Shri Abhaya Jain Granthalaya, Bikaner
Shravak Dharmvidhi Prakranam
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श्रीमात्मानन्द-जैनग्रन्यानमालाया सप्तसप्ततितम रत्नम् (७५) याकिनीमहत्तरामनु-श्रीमद्-हरिमद्रसरिसदृब्धं श्रावकधर्मविधिप्रकरणम्॥ श्रीमानदेवसूरिविवृतवृत्त्युपेतम् । सपादक सशोधकञ्च- प्रवर्तकश्रीमत्कान्तिविजयचरणकमलचश्चरीक: चतुरविजयो मुनिः। प्रकाशयित्री- भावनगरस्था श्री जैन-श्रात्मानन्दसभा। यपुयाँ प्रानन्द मुद्रालये मुदितम् । वीरसव २४५० विक्रममवत् १९८. ईसवीसन १९२४ आत्मसमव आनद प्रीटींग प्रेस-मेनेजर गुलाबपद लल्लमाई शाह भाषनगर प्रकारक- घल्लभदास त्रिभुवनदास गांधी-से- श्री जेनरमा
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॥ न्यायाभानिधि-श्रीमद्विजयानन्दसृरि ॥
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जन्म १८९
म्वग१९५२
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मान प्रीटीगम-भावनमः
Enav
27
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प्रस्ताविक निवेदन था श्रावधर्मविधि प्रकरण नामनो अति प्राचीन ग्रन्थ घणी प्रसिद्धिमा श्राव्यो होय एम जणातु नथी कारणके घणा हस्तलिखित प्राचीन पुस्तक भण्डारोनी तपासना परिणामे हु बेज पुस्तको मेळवी शक्यो छु जो आ अन्यनो विशेष प्रचार थयो होत तो पणा आदर्शों मळी आवत आ अपूर्व प्रन्थ नष्ट न थाय अने लोकोना उपयोगमा आये तेवा हेतुथी था लघु पण रहस्य- पूर्ण प्रन्यने जनसमाज आगळ जाहेरमा मूकवा प्रयास कर्यो छे आ प्रकरणनु जेवु नाम छ तेवुज तेमा वर्णन छे तेथीज आ प्रकरणनु जे नाम रासवामा आव्यु छे ते यथार्थ छ जो के । आ प्रकरणमा जे विपयनु वर्णन छे तेज विपयनु वर्णन आ प्रक- रणना कर्चा याकिनीमहत्तरासूनु श्रीमद् हरिभद्रसूरिए आवश्यक- वृहद्वृत्तित्रादिमा घण विस्तारपूर्वक गुथेलु छे परतु तेवा अति- गहन प्रयोनु अवगाहन नहि करी शकनार अल्पबुद्धिनाळा जिशा- सुश्रो आवा विषयी सर्वथा अज्ञात न रहे एवा उद्देशथी तेश्रोना उपकार माटे या प्रकरणनी रचना थइ होय तो ते सभावनीय छे था प्रकरणना कर्ता असाधारण विद्वान् अने सकलजिना- गमपारगामी होवाथी एमनी कृतिमा सहज गभीरता आवे ए स्वभाविक छ आ प्रकरणमा रहेला गभीर श्राशयोनु स्पष्टीकरण करवा माटे कोइक महर्पि महाशये या प्रकरण उपर विस्तृत टीका ४ लखी हती एम आ प्रकरणी 'प्रशस्तिना श्राद्य काव्य उपरथी सष्ट जणय छ परतु ते टीका सामत कालमा कोइ पण ठेका णेना पुस्तक भडारमा दृष्टिगोचर थत्ती नथी ए विस्तृत टीकाना आधारे श्रीमान् मानदेवसूरिए मार्गदर्शकरूप श्रा टीका रची छे ए प्रशस्ति उपरथी स्पष्ट थाय छ श्रा प्रकरण प्राकृत भाषामा एकसो वीस गाथामा गुथेलु छे तेमा श्रावकधर्मना स्वरूपने देसाडवा रूप मुरय विषयनु अने बीजा केटलाएक मुरय विषयना अगभूत अवातर विषयोन पण वर्णन छे श्रा प्रकरणनी प्रतिम गाथामा-" भवविरहवीयभूयो " एवो पाठ होवाथी भने वृत्तिमा पण-" इह च 'विरह इति सितावरश्रीहरिभद्राचार्यस्य करेप " एवो उल्लेस क्वाथी तेमज विरहपदाकित सघळा प्रथो याक्निीमहत्तरासूनुश्रीहरिभद्र- सूरिए परेला के एम जिनेश्वरसूरि, अभयदेवसूरि, मुनिचद्गसूरि विगेरे घणा प्रमाणिक श्राचार्योंने पण अभीष्ट होवाथी प्रस्तुत प्रक- रणना कर्ता श्रीमद् हरिभद्रसूरि निर्विवाद सिद्ध थाय के एव श्रीहरिमरिचिते तोऽत्र पृत्तिं मया प्राय पूर्वनिवद्धवृत्तितशतो दिमात्रस्पामिमाम् । २ इति विहितवतोचवृत्तिमता स्वात्या यदभिमतममाहाणि पुण्य मयाऽऽतम् । तदितशुमभम्न्या धर्ममवति भव्या ! विदधनु यतिभचा साधुग मानदेवा ॥२॥' १ " श्रीमद् हरिभद्रसूरिना समय निर्णयमाटे हालमा ये मत पडेला देसाय के तेमा एक पक्ष प्रद्युम्नसूरि आदि घणा प्राचा- योना उल्लेसना आधारे श्रीमद्नो कालनिर्णय छट्टी शताब्दी अने वीजो पक्ष प्राकृत कुवलयमालाकथा ना उल्लेखने आधारे आठमी शताब्दी सिद्ध करे छे माटे श्रीमद्ना समय निर्णयना विशेष जिज्ञासुओए मुद्रित धर्मसग्रहणी उपर मुनिश्नीकल्याणवि- जयजीए लसेली विस्तृत प्रस्तावना अने श्रीयुत जिनविजयजी सपादित साहित्य सशोधकनो वर्ष १ अक १ जोइ लेयो श्रा प्रकरणना टीकाकार श्रीमान् मानदेवसूरिनो समय निर्णय करवो घणो मुश्केल के कारणके एमना सनधमा साक्षात् कोइ प्रवळ प्रमाण मने मळी शक्यु नथी तेमज लघुशातिना कर्ता विगेरे अनेक मानदेवसूरि थया छे तेमाथी कया मानदेवसरिए आ टीका करी ए कहेवु प्रमाणना अभावे दुर्घट छे पूज्यपाद श्रीमद् हसविजयजी महाराजना स्वर्गवासी शिप्य मुनिश्रीदौलतविजयजीना सदुपदेशथी सौराष्ट्रदेशमा आवेला माग- रोठ यदरना रहेवासी हाल मुषइ वसता उदाराशय शेठ प्रेमजी नागरदास, शेठ जमनादास मोरारजी अने शेठ फुलचद वेलजीए आ प्रकरण छपाववामा जे आर्थिक सहाय करी 2 ते माटे तेमना था शुभ कार्यनी कोइ पण प्रशसा कर्या विना रहेशे नहीं श्रा सटीक प्रकरण तैयार करवामा बे पुस्तकोनीज मदद मळी छे तेमा श्र पुस्तक भाडारकर इन्स्टीटयुटनु हतु जे गूजरात ६ पुरातत्त्व सशोधक मदिरना प्राचार्य श्रीयुत-जिनविजयजी मारफत अने योजु य पुस्तक पाटण सागरगच्छना पुस्तक उपरथी वरालु पूज्यपाद प्रवर्तक श्रीमत्कान्तिविजयजी महाराज पासेयी मन्यु हतु आ वने पुस्तको घणा अशुद्ध हता या प्रकरणनु सशोधन करवामा आगमप्रकरणादिसशोधक श्रीमत् सागरानद- सूरिजीए जे मदद करी के तेमना ते उपकारने हु कदी भूली शरतो नथी उपर पतानेल बन्ने पुस्तकोना श्राधारे घणा प्रयत्नथी मा सटीक प्रकरण शोधीने तैयार क्युं छे तो पण अक्षरयोजकना दोपथी के दृष्टिदोपयी कोइ ठेकाणे अशुद्धि रहेवा पामी होय तो ते ठेकाणे पाचक महाशयो सुधारीने पाचशे एवी नम्र प्रार्थना करी विरमु छु लि मुनि चतुरविजय.
श्रावकधर्मविधिप्रकरणगाथाकारायनुक्रमः। ८२ गाथाद्यपाद इसेसइट्टिधम्म- ७ अनाईण सुद्धाण ८९ २४ २३ अप्पडिदुप्पडिलहिय- अव्यमे पुण विरई अविरुद्धो यवहारो अह मनसि होइ चिय अह सो सम्मद्दिट्टी अहिगारिणा सु धम्मो आउयपरिहाणीए आरभे मिच्छत्ते आरमे विव मिच्छे आह तिहाऽणुमई ज आहारदेहसकार इच्छापरिमाण खलु इटीओ ऐगविहा श्य आरभेऽणुमई इय मिच्छाओ विरमिय इस सपरपक्सविसय इहरा ठएइ कसे गाथा । इह सहसमक्साण ६७ उचिय सेवह वित्ति १०१ उड्डाहोतिरियदिसिं १०० उत्सुत्तमणुवइट ११६ / उत्सुत्तमायरतो ११४ । उस्सुत्त पुण एत्य एए पुरण विणेया ४५ एएसु चिय सवणा- ३ । एपहिं तदहिगारि- ११८ । एत्तो चिय तेसिमुव- एत्य उ सावगधम्मे एत्य य पासत्थाई- एत्य पुण अश्यारा एमाइ बहुविगप्प एय अणतरुत्त एवमसतो वि इमो एवं वाया न भण्इ एव सवासको ३१ भोगाइइ तत्थेवउ २९ । करदाणेण य सन्वे २८ १०९ २२ १०८ ४२ ३ - १०७ ५३ ६० फरसन्नभमुहलेषा- काम सहापसिद्ध पालतिषण य गुणिया कसा देसे एग क्दप्प घुक्कुइय रावणे येयावचे सेत्ताइहिरणाई गहणा उवरि पयत्ता गिहि धम्मकहापीई गुग्मूले सुयधम्मो गुरुविणओ तह काले गोसे भणियो य विही जइविस्सामणमुचिओ जइ राया सिहजो ज सा अगियराओ वत्तत्यसद्दहाण तत्थ तिहा सम्मत्त तत्यहिगारी अत्थी तम्हा निश्चसईए तह अगतित्थियाण तह चेईहरगमण वह पत्यदडविरई ता यह सपासागुम- ६४ तिरिण तिया तिणि ७६ | तित्यकरमत्तीए ५३ । तिविह विविहेणिको ९४ | तुले जीवत्ते यह ६१ थूलगपाणिवहस्सा " थूलमुसावायस्स य १०५ यूलादत्तादाणे ९ दिसिवयगहियस्स दिसा ७९ घिजाईयगिर्हाण न रेइ सय मिच्छ १२० नमिऊण वद्धमाण ११५ । नवकारेण वियोहो ३९ } निवमेज तत्थ सड्डो निस्सकिय निफाखिय ६८ निस्सकियाइरूव परदारस्स य विरई ४ | परलोगहिय सम्म १०६ पासत्योसणकुसील- १९ पुष्यपुरिसा जहोइय ११३ | पूय च असणपाणा- पच उ अणुव्वयाइ ११२ २ २१ ५६ ५९ Ghamtar - MM ८० १३ ५२ बाहगदोसविवक्सो बघवहछविच्छेच भगसय सीयाल मणवयणकायदुप्पणि- मिच्छत्तमरगनिह लोगुत्तमदेवम्मि वि वजइ इत्तरिअपरि- वजह इह प्राण्यण- वनइ इह तेरणाहड वजइ उड्ढाइकम वजणमणतगुथरि घयणविसवायाओ 'विउगच्छ ति व गरहा विचिगिच्छ देस एग विचिगिच्छाए विजा- वदपूयणसक्कार- वदशमेय मलाइ सचित्तनिक्सिवण्य सचित्त पडिबद्ध ११९ ( सच्छदमइविगप्पिय सम्मत्तमूलिया ऊ सम्मा पलियपुहुत्ते ९६ सव्वजणवल्लहत्त १६ सव्वे दुवालसग १८ सव्वे सव्वमयाइ ८६ / साहम्मियवच्छल्ल ९८ साहम्मियपछिल्लम्मि सिक्यावय तु एत्य ९० सुत्तविउद्धस्स पुणो ९१ । सुत्ता उवायरक्सण-- ३० । सुत्तापडिकुट्टो जा सुलमा अमूढदिट्ठी ६ ४९ ५५ / सुस्सूस धम्मरायो ११० ५७ | सभवमहिगिचेय २० सलेहणा य अते ससयकरए सका १०२ ( होति समत्यो धम्म १७
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श्रावकधर्मविधिप्रकरणवृत्त्यतर्गतपद्यानामकारादिक्रमः। पत्राक १०३ १०३ १०५ २८ २३ २३ पद्याधचरण पनाक पद्याधचरण. अग्निदहति नाकाश ४२ | उचिअचेण पवित्ती अत्यम्मि रागभावे १०८ बाचिया य दाणकिरिया अनिरिक्सया पमजिय ८९ उत्सर्गब्रह्मचारित्व- अप्पग्गथमहत्य ४५ उवसामगढिगयस्स अर्थी समर्थ शास्त्रेणा ८ ऊसरदेस दड्डुल्लय अलियमुवधायजणय ४५ / एगाहियेहिअतेहि- अवहितगति समतात् १०६ । एमेव अहाछदे अविराहियसामणस्स ५१ . एमेव जारिसेण श्रमदृशगुण वस्मात्तस्मा ४६ एमेव य मूलुचर प्राणाए पेव चरण एय पि जुनइ चिय श्राद्य भावारोग्य एव अप्परिवडिए आयुरपूर्वापूर्व १०६ आलोयणाए विणए एव खु जतपीलण- आवस्सगसज्झाए २२ एस कमो नरएमु वि आवस्सयाझ्याइ २२ | ओसखो वि य दुविहो इच्छे वेयावडिय १०८ ओसन्नो वि विहारे इह सलु क्प शुद्ध सिद्धो ४६ कइया वचइ सत्यो इह हि रमणीशलाक्षा ३७ कक्कुरुया इमा या इगाले वपसाडी ५२ | कयसामइओ पुयि एव ककारलमो ५ २२ ०४ ८४ २३ - किइफम्म च पससा जह चिरसचिअमिंधण- १०७ , देसम्मि उ पासत्थो कह सामाइयलामो ५ जा सजमया जीवे- काऊरण तक्सए चिय ८९ जीवतस्म इह असो काले दिणस्स पहे ९६ । जे दसणवावया कालो इह विणेो १३ । जो जेण पाहिजइ १०८ पा श्री श्रीएयामजस्र ज अपाणी कम्म १०७ २४ ज विसयविरत्ताण १०५ पुणमाणो विनिवित्ति ३८ तणसथारनिसको कुणमाणो वि य सिरिय ३८, तत्वे मूढ ! मनागपि ५३ बुलनिस्मा विहरद २२ तत्र प्रणाम प्रगति २ फेई भणति गिहिणो ६८ तम्हा रम्माणीय योउयभूईपम्मे २२ तिथि पर्वोत्सवा सर्व ९४ क्षीणेपु विनयीजेपु २तिविहो होइ मुसीलो २० सीणम्मि उदणम्मि १६ ! तिव्वयरे उपयोसे १०७ १६ । तीयाइभावकहण २२ ८४ तीरात्तीरमुपैति रौति वेसि नमो तेसि नमो जहा चलतो २२ | तो कह णिज्जुत्तीए ६८ निधा शुद्ध भैत जलमपि १०८ २६ | दुप्पसहत चरण जन्दा न धम्ममग्गे ८ दुर्गतिप्रसृतान् जीवान २२ ६ । दोसम्मिय सयमेत्त १०५ खीणे दमणमोहे मेते पडेह गोणे गूसिराग पत्त गोणो चधाग भजमाणस्स चोएइ चेइधारण ७ जह घेव उ मोक्सफला २ २३ १ ब्रह्मचारी गृहस्थश्च ९२ २६ or धम्माधम्मपएसा धर्मानुष्ठानवैतध्यात् धीरपुरिसपरिदागि नरएसु सुरवरेसुध न मरइ पमायजुत्तो नागमवचन तद्वत् नाणे नाणायार निखिलमसिलै सम्यम् निदा विगहापरिवजि- निहोस सारवत च निपुणधिपणाऽऽगुप्यान् निर्जितमदमदनाना पञ्चक्साए तु तहा पडिसेवणपडिमुणणा पढमधीया गिलाणे पासत्थाईएसु पासत्थाई पदमा- पासत्या ओसमा पासत्यो श्रोमो पाहुणविसेसदाणे पिता दासो दासो भ- पिंडविसोही समिई ४३ | पुमस्तस्या प्रवृत्त्य ६ पचासवप्पयत्तो ५१ / प्रेक्षापूर्वरता प्राय १०७ / यालस्त्रीमन्दमूरिणा ८९ ब्रह्मदेवो भातपो २२ भसइ एत्थ विभासा ४९ मङ्गल शाखसयध. मिच्छर जमुइण मिच्छदसणमहण ४५ ३ मूल द्वार प्रतिष्ठान- य इह गदिवा स्वा- १०७ यदपि च यस्तद्वस्ति- ६५ यदपि च भवेदल्पमन्य ३२ यल्लजनीयमतिगोप्य- यूनो वैदग्ध्यवत २३ । यो येन रकस्तमनु- २४ रायविदूसगमाई २१ लद्धफलमाणमेय वयसमाधम्मसजम- वहमारणअब्भक्सा- १०६ । विपरीता वितरा स्यात् ५९ विमलमपि हि चेत ४५ ९ ६६ १०७ १०० शिवशर्ममूलमेक शुक्रशोणिवसभूत शुश्रूपा चेहाद्य २ शुश्रूषाऽपि द्विविधा श्रेयासि बहु विनानि सकलविषयज्ञानाधीन सत्तावरी विराली स भपति पालादेव समुदितपदामादौ विद्वान सम्मत्तम्मि उ लद्धे ६८ ४६ २२ १०८ / साहम्मिय थिरकरणे १०५ / साहूण पदणेण ६१ / सिद्धार्थ सिद्धसपन्ध ६१ सीयनविहारओ खलु १ सीयाल भगसय ५७ । सुनिउणमणाइनिहण ८० | सुपिणगविजापहिय ५ सो दुविगप्पो भणियो २ | सो पासत्थो दुपिहो सोहग्गाइ निमित्त ६३ | सतगुणछायणा खलु २ | सविम्गसन्निभांग- समत्तो उ इयाणिं २७ सस्कृतप्राकृतमागध- ८० स्फुटमुपगतप्रामाण्य ८९ | स्वशरीरेऽपि न रज्यवि २९ होज हु वसणप्पचो २२ २२ ४ ૨૨ सर्वस्यैव हि शाखस्य सन्वजियाण जम्हा सम्वत्यामेण तहिं सव्वा वि कदजाई सामाइय ति फाउ सावजमाययण ARMA सटीकं- श्रावकधर्मविधिप्रकरणम्।
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॥ अहम् ॥ । न्यायाम्भोनिधिश्रीमद्विजयानन्दसूरिभ्यो नम ॥ याकिनीमहत्तरामनुश्रीहरिभद्रमूरिसन्य श्रावकधर्मविधिप्रकरणम्। (श्रीमानदेवसरिविवृतवृत्युपेतम्) द्वधा धर्मप्रणेतार, नत्वा वीर जिनेश्वरम् । वक्ष्ये श्रावकधारय-तन्ने धृत्तिं ममासन ॥१॥ अन पाचार्य शिष्टममयप्रतिपालनाय विनविनायकोपशर- न्तये प्रयोजनादिप्रतिपादनार्थ चागाविद गाथासूत्रमुपन्यस्तवान---- नमिऊण बद्धमाण, सावगधम्म समासओ चोच्छं । सम्मत्ताईमावत्थ-सगय सुचपीईए ॥१॥ " नमिजणे" त्यादि । इह हि शिष्टा कचिदिष्टे पस्तुनि प्रवर्तमानाः सन्त इष्टदेवतानमस्कारपुरस्सरमेव प्रवर्तन्ते । तदुक्तम्--- " प्रेक्षापूर्वझता प्राय , प्रारम्भेषु चतुष्टयम् । वक्त युक्त विनेयाना, प्रवृत्त्युत्साहवर्धनम् ।। १ ।। मङ्गल शास्त्रसबन्ध , शरीर सप्रयोज- नम् । चतुष्टयमभिप्रेत, प्रत्यूहापोहि मङ्गलम् ॥ २ ॥” इत्यादि । अयमप्याचार्यों नहि न शिष्ट इत्यत शिष्टसमयप्रतिपालनाय । तथा श्रेयास बहुनिनानि भवन्तीति । उक्त च--" अगासि बहुविघ्नानि, प्राचार्य " इति अ पुस्तके। "युन्युत्साहविर्धन" इति अ-गुम्नक । १
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॥ अहम् ॥ ॥ न्यायाम्भोनिधिश्रीमद्विजयानन्दसूरिभ्यो नम ॥ याकिनीमहत्तरामनुश्रीहरिभद्रमुरिसहब्ध श्रावकधर्मविधिप्रकरणम्। (श्रीमानदेनसरिविवृतवृत्त्युपेतम् ) वेधा धर्मप्रणेतार, नत्या वीर जिनेश्वरम् । वक्ष्ये श्रावकधर्माख्य-तन्ने वृत्ति समासत ॥१॥ श्रर चाचार्य शिष्टसमयप्रतिपालनाय विनविनायकोपशा- न्तये प्रयोजनादिप्रतिपादनार्थ चादाविद गाथासूनमुपन्यस्तवान्---- नमिऊण बद्धमाण, सावगधम्म ममासो वोच्छ । सम्मत्ताईमानस्थ-संगय सुत्तणीईए ॥१॥ " नमिऊणे" त्यादि ॥ इह हि शिष्टा कचिदिष्टे वस्तुनि प्रवर्तमाना सन्त इष्टदेवतानमस्कारपुरस्सरमेव प्रपन्ते । तदुक्तम्- प्रेक्षापूर्वकृता प्राय , प्रारम्भेषु चतुष्टयम् । वक्त युक्त विनेयाना, प्रवृत्त्युत्साहवर्धनम् ॥ १ ॥ मङ्गल शास्त्रसरन्ध , शरीर सप्रयोज- नम् । चतुष्टयमभिप्रेत, प्रत्यूहापोहि मङ्गलम् ।। २ ॥” इत्यादि । अयमप्याचार्यों नहि न शिष्ट इसत शिष्टसमयप्रतिपालनाय | तथा श्रेयास बहुविनानि भवन्तीति । उक्त च~ श्रेयासि बहुविनानि, इति अ-पुस्तक । २ "मृत्युत्साइविवधन' इति अ-पुस्तक। “ " १ भनाचाय " ने १ " हरिभद्रसूरिमस्थ भवन्ति महतामपि । अश्रेयमि प्रवृत्ताना, वापि यानि बिनाया ॥१॥" इति । १६ र प्रकरण सम्यग्दशनादिहेतुत्या योभा वर्ततेऽनो विघ्नविनाययोपशा तये, सिद्धा हायेम , उभयतास्तुनि- प्राप्तपुण्यप्रभावान् । सदुराम- तन प्रणाम प्रगति-प्रहना है. यता प्रति । मनोपाकायचेनासा, शिष्टेष्टेरिपये गति ॥१॥ पुसस्तम्या प्रवृत्स्य, श्रेयसो जमरमण । मेन न्यस्तसामध्या , सीयन्ते विनतय ॥२॥ क्षीणषु विप्रयीजेपु, जायते निरुपद्रया। श्रोतृव्याख्यातविपय-यापारद्धिपरम्परा ॥ ३ ॥ इति । तथा प्रयोजनादिरहिते प्रेक्षावन्तो न प्रवर्तन्ने, तदुतम्-" सर्वस्यैर हि शास्त्रम्य, कर्मणो याऽपि कस्यचित् । यावत् प्रयोजन नोक, तायत्त- त् पेन गृहाताम ? ॥१॥ तथा--" सिसार्य सिद्धमबन्ध, श्रोतु श्रोता प्रयनते । शाग्नादौ तेन मान्य , सपन्ध मप्रयोजन अन प्रयोजनातिप्रतिपादनार्य च। तत्र " मिऊप यद्धमाण "मित्यनेनेष्टदेवतानमस्कारमार, अयमेय चासन्यायाद्वितो. पशमहेतु । " सावगधम्म " मित्यादिना त्यभिधेयादित्रयम् । स- थाहि-श्रावधर्म समासतो पक्ष्ये' इति वदता मासान् श्रावध र्मोऽभिधेयतया निर्दिष्ट । मामाश तत्परिमानावातरादि प्रयोजन सायसाधनादिलक्षणश्च मनन्ध इति ममुदायार्थ । अयययार्थ पुनर्याख्यालसणानुरोधान योजनीय , तदम् (म पायम)-- "समुदितपदामादौ विद्वान देहि महिता, सदनु प पद तस्यैयार्थ । १ मिनिायकाता स । ३ प्रणति - अ। 2 विषये गति ' इति अ-पुस्तक पदचिह" इति । - तथा- " " श्रावधर्मविधिप्रकरणम्। पन्थ विप्रहम् । निपुणभरिणति तस्याऽऽनेप तथाऽम्य च निर्णय, बुधजनमता मूनव्याख्या भवेदिति पविया ॥१॥ "निपुणविषणाऽऽयुष्यान् शिष्यानपेक्ष्य तथेतरान्, बहुतिथपथान- यान मार्थान प्रतीत्य तथा परान् । यदिह वचसा भावार्थस्य प्रशा- सनमञ्जमा, तनिति विदुपा व्याग्व्यालक्ष्म प्रतीतमत परम् ॥२॥" इत्यादि । दह च गमनिकामात्रफलत्वात् प्रस्तुतप्रारम्भस्यानन्तरव्या- ख्यालक्षणानुरोधेन भूम्ना भानार्थकथन क्रियते । शेपत्र्याग्यालक्षण- योजना तु म्वयमेव सूरिभिवर्णनीया ।। तन " नमिकरण पदमाण मिति " ण, प्रहत्वे शदे इत्यस्य धातो " एककर्तृकयो पू- न्"ि इति क्त्वा प्रत्यये 'क्त्वातुम (म ) तूण-तुप्राणा इति प्राकृतलक्षणेन क्त्वम्तूणादेशे " क्गचजतदपयया लोपाच य- श्रुति इति तलोपे "इञ्च क्त्यातुमतव्येपु” इतीकारण 'नमिऊए' मिनि भवति । नत्वा-प्रणिपत्य, क्म् १ वर्षमान वर्तमानतीर्या- धिपतिम , अत्रापि " सर्वत्र लवरा" इति रलोपे "नो इति नस्य णत्वे चैव प्राकृतपाठ । क्त्वाप्रत्ययस्योत्तरक्रियामापेक्ष- चाहत्तरक्रियामाह-" सायगधम्म समासपो वोच्छ "मिति भा- या वक्ष्यमाणशब्दार्थास्तेपा धर्म-नि यसनिवन्धन सम्यक्त्वादि- परिणाम स, यतो नि श्रेयससिद्धि इति वचनात् तद्धेतुश्च याह्य- चेष्टा कारणे कार्योपचारात् श्रावकधर्मस्तम्, 'समासव 'सोपेणे- यात्मन प्रस्तुतप्रवृत्ते प्रयोजनमाह । 'वक्ष्ये' अभिधास्ये, “वचोऽत उच्च" इत्यादिना च प्राकृतलक्षणेन 'वोन्छ । मिति भवति । एव " ग - . f 44 १ एम य। २ "प्रनिपत्य 'च। क - 1 -- - . (४) हरिमद्रसूरिसंहा सर्वत्र प्राकृतलक्षणप्रसिद्ध स्वयमेव दृश्यम् , सर्व हि नोच्यते अन्य- विस्तरमयात् , विशेषप्राय तु भणिप्याम । विविध श्रावरधर्मम् ? इत्याह--" सम्मत्ताईभावत्यसगय" सम्यक्त्वम्-अमिधास्यमान- स्वरूपम्, आदिशब्दादणुव्रतादिग्रह , सम्यक्त्वादीना भावार्थ -पर- मार्थ सम्यक्त्वादिभावार्थ ," हस्वदीर्घा मिथ " इति वचनापूर्व- परम्य दीर्घत्वम् , सम्यक्त्वादिभावार्थेन सगत-युक्त सम्यक्त्वादि- भावार्थसंगतम् । सूननीत्या ' श्रागमन्यायेन, अनेन तु सर्पशा- गमानुवृत्त्या प्रपरपस्य प्रामाण्यमाह।। १ ।। एवमाद्यगाथाया मद्गलादिचतुष्टयमभिधाय श्रावधमस्य प्र. स्तुतत्वात् श्रावकपदस्यान्वर्थमाह- परलोगहिय सम्म, जो जिणवयण सुणेइ उपउत्तो । अइतिव्वकम्मविगमा, सुकोसो सावगो एत्थ ।। २ ॥ " परलोग" गाहा व्याख्या-जिनवचन य भृणोति स श्रावक इति योग । तन" श्रु श्रवणे" अस्मात् लुणि प्रत्ययेऽ- कादशे ऐन्यावादेशे च श्रावक इति भवति । ततश्च श्रवणक्रिया- योगात् श्रावक , एवं चाविप्रसङ्ग , प्रतिनियतच भावकव्यपदेशभागा-' -" सम्मत्तम्मि उ लद्धे, पलिअपुइत्तेण सा- घओ होजा" इत्यादि । ततो नियमयन्नाह-जिनवचन य रोति स ायक । जिनपचनस्वरूपमाह---परलोगहिन ' पर- लोक देवादिजन्म प्रधानजन्म या तस्मै हित-पध्य परलोकहितम्, जिवनश्रवणादि परलोकोऽनुकूल एव भवति । सम्यगिति अपये गमे रूद्ध , यदुतम्- - चनाति प्र० " प्रवणत्रिया.
