतसिंह व किशनसिंह विरुद्ध सहायता की भी मांग की। अव तो अंग्रेजों को दुहरी नीति विलकुल ही स्पष्ट हो गई। अंग्रेजी सरकार पर रणजीत सिंह को संदेह होने लगा था। महाराजा रणजीतसिंह को यह समझते देर नहीं लगी कि अंग्रेजी सरकार भरतपुर राज्य को अपने अधीन करना चाहती है और कभी भी भरतपुर के राज्य के मामलों में अंग्रेजी सरकार की यह दखलअंदाजी विस्फोट का कारण बन सकती है। स्थिति को समझकर महाराजा रणजीत सिंह ने होल्कर को सहायता देना अच्छा समझा। सन् 1804 ई० में अंग्रेजों में हारकर होल्कर भरतपुर राज्य में शरण लेने जा पहुंचे। अपने सैन्यदल के साथ वे डीग के किले में समय गुजारने लगे। होल्कर के भरतपुर आने की सूचना अंग्रेजों को मिल चुकी थी। अंग्रेजी सरकार ने तुरन्त रणजीतसिंह को पत्र लिखकर सूचित किया कि शीघ्र ही होल्कर को भरतपुर से निकाल बाहर करें या अंग्रेजी सरकार को सौप दें। महाराजा रणजीत सिंह ने अतिथि-धर्म का पालन करते हुए होल्कर को अंग्रेजों के अधीन नहीं सौंपा। उस समय एक अंग्रेज अधिकारी जनरल लेक ने गवर्नर को एक पत्र लिखा कि अब समय आ गया है कि भरतपुर के डीग के किले पर आक्रमण करना ही होगा और उसे अपने अधीन कर लेना होगा। ब्रिटिश सरकार के सेनापति जनरल लेक ने 13 दिसम्बर को डीग के किले पर आक्रमण कर दिया। लगातार 10 दिनों तक किले पर तोपें छटीं। किले की दिवार ध्वस्त हो गई। अंग्रेजी सैनिकों ने डीग के किले में अपने यामन जमा लिए और डोग के इर्द-गिर्द भी अपना अधिकार कर लिया। उधर होल्कर को मेना डोग के किले मे भरतपुर की ओर चल पड़ी थी। जनरल लेक ने 3 जनवरी सन् 1805 ई. को भरतपुर में अपना गैगिक शिविर बना लिया था। जैसे ही अंग्रेजी सेना रणजीतसिंह व किशनसिंह- 13 भरतपुर नगर में प्रवेश करने लगी कि भरतपुर के सैनिकों ने भी लड़ने के लिए हथियार उठा लिए। भरतपुरके सैनिकों ने अंग्रेजी सरकार के सैनिकों से डटकर मुकाबला किया । भरतपुर के सैनिकों की वीरता और वहादुरी से अंग्रेजी सेना आश्चर्यचकित हो गई। अंग्रेजी सेना भरतपुर के सैनिकों के सामने टिक नहीं सकी। अंग्नेजी सरकार के सभी सैनिक अफसर पराजित हो गए। अंग्रेजी सैनिकों ने हथियार डाल दिये । भरतपुर के किले में अंग्रेजों की लाशें बिछ गईं। भरतपुर के सैनिकों की बहादुरी के बारे में खबर लगते ही अंग्रेजी सरकार के उपनिवेशों में भय च्याप्त हो गया। भरतपुर के किले में भेजी गई तोपों ने भी जवाब देना शुरू कर दिया। अंग्रेजी सरकार की मंगजीन का सफाया कर दिया गया था। भरतपुर का यह संग्राम शान्त हो गया। इस संग्राम में भरत- पुर के सैनिकों की विजय हुई। महाराजा रणजीत सिंह को अपने सैनिकों पर गर्व था । वे हर्षोन्नत हो उठे। भरतपुर में चारों तरफ विजय की पताका उन्होंने लहराई । अपने वीर सैनिकों को शुभकामनाएं दीं। इस लड़ाई के बाद अंग्रेजी सरकार ने महाराजा रणजीतसिंह को होल्कर से अलग करने की कोशिश की। होल्कर के शुभा- कांक्षी अमीरखां को प्रलोभन देकर अपने में मिला लिया। होल्कर से अलग कर अमीर खां को सवलगढ़ में जाकर रखवा दिया। सन् 1805 ई० में अंग्रेजों के साथ महाराजा रणजीतसिंह की एक और संधि की विजय हुई। अंग्रेजी सरकार ने महाराजा रणजीत सिंह को भरतपुर की डीग के किले को तथा भरतपुर के भासपास के इलाकों को दे दिया। महाराणा रणजीतसिंह की वीरता के गीत आज भी राजस्थान के लोक गीतों में गाए जाते हैं। एक कवि ने यहां तक लिख दिया कि- 14 : रणजीतसिंह व किशनसिंह "आठ फिरंगी नौ गोरा, लड़े जाट के दो छोरा भरतपुर रियासत के एक राजा महाराजा किशनसिंह ने कभी अंग्रेजो को अपना शासनाधिकार नहीं दिया । उन्होने अंग्रेजी सरकार से शासन की सुरक्षा के लिए शासन समिति गठित करने की मांग की थी। अंग्रेजी सरकार ने उनके इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया और राजगद्दी से उतार दिया। भरतपुर रियासत के इन दो राजाओं के राष्ट्रीय स्वाभिमान, पौरुप और वीरता की कहानी आज भी राजस्थान के इतिहास में गूजित हो रही है।

कोटा के दो विप्लवियों को फांसी लाला जयदयाल और मेहरवां खां सन् 1857 ई० में भारत के अन्य प्रान्तों की सरह राजस्थान में भी विद्रोह की आग सुलगी थी। तत्कालीन समय के विद्रोही नेता भारत को फिरंगियों की दासता से मुक्त कराने को जागृत हो उठे। सन् 1857 ई० का विद्रोह कलकत्ता के बहरामपुर और बैरकपुर छावनी के विद्रोही सैनिकों से आरंभ हुआ। बहरामपुर रेजिमेंट के सैनिक मंगल पाण्डेय ने अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह का बिगुल बजा दिया। कई अफसरों को मार डाला तथा सैनिकों को विद्रोह करने के लिए भड़काया। इस महान वीर को अंग्रेजों ने फांसी दे दी थी। वंगाल की सैनिक छावनियों में विद्रोह की आग सुलगते ही मेरठ, रूहेलखण्ड, लखनऊ, अम्बाला, दिल्ली तथा पंजाब की फौजी छावनियों में विद्रोह की आग सुलगने लगी। सैनिक- विद्रोह की आग सुलगते-सुलगते राजस्थान भी जा पहुंची। राजस्थान में विद्रोह की आग सुलगने के कई कारण थे। भारतीय सैनिकों को यह पता चल चुका था कि ब्रिटिश सरकार के वन्दूकों और राइफलों में प्रयोग किये जाने वाले वारूद के ऊपर गाय और सुअर की चर्बी लगाई जाती है। और सैनिकों के खाद्य पदार्थो मे मानव हड्डियों का चूर्ण भी मिलाया जाता है। सबसे पहले नीमच और ऐरन की फौजी छावनियों के फौजी भड़के । नीमच में मेजर वर्टन अपने सैनिकों के साथ विद्रोहियों के विद्रोह को दबाने के लिए पहुंच गया। बर्टन के सैनिक दस्ते के पहुंचने की खबर जैसे ही नीमच के लोगों को पहुंची वे वहां से 16: लाला जयदयाल और मेहरबां खां । भाग गए। मेजर बर्टन के साथ आए हुए दोनों पुत्रों को भी नीमच में निराशा हाथ लगी। मेजर बटन नीमच से कोटा की ओर अपने सैन्यदल के साथ चल पड़ा। कोटा भी विप्लवियों का केन्द्र बन चुका था। कोटा के महाराव अंग्रेजों से मिले हुए थे। वे कभी नहीं चाहते थे कि कोटा में भारतीय सैनिक विद्रोह करें। इसीलिए उन्होंने वहां आए हुए मेजर वर्टन को भारतीय विद्रोही सैनिकों से लड़ने के लिए तैयार कर लिया था। कोटा के दो विप्लवी लाला जयदयाल और मेहरवां खां फोजी छावनियों में जा-जाकर भारतीय सैनिकों को विद्रोह करने को उकसा रहे थे। लाला जयदयाल के मन में विद्रोह तव पैदा हुआ जबकि मेजर वर्टन से महाराव की गुप्त वातचीत यह हुई थी कि "अंग्रेज ब्रिटिश सरकार के विरोधी अफसरों को कोटा के रियासत को नौकरी से निकाल देने में ही भलाई है क्योंकि वे अफसर ब्रिटिश सरकार के विरोधी हो गए हैं।" तभी से लाला जयदयाल को महाराव और अंग्रेजी सरकार की मिली भगत समझ में आ गई। लाला जयदयाल कोटा के एक संभ्रान्त नागरिक थे। वे एक सच्चे देशभक्त और भारतीय स्वाधीनता संग्राम के हिमायती थे । महाराव के दरबार में वे एक जाने-माने वकील थे। कोटा रियासत की समस्याओं को कानूनी ढंग से सुलझाने में वे चतुर प्रमाणित हुए थे। लाला जयदयाल कोटा में आई हुई गंभीर परिस्थिति को समझने लगे थे। उन्हें महाराव ने पदमुक्त कर दिया था। वे एक असैनिक सेवक के रूप में कार्य करने लगे थे। कोटा का एक और विप्लवी मेहरवां खो कोटा के सैनिकों का रिसालेदार था। दोनों विप्लवियों ने हिन्दु और मुस्लिमधर्म के विरुद्ध गाय और सुअर की चर्वी से भरी हुई ब्रिटिश सरकार की बन्दूकों को इस्तेमाल करने लाला जयदयाल और मेहरवां खां : 17 से रोका । उन दोनों ने कोटा की फौजी छावनियों के विद्रोहियों की हिन्दू और मुस्लिम धर्म के प्रति चेतना जगाई और कहा कि आप लोगों के धर्म के साथ अंग्नेज लोग खिलवाड़ कर रहे हैं और चीं मिले हुए कारतूस का प्रयोग कराकर धर्मभ्रष्ट करना चाहते है। लाला जयदयाल और मेहरवां खां की बातों का भारतीय सैनिकों पर असर पड़ गया और वे विद्रोह के मैदान में कूद पड़े । मेजर बर्टन ने उस समय की स्थिति को भांप लिया और कोटा के भारतीय विद्रोही सैनिकों पर आक्रमण कर दिया। 17 अक्तूबर सन् 1857 ई० को कोटा में अंग्रेजी सैनिकों और विद्रोहियों का भीषण संग्राम हुआ। लाला जयदयाल ने मेजर बर्टन और उसके दोनों पुत्रों को जान से मार डाला और कोटा के किले पर विद्रोही सैनिकों ने कब्जा कर लिया। फौजी छावनियों में आग लगा दी। मेहरयां खां ने भी अपने सैनिकों के साथ अंग्रेजी सेना के विरुद्ध विद्रोह कर दिया था। रिसालेदार मेहरवां खां के नेतृत्व में विद्रोही सेना अंग्रेजी फौज से जी-जान से लड़ी । एक- एक सैनिक ने चुन-चुन कर अंग्रेजी सेना के छोटे-बड़े अफसरों को मार डाला। कोटा के एक भी सैनिक ने महाराव का साथ नहीं दिया। एक वर्ष तक कोटा के विद्रोहियों के साथ अंग्रेजी सेना सड़ती रही और पराजित होती रही। विवश होकर कोटा के महाराव ने एक दो रियासतों के राजाओं से निक सहायता मांगी। उन रियासतों ने महाराव को सैनिक सहायता दी। कोटा में आए हए दूसरी रियासतों के सैनिक विद्रोही सैनिकों के कार नजर पने मंगे। कोटा में बाहरी रियासतों के सैनिकों के पास भारोहथियार पाउन मैनिकों के बढ़ते कदम देगार लाला जपदयाल कोटा मे भाग निकले और राजस्थान के कई स्थानों पर भूमिगत होकर रहने लगे थे। एक दिन जयपुर के पास ये गिरफ्तार कर लिए 18 : लाला जयदयाल और मेहरबांचा गए। अदालत ने लाला जयदयाल के ऊपर राजद्रोह करने, कोटा की एजेंसी के बंगले पर आक्रमण करने, मेजर वर्टन और उसके 'पुत्रों की हत्या का सहयोगी बनकर साथ देने, रिसालेदार मेहरबां खां के साथ मिलकर ब्रिटिश सेना के विरुद्ध सशस्त्र संघर्ष करने के आरोप में फांसी की सजा सुनाई। 19 सितंबर सन् 1860 ई० को कोटा एजेंसी वंगले के निकट विद्रोही जयदयाल को फांसी दे दी गई। मेहरवां खां भी कोटा से भागकर भूमिगत रहने लगे थे। फिरोजपुर के पास वे गिरफ्तार कर लिए गए । सन् 1860 ई० के जुलाई महीने में मेहरवां खां को ब्रिटिश सरकार के एजेंसी बंगले के नजदीक फांसी पर चढ़ा दिया गया था।

वे डाफू थे या क्रान्तिकारी डूंगजी और जवाहरजी सन् 1824 ई० तक राजस्थान में अंग्रेजों द्वारा गरीब किसानों का शोषण जोरशोर से होने लगा था। अंग्रेजी सरकार से मिले हुए जमीदारों, सामन्तों की खूब वन आई थी। गरीब जनता पर अंग्रेजों से सांठ-गांठ किए हुए जमीदारों और व्यवसायियों की गति- विधियों की प्रतिक्रिया राजनैतिक डकैतों में भी होने लगी थी। राजस्थान में कई ऐसे जिले थे, जहां कि ऐसे भी डाकू थे जो देश- भक्त थे । अंग्रेजी सरकार के अत्याचार से वे विक्षुब्ध थे। अंग्रेजी सरकार द्वारा सताए गए, मारे गए लोगों को वे डाकू सब तरह से सहायता पहुंचाते थे । क्योंकि वे जानते थे कि बड़े-बड़े भूमिपति व्यवसायो कभी भी अंग्रेजों के शिकार व्यक्ति की कुछ सहायता नहीं कर सकते है इसीलिए उन डाकुओं का पहला काम यह था कि किसी भी तरह से लूटपाट करके भी गरीबों को आर्थिक सहायता अवश्य दी जाए। इसी उद्देश्य से वे अंग्रेजी सरकार की मिलीभगत करने वालों-जमींदारों और व्यवसायियों के ऊपर डाका डालते थे। उन डाकुआं में डूगजी और जवाहरजी का नाम प्रसिद्ध था । ये दोनों डाकू शेखावत राजपूत थे। इन दोनों ने अपना एक सैनिक संगठन भी बनाया हुआ था। जब समय पड़ता तव में अपनी सेना के साथ सरकारी दफतरों, बैंकों और खजानों को लूटते थे, और लूट में उन्हें जो कुछ मिलता था वे गरीबों में बांट देते थे। अंग्रेजी सरकार की पुलिस और सेना इन दोनों के ऊपर कुदृष्टि रखने लगी थी। ये दोनों डाकू जहा कही । 20 : डूंगजी और जवाहरजी भीभूमिगत होते अंग्रेजी पुलिस उनका पीछा करती। कभी-कभी ऐसा समय आता जब अंग्रेजी सरकार के विरोधी, सामंत जमीदार, किसान या साधारण जनता उन्हें चुपचाप घर में आश्रय देती। ब्रिटिश सरकार की दृष्टि में वे दोनों डाकू थे किन्तु जनता की दृष्टि में वे दोनों एक प्रकार से फरिश्ते थे। एक दिन को वात है । डूगजी और जवाहरजी ने फतेहपुर के एक बड़े व्यवसायी के घर डकैती की। फतेहपुर का यह व्यवसायी अंग्रेजों से मिला हुआ था। फतेहपुर के इस डकैती काण्ड में डूंगजी और जवाहरजी को गिरफ्तार कर लिया गया। उन दोनों को आगरा जेल ले जाया गया। वह काल सन् 1846 ई० का काल था। डूगजी और जवाहर जी के बहुत से साथी सीकर में रहा करते थे। सीकर के साथियों को जब यह पता चला कि डूंगजी और जवाहरजी आगरा की जेल में हैं तव उन सब ने जेल पर आक्रमण करने की योजना बनाई। 28 दिसम्बर सन् 1846 ई० को डूंगजी और जवाहरजी को छुड़ाने के लिए सीकर के साथियों जेल पर आक्रमण कर दिया और उन दोनों को छुड़ा लिया। जेल से मुक्ति के बाद ड्रग जी और जवाहरजी ने लूट की एक दूसरी योजना बनाई। 18 जून सन् 1847 ई० को नसीराबाद छावनी पर उन दोनों ने आक्रमण कर दिया। छः छावनी के रक्षकों को मारकर नसीरावाद के खजाने लूट लिए। वहां का गार्ड हाऊस धू-धूकर जल उठा। डूंगजी और जवाहरजी की करतूतों से अंग्रेजी सरकार अत्यधिक घवराने लगी और राजस्थान के कोने- कोने तक यह घोषणा करवा दी गई कि जहां भी हों जैसे भी हो डूंगजी और जवाहर जी को गिरफ्तार कर लिया जाए । गिरफ्तार करवाने वालों को इनाम दिया जाएगा। डूंगजी और जवाहरजी को गिरफ्तार कराने की सूचना राजस्थान के सभी रियामतों के राजाओं को भी भेज दी गई। डूंगजी और जवाहरजी m डूंगजी और जवाहरजी, को उनको गिरफ्तारी की खबर जैसे ही लेंगी कि वे दोनों अलग- अलग स्थानो पर चले गए। डूगजी मारवाड़ की ओर निकल गए और जवाहरजी वीकानेर की ओर । जवाहरजी को बीकानेर में अंग्रेजी सेना ने धोखे से गिरफ्तार कर लिया और जेल भेज दिया। डूंगजी को अब तक भी पकड़ा नहीं जा सका था। जोधपुर के एक किलेदार ने डूगजी के बारे में अग्रेजी सरकार को खबर दे दी। उस समय डूगजी डिडवाना के निकट भूमिगत होकर रह रहे थे । जैसे ही डिडवाना के निकट अंग्रेजी पुलिस पहुंची तब तक डूंगजी वहां से फरार हो गए। फरारी की अवस्था में डूगजी का अंग्रेजी सेना ने पीछा करना नहीं छोड़ा। अंग्रेजी सेना किसी भी प्रयास से डूंगजी को गिरफ्तार नहीं कर सकी। अव अंग्रेजी सरकार ने डूंगजी को गिरफ्तार करने की दूसरी चाल चली । अंग्रेजी सरकार ने जोधपुर के कई जमीदारों और घुड़सवार सेना के अफसरों को डूंगजो की गिरफ्तारी के कड़े कदम उठाने को सूचित किया। जोधपुर के कुछ राजपूतों और घुड़- सवार सैनिकों के प्रयास से 28 दिसम्बर सन् 1847 ई० को जयपुर के निकट वेटोन गांव में डूगजी को बन्दी बना लिया गया। अधिकांश इतिहासकारों का यह मत है कि डूंगजी जब चारों ओर सैनिकों से घिर गए थे तब उन्होंने आत्म-समर्पण कर दिया था। राजस्थान के उस समय के कई कवियों और गीतकारो ने कई काव्य और गीत लिखे हैं । उन काव्यो में डूंगजी और जवाहर -जी को एक सच्चे देशभक्त के रूप में प्रदर्शित किया गया है । डूगजी को गिरफ्तार करने के बाद अदालत ने उन्हें फांसी की सजा सुनाई। फांसी की सजा को बाद में आजीवन कारावास में बदल दिया गया। डूंगजी को अजमेर ले जाया गया। अजमेर में भी उन पर मुकदमा चलाया गया। वहां के मुकदमे में भी उन्हें आजीवन कारावास की सजा दी गई।