- , -- श्रावकधर्मविधिप्रकरणम्। क्रियाविशेषणम् ।। ' सम्यग् ' अवैपरीत्येन श्रवणविध्याराधनेन, न तुच्छलान्वेपणादिनेत्यर्थ । श्रवणविधिश्चायम्.--" निहाविगहा- परिव-लिएहि गुत्तेहि पजलिउडोहि । भत्तिवहुमाणपुष्व, उवउत्तेहिं सुरणेयव्व ॥१॥" इत्यादि । तदेवाह-उपउत्तो 'त्ति 'उपयुक्त' दत्तावधानोऽपरशुश्रूषापरिहारेण, तया हि तत्त्वपरिणतेरभावात् । तदुक्तम् " विपरीता वितरा स्यात्, प्रायोऽनाय देहिना सा हु । या सुमनृपकथानकशुश्रूषापस्थिता लोके ॥१॥" एवविधश्रवणे हेतुमाह--'अइतिव्वकम्मविगमा' इति अतितीवस्य प्रत्युत्कटस्य कर्मण -ज्ञानावरणीयमिध्यात्वादेगिमाद्-विनाशादतितीवकर्मविग- मादिति । "इसमें दुहि लोप " इति असेलोपे " जास्यासु दीर्घत्वे धैव भवति । ततश्चातितीप्रकर्मविगमाद्धतोर्य शृणोति स आयक, नहि तीनकर्मविगममन्तरेण सम्यक्छषणसभव , परिपते- रभावात् । विशिष्टफल च श्रवणमभिप्रेतम् , तश्चैवमेव । तदुक्तम्--- "कह सामाइयलाभो', तस्सव्वविघाइदेसवाधाई । देसविधाईफडग- अणतवाढीविसुद्धस्स ॥१॥ एव ककारलभो, सेसाण वि एवमेव कमलभो ।" इत्यादि । शेष तु दूरभव्यस्य श्रवणमध्यश्रवणकल्पम् , तदुतम् आद्य भागरोग्य, बीज चैपा परस्य तस्यैव । अधिका- रिणो नियोगा [-चरम इय पुद्गलावते ॥ १॥ स भवति कालादेव, प्राधान्येन सुकृतादिभावेऽपि । वरशमनौषधसमयव-दिति समय- विदो विदुनिपुणम् ॥ २ ॥ नागमवयन तद्वत्, सम्यक् परिणमति नियम एपोऽत्र । -शमनीयमिवाभिनने, ज्वरोदयेऽकाल इति कृत्या १"हिं" इति भ। २ " तथा हि"३" अवहेतु-" ! . - -- - " - हरिभद्रसूरिसइब्ध ॥३॥" इत्यादि । 'स' इत्यादि। स इत्यनन्तरोदिष्ट गित्कृष्ट प्रधान , मुरयनाराव्यपदेशनिबन्धनभाजनत्यात् तस्य । यद्वा 'शुमा' शुलपाक्षिक 'सास्वरूप श्रापक श्रन ' प्रस्तुते, न तु श्रवणनियासबन्धमानेणेति गाथार्थ ॥॥ ननु किमिति मम्यक्ट्रवणनियन्धनमहासवानेयान भार- योऽधिनियते नापर , उच्यते--तस्यैव क्रियाफ्लयोगेन प्रस्तुता- नुष्ठानाधिकारित्वादन्यस्य तत्करणे दोपसभवादित्याह- अहिगारिणा खु धम्मो, कायथ्यो अणहिगारिणो दोसो। आणामगामो चिय, धम्मो श्राणाएँ पडिबद्धो ॥३॥ अहिगारिणा " गाहा व्यारया-अधिकरणमधिकार प्रस्तुतरिया प्रति यान्यत्वम् , स च प्रदर्शितपमहासलक्षणो वक्ष्य- माणार्थित्वादिचिह्नव्यङ्गय , स विद्यते यस्यासावधिकारी, मत्वर्थीये- नविधानान्, तेनाधिकारिण। 'खु ' इति निश्चयवितर्कसभावनासु इति निश्चयादियचन खुर्निपात । ततश्चाधिकारिणेव धर्म कर्तव्यो आपरेण, अधिकारिण एय नियाफलयोगात्, इतरम्य थानस्यापि सभवात् । पतदेवावधारणफलद्वारेणाऽऽविष्करोति-"अहिगारिणो दोसो' ति । अधिकारी यो न भवति सोऽनधिकारी-प्रतिपादित- प्रतीप तस्य दोप -अनर्थो धर्मकरण इति गम्यते, अनधिकारिणो हि विराधनानिनन्धनोधार्थ एव । अत एवोतम्-"अयिधिकृता- द्वरमतमेव" । तथा चागम -"जह चेव उ मोक्खपला, आणा आपहिआ जिणिंदाए । ससारदुक्खफ्लया, तह चेव विराहिा, ' होइ॥१॥" उथा--"धर्मानुष्ठानतध्यान् , प्रत्यपायो महान् मषेत् ।
f + - आयधर्मविधिमकरणम्। रोदु सौषजनको, दुष्पयुक्तादिवोपधात् ।। १ ॥" ननु योन कथ चतुर्थभङ्गपतितरूपकोपमितचैत्यवन्दनाधिकारेभिहितम् ---"एर पि जुजइ चिय, तयणारभा उ नप्पल व जओ । तप्पशवायभावो,' वि हदि तत्तो न जुत्तो ति॥ १॥" इत्यादि । श्रन हि विधिही- नभावशून्यचैत्यवन्दनाया अपि लौकिकत्येन लौकिकवन्दनाफलमुक्त- मेव, अनोचते-नन्वत्राप्येकान्तानाराधनाद्वारेण विराधनाजनिवा- नर्थफलाभाव एवोक्तान हि किन चिकित्साक्रियाभासमानध्यापारप- रोऽपि पुरपोऽत्र तथाविधचिकित्सापक्रियाकृतमपकारमवाप्नोति । विराधनामद्भावे तु तन्निबन्धनोऽनर्थ प्राप्तन्य एव सत्प्रवृत्तेन प्राणिना। आराधनापनेऽपि यद् दर्शनलाधयादिनिदानमसद्विधानमा धत्त तनिमित्त विशेपतोऽनर्थमवाप्नोत्येनामी । तदुसम्- " सीयलनिहारो खलु, भगवतामायणानिओगेण । ततो भयो अणतो, क्लेिसरहलो जो भणिय ॥ १॥" इत्यादि, वत् स्थित- मिदमनधिकारिण कारणे दोप इति । अनैव हेतुमाह-"आणा भगाओ चिय" इति । आज्ञा-सर्वज्ञवचन तस्या भग-उल्लाहन चिय चेय एवार्य " इति एवकारार्थे चियनिपात, आशाभग एवात्र दोषकारणम्, शेषस्याशुभभावादेरयान्तर्भूतत्वात् नापरमियपधारणार्थ नबेतदेय कथ यदुताऽक्षामने दोपोधर्मस्तु न भवति । इसाह--"धम्मो श्रारणा पहिवरो" इति । "दुर्गति प्रस्तान जीवान, यम्माद्वारयते तत । धत्ते चैतान शुभे स्थाने, तम्माधर्म इति स्मृत ॥१॥" इति वचनात् 'धर्म सतण्य, . अलस्वरूप " " करण - (८) हरिभद्रसूरिसाधे आज्ञाया' उक्तस्वरूपायामेव, " टाडसिङहीनामिदेदात इति डेरेदादेश । 'प्रतिबद्ध सवद्धो व्यवस्थित इति यावत् । तथा चोषम्--"श्रारणा मिश्र चरण, तभगे। गाहा ॥ तथा- "जम्हा न धम्ममग्गे, मोतूण श्रागम इह पमाण । विनइ छउम त्थाण, तम्हा तत्थेव जइयव्य ॥१॥" इत्यादि । इति गाथार्थ ॥३॥ अधिकारिणमेव छिद्मस्थज्ञानिलक्ष्य साक्षादाह- तत्यहिगारी अत्यी, समत्यो जो सुत्तपडिकुट्ठो । अली उ जो पिणीओ, समुपठिो पुच्छमाणो य ॥४॥ " तत्थहिगारी " व्याख्या-'तन्न' इति प्रस्तुते श्रावक- धर्म 'तत्र' एवयवस्थिते वा सर्वत्रैन धर्मे 'अधिकारी, योग्य नियाफलभागित्यर्थ । किविध ? इत्याह-अर्थी समर्थको यो न सूनप्रतिउष्ट । तनार्थ -प्रयोजनमभिधास्यमानलिङ्गगम्य यस्यास्ति सोऽर्थी, पुस्पार्थेषु धर्मस्य प्राधान्यात् तनाऽऽसवनातत्पर इत्यर्थ , न तु पापलिङ्गधर्मपथ्यारुचिमान् । तथा समर्थ एव समर्थक, यावादेरातिगणत्यात्म्यार्थिक कन्, "जातो या स्वार्थे केल्लोला" इति वा प्राकृत कप्रत्यय । शप्त न त्वङ्गीतमपि धर्म परेभ्यो भयान् त्यजति । तथा यो न सूनप्रतिकृष्ट, 'य ' इति उद्देशे, य एवविध सोऽधिकारोति योग, सूत्रेण-आगमेन प्रति कुष्ट-निवारितो नेति योग , क्यचिदर्थित्वसामर्थ्ययुक्तोऽपि शाम्बे निवारितोऽनधिकार्यवेत्यभिप्राय । तयाऽन्यैरप्युक्तम्---" अर्थी समर्थ शास्त्रेणापर्युदरतो धर्मेऽधिक्रियते" इति । एषा चाथित्वादि- समर्थ, , १ भीत्या य।
- प्रावकधर्मविधिमकरणम्। गुणानामेवमेव प्रवर्तकनिरूपणाप्रवृत्तेरित्यमुपन्यास । तथाहि- नानविकी सामध्यनिरुपणासर, अर्थित्व एव तत्समवात् । अत्त ण्य फैथिदुच्यते--" यो येन रसस्तमनुप्रवेष्टुमव्याहतस्वस्य स गय पन्था । अर्थित्वसचोभजडेक्षणेन, नोीक्षणीयस्त्वमरेश्वरोऽपि न चासमर्थे शास्त्रपर्युटामपालोचनावकाश, असाम- र्यनेन शेपचिन्ताया निरवकाशन्यात् । पामेवाादिगुणाना कार्य- लिगगम्य स्वरूपमाह--'अत्थी उ जो' इत्यादि, अर्थीति व्याख्ये. यनिर्देश , तुशब्द पुन शनार्थे । ततश्चायमर्थ ---अर्थी पुन कथ लक्ष्य ? तनाह यो विनीत ममुपस्थित प्रच्छश्व' वन विनी- त --धर्मप्रस्पर प्रति प्रतिपत्तिष्पाभ्युत्थानादिविनय कुर्वन वि लक्ष्यते, तथा सम्यग् उप-सामीप्येनोस्थित -धर्मभवणादी व्यक्तीह- नमम्मुग्पीभान, न तु प्रयोजनान्तरैरेव बोटीकृतत्वादसम्मुखीन, तथा प्रन्छश्च “प्रन्छ शीप्मायाम् " इति धाता शतु "न्तमाणौ शतृशानचो " इति माणादेशे प्राकृते पुच्चमाण इति स्यात् । शीलार्थो या "शक्तिवय शीलेपु" इति लट शाननादेश | 'प्रच्छन्' शीप्मन् , धर्मन्यरूपाहणविध्याटिकमिति गम्यते ।- पशब्दस्तूछ- द्वारेग विभिरपि लिग समुन्ति प्रायोऽर्थत्व परिपूर्ण लक्ष्यत इत्याह । इति गायार्थ ॥४॥ ममयं न्याचष्टे- होति समत्यो घम्म, मृण्माणों जो न चीहड परेसि । माइपिडमामिगुरुमा-इयाण धम्माणमिएमाण ॥ ५ ॥ "होइ समत्यो" गाहा व्याख्या-'मयति जायने 'समर्थ' 1 . तिरिकेभ्य , (१०) हरिभद्रसूरिसंबन्ध इति व्यारयेयम् । विविध ? इत्याह-धर्ममित्यादि । 'धर्म' उपस्वरूप चिकीर्षित 'पुर्यारण ' इति वर्तमानसामीप्यनिर्देशात् करिष्यमाण -धर्म विधास्यमानो य न निमति । नो प्रस्थति, "भियो भाषीहौ" इति भियो बीहादेश । 'परेभ्य । आत्मव्य कचित् पञ्चम्या " इति पष्ठीभाव | परानाह- 'मातापितृस्वामिगुर्यादिभ्य ' मानादय प्रतीता, तेपा द्वन्द्व कृत्वा ऽऽदिशन्दस्य यथायोग योग । ततश्च मातापिनादिभ्यो न निभेति, अनेन च योनिसबद्धा वन्धो गृहीता / तथा " स्वाम्यादिभ्य " इत्यनेनापि रक्षकसहायादिरूपा राजामात्यमित्रादय उपात्ता । तथा "गुर्वादिभ्य " इत्यनेन चान्वयाद्यागता अपरधर्मदावार केलो पाध्यायादयश्च तदाश्रिताश्वोपाचा द्रष्टव्या | एभ्यश्च किंभूतेभ्यो भय समवति ? इत्याह --'धर्मानभिज्ञेभ्य ' अधिकृतधमाश लेभ्य', अधिकृतधमकुशलास्तु तदनुकूला ण्य भवेयुरित्यभिप्राय । ततश्चैतेभ्यो यथोत्तरकालभानिभ्यो बहुतमादिभयनिवन्धनेभ्यश्च यो न बिभेति स भयत्रयमुक समर्थोऽत्र द्रष्टव्य । इति गाथार्थ ॥५॥ सूनाप्रतिउष्टमार- मुत्तापडिकुट्ठो जो, उत्तमधम्माण लोगविक्साए । गिहिधम्म बहु भएणइ, इहपरलोए निहिपरो य॥ ६ ॥ उचिय सेवइ वित्ति, सा पुण नियकुलकमागया सुद्धा । माहणसत्तियवहमा-ण सुद्धमुद्दाण नियनियगा ।।७।। 'सुत्तापडिकुट्टो" गाहा " उचिथ" गाहा व्यारया-सू ~ - “ 1 , १ कुलगपाध्यायादय - धावकधर्मविधिप्रकरणम् । (११) त्राप्रतिकृष्ट इत्युक्तस्यार्थमाह-"जो उत्तमधम्माण " इत्यादि । य इत्युद्देश , यत्तेनोनित्यामिसबन्धाद् य एवविध स सूत्रापति- कुष्ट इति योग । ' उत्तमधम्माण ' इति उत्तमधर्मेभ्य, प्राग्वत् पञ्चम्या पष्टी | 'लोकापेक्षया' लोकाप्रयेण, लोके हि-"ब्रह्मचारी गृहस्थाश्य, वानप्रस्थो यतिस्तथा ।" इत्यादयो ये धर्मा रूढान्तेभ्य सकाशाद् गृहिधर्ममिति सामान्यनिर्देशेऽपि प्रमानधिकृत श्रावकधर्म 'यहु मन्यते' ज्यायास प्रतिपद्यते, लोकधर्मापक्षयैव श्रावकधर्म बहु मन्यते, न तु लोकोत्तरयतिधर्मापेक्षयापीत्यभिप्राय । इहपरलोके विधिपरश्च सूनाप्रतिकुष्ट इति सण्टङ्क | तोह-इत्यत्लिन् जन्मनि, परलोके-धन्यजन्मनि, पृथय् पदे समाहारद्वन्द्वार सप्तम्येकवचनम्, विषयमामी चेयम , इहलोकविपये परलोकविषय इत्यर्थ (इहेति पाय- धर्माधिकारनिरूपणानसरे वा परलोके विधिपर परलोकनियन्ध- नधर्मानुष्ठाने प्रेकृतकल्पाराधनपरायण इति भार ।' च.' समुपये ॥६॥ तथा 'उचिता' प्रकृतधर्माप्रतिकूला 'सवते' प्रायते'वृत्ति' वर्ग- नम् , लोकधर्मविरद्धवृत्तिपरिहारगोचितामेव वृति य सेवते स सू- वाप्रतिकुष्ट इत्यर्थ । वृत्तिमेवाह-'मा पुनर्निजकुलकमागता शुद्धा मा तु वृत्तिर्निजलप्रमेण-स्वान्वयपरिपाट्याऽऽगता-प्राप्ता शुद्धा- तथाविधदोपरहिता, अनेन फुलक्रमागतामपि तथाविधाशुद्धा योनि- पोपणादिका वृश्चिमनुचितामाह । मा तु माझणक्षत्रियवैश्याना शुद्ध- शूदाणा च चतुर्ण वर्णानाम् , शुद्धबिशेपण शूदाणा तथाविधीवरा- टिव्यवच्छेदार्थम् । 'निजा निजा'आत्मीयाऽज्मीया, वीप्साया द्वि- " इत्सम्या -"ब! - "प्राक्तकापा-'ब "भाद्रियत " ब।
(१२) हरिभद्रमूरिसह) रुको पूर्वस्य हस्वत्वे के च प्राकृते 'नियनियगा' इति भवति । ततश्चैवविधा वृत्ति च य शुद्धा सेवते स सूनाप्रतिकुष्ट इत्यावेदित भवति ॥ ७॥ वदेव बहुमानविधिपरतोचितवृत्तिभिर्यथोपन्याससभविनीभि सूत्राप्रतिकृष्टत्वमेवयोध्य साप्रत यहुमानित्वादिगमकानि प्रत्येक पश्च पश्च लिगानि जिज्ञापयिपुराचार्य समन्धमारचयन्निदमा- एए पुण विएणेया, लिंगेहिंतो परोपयारीहिं । ताड तु पच पच य, तिएह पि हवति एयाइ ॥८॥ "एए" गाहा व्यारया-'एते' इति बहुभान्या (माना)- दय, पुन शब्दो भिनयाक्यतायाम् , 'विक्षया 'मातव्या 'लि अभ्य ' गमपचिप्लेभ्य , " भ्यमश्च हितो मुतो "इति भ्यसन्तमि- दम् । 'परोपकारिभि ' परोपकाराय धर्मयान्यादानासुद्यतैराधा र्यादिभिरित्यर्थ । प्रवर्तकाटिभि । इति पचित्पाठ, तनापि त एव प्रवर्तका , श्रादिशब्दाहायपशिक्षकादिपरिग्रह । 'सानि तु' लिङ्गानि पञ्च पश्च 'त्रयाणामपि' बहुमान्या(माना)दी 'भवति' सन्ति । एतानि ' वक्ष्यमाणानि । इति गाधार्थ ॥८॥ तान्येयाह- गिहिधम्मकहापीई, निंदाऽसवण च तदणुकपा य । सविसेसजाणणिच्छा, चित्तनिवेसो तहिं चैव ।।६।। गिद्दिधम्म" गाहा व्यारया- ग्रहिधर्मकथाप्रीति , - - भववादग्य " या - । च. - ५ प्रायफधर्मविधिप्रकरणम् । प्रस्तुतनावकानुष्ठानकथने प्रेमेति परमार्थ , सा बहुमानजन्यत्वाद्- बहुमानगमक लिङ्गम् , एव सर्वत्र योज्यम् । तया 'निन्दाशिवण' प्रनमात् श्रावकधर्मनिन्दाया अश्रवणम् । 'समुञ्चये । सद नुकम्पा' निन्दाप्रवृत्तप्राणिकरुणा, सापि बहुमानकार्यमेष, सबहु- मानाद्धि तन्निन्दोद्यवान प्रापदास्पद प्रतिपद्यमानोऽनुकम्प, लिस्य- मानानामनुकम्पास्पदत्वात् , न तु द्वेष्टि, पुरुषार्थानुपयोगात् । ण्य बहु- मानकार्यत्वमुत्तरयोरपि द्रष्टव्यम् । 'च' समुच्चये । तथा सविशेषा शानेन्छा-जिज्ञामा सविशेषज्ञानेन्छा, प्रस्तुतगतेति गम्यते । तथा 'चित्तनिवेशस्तत्रेय ' इति चित्तस्य-अन्त करणस्य निवेश -न्यास तनैव' प्रस्तुतधर्म एव । इति गाथार्थ ॥ ६॥ विधिपरतालिङ्गान्याह- गुरुनिणयो तह काले, नियए चिइनदणाडकरण च । उचियासण जुत्तसगे, सज्झाए सययमुक्ोगो ॥१०॥ गुरु " गाहा व्याग्या-गुरव -मानादय प्रस्तुवधर्मस्य दातारो वा तेषामुचितप्रतिपत्तिर्गुरविनय , सहि सर्वत्र धर्मश्रवणादी क्रियमाणो विधिपरता गमयति । तथा 'फाले निजे चैत्यबन्दना- दिकरणम्' तन चैत्यपन्दनाया निज काल सन्ध्यानयानिलक्षण । यदुक्त पूजानुपनेण--" कालो इइ विष्णेश्रो, समायोलिदिए ताव पोहेण । वित्तिफिरियाऽविरुद्धो, ग्रहवा जो जस्म जावइओ ॥१॥ । चैत्यवन्दनादे ' इत्यादिशात् प्रस्तुतधर्मप्रवणग्रहण देशोचिते काले करण-विधानम् । च प्राग्नन् । बयोचितासन - -- १ ५ दृश्य ब।
har हरिभद्रमुरिम सर्वत्र धर्मश्रवणादो, छन्दोमगभयादुत्सरेण समस्त निर्देश । उया 'युगस्वर' उचितध्वनि सर्वत्र चैत्ववन्दनादौ । तथा 'स्वाध्याये' सिद्धान्तप्रसिद्ध ' सतत ' सर्वदा । उपयोग । उपयुकता, समे- सद्धिकतेऽन्यत्र च नियमाण विधिपरता गमयतीतिविधिपरतालि. त्वमस्य द्रष्टव्यम् । इति गाथार्थः ॥ १० ॥ उचितवृत्तिलिङ्गान्याइ- सचजणवतहत, अगरहिय कम्म वीरया वसणे । जहमती चागतवा, मुलद्धलक्पत्तण धम्मे ॥ ११ ॥ " सध्वजण" गाहा व्याख्या-सर्वजावल्लभव' मा- ललोकप्रियत्वम् , तद्धि समुचितवृत्तिवृत्त्येव निवर्तयतीनि उचित- सेर्लिङ्गम् । तथा 'अगर्हित' अनिन्दित 'धर्म' जीविकालक्षणम् , तत् सस्कृतात सिद्धान माध्यमानाच" इति वचनात्सिद्वायम्पाया विवतितत्याा मस्तकृत ण्य मेर्लोप , प्राकृते तु पम्म 'इति भाव्यम् । तथा ' घीरता' देन्यानाश्रयणरूपा ' व्यसो' विपदि । तथा ' यथाशक्ति' शक्त्यनतिक्रमेण, प्राक्तत्वात्सख्यसमासेऽपि दीर्घ । ' यागतपसी ' प्रतीते, " द्विवचनस्य प्रवचन " इत्योवो असि धागतवा' इति भवति । तथा 'सुल धलक्ष्यत्व' परमा लक्षकत्व 'धर्मे ' धर्मविपयम् । एतदप्यखिलमौचित्यवृत्रिनिमि- समेव प्राय इति तमिहत्य सिद्धम् । इति गाथा ॥ ११ ॥ प्रफल निगमयन्नाद- एएहि तदहिगारितण धुव लक्सणेहि नाऊण । गिहिपम्म गाहिया, सिद्धतनिराहणा इहरा ॥ १२ ॥ " - - - । যুনিৰিখি। "" गाझा न्याया' दिमि तदपिकारित्वं महतश्रावन व दुईजन लक्ष्यते तरिति लक्षणानि-निशान इन्वाद धर्म' प्रकृत प्राहयेन्, बदाययिनि गन्ने पा शाति , तेन यापनदध्ये विधव, अन्य देशमा वाद-सिद्धान्तविण्यना' संबंद्राबस्टना, दरहिट "आलोषणाए पिएए" इत्यादि। इरमा अन्य दर निम्मपणामन्तरेणापि न पाहणामिन्यं गाया तमेव पाहणीयतयोदित आरकर्म भीख्या- सम्मत्तमलिया ऊ, पचाणुच्चय गुपवा निन्त्रि । चउसिक्सापयमहिना, मारगधम्मा दुवानमहा ॥१३॥ H मम्मत्त कारण यपा तानि सम्यक्त्वमूलानि, 'कमलावरोदा पुलिगना । —तु ' अधारणे, मन्यन्यमूलान्येव, नहि मन्यात्र मन्तरपाणुप्रसारिमभन । टुसम्मन द्वार मतिष्टानमाग भाजन निधि । द्विषट्कस्यास्य धर्मस्य सम्बनिमियत ॥१॥ पञ्चेति मख्या, अनि लयूनि महाप्रतापगया तानि-यठीमान्द रणुप्रतानि । तथा गुणत्रनानि चोरिए, पुलिङ्गना प्रावन । नत्व रोति सर या, शिक्षा अभ्यास तत्प्रधानानि प्रतानि शिक्षामवाति पुन पतु शदेन समान सहायान प्रारुतबाहा, ते सहित युट १ प्रदानुग्लिन चरितम् न्यरूपार्वे" मि० ५-३-१६ : तिरप्रत्यय ' गृहाणादिनि । अन्नर सिप्रत्यय सिद्धगिद पन् । " 142.
। - हरिभद्रसूरिस, श्रावकधर्मोऽधिकृत 'द्वादशधा' द्वादशप्रकारो भवतीत्यध्याहार । इति गाथार्थ ॥१३॥ सम्यक्त्व तावदाह- तत्य तिहा सम्मत्त, सइय उपसामिय सोपसम । मिच्छत्तपरिचाएण होइ तव्यज्जण चेय ॥१४॥ तत्थ " गाहा व्याख्या-तत्र' श्रावकधर्मे निधा' त्रिप्रकार 'सम्यक्त्य' शुभात्मपरिणामविशेषरूपम् । त्रैविध्यमाह--- 'क्षायिक ' क्षयनिप्पनम् , तथा 'प्रोपशमिक ' उपशमीप्पनम् , तथा 'सायोपशमिफ' क्षयोपशमाभ्या निष्पन्नम् । तत्स्वरूप सून- कृतैवैवमन्यनोक्तम्---" मिच्छत्त जमुइएण, त मीण अणुइय च उवसत । मीसीभावपरिणय, वेइजत गोवमम ॥ १ ॥ उपसा मगसेढिगयस्म होइ उवसामिश्र तु मम्मत्त । जो या अत्यतिपुजी, अखविअमिच्छो लहइ सम्म ॥२॥ सीणम्मि उइएणम्मी, श्रणु- इजते अ सेसमिच्छत्ते । अतोमुहुत्तमेत्त, ज्वसमसम्म लहइ जीवो ॥ ३ ॥ ऊसरदेस दड्ढेल्लय व विग्माइ वणदवो पाप । इन मि च्छस्स अणुदए, उवममसम्म लहइ जीयो || ४ ॥ खाणे दुसरण मोहे तिविहम्मि नि भानियाणभूयम्मि । निप्पचवायमल, सम्मत्त साइय होद ॥५॥ इह च प्राधान्यात् क्षायियादिप्रमेणोपन्यास, अत पश्चानुपूर्या गाथाभि म्यरूपमेपा द्रष्टव्यम् | रोचकनिसर्गर- च्यादिरूप तु तद्भेदान्तभाव्येवेति न पृथगुक्तम् , अन सक्षेपस्य प्र स्तुतत्वात् । तच तत्त्याधश्रद्धानशुद्धात्माध्यवसायस्वरूपममतो व श्यति । तत्र परोक्षज्ञानिनामुचितागुचितप्रवृत्तिनिवृत्तिव्ययम्, 'अ- , 4 7 धायकधर्मविधिप्रकरणम्। तस्तदभिधानमुसेन तनापि चानुचितनिवृत्तिपूर्वकत्वादुचितप्रवृत्तेरनु- चितनिवृत्तिधारण तावत्तत्स्वरूपमाविनिफीपुरह-'मिच्छे' 'यादि । मिथ्यात्वम्-अभिधास्यमानस्वरूप , तत्परित्यागेन-उत्परिहारेए. भवति जायते । यद्यपि तत् परमार्थत कर्मप्रन्थिभिदात प्रादुरस्ति तथाऽपि तम्यामपि मिथ्यात्वपरिहारादय कारणीभवन्त्येवेत्येतद्रा- याभिधानम् । 'तद्वर्जन' मिथ्यात्ववर्जनम् , चः पुनःशदायें, मिथ्यात्ववर्जन पुन 'एतद् ' वक्ष्यमाणम्, 'एन' वा वक्ष्यमाण- प्रकारेण, प्राकृतत्वाच" कगच-"इत्यादिसूनेण बलोपे समान एवं पाठ । इति गाथार्थ ॥ १४ ।। तदेवाह- न करेइ सय मिच्छ, न कारवेई करतमरि अएवं । नो अणुजाणइ मणसा, एव वायाएँ, कारणं ॥ १५॥ " न करे " इत्यादि व्याख्यान करोति स्वय नकि. धत्ते पात्मना ‘मिश्या ' मिध्यात्वम्, प्राकृतत्वाचैवम्, 'न का- रयति' न प्रयोजको भवति, मिथ्यात्वमित्यनुवर्तते, 'फुर्वन्तमप्य- न्य विद्धतमप्यन्य न समनुजानाति ' नानुमन्यते 'मनसा मनोयोगेन।' एव ' ति कृतकारितानुमतिमि वाचा.. भाग्यो- गेन । ' कायेन ' काययोगेन, एवमित्यनुवर्तते । तेनश्च निवियेनापि योगेन निविधमपि कृतादिभेट मिग्यात्य परिहरतीयावेदित भवति । मन प्रभृतिभिश्च कृतादिरूपमुत्रन स्वयमेनाभिधास्यतीति । इति - , AN गाथार्थ ॥ १५ ॥ १ सास्ता । "कायमान " | " M 4 तत्थ हरिभद्रसूरिसहाय श्रावधर्मोऽधिकृत 'द्वादशधा' द्वादशप्रकारो भयतीन्यध्याहार । इति गाथार्थ ॥ १३ ॥ सम्यक्त्व तावदाह- तत्य तिहा सम्मन, सत्य उपसामिय समोवसमं । मिच्छत्तपरिचाएण होइ तव्वज्नण चेय ॥१४॥ " गाहा व्याख्यातन' श्रावकधर्मे निधा' निप्रकार 'सम्यक्त्य' शुभात्मपरिणमविशेषरूपम् । विध्यमाह--- सायिक ' क्षयनिप्पनम् , तथा 'ओपशमिय' उपशमनिष्पनम् , तथा 'चायोपशमिफ' क्षयोपशमाभ्या निप्पमम् । तत्स्यरूप सूम कृतवैवमन्यनोषम्-" मिच्छत्त जमुइण्ण, त गीण अणुइय प उयसत | मीसीभायपरिणय, वेइज्जत गोवमम ॥ १॥ उपसा मगसेढिगयस्म होइ उवसामिष तु सम्मत्त । जो या अफयतिपुजी, अखविअमिच्यो लहइ सम्म ॥२॥ सीम्मि उइएणमी, श्रणु इझते अ सेसमिन्छत्ते । अतोमुटुसमेत्त, उवसमसम्म लहइ जीवो ॥ ३ ॥ उमरदेस दड्ढेल्लय प विज्माद यणदयो पप्प । इअ मि यस्म अणुदए, उवसमसम्म लहइ जीयो ॥ ४॥ सीणे दसए मोहे तिविम्मि पि भवनियाणभूयम्मि । निप्पश्चयायमऊल, सम्मत्त साइय होइ ॥ ५॥" इह च प्राधान्यात् क्षायिकादिकमणोपन्याम, अत पश्चानुपूच्या गाथामि स्वरूपमेपा द्रष्टव्यम् । रोचकनिमर्गरु- च्यादिरूप तु तद्भेदान्तर्भाव्यति न पृथगुप्तम्, अत्र सक्षेपस्य न स्तुतत्वात् । तच तत्वाधश्रद्धानशुद्धात्माध्यवसायस्वरुपमग्रतो प क्ष्यति । तथ परोक्षज्ञानिनामुचितानुचितप्रवृत्तिनिवृत्ति यद्यम् , अ• - . मायकधर्मविधिप्रकरणम् । (१७) तस्तदभिधानमुसेन वापि चानुचितनिवृत्तिपूर्वकत्वादुचितप्रवृत्तेनु- चितनिवृत्तिद्वारेण तायतत्स्वम्पमानिश्चिकीपुराहमिच्छे त्यादि । मिथ्यात्वम्-अभिधास्यमानस्वरूप उत्परित्यागेन-वत्परिहारेण भवति जायते । यद्यपि तत् परमार्थत कर्मपन्थिभिदात' प्रादुरस्ति तथाऽपि तस्यामपि मिथ्यात्त्रपरिहारादर कारणमवन्येक्यता- वाभिधानम् । तद्वर्जन ' मिध्यात्वर्जनम्, च पुनःशदार्थे,- भिध्यात्ववर्जन पुन 'एतद् ' यक्ष्यमाणम्, 'एर वा वक्ष्यनाए- प्रकारेण, प्राकृवत्वाच "कगच-"इत्यादिसूनेण यलोपे समान एवं पाठ । इति गाथार्थ ॥ १४ ॥ तदेवाह--- न करेइ सय मिच्छ, न कारवई करतमवि अएप। नो अणुजाणड मणसा, एव वायाएँ काएग ।।१५।।" "न करे" इत्यादि व्यारयान करोति स्वयं नवि- धत्ते प्रात्मना 'मिथ्या ' मिध्यात्यम्, प्रान्त्वाचैवम्, 'न का- .. रयति ' न प्रयोजको मनति, मिथ्यात्वमित्यनुवर्तते, 'पूर्वन्तमप्य- . न्य ' विदधतमन्यन्यं न समनुजानाति' नानुमन्यने 'मनसा' मनोयोगेन।' एर' ति यतकारितानुमतिमि 'वाचा' वाग्यो- गेन । ' कायेन ' काययोगेन, एरमिन्यनुवर्तते । ततश्च विवियनापि योगेन निविधमपि कृतादिभेद मिथ्यात्व परिहतीयारेरित मावि । मन प्रभूतिभिश्च कृवादिरूपनुत्तरत्र स्वपमेवामिधास्यतीनि । इति , , . 1 गायार्थ ॥१५॥ r सतनदा"। ॥ अतथा M .