राजस्थान वीर-केसरी केसरीसिंह बरहट राजस्थान के शाहपुरा में महान विप्लवी केसरीसिंह बरहट का जन्म हुआ था। राजपुताना के राजपूतों में इनका नाम आज भी गौरव से लिया जाता है। जैसा उनका नाम था वैसा ही उनका काम था। सिंह की तरह दहाड़ते हुए ब्रिटिश सत्ता को उन्होंने चुनौती दी थी। उनके मन, कर्म और वचन में एक सच्चे राजपूत की शान झलकती थी। मरुधरा उस विप्लवी ने अपने पुत्र प्रताप सिंह, चचेरे भाई जोरावर सिंह और जवांई ईश्वरसिंह को भारतभूमि की आजादी के लिए समर्पित कर दिया था। शाहपुरा में रहते हुए केसरी सिंह बरहट ने अंग्रेजों का जनता पर अनाचार देखा था। अंग्रेजी सत्ता से मिले हुए सामन्त- जमींदार कैसे-कैसे गरीबों से वेगारी लेते हैं, गैर कानूनी ढंग से लगान वसूलते हैं ! गरीबों को जमीन और जगह को केमे कैसे दखल करते हैं ! सामन्तों की इस करतूत को उनसे देखा न गया । किशोरावस्था से उन्होंने संकल्प लिया कि एक दिन भारत को गुलाम बनाने वाली शक्ति से लड़कर भारत को मुक्त कराना पड़ेगा। इसी उद्देश्य से केसरीसिंह बरहट शाहपुरा के नवयुवकों को मातृभूमि को आजादी के लिए चेतावनी देने लगे। सन् 1905 ई. की बात है कि महान विप्लवी वीर सावरकर के नेतृत्व में महाराष्ट्र और गुजगत में अभिनव भारत संस्था स्थापित हो गई थी। उसी काल में केसरी सिंह बरहट ने राजस्थान में अभिनव भारत संस्था को स्थापित किया। कांग्रेस मे गरम दल के महान नेता . रीसिंहवरहट:23 । युवापीढ़ी जाग गई। केसरीसिंह बरहटके साथ राजस्थान के अनेक विप्लवी थे जिनमें भूपसिंह, ठाकुर गोपाल सिंह, माणिक लाल वर्मा प्रमुख थे। इन संगठनों में अनेक पुरुष और स्त्रियां सम्मिलित होती गईं। तत्कालीन समय में एक प्रकार से राजस्थान के विप्लव का नेतृत्व केसरीसिंह वरहट के ऊपर था। केसरी सिंह बरहट के समय में मेवाड़ के सिंहासन पर महाराजा फतेह सिंह विराजे.थे । महाराजा फतेह सिंह की सेना मे केसरी सिंह बरहट थे। वे राज्य के कार्यों को संभालते हुए समय निकालकर विप्लवियों को संगठित करते । महाराष्ट्र, गुजरात, मध्यप्रदेश और उत्तर प्रदेश के विप्लवियों को राजस्थान की ब्रिटिश अधिकारवादी शक्तियों के बारे में सूचित करते। महान विप्लवी रासबिहारी बोस के साथ भी उनका प्रगाढ़ संबध था। विप्लवियों के नेतृत्व-कर्ता के रूप में रासबिहारी बोस प्रसिद्ध हो गए थे। वीर केसरी सिंह वरहट के पुत्र रासबिहारी बोस के सम्पर्क में आए और उनसे विप्लव करने के अनेक कार्यों को सीखा। पिता अपने पुत्रप्रतापसिंह को विप्लवकारी कार्य में सक्रिय देखते तो उनके मन में प्रसन्नता के फूल खिल उठते और प्रताप सिंह को आशीर्वाद देते कि बेटा "राजपूत एक बार जो भी ठान लेता है वह जिन्दगी के अनेक कष्टों को झेलता हुआ भी पूरा करता ही है।" वीर केसरीसिंह बरहट की इस वाणी ने प्रताप सिंह के पर जादू कर दिया। और वे राजस्थान के विप्लव कार्यों में लोकप्रिय होते गए। महाराणा फतेहसिंह स्वतंत्रता के एक सच्चे, पुजारी थे। उन्होंने कभी भी ब्रिटिश राज्य को हस्तक्षेप करने नहीं दिया। ।

24 : केसरीसिंह बरहट उन्होंने नागपुर के यशवंत राव होल्कर, अप्पा जी घोपले के साथ मिलकर भारत में अंग्रेजों से लड़ाई करने की योजना वनाई थी। इस कार्य के लिए उन्होंने अपने सैनिक संगठन को भी मजबूत करा था। राजस्थान वीर केसरीसिंह वरहट ने महाराणा फतेहसिंह की इस योजना को परिणत करने में योगदान किया था। किन्तु ब्रिटिश सत्ता को विशाल सैनिक शक्ति के सामने यह योजना अधूरी ही रही। राजस्थान वीर केसरीसिंह बरहट उर्दू, फारसी, संस्कृत तथा ज्योतिप विद्या के ज्ञाता थे तथा वे डिंगल भाषा के सुप्रसिद्ध कवि भी थे। सन् 1903 ई० में जव जॉर्ज पंचम के स्वागत की तयारी दिल्ली में की जाने लगी थी तव उत्तर भारत की रियासतों के अनेक राजे-महाराजे उनका स्वागत करने दिल्ली पहुंचे थे। महाराणा फतेहसिंह भी दिल्ली जाने के लिए तैयारी कर चुके। जैसे ही वीर केसरी सिंह वरहट को महाराणा के दिल्ली जाने के बारे में पता चला तव उन्होंने टिंगल भाषा में महाराणा को दिल्ली जाने से रोकने के लिए एक कविता लिखी, और उनके पास भेज दी। उस काव्य की ये पंक्तियां थीं- "पग-पग भव्य पहाड़ धरा छोड़ रास्यो घरम।" "हंम महाराणा मेवाड़ मराराणर मेवाइ हृदये वामिरा हिन्दरे" पीर येगरी मिह यरहट को इस ययिता से महाराणा ने दिल्ली जाना घोष्ट दिया। इस नायिता का यद आशय था कि मेयाइ पूर्व निरोगनि महाराणा प्रताप अपने स्वाभिमान की रक्षा के लिए देश धर्म का पालन करने के लिए और गच्चे ठाकुर की जन की गया.लिए जंगल-जगन भटकते हैं। और गय मयंग्य ममर्पण १. मुगलों में गामने भी नही । योर फेमगे गि: पगट पान से घर-घर में होने लगी।

। केसरीसिंह बरहट : 25 महाराणा फतेहसिंह जनता की दृष्टि में एक सच्चे देशभक्त के रूप में जाने जाने लगे। वीर केसरी सिंह बरहट की प्रशासनिक योग्यता के बारे में कोटा के महाराव ने सुन रखा था। कोटा के महाराव ने वीर केसरी सिंह को मेवाड़ के राज्य से अपने पास बुला लिया। उन्होंने कोटा, बूंदी, सिरोही के कार्य कर महाराव की दृष्टि में लोकप्रियता पा.ली। कोटा में एक दिन महन्त प्यारे राम साधु की हत्या हो गई। महन्त की इस हत्या के संबंध में वीर केसरी सिंह वरट को गिरफ्तार कर लिया गया। इस गिरफ्तारी के पीछे अंग्रेजी राज्य का भी पंड्यंत्र था। कोटा की अदालत में वीर केसरी सिंह बरहट को वीस वर्ष की सजा सुनाई गई। वे विहार के हजारी बाग जेल में भेज दिए गए। सन् 1920 ई० के लगभग द्वितीय महायुद्ध की समाप्ति हो गई थी। इस युद्ध में इग्लंड की विजय हुई थी। इंग्लैंड के युद्ध की विजय के उपलक्ष्य में भारत के विप्लवियों को जेल से छोड़ दिया गया। वीर केसरी सिंह वरहट को भी उसी अवसर पर जेल से मुक्त कर दिया गया। जेल से मुक्त होने के बाद महाराजा फतेहसिंह ने जोधपुर में उनके लिए शानदार आवास वनवाया । जेल से छूटने के समय तक प्रताप सिंह भी शहीद हो चुके थे। केसरी सिंह बहरट भी एक दिन मृत्यु को प्राप्त हो गए।

शहीद प्रताप सिंह एक युवक कारागार में 'भारत माता की जय, "अंग्रेजी राज्य मुर्दावाद' के नारे लगाता हुआ गौरवान्वित हो रहा था कि अचानक वहां एक पुलिस अफसर पहुंच गया और उसे अपने बूट की नोक से मारने लगा। तब भी उस युवक ने उफ तक न किया। उसे बर्फ की सिल्ली पर लिटाया गया और पूछा गया कि "तुम अपने क्रान्तिकारी साथी, वहनोई ईश्वर दास तथा चाचा जोरावर सिंह के बारे में बता दो तब तुम्हें अंग्रेजी सरकार द्वारा लाखों रुपये दिलवा देंगे, जो भी चाहोगे वही मिलेगा। जेल से भी मुक्त कर दिए जाओगे। तुम्हारी जब्त की हुई सम्पत्ति भी वापिस कर दी जाएगी । अंग्रेजी पुलिस अफसर की ये बातें सुन- कर वह युवक ठहाका लगाकर जोर-जोर से हंसने लगा । उस युवक को अंग्रेजो पुलिस द्वारा फिर अनेक यातनाएं दी गई। पुनः अंग्रेजी पुलिस अफसर ने उससे पूछा कि तुम अभी भी तैयार हो जाओ तुम्हें सरकार अच्छी नौकरी देगी। अभी भी तुम अपने फ्रान्तिकारी सायी बहनोई और चाचा का नाम-पता बता दो। उरा युवक को लोहे की सलाखों मे भी दागा गया। माये पर विजनीका मॉक लगाया गया। पुलिस को प्रहार से यह अधमरा-गा हो गया फिर भी उस युवक ने अपना साहस नही छोड़ा और चिल्ला उठा "मैं फिरंगियों का बेटा नहीं हूं जो इतने से मष्ट गे फिरंगियों की बातों को मान लूं । मैं तो एक सच्चे पिना और गन्नी मां का बेटा सोपाननाओं को शेलकर आज भी जी रहे है और मेरी सबसे बड़ी मो भारत माता है और में उसका बेटा हू। भारत मां का - । शहीद प्रतापसिंह : 27 बेटा किसी दुश्मन के आगे झुक नहीं सकता और गुलाम बनाने वालों के आगे तो कभी नहीं झक सकता। जेल में अनेक प्रताड़- नाओ का शिकार होकर उस युवक ने अंतिम सांस ली। बरेली जेल आज भी उस युवक की शहादत की पुकार कर रही है। 22 वर्ष का वह युवा शहीद प्रताप सिंह बरहट था। प्रताप सिंह वरहट कुल के भाल पर तिलक थे। उनके पिता केसरी सिंह वरहट महान क्रान्तिकारी थे। वे भी देश के लिए सर्वस्व न्यौछावर कर अत्यंत दयनीय अवस्था में जीकर मृत्यु को प्राप्त हुए थे। श्री केसरी सिंह बरहट की देशभक्ति की प्रेरणा से प्रेरित होकर प्रताप सिंह ने भी भारत को आजाद कराने की कसम खाई। एक दिन अपनी जन्मभूमि शाहपुरा से वे बंगाल चले गए और वहां महान क्रान्तिकारी रासबिहारी बोस के संपर्क में आए। उन दिनों बनारस में शचीन्द्रनाथ सान्याल रहते थे। प्रताप सिंह जब शचीन्द्रनाथ सान्याल के निकट पहुंचे तव शचीन्द्रनाथ सान्याल ने प्रताप सिंह के गौर वर्ण चेहरे, प्रशस्त ललाट और मजबूत वाजुओं की ओर निहारा और वोले कि सचमुच में तुम एक दिन मेवाड़ के महाराणा प्रताप का नाम उज्ज्वल करोगे। शचीन्द्रनाथ सान्याल का आशीर्वाद प्रताप के जीवन पर पड़ा। तब से वे क्रान्ति के महा समर में चलने के लिए मचल उठे। भारत की स्वतंत्रता के लिए समरांगन की अग्नि प्रज्वलित करने के लिए तड़प उठे। देशभक्ति की इस तड़प ने उन्हें विप्लवियों के दल में शरीक कर दिया। प्रतार सिंह वनारस, इलाहबाद, लखनऊ से लेकर मध्यप्रदेश तक ये अनेक नगरों में क्रान्तिकारी कार्यों को मारने के लिए गए। कई वार वनारस से शचीन्द्रनाथ सान्याल के साथ दिल्ली आए और विप्लवियों के संगठन में भाग लिया। एक वार शचीन्द्रनाथ सान्याल के साथ अंग्रेज अफसर कैन्डिल पर बम फेंकने की योजना बनाई। कैन्डिल दुर्भाग्य से 28 : शहीद प्रतापसिंह : वच गया। उस समय वह बीमारी की अवस्था में निवास स्थान पर सुरक्षित था। प्रताप सिंह की यह योजना अधूरी रह गई। दिल्ली के चांदनी चौक में लार्ड हार्डिंग के जुलूस पर वम फेंकने वाले विप्लवियों में प्रताप सिंह भी थे। उनके चाचा जोरावर सिंह व बहनोई ईश्वर दास ने भी लार्ड हाडिंग पर बम फेंकने का प्रयास किया। चांदनी चौक बम कांड में प्रताप सिंह और उनके बहनोई को गिरफ्तार कर लिया गया । किन्तु कोई प्रमाण न मिलने पर उन दोनों को अंग्रेजी सरकार ने रिहाई दे दी। लार्ड हाडिंग वम काण्ड के बाद प्रताप सिंह राजस्थान 'वीर सेवा दल' मे सक्रिय हो गए। शचीन्द्रनाथ सान्याल ने प्रताप सिंह को राजस्थान में विप्लवियों के संगठन की यह जिम्मेवारी सौंपी थी। राजस्थान में रहकर स्थान-स्थान पर विप्लवियों के क्षेत्रीय संगठन बनाए । गुप्त रूप से विप्लवियों को स्थान-स्थान पर विप्लवकारी कार्य करने को तैयार किया। अंग्रेजी सरकार प्रताप सिंह पर नजर रखने लगी। अंग्रेजी पुलिस प्रताप सिंह की आकांक्षाओं को आंकने लगी। कई स्थानों पर पुलिस ने धमकी दी किन्तु वे विप्लवकारी कार्यों में डटे रहे। एक बार बीकानेर से रेल पर जाते हुए अंसनाडा स्टेशन पर पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया। बाद में उन्हें छोड़ दिया गया। प्रताप सिंह बनारस पड्यंत्र में भाग लेने के लिए बनारस पहुंचे। वहां प्रसिद्ध क्रान्तिकारी विष्णु गणेश पिंगले के साथ बनारस की फौजी छावनियों में फौजियों को भड़काने की योजना बनाई। उन दोनों विप्लवियों ने बनारस में अंग्रेजी सेना के रेजिमेंट के भारतीय सिपाहियों को विद्रोह करने को उकसाया और विद्रोह की तारीख निश्चित की। 23 मार्च सन् 1915 ई० को ।

शहीद प्रतापसिंह : 29 बनारस में भारतीय सैनिकों को भड़काने का यह कार्य अधूरा रह गया क्योंकि एक भारतीय सैनिक ने अंग्रेजों को उत्तर भारत के विप्लव की तारीख की सूचना दे दी थी बनारस पड्यत्र में प्रताप सिंह बन्दी बना लिए गए। बन्दी बनाकर उन्हें बरेली जेल ले जाया गया। प्रताप सिंह के पिता श्री केसरी सिंह बरहट उस समय गिरफ्तार कर लिए गए थे जब कोटा में विप्लवियों के विप्लव की आग सुलगी थी। उन दिनों प्रताप सिंह जी माता-पिता से अलग होकर विप्लवकारी कार्यों में जी जान से लग गए थे। कोटा के पड्यंत्र में केसरी सिंह बरहट को काले पानी की सजा दी गई थी। इन्ही सालों में केसरी सिंह वरहट की सारी सपत्ति अंग्रेजी सरकार ने जब्त कर ली। जमीन जगह पर भी अंग्रेजी सरकार ने दखल कर लिया। प्रताप सिंह की मां को निर्धनता की अवस्था से गुजरना पड़ा। बरसों तक उन्हें चैन नहीं मिला। एक तरफ पति जेल में और दूसरी तरफ बेटा प्रताप जेल में । परिस्थितियों को मारी वह बेचारी मां न जाने कहां-कहां ठोकर खाई होगी। भूख प्यास की मारी-मारी प्रताप सिंह की मां फिर भी नहीं घबराई उसे अपने विप्लवी पति और बेटे पर नाज था। उसने अपने मायके में जाकर जिन्दगी गुजारी। एक दिन केसरी सिंह बरहट काला पानी से मुक्त होकर अपने गांव आए तब गांव के किसी एक आदमी ने उन्हें बताया 'कि डेढ वर्ष पहले ही प्रताप सिंह बरेली जेल में शहादत प्राप्त कर चुके हैं। उस व्यक्ति की बातों को सुनकर केसरी सिंह बरहट बिलकुल ही नहीं सहमें और न उनकी आंखों में आंसू आए । उस समय भी उनमें एक सच्चे राजपूत एक सच्चे देशभक्त और एक सच्चे विप्लवी या व्यक्तित्व झलक उठा। उनकी पत्नी जय मायके से आई और केसरी सिंह वरट से उसने प्रताप के बारे 30: शहीद प्रतापसिंह में पूछा तब उस समय अपनी मूंछ ऐंठते हुऐ वे शान से बोल उठे कि मेरा बेटा प्रताप भारत की आजादी के लिए बरेली जेल में डेढ़ वर्ष पहले बलिदान हो गया। राजस्थान के इस वरहट परिवार के दो विप्लवियों को स्मृति जव-जव इतिहास के पन्नों पर अंकित होती रहेगी तब-तब वे भारत के अमर विप्लवियों में याद किए जाएंगे।

किसान-क्रान्ति के सूत्रधार विजयसिंह पथिक सन् 1910 ई० के बाद मेवाड़ की क्रान्ति में एक नया मोड आया। मरुधरा के जिन्दादिल इन्सान भूप सिंह जी मेवाड़ के राजनीतिक गगन का सितारा बनकर चमके । उनका दूसरा नाम विजय सिंह पथिक भी था। क्रान्ति की लहरों पर सवार होकर मचलने वाले थपेड़ों ने इस युवा विप्लवी का नाम बदल दिया। सन् 1916 ई० से ये विजय सिंह पथिक नाम से जाने जाने लगे। सन् 1916 ई० के बिजोलिया किसान आन्दोलन को बढ़ाने का श्रेय विजय सिंह पथिक को था। सन् 1916 ई० में विजय सिंह पथिक का विप्लव केन्द्र राजस्थान तक ही सीमित नहीं था। बंगाल के विप्लवियों के पास भी वे आते जाते रहते थे। महान क्रान्तिकारी रासबिहारी बोस के क्रान्ति दल का समर्थन उन्हें प्राप्त था। ब्रिटिश सरकार द्वारा खाखा ठिकाने के विटिश अधिकारियों एवं ब्रिटिश सत्ता से मिले हुए जमीदारों, सामन्तों के विरुद्ध आन्दोलन करते हुए खाखा नामक स्थान के क्रान्तिकारी ठाकुर रावगोपाल सिंह के साथ दादगढ़ में वे नजरवन्द कर दिए गए । टाटगढ़ की नजरबन्दी के पोटे फिरोजपुर पडयंत्र का मामला था। उस समय तक वे भूप सिंह नामक नाम से जाने जाते थे। भूपसिंह के विद्ध अंग्रेजी मरकार ने वारंट जारी किया और उन्हें नजर बन्द कर दिया था। भूप सिंह ने नजरबन्दी के दौरान अपनी दाढ़ी बढ़ा ली थी ताकि अंग्रेजी सरकार उन्हें पहचान न सके। एक दिन अवसर

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विजयसिंह पथिक : 33 । शाही से ग्रामीण किसान तंग आकर कुछ सोचने को विवश हो गए थे। पथिक जी के साथ वर्मा जी ने मिलकर किसानों को राहत के लिए आन्दोलन का और भी गंभीर रास्ता चुना। विजोलिया के किसान आन्दोलन का पता अंग्रेजी सरकार के बड़े बड़े अधिकारियों को लग चुका था। अंग्रेजी सरकार के जासूस साधु सीताराम दास, माणिक लाल वर्मा और विजय सिंह पथिक के पीछे लग गए थे। मेवाड़ सरकार ने पथिक जी के विरुद्ध वारंट निकाला। वारंट निकालने का पता लगते ही पथिक जी विजोलिया से पलायन कर उमा जी के खेड़े में पहुंच गए। वहीं पर भूमिगत रहकर एक मकान में कई दिनों तक छिपकर रहे । भूमिगत रहते-रहते पथिक जी ने किसान आन्दोलन की प्रगति के लिए किसान पंचायत नामक एक संस्था का संगठन किया। सन् 1915 ई० में किसान पंचायत नामक संस्था का निर्माण किया गया। पावन ऋतु के अमावस तिथि के शुभ मुहूर्त में यह संस्था स्थापित की गई। उसी दिवस पर पथिक जी ने किसान कार्यकर्ताओं के बीच गीत गाते हुए संदेश दिया- "हरियाली अमावस, सुखद सुभमोहरत मान लो ! • स्वतंत्रता के अर्थ सव धर्म युद्ध की ठानलो।" विजयसिंह पथिक की दृष्टि में किसान आन्दोलन धर्म युद्ध था। जो अन्यायियों और अर्मियों की धर्मनीति के विरुद्ध संघर्ष का हवन करने के लिए आरंभ किया गया था। पथिक जी इस धर्म युद्ध में अपने प्राण विर्सजन करने को उद्धत हो उठे। उस काल में विश्व के रंग-मंच पर प्रथम विश्व युद्ध की अग्नि शिखा जल रही थी। प्रथम विश्वयुद्ध की आर्थिक कठिनाईयों को दूर करने के लिए अंग्रेजी सरकार के सैनिक देश के अनेक प्रान्तों में चन्दे एकत्रित करने का काम करने लगे। राजस्थान के गांव-गांव में चन्दे की वसूली की जाने लगी।

- । 34 : विजयसिंह पथिक ग्रामीण किसानों से जबदस्ती चन्दा वसूल किया जाने लगा। बिजोलिया के किसान पहले से ही तलवार बन्दी टैक्स 'लाटा कूता' से खिन्न थे और उस पर अंग्रेज अधिकारियों और अंग्रेजी सरकार के पिठ्ठओं ने वहां के किसानों से चन्दे की मांग की। विजोलिया के ग्रामीण किसानों से चन्दा वसूली का विरोध का कदम पथिक जी ने सबसे पहले उठाया। पथिक जी ने विजोलिया के किसानों को समझाया कि अंग्रेजी सरकार को किसी भी कीमत पर आप लोग चन्दा न दें। चाहे कैसी भी स्थिति आ जाए उन सबका मुकाबला करें। पथिक जी की बातों से ग्रामीण किसान प्रभावित हुए और चन्दा देने में असहयोग किया। ठीक उसी समय क्रान्तिकारियों को परेशान करने के लिए अंग्रेजी सरकार ने एक बहाना ढूढा। ठिकाने वालो के दवाव से गांव के एक किसान नारायण पटेल को वेगार देने को मजबूर किया। नारायण पटेल ने वेगार देने से इनकार कर दिया। सरकार ने नारायण पटेल को बन्दी बना लिया। बिजोलिया गांव में पथिक जी के नेतृत्व में किसानों को एक सभा बुलाकर सत्याग्रह आरंभ करने का विचार किया गया। बिजोलिया गांव में 2000 किसान आ पहुंचे। 2000 किसानों ने सत्याग्रह कर के ठिकाने के अधिकारियों चौंका दिया। नारायण पटेल को जेल से मुक्त कर दिया गया। आन्दोलन के प्रमुख कार्यकर्ता साधु सीताराम दास और प्रेमचन्द नामक भील वन्दी बना लिए गए। उन दोनों के ऊपर राजद्रोह का मुकदमा चलाया गया। विजोलिया के किसानों के अत्याचार के विरुद्ध पथिक जी ने लोकमान्य तिलक को पत्र भेजा। पथिक जी के प्रयास से विजो- लिया गांव में पंचायती अदालतें, महिला सभा और ग्राम रक्षक दल का निर्माण किया गया। बच्चों के पढ़ने के लिए पाठशालाएं खोली गई। किसान सत्याग्रह के प्रचार हेतू अभिक जी उस समय में कानपुर के प्रताप समाचार पत्र के सम्मानीय सम्पादक गणेश शंकर विद्यार्थी जी से मिले। विद्यार्थी को अपने समाचार पत्र में विजोलिया आन्दोलन की घटित घटनाओं को खुलकर प्रकाशित किया। सन् 1918 ई० में दिल्ली के कांग्रेस अधिवेशन में भी पथिक जी और वर्मा जी की भेंट पंडित गणेश शंकर विद्यार्थी जी से हुई । दिल्ली के अधिवेशन में विजय सिंह पथिक और माणिक लाल वर्मा जी ने संकल्प किया और सिंह गर्जन करते हुए कहा कि "किसी भी हालत में अंग्रेजी सरकार को अब देगार नहीं दिया जाएगा। ठिकाने के जुल्मियों के सम्मुख हम लोग कभी घुटने नहीं टेकेंगे।" अधिवेशन की समाप्ति के बाद जैसे ही पथिक जी विजोलिया गांव पहुंचे ठीक उसी समय माणिक लाल वर्मा और किसान आन्दोलन के अनेक प्रतिनिधियों को पकड़कर कारागार भेज दिया गया। अब ठिकाने के लोगों को और भी मौका मिल गया। ठिकाने के लोगों ने किसानों द्वारा उपजाई गई फसल में आग लगा दी। किसानों को मारा-पीटा गया। बेगार न देने पर किसानों के स्वाभिमान पर आंच पहुंचाई गई। ठिकानों के लोगों द्वारा पोते हुए भयानक अत्याचार पथिक जी को बदार्शत न हो सके। उन्होंने भारत सरकार को मेवाड़ सरकार के ठिकानों के अत्याचारियों के अन्याय और जुल्म के संबंध में पत्र भेजा। मेवाड़ सरकार की ओर से सन् 1919 ई० में एक जांच आयोग बनाया गया। आयोग में किसान आन्दोलन के नेताओं को मुक्त करने का निर्णय लिया गया और सभी नेता मुक्त कर दिए गए। किसानों की मांगों को स्वीकृति प्रदान कर दी गई। इसके साथ ही अनावश्यक लागत समाप्त कर दी गई। बेगारी प्रथा को बन्द कर दिया गया। फिर भी ठिकाने के लोग बेगार 36 : विजयसिंह पथिक लेने के ऊपर जिद करते रहे । पथिक जी के साथ किसानों ने गुहार लगाया कि हम सब किसी भी परिस्थिति में पुनः लगान नहीं देंगे चाहे शरीर के टुकड़े-टुकड़े ले जाएं। किसान आन्दोलन की समस्याओं को लेकर पथिक जी सन् 1921 ई० मे नागपुर में होने वाले अधिवेशन में भाग लेने गए। नागपुर में राजस्थान के किसान आन्दोलन से संबंधित कार्यक्रमों को गांधी जी के सामने उन्होने प्रस्तुत किया। खासकर ठिकानों की नीति के विरुद्ध गांधी जी को उन्होंने राजस्थान के लोगो द्वारा सत्याग्रह करने का पथावलोकन कराया। पथिक जी की बातों पर ध्यान देते हुए महात्मा गांधी जी ने भी किसान अन्दोलन की समस्या का समाधान करने के संबंध में अंग्रेजी सरकार को पत्र भेजे किन्तु अंग्रेजी सरकार ने भी कोई कार्रवाही नहीं की। नागपुर से लौटने तक पथिक जी ने अजमेर को 'किसान क्रान्ति' का केन्द्र बनाया । अजमेर में उन्होंने किसान क्रान्ति की कई शाखाएं खोली और किसान आन्दोलन में भाग लेने वाले पुरुषों और महिलाओं को अपनी संस्था का सदस्य बनाया । वहां की किसान क्रान्ति में उन्होने किसानों के लगान बढ़ाने के विरुद्ध आवाज उठाई और रोकने का प्रयत्न किया। वेगारी बन्द करने का भी प्रयास किया गया। परिणाम स्वरूप ठिकाने की आमदनी दिनों-दिन कम होती गई। पुलिस के सहयोग से ठिकाने का सारा कार्य-व्यापार चलता था और ठिकाना ही पुलिस का खर्चा वहन करती थी। ठिकाने की आमदनी वन्द होने पर ठिकाने के लोग पथिक जी के पीछे हाथ धोकर पड़ गए। ठिकाने के लोगों की भावनाओं को पथिक जो समझ गए और उन्होने किसानों के सम्मुख उद्घोषणा करते हुए कहा कि ठिकाने जो भी आदेश दें किमी भी हालत में वे न माने । न लगान दें और न वेगार । सब मिलजुलकर ठिकाने की अदालतों का बहिष्कार करें। और तो ।

विजयसिंह पथिक : 37 और कोई भी किसान शराव न पिएं और न थाद्धादि में किसी के मृत्योपरान्त भोज का बन्दोवस्त ही करें। पथिक जी की इस विचारधारा से किसानों का मानसिक परिवर्तन हुआ। पथिक जी के विचारों को किसान समुदाय अमल में लाने लगे। सन् 1921 ई० में वरसात ने अपना एक अनोखा रंग दिखाया। उस वर्ष खूब पानी बरसा घेतों में फसल अच्छी हुई। ठिकाने के लोगों ने फसल वृद्धि को नजरअन्दाज करते हुए किसानों को चेतावनी दी। चेतावनी देते हुए एक नोटिस जारी किया कि सभी किसान 8 अक्टूबर सन् 1921 ई० के एक सप्ताह तक ठिकाने में जाकर कूता करा लें अगर वे संव कूता नहीं कराएंगे, फसल नष्ट कर दी जाएगी। दो वर्ष तक किसानों ने ठिकाने की नोटिस पर विलकुल ही ध्यान नहीं दिया। ठिकाने द्वारा वात न मानने पर किसानों को अनेक यातनाएं दी गई। ठिकाने के लोग समय पाकर किसानों की काटी हुई फसल को कभी नष्ट कर देते । खेतों में आग लगाने पर भी वाज नहीं आते । जहां कहीं किसान आन्दोलन के आन्दोलनकारी एकांत में मिल जाते उन्हें मारते पीटते। उस समय तक अजमेर के क्षेत्रों में कार्य करते हुए पथिक जी बिजोलिया के किसानों का नेतृत्व पुनः देने लगे थे। ठिकाने की हरकतों से पथिक जो क्षुब्ध हो उठे। यहां तक कि पथिक जी ने मारवाड़े को सरकार से इस संबंध में पत्राचार किया । मारवाड़ की सरकार ने पथिक जी के द्वारा प्रस्तुत किसान आदोन्लन की समस्याओं के समाधान कराने के आश्वासन दिए। 23 जुलाई सन् 1923 ई० को गोविन्दपुरा में एक किसान सभा बुलाई गई थी। इस सभा में दूर-दूर से हजारों किसान आ-आकर उपस्थित हो रहे थे। किसानों के नेता सभा मंच पर उत्तेजक भाषण देने लगे कि वहां अंग्रेजी सेना पहुंच गई। किसानों के 38 :विजयसिंह पथिक ऊपर दनादन गोलियां चलाई जाने लगीं। रूपा जी और कृपा जी नामक दो व्यक्ति घटनास्थल पर ही शहीद हो गए। 10 सितंवर सन् 1923 ई० को पथिक जी बन्दी बना लिए गए। उनके पैरों में लोहे की जंजीरेंडाल दी गई थी। और उन्हें बेंगू ले जाया गया। अदालत ने उन्हें पांच वर्ष की सजा सुनाई। 27 अप्रैल सन् 1937 ई० को पथिक जी बन्दी जीवन से मुक्त कर दिए गए। बन्दी जीवन से मुक्त होने के बाद भी पथिक जी किसानों के हित के लिए ही कार्य करते रहे। अंग्रेजी सत्ता से व्याप्त किसानों के ऊपर अत्याचार का विरोध करते रहे। सन् 1930 ई० के सविनय अवज्ञा आन्दोलन में महात्मा गांधी का आशीर्वाद लेकर क्रिया- शील होते रहे। महात्मा गांधी के रचनात्मक कार्यक्रमों में भाग लेकर उन्होंने सच्चे गांधीवादी होने का भी प्रमाण दिया। राजस्थान के किसान आन्दोलन की विजय के सूत्रधार विजय सिंह पथिक के त्याग और समपर्ण से अंग्रेजों की गुलामी के समय कृषकों के बीच प्रगतिवादी चेतना की लहर लहराई जिसने कि जागीरदारों के अहंकार को चूर्ण किया। सामन्तों की सामन्तशाही की समाप्ति हुई जमींदारों की ताना शाही को जड़- मूल से निकाल फेंका। आजादी के बाद राजस्थान में सामन्तशाही जमींदारीशाही ने कभी भी अपना रोव नहीं जमाया। कृपकों के जीवन में नई क्रान्ति का सूत्रपात करने, उनके जीवन की रक्षा करने का श्रेय देने वालों के नामों का उल्लेख इतिहास के पृष्ठों में जब भी लिखा जाएगा तब-तब विजय सिंह पथिक का नाम गौरव से लिया जाएगा।