1 -- H (१८) हरिभद्रसूरिसंहद मिप्यात्वस्वरूपमाविष्णुप्रस्तत्वार्यभूता प्रवृत्तिमाह--- मिच्छत्तमणेगविह, सुयाणुसारेण होइ विएणेय । लोइयदेवेसु पसत्यमणपइकायवापारो ॥ १६ ॥ " मिच्छत्त" गाहा व्यारया-मिथ्यात्व' विपर्यस्ता त्माध्ययसायरूपम्, इह व यद्यपिजीवपरिणाम ण्य मिथ्यात्व क्यापि परिहारविषयीझवामेव प्रवृत्ति हेतुफलभावेन मिथ्यात्वमाह । 'म नेकविध ' अनेकप्रकारम् , देवतादिप्रतिवस्तुविपर्ययसमवात् । 'शु- वानुसारेण' आगमानुसारेण । प्रागमस्तु- समरणोवासो पुवामेव मिच्छत्तानो पडिकमइ सम्मत्त उवसपनइ । णो से कप्पड़ अजप्पभिई अरणतित्थिए वा अएणतिथिदेवयाणि या अपणति- स्थिअपरिग्गहिआणि अरहतचेइयाणि पा बदित्तए या एमसित्तए पा, पुयि प्रणालत्तेण आलवित्तए या सलवित्तए घा, तेसिं अ- सण वा पाण वा साहम वा साइम या दाउ वा नणुप्पदाउ यो पऽएणत्य रायामिओगेण गणाभियोगेण वलाभियोगेण देयवाभि- ओगेण गुरनिग्गहेण विचीकतारेण । इत्यादि । तदेव लेशत पाह-'लौकिकदेवेषु' भवानीपतिश्रीपतिप्रजापतिशचीपतिरतिपति वथागतप्रभृतिषु, किम् ? 'प्रशस्तमनोवाकायव्यापार प्रशस्ताना-. मुसिनिमित्ताराध्यतासूचकाना मनोवाकायाना-योगाना सस्मृति- स्तुतिपूजाद्यैर्व्यापार -यातत्व प्रशस्तमनोवायायव्यापार इति समास | मिथ्यात्व रिशेयमिति समन्ध । इति गाथार्थ ॥१६॥ एव च यथाऽईति पन्दनादिप्रत्ययवायोल्मादिना प्रवृत्ति १' सवाहति सवाहति' या " - + । " प्राथकधर्मविधिप्रकरणम् । सम्यक्त्व एव लौकिकन्वेषु तत्मवृत्तिर्मियात्वम् । वन्दनादि- स्वरूप त्वाह--- पदणमयं मलाइ पूयण वत्यमाइ सकारो। माणसपीई मायो, एमाई सुहुममइगम्म ॥ १७ ॥ वदण " गाहा व्याख्या-~-वन्दनम्, किम् १ 'एतत् ' अनन्तरोद्दिष्ट प्रशस्तमनोनागादि, “ पनि अभिवादनस्तुत्यो " इति धातुपाठात् । ' माल्यादि ' पुष्पदामादि देवतागवम् , किम् ? पूजन-पूजाशब्दवान्यम्, श्रादिशब्दाद् धूपादिप्रद । 'वलादि' वसनादि, तद्विपय 'सत्कार' सत्करण सत्कार , साव्यर्थसत्शब्द- पूर्वाकरोतेर्धम् । मनसि भवा मानसी सा धासी प्रीतिश्च मानस- प्रीति , किम् ? , मम्मानोऽनाऽभिप्रेत एवमादि एवविध वन्दनकरणश्रद्धादि 'सूक्ष्ममतिगम्य' निपुणधिपणावधा- यम् , मिथ्यात्वमिति मरन्ध । इति गाथार्थ ॥१७॥ एप लौकिकमिथ्यात्वमभिधाय लोकोत्तरमप्येतद्विमागेनाह- लोगुत्तमदेवम्मि गि, लोइयदेवाण जाणि लिंगाणि । इच्छापरिग्गहार्डणि वेसिमारोवण मिच्छा ॥१८॥ लोगुत्तम " गाहा व्याख्या---' लोकोत्तमदेवे' अईति 'अपि ' समुधये, न केवल लौकिकटेवगतमेव मिथ्यात्व किन्तु लोकोत्तरदेवेऽपीयर्थ । 'लौकिरदेवाना' प्राक्प्रदर्शिताना 'यानि' कानिचित् 'लिगानि ' इति लिङ्गयते रागादिरेभिरिति लिङ्गानि-, तथाविधान्तरङ्गरागानिगमकानि तथाविधतनुसन्निवेशनेपादिरूपाणि। प्रागपार्शिता" । " , मान - , , १ । , (२०) हरिभद्रसूरिसहब्ध तान्येवाह----इच्छा-अभिलाप तस्या परिग्रह -प्राश्रयण इच्छाप- रिग्रह , चार्थ या समास, स आदियेंया वेषपरिप्रहादीना तानि । तथाहि लौकिकदेवाना दृश्यन्त एव तथाविधलिङ्गानि, नेपा 'पारो पण' प्रकल्पन 'मिथ्या' इति मिध्यात्वम् । इति गाथार्थ ॥१८॥ एव देवगत मिथ्यात्वमभिधाय लिङ्गिगतमाह---- वह पएणतित्यियाण, तावससकाइलिंगधारीण । पुवालवणाइ परिचयो य तव्ययणकरणाई ॥१६॥ तह " गाहा व्यारया-' तथा ' देवोदितप्रकारेण 'अ- न्यत्तीथिकाना' जैनधमयहिभूतानाम् । तानेवाह- तापसशाक्या- दिलिङ्गधारिणा ' तापसशाक्यादिलिग धाग्यन्तीत्येवशीलास्तापम शाक्यादिलिङ्गधारिणम्तापसादय एव तेपाम्, 'पूर्यालापादि । प्रास्सभापणादि "पुब्बि अणालत्तण्ण " इत्यादिसूनप्रदर्शित 'परिचय ' सस्तव , चशब्दस्य तु समुच्चयार्थस्योतरन सबन्ध । तद्वचनकरणादिश्च व्यापारो मिथ्यात्वमिति सन्ध । इति गाथार्थ ॥ १६॥ वथा-- वदणपूयणसकारणाइ सब न कप्पए काउ। लोगुत्तमलिंगीण वि, केसिंवेर जसो भणिय ॥२०॥ पदण गाहा व्याख्या-'यन्दनपूजनसलारणादि । प्राग व्याख्यानम् , केवल मत्कारण सत्सारणा वा सत्कारशब्दान्व थे, एयन्ताल्ल्युन्युा । तत् 'सर्व वन्दनादि मिथ्यात्वमत न कल्पते' न युज्यते 'फ' विधातुम् । तथा 'लोकोत्तमलिझिनामपि । " 4 - मापक-शिविरम्। Feetenाधिन् । पार्श्वस्याटीना एवं' मधिनान फरपते 'नयमान मणित' मा इनि मापा ॥२०॥ सानु लगद पामन्यांमएचसीलीयससचजयमहाउँदं । नाममय मुविहिया, मच्चायचेण वजति ॥ २१ ॥ " पारयो " गाहा माया-पार्थे शानादीना विष्टनीति पात्र यादमा दि म्म अबसन्न । तथा इन्सित शीलमन्येति grir ! या नियमेश्य यमनानिय । तथा सनननान् मंसक । लम समूदायम्य प्रयेक्रममिमपन्ध, पार्थत्वजनमिन्यादि । Par मन्दो परमागन्यापल प, पृथा निर्देशन्वय सवि झोपन ! 'या' अनुष्य '' आगमरूपितस्वरूप डा' मुहिता ' इति गोमन विहित-अनुष्ठान येया गि माय मायला पारेण वयन्ति । सम्म बन्दनना ।ह पनि मुहिता मार एवं प्रती- mpire परिवार प्रतिवादितम्नयापि भारतानपि तद्वन्द. ওপর চাপিয়োনা ৰ পঢ়িা সাল ra . + m zine मला गगनात दोशमगुरविधी-पान Note सास रहेस संपदा । ममदाए मारगाए। Female आश्रिम पा- remoयय सनी । प्रहदो दिन -- है - (२०) हरिभद्रसूरिसहब्ध तान्येवाह---इच्छा-अभिलाप तस्या परिग्रह -श्राश्रयण इच्छाप रिमह , चार्थे वा समाम , स आदिउँपा पेपपरिप्रहादीना तानि । तथाहि लौकिकदेवाना दृश्यन्त एर तथाविधलिङ्गानि, तेषा 'आरो पण' प्रकल्पन 'मिथ्या' इति मिथ्यात्वम् । इति गाथार्थ ॥१८॥ एव देवगत मिथ्यात्वममिधाय लिङ्गिगतमाह-- वह पएणतित्यियाण, तावससकाइलिंगधारीण। पुच्चालवणाइ परिचयो य तच्चयणकरणाई ॥१६॥ गाहा व्यारया-' तथा ' देवोदितप्रकारेण 'श्र- न्यतीथिकाना' जैनधर्मवहिर्भूतानाम् । तानेवाह-' तापसशाक्या- दिलिगधारिणा' तापसशाक्यादिलित धारयन्तीत्येवशीलास्तापस शास्यादिलिड्गधारिणस्तापसादय एव तेपाम्, 'पूर्वालापादि । प्राक्सभापणादि " पुब्धि प्रणालतगण " इत्यादिसूनप्रदर्शित 'परिचय ' सरतव , चशदस्य तु समुच्चयार्थस्योत्तरन सबन्ध । तद्वचनकरणादिश्च व्यापारो मिथ्यात्वमिति सयन्ध' । इति . - गाथार्थ ॥१६॥ 16 " तथा-- चदणपूयणसकारणाइ सय न कप्पए काउ । लोगुत्तमलिंगीण वि, कमिचेर जो भणिय ।। २० ॥ वदण गाहा व्याख्या वन्दनपूजनसत्कारणादि प्राग् व्याख्यानम् , केवल सत्कारण सत्कारणा या सत्कारशब्दान्व थे, एयन्ताल्ल्युन्युर्यो । तत् 'सर्व' वन्दनादि मिध्यात्वमत 'न कल्पते' न युज्यते ' फतुं' विधातुम् । तथा 'लोकोतमलिङ्गिनामपि ।
. , । प्राधकधर्मविधिप्रकरणम् (२३) कुलमिप्पकम्मे, तवगुणसुत्ताइ सत्तयिह ॥ १३ ॥ कछकुरुयाइ मा. या, नियहीए डंभण तु ज भणिय । चीलम्सणाइ लक्षण, वि- जामताइया पयडा ॥ १४ ॥ ससत्तो उ इयाणिं, सो पुण गोम- चलदए चेव { उचिट्ठमणुचिह, ज विंची छुन्मई सव्व ।। १५ ।। एमेव य मूलुत्तर, दोसा य गुणा य जतिश्रा केई । ते तम्मी स एिणहिया, ममत्तो भएणई तम्हा ॥ १६ ॥ रायविदूसगमाई, अ- हवा वि नडो जहा उ बहुरूनी । अहवा वि मेलगो विव, इलि- दरागाइनहुवएणो ॥ १७ ॥ एमेव जारिसेण, सुद्धमसुद्धेण यावि समिलइ । तारिसो चित्र हवई, ससत्तो भएणई तम्हा ॥१८॥ सो दुनिगप्पो भणियो, जिणेहिं जिश्ररागदोसमोहेहिं । एगो उ मकिलिहो, असफिलिट्ठो तहा अएणो ॥ १६ ॥ पचासवप्प- वत्तो जो सलु तिहि गारवेहि पडियद्धो । इरिथगिहिसरिलिट्ठो, सस- तो सकिलिहो 3 ॥२०॥ पासत्याईएसु, सविग्गेमु च जत्य मि- लई उ । होइ तर्हि तारिसओ, पियधम्मो अहव इयरो 3 ॥ २१॥"॥२१॥ तर्जने हेतुमाह- एत्थ य पासत्थाईहिं सगय चरणनासय पाय । मम्मत्तहरमहालदेहि उ तल्लक्सण चेय ।। २२ ।। गाहा व्याया-पाच' पाश्चस्वादिषु, निर्धारणसप्तमी चेयम् , पार्श्वस्यान्पुि मध्ये, 'पायोपन्या मार्थे, पार्श्वस्थादिभि । उक्तस्वरूपै परिचितम्, किम् ? चन्दनादिरूप — चरणनाशक ' चारितापहारि । यदुक्तमा- -- एत्यय " - (२२) हरिभद्रसूरिमंह एए, अवणिजा जिणमयम्मि ॥१॥ पार्श्वस्थादिस्वरूप प परिभाषाहमवो भाध्यादयसेयम्---" सो पासत्थो दुविहो, सब्वे देसे अ होइ नायव्यो । सव्वम्मि नाणदसणचरणण जो उ पास त्यो ॥१॥देसम्मि उ पासत्यो, सिजायरऽभिहडरायपिंड च ।नीय च अग्गपिंड, मुजइ निकारणे चेव ॥ २ ॥ कुलनिस्साए विहरइ, ठनणपुलाणि अ अकारणे विसइ । ससडिपलोअणाए, गन्छ। तह सथय कुणइ ॥ ३ ॥ ओसएणो वि अ दुविहो, सव्वे देसे अ तत्थ सव्वम्मि । उउसद्धपीढफलओ, ठपिशगभोई य नायब्यो ॥ ४ ॥ श्रावस्सगसज्माण, पडिलेहणमाणभिक्सऽभत्तहे । आग मणे निग्गमणे, ठाणे अनिसीपण तुअट्टे ॥ ५ ॥ श्रावस्सयाइ. याइ, न परेई अहव हीणमहिआइ । गुरुवयणवलाइ तहा, भणि ओ एमो उ पोसएणो ॥ ६ ॥ गोणे जहा चलतो, भजइ समिल तु सो वि एमेव । गुरुवयण अक्रतो, बलाइ पुणई च प्रोसोदु ॥ ७॥ तिनिहो होइ पुसीलो, नाणे तह दसणे चरिते थ। एसो अवतारिणजो, पएणत्तो वीयरागेहिं ॥ ७ ॥ नाणे नाणायार, जो उ विराहेइ कालमाईय । दसणे दसणयार, चरणकुसीलो इमो होइ ॥ ६॥ कोउयभूईफम्मे, पसिणापसिणे निमिचमाजीची । पाकुरुथा य लक्षण, उपजीवह विजमताई ॥ १०॥सोहग्गाइ. निमित्त, परेसि एहवणाइ कोउग भणिय ! जरिआइ भूइदाण, भूई- कम्म पिणिद्दिष्ट ।। ११ ॥ सुविणगविज्ञााहिश्र, आइसणिपटि- आइकहिश्र या । ज मसिइ अण्णेसिं, पसिणापसिण, या एय ॥ १२ ॥ तीयाइभावकहण, होद मित्त इम तु जीव । जाइ- . है सो पुणे प्राधकधर्मविधिप्रकरणम् कुलसिप्पकम्मे, तवगुणसुत्ताइ सत्तविह ॥ १३ ॥ कर कुरुयाइ मा- था, नियडीए डमण तुज मणिम । थोलावणाइ लक्सण, वि. गोम- जामवाइया पयहा ॥ १४ ॥ समत्तो उ इयाणि, चलदा चेव । उचिट्ठमणुचि, ज किंची छु भई सव्य ॥ १५ ॥ ग्मेव य मूलुत्तर, दोसा य गुणा य जतिश्रा केई। ते तम्मी स- एिणहिश्रा, ससत्तो भएणई तम्हा ॥ १६ ॥ रायविदूसगमाई, अ- हवा नि नडो जहा उ बहुरूनी । अहवा वि मेलगो विव, हलि- इरागाइबहुवरणो ॥ १७ ॥ प्रमेव जारिसेण, सुद्धमसुद्धेश वापि समिलइ । तारिसश्रो चित्र हुवई, ससत्तो भएणई तम्हा ॥१८॥ सो दुविगप्पो भणियो, जिणेहिं जिभरागदोसमोहेहिं । एगो उ सकिलिट्ठो, असकिलिहो तहा अपणो ॥ १६ ॥ पचासवप्प- वत्तो जो गलु तिहि गारवेहि पडिनरो । इरिथगिहिमरिलिहो, सस- तो सकिलिट्टो उ ।। २० ॥ पासत्याईएसु, सविग्गेमु च सत्य मि- लई उ । होइ तहिं वारिसो, पियधम्मो अहव इयरो उ ॥ २१ ॥" ॥२१॥ वर्जने हेतुमाह- एत्थ य पासस्थाईहिं सगय चरणनासय पायं । मम्मत्तहरमहाछडेहि उवलक्सणं चेय ॥ २२ ॥ गाहा व्यारया--'अन च' पार्श्वस्यादिपु, निर्धारणसप्तमी चेयम् , पार्श्वस्यादिपु मध्ये, सार्थे, पार्श्वस्यानिमि । उत्तास्वरूपे । किन् ? बन्दनादिरूप 'चरणनाशक ' चारितापहारि। यदुक्तमा- + एत्य य S च , वाग्योपन्या ' परिचितम्, सगत 4 " (२४) हरिभद्रसूरिसंह, गमे- पासत्थाई पदमाणस्स, नेय कित्ती 1 निजरा होइ । फायकिलेस एमेव, कुणई तह पम्मषध च ॥ १॥ किइसम्म च पससा, सुहसीलजणम्मि फम्भवधा य । जे जे पमायठाणा ने ते उपवूहिश्रा होंति ॥२॥" 'सम्यक्त्वहर' सम्यग्दर्शननाशि यथाच्छन्दै । तुर्मिनवाक्यतायाम् , 'तल्लक्षण' यथाच्छन्दस्वरूप 'च ' पुनरर्थे 'एतत् ' वक्ष्यमाणमागमे उक्तमिति गम्यते ॥२२॥ उस्सुत्तमायरतो, उस्मुत्त चेव पएणवेमायो। एसो उ अहाउदो, इच्छाबदो ति एगत्या ॥२३॥ गाहा व्याख्या-सूनाद्-भागमा तिवृत्तमु सुन तदुत्सून 'आपरन् ' कुर्वन् , ' तत् ' उत्सूनमेव 'प्रज्ञाप यन् ' प्ररूपयन् , 'अनेन सविमपातिकस्य यथान्छन्दताव्यवच्छेद- माह । तदुक्तमागमे-" होज हु वसणप्पत्तो, सरीरदोपलयाए असमत्यो । चरणकरणे असुद्धे, सुद्ध मग्ग परवेजा ॥१॥ श्रोसनो नि विहारे, फम्म सोहेइ सुलहयोही उ । चरणकरण वि. सुद्ध, उपवूहेंतो परूतो ॥ २॥" इत्यादि । ' एप 'अनन्तरो- दितरूप , 'तु 'पुनरर्थे, 'यथाच्छन्द' यया येन प्रकारेणा- गमाननुपात्येव न्छन्दोऽस्य ययाच्छन्द इति । इन्छाच्छन्द इति' इच्छया च्छन्दोऽस्य म तयैकार्थम् । तथाध्य युक्त्यागमानपेक्ष हरितोपरिवर्तिडगलकमहणमेकवस्त्रोपरि शेपवस्त्रान्प्रित्युपेक्षण क्तव्यम् " इत्यादिरूपा वक्ष्यमाणा च प्ररूपणामागमाननुपातिनी- मेवाह । इति गाथार्थ ॥ २३ ॥ उत्सूनपद व्यारयातुमाह- - । । " + 1 प्रायफविधिप्रकरणम् । उस्सुत्तमधुवइट, मच्छंदरिंगप्पिय अणणुनाई। परतत्तिपवित्त तितिणों य इणमो अहारदा ।। २४ ॥ उस्सुत्त " गाहा व्याख्या-उत्सूत्रमनुपदिष्टम् , आगमे इति गम्यते । तय किविध स्यात् । इलाहस्वच्छन्दविफरिपत' स्वाभिप्रायटितम् । एवविधमपि किन किश्चिदर्थादविरुद्ध स्यादत प्राह-'अननुपाति' नाऽऽगमे कथश्चनाप्यतुपततीत्यर्य । नदेव- विधमेवोत्सूनमामिप्रेतम्, तदापरणादिना यथाच्छन्द, अतोऽन्यथाs- प्येनमाह-- परततिप्रवृत्त ' इति परेपा-गृहत्यादीना राति कार्यचिन्तनादिरूपा परतमि तस्या प्रवृत्तो य म तथा, 'निन्दिन: यथालन्धभकादिना अनित्तत्येनामीण रुटफ इत्यर्थ । प. प्रा.), रान्तरेण यथान्छन्दलदणमेतदित्याह । 'इणमो' श्रय-अनन्त- रोरिष्टो यथान्छन्द । इति गाथार्य ॥ २४॥ प्रकारान्तरेणाप्येनमाइ- सच्छदमइ निगप्पिय, किंची मुहमायविगडपदिपद्धो । तिहि गारवेहि मजड, त जाणाही अहाछद ॥ २५ ॥ सन्छद " गाहा व्यारव्या -'स्वच्छन्दमत्या' स्वाभिप्राय- मननेन, प्राकृतत्वाश सुब्लोपेन निर्देश प्रियाविशेषण या, स्व- च्छन्देन मनन यत्र विकल्पने तत्तथा । 'विकल्प्य ' चर्चयित्वा 'किश्चिद्' इत्यनिर्दिष्टस्वरूपन्, 'शुभसातविकृतिप्रतिबद्ध ' इति शुभ-द्धिरूपमुपररणादि सात-मुस विकृति -घृतादिका, शुभा- दीना द्वन्द्व, वन प्रतिवद्ध -अभिष्वक ऋद्धिमुसरसगौरवगृद्ध, इत्यर्थ । तथा पाह--'त्रिभिौरये' उगस्वरूपै मायति' परयशी- , " + .
श्रनेसि पएणवेति य, सिच्छाए जे अहाछदा ॥ २७ ॥ . २ - प्रयो (२६) हरिभारिसर भवति त जानीहि यथाच्छन्दम्, अयमपि यथाच्छन्द इत्यर्थ ॥२ उत्सूत्र दिल्यानेणोदाहरणीकुर्वप्निदमाह- उस्सुत्त पुण एत्थ, थावरपामोगरूपकरणाई । उन्भूहगकरउप्पा-यणाइ धम्माहिगारम्मि ॥२६॥ उस्सुत्त " गाहा व्याख्या-उत्सून पुनरवरूपम् , तर था---' स्थावरप्रायोगपकरणादि ' इति स्थावर-गृहम् । भय प्रायोग्ये या भव प्रायोग प्रायोग्य या-तथाविधवृद्धिप्रयुत धान्यादि, पकरण-यूपसननम् , अादिशब्दाद्वाटिकादिपरिप्रह तथाऽश्रुतिक --अभिनवोऽपूर्व कर-उत्पन्नद्रव्यविभागप्रहनक्ष ण तस्योत्पादन-प्रवर्तनम् , श्रादिशब्दादेवप्राय अन्यदप्यागमनि पिद्ध यतेश्चैत्यप्रयोजनचिन्तनादि धर्माधिकारे । धर्मप्रयोजनाचे न्तायाम् । इति गाथार्य ॥ २६ ॥ एमाइ बहुविगप्प, उस्सुत्त आयरति सयमेव । एमाइ गाहा व्याख्या--' एवमादि ' इति " क्ग घज" इत्यादिना बलोपे सन्धौ चैव भवति, मोक्षप्रायमन्यदपि द्रष्टव्यमित्यर्थ । यथा--" घोण्ड चेइयाण, सेत्तहिरपणाइगाम गावाई । लग्गतस्म उ जइणो, तिगरणसुद्धी यह ण भरे १ ॥ १॥” इति पूर्णपक्षमाप्रदर्शनादेव वेचिद् यतेश्चैत्यसयन्धिक्षेत्रादिचित- नत्यस्वीकरणादौ धर्ममवधारयन्ति, सूनाननुपाति चैतन् । यत एवमत्रोत्तरप्रन्थ ---" भएणह पत्य विभासा, जो एयाइ सय वि. मग्गेजा । न हु होइ तस्स सुद्धी, अह कोइ हरेज एयाउ ॥ १ ॥ -- । " " - . - - + मायधर्मविधिप्रकरणम्। (२७) सव्यत्यामेण तहि, सपेण होइ मग्गिश्रव्य ति | सचरितऽचरित्तीरण य, एय सम्वेसि कज तु 10॥ अत्र हि किल दर्शनपरिभव- प्राये पूर्वराजादिदचक्षेत्रादिलोपप्रस्ताव एव यतेरपि क्षेत्रादिचिन्त- नमुक्कम्, न तु मामान्येन, अलमतिप्रसङ्गेन । स्वयमेवप्राय भाग- मोर्शेयम् । 'बहुविकल्प ' अनेकप्रकारमुत्सूत्रमाचरन्ति प्ररूपणा- दिना स्वयमेव । तथा अन्येभ्यश्च ' श्रोतृभ्य प्रज्ञापयन्ति त- प्ररूपणाकरणदिभि । कथम् ' ' स्वेन्छया' स्वकीयाकूतकार्या- नुयातया युक्त्या, न तु सिद्धान्ताधीनदया। य एवविधा यतिये. पधारिणो यथाच्छन्दास्ते । इति गाथार्थ ॥ २७ ॥ एव यथाच्छन्दवन्दनादि मिथ्यात्वनिनन्धन परिहार्यतयाऽभिधा- यागमविशेपेणात्यर्थ तन्निपेधन प्रस्तुतफलवदेवेसावेदयभिदमाह- एचो चिय तेसिमुपस्सयम्मि तु दिवससमागमो साहू । तेसि धम्मकहाए, कुणइ विधाय सह बलम्मि ॥२८॥ " रातो चिय" गाहा व्याख्या-'अत एव ' इति यत एव तेपा सम्पर्कमानादेव मिथ्यात्वप्राभिमभवोऽत एव 'तेपा' यथाच्छन्दानामुपानये तु 'दिवससमागत' कथञ्चनाप्यागत्याऽऽगत साधु तेषा 'धर्मकथाया ' उत्सूनप्ररूपणारूपाया 'क्रोति वि- 'विधत्ते प्रतिक्षेप ' सति वने ' विद्यमाने सामर्थ्य इति, भिहित सिद्धान्त इति गम्यते । तथाद्योधनियुक्तौ उसम् --" - ढमवीआ गिलाणे, तइए सरणी चत्य साहम्मी । पचमगम्मिश्र वसही, छह वाहिओ होइ ॥ १॥" इति । वसतिद्वार व्या- चहाणेनोकम्-" सविग्गसनिभद्दगमुने नीयाइ मोत्तुहाएदे । + घात । । - हरिभद्रसिद तस्मेएसु, वमहाए मग्गणा होर॥ १॥" एय पथाच्छ दाना सर्वथा प्रत्यासते परिहारमभिधायागसामत्यामत्तिसभवेऽभिद्वितम् । " प्रमेय अहाएदे, पडिहणणा स्मरण अग्मयण फरणा । ठाण हिओ निसामे सुषणाहरणाइगहिएण ॥ १ ॥" ततश्व यथास्थ शिद् यथाच्छन्दपचनाश्रयणमभिहितम् ॥ २८॥ इदमेवाह--- इहरा ठएइ करणे, वस्मपणा मिच्छमेइ साह वि। अपलो किमु जो सट्ठो, जीवाजीपाइभरामिएयो ।। २६ ।। गाहा व्याया इतरया 'तत्तथाप्रतिपा- तारातो तथाविषयचनपाटयामागदिनाऽसत्या किम स्थगयति । करदिया पिधचे कर्ण ' श्रुती तद्वचनश्रयणपरिपन्धितया, उपल- पण चैता, उदितागमगदितानामध्ययनादीना सत्स्थाविपातहेतु नाम् । किमर्थमेवममी करोति ? इत्याह- तराइमरणात् ' यथा छन्दयचनश्रयणात् 'मिथ्यात्वमेति' विपर्यय याति ' साधुरपि' समवद्विशेपश्रुतो यतिरपि यथाच्छन्ददेशनया विपरिणम्यते, कि पुन श्रावक इत्यपिशन्दार्थः । तथा चाह.---'अबल' तथाविधा गमाभ्यामरहितन्वेन सन्मार्गे विशिष्ठापष्टम्भरहित उत्तरदानादाय समर्थ ' पुन 'किमङ्ग य 'श्राद्ध ' श्रद्धापान धारयः, सतु मुसरा विपरिणमते 1 निमित्तमाह-~-जीवातीपयोरनभिज्ञ , तथा- विधागमाप्रहणादित्यभिप्राय । इति गाथार्थ ॥२६॥ क्य विपरिणमति १ इत्याह- . - म वयण " एतस्य - श्रापकधर्मविधिप्रकरणम् । वयणविसनायाओ, उप्पजह ससओ फुड ज से। तम्हा तमणाययण, मिच्छ मिच्छत्तहेऊ वि ॥ ३०॥ गाहा व्याख्या-वचनयो-सन्मार्गप्रकाश- रयाताधुनारयायमानयोक्सिवादात-परस्पराघटमानत्वलक्षणात् 'उ- स्पाते सशय । सभवति सदेह -किं तत्सत्यमिट वा ? इत्यादि- स्फुट ' प्रफटम् , सशयकारणस्य प्रेवलत्वानाप्रकटस्व सश- यस्येति स्फुटार्थ । यत् ' यस्मात् सन्मार्गमशीनिवन्धन से' तत् ' तस्माद् यथाच्छन्दवन्दनादि निषेध्यतया प्रकृतम् , तत् । वा यथान्छन्दवश्चनस्थानादि, किम् ? 'अनायतन' पा- गमपरिभापितमशुद्धिस्थानम् | तदुक्त तत्र--" सारजमणाययण, असोहिठाण कुसीलमसग्गी । गगहा हुति पया, विवरीश्रा चेव आययणे ॥ १॥ ननु कथमिद लौकिकटेववन्दनादि यथाच्छ- नवन्दनाशवमान मिथ्यात्वम् ' यारता विपर्यस्ताध्यवमायरूपमे- व मिथ्यान्वमागमेऽमिहितम्, अत क्य मिथ्यात्वर्जनावसरे घ- य॑तयाऽभिधानमस्य ? इत्याह -'मिच्छ ' इत्यादि । मिश्यात्वमन्न मिध्याहेतुरूपमप्यभिप्रेत देतुफलभावेन, तन्दुलान् वर्षति पर्जन्य " इति, विपर्यस्तपरिणामकारि मिथ्यात्वनिवन्धन चैतद्व- न्दनादि, वेन तत्कार्यरूप मिथ्यात्व परिहारयता तहेतुरपि परि- हार्य ण्वोन्यदे, नहि हेतुविनाश विना फलविनाग, अत्रिकल- कारणसद्भावेऽवश्यमावित्वात् फलस्य, अन्यथा हेतुफलभाव गव न प्राग्यात् ना० " यथा । + - १ - -- . १ . , “ हरिभद्रसूरिसहा भवेत् । अलमतिप्रसङ्गेन । स्थितमेतन्-मिथ्यात्यहेतुरपि मिप्या । स्वम्, अतस्तत् परिहार्यम् । इति गाथार्थ ॥ ३०॥ प्रस्तुतनिगमनायाह- इय सपरपक्सविसय, सकारण जाणिऊण मिच्छत्त । पञ्चक्सिय तिह तिनिहेण पालणाभावणा एव ।।३१॥ इय " गाहा व्यारया---इतिशद एवमकारार्थ । ण्व प्रकार मिथ्यात्व ज्ञात्वेति योग । इह च " तेरितेर्वाक्यादौ" इति इतेरितोऽदादेशे " क्गज " इत्यादिना तलोप सत्येव पाठ । 'स्वपरपक्षविपय ' प्रदर्शितविमागेन लोकलोकोत्तराश्रयमित्यर्थ । सकारण ' सह कारणेन 'मिथ्यात्व' हेतुरूपमपि प्रदर्शित शात्वेत्यथ । प्रत्याख्याय ' परिहारेणाङ्गीकृय 'विधा' धृत- कारितानुमोदने 'विविधेन । मनसा याचा कायेन तथैव पाल येद् इत्युत्तरबियाध्यार, 'पसम्बइ ' इति तु पाठे इयमेवोत्तर- किया। पालनाभावना निया निविधेन मिथ्यात्वपरिहारनिर्वाहणपर- मार्य इत्यर्थ ।' एवं ' अभिधास्यमानप्रकारा। इतिगायार्थ ॥३१॥ तामेव भावनामाह- एय अणतरुत्त, मिच्छ मणमा न चिंतइ करोमि । सयमेसो य करेऊ, अएणेण कए वि सुटु कय ॥ ३२ ॥ "ण्य " गाहा व्यारया-एतदनन्तरोक्त 'मिथ्यात्व' - लौकिकदेववन्दनादिव 'मनसा' चेतसा 'न चिन्तयति' नाभि सघचे, यथा करोम्यहमिद मिथ्यात्व 'स्वय ' पात्मना, कृत- . - - - । - .. भायकधर्मविधिप्रकरणम्। मिदं मनसा, एप वा करोत्विति तु कारितम्, अन्येन कृते वा सुष्टु कृतमिति मन सम्प्रधारणमनुमोदनम् । इदि गायाः ॥ ३२॥ क्या वाचा निनिधमाह- एव वाया न भण्ड, करेमि एण च न भणइ करेहि । अन्नकय न पमंसइ, न कुणइ सयमेन कारण ॥ ३३ ॥ एव" गाहा व्यारया-'एव' मनोवद् वाचा न भरण- ति, यथा करोम्यह मिथ्यात्वम् । अन्य न भणति, यथा कुरु त्व- म् । अन्यकृत न प्रशसति, यथा शोभनमिद कृतम्। फायेनाऽऽह- न करोति स्वयमेव कायेन । इति गाथार्थ ॥ ३३ ॥ करसन्नभमुहरोनाइएहि न य कारयेइ अन्नेण । न पससह अन्नकय, छोडियहसियाइचेट्ठाहिं ॥ ३४ ॥ "र" गाहा व्याख्या-- करसज्ञाभूक्षेपादिभि । यव्यापाररूपे प्रतीतैरेव नो कारयति, मिथ्यात्वमिति सर्वन प्रकृ. तमेव, "अन्येन ' परेण। अन्यकृत न प्रशसति 'छोटिकादासिता- दिचेष्टाभि । प्रतीताभिरेव । इति गाथार्थ ।। ३४ ।। एव विधा त्रिविधेन मिथ्यात्वपरिहारे श्रावकस्य प्रतिपादिते प्राणातिपातादाविव निधा निविधेन विरतिमसमावयन् कदाचित्प- ध्यात्, यथा-- आह तिहाणुमई ज, सपासुनमोयपडिसुणणमेया ।। गिहिणो य सयावासो, बहुमिच्छादिटिमज्झम्मि ॥ ३५ ॥ श्राह" गाहा व्याख्या- पाह 'परो ब्रूते 'त्रिया' । त्रिप्रकारा अनुमति ' अनुमोदनरूपा ' यत् ' यस्मात् । नैवि- का- + , - - (३०) हरिभद्रसूरिसरब्ध भवेत् । अलमतिप्रसङ्गेन । स्थितमेतत्-मिध्यात्वहेतुरपि मिथ्या त्यम्, श्रवस्तत् परिहार्यम् । इति गाथार्थ ॥ ३०॥ प्रस्तुतनिगमनायाह--- इय सपरपरसविसय, सकारण जाणिऊण मिच्छत्त । पचक्खिय तिह तिविहेण पालणाभावणा एव ।।३१॥ इय गाहा व्यारया-इतिशाद एयप्रकारार्थ । एवं प्रकार मिथ्यात्व ज्ञात्वेति योग । इह च " तेरितेर्याक्यादी" इति इतेरितोनादेशे " कगचज " इत्यादिना तलोपे सत्येव पाठ । 'स्वपरपक्षविषय ' प्रदर्शितविभागेन लोकलोकोत्तराश्रयमित्यर्थ । सकारण ' सह कारणेन — मिथ्यात्व' हेतुरूपमपि प्रदर्शित , शात्वेत्यर्थ । प्रत्याख्याय ' परिहारेणगीकृत्य 'निधा' कृत- - कारितानुमोदनै निनिधन ' मनसा वाचा कायेन तथैव पाल येद् इत्युत्तरक्रियाध्यार , ‘पञ्चक्सइ ' इति तु पाठे इयमेवोत्तर- मिया। पालनाभावना निधा निविधेन मिथ्यात्वपरिहारनिर्वाहणपर- मार्थ इत्यर्थ । 'एव ' अभिधास्यमानप्रकारा। इति गाथार्थ ॥३१॥ - तामेव भायनामाह- एय अथतरुत्त, मिच्छ मणसा न चिंता करोमि । मयमेसो य करेऊ, अरणेण कए वि सु१ कय ॥ ३२ ॥ गाहा व्याख्या--एतदनन्तरोत 'मिध्यात्व लौकिकदेवयन्दनादिक ' मनसा' चेतसा न चिन्तयति' नाभि सघते, यथा' करोम्यहमिद मिथ्यात्व । स्वय ' आत्मना, कृत- " एय । । .. - A আমমঘিমিনু; मिदं मनसा, एप या करोत्विति तु पारितम्, अन्येन कृते वा सुष्ठ', कतमिति मन सम्यधारणमनुमोदनम् । इति गाथार्थ. ॥ ३२॥ सया वाचा रिविधमाह---- एव वाया न भणइ, करेमि एणं च न भणइ करहि । अन्नायं न पमसइ, न कुणइ सयमेव कारणं ॥ ३३ ॥ " एवं" गाहा व्याख्या-' एव' मनोवद् वाचा न भण- ति, यथा करोम्यह मिथ्यात्वम् । अन्य न भणति, यथा कुरु स्व- म् । अन्यत्त न प्रशसति, यया शोभनमिद कृतम्। कायेनाऽऽहन न क्रोनि स्वयमेव कायेन । इति गाथार्थ ॥ ३३ ॥ करसनभमुहरोपाइएहिं न य कारवेह अनेणं । न पससह श्रमकयं, छोटियहसियाइचढाहिं ।। ३४ ।। कर" गाहा व्याख्या करसाधूक्षेपादिभि ' फा यन्यापाररूपे प्रतीतैरव नो कारयति, मिध्यात्वमिति सर्वत्र प्रक- समेष, "अन्येन ' परेण । अन्यकृत्त न प्रशसति छोटिकाइसिता- दिपेष्टामि ' प्रतीताभिरेव । इति गाया ॥ ३४॥ एव विधा निविधेन मिथ्यात्यपरिहारे श्रावस्थ प्रतिपादिते प्राणातिपातादाविव विधा विविधन विरतिमसमावयन् कदाचित्प यान, यथा- आइ विहाणुमई , सवासुवमोयपडिमुणखमेया । . गिहियो सयासो, बहुमिच्छादिडिमन्सम्मि ॥ ३॥ ".आह." गाहा व्याख्या- विकार अनुमति 'अनुमोदनरूपा 'यत्' यस्मात् । नैति- आह' परो मृते निघा - ६ । . 10 + 1 हरिभद्रसूरिसंह ध्यमेवाह-सयास -मियादृष्टिभि सहकप्रयास , उपभोग-स- स्कृतोपजीरनम् , प्रतिभवण-वत्कुर्वत कुर्वित्यादिना प्रवर्तनम, तानि भेदा यस्या सा तया, तद्भेदादिति या। 'गृहिणश्च सदावास प्रकृतश्राययस्य च नित्य नियसन संभवेन ' यद्धमिध्यादृष्टिमध्ये' मिध्यादृष्टीना यहुत्वादित्यभिप्राय । इति गायार्य ॥ ३५ ॥ - - कध ता कह सवासाणुमइवअण सभाइ मुग्णसु एत्य । न हु जिपमयम्मि सवासमित्यो अणुमई इट्टा ।। ३६ ।। ता कह हा व्याख्या-'सत्' तस्मार केन प्रकारेण सवासानुमते -सयासवशागतमिथ्यात्वानुमोदनस्य वर्जर-परिहार 'मभवति' समस्ति ? इत्येव परेणोके सत्साद सूरि - शृणु' आरर्णय ' अर' मिथ्यात्वे, अन्यत्र स्वाधा फारम्भादो “ पडिसेवण पडिसुणणा, सवासणुमोषणा य घ उरो " इत्यादिवचनैर्यक्केवातुमति सवासनिनन्धनाभिहितेत्यमि- प्राय , 'न हु' नैव 'जिनमते ' अहन्छासने 'सवासमानान्' मिथ्यादृष्टिमि सहैत्ययसनादेवेत्यर्थः, 'अनुमति । अनुमोदना इष्टा' अभिप्रेता आगमहरिति गम्यते । इति गायार्थ ॥३६॥ विपक्षे याधकमाह- भारमे विन मिच्छ, सव्येमि सबहिं अइपसगो। को पुण एत्य विसेसो, मन्नइ इणमो निसामहि ॥ ३७॥ "प्रारभे विष" गाहा व्याख्या--' आरम्भे' पृथिव्या- ग्रुपमर्दनलक्षणे, "पिवमिवविव या इषार्थे " इतीचा विवादेश । - M * -- भाषकधर्मधिधिप्रकरणम। ततश्चारम्भ इवेति व्यतिरेकदृष्टान्त , मिथ्यात्वेऽनुमतौ अङ्गीक्रिय- माणाया कि स्यात् । इत्याह- सपा । जिनयत्यादीना सर्वन' लौकिकयदेव यन्दनादिरूपे मिथ्यात्वे 'अतिप्रसङ्ग ' अतिव्याप्ति. स्थात्, केयलिनोऽपि मिथ्यात्वानुमति, स्यादित्यभिप्राय । पर आह ~क पुनरत्र विशेष ? येनाऽऽरम्भे सभवत्यनुमतिर्न तु मि- ध्यात्वे । आचार्य आह- भण्यते ' कध्यते 'श्रय' वक्ष्यमाणत- या प्रत्यक्षो विशेपोऽय भएयत इति सटङ्क, 'निशामय' शृणु । इति गाथार्थः ॥ ३७॥ तर तावत् सामान्येनाऽऽरम्भमिथ्यात्वयोरनुमते परिहार्य- तयाऽभीष्टाया स्वरूपमाह- पारमे मिन्छत्ते, व वट्टमाणस्स ज पइ विगप्यो । म अणुमन्नड एसो, होइ अ(होम)णुमइ तस्स तत्थेव ॥३८॥ "आरभे" गाहा व्याख्या - आरम्भे' अभिहितस्व रूपे 'मिथ्यात्वे या' व्यस्तनिर्देशे वर्तमानस्य ' प्रवर्तमानस्य, आरम्भादाविति गम्मते । 'य प्रतेि' य श्रावकादिकमुद्दिश्य 'विक- हृदयाकूतम् , तदेवाह--'मामनुमन्यते ' मामारम्भादिप्रवृ. तमनुमोदते ' एप ' श्रावकादिः, एवरूपो विकल्पो य प्रति 'भ वति' जायते ' अनुमति । अनुमोदना ' तस्य' तत्वविकल्प- विपयीकृतस्य तव' प्रारम्भादौ, यो हि किलाऽऽरम्भादो वर्तमा- नम्य तथाऽऽनुफूल्य दर्शयति यथा तस्यैव मन मामेपोऽत्र प्रवर्तमानमनुमन्यते' तन इति गायार्य ॥ ३८॥ . - - रूप . , . , " परिभद्रसूरिसहब्ध गव सामान्येनानुमतिस्वरूपमभिधाय साम्प्रत प्रकृतमारम्भानुम- त्या मिथ्यात्वानुमतेसदृश्यमभिधातु सवासादारम्भानुमतिमाह--- जह राया सिहजयो, कलजीनी पगइ अतवासी य । सव्वे मन्नतेर, वसाम अन्नोनसगहिया ।। ३६ ॥ जह " गाहा व्याख्या- यथा' इत्युदाहरणोपन्यासे, निवामायातस्य मिथ्यात्वस्थानुमतेरिदमुदाहरणमित्यर्थ । 'राजा नृपति , 'शिष्टजन ' अमात्यादि , श्रेष्टिजन इति कचित् पाठ 'क्लाजीनिन' वणिगादय , " हस्वदीर्या मिथ " इति इखत्व कलाशन्दस्य, 'प्रकृतय' मालाकाराद्या , 'अन्तवासिन' जनगमा- दय ।' च ' समुधये । ' सर्वे' प्रागुप्ता ' मन्यन्ते । मन्यन्ते ' वुध्यन्ते 'एप' अभिधास्यमानखरूपम् , यथा सामो वयमन 'अन्यो- न्यसप्रहिका ' परस्परोपकारवन्त इत्यर्थ , 'अन्योन्यसलहिता वा' अन्योन्यसङ्ग-परस्परसबन्ध हिता-वास्तेन या हिता-उपकारिण इत्यर्थ । ते एवविधा घसाम इत्येव मन्यन्ते । इति गाथार्थ ॥३॥ , तथा- - करदाणेण य सव्वे, अन्नोन्नुनगारिणो फुड चेय। राया जाणवयाई, सिप्पकलाजीवणेण च ॥ ४०॥ कर" गाहा व्यारया-- करदानेन ' आभाव्यद्रव्यप्र- चशदात् तद्ग्रहणेन राजाय 'श्रन्योन्यो- ' परस्परोपष्टम्भहेतब 'स्फुट' प्रक्टम्, 'चे' चि एवार्थे " इत्येवार्थे चेयनिपात । राजाइय पालका: - * - - - " भाषकधर्मविधिप्रकरणम्। जनपदादय पाल्या , शिल्पकलाजीवनेन चोपकारिण स्फुटमेव । इति गायायं ॥४०॥ प्रकत निगमयमाह- इस धारभेणुमई, किरियामामग्गिसगय जम्हा । मिच्छ पुण मारफय, सो पुण भावो न परजाणिो ॥४१॥ गाहा व्याया--इतिहेतोरारम्भेऽनुमति, सना- मारपतीति गम्यते । प्रोतमेव हेतु सिञ्चिद्विशेपितमाह---'फिया- माममीमगत यम्मान ' इति मियामामय्याम-श्रारम्भप्रवृत्तिममम- साया सङ्गत-साद्गत्यमन्योन्योपष्टम्भरूप यग्मात-येन सरणेन सरमादारम्भेऽनुमति म्यादित्यभिप्राय । अत एव यते रियासा- ममीमातेरभावान मयामादनुमतिप्रसङ्गनातिप्रसङ्ग । न्येिर मि- प्यावे कि न भवति ? पताह--- मिथ्यात्य पुनभावकतम' मिध्यात्व हि भाववम-अध्यवमायनिवर्तितम, विपर्यस्वाभ्यवसा पम्पत्यात्तस्य । पुन शन्द आरम्मव्यापारादस्य वैशिष्टामाह, सनश्च किम् ? म पुनर्माय ' मिथ्यात्यरूप न परतीत न महवा- मिनिष्णादिस । यनापि श्वासपराजादिगोपष्टभ्यमा मिथ्यारदिनों- फिपदेयवन्नादि मियात्व निर्वाहयति तथापि न तस्य तदानु- मगिः, अध्ययमायस्येय मिथ्यात्यान, नम्य चोपष्टम्म कृत म्याद यामी व्यताउफूल्यव्यागरम्यैष विकल्समुत्पादो-'यदुत मामेव मिथ्यात्वे प्रवर्षमानमनुमन्यते एए' इत्यभिप्राय । इति गाथा ॥४॥ जयति-- , ८ .