। क्रान्तिकारी रॉव गोपालसिंह ठाकुर राजस्थान के खखा नामक स्थान में क्रान्तिकारी रॉव गोपाल सिंह ठाकुर का जन्म हुआ था। खखा के राजपूत अपनी आन और मान की रक्षा करने में अपना गौरव समझते थे। ठाकुर गोपाल सिंह जिस राजपूत परिवार में जन्मे थे उस परिवार के बड़े उच्च आदर्श थे। अच्छे खासे परिवार को सभी सुख- सुविधाओं को त्यागकर रॉव गोपाल सिंह ठाकुर किशोरावस्था आते-आते विप्लव के हवन कुण्ड में कूद पड़ने को संकल्पित हुये। सन् 1920 ई० के बाद राजस्थान के बिजोलिया क्षेत्र में भूप सिंह और ठाकुर गोपाल सिंह रॉव ने अंग्रेजी सरकार से सशस्त्र संघर्ष करने की व्यापक तैयारी की योजना बनाई। उन दोनों युवकों ने अस्त्र-शस्त्र जमा करने प्रारंभ कर दिए । वीस हजार से अधिक वन्दुकें उपलब्ध कर ली गईं। उन दोनों की योजना थी कि अस्त्र- शस्त्रों से लैस होकर फौजी छावनियों की विद्रोही सैनाओं को साथ लेकर विद्रोह की आग भड़का दी जाए और ब्रिटिश सरकार को नेस्तनाबूद कर दिया जाए। फौजी छावनियों में विद्रोह की योजना की तैयारी बंगाल से शुरू हुई थी। महान क्रान्तिकारी रास बिहारी बोस की अध्यक्षता में भारत के सभी प्रान्तों में गुप्त रूप से सैनिकों को भड़काने का काम किया गया था। विद्रोह के पूर्व ही एक गद्दार द्वारा ब्रिटिश सरकार को इसका पता लग गया। विप्लवियों की इस योजना पर पानी फिर गया। 19 फरवरी सन् 1915 ई० को बंगाल, बिहार, उत्तर प्रदेश, .. 40:क्रान्तिकारी रॉव गोपाल सिंह पंजाब और राजस्थान में विप्लवियों के अड्डों पर छापा मारकर पुलिस विप्लवियों को गिरफ्तार करने लगो। भूप सिंह और गोपाल सिंह ने खखा के किले में अस्त्र-शस्त्र छिपाकर रखे थे। खखा के किले पर अचानक पुलिस ने छापा मारा । उस समय गोपाल सिंह खखा के किले में भूमिगत होकर विद्रोह का खाका बना रहे थे। अचानक खखा के किले पर पुलिस ने छापा मारा। खखा के किले में पुलिस के प्रवेश होते ही रॉव गोपाल सिंह ठाकुर अपने साथियों के साथ रात के अन्धेरे में पुलिस की नजरों से बचते-बचाते भाग गए। खखा के किले से कुछ दूर हटकर रॉव गोपाल सिंह ने अपने साथियों के साथ पड़ाव डाला। अंग्रेजी पुलिस के जासूस ने किले के पास के जंगल में निवास करते हुए विप्लवियों का पता अंग्रेज कमिशनर को दे दिया। अजमेर कमिशनर ने 5.000 सैनिकों के साथ ठाकुर गोपाल सिंह के स्थान को घेर लिया । ठाकुर गोपाल सिंह अपने साथियों के साथ चारों तरफ से पुलिस से घिर गए थे । अंग्रेजों के सामने समर्पण करने के सिवा कोई चारा न था। गोपाल सिंह और उनके साथियों ने अग्रेजों के सामने आत्म समर्पण कर दिया। राँव गोपाल सिंह ठाकुर को टाटगढ में नजरबन्द कर दिया गया सन् 1920 ई. के पूर्व रॉव गोपाल सिंह को नजरबन्दी से मुक्ति मिली। 'सन् 1920 ई. में राजपुताना में मध्य भारत सभा का अधि- वेशन हुआ। इस अधिवेशन में भाग लेने के लिए श्री अर्जुन लाल सेठी, केसरी सिंह बरहट, गोपाल सिंह खखा, ठाकुर विजय सिंह पथिक जैसे इत्यादि नेता आए। सन् 1920 ई० के इस अधिवेशन से राजस्थान की जनता में जागृति हुई। सन् 1920 ई. के खिलाफत आन्दोलन में ठाकुर गोपाल सिंह सक्रिय रहे । 'सन् 1930 ई० के सविनय अवज्ञा आन्दोलन में ठाकुर गोपाल सिंह ने खुलकर भाग लिया। सविनय अवज्ञा आन्दोलन में सत्याग्रहियों के जत्थे का ।

क्रान्तिकारी रॉव गोपाल सिंह : 41 नेतृत्व रॉव गोपाल सिंह ने किया । अजमेर सत्याग्रह का प्रमुख केन्द्र था। इस सत्याग्रह में राव गोपाल सिंह वन्दी बना लिए गए। कुछ दिनों तक जेल में रहने के बाद वे मुक्त कर दिए गए। सन् 1932 ई० में अजमेर और मेरवाडा क्रान्तिकारी आन्दोलन को रावगोपाल सिंह ने पुनः जागृत करने का बीड़ा उठाया था।

धीर पुरुष माणिक्य लाल वर्मा राजस्थान के वीर पुरुपों में श्री माणिक्य लाल वर्मा की कोति क्रान्ति के इतिहास का उज्ज्वल पृष्ठ है । भारत की पराधीनता के समय से लेकर भारत की आजादी के दिनों तक श्री माणिक्य लाल वर्मा के जीवन के साथ राजस्थान की क्रान्ति का अध्याय जुड़ा हुआ है। श्री माणिक्य लाल वर्मा जी को राजस्थान की धरती कभी भूल नहीं सकती। सन् 1903 ई० में राजस्थान के जागीरदारों ने गरीब किसानों के जीवन में बेल वोया। वह विपबेल था। चंवरी नामक नया कर सबसे पहले बिजोलिया की जनता पर यह विषबेल रूपी कर लगाया गया। इस कर पर ठिकाने की बपौती थी। बिजोलिया के रॉव कृष्ण ने इस कर को लागू करके किसानों में दहशत पैदा कर दी। विजोलिया की प्रत्येक जनता इस कर को मानने को बाध्य हो गई। बिजोलिया की जनता को अपनी कन्या के विवाह के समय पांच रुपये का कर ठिकाने को उपलब्ध कराना था। थोड़े दिनों तक जनता इस कर को देते-देते हताश हो गई। किसानों ने मापस में मिलकर तय किया कि अब हम सब लड़की की शादी ही नहीं करेंगे । दो वर्ष तक किसी भी किसान ने अपनी लड़की नहीं व्याही। किसानों ने ऊपर माल जमीन पढ़त रख दिया। कृष्ण रॉव के समय में यह कर समाप्त नहीं हो पाया। किसानों के बढ़ते हुए विरोध को देखकर रॉव ने चंवरी कर समाप्त कर । उसके स्थान पर किसानों के द्वारा भूमि कर देने की वीर पुरुष माणिक्य लाल वर्मा: 43 घोषणा कर दी गई। फसल उत्पादन का 1/5 वां हिस्सा किसानों को मिलने लगा। करने लगे। सन् 1906 ई० में रॉव कृष्ण की मृत्यु होते हुए जागीर के मालिक पृथ्वी सिंह बने । पृथ्वी सिंह ने नया भूमि कर लागू कर दिया । यह कर तलवार बंधाई नामक कर था। तलवार बंधाई नामक कर किसानों के श्रम और मेहनत पर कांटा बनकर चुभने लगा। किसानों से इस नए कर को वसूलने के लिए ठिकाने के लोग जोर जबरदस्ती करने लगे। कूते में ठिकाने के लोगों का एकाधिकार सामने आया। कूते में बल पूर्वक किसानों के खेत के प्रति जमीन चरागाह भूमि का ब्योरा का कूता किया जाने लगा। ठिकाने के इस कठोर कदम को किसान कहां तक सहन कर पाते। भूमि कर का विषबेल कहीं बढ़ न जाए इसके लिए किसान चेष्टा उस समय तक बिजोलिया की धरती पर अनेक सपूत पैदा हो चुके थे। उन सपूतों ने विजोलिया के किसानों के साथ मिलकर ठिकाने की शोपणवादी नीतियों और कठोर कदमों का विरोध प्रकट किया। सन् 1913 ई० में किसानों ने सारे ऊपर माल के क्षेत्र को पढ़त रखा। मेवाड़ के जागीरदार और मेवाड़ की सरकार किसानों की जागृति की लहर से थर्रा उठी। चारण तथा देव नाम के दो किसानों को राज्य से निष्कासित कर दिया। एक और कान्तिकारी साधु सीताराम दास को पुस्तकालय की नौकरी से निकाल दिया। विजोलिया के किसान आन्दोलन के कार्यकर्ताओं को बन्दी बना लिया गया। इस आन्दोलन को ठिकाने के लोग कुचलने में कुछ काल के लिए सफल हो गए। विजोलिया के सामन्तों और जागीरदारों की अंग्रेजी सरकार से मिली भगत ने किसानों के हृदय में जजबात पैदा कर दिया। उस काल तक रॉव पृथ्वी सिंह की मृत्यु हो चुकी थी।

F 44 : वीर पुरुष माणिक्य लाल वर्मा बिजोलिया के किसान आन्दोलन को आंधी में श्री माणिक्य लाल वर्मा कूद पड़े। देव वर्मा जी ने पथिक जी के सम्पर्क में आकर किसान आन्दोलन में अपने पैर जमाए थे। सन् 1922 ई० में ठिकानों के लोगों द्वारा किसानों को शोषण की चक्की में पीसा जाने लगा। जो भी किसान ठिकाने का विरोध करते, कूता करने की मनाई करते, उन किसानों की जमीन पर जबरदस्ती कब्जा कर लिया जाता। खेत में उपजे हुए अनाज में आग लगा दी जाती, किसानों को तरह-तरह से अपमानित किया जाता, किसानों के ऊपर इतनी यातनाएं हुई, तव पर भी इन किसानों ने वेगार देना किसी भी हालत में स्वीकार नहीं किया। सन् 1927 ई० जाने के बाद विज़ोलिया के किसानों ने माणिक्य लाल वर्मा को किसान आन्दोलन का नेतृत्व सौंपा। वर्मा जी पहले ही ठिकाने की नौकरी से इस्तीफा दे चुके थे। किसान आन्दोलन के प्रमुख कार्यकर्ता के रूप में वर्मा जी ने अनेक कार्यों को करने की जिम्मेदारी ली थी। सबसे पहले किसान पंचायत नामक संगठन का निर्माण किया गया। इस संगठन में भी वर्मा जी के ऊपर ठिकानों के लोगों से मिले हुए सामन्तों और किसानों पर दबाव पड़ने लगा था जिससे इस संगठन से भी उन्होंने त्याग पन दे दिया। श्री माणिक्य लाल वर्मा तत्कालीन समय के जाने माने नेता, सेठ जमना लाल बजाज_तथा हरिबाबू उपाध्याय के पास गए और उन्होंने विज़ोलिया के किसानों का नेतृत्व करने की उन दोनों से प्रार्थना की। सेठ जमना लाल वाज किसान पंचायत आन्दोलन के सर्वेसर्वा चुने गए। सेठ जी ने हरिवायू उपाध्याय पर किसान पंचायत के नेतृत्व का उत्तरदायित्व सौंपा। किसान पंचायत आन्दोलन में सेठ जी और उपाध्याय जी ॥ . 1 वीर पुरव माणिपाल वर्मा : हो गया। यह सत्याग्रह किसानों वामि दिला संबंध में किया गया था। सत्याग्रह में सकी कि जो किसान अपनी जमीन से किसी कारण वर्श कसा वापदी के कारण या किसी पंडयंत्र में फंसकर अपनी जमीन खो बैठे हैं, वे सब अपने-अपने खतों में चले जाएं और हल जोतना आरंभ कर ।। वर्मा जी के नेतृत्व में सभी किसान अपनी-अपनी खोई हुई जमीनों पर गए और हल चलाना आरंभ कर दिया। ठिकाने के कर्मचारी, सेना पुलिस किसानों के स्वामियों पर लाठी, डण्डा, भाला, फरसा, रिवालवर, बन्दूक लेकर टूट पड़े। किसानों द्वारा हल जोतने के क्रम में अनेक किसान घायल कर दिए गए। वर्माजी को उसी दिन गिरफ्तार कर लिया गया। दो-सौ किसानों की गिरफ्तारी हुई। दो सौ में चालीस को बन्दीगृह में रखा गया वाकी सभी मुक्त कर दिए गए। वर्मा जी को छ: महीने का कारावास का दण्ड मिला। किसानों के व्यापक सत्याग्रह को कुचलने के लिए बिजोलिया में अंग्रेजी सेना को बटालियन और पुलिस के जत्थे चारों ओर से घिर गए। हरिबाबू उपाध्याय पर मेवाड़ प्रवेश के लिए पाबंदी लगा दी गई। बिजोलिया में नेताओं का आना नियमित रूप से आरंभ हो गया । सत्याग्रह दिनोंदिन बढ़ता ही गया किसान और नेता सत्याग्रह करते रहे और उन सबकी गिरफ्तारी का सिलसिला चलता ही रहा । मेवाड़ से निर्वासित रहकर हरिबाबू उपाध्याय जी ने मेवाड़ सरकार को किसानों की जमीन लौटाने के संबंध में पत्र भेजा। हरिवाबू.जी के पत्र की सुनवाई मेवाड़ सरकार ने कर ली। किसान आन्दोलन की समस्याओं का समाधान करने और किसानों को अपनी भूमि का अधिकार दिलाने का भार मेवाड सरकार में लोक राज्य सरकार को दे दिया। अखिल भारतीय देशी लोक राज्य परिषद ने एक जांच 16 : वीर पुस्प माणिक्य लाल वर्मा मिति गठित की। हरिवावू उपाध्याय जी ने महात्मा गांधी को बिजोलिया में ठिकाने के लोगों द्वारा हो रहे दानवीय त्याचार की जानकारी दी। महात्मा गांधी के निर्देश पर पं० दिन मोहन मालवीय जी ने तत्कालीन समय के मेवाड़ के प्रधान- मंत्री सर सुखदेव प्रसाद को पत्र भेजकर आगे के कार्य क्रमों पर नमल करने को कहा । सेठ जमना लाल बजाज उदयपुर गए। उस समय तक लोक परिषद की समिति ने बिजोलिया से संबंधित समस्याओं की जांच करने की दिलचस्पी न ली। एक प्रकार से जांच का काम स्थगित कर दिया गया। 20 जुलाई सन् 1931 ई० को उदयपुर के महाराणा तथा सुखदेव प्रसाद के बीच एक भेंट वार्ता हुई और समझौते की रूप रेखा तैयार की गई। समझौते के फलस्वरूप आपोदारों को जमीन लौटाने की सूचना दी गई। किन्तु जमीन लौटाने के संबंध में कोई कदम नहीं उठाए गए । केवल सत्याग्रही वन्दी से मुक्त कर दिए गए। जमीनों को न लौटाने की स्थिति में श्री माणिक्यलाल वर्मा कसानों के एक प्रतिनिधि मण्डल के साथ सुखदेव प्रसाद से भेंट करने के लिए उदयपुर पहुंचे । सर सुखदेव द्वारा वर्मा जी को उदयपुर में ही बन्दी बना लिया गया। उन्हें कुम्भलगढ़ में ले जाया गया और नजरबन्द कर दिया गया। सन् 1933 ई० में वर्मा जी नजरबन्दी से मुक्त कर दिए गए और तुरन्त उन्हें मेवाड़ से बाहर रहकर निर्वासित होने को विवशकर दिया गया। वर्मा जी के निर्वासित होते ही उनकी धर्मपत्नी श्रीमती नारायणी देवी एवं पुत्र सत्येन्द्र पत पर विपत्ति का पहाड़ टूट पड़ा । अपने पति से अलग उस ममतामयी मां ने अनेक दुःश और वोर पुरुष माणिक्य लाल वर्मा : 47 के अभाव में सत्येन्द्र की मृत्यु हो गई। पुत्र वियोग से पीड़ित नारायणी देवी ने अपने कलेजे पर पत्थर रख लिया। नारायणी देवी के आंसू बह-वहकर विद्रोह की चिंगारियां भडकाने के लिए जागरूक हो उठे। वर्मा जी पर अंग्रेजी राज्य का जुर्म बढ़ता ही गया। उन्हें देवली से घसीटते-घसीटते मेवाड़ की सीमा तक लाया गया। वही उन्हें निरवस्त्र कर एक वृक्ष में बांधकर कोड़ों से पीटा गया। फिर भी वे टस से मस नहीं हुए। आजादी का दिवाना माणिक्य लाल वर्मा अंग्रेजी सरकार की सभी प्रताड़णाओं को सहन करते हुए भारत की आजादी की चीतकार करते रहे। अंग्रेजी पुलिस के अमानवीय अत्याचार से वर्मा जी के शरीर के एक-एक अंग में पीड़ा और दर्द होने लगा। जीवन भर शारीरिक पीड़ा से पीड़ित रहे। वर्मा जी पर हुए अमानुपिक अत्याचार की निंदा महात्मा गांधी ने अपनी हरिजन पत्रिका में दी थी। श्री माणिक्य लाल वर्मा पर देशद्रोह का मुकदमा दायर किया गया। अदालत में दो वर्ष की सजा सुनाकर उन्हें कुम्बल- गढ़ को जेल में बन्द कर दिया। कुम्बलगढ़ जेल में वर्मा जी दिनों- दिन शारीरिक पीड़ से जर्जरित होते गए । वैसी हालत में उन्हें अजमेर जेल भेज दिया गया। सन् 1940 ई० में वे अजमेर जेल से मुक्त कर दिए गए। सन् 1940 ई० के बाद महात्मा गांधी ने धर्मा जी को मेवाड़ प्रजामण्डल को स्थगित करने की सूचना भेजी। सन् 1941 ई. में उदयपुर में प्रजामण्डल का अधिवेशन बुलाया गया। अधिवेशन को अध्यक्षता वर्मा जी ने की। सन् 1942 ई० में वर्मा जी भारत छोड़ो आन्दोलन में कूद पड़े। सन् 1942 ई० में उन्हें पुनः बन्दी बना लिया गया। सन् 1940 ई. के लगभग वर्मा जी जेल से श्री माणिक्य लाल वर्मा के साथ उनकी धर्मपत्नी श्रीमती मुक्त कर दिए गए।

। में 48 : वीर पुरुष माणिक्य लाल वर्मा नारायणी देवी के जीवन का इतिहास जुड़ा हुआ है । श्रीमती नारायणी देवी एक देशभक्त महिला थी। वह मध्य प्रदेश के सिंगोली नामक गांव की थी। वह राजस्थान के भद्र नागरिक वर्मा जी से ब्याही गई थी। श्री माणिक्य लाल वर्मा के साथ नारायणी देवी ने अंग्रेजी सरकार के विरुद्ध चलाए गए सभी आन्दोलनों में भाग लिया। विजोलिया के किसान आन्दोलन से लेकर सन् 1942 ई० की क्रान्ति तक नारायणी देवी अपना सक्रिय योगदान करती रही। वे भी कई बार गिरफ्तार होकर जेल गई। अंग्रेजी सरकार के जुर्म से वार-वार संत्रस्त होती रही। विजो. लिया आन्दोलन में श्रीमती नारायणी देवी को भी कुम्बलगढ़ बन्दी बना लिया गया था। अंग्रेजी सरकार ने वर्मा जी की सारी जायदाद को जब्त कर लिया था। सन् 1944 ई० में श्रीमती नारायणी देवी ने महात्मा जी के आदेशों को राजस्थान में साकार रूप देने का प्रयत्न किया । सर्व- प्रथम देवी जी ने भीलवाडा में महिला आश्रम संस्था की स्थापना कर नारी जागृति का प्रथम कदम उठाया। इस महिला आश्रम में महिलाओं को भारतीय संस्कृति से संस्कारित विद्या, ज्ञान प्रदान किया जाता है। यह संस्था आज भी नारी शिक्षा, और नारी संस्कार को जगाने का काम कर रही है। श्रीमती नारायणी देवी ने राजस्थान को अनेक भीलों में समाज सुधार के कई कार्य किए थे। पिछड़ी जातियों और आदिवासी जातियों को उन्नत करने के लिए उन्होंने आदिम जाति उद्योग केन्द्र, आदिम जाति छायावास, तया आदिवासी वन सहकारी समिति इत्यादि की स्थापना को। भारत की स्वाधीनता के बाद भी सन् 1970 ई० में श्रीमती नारायणी देवी राजस्थान विधान सभा द्वारा मनोनीत होकर राज्य सभा की सदस्या चुनी गई। मरुधरा को बंजर भूमि में श्री वीर पुरुष माणिक्य लाल वा: 49 माणिक्य लाल वर्मा और श्रीमती नारायणी देवी ने भारत की गुलामी के समय अंग्रेजों से टक्कर लेने के लिए विद्रोह और क्रान्ति का जो बीज बोया वही राजस्थान के लोगों में जागृति की हुंकार वनकर छा गया। और उन दोनों के आदर्शों की ज्योति शिक्षा और संस्कृति की दीप.शिखा को जलाने में सक्रिय होती रही। उन दोनों की देश सेवा, त्याग और कीर्ति को कभी भारत के इतिहास के पृष्ठों से अलग नहीं किया जा सकता। दोनों ही महान विभूतियों की अमर ज्योति आज भी मरुधरा की भूमि पर आलोक्ति हो रही है। ।

ठाकुर कुशल सिंह सन् 1924 ई० में ब्रिटिश सत्ता के विरुद्ध आन्दोलन की ज्वाला- मुखी पर राजस्थान आ गया था। अलवर जिले के निमूचना गांव के बाद मलहार लोना गांव आन्दोलन की आग में जल उठा । अलवर जिले के इस आन्दोलन में मलहार लोना के एक आन्दोलनकारी ठाकुर कुशल सिंह थे। ये जमींदार खानदान में पैदा हुए थे। मलहार लोना गांव के वीरों में इनकी गिनती होती थी। सन् 1924 ई० में अंग्रेजी सरकार ने माल गुजारी में पचास प्रतिशत वृद्धि कर गरीबों के ऊपर शोपण करना शुरू कर दिया। मलहार लोना के शेखावत राजपूत जमीदारों और किसानों को अंग्रेजी सरकार की आर्थिक नीति बिलकुल अच्छी नहीं लगी। शेखावत राजपूतों ने अपना एक सगठन बनाया। उस संगठन में मजदूरों, खेतिहारों, किसानों और शोषण से पीड़ित छोटे जमीदारों को शामिल किया गया। आन्दोलन की गतिविधि तेज की जाने लगी। आन्दोलन का पहला कदम यह था कि माल गुजारी में पचास प्रतिशत वृद्धि के विरोध में जोर-शोर से आन्दोलन शुरू कर दिया जाए। शेखावत राजपूत जमींदारों और किसानों ने 50 प्रतिशत माल गुजारी की वृद्धि के विरुद्ध आन्दोलन छेड़ दिया। मलहार लीना के भू-राजस्व अधिकारी, कलक्टर, पटवारी आदि असंतोप प्रकट करने लगे। भूमि के ये ठेकेदार अफसर और कर्मचारी के चित्त में किसानों के हित की ठाकुर कुशल सिंह:51 हो गए। • वात विलकुल नहीं आई। उन लोगों को मलहार लोना गांव के जमींदारों और किसानों द्वारा आन्दोलन की सूचना अंग्रेजी सरकार को दे दी। ब्रिटिश सरकार के अधिकारी मलहार गांव की ओर आने लगे और एक-एक आन्दोलनकारी पर नजर रखने लगे। फिर भी वहां के आन्दोलनकारी आन्दोलन में सक्रिय होते मलहार लोना गांव के शेखावत राजपूत जमींदारों और किसानों के आन्दोलन का दूसरा कदम यह था कि गांव के आस- पास मवेशियों के जितने चारागाह हैं और चारागाह के रूप मैं जितनी परती भूमि है उन सबकी रक्षा करने का प्रयत्न किया जाए। ब्रिटिश अधिकारियों से मिले हुए जमींदार, जमीनों के दलाल के हाथ रोक दिए जाएं। ठाकुर कुशल सिंह ने चरागाह के रूप में प्रयोग की जाने वाली परतीभूमि पर जबरदस्त कब्जा करने का विरोध किया और शेखावत राजपूतों के आन्दोलन में सक्रियता बरतने लगे। शेखावत राजपूतों की दृष्टि में किसानों की धरती उनकी मां थी। और उन्होंने उस मां के ऊपर आघात पहुंचाना और आघात पहुंचाने वाले लोगों के रवैयों को कभी पसंद नहीं । किया था। । 16 मई सन् 1925 ई० को अंग्रेजी सत्ता के हथियार मलहार लोना गांव पहुंचने लगे। अंग्रेजी सेना की तोपों और मशीनगनों की कतारें मलहार लोना गांव में विछ गई। चारों ओर से अंग्रेजी सैनिकों ने ग्रामीणों को घेर लिया। यहां तक की ग्रामीणों को पानी पीने पर भी रोक लगा दिया गया। किसी भी ग्रामीण को घर से नहीं निकलने दिया गया। जो आन्दोलनकारी अपने घरों से निकलकर गांव की सड़क पर आ गए उन्हें गोलियों से भून दिया गया था। मशीनगनों से निकल-निकलकर दन-दनाती हुई 52 : ठाकुर कुपल सिंह गोलियां गांव के स्त्री, पुरुप, बच्चे, बूढ़े, युवक सभी को क्षत-विक्षत करने लगी। ठाकुर कुशल सिंह ने प्यास से मरते हुए ग्रामीणों की करुण पुकार सुनकर ब्रिटिश अधिकारियों और अंग्रेजी सेना के संनिको से प्रार्थना की कि "प्यास से व्याकुल गांव वालों को कम- से-कम पानी पीने की तोआप लोग छूट दें।" किन्तु उनकी प्रार्थना का उत्तर अंग्रेजी सैनिकों की मशीनगनों से निकलती हुई धांय- धाय की आवाज थी। मशीनगन की दनदनाती गोलियां ठाकुर कुशल सिंह के हृदय को छलनी करती हुई निकल गई। उनके साथ आठ ग्रामीणों पर भी मशीनगन की गोलियां चली और ठाकुर कुशल सिंह के साथ वे भी शहीद हो गए। राजस्थान के इस युवा विप्लवी को भारत का इतिहास कभी नहीं भूलेगा। 1 । शहीद भूरजी सन् 1924 ई० में राजस्थान का किसान-आन्दोलन तेजो पर था। जो किसान जमींदार अंग्रेजी सरकार की आर्थिक शोषणवादी नीति को समझ गए थे वे सब इस आन्दोलन में भाग ले रहे थे। जमीदारों किसानों के साथ राजस्थान के कई जिलों की जनता भी आन्दोलन में भाग ले रही थी। जिला अलवर का संतलपुर, निमूचना गांव किसान-क्रान्ति का केन्द्र बन चुका था। संतलपुर गांव में भूर जी किसान-क्रान्ति के अगुवा थे। उनके पीछे सैकड़ों स्त्री, पुरुष थे भूरजी के पिता श्री केशोराम थे। भूर जी ने वचपन से ग्रामवासियों के ऊपर अंग्रेजी शासन का अत्या- चार देखा था। भूरजी ने वचपन में ही मन में ठान लिया था कि एक दिन अंग्रेजी-शासन से उपजी हुई आधिक-शोषण की नीति के विरुद्ध लड़कर किसानों को विजय दिलानी होगी। तभी से वे गांव के लोगों के सामने आई हुई समस्याओं पर ध्यान देने और उन सबकी समस्याओं का निराकरण करने में अपना अथक- परिश्रम लगाते। संतलपुर तथा आसपास के गांव के लोगों से उन्हें सहयोग मिलता था। किसान-आन्दोलन के नेताओं द्वारा तैपार किए गए कार्यक्रमों को भूरजी ने व्यावहारिक रूप में ढालने सन् 1924 ई० के काल में अंग्रेजी सरकार किसानों के लगान में दिनोंदिन वृद्धि करती हो गई । किसानों से वेगार लेना अंग्रेजी शासन का मानो धर्म हो गया था। जो किसान ठीक मे लगान का प्रयास किया।

54 : शहीद भूरजी नही देते, वेगार देने में आनाकानी करते उन्हें कड़ी से कड़ी सजा दी जाती। ठिकाने के कर्मचारी, अफसर पटवारी बड़े-बड़े सामंत किसानों के ऊपर तरह-तरह से जुल्म करते। अंग्रेजी-शासन की अनाचार की नीतियों से संतलपुर के किसान दुःखी थे। सन् 1924 ई० में ही संतलपुर निमूचना तथा अन्य गांवों के नवयुवकों, बच्चों, बूढ़ों, महिलाओं ने अंग्रेजी-शासन के विरुद्ध आन्दोलन करने का विचार किया। किसान-आन्दोलन के नेताओं के निर्देश से भूरजो अपने आन्दोलनकारी साथियों के साथ आन्दोलन में कूद पड़े। शेखावत राजपूतों ने भू-राजस्व में 50% वृद्धि का विरोध किया। मवेशियों की चारागाह की भूमि पर अंग्रेजी सरकार के अधीन ठिकाने के लोगों के कब्जे का विरोध किया। एक वर्ष तक नियमित रूप से गांव में सभा की जाने लगी। गांव के नौजवानों को आन्दोलन में भाग लेने को आमंत्रित किया जाने लगा। बहुत से मनचले जवान किसान- आन्दोलन के कार्यक्रमों में भाग लेने लगे। 16 मई सन् 1925 ई० का दिन संतलपुर में कयामत लेकर आया। उस दिन किसान-आन्दोलन के आन्दोलनकारियों द्वारा एक विशाल सभा बुलाई गई। गांव के लोगों का एक जुलूस निकाला गया था। भूरजी जुलूस के आगे-आगे जुलूस का नेतृत्व कर रहे थे। अंग्रेजी शासन की घुड़सवार पुलिस अस्त्र-शस्त्र से लैस होकर विना कुछ समझे हुए मशीनगन एवं तोपों से गोली चलाने तगे। गर्मी के मारे, प्यास के मारे लोगों के प्राण पहले ही तड़प रहे थे। उस पर उन पर गोलियों की वर्षा ने अनेक किसानों के प्राण ले लिए। 'पानी-पानी' की आवाज लगाते हुए कई बच्चे काल-कवलित हो गए। भूरजी भी गोली के शिकार हो गए। संतलपुर गांव में आज भी वीर भूरजी की समाधि बनी शहीद सीता देवी राजस्थान की धरती ने अनेक वीर-नारियां पैदा की हैं। उन वीर नारियों के कर्म और कीति से भारत के इतिहास का अध्याय उज्ज्वल है। राजपुतानों में एक ऐसी नारी भी जन्मी जो ब्रिटिश-सत्ता से जकड़े हुए भारत को स्वतंत्र कराने का दृढ़ संकल्प लेकर क्रान्ति के यज्ञकुड में कूद पड़ी और आहूत हो गई। उस नारी का नाम सीता देव थी। सन् 1904 ई० में जिला अलवर के निमूचना गांव में सीता देवी का जन्म हुआ था। शेखावत राजपूतों का यह गांव सदा से ही वीर पुरुषों और वीर नारियों का गांव था। इसी गांव के श्री रघुनाथ किसान की वह लाडली वेटी थी। गांव में ही उसकी शिक्षा का प्रबंध किया गया। दिनोंदिन वह देश-दुनिया के बारे में समझने लगी। किसान आन्दोलन के नेता भूरजी के संपर्क में वह आई । भूरजी से उन्हें गुलाम देश भारत को आजाद कराने की प्रेरणा मिली। ग्रामवासियों के अधिकार की उनके हृदय में चेतना जगी। ज्यों-ज्यों उसकी उम्र बढ़ती गई, उसका अनुभव भी बढ़ता ही गया । वह अपने गांव में जब वेवस-गरीब किसानों पर ठिकाने के जुल्म को देखती, उन ठिकाने के लोगों द्वारा किसानों के जमीन जायदाद का अपहरण होते उसकी आंखें देखती तो उसका दिल पसीज जाता । उसका मन गवाह देता क्यों न ब्रिटिश मत्ता के इशारे पर नाचने वाले ठिकाने के लोगों को चकनाचूर कर दें। भूरजी उसके पास नियमित रूप से आते और किसान- 56: शहीद सीता देवी क्रान्ति के कार्यक्रमों को बतलाते । किसान-क्रान्ति के सत्याग्रहियों की कतार में सम्मिलित होकर समय-समय पर वह भी सत्या- ग्रह करती। किसानों को अपना अधिकार दिलाने का नारा लगाती । सीता देवी को यह आवाज गांव के छोटे बड़े किसानों के सम्मुख अपना अधिकार वापस करने को जागरूक करने लगी। 16 मई सन् 1925 ई० के दिन निमूचना गांव में किसानों की एक विशाल सभा का आयोजन किया गया। शेखावत जमी- दारों और किसानों का सत्याग्रह आरंभ हो गया। सीता देवी गांव के जमींदारों और किसानों के सामने सिंह सिंहनी के समान दहाडती हुई बोली कि "हम सब किसी भी स्थिति में ठिकाने के लोगों को लगान नहीं देंगे। चारागाह भूमि पर हम सबों का अधिकार है। अपने अधिकार की रक्षा करने में हम सब प्राण गवा सकते हैं किन्तु अधिकार को गैर हाथों में नीलाम नही करेंगे।" सीता देवी की आवाज का प्रभाव ग्रामवासियों पर पड़ा। उन्होंने अधिक संख्या में होकर ग्रामवासी किसान सत्याग्रह में भाग लेना आरंभ कर दिया। 16 मई सन् 1925 ई० के दिन ही निमूचना गांव को सरकारी-तंत्र के अधिकारियों ने घेर लिया। ब्रिटिश सैनिकों ने सत्याग्रहियों को तीतर-वीतर करने के लिए गोलियां चलाई। अनेक सत्याग्रही घायल हो गए मशीनगर्ने और तोपें चुन-चुनकर किसानों को मारने लगी। सीता देवी भी गोलियों के बीच कहां वचती। अंग्रेजी सैनिकों की गोलियों ने उसके भी प्राण ले लिए। और वे वही शहीद हो गई।

शहीद जमना वनिया राजस्थान में अलवर जिले का निमूचना गांव आज भी सन् 1924 ई० के किसान आन्दोलन के इतिहास को ताजा किए हुए है सन् 1924-25 ई० में इस गांव के कई क्रान्तिकारी किसानों को उचित अधिकार दिलाने, ग्रामीण मजदूरों की वेगारी प्रथा हटाने दीन-दलित किसानों की भूमि का अपहरण करने के विरोध में किसान आन्दोलन शुरू करने के लिए आगे पढ़े ! इस गांव के क्रान्तिकारियों में जमना बनिया अग्रणी थे। लगान में बढ़ाई गई 50% आय के विरोध में और मवेशियों के चरागाह पर वलपूर्वक अधिकार करने तथा ब्रिटिश सत्ता के अधिकारियों तथा उनसे मिले हुए सामन्तों, जमींदारों, भूमि के दलालों, सैटल मेंट आफिसरों के द्वारा होते हुए अन्याय का उन्होंने दमन किया। निमूचना गांव के किसानों के संगठन में नेतृत्व देते हुए उन्होंने गांव के एक सच्चे ग्रामीण नेता होने का परिचय दिया। सन् 1924 ई. में ही वे निमूचना गांव में दिन प्रतिदिन किसानों को सभाएं करने लगे। जुलूस निकाले जाने लगे। किमान आन्दोलन में काम करने वाले लोगों को सदस्यता दी गई। इनमें से अधिकांश शेखावत राजपूत और जमीदार थे। 16 मई सन् 1925 ई० का दिन निमूचना गांव के लिए भयानक दिन था। उस दिन किसान आन्दोलन के नेताओं ने निमूचना गांव में एक सभा का आयोजन किया था। अचानक 58 : शहीद जमना पनिमा 1 मशीनगनों और तोपयानों से लैस अंग्रेजी सैनिक गांव की तरफ बढ़ने लगे। देखते ही देखते सैनिकों ने गांव को घेर लिया। गांव मे आतंक फैल गया। लोग अपने-अपने घरों में जाकर छिप गए। ग्रीष्म काल को वेला मैं लोग पानी बिना पाही मान-याही मान करने लगे। निर्दयी अंग्रेजी सेना ने ग्रामीणों को पानी पीने पर प्रतिबंध लगा दिया था। प्यास से तड़पते ग्रामीणों ने पानी की मांग की तो उसके बदले उन्हें बन्दूक की दन-दनाती गोलियों और मशीनगनों से उगलती आग से ग्रामीणों को जलाकर खाक कर दिया। जमना वनिया के ऊपर मशीनगन की गोली चली जो उसके शरीर के आर पार हो गई। जमना वनिया के साथ उनकी अपनी बहना सीता भी मशीनगन को गोली से शहीद हो गई। निमूचना गांव के इस आन्दोलन में अनेक लोग पाहीद हुए थे।