t एय हरिभद्रसूरिमंरब्ध एव सवासकओ मिच्छतेऽणुमइममनो नत्यि । श्रह वत्य नि इच्छिाइ, ता सम्मत्ते वि सो होड ॥ ४२ ॥ गाहा व्यारया -'व' उनीत्या सघाम- वृत 'सहयासनिमित्त मिथ्यात्वे अनुमते -परेणाऽऽसजिताया स- भय -प्रमग 'नास्ति' न विद्यते । तत्भ्युपगमेऽतिप्रसङ्ग याध फमाह --प्रय तनापि इष्यते' यदि सयासेऽयधियता अनुमतिर- भ्युपगम्यत इत्यर्थ , ततश्च — सम्यक्त्वेऽपि ' मोक्षवृक्षमूलक्ल्पे 'स ' सपासमानप्रापितानुमतिसभव ' भवेत् ' जायेत भवनभि- प्रायेण । इति गाथार्थ ॥ ४ ॥ पराभिप्रायमेवाह- अह मनसि होइ चिय, कह न अभव्याणमणुमई सम्मे। सिय तेसु वि को दोसो, मोक्सपसगाइबहुदोसा ॥ ४३ ॥ गाहा व्याग्या-अथ मन्यसे भवत्येव ' इति यदि बुध्यमे सवासमानादेवानुमतिरारम्भादाविव सम्यक्त्वेऽपि म वत्येवेत्यर्थ, ततश्च पथ' फेन प्रकारेण “मासादिपु च" इत्यनुस्वारलोप , 'न' वि निपेधे 'अभव्याना' मुतिगमना योग्यानां । अनुमति । सवासििमत्तेति प्रकृतम् । सम्मे' इति मम्यक्त्वे, एव घभव्याना सम्यक्त्वानुमतिरपि स्थादित्यर्थ । स्या- म् मन्यसे । तेष्वपि ' अभव्येषु' को दोप किं दूपण स्यात् ? अयोन्यते--मोक्षप्रसङ्गादयो यहवो दोपा, एव हि मोक्षवृक्षापन्ध्य- मोतगमनपश्चोत्तर(शाउ) ति प्रकृत प्रकृतम्' घ । २ छ । २ । सम्परत्वऽपि " । ३७ M - . . प्रावधर्मविधिप्रकरणम् । विमानोत्पादादय सिद्धान्तनिपिद्धा भूयासो भावा सभवेयुरिति भार' । इति गाथार्थ ॥ ४३ ॥ एव सम्यक्त्वप्रतिपत्तिप्रसङ्गप्राप्ता मिथ्यात्वानिवृत्ति विविध त्रिविधेनाभिधाय निगमयति- इय मिच्छामो विरमिय, सम्म उवगम्म भणइ गुरुपुरो । अरहतो निस्सगो, मम देवो दक्खिणा साहू ॥४४॥ इय मिच्छाओ" गाहा व्यारया--' -' इति ' उदितनीत्या निविध त्रिविधेन 'मिथ्यात्वात् ' उक्तस्वरूपात 'विरम्य' विरत्य- श्रीकार कृत्या ' सम्यग् ' आगमाभिहितेन जिनप्रतिमापूजादिवि- धिना ' उपगम्य ' सामीप्येन गत्वा ' भणति 'प्रतिजानीते 'गु- रुपुरत ' दीक्षादायकाचार्यादेरप्रत । यद्भणति सदाह-'अर्हन इत्यष्टमहाप्रातिहार्यरूपा सुरकृता सपर्यामईतीत्यर्हन, “न्तमाणी शतृशानचो " इति शतुन्तादेश । किविधोऽसौ ? इत्याह-नि- स्सग 'निर्गतो बाह्याभ्यन्तरो रागकपायादिरूप मङ्गोऽस्मादिति निस्सन , प्रतिकृति प्रवचनादिप्रतीयमानाशेपरागादिकालुप्यदोपवि- रह , तदुच्यते---"इह हि रमणीशस्त्राक्षालीघरा सुरमूर्तयो, निपुण- सुगमान् रागद्वेपभ्रमान शमयन्त्यलम् । तव पुनरिय त्यहासङ्गा । तनु कृतकृत्यता, प्रसभमुशति स्वामिन् । मत्य प्रवति तदत्ययम् ॥ १ ॥ य इह गदिता स्वात्मारामा गवादिकमाश्रिता , अपि जिन' जडेस्तेपा तत्त्व फथ किल तत्त्वत | तर तु निखिल वाधान्त - स्थ परिग्रहमुज्झतो, मुनिवर ! भवेद् युक्त्या युक्त तदेतदयाधितम् ॥२॥” इत्यादि । 'मम' इत्यात्मनिर्दशे ' देव ' मोक्षायारा- , । 1 .
+ . साधव 1 . हरिभद्रसूरिस धनीया देवतेत्यर्थ । ' दक्षिणा ' दक्षिणाही पूज्य गुरव इत्यर्थः, यतय । इति गायार्थ ॥४४॥ सम्यक्त्वाभ्युपगमानन्तर यदस्य पालनीय तदाह- अह सो सम्मदिट्ठी, सपुग्न भावचरणमिच्छतो। पालेइ दसणायारमट्टहा सो पुष इमो नि ॥ ४५ ॥ "अह" गाहा व्यारया-'अय' सम्यक्त्वप्रतिपत्त्यन- उपस्वरूप 'सम्यग्दृष्टि अविपर्यस्तदृष्टि । सपू. र्णम् ' थसएट ' भावचरण' फर्मक्षयोपशमादिनिरन्धन तात्त्विक चारित्र 'इन्छन्' अभिलपन् ' पालयति' मम्यगासेवते । दर्श- नाचार' विपर्यस्तप्रतिपत्तिनिमित्तमनुष्ठान ' अष्टधा ' अष्टप्रफा- रम् । स पुन ' स तु दर्शनाचार 'अय इति' वक्ष्यमाण । नहि दर्शनशुद्धिं विना कष्टमियावतोऽपि च तत्फलोदय इत्यमि- प्राय । तदुतम्---" पुणमाणो पि अकिरिश्र, परिशयतो यि सयणधणभोगे । वो नि दुहस्स उर, न जिणइ अधो पराणी ॥ १॥ कुणमाणो वि निवित्ति, परिचयतो वि सयणघणमोगे । देतो नि दुहस्स उर, मिनयदिट्टी न सिज्मइ उ ॥२तम्हा 4- म्माणीय, जेउमणो दसणम्मि पयाजा । दसणवो हि सहलाणि हॉति तवनागचरपाणि ॥३॥" इरादि । इति गाथार्थ ॥४॥ दर्शनाचारमेवाष्टघोहिष्ट निर्दिशति-- निस्सकिय निकसिय, निव्यितिगिच्छा श्रमूढदिट्ठी य । उपयूहथिरीकरणे, वच्छल्लपभाषणे अट्ठ ॥ ४६॥ " निस्सफ्यि" गाहा व्यायानि शङ्कित ' निर्गत- । H श्रापकधर्मविधिप्रकरणम् । शको जीवादिषु । ' निष्कासित 'निर्गताऽऽकालोऽन्यतीर्थिकमतेषु । निर्विचिकित्स 'नि सदिग्धोऽनुष्ठानफल प्रति । 'अमूढदृष्टि खुतीर्थिकविद्यादिदर्शने ।' 'समुचये । एष गुणगुणिनो क- थञ्चिदभेदावेदनद्वारेण दर्शनाचारमभिदधता तद्वदभिधानमुखेन असो उक्त । अतस्त ततो भेदेनाप्याह-उपवृहणमुपवृहा-गुणवत्स्तुति- रूपा, स्थिरीकरण-धर्म चलाचलस्य स्थिरत्वापानलक्षणम् तन, समाहारद्वन्द्वात्सप्तम्येकवचनम् , तद्विपयो दर्शनाचार , प्राकृतत्वात् प्रथमान्त वा । तथा वात्सत्य वत्सलभाव -साधर्मिकाणामाहारा- दिभिरुपष्टम्भकरणमित्यर्थ , तथा प्रकर्पण भावना-जिनशासनमा- हात्म्याऽऽविष्करणरूपा तत्र, शेष पूर्ववत् । ' प्रष्टो' अमी दर्शना- चारा इति गाथाऽतरार्थ । भावार्थ स्वयमेव ग्रन्थकृदभिधास्यति॥४६॥ तत्र तापनि शवितादीना दर्शनाचाराणा येपा यथा स्वरूप- मवतिष्ठमानमिहाभिधातव्य तेपा तथाऽऽह-- निस्सफियाइरून, चिवक्सचाएण होइ केसिचि । तेसि विपक्ससरूव, भन्नइ सेसाण नियरूव ॥ ४७ ॥ "निस्सफि” गाहा व्यारया-'नि शङ्कितादिस्वरूप नि शकित्तादीना दर्शनाचायणा स्वरूप-स्वलक्षण तद् विपक्ष या- गेन' शङ्कादिरूपप्रतिपक्षपरिहारेण ' भवति ' जायते ' केपाश्चित् ' नि शक्ति-निष्कासित-निर्विचिकित्सा-ऽमूहरष्ट्रिरूप-र्शनाधाराणा- म् । तेपामन विष्वता 'विपक्षसरूप'शक्षादिरूप साक्षात् भएयते' प्रतिपाद्यते । 'शेपारणा' तूपहाटीना 'निजरूप' आत्मस्वरूप- मेव । इति गाथार्थ ॥४७॥ 1 । L - - (४०) हरिभद्रमूरिसरब्ध तदेवाह-- ससयकरण सका, कसा अनोन्नदसराग्गाहो । सतम्मि विनितिगिन्छा, सिझेज न मे अय अट्ठो ॥४॥ ससय' गाहा व्याख्या-'सशयकरण शक्षा' भगव- दईत्प्रणीतेषु पदार्येषु धर्माधर्माकाशादिप्यत्यन्तगहनेषु मतिमान्द्या- दिभ्योऽनवधार्यमाणेषु सशय इत्यर्थ , विमेय स्यात् ' नैवम् इनि, इय तु वक्ष्यमाणप्रकाराभ्या द्विधा । पाला 'अन्योन्यदर्शनमाह । अपरापरदृष्ट्यभिलाप , तथैवेयमपि द्विधा । 'सत्यपि विचिकित्सा सिध्यत्र मेऽयमर्थ इति । अयमन भावार्थ -'विचिकित्मा' म- निविभ्रमो युक्त्याऽऽगमोपपन्नेमप्यर्थषु फल प्रति सम्मोह , किमस्य महतस्तप से शायासस्य सिफताक्वलचर्वणप्रायस्य फनकारल्यादे- रायत्या मम फल भविष्यति ? कि वा न ? इति, उभयथा हि घि फलवत्यो निष्फलाश्च श्यन्ते पीपलादीनाम् ।न चेय श- तातो न भिद्यते इत्याशङ्कनीयम्, शशा हि सालासक्लभाक्त्वेन द्रव्यगुणविषया, इय तु क्रियाविपर्यय, तत्त्वतस्तु सर्वेऽप्येते प्रा- यशो मिथ्यात्वमोहनीयोदयतो जीवपरिणमविशेपा सम्यक्त्वाति- चारा उन्यन्ते, नानवमन्त वादिनाऽतिसूक्ष्मेक्षिका कर्तव्या, अज्ञा- तज्ञापनद्वारेण तथाविधविनेयोपकारस्य प्रन्थस्ता चिकीर्पितत्वात् । कृत प्रसङ्गेन । इति गाथाथ ॥४८॥ विचिकिमास्थाने पाठान्तरेण प्राकृतत्वादर्थान्तरेण याऽन्य- थाप्यनामाह-- -1"-पपन्नभयरे स। -- उभयचर घा - - - , . - भाषकधर्मयिधिप्रकरणम्। (४१) विउगुच्छ ति व गरहा, सा पुण थाहारमोयमसिणाई । सका दुनिहा देस, सव्वम्मि य तत्थिमा देसे ॥ ४६॥ " विउ " गाहा व्यारया-- T-'विउगुच्छ ति व ' इति वि- द्वास -साधव नेपा कुत्सा-निन्दा विद्वत्कुत्सा ' इति वा' इति प्रकारान्तरसूचनम् । तत्र कुत्सार्थमाह-गर्हण — गर्दा 'कुत्साऽत्र, मा पुन 'गर्दा तु विरूपा' इत्याह -'आहारमोकाऽस्नानादीनि' आहार -पात्रादिभोजनरूप , मोक - कायिकव्यापारो यतिजनप्रती- नप्रक्रियया, मकारस्तु प्राकृतानुरोधात्, अस्नान-सर्वदा देहमला- क्षालनरूपम, आदिशब्दान्छौचादि च मुनिजनोचितमितपानीया- दिना, कश्चिददृष्टशाखपरमार्थत्वेन शिष्टमम्मतशौचव्यवहारातीवशु- चिपोद्रताग्रहेण बाऽऽहारादिविपया गहां क्रोतीत्यर्थः । माप्रत श- काभेदानाह.--' सङ्का' इत्यादि । 'शङ्का' उक्तस्वरूपा द्विविधा' द्विप्रकारा, कथम् १ । देशे' प्रतिनियतविषया, 'सर्वस्मिंश्च' नि शेप- विषया च । तर 'इय' वक्ष्यमाणा देशे। इति गाथार्थ ॥४॥ तामेवोदाहरणैर्व्यनक्ति-~- तुल्ले जीवत्ते कह, एगे भव्यानरे अभव्य ति । अहवेगारणपुन्ने, सेत्तपएसे कह अन्नो ।। ५० ।। तुल्ले" गाहा व्याख्-' तुल्ये' समाने जीवत्ये' उपयोगलक्षणवेन 'के' केचिद् ऋपमादय 'भव्या'मुक्तिगामिन , 'अपरे' श्रन्येऽङ्गारमर्दकान्य । अभव्या 'मदा भवावस्थिता., समाने हि जीवले किं निरन्धनमेपामनादिभव्यत अन्येषां त्वभ- व्यत्वम् ?, प्रतिनियतस्वहेतुनिर्मित हि दावादे, प्रविमादियोग्यत्वा- , , “ - " कथ (११) दरिमन्द्रसिंह योग्यत्र दृष्टमिति हृदयम् । इह चैव नास्त्येव वस्तुतः शशाप्रपारा, यत स्वहेतुपरम्परामापितमेय तेपा तत्त्वम्, न हि माया प्रतिनिय - वस्तुपरम्पराप्रापित प्रतिनियतमात्मरूपमापना पर्ययोगार्दा भय न्ति । सथा तुल्ये वस्तुत्वे मूर्ता परमाणुभभृतय अमूर्ता ज्ञानादय इति कोऽन पर्यनुयुज्यताम् ? वस्तुस्यमावत्यादस्य । तदुत-- "अग्निदहति नापाश कोऽत्र पयनुयुज्यताम् । इत्यादि । उदा हरणान्तरमाह--' अथवा ' इति प्रकारान्तरद्योतक , ' एकागुपूर्णे एकपरमाणुपूरिते । क्षेत्रप्रदेशे আজায়ানিৰিামালয়ে 'केनप्रकारेण 'अन्य । द्वितीयानि परमाणुरिति प्रकृतम्, अपगाहते इति क्रिया तूत्तरगाथाया पक्ष्यति । इति गाथाय ॥५०॥ भोगाइ तत्येव उ, न य परमाणुण लहुयरत पि । न य अन्नोनपवेसो, ता कहमेय घडिज ति ॥५१॥ " श्रोगाइ " गाहा यारया- अयगाहत' यति ते मातीत्यर्थ , ' तय ' तस्मिनेय प्रदेशे, 'तु' विशेषणे, असा- पपि सर्वव्यापितथा तनापतिष्ठत इति विशिनष्टि । अथ परमाणुना- मपि पूर्वरूपाल्लघुतरत्वापत्त्याऽयमर्थ मभविष्यतीत्याशयाह- नच' इत्यादि । 'न' नैय परमाणुना लघुतरत्वम् येन यहवोऽपि तव मायुरित्यभिप्रा", अपिशव्दाद् वृहत्तरत्वमपि नास्ति। अथान्योन्यानुप्रयेशादणूनामेवमेतत्, तदपि नास्ती याहन च' नैव 'अन्योन्यप्रवेश परमाणो परमाण्वन्तरेऽन्तर्भाव इत्यर्थः । निगमयति--- तत् 'स्मात् कथ 'एतत् उत 'टेत' युज्येत । " लिहोम " इति लिडो ऽमादेश ।। इति 'हेतो, परमात् - - - भाषकधर्मविधिप्रकरणम्। उदितहेतो । कथमेतत् १ इत्येनरूपा या देशशङ्का । यदि हि प्रदे- शो निर्विभाग [ भाग ] परमाणूना च लघुतरत्व अन्योन्यानु- प्रवेशश्च न सभवति अत कथमेकपरमाएपाक्रान्त एवं प्रदेशेऽन- न्ताना तेषा तत्रैवावत्यानम ?, लोकाकाशप्रदेशेभ्योऽनन्तगुणत्वात्प- रमाणुनाम् । यदुक्तम्--" धम्माधम्मपण्मा, तुला परमाएको अगतगुणा । तावन्तश्च लोकाकाशप्रदेशा इत्यवश्यमनन्तानामे कश आकाशदेशेऽनस्थितिरभ्युपगन्तव्या । न च परमाणुभिर्विमा- गेन प्रदेशपूरणम्, प्रदेशम्य मविभागत्वप्रसङ्गारिति । मभविनी इय देशशङ्का । अन चैव परिहारो द्रष्ट्रव्य ---इह हि यद्यपि परमा- णूना लघुतरत्वमन्योन्यानुप्रवेशो वा नास्ति तथापि परिणामान्त- रापत्तिर्भवत्येव, तेनैकाणुपूर्णेऽपि प्रदशे परमाण्वन्तरावगाहो न दुध्यति, न चेयमेव लघुतरत्वापत्ति यत्परिणामान्तरत्यमिति पक सम् , यतो निर्विभागत्वममुञ्चन्नेवासी परिणतिविशेष प्रतिपद्यते । न हि सक्नुपरमाणवो जलेनार्दीकृता परिणामान्तरमापद्यमाना निर्वि- भागरूपमात्मरूप मुश्चन्ति, तौल्यादिनाऽपि पूर्वरूपसवाददर्शनात् , अथ चावगाहान्तर प्रतिपद्यन्ते । न चानापि परमाणूनामन्योन्या- उप्रवेश इति यस्तु युक्तम, र ह्यपरापगणुप्रवेशसभनाणूनामल्प- त्वेन तौल्यादितत्वव्यत्यगेऽपि तेपा स्यान । न चासौ परिणामा- न्तरापत्तिमात्रेण लक्ष्यते, दृश्यते चैकमनीपप्रभापरमाणुपरिपूरितेऽ- प्यपररकाभ्यन्तरेऽपरप्रदीपप्रभापरमाणुनामपस्थिति । न चानापर- परमाणुनामामलकफलपूर्णघट इव जलादेरन्तरालावस्थानेन तथाम .
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(४) शरिभद्रमरिमेट तिभासममिति वक्तव्यम् , तदेशाध्यासनेन शनात्, न च दृष्टेऽनुप- पन्न नाम । इति गायाभावार्थ ॥ ५१ ॥ सर्वशहोदाहरणमाह- सो दुमालसग, गणिपिडग पगयभासपद्धज। तम्हा पागयपुरिमेहि कप्पिय मा न होज ति ॥ ५२ ॥ " सञ्चे" गाहा व्याख्या-'सर्वस्मिन् ' सर्वविपया श- वेत्यर्थ । ' द्वादशा' पाचारादिरूप 'गणिपिटक ' गणधरसर्व स्वभूत लोकोत्तरश्रुतमित्यर्थ , ' प्राकृतभापानद्ध' इति प्राकृतभाषा हि किल विश्वतोमुखा नाविगानेन शिष्टाभीष्टा, प्रतिनियताशा वाला- पलादिवचनयोग्या, नहि तया प्रायशो विद्वास प्रगल्भास्तत्वममि पति, तया पद्ध-प्रथितम् । अत्र च "श्रदातो यथादिपु " इति प्राकृताकारस्थाऽदादेश , " हमीर्घा मिथ इति भापाकारह- स्थत्यम् । प्राकृतभापावद्ध ' यत् यस्मान् कारणात गणिपिटक तस्मात् 'प्राकृतपुरुपै । इति इतरजनैरोग्दर्शिभिरेव प्रकल्पित' पर्षितम्, 'मान' इति सशयवचनम्, 'भवेत् ' म्यान । इदमन हृदयम्-~-भाषा हि किल केपावि मतेन पट् प्रसिद्धा । यदुतम्--- सहवप्रातमागधपिशाचभापाव सूरसेनी च । पप्ठोऽन भूरि- भेदो देशविशेषादपभ्रश ॥ १ " अपरेपा तु मस्कृताऽतिरिका भाषा प्राकता, अपभ्रशश्च रूढा । तरच किल सस्कृता भाषा पाणि न्यादिशब्दानुशासनप्रतिपादितप्रतिनियतप्रयोगसमता स्फुटपदार्थ । विपाइनप्रत्यला सकलशिष्टाभीष्टा विशिष्ठा पा युक्ता । प्राकृता , -- " सौरमनी' या + . . भाषभर्मविधिमकरणम् । तु विश्वतोमुसा प्रायोऽनियतलनणा प्रारतपुरुषाणामपि : प्रयोगयो- ग्या, तद्भणने न पश्चिद्वकृत्याद्यतिशय आत्मनो ज्ञापितो भवति । गणिपिटफ तु प्रायस्तदन्त पात्यधमागधिकाभिधानया भाषया निब- खम्, श्रत फादाचित्कत्वशक्तिवियुक्तरेख कैश्चिर्चितमिति तदुक्का सर्वोऽप्यर्थ सशीतिरिपय इति मिथ्यात्वनिवन्धना सभविनी सर्व- शङ्का । अस्याश्चैवमपनयन विधेयम्--इह हि यधपि मफलोपफा- यवालावलागुपफारफरणप्रयणेगणधरलत् प्राकृतभाषया नियध्यते, वदुरम्-" यालश्रीमन्दमूसाणा, नृणा चारित्रकाशिणाम् । उप- काराय तत्त्वज्ञे , सिद्धान्त प्राकृत कृत ॥ १ ॥ तथाऽपि विशि- धानन्यसाधारणाल्पअन्यत्वादिगुणगणयागादगार्हतगरिमवैतत् ।त- दुकम्-अप्पग्गथमहत्य, वत्तीमा नोसपिरहिश्र ज च । लक्स एजुत्त सुत्त, अहहि अगुणेहि उवनेय ॥ १॥" द्वात्रिंशदोषा- स्तु-" अलिअमुवधायजणय, श्रवत्यगनिरत्यग छल दुहिल । निस्मारमहिश्रमूण, पुणरुत्त बायमजुत्त ॥ २ ॥ इत्यादय " निहोस मारवत च, हेउजुत्तमलकिय । उवणीय मोक्यार च, मिय महुरमेय य ।। १ ।" तथा-" सुटमुपगत- प्रामाण्य स्वैरमन्यममैर्गुणैर्गदितुरुति मजल प्रकाशयदासा । अपरवचसामप्रामाण्य प्रशासदलन्तरामिति जिनबचो लक्ष्य साक्षा- परीक्ष्य विचक्षणे ॥ १॥ यदपि च भवेदल्पप्रन्य तयाऽपि महा.. र्थक, करगुणमिर्दोषैस्त्यक्त गुणैर्युवमष्टमि. । तदपि च पर लक्ष्मै अष्टौ गुणा ॥ २ धरिमप्रमूरिसरमा तस्य प्रतीतमत पर, मयितगययातायर पुतीपियस्थितम् ॥२॥ असदृशगुण तस्मात्तस्माघदन पच स्थित, तनसिलमपि श्रीसर्याप्र- वृत्तमिति स्थितम् । मदपि च पर म्यादापारपरन्पपुरस्सर, पदति- लमिह प्रोक्त रूप प्रतीतमयाधितम् ॥३॥"नथा मफलविद्वरसम्मवप. रिशुद्धफ्पादिभिश्वेदमेव निघटितम् , तद्वच्म "इह सलु कप शुद्ध मिद्धा युधैरयधार्यते, सक्लविषयच्छेदश्छेके पर परिलक्ष्यते । प्रकन्यदना प्राप्तस्वाप प्रतीतिपद मतामिति जिनमते व्यका यतो ( यस्मात् ) प्रमाणयिनिश्चिति ॥५॥ यदपि च यस्तद्वकिनि- त्वचित क्लि फ्लप्यते, तदसिलविद सूत्रम्यान्तर्गत सलु लक्षयेत् । इह हि निखिल रत्न रत्नाफरमभव भरेनदपरभुवि प्राय प्राप्त पर तत य तत् ॥ ५ ॥" तथा [--" मुनि उणमयाइनिहण, भूअहि अ भूयभावणमणग्य । अमिश्रमजिथ महत्य, महाणुमाव महा. विसय ॥ १॥" इत्यादि । विश्वतोमुपत्य अनियतलक्षणत्वं प पचित्सस्कृतेऽपि तुल्यम्, 'प्रत परप्रतीतिप्रत्यल प्राकृत प्रयोतु युक मनेति नोक्तशवासकाश । इति गाथार्य ।। ५२ ॥ पाहामपि देशसर्वनिपया द्विधामाह-- कसा देमे एग, कुतित्थिमयमिच्छए जहित्य पि । भणियमहिंसादुफयसुकयफल सग्गमोक्साई ॥ ५३ ।। ' कसा " गाहा व्यारया- काला' प्रारतिपादितस्य- रूपा देशे देशविषया शर्यत इति गम्यते । 'कुतीमित ' माख्यादिदर्शन 'इच्छति ' अभिलपति, मौवागतया मन्यत इत्य- र्थ । यथा मयदे तथाऽऽद-'यथा' इति प्रकारयचन, यथा - - - - , - ५ है . भाषफधर्मविधिमफरणम् । । सौगतादिदर्शने ' भणित ' अभिहितम् । किम् हिंसादुष्कृतसुझतफलम् ' इति, अहिंसा-प्राणिपीडापरिहारलक्षणा, उपलक्षणेन च सत्यादिपरिग्रह , याहिंसा प्रततिरूपत्वेनाशेष प्रतस्याहिंसधफ अचम् , दुप्पत-प्राणज्यपरोपणादि, सुकन- ध्यानाध्ययनदानादि, तस्य प्रतिपेविधिरूपहिंसाऽध्ययनाद्यात्मकस्य सुकृतस्य दुष्कृतस्य च फल-कार्य ' स्वर्गमोक्षादि' निविष्टपापवर्ग- सुलप्रभृतीत्यर्थ , आदिशन्दस्य यथायोग योगाद् दुष्कृतफल नरका द्यपि । अनापि क्लि सारयादिदर्शने सुकृतदुप्कृतफलममिहितमेवे- ति इदमपि न क्षेपार्ह मिति देशकाडा । इति गाथाहृदयार्थ ॥१३॥ सये सचमयाइ, कसइ जहमणियकारणेहितो । सकाए पयपाई, कसाए अमचरायाणो ॥ ५४॥ "सने" गाहा न्यारया- सर्वस्मिन ' सर्व विषया का- वेत्ति प्रकृतम् , ' सनमतानि' सर्वदर्शनानि जैमिनिकणभक्षाक्षपा- दशाक्यकपिलादिप्रतिवद्धानि, रिम् ? ' कासले' मोजागतयाऽङ्गी- फरोतीत्यर्थ । • यथामणितकारणेभ्य । प्रास्प्रदर्शितसुकृतफला मिधानादि-या, "भ्यसश्च हिंतो मुतो” इति पञ्चमीभ्यसो हितो- यादेश । ऐहिकप्रत्यपायप्रत्यक्त्वमपि शङ्काकाइयोराविष्कुर्वन्नुदा- हरणे पाह-'मका' इत्यादि गाथार्धम् । शिया पेयापायिनी युमारकावुनाहरणमिति गम्यते । पासायासमात्यराजानाबुदाहरण म् । इदि गायाधराय ।। ५४ ।। १, तिनमान्यनाशनमतस्य" । से For " (५८) हरिभप्रसूरिसह भावार्थस्तु फयानक्गम्य , वे चैते- जहा गम्मि नयरे गस्म मेहिस्म टोरिण पुता लेष्ठ- सालाए पढति । सिणेहा य से माया मा कोई पन्छिही अपसारि- एमइमेहाफरि श्रीमहि पेय देह । तत्य परिमुजमाणाण घेव गो वितेइ, नूण मन्छियानो ण्यासी । नस्स सका घेव माणसदु- कम्पपुव्यग सारीर ति यग्गुलीयाही जायो मयो । इहलोगमो. गाण श्रणाभागी जाओ। अपरो न माया अहिश्र चिंतेड तिनि- स्सकियो पढिउमारद्धो । परिणया पजा, निरुपण य गहियो नि बाक्लायो । इहलोगभोगाण प्रामागी जाओ ति | यथाऽसावविषयविषया शङ्का कुवनेहिकापाय प्राप, अधिपय विषयता चार शहाया सपत्नीमातुरपि व्यापार्योपलम्मेन सथाविधशङ्काया वस्तुतो निर्विपयत्यात् तथा जिनमतगता शङ्का कुराननेकपारनिकापायपर स्यात । तदुप्तम् - ' विमलमपि हि घेत शश्या पहिल स्यात् , पय इव च पयाधे कर्दमोदामयोगात । तदनु च जिनवाक्ये प्रत्यय स्यादगाढ , म च ग्यलु परिपन्धी तत्त्वदृष्टेरनिष्ट ॥१॥" "त्यादि । तथा- राया कुमारामयो य भासेणावहरिश्रा अहार्य पविहा । छुहापरता वणफ्लाणि सायति । पडिनियत्ताण च राया चिंते, लडुमपूयलगमाणि सव्याणि चक्सामि । आगया दो वि जरणा ! रएणा सूआरा मणिश्रा, ज लोए पयरइ न सय रघेह ति । ठेहि रघेता उपहाविध थरएको । मो गया पेच्छाऽदिहत करेह । क ३ (१९) 1 श्रावधर्मविधिप्रकरणम्! प्पट्टिया बलिहिँ धाडिन्नति, व मिट्ठस्स अवगामो होडिइ । करणकुडगमगाईगि वि खाइयाणि, वहिं सूलेण मनो। अमरेण पुण बमणविरेयणारिण कयाणि, आभागी भोगाण जाओ"ति॥ एवमिहाप्यपरनिरपेकवनयमतमात्रनिर्मितरतार्थिदर्शनानि काडमाण सेवामपरापरप्रतिक्षेपद्वारेण पाय प्रवृत्ते सर्वानाश्वास., सर्वनयमतव्यवस्थिचवस्तुतत्वानपिगतेरनेकामुष्मिकापायभाग मव- ति। तदुच्यते-- निखिलमसिलै सम्यग:व्ध नयैर्न किलैकशो, यादिति बहुधा बोषाध्यानस्त्वया प्रथिता प्रभो । वदिति कुशो व्यायकोरान्त्यनेक्पयस्थिता, असकलशो हस्तिन्यन्धा यया किल कुर्वते ॥ १॥" इति गायार्थ ॥ ५४॥ विचिकित्सामपि प्राणुकां द्विपाऽऽह- विचिगिच्छ देस एग, चिहनदयनियमपोसहायं । सफलं रिपलं व होज, न नजए सब सच्याणि ॥ ५५ ॥ विचिगिच्छ " गाहा ध्यास्या-'विचिकित्सा' पदि. तम्वरूपा, इस्वत्व तु च्छन्दोभद्मयात् । 'देशे। देशविषया यथा---ए' किञ्चित चैत्यवन्दननियमपौषपादिक अनुष्ठान सफल विफल वा मयेत् न झायते इति यिचिकित्सनाति योग । सन नियमा -विविधामिप्रहविशेषा अणुप्रतादिरूपा वा, पौधर- शिक्षामवान्त पाति, आदिशाहर्शनप्रतिमादिपरिमह । तपा “ - घेत्यवन्दनादीना मध्येऽन्यतरद्विचिकित्सरे, यथा सपन' स. ""घा २ "प्रागुदिता".