रिवाल्वर, तोप, बम, हथगोले तैयार करने लगे थे। उनका की तैयारी करने लगे। वे स्वयं बंदूकें तैयार करने लगे, बंगुको क्रान्तिवीर दामोदरदास राठी वीर-प्रसविनी भूमि राजस्थान में हर काल, हर युग में अनेक वीर पुत्रों और वीर वालाओं ने जन्म लिया है। क्रान्ति वीर दामोदर दास राठी भारतीय राष्ट्रीय-आन्दोलन के कर्मवीर थे । उन्होंने सदा इस देश का उद्धार चाहा और भारत को अंग्रेजों के हाथों से मुक्त कराने के लिए आजीवन लड़ते रहे। उन्होंने केवल क्रान्ति ही नहीं की वरन् क्रान्तिकारियों को सही-पथ निर्देशन देकर राजस्थान की क्रान्ति को अग्रसरित किया। क्रान्ति-पथ के राही दामोदर दास राठी का कर्म क्षेत्र ब्यावर था। किशोरावस्था से ही उन्होंने अंग्रेजों की पडयंत्रकारी नीतियो को परखा था। अंग्रेज कैसे-कैसे राजस्थान की अनपढ़, गंवार, भोलीभाली जनता को डरा धमकाकर अनेक रियासतों के राजे, रजवाड़ों को अपने में मिलाने की कैसे-कैसे चाल चलते हैं। अंग्रेजों की इन शोषक नीतियों से उनके मन में देश की स्वतंत्रता की भावना पैदा हुई और क्रान्ति के जीवित-पथ पर चल पड़े। उस समय क्रान्ति का जीवित पथ सशस्त्र क्रान्ति का पय था जिस पथ पर चलकर भारत के बंगाल, बिहार, पंजाब, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, असम के वीर-वांकुरे बंदूक, उद्देश्य सशस्त्र क्रान्ति से भारत भूमि को आजाद कराना था। इसी उद्देश्य को लेकर दामोदर दास राठी भी सशस्त्र .ir 60: कान्तिवीर दामोदरदास राठो - कारतूस भरना, बंदूक के निशाने का अभ्यास करना आदि कार्यों में वे निपुण होते गए। शस्त्र-निर्माण के साधनों की सहायता तत्कालीन समय की देशी रियासतों के देशभक्त राजाओं ने उन्हें देना आरंभ कर दिया। उन राजाओं में बीकानेर के गंगासिंह, उदयपुर के फतेह सिंह, कोटा के उम्मेद सिंह थे । राजे महाराजे दामोदर दास राठी को और भी क्रान्तिकारी-योजनाओं में गुप्त रूप में सहायता करते थे। दामोदर दास राठी एक सहृदय व्यक्ति थे। क्रान्तिकारियों के सम्मान के लिए उनका हृदय खुला था। किसी भी प्रकार की विपत्ति के समय क्रान्तिकारियों को तन, मन, धन से सहायता पहुंचाते थे। भूमिगत-अवस्था में कार्य करते हुए भान्तिकारियों को वे अपने घर पर रखते थे। उनके लिए भोजनादि की व्यवस्था करते थे। उन सबका खूब आतिथ्य करते थे। भूमिगत क्रान्ति- कारी उनके पास आते थे और क्रान्तिकारी-योजनाओं पर विचार- विमर्श लेते थे तथा उनसे क्रान्ति और विप्लव का मार्गदर्शन करते थे। वे क्रान्तिकारियों के सच्चे दोस्त थे । जयपुर में अर्जुनलाल सेठी ने जैन वर्द्धमान विद्यालय की स्थापना की थी। विद्यालय के छात्रों में देशप्रेम, राष्ट्रीय चेतना तथा बलिदान की भावना जगाई जाती थी। जैन वर्द्धमान विद्यालय क्रान्तिकारियों, विप्लवियों की क्रान्ति का केन्द्र था। वहां एक क्रान्तिकारी दल की स्थापना की गई थी। क्रान्तिकारी दल में गाहपुरा के केसरी सिंह वरहट, राव गोपाल सिंह, दामोदर दास राठी,भूपसिंह जो आगे चलकर विजय सिंह पथिक के नाम से प्रसिद्ध हुए, इत्यादि थे। छात्र दामोदर दास राठी क्रान्तिकारियों को समय-समय पर स्कूल में गुप्त रूप से शस्त्रास्त्र प्रशिक्षण देते थे। दामोदर दास राठी के प्रयास से रोज-रोज क्रान्तिवीर दामोदरदास राठी: 61 नये-नये युवक क्रान्तिकारी दल में सम्मिलित होते थे। भूपसिंह ने अजमेर में सशस्त्र-क्रान्तिकारियों को नेतृत्व प्रदान किया था। सन् 1913 ई० में अजमेर में 'वीर भारत समाज' नामक संस्था की स्थापना हुई थी। वीर भारत समाज में भी क्रान्तिकारियों को अस्त्र-शस्त्र की शिक्षा में निष्णात किया जाता था। दामोदर दास राठी 'वीर भारत समाज, से संबद्ध थे। वक्त निकालकर 'वीर भारत समाज' के क्रान्तिकारी क्रिया- कलापों में भाग लेते थे। 21 फरवरी सन् 1915 ई० को सारे भारत के क्रान्तिकारियों ने सन् 1857 ई० के सिपाही विद्रोह की तरह ही दूसरा सिपाही विद्रोह की योजना बनायी थी। 21 फरवरी सन् 1915 ई० को 'विद्रोह' की आग भड़काने का दिन निश्चित किया गया था। किन्तु एक, देशद्रोही सिपाही ने अंग्रेजी सरकार को 'विद्रोह' के गुप्त रहस्यों की जानकारी दे दी। अंग्रेजी सरकार ने सख्ती से इस विद्रोह को दवा दिया और प्रमुख स्थानों के विद्रोहियों को गिरफ्तार कर लिया। राजस्थान में स्थान-स्थान की फौजी छावनियों की भारतीय फौजों में 'विद्रोह' की आग सुलगाने तथा फौजी छावनियों पर कब्जा करने की ज़िम्मेदारी राव गोपाल सिंह, भूपसिंह, दामोदर दास राठी प्रभृति क्रान्तिकारियों को सौपी गई थी। क्रान्ति- कारियों के विद्रोह की योजना सफल नहीं हो सकी। सभी क्रान्ति- कारियों को बंदी बना लिया गया। दामोदर दास राठी को क्रान्तिकारियों के साथ टाटगढ़ में नजरबंद कर दिया गया था। । 1 शहीद ठाकुर सुरजन सिंह राजस्थान के अलवर जिला में स्थित विसालू गांव सन् 1924 ई० की किसान क्रान्ति को आज भी नहीं भूला है । सन् 1924 ई० की किसान क्रान्ति के नेता इसी गांव के ठाकुर सुरजन सिंह थे। वे शेखावती राजपूत कुल से सम्बन्धित थे। उन्होंने अंग्रेजों से किसानों की भूमि की रक्षा के लिए लड़ाई लड़ी थी और किसान क्रान्ति में अपने रक्त की बलि चढ़ाई थी। ठाकुर सुरजन सिंह का जन्म काल सन् 1894 ई० माना जाता है। बिसालू गांव में रहकर बचपन से उन्होंने अंग्रेजी सरकार से मिले हुए सामंतों के अत्याचार को देखा था। ठिकाने के लोगों द्वारा कृषि भूमि और चरागाह भूमि पर जवरदस्तो अधिकार किया जा रहा था। भूमि लगान में 50% वृद्धि कर किसानों में असंतोप फैला दिया गया था। ब्रिटिश सरकार एवं सामन्तवादी शोषण के विरोध में शेखावती राजपूत जमींदार और किसान आन्दोलन की तैयारी करने लगे। उस समय की किसान क्रान्ति के बड़े-बड़े नेताओं का सहयोग भी उन्हें मिला । ठाकुर सुरजन सिंह ने बिसाल गांव में किसान क्रान्ति के नेतृत्व का उत्तरदायित्व अपने कन्धों पर लिया। सन् 1924 ई० में लगान में वृद्धि की प्रतिक्रिया स्वरूप अलवर जिले के कई गांव में किसान आन्दोलन अपना रंग जमाने लगा। उन गांवों में ठिकाने के लोगों का विरोध किया जाने लगा। जगह-जगह सभाएं और जुलूस निकाले जाने लगे। किसान शहीद ठाकुर सुरजनसिंह : 63 भी रोज-रोज सभा करते जुलूस निकालते और ठिकाने के लोगों के विरोध में नारेबाजी करते । ठाकुर सुरजन सिंह किसान आन्दोलन में सक्रिय भाग लेने लगे। 16 मई सन् 1925 ई० की बात है बिसालू गांव में लगान में वृद्धि के विरोध में एक विशाल सभा बुलाई गई। सभा में आसपास के गांव के लोग भी आ-आकर उपस्थित हो गए। सभी किसान एक स्वर से ठिकानों द्वारा परती भूमि के अधिग्रहण के विरोध की आवाज लगाने लगे कि तभी मशीनगनों और तोप- खानों से लैस घुड़सवार और पैदल सैनिकों ने पूरे गांव की घेरा- बन्दी कर दी और दनादन मशीनगर्ने और तोपें छूटने लगीं। ठाकुर सुरजन सिंह के साथ अनगिनत लोगों के ऊपर गोलियां चली। सबके सब वहीं शहीद हो गए, ठाकुर सुरजन सिंह ने अपना बलिदान देकर मातृभूमि का एक ऋण चुकाया।

सन् 1942 ई० काशहीद लक्ष्मण प्रसाद सिंह भारत की आजादी का इतिहास रक्तरंजित स्याही से लिखा गया है। भारत माता के चरणों पर एक-एक नवयुवक अपने खून का अर्घ्य चढ़ाते गए और स्वतंत्रता की वेदी पर अपना शीश अर्पण करते गए। सन् 1942 ई० आते-आते तो लाखों ने स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ी और प्राण न्यौछावर कर दिए। राज- स्थान के क्रान्तिकारियों में क्रान्ति की आवाज बुलन्द कर मातृ- भूमि की वेदी पर बलि चढाने वाले बलिदानियों में लक्ष्मण प्रसाद सिंह भी एक थे। सन् 1882 ई० में लक्ष्म प्रसाद सिंह का जन्म वीकानेर नगर में हुआ था। मरुधरा में बढ़ती हुई क्रान्ति की आंधी ने उन्हें युवावस्था में झकझोरा और वे क्रान्ति की आंधी के साथ चल पड़े। युवावस्था से ही वे वर्षो से बढ़ती हुई किसान-क्रान्ति के नायकों से प्रभावित हुए और अपने जीवन की अनमोल घड़ी को क्रान्तिकारी कार्यों में लगाने का विचार करने लगे। समय की गति ने उन्हें एक दिन उत्तर प्रदेश के मथुरा में पहुंचा दिया। मथुरा में रहकर उन्होंने वहां की क्रान्तिकारी गतिविधियों को निकट से देखा। उन्होंने देखा कि बंगाल, बिहार, महाराष्ट्र, दिल्ली के क्रान्तिकारी यहां आ-आकर अंग्रेजी-सत्ता से मुकाबला करने के लिए कैसे-कैसे तरकीब निकालते हैं। क्रान्तिकारी योजनाओं को कैसे-कैसे बनाते हैं। क्रान्तिकारियों के क्रिया- कलाप ने उन्हें भी मातृ-भूमि की आजादी के लिए जगा दिया।

लक्ष्मण प्रसाद सिंह: 65 उस समय ऐसी घड़ी आ गई थी कि देश के लाखों नवयुवक, बच्चे, बूढ़े, महिलाएँ भारत देश को आजाद कराने को संकल्पबद्ध हो गए थे। वह घड़ी सन् 1942 ई० की घड़ी थी। सन् 1942 ई० में संपूर्ण भारत में 'अंग्रेजो, भारत छोड़ो' का नारा लगाया जा रहा था। प्रांत प्रांत के क्रान्तिकारी अग्रेजों को भारत से अपने देश इंग्लैंड जाने को विवश कर रहे थे । लक्ष्मण प्रसाद सिंह भी इसी उद्देश्य से सन् 1942 ई० की क्रान्ति में सर्वस्व न्यौछावर करने को तैयार हो गए। वे एक-एक बूंद खून देकर भारत को आजाद कराना चाहते थे। 28 अगस्त सन् 1942 ई० को वृन्दावन में सरकारी बंगलों, दफ्तरों, कोर्ट, कचहरी के छत के ऊपर लहराते हुए यूनियन जैक उतारकर राष्ट्रीय तिरंगा फहराने के लिए विशाल जन समूह उमड़ पड़ा था। विशाल जन समूह जुलूस के रूप में परिणत हो गया था। लक्ष्मण प्रसाद सिंह हाथ में तिरंगा लिए वंदेमातरन् 'इन्कलाब जिंदावाद' अंग्रेजो वापस जाओ, भारत माता की जय का नारा लगाते हुए जुलूस के आगे-आगे जा रहे थे कि अचानक अंग्रेजी सरकार के पुलिस-दल के एक पुलिस अधिकारी ने उन पर गोली चला दी। गोली लगते ही वे वहीं गिर पड़े और अमरत्व । को प्राप्त कर शहीद हो गए।

युवा विप्लवी 1 विशंभर दयाल युवा जीवन की उमंगें नदी की लहरों की तरह होती हैं जो हर समय कुछ कर गुजरने को तैयार रहती हैं। युवा जीवन की आकांक्षा ही युग और काल के पृष्ठों पर किसी भी समाज और देश को परिवर्तन का इतिहास लिखती रहती है । जिस समाज और देश के नवयुवकों में समाज और देश के परिवर्तन की आक्षाएं जगी हैं, वह देश पराधनता के बंधन से अवश्य ही मुक्त हुआ है। भारत में अंग्रेजी शासन के विरुद्ध विप्लव का युग था। भारत के हजारों नवयुवक अंग्रेजों की पराधीनता से भारत को मुक्त कराने के लिए जागरूक हो गए थे। और अंग्रेजी शासन से टक्कर लेने को संकल्पशील हो गए थे। उन नवयुवकों में राजस्थान के युवा-विप्लवी विशंभरदयाल थे। उन्होंने अंग्रेजी शासन के अत्याचार का प्रतिरोध किया और अंग्रेजी साम्राज्य- वाद को ललकारते हुए मातृ-भूमि की वेदी पर स्वयं को न्यौछा- वर कर दिया। युवा-विप्लवी विशंभर दयाल का जन्मस्थान जिला अलवर का बहरोड गांव आज भी विप्लव के दिनों की अमरगाथा सुनाता है। बचपन की अवस्था से ही राजस्थान के सामंतों, भूमिपतियों को गरीब किसानों पर अत्याचार और जुल्म करते देखते तो उनका मन कुछ कर गुजरने को कटिबद्ध होने लगता। उन्हें फिर मन मसोसकर रह जाना पड़ता। युवावस्था में उन्होंने अपने मन को दृढ़ किया और एक दिन विप्लवियों में जा मिले।

युवा विप्लवी-विशंभर दयाल : 67 उनकै विप्लव का क्षेत्र राजस्थान के दूर-दूर तक स्थानों तक फैला हुआ था। वे गांव के लोगों को अंग्रेजी साम्राज्यवाद की काली करतूतों पर ध्यान दिलाते और उन सबको विप्लेव करने और झुकाने का प्रयत्न करते। कभी-कभी वे भारत के अन्य राज्यों के विप्लवियों के नेताओं के पास जाते और उनकी बनाई । गई विप्लवकारी योजनाओं में भाग लेते। वंगाल, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, पंजाब के विप्लवियों से उनका संबंध जुड़ता गया। सन्, 1912 ई० में विप्लवियों ने दिल्ली में लार्ड हाडिंग के ऊपर वम प्रहार की योजना बनाई। इस योजना में विशंभर दयाल ने भाग लिया। लार्ड हार्डिंग पर वम फेंकने की तारीख निश्चित की गई। 12 दिसम्बर सन् 1912 ई० को लाई हार्डिंग पर बम फेंकने वालों में विशंभर दयाल भी थे। लार्ड हाडिंग पर वम फेंककर सभी विप्लवी भाग गए। विशंभर दयाल भी भागने वालों में थे। पुलिस उनके पीछे-पीछे पड़ गई। 16 मार्च सन्, 1931 ई० को वे पुलिस से घिर गए। पुलिस के साथ उनका जोरदार मुकाबला हुआ। वे बंदी बना दिए गए । उनपर मुकद्दमा दायर किया गया और कैदी के रूप में वे दिल्ली की जेल में रखे गए थे। जेल में उन्हें अनेक यातनाएं दी गई। 25 अप्रैल सन् 1931 ई० को दिल्ली की जेल में ही प्राण त्याग दिए।

निमूचना गांव का शहीद कन्हैया राजस्थान का जिला अलवर देशी राज्य और रजवाड़ों की कभी शासकीय भूमि थी। सन् 1857 ई० के सिपाही विद्रोह में अलवर के विद्रोहियों ने ब्रिटिश सत्ता से लोहा लिया था। अलवर के कई जमींदार और नरेश अंग्रेजों से भी मिले हुए थे जिससे कि अलवर में अंग्रेजों को अपनी आर्थिक नीति द्वारा ग्रामीणों का शोपण करने का अवसर मिल गया था। सन् 1897 ई० आते- आते अलवर के किसानों के बीच यह प्रश्न उठा कि अंग्रेजी सरकार द्वारा किए गए जुल्म और आर्थिक शोषण दूर करने वाला कोई जन्म भी लेगा या नहीं लेगा। ठीक उसी समय अलवर जिले के निमूचना गांव में एक विप्लवी का जन्म हुआ। उस विप्लवी का नाम कन्हैया था। इनके पिता श्री उदमीनाई सच्चे देशभक्त थे। बाल्यावस्था को पार कर कन्हैया ने ज्यों ही होश संभाला त्यों ही उनमें देश प्रेम जागने लगा। उस युवक ने देखा कि राजस्थान के बड़े बड़े जमीदार, किसान अंग्रेजों की मिली भगत से गरीब जनता की जमीन पर जवरदस्ती अधिकार करने लगे है। अंग्रेजी सरकार की आर्थिक नीति कुछ ऐसी हो गई है कि "मेरे जैसे युवक को अलवर के किसानों के आर्थिक शोपण के विरुद्ध आन्दोलन करना चाहिए।" कई वर्षों तक कन्हैया यही सोचता रहा । किन्तु कोई उपाय उसके सामने नही आया। सन् 1924 ई० का काल आ गया उस समय तक भू-राजस्व निमूचना गांव का शहीद--कन्हैया : 69 में 50% वृद्धि कर दी गई थी इससे बेचारे गरीब किसान परेशान हो गए थे । कन्हैया को यह सहन नहीं हुआ। अलवर के युवकों ने भू-राजस्व की वृद्धि के विरुद्ध आन्दोलन करने की ठानी। अलवर के शेखावत राजपूत जमींदार और किसानों ने 'भू-राजस्व की वृद्धि का विरोध किया । कन्हैया भी किसानों के इस आन्दो- लन में कूद पड़ा। अलवर के शेखावत किसानों और जमीदारों के साथ रहकर आन्दोलनकारी कार्यों में भाग लेने लगा। अलवर के किसानों के साथ एक समस्या और भी थी कि अंग्रेजी सरकार मवेशियों के चरागाह की भूमि पर कब्जा जमाने लगी थी। अंग्रेजी सरकार की यह हरकत कन्हैया को अच्छी नहीं लगी। निमूचना गांव के आन्दोलनकारियों ने भू-राजस्व के विरोध में भू-राजस्व के कार्यालयों में प्रदर्शन किया। निमूचना गांव में आन्दोलनकारियों ने एक जुलूस निकाला। कन्हैया भी इस जुलूस में शामिल हो गया । अंग्रेजी सरकार ने 16 मई सन् 1925 ई० को निमूचना गांव के आन्दोलनकारियों का आन्दोलन दवाने के लिए सेना भेज दो। अंग्रेजो सैनिक गांव वालों के मवेशियों के चरागाह की भूमि को अपने अधिकार में लेने लगे। गांवों में कुओं से ग्रामीणों के पानी लेने पर भी प्रतिबंध लगा दिया गया। प्यास से लोग आक्रान्त हो गए। तब भी अंग्रेजी सैनिकों ने गांव के लोगों को परेशान करना नहीं छोड़ा। मशीनगर्ने और तोपें गांव के चारों ओर आग उगलने लगीं। आन्दोलनकारियों के साथ कन्हैया भी आग उगलते हुए मशीनगनों के बीच आ गया और उसका शरीर क्षत-विक्षत हो गया। उसने निमूचना गांव में ही शहादत प्राप्त कर ली। ।

गिब्सन की हत्या का पड़यंत्र और विप्लवी रामचन्द्र नरहरि वापट सन् 1930 ई० की क्रान्ति की लहर ने जहां राजस्थान के कृषक आन्दोलन को बढ़ावा दिया था वहां विप्लवियों ने विप्लव की आग सुलगाकर वहां के नवयुवकों में विप्लववादि चेतना को जन्म दिया था। नवयुवकों को विप्लव में कूद पड़ने की परि- स्थिति स्वयं अंग्रेजी सरकार ने पैदा की थी। अजमेर 1930 ई. के पहले ही विप्लवियों का केन्द्र था। क्रान्तिकारी विजय सिंह पथिक, राव गोपाल सिंह ठाकुर, माणिक्य लाल वर्मा, राम नारायण चौधरी इत्यादि नेताओं के प्रयास से, अजमेर के किसान आन्दोलन में नई चेतना जगी थी। उनसे अलग विप्लवियों का एक दल और भी था। उस विप्लवी दल में तरुण नवयुवक सम्मिलित थे। उस दल में श्री ज्वाला प्रसाद शर्मा, राम सिंह, श्री राम जी वन्धु थे । विप्लवी दल का संगठन श्री रामचन्द्र नरहरि बापट ने किया था। राजस्थान की देवली में बंगाल के अनेक विप्लवियों को लाकर नजरबन्द कर दिया था। उन विप्लवियों पर अंग्रेजी पुलिस पूर्ण अत्याचार कर रही थी। विप्लवियों के ऊपर अत्याचार का प्रहार अजमेर के युवकों को सहन नही हुआ। अजमेर मेरवाड़ा का इन्सपेक्टर जनरल और प्रिंसेज गिन्सन देवली जेल के कंदियों का दुश्मन हो गया था। छोटे-छोटे बहाने लेकर वह कैदियो पर तरह-तरह के जुल्म करता था। तरह-तरह से यातनाएं देकर फैदियों को लहू-लुहान कर देता था। श्री रामचन्द्र नरहरि वापट ने अपने प्रान्तिकारी साथियों के साथ गिमन की हत्या रामचन्द्र नरहरि यापट : 71 की योजना बनाई। वापट ने गिब्सन की हत्या की जिम्मेवारी ली। 25 अप्रैल सन् 1932-ई० को वापट रिवालवर में गोलियां भरकर जिला मजिस्ट्रेट के कार्यालय में पहुंचा। रिवालवर निकालकर गिब्सन पर गोली चलाने की ज्यों ही कोशिश की कि रिवालवर जाम हो गया। रिवालवर जाम होने के कारण गोलियां नहीं निकल सकी। वापट को तभी वही पर गिरफ्तार कर लिया गया। अदालत ने उन्हें दस वर्ष की सजा सुनाई । सन् 1940 ई० में कठिन सजा भुगतने के बाद उन्हें मुक्त कर दिया गया था।

प्राणनाथ मेगरा की हत्या और विप्लवी रामसिंह और रमेशचन्द्र व्यास सन् 1935 ई० में अजमेर का पुलिस विभाग क्रान्तिकारियों का शत्रु हो गया था। अजमेर का पुलिस उप-अधीक्षक विप्लवियों को बन्दी बना रहा था। उसे निर्दयता पूर्वक विप्लवियों को बन्दी बनाते देख अन्य विप्लवियों ने अजमेर के पुलिस उप-अधीक्षक प्राण नाथ डोगरा की हत्या करने की योजना बनाई। ज्वाला प्रसाद, रामसिंह और रमेशचन्द्र व्यास ने डोगरा की हत्या का दिन निश्चित किया। एक दिन व्यास जी डोगरा को सिनेमा दिखाने के बहाने सिनेमा गृह में ले गए । सिनेमा गृह से लौटते हुए डोगरा पर धांय-धांय करती हुई गोलियां चली और वह वहीं घायल हो गया । डोगरा पर गोली चलाने का काम राम सिंह ने किया था। डोगरा के साथी खलिलुद्दीन नामक पुलिस इन्सपैक्टर पर ज्वालाप्रसाद ने रिवालवर चलाया। खलिलुद्दीन भी घायल हो गया। अंग्रेजी अदालत ने इस हत्या के मुकद्दमे को डोगरा शूटिंग केस नाम दिया । अंग्रेजी पुलिस ने राम सिंह और रमेशचन्द्र व्यास पर मुकद्दमा चलाया और ज्वाला प्रसाद को नजरवन्द कर दिया गया। रमेशचन्द्र व्यास जी मुकद्दमे से वरी हो गए । राम सिंह को सात साल की सजा दी गई। वाद में उन्हे काला पानी भेज दिया गया। सन् 1938 ई० में रमेश चन्द्र व्यास ने अपना कार्य क्षेत्र मेवाड़ को बनाया। सन् 1942 ई० के भारत छोड़ो आन्दोलन में वे वन्दी बनाए गए । आजादी के बाद अजमेर से राजस्थान के विधान सभा के सदस्य भी नियुक्त किए गए। वे बहुत दिनों तक राजस्थान परिवहन निगम के अध्यक्ष भी रहे थे।

गए थे। भाई खांट क्रुद्ध होकर वोले कि स्कूल भोगी लाल पन्डया के शहीद वालिका कालीवाई राजस्थान के जिला डूंगर पुर में रास्तापाल नामक एक गांव है । उस गांव में आज भी एक कुमारी काली बाई का स्मारक है। सन् 1947 ई० में इस गांव के एक स्कूल में अंग्रेजी सरकार ने बड़ी बेरहमी से कई शिक्षकों को मारा-पीटा था और उनमें एक शिक्षक थे नाना भाई खांट जिनको मृत्यु की गोद में सुला दिया गया था। दूसरे शिक्षक सेंगा भाई जो घायल सन् 1947 ई० के पहले से रास्तापाल गांव में श्री भोगी लाल पन्डया के संरक्षण में एक स्कूल चलाया जा रहा था। भोगी लाल पन्डया जो अप्रत्यक्ष रूप से उस स्कूल में अंग्रेजी सरकार के विरुद्ध क्रान्तिकारी गतिविधियों में सक्रिय थे । नाना भाई खांट जो और सेंगा भाई जी उस स्कूल में क्रान्तिकारी क्रिया कलापों को करते । गुप्त रूप से क्रान्तिकारियों की सभा की जाती। गुप्त रूप से क्रान्तिकारी सूचनाएं और पर्चे बांटे जाते। अंग्रेजी सरकार को उस स्कूल की क्रान्तिकारी गतिविधिओं का पता लग गया। अंग्रेजी सरकार ने डूंगरपुर जिला के महारावल लक्षमण सिंह को सूचित किया कि शीघ्र ही रास्तापाल गांव के स्कूल को वे बन्द करवा दें। महारावल लक्षमण सिंह के लोग रास्तापाल गांव पहुंचे और उनके साथ अंग्रेजी सरकार की पुलिस और सेना भी वहां पहुंच गई। अंग्रेजी पुलिस ने नाना भाई खोट को स्कूल बन्द करने की चेतावनी दी। तिस पर नाना आदेश से चल रहा है । मैं कौन होता हूं स्कूल चलाने वाला।

74: शहीद वालिका कालीबाई सेंगा भाई को भी स्कूल बन्द करने के लिए कहा गया। सेंगाभाई ने भी यही उत्तर दिया। तब तक वहां जिला मजिस्ट्रेट पहुंच गया। जिला मैजिस्ट्रेट ने शिक्षकों को कहा कि वे सब स्कूल बन्द कर दें। किन्तु शिक्षकों ने किसी भी हालत में स्कूल बन्द नहीं किया। जिला मजिस्ट्रेट के आदेश से पुलिस ने सेंगा भाई को जीप में एक रस्से से बांध दिया। नाना भाई खांट को लाठी और बंदूक कुन्दे से मार-मारकर ढेर कर दिया। सेंगाभाई को जीप में बंधे देख एक 13 वर्ष की लड़की काली बाई पुलिस की जीप के सामने आकर चिल्लाने लगी कि "मास्टर साहब को छोड़ दो, इन्होंने क्या गलती की है। पुलिस ने डांटते हुए कालीयाई को कहा कि "तू रास्ते से हट जा नहीं तो गोलियों से भून दी जाएगी।" काली वाई साहस से जीप के पीछे पहुंच गई और हाथ में कचिया लेकर सेंगाभाई के हाथों में बंधी रस्सी को काटने लगी। सेंगाभाई तो बचकर निकल भागे। अचानक अंग्रेजी सेना की गोलियों की बौछार से कालीवाई के प्राण पखेरू उड़ गए। आदिवासी भील जाति के हजारों लोग कालीबाई को देखने जा पहुंचे। भीलों ने मारू ढोल बजा दिया और अपने-अपने हथियार लेकर अंग्रेजी सेना के पीछे गिद्ध की तरह झपट्टा मारते हुए आगे बढ़ते गए । अंग्रेजी सेना ने गुजरात की सीमा पर जाकर बन लिया। काली बाई वलिदान हो गई किन्तु अपनी कीति की कहानी क्रान्तिकारियों के इतिहास में लिख गई। कालीबाई जैसी वीर बालिका आज के भारत में क्या याद की जाएंगी?

उठी। शहीद राधादेवी राजस्थान की वीरांगनाओं में राधादेवी अपनी वीरतापूर्ण कार्यों से इतिहास में अमर हो गई है। वे अलवर जिला के निमूचना गांव की थी। उसके पति का पेशा सुनार का था । राधादेवी अपने पति के साथ रहकर निमूचना गांव में जीवन यापन करती किन्तु वह गांव सदा ठिकाने के लोगों के जुर्म से अशान्त रहता । कोई भी दिन ऐसा नहीं होता कि जिस दिन किसी-न-किसी ग्रामवासी के साथ कोई-न-कोई हादसा न होता। करुणा की प्रतिमा राधा- देवी गांव में होते हुए ठिकाने के लोगों के जुल्म से त्रस्त हो उठी और उस समय की किसान क्रान्ति में भाग लेने के लिए आतुर हो राधादेवी के सामने एक ओर गृहस्थ जीवन का भार और दूसरी ओर किसानों के अधिकारको रक्षा का प्रश्न था। सबसे पहले उसने किसानों के अधिकार की रक्षा की आवाज लगाई और किसानों के अधिकार दिलाने के लिए किसान क्रान्ति की सदस्या हो गई। किसान क्रान्ति के कार्यक्रमों में वह दिन रात काम लेने लगी। उसने अपने साथ अनेक महिलाओं को भी गांव की महिला सभा में सम्मिलित किया। महिलाओं ने राधादेवी के नेतृत्व में किसान क्रान्ति में भाग लिया। सन् 1924 ई० में राजस्थान के गांव-गांव में किसान क्रान्ति- की आंधी जोर पकड़ने लगी थी। निमूचना गांव के स्त्री-पुरुष किसान आंदोलन में कार्य कर रहे थे । श्रीमती राधादेवी के साथ सीतादेवी भी किसान क्रान्ति के कार्यों को सुचारू ढंग से पल 1 ।

76 : शहीद राधादेवी । रही थी। एक वर्ष तक निमूचना गांव में शेखावत राजपूत, जमींदारों और किसानों के साथ कई महिला कार्यकर्ता क्रान्ति के कामों में भाग लेकर किसानों की समस्याओं की आवाज लगा रही थी। भूमि राजस्व की वृद्धि के विरोध में नारे लगाए जाने लगे। ठिकाने के लोगों द्वारा चारागाह की भूमि पर जबरदस्ती कब्जा करने का विरोध किया गया। 16 मई सन् 1925 ई० को निमूचना गांव में किसान क्रान्ति को एक सभा आयोजित की गई। राधादेवी भी उस सभा में उपस्थित थी। ठिकाने के लोगों ने अंग्रेजी सेना को गांव में बुला लिया था। गांव के चारों ओर पुलिस ने घेरा डाल दिया था। गांव के सभी कुओं पर पुलिस के पहरे लगा दिए गए थे। सभा के समय ही अंग्रेजी मशीनगनों और तोपों से महिलाओं, बच्चों, बूढों, नवयुवकों पर गोलियां चलाई जाने लगीं। पानी भरने के लिए कोई भी कुएं पर बढ़ता तो पानी भरने नहीं दिया जाता। प्यास से चीखते हुए बच्चों को भी पीने के लिए पानी नहीं दिया जाता। प्यासे ग्रामीणों पर भी गोलियां चलाने में सैनिकों ने देर न की। पूरा गांव ऐसा लगने लगा कि अंगेजी सरकार की अंगेजो शाही ने निमूचना गांव के गोली काण्ड को दूसरा जलियांवाला बाग काण्ड बना दिया हो। गांव के लोगों ने देखा कि राधादेवी अंग्रेजी पुलिस की गोली का निशाना बन चुकी थी।

आत्मबलिदानी शंभूनारायण सन् 1920 ई० से पहले राजस्थान का अजमेर शहर कान्ति- कारियों को क्रान्ति का केन्द्र बन चुका था। राजस्थान वीर केसरी केसरी सिंह बरहट, विजयसिंह पथिक, साधु सीताराम, शरणदास जैसे क्रान्तिकारियों ने किसान-क्रान्ति का अलख जगाया था। क्रान्ति की मशाल जलाने के लिए विप्लवियों की आवश्यकता थी। भारत को गुलाम बनाने वाले अंग्रेजों से लड़ाई लड़ने के लिए सत्याग्रह, समझौता की आवश्यकता ही नही थी, अपितु वम, पिस्तौल, हथगोले की भी जरूरत थी। सशस्त्र क्रान्ति करने वाले विप्लवी ही अंग्रेजी सरकार के अत्याचारियों से लोहा ले सकते थे। सन् 1920 ई० में अजमेर में शंभूनारायण नामक विप्लवो का जन्म हुआ था। अजमेर शहर में शंभूनारायण की पढ़ाई- लिखाई हुई। विद्यार्थी जीवन से ही वे विप्लवियों के भारतीय क्रान्तिकारी दल के सदस्य बन गए और क्रान्तिकारी कार्यों में अपना तन,मन, धन समर्पित कर दिया। भारतीय क्रान्तिकारी दल के द्वारा जो भी कार्यक्रम करने का निर्णय लिया जाता शंभू नारायण उन कार्यक्रमों में खुलकर हिस्सा लेने लगे। एक दिन विप्लवियों ने विप्लवियों के सरकार के पिळू प्राणनाथ डोगरा की हत्या की योजना बनाई। इस हत्या योजना में शंभूनारायण भी शामिल हुए। उस समय उनकी अवस्था 14 वर्ष की थी। 14 वर्ष के इस युवक के . कलाप से अंग्रेजी सरकार घबरा गई। प्राणनाथ डोगरा को दुश्मन, अंग्रेजी 78 : आत्मबलिदानी शंभूनारायण का अभियुक्त बनाकर उन्हें अदालत में खड़ा किया गया था। गिरफ्तार करके उन पर राजद्रोह का मुकदमा चलाया गया । बिना लाइसेंस का रिवाल्वर रखने तथा विप्लवी साहित्य रखने के आरोप भी इस मुकदमें की कार्यवाही में रखे गए। अजमेर के केन्द्रीय जेल में युवक शंभूनारायण को रखा गया था। वहां अंग्रेजी पुलिस के अधिकारियों ने उनसे अपने विप्लवी साथियों के बारे में बार-बार पूछताछ की। किन्तु उन्होंने कोई उत्तर नहीं दिया। जेल में साथियों का नाम वोलवाने के लिए कोड़े मारे गए, उनके माथे पर बिजली का शौक लगाया गया, उन्हें बर्फ की सिल्ली पर सुलाया गया। गरम लोहे से उन्हें दागा गया। घनघोर यातनाओं को सहन करते हुए शंभू नारायण जी ने उफ तक नहीं की। 'वंदे मातरम्' का नारा लगाकर वे जेल को गूजा देते थे। एक दिन उन्होंने सोचा कि आत्मसम्मान की रक्षा करना ही इस देश के युवकों का कर्तव्य है, चाहे इसके लिए प्राणों की आहुतियां क्यों न देनी पड़ें। अवसर पाकर उन्होने स्वयं अपने हाथों से अपनी हत्या कर ली। उनकी आत्महत्या आत्महत्या नहीं थी, आत्म वलिदान था जो दासता की जंजीरों में कसी भारत मां अपने पुत्रों से मांग रही थी। भारत माता के इस अनमोल लाल ने उसे पूरा कर दिखाया।