धा - हरिभद्रसूरिसंहब्ध गादिफलहेतु 'विफल' तद्विपरीत कायक्लेशफलमानमेव या वि. चिकित्सा । सर्वस्मिन् ' सर्वविपया विचिकित्मेति प्रकृतम्। किवि- १ सर्वाणि' इति सक्लान्येव चैत्यवन्दनादीन्यनुष्ठानानि विचिक्त्सिति, यथा न ज्ञायते सर्वस्यास्य चैत्यवन्दनादेरागममान- प्रतिष्ठितफलस्यास्माक कि फ्लमस्ति ? उत न। इति गाथार्थ ॥५॥ सत्यपि नि शङ्किते जीवाद्यस्तित्वे विचिकित्सानियन्धनम- भिप्रायमाद- पुनपुरिसा जहचिय (जहोइय), मग्गचरा घडड तेसु फलजोगी। अम्हेर धिहसघयणविरहयो न तह तेसि फल ।। ५६ ॥ " पु वपुरिसा" गाहा व्यारया---' पूर्वपुरुया ' कामदे- 'यथोदितमार्गचरा ' श्रागमनिर्दिष्ट धर्मनिश्चलत्वादिगुणा- सेविन इत्यर्थ , 'यथोचितमार्गचरा वा' सर्वनौचित्याचरणपरा- यणा इति भाय , अव ' तेयु ' तद्विपय ‘घटते ' युज्यते 'फ- लयोग' श्रागमाभिहितनिपिष्टपपदोत्पादेकारतारत्वादिधर्मनियाका- यसपन्ध । 'अस्मासु ' अस्मद्विपये, तुशब्दो भिनपाक्यतायाम् , "क" श्रादिसूत्रेण च तलोपे सन्धौ चैव भपति | 'धृतिसहन- नविरहत । तथाविधानुष्ठानप्रवृत्तिनिमित्ततनुशक्त्यभावादित्यर्थ । 'न' इति निषेधे । ' तथा ' तेन पूर्वपुर पप्रतीतप्रकारेण 'तेपा' चैत्यवन्दनादी। धर्मव्यापाराणा 'फ्ल' साध्यकार्य स्वर्गादिनति समन्ध । ण्यविधा पिचिकित्सा वस्तुतो मिथ्यात्वनिरन्धनेव, यतो नहि सभघोऽस्या विपर्यय विना ! तथाहि-यथा पूर्वपुरुपाणा धृ- त्यादियुजा सम्यक्त्तादेः स्वगादि फ्ल तथेदानीतनानामपि जघ- यादय ।
श्रावकधर्मविधिप्रकरणम् । - - तथा- तद्वता न्यादिभेद तदेव । यत श्रागम "अविराहिअसामरणस्स सा- हुणो सागस्स य जहएो । सोहम्मे उववाओ, भणियो तेलो- कादसीहि ॥ १॥"न चेदानीमागममनुसरतामपि सम्यक्त्वाद्य- सभव । तदुक्तम् दुप्पसहत चरण, भणिन ज भगवया इह सेत्ते । आणाजुत्ताणमिण, न होइ अहण त्ति वामोहो ॥ १ ॥ -~-" जा सजमया जीवेसु ताव मूला य उत्तरगुणा य । इत्तरियछेअसजम, निग्गथ यउसा य पडिसेवा ॥ २ ॥ तदेव तीर्थावसानसमयानुगामीनि सम्यगज्ञानदर्शनचारित्राणि, च कालाद्यपेक्षमनुष्टानमवश्य मुक्तिफलवदेव । अत एवेन कालमपेक्ष्य सभवयतनागुणेन सयममाराधयता साधूना हीलाविधायिनामागमे महाननर्थोऽभिहित । यदुक्तम् -" धीरपुरिसपरिहाण, पाऊण मदधम्मिश्रा केई । होलेति निहरमाण, सविग्गजण अबुद्धीमा ॥१॥" तेपा चेद फलम् --" सतगुणछायण सलु, परपरि- वाओ अ होइ अलिश्र च । धम्मे अ अबहुमारणो, साइपओसे अससारो ॥१॥" इत्यादि । तस्मात्सहननाद्यनुरूप धर्मे परा- फामतामवश्य ययाभिहित फलमस्तीति निर्विचिकित्सेन भाव्यम् । इति गाथार्थ ॥ ५६॥ साप्रत द्विरूपाऽपि विचिकित्सहिकस्यायपायस्य निदानम्, एतद् दृष्टान्तेन दर्शयति-- निचिगिच्याए विजासाहताऽसड्डचोर दिटुंतो। निउगुच्छाए पञ्चतनासियो सट्टगस्स मुया ॥ ५७ ॥ "निचिगिन्छा" गाहा व्याया--' विचिकित्साया , हरिमरिमहरा म्यरुपाया ' विशामाधयद्याद्वचारणान 'इति विद्या माध- यन शिासायग्निति गन्तन मगामो गमकत्यात् । तदुतम्-- दव्यमझायपासाभ्या, ममासो न निषिध्यते।" मारता था ममास । तभ विद्यामाघयधामावाद्धति विशासापय". भाद्ध म प पौरभेति चार्य , तो रष्टान्त ' पदाहरणम् । 'वि- दरजुगुप्माया' अभिहितरूपाया प्रत्यन्तवासिन । तथाविधसा- ध्वापातरहितमामयासिन 'प्रायम्य ' पासस्य 'मुता'दुहिता । इति गाथाऽभरार्थ ।भावार्धस्तु कथानकगम्य । रोते कथानके- " साययनदीसरवरदीवगमण व्यिगधाण देवसथ मएं- मित्तस्म पुच्छण, विज्ञापयाण, मादण, मसाणे पउपाय सिकग वा इगाला साइरो असूलो। भट्टसयवारा परिजयेशा पाओ मिशगरस दिई । य नितिनो तामओ। पत्ये छिएणे भागा- मेण पपई । तेण सा विज्ञा गहिया । फालचउसिरति सारे। ममाणे चोरो य नगगरायगेहिं परद्धोपरिन्मममायो सत्येय मा. गओ । ताई वेढेउ मसाए ठिमा पभा घेपिहिए ति । सो भ- मनो विजामाहग पच्छ । तेण पुग्छिनो मो भण्ड, विज सा हेमि । चोरो भणइ, येण दिएगा ?, मो मपद, सावगेण । चारेण भणिय, इम दव्य गेपहाहि यिज देहि । सो सडो विगि छह ति मिश्मेजा न यत्ति नेण दिएणा । घोरो चिंतेर, सायो डिआए वि पोड नेन्धर, सथमेय, मो माहेउमारहो । इयरो महोढो गहियो । तेणागासगरण लोगो भेसियो, साहे सो मुनो, ते वि सट्टगा जाय ति॥
- प्राधकधर्मयिधिप्रकरणम् । एवमिहापि निजानुधानफल विचिफिल्ममानोऽमुमान प्रामु- मिफापायभाम् भवति । तदुतम् " तत्वे मूह ' मनागपि अ- (प्य मचिर्जिनदृष्टभावविपयेयम् । विद्यागतेय तत्साधकस्य तत्क- लविधाताय ॥ १ ॥” इति । विद्वज्जुगुप्सायां श्रावकसुता घ--- गो सङ्लो पाते परिवसइ । तस्स धूयाविनाहे कह पि माहु- यो प्रागया। मा पिउणा मणिश्रा, पुत्तिग । पटिलाहेहि साहु- णे । सा मडिअपसाहिआ पडिलाहेड, माहण जल्लगधी ती भागयो । मा चितेह, अहो 'अणवजी साहरण धम्मो देसिओ । जह पुरण फासुण्ण रहाण्जा को दोसो होजा? । सा तस्म हाण- म्म श्रणालोइयपडिकता काल किया रायगिहे गणिया पोट्टे आ- या गभगया चेय अरइ जण्ड । गम्भपाडणेहिं पि न पटइ । जाया ममाणी उमिश्रा | मा य गधेण त पण वासेइ । सेणियो तेण पामेण निग्गन्ध सामिणो पदो, मोरधानायेती गधम- महतो परम्मुहो मग्गो । रगणा पुन्छि, कि एय' । तेण प. हिन, धारिया गधो । गतूण दिवा । भण्इ, एमेव पढमपुग्छ त्ति । गो परित्ता पुच्छर । तो भगवया तीर उहाणपारिया- वणा कहिया । भणइ गया, कहि एमा पचणुभविस्मइ मुह या टुह पा' | सामी भगइ, एण्ण कालेण वेइय । सा ते चेव भना मविस्मइ, अग्गमहिसी अह सान्छराणि । जा य तुझ रममा- एस्स पट्टीए हसौलील काहिइ त जाणन्नामि । यदित्ता गमओ । सा य अवगयगधा प्रामीरेण गहिश्रा, सवष्टिया जोश्रणका जाया । कोमुझ्वार माया मम आगया | अमो सेपियो अ हरिभद्रसूरिसदृब्ध पन्छएणा कोमुइयार पेच्छति । तीमे दारिआए अगफासेण सोणि- ओ अज्मोववरणो नाममुद्द दसिपाए ती बघा । अभयरस क. हिअ । नाममुद्दा हारिश्रा मग्गाहि । तेण मणुस्सा दारहिं यद्धेहि ठविश्रा । एकेक मागुम पलोण निणिजइ । सा दारिमा रिहा, चौरि त्ति गहिआ परिणीथा । श्रएण्या य यज्मफेण रम ति रायाण राणियालो पोत्तेण वाहिति, इयरी पोत्त देतीया चेव विलग्गा, रगणा मरिय मुथा य, पवइया " ॥ ५७ ॥ अधुनाऽमूढदृष्टिरूप दर्शनाचारमाह-- इड्डीयो गरिहा, मिजाजणिया तवोमयायो य । वेउध्वियलद्धिकया, नहगमणाई य दतॄण ।। ५८ ॥ पृय च असणपाणाइवत्थपत्ताइएहि निविहेहि । परपासडत्थाण, सकोलूयाइण दह्र ॥ ५६ ।। घिजाईयगिहीण, पासत्थाईरा वागि जम्स न मुझइ दिट्ठी, अमूढदिहि तय विति ॥ ६०॥ इड्डीत्रो" गाहा व्यारया ऋद्धी ' विभूती वक्ष्य माणम्पा राष्ट्वा यस्य दृष्टिन मुह्यतेऽ(ति अ)मूढदृष्टिं तक ध्रुवत इति सयन्न । किंविधा ऋद्धी ? अनेकप्रकारा यहुविधा । तथैवाह- 'विगाजनिता' वशीकरणादिविद्यासम्पादिता, 'तपोमयीच' विकृष्टोपवासादिप्रापिताश्चेत्यर्थ,'वैनियल धकृता 'काश्चनपद्मा दिनिर्माणम्पा , नभोगमनादिकाश्च' पाराशगमनादिका दृष्ट्वा' उपलभ्य | इति गाथार्थ ॥ ५८॥ तथा- -- . , भाषकधर्मविधिप्रकरणम्। पूय " गाहा व्यारया---' पूजा' सपयां, चशन्दा स- वेऽत्र समुच्चये, अशनपानाभ्या-ओदनद्राक्षापानादिरूपाभ्याम् , 'आदिशब्दात्सादिमरवादिमाभ्याम , तथा घलपात्राभ्या प्रतीताभ्या- म्, आदिशन्दादासनादिपरिमह , सर्वेपा पदाना चार्थसमासेन नि- देश, तै ।' विविधै । अनेकप्रकारे । केपाम् ? इत्याह-पर- पापण्डस्थाना' परपापण्डे--शाक्यादिलिङ्गे तिष्ठन्ति ये ते तथा ते- पाम् । तथैवाह-' शाक्योलूकादीना' योद्धभौतप्रभृतीना 'दृष्ट्या' उपलभ्य । इति गाथार्थ ॥ ५९॥ तथा- "विजाईय" गाहा व्याख्या-धिगजातीया -द्विजातय त एव गृहिण , अन्ये या गृहिणो धार्मिकमन्यास्तेपाम् , तथा 'पा- वस्थादीना' प्रागभिहितस्वरूपाणामाईतानामेर । था-अपिशनी समुचये । यस्य न मुह्यते(ति) 'न भ्रान्तिमुपयाति 'दृष्टि । दर्शनममूढदृष्टिं ' तक ' एवविध 'बुवते ' प्रतिपादयन्नि पूर्वा- चार्या । यो बनेकप्रकारैरपि मोक्षमार्गविगुणविभूतिविशेपै परपा- पण्डादिगतै वय॑ते तममूढदृष्टिमाह । इति गाथात्रयभावार्थ ॥६॥ उपयहादर्शनाचारमाह- खवणे येयानचे, पिणए सज्मायमाडउजुत्त । जो त पससए एस होड उवगृहणा नाम ॥ ६१ ।। "सपणे " गाहा व्याख्या-'क्षपण' अविकष्टविकृष्टरूप पष्टाष्टमादि तत्र, 'वैयावृत्त्ये ' व्यावृतभावलक्षणे प्राचार्यादिगते, 'विनये' अभ्युत्थानादिरूपे, स्वाध्याये-वाचनादी, आदिशदाद- + . " , हरिमरिसंहा न्यत्र प साधुकृत्ये परणकरणरूपे उधुत-उद्योगवन्त यस 'प्रश- सति ' स्तौति, 'पा' इति पद्वारेण निर्दिष्टा प्रशसाक्रिया भवति 'उपगृहणा नाम' उपहारूपो दर्शनाचार । इति गायर्ष ॥६॥ स्थिरीकरणदर्शशापारमाह- एएमु चिय खवणाइएसु सीयतु चोयगा जाउ । बहुदोसे माणुस्से, मा सीय थिरीकरणमय ।। ६२ ।। एएमु " गाहा व्याख्या-~'एतेष 'प्राग्गाथाकथितेषु क्षपणादिपु ' सपणवेयापत्यपिनयम्याध्यायादिपु 'मीदव ' प्रमा- घत साध्यादेरिति गम्यते, 'चोदना' प्रोत्साहना तयाविधवचना- दिभिः प्रवर्तनेत्यर्थ , 'या तु ' या पुनरेवविधा निया व स्थिरीक- रणमिति योग 1 फय पो ना ? इत्याह-" यहुदोसे" इत्यादि, बहवो दोपा प्रस्तुतधर्मविघ्नभूता रोगादयो यस्तिसथा सत्र, 'मा- नुपे' मनुष्यत्वे ' मा सीद' मा प्रमादी स्थिरीकरण 'एता' एवविधम् । इति गाथार्थ ॥ २ ॥ वात्सल्यदर्शनाचारमाए-- साहम्मियपच्छल्ल, आहाराईहि होइ सम्पत्य । आएसगुरुगिलायेतवस्सिवालाइसु विसेसा ।। ६३ ।। "साइम्मिय" गाहा व्याख्या-पार्मिकाणा-सधर्माणा साध्यादीना यथासमय यात्सल्य-यत्सलभाषलक्षण माधर्मिफवास- ल्य 'आहारादिभि ' भापानपखपानादिभि भववि ' जायते कर्तव्यमिति शेप , 'सर्यग्र साधुवर्ग, विशेषमाह-'आदेशगुरुग्ला- .
- , श्रावकधर्मविधिप्रकरणम् । (५७) नतपस्विवालादिपु विशेषात् ' तर श्रादेशा -प्राघूर्णका , गुरव- प्राचार्या, ग्लाना -रोगादिपीडिता, तपस्विन-विकृष्टतपोयुक्न , वाला-तुल्लका , आदिशन्दाच्छतकमहोदरादिपरिग्रह, तेप्यादेशा- दिपु' 'विशेषात् । अतिशयेन यात्सल्य कार्यम् । यदुक्तम्--- "पाहुणविसेसदाणे, निजर कित्ती य इहर विवरीय ।" इत्यादि । इति गायार्थ ॥ ६३ ॥ साप्रत प्रभारनोच्यते, तत्र प्रकर्षेण भावना-जिनशासनस्य स्वशत्या दीपनेत्यर्थ । नन्वेवमसौ जिनशासनस्य स्वमहिम्नन सिद्धा किं तनापरपुरुपव्यापार ? भत एवोच्यते-" मकलवि- पयशानाधीन प्रमाभिरबाधित, सकलममल सत्सवाद वदन्निति स- पदा । भवति भगवन् । सर्वज्ञत्व सदाऽभिदधद् सद, जयति भवत सिद्धान्तोऽय परैरपराजित ॥१॥” सत्यमित्यमिति हदि निधायाह- काम सहावसिद्धं, तु पवयस दिप्पए सय चेन । तहति य जो जेणऽहिरो, सो तेण पयासए तंतु ॥ ६४ ।। गाहा व्याख्या 'काम' अनुमतमिद . भावसिद्ध ' निजप्रभावप्रतिष्ठितमित्यर्थ । 'तु' अधारणे, स्व- भावसिद्धमेव, अत 'दीप्यते' प्रकाशीमवति 'स्वयमेव' ल्मनेव, तर्हि कथ प्रभावनाकरणम् ? इत्याइ-'तयापि' यद्यपि एव 'य' अवधिज्ञान्यादि । येन' अतिशयादिना अधिक अपराणिभ्य उत्कलित 'अवधिज्ञान्यादि तेन' श्रा- १ तसेवन्त ज्यादानि"। " काम - . , , म , . २ हरिभद्रवरिसडधं स्माविशयेन प्रकाशते ' प्रदीपयत्येव । 'तत् ' प्रवचनम्, 'तु अवधारणे, प्रकाशत इत्यस्मात्परतो योजित एव । इदमत्र हृदयम्- यद्यपि जिनप्रवचनमनेकातिशयनिधानत्वेन प्रभावनाप्राप्तमेव तथापि यथा तत् सत्त्येन भव्याना मनस्सु विश्राम्यति तथा सम्यग्दृष्टिभिर्यवि- तव्यम् । इति गाथार्थ ॥ ६४ ॥ अमूढदृष्ट्यादाबुदाहरणान्याइ- सुलसा श्रमूढदिट्ठी, सेणिय उववूह थिरीकरण साढो । यच्छनम्मि य वडरो, पभावगा अट्ठ पुण हुति ॥ ६५ ॥ सुलसा गाहा व्यारया--मुलसाश्राविकाऽमूढदृष्टावु- दाहरणम्-यथाऽसावम्मट ( ऽमावम्बड ) परिपादपतविद्यानिमित्ता- गुतभावेर्न सम्यदृष्टी मुमोह, एवममूढदृष्टिना भाव्यम् । श्रेणिको राजा उपहायामुदादरणम्-यथाऽसौ क्लि सुरमायानिर्मितस्य मृत- स्य शुक्लादन्तादिप्रशसाद्वारेणोपबहा, चकार, यथा वा स एव सम्यक्त्वनिश्चलत्वादी शक्रेणोपवृहित , एन क्षपणादी माधूनामुप- हा विधेया । 'थिरीकरण साढ' इति स्थिरीकरणे आर्यापाढा- चार्यों ज्ञातम-यथाऽमो किल धर्मे चलाचल सन प्रनग्या तित्यनु क्षुल्लकजीवदेयेन स्थिरीकृत एय स्थिरीकरण कर्तव्यम् । वात्स- ल्ये वैर ' इति वात्सल्ये वैरस्वामी ज्ञातम्-यथाऽसौ श्रमणसघ दुर्मिक्षोदधेर्विद्यानिमितपटपोतेोत्तारणायोधतो दालूनशिसेन श- य्यातरेणाभिहित , यथा- भगवन् । मामपि साधर्मिकमेवावधार्यो- तारयातो विपद ' इति विज्ञप्तश्च तमपि साधर्मिकवात्मल्य चिकी- मुस्तथैवोत्तारितवान, एव साधर्मिक्वात्सल्य विधेयम् । एतत्सबद्ध- - - . " भावकधर्मविधिप्रकरणम् । कथानकानि तु प्राय प्रसिद्धत्वाद् ग्रन्थविस्तरभयाथै न लिरयन्ते । प्रभावका प्रभावनाया कार 'अष्टो' वक्ष्यमाणरूपा पुन ' भिन्नवाक्यतायाम् , प्रभावका पुन इति द्रष्टव्यम् । 'भ- वन्ति ' सन्ति । इति गाथार्थ ।। ६५ ।। साम्प्रत प्रभावनाया कर्तव्यतामागमादाविपउर्वनपरमपि त- सहचरिततया निर्दिष्टमाह-यद्वा यदार्यवैर सून स्मरद्भि सा. धर्मिकवात्सल्यमकारि तमाह-- माहम्मियवच्छल्लम्मि उजया उजया य सज्झाए । चरणकरणम्मि य तहा, तित्थस्स पभावणाए य ॥६६॥ साहम्मिय गाहा व्याख्या साधमिकवात्सल्ये कथितस्वरूपे । उद्यता उद्योगवन्त, 'उदाताश्च स्वाध्याये [ स्वाध्याये ] चोदता इति द्रष्टव्यम् , चरणरणम्मि त्ति चर्यत इति चरण-प्रतादि, तदुप्तम्-" वय५ समणधम्म १० स- जम१७, वेयावश्च १० च यमगुत्तीअोर । नाणाइतिग३ तव१२ कोहनिग्गहाई४ चरणमे ॥ १॥" क्यित इति करणम्-पिण्ड- विशुद्धपादि, तदुक्तम्---" पिंडविसोही४ समिई५, भावण १० पडिमा१० य इदियनिरोहो५ । पडिलेहण२५ गुत्तीओ३, अभि- गगहा४ चेव करण तु ॥ १ ॥" तर । पशद्ध उद्यतक्रियानुकर्प- तथा' श्रागमोक्तप्रकारेण 'तीर्थस्य प्रभावनाया' उक्त- स्वरूपायाम् । चशब्द प्राग्वत् । सुसाधवो हि साधर्मिकगात्सल्या पवुद्यता भवन्ति । इति गाथासमुदायार्थ ॥ ६६ ।। भयातु"या ' , " . णार्थ । । । " M १ . . हरिभद्रसूरिसंह जना ' विक्ल्पना, कदाचिद्भवत्यसौ कदाचिनेति ! 'तु ' पुनरर्थे । नतप्रतिपत्तौ पुनर्भजनेति द्रष्टव्यम् । इति गाथार्थ ॥ ६६ ॥ भजनाकारणमेवाह- ज सा अहिगयरामो, कम्मखोवसमओ न य तो वि । होड परिणाममेया, लहु ति तम्हा इह भयणा ।। ७० ॥ "ज सा " गाहा व्यारया-'यत्' यस्मान् कारणात् सा' प्रतप्रतिपत्ति 'अधिक्तरात् ' सम्यस्त्वमप्राप्तिनिमित्तभू- तादर्गलतरात् 'कर्मक्षयोपशमत ' इति कर्मणा-चारिनमोहनीय- लक्षणाना क्षयोपशमस्तत , उपलक्षणत्वाच अस्योपशमात् क्षयाच । स एव सम्यक्त्वलाभे नि भवति ? इत्याह--'न च'नेय 'तो' इति 'सक ' कर्मक्षयोपशम , तुशन्द पुन शब्दार्थ, स पुरारिति च द्रष्टव्यम्, ' भवति ' जायते 'परिणामभेदात् ' तथा- मव्यत्वनिदानकर्मक्षयोपशमावन्ध्यनिरन्धनादात्माभ्यवसायविशेषा- दित्यर्थ , 'लघु' भटित्येव ' इति ' सम्यक्त्वगत् , ' तस्मात् तत कारणा ' इह ' प्रतप्रतिपत्तौ भजना, शुभूपादिपु तु निय- म । इयमन भावना--यापि पर्मग्रन्थिभेरादेव सम्यक्त्वमुदति, तस्मिंश्च प्रतप्रतिपत्तिमेवोपादेयतरामध्यवस्यति तथाऽपि न यावत्या कर्मस्थितो मम्यक्त्वलाम सपनस्तावत्यामेव प्रतप्रतिपनिरपि त- चतो भवति । इति गाथार्थ ॥७॥ इदमेवाह-- सम्मा पलियपुहुत्तेऽवगए कम्माण भावसो हुति । क्यपभिईणि भवएणपतरडतुत्राणि नियमेण ॥ ७ M " . . - श्रायकधर्मविधिप्रकरणम् । सम्मा पाहा व्यारया-'सम्म' त्ति सूचनात् मूनमिति न्यायात्सम्यक्त्वान् प्रातात् मन्या लाभकालसभाविकर्मस्थितेरिति हृदयम् । ' पत्योपमहथकरे' सिद्वान्तपमिद्वे । तदुसम्---" ए- गाहियेहिअहिआण उद्दोस सत्तरत्ताण । सम्मट्ट सनिचिन, भरिभ यालग्गकोडीण ॥ १ ॥ ॥ इत्यादि ॥ द्विप्रभृतियनवभ्य इति पृथक्त्वपरिभाषा । तस्मिन् पन्योपमयस्त्वे 'कर्मणा' तदा- वारकाणा 'अपगते' याते बेदिते इत्यर्थ , भावत परमार्थ- गन्या, न तु बाह्यप्रवृत्तिमानमानित्य, तयात्वेन मिथ्यादृष्टेरपि रजो- हरणादिधारणक्रियाया अपि सभवात् । यदुक्तम्----" सम्वजियाण जम्हा, मुत्ते गेवेनगेसु उमवाओ । भणिो जिणेहिं सो न य, लिंग मोत्तु जो भणिय ॥१॥ जे दमणगावरणा, लिंगरगहण करेंवि सामएणे । तेसि पि श्र उववाओ, उकोमो जाव गेज२॥" इत्यादि । 'मान्ति ' जायन्ते । व्रतप्रभूतीनि' अणुनतलाभादी- नीत्यर्थ । किंविधानि ? ' भवार्णवतरण्डतुल्यानि ' ससारामारो- त्तारणे तरण्यादिकल्पानि नियमेन' अवश्यतया । तदुक्तम्- " सम्मत्तम्मि उ लद्धे, पलिश्रपुहुत्तेण मावी हुजा । घरणोवस- मसयाण सागरसखतरा हॉति ॥ १॥ स च तथाविध कर्म- स्थिति हासोऽनुकमवेदनाद्वा स्याद् वीर्योल्लासविशेषात्करणान्तरप्रवृत्ते. एन अपरिवडिए, सम्मत्ते देव. मणुश्रजम्मेसु । अनयरसेठियज्ञ, एगभवेण च सव्वाइ ॥ १ ॥ " रतिशीतकालेन वा । तटकम्-- । १ भोले" अ.
"जमा सा हरिभद्रसूरिसंहा जना ' विक्ल्पना, कदाचिद्भवत्यसो क्दाचिन्नेति । 'तु ' पुनरर्थे। व्रतप्रतिपत्तौ पुनर्भजनेति द्रष्टव्यम् । इति गाथार्थ ॥ ६६ ।। भजनाकारणमेवाह--- जसा अहिगयरामो, कम्मखोनसममो न य तो नि। होड़ परिणाममेया, लहुँ ति तम्हा इह भयणा ॥ ७० ॥ गाहा व्याया-'यत्' यस्मात् फारणात् 'प्रतप्रविपत्ति 'अधिकतरात्' सम्यक्त्वसमाप्तिनिमित्तभू- तादर्गलतरात् ' कर्मक्षयोपशमन ' इति कर्मणा-चारिजमोहनीय- लक्षणाना क्षयोपशमस्तत , उपलक्षणत्याच अस्योपशमात् क्षयाच । स एव सम्यक्त्वलाभे किं न भवति ? इत्याह--'न घ नैव 'तो' इति 'सक 'कर्मक्षयोपशम , तुशब्द पुन शब्दार्थे, स पुनरिति च दृष्टव्यम्, ' भवति । जायत्ते 'परिणामभेदात् ' तथा- मव्यत्वनिदानकर्मक्षयोपशमावन्ध्यनियन्धनादात्माभ्यवसायविशेपा- दित्यर्थ , ' लघु' भटित्येर ' इति ' सम्यक्त्ववत् , ' तस्मात् तत फारणान् इह ' ग्रतप्रतिपत्तौ भजना, शुश्रूपादिपु तु निय- म । इयमन भावना-यवपि कर्मप्रन्यिभेदादेव सम्यक्त्रमुदति, तस्मिंश्च प्रतप्रतिपत्तिमेनोपादेयतरामध्यवस्यति तथाऽपि न यावत्या कर्मस्थितौ सम्यक्त्वलाभ सपनस्तावत्यामेव प्रतप्रतिपतिरपि त- वतो भवति । इति गाथार्थ ॥ ७० ॥ इदमेवाह-- सम्मा पलियपुडत्तेऽवगए कम्माण भावसो हुति । ययपभिईणि भवएणवतरडतुल्लाथि नियमेण ।। ७१ ॥ ।
' भावत श्रावकधर्मविधिप्रकरणम् । सम्मा पाहा व्यार या-'सम्म' ति सूचनात् सूनामिति न्यायात्सम्यकत्वात् प्रातात् सम्यक्यलाभकालसमविक्रमस्थितेरिति हत्यम् । 'परयोपन पृथक्वे' सिद्धान्तप्रसिद्वे । तदुक्तम्--" ए- गाहिअवेहिअतेहिमाण उवोस सत्तरत्ताण । सम्म सन्निचित्र, भरिम वालग्गकोडीण ॥१॥" इत्यादि ॥ द्विप्रभृतिरानाभ्य इति पृयस्त्वपरिभापा । तस्मिन् पत्योपमपृथक्त्वे 'कर्मणा' तदा- यारकाणा 'अपगते ' याते वेन्तेि इत्यर्थ , परमार्थ- गत्या, न तु यायप्रवृत्तिमानमाश्रित्य, तथात्वेन सिध्यादृष्टेरपि रजो- हरणादिधारणक्रियाया अपि सभवात् । यदुकम---" सव्वजियाण जम्हा, सुत्ते गेवेनगेसु उयवानो । भणिओ जिणेहि मो न य, लिंग मोत्तु जनो भणिय ॥ १॥ जे दसणवावरणा, लिंगरगहण करेंति सामएएँ । तेसि पि श्र उपनाओ, छोसो जाव गेवेजा।।२॥" इत्यादि । ' भवन्ति ' जायन्ते 'तप्रभृतीनि ' अणुनतलामादी- नीत्यर्थ । किंविधानि ? ' भवार्णवतरण्डतुल्यानि ' ससारापारो- तारणे तरण्यादिकल्पानि 'नियमेन' भवश्यतया । तदुतम्-~ " सम्मत्तम्मि उ लद्धे, पलि प्रपुहुत्तेण मावो हुजा । चरणोवस- मग्रयाण सागरससतरा होति ॥ १॥ म य तथाविध• कर्म- स्थिति हासोऽनुर मवेदनाद्वा स्याद् वीर्योल्लामविशेपात्करणान्तरप्रवृत्ते- गतिशीघकालेन वा । तदुक्तम्-"ए अपरिवडिए, सम्मते देर- मणुअजम्मेमु । अनयरसेटियन, एगभषेण च सव्वाइ ॥ १ ॥" 5"ओत". तापन"। " २ - पच - . (६४) हरिभद्रसूरिस, तस्मात्सम्यक्त्वलाभेऽपि प्रतप्रतिपत्ती भजनेति स्थितम । इति गाथार्थ ॥ ७१ ॥ ग्य - सम्यक्त्वमूलानि पञ्चाणुनतानि ' इत्यादि यदुपदिष्ट- मात्तिन सम्यक्त्वमुक्तम् । इदानीमणुप्रताचाह- पच उ अणुव्ययाइ, थूलगपाणवहविरमणाईणि । उत्तरगुणा उ अण्णे, दिसिव्ययाइ इमेसिं तु ।। ७२ ॥ गाहा च्यारया--' पञ्च' इति सग्या ।'तु अवधारणे । पौष, न तु घरवारिपइया । अनि सपनि प्रतानि- नियमा अणुप्रतानि, अणुत्व पामीपा महाप्रतापेक्षम् । तथाह- स्थूलक प्राणषधविरमणादीनि ' स्थूलकप्रणिवधपिरमण यक्ष्यमाण- मादिपा तानि तथा, मूलगुणाश्च रतानि परिमाप्य से, श्रायषध- मतरोमूलफल्पत्वात् । गुणवतार्दानि तु तदुपचयगुणनियन्धनत्वे- नारमसत्ता विभ्रति, ततस्तानि श्राफकधर्मकल्पफलिनस्य शासापरया- न्युत्तरगुणपरिभाषाभाजि । तथा चाह- उत्तरगुणा ' इति उत्त ररूपा गुणा उत्तरगुणा , उपचयहेतय इत्यर्थ । 'तु ' पुनरर्थे भिन्नमश्च, दिगमतादयस्त्विति दृश्यम् । अन्ये ' शेषा प्रतविशेषा गुणवतशिक्षातरूपा, अणुप्रताना मूलगुणत्वेन रूढानामुत्तरगुणा इति योग । इति गाथार्थ ॥७२॥ साप्रतमणुप्रतादीनामेव ग्रहणविधिमभिधातुकामो देशविर- तेचिग्यमाविष्कुर्वन् ग्रहणसभविभज्ञान प्रस्तावयति- भगसय सीयाल, तु चिसयभेएण गिहिययग्गहणे । तच विहिणा इमेण, विनय अकरयणाए ॥७३॥ - 'दिगवतादय 'एपा "- प्रावधर्मविधिप्रकरणम् । . . भगसय " गाहा व्याग्या-मनाना-ग्रहणप्रकाररूपाणा शत भाकशत 'सप्तचत्वारिंश' सप्तचत्वारिंशताऽधिकम्, “ शतिशह- शान्ताधिकाऽस्मिन् शतसहस्र ड इति ढप्रत्यय " उल्लादयो बहुलम् " इति प्रायतलक्षणात्तु सीयालादेश । 'तु ' विशेपणे, किं विशिनष्टि ? विशेषविषयापेक्षमेवम् । तथा चाह-'विषयभे- देन ' गोचरविभागेन भणिप्यमाणरूपेण 'गृहियत्तग्रहणे' अणु- बताद्युपादाने । तध भगक्शत सप्तचत्वारिंश । विधिना' प्रकारेण । अनेन ' अनन्तरमेयाभिधित्सितेन विजेय' अवबोध्य अकरचनया' निकादिन्यासेन । इति गाथार्थ ॥ ७३ ।। भङ्गरचनामेवाह- तिरिण तिया तिरिण दुया, तिरिणपिका य होति जोगेसु । ति दु एक ति दु एक, ति दु एक्क चेव करणाइ ॥ ७४ ॥ "तिरिण तिया " गाहा व्यारया-त्रयविकारयो द्विका- स्त्रय एक्याश्च भवन्ति 'योगेपु' योगपिया । करणादयश्च योगात्रयो द्वापरयो द्वावक्रयो द्वारेश्वेर 'करणानि' कर- णविपया अमी अड्वा इत्यर्थ । करणानि तु मन प्रभृतीनि । शेप सुगमम् । केयल ' ति दु' इति प्राकृतत्वाद्विभाति विनापि निर्दे. श, समाहारे चार्थसमासाद्वा सुवचनम् । इति गाथार्थ ॥ ७४ ।। प्रत्येक नवानामपि भगानामागतफलमाह- तिविह तिविहणिको, एगयरनिगेण भगया तिनि । तिगरहिए नर भगा, सव्वे उण अउणपन्नासा ॥७५ ॥ " तिविह" गाहा व्यारया-त्रिविध त्रिविधेन प्रथमभ- " पच , हरिभद्रसूरिसम्ध तस्मात्सम्यक्त्वलाभेऽपि प्रतप्रतिपत्ती भननेति म्यिवम् । इति गाथार्थ ॥ ७१ ॥ ण्य सम्यस्त्वमूलानि पञ्चायुप्रतानि ' इत्यादि यदुपदिष्ट- मात्तित्र सम्यक्त्वमुक्तम् । इदानीमणुमताचाह- पच उ अणुच्ययाइ, धूलगपाणयहविरमणाईणि । उत्तरगुणा उ अएणे, दिसिव्यया: इमेसि तु ।। ७२ ।। गादा ध्याग्य,-'पद्ध' इति सरन्या ।'तु अयधारणे । पश्चैय, न तु पत्यारिषड्या। अनि सपनि प्रसानि- नियमा अणुप्रतानि, अगुत्व धामीपा महामतापेतम् । तयाह-- स्थूलफप्राणवधयिरमणादीनि' स्थूलफप्रणियधपिरमण यदयमाण मादिपा तानि तथा, मूलगुणाश्च तानि परिमाप्य से, आयफध- मतरोमूलकल्पत्वात् । गुणवतार्दानि तु तदुपचयगुणनियन्धनत्वे- नात्मसत्ता विभ्रति ततस्तानि भावाधर्मक्ल्पपलिनस्य शासापरया- न्युत्तरगुणपरिभाषाभाञ्जि । तया चाह-' उत्तरगुणा ' इति उत्त ररूपा गुणा उत्तरगुणा , उपघयहेतव इत्यर्थ । 'तु ' पुनर] भिमनमश्च, दिग्यतादयस्थिति दृश्यम् । अन्ये 'शेपा प्रतविशेषा दिगमतादय गुणवतशिक्षाप्रतरूपा, एपा' अणुमताना मूलगुणत्वेन रूढानामुत्तरगुणा इति योग । इति गाथार्थ ॥७२॥ साप्रतमणुप्रतादीनामेष ग्रहणविधिमभिधातुफामो देशविर- तेवैचिम्यमापिटकुर्वन महणसभविभमान प्रस्ताषयति-- भगसय सीयाल, तु विसयभेएण गिहिवयग्गहणे। त च विहिणा इमेण, विभय अकरयणाए ॥७३॥ .