डावडा ग्राम के शहीद श्री मथुरादास, चुन्नीलाल शर्मा आदि 8मई सन् 1944 ई० को नागौर जिला की लाडनू तहसील के लोक परिषद के नेताओं को वन्दी से मुक्त कर दिया गया। लाडनू तहसील के डावडा ग्राम में श्री मथुरादास के नेतृत्व में एक किसान सभा आयोजित की गई । उस गांव में यह सभा इस लिए बुलाई गई थी कि अंग्रेजी सरकार के प्रशासन में गांव में सुधार के बदले जागीरदारी जुल्म को बढ़ाया गया था । नागरिक अधिकारों का हनन किया गया था। ग्रामीणों की इज्जत की रक्षा नहीं की गई थी। दिन-प्रतिदिन किसी के भी साथ ठिकाने के लोग या प्रशासन के लोग कोई न कोई जुर्म करके ही चैन लेते थे। डावडा ग्राम की इस सभा में उपस्थित सभापति, नेता, संयोजक तथा अन्य कार्यकर्ता गांव के लोगों की सुरक्षा के संबंध में विचार व्यक्त कर ही रहे थे कि ठिकाने के जागीरदारों ने सभा के लोगों पर अस्त्र-शस्त्र चलाना शुरू कर दिया। सभा में आए हुए कई लोग हताहत हो गए। लाडनू तहसील के चुन्नी लाल शर्मा के साथ और भी कई ग्रामीण पुलिस का निशाना बनें।

शहीद बालमुकन्द विस्सा सन् 1942 ई०में अंग्रेजी सरकार बन्दी बनाए गए पत्रकारों के साथ यूरव्यवहार करने लगी थी। उन्हें कुभोजन दिया जाता, समाचार पत्र पढ़ने से वंचित किया जाता। सोने का प्रबंध भी ठीक से नहीं किया जाता । भारत के अन्य प्रान्तों की तरह राजस्थान के वन्दी पत्रकार को भी जेल में इसी दुरावस्था से गुजरना पड़ा। उस समय के पत्रकार शिरोमणि, श्री जयनारायण व्यास, चौपासनी वाला, अभयमल जैन, अभलेश्वर प्रसाद शर्मा और बालमुकुन्द विस्सा आदि 41 वन्दियों ने भूख हड़ताल कर दी थी। भूख हड़ताल करने की खवर संपूर्ण देश में फैल गई। भूख हड़ताल के दौरान ही बालमुकुन्द बिस्सा का स्वास्थ्य दिनों-दिन खराव होता चला गया। दिन-प्रतिदिन उनका होश जाता रहा। गंभीर हालत में उन्हें अस्पताल ले जाया गया । अस्पताल में ही वे शहीद हो गए।

एक शहीद की रहस्यमय मृत्यु श्री सागरमल गोपाजी माजादी के जो दीवाने होते हैं वे वसंती रंग का चोला पहनकर, जान हथेली पर लेकर अपनी जन्मभूमि की वेदी पर न्यौछावर हो जाते हैं। एक युवा विप्लवी सागरमल गोपाजी बसंती रंग के चोले को धारण कर अपना सर्वस्व समर्पित कर भारत देश को गुलामी से मुक्त करने के लिए बलिदान हो गए। उनका बलिदान आज तक रहस्य बना हुआ है। सन् 1930 ई० में नागपुर से एक युवक जैसलमेर पहुंचा। जैसलमेर के विप्लवियों की योजनाओं में उसने भाग लिया था। जैसलमेर के विप्लवियों में उन्होंने साहस भरा और वहां विप्लव की हवा जोरों से लहराने लगी। अंग्रेजी शासन के अत्याचार ओर जुल्म के सम्बन्ध में उन्होंने गुंडाराज नामक एक पुस्तक लिखी। इस पुस्तक का प्रचार-प्रसार होते ही जैसलमेर के अंग्रेजी अधिकारी उस युवक से जलभुन गए। अंग्रेजी सरकार के पुलिस और जासूस उस युवक को बन्दी बनाने का प्रयत्न करने लगे। वह युवक क्रान्तिकारी गतिविधियों में भाग लेने के लिए कभी नागपुर जाते, कभी जैसलमेर । सन् 1939 ई० में उस युवक के पिता का देहावसान हो गया था। उस समय उनके पिता जैसलमेर में ही रहते थे। नागपुर के उस विप्लवी का नाम सागर मल गोपा था। पिता की मृत्यु की खबर सुनते ही जब वे नागपुर से चलने की तैयारी करने लगे तब उनके शुभाकांक्षियों ने जैसलमेर जाने के लिए मना किया। क्योंकि जैसलमेर की पुलिस गोपा जी को गिरफ्तार करने की तलाश में थी। गोपाजी नहीं माने और वे ।

. । 82 : एक शहीद की रहस्यमय मृत्यु-सागरमल गोपाजी जैसलमेर चले ही गए। अपने पिता के श्राद्धा दिकार्यो को कर जैसलमेर पहुंचने के लिए तैयार हुए ही थे कि 25 मई सन् 1941 ई० को उनके हाथों में हथकड़ी पहना दी गई । अदालत में उन पर राजद्रोह का मुकद्दमा चलाया गया। जेल में गोपा जी को अनेक कष्ट दिए गए। उन्हें अनेक यातनाएं दी गई। लोहा गर्म करके उन्हें दागा गया। वर्फ की सिल्ली पर लिटा-लिटाकर उनसे क्रान्तिकारी स्थितियों के बारे में पूछा गया। किन्तु वे एक शब्द भी नहीं बोले । गोपा जी पर जेल में किए गए अत्याचार का पता उस समय के प्रसिद्ध नेता और पत्रकार जयनारायण व्यास को लग गया। श्री जयनारायण व्यास ने पोलिटिकल एजेंट से जेल में गोपा जी के साथ हुए दुर्व्यवहार की जानकारी प्राप्त करने की एक पत्र द्वारा सूचना दी। जयनारायण व्यास के पत्र को पढ़कर पोलिटिकल एजेंट जैसलमेर पहुंचने का कार्यक्रम बनाने लगा।पोलिटिकल एजेंट के पहुंचने से पहले ही 3 अप्रैल सन् 1941 ई० की रात को जैसलमेर में यह खबर विजली की तरह फैल गई कि गोपाजी का शरीर जेल में आग से झुलस गया है । जैसलमेर शहर के हजारों लोग गोपा को देखने के लिए जेल की तरफ बढ़ने लगे। किसी को भी गोपाजी को देखने नहीं दिया गया। गोपाजी के सम्बन्धियों को भी गोपाजी से मिलने के लिए रोका गया। उसी रात को गोपाजी को जैसलमेर के अस्पताल में इलाज के लिए ले जाया गया। अस्पताल में गोपाजी अपने वैड पर रोते- चोखते रहे किन्तु डॉक्टर के कानों में जूं तक नहीं रेंगी। अस्पताल में गोपाजी का इलाज बिल्कुल ही नहीं किया गया । और वही दर्दनाक अवस्था में गोपाजी ने दम तोड़ दिया। वह दिन 4 अप्रैल सन् 1946 ई० का दिन था। गोपाजी ने स्वयं अपने शरीर में आग लगाई थी या जेल में किसी ने आगलगा दी थी? यह एक रहरय बनकर रह गया। सारिकामसे तीखीमरे गांव के शहीद ठाकुर छत्रसिंह व पंचमसिंह सन् 1946 ई० को धौलपुर जिला में संगठित प्रजा मण्डल में उत्तरदायी शासन की मांग अंग्रेजी शासन से की थी। प्रजामण्डल के नेता और कार्यकर्ता अंग्रेजी सरकार के अधिकारियों से प्रार्थना करने लगे कि शाघ्र ही धौलपुर में उत्तरदायी शासन हो जाए तो किसान क्रान्ति में नया मोड़ आ सकता है और अंग्रेजी सरकार से किसानों का समझौता हो सकता है। किन्तु अंग्रेजी सरकार ने इस पर कोई ध्यान नहीं दिया। सन् 1946 ई० में धौलपुर जिला के तीखीमरे गांव में कांग्रेस को एक सभा बुलाई गई। कांग्रेस की सभा में नेताओं ने जोर-जोर से भाषण देना शुरू किया। प्रमुख कार्यकर्ताओं ने भी विचार व्यक्त किया था। विचार कर ही रहे थे कि अंग्रेजी पुलिस दल वहां पहुंच गया और उपस्थित सभा पर गोली चला दी। कांग्रेस के कार्यकर्ता ठाकुर छत्रसिंह और पंचमसिंह को गोली लगी और वे वही बलिदान हो गए। प्रजामण्डल के कई कार्यकर्ताओं को निर्वासन दे दिया गया। धौलपुर का तीखीमरे गांव आज भी उन शहीदों को याद करता है ।

सन् 1857 ई० में राजस्थान के चम्पावत ठाकुरों की शौर्य गाथा भारत में जवसे ब्रिटिश हुकूमत ने अपना जाल फैलाना शुरू किया तव से ही भारत वासियों में देश की आजादी की आकांक्षा जागी और अग्रेजों को खदेडने के लिए कदम आगे बढ़ाते गए। 17 वी शताब्दी में कलकत्ता, मद्रास, वम्बई, गोवा, केरल इत्यादि उपनिवेशों में अंग्रेजों के साथ भारतीयों की लडाई होती रही। अपने देश को आजाद कराने के लिए बहुतों ने अपनी जान की बलि दे दी। 17 वीं शताब्दी में भारत की स्वतंत्रता की लड़ाई एक स्थान विशेष की लड़ाई कही जा सकती है। सामूहिक लड़ाई नहीं। सन् 1700 ई० से लेकर सन् 1857 ई० तक भारत के कई स्थानो पर छिट-पुट लड़ाईयां होती रहीं। ब्रिटिश हुकूमत से भारत को स्वतंत्र कराने की चेतना सन् 1857 ई० में क्रान्ति की भावना वनकर लहरायी। महान क्रान्तिकारी वीर सावरकर ने भारत में सन् 1857 ई० की स्वतंत्रता की लड़ाई को प्रथम स्वाधीनता संग्राम कहकर सम्बोधित किया है। ब्रिटिश शासन की गुलामी से भारत की मुक्ति का इतिहास वस्तुतः सन् 1857 ई० से ही होता है। सन् 1857 ई० में भारतीय स्वतंत्रता की प्राप्ति का विशेष कारण यह था कि इंग्लण्ड ने कीमियां के युद्ध में एनफिल्ड नामक राइफल का प्रयोग किया था। सन् 1857 ई० में इन राइफलों को भारतीय और सैनिकों के प्रयोग के लिए भेजा गया। इन राइफलों में जो कारतूस भरे जाते थे, उनमें गाय और सुअर की चर्बी भरी जाती थी। कारतूस के ऊपर लगे हुए चमड़े को दांत FAtta सन् 1857 ई० में राजस्थान के चम्पावत ठाकुरों को शौर्य गाथा: 85 से तोड़कर गोली निकालने का काम किया जाता था। कलकत्ता की बरहामपुर रेजिमेंट के सिपाहियों को एनफिल्ड में भरे जाने वाले कारतूसों में गाय और सुभर की चर्चा का पता लग गया। राइफलों के कारतूस में भरी जाने वाली गाय और सुअर की चर्बी का न हिन्दू सैनिकों को अच्छा लगा न मुसलिम सैनिकों को। यह सब हिन्दू और मुस्लिम दोनों ही धर्मों के खिलाफ था । अपने धर्म पर आघात देखकर वरहामपुर की रेजिमेंट ने अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह कर दिया। तदुपरान्त वैरकपुर छावनी में विद्रोह की आग जल उठी | बंगाल के अन्य स्थानो में भी सैनिक विद्रोह फैलते गए । बंगाल से सैनिक विद्रोह फैलते फैलते विहार उत्तरप्रदेश, दिल्ली से राजस्थान की ओर फैलता गया । सन् 1857 ई० का यह विद्रोह हिन्दू, मुस्लिम धर्म की रक्षा हेतु प्रारंभ हुआ था जिसमें कि अंग्रेजी शासन के विरुद्ध घृणा पैदा कर दी थी। अंग्रेजों के प्रति घृणा की भावना भारतीय सिपाहियों के हृदय में विद्रोह की ज्वाला बनकर फूट पड़ी थी। भारत की मरुधरा भूमि राजस्थान में सन् 1857 ई० के सिपाही विद्रोह ने अपना अलग ही रूप दिखाया। यह विद्रोह 21 अगस्त सन् 1857 ई० को नीमच नसीराबाद की छावनी में फैलते-फैलते ऐरनपुर की छावनी तक फैल गया । 21 अगस्त सन् 1857 ई० को ऐरनपुर छावनी के भारतीय सैनिकों के दस्तों ने विद्रोह को आग सुलगाई। एरनपुर छावनी से विद्रोही मांऊट आबू की ओर पहुंचे और वहां भी विद्रोह की आग जला दी। माउटआबू के विद्रोही सिपाहियों ने वहां के अंग्रेज अधि- कारियों, अफसरों पर गोलियां चला-चलाकर उन सबके शरीर को छलनी-छलनी कर दिया। कई फौजी छावनियों के सिपाहियों ने दिल्ली चलो अभियान शुरू किया और वहांसे सिपाहियों की कतारें दिल्ली की ओर चढ़ पडी। मार्ग में आडवा नामक स्थान पड़ता था। वहीं विद्रोही सिपाहियों ने अपना पड़ाव 86 : सन् 1857 ई० में राजस्थान के चम्मादत ठाकुरों की शौर्य गाथा डाला। आडवा के ठाकुर कुशलसिंह भी विद्रोहियों का साथ देने अपने सैनिकों के साथ जा पहुंचे । तत्कालीन समय में भारत के प्रान्त-प्रान्त के क्रान्तिकारी नेता विद्रोहियों का साथ दे रहे थे। महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश में नाना साहब पेशवा, तात्याटोपे महारानी लक्ष्मीवाई, बिहार में वीर कुंवरसिंह, दिल्ली मे बहादुर शाह जाफर, हरियाणा मे तुलाराम और राजस्थानों में सबसे पहला क्रान्तिकारी नेता ठाकुर कुशलसिंह विद्रोहियों को नेतृत्व प्रदान करने के लिए आगे बढ़े। ठाकुर कुशल सिंह के नेतृत्व में विद्रोही सिपाहियों ने अपना सर्वस्व न्यौछावर करने का संकल्प लिया। ठाकुर कुशलसिंह के साथ देश भक्त क्षत्रिय आ मिले। उनमे आशोपक ठाकुर शिवनाथ सिंह, गूलर ठाकुर बिसन सिंह और आलनियावास ठाकुर अजीतसिंह थे। दिल्ली की ओर विद्रोहियों की कतारं बढ़ ही रही थी कि उस समय के अजमेर के चीफ कमिशनर सर पैट्रिक लोरेंस ने जोधपुर के महाराजा तख्त सिंह से सैनिक सहायता मागी। जोधपुर के इस राजा में देशभक्ति का तनिक भी ज्ञान नहीं था। वह पेट्रिक लारेन्स की बातों में आ गया और उसने ओनाड सिंह पवार, राव राजलम लोढ़ा, कुशलराज सिंघनी एवं विजय पाल मेहता को विद्रोही सिपाहियों के विरुद्ध युद्ध करने के लिए भेजा। ठाकुर कुशलसिंह के नेतृत्व में अंग्रेजी सेना के साथ मिले हुए महाराजा की सेना से धनघोर संग्राम हुआ। इस संग्राम में ओनाड़ सिंह मारे गए। 8 सितंबर सन् 1857 ई० को चिठड़ा नामक स्थान पर अंग्रेजी सैनिकों और विद्रोही सिपाहियों के बीच भयकर लड़ाई हुई। जोधपुर का पोलिटिकल ऐजेंट मेन्सन अपने सैनिको के साथ आडवा के ठाकुर कुशलसिंह के माथ युद्ध करने आ पहुंचा। इस युद्ध में मेसन की सेना को पराजय का मुंह देखना सन् 1857 ई० में राजस्थान के चम्पावत ठाकुरों की शौर्य गाथा : 87 5 महीनों तक विद्रोही सिपाहियों और अंग्रेजी सैनिकों की लड़ाई होती रही। 20 जनवरी सन् 1858 ई० को करनल होम्स की देखरेख में कई सैनिक दस्तों ने आडवा पर हमला कर दिया। करनल होम्स की सेनाओं ने आडवा के विद्रोही सिपाहियों को चारों तरफ से घेर लिया। अंग्रेजी सेना की विशाल शक्ति के सामने तक भी विद्रोही सिपाहियों ने अंग्रेजी सैनिकों की ईंट से इंट वजा दी थी। किन्तु अन्त में विद्रोहियों की हार ही हुई। सन् 1857 ई. के राजस्थान के विद्रोही सैनिकों और अंग्रेजी सैनिकों के मध्य युद्ध में चम्पावत ठाकुर कुशलसिंह की आत्म शक्ति की विजय हुई थी। चम्पावत क्षत्रिय देशभक्तों ने जिस ढंग से अंग्रेजी सैनिकों का मुकावला किया वह वीरता का महत्त्वपूर्ण कदम था। चम्पावत ठाकुर कुशलसिंह की वीरता और बहादुरी की गाथा राजस्थान के लोकगीतों में आज भी सुनने को मिलती है-ढोल बाजे, चंग बाजे, मेलो बाजे वांकियो। ऐजेंट ने मारकर, दरवाजे टांकियो। जूझे आडवो। ते ओजूझे आडवो॥

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Rajasthan Ke Amar Shahidon Ki Kahaniyan

Author
Amar Shahid Granthmala
Title
Rajasthan Ke Amar Shahidon Ki Kahaniyan
File name
Rajasthan Ke Amar Shahidon Ki Kahaniyan
Text
OCR done
Citation
1956
Published
2011/03
Publisher
Itihas Shodh Sansthan New Dehli
Language
Sanskrit
Pages
92
Library
Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner
Classification
Literature
DLI number
551057
Barcode
4990010031836.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
T2i70WvrPfk
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