भाषकधर्मविधिप्रकरणम् । (६७) रणइ ३ । एए विरिण भगा मणेण यायाए य लद्धा । अरणे विवि- रिण मणेण पाए एवमेव लन्मति। तहा अवरे वि यायाए कारण य लन्भति तिरिण । एव सन्चे वि नव । पनमोऽ- प्युक्तो मूलभेत ५॥ याणि छटो |-न करेड न पारवेद मणेरा पोर । तहा न करेइ करेंत नाणुजाणइ मणेण पीओ२ । न सारवेद त नाणुजाण तइयोउ । एव यायाए कारण चि तिरिण विरिण लन्भति । उक्त पष्ठो मृलभेद ६ ॥ मतमोऽभिधी- यते-- ---न करइ मरणेण यायाण काण्ण य को १ । न पारवेइ मणार्टहिं वीओ। करत नाणुजाणड तइश्रो ३ । मप्तमोऽप्युक्त ॥ इनानीमष्टम ---न परेड मणेरा वाया य हो । तहा मगण कारण य निइन्प्रा । तहा घायाण पाण्ण य तइओ३ । एव न पाग्वेद पत्थ पि तिरिण भगा ग्यमेव । परंत नागु नाण्इ त्य पि तिएिण भगा | उहोऽप्रम ८ ॥ इदानी नवम न द मणेण पपा । न पारड यीनो । फ्रेंत नाणुजाणइ सहयो । ण्य याया वितिय सारण नि होइ विश्रमेव नयमोs- प्युल ६ । ण्य मर्वसपिण्डने मत्येसनपञ्चाशत् ॥ ७५ ॥ तनव- कालतिएण य गुणिया, मीयालसय तु होइ मगाण । विमयहि भगतिय, चोयालसय सचिसयम्मि ॥ ७६ ॥ गाहा व्याख्या-'कालत्रिफेण' अतीतानाग- ववर्तमानलक्षणेन गुणितास्त एकानपश्चाशद्भगा ' मप्तचत्वारिंश + 'मुन्यकोनपशाशत्" । काल " " - AN ३1३ यागा ३ हरिभद्रसरिसंह, के विविध योग कृत कारितमनुमत प्रत्याचक्षाणस्यैक एषागत- फलम् , सर्वप्रकारे प्रत्यारयातत्याद्विकल्पान्तराभाव इत्यर्थ । एक- तरत्रिरेण सता त्रय एव महविकल्पा भपति, ते च द्वितीयतृतीय- चतुर्थसप्तमेपु प्रष्टया । निषविरहिते भगवस्थाने नय भगाविक- ल्पा, ते च पश्चमपठाष्टमनयमस्थानेषु । ' सर्वे । अनन्तरोदिष्टा. पुनरेकन मिलिता एकोनपश्चाशदिय स्यात् । इति गायाद्वयघट- ना || भागार्थस्तु स्थापनया दर्यते, सा चेयम्- २० भावना चार-"नफ- रेइ न पारवइ करेंत पि १२.३२३१ करणानि अपण न समगुजाण्इ मरपेण याया कारण । ३३३३८३६ आगतम् | फो भेो १ ॥ श्याणिं यीयो-न फरेइ न कारवेइ परेंत अण्ण न समगु- जाणइ मणेण वाया एको । तहा मणेण कारण पीओ । तहा यायाए कारण य तइयो । पीओ मूलभेमो गओ २॥ याणि तइयथो-न परेइ न फारवेइ फ्रेंत पि अएण न समणुनाणइ मणेण हो, यायाए२, कारण य३ । गयो तह- यो मूलभेओ ३ ॥ इयाणिं पउत्यो-न करेइ न फारवेइ म- गेण पायाए कारण य एको१ । न परेड करत नाणुजाए। यीओर । न पारवेइ करेंत नाणुजाणइ३ । घउत्यो मूलभेो४॥ इयाणि पचमोन परेइ न कारवेद मणेण पायाए एघो१ । न परेइ फरेंत नाणुजाणइ दिइयो । न पारवेइ फ्रेंत नाणुजा- य समय " श्रावधर्मविधिप्रकरणम् । मभरमहिगिच्चेय, नियनिसनो भरह आरिय सड़। तस्स नहिं मनवया, साहुसरिच्छा सपिगिहीण ॥७७ ॥ गाहा व्यारया-'सभव' भडकविरचनाल- क्षण मभवमानमधिकृत्यैव प्रदर्श्यते, न तु मर्मभङ्गेपु प्रत्यारयातार इत्यर्थ । या मभव-मामान्येन प्रत्यारयातृगता विचिना विव- क्षामाश्रित्येत्यर्थ । काचित्मभर स्वरिपय तद्वहिर्वेत्यनपेक्ष्य सा- मान्येनैवमभिधीयत इत्यर्थ । स्वविपयमुद्दिष्ट व्याचप्टे-'निय' इत्यादि । 'निजविपय । स्वविषय , कोन ? ' भरत' भरत- क्षेत्रम्, तत्रापि ' आर्य सण्ड' मध्यमण्ड आर्यापडविंशतिजनप- देम्पलक्षितम्, तर किल सभवत्मव्यवहारवशेनानुमतेरागतिसभव इत्यथ ।' तम्मात् ' भरतात् 'यहि ' अपरतेनेप्वित्यर्थ , इह च सूने " चित्पश्चम्या ” इति पष्ठी, सरन्धमात्रविवक्षया था। * मर्वत्रतानि ' प्रागुद्दिष्टानि 'माधुमहक्षाणि ' यनितुल्यानि निविध निविधेनेत्यर्थ , तत्रानुगतिवर्जनस्थापि सभवात् 'मगृहिणा : ममम्तश्रावकाणाम् । इति गाथार्थ ॥ ७७ ।। एव जतग्रहणप्रसार मभवत प्रावियत्य प्रतस्वरूपमाह- थूलगपाणवहस्सा, चिरई दुविहो य सो वहो होड । सकप्पारभेहि, बजइ संकप्पो पिहिणा ॥ ७८ ।। लग गाहा व्यारया-'स्थूलप्राणवधस्य विति' म्यूरा एव स्थूरका -द्वीन्द्रियान्य तेपा प्राणा-शरीरेन्द्रियोच्या- मायुर्लक्षणा तेपा वध -जिवासन तस्य विरति -निवृत्तिरित्यर्थ । १॥-वजनममनात -- " (६८) हरिभरिमंध शत तु भवति भगाना ' तिस पोनपञ्चाशता मिलिता सप्तच- त्वारिंश शत भवतीत्यर्थ । तदुतम्-.-." लद्धफलमाणमेय, भगा उ भवति अउणपण्णास । तीयाणागयसपटगुणि कालेण होड इम ।। १ ॥ मीयाल भगसय, कह कालतिषण होइ गुणणाओ । तीयस्स पडियमण, पन्चुप्पएणस्म सवरण ॥ २॥ पचरसाण तु सहा, हाइ एस्सस्स एव गुरगणाओ । कालतिषण भणिन, जिरण- गणहरवायगेहिं च ॥ ३॥" नन्वेव श्रावकस्य निवियनिविध- निवृत्ती सत्या सभवति, सा चास्यानुमतेप्रतिपिद्धत्वादसभगिनी, अत एप नियुक्तिोतम्--" दुवित तिविहेण" इत्यादि इति हया- धाया---'विपयाहि । भग्तमभ्यमगण्डाहिरित्यर्थ , निक । अनुमतिभिपेपसहितम् । चतुश्चत्वारिश गत स्वविपये, समयद-यवहारगोचरे अनुमतिर्जनम्य सामान्यनासभपात ।। इमन हृदयम्-यद्यपि धायरस मामान्यनानुमतिवर्जन न सम वति, मभवत्सव्यवहारविपयेऽनुमतेरागतिसंभवा, तथाऽपि विशे- पविषय गृह्णतोऽम्यानुमतिपर्जनमपि समविपदमाश्रित्योक्तम् । तथा चोक्तम्---" ई भणति गिहिणो, तिविह तिविहेण नत्थि सवरण । त न जो निहिह, पएणत्तीए विमेमेउ ॥ १॥ तो कह निन्जुचीऽणुमणिसेहो तिमो सविसयम्मि | सामएणे या तत्य उ, निविह तिविहेण को दोसा ||२||" इति गाथार्थ ॥७६॥ नन्वेवमपि न करइ न कारवइ करत नागुजाराई मणे चाया" इत्यादिषु भगवेषु कायप्रवृत्तेरप्रत्यास्यात वाा तत्प्रवृत्ती चमन प्रवृत्तेरपि प्रसङ्गात् कथ प्रत्यारयानपालासभर इत्याह ?
ममव " धावपधर्मविधिप्रकरणम् । (६९) सभरमहिगिचेयं, नियपिमयो भरह पारिय सड । तस्म यहि सव्यपया, साहुसरिच्छा सपिगिहीण ।। ७७॥ गाहा व्यारया-'सभव' भङ्ग कविरचनाल- चरण मभरमात्रमविकृत्यैव प्रदर्श्यते, न तु सर्वमङ्गेपु प्रत्यारयातार इत्यर्थ । यहा सभर-मामान्येन प्रत्यार यातृगता विचित्रा विव- तामानित्येत्यर्थ । कदाचित्मभव स्वविपय तद्वहिर्वेत्यनपेक्ष्य सा- मान्येनैवमभिधीयत इत्यर्व । म्यविपयमुद्दिष्ट व्याचष्टे-'निय' इत्यादि ।' निजविपय । स्वविपय , कोऽत्र ? भरत' मरत- क्षेत्रम्, तनापि 'आर्य सण्ड' मध्यसएड आर्यापपडविंशतिजनप- पलक्षितम्, तत्र किल सभवत्सव्यवहारयशेनानुमतेरागतिमभव इत्यथ ! ' तस्मात् ' भरतात् ' वहि ' अपरक्षेप्वित्यर्थ , इस च मूने “ चित्पञ्चम्या ' इति पष्ठी, मवन्धमाननिरक्षया वा । 'मर्वत्रतानि ' प्रागुहिष्टानि 'साधुमहक्षाणि ' यतितुल्यानि विविध निनिधेनेत्यर्थ, तनानुमतिवर्जनस्यापि समवात् मर्वगृहिणा समम्तश्रावकाणाम् । इति गाथार्थ ॥ ७७ !! एव प्रतग्रहणप्रकार सभयत पाविस प्रतस्वरूपमाह- धूलगपाणवहस्सा, निरई दुविहो य सो यहो होड । सकप्पारभेहिं, वजह सकप्पो पिहिणा ॥ ७८ ॥ धूलग गाहा व्याया-'स्थूलकपाणवधम्य विरति.' स्थूरा एव स्थूरका द्वीन्द्रियान्य तेपा प्राणा -शरीरेन्द्रियोच्या- मायुर्लनणा तेपा वध -जिघासन तस्य विरति - निवृत्तिरित्यर्थ । १"-यनममगान् , - तम . (७०) हरिभद्रसूरिसंहा द्विविधश्वासौ यधो भवति । कथम् ? सफ्ल्पारम्भाभ्या व्यापादनाभिमधि सकप , कृष्यादिपस्त्वारम्भ । तत्र वर्जयति सब पत । परिहग्त्यमी श्रावक प्राणघ मकरपेन, नत्यारम्भ- तोऽपि, तन नियमेन प्रवृत्ते । । विधिता 'प्रचनोखेन वर्जयति, न तु यथास्थन्वित । इति गाथार्थ ॥ ७८ ॥ म चाय विधि गुरुमूले सुयधम्मो, सविग्गो इत्तर व इयर वा। वजित्तु तयो सम्म, बजेइ इमे अईयारे ॥ ७९ ॥ " गुरमूले " गाहा व्यारया-'गुरमूले' आचार्याय- न्तिके ' श्रुतधर्मा ' श्रायणिताणुनतादि , ' सनिग्न ' मोक्षसुग्पा- मिलापी, न तु ऋद्धिकाम , ' इत्वर' चातुर्मास्यानिकालारधिना इतरद्वा' यारसधिक्मेव 'वर्जयित्ना' प्रत्यारन्याय वधमिति प्रकृतम् । 'तत तदनन्तर सम्यक् ' अध्यवसायविशुद्धया 'वजयति ' परिहरते, विरतिपरिणती प्रत्याग्याने सत्येव प्रवृत्ति- रेव नास्य सभयतीत्यर्थ । 'इमान' यक्ष्यमाणलक्षणन, ? अतिचरणान्यतीचाग-प्रत्यारयानमलिनताहेतो व्यापारास्वान् । इति गाथार्थ ॥ ७६॥ तानगाह- यघवहछपिच्छेय, अइमार भत्तपाणवोच्छेय । कोहाइसियमणो, गोमणुयाईण नो दुआ ॥ ८० ॥ यधरह गाहा व्यारया-पन्धवधन्धविन्छेदान् अ- तिभार भक्तपानव्यवच्छेद ग्रोधादिदृषितमना गोमनुष्यादीना न कान " - -पाटन करपत्रा- भाषकधर्मविधिप्रकरणम्। कुर्यात् । तर यन्धन बन्ध-सयमन रज्जुदामकादिमि , हनन- वधरताडन कपादिभिः, छवि-शरीर तस्य च्छेद दिभि । भरण भार अतीव भरणमतिभार , प्रभूतस्य पूगफलादे स्कन्धपृष्ठधादिप्यारोपणमित्यर्थ । भक्त-अशनमोदफादि, पान- पेयमुदकादि, तस्य व्यवच्छेद -निरोधोऽदानमित्यर्थ । एतान स. माचरन् अतिचरति प्रथमाणुप्रतम् । एतान क्रोधादिदूपितमना न कुर्यादिति । अनेनापवादमाह-अन्यथाफरणाप्रतिपेधावगमात् । सन चाय पूर्वाचार्योक्तो विधि घधो दुपयाण चउप्पयाण च अ- द्वाए अट्ठार अ । अणहार न पट्टइ बधिउ । अट्टाए दुषिहो सावेवग्यो निरवेक्यो य । हिरवेक्मो निश्चल धणिय ज यधइ । सावक्सी दामगटिणा, ज च सकइ पलीवणाइसु मुचित छिदिउ वा, रण ससरपासण्ण परिश्रव्य । न ताय चउप्पयाण । दुप- याण पि दासो दामी या चोरो या पुत्तो ना एपढतगाइ जद बमति तो मविक्ष्माणि यधिअव्याणि रस्सिअव्वाणि य, जहा अग्गिभयाइसु न पिणस्मति । ताणि फिर दुपयचउप्पयाणि साव. गेण गिरिहश्रव्याणि जाणि अबद्धाणि चर अच्छति । वहो वि तह चेय । वधो नाम ताडरणा ! अणट्ठाए निरवेक्यो निदय ता- लेइ । सावक्सो पुण पुयामेव भीअपरिसेण होभव्य । जइ न रेजा तो मम्म मोत्तूण ताहे लयाए दोरेण वा एक या दोरिण या वारे | छविच्छेश्रो अणद्वाए तहेव । निरवक्रवो हत्यपायकएएन काइ निदश्रो विंदा । सावेरमा गड वा अरम वा विदेजा या चिति" ध।
हरिभद्रप्रिमहरू रहेज वा । अहमारो न आरोग्अयो। पुचि चेरजा वाहणाए जीवित्रा सा मोत्तया । न होना धरण जीवित्रा ताहे दुपय ज सय उक्सिवह ओमारेद या भार पर वहारिजह । वहल्लाण जहा- साभाविधानो नि भाराश्रो अणो कीरड, हलसगडेसु नि वे. लाए चेव मुबइ । प्रामह्त्यासु वि एमेव विही । भत्तपाणयो- पछेत्रो न कस्स नि काययो, तिस्सद्धहो मा मरेज्जा । तहेव अ- पहाए तोमा परिहरेज्जा । सायेसो पुण रोगनिमित्त वा वायाए या भणेना, अज ते न देभि नि । सतिनिमित्त या उपनास फार- वेजा । सन्चत्य नि जयणा, जहा यूलगपाणाशायस्म अइयारो न हवइ तहा पयदान |" इति गाथार्थ ॥८॥ म मातिचार प्रथमाणुनतम , मामत द्वितीयमुन्यते- धूलमुसावायरस य, निरर्ड सो पचहा समासेण । करणागोभूमालियनासहरणाडसक्सिजे ॥ १ ॥ थूल" गाहा व्याख्या--स्थूलमृपावादस्य च विरतिदि- तीयमणुमत भवतीति गम्यते । तर द्विविधो मृपावाद -स्थूल सू- चमन । तर परिस्थरवस्तुरिपयोऽतिदुष्परिनतासमुद्भव स्थूल , वि- परीतस्त्वितर , न च तेनेह प्रयोननम् , श्रावधर्माधिकारात्स्थूल- स्य प्रान्तत्यान । तथा चाह-स पश्चधा मृपावाद' पञ्चधा- पञ्चप्रकार , ' ममासेन ' सोपेण, शेषभेनाना बुमारानृतादीना सनातीयत्वेनानान्तभाव इति हृदयम् । पञ्चविधत्वमाह-कन्या भूम्यलीपन्यासहरणफूटसातित्वे ' इति, अलीकश द प्रत्येक क- न्यादिपदेषु योननीय , तश्या-पन्यालीपमित्यादि, "इन पानी- -- (७३) । भावधर्मविधिप्रकरणम्। यादिषु " इत्यलीफशन्द-ईत इदारेशा । तर कन्याविषयमलीकम- मिभमन्यामितरा पति विपर्यय या । ण्य गवालीकमपि, अल्प- धीर पटुजीरा विपर्यय या पति । भृन्यलीक तु परसत्कामेवात्म- मन्को यति । व्यवहार वा नियुक्तोऽनाभरद्वयनहारेणैव कस्य- विदेकम्य गगाभिभूतो रक्ति, अस्यैवेदमाभवतीति | न्यस्यत इति नाम -रूपाद्यर्पण तस्य हरण, येन वचनेन न्यासमपलपति स मणवाद , तद्ग्रहण त्वचाानमेति भाव । कूटसाक्षित्व 'तू- सोचामत्मराधभिभूत प्रमाणीकृत मन कृट वक्ति, यथाऽस्म्यह- मत्र सादी । इति गाधार्थ ॥ ८१॥ अतिसारानाह--- इह महसम्भक्साणं, रहसा य सदारमतभयं च । मोमोचएमय कूडलहकरण च वजा || ८२॥ रह" गाहा न्याया- इह ' मृपावादविरती सह- मा-नालोन्याभ्याग्ल्यान । महमाभ्यारयान' असद यारोपणम् । . ए- साया 1- पौरस्त्व पारगारिको या" इत्यादि । रह -एकान्त नत्र भव राव तेन तस्मिन याऽभ्यारयान रहस्याभ्यारयानम, पदुम भवनि-पान्ते मन्त्रयमाणानभित्ते, एते हीद चेद च गाविलाकि म त्रयन्त इति । 'म्बतारमन्त्रभेद च ' सकलन- विभवमारितान्यकपन चेत्यर्थ । मृपोपदेश' असत्योपदेशम् , इमेन चैव च मूहीत्यादिलक्षणम् । फलेपकरण घ' अन्य- मानमुगारविम्बस्वरुपलेसफरणं च वर्जयेन । यत एतानि समा- परिचणी द्विीपाशुपतम् । इति गायार्थ irmi (७२) परिभद्र रिसंहार दहेज वा । अहमारो न प्रारोगप्रयो । पुचि र जा पाहणार जीवित्रा सा मोत्तदा । न होना प्राण, जोविमा वादे उपय ज सय उक्सियह प्रोभारे या भार र यहाविना । पहलाण जहा- माभानिमामो वि भारायो ऊपयो फीरड, हलमगडेसु बि पे- लाए चेव मुबह । श्रासहत्थीमु वि पसेर विही । मतपाणयो- न्छेओ न फस्स वि पाय यो, तिवसाहो मा मोजा । तहत प्र- गद्वाप प्रोमा परिहरेना । सायेक्यो पुण रोगनिमित्त या याया या भणे जा, अज ते न देमि नि । मतिनिमित्त या उसाम फार- येना । सत्य वि जयणा, जहा यूलगपाणासायरस अइयारो न हवइ तहा पयइअन्य । " इति गाथार्थ ॥५०॥ 37 साति गार प्रयमाणुप्रतम , माप्रत द्वितीयमुन्यते- धूलमुसापायस्स य, चिरई सो पचहा समासेण । काणागोभूमालियनासहरणाडसक्सिले ॥१॥ यूल" गाहा व्याख्या-पूलमृपावादम्य च विरतिद्धि- तीयमणुप्रत भवतीति गम्यते । तत्र द्विविधो मृपायाद स्थूल सू- मञ्च । तत्र परित्यूरवस्तुविपयोऽतिदुष्परिवतासमुद्भव म्यूल , वि- परीतस्त्यितर , न च सेनेह प्रयोजनम् , श्रावधर्माधिकारात्म्धूल- स्य प्रशान्तत्यान् । तथा चाह--'स पञ्चधा मृपावाट 'पञ्चधा- पञ्चप्रकार , ' समासेन ' सक्षेपेण, शेषभेटाना घुमारान्तादीना मनातीयत्नानेमान्ताव इति दृदयम् । पञ्चविधत्वमाह-कन्या भूम्यलीरन्यासहरणटसातित्व ' इति, अलीकशी प्रत्येक - न्यादिपदेषु योननीय , तड्या-पन्यालीपमित्यादि, "इन् पानी- . । अ
भाषकधर्मविधिप्रकरणम् । (७३)
यादिपु" इत्यलीपशट-ईत इनादेश । तर कन्याविषयमलीकम-
भिन्नकन्यामितरा वक्ति विपर्यय वा । एव गवालीकमपि, अल्प-
क्षीण बहुक्षीरा विपर्यय वा वति | भूम्यलोक तु परमत्कामेवात्म-
मत्का पति । व्यवहारे वा नियुक्तोऽनाभयद्वयबारेणैन कस्य-
चिदेकस्य रागाद्यभिभूतो वक्ति, अस्यैवेदमाभवतीति । न्यस्यत इति
न्यास -रूपकाद्यर्पण तस्य हरण, येन वचनेन न्यासमपलपति स
मृपावाद , तद्ब्रहण त्वत्तादानमेवेति भाव । टसाक्षित्व तू-
स्कोचामत्सराद्यभिभूत प्रमाणीकृत मन कृट वक्ति, यथाऽस्म्यह-
मन साक्षी | इति गाथार्थ ॥ ८१ ॥
अतिचारानाह-
इह सहसम्मरसाण, रहसा य मदारमतभेय च ।
मोसोवएसय डलेहकरण च यजेजा ॥२॥
इह गाहा व्याख्या- इह ' मृपावादविरतो सह-
सा-अनालोन्याभ्याग्ज्यान ' महसाभ्याग्यान' असदध्यारोपणम्।
साधा पौरस्त्व पारदारिको ना" इत्यादि । रह -एकान्त.
तन भव रहस्य तेन तस्मिन् वाऽभ्यारयान रहस्याभ्यारयानम,
तदुरा भवति-कान्ते मन्त्रयमाणानभिधत्ते, एते ही चेद च
राजविरद्वारिक मन्त्रयन्त इति । ' स्वतारमन्त्रभेद च' स्वकलन-
विश्रधभापितान्यकथन चेत्यर्थ ।' मृपोपदेश' असत्योपदेशम् ,
इदमेव चैव च बृहीत्यादिलक्षणम् । 'फूटलेसकरण च
नाममुद्रातरयिम्बस्वरूपलेसफरण च वर्जयेत् । यत एतानि समा-
"परनविचरति द्वितीयाणुप्रतम् । इति गाथार्य ॥२॥
- - - . - (७४) हरिमन्नसूरिसष्टब्ध गा सातिचार द्वितीयमणुनतम, अधुना तृतीयमाह- थूलादत्तादाणे, विरई त दुविह मो उ निदिट्ट । सचित्ताचिचेसु, लवणहिरएणाइवत्थुगर ॥ ३ ॥ "थूलादत्ताताणे" गाहा व्याख्या-इहादत्तादान द्विविध, स्थूल सूक्ष्म च । तत्र परिग्यूलरस्तुविषय चौर्यारोपणहेतुत्वेन प्र- तीत स्थूलम् , तद्विपर्गत तु सूक्ष्मम् । तर ' स्थूलादत्तादाने ' तद्वि- पया ' विरति ' निवृत्तिम्तृतीयमणुप्रतमिति प्रश्रम । तत्तु ' द्वि- विध ' द्विप्रकाग्म्, ' मो' इति निपात पादपूरणे, 'तु पुन- रर्थे भिन्नम्मच, तत्विति योजित एप। निर्दिष्ट' फथितमागम इति गम्यते । तरेय द्वैविध्यमाह- सभित्ताचित्तेषु' सचित्तविष यमचित्तविषय चेत्यर्थ । तवाह-लवणहिरण्यादिवस्तुगतम, इति जीवानीवम्पल्याा तम्य, श्रानिशब्दादश्ववस्वादिपरिग्रह । मि- आदत्तादान त्वनयारेवान्तर्भूत मान्न पृथग्विवक्षितम, सक्षेपस्यैव प्रस्तुतत्वात् । इति गाथा ॥८३ ॥ इहातिचागनाह- वाइ इह तेनाइड तकरजोग विरुद्धरज च । कूडतुलडमाण, तप्पडिरूव च ववहार ॥ ४॥ गाहा व्यारया-' वर्जयति ' परिहरते 'इह' अदत्तानविरती · तनाहनम' तन स्तेना -चौरास्तैराहत-मानीत किश्चित् कुकुमानि देशान्तगत् तत् समर्घ इति लोभान गृहीयात् । तथा ' तस्करयोग ' तस्करा-चौयस्तेपा योग -हरणक्रियाया प्रे-- रण अभ्यनुज्ञा " हरत यूयम्" इति तस्करप्रयोगस्त च वर्जयेत्। “ यन्नड . . , भावधर्मविधिमकरणम्। 'विग्द्धराज्य पनि च मुचनात म्बनिनि निदग गदिने च वयेन् , विरुद्ध नृपयो राज्य तत्रादिक्रमः, न हि नाना तत्र तदागमनमनुज्ञानमिति । नया ' कृटनुनाइटमान' दुना-प्रदान, मान बुद्धवादि, यूटन्द-न्यूनापिन्च, न्यूना ददानि अश्किया गृहाति । तया ' तत्प्रविम्प च विहार तेन-अरिकृदन प्रति- रूप-मश नत्प्रतिस्प वन त्र्यवहारम् , यट त्रटन ग्रीद्याटियता- दिषु पल यादियमादि तन्य तत्र प्रापए विक्राम्त वया, यद ग्नानि समाचरन्नतिचरति तृतीयागुनतम । इनि गाथार्य || र सातिवार तृतीयागुनतम । साप्रत चतुर्थमाः- परदारस्म य विरई, ओरालमियमैया दत्रिह । एयमिह मुऐयवं, सदारमतीम मोदय ॥५॥ परदार गाहा व्यारया-परे-यान्मन्यतिरिमान्तया दारा -कलाणि परदारान्नेभ्यन्नपा नि, प्रान् पष्ठी । एकवच- नान्तता तु प्राकृतत्यान । परफलाम्येन निति ,नन्याया अपी- त्यर्थ । चतुर्थमणुनतमिनि प्रक्रम | चशठ ममुश्चये । बदारम- द्रष्टन्य । ' श्रीनगरिकनैरियभेदनोद्विवियमेतद् ज्ञातन्य इति तरिति प्राप्तत्त्वेन नपुसकर्निश, 'गते' परदारा इति द्रष्टव्यम भोटारिकपैत्रियभेदत ( द्विविधा द्विप्रकारा | ननौदारिका नार्य विरएच्यश्च | वनिया विद्याधर्या देव्यश्च । म्यस्य दारा स्वदारा स्वरलन नै सतोष म्पदारसतोप , मैथुनामेवन प्रति वेश्यादेरी वर्जनमिति हृदयम । स्वदारसनापश्चतुर्थाणुव्रतमिति योजितमेव अत्र चतुर्धाणुप्रत यनयतीत्युत्तरण योग । इति गाथार्थ ॥ ८५ ॥ घोपवेत्यत्र . . -
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उन्नदिति प्राकृनत्वेन नपुमनिटंग, गत' परदाग इति द्रष्टव्यमा दारिफकिरमदनः । द्विविधा ' द्विप्रकारा । तौदारिफा नार्य रित्र देः समोर पदारमतोप, मैथुनामवन प्रति बश्यादेगपि इन मनि ट्यम् । म्वदारसनोपश्चतुर्थाणुनतमिति योजितमेत्र ! Pur प्रावधाविधिका रा' इति च सुचनार मूत्रनिनि विगच दिन, वित्यो गन्य तनिशन न दिइन्दन Pाम्नम्टमानिति ( था ' कटटुलाशनान' नं. न कुमार, कृन्द-न्यूनाधिश्व, न्यूना दहावे मर गाठ (न्या दाटम्प च यदान द-अविनति- চষ্য বসশি বল , বর- 'दु पर सदियमानि दम्य उन्न प्रोत वियन्न उच्चत. कान ममावाननिदरनि तृतीयाएनतम । ति गत्यार्य. मातिचार तृतीयामुमतम् । माग्ने दम्पन्न- परदास य दिन्न, ओरालविश्यमंया दुविद । एपमिह मुरणपन्न, सदारमतोम मा य = * पार" गाहा न्याया-परे-सामन्यनिरन्या रा - स्मारि परागनियन्तेया पति, प्रान्चत पटी पकारः ना तु मातत्यान । परफलाम्यैर विगत , न खाया अपी- । चनुमणुबनमिनि प्रक्रम | चार समुहये । बारम- पोरा य । श्रागरिकक्रियमेनो द्विविधमतद्वानन्य • । रासच वनिया पिशवयों देव्यश्च । स्वन्य दारा म्यदारा । त्रि धनुर्धामुनत वर्नयतीत्युत्तग्ण योग । इति गाथार्थ ॥ ८५ ॥ , - यह (७६) हरिभद्रमूरिमा, अनिचागनाह- वजड इत्तरियपरिग्गहियागमण यणगफीड च । परवीराहकरण, कामे तिष्यामिलाम च ॥८६॥ गाहा व्यारया- पनयनि । परिहरति, किम्' इत्वरीति, पटनशीला इत्वरी "गते शीले त्वरत"-"श्रादीवी यहुल " इत्यादन्तता स्तोकपालगृहीता, तम्या गमनमिति सवध्यये, भानिप्रदानेन क्यिन्तमपि काल स्ययशीकृतपेश्यामेथुनामेवनमित्य- र्थ । ' अपरिगृहीनागमन ' अपरिगृहीता नाम वेश्या 'अन्यमत्क- गृहीतभाटि , कुलाहना वाऽनाथेति तहमनम । यथानम पदारस- तोपना परतारपनिनोरतिचागे । अनङ्गनीडा नाम कुचक्क्षोग्नाभि- वानान्तरमीडा, तीनमामाभिलापेण वा परिसमाप्तरतम्याप्याहार्य म्धालफातिभिर्योपितोऽमान्यप्रशासेवनमिति । परविवाहकरण' अन्यापत्यस्य कन्याफ्ललिप्सया स्नेहसयन्धेन या विवाहपरणम्, स्थापत्येप्नपि मप्याभिग्रहो न्याग्य इनि । 'यामे तीवामिलाप प' प्रति सूचना भामभोगतीनाभिलाप 'कामा -शनायो भोगा रमादय एतेषु तीमाभिलाप -अत्यन्ततन्ध्यनसायित्सम । एतानि समाचरम्नतिचरति चतुर्थाणुवतम् । इति गाथार्थ ॥८६॥ रक्त मातिचार चतुर्थमगुम्रतम । साप्रत पञ्चममुन्यते-- इच्छापरिमाण सलु, अमयारभविणिरित्तिमजणय । सित्ताइयत्युनिसय, चित्तादविरोहयो चित्त ॥ ८७ ।। इन्छा"गाहाव्यारया इच्छापरिमाण पश्चममणुप्रतमिति पनि । - वा परिमाण .
, प्रावधयिधिप्रकरणम्। (७७) किफलम् ? इत्याह-'अमदारम्भविनिवृत्तिमजनक' असुन्दरारम्भ- प्रत्यारयाननिनन्धनम् । तश 'क्षेनादिनम्नुविपय' क्षेत्रातीनि - स्तूनि विपयोऽस्येति समाम । तदुक्तम्---" धण धरण सेत्त वत्थु रूप सुवरण कुवित्र दुपय चउप्पय च” इत्यादि । अर चादिशन्द प्रकारचन । वाग्य क्षेत्रप्रकारा धनादय इत्यर्थ । 'चित्ताधवरोधात् ' चित्तरित्तदेशवशायाश्रयेण 'चित्र' अनेका- कारम् । इति गाथार्थ ॥ ८७ ॥ अनातिचारानाह- खेत्ताइहिरपणाईघणाइदुपयाडकुप्पमाणकमे । जोयणपयाणधणकारणभावहि नो कुणड ॥ ८ ॥ " मेत्ताइ " गाहा व्याया- 'नानिहिरण्यादिधनादि- द्विपदातियुप्यमानरमान ' क्षनातिगृहीतपरिमाणतिमानित्यर्थ । 'योजनप्रदाननन्धनकारणभा 'एभिर्योजनादिभिर्यशासाय । करोति ' न विधत्ते इति समुदायार्थ । तत्र क्षेत्रवास्तूना योजनेन वित्रादीना गृहीतपरिमाणभगभयाद् वृत्याद्यपनयनादिनकरमायापालन- नेत्यर्थ । एव हिरण्यसुवर्णयो प्रदानेनागृहीतपरिमाणाधिकालात्प- रत उदुमाहणीययोपद्धिप्रयुक्त्या धनधान्ययोन्धिनेन सत्यवारा दिना नियन्त्रणेन । द्विपदचतुप्पदयो कारणन-गर्भाधानप्रयोजनेन, प्यस्य च भावन-अध्यवसायेन तर्थित्वरूपेण, एतत्तु मर्वमपि प्र- दानादि परिमाणवीकृतचतुर्मासयाटिकालार्वागय करोति-किलम- मैतदवधीकृतफालात्परत एष परिमविषयीभविष्यत्य यवमायेन । अनवप्रकार " य।
. (७८) दरिमसिंह अत्र चादिशब्दा आगमपाठप्रसिद्धवास्त्वादिग्राहका । तथा चाग- म - धणधएगप्पमाणाइफमे सत्तवत्युपमाणातिकमे हिरण- मुवरण पमाणाइयमे दुपयचउप्पयापमाणाइफमे कुविअपमाणाइ- कामे | " पचमण्याविपयत्य च सजातीयत्येन शेपभेदानामान्त- भवानिछप्यहितत्वेन च प्राय सबर मध्यमगतेर्विवक्षितत्यात पत्र- कमख्ययैवातिचारपग्गिणनम्, अतश्चतुष्पहासिर ययातिचाराणा- मगरणनमुपपन्नम् । इति गाथार्थ ॥८॥ उतान्यणुप्रतानि, माप्रत गुणमतान्यार-तत्रापि प्रथम दिग्वतम् , तनाह-- उद्यवाहोतिरियदिसि, चाउम्मामाइकालमाणेण । गमणपरिमाणकरण, गुणव्यय होइ विएणेय ॥६॥ उड्डाहो गाहा व्यारया- उद्धांधस्तियरिशम् । इति उर्द्ध-पयतारोहणाली, अध बापयशाली, नियम्-पूर्षायासु नितु, किशब्द प्रत्येकमभिसमध्यत, उद्धांदिदिशमगीकृत्य 'चा- नुर्मास्यादिकालमानन ' चतुरो मासान , अष्टो या यावत् इत्यादि । 'गमनपरिमाणकरणम्' अभिप्रेतवान् परतो गमननिवृत्तिरित्यर्थ । गुणवत 'अणुमतानामेव गुणक्रमित्यर्थ , मपति विमेय प्रथ- ममिति गम्यते । इति गाथार्थ ||८९ ।। अनातिचारानाह- बजइ उड्वाइममाणयणप्पेसपोमयविसुद्ध । तह घेव संतवृष्टि, कर्हिचि मइयवरद्ध च ।। १०॥ " .. - १ गाथाविभागार्थ " . श्रावकधर्मविधिप्रकरणम् । (७९) " बजा" गाहा व्याख्या-वर्नयति' परिहरते 'अ- दिनमम्' इति, ऊर्द्धादिपु रितु कम -क्रमण विपनिवक्षेत्रात्पर- त इति गम्यते अतिक्रमो वा मोऽभिप्रेत तम् । अनेन त्रयोड- तिधारा प्रतिपादिता । तयथा--" उदुनिसिपमाणाइलमे १, अ- होदिसिपमाणाइममे२, तिरिनिसिपमाणाइक्मे३ | " एव चो - दिदिगतिकम द्विविध निविधेन प्रहरणे । श्रानयनप्रेषणोभयविशुद्ध वर्जयति, तत्र पानयन-परेण विवक्षिततेनात्परत स्थितस्य, प्रेप- रण ततः परेण नयनम् , उभय-उक्तद्वय अप्येकदेव तै कि- शुद्ध-निर्दोषम् । ' तथैव ' तनैव प्रकारेण क्षेत्रवृद्धि ' पूर्वादिदि- परिमाणस्य दक्षिणानिदिशि प्रक्षेप नक्षणा घर्जयतीत्यनुवर्तते । • कथञ्चित् ' केन प्रकारेण 'स्मृत्यन्तर्धान च' स्मृते -गमनपरिमा- योजनादिसरयोपयोगस्यान्तर्धान-तिगेधान भ्रशनमित्यर्थ । स्मृ. तिमूल हि नियमानुष्ठानम, तद्भशे हि नियमत एप तभ्रंश इत्यतिचारता । इति गाथार्थ ॥६॥ तन पृद्वसप्रदाय --उर्दु ज पमाण गहिश्र तस्म उपरि पव्ययसिहरे रुस्से या मकडो परपी या सावयस्त वत्थ प्राम- ग्ण वा गिएिहउ पमाणाइरेग भूमि वञ्चेजा तत्व से न कप्पड गर्नु, जाहे त पडि अरणेण वा आणि ताहे कप्पड़, एष पुष अहापयउर्जेताइसु हवेना । एव अहे विभाइसु विभासा । तिरि- " ज पमाण गहिम त तिविहेण वि करणेण नाइफमिश्रन्छ । खेत्तवुट्टी न कायव्या, कह ? सो पुन्वेण भड गहाय गओ जाव त परिमाण, तयो परेण भड अग्पइ त्ति काउ अवरेण जाणि हरिभवसूरिसहाय जोअगाणि ताणि पुरदिसाए न छुभेजा । मित्र वोलीयो होला नियत्तिश्रय नि, जाणिए या ण गवन्ध । श्रपणे न विसनि- अब्यो । अणणाए कोई गओ होजा ज विसुमरिअसेत्तगएण लद्ध अणाणा ति गण्ण वा त न गैरहेन" ति।। उक्त मातिचार प्रथम गुणनतम् , अधुना द्वितीयमाह- वजणमणतगुगरियच्चगाण च भोगो माण । कम्मामा सरकम्माइयाण नयर इम मणिय ॥३१॥ वजण गाहा व्याव्या- वर्जन' परिहार 'अण- तगुवरि 'ति अनन्तकायस्य-श्राकादेशगमप्रसिद्धस्य, यदुताम्- " चफाग भजमाणस्म, गठी घुएणपणो भव । पुढविसरिसेण भेएण, अणतनीय वियाणाहि ॥ १॥ गृहसिगग पत्त, सच्छीर ज च होइ निन्छीर । ज पि श्र पहनधि, अणतजीय वियाणा- हि ॥ २ ॥ मचा वि क्दजाई, सूरणकदा श्र पनदो । अ- लहरिक्षा य तहा, अल्ल तह अल्लकाचूरो ॥ ३॥ सत्तावरी निरी- ली, हरि गिलोई श्र होइ नायव्यो । गजर लोणा लोढा, विरह वह लालपत च ॥ ४ ॥” इत्यादि । एव प्रसिद्धस्यानन्तकस्य वर्जनमिति योग । तथा उदुम्परीति-सिद्धान्तप्रसिद्धाना घटपिप्प- लोदुम्बरसदपदुम्बरफलानामत्यगासाम-अतिभोगाङ्गाना मनाम- धुमासादीनाम्, चस्य तूत्तरत्र योग , भोगमानिस 'मान च'-परिमाण च । इद हि क्लि द्वितीय गुणनत उपभोगपरि भोगगुणप्रताभिधान द्विधा भवति भोजनत क्मतश्च । तत्रापभुज्यत "दि' या 'भागत ' भायकधर्मविधिप्रकरणम्। इत्युपभोग -अशनादि , सकदर्थत्यादुपशब्दस्य, अन्तरर्थत्वादन्त- भोंगो था। परिमुज्यत इति परिभोग वखादे ,आवृत्त्यर्थत्वात् परिश- ब्दस्य, पहिरर्थत्वाा वहिर्मोग । एष चामक्रियारूपोऽपि विषय- विपयिरपोरभेदाद्विपय एवोपचरित , अत एव तनिवन्धनकर्मण्य- प्ययमनोपर्यत इत्याह- कर्मत ' कर्माश्रित्य 'खरकर्मादीना' कोट्टपालफर्मादीना वर्जनमिति प्रकृतम् । अपर' अन्यद् द्वितीय गुणवमिद ' भणित' प्रतिपादित पूर्वाचारिति गम्यते ॥ तथा च वृद्धसप्रदाय --" भोअणओ सावगो उस्सग्गेण फासुथ एस आहार आहारेजा । तस्सासइ अणेमणीयमवि सचित्तवज्ज | तस्सासइ अणतकायमहुवीयगाणि परिहरेजा । अ- सणे अलयमूलगमसादि, पाणे मसरसमजाई, साइमे पचुवराई, साइमे महुमाई । एव परिमोगे वि वत्थादो-थुलघवलप्पमुल्लाणि परि- मिश्राणि परिमुजेजा । सासणगोरवत्थमुवरि विमासा, जाव देव- दूसाइपरिभोगे वि परिमाण करना । कम्मश्रो वि अपम्मा न तरइ जीवित ताहे अञ्चतसावनाणि परिहरेज्बा । एत्य पि एकसिं चेव ज कीरइ कम्म पहरववहरणाइविवक्साए तमुवभोगो, पुणो पुणो य ज त पुण परिभोगो ति । एणे पुण कम्मपक्से उपभोग- परिमोगजोयण न फरेंति । उपनासो अ एस्सुवमोगपरिभोगका- रममावेण ।" इति ।। ६१ ॥ उमयरूपेऽप्यत्राविचारानाह- सचिचं पडिबद्ध, अपउलदुप्पउलतुच्छमक्सण्यं । वजह कम्मपनो वि हु, पत्य इगालकम्माई ।। ६२ ।।
हरिभवहिसह " मभित्त" गाहा व्यारया--आवकेण हि भोजनवा कि न उत्सर्गतो निरवद्याहारमोजिना माव्यम् , फर्मतश्च प्रायो निरषय- झर्मानुष्ठानेन भवितव्यम् । अतस्तदपेक्षया यथासमयममी प्रति धारा दृश्या , तत्र च भोजनतस्तावाह-सचित्त' इत्यादि । 'स पित्त' फन्दादि, इह च सर्वन निवृत्तिविषयीकृतप्रवृत्तायप्यविचारा मिधान प्रतसापेक्षप्रवृत्तानाभोगादिनियन्धमत्या स्श्यम्, अन्यया भन एष स्यात् । तथा तनिवृत्तियिषयीकृत सचित्त वर्जयतीति योग । प्रतियद्धमिति सचित्तप्रतियद्ध-वृक्षस्थगोन्दादि पकफलादि वा । ' अपउलिश्र' इति अपय कणिकादि संभवत्सचित्ताव- यवम् । 'दुप्पउलिथ' इति · दुप्पा ' अर्धस्विनमाय यवावपून कादि । तुच्छ-यत्र पहुनाऽपि भतितो न किञ्चित तथाविधमाहार- कार्यम् , समवदवा यानिष्पन्नमुद्फत्यादि । भक्षणशब्द प्रत्येक मभिसवध्यते, सचित्तभक्षणमित्यादि । वर्जयति ' परिहरते ' कर्म- तोऽपिच' फर्माश्रित्य पुन 'अ' द्वितीयगुणप्रतेऽडारकर्मादि पर्नयतीति योग । कर्मतो हि द्वितीयगुणपते पञ्चशातिचाय भ• बन्ति । तदुक्तम्-"इगाले१यणरसाडीभाडी४फाडीसु५ पत्रए कम्म । पाणिन चेव य दतश्लक्सरसकेसविसविसय५॥१॥ । एय स्खु जतपीलएकम्मर निल्लघण२ प दषदाण३ | सरदहतलाय. सोस४, असईपोस५ ५ बजेना ॥ २॥" भावार्थस्तु वृद्धसम दायादषसेय , स पायम्- "इगालकम्म ति इगाले उहिउ विकिरण, वस्य पह पायाए वहो, तन कपइ । दणकम्म जो वर्ष किला, पच्छा भाषकर्मविधिप्रकरणम् । (८३) मक्खे छिदिउ मोल्लेण जीवइ, एव पत्तगाइ पडिमिद्धा होति । सा- गडिकम्म मागडिअत्तणेण जीवइ, तत्य वधवहाइ दोसा। भाडी- कम्म सपण भडोवक्सरेण भाडण्ण वहइ, परायग न कप्पड़, अण्णेसिं या सगड वलहे अ देइ, एवमाइ काउ न कप्पड़फो- डीकम्म उडत्तण हलेण वा भूमीए फोडण | दतवाणिज पुठिय चेव पुलिंदाण मुल्ल देइ, दते देजाह ति, पच्छा पुलिंदा हत्यि घाएति, अचिरा सो वाणिसओ एइ ति फाउ, एव कम्मगराण ससमुल्ल देइ, पुव्याणि किरणइ । लक्सवाणिज लक्सवाणिजे वि एए चेव दोसा, तत्थ किमिमा होति । रसवाणिज फल्लवाल- त्तण, तत्थ सुराइ अणेगे दोसा मारणाकोसवहाइ जम्हा तम्हान कापइ । केसवाणिज दासीनो गहाय अएणत्य विकिरण जत्य अग्पति, एत्य वि अणेगे दोसा परवसत्तादओ । विसवाणिज वि- सविको सो न कप्पड़, तेण पहूण जीवाण विराहणा । जतपी- लणकम्म तेल्लिअजत उन्छुजत च, तकम्माई य न कप्पइ । निल- छणकम्म वद्धउ गोरणाइ न कप्पइ । दवम्गिदावणयाकम्म पणदव देह सेत्तरक्षणनिमित्त जहा उत्तरायहे, पच्छा ददे तरणग तण उद्देइ, तत्थ सत्ताण सयसहस्साण यहो। सरदहतलागपरिसोसण- या सरदहतलागाईणि सोसेइ, पच्छा वाविजइ, ण्व न कप्पइ । असईपोस त्ति जहा गोल्लाविसग जोणीपोसणगा दासीण तरिणम माडि गेएहति।" प्रदर्शन चैतद् बहुसावधाना कर्मणामेवजातीया- नाम्, न पुन परिगणनमिति ॥ इह चैव विंशतिसरयाविचारामि थानमन्यनापि पश्चातिचारसख्यया तज्जातीयाना मतपरिणामका- तह " - (८४) हरिभद्रसूरिसंहब्ध लुप्यनिवन्धनविधीनामपरेपा समहो द्रष्टव्य इति जापनार्थम् , वेन स्मृत्यन्तर्धानात्यो यथामभव सर्वग्रतेष्वविचारा दृश्या । कृत प्र. सङ्गेन । इति गाथार्थ ॥ ३ ॥ उक्त सातिचार द्वितीय गुणनतम् । इदानी तृतीयमाह--- तहऽणत्यदडविरई, अन्न स चउन्विहो अवज्माणे । पमयायरिए हिंसप्पयाण पागोवएसे य ।। ६४ ॥ गाहा व्यारया--' तथा ' तेनैव प्रकारेण "गु रुमूले " इत्यादिना निर्दिष्टेन 'अनर्थदण्डविरति ' इति अर्य- प्रयोजनम्, न विद्यतेऽर्थों यस्मिन् सोऽनर्थ , दण्ड्यते अात्माs- नेनेति दण्ड -निमह , अनर्थश्वासो दण्डश्चानर्थदण्ड --इहलोक- प्रयोजनमप्यनीय निष्प्रयोजनभूतोपमर्दैनात्मनो निग्रह इत्यर्य, तस्य विरति-उपरम अन्यन्' अपर तृतीय गुणपतमिति हृदयम् । स चानर्थदण्ड 'चतुर्विध ' चतुष्पकार । तदाह- 'अपभ्याने' निष्प्रयोजनदुष्टध्यानविपय इत्यर्थ । तदुक्तम्--- फइया यघद सत्यो ?, किं भड ? कत्य केत्तिश्रा भूमी १ । को क्यविषयकालो ?, निव्विसई कि कहिं पेण ? ॥ १॥" इत्यादि । 'प्रमादाचरिते' इति मद्यादि प्रमाद वाचरितविपय । अनर्थदण्डत्व पास्योपशव्दार्थद्वारेण स्वबुद्धया दृश्यम् । हिंसेवि- हिंसाहेतुत्यादायुधानलविषादयो हिंसेत्युच्यन्ते, कारणे कार्योपचा- रात्, तेषा प्रदाने-अन्यस्मै तत्समर्पणे । 'पापोपदेशे च ' सूच- नात्सूत्रमिति पापकर्मोपदेशे ' कृप्याद्युपदिशने । उदुम्-"खेते . 6 - मावकधर्मषिधिमकरणम् । खडेह गोणे, दमेह एमाइ सावयजएस्स | उवदिसिउ हो कप्पड़, जाणिजिणवयणसारस्स ॥ १॥"'समुपये । एव च. तुर्विधोऽनर्थदण्ड । इति गाथार्थ ॥ ६३॥ अनाविचारानाह--- कदप्प कफुडय, मोहरिय सजुयाहिगरण च । उवमोगपरीमोगाइरेगय चेत्थ वजेइ ।। ६४॥ कदाप गाहा व्यारया--कन्दर्प कोकुच्य मौसर्य स- युताधिकरण चोपभोगपरिमोगातिरेकता चात्र वर्जयतीति पदध- टना । कन्दर्प -काम तद्धेतुर्विशिष्टो वाक्प्रयोगोऽपि कन्दर्प उच्यते, मोहोरीपक या नर्मेति भाव । इह च मामायारी--" सावगस्स अट्टहामो न वट्टइ । जइ नाम हमिश्रब्य तो ईसिं चेव विहसि- इति । कौकुच्य-कुत्मितसकोचनादिक्रियायुक्त फुकुच , तद्भार कौकुच्यम , अनेकप्रकारा मुसनयनौष्ठकरचरणधूविकार- पर्विका परिहासानिजनिता भाण्डानामिव विडम्बनरियेत्यर्थ । एत्य मामायारी-" तारिसाणि मण्डि न कप्पति जारिसेहि लोगस्स हासो उपजइ । एव गईए ठाणेण वा ठाइड मौसर्य-धाष्टप्रायमसवद्धप्रलापित्वमुच्यते । मुहेण वा अरि- माणेइ, जहा कुमारामण सो चारभडो विसजिओ, रएणो निवे- इय, ताए जीवियाग वित्ती दिएणा, अण्ण्या रहेण मारियो कुमारामयो । " 'सजुत्ताहिगरण' अधिक्रियते नरकारिध्वनेने- त्यधिकरण वास्युदूसलशिलापुत्रगोधूमयन्त्रकादि, सयुक्त-अर्थक्रिया- १" उहिसिड" या " अव्व इति । - हरिमप्रसूरिसर करणयोग्यम् , सयुक्त च तदधिकरण घेति ममास । तत्थ सामा- यारी-" सावगेण न सजुत्ताणि घेष सगहाईणि धरेमवाणि, एव वासीपरसुमाईविमासा । उपभोगपरिभोगाइरेगय' ति उपभोगपरिमोगश दार्थों निरूपित एव, तनतिरेकता-तनाधिस्यम् , एत्य नि सामायारी-- उपभोगाइरित्त जइ तेल्लामला बहु गिराहा तो यहुगा रहायगा वमति, तस्स लोलिाग अण्णे वि पहायगा वचति, पन्छा पूतराउकायवहो । एव पुप्फतयोलमाइविमासा । एव 7 वइ । का विही सायगरस उवभोगे एहाणे १ घरे एहाइ- यव्य, नस्थि ताहे तेल्लामलाहिं सीम पसित्ता मव्वे साडिए तलागानीण नडे निविही अजाहिं रहाइ । ग्य जेमु अ पुप्फेम कुथुमाइ ताणि य परिहरवि ॥४॥ उक्त मातिचार तृतीय गुपनतम् । तदुती चोक्तानि गुणत्र तानि | अधुना शिक्षाप्रतान्युन्यन्त, तन शिक्षा-अभ्यासस्तत्प्रधा- नानि प्रतानि शिक्षाप्रतानि पुन पुनरामेवनार्हाणीत्यर्थे । शानि च सामायिकादीनि चत्वारि, तत्र तायन् सामायिकमाह- सिक्खावय तु एत्थ, सामाइय मो तय तु विएणेय । सावनेयरजोगाण वाणासेवणारूव ॥ १५॥ "मिक्सा" गाहा व्याख्या-शिक्षा-परमपदप्रापिका निया, तत्प्रधान प्रत शिक्षाप्रत 'अ' श्रावय । मामायि- कम्' इति मम -रागद्वेषवियुक्त, आय -लाभ, समस्याय समाय समो हि प्रतिक्षणमपूर्वनिदर्शनचारित्रपर्यायनिरुपमसुराहेतुभिरध - कृतचिन्तामणिकल्पद्रुमैयुज्यते, स एव समाय प्रयोजनमस्य त्रियानु- , भावकधर्मविधिप्रकरणम्। धानस्येति प्रयोजन इति, किम् सामायिकम् , प्राकृतत्वात्सुप्लुका निर्दे- श । 'मी' निपात पादपूरणे । 'तत्तु' सामायिक पुन 'सावद्येतरयो- गाना' सपापधर्मव्यापाराणा यथासख्य वर्जनासेवनास्वरूप कालाव- पिनेति गम्यते। चस्मिन् गृहीते आरम्मादिपरिहार स्वाध्यायादिविधि- श्च विधेय । इह सारद्ययोगवर्जनवदनवद्ययोगासेपनमप्यहर्निश कर्व- व्यमिति ज्ञापनार्थमुभयोपादानम् । एत्य पुण सामायारी-" सा- माइय सावरण कहिं कायव्व वि ', इह सावगो दुनिहो, इड्डीर- तो अ अणिविपत्तो अ । जो सो अणिडिपत्तो मो चेइयघरे सा- हुसमीवे करेट, घरे या पोसहसालाए वा जत्थ वा वीसमइ अच्छह या निन्यावारी सव्वत्य करइ | मन्व चउसु वि ठाणेसु नियमा काय- -चेइयघरे साहुसमीवे पोसहसालार घरे आगासग करेंति ति । तत्य जड साहुसगामे करेइ तत्य का विही ? जइ परपरमय नत्यि, जइ विश्र फेणइ सम विवाओ नत्थि, जड कस्सइन घरेइ मा तेए अछवियछी कजिही, अइ धारणग दटूण न गिएहड मा भनिही, जइ य वावार न मरेइ वाहे घरे व सामाइय काऊण वाई । पचसमिश्रो विगुत्तो इरियादुवउत्तो, जहा साहू, मामाए सावज परिहरेतो, एमणाए कई वा लेटुग वा पडिलेहिउ पमजिउ, एव आयाणे निक्स्येवे असेलमिघाणए न विगिचइ, विगिचतो वा पढि- लेहेइ पमनद य, जत्य चिट्ठति तत्य वि गुचिनिरोह करेइ । एया विही गता विविहेण नमिऊण साहुणो पच्छा सामाइय करेइ, करेमि मंते सामाक्ष्य सावज जोग पनक्सामि जाव माहू पन्जु- वासामि दुविह विविहेण ति फाउ, पच्छा इरियावहियाए पडिपमह । , - (८८) हरिभद्रसूरिसह पच्छा आलोएत्ता वदइ आयरिआइ जहा गयणियाए, पुणे वि गुर वदित्ता पडिलेहित्ता निविट्ठो पुन्छः पढइ पा, एप घेइएमुदि। जया सगिहे पोसहसालाए वा तत्थ नवरि गमण नस्थि । जो इटि- पत्तो सो सम्विड्डीए एइ, तेण जएस्स प्रत्या हाइ, आदिवा सा- हुणो सुपुरिसपरिग्गहेण । जइ सो कयसामाइओ एइ ताहे श्रास- हत्यिमाई जणेण अहिंगरण न पट्टड ताई न परेइ, पयसामाइ. गण य पाएहिं आगतव्य तेण न करेड | जइ सो सावो तो न कोइ उठेइ । अह अहाभही पूआ कया होउ ति भणति ताहे पुष्वरइय पासण कीरइ, पायरिआ य उहिया अन्छति, वत्य उडेत-अणुढेते दोसा विभासिय का । पच्छा सो इडिपत्तो सामा- इय करेइ अणेण विहिणा, करेमि भते । सामाइय सावज जोग पञ्चकमामि दुविह तिविहेण जाव नियम पज्जुवासामि, इति । एवं सामाइय काउ पडिकतो धदित्ता पुच्छह । सो अ किर सामाइय करेंतो मउड अवणेद, कुडलाइ नाममुर पुप्फ बोल पावारग- माई चोसिरह । एसो विही सामाइयम्स "|| ६५ ॥ अत्यैवातिचारालाह--- मणवयणकायदुप्पणिहाण इह जत्तमो विवन्नेह । सहप्रकरणय अणवाट्टियस्स तह श्रकरणय चेव ।। ६६ ।। " मण" गाहा व्याख्या-'मनोवचनकायदुष्पणिधान' मन प्रभृतीना सापद्याना प्रवर्तनमित्यर्थ , इह' सामायिके 'य. नत 'आदरेश विवर्जयति' परिहरते । प्रयोऽमी अतिचारा सत्यकरण' स्मृते सामायिकविषयाया अनासेवनम्, एतदुक्त 1 - .
प्राधकधर्मविधिप्रकरणम् (८९) मवति-प्रबलप्रमादान्नेव स्मरति, अस्या वेलाया सामायिक फर्च- व्य कृत न कृतमिति वा, स्मृतिमूल हि मोक्षानुष्ठानम् । अनव- स्थितकरण-करणानन्तरमेव यजति, यथास्यचिद्वाऽनपस्थित क- रोतीत्यनपस्थितकरण वर्जयतीति । ' ' समुपयार्थ । ' एप अवधारणे । अयमन भावार्थ -" सामाइय वि काउ, घरचिंत जो उ चिंतए सड्डो । अट्टक्सट्टोवगो, निरत्यय तस्स सामइय ॥ १ ॥ कयसामइओ पुब्धि, बुद्धीए पेहिऊण भासिना । सइ नि- रवनं वयण, अरणह मामाइय न भये ॥ ॥ अनिरिक्खिया- पमजिभडिल्ले ठाणमाइ सेवेतो । हिमाऽभावे वि न सो, कडसा- मइयो पमायाओ॥ ३ ॥ न सरइ पमायजुत्तो, जो सामइय कया हु कायव्य । क्यमक्रय वा सस्म हु, कय पि विफल तय नेय ॥४॥ काऊए तक्रमण चित्र, पारेड करेइ वा जहिच्छाए। अ- रणवद्विअसामइय, अणायराओ न त मुद्ध ॥ ५ ॥ उक सातिचार प्रथम शिक्षाप्रतम् । साप्रेत द्वितीयमाह-- दिसिवयगहियस्स दिसापरिमाणस्सेह पडदिण ज तु । परिमाणकरणमेय, अवर सलु होइ विभयं ॥ १७ ॥ " दिसिवय " गाहा व्यारया-दिग्प्रतमुस्विरूपम् , तत्र गृहीतस्य दिक्परिमाणस्य दीर्घकालिकम्येति गम्यते, 'इ' श्राव- कधर्मे । प्रतिदिन ' अनुदिवसम् , तोपलक्षण प्रतिप्रहरादे', 'यत्तु ' यत्पुन 'परिमाणकरण ' सक्षिप्ततरदिक्प्रमाणप्रहणमि- पर्य , ' एतत' एवविध परिमाणकरण , अन्यहितीयं मधुना " अपर स म।
- सदाणुरूपवाय, तह पहियापोग्गलक्लेव ॥१८॥ " यजइ " गाहा व्यास्या यर्जयति' इह 'द्वितीयशिक्षा- न आनयनप्रयोगप्रेष्यप्रयोगता चैव शब्दानुपात रूपानुपात तथा हे पुद्गलप्रक्षेपम् इति सूत्रानुवृत्ते प्राकृतत्याच पदघटना । भा. र्थस्तु-इह विशिष्टाधिके भूदेशावाहे परत स्वय गमनायो- यदन्य सचित्तादिद्रव्यानयने प्रयुज्यते सदेशफप्रदानादिना त्वये- मानेय इत्ययमानयनप्रयोग । तथा प्रेष्यप्रयोग यथा-अभिगृही. विचारदेशव्यतिक्रमभयादवश्यमेव गत्वा त्वया मम गवाघाने- न्, इद वा तन कर्तव्यम् इत्येवभूत तथा शब्दानुपात -स्वगृह- तेप्राकारादिव्यवच्छिन्नभूदेशाभिमहे यहि प्रयोजनोत्पत्तौ तत्र त्य गमनायोगात् पृतिप्राकारप्रत्यासन्नवर्तिनो युद्धिपूर्वक शुत्काशि- दिशब्दकरणेन समवसितकान् बोधयतः, शब्दानुपात ब्दस्यानुपातन-उचारण शब्दानुपात वविवरमनुपतत्यसाविति । तथा रूपानुपात -अमिगृहीतदेशा हे प्रयोजनमावे शब्दमनुशारयत एव परेषा समीपानयनायें शरीररूपप्रदर्शन रूपानुपात | तथा पहि पुद्गलप्रक्षेप -अ- गृहीतदेशादहि प्रयोजनभावे परेषा प्रयोधनाय लेष्ट्यादिक्षेप पुर- वाग् येन परकीय- 4 भावधर्मविधिमकामा लाप इति भावना । देशावकाशिकमेवर्यननिरपडेना न्हाई. प्रेमनाऽऽगमनादिव्यापारजनित प्राण्युपन इति, स च न्व- वोऽन्येन या कारित इति न कश्चित् फले विशेष , प्रयुत गुए त्यगमने, ईपियविशुद्धे, परस्य पुनरनिपुणत्वात् वदद्धि । इति गायार्थ ॥१८॥ टत माविचार द्वितीय शिक्षानतम् । सात तृतीयमुच्यते-- आहारदेहसकारखंभवागारपोसहो अन्न। देसे मन्ये य इम, चरमे सामाइय नियमा ।। ६६ ॥ "आहार" गाहा व्याल्या-'आहार-देहसत्कार-ब्रह्म-श्रव्यापा- रपौषध ' इति इह पापधशो रूटया पर्वसु वर्तते, पर्वाणि चाष्ट- म्यादिविषय पूरणात्पर्य धर्मोपचयहेतुत्यानित्यर्थ । पौपघशब्दश्चाय प्रत्येकमभिसवध्यते, आहारपौषध इत्यादि । 'अन्यत्' अपरं तृतीय पौषधोपवासशिक्षानतमित्यर्थ । देशे ' देशविपय सर्व- स्मिन् । सर्वविषयम्, 'च ' समुच्चये, 'इद' पोपधोपवासशिक्षाबत । घरमे ' सर्वतोऽन्यापारपोषधेऽङ्गीयते । सामायिक' उक्तस्वरूप करणीयमिति गम्यते, 'नियमात् ' अवश्यतया, अन्यथा सामा- यिकगुणभाव इति पत्घटना । त्राहार:-प्रतीत तद्विपयस्तनिमि- हो या पौषध आहारपोपघ , आहारादिनिवृत्तिनिमित्त धर्मपूरण पर्वेवि भावना | एव शरीरसत्कारपोपय । ब्रह्मचर्यपोषधः, अत्र गदमद- , परीय पर्यम् , " अचो यन् " इम्यम्माधिकारान्, " परपमशानुपसर्गे" (पा०-३-१-१०० ) इति यन् । प्रह- (९२) हरिभद्रसूरिसंहाधं कुशलानुष्ठानम् । यथोकम्-" ब्रह्म देवो अझ तपो, प्रधान प शाश्वतम् । " प्रझ च तचर्य चेति समास , शेष पूर्ववत् । तथा व्यापारपीपध इति, एत्य भावत्यो पुरण इमो-श्राहारपोसहो दु- बिहो, देसे सव्वे य । देसे अमुगा विगई पायनिल या एकासि या दो वा । सव्वे चउव्यिहो आहारो अहोरत्त पञ्चक्साओ । मरीरपो- सहो रहागुव्यदृणवएणगनिलेपणपुप्फगधतमोलाण यत्याभरणपरि थागो य, सो वि देसे सब्वे य | टेसे अमुग सरीरसपार न फरेमि सव्वे सव्व न करेमि ति । यभरपोमहो वि देसे मवे अदेसे दिवा रति या पासिं या दो या वारे त्ति | सत्ये अहोरत यभयारी हवइ । अव्यावारपोसहो वि देसे सच्चे य । देसे अमुग पावार न करेमि । सव्वे सव्य वा वायार चेव हलसगडघरपरिकम्माईय न करेमि । एत्य जो देसे पोसह परेइ सामाइय फरेड वा न वा । जो सव्वपीमह रेइ मो नियमा क्यसामइयो । जइ न करेइ ता नि- यमा पचिजह । त पहिं करेइ १ चेयपरे वा साहुमूले या घरे या पोसहसालाए वा उम्मुहमणिसुपएणो पढतो पोत्यय वा पायतो ध म माण मायइ । जहा गए साहुगुणे अह न समत्थो मदभग्गो पारेउ विभामा" ।। ६६॥ अनातिचापनाह-- अप्पडिदुप्पडिलेहियपमअसेआइ वाई इत्थ । सम व अणणुपालणमाहाराईसु सब्बेसु ॥ १० ॥ गाहा व्यारया--"अप्पडिदुप्पडिलेहि. अपमनसेजा" इति सूचनात् सूत्रमिति न्यायात् प्राकृतानुरोधाचाय- " अप्पडि० " भाषकधर्मविधिप्रकरणम् । मर्थ:--अप्रत्युपेक्षितदुप्पत्युपेक्षितशय्यासस्तारको तयाप्रमार्जितदु- प्यमार्जितशय्यासस्तारको वर्जयतीवि योग । इह च शय्या प्रवीवा, संस्तीर्यत इति संस्तारक -पोपपव्रत उपयोगी ठर्भकुशकन्बलीवला- नि, तयोश्वाप्रत्युपेक्षण-गोचरापन्नयोश्चतुपाऽनिरीक्षण दुष्ट-उद्घा- न्तचेतस प्रत्युपेक्षणम्, ततश्चाप्रत्युपेक्षितदुप्प्रत्युपेक्षितौ च ती श- ग्यासस्तारको चति समास, शय्यैव वा सस्तारक इति । एवमन्यत्रा- प्यक्षरगमनिका कार्येति । उपलक्षण च शय्यासस्तारको, उपयोगिन पीठकादेरपि । एत्य पुरण सामायारी-~" कडपोसहिओ नो अप्प- हिलेहिब सेज दुरुहड, सथारग वा दुरूहइ, पोसहसाल वा सेवइ, दन्मवत्थ वा सुद्धवत्थ वा भूमीए सथरइ, काइयभूमीओ वा आग- श्रो पुणरवि पडिलेहेइ, अण्णहा अइयाये। एव पीढगाइसु वि विभासा ॥ " तथा प्रमार्जन-शय्यादेर्वस्त्रोपान्तादिना तदकरणमप्र- मार्जनम्, ' सम्यग् वाऽननुपालनम् ' यथावदविधान । आहारा- टिपु सर्वेषु' प्रागुरिटेषु । इति गाथार्थ ।। एत्य भावणा-~-कयपोसहो अथिरचित्तोपाहार ताव सव्व देसं का पत्येइ, वीयदिवसे पारणगस्स वा अपएणो अट्ठा आढत्ति करेइ कारवेइ वा, इम इम व ति करेह न वट्टइ । मरीरसकारे म- रोर उन्वटेइ, दाढिायो केमे वा रोमाइ वा सिंगाराहिप्पारण मठवेइ, दाहे वा सरीर सिंचइ, एव सव्वाणि सरीरभूसाकारणाणि परिहर । बभचेरे इहलोइए पारलोइए या भोगे पत्येइ सबाहेइ था, अहवा सहफरिसरमरूवगया अभिलसइ, वभेचरपोसहो कया पूरिही, चइयामो बभचरेण ति । अव्वावारे सावजाणि धावारेइ, . - " . हरिभप्रसूरिमहरा कयमकय वाचिंतइ, एव पचयारसुद्धो अणुपालिश्रव्यो इति॥१०॥ उत मातिचार तृतीय शिक्षाप्रतम् । अधुना चतुर्थमुच्यते- अमाईण सुद्धाण कप्पणिजाण देसकालजुय । दाण जईणमुचिय, गिहीण सिक्खावय मणिय ॥ १०१ ॥ अण्णाईण " गाहा व्याख्या- अनादीना' भोनना- दीनाम् , आदिश दात्पानवस्रोपादिपरिग्रह , अनेन च हिरण्यादि- न्यवच्छेदमाह । 'शुद्धाना ' न्यायागतानाम्, न्यायश्व-द्विजधानि- यैवेश्यशूद्राणा स्ववृत्त्यनुष्ठानम् , अनेनाप्यन्यायागताना निषेधमाद । फरपनीयानाम् ' उद्गमादिदोपवर्जितानाम् , अनेन त्वक्ल्पनीयाना प्रतिपेधमाह । ' देशकालयुत ' प्रस्तावोचित 'दान' वितरण ' य- तिभ्य ' मुनिभ्य — उचित ' सगत गृहिणा शिक्षाप्रत 'भणित ' धक्तमतिथिसविभागप्रतमित्यथ । इह भोजनार्थ भोजनकालोपस्थायी अतिथिरुच्यते, तात्मार्थनिष्पादिताहारस्य गृहिण साधुरेवातिथि । तदुकम्-" तिथिपर्वोत्सवा सर्वे, त्यता येन महात्मना । अति- थि त विजानीयान्छेपमभ्यागत विदुः ॥ १॥" तस्यातिथे सवि- भागोऽतिथिसविभाग, सविभागमहणात्पश्चात्कर्मादिपरिहारमा । इति गाथार्थ ॥१०१॥ पत्थ सामायारी-सावगेण पोमह पारतेण नियमा साहूण दाउ पारेअन्व, अएगदा पुण अणियमो-दाउ था पारेइ पारिए या देह ति । तम्हा पुव्व साहूण दाउ पन्छा पारेअन्य | कह १ जाहे देसकालो वाहे अप्पणो सरीरस्म विभूस काउ साहुपढिस्सय गतु -सौषधाद २ क्षनियविद्य-'य। ।
भाषकधर्मषिधिप्रकरणम् । निमतेइ भिक्स गेएहह त्ति । साहरण का पडिवत्ती? ताहे अरपो पडल अएणो मुहणतय अएणो भायण पडिलेहेइ, मा अवराइय- दोसा ठपणादोसा भविस्सति, सो जइ पढमाए पोरसीए निमतेइ अयि अनमोकारमहिश्रइत्तगो तो गेज्मड, अह नत्थि न गेज्मद, न बहिअन्य होइ, जइ पण लगेजा वाहे गेज्मइ सचिक्साविज। जो वा उग्घाडाए पोरसीए पारेद पारणइत्तो अरणो वा तस्स दि- नइ, पच्छा तेण मावगेण समग सघाडगो ववइ, एगो न बट्टा पेसिड, माहू पुरओ सायगो मग्गो घर नेऊए पासणेण उपनि- मतद, जइ निविद्वा लहय, अह न निविसति तहावि विणओ पर- सोहोउ ति, साई भत्तपाण सय घेव देइ ति, अहवा भाग घरेइ मजा देइ, अहया ठितो अच्छइ जाव दिएण, साहू वि सा- बसेसय दव्य गेरहति पच्छाकम्मपरिहरपट्टा, दाऊण पदिउ विस- बेइ, विसजेत्ता अणुगन्छड, पच्छा सय भुजइ । ज प फिर सा- हण न दिएण न सावगेण न भोत्तव्य | जइ पुण साहू नस्थि ता देसफालयेलाए दिमालोश्रो फायब्बो, विसुद्धभावेण वेिश्रव्य, जइ साहूणो होता तो म्हि नित्यारिओ होतो त्ति विभासा ।। अनातिचारानाह- सचित्तनिक्सिवणय, वजह सवितपिठणय चेव । कालाइक्मपरवषएस मछरिययं चेव ॥१०२॥ " सचिरा " गाहा व्याख्या-सचित्तनिक्षेपण पर्जयेत् स- चित्तपिधान पेव कालातिकमपरव्यपदेश मात्सर्य व वर्जयेदिति पदपटना | तब ' सविसनिषण' सविपु-श्रीमादिषु निरोप .
हरिभरिसंघब्धं एममादेरदानबुद्ध या मातृस्थानत एव । 'सचित्तपिधान' सचि- तेन-फलादिना पिधान-स्थगनमिति समास भावना प्राग्वत् । 'कालातिक्रम' इति कालस्याविक्रम कालाविक्रम -इत्युचितो यो भि- हाकाल साधूना तमतिक्रम्य-अतिला थानागत वा भुङ्क्ते, तदा घ किं तेन लब्धेनापि कालातिक्रान्तत्वात् । तदुक्तम्-" काले दिएण. स्स पहेणयस्स अग्यो न तीरए काउ। तस्सेव अथकपणामिअस्स गिएहतया नत्थि ॥" 'परव्यपदेश' इति आत्मव्यतिरिक्त पर तस्य व्यपदेश परव्यपदेश इति समास । साधो पोषधोपवासपा- रणकाले भिक्षायै समुपस्थितस्य प्रकटमनादि पश्यत श्रावकोऽभि- धत्ते परकीयमिदमिति नास्माकीनमतो न ददामि किश्चित् , याचितो वाऽभिधत्ते विद्यमान एवामुकस्येदमस्ति तर गत्या मार्गत यूयमिति । मात्सर्यमिति-याचित फुप्यति, परोनतिवैमनस्य वा मात्सर्य इति तेन तावद् द्रमकेण याचितेन दत्त किमह ततोऽपि न्यून इति मा- त्सर्यादाति, कपायकलुपितेन वा चित्तेन वा ददतो मात्सर्यम् । इति गाथार्थ ॥ १०२ ॥ उक्त साविचार चतुर्य शिक्षाप्रतम् । तदुक्ती चोकानि द्वाद- शापि श्रावकववानि । साप्रत तत्रातिचायेप्तिमेव शोधयति । ननु यद्यतिचारा अपि परिहारविषयीभावेनात्राभिधीयन्ते किमिति तेपा मपि प्रतानामिव प्रत्याख्यान निघानिधादिविभागेन न प्रदर्शितमिति मनस्याघायाह- एत्य पुण अइयारा, नो परिसुद्धेसु हुति सव्वेसु । अक्खडविरइमावा, वाइ सन्चत्यमो भणिय ॥ १०३ ॥ - - - श्रावधर्मविधिप्रकरणम् । (९७) गाहा व्यास्या--'अन' तेषु प्राणातिपाना दिरतेपु, पुन शब्दो विशेषणे, अतिचारगतमेतदन विशेपितमभि- धातव्यमित्यर्थ । 'नो' निषेत्र, 'परिशुद्धेपु' विन्धककर्मानु- दयागततात्त्विकविरतिपरिणामप्रतिपनपु ' भवन्ति ' जायन्ते 'म- पु' द्वादशस्वपि । हेतुमाह-' असण्डविरतिभावात् ' परिपूर्ण देशविरतिसद्भावत , नहि परिपूर्णदेशविरतिसद्भावे वधादिप्रतिप- निर्भवतीति भाय । वर्जयति, अन इतिशब्दाध्याहारी दृश्य , यतीत्येव सर्वन ' सूत्रे । 'प्रत ' यताऽखण्डविरतिभावाद् वधा- दिप्रवृत्तिर्न भवसेव अस्माद्धेतो 'भणित' उक्तम् । इदमुक्त भवति-पद्यप्यतिचाराणा पृथक् प्रत्यारयान नोक्त तथापि प्राणि- स्थानिप्रत्यादयान ण्व शुद्धिमाप्ने प्रत्याख्यातुर्वधरन्धाद्यतिचारपरि- हारप्रयणेच प्राय प्रवृत्ति स्यादतो जतप्रत्याग्यानमेवविधविपय- व्यापीति नातिचारा अन पृथक् प्रत्याग्न्येयतयोच्यन्ते, किन्वेववि- धविरती वधादिरूपा प्रवृत्तिनं भवतीति ज्ञापनाय सर्वनातिचारान वर्जयतीत्युच्यते । इति गाथार्थ ॥ १०३ ॥ ननु यद्येव पिरतिविन्धक्कमझासवशागतविरतिपरिणामे स्वग्मत एप बधादिपरिहारप्रपणेच प्रवृत्तिविरतिमतस्तहि वस्येद वितिविपयादिनिरूपसून किंफल देशविरतिं प्रति स्यात् । इत्याह- सुत्ता उवायरक्सणगहणपयत्चरिसया मुणेयच्या । कुमारचकभामगदडाहरणेण धीरेहि ॥ १०४ ।। मुचा " गाहा व्याख्या--'सूत्रात् ' भागमात् उपाय- रमशाय बुम्भकारचा भ्रामक्दण्डोदाहरणेन धीरजातल्या इति (९८१ हरिभद्र मिहब्ध योग । वनोपायेन रक्षणमुपायरतणम्, परिशुद्धनलमहणादिप्र- हणे प्रयत्नो प्रहणप्रयल , प्रतमहणार्थ चतुर्मासयाली पुन पुन श्रवणादिविषय श्रादरविषय | साल्पविषयीरतप्राण्यादिरूप उपा यरक्षणादीता चार्थस्ते उपायरक्षणात्य सूनाद् ज्ञातव्या । कथम् ? कुम्भकारचभ्रामकदण्डोदाहरणेन । इदमत्र इदयम्-~यथा ग्लि कुम्भकारचमस्याभ्रमतो भ्रमतो या दएडो भ्रमणतत्स्थैर्यनियन्धनमे व भवति, एवमिहापि सूनेणोपायरक्षणादयो निरूप्यमाणा विरति- परिणामेऽसति सति च सभवद्विरतेरसुमतो गुणकरा एव । इह पेचिद् विपयादिपदानि पश्चानुपूर्त्या विभागेनान्यथाऽपि व्याचक्षते, इह तु प्रविपत्तिलाघायेत्यमेव व्याख्यातानि । इतिगाथार्थ ॥१०॥ प्रदर्शितोदाहरणमेय समर्थयति- गहणा उवरि पयत्ता, होड असतो वि विरइपरिणामो । अकुसलकम्मोदयो, पडइ अपनाइ लिंगमिह ॥ १०५॥ गणा गाहा व्याख्या- मूले " त्यादिसूननिदर्शिततोपादानोत्तरकालमित्यर्थ , प्रयत्नात्' पुन पुन श्रयणाद्यादरात्, किम् ? भनि ' जायते । अस नपि विरतिपरिणम 'अविद्यमानोऽपि कर्महासनिबन्धनस्तात्त्वि को पिरत्य' यवसाय , थनेन च सूनादुपायरक्षणादयो निरूप्यमाणा विरतिपरिणामेऽसति तदुत्पादका भवन्तीत्यावेदित भवति । सति तु तर फलमाइ-'अकुशलकर्मोदयत । अशुभपायादिक्मानुभावात् पतति' अपयाति विरतिपरिणाम इति प्रकृतम् , अत सूत्रादु- पायरक्षणादयस्तस्थिरतानिवन्धना भवन्तीत्यभिमाय | वन प्रति- " " महणदुपरि' -
भाषकधर्मविधिप्रकरणम् ।
पतिते चिलमाह--प्रवर्ण-अश्या अवज्ञा वा-अनादर प्रादिर्यस्य
सत्तथा, आदिशब्दात्तदक्षणेपायाप्रवृत्त्यादि घ । लिङ्ग' चित
इह ' प्रतपरिणामपरिपाते । इति गाथार्थ ॥ १०५॥
श्रतस्तस्यामत उत्पादनाय मत स्थैर्याय यद्विधेय तन्निग-
मनद्वारेणाह-
तम्हा निचसईए, बहुमायेण च अहिगयगुणम्मि ।
पडिवक्खदुगुलाए, परिणइमालोयणेण च ॥ १०६ ।।
तम्हा गाहा व्याख्या-यस्मादेवमसन भवति सच
प्रमादात परिपतति विरतिपरिणामस्तस्मात् नित्य-सदा स्मृत्या-अ-
विकृतानिस्मरणेन, 'बहुमाने च' भावप्रतिनन्धेन च ' अधिक
तगुणे' मम्यक्त्याणुमताटो, 'प्रतिपत्तजुगुप्सया' मिथ्यात्वप्राणि-
वधायुद्वेगेन, 'परिणत्यालोचनेन थ' मिथ्यात्वप्राणिवघाटीना "दा-
रणफ्ला पते " इति विपाकालोचनेन । इति गाथार्थ ॥ १०६ ।।
"
तथा-
तित्थकरमत्तीए, सुसाहुजणपज्जुवासणाए य ।
उत्तरगुणसद्धाए, एत्थ मया होइ जयन्वं ।। १०७ ।।
" वित्यकर" गाहा ज्याख्या-- तीर्थकरभक्त्या' परम-
गुरविनयेन 'सुसाधुजनपर्युपासनया च भावयतिसेवनया
'उत्तरगुणश्रद्धया च' सम्यक्त्वे सत्यणुप्रताभिलापेण तेषु सत्सु
महाव्रतामिलापेण च अत्र' विरतिव्यतिफरे 'सदा सर्वदा
भवति । यतितव्य ' उद्यम फरणीय 1 इति गाथार्थ ॥ १०७ ॥
(१००) हरिभद्रसूरिसंह, एवमसतो वि इमो, जायड जाओ पि न पडइ कयाई । ता इत्थ बुद्धिमया, अपमानो होइ काययो ॥१८॥ गाहा व्यारया --' एवं ' उक्तन्यायेन प्रवृत्ती 'असन्नपि ' अविद्यमानोऽपि अय' पिरतिपरिणाम जायते' भवति, जातश्च ' सपनश्च 'नपतति कदाचित् ' नापैति कदाचि- दपि, 'तत् ' तस्मात् ' अर' नित्यस्मरणादौ 'बुद्धिमता' धी मता ' अप्रमाद ' उद्यमो भवति कर्तव्य । इति गाथार्थ ॥१०॥ उत्तमतानामेवाऽवधिविशेष निदर्शयन्नाह - एत्थ उ सारगधम्मे, पायमणुव्वयगुणव्वयाइ च । आवकहिया सिक्खावया पुण इत्तराइ ति ।। १०६ ।। गाहा व्यारया- अन गतस्मिन् प्रस्तुते श्रावकधर्म इति योग , ' तु ' अवधारणे, अत्रैव न शाक्यादि- धर्म, 'प्राय ' बाहुल्येन, प्रायोग्रहणेन परिग्रहवतादौ चतुर्मासका तिरूपमायवधिमाह । 'श्रणुनतगुणतानि च ' इति पञ्चाणुव्रतानि प्रतिपादितस्वरूपाणि त्रीणि गुणव्रतानि उक्वलक्षणान्येन ' यावत्क थिकानि ' इति मकृट्टहीतानि यायजीवमपि धारणीयानि, तु नियोगतो यावजीवमे" इनि गुरवो व्याचक्षते, प्रतिचतुर्भाम कमपि तद्रह , युद्धपरपरायातनथासामाचार्युपल धे । 'शिक्षानता नि पुनरित्यराणि' इति शिक्षा-अभ्यासस्तस्या प्रतानि शिक्षान. तानि इत्यराणीति-इत्वरकालानि ! तर प्रतिविमानुष्ठेये मामा यिकशासफाशि पुन पुनराचार्यते इति भावना, पोपधोपवामा निथिसविभागौ तु प्रतिनियतदिवसानुष्ठेयो न प्रतिदिवसाचरणी " एथ " श्रावकटमेविधिप्रकरणम् । . यो । इति गाथार्थ ॥ १०६ ॥ ण्य द्वादशविधेऽपि श्रावधर्मेऽभिहित सलेखनाभिधाना- वसरस्तमाह-- सलेहणा य अते, न निरोगा जेण पव्वयइ कोई । तम्हा नो इह भणिया, विहिसेसमिमस्स वोच्छामि॥११०॥ " सलेहणा" गाहा व्याख्या-सलेसना ' चरमानश नपूर्वप्रियारूपा पागमप्रसिद्धा · श्रन्ते जीवितपर्यवसाने सभवि- नी, न — नियोगात ' अवश्यतया सा गृहिण समविनी । कारण- माह-येन कारणेन ' प्रमजति ' यतिर्भवति 'कोऽपि तथाविधवि- रतिपरिणामवान गृही ' तस्मात् ' अतो हेतो • नो' नैव 'इह' अनावसरे भणिता प्रतिपादिता । ' विधिशेप' श्रावककर्तव्य- मेवानुक्त । अस्य' श्रावकस्य वक्ष्ये' अभिवास्ये । इति गा- थार्थ ॥ ११॥ तमेवाह- निवसेज तत्थ सड्डो, साहूण जत्थ होइ सपाओ। चेश्यहराइँ य जम्मि तयन्नसाहम्मिया चेव ॥ १११ ॥ "निवमेज" गाहा व्यारया-निनसेत ' पावसेत् तन' नगरादी श्रावक साधूना यत्र भवति । मपतन सपात-आगमनमित्यर्थ । चैत्यगृहाणि च यस्मिन , तदन्यसमानधार्मिकाश्चैव श्रावकाद्य , इति गाथार्थ ।। १११ ॥ एपविधस्थाने निवसने किं फलम् १ [इति चेदुल्यते-- १ "-वमरसत्रमाह' छ। . श्राद्ध सपा- त (१०४) हरिभरिम चा, यतस्तेषामपि यन्दनावसरे प्राक्पर्शिताभिगमाऽभिहित एय यद्वा श्रवणपात प्रागेय सत्कारयन्दनानिपश्योगोऽर्थतो दृश्य तेनाईद्विम्यविषयमेव सत्कागति । इति गायार्थ ॥ ११४ ॥ जइविस्सामणमुचियो, जोगा नयकारचितणाईनो । गिहिगमण विहिमुवण, सरण गुरुदेवयाईण ॥ ११५ ।। जइ" गाहा ज्यारया--'यतिनिश्रमण' साधूना वैया- वृत्त्यस्वाध्यायाश्रिान्ताना पुष्टकारणात्तथाविधधारकादपि देहसेदा- पनोदनमिच्छता तदपनयन परणीयमिति गम्यते, प्रास्तत्वाश श्रा म्यतेरपान्तदीर्घत्वम् । यद्वा विश्राम्यत प्रयोग इति शनन्तस्य णिचि ल्युटि च विश्रामणमिति च भवति । ' उचित ' स्वभूमि कायोग्य · योग ' व्यापार । तमेवाह-नमस्कारचिन्तनादिक, आदिश दात् परिपठितप्रकरणगुणनादिपरिग्रह । ततो 'गृहगमन' निजवेश्मगमनम् । तत्र च विधिस्वपन ' विधिना शयननिया। तमेवाह म्मरण ' मनसि धारणम , उपलक्षणत्यास्य गुणवर्ण- नादि च 'गुरुदेवतादीनाम् ' गुरुणा-धर्मदायकाना देवताना च- अर्हताम, प्रातिशब्दादन्येपा च धर्मोपचारवाणा प्रत्यारयाना- दीना च स्मरणम् । इति गाथार्थ ॥११५ ॥ - तन च- अनमे पुण विरई, मोहदुगछा सतत्तचिंता य । इत्थीकडेवराण, तविरएसु च बहुमाणो ॥ ११६ ।। "अब्बभे" गाहा व्याख्या--'अब्रह्माणि ' स्त्रीपरिभोग- - श्रायकधर्मयिधिप्रकरणम् । लक्षणे, पुन शब्दा विशेषणे, मुख्यमार्ग विशिनष्टि । तदुत्तम- "उत्सर्गनह्मचारित्वमसेवा पारिणामिकम् । अवश्य तेन कर्तव्य, दुरन्त कामविड्वर ॥१॥" इति । ' मोहजुगुप्सा' स्त्रीपरि- भोगहेतुवेदादिमोहनीयनिन्दनम् । यथा--- ." यलजनीयमतिगोप्य मदर्शनीय, वीभनमुल्वणमलाविलपूर्तिगन्धि । तद् याचतेऽगमिह कामकृमिस्तदेव, किंवा दुनोति न मनोभवनामता मा ॥१॥" इत्यादि । 'स्वतत्त्वचिन्ता च 'वीकडेवराणा वस्तुतत्त्वपर्यालो- चन वा योपिदङ्गानाम । तदुत्तम-" का श्री प्रोण्यामजन श्रव दुदरदरीपूतिसान्द्रद्रनाया ?, का शोभा भूरिमासोद्भनगदुषु निषा तोन्मुसेषु म्तनेषु ' । का वा लीला सुलीलाचलितजललवालोल- केप्वीक्षणेषु ?, स्त्रीण किं चास्ति रम्य वदत बुधजना सति विदध्म ॥१॥ शुक्रशोणितसभूत, नरच्छिद्र मलोल्वरणम। अस्थिसलिकामान, हन्त योपिच्छरीरकम् ॥ २ ॥ " इत्यादि । ' सद्विरतेपु च ' अब्रह्मविरतेषु च रतिषु बहुमान -अन्तरङ्गप्रीति- रूप | यथोक्तम्-" तीरात्तीरमुपैति रौति फरुण चिन्ता समा- लम्यते, किंचिद् ध्यायति निश्चलेन मनसा योगीन युवेक्षण । स्वा छायामवलोक्य पूजति पुन कान्तेति मुग्ध सगो, धन्यान्ते भुवि ये निवृत्तमदना धिग्दु सिता कामिन ॥१॥ तणमथारनिस- एणो, वि मुणिवरो भट्ठगगमयमोहो । ज पावह मुत्तिसुह, कत्तो त चावट्टी वि ॥२॥ ज विसयविरचाण, मोक्स सज्झायमावि- यमईण | त मुणइ मुणिवरो चिय, अणुहवओ न उण अएणो ति ॥२॥" इत्यादि । इति गाथार्थ ॥ ११६ ॥ यन । (१०६) हरिभद्रसूरिसंहब्ध मुत्तविउद्धस्स पुणो, सुहुमपयत्थेसु चित्तविभासो । भवठिइनिरूवणे चा, अहिंगरणोवसमचित्ते वा ॥ ११७ ॥ सुत्त " गाहा व्याख्या--'सुप्तविबुद्धम्य पुन 'निद्रा. पगमेन जाप्रतस्तु श्रावस्य 'सूक्ष्मपदार्थेषु ' कर्मात्मपरिणामादिषु 'चित्तविन्यास 'मानसावेशन करणीय इति गम्यते । ' भवस्थि- तिनिरूपणे ' ससारसभवद्भावपर्यालोचने चित्तविन्यास इति प्रक- तम् । यथोक्तम्--" पिता दासो दासो भवति जनको बन्धुरहितो, रिपुर्वन्धुर्माता भवति दुहिता साऽपि जननी । अनिष्ट स्थादिष्ट परिणमति शर्माऽसुसतया, जनो धिक् ससारे सदपि रमति नो विर- मति ॥ १॥" इत्यादि । वाशब्द पूर्वापेक्षया पक्षान्तरद्योतक । । अधिकरणोपशमचित्ते वा' प्रवृत्तफलहक्षामणापर्यालोचने वा, कृप्यादीनि वाधिकरणानि । शेष सुगमम् । इति गाथार्थ ॥११७॥ तथा- " आउय पाउयपरिहाणीए, असमजसचेट्ठियाण व विवागे । खणलाभदीवणाए, धम्मगुणेसु च विविहेसु ॥१०॥ गाहा व्याख्या-'आयु परिहाणौ ' प्रतिक्ष- वायुमक्षयलक्षणाया चित्तन्यास इति योग । यगोक्तम्---"प्रा- युरपूर्षापूर्व, पूर्वोपात्तरपातमिदमनिशम् । क्षपतितरा सीवातप- परिशोपितशेषमम्भ इव ॥ १॥ अविहतगति समन्तात् , प्रति- दिनमासनता समभ्योति । मृत्युस्वथापि जानन , विश्रब्ध स्वपि- पि रजनीपु ॥ २ ॥" इत्यादि । 'असमञ्जसचेष्टिताना वा विपा- के ' इति असदाचरिताना-प्राणिवधादीनाम् , वा शब्द प्राग्वत्, , , आषधविधिप्रकरणम्। विपाके नरकादिद्वारेण फलदायकत्वे चित्तन्यास इति प्रतिपदमस्य योग । यथोक्तम्- यहमारणभन्भक्साणदाणपरधणविलोवणा- ईण | सव्वजहएणो उत्ओ, दसगुणिो इक्वसिकयाण ॥ १ ॥ तिव्ययरे 3 पोसे, सयगुणिमो सयसहस्मकोडीगुणो। कोडा- कोडिगुणो वा, हुन्न विवागो बहुतरो वा ॥२॥" 'क्षणलाभदीप- नाया' क्षणे-कालविशेपे स्तोकेऽपि काले इत्यर्थ , लामस्य-कर्मनि- जेरापुण्योपार्जनार्दीपना-प्रकाशना क्षणलामदीपना तस्याम् । यथोक्तम्--"ज अएणणी कम्म, सवेइ बहुश्राहिं वासकोडीहिं । तणाणी तिहि गुत्तो, गवेइ उसासमित्तेण ।। १ ।। जह चिरस- चित्रमिंधणमनलो परणसहिओ दुअ डहाइ । तह कम्भिधणममि- अ, गणेण झाणानलो इइ ॥ २॥" तथा---"नरएसु सुरवरे- मु अ, जो वधइ सागरोवम एक । पलिबोरमाण बघइ, कोडिस. हस्साणि दिवसेण ॥ १ ॥ एस कमो नरएमु नि, बुहेण नाऊरण नाम एश्र पि । धम्मम्मि कह पमाश्रो, निमेसमित्त पि यायव्बो ? ॥ २॥" 'धर्मगुणेषु च विविधेषु' धर्मगुणेपु-जानादिगुरणेविह- लोकपरलोकार्यसाधनेषु विविधेषु-बहुविधेषु । यथोच-" जीव तस्म इह जसो, रित्ती य मयस्स परभवे धम्मो । सगुणस्स नि ग्गुणम्स य, अयमोऽकिती अहम्मो अ॥ १ ॥ र्जितमदमदनाना, वाकायमनोविकाररहितानाम । विनिवृत्तपराशा- नामिहेव मोन सुविहितानाम् ॥ १ ॥ स्वशरीरेऽपि न रज्यति, शत्रावपि न प्रदोपमुपयाति । रोगजरामरणभयेरख्यथितो य नित्यमुखी ॥ २॥” इत्यादि । इति गाथार्थ ॥ ११८ ॥ तथा--" स (१०८) हरिभद्रपूरिसइब्ध तथा--- वाहग पाहगदोसविपक्खो धम्मायरिए य उज्जुयविहारे । एमाइपित्तनासो, सवेगरसायण देह ॥ ११६ ।। गाहा व्यारया-वाधकदोषा-अर्थोपार्जना नुरागात्यो ये यस्याभ्यवसायकालुप्यहेतव स तद्विपक्षे-त-पगमहे- तो चित्तन्यास विदध्यादिति योजना । यदुक्तम्-" ओ जेण वाहिजइ, दोसण येणाइविसरण । मो खलु तस्स विपक्रत, तब्धिसय घेय भावेजा ॥ १ ॥ अत्यम्मि रागभारे, तस्सेव उ अ जणाइसकेस । भावेज धम्महेर, अभावमो तह य तस्मेव ॥ २॥ दोमम्मि य सयमेत्त, माइताई य मव्यजीवाण | मोहम्मि अहाथूर, वत्थुसहाव सुपणिहाण || ३ ॥ ' इत्यादि । धर्माचार्ये' धर्म दानरि गुरावित्यथ । यथोक्तम्-- इच्छे वेयावडिप, गुरुमाईण महागणुभावाण । जेसि पभावणेय, पत्त तह पालिश्व चेव ॥ १ ॥ तेसि नमो तेसि नमो, भावेण पुणो वि चेव तेसि नमो | अणुव- फ्यपरहियरया, जे ण्य देनि जीवाण ॥ ॥" इत्यादि । ' उद्य तविहारे' अप्रतिवद्धमासक्त्पादिविहारे साधुगत इति गम्यते, घ मर्माचार्यविशेषण या| यथोक्तम-"विधा शुद्ध भैक्ष जलमपि मित प्रामुस्तम, मले लिन गान यसनमसदेवावृतिकरम् । अमू रित्तित्व पचिदपि शम कोऽपि मनमा, नमस्याम साधूश्वरित मिति येषामभिमनम् ॥१॥ एव च चित्तविन्यास फलनिर्देशद्वा- रेण निगमयति---'एवमादिचिनन्यास एवप्रकारमन्यदप्यात्म प्रमादी दादिचि तनम । यथोक्तम--"शिवशर्ममूलमेक, दुरापमा- । .
- श्रावधर्मविधिमारणम् । सोऽसि जीव | जिनधर्मम् । तादि मपदि तदिन्यमि, नोयन्छ- सि किमिति तन बराम् ? ॥ १ ॥ इत्यादि 1 किम् ? 'सवेगर- मायन ' मवेग -ससारनिर्वदो मोनानुरागो या रसायन-अमृत निर्वृतिहेतुत्वात्सवेगरमायन तद् 'दनाति ' प्रयच्छति, चिन्तने हि सवेग उत्पद्यते । इति गाथार्थ' | ११६॥ तत - विधि, - यथा- गोसे मणिमो य विही, इय श्रणवरय तु चिट्ठमाणस्स । भवविरहवीयभूत्रो, जायड चारित्तपरिणामो ॥ १२० ॥ गोसे" गाहा व्यारया- गोसे' प्रत्युपसि भणितश्च निधि , चशब्दस्य एवकारार्थत्वात प्रत्युपमि प्रामप्रतिपादित एव "नरकारेण विनोदो ' इत्यादिक । एव च प्रति- दिनानुष्ठान फलप्रदर्शनद्वारेण निगमयनि-' इति ' प्रागुक्तप्रका- रेण 'अनवरत ' सन्तत ' चेष्टमानस्य' प्रदर्शितमनुष्ठान विदध- त श्रावस्येति गम्यम् । किं भपति ? ' भवनिरवीजभूत ' मारवियोगकारणकल्प जायते' मपाते चारित्रपरिणाम मर्व- विरतिपरिणतिरिति योऽर्थ । एव हि देशविरतिमभ्यस्यते, उपायप्र. वृत्तेरवश्य भवनिरहवीजभूतश्चारित्रपरिणामस्तवान्यत्र वा भवे भवे- दिति हृदयम् । इह च " विरह " इति सिताम्वरश्रीहरिभद्राचार्य- स्य कवेरङ्क । इति गाथार्थ ॥ १० ॥ एव श्रीहरिमद्रमूरिरचिते तन्नेऽत्र वृत्ति मया, प्राय पूर्वनिरवृत्तिवशतो दिड्मानरूपामिमाम् । - .
हारभद्रसूरिसहरुध शक्या नाम रियध्नता यदविध किञ्चिनिवद्ध भवेत् , तत् सिद्धान्तविचक्षणे क्षमिजने क्षम्य विशोध्य तथा ॥१॥ इति विहितपतोचैर्वृत्तिमेता स्वशक्त्या, यदभिमतसमीहापूरि पुण्य मयाऽऽसम् | तदुदितशुभमक्या धर्ममेवेति भव्या ', विदधतु यतिभक्ता साधुसन्मानदेवा ॥२॥ इति श्रीमानदेवसूरिविरचिता श्रारमधर्मविधिप्रकरणस्य वृत्ति परिसमाप्तेति ॥ मन्थाममुद्देशतोऽनुष्टुप्परिकल्पनया पश्चदशशतानि पइविंशत्यु- तराणि अक्षतोऽपि १५२६ ।। ૨ 000000000 ॥ समाप्तमिद सत्तिक भाकधर्मविधिप्रकरणम् ।। 0000000003 100000008 'चतुर्दश' अ। २०१४२६ ' ।
श्रात्मानन्दग्रन्यरत्नमालायामयावधिमुद्रिवाना ग्रन्थानां सूची. १ समवमरणास्तर २ मुकमवप्रकरणम् ३ लोकनालिका ४ योनिस्तव ५ कालसप्ततिका ६ देइस्थितिम्तयो लघ्वल्पबहुत्य च ७ सिद्धदण्डिका ८ कायस्थितिम्तव भावप्रकरणम् १० नवतावप्रकरण ( भाग्यविनिम मलकतम् ) ११ विचारपचाशिका १२ बन्धपििशका १३ परमाणु-युगल-निगादघर्विशिरा १४ धावपतमगप्रकरणम् १५ दवा दनादिभाप्यत्रयम् १६ सिद्धपश्चाशिका १७ मनायउन्छकुलपम् १८ विचारसप्ततिका १६ अल्पवदुत्वर्मिनवीरस्तवनादि २० पञ्चसूत्रम् २१ जम्बूस्वामिचरितम् २२ रत्नपालनृपयानकम् २३ सूतरत्नावली २४ मेघदनसमस्यालेस २५ चतादूतम् २६ प्रवाहिकाव्याल्यानम् २७ चम्पकमालाकथानकम् ०८ सम्यक्त्यकौमुदी २६. श्रादगुणपिचरणम् ३० धर्मरत्नप्ररण (स्वोपइटीकया समलातम्) ३१ पल्पसूत्र सुवाधिकानाम्न्या टीक या भूषितम्) ३२ उत्तराध्ययनम् (भानविजयगणि विरचितटीक्योपेतम् ) ३३ उपदेशमप्ततिका ३४ कुमारपालप्रबन्ध ३५ आचारोपदश ३६ रोहिण्यशोरचन्द्रस्था ३७ ज्ञानसागटा (सानमपरीनाम्न्या क्या समरानम् ३८ गुरुगुणपत्पित्रिशिकाकुलक (दिपिकया भूपितम् ) ३९ समयसारप्रकरया सदाकम् ४० मुक्तसागरम् ४१ धम्मिलकथा ४२ धन्यकथानकम् ४३ प्रतिमाशतकम् ४४ चतुर्विंशतिस्तुतिसग्रह ४५ रोहिणेयकथा १६ क्षेत्रसमासप्रकरण (स्त्रोपटीक या भूषितम् ।) ४७ प्राविधि (विधिकोमुदीनाम्न्या वृश्योपत) ८८ वृहत्सग्रहणी ४९ पग्दर्शनसमुच्चय ५० पश्चमग्रह ५१ सुकृतसकीर्तनमहाकाव्यम् ५२ चत्वार प्राचानकर्मग्रन्था ५३ सम्याघसनाति ५० बुवलयमाला क्या-सम्कृत ५५ सामाचारीप्रकरण । म्वापारीक या भूषितम् ) ५६ करणावमायुधनाटकम् । ५७ कुमारपालचरित्रमहाकाव्यम् ५८ महागीरचारिय ५९ कौमुदीनिनाण दनाटकम् ६. प्रमुख निणयम् ६१ धमाभ्युदयम् ६२ पञ्चनिग्रन्थीमापनानृत्तीयपदसम्र इणीप्रसरण ६३ रयणमहरीम्हा ६४ सिद्धप्रामृतम् ६६ दानप्रदीपम् ६६ बघहेतूदयविभीमादि ६७ धर्मपरीक्षा ६८ समतिशतस्थानकम् ६६ चैत्यवदनमहाभाध्यम ७० प्रश्नपद्धति ७१ कल्पकिरणावटी ७२ योगदर्शनम् ७३ मडरप्रकरणम् ७४ दवन्दनरकन्द्र मरीयम् ७. मुमुग्वनृपादिग्थानकन् ७६ धारक्षमविधि मगर ७७ मेघदत मटीकम् ७८ गुप्तत्त्वमिनिश्चय सटीक छपायेला परचुरण सस्कृत ग्रंथ १ मस्जयादशीक्षा २ मुमचरितम् ३ मुदशनाचरित्रम् (प्रथम भाग) ४ रपमरी ५ नमतरियाविधि ६ मामास्यक्रियासूत्राणि ७ नलदमय याभ्यानम् ८ अनुत्तरोपपातिरदशासूत्रे -Rak---
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